Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Vivah Pragyapti (bhagvati) 1 Va Shatak
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स्व. राजा बहादुर लाला सुखदेव सहायजी, जौहरी
जैन स्थम्भ दानवीर
En
९.९९८५६:४:४४४३५६८६६८०५६
on
40
FREE जैन शास्त्रोद्धार मुद्रालय, सिकंदराबाद, (दक्षिण.)
अमूल्य शास दानदाता
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लारा पालाप्रसादजी. जौहरी,
जैन मभावक धर्म धूरंधर
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*987 पंचाङ्ग विवाह ज्ञप्ति ( भगवती) सूत्र * श्री भगवती सूत्र की प्रस्तावना श्लोक-सर्वज्ञ मीश्वर मनंत मसंग मग्रं, सर्वाय मस्यरनीस मनीहसत्यम् । शिवं शिवं शिवकरं व्यपेतं, श्रीमाजिनं जितरिपुप्रयतप्रणामि ॥ १ ॥ अर्थ-प्रथम इष्टार्थ की सिद्धि के लिये मंगलाचरण करते हैं. तीनों लोक के ईश्वर, अंत रहित सुख के भोक्ता, कर्म काया के संग रहित, सर्व लोकान में रहे, अथवा सब के अग्रेश्वर, कंदर्प रहित, किसी के स्वामित्व रहित, स्नेह रहित, सकलार्थ की सिद्धि कर सिद्ध हुए. कमाँ के उपद्रव रहित, सिद्ध स्थान में संस्थित, अन्य आत्माओं के कल्याणकारी. उपद्रव के हर्ता, अपरम्पार गुणों के धारक, अनि- न्द्रिय अतीव सुख में सदैव लीन, अष्टकर्म रूप महाशबुओं के पराभव करने वाले ऐसे जिनेन्द्र भगवान को यथाविधी सविनय यथा युक्तनमस्कार करता हुँ. देव देवं जिनं नत्वा, नत्वा च श्रुतदेवतम्। वार्तिकं पंचममंगस्य, वक्षे वृत्यानुसारता॥१॥ अर्थात्-देवाधि देव श्री जिनेश्वर भगवान को और श्रुत देवता, श्रुत शान के दाता गुरु महाराज को नमस्कार कर के पंचमांगे श्री विवाह प्रज्ञप्ति ( भगवती) सूत्र का हिन्दी भाषानुवाद मेरी अल्पपत्यानुसार कहूंगा. प्रथम के चारो अंगों में चार अनुयोग का चयन भिन्न २ वहा और इस मूत्र में चारोअनुयोगों का पंथन किया गया है इस का नाम विव.इप्ति इस हाये मरिद्ध हुवा - प्रस्तावना १
अर्थ
* अनुवादक बाल प्रमचारी मुनि श्री अलक प्रापिनी
कि इस में नाना प्रकार के जीगानीगादि का नाम मीना मा int.
२ तीर्थकगें ने गणपणे को करी, गणपगेने भाजापादित. भामापदिनों को सौ.
यों पूर्व परंपरा से विविध पदा पुरुषोंगे तो भगा गोगा lifittari.
अर्य का प्रवाह और नयों का प्रभार निगम nिti
एक स्थान में समावेश ने गे गिर नि. : निम mintam Air का
की सामग्री पीलाना है उस सरार इसमें भी सिपाहिमानी !
गया है. इसलिंग इस शिर मान पर मा ₹. या सर्व
कहते हैं. सो मी माननीय, संपूरपोप गरि र xist.
म विवाह मशति (भगरनी ) गुप से जिन्न हो गया है जिसकी गति
लीला करके लोगों के मन को प्रपादन करना है मेरोमा
और इस का सम्पम मकार मापन गोगों पर निग, . in र
दस्ती गुल गुलाट शन्द करना है.
अगर minity Er..
गहन, गंभीर, साध्यापादि का गप रोका जमेमो मग पाल दुर को
ही यह मूत्र भी निंग, सपन भनि भाई कमलादरीपाद राम जिन
प्रकार चकरी रस्ती देवापिष्टित रामागे होपरा भी समानांतर बनेका
#NEERITERRIf antt.
१०
298 पंचमांग विवाह पण्णत्ती (भगवती) सूत्र * चांदी परपाल वगैरह के भूपणों सहित भूपित होता है वैसे ही यह सूत्र भी उद्देशे, हेतु, कारन रूप भूपणों से भूपित है. ६ जिस प्रकार हाथी सव में बड़ा जानवर है वैसे ही यह सूत्र भी ३६००० प्रश्नोत्तर से बहुत बड़ा है, ७ जैसे हाथी के चार पांव होते हैं वैसे ही इस सूत्र रूप हाथी के ? चरण करणानुयोग, २ द्रव्यानुयोग, ३ धर्मकथानुयोग और ४ गणितानुयोग यों चार अनुयोग रूप चार पांव जैसे हाथी के दो आंखों होती है, वैसे ही इस सूत्र रूप हाथी के ज्ञान व चारित्र रूप दो आंखें हैं. ९ जैसे हाथी के दो दंताशूल होते हैं, वैसे ही इस सूत्र रूप हाथी के द्रव्यास्तिक व पर्यायास्ति नय रूप दो दंताशूल हैं. १० जैसे हाथी के दो कुंभस्थल होते हैं वैसे ही इस मूत्र रूप हाथी के निश्चय व व्यवहार नय रूप दो कुंभस्थल हैं. ११ जैसे हाथी के सूंड होती है वैसे ही इस मूत्र रूप दाथी के प्रशस्त वचन की रचना रूप मूंडादंड है, १३ निगम वचन रूप छोटी पुंछ है, १४ काल आदि पांच समवाय और आठ प्रवचन माता के रूप आवरणादि उपकरण है, १५ उत्सर्ग व अपवाद मार्ग रूप दो घंटा है, १६ यशारूप पडद्द का अवाज चारों दिशा में विस्तृत है, १७ सूत्र रूप हाथी के महापीर स्वामीजी रूप राजा हैं, १८ इस सूत्र रूप गज पर आरूढ होने वाला ३६३ पाखंडियों का पराभव करता है, १९ यह सूत्र रूप हाथी अनेक प्रश्नों के उचर रूप तथा पांच ज्ञान रूप शस्त्र सहित सज्ज है, २० यह सूत्र रूप हाथी उपांग रूप चतुरंगिनी सेना सहित चतुर्गति का निकंदन करता है २१ चक्रवर्ती के हाथी के चारों और १४ रत्न होते हैं वैसे ही इस सूत्र रूप हाथी के च उदह पूर्व के अंगोपांग रूप 298 प्रस्तावना 888 सूत्र 5. अनुवादक बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक पिजी 87 रत्न है, विविध प्रकार के समीम के मपुर में पिरपान माना . 3 कोटी ने वाला श्री महावीर महाराना के बल से पुक्त परमी? • श्लोक-या पाशत् सहस्त्रन्प्रति विधि, नुविभाग in भिमाको? प्रधपति परितः अगि मुगलानाम् मा नया गाना गाता विवाह प्रज्ञप्ति । पंचमा जति मगरणी मा मिना ! पारा सिह प्राति पर नाम माती. मीरा RT AUR TERE गूढार्थ वाला है. इसमें ....... RT TRA समुद्र का गृह भेद मय रत्नों का देि के पEnो को हो । माप्त कर सकते हैं. ऐगा या मातीमा काउii. इस भगवती गूप का अनुवाद पुष्पा में पानी का परदा की छपाइ हुइ मनपर मे भार परदा iiiii श्री नागचंद्रगी महाराज के तार में एक साथी र सी" सायमें रख कर किया है. गमती मीनागासामीनीxin हिन्दी अर्थवादी मन पोर एलसी पासीमा nirat ॥ ॥ शक्ति व यथामति प्राप्त किया गया दिनमा तान अर्थ मsar विवाह प्रज्ञप्ति ( भगवती ) मूल की विषयानुक्रमणिका. प्रथम शतक का प्रथमादेश .५२ १५ अत्रतिजीव देवता होवे १६ वागण्यन्तर देवता के सुख ।। प्रथम शतक का द्वितीयोहेश ....५७ aag पंचमांग विवाह प्रज्ञप्ति ( भगवती) सूत्र APRIYA नवकारयंत्र, नमो बंभीए लिबीए प्रश्नों के नाम .२ ३ सूत्रारंभ. नगरादि अधिकार ४ भगवंत महावीर स्वामी के गुण-नमोत्थुणं...५ गौतम स्वामीजी के गुणाणुवाद ६ संशयोपत्ति मन पृच्छा ७चलमाणे चल आदि ९ प्रश्नोत्तर । ...१२ ८ नरकविकार. आहार के ६३ भांगे वगैरा....६ ६ असुरकुमारादि भुवनपति अधिकार - १० पृथ्वीकायादि स्थावरों का अधिकार ...३१ ११ बैंन्द्रियादि शेप देड के अधिकार १२ जीय आत्मारंभी आदि प्रश्नोत्तर ।। १३ ज्ञान इस भव का के पर भव का ...४८ १४ असंवुड संयुड अणगार ..१० १७जीव स्वतं कृत दुःख को वेदता है ..५७ १८नरक के जीव सव समाहारी हैं क्या.१५९ १९नरक के जीव सब समकर्मी हैं क्या ?...६१. २०नरक के जीव सब समोत्पत्ती है क्या ? २१नरक के जीव सब समलेशी हैं क्या ? ...६३ २२नरक के जीव सब सम वेदनावाले हैं क्या?.६४ २३नरक के जीव सब सम क्रियावाले है क्या?६५ २४नरक के जीव सबसग आयुष्य वाले क्या?.६० २५नरक के प्रश्न जैसे चौवीसही दंडक पर मन.१७ २६ लेण्या आश्रिय प्रश्नोत्तर. 4-28-388 विषयानुक्रम 9822 .७५
सूत्र
१ अनुपादक बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 85
रत्न है, विविध प्रकार के समाग के ममुर मे रिपार मान मरों ..म
पर
ने वाला श्री महावीर माराना के पल में पुक परपी?
• श्लोक-या पात्रंशत् सहलन्प्रति विधि, मजुषांविधान प्रभागा ना?
प्रथयति परितः श्रगि मुगलानाम् II राना समानामा
विवाह प्रजाति । नमाजपति भगती मा नि !
पांचवा विमाह प्राप्ति पर नापती. मात्र मार..
गूढार्थ वाश है. इस में ? E!... : EKTElm
समुद्र का गूर, भेद कप रत्नों पियर यदि के पानी को गानो
माप्त कर सकते हैं. ऐमा पर मगनी महाउl.
इम भगवनी मृग का गुराद गुप्या में गोमा in Taitti
छपाइ हुइ मनपर मे भोर सादर <iiउगी sit
श्री नागचंद्रगी महागन के नाम ए. पं. र. १. ३ ॥
साथ रख कर किया है. गमेरी भीनाममामी 2012
हिन्दी अर्थवादी मन मोर पसीपीnimit 31
शक्ति च यथामति प्रयास किया गया दिरहम द हे
BAERRIER REpis
अर्थ
BAAT
पंचमांग-विवाह प्रज्ञप्ति (भगवती ) मूत्र 3808 ४९. लोक अलोक द्वीप समुद्र की स्पर्शना.) १४८ ५० जीव प्राणातिपातकी क्रिया करे ?..१४९ ५१ रोहा अनगार के प्रश्नोत्तर-लोक अलोक, V जीव कर्म भव्याभव्यक सिद्धासिद्ध, मूर्गा अंडादि पहिले पीछे कौन?v..१४९ ५२ गौतम स्वामी के प्रश्नोत्तर लोक की स्थिति. १६० ५३ लोक किस आधार से रहा दृष्टांत ४.१६१ ५४ जीय पुद्गल परस्पर मिले क्या. ? ...१६३ ५५ सदैव सूक्ष्म पानी की वर्षाद प्रथम शतकका सातवा उद्देश. १६६ ५६ नेरीया-देशसे-उत्पन्न आहार-उद्धर्त. अधा उत्पन्न के प्रश्नोत्तर ...१३६ ५७ विग्रहगति के प्रश्नोत्तर ...१७२ ५८ देव-मनुष्य के आहार की दुर्गछा करे व मनुष्य नीर्यचका आयुप्य वेदे ...१७३ ५१ गई उत्पत्ति आश्रिय प्रश्नोचरों ...१७४ ६० माता पिता के अंग व स्थिति. v ६५ गर्भ का जीव नरक में भी जावे...१८२ ६२ गर्भ का जीव देवलोक में भी जावे...१-४, ६३ गर्भ वृद्धिका व सूती का कथन ...१८६ प्रथम शतक का आठवा उद्देशा. १९० ६४ एकांत पाल मनुष्य किस का आयुप्य करे ९० ६५एकात पंडित मनुष्य किस का आयुप्य करे. १९१ वश्वाल पंडित मनुष्य किस का आयुप्य करे१९२ ६७ मृग वधक मनुष्य को कितनी क्रिया. १९४ ६८ आनिकाय प्रज्वलित कर्ता को कितनी क्रिया ६९ पुनः मृगमारने वाले की क्रिया ...२०० ७० मृगवधक को पुरुषमारे दोनोंकी क्रिया. २०१ ७१ पुरुषमारने वाले को कितनी क्रिया. २०३ ७२ दोनों समान मनुष्य में जय पराजय ...२०४ ७३ सवीर्य अवीर्य का प्रश्नोत्तर ...२०६ प्रथम शतक का नववा उद्देशा. २१० ७४ जीव गुरुलघु किस प्रकार होता है .,.२१. १.3%88 विषयानुक्रमणिका - १८० ।
AR 1 .८८ अनुवादक बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी १२७ संचिठन काल आश्रिय प्रशोचर को मनानीको २८ अमंयति आदि बारे प्रकार के जीवों १.कसान भपिशानी देवलोक में उत्पन्न होने के प्रमोगर .. ८२ प्रया द्वारा हा. २९ असड़ी के आयुष्य किनने प्रकार के? .... नाना प्रथम शतक का तृतीयादेश गुमा मुन ३० कक्षिमोहनीय कर्म के प्रमोगर लोपमेपोतियार ३१ आराधक जीनों के नाम मनो ३२ पुनकासामोहनीय के प्रश्नोतर नागHिT ३३ साधु के भी कक्षामोहनी पंश रोना है, ३.२ २. मोरा नारी-isirias. प्रथम शतक का पीया उद्देशा....१.६ याना ३४ कर्म प्रकृति तया मोहनीय कर्म ...। र मागे ३५ अपक्रमन के मनोत्तर 2011 को पानी मागे." ३६ कर्म भोगने पिना मोक्षनरी ११. ३७ पुल भाधिगमोरार प्रादे ३८ जीप के नीछा २८ ? प्रा. . Stan.IrAIR RETRIEEEEE GYO .३८५१ ॐ पंचमांग-विवाह प्रज्ञप्ति [भगवती ] सूत्र 8882 २००. मनुष्य के बीन की स्थिति १०१ एक जीव के पिता पुत्र की संख्या ...३३२ १०२ मैथुन सेवन में महा हिंसा ..३३४ १०३ तुगीया नगरी के श्रावक का वर्णन व स्थविरों से धर्म ची, महावीर स्वामी की सम्मती १०४ द्रहका उप्णपानी का प्रश्नोत्तर द्वितीय शतक का छट्ठा उद्देशा. ३६४ १०५ ओहारणी भाषा के प्रश्नोत्तर ...३६४ द्वितीय शतक का सातवा उद्देशा ३६५ १०६ देवताओं का कथन द्वितीय शतक का आठवा उद्देशा ३६७ १०७ असुरेन्द्र की सौध सभा द्वितीय शतक का नववा उदेशा ३६८ 90 १.०८ समय क्षेत्र [ अढाइ द्वीप ] का V...३७४ द्वितीय शतक का दशवा उद्देशा ३७५ १०१ आस्तिकाया का अधिकार ...३७२/ ११० जीव के उत्थानादि गुन ...३८३' १११ आकाश के प्रकार ११२ आकास्तिकाय की स्पर्शना ...३८८१ ३ तृतिय शतक का प्रथमोहेश ११.३ चमरेन्द्र की ऋद्धि ..३९४ ११४ चमरेन्द्र के सामानीक देव की दि.३९९ ११५ चमरेन्द्र के वात्रिंशक देव की ऋद्धि-४०१ ११६ वरेन्द्र की द्धि ...४०० ११७ धरणेन्द्र की प्रद्धि ...४०८ ११८ वाणव्यन्तर ज्योतिपी इन्द्रकी ऋद्धि...४१० ११९ शकेन्द्र की द्धि ७ ४१.१ १२० तिप्यगुप्त अनगार, समानिक देव हु.४१.३ २२१ इशान इन्द्र की ऋद्धि । ...४१७ १२२ गुरुदत्त अणगार-कामानिक देव ....४१८ १२३ सनत्कुमारादि सब इन्द्र की ऋद्धि ३.४२० १२४ ईशानेन्द्र का पूर्वभव-तामली तापस. ७४२५ 388 विपयाणुक्रमणिका 8 V 60 .
* अनुवादक बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी
७५ आकार का गुमर रगत
६. anौर के म
७६ नौवीम दंड का गुरूव लगत्त
? वाम ITI Ran..
७७ पडल्य का रूप लाख
१४८ लेक्श, हैप्टी. दर्शन. वान,मानोगादि.
७१ अच्छे सारे लाग
...२८
. मात्र
८. एक समय में दो आयात
1. नाम
८१. कालानी यार के सापति के
दिलीममा ३११
मन्नानर,
८२ मा प्रति एक मीहिपान. "
८३ आषांसाहार नर्म रगत.
दिनापा ?
शाक पाहा कार्य गिरा....३५
८५ अस्थिर पदार्ग का परदादा.
रिसर
प्रथम शतक कापाया जा २३८
८६ अन्यनीयिक को नयमान भगशिश.२.८
८७ एक
जीप में दीरिया को २०
२ हिनीय गतक का प्रामादिगा २११ २initisati
or RATri
.
७ 86032 पंचमांग विवाह प्रज्ञप्ति (भगवती) सूत्र Br उत्पन्न होवे. तृतीय शतक का दशवा उद्देश. ५९० पांचवे शतक का दुसरा उद्देशा ६२० १४१ चोसट इन्द्रों की परिपद का । १९८ वायुकाय आश्रिय प्रश्नोत्तर ...६२१ चतुर्थ शतक के चार उद्देशे ५९३ १५९ धान्य धातू हड्डीचर्म कोयले राख गोवर १५. ईशानेन्द्र के चारों लोकपाल ....५१३ इन के शरीर का प्रश्नोत्तर ...६२५ चतुर्थ शतक के चार उद्देशे ५९६ १६० लवण समुद्र का प्रमाण ...६२९ १५१ चारों लोकपालकी राज्यधानी के .५९६ पंचवे शतक का तीसरा उद्देशा ६३० चतुर्थ शतक का नववा उद्देशा ५९७ १६.. एक समय में दो भव का आयुष्यवेदे ३३० १५२ नेरीयों के उत्पन्न होने का १६२ जीव पर भव में आयुष्य सहित ...५९७ चतुर्थ शतक का दशवा उद्देशा ५९८ पांचवा शतक का चौथा उद्देशा ६३६ १५१ परस्पर लेश्या परिणमनेका ...५९८ १६३ छद्मस्त सुने केवली शब्द जाने देख ६३६ पांचवा शतक का पहिला उद्देशा ६०१ १६४ छद्मस्त इसे केवली इसे नहीं ...६४० १५४ जम्बुद्वीप में सूर्य का चारों दिशा में उदय,६०१ १६५ हंसने से कर्म वन्ध होता है ..६४१ १५५ दिन रात्रि का प्रमाण ...६०५ १६६ छमस्त निद्रा ले केवली नहीं ...६४२ १५६ जवूदीए के क्षत्रों में ऋतु आदि प्रमाण ६१० १६० निद्रालेने से कर्म बंध होता है. .६४३ १५७ लवण समुद्र, धातकी खंडद्दीप, कालोदी १६७ हरि गमेपी देव गर्भ का संहरण करे ६४४ समुद्र, पुष्कराधद्वीप सूर्योदय का कथन६.६४/ १६८ एवंतणकुमार साधु पातरी तिराई ...६४६ - विषयाणुक्रमणिका 4982- अनुवादक बाळ ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक पिाजी १२५ सौधर्म ईशान देवना का विपर.. तृतिय गणका गौमा " १२६ सौधर्मेन्द्र शानेन्द्र का मिलाप ....४.८ TARR १२७ उक्त दोनों इन्द्रों का प्रगटा. मनका १० पासपा , .. पारेन्द्र समजावे,सनत्कुपारेद्र का पूभिर 1 :मको मिति २ri" तृतिय शतक का दूसर। उरेश ४६५ १.२ मा TRYीका र १२८ अमुरकुमार का निरासार १० मा सोना १२१ अमुरकुमार का नीनों दिशा में गगन... गनियन का मोदक १३. वैमानिक देव चोरी करने..... १३. अमुरकुमार का साप मार्ग में गान. पुनःगा पायो १३२ अमुरकुमार का मन नामकीनाम 37 गनिप कार का .:५५ १३३ सौधर्मेन्द्र अमरेन्द्र मास की गति ...in 4 ३. तृतिय शतक का तीसरा उदेन ५० राई र १३४ मंडीपुत्र सार के क्रिया के मोगर ५१७ नातिय पर काम १३५ साधु को भी किया नानी । पामेंगे ! १३. सायोगी सक्रिय भन्नभिगानी गरे.. TET HERE: १३७ योगनिया मनाकिया सरेशान...५२४ ११३८ लवण समुद्री मानी पाने का स... मानो वानि. . yo 4+ ७४३ * पंचमांङ्ग विवाह शमप्ति ( भगवती) सूत्र 880 १९४ प्रमाणु व स्कन्धो की स्थिति ७०१ २०७ देवलोक कितने कहे हैं। ૩૪૨ १९५ प्रमाणु स्कंधों का अंतर काल ७.४ पांचवा शतक का दशवा उद्देशा....७४३ १९६ ममाणु स्कंधों की अल्पा बहुत्व ७०६ २०८ चन्द्रमा देव का निवास स्थान । १९७ चौवीस ही दंडक का आरंभ परिग्रह ७०७ ६छटे शतक का-प्रथमोदेशा ....७४४ १९८ पांच प्रकार के हेतूओं ७१३ २०१ महा वेदना महा निर्जरा आदि दृष्टांतो७४४ पांचवा शतक का-आठवा उद्देशा ७९५ २१० करण का कथन ७५० १९९ नारदपुत्र निम्रन्थ पुत्र साधु की पुद्गली २११ वेदना निर्जरा की चौभंगी चर्चा, २०० जीवादि की हानी वृद्धी अवस्थितता ७२२ छटे शतक का-दूसरा उद्देशा. ७५६ २०१ सोवचय सावचय के प्रश्नोतर २१२ आहार अधिकार ७२८ पांचवा शतकका नववा उद्देशा ....७३१ छट्टे शतक का-तीसरा उद्देशा. ७५७ २०२ राजगृही पृथव्यादि किसे कहना ? । २१३ वस्त्र का और कर्म का दृष्टांतिक संबंध७५७ ७३१ २०३ दिन का उद्योत रानि का अन्धकार ७३२ २१४ कर्म बंध के स्थिति आदि १६ द्वारों. ७६७ २७ ४ चौवीस ही दंडक में उन्नोत अंधकार ७३४ छट्टे शतक का-चौथा उद्देशा. २०५ मनुष्य लोक सिवाय काल गमाण कहीं २१५ जीवादि काल आश्रिय समंदशी अमदेशी भी नहीं क मांगे २६६ असंख्यात लोक अनंत अहोरात्रि २१६ जीवादि चोवीस दंडक पचक्खानी क्या७९० विषयानुक्रमणिका 82428 ७८०
*
.
43 अनुवादक वालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी
१३१. पहागुरु देव का मनोमग प्रश्न ११ १८i ngीपाद: "
१७० देवता को असंगति कहना गया! १८र भाभीपापमपाको
१७. देवताओं की अर्धमागधी मापा.. १७ 12. पा.
१७२ केवली पायगामी को जाने मन १८ नोवा
सुनकर पोखगायी जाने.
1. गाम में
१७३ चार प्रमाण, केवली नर्म मनाने
.. पारगि
१७४ केवली के मनयोग को देला ना! परदार मोनोगता.
१७० अनुचर विमान के देव हमे को १८. मोपमा पोर
१७६ अनुसार विमान के देव भीमपोरीist:
१७७ केवली इन्दियों से जाने देगी. ६५९ ११. सायबर
१.५८ केरली समपनन्नर पपरटी
१७१ च दे धारी अनेक परमार
mar
पांचवे शतक का पापा ६६९
१८. उस मनुप्प सिद्ध नहीं होगे.
१८१ सय नया एतभूत वेदना हो
१९२ रोपाicit.
१८२ भरन के वनपान गरी
नमा HTTER.
११ मा
पनवे शतक छटा देश
THEATER REt.
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8 पंचांश विवाह ज्ञप्ति ( भगवी) सूत्र - १९४ प्रमाणु व कन्या की स्थिति. ७०१ ११९५ प्रमाणु स्कंधों का अंतर काल १९६ प्रमाणु स्कंधों की अल्पा बहत्व ७०६ १९७ चौवीस ही दंडक का आरंभ परिग्रह ७०७ १९८ पांच प्रकार के हेतूओं ७१३ पांचवा शतक का-आठवा उद्देशा ७९५ १९९ नारदपुत्र निर्गन्ध पुत्र साधु की पुद्गली चचा, ६१० २०० जीवादि की हानी वृद्धी अवस्थितता ७२२ २०१ सोवचय सावचय के प्रश्नोत्तर ७२८ पांचवा शतकका नववा उद्देशा ....७३१ २०२ राजगृही पृथव्यादि किसे कहना? ७३१ १२०३ दिन का उद्योग रात्रि का अन्धकार ७३२ २७४ चौवीसह दंडक में उचोत अंधकार ७३४ २०५ मनुष्य लोक सिवाय काल गमाण कहीं भी नहीं १२.६ असंख्यात लोक अनंत अहोरात्रि २०७ देवलोक कितने कहे हैं। ७४२ पंचवा शतक का दशवा उद्देशा....७४३ २०८ चन्द्रमा देव का निवास स्थान ।। ६छटे शतक का-प्रथमोद्देशा ....७४४ २०१ महा वेदना महा निर्जरा आदि ति७ि४४ २१. करण का कथन ७५० २११ वेदना निर्जरा की चौभंगी ७५४ छट्टे शतक का-दूसरा उद्देशा. ७५६ २१२ आहार अधिकार उठे शतक का-तीसरा उद्देशा. ७५७ २१३ वस्न का और कर्म का दृष्टांतिक संबंध ७५७ २१४ कर्म बंध के स्थिति आदि १६ द्वारों. ७६७ छठे शतक का-चौथा उद्देशा. ७८० २२५ जीवादे काल आश्रिय समंदशी अनदेशी विषयानुक्रमाणिका - क मांगे ७८० २१६ जीतादि चौबीस दंडा. पचक्खानी क्या७९०
२८ जागा
२२ra :
एका दम
11 mitrastri
मला, शार
१. मयोजक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक नापिनी
शतक का-पांचया उदेगा. ९२
२१७ तपस्काया का अधिकार
२१८ कृष्ण रानी का अधिकार
२१९ लोकांतिक देवना का नभिरार! "
छटे शतक का उट्ठा
उदगा ....८१५
२२० नरक देव के पानामानी गया
२२१ मरणानिक समुदगार रा रमन
छ8 शतक का-सातया उदगा....८२२
२२२ धान्य बन्धन में मयोनिक निना.....
२२३ महन के भावोधादि काम मा. t
२२४ संख्यान काले, परपोरम, मागोर
कालनकादि
२२५ प्रथम पाराका गन
छ? शतक का आठया उमा.. ८३१
२२. नरक में गया पानी
२२७ 7 महार आयुध सरा कपन
• Rit-ETHER
२॥ी की कार
१८ मग?
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*98 पंचमांग विवाह प्रज्ञप्ति (भगवती) सूत्र - २४२ लोक का संस्थान ८६४ २४३ आवकको सामायिक सम्परायक्रिया८६४ २४४ पृथ्वीखोदते त्रस मरेको प्रत्या ख्यान खंडन नहीं होवे २४५ साधु को शुद्ध आहार देते सहायदात होवे८६७ २४० साधु को आहार देते मोक्ष प्राप्त करे. ८६७ २४७ अकर्मि जीव की गति के दृष्टांत २४८ दुःखी दुःख को स्पर्शता है क्या? ८७३ २४९ साधु अयत्ना से कार्य का संपराइ क्रिया८७४ २५० इंगाल धूम्र दोपवाला आहार ८७६ २५६ क्षेत्र काल मार्ग प्रमाण अतिक्रन्त आहार ८७८ २५३शास्त्रातीत एपणी वेपणी सगुदानी आहार८८१ सातवे शतक का-दुसरा उद्देशा. ८८३ २५४ मुमत्याख्यान दुमत्याख्यान ८८३ २५५ प्रत्यख्यान दो प्रकार के २५६ जीव प्रत्याख्यानी अप्रत्याख्यानी १ ८९३ २५७ जीव शाश्वता की अशाश्वता: V८९४ सप्तम शतक का-तीसरा उद्देशा ८९५ २५८ वनस्पति के न्यूनाधिक आहार काल ८९५ २५९. मूल दादी के प्थक २ जीवों ८९७ २६० अनंत काय कंद मुल के नाम २६.. लेश्यानुसार कर्म न्युनाधिक २६२ वेदना निर्जरा की भिन्नता २६३ नेरीये के साता असाता दोनों हैं सप्तम् शतक का-चौथा उद्देशा ९०७ २६४ संसारी जीवोंछ प्रकार के ९०७१ सप्तम शतक का-पांच्या उद्देशा ९०८१ २६५ खेचरकी तीन प्रकार की योनी सप्तम् शतक का छट्ठा उद्देशा ९१० २६६ यहां आयुप्य बंधे वहां भोगये २६७ यहां अल्पवेदना वहां महावेदना २६७ अभोगनिवृति अनाभोगनिवृति बाय ९१३ २६८ अठारापापसे कर्कश वेदनी कर्भ वन्धे ९१४ RECg विषयानुक्रमणिका 80838 ८८७
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११ मयोजक पालनहाचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी
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छटे शतक का पांचया उद्देगा. ७९२ भाग गया IEET
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११ *98 पंचमांग विवाह प्रज्ञप्ति (भगवती) सूत्र 8 २४२ लोक का संस्थान २४३ आवकको सामायिक सम्परायक्रियाद६४ २४४ पृथ्वीखोदते बस मरेतो प्रत्या ख्यान खंडन नहीं होवे २४५ साधु को शुद्ध आहार देते सहायदात होवे८६७ २४६ साधु को आहार देते मोक्ष प्राप्त करे. ८६७ २४७ अकार्म जीव की गति के दृष्टांत २४८ दुःखी दुःख को स्पर्शता है क्या ? ८७३ २४९ साधु अयत्ना से कार्य कर्ता संपराइ क्रिया८७४ २५० इंगाल धूम्र दोपवाला आहार ८७६ २५६ क्षेत्र काल मार्ग प्रमाण अतिक्रन्त आहार ८७८ २५३शास्त्रातीत एपणी वेपणी सगुदानी आहार८८१ सातवे शतक का-दूसरा उद्देशा. ८८३ २५४ सुप्रत्याख्यान दुपत्याख्यान ८८३ २५५ प्रत्यख्यान दो प्रकार के ८८७ २५६ जीव प्रत्याख्यानी अप्रत्याख्यानी । ८९३ २५७ जीव शाश्वता की अशाश्वता: V८९४ सप्तम शतक का तीसरा उद्देशा ८९५ २५८ वनस्पति के न्युनाधिक आहार काल ८९५ २५९ मूल दादी के पथक २जीवों ८९७ २६० अनंत काय कंद मूल के नाम ८१८ २६१. लेश्यानुसार कर्म न्युनाधिक २६२ वेदना निर्जरा की भिन्नता ९०११ २६३ नेरीये के साता असाता दोनों हैं सप्तम् शतक का-चौथा उद्देशा ९०७ २६४ संसारी जीवा छ प्रकार के सप्तम शतक का-पांचवा उद्देशा ९०८ २६५ खेचरकी तीन प्रकार की योनी ५.०८ सप्तम् शतक का छट्ठा उद्देशा ९१० २६६ यहां आयुष्य बंधे वहां भोगवे ९१० २६७ यहां अल्पवेदना वहां महावेदना ९.१.१. २६७ अभोगनिवृति अनाभोगनिति आय ९१३ २६८ अठगरापापसे कर्कश वेदनी कर्म वन्धे ९१४ 28 विषयानुक्रमाणिका 8882
योजक बालब्रह्मचारी मुरि श्री अमोलक पिजी
छट्टे शतक का-पांचया उद्देशा. ७९२ २८ नागानों पर
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११. 989 पंचमांग विवाह प्रज्ञप्ति (भगवती) सूत्र 88 २४२ लोक का संस्थान २४३ आवकको सामाविको सम्परायक्रिया८६४ २४४ पृथ्वीखोदते स मरेको प्रत्या ख्यान खंडन नहीं हो ...८३६ २४५ साधु को शुद्ध आहार देते सहायदात होवे८६७ २४६ साधु को आहार देते मोक्ष प्राप्त करे. ८६७ २४७ अकर्पि जीव की गति के दृष्टांत २४८ दुःखी दुःख को स्पर्शता है क्या ? ८७३ २४९ साधु अयत्ना से कार्य कर्ता संपराइ क्रिया८७४ २५० इंगाल धूम्र दोपवाला आहार ८७१ २५६ क्षेत्र काल मार्ग प्रमाण अतिक्रन्त आहार ८७८ २५३शास्त्रातीत एपणी वेपणी सदानी आहार८८? सातवे शतक का-दूसरा उद्देशा. ८८३ २६४ सुमत्याख्यान दुपत्याख्यान ८८३ २५५ प्रत्यख्यान दो प्रकार के ८८७ २५६ जीव प्रत्याख्यानी अपत्याख्यानी ? ८९३ २५७ जीव शाश्वता की अशाश्वता: V८९४ सप्तम शतक का तीसरा उद्देशा ८९५ २५८ वनस्पति के न्यूनाधिक आहार काल ८९५ २५९ मूल पं.दादी के पथक २ जीवों ८९७ २६० अनंत काय कंद मुल के नाम ८९ २६? लेश्यानुसार कर्म न्युनाधिक २६२ वेदना निर्जरा की भिन्नता ९०१ २६३, नेरीये के साता असाता दोनों हैं सप्तम् शतक का-चौथा उद्देशा ९०७१ २६४ संसारी जीवों छ प्रकार के सप्तम शतक का-पांचवा उद्देशा ९०८ २६५ खेचरकी तीन प्रकार की योनी ९०८१ सप्तम् शतक का छट्ठा उद्देशा ९१० २६६ यहां आयुप्य बंधे वहां भोगवे २६७ यहां अल्पवेदना वहां महावेदना ९.१.१ २६७ अभोगनिवृति अनाभोगनिवृति आय ९' २६८ अगरापापसे कर्कश बेदनी कर्म वन्धे ९१४) ABP विषयानुक्रमणिका 307 .. समयोजक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक प्रापिनी- छट्टे शतक का-पांचया उद्देशा. ७९२ रामागियों na: २१७ तमस्काया का अधिकार ७१.२. २१८ कृष्ण रानी का अधिकार २१९ लोकांतिक देवना का नपिरार! : ११.in माxिit छटे शतक का उट्ठा उदेगा .....१५ करके ere २२० नरक देव के मातामा की मंल्पा ८९९ २२१. मरणांतिक समुदाय का कपन हा- देशा छ? शतक का-सातवा उददशा....८२२ मगर दुलो मात्र २२२ धान्य यन्धन में मपोनिक स्लिाई.८... २२३ मन के भात्रोधादि काल मान. ८ am २२४ संख्यान काले, पल्पोरम, सामोरम कालनकादि. १८ भी है २२५ प्रथम प्राराका पर छठे शतक का आठया उद्देश.. ८३४ मी तिला २२० नरक में गया पानी पाक का " २२७ छ प्रहार आयुष रा नगन. २५३ TREATKE Sankettrem Tith .. 60 by *98- पंचमांग विवाह प्रज्ञप्ति (भगवती) सूत्र 28 २४२ लोक का संस्थान २४३ श्रावकको सामायिको सम्परायक्रिया८६४ २४४ पृथ्वीखोदते स मरेतो प्रत्या ख्यान खंडन नहीं होवे २४५ साधु को शुद्ध आहार देते सहायदात होवे८६७ २४० साधु को आहार देते मोक्ष प्राप्त करे. ८६७ २४७ अकर्मि जीव की गति के दृष्टांत २४८ दुःखी दुःख को स्पर्शता है क्या ? ८७३ २४९ साधु अयत्ना से कार्य कर्ता संपराइ क्रिया८७४ २५० इंगाल धूम्र दोपवाला आहार ८७६ १२५६ क्षेत्र काल मार्गप्रमाण अतिक्रन्त आहार ८७८ २५३शास्त्रातीत एपणी वेपणी सगुदानी आहार८८१ सातवे शतक का-दूसरा उद्देशा. ८८३ २५४ मुमत्याख्यान दुपत्याख्यान ८८३ २५५ प्रत्यख्यान दो प्रकार के ८८७ २५६ जीव प्रत्याख्यानी अगत्याख्यानी ? ८९३ २५७ जीव शाश्वता की अशाश्वत्ता ! V८९४ सप्तम शतक का-तीसरा उद्देशा ८९५ २५८ वनस्पति के न्यूनाधिक आहार काल ८९५ २५९ मूल पैदादी के पथक २ जीवों ८९७ २६० अनंत काय कंद मुल के नाम ८१८ २६. लश्यानुसार कर्म न्युनाधिक २६२ वेदना निर्जरा की भिन्नता २६३ नेरीये के साता असाता दोनों हैं ९०५. सप्तम् शतक का-चौथा उद्देशा ९०७ २६४ संसारी जीवों छ प्रकार के सप्तम शतक का-पांचवा उद्देशा ९०८ २६५ खेचरकी तीन प्रकार की योनी सप्तम् शतक का छट्ठा उद्देशा ९१० २६६ यहां आयुष्य बंधे वहां भोगवे ९१०१ २६७ यहां अल्पवेदना वहां महावेदना ९१.१. २६७ अभोगनिवृति अनाभोगनिवृति आय ९१३ २६८ अठारापापसे कर्कश वेदनी कर्म बन्धे ९१४ 8 विषयानुक्रमणिका 88887
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- पंचमांग विवाह प्रज्ञप्ति ( मगवती) सूत्र - आठवे शतक का-दसरा उद्देशा. १०३१ ०/२९६ आशी (दाह) विष का कथन ...१०३१ २९७ विच्छू मेंडक सर्प मनुष्य का विप ...१०३२ २९८ कर्म के आशी विप का कथन ...१०३४ २१९ दश वात छद्मस्त न जाने केवली जाने १०३८ ३०० ज्ञान अज्ञान के भेदानुभेद ३०१ ज्ञान अज्ञान की लद्धि के द्वारों ...१०४४ ३०२ पांचों ज्ञान का विषय ...१०६४ ३०३ पांचों ज्ञान की स्थिति व पर्यव ...१०६८ आठवे शतक-का-पांचवा उद्देशा. १०.८० ३०८सामायिक में चोरी के माल की चौकस १०८० ३०९ सामायिकवाले की खी है ...१०८३ ३१० गत काल प्रतिक्रमण, वर्तमान संवर अना-old गत प्रत्याख्यान इन के भेद ४१. भांगे ...१०८४ ३११ गौशाल के श्रावकों के नाम, आनार १०९० आठवे शतक का-छट्ठा उद्देशा. १०९४ ३१२ साधुको शुद्धाहार देते एकांत निर्जरा१०९४ ३१३ साधु को अशुद्ध आहार देते अल्प पाप बहु निर्जरा। ...१०१५ ३१४ असंयति को आहार देते एकांत पाप?०९५ ३१५ आहार आदि जिस के लिये लाया उसे दी साधु को देना ...१०९६ ३१६ आलोचना अमिर जावेतो आराधक ११०० ३१७ दीपक जलते क्या जलता है ?...११०७ ३१७ शरीर से क्रिया का कथन ... ११.०९ *2888> विषयानुक्रमाणका 88882 आठवा शतक का-तीसरा उद्देशा. १०७३ ३०४ वृक्षों के कार ...१.२७३ ३०५ शरीर के टुकडे के अंतर में प्रदेश १०७६ ३०६ पृथ्वी का चरम अचरमपना ...१०७७ Mo? आठवा शतक का-चौथा उद्देशा. १०७९ ३:७ कायिकादि पांचों क्रिया का ...१०७९ २८. मामा दानशीनगर २४ तासीमा गरना ...ार हारे . १८ कालिका ५. प्रयोजक पाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8. १२६९ अठारापाप त्याग से प्राच वेदनी। २७० जोर दा से माना गेली की र. ११५ २७१ जी को दुःख देने से दुसार १७२ छठे आराका वर्णन. सप्तम शतक का-सातवा उद्देशा. १२८ २७३ संवृत साधु भीम भोग विली क्रियाको २७४ काम भोग रूपी मापी भेदों. २७५ चौधरीम दंरक कामी मोगी का . " २७५ उमस्त देवता हो भोग भोगने मम २७६ आवधी ज्ञानी.पग्य भवशी परवानी २७७ अमनी अंकाम वेदना वेदने ! २७८ सशी अमानता से निपसंदना रेले ११८ सप्तम शतक का आठवा, उद्देशा. १३० २७१ उप्रान गिद्ध न हो २८. दृस्ति कंगने का मामा नीर २८१. दग संज्ञा चौतीस टक पर TRA PAREER ARRAYARIES .A गामा ११ २. मासिक पां." परी १८ १ अविसमा २. विमा ८८ २१९ वयोवना, विमा,५२९१ .
- पंचमांग विवाह प्रज्ञप्ति ( मावती) सूत्र - आठवे शतक का-दूसरा उद्देशा. १०३१ २९६ आशी (दाह) विष का कथन ...१०३१ २१७ विच्छू मेंडक सर्पमनुष्य का विप ...१०३२ २९८ कर्म के आशी विप का कथन ...१०३४ २१९ दश वात छद्मस्त न जाने केवली जाने १०३८ ३०० ज्ञान अज्ञान के भेदानुभेद ...१०३९ ३०१ ज्ञान अज्ञान की लद्धि के द्वारों ...१०४४ ३०२ पांचों ज्ञान का विषय ...१०६४ ३०३ पांचों ज्ञान की स्थिति व पर्यव ...१०६८ आठवा शतक का-तीसरा उद्देशा. १०७३ ३०४ वृक्षों के प्रकार ...१.०७३ ३०५ शरीर के टुकडे के अंतर में प्रदेश १०७६ ३०६ पृथ्वी का चरम अचरमपना ...१०७७ आठवा शतक का-चौथा उद्देशा. १०७९ ३.७ कायिकादि पांचों क्रिया का ...१०७९ *998- विपयानुक्रमाणिका <8862 आठवे शतक का-पांचवा उद्देशा. १.०.८० ३०८ सामायिक में चोरी के माल की चौकस १०८० ३०२ सामायिकवाले की रखी है ...१०८३ १३ ३१० गत काल अतिक्रमण, वर्तमान संवर अना-old गत प्रत्याख्यान इन के भेद् ४९ भांगे ... १०८४१०६ ३११ गौशाल के श्रावकों के नाम, आवार?.०९० आठवे शतक का-छट्ठा उद्देशा. १०९४ ३१२ साधुको शुद्धआहार देते एकांत निर्जरा १०९४ ३१३ साधु को अशुद्ध आहार देते अल्प पाप बहु निर्जरा ...१०९५ ३१४ असंयति को आहार देते एकांत पाप१०९५ ३१५ आहार आदि जिस के लिये लाया उसे ही साधु को देना ...१०९६ ३१६ आलोचनार्थि मर जावेतो आराधक११०० ३१७ दीपक जलते क्या जलता है ?... ११.०७ ३१७ शरीर से क्रिया का कथन / ९४० १२ १. प्रयोजक वाल प्रहमचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिधी २६९ अठारापापके त्याग से अकर्कश वेदनी११.४ २७० नोव दया से साता वेदनी कर्म बन्धे. ९१५ २७१. जीव को दुःख देने से दुःखपाप. १७२ छ आराका वर्णन. सप्तम शतक का-सातवा उद्देशा. ९२८ २७३ संवृत साधु भी अ उपयोगसे इया वही क्रियाकरे. ९२८ २७४ काम भोग रूपी अरूपी-व भेदों. ९२९ २७५ चौबीस दंडक कामी मोगी का प्रश्न. ९३१ २७५ छद्मस्त देवता हो भोग भोगने समर्थ है V९३४ २७६ आवधी झानी.परम अवधी.केवल ज्ञानी९३५ २७७ असजी अंकाम वेदना वेदते हैं ? २७८ सझी अज्ञानता से निकरण वेदना वेदते ९३८ सप्तम शतक का-आठवा उद्देशा. ९३९ २७१ छद्मस्त सिद्ध न होवे २०/२८. हस्ति कुंथवे का सरीखा जीव ६ २८१ दश संज्ञा चौवीस दंडक पर २८२ नेरीये के पापकर्म दुःख हेतृभूत २८३ न की दश प्रकार की क्षेत्र वेदना ९४१ २८४ हस्ति कुंथवे की सरीखी क्रिया ९४२ सप्तम शतक का-नववा उद्देशा. ९४१ २८५ साधु के वैकेय करने का कथन ९४४ २८६ कोणिक चेडा का महा सिला कंटक सं.९४५ २८७ कोणिक चेडा का रथमूशल संग्राम १५४ २८८ शकेन्द्र कोणिक के पूर्व के मित्र ...९५,६. २८९ संग्राम में मरे वे देवता होवे वरूनागः ९५८ सप्तम शतक का-दशवा उद्देशा. ९७१ २९० अन्य तीथिक की चर्चा आस्तिकाया ९७२ २९१ पापकर्म पुण्यकर्म परिणमने का दृष्टांत ९८२ २१३ अग्नि प्रजालने से बुझानेवाला अल्पकर्मी ९८५) २९४ अचित्त पुद्गलों का प्रकोश तेजोलेश्या ९८८ अष्टम शतक का-प्रथमोहेशा. २९५ प्रयोगसा, मिस्रा, विशेष पुद्गलों का कथन९९० प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी-ज्वालाप्रसादजी
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* पंचमांग-विवाह प्रज्ञप्ति [ भगवती ] सूत्र
नववा शतक का-प्रथमो उदेशा.
नवना शतक का-तेतीसवा उद्देशा.
३४२ जंबूद्वीप का वर्णन् । ...१२३५ ३५१ ऋपभदत्त ब्राह्मण देवानं हा ब्राह्मणी, १३३४
नववे शतक का-दूसरा उद्देशा.
३५२ जामलीक्षबी कुमार का अधिकार १३५४
३५३ जमालीजी की सातापितासे चर्चा ...१३६८
३४२ अढाइ द्वीप के ज्योतिपी की संख्या १२३७ ३५४ जमालीजी का दीक्षा औत्सव ....३२०
नववे शतक का-तीसरा उद्देशा. ३.५५ जमालीजी स्वच्छंदाचारी श्रद्धाभष्टयने:४२१
३४३ दक्षिण के अठावीस अन्तर द्वीपों ...१२३९ ३५६ जमाली को गौतम स्वामीने हराये. १४३२
नववा शतक का-इकतीसवा उद्देशा ३५७ जमाली क्लिविपी देव हुआ ...१४३८
नववा शतक का-चौतीसवा उद्देशा
४४ असोजा केवली के श्रावकादि का कथन१२४३
३४० असोचा केवली कैसे होते हैं
..१२५५
पुरुप की घोडे की बात का प्रश्नोत्तर१४४६
३४६ सोच्चा केवली के श्रावकादि का ...१२६४
३५१ ऋपि को मारने वाला अनंत जीवमारे१९४७
३४७ सोचा येवला कैसे होते हैं
...१२५५
३.६० एक को मारता अनेक का वैरकरे. १४४८
३.६१ पांचों स्थारों का परस्पर श्वाशोश्वास१४५०
नववा शतक का-बावीसवा उद्देशा
३६१ श्वासो श्वास लेते कितनी क्रिया ...१४५०
90३४८ गंगीया आणगारे भांगे ...१२१० ३६२ वायु के धक्केवृक्ष पडे कितनी क्रिया १४५२
.90/३४१ भांगे बनाने की विधी का यंत्र ...१३१६ १० दशवे शतक का-पहिला उद्देश
३५५ छत्तेनार की होते हैं कि अछत्ते !...१३२६ ३६३ दिशा किसे कहते हैं दिशा के नाम १.४३३
Agg विषयाणुक्रमाणका -
१४ प्रोनक पाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोळक प्रकार आठवे शतक का सातवा उद्देशा. .१११२ ३१९ स्थविर अन्य तीथिक की चर्चा...१११२ ३२० पांच प्रकार का गतिप्रवाद ...११२३ आठवा शतक का-आठवा उद्देशा ११२५ ३२१ गुरु के-गति के समूह के सूत्र के भाव के प्रत्याख्यानीक ...११२८ १२२ पांच प्रकार के व्यवहार. ...११.२८ ३२३ इयां पथिक सम्परायिक बंध के भांगे११३२ ३२४ वाईस परिपह किस कर्मोदयसे ...११४३ ३२९ सूर्य दृष्टीगत आने के सपने के प्रश्नोत्तर: १४९ ३२६ आढाइ द्वीपके वाहिर भीतर के । ज्योतिपी का अधिकार । आठवे शतक का-नववा उद्देशा. ३२७ प्रयोगवध रिसेसवंबंध का कथन ३२८ अनादि सादी वीसेसा बंध. ....११५६ 1.३.२९ प्रयोग वन्धके तीन प्रकार. ...१९६१ ३३० अल्लिका बंधके पांच प्रकार ३३१ सरीर बंध के दो प्रकार. ३३२ सरीर प्रयोग बंध के पांच प्रकार ११३८ ३३२ पांचों शरीर प्रयोग बंध किस २ कर्मोदया से होवे देश बंध सर्व बंध की स्थिति अल्पावहुत्वे अन्तर. ३३३ अठो कर्म बंध के कारण. ३.३४ पांचों शरीर का परस्पर वन्ध. १२३७ आठवे शतक का-दशवा उदेशा. .३३५ ज्ञान क्रिया.सेआराधक की चौभंगी १२१२ ३३६ तीन प्रकार की आराधनाका कथन..१२१६ ३३७ पुद्गल परिणाम के पांच प्रकार. १२२१ ३३८ पुद्गलों के सम्बन्ध के प्रश्नोत्तर. १२२२ ३३१ अठों कर्म के अविभाग पग्छेिद १२.२५ ३४० अठों कर्मों का परस्पर.सम्बन्ध.....१२२८ ३.४१ जीव पुद्गल कि पुद्गलो. ....१२३२ *भकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
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ॐ पंचमांग-विवाह प्रज्ञाप्त [ भगवती ] सूत्र :-
नववा शतक का-प्रथमो उदेशा.
नववा शतक का-तेतीसवा उद्देशा.
३४२ जंबूद्वीप का वर्णनं .... ..१२३५ ३५१ ऋपभदत्त ब्राह्मण देवानंदा ब्राह्मणी,.१३३४
नववे शतक का-दूसरा उद्देशा.
३५२ जामलीक्षची कुमार का अधिकार १.३५४
३५३ जमालीजी की सातापितासे चर्चा ..१३६८
३४२. अढाइ द्वीप के ज्योतिपी की संख्या १२३७८, ३५४ जमालीजी का दीक्षा औत्सब ....१.३१०
नववे शतक का-तीसरा उद्देशा.
३.५५ जमालीजी स्वच्छंदाचारी श्रद्धाभ्रष्टवने १४२१
३४३ दक्षिण के अठावीस अन्तर द्वीपों ...१२३९ ३५६ जमाली को गौतम स्वामीने हराये. १४३२
नववा शतक का-इकतीसवा उद्देशा ३५७ जमाली क्लिविपी देव हु ...१४३८
नववा शतक का-चौतीसवा उद्देशा
४४ असोजा केवली के श्रावकादि का कथन१२४३
३४०, असोचा केवली कैसे होते ...१२५५
३५८ पुरुप की घोडे की बात का प्रश्नोत्तर१४४६
३४६ सोचा केवली के श्रावकादि का ..१२६४
३५१ ऋपि को मारने वाला अनंत जीवमारे:५४७
३४७ सोचा ,वला कैसे होते हैं
३.६० एक को मारता अनेक का वैरकरे.१४४८
...१२५५
३.६१ पांचों स्थारों का परस्पर श्वाशोश्वास१४५०
नववा शतक का-बावीसवा उद्देशा
३६१ श्वासो श्वास लेते कितनी क्रिया ...१४५०
३४८ गंगीया आणणारे मांगे ...१२१० ३६२ वायु के धकवृक्ष पडे कितनी क्रिया १४५२
50३४१ भांगे बनाने की विधी का यंत्र ...१३१६ १० दशवे शतक का-पहिला उद्देश
३५५ छतेनार की होते हैं कि अछत्ते ....१३२६ ३६३ दिशा किसे कहते हैं दिशा के नाम १.४३३
8 विपयाणुक्रमणिका -
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१५२३ योजक बाल बचाती मुनि श्री अमोलक ऋषिनी '३१४ दिशाओं में जीय प्रदेश का कथन १४५५ ३६५ पांच शरीर का कथन ...१४५९ दशरे शनक का-दुसरा उद्देशा. ३६६ संवृति माधु रूप देखते क्रिया लगे १४६० ३६५ योनि और वेदना के प्रश्नोतर २४६४ ३६० आलोयना भाराधना नहीं .१४६६ ३११ आलोयने का इच्छक मेरे तो भी आरारक ...१४६७ दशव शतक का-तीसरा उद्देशा, ३३२ आत्म ऋदि से देव गमन करे .. १.४६९ ३६३ अनादि पढ़ा ऋद्धि देवों का विशेष१४७० ३६४ अश्व चल रपूर ३ब्द क्यों होवे ...१४७३ ३३५ भाषाओं का कथन ...१४७४ • देशवे शतक का चौथा उद्देशा. ३६५ त्रायत्रिसक देवों का कथन ...१४७६. दशवे शतक का पांचवा उद्देशा. ३६६ अनपहेपीयों का कथन ...१४८६. दशवे शतक का छट्ठा उद्देशा. ३६७ शक्रेन्द्र की सौधार्मिक सभा / ...१५०२ ३६८ उचर दिशा के २८ अंतर द्वीपों...१५०५ ११ एका दशम शतक का-पहिला उद्देशा ३६९ उत्पलादि कमल के जिवादि३२द्वारों२५०७ ३७० दुसरा-उद्देशा साल कमल का ..१५४२ ३७१ तासरा-उदेशा पलासला ३७२ चौथा उद्देशा-कुंभीका १४२५ ३७३ पांचवा उद्देशा पद्म के एक पत्ते में ...१५२४, ३७४ छठा उदेशा पद्मके एक पत्त में एक जीव१५२५ ३७५ सातवां उद्देशाकर्णिकके एक पत्ते में जीव१५२६ ३७६ आठवा उद्देशा नलीन.के पत्ते में जीव१५२६, २७७ नववा उद्देशा शिवराज ऋषिका. १५२७ ३७८ दशवा उद्देशा लोकालोक के प्रमाण का चार प्रकार का लोक. *प्रकाशक-राजायहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाम.दजी एक जीवे ३ ... १५५६.
888 पंचमांग-विवाद प्रज्ञप्ति ( भगवती) सूत्र 387 ९७६इग्यारवा उद्देश-सुदर्शन शेठ के काल के प्रमाण आश्रिय प्रश्नोत्तर. ..१५६२ ३८० सुदर्शन का पूर्व भव महावलकुमार ) १९८ वस्तुकादयचा. दीक्षवगैरा. ...१५९३ ३८१ वारवउदेशा आलंभिका नगरी के श्रावक की चर्चा देवस्थिती आश्रिय १६३८ ३८२ पुद्गल नामक परिवर्जन को ...१६४८ १२ द्वादश शतक का-प्रथम उद्देशा ३८३ शंखजी पोखली जी श्रावक का. १६५५ २८४ तीन प्रकार की जागरणा ...१६७१ ३८५ परस्पर क्लेश से कर्म वन्ध द्वादश शतक का-दूसरा उदशा ३८६ जयंती बाई के मश्नोत्तर; ...१६७६ ३८७ जीव हलका पारी काय से होवे ..१६७२ 1८८संसारिक जीवों का अन्त नहीं होता है१६८२ ३८९ मूता मागता. लवन्त निर्वल. दक्ष अदक्ष इन में कौन अच्छा कौनबुरा? १६८४४ ४९० पांचों, इन्द्रिय के वश्य संसार गॅभ्रमें १६८८ द्वादशम शतक का-तीसरा उद्देशा. ३९१ सातों नर्क के नाम गोत्र ... १६९९ द्वादश .शकत का चौथा उद्देशा ३९२ प्रमाणु पुद्गल स्कन्धों का कथन १.६९० ३९३ पुद्गल परावर्तन का कथन ...१७२७१ द्वादश शतक का-पांचवा उद्देशा ३९४ क्रोधमान माया लोभके नामों ...१७२८ ३९५ रूपी अरूपी चौस्पी अठस्पयर्थी १७३० बारवा शतक का-छट्ठा उद्देश ३९६ ग्रहण किस प्रकार होता है. ५..१७३७ ३९७ राहु के प्रकार व ग्रहण अंतर १७४२ ३१८ चन्द्रशशी क्यों सूर्य अदित्यक्यों.१, १७४४ ३९८ चन्द्र सूर्य की अग्रममेहपी व सुखोप भोग किस प्रकार के है. दृष्टान्त., २७६५ 8 विपयाणुक्रमणिका 288
५.
* प्रयोजक बाल प्रमचारी मुनि श्री अमोळक पिजी -
द्वादश शतक का-सातवा उद्देशा. १२ त्रयोदश शतक का-प्रथमोद्देशा.
४०० असंख्यात योजन का लोक है V..१७५०
४११नरकावासे का प्रमाण जीवोंकी उत्पत्ति १७९६
४०१ संपूर्ण लोक जीव ने स्पर्शा-दृष्टांत. १७५१ ४१२ लेश्या स्थान पर वर्त नरक में जावे १८१०
४०२ सब लोक में जीव जन्म मरण करे हैं१७५३
४०३ सय लोक के जीवों के साथ सजन दुर्जन त्रयोदश शतक का-दूसरा उद्देशा,
के सब प्रकार के संबंध जीवने किये २७५८
४१३देवताओं के स्थान में उपजने निकलने१.८१३
द्वादश शतक का-आठवा उद्देशा.
त्रयोदश शतक का-तीसरा उद्देशा.
४.४ देवनानाग में मणि में उत्पन्न हो पूजाचे १७५९
१०५ हिंसक जानवरों कुगति में जाते हैं "१७६१
४१४ परिचारणा का संक्षेपित कथन/...१८२३
द्वादश शतक.का-नववा उद्देशा
त्रयोदश शतक का-चौथा उद्देशा.
४०६ पांच देवों का थोकडा
४२५नीचे की नरक ऊपरकीनरक विस्तरित१८२३
...१७६३
४२६ तीनों लोक का मध्य विभाग ...१८२३
द्वादश..शतक का-दशवा उद्देशा. : ४२६ तीनों लोक का मध्य विभाग ,..१८२९
४०७ आठ आत्माका परस्पर संबंध ...१७७५ ४२७ दशों दिशा कि आदि कहां से ...१८३१
४०८ आत्मा ज्ञानदर्शन है कि अन्य ज्ञान है १७८२ ४२८ लोक किसे कहते हैं, पंचास्तिकाया १८३३
४०९ आत्मा नरकादि दंडक हैं कि अन्य है १७८४ ४२९ आस्तिकाया के परस्पर प्रदेशों ...१.३३
४१० आत्मा युगल स्कंध है कि अन्य है... १७८६ ४३० लोक का संकोच विस्तार का कथन१८५४
* प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी-ज्वालाप्रसादना*
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OYC 38 पंचमांग विवाह पण्णत्ती (भगवती) मूत्र १ त्रयोदश शतक का-पाचवा उद्देशा ४३१ तीन प्रकार के आहार का कथन १८५६ तेरवे शतक का छट्ठा उद्देशा ४३२ गंगेया-अनगार जैसे ही भांगे ...१८५७ ४३३ चमर चंचा राज्य धनि का ...१८५८ ४३४ उदायन राजा की आधिकार ...१८६२ तेरबे शतक का-सातवा उद्देशा ४३५ भापासम्बन्धीकायासम्बन्धमिश्नोत्तरो१००४ ४३५ पांच प्रकार के मृत्यु का कथन ...१०९१ तेरवे शतक का-आठवा उद्देशा ४३७ कर्म प्रकृतियों का संक्षिप्त ...१८९७ तेरवे शतक का-नववा उद्देशा ४३८ आकाश में गमन करने वाले साधु १८९८ तेरवे शतक का-दशवा उद्देशा. ४३९ छद्मस्त के छ समुद्र थात ...१९०५ १४ चतुर्दश शतक का-प्रथमोदेशा- ४३९ साधु धर्म देव स्थान को उल्लंध परम वास का आयुर्वन्ध करते मरेतो कहां जावे ...१९०७ ४४० जीव को परभवोत्पन्न की ग्रहण गती१९०९ ४४१ अनन्तर परम्पर के प्रश्नोत्तर ...१९१२ चउदवे शतक का-दूसरा उदेशा ४४२ या उन्माद से मोहनी का उन्माद जवर.. ४४३ काल से और इन्द्र से वी होती है,१९१० ४४४ असुर कुमार देव भी वृष्टी करते हैं.१९१९ ४४४ ईशान देवेन्द्रादि देव तमुकाय कैसे करे१९२० चउदवे शतक का-तीसरा उद्देशा ४४५ साधु के वीचमेंसे देवता नहीं जा सके १९२२ ४४६ चौवीस दंडक में सत्कार सन्मान...१९२३ ४४७ देवता के बीच में से देव जास के ? १९३४ 238 विषयानुक्रमणिका 8888 .
२० प्रयोनर पाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक शिनी ४४८ नरक में पुद्गल परिणाम ...१९२६. चउरवां शतक का-सातवा उद्देशा१९४९ चउदवे शतक का-चौथा उद्देशा. v५७ महावीर स्वामी गौतम स्वामी का प्रेम.९४३ ४४१ पुदलों का पारणमन ...१९२७ ४५८ द्रव्य क्षेत्र काल भाव की तुल्यता ...१९४४ ४५० जीव के सुख दुःख का जोडा ...१९२८ ४.८ भक्त प्रत्याख्यानी आहार करे क्या. १९५० ४५१ प्रमाण पुद्गल का चर्म अचर्म पना . .१९२९ ४६० लप सत्तम देवता का अर्थ ...१९५० ४५१ अनुत्तरोपापति देव का अर्थ किस चउदवे शतक का-पांचवा उद्देशा कर्म से हुआ ...१९५२ ४०२ चोइस दंडक के जीव अग्नि के मध्य चउदेवे शतक का-आठवा उद्देशा हो जा सके क्या ? ....२९४० ४९३ रत्नापमा से ज्योनपी वैमानिक का ४५३ दश प्रकार के मुख दुःख चोइस ...१९३५ ४९४ शालवृक्षमुज्य क्यों है ४५४ देवता वाहिर के पुद्गलों ग्रहण कर ४९५ अपड शंन्यासी के ७०० शिष्यों /१९५९ क्रमण करे ....१९३६ ४१५ देवता अव्यावाध कैसे होते हैं ? • चौबीसवा शतक का-छट्ठा उद्देशा ४९६ देवता की चिन्त्य" शक्ति. १९६१ ४५५ आहार परिमाणयोनि स्थिती काकथन१९३७ ४९७ जंभक देव का कृतव्य व प्रकार ।। २९६३ ४९६ गन्द्रादि इन्द्र भोग किस प्रकार चउदवे शतक का-नववा उद्देशा ४१८साधु कर्म लेश्या जाने रूपी कर्म लेश्या!१९६५ *प्रकाशक रानावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी अंतर दंडक पर V भोगये है RAPE पेचमांग-विवाह प्रज्ञप्ति ( भागवती) सूत्र 882 ४९९ सुख दुःख रूप पुद्गले २४ देडकपर १९५६ ५०० देवता-सहश्रोरूप से सह श्रोभापा बोले. १९५७ ६०१ मूर्य क्या है सूर्य का प्रयोजन क्या है ११५८ ५०२अधिक दीक्षित साधु अधिक तेजोलेशी१९५८ चउदवा शंतक का दशवा उद्देशों ५८३ केवली सिद्ध को जाने छद्मस्त नहीं. १९६० ५०४ केवली हलने चलन करे सवजानेदेखे १९७१ पञ्चदश शतंक का एक ही उद्देशा ५०५हालाहला कुमारी के स्थान में गोशालक१९.७४ ५०३ दिशाचर(नेमितिक)गोशालक मिले. १९७६ ६०७ गोशालक-जिन नाम धारन किया. १९.७८ ५०८ गोशालक की मूल से उत्पत्ति ...१९८१ ५०१ गोशालक भगवंता का मिलाप १९८६. ५.१०.. गोशालक ने की हुइ बुद्धियो । ...२००४ विषयाणुक्रमाणका 48 PM २११ गोशालक को तेजोलेश्या निमित्त ज्ञान की प्राप्ति .२०२१. ५१३ गोशालकने अणंद साधु को कहां हुवा दृष्टान्तः .....२०२६१२१ ६१४ अर्हन्त को उपसर्ग नहीं होता है ५१५ गोशालक से बोलने की मना की २०४९ ५१६ गोशालक ने भगवान से अपने सांत पट्ठल कहे २०५२ ५१७ गोशालक का भगवंत से विवाद ...२०६७ ५१.८ सर्वानुभूती सुनक्षत्र साधु की घात २०७० ५१९गोशालकने भगवंतपर तेजोलेश्याडाली २२७६ ५२० अपनी तेजोलेश्या से आपही जलमरेगा२०७१) ५२१ अशक्त गोशालक साधुकी मेरना से भगे२०८१. ५२२ गौशालक,की निटम्बना ८ चर्मरूपे. २०८७ ५२३ गोशालक का अयंपुलक श्रावकं ...२०९५ ५२४ गोशालकने सम्यक्त्व प्राप्त की .२१०७ ५२५ रेवंती गाथापत्नी से भगवंतका रोगगया २११५ पाइ प्रयोगकराल अपचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी । 2)५२६ सर्वानुभूति मुनक्षत्र साधु की गति ।..२१२९ ५३९ जीव को चैतन्य कृत कर्म हैं २१८९ ५२७ गोशालक का पुण्यप्रभाव ...२१३२ सोलवे शतक का तीसरा उद्देशा, ५२८ सोमंगले अनगारने गोचालक जीव ५४० कर्मप्रकृति स्वयं कृत वेदता है २१९१ को जलाया ...२१४४ ५४१ साधु की औषधोपचार में क्रिया नहीं २१९४ ५२९ गोशालक का भव भ्रमण ...२१५३ ५३० गोशालक हर प्रतिज्ञा केवली हो सोलवा शतंक का चौथा उद्देशा. मोक्ष गये ...२१६६ २४२ चौथ भक्तादि तपश्चर्या का फल २१९६ षोडश शतक का प्रथमोद्देशा. ५८२ तपश्चर्या से कर्म क्षपने के दृष्टांत २१९९ ५३१ अग्निकायवायुकाय का सम्बन्ध २१७१ सोलवा शतक का पाचवा उद्देशा. ५३१भट्टी संदास आदि उपकरणों की क्रिया २१७२ ५५८१ शक्रेन्द्र से ऊपर के देवों का तेज अधिक २२०२ ५३२ जीव अधिकारणी के अधिकरण ....२१७७ ५८४ देवता को विशिष्ट ऋद्धि कैसे मिली २२१३ सोलवा शतक का दूसरा उद्देशा. सोलवे शतक का छट्ठा उद्देशा. १५३३ शारीरिक मानसिक दुःख ...२१८२ ५८५ पांच प्रकार से स्वम आवे वगैरा २२२० ५१४ भगवंतने शकेन्द्र से पांच अपग्रह कहे इन्द्रने ५८६पाप स्वम महास्वम तीर्थंकरादि के स्वम२२२१ साधुओं को आज्ञा दी v ...२१८७ ५८७ महावीर स्वामी के १० स्वप्न २२२४ 1५३५ श्वेन्द्र समवादी है - ...२१८७५८८ मोक्ष प्राप्ति के १६ स्वप्न -२२३२ ५३८ ऊयदि मुख से बोले सो सावध भाषा:२१८८ ५८९ सारा सा दो प्रकार उपयोग . २२४० अप्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी चालाप्रसादमी।
२१ 48 पंचांग विवाह समति ( भगवती), सूत्र में सालव शतक का-आठवा उद्देशा. ५९. लोक की दिशा में जीव प्रदेश २२४१ ५९१ परमाणु एक समयमें लोकान्तकजावे २२४५ ५९२ वर्षाद वर्षते इस्तादि प्रसारते क्रिया २२४६ ५९३ नववा उद्देश-बलेन्द्र की सभा २२४८ ५९४ दशवा उद्देश-अवधि ज्ञान २३५० ५९५ इग्यारवा उद्देश-द्वीपकुमार का २२५२ ५९६ बारवा उद्देश-उदधी कुमारका २२५२ सतरहले शतक का प्रथमोदेशा. ६९७ उदायन भुतानन्दं हाथी का कथन २२५४ ५९८ ताडवृक्षचड फल डालने की क्रिया २१५५ ५९९ ताड फल पडने से किानी क्रिया २२५६ ६०० वृक्ष पटकते पुरुष को दक्ष को क्रिया २२५७ ६०१ शरीर इन्द्रिय जोगनिवृति की क्रिया २२६० ६०२ छ भाबों का संक्षिप्त कथन २२६२ सतरहवे शतक का दूसरा उद्देशा. ६०१ धर्मामि अधर्माधि २२६२ ६०४ पंडित बालपडित अपंडित २२६४, ६०५ अन्यमति प्रति अवति आदि जीव की भिन्नता २२६६ ६०६ देवता अरूपी पैकेय नहीं कर सके, २२६८ सतरइवे शतक का-तीसरा उद्देशा. ६८७ सलेशी साधु इलन चलन नहीं करे २२७० ६०८ पान प्रकार का हलन चलन २२७. 6०९ तीन प्रकार का चलन २२७२ ६१० पांचास कार्यो का मोक्ष पूल २२७४ सतरहवे शतक का चौथा उद्देशा. ६११ प्राणातिपातादि क्रिया स्पर्श कर करे२२७६ ६१२ दुःख वेदना आत्म कृत पर कृत उभय कृत २२७८ ६१३ पांचवा उद्देश-ईशानेन्द्र की समा २२८० ६१४ छठे सातवे उद्देशे में पृथ्वी काया का२२८४१ 4 ६१५ आठवे नववे उद्देशे में अपकाया का २२८५ ६१६ दशवे ग्यारवे उद्देशे में वायु काया का२२८७ * विपयाणुक्रमणिका 8848 *प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी-ज्वालाप्रसादजी. २४ प्रयाजक बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी ६. बारवे उद्देशे में एकेन्द्रिय का कथन २२८८ १३१८ तेरवे उद्देशे में मे नाग कुमार का २२९० ६.९ च उदवे उद्देशे में सुवर्ण कुमार का २२९० २० पन्दरचे उदेशे में विद्युत्कुमार का २२९० १६२१ सोलवे उद्देशे में वायुकुमार का २२९० ६२२ सत्तरखे उद्दश में-अन्तिकुमारका २२९१ अष्टादश शतक का-प्रथमोदशा: ६२३ मथम अप्रथम का कथन २२१२ १६२४. चरम अचरम का कथन २२१८ ६२५दूसराशतक केन्द्रका पूर्व भवकार्तिक २३०४ अठारवा शतक का तीसरा उद्देशा ६२६ काउलेल्या पृथ्वीकायादि पर पनुप्य हावे. २३१ ६२७ चर्म निगरा के पुद्गल सर्वलोकस्पर्शे २३२७ ६२८ द्रव्य बंध भाव वध का कथन २३१९ ६२२ पापकर्म किये व करेंगेजिसका विशेष २३२१ १३. नेरीये का आहार ग्रहण परिणमन २३२२ अठारवे शतक का चौथा उद्देशा- ६३१ अठारापाप अठाराधर्म, छ काय छ द्रव्य जीव पुदल शरीर इत्यादि जीव के भोग में आते है क्या? २३२३ ६३२ कृनयुग्मादि युग्मका कथन २३२५ अठारवे शतक का पांचवा उद्देशा ६३३ दो देव सरूप कुरूप किस प्रकार २३२९ ६३४ दो नेरीये हलुकभिारी कमी कैसे? २२३१ ६३५ वर्तमान भवायुवेदेआगमिकबंधकररहे २३३३ अठवा शतक का छट्ठा उद्देशा ६३६ गुड, भ्रमर, तोता में वर्णादि ६३७ प्रमाणु स्कन्ध में वर्णादि अठारवा शतक का सातवा उद्देशा १६३८ केवलीदेवाधिष्टेस भी सत्य भापाचोले २३४० ६३९ उपाधी परिग्रह तीन प्रकार की . २१४० ६४० सुप्रणिधान दु पणिधान २३४२ " २५ 88.2 पंचांग विवाह प्रज्ञप्ति (भगवती) सूत्र 38 V६४१ मंडुक श्रावने अन्यमति को हराया २३४४ ६४२ देवता परस्पररूप वैक्रयकरसंग्रामकरे २३५१ २४६४३ देवता संग्रामकारे काष्ठादि शास्त्रवन २३५२ ५६४४ देवता रूचक द्वीपतक परकमादेसके २३५२ ६४५ देवता पुष्प अंशक्षय करने की तफावत् २३५३ अठारवा शतक का आठवा उद्देशा. ६४६ साधु पूर्ण: कां अंडे कचरने में क्रिया २३०६ ६४७ गौतम स्वामी अन्यतीर्थक की चर्चा.२३५७ ६४८ छमस्त मनुष्य प्रमाणुआदि जानेदेखे २३३२ अठारवां शतक का नवा उद्देशा. ६४९ भविय द्रव्य नेगये आदि का कथन . २३६४ अठारवा शतक का. दसका उद्देशा. ६५० भांवितात्मा शााखं से छदावे नहीं २३६७ ६५१ वायु परमाणु से परमाणु वायु से स्पर्श२३६७ ६५२ वायु मशक से स्पर्श उक्त प्रकार २३६८ १६५३महावीर स्वामी सोमिल ब्राह्मण के प्रश्नो २३६९ गुनीसवा शतक ६५४ पहला-दूसरा उद्देशा-लेश्याधिकार २३८० ६५५तीसरा उद्देशा-पृथ्वीकायादि के १२द्वार २३८१ ६५६ पृथव्यादि पांचों सूक्ष्म वादर की अल्पावहुत २३८७ ६५७ पांचों स्थावरों में सूक्ष्म. पादर कौन २ हैं २३९२ ६.८ पृथ्वी के शरीर की मूक्ष्मता दृष्टान्त से २३९५ ६५९ पृथ्वी के संघटे से वेदना दृष्टांत से ६६० चौथा उद्देशा-आश्रय क्रिया निर्जरा वेदना के १६ भांगे २३९८ ६६१ पांचना उद्देशा-चरमउत्परम २४ दंडक२४०२ ६६२ छठा उद्देशा-द्वीप समुद्रों का प्रमाण संठाण २४०४ ६६३ सातवा उद्देशा-नरक देव के वास २४०४ ६६४ आठवा उद्देशा-निवृत्ति के. ८२ बोल. २४०७ ६६५ नववा उद्देशा-करण के ५५ बोल २४१५. 298 विषयानुक्रमाणिका 28 .
२८. मयानक वाळ ग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक पिाजी ७१२ पांचवा उद्देशा कालममाण निगोद दो प्रकार २७८७ ६१.३ छठा उद्देशापकारनिमन्तेक ३६द्वार २७९७ ७१४ सातवा उद्देशा समतिके ३३द्वार २८४६ ७१५ बाटवा उद्देशानकोत्पत्ति गति गमण आदि २८९७ ७१६ नवसे चारउद्देशतक नरकेप्रयत्तीपाद २९०० छब्बीसवा शतक ७१७ प्रथमोद्देशा-पापकर्मवन्ध के १०द्वार २९०३ ७१८ दूसराउद्देशा-अन्तरोत्तपनर्कके ११द्वार२९०४ ७१. तीसरा उद्देशा-अन्तरायगाढनर्कका २९१.८ ७२० पांचवा उद्देशा परम्परावगाह का २९१९ ७२१. उठा उद्देशा-अनन्तर आहार का २९१० ७२२ साना उद्देशा-परम्पर आहार का २९२०. ७२३ आठवा उद्देशा-अनन्तर पर्याप्त का २९२० ०२. नवरा उद्देशी-परम्पर पर्याप्त का २९२१ ७२५ दशा उद्देशा-चरम नर्क का २९२१ ७२६ इग्वारचा उद्देशा-अचरम नरक का २९२१९ २७ सत्तावीसवा शतक का इग्यारहवा उद्देशा पापकरने के छब्धीसवे शतक जैसा कहना २९२६ २८ अट्ठावीसवा तक के ११ उद्देशा पाप कर्म समार्जन अगश्रय उक्तप्रकार २९२७ २९ गुनतीसवा शतक का ११ उद्देशा पाप कर्म समकाल में वेदने के उक्तप्रकार २९११ ३० तीसरा शतक का उद्देशा क्रियावादी आदि चारों के समवसरणका २९३६ ३१ एकनीसवां शतक के २८ उद्देशे में कुडाग सुखडातक का विविध प्रकास्का कथन२९५५ ३२ वत्तीसवा शतक का. २८ उद्देश में कुठाग कृतयुग्म नेरिय की उत्पत्ति ..२९७. ३३ तेतीसबा शतक का प्रतिशतक १२ एकेक शतकके इग्यार उद्देशेमें एकेन्द्रियका २९७३ मकाशेक-राजाबाहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादार 010 O0 ३०५६ पंचमोग-विवाह प्रज्ञप्ति [भगवती ] सूत्र 9881 ३३ चौतीसवा शतक के प्रतिशतक २ एकेंक ३८ अडतीसवा शतक प्रतिशतक ११. एकक शतक के इग्यार २ उद्देशे मे एकन्द्रिय के उद्देश इग्यारा २ सब में चौरिन्द्रिय के श्रेणि का कथन २९८९ युग्मादि का कथन ३५ पैंतीसवा शतक के प्रतिशतक १२ एकेक ३९. गुनचालीसवा शतक के प्रतिशतक १.२ एके शतक के इग्यारा २ उद्देश में महाकृत क उद्देश इग्यारा २ सव में असली युग्मादि का कथन ३०२८ पचेद्रिय के कृत्युग्मादि का ३६ छत्तीसवा शतक के प्रतिशतक १२ एकेक ४० चालीसवा शतक के प्रतिशतक २१ एकेक उद्देश में इग्यारा २ सय में वेंन्द्रिय के उद्देश इग्याग २ सजीपचेन्द्रिय कृत्युगमा- कृतयुग्मादि का कथन दि का कथन .३८ अडतीसवा शतक के प्रतिशतक १२ एकेक ४३ एकतालीसा शतक के १९६ उद्देशे जिस उद्देश इग्यारा सब में तेन्द्रिय के कृत्यु में राशीकृत्युग्म नेरिआदि चौवीसही प्रमादि का कथन दंडकपर कथन है ३०७० भगवतीका उपसंहार ३०८७ का पुज्य श्री कहानजी ऋपि महाराज का सम्पदायके वालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलकत्रापिजी ने सीर्फ तीन वर्ष में ३२ ही शास्त्रो का हिंदी भाषानुवाद किया. उन ३२ ही शास्त्रों की १०००- १००० प्रतों सीर्फ पांच ही वर्ष में छपवा कर दक्षिण हैद्राबाद निवासी राजा बहादुरलाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रासाद जीने सब लाभ दिया है, -> विषयानुक्रमाणका 398 100 . 42 को अमूल्य २८ः गति 1 मयोजक वाळ ग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक पिानी ७१२ पांचवा उद्देशा कालममाण निगोद दो प्रकार २७८७ ७१३ छठा उद्देशाप्रकारनिग्नन्तेक ३६द्वार २७९७ ७१४ सातवा उद्देशा ५सम तके ३६वार २८४५ ७१५ आटवा उद्देशा-नकोत्पत्ति गमण आदि २८९७ ७१६ नवसे बारेउद्देशतक नरकेप्रयत्तीपाद २९०० छब्बीसवा शतक ७१७ प्रथपोद्देशा-पापकर्मवन्ध के १०द्वार २९०३ ७१.८ दूसराउद्देशा-अन्तरोत्तपनर्कके ११द्वार२९०४ १७... तीसरा उद्देशा-अन्तरायगाढनर्कका २९१८' १७२० पांचवा उद्देशा परम्परावगाढ का २९१९ ७२१. उठा उद्देशा-अनन्तर आहार का २९१० ७२२ सातवा उद्देशा-परम्पर आहार का २९२०. ७२३ आठवा उद्देशा-अनन्तर पर्याप्त का .२९२० ७२१ नवा उद्देशा-परम्पर पर्याप्त का २९२१ ७२५ दशा उद्देशा-चरम नर्क का २९२१ ७२६ इग्वारवा उद्देशा-अचरम नरक का २९२११ २७ सत्तावीसवा शतक का इग्यारहवा उद्देशा पापकरने के छन्धीसवे शतक जैसा कहना २९२६ २८ अठ्ठावीसवा तक के ११ उद्देशा पाप कर्म. समार्जन आश्रिय उक्तप्रकार २९२७ २९ गुनतीसवा शतक का ११ उद्देशा पाप कर्म. समकाल में वेदने के उक्त प्रकार ३० तासवा शतक का ११ उद्देशा क्रियावादी आदि चारों के समवसरणका २९३६ ३१ एकतीसवां शतक के २८ उद्देशे में कुडाग सुखडातक का विविध प्रकारका कथन२९५५ ३२ वत्तीसवा शतक का २८ उद्देश में, कुठाग • कृतयुग्म नेरिय की उत्पत्ति ..२९७. ३३ तेतीसबा शतक का प्रतिशतक १२ - एकेक शतकके इग्यार उद्देशे में एकेन्द्रियका २९७३॥ प्रकाशक-राजावाहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी* 9
पंचमांग-विवाह प्रज्ञप्ति [ भगवती ] सूत्र ॐ88
३३ चौतीसवा शतक के प्रतिशतक २ एकेंक ३८ अडतीसवा शतक प्रतिशतक ११. एकेक
शतक के इग्यार २ उद्देशे मे एकन्द्रिय के उद्देश इग्यारा २ सब में चौरिन्द्रिय के
श्रोणि का कथन
२९८९
युग्मादि का कथन
पैंतीसवा शतक के प्रतिशतक १२ एकेक ३०. गुनचालीसवा शतक के प्रतिशतक १२ एके
शतक के इग्यारा २ उद्देश में महाकृत क उद्देश इग्यारा २ सव में असली
युग्मादि का कथन
३०२८ पचेद्रिय के कृत्युग्मादि का
३६ छत्तीसवा शतक के प्रतिशतक १२ एकेक ४० चालीसवा शतक के प्रतिशतक २१ एकेक
उद्देश में इग्यारा २ सय में वेन्द्रिय के उद्देश इग्याग २ सशीपचेन्द्रिय कृत्युगमा.
कृतयुग्मादि का कथन
दि का कथन
३०५७
.३८ अडतीसवा शतक के प्रतिशतक १२ एकेक ४३ एकतालीसा शतक के १९६ उद्देशे जिस
उद्देश इग्यारा सब में तेन्द्रिय के कृत्यु में राशीकृत्युग्म नेरिआदि चोवीसही
प्रमादि का कथन
दंडकपर कथन है
३०७०
भगवतीका उपसंहार
३०८७
म पुज्य श्री कज्ञानजी ऋपि महाराज का सम्पदायके वालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलकत्रापिजी ने
सीर्फ तीन वर्ष में ३२ ही शास्त्रो का हिंदी भापानुवाद किया. उन ३२ ही शास्त्रों की १०००-
१००० प्रतों सीर्फ पांच ही वर्ष में छपवा कर दक्षिण हैद्राबाद निवासी राजा वहादुरलाला
मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रासाद जीने सब को अमूल्य लाभ दिया है,
-<dog89 विषयानुक्रमाणका 8
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Oreoya ॥ पंचमांग ॥ ॥ विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र ।। 488 पंचमांग विवाह पणत्ति ( भगवती) सूत्र 8883 * प्रथम शतकम् * ब्दार्थ ण. नमस्कार अ० अरहंत को ण नमस्कार सि० सिद्धको ण नमस्कार आ० आचार्य को ण. णमो अरहताणं । णमो सिद्धाणं । णमो आयरियाणं । णमो उबझायाणं । णमो लोए भावार्थ ० श्री अरहंत को नमस्कार होवो. कर, चरण व मस्तक का सुप्रणिधान सो नमस्कार कहा जाता है. किसको नमस्कार करना ? श्री अरहंत को. अरहंत किस को कहते हैं ! देवताओं से विनिर्मित महा- ० प्रतिहार्य नामक पूजा से जो पृजित वने हुले हैं, अथवा रहा-एकान्त देश व अन्त जिम को नहीं है, पहिला शतक का पहिला उद्देशा 988- सन्न १ अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दार्थ नमस्कार उ• उपाध्याय को ण नमस्कार लो लोक स सर्व सा० साधुको ॥*ण नमस्कार मामी सब्बसाहणं ॥ * ॥ णमो बंभीए लिवीए ॥ * ॥ रायगिह, चलण, दुक्खे, कंखप- सूत्र भावार्थ अर्थात् जो सब भाव को जान व देख सकते हैं उन को अरहंत कहते हैं. ऐसे अरहंत भगवंत को नम- स्कार होवो. इस का अरुहताणं व अरिहंताणं ऐसे दो पाठान्तर है. अष्टप्रकार के कर्मरूप शत्रुको इणने- वाले अरिहंत कहाते हैं. कर्मरूप बीज का क्षय होने से संसार में पुनःजन्म लेने का जिन को नहीं है इसलिये अरुहंत कहाते हैं, उनको नमस्कार होवो. सिद्ध भगवंत को नमस्कार होवो. वे कैसे हैं ? शुक्ल ध्यानरूप अनि से अष्टमकार के कर्मों को दग्ध करके जो मोक्ष पहुंचे हैं उन्हें सिद्ध कहते हैं; उन को नमस्कार होवो. जिन शासन के उपदेशक, ज्ञानादि पंचाचार पालनेवाले, गच्छ के नायक, अष्ट संपदा के धारक, ऐसे श्री आचार्यको नमस्कार होवो. अग्यारह अंग व बारह उपांग स्वयं पठन करे, अन्य को पठन करावे, और चरण सचरी च करण सचरी पञ्चीम गुणों से युक्त होवे ऐसे उपाध्याय को नमस्कार होवो. ज्ञानादिक से मोक्ष मार्ग साधे वैसे सब साधु को नमस्कार होवो. यहाँपर “ सव्यसाहूर्ण" पाउ में सच शब्दका प्रयोग करने से सामायिक विशेष, अप्रमत्तादिक, पुलाकादिक, जिन कल्पिक, परि- हार विशुद्ध कल्पिक, यथा लिंगादि कल्पिक प्रत्येक बुद्ध, स्वयंबुद्ध, व बुद्धयोधित प्रमुख गुणवंत साधु- ओं को भी ग्रहण कीये हैं उक्त पंच परमेष्टी मोक्षमार्ग के साहायक व परम उपकारी हैं * ब्राह्मी लिपिक * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्यालामसादजी * 10 भावार्थ Q OYO 89 पंचमाङ्ग विवाह पण्णति ( भगवती) सूत्र 9987- को नमस्कार होवो' अर्थात् श्री ऋषभदेवनीने गृहवास में अपनी ज्येष्टा पुत्री ब्राह्मी को अठारह प्रकार की लिपि यतलाई. उस लिपि से शास्त्र लिखे गये इस लिये उस का कथन करनेवाले श्री ऋषभदेव स्वामी को शास्त्र के उपदेश देनेवाले श्री सुधर्मास्वामी नमस्कार करते हैं. इस तरह नमस्कार किये पीछे पांचवा अंग श्री व्याख्यामज्ञप्ति का आधिकार कहते हैं. इस में जीवाजीव की विविध प्रकार की मरूपना की है, गौतमादिक के विविध प्रकार के प्रश्नों व उनके उत्तर दिये हैं. इस में एक सरिखा संबंध होनेपरभी पुष्पावकीर्ण की तरह भिन्न २ प्रकार का अधिकार है. इस का अपर नाम भगवती है अर्थात् भगवंत की वाणी सर्वमान्य होने से भगवती कहाती है. इस के १.३८ शतक हैं, उन के उद्देशे १०००० प्रमाण हैं, ३६ हजार प्रश्न और पद २८८००० हैं. प्रथम शतक श्री भगवन्तने राजनही नगरी में कहा. इस के दश उद्देशे कहे हैं. प्रत्येक उद्देशे में भिन्न २ प्रश्न पूछे हैं सो बताते हैं. अब उद्देशेके नाम बताते हैं. १ चलण-चलमाणे 898 पहिला शतकका पहिला उद्देशा 85 १ कितनेक 'नमो बंभीए लिवीए' इनका ब्राह्मी लिपि को नमस्कार होवो ऐसा अर्थ करके अक्षर स्थापना निक्षेप सिद्ध करते हैं, परंतु जैसे अनुयोग द्वार में पाथा का जान पुरुप पाथा कहाता है वैसे ही लिपिका शिखानेवाला पुरुप लिपिक कहा जा सकता है. इसलिये यहांपर सूत्रकारने अक्षर स्थापना रूप लिपि को नमस्कार नहीं करते हुवे लिपि बतानेवाले श्री ऋपभदेव स्वामी को नमस्कार किया है. और भी वीर निर्वाण पीछे ९८० वर्ष में पुस्तकारूढ ज्ञान हुवा इस से लिपि को नमस्कार करना नहीं संभवता है.
शब्दाथा सूत्र भावार्थ ॐ अनुवादक पालयनगरी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 8 लि. लिपिक को॥ ॥रा० राजगृह में च• चलन दु० दुःख कं० कांक्षा प्रदीप प० प्रकृति पु० पृथ्वी जा मावन्त ० नारकी वा० बाल गु० गुरुक च० चलन||*॥ण नमस्कार सु श्रुतको ते. उस का०काल ते. उस स० समय में रा० राजगृह णा० नाम न० नगर हो० था व वर्णन वाला त० उस रा० राजगृह ओसेय, पगइ, पुढवीओ, जावंते, नेरइए, बाले, गुरुएय, चलणाओ॥ ॥णमो सुअस्त ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णामं णयरे होत्था, वण्णओ तस्सणं रायगिह- चलिए इत्यादि चलण विषय अर्थ का निर्णय रूप पहिला उद्देशा नव मश का जानना. २ दुःख-इस में नीव अपना कीया हुवा कर्म वेदता है इत्यादि प्रश्नकी पृच्छा है. ३ कांक्षा प्रदोप-इप्त में जीवने , कांक्षा मोहनीय कर्म किया ? ऐसे प्रश्नोंकी पृच्छा है ४ प्रकृति-इप्स में कर्म की कितनी प्रकृतियों कही है। इत्यादि प्रश्नकी पृच्छा है. पृथ्वी-इस में रत्नप्रभादि कीतनी पृथ्वी है इसका निर्णय किया है ६ जावेत इसमें जितना अंतर से सूर्य का उदय होता होवे उसका निर्णय किया है ७ नारकी-इस में नरक में नारकी उत्पन्न होते हैं या नारकी सिवाय अन्य जीव उत्पन्न होते है इसका निर्णय किया है ८ वाल-इसमें एकान्त पालका स्वरूप कहा है, ९ गुरुक-इसमें कोनसा जीव भारी होता है इसप्रश्न का निर्णय किया है ?.. चलणाओ-इसमें अन्य दर्शनियों का ऐसा कथन होवे कि चलमाणे अचलिए इत्यादि प्रश्न का निर्णय किया है। इस द्वादशांग रूप श्रुत सो अर्हत् भवचन उस को नमस्कार होवो. इस तरह नमस्कार करके श्री * प्रकाशक-राजाहादुर लाला मुहानहायती मालामादगी * GYO 888 पंचमाङ्ग विवाह पप्णत्ति (भगवती)-सूत्र 8888 शब्दार्थी न० नगर की व० बाहिर उ० ईशान दि० दिशा में गु० गुणशिल णा नामका चे० चैत्य हो० था त० तहां से श्रेणिक राजा चि० चेलणादेवी ॥ १॥ ते. उस का काल ते. उस स समय में स० श्रमण १०भ० भगवान् म० महावीर आ० आदिकर ति तीर्थकर स० स्वयं संबुद्ध पु० पुरुपोत्तम पु. पुरुपसिंह सूत्र स्स णयरस वहिया उत्तरपुरच्छिमे दिसीभाए गुणासिलए णामं चेइए होत्था तत्थ- णं सेणिए राया, चिलणादेवी ॥ १ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महा- वीरे-आदिगरे, तित्थगरे,सयंसंबुद्धे, पुरिसुत्तमे पुरिससीहे, पुरिसवर पुंडरीए,पुरिसवरगंधह- भावार्थ सुधर्मा स्वामी अपने पाटवीय शिष्य श्री जम्बूस्वामी को कहते हैं कि उसकाल उस समय में अर्थात् इस अवसर्पिणी काल के दुपम सुपम नामक चौथे आरेमें भगवन्तने इस कथाका उपदेश दिया तव राजगृह * नामक नगर था. उमका वर्णन रायमसेणी सूत्र से जानना. उस राजगृही नगरी की ईशान कोन में गुणशील नामक यक्ष का चैत्य (विव अथवा विम्ब युक्त आयतन ) था. उस राजगृह श्रेणिक राजा राज्य करता था. और उनको चेलणा नायक राणी थी. ॥१॥ उस काल उस समय में 10 श्रुत व चारित्र धर्म की आदि के करनेवाले, साधु साध्वी, श्रावक व श्राविका इन चार तीर्थ को * यद्यपि वर्तमान काल में राजगृह नामक नगर है तथापि अतीत काल जैसा अब नहीं अनत वर्णादिक के पुद्गलों का क्षय हुवा है, इसलिये यहां भूतकाल का प्रयोग किया है. 2989- पहिला शतकका पहिला उद्देशा ४ ॐ अनुवादक पालयलाचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 82 शब्दार्थ लि. लिपिक को॥ ॥रा० राजगृह में च० चलन दु० दुःख कं० कांक्षा पदोप प० प्रकृति पु० पृथ्वी जा. जावन्त ० नारकी वा० बाल गु० गुरुक च० चलन॥*ण नमस्कार सु श्रुतको ते० उस का काल ते. उस स० समय में रा० राजगृह णा० नाम न० नगर हो० था व वर्णन वाला त. उस रा० राजगृह ओसेय, पगइ, पुढवीओ, जावते, नेरइए, बाले, गुरुएय, चलणाओ।। णमो सुअस्स ॥ सूत्र तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णामं णयरे होत्था, वण्णओ तस्सणं रायगिह- भावार्थ चलिए इत्यादि चलण विषय अर्थ का निर्णय रूप पहिला उद्देशा नव प्रश्न का जानना. २ दुःख-इस में जीव अपना कीया हुवा कर्म वेदता है इत्यादि प्रश्नकी पृच्छा है. ३ कांक्षा पदोप-इस में जीवने कांक्षा मोहनीय कर्म किया ? ऐसे प्रश्नोंकी पृच्छा है ४ प्रकृति-इम में कर्म की कितनी मकृतियों कही हैं इत्यादि मनकी पृच्छा है. पृथ्वी-इस में रत्नप्रभादि कीतनी पृथ्वी है इसका निर्णय किया है ६ जावत इसमें जितना अंतर से सूर्य का उदय होता होवे उसका निर्णय किया है ७ नारकी-इस में नरक में नारकी उत्पन्न होते हैं या नारकी सिवाय अन्य जीव उत्पन्न होते है इसका निर्णय किया है ८ बाल-इसमें एकान्त पालका स्वरूप कहा है, ९ गुरुक-इसमें कोनसा जीव भारी होता है इसप्रश्न का निर्णय किया है ? चलणाओ-इसमें अन्य दर्शनियों का ऐसा कथन होवे कि चलमाणे अचलिए इत्यादि प्रश्न का निर्णय किया है। इस द्वादशांग रूप श्रुत सो अर्हत् प्रवचनः उस को नमस्कार होवो. इस तरह नमस्कार करके श्री * प्रकाशक-राजासादुर लाला नुनडायनी आलाप सादजी a ** ब्दार्थ भावार्थ 3 पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र १२० सरण ग• गति प० रहे हुवे अ• अप्रतिहत २० प्रधान ना. ज्ञान दर्शन घ० धरने वाले वि० निवृत्त छ. छमस्थपने से गि. जिते जा. जितानेवाले ति तीरे ता० तारक बुब्बुद्ध को बुझावे मु० मुक्त मो मुक्तकरे म० सर्वज्ञ स० सर्वदर्शी सि. शिव अ० अचल अ० रोगरहित अ० अनंत अ० अक्षय अ० दसणधरे, वियट छउमे जिणे, जावए, तिणे, तारए, बुढे, बोहिए, मुत्ते मायए, स- व्वण्णू सव्वदरिसी सिंव, मयल, मरुअ, मणंत, मक्खय, मव्वाबाह, मपुणरावत्तियं, चक्षु के दातार, मोक्ष मार्ग के दातार, विविध प्रकार के उपद्रव से पीडित, जीव को रक्षा स्थान-मोक्ष स्थान देनेसे शरण देनेवाले, सम्यक्त्व चारित्र रूप वोधिके देनेवाले, श्रुत चारित्र रूप धर्म देनेवाले, धर्म के उपदेशक, धर्म के नायक, धर्मरूप रथके सारथी, जैसे पृथिवी पे समस्त राजाओं में चक्रवर्ती प्रधान है वैसेही धर्म कथन में भंगवान् चक्रवर्ती चारों गतिके अंत करनेवाले, जैसे समुद्र में रहे हुवे जीवों को द्वीप आधार भूत है वैसेही संसार रूप समुद्र में रहे हुवे प्राणियों को आधार भूत, अप्रतिहत व श्रेष्ट ज्ञान दर्शन के धारक, छमस्थपना से निवर्तनेवाले, रागादि जीतनेवाले, अन्य को धर्मोपदेश कर के रागद्वेप जीतानेवाले, स्वयं संसार समुद्र से तीरनेवाले, अन्य को संसार समुद्र से तीरानेवाले, स्वयंतत्त्वको जानने वाले, अन्य को तत्वका ज्ञान देनेवाले, स्वयं अष्टकर्म से मुक्त होनेवाले व अन्य को मुक्त करानेवाले, सर्वज्ञ सर्वदर्शी, सब उपद्रव रहित, अचल, रोगरहित, अनंत, अक्षय, अव्यायाध, अपुनरावर्त ऐसीसिद्ध 33 पहिला शतक का पहिला उद्देशा 988s शब्दार्थ सुत्र अनुसादर - मालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीनी 63 पु० पुरुपवर पुंडरीक पु० पुरुपवर गंधहस्ती लोलोकमें उत्तम लो• लोक के नाथ लो० लोक के हितकर्ता लो लोक में द्वीपसमान लो० लोकमें प० सूर्यसमान अ० अभय देनेवाले च० चक्षुके देनेवाले म० मार्ग देनेवाले जी. जीव देनेवाले रक्षक वो० वोधि देनेवाले घ० धर्मके देनेवाले ध० ध० धर्मके उपदेशक घ० धर्मके नायक ध० धर्मके सारथि ध० धर्ममें व० प्रधान चा० चातुरंत चक्रवर्ती दी द्वीप ता० त्राण थी, लोगुत्तमे, लोगनाहे, लोगहिए लोगपदीवे, लोग पन्जोयगरे, अभयदए, चक्खु- दए, मग्गदए, सरणदए, जीवदए, बोहिदए, धम्मदए, धम्मदेसिए, धम्मनायगे, धम्म- सारहिए, धम्मवर चाउरंत चक्कवट्टी, दीवो ताण सरणगइपइटे, अप्पडिहयवरणाण स्थापनेवाले, अन्यके उपदेश विना स्वताही हेय ज्ञेय उपादेय पदार्थ स्वरूप को जाननेवाले, रूपादि अतिशय अथवा जात्यादिकके उच्चत्वसे पुरुपोंमें उत्तम, शौर्यगुणसे पुरुपमें सिंह समान, सब अशुभ पाप रहित होनेसे पुरुषों में पुंडरीक कमल समान, पुरुषों में गंधहस्ती समान लोक में उत्तम, लोककेनाथ अर्थात् योग सो जिसको पहिले धर्म नहीं प्राप्त हुआहै उतको धर्म की प्राप्ति कराना और क्षेम सोधर्मकी प्राप्ति होनेपर मनको स्थिर रहनेदेना इस तरह योगव क्षेम दोनों करनेवाले होनेसे लोककेनाथ, पविधजीवनिकाय रूप लोक की रक्षा करने से हितकारी, संझी पंचेन्द्रिय जीवरूप लोकको द्वीपसमान, गणवरादिलोकको उद्योतके करनेवाले, अभय के दाता, श्रुतज्ञानरूप १ आसन्न सिद्धिक मोक्षगामी सव भव्य जीव. * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी* भावार्थ शब्दार्थ सूत्र 8288 पंचपाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8-8 गुण घो घोरतपस्वी घो० घोर ब्राह्मचारी उ० मुश्रुपा रहित से० संक्षिप्त वि० बहुत ते. तेजस लेश्या च० चौदहपुर्वी च० चार णा० ज्ञान के उ० धारक स० सर्व अक्षर स० सन्निपाति स० श्रमण भ० भगवान् म. महावीर से अ० दूर नहीं नजदीक नहीं उ० अर्ध्वजानु अ० अधोशिर झा० ध्यान कोठे में उ० तवे, तत्ततवे, गहातवे,घोरतवे,उराले, घोरे, घोरगुणे, घोर तबस्सी घोर वंभचेरवासी, उच्छू- ढ सरीरे, संखित्तविउल तेउलेस्से, चउद्दसपुब्बी, चउणाणोवगए, सव्वक्खरसणि- वाती, समणस्स भगवओ महावीरस्स अदूरसामंते उड्डजाणू अहोसिरे झाणकोट्ठो- की अवगाहनावाले, समचतुत्र संस्थान से संस्थित, वज्रमपम नाराच. संघयण युक्त, कनकके विन्दुसमान व पन कमल समान गौर वर्णवाले, उग्रतपस्वी, दीप्त तपवाले, आशंप्तादि दोप रहित, महत् तप करने वाले, घोर तप करनेवाले, प्रधान तपसे पार्थस्थादि जीव को भय उपजानेवाले, परीपह व इन्द्रियादि रिपु को नाश करने में घोर, अन्य जीव नहीं आचर सके वैसे घोरगुणों को धारन करनेवाले, घोर तपस्वी, घोर ब्रह्मचारी, शरीर की शुश्रुपा का त्याग करनेवाले, अनेक योजन प्रमाण क्षेत्राश्रित वस्तुदहन में समर्थ तेजोलेश्या को संकुचित करनेवाले, उत्पातादि चौदह पूर्व के धारक, फेवल ज्ञान वजित चार ज्ञान के धारक व सब अक्षर के मंयोगको जाननेवाले गौतम स्वामी श्री श्रमण, भगवंत महावीर स्वामी से <B> पहिला शतकका पहिला उद्देशा 988 भावार्थ शब्दार्थ सत्र १०% अनुवादक-वाल्यामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी ४ अव्यावाघ अ० पुनरागमन रहित सि सिद्धगति ना० नाम ठा० स्थान को सं० प्राप्त करने की का इच्छापाले जा० यावत् स० समवसरण प० परिषदा णि निर्गता ध० धर्म क• कहा ५० परिषदा पति- गता ॥ २ ॥ ते. उस का काल ते. उस म० समय में स० श्रमण भ० भगवान् म० महावीर के जे. ज्येष्ट अं० अंतेवासी ई० इन्द्रभूति ना० नाम का अ० अनगार गो० गौतम गोत्रीय म० सात हाथ के ऊंचे स० समचतुस्र टान सं० सहित ३० वज्र ऋपभ नाराच संघयणी क० सुवर्ण पु० कसोटी णि घसाहुवा सिद्धगइनामधेयं ठाणं संपाविउकामे जाव समोसरणं । परिसाणिग्गया । धम्मोक- हिओ, परिसा पडिगया ॥ २ ॥ तेणं कालेणं, तेणं समएणं; समणस्स भगवओ महावीररस जेटे अंतेवासी इंदभुती णाम अणगारे गोयमगोत्तेणं सत्तुस्सेहे समचउरे- स सठाण संठिए, बजरिसह नाराय संघयणे कणगपुलगणिघसपम्हगोरे, उग्गतवे, दित्त गति को प्राप्त करने की इच्छालाले श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामीने राजग्रह नगर के गुणशील नामक बगीचे में बारहे प्रकार की परिपदा की समक्ष धर्मोपदेश दिया. जीव है, अजीव है लोक है अलोक यावत् मोक्ष है. परिपदा के देव,देवी, मनुष्य वगैरह सब भगवंत को चांदकर स्वस्थान गये ||२|| उस काल उस ममय में श्री श्रमण भगवंत का जेष्ट अंतेवासी इन्द्रमति नामक अणगार, गौतम गोत्रीय, सात हाथ १ चार देव, चार देवी व चतुर्विध संघ. * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावाथा १२ - पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 880- शब्दार्थ विशेष उत्पन्न हुवा है कुतुहल उ० स्थान से उ० उठे प्र० स्थान से उठकर जे० जहां स० श्रमण भ० भगवान् म० महावीर ते. तहां उ० आये उ० आकर स: श्रमण भ० भगवान् म० महावीर को ति० तीनवक्त आ आदान प०प्रदक्षिणा क०की क०करके वं०वंदे न० नमस्कारकिये वै० वंदनकर ण. नमस्कार करण नीचा आसनसे णा० दूरनहीं सुश्रवण करने की इच्छावाले ण. नमस्कार करते अ० सन्मुख वि० विनय से पं. हस्त जोडकर प० सेवा करते एक ऐसा व वोले ॥ ४ ॥ से वह पू० निश्चय भं० भगवन कोउहल्ले, । उट्ठाएउट्ठति, उट्ठाएउद्वैत्ता जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव- उवागच्छइ; उवागच्छित्ता समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणं, पयाहिणं करेइ, करेइत्ता वंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता णचासणे णातिदूरे, सुस्सूसमाणे णमंस- माणे आभिमुहे विणएणं पंजलिउडे पज्जुवासमाणे एवं वयासी ॥ ४ ॥ से णूणं- भावार्थ से उपस्थित हुवे. उपस्थित होकर जहां श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी विराजते थे वहां आये. आकर श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामीको तीन बार प्रदक्षिणा कर के वांदे नमस्कार किया. वंदणा नमस्कार कर के अतिदूर व अति नजीक भी नहीं वैसे भगवंत के वचन श्रवण करने की अत्यंत अभिलापा रखते हुवे, नमस्कार करते हुये, भगवन्त सन्मुख मुख कर के विनय पूर्वक हस्तद्वय जोडकर सेवा करते हुवे ऐसा बोले अर्थात् गौतम स्वामीने ऐसा प्रश्नकिया॥४॥अहो भगवन !जो कर्म अपनी स्थितिसे चलनेलगे, भोग सन्मुख > पहिला शतक का पहिला उद्देशा 938 Cyo शब्दार्थ १० सूत्र १ अनुवादक-बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी8 रहेहुचे सं० संयम त० तप से अ० आत्मा को भा. भावते वि. विचरते हैं. ॥३॥ त० तब गो० गौतम को ना० उत्पन्न है स ० श्रद्धा जा० उत्पन्न है सं० संशय जा० उत्पन्न है को० कुतुहल उ० उत्पन्न हुइ स० श्रद्धा उ० उत्पन्न संशय उ० उत्पन्न कुतुहल स० विशेष उत्पन्न है श्रद्धा सं० विशेष उत्पन्न है संशय सं० विशेष उत्पन्न है कुतुहल स० विशेष उत्पन्न हुइ है श्रद्धा सं० विशेष उत्पन्न हुवा है संशय सं० वगए संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरइ ॥ ३ ॥ तएणं से भगवं गोयमे जा- यसड्डे, जायसंसये, जायकोउहल्ले; उप्पण्णसड्डे, उप्पण्णसंसए, उप्पण्णकोउहल्ले; सं- जायसड्ढे, संजाय संसये, संजाय कोउहल्ले, समुप्पन्नसड्डे, समुप्पन्नसंसये, समुप्पन्न बहुत दूर नहीं वैसेही नजीक भी नहीं ऐसे ऊर्धजानु व अधोशिर (उत्कर आसन ) कर बैठेहुवे धर्म ध्यान व शुलध्यान करते और, संयम व तपसे आत्मा को भावते हुवे विचर रहें ॥ ३ ॥. उस समय श्री गौतम स्वामी को तत्त्वार्थ जानने की श्रद्धा उत्पन्न हुई। क्योंकी “चलमाणे चलिए" इस में वर्तमानकाल व अतीतकाल एक सरिखा कहा ऐसा वाक्य किस न्यायसे कहा? ऐसा संशय उत्पन्न हुवा, किस प्रकार से इस का अर्थ प्रकाशेंगे ऐसा कुतुहल उत्पन्न हुवा, तत्काल श्रद्धा उत्पन्न हुई, तत्काल संदेह उत्पन्न हुवा तत्काल कुतुहल उत्पन्न हुवा, विशेष श्रद्धा हुई, विशेप संशय उत्पन्न हुवा, व विशेष कुतुहल उत्पन्न हुवा निस को ऐसे व समुत्पन्न श्रद्धा, समुत्पन्न संशय व समुत्पन्न कुतुहल वाले श्री गौतमस्वामी स्वस्थानक * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादनी * भावार्थ - पंचमाङ्ग विवाह पप्णत्ति (भगवती) सूत्र 888%> शब्दार्थ मिस णि निर्जरते को णि निर्जरा है. हा गो गौतम ! च. चलते को च० चला जा० यावत् पि. लिज्जमाणे छिण्णे ? भिजमाणे भिण्णे? दझमाणे दड्डे ? मिजमाणे मडे?णिजरिजमाणे णिनि सूत्र इन्धन जलाना. शाकिया इस तरह जलाले को जलाया कहना? ८ जिम के आयुप्य का संचित पुद्गल का नावाय क्षय होने लगा मृत्यु सन्मुख हुवा तब उस मरते को मरा कहना ?९ जीव प्रदेश से कर्भ पुद्गलों की निर्जरा करने लगा उस निर्जरा करने को निर्जरा कहना? यह नवप्रश्नों श्री महावीर स्वामीसे गौतम स्वामीने पूछे राव भगवन्त महावीर स्वामी उत्तर देते हैं कि हा गौतम ! उनका अर्थ वैसही है. अर्थात् जैने किसी कपडे बनानेवाले वनकरने कपडा बनाना शरु किया और प्रथम तंतु युना उभे वस्त्र बना कहा जाता है वैसेही उक्त प्रकार के कार्य जिस समय में शरु किये उस ही समय में हुवे कहे जासकते हैं. यद्यपि इन को पूर्ण होने में असंख्यात समय व्यतीत होते हैं तापि उस की परिणति में उस की सब आकृति धनगइ है या वह पूर्ण करने का अभिलापि बना हुवा है. १ वैसे ही जिसने अपने अनादि कर्म को कर्मस्थिति से मंचलित किये, भोगवने सन्मुख हुवा उन्हें निश्चय से कर्म भोगवेगा. २ जो उदय नहीं आये हैं उन को उदारणा से उदय में लाने का जिसने प्रयत्न किया वह उदीरना करेगा. ३ जिनके कर्म उदयमें आकर वेदना देनेशगे वे सयही वेदे जावेंगे ४ जिन के कर्म जीवके प्रदेशसे पतन होनेलगे उम के सब कर्म पड़ेंगे ५ जिसने कर्म की स्थिति हस्व कालकी की वह क्षय करेगा जो कर्म पुद्गलों को परावर्तन करने लगा वह परावर्तगा. * पहिला शतक का पहिला उद्देशा ७ १२ अनुवादक बालबाह्मचारामुनि श्री अमोलक ऋपिनी ४ शब्दार्थ च० गटने को च० चला उ० उदीरते को उ० उदीरा वेग्वेदते को वे वेदा प० छोडते को ५० छोडा लि. छेदने को छि० छेदा भि० भेदते को भि० भेदा दः जलाते को द० जलाया मि० मरते को म० सूत्र भंते !चलमाणे चालए ?उदीरिजमाणे उदीरिए ? वेदिजमाणे वेदिए ? पहेजमाणे पहीणे ! मावाध उनकों को क्या चलेही कहना ? + २ जो कर्म उदय में नहीं आये हैं, बहुत आगामिक काल में उदय आगे उनको शुभ अध्यवसाय से आकर्ष कर उदय में लावे उसे उदीरणा कहते हैं. इस तरह प्रथम समय उदारणा करते को उदीरही क्या कहना ? ३ कर्य उदय में आकर प्रथम समय में वेदते होवे उन्हें क्या देही कहना. ? ४ जो कर्म पुद्गल जीव के प्रदेश में अबलम्बन कर रहे थे वे पतन होने लगे उन्हे क्या पगन हुआ कहना ? ५ जो कर्म दीर्घकाल की स्थितिवाले थे उनका छेदन कर अल्प काल की स्थितिवाले बनाये, इस तरह से प्रथम समय में छेदते को छेदा कहना ? ६ जो कर्म तीवरस देने वाले थे उनको मंद. रस देनेवाले बनाये इस तरह उनकर्मों को प्रथम समयमें भेदतेको भेदे कहना.? ७ ध्यानरूप ज्वालासे कर्मरूप + श्री मुधर्मा स्वामी ने सूत्र की आदि में अन्य अनेक प्रश्नों को छोडकर "चलमाणे चालिए" यह प्रश्न ययों ग्रहण किया ? समाधान-धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष इन चारों को साधने में उद्यमश्रेष्ठ कहा है. चारों में मोन श्रेष्ठ है वह कर्मक्षय से होता है और कर्म क्षय अनुक्रम से होता है इसालय प्रधान हेतु की सिद्धि के लिये प्रथम ही"चलपाणे चलिए" इसमश्नसे निश्चय किया कि जिनके कर्म अपने अनादि स्वभावकी सिद्धिसे चलित हुन उन को चले ही कहना मोक्ष प्राप्ति का प्रथम कार्य में ही यह दर्शाया है.. * प्रकाशक-सजावहादुर लाला मुखदेवतायनी ज्वालाप्रसादजी * C.C शब्दार्थ ७ 89 अथवा णा विविध अर्थी वि०विविधउचारके णा विविध व्यंजनके गोगौतम ए ये चचार पद ए एकअर्थी णाविविध उचारणा विविध व्यंजन उ० उत्पन्न पक्षके ए ये पं०पांचपदणा विविधAणा विविध उच्चारके पूज णाणा वंजणा? गोयमा! चलमाणे चलिए, उदीरिजमाणे उदीरिए, वेइज्जमाणे येइए, पहेज- माणे पहीणे, एएणं चत्तारि पया एगट्ठा णाणा घोसा, णाणावंजणा उप्पण्ण सूत्र भावार्थ 2. पंचमांग विवाह पप्णति (भगवती) मूत्र 8380- ये चार पद उत्पन्न पक्ष आश्रित एक अर्थवाले, अनेक घोप, ३ अनेक व्यंजनवाले हैं यहांपर दो पक्ष ग्रहण किये हैं एक उत्पाद पक्ष और दूसरा विगध पक्ष. उस में उक्त चारों पद केवल ज्ञान सो उत्पाद और मोक्ष सो विगत पद. जस में यह चारों पद केवल उत्पाद विपयक होने से एक अर्थ वाले को हैं जैसे केवल ज्ञान पर्याय जीव को पहिले नहीं प्राप्त हुइ थी और जीव का प्रयास केवल ज्ञान निमित्त है इसलिये वह ही केवल ज्ञान उत्पत्ति पर्याय कहा. जो कर्म चलायमान होयेंगे ये उदय में आयेंग और जो उदय में आगे वे वेदे जायेंगे और वेदे पीछे क्षीण होयेंगे, इस लिये उत्पाद पक्ष में ये चारों पद एकार्थ वानी जानना. अथवा स्थिति बंधादि विशेपित सामान्य आश्रय से एकार्थ है. केवल उत्पादक पक्ष के साधक है, क्यों कि उत्पन्न पक्ष में कर्म चिंता का प्रक्षीणपना होता है. छिन्न पद में स्थिति का विगम कहा, भिन्न पद में रसका विगम कहा. दज्झा पद में दाहरूप विगम कहा, मिज पद में आयुष्य कर्म १३ अभावका विगम कहा, णिजरिज पद में सब कर्म का विगम कहा इस लिये इनको विगत पक्ष में पहिला शतक कापहिला उद्देशा 9ARY १.. २. भनुवादक-बानबालचारी मुनि श्री अमोलक पिनी शब्दार्थ निग्नको णि निर्जरा॥५॥ए येन नवपद कि क्या ए०एक अ णा०विविध उचारके णा विविश्व्यंजनके उ०१ पणे ? ॥ हंता गोयमा! चलमाणे चलिए जाव णिज्जारज्जमाणे णिजिण्णे ॥ ५ ॥ एएणं सूत्र भंते नवपदा किं एगट्ठा, णाणा घोसा, णाणा वंजणा उदाहु णाणट्ठा, णाणा घोसा, ७ जो शुभ ध्यानरूप अग्नि से कर्म रूप इन्धन जलानेलगा वह कर्म को जलावेगा ८ जिसके आयुप्य का भावाथा पुल क्षीण होनेलगा वह मरेगा ९ जिसने कर्म की निर्जरा करनी शरु की वह कर्म की निर्जरा करेगा. इस रीति से इन नव कार्यों को प्रारंभ करते ही वनाहुवा कहना ॥ ५ ॥ पुनः गौतम स्वामी प्रश्न करने हैं. कि अहो भगवन् ! इन नव पद का क्या एक अर्थ या एक प्रयोजन है ? या उदात्त, अनुदात्त व स्वरित घोपवाले हैं ! अनेक व्यंजनमय है ! अथवा विविध प्रकार के अर्थवाले, घोपवाले, या व्यंजनवाले हैं। अहो गौतम ! १ चलमाणे चलिए २ उदीरिजमाणे उदीरिए, ३ वेइज्जमाणे वेइए ४ पहेज्जमाणे पहीण यहां चौभंगी जानना. १ एक,अर्थ एक व्यंजन जैसे क्षीर क्षीर २ एक अर्थ अनेक व्यंजन यथा क्षार पयः ३ अंक अर्थ एफ व्यंजन अर्क गोमहिपी का क्षीर ४ अनेक अर्थ अनेक व्यंजन घट पटादि. इस में दूसरा चाया भांगा यहां ग्रहण किया है, अन्य दोनों भांगे असंभवित होनेसे नहीं ग्रहण किये हैं इस सूत्र में चन्द्रमाणेधादि चार पद आश्रित दूसरा भांगा जानना और छिज्जमाण वगैरह पांचपद आश्रित चांथा भांगा जानना. * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी on 9 १७ 83 पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 892 पदार्थ वामेल ऊ ऊंचाश्चासले णी नीचाचालले जं. जैसे उ ऊ पासपद में ॥ ८ ॥णे. नारकी मं• भग- वर आ० आहाराके अर्थी ज. जैसे प०पन्नवणा में प० प्रथम शतक में आ० आहार उद्देशे में त० तैसे भा० कहनाठि स्थिति उ० अश्वास आ० आहार किं० किंसतरह आ. भाहारले स० सर्वसे क० कितना भाग स० सर्व की० किसप्रकार से भु० वारंवार १० परिण ॥ ९ ॥णे. नारकी भं० भगवन् पु० पूर्व आ० सूत्र जहा उस्सासपदे ।। ८ ॥णेरइयाणं भंते आहारट्ठी, ? जहा पन्नवणाए पढमसए आहारुहेसए तहा भाणियव्यं ॥ गाथा ।। ठिति उस्सालाहरे, किंवाहारेई सवओबावि; कइभागं सवाणिव कीसव भुजो परिणमंति ॥ १ ॥ ९ ॥ जेरइयाणं भंते पुब्बा- वाथ के जीव निरंतर समय मात्रका विरह गहित-श्वासोश्वास लेते हैं ऐसा कहा है वैसेही यहां जानना. ॥८॥ अहो भगवन् नारकी आहार के अ-िवांच्छक हैं ? इस का पन्नवणा सूत्र में प्रथम शतक के आहार उद्देशे में जैसे कहा है वो कहना. नारकी कैने आहारलेवे ? आत्मा के सब प्रदेश से आहार लेये. नारकी कितना आहार लेये ! आहार निमित्त जितने पुद्गल ग्रहण किये होवे उस के असंख्यात भाग का आहार लेवे, अनंत भाग में आस्वादे, अथवा आहार परिणम योग्य सब पुद्गल का आहार करे. जिन पुगलों का आहार किया है वे पुद्गलों किप्त प्रकार से वारंवार परिणमते हैं ! वे आहार के पुद्गलों इन्द्रियपने यावत् ले गरिर मा अधिकार निम्तार पूर्वक पत्रणा सत्र से जानना ॥९. !! अब नारकी SEP> पहिला शतक का पहिला उद्देशा 988-8 90 दाव्दार्थ १३ सूत्र ? * अनुवादक-बालनाचारी मुनि श्री अमोलक पिनी- णा विविधव्यंजन के वि० विगतपक्ष का ६॥णे नारफी को भ० भगवन के कितने कालकीठि स्थिति १५० प्ररूपी गो गौतम ज० जघन्य द० दशवर्षस० सहस्र उ० उत्कृष्ट ते ० तेत्तीस सा० सागरोपम की ठि० स्थिति ॥ ७॥णे० मारकी भं० भगवन् के. कीतना का काल में आ० थोडाश्वासले पा० बहुत पक्खस्स छिजमाणे छिण्णे भिजमाणे भिण्णे, दज्झमाणे दवे, मिजमाणे मए णिजीरज- माणे णिजिण्णे, एएणं पंचपदा-णाणट्ठा, णाणाघोसा, णाणा वंजणा, विगय पंक्ख- रस ॥ ६ ॥ गैरइयाणं भंते केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता ? गोयमा ! जहण्णेणं दस बास सहस्साई ठिई पण्णत्ता, उक्कोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाई ठिई पण्णत्ता ॥ ७ ॥ गेरइयाणं भंते केवइयं कालस्स आणमंतिवा, पाणमंतिधा, उससंतिवा, णीससंतिवा ? एक कहे हैं. ये पांचों पद विगत पक्ष की अपेक्षा से विविध प्रकार के अर्थ, घोप, व व्यंजनवाले हैं. ये पांचों पद विगत पक्ष पाचक हैं. इसका अन्तिम नववा पदमें मोक्षकी कथा कही और वह मोक्ष जीवको होता है.॥६॥ नरकादिक चौषिस दंडक के जीव कहे जाते हैं. उन में से प्रथम नरककी स्थिति का प्रश्न चलता है अहो भगवन् ! नरक के नेरइयों की कितने काल की स्थिति कही ? अहो गौतम ! नारकी की प्रथम नरक की अपेक्षा जयन्य दश हजार वर्ष की और सातवी नरक की अपेक्षासे उत्कृष्ट तेत्तीस सागरोपम की कही. ॥७॥ अहो भगवन् नारकी किवतेकाल तक वासोवास लेवे ? अहो गौतम जैसे श्वासोश्वासपद में नारकी * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुवदेवमहायजी बालाप्रसादजी* भावार्थ 66 ए ११ Ads पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र ब्दिाथ सजा त्रिसंजोगी. चतुःसंजोगी. पंचसंजोगी. करते पो० पुद्गल प० परिणमें प० परिणमते हैं अनाहारी आ° आहार करेंने पो० पुद्गल णो नहीं प. परिणमें प. परिणमेंगे गी १५ २० १५ १२३४ १२३४६/अ० अनाहारीक अ० आहार नहीं करेंगे पा. पुद्गल णो नहीं १२,१२३२५६ १३/१२४३४५ १२३५/ १२३४६ १४/१.२५/३४६ १२३६, १२३५६/परिणमंतिय। अणाहारिया आहारिजरसमाणा पोग्गलाणी १२४५ १२४५६/परिणया परिणामस्संति । अणाहारिया अणाहारिजस्स- माणा पोग्गला णो परिणया णो परिणमिस्संति ॥१०॥ १.२५६ २३४५६ २४१३६ १३४५, णेरइयाणं भंते पुवाहारिया पोग्गला चिया ॥ पुच्छा ॥ २५/२४५ १३४६छसंजोगी? गवार्थ २६१४० १३९६२ २३.४५३ अहो गौतम ! नारकी को पहिले ग्रहण किये हुचे पुद्गल परिणमें क्यों कि ग्रहण किये पीछे ही पुद्गल परिणमते हैं पूर्व ३५/२३४ २३४० जोगी. कालमें ग्रहण किये वर्गमान में ग्रहण करते हैं वैसे पुगलों नारकी ३०/२३५ को परिणमें और परिणमते हैं अतीत काल में पुद्गल नहीं ग्रहण ४५२३६ किये हैं और भविष्य में ग्रहण करेंगे वैसे पुल नारकी का ४६२४५० २४५६ परिणमें नहीं हैं परंतु अनागत में ग्रहण किये अनंतर परिण- ५६२४३/ मेंगे, अतीत काल में ग्रहण नहीं किये और भविप्योभी ग्रहण नहीं करेंगे वैसे पुद्गल नारकी को परिणमें नहीं और परिणयेंगे P><3 पहिला शतक का पहिला उद्देशा एक सं. SA9 शब्दार्थ १८ भाराध REE अनुवादक गालवामानारी मान श्री अमोलक ऋपिनी 85 आधारकिये पो पदल प० परिण में आ० आहारकिये आ० ओहार करत पो. पुद्गल प-परिणमें अ.आ. रनहीं िकये आ० आहार करेंगे पापुदल प०परिणमें अ आहारनहींकिये भ० नहीं आहार करेंगे पो० पुद्गल प०परिणमें गो गौतम! णे नारकी पु०पूर्वआहारनहींकिये पोपुद्गल प०परिणमें आ० आहारकिये आ०आहा हारिया पोग्गला परिणया आहारियाआहारिजमाणापोग्गला परिणया अणाहारिया आहारि जस्समाणा योग्गला परिणया अणाहारियाअणाहारिजरसमाणा पोग्गला परिणया? गोयमा णेरइयाणं पुवाहारिया पोग्गला परिणया, आहारिया आहारिज्जमाणा पोग्गला परिणया के भाहागाधिकार से आहार विपयिक प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! नारकी को पहिले-शरीर साय आहार यि हुरे पगल क्या परिणमे ? पूर्वकाल में जिन पुद्गलों का आहार किया होवे अथवा वर्तमान में आहार करने है ये पुद्गलों नारकी को क्या परिणमें ? पूर्वकाल में जिन पुद्गलों का आहार नहीं किया और भविष्य में आहार करेंगे वैसे पुद्गलों क्या नारकी को परिणमें ? ओर पूर्वकाल में आहार के पुद्गलों संग्रहे नहीं और अनागत में भी संग्रह करेंगे नहीं वैसे पुद्गलों क्या नारकी को परिणमें ? यहां चार प्रश्न कहे उस के ६३ भांगे होते हैं. अतीत काल में आहारे, वर्तमान में आहारते हैं और अनागत में भादारंगे, अतीत काल में आहारे नहीं, वर्तमान में नहीं आहारते हैं और भविष्य में आहारेंगे इस तरह छ पद के ६३ भांगे होते है. अब भगवंत श्री महावीर स्वामी उत्तर देते हैं. • प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवतहायजी ज्वालाप्रसादजी * नहीं > पंचमांग विवाह.पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 8 ब्दार्थ अ. आश्री दु० दोपकार के पो पुद्गल चि० चिने अ० सूक्ष्म वा वादर ए. ऐसे उपचिन णे० नारकी क० कितने प्रकार के पी० पुद्गल उ उदीरते हैं गो० गौतम क० कर्म दल द्रव्य व० वर्गणा अ० आश्री दु० दोपकारके पोपुद्गल उ० उदीरते हैं उ०अपवर्तनकिये उ अपवर्तत हैं उ०अपातेंगे सं०संक्रमें मं०संक्रमतेहैं सं०११ संक्रमेंगे निः विखरें नि: विखरते हैं नि विखरेंगे नि० एकत्रित हुवे नि० एकत्रित होते हैं नि० एकत्रित सत्र कतिविहा पोग्गला चिजंति ? गोयमा ! आहारदव्य वग्गणमहिकिच्च, दुविहा पोग्ग- ला चिजति तंजहा अणचेव वायराचेव. । एवं उवाचजति ॥णेरइयाणं भंते क- तिविहा पोग्गला उदीरति ? गोयमा ! कम्मदव वग्गणमहिकिच्च दुविहा पोग्गला उदीरंति, तंजहा-अणूचेव बायराचेव । सेसावि एवं चैव भाणियव्या । वेदति । णि- जरंति । उयाटुंसु । उयटुंति । उयटिरसंति ॥ संकार्मिसु । संकामति । संकामिस्तंति।। वार्थ सेही शरीर संबंधी चय उपचय पहिले कहा. आहार मे ही चय उपचय होता है परंतु अन्य द्रव्य से नहीं होना है. उस में सूक्ष्म सो केवालि गम्य और बादर सो चर्मचक्षु ग्राह्य है. ऐसे ही उपविन आश्रित कहना. अहो भगवन् ! नारकी को कितने प्रकार के पुद्गल की उदीरना होने ? अहो गौतम ! नारकी को कद्रव्य वर्गणा आश्रित सूक्ष्म व चादर ऐसे दो प्रकार के पुद्गल की उदीरणा होये. क्यों की उदीरनादिक कर्म sya दिव्य को होती है ऐसे ही ५ वेदे ६ निर्जरे ७ अपवर्तन हुवे, ८ अपवर्तन होता है, १ अपवर्तन हायेंगे १० १ अध्यवसाय से कर्म स्थिति को हीन करना यहां अपवर्तन में उपलक्षण सं उद्वर्तन भी ग्रहण करना उद्वतन सो स्थिति आदि को द्धि करना. १. पहिला शतक का पहिला उद्देशा >> सूत्र १.१ अनुवादक-बालबालचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दार्थ परिणौ णो नहीं प. परिणमेंगे।।१.०॥णेनारकीने भ भगवन् पु०पूर्वाहारी पो० पुद्गल चिइकठेकिये ज. जैसे प० परिणमें त० तैमे चि० इकठेकिये उ० उपचिने उ० उदीरे वे वेदे णि निर्जरे ए० एकेक प० पदमें चार प्रकारकेपो०पुद्गल हैं॥११॥णे० नारकी ककितने प्रकारसे पो पुद्गलभिभेदातेहैं गो गौतम क० कर्म द द्रव्य व० वर्गणा अ० आश्री दु० दोपकार के पो० पुद्गल भि० भेदावे अ० सूक्ष्म वा वादर णे० नारकी का किनने प्रकार के पो० पुगल चि० चिणे गो गौतम ! आ० आहार द. द्रव्य व धर्गणा परिणया नहा चियावि एवंचिया उवचिया,उदीरिया,बेइया,णिजिणा|गाथा॥परिणत चियाय उवचिया उदीरिया वेइयाय णिजिण्णा, एकिक्कम्मि पदाम्म चउन्विहा पोग्गलाहोति ॥ १ ॥ ११ ॥ णेरइयाणं भंते कतिचिहा पोग्गला भिजति ? गोयमा ! कम्मदव्य वग्गणमाहगिच्च दुविहा पोग्गला भिजति तंजहा अणूचेव, बायराचेव णेरइयाणं भंते भावार्थ नहीं.॥१०॥अहो भगवन् नारकीको पहिले आहारे हुवे पुद्गल एकमित किये! अहो गौतम इसका सवखुलाला जम परिणमें का कहा वैसे ही जानना. और इसी तरह बहुत एकत्रित किये, उदीरे, वेदे और निर्जरे ऐसे एक २ पद में चार २ भेद जानना ॥ ११ ॥ अहो भगवन् नारकी को कितने पुदल अनुभाग भेद से भेदा ? अर्थात तीवमंद, मध्यभेद से भेदंपामे, उद्वर्तन करण से मन्दरस तीनहोवे तीव्ररस मंद होवे ? अहो गौतम कर्म द्रव्यवर्गणाके आश्रित दो प्रकारके पुद्गल भेदपावे सूक्ष्म व बादर. उदारिकादि द्रव्यमें कर्म द्रव्यही सूक्ष्म है. अहो भगवन् ! नारकी को कितने प्रकार के पुद्गल चिणे, एकत्रित हुवे ? अहो गौतम आहार द्रव्य नर्गणा के आश्रित मूक्ष्म व वादर ऐसे दो प्रकार के पुद्गल एकत्रित होते हैं क्यों की आहार द्रव्य * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सदायनी ज्वालाप्रसादजी * स० ><पंचमांग विवाह. पण्णसि ( भवगती) सूत्र ब्दिार्थ अ. आश्री दु० दोपकार के पो• पुद्गल चि० चिने अ० सूक्ष्म वा वादर ए. ऐसे उपचिन णे० नारकी क० कितने प्रकार के पी० पुद्गल उ०उदीरते हैं गो गौतम क० कर्म दल द्रव्य व वर्गणा अ० आश्री दु० दोपकारके पो पुद्गल उ० उदीरते हैं उ० अपवर्तनकिये उ अपवर्तते हैं उ० अपातेंगे सं० संक्रमें नं०संक्रमतेहैं संक्रमेंगे निः विखरें नि० विखरते हैं निः विखरेंगे नि० एकत्रित हुवे नि० एकत्रित होते हैं नि० एकत्रित सत्र कतिविहा पोग्गला चिजंति ? गोयमा ! आहारदव्य वग्गणमहिकिच्च, दुविहा पोग्ग- ला चिजति तंजहा अणूचेव बायराचेव. । एवं उवाचजति ॥णेरइयाणं भंते क. तिविहा पोग्गला उदीरति ? गोयमा ! कम्मदव्य वग्गणमहिकिच्च दुविहा पोग्गला उदीरांति, तंजहा-अणूचेव बायराचेव । सेसावि एवं चेव भाणियव्वा । वेदति । णि- जरंति । उयाटुंसु । उयति । उयटिस्संति ॥ संकार्मिसु । संकामति । संकामिस्तंति॥ वाथ सेही शरीर संबंधी चय उपचय पहिले कहा. आहार मे ही चय उपचय होता है परंतु अन्य द्रव्य से नहीं होना है. उस में सूक्ष्म सो केवालि गम्य और बादर सो चर्मचक्षु ग्राह्य है. ऐसे ही उपचिन आश्रित कहना. अहो भगवन् ! नारकी को कितने प्रकार के पुद्गल की उदीरना होवे ? अहो गौतम ! नारफी को कद्रव्य वर्गणा आश्रित मूक्ष्म व वादर ऐसे दो प्रकार के पुद्गल की उदीरणा होवे. क्यों की उदीरनादिक कर्म द्रव्य को होती है ऐसे ही ५ वेदे ६ निर्जरे ७ अपवर्तन हुवे. ८ अपवर्तन होता है, ९ अपवर्तन हविगे १० १ अध्यवसाय से कर्म स्थिति को हीन करना यहां अपवर्तन में उपलक्षण से उद्वर्तन भी ग्रहण करना उद्वर्तन सो स्थिति आदि की वृद्धि करना. पहिला शतक का पहिला उद्देशा 982 शब्दार्थ २२ सत्र 2 अनुरादा-बालमानारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी - होंगे स. सर्व में क० कर्म द० द्रव्य व० वर्गणा अ आश्री भे भेद चि. चिन उ० उपचिन उ० उदीर वे. वेद णि निर्जरा उ. अपवर्तन सं० संक्रमन नि० निधर णि निकाच ति तीन प्रकार का का० काल ॥ १२ ॥ न० नारकी जे जो०. पो. पुद्गल ते तेजस क० कार्माणपने गि० ग्रहण करते हैं ते० वे किं. निहतिसु । निहत्तंति । निहत्तिस्संति निकाइंसु । निकायति । निकाइस्संति ॥ सव्वे- सुवि कम्म दव्ववग्गण भहिकिच्च ॥ गाथा ॥ भेदिय चिता उवचिता, उदीरिता वे- रियाय णिजिष्णा । उवदृण संकामण णिहत्तणिकायणे तिविह कालो ॥ १ ॥१२॥ णेरइयाणं भंते जे पोग्गला तेया कम्मत्ताए गिण्हंति, ते किं तीतकाल समए गिण्हंति? मूल व उत्तर प्रकृतियों का अध्ययसाय स परस्पर संचार होना उसे संक्रामन कहते हैं. अतीत काल मंक्रमण ११. हुवा, वर्तमान काल में संक्रमण होता है और १२ आगामिक में संक्रमण होयेगा, भिन्न विखरे हुवे पुद्गलों को निधत्त करना. १.३ ऐसे अतीत काल में एकत्रित किये, १४ वर्तमान में कर रहे १५ आगामिक में एकत्रित करेंगे. १६ अतीत काल में निकाचे, १६. वर्तमान में निकाचते हैं और १८ आगामिक में निकाचेंगे उक्तसब १८ भेद कर्म द्रव्य वर्गणा आश्रित जानना. ॥ १२ ॥ अहोभगवन् नारकी जो पुहल तेजत व कार्माण शरीरपने ग्रहण करते हैं वे क्या अतीतकाल में ग्रहण करते हैं. वर्तमान * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायगी बालाप्रसादजी भावाथा 16 MS . शब्दाथ, Q4 सूत्र पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भगवती) सूत्र - क्या ती० अतीत काल स. समय में गि० ग्रहण करते हैं प० वर्तमान समय में गि० ग्रहण करते हैं अ. अनागत स ममय में गि० ग्रहण करते हैं गो० गीतम णो नहीं ती० अतीत काल में गि. ग्रहण करते हैं प० वर्तमान काल में गि० ग्रहण करते हैं णो नहीं अ० अनागत काल में गि० ग्रहण करते हैं णे. नारकी जे. जो पी० पुद्गल ते. तेनस क० कार्माणपने गः ग्रहाहुवा उ० उदीरते हैं ते० वे कि क्या ती० अतीत काल में ग० ग्रहा हुवा पो० पुद्गल उ. उदीरते हैं ५० वर्तमान काल में घि० लेते हैं। पडुप्पण्ण कालसमए गिण्हति ? अणागय काल समए गिण्हंति ? गोयमा ! णो तीत कालसमए गिण्हंति, पडुप्पण्ण कालसमए गिण्हंति, गो अणागय कालसमए गिण्हंति णेरइयाणं भंते जे पोग्गला तेयाकम्मत्ताए गहिए उदौरंति; ते कितीत कालसमय गाहिए पोग्गले उदीरंति, पडुप्पण्ण काल समय धिप्पमाणे पोग्गले उदीरंति, गहण समय पुरक्खडे पोग्गले उदीरति ? गोयमा ! तीत काल समय गहिए में ग्रहण करते हैं या अनागत में ग्रहण करते हैं ? अहो गौतम ! अतीत काल में नहीं ग्रहण करे वर्तमान काल में ग्रहण करे और अनागत काल में ग्रहण करे नहीं. अहो भगवन् नारकी जो पुद्गल तेजस कार्माण कर्मपने ग्रहण करके उदीरते हैं. वे क्या अतीत काल के ग्रहण किये पुद्गल उदीरते हैं, वर्तमानकाल में ग्रहण करते पुद्गल उदीरते हैं अथवा ग्रहण समय से आगे के पुद्गल उदीरते हैं ? अहो गौतम! भावार्थ शब्दार्थ २२ सूत्र 2 अनुवादक-यालबागचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 83 होंगे स० सर्व में क० कर्म द० द्रव्य व० वर्गणा अ• आश्री मे भेद चि. चिन उ० उपचिन उ० उदीर ० वेद णि निर्जरा उ. अपवर्तन सं० संक्रमन नि० निधत णि निकाच ति तीन प्रकार का का० काल ॥ १२ ॥ न० नारकी जे जो०. पो. पुद्गल ते तेजस् क० कार्माणपने गि० ग्रहण करते हैं ते. वे किं. निहत्तिं । निहत्तंति । निहत्तिस्संति निकाइंसु । निकायति । निकाइस्सति ॥ सव्वे. सुवि कम्म दव्ववग्गण महिकिच्च ॥ गाथा ॥ भेदिय चिता उवचिता, उदीरिता वे- दियाय णिजिण्णा । उवण संक्रामण णिहत्तणिकायणे तिविह कालो ॥ १.॥१२॥ णेरइयाणं भंते जे पोग्गला तेया कम्मत्ताए गिण्हंति, ते किं तीतकाल समए गिण्हंति? मूल व उत्तर प्रकृतियों का अध्ययमाय स परस्पर संचार होना उसे संक्रामन कहते हैं. अतीत काल मंक्रमण ११. हुया, वर्तमान काल में संक्रमण होता है और १२ आगामिक में संक्रमण होवेगा, भिन्न २ विखरे हुवे पुद्गलों को निधन करना. १३ ऐसे अतीत काल में एकत्रित किये, १४ वर्तमान में कर रहे ११५ आगापिक में एकत्रित करेंगे. १६ अतीत काल में निकाचे, १६. वर्तमान में निकाचते हैं और १८ आगामिक में निकाचेंगे उक्तसब १८ भेद कर्म द्रव्य वर्गणा आश्रित जानना. ॥ १२ ॥ अहोभगवन् ! नारफी जो पुगल तेजत व कार्माण शरीरपने ग्रहण करते हैं वे क्या अतीतकाल में ग्रहण करते हैं. वर्तमान *प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालामसादजी भावार्थ * २६ पचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 83-8% अर्थ संग्रहते स० सर्व में अ० अचलित नो० नहीं च० चलित ने० नारकी जी० जीव किं क्या च० चलित कर कर्म णि जिंजरे अ०अचलित गोगौतम च० चलित क०कर्म णिणि रेणो नहीं अ० अचलित क कर्म णि मिर्जरे ५० बंध उ० उदय उ०अपवर्त सं० संक्रमन नि० निधत्त नि०निकाच में अ० अचलित क० कर्म भ० होये च० चलित णिं. निर्जरा में ॥ १४ ॥ अ० असुर कुमार की मंः भगवन् के० कितना का० सूत्र उदीरंति, अचलियं कम्मं उदीरति ? गोयमा णो चलियं कम्मं उदीरति अचलियं कम्मं उदीरंति । एवं वेदंति उयटंति । संकामति । निहत्तंति । णिकायति । सव्वेसु अचलियं णो चलियं णेरइयाणं भंते जीवाओ किं चलियं कम्मं णिजरेंति अचलियं कम्मं णिजाति ? गोथमा ! चलियं कम्मं णिजति, णो अचलियं कम्म णिज्जरेति ॥ गाहा ॥ बंधोदयवेदोवट संकमण णिहत्त णिकाएसु । अचलियं कम्मंतुभवे, चलियं जीवाउ णिजरए ॥ १४ ॥ असुरकुमारणं भंते केवइयं कालं भावार्थ की उदीरणा करे या अचलित कर्म की उदीरणा करे ? अहो गौतम ! चलित कर्म की उदीरणा करे नहीं परंतु अचलित कर्म की उदारणा करे. ऐसे ही ३ वेदना, ४ क्षीण करना ५ संक्रमाना ६ धारना १७ निकाचना इन सब में चलित कर्म लेना नहीं परंतु अचलित कर्म लेना ८ अहो भगवन् नारकी जीव- प्रदेश से चलित कर्भ की निर्जरा करते हैं या अचलित कर्म की निर्जरा करते हैं ? अहो गौतम ! नारकी P3 पहिला शतक का पहिला उद्देशा 8-81- Yo २४ RO अनुवादक बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 89 शब्दार्थ पो. पुदन उ. उदीरते हैं गः ग्रहण समय पु० आगे पो पुद्गल उ० उदीरते हैं गो गौतम ! ती. अतीत काल में ग. ग्रहे दुवे पो० पुद्गल उ. उदीरते हैं णो० नहीं प० वर्तमान में वि० लेते पो० पुद्गल उ० उदीरते हैं जो नहीं ग्रहण समय पुः आगे पो० पुद्गल उ० उदीरते हैं ए. ऐसे वे० वेदते हैं णि निर्जरते हैं ॥ १३ ॥णे० नारकी भ० भगवन् जी० जीव कि० क्या चः चलित का कर्म यं० यांचे अ० अचलित कः कर्म वं० बांधे गो० गौतम णो नहीं च० चलित क. कर्म वं० गये अ० प्रचलित क० कर्म २० वांधे उ. उदीरे पे० वेदे उ० अपवर्ते सं० संक्रो नि० निवर्ते नि० पोग्गले उदीरति णो पडुप्पण्ण काल समय घिप्पमाणे पोग्गले उदीरंति, णो गहण समय पुरक्खडे पोग्गले उदीरंति । एवं वेदति । णिजरंति ॥ १३ ॥णेरइयाणं भंते जीवाओ किंचलियं कम्मंबंधति, अचलियं कम्मंबंधति ? गोयमा णोचलियं कम्मबंधति अचलियं कम्मं बंधति णेरइयाणं भंते जीवाओ किंचलियं कम्म भावार्थ अतीत काल में ग्रहण किये पुद्गल उदीरते हैं परंतु वर्तमान में ग्रहण करते अथवा ग्रहण समय आगे के पुद्गल उदीरते नहीं है ऐसेही चेदन निर्जरा का जानना.. ॥ १३ ॥ १ अहो भगवन् ! नारकी जीव प्रदेश मे क्या चलित कर्म का बंधकरे या अचलित कर्म का बंधकरे ? अहो गौतम ! तेजस कर्म के योगसे चलित कर्म का बंधकरे नहीं परंतु अचलित कर्म का बंधकरे अहो भगवन् नारकी जीव प्रदेश से चलित कर्म * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादनी * 610 849 २५ 828:पचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 7-8%> दार्थ संग्रहते स० सर्व में अ० अचलित नो० नहीं च० चलित ने० नारकी जी० जीव किं क्या च० चलित क. कर्म णि जिरे अ०अचलित गो गौतम च० चलित क०कर्म णिणि रेणो० नहीं अ० अचलित क कर्म णि णिर्जरे ५० वध उ०उदय उ०अपवर्त सं० संक्रमन नि० निधत्त निनिकाच में अ० अचलित क० कर्म भ० होवे च० चलित णि निर्जरा में ॥ १४ ॥ अ० असुर कुमार की भं० भगवन् के० कितना का० सूत्र उदीरंति, अचलियं कम्मं उदीरंति ? गोयमा णो चलियं कम्मं उदीरति अचलियं कम्मं उदीरंति । एवं वेदति उयहति । संकामति । निहत्तंति । णिकायति । सव्वेसु अचलियं णो चलियं गेरइयाणं भंते जीवाओ किं चलियं कम्मं णिजरेति अचलियं कम्मं णिजति ? गोयमा ! चलियं कम्मं णिजरेति, णो अंचलियं कम्म णिजरेति ॥ गाहा ॥ बंधोदयवेदोवट संकमण णिहत्त णिकाएसु । अचलियं कम्मतुभवे, चलियं जीवाउ णिज्जरए ॥ १४ ॥ असुरकुमारणं भंते केवइयं कालं भावार्थ की उदीरणा करे या अचलित कर्म की उदीरणा करे ? अहो गौतम ! चलित कर्म की उदीरणा करे नहीं परंतु अचलित कर्म की उदीरणा करे. ऐसे ही ३ वेदना, ४ क्षीण करना ५ संक्रमाना ६ घारना १७ निकाचना इन सब में चलित कर्म लेना नहीं परंतु अचलित कर्म लेना ८ अहो भगवन् नारकी जीव- प्रदेश से चलित कर्म की निर्जरा करते हैं या अचलित कर्म की निर्जरा करते हैं ? अहो गौतम ! नारकी 8- पहिला शतक का पहिला उद्देशा 8%80- शब्दार्थ अनुवादक-पालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8- काल की ठि० स्थिति गोर गौतम ज० जघन्य ६० दश वर्ष स० सहस्र उ० उत्कृष्ट सा० अधिक सा० सागरोपम ॥ १५ ॥ असुर कुमार के० कितनाकाल में आ० थोडा श्वासले पा० बहुत श्वास से ऊ० ऊंचा श्वासले णी नीचाश्चासले गो. गौतम न० जघन्य स० सात थो० स्तोक उ० उत्कृष्ट सा० अधिक प० पक्ष ठिई प० गोयमा अहण्णेणं दस वास सहस्साई ठिई प० उक्कोसेणं साइरेगं सागरोवमं सूत्र ॥ १५ ॥ असुरकुमाराणं भंते केवइयं कालं आणमंतिवा, पाणमंति वा ऊससंतिवा, नीससंतिवा ॥ पुच्छा ॥ गोयमा ! जहण्णेणं सत्तण्डं थोवाणं, उक्कोसेणं साइरेगस्स पंक्खस्स आगमंतिवा पाणमंतिवा, ऊससंतिवा, नीससंतिवा, ॥ १६ ॥ असुर- भावार्थ चलित कर्म की निर्जरा करे अचलित कर्म की निर्जरा करे नहीं ॥ १४ ॥ अहो भगवन् ! असुर कुमार की कितने काल की स्थिति कही ? अहो गौतम ! असुरकुमार की स्थिति जघन्य दश हजार वर्ष की उत्कृष्ट एक सागरोपम से कुच्छ अधिक कही [ उत्तर दिशाके चलेन्द्र आश्रित जानना] ॥ १५॥ अहो भगवन् ! अमुरकुमारके देव कितने काल में श्वासोश्वास लेते हैं? अहो गौतम ! असुर कुमार के देव जघन्य सात स्तोक में उत्कृष्ट एक पक्ष से कुच्छ अधिक में श्वासोश्वास लेवे ॥ १६ ॥. अहो भगवन् ! असुरकुमार आंहार के अर्थी हैं ! हां गौतम ! वे आहार के अर्थी हैं. अहो भगवन् ! कितने समय में उन को आ- १ अमुरनिकायमें उत्पन्न होनेसे व कुमारकी तरई क्रीडा करनेसे अमुरकुमार कहाये गये हैं। * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी 00 * । दार्थ २७ 388 पंचमांग विवाह पाणत्ति (भगवती) सूत्र 9888 ॥ १६ ॥ अ० असुरकुमार भं० भगवन् आ० आहार के अर्थी है. हां आ० आहार के अर्थी अ० असुर कुमार को भं• भगवन् के० कितना काल में आ० आहार की इच्छा स० उत्पन्न होवे गो. गौतम अ० असुर कुमार को दु० दोप्रकार का आ० आहार आ० आभोगनिवर्तित अ० अनाभोगनिवर्तित त. तहां जे० जो अ० अनाभोग निवर्तित से वह अ० समय समय में अ० आंतरा रहित आ० आहार की इच्छा स० उत्पन्न होवे त० तहां जे० जो आ० आभोग निवर्तित से वह ज. जघन्य च. चतुर्थभक्त कुमाराणं भंते आहारट्ठी ? हंता आहारट्ठी । असुर कुमाराणं भंते केवइय कालस्स आहारट्टे समुप्पज्जइ १ गोयमा ! असुर कुमाराणं दुविहे आहारे . पण्णत्ते तंजहा आभोगनिव्वत्तिएय, अणाभोग णिव्यत्तिएय । तत्थणं जे से अणाभोगणिव्वत्तिए से अणुसमयं अविरहिए आहारट्ठे समुप्पज्जइ । तत्यणं जे से आभोगणिव्वत्तिए से जहण्णणं चउत्थ भत्तस्स उक्कोसेणं हार की इच्छा उत्पन्न होती है ? अहो गौतम ! असुर कुमार को दो प्रकार का आहार कहा. १ आ. भोग निवर्तित सो जानते हुवे आहार लेवे और २ अनाभोग निवर्तित सो अनजान से करे. उस में जो अनाभोग निवर्तित आहार है उप्त की इच्छा पतिसमय विरह रहित नारकी को उत्पन्न होवे और आभोग निवर्तित जो आहार है उस की इच्छा जघन्य चतुर्थ भक्त (एक दिन) में उत्पन्न होवे उत्कृष्ट एक हजार पहिला शतकका पहिला उद्देशा -* भावार्थ शब्दार्थ २८ सून . १ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी उ० उत्कृष्ट सा० सातिरेक वा० सहस्र वर्ष में आ० आहार की इच्छा स० उत्पन्न होवे ॥ १७ अ० असुर कुमार किं० क्या आ० आहार आ० ग्रहण करते हैं गो० गौतम द. द्रव्य से अ० अनंत प० प्रदेश द० द्रव्य खे० क्षेत्र का० काल भा० भाव से प० पनवणा में से० शेष जं. जैसे णे० नारकी को जा० यावत् ते उनको पो० पुद्गल की कीसतरह भु. वारंवार प० परिणमते हैं गो० गौतम सो० श्रोतेन्द्रियपने सु० सुरूपपने मु० अच्छावर्णपने इ० इष्टपने इ० इच्छापने अ० अच्छी वांच्छापने उ० प्रधानपने णो० नहीं अ० साइरेगरस वाससहस्सस्स आहारट्टे समुप्पज्जइ. ॥ १७ ॥ असुरकुमाराणं भंते किं आहार माहारेति ? गोयमा ! दव्वओ अणंतपएसियाई दव्वाई खेत्त काल भाव पण्णवागमेणं सेसं जहा णेरइयाणं जाव तेणं तेसिं ' पोग्गला कीसत्ता भुजो भुजो परिणमंति ? गोयमा ! सोइंदियत्ताए, सुरूवत्ताए, सुवण्णत्ताए, इट्टत्ताए, इच्छियत्ताए, वर्ष से कुच्छ अधिक समय में उत्पन्न होवे ॥ १७ ॥ अहो भगवन् ! अमुरकुमार जाति के देवता क्या आहार करे! अहो गौतम ! द्रव्य से अनंत प्रदेशी द्रव्य का आहार करे, क्षेत्र से, काल से. भाव से आ- हार करने की विधि जैसी पन्नवणा सूत्र में कही है वैसी यहां जानना और शेष सब अधिकार नारकी का कहा वैसे ही यहां कहना. और उनको पुद्गल कीस तरह परिणमते हैं ? उन को पुद्गल श्रोतेन्द्रियपने, सुरूप, सर्वोत्कृष्ट वर्ण, इष्टपने, ईप्सितपने षड्ऋतु में सुखदायीपना से, वारंवार ऐसाही बना रहुँ - ऐसी * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवस हायजी ज्वालामसादनी * ? भावार्थ २९ सूत्र 989- पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती.) सूत्र 83-85- अर्थ अधोपने सु० सुखपने णो० नहीं दुआ दुःखपने भु० वारंवार प. परिणमते हैं ॥ १८ ॥ अ० असुर कुमार भ० भगवन् पु° पूर्वाहारी पो० पुद्गल प० परिणमें अ० असुरकुमार के अ अभिलाप से ज. जैसे णे० नारकी जा० यावत् च० चलित क० कर्म णि निर्जरते हैं ॥ १९ ।। ना० नागकुमार की मं० भगवन के० कितना काल की ठि० स्थिति गो० गौतम ज ० जघन्य द० दशवर्प स० सहस्र उ० उत्कृष्ट दे० देशऊण, अभिज्झियत्ताए, उद्वृत्ताए णो अहत्ताए सुहत्ताए णोदुहत्ताए भुज्जो भुजो परिण- मंति ॥ १८ ॥ असुरकुमाराणं भंते ! पुवाहारिया पोग्गला परिणया ? असुर कुमाराभिलावेणं जहा गैरइयाणं जाव चलियं कम्मं णिजरेति ॥ १९ ॥ णाग कुमाराणं भंते केवइयं कालं ठिई प. ? गोयमा ! जहण्णेणं दसदाससहस्साई उक्कोसेणं देसूणाई दो पलिओवमाई ॥ २० ॥ नागकुमाराणं भते केवइय काल वार्थ इच्छापने, ऊर्बपने, अधोपने नहीं, च सुखपने वारंवार परिणमते हैं परंतु दुःखपने नहीं परिणमते हैं ॥१८॥ अहो भगवन् ! असुरकुमार को पूर्व के ग्रहण किये हुवे पुद्गल परिणमें ? वे चलित कर्म की निर्जरा करते हैं वहां तक अमुरकुमारका सब आधिकार नारकीका अधिकार जैसे कहना ॥ १९॥ अहो भगवन् ! नागकुमार जाति के देवता की कितने काल की स्थिति कही ? अहो गौतम ! नाग कुमार जाति के देवता की जघन्य दश हजार वर्ष उत्कृष्ट देश ऊना दो पल्योपम की स्थिति कही ॥ २० ॥ अहो भगवन्! 388 पहिला शतकका पहिला उद्देशा 8888- ? अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दाया दो० दोपल्योपम की ॥ २० ॥ ना• नागकुमार भ० भगवन् के० कितना काल में आ० थोडाश्वास ले पा० बहुत श्वास ले ऊ० ऊंचा श्वास ले नीचा श्वास ले गोल गौतम ज० जघन्य स० सात थोभ उ० उत्कृष्ट मु० मुहूर्त पृथक ॥ २१ ॥ ना० नागकुमार भ० भगवन् आ० आहारके अर्थी हैं. हां आ• आहार के अर्थी णा० नागकुमार को भं० भगवन् के० कितना काल में आ० आहार की इच्छा स०उत्पन्न होवे गो गौतम ना० नागकुमार दु० दोपकार का आहार आ. आहारे आ° आभोग निवर्तित अ० अनाभोग सूत्र स्स आणमंतिवा, पाणमंतिवा, ऊससंतिवा, णीससंतिवा ? गोयमा ! जहण्णेणं सत्तण्हं थोवाणं, उक्कोसेणं मुहुत्त पुहुत्तस्स आणमंतिवा, पाणमंतिवा, ऊससंतिवा, नीससंतिवा. ॥ २१ ॥ नागकुमाराणं भंते आहारट्ठी ? हंता आहारट्ठी । णागकुमाराणं भंते केवइय कालरस आहारट्टे समुप्पज्जइ ? गोयमा ! णागकुमाराणं दुविहे आहारे पण्णणे तंजहां भावार्थ नागकुमार के देवता कितने काल में श्वासोश्वास लेते हैं ? अहो गौतम ! नाग कुमार देवता जघन्य सात स्तोक उत्कृष्ट मुहूर्त से पृथकूमें श्वासोश्वास लेते हैं ॥ २१ ॥ अहो भगवन् ! नागकुमार जाति के देवता क्या आहार के अर्थी हैं ? हां गौतम ! नागकुमार जाति के देवता आहार के अर्थी हैं. अहो भगवन् ! उन को कितने काल में आहार की इच्छा उत्पन्न होवे ? , अहो गौतम ! आहार दो प्रकार का १ दो मुहूर्तसे नव मुहूर्ततक. इसको प्रत्येक मुहूर्तभी कहते हैं. * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * हा Gro ३२ 88808 पंचमाङ्ग विवाह पण्गत्ति (भगवती) सूत्र 9888 शब्दार्थनिवर्तित त० तहां जे० जो अनाभोग निवर्तित से उनको अ० समय समयमें अ०आंतरा रहित आ० आहार । की इच्छा स० उत्पन्न होवे त० तहां जे० जो आ० आभोग निवर्तित से उनको ज० नघन्य च चतुर्थभक्त उ०. उत्कृष्ट दि० दिवस पृथक् आ० आहार की स०इच्छा उत्पन्न होवे से० शेप जः जैसे अ० असुरकुमार जा. यावत् च० चलित क० कर्म णि निर्जरते हैं ॥ २२॥ ए. ऐसे मु०सुवर्ण कुमार को भी जा० यावतू थ० स्तनित कुमार को ॥२३॥ पु. पृथ्वी काया की भ० भगवन के० कितना काल की ठिक स्थिति गो. आभोगाणिव्वत्तिएय, अणाभोगनिव्वत्तिएय । तत्थणं जे से अणाभोग णिव्यत्तिए से अणुसमयं अविराहिए आहारट्टे समुप्पज्जइ, तत्थणं जे से आभोग णिव्वत्तिए से- जहण्णेणं चउत्थभत्तस्स, उक्कोसेणं दिवस पुहुत्तरस आहारढे समुप्पज्जइ, सेसं जहा असुरकुमारणं जाव चलियं कम्मं णिजरेति ॥ २२ ॥ एवं सुवण्णकुमाराणवि जाव थणियकुमाराणंति ॥२३॥ पुढविकाइयाणं भंते केवइयंकालंठिई पण्णत्ता ? गोयमा ! भावार्थ १ आभोग निवर्तित, २ अनाभोग निवर्तित. उस में अनाभोग निवर्तित आहार की निरंतर समय २ में अ- विच्छिन्नपन्ने इच्छा उत्पन्न होती रहती है और आभोग निवर्तित आहार की इच्छा जघन्य चतुर्थ भक्त उत्कृष्ट दिन प्रथक अर्थात् दो दिन से नव दिन तक शेप चलित कर्म निरे वहां तकका अधिकार अमुर कुमार जैसे कहना ॥ २२ ॥ जैसे नागकुमार को कहा वैसे ही सुवर्णकुमार यावत् स्तनित कुमारका Pos><3 पहिला शतक का पहिला उद्देशा8883 ३० अनुवादक बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ दो० दोपल्योपम की ॥ २० ॥ ना• नागकुमार भ० भगवन् के० कितना काल में आ० थोडावास ले पा० बहुत श्वास ले ऊ० ऊंचा श्वास ले नीचा श्वांस ले गो गौतम ज० जघन्य स० सात थोभ उ० उत्कृष्ट मु० मुहूर्त पृथक ॥ २१ ॥ ना० नागकुमार भ० भगवन् आ० आहारके अर्थी हं० हां आ• आहार के अर्थी णा० नागकुमार को भ० भगवन् के० कितना काल में आ० आहार की इच्छा स०उत्पन्न होवे गो० गौतम ना० नागकुमार दु० दोपकार का आहार आ. आहारे आ3 आभोग निवर्तित अ० अनाभोग सूत्र स्स आणमंतिवा, पाणमंतिवा, ऊससंतिवा, णीससंतिवा ? गोयमा ! जहण्णेणं सत्तण्हं थोवाणं, उक्कोसेणं मुहुत्त पुहुत्तस्स आणमंतिवा, पाणमंतिवा, ऊससंतिवा, नीससंतिवा. ॥ २१ ॥ नागकुमाराणं भंते आहारट्ठी ? हंता आहारट्ठी । णागकुमाराणं भते केवइय कालरस आहारट्टे समुप्पज्जइ ? गोयमा ! णागकुमाराणं दुविहे आहारे पण्णणे तंजहा भावार्थ नागकुमार के देवता कितने काल में श्वासोश्वास लेते हैं ? अहो गौतम ! नाग कुमार देवता जघन्य सात स्तोक उत्कृष्ट मुहूर्त से पृथकूमें श्वासोश्वास लेते हैं ॥ २१॥ अहो भगवन् ! नागकुमार जाति के देवता क्या आहार के अर्थी हैं ! हां गौतम ! नागकुमार जाति के देवता आहार के अर्थी हैं. अहो भगवन् ! उन को कितने काल में आहार की इच्छा उत्पन्न होवे ?, अहो गौतम ! आहार दो प्रकार का दो मुहूर्तसे नव मुहूर्ततक. इसको प्रत्येक मुहूर्तभी कहते हैं. * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * 0 सत्र 88.9 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 83-83 ब्दार्थ उत्पन्न होवे गो० गौतम अ समय समय में अ० अंतर रहित आ० आहार की इच्छा स० उत्पन्न होवे पु० पृथ्वी काया भ० भगवन् किं. कौनसा आ० आहार आ० ग्रहण करे गो० गौतम द० द्रव्य से ज० जैसे णे. नारकी णि निर्व्याघात छ० छदिशि में वा० व्याघात आश्री सि० काचित् ति० तीनदिशा में सि० क्वचितू च० चारदिशा में सि० क्वचित् पं० पांचदिशा में व० वर्ण से का० काला नी नीला आहारटे समुप्पज्जइ ? गोयमा ! अणुसमयं अविरहिए आहारटे समुप्पजइ ॥ पुढविकाइयाणं भंते किमाहार माहारेति? गोयमा ! दबओ जहा णेरइयाणं. णिवा- घाएणं छदिसिं वाघायंपडुच्च सियतिदिसिं सियचउदिसिं, सियपंचदिसिं, वण्णओ काल नील लोहिय हालिद्द सुकिलाणं, गंधओ सुन्भिगंध दुरभिगंधाइं, रसओ तित्ताई कायिक जीव क्या आहार करते हैं ? द्रव्य से अनंत प्रदेशात्मक द्रव्य का आहार करे वगैरह सब अधि- भावार्थ कार नारकी जैसे कहना. निाघाते से छ दिशि का आहार लेवे पूर्वादिचार व ऊर्ध्व और अधो. व्याघात भाश्रित अर्थात लोकान्त के उपर या नीचे व पूर्व दक्षिण में अलोक होये वेस स्थान उत्पन्न होने वाले पृथ्वी का- यिक जीव तीन दिशा का आहार लेवें. उपर नीचे अलोक होवे वैसे स्थान में उत्पन्न होनेवाले चार दिशाका आहार करें, और छ दिशामें से एक दिशा में ही मात्र अलोक होवे वैसे स्थान उत्पन्न होनेवाले पांच १ लोकान्त निष्कुट को व्याघात कहते हैं उसको छोडकर अन्यत्र उत्पन्न होनेवाले. > पहिला शतक का पहिला उद्देशा 9883-88- 09 ३२ सूत्र अनुवादक-यालयमचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी • शब्दार्थ गौतम ज० जपन्य अं० अन्तर्मुहुर्त उ० उत्कृष्ट वा० वावीसवर्ष स० सहस्र की. ॥ २४ ॥ पु. पृथ्वी काया भ० भगवन के० कितना काल आ० थोडा श्वास ले पा वहुत श्वास ले ऊऊंचा श्वासले नी० नीचा श्वास ले गो० गौतम वे० मात्रा ॥ २५ ॥ पु० पृथ्वी काया आ० आहारार्थी हैं. हां गो० गौतम आ० आहार के अर्थी पु० पृथ्वी काया को के- कितना काल में आ० आहार की इच्छा स. जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं बावीसं वाससहस्साई ॥ २४ ॥ पुढविकाइयाणं भंते केवइयकालस्स आणमंतिवा, पाणमंतिवा, ऊससंतिवा, नीससंतिवा ? गोयमा! बेमायाए आणमंतिवा पाणमंतिवा, उससंतिवा नीससंतिवा ॥ २५ ॥ पुढविकाइयाणं भंते ! आहारट्ठी ? हंता गोयमा ! आहारट्ठी । पुढविकाइयाणं भंते केवइय कालस्स भावार्थ जानना ॥ २३ ॥ अहो भगवन् ! पृथ्वी काया की कितने काल की स्थिति कही ? अहो गौतम! जघन्य अंतर्मुहूर्त उस्कृष्ट २२ हजार वर्ष की ॥ २४ ॥ अहो भगवन् ! पृथ्वीकाया कितने काल में श्वासोश्वास, लेते हैं ? अहो गौतम! पृथ्वी कायाके जीव वे मात्रा से श्वासोश्वास लेवे अर्थात् उन को श्वासोश्वास लेने की मर्यादा नहीं है ॥ २५ ॥ अहो भगवन् ! पृथ्वी कायिक जीवों क्या आहार के अर्थी हैं ? हा गौतम ! वे आहार के अर्थी हैं. अहो भगवन् ! उन को आहार की इच्छा कितने काल में उत्पन्न होती ? अहो गौतम ! उन को प्रति समय विरह रहित आहार की इच्छा उत्पन्न होती है. अहो भगवन ! पृथ्वी * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी yo ३३ सत्र 888 पंचगंग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - 38-4888 पहिला शतक का पहिला उद्देशा-8883%88- दार्थ उत्पन्न होवे गो० गौतम अ समय समय में अ० अंतर रहित आ० आहार की इच्छा स० उत्पन्न होवे पु० पृथ्वी काया भं० भगवन् कि० कौनसा आआहार आ० ग्रहण करे गो० गौतम द० द्रव्य से ज०१० जैसे णे० नारकी णि निर्व्याघात छ० छदिशि में वा० व्याघात आश्री सि० काचित् ति० तीनदिशा में सि. क्वचितू च० चारदिशा में सि० क्वचित् पं० पांचदिशा में २० वर्ण से का० काला नी नीला आहारट्टे समुप्पज्जइ ? गोयमा ! अणुसमयं अविरहिए आहारट्टे समुप्पजइ ॥ पुढविकाइयाणं भंते किमाहार माहारेति ? गोयमा ! दव्वओ जहा णेरइयाणं. णिव्या- घाएणं छदिसिं वाघायंपडुच्च सियतिदिसिं सियचउदिसिं, सियपंचदिसिं, वण्णओ काल नील लोहिय हालिद्द सुकिलाणं, गंधओ सुन्भिगंध दुरभिगंधाई, रसओ तित्ताई कायिक जीव क्या आहार करते हैं ? द्रव्य से अनंत प्रदेशात्मक द्रव्य का आहार करे वगैरह सब अधि- भावार्थ कार नारफी जैसे कहना. निळधाते से छ दिशि का आहार लेवे पूर्वादिचार व ऊर्य और अधो. व्याघात आश्रित अर्थात लोकान्त के उपर या नीचे वपूर्व दक्षिण में अलोक होवे वेस स्थान उत्पन्न होने वाले पृथ्वी का- यिक जीव तीन दिशा का आहार लेवें. उपर नीचे अलोक होवे वैसे स्थान में उत्पन्न होनेवाले चार दिशाका आहार करें, और छ दिशामें से एक दिशा में है। मात्र अलोक होवे वैसेस्थान उत्पन्न होनेवाले पांच १ लोकान्त निप्कुट को व्याघात कहते हैं उसको छोडकर अन्यत्र उत्पन्न होनेवाले. YO शब्दार्थ ३८ सत्र ॐ अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी के लो० राता हा० पीला सु० शुक्ल गे० गंधसे सु० सुरभिगंध दु० दुराभिगंध र० रस से ति० तिक्तादि फा० स्पर्श क० कर्कश आदि मे० शेष त० तैसे पा जानना क० कीतना भाग आ० आहार करते हैं क० कीतना भाग फा० स्पर्शते हैं गो० गौतम अ० असंख्यात में भाग आ० आहार करते हैं अ० अनंत में भाग फा० स्पर्शते हैं जा० यावत् ते. उनको पो० पुद्गल की० कीस तरह भु० वारंवार प० परिणमते हैं। गो० गौतम फा स्पर्शेन्द्रियपने वे० वेमात्रा भु० वारंवार प. परिणमते हैं शेप ज० जैसे णे. नारकी जा ५, फासओ कक्खडाई ८, ॥ सेसं तहेव णाणत्तं कइभागं आहारेंति, कइभागं फासेति ? गोयमा ! असंखेन्नइ भागं आहारति अणंतभाग फासेंति । जाव तेणं पोग्गला कीसत्ताए भुजो भुजो परिणमंति ? गोयमा फासिंदिय बेमायाए भुजो भुजो दिशा का आहार करे. वर्ण से काला, नीला, रक्त, पीला व शुक्ल पुद्गलोंका आहार करें, गंध से सुरभिगंध व दुरभिगंध का आहार करें, रस से तिक्तादि पांचों रस का आहार करें और स्पर्श से कर्कशादि आठों स्पर्श का आहार करें. शेप जैसे नारकी का कहा वैसे ही कहना. परंतु इतना विशेप जानना कि कितना भाग का आहार करे व कितना भाग आस्वादे ? अहो गौतम ! असंख्यात भाग का आहार करे, व अनंत में भाग में आस्वादे. वे'पुद्गल कैसे परिणमते हैं ? अहो गौतम ! वे पुगलों स्पर्शेन्द्रियपमे परिणमे अथवा विषम मात्रा या विविध मात्रा से वारंवार परिणमे यावतू चलित कर्म निजरे वहां तक का शेष * प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालामसादजी * भावार्थ ३५ सत्र 998 पंचमाङ्ग विवाह पण्णति ( भगवती ) सत्र 8989 शब्दार्थ यावत् णो० नहीं अ० अचलित क० कर्म णि निर्जरते हैं।॥२६॥ए. ऐसे जा० यावत् २० वनस्पति काया को विशेप वि० स्थिति व० कहना जा० जो ज. जिनका उ ऊश्वास ० मात्रा ॥ २७ ॥ ० ये- न्द्रिय की ठि० स्थिति भी कहना उ० ऊपास बे० वेमात्रा |॥ २८ ॥ वे वे द्वीन्द्रिय को आ० आहारकी पु० पृच्छा अ० अनाभोग निवर्तित त० तैसे त० तहां जे० जो आ० आभोगनिवर्तित अ० परिणमंति, सेसं जहा णेरइयाणं जाव णो अचलियं कम्मं णिजरेति ॥ २६ ॥ एवं जाव वणरसइ काइयाणं, णवरंठिती वण्णेतव्वा जा जस्स उस्सासो वेमायाए॥ २७ ॥ बेइंदियाणं ठिती भाणियव्या, ऊसासो वेमायाए. ॥ २८ ॥ बेइंदियाणं आहारे पुच्छा, भावाथ सब अधिकार नारकी जैसे कहना ॥ २६ ॥ जैसे पृथ्वी कायिक जीवों का अधिकार कहा वैसे ही अपका- यिक, तेउकायिक. वायुकायिक व वनस्पति कायिक जीवोंका जानना. इस में मान स्थिति की भिन्नता बतलाइ है सो कहते हैं-सब की जघन्य अंत मुहूर्त की उत्कृष्ट अफ्कायिक जीवों की सात हजार वर्ष की, तेउकायिक जीवों की तीन अहो रात्रि, वायु कायिक जीवों की तीन हजार वर्ष की और वनस्पति कायिक जीवों की दश हजार वर्ष की और श्वासोश्वास मर्यादा रहित ॥ २७ ॥ द्वीन्द्रिय की स्थिति बारह वर्ष की कही और श्वासोश्वास मर्यादा रहित जानना ॥२८॥ अहो भगवन् ! द्वीन्द्रिय कैसे आहार करते हैं? अहो गौतम ! आहार के दो भेद आभोगनिवर्तित' व अनाभोगनिवर्तित. उस में आभोग 28- पहिला शतकका पहिला उद्देशा o0 ला 60 49 taram- अनुवादक-वालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ लो० राता हा० पीला सु० शुक्ल ग० गंधसे सु० सुरभिगंध दु० दुराभिगंध र० रस से ति० तिक्तादि फा० स्पर्श क० कर्कश आदि मे० शेप त० तैसे णा जानना क. कीतना भाग आ० आहार करते हैं .का कीतना भाग फा० स्पर्शते हैं गो० गौतम अ० असंख्यात में भाग आ० आहार करते हैं अ० अनंत भाग फा० स्पर्शते हैं जा०' यावत् ते० उनको पो० पुद्गल की० कीस तरह भु० वारंवार प. परिणमते हैं गो. गौतम फा० स्पर्शेन्द्रियपने वे० वेमात्रा भु० वारंवार प. परिणमते हैं शेप ज. जैसे णे. नारकी जा. सुत्र । ५, फासओ कक्खडाइं ८, ॥ सेसं तहेव णाणतं कइभागं आहारति, कइभागं फासेंति ? गोयमा ! असंखेजइ भागं आहारति अणंतभाग़ फासेति । जाव तेणं पोग्गला कीसत्ताए भुजो भुजो परिणमंति ? गोयमा फासिदिय बेमायाए भुजो भुजो भावार्थ दिशा का आहार करे. वर्ण से काला, नीला, रक्त, पीला व शुक्ल पुद्गलोंका आहार करें, गंध से सुरभिगंध व दुरभिगंध का आहार करें, रस से तिक्तादि पांचों रस का आहार करें और स्पर्श से कर्कशादि आठों स्पर्श का आहार करें. शेप जैसे नारकी का कहा वैसे ही कहना. परंतु इतना विशेष जानना कि कितना भाग का आहार करे व कितना भाग आस्वादे ? अहो गौतम ! असंख्यात भाग का आहार करे, व अनंत में भाग में आस्वादे. वे पुद्गल कैसे परिणमते हैं ? अहो गौतम ! वे पुद्गलों स्पर्शेन्द्रियपने परिणमे अथवा विषम मात्रा या.विविध मात्रा से वारंवार परिणमे यावतू चलित क़र्म निजैरे वहां-तक का शेप * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्यालाप्रसादजी * पंचमांग विवाह पण्णचि ( भगवती) मूत्र 839 ब्दार्थ ज० जैसे लो० रोम आहार प० कवल आहार जे. जो पो० पुद्गल लो० रोम आहारपने गि० ग्रहण करते हैं ते वे स० सर्व अ० निर्विशेष आ० आहारकरे जे. जो. पो. पुद्गल प० कवल आहारपने गि• ग्रहण करतेहैं पो० पुद्गल को अ० असंख्यात भाग को अ० आहारकरे अ० अनेक भाग स. सहस्र अ० नहीं भोगवे अ० नहीं स्पर्श वि० विध्वसंपाते हैं ए० इन पो० पुद्गल को अ० नहीं भोगवा न० नही स्पर्शा क. कौन से अ. थोडे व० बहुत तु. सरिखे वि. विशेषाधिक गो० गौतम स०सर्व से थोडा पो पुद्गल अ० नहीं पोग्गले पक्खेवाहारत्ताए गिण्हति तेसिणं पोग्गलाणं असंखेजइ भागं आहारैति. सूत्र अणेगाइंचणं भागसहस्साई अणासाइजमाणाई अफासाइजमाणाई विद्वंसमावज्जइ ।। एएसिणं भंते पोग्गलाणं. अणासाइजमाणाणं अफासाइजमाणाणं य, कयरे २ हिंतो अप्पावा, बहुलावा, तुल्लावा, विसेसाहियावा ? गोयमा ! सन्वत्थोवा पोग्गला 89894 पहिला शतक का पहिला उद्देशा भावार्थ ग्रहण करते हैं उन सव पुद्गलों का आहार करते हैं. और जो पुद्गल प्रक्षेप आहारपने ग्रहण किये जाते उन का असंख्यात में भागमें आहार करते हैं, और अनेक सहस्र भाग नहीं आस्वादते व नहीं स्पर्शते उन का विध्वंस होता है. अहो भगवन् ! नहीं आस्वादन किये हुवे व नहीं स्पर्श हुवे पुद्गलों में से कोनसा जल्प व बहुत है ? अथवा तुल्य है या विशेपाधिक है ? अहो गौतम ! सब से।
शब्दाथा ३ सूत्र 2 अनुवादक-पालबाह्मचारी मुनि श्री अमालक ऋपिजी 83 असंख्यात समय अ० अन्तर्मुहूर्त वे० वेमात्रा आ० आहार की इच्छा स० उत्पन्न होवे से० शेप त० तैसे जा. यावत् अ० अनन भाग आ० आस्वादे ॥ २९ ॥ ३० बेइन्द्रिय भं० भगवन जे. जो पो० पुगल आ० आहारपने गि० ग्रहण करते हैं ते वे किं. क्या स० सर्व आ. आहार करते हैं णो नहीं म. सर्व आ० आहार करते हैं गो० गौतम वे० वेइन्द्रिय को दु० दोपकार का आ० आहार प० कहा तं० वह अणाभोगणिन्वत्तिए तहेव ॥ तत्थणं जेसे आभोगाणिव्यत्तिए सेणं असंखेज समइए, अंतोमुहुत्तिए बेमायाए आहारट्टे समुप्पजइ. सेसं तहेव जाव अणंतभागं आसायंति ॥ २९ ॥ बेइंदियाणं भंते जे पोग्गले आहारत्ताए गिण्हति ते किं सव्वे आहारैति, णो सब्वे आहारेति ? गोयमा! बेइंदियाणं दुविहे आहारे पण्णत्ते तंजहा लोमाहारेय पक्खेवाहारेय । जे पोग्गले लोमाहारत्ताए गिण्हंति ते सव्वे अपरिसेसिए आहारेंति, जे निवर्तित आहार असंख्यात समयिक अंतर्मुहूर्त में मर्यादा रहित आहार करे. अन्य यावत् अनंत भाग का आस्वादन करे वहांतक का सब आधिकार पहिले जैसे कहना ॥ २९ ॥' अहो भगवन् ! इन्द्रिय जितने पुद्गलों को आहार के लिये ग्रहण करते हैं उन सब का क्या ये आहार करते हैं. या सव का आहार नहीं करते हैं ? अहो गौतम ! द्वीइन्द्रिय के आहार के दो भेद कहे हैं. १. रोम आहार सो ओघ से वर्षादि समय में जो पुगलों प्रवेश करे और २ प्रक्षेप. आहार सो कवल रूप. इस में जो पुद्गल रोम आहारपने ? प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ 00 ३५ ST><3 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र शब्दार्थ ज. जैसे लो० रोम आहार प० कवल आहार जे० जो पो० पुद्गल लो० रोम आहारपने गि० प्रहण करते हैं ते वे स० सर्व अ० निर्विशेष आ. आहारकरे जे. जो. पो. पुद्गल प० कवल आहारपने गि० ग्रहण करते हैं पो० पुद्गल को अअसंख्यात भाग को अ० आहारकरे अ० अनेक भाग स. सहस्र अ० नहीं भोगवे अ० नहीं स्पर्श वि० विध्वसंपाते हैं ए० इन पो० पुद्गल को अ० नहीं भोगवा न० नही स्पर्शा क० कौन से अ. थोडे व० बहुत तु० सरिखे वि० विशेषाधिक गो० गौतम स०सर्व से थोडा पो पुद्गल अ० नहीं पोग्गले पक्खेवाहारत्ताए गिण्हंति तेसिणं पोग्गलाणं असंखेजइ भागं आहारैति. सूत्र अणेगाइंचणं भागसहस्साई अणासाइजमाणाई अफासाइजमाणाई विढंसमावज्जइ ।। एएसिणं भंते पोग्गलाणं अणासाइजमाणाणं अफासाइजमाणाणं य, कयरे २ हिंतो अप्पावा, बहुलावा, तुल्लावा, विसेसाहियावा ? गोयमा ! सम्वत्थोवा पोग्गला 2988-83 पहिला शतक का पहिला उद्देशा भावार्थ ग्रहण करते हैं उन सब पुद्गलों का आहार करते हैं. और जो पुद्गल प्रक्षेप आहारपने ग्रहण किये जाते उन का असंख्यात में भागमें आहार करते हैं, और अनेक सहस्र भाग नहीं आस्वादते व नहीं स्पर्शते उन का विध्वंस होता है. अहो भगवन् ! नहीं आस्वादन किये हुवे व नहीं स्पर्श हुवे पुद्गलों में से कोनसा अल्प व बहुत है ? अथवा तुल्य है या विशेपाधिक है ? अहो. गौतम ! सव से।
शब्दार्थ ३८ १ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 भोगवा अ०.नही स्पर्शा अ० अनंतगुणा ॥ ३० ॥ वे वेइन्द्रिय भं० भगवन् पो० पुद्गल आ०.आहारपने गि० ग्रहण करते हैं ते वे पो० पुद्गल की० कीसतरह भु० वारंवार प० परिणमते हैं गो० गौतम जि० जिव्हेन्द्रिय फा• स्पर्शेन्द्रियपने वे० वेमात्रा भु० वारंवार प० परिणमते हैं वे० वेइन्द्रिय भं• भगवन् पु० पूर्वाहारी पो० पुदल प० परिणमा २० तैसे जा. यावत् च० चलित कर्म णि निर्जरे ॥ ३१ ॥ ते० तेइन्द्रिय च० चतुरेन्द्रिय णा० विविध प्रकार की ठि० स्थिति जा० यावत् अ० अनेक भा० भाग सहस अ० अणासाइजमाण, अफासाइजमाणा अणंतगुणा ॥ ३० ॥ बेइंदियाणं भंते पोग्गला आहारत्ताए गिण्हंति तेणं तेसिं पोग्गला कीसत्ताए भुजो भुजो परिणमंति ? गोयमा ! जिभिंदिय फासिदिय बेमायाए भुजो भुजो परिणमंति ॥ बेइंदियाणं भंते पुन्याहारिया पोग्गला परिणया तहेव जाव चलियं कम्मं णिजरेति ॥ ३१ ॥ तेइंदिय चउरिदि- घोडे आस्वाद नहीं कराये हुवे पुद्गल उस से अस्पर्शमान पुद्गल अनंत गुने कहे हैं ॥ ३० ॥ अहो भगवन् ! जो पुद्गल द्वीइन्द्रिय आहारपने ग्रहण करते हैं वे कैसे परिणमते हैं ? अहो गौतम ! वे आहार के पुद्गल वेइन्द्रिय को जिव्हेन्द्रियपने स्पर्शेन्द्रियपने व वमात्रासे परिणमते हैं. अहो भगवन् ! धेइन्द्रिय को पहिले के आहारे हुवे पुद्गल परिणमते हैं यावत् चलित कर्म की निर्जरा करते हैं वगैरह सब अधिकार पहिले जैसे कहना 1-३१॥ तेइन्द्रियः की स्थिति ४९ दिन की न चतुरेन्द्रिय की स्थिति ६ मास की अन्य सव अ- * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ शब्दाथा OY 4339 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8-89 नहीं मुंवते १० नहीं स्वादलेते अ० नहीं स्पर्शते वि० विध्वंसपाते हैं पो० पुद्गल को अ० नहीं संघहुवे अ. नहीं स्वादलिये अ० नहीं स्पर्शेहुवे गो० गौतम स० सर्व से थोडा पो० पुद्गल अ० नहीं सुंघेहुवे अ० नहीं स्वादलिये अ० अनंतगुने अ० नहीं स्पर्शहुये अ. अनंतगुने ते. तेइन्द्रिय को घा० घ्राणेन्द्रिय जि० जिव्हीन्द्रय फा० स्पर्शेन्द्रियपने वे० चेमात्रा भुं० वारंवार परिणमें च० चतुरिन्द्रिय को च० चक्षु- याणं णाणत्तं ठिईए जाव अणेगाइं च णं भागसहस्साइं अणाघाइजमाणाई, अ- णासाइजमाणाई, अफासाइजमाणाइं विद्धंसमावज्जति. एएलिणं भंते पोग्गलाणं अ. णाघाइज्जमाणाणं, अणासाइजमाणाणं अफासाइज माणाणं य पुच्छा ॥ गोयमा ? सव्वत्थोवा पोग्गला अणाघाइजमाणा, अणासाइजमाणा अणंतगुणा अफासाइजमा- णा अणंतगुणा ॥ तेइंदियाणं घाणेदिय जिन्भिदिय फासिदिय वमायत्ताए भुजो भुजो धिकार अनेक भाग सहस्र घाणेन्द्रिय से नहीं संघते, रसनेन्द्रिय मे नहीं आस्वादते व स्पर्शेन्द्रिय से नहीं स्पर्शते नष्ट होते हैं वहां तक पहिले जैसे कहना. उन में कोनसा अल्प व बहुत है ! तुल्प व वि- शेषाधिक है ? अहो गौतम ! सब से थोडे घाणेन्द्रियपने नहीं मुंघे हुवे पुद्गलों, इस से रसनेन्द्रियपने नहीं आस्वादे हुवे पुद्गलों अनंत गुने, इस से स्पर्शेन्द्रिपने नहीं स्पर्श हुवे पुद्गलों अनंत गुने, तेइन्द्रिय को आहार के पुद्गल घ्राणेन्द्रिय, जिन्हेन्द्रिय स्पर्शेन्द्रियपने, व विविध प्रकार से परिणमते हैं. वैसे ही चतुरोन्द्रिय को 898 पहिला शतकका पहिला उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ ३८ सूत्र 4.2 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 भोगवा अ० नहीं स्पर्श अ० अनंतगुणा ॥ ३० ॥ बे० वेइन्द्रिय भ० भगवन् पो० पुद्गल आ° आहारपने गि० ग्रहण करते हैं ते० वे पो० पुद्गल. की० कीसतरह भु० वारंवार प० परिणमते हैं गो. गौतम जि. जिव्हेन्द्रिय फा• स्पर्शेन्द्रियपने वे० वेमात्रा भु. वारंवार प० परिणमते हैं वे० वेइन्द्रिय भं• भगवन् पु० पूर्वाहारी पो० पुदल १० परिणमा त० तैसे जा० यावत् च० चलित कर्मणि निर्जरे ॥ ३१ ॥ ते तेइन्द्रिय च० चतुरेन्द्रिय णा० विविध प्रकार की ठि० स्थिति जा० यावत् अ० अनेक भा० भाग सहस्र अ० अणासाइजमाण, अफासाइज्जमाणा अणंतगुणा ॥ ३० ॥ बेइंदियाणं भंते पोग्गला आहारत्ताए गिण्हंति तेणं तेसिं पोग्गला कीसत्ताए भुजो भुजो परिणमंति ? गोयमा ! जिभिंदिय फासिदिय बेमायाए भुज्जो भुजो परिणमंति ॥ वइंदियाणं भंते पुन्वाहारिया पोग्गला परिणया तहेव जाव चलियं कम्मं णिजति ॥ ३१॥ तेइंदिय चउरिदि- घोडे आस्वाद नहीं कराये हुवे पुद्गल उस से अस्पर्शमान पुद्गल अनंत गुने कहे हैं ॥ ३० ॥ अहो भगवन् ! जो पुद्गल द्वीइन्द्रिय आहारपने ग्रहण करते हैं वे कैसे परिणमते हैं? अहो गौतम ! वे आहार के -पुद्गल बेइन्द्रिय को जिव्हेन्द्रियपने स्पर्शेन्द्रियपने व वमात्रासे परिणमते हैं. अहो भगवन् ! वेइन्द्रिय को पहिले के आहारे हुवे पुद्गल परिणमते हैं यावत् चलित कर्म की निर्जरा करते हैं वगैरह सव अधिकार पहिले जैसे कहना ॥३१॥ तेइन्द्रिय की स्थिति ४९ दिन की- चतुरेन्द्रिय की स्थिति ६ मास की अन्य सब अ- * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ হাল্কাখ सूत्र 8888 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र -8880- ए. ऐसे म० मनुष्य को ण विशेप आ० आभोग निवर्तितपने ज० जघन्य अं० अंतर्मुहूर्त उ० उत्कृष्ट अ० अठम भक्त सो० श्रोतेन्द्रिय च० चक्षुइन्द्रिय घा० प्राणेन्द्रिय जि० जिव्हेन्द्रिय फा० स्पर्शेन्द्रियपने वे. येमात्रा भु० वारंवार ५० परिणमें से० शेप त० तैसे जा० यावत् च० चलित कर्मणि निर्जरे॥३४॥ वा वाणव्यंतर को ठि० स्थिति णा नानाप्रकारकी. अ० निरवशेष ज० जैसे णा नाग कुमार को॥३५॥ ए. ऐसा जो० ज्योतिपी को ण विशेप उ० उश्वास ज. जघन्य मु० मुहूर्त पृथक् उ० उत्कृष्ट मु० मुहूर्त मुहुत्तं, उक्कोसेणं अट्ठमभत्तस्स सोइंदिय चक्खंदिय घाणिदिय जिभिदिय फासिंदिय बेमायाए भुजो भुजो परिणमंति सेसं तहेव जाव चलियं कम्मणिज्जरेति ॥ ३४ ॥ वाणमंतराणं टिईए णाणत्तं । अबसेसं जहा णाग कुमाराणं ॥३५॥ एवं जोइसियाणं मनुष्य को जानना. परंतु आभोग निवर्तित आहार की इच्छा जघन्य अंतर्मुहूर्त उत्कृष्ट अठम भक्त सो तीन दिन में होने देव कुरु उत्तर कुरु क्षेत्र के मनुष्य आश्रित. दोनों को आहार के पुद्गल श्रोतेन्द्रिय चाइन्द्रिय, घाणेन्द्रिय, जिव्हेन्द्रिय, स्पर्शेन्द्रियपने व वे मात्रा से परिणमते हैं. अन्य चलित कर्म की निर्जरा करे वहांतक सव पहिले जैसे कहना ॥ ३४॥ वाणव्यतर देवता की स्थिति जघन्य दशई हजार वर्ष की उत्कृष्ट एक पल्योपम की अन्य सब नाग कुमार जैसे कहना. ॥ ३५ ॥ ज्योसिपी देवता की स्थिति जघन्य एक पल्यापम का आठवा भागउत्कृष्ट एक पल्योपम व एकलाख वर्ष अधिक जानना. और है Prem पहिला शतक का पहला उद्देशा82- भावार्थ oyo शब्दार्थ ७२६ सूत्र अनुगदर पानामगरी मुनि श्री अमोलक प्रापिनी जा. यावत् च० चतुरेन्द्रिय अ० अवशेपं स० सव व० वढते हैं हा हीन होते हैं. त० तैसे अ० अवस्थित का ना० भिन्नता इ० यह स० समूच्छिम ति तियेच पंचेन्द्रिय दो दो अ० अंतर्मुहूर्त ग. गर्भ ३० उत्पन्न के च० चौवीस मु. मुहूर्त सं० संमूच्छिम म० मनुष्य का अ० अडतालीस मु. मुहूर्त ग• गर्भन म० मनुष्य का च० चौवीस मु० मुहूर्त वा० वाणव्यंवर जो० ज्योतिषी सो० सौधर्म ई. ईशान में अ० भडतालीस मु० मुहूर्त स० सनत्कुमार में अ० अठारह रा० रात्रिदिन च० चालीस मु० मुहूर्त मा० माहे- जहणं एक समयं, उक्कोसं दोअंतोमुहुत्ता एवं जाव चउरिदिया, अवसेसा सव्वे, बटुति हायति तहचेव अवट्ठियाणं नाणत्तं इमं तंजहा संमुच्छिम पंचिंदिय तिरिक्ख जोणियाणं दो अंतोमुहुत्ता, गब्भवंकतियाणं चउव्वीसं मुहुत्ता, समुच्छिम ,मणुस्सा अटुचचालीसं मुहुत्ता, गम्भवक्वतिय मणुस्साणं चउव्वीसं मुहुत्ता, वाणमंतरजोइस सोहम्मीसाणेसु अट्ठचत्तालीसं मुहुत्ता, सगंकुमारे अट्ठारस राइंदियाई चत्तालीसय मु- दो अंतमहत. ममूदिम तियेच पंचेन्द्रिय का चौवीस मुहूर्त, संमूर्छिम मनुष्य का ४८ मुहूर्त, गर्भज - मनुष्य का नौतीम मुहूर्त, वाणव्यंतर ज्योतिप सौधर्म व ईशान देवलोक में ४८ मुहूर्त, सनत्कुपार में अदार रानि दिन, य गालिस मुहूर्त, माहेन्द्र में २४ रात्रि दिन १० मुहूर्त, ब्रह्मदेवलोक में ४५ दिन, लंबक ये ९० दिन महागुरु में 25• दिन सहसार में २०० आणत माणत में संख्यात रात्रिदिन आरण अच्युत में संख्यात वर्ष * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी थि ७२७ <88% पंचगंग विवाह पाणत्ति ( भगवती) सूत्र - पांचवा शतक का पाठया उद्देशा- न्द्र में चो० चौवीस रा० रात्रिदिन वीब्धीस मु० मुहूर्त वं. ब्रह्मदेवलोक में च० चालीप्स लं०लांतक में न० नेऊम० महाशुक्र में स: साठ रा० मत्रिदिन स० सा स० सहस्त्रार में दो० दोसो रात्रिदिन आ०१fo आणत पा० माणत में मं० संख्यात मास आ० आरण अ० अच्युत में सं० संख्यात वा० वर्ष ए. ऐसे गे० प्रैवेयक विमान के दे० देवों का वि० विजय वे० चैजयंत ज. जयंत अ० अपराजित का अ: अरां- ख्यात वां० वर्ष स० सहस स० सर्वार्थ सिद्ध में प० पल्योपम का सं० संख्यात भाग शेप पूर्ववत् ॥ १४ ॥ हुत्ता, माहिदे चउबीसं राइंदियाई वसिय मुहुत्ता, बंभलोए पंच चत्तालीस राइंदियाई, लंतए नउयराइंदियाई, महासुक्के सर्टि राइंदियसयं, सहस्सारे दो राइंदियसयाई, आणयपाणयाणं संखेज्जामासा, आरणच्चुयाई संखेज्जाई वासाई एवं गेवेज देवाणं, विजयवेजयंतजयंतापराजियाणं असंखेजाइं वास सहस्साई, सन्वट्ठसिद्धेय पलिओ- वमस्स संखेजभागो एवं भाणियव्वं, वट्ठति हायंति, जहण्णेणं एक समयं उक्कोसणं आवलियाए असंखेजइभागं अवढियाणं जं भणियं ॥ १४ ॥ सिद्धाणं भंते ! केव- नव गेवेयक में संख्यात वर्ष,विजय वैजयंत जयंत अपराजित में असंख्यात वर्ष सहस और सर्वार्थसिद्ध में पल्योपम का संख्यात चे भाग तक अवस्थित काल रहता है. उन सब कावृद्धि होना वहीन होनेका काल जघन्य एक समय }os उत्कृष्ट आवालिका के असंख्यात वे भाग का है ॥ १४॥ सिद्ध भगवंतजयन्य एक समय उत्कृष्ट आठ समय तक बढते वार्थ शब्दार्थ सूत्र ७२८ १४ अनुराइक-बालमनगरी मुनि श्री अमोलक ऋअपनी पूर्ववत् ॥ १५ ॥ जी. जीव भ० भगवन कि० क्या सो? वृद्धिहा साश्ने बोल हीन होने, काले सो०. मृद्धि व हीन होने वाले नि० वृद्धि व हीन नहीं होने वाले स० एकेन्द्रिय त० तीसरे प० पद में से इयं कालं वड्डेति ? गोयमा ! जहण्णं एकं समयं उकोसेणं अट्ठसमया, केवइयं कालं अवाट्ठिया ? गोयमा ! जहणं एक समयं उक्कोसेणं छम्मासा ॥ १५ ॥ जीवाणं. भंते ! किं सोवचया, सावचया, सोवचयसावचया, निरुवचयनिरवचया ? गोयमा ! जीवा नो सोवचया, नो सावचया, नो सोवचयसावचया, निरुवचय निरवचया ॥ एगि दिया तइय पदे, सेसा जीवा चउहिं पएहिं भाणियव्या ॥ १६ ॥ सिद्धाणं भंते ! पुच्छा ? गोयमा ! सिद्धा सोवचया, नोसावचया, नो सोवचयसावचया, निरुवचयः ई.उनका अवस्थितकाल जघन्य एक समय उत्कृष्ट छ मासका है।॥२५॥अहो भगवन्! क्या जीवसोवचय-नविन उत्पन्न रोकर पढ़ने वाले सावचय-कालकर हीन होनेवाले, सोवचयसावचष य कुछ वढनेवाले कुच्छ हीन होनेवाले और क्या निवचयनिरपचय हीन व वढनेवाले नहीं हैं? अहा गौतम! समुञ्चय जीवनिरुवचयनिरवचयवाले हैं अर्थात इस में कोई नविन जीन उत्तन नहीं होता है वैसे ही कोई जीव उस में से विनाश नहीं पाता है. इस में कऐन्द्रिय में मोरवय सावचय का मांगा पाता है और शेप सब दंडक में चारोंही भांगे पाते हैं. ॥ १६ ॥ सिद्ध भगवन में नविन उत्पन्न होकर वृद्धि होवे वैसा सोरचय और वदे नहीं व हीन नहीं होवे वैसा निरुवच * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी 6Ya सूत्र ७२२ निरवचया ॥ १७ ॥ जीवाणं भंते ! केवइयं कालं निरुवचयनिरवचया ? गोयमा ! सम्वद्धं ॥ नेरइयाणं भंते ! केवइयं कालं सोवचया ? गोंयमा ! जहण्णं एक समयं, उक्कोसेणं आवलियाए असंखजइ भागं, । केवइयं कालं सावचया ? एवं चेव ॥ केवइयं कालं सोयचयसावचण ? एवं चेव ॥ केवइयं कालं निरुवचय निरवचया ? गोयमा! जहण्णं एक समयं उकोसं बारस मुहुत्ता, एगिदिया सव्वे सोवचया, साघचया; सब्बद्धं ॥ सेसा सव्वे सोवचयावि, सोवचयसावचयावि KA पंचमांग विवाह पण्णचि ( भगवती) सूत्र 888> पांचवा शतकका आठवा उद्देशा 98298 भावार्थ निरवचय ऐसे दो भांगे पाते हैं ॥ १७ ॥ अहो भगवन् ! जीव कितने कालतक निरुवचय निरवचय रहते हैं ? अहो गौतम ! जीव सब काल निरुवचय निरवचय रहते है. अहो भगवन् ! नारकी कितने काल तक सोपचय रहते हैं ? अहो गौतम ! नारकी जघन्य एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यात वा भाग तक सोवचय रहते हैं. अहो भगवन् ! नारकी कितने काल तक सावचय, व सोवययसायचय रहते हैं ? अहो गौतम ! जघन्य एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यात वा भाग तक रहते हैं. भारकी निरुवचय निरवचय जघन्य एक समय उत्कृष्ट बारह मुहूर्त तक रहते हैं. सब एकन्द्रिय सदैव सोवचय मावचय रहते हैं. शेप.सब पृथक् २ जीवों का सोवचय, मावचय, प मोरचय सापचय का काल जघन्य od 60 शब्दार्थ शंपनी नीव च० चार प० पद से भा० कहना. ॥ १६ ॥ पूर्ववत् ॥ १७ ॥ पूर्ववत् ।। १८ ॥ सि गिद्ध भ० भगवन के कितना काल सो० बढनेवाले गो० गौतम ज• जघन्य ए. एक स० समय उ० उराष्ट अं० आठ स. समय के० कितनाकालतक नि० बराबर ज. जघन्य ए एक समय उ० उत्कृष्ट छ० उमाम सेवेसे भ० भगवन् ॥५॥८॥ * ७३० सूत्र * अनुवादका पानवायचागमुनि श्री अमंलक प्रापिनी * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * चार्य जहण्णं एवं समयं उक्कोसं आवलियाए असंखेजइ भागं अवट्टिएहिं वतिय कालो भाणियव्यो ॥ १८ ॥ सिद्धाणं भंते ! केवइयं कालं सोवचया'? गोयभा ! जहणं एक समयं उक्कोसं अट्ठसमया. केवइयं निरुवचयनिरवचया ? जहणं एकं समयं. उयोसं उम्मासा सेवं भंते भंतेत्ति ॥ पंचम सयरस अट्ठमो उद्देसो सम्मप्तो ॥५॥८॥ पर समय उत्कृष्ट आपलिका के असंख्यात वा भागतक जानना. निरुवचय निरवचय का पत्रणासूत्र विरहद्वार जैसे नानना ॥, १.८ ॥ अहो भगवन् ! सिद्ध किनने कालतक सोपचय रहते हैं ? अहो गौतम ! जघन्य एक समय उत्कृष्ट आठ समय. और उन का निरुवचय, काल जघन्य एक गमय उत्कृष्ट छ मास का है. अहो भगवन् आपके वचन सत्य हैं. यह पांचा भाउया उद्देशा संपूर्ण दुवा ॥ ५॥ ८ ॥ शतक का x ७२२ G9 निरवचया ॥ १७ ॥ जीवाणं भंते ! केवइयं कालं निरुवचयनिरवचया ? गोयमा ! सव्वद्धं ॥ नेरइयाणं भंते ! केवइयं कालं सोवचया ? गोयमा ! जहणं एक समयं, उक्कोसेणं आवलियाए असंखजइ भागं, । केवइयं कालं सावचया ? एवं चेव ॥ केवइयं कालं सोयचयसावचय? एवं चेव ॥ केवइयं कालं निरुवचय निरवचया ? गोयमा'! जहण्णं एकं समयं उकोसं बारस मुहुत्ता, एगिंदिया सव्ये सोवचया, साघचया; सम्बद्धं ॥ सेसा सव्वे सोवचयावि, सोवचयसावचयावि Hap> पंचमांग विवाह पण्णचि ( भगवती) सूत्र 888 88 पांचवा शतकका आठया उद्देशा 958 भावार्थ निरवचय ऐसे दो भांगे पाते हैं ॥ १७ ॥ अहो भगवन् ! जीव कितने कालतक निरुवचय निरवचय रहते ? अहो गौतम ! जीव सब काल निरुवचय निरवचय रहते है. अहो भगवन् ! नारकी कितने काल तक सोपचय रहते हैं ? अहो गौतम ! नारकी जघन्य एक समय उत्कृष्ट भावलिका का असंख्यात वा भाग तक सोवचय रहते हैं. अहो भगवन् ! नारकी कितने काल तक सावचय, व सोवययसायचय रहते हैं ? अहो गौतम ! जघन्य एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यात वा भाग तक रहते हैं. मारको निरुवचय निरवचय जघन्य एक समय उत्कृष्ट बारह मुहूर्त तक रहते हैं. सब एकन्द्रिय सदैव. सोवचय मावचय रहते हैं. शेप. सब पृथक् २ जीवों का सोवचय, मावचय, प मोरचय सापचय का काल जघन्य od 00 হাখি ७३२ ४ अनुवादक-बालप्रमानसिमुनि श्री अमोलक ऋपिनी र न्य न० नंगर रा० राजगृह त्ति ऐसा प० कहाता है गो० गौतम पुपृथ्वी न० नगर स० रान: गृा जा. यावत् स० सचित्त अ० अचित्त मी० मीश्र द० द्रव्य न० नगर रा० राजगृह से• अथ के कैमे गो० गौतम पु० पृथ्वी जी० जीववाली अ° अजीववाली न० नगर रा० राजगृह प० कहाता मा० यावत् स० सचित्त अ० अचित्त मी० मीश्र द्रव्य जी० जीव अ० अजीव वाले न० नगर रा० राजगृह प० कहाता है ते. इसलिये सं० वैसा ॥ 2 ॥ से० अथ णू० शंकादर्शी भ० भगवन् दि० दिन गिहंति पवुच्चइ जाव सचित्ताचित्तमीसयाई दवाई नगरं रायागहंति पवुच्चइ । से केणटेणं ? गोयमा ! पुढवी जीवाइय, अजीवाइय, नगरं रायगिहंति पवुच्चइ जाव. सचिसा चित्त मीसयाई दव्याई जीवाइय अजीवाइय,नगरं रायगिहंति पवुच्चइ सेतेण- टेणं तचेव ॥ १ ॥ सेणूणं भंते ! दिवा उज्जोए राइ अंधयारे ? हंता गोयमा ! कहना ? भहो गौतम ! पृथ्वी राजगृही कहाती है यावत् सचित्त अचित्त घ मीश्र द्रव्य राजगृही कहाते अटो भगवन् ! कैसे पृथ्वी राजगृही कहानी है, यावत् सचित्त, अचित्त व मिश्र द्रव्य राजगृही कहाते हैं. अहो गौतम ! पृथ्वी, पानी आदि स्थावर पशु मनुष्यादि सब जीव, गृह भवन शयनासनादि सर्व वस्तु के संयोग से ही जीव अजीव का जहां संग्रह होता है वह नमर कहाता है. और वैसा संयोग राजगृही नगरी में होने मे उनको राजगृही कहा है ॥२॥ अहो भगवन् ! क्या दिन को उद्योत व रात्रि को अंधकार * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी शब्दार्थ ते. उस का काल ले० उस स० समय में ला० यावत् एक ऐसा २० बोले कि क्या इ० यह भ०१ भगरम् न० नगर म० राजगृह ति० ऐसा प० कहाता है कि० क्या पु० पृथ्वी न० नगर रा० राजगृह प० कहाता है आ० अप् जा. यावत् २० वनस्पति ज० जैसे ए. इस का अ० अनुदेशमे पं० पंचेन्द्रिय इति तिर्यंच की व० वक्तव्यता त० तैसे भा० कहना जा० याक्त् स. सचित्त अ० अचित मी० मीश्र ७३१ पंचाम विवाद पप्पचि (भगवती) सुन तेणं कालेणं तेणं समएणं जाव एवं वपासी-किमिदं भंते ! णयरं रायगिहंति पञ्चइ किं पुढवी णयर रायगिहंति पयुच्चइ, आऊ नगरं रायागहीत पवुच्चइ,जाव वणस्सइ नाहा एपणुदेसए पचिदिय तिरिक्ख जोणियाणं यत्तव्यया तहा भाणियव्या जाव स- थित्ताचित्तमीसयाई, दवाई नारं रायगिहंति पवुच्चइ ? गोथमा ! पुढयौवि नगरं राय- आठये उद्देशे में जीवों की उत्पत्ति व वृद्धि के प्रश्नोत्तर फहे. चे ग्रामदिक में होते हैं इसलिये, वार्थों अथवा भगवंत श्री महावीर स्वामी राजगृही नगरी में वारंवार पधारे इसलिये राजगृही नगरीका प्रश्न पूछते हैं. उस काल उस समय में श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी को भगवान गौतम स्वामी पूछनेलगे. ae कि अहो भगवन् ! इस नगरी को राजगृही क्यों कहना ? क्या पृथ्वी, अप, तेउ, चाउ, वनस्पति, यावत् सचित्र अचित्त मीश्र द्रव्य वगैरह जो सातवे उद्देशे में कहे हैं उन सब पदार्थ को क्या राजगृही पांचवा शतकका नवयां रदेशा bya w ७३४ अनुरादक-मालयामनारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 65 दशध्दार्थ ते० इमलिये ॥ ३ ॥ अ० असुरकुमार भ० भगवन् किं. क्या उ. उद्योत करने वाले अं० अंधकार चाले गो०. गौतम ५० असुरकुमार उ० उद्योत्त वाले नो० नहीं अं० अंधकार वाले के० कैसे गो गौतम 4. अमुर कुमार को सु० शुभ पो० पुद्गल सु० शुभ पुद्गल परिणम जा. यावत् थ० स्थनित कुमार को ॥ ४॥ पु. पृथ्वी काया को जा० यावत् ते तेइन्द्रिय ज. जैसे ने नारकी च० चतुरेन्द्रिय भ० भगवन् सूत्र गोयमा ! नेरझ्याणं असुभा पोग्गला असुभे पोग्गलपरिणामे से तेणटेणं ॥ ३ ॥ असुरकुमाराणं भंते ! किं उज्जोए अंधयारे ? गोयमा. ! असुरकुमाराणं उज्जोए नो अंधयारे ॥ से केपट्टेणं ? गोयमा ! असुरकुमाराणं सुभा पोग्गला सुभे पोग्गल परिणामे से तेणटेणं जाब एवं बुच्चइ, जाव थणियाणं ॥ ४ ॥ पुढवीकाइया. जाव तेइंदिया जहा नेरइया । चउरिंदियाणं भंते ! किं उज्जोए अंधयारे ?गोयमा ! उज्जोएवि परिणम है; इस से अंधकार होता है ॥ ३॥ अहो भगवन् ! अमुरकुमार को क्या उद्योत होता है अथवा अंधकार होता है ? अहो गौतम ! असुरकुंमार को उद्योत होता है परंतु अंधकार नहीं होता है. स्पोकि अमुरकुमार को शुभ पुद्गलों होते हैं और वे शुभपने परिणमते हैं. ऐसे ही नागकुमार यावत् स्थनित कुमारतक जानना ॥ ४॥ पृथ्वीकायादि पांच स्थावर वेइन्द्रिय व तेइन्द्रिय का नारकी जैसे कहना. अहो भगवन् ! चतुरेन्द्रिय को क्या उद्योत अथवा.अंधकार होता है ? अहो गौतम ! * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * बाब्दार्थ ७ को उ० उद्योत रा० रात्रि को अं अंधकार ई० हा गो० गौतम जा. यावत् अं० अंधकार से वह के.सी कैसे गो० गौतम दि० दिन को सु० शुभ पो• पुद्गल सुशुभ पुद्गल प० परिणम रा० रात्रि को अ० अशुभ पो० पुद्गल अ० अशुभ पो० पुद्गल प. परिणम ते० इसलिये ॥ २॥ ने० नारकी किं. क्या उ० उद्योत वाले अं० अंधकार वाले गो० गौतम ने नारकी नो० नहीं उ. ज्योतवाले अं० अंधकार वाले के कैसे गो० गौतम ने नारकी में अ० अशुभ पो. पुद्गल अ० अशुभ पो० पुद्गल प० परिणम ७३३ सत्र ११ पांचवा शतक का नववा उद्देशा . 498 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र ॐ8 जाव अंधयारे, से केण्टेणं ? गोयमा ! दिवा सुभा पोग्गला सुभे पोग्गलपरिणामे, राति असुभापोग्गला, असुभे पोग्गलपरिणामे से तेणटेणं ॥ २ ॥ नेरइयाणं भंते ! किं उज्जोए अंधयारे ? गोयमा ! नेरइयाणं नो उज्जोए अंधयारे॥ से केणटेणं? भावार्थ होता है ? हां गौतम ! दिन को उद्योत व रात्रि को अंधकार होता है. अहो भगवन् ! यह किस तरह है ?. अहो गौतम ! दिन को सूर्य के किरण रूप शुभ पुद्गलं परिणमते हैं जिस से उद्योत होता है और रात्रि को अशुभ पुद्गल परिणमते हैं जिस से अंधकार होता है ॥ २॥ अहो भगवन् ! क्या नारकी को उद्योत या अंधकार है ? अहो गौतम ! नारकी को उद्योत नहीं है परंतु अंधकार है. अहो भर्गवन् ! यह किस तरह है ? अहो गौतम ! नारकी में सूर्य के अभाव से अशुभ पुद्गलों हैं और अशुभ पुद्गल शब्दाम ४० सूत्र 4. अनुवादक बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 इन्द्रिय पा. प्राणेन्द्रिय जि० जिव्हेन्द्रिय फा० स्पर्शेन्द्रियपने भु० वारंवार प० परिणमें ॥ ३२॥ पं० पंचे- न्द्रिय ति० तिर्यंच ठि०.स्थिति भ० कहना ऊ. उश्वास घे० वेमावा आ० आहार अ० अनाभोग निवर्तित पने अ० समय समय में अ० आंतरा रहित आआभोग निवर्तितपने जजघन्य अ० अन्तर्मुहूर्त उ० उत्कृष्ट छ० छ? भक्त में से शेष ज० जैसे च० चतुरेंन्द्रिय जा. यावन् च० चलित कर्म णि निर्जरे ॥ ३३ ॥ परिणमंति चउरिदियाणं चक्खुंदिय घाणिदिय जिम्भिादिय फासिंदियत्ताए भुजो भुजो परिणमति ॥ ३ २ ॥ पंचिंदिय तिरिक्ख जोणियाणं ठिई भणिऊण ऊसासोवेमाया- ए आहारो अणाभोगणिव्वात्तिए अणुसमइयं अविरहिओ आभोनिव्वत्तिओ जह- ण्णणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणं छट्ठभत्तस्स सेसं जहा चउरिदियाणं जाव चलियं कम्मं णिजरेंति ॥३३॥ एवं मणुस्साणवि. गवरं आभोगणिन्वात्तए जहण्णेणं अंतो- चक्षुइन्द्रिय, घाणेन्द्रिय, जिव्हेन्द्रिय व स्पर्शेन्द्रियपने परिणमते हैं ॥ ३२॥ तिर्यंच पंचेन्द्रिय की स्थिति जघन्य अंतमुहूर्त की उत्कृष्ठ तीन पल्योपम की. उन का श्वासोश्वास मर्यादा रहित जानना. उन को अनाभोग निवर्तित आहार प्रति समय विरह रहित होता है. और आभोग निवर्तित आहार जघन्य अंत मुहूर्त में उत्कृष्ट छह भक्त सो दो दिन में. (देवकुरु उत्तर कुरु के क्षेत्र के तिर्यंच आश्रित.) और चलित कर्म की. निर्जरा करेंगे वहांतक का शेप सब अधिकार चतुरेन्द्रिय. जैसे कहना ॥ ३३ ॥ ऐसे ही * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी भावार्थ ora ७३५ 33 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भवगती) सूत्र 28 ब्दार्थ कि क्या उ० उद्योत वाले अं० अंधकारवाले गो० गौतम उ० उयोत वाले अं० अंधकार वाले भी गो० गौतम च० चतुरेन्द्रिय को सु० शुभाशुभ पो० पुद्गल परिणम ए० ऐसे जा० यावत् म. मनुष्य को वा० वाणव्यंतर जो० ज्योतिपी वे० वैमानिक ज० जैसे अ० असुरकुमार ॥ ४॥ अ. है भं भगवन् ने नारकी त० वहां रहे हुये एक ऐसे प० जाननेवाले तं० वह ज० यथा स० समय आ० आवलिका जा. यावत् ओ० अवसर्पिणी गो गोतम णो नहीं इ० यह अ० अर्थ स० समर्थ के कैसे जा० अंधयारेवि । से केण?णं ? गोयमा ! चउरिदियाणं सुभासुभा पोग्गला सुभासुभे पोग्गलपरिणामे से तेण?णं ॥ एवं जाव मणुस्साणं, वाणमंतर जोइस वेमाणिया जहा असुरकुमारा ॥ ५॥ अत्थिणं भंते ! नेरइयाणं तत्थगयाणं एवं पण्णायए तं. समयाइवा,आवलियाइवा, जाव ओसप्पिणीइवा उस्सप्पिणीइवा? गोयमा ! णो इणटे सम टे।से केणटेणं जाव समयातिवाआवलियातिवा ओसप्पिणीतिवा उस्सप्पिणीइवा? गोयमा! गवाथ न्द्रिय को उद्योत व अंधकार दोनों होते हैं. क्योंकि उन को शुभाशुभ पुद्गल व शुभाशुभ पुद्गल परिणम होता है. ऐसे ही तिर्यंच पंचेन्द्रिय व मनुष्य का जानना. वाणव्यंतर ज्योतिपी व वैमानिक को असुर कुमार जैसे कहना ॥ ५॥ उद्योत सूर्य की कीरणों से होता है. और सूर्य से काल मान भी होता है. इसलिये काल आश्री प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! नारकी नरक लोक में रहे हुवे क्या समय, आ- 42 पांचवा शतक का नववा उद्देशा 988 शम्दाथ सूत्र प. अनुरादक-बालसमचारी मुनि श्री अमोलक पिनी यावत् स० समय आ० आवलिका ओ० अवसर्पिणी गो• गातमै इ० यहां ते. उनका मा० मान इ० यहां ते. उनका प०. ममाण इ. यहां ते० उनको ए. ऐसा प० जाना जावे तं. वह स० मपय जा. यावत् उ० उत्सागी एक ऐने जा. यावत् पं० पंचेन्द्रिय ति० तिर्यच ॥६॥ अ० है भ०भगवन् म. मनुष्य को १० यहां रहे हुवे ए ऐसा प० जाना जाता है स० समय जा० यावत् उ० उत्सर्पिणी इह तेसिं माणं, इह तेर्सि पमाणं, इह तेसिं एवं 'पण्णायतेः तं समयाइवा' जाव उस्साप्मिणीइवा, से तेणं जाव नो एवं पण्णायए समयाइवा' जाव उस्सप्पिणीइवा, एवं जाव पंचिंदिय तिरिक्ख. जोणिया ॥ ६ ॥ अत्थिणं भंते ! मणुस्साणं इहगयाणं एवं पण्णायइ तं समयाइवा, जाव उसप्पिणीइवा ? हंता अस्थि ॥ से केणटेणं ? पलिका, दिन, रात्रि, मास, वर्ष यावत् अवसर्पिणी उत्सर्पिणी जान सकते हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ मम नहीं है. अहो भगवन् ! किस कारन से यह अर्थ समर्थ नहीं है ? अहो गौतम ! सूर्य का चलना मनुष्य गोक में होता है नरकादि स्थानों में नहीं होता है. इसलिये वे समय, आवलिका यावत् अवसर्पिणी उत्सर्पिणी नहीं जान सकते हैं. जैसे नारकी का कहा वैसे ही पांच स्थावर तीन विकलेन्द्रिय व तिर्यंच पंचन्दिप का जानना ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! क्या मनुष्य समय, आवलिका यावत् उत्सर्पिणी जानने को रामर्थ हैं हां गौतम ! मनुष्य समयादि जान सकते हैं. अहो भगवन् ! वे कैसे जान सकते हैं ! अहो * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्यालाप्रसादजी * शब्दाथ .yo सूत्र ११ पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवत्ती ) मूत्र 988- • हां अ० है के. कैसे गो० गौतम इ० यहां ते० उन को मा० मान इ. यहां ते. उन को प०प्रमाण इ० यहां ते. उन को ए. ऐसा प० जाना जावे स० समय जा. यावत् उ० उत्सपिणी ते. इसलिये वा. वाणव्यंतर जो० ज्योतिपी वे० वैमानिक को ज. जैसे ने० नारकी को ॥ ७॥ ते. उस काल ते. उस स० समय में पा. पाश्वनाथ के अ० अपत्य ( संतानीये थे० स्थविर भ० भगवन्त जे. जहां स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर ते० वहां उ० आकर के स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर की अ. गोयमा ! इह तेसिं माणं इह चैव तेसिं पमाणं इह तेसिं एवं पण्णायइ, तंजहा. समयाइवा जाव उस्सप्पिणीइवा, से तेणटेणं । वाणमंतर जोइस वेमाणियाणं जहा नेरइयाणं ॥ ७ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं पासावचिज्जा थेरा भगवंतो जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता, समणस्स भगवओ महा-. वीरस्स अदूरसामंते ठिच्चा एवं वयासी-सेणूणं भंते ! असंखेजेलोए अणता राइंदिया गौतम ! मनुष्य लोक में सूर्य का चलना होता है जिस से समय, आवालिका श्वासोश्वास यावत् अवसर्पिणी उत्सर्पिणी जान सकते हैं. वाणव्यंतर ज्योतिपी व वैमानिक का नारकी जैसे जानना || उस काल उस समय में श्री पार्श्वनाथ स्वामी के संतानिये श्रमण भगवंत महावीर स्वामी की पास आये और सामनेखडे रहकर ऐसा बोले कि अहो भगवन् ! क्या असंख्यात प्रदेशात्मक लोक में अनंत रात्रिदिनई पांचवा शतक का नववा उद्देशा 84332 वार्थ oyo ७४८ 18 भनुवादक-पालग्रहमचारी मनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 शब्दार्थ देखते हैं. जो. जो लो० दीखता है से वह लो० लोक है. हां भ० भगवन् ते. इस से अ• आर्य ए० ऐसा नु० कहा है अ० असंख्यात तं० वैसे ही ॥ ८॥ त० उसदिन से ते वे पा० पार्श्वनाथ के अ० अपत्य थे० स्थविर भ० भगवंत स० श्रमण भ. भगवंत म० महावीर को प० जानते हैं स० सर्वज्ञ स. सर्वदर्शी त० तव ते वे थे० स्थविर भ० भगवंत सः श्रमण भ० भगवंत म महावीर को वं. वंदना करके न० नमस्कार करके एक ऐसा व० बोले इ० इच्छता हूं मैं• भगवन् तु. तुम्हारी अं० समीप चा. सूत्र चा २, निलीयंति ॥ से भूए उप्पन्नेविगए परिणए अजीवेहिं लोकइ पलोकइ । जे लोकइ सेलोए, हंता भगवं से तेण?णं अज्जो एवं वुच्चइ असंखेज्जे तंचेव ॥८॥ तप्पभिई चणं ते पासावच्चेजा थेरा भगवंतो समणं भगवं महावीरं पञ्चभिजाणंति सव्वण्णुं सव्वदरिसिं ॥ तएणं ते थेरा भगवंतो समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ नमसइत्ता वार्थ परिता (मसेक) रात्रे होती हैं. जहां बहुत जीव उत्पन्न होवे व नष्ट होवे और इस तरह उत्पन्न व विनाश का सभाव होवे वह लोक कहाता है. अजीव पुद्गलादिक से जो उत्पन्न, विनाश व परिणम के स्वभाववाला दीखने में आवे मो लोक कहाता है. इस से अहो आर्य ! असंख्यात प्रदेशात्मक लोक. में अनंत रात्रि दिन र परिता रात्रि दिन उत्पन्न हुवे, होते हैं व होवेंगे ॥ ८॥ उस दिन से पार्श्वनाथ स्वामी के संतानी ये स्थविर भगवन्त श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी को. सर्वज्ञ सर्वदी जानने लगे. फीर. वे स्थविर * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * मत PAS का ७४१ सूत्र 432 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 88 शब्दी चार जा. याम रूप ध धर्म से पं० पांच म० महावत स० प्रतिक्रमण सहित ध० धर्म उ० अंगीकार कर वि० विचरने को अ० यथासुख दे. देवानुपिय मा० विलंब त तव ते ने पा. पार्थापत्य थे० स्थविर भ. भगवंत जा० यावत् च० छेल्ला उ० उश्वास नि. निश्वास से सि० सिद्ध हुने जा० यावत् स० सब दु० दुःखों से प० रहित हुवे अ० कितनेक दे० देवलोक में उ० उत्पन्न ॥ ९ ॥ क० कितनेक भं० भगवन् दे० देवलोक प० प्ररूपे गो० गौतम च• चार एवं वयासी-इच्छामिणं भंते! तुझं अंतिए चाउज्जामाओधम्माओ पंचमहन्वइयं सपडिक्कम धम्म उवसंपजिताणं विहरित्तए ? अहासुहं देवाणुप्पिया ! मापडिबंध, तएणं तेपा- सावच्चिजा थेरा भगवंतो जाव चरिमेहिं उस्सासनिस्सासेहिं सिद्धा जाव सव्वदुक्ख- प्पहीणा. अत्थेगइया देवलोसु उक्वन्ना, ॥ ९॥ कइविहाणं भंते ! देवलोगा भगवन्त श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी को चंदना नमस्कार कर ऐसा कहने लगे कि अहो भगवन् वाथ आप की पास से चार याम रूप धर्म से पांच महायत रूप धर्म अंगीकार करने को इच्छते हैं. अहो दे- 50वानुप्रिय ! तुम को जैसे सुख होवे वैसे करो, विलम्ब मत करो. फीर वे पार्श्वनाथ स्वामी के संतानिये स्थविर भगनन्त चरिम उश्वास निश्वास में सिद्ध हुवे, यावत् सय दुःखों से रहित हुवे और कितनेक. देव- लोक में उत्पन्न हुवे ॥९॥ अहो भगवन् ! देवलोक कितने प्रकार के कहें ! अहो गौतम ! चार 838 पांचवा शतकका नववा उद्देशा 8 OG ७४२ x x * अनुवादक वादग्रामवारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थों प्रकार के दे. देवलोक भ० भवनवासी वा० वाणव्यंतर जो० ज्योतिपि वे० वैमानिक भे० भेदसे भ० भवन वासी द० दश प्रकार के वा वाणव्यंतर अ० आठ प्रकार के जो ज्योतिषी पं० पांच प्रकार के २० वैमानिक दु० दो प्रकार के गा० गाथा कि० क्या इ यह रा० राजगृह उ० उद्योत अं० अंधकार स समय पा० पानाथ के अं० शिप्य की पु० पूच्छा रा० रात्रिदिन दे० देवलोक से० वैसे ही भ० भगवन् प० पांचया म. गतक का न० नववा उ० उद्देशा स० संपूर्ण ॥ ५ ॥ १ ॥ पण्णत्ता ? गोयमा ! चउन्विहा देवलोगा पं० तं. भवणवासी, वाणमंतरा; जोइ. मूत्र सिया, वैमाणियाभेएणं, भवणवासी देसविहा, 'वाणमंतरा अट्ठविहा, जोइसिया पंच- विहा, वेमाणिया दुविहा ॥ गाहा- किंमियं रायगिहतिय, उज्जोय अंधयार समएय । पासंतिशासिपुच्छा राइंदिय देवलोगाय ॥ १॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥.पंचम सयरस नवमा उद्देसो सम्मत्तो ॥ ५ ॥ ९ ॥ प्रकार के देवलोक कहे हैं भवनपति, वाणव्यन्तर, ज्योतिपी व वैमानिक. उस में से भवनपति के दश भेद, वाणन्यन्नर के आठ भेद, ज्योतिषी के पांच भेद, व वैमानिक के दो भेद. अब इस उद्देशे का सा- रांग कहते हैं ? राजगृही नगरी कित को कहना, उद्योत व अंधकार, समय, पार्श्वनाथ स्वामी के संता- नीये का गात्र दिन संबंधि प्रश्न, व देवलोक. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं. यह पांचवा शतक का नववा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ५ ॥ ९ ॥ प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी. ज्वालाप्रसादजी * * x x.
x 883> पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र - ब्दार्थ, ते उस काल ते. उस समय में चं चपा न० नगरी ज. जैसे ५० पहिला उ० उद्देशा त० तैसे ने० जानना ए. यह भी न० विशेप चं चंद्रमा भा० कहना पं० पांचवा स० शतक का द० दशवा उ० उद्देशा स. संपूर्ण ॥ ५॥ १० ॥ पं. पांचवा स० शतक स० संपूर्ण ॥ ५ ॥ सूत्र तेणं कालेणं तेणं समएणं चंपा नामं नयरी, जहा पढमिल्लो उदेसओ तहा नेयम्बो एसोवि नवरं चंदिमा भाणियव्वो पंचमसयस्स दसमो उद्देसो सम्मत्तो ॥५॥ १० ॥ नववे उद्देशे के अंत में देवता का आधिकार कहा. दशवे में मात्र चंद्र का प्रश्न पूछते हैं. उस काल भावार्थ उस समय में चंपा नाम की नगरी थी उस की ईशान कौन में पूर्ण भद्र बगीचे में श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी पधारे. और श्री गौतम स्वामी वंदना नमस्कार कर ऐसा प्रश्न पूछने लगे कि अहो भगवन् ! चंद्रमा देव कहां रहता है ? अहो गौतम ! समभूमि से आठसो योजन ऊंचे चंद्र का विमान है. शेष सब अधिकार प्रथम शतक का पहिला उद्देशा जैसे कहना. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य है. यह पांचवा शतक का दशवा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ५ ॥ १० ॥ पांचवा शतक समाप्त ॥ ५ ॥ D. पांचवा शतक का दशवा उद्देशा-gos TO शब्दार्थ ७४४ सूत्र 18 भनुवादक-पालमानचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी * षष्ठ शतकम.* वे. वेदना आ० आहार म० महाश्रव स० प्रदेश सहित त. तमस्काय भ० भव्य सा० धान्य पुल पृथ्वी क० कर्म अ• अन्यत्तीथिक द० दश छ० छ8 स० शतक में ॥ १॥ से० अथ णू० शंकादी ० भगवन ज० जो म० महावेदना वाले से वह म० महानिर्जरा वाले जे. जो म. महानिर्जरा वाले से. येयण आहार महस्सवेय, सपएस तमुयए भविए ॥ साली पुढवी कम्म, अण्णउत्थि दस छटुगंमिसए ॥ १ ॥ सेणणं भंते ! जे महावेयणे से महानिजरे, जे महानिजरे से महावेयणे, महावेयणस्सय अप्पवेयणस्सय से सेए जे पंसस्थनिजराए ? उहं शतक में दश उद्देश कहे हैं. १ पहिले उद्देशे में महावेदना महा निर्जरा का अधिकार, २ दूसरे उद्देशे में आधार का अधिकार, ३ तीसरे उद्देशे में महाआश्रव का आधिकार, ४. चौये उद्देशे में जीव मप्रदेशी है या अप्रदेशी है .इस के प्रश्नाचर, ५ पांचवे में तमस्कार्य का अधिकार ६ छठे में नरक में उत्पन्न होनेयोग्य का अधिकार. ७ सातवे में धान्य का विचार. ८ आठवे में रत्नप्रभादि पृथ्वी का अधिकार ९ नववे में कर्मवन्ध का अधिकार व १० दशरे में अन्यतीर्थियों का अधिकार. इस तरह उठे मतक में दश उद्देशे कहे हैं ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! जो महा वेदनांवाला होता है वह क्या महा निर्जरावाला होता है ? और जो महानिर्जरावाला होता है वह क्या महा वेदनावाला होता है ? महा * प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ ग्दाथा ..७४९ - पंचमाङ्ग विवाह पण्णाति ( भगवती ) सूत्र <ages वह म० महावेदना वाले म. महावेदनावत.अ०, अल्प वेदनावंत में से यह से० श्रेय जे. जो १० प्रशस्तनिर्गवाले हैं. हां गो गौतम जे० जो मः महावेदना पाले ए ऐसे ॥ २॥ छ० उही स० सातवी भ० भगवन् पु. पृथ्वी में ने० नारकी म० महावेदना वाले हैं. हां म० महावेदना वाले ते वे भ० भगवन् स० श्रमण नि० निर्ग्रन्थ से म. महानिर्जरा वाले गो० गौतम णो० नहीं इ० यह अं० अर्थ स० समर्थ से वह के कैसे अ० कहा जावे अ० अर्थ से भ० भगवन् ए. ऐसा बु. कहाता हंता गोयमा ! जे महावेयणे एवं चेव ॥ २ ॥ छ? सत्तमासुर्ण भंते ! पुढवीसु नेरइया महावेयणा ? हंता महावेयणा, तेणं भंते ! समणेहिंतो निग्गंथेहितो महानिज्जरतरागा ? गोयमा ! णो इणढे समढे । से केणं खाइ अटेणं भंते ! एवं बुच्चइ जे महावेयणे जाव पसत्थ निजराए ?गोयमा! से जहा नामए दुवे वत्था सिया एगेवत्थे कद्दम रागरत्ते, एगेवत्थे खंजण रागरत्ते, एएसिणं गोयमा! दोण्हं यत्थाणं कयरे वेदना व अल्प वेदनावाले में जो प्रशस्त निर्जरावाला है वह क्या श्रेय-प्रधान है ? हां गौतम ! जो महावेदनावाला होता है वह महा निर्जरावाला होता है और जो महा निर्जरावाला होता है वह महा वेदनावाला होता है, वैसे ही महावेदना व अल्प वेदनावन्त में जो प्रशस्त निर्जरावाला होता है वह श्रेष्ठ है ॥ २ ॥ अहो भगवन ! क्या उठी सातवी पृथ्वी-नरक में नारकी महा वेदनावाले हैं ? हां या शतकका पहिला उद्देशा 8888 भावार्थ शब्दाची .७४६ सूत्र भनुवादक-यालयमचशिमुनि श्री अमोलक ऋषिजी न जो म० महावेदनावाले जा० यावत् प० प्रशस्त निरा :वाले से० अथ ज. जैसे दु० दो २० वस्त्र सि. होवे ए. ऐक ब० वस्त्र का कीचड के रा० रंगले र० रक्त ए० एक व० वस्त्र खं० गाडेका खंजन के रा. रंगस र रक्त ए० इन दो० दोनों व वस्त्र में क. कौनसा ३० वस्त्र दु० कठिनतासे धोया जावे दु. कठिनता से रंग नीकाला जावे दु० वहून पराक्रम क० कौनसा ३० वस्त्रं मु० सरलता वत्थे दुधोयतराए चेव दुवामतराए चेब, दुपरिकम्मतराए चेव, कयरे वा बत्थे सुधोयतराए चेत्र, सुवामंतराए चेव, सुपरिकम्मतराए येव, जेवा से वत्थे कदमरागरत्ते जेवा से वत्थे खंजणरागरत्ते; भगवं ! तत्थणं जे से कंदम- राग रत्ते सेणं वत्थे दुधोयतराए चेव, दुवामतराए चेव दुपरिकम्मतगए चेव, एवा गोनम ! वे महा वेदनावाले हैं.. अहो भगवन् ! तब क्या वे श्रमण निर्ग्रन्थ से महा निर्जरावाले हैं ? अर्थात् पे माहित करते हैं ? अहो गौतन ! यह अर्थ योग्य नहीं है अर्थात् छठी. सातवी नरक में नारकी महा वेदना भोगते हुये महा निर्जरा नहीं करते हैं. तब अहो. भगवन् ! यह किस अपेक्षासे कहा है कि जो ना वेदनावाला होता है वह महा निर्जरावाला होता है यावत् जिन को प्रशस्त निर्जरा होती है वह श्रेय है ? अहो गौतम! जैसे एक कर्दम (कीचड) से भरा हुवा और दूसरा दीपक की कालिमा ममान काला गाडे के खंजन से भरा हुवा ऐसे दो वस्त्र होवे..अब अहो गौतमः! उक्त दोनों * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * ए ४३ सूत्र 88 पंचमांग विवाह पण्णत्ति' (भगवती) सूत्र ? शब्दार्थ स्थितिपद में त० तैसे भा० कहना स० सर्व जी० जीव का आ० आहार ज जैसे प० पनवणा में ५० प्रथम आ० आहार उद्देशे में त० तैप्से भा० कहना ए० यहां से आ० लेकर णे० नारकी भं० भगवन् आ० आहार के अर्थी जा० यावत् दु० दुःखपने भु० वारंवार परिणमें ॥ ३७ ॥ जी० जीव भं भगवन् किं. क्या आ० आत्मारंभी प० परारंभी उ० उभयारंभी अ० अनारंभी गो० गौतम अ० कितनेक जी. जीव आ. आत्मारंभी प० परारंभी उ० उभयारंभी णो० नहीं अ० अनारंभी अ० कितनेक जीव णो नहीं ठिती जहा ठितीपदे तहा भाणियव्वा. सव्व जीवाणं आहारोय जहा पन्नवणाए प- ढमे आहारुद्देसए तहा भाणेयव्यो । एत्तो आढत्तो गेरइयाणं भंते आहारट्ठी जाव दुक्खत्ताए भुजो भुज्जो परिणमंति ॥ ३७ ॥ जीवाणं भंते किं आयारंभा, परारंभा, तदुभयारंभा, अणारंभा? गोयमा!अत्थेगइया जीवा आयारंभावि,परारंभावितदुभयारंभावि, भावार्थ जानना. इसी तरह चौविस दंडक का कहदेना अहो भगवन् ! नारकी को आहार की इच्छा होती है ? यावत् दुःखरूप वारंवार परिणमे. इस में पहिले नारकी की वक्तव्यता कहीं वह आरंभ पूर्वक होती है इस लिये आरंभका निरूपण करते हैं॥३७॥अहो भगवन् ! क्या जीव स्वतः घात करनेवाले हैं, व अन्य की पास घात करनेवाले हैं स्वतः घात करानेवाले व अन्य की पास करानेवाले हैं, या दोनों प्रकार की घात से रहित अनारंभी हैं ? अहो गौतम कितनेक जीव आत्मारंभी हैं, परारंभी भी हैं, आत्मपरारंभी भी हैं परंतु अनारंभी पहिला शतक का पहिला उद्देशा २१.8 o शुदा ७४८ सूत्र • भनुवादक-पालप्रमागरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी र भ० होते हैं से० अथ ज० जैसे के कोई पु० पुरुष अ० एरण को आ० कुंटते हुवे म० बडे बडे स. शब्द से घो० घोप से प०परंपरा घा० घात से णो० नहीं सं० समर्थ ती उस अ० एरण के अं० यथा पादर पो० पुद्गल प० नीकालने को एक ऐसे ही गो, गौतम ने नारकी को पा० पापकर्म गा० दृढ किये हुवे जा० यावत् नो० नहीं म० महापर्यवसान वाले भ० होते हैं भ० भगवन् त वहा जे० जो व. जाव नो महापजवसाणाई भवति भगवं तत्थ जे से वत्थे खंजणरागरत्ते सेणं वत्थे सुधोयतराए चेव, सुवामतराए चेव सुपरिकम्मतराए चैव, एवामेव गोयमा ! समणांणं निग्गंथाणं अहा बायराई कम्माई, सिढिली कयाई, निट्ठियाई कडाई विप्परिणा- मियाई खिप्पामेव विद्वत्थाई भवंति ॥ जावइयं तावइयं विणं ते वेयणं वेएमाणा पार कर्म बहुत हह बन्धनवाले होते हैं, बहुत चीकने होते हैं, नियत्त होते हैं, निकाचित होते हैं. इस से नारकी उक्त करो भोगवे विना नहीं छुटने हैं. इस तरह महावेदना वेदते हुवे नारकी महा निर्जरा नहीं कर सकते हैं वैसे ही उन का महा पर्यवसान-निर्वाण नहीं होता है. जैसे पुरुप एरण पर लोहा रवकर बडे २ शब्दों से व घांप से एक पीछे एक बडे बडे घाव मारते हुवे उस के बादर पुद्गलों दूर करने को मपर्य नहीं होता है जैसे ही नारकी पूर्वकृत पाप कर्मों को दूर करने को व निर्वाण प्राप्त करने को ममयं नहीं होते है और जैसे खनन से भरा हुवा वस्त्र मरलता पूर्वक स्वच्छ व शुद्ध होता है वैसे * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी मालाप्रसादजी * ~ सत्र <80%> पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8888 धोयाजाये सु० सरलतासेरंगनीकाला जाये . पराक्रम वाले जे०. जो से उस को ५० वस्त्र के० कर्दम के रा. रंग से र० रंगाया हुवा जे० जो से वह व० वस्त्र खं० खंजन. के रा० रंग से र० रंगाया हुआ भ० भगवन् त० उस में जे० जो क० कर्दम राग से र० रक्त ए. ऐसे गो० गौतम ने० नारकी को पा० पापकर्म गा० दृढ क किये हुवे चि• चिकने किये हुए सि० निधत्त किये हुए खि• निकाचित किये हुए सं० दृढ ते वे वे० वेदना ये वेदते हुए णो नहीं म० महानिर्जरा नो० नहीं म० भहा पर्यवमान वाले मेव गोयमा ! नेरइयाणं पाबाई कम्माई गाढीकयाई, चिकणी कयाई, सिढिलीक- याई, खिलीकयाई भवंति, सपगाढंपियणं ते वेयणं वेएमाणा णो महानिजरा, नो महापज्जवसाणा भवंति, ॥ से जहा बा केइ पुरिसे अहिगरणिं आउडेमाणे महया महया सद्देणं महया २ घोसेणं, महया२ परंपराघाएणं णो संचाएइ तीसे अहिंगरणीए अहावायरे पोग्गले परिसाडित्तए ॥ एवामेव गोयमा ! नेरइयाणं पावाई कम्माई गाढीकयाई वखों में से कौनमा वस्त्र कठिनता से धोया जाता है, कौनसा वस्त्र का रंग कठिनता मे नीकाला जाता है, और कौनसा वस्त्र धोने में पराक्रम करना पडता है ? ऐसे ही कौनसा यत सरलता पूर्वक धोया जाना है, रंग निकाला जाता है व कौनसा वख धोने में पराक्रम नहीं करना पडना है ? अहो भगवन् ! जो चय कर्दम से भरा हुवा है वह कठिनता से युद्ध हो सकता है. ऐसे ही अहो गाँतर : नरक के जीरों को 388 उहा शतकका पहिला उद्देशा वार्थ A.
शब्दाथा ७५० सूत्र १ अनुवादक-लय मुनि श्री अमोलक मनीनी शुष्क त तृण हः हस्त जा आने में प० डालते हुए खि० शीघ्र भ० भस्म को आ० प्राप्त होता है ई० भ: भस्म को आ०. प्राप्त होता है एक ऐसे ही गो० गौतम स०.श्रमण नि. निर्ग्रन्थ अ० यथा वादर का धर्म जा. यावत् मं० महापर्यवसान वाले भ० होते हैं से० अथ ज० जैसे के० कोई पु० पुरुप त० तप्त अ० लोहे में उ० पानी का विं० विन्दु ना यावत् ६० हां विध्वंस को आ० प्राप्त होता है ए० ऐसे गो. गौतम स० श्रमग नि० निर्ग्रन्थ जा० यावत् म० महापर्यवसान वाले भ० होते हैं मे० अथ ते. इसलिय ने जो.म. महावेदना वाले से वह म० महानिर्जरा वाले जा० यावत् नि निर्जरा वाले ॥ ३ ॥ क० कितने प्रकार क भ० भगन क. करण प० प्ररूपे गो० गौतम च० चार प्रकार के क. करण ५० कइ रिसे तसि अयकवलंसि उदगाबिंदु जाव हंता विद्धंसमा गच्छइ, एवामेवगोयमा! समणाणं निग्गंथाणं जाव महापज्जवसाणा भवंति ॥ से तेणटेणं जे महावेयणे से महानिबरे जाव निजराए ॥ ३ ॥ कइविहेणं भंते ! करणे पणत्ते ? गोयमा ! पडने से शीघ नष्ट होता है वैसे ही श्रमण निर्ग्रन्थ के बादर कर्म पुद्गलों नष्ट होजाते हैं. इसी कारन से कहा है कि जो महा वेदनावाले होते हैं वे महा निर्गरावाले होते हैं और जो महा निर्जरावाले होते हैं। वे महा वेदनााले होत हैं. और महा वेदना व अल्प वेदनावाले में जो प्रशस्त निर्जरावाला है वह श्रेष्ट- प्रधान होता है ॥ ३ ॥ वेदना करण से होती है इसलिये करण का प्रश्न करने हैं. अहो भगवन् * प्रकाशक-रांजायहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * PAN हाथ GO ७४१ सूत्र पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती वख खं० खंजन राग से र० रक्त से वह व० वस्त्र सु० सरालता से धोया नावे मु० अच्छी तरह रंग हनीकाला जावे सु० अच्छा पराक्रम वाले ए. ऐसे ही गो० गौतम स० श्रमण निः निर्ग्रन्थ को अ० यथा वादर क० कर्म सि० शिथिल किये हुए नि० निष्टितार्थ क० किये हुवे वि० परिणमेहुए खि० शीघ्र वि. विध्वंस भ० होते हैं जा. जहांलग ता. वहाँलग ते. वे वे. वेदना वे वेदते हुवे म. महा निर्जरा म. महापर्यवसान भ० होते हैं से० अथ ज० जैसे के० कोई पु० पुरुप सु० सूका त तृण ह० हस्त में जा० अग्नि में ५० डाले से० अथ, णू० शंकादशी गो० गौतम से० वह मु. महानिजरा महापजवसाणा भवंति, से जहा नामए केइ पुरिसे सुकं तणहत्थयं जायतेयांस पक्खियेज्जा सेनूणं गोयमा से सुके तणहत्थए जायतेयंसि पक्खित्ते समाणे खिप्पामेव मसमसा विजइ ? हंता मसवसाविजइ, एवामेव गोयमा समणाणं निग्गंथाणं अहाबायराई कम्माइं जाव महापज्जवसाणाई भवंति, ॥ से जहा नामए ही अहो गौतम ! श्रमण निग्रंथ ने वादर कर्म पुगलों को मंदविपाकवाले वनाये, रस रहित किये, और शीघ्र नष्ट होवे वैसे बनाये. जहांलग उन को वे कर्मों उदय में रहते हैं वहांलग भी उन्हे वेदते हुवे महा निर्जरा व महा पर्यवमान करते हैं. जैसे शुष्क तृण अग्नि में डालते ही जल जाता है वैसे ही श्रमण निर्ग्रन्थ वादर कर्म पुगलों का विनाश करते हैं. और जैसे तप्त लोहे की. सलाका पर पानी का विन्दू 895 छठा शतकका पहिला उद्देशा 988 वार्थ 1- शब्दार्थ सून | अनुवादक-बालमनगरी मुनि श्री अमोलक आपनी काय करण क. कर्म करण ॥ ४ ॥ ने नारकी भ. भगवन् कि क्या क. करण से अ. असाता वि० वेदना वेज्वेदते हैं अ० अकरण से अ० अमाता वेवेदना वे० वेदते हैं के कैसे गो० गौतम ने नारकी को च. चार प्रकार के क. करण म० मन करण २० वचन करण का काया करण क० कर्म करण इ. इन च०चार प्रकार के अ० अशुभ करण से ने० नारकी क० करण से अ० असाता वे० पेदना ये वेदते हैं जो नहीं अ० अकरण से ते. इसलिये ॥ ५॥ अ० असुरकुमार किं० क्या क० विगलिंदियाणं वइकरणे कायकरणे कम्मकरणे, ॥ ४ ॥ नेरइयाणं भंते ! किं करणओ 'असायं वेयणं वेदंति, अकरणओ असायं वेयणं वेदति ? गोयमा ! नेरइयाणं करणओ असायं वेयणं वेदति णो अकरणओ असायं वेयणं वेदंति ॥ से केणट्रेणं ? गोयमा ! नेरइयाणं चउव्यिहे करणे प० तंजहा-मण करणे, वइकरणे, काय करणे कम्म करणे, इतेण नउबिहेणं असुभेणं करणेणं नरइया करणओ असायं वेयणं वेदति णो अकरणओ से तेणटेणं ॥ ५ ॥ असुरकुमाराणं किं करणओ अकरणओ ? गोयमा ! असाना वेदना नहीं वेदते हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से नारकी करण से असाता वेदना वेदते हैं. परंतु अकरण में नहीं वेदते हैं ? अहो गौतम ! नारकी को मन, वचन, काय व कर्भ ऐसे करण रहे हुवे इन चार अशुभ करण से नारकी असाता वेदना वेदते हैं ॥५॥ अहो भगवन् : क्या अमुर * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * सि शब्दाथ ७५१ 3282 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 88- प्ररूपे तं० वडज यथा म. मन करण व० वचन करण का काया करण क. कर्म करण ने नारकी को भ० भगवन् क. कितने प्रकार के क. करण ५० प्ररूपे म० मनकरण जा० यावत् क० कर्म करण ए. ऐसे पं० पंचेन्द्रिय स सब में च० चार प्रकार के क. करण प० प्ररूपे ए. एकेन्द्रिय को दु० दोप्रकार के का० काय करण क० कर्म क. करण वि० विकलेन्द्रिय को व० वचन करण का० चउविहे करणे पण्णत्ते, तंजहा मणकरणे, वइ करणे, काय करणे, कम्म करणे, नेरइयाणं भंते ! कइविहे करणे प० तं० मणकरणे जाव कम्मकरणे, एवं पंचिंदियाणं सव्यर्सि चउम्विहे करणे पण्णत्ते, एगिदियाणं दुविहे काय करणेय कम्म करणेय, करण के कितने भेद कहे हैं ? अहो गौतम ! करण के चार भेद कहे हैं मन करण, वचन करण, काया करण व कर्म करण. अहो भगवन् ! नारकी को कितने करण कहे ? अहो गौतम ! नारकी को चार करण कहे हैं. १ मन करण, वचन करण, काया करण, व कर्म करण. उसी प्रकार जितने पंचेन्द्रिय जीव हैं उन सब को चार करण होते हैं एकेन्द्रिय को काय करण व कर्म करण ऐसे दो करण होते हैं, और तीन विकलेन्द्रिय को काय, वचन व कर्म ऐसे तीन करण होते हैं ॥ ४ ॥ अहो भगवन् क्या नारकी करण से असाता वेदनीय वंदते हैं या अकरण से असाता वेदनीय वेदते हैं. अहो गौतम ! नारकी करण से अप्ताता वेदनीय वेदते हैं परंतु अकरण से SHRA छठा शतकका पहिला उद्देशा86880- भावार्थ e9 शव्दार्थ ७५२ सूत्र - अनुवादक-बालप्रमगरी मुनि श्री अमोलक पनी काय करण क० कर्म करण ॥ ४ ॥ ने० नारकी भ. भगवन् कि क्या क० करण से अ. असाता वेदना वेग्वेदते हैं अ० अकरण से अ० अमाता वेदना वे० वेदते हैं के कैसे गो. गौतम ने नारकी को च० चार प्रकार के क. करण म० मन करण व वचन करण का काया करण का कर्म करण इ० इन च चार प्रकार के अ० अशुभ करण से ने० नारकी क. करण से अ० असाता वे० वेदना वे वेदते हैं जो नहीं अ० अकरण से ते० इसलिये ॥५॥ अ० असुरकुमार किं. क्या क. विगलिंदियाणं वइकरणे कायकरणे कम्मकरणे, ॥ ४॥ नेरइयाणं भंते ! किं करणओ 'असायं वेयणं वेदंति, अकरणओ असायं वेयणं वेदति ? गोयमा ! नेरइयाणं करणओ असायं वेयणं वेदति णो अकरणओ असायं वेयणं वेदति ॥ से केणटेणं ? गोयमा ! नेरइयाणं चउविहे करणे प० तंजहा-मण करणे, वइकरणे, काय करणे कम्म करणे, इच्छेतेण नउन्विहेणं असुभेणं करणेणं नरइया करणओ असायं वेयणं वेदति णो अकरणओ से तेणटेणं ॥ ५ ॥ असुरकुमाराणं किं करणओ अकरणओ ? गोयमा ! भसाना वेदना नहीं वेदते हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से नारकी करण से असाता वेदना वेदते हैं. परंतु अकरण से नहीं वेदते हैं ? .अहो गौतम ! नारकी को मन, वचन, काय व कर्म ऐसे करण रहे हुवे इन चार अशुभ करण से नारकी अमाता वेदना वेदते हैं ॥५॥ अहो भगवन् ! क्या असुर * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्यालाप्रसादनी * apta गार्थ 60 P ९.9 • पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र <282 થી 6 करण से अ० अकरण से गो० गौतम क • करण से णो० नहीं अ० अकरण से के० कैसे गो० गौतम अ० असुरकुमार को च. चार प्रकार के क० करण इ० इन सु. शुभ करण से अ. असुरकुमार क. करण से सा० साता वे० वेदना बे०वेदते हैं नो नहीं अ० अकरण से ए. ऐसे थ० स्थनित कुमार पु० पृथ्वीकायिक क. करण से वे बेमात्रा ( मर्यादा रहित ) वे० वेदना चे. वेदते हैं नो० नहीं अ° अकरण से उ० उदारिक शरीर वाले स० सर मु० शुभ अ० अशुभ से वे वेमात्रा से दे देवा सु० शुभ करणओ जो अकरणओ। से केणटेणं ? गोयमा ! असुरकुमाराणं चउब्धिहे करणे सूत्र पण्णत्ते, तंजहा-मणकरणे, वइकरणे, कायकरणे, कम्मकरणे, इच्चेतेणं सुभेणंकरणेणं असुरकुमारा करणओ सायं वेयणं वेदंति, नो अकरणओं एवं जाव थणियकुमारा ॥ पुढवीकाइयाणं एवामेव पुच्छा णवरं एचएणं विकाइया करणओ वेमायाए वेयणं वेदति, नो अकरणओ ॥ उरालिय सरीरा नावार्थ कुमार करण मे या अकरण से वेदना वेदते हैं ? अहो गौतम ! असुरकुमार को मन, वचनं, काया व कर्म यों चार शुभ करण रहे हुवे हैं इन चारों ही शुभ करण से असुर कुमार साता वेदनीय कर्म वेदते हैं. ऐसे ही स्थानित कुमार का जानना. पृथ्वीकायिक करण से वेमात्रा वेदना वेदते हैं सब उदारिक शरीर वाले जीव शुभाशभ करण से मर्यादा रहित वेदना वेदते हैं, और देवों शुभ करण से माता वेदनीय APPS छठा शतक का पहिला उद्देशा सुभासुभेणं करणेणं पुढe ७० शब्दार्थ ७५४ सूत्र 1. अनुरादक बालनामधारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी करण से सा० साता वे वेदना वे० वदते हैं ॥ ६ ॥ जी जीव कि क्या म० महावेदना वाले म० महानिर्जरा याले म० महावेदना वाले अ० अल्ल निर्जरा वाले अ० अल्प वेदना वाले म० महानिर्जरा वाले अ० अल्प वेदना वाले अ० अल्प निर्जरावाले गो गौतम अ० कितनेक जी जीव म० महावेदनावाले १० महानिर्जग वाले के कैसे प० प्रतिमा ५० प्रतिपन्न ( सहित ) अ० अनगार म. महावेदनावाले सव्ये सुभासुभेणं वेमायाए, ॥ देवा सभेणं सायवेयणं वेदति, ॥ ६ ॥ जीवाणं भंते किं महावयणा महानिजरा, महावयण! अप्पनिजरा, अप्पवेयणा महानिजरा, अ- अप्पवेयणाअप्पनिजरा? गोयमा ! अत्थेगइया जीवा महावेयणा महानिजरा, अत्थेगइया जीवा महावेयणा अप्पनिजरा, अत्थेगइया जीवा अप्पवेयणा महानिजरा, अत्थेगइया जीवा अप्पवेयणा अप्पमिजरा ॥ से केणटेणं ?. गोयमा ! पडिमापाडेवण्णए अण- कर्म वेदते हैं ॥ ६॥ अहो भगवन् ! क्या जो जीव महा वेदनावाला होता है वह महा निर्जरावाला होता है, महा वेदनावाला अल्प निर्जरावाला होता है, अल्प निर्जरावाला महा वेदनावाला होता है, या अल वेदनागला अल्प निर्जरावाला होता है ? अहो गौतम ! कितनेक जीव. महा वेदनावाले व महा निर्जरावाले हैं, कितनेक महा वेदनाशले व अल्प निर्जरावाले हैं, कितनेक अल्प वेदनावाले व महा निगवाले हैं, और कितनेक अल्प वेदनावाले व अल्प निर्जरावाले हैं. अहों भगवन् ! यह किस तरह * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी साथ Poin शब्दार्थ ७०५ सत्र 8- पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगतो) मूत्र 883> म० महानिर्जरा वाले छ० छठी स० सातमी पु० पृथ्वी में नेक नारकी म० महावेदनांवाले अ० अल्प निर्जरा वाले से शैलेशी ५० प्रतिपन्न अ० अनगार अ० अल्प वेदनावाले म० महानिर्जरा याले अ० अनुत्तरोपपातिक दे देव अ. अल्प के. वेदना वाले अ० अल्प निर्जरा वाले से० वैसे ही भ० भगवन् म. महावेदना व वस्त्र क० कीचड खं० खंजन अ० एरण त० तृण ६० हस्त क. गारे महायणे महानिज, छट्ठसत्तमासु पुढवीसु नेरइया महायणा अप्पनिज्जरा, सेलेसि पडिवण्णए अणगारे अप्पवेयणेरे महानिजरे, अणुत्तरोववाइया देवा अप्पवेयणा, अप्पनिजरा ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ महावेयणायवत्थे, कद्दम खंजण कएय अहिकरणी, तणहत्थयकवल्ले, करण महावेयणा जीवा ॥ सेवं भंते ? अहो गौतम. ! प्रतिमा अंगीकार करनेवाले अनगार महा वेदनावाले महा निर्जरावाले होते हैं; क्योंकि वारद प्रकार की प्रतिमा अंगीकार करते अनेक प्रकार के कष्ट उपसर्ग होते हैं. २ छठी सातवी नरक के नारकी महा वेदनावाले व अल्प निर्जरावाले हैं ३ शैलेशी प्रतिपन्न चौदहवे गुण स्थान में रहनेवाले अनगार अल्प वेदनावाले व महा निर्जरावाले हैं और ४ सर्वार्ध सिद्ध विमान के देवता अल्प वेदना व अल्प निर्जरावाले हैं. इस उद्देशे का सारांश. महा वेदना का अधिकार, कर्दम व खंजनवाले दो वस्त्रका द्रष्टान, लोहार की ऐरण, तृण व तप्त लोहेका द्रष्टांत, चार करण का आधिकार, वेदना निर्जराकी चौभंगी, 89-90% छटा शतक का पहिला उद्देशा भावार्थ UYO शब्दार्थ ७७ सुत्र अनुवादक-बालग्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी पृथक् आ० आहार ज० जघन्य दि० दिवस पृथक् उ० उत्कृष्ट दिवस पृथक् ॥ ३६ ॥ वे० वैमानिक को ठि० स्थिति मा० कहना उ० उश्वास न० जघन्य मु० मुहूर्त पृथक् उ० उत्कृष्ट ते० तेत्तीस प० पक्ष आ० आहार ज० जघन्य दि० दिवस पृथक् उ० उत्कृष्ट ते० तेत्तीसवर्ष स० सहस्र से० शेष तं० तैसे जा० यावत् णि निर्जरे ए० ऐसे ठि० स्थिति आ० आहार भा० कहना ठि• स्थिति ज जैसे ठि० वि णवरं उस्सासो जहण्णेणं मुहुत्त पुहुत्तस्स, उक्कोसेणवि मुहुत्त पुहुत्तस्स आहारो जहण्णेणं दिवस पुहुत्तस्स उक्कोसेणवि दिवस पुहुत्तस्स सेसं तंचेव ॥ ३६ ॥ वेमा- णियाणं ठिई भाणियवाओहिया, उस्सासो जहण्णेणं मुहुत्त पुहुत्तस्स, उक्कोसेणं ते- त्तीसाए पक्खाणं ॥ आहारो आभोगनिव्वत्तिओ जहण्णेणं दिवस पुहुत्तस्स उक्कोसेणं तेत्तीसाए वाससहस्साणं, सेसं तंचव जाव णिजरेति. एवं ठिती आहारो य भाणियन्वो. उश्वास जघन्य उत्कृष्ट प्रत्येक मुहूर्त आहार की इच्छा जघन्य उत्कृष्ट प्रत्येक दिन में होवे ॥ ३६ ॥ वैमा- निक,देवताओं की स्थिति जघन्य एक पल्योपमकी उत्कृष्ट तेतीस सागरोपम की श्वासोश्वास जघन्य प्रत्येक मुहूर्त में लेवे उत्कृष्ट ३३ पक्ष में लेवे, आभोग निवर्तित आहार की इच्छा जघन्य प्रत्येक दिन में होवे. उत्कृष्ट तेत्तीस हजार वर्ष में होवे शेप चलित कर्म की निर्जरा करे वहांतक. सव अधिकार पहिले जैसे कहना. सब जीवों की स्थिति स्थिति पद से जानना व आहार पनवणा मूत्रके पदिले आहार उद्देशे में जैसा * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी * भावार्थ ७५५ 8 पंचमाङ्ग विवाह पण्णनि (भगतो) मूत्र > शब्दार्थ म. महानिर्जरा वाले छ• छठी स. सातमी पु० पृथ्वी में ने. नारकी म. महावेदनांवाले अ० अल्प निर्जरा वाले से शैलेशी ५० प्रतिपन्न अ० अनगार अ० अल्प वेदनावाले म० महानिर्जरा वाले अ० अनुत्तरोपपातिक दे देव अ. अल्प वे. वेदना वाले अ० अल्प निर्जरा वाले से० वैसे ही भ० भगवन् म. महावेदना व वन क० कोचड खं० खंजन अ० एरण त० तृण द० हस्त कर सूत्र गारे महायणे महानिज, छट्ठसत्तमासु पुढवीसु नेरइया महारयणा अप्पनिजरा, सेलेसि पडिवण्णए अणगारे अप्पवेयणेरे महानिजरे, अणुत्तरोववाझ्या देवा अप्पवेयणा, अप्पनिजरा ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ महावेयणायवत्थे, कहम खंजण कएय अहिकरणी, तणहत्थयकवल्ले, करण महावेयणा जीवा ॥ सेवं भंते भावार्थ ? अहो गौतम ! प्रतिमा अंगीकार करनेवाले अनगार महा वेदनावाले व महा निर्जरावाले होते हैं; क्योंकि वाराह प्रकार की प्रतिमा अंगीकार करते अनेक प्रकार के कष्ट उपसर्ग होते हैं. २ छठी सातवी नरक के लारकी महा वेदनावारे व अल्प निर्जरावाले हैं ३ शैलेशी प्रतिपन्न चौदहवे गुण स्थान में रहनेवाले अनगार अल्प वेदनावाले व महा निर्जरावाले हैं और ४ सर्वार्ध सिद्ध विमान के देवता अल्प वेदना व अल्प निर्जरावाले हैं. इस उद्देशे का सारांश. महा वेदना का अधिकार, कर्दम व खंजनवाले दो वस्त्रका द्रष्टांत, लोहार की ऐरण, तृण व तप्त लोहेका द्रष्टांत, चार करण का आधिकार, वेदना निर्जराकी चौभंगी. 99-2009 छटा शतक का पहिला उद्देशा शव्दार्थ ७५४ सूत्र सः अनुवादक-यालयामचारी मुनि श्री अमालक ऋपिनी करण से सा० साता चे. वेदना वे वेदते हैं ॥ ६॥ जी जीव कि क्या म. महावेदना वाले म० महानिर्जरा वाले म० महावेदना वाले अ० अल्प निर्जरा वाले अ० अल्प वेदना वाले म० महानिर्जरा वाले अ. अल्प वेदनां वाले अ० अरूप निर्जरावाले गो गौतम अ कितनेक जी. जीव म० महावेदनावाले १० महानिर्जग वाले के कैसे ५० प्रतिमा ५० प्रतिपन्न ( सहित ) अ. अनगार म. महावेदनावाले सब्बे सुभासुभेणं वेमायाए, ॥ देवा सभेणं सायवेयणं वेदति, ॥ ६ ॥ जीवाणं भंते किं महावेयणा महानिजरा, महावयणा अप्पनिजरा, अप्पवेयणा महानिजरा, अ- अप्पवेयगाअप्पनिजरा? गोयमा ! अत्थेगइया जीवा महावेयणा महानिजरा, अत्थेगइया जीवा महावेयणा अप्पनिजरा, अत्थेगइया जीवा अप्पवेयणा महानिजरा, अत्थेगइया जीवा अप्पवेयणा अप्पमिजरा ॥ से केणट्रेणं ?. गोयमा ! पडिमापाडेवण्णए अण- गर्म वेदते हैं ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! क्या जो जीव महा वेदनावाला होता है वह महा निर्जरावाला होता है, महा वेदनावाला अल्प निर्जरावाला होता है, अल्म निर्जरावाला महा वेदनावाला होता है, या अल्प वेदनागला अल्प निराशाला होता है ? अहो गौतम ! कितनेक जीव महा वेदनावाले व महा निर्जरावाले हैं, कितनेक महा वेदनाराले व अल्प निर्जरावाले हैं, कितनेक अल्प वेदनावाले व महा निर्जगवाले हैं, और कितनेक अल्प वेदनावाले व.अल्प निर्जरावाले हैं. अहों भगवन् ! यह किस तरह प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी 'नानाथ NA शब्दार्थ सन्न १११ पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भवगती) सूत्र 28 व० बहुत क० कर्म व वस्त्र पो० पद्गल प० प्रयोगसे पी० स्वभाव से सा० अदिसहित. क: कर्म स्थिति इ० स्त्री सं: संयति स० सम्यक् दृष्टि स० संज्ञी भ० भव्य दं दर्शन प० प्रर्याप्त भा० भापक अ० अपरत ना. ज्ञान जो० योग उ० उपयोग आ० आहारक सू० सूक्ष्म च० चरिम बे० बंध अ० अल्पबिहुल से. अथ पू. शंकादर्शी भ• भगवन् म० महाकर्मवाले म० महा आश्रव वाले म. महाक्रिया वाले त० महा- बहुकम्म वत्थ पोग्गल पयोगसा वीससाय सादीए ॥ कम्मट्ठिइथि संजय, सम्मदि- ट्ठीय सन्नीय ॥ १ ॥ भविए देसण पज्जत्त, भास अपरित्त नाण जोगेय ॥ उवओगा हारग सुहम चरिमबंधेय अप्पबहुं ॥ २ ॥ से णूणं भंते ! महाकम्मस्स, महासवस्स महाकिरियरस, महावेयणस्स, सव्वओ पोग्गला बझीत, सव्वओ पोग्गला चिजंति, दूसरे उद्देशे में आहार का अधिकार कहा. आहारिक जीव सकर्मी होते हैं इसलिये कर्मबंध का, सम्बन्ध कहते हैं. जैसे आदि में स्वभाव से व प्रयोग से पुद्गलों एकत्रित होकर वन बनता है वैसे ही महाकर्म से पुद्गल का बंध करे, कर्म की स्थिति, स्त्री पुरुप कर्म का बंध करे, संयति, दृष्टिद्वार, संज्ञी, भवि, दर्शन, पर्याप्त, भाषक परत, ज्ञान, जोग, उपयोग, आहारक, मूक्ष्म, चरिम, वंध व अल्पाबहुत्व. अहो भगवन् ! स्थिति आदि की अपेक्षा से महाकर्मी, मिथ्यात्वादिक की अपेक्षा से महा आश्रवी, कायि- कादि क्रिया से महा क्रियावंत, और साता असाता रूप वेदना से महा वेदनावंत जीव को सब दिशी के भावार्थ छठा - शतक का तीसरा उद्देशा 88 00 yo
शब्दार्थ) लोहे क. ग्वीला क० करण म. महावेदना जी० जीव छ० छट्ठा स० शतकका प०प्रथम उ०उद्देशा॥६॥शा
रा० रानगृह ने० नगर जा. यावत् ए. ऐसा व० बोले आ० आहार उ० उद्देशा जो० प० पनवणा
म. सब नि० निरवशेष ने० जानना. छ० छट्ठा स० शतक का वि० दुसरा उ० उद्देशा स०समाप्त।६।२
७५६
सत्र
x
भंतेत्ति ॥ छ? सयस्स पढमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ६ ॥१॥
रायगिहं णगरं जाव एवं वयासी-आहारुद्देसो जो पण्णवणाए सब्बों निरवसेसो
नेयव्यो । सेवं भंते भंतेत्ति ॥ छट्ठसयस्स विइओ उद्देसो सम्मत्तो ॥ ६ ॥ २ ॥
व अनुवादक-बालमानगारोमुनि श्री अमोलक ऋपिनी
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ
.
अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह छठा शतक का पहिला उद्देशा पूर्ण दुवा ॥ ६ ॥ १ ॥
प्रथम उद्देशे में वेदना का अधिकार कहा. वह वेदना आहारवन्त जीव को होती है इसलिये आगे
आहार का अधिकार कहते हैं. राजगृही नगरी में गुण शील नामक उद्यान में श्रमण भगवन्त महावीर
सामी को भगवान् गौतम स्वामी वेदना नमस्कार कर पूछने लगे कि अहो भगवन् ! नरक के जीवोंको
पया मनिन, अचित्त, या मीश्र का आहार है ? अहो गौतम ! नरक के जीवों सचित्त आचत्त.का
पाहार करते हैं परंतु मीश्र का आहार नहीं करते हैं. इत्यादि आहार संबंधी सब वर्णन पन्नवणा सूत्र जैसे
नानना. अहाँ भगवन् ! आप के बनन सत्य हैं. यह छठा शतक का दूसरा उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥३॥२॥
शब्दार्थ 29 ७५९ सूत्र 88- पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 383 11 वाले को तं वैसे ही से० अथ के० कैसे गो गौतम ज० जैसे व० वस्त्र अ० नहीं भोगवा हुवा धो० धोया हुवा त० तंतुमे रहा हुवा आ० अनुक्रम ले प० भोगते हुने स० चारों तरफ से पो० पुद्गल १० बंधाते हैं स० चारों तरफ से पो० पुद्गलं चि० चयहोते हैं उ• उपचय होते हैं जा० यावत् प० परिण- मते हैं ते. इसलिये ॥ १ ॥ से० अथ भं. भगवन् अ० अल्प आश्रय वाले को अ० अल्प कर्म वाले को दुक्खत्ताए नो सुहत्ताए, भुजो भुजो परिणमंति ? हेता गोयमा ! महाकम्मरस तंचेव सेकेणटेणं ? गोयमा ! से जहा नामए वत्थस्स अहतस्सवा, धोयस्सवा, तंतुगय. स्सवा आणुपुब्बीए परिभुंजमाणस्स सब्बओ पोग्गला बझंति, सबओ पोग्गला चिजंति, जाव परिणमंति सेतेणटेणं ॥ १ ॥ सेणूणं भंते ! अप्पासवस्स अप्प- कम्मरस, अप्पकिरियस्स, अप्पवेयणस्स, सव्वओ पोग्गला भिति,सव्वओ पोग्गला जैसे उपयोग में नहीं लाया हुवा, धोया हुवा अथवा तुरीवेमादिक (साल) से मात्र निकाला हुवा ऐसा वख को भोगते हुवे उस में मलिन पुद्गलों का बंध, चये, व उपचय होता है और वह वन भी खराय वर्णपने यावत वारंवार परिणमता है वैसे ही महाकर्म, महाआश्रयवाले को संचित किये हुचे पुद्गलों दुष्ट वर्णपने यावर वारंवार परिणमते हैं ॥१॥ अहो भगवन् ! अल्प कर्मवाले, अल्प आश्रववाले, अल्प नियावाले व अल्प वेदनावाले पुरुष को सब दिशि के पुद्गलों क्या मेदाते हैं. छेदाते हैं, विध्वंस होते 3 छठा शतक का तीमरा उद्देशा - भावार्थ शनाया मूत्र 4 अनुवादक-बालभारी माने श्री अमोलक पनीर वदना वाले म० सब से पो०. पुद्गल व० बंधाते हैं..म सब पो०.पुगल चि० चयहोते हैं. उ० उपचय दोखे हैं स० सदाः स निरंतर त उस का.आ. आत्मा दु० दुष्टरूपपने दु: दुष्ट वर्णपने दु०. दुष्ट गंध पने दु० दुष्ट रसपने दु० दुष्ट स्पर्श पने अ० अनिष्ट अ० अकांत. अ.: अमिय, अ० अशुभ अ० अमनोज्ञ भ० अमणाम अनहीं इच्छने योग्यपने अ०..नहीं चितवने योग्य अ०, जघन्यपने नो० नहीं ३०,मुख्यपने दु. दुम्पपने नो• नहीं मु० सुखपने भु. वारंवार प० परिणमते हैं ई० -हां गो. गौतम. म० : महाकर्म सव्यओ पोग्गला उवचिजति, · सयासमियं पोग्गला बझंति; सयासमियं पोग्गला...., चिजंति, सयासमियं पोग्गला उवचिजंति, सयासमियं च णं तस्स आया दुरूवत्ताए, दुवण्णचाए, दुगंधत्ताए दुरसत्ताए, दुफासत्ताए, अणि?त्ताए, अकंत-अप्पिय-असुभ अमणुण्ण-अमणामत्ताए-अणिच्छियत्ताए, अभिझियत्ताए, अहत्ताए,. . नोउद्धृत्ताए; भया जोर के सब प्रदेश आश्रित पुद्गलों का क्या बंध, चय, व उपचय होता है ? अथवा सदैव निरन्तर उन पुगनों का बंध, चय व उपचय होता है ? और जिन को कर्म का बंध, चय व उपचय होता उन का भात्मा बाबात्मा ] क्या दुष्ट वर्ण, गंय, रस, वं स्पर्शपने, अनिष्ट, अकांत, अमिय, अमनोज व अ. पनामपने, अथवा नहीं इच्छो योग्य, नहीं चितवने योग्यपने, जघन्यपने, मुख्यपने, व दुःखपने, वारंवार परिणमना है? हां गौतम ! सब वैसे ही होता है. अहो भगवन् ! यह किस तरह ? .अहो गौतम * मकाशक-रांजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * ve शब्दार्थ ७०.. सूत्र १३. पंचमांग विवाह पण्णचि ( भगवती) मूत्र 8980- म. भेदाते हैं जा० यावत् प० परिणमते है ते इसलिये ॥२॥ वं० वस्त्र के भ० भगवन् । पो० पुगलों का उ० उपचय किं. क्या ५० प्रयोग से पी० साभाव से गो० गौतम प० प्रयोग से भी वा० स्वभाव से भी ज. जैसे त० तैसे क० कर्मों का उ० उपचय कि० क्या प. प्रयोग से पी० स्वभाव से गो० गौतम प० प्रयोग से नो० नहीं वी० स्वभाव से के० कैसे.गो. गौतम भिजति जाव परिणमंति. से तेणटेणं ॥ २ ॥ वत्थस्सणं भंते ! पोग्गलोवचये किं पयोगसा वीससा ? गोयमा ! पयोगसावि, बीससावि, जहाणं भंते ! वत्थरसणं पोग्गलोरचये पयोगसावि, वीससावि, तहाणं जीवाणं कम्मोवचए, किं पयोगप्ता, वीससा ? गोर्यमा ! पयोगसा नो वीससा । से केणट्टेणं ? गोयमा ! जीवाणं तिविहे पओगे पण्णत्ते तजहा मणप्पओगे, वइप्पओगे, कायप्पओगे, इच्चेतेणं तिविहेणं पयो- क्रिया व वेदनावाले को कर्म पुद्गल छेदाते भेदाते हैं और उन का आत्मा मुखपने परिणमता है ॥२॥ अहो भगवन् ! वस्त्र के पुद्गलों का उपचय क्या स्वभाव से होता है या प्रयोग से होता है ? अहो गौतम ! वस्त्र के पुद्गलों का उपचय स्वभाव से होता है परंतु प्रयोग से नहीं होता है. अहो भगवन् जैसे वस्त्र के पुद्गलों का उपचय प्रयोग व स्वभाव दोनों से होता है वैसे ही क्या जीव के कर्मों को उप- चय स्वभाव से होता है.-या प्रयोग से होता है ?. अहो गौतम ! जीवों को कर्मों का उपचय स्वभाव से छठा शतक का तीसरा उद्देशा 8 भावार्थ OTO 4. भनुदकयालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ अ० ला क्रिया वाले को-अ० अल्प वेदना वाले को स० सब से पो. पुद्गल 'भि० भेदाते हैं छि० छदाते हैं वि० विनाश पाते है १० वारंवार विनाशपाते हैं स० सदैव १० उस का आ• आत्मा सु. रूपपने प० प्रशस्त ने जानना जा० यावत् सु० सुखपने भु. वारंवार प० परिणमते है ई० हाँ गो गौतम जा० यावत् प० परिणमते हैं के कैप्से गोगौतम व० वस्त्र ज० मेला पं. कीचंड वाला, म० कठिन मेलबाला ररजयुक्त आं० अनुक्रवसे प०पराक्रम करते सु० शुद्ध पा०पानीसे घो घोते स०सव पो० पुद्गल सूत्र छिजाति,सव्वओ पोग्गला विद्धंसति संवओ पोग्गला परािवद्धसंति, सयासमियं पोग्गला मिजात,छिज्जंति,विद्वंसंति,परिवद्धसंति;सयासंमियंचणं तस्स आयारूवताए पसत्थं नेयन्वं जाव सुहत्ताए, नोदुक्खत्ताए भुजो भुजो परिणमइ ? हंता गोयमा! जाव परिणमइ । से केणट्टेणं? गोयमा! से जंहा नामए वत्थरस जल्लियस्सवा, पंकियस्सवा, मइलियस्सवा, रति- लियस्सवा आणुपुवीए परिकमिजमाणस्स सुद्धेणं वारिणा धोव्वमाणस्स सव्वओ पोग्गला या पारीधिसं होते हैं ? अथवा मदैव निरंतर पुद्गल भेदाते हैं यावत् विशेष नष्ट होते हैं. उस का भारमा अच्छे रूप, वर्ण, गंध, रस व स्पर्शपने यावत् सुखपने वारंवार 'क्या परिणमता है ? हां गौतम ! एमा होता है. अहो भगवन् ! यह किन तरह ? अहो गौतम ! जैसे मैल, कीचड व रज मे भरा हुवा राम को शुद्ध पानी से धोने से मब मलिन पुगलों नष्ट हो जाते हैं वैसे ही अल्प कर्म, आश्रय, प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * ७ । ७६३ 48 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 88-80 ब्दार्थ जा. यावत् वे० वैमानिक ॥३॥व० वस्त्र के० भ० भगवन् पो. पुद्गलोपचय में किं० क्या सा० आदि समान्त सा० सादि अ० अनंत अ० अनादि स० सांत अ अनादि अ० अनंत ज० जैसे भं० एवं जस्स जोप्पओगो जाव वेमाणियाणं ॥ ३ ॥ वत्थस्सणं भंते ! पोग्गलोवचए सूत्र किं सादीए सपज्जवसिए, सादीए अपज्जवसिए, अणणदीए, सपज्जवसिए, अणादीए अपजवसिए ? गोयमा ! वत्थस्सणं पोग्गलोवचए सादीए सपनवासिए, नोसादिए अपजवसिए, नो अणादीए सपज्जवसिए नोअणादीए अपजवासिए ॥ जहाणं भंते ! वत्थस्स पोग्गलोवचए सादीए सपज्जवसिए, नोसादीए अपज्जवसिए णो अणादीए सपज्जवसिए नोअणादीए अपज्जवसिए, तहाणं जीवाणं कम्मावचए पुच्छा, गोयमा ! भावार्थ जो प्रयोग होवे वैसा वैमानिक तक जानना ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! वस्त्र का पुद्गलोपचय क्या आदि अंव- वाला है, आदि अंत रहित है, अनादि मान्त है व अनादि अनंत है ? अहो भगवन् ! वस्त्र के पुद्गलों का उपचय आदि सान्त है. इस में शेष तीन भांगे नहीं मिल सकते हैं. अहो भगवन् ! जैसे वस्त्र का पुद्गलोपचय सादि मान्त, परंतु सादि अनंत, अनादि सान्त व अनादि अनंत नहीं है वैसे ही क्या कर्म का उपचय सादि सान्त यावत् अनादि अनंत है ? अहो गौतम ! कितनेक जीवों का कर्मोपचय सादिसान्त है, कितनेक को अनादि सांत है और कितनेक को अनादि अनंत है परंतु सादि अनंत नहीं 3 छठा शतकका तीसरा उद्देशा 8><P> 09 शब्दार्थ ७६२ सूत्र अनुवादक- बालनमवारी मनि श्री अमोलक अपनी जी० जीपों को. ति तीन प० प्रयोग प० प्रयोग से जी० जीव क० कापचय प० प्रयोग से नो० नहीं व० स्वभाव मे ए ऐसे स० सव पं० पंचेन्द्रिय को वि०. तीन ५० प्रयोग भा० कहा पु० पृथ्वीकाय ए० एक पं० प्रयोग से ए. ऐसे जा० जावत् २० वनस्पति का काया वि. विकलेन्द्रिय दु. दोप्रकार के प० प्रयोग प० कहे व० वचन प्रयोग का काय प्रयोग ए० ऐसे ज० जिन को जो जो प० प्रयोग गेणं जीवाणं कम्मोवचये पयोगसा नो वीससा, एवंसव्वेसिं पंचिंदियाणं तिविहे फ्योगे भाणियव्ये, ॥ पुढविकाइयाणं एग विहपओगेणं, एवं जाव वणस्सइ काइया, •॥ विगलिंदियाणं- दुविहे पओगे पण्णत्ते तंजहा-वइप्पयोगेय, कायप्पओगेय, इच्चेतेणं दुविहेणं पयोगेणं कम्मोवचये पयोगसा नोवीससा से एणं अटेणं जाव नो वीससा ॥ नहीं होता है परंतु प्रयोग से होता है. अहो भगवन् ! किस प्रकार जीवों को प्रयोग से कर्म पुद्गलों का उपचय होता है ? अहो गौतम! जीवों को तीन प्रकार का प्रयोग कहा. १ मनं प्रयोग, २ वचन प्रयोग ३ काय प्रयोग. इन तीन प्रयोग से जीव कर्मों का उपचय करते हैं परंतु स्वभाव से नहीं करते हैं. ऐसे ही सब पंचेन्द्रिय का जानना.' पृथ्वीकायिकादिक पांच स्थावर को मात्र एक काय प्रयोग है और विकलेन्द्रिय को काया व वचन ऐसे दो प्रयोग हैं. इसलिये पांच स्थावर एक काया का प्रयोग से र विस्लेन्द्रिय काया व वचन ऐमे दोनों के प्रयोग से कर्म का उपचय करते हैं, इस तरह जिम को * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ 3888 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 928 B803 पहिला शतक कापहिला उद्देशा goog- शब्दार्थ अममत्त संथति त तहां जे० जो अ० अप्रमत्त संयति तेवे णो० नहीं आ- आत्मारंभी णो नहीं ५० परारंभी जा० यावत् अ० अनारंभी त• तहां जे० जो प० प्रमत्त संयति ते वे सु० शुभयोग ५० आ. श्रित णो नहीं आ० आत्मारंभी जा. यावत् अ० अनारंभी अ० अशुभयोग प० आश्रित आ० आ- त्मारंभी जा. यावत् णो० नहीं अ० अनारंभी तं तहां जे० जो० अ० असंयति ते० वे अ० अविरति आयारंभा जाव अणारंभा ॥ तत्थणं जे ते संसार समावण्णगा, तेदुविहा प०, तं. संजयाय, असंजयाय । तत्थणं जे ते संजया, ते दुविहा प०, तं० पमत्त संजयाय, अपमत्त संजयाय । तत्थणं जे ते अपमत्त संजया तेणं णो आयारंभा, णो परारंभा जाव अणारंभा । तत्थणं जे ते पमत्त संजया ते सुहंजोगं पडुच्च णो आयारंभा, भावार्थ गतिरूप संसार में अनंत वक्त परिभ्रमण करके समस्त कर्म क्षयरूप स्थानक सो मोक्ष को प्राप्त हुवे उन को सिद्ध कहते हैं. वे मिद्ध आत्मारंभी, परारंभी व उभयारंभी नहीं हैं. परंतु अनारंभी हैं. और जो संसार समावन्न जीव हैं वे दो प्रकार के कहे हैं संयति सो चारित्र सहित व असंयति सो चारित्र रहित .० उस में संयति के दो भेद १ प्रमत्त संयति २ अप्रयत्त संयति. जो सप्तम गुणस्थान वर्ती अममत्त संयति हैं वे आत्मारंभी, परारंभी व उभयारंभी नहीं हैं परंतु अनारंभी हैं. और जो छठे गुणस्थानवर्ती प्रमत्त संयति हैं वे शुभ योग आश्रित आत्मारंभी, परारंभी, व उभयारंभी नहीं हैं परंतु अनारंभी शब्दार्थ ७६४ र अनुवादक-नालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 6 भगवन् व० वस्त्रं का पो० पुगलौपचय सा० सादि स• सान्त त० तैसे जी० जीवों को क. कर्पोपचय में पु० पृच्छा गो० गौतम अ० कितनेक जी० जीवों को क• काँपचय सा० सादी स० सान्त अ० कितनेक अ० अनादि स सान्त अ० कितनेक अ० अनादि अ० अनंत नो नहीं सा० सादि अ० अनंत के० कैसे गो० गौतम इ० ईपिथिक 40 बंध के क० कर्मोपचय सा० सादि स. सान्त भ. भवमिद्धिक क० कर्मोपचय अ० अनादि स सान्त अ० अभवसिद्धिये का क० कर्मोपचय अ० अनादि अत्थेगइयाणं जीवाणं कम्मोवचए, सादीए सपज्जवसिए, अत्थेगइए अणादीए सपज्जवसिए अत्यगइए अणादीए अपज्जवसिए, नोचेवणं जीवाणं कम्मोवचए सादीए अपज्जवसिए से केणटेणं ? गोयमा ! इरियावहियाबंधस्स कम्मोवचए सादीए. सपजवासिए, भवसिद्धियस्स कम्मोवचए अणादीए सपज्जवसिए, अभवसिद्धियरस कम्मोवचए अहो भगवन् ! यह किस तरह है ? अहो गौतम ! ईर्यापथिक बंध का कर्मोपचय सादिपान्त है. क्योंकि उपशान्त व क्षीण मोहनीय गुणस्थानवी जीव ऐसा कर्मबंध करते हैं कि जो पहिले समय में पपिने हैं, दूसरे समय में वेदते हैं और तीसरे समय में निर्जरते हैं. भवसिद्धिक जीवों को अनादिसान्त क्योंकि उन के कर्मों की आदि नहीं है परंतु वे कर्मों का क्षय करके मोक्ष में जायेंगे इसलिये सान्त है अमासिद्धिको कर्मोपचय अनादि अनंत है. क्योंकि उन को कर्मों की आदि नहीं होती है वैसे ही * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * पाथ ०७ सूत्र Mer पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 2283 छठा शतक का तीसरा उद्देशा<PP अ० अनंत ते. इसलिये ॥ ४ ॥ ३० व भं० भगवन् कि क्या सा० सादि स० सांत च. चार भांगे गो० गौतम व वस्त्र सा० सादि स० सांत अ० शेप ती तीन का प० प्रतिपध ज. जैसे भ० भगवन् । सा सादि म० सांत त• तैसे जी. जीव किं. क्या सा. सादि स० बान्त च. चार भांगे पु० * ७६५ पृच्छा गो० गौतम सा० सादि सा० सान्त च० चारों भा० कहना के० कैमे गो० गौतम ने. अणादीए अपज्जवसिए से तेणट्रेणं ॥ ४ ॥ वत्थेणं भंते ! किं सादीए सपज्जवासए चउभंगो ? गोयमा ! वत्थे सादीए सपजवासिए अबसेसा तिण्णिवि पडिसेहेयव्वा जहाणं भंते! वत्थे सादीए सपजवासए नो सादीए अपज्जवसिए, नो अणादीए सपज- वसिए, णो अणादीए अपजवसिए ॥ तहा जीवा किं सादीया सपजवसिया चउभंगो, मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकते हैं इसलिये ऐमा कहागया है ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! क्या बत्र सादिसान्त, सादि अनंत, अनादिसान्त व अनादि अन्त है ? अहो गौतम ! वन में सादिसान्त भांगा मिलता है. शेप तीन भांगे नहीं मीलते हैं. अहो भगवन् ! जैसे वस्र सादिसान्त है वैसे ही जीव क्या सादिसान्त, सादि अनंत, अनादिमान्त, व अनादि अनंत है ? अहो गौतम ! जीव में चारों भांग पाते हैं. अहो भगवन् ! यह किस तरह ! अहो गौतम ! नरक, तिर्यंच, मनुष्य व देव इन चारों गति आश्रित सादिसान्त हैं क्योंकि उक्त चारों गति में जीव उत्पन्न होते है सो आदि और चवते हैं सो अंत, सिद्ध- भावाथे, .
शब्दार्थ) भनुवादक-बालबमधारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 नारकी ति० तिर्यंच म० मनुष्य दे. देव ग. गति आ. आगति प० संबंधी सा. सादि स. सान्त सि. सिद्धगति ५० आश्रित सा० सादि अ० अनंत भ० भवसिद्धिक ल. लब्धि ५० आश्रित अ. अनादि स० सान्त अ० अभवसिद्धिक सं० संसार १० आश्रित अ० अनादि अ० अनंत ते इसलिये ॥ ५॥ क० कितनी भ० भगवन् क० कर्म प्रकृति प० कही गो० गौतम अ० आठ क. कर्म प० प्रकृतियों प० कहीं णा० ज्ञाना वरणीय दं० दर्शना वरणीय जा. यावत् अं० अंतराय ना. पुच्छा ? गोयमा ! सादीया सपज्जवसिया, चत्तारि वि भाणियव्या ॥ से केणढणं ? गोयमा ! नेरइय तिरिक्ख जोणिय मणुस्स देवा गइरागई पडुच्च सादीया सपजव- सिया ॥ सिद्धगति पडुच्च सादीया अपजवसिया, भवसिद्धिया लद्धिं पडुच्च अणादिया सपजयसिया, अभवसिद्धिया संसारपडुच्च अणादीया अपज्जवसिया से तेण?णं ॥५॥ गनि आश्रित सादि अनंत है क्योंकि सिद्धगति में उत्पन्न होने का है परंतु चवने का नहीं है. भवसि- दिकी न्यन्धि आश्री अनादि सान्त है क्योंकि जीव को स्वभाव से भवसिद्धिकी लब्धि होती है परंतु जब सिद्ध होते हैं उम समय में लब्धि का क्षय होता है और अभवसिद्धिक संसार आश्री अनादि अनंत १. इमलिये जीव में चार भांगे ग्रहण किये हैं ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! कर्म प्रकृतियों कितने प्रकार की कही है अहो गौतम ! १. ज्ञानावरणीय, २ दर्शनावरणीय, ३ वेदनीय, ४ मोहनीय, ५ आयुष्य, नाम, * प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * , ब्दार्थ ७६७ ११- पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 388 ज्ञाना वरणीय क कर्म की के० कितना का काल की पं०. बंधस्थिति गो०. गौतम ज०. जघन्य अं० अंतर्मुहूर्त उ० उत्कृष्ट ती० तीस मागरोपम को० कोडी ति० तीन वा० वर्ष स० सहस्र अ० अवाधा अ० अबाधा उ० कम क० कर्म स्थिति क० कर्म निपेक ए. ऐसे दं. दर्शनावरणीय वे० वेदनीय का कइणं भंते ! कम्मपगडीओ पण्णताओ ? गोयमा ! अट्ठकम्मपगडीओ पण्णत्ताओ' तंजहा गाणावराणिजं, दरिसणावराणिजं, जाव अंतरायं ॥ नाणावरणिज्नस्सणं भंते ! कम्मस्स केवइयं कालं बंधट्ठिई पणत्ता ? गोयमा ! जहणं अंतोमुहत्तं उक्कोसं तीसं सागरोवम कोडाकोडीओ, तिण्णियवाससहस्साई अवाहा, अबाहूणिया, कम्मट्टिई कम्मनिसेओ ॥ एवं दरिसणावराणपि ॥ वेयणिजं जहण्णं दो समया उ- ७ गोत्र व ८ अंतराय ऐसे आठ कर्मप्रकृतियों कही हैं. अहो भगवन् ! ज्ञानावरणीय कर्म की कितने काल की वंधस्थिति कही है ? अहो गौतम ! ज्ञानावरणीय की जघन्य अंतर्मुहूर्त उत्कृष्ट तीस क्रोडा: क्रोड सागरोपम की स्थिति व तीन हजार वर्ष का अवाघो काल कहा है, इम अवाधा काल से कर्म स्थिति व कर्म निपेक कम होता है. ऐसे ही दर्शनावरणीय कर्म का जानना. वेदनीय की स्थिति जघन्य अंतर्मुहूर्त १ फर्म बंध हुए पीछे उदय में आवे उस के बीच का अंतर को अबाधा काल • कहते हैं. २ उदय आये पीछे समय २ में हीन रस होवे. भावार्थ या शतकका तीसरा उद्देशा 88- शब्दार्थ ७६८ सूत्र • अनुदक-गारग्रामवारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी ज. जघन्य दो दोसमय उ० उत्कृष्ट ज० जैसे ना० ज्ञानावरणीय मो० मोहनीय ज० जघन्य अंक. अंत! मुहूर्त उ० उत्कृष्ट स० सीतर सा० सागरोपम को क्रोडा क्रोड स० सात वा० वर्ष स० सहस्र जा० यावत् आ• आयुष्य ज जघन्य अं० अंतर्मुहूर्त उ० उत्कृष्ट ते० तेत्तीस सा० सागरोपम पु० पूर्व क्रोड ती तीन मा० भाग म० मध्य अ० अधिक क. कर्म स्थिति क० कर्म ना० नाम गो० गोत्र ज० जघन्य अ. आठ मुंहून ३० उत्कृष्ट बी० बीसं सा० सागरोपम को० क्रोडा क्रोड दो० दो वा० वर्ष स० सहस्रो कोसं जहा नाणावराणिज ॥ मोहणिजं जहणं अंतोमुहुत्तं उक्कोस सत्तरि सागरोवम कोडाकोडीओ, सत्तयवास सहस्साणि जाव. निसेओ ॥ आउगं जहणं अंतोमुहुत्तं उक्कोसं तेत्तीसं सागरोवमाणि, पुवकोडि ,तिभागमञ्झाहियांणि कम्मट्टिई कम्मान- सेओ ॥ नाम गोयाणं जहणं अट्ठमुहुत्ता उक्कोसं. वीसं साग़रोवम, कोडाकोडीओ, दोणिय वास सहस्साणि, अवाहा,. अबाहूणिया, कम्मट्टिई कम्मनिसेओ ॥ अंत: उत्कृष्ट तीस फोडाफोड सागरोपम. अवाधा काल तीन हजार वर्ष का. मोहनीय कर्म की स्थिति जपन्य अंतर्मन उत्कृष्ट ७० क्रोडाक्रोड सागरोपम अवाधा-काल .७ हजार वर्ष.. आयुष्य की जघन्य अंत मार्न उत्कृष्ट तेत्तीस सागरोपम व क्रोड पूर्व का तीसरा भाग अधिक नाम व गोत्र की जघन्य आठ मुहर्न उत्कृष्ट बीम कोडाकोड सागरोपम. अवाघा काल दो हजार वर्ष का. अंतराय की जघन्य अंतर्मुहूर्त * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी * सपाध tar दार्थ o PAS सूत्र 888 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) <3881 अ. अबाधा अ० असाधा से उ कम क० कर्म स्थिति क० कर्म निपैक अं० अंतराय का ज. जैसे ना० ज्ञानावरणीय ॥ ६ ॥ ना० ज्ञानावरणीय भ० भगवन् क०कर्म कि० क्या इस्वी व बांधती है पु० पुरुष यं घांधता है न० नपुंसक ५० वांधत्ता है नोक नहीं स्त्री नो० नहीं पुरुष नो० नहीं नपुंसक ५० बांधता है गो० गौतम इ० वी भी वं० बांधती है पु० पुरुष भी वै० बांधता है, न० नपुंसक भी वं० बांधता है नो. नहीं स्त्री नो० नहीं पुरुष नो० नहीं नपुंसक वं० बांधता है ए. ऐसे आ० आयुष्य २० छोडकर स० सात राइयं जहा नाणावरणिज ।। ६ ॥ नाणावरणिज्जं णं भंते ! कम किं इत्थी बंधइ, पुरिसो बंधइ, नपुंसओ बंधइ, नो इत्थी नो पुरिसो नो नपुंसओ बंधइ ? गोयमा ! इत्थीवि बंधइ, पुरिसोवि बंधइ, नपुंसओवि बंधइ, नो इत्थी नो पुरिसो नो नपुंसओ सिय बंधइ सिय नो बंधइ ॥ एवं आउगवजाओ सत्तकम्मपगडीओ।। आउगं भंते ! कम्मं किं इत्थी वंधइ, पुरिसो बंधइ, पुच्छा ? गोयमा ! इत्थी सिय बंधइ, सिय उत्कृष्ट तीस क्रोडाकोड सागरोपम की. अबाधा काल तीन हजार वर्ष का ॥२॥ अहो भगवन् ज्ञानावरणीय कर्म क्या स्त्री वांधती है, पुरुप वांधता है, नपुंसक बांधता है या इन तीनों वेद रहिन अवेदी वांधता है ? अहो गौतम ! ज्ञानावरणीय कर्म का बंध स्त्री पुरुप व नपुंसक तीनों ही करते हैं. नावे दशन गुणस्थान में रहनेवाले भवेदी ज्ञानावरणीय का बंध करते हैं अग्यारहवे, वारहवे तेरहवे व चौदहवे NBT छठा शतक का तीसरा उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ ७७० सूत्र प, अनुनादक सालयतरसिमुनि श्री अमोलक अपनी 8th क. कर्म प्रकृतियों ॥ ७॥ ना० ज्ञानावरणीय किं. क्या सं० संयति बं० बांधता है अ० असंयति बं० वांपता है एक ऐसे मं० संयतासयति 4 वांधता है नो० नहीं संयती नो० नहीं असंयती नो. नहीं संपता संपती २० बांधना है एक ऐसे आ. आयुष्य वर्जित स० सात आ० आयुष्य हे नीचे के ति० नो बंधइ, एवं तिन्निवि भाणियव्वा ॥ नो इत्थी नो पुरिसो नो नपुंसओ न बंधइ ॥ ७ ॥ णाणावरणिज णं भंते ! कम्मं किं संजए बंधइ, असंजए बंधइ, एवं संजयासंजए बंधइ, नो संजए नो असंजए नो संजयासंजए बंधइ ? गोयमा ! संजए सियबंधइ सियनोवंधइ, असंजए बंधइ, संजयासंजएवि बंधई नो संजए नो असंजए नो. संजयासंजए न बंधई । एवं आउगवजाओ सत्तवि, आउगे हे गुगस्थानवाले अवेदी ज्ञानावरणीय का बंध नहीं करते हैं. ऐसे आयुष्य कर्म छोडकर शेष सब कमाँ का भोदी मवेदी आश्री जानना. आयुष्य कर्म का बंध तीनों वेदवाले क्वचित् करते हैं व क्वचित् नहीं करते हैं. अवेदी आयुष्य का यंध नहीं करते हैं ॥ ७॥ अहो भगवन् ! ज्ञानावरणीय कर्म का बंध या संयति करते हैं, असंयाते करते हैं, संयतासंयति करते है, व नो . संयति नो असंयति नो संयता- मंयति (सिद्ध ) करते हैं ? अहो गौतम ! संयति ज्ञानावरणीय कर्म का बंध क्वचित् । करने है व याचित् नहीं करते है. असंयति व मयतासंगति ज्ञानावरणीय का बंध निश्चयही करते हैं. * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादनी * शब्दार्थी पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) 9268 अ० अबाधा अ० असाधा से उ• कम क० कर्म स्थिति क० कर्म निपेक अं० अंतराय का ज० जैसे ना० ज्ञानावरणीय ॥ ६ ॥ ना० ज्ञानावरणीय भं० भगवन् क०कर्म कि० क्या इ०वी वंध्यांधती है पु० पुरुप ० बांधता है न० नपुंसक ५० बांधता है नो नहीं स्त्री नो० नहीं पुरुप नो० नहीं नपुंसक ५० बांधता है मो० गौतम इ० वी भी पं० वांधती है पु० पुरुप भी • बांधता है, न० नपुंसक भी बं० वांधता है नो. नहीं स्त्री नोक नहीं पुरुष नो० नहीं नपुंसक वं० वांधता है ए० ऐसे आ० आयुष्य २० छोडकर स० सात राइयं जहा नाणावरणिज्ज ।। ६ ॥ नाणावरणिज्जं णं भंते ! कम्मं किं इत्थी बंधइ, पुरिसो बंधइ, नपुंसओ बंधइ, नो इत्थी नो पुरिसो नो नपुंसओ बंधइ ? गोयमा ! इत्थीवि बंधइ, पुरिसोवि बंधइ, नपुंसओवि बंधइ, नो इत्थी नो पुरिसो नो नपुंसओ सिय बंधइ सिय नो बंधइ ॥ एवं आउगवज्जाओ सत्तकम्मपगडीओ॥ आउगं भंते ! कम्मं किं इत्थी बंधइ, पुरिसो बंधइ, पुच्छा ? गोयमा ! इत्थी सिय बंधइ, सिय उत्कृष्ट तीस क्रोडाकोड सागरोपम की. अबाधा काल तीन, हजार वर्प का ॥६॥ अहो भगवन् ज्ञानावरणीय कर्म क्या स्त्री वांधती है, पुरुप बांधता है, नपुंसक बांधता है या इन तीनों वेद रहित अवेदी वांधता है ? अहो गौतम ! ज्ञानावरणीय कर्म का बंध स्त्री पुरुप व नपुंसक तीनों ही करते हैं. नतो दशव गुणस्थान में रहनेवाले अवेदी ज्ञानावरणीय का बंध करते हैं अग्यारहवे, वारहवे तेरहवे व चौदहवे छटा शतक का तीसरा उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ) ७७० सूत्र भनुवादक-पालग्रह्मगरिमुनि श्री अमोलक ऋपनी 81 क० कर्म प्रकृतियों ॥७॥ ना. ज्ञानावरणीय किं. क्या संक संयति बं० बांधता है अ० असंयति वं० संघता है एक ऐसे मं० संयतासयति बै० वांचता है नोक नहीं संयती नो० नहीं असंयती नो. नहीं संयता संयती व बांधता है एक ऐसे आ. आयुष्य वर्जित स० सात आ० आयुष्य हे नीचे के ति० नो बंधइ, एवं तिन्निवि भाणियन्वा ॥ नो इत्थी नो पुरिसो नो नपुंसओ न बंधइ ।। ७ ।। णाणावरणिज णं भंते ! कम्मं किं संजए बंधइ, असंजए बंधइ, एवं संजयासंजए वंधइ, नो संजए नो असंजए नो संजयासंजए बंधइ ? गोयमा ! संजए लियबंधइ सियनोवंधइ, असंजएं बंधइ, संजयासंजएवि बंधइ नो संजए नो असंजए नो संजयासंजए नं बंधई । एवं आउगवजाओ सत्तवि, आउगे हे गुगस्थानवाले अोदी ज्ञानावरणीय का बंध नहीं करते हैं. ऐसे आयुष्य कर्म छोडकर शेष सब कर्मों का अवेदी पवेदी आश्री जानना. आयुप्य कर्म का बंध तीनों वेदवाले क्वचित् करते हैं व क्वचित् नहीं करने हैं. अवेदी आयुप्य का बंध नहीं करते हैं ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! ज्ञानावरणीय कर्म का बंध वया संपति करते हैं, असंयाते करते हैं, संयतासंयति करते है, व नो . संयति नो असंयति नो संयता- मपात (सिद्ध ) करते हैं ? अहो गौतम ! संयति ज्ञानावरणीय कर्म का बंध क्वचित् करते हैं व काचित् नहीं करते है. अमयति व मयतासंयंति ज्ञानावरणीय का वंघ निश्चयही करते हैं. * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादनी * २७ ७७१ शब्दार्थ। 4. तीन भ० भजना'उ० उपर कान महावं. वांधता है ॥ ८॥ ना. 'ज्ञानावरणीय f. क्या स. सम्यगू दृष्टि वं० वांधता है मि० मिथ्यादृष्टि वं० बांधता है स० सम्यमिथ्या दृष्टि ५० वांधता है। ट्ठिल्ला तिाण भयणाए उवरिल्लो न बंधइ ॥ ८ ॥ नाणावराणिज भंते ! कम्मं किं सम्मादट्ठी बंधइ, मिच्छदिट्ठी बंधइ, सम्मामिच्छादिट्ठी बंधइ?गोयमा! सम्मादट्ठी सियवंधइ सिय नोबंधइ, मिच्छादिट्ठी बंधइ, सम्मामिच्छदिट्ठी बंधइ । एवं आउगवजा ओ सत्तवि, आउएहो?ल्ला दो भयणाए सम्मामिच्छट्ठिी नबंधइ ॥ ९॥ नाणावरणं सूत्र ॐ पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र - 2989- छटा शतकका तीमरा उद्देशा 9858 भावार्थ परंतु सिद्ध नहीं करते हैं. ऐसे ही आयुष्य छोडकर शेष सात कर्मों का जानना. संयति, असंयति व संयतासंयति आयुष्य का बंध क्वचित् करते हैं व क्वचित् नहीं करते हैं. सिद्ध आयुष्य कर्म का बंध नहीं करते हैं ॥ ८॥ अहो भगवन् ! क्या समदृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं, मिथ्यादृष्टि ज्ञानावर- णीय कर्म बांधते हैं, या सममिथ्यादृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म नांधते हैं ? अहो गौतम ! समदृष्टि ज्ञाना- वरणीय कर्म काचित् बांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं. मिथ्यादृष्टि व सममिथ्यादृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं. ऐसे ही आयुष्य छोडकर शेप सात का जानना. समदृष्टि व मिथ्यादृष्टि आयुष्य कर्म क्वचित् बांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं. सममिध्यादृष्टि आयुष्य कर्म नहीं बांधते हैं ॥९॥ शाना- शब्दार्थ सूत्र १ अनुपादक-पालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी आ० आत्मारंभी णो नहीं परारंभी णो नहीं उ० उभयारंभी अ० अनारंभी से वह के कीसतरह एक ऐसा बु. कहा अ० कितनेक जी० जीव आ० आत्मारंभी एक ऐसे प० पीछा कहना गो० गौतम जी० जीव दु० दोपकार के सं० संसारी अ० संसार को अमाप्त तक तहां जे० जो अ० संसार को अमाप्त ते वे सि. सिद्ध णो० नहीं आ० आत्मारंभी जा० यावत् अ० अनारंभी त० तहां जे० जो सं० संसार ते. वे दु० दोप्रकार के सं०संयति अ०असंयति तं०तहां जे०जो सं०संयति तेल्वे दु०दोप्रकार के प० प्रमत्त संयति अ० णो अणारंभा ॥ अत्थेगइया जीवाणो आयारंभा, णो परारंभा, णो तदुभयारंभा, अणारंभा ॥ से केण?णं भंते एवं वुच्चइ ? अत्थेगइया जीवा आयारंभावि ! एवं पडि उच्चारेयव्वं ॥ गोयमा ! जीवा दुविहा पण्णता, तंजहा-संसार समावण्णगाय, असंसार समावण्णगाय ॥ तत्थणं जे ते असंसार समावण्णगाय, तेणं सिद्धा. सिद्धा णं णो नहीं है. कितनेक जीव आत्मारंभी नहीं है, परारंभी नहीं है, उभयारंभी भी नहीं हैं परंतु अनारंभी हैं. अहो भगवन् ! कितनेक जीव आत्मारंभी हैं, परारंभी है और उभयारंभी भी है। परंतु अनारंभी नहीं है वैसे ही कितनेक जीव आत्मारंभी नहीं है, परारंभी नहीं है, आत्मपरारंभी दोनों नहीं हैं परंतु अनारंभी हैं। ऐसा जो आपका कथन है वह किस तरह से हैं ? अहो गौतम ! जीव के दो भेद हैं ? संसार में रहनेवाले और २ संसार से मुक्त. उस में जो संसार असमावन जीव हैं वे चार * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ Hindi शब्दार्थ तीन भ० भजनाउ० उपर का ना नहावं. वांधता है ॥ ८॥ ना. ज्ञानावरणीय' किं. क्या सः सम्यगू दृष्टि बं० वांधता है मि० मिथ्यादृष्टि वं० वांधता है स० सम्यगमिथ्या दृष्टि ५० बांधता है। ० ७७१ 28 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 8888- भावार्थ डिल्ला तिणि भयणाए उवरिलो न बंधइ ॥ ८ ॥ नाणावराणिज भंते ! कम्मं किं सम्मादट्ठी बंधइ, मिच्छदिट्ठी बंधइ, सम्मामिच्छादिट्ठी बंधइ?गोयमा! सम्मादट्ठी सियबंधइ सिय नोबंधइ, मिच्छादिट्ठी बंधइ, सम्मामिच्छदिट्ठी बंधइ । एवं आउगवजा ओ सत्तवि, आउएहो?ल्ला दो भयणाए सम्मामिच्छट्ठिी नबंधइ ॥ ९॥ नाणावरणं परंतु सिद्ध नहीं करते हैं. ऐसे ही आयुष्य छोडकर शेष सात कर्मों का जानना. संयति, असंयति व संयतासंयति आयुष्य का बंध क्वचित् करते हैं व क्यचित् नहीं करते हैं. सिद्ध आयुष्य कर्म का बंध नहीं करते हैं ॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! क्या समदृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं, मिथ्यादृष्टि ज्ञानावर- णीय कर्म बांधते हैं, या सममिथ्यादृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं ? अहो गौतम ! समदृष्टि ज्ञाना- वरणीय कर्म काचित् वांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं. मिथ्यादृष्टि व सममिथ्यादृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म वांधते हैं. ऐसे ही आयुष्य छोडकर शेप सात का जानना. समदृष्टि व मिथ्यादृष्टि आयुष्य कर्म चित् यांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं. सममिथ्याद्दीष्ट आयुष्य कर्म नहीं बांधते हैं ॥ ९ ॥ ज्ञाना- ११.8- छठा शतकका तीमरा उद्देशा - शब्दार्थ ७७० सूत्र म भनुवादक-पालप्रमावरािमुनि श्री अमोलक अपनी 87 इक कर्म प्रकृतियों ॥ ७॥ ना० ज्ञानावरणीय किं. क्या सं० संयति बं० बांधता है अ० असंयति वं. बघता है एक ऐसे मं० संयतासंयति ५० बांधता है नोक नहीं संयती नो० नहीं असंयती नो० नहीं संयता संयती २० बांधना है ए. ऐसे आ. आयुष्य वर्जित स० सात आ० आयुष्य हे नीचे के ति० नो बंधइ, एवं तिन्निवि भाणियन्वा । नो इत्थी नो पुरिसो नो नपुंसओ न बंधा ।। ७ ।। णाणावरणिज णं भंते ! कम्मं किं संजए बंधइ, असंजए बंधइ, एवं संजयासंजए बंधइ, नो संजए नो असंजए नो संजयासंजए बंधइ ? गोयमा ! संजए सियबंधइ सियनोबंधइ, असंजएं बंधइ, संजयासंजएवि बंधई नो संजए नो असंजए नो. संजयासंजए नं बंधई । एवं आउगवजाओ सत्तवि, आउगे है गुगस्थानवाले अवेदी ज्ञानावरणीय का बंध नहीं करते हैं, ऐसे आयुष्य कर्म छोडकर शेष सब कर्मों का अवेदी मवेदी आश्री जानना. आयुष्य कर्म का बंध तीनों वेदवाले क्वचित् करते हैं व क्वचित् नहीं करने हैं. अबंदी आयुष्य का बंध नहीं करते हैं ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! ज्ञानावरणीय कर्म का बंध पया संयति करते हैं, असंयाते करते हैं, संयतासंयति करते है, व नो संयति नो असंयति नो संयता- गंयाने ( सिद्ध ) करते हैं ? अहो गौतम ! संयति ज्ञानावरणीय कर्म का बंध क्वचित करते हैं व पित् नहीं करते है. असंयति व मयतासंयति ज्ञानावरणीय का बंध निश्चयही करते हैं. * प्रकाशक-राजायहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादनी ७७१ सूत्र - पंचमाङ्ग विवाह पण्णति (भगवती) सूत्र 8888 शब्दार्थ तीन भ० भजना उ० उपर का न. हा वं० वांधता है ॥ ८॥ ना. ज्ञानावरणीय' किं. क्या स सम्यगू दृष्टि बं० वांधता है मि० मिथ्यादृष्टि बं० बांधता है स० सम्यमिथ्या दृष्टि पं० बांधता है डिल्ला तिाण भयणाए उवरिलो न बंधइ ॥ ८ ॥ नाणावराणिज भंते ! कम्मं किं सम्मादिट्ठी बंधइ, मिच्छदिट्ठी बंधइ, सम्मामिच्छट्ठिी बंधइ ?गोयमा सम्माट्ठिी सियबंधइ सिय नोबंधइ, मिच्छादिट्ठी बंधइ, सम्मामिच्छदिट्ठी बंधइ । एवं आउगवजा ओ सत्तवि, आउएहोट्ठला दो भयणाए सम्मामिच्छट्ठिी नबंधइ ॥ ९ ॥ नाणावरणं 98238 छठा शतकका तीसरा उद्देशा 988 भावार्थ परंतु सिद्ध नहीं करते हैं. ऐसे ही आयुष्य छोडकर शेष सात कर्मों का जानना. संयति, असंयति व संयतासंयति आयुष्य का बंध क्वचित करते हैं व क्वचित् नहीं करते हैं. सिद्ध आयुष्य कर्म का बंध नहीं करते हैं ॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! क्या समदृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं, मिथ्यादृष्टि ज्ञानावर- णीय कर्म बांधते हैं, या सममिथ्यादृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म नांधते हैं ? अहो गौतम ! समदृष्टि ज्ञाना- वरणीय कर्म क्वचित् बांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं. मिथ्यादृष्टि व सममिथ्यादृष्टि ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं. ऐसे ही आयुष्य छोडकर शेष सात का जानना. समदृष्टि व मिथ्यादृष्टि आयुष्य कर्म क्वचित् वांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं. सममिथ्याोष्ट आयुष्य कर्म नहीं बांधते हैं ॥ ९॥ शाना- शब्दार्थ ७७२ -- • अनुवादक-यालयमगरी मुनि श्री अमोलक प्रापजी 8 ॥९॥ ना. ज्ञानावरणीय किं० क्या स० संजी अ० असंज्ञी नोनहीं संज्ञी नोनहीं असंही वं०बांधता है। ॥ १० ॥ ना० ज्ञानापरणीय किं० क्या भ० भवसिद्धिक अ० अभवसिद्धिक नो० नहीं भवसिद्धिक नो० किं सन्नी बंधइ असन्नी वंधइ नो.सन्नी नो असन्नी बंधइ ? गोयमा ! सन्नी सिय बंधइ सिय नबंधइ, असन्नी बंधइ, नो सन्नी नो असन्नी न बंधइ एवं वेयाणजाउगवजाओ छकम्मप्पगडीओ.) वेयाण हेछिल्ला दो बंधइ, उवरिल्ला भयणाए ॥ आउगं हेछिल्ला दोभयणाए उवरिल्लो न बंधइ ॥ १० ॥ नाणावरणिजं कम्मं किं भवासद्धिए वधइ अभवसिहिए, नो भवसिद्धिए नो अभवासहिए बंधइ ? गोयमा ! भरसिद्धिए भय- वरणीय कर्म क्या संज्ञी बांधते हैं, असंज्ञो वांधते हैं या नोसंज्ञी नोअसंही वांधते हैं . ?. अहो गौतम ! मंत्री ज्ञानावरणीय कर्म क्वचित् बांधने हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं, असंज्ञी बांधते हैं, परंतु नो संज्ञी नो असंज्ञी नहीं बांधने हैं ऐसे ही वेदनीय व आयुष्य कर्म छोडकर शेप सब कर्मों का जानना. वेदनीय कर्म मंझी असंज्ञी बांधते हैं परंतु नो संज्ञो नोअसंझो क्यचित् वांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं. आयुष्य कर्म संत्री अमंजी क्वचित् बांधते हैं व काचित् नहीं बांधते हैं परंतु नो संज्ञो नो असंही आयुष्य कर्म नहीं बांधते हैं॥ २ ॥ अहो भगवन् ! क्या भवासद्धिक ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं, अभवसिद्धिक बांधवे हैं, या भामिद्धिक नो अभासिद्धिक बांधते हैं ? अहो गौतम ! भवसिद्धिये ज्ञानावरणीय कर्म क्वचित * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादगी * भावार्थ क व्दिाथ ७१३ पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8888 नहीं अभवसिद्धिक ॥ ११ ॥ ना० ज्ञानावरणीय कि क्या च. चक्षुदर्शनीय अ० अक्षुदर्शनीय आ० अवधिदर्शनीय के० केवलदर्शनीय ॥ १२ ॥ ना. ज्ञानावरणीय कि क्या प० प्रर्याप्त अ० अपर्याप्त नो.yo णाए अभवासिद्धिए बंधइ नो भवसिद्धिए नो अभवासिद्धिए न बंधइ एवं आउगवजा सत्तवि, आउगं हेट्ठिलादो भयणाए, उवरिलो न बंधइ।।११॥ नाणावरणं किं चक्खुदसणी बंधइअचक्खुदसणी बंधइ ओहिंदसणी बंधइ केवलदसणी बंधइ ? गोयमा ! हेछिल्ला तिण्णि भयणाए उवरिल्ले णबंधइ ॥ एवं वेयाणजवजाओ सत्तवि, वेयाणजं होठ्ठला तिण्णि बंधइ चांधते हैं, और क्वचित् नहीं भी बांधते हैं अभवसिद्धिये ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं नो भवसिद्धिये नो अभवसिद्धिये ज्ञानावरणीय कर्म नहीं वांचते हैं. ऐसे ही आयुप्य छोडकर शेप मय कर्मों का जानना आयुष्य कर्म भवसिद्धिक व अभवसिद्धिक क्वचित बांधते हैं व क्वचित् नहीं बांघते हैं, परंतु नो भवति- द्रिक नो अभवसिद्धिक आयुप्य कर्म नहीं बांधते हैं ॥ ११ ॥ अहो भगवन् ! क्या ज्ञानावरणीय कर्म चक्षु दर्शनी, अचक्षु दर्शनी, अवधि दर्शनी, या केवल दर्शनी बांधते हैं ? अहो गौतम ! चक्षु, अचक्षु व अवधिदर्शनी में भजना. और केवल ज्ञानी नहीं बांधते हैं ऐसे ही वेदनीय कर्म छोडकर सातों को का जानना. वेदनीय कर्म चक्षु, अचक्षु व अवधि दर्शनी वांधते हैं परंतु केवल दर्शनी नहीं यांधते हैं ।।.१२ ॥ अहो भगवन् ! ज्ञानावरणीय कर्म क्या पर्याप्त जीव बांधते हैं. अपर्याप्त बांधते हैं. भावार्थ छठा शतक का तीसरा उद्देशा - शब्दार्थ सून ७७४ * अनुगादक बालमनगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी नहीं पर्याप्त नो नहीं अपर्याप्त ॥१३॥ नाज्ञानावरणीय कि क्या भागभापक अ०अभापक गो गौतम दो० केवलदंसणी भयणाए॥१२॥नाणावरणिजं कम्मं किं पजत्तओबंधइ अपजत्तंओ बंधइ नो पजत्तओ नो अपजत्तओ बंधइ ?गोयना ! पजत्तए भयणाए, अपज्जत्तए बंधइ, नोपज्जत्तए 'नो अपजत्तए नबंधइ ॥ एवं आउगवजाओ, आउगहेट्ठिला दोभयणाए, उबरिल्लेणबंधइ ॥ १३ ॥ नाणावरणं किं भासए बंधइ अभासए ? गोयमा ! दोवि भयणाए ॥ एवं वेयाणिजबजाओ सत्त, वेयाणिजं भा पए बंधई, अभासए भयणाए ॥ १४ ॥ नाणावरणं किं परित्ते बंधइ, अपरित्ते बंधइ नो परित्ते नो अपरित्ते बंधइ ? गोयमा ! या ना पयाप्त नो अपर्याप्त बांधते हैं ? अहो गौतम ! ज्ञानावरणीय कर्म पर्याप्त जीव क्वचित् वांधतें हैं न पाचित् नहीं बांधते हैं, अपर्याप्त बांधते हैं. नो पर्याप्त नो अपर्याप्त नहीं बांधते हैं. ऐसे ही आयुष्य कर्म छोरकर शेष स । कर्मों का जानना. आयुप्य कर्म पर्याप्त अपर्याप्त बांधते भी हैं और नहीं भी बांधते १. नो पर्याप्त नो अपर्याप्त जीव आयष्य कर्म नहीं वाधते हैं ॥१३॥ अहो भगवन ! ज्ञानावरणीय कर्म क्या म.पा बांधत हैं । अमापक बांधते हैं ? अहो गौतम ! ज्ञानावरणीय कर्म भापक व अभाषक दोनों पाचिन् यांधते हैं व काचित् नहीं बांधते हैं ऐसे ही वेदनीय कर्म छोडकर शेष सब कर्मों का जान- ना. पेदनीय कर्म भापक बांधत हैं परंतु अभापक क्वचित् वांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं ॥ १४ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * . !
सूत्र ०।। ७७५ 880 पंचमाङ्ग विवाह पग्गत्ति (भगवती ) सत्र - दार्थ न दोनों में भ० भजना ॥१४॥ मा० ज्ञानावरणीय किं. क्या प. परित अ० अपरित वं० वांधता हैं ॥ १५ ॥ ना ज्ञानावरणीय के क्या आ० मभिज्ञानी सु० श्रुतज्ञानी ओ० अवधिज्ञानी म० मनःपर्यव ज्ञानी के० परित्ते भयणाए, अपरित्ते बंधइ, नो परित्ते नो अपरित्ते न बंधइ एवं आउगव- जाआ सत्तकम्मपगडीओ आउए परित्तोवि अपरित्तोवि भयणाए, नो परित्तो नो अपरित्तो नबंबइ ॥ १५ ॥ नाणावरणं किं आभाणबोहियनाणी बंधेइ, सुयनाणी बंधइ, ओहिनाणी, मणपजवनाणी, केवलनाणी ? हेट्ठिल्ला चत्तारि भयणाए केवलनाणी न बंधइ, एवं वेयणिजबजाओ सत्तवि, वेयणिज्ज हेछिल्ला चत्तारि बंधइ भावार्थ अहो भगान् ! परित्त [ अल्प संसारी | अपरित्त [अनंत संप्ताी । नो परित्त नो अपरित्त (सिद्ध) इन तीन में से कौन ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं ? अहो भगवन् ! परित्त ज्ञानावरणीय कर्म क्यचिन बांधते हैं। व क्वचित् नहीं बांधते हैं, अपरित्त वांरते हैं, और नो परित्त नो अपरित्त नहीं बांधने है. ऐसे ही आयुप्य छोडकर सात कर्म प्रकृतियों का जानना. आयप्य कर्म की परित व अपरित में भजना है. नो- परित नो अपरित आयुष्य कर्म नहा बांधते हैं ॥ १५ ॥ अहो भगान् ! क्या मतितानी, श्रुतज्ञानी, अवधि शानी, मनापर्यवज्ञानी व केवलज्ञानी ज्ञानावरणीय कर्म यांधत हैं ? अहो गौतम ! चार ज्ञान वाले क्वचित् वांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं. केवल ज्ञानी नहीं बांधते हैं. ऐसे वेदनीय छोडकर सानों 888 छठा शतकका तीमरा उद्देशा 28 ७७६ - अनुवादक बालयमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दा केवल ज्ञानी है नीचे के च० चार में भ० भजना के. केवली न० नहीं ० बांधते हैं ॥ १६ ॥ म० मति अज्ञानी सु० श्रुत अज्ञानी वि० विभंगज्ञानी ॥ १७ ॥ म० मन योगी १० वचन योगी का० काय केवलनाणी भयणाए ॥ १६ ॥ नाणावरणं किं मति अण्णाणी बंधइ सुयअण्णाणी सून विभंगनाणी ? गोयमा ! आउगवजाओ सत्तवि बंधइ, आउगं भयणाए ॥ १७ ॥ णाणावरणं किं मणजोगी बंधइ, वइजोगी बंधइ, कायजोगी, अजोगी बंधइ ? गोयमा ! हेट्ठिला तिण्णिभयणाए, अजोगी नबंधइ । एवं वेयणिज्जवजाओ वेयणिज हेछिल्ला बंधति, अजोगी नबंधइ ॥ १८ ॥ नाणावरणं किं सागारोवउत्ते बंधइ अना भागाथा कमी का.' जानना. चारों ज्ञान वाले वेदनीय कर्म बांधते हैं परंतु · केवलज्ञानवाले वेदनीय कप क्वचित् बांधते हैं व क्वचित् नहीं बांधते हैं ॥ १६ ॥ अहो भगवन् ! क्या मति अज्ञानी थुन भवानी . व विभंग ज्ञानी ज्ञानावरणीय कर्म वांधते हैं ? अहो गौतम ! आयुप्य कर्म छोडकर सातों कर्म तीनों अज्ञान वाले बांधते हैं आयुष्य कर्म की उन में भजना रहती है ॥ १७ ॥ अहो भगवन् ! क्या मनयोगी, वचन योगी, काया योगी व अयोगी ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं ?. अहो गौनम:! तीन योग वालों में भजना है और अयोगी नहीं बांधते हैं. ऐसे ही वेदनीय छोडकर सप सब का जानना. तीन योग वाले वेदनीयं . वांधते हैं और . अयोगी नहीं वांधते हैं-॥ १८॥ अहो * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी योगी ॥ १८ ॥ सा० साकारोपयुक्त अ० अनाकारोपयुक्त ॥ १२ ॥ आ• आहारक अ०' अनाहारक सत्र - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 8 गारोवउत्ते बंधइ ? गोयमा ! अट्ठसुवि भयणाए ॥१९॥ नाणावरणं किं आहारएबंधइ अणाहारए बंधइ?गोयमा! दोविभयणाए।एवं वेयणिज्जाउगवजाणं छण्ह, रेयणिज्ज आहारए बंधइ, अणाहारए भयणाए, आउए आहारए भयणाए, आगाहारए न बंध॥ २० ॥ नाणावरणं किं सुहुने बंधइ, बादरे बंधइ, नो सुहुमे नो बादरे बंधइ ? गोयमा ! सहुमे बंधइ, बादरे भयणाए, नो सुहुमे नो बादरे नबंधइ, एवं आउगवजाओ सत्तवि भगवन् ! साकारोपयुक्त या अनाकारोपयुक्त क्या ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं ? अहो गौतम ! आठों कर्मों में उन की भजना रहती है ॥ ११ ॥ अहो भगवन् ! ज्ञानावरणीय क्या आहारिक बांधते हैं या अनाहारिक बांधते हैं ? अहो गौतम ! दोनों में भजना है. ऐसे हो वेदनीय व आयुप्य छोडकर शेप सब का जानना. आहारक वेदनीय बांधते हैं और अनाहारक में भजना है. आयुष्य की आहारक में भजना और अनाहारक नहीं बांधता है ॥ २० ॥ अहो भगान् ! क्या सूक्ष्म जीवों ज्ञानावरणीय कर्म यांचते हैं, वादर जीवों वांधते हैं या नो सूक्ष्म नो वादर जीवों वांधते है ? अहो गौतम ! सूक्ष्म जीव ज्ञानावरणीय कर्म बांधते हैं चादर में भजना है, और नो मूक्ष्म नो वादर नहीं बांधते हैं. ऐसे ही आयुष्य सिवा सय भावार्थ छहा शतकका तीसरा उद्देशा 988- शब्दार्थ ॥ २०॥ सु० मूक्ष्म वा. बादर नोक नहीं सूक्ष्म नो० नहीं वादर ॥ २१ ॥ च० चरिम अ० अचरिम ॥ २२॥ ए० इन मं० भगवन् जी. जीवों में इ० स्त्री वेदी पु० पुरुप वेदी न० नपुंसकवेदी अ० सूत्र ७७८ মাথাখা र अनुरादकायमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीनी 87 आउए सुहुमे वादरे भयणाए, नो सुहमे नो बादरे नबंधइ ॥ २१ ॥ नाणावरणं किं चरिमे बंधइ, अचरिमे बंधइ, ? गोयमा ! अट्ठवि भयणाए ॥ २२ ॥ एएसिणं भंते ! जीवाण-इथिवेयगाणं, पुरिसवेयगाणं, नपुंसगवेयगाणं, अवेयगाणय कयरे कयरे कर्मों का जानना. आयुष्य की दो में भजना और नो सूक्ष्म नों बादर नहीं बांधते हैं ॥ २१ ॥ अहो भगवन् ! ज्ञानावरणीय क्या चरिम वांधते हैं या अचरिम बांधते हैं ? अहो गौतम! आठों को की भनना है ॥ २२ ॥ अहो भगवन् ! स्त्री वेदी, पुरुपधेदी, नपुसकवेदी व अवदी में कौन किस से यारत् विशेषाधिक है ! अहो गौतम ! सब से थोडे पुरुप वेदी, इस से स्त्री वेदी संख्यात गुने उस से भवेदी अनंत गुने उस भे नपुंसक वेदी अनंत गुने (२) सब से थोडे संयति. संयतासंयाते संख्यातगुने नो मंयाने नो असंयति नो संयतासंयति अनंत गुने व असंयति अनंतगुने (३) सब से थोडे समदृष्टि मिश्र दृष्टि अनंत गुने व मिथ्या दृष्टि अनंत गुने (४) सब से थोडे संजी, नो संझी नो असंज्ञी अनंत गुने, अमंत्री अनंत गुने (५) सब से थोडे अभाव, नो भवि नो अभाव अनंत गुने, भवी अनंत गुने (६) * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी * सूत्र 888 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र पहिला शतक कापहिला उद्देशा 8 Eg- शब्दाथ अपपत्त संथति त तहां जे० जो अ० अममत्त संयतिं ते. वे णो० नहीं आ- आत्मारंभी णो नहीं प० परारंभी जा० यावत् अ० अनारंभी त० तहां जे० जो १० प्रमत्त संयति ते वे सु० शुभयोग प० आ-४० इश्रित णो नहीं आ० आत्मारंभी जा. यावत् अ० अनारंभी अ० अशुभयोग प० आश्रित आ० आ- स्मारंभी जा० यावत् णो० नहीं अ० अनारंभी तं. तहां जे० जो० अ० असंयति ने वे अ० अविरति आयारंभा जाव अणारंभा ॥ तत्थणं जे ते संसार समावण्णगा, तेदुविहा प०, ते. संजयाय, असंजयाय । तत्थणं जे ते संजया, ते दुविहा प०, तं. पमत्त संजयाय, अपमत्त संजयाय । तत्थणं जे ते अपमत्त संजया तेणं णो आयारंभा, णो परारंभा जाव अणारंभा । तत्थणं जे ते पमत्त संजया ते सुहंजोगं पडुच्च णो आयारंभा, भावार्थ गतिरूप संसार में अनंत बक्त परिभ्रमण करके समस्त कर्म क्षयरूप स्थानक सो मोक्ष को माप्त हुने उन को सिद्ध कहते हैं. वे सिद्ध आत्मारंभी, परारंभी व उभयारंभी नहीं हैं. परंतु अनारंभी हैं. और जो संसार समावन्न जीव हैं वे दो प्रकार के कहे हैं संयति सो चारित्र सहित व असंयति सो चारित्र रहित .० उस में संयति के दो भेद १ प्रमत्त संयति २ अप्रमत्त संयति. जो सप्तम गुणस्थान वर्ती अप्रमत्त संयति ई वे आत्मारंभी, परारंभी व उभयारंभी नहीं हैं परंतु अनारंभी हैं. और जो छठे गुणस्थानवी ममत्त संयति हैं वे शुभ योग आश्रित आत्मारंभी, परारंभी, व उभयारंभी नहीं हैं परंतु अनारंभी शव्दार्थ सुन ७८० भावाथ का अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमालक ऋपिजी * प्रकाशक-राजावहादुर लांला मुखदेवसहायनी ज्वालामसादले x अनंन गुने से वैसे ही भ० भगवन् छ० छठा स० शतक का त० तीसरा उ उद्देशा ॥ ६ ॥३॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ छ? सयस्स तइओ उद्देसो सम्मत्तो॥ ६ ॥ ३ ॥ * जीवेणं भंते ! · कालादेसेणं किं सपएसे अपएसे ? गोयमा ! नियमा सपएसे॥१॥ नेरइएणं भंते ? कालादेसणं किं सपएसे अपएसे ? गोयमा ! सिय सपएसे सिय अ- पएसे, एवं जाव सिद्धे ॥२॥ जीवाणं भंते कालादेसेणं सपएसा अपएसा ? गोयमा ! १६) सब से थोडे अचरम, चरग जीव अनंत गुने. अहो भगवन आप के वचन सस हैं यह छठा शतक का तीसरा उद्देशा पूर्ण हुआ. ॥ ६ ॥ ३ ॥ ४' तीमरे उद्देश में जीव का अधिकार कहा आगे भी इन का ही विशेष अधिकार कहते हैं. अहो भग- वन् ! एक जीव काल आश्री मप्रदेशी है या अप्रदेशी है ? अहो गौतम ! एक जीव काल आश्री सप्रदे जी है, परंतु अपदेशी नहीं है क्यों की जीव की स्थिति अनादि अनंत है ॥ १ ॥ अहो भगवन् । नरक का जीव काल आश्री समदेशी है या अप्रदेशी है ? अहो गौतम ! नरक का जीव कालादेश से पानिन् सम्देशी व अमदेशी है.. क्योंकि जिस को उत्पन्न हुए एक समय हुवा है वह अपदेशी है और विशेष समय हुवा है वह सप्रदेशी है ऐसे ही सिद्ध तक सब जीव का जानना. ॥ २ ॥ अहो भग- वन् ! यहुन जीव क्या काला देशसे समदेशी-हैं. या अप्रदेशी हैं. १ . अहो गौतम.! जीव कालादेशसे x R . दार्थ सूत्र अवेदी क. कौन जा० यावत् वि० विशेषाधिक गो गौतम स० सब से थोडे पु० पुरुषवेदी इ० स्त्रीवेदी सं० संख्यात गुने अ० अवेदी अ० अनंत गुने न० नपुंसक वेदी अ० अनंत गुने ए० इन स० सब ५० पदकी अ० अल्पावहुत् उ० कहना जा० यावत् स० सव से० थोडे अ० अंचरिम च० चरिम अ. जाव विसेसाहिया वा ? गोयमा ! सव्वत्थोवा पुरिस वेयगा, इत्थीवेयगा संखेजगु- णा, अवेयगा अणंतगुणा, नपुंसग वेयगा अणंतगुणा ॥ एएसिं सव्वेसिं पयाणं अप्पबहुगाई उच्चारियन्वाइं जाव सवत्थोवा जीवा अचरिमा चरिमा अणंतगुणा ॥ भव से थोडे अवधि दर्शनी, चक्षुदर्शनी असंख्यात गुने, केवल दर्शनी अनंत गुने, अचक्षु दर्शनी अनंत गुने (७) सब से थोडे पर्याप्त, नो पर्याप्त नो अपर्याप्त अनंत गुने अपर्याप्त अनंत गुने (८) सब से थोडे भाषक, अभापक अनंत गुने (९) सब से थोडे परित, नो परित नो अपरित अनंत गुने, अपरित अनंत गुने (१०) सब से थोडे मनःपर्यव ज्ञानी, अवधि ज्ञानी असंख्यात गुने, मति श्रुति परस्पर तुल्य व विशेषाधिक केवल ज्ञानी अनंत गुने (११) सर्व से थोडे विभंग ज्ञानी,. मति श्रुत अज्ञानी परस्पर तुल्य अनंत गुने (१२) सब से थोडे मंन योगी, वचन योगी असंख्यात गुने, अयोगी अनंत गुने, काया योगी अनंत गुने (१३) सब से थोडे साकारोपयुक्त, अनाकारोपयुक्त विशेषाधिक (१४) सब से थोडे' आहारक अ- नाहारक असंख्यात गुने [१५] सव से थोडे नो सूक्ष्म नो वादर, वादर अनंत गुने, सूक्ष्म असंख्यात गुने FE पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र-86 भावार्थ 'छठा शतकका तीसरा उद्देशा सूत्र ७८२ भावाथ of अनुवादक-चालयालाचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी - ॥५॥ आहारगाणं जीवेगिदियवमो तिय भंगो, अणाहारगाणं जीवेगिंदियवंजाछन्भंगा एवं भाणियन्ना, सपएसावा, अपएसावा अहवा सपएसेय अपएसेय, अहवा सपएसेय आहारक जीव समदेशी है या अप्रदेशी है ? अहो गौतम ! आहारक जीव क्वचित् समदेशी है- व स्यचित् अप्रदेशी है. क्योंकि विग्रहगति या केवली समुद्घान में जीव अनाहारक बनकर जब आहारक होता है तय पहिले ममय में अप्रदेशी होता है और दूसरे समय से समदेशी होता है. यह - एकवचन सब सादि भाव में कहना. अनादि भाव में नियमा समदेशी रहते हैं. अहो भगवन् ! बहुत आहारक जीव क्या समदेशी हैं या अमदशो हैं ? अहो गौतम ! बहुत आहारक जीव सप्रदेशी भी हैं और भप्रदेशी भी हैं क्योंकि बहुत जीव आहारकपने बहुत काल से रहे हुवे हैं इसलिये सप्रदेशी और विग्रह गति अनंतर बहुन जीवों को आहारक बनने में एक समय हुवाहै इसलिये अप्रदेशी जानना. जीवपद-व एकेन्द्रिय पद छोडकर आहारक जीवों में तीन भांगे पाते हैं. सिद्ध अनाहारक होने से नहीं ग्रहण किये हैं. विग्रहगति प्रतिपन्न व केवली समुदातवाले को दो भांगे पाते हैं सप्रदेशी भी होवे और अप्रदेशी भी होवे. भनाहारकके जीवपद व एकेन्द्रियपद में सप्रदेशी. अप्रदेशी का एक ही भांगा पाता है इसलिये इसे छोडकर शप सब अनाहारक में छ भांगे पाते हैं. इस में दो भांगे बहुवचन आश्रित व चार भांगे एक वचन व बहुस्नान के संयोग से होते हैं. १. वहुन सप्रदेशी २- बहुत अप्रदेशी ३ एक संपदेशी एक अभदेशी ४ * प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसंहायजी ज्वालाप्रसादजी* : SC :७८१. वाथे| 82 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र BER नियमा सपएसा॥३॥ नेरइयाणं भंते! कालादेसेणं किं सपएसा अवएसा?गोयमा! सव्येवि ताव होज सपएसा, अहवा सपएसाय अपएसेय, अहवा सपएसाय अपएसाय एवं जाव थाणियकुमारा ॥ ४ ॥ पुढविकाइयाणं भंते ! किं सपएसा अपएसा ? गोयमा! सपएसावि अपएसावि, एवं जाघ वणप्फइकाइया, सेसा जहा नेरइया तहा सिद्धा समदेशी ही हैं क्यों कि सब जीव अनादि हैं ॥३॥ अहो भगवन् ! नरक के बहुत जीव काल आश्री सम- देशी हैं या अमदेशी है ? अहो गौतम ! १ सब जीव समदेशी हैं क्योंकि उत्पात विरह काल पहिले असंख्याते उत्पन्न हुए यह प्रथम भंग. २ पहिले वहुत नारकी उत्पन्न हुवे हैं जिस में एक और उत्पन्न होये. वह प्रथम समय में उत्पन्न होने से अभदेशी है और पहिले उत्पन्न हुए नारकी को उत्पन्न हुए बहुत समय होजाने से सप्रदेशी हैं, इस से बहुत सप्रदेशी व एक अप्रदेशी यह दूसरा भांगा ३ पहिले बहुत जीव उत्पन्न हुए थे जिस में बहुत जीव नविन आकर उत्पन्न हुए इस से बहुत सप्रदेशी व बहुत अप्रदेशी भांगा मीलता है. यो असुरकुमारादि दश दंडक में तीनों भांगे पाते हैं ॥ ४ ॥ पृथ्वीकायिकादि पांचों स्थावर में समदेशी अप्रदेशी दोनों रहें हुवे हैं क्योंकि इस में विरह काल नहीं है. शेष तीन विकले- न्द्रिय, तिर्यंच पंचेन्द्रिय, मनुष्य, वाणव्यंतर, ज्योतिपी, वैमानिक व सिद्धतक का अधिकार जैसे नरक के जीवों में तीन भांगे कहे वैसे ही कहना. क्यों कि इस में विरह काल रहा है ॥५॥ अहो भगवन् ! क्या छठा शतक का चौथा उद्देशा PRE ७८४ भावाय : अनुवादक-बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी एहि छन्भंगो, नोसन्नि नोअसन्निजीवे मणुयसिद्धेहिं तियभंगो॥ सलेसे जहा ओहिया, कण्हलेस्सा नीललेस्सा, काउलेस्सा जहां आहारओ णवरं जस्स आत्थियाओ। नंतर एक की उत्पत्ति का समय और पहिले के उत्पन्न हुए सो ३ बहुत सप्रदेशी बहुत अंग- देगी. ऐसे ही एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय व सिद्ध छोडकर सब पद में कहना, क्योंकि उक्त तीनों पद वाले संझी नहीं हैं. असंशो का बहुत जीव आश्रित पृथिव्यादि में बहुत सप्रदेशी बहुत अप्रदेशी एक ही भांगा पाता है. और इस सिवा अन्य सब में तीन भांगे पाते हैं. नरक, भूवनपति व वाणव्यंतर में अमंडी के संझी होते हैं, इसलिये भूतकाल की अपेक्षा मे संज्ञी को भी असंझी कहे हुवे है. नरकादिकमें धमंझीपना क्वचित् होता है इम अपेक्षा पूर्वोक्त छ भांगे पाते हैं. ज्योतिपी, वैमानिक व सिद्ध असंज्ञी नहीं होने से ग्रहण नहीं किये गये हैं. नो संझी नो असंज्ञी जीव के दोनों दंडक में जीव, मनुष्य व सिद्ध ऐसे नीन पद होते हैं. इन तीन पद में बहुत जीव आश्री तीन २ भांगे पाते हैं. सलेशी के एक जीव व बहुत जीव ऐसे दो दंडक जानना. दोनों में जीव तथा नरकादिक का औधिक दंडक जैसे जानना. क्योंकि मलेशीपना में जीवपने की अनादि है. सिद्ध अलेशी होने से नहीं ग्रहण किये हैं. कृष्ण, नील व कापोत लेश्यावाले के दोनों दंडक आहारक जैसे कहना. नारकी में जिस लेण्या का प्रश्न होवे उनी लेश्या कहना.. ज्योतिषी वैमानिक में कृष्णादि लेश्या नही होती है. सेजो लेश्या * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * PAL सत्र ७८३ भामा *388- पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 3880- अपएसाय,अहवां संपएसाय अपएंसेय अहंवा सपएसाय अपएसाया।सिद्धोहिं तियभंगो। भव सिद्धीय अभवसिद्धीय जहा ओहिया नो भवसिद्धीय नो अभवासहीय जीवसिद्धेहि तिय भंगो,॥ सन्नीहिं जीवादिओतियभंगो,असन्नीएहिं एगिदियवज्जो तियभंगो, नेरइयदेव मणु सप्रदेशी एक अप्रदेशी बहुत ५ सप्रदेशी बहुत अमदेशी एक ६ समदेशी बहुत अमदेशी बहुत यह छ। भांगे जानना. सिद्ध पद में तीन भांगे जानना. भव्यजीव व अभव्य जीव को औधिक जीव की तरह जानना. इन का एक जीव आश्री व अनेक जीव आश्री ऐसे दो दंडक करना. एक जीव आश्री भव्य अभव्य दोनों नियमा सप्रदेशी होवे, और नरकादि दंडक में सप्रदेशी अमदेशी दोनों होवे. बहुत भव्य अभव्य जीव सप्रदेशी होवे इसलिये नरकादिक में तीन भांगे होते. १ बहुत सप्रदेशी २ बहुत सप्रदेशी एक अमदेशी ३ बहुत सप्रदेशी बहुत अप्रदेशी, एकेन्द्रिय में बहुत सप्रदेशी व बहुत अप्रदेशी का भांगा पाता है. सिद्ध भव्य अभव्य नहीं होते हैं, परंतु नोभव्य नोअभव्य होते हैं. इस के बहुत जीव व एक जीव आश्री दो दंडक करना. यह विशेषण मात्र समुच्चय जीवपद व सिद्ध पद ऐसे दो पद में पाता इन में तीन भांगे पाते हैं. संज्ञी के एक जीव व अनेक जीव आश्री दो दंडक हैं उस में अनेक जीव आश्री दंडक के जीवादि पद, में तीन भांगे पाते हैं १ संजी जीव कालादेशसे समदेशी है क्यों की बहुत काल के उत्पन्न हुए होते हैं २ बहुत सपदेशी एक अप्रदेशी उत्पात विरहा- 29 छठा शतकका चौथा उद्देशा 8 <382- सूत्र भावाथे पर अनुरादक-पालनपनारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी. पम्हलेस्से सुकलेस्सोए जीवाइओ तियभंगो,अलेस्सहिं जीवे सिद्धेहि तियभंगो, मणुएसु छभंगा, ॥ सम्मदिट्ठीहिं जीवादिय तिओ भंगो, विगलिंदिएमु छन्भंगा, मिच्छदि- ट्ठीहिं एगिदियवज्जो तियभंगो, सम्मामिच्छदिट्ठीहिं छब्भंगा, संजएहि जीवादिओ तियभंगो, असंजएहिं एगिदियवज्जो तियभंगो, संजयांसंजएहिं तियभंगो, जीवादि- ओ नोसंजय नोअसंजय नोसंजयासंजय जीव सिद्धेहिं तियभंगो ॥ सकसाईहिं- जीव सदैव बहुत अवस्थित रहते हैं इसलिये एक भांगा. परंतु उपशम श्रेणी से भ्रष्ट होते अकपायी वन कर पुनःसकपायी बनते हैं इस से दूसरा भांगा, और उपश्रेणी से बहुत जीव पडके सकपायपने को माप्त होते हैं इसलिये तीसरा भांगा. नरकादिक में पूर्वोक्त तीन भांगे. एकेन्द्रिय में एक भांगा. क्रोध कपाय के दूसरे दंडक में जीवपद व एकेन्द्रियादि पदमें एक भांगा, शेपमें तीन भांगे * देव पदमें छ भांगे पावे, मान कपायी व माया कपायी में जीव पद व एकेन्द्रिय पद में एक भांगा. नारकी व देव में छ भांगे और शेप पद में तीन भांगे. लोभ कपायी क्रोध कपायी जैसे कहना, इसमें नरक में छ भांगे जानना. अकपायी के दूसरे दंडक के जीव, मनुष्य व सिद्ध में तीन भांगे पाते हैं औधिक मतिज्ञान- व. श्रुतज्ञान के दूसरे दंडक में नीवादि पद में तीन भांगे, विकलेन्द्रिय में छ भांगे. अवधिज्ञान का भी ऐसे ही जानना. परंतु * यहां कोई प्रश्न करे कि सव पद जसे क्रोध कयायी जीव में तीन भांगे क्यों न होवे ? मान माया व लोभ से निवर्तसर कोष कपाय को प्राप्त होने वाले जीव अनेक है इस से तीन भांगे न होवे, प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादनी' *.
तेउलेस्साए जीवादियओ तियभंगो णवरं पुढविकाइएसु आउवणंफईसु छन्भंगो, उन्न ७८५ 885 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 885 के दूसरे दंडक में जीवादि पद में तीन भांगे पाते हैं. पृथ्वी, अप्, व वनस्पति में पूर्वोक्त छ भांगे कहना भावार्थ नरक, तेउ, वायु, विकलेन्द्रिय व सिद्ध में तेजोलेश्या नहीं होती है इसलिये उन को यहां ग्रहण करना नहीं. पद्म व शुक्ल लेश्या में जीव, तिर्यंचपंचेन्द्रिय, मनुष्य व वैमानिक यह चार पद ही पाते हैं इन में पूर्वोक्त तीन भांगे होते हैं. अलेशी के दोनों दंडक में जीव, मनुष्य व सिद्ध ये तीन ही पद पाते हैं. जीव व सिद्ध पद में तीन भांगे व मनुष्य पद में छ भांगे पाते हैं. समदृष्टी के एक जीव बहुत जीव ऐसे दो दंडक. इस के दूसरे दंडक जीवादि में तीन भांगे. विकलेन्द्रिय में छ भांगे क्यों कि विकलेन्द्रिय में साश्चादान सम्यम् दृष्टिवाले कोई पहिले उत्पन्न होते हैं इसलिये सप्रदेश, अप्रदेशपने एकत्व बहुत का संभव होता है. एके- इन्द्रिय में समदृष्टी नहीं होने से नहीं लिये गये हैं. मिथ्यादृष्टि के दूसरे दंडक के जीव पद में तीन भांगे एकेन्द्रिय में एक भांगा. मिश्रदृष्टी में सब दंडक में छ भांगे. इस में एकेन्द्रिय व सिद्ध नहीं हैं. संयति के दूसरे दंडक में जीवादि पद में तीन भांगे. इस में जीव व मनुष्य ऐसे दो ही पद ग्रहण करना. असंयति के दूसरे दंडक में जीवादि पद में तीन भांगे हैं, एकेन्द्रिय में एक भांगा. संयतासंयति के दूसरे दंडक में जीवादि में तीन भांगे, इस में जीव, तिर्यंच पंचेन्द्रिय व मनुष्य यह तीन पद कहना. नोसंयति, नोअसंयति नोसंयंतारयति में दूसरे दंडक में जीव व सिद्ध ऐसे दो पद होते हैं. उन में तीन भांगे पाते हैं. सकपायी 893 छठा शतकका चौथा उद्देशा 8380- सूत्र ७८८ भावार्थ 1 अनुवादक- बालमनचारी पनि श्री अमोलक ऋपिनी अजोगी जहा अलेस्सा|सागारोवउत्ते अणागारोवउत्तेहिं जीवागीदयवज्जो तियभंगो सवेयगा जहा सकसाई, इत्थीवेयग पुरिसवेयग नपुंसगेवयगसु जीवादिओ तियभंगो णवरं नपुंसगवेद एगिदिएसु अभंगयं, अवेयगा जहा अकसाई ससरीरी जहा ओहि- पृथिव्यादि पद में एक ही भांगा कहा. यह एक उपयोगसे दुसरे उपयोग में जाना इस आश्री लीया गया है. गिद्ध को सदाही उपयोग रहा हुवा है तथापि साकार अनाकार रुपयोग की वारंवार प्राप्ति होने से सप्रदेशीपना व एकवार प्राप्ति होने से अप्रदेशी पना जानना. ऐसे बहुत जीव वारंवार पाकारोपयोग को प्राप्त हुवे सो समदेशी एक भांगा, एक ही वक्त साकारोपयोग को प्राप्त हुए सो अप्रेदशी दूसरा मांगा, और वही मानारोपयोग एक बार व अनेक वार प्राप्त किया सो तीसरा भांगा, ऐसे ही अनाकारोपयोग का नानना. सवेदी जीव सकषायी जैसे कहना. स्त्री, वेदी पुरुषवेदी व नपुंसक वेदी में जीवादि पद में तीन भांगे, मात्र नपुंसक वेद में एकेन्द्रिय में एक भांगा पावे, पुरुष वेदी व स्त्री वेदी मात्र देव, मनुष्य व तियेच (पंचन्द्रिय में कहना. नपुंसक वेद में दो दंडक वर्जकर कहना. अवेदी अकषायी जैसे कहना. इस में जीव मनुप्य व सिद्ध ऐसे तीन पद कहनाः सशरीरी के दोनों दंडकं में जीव सप्रदेशी कहना क्यों - की जीवों को शरीर अनादि हैं. नरकादिक में तीन भांगे, एकेन्द्रिय में सप्रदेशी अप्रदेशी ऐसा एक भांगा; उदारिक नरसि के जीव पद व एकेन्द्रिय पद में तीसरा भांगा और शेप में तीन भांगे होवे. उदारिक शरीर नरक व * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * ।
७८७ ११.3 पंचमांग विवाह पण्गत्ति (भगवती) मूत्र 8363> जीवादिओ तियभंगो, एगिदिएसु अभंगकं, कोहकसाईहिं जीवेगिदियवज्जो तिय- भंगो, देवेहि छन्भंगो, माणकसाई माइकसाई जीवेगिंदियवज्जो तियभंगो, नेरइय देवेहि छन्भंगा, लोभकसाईहिं जीवेगिंदयवज्जो तियभंगो, नेरइएसु छन्भंगा अकसाई जीवमणुएहिं सिद्धेहिं तियभंगो ओहियणाणे आभिणिवोहियणाणे सुयणाणे जीवादिओ तियभंगो, विगलिंदिएहि छन्भंगा, ओहिणाणे मणपज्जवणाणे केवलणाणे जीवादियओ तियभंगो ओहिए अण्णाणे मतिअण्णाणे सुयअण्णाणे एगिदियवज्जो तियभंगो, विभंगणाणे जीवादिओ तियभंगो ॥ सजोई जहा ओहिओ मणजोगि वइजोगि, कायजोगि, जीवादिओ तियभंगो, णवरं कायजोगी एगिदिया तेसुअभंगकं, इस में विकलेन्द्रिय नहीं कहना. मनःपर्यव ज्ञान के दुसरे दंडक में जीव व मनुष्य में तीन भांगे केवलज्ञान में जीव, मनुष्यव सिद्ध पदमें तीन मांगे जानना. समुच्चय अज्ञान, मति अज्ञान व श्रुत अझानमे जीवादि पदमें तीन भांगे, पृथिव्यादिक में एक भांगा विभंगज्ञान को अवधि ज्ञान जैसे कहना, सजोगीमें औधिक जीवादिक का कहा वैसे जानना. मनयोगी संज्ञी, वचन योगी एकेन्द्रिय वर्ज कर सक, और काययोगी में सब जीव इन में तीन भांगे पावे. परंतु काययोगी में दूसरे दंडक में एकेन्द्रिय को एक भांगा पावे. अयोगी अलेशी जैसे कहना. साकारोपयोग व अनाकारोपयोग के दसरे दंडक में नरकाहिक में तीन मांगे जी परत १११११ छठा शतक का चौथा उद्देशा. 88gger भावार्थ शब्दार्थ ४६ सत्र 3 अनुवादक-यालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक अपिजी 83 ५० आश्रित आ० आत्मारंभी जा० यावत् णो नहीं अ० अनारंभी से वह ते० इसलिये गो० गौतम ए. ऐसे चु० कहा जाता है अ० कितनेक जीव जा० यावत् अ० अनारंभी ॥ ३८ ॥ ० नारकी भं० भगवन् कि क्या आ० आत्मारंभी प० परारंभी त. उभयारंभी अ० अनारंभी गो गौतम ० नारकी णो परारंभा, जाव अणारंभा । असुहं जोगं पडुच्च आयारंभावि जाव णो अणारंभा । तत्थणं जे ते असंजया ते अविरतिं पुडुच्च आयारंभावि जाव णो अणारंभा. से ते. गटेणं गोयमा एवं वुच्चइ, अत्थेगइया जीवा जाव अणारंभा ॥३८॥ णेरइयाणं भंते किं आयारंभा, परारंभा, तदुभयारंभा, अणारंभा ? गोयमा ! गैरइया आया- और अशुभ योग आश्रित आन्मारंभी परारंभी व उभयारंभी हैं परंतु अनारंभी नहीं हैं. और जो असंसंयति हैं. वे अविरति की अपेक्षा से आत्मारंभी, परारंभी, व उभयारंभी हैं परंतु अनारंभी नहीं है. इसलिये अहो गौतम ! ऐसा कहा कि कितनेक जीव आत्मारंभी, परारंभी व उभयारंभी हैं . परंतु अनारंभी नहीं हैं। और आत्मारंभी, परारंभी व उभयारंभी नहीं हैं परंतु अनारंभी हैं ॥ ३८ ॥ अहो भगवन् ! नारकी आत्मारंभी, परारंभी व उभयारंभी हैं या अनारंभी हैं ? अहो गौतम नारकी आत्मारंभी, परारंभी, व प्रत्युपक्षणादि करणसो अशुभयोग-पुढवी आऊकाए । तेऊवाऊ वणस्सइ तसाणं ॥ पडिलेहण पमत्ता। छण्इं विराहणा होइ ॥१॥ प्रमादसे प्रतिलेखना करनेवाला छ ही कायाका घातक होताहै: * प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ 30 सत्र ७८९ 1383 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 3gp> ओ ओरालिय वेउन्विय सरीराणं जीवेगिंदियवज्जो तियभंगो आहारगसरीरे जीव मणु एमु छन्भंगा, तेयग कम्मगाई जहा ओहिया, असरीरोहिं जीव सिद्धेहिं तियभंगो, ॥ आहार पजत्तीए सरीर पजत्तीए इंदियपजत्तीए आणापाण पनत्तीए जीवेगिदियवजो तियभंगो, भासामणपज्जत्ती जहासन्नी आहारअपजत्ती जहा अणाहारगा, सरीर देवलोक में नहीं है इसलिये यह भागा नहीं लीया गया है. वैक्रेय शरीर पृथ्वी, अप्, तेउ, वनस्पति व विकलेन्द्रिय में नहीं है. वायुकाय में एक भांगा, और शेप में तीन भांगे. आहारक शरीर जीव व मनुष्य इन दोनों पद में होवे. आहारक जीव के अल्पपना से इन में छ भांगे मीले. तेजस कार्माण में जीवादिक पद औधिक जैसे कहना. अर्थात् जीवपद में समदेशी और नारकादि पद में तीन भांगे जानना. एके-3 न्द्रिय में एक तीसरा भांगा. अशरीरी के दूसरे दंडक में जीव व सिद्ध में तीन भांगे. आहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति, इन्द्रिय पर्याप्ति, व श्वासोश्वास पर्याप्तिवाले जीवों के दूसरे दंडक में जीव व एकेन्द्रिय में एक ही भांगा और शेष नरकादि में तीन भांगे. भापामन पर्याप्ति संज्ञी जैसे जानना. अर्थात् सब नपद पद में तीन भांगे कहना. आहार अपर्याप्तिवन्त बहुत जीव विग्रहगति संपन्न होते हैं इसलिये एक भांगा और अन्य सव स्थान छ भांगे. शरीर अपर्याप्ति, इन्द्रिय अपर्याप्ति, श्वासोश्वास अपर्याप्तिवाले के दूसरे दंडक में जीव व एकेन्द्रिय छोडकर शंप में तीन भागे. जीव व एकेन्द्रिय में एक भांगा. नरक देव व? 3 छठा शतक का चौथा उद्देशा 8-832 भावार्थ ७१० . 4. अनुवादक-बालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 अपजत्तीए, इंदिय अपजत्तीए,. आंणापाण अपजत्तीए जीवे एगिदियवज्जो तियभंगो नेरइयदेवमणुएहिं छन्भंगा, भासामणअपजत्तीए जीवादिओ तियभंगो, णेरइयदेवमणु- एहिं छब्भंगा । सपएसाहारग भविय, सण्णिलप्सादिट्ठि संजयकसाए ॥ नाणे जोगु- वयोगे वेएयसरीर पजत्ती॥२॥६॥जीवाणं भंते! किं पञ्चक्खाणी अपच्चक्खाणी पच्चक्खाणा पञ्चक्खाणी? गोयमा! जीवा पच्चक्खाणीवि, अपच्चक्खाणीवि, पच्चक्खाणा पच्चक्खा- णीवि सव्व जीवाणं एवं पुच्छा ? गोयमा ! नेरइया अपच्चक्खाणी जाव चउरिदिया सेसा दो पडिसेहेयत्वा पंचिंदियतिरिक्खजोणिया नो पञ्चक्खाणी, अपच्चक्खाणीवि, मनुष्य में छ भांगे. भापामन की अपर्याप्ति में जीवादि पद में तीन भांगे, नारकी, देव व मनुष्य में छ भांगे. सिद्ध भगवन्त पर्याप्तअपर्याप्त में दोनों नहीं है. .अब इनसब का संग्रह गाथा में कहते हैं. २ सप्र- देशी, २ आहारक,३ भव्य ४ संज्ञीः ५ लेश्या, ६ दृष्टि, ७ संयति, ८ कपाय, ९ ज्ञान, १० योग. १२ उप- योग, १२ वेद, १३ शरीर, १४ पर्याप्तिअपर्याप्ति ॥ ६ !! अहो भगवन् ! क्या जीव प्रत्याख्यानी (मी विरते) अप्रत्याख्यानी (अविरति) व प्रत्याख्यानापत्याख्यानी (देश विरति) हैं ? अहो गौतम ! जीव सर्व विरति, अविरति व देश विरति हैं. अहो भगवन् ! नरकादि चौवीस दंडक के जीव प्रत्या- ख्यानी, अमत्याख्यानी व प्रत्याख्याना प्रत्याख्यानी हैं ? अहो गौतम ! नारकी, दशभुवनपति पांच * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * - মায়াখ --- Mushwa मत्र पच्चक्खाणापच्चक्खाणीवि, मण्यातिण्णिवि, सेसाजहा नेरझ्या ॥ ७ ॥ जीवाणं भंते ! किं पञ्चक्खाणं जाणंति, अपच्चक्खाणं जाणंति, पञ्चक्खाणापचक्खाणं जाणंति ? गोयमा ! जे पंचिंदिया तेतिण्णिवि जाणंति अवसेसा न पच्चक्खाणं जाणति ॥८॥ जीवाणं भंते ! किं पञ्चक्खाणं कुव्वंति अपच्चक्खाणं कुव्वंति पचक्खा- णापच्चक्खाणं कुवंति ? जहा ओहिया तहा कुव्वणा ॥ ९॥ जीवाणं भंते ! किं पच्चक्खाणनिवत्तियाउया, अपच्चक्खाण णिवत्तियाउया पचक्खाणापचक्खाण णिवत्तियाउया ? गोयमा ! जीवाय वेमाणियाय पच्चक्खाण निवत्तियाउया तिण्णिवि, 28-39 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 888 Arts छठा. शतक का चौथा उद्देशा gene भावार्थ एकेन्द्रिय, तीन विकलेन्द्रिय, वाणव्यंतर, ज्योतिषी व वैमानिक अप्रत्याख्यानी हैं. तिथंच पंचेन्द्रिय अप्र- त्याख्यानी व प्रत्याख्यानाप्रत्याख्यानी हैं मनुष्य में तीनों भांगे पाते हैं ॥७॥ अहो भगवन् ! क्या जीव प्रत्याख्यान, अप्रत्याख्यान, व प्रत्याख्यानाप्रत्याख्यान जानते हैं ? अहो गौतम ! जो पंचेन्द्रिय के तीनों जानते हैं और शेप जीवों प्रत्याख्यान नहीं जानते हैं ॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! क्या जीव प्रत्याख्यानादि करते हैं ? अहो गौतम ! जैसे औधिक सूत्र कहा वैसे कहना. अर्थात् पंचेन्द्रिय तिर्यंच, व मनुष्य छोडकर सब अप्रत्याख्यानी हैं. मनुष्य तीनों करते हैं और तिर्यंच पंचेन्द्रिय अप्रत्याख्यान व प्रत्याख्यानोप्रत्याख्यान करते हैं ॥ ९॥ अहो भगवन् ! क्या जीव प्रत्याख्यान से, अत्याख्यान से या शब्दार्थ सूत्र x x * अनुरादक-बालबनवारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी कि० क्या इ.यह भ भगवन् त० तमस्काय प०कहाती है कि क्या पुपृथ्वी न० तमस्काय आ० अप् त तमस्काय गो गौतम नो नहीं पु०पृथ्वी त०तमस्काय प०कहाती है आ०अप् त तमस्काय से अथ के० अवसेसा अपञ्चक्खाणनिवत्तियाउया ॥ १०॥ गाहा-पच्चक्खाणं जाणइ, कु- वंति तेणेव आउनिव्वत्ती, ॥ सपएसुद्देसंमिय, एमए दंडगा चउरो ॥ १ ॥. सेवंभंते भंतेत्ति ॥ छट्ठ सयस्स चउत्थो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ६ ॥ ४ ॥ किमियं भंते ! तमुकाएत्ति पवुच्चइ, किं पुढवी तमुकाएत्ति, पवुच्चइ, आउतमुकाएत्ति पयुचइ, ? गोयमा ! नो पुढवि तमुकाएत्ति पवुच्चइ, आउतमुकाएत्ति पवुच्चइ, से प्रत्यारयाना प्रत्याख्यान से आयुष्य का वध करते हैं ? अहो गौतम ! जीव प्रत्याख्यानादि तीनों प्रकार में वैमानिक का आयुबंध करते हैं शेप अपत्याख्यान से आयुर्बध करते हैं ॥ ८॥ प्रत्याख्यानी हैं, प्रत्याख्यान जानते हैं, पत्याख्यान करते हैं, व. प्रत्याख्यान से आयुर्वेध करते हैं यह चार दंडक उक्त प्रदेशात्मक उद्देशे में विशेष कहे हैं. यह छठा शतक का चौथा उद्देशा. पूर्ण दुवा ॥ ६ ॥४॥ चौधे उद्देश में जीव के सपदेशपने का कथना किया. पाचवे उद्देशे में तमस्काय का स्वरूप कहते हैं. तमिस पुद्गलों की राशि सो तमस्काय. अहो भगवन् ! क्या पृथ्वी को तमस्काय कहते हैं, या पानीको * मकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी * वार्थ ७९३ सत्र 98 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 8-8 शब्दार्थ कस गो गौतम पु० पृथ्वीकाधिक अ० कितनेक सु० शुभ देश को पप्रकाशित करते है. अ.कितनेक दे० देश को नो० नहीं प० प्रकाशित करते हैं ते० इसलिये ॥ १॥ त० तमस्काय भ० भगवन क.org कहां स० उत्पन्न हुई क० कहां सं० रही गो० गौतम जं० जम्बूद्वीप की २० बाहिर ति. ती अ० केणटेणं ? गोपमा ! पुढविकाएणं अत्थेगइए सुभे देसं पकासेइ अत्थेगइए देसं नो पकासेइ से तेणटेणं ॥१॥ तमुकाए भंते ! कहिं समुट्ठिए कहिं संनिहिए ? गोयमा! जंबुद्दीवस्स २ बहिया तिरिय मसंखेज्जे दीवसमुद्दे वीईवइत्ता, अरुणवरस्स भावार्थ तमस्काय कहते हैं ? अहो गौतम ! जो तमस्काय है वह पृथ्वी का परिणाम नहीं है परंतु पानी का परिणाम है. इसलिये पृथ्वी को तमस्काय कहना नहीं, परंतु पानी को तमस्काय कहना. अहो भगवन् ! किस कारन से पृथ्वी को तमस्काय नहीं कहना परंतु पानी को तमस्काय कहा? अहो गौतम ! पृथ्वी- काया के मणि आदि कितनेक स्कंध भास्वरपना से विवक्षित क्षेत्र में प्रकाश करते हैं, और कितनेक पृथ्वीकाधिक देशपृथ्वीकायांतर प्रकाशने योग्य होने पर भी अभास्वरपना से प्रकाश नहीं करते अप्काय में अमकाशकपना रहा हुवा है वैसे ही तमस्काय में भी अप्रकाशकपना रदः टुना है. इस से अप्काय परिणामवाली। तमस्काय रही हुई है ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! तमस्काय कहाँ से उत्पन्न हुई है वह कहां रही हुई है ? अहो गौतम ! इस जम्बूद्वीप से बाहिर असंख्यात द्वीप समुद्र उल्लंघ कर जाये वहां *8888 छहा शतकका पांचवा उद्देशा 9888 DO शब्दार्थ ७९४ 4. अनुवादक-लबझनारी मुनि श्री अमोलक पीनी असंख्यान दी० द्वीप समुद्र वीव्यत्तिकान्त करते अमरुणवर द्वीपकी वा० बाहिर की वे वेरिका से १० अरुणोदय स० समुद्र को वा. वीयालीसं जो० योजन सहस्र उ० अरगाहकर उ० उपर के ज० जल के. भंत से ए. एक प्रदेश की से० श्रेणीसे त. वहां त०तमस्कायं सउत्पन्न हुई स० सत्तरह इ० इक्कीस जो पोनन सहस उ० अर्व उ० जाकर त° उस ५० पीछे ति० तीछी ५० विस्तृत होती हुई सो० सौधर्म ई. ईशान स० सनत्कुमार म० माहेन्द्र च० चारों क० कल्प को आ० ढककर उ० ऊर्च दीवस्स बाहिरिलाओ वेइयंताओ अरुणोदयं समुई बायालीस जोयण सहस्सागि उग्गाहिता उवरिलाओ जलंताओ एग पदेसियाए सेढीए तत्थणं तमुकाए समुट्ठिए सत्तरसएकावीसे जोयणसए उ8 उप्पइत्ता तओ पच्छा तिरिय पवित्थरमाणे २ अरुणाद्वीप आता है, उस अरुणवरद्वीप की बाहिर की चेदिका से ४२ हजार. योजन दूर अरुणवर समुद्र में जाने वहां पानी के उपर अंतिम विभाग की एक प्रदेश की + श्रेणी में से तमस्काय नीकली वहां से १७२१ योजन ऊंची जाकर तीछी विस्तृत होती हुई सौधर्म, ईशान, सनत्कुमार व - माहेन्द्र इन पहां प्रदेश शन्द से आकाश का मात्र एक प्रदेश ग्रहण करना नहीं, क्योंकि एक प्रदेश में अपकाय नहीं ठहर मझती है. परंतु नसे एक प्रदेश में साधु समोसरे अर्थात् थोडे क्षेत्र में रहे, वैसे ही यहांपर एक प्रदेश का कथन किया है. अर्थात् घोडा क्षेत्र जानना. * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * 98605 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति ( भगवती) सूत्र 980- दिदार्थ जा. यावत् २० ब्रह्म क. देवलोक में रि० रिष्ट विमान प० प्रस्तर को. सं० माप्त ए. यहां तक तमस्काय सं० रही हुई है. ॥२॥ त० तमस्काय मं० भगवन् कि० क्या सं० संस्थित अ० नीचे म० सरावले के मू० मूलसे सं० संस्थित उ० ऊपर कु. कूर्कट का पं०पिंजरे से सं० संस्थित ॥ ३॥ त तम- स्काय भ० भगवन् के० कितनी वि० चौडाई से के० कितनी प० परिधि से प० प्ररूपी गो० गौतम दू० सोहम्मीसाणसणंकुमारमहिंदे चत्तारिवि कप्पे आवरेत्ताणं उर्दु पियणं जाव बंभ- लोए कप्पे रिट्ठविमाणपत्थडं संपण्णे एत्थणं तमुकाए संनिट्ठिए ॥ २ ॥ तमु- काएणं भंते ! किं संठिए ? गोयमा ! अहेमल्लगमूलसंठिए, उप्पि कुक्कुडगपंजरग संठिए पण्णत्ते ॥ ३ ॥ तमुकाएणं भंते ! केवइयं विक्खंभेणं केवइयं परिक्खेवेणं पण्णते ? गोयमा दुविहे पण्णत्ते तंजहा-खखेजवित्थडेय, असंखेजवित्थडेय । तत्थणं भावार्थ चारों देवलोक को घेर कर पांचवे ब्रह्मदवलोक में रिष्ट नामक तीसरी प्रतर में उस के विमानतक गइ हुई है. और वहां परही तमस्काय स्थिर रही हुई है ॥ २॥ अहो भगवन् ! तमस्काय का कौनसा संस्थान है? अहो गौतम ! नीचे सरावले के संपुट का आकारवाली है और उपर मूर्गे के पिंजर का आकारखाली है। ॥३॥ अहो भगवन् ! तपस्काय चोडाइ में कितनी है, व परिधि में कितनी है? अहो गौतप! तम- PERS छठा शतकका पांचवा उद्देशा 987 शब्दार्थ • अनुगादक यालमनगरी मुनि श्री अमालक ऋपिनी दोपकार की प० प्ररूपी तक वह ज यथा सं० संख्यात विस्तार वाली अ. असंख्यात विस्तार वाली न उस में जे. जो सं० संख्यात विस्तार वाली से वह सं० संख्यात जो० योजन स०. सहस्र वि० चौढाइ मे अ० असंख्यात जो० योजन सहस्र प० परिधि से त उस में जे. जो अ० असंख्यात वि० विस्तार वाली अ० असंख्यान जो० योजन स० सहस्र वि० चौडाइ में अ. असंख्यात जो योजन सहस प० परिधि में ॥ ४ ॥ त० तपस्काय भ० भगवन् के० कितनी म० वडी अ० इस जं० जम्बूद्वीप में जे से संखेनावित्थडे सेणं सखजाइ जोयणसहस्साई विखंभेणं, असंखजाई जो. यणसहस्साई परिक्खेवैण पण्णत्ते तत्थणं जे से असंखजवित्थड़े सेणं असंखे- जाई जोयणसहस्साई विक्खंभेणं असंखजाई जोयण सहस्साई परिक्खेवेणं प०॥४॥ तमुकाएणं भंते ! केमहालए पण्णत्ते ? गोयमा ! अयणं जबूद्दीने द्दीवे सव्व दीव * मकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायनी चालाप्रसादजी * काय का विस्तार से प्रकार का है? संख्यात योजन का विस्तार व २असंख्यात योजन का विस्तार.जहां मंख्यान योनन का विस्तार है वहां उस की चौडाइ संख्यात सहस्र योजन की है और परिधि असंख्यात सहययोजन की है. जहां असंख्पात योजन का विस्तार है वहां असंख्यात योजन महस की चौडाइ है और भगख्यान यांजन सहस्र की परोिध है।।४॥ अहो भगवन् ! तमस्काय कितनी बडी कही ? अहो गौतम ! सब शब्दार्थ स० सब दी० द्वीप सः समुद्र की स० सत्र आभ्यंतर जायावत् प०,परिधि में प० कहा दे० देश म० महाक जा० यावत् १० महानुभाग इ० अभी ति० ऐसा क० करके के० में पूर्ण ज. जम्बूद्वीप ती० 300 तीन अ० चपुट्टिका नि० कीहुई ति० एक्कीसवार अ० परिभ्रमण करके ह. शीघ्र आ० आधे से उस दे० देवता की उ० उत्कृष्ट तु• त्वरित जा. यावत् दे. देवगति से वा० जातेहुए जा० यावत् एक एक अ० दिन दु० दो दिन ति तीन दिन उ० उत्कृष्ट छ०छमास वी० जावे अ० कितनेक त? तमस्काय वि० सूत्र ESS पंचमांग विवाह पण्णात्ति ( भगवती) सूत्र 8880 समुदाणं सव्वभंतराए जाव परिक्खेवणं पण्णत्ते, देवेणं महिढीए जाव महाणुभावे इणामेव २ त्तिकटु केवलकप्पं जंबुद्दीवं दीवे तीहिं अच्छरानिवाएहि तिसत्तख- तो अणुपरियाहत्ताणं हव्वमागच्छेज्जा, सेणं देवत्ताए उकिट्टाए, तुरियाए जाव देवगईए वीईबयमाणे जाव एकाहंवा दुयाहं तियाहंवा उक्कोसेणं छम्मासे वीईवएज्जा अत्थेगइए तमु- द्वीप समुद्र में यह जम्बूदीप बहुत छोटा, व आभ्यंतर है इस की पारीधि तीन लाख सोलह हजार दोसो अठाइस योजन से कुछ कम की है. इस का कोई महर्चिक यावत् महानुभाग देव तीन चपटी बजावे इतने काल में इकवीस वक्त फीरे ऐसी उत्कृष्ट, त्वरित यावत् देवगति से एक दिन, दो दिन, तीन दिन यावत् छ मास पर्यंत फीरे तब संख्यात योजन के विस्तारवाली तमस्काय को उत्तीर्ण होजाते हैं परंतु असंख्यात * छठा शतक का पांचवा उद्देशा•89838 भावार्थ CAS शब्दार्थ • अनुवादक पानमनगरी मुनि श्री ममालक ऋपिनी 87 की प० प्ररूपी तं० वह ज. यथा सं० संख्यात विस्तार वाली अ असंख्यात विस्तार वाली दोप्रकार न. उस में जे० जो सं० संख्यात विस्तार.वाली से वह सं० संख्यात जो० योजन स०. सहस्र वि० चौडाइ से अ० असंख्यात जो० योजन सहस्र प० परिधि से त उस में जे. जो अ० असंख्यात पिक विस्तार वाली अ० असंख्यान जो० योजन स० सहस्र वि० चौडाइ में अ. असंख्यात जो० योजन माइस प० परिधि में ॥ ४ ॥ त० तमस्काय भ० भगवन् के० कितनी म० वडी अ० इस जम्बूद्वीप में जे से सखेजावत्थडे सेणं संखेजाइ जोयणसहस्साई विखंभेणं, असंखजाई जो- यणसहस्साई परिक्खेवैण पण्णत्ते तत्थणं जे से असंखज्जवित्थड़े सेणं असंख- जाई जोयणसहस्साई विक्खंभेणं असंखज्जाई जोयण सहस्साई परिक्खेवेणं प०॥४॥ तमुकाएणं भंते ! केमहालए पण्णत्ते ? गोयमा ! अयणं जंबूद्दीने द्दीवे सव्व दीव * मकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी बालाप्रसादजी * साप का विस्तार रो प्रकार का है? संख्यात योजन का विस्तार व २असंख्यात योजन का विस्तार.जहां प्रख्यात योनन का विस्तार है वहाँ उस की चौडाइ संख्यात सहस्र योजन की है और परिधि असंख्यात सहस्त्र योजन की है. जहां असंख्यात योजन का विस्तार है वहां असंख्यात योजन महल की चौडाइ है और भरख्यात योजन सहस्र की परिधि है।। ४॥ अहो भगवन् ! तमस्काय कितनी बडी कही ? अहो गौतम ! सब शब्दार्थ/ आ० आत्मारंभी जा. यावत् णो० नहीं अ० अनारंभी से वह के० कीसतरह भं० भवगन् ए. ऐसा चु. कहा जाता है गो. गौतम अ० अविरति प० प्रसयिक से वह ते• इसलिये जा. यावत् णो० नहीं अ० अनारंभी ए० ऐसे जा. यावत् पं० पंचेन्द्रिय तिर्यंच म० मनुष्य ज. जैसे जी० जीव ण. विशेष सि. सिद्ध वि• रहित भा० कहना वा० चाणव्यंतर जा० यावत् ० वैमानिक ज. जैसे णे नारकी॥३९॥ e9 389 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 80 रंभावि जाव णो अणारंभा ॥ से केणटेणं भंते एवं बुच्चइ ? गोयमा ! आविरतिं पडुच्च. से तेण?णं जाव णो अणारंभा ॥ एवं जाव पंचिंदिय तिरिक्ख जोणिया ॥ मणुस्सा जहा जीवा णवरं सिद्धविरहिता भाणेयव्वा ॥ वाणमंतरा जाव वेमाणिया जहा नेरइया १. पहिला शतक का पहिला उद्देशा 988 गवार्थ उभयारंभी हैं परंतु अनारंभी नहीं हैं. अहो भगवन् ! वह कैसे ? नारकी आत्मारंभी हैं यावत् अनारंभी नहीं हैं. अहो गौतम नारकी के जीव अविरति होने से आत्मारंभी हैं यावत् अनारंभी नहीं हैं. जैसे नारकी का कहा वैसेही दश भुवनपति, पांच स्थावर व तीन विकलेन्द्रिय व तिर्यंच पंचेन्द्रियतक जानना. और मनुष्य १० को सिद्ध भगवान् छोडकर जैसे जीवको संयति, असंयति, प्रमत्त अप्रमत्त ऐसे चार भांगे कहें वैसे ही यहां भांगा अनुसार आत्मारंभी परारंभी, उभयारंभी व अनारंभी के भेद जानना. और जैसे नारकी को कहा वैसे ही वाणब्यंतर ज्योतिषी व वैमानिक का जानना. ॥ ३९॥ अविरति व सलेशी की साधर्म्यतासे आगे ७९८ सूत्र अनुवादक-पालप्राचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दाथी उल्लंघे अ० कितनेक नोक नहीं पा० उल्लंधे एक यह म० उचाइ गो. मातम त० तमस्काय प० प्ररूपी ॥५॥ ० है भ० भगवन् त० तेमस्काय गे० गृह गे• दुकान नो• नहीं इ० यह अ० अर्थ स० योग्य अ० है ० भगवन् त० तमस्काय गा० ग्राम जा. यावत् स० सन्निवेश नो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ ॥ ६॥ अ० है भ० भगवन् त० तमस्काय उ. प्रधान-२० मेघ से० झरे स० उत्पन्न होवे वा० व चा० यावे हं० हां अ० है तं० उसे भ० भगवन किं० क्या दे. देव प० करते है अ० असुर प० कार्य वीईवएजा अत्यंगइएतमुकायं नो वीइवएजा, ए महालएणंगोयमा! तमुकाएपण्णत्ते ॥५॥अस्थिण भंते! तमुकाए गेहाइवा गेहवणाइवा? णोइणट्टे समटे।अस्थिण भते! तमुकाए गामाइवा जाव सन्निवेसाइवा ? णो इणढे समढे ॥ ६ ॥ अत्थिणं भंते ! तमु- काए उराला बलाहया सेसंयंति समुच्छंति वासं वासंति ? हेता अत्थि, तं भंते ! किं देवो पकरेइ, असुरो पकरेइ, नागो पकरेइ ? गोयमा ! देवोवि पकरेइ असुरोवि पकरेइ, योजनवानी तमस्काय को उत्तीर्ण नहीं हो सकते हैं. अहो गौतम ! तमस्काय इतनी बडी कही है ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! क्या तमस्काय में गृह, दुकान, ग्राम, या नगर के आकार हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! तमस्काय में बहुत बड़े मेघ स्नेह उत्पन्न करते हैं, पुद्गलों उत्पन्न होते हैं. और वर्षा वर्पती है ? हां गौतम ! यावत् वर्षा चर्पती है. अहो भगवन * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालाप्रसादजी * How L क्य ब्दार्थ 385 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र -3803 करते हैं ना० नाग प० करते हैं गो. गौतम दे० देव करते हैं अ० असुर करते हैं ना. नाग करते ॥ ७॥ अ० है भं• भगवन् त० तमस्काय में वा ० वादर थ० स्थनित स० शब्द वा. वादर वि० विद्युत् ई० हां अ० है ॥ ८ ॥ अ० है ० भगवन् त० तमस्काय वा० वादर पु० पृथ्वी काय वा वादर अ० अग्निकाय णो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थन नहीं अ० अन्य वि. विग्रहगति ९ ॥ अ० है भ• भगवन् त? तमस्काय चं० चंद्रमा सू० सूर्य ग० ग्रह ग० समुह ण. नक्षत्र ता० सत्र नागोवि पकरेइ ॥ ७ ॥ अत्थिणं भंते ! तमुकाए वादरे थणियसद्दे वादरविजुयाए ? हंता अत्थि, तं भंते ! किं देवो पकरेइ ? तिण्णिवि पकरेइ ॥ ८ ॥ अत्थिणं भंते ! तमुकाए बादरे पुढवीकाए वादरे अगाणकाए ? णोइणढे समढे ॥ णण्णत्थ विग्ग- हगइसमावणाएणं ॥९॥ अत्थिणं भते! तमुकाए चदिम सरिय गहगणनक्खत्त तारा भावार्थ . वह वर्षा देव करते हैं, असुर करते हैं व नाग करते हैं. ? अहो गौतम ! देव, असुर व नाग तीनों ही वर्षा करते हैं ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! तमस्काय में क्या वादर शब्द व वादर विद्युत होते हैं ? हां गौतम! तमस्काय में चादर विद्युत् व वादूर शब्द होते हैं, अहो भगवन् ! उसे क्या देव, असुर व नाग करते हैं ? अहो गौतम ! तीनों जाति के देवों करते हैं ॥८॥ अहो भगवन् ! तमस्काय में चादर पथ्वीकाय व वादर तेउकाय क्या है ? अहो गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है, अर्थात् उस में वादर, - छठा शतकका पचिया उद्देशा SP> ८०० ? + अनुवादक-वान्यायशिमुनि श्री अमोलक ऋपिनी के शब्दार्थों तारारूप नो नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ ० चारो तरफ अं० है भं० भगवन् त० तमस्काय चं० चंद्रकी भा० कान्ति सू०. सूर्य की भा० कान्ति णो० नहीं इ० यह अर्थ स. समर्थ दु० दुपनीक पु० पुनः सा०.वह ॥ १०॥ त० तमस्काय भं० भगवन् के० कैसा ३० वर्ण से गो० गौतम का काली का० काली कान्ति गं० गंभीर लो० रोमहर्प की उत्पति भी० रौद्र उ० त्रास उत्पन्न करने वाली ५० परम कि? रूवा ? णो इण? सम? पलियस्सओ पुण अस्थि । अत्थिणं भते ! तमुकाए चंदा- सत्र भाइवा; सूराभाइवा ? णोइणढे समढे का दूसणिया पुणे सा ॥ १० ॥ तमुकाएणं भैते ! केरिसए वण्णणं पण्णने ? गोयमा ! कालो, कालोभासे, गंभरिलोमह- भावाधा पृथ्वीकाय व वादर अग्निकाय नहीं है. मात्र बादर पृथ्वीकाय के जीव आयुष्य पूर्ण होने पर तमस्काय जाते हैं. वादर अग्निकाय मात्र मनुष्य लोक में है ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! तमस्काय में चंद्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र व तारे रहे हुचे हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अर्थात, तमस्काय में ज्योतिष चक्र नहीं है परंतु उस की आसपास रहा हुवा है. अहो भगवन् ! तमस्काय में क्या चंद्र व सूर्य की प्रभा है ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है क्योंकि अढाइद्वीप की वाहिर चंद्र सूर्य स्थिर है। और उन पुगलों को चंद्र सूर्य की प्रभा दूपित होती है ॥ १० ॥ अहो भगवन् ! तमस्काय का वर्ण कौ- नमा कहा ? अहो गौतम ! तमस्काय . का वर्ण काला, काली प्रभावाला, गंभीररोमकम्पहर्प उत्पन्न * प्रकाशक-राजावहादुर.लाला मुखदेवमहायनी ज्वालाप्रसादजी ८०१ सत्र पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) कृष्ण ३० वर्ण से ५० प्ररूपा दे० देव अ० कितने जे० जो त०. उसको.प० पहिले पा..देखकर ख.००० क्षुब्ध होघे अ० अथ अ० प्राप्त होवे त. उस की प० पीछे सी० शीघ्र तु० त्वरित खि० शीघ्र ही.वी. व्यतिक्रान्त करे ॥ ११॥ त० तमस्काय के भं० भगवन् क० कितने ना० नाम प. कहे गो० गौतम ते० तेरह ना० नाम प० कहे तं० वह ज० यथा त ० तम त० तमस्काय अं० अंधकार म० महांधकार लो. लोकांप्रकार लो० लोक तमित्र दे० देवांधकार दे देवतमिस्र दे० देवअरण्य वे०देवव्युह दे०देवफलिह दे० रिसजणणे, भीभे, उचासणए, परमकिण्हे वण्णेणं पण्णत्ते । देवेविणं अत्थेगइए जेणं तप्पढमयाए पासित्ताणं खन्भाएज्जा, अहेणं अभिसमागच्छेना, तओ पच्छा सहिं २ तुरियं २ खिप्पामेव वीईवएज्जा ।॥११॥ तमुकायस्सणं भते! कइ नामधेजा पण्णता? गोयमा ! तेरस णामधेजा पण्णत्ता, तंजहा तमेइवा, तमुकाएइवा, अंधकारइवा, मह धकारइया, लोगंधकारेइवा, लोगतमिसेइवा, देबंधकारेड़वा, देवतमिसेइवा, देवरण्णे- करनेवाला, भयंकर, त्रास उत्पन्न करे वैसा व परम कृष्ण कहा है. कितनेक देव भी उस को पहिले देखकर क्षुभित होते हैं. फीर तपस्कार में प्रवेश करके शीघ्र वरित गति से उसे उल्लंध जाते है। ॥ ११॥ अहो भगवन् ! तमस्काय के कितने नाम कहे हैं? अहो गौतम ! तमस्काय के तेरह नाम कहे हैं. १ तम २ तमस्काय ३ अंधकार ४ महा अंधकार ५ लोकांधकार ६ लोक तयिस ६ देवांधकार - छठा शतक का पांचवा उद्देशा805888 नवाथे शब्दा ८०२ 4 भनुवादक-बालमनचारी मुनि श्री अमोलक अपिजी : देवप्रतिक्षोभ अ. अरुंगोदय स० समुद्र ॥ १२ ॥ त०, तमस्काय. भ० भगवन् किं. क्या पु० पृथ्वीपरि- णाम जी जीव परिणाम आ० अप्परिणाम पो० गुद्गल परिणाम गो० गौतम नो० नहीं पु. पृथ्वी परि- णाम आ० अप्परिणाम भी जीव परिणाम. पो० पुद्गल परिणाम ॥ १६ ॥ त० तमस्काय भं० भगवन स० सब पा०. प्राण.भू० भूत जी० जोर स० सत्त्व पु० पृथ्वी कायपने जा० यावत् त. त्रसकाय पने इवा, देवबूहेइवा, देवफलिहेइवा, देवपडिक्खोभेइवा, अरुणोदएइवा, समुद्दे ॥ १२ ॥ तमुकाएणं भंते ! किं पुढवि परिणामे, जीव परिणामे, आउपरिणामे पोग्गल परिणा- मे ? गोयमा ! नो पुढवि परिणाम आउपरिणामेवि, जीव परिणामेवि, पोग्गल परि- णामेवि, ॥ १३ ॥ तमुकाएणं भंते ! सब्चे पाणा भूया जीवा सत्ता पुढवीकाइयत्ताए जाव तसकाइयत्ताए उववण्णपुवा ? हंता गोयमा. .! असई अदुवा, अणतखुत्तो.। ८ देवतामिस ९ देव अरण्य १० देव व्यूह १.१. देव फलसा १२ देव. प्रतिक्षोभ व १३ अरुणोदय ॥ १२ ॥ भो भगवन् ! तपस्काय क्या पृथ्वीपरिणामवाली, पानी परिणामवाली, जीव, परिणामवाली व पुद्गल, परिणामवाली है ?. अहो गौतम ! तमस्काय पृथ्वी परिणामवाली नहीं है अपितु पानी, जीव व पुद्गल परिणामवाली है ॥ १३ ॥ अहो . भगवन् ! तमस्काय में पृथ्वीकाय यावत् सकायपने सव.प्राण भूत जीव व सल पहिले क्या उत्पन्न हुए ! हां गौतम.! सब प्राण, भूत, जीव व सत्र अनेक वार अथवा * प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालाप्रसादी साथ ८०१ पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) कृष्ण व० वर्ण से प० प्ररूपा दे० देव अ० कितनेक जे० जो त०. उसको.प० पहिले पा०.देखकर ख० क्षुब्ध होवे अ० अथ अ० प्राप्त होवे त• उस की प० पीछे सी० शीघ्र तु० त्वरित खि० शीघ्र ही. वी. व्यतिक्रान्त करे ॥ ११ ॥ त० तमस्काय के भं० भगवन् क. किनने ना० नाम प० कहे गो० गौतम ते० तेरह ना० नाम प० कहे तं० वह ज० यथा त० तम त० तमस्काय अं० अंधकार म० महांधकार लो०१० लोकांप्रकार लो० लोक तमित्र दे० देवांधकार दे० देवतमिस्र दे० देवअरण्य वेदेवव्युह दे०देवफलिह दे० रिसजणणे, भीभे, उत्तासणए, परमकिण्हे वण्णेणं पण्णत्ते । देवेषिणं अत्थेगइए जेणं तप्पढमयाए पासित्ताणं खब्भाएज्जा, अहेणं अभिसमागच्छेज्जा, तओ पच्छा सहिं २ तुरियर खिप्पामेव वीईवएज्जा ॥११॥ तमुकायस्सणं भंते! कइ नामधेजा पण्णत्ता? गोयमा ! तेरस णामधेजा पण्णत्ता, तंजहा तमेइवा, तमुकाएइवा, अंधकारइवा, महं- धकारइया, लोगंधकारेइवा, लोगतमिसेइवा, देवंधकारेइवा, देवतमिसेइवा, देवराणे- नावार्थ करनेवाला, भयंकर, त्रास उत्पन्न करे चैसा व परम कृष्ण कहा है. कितनेक देव भी उस को पहिले देखकर क्षुभित होते हैं. फीर तमस्काय में प्रवेश करके शीघ्र वरित गति से उसे उल्लंध जाते हैं ॥ ११॥ अहो भगवन् ! तमस्काय के कितने नाम कहे हैं? अहो गौतम ! तमस्काय के तेरह नाम कहे हैं. १ तम २ तमस्काय ३ अंधकार ४ महा अंधकार ५ लोकांधकार ६ लोक तमिस्र ६ देवांधकार - छठा शतक का पांचवा उद्देशा 988 ora शब्दार्थ ८०२ पर अनुवादक-बालप्रामनारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी देवप्रतिक्षोभ अ० अगोदय स० समुद्रः ॥ १२ ॥ त०, तमस्काय भ० भगवन् कि० क्या पु० पृथ्वीपरि- णाम जी० जीव परिणाम आ. अप्परिणाम पो० गुद्गल परिणाम गो० गौतम नो० नहीं पु० पृथ्वी परि- णाम आ० अप्परिणाम जी० जीव परिणाम. पो० पुद्गल परिणाम ॥ १६ ॥ त० तमस्काय भं० भगवन् स० सब पा०. प्राण भू० भूत जी० जोर स० सत्त्व पु० पृथ्वी कायपने जा. यावत् त. त्रसकाय पने इवा, देवव्हेइवा, देवफालिहेइवा, देवपडिक्खोभेइवा, अरुणोदएइवा, समुद्दे ॥ १२ ॥ तमुकाएणं भंते ! किं पुढवि. परिणामे,,जीव परिणामे, आउपरिणामे पोग्गल परिणा- मे ? गोयमा ! नो पुढवि परिणामे आउपरिणामेवि, जीव परिणामेवि, पोग्गल परि- णामेवि, ॥ १३ ॥ तमुकाएणं भंते ! सब्वे पाणा भूया जीवा सत्ता पुढवीकाइयत्ताए जाव तसकाइयत्ताए उववण्णपुव्वा ? हंता गोयमा ! असई अदुवा अणतखुत्तो.। ८ देवतमिस ९ देव अरण्य १० देव व्यूह ? १. देव फलसा १२ देव. प्रतिक्षोभ व १३ अरुणोदय ॥ १२ ॥ ो भगवन् ! तमस्काय क्या पृथ्वीपरिणामवाली, पानी परिणामवाली, जीव परिणामवाली व पुद्गल परिणामगली है ? अहो गौतम! तमस्काय पृथ्वी परिणामवाली नहीं है अपितु पानी, जीव व पुद्गल परिणामवाली है ॥ १३ ॥ अहो भगवन् तमस्काय में पृथ्वीकाय यावत् प्रसकायपने सब.प्राण भूत नीर व मल पहिले क्या उत्पन्न हुए! हां मौतम ! सब प्राण, भूत, जीव व सत्र अनेक वार ' अथवा * मकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेवसहायनी चालाप्रसादी तार्थ ७ सत्र 388 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 888 उ० उत्पन्न पूर्व है. हाँ गो० गौतम अ० अनेक वार अ० अथवा भ० अनंतवार णो नहीं था. बादर पु० पृथ्वी कायपने वा० चादर अनिकायपने ॥ १४ ॥ क० कितनी भं० भगवन् क. कृष्णराजियों प० मरूपी गो गौतम अ० आठ क० कृष्णराजियों प० प्ररूपी क° कहां भ• भगवन् ए० यह अ० आठ क. कृष्णराजियों प० मरूपी गो० गौतम उ ऊपर स० सनत्कुमार मा० माहेन्द्र क. देवलोक में हि० नीचे वं० ब्रह्मलोक क० देवलोक में रि०रिष्ट वि० विमान ५० प्रस्तर ए. यहां अ० अखाडा के सं० णो चेवणं बादर पुढविकाइयत्ताए, बादर अगणिकाइयत्ताए ॥ १४ ॥ कइणं भंते ! कण्हराईओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! अट्ठ कण्हराईओ पण्णत्ताओ कहिणं भंते ! एया अट्ठ कण्हराईओ पण्णताओ ? गोयमा ! उप्पिं सणंकुमारमा- हिंदाणं कप्पाणं हिट्टि बंभलोए कप्पे रिट्टे विमाणे पत्थडे एत्थणं अक्खाडग समचउ- रंस संठाण संठियाओ अट्टराईओ पण्णत्ताओ, तंजहा पुरच्छिमेणं दो, पञ्चत्थिमणं दो, दाहिणेणं दो, उत्तरेणं दो, पुरच्छिमभंतरा कण्हराई दाहिणं बाहिर अनंत वार उत्पन्न हुए, परंतु वादर पृथ्वोकाय व वादर अनिकायपने नहीं उत्पन्न हुए, क्योंकि उन की उत्पत्ति का वहां अभाव है ॥ १४ ॥ तमस्काय के समान रंगवाली कृष्णराजी है इस से कृष्णराजी का प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! कृष्णरामी कितनी कही? अहो गौतम! कृष्णराजी आठ कहीं अहो भगवन् ! 28छठा शतकका पांचवा उद्देशा 988 वार्थ ८०४ .: अनुवादक-बालग्रहगी मुनि श्री अमोलक कार्पनी शब्दाधी सम चनुस्र सं० सैडाण से सं० रही हुई अ० आठ रा० राजियों ५० प्ररूपी पु० पूर्व में दो दो प०पश्चिम में दो दो दा दक्षिण में दो दो उ० उत्तर में दो दो पू. पूर्व की अ. आभ्यंतर क. कृष्णराजी दा० दक्षिण की वा वाहिर की क० कृष्णराजी को पु० रूपी हुई दा० दक्षिण की अ० आभ्यंतर क. कृष्णराजी प० पश्चिम की पा० बाह्य कः कृष्णराजियों छ० छकौने वाली दो० दो पु० - पूर्व प० पश्चिम कण्हराइं पुट्ठा, दाहिणभतरा कण्हराई पच्चच्छिम बाहिरं कण्हाई पुट्ठा पञ्चत्थिमन्भ- 'तरां कण्हराई उत्तरवाहिरं कण्हराई' 'पुट्टा, उत्तरभंतरा कण्हराई पुराच्छिसवाहिरं । कण्हराई पुट्ठा, दो पुरच्छिम पञ्चच्छिमाओ. बाहिराओ कण्हराईओ छलंसाओ; दो उत्तरदाहिणवाहिराओ कण्हराईओ तंसाओ, दो पुरच्छिमपञ्चच्छिमाओ अभंतरा- ओ कण्हराईओ चउरंसाओ, दो उत्तर दाहिणाओ अभंताराओ कण्हराईओ चउरं कृष्णराजी कहां कही ? अहो गौतम ! सनत्कुमार माहेन्द्र देवलोक की उपर व ब्रह्मदेवलोक की नीचे रिट विमानं मस्तर में अखाडे के समान समचउरंस संठाणसे रही हुई हैं. पूर्व में दो, पश्चिम में दो, दक्षिण में दो. उगर में दो. पूर्व की आभ्यंतर कृष्णराजी दक्षिण की वाह्य कृष्णराजी को. स्पर्शकर रही हुई है, दक्षिण की आभ्यंतर कृष्णराजी पश्चिम की वाह्य कृष्णराजी को स्पर्शकर . रही है पश्चिम, की आभ्यंतर कृष्णाजी उतर की बात कृष्णरानी को स्पर्शकर रही है और उत्तर की आभ्यंतर कृष्णराजी-पूर्व की * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादगी * हार्थी ८०३ 219 80 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8882 उ० उत्पन्न पूर्व हं• हां गो० गौतम अ० अनेक वार अ०. अथवा अ० अनंतवार णो नहीं बा. बादर पु० पृथ्वी कायपने वा० बादर अग्निकायपने ॥ १४ ॥ क० कितनी भं० भगवन् क. कृष्णराजियों प० प्ररूपी गो गौतम अ० आठ क० कृष्णराजियों प० प्ररूपी क° कहां भ• भगवन् ए. यह अ० आठ क. कृष्णराजियों प० प्ररूपी गो गौतम उ ऊपर स० सनत्कुमार मा० माहेन्द्र क. देवलोक में हि० नीचे वं० ब्रह्मलोक क० देवलोक में रि० रिष्ट वि० विमान ५० प्रस्तर ए. यहां अ० अखाडा के सं० णो चेवणं बादर पुढविकाइयत्ताए, बादर अगणिकाइयत्ताए ॥ १४ ॥ कइणं भंते ! कण्हराईओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! अट्ठ कण्हराईओ पण्णत्ताओ कहिणं मंते ! एया अट्ठ कण्हराईओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! उप्पिं सणंकुमारमा- हिंदाणं कप्पाणं हिढेि बंभलोए कप्पे रिटे विमाणे पत्थडे एत्थणं अक्खाडग समचउ- रंस संठाण संठियाओ अट्टराईओ पण्णत्ताओ, पण्णत्ताओ, तंजहा पुरच्छिमेणं दो, पच्चात्थिमेणं दो, दाहिणणं दो, उत्तरेणं दो, पुरच्छिमभंतरा कण्हराई दाहिणं वाहिरं अनंत वार उत्पन्न हुए, परंतु वादर पृथ्वोकाय व वादर अग्निकायपने नहीं उत्पन्न हुए, क्योंकि उन की उत्पत्ति का वहां अभाव है ॥ १४ ॥ तमस्काय के समान रंगवाली कृष्णराजी है इस से कृष्णराजी का प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! कृष्णरामी कितनी कही? अहो गौतम! कृष्णराजी आठ कहीं अहो भगवन् ! 88 छठा शतकका पांचवा उद्देशा गवार्थ शब्दार्थ स. लेश्या सहित ज. जैसे ओ०औधिक कि० कृष्णलेश्या नी नीललेश्या काकापुत लेश्या ज० जैसे ओ० औधिक जीव ण विशेष प० प्रमत्त अ० अप्रमत्त भा० कहना ते• तेजो लेश्या प० पद्मलेश्या सु० शुक्ल लेश्या ज. जैसे ओ० औधिक जीव ण. विशेष सि. सिद्ध णा० नहीं भा० कहना ॥४०॥ इ० यह भ० भविक भ० भगवन णा• ज्ञान प० परभविक ज्ञान उ० उभय भविक गो गौतम इ० यह भ० भविक ज्ञान ४८ .. सूत्र 4 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी ॥ ३९ ॥ सलेस्सा जहा ओहिया किण्हलेसस्स नीललेसस्स, काउलेसस्स, जहा ओहिया जीवा । णवरं पमत्त अपमत्ताण भाणियव्वा । तेउलेसस्स पम्हलेसरस सुक्क- लेसरस जहा ओहिया जीवा । णवरं सिद्धा ण भाणिया ॥ ४० ॥ इह भविए भंते णाणे, परभविए णाणे, तदुभय भवि एणाणे ? गोयमा ! इह भविए वि णाणे, परभवि- * भकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी Aarx वार्थ लेश्या का प्रश्नकहते हैं. अहो भगवन् ! सलेशी जीव आरंभी हैं? अहो गौतम जैसे समुच्चय जीव का कहा. वैसा कहना. कृष्ण, नील व कापोत लेश्यावालेको समस्त जीव जेसे कहना परंतु इसमें प्रमत्तव अप्रमत्तका कयन करना नहीं तेजु, पद्म, व शुक्ल लेश्या वाले औधिक जीव (सव जीवो जैसे कहना यहां पर सिद्ध को कहना नहीं क्योंकि सिद्ध अलेशी हैं ॥ ४० ॥ अत्र आरंभ का हेतुभूत ज्ञानका स्वरूप बताते हैं. अहो भगवन् । * ८०५ 3-2 पंचमांग विवाह पणत्ति ( भवगती) सूत्र - पर्थ उ० उत्तर द० दक्षिण की वा वाहिर की क० कृष्णराजी तं० तीनकोने वाली दो० दो पु. पूर्व प० पश्चिम की अ. आभ्यंतर क० कृष्णराजी च० चौरस ॥ १५ ॥ क० कृष्णराजियों भं भगवन के० कितनी आ० लम्बाइ में के० कितनी वि० चौडाइ में के० कितनी प० परिधि में गो० गौतम अ० असंख्यात जो० योजन सहस्र आ० लम्बाइ में सं० संख्यात जो० योजन सहस्र वि० चौडाइ में. अं० अंसख्यात जो योजनसहस्र प० परिधिमें प० कही ॥१६॥ क. कृष्णराजियों भं भगवन् के० कितनी सूत्र साओ, ॥ पुव्वावरा छलंसा, तंसापुण दाहणुत्तरावज्झा ॥ अवसेसा चउरसा, सव्वाविय कण्हराईओ ॥ १ ॥ १५ ॥ कण्हराईओणं भंते ! केवइयं आयामेणं केवइयं विक्खंभेणं, केवइयं परिक्खेवेणं पण्णत्ताओ ? गोयमा ! असंखेज्जाइं जोयण सहस्साई आयामेणं, संखेज्जाई जोयण सहस्साई विक्खंभेणं,असंखजाई जोयणसहस्साई परिक्खेवेणं पण्णत्ताओ ॥१६॥ कण्हराईओणं भंते ! के महालियाओ पण्णत्ताओ ? भावाथ बाह्य कृष्णराजी को स्पर्शकर रही है. पूर्व पश्चिम की वाह्य दो कृष्णराजीयों छ कौनेवाली हैं, उत्तर दक्षिण की. वाहिर की दो कृष्णराजीयों त्रिकोनाकार हैं, पूर्व पश्चिम की आभ्यंतर दो कृष्णराजीयों चौरस हैं, वैसेही उत्तर दक्षिण की दोनों आभ्यंतर कृष्णराजीयों चौरस हैं॥१५॥ अहो भगवन् ! कृष्णराजीयों लम्बाई चौडाई व परिधि में कितनी कहींहै? अहो गौतम! कृष्णराजीयों असंख्यात योजनकी लम्बी, संख्यात योजन सहस्र की चौडी, व असंख्यात योजन सहस्र की परिधिवाली हैं ॥ ६ ॥ अहो भगवन् - कृष्णराजीयों 2 छठा शतक का पांचया उद्देशा 86-820 ८०४ १४ भनुवादक-बालप्रमागरी मुनि श्री अमोलक ऋापनी 87 शब्दार्थ संप चतुस्र सं० संठाण से सं० रही हुई अ० आठ रा० राजियों ५० प्ररूपी पु० पूर्व में दो दोपपश्चिम में दो दो दा दक्षिण में दो दो उ उत्तर में दो० दो पू० पूर्व की अ. आभ्यंतर क. कृष्णराजी दां दक्षिण की वा वाहिर की क० कृष्णरांजी को पु० स्पर्शी हुई दा. दक्षिण की अ० आभ्यंतर क. कृष्णराजी प० पश्चिम की श० वाह्य कः कृष्णराजियों छ० छकौने वाली दो दो पु० 'पूर्व प. पश्चिम कण्हराई पुढा, दाहिणमंतरा कण्हराई पच्चच्छिम बाहिरं कण्हराई पुट्ठा पञ्चत्थिमभं- 'तरा कण्हराई उत्तरवाहिरं कण्हराई' पुट्टा, उत्तरम्भतरा कण्हराई पुराच्छसवाहिरं कण्हराई पुट्ठा, दो पुरच्छिम पञ्चाच्छिमाओ बाहिराओ कण्हराईओ छलंसाओ; दो उत्तरदाहिणवाहिराओ . कण्हराईओ तंसाओ, दो पुरछिमपञ्चच्छिमाओ अब्भंतरा- ओ कण्हराईओ चउरंसाओ, दो उत्तर दाहिणाओ अब्भंताराओ कण्हराईओ चउरं 'घ छप्णराजी कहां कही ? अहो गौतम ! सनत्कुमार माहेन्द्र देवलोक की उपर व ब्रह्मदेवलोक की नीचे रिट विमान प्रस्तर में अखाडे के समान समचउरंस सठाणले रही हुई. हैं. पूर्व में दो, पश्चिम में दो, दक्षिण में दो. इमर में दो. पूर्व की आभ्यंतर कृष्णराजी दक्षिण की,वाह्य कृष्णराजी को स्पर्शकर रही हुई है, दक्षिण की आभ्यंतर कृष्णराजी पश्चिम को वाहा कृष्णाजी को स्पर्शकर. रही है पश्चिम की आभ्यंतर कृष्णरानी उनर की वाध कृपगरानी को स्पर्श कर रही है और उत्तर की आभ्यंतर' कृष्णराजी पूर्व की * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादगी ८०५ सत्र ११-82 पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भवगती) सूत्र 28 Tी ज० उत्तर द० दक्षिण की वा वाहिर की क. कृष्णराजी तं० तीनकोने वाली दो० दो .पु. पूर्व प. पश्चिम की अ. आभ्यंतर क० कृष्णराजी च० चौरस ॥ १५ ॥ क० कृष्णराजियों भ० भगवन् । के० कितनी आ० लम्बाइ में के० कितनी वि० चौडाइ में के० कितनी प० परिधि में गो० गौतम अ० असंख्यात जो० योजन सहस्र आ० लम्बाइ में सं० संख्यात जो० योजन सहस्र वि० चौडाइ में अं• अंसख्यात जो योजनसहस्र प० परिधि पकही ॥१६॥ क० कृष्णराजियों भ० भगवन् के० कितनी साओ, ॥ पुव्वावरा छलंसा, तंसापुण दाहणुत्तराबज्झा ॥ अवसेसा चउरंसा, सव्वाविय कण्हराईओ ॥ १ ॥ १५ ॥ कण्हराईओणं भंते ! केवइयं आयामेणं केवइयं विक्खंभेणं, केवइयं परिक्खेवेणं पण्णत्ताओ ? गोयमा ! असंखेज्जाई जोयण सहस्साई आयामेणं, संखेज्जाई जोयण सहस्साई विक्खंभेणं,असंखज्जाई जोयणसहस्साई परिक्खेवेणं पण्णत्ताओ ||१६॥ कण्हराईओणं भंते ! के महालियाओ पण्णत्ताओ ? भावार्थ बाह्य कृष्णराजी को स्पर्शकर रही है. पूर्व पश्चिम की बाह्य दो कृष्णराजीयों छ कौनेवाली हैं, उत्तर दक्षिण की. वाहिर की दो कृष्णराजीयों त्रिकोनाकार हैं, पूर्व पश्चिम की आभ्यंतर दो कृष्णराजीयों चौरस हैं, वैसेही उत्तर दक्षिण की दोनों आभ्यंतर कृष्णराजीयों चौरस है॥१५॥ अहो भगवन् ! कृष्णरानीयों लम्बाई चौडाई व परिधि में कितनी कहींहैं? अहो गौतम! कृष्णराजीयों असंख्यात योजनकी लम्बी, संख्यात योजन सहस्र की चौडी, व असंख्यात योजन सहस्र की परिधिवाली हैं ॥६॥ अहो भगवन् ! कृष्णराजीयों 82 छठा शतक का पांचवा उद्देशा 8-82 ८.६ 4. अनुवादक-बालमनचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ बढी प० कही गोगौतम अ० यह जं. जम्बूद्वीप ना० यावत् अ० आठ मास वी० व्यतीत होवे अ कितनीक क० कृष्णराजियों वी० उलंघाचे अ० कितनीक क. कृष्णराजियों णो नहीं-वी उल्लंघावे.ए. यह म० घडी गो० गौतम क• कृष्णराजियों प० प्ररूपी ॥ १७ ॥ अ० है भं० भगवन् क० कृष्णराजियों में गे गृह गे० दुकानों को नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ अ है भ० भगवन् क कृष्णराजियों में गा.० ग्राम जा. यावत् स० सन्निवेश णो नहीं इ० यह अर्थ स०' समर्थ ॥ १८ ॥ अ० है. भं० -भगवन् क. गोयमा ! अयणं. जंबुद्दीवे जाव अट्टमासं वीईवएज्जा, अत्थेगइए कण्हराई वीई- वएजा अत्थेगइए कण्हाई णो वीईवएज्जा, ए महालियाओ गोयमा ! कण्हराईओ पण्णत्ताओ ॥ १७ ॥ अत्थिणं भंते ! कण्हराईसु गेहाइवा गेहवणाइवा ? णोइणढे समटे ॥ आस्थणं भंते ! कण्हराईसु गामाइवा जाव साण्णवेसाइवा ? णोइणढेसम? कितनी बड़ी कही हैं ? अहो गौतम! कोई देव तीन चप्पटिका में इस जम्बूद्वीप की आसपास इक्कीस वक्त परिभ्रमण करे ऐमी शीघ्र दीव्य देवगति से कृष्णराजि में आठ मास तक चले तब कितनीक कृष्णराजियों को अतिक्रमे और कितनीक कृष्णराजियों को अतिक्रमे नहीं. अहो गौतम ! इतनी बडी कृष्णराजियों कही हैं ॥१७॥ अहो भगवन् ! इन कृष्णराजियों में गृह, दुकानों, ग्राम यावत् सन्निवेश हैं ? अहो गौतम? में गृह यावत् सन्निवेश नहीं हैं ॥ २८॥ अहो भगवन् ! कृष्णराजियों में क्या. वडे २ मेघ वगैरह * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वाशप्रसादजी * शब्दार्थ/कृष्णराजियों में उ० वादर व० मेघ २० संस्वेद है. हां १० है तैः० उसे भ० भगवन् किं. देव गो० गौतम देव प० करते हैं नो० नहीं अ० अंसुर नो० नहीं ना० नाग अ० है भं० भगवन् क. कृष्णरा- जियों में व० बादर थ० गर्जना ज० जैसे उ० वडे त० तैसे ॥ १९ ।। अ० है भं० भगवन् क० कृष्ण राजियों में वा. वादर आ० अकाग बा० वादर अ० अनिकाय, वा० बादर व० वनस्पतिकाय णो० olo Oyo ७ Fya ८०७ 888 पंचमाङ्ग विवाह- पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 988s ॥१८॥ आथिणं भंते ! कण्हराईसु उरालाबलाहया संसेयंति ३ ? हंता अस्थि ॥ तं भंते ! किं देवो ३ ? गोयमा ! देवो पकरेइ नो असुरो नो नाओ । आत्थिणं भंते ! कण्हराईसु बादरे थाणयसद्दे २ ? जहा उराला तहा ॥१९॥ आत्थिणं भंते ! कण्ह- राईसु बायरे आउकाए बायरे अगणिकाए,बायरेवणप्फइकाए ? णोइणढे समढे॥णण्ण- भावार्थ हां गौतम ! वडे २ मेघ रहे हुवे हैं. अहो भगवन् ! उन्हे क्या देव करते हैं, असुर करते हैं या नाग करते हैं? अहो गौतम ! उन मेघको देव बनाते हैं परंतु असुर व नाग नहीं बनाते हैं. अहो भगवन् ! 100 कृष्णराजियों में क्या वादर गर्जना व वादर विद्युत् है ? हां गौतम ! उस में वादर गर्जना व वादर विद्युत् है, और उन्हे देव बनाते हैं. परंतु असुर व नाग जाति के देव नहीं बनाते हैं. क्योंकि उन का वहां गमन नहीं है ॥ १९॥ अहो भगवन् ! क्या कृष्णराजियों में वादर अप्काय, अनिकाय व वनस्पति 8 छा शतक का पांचवा उद्देशा 988 oyo ८.६ सूत्र १४ अनुरादक-पालमनचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ बढी प० कहीं गो.गौतम अ० यह ज० जम्बूद्वीप जायावत् अ. 'आठ मास वी०व्यतीत होवे अ कितनीक क० कृष्णराजियों वी० उलंघाचे अ० कितनीक क० 'कृष्णराजियों णो नहीं-वी उल्लंघावे एक यह म० घडी गो० गौतम क० कृष्णराजियों प०अरूपी ॥ १७ ॥ अ० है भं० भगवन् क० कृष्णराजियों में गे गृह गे० दुकानों णो० नहीं इ. यह अर्थ स० समर्थ अ है भं० भगवन् क. कृष्णराजियों में गा० ग्राम ना यावत् स० सन्निवेश णो नहीं इ० यह अर्थ स. समर्थ ॥ १८ ॥ अ०. है भं० -भगवन् क. गोयमा ! अयणं. जंबुद्दीवे जाव अट्ठमासं वीईवएज्जा, अत्थेगइए कण्हराई वीई- वएना अत्थेगइए कण्हराई णो वीईवएजा, ए महालियाओ गोयमा ! कण्हराईओ पण्णत्ताओ ॥ १७ ॥ अत्थिणं भंते ! कण्हराईसु गेहाइवा गेहवणाइवा ? णोइंणद्वे साया सम? ॥ आत्थणं भंते ! कण्हराईसु गामाइवा जाव साण्णवेसाइवा ? णोइणट्टेसमटे कितनी बडी कही ? अहो गौतम! कोई देव तीन चप्पटिका में इस जम्बूद्वीप की आसपास इक्कीस वक्त परिभ्रमण करे ऐमी शीघ्र दीव्य देवगति से कृष्णराजि में आठ मास तक चले तब कितनीक कृष्णराजियों को अतिक्रमे और कितनीक कृष्णराजियों को अतिक्रमे नहीं. 'अहो गौतम ! इतनी बड़ी कृष्णराजियों कही हैं ॥१७॥ अहो भगवन् ! इन कृष्णराजियों में गृह, दुकानों, ग्राम यावत् सन्निवेश हैं ? अहो गौतम ? में गृह यावत मन्निवेश नहीं हैं ॥ १८ ॥ अहो भगवन ! कप्णगजियों में क्या बटे पर वगैरह हैं * प्रकाशक रानायहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादनी C शब्दार्थ कृष्णराजियों में उ० वादर व० मेघ सं० संस्वेदं हं हां है तो उसे भ० भगवन कि.. देव गो० गौतम देव प० करते हैं नो० नहीं अ० अंसुर नो० नहीं ना० नाग अ० है .० भगवन् क. कृष्णरा- जियों में व० वादर ५० गर्नना ज० जैसे उ० वडे त० तैसे ॥ १९ ॥ अ० है भं० भगवन् क० कृष्ण राजियों में वा. वादर आ० अपकार गा. वादर अ० अनिकाय, या बादर क. वनस्पतिकाय णो० ८०७ सूत्र 28 पंचमाङ्ग विवाह. पण्णत्ति (भगवती) सूत्र - ॥१८॥ आत्थिणं भंते ! कण्हराईसु उरालाबलाहया संसेयंति ३ ? हंता आत्थि ॥ तं भंते ! किं देवो ३ ? गोयमा ! देवो पकरेइ नो असुरो नो नाओ । आत्थिणं भंते ! कण्हाईसु बादरे थाणयसद्दे २ ? जहा उराला तहा ॥१९॥ अत्थिणं भंते ! कण्ह- राईसु बायरे आउकाए बायरे अगणिकाए,बायरे वणप्फइकाए ? णोइणढे समटे॥णण्ण- EBR><2 छा शतक का पांचवा उद्देशा Regis भावाथे| हां गौतम ! बडे २ मेघ रहे हुये हैं. अहो भगवन् ! उन्हे क्या देव करते हैं, असुर करते हैं या नाग करते हैं ? अहो गौतम ! उन मेघको देव बनाते हैं परंतु असुर व नाग नहीं बनाते हैं. अहो भगवन् ! कृष्णराजियों में क्या वादर गर्जना व वादर विद्युतू है ? हां गौतम ! उस में वादर गर्जना व वादर विद्युत् है, और उन्हे देव बनाते हैं. परंतु असुर व नाग जाति के देव नहीं बनाते हैं. क्योंकि उन का वहां गमन नहीं है ॥ १९॥ अहो भगवन् ! क्या कृष्णराजियों में वादर अप्काय, अनिकाय व वनस्पति oyo 4 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी * शब्दार्थ ममढी प० कही गोगौतम अ० यह ज० जम्बूद्वीप जायावत् अ. 'आठ मास वी०व्यतीत होवे अ० कितनीक क० कृष्णराजियों वी० उल्लंघाचे अ० किसनीक क. 'कृष्णराजियों णो नहीं वी उल्लंघावे. ए. यह म० घडी गो० गौतम क• कृष्णराजियों प०मरूपी ॥ १७ ॥ अ० है मं० भगवन् क० कृष्णराजियों में गे गृह गे० दुकानों णो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ अ है भ० भगवन् क कृष्णराजियों में गा० ग्राम जा. यावत् स० सन्निवेश णो नहीं इ० यह अर्थ स०' समर्थ ॥ १८ ॥ अ० है भं भगवन् क. सूत्रा गोयमा ! अयणं. जंबुद्दीवे जाव अट्ठमासं वीईवएज्जा, अत्थगइए कण्हराई. वीई- वएना अत्थेगइए कण्हराई णो वीईवएज्जा, ए महालियाओ गोयमा ! कण्हराईओ पण्णताओ ॥ १७ ॥ अत्थिणं भंते ! कण्हराईसु गेहाइवा गेहवणाइवा ? - णोईणढे सवाय सम? ॥ आत्थणं भंते ! कण्हराईसु गामाइवा जाव साण्णवेसाइवा ? णोइणढेसमटे कितनी बडी कही हैं ? अहो गौतम! कोई देव तीन चप्पटिका में इस जम्बूद्वीप की आसपास इक्कीस वक्त परिभ्रमण करे ऐमी शीघ्र दीव्य देवगति से कृष्णराजि में आठ मास तक चले तब कितनीक कृष्णराजियों को अतिक्रमे और कितनीक कृष्णराजियों को अतिक्रमे नहीं. 'अहो गौतम. ! इतनी बडी कृष्णराजियों की हैं ॥१७॥ अहो भगवन् ! इन कृष्णराजियों में गृह, दुकानों, ग्राम यावत् सन्निवेश हैं ? अहो गौतम गृह यावत् मनिवेश नहीं हैं ॥ १८ !! अहो भगवन् ॥ अहो भगवन् ! कृष्णराजियों में क्या वडे २ मेय वगैरह हैं ? * प्रकाशक रानायहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * ८०७ सूत्र 8 पंचमाङ्ग विवाह. पण्णत्ति (भगवती) सूत्र शब्दार्थ/कृष्णराजियों में उ० वादर व० मेघ २० संस्खेद है. हाँ है तः उसे भ० भगवन् किं. देव गो. गौतम देव प० करते हैं नो० नहीं अ० अंसुर नो० नहीं ना० नाग अ० है भ० भगवन् क. कृष्णरा- जियों में व० बादर ५० गर्जना ज० जैसे उ० वडे त० तैसे ॥ १९ ॥ अ० है भ० भगवन् क० कृष्ण' राजियों में वा० बादर आ० अप्कार मा० बादर अ० अनिकाय, वा० बादर व० वनस्पतिकाय णो ॥१८॥ आत्थिणं भंते ! कण्हराईसु उरालावलाया संसेयंति ३ ? हंता आत्थि ॥ तं भंते ! किं देवो ३ ? गोयमा ! देवो पकरेइ नो असुरो नो नाओ। आत्थिणं भंते ! कण्हराईसु बादरे थाणयसदै २ ? जहा उराला तहा ॥१९॥ आत्थिणं भंते ! कण्ह- राईसु बायरे आउकाए बायरे अगणिकाए,बायरेवणप्फइकाए ?णोइणढे समढे॥णण्ण- भावार्थ हां गौतम ! वडे २ मेघ रहे हुचे हैं. अहो भगवन् ! उन्हे क्या देव करते हैं, असुर करते हैं या नाग करते हैं ? अहो गौतम ! उन मेपको देव बनाते हैं परंतु असुर व नाग नहीं बनाते हैं. अहो भगवन् कृष्णराजियों में क्या वादर गर्जना व वादर विद्युत् है ? हां गौतम ! उस में वादर गर्जना व पादर विद्युत है, और उन्हे देव बनाते हैं. परंतु असुर व नाग जाति के देव नहीं बनाते हैं. क्योंकि उन का वहां गमन नहीं है ॥ १९ ॥ अहो भगवन् ! क्या कृष्णराजियों में वादर अप्काय, अग्निकाय व वनस्पति HERO छा शतक का पांचवा उद्देशा gig ora शब्दार्थ नहीं इ० यह अर्थ सं० समर्थ ण नहीं अ० अन्यत्र वि० विग्रहगति स० समापन्न ॥ २० ॥ अ० है भं० भगवन् चं० चंद्र सू० मूर्य जो नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ अ है भ० भगवन् क. कृष्णराजियों में च० चंद्र की कान्ति नो० नहीं इ० यह अर्थ सयोग्य ॥ २१॥ क. कृष्णराजियों का भं० भगवन् के० कैसा व०पर्ण प० कहा का काला जा. यावत् खिशीघ्र वी० व्यतिक्रान्त होवे ॥२२॥ क कृष्णराजियों ८०८ अनुगदक-गलनमवारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी त्य विग्गहगइसमावण्णएणं ॥ २० ॥ आथिणं भंते ! चंदिम सूरिम ? णो इण?- समटे । आत्थिणं कण्हराइंसु चंदाभाइ २ वा ? णोइणटे सेमटे ॥ २१ ॥ कण्हरा- ईणं भंते ! केरिसियाओ वणेणं पण्णत्ताओ ?.गोयमा ! कालाओ जाव खिप्पामेव. बोईवएजा ॥ २२ ॥ - कण्हराईणं भंते ! कइनामधेजा पण्णत्ता ? गोयमा ! अट्ठ काय है? अहो गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है, परंतु विग्रहगतिवाले जीव क्वचित् उत्पन्न होते ॥ २० ॥ अहो भगवन् ! क्या वहां चंद्र सूर्य अथवा चंद्र सूर्य की कान्ति है ? यह अर्थ योग्य नीं है अर्थान् वहां नहीं है ॥ २१ ॥ अहो भगवन् ! कृष्णराजियों का वर्ण कैसा है ? अहो गौतम ! कृष्णरानियों का वर्ण काला, काली कान्तिवाला यावत् देवता भी उसे देखकर क्षुब्ध होते हैं और शी । उने उलंघ जाते हैं ॥ २२ ॥ अहो भगान् ! कृष्णराजियों के कितने नाम कहे हैं ? अहो गौतम मकाशंक-राजाद हादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वहाप्रसादजी * dhe ४९ 23-39 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र -9888- शब्दार्थ प०परभविक उ० उभय भविक ज्ञान दं दर्शन ए०ऐसे।।४।। इ०यह भभविक च० चारित्र प० परविक चारित्र उ० उयभावक चारित्र गो गौतम इ०यह भविक चारित्र णोनहीं प.परभविक चारित्र णो नहीं उ० उभयभविक चारित्रए. ऐसे त तपसंयम॥४२॥ अ० असंवृत अ० अनगार सि सिझे बुबुझे मु०मुक्त होवे प० एवि णाणे, तदुभयभविएवि णाणेय दसणंपि एवामेव ॥४१॥ इह भविए भंते चरित्ते, सुत्र परभविए भंते चरित्ते, तदुभय भविए चरित्ते ? गोयमा ! इह भविए चरित्ने, णो पर भविए चरित्ते, णो तदुभय भविए चरित्ते एवं तघे, संजमे ॥ ४२ ॥ असंबुडेणं भंते अणगारे सिज्झति, बुज्झति, मुच्चति, परिणिवाति, सन्यदुक्खाणमंतंकरेति ? गोयमा ! भावार्थ इस भविक ज्ञान होता है, परभषिक ज्ञान होता है, अथया दोनों मैकार का ज्ञान होता है ? अहो गौतम ! इस भविक, परभविक व तदुभयभविक ज्ञान होता है ऐसे ही दर्शनका जानना. ॥ ४१ ॥ अहो भगवन्! इस भवका चारित्र, परभवका चारित्र, व दोनों भवका चारित्रअहो गौतम! इस भव संबंधिही चारित्र है परंतु परभविक व उभय भविक चारित्र नहीं है ऐसेही तप व संयम का जानना.॥४२॥ अहो भगवन् असंवत आश्रद्धार को नहीं रुंधने वाला अणगार क्या सिझे, बुझे, कर्म से मुक्त होवे निर्वाणको प्राप्त होवे १ जो ज्ञान यहां पर शीखने में आया होवे और परभव में साथ न जावे, २ इस भवमे शीखने मे आया होवे और परंभवमें साथ जावे ३ इस भवमे शीखनेमें आया होवे वह परभव में व परतरभव में अनुवर्तेसो पहिला शतक का पहिला उद्देशा883 सूत्र ८.० .. भावाथा * मनुवादक-बालग्रागारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी. गौतम अ० अनेकवार अ० अथवा अ० अनंतवार नोक नहीं पा० वादर आ° अप्कायपने वा० वादर अग्निकायपने वा० बादर वायुकायपने ॥ २५ ॥ इ० इन अ० आठ क० कृष्णराजियों में अ० आठ उ० भांतरे में अ० आठ लो. लोकान्तिक वि० विमान प० कहे अ० अर्वी अ० अचिमाली ३० वैरोचन १० प्रभंकर चं० चद्राभ मू० सूर्याभ सु० शुक्राम सु० सुप्रतिष्ठाभ म० मध्य में रि० रिष्टाभ ॥ २३ ॥ क० कहां अ० अर्ची वि. विमान प० प्ररूपा गो० गौतम उ०ईशान में ए. ऐसे ही प०परिपाटी से ने० जानना क्खुत्तो नो चेवणं वायर आउकाइयत्ताए, बादर अगणिकाइयत्ताएवा, बादरवप्फइ काइयत्ताएवा ॥ २५ ॥ एयासिणं अट्ठण्हं कण्हराईणं अट्ठसु उवासंतरेसु अट्ठलोग- तिय विमाणा पण्णत्ता, तंजहा अच्ची, अच्चीमाली, वइरोयणे, पभंकरे, चंदाभे, सूराभे, सुकाभे, सुपइट्ठाभे, मझे रिट्ठाभे ॥ २६ ॥ कहिणं भंते ! अच्चिविमाणे . पण्णत्ते ? गोयमा ! उत्तरपुरच्छिमेणं ॥ कहिणं भंते ! अच्चिमाली विमाणे पण्णत्ते ? गोयमा! जीव व सत यया पहिले उत्पन्न हुए ? हां गौतम ! पहिले अनेक बार व अनंत वार उतान हुवे परंतु पादर अप्काय, आनिकाय व वनस्पति कायपने उत्पन्न नहीं हुवे हैं ॥ २५ ॥ इन आठ कृष्णरानियों के आठ आंतरे कहे हैं. उन आठ आंतरे में लोकान्तिक देव के आठ विमान कहे हैं:-अर्ची, अर्ची- माली, वैरोचन, प्रभंकर, चंद्राभ, मूर्याभ, शुक्राभ, सुप्रतिष्ठाभ और मध्य में रिष्टाभ ।। २६ ॥ अहो भगवन् ! प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालामसादजी * शब्दार्थ aka 00 सत्र 2-88 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र - के क० कितने ना० नाम गो० गौतम अ० आठ क. कृष्णराजी मे मेघराजी म० मा मा० माघवती वा० वातफलिह वा वातपरिक्षोभ दे देवफलिह दे० देवपरिक्षोभ ॥ २३ ।। क० कृष्णराजियों का भं० भगवन् कि क्या पु० पृथ्वी परिणाम आ० अप् जी० जीव पो० पुद्गल परिणाम गो० गौतम पु० पृथ्वी परिणाम नो नहीं आ० अप् परिणाम जी० जीव परिणाम पो. पुद्गल परिणाम ॥ २४ ॥ क. कृष्ण राजी में भ० भगवन् स० सव पा० प्राण भू० भूत जी0 जीव स सत्व उ० उत्पन्न पु० पूर्व हं० हा गो० नामधेजा पण्णत्ता तंजहा कण्हराईइवा, मेहराईइवा, मघाइवा, माघवईइवा, वायफालहा इवा, वायफलिक्खोभाइवा, देवफलिहाइचा, देवफलिक्खोभाइवा ॥२३॥ कण्हराईओणं. भंते ! किं पुढवि परिणामाओ, आउ जीव पोग्गल परिणामाओ? गोयमा ! पुढवि परिणा- माओवि, नो आउपरिणामाओ जीव परिणामाओवि, पोग्गलपरिणामाओवि॥२४॥कण्हरा- ईसुणं भंते! सब्वे पाणा भया जीवा सत्ता उवषण्ण पुव्वा? हंता गोयमा! असई अदुवाअणंत- कृष्णराजियों के आठ नाम कहे हैं ? कृष्णराजि, मेघरानि, मघा, माघवती, वातफलिह, वातपरिक्षोभ, देवफलिह, देवपरिक्षोभ ॥ २३ ॥ अहो भगवन् ! क्या कृष्णराजियों पृथ्वी परिणामवाली है, या अप जीव व पुद्गल परिणामवाली हैं ? अहो भगवन् ! कृष्णराजियों पृथ्वी परिणामवाली हैं वैसेही जीव व पुद्गल परिणामवाली हैं परंतु अप् परिणामवाली नहीं हैं ॥ २४ ॥ अहो भगवन् ! कृष्णरानि में सब प्राण भूत, 389 छठा शतक का पांचवा उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ ८१२ सूत्र 1. अनुवादक-यालग्रह्मचारी मनि श्री अमोलक ऋपिनी 827 वि० विमान में प० रहते हैं क० कहां आ. अदित्य देव प० रहते हैं अ० अर्चिमाली विमान में एक ऐसे ने० जानना ज० यथानुपूर्षि जा. यावत् क० कहां भ० भगवन् रि० रिष्टदेव १० रहते हैं गोर गौतम रि. रिष्ट विमान में ॥ २१ ॥ सा० सारस्वत आ० आदित्य को भ० भगवन् दे देवों को क० कितने देव क० कितने दे० देवशत प० कई गो०.गौतम स० सात दे० देव स० सात देवशत प० परिवार व० यन्हि व० वरुण दे देवों को चो० चौदह दे० देव चो० चौदहदेवमहस्र ग• गर्दतोय तु तुपित को स. गोयमा ! आचिंमि विमाणे परिवसंति ॥ कहिणं आइच्चा देवा परिवसति ? गोयमा ! अधिमालिंमि विमाणे, एवं नेयव्वं जहाणुपुबीए जाव कहिणं भंते ! रिट्ठा.देवा परि- वसंति ? गोयमा ! रिटुंमि विमाणे ॥ २९ ॥ सारस्सय माइचाणं भंते ! देवाणं कइदेवा कइदेवसया पण्णत्ता ? गोयमा सत्तदेवा सत्तदेवसया परिवारो पण्णत्ता ॥ वहिवरुणाणं चोदसदेवा चोदसदेव सहस्सा पण्णत्ता ॥ गद्दतोय तुसियाणं देवाणं सत्तदेवा सत्तदेवसहस्सा ५० ॥ अवसेसाणं नवदेवा, नवदेवसया पण्णत्ता । पढम में बन्दि, प्रभंकर में वरुण, चंद्राभ में गर्दतोय, सूर्याभ में तुपित, शुक्राम में अव्यावाध, सुप्रतिष्ठाभ में अगिच्च, और रिष्टाभ में रिष्ट नामक लोकान्तिक देव रहते हैं ॥ २९ ॥ सारस्वत आदित्य इन दोनों देवों को सात देव आधिपति हैं और एक २ को एकसो २ का परिवार रहा हुवा है इस से सातसो देव का परिवार * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * गर्थ ८११ 8- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 988 -गब्दार्थ क० कहां भं० भगवन् रि० रिष्ट विमान प० कहा गो० गौतम व० बहुतं मध्य के दे० देशमें ॥ २७ ॥ ए. इन अ० आठ लो० लोकान्तिक वि० विमान में अ० आठ लो० लोकान्तिक दे० देव प. रहने हैं सा सारस्वत आ० आदित्य ववन्हि ब० नरुण गगर्दतोय त० तुपित अ० अव्यावाच अ०अगिन रि० रिष्ट ॥ २८ ॥ क० कहां भ० भगवन् सा० सारस्वत दे० देव प० रहते हैं गो० गौतम अ० अर्चि सूत्र पुरच्छिमेणं एवं परिवाडीए नेयव्वं जाव काहणं भंते ! रिट्ठविमाणे पण्णत्ते ? गोयमा ! बहुमज्झ देसभागे॥ २७ ॥ एएसुणं अट्ठसु लोगंतिय विमाणेसु अट्ठविहा लोगतिया देवा परिवसंति तंजहा-सारस्सय माइच्चा, वण्ही वरुणाय गहतोयाय ॥ तुसिया अव्यावाहा अग्गिच्चा चेव रिट्ठाय ॥ १ ॥ २८ ॥ कहिणं भंते ! सारस्सया देवा परिवसंति ? 8893 छठा शतकका पांचया उद्देशा 988 भावार्थ अर्थी विमान कहां कहा है ? अहो गौतम ! अझै विमान ईशान कौन में कहा है. अर्चीमाली पूर्व में, वैरोचन अग्निकौन में, प्रभंकर दक्षिण में, चंद्राभ नैऋखकौन में, सूर्याभ पश्चिम में, शुक्राम वायव्य में,सुमति-800 ग्राम उत्तर में और मध्य में रिष्ठाभ ॥ २७ ॥ इन आठ लोकान्तिक विमान में आठ प्रकार के लोका- ईन्तिक देव रहते हैं. १ .सारस्वत, २ आदित्य ३ वन्हि ४ . वरुण, ५ गर्दतोय ६ तुपित ७ अव्यावाधof आगच और ९ रिष्ठ ॥ २८ ॥ अर्ची विमान में सारस्वत देव रहते हैं, अचिमाली में आदित्य, वैरोचन 6 Oyo ८१.४ + अनुवादक याला प्रचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनीर शब्दार्थ अ. 'अनंतवार - नो० नहीं दे० देवपने लो. लोकान्तिक वि० विमान में लो० लोकान्तिक ॥ ३१॥ लो० लोकान्तिक दे देवों की भ० भगवन् के० कितनी ठि० स्थिति ५० प्ररूपी गो. गौतम अ० आठ सागरोपम की ठिक स्थिति प० प्ररूपी ॥३२॥ लो० लोकान्तिक वि. विमानों से भ० भगवन् के० कितना अ० अव्यावाध से लो० लोकान्त १० प्ररूपा गो० गौतम अ. असंख्यात जो० योजन स० सहस्र अ० अव्यावाध से लो० लोकान्त ५० प्ररूपा से० वैसे ही भ० भगवन्। अदुवा अणंतक्खुत्तो नो चेवणं देवत्ताए लोगंतिय विमाणेमु लोगतिया . ॥ ३१ ॥ सुत्र लोंगतिय देवाणं भंते. ! केवइयं कालंठिई. पण्णत्ता ? .गोयमा. !.अट्ठसागरोवमाई ठिई पण्णत्ता, ॥ ३२ ॥ लोगतिय विमाणेहितो णं भते ! केवइयं अबाहाए लोगते पण्णचे ? गोयमा ! असंखजाइं जोयण सहस्साइं,. अबाहाए लोगते पण्णत्ते सेवं योजन का तला कहा है, यावत् लोकान्तिक विमान में पृथ्वीकायादिपने अनेक बार व. अनंत बार उत्पन्न हुए परंतु लौकान्तिक देवपने नहीं उत्पन्न हुए ॥ ३१ ॥ अहो भगवन् ! लोकान्तिक देवों की कितनी स्थिति कही ? अहो गौतम ! लोकान्तिक देवों की आठ सागगेपम की स्थिति कही ॥ ३२ ॥ अहो भगवन् ! लोकान्तिक विमानों से कितना दूर लोकान्त रहा है.? अहो गौतम ! अव्याबाध पने असं- स्पात योजन दूर लोकान्त रहा हुवा है. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह छठा शतक का *-प्रकाशक-रानावहादुर लाला सुखदेवसहायनीज्वालाप्रसादजी * गा - नाथ ७ ८१३ सूत्र 4.33 पंचांग विवाह पण्णनि (भगश्ती) मूत्र 8888 सातदेव सा० मातदेव सहस्र अ० शेप न० नवदेव न० नवदेवशत ५० प्रथम जु० दो में स० सात प. सो वी० दूसरे में चो० चौदह स० सहस्र त. तीसरे में स० सात स० सहस्र न० नव स० सो से. शेष में ॥ ३० ॥ लो० लोकान्तिक भं भगवन् वि० विमान कि० क्या प० प्रतिष्ठित एक ऐसे ही ने० जानना वि. विमानों का प० आधार वा० जाडाइ उ• ऊंचाइ सं. संठाण वं० ब्रह्मलोक की व. वक्तव्यता ज० जैसे जी० जीवाभिगम में दे० देव उ० उद्देशे में जा. यावत् है. हां अ० अनेकवार अ० अथवा जुगलंमि सत्तओ सयाणि, बीयम्मि चोद्दससहस्सा, ॥ तइए सत्तसहस्सा, नवचव सयाणि सेसेसु ॥ १ ॥ ३० ॥ लोगंतिय विमाणाणं भंते ! किंपइट्ठिया पण्णत्ता ? गोयमा ! वाउपइट्ठिया । एवं नेयव्वं विमाणाणं पट्ठाणं बाहुल्लुच्चत्तमेव संठाणं, बंभ. लोय वत्तव्वया नेयव्वा, जहा जीवाभिगम देवुद्देसए जाव ? हंता गोयमा असई चन्हि वरुण को चौदह देव हैं, एक को एक २ हजार का परिवार होने से चौदह हजार देव का परिवार रहा हुवा है. गर्दतोय और तुपित को सात देव और सात हजार देव का परिवार, अव्यायाध, आगि-300 च व रिष्ट को नव देव नवप्तों देवों का परिवार है ॥ ३० ॥ अहो भगवन् ! लोकान्तिक विमान किस आधार से रहे हुवे हैं ? अहो गौतम ! लोकान्तिक विमान वायु प्रतिष्टित हैं. लोकान्तिक विमान अत्यु- त्तम श्रेष्ठ हैं विमान में रक्त, पीत व शुक्ल ऐसे तीन वर्ण हैं सात सो योजन के ऊंचे कहे हैं, पचीस सो. g-2 छठा शतक का पंचवा उद्देशा HAPA भावार्थ 69 Y OYO P.
शब्दार्थ 13 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी ना. यावत् क० कितने भं• भगवन् अ० अनुत्तर विमान प० कहे गो गौतम पं० पांच अ० अनुत्तर विमान ५० कहे तं० वह ज० यथा वि. विजय जा० यावत् स० सर्वार्थसिद्ध ॥ १॥ जी० जीव भं० भगवन् मा० मारणान्तिक स० समुद्घात से स० मरकर जे० जो भ०' योग्य इ० इस.र० रत्नप्रभा पु० पृथ्वी में तीतीस नि० नरकावास में स० लक्ष अ० अन्यतर नि० नरकावास में नेनारकीपने उ. उत्पन्न होने को से० अथ भ० भगवन् त• वहां आ० आहारकरे ५० परिणमा स० शरीर वं. वांधे गो० पण्णता? गोयमा! पंच अणुत्तर विमाणा पण्णत्ता,तंजहा विजए जाव सन्वट्ठसिद्धे॥१॥ जीवेणं भंते ! मारणंतिय समुग्घाएणं समोहए समोहणित्ता जे भावए इमीसे रयणप्पभाए पुढवाए तीसाए निरयावास सयसहस्सेमु अन्नयरंस निरयावाससि नेर- इयत्ताए उववाजित्तए, सेणं भंते ! तत्थगए चेव आहारेजवा परिणामेजवा सरीरंवा बंधेजा ? गोयमा ! अत्थेगइए तत्थगएचेव आहारेजवा परिणामेजवा सरीरंवा विमान की पृच्छा करते हैं. अहो भगवन् ! अनुत्तर विमान कितने कहे हैं ? अहोः गौतम ! अनुत्तर वि- मान पान कहे हैं उन के नाम १ विजय २ वैजयंत ३ जयंत ४ अपराजिता ५ सर्वार्थ सिद्ध ॥१॥ भगवन ! मारगान्ता समुद्धातसे मरकरके जो जीव इस रत्नप्रभा पृथ्वी के तास लाख नरकावामे में किसी नरकावास में नारकीपने उत्पन्न होने योग्य होवे, वह जीव क्या वहां गया हुवा वहां के पुद्गलों का * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालामसादजी * दार्थ NA सत्र 2038- पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 3382 3 छठा शतकका छठा उद्देशा - 98 छ० छठा स०.शतक का प..पांचवा उ० उद्देशा स० समाप्त ॥ ॥ ५ ॥ क० कितनी भ० भगदम्, पु० पृथ्वी ५० प्ररूपी.गो० गौतम स० सात पु० पृथ्वीयों प. मरूपी त० वह ज० यथा र रत्नप्रभा जा० यावत् त० तमतमप्रभा २० रत्नप्रभा के आ० आवास भा० कहना / ८१८ जा. यावत् अ नीचे स० सातवी ए. ऐसे जे० जो० ज० जितने आ० आषाप्त ते वे भा० कहना भते भंतेत्ति ॥ छट्ठसए पंचमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ६ ॥ ५ ॥ कइणं भते ! पुढवीओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! सत्त पुढवीओ पण्णत्ताओ, तंज- हा-रयणप्पभा जाव तमतमा, रयणप्पभादीणं आवासा भाणियव्वा जाव अहे सत्त- माए एवं जे जत्तिया आवासा ते भाणियव्या जाव कइणं भेते ! अणुत्तर विमाणा पांचवा उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥६॥७॥ + पांचवे उद्देशे में विमानादिकों की वक्तव्यता कही, और इस में भी इप्त का आधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! 'पृथी कितनी कहीं ? अहो गौतम ! पृथ्वी सात कही. उन के नाम १. रत्नप्रभा २ शर्कर प्रभा-३ वालु मभा ४ पंकममा ५ धूम्रप्रभा द तमप्रभा और ७ तमतपप्रभा,रत्न प्रभा में ३० लाख आवास, शर- प्रशश में २५ लाख, वालुप्रभा में १५ लाख, पंकमभा में १० लाख, धूम्रमभा में तीन लाख, तमप्रभा में पांच कर्मएक लाख, और तमतमप्रभा में मात्र पांच आवास कहे हैं. ऐसेही अनुत्तर विधान तक जानना. अनुत्तर भामाथ yo शब्दा ८१८ सूत्र 1. अनुवादक-बालग्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी मारणान्तिक से स० मरकर जे० जो भ० योग्य च० चौसठ अ० असुरकुमार वास स० लक्ष अ० अन्यतर अ अमुरकुमार वास में अ० असुरकुमार पने उ० उत्पन्न होने को ज. जैसे ने नारकी त० तैसे भा० कहना जा० यावत् थ० स्यनित कुमार ॥ ३ ॥ जी० जीव भ० भगवन् मा० मारणान्तिक स० करके जे० जो भ० योग्य अ० असंख्यात पु० पृथ्वी कायिक वा० वर्ष स० लक्ष अ० अन्यतर पु० पृथ्वीकायिक घा वाम में पु० पृथ्वीकायपने उ० उत्पन्न होने को. से० · अथ. मैं भगवन् मं० मेरु ५० पर्वत पुढवी ॥ २ ॥ जीवेणं भंते ! मारणंतियसमुग्धाएंणं समोहए: जे. भविए. चउसट्ठीए असुरकुमारावाससयसहस्सेसु . अण्णयरांस. असुरंकुमारावाससि असुरकुमारत्ताए उववजित्तए जहा नेरइया तहा भाणियव्वा जाव थणियकुमारा ॥ ३ ॥ जीवेणं. भंते ! मारणतिय समुग्घाएणं समोहए २ जे भविए. असंखजेसु पुढविकाइया वास सयसहस्सेसु अन्नयरंसि पुढविकाइयावासंसि पुढवि काइयत्ताए उववाजत्तए सेणं " और शरीर यांचते हैं, ऐसे ही सातवी पृथ्वीतक का जानना ॥ २॥ असुरकुमार यावत् स्थानित कुमार में उत्पन्न होकर आहार करने का, रस परिणमाने का व शरीर बांधने का नारकी जैसे कहना ॥ ३ ॥ अहों भगवन् ! मारणान्तिक समुदात से मरकर जो जीव पृथ्वीकायिक के असंख्यात स्थान में से किसी स्थान उत्पन्न होने योग्य होता है यह मेरू पर्वत की पूर्व दिशा में कितना दूर जाता है और किस स्थान प्राप्त * मकााक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालामसादजी * माथा 0 0७ ८१७ सूत्र 898- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 888 गौतम अ० किननेक तक वहां रहे हुवे आ० आहारकरे प. परिणमा स: शरीर बांधे अ० कितनेक त० वहां से प० पीछा फीरकर इ० यहां आ० आवे आ० आकर दो० दूसरीवार मा० मारणान्तिक स० समुद्रात स० करे स० करके इ० इस र रत्नप्रभा पु०पृथ्वीके ती०तीस नि० नरकावास म०लक्ष अ० अन्य ने नारकीपने उ० उत्पन्न होने को तः उस प० पीछे आ० आहारकरे ५० परिणमार स० शरीर ३० वांधे ए. ऐसे जा० यावत् अ० नीचे स० सातवी पु० पृथ्वी ॥ २ ॥ जी० जीव भ० भगवन् मा० बंधेजा, अत्थेगइए तत्थपडिनियत्तइ तओ पडिनियतित्ता इह मागच्छइ मागच्छइत्ता दोच्चपि मारणंतिय समुग्घाएणं समोहणइ समोहणइत्ता इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए तीसाए निरयावास सय सहस्सेसु अण्णयरंसि निरयावाससि णेरइयत्ताए उववजित्तए। तओ पच्छा आहारेजवा परिणामेजवा सरीरं वा बंधेजा, एवं जाव अहे सत्तमा आहार करता है, उन को खल रसपने परिणमाता है व शरीर उत्पन्न करता है ? अहो गौतम कितनेक जीव वहां रहे हुवे आहार करते हैं, उसे खल रसपने परिणमाते हैं, व शरीर बांधते हैं. और कितनेक जीव उस नरकावास से अथवा मारणान्तिक समुद्धात से पीछे फीरते हैं और जहां अपने शरीर वहां आते हैं. आकर दूसरी वक्त मारणान्तिक समुद्रात से मरकर इस रत्नप्रभा पृथ्वी के तीस लाख नरकावासे में से किसी नरकावास में उत्पन्न होते हैं, फीर आहार करते हैं, खल रसपने परिणमाते 88-8982 छहा शतकका छठा उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ स. लेश्या सहित ज. जैसे ओ० औधिक कि कृष्णलेश्या नीनीललेश्या काकापुत लेश्या ज. जैसे ओ. औषिक जीव ण विशेष प० प्रमत्त अ० अप्रमत्त भा० कहना ते• तेजो लेश्या प० पद्मलेश्या सु० शुक्ल लेश्या ज. जैसे ओ० औधिक जीव ण. विशेष सि. सिद्ध णा० नहीं भा० कहना ॥४०॥ इ० यह भ० भविक भ० भगवन णा ज्ञान प० परभविक ज्ञान उ० उभय भविक गो गौतम इ० यह भ० भविक ज्ञान ४८ सूत्र 4 अनुवादक-वालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी ॥ ३९ ॥ सलेस्सा जहा ओहिया किण्हलेसस्स नीललेसस्स, काउलेसरस, जहा ओहिया जीवा । णवरं पमत्त अपमत्ताण भाणियव्वा । तेउलेसस्स पम्हलेसरस सुक- लेसरस जहा ओहिया जीवा । णवरं सिद्धा ण भाणियया ॥ ४० ॥ इह भविए भंते णाणे, परभविए णाणे, तदुभय भवि एणाणे ? गोयमा ! इह भविए वि णाणे, परभवि- * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * वार्थ लेश्या का प्रश्नकहते हैं. अहो भगवन् ! सलेशी जीव आरंभी हैं? अहो गौतम जैसे समुच्चय जीव का कहा. वैसा कहना.कृष्ण, नील व कापोत लेश्यावालेको समस्त जीव जेसे कहना परंतु इसमें प्रमत्त व अप्रमत्तका कथन करना नहीं तेजु, पद्म, व शुक्ल लेश्या वाले औधिक जीव (सब जीवो जैसे कहना यहां पर सिद्ध को कहना नहीं क्योंकि सिद्ध अलेशी हैं ॥ ४० ॥ अब आरंभ का हेतुभूत ज्ञानका स्वरूप बताते हैं. अहो भगवन् 50 UYO ८१ सूत्र 898 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति (भगवती ) सूत्र 982- ब्दार्थ की पु० पूर्व में के० कितना ग. जावे के कहाँ पा० प्राप्त होवे गो० गौतम लो० लोकान्त में ग. जाये लो. लोकान्त में पा० प्राप्त होवे अ० अंगुल का अ० असंख्यात भा. भागमात्र सं० संख्यात भा० भागमात्र वा वालाग्र वा० प्रत्येक वालाग्र ए० ऐसे लि० लीख जू० यूका ज. यव अं० अंगूल जा. यावत् जो मंते ! मंदरस्स पव्वयरस पुरच्छिमेणं केवइयं गच्छेजा केवइयं पाउणेजा ? गोयमा ! लोयतं गच्छज्जा लोयंत पाउणेजा ॥ सेणं भंते ! तत्थगए चेव आहारेजवा परिणामेजवा सरीरंवा बंधेजा ? गोयमा ! अत्थेगइए तत्थगएचेव आहारेजवा परिणामेजवा सरीरंवा बंधेजा, अत्थेगइए तओ पडिनियत्तइ २ त्ता इह मागच्छइ मागच्छइत्ता दोच्चपि मारणतिय समुग्धाएणं समोहणइ मदरस्स पन्वयस्स पुराच्छिमेणं अंगुलस्स असंखजभागमेत्तंवा, संखेजइ भागमेत्तंवा बालग्गंवा भावार्थ होता है ? अहो गौतम ! वह जीव मारणान्तिक समुद्धात करके लोकान्ततक जाता है और लोकान्त तक स्थिर होता है. अहो भगवन् ! क्या वे जीव वहां ही आहार करते हैं, परिणमाते हैं व शरीर वांधते हैं ? अहो गौतम ! कितनेक वहां ही आहार करते हैं, परिणमाते हैं व शरीर बांधते हैं और कितनेक वहां से पीछे अपने शरीर में आते हैं, और पुनः मारणान्तिक समुद्धात से मरकर मेरु पर्वत की पूर्व में अंगुल के असंख्यात भागमात्र, संख्यात भागमात्र, वालाग्र, प्रत्येक बालाग्र, ऐसेही लिख, 980- छठा शतकका छठा उद्देशा 988 GA9 00 यूका, शादा सूत्र 2 अनुवाद कलियमचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीनी योजन कोड जो० योजन क्रोडा क्रोड सं० संख्यात अ० असंख्यात जो० योजन सहस्र में लो० लो- कान्त में ए० एक प्रदेशात्मक से० श्रेणीको मो०अवगाहकर अ० असंख्यात पु० पृथ्वी कायिक वा वास स० लक्ष अ० अन्यतर पु० पृथ्वी काया के वा० वास में पु० पृथ्वी कायापने उ० उत्पन्न होवे त० उस बालग्गपुहत्तंबा, एवं लिक्ख,जूयं, जव, अंगुल, जाव जोयणकोडिंवा जोयण कोडा कोडिंबा, संखेजेसुवा असंखेजेसुवा, जोयणसहस्सेसु लोगंतेवा एगपदेसियं सेटिं मोत्तूण असंखेजेसु पुढविकाइया वास सयसहस्सेसु अण्णयरंसि पुढवि काइया- वासंसि पुढविकाइयत्ताए उववजेत्ता तओ पच्छा आहारेजवा परिणामेजवा सरीरंवा वधेजा, जहा पुरच्छिमेणं मंदरस्स पव्वयस्स आलावओ भणिओ, एवं दाहिणणं पचस्थिमेणं, उत्तरेणं उड्डे अहे जहा पुढविकाइया तहा एगिदियाणं सव्येसिं एक- पर, अंगूल यावत् कोडाकोड योजन, संख्यात, असंख्यात योजन सहस्र व लोकान्त तक जाकर अंगुल के अमरूपातवे भाग जितने क्षेत्र में एक प्रदेशात्मक श्रेणी को अवगाह करके पृथ्वीकाय के असंख्यात सहस्त्र वाम में से किमी वास में उत्पन्न हुए पीछे आहार करते हैं, खलरसपने परिणमाते हैं व शरीर बांधते हैं. पपि असंख्यात आकाश प्रदेश अवगाहन स्वभाववाला जीव है तथापि एक प्रदेश की श्रेणीवर्ती असंख्यात प्रदेश की अवगाहना में भी जाने का स्वभाव होने से एक प्रदेश श्रेणी अवगाह कर जाने का कहा. * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्यालाप्रसादनी भावाधा 5 दार्थ ८२१ सूत्र 888 पंचगंग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र -33901 शरीर वं. बांधे ज जैसे पु० पूर्व में म. मेरु पपर्वत का आ० पीछे आं० आहारकर ५० पारणमा u. आलापक भ० कहा ए० ऐसे दा० दक्षिण का १० पश्चिम का उ० उत्तर का उ ऊर्य अ० अधो ज. जैसे पु० पृथ्वीकायिक त० तैसे ए० एकेन्द्रिय स० सर ए. एक का छ० छ आ० आलापक भा० कहना कास्स छ आलानया भाणियव्वा ॥ ४ ॥ जीवेणं भंते ! मारणतिय समुग्धाएणं समोहए २ जे भविए असंखेजेसु बेइंदियावास सय सहस्सेसु अण्णयरंसि वेइंदिया वासंसि बेइंदियत्ताए उववजित्तए, सेणं भंते ! तत्थगएचव जहा नेरइया एवं जाव . अणुत्तरोववाइया ॥ जीवेणं भंते ! मारणंतिय समुग्धाएणं समोहए २ जेभविए पंच अणुत्तरेसु महइ महालएसु महाविमाणेसु अण्णयरंसि अणुत्तरविमाणसि अणुत्तरोववाइय देवत्ताए उववाजित्तए सेणं भते! तत्थगए चेव जाव आहारेजवा परिणामेजवा सरीरंवा बंधेजा जैसे पूर्व दिशा का कहा वैसे ही दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, ऊर्ध्व व अधो का जानना. पृथ्वीकाय के छ आ- लापक जैते अप्, तेउ, वायु, व वनस्पति का जानना ॥ ४ ॥ तीन विकलेन्द्रिय, तिर्यंच पंचेन्द्रिय, मनुष्य, बाणव्यंतर ज्योतिपी, व वैमानिक का नारकी जैसे जानना. अहो भगवन! जीव मारणान्तिक समुद्धात करके जो पांच अनुत्तर विमान में उत्पन्न होने योग्य होता है वह वहां उत्पन्न होकर क्या आहार करते हैं, खल- रसपने परिणमाते हैं व शरीर बांधते हैं ? अहो गौतम ! कितनेक जीव वहां आहार ग्रहण करते 200 छठा शतक का छठा उद्देशा - . भावाथ! 9 0/9 ८२२ सत्र भनुवादक-यालयमचारीमुनि श्री अमोलक पिजी शब्दार्थ । ॥ १ ॥ पूर्ववत् से० वैसे ही मैं भगवन् छ० छठा स० शतक में छ० छठा उ० उद्देशा ॥ ६ ॥ ६॥ अ० अथ भं० भगवन् सा० शाल वी० बीहि गो० गेहुँ ज० यव ज० जवार ए० इन ध० धान्य को को कोठे में गुप्त प० वांस के टोपले में गुप्त मं• तृण के माले में उ० उपलिप्त लिलिप्त पिढका हुवा मु० मुदिन हुआ लं० लक्षित किया की के कितना काल जो०. योनि सं० रहती है गो गौतम ज० जयन्य अं० अंत मुंहून उ० उत्कृष्ट ति० तीन सं० सवत्सर ते० उस पीछे जो योनि प० म्लान होवे ते. उस सेवं भंते भतेत्ति पुढवि उद्देसओ सम्मत्तो ॥ छट्ठसए छट्ठो उद्देसो सम्मत्तो ॥६॥६॥ अह भंते ! सालीणं, वीहीणं, गोधूमाण, जवाणं, जवजवाणं, एएसिणं धण्णाणं कोटाउत्ताणं, पल्लाउत्ताणं, मंचाउत्ताणं, मालाउत्ताण, उलित्ताणं, लित्ताणं, पिहियाणं मुदियाणं, लंछियाणं केवइयं कालं जोणी सचिट्ठइ ? गोयमा ! जहण्णं अतोमुहुत्तं । * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * वाथा ब सल रस पने परिणमाते हैं व शरीर बांधते हैं और कितनेक वहां से पीछे स्वशरीर में आकर दूसरी वक्त मारणा निक समुदात करके वहां उत्पन्न होते हैं और फीर आहागादि करते हैं. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह छठा शतक का छठा उद्देशा पूर्ण हुदा ॥ ६ ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! शाल, श्रीहि, गेहूं, यव व जवार इन धान्य को कोठा, पाला, मांचा, व माले में रखकर शब्दार्थ Fra 20 EAS ८२३ सुत्र 8- पंचमग विवाह पण्णत्ति (भगाती) मूत्र - ago छठा शतक का सातवां उद्देशा पीछे जो० योनि वि० विध्वंम होवे ते० उस पीछे वी० बीज अं० अबीज भ० होवे ते. उस पीछे जो० योनि का बी० विच्छेदपना प० प्ररूपा स० श्रमण ॥१॥ अ० अथ भ० भगवन् क० चने म० मार तिfo तिल मु० मूंग मा० उडद नि० वाल कु. कुलथी आ. चरले सं० तुवर प० काले चने इ०इन ध० धान्या को ज० जैसें सा० शाली का त० तैसे ए. ऐसे न विशेष पं० पांच सं० संवत्सर से० शेप तं. वैसे उक्कोस तिणि संवच्छराई, तेणपरं जोणी पमिलायइ तेण परं जोणी विद्धंसइ, तेणं परं बीए अबीए भवइ, तेणं परं जोणी वोच्छेदे पन्नत्ते समणाउसो! ॥ १ ॥ अह भंते ! कलाव, मसूर, तिल, मुग्ग, मास, निप्फाव, कुलत्थ, आलिसंदग, संताणं पलिमंथगाईणं, एएसिणं धण्णाणं जहा सालीणं तहा एयाणिवि णवर पंच संव- च्छराई सेसं तंचेव ॥ २ ॥ अह भंते ! अयास कुसंभग, कोदव, कगु, वरग,रालग, चारों तरफ से लीपे, अच्छी तरह ढके, मुद्रित करे, व रेखादिक के लक्षण करे तब उस की योनि कितने काल तक रहती है, ? अहो गौतम ! जघन्य अंतर्मुहूर्त उत्कृष्ट तीन वर्ष तक रहे. फीर योनि म्लान होती है, विध्वंस होती है और वीज अवीज होजाता है, और योनि का विच्छेद होजाता है। ॥१॥ अहो भगवन् ! चने, मसुर तिल, मुंग, उडद, वाल, कुलथी, चवले, तुवर व कालेचने इन धान्यों को कोठे आदि में भरकर अच्छी तरह से लीपे यावत् मुद्रित करे तब कितना काल तक रहे ? भावार्थ लस अडडांगका एक ८२६ 1 अनुवादक-बालमनचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दार्थ भ० अहोरात्रि १० पक्ष दो० दो ५० पक्ष मा० मास दो दो मास उ० ऋतु ति. तीन उ० ऋतु अ० अयन दो० अयन सं० सवत्सर पं० पांच स०संवत्सर जुः युग वी० वीसयुग वा०वर्षशत द दश वा० वर्ष शत वा० वर्ष.सहस्र स० सो वा० वर्प सहस्र का वा० वर्ष लक्ष च० चौरासी व० वर्पलक्ष ए० एक पु० पूर्वांगचचौरासी पु०पूर्वाग लक्ष ए०एक पु०पूर्व ए ऐसे तु तृटित अ०अडड अअपप हूयउ उत्पल प०पद्म वाससंयं, दसवाससयाई वाससहस्सं, सयं वाससहस्साणं वाससयसहस्सं, चउ- रासीई वास सयसहस्साणि से एगे पुज्वंगे, चउरासीति पुच्वंग सय सहस्साइं सेएगे- पुब्बे; एवं तुडिए २, अडडे २, अपपे २, हूहुए २, उप्पले २, पउमे २, नलिणे २ भाग वर्ष, चौरासी लक्ष वर्ष का एक पूर्वांग, चौरासी लक्ष पूर्वागका एक पूर्व, चौरासी लांख पूर्व का एक तृटितांग अडड, नौरासी लक्ष अडडका अपपांग, चौरासी लक्ष अपपांग का एक अपप, चौरासी लक्ष अपप का एक हहूनांग, चौरासी लक्ष हुहूतांग का एक हूहूत, चौरासी लक्ष दूंहून का एक उत्पलांग, चौरासी लक्ष उत्प- लांग का एक उत्पल, चौरासी लक्ष उत्पल का एक पद्यांग, चौरासी लक्ष, पद्मांग का एक पद्म, चौरासी लक्ष पत्र का एक नलिणांग, चौरासी लक्ष नलिणांग का एक नलिण, चौरासी लक्ष नलिन का एक अ- चिनिउरांग, चौरासी लक्ष अच्छिनिउरांग का एक अच्छिनिउर, चौरासी लक्ष अच्छिनिउर का एक * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी जालापसादजी * ८२७ सत्र 883 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8380 982-83 छहा.शतकका सातवा उद्देशा 988- शब्दार्थ न नलिन अ० अच्छिणिऊर अ० अडय ए० एडय न० नउय चू चूलिका सी० शीर्षप्रहेलिका ए० .यह अ० गणित का वि० विपय ते० उस पीछे उ. उपमा ॥ ४ से० अथ कि क्या उ० उपमा दु० दोमकार/yo 0७की प० पल्योपम सा० सागरोपम से से. अथ किं० क्या प० पल्योपम स. शस्त्र से ति० तीक्ष्ण छ । छेदने को भे० भेदने को जै० जिसे न० नहीं कि० खरेखर स० शक्य तं० उसे प० परमाणु सि० केवली 4. कहते हैं आ० आदि ५० प्रमाण का अ० अनंत ५० परमाणु पुद्गलों के स० समुदायं का स० आच्छणिऊरे २, अडए २, एडए २, नउएय २, चूलिय २, सीसपहेलिय २, एयावयावगणियस्स विसए, तेणंपरं उवमिए ॥ ४ ॥ से किं तं उवमिए दुविहे पण्णत्ते, तंजहा--पलिओवमेय, सागरोवमेय ॥ से किं तं पलिओवमे ? सत्थेणं सु- तिक्खेणवि छेत्तुं भेत्तुं च ज न किरसक्का ॥ तं परमाणुं सिद्धा, वयंति आई पमाणाणं ॥ १ ॥ अणताणं परमाणुपोग्गलाणं समुदय समिति समागमेणं साएगा उसण्ह णि- भावार्थ अडयांग ऐसे ही चौरासी लक्ष गुने करते अश्य, एडयांग, एडय, नउयांग. नउय, चूलियांग, चूलिय, सीसपहेलियांग, सीसपहेलिय. वहांतक गणित का विषय है, इस से आगे मात्र उपमा है ॥ ४ ॥ उपमा दो प्रकार की पल्योपम व सागरोपम. उस में से पल्योपम की उपमा बतलाते हैं. तीक्ष्ण शस्त्रसे भी जो भेदावे नहीं, छेदात्रे नहीं उस परमाणुको केवली भगवन्त आदि प्रमाण कहते हैं. अर्थात् प्रमाणों की आदि परमाणु से है. OO ८२८ सूत्र - अनुवादक-चालन गरी मुनि श्री अमोलक ऋर्पनी शब्दार मीलने के स• समागम से सा० वह ए० एक उ० ओसन्न सनिय स० शीत सन्निया उ० अर्वरेणु त. असरेणु र० रथरेणु वा० बालाग्र लि० लीख जू० यूका ज. यवमध्य अं० अंगूल अ० आठ ३० ओसन्न सन्निया का ए. एक म० शीतसनिया अं० आठ शीतसन्निया का ए. एक उ० ऊर्वरेणु दे० देवकुम उ० उत्तरकुरु के म° मनुष्यों का या. वालाग्र ए. ऐसे ह० हरिवास २० रम्यक हे हेमक्य याइवा, सण्हसाव्हियाइवा उढरेणूइवा, तसरेणूइवा, रहरेणूइया, बालग्गाइवा, लिक्खा इवा, जूयाइवा, जवमझेइवा, अंगुलेइवा, अट्ठ उसण्हसहियाओ साएगा सण्हसहिया अट्ठसण्हसण्हयाओ सा एगा उद्रेणू,अट्ट उड्डरेणूओ सा एगा तसरेणू अट्ठतसरेणूओसाएगा रहरेणू, अट्टरहरेणूओं से एगे देवकुरु उत्तरकुरुगाणं मसाणं बालगो,एवं हरिवासरम्मग, মায়া। पर परमाणु सूक्ष्म शस्त्र से भी भेदा नहीं जाता है. ऐसे अनंत परमाणुओं का एक उसनसनिया होता ३, आठ उमन सन्निया का एक शीतसेणीया होवे, आठ शीतसेणीयाका का एक ऊधरेणु, पाठ उधरण का एक त्रसरेणु (पूर्वादिवायु से प्रेरित) आठ त्रसरेणु का एक स्थरेणु, आठ स्थरेण का देवकुछ उत्तरकुरु क्षेत्रोत्पन्न मनुप्य का एक वाला, देवकुरु उत्तरकुरुक्षेत्र के मनुष्य के आठ बालाग्र निनना एक हरिवर्प रम्यवर्प मनुप्य का वालाग्र, इरिवर्प' रम्यकवर्प मनुष्य के आठ वालाग्र जितना हेमाय एरणवय मनुष्य का एक वालाग्र, हेमवय एरणवय मनुष्य के आठ वालाग्र जितना पूर्व-पश्चिम प्रकाशक-सनावहादुर लाला मुखदेवसहायनी जालाप्रसादजी शब्दार्थ ८२९- <PRIT पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र , ए. एरणक्य पु० पूर्व. विदेह अ०.पश्चिम विदेह म० मनुष्यों के अ० आठ वा वालाग्र ए. एक लि. लीख अ० आठ लि. लीख की ए० एक जू० यूका अ० आठ जू० यूका का ए० एक ज. यवमध्य अ० आठ ज. यवमध्य का ए• एक अं० अंगूल प्रमाण इ० इन अ० अंगुल प्रमाण से छ० छ अंगूल का पा० पांव या बारह अं० अंगूल की वि० त च० चौवीस अं० अंगूल की र० हाथ अ०अडतालीस अं० अंगूल की कु० कुक्षि छ० छन्नु अं० अंगुल के ए० एक दं० दंड धः धनुष्य जु० धोसरं ना० हेमवएरन्नवयाणं, पुन्वविदेहाणं मणूसाणं अट्ठ बालग्गा सा एगा लिक्खा, अट्ट लिक्खाओ सा एगा जूया, अट्ठजूयाओ साएगा जवमझे अट्ठ जवमझाओ से एगे अंगुले एएणं अंगुलप्पमाणेणं, छअंगुलाणि पादो, बारस अंगुलाई विहत्थी, चउवीस अंगुलाई रयणी अडयालीसं अंगुलाई कुच्छी, छण्णउइ अंगुलाणि से एगे दंडेइवा धणूइवा जुएइका नालियाइवा, अक्खेइवा, मुसलेइवा एएणं धणुप्पमाणेणं दो धणुसहस्साई गाउयं, महाविदेह क्षेत्र के मनुष्य का चालान, पूर्वपश्चिम महाविदेह क्षेत्र के मनुष्य के आठ वालाग्र जितनी एक लिख, आठलिख जितनी एक यू का, आठ यूका जितना एक यवमध्य, आठ यवमध्य जितना एक अंगूल, छ अंगूल का एक पांव, बारह अंगूल की एकवेत, चौवीस अंगृल का एक हाथ, अडतालीस अंगुल : की एक कुच्छी ! कुक्षि ] छिन्नु अंगुलके धनुष्य, दंड, गाडी का धूसरा, लाष्टि, गाडे के चक्र का आरा Posgo छला शतक का सातवा उद्देशा Regi भावार्थ चारिका • अक्ष मु: मूल ३० इन पधनुष्य प्रमाण से दोमो पसभार मामा In गाउका जो योनन एऐसा मो. योगन ममाण से गोपाला गोर गोगन का और जो ये जन उ उ. जैना उसे तिगुने स० विश ५० पनि ६. दोदित केले. नामदिन के उ. उस सात १० पये का कर्ण tul रे गाउयाई जायणं, एएणं जोयणप्पमाणेणे, पहजोगणे आगाम Ani. भेणं जोयणं उड्डें उपरोणं ते तिउर्ण रागिरोरो परिरएणे, रोण एगादिम जाहिए 4 उकास सत्रत्तप्परूढाणं संम? रानियेए भरिए पालामोडी allism अग्गी डहेजा, नो वाऊ हरेजा, नो कुमजा, नो परिवारोजा, गोfilk होते हैं. इस धनुष्य प्रमाण से दो हमार मनुष्य का गाय, 'गार गrit It im योजन प्रमाण से एक योजन का सम्मा, पौरा, सीगुनी रो विशेष परिविवाठा, और का उंडा ऐमा एक पाला में देवकुरु उपशकुन क्षेत्र का दिन, यो दिन गापन, पान दिन गोपा युगलिपे के वचों का चालान के अलियान द करो भरे. और 'miritirit कि जिम में उन चालानों को अग्नि जला सके नही, माग 'उदा misीडेमkh Maint, first होवे नहीं, दुर्गध उत्पन्न होवे न फीर उस पापो सोपा पार पाया जा अनुवादक ५१ ११ पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती सूत्र 880% शब्दार्थ! 4. १करे आ० आयुष्य क० कर्म सि. कदाचित् व० वांधे सि कदाचित् नो० नहीं पं० वांधे अ० असाता वे. वेदनीय क• कर्म को भु. वारंवार उ० इकटाकरे अ० अनादी अ० अनंत दी० दीर्यकाल चा: चातुरंत सं० संसार कतार में अ० परिभ्रमणकरे से० उसको ते• इसलिये गो० गौतम अ० अ. संवृत अ० अनगार णो० नहीं सि. सिझे ॥ ४३ ॥ सं० संवृत अ० अनगार सि० सिझे हं० हा सिय बंधइ सिय नो बंधइ, असाया वेयणिजं च णं कम्मं भुजो भुजो उवचिणइ, अणाइयं च णं अणवदगां दीहमद्धं चाउरत संसार कंतारं अणुपरियति । से तेणटेणं गोयमा ! असंबुडे अणगारे णो सिज्झइ ॥ १३ ॥ संवुडेणं भंते अणगारे सिज्झइ ? हंता सिज्झइ जाव अंतं करेइ ॥ सेकेणटेणं भंते एवं बुच्चइ ? गोयमा ! संवुडेणं भावार्थ कर्मों को दीर्घ काल की स्थितिपाले वनाता है मैद रस देनेवाले कर्मों को तोबास देनेवाला करता है, अ- रूप प्रदेशात्मक कर्मों को बहुत प्रदेशात्मक कर्म करता है. आयुष्य कर्म का वध किति समय करता है किसि- समय नहीं करता है, असाता वेदनीय कर्म पुनःपुनः संचित करता है, और अनादि अनंत संसार कतार में परिभ्रमण करता है। इसलिये अहो गौतम ! असंवृत अनगार सिझे नहीं, यावत् संसार का अंतकरे नही. ॥ ४३ ॥ अहो भगवन्! आश्रवद्वार का रंधन करनेवाला संवृत अणगार क्या सिझे यावत् अंतकरे ? हाई गौतम ! संवृत अणगार सिझे यावत अंत करे भगवन : किस कारन से संवृत्त अणगार सिझे यावत् अंत POSपहिला शतकका पहिला उद्देशा 845 शामार्थ सूत्र र भनुपादक बालअपचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिनी क्रोड १० होवे द. दशगुने तं० वह सा. सागरोपम का ए० एक भ० होवे प० परिमाण ए० इन साः सागरोपम का १० प्रमाण से १० चार सा. सागरोपम क्रोडा क्रोड का का० काल सु. मुपम सुपमा ति. नीन सा० सागरोपम को० कोडा कोडी का काल सु. सुपम दो दो सागरोपम को० क्रोहा कोड काल मु० सुपम दुपम ए० एक सा० सागरोपम को क्रोढा कोड में वा० वीयालीस वा० वर्ष सहस उ० कम का काल दु दुपम सुपमा ए० इक्कीस वा० वर्ष सहस्र का काल दु० दुपम ए० इक्कीस वार वर्ष रोवमकोडाकोडीओ कालो सुसमदुसमा, एगा सागरोवमकोडाकोडीओ बायालीसए वाससहस्सहिं जाणिया कालो दुसम सुसमा, एकवीसं वाससहस्साई कालो दुसमा, एकवीसं वाससहस्साई कालो दुसमदुसमा, पुणरबि उस्तप्पिणीए एकवीसं वास सहस्साई कालो इंसमदुसमा, एकवीसं वास सहस्साई कालो दुसमा नाव चत्तारि होता है, एक कोडाकोड सागरोपम में वीयालीस हजार वर्ष कम का चौथा दुपम सुपम, इक्कीस हजार वर्ष का दुपम और इक्कीस हजार वर्ष का दुपम दुपम नामक छठा आरा होता ऐसे ही उत्सर्पिणी काल के छ आरे इक्कीस इनार वर्ष का दुपमादुपम, इक्कीस हजार वर्ष का दूसरा दुषम, वीयालीस हजार नपं कम एक क्रोडाकोड मागरोपम का दुपम सुपम नामक तीसरा, दो क्रोडाक्रोड सागरोपम का मरस दुपन. तीन क्रोडाक्रोड सागरोपम का सुषम और चार क्रोडाक्रोड सागरोपम का सुषममुपम. इस * प्रकाशक राजायहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावाथ शब्दा ८३१ सूत्र 28 पंचभाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - हुवा स० खंड से भरा हुवा भ० भरा हुवा वा वालाग्र को क्रोड ते. उन वा० वालाग्र को नो. नहीं अ० अग्नि ड० जलावे नो० नहीं वा० वायु अ० लेजावे नो० नहीं कु० खण्ड होवे नो० नहीं १० विध्वंस 0 होवे नो० नहीं पू० पूतिभाव को हं. शीघ्र आ० आवे त० पीछे वा० वर्षशत ए० एक २ वा० बालाग्र अ० लेकर के जा० जितने का० काल में से वह प० पाला खी० क्षीण नी० रज रहित निः निर्मल नि. निष्ठित, अ० अपहृत वि. विशुद्ध भ० होवे से० वह प० पल्योपम ए० इन ५० पल्यकी को क्रोडा हव्वमागच्छेज्जा; तओणं वाससए२ एगमेगं बालग्गं अवहाय जावइएणं कालेणं सेपल्ले खीणे नीरये निम्मले निट्ठिए, निल्लेवे, अवहडे, विसुद्धे भवइ, से तं पलि- ओवमे गाहा-एएसिणं पल्लाण कोडाकोडी हवेज दसगुणिया ॥ तं सागरोवमरस,एकस्स भवे परीमाणं ॥१॥ एएणं सागरोवमपमाणेणं चत्तारिसागरोवमकोडाकोडीओ कालो सुसमसुसमा ॥ तिाण सागरोवमकोडाकोडीओ कालो सुसमा, दो साग- सो वर्ष में एक २ वालाग्र नीकालते जितने समय में वह पाला संपूर्ण खाली, रज रहित, निर्मल, निलेप होजाता है उतने कालको एक पल्योपम कहते हैं. ऐसे दश क्रोडाफोड पल्योपम का एक सागरोपम होता है, ऐसे चार क्रोडाक्रोड सागरोपम का एक सुपमासुषम आरा होता है, तीन ऋोडाक्रोड सागरो- पम का सुषम नामक दूसरा आरा होता है, सुषमदुषम नामक दो कोडाकोड सागरोपम का तीसरा आरा 3 छठ्ठा शतकका सातवा उद्देशा 8 শৰাথ शब्दाथा ८३ सूत्र अनुवादक-पालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी - से अब ज०. जैसे अ० मादल ए. ऐसे उ० उत्तरकुरु व वक्तव्यता ने० जानना जा० यावत् आ० आस्वादे ती• उस स० समय भा० भरत वर्ष में त० वहां २ दे० देशविभाग में क. बहुत उ० उदार को कोद्रव जा० यावत् कु० कुश विकुश वि० विशुद्ध रू० वृक्षमूल जा. यावत् छ० उपकार के म० मनुष्य अ० अनुसक्तवंत तं० वह ज० यथा प० पद्मगंधवाले मि० मृगगंध वाले अ० अममत्वी ते० तेजस्वी स. समर्थ स० शनैः चलने वाले से वैसे भ० भगवन् छ० छठा स० शतक का स० सातवा जहानामए आलिंगपुक्खरेइवा, एवं उत्तरकुरुवत्तव्वया नेयव्या जाव आसयंति, सयांते ॥ तीसेणं समाए भारहेवासे तत्थ २ देसे २ तहिं बहवे उद्दाला कोदाला जाव कुसविकुसविसुद्धरुक्खमूला जाव छव्विहा मणुस्सा अणुसाजिझत्था तंजहा- पम्हगंधा, मियगंधा, अममा, तेयली, सहा, सणिचारी सेवं भंते भंतेत्ति ॥ छट्ठसए वैसे ही भरतक्षेत्र का भूमिभाग था. उस स्थान में अनेक प्रकार के शाल क्रोद्रव के वृक्ष थे. उन के मूल कूश विकुशादि रहित थे और मूल स्कंध, शाखा, प्रतिशाखा, पत्र, पुष्प व फलादि से अत्यंत सुशोभित थे. उस में छ प्रकार के मनुष्य उत्पन्न हुवे. पद्म कमल जैसी गंधवाले, मृगमद जैसी गंधवाले, ममकार रहित, तेजस्वी, समर्थ और मैदचालबाले. इमं आरे का शेष वर्णन देवकुरु उत्तरकुरु जैसे जानना और अन्य आरों का विवरण जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति से जानना. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं. यह प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी भागाथा 0 Q. ८३ 389 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र <> शब्दाथ सहस्र का. काल दु. दुपम दुपम पु० पुनरपि उ. उत्सर्पिणी का द० दश सा. सागरी पम को० क्रोडा कोड का का० काल उ• उत्सर्पिणी वी० बीस सा. सगारोपम को० क्रोडा कोड Toyo का. काल ओ० अवसर्पिणी उ० उत्सर्पिणी ॥ ५ ॥ जं० जम्बूद्वीप में भं० भगवन् दी० द्वीप में इ० इस ओ• अवप्तपिणी में मु० सुपम सुपम स० समय में उ० उत्तमता ५० प्राप्त म० भरत वा० वर्ष के कैला आ० आकार भाव प० प्रत्यवतार हो० था गो• गौतम ० बहुत स० सममणीय भू० भूमिभाग हो या सागरोवम कोडाकोडीओ कालो सुसमसुसमा; दस सागरोवम कोडाकोडीओ का. लो ओसप्पिणी, दस सागरोवम कोडाकोडीओ कालो उस्सप्पिणी, वीसं सागरो- वम कोडाकोडीओ कालोओसप्पिणीय उस्सप्पिणीय ॥ ५ ॥ जंबूहीवेणं भंते ! दीवे इमीसे उसप्पिणीए सुसमसुसमाए समाए उत्तिमट्ठपत्ताए भरहस्स वासरसके. रिसए आगारभावपडोयारे होत्था ? गोयमा बहुसमरमणिजे भूमिभागे होत्था, से तरह दश क्रोडाक्रोड मागरोपम की अवसर्पिणी, दश क्रोडाकोड सागरोपम की उत्सर्पिणी. वीस कोडा- भावार्थ क्रोड. सागरोपम का एक काल चक्र. यह पल्य व सागर की उपमा का प्रमाण जानना ॥ ५ ॥ अहो भग वन् ! इस जम्बूद्वीप में प्रथम सुपमसुपम नामक समय में उत्कृष्ट आयुप्यादि माप्त होते भरतक्षेत्र का कैमा आकार भाव प्रत्यवतार था ? अहो गौतम ! जैसे मादल के उपर का चर्म बहुत. सम होता 9 छा शतक का सातवा,उद्देशा -- bya शब्दार्थ ८३ , अनुवादक-बालग्रामनारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी भगवन् इ० इस र० रत्नप्रभा पु० पृथ्वी की अ० नीचे गा गृह स० सन्निवेश नो नहीं इ० यह अ. अर्थ म० समर्थ ॥ ३ ॥ अ० है मैं भगवन् इ० इस २० रत्नप्रभा पु. पृथ्वी की अ० नीचे उ० उदार २० बाल सं० स्नेह उत्पन्न होवे. स० पुद्गल होवे वा० वर्षा वा० वर्षे ६० हां अ० है ति तीनों प० करे दे. देव प० करे अ० असुर ना. नाग कुमार ॥ ४॥ अ हैं भ० भगवन् इ० इस र० रत्नप्रभा पु० पृथ्वीकी अनीचे वा वादर थ स्थनित शब्द है ० हां अ०है ति०तीनों प० करे ॥ ५ ॥ अ० है भं० भगवन् इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए अहे गामाइवा, जाव सण्णिवेसाइवा ? नो. इणटे समढे ॥ ३ ॥ अस्थिणं भंते ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए अहे · उराला बलाहया संसेयंति समुच्छंति, वासं वासंति ? हंता अस्थि तिण्णिवि पकरेंति देवावि पकरेइ असुरोवि, नागोवि, ॥ ४ ॥ अत्थिणं. भते ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए बादरे थणियसद्दे ? हंता अत्थि तिष्णिवि पकरेंति ॥ ५ ॥ अत्थिणं भते ! इमीसे रयण- सन्निवेश क्या हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी की नीचे बडे बद्दल उत्पन्न होते हैं व वर्पा वर्षात हैं ? हां गौतम अहो भगवन् ! वहां क्या देव, भमुर व नाग वपाते हैं ? हां गौतम! तीनों वर्षा वर्षाते हैं ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! इस रत्नममा पृथ्वी नीचे क्या चादर स्थनित शब्द है ? हां गौतम ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी नीचे चादर स्थनित शब्द है और उसे असुर, नाग य देव ऐसे तीनों जातिवाले करते हैं ॥ ५॥ अहो भागवन् ! क्या इस रत्नप्रभा पृथ्वी * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी चालाप्रसादनी * भावाथ शब्दार्थ ज० उद्देशा स. समाप्त ॥६॥ ७॥ क० कितनी भ० भगवन् पु० पृथ्वी प० प्ररूपी गो० गौतम अ० आठ पु० पृथ्वीयों प० कहीं र० रत्न प्रभा जा० यावत् ई० ईपत् प्रागभार ॥ १॥ अ० है ० भगवन् इ० इस २० रत्नप्रभा पु० पृथ्वी की अ० नीचे गे० गृह गे० दुकानों गो. गौतम णो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ ॥ २ ॥ अ० है भ० ८३१ सूत्र * x - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 888 सत्तमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ६ ॥ ७ ॥ कइणं भंते पुढवीओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! अट्ठ पुढवीओ पण्णत्ताओ, तंजहा- रयणप्पभा जाव ईसिप्पभारा ॥ १ ॥ अत्थिणं भंते ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए अहे गेहाइवा, गेहावणाइवा ? गोयमा ! णोइणढे समटे ॥ २ ॥ अत्थिणं भंते ! 83 छठा शतकका आठवा उद्देशा 8R><88037 भावार्थ x छठा शतक का सातवा उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥ ६ ॥ ७॥ मातवे उद्देशे में भरतक्षेप का वर्णन कहा. आठवे उद्देशे में पृथ्वी का वर्णन करते हैं. अहो भगवन् ! पृथ्वी कितनी कही ? अहो गौतम ! आठ पृथ्वीयों कही. रत्लमभा, शर्करमभा यावत् तमतमाममा व ईपत्मारभार ॥ १॥ अहो भगवन् ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी की नीचे क्या गृह व दुकानों हैं ? अहो गौतम ! यह. अर्थ योग्य नहीं है ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी की नीचे ग्राम यावत् ।
शरदाय सूत्र 1 अनुवादक-बालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 50 अ० असुर ५० करे नोक नहीं ना० नाग १० करे च० चौथी में ण विशेप दे० देव ए. एक प. करे नो. नहीं . असुर नो. नहीं ना. नाग ए०.ऐसे हे नीचे दे० देव ए. एक प० करे ॥१॥ त० तमस्काय कर कल्प प पांच अ० अग्नि पु. पृथ्वी अ० अग्नि पु० पृथ्वी में आ० अप्काय ते तेउ २० एवि भाणियव्यं, णवरं देवोवि पकरेइ, असुरोवि पकरेइ नो नाओ पकरेइ ॥. चउ- रथीएविणावरं देवो एक्को पकरेइ, नो असुरो नो नाओ. एवं हेथिल्लासु देवो एकोपकरेइ ॥९॥ अथणं भंते ! सोहम्मीसाणेणं कप्पाणं अहे गेहाइवा, गेहावणाइवा ? नो इणढे समढे। अत्थिणं भंते ! उराला बलाया ? हंता अत्थि; देवो पकरेइ, असुरोविपकरेइ नो नाओ ॥ एवं थणियसदेवि । अत्थिणं भते ! बादरे पुढविकाए बादरे अगणिकाए ? करते हैं परंतु नाग नहीं करते हैं. चौथी, पांचवी, छठी, सातवी में मात्र देव करते हैं ॥९॥ अहो भगवन् ! क्या सौधर्म ईशान देवलोक की नीचे गृह व दुकानों हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! क्या सौधर्म ईशान देवलोक नीचे बडे मेघ होते हैं व वर्षा वर्षाते हैं ? अहो गौतम ! वहां मेघ होते हैं व वर्षा वर्पती है. उम मेघ को देव व असुर करते हैं परंतु नाग नहीं करते है. क्योंकि नाग का उन देवलोके नीचे गमन नहीं है. वैसे ही चादर स्थनित शब्द भी देव व असुर करते हैं. सौधर्म ईशान देवलोक की नीचे क्या बादर पृथ्वीकाय व बादर अग्निकाय है ? अहो गौतम ! प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी * | सूत्र 83 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 287- इ० इस र० रत्नप्रभा पु० पृथ्वी में वा० चादर अ० अग्निकाय गो० गौतम नो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ ण नहीं अ० अन्यत्र वि. विग्रहगति स० मास ॥ ६ ॥ अ है भंभगवन् इ. इस र. रत्नप्रभा पु. पृथी में चं चंद्रमा जा० यावत् ता तारारूप नो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ ॥5॥ अ. मं० भगवन् इ० इस र. रत्नप्रभा में च. चंद्रकाति नो नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ ॥ ८॥ ए. ऐसे दो० दूसरी पु० पृथ्वी में भा० कहना ए ऐमे त० तीसरी में भा० कहना ण विशेप दे० देव ५० करे प्पभाए पुढवीए बादरे अगणिकाए ? गोयमा ! णो इणढे सम8 णण्णत्थ विग्गह गइसमावण्णएणं ॥ ६ ॥ अत्थिणं भंते ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए चदिम जाव तारारूवा ? नो इणढे समढे ॥ ७ ॥ अस्थिणं भंते ! इमीसे रयणप्पभाए चंदाभाइवा २ ? णो इणटे समट्टे ॥८॥ एवं दोचाए पुढवीए भाणियव्यं ॥ एवं तच्चा: में क्या वादर अग्निकाय है ? अहो गौतम ! वहां वादर निकाय नहीं है. परंतु काचित् विग्रहगतिवाले वादर अग्निकाय के जीव वहां जाते हैं ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! क्या इस रत्नप्रभा पृथ्वी में चंद्र, . सूर्य यावत् तारे रहे हुवे हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है ॥ ७ ॥ क्या इस रत्नप्रभा पृथ्वी चंद्र सूर्य की कान्ति है ? अहो गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है ॥ ८ ॥ जैसे पहिली पृथ्वी का कहा वैसे ही दूसरी व तीसरी का जानना. परंतु दूमरी व तीसरी में देव व असुर हो मेघ व स्थनित शब्द छठा शतक का आठवा उदेशा'><AYEE भावार्थ ८३८ अनुवादक-बालमनचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्य अ० असुर १० करे नो० नहीं ना० नाग १० करे च० चौथी में ण. विशेप दे० देव ए. एक प. करे नो० नहीं अं• अमुर नो० नहीं ना नाग एक ऐसे हे नीचे दे० देव ए. एक प० करे ॥ १ ॥ त० तमस्काय के कल्प प पांच अ० अग्नि पु. पृथ्वी अ० अग्नि पु० पृथी में आ० अप्काय ते. तेउ २० एवि भाणियव्यं, णवरं देवोवि पकरेइ, असुरोवि पकरेइ नो नाओ पकरेइ ॥. चउ- त्थीएविणावरं देवो एक्को पकरेइ,नो असुरो नो नाओ एवं हेथिल्लासु देवो एक्कोपकरेइ ॥९॥ सूत्र अस्थिणं भंते ! सोहम्मीसाणेणं कप्पाणं अहे. गेहाइवा, गेहावणाइवा ? नो इणढे समटे । अस्थिणं भंते ! उराला बलाहया ? हंता अत्थि; देवो पकरेइ, असुरोविपकरेइ नो नाओ ॥ एवं थणियसदेवि । अत्थिणं भते ! बादरे पुढविकाए बादरे अगणिकाए? करते हैं परंतु नाग नहीं करते हैं. चौथी, पांचवी, छठी, सातवी में मात्र देव करते हैं ॥९॥ अहो भगवन् ! क्या सौधर्म ईशान देवलोक की नीचे गृह व दुकानों हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य भाराध नहीं है. अहो भगवन् ! क्या सौधर्भ ईशान देवलोक नीचे बडे मेघ होते हैं व वर्षा वर्षाते हैं ? अहो गौतम ! वहाँ मेय होते हैं व वर्षा वर्षती हैं. उम मेघ को देव व असुर करते हैं परंतु नाग नहीं करते है. क्योंकि नाग का उन देवलोंके नीचे गमन नहीं है. वैसे ही चादर स्थनित शब्द भी देव व असुर करते हैं. मौधर्म ईशान देवलोक की नीचे क्या वादर पृथ्वीकाय व बादर अनिकाय है ? अहो गौतम ! प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी शब्दार्थ सन ८३९ वनस्पति क० कल्प उ० उपरके क. कृष्णराजी में ॥ १० ॥क० कितने प्रकार का भ० भगवन आ. णो इणटे सम, णण्णत्थ विग्गहगइ समावण्णएणं । अत्थिणं भंते ! चंदिम जाव तारारूवा ? गायमा ! णो इण? समटे । अस्थिणं भंते ! गामाइवा जाव सन्निवे. साइवा ? गोयमा ! णो इ8 समटे ॥ अस्थिणं भंते ! चंदा भाइबा ? गोषमा ! नो इणढे समटे एवं सणंकुमारमाहिंदेसु णवरं देवो एगो पकरेइ ॥ एवं बभ- लोएरावे एवं बंभलोगस्स उवारे सव्वहिं देवो पकरेइ पुच्छियव्वोय, बापरे आउकाए, बायर अगणिकाए, बायरे वणस्सइकाए, अण्णं तं चेव गाहा-तमुकाय कप्पपणए, वहां वादर पृथ्वीकाय व वादर अनिकाय नहीं है परंतु विग्रहगति आश्री वहां जीव मालते हैं. अहो भगवन् ! क्या वहां चंद्र यावत् तार रहे हुवे है ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! क्या वहां ग्राम यावत् संनिवेश हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! क्या सौधर्म ईशान देवलोक में चंद्रकी कान्ति व सूर्य की कान्ति है ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. जैसे सौधर्म ईशान का कहा वैसे ही सनत्कुमार माहेंद्र का जानना. इस में मात्र देवही उपर जासकते हैं। परंतु असुर व नाग नहीं जासकते हैं, इसलिये मात्र देवही पानी की दृष्टि व शब्द करते हैं. इसी प्रकार ब्रह्म देवलोक से अच्युत देवलोकनक का जानना. वारद देवलोक में मात्र देव ही हैं उपर के देवों वक्रय नहीं करते हैं इसलिये वहां वैसा शब्द व मेघ नहीं है, पांचवा ब्रह्म देवलोक से उपर के सब विमानों 42. पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 888 87-8 छठा शतक का आठवा उद्देशा. भावार्थ ५० सुन * अनुवादक बालब्रह्मगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 शब्दार्थ निर्वाणपामे १० सर्व दुःख का अं० अंत करे गो गौतम णो० नहीं इ० यह अर्थ स. समर्थ से वह के कैसे भ० भगवन् जा० यावत् अंत न नहीं का करे गो० गौतम अ० असंवृत अनगार आ० आयुष्य १० वर्मकर स० सात कर्म प्रकृति सि० शिथिल चं० बंधन ब० बंधिहुइ को ध० निकाचित वै० बंधनसे २० पद प० करे हस्विकाल की ठि० स्थिति को दी. दीर्घकाल की ठि० स्थिति प० करे मंई मंद अनुभाग को ति० तीव्र अनुभाग प० करे अ० अल्प प्रदेश को ५० बहुत प्रदेश प. गोइणटे समढे ॥ से केणटेणं भंते जाव अंतं न करेति ? गोयमा ! असंवुडे अण- गारे आउय वजाओ सत्तकम्म पगडीओ सिदिलबंधणबढाओ धणिय बंधण बद्धाओ पकरेइ; हस्सकालद्वितीयाओ दीहकालट्ठितीयाओ पकरेइ; मंदाणुभावाओ तिन्वाणुभावाओ पकरेइ, अप्प पदेसगाओ बहुपदेसगाओ पकरेइ, आउयंचणं कम्म भावार्थ च सब दुःखों का अंत करे ! अहो गौतम ! यह अर्थ समय नहीं है अर्थात् ऐसा नहीं होता है. पुनः गौतम स्वामी प्रश्न करते हैं कि अहो भगवन् ! किस कारणसे असंत अणगार सिझे नहीं, बुझे नहीं यावत् । सय दुःख का अंतकरे नहीं? अहो गौतम ! असंवृत अणगार आयुष्यं कर्म छोडकर अन्य मात कर्म की भकृतियों का शिथिल बंधन हुवा होवे तो उन का निकाचित बंध करता है, इस कालकी स्थिति वाले १ आयुष्य कर्मका बंध भव आश्रित एकही वक्तहोताहै. * प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेवसहायनी वालाप्रसादजी.* 000 " २.9 thye सून 8 पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती ) सूत्र 3888- निघत आ आयुष्यबंध ॥ ११ ॥ पूर्ववत् ॥ ११-१२ ॥ ल० लवण स० समुद्र कि क्या उ० ऊंचापानी ओगाहणा नामनिहत्ताउए, पएसनामनिहत्ताउए, अणुभागनामनिहत्ताउए, दंडओ जाव वैमाणियाणं ॥ ११ ॥ जीवेणं भंते ! किं जाइनामनिहत्ता जाव अनुभाग नामनिहत्ता ? गोयमा ! जाइ नामनिहत्तावि जाव अणुभागनामनिहत्तावि, दंडओ जाव बेमाणियाणं । जीवाणं भंते ! कि जाइनाम निहत्ताउया जाव अणुभागनाम निहत्ताउया ? गोयमा ! . जाइनामनिहत्ताउयावि जाव अणुभागनामनिहत्ता- एक भव में रहने का काल का बंध सो स्थितिनामनिधत आयुष्य बंध ४ औदारिकादि शरीर प्रमाण का बंध सो अवगाहना नाम निधत आयुष्य वंध ५ आयुष्य कर्म के तथाविध प्रणित जो प्रदेश का बंध सो प्रदेश नाम निधत्त आयुष्य बंध, और ६ आयुष्य द्रव्य का विपाक सो अनुभाग नाम निधत्त आयुष्य बंध. यह छप्रकार का आयुर्वध चौवीस ही दंडक में पाता है. ॥ ११ ॥ अहो भगवन् ! एक जीवने एके- न्द्रियादि जातिका बंध किया उसे जाति नाम निधत क्या कहना ? अहो गौतम ! जितने जातिनाम का बंध किया उसे जातिनामनिधत कहना. जाति नामाभिधा जैसे गति, स्थिति, अवगाहना, प्रदेश व अनुभाग के छ दंडक जानना. अहो भगवन् ! अनेक जीवोंने जिस प्रकार एकेन्द्रियादि जाति नाम का वध किया उसे क्या जाति नाम निधन आयत्य कान ? अहो गौतम! अनेक जीवाने जाते भावार्थ P> छठा शतकका आठवा उद्देशा CO ८४० 2 अनुसादक-बालग्राह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी + शब्दार्थ आयुष्य बंध प० प्ररूपा गो गौतम छ० छ प्रकार का आ० आयुष्यबंध जा० जातिनाम निधत्त आ० आयुष्यबंध म०. गतिनाम निघत्त आ० आयुष्यबंध ठि० स्थितिनाम निघत आ० आयुष्यबंध ओ० अवगाहन नाम निधत्त आ० आयुप्यबंध प० प्रदेश नाम निघत आ० आप्ययुवंध अ० अनुभाग नाम 'अगंणी पुढवीय अगणि पुढवीसु ॥ आउतेउ वणस्सइ, कप्पुवरंमि कण्हराईसु सून ॥ १० ॥ कइविहेण भते ! आउयबंधे पण्णत्ते ? गोयमा ! छविहे आउयबंधे पण्णते, तंजहा--जाइनाम निहत्ताउए, मतिनाम. निहत्ताउए, ठिइनाम निहत्ताउए भावार्थ में वादर अप्काय, बादर अनिकाय व वादर वनस्पतिकाय नहीं हैं यह विशेषता है. नवग्रेवेयक से ईपत् मागभार पृथ्वीतक वर्णनं नहीं लिया है, परंतु इस का निपेध जानना.. तमस्काय वैसेही सौधर्मादि पांच देवलोक में अग्निकाय व पृथ्वीकाय का प्रश्न, सातों पृथ्वीयों में आग्निकाय का प्रश्न और उपर के देवलोक में अप्काय, तेउकाय व वनस्पतिकाय का प्रश्न कहा है: ।। १.० ॥ पृथिव्यादि जीव आयुष्य - सहित होते है इसलिये आयुप्य का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् - आयुप्य का बंध कितने प्रकार का कहा ? अहो गौतम ! आयुष्य का बंध छ प्रकार का कहा है. एकेन्द्रियादि पांच प्रकार के जातिरूप. नामकर्म. की उत्तर प्रकृति विशेष अथवा जीव परिणामकी साथ प्रतिसमय कर्म पुद्गलका अनुभव के लिये. जो आयुष्य वांधनेमें आवे मो नानि नाम निघत आयुष्य २ नरकादिगति का आयुष्यबंध करे सो गति नाम निधत्त, आयुष्य. ३ * मका शक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी.* ८४१ CARRA पंचमांग बबाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 988 ब्दार्थ निघत आ आयुष्यबंध ॥ ११ ॥ पूर्ववत् ॥ ११-१२ ।। ल० लवण स. समुद्र कि क्या उ० ऊँचापानी ओगाहणा नामनिहत्ताउए, पएसनामनिहत्ताउए, अणुभागनामनिहत्ताउए, दंडओ जाव वेमाणियाणं ॥ ११॥ जीवेणं भंते ! किं जाइनामनिहत्ता जाव अनुभाग नामनिहत्ता ? गोयमा ! जाइ नामनिहत्तावि जाव अणुभागनामनिहत्तावि, दंडओ जाव वेमाणियाणं । जीवाणं भंते ! किं जाइनाम निहत्ताउया जाव अणुभागनाम निहत्ताउया ? गोयमा ! जाइनामनिहत्ताउयावि जाव अणुभागनामनिहत्ता- भावार्थ एक भव में रहने का काल का बंध सो स्थितिनामनिधश आयुष्य बंध ? औदारिकादि शरीर प्रमाण का बंध सो अवगाहना नाम निधत्त आयुष्य बंध ५ आयुष्य कर्म के तथाविध प्रणित जो प्रदेश का बंध सो प्रदेश नाम निधत्त आयुष्य बंध, और ६ आयुप्य द्रव्य का विपाक सो अनुभाग नाम निधत्त आयुष्य बंध. यह छप्रकार का आयुर्वेध चौवीस ही दंडक में पाता है. ॥ ११ ॥ अहो भगवन् ! एक जीवने एके- न्द्रियादि जातिका बंध किया उसे जाति नाम निधत्व क्या कहना ? अहो गौतम ! जितने जातिनाम का बंध किया उसे जातिनामनिधत्त कहना. जाति नामाना जैसे गति, स्थिति, अवगाहना, प्रदेश व अनुभाग के छ दंडक जानना. अहो भगवन् ! अनेक जीवाने जिस प्रकार एकेन्द्रियादि जाति नाम का वध किया उसे क्या जाति नाम निघत्त भागय काना. अहो गौतम ! ओक जीवाने जात * छठा शतकका आठवा उद्देशा YO सन्न ८४२ भावार्थ 4 भनुमादक-बान्यालचारीमुनि श्री अमोलक वापिनी उयावि ॥.दंडओ जाव वैमाणियाणं एवं एए दुवालस दंडगा भाणियव्या ॥ ११ ॥ जीवाणं भते ! किं जाइ नाम निहत्ता, जाइनामनिहत्ताउया, जाइनामनिउत्ता, जाइनामनिउत्ताउया, जाइगोयनिहन्ता, जाइगोयनिहत्ताउया, जाइगोयनिउत्ता, जाइगोयनिउत्ताउया, जाइनामगोय निहत्ता, जाइनामगोयनिहत्ताउया जाइ- नामगोयनिउत्ता, जाइ नामगोय निउत्ताउया जाव अणुभाग नामगोय निउत्ताउया ? नाम का वध किया उन्हें भी जाति नाम निघत्त कहना. अनेक जीनों के जाति नाम निधत्त समान गति मिति, अवगाहना, प्रदेश व अनुभाग का जानना. इस तरह एक जीव व अनेक जीव के बारह दंडक चौनीम ही दंडक पर उतारना ।।१.१॥ १ एक जीव सामान्य जातिका आयुष्य बंध करे २ वहुन जीव सामान्य जाति का आयुष्य बंध करे ३ एक जीव उत्तम जाति का आयुष्य बंध करे ४ वहुत जीव उत्तम जाति का आयुष्य वंध करे, ५ एक जीव जाति की साथ नीच गोत्र का आयुर्वध करे ६ वहुत जीव जाति की साथ- नीच गोत्र के आयुप्य का वध करे ७ एक जीव जाति की साथ उच्च गोत्र के आयुष्य का बंध करे यहुत जीव जानि की राय उच्च गोत्र के आयुष्य का बंध करे ९ एक जीव जाति की साथ नीच नाम व गोत्र के आयुप्य का बंध करे-१० बहुत जीव जाति की साथ नीच नाम व गोत्र के आयुष्य का बंध करे ११.१. एक जीव जाति की साथ उच्च नाम व गोत्र के आयुप्य का बंध करे १२ बहुत जीव जाति की साथ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्वालाममादजी 670 ८४ > पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 8 शब्दार्थ वाला, पं० प्रस्तरोदक वाला खु० क्षुब्धजल वाला अ० अक्षुब्ध जल वाला गो० गौतम ल० लवण समुद्र उ० ऊंचापानी वाला प. प्रस्तर उदक वाला खु. क्षुब्ध जल वाला नो० नहीं अ० अक्षुब्ध जल वाला ए. यहां आ० लेकर ज. जैसे जी जीवाभिगभ में जा० यावत् से० वह ते० इसलिये गो गौतम बा० बाहिर के दी० द्वीप समुद्र पु० पूर्ण पु० पूर्ण प्रमाण वो० उछलते वो० उल्लालपामते स. समान घ० घडे गोयमा ! जाइनामगोयनिउत्ताउयावि जाव अणुभागनामगोयनिउ-नाउयावि, दंडओ जाव वेमाणियाणं ॥ १२ ॥ लवणेणे भंते ! समुद्दे कि उस्सिओदए, पत्थडोदए, खुभियजले, अक्खुभिय जले ? गोयमा ! लवणेणं समुद्दे उस्सिओदए नो पत्थ- डोदए, खुभियजले, नो अखुभियजले, एत्तो आढत्तं जहा जीवाभिगमे, जाव से केणद्वेणं ? गोयमा ! बाहिरयाणं दीवसमुद्दा पुण्णा पुण्णप्पमाणा, बोलदृमाणा, वोस. भावार्थ उच्च नाम व गोत्र के आयुष्य का बंध करे. यह बारह दंडक जाति आश्रित हुए. वैसे ही अनुभागतक छ बोल का जानना. इस तरह १२+६ ७२ दंडक होते हैं ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! क्या पानी की वृद्धि होती है, या पानी वरायर रहता है अथा लाणममुद्र क्षुब्ध रहता है या शान्त रहता है ? अहो भगवन् ! लपण समुद्र में पानी उपर चडता है क्योंकि सोलह हमार योजन का ऊंचा पानी का दगमाल है, इसलिये सम पानी नहीं. पैसे ही उन का जल क्षुध है परंतु शान्त नहीं 2017 छठा शतकका आठवा उद्देशा लवण समुद्र शब्दाथ सुन ६ अनुवादक-वायलचारी मुनि श्री अमालक ऋपिजी चि० रहते हैं स० संठान से एक एक प्रकार का विक स्वरूप वि. विस्तार से अ० अनेकविध वि स्वरूप दु० दुगुने दु० दुगुने प्रमाण के जा. यावत् अ० इस तितिर्यक् लोकमें अ० असंख्यात दी. द्वीप समुद्र म० स्वयंभू रमण समुद्र, प.छेल्ला ५० मरूपा स० आयुष्यमान् श्रमण ॥ १३ ॥ दीद्वीप स. समुद्र के भ० भगवन् के० कितने ना० नाम ५० प्ररूपे गो. गौतम जा. जितने लो. लोक में मु. हमाणा, समभरघडत्ताए चिटुंति, संठाणओ एगविहिविहाणा वित्थारओ अणेगविहि- विहाणा दुगुणा दुगुणप्पमाणाओ, जाव अस्ति तिरियलोए असंखेज दीवसमुद्दा स. यंभुरमणपज्जवसाणा पण्णत्ता समणाउसो ॥ १३ ॥ दीवसमुदाणं भंते ! केवइया नामधेजेहिं पण्णत्ता ? गोयमा ! जावइया लोए सुभा नामा, सुभारूवा, सुभागंधा; वगैरह पर अधिकार जीवाभिगम सूत्र जैसे जानना यावत् वाहिर के द्वीप समुद्र किनारे तफ पानी से पूर्ण भरे हुवे हैं, उबरा हुवा पानी है, चारों तरफ विखरता है, भरा हुवा घडा समान रहा है, चूड़ी के भाकारवाला है, चौडाइमें एक २एक मे दुगने हैं, इस तरह तीछे लोकमें दोप समुद्र रहे हुवे हैं. उस में छल्ला ममुद्र स्वयंभूरमण है ॥ १३ ॥ अहो भगवन् ! द्वीप समुद्र के कितने नाम है ? अहो गौतम ! लोक में जितने शुभ नाम के, शुभ रूप के, शुभ गंध के, शुभ रस. के, व शुभ · स्पर्श के पदार्थों उसने नाम के सब द्वीप समुद्र हैं. और एक २ नाप के अनेक द्वीप. समुद्र हैं. पहिले पल्योपम * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी चालाप्रसादजी मावाथ इस .
दा ८४८॥ सत्र ॐ पंचमाङ्ग विवाह पण्णाति ( भगवती ) सत्र 8.3 शुभनाम सु० शुभरूप मु. शुभगंध सु० शुभरस सु० शुभस्पर्श ए० इतने दी द्वीप स. समुद्र ना० नाम ५० प्ररूपे एक ऐसे ने जानना मु० शुभनाम उ० उद्धार प० परिणाम स० सर्व जीवों का से० ऐसे भं. भगवन् छ० छठा शतक का अ० आठवा उ० उद्देशा स० समाप्त ॥ ६ ॥८॥ जी० जीव भं. भगवन् ना० ज्ञानावरणीय क० कर्म २० वांधते का कितनी क० प्रकृति वं. सुभारसा, सुभाफासा, एवइयाणं दीर समुदा नामधेजेहिं पण्णत्ता, एवं नेयव्या सुभानामा उदारो परिणामो सव्व जीवाणं सेवं भंते भंतेत्ति, ॥ छट्ठसयरस अट्ठमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ६ ॥ ८ ॥ जीवेणं भंते ! नाणावरणिज कम्मं बंधमाणे कइ कम्मप्पगडीओ बंधइ ? गायमा ! का स्वरूप बतानेवाला पालामें वालाग्र भरनेका जो दृष्टांत कहा उस पाले में से समय २ में एक २ खण्ड नीकालते उद्धापल्य होवे ऐसे दश कोडाकोड कुवा खाली होवे सब उद्धा सागरोपम होवे, ऐसे अढाइ सागरोपम के मितने समय होते हैं उतने ही द्वीप समुद्र होते हैं. इन में सब जीव अनेक वक्त उत्पन्न हवा. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह छठा शतक का अठवा उद्देशा समाप्त हुवा ॥३८॥ गत उद्देशे के अना में उत्पन्न होने का कहा. उत्पन्न होना फर्म से होता है इसलिये कर्मबन्ध का अ- धिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! जीव ज्ञानावरणीय कर्म बांधता हुवा कितनी कर्म प्रकृतियों का धंध - छछा शतक का नववा उद्देशा भावार्थ OYO शब्दार्थ ८४६ सूत्र १ अनुवादक-याला हायसिमुनि श्री अमोलक ऋपिनी gk बांधे गो० गौतम स० सात बांधे अ० आठ वं० वांधे बंध उ० उद्देशाने जानना ॥ १॥ दे. देव भै भगवन् म० महदिक जा. यावत् १० महानुभाव या वाह्य पो० पुद्गल अ० विनाग्रहण किये १० समर्थ ए० एक वर्ण ए० एक रूप वि० पिकुर्वणा करने को गो गौतम नो० नहीं इ० यह अर्थ स० योग्य ॥ २ ॥ दे. देव भे० भगवन् वा वाह्य पो० पुद्गल प० ग्रहण कर म० समर्थ है. हा प. समर्थ सत्ताविह बंधएवा, अट्ठविह बंधएवा, छविह बंधएवा, बंधुहेसो पण्णवणाए नेयन्यो ॥ १ ॥ देवेणं भंते! महिड्डीए जाव महाणुभाए बाहिरए पोग्गले, अपरियाइत्ता पभू एगवण्णं, एगरूवं विउवित्तए ? गोयमा ! नो इणढे समटे ॥ २ ॥ देवेणं भंते ! करता है ? अहो गौतम ! जीव सात प्रकार की व आठ प्रकार की कर्मप्रकृतियों का बंध करता है. जब आयुप्य कर्म का बंध नहीं करता है तब सात, आयुष्य कर्म का बंध करता है तब आठ, और दशवे गुण स्थान में मोहनीय और आयुप्य दोनों कर्मों का बंध नहीं करता है तब छ. कर्म प्रकृत्तियों का बंध करना है. इस का विशेष अधिकार पन्नवणा सूत्र के चौबीसवे पद में कहा है ॥ १ ॥ अहो भगवन् महा ऋद्धिवंत यावत् महानुभाग देव वाहिर के पुद्गलों ग्रहण किये विना क्या एक वर्ण एकरूप (एक सरीखा आकाराला शरीरादि) बनाने को क्या समर्थ है ? अहो गौतम ! यह अर्थयोग्य नहीं है. अर्थान् देव इस तरह वैक्रय बनाने को समर्थ नहीं है ॥२॥ अहो भगवन् ! क्या महर्दिक यावत् महानु' * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्यालाप्रसादजी * भावार्थ ८४७ 8888 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - शब्दार्थ ० सेवह मैं भगवन् कि० क्या इ० यहां रहेहुवे पो० पुद्गल प० ग्रहण कर वि० विकुर्वणाकरे त० तहाँ रहे हुवे पो० पुद्गल प० ग्रहणकर विः विकुर्वणाकरे अ० अन्यत्र रहे हुवे पो० पुद्गल प० ग्रहणकर वि. वि. कुर्षणाकरे गो० गौतम नो नहीं इ० यह अर्थ म. योग्य ॥ ३ ॥ दे० देव भ० भगवन् म. महर्द्धिक बाहिरए पुग्गले परियाइत्ता पभू ? हंता पभू । से णं भंते ! किं इहगए पोग्गले सत्र परियाइत्ता विउब्वइ, तत्थगए पोग्गले परियाइत्ता विकुव्वइ अण्णत्थगए पोग्गले परियाइत्ता बिउव्वइ, ? गोयमा ! नो इहगए पोग्गले परियाइत्ता विउब्वइ, तत्थगए पोग्गले परियाइत्ता विउब्वइ णो अण्णत्थगए पोग्गले परियाइत्ता, विउव्वइ, एवं एएणं गमेणं एगवण्णं, एगरूवं, जाव अणेगवण्णं अणेगरूवं चउभंगो ॥ ३ ॥ भावार्थ भाग देव बाहिर के पुद्गलों ग्रहण कर के वैक्रेय बनाने को समर्थ है ? हां गौतम ! देव बाहिर के पुद्गलो ग्रहण कर के वैक्रय करने को समर्थ है, अहो भगवन् ! क्या वह यहां मनुप्य क्षेत्र गत पुद्गलों को ग्रहण कर वैक्रेय करे, अथवा वहां रहे हुवे पुद्गलों को ग्रहण कर वैक्रय करे, अथवा अन्यत्र के पुद्गल ग्रहण करे वैकेय करे ? अहो गौतम ! देवलोक में रहे हुये पुद्गलों को ग्रहण कर वैकेय बनाता है परंतु मनुष्य क्षेत्र अथवा अन्यस्थान के पुद्गल ग्रहण कर वैक्रेय नहीं बनाता है. इस प्रकार से एकवर्ण, एक रूप व अनेक वर्ण अनेक रूप ऐसे चार मांगे जानना. ॥ ३ ॥ अहो भगवन् 2883> छठा शतकका नववा उद्देशा 83> <TRA ८४८ अनुवादक बालमनगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिगी 85 । ब्दार्थ ना. यावत् म० महानुभाग या बाह्य पो० पुगल अ० विनाग्रहण किये प० समर्थ का० काले पो० पुगल देवेणं भंते ! महिड्डीए जाव महाणुभागे, बाहिरए पोग्गले अपरियाइत्ता पभू कालगं सूत्र पोग्गलं नीलयपोग्गलत्ताए परिणामेत्तए, नीलं पोग्गलंवा कालए पोग्गलत्ताए परि• णामेत्तए ? गोयमा ! नो इण? समटे, परियाइत्ता पभू ॥ सेणं भंते ! किं इहगए पोग्गले तंचेव नवरं, परिणामेइत्ति भाणियव्वं । एवं कालगपोग्गललोहिय पोग्ग- लत्ताए एवं कालएणं जाव सुविलं, एवं नीलएणं जाव सुकिलं । एवं लोहिएणं जाव सुकिल्लं. एवं हालिदएणं जाव सुकिल्लं एवं एयाए परिवाडीए गंधरसफास मावाधा महदिक यावत् महानुभाग देव बाहिर के पुद्गल ग्रहण किये बिना काले पुद्गलों को नीले पुद्गलों में व नीले पुद्गलों को काल में परिणमाने को क्या समर्थ हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं. परंतु पादिर के पुलों ग्रहण करके काले का नीले में व नीले का काले में परिणमाको को समर्थ है और वह वहां के ही पुगलों ग्रहण कर परिणमाते हैं. जैसे काला नीला का कहा वैसे ही काला व लाल, काला व पोला, और काला व शुक्ल पुद्गल परिणमाने का जानना. ऐसे ही दो गंध, पांचरस, व आठ स्पर्शका जानना. १ काला नीला, २ काला लाल ३ काला पीला ४ काला श्वत . ५ नीला लाल, ६ नीला पीला ७ नीला श्वेत, ८ लाल पीला १ लाल श्वत और १० पीला श्वत-यह दश भांगे हुए. ऐसे ही गंध * प्रकाशक रानाबहादुर लाला सुखदेवसहायनी मालाप्रमादजी * शब्दार्थ ५१ सूत्र 389 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र dog करे आ० आयुष्य क० कर्म सि. कदाचित् वं० वांधे सिर कदाचित् नो नहीं 40 वांधे अ० असाता वे० वेदनीय क. कर्म को भु. वारंवार उ० इकटाकरे अ० अनादी अ. अनंत दी० दीर्यकाल चा० चातुरंत सं० संसार कतार में अ० परिभ्रमणकरे से० उसको ते• इसलिये गो० गौतम अ० अ- संवृत अ० अनगार णो० नहीं सि• सिझे ॥ ४३ ॥ सं० संवृत अ० अनगार सि• सिझे ई० हा? सिय बंधइ सिय नो बंधइ, असाया वेयणिजं च णं कम्मं भुजो भुजो उवचिणइ, अणाइयं च णे अणवदगं दीहमद्धं चाउरंत संसार कंतारं अणुपरियति । से तेणटेणं गोयमा ! असंवुडे अणगारे णो सिज्झइ ॥ ४३ ॥ संवुडेणं भंते अणगारे सिज्झइ ? हंता सिझइ जाव अंतं करेइ ॥ सेकेणटेणं भंते एवं वुच्चइ ? गोयमा ! संबुडेणं कर्मों को दीर्घ काल की स्थितिाले बनाता है मंद रस देनेवाले कर्मों को तोवास देनेवाला करता है, अ- ल्प प्रदेशात्मक कर्मों को बहुत प्रदेशात्मक कर्म करता है. आयुष्य कर्भ का बंध किसि समय करता है किसि- समय नहीं करता है, असाता वेदनीय कर्म पुनःपुनः संचित करता है, और अनादि अनंत संसार कतार में परिभ्रमण करता है। इसलिये अहो गौतम ! असंवृत अनगार सिझे नहीं, यावत् संसार का अंतकरे नही. ॥ ४३ ॥ अहो भगवन्! पाश्रवद्वार का रंधन करनेवाला संवृत अणगार क्या सिझे यावत् अंतकरे ? हां गौतम ! संवृत अणगार सिझे यावत अंत करे भगवन ! किस कारन से संवृत्त अणगार सिझे यावत् अंत SIS पहिला शतकका पहिला उद्देशा 988 भावार्थ O0 .
८५० 4. अनुरादक ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी लेसं देवं, अविसुद्धलेसे देवे समोहएण अप्पाणेणं विसुद्धलेसं देवं, अविसुद्धलेसे समोहया स- सूत्र मोहएणं अविसुद्धलेसं देवं,अविसुद्धलेस देवे समोहया समोहएणं विसुद्धलेसं देवं विसुद्धले. से देवे असमोहएणंअधिसुद्धलेसंदेवं विसुद्धलेसे असमोहएणं विसुद्धलेसं देवं, विसुद्ध लेसेणं भंते ! देवे समोहएणं अविसुद्धलेसं देवं जाणइ पासइ ? हंता जाणइ पासइ, एवं विसुद्ध समो. हए विसुद्धलेसंदेवं,विसुद्ध समोहयासमोहएणं अविसुद्धलेसं देवं,विसुद्ध समोहयासमोहएणं, भावार्थ ही २ विभंगज्ञानवंत देव उपयोग रहित आत्मा से अवधि ज्ञानवंत देव, देवी या अन्य को नहीं जान व देख सकते हैं. ६ विभंग ज्ञानवंत देव उपयोग सहित आत्मासे विभंग ज्ञानी देव, देवी व अन्य किसी को नहीं जान सकता है ४ विभंग ज्ञानी उपयोग सहित अवधिज्ञानी देवादि को नहीं जान सकता ५ विभंगज्ञानी देव उपयोग सहित व रहित आत्मा से विभंगज्ञानवंत देव देवी या अन्य किसी को नहीं जान मके ३ विभेग ज्ञानी उपयोग सहित या रहित आत्मा से अवधिज्ञानवंत देव देवी को नहीं जान देख मकते हैं, यह छ भांगें मिथ्यादृष्टि देव के जानना*७ अवधिज्ञानी देव उपयोग रहित आत्मा से विभंग ज्ञान- न देव देवी या अन्य किसी को नहीं जान सके व नहीं देख सके, ८ अवधिज्ञानी देव उपयोग रहित * इस में से तीन भांगे उपयोग रहित वाले हैं. उपयोग रहित जीव कदापि नही जानसकता व देख सकता है. परंतु उपयोग महित मिथ्याटि मिथ्यात्व व अज्ञान के प्रभाव से यथार्थ वस्तु स्वरूप नहीं जान सकता है इसलिये छ भांगे नहीं जानने व नहीं दम्पन के कहे हैं. * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्यालाप्रमादजी * ८४९ - पंचमांग विवाह पपणत्ति ( भगवती) सूत्र 87- ब्दार्थ १ को नी० नीले पो० पुद्गलपने ५० परिणमें ॥ ४ ॥ पूर्ववत् ॥ ५ ॥ पूर्ववत् ।। ६ ॥ ९॥ कक्खड फास पोगगलं, मउअ फास पोग्गलत्ताए एवं दो दो गरअ लहुअ सीय उ- सूत्र सिण गिद्धलुक्खवण्णाई, सव्वत्थ परिणामेइ आलावगा य दो दो पोग्गले अपरिया- इत्ता परियाइत्ता॥४॥ अविसुद्धलेसेणं भंते! देवे असमोहएणं अप्पाणेणं अरिसुद्धलेसं देवं देविं अण्णतरं जाणइ पासइ ? गोयमा ! णो इणढे समट्टे ॥ एवं अविसुद्धलेस्से असमोहएणं अप्पाणेणं विसुद्धलेसं देवं, अविसुद्धलेसे समोहएणं अप्पाणेणं अविसुद्ध- भावार्थ पांचरस के व भाठ स्पर्श के दो २ भांगे ग्रहण करना. कर्कशको कोमलपने परिणमावे व कोमलको कर्कशपने परिणमा गुरु को लघुपने परिणमावे लघुको गुरुपने परिणमावे शीत को ऊपण व ऊपण को शीतपने परिणमावे, स्निग्य को रूक्षपने व रूक्ष को स्निगधपने परिणमावे. चाहिर के पुद्गलों ग्रहण किये बिना नहीं परिणमा सकता है, परंतु बाहिर के पुद्गलो ग्रहण कर परिणमा सकता है। यह सब परिणमानेका अधिकार कहा ॥ ४ ॥ यह देवशक्ति कही अब देवशक्तिकी भिन्नता बतलाते हैं. अविशुद्धलेशी देव, अमसवहतात्मदेव, और विशुद्धलेशी देवादिक इन तीन पद के १२ विकल्प कहते अहां भगवन् : विभंगज्ञान वाले देव उपयोग रहित आत्मासे विभंग ज्ञानवंत देवता देवी व अन्य किसी क्या ज्ञान से जान सकते हैं व दर्शन से देखसकते हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. ऐसे <PORT छठा शतक का नववा उद्देशा . " DO oyo .
शब्दा ८५२ सूत्र 2 भनुवादक-वालयमचारी मुनि श्री अमोलक आपनी मुख दु० दुःख जा. यावत् को गुठली मात्र नि. वाल, मात्र क० कलम मा० मात्रभी मा. ऊडद मा० मात्रभी मु० मुंगमात्र जू० यूकामात्र लिलिखमात्र अनिकालकर उ० वताने को से० वद्द क. कैसे भ० भगवन् ए. ऐसा गो० गौतम ज. जो ते वे अ० अन्यतीथिक ए. ऐसा आ० कहते हैं जा यावत् मि० मिध्या ते वे ए. ऐसा आ०. कहते हैं अ० मैं पुर फीर गो० गौतम ए. ऐसा आ० कहता हूं जा. यावत् प० प्ररूपता हूं सः सर्व लोक में स... सर्व जीव नोक नहीं च० शक्तिवंत के० कोई सु. मायमवि, कलममायमवि, मासमायमवि, मुमामायमवि, जूयमायमवि, लिक्खमायमवि, अभिनिवत्ता उवदंसित्तए से कहमेयं, भंते! एवं? गोयमा ! जण्णं ते. आण्णउत्थिया एव माइक्खंति जाय मिच्छं. ते. एव. माहंसु ।। अहं पुण गोयमा ! एव माइक्वामि. जाव परूवेमि सबलोए वियणं: सव्वजीवाणं. नो चकिया केइ. सुहंवाः तं. चेव. जाव. कोई भी नीव वेर जितना वाल जितना, मुंग, अडद, लीकवयूका जितनाभी सुख दुःख.नीकालकर बतासकता नी है. अहो भगवन् ! उन का यह कथन किस तरह है ? अहो गौतम !. जो अन्यतीर्थिक ऐसाई कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं वे मिथ्या ऐसा कहते हैं. में ऐसा कहता हूं. यावत् प्ररूपता. हूं कि संपूर्ण लोकमें किसी जीव को वेरकी गुठली जितना यावत् यूका जितना मुख दुःख नीकाल कर बताने को कोई ममर्थ नहीं है. यहाँ भगवन् ! यह किस तरह है ? अहो गौतम ! यह जम्बूद्वीप एक लक्ष.. योगन. का * प्रकाश रानावहादुर लाला मुखदेवसहीयजी ज्वालाप्रसादनी भारार्थ - <B> पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8-8 व्दिार्थ न अ० भन्यतीथिक भ० भगवन् ए. ऐसा आ८ कहते हैं जा० यावत् प० मरूपते हैं ना० जितने रा० राजगृह न० नगर में जी जीव ए. इतने जी० जीव को नो० नहीं च० शक्तिवन्त के० कोई सु० विसुद्धलेसं देवं, एवं हेदिलएहि अगाहिं नजा गइ नपारइ, उपरिल्लएहिं चउहि जाण- सत्र इ पासई, ॥ सेव भंते भते ति ॥ छट्ठसए नवमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ६ ॥ ९ ॥ * अण्णउत्थियाणं भंते ! एवमाइक्खंति जाव परूवंति जावइया रायगिहे णगरे जीवा एवझ्याणं जीवाणं नो चकिया केइ सुहवा दुहंवा जाव कोलट्ठिगमायमवि, निप्पाव भावार्थ आत्मा से अवधिशानी को नहीं जान सके व देख सके, ९ अवधिज्ञानी उपयोग सहित आत्मा से विभंग ज्ञानी देव, देवी या अन्य को जान सके व देख सके, १० विभंग ज्ञानी उपयोग सहित आत्मा से अवधि ज्ञानी देव, देवी या अन्य किसी को जान व देख सके, ११ अवधि ज्ञानी उपयोग सहित व रहित आत्मा से विभंग ज्ञानी को जान व देख सके और १२ अवधि ज्ञानी उपयोग सहित वरहित आत्मा से अवधि ज्ञानीको जान व देखमके यह छ भांगे समदृष्टि आश्री कहे हैं. इनमें से आठ भांगेवाले नहीं जान व नहीं देख सकते हैं. अहो मगवन् ! आपके वचन सत्य हैं. यह छठा शतक का नववा उद्देशा पूर्ण हुआ. ॥६॥२॥ * नववे उद्देशे में अज्ञानिया को जानने का अभाव कहा. अब दशवे उद्देशे में इसकाही स्वरूप कहते हैं. अहो भगवन् ! अन्यतीर्थिक ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं कि रानगृही नगरी में जितने जीव हैं उन.को <<BR> छठा शतकका दशवा उद्देशा SONG सूत्र पर अनुवादक बालमनचारी मनि श्री अमोलक ऋपिजी. शब्दार्थ ते उस पा० घ्राणेन्द्रिय योग्य पो पुद्गल को कौ० गुठलीमात्र जा. यावत् उ० वताने को गो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ से०.वह ते. इसलिये जा० यावत् उ० बताने को ॥१॥जी० जीव भ० भगवन् जी० चैतन्य जी० चैतन्य जी. जीव गो. गौतम जी. जीच ' जा. यावत् नि निश्चय जी० चैतन्य जी चैतन्य नि. निश्चय जी जीव ॥२॥जी० जीव भं भगवन् ने नारकी ने० नार- यमा ! केइ तेर्सि घाणपोग्गलाणं कोलट्ठिमायमवि जाव उवदंसित्तए ! णो इण ढे समटे ॥ सेतणटेणं जाव उवदंसित्तए ॥१॥ जीवेणं भंते ! जीवे जीवे जीवे? गो- यमा ! जीवे ताव नियमा, जीवे, जीवेवि नियमा जीवे ॥ २ ॥ जीवेणं भंते ! नेरइए भावार्थ जम्बूद्वीप मे विस्तृत होती है ? हाँ भगवन् ! वह गंध संपूर्ण जम्बूद्वीप में विस्तृत होती है. तब अहो गौतम! उस गंध से घेरकी गुटली प्रमाण यावन् यूका प्रमाण पुद्गलोंको पृथक् कर बतानेको क्या समर्थ है? भो मगवन् ! यह अर्थ योग्य नहीं है अर्थात् वैसे बताने को समर्थ नहीं है. इसी तरह जीव सुख दुःख सरीता है परंतु पृथक् करके बनाने को मपर्थ नहीं होता है ॥१॥ सुख दुःख का भोक्ता जीव होने से जीव मंबंधी प्रश्न पूछने हैं. अहो भगवन् ! जो जीव है वह क्या चैतन्य है. और जो चैतन्य है सो. जीव है ? अहो गौतमः पैतन्य प नीव परस्पर अधिनाभूत है, अर्थात् जीव विना चैतन्य नहीं व चैतन्य विना जीव नहीं, इसलिये चैतन्य है वह जीव है और जीव है वह चैतन्य है|२अहो भगवन् ! क्या जीव है सो नारकी है व प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुलदेव सहायनी ज्वालाप्रसादनी ब्दार्थ ८५३ सूत्र Egg पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र सुख दु. दुःख जा. यावत् उ०' बताये से वह के० कैसे गो०-गौतम अ० वह जं जंबूद्वीप जा०, यावत् वि. विशेषाधिक १० परिधि प.मरूपी दे देव म० महद्धिक जा. यावत् म. महानुभाग ए० एक म० वडा स० विलेपन सहित ग. गंधका मु० डबा ग० लेकर तं० उसको अ. उघाडकर जा० यावत् इ० क० करके के० संपूर्ण जं. जंबूद्वीप को ति० तीन अ० चिपटी से ति० इक्कीसवार अ० पर्यटणा करके ह० शीघ्र आ. आवे से वह नू निश्चय गो० गौतम से• वह के. केवलकल्ल जं. जम्बूद्वीप ति० उस घा० घाणेन्द्रिय के पो पुद्गल फु० स्पर्श हं० हां फु० स्पर्श च. शक्तिवन्त गो गौतम के० कोई उवदसित्तए ॥ से केणटेणं ? गोयमा ! अयणं जंबूहीवेदीवे. जाब विसेसाहिए परि- क्खेवेणं पण्णत्ते, देवेणं महिट्ठीए जाव महाणुभागे एंगं महं. सविलेवणगंधसमुग्गमं गहाय, तं अवदालेइ अवद्दालेता जाव इणामेवत्ति कटु केवलकप्पं जंबुद्दीवं दीवं तिहिं. अच्छरानिवाएहिं तिसत्तखुत्तो अणुपरियहित्ताणं हब्बमागच्छेजा ॥ सेणूणं • गोयमा ! से केवलकप्पे जंबूहीवेदीये तिहिं घाणपोग्गलेहि फुडे, हंता फुडे । चकियाणं गो- लम्बा चौडा है उसे की परिधि ३१६ २२७ योजन से कुच्छ विशपकी है ऐसा जम्बूद्वीप को कोई महाद्धक यावत् महानुभाग देव विलेपन वाला किसी सुगंधी पात्र को खुले मुखसे हस्त में लेकर तीन वपटिका में इक्कीस. रक्त संपूर्ण जम्बूद्वीप की आवर्तना करे. तय अहो गौतम ! क्या वह गंध संपूर्ण AA छठा शतकको दशंवा उद्देशा भावार्थ olo शब्दार्थ ढा ८५९ सूत्र पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र > आत्मा स शरीर खे० क्षेत्र मो. अवाहित पो० पुद्गल अ० आत्मा से आ० ग्रहणकर आ० आहार करे अ० अंतर रहित खेर क्षेत्र ओ० अवगाह्य पो० पुद्गल अ० आत्मा से आ० ग्रहणकर १० परंपर खे० क्षेत्र ओ० अवगाहित पो० पुद्गल अ० आत्मा से अ० ग्रहण कर आ० आहार करते हैं ॥ ८ ॥ के० केवली भं भगवन् आ० इन्द्रिय से जा० जाने पा० देखे गो० गौतम नो० नहीं इ० यह अर्थ स० योग्य अत्तमायाए आहारंति, परंपरखेत्तोगाढे पोग्गले अत्तमायाए आहारंति ? गोयमा ! आय सरीर खेत्तोगाढे पोग्गले अत्तमायाए आहारंति नो अणंतर खेत्तोगाढे पोग्गले अत्तमायाए आहारंति, नो परंपर खेत्तोगाढे । जहा नेरइया तहा जाव वेमाणि- याणं दंडओ. ॥ ८ ॥ केवलीण भते! आयाणेहिं जाणइ पासइ ? गोयमा ! नो इण- ढे समटे । से केणटेणं ? गोयमा ! केवलीणं पुरच्छिमेणं मियंपि जाणइ, अमियंपि जाणइ, जाव निम्बुडे सणे केवलिस्स से तेणटेणं ॥ जीवाणय सुहं. दुक्खं, जीवे क्षेत्रावगाहित आहार करने योग्य पुद्गलों का आहार करता है परंतु अनंतर व परंपर क्षेत्रावगाहित पुद्गलों का आहार नहीं करता है. नारकी जैस वैमानिक तक सब दंडक का जानना ॥८॥ अहो भगवन् क्या केवली इन्द्रियों से जानते हैं व देखते हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है क्यों कि केवली पूर्व में मर्यादित व अमर्यादित जानते हैं व देखते हैं यावत् उन का ज्ञान आवरण रहित निर्मल रहा हुआ है * छा शतक का दशवा उद्देशा भावार्थ ८५४ शब्दार्थ त उस पा० नाणेन्द्रिय योग्य पो. पुद्गल को को० गुठलीमात्र जा. यावत् उ० वताने को गोल नहीं, इ० यह अर्थ स० समर्थ से. वह ते. इसलिये जा. यावत् उ० बताने को ॥ १॥जी०जीव भ० भगवन् जी० चैतन्य' जी० चैतन्य जी० जीव' गो. गौतम जी० जीव जा. यावत् नि. निश्चय जी० चैतन्य जी चैतन्य नि० निश्चय जी. जीव ॥२॥ जी०जीव भं भगवन ने नारकी ने० नार- यमा ! केइ तेर्सि घाणपोग्गलाणं कोलट्ठिमायमवि जाव उवदंसित्तए ! णो इण सूत्र हे सम? ॥ सेतणद्वेणं जाव उवदंसित्तए ॥१॥ जीवेणं भंते ! जीवे जीवे जीवे? गो- यमा ! जीवे ताव नियमा, जीवे, जीववि नियमा जीवे ॥ २ ॥ जीवेणं भंते ! नेरइए भावार्थ जम्बूद्वीप मे विस्तृत होती है ? हां भगवन् ! वह गंध संपूर्ण जम्बूद्वीप में विस्तृत होती है. तब अहो गौतम! उस गंधमें से बेरकी गुटली प्रमाण यावत् यूका प्रमाण पुद्गलोंको पृथक् कर बतानेको क्या समर्थ है? अो भगवन् ! यह अर्थ योग्य नहीं है अर्थात् वैसे बताने को समर्थ नहीं है. इसी तरह जीव सुख दुःख सीता है परंतु पृथक करके बताने को यर्थ नहीं होता है ॥१॥ सुख दुःख का भोक्ता जीव होने से जीव संबंधी प्रश्न पूछने हैं. अहो भगवन् ! जो जीव है वह क्या चैतन्य है. और जो चैतन्य है सो. जीव है ? अहो गौतम चैतन्य व जीव परस्पर अविनाभूत है, अर्थात् जीव बिना चैतन्य नहीं व चैतन्य विना जीव नहीं, इसलिये चैतन्य है वह जीव है और जीव है वह चैतन्य है॥२॥अहो भगवन् ! क्या जीव है सो नारकी है , अनुरादक-बालप्रमचारी-मनि श्री अमोलक ऋपिजी. * मकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी शब्दार्थ सून 18 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 86- आत्मा स शरीर खे० क्षेत्र मो. अवाहित पो० युद्गल अ० आत्मा से आ० ग्रहणकर आ० आहार करे अ० अंतर रहित खेल क्षेत्र ओ० अवगाह्य पो० पुद्गल अ० आत्मा से आ० ग्रहणकर प० परंपर खेल क्षेत्र ओ० अवगाहित पो० पुद्गल अ० आत्मा से अ० ग्रहण कर आ० आहार करते हैं ॥ ८ ॥ के० केवली भं० भगवन् आ० इन्द्रिय से जा० जाने पा० देखे गो० गौतम नो० नहीं इ० यह अर्थ स० योग्य अत्तमायाए आहारंति, परंपरखेत्तोगाढे पोग्गले अत्तमायाए आहारंति ? गोयमा ! आय सरीर खेत्तोगाढे पोग्गले अत्तमायाए आहारंति नो अणंतर खत्तोगाढे पोग्गले अत्तमायाए आहारंति, नो परंपर खेत्तोगाढे । जहा नेरइया तहा जाव वेमाणि- याणं दंडओ. ॥ ८ ॥ केवलीणं भते! आयाणेहिं जाणइ पासइ ? गोयमा ! नो इण- ढे समढे । से केणटेणं ? गोयमा ! केवलीणं पुरच्छिमेणं मियंपि जाणइ, अमियंपि जाणइ, जाव निम्बुडे ईसणे केवलिस्स से तेण?णं ॥ जीवाणय सुहं दुक्खं, जीवे क्षेत्रावगाहित आहार करने योग्य पुगलों का आहार करता है परंतु अनंतर व परंपर क्षेत्रावगाहित पुद्गलों का आहार नहीं करता है. नारकी जैस वैमानिक तक सब दंडक का जानना ||८॥ अहो भगवन् क्या केवली इन्द्रियों से जानते हैं व देखते हैं ? अहो गौतम! यह अर्थ योग्य नहीं है क्यों कि केवली पूर्व में मर्यादित व अमर्यादित,जानते हैं व देखते हैं यावत् उन का ज्ञान आवरण रहित निर्मल रहा हुआ ॐ98छठा शतक का दशवा उद्देशा भावार्थ i -.
०७ ८५८ शब्दार्थसाता वेदना वे० वेदते हैं आ० अथवा अ० असाता दे. वेदना ३० वेदे ॥ ७॥ ने नारकी भं० भगवन् जे० जो पो० पुद्गल अ० आत्मा से आ० ग्रहणकर आ० आहार करते हैं ते वे किं. क्या आ० सूत्र सत्ता एगंतसायं वेयणं वेयंति आहञ्च असायं वेयणं वेयंति ॥ अस्थगइया पाणा भूया जीवा सत्ता चैमायाए वेयणं वेयंति, आहच सायमसायं ॥ से केणट्टेणं ? गोयमा ! नेरइयाणं एगत दुक्खं वेयणं वेयंति, आहच्च सायं।भवणवइ, वाणमंतर, जोइस,वेमाणिया एगंत सायंवेयंति,आहच्च असायं पुढविकाइया जाव मणुस्सा बेमायाए वेयर्णवेयंति,आहच्च सायम सायं से तेणटेणं ॥७॥ नेरइयाण भते. जे पोग्गला अत्तमायाए आहारंति ते किं. आयसरीरखेतोगाढे पोग्गले अत्तमायाए "आहारंति अणंतर खेतोगाढे पोग्गले भारार्ध परंतु चषण काल में अथवा वज्र महारादि से असाता वेदना वेदते हैं. पृथ्वीकायादि से मनुष्य पर्यंत जीव को मर्यादा रहित वेदना है तथापि क्वचिदू साता व क्वचित् असाता ऐमे दोनों प्रकार की वेदना दते हैं ॥ ७ ॥ साता असाता वेदना आहार के पुद्गलों से होती है इसलिये आहार संबंधी प्रश्न करते अहो भगवन् ! नरक का जीव आहार करने योग्य पुद्गलों को आत्मा से आहारपने ग्रहण करता वह वया स्वशरीर क्षेत्र अवगाहित पुद्गलों का आहार करता है, अनंतर क्षेत्र अवगाहित पुलों का आहार करता है अथवा परपरक्षेत्र अवगाहित पुगलों का आहार करता है ? अहो गौतम ! नारकी स्वशरीर 4 अनुवादक-पालप्रसवारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 82 प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी ५२ सूत्र ० अनुवादक-चालनमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8.33 शब्दार्थ इसिसिझे यावत् अं० अंतकरे से• वह के० कैसे भ० भगवन् ए ऐसे यु. कहा जाता है पूर्ववत् ३॥ ४४ ॥ जी० जीव भ० भगवन् अ० असंयति अ० अविरति अ० अप्रतिहत प० प्रत्याख्यानं पा० अणगारे आउयवजाओ सत्तकम्म पगडीओ धणिय बंधण बढाओ सिढिल वंधण बढाओ पकरेइ, दीहकालद्वितीयाओ हस्सकालद्वितीयाओ पकरेइ, तिव्वाणुभावा- ओ मंदाणुभावाओ पकरेइ, बहुपदेसगाओ अप्पपदेसगाओ पकरेइ, आउयंचणं कम्मं न बंधइ, असायावेयणिजं चणं कम्मंणो भुजो भुजो उवचिणइ. अणादीयंचणं अणवदग्गं दीहमद्धं चाउरंत संसार कंतारं वीईवयइ. से तेण?णं गोयमा ! एवं संवुडे अणगारे सिज्झइ जाव अंतकरेइ ॥४४॥ जीवेणं भंतेअसंजए, अविरए, अप्पडिहय करे ? अहो गोतम ! संवृत्त अणगार आयुष्य छोडकर अन्य सात कर्म की प्रकृतियों का निकाचित बंधन भावार्थ किया होवे नो उन को शिथिलकरे, दीर्घ काल की स्थिति वाले कर्मों को इस्त्र काल की स्थिति वाले बनावे तीव्र रसवाले कमों को अल्प रसवाले बनावे, बहुत प्रदेशात्मक कमाँ को अल्प प्रदेशात्मक बनावे, आयुप्य कर्म का बंध करे नहीं, असाता वेदनीय कर्म को वारंवार संचित करे नहीं व अनादि अनंत समारं अहो भगवन् ! असंयति, अविरति, व पत्याख्यान से पापकर्म नहीं तोडने वाला यहां से चककर परलोक में परिभ्रमण करे नहीं; इसलिये अहो गौतम! संवृत्त अणगार सिझे यावत् दुःखों का अंतकरे ॥ ४४ ॥ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायनी ज्यालाप्रसादजी * CO ८६ शब्दार्थ से वह के कैसे गो गौतम के केवली पु०पूर्वे मि० मर्यादायुक्त अ० मर्यादा रहित जा. जाने जा. यावत् णि निरावरण दं० दर्शन के केवली को ते. इसलिये ॥ ६ ॥ सूत्र जीवइ तहेव भवियाय ! एगंत दुक्ख वेयण, अत्तमायाय केवली। सेवं भंते भंतेति।। छट्ठसए दसमो उद्देसो समत्तो ॥ ६ ॥ १० ॥ छट्ठसयं सम्मत्तं ॥ ६ ॥ भावार्थी इसलिये केवली इन्द्रियों से नहीं जानते हैं, व नहीं देखते हैं इस उद्देशे का सारांश कहते हैं. जीव का सुख, दुःख, चैतन्य, प्राण, भव्य, एकान्त दुःख, आहार व केवली. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह उठा शतक का दशा उद्देशा समाप्त हुआ ॥७॥१०॥ और छठा शतक भी समास हुभा ॥ ६ ॥ * ANIL KOMAR 42 अनुवादक-पालनामचारीमान श्री अमोलक ऋपिनी * प्रकाशक रानावहादुर लाला सुखदेवमहायजी मालाप्रसादजी* है SANAM उपकारी-महात्मा RAPARNA मुख्याधिकारी 24 परम पूज्य श्री कहानजी ऋपिजी महाराज की सम्प्रदाय के शुध्धाचारी पूज्य श्री खुला ऋपिजी महाराज के शिष्यवर्य स्व. तपस्वीजी श्री केवल ऋपिजी महाराज आप श्रीने मुझे साथ ले महा परि- श्रम मे हैद्राबाद जैसा वडा क्षेत्र साधुमागिय धर्म में प्रसिद्ध किया व परमोपदेश से राजावहादुर दानवीर लाला सुखदेव सहायजी ज्याला प्रसादजी को धर्मप्रेमी बनाये. उनके मतापसे ही शासोद्धा- रादि महा कार्य हैद्राबाद में हुए. इस लिये इस कार्य के मुख्याधिकारी आपही हुए. जो जो भव्य जांघों इन शास्त्र द्वारा महालाभ मात करेंगे ये भापही के कृतज्ञ होंगे. परम पूज्य श्री कहानजी ऋपिनी महाराज की सम्पदाय के कविवरेन्द्र महा पुरुप श्री तिलोक पिनी महाराज के पाटवीय शिष्य वर्य, पूज्य- पाद गुरु चर्य श्री रत्नपिनी महाराज! आप श्री की भाज्ञासे ही शास्त्रोद्धार का कार्य स्पी- फार किया और आपके परमाशिर्वाद से पूर्ण कर- सका. इस लिये इस कार्य के परमोपकारी महा- स्मा आप ही हैं. आप का उपकार केवल मेरे पर ही नहीं परन्तु जो जो भव्यों इन शास्त्रोंदरा लाभ प्राप्त करेंगे उन सबपर ही होगा. TRU शिशु-अमोल ऋपि. WressNRNER दास-अमोल कापENA --- शब्दार्थ से० वह के० कैसे गो गौतम के०केवली पु० पूर्वे मि० मर्यादायुक्त अ० मर्यादा रहित जा० जाने जा० यावत् णि निरावरण दे० दर्शन के० केवली को ते० इसलिये ॥६॥ सूत्र जीवइ तहेव भवियाय । एगंत दुक्ख वेयण, अत्तमायाय केवली ॥ सेवं भंते भंतेत्ति। छट्ठसए दसमो उद्देसो समत्तो ॥ ६ ॥ १० ॥ छट्ठसयं सम्मत्तं ॥ ६॥ માવાઈ इसलिये केवली इन्द्रियों से नहीं जानते हैं, व नहीं देखने हैं इस उद्देशे का सारांश कहते हैं. जीव का सुख, दुःख, चैतन्य, प्राण, भव्य, एकान्त दुःख, आहार व केवली. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह छठा शतक का दशवा उद्देशा समाप्त हुआ ॥२॥१०॥ और छठा शतक भी समाप्त हुआ ॥ ६ ॥ * ANIE -- + अनुवादक-बालापनारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी - * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी मालापसादजी IL Koman जार x S RAM उपकारी-महात्वा EMANEE Manasla मुख्याधिकारी Aasala परम पूज्य श्री कहानजी ऋपिजी महाराज की सम्प्रदाय के शुध्वाचारी पूज्य श्री खुवा ऋपिजी महाराज के शिष्यपर्य स. तपस्वीजी भी केवल ऋपिजी महाराज!आप श्रीने मुझे साथ ले महा परि थन से हैद्राबाद जैसा बडा क्षेत्र साधुपानिय धर्म में प्रसिद्ध किया व परमोपदेश से राजावहादुर दानवीरलाला मुखदेव सहायजी ज्याला प्रसादजी को धर्मप्रेमी बनाये. उनके मतापसे ही शास्त्रोद्धा- रादि महा कार्य हैद्राबाद में हुए. इस लिये इस कार्य के मुख्याधिकारी आपही हुए. जो जो भव्य मीयों इन शास्त्र द्वारा महालाभ प्राप्त करेंगे ये आपही के कृतज्ञ होंगे. परम पुज्य श्री कहानजी ऋपिजी महाराज की सम्प्रदाय के करियरेन्द्र महा पुरुष श्री तिलोक ऋपिजी महाराज के पाटवीय शिष्य वर्थ, पूज्य. पाद गुरु वर्य श्री रतऋषिजी महाराज ! आपश्री की आज्ञाने ही शालोद्धार का कार्य सी. कारकिया और भाप के परमाशिर्वाद से पूर्ण कर- सका इस लिये इस कार्य के परमोपकारी महा- त्मा आप ही हैं. आप का उपकार केवल मेरे पर ही नहीं परन्तु जो मो भव्यों इन शास्त्रोंद्वारा साभ प्राप्त करेंगे उन सबपर ही होगा. SHRES शिशु-भसोस प्रषिVERNEVERNMENS दाम-अमोल भाप NS दाम अमोल अपि Rs आश्रयदाता KARSशाख-प्रकाशक दक्षिण हैद्राबाद निवासी जौहरी वर्ग में श्रेष्ट दृयी दानवीर राजा बहादुर लालाजी सादेव श्री मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी! आपने साधु सेग के और ज्ञान दान जैसे महा- लाभके लोभी पन साधुमार्गीय जैन धर्म के परम माननीय व परम आदरणीय बत्तीस शास्त्रों को हिन्दी भाषानुवाद माहित छपाने को रु. २००००, का पर्पकर अल्प देना स्वीकार किया और पुरोप युद्धारंभ से सब वस्तु के भाव में वृद्धि होने से रु. ४०००० के खर्च में भी काम पूरा होमेका समर नही होते भी आपने उस हो उस्माइ से कार्य को समाप्त कर सबको अमूल्य महालाभ दिया, या आप को उदारता माधुमार्गीयों की गौरव दर्शक व परमादरणीय है! झोपाला (काठीयावाड) निवासी धर्म प्रेमी कार्यदक्ष कृतज्ञ मणिलाल शिवलाल शेट! इनाने जैन ट्रेनिंग कालेज रतलाम में संस्कृत प्राकृत व अंग्रेजी का अभ्यास कर तीन वर्ष उपदेशक रद अच्छी कौशल्यता प्राप्त की. इन से शादोभ्यरका कार्य अच्छा होगा ऐसी मूचना गुरुवर्य श्री रत्न पिजी महाराज से मिलने से इन को बोलाये. इनोंने अन्य प्रेस में शुद्ध अच्छा और शीघ्र काम होता नहीं देस शास्त्रोध्धार मेल कायम किया और प्रेस के कर्मचारियों को उत्साही कार्य दक्ष बना काम लिया. तैले ही भाषानुवाद की मेसकोपी धनाइ.यद्यापि यह भाइ पगार से रहे थे तथापि इनोंने इस कार्य की सेवा येवन के प्रमाण में अधिक की. इस लिये इनको भी धन्यवाद देते हैं. विद्राबाद सिकन्द्राबाद जन मघ :- ज्यालाप्रसाद an सहायक मुभिमंडल -- Tales और भी-सहायदाना अपनी छत्ती ऋद्धि का त्याग कर हैद्रामद हीकन्द्राबादमें दीक्षाधारक याल ब्रह्मचारी पण्डित मुनि श्रीभमोलक ऋपिजीके शिप्पपर्य ज्ञानानंदी श्री देव प्रापिजी. वैय्यारत्यी श्री राज ऋपिजी. तपस्वी श्री पदय प्रापिजी और विद्याविलासी श्री मोहन पिजी. इन चारों मुनियरोंने गुरु आज्ञाका पहुमानसे सीकार कर आहार पानी आदि मुखोप- चार का संयोग मिला. दो प्रहर का व्याख्यान, मसंगीसे पार्तालाप,कार्य दक्षता व समाधि भाव से सहाय दिया जिस से ही यह महा कार्य इतनी शीघ्रता से लेखक पूर्ण सके. इस लिये इस कार्य यस उक्त मुनिवरों का भी बड़ा उपकार है. पंभार देश पावन करता पूज्य श्री सोहन- लालजी, महात्मा श्री माधव मुनिजी, शतास्थानी श्री रत्नचन्द्रजी,तपस्वीजी माणक चन्द जी,कवीवर श्री भमी ऋपिजी,मुवक्ता श्री दौलत नापिनी.पं. श्री नथमलजी.पं.श्री जोरावरमसजी. काविर श्री नानयन्द्र जी.प्रवर्तिनी सतीजी श्री पार्वतीजी.गुणज्ञ- सतीजी श्रीरंभागी-धोराजी सर्वज्ञ भरार, भीना सरवाले कनीरामजी बहादरमलजी बाँठीया, लीबडी भंडार, कुचेरा भंडार, इत्यादिक की तरफ से शास्त्रों व सम्मति द्वारा इस कार्य को बहुत सहायता मिली है. इस लिये इम का भी बहुत उपकार मानते हैं. मुखदेव सहाय याला प्रमाद र युखदेव महाय चालाप्रसाद
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12 थामारी-महात्मा ARMER
RBIRHARन्दी भापातुरादक RRA
कच्छ देश पावन कर्ता मोटी पक्ष के परम
पूष श्री कमसिंहजी महाराज के शिष्यवर्य
महात्मा फपिवर्य श्री नागचन्द्रनी महाराज!
इस शालोद्धार कार्य में आद्योपान्त आप श्री
मापिन शुद्ध शान, हुंडी,गुटका और समय पर
मापश्यकीय शुभ सम्मति द्वारा मदत देते रहनसेही
में इस कार्य को पूर्ण कर सका. इस लिये केवल
मानी पान्तु जो जो भब्य इन शास्त्रोद्वारा
काम माप्त करेंगे ये सब ही आप के प्रभारी
शुद्धाचारी पूज्य श्री स्वा अपिजी महाराज के
शिष्यवर्य,भार्य मुनि श्री चना ऋषिजी महाराज
शिप्यवर्य बालब्रह्मचारी पण्डित मनि धीभोलक
ऋषिजी महाराज!आपने बड़े साहम से शास्त्रोद्धार
जैसे महा परिश्रम वाले कार्य का जिस उत्साह
स्वीकार किया था उस ही उत्साह से तीन वर्ष
जितने स्वरप समय में अहर्निश कार्य को अच्छा
बनाने के शुभाशय से सदैव एक भक्त भोजन
और दिन के सात घंटे लेखन में व्यतीत कर
घूर्ण किया. और ऐसा सरल बनादिया कि
कोई भी हिन्दी भाषज्ञ सहज में समंज सके, ऐसे
ज्ञानदान के महा उपकार तल दवे हुथे हम भाप
के बडे अभारी हैं.
संघकी तर्फ से.
आपका अमोल ऋपि
मुखदेव सहाय ज्याला प्रसाद
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12 शाश्व-प्रकाशक दक्षिण द्रिाबाद निवासी जौहरी वर्ग में श्रेष्ठ दृढपी दानवीर राजा वहादुर लालाजी साहेब श्री मुखदेव सहायनी पालापनादजी! आपने साधु सेवा के और ज्ञान दान जैने महा- साभके लोभी वन जैन साधुमार्गीय धर्म के परम माननीय व परम आदरणीय बत्तीम शास्त्रों को हिन्दी भापानुभद सहित छपाने को रु.२००००, का पर्चकर अमूल्य देना सोकार किया और पुगेप युद्धारंभ से सब वस्तु के भाव में वृद्धि होने से रु. ४०००० के खर्च में भी काम पूरा होनेका गभर नहीं होते भी आपने उस ही उत्साह से कार्य को समाप्त कर सवको अयूल्य महालाभ दिया, यह आप की उदारता साधुमार्गीयों की भौख दर्शक व परमादरणीय है! बमोठाबाट मिकन्द्राबाद जन मय PAPER आश्रयदाता झोवाला (कागयावाह) निवासी धर्म प्रेमी कार्यदक्ष कृतज्ञ मणिलाल शिवलाल शंठ! इनाने जैन ट्रेनिंग कालेज रतलाम में संस्कृत माकृत व अंग्रेजी का अभ्यास कर तीन वर्प उपदेशक रह अच्छी कौशल्यता प्राप्त की.इन से शास्त्रोचार का कार्य अच्छा होगा ऐमी सूचना गुरूार्य श्री रत्न ऋपिजी महाराज ने मिलने से इन को बोलाये, इनोंने अन्ध प्रेत में शुद्ध अच्छा और शीत्र काम होता नहीं देख शास्त्राचार प्रेस कायन किया और प्रेस के कर्मचारियों को उत्साही कार्य दक्ष बना काम लिया. तैले ही भापानुवाद की मेसकोगी बनाइ, यद्यपि यह भाइ पगार से रहे थे तथापि इनोंने इन कार्य की सेवा वेतन के प्रमाण से अधिक की. इस लिये इनको भी धन्यवाद देते हैं. पालामसाद
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सूत्र 398- पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र - शब्दार्थ पापकर्म इ० यहां से चु० चवकर पे० पेरलाक में देव सि० होवे गो० गौतम अकितनेक दे देवसि हो अ. कितनेक णो० नहीं दे० देव सि. होवे से वह के कैसे भ० भगवन् जा. यावत् इ० यहां से चु० चक्कर पे० परलोक में अ० कितनेक दे० देव सि० होवे अ० कितनेक णो नहीं दे० देव सि० होवे गो० गौतम जे० जो जी० जीव गा० ग्राम आ० आगर न० नगर निः निगम रा० राज्यधानि खे० खेडं क० कब्बड मं० मंडप दो द्रोणमुख १० पट्टण आ० आश्रम स० सन्निवेश में अ० अकाम तृष्णा पञ्चक्खाय पावकम्मे; इतो चुते पेच्चा देवे सिया ? गोयमा ! अत्थेगइए देवे सिया अत्थेगइए णो देवे सिया । सेकेणतुणं भंते जाव इतो चुते पेच्चा अत्थेगइए देवेसिया, अत्थेगइए णो देवे सिया? गोयमा! जे इमे जीवा गामागर नगर निगम रायहाणि खेड कबड मडंव दोणमुह पट्टणासम सन्निवेसेसु अकामतण्हाए, अकामछुहाए, भावार्थ में क्या देवता होवे ? अहो गौतम ! कितनेक देव होवे और कितनेक देव न होवे. अहो भगवन् ? किस कारण से कितनेक देव होवे और कितनेक देव नहोवे ! जो जीव ग्राम, आगर, नगर, निगम, राज्यधानी, खेड, कव्वड, मंडप द्रोणमुख, पट्टण. आश्रम, सन्निवेश में अकाम-विना इच्छा से, तृष्णा, क्षुधा, ब्रह्मचर्य, शीत, आतप, दंश मशक, स्नान नहीं करना, स्वेद नहीं पुछना, शरीर का मेल दूर नहीं करना, मल, पंक व परिदाह से अल्प या बहुत समय तक आत्मा को क्लेश पहुंचावे और इस तरह आत्मा को कष्ट देते * पहिला शतक का पहिला उद्देशा-88888 ६० अनुवादक-यालयमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 शब्दार्थ इसि. सिझे यावत् अं० अंतकरे से• पद के० कैसे भ० भगवन् ए. ऐसे यु कहा जाता है पूर्ववत् ॥ ४४ ।। जी० जीव भ० भगवन् अ० असंयति अ० अविरति अ० अप्रतिहत प० प्रत्याख्यान पा० अणगारे आउयवज्जाओ सत्तकम्म पगडीओ धणिय बंधण बढाओ सिढिल बंधण बढाओ पकरेइ, दीहकालट्ठितीयाओ हस्सकालट्ठितीयाओ पकरेइ, तिव्वाणुभावा- ओ मंदाणुभावाओ पकरेइ, बहुपदेसगाओ अप्पपदेसगाओ पकरेइ, आउयंचणं सूत्र कम्मं न बंधइ, असायावेयणिज्जं चणं कम्मणो भुजो भुजो उवचिणइ. अणादीयंचणं अणवदग्गं दीहमद चाउरंत संसार कंतारं वीईवयइ. से तेण?णं गोयमा ! एवं संवुडे अणगारे सिज्झइ जाव अंतकरेइ ॥ ४४ ॥'जीवेणं भंतेअसंजए, अविरए, अप्पडिहय करे ? अहो गोतम ! संवृत्त अणगार आयुष्य छोडकर अन्य सात कर्म की प्रकृतियों का निकाचित बंधन किया होवे नो उन को शिथिलकरे, दीर्घ काल की स्थिति वाले कर्मों को इस काल की स्थिति वाले बनावे तीत्र रप्तवाले कर्मों को अल्प रसवाले बनाये, बहुत प्रदेशात्मक कर्मों को अल्प प्रदेशात्मक बनावे, आयुष्य कर्म का बंध करे नहीं, असाता वेदनीय कर्म को वारंवार संचित करे नहीं व अनादि अनंत संसार में परिभ्रमण करे नहीं; इसलिये अहो गौतम! संवृत अणगार सिझे यावत् दुःखों का अंतकरे ॥ ४४ ॥ अहो भगवन् ! असंयति, अविरति, व प्रत्याख्यान से पापकर्म नहीं तोडने वाला यहां से चक्कर परलोक * प्रकाशक-राजाकादुर लाला मुखदेवाहायनी ज्यालाप्रसादजी भावार्थ * 29 शब्दार्थ के दे० देवलोक १० प्ररूपे गो० गौतम इ. यह म० मनुष्य लोकगें अ० अशोक वृक्षके वन स० सप्त पर्णवन चं० चपकवन चू, आम्रवन ति तिलकवन ला० वृक्ष निशेष नि० वड के वन छ. छत्राहयन अ० अशनयन स० शण केवन अ० अलसीके वन कु० कुसुंभवन सि० सरसव के वन पं० वृक्ष विशेप नि० नित्य कु• कुसुम वाले मौ० मंजरी ल० वेल थ० फूलजाति गु० लता गो० पत्रसमुह ज० समश्रेणी जु० युगल वि. नमेहुवे प० विशेष नमेहुवे गु० प्रगट पिं० लुम्म मं० मांजर व नवकुंपल ध० धारन करने वाले सि० शो- सूत्र 88 पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र लाउयवणेइवा, निग्गोहवणेइवा,छत्तोहवणेइवा;असणवणेइवा,सणवणेइवा,अयसिवणेइवा, कुसुंभवणेइवा, सिद्धत्थवणेइवा, बंधुजीववणेइवा; निच्चं कुसुमिय माइयलवइयथवइय गुल- इय गोच्छिय जमालय जुवालिय विणमिय पणमिय सुविभत्त पिडिमंजरि वडिंगधरे, सिरीए अतीव अतीव उवसोभेमाणे उवसोभेमाणे चिट्ठइ एवामेव तेसिं वाणमंतरा- पहिला शतकका पहिला उद्देशा 988 भावार्थ युगल वृक्ष के पुष्पों का भार से नमे हुवे, विशेष नमें हुवे, नविन कुंपल रूपी मुकुट को धारण करने वाले व बनलक्ष्मी से बहुत ही शोभनीक हैं वही उन वाणव्यंतर देवता के देवलोक जानना. उस की स्थिति जघन्य दश हजार वर्ष की उत्कट एक पल्योपम की जानना. वे देवलोक बहुत बाणच्यंतर देव व देषियों से व्याप्त, क्रीडा में आसक्त होनेसे उपरा उपर आच्छादे हुये, परस्पर बहुत दूर तक खेलनेसे हा शब्दार्थ ५४ मूत्र 42 अनुवादक बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक वलीनी अ० अकामक्षुधा अ० अकाम ब्रह्मचर्ग अ० अकाम सी० शीत आ०आतप दं० दशम० मशक अ० स्नान रहित से खेद न० जल म० मल पं० कर्दम प० परिदाह अ० थोडे भु० बहुत का० काल अ० आत्मा को प० कष्टदेवे १० कष्टदेकर का० काल के अवसर में का. काल कि० करके अ० अन्यतर वा० वाण व्यतर दे देवलोक में दे देवपने उ० उत्पन्न भ० होवे के० कैसे भं भगवन. वा० वाणव्यंतर दे० देवता अकाम बंभचेरवासेगं, अकामसीतातवदंसमसगं, अण्हाणगसेयजल्लमल पंकपरि- दाहेणं अप्पतरोबा भुजतरोत्रा कालं अप्पाणं परिकिलेसंति परिकिलेसइत्ता; कालमासे कलंकिच्चा, अण्णयरेसु वाणमंतरेसु देवलोएसु देवत्ताए उववत्तारो भवति ॥ केरि- साणं भंते तेसिं वाणमंतराणं देवाणं देवलोगा प०? गोयमा! से जहानामए इह मणुस्स लोगंमि असोगवणेइवा सत्तवण्णवणेइवा, चपयवणेइवा, चूयवणेइवा, तिलगवणेइवा, काल के अवसर में काल करे तो वाणव्यंतर देवलोक में देवतापने उत्पन्न होवे. अहो भगवन् ! उन शागत्यंतर देवता के देवलोक कैसे हैं ! अहो गौतम जैसे मनुष्य लोक में अशोकवन, सप्तपर्णवन, चंपकवन आम्रनन, तिलक बन, अलंयुक ( तुम्मी का) बन, न्यग्रोधवन, छत्राहवन, अशनवृक्षवन, शणवृक्ष के वन अलसीका वन, कुसुभवन, सिद्धत्य-देतस रसवका वन, बंधजीव सो मध्यान्द के कुसुमका वन वगैरह वनों सदैव कुसुमों से फुले हुवे, मंजरी, गुच्छा, गुलम, बेल, पत्र, अन्य अनेक वृक्षोंकी श्रेणियों के समुद्र व * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * भावाथ Q शब्दार्थ के दे० देवलोक १० प्ररूपे गो० गौतम इ. यह म० मनुष्य लोकमें अ० अशोक वृक्षके वन स० सप्त पर्णवन चं० चंपकवन चू. आम्रवन ति तिलकपन ला० वृक्ष विशेष नि० घड के वन छ. छत्रावन अ० अशनवन स० शण केवन अ० अलसीके वन कु० कुसुंभवन सि० सरसव के वन वं० वृक्ष विशेप नि० नित्य कु. कुसुम वाले मा० मंजरी ल० वेल थ० फूलनाति गु० लता गो० पत्रसमुह ज० समश्रेणी जु० युगल वि• नमेहुवे प० विशेष नमेहुवे गु० प्रगट पिं० लुम्घ मं० मांजर व नवकुंपल ध धारन करने वाले सि० शो- ५० . PPPY पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र लाउयवणेइवा,निग्गोहवणेइवा,छत्तोहवणेइवा असणवणेइवा,सणवणेइवा,अयसिवणेइवा, कुसुंभवणेइवा, सिद्धत्थवणेइवा, बंधुजीववणेइवा; निच्चं कुसुमिय माइयलवइयथवइय गुलु- इय गोच्छिय जमालय जुवालय विणमिय पणमिय सुविभत्त पिंडिमंजरि वडिंगधरे, सिरीए अतीव अतीव उवसोभेमाणे उबसोभेमाणे चिट्ठइ एवामेव तेसिं वाणमंतरा- पहिला शतकका पहिला उद्देशा88-88- भावार्थ युगल वृक्ष के पुणों का भार से नमे हुवे, विशेप नमें हुवे, नविन कुंपल रूपी मुकुट को धारण करने बाले व बनलक्ष्मी से बहुत ही शोभनीक हैं वैभेही उन वाणव्यंतर देवता के देवलोक जानना. उस की स्थिति जघन्य दश हजार वर्ष की उत्कट एक पल्योपम की जानना. वे देवलोक बहुत पाणव्यंतर देव देवियों से व्याप्त, क्रीडा में आसक्त होनेसे उपरा उपर आच्छादे हुये, परस्पर बहुत दूर तक खेलने से १ अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक अपिजी शब्दार्थ भनिक अ० अतीव उ० सुंदर चि० हैं ए ऐसे ते. उन वा० वाणव्यंतर दे० देवके दे० देवलोक जा जघन्य द० दशवर्प स० सहस्र ठि० स्थिति से उ० उत्कृष्ट प० पल्योपम ठि• स्थिति से ब• बहुत वा० वाणव्यंतर दे० देव दे० देवीसे आ० व्याप्त वि० विस्तीर्ण उ. आच्छादित सं० संस्तणि फु० स्पर्श अ० रहे गा० गुप्त सि० लक्ष्मी से अ० अतीत २ उ• सुंदर शोभते चि० हैं ए. ऐसे गो० गौतम ते० उन वा० वाणव्यंतर दे० देवके दे० देवलोक प० प्ररूपे सो० वह ते० इसलिये गो० गौतम ए०सा बु. कहा सूत्र णं देवाणं देवलोया जहण्णेणं दस वास सहस्स ठिईएहिं, उक्कोसेणं पलिओवमट्टिईए- हिं बहुहिं वाणमंतरेहिं देवेहिय देवीहिय आतिण्णा, वितिण्णा, उवत्थडा संथडा फु- डा, अवगाढगाढ सिरीए, अतीव अतीव उवसोभमाणा उवसोभेमाणा चिट्ठति ॥• ए- रिसगाणं गोयमा ! तोप्तिं वाणमंतराणं देवाणं देवलोगा पण्णत्ता से तेणटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ जीवे णं असंजए जाव देवोसिया ॥ ४५ ॥ सेवं भंते ! भंते ति भगवं वाथे संधारा जैसे विस्तीर्ण वने हुवे, आसन शयन रमण भाग से भोगवते व लक्ष्मी से अतीव सुशोभित रहे हुवे हैं. अहो गौतम ! उन वाणव्यतर के ऐसे देवलोक कहे हैं. और इसी कारण से कितनेक असंयति जीव देवतापने उत्पन्न होवे और कितनेक उत्पन्न नहोवे ॥ ४५ ॥ अहो भगवन् जैसे मैंने पृच्छा की वेसे ही आपने प्रतिपादन किया है. आप जैसा कहते है; वैसा ही है अन्यथा नहीं है. इस प्रकार भगवन्त के र प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी बालाप्रसादजी * o GY olo सूत्र 80 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र-888 शब्दार्थ जाता है जी० जीव अ० असयंति जा. यावत् दे देव सिहोवे॥४५॥से ऐसेही भ. भगान् गो• गौतम स० श्रमण भ० भगवन म० महावीर को वं. वंदे ण नमस्कार कया पं० वंदना करके सं० संयम से त०/yo तपसे अ० आत्मा को भा० भावते हुवे वि• विचरते हैं. ॥ १ ॥ १ ॥ * रा० राजगृह ण नगर स० समवसरण १० परिपदाणि निर्गता जा. यावत् ए. ऐमा व० कहा जी० गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता संजनेणं तवसाअप्पा- णं भावमाणे विहरइ इति पढमसए पढमोदेसो सम्मत्तो ॥ १ ॥ १ ॥ रायगिहे णयरे, समोसरणं, परिसा णिग्गया जाव एवं . वयासी. जीवणं भंते सय विभार्थ वचनों को बहुत मान देकर गौतम स्वामीने श्री श्रमण भगवन्त महावीर को वंदना नमस्कार किया, वंदना नमस्कार कर के संयम व तपसे आत्मा के स्वरूप को विचारते हुवे विचरने लगे यह पहिला शतक का पहिला उद्देशा संपूर्ण हुआ. ॥ १ ॥ १ ॥ गत उद्देशे में कर्म के चलनादि प्रश्नोत्तर कहे हैं वे कर्म दुःखरूप होते हैं इसलिये आगे दुःख का प्रश्न करते हैं. राजगृह नगर के गुणशील नामक उद्यान में भगवन्त श्री महावीर स्वामी पधारे, परिपदा वांदने को आई, वाणी सुनकर परिपदा पाछीगई. उस समय श्री गौतम स्वामीने भगवन्त को प्रश्न पुछा कि अहो भगवन् ! जीव अपना किया हुवा दुःख येदता है ? अहो गौतम ! किननेक सकृत कर्मवंदे, कित. > पहिला शतकका दूसरा उद्देशा 988 + x अनुवादक-बालग्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक पिजी शब्दार्थ भनिक अ० अतीच उ० मुंदर चि० हैं एक ऐसे ते० उन बा० वाणव्यंतर दे० देवके दे० देवलोक जा जघन्य द० दशवर्प स० सहस्र ठि० स्थिति से उ० उत्कृष्ट प० पल्योपम ठि• स्थिति से व• बहुत वा० वाणव्यंतर दे. देव दे० देवीसे आ० व्याप्त वि० विस्तीर्ण उ० आच्छादित सं० संस्तर्णि फु० स्पर्शे अ० रहे गा० गुप्त सि० लक्ष्मी से अ० अतीत २ उ• सुंदर शोभते चि० हैं ए. ऐसे गो. गौतम ते० उन वा. वाणव्यंतर दे० देवके दे० देवलोक प० प्ररूपे सो० वह ते० इसलिये गो० गौतम ए ऐसा बु. कहा सूत्र णं देवाणं देवलोया जहण्णेणं दस वास सहस्स ठिईएहिं, उक्कोसेणं पलिओवमट्टिईए- हिं बहुहिं वाणमंतरहिं देवेहिय देवीहिय आतिण्णा, वितिण्णा, उवत्थडा संथडा फु. डा, अवगाढगाढ सिरीए, अतीव अतीव उक्सोभमाणा उवसोभेमाणा चिट्ठति ।।• ए- रिसगाणं गोयमा ! तोतं वाणमंतराणं देवाणं देवलोगा. पण्णत्ता से तेणटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ जीवे णं असंजए जाव देवोसिया ॥ ४५ ॥ सेवं भंते ! भंते ति भगवं संथारा जैसे विस्तीर्ण वने हुवे, आसन शयन रमण भाग से भोगवते व लक्ष्मी से अतीव सुशोभित रहे हुवे हैं. अहो गौतम ! उन वाणव्यंतर के ऐसे देवलोक कहे हैं. और इसी कारण से कितनेक असंयति जीव देवतापने उत्पन्न होवे और कितनक उत्पन्न नहोवे ॥ ४५ ॥ अहो भगवन् जैसे मैंने पृच्छा की वेसे ही आपने प्रतिपादन किया है. आप जैसा कहते है; वैसा ही है अन्यथा नहीं है. इस प्रकार भगवन्त के र प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * वार्थ 070 शब्दार्थ O ५७ सूत्र 388 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र-08 जाता है जी जीव अ० असयंति जा० यावत् दे० देव सि होवे॥४५॥से ऐसेही भ० भगतनू गो० गौतम स० श्रमण भ० भगवनू म० महावीर को वै० वंदे ण. नमस्कार कया ५० वंदना करके सं० संयम से त०yo तपसे अ० आत्मा को भा० भावते हुवे वि. विचरते हैं. ॥ १ ॥ १॥ * रा० राजगृह ण नगर स० समवसरण ५० परिपदाणि निर्गता जा० यावत् ए. ऐमा व० कहा जी० गोयमे समणं भगवं महावीरं बंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता संजमेणं तवसाअप्पा- णं भावमाणे विहरइ इति पढमसए पढमोद्देसो सम्मत्तो ॥ १ ॥ १ ॥ रायगिहे णयरे, समोसरणं, परिसा णिग्गया जाव एवं. वयासी. जीवेणं भंते सय वचनों को बहुत मान देकर गौतम स्वामीने श्री श्रमण भगवन्त महावीर को वेदना नमस्कार किया, वंदना नमस्कार कर के संयम व तपसे आत्मा के स्वरूप को विचारते हुवे विचरने लगे यह पहिला शतक का पहिला उद्देशा संपूर्ण हुआ. ॥ १॥? ॥ गत उद्देशे में कर्म के चलनादि प्रश्नोत्तर कहे हैं वे कर्म दुःखरूप होते हैं इसलिये आगे दुःख का प्रश्न करते हैं. राजगृह नगर के गुणशील नामक उद्यान में भगवन्त श्री महावीर स्वामी पधारे, परिपदा वांदने को आई, वाणी सुनकर परिपदा पाछीगई. उस समय श्री गौतम स्वामीने भगवन्त को प्रश्न पुछा कि अहो भगवन् ! जीव अपना किया हुवा दुःख पेदता है ? अहो गौतम ! किननेक स्वकृत कर्मवंदे, कित- पहिला शतकका दूमरा उद्देशा नवभाथे x ५३ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक अपिजी 87 शब्दार्थ भनिक अ० अतीव उ० सुंदर चि० हैं एक ऐसे ते० उन वा० वाणव्यंतर दे० देवके दे० देवलोक जा जघन्य द० दशवर्प स० सहस्र ठि० स्थिति से उ० उत्कृष्ट प० पल्योपम ठि• स्थिति से व• बहुत वा० याणव्यंतर दे० देव दे० देवीसे आ० व्याप्त वि० विस्तीर्ण उ० आच्छादित सं० संस्तर्णि फु० स्पर्श अ. रहे गा० गुप्त सि० लक्ष्मी से अ० अतीत २ उ• सुंदर शोभते चि० हैं ए. ऐसे गो० गौतम ते. उन वा. वाणव्यंतर दे० देवके दे देवलोक प० प्ररूपे सो० वह ते० इसलिये गो० गौतम ए०ऐसा बु. कहा सूत्र णं देवाणं देवलोया जहण्णेणं दस वास सहस्स ठिईएहिं, उक्कोसेणं पलिओवमट्टिईए- हिं बहुहिं वाणमंतरेहिं देवेहिय देवीहिय आतिण्णा, वितिण्णा, उवत्थडा संथडा फु- डा, अवगाढगाढ सिरीए, अतीव अतीव उवसोभमाणा उवसोभेमाणा चिट्ठति ।।• ए- रिसगाणं गोयमा ! तोप्ति वाणमंतराणं देवाणं देवलोगा. पण्णत्ता से तेणट्रेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ जीवे णं असंजए जाव देवोसया ॥ ४५ ॥ सेवं भंते ! भंते ति भगवं वाथे संथारा जैसे विस्तीर्ण वने हुवे, आसन शयन रमण भाग से भोगवते व लक्ष्मी से अतीव सुशोभित रहे हुवे हैं. अहो गौतम ! उन वाणव्यंतर के ऐसे देवलोक कहे हैं. और इसी कारण से कितनेक असंयति जीव देवतापने उत्पन्न होवे और कितनेक उत्पन्न नहोवे ॥ ४५ ॥ अहो भगवन् जैसे मैंने पृच्छा की वेसे ही आपने प्रतिपादन किया है. आप जैसा कहते है, वैसा ही है अन्यथा नहीं है. इस प्रकार भगवन्त के ९ प्रकाशक-राजारहादुर लाला मुखदेवसहायजी चालाप्रसादनी * ora 09 * २८ सत्र 88 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र-888 शब्दार्थ जाता है जी० जीव अ० असयंति जा. यावत् दे० देवं सि होवे॥४५॥से ऐसेही भ. भगवन् गो० गौतम स० श्रमण भ० भगवन म० महावीर को वं० वंदे ण. नमस्कार कैया ५० वंदना करके सं० संयम से त. तपसे अ० आत्मा को भा० भावते हुये विविचरते हैं. ॥ १ ॥ १॥ * रा० राजगृह ण नगर स० समवसरण १० परिपदाणि निर्गता जा. यावत् ए. ऐमा २० कहा जी० गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदइ णमंसइ, वंदित्ता णमंसित्ता संजमेणं तवसाअप्पा- णं भावमाणे विहरइ इति पढमसए पढमोदेसो सम्मत्तो ॥ १ ॥ १ ॥ रायगिहे णयरे, समोसरणं, परिसा णिग्गया जाब एवं. बयासी. जीवेणं भंते सय विभाथे वचनों को बहुत मान देकर गौतम स्वामीने श्री श्रमण भगवन्त महावीर को वंदना नमस्कार किया, वंदना नमस्कार कर के संयम व तपसे आत्मा के स्वरूप को विचारते हुवे विचरने लगे यह पहिला शतक का पहिला उद्देशा संपूर्ण हुआ. ॥ १ ॥१॥ गत उद्देश में कर्म के चलनादि प्रश्नोत्तर कहे हैं वे कर्म दुःखरूप होते हैं इसलिये आगे दुःख का प्रश्न करते हैं. राजगृह नगर के गुणशील नामक उद्यान में भगवन्त श्री महावीर स्वामी पधारे, परिपदा वांदने को आई, वाणी सुनकर परिपदा पीछीगई. उस समय श्री गौतम स्वामीने भगवन्त को प्रश्न पुछा कि अहो भगवन् ! जीव अपना किया हुवा दुःख षेदता है ? अहो गौतम ! किननेक सकृत कर्मवेदे, कित- > पहिला शतकका दूसरा उद्देशा 3> <3 + x अनुवादक-यालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक पिजी शब्दार्थ भनिक अ० अतीव उ सुंदर चि० हैं ए. ऐसे ते० उन वा० वाणव्यंतर दे० देवके दे० देवलोक जा जघन्य द० दशवर्प स० सहस्र ठि० स्थिति से उ० उत्कृष्ट प० पल्योपम ठि• स्थिनि से व• बहुत वा० चाणव्यंतर दे० देव दे० देवीसे आ० व्याप्त वि० विस्तीर्ण उ० आच्छादित सं० संस्तर्णि फु० स्पर्शे अ०॥ रहे गा० गुप्त सि० लक्ष्मी से अ० अतीत २ उ. सुंदर शोभते चि० हैं ए. ऐसे गो० गौतम ते. उन वा. वाणव्यंतर दे० देवके दे. देवलोक प० प्ररूपे सो० वह ते० इसलिये गो० गौतम एसा बु. कहा सुत्र णं देवाणं देवलोया जहण्येणं दस वास सहस्स ठिईएहि, उक्कोसेणं पलिओवमद्धिईए- हिं बहुहिं वाणमंतरेंहिं देवेहिय देवीहिया आतिण्णा, वितिण्णा, उवत्थडा सैथडा फु- डा, अवगाढगाढ सिरीए, अतीव अतीव उबसोभेमाणा उबसोभेमाणा चिट्ठति ॥• ए- रिसगाणं गोयमा ! तोप्तं वाणमंतराणं देवाणं देवलोगा. पण्णत्ता से तेणटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ जीवे णं असंजए जाव देवसिया ॥ ४५ ॥ सेवं भंते ! भंते ति भगवं गवार्थ संधारा जैसे विस्तीर्ण वने हुवे, आसन शयन रमण भाग से भोगवते व लक्ष्मी से अतीव सुशोभित रहे हुवे हैं. अहो गौतम ! उन वाणव्यंतर के ऐसे देवलोक कहे हैं. और इसी कारण से कितनेक असंयति जीव देवतापने उत्पन्न होवे और कितनेक उत्पन्न नहोवे ॥ ४५ ॥ अहो भगवन् जैसे मैंने पृच्छा की वेसे ही आपने प्रतिपादन किया है. आप जैसा कहते है; वैसा ही है अन्यथा नहीं है. इस प्रकार भगवन्त के * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * शब्दार्थ 88.2 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगरती ) सूत्र नहीं उदयमें आया वै० वेदे से वह ते० इसलिये एक ऐसा दु. कहा जाता है एक ऐसा च० चौवीस दं. दंडक को जा० यावत् वे० पैमानीक ज. जैसे दु० दुःख में दो दोभेद त० तैसे आ० आयुष्य में ए. एकवचन पो० पृथक ए० एक वचन से जाः यायतू ये वैमानिक पु० पृथक् तक ॥१॥णे० नारकी भं० भगवन् स० सर्व स० सरिखे आहारी स० सर्व स. सरिखे शरीरी स. सर्व स० सरिखे उपासनी जीवेणं भंते सयं कडं आउयं वेदेति? गोयमा! अत्थेगइयं वेदेति, अत्थेगइयं णोवेदेति जहा दुक्खणं दो दंडगा तहा आउएणवि. एगत्त पोहत्तिया, एगत्तेणं, जाव वे. माणिया पुहुत्तेणवि तहेव ॥ १ ॥ णेरइयाणं भंते सव्वे समाहारा सव्वे समसरीरा सव्वे समुस्सासणिस्सासा ? गोयमा णोइणढे रामटे ? सेकेणटेणं भंते एवं बुच्चइ णे- रइया णो सव्वे समाहारा णो सब्वे समुस्सासणिरसासा? गोयमा! णेरइयां दुविहा पण्ण नहीं. अहो भगवन् ! किसकारन से ? अहो गौतय ! उदय आयाहुवा वेदे और उदय में नहीं आयाहुवा वेदे नहीं इस कारण से कितनेक जीव स्वकृत आयुष्य वेदे और कितनेक वेदे नहीं. ऐसे ही अनेक जीव आ. श्रित जानना. और चौविस ही दंडक आश्रित दोनों बोल उतारना ॥ १ ॥ आयुष्य आहार के बलसे ही टिकता है इसलिये आहार संबंधी प्रश्न करते हैं अहो भगवन् ! क्या सब नारकी सारखे आहार करने वाले हैं ? क्या सव सरिखे शरीर वाले हैं ? क्या सब सरीखे श्वासोश्वास लेने वाले हैं ? अहो गौतम ! यह पाईला शतक का दूसरा उद्देशा भावार्थ OYO y १८ 3 अनुवादक-यालयलगरी मुनि श्री अमोलक ऋापिनी है। शब्दार्थ जीव भ० भगवन् स० स्वकृत दु० दुःख वे० वेदता है गो गौतम अ० कितनेक वे वेदे अ० किवनेक णो० नहीं वे० वेदे से वह केकीसतरह भ० भगान् ए. ऐसा बु. कहा जाता है अ० फितनेक वे० वेदे अ० कितनेक णो नहीं वेदे गो० गौतम उ० उदयमें आया ये बेदे णो० नहीं अ० कडं दुक्खं वेदेइ ? गोयमा ! अत्थेगइयं वेदेइ, अत्यंगइयं नो वेदेइ । सेकेणद्वेणं भंते सूत्र एवं वुच्चइ अत्यंगइयं वेदेइ अत्थेगइयं नोवेदेति ? गोयमा ! उदिण्णं वेदेति णो अ. णुदिण्णं वेदति, सेतेणद्वेणं एवं वुच्चइ गोयमा ! अत्थेगइयं वेदेइ, अत्थेगइयं णोवदेइ एवं चउवीसदंडएणं जाव वेमाणिए ॥ जीवाणं भंते सयं कई दुक्खं वेदेति ? गोयमा ! अत्यंगइया वेदेति, अस्थेगइया णो वेदेति. । से केणट्रेणं भंते एवं वुच्चइ ? गोयमा : उदिण्णं वेदेति. णो अणुदिण्णं वेदेति ॥ एवं जाव वेमाणिया रावार्थ निक स्वकृत कर्मवेदे नहीं. अहो भगवन् ! किस कारन से कितनेक स्वकृत कमाँ वेदते हैं और कितनेक नहीं वेदते हैं. अहो गौतम ! उदय में आये हुये कर्म वेदते हैं और उदय में नहीं आये हुरे कर्म नहीं वेदते हैं और इसी कारण से ऐता कहा है कि कितनेक जीव स्वकृत दुःखदे और कितनेक जीव स्वकृत दुःख नहीं वेदे. ऐसे ही पृथक् २ चौविसही दंडक आश्रित जानना. उपर जैसे एक जीन आश्रित कहा है वैसेही अनेक जीव आश्रित जानना. अहो भगवन् जीव स्वकृत आयुष्य वेदे ? अहो गौतम ! कितनेक वेदे और कितनेक वेदे प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायनी मालामसादजी शब्दार्थ ५९ 38 पंचमाङ्ग विवाह पुण्णत्ति (भगवती ) सूत्र 989 नहीं उदयमें आया वे वेदे से वह ते. इसलिये एक ऐसा वु. कहा जाता है एक ऐसा च० चौवीस दं. दंडक को जा. यावत् वे० पैमानीक ज० जैसे दु० दुःख में दो दोभेद त० तैसे आ० आयुष्य में ए. एकवचन पो• पृथक ए० एक वचन से जा. यावत् वे वैमानिक पु० पृथक् तक ॥१॥.. नारकी भ० भगवन् स० सर्व स० सरिखे आहारी स० सर्व स० सरिखे शरीरी स० सर्व स० सरिखे ऊन्चासनी जीवेणं भंते सयं कडं आउयं वेदति? गोयमा! अत्थेगइयं वेदेति, अत्थेगइयं णोवेदेति जहा दुक्खणं दो दंडगा तहा आउएणवि. एगत्त पोहत्तिया, एगत्तेणं, जाव वे- माणिया पुहुत्तेणवि तहेव ॥ १ ॥णेरइयाणं भंते सव्वे समाहारा सन्चे समसरीरा सव्वे समुस्सासणिस्सासा ? गोयमा णोइणढे समढे ? सेकेण?णं भंते एवं बुच्चइ णे- रइया णो सव्वे समाहारा णो सब्बे समुस्सासणिस्सासा? गोयमा! णेरइयां दुविहा पण्ण नहीं. अहो भगवन् ! किसकारन से ? अहो गौतम ! उदय आयाहुवा वेदे और उदय में नहीं आयाहुवा बेदे नहीं इस कारण से कितनेक जीव स्वकृत आयुष्य वेदे और कितनेक वेदे नहीं. ऐसे ही अनेक जीव आ. श्रित जानना. और चौविस ही दंडक आश्रित दोनों बोल उतारना ।। १ ॥ आयुष्य आहार के बलसे ही टिकता है इसलिये आहार संबंधी प्रश्न करते हैं अहो भगवन् ! क्या सब नारकी सारखे आहार करने वाले हैं ? क्या सव सरिखे शरीर वाले हैं ? क्या सब सरीखे श्वासोचाप्त लेने वाले हैं ? अहो गौतम ! यह < पाईला शतक का दूसरा उद्देशा 889823 भावार्थ ५८ ! अनुवादक-पालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ जीव भं० भगवन् स० स्वकृत दु० दुःख वे. वेदता है गो गौतम अ० कितनेक वे वेदे अ० किवनेक णो० नहीं वे वेदे से वह के. कीसतरह भं० भगवन् ए. ऐसा बु. कहा जाता है अ० कितनेक वे वेदे अ० कितनेक णो नहीं वेदे गो० गौतम उ० उदयमें आया वे बेदे णो नहीं अ० कडं दुक्खं वेदेइ ? गोयमा ! अत्थेगइयं वेदेइ, अत्थगइयं नो वेदेइ । सेकेणद्वेणं भंते सूत्र एवं वुच्चइ अत्यैगइयं वेदेइ अत्थेगइयं नोवेदेति ? गोयमा ! उदिण्णं वेदति णो अ- णुदिण्णं वेदेति, सेतेणटेणं एवं वुच्चइ गोयमा ! अत्थेगइयं वेदेइ, अत्थेगइयं जोवेदेइ एवं चउवीसदंडएणं जाव वेमाणिए ॥ जीवाणं भंते सयं कहं दुक्खं वेदेति ? गोयमा ! अत्थेगइया वेदेति, वेदेति, अत्थेगइया णो वेदेति. । से केणटेणं भंते एवं वुञ्चइ ? गोयमा : उदिण्णं वेदेति. णो अणुदिण्णं वेदेति ॥ एवं जाव' वेमाणिया भावार्थ नेक स्वकृत कर्मवेदे नहीं. अहो भगवन् ! किस कारन से कितनेक स्वकृत कौ चेदते हैं और कितनेक नहीं वेदते हैं. अहो गौतम ! उदय में आये हुये कर्म वेदते हैं और उदय में नहीं आये हुवे कर्म नहीं वेदते हैं और इसी कारण से ऐता कहा है कि कितनेक जीव स्वकृत दुःखरेदे और कितनेक जीव स्वकृत दुःख नहीं वेदे. ऐसे ही पृथक् २ चौविसही दंडक आश्रित जानना. उपर जैसे एक जीन आश्रित कहा है वैसेही अनेक जीव आश्रित जानना. अहो भगवन् जीव स्वकृत आयुष्य वेदे ? अहो गौतम ! कितनेक वेदै और कितनेक दे * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * . शब्दार्थ ५९ सन्न 838 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती ) सूत्र 888 नहीं उदयमें आया वे वेदे से वह ते० इसलिये एक ऐसा वु. कहा जाता है एक ऐसा च० चौवास दं दंडक को जा० यावत् वे० वैमानीक ज० जैसे दु० दुःख में दो दोभेद त तैसे आ० आयुष्य में ए. एकवचन पो० पृथक् ए० एक वचन से जा० यावत् वे वैमानिक पु० पृथक् तक ॥ १॥णे० नारकी भं० भगवन् त सर्व स० सरिखे आहारी स० सर्व स० सरिखे शरीरी स. सर्व स० सरिखे आश्वासनी जीवेणं भंते सयं कडं आउयं वेदेति? गोयमा! अत्थेगइयं वेदेति, अत्थेगइयं णोवेदेति जहा दुक्खणं दो दंडगा तहा आउएणवि. एगत्त पोहत्तिया, एगत्तेणं, जाव वे- माणिया पुहुत्तेणवि तहेव ॥ १ ॥णेरइयाणं भंते सव्वे समाहारा सव्वे समसरीरा सन्चे समुस्सासणिस्सासा ? गोयमा णोइणटे समढे ? सेकेणटेणं भंते एवं बुच्चइ णे- रइया णो सव्वे समाहारा णो सबै समुस्सासणिस्सासा? गोयमा! णेरइयां दुविहा पण्ण नहीं. अहो भगवन् ! किसकारन से ? अहो गौत्तम ! उदय आयाहुवा बेदे और उदय में नहीं आयाहुवा वेदे नहीं इस कारण से कितनेक जीव स्वकृत आयुष्य वेदे और कितनेक वेदे नहीं. ऐसे ही अनेक जीव आ- श्रित जानना. और चौविस ही दंडक आश्रित दोनों बोल उतारना ॥१॥ आयुष्य आहार के वलसे ही दिकता है इसलिये आहार संबंधी प्रश्न करते हैं अहो भगवन् ! क्या सब नारकी सारखे आहार करने वाले हैं ? क्या सब सरिखे शरीर वाले हैं ? क्या सव सरीखे श्वासोश्वास लेने वाले हैं ? अहो गौतम ! यह BS पाईला शतक का दूसरा उद्देशा 89 भावार्थ 4. अनुवादक-बालब्रह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 शब्दार्थ) वासले गो. गौतम णो नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ से० वह के. कैसे भ० भगवन् ए. ऐप्ता यु० कहा जाता है ण नारकी णो नहीं स० सर्व स० समाहारी णो नहीं स० सर्व म० समशरीरी णो नहीं स० सर्व स० सरिखा उ० उश्वास णि निश्वासले गो० गौतम णे० नारकी दु० दोपकार के प० प्ररूपे म० महा शरीरी अ० अल्प शरीरी त० तहां जे० जो म० महा शरीरी ते० वे व० बहुत पो० पुद्गल आ० आहार सूत्र त्तातंजहामहासरीराय अप्पसरीराय।तत्थणं जेते महासरीरा ते बहुतराए पोग्गले आहारैति, बहुतराए पोग्गले परिणामति, बहुतराए पोग्गले ऊससंति, बहुतराए पोग्गले णीससंति, अ- भिक्खणं आहारैति, अभिक्खणंपरिणामेति,आभिक्खणं ऊससंति, आभिक्खणं णीससंति,॥ तत्थणं जेते अप्पसरीरा तेणं अप्पंतराए पोग्गले आहारति, अप्पतराए पोग्गले परिणामति, भावार्थ अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! किस कारन से सब नारकी सारखे आहार, शरीर, श्वासोश्वास वाले नहीं है ! अहो गौतम ! नारकी दोप्रकार के कहे हैं. १ बडे शरीर वाले और २ छोटे शरीर वाले. * जो वडे शरीर वाले हैं. वे बहुत दुःखी होते हुवे बहुत पुद्गलों का आहार करे, बहुत पुद्गलों परिणमावे बहुत पुद्गलों को उश्वास रूप से ग्रहण करे, बहुत पुद्गलों को निश्वासरूप से नीकाले और भी वारंवार * नारकी की भवंधारनीय अवगाहना जघन्य अंगुलका असंख्यात वा भाग उत्कृष्ट ५०० धनुष्य और उत्तर वैक्रेय जघन्य अंगुल का अत्तख्यातवा भाग उत्कृष्ट एक हजार योजन प्रमाण. * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * पास लेते हैं व ८ 81 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती). सूत्र - शब्दार्थ करे ५० बहुत पो० पुद्गल प० परिणमे २० बहुत पो. पुद्गल ऊ० अश्वारो २० बहुत पो० पुद्गल का णी निवास ले अ. वारंवार आ० आहारले अ० वारंवार परिणमे अ० वारंवार ऊ० अश्वासले अ० वारंवार णी निश्वासले त. तहां जे. जो० अ० अल्प शरीरी तेचे अ० थोडा पो० पुद्गल आ० आहार करे अ० थोडा पो० पुद्गल परिणमें अ० थोडे पो० पुद्गल ऊ० उश्वासले अ० थोडे पो० पुद्गल नी० निश्वासले ॥ २ ॥णे० नारकी भ० भगवन स० सर्व स० समकर्म वाले गो. गौतम णो नहीं इ० अप्पतराए पोग्गले ऊससंति, अप्पतराए पोग्गले णीससंति । आहच आहारैति, आहच्च परिणामेति, आहच्च ऊससंति, आहच्च णीससंति. से तेण?णं गोयमा ! एवं वुच्चइ, णेरइया णो सब्वे समाहारा, जाव णो सव्वे समुस्सास णीसासा ॥ २ ॥णे- रइयाण मंते सम्बे समकम्मा ? गोयमा ! णोइणढे समढे, । सेकेणटेणं भंते एवं भावार्थ आहारकरे, वारंवार परिणमावे, वारंवार श्वासलेवे, वारंवार श्वास नीकाले, और जो छोटे शरीर वाले वे अल्प पुद्गलों का आहार करते हैं, अल्प पुद्गलों परिणमाते हैं, अल्प पुद्गलों का वासलेते हैं, अल्प श्वास नीकालते हैं. इसलिये अहो गौतम ! ऐसा कहा है कि सब नारकी एक सरिखे शरीर, आहार उवास, निधासवाले नहीं हैं ॥२॥ अहो भगवन् ! क्या सब नारकी सरीखे कर्म वाले हैं ? अहो 8. पहिला शतक का दूसरा उद्देशा 182382 सुन . 3. अनुवादक बालबाह्मचारीमुनि .श्री अमोलक ऋपिनी 8 भावार्थ शब्दार्थ यह अर्थ स० समर्थ से वह के कैसे भ० भगवन् ए. ऐसा वु. कहा जाता है गो० गौतम णे नारकी दु० दोप्रकार के पु० पहिले के उत्पन्न प० पश्चात् उ० उत्पन्न त० तहां जे० जो पु० पूर्वोत्पन्न- ते. वे अ० अल्प कर्म वाले त० तहां ज० जो प० पश्चात् उ उत्पन्न ते वे म० महाकर्म वाले ॥३॥ वुच्चइ? गोयमा ! णेरइयादुविहाप.तं. पुच्चोववण्णगाय पच्छोववण्णगाय तत्थणं जे ते : पुव्वोचवण्णगा तेणं अप्पकम्मतरा तत्थणं जे ते पच्छोववण्णगा तेणं महाकम्मतरा सेतेणटेणं गोयमा एवं बुच्चइ ॥ ३ ॥ णेरइयाणं भंते.सत्वे समवण्णगा? गोय- गौतम ? यह अर्थ योग्य नहीं हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से यह अर्थ योग्य नहीं है ? अहो गौतम! नारकी के दो भेद १ पूर्वोत्पन्न पहिले उत्पन्न हुवे २ पश्चादुत्पन्न-पीछे से उत्पन्न हुवे उस में जो पहिले उत्पन्न हुवे हैं वे अल्पकर्यवाले हैं क्योंकी उनों ने आयुःकर्म तथा अन्य कर्म भेदे हुवे हैं व जो पीछे उत्पन्न हुवे हैं वे बहुत कर्मवाले हैं क्योंकी उनों ने आयुष्य कर्म बहुत थोडा ..छेदा हुवा है + इमलिये सब नारकी सरीखे कर्म वाले नहीं हैं. ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! क्या सर नारकी सरीखे यहां सरिखि स्थिति वाले नारको को अंगीकार करके. यह सूत्र कहा है; अन्यथा कोई एक सागरोपम की स्थिति वाला नारकी बहुत स्थिति भोगव कर शेप एक पल्योपम रहे पीछे दूसरा दश हजार वर्ष की स्थिति वाला नारकी उत्पन्न होवे तो; क्या पहिले उत्पन्न हुवा शेष फ्ल्योपमके आयुष्य वाला नारकी प्रकाशक:राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी चालाप्रसादजी M १.383 पंचमांग विवाह पण्णति (भगरती) सूत्र 8-882 ब्दार्थ नारकी भ भगवन् स. सर्व स० समवर्णवाले गो० गौतम णों नहीं इ० या अर्थ स० समर्थ से वह के० कैसे गो० गौतम जे. जो पु० पूर्वोत्पन्न ते वे वि० विशुद्ध वर्णवाले त० तैसेही से. यह ते इसलिये ॥ ४ ॥णे० नारकी भ० भगवन् स० सर्व स० सम लेश्यावाले गो० गौतम पो० नहीं इ. यह अर्थ स० समर्थ त० तहां जे० जो पु० पूर्वोत्पन्न ते वे वि० विशुद्ध लश्यावाले जे. जो प० पीछे मा ! णोइणढे समढे । सेकेण?णं तहचेव ? गोयमा ! जे ते पुन्वोक्वण्णगा तेणं विसुद्ध वण्णतरागा तहेव । सेतेणटेणं गोयमा ॥४॥णेरइयाणं भंते सव्वे सगलेस्सा ? गोयमा ! णोइणढे समढे । सेकेणटेणं जाव णो सव्वे समलेस्सा ? गोयमा ! परइया दुविहा पण्णत्ता तंजहा पुन्योववण्णगाय, पच्छोववण्णगाय तत्थणं जे ते पुन्बोव वार्थ वर्ण वाले हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं.क्या कारण से ? अहो गौतम ! नारकी के दो भेद पहिले उत्पन्न हुवे और पीछे उत्पन्न, जो पहिले उत्पन्न हुवे वे ,विशुद्ध वर्णवाले होते हैं, और पीछे जो उत्पन्न. हुवे हैं वे विशुद्ध वर्ण वाले नहीं हैं। इसलिये अहो गौतम ! सब नारकी सम वर्ण वाले नहीं हैं ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! सव नारकी मरिखि लेश्या वाले हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. क्या कारण से ? अहो गौतमी नारकी के दो भेद? पहिले उत्पन्न हुवे व २ पीछे उत्पन्न हुवे. जो पहिले उत्पन्न हुवे हैं वे विशुद्ध को आपेक्षा से दश हजार वर्ष की स्थिति वाला महाकर्मीहोसके ! अर्थात नहीं होवे. 3-8883 पहिला शतकका दूसग उद्देशा 988 00 O0 शब्दार्थ २ M सुत्र यह अर्थ स० समर्थ से वह के• कैसे भ० भगवन् ए. ऐसा वु. कहा जाता है .गो० गौतम : नारकी दु० दोपकार के पु० पहिले के उत्पन्न ५० पश्चात् उ० उत्पन्न त० तहां जे० जो पु० पूर्वोत्पन्न- ते. अ० अल्प कर्म वाले त० तहां ज० जो ५० पश्चात् उ उत्पन्न ते वे म० महाकर्म वाले ॥ ३॥ ० वुच्चइ? गोयमा ! णेरइयादुविहाप.तं. पुयोववण्णगाय पच्छोववण्णगाय तत्थणं जे ते. पुबोववण्णगा तेणं अप्पकम्मतरा तत्थणं जे ते पच्छोववण्णगा तेणं महाकम्मतरा सेतेणटेणं गोयमा एवं वुच्चइ ॥ ३ ॥ जेरइयाणं भंते.सव्वे समवण्णगा? गोय- गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से यह अर्थ योग्य नहीं है ? अहो गौतम! नारकी के दो भेद १ पूर्वोत्पन्न पहिले उत्पन्न हुवे २ पश्चादुत्पन्न-पीछे से उत्पन्न हुवे उस में जो पहिलं उत्पन्न हुवे हैं वे अल्पकर्मवाले हैं क्योंकी उनों ने आयुःकर्म तथा अन्य कर्म भेदे हुवे हैं व जो पीछे उत्पन्न हुवे हैं वे बहुत कर्मवाले हैं क्योंकी जनों ने आयुष्य कर्म बहुत थोडा , छेदा हुवा है * इमलिये सब नारकी सरीखे कर्म वाले नहीं हैं. ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! क्या सर नारकी सरीखे - यहां सरिखि स्थिति वाले नारकी को अंगीकार. करके. यह सूत्र कहा है; अन्यथा कोई एक सागरोपम की स्थिति वाला नारकी बहुत स्थिति भोगव कर शेप एक पल्योपम रहे पीछे दूसरा दश हजार वर्ष की स्थिति वाला नारकी उत्पन्न होवे तो; क्या पहिले उत्पन्न हुवा शेप पल्योपमके आयुष्य वाला नारकी 18. अनुवादक बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी २. प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ ? <3.88 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 3985 शब्दार्थ है जो सं० संत्री ते वे म० बहुतपेदना वाले जे. जो अ० असंज्ञी थोडीवेदनावाले ॥६॥णे नारकी०म-3 गवन् स० सर्व स० समक्रियावाले गो गौतम नो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थःणे नारकी ति तीन प्रकार केस० सम्यक् दृष्टि मि० मिथ्यादृष्टि स० सममिथ्यादृष्टिजेजोस० समष्टि ते० उन को च० चारक्रिया प० प्ररूपी आ० ते असण्णिभूया तेणं अप्पवेयणतरागा से तेणटेणं गोयमा ॥ ६ ॥ गैरइयाणं भंते सूत्र सव्वे समाकरिया ? गोयमा ! णोइणढे समझे । सेकेणटेणं भंते ? गोयमा ! णेरइया तिविहा प० तं० सम्मदिट्ठीय, मिच्छाइट्ठीय, सम्ममिच्छद्दिट्ठीय । तत्थणं जेते सम्मदिट्ठी तेसिणं चत्तारि किरियाओ पण्णत्ताओ तं० आरंभिया, परिग्गहिया, ऐसा भी अर्थ करते हैं कि संज्ञी पंचेन्द्रिय नारकी में उत्पन्न होवे सो संज्ञीभूत वे बहुत वेदनावाले होवे भावाथे क्यों कि अशुभ अध्यवसाय मे बहुत अशुभ कर्म का बंध कीया और इस से नरक में उत्पन्न हुवे. और असंज्ञी पंचेन्द्रिय प्रथम नरक में असंज्ञीपने उत्पन्न होवे वे अल्प वेदनावाले होवे क्यों कि उनको अति तीव्र अशुभ अध्यवसाय नहीं होते हैं. अथवा संज्ञीभूत तो पर्याप्ता बहुत वेदनावाले और असंज्ञीभूत सो अपर्याप्ता अल्पवेदना वाले, इसलिये अहो गौतम ! सव नारकी सरिखी वेदनापाले नहीं हैं ॥ ६॥ अहो भगवन् ! सब नारकी सम क्रियावाले हैं ? अहो गौतम यह अर्थ योग्य नहीं हैं. क्यों कि नारकी के तीन भेद कहे हैं. १ समदृष्टी, २ मिथ्यादृष्टी ३ सममिथ्यादृष्टि. उस में जो समदृष्टी हैं उन को चार <883> पहिला शतक का दूसरा उद्देशा8784 ..
43 अनुवादक-पालबह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 उत्पन्न हुवे ते वे अ० अविशुद्ध लेश्यावाले ॥ ५ ॥णे. नारकी भ• भगवन स० सर्ने स० समवेदनावाले ब्दिाथ गो० गौतम णो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ णे० नारकी दु. दोपकार के स० संज्ञी अ० असंजी वण्णगा तेणं विसुद्धलेसतरागा । तत्थणं जे. ते पच्छोववष्णगा तेणं अविसुद्ध सूत्र लेसतरागा । सेतेण?णं गोयमा! ॥ ५ ॥णेरइयाणं भंते सव्वे समवेदणा ? गोय- मा ! णोइण? समढे । सेकेणटेणं भंते ? गोयमा ! गैरइया दुविहा पण्णत्ता तंजहा सणिभूयाय, असण्णिभूयाय । तत्थणं जेते सपिणभूया तेणंमहावेदणा, तत्थणं जे लेश्या वाले होते हैं; क्यों की उन को अल्प कर्म रहते हैं और जो पीछे उत्पन्न हुचे हैं वे · अशुद्ध लेश्या भावार्थ वाले हैं क्यों कि उन को बहुत कर्म रहते हैं इसलिये अहो गौतम ! सब नारकी सरिखी लेश्या वाले नहीं हैं ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! सब नारकी को सरिखी वेदना है ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं. किस कारण से ? अहो गौतम ! नारकी के दो भेद १ संज्ञीभूत सो समदृष्टि व असंज्ञीभूत सो मि- ध्यादृष्टि. उस में जो भज्ञी भूत समदृष्टि हैं चे बहुत वेदना वाले हैं क्यों कि सम्यम् ज्ञान से पूर्वकृत कर्म विपाक की स्मृति होनेसे अती दुःख होवे और पश्चाताप करे कि मैंने अरिहंत परूपित धर्म पाला नहीं इस कारण से उन को मानसिक दुःख बहुत होये. और जो असंझीभूत-मिथ्यादृष्टि हैं वे अल्पवेदना वाले हैं क्यों कि वे अपने कृतकर्म को नहीं जानते हैं इस से उन को मानसिक दुःख अल्प रहता है. कितनेक * प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी * 588 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 988 शब्दार्थ जे. जो सं० संज्ञी ते वे म० बहुतपेदना वाले जे० जो अ० असंज्ञी योडीवेदनावाले ॥६॥णे नारकीभ०म-3 गवन् स० सर्व स० समक्रियावाले गो गौतम नो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थणे नारकी ति तीन प्रकार केस सम्यक् दृष्टि मि० मिथ्यादृष्टि स० सममिथ्यादृष्टि ने जोस० ससहष्टि ते उन को च० चारक्रिया प० प्ररूपी आ० ते असण्णिभूया तेणं अप्पवेयणतरागा से तेणटेणं गोयमा ॥ ६ ॥ णेरइयाणं भंते सूत्र सव्वे समाकरिया ? गोयमा ! णोइणटे समटे । सेकेणटेणं भंते ? गोयमा ! णेरइया तिविहा प० तं० सम्मविट्ठीय, मिच्छाईट्ठीय, सम्ममिच्छट्ठिीय । तत्थणं जेते सम्मट्ठिी तेसिणं चत्तारि किरियाओ पण्णत्ताओ तं• आरंभिया, परिग्गहिया, ऐसा भी अर्थ करते हैं कि संज्ञी पंचेन्द्रिय नारकी में उत्पन्न होवे सो संज्ञीभूत वे बहुत वेदनावाले होवे भावार्थ क्यों कि अशुभ अध्यवसाय से बहुत अशुभ कर्म का बंध कीया और इस से नरक में उत्पन्न हुवे. और असंज्ञी पंचेन्द्रिय प्रथम नरक में असंज्ञीपने उत्पन्न होवे वे अल्प वेदनावाले होवे क्यों कि उनको अति तीव्र अशुभ अध्यवसाय नहीं होते हैं. अथवा संज्ञीभूत तो पर्याप्ता बहुत वेदनावाले और असंज्ञीभूत सो अपर्याप्ता अल्पवेदना वाले, इसलिये अहो गौतम ! सब नारकी सरिखी वेदनावाले नहीं हैं ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! सव नारकी. सम क्रियावाले हैं ? अहो गौतम यह अर्थ योग्य नहीं हैं. क्यों कि नारकी के तीन भेद कहे हैं. १ समदृष्टी, २ मिथ्यादृष्टी ३ सममिथ्यादृष्टि. उस में जो समदृष्टी हैं उन को चार 883> पहिला शतक का दूसरा उद्देशा8787 शब्दार्थ सूत्र अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 भावार्थ आरंभिकी प०५० पारिग्रहिकी मा० मायाप्रत्ययिकी अ० अप्रत्याख्यानक्रिया मि० मिथ्यादृष्ठि को पं० पांच क्रिया आ० आरंभिकी जा० यावत् मि० मिथ्यादर्शन प्रत्यायकी ए०ऐसे स० सममिथ्या दृष्टि को भी ॥ ७ ॥णे० नारकी भ० भगवन् स० सर्व स० सम आयुष्यवाले स० सम उत्पन्न गो० गौतम णो० नहीं मायावत्तिया, अपच्चरखाणकिरिया, । तत्थणं जे ते मिच्छट्ठिी तेसिणं पंचकिरिया ओ कजति तं० आरंभिया जाव मिच्छादसणवत्तिया । एवंसम्मामिच्छद्दिट्ठीणंपि. सेतेण?णं गोयमा ॥७॥ णेरइयाणं भंते सव्वेसमाउया सवे समोववण्णगा? गोयमा! क्रिया लगती हैं । पृथिव्यादिक का आरंभसो आरंभिकी २ शरीरादिपर ममत्व सो पारिग्रहिकी ३ वक्रपना व क्रोध, मान व माया युक्त स्वभावसो मायाप्रत्यायकी और ४ निवृत्ति के अभाव से जो क्रिया लगेसो अप्रत्याख्यान.मिध्यादृष्टी नारकी को पांच क्रिया लगे. उक्त चार क्रियायों में मिथ्यादर्शन प्रत्यायिक क्रिया बदी. और ऐसे ही समपिथ्यादृष्टी को जानना. इस कारण से अहो गौतम ! नारकी को सरिखि क्रिया नहीं हैं. ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! सब नारकी सरीखे आयुष्य वाले हैं ? और सब सरीखे-एक साथ उत्पन्न होनेवाले हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं. अहो भगवन् ! किस कारण से यह अर्थ योग्य नहीं हैं ? अहो गौतम ! नारकी के चार भेद कहे हैं. ? कितनेक संम आयुष्य वाले और एक साथ उत्पन्न होनेवाले हैं २ कितनेक. सम आयुप्यवाले हैं विषम उत्पन्न होते हैं अर्थात् * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ya * शब्दार्थ सूत्र ११ पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र - इ० यह अर्थ म० समर्थ णे. नारकी च० चार प्रकार के अ० कितनेक स० सम आयुष्यवाले स० समोत्पन्न अ० कितनेक स. सम आयुष्यवाले वि. विपमो उत्पन्न अ० कितनेक वि० विषम आयुष्यवाले स० समोत्पन्न अ० कितनेक वि विपम आयुष्यवाले वि० विपभत्पन्न ॥ ८॥ अ० असुरकुमार भं० भगवन स० सर्व स० सम आहारी स० सर्व स० सम शरीरी ज० जैसे • नारकी त० तैसे भा० कह- णोइणटे समढे। सेकेणटेणं भंते एवं बुच्चइ ? गोयमा! णेरइया चउन्विहा प०२० अत्थे गइया समाउया समोरवण्णगा, अत्थेगइया समाउया विसमोववण्णगा, अत्थेगइया विसमाउया समोववण्णगा, अत्थेगइया विसमाउया विसमोववण्णगा, सेतेणटेणं गोयमा ॥८॥ असुरकुमाराणं भंते सव्वे समाहारा सब्वे समसरीरा ? जहा णेरइया एक साथ नहीं उत्पन्न होते हैं कितनेक विपम आयुष्यवाले हैं और एक साथ उत्पन्न होने वाले हैं। कितनेक विषम आयुष्य वाले हैं और विपम उत्पन्न होने वाले हैं, इसलिये अहो गौतम ! सब नारकी एक सरिखे आयुष्य व एक साथ उत्पन्न होने वाले नहीं ॥ ८॥ अहो भगवन् ! असुरकुमार जाति के सब देवता क्या सरिसे आहार वाले व सरिखे शरीर वाले हैं ? अहो गौतम जैसे नारकी का कहा पैसेही यहां कहना. विशेष इतनाही कि असुरकुमारको भवधारणीय शरीरकी अवगाहना जघन्य अंगुलका असंख्यात वे भाग उत्कृष्ट सात हाथकी और उत्तर वैक्रेय जयन्य अंगुलका असंख्यात वा भाग उत्कृष्ट एकलक्ष योजनकी.जो महाशरीर वाले होते 23. पहिला शतक का दूसरा उद्देशा ><BRE भावार्थ ६ सूत्र . अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 शब्दार्थ आरंभिकी ५० ५० पारिग्रहिकी मा० मायामत्ययिकी अ० अप्रत्याख्यानक्रिया मि० मिथ्यादृष्टि को पं. पांच क्रिया आ० आरंभिकी जा० यावत् मि० मिथ्यादर्शन प्रत्यायकी ए०ऐसे स० सममिथ्या दृष्टि को भी ॥ ७॥णे. नारकी भ० भगवन् स० सर्व स० सम आयुष्यवाले स० सम उत्पन्न गो० गौतम णो० नहीं मायावत्तिया, अपचक्खाणकिरिया, । तत्थणं जे ते मिच्छट्टिी तेसिणं पंचकिरिया ओ कजति तं• आरंभिया जाव मिच्छादसणवत्तिया । एवंसम्ममिच्छदिट्ठीणंपि. सेतेणटेणं गोयमा ॥७॥ गेरइयाणं भंते सव्वेसमाउया सव्वे समोववण्णगा? गोयमा! भावार्थ क्रिया लगती हैं । पृथिव्यादिक का आरंभसो आरंभिकी २ शरीरादिपर ममत्व सो पारिग्रहिकी ३ वझपना व क्रोध, मान व माया युक्त स्वभावसो मायाप्रत्यायकी और ४ निवृत्ति के अभाव से जो क्रिया लगेसो अप्रत्याख्यान. मिथ्यादृष्टी नारकी को पांच क्रिया लगे. उक्त चार क्रियायों में मिथ्यादर्शन प्रत्यायक क्रिया यदी. और ऐसे ही समपिथ्यादृष्टी को जानना. इस कारण से अहो गौतम ! नारकी को सरिखि क्रिया नहीं हैं. ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! सब नारकी सरीखे आयुष्य वाले हैं ? और सब सरीखे-एक साथ उत्पन्न होनेवाले हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं. अहो भगवन् ! किस कारण से यह अर्थ योग्य नहीं है ? अहो गौतम ! नारकी के चार भेद कहे हैं. १ कितनेक संप आयुष्य वाले हैं और एक साथ उत्पन्न होनेवाले हैं २ कितनेक. सम आयुप्यवाले हैं विषम उत्पन्न होते हैं अर्थात् * मकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * १७ सूत्र पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र -888 इ० यह अर्थ म० समर्थ णे० नारकी च० चार प्रकार के अ. कितनेक स० मम आयुष्यवाले स० समोत्पन्न अ० कितन्क स० सम आयुष्यवाले वि. विपमो उत्पन्न अ कितनेक वि० विपम आयुष्यवाले स० समोत्पन्न अ० कितनेक वि. विपम आयुष्यवाले वि० विषभत्पन्न ॥ ८॥ अ० असुरकुमार भं० भगवन् स० सर्व स० सम आहारी स० सर्व स. सम शरीरी ज० जैसे णे. नारकी त० तैसे भा० कह-०७ णोइणढे सम8। सेकेणतुणं भंते एवं बुच्चइ ? गोयमा! णेरइया चउन्विहा प०० अत्थे गझ्या समाउया समोक्वण्णगा, अत्थेगइया समाउया विसमोववण्णगा, अत्थेगइया विसमाउया समोववण्णगा, अत्थेगइया विसमाउया विसमोववण्णगा, सेतेणटेणं गोयमा ॥८॥ असुरकुमाराणं भंते सव्वे समाहारा सन्चे समसरीरा ? जहा णेरइया एक साथ नहीं उत्पन्न होते हैं कितनेक रिपम आयुष्याले हैं और एक साथ उत्पन्न होने वाले हैं। कितनेक विषम आयुष्य वाले हैं और विपम उत्पन्न होने वाले हैं, इसलिये अहो गौतम ! सब नारकी एक सरिखे आयुष्य व एक साथ उत्पन्न होने वाले नहीं ॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! असुरकुमार जाति के सब देवता क्या सरिसे आहार वाले व सरिखे शरीर वाले हैं ? अहो गौतम जैसे नारकी का कहा वैसेही यहां कहना. विशेष इतनाही कि अमुस्कुमारको भवधारणीय शरीरकी अवगाहना जघन्य अंगुलका असंख्यात वे भाग उत्कृष्ट सात हाथकी और उत्तर वैक्रेय जयन्य अंगुलका असंख्यात वा भाग उत्कृष्ट एकलक्ष योजनकी.जो महाशरीर वाले होते 33 पहिला शतक का दूसरा उद्देशा 9><SPAR भावार्थ ६८ ॐ अनुवादक-पालग्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 85 शब्दार्थना ण विशेष क कर्म व०वर्ण ले लेश्या प०कहना पु पूर्वोपन्न म०बहुत कर्मवाले अ०अविशुद्धवर्णवाले अ अविशुद्ध लेश्यावाले प०पीछे उत्पन्न हुवे प प्रशस्त से शेष ते तैसे एक ऐसे जा० यावत् थस्थनित कुमार तहा भाणियव्या, णवरं कम्म, वण्ण, लेस्साओ, परिवण्णेयवाओ पुबोववण्णगा सूत्र महाकम्मतरा, अविसुद्ध वण्णतरा, अविसुद्ध लेसतरा, पच्छोववष्णगा पसत्या से- संतंचेव. एवं जाव थणियकुमाराणं ॥ ९ ॥ पुढविकाइयाणं आहारकम्म वण्ण लेस्सा भावार्थ हैं वे बहुत पुद्गलों का आहार करते हैं, और जो छोटे शरीर वाले होते हैं वे अला पुद्गलों का आहार करते हैं. जघन्य चतुर्थभक्त उत्कृष्ट एक हजार वर्ष में आहार की इच्छा उत्पन्न होते. जघन्य सातस्तोक में उत्कृष्ट एकपक्ष में श्वासोश्वास लेते हैं, जो पहिले उत्पन्न हुवे हैं वे महाकर्मी, अविशुद्ध वर्ण वाले, अविशुद्धले श्या वाले हैं और जो पीछे उन्पन्न हुवे हैं वे अल्प कर्म वाले, विशुद्ध वर्ण व विशुद्ध लेश्या वाले हैं. क्यों की पहिले उत्पन्न हुवे देवताओ अतिलुब्धता से दीव्य सुखों को भोगवकर बहुत शुभ कर्म का क्षय करते हैं और अशुभ कर्म का संचय करते हैं इस से किननेक तियेच पृथ्वी पानी वनस्पति में उत्पन्न होते और पीछे से उत्पन्न होने वाले के पुण्य के दल रह जाने से विशुद्ध वर्ण लेश्या वाले.होते हैं शेप सब अधिकार नारकी जैसे कहना जैसे असुरकुमार का कहा वैसे ही स्तनित कुमार-का जानना. ॥ ९ ॥ पृथ्वी * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * :- सूत्र पंचांग विवाद पपणति ( भगवती) मूम 3> <TOR Taagin 2 || पु० पृथ्वी काया को त्रा० आहार क• कर्म व० वर्ण न्द्रेश्या ज जैसे नारकी पुः पृथ्वीकाया में भगवन् म मर्व स० समवेदना वाले ह. हा म ममवेदना पाले मे वह के कैसे गो गौनम पु. पृथ्वीकाया म म अ असान्ने य. निद्धारविना वेवेदने हैं से बह ने इसलिये पु-पृथ्वीकाया मं० भगवन् म. सर्व मा ममक्रियावाले हैं. हां मा सरक्रिया बाले में वह के कैसे पु• पुथ्वी काया गो गौतम म. सर्व पा. मायी मि० पिच्यादृष्टि में निरंतर पं. पांचक्रिया क करनेआ. प्रागमिकी जहा णेरझ्याणं, पुढाविकाइयाणं भंते सन्चे समवेदणा? हंता समवदणा से केण?णं मंते सन्चे समवेयणा ? गोयमा ! पुद्धविकाझ्या सब्वे असण्णिभृया, अणिदाए वेदर्ण वेदति सेतेणटुंणं । युविकाझ्याणं भंते सव्व समकिरिया ? इंता समकिरिया ! सेकेण- ट्रेणं मंते पुढविकाझ्या ? गोयमा ! पुढविकाझ्या सब्वे माईमिछट्ठिी तागणेय- काया को आहार, कम, वर्ण, व लेय्या नारकी जैसे कहना. अहो मगवन् ! क्या मत्र पृथ्वीकायिक जीव समवेदना वाले है. गौतम मव पृथ्वी कायिक जीव ममवेदनावाले हैं. अटो भगवन् !किन नरहने वे मव मवेदना वेदते है ! अहो गाना ! मत्र पृथ्वीकायिक अमंत्री यून होने में निचोर बिना बेदना वेदते हैं परंतु कर्य पहिले के आर्जित है बैगा जाने नही इमलिय अहो गोनम ! मत्र पृथ्वी कायिकजीव ममतेदना वेदने हैं. अहो भगवन् ! सब पृथ्वी कापिक जीव मरिन्ची क्रिया वाले हैं. ! हां गौतम व मत्र मग्विी < पहिला शतक का दसरा उद्देशा <ST ধাৰা ६८ शब्दार्थना ण विशेष क०कर्म व०वर्ण ले लेश्या प०कहना पु० पूर्वोत्पन्न म०बहुत कर्मवाले अअविशुद्धवर्ण वाले अ. अविशुद्ध लेश्यावाले प०पीछे उत्पन्न हुवे प प्रशस्त से शेष तं० तैसे एक ऐसे जा. यावत् थ०स्थनित कुमार सूत्र तहा भाणियव्या, णवरं कम्म, वण्ण, लेस्साओ, परिवण्णेयवाओ पुव्योववण्णगा महाकम्मतरा, अविसुद्ध वण्णतरा, अविसुद्ध लेसतरा, पच्छोववण्णगा पसत्या से- संतंचेव. एवं जाव थणियकुमाराणं ॥ ९ ॥ पुढविकाइयाणं आहारकम्म वण्ण लेस्सा to अनुवादक-यालयामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 85 भावाधा वे बहुत पुद्गलों का आहार करते हैं, और जो छोटे शरीर वाले होते हैं वे अलल पुद्गलों का आहार करते जघन्य चतुर्थभक्त उत्कृष्ट एक हजार वर्ष में आहार की इच्छा उत्पन्न होवे. जघन्य सातस्तोक में उत्कृष्ट एकपक्ष में श्वासोश्वास लेते हैं, जो पहिले उत्पन्न हुवे हैं वे महाकर्मी, अत्रिशुद्ध वर्ण वाले, अविशुद्धले श्या वाले हैं और जो पीछे उत्पन्न हुवे हैं वे अल्प कर्म वाले, विशुद्ध वर्ण व विशुद्ध लेश्या वाले हैं. क्यों की पहिले उत्पन्न हुवे देवताओ अतिलुब्धता से दीव्य सुखों को भोगवकर बहुत शुभ कर्म का क्षय करते हैं और अशुभ कर्म का संचय करते हैं इस से किननेक तियेच पृथ्वी .पानी वनस्पति में उत्पन्न होते हैं. और पीछे से उत्पन्न होने वाले के पुण्य के दलः रह जाने से विशुद्ध वर्ण लेश्या वाले होते. हैं शेष सब अधिकार नारकी जैसे कहना जैसे असुरकुमार का कहा वैसे ही स्तनित कुमार का जानना. ॥ ९ ॥ पृथ्वी * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * ६२ सूत्र g पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 8 ॥९॥ पु० पृथ्वी काया को आ० आहार क० कर्म व० वर्ण लेण्या ज. जैसे णे० नारकी पु-पृथ्वीकाया भ० भगवन् स० सर्व स० समवेदना वाले हैं. हा स० समवेदना वाले से वह के० कैसे गो० गौतम पु. पृथ्वीकाया स० सर्व अ० असज्ञि अ. निीरविना वे० वेदते हैं ऐ० वह ने० इसलिये पु• पृथ्वीकाया भं० भगवन् स० सर्व स० समक्रियावाले हैं. हां स सनक्रिया वाले से वह के• कैसे पु० पुथ्वी काया गो० गौतम स० सर्व मा० मायी मि० मिथ्यादृष्टि णे. निरंतर पं० पांचक्रिया का करते हैं आ० आरंभिकी जहा णेरइयाणं, पुढविकाइयाणं भंते सव्वे समवेदणा? हंता समवेदणा से केणटेणं भंते सव्वे समवेयणा ? गोयमा ! पुढविकाइया सव्रे असण्णिभूया, अणिदाए वेदणं वेदेति सेतेण?णं ।पुढविकाइयाणं भंते सव्वे समकिरिया ? हंता समकिरिया। सेकेण- टेणं भंते पुढविकाइया ? गोयमा ! पुढविकाइया सव्वे माईमिच्छट्ठिी ताणणेय- काया को आहार, कर्म, वर्ण, व लेश्या नारकी जैसे कहना. अहो भगवन् ! क्या सब पृथ्वीकायिक जीव समवेदना वाले हैं? गौतम सब पृथ्वी कायिक जीव समवेदनावाले हैं. अहो भगवन् ! किम तरहसे वे सब समवेदना वेदते हैं ? अहो गौतम ! सब पृथ्वीकायिक असंज्ञी भूत होने से निर्धार विना वेदना वेदते हैं परंतु ये कर्म पहिले के उपार्जित हैं वैसा जाने नहीं इसलिये अहो गौतम ! सब पृथ्वी कायिकजीव समवेदना वेदते हैं. अहो भगवन् ! सब पृथ्वी कायिक जीव सरिखी क्रिया वाले हैं. ! हां गौतम वे संब सरिखी 188889 पहिला शतक का दूसरा उद्देशा - भावार्थ शब्दार्थना विशेष ककर्म व०वर्ण ले लेश्या प०कहना पु० पूर्वोत्पन्न म०बहुत कर्मवाले अ०अविशुद्धवर्ण वाले अ. अपिशुद्ध लेश्यावाले प०पीछे उत्पन्न हुवे प प्रशस्त से शेप तं० तैसे एक ऐसे जा० यावत् २० स्थनित कुमार ६८ सूत्र तहा भाणियन्या, णवरं कम्म, वण्ण, लेस्साओ, परिवण्णेयवाओ पुब्बोचवण्णगा महाकम्मतरा, अविसुद्ध वण्णतरा, अविसुद्ध लेसतरा, पच्छोक्वण्णगा पसत्या से. संतंचेव. एवं जाव थणियकुमाराणं ॥ ९ ॥ पुढविकाइयाणं आहारकम्म वण्ण लेस्सा भावार्थ tos अनुपादक-बालग्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी ४ वे बहुत पुद्गलों का आहार करते हैं, और जो छोटे शरीर वाले होते हैं वे अल्स पुद्गलों का आहार करते हैं. जघन्य चतुर्थभक्त उत्कृष्ट एक हजार वर्ष में आहार की इच्छा उत्पन्न होवे. जघन्य सातस्तोक में उत्कृष्ट एकपक्ष में श्वासोचास लेते हैं, जो पहिले उत्पन्न हुवे हैं वे महाकर्मी, अविशुद्ध वर्ण पाले, अविशुद्धले श्या वाले हैं और जो पीछे उन्पन्न हुवे हैं चे अल्प कर्म वाले, विशुद्ध वर्ण व विशुद्ध लेश्या वाले हैं. क्यों की पहिले उत्पन्न हुवे देवताओ अतिलुब्धता से दीव्य सुखों को भोगवकर वहुत शुभ.. कर्म का क्षय करते हैं और अशुभ कर्म का संचय करते हैं इस से किननेक तिर्यंच पृथ्वी पानी वनस्पति में उत्पन्न होते और पीछे से उत्पन्न होने वाले के पुण्य के दल रह जाने से विशुद्ध वर्ण लेश्या वाले होते. हैं शेष सब अधिकार नारकी जैसे कहना जैसे असुरकुमार का कहा वैसे ही स्तनित कुमार का जानना. ॥ ९ ॥ पृथ्वी * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * ब्दार्थ मिथ्यादृष्टि स० सममिथ्यादृष्टि त तहां जे० जो सः समाष्ट ते वे दु० दोपकार के अ० असंयति सं० संयतासंयति त० तहां जे० जो सं० संयतासयति ते० उनको ति० तीन कि० क्रिया तं. वह ज जैसे आ० आरंभिकी प०पारिग्रहिकी मा० मायामत्ययिकी अ० असंयति को च. चार मि० ७१ सत्र पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 8882 रिया ? गोयमा ! णोइणढे समढे । सेकेण?णं भंते ? गोयमा ! पांचंदिय तिरिक्ख जो- णिया, तिविहा प० तं० सम्माद्दट्ठी, मिच्छट्ठिी ! सम्ममिच्छहिट्ठी, तत्थणं जे ते सम्माट्ठी ते दुविहा प.तं. असंजयाय, संजयासंजयाय, तत्थणं जे ते संजयासंजया तेसिणं तिण्णि किरियाओकजति, तंजहा-आरंभिया, परिग्गहिया, मायावत्तिया. असंज- भावार्थ पहिला शतक का दूसरा उद्देशा. छोटा शरीरको अपनी २ अवगाहना जैसे कहना. विकलेन्द्रियादिक को प्रक्षेप आहार होता है ॥ ११॥ तिर्यंच पंचेन्द्रिय नारकी जैसे कहना, परंतु क्रिया में जो भेद हैं सो बताते हैं. अहो भगवन् क्या सब तिर्यंच पंचेन्द्रिय सरिखि क्रिया वाले हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं. किस कारन से ! ति- बैंच पंचेन्द्रिय के तीन भेद, सम्यक् दृष्टि, मिथ्याष्टि, व सममिथ्यादृष्टिः उस में जो ममदृष्टि हैं उनके दो भेद असंयति व संयतासंयति उस में जो संयतासंयति हैं. उनको तीन क्रिया लगती हैं. १ आरंभिकी, २ पारिग्रहिकी व ३ मायाप्रन्यायिकी अमंगतिको नार, सममिथ्यादृष्टि व मिथ्यादृष्टी को पांच २ क्रियाओं कही।
ब्दिार्थ ७० सूत्र १ अनुवादक-पालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी जा. यावत् मि० मिथ्या दर्शन प्रत्यायकी से वह ते० इसलिये पु० पृथ्वी काया स० समायुष्य वाले स० समवर्ण वाले ज० जैसे णे. नारकी त० तैसे भा० कहना ॥ १० ॥ ज० जैसे पु० पृथ्वी काया त तैसे जा. यावत् च० चतुरेन्द्रिय ॥ ११ ॥ पं० पंचेन्द्रिय तियेच ज० जैसे णे० नारकी णा० नानाप्रकार कि० क्रिया पं० पंचन्द्रिय तिर्यंच भं० भगवन् स० सर्व स० समक्रिया वाले गो गौतम णो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ से पह के कैमे गो० गौतम पं० पंचेन्द्रिय तिर्यंच ति० तीन प्रकार के स० समदृष्टि मिल तियाणं पंचकिरियाओ कजति, तंजहा - आरंभिया जाव मिच्छादसणवत्तिया. सेते- गटेणं. पुढविकाइया समाउया समोववण्णगा? जहा णेरइया तहा भाणियन्वा ॥१०॥ जहा पुढविकाइया तहा 'जाव चउरिदिया ॥ ११ ॥ पंचिंदिय तिरिक्खजोणिया जहा गैरइया, णाणत्वं किरियासु ॥ पचिंदिय तिरिक्ख जोणियाणं भंते सव्वे समाकि- क्रिया वाले हैं. ? अहो भगवन् ! वह कैसे ! अहो गौतम ! सब पृथ्वीकायिक जीव मायावी व मिथ्या दृष्टी हैं, उनको अवश्यही आरंभिकी यावत् मिथ्या दर्शन प्रत्ययिकी पांच क्रियायों लगती हैं. इसी से पृथ्वी कायिक जीव समक्रिया वाले हैं. सब पृथ्वी कायिक जीव. सरिखे आयुष्य-वाले. व साथ उत्पन्न होने वाले हैं। इसका सब अधिकार नारकी जैसे कहना॥१०॥ जैसे पृथ्वी कायाका अधिकार कहा वैसेही अप्काय तेउकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय, द्वीन्द्रिय, तेइन्द्रियं व चतुरेन्द्रिय का जानना. यहांपर, बडा शरीर व * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुग्वदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावाथ 00 i 298 पंचमाङ्ग.विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 838 शब्दार्थ वे०..वेदना म० मनुष्य भं० मगवन् स० सर्व सः समक्रिया वाले मो० गौतम णो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ से० वह के० कैसे गो गौतम म मनुष्य ति तीन प्रकार के स० समष्टि मि० मिथ्यादृष्टिं स. सममिथ्यादृष्टि त०तहां जे. जो स० समदृष्टि ते. वे नि० तीन प्रकार के सं० संयति अ. असं यति सं० संयतासंयति जे. जो सं० संयति तेचे दु० दोपकार के स० सराग संयति वी० चीतराग संयति त. तहां जे. जो पी० वीतराग संयति ले० चे अ० अक्रिया वाले स० संराग संयति समकिरिया ? गोयमा! णोइणटेसमटे । सेकेणटेण भंते ? गोयमा ! मणुस्सा तिविहा प- सत्र ण्णत्ता तं० सम्माइट्ठी, मिच्छादिट्ठी, सम्मामिच्छदिठी, तत्थणं जे ते सम्माठिी ते तिविहा प० तं० .संजयाय असंजयाय संजया संजयाय । तत्थणंजेते संजया ते दुविहा प.तं. तराग संजयाय वीयराग संजयाय, तत्थणं जे ते वीयरागं संजया तेणं अकिरिया । तत्थणं जे ते सराग संजया ते दुविहा प० तं० पमत्त संजयाय, भावार्थ मनुष्य के तीन भेद कहे हैं सम्यकदृष्टि, मिथ्यादृष्टि सममिथ्याष्टि; उस में जो सम्यंगदृष्टि हैं। उनके तीन भेद कहे हैं संयति, असंयति व. संयतासंयति; उसमें संयति के.. दो भेद सरागसंयति ३.g वीतराग संयति. उसमें जो वीतराग संयति हैं वे अक्रिय हैं अर्थात् उन को किसी भी सांपरायिक क्रिया नहीं, लगती है. जो सरागसंयंति में उनके दो भेद प्रमत्त संयति य : अप्रमत्त संयतिः अप्रमत्त संयति सातवे. गुण स्थानवी हैं उनको एक गायामत्ययिकी क्रिया लगतीहैं और छठे गुणः स्थानवी प्रमत्त संपतिको आरंभिकीय * पहिला शतक का दूसरा उद्देशा शब्दार्थ मिथ्याष्ट्रिको पं०पांच स-सममिथ्यादृष्टि को पं०पांच।।१२।। मन्मनुप्य ज जैसे नारकीणा नानामकार म०महाशरीरी आ० कदाचित् आ०आहार करते हैं जे० जो अ० अल्प शरीरी ते वे अ थोडे पो० पुद्गल आ० आहार करते हैं अ० वारंवार आ० आहार करते हैं से० शेप ज० जैसे ण नारकी जा० यावत मूत्र 43 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 याणं चत्तारि,मिच्छट्ठिीणं पंच सम्ममिच्छट्ठिीणं पंच॥१२॥मणुस्सा जहाणेरइया,णाणलं जे महासरीरा ते आहच आहारैति ४ बजे अप्पसरीरा ते अप्पतराए पोग्गले आहारैति ४ । आभिक्खणं आहारैति. सेसं जहा णेरयाणं जाव वेदणा. मणुस्साणं भंते . सब्वे ॥१२॥ मनुष्य का अधिकार नारंकी जैसे कहना. विशेष इतना कि-क्या सब मनुष्य सारखे आहार करनेवाले है ? अहो गौतम ! मनुष्य के दो भेद; बडे शरीवाले व छोटे शरीखाले. उस में जो बडे शरीर वाले हैं वे बहुत पुगलों का आहार करते हैं, बहुत पुद्गल परिणमते हैं, वैसे ही श्वासोश्वास लेते हैं. यहां नरकमें चारंवार आहार करने का कहा है, परंतु देवकुरु उत्तरकुरु के युगलिये तीन दिन में आहार लेते हैं. छोटे शरीर वाले अल्प पुद्गलों का आहार करते हैं, उस के दो भेद समूच्छिम व बालक वे दोनों वारंवार आहार करते हैं. की का सब अधिकार नारकी जैसे कहना. अहो भगवन् ! सब मनुष्य सरिखि क्रिया वाले हैं ? अहो गीतप ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! किम कारण से यह अर्थ योग्य नही है ? अहो गौतम !! * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ उदार्थ सूत्र 1988 पंचमाङ्ग विवाह पण्णचि (भगवती) सूत्र 89867 मिथ्या राष्टे उ० उत्पन्न हुने अ० अल्प वेदना पाले अ० अमायी स. समहाष्ट ३० उत्पन्न हुवे म. बहुत वेदना भा० कहना जो० ज्योतिषी ३० वैमानिक को ॥ १४ ॥ म मलेशी णे० नारकी स. सर्व स. समाहारी औ• अधिक स० सलेशी मु. शुकदेशी एइन तिः तीन में ए. एक सरिखे क. कृ. एणलेशी नी नीललेशी ए० एक सरिखे ण. विशप ये वेदना में मा० मायी कि मिथ्यादृष्टि उ० उत्पन्न सुरकुमारा णवरं वेदणाए णाणत्तं । मायी मिच्छट्ठिी उबवण्णगाय अप्पवेयणतरा, अमायी सम्मट्टिी उक्वण्णगाय महावेयणतरा भाणियव्या ॥ जोइस वेमाणियाय ॥ १४ ॥ सलेरसाणं भंते णेरइया सवे समाहारगा ओहियाणं, सलेस्साणं प्रकारकी है सो बताते हैं. ज्योतिषी वैमानिक में मायी मिथ्याष्टि पने उत्पन्न हुरे सो अल्पवेदनावाले हैं क्यों की उन को साता वेदनीय कर्म अल्प रहता है. और अमायो सम्यक्ष्टि बहुत वेदनावाले हैं क्यों की उनको साता वेदनीय कर्म विशेष रहना है इतना ज्योतिषी व वैमानिक में अमुकुमार मे विशेष है शेष सब अमुरकुमार (जसे कहना ॥ १४ ॥ अहो भगवन् ! लेश्या सहित नारकी क्या सरिखे आहार करनेवाले हैं ? अहो 50 गौतम ! समुच्चय जीव, सलेशी व शुक्ललेशी इन तीन का एक गमा जानना. कृष्ण व नील लेशीका एक गमा जानना,वेदना में इतना विशेषपना कि मायावी, मिथ्यादृष्टी को बहुत बेदना और अमापी सम्यगूदृष्टी को अल्पवेदना. मनुष्यपद में, क्रिया सूत्र में च औधिक (समुचय ) दंदक में सराग, वीतराग, भावार्थे| पहिला शतक का दूसरा उद्देशा sters oo शब्दार्थ सूत्र अनुवादक-बालबमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8- प्रकार के प०अमत अनमत्त जे० जो अ० अप्रमत्त संयति ते. उनको'ए. एक मा. मायाप्रत्ययिकी क्रिया जे०. जो प० प्रमत्त संयति ते. उनको दो० दोक्रिया आ० आरंभिकी मा० मायामत्यायकी जे० जो सं० संयतासंयति ते० उनको आ० पहिली तिः तीन कि० क्रिया अ० असंयति को, च० चारक्रिया मि० मिथ्यादृष्टि को पं० पांचक्रिया स० सममिथ्याष्टि को पं. पांचक्रिया ॥ १३ ॥ वा. 'वाणज्यंतर जोज्योतिपी वे वैमानिक ज• जैसे अ अमुरकुमार नविशेष वेव्वेदना में णा नानासकार मा०मायी मि० अपमच संजयाय, ॥ तत्थणं जे ते अपमत्तसंजया तेसिणं एगा मायावत्तिया कि- रिया कज्जइ । तत्थणं जे ते पमत्तसंजया तेसिणं दो किरिया कज्जइ तं. आरंभियाय मायावत्तियाय. तत्थणं जे ते संजयासंजया तेसिणं आदिमाओ तिणि किरि- याओ कजति । असंजयाणंचचारि किरियाओ कजति मिच्छहिट्ठीणं पंच सम्ममिच्छट्ठिीणं पंच ॥ १३ ॥ वाणमंतरजोइसवेमाणिया जहा अ- मायापत्पयिकी ऐसी दो क्रियाओं लगती हैं. जो संयतासयति-श्रावक हैं उन को आरंभिकी माया प्रत्ययिकी व परिग्रहिकी ऐसी तीन क्रियाओं लगती हैं. असंयति को चार क्रियाओं लगती हैं. उपर्युक्त तीन और चौथी अप्रत्याख्यान. मिथ्यादृष्टि वसममिथ्यादृष्टि को पांच क्रियाओं. उपर्युक्त क्रियाओंमें मिथ्या दर्शन प्रत्यायिकी क्रिया पांचवी बढी ॥१३॥ वाणव्यंतर ज्योतिषी व वैमानिक को अमुरकुमार जैसे कहना. शरीर का अल्पपना व बहुतपना अपने २ शरीर की अवगाहना के अनुसार जानना. वेदना विविध प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ दार्थ सुत्र 288 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 988 मिथ्या दृष्टेि उ० उत्पन्न हुव अ० अल्प वेदना बाले अ० अमायी स. समदृष्टि उ. उत्पन्न हुवे बहुत वेदना भा० कहना जो० ज्योतिषी वे० वैमानिक को ॥ १४ ॥ म मलेशी जे० नारकी स० सर्व स. समाहारी औ• औधिक स० सलेशी मु. शुकठेशी ए. इन ति. तीन में ए. एक सरिखे क. कृ. प्णलेशी नी नीललेशी ए. एक सरिले ण. विशप ये वेदना में मा० मायी मि. मिथ्यादृष्टि उ० उत्पन्न सुरकुमारा णवरं वेदणाए णाणत्तं । मायी मिच्छद्दिट्ठी उपवण्णगाय अप्पवेयणतरा, अमायी सम्मदिट्ठी उबवण्णगाय महावेयणतरा भाणियन्वा ॥ जोइस वेमाणियाय ॥ १४ ॥ सलेस्साणं भंते णेरइया सव्वे समाहारगा ओहियाणं, सलेस्साणं प्रकारकी है सो बताते हैं. ज्योतिषी वैमानिक में मायी मिथ्यादृष्टि पने उत्पन्न हुने सो अल्पवेदनावाले हैं क्यों की उन को साता वेदनीय कर्म अल्प रहता है. और अमायी सम्यदृष्टि बहुत वेदनावाले हैं क्यों की उनको साता वेदनीय कर्म विशेष रहना है इतना ज्योतिषी व वैमानिक में असुाकुमार मे विशेष है शेष सब असुरकुमार जैसे कहना ॥ १४ ॥ अहो भगवन् ! लेश्या सहित नारकी क्या सरिखे आहार करनेवाले हैं ? अहो 50 गौतम : समुच्चय जीव, सलेशी व शुक्ललेशी इन तीन का एक गमा जानना. कृष्ण व नील लेशीका एकनमा जानना,वेदना में इतना विशेषपना कि मायावी, मिथ्यादृष्टी को बहुत वेदना और अमापी सम्यग्दृष्टी को अल्पवेदना. मनुष्यपद में, क्रिया सूत्र में च औधिक (समुच्चय ) दंडक में सराग, वीतराम, भावार्थ पहिला शतक का दूसरा उद्देशा84880 शब्दार्थ सूत्र 20 अनुवादक यालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 अ. अमायी स. समदृष्टि उ० उत्पन्न हुवे भा० कहना म० मनुष्य कि क्रिया में स: सरागी वी. वीतरागी अ० अप्रमत्त प० प्रमत्त भा० कहना का कापुतलेशी ए. ऐसे ण. विशेष : नारकी ज. जैसे ओ० औधिक दं० दंडक त० तैसे भा० कहना ते. तेजु लेशी ५० पमलशी ज. जिनको अ. है ज० जप्ते ओ० औधिक त० तैसे भा० कहना ण. विशेप म० मनुष्य स० सरागी वी० वीतरागी भा० कहना दु दुःख आ० आयुप्य उ. उदीरणा आ० आहार क० कर्म २० वर्ण ले० लेश्या स. सुकालेस्साणं एएसिणं तिहं एकोगमो कण्हलेसणीललेस्साणंपि एगोगमो ॥ णवरं वेदणाए मायीमिच्छहिट्ठीउववण्णगाय, अमायीसम्मट्ठिी उववण्णगाय भाणियव्वा म- गुरसा किरियासु सराग वीतराग अपमत्ता पमत्ताण भाणियवा ॥ काउलेस्साणवि एवमेवगमो णवरं णेरइए जहा ओहिए दंडए तहा भाणियव्वा, तेउलेस्सा, पम्हलेस्सा जस्स अस्थि जहा ओहिओ तहा भाणियव्वा णवरं मणुस्सा सराग वीतरागा ण भा- अपमत्त व प्रमत्त कहा है, परंतु कृष्ण नीललेश्यावाले मनुष्य में यह कहना नहीं; क्योंकि दोनों लेश्यावाले को संवा का अभाव होता है. कापुत लेश्या में वैसा जानना परंतु नारकी को औधिक दंडक जैसे कहना. जो लेश्या र पद्मलेश्या जिन को हैं; उन को औधिक दंडक जो कहना. मनुप्य सराग वीतराग कहे हुये हैं ये यहांपर कहना नहीं; क्यों की तीनों लेश्यागलों को वीतरागपने का अभाव होता है. अब उद्देश के प्रारंभ से जो अधिकार आयासो गाथासे बतातेहैं. एक वचन व बहुवेचन आश्रित क्या दुःख व आयुष्य प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुसदेव सहायनी ज्यालाप्रसादजी * भावाथ 0 शब्दार्थ समवेदना स० समक्रिया स० समायुष्य वो जानना ॥ १५ ॥ क० कितनी भ० भगवन् ले० लेश्या प० प्ररूपी गो गोतम छ० छठेश्या प० प्ररूपी ललेश्या का वी. दुसरा उ. उद्देशा भा० कहना जा० ७७ सूत्र णियव्वा गाथा ॥ दुक्खाउएउदिष्णे आहारे कम्म वण्ण लेरसाय सम- वेयण समकिरिया. समाउया चेव बोधव्वा ॥ १ ॥ १६॥ कइणं भंते लेस्साओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! छ लेस्साओ पण्णत्ताओ, तंजहा लेस्साणं वीओउ- भावार्थ 238 पंचपाङ्ग विवाह पण्यत्ति ( भगवती) सूत्र 8-88 उदय में आया हुवा वेदे ? क्या सरिखे आहार, कर्म वर्ण, लेश्या, वेदना, क्रिया व आयुष्यवाले हैं वगैरह सब पूर्वोक्त जैसे कहना. ॥१५॥ नारकी सलेशी हैं ऐमा पहिले कहा इसलिये आगे लेश्याका स्वरूप कहते हैं. अहो भगवन् ! लेश्या के कितने भेद ? अहो गौतम ! लेश्या के छ भेद कहे हैं इन छही लेश्या का वर्णन पन्नवणा सूत्र में लेश्यापद का दूसरा उद्देशा में जैसा कहा है वैसा जानना: अहो भगवन् इन लेश्यामेंसे कोनसी लेश्यावाला विशेष ऋद्धि का धारक व कौनसी लेश्यावाला अल्पनऽद्धिका धारकं होता है ? अहो गौतम ! कृष्ण लेश्या से नील लेश्यावाला अधिक ऋद्धिका धारक होता है, नील लेश्या से कापोत लेश्यावाला अधिक ऋद्धिका धारक होता है, कापोत से तेजो लेश्यावाला अधिक ऋद्धि का धारक होता है, तेजोसे पद्मलेश्यावाला अधिक ऋद्धिका धारक होता है, और पद्म से शुल लेश्यावाला 81 पहिला शतक का दूसरा उद्देशा -380- शब्दार्थ -- सुन अनुवादक-यालयमगरी मुनि श्री अमालक ऋपिजी 83 हुवे अ० अमायी स. समदृष्टि उ० उत्पन्न हुवे भा० कहना २० मनुष्य कि क्रिया में स: सरागी वी. वीतरागी अ० अप्रमत्त प० प्रमत्त भा० कहना का कापुतलेशी ए. ऐसे ण. विशेषणे. नारकी ज० जसे ओ० औधिक दं० दंडक त० तैसे भा० कहना ते० तेजु लेशी' प. पद्मलेशी ज० जिनको अ. है ज० जैसे और औधिक त० तैसे भा• कहना ण विशेप म. मनुष्य स० सरागी वी० वीतरागी भा० कहना दु० दुःख आ० आयुष्य उ. उदीरणा आ० आहार क. कर्म व० वर्ण ले० लेश्या · स. सुकालेस्साणं एएसिणं तिण्हं एक्कोगमो कण्हलेसणीललेस्साणंपि एगोगमो ।। णवरं वेदणाए मायीमिच्छट्ठिीउववण्णगाय, अमायीसम्मदिट्ठी उववण्णगाय भाणियव्या म- णुरसा किरियासु सराग वीतराग अपमचा पमत्ताण भाणियन्वा ॥ काउलेरसाणवि एवमेवगमो णवरं णेरइए जहा ओहिए दंडए तहा भाणियव्वा, तेउलेस्सा, पम्हलेस्सा जस्स आत्थि जहा ओहिओ तहा भाणियन्वा णवरं मणुस्सा सराग वीतरागा ण भा- अपमत्त व प्रमत्त कहा है, परंतु कृष्ण नीललेश्यावाले मनुष्य में यह कहना नहीं; क्योंकि दोनों लेश्यावाले को संयग का अभाव होता है. कापुत लेश्या में वैसा जानना परंतु नारकी को औधिक दंडक जैसे कहना. नेजो लेश्या र पद्मलेश्या जिन को हैं; उन को औधिक दंडक जैसे कहना. मनुष्य सराग वीतराग कहे हुवे ये यहाँपर कहना नहीं; क्यों की तीनों लेश्यावालों को वीतरागपने का अभाव होता है. अब उद्देश प्रारंभ से जो अधिकार आयासो गाथासे बतातहैं. एक वचन व बहुवेचन आश्रित क्या दुभव व आयुष्य प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुसंदेव सहायनी ज्यालाप्रसादजी * भावार्थ GO शब्दार्थ ७९ सूत्र भावार्थ » पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 389 ति० तीन प्रकार का सु. शून्य काल अ० अशुन्य काल मि. मिश्रकाल ति तिर्यंच का सं० संसार सं० संचिठण काल पु० पृच्छा गो० गौतम दु. दोप्रकार का अ० अशून्प काल मि. मिश्रकाल • म० मनुष्य संसार संचि?ण काले, देव संसार संचिट्ठण काल।। णेरइय संसार संचिट्ठण कालेणं भंते कइविहे प०? गोयमा! तिविहे प०२० सुण्णकाले, असुण्णकाले, मिस्सकाले। तिरिक्त (संचिठन काल ३ मनुष्य के भव में रहे सो मनुष्य मंसार संचिठन काल ४ देवता के भव में रहे सो देव संसार संचिठन काल. अहो भगवन् ! नारकी संसार संचिठन काल के कितने भेद ? अहो गौतम ! नारक संसार संचिठन काल के तीन भेद कहे हैं ? शून्यकाल २ अशून्यकाल और ३ मिश्रकाल * अहो भगवन् ! तिर्यंच संसार संचिठन कालके कितने भेद ? अहो गौतम ! दो भेद. अशून्यकाल * वर्तमान कालमें सातों नरकमें जो नारकी विद्यमानहैं उनमें से कोई उद्वर्तेनहीं, और उसमें कोई नविन उत्पन्न होने नहीं, जितने हैं उतने ही रहे सो नरक गति आश्रित अशून्यकाल. जैसे कहा है आइह समइ- याण नेरइयाणं न जाब एक्को वि उवट्टइ अण्णोवा उववज्जइ सो अमुण्णोउ ॥१॥ उन सातों नरक के नारकी में से जो उद्वर्त वाले होवे उस में एक शेप रहे सो मिश्रकाल और सब उद्वर्ते सो शून्यकाल जैसे उन्बर्ट एक्कमिवि तामीसो धरइ जाव एकोवि णिल्लेवएहि सव्वेहि वट्टमाणेहिं मुण्णोउ ॥१॥ यहांपर मिश्र नारक संसारा- वस्थान काल सून वर्तमान भव आश्रित नहीं ग्रहण किया है परंतु वर्तमान काल के नारकी अन्य गति में ABHIS पहिला शतकका दसरा उद्देशा Pos 60 शब्दाथा ७ 4 अनुवादक-वालप्रमागरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी यावत् इ० ऋद्धि ॥ १५ ॥ जी जीव का ती• अतीत काल आ० कहा हुवा क० कितना सं० संसार सं: संचिठण काल १० प्ररूपा गो० गौतम च० चार प्रकार का सं० संसार संचिठन काल णे० नारकी सं० संसार संचिठन काल तिः तिर्यंच मसार सं० संचिठन काल म० मनुष्य संसार सं० मंचिठण काल दे. देवसंमार सं० संचिठण कालणे नारकी सं० संसार संचिठण काल का कितना प्रकार का गो. गौतम देसओ भाणेयचो जाव इड्डी ॥ १६ ॥ जीवस्तणं भंते तीयद्वाए आदिट्टस्स कइविहे संसार संचिट्ठण काले पण्णते ? गोयमा! चउन्विहे संसार संचिट्ठण काले पण्णत्ते, तंजहा औरइए संसार संचिट्ठण काले, तिरिक्ख जोणिय संसार संचिट्ठण काले, मणुस्स अधिक ऋद्धि का धारक होता है ॥ १६ ॥ सलेशी जीव मंसार में रहते हैं इसलिये संसार में रहनेका प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! नारकी आदि जीवों को अतीत काल में कितने प्रकार के संसार संचिठनकाल कहे हैं ? अहो गौतम ! उपविभेद मे एक भव से भवान्तर में रहने की क्रिया का काल के चार भेद कहे है... नारकी के भव में जीव रहे सो नरक संसार संचिठनकाल २ तिर्यंच के भव में रहे सो तियेच संसार *कितक की ऐसी मान्यता होती है कि मनुष्य मरकर मनुष्य व पशु मरकर पशु ही होता है इसका निर्णय यहांपर किया गया है. १ एक भवसे दूसरे भव में रहने की क्रिया का काल. * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी घालाप्रसादजी * भावार्थ शब्दार्थ ७९ सूत्र भावार्थ - पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) सूत्र 389 ति० तीन प्रकार का सु शून्य काल अ० अशून्य काल मि. मिश्रकाल ति० तिर्यंच का सं० संसार सं० सचिठण काल पु० पृच्छा गो० गौतम दु. दोमकार का अ० अशून्य काल मि० मिश्रकाल - म० मनुष्य संसार संचिट्ठण काले, देव संसार संचिट्ठण कालाणेरइय संसार संचिट्ठण कालेणं भंते कइविहे प०? गोयमा! तिविहे प०तं० सुण्णकाले, असुण्णकाले, मिस्सकाले। तिरिक्त संचिठन काल ३ मनुष्य के भव में रहे सो मनुष्य संप्तार संचिठन काल ४ देवता के भव में रहे सो देव संसार संचिठन काल. अहो भगवन् ! नारकी संसार संचिठन काल के कितने भेद ? अहो गौतम ! नारक संसार संचिठन काल के तीन भेद कहे हैं १ शून्यकाल २ अशून्यकाल और ३ मिश्रकाल * अहो भगवन् ! तिर्यंच संसार संचिठन कालके कितने भेद ? अहो गौतम ! दो भेद. अशून्यकाल * वर्तमान कालमें सातों नरकमें जो नारकी विद्यमान, उनमें से कोई उद्वर्तेनहीं, और उसमें कोई नविन उत्पन्न होवे नहीं, जितने हैं उतने ही रहे सो नरक गति आश्रित अशून्यकाल. जैसे कहा है आइ8 समइ- याण नेइयाणं न जाय एक्को वि उवट्टइ अण्णोवा उववज्जइ सो अमुण्णोउ ॥१॥ उन सातों नरक के नारकी में से जो उद्वर्त वाले होवे उस में एक शेप रहे सोमिश्रकाल और सब उद्धर्ते सो शून्यकाल जैसे उबट्टे एक्कमिवि तामीसो धरड़ जाव एकोपि पिल्लेवएहि सवेहि वट्टमाणेहि मुण्णोउ ॥ १ ॥ यहांपर मिश्र नारक संसारा- वस्थान काल मूव वर्तमान भव आश्रित नहीं ग्रहण किया है परंतु वर्तमान काल के नारकी अन्य गति में 80 पहिला शतकका दूसरा उद्देशा !
८०
अनुगदक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक पीजी
शब्दार्थ दे० देवता को न जैसे णे० नारकी ए. यह भ० भगवन : नारकी का सं० संसार संचिठण काल
मु० शून्य अ० अशून्य मि. मिश्र क० कौन के किससे अ० अल्प २० बहुत तुतुल्य वि. विशेपाधिक
गो० गौतम स० सब से थोडा अ० अनून्य काल मी० मिश्रकाल अ० अनंत गुणा सु० शून्य काल अ०
अनंतगुणा ति तिर्यंच का स० सर्व से थोडा अ० अशन्य काल मी० मिश्रकाल अनंतगुणा म० मनुप्य
सूत्र जोणिय संसार संचिट्ठण काल पुच्छा ? गोयमा ! दुविहे प० तं. असुण्णकालेय, मि
स्सकालेय. मणुस्साणय देवाणय जहाणेरइयाणं । एयरसणं भंते णेरइय संसार संचिट्ठण
कालस्स सुण्णकालस्स, असुण्णकालस्स मीसकालरस, कयरे कयरेहितो अप्पेवा, बहुएवा,.
तुल्लेवा, विसेसाहिएवा ? गोयमा ! सबथोवा असुण्णकाले, मीसकाले अणंतगुणे,
भावार्थ मिश्रकाल. मनुप्य व देवता में तीनों काल जानना. अहो भगवन् ! इस नरक संसार संचिठन काल
शून्य, अशून्य व मिश्रकाल में से कोन फिससे अल्प, बहुत तुल्य व विशेषाधिक है ! अहो गौतम सब से
* प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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जाकर पुनः नरक गति में उत्पन्न होवे उन जीवों आश्रित लिया गया है. यदि उसी नरक भव आश्रित क-
हा जाये तो अल्प बहुत्य सूत्र में अन्य कालको अपेक्षा से मोश्र काल को अनंत गुना कहा है वह नहीं
हो सकता है जैसे एयं पुण ते जीवे पडुच मुत्तं न तभवं चेव। जइ होजत भवतो अणंतकालो न संभवइ ।
॥१॥
Jap ब्दार्थ दे देव ज० जैसे नारकी भं० भगवन् णे. नारकी का सं• संसार संचिठण काल जा. यावत् दे. देव संसार संचिठण काल का जा. यावत् वि. विशेषाधिक गो० गौतम स० सर्व से थोडा म. मनुष्य संसार संचिठण काल २ नारकी संसार संचिठण काल अ० असंख्यातगुणा दे. देव मंसार संचिठण काल अ० असंख्यात गुणा ति० तिर्यंच संसार संचिठण काल थ० अनंतगुणा ॥ १७ ॥ जी जीव भं. ८१ PER पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगरती) सूत्र 89893 मुण्णकाले अणंतगुणे, ॥ तिरिक्ख जोणियाणं सम्बत्थोवे असुण्णकाले, मीसकाले अणंतगुणे, ॥ मणुस्साणय, देवाणय जहा जेरइयाणं एयस्सणं भंते णेरइय संसार सं- चिटण कालरस जाव देव संसार संचिट्ठण कालस्स जाव विससाहिएवा गोयमा ? सव्वत्थोवे मणुस्स संसार संचिट्ठण काले, णेरइय संसार संचिट्ठण काले असंखजगुणे,देव थोडा अशून्यकाल है, क्योंकि उत्पाद व उद्वर्तना काल का विरह बारह मुहर्त का है, उस से मीश्रकाल अनंत गुना, और उस से शून्यकाल अनंत गुना कहा है. तिर्यंच में सब मे थोडा अशुन्यकाल उस से मीश्रकाल अनंत गुना. मनुष्य व देवता का नारकी जैसे कठना. अहो भगवन् !चारों संसारसंचिठन कालमें से कोन किस से अल्प, बहुत, तुल्य व विशेषाधिक है अहो ? गौतम ! सब से थोडा मनुष्य संमार संचिठन काल, उस से नारकी संसार संचिठन काल असंख्यात गुना, उस से देव संसार संचिटन काल असंख्यात 3888> पहिला शतकका दुसरा उदेगा 88888 भावार्थ oyo ब्दिार्थ) ૮૨ सूत्र 42.अनुवादक-बालग्रह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी भगवन् अं० अंतक्रिया क. करे गो गौतम अ० कितनेक क. करे अ० कितनेक पा० नहीं करे अ. अंतक्रिया पद ० जानना ॥ १८ ॥ अ. अहो भ० भगवन् अ० असंयति भ० विद्रव्य देव अ. अ. विराधिक सं० संयति वि० विराधिक संयति अ० अविराधिक संयतासयति वि. विराधिक सं० संयता संपति अ० असंही ता० तापस कं. कंदर्पिक च० चरक परिव्राजक कि० अशुभ परिणाम वाले ति० संसार संचिट्ठण काले असंखजगुणे, तिरिक्ख जोणिय संसार संचिटण काले अणंत- गुणे ॥ १७ ॥ जीवेणं भंते अंत किरियं करेजा ? गोयमा ! अत्थगइए करेजा, अत्यंगइए जो करेजा. अंतकिरिया पदं तव्वं ॥ १८ ॥ अहभंत असंजय भविय दव देवाणं, अविराहिय संजमाणं, विराहिय संजमाणं, अविराहिय संजमासंजमाणं, विराहिय संजमामंजमाणं, असण्णीणं, तावसाणं, कंदप्पियाणं, चरगपरव्वायगाणं, प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * थि गुना उस से तियेच संसार संचिठन काल अनंत गुना ॥ १७ ॥ अहो भगवन् ! जीव अंतक्रिया करे? अहो गौतम ! कितनेक जीव अंचक्रिया करे और कितनेक अंतक्रिया करे नहीं इस का विशेष अधिकार पभरणा के वीस वे अंतक्रिया पद में जानना.॥१८॥ अंतक्रियाके अभावसे कोई जीव देवलोक में उत्पन्न होरे इसलिये उस का विशेष स्वरूप बताते हैं. अंहो भगवन् ! चारित्र परिणाम से शून्य मिथ्यादृष्टि, शब्दार्थ २७ ८३ सत्र 298 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र-१-88- तिर्यंच आ० आजीविक आ० आभियोगिक स०स्वलिंगी दं दर्शन से भ्रष्ट ए० इनकी दे० देवलोक में उ० उपजते क० कीसका क. कहां उ० उपपात प० प्ररूपा गो० गौतम अ० असंयति भविद्रव्यदेव ज. जघ- न्य भ० भवनपति में उ. उपरकी गे ग्रैवेयक में अ. अविराधिक सं० संयति ज. जयन्य सो० सौधर्म देवलोक उ० उत्कृष्ट स० सवार्थसिद्ध विमान में वि० विराधिक संयति ज० जघन्य भवनपति में उ० उत्कृष्ट सो० सौधर्म देवलोक अ० अविराधिक सं० संयतासंयति ज० जघन्य सो० सौधर्म देवलोक उ० उत्कृष्ट अ. अच्युत किदिवसियाणं, तिरिच्छियाणं, आजीवियाणं, आभिओगियाणं, सलिंगीदसणवावण्णगा- णं, एएसिणं देवलोएसु उववज्जमाणाणं करस कहिं उबवाए प० ? गोयमा ! असंजय भविय दव्व देवाणं जहणणं भवणवासीसु, उक्कोसणं उवरिम गेवेज्जएसु, अविरा- हिय संजमाणं जहण्णेणं सोहम्मे कप्पे, उक्कोसणं सम्वट्ठसिद्धे. विमाणं, विराहिय मात्र क्रिया के करने वाले, मवा काल से निरति चार पूक पूर्ण चारित्र पालने वाले, अपिराधिक संयमी १. इसका कितनेक भावि में होनेवाला देवमो भावद्रव्य देव,चरणपरिणाम शून्य सोअसंयति, अमंयतिभवि द्रव्य देव अर्थात् असंयति सम्यकदृष्टा ऐसा अर्थ करते हैं परंतु यह अर्थ यहांपर योग्य नहीं है क्योंकि इन की उत्कृष्ट उपरका अवेयक में उत्पत्ति बतलाइ है. और सम्यग् दृष्टि देश विरति की तो मात्र अच्युत देव लोक तकही ली है इसलिये यहां मिथ्यादृष्टी असंयति भव्य अभव्य जीव ग्रहण किये है. 488 पहिला शतकका दूसरा उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ ८४ मुना ६ अनुवादक-बालबमचारीमुनि श्री अमालक ऋपिनी देवलोक वि० विराधिक सं० संयतामयति ज० जघन्य भवनपति उ० उत्कृष्ट जो ज्योतिषी अ० असंज्ञी ज. जघन्य भ० भवनपति उ. उत्कृष्ट वा० वाणव्यंतर अ० वाकी के सः सब ज० जघन्य भ० भवनपति में उत्कृष्ट ता. तापस जो ज्योतिषी में कं० कंदर्षिक सो सौधर्म देवलोक में च० चरक परित्राजिक व ब्रह्मदेवलोक में कि० लिटपरिणामी लं० लंतक देवलोक में ति० तिर्यंच स० सहस्रार देवलोक में आ० आजी संजमाणं जहण्णणं भवणवासीसु, उक्कोसेणं सोहम्मेकप्पे; अविराहिय संजमासंजमा- णं जहणणं सोहम्मेकप्पे, उक्कोसेणं अच्चुएकप्पे, विराहिय संजमासंजमाणं जहण्ण- णं भवणवासीसु, उक्कोसेणं जोइसिएसु, असण्णीणं जहण्णणं भवणवासीसु उक्कोसेणं वाणमंतरेसु अबससा सव्वे जहणणं भवणयासीसु उक्कोसेणं वोच्छामि-तावसाणं जोइसिएसु, कंदप्पियाणं सोहम्मे कप्पे, चरग परिव्वायगाणं बंभलोए कप्पे, किन्विसि- विराधिक संयमी, अविराधिक संयमासयमी विराधिक संयमासंयमी, असंजी, तापस, कंदर्प कथा करने वाले, विदंडिये, कपिल मुनि के संतानिये, ज्ञानादिक के अवर्णवाद बोलने वाले, तियेच, आजीविक धर्म वाले व्यवहार में चारित्रवंत होते हुवे मंत्र यंत्रादिक के करने वाले आभियोगिक, और साधु वेप होने पर सम्यक्तत्र से भ्रष्ट निन्हव देवलोक में उत्पन्न होते किस २ स्थान पर उत्पन्न होवे ? अहो गौतम असंयति भवि द्रव्य देव जयन्य भवनपति में उत्कष्ट उपर की ग्रेवयक. में. अविराधिक साधु जघन्य सौधर्म देवलोक * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी अवार्थ * NYD es शब्दार्थ सत्र 89-9 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भवगती) सूत्र विक अ० अच्युत देवलोक आ० आभियोगिक अ. अच्युत देवलोक में स. मलिंगी दर्शन भ्रष्ट ज० उपर की गे० ग्रैवेयक में ॥ १९ ॥ क० कितने प्रकार का भं भगवन् अ० अमंजी आ. आयुष्य गो० गौतम च० चार प्रकार का अ० असंज्ञी आयुष्य ण नारकी अ० असंज्ञी आयुप्य ति• तिर्यच अ० असंज्ञा आयुष्य म० मनुष्य अ० अमंजी आयुष्य दे. देव असंज्ञी आयुष्य अ० असंही भं० भगवन याणं लंतगे कप्पे, तिरिच्छियाणं सहस्सारे कप्पे, आजीवियाणं अच्चुएकप्पे, आभि- ओगिया अच्चुए कप्पे, सलिंगीदसणवावण्णगा उवरिमगेविजएसु ॥ १९ ॥ कइविहे- णं भंते असण्णियाउए, पण्णत्ते ? गोयमा ! चउबिहे असणियाउए ५० तं० णेरइय असणियाउए तिरिक्खजोणिय असण्णियाउए, मणुस्स. असणियाउए, दे. ' व असण्णियाउए ॥ असण्णीणं भंते ! जीवे किं णेरइयाउयं पकरेइ, तिरिक्ख उत्कृष्ट मर्वार्थसिद्ध विमान में पिराधिक . साधु जघन्य भवनपति में उत्कृष्ट सौधर्म देवलोक में अविराधिक श्रावक जघन्य सौधर्म देवलोक में, उत्कृष्ट अच्युत देवलोक में, विराधिक श्रावक जघन्य भवन पति, उत्कृष्ट ज्योतिपि में, असंज्ञी जघन्य भवनपति, उत्कृष्ट वाणव्यंतरमें शेप सब जघन्य भवनपति में उत्पन्न होवे और उत्कृष्ट तापस ज्योतिपीमें, कंदर्पकी कथा करनेवाले सौधने देवलोक में, चरक परिवाजिक ब्रह्मदेवलोक में ज्ञानादि के अवर्णवाद बोलनेवाले लांतक देवलोकमें तिर्यंच सहसार देवलोकमें आजीविक मतानुसारीअच्युतः or देवलोक में आभियोगिक अच्युत देवलोकमें और दर्शन से भ्रष्ट सलिंगी उपर की ग्रेयेयकमें उत्पन्न होते हैं. ॥ १९ ॥ अव असंही का आयुष्य कहतेहैं. अहो भगवन् ! असंज्ञी परभव योग्य कितने प्रकार का आयुष्य 298 पहिला शनकका दूसग उद्देशा 988- भावार्थ शब्दार्थ भी जीव भं० भगान के० कांक्षा मोहनीय क० कर्म क करे हैं. हां कल करे से वह भ० भगवन कि क्या देश्देशने दे देश क०करे देख्दश मे म०सर्व क०करे स०सर्व से दे देश क करे स०सर्व से स. सर्व क०करे गो गौतम जो नहीं दे देश ने दे देश क करे जो नहीं दे देश स०सर्वक करे णो नहीं स. ८८ सूत्र जीवाणं भंते ! कंखामोहणिजे कामे कडे ? हंता कडे. से भंते ! किं देसेणं देसे कडे देसणं सव्वे कडे सव्वणं देसे कडे सव्वेण सव्वे कडे ?गोयमा! णो देसेणंदेसेकडे णो. भावार्थ 43 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 83 द्वितीय उद्देशे में आयुष्य का स्वरूप कहा. वह मोहनीय कर्म से होवे इसलिये आगे पोहनीय कर्म का सरूप कहते हैं. अहो भगवन् ! क्या जीव कांक्षा मोहनीय कर्म। मिथ्यात मोहनीय कर्म ) करे ? हाँ गौतम! जीव कांक्षा मोहनीय कर्म करे. अहो भगवन् ! जैले”. हस्तादि देश से किमी वस्तुका देश आच्छादे,२ हस्ता- दि देशसे समस्त वस्तु आच्छाद,३ समस्त शरीर से वस्तुका देश आच्छादे, ४ समस्त शरीर से समस्त वस्तु का आच्छादन करे जैसे ही क्या जीव का देश कांक्षा मोहनीय का एक देश करे, जीव का एक देश सब कांक्षा मोहनीय कर्म करे. संपूर्ण जीन कांक्षा योहनीय का एक देश करे, अथवा संपूर्ण जीव. संपूर्ण कांक्षा मोहनीय कर्म करे? अहो गौतमः जीत का एक देश कांक्षा सोहनीय का एक देश नहीं करे, जीव का एक देश संपूर्ण कांक्षा मोहनीय कर्म नहीं करे, संपूर्ण जीव कांक्षा मोहनीय का एक देश नहीं करे, परंतु संपूर्ण जीव * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * CAD - शब्दाश ८९ सुन 2. पंचमाङ्ग विवाह एण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8888 सर्व से दे० देश क० करे स० सर्व से स० सर्व क० करे ॥ १ ॥णे नारकी भ० भगवन् कं० कक्षा मो- हनीय कर्म ककरे ६० हां क करे जा. यावत् स मर्च मे स० नर्व क० करे एक ऐसे जा. यावत् वे. वैमानिक दं० दंडक भा० कहना !! २ ॥ जी. जीपने भ० भगवन् क० कांक्षा मोहनीय कर्म का किया ६० हा क० किया तं० उन को भं० भगान् किं. क्या दे देश से दे देश का किया ए. यह अ० देसणं सव्वेकडे.णोसव्येणं देसेकडे,मव्वेणं सव्वे कडे॥ ॥णेरइयाणं भंते कंखा मोहणिजे कम्मेकडे? हंताकडे,जाव सव्वेणं सव्वेकडे । एवं जाव वेमाणियाणं दंडओ भाणियबो॥२॥ जीवाणं भंते ! कंखा मोहाणिजं कम्मं करिंसु ? हंताकरिमु । तं भंते ! किं. देसेणं देसं करिसु, ?एएणं अभिलावेणं दंडओ जाव वैमाणियाणं । एवंकरंति, एत्थवि दंडओ जांब वेमाणियाणं । एवं करिस्संति, एत्थवि दंडओ जाव वेगाणियाणं ॥ एवं चिए, चिणिंसु, चिणंति, चिणिस्संति । उवचिए,उवचिणिंसु, उवचिणति, उवचिणिसति संपूर्ण कांता मोहनीय कर्म करे ॥१॥अहो भगान् ! क्या नारकी कांक्षा (मिथ्यात्व) मोहनीय कर्म करे ? हां गौतम! नारकी कांक्षा मोहनीय कर्मकरे; यावत् सवो सब कांक्षा मोहनीय कर्म करे वैसे ही चौवीस दंडक का जानना ॥२॥ अहो भगवन् ! जीव ने क्या अतीत काल में कांक्षा मोहनीय कर्म किया ? हा गौतम किया. देश से देश यावत् सर्व से सर्व किया वगैरह वैमानिक तक जानना. और वैसे ही वर्तमान काल पहिला शतक का तीसरा उद्देशा 988 भावाय । muni शब्दार्थ जी जीव भं० भगान के० कांक्षा मोहनीय क० कर्म को करे हैं. हां क० करे से वह भ० भगवन् कि क्या दे देशने दे देश क०करे देश मे म०सर्व क०करे स सर्व से दे देश क करे स० मर्च से सा सर्व क०करे मो०गौतम णो नहीं दे०देशने दे०देशक करे जो नहीं दे देशसे स०सर्वक करे गोप्नहीं स. ८८ सूत्र जीवाणं भंते ! कंखामोहणिजे करमे कडे ? हेता कडे. से भंते: किं देसेणं देसे कडे देसणं सव्वे कडे सव्वेणं देसे कडे सव्वेण सब्बे कडे ?गोयमा! णो देसेणंदेसेकडेणो भावार्थ 4. अनुवादक-वालग्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 83 दिनीय उद्देशे में आयुष्य का स्वरूप कहा. वह मोहनीय कर्म से होवे इसलिये आगे मोडनीय कर्म का सरूप कहते हैं. अहो भगवन् ! क्या जीव कांक्षा मोहनीय कर्म। मिथ्यात्व मोहनीय कर्म ) करे ? हां गौतम! जीव कांक्षा मोहनीय कर्म करे. अहो भगवन ! जैने? हस्तादि देश से किसी वस्तुका देश आच्छादे,२ हस्ता- दि देशसे समस्त वस्तु आच्छाद,३ समस्त शरीर से वस्तुका देश आच्छादे, ४ समस्त शरीर से समस्त वस्तु का आच्छादन करे; वैसे ही क्या जीव का देश कांक्षा मोहनीय का एक देश करे, जीव का एक देश सब कांक्षा मोदनीय कर्म करे. संपूर्ण जीय कांक्षा मोहनीय का एक देश करे, अथवा संपूर्ण जीव संपूर्ण कांक्षा मोहनीय कर्य करे? अहो गौतमः जीव का एक देश कांक्षा मोहनीय का एक देश नहीं करे, जीव का एक देश पूर्ण कांक्षा मोहनीय कर्म नहीं करे, संपूर्ण जीव कांक्षा मोहनीय का एक देश नहीं करे, परंतु संपूर्ण जीव * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालामसादजी * 010 ALL - ADVER PRIR पंचांग विवाह पण्णत्ति । भगवती) सूत्र हनीय कर्म 0 वेदते हैं ई० हां वे वेदते हैं क कैसे भ० भगवन् जी० जीव के० कांक्षा मोहनीय कर्म वे. वेदते हैं गो० गौतम ते. उस २ का० कारनसे सं० शकित कं. कांक्षा सहित वि० फल में संदेह सहित भे० भेदका प्राप्त क० संक्लिष्ट परिणामी जी.जीव क. कांक्षा मोहनीय कर्म वे. वेदे ॥ ४ ॥ तं. बदही स० सत्य णी. शंकारहित जं. जो जि० जिनने १० मरूपा है. हां गो० गौतम त. वडही स० सत्य णी शंकारहित जं० जो जि० जिनने प०अरूपा ॥५॥ से वह णू० निश्चय भ भगवन ए ऐसा वेदेति । कहणं भंते ! जीवा कंखा मोहणिजं कम्मं वेदेति ? गोयमा ! तेहिं तेहिं कारणेहिं संकिया, कंखिया, वितिगिच्छिया, भेदसभावण्णगा, कलुससमावण्णगा, एवं खलु जीवा कंखामोहणिजे कम्मं वेदेति ॥ ४ ॥ सेणगं भंते ! तमेवसचं, णीसंकं, जं जिणेहिं पवेइयं? हंता गोयमा ! तमेव सच्चं णीसंकं जं जिणेहिं पवेइयं पदार्थ में देश से या सर्व से शंका उत्पन्न होवे, अन्य दर्शन ग्रहण करने की इच्छा उत्पन्न होये, कृत कार्य के फल में संदेह उत्पन्न होये, देवीभाव उत्पन्न होवे, अथवा मतिभ्रम होवे, इस तरह से जीव कांक्षा हनीय कर्म वेदता है ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! जो निन भगवान ने कहा है वह क्या निःशंक सत्य है ? गौतम ! जो जिन भगवान ने कहा है वह दी निशक सत्य है ॥५॥ अटो भगवन् ! इस तरह मन में धारता हुवा, ऐसे करना हुवा, ऐसे रहता हुवा ऐसे ही प्राणातिपातादिक से आत्मा को संवरता हुवा पहिला शतक का तीसरा उद्देशा भावार्थ ९० 4. अनुवादक-गालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दाथ अभिलाप से दं० दंडक जा. यावत् वे० वैमानिक को ए, ऐसे क० करता है ए० इस का दं० दंडक जा० यावत् ३० वैमानिक ए. ऐसे क० करेंगे ए० यह दै० दंडक जा. यावत् वे वैमानिक ए. ऐसे क० किरे चि० इकठे किरे उ. विशेष इकठे किरे उ. उदीरे वे वेदे नि. निर्जरे आ० आदिके ति० तीनके च? चारभेद ति० तीनभेद १० पीछेके ति० तीन के ॥३॥ जी० जीव भं० भगवन् के० कांक्षा मो; सूत्र उदीरेंसु, उदीरंति, उदीरिसंति,बेदेंसु, वेदेति, वेदिस्संति । णिज्जरसु, णिज्जरेंति, णिरिस्संति गाहा॥ कडे चिए य उवचिए,उदीरिया वेदियाय णिजिण्णा|आदितिए चउभेया, तियभेया पच्छिमातिण्णि ॥ १ ॥ ३ ॥ जीवाणं भंते ! कंखा मोहणिजं कम्मं वेदेति ? हंता- *प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * : भावाधा आश्रितं जीव कांक्षा मोहनीय कर्म करता है, और भविष्यकाल आश्रित जीव कांक्षा मोहनीय कर्म करेगा, वगैरह चौवीत दंडक में जानना. ऐ ही चिय, उपचिय, का सामान्य, भूत भविष्य व वर्तमान काल आश्रित जानना. और उदीरणा, वेद व निर्जरा इन तीन बोल को भूत, भविष्य व वर्तमान काल भाजित चौविस दंडक पर भारत ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! जीव कांक्षा' मोहनीय कर्म वेदता है ? हां गोतन ! जीव कांक्षा मोहनीय को वंदना है. अहो भगवन् ! किन तरह से जीव कांक्षा मोहनीय कर्म वेदता है ? अहो गौतम ! मिथ्यात्व की संगति से या. परदर्शन के वचन श्रवण से श्री वीतराग प्ररूपित शब्दार्थ परिणमे ण. नास्तित्व ण. नास्तिरूप प. परिणमे १० हां गो. गौतम जा. यावत् प० परिणमे जं. जो भं. भगवन् अ० अस्तित अः अस्तिरूप पने प० परिणमे न० नास्तित्व न. नास्तिरूप पने प. परिणमे तं० उस को कि क्या प० प्रयोग से वी सभाव से मो० गोतम प० प्रयोगले वी० सभा- वसे ॥ ७ ॥ से वह भं० भगवन् अ० अस्तित्व अ. अस्तिरूप पने ग० प्रकाशने योग्य ज. जैसे प०१७ 0/9 ga पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 80- नत्थित्ते परिणमइतंकिंपओगसावीससा? गोयमा! पओगसावितं वीससावितीजहाते भंते! अस्थित्तं अत्थित्ते परिणमइ,तहाते णत्थित्तं णत्थित्ते परिणमइ, जहातेनस्थित्तं नत्थित्ते परि णमइ,तहातेअस्थित्तं अत्थित्ते परिणमइ? हेता गोयमा !जहामे अत्थितं अत्थित्ते परिणमइ तहामे नत्थित्तं नत्थित्ते परिणमइ. जहामे नत्थित्तं नत्थित्ते परिणमइ तहामे अत्थित्तं अत्थित्ते परिणमइ ॥ ७ ॥ सेणूणं भंते ! अत्थित्तं अत्थित्ते गणिजं जहा वैसे ही क्या आपके यत में नास्तिपना नास्ति पने परिणनता है ? और जैसे नास्तिपना नास्तिपने ४० परिणमता है वैसे ही क्या स्तिपना अस्तिपने परिणमना है ? हां गौतम ! जैसे हमारे मत में अस्तित्व अस्तिपने परिणमता है वैसेही नास्तिपना नास्तिपने परिणप्रना है और जले नास्तिपना नास्तिपने परिणमता है ! वैतेही अस्तित्व अस्तिपने परिणमता है. ||७॥ अहो भगान् ! अस्तित्र अस्तिपने गमनीय 38889 पहिला शतक का तीमरा उद्देशा g><BR> भावार्थ . १२ 43 अनुवादक-बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक प्रापिजी शब्दार्थ प०मनमें अ० धारता ५० करता चि० रहता सं . संवरता आ आज्ञा आ०आराधक भ० होवे हा गो गौतम ए ऐसायमा अ० धारता जा यावत् भ० होते. ॥७॥ ० वह भ०भगान् अ० अस्तिरूप पने प. ॥ ५ ॥ सेणूणं भंते ! एवं मणे धारेमाणे एवं पकरेमाणे, एवं चिढेमाणे, एवं संवरे- माणे, आणाए आराहए भवइ ? हंता गोयमा! एवं मणे धारमाणे जाव भवइ ॥ ६ ॥ सेणणं भंते ! अत्थित्तं अस्थित्ने परिणमइ, णत्यित्तं णत्थित्ते परिणमइ ? हंता गोयमा ! जाव परिणमइ ॥ तंभंते ! अस्थित्तं अत्थित्ते परिणमइ, नत्थित्तं भावार्थ क्या आज्ञा का आराधक होता है ? हां गौतम ! एना करने वाला आज्ञा का आगंधक होवे ॥६॥ अहो भगवन् ! अस्तित्व अस्तिरूपपने (यस्तु का पर्यायान्तर होने पर जो मूल गुग है वह होना ) परिणमे? जने अंगुली ऋजुता, वक्रता, धारन करे तो भी अंगुलीपने परिणमे और नास्तित्व सो नास्ति- रूपपने परिणमे ? हाँ गौतम ! जो अस्ति रूप वस्तु है वह अस्तिपने परिणमती है, जैसे अंगुली को अंगुली ही कही जाति है और अछी वस्तु नास्तित्व पने परिणमति है जैसे जो • पट नहीं है वह कदापि पट नहीं है. अहो भगवन् ! क्या यह प्रयोग मो जीव का व्यापारसे या स्वभाव से परिणमे ?हां गौतम ! प्रयोग से भी परिणमें जमे कुंभकार मृत्तिका का घर बनावे और स्वभाव से भी परिणमें जैसे आकाश में बदल होये. अहो भगवन् !जैसे आपके मत में प्रयोग या' स्वाभाव से अस्तिपना अस्तिपने परिणमताहै * प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * Jaanka , पर व्दाय ०७ 010 ram परिणमे ण. नास्तित्व ण नास्तिरूप प. परिणमे १० हां गो० गौतम जा. यावत् प. परिणमे जं. जो भ० भगवन् अ. अस्तित्व अ. अस्तिरूप पने प० परिणमे न० नास्तित्व न. नास्तिम्प पने १० परिणमे तं० उस को कि क्या ५० प्रयोग से वी सभाव से गो० गोतम ५० प्रयोगले वी० सभा- वसे ॥ ७ ॥ से वह भं० भगवन् अ० अस्तित्व १० अस्तिरूप पने ग० प्रकाशने योग्य ज. जैसे प.08 ह/७ । सूत्र 03 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 89 नत्थित्ते परिणमइतं किंपओगतावीससा? गोयमा! पओगसावितं वीससावित।जहाते भंते! अत्थित्तं अत्थित्ते परिणमइ, तहाते णत्थित्तं णत्थित्ते परिणमइ, जहाते नत्थित्तं नत्थित्ते परि णमइ,तहातेअस्थित्तं अत्थित्ते परिणमइ? हंता गोयमा !जहामे अस्थित्तं अत्थित्ते परिणमइ तहामे नत्थित्तं नत्थित्ते परिणमइ. जहामे नत्थित्तंनत्थित्ते परिणमइ तहामे अत्थित्तं अत्थित्ते परिणमइ ॥ ७ ॥ सेणणं भंते ! अत्थित्तं अत्थित्ते गणिजं जहा ही क्या आपके यत में नास्तिपना नास्ति पने परिणनता है ? और जैसे नास्तिपना नास्तिपने ४० परिणमता है वैसे ही क्या अस्तिपना अस्तिपने परिणमता है ? हां गौता ! जैसे हमारे मत में अस्तित्व अस्तिपने परिणमता है वैसेही नास्तिपना नास्तिपने परिणमना है और जैसे नास्तिपना नास्तिपने परिणमता है ! वैसेही अस्तित्व अस्तिपने परिणमता है. ||७॥ अहो भगान् ! अस्तित्र अस्तिपने गमनीय १ पहिला शतक का तीमरा उद्देशाg>< भावाथ शब्दाथे|| २४ सत्र परिणमे में दो दोआलापक त तसे ग. प्रकाशने में दो० दो आ० आलाप भा० कहना ॥ ८॥जी. जीर भ• भगान् के० कांक्षा मोहनीय कर्म वं० चांचे है। हां गो. गौतम ० वांवे क० कैसे भ० भगवन् जी० जीप कंकाक्षा मोहनीय कर्म बं० बांधे गो० गौतम ५० प्रमाद प्रत्यय जो जोगानिमित्त से वह परिणमइ दो आलावगाा,तहागमणिजेणवि दो आलावगा भाणियव्वा,जाव तहामे अस्थित्तं अस्थित्ते गमणिजं जहा ते भंते! एत्थंगमणिनं तहाते इह गमणिजं जहाते इह गमणिज्ज तहाते इत्थं गणिजं?हता गोयमा!जहामे इत्थं गमणि तहामे इगमणिजीजीगणं भंत कंखा मोहाणिज कम्मं बधति ? हंता गायमा ! बंधति । कहणं भंते ! जीवा कंखा अर्थात् छती वस्तु छतेपने ही प्रकाशने योग्य है अन्य को जनाने योग्य है ? यहां पर जैसे परिणमते के दो आलाप को चैने ही प्रकाशने के हमारे मतमें अस्तित्र अस्तिपने प्रकाशने योग्य है वहां तक दो आलापक कहना. और भी अहो भगान् ! जैसे आप के मत में मेरे जसे मुशिप्य को वस्तु प्ररूपी वैनेही क्या आपके मन में पाखंडी गृहस्थादिक को प्ररूपी ? और जैसे पाखंडी गृहस्यादिक को वस्तु मम्मी वैसेही क्या मेरे जैसे सुशिष्यको वस्तु प्ररूपी ? हां गौनम ! जैसे मेरे मत में गुशिष्यादिक को वस्तु स्वरूप प्ररूपा वैसे ही पाखंडी गृहस्थादिक को वस्तु स्वरूप प्ररूपा और जैसे पाखंडी को वस्तु स्वरूप प्ररूपा वैसेही मुशिष्य को वस्तु स्वरूप प्ररूमा ॥ ८॥ अहो भगवन् ! जीव कांक्षा भावार्थ 4. अनुवादक-पालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिगी प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदवमहायजी बालाप्रसादनी * PRAK SO शन्द्रार्थ, भावार्थ <PE80 पंचमांग विवाह पण्णधि ( भगवती) सूत्र 28 भ० भगवन् प०प्रमाद किं० किमसे पं उत्पन्न होरे गोः गौतम जो० जोगसे ५० उत्पन्न होने जोरजोग किं० किससे प० उत्पन्नहोवे गो गौतम वी०वीर्यने ५० उत्पन्नहींव वीवीर्य कि०किससे प० उत्पन्न होवं सशरीर से मोहणिजं कम्म बंधति ? गोयमा! पमाद पच्चयं, जोगानिमित्तंच ॥ सेणं भंते ! पमादे "किपबहे ? गोयमा! जोगप्पवहे । सेणं भंते ! जोए किंपवहे ? गोयमा ! वारियप्पवहे। सेणं भंते ! वीरिए किंबहे ? गोयमा ! सरीरप्परहे । सेणं भंते सरीरे किंपवहे ! मोहनीय कर्म बांधता है ? हां गौतम ! जीव कांक्षा मोहनीय कर्म बांधता है. अहो भगवन् ! जीव कैसे का- क्षा (मिथ्यात्व ) मोहनीय कर्म बांधता है ? अहो गौतम! प्रमाद प्रत्ययिक व योग निमित्त से. अहो भगवन ! प्रमाद किस कारन से प्रवर्ते अर्थात् को उत्पन्न होवे ? अहो गौतम ! मन प्रमुख योग के व्यापार से प्रमाद उत्पन्न होते. अहो भगान् ! योग कैसे उत्पन्न होये ? अहो गौतम ! वीर्यातरायं कर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न हुवा जो जीव परिणाम उन से योग उत्पन्न होवे. अहो भगवन् ! वीर्य कैसे उत्पन्न होवे ? अहो गौतम ! वीर्य के दो भेद सकरण वीर्य और अकरण वीर्य. उस में अलेशी केवली समस्त पदार्थ जानेते व देखते को वैसंही केवल ज्ञान केवल दर्शन प्रयुनते को जो अप्रतिघाती परिणाम विशेष भाव होवे उसे अकरण वीर्य कहते हैं उस का यहांपर अधिकार नहीं है. परंतु, यहां पर मन वचन करण साधन सलेशीजी प्रदेशात्मक व्यापार सो मकरण वीर्य ग्रहण कीया 1883 पहिला शतक का तीसरा उद्देशा8: 238 oyo सूत्र 2. अनुवादकालयलचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थप उरान्नहोवे सशरीर किंकममे प० उत्पन्न होवे जी जीवसे प उत्पन्नहोवे ए.एसे स होते अ० है उ० उत्थान क कर्म व वल वी वीर्य पु० पुरुषात्कार प० पराक्राम ॥२॥ से वह णू. निश्चय भ० भगवन् अ० आत्मा से उ० उदीरे ग. निन्दे सं० संवरे है. हा गो. गौतम आ० आत्मा से ते तैसे ही उ. कहना गोयमा! जीवप्पवहे एवंसइ अत्थि उट्ठाणेइवा. कम्मेइवा, बलेइवावीरिएइदा पुरिसक्कार परकामेइवा ॥ ९ ॥ सेणणं भंते , अप्पणाचत्र उदीरेइ, अप्पणाचेव . गरहइ, अप्पणा चेव संवरइ ? हंता गोयमा ! अप्पणा चेव उच्चारेयव्यं ॥ जंतंभंते । अप्पणा चेव उदीरेइ, भावार्थव शरीर के व्यापार से होता है. अहो भगान् ! शरीर कैसे उत्पन्न होवे ? अहो गौतम जीव से उत्पन्न होवे+ यदि ऐसा होवे तो उट्ठान-कार्य साधन के लिये खडे होना, कर्म-गमनादि कर्म करना, बल- शरीर की मामर्थ्यता, वीर्य-उत्साह, पुरुषात्कार-पुरुपका अभिमान, व पराक्रम-कार्य पूर्ण करना, इस में भी जीव की प्रधानता है. ॥२॥ अहो भगवन् ! कर्मधादिक में जीव की प्रधानता है तो क्या स्वयंही कर्म की उदीरणा करे, स्वयंही कृत कर्म को निन्दाकरे ओर स्वयंही संवरे, अर्थात् कर्म करे नहीं ? हां गोतम स्वयंही कर्मकी उदीरणा करे यावत् स्वयं कर्म करे नहीं.अहो भगवन जब जीव स्वयं उदीरता है,गहता है,व संवरता है तो क्या + यद्यपि शरीर में कर्म भी कारण है निष्फ्रेवल जीव ही कारण नहीं है, तथापि कर्म का कती जीव होने से जीव से शरीर उत्पन्न होना कहा है. प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी * शब्दार्थ More ulu BAS सूत्र स 88.2 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र-8- ज. जो भ• भगवन् आ०आत्माले उ०उदोरे गनिन्दे सं० संवरे ते उन को कि क्या उ० उदेभाया उ. उदीरे अ० उदे नहीं आया अ. उदीरे उ० उदे नहीं आया उ. उदीरगा योग्य उ.उदीरे उ० उदयान्तर ५०पीछे क०कीया कर्म उ० उदीरे गो० गौतम णो नहीं उ० उदे आया उ.उदीरे णो० नहीं अ० उदे नहीं आया • अप्पणाचेव गरहइ, अप्पणाचेव संवरइ, तंकि उदिण्णं उदीरेइ, अणुदिन्नं उदीरेइ अणुदिनं उदीरणा भवियं, कम्मं उदीरेइ, उदयाणतरं पच्छाकडं कम्मं उदीरेइ ! गोयमा ! नो उदिण्णं उदीइ, णो अनुदिण्णं उदीरेइ, अनुदिण्णं उदीरणा भवियं कम्म उदीरेइ, नो उदयाणंतरं पच्छाकडं कम्मं उदीरेइ ॥ जंतंभंते ! अणुदिन्नं उदीरणा उदय आया हुना उदीरता है, उदय नहीं आया हुवा उदीरता है, उदय में नहीं आया है परंतु उदारणा के योग्य जो उते है उदीरता है, अथवा उदय के अनंतर समय में पश्चात् कृत कर्म को उदीरता है ? अहो गौतम! जो कर्म उदयमें आये हैं उनकी उदीरणा करे नहीं क्योंकी उदयमें आये हुवे कर्मों की उदीरणा नहीं होती है, जो उदय में नहीं आये हैं उन की भी उदीरणा नहीं होती है क्यों की वे बहुत काल में जदय में आयेंगे इस लिये वर्तमान काल में उन की उदीरणा का अभाव है, जो उदय में नहीं आये हैं परंतु उ- दीरणा के योग्य हुवे हैं उन को उदीरते हैं और उदयांतर कृत कर्म को नहीं उदीरते हैं. अहो भगवन् ! जो उदय में नहीं आये हैं और उदीरणा के योग्य बने हुने उन को उदीरते हैं तो क्या भावार्थ - पहिला शतकका तीसरा उद्देशा858 4. अनुवादक-रालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी- शब्दार्थप उरानहोवे स०शरीर कि किमसे ५० उत्पन्न होवे जी जीवसे प उत्पन्नहावे एएसेस होते अ० है उ० उत्थान क कर्म य० वल बी वार्य पु० पुरुपात्कार प० पराक्रम ॥२॥ से वह णू निश्चय भ० भगवन् अ० आत्मा से उ. उदीरे ग. निन्दे सं० संवरे हैं. हा गो. गौतम आ० आत्मा स त तैले ही उ. कहना गोयमा! जीवप्पवहे एवंसइ अत्थि उट्ठाणेइवा. कम्मेइवा, बलेइवावीरिएइदा पुरिसकार सूत्र परक्कमेइवा ॥ ९ ॥ सेणणं भंते , अप्पणाचेच उदीरेइ, अप्पणाचेव . गरहइ, अप्पणा चेव संवरइ ? हंता गोयमा! अप्पणा चेव उच्चारेयव्यं ॥ जंतंभंते । अप्पणा चेव उदीरेइ, यह शरीर के व्यापार से होता है. अहो भगवन् ! शरीर कैसे उत्पन्न होवे ? अहो गौतम जीव से उत्पन्न होने यदि ऐसा हो तो उद्वान-कार्य साधन के लिये खडे होना, कर्म-गमनादि कर्म करना, बल- शरीर की सामर्थ्यता, वीर्य-उत्साह, पुरुपात्कार-पुरुपका अभिमान, व पराक्रम कार्य पूर्ण करना, इस में भी जीव की प्रधानता है. 1॥२॥ अहो भगवन् ! कर्मबंधादिक में जीव की प्रधानता है तो क्या स्वयंही कर्म की उदीरणा करे, स्वयही कृत कर्म की निन्दाकरे ओर स्वयंही संवरे, अर्थात् कर्म करे नहीं ? हां गोतम; स्वयंही कर्मकी उदीरणा करे यात्रत् स्वयं कर्म करे नहीं हो भगवन् जब जीव स्वयं उदीरता है, गर्हता है,व संवरता है तो क्या + यद्यपि शरीर में कर्म भी कारण है निष्कैवल जीव ही कारण नहीं है, तथापि कर्म का कर्ता जीव होने से जीव से शरीर उत्पन्न होना कहा है. * प्रकाश रानावहादुर लाला मुखदेव महायजी ज्वालाप्रसादजी * ९९ 28 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 83-88- अ०अवल अवीर्यरहित म०पुरुषात्कार पराक्रम रहित ॥१०॥सेवह भ भगवन् अ आत्मा सेउ उपशमोव ग. ज्दाथ निन्दे सं० संवरे हैं. हां ए० यहां त तैसे भा०कहना ण विशप अ० उदे नहीं आया उ० उपशमावे से शेप 204० वर्जना ति तोन जं० जो भ० भगवन् अ० उदे नहीं आया उ० उपशमावे तं०. उन को कि० क्या अपुरिसकार परकमेणं अणुदिन्नं उदीरणा भावियं कम्मं उदीरंति. एवं सइ अत्थि उदाणेइवा, कम्मेइवा, बलेइवा, वीरिएइवा, पुरिसक्कार परकमेइवा ॥ १० ॥ सत्रः सेणणं भंते अप्पणाचेव उवसामेइ, अप्पणाचेव गरहइ, अप्पणाचेव संवरइ ? हंता गोयमा ! एत्थवि तहेव भाणियव्वं, णवरं अणुदिन्नं उवसामेइ, सेसा पडिसेहियन्या तिणि ॥ जं तं भंते! अणुदिन्नं उवसामेइ तंकिं उट्ठाणेणं जाव पुरिसकार परकमेइवा अनुदित कर्म को उदीरता है ॥ १० ॥ अव कांक्षा मोहनीय का उपशम कहते हैं. अहो भगवन् ! क्या भावार्थ जीव स्वयं कांक्षा मोहनीय कर्म उपशमावे, गर्ने, व संवरे ! हां गौतम ! जीव स्वयं ही कांक्षा मोहनीय कर्म उपशमावे यावत् संवरे. यहांपर पूर्वोक्त उदीरणा जैसे कहना, परंतु यहां अनुदित कर्म का उपशम करते हैं और शेष तीन को छोडना. जो उदय में आया है वह अवश्यही वेदाता है .इस लिये अनुदित कर्भ का उपशम कहा है. अहो भगवन् ! जो अशुदित कर्म का उपशम करता है वह क्या उत्यान, कर्म-यावत् पराक्रम से करता है या उत्थानादि विना उपशम करता है ? वगैरह आधिकार पहिले जैसे 298 पहिला शतक का तीसरा उद्देशा 98 OYO GY शब्दार्थ उ. उदीरे अ० उद नहीं आया उः उदीरणा योग्य-क० कर्म- उ. उदीरे नो० नहीं उ. उदयान्तर ५० पीछे क० कीया कर्म'उ० उदीरे.ज. जों में भगवन अ० उदे नहीं आया उ० उदीरना योग्य क० कर्म उ० उदीरे त उन को उ० उत्थान क० कर्म व० वल वी० वीर्य पुत्र पुरुषात्कार पराक्रम से अ० उदे नहीं आया उ० उदीरणा योग्य उ० उदीरे उ० अश्वा तं. उन को अ०. अनुत्थान अ० अकर्म १८ सूत्र 4. अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिज़ी भवियं कम्मं उदीरेइ तंकि उट्ठाणेणं, कम्मेणं, बलेणं, वीरिएणं, पुरिसक्कार परक्कमेणं अणुदिन्नं उदरिणा भवियं कम्मं उदीरेति. उादहु तं अणुट्ठाणेणं, अकम्मेणं; अबलेणं अवीरिएणं, अपुरिसकार परकमेणं; अणुदिष्णं उदीरणा भावयं कम्मं उदीरेइ ?, गोय- मा ! 'तं. उट्ठाणेणवि, कम्मणवि, बलेणवि, वीरिएणवि, पुरिसक्कार परक्कमेणविं, अणु- दिन्नं उदीरणा भावयं कम्मं उदीरेइ नो, तं अणुटाणेणं अकम्मेणं अबलेणं अवीरिएणं उत्थान; कर्म, वल, वीर्य, व पुरुषात्कार पराक्रम से उदारता है ? अथवा उत्थान, कर्म, वल, वीर्य, व पुरुपा तार' पराक्रम विना उदीरता है ? अहो गौतमः! उत्थान. यावत पराक्रम.से. उदीरणा के योग्य अनु: दित कर्म उदीरता है.. परंतु उत्थान यावत् पराक्रम विना उदीरणा के योग्य अनुदित कर्म को नहीं उदी- रता है. इस लिये उत्थान, कर्म, वल, वीर्य, व पुरुषात्कार पराक्रम में अस्ति है जिस से उदीरणा योग्य * प्रकाशक-राजीवहादुर लालो मुखदेवसंहायजी ज्वालाप्रसादजी * वार्थ oro tana- दार्थ १०१. सून 88 पंचमाङ्ग विवाह पण्यत्ति (भगवती) सूत्र 385 <> पहिला शतकका तीसरा उद्देशशा 888 जा यावत् प० पराक्रम ॥ १३॥णे. नारकी भ० भगवन् के० कांक्षा मोहनीय क. कर्म ३० वेदे ज. जैसे ओ० औधिक जीव त० तैसे ने० नारकी जा० यावत् थ स्तनित कुमार ॥ १४ ॥ पु० पृथ्वी. काया भ० भगवन् कं० कांक्षा मोहनीय क० कर्म वे० वदे हैं. हां ये वेदे क. कैमे भ० भगवन् पु० . पृथ्वीकाया कं० कांक्षा मोहनीय कर्म ये वेदे गो० गौतम ते० उन जी० जीवों को जो नहीं हैं ए. ऐसा णिजेरइ एवं जाव परकामेइवा ॥ १३ ॥ णेरइयाणं भंते! कंखा मोहाण कम्मं वेदं. ति ? जहा आहिया जीवा तहा णेरइया जाव थाणिय कुमारा ॥ १४ ॥ पुढवि. काइयाणं भंते ! कंखा मोहाण कम्गं वेदंति ? हेता वेदंति । कहणं भंते । पुढवि- काइया कंखा मोहणिज कम्मं वेदंति ? गोयमा ! तेसिणं जीवाणं णो एवं तक्काइवा, शेप पुरुषात्कार पराक्रम तक का सव अधिकार पहिले जैसे कहना ॥ १३ ॥ अहां भगवन् क्या नार. की कांक्षा मोहनीय कर्म वेदता है ? अहो गोतम ! जैसे समुच्चय जीव का कहा वैसे ही नारकी का जानना. और वैसे ही स्तनित कुमार तक का जानना ॥ १४ ॥ पंचेन्द्रिय को शकितादि दोप होवे इस से १० कक्षा मोहनीय कर्मकी वेदनादि होवे परंतु एकेन्द्रियादिकको शकितादि दोप नहीं होने से कांक्षा मोहनीय की वेदना होवे नहीं इस लिये एकेन्द्रिय को विशेषता से कांक्षा मोहनीय का खरूप बताते हैं. अहो भगवन् ! पृथ्वी काय कांक्षा मोहनीय कर्म वेदे ? हां गौतम! पृथ्वी कायिक जीव कांक्षा मोहनीय कर्म वेदे. भावार्थ Gyo शब्दाथ| उ० उत्थान जा. यावत् पु. पुरुपात्कार पराक्रमले ॥ ११ ॥ से वह भ० भगवन् अ. आत्मा से थे. वेदे ग निन्दे हैं. हां गो० गौतम ए. यहां सं० सर्व प० परंपरा ण विशेष उ० उदेआया वे. चंदे णो नहीं अउदे नहीं आया वे० वेदे एक ऐसे जा० यावत् पु० पुरुषात्कार पराक्रम ॥ १२॥ से वह भं० भगवन् अ० आस्मा से णि निर्जरे अ० आत्मा से ग० निन्दे है० हां गो० गौतम ए. यहां स: सर्व १० परंपरा ण. विशेप उ. उदयान्तर १० पीछे क० कीया क. कर्म नि० निर्जरे ए. सूत्र 2. अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 ॥ ११ ॥ सेणूणं भंते ! अप्पणा चेव वेदेइ, अप्पणा चेव गरहइ ? हंता गोयमा ! एत्थवि सम्बधि परिवाडी, णवरं उदिण्णं वेदेइ, णो अणुदिन्नं वेदेइ. एवं जांच पुरिसकार परकमेइवा ॥ १२ ॥ सेणूणं भंते.! अप्पणा चेव णिजरेइ अप्पणा चेव गरहइ ? हेता गोयमा ! एत्थवि सव्वेवि परिवाडी, णवरं उदयाणंतर पच्छा कंडं कम्म कहना ॥ ११॥ अहो भगवन् ! जीव स्वयं वेदता है, सयं गर्हता है ? हां गौतम ! यहाँपर सत्र परि- पाटी पहिले जसे कहना. इस में उदय आये हुवे कर्म वेदते हैं इतना ही विशेष हैं और पुरुषात्कार पराक्रमतक पहिले जैसे कहना ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! जीव क्या स्वयं कर्म की निर्जरा करता है व नहीं करता है ! हां गौतम ! यॉपर उदयान्तर समय पश्चात् कृतकर्म निजरे इतना विशेष जानना * प्रकाश राजाबहादुर लाला सुखदेवासायनी बालापनादजी भावार्थ ब्दिाथा १.०१. सूत्र *323 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 3809 जा. यावत् १० पराक्रम ॥ १३॥णे. नारकी भ० भगवन् के. कांक्षा मोहनीय क कर्म ३० वेदे ज. जैसे ओ० औधिक जीव त० तैसे ने नारकी जा० यावत् थ० स्तानित कुमार ॥ १४ ॥ पु० पृथ्वी- काया भ० भगवन् कं० कांक्षा मोहनीय क० कर्म वे • वेदे है. हां ये वेदे क० कैसे भ० भगवन् पु. पृथ्वीकाया के० कांक्षा मोहनीय कर्म वे० वेदे गो गौलम ते० उन जी जीवों को णो नहीं हैं ए. ऐसा गिजरेइ एवं जाव परकमेइवा ।। १३ ॥ णेरइयाणं भंते! कंखा मोहाणज्ज कम्मं बेदं. ति ? जहा ओहिया जीवा तहा जेरइया जाव थाणिय कुमारा ॥ १४ ॥ पुढवि- काइयाणं भंते ! कंखा मोहाणिज कम्गं वेदति ? हंता वेदंति । कहणं भंते । पुढवि. काइया कंखा मोहणिज कम्मं वेदंति ? गोयमा ! तेसिणं जीवाणं णो एवं तत्काइवा, शेष पुरुषात्कार पराक्रम तक का सब अधिकार पहिले जैसे कहना ॥ १३ ॥ अहाँ भगवन क्या नार की कांक्षा मोहनीय कर्म वेदता है ? अहो गौतम ! जैसे समुच्चय जीव का कहा वैसे ही नारकी का. जानना. और वैसे ही स्तनित कुमार तक का जानना ॥ १४ ॥ पंचेन्द्रिय को शांकितादि दोप होवे इस से कांक्षा मोहनीय कर्मकी वेदनादि होवे परंतु एकेन्द्रियादिकको शांकतादि दोप नहीं होने से कांक्षा मोहनीय की वेदना होवे नहीं इस लिये एकेन्द्रिय को विशेषता से कांक्षा मोहनीय का स्वरूप बताते हैं. अहो. भगवन् ! पृथ्वी काय कांक्षा मोहनीय कर्म वेदे ? हां गौतम ! पृथ्वी कायिक जीव कांता मोहनीय कर्म वेदे. १००> पहिला शतकका तीसरा उद्देशशा भावार्थ ' Mrnima नःपन ३० वचन :अकोला महनीपटना RI यायत पुल पुम्बाधार पराक्ररए मनानावत . गनगन्दा ॥ १० निन्दिय । त्रा यावत् ये ० दयानिक जमा प्राधिक नीव ॥ १३॥ मगवन १. श्रमण निक माणगाड्या , पण्याइवा , मणइवा , वइइबा , अम्हणं कंखा माहणिनं कम्मं बदमो . मा० यावर phir - पीस मलनी काटिनगो नि निन्न १. मा. पति । पुणते सेणूणभंते ! तमेवसच्चं णीसंकंजंजिणेहि पवेइयं सेसं तंचव जाव परिसफा-' 'परकमेवा एवं जाव चरिदियाणं ॥ १५ ॥ पंचिंदिय तिरिक्खजोणिया जाब गणिया जहा ओहिया जीवा ॥ १६ ॥ अस्थिणं भंते ! समणा निग्गंधा कंखा भगमन् ! वे कैसे कांक्षा मोदनीय कर्म वेदे ? अहो गौतम ! उन जीवोंको नर्क, संज्ञा, मना, मन, वचनः व में कांक्षां मोहनीय कर्म वेदता हूं ऐसा ज्ञान नहीं हैं। तथापि वे कांक्षा मोहनीय कर्म वंदे. इस कारन से ऐसे स्थान में, : साधु को ऐसा कहना कि जो जिन भगवानूने यरूपा है वहही निःशंक सत्य है. शेष पुरुषात्कार पराक्रम तकका सब , अधिकार पूर्ववत् जानना और ऐसे ही अप, तेउ, वागु, वनस्पति, बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चतुरेन्द्रिय तक कहना ॥ १.५.. पंचेन्द्रिय लियच, मनुष्य, वाणव्यंतर, ज्योतिषी व वैमानिक का औधिक (समुच्चय ) जीव जैसे कहना ॥ १६॥ सब मागगनारहादुर लाला मुन्वय सहायजी बालाप्रसादजी . , सूत्र १०३ ? भावाथे 388 पंचमांग विवाह पण्गत्ति (भगवती) सूत्र 80 पहिला शतक का तीसरा उद्देशा 8 निग्रंथ कं० कक्षा मोहनीय कर्म वे वेदे है० हां क० कैसे भ० भगवन्. स. श्रमण नि० निंग्रेथ के० कांक्षा मोहनीय कर्म वे. वेदे गो गौतम ते. उस का० कारन से ना० ज्ञानांतरसे दं. दर्शनांतर से च० मोहणिज्ज कंमं वेदति ? हंता अत्थि । कहणं भंते ? समणा. निग्गंथा कंखामोहणि- जं. कर्म वेदति ? गोतमा ! तेहिं तेहिं कारणेहिं, नाणंतरहिं, दसणंतरेहिं, चरित्ततरोहिं जीवोंको मिथ्यात्व मोहनीय कर्म वेदना कहा परंतु वह निग्रंथ को नहीं होता है क्यों कि जिनागम जानने- वाले को निर्मल बुद्धि रहती है, इस लिये निग्रंथ संबंधी पृच्छा करते हैं. अहो भगवन् ! वाह्या- भ्यंतर परिग्रह रहित श्रमण तपस्वी कांक्षा मोहनीय कर्म वेदते हैं ? हां गौतम ! वे वेदते हैं. अहो भगः वन् ! वे श्रमण निग्रंथ किस प्रकार से कांक्षा मोहनीय कर्म वेदते हैं ? अहो गौतम ! ' इस का कारण मैं बताता हूं. १ ज्ञानांतर से - एक ज्ञान से दूसरे ज्ञान में शंका उत्पन्न होवे जैसे अवधि ज्ञानवाला परमाणु वगैरह सकल रूपी द्रव्य अवधि ज्ञान से जाने और मनःपर्यव ज्ञानी अढाइद्वीप में रहे हुवे संज्ञी के मन का भाव जाने. इस में मन द्रव्य रूपी होने से अवधि ज्ञानी अवधि ज्ञान से मन का भाव जाने जब मनः पर्यव} 50 ज्ञान में क्या विशेषता ? ऐसी शंका करे. २ दर्शनांतर से अर्थात् एक दर्शन से दूसरे दर्शन में शंका उत्पन्न होवे जैसे चक्षुदर्शन व अचक्षुदर्शन को भिन्न क्यों कहा ? अथवा • सम्यक् दर्शन में शंका उत्पन्न होवे ३ चारित्रांतरसे - अर्थात् एक चारित्र से दूसरे चारित्र में शंका उत्पन्न होवे जैसे सामायिक चारित Q.9 O0 ૧૦૨ सत्र सूत्र * अनुवादक-बालब्रह्मचरिमुनि श्री अमोलक पिनी शब्दार्थ) न० तर्क स० संज्ञा प० प्रज्ञामः मनव० वचन अ० अम्हे कं० कांक्षा मोहनीय क• कर्न वे वेदते हैं वे जानते पु. फीर तं० चहहीं स. सत्य नी० शंकारहित-जं. जो जि० जिनने प० प्ररूपा. से- शेष तं० से जा० यावतू पु० पुरुषात्कार पराक्रम ए. ऐमे जा० जावत् च चतुरेन्द्रिय ॥ १५ ॥ ५० पैनेन्द्रिय तिर्यंच जा० यावतू ये० वैमानिक ज जैसे ओ० औधिक जीव ॥ १६ ॥ भं० भगवन्- स० · श्रमण नि० सण्णाइवा, पण्णाइवा, मणेइवा, वइइवा, अम्हेणं कंखा मोहाणिज्ज कम्मं वेदेमो वे- देति । पुणते सेणूणभंते ! तमेवसच्चं णीसंकंजंजिणेहिं पवेइयं सेसं तंचेव जाव परिसक्का- र परकर्मइवा एवं जाव चरिंदियाणं ॥ १५ ॥ पंचिंदिय तिरिक्खजोणिया जाव. वेमाणिया जहा ओहिया जीवा ॥ १६ ॥' अत्थिणं भंते ! समणा निग्गंथा कंखा भावार्थ भो भगमन् ! वे कैसे कांक्षा मोहनीय कर्म वेदे ! अहो गौतम ! उन जीवोंको तर्क, संज्ञा, मना, मन, वचनः व. मैं कांक्षां मोहनीय, कर्म वेदता हूं ऐसा ज्ञान नहीं हैं। तथापि वे कांक्षा मोहनीय कर्म बंदे.. इस कारन से ऐसे स्थान में साधु को ऐसा कहना कि जो जिन भगवानूने मरूपा है वहही निःशंक सत्य है. शेप पुरुषात्कार पराक्रम तकका सव. अधिकार पूर्ववत् जाना और ऐसे ही अपू, तेउ, वागु, वनस्पति, वेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चतुरेन्द्रिय तक कहना ॥ १५ ॥ पंचेन्द्रिय इतियच, मनुप्प, वाणव्यंतर, ज्यातिपी व वैमानिक का औधिक (समुच्चय) जीव-जैसे कहना ॥ १६॥ सब * प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी बालाप्रसादजी * . oyo -- AAR पंचपाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 8-88- व्दार्थ है मतांतरसे भ० भंगोके अंतरसे णः नयांतर से णि नियमांतरसे या प्रमाणांतरसे सं० शंकित कं० वाच्छा, वाला वि० संदेह वाला के० कांक्षा मोहनीय कर्म के० वेदे ॥ १७ ॥ भ० भगवन तं० वहही स० सत्य नी० शंकारहित जा. यावत् पु० पुरुषात्कार पराक्रम स० वह ए० ऐसे भं० भगवन् ॥१॥३॥ णयंतरहि, णियमंतरोहि, पमाणंतरेहि, संकिया कंखिया, वितिनिच्छिया, भेदसमावण्णा, सूत्र कलुससमावण्णा, एवं खलु समणा निग्गंथा कंखा मोहणिजे कम्मं वेदंति ॥ १७ ॥ सेणूणं भंते ! तमेव सच्चं नीसंकं जं जिणेहिं पवेइयं? हंता गोयमा तमेव सच्चं नीसंकं एवं जाव पुरिसकार परकमेइवा ॥ सेवंभंते भंते ! त्ति पढमसए तइओ उहेसो सम्मत्तो॥ १ ॥३॥ भावार्थ यिकादिक का प्रत्याख्यान है तो पहरसी वगैरह की क्या विशेषता है ऐमी शंका करे १३ प्रमाणान्तर से- प्रयक्ष प्रमाण व आगम प्रमाणमें भेद क्यों ? आगम प्रमाण से मूर्य ८०० योजन ऊंचे उदित होता है और चक्षु दृष्टि से जमीन में से नीकलना हुवा दीखता है इस में शंका उत्पन्न होवे. इस तरह तेरह प्रकार की शंका उत्पन्न होवे, मिथ्या दर्शन की यांच्छा होवे, धर्म करणी में फलका मंदेड लावे, मस अम- त्यका भेद करे, मतिभ्रम होने से कालुष्यतापाले बने, इसी कारण से श्रमण निग्रंथ कांक्षा मोहनीय कर्म वेदते हैं ॥ १७ ॥ अहो भगवन ! जो जिन भगवान्ने प्ररूपा है वह सस है ? हां गौतम ! जो जिन भगवान्ने प्ररूपा है वहरी निःशंक सय है. ऐसे ही पुरुपातार पराक्रमतक कहना. श्री गौतम स्वामी कहते कि अहो भगवन ! जैसे आप प्ररूपते हैं वह सब सत्य है. यह पहिला शतकका तीसरा उद्देशा. ENABT पहिला शतकका तीसरा उद्देशा - x m .
सूत्र १०४ 22 अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी 87 शब्दाः चारित्रांतरसे लिं. लिंगांतरसे प. प्रवचनांतरसे पा० प्राव वनांतरसे कर कल्पांतरसे म. मागीतरमे म. लिंगतरेहि, पबयणंतरेहिं पावयणंतरेहिं कप्पंतरेहि, मग्गतरेहि, मयंतरेहि, भगतरेहिं, भावार्थ में सब साक्यका प्रत्याख्यान है और छेदोपस्थापनीय में पंचमहावत का आरोपण किया है. ४ लिंगांतर, से - लिंग जो साधु का वेप उस में शंका उत्पन्न होवे जैसे वावीस तीर्थंकर के साधु जैसे शुद्ध पत्र मीले वैसा ग्रहण करे और प्रथम व अन्तिम तीर्थंकर के साधु प्रमाण युक्त वस्त्र धारन करे. इस तरह जो भिन्नता है वह क्यों होवे ऐसी शंका होवे ५ प्रवचनान्तर से - प्रवचन सो आगम इस में भिन्नता होने से शंका उत्पन्न होवे. जैसे वावीस तीर्थंकर के साधुओंको चार महाव्रत और प्रथम व अंतिम तीर्थकर के माधुओं को पांच महाव्रत ऐसी भिन्नता ६ प्रावचनान्तर से - अर्थात् गीतार्थ के वचन में भिन्नता होने से शंका करे जैसे एक आचार्य थोडी क्रिया करते हैं और दूसरे विशेष क्रिया करते. होये. ७. कल्पान्तर से • अर्थात् कल्प २ में भिन्नता देखकर शंका होवे जैसे जिन कल्पी नग्नत्वपना वगैरह अतिकष्ट सहन करते हैं और स्थविर कल्पी वस्त्रादि महित प्रवर्ते. ये दोनों किस प्रकार से कर्मक्षय करे वैसी शंका उत्पन्न होवे ८ मा- गन्तिर से - अर्थातू पूर्वापर समाचारी में भिन्नता होने से शंका उत्पन्न होवे ९ मतांतर से - आचार्य के अभिमाय में भिन्नता होने से शंका उत्पन्न होवे १० भंगान्तरसे - अर्थात् द्वीभंगी चौभंगी की विचारना उस में भिन्नता की समझ नहीं होने से शंका उत्पन्न होवे ११ नयांतर से द्रव्यास्तिक पर्यायास्तिक नय में नित्यानिस वस्तु का स्वरूप. जानकर शंका उत्पन्न होवे, १२. नियमान्तर से - जब. यावजीव पर्यंत सासा- * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालाप्रमादजी * YO 889- पंचपाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8-88- व्दिार्थ - मतांतरसे भ० भंगोकेअंतरसे णः नयांतर से णि नियमांतरसे य० प्रमाणातरसे सं० शंकित कं० वाच्छा वाला वि० संदेह वाला कं० कांक्षा मोहनीय कर्म वे० वेदे ॥ १७ ॥ भ० भगवन तं० बहही स० सत्य नी० शंकारहित जा. यावत् पु० पुरुषात्कार पराक्रम स० वह ए० ऐसे भं० भगवन् ॥१॥३॥ णयंतरहि, णियमंतहिं, पमाणतरेहि, संकिया कंखिया, वितिगिच्छिया, भेदसमावण्णा, सूत्र कलुससमावण्णा, एवं खलु समणा निग्गंथा कंखा मोहणिज कम्मं वेदति ॥ १७ ॥ सेणूणं भंते ! तमेव सच्चं नीसंकं जं जिणेहिं पवेइयं? हंता गोयमा तमेव सच्चं नीसंकं एवं जाव पुरिसक्कार परक्कमेइवा ॥ सेवंभंते भंते ! त्ति पढमसए तइओ उद्देसो सम्मत्तो ॥ १ ॥ ३ ॥ भावार्थ यिकादिक का प्रत्याख्यान है तो प्रहरसी वगैरह की क्या विशेषता है ऐसी शंका करे १३ प्रमाणान्तर से- प्रसस प्रमाण व आगम प्रमाणमें भेद क्यों ? आगम प्रमाण से मूर्य ८०० योजन ऊंचे उदित होता है और चा दृष्टि से जमीन में से नीकलता हुवा दीखता है इस में शंका उत्पन्न होवे. इस तरह तेरह प्रकार की शंका उत्पन्न होवे, मिथ्या दर्शन की वांच्छा होवे, धर्म करणी में फलका मंदेह लावे, सस अम- त्यका भेद करे, मतिभ्रम होने से कालुप्यतानाले बने, इसी कारण से श्रमण निग्रंथ कांक्षा मोहनीय कर्म वेदत हैं ॥ १७ ॥ अहो भगवन् ! जो जिन भगवान्ने प्ररूपा है वह सस है ? हां गौतम ! जो जिन भगवान्ने प्ररूपा है वहरी निःशंक सस है. ऐसे ही पुरुपातार पराक्रमतक कहना. श्री गौतम स्वामी कहते कि अहो भगवन ! जैसे आप प्ररूपते हैं वह सब सत्य है. यह पहिला शतकका तीसरा उद्देशा. X 885<P> पहिला शतकका तीरा उद्देशा 9A%ई.
शब्दाथ क० कितनी भं• भगवन् क कर्म प्रकृति प० प्ररूपी गो० गौतम अ० आठ कर्म प्रकृति प० 'प्ररूपी क. कर्म प्रकृतिका प० पहिला उद्देशा ने० जानना जा०. यावत्: अ० अनुभाग क० कितनी क० कर्म प्रकृति क० कैसे ब० वांधे क कितने ठा० स्थानमें पं० वांधे प० प्रकृति ककितनी वे० पेदे प० प्रकृति अ० अनुभाग क० कितना प्रकारका क किपका ॥ १ ॥ जी० जीव भ० भगवन मो० मोहनीय कर कीये १०६ 1 अनुवादक बालग्रह्मगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी * कतिणं भंते ! कम्म पगडीओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! अट्ठकम्म पगडीओ पण्णत्ता- ओं, । कम्म पयडीए पढमोउद्देसो नेयम्वो ॥ जाव अणु भागो सम्मत्तो. ॥ गाहा कति पगडी कहिं बंधइ । कतिहिं ठाणेहिं बंधए पगडी ॥ कई वेदेइ च पगडी । अणुभागो कतिविहो कस्स ॥ १ ॥ १ ॥ जीवेणं भंते ! मोहणिज्जेणं कडेणं कम्मेणं उदिण्णे- भावार्थ गत उद्देशे में कर्म की वेदना उदीरणा आदिका-कथन किया है. अब इस उद्देशे में कर्म का 'सरूप, वताते हैं. अहो भगवन ! कितनी कर्म प्रकृतियों कही ? अहो गौतम ! :कर्म की मूल आठ प्रकृति कही. : इन का विस्तार पूर्वक कथन पन्नघणा, सूत्र के तेत्तोमवा पद के प्रथम उद्देशे में कहा है.. उस में से अनुभाग तक का जानना. उस का संक्षेप में अर्थ बतानेवाली संग्रह गाथा कहते हैं. १ कितनी कर्म प्रकृतियों २ प्रकृति कैसे वधि ३ कितने स्थानक में प्रकृति वांये, ४ कितनी प्रकृति वेदे और ५ कितने ११ प्रकार का अनुभाग होवें ऐसे पांच द्वार कहे हैं ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! मिथ्यात्व मोहनीय से कराये हुवे * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * .
१०७ 988- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 88 शब्दार्थ- क-कर्म उ० उदय से के उ अंगीकारकरे ६० हां गो गौतम उ० अंगीकारकरे से वह भगवन कि क्या वी० % वीर्यपने.उ० अंगीकार करे अ० अवीर्यपने उ. अंगीकार करे गो गौतम वी वीर्यपने उ. अंगीकार करे णो० नहीं अ० अवीर्यपने उ० अंगीकार करे ज० यदि वी० वीर्यपने उ० अंगीकार करे किं० क्या. वा० वाल वीर्यपने उ०. अंगीकार करे पं० पंडितवीर्य पने उ० अंगीकार करे वा. वाल पंडित वीर्यपने उ० णं उवट्ठाएजा ? हंता गोयमा ! उवट्ठाएजा । से भंते! किं वीरियत्ताए उबट्ठाएजा, अवीरियत्ताए उवट्ठाएज्जा ? गोयमा ! वीरयत्ताए उवट्ठाएज्जा, णो अवीरियत्ताए उवट्ठाएजा ॥ जइ वीरियत्ताए उबट्टाएज्जा, किं बाल वीरियत्ताए उवट्ठाएजा, पंडित वीरियत्ताए उवट्ठाएज्जा, बालपंडित वौरियत्ताए उवट्ठाएज्जा ? गोयमा ! बाल वी- भावार्थ कर्मो के उदय से क्या जीव परलोक क्रिया अंगीकार करे अर्थात् अन्य दर्शनी बने ? हां गौतमः ! अन्य दर्शनी बने. अहो भावनू ! जीव वीर्य सहित अन्य दर्शन अंगीकार करे अथवा वीर्य रहित अंगीकार करे ? अहो गौतम ! जीव वीर्य से परलोक क्रिया अंगीकार करे परंतु वीर्य रहितपने अंगीकार करे नहीं: अहो भगवन ! यदि वीर्य से परलोक क्रिया अंगीकारकरे तो क्या वल वीर्य से, पंडित वीर्य से अथवा वालपंडित वीर्य से परलोक क्रिया अंगीकार करे ? अहो गौतम ! मिथ्यात्व के उदय से मिथ्या- दृष्टिपना से जीव को जो बाल वीर्य स्थिर रहता है उस से ही अन्य दर्शन अंगीकार करता है, पंडित Tags पहिला शतक का चौथा उद्देशाggg GO oro शब्दाथा १०६ सूत्र अनुवादक बालब्रह्मगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 83 क० कितनी भं० भगवन क० कर्म प्रकृति प० प्ररूपी गो० गौतम अ० आठ कर्म प्रकृति ५० प्ररूपी क० कर्म प्रकृतिका प० पहिला उद्देशा ने० जानना जा०. यावत् अ० अनुभाग क. कितनी क० कर्म प्रकृति क० कैसे पं० वांये क कितने ठा० स्थानमें 4० वांधे प० प्रकृति ककितनी वे• वेदे प० प्रकृति अ० अनुभाग क० कितना प्रकारका क० किपका ॥ १ ॥ जी० जीव भं० भावन मो० मोहनीय क. कीये कतिणं भंते ! कम्म पगडीओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! अट्ठ कम्म पगडीओ पण्णत्ता- ओं, । कम्म पयडीए पढमोउद्देसो नेयव्वो ॥ जाव अणु भागो सम्मत्तोः ॥ गाहा-कति पगडी कहिं बंधइ । कतिहिं ठाणेहिं बंधए पगडी ॥ कई वेदेइ च पगडी । अणुभागो कतिविहो कस्स ॥ १ ॥ १ ॥ जीवेणं भंते ! मोहणिजेणं कडेणं कम्मेणं उदिण्णे- * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालापसादनी * भावार्थ -- गत उद्देशे में कर्म की वेदना उदीरणा आदिका कथन किया है. अब इस उद्देशे में कर्म का सरूप बताते हैं. अहो भगवन ! कितनी कर्म प्रकृतियों कही ! अहो गौतम ! कर्म की मूल आठ प्रकृति कदी. : इन का विस्तार पूर्वक कथन पन्नपणा सूत्र के तेत्तोमवा पद के प्रथम उद्देशे में कहा है. उस में से अनुभाग तक का जानना. उसका संक्षेप में अर्थ-वतानेवाली संग्रह गाथा कहते हैं. १ .कितनी कर्म प्रकृतियों २ प्रकृति कैसे बांधे ३ कितने-स्थानक में प्रकृति बांये, ४ कितनी प्रकृति वदे और ५. कितने प्रकार का अनुभाग होवे ऐसे पांच द्वार कहे हैं ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! मिथ्यात्व मोहनीय से, कराये हुवे कोक - पंचमांग विवाह पृण्णति ( भगवती) सूत्र 8382 शब्दार्थ सि. कदाचित् वा बालपंडित वीर्यपने अ० अतिक्रमे ॥ ३ ॥ ज० जैसे उ० उदयमें दो० दोआलापक त. तैसे उ० उपशांत में दो दोभालापक मा. कहना ण विशेष उ० अंगीकार करे पं० पंडित वीर्यपने अ अतिक्रमे बा० पालपंडित वीर्यपने अ० अतिक्रमे ॥ ४ ॥ से पह भ० भगवन् कि० क्या औ० भा. वीरियताए अवकमेजा, ॥ ३ ॥ जहा उदिन्नेणं दो आलावगा, तहा उवसंतेणवि दो आलावगा भाणियव्वा, णवरं उवट्ठाएजा, पंडियवीरियत्ताए अवकमेजा, बाल पंडिय वीरियत्ताए अवक्कमेजाः॥ ४ ॥ से भंते ! किं आयाए अवकमई, अणायाएं भावार्थ वीर्य से अपक्रमे अर्थात् बाल पंडित वीर्य से देशविराति (श्रावक) होता है. पाठान्तर ऐसा भी है ति मात्र घालवीर्यपने मिथ्यात्व मोहनीय कर्म का उदयसे अपक्रमे परंतु अन्य दो वीर्य सहित अपक्रमे नहीं ॥ ३ ॥ जैसे उदय का दो आलापक कहा वैसेही उपशान्तका दो आलापक जानना. इन में विशेप इतना कि पहिला आलापक में क्रिया करते सर्वथा मोहनीय उपशान्त रहे इसलिये उपशान्त मोह अवस्था में पंडित वीर्य का भाव है और अन्य दो का अभाव है. दुसरा आलापक मे संयतपना से मोह-190 नीय कर्म उपशमा और पाल पंडित वीर्य से पीछा पडकर देश विरति हुवा उनको मोहनीय कर्म के उप- शम का सद्भाव है परंतु मिथ्यावी नहीं हुवा है क्योंकि मोह के उदय से ही मिथ्यात्वी होवें परंत/ यहां पर मोह मिथ्यात्व के उपशम का अधिकार है ॥४॥ अव सामान्य से अपक्रम का अधिकार चकता। 84 पहिला शतक का चौथा उद्देशा geet ya शब्दार्थ अंगीकारवारे गो गौतम वा वालवीर्य पने उ० अंगीकार करे णो नहीं पंपंडित वीर्यपने नोनहीं या वाल- पडिन वीर्यपने ॥ २ ॥ जी जीन भं भगवन् मो० मोहनीय क० कीये क० कर्म के उ. उदयसे अ० अतिक्रमे हं० हां अ० अतिक्रमे से वह भं० एगवन् जा० यावत् वा० वाल पंडित यि पने अ० अतिक्रमे १०८ सूत्र का अनुवादक-बालब्रह्मगरी मुनि श्री अमोलक ऋापेनी है रियत्ताए उवट्ठाएज्जा जो पंडिय वीरियत्ताए उवट्ठाएजा, णो बाल पंडिय वीरियत्ताए उवट्ठाएजा ॥ २ ॥ जीवणं भंते ! मोहणिजेणं कडेणं कम्मेणं उदिन्नेणं अवकामेजा? हंता अवक्कमेजा. से भंते ! जाव बालरंडिय वीरियत्ताए अवकामेजा ? गोयमा ! बाल वीरियत्ताए अवकमेजा, नो पंडिय बीरियत्ताए अवकमेजा. सिय वाल पंडिय * मकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी मालामसादजी* भावार्थ वीर्य व बाल पंडित वीर्य से अंगीकार नहीं करता है ॥ २ ॥ अव अपक्रमण सो पीछा पडना उस संबंध प्रश्न पूछते हैं. अहाँ भगवन् ! जीव मोहनीय कर्म के 'उदय से अपक्रमता है, उपर के गुणस्थान पर गया हुवा पीछा पड़ता है ? हां गौतम! जीव मोहनीय कर्म के उदय से उत्तम गुणस्थान से हीन गुणस्थान को जाता है. अहो भगवनू ! का वीर्य सहित जाता है या वीर्य रहित जाता है ? अहो गौतम ! वीर्य सहित जाता है. याद वीर्य सहित जाता है. तो क्या बाल वीर्य से, पंडित वीर्य से या बाल पंडित वीर्य से? जाता है. ? अहो गौतम ! बाल वीर्य मे अपक्रमे परंतु पंडित वीर्य से अपक्रमे नहीं कदाचित् बाल पंडित ब्दार्थ सूत्र 838 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भवगती) सूत्र 880 की ति तियेच म० मनुष्य दे देव जे. जो क० किये पा• पापकर्म ण नहीं हैं त. उसका अविना- भोगवा मो० मोक्ष हैं. हां गो० गौतम ने नारकी ति तिव म. मनुष्य दे० देव को जा० यावतू मो० मोक्ष से वह के० कैसे भं० भगान ए. ऐने बु. कहा जाता है नेक नारकी, जा० यावतू मो० णियस्सवा, मणुस्सरसवा, देवस्लवा जे कडे पावे कम्मे णत्थि तस्स अवेइयत्ता मो- - "क्खो ? हंता गोयमा ! णेरइयरसवा, तिरिक्ख मणुस्स देवरसवा जाव मोक्खो । सेकेणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ, नेरइयरसवा जाव मोक्खो ? एवं खलुमए गोयमा ! सामान्य कर्म की चिन्तयना कहते हैं अहो भगवन् ! नरक, तिर्यंच, मनुष्य, व देवताने अशुभाचरण से जो पापकर्म किये हैं उन को वेदे बिना क्या ये मुक्त नहीं हो सकते हैं ? हां गौतम ! नारकी; तिर्यंच, मनुष्य व देवताने जो पापकर्म किये हैं उन को विना वेदे वे मुक्त नहीं हो सकते हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से भारकी तिर्यंव, मनुष्य व देवता किये हुवे कर्मों से विना वेदे नहीं छूट सकते हैं ? अहो गौतम, कर्म के दो भेद मैंने कहे हैं. प्रदेश कर्म व अनुभाग कर्म. उस में मे जो प्रदेश कर्म हैं वे निश्चय ही जैसे किये पैसे दी वेदते हैं, और अनुभाग कर्म को कितनेक वेदते हैं, और कितनेक नहीं वेदते हैं. जैसे मि- थ्यात्व क्षयोपशम काल में प्रदेश कर्म वेदे परंतु अनुभाग कर्म वेदे नहीं. कर्म वेदने के प्रकार अरिहंत देवने ही जाने हैं, अरिहंतने उपदेशे हैं, उनोंने ही उन का चिन्तवन किया है, व द्रव्य क्षेत्र काल भा. 987 पहिला शतकका चौथा उद्देशा भावार्थ 43. अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 63 शब्दार्थमा से अ० अतिक्रमे अ० परात्मा से अतिक्रमे गो०' गौतम आ आत्मासे अ० अतिक्रमः णो० नहीं 'अ परात्मासे अं अतिक्रमे मो मोहनीय के कर्म वे० वेदता से वह के० कैसे ए. यह भ० भगवन् ए. ऐसे गो गौतम पु पहिले से वह ए यह ए ऐसा रो रुचे'इ० पीछे हैं. वह ए. यह ए. ऐसा णो नहीं रो रुचे ए. ऐसे ख. निश्चय ए. यह ॥५॥ से वह णू निश्चय भं• भगवन ने० नार- सूत्र अवकमइ ? गोयमा ! आयाए अवक्कमइ, णो अणायाए अवक्कमइ । मोहणिजे कम्म वेदेमाणे । सेकहमेयं भते.! एवं : गोयमा ! पुद्धि से एयं एवं रोयइ, इयाणिं से एयं. एवं नो रोयइ, एवं खलु एयं एवं ॥ ५ ॥ सेणूणं भंते ! नेरइयरसवा, तिरिक्ख जो- भावार्थ अहो भगवन ! जीव अपनी आत्मासे अपक्रमता है या अन्य की आत्मा से अपक्रमता है. अहो. गौतम ! जीव मिथ्याल मोहनीय व. चारित्र.मोहनीय वेदता.डुवा, अपनी आत्मा से अपक्रमे परंतु अन्यकी आत्मा से अपक्रमे नहीं. अहो भगवन् ! मोहनीय कर्म वेदनेवाले को पहिले पंडितपने की रुचि थी और फीर मिथ्यात की रुचि हुई वह कैसे ? अहो गौतम ! अपक्रमण से पहिले अपेक्रमणकारी जीव इस जीवादि पदार्थ अथवा आहिंसादि वस्तुं को जैसे जिनेश्वर भगवान्ने कहीं में ही श्रद्धता था; अब मोहनीय कर्म के उदय से जीवादि पदार्थ व अहिंसादिक वस्तु को जैसे तीर्थकरने कहीं वैसे'श्रद्धे नहीं इसलिये निश्चय में उक्त प्रकार से मोनीय की वेदते हुवे जीवं स्वात्मा से अपक्रमे ॥ ५॥ मोहनीय कर्म के आधिकार प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालामसादजी * * aaa 8 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र बाब्दार्थ/ लिये गो० गौतम ने० नारकी जा० यानत् मो० मोक्ष ॥ ६ ॥ ए• यह भ० भगवन् पो० पुद्गल तो० भ 4 तीत काल में अ० अनंत सा० शाश्वत स० काल भु० हुवा इ. ऐसे व० कहना है० हां गो० गौतम ए. पो० • पुद्गल ती० अतीत काल में अ. अनंत सा० शाश्वत स० काल भु० हुवा इ० ऐसा व० कहना ए. वह भ० भगवन् पो० पुद्गल प० वर्तमान काल में सा० शाश्वत स० काल भ० है इ० ऐसा का कहना ०७ सूत्र गरणं, जहा जहा तं भगवया दिटुं तहा तहा तंविपरिणमिरसतीति. सेतेणटेणं गोयमा ! नेरइयरसबा.जाव मोक्खो ॥ ६ ॥ एसणं भंते ! पोग्गले तीतमणंतं सासयं समयं भुवीति वत्तव्वंसिया ? हंता गोयमा ! एसणं पोग्गले तीतमणतं सासयं समयं भुबीति वृत्तव्यं सिया । एसणं भंते ! पोग्गले पडुप्पण्णसासयं समय भवतीति वत्तव्यं सिया ? हंता गोयमा ! तंचव उच्चारेयव्वं । एसणं भंते ! पोग्गले भावार्थ नारकी, तिर्यंच, मनुष्य व देवता किये हुये कमों से मुक्त नहीं हो सकते हैं ॥ ६॥ उपर कर्म की चिन्ता बना की वह कर्म पुद्गल रूप हैं इस लिये परमाणु आदि पुद्गल की चिन्तयना कहते हैं. अथवा परि- शाम अधिकार से पुद्गल परिणाम कहते हैं, अहो भगवन् ! अतीत काल में सब गुगल अनंत, शाक्त थे ऐसा कहना ? हां गौतम : परमाणु पुद्गल अतीत काल में सदा थे. ऐसा कदापि नहीं हुवा कि अतीत काल में शुन्य समय [ काल ] हुवा. अहो भगवन ! वर्तमान काल में सब पुद्गल, क्या पावत देता 32.2 पहिला शतक का चौथा उद्देशाage १.२ 48 अनुवादक-पालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 शब्दाथ मांश ए. ऐसे म० मैंने दु० दोगकारे क० कर्म प० प्ररूपेप०प्रदेश कर्म अनुनाग कर्म-० तहां ज. जो प. प्रदेश कर्म तं० उस को मि० निश्चय वे० वेदे जं. जो अ० अनुपाग कर्म तं. उस को 'अ कितः नेक वे वेदे अ० कितनेक नोक नहीं वे. वेदे णा जाना अ.. अरिहंतने सु० राना भ• अरिहंतने वि० विशेषजाना अ० अरिहंतने इ० इस कर्म को अ• यह जीव उ० उदय आये वे वेदना वे. वेदेगा अ० जने कर्म अ० वांधे हैं ज. जैसे तं० उनको भ० भगान्तने दि० देखे त० तैसे १० परिणमेंगे से० इस सूत्र दुविहे कंम्मे पण्णत्त तंजहा, पएसकम्मेय, अणुभागकम्मेय । तत्थणं तं पएसकम्म तं नियमा वेदेइ, तत्थणं जं तं अशुभागमंतं अत्यगइयं वेदेइ अत्थे गइयं नो वेदेइ णायमेयं अरहया, सुयमेयं अरहया, विण्णायमेयं अरहया, इमं कम्मं अयंजीवे अम्भोवगमियाए. वेयणाए वेयइरसइ,इमंकम्मं अयं जीवे उवक्कमियाए वेयणाए वेयइस्सइ, अहाकम्मं अंहाणि भावार्थ वादिक अनेक प्रकार से भिन्न प्रकार के विभाग करके जाने हैं, अरिहंत को ' यह कर्म है, यह जीव है' ऐसा प्रयक्ष है. पवा काल से लेकर ब्रह्मचर्य भूमिशयन, केशलोचनादिक का अंगीकार से निवर्तना सो अभ्युपगमिकी वेदना उस को यह जीव वेदेगा. स्वयपेत्र उदय में आये हुवे अथवा उदीरणा से उदय में लाये हुवे कर्मों को वेदना सो औपक्रनिकी वेदना, उन को यह जीव वेदेगा. जैसे कर्म बांधे हैं, जैसे कर्म के देश कालादि है और जैसे २ भगवन्तने कर्म देखे वैसे २ परिणमेंगे. इसलिपे- महो गौवम ! भकाशक-राजाबहादुर लाला गुखदेवमहायजी जालाप्रसादजी ११५. स०काल के०संपूर्ण संयम से के०संपूर्ण संघर से के०संपूर्ण ब्रह्मचर्य से के०संपूर्ण प्रवचन माता से सिं० सिझे दु बुझें जा० यावत् स० सर्व दु० दुःख का अं० अंतकिया गो० गौतम नो० नहीं इ० यह अर्थ स०समर्थ से वह के कैसे भं० भगवन ए. ऐसे यु. कहा जाता है जा० यावत् अं० अंत क०: किया गो० गौतम जे. जो के० कोइ अं० अंत करने वाले अ० चरम शरीरी स० सर्व दु. दुःखों का अं० अंत क. किया क० करते हैं क० करेंगे स० सब ते वे उ० उत्पन्न ना० शान दर्शन वाले अ०. अरित जि० जिन के केवली भ० होकर त० पीछे सि० सिझते हैं बु० बुझते हैं मु० मुक्त होते हैं १० निर्वाणपाने केवलेणं संवरेणं, संवरेणं, केवलेणं बंभचेरवासेणं, केवलीहिं पवयणमायाहिं, सि- झिसु, बुझिनु जात्र सम्वदुक्खाणमंतं करिसु ? गोयमा ! नो इण? समटे । सेकेणढेणं भंते ! एवंवुच्चइ, तंचेव जाव अंतं करिंसु ? गोयमा ! जेकेइ अतकरावा अतिम सरीरियावा सव्व दुक्खाणमंतं करिसुवा, करितिवा, करिस्तंतिवा, सवे केवल संवर से, केवल ब्रह्मचर्य से व केवल आठ प्रवचन माता से सिझें, बुझें. यावत् सब दुःखों का अंत किया? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं. अठो भगवन् ! किस कारन से छमस्थ मनुष्य सिझें, बुझे नहीं यावत् सर दुःखों का अंत किया नहीं ? अहो गोतम ! संसार के अंत करनेवाले व चरम शरीरी ने सब दुःखों का अंत किया, करते हैं, व करेंगे. वे सब कंवलज्ञान, कंवलदर्शन के ११.पंचमाङ्ग विवाह पप्णत्ति (मगवती) सूत्र सूत्र पहिला शतक का चौथा उद्देशा भावार्थ eg oyo ११४. अनुवादक वालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी ? ६० हाँ गो० गौतम त० मे १० कहना १० यह भ० भगवन् पो० पुद्गल अ० अनागत में. अ० अनंत सा० शाश्वत स० काल भ० होगा इ० ऐसा व० कहना हं० हां गो. गौतम तं तैसे ही उ० कहना. ए. ऐसे सं० स्कन्ध में ति तीन आ० आलापक ॥ ७॥ ए. ऐसे जी० जीव में ति तीन आऔलापक भा०' कहना ॥८॥छ० छमस्थ भं० भगवन् म. मनुष्य अ० अतीत काल में अ० अनंत. सा.' शाश्वत अणागयमणतं सासयं समयं भविस्सतीति वत्तव्यं सिया? हंता गोयमा! तंचेवं उच्चारेयव्वं ॥ एवं खंधणवितिण्णि आलावगा ॥ ७ ॥ एवं जीवेणवि तिण्णि आलावगा भाणि- यव्वा..॥ ८ ॥ छउमत्येणं भंते ! मणसे तीतमणतं सासयं समयं केवलेणं संजमेणं, भावार्थ करना ? हां गौतम ! वर्तमान काल में सब पुल शाश्वत है. अहो भगवन् ! अनागत काल में सब पुनल अनंतपना से शाश्वत रहेंगे ? हां गौतम ! मव पुद्गल शाश्वत रहेंगे. (परमाणु पुद्गल का संयोग मीलने से स्कंध होता है उन पर भी तीन आलापक जानना ॥ ७ ॥ पुद्गल का. प्रतिपक्षी जीव है इसलिये जीव का प्रश्न करते हैं, अहो भगवन् ! अतीत काल में जीव था ? अहो गौतम ! जैसे तीन काल के तीन आलापक पुद्गल के कहे वैसे ही भूत, भविष्य व वर्तमान काले की अपेक्षा से जीव के भी तीन आ- लापक जानना ॥ ८॥ अब नीर के आधिकार से उद्देशा के अंत तक यथोत्तर प्रधान जीव की वक्तव्य- ता कहते हैं. अहो भगवन् ! छमस्थ मनुष्य अतीत, अनंत व शाश्वत काल में संपूर्ण शुद्ध संयम से, १ इसमें केवल ज्ञान व अवपिज्ञान ऐसे दोनोहान रहितको लेना क्योंकि अवधिज्ञानका अधिकार आगेआवेगा प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * साथ ११५. स०काल के संपूर्ण संयम से के संपूर्ण संवर से के०संपूर्ण ब्रह्मचर्य से के०संपूर्ण प्रवचन माता से सिं० सिझें दु: वुझें जा० यावत् स० सर्व दु० दुःख का अं अंतकिया गो० गौतम नो० नहीं इ० यह अर्थ स०समर्थ से वह के कैसे भ० भगवन ए. ऐसे बु० कहा जाता है जा. यावत् अं० अंत क० किया गो० गौतम जे. जो के० कोइ अं• अंत करने वाले अ० चरम शरीरी स० सर्व दु. दुःखों का अं० अंत क० किया क० करते हैं क० करेंगे म० सब ते वे उ० उत्पन्न ना० ज्ञान दर्शन वाले अ०. अरिहंत.जि. जिन के केवली भ० होकर त० पीछे सि० सिझते हैं बु० बुझते हैं मु० मुक्त होते हैं प० निर्वाणपाते केवलेणं संवरेणं, . केवलेणं बंभचेरवासेणं, केवलीहिं पवयणमायाहि, सि- झिसु, बुझिनु जाव सव्वदुक्खाणमंतं करिंसु ? गोयमा ! नो इणढे समढे । सेकेण?णं भंते ! एवंवुच्चइ, तंचेव जाव अतं करिसु ? गोयमा ! जेकेइ अंतकरावा अतिम सरीरियावा सव्व दुक्खाणमंतं करिसुवा, कारतिवा, करिस्तंतिवा, सव्वे केवल संवर से, केवल ब्रह्मचर्य से व केवल आठ प्रवचन माता से सिझें, बुझें. यावत् सब दुःखों का अंत किया ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से छमस्थ मनुष्य सिझें, बुझं नहीं यावत् सब दुःखों का अंत किया नहीं ? अहो गोतम ! संसार के अंत करनेवाले व चरम शरीरी ने सब दुःखों का अंत किया, करते हैं, व करेंगे. वे सब केवलज्ञान, केवलदर्शन के १.११.१.पंचमान विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र सूत्र ११ पहिला शतक का चौथा उद्देशा भावार्थ 89 o शब्दार्थ ११.६ सूत्र 48 अनुवादक-चालनमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 88 जा० यावत् स० सब दु० दुःखों का अं० अंत क० किया क० करते हैं क० करेंगे से वह ते. इस लिये गो० गौतम जा० यावत् स० सब दु० दुःखों का अं० अंतकिया प. नर्तमान में ए. ऐमे न विशेष सि० मिझते हैं भा० कहना अ. अनागत में ए. ऐन न० विशेष निमिझेंगे भा• कहना ॥ ९ ॥ ज. जैसे छ० छमस्थ त० तैसे अ० अवधि त• तैस प. परमावधि ति० तीन २ आ. आलाप भा० कहना ॥ १०॥ के० केवला भं० भगवन् म० मनुष्य ती. अतीत काल में अ० अनंत सा० शाश्वत स० ते उप्पन्न नाणदसणधरा अरहा जिणे केवली भवित्ता तओ पच्छा सिझति, बुज्झति, मुचंति, परिनिव्वायंति, जाव सव्वदुक्खाणमंतं करिसुवा करितिवा करिस्संतिवा से तेणटेणं गोयमा ! जाव सव्व दुक्खाणमंतं करिंसु । पडुपन्नति एवं चेव, नवरं सिझंति भाणियव्वं. अणागएवि एवंचेव, नवरं सिज्झिस्सति भाणियव्वं ॥ ९ ॥ जहा छउमत्थो तहा आहोहिओवि, तहा परमोहिओवि तिन्नितिन्नि आलावगा भाणियव्वा ॥ १० ॥ केवलीणं भंते ! मणूसे तीतमणतं सासयं समयं जाव अंतं करेंसु ? हंता घारक जिन हुवे पीछे मिझते हैं, बुझते हैं व निर्वाण को प्राप्त होते हैं यावद सब दुःखों का अंत किया, करते हैं व करेंगे. इसलिये अहो गौतम ! सब दुःखों का अंत किया वहां वर्तमान काल में मिझते हैं व भविष्य काल में निझेंगे कहना शेष सब पहिले जैसे कहना ॥ ९॥ जैसे छमस्थ का कहा वैने ही अवाध व परम अवधिज्ञानी का जानना ॥ १० ॥ अब केवल ज्ञानी की पृच्छा करते हैं. अहो प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी 'वाथ * ... ११७ सूत्र 2383 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8382 29892289 पहिला शतक का चौया उद्देशा 9887 काल जा. यावत् अं० अंत किया है. हा गो० गौतम जा. यावत्. अं० अंतषिया ए. ये ति तीन आंक आलापक भा० कहना छ० छमस्थ को ज. जैसे ण विशेष सि. सिझें सि. सिझते हैं सि. सिझेंगे ४० ॥ ११ ॥ से० वह भं० भगवन् ती• अतीत काल में अ० अनंत मा० शाश्वत स० काल ५० वर्तमान सा० शाश्वत स० समय अ० अनागत अ० अनंत सा० शाश्वत स० समय जे० जो के०कोई अं०अंत करने वाले गोयमासिन्झिसु जाव अंतंकरिंसु एते तिन्निआलावगाभाणियवाछउमत्थस्स जहाणवरं सिझंसुसिझंति,सिन्झिस्संति॥११॥ सेणूणं भते!तीतमणतंसासयं समयं पडुप्पन्नवासास- यसमयं अणागय मणतंवा सासयं समयोजेकेइ अंतकरावा अंतिम सरीरियावा सव्व दुक्खाण. भगवन् ! केवली अतीत शाश्वत काल में सिझे, बुझे यावत् सब दुखों का अंत किया ? हां गौतम ! सिझे यावत् अंत किया. ऐसे अतीत, अनागत व वर्तमान के नीन २ आलापक जानना. जैसे छमस्थ का कहा वैसे ही केवली का जानना मात्र विशेषता यह है कि अतीत काल में सिझें, वर्तमान में सिझते हैं। और आगामिक में सिझेंगे ॥ ११ ॥ अहो भगान् ! अतीत, काल में अनंत शाश्वत समय में वर्तमान का भी शाश्वत समय में, अनागत काल के अनंत शाश्वत समय में जो कोई अंत करनेवाले अन्तिम शरीरीने सब दुःखों का अंत किया, करते हैं व करेंगे वे क्या सब उत्पन्न केवल ज्ञान, केवल दर्शन के धारक अरिहंत केवली हुवे पीछे सिझते हैं यावत् सव दुःखों का अंत करते हैं ? हो गौतमः! अतीत भावार्थ 60 -- शब्दार्थ अं० चरिम शरीरी स० सर्व दुःख का अं अंतकिया क० करता है क. करेगा स सर्व ते. वे. उत्पन्न ना० ज्ञान दं० दर्शन वाले अ० अरिहंत जि० जिन के. केवली भ० होकर त० पीछे सि० सिझते जा० यावत् अं० अंत क० करेंगे है. हां गो० गौतम ती. अतीत काल में अ, अनंत सा. शाश्वत जा. यावत् अं० अंत करेंगे ॥ १२ ॥ से. वह भभगवन् उ० उत्पन्न ना० झान दर्शन वाले अ. अरिहंत जि० जिन के० केवली अ• चाहिए उतना ३० कहना है. हां गो: गौतम उ० उत्पन्न १.१८ सत्र 4. अनुवादक:यालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 85 मंतं करिसुवा, करितिवा, करिस्संतिवा ॥ सव्वेते उप्पण्ण नाण देसण धरा अरहा । जिणे केवली भवित्ता, तओ पच्छा सिझंति जाव अतं करिस्सतिबा ? हंता गोयमा! तीत मणंतं सामयं जाव अतंकरिस्संतिवा ॥ १२ ॥ सेणूणं भंते ! उप्पण्णं नाण दसण धरे अरहा जिणे केवली अलमत्थुत्ति वत्तव्वं सिया ? हंता गोयमा उप्पण्ण काल के अनंत शाश्वत समय में सिझते हैं यावत् सब दुःखों का अंत करते हैं ॥ १२॥ अहो भगवन् उत्पन्न ज्ञान दर्शन के धारक, अरिहंत जिन केवली ही संपूर्ण ज्ञानवाले हुवे उन से अधिक ज्ञान प्राप्त करने को अन्य कोई भी समर्थ नहीं है? हां गोतम !. उत्पन्न ज्ञान दर्शन के धारक अरिहंत. जिन केवली से संपूर्ण ज्ञानवाले हैं अन्य कोई इस से अधिक ज्ञानी नहीं है. अहो भगवनू ! आपने कहा *प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ ११.१९ सूत्र 980- पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 382 'शब्दार्थ ना ज्ञान दर्शन वाले अ० अरिहंत जि० जिन के० केवली अ० चाहिए उतना व० कहना से ऐसे ही भं० भगवन्. ॥१॥४॥ क० कितनी भ० भगवन् पु० पृथ्वी प० प्ररूपी गो० गौतम स० सोतं पु० पृथ्वी ५० प्ररूपी २० रत्न प्रभा जा० यावत् त० तमतम इ० इस भ० भगवन् रं० रत्नप्रभा पृथ्वी में क० कितने नि० नरकावास नाण सण धरे अरहा जिणे केवली अलमत्थुत्ति वत्तव्वं सिया सिया सेवं भंते भंतेत्ति पढमसए चउत्थोदेसो सम्मत्तो ॥ १ ॥ ४ ॥ कइणं भंते ! पुढवीओ पण्णत्ताओ ! गोयमा ! सत्त पुढवीओ पण्णचाओ, तंजहा-र- यणप्पभा जाव तमतमा। इमीसेणं भंते! रयणप्पभाए पुढवीए कइ निरयावास भावार्थ वह वैसे ही है अन्यथा नहीं है. यह पहिला शतकका चौथा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ १ ॥ ४ ॥ पहिले उद्देशे के अंत में अरहतादिक कहे वे पृथ्वी पर हुवे इस लिये इस उद्देशे में पृथ्वी संबंधी प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! कितनी पृथ्वी कहीं ? अहो गौतम ! 'पृथी सात कहीं उन के नाम रत्न- प्रभा इस में रत्नों की प्रभा २ शर्कर प्रभा इस में कंकरों की प्रभा ३ वालु प्रभां जिस में वालु की कान्ति ४ पंक प्रभा जिस में अशुचि रूप कर्दम की कान्ति ५ धूम प्रभा जिस में धूम्र सरिखी कान्ति ६ अंधकार की भभा सो तेम प्रभा और ७ महा अंधकार की प्रभा. सो • तमतम मभा. अहो भगवन् 8.पहिला शतक का पांचवा उद्देशा8-40 शब्दार्थ 09 अं० चरिम शरीरी स० सर्व दुःख का अं• अंतकिया क• करता है क. करेगा स सर्व ते वे. उत्पन्न ना. ज्ञान दं० दर्शन वाले अ० अरिहंत जि. जिन के केवली भहोकर त० पीछे सि० मिझते जा. यावत् ७ अं अंत का करेंगे है. हां गो० गौतम ती. अतीत काल में अ) अनंत सा० शाश्वत जा. यावत् अं० अंत करेंगे ॥ १२ ॥ से• वह भ• भगवन् उ० उत्पन्न ना• ज्ञान दर्शन वाले अ. अरिहंत जि० जिन के० केवली अ• चाहिए उतना व० कहना ई० हां गो गौतम उ० उत्पन्न १.१८ सूत्र 4. अनुवादक:बालपमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8- मंतं करिसुवा, करितिवा, करिस्संतिवा ॥ सव्वेते उप्पण्ण नाण दसण धरा अरहा जिणे केवली भवित्ता, तओ पच्छा सिझंति जाव अतं करिरसतिबा ? हंता गोयमा! तीत मणंतं सामयं जाव अंतकरिस्सतिया ॥ १२ ॥ सेणूणं भंते ! उप्पण्ण नाण दसण धरे अरहा जिणे केवली अलमत्थुत्ति बत्तवं सिया ? हंता गोयमा ! उप्पण्ण काल के अनंत शाश्वत समय में सिझते हैं यावत् सब दुःखों का अंत करते हैं ॥ १२ ॥. अहो भगवन् उत्पन्न ज्ञान दर्शन के धारक, अरिहंत जिन केवली ही संपूर्ण ज्ञानवाले हुवे? उन से अधिक ज्ञान प्राप्त करने को अन्य कोई भी समर्थ नहीं है ! हां गोतम !. उत्पन्न ज्ञान दर्शन' के धारक अरिहंत जिन केवली ही संपूर्ण मानवाले हैं अन्य कोई इस से अधिक ज्ञानी नहीं है. अहो भगवन् ! आपने कहा *प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी ! भावार्थ शब्दार्थ yo १२३ सूत्र तीन स० सात वि० विमान स० शत च० चार क० देवलोक में ए. अग्यारह उ उत्तर हे० नीचे की स० सात ७० उत्तर म० मध्यकी स० शत उ० उपर की पं० पांच अ० अनुत्तर विमान में ॥ ३ ॥ पु० पृथ्वी ठि० स्थिति ओ० अवगाहना स० शरीर सं० संघयण सं० संठाण ले० लेश्या दि० दृष्टि णा० ज्ञान जो० जोग उ० उपयोग द० दश स्थान इ० इस भं० भगवन २० रत्नप्रभा पु० पृथ्वी के ती० एक्कारसुत्तरहेट्ठिमए सत्तुत्तरंच माझमए ॥ सयमेयं उवरिमए ॥ पंचेवय अणुत्तर- विमाणा ॥ ३ ॥ १ ॥ पुढवि ठिइ ओगाहण सरीर संघयण मेव संठाणे ॥ लेस्सा दिट्ठी णाणे, जोगुवओगे य दसठाणा ॥ १ ॥ इमीसेणं भंते ! रयणप्पभाए पुढवीए अच्युत इन दोनों में तीनसो. नवगैरेयक की प्रथम त्रिक में १११, दूसरी त्रिक में १०७, तीसरी त्रिक में १०० और उपर पांच अनुत्तर विमान के पांच सब मालकर ८४९७०२३ विमान हुवे ॥ ३ ॥ अव आगे उद्देशा के लीये द्वार गाथाने बताते हैं. १ स्थिति २ अवगाहना ३ शरीर ४ मंघयण ५ सठान ६ लेश्या ७ दृष्टि ८ शान ९ जोग १० उपयोग, इस में प्रथम स्थिति द्वार कहते हैं अहो भगवन् ! इस रत्नप्रभा नामक पृथ्वी में तीप्त लाख नरकावासमें से प्रत्येक नरकावात में नारकी के कितने स्थिति स्थान कहे, हैं ? अहो गौतम ! प्रत्येक नरकावास में असंख्याते स्थिति स्थान कहे हैं क्योंकी प्रथम पृथ्वी की अपेक्षासे नारकी की जघन्य दश हजार वर्ग की स्थिति है. और एक २ समय बढाते उत्कृष्ट एक मागरोपम की 98 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र g><88- पहिला शतकका पांचवा उद्देशा भावार्थ १२२ सूत्र 4 अनुवादक-यालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी - शब्दार्थ जो०. ज्योतिषी वि०. विमान-वास. स. शत-सहस्र-मो० सौधर्म में भं० भगवनू क०. कितने. वि विमान वास, सः शतसहस्रगो०. गौतम ब. बत्तीस- विमानवास स० शतसहस्र-एक ऐसे ब० बत्तीस अ.. अहा- वीस व.. बारह अ०. आठ च.. चार स० शतसहस्र प० पञ्चास च. चालीस-छ०, छ स०. 'सहसः सन् सहस्रार में आ• आनत पा० माणतः क देवलोक च. चार-स.. शत. आ: आरण: अ.. अच्युतः में ति. ५० ॥ सोहम्मेणं भंते ! कइविमाणा वास. सयसहस्सा पण्णता ? गोयमा ! बत्तीसं विमाणावास सयसहस्सा प० । एवं (गाथा) बत्तीसट्ठावीसा, बारस अट्ठ, चउरो सयसहस्सा ॥, पण्णा चत्तालीसाछच्चसहस्सा सहस्सारे. ॥३॥ आणय पाणयकप्पे, चत्तारि सयारणच्चुए. तिण्णि ॥ सत्त विमाण. सयाई, चउसुवि. एएसु. कप्पेसु. ॥ २ ॥ भावार्थ अपू, ऊ, वायु, वनस्पतिकायिक जीव द्वीन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चतुरेन्द्रिय, तियेच, पंचेन्द्रिय, मनुष्य, वाणव्यंतर व ज्योतिपी के असंख्यात-स्थान कहे हैं. अहो भगवन् ! सौधर्म देवलोक में कितने वास कहें हैं ? अहो गौतमः! सौधर्म देवलोक में बत्तीस लाख विमान वास कहे हैं. दूसरे ईशान देवलोक में अहावीस लाख विमान कहे हैं तीसरे- सनत्कुमार में बारह लाख विमान कहे हैं, चौथे माहेन्द्र देवलोक में आठ, लाख पांचवे ब्रह्म देवलोक में. चार लाख छढे लांतक में ५० हजार, सातवे माशुक्र में ४० इंजार, आठवे सहसार में छ इनार नव आणत दश प्राणत. में इन दानों देवलोक में चारसो अग्यारवे आरण बारवे * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादी * १२० पंचङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र-23 शब्दार्थी पास स० शत सहस्र में ए. एकेक नि० नरका पास में ज. जघन्य ठि० स्थिति वाले ३० वर्तते. ने० सयसहस्मेसु एगमेगंति निरयावासंसि जहणियाए ठिईए वहमाणा नेरइया कि को- होवउत्ता, माणोवउत्ता, मायोवउत्ता, लोभोवउत्ता? गोयमा ! सब्वेवि ताव होज. कोहोवउत्ता, अहवा कोहोवउत्ता मागोवउत्तंय, । अहवा कोहोरउत्ताय, माणोवउत्ताय, । अहवा कोहोवउत्ताय मायोवउत्तेय, । अहवा कोहो- वउत्ताय मायोवउत्ताय । अहवा कोहोवउत्ताय लोभोवउत्तेय, । अहवा कोहोवउत्ताय, लोभोवउत्ताय । अहवा कोहोवउत्ताय माणोवउत्तेय, मायोवउत्तेय; । कोहोवउत्ताय, 389 पहिला शतकका पांचवा उद्देशा881 भावार्थ प्रकार का है. ॥ ४ ॥ अब इन स्थिति स्थान में क्रोधादि विपय का विभाग कर बताते हैं. अहो भगवन् रत्नप्रभा पृथ्वी के तीस लाख नरकावासमें से प्रत्येक नरकावास में जघन्य स्थितियाले नारकीरहे हैं उनमें से क्या क्रोधवाले ज्यादा हैं, ? मानवाले ज्यादा हैं ? मायावाले ज्यादा है ? अथवा लोभयाले ज्यादा हैं ? अहो गौतम ! प्रत्येक नरक में जघन्य स्थिति वाले नारकी सदैव रहते हैं उन में क्रोध युक्त विशेष रहते हैं. इस से उन के २७ भागे किये हैं. और एकादि से संख्यात सपयाधिक जघन्य स्थितियाले नार- हैं वे क्वचित हैं और काचित नहीं भी हैं. इसलिये उसमें क्रोध सहित एक भी होवे अनेकभी होवे इससे शब्दाथा १२ सूत्र 43 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋापेनी ते प न रहावाम म० शा सहस्र में ए० एक नि. नरकाशन में ने० नारकी क० कितने ठि योनि गो गौता अ० असंख्यात सिसात स्थान ५० प्ररूपे तं० वह ज. जघन्य ठि० स्थिति स० सप्याकिन अन्य स्थिान दु. दोसाविक जा. यापत् अ. असंख्य त ममयाधिक ज. जघ. न्य स्थिी न० उपयोग उ० उत्कृष्ट डि• स्थिति ॥४॥ इ० इस ररत्नप्रभा पृथ्वी में ती० तीन नि नरका तीसाए निग्यावास सयसहस्से तु एगमेगंति निरयावासंसि नेाइयाणं केवइया ठिइ. ट्ठाणा प० ? गोपमा ! असंखे का ठिट्ठाणा प० तं. जहाणिया ठिई समयाहिया, १ जहाणया ठिई दुममयाहिया, जाव असंखज समयाहिया जहाण्णया ठिई. तप्पाउ- ग्गुक्कासिपा ठिई ॥ ४ ॥ इमीसणं भंते ! रयणप्पभाए पुढवीए तीसाए निरयावास स्थिति होती है. उन में असंख्यात ममय होते, इसलिये प्रख्यात स्थिति स्थान होते. वैसेटी प्रत्येक नरकावाम की अपेक्षामे भी असंख्याते स्थिति स्थान हो. जो रत्नप्रभा के पहिले पाथडे में जघन्य दश हनार वर्ष उत्कृष्ट १० हजार वर्ष की स्थिति है वह एक स्थिति स्थान वह भी प्रत्यक नरक में भिन्न है. उन से एक ममय अधिक सो दनरा जघन्य स्थिति स्थान वह भी अनेक प्रकार का है. ऐमेही अरुपात समय अधिक जघन्य स्थिति स्थान वह भी अनेक प्रकार का है. स्थिति स्थानक प्रत्येक नरक प्रत्येक पाथर्ड में भिन्न है. ऐसेही मिक्षित नरकात को योग्य उत्कृष्ट स्थिति स्थानक भी अनेक * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालापमादजी भावार्थ शब्दार्थी पास स० शत सहस्र में ए० एकेक नि. नरका घास में जा जघन्य ठि० स्थिति वाले ० वर्तते. ने० १२५ पंचङ्ग विवाह पग्णत्ति ( भगवती) मूत्र 8888 सयसहस्मेसु एगमेगस्ति निरयावासंसि जहणियाए ठिईए वढमाणा नेरइया कि को- होवउत्ता, माणोवउत्ता, मायोवउत्ता, लोभोवउत्ता ? गोयमा ! सब्वेवि ताव होज. कोहोवउत्ता, अवा कोहोवउत्ता माणोवउत्तेय, । अहवा कोहोरउत्ताय, माणोवउत्ताय, । अहवा कोहोवउत्ताय मायोवउत्तेय, मायोवउत्तेय, । अहवाः कोहो- वउत्ताय मायोवउत्ताय । अहवा कोहोवउत्ताय लोभोवउत्तेय, । अहवा कोहोवउत्ताय, लोभोवउत्ताय । अहवा कोहोवउत्ताय माणोवउत्तेय, मायोवउत्तेयः । कोहोवउत्ताय, 2983- पहिला शतकका पांचवा उद्देशा भावार्थ GY0 मकार का है. ॥ ४ ॥ अब इन स्थिति स्थान में क्रोधादि पिपय का विभाग कर बनाते हैं. अहो भगवन रत्नप्रभा पृथ्वी के तीस लाख नरकावासमें से प्रत्येक नरकावास में जयन्य स्थितिवाले नारकीरहे उनमें से क्या क्रोधवाले ज्यादा है, ? मानवाले ज्यादा हैं ? मायावाले ज्यादा हैं ? अथवा लोभवाले ज्यादा १४? अहो गौतम ! प्रत्येक नरक में जघन्य स्थिति वाले नारकी सदैव रहते हैं उनमें क्रोध युक्त विशेष रहते हैं. इस से उन के २७ भागे किये हैं. और एकादि से संख्यात समयाधिक जघन्य स्थितियाले नार- हैं वे क्वचित हैं और क्वचित नहीं भी हैं. इसलिये उसमें क्रोध सहित एक भी होवे अनेकभी होवे इससे १२६ . अनुवादक बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 शव्यायाम नारकी किं० क्या को क्रोधयुक्त मा० मा युक्त मा० मायायुक्त लो० लोभयुक्त स० सर्व ता० तैसा माणोवउत्तय मायोवउत्ता । कोहोवउत्ता, माणोवउत्ता, मायोवउत्तेय । कोहोव रत्ता, सूत्र मागोवउत्ता, मायोवउत्ता ॥ एवं कोहेणंमाणेण लोभेणं चत्तारि भंगा ॥ अहवाः कोहो- वउत्ता, माणोवउत्ते मायोवउत्ते, लोभोवउत्ते. । अहवा कोहोवउत्ता, माणोवउत्ते, मायोवउत्ते लोभोवउत्ता । अहवा कोहोवउत्ता, माणोवउत्ते, मायोवउत्ता, लोभविउत्ते. अहा कोहोवउत्ता माणोवउत्ते मायोवउत्ता लोभोवउत्ता । अहवा कोहोवउत्ता, माणो वउत्ता,मायोवउत्ते, लोभोवउत्ते. अहव। कोहोवउत्ता. माणोवउत्ता मायोवउत्ते,लोभोवउत्ता भावार्थ इसमें अस्सी भांगे होते हैं. एकेन्द्रिय में चारों कपायवाले बहुत हैं इस से इन में भांगा नहीं होता है. x अव भांगे के भेद हैं ? क्रोधवाले बहुत २ क्रोधके बहुत मान के एक ३ क्रोध के बहुत मान के बहुत क्राप के बहुत माया के एक ५ क्रोध के बहुत माया के बहुत ६ क्रोध के बहुत लोभ के एक ७ क्रोध के बहुत लोभ के बहुत ( अयोगी एक व द्वी योगी ६ मील ७ हुवे ) ८ क्रोधवंत बहुत मानवंत एक मायावत एक २ क्रांधांत बहुन मानवंत एक व मायावंत बहुत १० क्रोधवंत बहुत मानवेत बहुन + जा गिरह वहां अस्मीभांगे और जहां विरह नहीं है वहां सत्ताइस भांगे होते हैं. यह विरह उत्पाद की अपेक्षा से नहीं ग्रहण किया है क्यों की वहांपर चौविस मुहूर्त का उत्पाद विरह कहा है और भांगे भी सत्तावीस ही कई हैं. प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी* शब्दार्थ हो० होवे ए० ऐसे स० सत्तावीम में० भांगा ने जानना॥२॥ इ० इस र० रत्नप्रभा पु०पृथ्वी में ती०तीस अहवा कोहोवउत्ता, माणोवउत्ता, मायोवउत्ता, लोभोवउत्ते. अहवा कोहोव- उत्ता माणोवउत्ता, मायोवउत्ता, लोभोवउत्ता, एवं सत्तावीसं भंगा नेयव्वा ॥ ५॥ सून ૧ર भावार्थ। 3802- पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 3-80 मायावंत एक ११ कोतवंत बहुत मानवंत बहुत व मायावंत बहुत. १२ बहुत मानवंत एक व लोभवंत एक १३ क्रोधवंत बहुत मानवंत एक व लोभवंत बहुत १४ क्रोधवंत बहुत मानवंत बहुत व लोभ वंत एक १५ क्रोधवंत बहुत मानवंत बहुत व लोभवंत बहुत १६ क्रोधवंत बहुत मायावंत एक व लोभवंत एक १७ क्रोधवंत वहुन मायावंत एक व लोभवंत बहुत १८ क्रोधवंत बहुत मायावंत बहुत व लोमवंत एक १९ क्रोधवंत बहुत पायावंत बहुत व लोभयंत बहुत २० क्रोधवंत बहुत मानवंत एक, मायावंत एक व लोभवंत एक २१ क्रोधवंत बहुत मानवंत एक मायावंत एक व लोभवंत बहुत २२ क्रोधयंत बहुत मानवंत एक मायावत बहुत व लोभवंत एक २३ क्रोधवंत बहुत मानवंत बहुत मायावंत एक व. लोभवंत एकं २४ क्रोधवंत वहुत मानवंत बहुत मायावंत एक व लोभवंत एक २५ क्रोधवंत बहुत मानवंत बहुत मायावंत एक व लोभवंत बहुत २६ क्रोधवंत बहुत मानवंत. बहुत मायावत बहुत व लोभवंत एक २७ क्रोधवंत बहुत, मानवंत बहुत मायावंत बहुत व लोभवंत वहुत ये सब मीलकर २७ भांगे जघन्य स्थिति वाले नारकी में होते हैं. ॥५॥ अहो भगवनू ! एक समय से अधिक समय पहिला शतक का पांचवा उद्देशा ! oyo 90 शब्दाथ १२. मात्र 48 अनुवादक-बालग्रह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी - नरका वास स० शन सहस्र में ए. एकेक निष्नरका बाग में म० समयाधिक ज० जघन्य ठि० स्थिति व० वर्तते ने० नारकी कि क्या को क्रोधयुक्त मा० मानयुक्त मा० मायायुक्त लो लोभयुत गो० इमीसेणं भंते ! रयणप्पभाए पुढवीए तीसाए निरयावाप्त सयसहस्सु एगमेगसि निरयावासंसि समयाहियाए जहण्णट्ठिईए वट्टमाणा नेरइया किं कोहोवउत्ता, माणो- वउत्ता, मायोवउत्ता, लोभीवउत्ता ? गोयमा ! कोहोवउत्तेय. माणोवउत्तेय, मायो- वउत्तेय,लोभोवउत्तेय । कोहोवउत्ताय,माणोवउत्ताय, मायोवउत्ताय,लोभोवउत्ताया|अहवा की जघन्य स्थितियाले नारकी क्या क्रोधवाले ज्यादा है मानवालेज्यादे हैं मायावाले ज्यादा है! या लोभवाले ज्यादा है ? अहो गौतम : एक समय से अधिक समय की व संख्यात समय से अधिक समय की जघन्य स्थिति वाले नारकी होवे और नभी होवे इसलिये इन में अस्सी भांग होते हैं. उस में असंयोगी आठ भांगे ? फ्रांध का एक २ मान का एक ३ माया का एक ४ लोभ का एक ५ क्रोध का बहुत ६ मान का बहुत ७ माया का बहुत व ८ लोभ का बहुत. द्वि योगी भांगे २५-१. क्रोधांत एक 'मानवंत एक शोधयन एक मानवंत वहुन ३ क्रोधांत बहुत मानवंत एक ४ क्रोधात बहुन मानयंत बहुत ५ क्रोधवंत एक मायावंत एक ६ क्रोधवन एक मायावन बहुत ७ कोयंत बहुत मायावंत एक ८ क्रोध वंत बहुत मायात बहुतरोधवतएक लोभवंतएक..९क्रायवंत एक लोभवंत बहुत ११क्रोधवंत बहुत लोभवंत * प्रकाश रानावहादुर लामा मुखदेव सहायनी मालाप्रसादजी ब्दार्थ १२१ सत्र भावार्थ - पंचगंग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र गौतम को क्रोधयक्त मा० गानयुक्त मा० मायायुक्त लो० लोभयुक्त ए ऐसे अ० अस्मी भ० भांगा ने० जारना ए ऐ जा० यारत् सं० संख्यात म० समयाधिक ठि० स्थिति वाले अ० असंख्या स० समया. धिक स्थिति वाले त उनयोग्य उ० उत्कट ठिक स्थिति वाले स० पत्तावीस भ० भांगे भा० कहना. ॥६॥ कोहोवउत्तेय, माणोवउत्तय, अहवाकोहोवउत्तेयमाणोवउत्ताय एवं असीइ भंगा नेयच्चा ।। एवं जाव संखेज समयाहिया ठिई, अांखेन समपाहिया ठेईए, तप्पाउग्गुझासियाए ठिईए सत्तावीसं भंगा भाणियव्ग॥६॥इमीसणं भने? रयणप्पभाए पुढवीए तीलाए निरयावास एक १२ शोधांत बहुत लोभांत बहुत'.३ मानवन एक माया तिरफ१४मानवंत एक मायावत बहुत १५मानत बहुत मायावंत एक १६ मात बहुत मायांत बहुन ?७ नानांत एक लोभांत एक१८ मानवंत एक लोभ- वंत बहन ११ मानवंत बहुत लोन। एक २० मात बहुन व लोभवो बहुत २१. मायावंत एक लोभवंत एक २२ मायाति र आभार न २३ मायान बहुत लोभांत एक २४ मायावंत, वहुन व लोभांत बहुत. विसंयोगी भांग ३२.१ क्रोधात, मानत. मायावंत एक, अनेक एसे मीलकर ३२ भांगे होते हैं और चतुःसंयोगो के १६ भाग होते हैं यो सर मील कर जघन्य स्थिति के नारकी में एक से अस्ती पर्यंत भांगे होते हैं. और संख्यात समय से अधिक समय तक के जघन्य स्थिति वाले नारकी से लगाहर उत्कृष्ट स्थिति वाले तक सत्तावीस भांगे होते हैं यह प्रथमदार हुआ 8. पहिला शतक का पांचवा उद्दशा - OYO yo शब्दार्थ १७२ ददडक भी कहना ॥ ६॥ जी० जीव भ भगवन् कि क्या वि० विग्रहगति समास- अवि- ग्रहगति स० प्राप्त गो. गौतम 'सि० कदाचित् वि. विग्रहगति स० पात सि. कदाचितू अ. अविग्रहगति स० प्राप्त ए ऐसे जा० यावत् वे० वैमानिक ॥ ७॥ ने नारकी भं• भगवन् कि• क्या वि० विग्रह- भाणियव्वं ॥ एवं णाणत्तं, एवं सव्येवि सोलसदंडगा भाणियव्वा ॥ ६ ॥ जीवेणं भते किं विग्गहगइ समावण्णए, अविग्गहगइ समावण्णए ? गोयमाः सियविग्गह गइ समावण्गए, सिय आविग्गहगइ समावण्णए एवं जाव वेमाणिए॥जीवाणं भंते। किं विग्गहगइ समावण्णगा, अविग्गहगइ समावण्णगा ? गोयमा ! विग्गहगइ. समा. वण्णगावि, अविग्गहगइ समावण्णगावि ॥ ७ ॥ नेरइयाणं भंते ! कि विग्गहंगइ . - अनुवादक पालनागरी मुनि श्री अमोलक कपिजी * प्रकाशक-राजारहादुर लाला मुखदेव सायनी बालाप्रसादजी भावार्थ व चवण प्रायःगति पूर्वक होता है. इसलिये आगे गति का वर्णन कहते हैं. अहो भगवन् ! गति करते जीव क्या विग्रह गति में जाता है या.. अविग्रह गति से जाता है ? अहो गौतम ! किसी समय जीव रिग्रह गति से जाना है और किमी ममय जीव प्रविग्रह गति से जाता है. ऐमा वैमानिक तक का जानन्ग अव बहुन जीव भाश्री प्रश्न करते हैं अहो भगवन् !- बहुत जोव पिग्रह गतिवाले हैं या अविग्रह गतिवाले 1८! विग्रहगतिवाले भी है और अविग्रहगतिवाले भी हैं ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! क्या नारकी विग्रह ino ७ सन्न +88 पंचङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 8833 गति स. मा अ८ अधिग्रहगति समाप्त गो गोतम स० सई ता० तैसे हो. होवे एक ऐसे जी जीव ए. एकेन्द्रिय घ० वर्जकर ति तीन भांग ॥ ८ ॥ दे. देव भं भगवन् म० महर्दिक मज्योतिवंत मञ्चलवत म० यशस्वी म० महासुखी ममहानुभाव अ° नजदीक च० चवता किं० थोडाकाल हि० लज्जा दु० दुर्ग- समावणगा अविग्गहगइ समावण्णगा ? गोयमा ! सब्वेवि तावहोजा. अविग्गहगइ समावण्णगा, अहवा अविग्गहगइ समावण्णगाय, विगहगइ समावण्णगेय, अहवा अविग्गहगह समावण्णगाय विग्गहगइ समावण्णगाय एवं जीव एगिदिय वज्जो तिय भंगो ॥ ८ ॥ देवेणं भंते : महड्डिए, महज्जुइए, महब्बले, महाजसे, महेसक्खे, महाणुभावे, अविसकंतियं चयमाणे किंचिकालं हिरवत्तियं, दुगं. गति करनेवाले हैं या अविग्रह गति करनेवाले हैं ! अहो गौतम ! नारकी में अविग्रहगतिवाले विशेष होने से अधिग्रहगति में बहुवचन लीया है. और विग्रह गतिवाले थोडे होवे अथवा न होवे इसलिये एक वचन लिया है. इस के तीन मांगे होते हैं ? नारकी में सब जीव अविग्रहगति संयुक्त २ अविग्रहगतिवन्त वहुत व विग्रहगतिवन्त एक ३ अधिग्रह गतिवन बहुत व विग्रहगतिवन्त यहुत. ऐसे ही एकेन्द्रिय के पांच दंडक छोडकर अन्य सब दंडक में उक्त तीनों भांग पाते हैं. एकेन्द्रिप में विग्रहगतिवन्त व अविग्रहगति- वंत बहुत होने से मांगा नहीं होता है ॥ ८ ॥ अहो भगवनू : महर्दिक, महात्तिवन्त, महारलवन्त, मही १. पहिला शतक का सातवा उद्देशा भावार्थ OYO १७४ - अनुवादक-चालयमचारी मुनि श्री अमोलक शापिनी है शब्दार्थी च्छा प० परीपह आ० आहार नो० नहीं आः आहार करे आ• आहारकरें आः आहार करता आ० आहार करे ५० परिणमता प०परिणमे १० क्षीण आ० आयुष्य वाला भ• होने जजहां उ० उपजे त० उस आ० आयुष्य प०अनुभवे तं० उस तितियेच आयुष्य म० मनुष्य आयुप्य गो गौतम दे० देव म० महर्दिक जा. यावतु म० मनुष्य आ० आयुष्य ॥ ९ ॥ जी० जीव भं० भगवन् ग० गर्भ में वः छावत्तियं, परिसह वत्तियं, आहारं नो आहारेइ, अहेणं आहारेइ आहारेजमाणे आहारिए.परिणामिजमाणे परिणामिए, पहीणेय आउए भवइ, जत्थं उववज्जइ, तमाउयं पडिसंवेदेइ तिरिक्ख जोणियाउयंवा, · मणुस्साउयंवा ? हंता गोयमा ! देवेणं महड्डिए जाव मणुस्साउयं वा ॥९॥ जीवेणं भंते ! गम्भं वक्कममाणे किं सइंदिए वक्कमइ, * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वा लाप्रसादनी भावार्थ मुखवाले, व महानुभाव देवों चयन होने का समय पास आया हुवा जानकर माता पिता का क्रीडा स्थान देख लज्जा आने से, शुक्र.शोणित का आहार की दुर्गच्छा आने से व पुद्गल ग्रहणरूप अरति परिपह से किंचित्कालतक आहार करे नहीं परंतु चवे पीछे क्षुधा वेदनीय के उदय से आहार करे. ऐसा आहार किये हुने, परिणमाये हुवे व प्रक्षीण आयुष्यवाले देव मनुष्य तिर्यंच का आयुप्य क्या वेदे ? हां गौतम ! ऐमा महर्दिक देव मनुप्य तिर्यंच का आयुष्य वेदे ॥ ९ ! गर्भ में उत्पन्न होने के कारन से गर्भ की अब- १७८ 388 पंचमान विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 83-88- शब्दाथ उपजता कि० क्या स सइन्द्रियपने २० उपजता है अ० अनिन्द्रियपने २० उपजता है गो० गौतम सि कदाचित् स० सइन्द्रियपने व० उपजता है सि. कदाचित अ० अनिद्रियपने उपजता है.से. वह के कैसे गो गौतम द० द्रव्येन्द्रिय प. प्रत्यय अ. अनिन्द्रिय व उपजे भा० भाव इन्द्रिय प० प्रत्यय स० सई न्द्रिय व उपजे से वह ते० इसलिये ॥ १० ॥ जी० जीव भ० भगवन् ग० गर्भ में व० उपजता किं० अणिदिए वक्कमइ ? गोयमा ! सिय सइंदिए वक्कमइ, सिय अणिदिए वकमइ । से केण्डेणं ? गोयमा दबिंदियाइं पडुच्च अणिदिए बकमइ, भाविदियाई पडुच्च सइंदिए वक्कमइ से तेण?णं ॥ १० ॥ जीवेणं भंते ! गम्भं वक्कममाणे किं सरीरी वक्कमइ, स्थान का प्रश्न पूछते हैं अहे. भगान!गर्भ में उत्पन्न होता हुवा जीव क्या इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है अथवा भावाथ इन्द्रिय रहित उत्पन्न होता है ?अहो गौतम ! क्वचित् इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है और क्वचित् इन्द्रिय रहित भी उत्पन्न होता है. अहो भगवन् ! किम कारन से जीव क्वचित् सइन्द्रियपने उत्पन्न होता है और क्वचित् आनेन्द्रियपने होता है ? अहो गौतम ! द्रव्य इन्द्रिय आश्रित अनिन्द्रिय उत्पन्न होता है क्यों कि ope निवृत्त्युपकरण रूप, स्पर्शन, रस, घाण, चक्षुः व श्रोतेन्द्रिय पर्याप्त हुये पीछे होती है और भावेन्द्रिय आ. श्रित सइन्द्रिय होता है क्यों की ज्ञानरूप इन्द्रिय जीव को सदा काल रहती हैं. इसलिये अहो गौतम !! aka क्यचित् इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है और क्वचित् इन्द्रिय रहित - उत्पन्न होता है. ॥ १० ॥ इन्द्रिय पहिला शतक का सातवा उद्देशा ofe शब्दार्थी १७४ * अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी च्छा प० परीपह आ० आहार नो० नहीं आ- आहार करे आ• आहारकरें आ. आहार करता आ० आहार करे प० परिणमता प०परिणमे प० क्षीण आ० आयुष्य वाला भ• होवे ज जहां उ० उपजे त० उस आ० आयुष्य प०अनुभवे तं० उस तितिर्यंच आयुष्य म० मनुष्य आयुष्य गोः गौतम दे० देव म० महर्दिक जा० यावतू म० मनुष्य आ. आयुष्य ॥ ९॥ जी० जीव भ० भगवन् ग० गर्भ में व० छावत्तियं, परिसह वत्तियं, आहारं नो आहारेइ, अहेणं आहारेइ आहारेजमाणे आहारिए,परिणामिजमाणे परिणामिए, पहीणेय आउए भवइ, जत्थं उववजइ, तमाउयं पडिसंवेदेइ तिरिक्ख जोणियाउयंबा, ' मणुस्साउयंवा ? हंता गोयमा देवेणं महड्दिए जाव मणुस्साउयं वा ॥९॥ जीवेणं भंते ! गभं वक्कममाणे किं सइंदिए वक्कमइ, ! * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * " भावार्थ सुखवाले, व महानुभाव देवों चयन होने का समय पास आया हुवा जानकर माता पिना का क्रीडा स्थान देख लज्जा आने से, शुक्र शोणित का आहार की दुर्गच्छा आने से व पुद्गल, ग्रहणरूप अरति परिपह से किंचित्कालतक आहार करे नहीं परंतु चवे पीछे क्षुधा वेदनीय के उदय से आहार करे. ऐसा आहार किये हुवे, परिणमाये हुवे व प्रक्षीण आयुष्यवाले देव मनुष्य तिर्यंच का आयुप्य क्या वेदे ? हां गौतम ! ऐमा महद्धिक देव मनुष्य तिर्यच का आयुप्प वेदे ।। ९ ! गर्भ में उत्पन्न होने के कारन से गर्भ की अब.
ब्दाथ/ १७७ सत्र - पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र - आहार आ० आहारकरे गां० गौतर मा. पाता का ओ० रुधिर पि० पिताका मु. वीर्य तं० उस उ०१ दोनों सं० मिलादुवा क० मलिन कि० किलीपरूप प० प्रथम आ० आहार आ० आहारकरे ॥ १२ ॥ जी• जीव भं० भगवन् ग० गर्भ में ग० गयाहुवा किं० क्या आ० आहार आ० आहारकरे गो० गौतम जं० मा० माता ना. नानाप्रकार र० रस वि० विकृति आ० आहारकरे त. उम का ए० एक दे० देश ओ ओज आ० आहारकरे ॥१३॥ जी. जीव को भभगान ग• गर्भ में ग० उत्पन्न हुवा अ० है उ. वक्कममाणे तप्पढमयाए कमाहाग्माहारेइ ? गोयमा ! माउआयं पिउमुकं तं तदुभय संसिर्ल्ड कलुसं किविसं, तप्पढमयाए आहारमाहारेइ ॥ १२ ॥ जीवेणं भंते ! गब्भगए समाणे किं आहारमाहोरइ ? गोयमा! जं से माया नाणाविहाओ रसविगईओ आहारेइ तदेगदेसेणय ओय माहारेइ ॥ १३ ॥ जीवरसणं भंते ! गभगयस्त है. ॥ ११ ॥ शरीर आहार से होता है इसलिये आहार का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! गर्भ में उत्पन्न होता जीव पहिलेहि क्या आहार करता है ? अहो गौतम ! माता का ऋतुकाल संबंधी रुधिर व पिता का? वीर्य यह दोनों परसर मिलने से किल्विप रूप बने हुवे पुद्गलों का आहार जीव प्रथम करता है. ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! गर्भ में रहा हुवा जीव किन का आहार करना हे ? अहो गौतम ? गर्भवती स्त्री दुग्ध घृता- 26 दिक का जो आहार करती है और उस का जो रस होता है उस में से एक देश (कुच्छ थोडा विभाग - पहिला शतक का सातवा उद्देशा भावार्थ (Nis Dyo प - - F 42 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी 83 दाथ क्या स० सशरीरी उपजे अ० अशरीरी २० उपजे गो० गौतम सि कदाचित् म० मशरीरी ३० उपजे सि. कदाचित् अ० अशरारी व० उपजे से वह के० कैसे गो० गौतम ओ उदारीक वे चक्रेय आ साहारक प० प्रत्यय अ० अशरीरी ते० तेजस क० कार्माण प० प्रत्यय म० सशरीरी २० उपजे से वह ते. इसलिये ॥ ११ ॥ जी जीव भ० भगवन् ग. गर्भ में व० उपजता ५० प्रथम के कौनसा श्रा: असरीरी वक्कमद ? गोयमा ! सिय ससरीरी वक्कमइ, सिय असरीरी वकमइ । सेके- ण?णं ? गोयमा ! ओरालिय वेउब्धिय आहारयाई पडुच्च असरीरी वक्कमई ! तेया कम्माई पडुच्च ससरीरी वकमइ, से तेण?णं गोयमा ॥ ११ ॥ जीवेणं भंते ! गभं शरीर को होती है इसलिये शरीर का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! क्या जीव शरीरी उत्पन्न होता अथवा अशरीरी उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! जीव क्वचिन् । शरीरी उत्पन्न होता है और काचित् अशरीरी उत्पन्न होता है. अहो भगवन् ! किस कारण से ? अहो गौतम ! उदारिक बैक्रेय व आहारक इन तीनों शरीर की अपेक्षा से अशरीरी क्यों की ये तीनों शरीर एक स्थान से चयकर अन्य स्थान में उत्पन्न हुवे पीछे जीव को पाते हैं. गमन करते मार्ग में इन तीनों शरीर का अभाव है. तेजस व कार्माण शरीर की अपेक्षा से सशरीरी उत्पन्न होते हैं क्यों कि ये दोनों शरीर जीव को संसार अवस्था में सदेव रहते हैं इसलिये ऐसा कहा गया है कि कदाचितू शरीर सहित और कदाचित् शरीर रहित उत्पन्न होता * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायणी मालाप्रसादजी.
ब्दाथ Qua सत्र 28 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती)-सूत्र : आहार आ० आहारकरे गो० गौतम मा. माता का ओ० रुधिर पि. पिताका मु० वीर्य तं० उस 300 दोनों सं० मिलादुवा का मलिन कि० किलीपरूप प० प्रथम आ० आहार आ० आहारकरे ॥ १२ ॥ जी• जीव भं० भगवन् ग० गर्भ में ग० गयाहुवा कि क्या आ• आहार आ० आहारकरे गो गौतम जं. जो मा० माता ना. नानामकार र० रस वि० विकृति आ० आहारकरे त० उम का ए० एक दे० देश ओक आज आ० आहारकर ॥१६॥ जी जीव को भ० भाग गगर्भ में ग० उत्पन्न हुवा अ० वक्कममाणे तपढमयाए कमाहाग्माहारेइ ? गोयमा ! माउआयं पिउमुवं तं तदुभय संसिष्टुं कलुसं किन्धिसं, तप्पढमयाए आहारमाहारेइ ॥ १२ ॥ जीवणं भंते ! गब्भगए समाणे किं आहारमाहोरइ ? गोयमा! जं से माया नाणाविहाओ रसविगईओ आहारेइ तदेगदेसेणय ओय माहारेइ ॥ १३ ॥ जीवरसणं भंते ! गब्भगयरस है. ॥ ११ ॥ शरीर आहार से होता है इसलिये आहार का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! गर्भ में उत्पन्न होता जीव पहिलेहि क्या आहार करता है ? अहो गौतम ! माता का ऋतुकाल संबंधी रुधिर व पिता का वीर्य यह दोनों परसर मिलने से किल्विप रूप बने हुवे पुद्गलों का आहार जीव प्रथम करता है. ॥ १२॥ अहा भगवन् ! गर्भ में रहा हुया जीव किस का आहार करना है ? अहो गौतम ? गर्भवती खी दुग्ध घृता- दिक का जो आहार करती है और उस का जो रस होता है उस में से एक देश (कुच्छ थोडा विभाग ! < पहिला शतक का सातवा उद्देशा भावार्थ १७८ सी मूत्र 4. अनुवादक-वालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दार्थ वडीनीत पा० लघुनीत खे० यूंक सिं श्लेष्म वं० वमन पि० पित्त गो० गौतम नो नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ से• वह के० कैसे गो. गौतम जी जीव ग० गर्भ में ग• गयाहुवा जं. जो आ० आहार करता है त उसको चि० इकठा करता है तं० उसको मो० श्रोतेन्द्रियपने जा० यावत् फा० स्पर्शेन्द्रियपने अ. हष्टि अ० हड्डिकीर्मिनी के केश मं०मच रोरोन नखपने से०वह तेइसलिये ॥ १४ ॥ जी०जीव भं: समाणरस अत्थि उच्चारेइवा, पासवणेइवा, खेलेइवा, सिंघाणेइवा, वैतेइवा, पित्तेइवा ? गोयमा ! णोइण?' समटे.! से केणटेणं ? गोयमा ! जीवेणं गभगए ‘समाणे जमाहारेइ तं चिणाइ, तं सोइदियत्ताए जाव फासिदियत्ताए, अट्टि अट्ठिमिंज केस मंसुरोम नहत्ताए से तेणट्टेणं ।। १४ ॥'जीवेणं भंते ! गभगए. समाणे ' पभूमुहेणं रूप ओज, आहार करता है. ॥ १३ ॥ जहां आहार होता है, वहां निहार होता है इसलिये निहार संबंधि प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! गर्भ में रहा हुवा. जीव को वडीनीत, लघुनीत खेकार, श्लेष्म, वमन व पित्त क्या होता है ! अहो गौतम ! गर्भ में रहे हुवे जीव को यह नही होता है. अदो भगवन् ! ऐसा नहीं होने का क्या कारण है ? अहो गौतम ! गर्भ में रहा हुवा जीव जो आहार करता है वह सब आहार श्रोत्रेन्द्रियादि पांचो इन्द्रियपने, हड्डी, हड्डी की मिजी, केश, मश्रु रोम व नखपने परिणमता है इसे लिये उन जीवों को लघुनीत वडीनीत वगैरह नहीं होते हैं ॥ १४॥ अहो. भगवन् ! गर्भ में रहा सा जीव क्या * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालाप्रसादजी.* भावाथ 6Va दार्थ GO १७९ 89 8888 पंचमांग विवाह गति (भगवती) मूत्र 8883 भगवन ग. गर्भ में उत्पन्न मु. मुखसे का कवल आ० आहार आ० आहार करे गो० गौतम नो नहीं इ. यह अर्थसः समर्थ से वह के० कैसे मो० गौतम जी जीव गः गर्भ में उपजात सर्व तरफ से आ० आहारकरे प० परिणमे उ० अश्वासले नि० निश्वासले अ० वारंवार आ० आहारकरे प० प- हरिणमे उ० अश्वासले नि निश्वासले आ. कदाचित् आ० आहार करे ५० परिणमे उ० ऊश्वासले नि निश्वासले मा० माताका जीव र० नाभिनाल पु० पुत्रका जीव र० नाभिनाल मा० माता का कावलियं आहारं आहारित्तए ? गोयमा ! णो इण? समढे । सेकेण?णं ? गोयमा- जीवेणं गभगए समाणे सव्वओ आहारेइ, सवओ परिणामेइ, सवओं उस्ससइ, सबओ निस्ससइ आभक्खण आहारेइ आभिक्खणं परिणामेइ आभिक्खणं उस्ससई अभिक्खणं निस्ससइ, आहच्च आहारेइ आहच्च परिणामेइ, आहच्च उस्ससइ, आहच्च निस्ससइ, माउ जीव रसहरणी पुत्तजीव रसहरणी 'माउ जीव पडिबढा पुत्तजीव कवल का आहार कर सकता है ? अहो गौतम ! यह अर्थयोग्य नहीं है. अहो भगवन् ! किस कारन से ! अहो गौतम ! गर्भ में रहा हुवा जीव सब आत्मा से आहार करता है, परिणमाता है, उश्वास लेता है, नाश्वास लेता है, वारंवार आहार करता है, वारंवार परिणमाता है, वारंवार श्वासोश्वास लेता है, अथवा क्वचित् अहार करता है, परिणमाता है व श्वासोश्वास लेना है, गर्भवती स्त्री को नाभीस्थान में रसहरणी नामक एक नाडी नली रूप होती है. यह नाली गर्भस्थ जीव को स्पर्शकर रहती है. उस से वह जीव 8 पहिला शतककासातवा उद्देशा. भावार्थ 5 5 - शब्दाथ १८० जत्र का अनुवादक-बालग्राचारामुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87. जीव प० प्रतिवद्ध पु० पुत्रका जीर फु० स्पर्शा हुवा त० इसलिये आ० आहार करे ५० परिणमें अ० अथ- या पु० पुत्रका जीव ५० प्रतिवद्ध मा०माता का जीव से फु० स्पर्शा हुवा त• इस लिये चिनिने उ उप- चेने वह ते. इसलिये जा. यावत् नो० नहीं मु० मुख से का० कवल आ०, आहार आ० आहारं १५ ॥ का कितने भं० भगवन् मा० माता के अंग गो० गौतम त• तीन मा० माता के अंग प. मरूपे मंः मास सो० रुधिर म० मस्तक ॥ १६ ॥ क. कितने भ० भगवन् पे पिता के फुडा, तम्हा आहारेइ, तम्हा परिणामेइ, अविरावियणं पुत्तजीव पडिबद्धा भाउजीव फुडा तम्हा चिणाइ, तम्हा उवचिणाइ.. से तेणटेणं जावं नो पभू मुहेणं कावलियं आहारं आहारित्तए ॥ १५॥ कइणं भंते ! माइअंगा-. पण्णत्ता ?. गोयमा! तओ माइयंगा पण्णत्वा तंजहा मंससोणिए मत्थुलंग ॥ १६ ॥ कइणं. भंते ! पेइयंगा प. आहार करता है और शरीर में परिणमाना.है. दूसरी पुत्रजीवरमहरणी नाडी पुत्रके जीव की साथ बंधी हुई व माता की साथ स्पी हुई है. इस से गर्भस्थ जीव के शरीर की वृद्धि होती है.. इसीसे अहो गौतम ! कवल आहार लेने को गर्भस्य जीव नहीं समर्थ होता है ॥१५॥ अहो भगवन् ! माता के.कितने भंग कर है..? अहों गौतम ! माता के तीन अंग कहे हैं. मांस, रुधिर व मस्तक की मीजी: फेफसा अथवा कलेगा ऐमा भी अर्थ कितनेक करते हैं. ॥ १६ ॥ अंहो भगवन् ! पिता के कितने अंग हैं ? अहो गौतम प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी बालाप्रसादजी * गर्थ ०७ ब्दार्थ अंग गोगौतम त तीन पे पिता के अंग अ हड्डि अव्हड्डिकीर्भिज के केश मंश्मश्रु रो रोमन नख।। १.७॥ अ० माता पिता का भं०भगवन् सशरीर के कितना का०काल सं० रहे गो गौतम जा० जितना काकाल भ० भवधारणीय स० शरीर अ० नाश न पामे ए• इतना का० काल सं० रहे अ० अब सममय २ में वो हीन होता च० चरिम का० काल स०समय में वो० नाश भ० होवे ॥ १८ ॥ जी. जीव भ० भगवन .. १८. 8 पंचमांग विवाह पप्णचि ( भगवती) सूत्र 88 ण्णता ? गोयमा ! तओ पेड्यंगा पण्णत्ता तंजहा आट्टि, आट्ठिमिंजा, केसमंसुरोमनहे ॥ १७ ॥ अम्मा पेइएणं भंते ! सरीरए केवइयं कालं संचिट्ठइ ? गोयमा ! जावइयं से कालं भवधारणिजे सरीरए अव्वावण्णे भवइ, एवतियं कालं संचिट्ठइ. अहेणं समए समए वोयसिजमाणे चरिम काल समयंसि वोच्छिण्णे भवइ ॥ १८ ॥ जीवेणं - पहिला शतक का सातवा उद्देशा 988 d भावार्थ शरीर में पिता के तीन अंग होते हैं. १ अस्थि, २ अस्थि की मांजी ३ केश श्मश्रु रोम व नख. ॥ १७ ॥ अहो गवन् ! माता व पिता के अंग जीव की साथ कितने काल तक सम्बन्ध रखते हैं. ? अहो गौतम जहाँलग मनुष्यादिक का भवधारणीय शरीर विनाश होवे नहीं वहां लग माता व पिता के अंग रहते हैं. अर्थात् शरीर का विनाश होनेपर इन अंगों का भी विनाश होता है. जिस समय से माता व पिता, {अंगों संबंधी आहार ग्रहण किया था उस समय से लगाकर मति समय क्षीण होते २ अन्तिम काल शब्दार्थ गर्म में गा रहाहुवा ने नरक में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम किसनेक उ० उत्पन्न होवे अ० कितनेक नो. नहीं उ० उत्पन्न होवे से० वह के० कैसे गो० गौतम स० संजीपंचेन्द्रिय स सर्व प. प. याप्तिने १० पर्याप्त वी० वीर्यलन्धिसे वे वैक्रेयलब्धिमे प० शत्रुमैन्य आ० आया हुवा सो० सुनकर नि० अवधारकर ५० प्रदेश नि: बहार निकाले वे. वैक्रेय समुद्घात से स० ग्रहण करे स० ग्रहण करके १८२ 12 अनुवादक-पालग्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक कपिजी भंते गभगए समाणे नेरइएसु उवज्जेज्जा ? गोयमा ! अत्थेगइए उववज्जेजा, अत्थे- गइए नो उववजेजा। सेकेणटेणं ? गोयमा ! सेणं सण्णी पंचिंदिए सव्वाहिं पजत्तीएहिं पजत्तए वीरियलहीए, वेउन्चिय लडीए पराणियं आगयं सोचा निसम्म पएसे नि. * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ मट होजाते हैं। ॥ १८॥ अब गर्भस्थ जीव कदाचित् गर्भ में ही काल अवस्था को प्राप्त होवे . तो कहां पर उत्पन्न होता है उस संबंधी प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! गर्भस्थ जीव आयुष्य पूर्ण होने से कालकर क्या नरक में उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! कितनेक जीव नरक में उत्पन्न होते हैं और कितनेक नरक में नहीं उत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! किस तरह से गर्भस्थ जीव नारकी में , उत्पन्न होते हैं। अहो गौतम ! कोई संझी पंचेन्द्रिय जीव राणी की कुक्षि में उत्पन्न होवे अर्थात् गजपुत्र. होवे. वहां उन को (पूर्ण पर्याय बांधकर पर्याप्ता हुवे पीछे. पूर्व करणी के प्रभाव से वीर्य लब्धि व वैक्रेय लब्धि की प्राप्ति होते.
२७ ०७ १८३ 48 पंचमांग विवाह पण्णनि (भगवती) मूत्र दार्थ पा. चतुरंगी से० सैन्य वि० विकु वि०विकुर्व कर चा चतुरंगी से० सैन्य से प०शचु शैन्य की समाय सं० मंग्राम सं० संग्राम करे से वह जी० जीव अ० अर्थ का इच्छक २० राज्य का इच्छा भो० भोग की इच्छा वाला का काम की इच्छा वाला अ० अर्थ की कांक्षा वाला र राज्यकी कांक्षा वाला भोक भोगकी कांक्षा वाला का काम की कांक्षावाला अ० अर्थ पिपासु र राज्य पिपासु भो भोग पिपासु का काम पिपासु तक उसमें चित्त वाला १० मन वाला ले० लेश्या वाला अ०अध्यवसाय वाला ति० तीन आरंभ वाला अ० छुभइ,वेउन्धिय समुग्धारण समोहगइ,समोहणइए चाउरंगिणीए सेणाए विउन्बइ, विउल्य सूत्र इत्ता चाउरंगिणीए सेणाए पराणीएणं सद्धिसंगाम संगामेइ, सेणं जीवे अत्थ कामए, रज्जकामए, भोग कामए, कामकामए, अत्थकंखिए, रजकंखिए, भोगकखिए, काम वह गर्भस्थ जीव ऐसी बात सुने की परचक्री की सेना आई है और अपन को दुःखी करेगी. ऐमी वात सुनकर, अवधारकर जीव के प्रदेश गर्भ की बाहिर नीकाले और वैकेय ममुद्घात से तथाविध पुद्गलों को ग्रहण कर हाथी, घोडे, रथ, पायदल वगैरह सेना की चिकुरा करे, विकुर्वणा करके परचक्री की सेना -माय संग्राम करे. द्रव्य की अभिलापागला राज्यऋद्धि की अभिलापावाला, गंधरम स्पर्शरूप भोग की अभिलापावाला, शब्द रूपादि कामकी अभिलापावाला धन की इच्छा से आसक्त बनाहुवा, राज्य, भोग, व:कामः की. इच्छा से आसक्त बना हुवा. धन, राज्य, भोग व काम का पिपासु, अतृप्त, तन्मय 88. पहिला शतक का सातवा उद्देशा 48-8-27 भावार्थ GyO লাখ ग०.गर्भ में ग० रहाहुवा ने० नरक में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम अ० किसनेक उ० उत्पन्न होवे अ० कितनेक नो. नहीं उ० उत्पन्न होने से वह के० कैसे गो० गौतम स० संझीपंचेन्द्रिय स. सर्व प. प. योप्तिने प० पर्याप्त-वी० वीर्यलन्धिसे वे० वैक्रेयलब्धिमे प. शत्रुमैन्य आ० आया हुवा सो० मुनकर नि० अवधारकर १० प्रदेश नि बहार निकाले वे वैक्रेय समुद्घात.से स० ग्रहण करे स० ग्रहण करके १८२ सूत्र भंते गभगए समाणे नेरइएसु उवजेजा ? गोयमा ! अत्थेगइए उववजेजा, अत्थे- गइए नो उववजेजा। सेकेणटेणं ? गोयमा ! सेणं सण्णी पंचिंदिए सव्वाहिं पजत्तीएहिं पजत्तए वीरियलहीए, वेउन्विय लडीए पराणियं आगयं सोच्चा निसम्म पएसे नि. 12 अनुवादक-पालग्राह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * भावाया नष्ट होजाते हैं। ॥१८॥ अब गर्भस्थ जीव कदाचित् गर्भ में ही काल अवस्था को प्राप्त होवे तो कहां पर उत्तम होता है उस संबंधी प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! गर्भस्थ जीव आयुष्य पूर्ण होने से. कालकर क्या नरक में उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! कितनेक जीव नरक में उत्पन्न होते हैं और कितनेक नरक में नहीं उत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! किस तरह से गर्भस्थ जीव नारकी में उत्पन्न होते हैं। अहो गौतम ! कोई संझी पंचेन्द्रिय जीव राणी की कुक्षि में उत्पन्न होवे अर्थात् गजपुष होवे. वहां उन को पूर्ण पर्याय बांधकर पर्याप्ता हुवे पीछे. पूर्व करणी के प्रभाव से वीर्य लब्धि व वैफ्रेय लब्धि की प्राप्ति होते.
ब्दिार्थ कैसे गो गौतम स० संत्री पं० पंचन्द्रिय स० सर्व प० पर्याप्ति से प० पर्याप्त त. तधारूप स० श्रमण मा० माहण की अं० पाम ए. एक आ० आर्य ध धर्म का सु० अच्छा वचन सो० सुनकर नि० अब. धारकर त० पीछे भ० होचे संवैराग्य से उ० उत्पन्न स० श्रद्धा ति० तीव्र ५० धर्मानुराग र० रक्त जी० जीव ध० धर्म को कामी पु० पुन्य का कामी स० स्वर्ग का कामी मो० मोक्षका कामी ध° धर्म वज्जेज्जा, अत्थेगइए णो उववजेजा। सेकेण?णं ? गोयमा ! सेणं सण्णी पंचिंदिए सव्वाहि पजत्तीहि पजत्तए तहारूवरस समणस्सवा, माहणरसवा अंतिए एगमधि आरियं धम्मियं सुवयणं सोचा, निसम्म तओ भवइ संवेगजायसवे तिव्वधम्माणुराग:- रत्ते, सेणं जीवे धम्मकामए, पुषणकामए, सग्गकामए; मोक्खकामए; धम्मकंखिए, सूत्र 298 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 887 पहिला पातक का सातवा उद्देशा 98880 भावार्थे कितनेक जीव देवलोक में नहीं उत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! किम कारन से कितनेक जीव देवलोक में उत्पन्न होते हैं और कितनेक जीव देवलोक में नहीं उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! कोई जीव धर्मिष्ट स्त्री की कुक्षि में संशी पंचेन्द्रियपने उत्पन्न हुवा. वहां पूर्ण पर्याय बांधकर पर्याप्त हुवे पीछे तथारूप श्रमण माहण की पास एकान्त आर्य धार्मिक वचन श्रवण कर, अवधारकर संवेग से धर्मादि में श्रद्धावन्त हुवा व तीन धर्मानराग से रक्त बनगया. फीर वह भुत चारित्र रूप धर्म का अभिलापी बनाहुवा, पुण्य का शब्दार्थ सत्र 43 अनुवादक-पालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 83 अर्थयुक्त अ० रहावा करण भा. भावना भ० भावता. ए. इन अं० अंतर में का काल क. करे ने नरक में उ० उत्पन्न होवे से० चह ने इस लिये गोः गौतम जा. यावत् अ० कितनेक नो० नहीं ० उत्पन्न हो. ॥ १९ ॥ जी जीव भ० भगवन् ग. गर्भ में ग० रहावा दे देवलोक में उ० उत्सन्न होवे गो० गौतम अ० कितनेक उ० उपल्न होवे अ० किनक नो० नहीं उ० उत्पन्न होने से वह के० कंखिए, अत्थ पिवासिए, रजपिवासिए भोगपिवासिए काम पिवासिए, तश्चित्ते, तम्मणे, तल्लेस्से, तदझवसिए तत्तिव्यज्झवसाणे तट्ठोवउत्ते, तदप्पिय करणे तब्भावणा भाविए एयंसिणं अतरंसि कालं करेजा नेरइएसु उववज्जइ । से तेण?णं गोयमा ! जाव अत्थेंगइए नो उववज्जज्जा ॥ १९॥ जीवेणं भंते : ! गब्भगए समाणे देवलोगेसु समाणे देवलोगेसु उववजेजा ?. गोयमा ! अत्येगइए उव. वनाहुना, तीन अशुद्ध लेश्या से ध्यानयुक्त, काम भोगों की भावना भावता हुवा व करण करावण व अनु. मोदन रूप अध्यवसाय की प्रबलता करता हुवा वह जीव यदि उसी समय काल कर जावे अर्थात् आयुप्य पूर्ण कर के चचे तो वह नरक गतिम उत्पन्न होवे इसलिये अहो गौतम! कितनेक जीव नरक में उत्पन्न होते हैं। और कितनक नहीं होते हैं ॥ १९ ॥ अहो भगवन् ! गर्भ में रहा हुवा जीव यदि आयुष्य पूर्ण कर जाये तो क्या देवलोक में उसन्न होता है ? अहो गौतम ! कितनेक जीव. देवलोक में. उत्पन्न होते हैं और * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी बालाप्रसादजी नोब्दार्थ सूत्र पंचमा विवाह: पण्णत्ति (भगवती.) सूत्र : फल जैसे अ० होवे चि० खडारहे नि० बैठे तु० सोचे मा० माता मु० सोती होवे मु. सोवे मा० जगती होवे जा० जगे सु० सुखी होती सु० सुखी होवे दु० दुःखी होती दु० दुःखी होवे है. हाँ गो० गौतम जी० जीव ग० गर्भ में ग० गया हुवा जा. यावत् दु० दुःखी होते दु० दुःखी भ० होवे ॥ २१ ॥ ५० प्रसन्न का० अवसर में सी० मस्तक से पा० पावसे आ० आवे स० सीधा आ० आवे ति० तिर्छा आ० अंबखुजएवा, अच्छेजवा, चिटेजवा, निसीएजवा, तुयटेजवा; माऊए सुयमाणीए सुयई, जागरमाणीए जागरइ, सुहियाए सुहिए भवइ, दुहियाए दुहिए भवइ ? हंता गायमा ! जीवेणं गभगए समाणे जाव दुहियाए दुहिए भवइ ॥ २१ ॥ अहेणं पसवण काल समयंसि सीसेणवा, पाएहिंवा आगच्छइ, सममागच्छइ, तिरिय माग- जीव किस प्रकार गर्भ में रहता है और गर्भ से नीकले पीछे करणी के फल किस तरह प्राप्त करता है। वह बतलाते हैं. अहो भगवन् ! गर्भ में रहा हुवा जीव क्या उत्तान - छत्राकार रहता है, एक पतली की तरह पड़ा रहता है, आम्र फल की तरह उत्कट आमनसे रहता है, अर्थ स्थान बैठा रहता है, वडा होता है, बैठाहोता है, शयन करता है, जब उस की माना शयन करती है तब सोता है, माता जगती है तब जागृत होता है,माता सुखी तो वह मुखी रहता है, और माता दुःखी रहनेपर क्ण दुःखी रहता है? हां गौतम ! गर्भ में रहनेवाले जीव को उक्त सब क्रियाओं होती है. ॥ २१॥ अब जब प्रसन काल HAB802- पहिला शतकक' सातवा उद्देशा 988 भावार्थ fo ए शब्दा १८६ मूत्र 48 अनुवादक:बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी- का कांक्षी पु० पुन्य का कांक्षी स० स्वर्ग का कांक्षी मो० मोक्ष का कांक्षी ध धर्म पि० पिपासु पु० पुन्य पिपासु स० स्वर्ग पिपासु मो० मोक्ष पिपासु त. उम में चित्त वाला म० मनवाला ले० लेश्या वाला अ० अध्यवसाय वाला अ० अर्थयुक्त अ० अर्पित करण वाला उ० उस मा० भावना से भा. भावता ए. इस अं० अंतर में का० काल क. करे दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होने से वह ते. इस लिये गो. गौतम ॥ ५० ॥ जी जीव भ० भगान् ग. गर्भ में ग० गया हुवा उ० उलटा होवे पा० पसली जैसे अं० आंम्र पुण्णकंखिए, सग्गकंखिए, मोक्खकंखिए; धम्मपिवासिए, पुण्णपिवासिए, सग्गपिना- सिए, मोक्खपिवासिए, तचित्ते, तम्मणे, तल्लेसे तदझवासिए, तदट्ठोवउत्ते; तदप्पि: यकरणे तब्भावणाभाविए, एयंसिणं अंतरमि कालं करेजा देवलोएम उववजइ सेतेणंट्रेणं गोयमा ॥ २० ॥ जीवेणं भंते गन्भगए समाणे उत्ताणएवा, पासल्लएवा कामी, स्वर्ग का कामी व मोक्ष का कामी; धर्म, पुण्य, स्वर्ग व मोक्षका कांक्षी; धर्म, पुण्य, स्वर्ग व मोक्ष का पिपासु, धर्मादिमें तथा प्रकारको चित्तवाला, तन्मय, तीनशुभ लेश्यावन्त, वैसेही अध्यवसाय युक्त, उस अर्थ प्रयोजन युक्त..उसी अर्थ में आत्मा को अर्पण करनेवाला व वैसा भाव को चिन्तवनेवाला यदि उसी समयं काल कर जावे तो देवलोक में देवतापने उत्पन्न होता है. इस कारन से अहो गौतम! कितनेक जीव देवलोक में उत्पन्न होते हैं और कितनेक जीव देवलोक में, नहीं उत्पन्न होते हैं ॥ २० ॥ अप प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ बाब्दार्थ १८७ सूत्र पंचमान विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 18 फल जैसे अ० होवें चि० खडारहे नि० वैठे तु० सोचे मा० माता मु० सोती होवें मु० सोवे जा० जगती हावे जा० जगे सु० सुखी होती सु° सुखी होवे दु० दुःखी होती दु० दुःखी होवे है. हाँ गो० गौतम जी० जीव ग० गर्भ में ग० गया हुवा जा० यावत् दु. दुःखी होते दु० दुःखी भ० होवे ॥ २१ ॥ १० प्रसवन का अवसर में सी० मस्तक से पा० पावसे आ० आवे स० मीधा आ० आवे ति तिर्छा आ० अंबखुजएवा, अच्छेजवा, चिट्ठजवा, निसीएजवा, तुयटेजवा; माऊए सुयमाणीए सुयई, जागरमाणीए जागरइ, सुहियाए सुहिए भवइ, दुहियाए दुहिए भवइ ? हंता गोयमा ! जीवेणं गभगए समाणे जाव दुहियाए दुहिए भवइ ॥ २१ ॥ अहेणं पसवण काल समयंसि सीसेणवा, पाएहिंवा आगच्छइ, सममागच्छइ, तिरिय मागं. जीव किस प्रकार गर्भ में रहता है और गर्भ से नीकले पीछे करणी के फल किस तरह प्राप्त करता है वह बतलाते हैं. अहो भगवन् ! गर्भ में रहा हुवा जीव क्या उत्तान - छत्राकार रहता है, एक पसली की तरह पड़ा रहता है, आम्र फल की तरह उत्कट आमनसे रहता है, ऊर्थ स्थान बैठा रहता होता है, बैठाहोता है, शयन करता है, जब उस की माता शयन करती है तब सोता है, माता जगती है तब जागृत होता है,माता सुखी तो वह मुखी रहता है, और माता दुःखी रहनेपर क्या दुःखी रहता है। हां गौतम गर्भ में रहनेवाले जीव को उक्त सत्र क्रियाओं होती है. ॥ २१ ॥ अब जब प्रसवन: काल RSSB पहिला शतकक सोतंवा उद्देशा 9888 भावार्थ खडा oro १८८ 43: अनुवादक-वालग्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी - शब्दार्थ आवे वि. विनाश आ० पावे व० वर्ण व० वध्य क०. कर्म २० वांधे हुवे पु. स्तछे हुवे णि निकाचित बांधे क० कोये ५० स्थापे अ० तीव्र स्थापे अ० सन्मुख आये उ० उदय आये जो नहीं उ. उपशांत हुये दु. कुरूप दु० खराववर्ण वाला दु. दर्गंधी दु. खरावर वाला दु. खराब स्पर्श वाला अ०' अनिष्ट अः मकान्त अ अप्रिय अ० अशुभ अ० अमनोज्ञ अ० अमनाम ही. हीनस्तर वांला दी. दीनस्वर सत्र च्छइ, विणिहाय मावजइ, वण्णवज्झाणिय से कम्माई बढाई, पुट्ठाई, णिहित्ताई, कडाई, पट्टवियाई, अभिनिविट्ठाई, आभिसमण्णगयाइं उदिण्णाइं. णोउवसंताई भवति, तओ भवई, दुरूवे, दुवणे, दुग्गंधे, दुरसे, दुफासे, आणिटे, अकते, आप्पिए, असुभे, अमणुण्णे, अमणामे, हीणरसरे, दीणस्सरे आणिटुस्सरे, अकंतरसरे आप्पियस्सरे,असुभस्सरे, वार्थ माप्त होता है तब कितनेक जीव मस्तक से नीकलते हैं, और कितनेक पांच से नीकलते हैं, अथवा माता व जीव दोनों की घात नै हो वैसे नीकलते हैं, और अशुभ कर्मोदय से कदाचित् तिळ होजाना है तो नीकलन व नीकालने के अभाव से मृत्यु को प्राप्त होजाता है. अब गर्भ से नीकले वाद जो होता है सो कहते हैं, जिनाने पूर्व भव में पापाचरण व अयोग्य कर्तव्य से निकाचित कमों का वैध किया है वैसही जिन को मनुष्य तिर्यचादि गति, पंचेंद्रियादि जाति, सादि नामकर्म से व्यवस्थापित किये, तीत्र अनुभाव से स्थापित किये, उदय सन्मुख हुये स्वतः की उदीरना से उदय में आये और उपशान्त न हुवे, उन को.अशुभ वर्ण, गंध, भकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी वालाप्रसादजी * दार्थ Q । x x २८९ सूत्र 8 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र - 8888 पहिला-पतक का माता उद्देशा भावार्थे। अ० अनिष्टस्तर अ० अनादेय वचन वाला प० उत्पन्न भ० होवे व० वर्ण व० वध्य क. कर्म नो नहीं ५० बंधेडुके पं० प्रशस्त ने जानना. जा० यावत् आ० आदेय वचन वाला प० उत्पन्न भ० होवे से वह ए. ऐसे भ० भगवन्. ॥ १ ॥ ७ ॥ अमंणुण्णसरे, अमणामस्सरे, अणाएजवयणं, पञ्चायाएवि भवइ, वण्णवज्झाणिय, से कम्माई नोबढाइं पसत्थं णेयव्वं जाव आदेजवयणं पञ्चायाएविभवइ ।सेवं भंते भंतेत्ति पढमे सए सत्तमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ १ ॥ ७ ॥ रस, स्पर्श होवे. उन को सब संयोग अनिष्ट, अकान्त, अगिय, अशुभ, अमनोज्ञ, अंमणाम होवे. वैसे ही वह जीव हीनस्वर, दीनस्वर, अनिष्टस्वर, आप्रियस्तर, अशुभस्तर, अमनोज्ञस्वर, अमनामस्वर व अनादेय वचनवाला होवे अर्थात् उन का वचन किसी को माननीय होवे नहीं. यह अशुभ कर्म का फलकहा और जिनोंने अशुभ कर्म नहीं किये हैं और धर्माचरण से शुभ कर्म की उपार्जना की है उन को शुभ फलका उदय होते बेशुभ वर्ण, गंध, रस व स्पर्शवन्त होवे. वैसे ही मियकारि, शुभ मनोज्ञ व सब मान्य करे ऐसे अच्छे संयोग मीले. सय में माननीय पूजनीय होये और सब प्रकार के सुख भोगवे. 'यह सब पुण्य फल जानना. अहो भगवन् ! आपने जो प्रतिपादन किया है वह सत्य है. यह पहिला शतक का सातवा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ १ ॥ ७ ॥\/ oya x x शब्दार्थ १८८ सत्र 48: अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 82 आवे वि. विनाश आ० पावे व० वर्ण व० वध्य क०. कर्म व० वांधे हुवे पु. स्तरों हुवे णि निकाचित घांधे क० कीये प० स्थापे अ० तीव्र स्थापे अ० सन्मुख आये उ० उदय आये णो नहीं है. उपशांत हुवे दु० कुरूप दु० खराववर्ण वाला दु० दगंधी दु० खरावर वाला दु० खराब स्पर्श वाला अ०' अनिष्ट अ अकान्त अ अप्रिय अ० अशुभ अ० अमनोज्ञ अ अमनाम ही० हीनस्तर वांला दी. दीनस्वर च्छइ, विणिहाय मावजइ, वण्णव झाणिय से कम्माई बढाई, पुट्ठाई, णिहित्ताई, कडाई, • पट्टवियाई, अभिनिविट्ठाई, आभिसमण्णगयाइं उदिण्णाई, णोउवसंताई भवंति, तओ भवइ, दुरूवे, दुवण्णे, दुग्गंधे, दुरसे, दुफासे, आणिटे, अर्कते, आप्पिए, असुभे, अमणुण्णे, अमणामे, हीणस्सरे, दीणस्सरे आणिट्ठस्सरे, अकंतरसरेआप्पयस्सरे,असुभस्सरे, माप्त होता है तब कितनेक जीव मस्तक से नीकलते हैं, और कितनेक पांच से नीकलते हैं, अथवा माता व जीव दोनों की घात न होवे वैसे नीकलते हैं, और अशुभ कर्मोदय से कदाचित तिळ होजाना है तो नीकलन नीकालने के अभाव से मृत्यु को प्राप्त होजाता है. अब गर्भ से नीकले वाद जो होता है सो कहते हैं. जिनोंने पूर्व भव में पापाचरण व अयोग्य कर्तव्य से निकाचित कमों का बंध किया है वैसही जिन को मनुष्य तिर्यचादि गति, पंचेंद्रियादि जाति, सादि नामकर्म से व्यवस्थापित किये, तीत्र अनुभाव से स्थापित किये, उदय सन्मुख हुने, स्वतः की उदीरना से उदय में आये और उपशान्त न हुवे, उन को.अशुभ वर्ण, गंध, * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * वार्थ शब्दर्थ १९१ सूत्र 329 पंचांग विवाह पण्णत्ति (भवगती) सूत्र ने० नारकी का आ० आयुष्य प० गांचे नि० तिर्यंच म. मनुष्य दे देष मा. आयुष्य प० वांधे ने० नारकी का आ० आयुष्य किः करक ने 'रक में उ. उत्पन्न होवे ति० निर्यच म० मनुष्य दे. देव आ० आयुष्य कि० करके दे० सलोक में उत्पन्न होवे ॥ १ ॥ ए० एकान्त पं० पंडित भं भगवन् म० मनुष्य किं० क्या ने० नारकी का आ० आयुष्य प० बांधे जा० यावत् दे० देव का आ' आयुष्य कि०. करके दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम ए० एकान्त पं० पंडित म. मनुष्य आ० आयुष्य लोएसु उववज्जइ ? गौयमा ! एगंत बालेणं मणुस्से नेरइयाउयं पि पकरेइ, तिरिमणु- देवाउयंपि पकरेइ, । मेरइयाउयपि किच्चा नेरइएसु उववजइ, तिरिमणुदेवाउयं कि- चा देवलोएमु उववज्जइ ॥ १॥ एगंत पंडिएणं भंते ! मणुस्से किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवलोएसु उववजइ ? गोयमा ! एगंत पंडिएणं मणुस्से आउ- के आयुष्य का बंध कर के देवलोक में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम! एकान्त पाल मनुष्य नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है वैसे ही नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देवता के आयुष्य वैध कर नारकी, तिर्यंच, मनुष्य व देवता में उत्पन्न होता है. ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! एकान्त पंडित मनुष्य क्या नरक, तिथंच, मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है? और नरक का आयुष्य वधि कर नरकम उत्पन्न होता है यावत् देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! एकान्त 38पहिला तक का आठवा उद्देशा भावार्थ शब्दार्थी ए. एकान्त था. अज्ञानी भ० भगवन् म० मनुष्य कि० क्या ने० नारकी का आ• आयुष्य ५० बांध ति. पिंच का आ०आयुष्य प०वांधे ममनुष्य का आ०आयुष्य पवांधे देश्देव का आ आयुष्य प०बांधे ने नारकी का आ० आयुष्य कि० करके ने० नरक में उ० उपजे ति तिर्यच का आ० आयुष्य कि. करके ति० तियैच में उ० उपजे म० मनुष्य का आ० आयुष्य कि० करके म० मनुष्य में उ० उपजे दे. देव का आ० आयुष्य कि०करके दे देवलोक में उ० उपजे गो० गौतम ए०एकान्त वा० अज्ञानी म मनुष्य एगंत बालेणं भंते ! भणूसे किं नेरइयाउयं पकरेइ, तिरिआउयं पकरेइ, मणुआउयं पकरेइ, देवाउयं पकरेइ, नेरइयाउयं किचा नेरइएसु उवरज्जइ, तिरियाउयं कि- चा तिरिएसु उववज्जइ, मणुयाउयं किच्चा मणुएसु उववजइ, देशउयं किच्चा देव- सत्र 48 अनुवादक-बालसमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 * प्रकाशक- राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी * सातवे उद्देशे में गर्भ की वक्तव्यता कही. गर्भ आयुष्य से होता है इसलिये आगे आयुष्य संबंधि प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! एकान्त वाल ( मिथ्यात्री) मनुष्य क्या नरक के आयुष्य का वध करता है। मनुष्य के आयुष्य का बंध करता है, तिर्यंच के आयुष्य का बंध करता है, या देव के आयुष्य का बंध करता है ! और नरक के आयुष्य का बंध कर के क्या नरक में उत्पन्न होता है, तिर्यंच के आयुष्य का देष कर के तिरीन में उत्पन्न होता है, मनुष्य के आयुष्य का बंधकर के मनुष्य में उत्पन्न होता है या देव 60 शब्दर्थ १९१ सूत्र ११ पंचमांग विवाह पणत्ति (भवगती) सूत्र ने० नारकी का आ० आयुष्य प० गंधे नि तिर्यंच म. मनुष्य दे देष मा. आयुष्य प. बांधे ने नारकी का आ० आयुष्य कि करक ने रक में उ० उत्पन्न होवे ति० निर्यच.म० मनुष्य दे० देव आ० आयुष्य कि० करके दे० सलोक में उत्पन्न होवे ॥ १ ॥ ए० एकान्त पं० पंडित भ भगवन् म० मनुष्य किं. क्या ने० नारकी का आ० आयुष्य प. बांधे जा० यावत् दे० देव का आ. आयुष्य कि०, करके दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम ए० एकान्त पं० पंडित म. मनुष्य आ० आयुप्य लोएसु उववजइ ? गोयमा ! एगंत बालेणं मणुस्से नेरइयाउयं पि पकरेइ, तिरिमणु- देवाउयपि पकरेइ, । मेरइयाउयंपि किच्चा नेरइएसु उववजइ, तिरिमणुदेवाउयं कि- चा देवलोएमु उववजइ ॥ १॥ एगंत पंडिएणं भंते ! मणुस्से किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवलोएसु उववज्जइ ? गोयमा ! एगंत पंडिएणं मणुस्से आउ- के आयुष्य का बंध कर के देवलोक में उत्पन्न होता है ? अहो गीतम! एकान्त वाल मनुष्य नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है वैसे ही नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देवता के आयुष्य बंध कर नारकी, तियेच, मनुष्य व देवता में उत्पन्न होता है. ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! एकान्त पंडित मनुष्य क्या नरक, तिथंच, मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है? और नरक का आयुष्य बांध कर नरकमें उत्पन्न होता है यावत् देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! एकान्त 2385 पहिला शतक का आठवा उद्देशा848 ! भावार्थ O0 SYD शब्दार्थ १९२ व अनुवादकालयमचारी मुनि श्री अमोहक ऋपिजी 8 मि. कदाचित् प० गांधे मि० कदाचित् नो० नहीं प० बांधे ज० यदि प० वांधे नो० नहीं है. नारकी का आ० आयुष्य प. बांधे को नहीं नि तिर्यंच का आ- आयुष्य प० वाँधे नो० नहीं म. मनुष्य का आ० आयप्य प० बांधे दे० देवता का. आ. आयुष्य प० बांधे णो नहीं ने नारकी का आ० आयुष्य कि० करके ने० नरक में उ० उत्पन्न होवे णो० नहीं तिः तिर्यंच नो०नहीं म०मनुप्य दे० देव का आ० आयुष्य कि० करके दे० देवता में उ० उत्पन्न होने से वह के० कैसे जा० यावत् दे० देवंका यंसियपकरेइ सियणोपकरेइजइपकरेइणोणेरइयाउयंपकरेइ णा तिरियाउयं पकरेइ णो मणुयाउयं पकरेइ देवाउयं पकोइणो नेरइयाउयं किच्चाणेरइएसु उववजइ, णोतिरि नोमणु देवाउयं किच्चा देवेसु उववजइ । सेकेण?णं जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उबवजइ ? गोयमा ! एगंत पंडियस्सणं मणुस्सस्स केवलमेव दोगईओ. पण्णायंति तंजहा-अंत- पंडित मनुष्य किसी ममय आयुष्य का बंध करता है. और किसी समय आयुष्य का बंध नहीं करता है. नव आयुष्य का बंधकरता है, तब नरक तिर्यंच व मनुष्य का आयुष्य नहीं बांधता है. और वहां नहीं उत्पन्न होता है परंतु मात्र एक देवगति का आयुष्य बांधता है और कहां उत्पन्न होता है. अहो. भगवन् किस कारन से एकान्न पंडित नरक तिर्यंच व मनुष्य का आयुष्य नहीं बविता: है यावत् देवता का आयुष्य गांधकर देवता में उत्पन्न होता है. ? अहो गौतम ! एकान्त पंडित मनुष्य को केवल दो गति कही. १. मब कों का अंत.करना मो अंतक्रिया और समस्त कर्म शय नहीं होने से व पुण्य की वृद्धि होने से प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेव सहायनी जालाप्रसादजी * वाथ सत्र 8- पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र - आयुष्य कि० करके दे देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो गौतम ए. एकान्तं पं. पंडित मं० मनुप्य को के. मात्र दो दोगनि प० कही है अं० अंतक्रिया क. कल्पोत्पन्न से० वह ते० इस लिये जा यावत् दे देवता का आ० आयुष्य कि० करके दे देवलोक में उ० उत्पन्न होवे ॥ २॥ वाव्याल पंडित भं० भगवन् म मनुष्य किं० क्या ने नारकी का आ० आयुष्य प० वांधे जा यावत् दे० देवता का आ. आयुष्य कि० करके दे० देवता में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम णो० नहीं ने नारकी का आ० आयुष्य प० बांधे जा यावत् दे० देवता का आ० आयुष्य कि० करके दे० देवता में उ० उत्पन्न होवे किरिया चेव, कप्पोववत्तिया चेट; से तेणटेणं गोयमा ! जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववज्जइ ॥ २ ॥ बाल पंडिएणं भंते ! मणूसे किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववज्जइ ? गोयमा! णो णेग्इयाउयं पकरेइ जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववज्जइ । सेकेणटेणं जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववनइ ? गोयमा ! बाल- वैमानिक देवलोकमें उत्पन्न होवे ऐसी दोगति कही. इसलिये अहो गौतम ! एकान्त पंडित मनुष्य देवगति के आयुष्य का पंधकर देवगति में उत्पन्न होता है. ॥ २॥ अहो भगवन् ! वाल पंडित (श्रावक ) मनुष्य क्या नारकी का आयुप्य यावत् देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होवे ? अहो गौतम ! बाल पंडित मनुष्य नारकी का आयुष्य वांधे नहीं, तिर्यंच का आयुष्य वांधे नहीं,. मनुष्य का आयुष्य ARSHAN पहिला शतक का आठवा उदेशा8-298 मावार्थ ya १९४. अनुवादक-मनमगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी. शब्दाय में वह के कैसे जा. यावत् दे. देवता का मा० आयुष्य कि० करके दे देवता में उ० उत्पन्न होने गो. गौतम बा० श्रावक त तयारूप स. श्रमण मा० मारण की अं० पाम ए. एक आ० आर्य : धर्म का मु० मुवचन सो० मुनकर निश, अवधारकर देण्देशसे उविरमे दे०.देशसे नो० नहीं उविरमे, है. देश प० पत्याख्यान करे दे० देश नो० नहीं. ५०.प्रत्याख्यान करे ते इस लिये दे.. देश विरति से देश प्रत्याख्यान से नोनी ने नारकी का आ० आयष्य प० बांधे जा० यावत दे देवता का भा० आयुष्य कि० करके दे देवता में उ० उत्पन्न होर ।। ३. | पु० पुरुष भ० भगवन् ,क: कच्छ द. पंडिएणं मणुस्से तहारूवस्स समणस्सवा,माहणस्सवा अंतिए एगमवि आरियं धम्मियं सुव- यणं सोचा निसम्म देसं उवरमइ, देसं णो उवरमइ; देसं पच्चक्खाइ, देसं णो पञ्चक्खाइ; से तेणं देसोवरमइ, देसपच्चक्खाणेणं णो णेरइयाउयं पकरेइ जाव . देवाउयं किच्चा देवेसु उववजई । से तेणटेणं जाव देवेसु उववंजइ ॥ ३॥ पुरिसेणं भंते.! कच्छंसि- बांधे नहीं परंतु देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होवे. अहो. भगवन्-! किम कारन से बाल पंडित मनुष्य देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होवे ? अहो गौतम.! बाल पंडित मनुष्य तथा रूप प्रग माहण की पास से एकान्त आर्यधर्म श्रवणकर अवधारकर देश से निवर्ते, देशसे निवर्ते नहीं, देशमे, प्रत्याख्यान करे, देश मे प्रत्याख्यान करे नहीं, इस तरह देश से निवर्तने से व प्रत्याख्यान करने से * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालापसादनी * दार्थ 09 सूत्र 88 पंचमांग विवाह- पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र-887 द्रह उ० पानी द. द्रव्य व वलय प्र० गुप्तस्थान ग० गहन वि० विषम प० पर्वत प० पर्वत वि० विपम, स्थान व वन व वनविषम स्थान मि• मृगवृत्ति वाला मिः मृगमंकल्प वाला मि० मृगकेवध का अध्यव- सायी मि० मृग ३० वधकरने को गं० गया हुवा मि० मृग ति ऐसा का० करके अ० अन्य कोई मि० मृग व० मारने को कू० कूटपाश उ० बनावे त० तब भ० भगवन् से० उम पुरुप को क० कितनी कि०११ क्रिया गो० गौतम सि० कदाचित् ति तीनक्रिया च० चारक्रिया पं० पांचक्रिया से वह के कैसे भं० वा दहंसिवा, उदगंसिवा, दवियंसिवा, वलयंसिवा, मंसिवा, गहणंसिवा, गहण वि- दुग्गंसिवा, पन्वयंसिवा, पन्वय विदुग्गंसिवा, वर्णसिवा, वणविदुग्गसिवा, मियवित्तीए. मियसंकप्पे, मियपणिहाणे, मियवहाए गंताए एमिएत्ति काओ, अण्णयरस्समियवहाए, कूडपास उडाइ । तओणं भंते ! से पुरिसे कइकिरिए ? गोयमा ! सिय तिकिरिए, नारकी, तिर्यंच व मनुष्य का आयुष्य यांध नहीं परंतु देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होर ॥ ३॥ आयुष्य बंध के कारन भूत क्रियाओं हैं इसलिये क्रिया के संबंध में प्रश्न पूछते हैं. अहो.भगान् ? कच्छ, द्रह, उदके, द्रव्य, वलय, नूम, गहन, गहनविदुर्ग, पर्वत, पर्वत विदुर्ग, वन व वनविदुर्ग में मृग की वृत्तिवाला, मृग के वध का अध्यवसायवाला, मृग को मारने के लिये एकाग्र चित्त करनेवाला नदी का पानी व वृक्षादि से घेराया हुवा भूमिभाग २ तडागादि.में कुंड ३ अल्पजल ४ तृणादिस- मुदाय ५ वर्तुलाकार.नदी के जल की कुटिलगति वाला प्रदेश ६ गुफाआदिगुप्त स्थानः पहिला शंकाका आठवा उद्देशा-१-3800 भावार्थ - * अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी शब्दाथ श्री भगवन् ए. ऐसा वु. कहा जाता है सि० कदाचित् ति० तनिक्रिया सि० कदाचित् च० चारक्रिया पं० पांचक्रिया गो० गौतम जे. जो भ० भव्य उ० बनाने से जो नहीं वं० बंधन करने से णो नहीं मा० मारने से ता० तव से उस पु० पुरुप को का० कायिकी अ० अधिकरणी की पा. मद्वेषिकी तिक तीन कि० क्रिया प० स्पर्शी जे० जो भ. भव्य उ० बनाने से वं. बंधन करने से नो० नहीं म० सिय चउकिरिए, लियपंचकिरिए । से केण?णं भंते ? एवं वुच्चइ सिय तिकिरिए सिय चउकिरिए, सिय पंच किरिए ? गोयमा ! जे भविए उडवणयाए णो बंधणयाए, णो मारणयाए, तावं चणं से पुरिसे काइयाए अहिंगरणियाए, पाउसियाए, तिहिं कि. रियाहिं पुढे । जे भविए उडवणयाएवि बंधणयाएपि, णोमारणयाए तावंचणं वार्थ कोई पुरुष मृग को मारने के लिये कूटपाश करे; तच अहो भगवन् ! उम मृगपाश करनेवाले पुरुप को कितनी क्रिया लगती हैं ? अहो गौतम ! उस मृगपाश बनानेवाले को तीन, चार व पांच क्रिया लगती अहो भगवन् ! किस कारन से तीन चार व पांच क्रिया उम पुरुष को लगती हैं ? अहो गौतम! निस को जितने कालतक कूटपाश करने का भाव है परंतु बंधन करने का व मारने का भाव नहीं है। उस पुरुप को उतने कालतक तीन क्रियाओं लगती हैं. १ गमनादि रूप सो कायिकी, क्रिया, कूटपाशा. दिक को उसन्न करना मो अधिकरण की और मृग में दुष्ट भाव रखना सो प्रपिकी जिस. पुरुष को * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाममादजी * ब्दार्थ -- 4989 पंचमांग विवाह पण्णति ( भगवती) मूत्र 982 मारने से ता० तब से उस पु० पुरुष को का० कायिकी अ० अधिकरण की प. प्रवेपिकी प० परितापनिकी च० चार कि० क्रिया पु० स्पर्शी जे० जो भ० भव्य उ० बनाने से वं० बंधन करने से मा० मारने से ता० वहांलग से० उस पु० पुरुष को का० कायिकी जा० यावत् पा० पाणातिपातिकी पं० पांच कि० क्रिया पु० स्पर्शी से० वह ते० इसलिये जा० यावत पं० पांच कि. क्रिया ॥ ४ ॥ पु० पुरुष क० कच्छ जा० यावत् २० वन वि० विषम त• तृण ऊ० ऊंचा करके अ० अनिकाय से पुरिसे काइयाए अहिगरणयाए, पाओसियाए, परियावणियाए, चउहि किरियाहिं पुढे । जे भविए उडवणयाएवि बंधणथाएवि, मारणयाएवि तावचणसे पुरिसे काइ.. याए जाब पाणाइवाय किरियाए पंचहि किरियाहिं पुट्टे । से तेणटेणं जाव पंचकिरिए ॥ ४ ॥ पुरिसेणं भंते ! कच्छंसिवा, जाव वणविदुग्गसिवा, तणाई ऊसंविय २ अ- जितने कालं पर्यंत कूटपाश वनाने का व मृग बांधने का भाव है परंतु मारने का भाव नहीं है उम को उतने कालतंक चार क्रिया लगती हैं. उक्त तीनों में उत मृग को परिताप दुःख दिया सो परितापनिकी क्रिया वढी. जिस को जितने कालतक कूटपाश वनाने का, वांधने का व मारने का भाव है उस को उतने कालतक पांच क्रिया ओं लगती हैं. कायिकी, अधिकरणकी, प्रवपिकी, परितापनिकी व प्राणातिपातिकी. इसी कारन से अहो गौतमः!! उक्त पुरुष को काचित् तीन, काचित् चार व काचित् पांच क्रियाओं लगती हैं ॥ ४ ॥ पहिला शंतकका आठवा उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ 42 अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी 8 भगवन् ए. ऐसा बु. कहा जाता है सि० कदाचित् ति० तीनक्रिया सि० काचित् च० चारक्रिया पं० पांचक्रिया गो० गौतम जे. जो भ० भव्य उ० बनाने से जो नहीं बं० बंधन करने से णो नहीं मा० मारने से ता. तय से० उस पु० पुरुप को का० कायिकी अ० अधिकरणी की पापद्वेषिकी तिक तीन कि० क्रिया प० स्पर्शी जे० जो भ• भव्य उ० बनाने से 40 बंधन करने से नो० नहीं म० सिय चउकिरिए, सियपंचकिरिए । से केण?णं भंते ? एवं वुच्चइ सिय तिकिरिए सिय चउकिरिए, सिय पंच किरिए ? गोयमा ! जे भविए उडवणयाए णो बंधणेयाए, णो मारणयाए, तावं चणं से पुरिसे काइयाए अहिगरणियाए, पाउसियाए, तिहिं कि- रियाहिं पुढे । जे भविए उडवणयाएवि बंधणयाएवि, णोमारणयाए तावंचणं कोई पुरुष मृग को मारने के लिये कूटपाश करे; तब अहो -भगवन् ! उम मृगपाश करनेवाले पुरुप को कितनी क्रिया लगती हैं ! अहो गौतम ! उस मृगपाश बनानेवाले को तीन, चार व पांच क्रिया लगती अहो भगवन् ! किस कारन से तीन चार व पांच क्रिया उस पुरुष को लगती हैं ? अहो गौतम! निस को जितने कालतक कूटपाश क्रने का भाव है परंतु बंधन करने का व मारने का भाव नहीं है उस पुरुष को उतने कालतक तीन क्रियाओं लगती हैं. १. गमनादि रूप सो कायिकी, क्रिया, कूटपाशा- दिक को उत्सन्न करना मो अधिकरणकी और मृग में दुष्ट भाव रखना सो प्रद्वेषिकी जिस. पुरुप को *प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ शब्दार्थ N 38 पंचङ्ग हिववपण्णाचि (भगवती) मूत्र - पु० पुरुप को का० कायिकी जा. यावत् पं० पांच कि० क्रिया पु० स्पर्शी.से वह, ते• इसलिये गो. गौतम ॥ ५॥ पु० पुरुष क० कच्छ जा० यावत् व० वन वि० विपम मि० मृगवृत्ति वाला मि० मृगसंकल्प वाला मि० मृग मारने का अध्यवसाय वाला मि० मृगवध केलिये गं० गया हुवा मि० मृग ति० ऐसे का० करके अ० किसी एक मि० मृग का ५० वधकेलिये उ० वाण नि० निकाले त० तब भ० भगवन् क० उस्सवणयाएवि, निसिरणयाएवि, दहणयाएथि, तावंचणं से पुरिसे काइयाए जाव पंचहिँ किरियाहिं पुढे । से तेण?णं गोयमा ! ॥ ५ ॥ पुरिसेणं कच्छंसिवा जाव वणविदुग्गंसिवा मियवित्तीए मियसंकप्पे. मिय पणिहाणे, मियवहाए गंताए, एमिए. त्तिकाउं अन्नयरस्स मियस्स वहाए उसु निसिरइ. ततोणं भंते ! सेपुरिसे कइकिरिए ? गोयमा ! सिय तिकिरिए, सियचंउकिरिए, सियपंचकिरिए । सेकेणटेणं ? गोयमा ! भावार्थ, इसलिये अहो गौतम ! ऐसा कहागया है कि उक्त पुरुप को काचित् नीन, चार, व पांच क्रियाओं ge लगती हैं ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! कच्छ यावत् वन्दुर्ग में मृगको वृत्रिपाल, मृगरध का संकल्पवाला, मृग- वध का चिन्तवन करनेवाला, यह मृग है ऐमा कहकर मृग मारने के लिये निकलाहुवा किसी पुरुपने किसी एक मृग को मारने के लिये वाण छोडा. उस समय अहो भगवन ! उस पुरुप को कितनी क्रियाओं १.पहिला शतकका आठवां उद्देशा. 8 १९८ सूत्र 43 अनुवादक-बालमनंचगरी मुनि श्री अमोलक अपनी शब्दानिक डाले ता० तब भ० भगवनू से उस पु० पुरुष को क० कितनी कि० क्रिषा सि० कदाचित् ति० चीनक्रिया सि. कदाचित् च० चारक्रिया सि. कदाचित् पं० पांचक्रिया से० यह के० कैसे गो. गौतम जो भ० योग्य उ० ऊंचा करने से ति तीन उ ऊंचा करने से नि० डालने से नो नहीं द० जलाने से च० चार जे०जी० भ० योग्य उ० ऊंचा करने से नि० फेंकने से द० जलाने से से उस गणिकासि निसिरइ तावंचणं भंते ! सेपुरिसे कइकिरिए ? गोयमा ! सिय तिकिरिए, सिय चउकिरिए, सिय पंचकिरिए । से केपट्टेणं ? गोयमा ! जे भवि- ए उस्सवणयाए तिहिं, उस्सवणयाएवि निसिरणयाएवि नोदहणयाए चउहि, जेभविए भावार्थ अहो भगवन् ! कोई पुरुष कच्छ में यावतू वनदुर्ग में तृणका ढंग करके उस में अनिकाय का प्रक्षेप करे तो उन को कितनी क्रिया लगती हैं ? अहो गौतम ! उन को तीन, चार व पांच क्रियाओं लगती हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से उन को तीन, चार, व पांच क्रियाओं लगती हैं ? अहो गौतम ! जितना काल पर्यंत नृणका समुदाय एकत्रित करता है उतना कालतक उन को कायिकी. अधिकरणकी व प्रदे- पिकी ऐमी तीन क्रियाओं लगती हैं और तृण एकत्रित कर अग्नि में डाले परंतु जले नहीं वहांतक का- यिकी, अधिकरण की, प्रदेपिकी, व परितापनिकी ऐनी चार क्रियाओं लगती हैं, और जो तृण एकत्रित करके अग्नि में डालता है और उम में जलता है. उसको कायिकी आदि पांचों क्रियाओं. लगती हैं. प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी ।
२०१ REET पंचमाङ्ग विवाह पण्णति ( भगवती ) सूत्र 8-81 कानतक उल्याण को आ०खींचकर चि०खडारहे अ०अन्य कोई पु०पुरुप म०पीछेसे आ०आकर स० अपने पा० हस्त से अ० असिसे सी० शीर्प छि० छेदे से • वह उ० वाण ता० उन पु० पूर्वाकर्षण मे ने उस मि० मृगको वि० विधे से वह भं० भगवन् पु० पुरुष किं मि० मृग वैरसे पु० स्पर्शा पु० पुरुष वे० वैरसे पु० स्पर्शा गो० गौतम जे जो मि० मृगको मा० हने से वह मि. मृगवैर से पु० स्पर्श जे. जो पु० पुरुष को मा० हने से वह पु० पुरुष वैरसे पु० स्पर्शा से० वह के० कैसे भं. भगवन् ए. ऐसा कुछ कहा आयय कण्णाययं उसु आयामेत्ता चिट्ठिजा. अन्नयरे पुरिसे मग्गओ आगम्म सय- पाणिणा असिणा सीसं छिदेज्जा, सेय उसू ताएगेव पव्यायामणयाए तमियं विधेजा । सेणं भंते ! पुरिसे किं मियवरेण य पुढे पुरिसवेरेणं पुढे ? गोयमा ! जमियं मारेइ, से मियवरेणं पुढे, जे पुरिसं मारेइ से पुरिसवेरेणं पुढे । सेकेणटेणं भंते! एवं वुच्चइ भावार्थ अहो भगवन् ! कच्छ यावत् वनदुर्ग में मृग का वध के लिये कोई पुरुष धनुष्य में वाण रखकर कान पर्यंत प्रत्यंचा खींच कर खडारहे; उतने में पीछे से अन्य कोई पुरुष आकर अपने हस्त में खङ्गलेकर उस मृग वधक का मस्तक छेदे. उस समय उम मृग को उद्देशकर खींचा हुवा वाण उस पुरुप के हस्त में से छुटकर उमी मृग को भेदे. अब अहो भगवन् ! उस मस्तक छेदनेवाला पुरुप को क्या मृग का वैर हुआ अथवा पुरुष का वैर हुआ ? अहो गौतम ! जिसने पुरुष को मारा उस को पुरुष का वैर हुवा और जिसने पहिला शतक का आठया उद्देशा<APHY Sya oyo o0 48 अनुवादक-बालब्रह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 शब्दार्थी कितनी कि क्रिया गो० गौतम सि० कदाचित् ति तीन क्रिया सि. कदाचित् च. चारक्रिया सि. कदाचित पं० पांचक्रिया जे० जो भ० योग्य नि निकालनेसे ति० तीन जे० जो भ० योग्य नि निकाल भेसे वि० विध्वंस करने से नो० नहीं मा० मारने से च. चार जे. जो भ० योग्य नि. निकालने से वि० विध्वंस करने से मा० मारने से से० उम पु० पुरुष को जा. यावत् पं० पांचक्रिया ॥ ६ ॥ पु० पुरुष भ० भगवन् क • कच्छ जा० यावत अ० किसी एक मि० मृग का व० वधकेलिये आ. सूत्र जे भविए निसिरणयाए तिहिं, जेभविए निसिरणयाएबि, विद्वंसणयाएवि, णोमारणयाएं चउहिं, जे भविए निसिरणयाएवि, विद्धंसणयाएवि, मारणयाएवि, तावंचणं सेपुरिसे जाव पंचकिरियाहिं पुढे । से तेणट्टेणं गोयमा ! सियतिकिरिए, सिय चउकिरिए, सियपंच किरिए ॥ ६ ॥ पुरिसेणं भंते ! कच्छंसिवा जाव अन्नयरस्सीमयस्स बहाए कही? अहो गौतम ! क्वचित तीन क्रिया. क्वचित् चार क्रिया व क्वचित् पांच क्रिया कही हैं. अहो भगवन् ! किस कारण मे ऐसा कहा ? अहो. गौतम ! जो वाण छोडता है उस को कायिकादि तीन क्रिया. जहांला जो वाण छोडकर उस मृग को दुःखी करता है वहांलग उस को. चार क्रिया और जो पुरुष वाण छोडता है, मृग को दुःखी करता है, और मार डालता है वहांलग उस पुरुष को पांच क्रियाओं लगती हैं इसलिये अहो गौतम ! उक्त पुरुष को क्वचित् तीन चार व पांच क्रिया ओं लगती हैं ॥६॥ * प्रकाशक-राजावहादुरं लाला मुखदेव सहायजी.ज्वालाप्रसादजी वार्थ * २७ सार्थ अंदर में छ० छमास की म० मरे का० कायिकी जा? यावत् पं० पांचक्रिया पु० स्पर्शे वा० बाहिर छ. छमाम की म० मरे च० चारक्रिया पु० स्पर्शे ॥ ७ ॥ पुं० पुरुष भं• भगवन् पु० पुरुष को स० भाला से म. गांधे म सतः के पा० हस्त में अ० असिमे सी. शीर्ष छि• छेदे त० तब से उस पु० पुरुष को क. कितनी कि क्रिया गो: गौतम जा. जब से वह पु० पुरुष तं० उस पु. पुरुष को सः पंचमांग विवाहपत्ति ( भगवती) सूत्र ११ काइयाए जाव पंचहि किरियाहिं पुढे : बाहिं छण्हं मासाणं मरइ, काइयाए जाव पा- रियावणियाए चउहिं किरियाहिं पुढें ॥ ७ ॥ पुरिसेणं भंते ! पुरिसं सत्तीए समभि- संधेजा सयपाणिणावा से असिणा सीसं छिदेजा । तओणं भंते ! से पुरिसे कइकि- - पहिला शतकका आठया उद्देशा भावा मारनेवाले को पुरुष का वैर लगता है. वह मृग यदि छ मांस की अंदर मरजावे तो घातक पुरुष को पांच क्रियाओं' लगती हैं क्यों की छ मासतक मृग को महार हेतुरु मरण होता है. छ मास पीछे यदि वह मृग मजावे तो प्राणप्रतिपातिकी क्रिया छोडकर अन्य चार क्रियाओं लगती है * ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! कोई गरूप शक्ति "भा से, अथरा अपने हस्त में रहा हुना खड्ग से किसी पुरुप का शिरच्छेदन करे तब यहांपर व्यहारकी अपेक्षा प्राणानिपातिकी क्रिया मात्र व्यपंदश बतानेको कहीहै. अन्यथा जव प्रहारहेतुक मरण होवे उस समय उस वकालो कायिकी यावत् प्राणातिपातिकी पांच क्रिया लगती हैं: end शब्दार्थ २०३ सूत्र पर अनुवादक-बालप्रमचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी माता है जा. यावत् से वह पु. पुरुषवैर से पु० स्पर्शा से वह गो० गौतम का करते को कः किया सं. मांथते को सं० मांपा नि० खींचते को नि० खींचा नि० निकलते को नि० निकला व० कहना हं० हां भं भगवन् कः करते को किया जा० यारत् निकाला जे जो मि• मृगको मा० हने से. मि. मृगवैर में पु० स्पर्श ने जो पु० पुरुष को मा हो से० क पु० पुरुषपैर से पु० - स्पर्श अं० जाव से पुरिसबेरेणं पुढे । सेणूणं गोयमा ! कज्जमाणे कडे, संधेजमाणे संधिए, नि- . व्यत्तिज्जमाणे निव्वत्तिए, निसिरिजमाण निसिटेत्ति वत्तव्वंसिया । हंता भगवं ! क- जमाणे कडे जाव निसटेत्ति वत्तव्यंसिया । से तेण?णं गोयमा ! जे मियंमारेइ से मियवरेणं पुढे, जे पुरिसं मारेइसे पुरिसवरेणं पुढे. अंतो छण्हं मासाणं मरइ- मृग को मारा उस को मृग का वैर हुआ. अहो भगवन् ! यह अर्थ किस तरह है ? अहो गौतम ! "कज- माणे कडे' करते हुवे को किया अर्थातू धनुष्य वाण करने लगा सो किया, 'संविजनाणे संधिए' धनुष्य पाण मांधनेलगा सो मंधा, 'नियत्तिज्जमाणे निव्यत्तिए' धनुष्य सींचने लगा सो खींचा व : निसरिजमाणे निसि?' धनुष्य में से बाण नीकलने लगा सो नीकला ऐसा कहा जा सकता है: हां भगवन् ! करते को किया हुवा यावत् नीकलने को निकला हुवा कहा जा सकता है. इनमें अटो गौतम ! जो मृग मारता है वह मृग का वैर से स्पर्शाता है अर्थात् उनः मृग मारनेवाले को मृग का वैर लगना : है औरः पुरुष करानाबादुर नाला मुखदेवताहायनी मागलादनी, भावार्थ 67 अंदर में छ० छमास की म० मरे का० कायिकी जा: यावत् पं० पांचक्रिया पु० स्पर्श वा० बाहिर छ. Pe छमाम की म मरे च० चाक्रिया पु० स्पर्शे ॥ ७ ॥ पुं० पुरुष भ० भागचन् पु. पुरुष को स० भाला से सं० मांये म. सतः के पा. हस्त मे अ० असिमे सी० शीर्प छि० छदे त० तब.से. उस पु० पुरुष को क कितनी कि क्रिया गो गौतम जा. जब से वह पु. पुरुप तं० उस पु० पुरुष को सः 8 पंचमांग विवाह जत्ति (भगवती) सूत्र - काइयाए जाव पंचहि किरियाहिं पुढे : बाहिं छण्हं मासाणं मरइ, काइयाए जाव पा- रियावणियाए चउहि किरियाहिं पुढे ॥ ७ ॥ पुरिसेणं भंते ! पुरिसं सत्तीए समभि- संधेजा सयपाणिणावा से असिणा सीसं छिंदज्जा । तओणं भंते ! से पुरिसे कइकि- 383%80% पहिला शतकका आठवा उद्देशा > भाग , मार वाले को पुरुष का वैर लगता है. वह मृग यदि छ मांस की अंदर मरजावे तो घातक पुरुष को पांच क्रियाओं लगती हैं क्यों की छ मासतक मृग को प्रहार हेतुरु मरण होता है. छ मास पीछे यदि वह मृग मरजाये तो माणातिपातिकी क्रिया छोडकर अन्य चार क्रियाओं लगती है * ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! कोई गान शक्ति "भा से, अथरा अपने हस्त में रहा हुना खड्ग से किती पुरुष का शिरच्छेदन करे तब यहॉपर व्यापारको अपेक्षा प्राणातिपातिकी क्रिया मात्र व्यपंदश बतानेको कहीहै. अन्यथा जब महारहेतुक मरण होने उस समय उन वकको कायिकी यावत् प्राणातिपातिकी पांच निया लगती है. ex yo शब्दार्थ सूत्र 42 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 सर्वकाल ए. ऐसे उ० उपर का ए० एकेक को सं० जोडना जो० शो हे० निचे का तं. उन को छ० छोडना ने० जानना जा० यावत् अ० अतीत अ० अनागतकाल १० पीछे स० सर्वकाल जा. यावद अ० अननुक्रम मे सा० वह रो रोहा से वह ए. ऐसे भं• भगवन् जा. यावत् वि० विचरते हैं ॥१४॥ भ. भगवान् गो० गौतम स० श्रमण जा० यावत् ए. ऐसा क्० वोले क. कितना प्रकार की भं० भगान् एक्ककं संजोयं, तेणं जो जो हेढिल्लो तं तं छडेतेणं नेयत्वं जाव अतीय अणागयढा, पच्छासम्बद्धा. जाव अणाणुपुल्चीए सा रोहा, सेवं भंते २ जाव विहरइ ॥ १४ ॥ भंतेत्ति भगवं गोयमे समणं जाव एवं वयासी कइविहाणं भंते ! लोयट्ठिई पण्ण- त्ता ? गोंयमा ! अट्ठबिहा लोयट्टिई .पण्णत्ता, . तंजहाँ – आगासपाट्ठए वाएं भी वैसे ही कहना. इस में कोई पहिले पीछे नहीं, सब अनुक्रम रहित बराबर हैं. सदा शाश्वत है. फीर रोहक अनगार वोले की अहो भगवन् ! आपने जो कहा वह वैसे ही है यों कहकर तप संयम से आत्माको भावते हुवे पिचरने लगे ।। १.४ ॥ श्री गौतम स्वामीने प्रश्न किया कि अहो भगवन् ! लोक स्थिति कितने प्रकार की है! अहो गौतम ! लोक स्थिति आठ प्रकार की है. १ आकाश प्रतिष्ठित वायु अर्थात् आकाश के आधार मे घनवात तनुत ऐसे दोनों वायु रहें हैं. २ वायु के आधार से उदधि है ३ उद- घि प्रतिष्ठिन पृथ्वी । पृथ्वी प्रतिष्टित अन स्थावर प्राणी ५ जीव के आधार से अजीव रहे हैं ६ कर्म के आ- प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वामानादजी भावार्थ * १.६१ पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) मूत्र 3883 दार्थ लो० लोकस्थिति गो० गौतम अ० आठ प्रकार की लो० लोकस्थिनि आ० आकाश पं० प्रतिष्ठित धा० वायु वा वायु प-प्रतिष्ठित पु० पृथ्वी पु० पृथ्वी प० प्रतिष्ठित त० त्रस था० स्थावर माणी अ० अजीव जी जीव प्रतिष्ठित जी जीव क. कर्म प० प्रतिष्ठित अ० अजीव जी० जीव सं संग्रहित जी. जीव क० कर्म सं० संग्रहित ।। १५ ।। से वह के० कैसे भ० भगवन् ए. ऐमा बु. कहा जाता है अ० आठ प्रकार की जा. यावत् जी० जीव क० कर्म सं० संग्रहित गो० गौतम से० वह ज० जैसे के० कोइ पुरुष सूत्र वाय पइट्ठिइए उदही, उदहि पट्ठिया पुढवी, पुढवी पइट्ठिया तसा, थावरा पाणा, अर्जावा जीव पइट्ठिया, जीवा कम्मपइट्टिया, अजीवा जीव संगहिया, जीवा कम्म संगहिया ॥ १५ ॥ सेकेणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ, अट्ठविहा जाव जीवा कम्म संगहिया ? गोयमा ! सेजहा नामए केइपुरिसे वत्थिमाडावेइ.२ ता उप्पि सिई भावार्थ धार से जीव है ७ जीवने अनीव ग्रहण किया, मन भाषा के पुद्गलों जीवने ग्रहण किये ८ करें - ग्रहीन संसारी जीव हैं. उदय में आये हुवे कर्मों के पश से जो प्रवर्तते हैं, जो जिम में रहते हैं, वे उस में प्रतिष्ठित हैं जैसे घटादि में रूप रहने से घटादि प्रतिष्ठित रूप कहाजाता है ॥ १५॥ अहो भगवन् ! किस कारन से आठ प्रकार की लोक स्थिति कही ? अहो गौतम : जैसे कोई पुरुप चमडे की मशक में माय भरे और करि उस का उपर का मुस्क अंधे कर देवे मुख शंधकर उस मशरुके मध्य भाग में 22 पहिला शतक का छठा उद्देशा 98880 शब्दार्थी, १६२ सत्र 43 अनुवादक-पालनमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी - १० मशक को आ भरकर उ० उपर सि. बंधन बै० बांधे म० मध्य में गं गांठ ० बांधे उ० उपर की ग० गांठ को मु० छोडे उ० उपर के दे भाग की वार नीकाले उ० उपला दे० भाग में आ पानी पू० भरे उ० उपर का सि बंधन बांधे म० मध्य की गं० गांउ. को मु छोडे से वह गो० गौतम आ० पानी वा. वायु की उ० उपर चिं. रहे हैं. हां चि० रहे से वह बंघइ २ त्ता, मझे गठिं बंधइ २ त्ता, उवरिलं गठिं मुयइ. २ त्ता, उवरिल्लं देसं वामेइ २ ता, उवरिल्लं देसं आउयायस्स पूरेइ २ त्ता, उप्पिं सियं बंधइ . २ त्ता, माझिालं गठिं मुयइ ॥ सेणूणं गोयमा ! से आउयाए तस्स वाउयायस्स उाप्पं उव- रितले चिट्ठइ ? हंता चिट्ठइ । से तेणटेणं जाव जीवा कम्मसंगहिया, से दूसरा बंध वांधे, मध्य में बंध बांधकर · उपर का मुख खोलकर वायुनीकाल देवे और पानी भरे. फीर उस का मुख बांधकर बीच का बंध छोड देवे तो क्या गौतम ! उस मशक में रहे हुवे. नीचे के वायु से पानी रह सकता है ? हां भगवन् ! उपर के विभाग में वायु के आधार से पानी रह सकता है. तब भगवन्तने कहा कि जैसे वायु के आधार से मशक में पानी रहा वैसे ही आकाश के आधार से वायु, वायु के आधार से पानी यावतं कर्म संग्रहीत जीव है. दूसरा दृष्टान्त जैसे कोई. पुरुष वायु से पूरिन चमडे की मशक को कहि से बांधकर पुरुष प्रमाण से अधिक अगाध पानीवाले द्रह में प्रवेश । मकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनीजालापसादजी भावाथा - दाथै ४ ते तैसे जा० यावत् जी० जीव क. कर्म संग्रहित से० वह ज. जैसे के० कोइ पुरुष व मशक को आ० भरे क० कटि से वं०वांघेअ अगाध म तल अ०बहुत पुः पुरुषप्रमाण उ०पानी में ओ० मवेश करे से: वह णू निश्चय गो० गौतम मे०वह पु० · पुरुष त० उस आ० पानी की उ० उपर 'चि० रहे हं० हां चि० रहे ए. ऐसे अ० आठ प्रकार की लो लोकस्थिति ५० प्ररूपी जा. यावत् जी० जीव क कर्म संग्रहितं ॥ १६ ॥ अ० है भ० भगवन नी• जीव पोर पुद्गल अ० अन्योन्य व० बंधाये हुवे अ० अन्योन्य 13१३:पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 38 जहावा केइ पुरिसे वत्थिमाडोवेइ २ त्ता कडीए बंधइ अत्थाह मतारम पारिसियं उदगंसि ओग्गाहेजा ॥ सेणूणं गोयमा ! से पुरिसे तरस आउयायस्स उवरिमतले चिट्ठइ ? हंता चिट्ठइ ॥ एवं वा अट्टविहा लोयट्टिई पण्णत्ता, जाब. जीवा कम्म संगहिया ॥१६॥ अस्थिणं भंते ! जीवा य पोग्गला य अण्णमण्ण बद्धा, अण्णमण्ण : पहिला शतक का छहा उद्देशा 88 भावार्थ करके आगे जावे तो क्या गौतम ! वह पुरुष पानी पर तीरता हुवा रहता है ? गौतम स्वामी कहते हैं कि वह पुरुष पानी पर ही तीरता हुवा रहता है. जैसे वह पानी पर ही तीरता हुवा रहता है वैसे ही अहाँ गौतम ! आकाश प्रतिष्ठित वायु वगैरह आठ प्रकार की लोक स्थिति कही है ॥ १६ ॥ अहो भगवन् !! जीव व पुद्गल परस्पर क्या बंधे हुवे हैं ! परस्पर एक २ को स्पर्श हुवे हैं ! परस्पर चिकनाइ से लगे yo शब्दार्थ सूत्र 43 अनुवादक-बालमह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 89 रूपये अ० अन्योन्य ओक अवगाहे हुवे 'अ० अन्योन्य सि. स्निग्ध प. बंधाये अ० अन्योन्य घ. घडापने चि० रहते हैं . हा अ० है से वह के. कैसे भं० भगनन् जा. यावत् चि०. रहते हैं गो. गौतम से वह ज० जैसे उ० द्रह सिहोवे पु० पूर्ण प० प्रतिपूर्ण वो उछलता नो० विकसता स० - सम घ. घडापने चि० रहे अ० अब के० कोइ पु० पुरुप तं उस हद्रहमें ए. एक अ० वडा ना० नाव स० पुट्ठा, अण्णमण्ण मोगाढा, अण्णमण्ण सिणेह पडिबढा, अण्णमण्ण घडत्ताए चि. टुंति ? हंता अस्थि ।। सेकेण?णं भंते ! जाव चिटुंति ? गोयमा ! से जहा नामए हरदेसिया पुण्णे पुण्णप्पमाणे वोलमाणे वीसटमाणे समभर घडत्ताए चिट्ठइ ॥ अ. हेणं केइपुरिसे तसि हरदसि एगं महं. नावं सदासर्व सयच्छिदं ओग्गाहेजा, सेणूर्ण गोयमा ! सानावा तेहिं आसंवदारहिं आपूरमाणी २ पुण्णा पुण्णप्पमाणा वोलमाणा हुवे हैं ! भगवन्त कहते हैं कि हाँ गौतम ! जीव पुद्गल परस्पर बन्धे हुवे रहने हैं यावत् लोली भूत रहते हैं. अहो भगवन ! किस प्रकार से जीव अजीव दोनों, बंधे हुवे हैं. यावतू लोलीभूत हैं! अहो गीतम! जैसे कोई द्रह पानी से परिपूर्ण होवे किंचिन्मात्र खाली न होवे, उस में पानीः उछलता होचे, और बहुत सुशोभित होवे, वैसे दह में कोई पुरुष एक बडी छिद्रवाली नाव सहित प्रवेश करे. - अब अहो गौतम ! छिद्रों से आता हुवा पानी से भरकर वह नावा भरे हुचे घडे समान क्या नीचे बैठे ? हां प्रकाशक-राजावहादुर लाला एखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी * न्दिर्थ ॐ883 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती ) सूत्र 82 सदा आश्रय स० शतच्छंद ओ० प्रवेशकरे गो० गौतम सा- वह ना० चो० उछलता वो० वीकसता स०मम घ० घडापने वि० रहे ० हां चि० रहे से वह ते ऐसे गो० गौतम अ० है जी० जीव जा. यावत् चि० रहे ।। १७ ।। अ० है भ० भगवन् स० सदैव मु० सुक्ष्म सि० अप्काय ५० गीरता है ई० हां अ० है से० वह भ० भगवन् कि० क्या उ• ऊर्ध प० गोरे अ० अघो प. गीरे ति. तिर्यक् प० गोरे. गो. वोसट्टमाणासभमर घडत्ताए चिट्ठइ. हंता चिटुइ। से तेणटेणं गोयमा!अस्थिणं जीवाय जाव चिटुंति ॥ १७ ॥ अत्थिणं भंते सदासमियं सुहुम सिणेहकाये पवडइ ? हता अस्थि । से भंते ! किंउड्डे पवडइ, अहेपवडइ, तिरिए पवडइ ? गोयमाउड्डेवि पवडइ, अहेवि पडवइ, तिरिएवि पवडइ, ॥ १८ ॥ जहा से बादरे आउयाए अण्णमण्ण भगवन् ! वह नावां पानी भराने से नीचे बैठे. ऐसे ही अहो गौतम ! जीव व पुद्गल परस्पर बंधे हुवे, मीले हुवे, यावत् लोलीभूत बने हुवे हैं ।। १७ ॥ अहो भगवन् ! सदैव सूक्ष्म पानी पडता है ! हां गौतम ! सदैव सूक्ष्म अप्काय पडती है. अहो भगवन् ! क्या वह उपर पड़ती है, नीचे पडती है, या तिर्यक पड़ती है ! अहो गौतम ! ऊर्भ लोक में वाटलादि पर्वत पर पडती है, अधो लोक में अधोगामिनी विजय में पडती है और तिर्यक् लोक में भी पडती है ॥ १८ ॥ अहो भगवन् ! जैसे चादर पानी की वर्षा होने से वह पानी तडागादि में एकत्रित होकर बहुत काल पर्यंत टिकता है वैसे ही क्या सूक्ष्म अप्काय पहिला शतक का छठा उद्देशा भावार्थ YO 00 शब्दार्थ १६४ 43 अनुवादक-बालब्रह्मचारी-मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 800 पु० स्पर्शाये अ० अन्योन्य ओ० अवगाहे हुवे 'अ० अन्योन्य सि. स्निग्ध प. बंधाये. अ अन्योन्य १० घडापने चि० रहते हैं ई० हां अ० है से वह के कैसे भं० भगान् जा० यारत् चि०. रहते हैं गो. गौतम से वह ज. जैसे ४० द्रह सिव्होवे पु० पूर्ण प: प्रतिपूर्ण वो उछलता नो० विकसता स० . सम घ. घडापने चि० रहे अ० अब के० कोइ पु० पुरुप त उस ह. द्रहमें ए. एक अ० वहां ना० नाव स० पुट्ठा, अण्णमण्ण मोगाढा, अण्णमण्ण सिणेह . पडिबढा, अण्णमण्ण-घडताए चि- टुंति ? हंता अस्थि ॥ सेकेणटेणं भंते ! जाव चिटुंति ? गोयमा ! से जहा नामए हरदेसिया पुण्णे पुण्णप्पमाणे बोलमाणे बोसटमाणे समभर घडताए चिट्ठइ ॥ अ. हेणं केइपुरिसे तसि हरदसि एगं महं नावं सदासर्व सयच्छिदं ओग्गाहेजा, सेणं गोयमा ! सानावा तेहिं आसबदारहि आपूरमाणी २ पुण्णा पुण्णप्पमाणा वोलटमाणा हुवे हैं ! भगवन्त कहते हैं कि हां गौतम ! जीव पुद्गल परस्पर वन्ये हुवे रहने हैं यावत् लोली भूत रहते हैं. अहो भगवनू ! किस प्रकार से जीव अजीव दोनों. बंधे हुवे हैं यावतू लोलीभूत हैं! अहो गौतम ! जैसे कोई द्रह पानी से परिपूर्ण होवे किंचिन्मात्र खाली न होवे, उस में पानीः उछलता होचे, और बहुत सुशोभित होवे, वैसे द्रह में कोई पुरुष एक बडी छिद्रवाली नाव सहित प्रवेश करे. अब अहो गौतम ! छिद्रों से आता हुवा पानी से भरकर वह नावा भरे हुवे घडे समान क्या नीचे बैठे? प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी * भाता शब्दर्थ १६५ 38 पंचपांग विवाह पण्णत्ति (भवगती) सूत्र 3 सदा आश्रवस० शतच्छंद ओ० प्रवेशकरे गो० गौतम मा. वह ना० वो उछलता वो० वीकसता स०मम घ. घडापने चि० रहे हैं. हां चि० रहे से• वह ते ऐसे गो० गौतम अ० है जी. जीव जा. यावत् चि० रहे ॥ १७ ॥ अ० है भ० भगवन् स० सदैव मु० सुक्ष्म सि० अप्काय प० गीरता है ४० हां अ० है से० वह भ० भगवन् कि क्या उ• ऊर्थ प० गोरे अ० अधो प. गीरे ति. तिर्यक् प० गोरे गो. वोसट्टमाणासभमर घडताए चिट्ठइः हंता चिटुइ। से तेण?णं गोयमा!अत्थिणं जीवाय जाव चिटुंति ॥ १७ ॥ अत्थिणं भंते सदासमियं सुहुम सिणेहकाये पवडइ ? हंता अत्थि । से भंते ! किंउड्डे पवडइ, अहेपवडइ, तिरिए पवडइ ? गोयमाउड्डेवि पवडइ, अहेवि पडवइ, तिरिएवि पवडइ, ॥ १८ ॥ जहा से बादरे आउयाए अण्णमण्ण भगवन् ! वह नावां पानी भराने से नीचे बैठे. ऐसे ही अहो गौतम ! जीव व पुद्गल परस्पर वैधे हुवे. मीले हुवे, यावत् लोलीभूत बने हुवे हैं ॥ १७ ॥ अहो भगवन् ! सदैव सूक्ष्म पानी पहता है ! हां गौतम ! सदैव सूक्ष्म अप्काय पडती है. अहो भगवन् ! क्या वह उपर पडती है, नीचे पडती है, या तिर्यक पडती है! अहो गौतम ! ऊर्भ लोक में वाटलादि पर्वत पर पडती है, अधो लोक में अधोगामिनी विजय में पडती है और तिर्यक् लोक में भी पडती है ।। ५८ ॥ अहो भगवन् ! जैसे वादर पानी की वर्षा होने से वह पानी तडागादि में एकत्रित होकर बहुत काल पर्यंत टिकता है वैसे ही क्या सूक्ष्म अप्काय पहिला शतक का छठा उद्देशा भावार्थ . Syo शब्दार्थ गौतम उ ऊर्य पगीरे अ० अधो प. गोरे ति: तिर्यक् प०गीरे॥१८॥ ज जैसे से वह वा वादर आ अपूकाय अ० अन्योन्य स० रहता चि• चिरकाल दी. दीर्घकाल चिः रहे त० तैसे से वह नो० नहीं इ. यह अर्थ स. समर्थ से वह खि० शीघ वि. विश्वंस आ आता है से ऐसे भ भगन्॥१॥६॥ ने० नारकी भ० भगवन ने०नरकमें, उ० उपजता कि क्या देण्देशने दे० देश उ० उपजे दे देश से स० सर्व. उ० उपजे स० सर्व से दे० देश उ० उपजे स० सर्व से स. सर्व उ० उपजे गो० गौतम नो. नहीं सत्र ॐ अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालाप्रसादजी* उववजह समाउत्ते चिरंपि दीहकालं चिट्ठइ, तहाणं सेवि ? णोइणढे संम? । सेणं खिप्पामेव वि. ईसमागच्छइ ॥ सेवं. भंते भंतेत्ति पढमे, सए छट्ठो उद्देसो सम्मत्तो ॥१॥६॥ नेरइएणं भंते ! नैरइएसु उववजमाणे किं. देसेणं देस उववेजई, देसेण सव्वं उवव- T जइ, सम्वेणं देसं उपवजइ, सवणं सत्र, ? गोयमा.! नो देसेणं देसं उव भी बहुतः काल तक टिकती है ? अहो गौतम ! यठ अर्थ योग्य नहीं हैं क्यों की मूक्ष्म - अपकाय बहुत काल पर्यंत · नहीं टिकतीः है: अंस समयं में नष्ट होती है. गौतम स्वामी कहते हैं कि अहो भगान् ! आपका वचन: सत्य है.. अन्यथा नहीं है. यह पहिले शतकका छंठा उद्देशा पूर्ण हुग ॥१॥६॥ 'छठे उद्देश में विधंस की कथा कहीं अब सातये उद्देशे में इससे विपरीत उत्पन्न होने की वक्तव्यंता करते viakur गवार्थ ४ yo शब्दार्थ दे० देश से दे० देश उ० उपजे नो० नहीं दे० देशसे स०.सर्व ८० उपने नोक नहीं स: सर्व से दे. देश उ० उपने स० सर्व से ससर्व.उ उपने ज. जैसे ने नारकी ए० ऐने जा यावत् वे वैमानक ॥२॥ वजइ, नोदेसेणं सब्बं उववज्जइ, णोसव्येणं देस उववज्जइ, सवेणं सव्वं उववजइ ॥ सूत्र जहा नैरइए, एवं जाव वेमाणिए ॥ १ नेरइएणं' भंते !' नेरइएसु उववजमाणे भावार्थ 32 पंचमांग-विवाह :पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र हैं. अहो भगवन् ! 'नारकी में उत्पन्न होता.* हुवा जीव क्या अपने देश मे नारकी का देशपने उत्पन्न ाता है ! क्या. अपना एक देश से नारकीका सर्वांगपने उत्पन्न होता है ? क्या अपना सर्वांग से नारकी का एक दशपने उत्पन्न होता है ? अथवा क्या अपना सर्वांग से नारकी का सर्वांगपमे उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! नारकी में उत्पन होता जीव देश से देश नहीं उत्पन्न होता है, देश से सर्व नहीं उत्पन्न होता है, सर्व से देश नहीं उत्पन्न होता है, परंतु सर्व से सर्व उत्पन्न होता है अर्थात् . संपूर्ण जीव नारकी के सर्वांगपने उत्पन्न होता है. जैसे नरकका कहा है वैसे ही अमुर कुमारादिक से वैमानिक तक के मत्र दंडक का कहना ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! नारकी में उत्पन्न होता जीव क्या अपना देश से देश का * यहांपर उत्पन्न होताहुवा कहनेसे उत्पन्नहुवा ऐसाही जानना. क्योंकी नारकांके आयुष्यका उदय हो- नेसे अन्य तिर्यंचादिक आयुष्यका अभानहै पहिला शतक का सातवा उद्देशा 20999 गन् ! आपका वचन.सत्य है :. अन्यथा नहीं है . यह पहिले शतकका छठा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥१॥६ ॥ शब्दार्थ गौतम-उ० ऊर्ध्व पगोरे अ अधो प० गोरे ति: तिर्यक् प०गोरे॥१८॥ ज जैसे से वह बा. वादर आ अपूकाय अ० अन्योन्य स० रहता चिचिरकाल दी दीर्घकाल चि० रहे ते तैसे से वह नो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ से वह खि० शीघ्र वि. विश्वंस आ? आता है. से ऐसे भ भगवनशिक्षा ने० नारकी भ० भगवनू ने नरको उ० उपजता कि क्या देण्देशने दे. देश उ० उपजे दे देश से स. सर्व उ० उपजे स० सर्व से दे० देश उ० उपजे स० मर्व से स०. सर्व उ० उपजे गोर गौतम नो० नहीं -- सत्र अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 समाउत्ते चिरंपि दीहकालं चिट्ठइ, तहाणं सेवि ? णोइण? संम?। सेणं खिप्पामेव वि- हंसमागच्छइ ॥ सेवं भंते भतेत्ति पढमे, सए छट्ठो उद्देसो सम्मत्तो ॥१॥६॥ / नेरइएणं भंते ! नेरइएसु उववजमाणेः किं. देसेणं देस उववजय, देसेणं सव्वं उवव- जइ, सव्येणं देसं उववजइ, सब्वेणं सब, उववजइ ? गोयमा.! नो देसेणं देसं उव *भकाशक :राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी वार्थ भी बहुतः काल तक टिकती है ? अहो. गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं क्यों की सूक्ष्म अपकाय बहुतः काल पर्यंत नहीं टिकती है: अल्प समयं में नष्ट होती है. गौतम स्वामी कहते हैं कि अहो 'छठे उद्देशे में विधस की कथा कहीं अब सातथे उद्देशे में इससे विपरीत उत्पन्न होने की वक्तव्यता करते सूत्र 88 पंचगंग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8. ए. ऐसे जा यावत् के. वैमानिक ॥ २॥ ने नारकी भ• भगवन् ने नरक से. उ? चवता कि क्या दे देश से दे देशं उचो जा जैसे उ• उपजने में त० तैसे उ० चवने में दं०दंडक भा०कहना ॥३॥ ने. नारकी भ० भगवन् ने नरक से उ० ता कि क्या दे देश मे दे० देश .आ० :आहार करे त. वा देस आहारेइ, सब्वेणं वा सधं आहारेइ, एवं जाव वेमाणिए ॥ २ ॥ नेरइएणं भंते ! नेरइएहितो उन्बहमाणे, किं देसेणं देसं उबटइ? जहा उबवजमाणे, तहेब उ. वट्टमाणेवि दंडगो भाणियन्वो ॥ ३ ॥ नेरइएणं भंते ! नेरइएहितो उबमाणे किं देसेणं देसं आहारेइ ? तहेब जाव सव्वेणं बादेसं आहारेइ, सव्वेणं वा सवं आहारे ।। दंडक का जानना. ॥ २॥ अहो भगवन् : नारकी में से उर्तता हुवा जीव क्या अपने देश से देशको उद्वर्तना करे, देशसे सर्व की उद्वर्तना करे, सर्व से देश की उद्वर्तना करे, या सर्व से सर्व की उतना करे? अहो गौतम ! जैसे उत्सन आश्रित कहा वैसे ही उद्वर्तन आश्रित जानना. इस में सर्व से सर्व उद्वर्तता ३ ॥ अहो भगवन् ! नारकी में से उर्तता हुवा जीव क्या देश से देश पुद्गलों का आहार करे। देश से सर्व पुद्गलों का आहार करे? सर्व से देश का आहार करे ? अथवा सर्व से सर्व का आहार करे ? अहो गौतम ! सर्वसे देश का आहार करे व सर्व से सर्व का आहार करे, शेप-सव पहिले उपजने के समय आहार का कहा वैसे ही यहां कहना. जैसे नरक का उद्वर्तन व आहार का कहा वैसे ही शेप सब पहिला प्रतकका सातवा उद्देशा NRN भावार्थ से 42 अनुवादक-पालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8- शब्दार्थ ने नारकी भ० भगवन् ने० नरक में उ० उपजता किं० क्या दे देश से दे० देश आ० आहारकरे दे० देश से स० सर्व आ० आहार करे स० स से दे० देश आ० आंहार करे स. सर्व से स० सर्व आ० आहार करे गो० गौतम नो० नहीं दे० देश से दे० देश भा० आहार करे नो नहीं दे. देश स० सर्व आ० आहारकरे स० सर्व से दे० देश आ० आहार करे स० सर्वले स० सर्व आ. आहार करे किं देसेणं देसं आहारेइ, देसेणं सब्बं आहारेइ, सब्वेणं देसं आहारेइ, संवेणं : सन्च आहोरेइ ? गोयमा ! णो देसेणं देसं आहारेइ, णो देसेणं सव्वं आहारेइ, . सवेणं आहार करे! देश से सर्पका आहार करे? सर्व से देश का आहार करे ! अथवा सर्व से सर्व का आ- भावार्थ हार करे ? अहो गौतम ! जीव एक देश से देश. पुद्गलो.का.आहार नहीं करता है, जीव एक देश से सब पुगलों का आहार नहीं करता है, परंतु उत्पन्न होने के दूसरे समय में ही सब प्रदेश से नरक के देश पुगलों का आहार करता है, और जीव के समस्त प्रदेश से समस्त पुद्गलों का आहार करता है. जैसे ऊष्ण किया हुवा तेल की कडाइ में पुरी को डालते पहिले पास के तेल को चूस लेती है फीर थोडा बहुत प्राण करती हैं और थोडा बहुत छोडती है. इस प्रकार उत्पन्न होने के समय में आहार के ग्रहण योग्य जितने पुद्गलों होवे उन सब को खींच लेता है 'फोर कितनेक पुगलों ग्रहण करता है और कितनेक छो- डना है, इस तरह दो प्रकार से नरंक के. जीव आहार करते हैं. जैसे नरक का कहा वैसे ही अन्य सब * प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेवमहायजी बालाप्रसादजी * -- सूत्र <98 पंचांग विवाह पण्णचि ( भगवती) सूत्र 8 ऐसे जा. यावत् वैमानिक ॥२॥ ने नारकी भ० भगवन् ने नरक मे. उ: चवता कि क्या दे देश में दे देश उ. चये.ज. जैसे उ• उपजने में त० तैसे ऊ चवने में ददंडक भा०कहना।।३।। ने नारकी भ० भगवन् ने नरक से उ० चवता कि क्या दे देश मे दे. देश .आ० आहार करे त वा देसं आहारेइ, सवेणं वा सब्बं आहारेइ, एवं जाव वैमाणिए ॥ २ ॥ नेरइएणं भंते ! नेरइएहिंतो उन्बमाणे, किं देसेणं देसं उन्वटइ? जहा उववनमाणे, तहेव उ- वट्टमाणेवि दंडगो भाणियबो ॥ ३ ॥ नेरइएणं भंते ! नेरइएहितो उन्घटमाणे किं देसेणं देसं आहारेइ ? तहेब जाव सवेणं वादेसं आहारेइ, सन्त्रेणं वा सब्बं आहारे।।। दंडक का जानना. ॥ २॥ अहो भगवन् ! नारकी में से उद्धर्तता हुवा जीव क्या अपने देश से देशकी उद्वर्तना करे, देशसे सर्व की उद्वर्तना करे, सर्व से देश की उद्वर्तना करे, या सर्व से सर्व की उद्वर्तनां करे? अहो गौतम ! जैसे उत्पन्न आश्रित कहा वैसे ही उद्वर्तन आश्रित जानना. इस में सर्व से सर्व उद्वर्तता ॥३॥ अहो भगवन् ! नारकी में से उर्तता हुवा जीव क्या देश से देश पुद्गलों का आहार करे ? देश से सर्व पुद्गलों का आहार करे? सर्व से देश का आहार करे ? अथवा सर्व से सर्व का आहार करे? अहो गौतम ! सर्वसे देश का आहार करे व सर्व से सर्व का-आहार करे, शेष सब पहिले उपजने के समय आहार का कहा वैसे ही यहां कहना. जैसे नरक का उद्वर्तन व आहार का कहा वैसे ही शेप सब पहिला प्रताका सातवा उद्देशा মান্নাথ। oyo १७० 48.अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दाथ नेसे जायावत् स सर्व से स० सर्व आ आहार करें ए. ऐसे जां यावत् वे वैमानिकाशा ने नारकी भं०भगवन ने नरक में उ उत्पन्न हुवा कि० क्या दे देश से दे० देश उ.० उत्पन्न हुवा ए० यह त' तैसे जा. यावत् स० सर्व से स० सर्व उ० उत्पन्न हुवा ज. जैसे उ० उपजता उ० चवता में च.बार दं दंडक त० तैसे उ० उत्पन्न हुवा उ० चा च० चार दं० दंडक भा. कहना स. सर्व से से सर्व उ० उत्पन्न हुवा ग० सर्व से दे. देश आ० आहार करे स० सर्व से स० सर्व आ० आहारकरे एक एवं जाव वेमाणिय ॥ ४ ॥ नेरइएणं भंते ! नेरइएसु उववण्णे किं देसेणं देमं उववणे ? एसोवि तहेव जाव सव्वेणं सव्व उबवण्णे जहा उववजमाणे उबट्टमाणेय चत्तारि दंडगा तहा उववण्णे, उव्वदृणेवि चत्वारि दंडगा भाणियव्या, सब्वेणं सव् उववण्णं. सव्वेण वा देसं आहारेइ सव्वेणं सव्वं दंडक में जानना ॥ ४ ॥ अब उत्पन्न हुवा व उत्पन्न हुए का आहार संबंधी दो दंडक कहते हैं. अहो भगवन् ! नारकी में उत्पन्न हुवा जीव क्या अपने देश से नारकी का देशपने उत्पन्न हुवा यावत् सर्व से सर्वपने उत्पन्न हुवा ? अहो गौतम ! इस का अधिकार उत्पन्न होते हुवे में जैसा कहा वेसा यहां पर कहना. उत्पन्न होते व उर्तते के चार दंडक जैसे कहा वैसे ही उत्पन्न हुवे व उद्वर्ते का आहार की साथ नार दंडक न.नना. इम में सर से सब उत्पन्न हुवा, उसन्न हुए जीव सब से देश का आहार करे, संब * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी जालाप्रसादजी* पदार्थ 8. पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र यह अ. अभिलाप से उ० उत्पन्न हुवा उ० चवा में ने जानना ॥ ५ ॥ ने नारकी भं० भगवन् ने नरक में उ० उपजता कि क्या अ० अर्ध से अ० अर्ध उ० उपजे अ० अर्ध से सस उ० उपने स० सर्व से भ० अर्थ उपजे स० सर्व से स० सर्व उ० उपजे ज० जैसे प. प्रथम अ. आठ दं० दंडक त तैसे अ० अर्ध में अ० आठ दं० दंडक भा० कहना ण. विशेष अ० जहां दे० देश से दे० देश उ. उपजे 10 तहां अ. अध से अं अर्ध उ० उपजे भा॰ कहना ए. ऐसे ना. नानाप्रकार स० सर्व सो सोलह आहारइ. एएणं आभिलावेणं उववण्णे उव्वद्देवि नेयव्वं ॥ ५ ॥ नेरइएणं भंते ! नेर- इएस उबजमाणे किं अद्धणं अखं उबवज्जइ, अडेणं सव्वं उबवज्जइ, सवेणं अखं उववज्जइ, सवेणं सव्वं उबवज्जइ ? जहापढमिल्लेणं अट्ठदंडगा तहा. अद्धणवि अट्ठ दंडगा भाणियव्या. णवरं जाहि दलेणं देसं उवयजइ तहिं अदेणं अद्ध उववज्जइ त्ति: सर का.आहार करे ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! नरक में उत्पन्न होता जीव क्या अपना अर्ध से अर्थ नारकीपने उत्पन्न होता है, अर्थ मे सर्व उत्पन्न होता है, स से अब उत्पन्न होता है, सर्व से सर्व उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! जैसे पहिले देश के आठ दंड कडे चैते ही यहां अर्थ के आठ दंडक जानना. 'इतनी भिन्नता कि देश के स्थान में यहां पर अर्ध कहना. * एने सब मीलकर सोलह दंडक हुने ॥ उत्पन्नई * यहां कोई प्रश्न करे कि देश व अर्धमें क्या भिन्नता है ? देशके थोडे, बहुत ऐमे अनेक भेद होते हैं, और अधके दो विभागही होते हैं. 8- पहिला शतकका सातवा उद्देशा भावार्थ २७ DYC शब्दार्थ १७२ एवं 4.अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी से जायावत् स सर्व से स० सर्व आ. आहार करें ए० ऐसे जायावत् के. वैमानिकाशा ने नारकी भं भगवन् ने नरक में उ० उत्पन्न हुवा कि० क्या दे० देश से दे० देश उ० उत्पन्न हुवा ए०यह त तैसे जा० यावत् स० सर्व से स० सर्व उ० उत्पन्न हुवा ज. जैसे उ० उपजता उ० चवता में च०. चार द. दंडक त० तैसे उ० उत्पन्न हुवा उ० चवा च० चार दं० दंडक भा० कहना स. सर्व से से. सर्व उ० उत्पन्न हुवा ग० सर्व से दे. देश आ० आहार करे स० सर्व से स० सर्व आ० आहारकरे ए. जाव वेमाणिय ॥ ४ ॥ नेरइएणं भंते ! नेरइएसु . उववण्णे किं देसेणं देसं उववण्णे ? एसोवि तहेव जाव सब्वेणं सच उबवण्णे जहा उवबजमाणे उबट्टमाणेय चत्तारि दंडगा तहा उबवण्णे उब्वटणेवि चत्तारि दंडगा भाणियन्वा, सवेणं सव्वं उववण्णं. सव्वेण वा देसं आहारेइ सव्वेणं सव्वं दंडक में जानना ॥ ४ ॥ अब उत्पन्न हुवा व उत्पन्न हुए का आहार संबंधी दो दंडक कहते हैं. अहो भगवन् ! नारकी में उत्पन्न हुवा जीव क्या अपने देश से नारकी का देशपने उत्पन्न हुना यावत् सर्व से सर्वपने उत्पन्न हुवा ? अहो गौतम ! इस का अधिकार उत्पन्न होते हुवे में जैसा कहा वैसा यहां पर कहना. उत्पन्न होते व उटूर्तते के चार दंडक जैसे कहा वैसे ही उत्पन्न हुवे व उद्वर्ते का आहार की साथ नार दंडक जानना. इम में सब से सब उत्पन्न हुवा, उसन्न हुए जीव सब से देश का आहार करे, * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी चालाप्रसादजी* 885 पंचङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8.83 शब्दार्थ गति समाप्त अ० विग्रहगति समाप्त गो गोतम स० सर्व ता० तैसे हो० होवे एक ऐसे जी० जीव ए० एफेन्द्रिय व० वर्जकर ति तीन भांग ॥ ८ ॥ दे देव भ भगवन् म० महादिक मज्योतिवत मथलवेत म० यशस्वी म० महासुखी ममहानुभाव अ० नजदीक च० चवता किं० थोडाकाल हि० लजा दु० दुर्ग- समावण्णगा अविग्गहगइ समावण्णगा ? गोयमा ! सब्वेवि तावहोज्जा. अविग्गहगइ सूत्र समावण्णगा, अहवा अधिग्गहगइ समावण्णगाय, विगहगइ समावण्णगेय, अहवा अविग्गहगइ समावण्णगाय विग्गहगइ समावण्णगाय एवं जीव एगिदिय बजो तिय भंगो ॥ ८ ॥ देवेणं भंते : महड्डिए, महज्जुइए, महब्बले, महाजसे, महेसक्खे, महाणुभावे, अविउकंतियं चयमाणे किंचिकालं हिरवत्तियं, दुगं- भावार्थ गति करनेवाले हैं या अविग्रह गति करनेवाले हैं ? अहो गौतम! नारकी में अविग्रहगतिवाले विशेष होने से अविग्रहगति में यहुवचन लीया है. और विग्रह गतिबाले थोडे होवे अथवा न होवे इसलिये एक वचन लिया है. इस के तीन मांगे होते हैं १ नारकी में सब जीव अविग्रहगति संयुक्त २ अविग्रहगतिवन्त बहुत व विग्रहगतिवन्त एक ३ अविग्रह गतिवन्न बहुत व विग्रहगतिवन्त यहुत. ऐसे ही एकेन्द्रिय के पांच दंडक छोडकर अन्य सब दंडक में उक्त तीनों भांगे पाते हैं. एकेन्द्रिय में विग्रहगतिवन्त व अविग्रहगति- वन बहुत होने से भागा नहीं होता है ॥ ८ ॥ अहो भगवन ! महर्दिक, महात्तिवन्त, महाबलवन्त, महाँ । 1385 पहिला शतक का सातवा उद्देशा 988888 शन्दाथ १७२ सूत्र . < अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक कपिजी - द दडक भी कहना ॥ ६॥ नीजीव भ भगवन् कि० क्या वि० विग्रहगति स. भात- अवि- ग्रहगति स० प्राप्त गो० गौतम सि. कदाचित् वि. विग्रहगति स० प्राप्त सि० कदाचित् अ० अविग्रहगति स० प्राप्त ए ऐसे जा. यावत् वे० वैमानिक ॥ ७ ॥ ने० नारकी भं० भगवन् कि क्या वि० विग्रह- भागियध्वं ॥ एवं णाणत्तं, एवं सव्वेवि सोलसदंडगा भाणियव्वा ॥ ६ ॥ जीवेणं भते किं विग्गहगइ समावण्णए, अविग्गहगइ समावण्णए? गोयमा सियविग्गह गइ समावण्णए, सिय आवग्गहगइ समावण्णए एवं जाव वेमाणिए।जीवाणं भंते । किं विग्गहगइ समावण्णगा, अविग्गहगइ समावण्णगा ? गोयमा ! विग्गहगइ समा. वण्णगावि, अविग्गहगइ समावण्णगावि ॥ ७ ॥ नेरइयाणं भंते ! किं विग्गहगइ व नाण प्रायःगति पूर्वक होता है. इसलिये आगे गति का वर्णन कहते हैं. अहो भगवन् ! गति करते जीव क्या विग्रह गति में जाता है या. अविग्रह गति से जाता है ? अहो गौतम ! किसी समय जीव विग्रह गति में जाना है और किमी ममय जीव, प्रविग्रह गति से जाता है. ऐमा वैमानिक तक का जानना अब बहुन जीव भाश्री प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! बहुत जोर विग्रह गतिवाले हैं या अविग्रह गातेवाले ६ ! विग्रहगतिवाले भी हैं और अविग्रहगतिवाले भी है ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! क्या नारकी विग्रह * प्रकाश रानावहादुर लाला मुखदेव सहायनी पालाप्रसादनी वार्थ mo शब्दार्थ गति स० प्राप्त अ० अविग्रहगति सः प्राप्त गो-गोतम स० सर्व ता० तैसे हो० होवे ए० ऐसे जी० जीव ए. ०७ १७३ सूत्र 388 पंचङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8903 एकेन्द्रिय व० वर्जकर ति तीन भांग ॥ ८॥ दे देव भं भगवन् म० महादक मज्योतिवंत मचलवत म० यशस्वी म० महासुखी म०महानुभाव अ० नजदीक च. चवता कि० थोडाकाल हि० लज्जा दु० दुर्ग-३ समावण्णगा अविग्गहगइ समावण्णगा ? गोयमा ! सव्वेवि तावहोजा. अविग्गहगइ समावण्णगा, अहवा अविग्गहगइ समावण्णगाय, विग्गहगइ समावण्णगेय, अहवा अविग्गहगह समावण्णगाय विग्गहगइ समावण्णगाय एवं जीव एगिदिय वज्जो तिय भंगो ॥ ८ ॥ देवेणं भंत : महड्डिए, महज्जुइए, महब्बले, महाजसे, महेसक्खे, महाणुभावे, अविउक्कंतियं चयमाणे किंचिकालं हिरवत्तियं, दुगं. गति करनेवाले हैं या अविग्रह गति करनेवाले हैं ? अहो गौतम ! नारकी में अविग्रहगतिवाले विशेष होने से अविग्रहगति में बहुवचन लीया है. और विग्रह गतियाले थोडे होवे अथवा न होवे इसलिये एक वचन लिया है. इस के तीन भांगे होते हैं १. नारकी में सब जीव अविग्रहगति संयुक्त २ अविग्रहगतिवन्त बहुत व विग्रहगतिवन्त एक ३ अविग्रह गतिवन्न बहुत व विग्रहगतिवन्त बहुत. ऐसे ही एकेन्द्रिय के पांच दंडक छोडकर अन्य सब दंडक में उक्त तीनों भांगे पाते हैं. एकेन्द्रिय में विग्रहगतिवन्त व अविग्रहगति- चंत बहुत होने से भागा नहीं होता है ॥ ८ ॥ अहो भगवन ! महर्दिक, महाद्युत्तिवन्त, महाबलवन्त, महा। 435 पहिला शतक का सातशा उद्देशा 888888- भावार्थ शब्दाथा १७२ द दडक भी कहना ॥ ६॥जी. जीव भ भगवन् कि क्या वि० विग्रहगति समाप्त-अ. अवि- ग्रहगति स० प्राप्त गो० गौतम 'सि० कदाचित् वि. विग्रहगति स० माप्त सि० कदाचित् अ० अविग्रहगति स० प्राप्त ए. ऐसे जा. यावत् वे० वैमानिक ॥ ७ ॥ ने नारकी भं० भगवन कि• क्या वि० विग्रह- भाणियव्वं ॥ एवं णाणत्तं, एवं सव्येवि सोलसदंडगा भाणियव्वा ॥६॥ जीवेणं भते किं विग्गहगइ समायण्णए, अविग्गहगइ समावण्णए? गोयमा सियविग्गह गइ समावण्गए, सिय आविग्गहगइ समावण्णए एवं जाव वेमाणिए॥जीवाणं भंते । किं विग्गहगइ समावण्णगा, अविग्गहगइ समावण्णगा ? गोयमा ! विग्गहगइ समा- वण्णगावि, अविग्गहगइ समावण्णगावि ॥ ७ ॥ नेरइयाणं भंते ! किं विग्गहगइ . < अनुवादक वालब्रह्मगरी मुनि श्री अमालक ऋपिजी 89 * प्रकाश रानावहादुर लाला मुखदेव सायनी मालाप्रसादजी वार्थ . व चवण प्रायःगति पूर्वक होता है. इसलिये आगे गति का वर्णन कहते हैं. अहो भगवन् ! गति करते जीव क्या विग्रह गति में जाता है या. अविग्रह गति से जाता है ? अहो गौतम ! किसी समय जीव विग्रह गति से जाना है और किमी ममय जीव अविग्रह गति से जाता है. ऐमा वैमानिक तक का जानना अव बहुन जीव भाश्री प्रश्न करते हैं अहाँ भगवन् ! बहुत जीव पिग्रह गतिवाले हैं या आविग्रह गतिवाले ! विग्रहगतिवाले भी हैं और अविग्नहगतिवाले भी हैं ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! क्या नारकी विग्रह *- * १७८ 8 पंचमान विवाह पप्णत्ति ( भगवती) सूत्र शब्दाथा है उपजता कि क्या म. सइन्द्रियपने २० उपजता है अ० अनिन्द्रियपने २० उपजता है गो० गौतम सि० कदाचित् स० सइन्द्रियपने २० उपजता है सि. कदाचित अ० अनिद्रियपने उपजता है.से० वह के कैसे गो० गौतम द० द्रव्येन्द्रिय प. प्रत्यय अ. अनिन्द्रिय क. उपजे भा० भाव इन्द्रिय ५० प्रत्यय स० सई १० उपजे से वह ते० इसलिये ॥ १० ॥ जी० जीव भं० भगवन् ग० गर्भ में उपजता किं० सत्र अणिदिए वकामइ ? गोयमा । सिय सइंदिए वकामइ, सिय अणिदिए वकमइ । से केणटेणं ? गोयमा दविदियाइं पडुच्च अणिदिए वकामइ, भाविंदियाइं पडुच्च सइंदिए वकमइ से तेणटेणं ॥ १० ॥ जीवेणं भंते ! गम्भं बकममाणे किं सरीरी बकमइ; स्थान का प्रश्न पूछते हैं अहे. भगान गर्भ में उत्पन्न होता हुवा जी क्या इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है अथवा भावाथ इन्द्रिय रहित उत्पन्न होता है ? अहो गौनम ! क्वचित् इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है और क्वचित् इन्द्रिय रहित भी उत्पन्न होता है. अहो भगवन् ! किम कारन से जीव काचित् सइन्द्रियपने उत्पन्न होता है और क्वचित् आनेन्द्रियपने होता है ? अहो गौतम ! द्रव्य इन्द्रिय आश्रित अनिन्द्रिय उत्पन्न होता है क्यों कि निवृत्त्युपकरण रूप, स्पर्शन, रस, घाण, चक्षुः व श्रोतेन्द्रिय पर्याप्त हुये पीछे होती है और भावेन्द्रिय आ- श्रित सइन्द्रिय होता है क्यों की ज्ञानरूप इन्द्रिय जीव को सदा काल रहनी है. इसलिये अहो गीतम ! काचित् इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है और क्वचित् इन्द्रिय रहित - उत्पन्न होता है. ॥ १० ॥ इन्द्रिय पहिला शतक का सातवा उद्देशा ܃ अ० शब्दाथी उपजता किं. क्या म. सइन्द्रियपने व० उपजता अनिन्द्रियपने १० उपजता है गो गौतम सि कदाचित् स० सइन्द्रियपने व० उपजता है सि. कदाचित अ० अनिद्रियपने उपजता है से वह के कैसे गो गौतम द० ध्येन्द्रिय ५० प्रत्यय अ. अनिन्द्रिय व उपजे भा. भाव इन्द्रिय ५० प्रत्यय 'स० सई न्द्रिय व० उपजे से वह ते. इसलिये ॥ १० ॥ जी० जीव भं० भगवन् ग. गर्भ में ० उपजता किं० १०० सूत्र अणिदिए वक्कमइ ? गोयमा ! सिय सइंदिए वक्कमइ, सिय अणिदिए वकमइ । से केणटेणं ? गोयमा दबिंदियाइं पडुच्च अणिदिए बक्कमइ, भाविंदियाई पडुच्च सइंदिए वकमइ से तेण?णं ॥ १० ॥ जीवेणं भंते ! गभं वक्कममाणे किं सरीरी वकमइ, स्थान का प्रश्न पूछते हैं अहे. भगवन!गर्भ में उत्पन्न होता हुवा जीव क्या इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है अथवा भावाथ इन्द्रिय रहित उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! क्वचित् इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है और क्वचित् इन्द्रिय रहित भी उत्पन्न होता है. अहो भगवन् ! किम कारन से जीव क्वचित् सइन्द्रियपने उत्पन्न होता है और क्वचित् अनिन्द्रियपने होता है ? अहो गौतम ! द्रव्य इन्द्रिय आश्रित अनिन्द्रिय उत्पन्न होता है क्यों कि निवृत्त्युपकरण रूप, स्पर्शन, रस, घाण, चक्षुः व श्रीतेन्द्रिय पर्याप्त हुये पीछे होती है और भावेन्द्रिय आ- श्रित सइन्द्रिय होता है क्यों की ज्ञानरूप इन्द्रिय जीव को सदा काल रहती हैं. इसलिये अहो गौतम ! कचित् इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है और क्वचित् इन्द्रिय रहित - उत्पन्न होता है. ॥ १० ॥ इन्द्रिय *9808 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 83%88- पहिला शतक का सातवा उद्देशा <3 Sy ore शब्दाथ -- १७५ सूत्र ॐ पंचमाङ्ग विवाह पप्णत्ति (भगवती) मृत्र 83-80 उपजता कि क्या स० सइन्द्रियपने ० उपजता है अ० अनिन्द्रियपने व० उपजता है गो० गौतम सि० कदाचित् स० सइन्द्रियपने व० उपजता है सि. कदाचित् अ० अनिद्रियपने उपजता है.से० वह के० कैसे गो• गौतम द० द्रव्येन्द्रिय प. प्रत्यय अ. अनिन्द्रिय व उपजे भा० भाव इन्द्रिय ५० प्रत्यय 'स० सई न्द्रिय व उपजे से वह ते. इसलिये ॥ १० ॥ जी० जीव भ० भगवन् ग० गर्भ में व० उपजता किं० अणिदिए वक्कमइ ? गोयमा ! सिय सइंदिए वक्कमइ, सिय अणिदिए वकमइ । से केणटेणं ? गोयमा दविदियाई पडुच्च अणिदिए वकमइ, भाबिंदियाई पडुच्च सईदिए वकमइ से तेण?णं ॥ १० ॥ जीवेणं भंते ! गम्भं बकममाणे किं सरीरी बक्कमइ, स्थान का प्रश्न पूछते हैं अहे. भगान!गर्भ में उत्पन्न होता या जीव क्या इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है अथवा इन्द्रिय रहित उत्पन्न होता है ? अहो गोनम ! क्यचित् इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है और क्वचित् इन्द्रिय रहित भी उत्पन्न होता है. अहो भगवन् ! किम कारन से जीव काचित् सइन्द्रियपने उत्पन्न होता है और क्वचित् आनन्द्रियपने होता है ? अहो गौतम ! द्रव्य इन्द्रिय आश्रित अनिन्द्रिय उत्पन्न होता है क्यों कि (निवृत्त्युपकरण रूप, स्पर्शन, रस, घाण, चक्षुः व श्रोतेन्द्रिय पर्याप्त हुने पीछे होती है और भावन्द्रिय आ- श्रित सइन्द्रिय होता है क्यों की ज्ञानरूप इन्द्रिय जीव को सदा काल रहती हैं. इसलिये अहो गौनम ! क्यचित् इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है और क्वचित् इन्द्रिय रहित - उत्पन्न होता है. ॥ १० ॥ इन्द्रिय पहिला शतक का सातवा उद्देशा भावाथ YO GY १७२, सूत्र विवार, पलानि ( भगवती.) सूत्र 832 उपजता किं. क्या म. सइन्द्रियपने १० उपजता है अ० अनिन्द्रियपने ५० उपजता है गो गौतम सि० कदाचित् स० सइन्द्रियपने व उपजता है सि. कदाचित् अ० अनिद्रियपने उपजता है से वह के कैसे गो० गौतम द० द्रव्येन्द्रिय प. प्रत्यय अ. अनिन्द्रिय ३० उपजे भा० भाव इन्द्रिय ५० प्रत्यय स० सई न्द्रिय व उपजे से वह ते० इसलिये ॥ १० ॥ जी० जीव भं० भगवन् ग० गर्भ में व० उपजता किं० अणिदिए वक्कमइ ? गोयमा ! सिय सइंदिए वक्कमइ, सिय अणिदिए वकमइ । से केणटेणं ? गोयमा दबिंदियाइं पडुच्च अणिदिए वक्कमइ, भाविंदियाई पडुच्च सइंदिए वकमइ से तेणटेणं ॥ १० ॥ जीवेणं भंते ! गन्भं वक्कममाणे किं सरीरी वक्कमइ, स्था का मम पूछते हैं अहे. भगान गर्भ में उत्पन्न होता हुवा जीव क्या इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है अथवा म होता है जो गौतम ! क्वचित इन्द्रिय सहित उत्पन्न होता है और क्वचित् इन्द्रिय रहित भो sav sim MIT काल से जीव क्वचित् मइन्द्रियपने उत्पन्न होता है और पापित् १५५३ होता गौतम ! ट्रम्प इन्द्रिय आश्रित अनिन्द्रिय उत्पन्न होता है क्यों कि 'पपकर५ मा ५३ न. १. मा. श्रीन्द्रिय पर्याप्त ध्ये पीछे होती है और भावेन्द्रिय आ- निय l trek at HAN को PET काल रहती है. इसलिये अहो गौतम ! पहिला शतक का सातवा उद्देशा भा 4. It wirink और तय राहिस • उत्पन होता है. ॥ १० ॥ इन्द्रिय दार्थ or १७७ सत्र पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र - आहार आ० आहारकरे गो० गॉतर मा. पाता का ओ० रुधिर पि० पिताका मु०. वीर्य तं० उस उ० दोनों सं० मिलादुवा क० मलिन कि० किल्पीपरूप प० प्रथम आ० आहार आ० आहारकरे ॥ १२ ॥ जी• जीव भं० भगवन् ग० गर्भ में ग० गयाहुना कि क्या आ० आहार आ० आहारकरे गो० गौतम जं. जो मा० माता ना. नानासकार र० रस वि० विकृति आ० आहारकरे त० उम का ए० एक दे. देश ओ० ओज आ० आहारकरे ।।१३।। जी. जीव को भ. भगाल ग. गर्भ में ग० उत्पन्न हुवा अ० है उ. वक्कममाणे तप्नढमयाए कमाहाग्माहारेइ ? गोयमा ! माउआयं पिउमुकं तं तदुभय संसिटुं कलुसं किब्धिसं, तप्पढमयाए आहारमाहारेइ ॥ १२ ॥ जीवेणं भंते ! गब्भगए समाणे किं आहारमाहोरइ ? गोयमा! जं से माया नाणाविहाओ रसविगईओ आहारेइ तदेगदेसेणय ओय माहारेइ ॥ १३ ॥ जीवरसणं भंते ! गभगयस्स है. ॥ ११ ॥ शरीर आहार से होता है इसलिये आहार का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! गर्भ में उत्पन्न होता जीच पहिलेहि क्या आहार करता है ? अहो गीतम ! माता का ऋतुकाल संबंधी रुधिर व पिता का वीर्य यह दोनों परसर मिलने से किल्विप रूप वने हुवे पुद्गलों का आहार जीव प्रथम करता है. ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! गर्भ में रहा हुवा जीव किस का आहार करना है ? अहो गौतम ? गर्भवती स्त्री दुग्ध घृता- दिक का जो आहार करती है और उस का जो रस होता है उस में से एक देश (कुच्छ थोडा विभाग) < पहिला शतक का सातवा उद्देशा 930 भावार्थ 00 oyo y ब्दार्थ Y १७७ 2 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती)-मूत्र - आहार आ० आहारकरे गां० गौतम मा० माता का मो० रुधिर पि० पिताका मु. वीर्य तं. उस उ. दोनों सं० मिलादुवा क० मलिन कि० किल्लीपरूप प० प्रथम आ० आहार आ० आहारकरे ॥ १२ ॥ जी. जीव भं० भगवन् ग० गर्भ में ग० गयाहुया कि क्या आ० आहार आ० आहारकरे गो. गौतम जं. जो मा० माता ना० नानाप्रकार र० रस वि० विकृति आ० आहारकरे त० उम का ए० एक द. देश ओ ओज आ० आहारकरे ॥१३॥ जी• जीव को भं• भगाल ग. गर्भ में ग० उत्पन्न हुवा अ. वक्कममाणे तप्पढमयाए कमाहारमाहारेइ ? गोयमा ! माउआयं पिउमुक तं तदुभय संसिटुं कलुसं किविसं, तप्पढमयाए आहारमाहारेइ. ॥ १२ ॥ जीवेणं भंते ! गब्भगए समाणे किं आहारमाहोरइ ? गोयमा ! जं से माया नाणाविहाओ रसविगईओ आहारेइ तदेगदेसेणय ओय माहारेइ ॥ १३ ॥ जीवस्सणं भंते ! गभगयरस ॥ ११ ॥ शरीर आहार से होता है इसलिये आहार का मन करते हैं. अहो भगवन् ! गर्भ में उत्पन्न होता जीव पहिलेहि क्या आहार करता है ? अहो गौतम ! माता का प्रस्तुकाल संबंधी रूधिर व पिता का वीर्य यह दोनों परसर मिलने से किल्विप रूप धने हुवे पुद्गलों का आहार जीव प्रथम करता है. ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! गर्भ में रहा हुया जीव किस का आहार करना हे ? अहो गौतम ? गर्भवती स्त्री दुग्ध घृता-2 दिक का जो आहार करती है और उस का जो रस होता है उस में से एक देश (कुच्छ थोडा विभाग) पहिला शतक का सातवा उद्देशा भावार्थ 10 :.
ब्दिाथ <3 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र - आहार आ० आहारकरे गो० गौतए मा० माता का ओ० रुधिर पि० पिताका मु. वीर्य तं. उस उ० दोनों सं० मिलाहुवा कमलिन कि० किलीपरूप प० प्रथम आ० आहार आ० आहारकरे ॥ १२ ॥ जी० जीव भं० भगवन् ग० गर्भ में ग० गयाहुवा किं. क्या आआहार आ० आहारकरे गो गौतम जं. जो मा० माता ना० नानाप्रकार र० रस वि० विकृति आ० आहारकरे त० उम का ए. एक दे० देश ओ ओज आ० आहारकरे ॥१३॥ जी. जीव को भं. भगान ग• गर्भ में ग० उत्पन्न हुवा अ० है उ. वक्कममाणे तप्पढमयाए कमाहाग्माहारेइ ? गोयमा ! माउआयं पिउमुळं तं तदुभय संसिटुं कलुसं किविसं, तप्पढमयाए आहारमाहारेइ ॥ १२ ॥ जीवेणं भंते ! गभगए समाणे किं आहारमाहोरइ ? गोयमा ! जं से माया नाणाविहाओ रसविगईओ आहारेइ तदेगदेसेणय ओय माहारेइ ॥ १३ ॥ जीवस्सणं भंते ! गब्भगयरस है. ॥ ११ ॥ शरीर आहार से होता है इसलिये आहार का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! गर्भ में उत्पन्न होता जीव पहिलहि क्या आहार करता है ? अहो गौतम ! माता का ऋतुकाल संबंधी रुधिर व पिता का वीर्य यह दोनों परसर मिलने से किल्विप रूप बने हुवे पुद्गलों का आहार जीव प्रथम करता है. ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! गर्भ में रहा हुवा जीव किस का आहार करना हे ? अहो गौतम ? गर्भवती स्त्री दुग्ध घृता-ॐ दिक का जो आहार करती है और उस का जो रस होता है उस में से एक देश (कुच्छ थोडा विभाग) पहिला शतक का सातवा उद्देशा 980> भावार्थ 00 RAN oyo सूत्र 8- पंचमांग विवाह गनि ( भगवती) मूत्र 8883 भगवन ग• गर्भ में उत्पन्न मु. मुखसे का कवल आ० आहार आ. आहार करे गो० गौतम नोक नही इ. यह अर्थस. समर्थ से वह के कैसे गो गौतम जी जीव ग. गर्भ में उपजा स.' सर्व तरफ से आ० आहारकरे प० परिणमे उ० अश्वासले नि० निश्वासले अ०. वारंवार आ० आहारकरे ५० प- रिणमे उ० अश्वासले नि० निश्वासले आ० कदाचित् आ० आहार करे ५० परिणमे उ० ऊचासले नि निश्वासले मा० माताका जीव र० नाभिनाल पु० पुत्रका जीव र० नाभिनाल मा० माता का कावलियं आहारं आहारित्तए ? गोयमा ! णो इण? सम। सेकेण?णं ? गोयमा- जीवणं गभगए समाणे सवओ आहारेइ, सवओ परिणामेइ, सबओं उस्ससइ, सबओ निस्ससइ आभिक्खण आहारेइ आभिक्खणं परिणामेइ आभिक्खणं उस्ससई अभिक्खणं निस्ससइ, आहच्च आहारेइ आहच्च परिणामेइ, आहच्च उस्ससइ, आहच्च निस्ससइ, माउ जीव रसहरणी पुत्तजीव रसहरणी माउ जीव पडिबढा पुत्तजीव कवल का आहार कर सकता है ? अहो गौतम ! यह अर्थयोग्य नहीं है. अहो भगवन् ! किस कारन से ! अहो गौतम ! गर्भ में रहा हुवा जीव सब आत्मा से आहार करता है, परिणमाता है, उश्वास लेता है, निश्वास लेता है, वारंवार आहार करता है, वारंवार परिणमाता है, वारंवार भासोश्वास लेता है, अथवा क्वचित् अहार करता है, परिणमाता है व श्वासोश्वास लेना है, गर्भवती स्त्री को नाभीस्थान में रसहरणी नामक एक नाडी नली रूप होती है. यह नाली गर्भस्थ जीव को स्पर्शकर रहती है. उस से- वह जीव 9808.पहिला शतककाइसातवा उद्देशा भावार्थ .
“न्दिाथ १७९ का सूत्र *१६. पंचमांग विवाह (पगति ( भगवती) मूत्र भगवन ग. गर्भ में उत्पन्न मु. मुलसे का कवल आ० आहार आ. आहार करे गो० गौतम नो नहीं इ० यह अर्थ स. समर्थ से वह के० कैसे गो० गौतम जी जीव ग. गर्भ में उपना स० सर्व तरफ से आ० आहारकरे ५० परिणमे उ० उचामले नि० निश्वासले अ०. वारंवार आ० आहारकरे ५० प. रिणमे उ० ऊश्वासले नि० निश्वासले आ० कदाचित् आ० आहार करे ५० परिणमे 'उ० अश्वासले नि निधासले मा० माताका जीव र० नाभिनाल पु० पुत्रका जीव २० नाभिनाल मा० माता कावलियं आहारं आहारित्तए ? गोयमा ! णो इण? समढे । सेकेण?णं ? गोयमा- जीवेणं गभगए समाणे सवओ आहारेइ, सन्वओ परिणामेइ, सबओ उस्ससइ, सबओ निस्ससइ आभिक्खण आहारेइ आभिक्खणं परिणामेइ. आभिक्खणं उस्ससई अभिक्खणं निस्ससइ, आहच्च आहारेइ आहच्च परिणामेइ, आहच्च उस्ससइ, आहिच्च निस्ससइ, माउ जीव रसहरणी पुत्तजीव रसहरणी माउ जीव पडिबढा पुत्तजीव कवल का आहार कर सकता है ? अहो गौतम ! यह अर्थयोग्य नहीं है. अहो भगवन् ! किस कारन से ! अहो गौतम ! गर्भ में रहा हुवा जीव सब आत्मा से आहार करता है, परिणमाता है, उश्वास लेता है, नीश्वास लेता है, वारंवार आहार करता है, वारंवार परिणमाता है, वारंवार वासोश्वास लेता है, अथवा क्वचित् अहार करता है, परिणमाता है व श्वासोश्वास लेना है, गर्भवती स्त्री को नाभीस्थान में रसहरणी नामक एक नाडी नली रूप होती है. यह नाली गर्भस्थ जीव को स्पर्शकर रहती है. उस से वह जीव > पहिला शतककासातवा उद्देशा. भावार्थ दार्थ २७ oya १७९ सूत्र 298 पंचमांग विवाह गीत ( भगवती) मूत्र 989 भगवन ग• गर्भ में उत्पन्न मु. मुखसे का काल आ० आहार आ. आहार करे गो० गौतम नो नहीं इ. यह अर्थ स. समर्थ से वह के० कैसे गो० गौतम जी जीव ग० गर्भ में उपजा स सर्व तरफ से आ० आहारकरे ५० परिणमे उ० अभ्यासले नि० निवासले अ० वारंवार आ० आहारकरे ५० प. रिणमे उ० ऊश्वासले नि० निश्वासले आ० कदाचित् आ० आहार कर ५० परिणमे 'उ० उश्वासले नि निश्वासले मा० माताका जीव र० नाभिनाल पु० पुत्रका जीव र० नाभिनाल मा० माता का कावलियं आहारं आहारित्तए ? गोयमा ! णो इण? सम? । सेकेण?णं ? गोयमा- जीवेणं गभगए समाणे सवओ आहारेइ, सवओ परिणामेइ, सवओं उस्ससइ, सव्वओ निस्ससइ आभिक्खण आहारेइ आभिक्खणं परिणामेइ आभिक्खणं उस्ससई अभिक्खणं निस्ससइ, आहच आहोरेइ आहच्च परिणामेइ, आहच्च उस्ससइ, आहच्च निस्ससइ, माउ जीव रसहरणी पुत्तजीव रसहरणी माउ जीव पडिबढा पुत्तजीव कवल का आहार कर सकता है ? अहो गौतम ! यह अर्थयोग्य नहीं है. अहो भगवन् ! किस कारन से ! अहो गौतम ! गर्भ में रहा हुवा जीव सब आत्मा से आहार करता है, परिणमाता है, उश्वास लेता है, नाश्वास लेता है, वारंवार आहार करता है, वारंवार परिणमाता है, वारंवार श्वासोश्वास लेता है, अथवा क्वचित् अहार करता है, परिणमाता है व श्वासोश्वास लेना है, गर्भवती स्त्री को नाभीस्थान में रसहरणी नामक एक नाडी नली रूप होती है. यह नाली गर्भस्थ जीव को स्पर्शकर रहती है. उस से वह -जीव 388%> पहिला शतककासातवा उद्देशा828 . भावार्थ . - Q. शब्दार्थ अंग गो गौतम त तीन पे०पिता के अंग अन् हड्डि अव्हडिकीजि के केश मंश्मश्रु रो रोमन नख॥१.७॥ अ० माता पिता का भभगवन् सशरीर के कितना का०काल सं० रहे गो गौतम जा० जितना का काल भ० भवधारणीय स० शरीर अ० नाश न पामे ए• इतना का० काल सं० रहे अ० अब स०ममय २ में वो हीन होता च० चरिम का० काल स समय में वो० नाश भ० होवे ॥ १८ ॥ जी० जीव भ० भगवन १८१ सत्र 8 पंचमांग विवाह पप्णति (भगवती) सूत्र :- प्णत्ता ? गोयमा ! तओ. पेइयंगा पण्णत्ता तंजहा आट्ठि, आट्ठीमिंजा, केसमंसुरेरामनहे ॥ १७ ॥ अम्मा पेइएणं भंते ! सरीरए केवइयं कालं सचिट्ठइ ? गोयमा ! जावइयं से काले भवधारणिजे सरीरए अव्वावण्णे भवइ, एवतियं कालं संचिट्ठइ. अहेणं ' समए समए वोयसिज्जमाणे चरिम काल समयंसि वोच्छिण्णे भवइ ॥ १८ ॥ जीवेणं 4. पहिला शतक का सातवा उद्देशा 98 भावार्थ शरीर में पिता के तीन अंग होते हैं. १ अस्थि, २ अस्थि की मीजी ३ फेश श्मश्रु रोम व नख. ॥ १७ ॥ अहो भगवन् ! माता व पिता के अंग जीव की साथ कितने काल तक सम्बन्ध रखते हैं. ? अहो गौतम : जहांलग मनुष्यादिक का भवधारणीय शरीर विनाश होवे नहीं वहां लग माता व पिता के अंग रहते हैं. अर्थात् शरीर का विनाश होनेपर इन अंगों का भी विनाश होता है. जिस समय से माता व पिता के, अंगों संबंधी आहार ग्रहण किया था उस समय से लगाकर प्रति समय क्षीण होते २ अन्तिम काल शब्दार्थ अंग गो गौतम त तीन पे पिता के अंग अ हहि अव्हडिकीमिंज के केश मं श्मश्रु रो रोमन नखा॥१७॥ अ० माता पिता का भंभगान् सशरीर को कितना का काल सं० रहे गो गौतम जा०जितना काकाल भ० भवधारणीय स० शरीर अ० नाश न पामे ए• इतना का. काल सं० रहे अ० अब स०ममय २ में वो हीन होता च० चरिम का. काल त समय में वो० नाश भ० होवे ॥ १८ ॥ जी० जीव भं० भगवन ?* सूत्र 8 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8-> प्रणता ? गोयमा ! तओ. पेड्यंगा पण्णत्ता तंजहा अट्ठि, आट्ठीमिजा, केसमंसुरोमनहे ॥ १७ ॥ अम्मा पेइएणं भंते ! सरीरए केवइयं कालं सचिट्ठइ ? गोयमा ! जावइयं से कालं भवधारणिज्जे सरीरए अव्वावण्णे भवइ, एवतियं कालं संचिठ्ठइ. अहेणं • समए समए वोयसिजमाणे चरिम काल समयंसि वोच्छिण्णे भवइ ॥ १८ ॥ जीवेणं पहिला शतक का सातवा उद्देशा 988 भावार्थ शरीर में पिना के तीन अंग होते हैं. १ अस्थि, २ अस्थि की मांजी ३ केश श्मश्रु रोम व नख. ॥ १७ ॥ हो पगान् ! माता व पिता के अंग जीव की साथ कितने काल तक सम्बन्ध रखते हैं. ? अहो गौतम ! जहांलग मनुष्यादिक का भवधारणीय शरीर विनाश होवे नहीं वहां लग माता व पिता के अंग रहते हैं. अर्थात् शरीर का विनाश होनेपर इन अंगों का भी विनाश होता है. जिस समय से माता व पिता के. अंगों संबंधी आहार ग्रहण किया था उस समय से लगाकर प्रति समय क्षीण होते २ भन्तिम काल ory सन्दा अंग गो गौतम त तीन पे पिता के अंग अ हड्डि अव्हड्डिकीमिंज के केश मं० श्मश्रु रो रोमन नख॥१७॥ अ० माता पिता का भं०भगवन् सशरीर के कितना का काल सं० रहे गो गौतम जा. जितना काकाल भ० भवधारणीय स० शरीर अ० नाश न पामे ए. इतना का० काल सं० रहे अ० अब स०ममय २ में वो हीन होता च० चरिम का० काल त समय में वो० नाश भ० होवे ॥ १८ ॥ जी. जीव भं० भगवन १८१ तत्र पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - ण्णत्ता ? गोयमा ! तओ. पेइयंगा पण्णत्ता तंजहा आट्ठि, आट्ठमिजा, केसमंसुरोमनहे ॥ १७ ॥ अम्मा पेइएणं भंते ! सरीरए केवइयं कालं संचिट्ठइ ? गोयमा ! जावइयं से कालं भवधारणिजे सरीरए अव्वावण्णे भवइ, एवतियं कालं संचिठ्ठइ. अहेणं समए समए वोयसिज्जमाणे चरिम काल समयंसि वोच्छिण्णे भवइ ॥ १८ ॥ जीवेणं ११-49 पहिला शतक का सातवा उद्देशा 988 भावार्थ GO शरीर में पिना के तीन अंग होते हैं. १ अस्थि, २ अस्थि की माँजी ३ केश श्मश्रु रोम व नख. ॥ १७ ॥ हो गवन् ! माता व पिता के अंग जीव की साथ कितने काल तक सम्बन्ध रखते हैं. ? अहो गौतम जहांलग मनुष्यादिक का भवधारणीय शरीर विनाश होवे नहीं वहां लग माता व पिता के अंग रहते अर्थात् शरीर का विनाश होनेपर इन अंगों का भी विनाश होता है. जिस समय से माता व पिता के, अंगों संबंधी आहार ग्रहण किया था उस समय से लगाकर प्रति समय क्षीण होते २ अन्तिम काल -----manavar- 9 १८३ दार्थ पा. चतुरंगी से० सैन्य वि० विकु वि०विकुर्व कर चा चतुरंगी से सैन्य से प०शचु शैन्य की स साथ सं० संग्राम सं० संग्राम करे से वह जी० जीव अ० अर्थ का इच्छक र० राज्य का इच्छरु भो भोग २७ की इच्छा वाला का० काम की इच्छा वाला अ० अर्थ की कांक्षा वालार राज्यकी कांक्षा वाला भो भोगकी कांक्षा वाला का काम की कांक्षा वाला अ०अर्थ पिपासु र राज्य पिपासु भो भोग पिपासु का काम पिपासु १०उसमें चित्त वाला R० मन वाला ले लेश्या वाला अ० अध्यवसाय वाला ति तीन आरंभ वाला अ० सूत्र छुभइ,वेउब्धिय समुग्घाएणं समोहणइ,समोहणइए चाउरंगिणीए सेणाए विउब्बइ, विउल्य इत्ता चाउरंगिणीए सेणाए पराणीएणं सद्धिसंगाम संगामेइ, सेणं जीवे अत्थ कामए, रज्जकामए, भोग कामए, कामकामए, अत्थकंखिए, रजकंखिए, भोगकखिए, काम भावार्थ । वह गर्भस्थ जीव ऐसी बात सुने की परचक्री की सेना आई है और अपन को दुःखी करेगी. ऐमी वात मुनकर, अवधारकर जीव के प्रदेश गर्भ की बाहिर नीकाले और वैक्रेय ममुद्घात से तथाविध पुद्गलों को ग्रहण कर हाथी, घोडे, ग्थ, पायदल वगैरह सेना की चिकुवर्णा करे, विकुर्वणा करके परचक्री की सेना माय संग्राम करे. द्रव्य की अभिलापावाला राज्यऋद्धि की अभिलाषावाला, गंधरम स्पर्शरूप भोग की अभिलापाराला, शब्द रूपादि कामकी अभिलापावाला धन की इच्छा से आसक्त बनाहुवा, राज्य, भोग, 4 कामः की. इच्छा से आसक्त बना हुवा. धन, राज्य, भोग व काम का पिपासु, अतृप्त, तन्मय ११ पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 88 38 पहिला शतक का सातवा उद्देशा -23212 , . GY0 60 Q. ब्दा १८३ सूत्र 34. पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगरती) मूत्र 88 पा. चतुरंगी से० सैन्य वि० विकु वि०विकुर्व कर चा चतुरंगी से• सैन्य से प०शचु शैन्य की समाध सं० संग्राम सं० संग्राम करे से वह जी. जीव अ० अर्थ का इच्छक र० राज्य का इच्छा भो० भोग की इच्छा वाला का० काम की इच्छा वाला अ० अर्थ की कांक्षा वाला र०राज्यकी कांक्षा वाला भो भोगकी कांक्षा वाला का काम की कांक्षा वाला अ०अर्थ पिपासु र राज्य पिपासु भो भोग पिपासु का काम पिपासु स० उसमें चित्त वाला म. मन वाला ले. लेश्या वाला अ० अध्यवसाय वाला ति० तीय आरंभ वाला अ० च्छुभइ,वेउब्धिय समुग्घाएणं समोहगइ,समोहणइए चाउरंगिणीए सेणाए विउव्वइ, विउच्च इत्ता चाउरंगिणीए सेणाए पराणीएणं सद्धिसंगामं संगामेइ, सेणं जीवे अत्थ कामए, रजकामए, भोग कामए, कामकामए, अत्थकंखिए, रजकंखिए, भोगकखिए, काम वह गर्भस्थ जीव ऐसी बात सुने की परचक्री की सेना आई है और अपन को दुःखी करेगी. ऐमी वात मुनकर, अवधारकर जीव के प्रदेश गर्भ की बाहिर नीकाले और वैक्रेय ममुद्घात से तथाविध पुद्गलों को ग्रहण कर-हाथी, घोडे, रथ, पायदल वगैरह सेना की चिकुवर्णा करे, विकुणा करके परचक्री की सेना माय संग्राम करे. द्रव्य की अभिलापावाला राज्यऋद्धि की अभिलापावाला, गंधरम स्पर्शरूप मोग की अभिलापावाला, शब्द रूपादि कामकी अभिलापावाला धन की इच्छा से आसक्त बनाहुवा, राज्य, भोग, :व :काम की. इच्छा से आसक्त बना हुवा. धन, राज्य, भोग व काम का पिपासु, अतृप्त, तन्मय HERपहिला शतक का सातवा उद्देशा 4.११.११ भावार्थ QO १८३ दार्थ पा. चतुरंगी से० सैन्य वि० विकु वि०विकुर्व कर चा. चतुरंगी से० सैन्य से प०शचु शैन्य की समाध सं० संग्राम सं० संग्राम करे से वह जी. जीव अ० अर्थ का इच्छक र० राज्य का इच्छा भो० भोग की इच्छा वाला का० काम की इच्छा वाला अ०अर्थ की कांक्षा वालार राज्यकी कांक्षा वाला भोक भोगकी कांक्षा वाला का काम की कांक्षा वाला अ०अर्थ पिपासु र राज्य पिपासु भो भोग पिपासु का काम पिपास स०उसमें चित्त वाला R० मन वाला ले लेश्या वाला अ०अध्यवसाय वाला तितीय आरंभ वाला अ० सूत्र कछुभइ,वेउन्धिय समुग्घाएणं समोहगइ,समोहणइए चाउरंगिणीए सेणाए विउव्यइ, विउज्य इत्ता चाउरंगिणीए सेणाए पराणीएणं सद्धिसंगामं संगामेइ, सेणं जीवे अत्थ कामए, रजकामए, भोग कामए, कामकामए, अत्थकंखिए, रजकंखिए, भोगकखिए, काम भावार्थ वह गर्भस्थ जीव ऐसी धात सुने की परचक्री की सेना आई है और अपन को दुःखी करेगी. ऐमी वात मुनकर, अवधारकर जीव के प्रदेश गर्भ की बाहिर नीकाले और वैकेय ममुद्घात से तथाविध पुद्गलों को ग्रहण कर हाथी, घोडे, ग्य, पायदल वगैरह सेना की विकुरर्णा करे, विकुणा करके परचक्री की सेना साथ संग्राम करे. द्रव्य की अभिलापावाला राज्यादि की अभिलापावाला, गंधरम स्पर्शरूप भोग की अभिलापावाला, शब्द रूपादि कामकी अभिलापावाला धन की इच्छा से आसक्त पनाहुवा, राज्य, भोग, व काम की: इच्छा से आसक्त बना हुवा. धन, राज्य, भोग व काम का पिपासु, [अतृप्त,). तन्मय 14.8 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (मगरती) मूत्र 898 18पहिला शतक का सातवा उद्देशा 43-832 - . - १८३ . सपनात (मगरती) सूत्र पा. चतुरंगी से० सैन्य वि० विकु वि०विकुर्व कर चा० चतुरंगी से• सैन्य से प०शचु शैन्य की समाध सं० मंग्राम सं० संग्राम करे से वह जी० जीव अ० अर्थ का इच्छक र० राज्य का इच्छा भो० भोग की इच्छा वाला का० काम की इच्छा वाला अ०अर्थ की कांक्षा वाला र राज्यकी कांक्षा वाला भो भोगकी काक्षा वाला का काम की कांक्षा वाला अ०अर्थ पिपासु र राज्य पिपासु भो भोग पिपासु का०काम पिपासु स०उसमें चित्त वाला R० मन वाला ले. लेश्या वाला अ०अध्यवसाय वाला ति तीन आरंभ वाला अ० च्छुभइ,वेउन्विय समुग्धाएणं समोहगइ,समोहणइए चाउरंगिणीए सेणाए विउन्बइ, विउब इत्ता चाउरंगिणीए सेणाए पराणीएणं सद्धिसंगामं संगामेइ, सेणं जीवे अत्थ कामए, रमलामए, भोग कामए, कामकामए, अत्थकंखिए, रजकंखिए, भोगकखिए, काम या गर्भस्थ जी को भात सने की परचक्री की सेना आई है और अपन को दुःखी करेगी. ऐमी वात FR, AINIK लोग परेश गर्भ की चाहिर नीकाले और बैक्रेय ममुद्घात से तथाविध पुद्गलों ग कर हामी भोको प, पाल वगैरह सेना की चिकुरर्णा करे, विकुणा करके परचक्री की K HER करे की भाजपागल राज्यमादि की अभिलाषागला, गंधरम स्पर्शरूप.भोग ! ...AMA, NIK AIR नामी भनिगाला धन की इा से आसक्त बनाहुवा, राज्य, र धर्मानुराग से रक्त वनगया. फोर वह 3॥ Hो भासन मना रा. पान, रार, भोग न काम का पिपासु, अतृप्तः) तन्मय 387 पहिला शतक का सातवा उद्देशा 438922 न्दिार्थ कैसे गो. गौतम स० संज्ञी पं० पंचेन्द्रिय स० सर्व प० पर्याप्ति से प० पर्याप्त त तथारूप स. श्रमण मा माहण की अं० पास ए० एक आ० आर्य ध. धर्म का सु० अच्छा वचन सो० सुनकर नि० अब. धारकर त० पीछे भ० होवे सं० वैराग्य से उ० उत्पन्न स० श्रद्धा ति० तीन ५० धर्मानुराग र० रक्त जी० जीव ध० धर्म को कामी पु० पुन्य का कामी स० स्वर्ग का कामी मो० मोक्षका कामी ५० धर्म १.८५ ? पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र -882 सूत्र वजेजा, अत्थेगइए णो उववज्जेज्जा । सेकेणटेणं ? गोयमा ! सेणं सगणी पंचिंदिए सब्याहिं पजत्तीहि पजत्तए तहारूवरस समणस्सवा, माहणस्सबा अंतिए एगमवि आरियं धम्मियं सुवयणं सोचा, निसम्म तओ भवइ संवेगजायसढे तिव्वधम्माणुराग: रत्ते, सेणं जीवे धम्मकामए, पुण्णकामए, सग्गकामए, भोक्खकामए; धम्मकंखिए, कितनेक जीव देवलोक में नहीं उत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! किम कारन से कितनेक जीव देवलोक में उत्पन्न होते हैं और कितनेक जीव देवलोक में नहीं उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! कोई जीव धर्मिष्ट त्रिी की कुक्षि में संशी पंचेन्द्रियपने उत्पन्न हुवा. वहां पूर्ण पर्याय बांधकर पर्याप्त हुवे पीछे तथारूप श्रमण माहण की पास एकान्त आर्य धार्मिक वचन श्रवण कर, अवधारकर संवेग से धर्मादि में श्रद्धावन्त हुवा व तीन धर्मानुराग से रक्त वनगया. फीर वह श्रुत चारित्र रूप धर्म का अभिलापी बनाईवा, पुण्य का 24. पहिला शतक का सातवा उद्देशा भावार्थ ' wU ब्दाथा १८५ कैसे गो. गौतम स० संज्ञी पं० पंचेन्द्रिय स सर्व प० पर्याप्ति से प० पर्याप्त त: तयारूप स. श्रमण मा माहण की अं० पाम ए. एक आ० आर्य ध धर्म का सु० अच्छा वचन सो० सुनकर नि० अब. धारकर त० पीछे भ० होवे सं० वैराग्य से उ० उत्पन्न स० श्रद्धा ति० तीत्र ५० धर्मानुराग र० रक्त जी० जीव घ० धर्म को कामी पु० पुन्य का कामी स० स्वर्ग का कामी मो० मोक्षका कामी ५० · धर्म वज्जेजा, अत्थेगइए णो उववज्जेज्जा । सेकेणटेणं ? गोयमा ! सेणं सण्णी पंचिंदिए सव्वाहिं पजत्तीहि पज्जत्तए तहारूवरस समणस्सवा, माहणरसवा अंतिए एगमवि आरियं धाम्मियं सुवयणं सोचा, निसम्म तओ भवइ संवेगजायसवे तिव्वधम्माणुराग: रत्ते, सेणं जीवे धम्मकामए, पुण्णकामए, सग्गकामए; मोक्खकामए; धम्मकंखिए, ? सूत्र पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र १११पहिला मातक का सातवा उद्देशा 858RRNE भावार्थ कितनेक जीव देवलोक में नहीं उत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! किम कारन से कितनेक जीव देवलोक में उत्पन्न होते हैं और कितनेक जीव देवलोक में नहीं उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम! कोई जीव धर्मिष्ट खी की कुक्षि में संशी पंचेन्द्रियपने उत्पन्न हुवा. वहां पूर्ण पर्याय बांधकर पर्याप्त हुवे पीछे तथारूप श्रमण 09 माहण की पास एकान्त आर्य धार्मिक वचन श्रवण कर, अवधारकर संवेग से धर्मादि में श्रद्धावन्त हुवा व तीन धर्मानुराग से रक्त वनगया. फीर वह श्रुत चारित्र रूप धर्म का अभिलापी बनाहुवा, पुण्य का शब्दार्थ कैसे गो गौतम स० संबी पं० पंचेन्द्रिय स० सर्व पः पर्याप्ति से प० पर्याप्त तर तधारूप स० श्रमण मा० माहण की अं० पास ए० एक आ० आर्य ध धर्म का सु० अच्छा वचन सो० सुनकर नि० अब- धारकर त० पीछे भ० होवे सं० वैराग्य से उ• उत्पन्न स० श्रद्धा ति० तीव्र ध० धर्मानुराग र० रक्त जी जीव ध० धर्म को कामी पु० पुन्य का कामी स० स्वर्ग का कामी मो० मोक्षका कामी ५० धर्म सूत्र ag पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र वजेज्जा, अत्गइए णो उववजेजा । सेकेणटेणं ? गोयमा ! सेणं सग्णी पंचिंदिए सव्वाहि पजत्तीहिं पजत्तए तहारूवरस समणस्सवा, माहणस्सवा अंतिए एगमवि आरियं धम्मियं सुवयणं सोचा, निसम्म तओ भवइ संवेगजायसढे तिव्वधम्माणुराग- रत्ते, सेणं जीवे धम्मकामए, पुण्णकामए, सग्गकामए; मोक्खकामए; धम्मकंखिए, 2043 पहिला पातक का सातवा उद्देशा भावार्थ कितनेक जीव देवलोक में नहीं उत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से कितनेक जीव देवलोक में उत्पन्न होते हैं और कितनेक जीव देवलोक में नहीं उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! कोई जीव धर्मिष्ट स्त्री की कुक्षि में संशी पंचेन्द्रियपने उत्पन्न हुवा. वहां पूर्ण पर्याय बांधकर पर्याप्त हुचे पीछे तथारूप श्रमण माइण की पास एकान्त आर्य धार्मिक वचन श्रवण कर, अवधारकर संवेग से धर्मादि में श्रद्धावन्त हुवा व तीय धर्मानुराग से रक्त बनगया. फीर वह भुत चारित्र रूप धर्म का अभिलापी पनाहुवा, पुण्य का Q19 कैसे गो गौतम स० संज्ञी पं० पंचेन्द्रिय स० सर्व प० पर्याप्ति से प० पर्याप्त त: तयारूप स० अमण मा माहण की पाम ए. एक आ० आर्य ध धर्म का सु० अच्छा वचन सो० सुनकर नि० अब. धारकर त० पीछे भ० होवे सं० वैराग्य उ० उत्पन्न स० श्रद्धा ति० तीव्र ध० धर्मानुराग २० रक्त जी० जीव ध० धर्म को कामी पु० पन्य का कामी स० स्वर्ग का कामी मो० मोक्षका कामी ध धर्म १८५ सूत्र पंचमांगविणत्ति (भगवती) सूत्र १ वज्जेज्जा, अत्थेगइए णो उववज्जेजा। सेकेणटेणं ? गोयमा ! सेणं सग्णी पंचिंदिए सव्वाहिं पजत्तीहिं पजत्तए तहारूवरस समणस्सवा, माहणस्सवा अंतिए एगमवि आरियं धम्मियं सुवयणं सोचा, निसम्म तओ भवइ संवेगजायसद्वे तिब्वधम्माणुराग- रत्ते, सेणं जीवे धम्मकामए, पुण्णकामए, सग्गकामए; मोक्खकामए; धम्मकंखिए, स जीव देवलोक में नहीं उत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से कितनेक जीव देवलोक में TREA की है और कितनेक जीव देवलोक में नहीं उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! कोई जीव धर्मिष्ट तो शो पंचेन्द्रियपने उत्पन्न हुवा. वहां पूर्ण पर्याय बांधकर पर्याप्त हुवे पीछे तथारूप श्रमण सारण ६ सपा धार्मिक वचन श्रवण कर, अवधारकर संवेग से धर्मादि में श्रद्धावन्त हुवा व पनि २ क मागा, सीर वह श्रुत चारित्र रूप धर्म का अभिलापी बनाहुवा, पुण्य का ११. पहिला शतक का सातवा उद्देशा 89 दार्थ oro १८७ सूत्र ११११ पंचमा विवाह . पण्णत्ति (भगवती-) सूत्र 18808 फल जैसे अ० होवें चि० खडारहे नि० बैठे तु० सोवे मा० माता सु० सोती होवे मु० सोवे जा. जगती होवे जा० जगे सु० सुखी होती मु० सुखी होये दु० दुःखी होती दु० दुःखी होवे हैं. हा गो० गौतम जी० जीव ग० गर्भ में ग० गया हुवा जा. यावत् दु० दुःखी होते दु. दुःस्वी भ० होवे ॥ २१ ॥ १० ॥ प्रसवन का० अवसर में सी० मस्तक से पा० पावसे आ० आवे स० सीधा आ० आवे ति• तिर्छा आ० अंबखुजएवा, अच्छेजवा, चिटेजवा, निसीएजवा, तुयटेजवा; माऊए सुयमाणीए सुयइ, जागरमाणीए जागरइ, सुहियाए सुहिए भवइ, दुहियाए दुहिए भवइ ? हंता गायमा ! जीवेणं गभगए समाणे जाव दुहियाए दुहिए भवइ ॥ २१ ॥ अहेणं पसवण काल समयंसि सीसेणवा, पाएहिंवा आगच्छइ, सममागच्छइ, तिरिय माग- जीव किस प्रकार गर्भ में रहता है और गर्भ से नीकले पीछे करणी के फल किस तरह प्राप्त करता वह बतलाते हैं. अहो भगवन् ! गर्भ में रहा हुवा जीव क्या उत्तान - छत्राकार रहता है, एक पसली की तरह पड़ा रहता है, आम्र फल की तरह उत्कट आमनसे रहता है, ऊर्थ स्थान बैठा रहता है, खडा होता है, बैठाहोता है, शयन करता है, जब उस की माता शयन करती है तब सोता है, माता जगती है तब जागृत होता है,माता सुखी तो वह मुखी रहता है, और माता दुःखी रहनेपर क्या दुःखी रहता है? हां गौतम ! गर्भ में रहनेवाले जीव को उक्त सब क्रियाओं होती हैं. ॥ २१ ॥ अब जब प्रसन. काल - पहिला शतकका सातवा उद्देशा. 28 भावार्थ १८७ 808 पंचमाङ्ग:विवाह . पण्णन्ति (भगवती) सूत्र 88803 फल जैसे अ० हा चि० खडारहे नि० वैठे तु० सोचे मा० माता सु० सोती होवे मु० सोवे जा० जगती होवे जा० जगे सु० सुखी होती सु० सुखी होवे दु० दुःखी होती दु० दुःखी होवे हैं. हां गो० गौतम जी० जीव ग० गर्भ में ग० गया हुवा जा. यावत् दु. दुःखी होते दु० दुःखी भ० होवे ॥ २१ ।। १० प्रसवन का० अवसर में सी० मस्तक से पा० पावसे आ० आवे स० मीधा आ० आय ति० तिर्छा आ० अंबखुजएवा, अच्छेजवा, चिट्ठजवा, निसीएजवा, तुयटेजवा; माऊए सुयमाणीए सुयइ, जागरमाणीए जागरइ, सुहियाए सुहिए भवइ, दुहियाए दुहिए भवइ ? हंता गायमा ! जीवेणं गब्भगए समाणे जाव दुहियाए दुहिए भवइ ॥ २१ ॥ अहेणं पसवण काल समयंसि सीसेणवा, पाएहिंवा आगच्छइ, सममागच्छइ, तिरिय माग- भावार्थ जीव किस प्रकार गर्भ में रहता है और गर्भ से नीकले पीछे करणी के फल किस तरह प्राप्त करता है। वह बतलाते हैं. अहो भगवन् ! गर्भ में रहा हुवा जीव क्या उत्तान - छत्राकार रहता है, एक पसली की तरह पडा रहता है, आम्र फल की तरह उत्कट आमनसेः रहता है, अर्थ स्थान बैठा रहता होता है, बैठाहोता है, शयन करता है, जब उस की माना शयन करती है तब सोता है, माता जगती है तब जागृत होता है,माता सुखी तो वह सुखी रहता है, और माता दुःखी रहनेपर क्ण दुःखी रहता है? कहां गौतम ! गर्भ में रहनेवाले जीव को उक्त सब क्रियाओं होती हैं. ॥ २१ ॥ अब जब प्रसवंत काल R82- पहिला शतकका सातवा उद्देशा 9 !
ol दार्थ फल जैसे अ० हाचे चि० खडारहे नि० बैठे तु० सो मा० माता सु० सोती होवे सु० सोवे जा. जगती होवे जा० जगे सु० सुखी होती सु. सुखी होवे दु० दुःखी होती दु० दुःखी होने हैं. हा गोगौतम जी० जीव ग० गर्भ में ग० गया हुवा जा० यावत् दु. दुःखी होते दु० दुःखी भ० होवे ।। २१ ॥ १० मसरन का० अवसर में सी० मस्तक से पा. पावस भा० आवे स० सीधा आ० आव ति० तिर्छा आ०. अंबखुज्जएवा, अच्छेजवा, चिट्ठजवा, निसीएजवा, तुयट्टेजवा; माऊए सुयमाणीए सुयइ, जागरमाणीए जागरइ, सुहियाए सुहिए भवइ, दुहियाए दुहिए भवइ ? हंता गायमा ! जीवेणं गभगए समाणे जाव दुहियाए दुहिए भवई ॥ २१ ॥ अहेणं पसवण काल समयंसि सीसेणवा, पाएहिंवा आगच्छइ, सममागच्छइ, तिरिय माग- भावार्थ जीव किस प्रकार गर्भ में रहता है और गर्भ से नीकले पीछे करणी के फल किस तरह माप्त करता वह बतलाते हैं. अहो भगवन् ! गर्भ में रहा हुवा जीव क्या उत्तान - छत्राकार रहता है, एक पसली की तरह पड़ा रहता है, मात्र फल की तरह उत्कट आमनसे रहता है, अर्थ स्थान बैठा रहता है, लडा होता है, बैठाता है, शयन करता है, जब उस की माता शयन करती है तब सोता है, माता जगती है तब जागृत होता है,माता सुखी तो वह सुखी रहता है, और माता दुःखी रहनेपर क्ण दुःखी रहता है? हां गौतम ! गर्भ में रहनेवाले जीव को उक्त सब क्रियाओं होती है. ॥ २१॥ अब जब प्रसरत काल ११ पंचमान,विवाह . पण्णत्ति (भगवती.) सूत्र 1888 REE पहिला शंतकक' सांतवा उद्देशा - .
x x १.८९ सूत्र पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 898 भावार्थ अ० अनिष्टस्तर अ० अनादेय वचन वाला प० उत्पन्न भ० होवे व० वर्ण व० वध्य क० कर्म नो नहीं ५० बंधेहुवे १० प्रशस्त ने जानना. जा० यावत् आ० आदेय वचन वाला प० उत्पन्न भ० होवे से वह ए. ऐसे में भगवन्. ॥ १ ॥ ७ ॥ अमंणुण्णसरे, अमणामस्सरे, अणाएज्जवयणं, पञ्चायाएवि भवइ, वण्णवज्झाणिय, से कम्माई नोबढाइं पसत्थं णेयव्वं जाव आदेजवयणं पञ्चायाएविभवइ ।। सेवं भंते भंतेत्ति पढमे सए सत्तमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ १ ॥ ७ ॥ रस, स्पर्श होवे. उन को सब संयोग अनिष्ट, अकान्त, अमिय, अशुभ, अमनोज्ञ, अंमणाम होवे. वैसे ही वह जीव हीनस्वर, दीनस्वर, अनिष्टस्वर, आप्रियस्वर, अशुभस्तर, अमनोज्ञस्वर, अमनामस्वर व अनादेय वचनवाला होवे अर्थात् उन का वचन किसी को माननीय होवे नहीं. यह अशुभ कर्म का फलकहा और जिनौने अशुभ कर्म नहीं किये हैं और धर्माचरण से शुभ कर्म की उपार्जना की है उन को शुभ फलका उदय होते चेशुभ वर्ण, गंध, रस व स्पर्शवन्त होवे. वैसे ही प्रियकारि, शुभ मनोज्ञ व सव मान्य करे ऐसे अच्छे संयोग मीले. सब में माननीय पूजनीय होवे और सब प्रकार के सुख भोगवे. यह सब पुण्य फल जानना. अठो भगवन् ! आपने जो प्रतिपादन किया है वह सत्य है. यह पहिला शतक का सातवा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥१॥9॥V + पहिला शतक का मातरा उदेगा , ७yo alo x x - यि x X सूत्र पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 838 अ० अनिष्टस्तर अ० अनादेय वचन वाला प० उत्पन्न भ० होवे व० वर्ण 4. वध्य क० कर्म नो नहीं । ५० बंधेहुवे १० प्रशस्त ने जानना. जा० यावत् आ० आदेय वचन वाला प० उत्पन्न भ० होवे से वह ए. ऐसे में भगवन् ॥ १॥ ७ ॥ अमंणुण्णसरे, अमणामस्सरे, अणाएजवयणं, पञ्चायाएवि भवइ, वण्णवज्झाणिय, से कम्माई नोबहाई पसत्थं णेयव्वं जाव आदेज्जत्रयणं पञ्चायाएविभवइ । सेवं भंते भंतेत्ति पढमे सए सत्तमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ १॥ ७ ॥ रस, स्पर्श होवे. उन को सब संयोग अनिष्ट, अकान्त, अमिय, अशुभ, अमनोज्ञ, अंमणाम होवे. वैसे ही वह जीव होनस्वर, दीनस्वर, अनिष्टस्वर, अप्रियस्वर, अशुभस्वर, अमनोज्ञस्वर, अमनामस्वर व अनादेय वचनवाला होवे अर्थात् उन का बचन किसी को माननीय होवे नहीं. यह अशुभ कर्म का फलकहा और जिनौने अशुभ कर्म नहीं किये हैं और धर्माचरण से शुभ कर्म की उपार्जना की है उन को शुभ फलका उदय होते बेशुभ वर्ण, गंध, रम व स्पर्शवन्त होवे. वैसे ही मियकारि, शुभ मनोज्ञ व सब मान्य करे ऐसे अच्छे संयोग मीले. सब में माननीय पूजनीय होवे और सब प्रकार के सुख भोगये. यह सब पुण्य फल जानना. अठो भगवन् ! आपने जो मतिपादन किया है वह सत्य है. यह पहिला शतक का सातवा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥१॥७॥V ॐ38पहिला-शतक का माता उद्देशा भावार्थ , x x x x १८९ सूत्र মাথ 898 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 6987 पहिला-शतक का माता उद्देशा अ० अनिष्टावर अ० अनादेय वचन वाला प० उत्पन्न भ० होवे व० वर्ण व० वध्य क० कर्म नो नहीं प. बंधेडुके प. प्रशस्त ने जानना. जा. यावत् आ० आदेय वचन वाला ५० उत्पन्न भ० होवे से वह ए. ऐसे भ० भगवन्. ॥ १ ॥ ७ ॥ अमंणुण्णसरे, अमणामस्सरे, अणाएजवयणं, पञ्चायाएवि भवइ, वण्णवज्झाणिय, से कम्माई नोबढाइं पसत्थं गेयव्वं जाव आदेजवयणं पञ्चायाएविभवइ ।सेवं भंते भंतेत्ति पढमे सए सत्तमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ १ ॥ ७ ॥ रस, स्पर्श होवे. उन को सब संयोग अनिष्ट, अकान्त, अमिय, अशुभ, अमनोज्ञ, अंमणाम होवे. वैसे ही वह जीव हीनस्वर, दीनस्वर, अनिष्टस्वर, अप्रियस्वर, अशुभस्वर, अमनोजस्वर, अमनामस्वर व अनादेय वचनवाला होवे अर्थात उन का वचन किसी को माननीय होवे नहीं. यह अशुभ कर्म का फलकहा और जिनौने अशुभ कर्म नहीं किये हैं और धर्माचरण से शुभ कर्म की उपार्जना की है उन को शुभ फलका उदय होते वेशुभ वर्ण, गंध, रम व स्पर्शवन्त होवे. वैसे ही प्रियकारि, शुभ मनोज्ञ व सव मान्य करे ऐसे अच्छे संयोग मीले. सब में माननीय पूजनीय होवे और सब प्रकार के मुख भोगवे. यह सब पुण्य फल जानना. अहो भगवन् ! आपने जो प्रतिपादन किया है वह सत्य है. यह पहिला शतक का सातवा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥१॥७॥V oyo 5. x x Sya ...
७ x २८९ सूत्र भावार्थ * पंचमांग विवाह पपणत्ति ( भगवती) मूत्र अ० अनिष्टस्वर अ० अनादेय वचन वाला प० उत्पन्न भ० होवे व० वर्ण व० वध्य क० कर्म नो नहीं ५० बंधेहुवे ५० प्रशस्त ने जानना. जा. यावत् आ० आदेय वचन वाला ५० उत्पन्न भ० होवे से वह ए. ऐसे भ० भगवन्. ॥ १ ॥ ७ ॥ अमंणुण्णसरे, अमणामस्सरे, अणाएजवयणं, पञ्चायाएवि भवइ, वण्णवज्झाणिय, से कम्माई नोबडाई पसत्थं यवं जाव आदेजवयणं पच्चायाएवि भवइ ।। सेवं भंते भंतेत्ति पढमे सए सत्तमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ १ ॥ ७ ॥ रस, स्पर्श होये. उन को सब संयोग अनिष्ट, अकान्त, अमिय, 'अशुभ, अमनोज्ञ, अंमणाम होवे. वैसे ही वह जीव हीनस्वर, दीनस्वर, अनिष्टस्वर, अप्रियस्वर, अशुभस्वर, अमनोज्ञस्वर, अमनामस्वर व अनादेय वचनवाला होवे अर्थात् उन का वचन किसी को माननीय होवे नहीं. यह अशुभ कर्म का फलकहा और जिनीने अशुभ कर्म नहीं किये हैं और धर्माचरण से शुभ कर्म की उपार्जना की है उन को शुभ फलका उदय होते बेशुभ वर्ण, गंध, रम व स्पर्शवन्त होवे. वैसे ही मियकारि, शुभ मनोज्ञ व सव मान्य करे ऐसे अच्छे संयोग मीले. सब में माननीय पूजनीय होवे और सब प्रकार के सुख भोगवे. यह सब पुण्य फल जानना. अहो भगवन् ! आपने जो प्रतिपादन किया है वह सत्य है. यह पहिला शतक का सातवा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ १ ॥ ७ ॥ 8-09 पहिला-शतक का सातवा उद्देशा x x 08 १४ पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भवगती) सूत्र ने० नारकी का आ० आयुष्य प० गांधे नि तिर्यंच म मनुष्य दे० देष मा. आयुष्य १० वां ने नारकी का आ० आयुष्य कि: करक ने रक में उ० उत्पन्न होवे ति० निर्यच म० मनुष्य दे० देव आ० आयुष्य कि० करके द.लोक में उत्पन्न होवे ॥ १॥ ए. एकान्त पं० पंडित भं भगवन् म० मनुष्य किं० क्या ने० नारकी का आ० आयुष्य प. बांधे जा० यावत् दे० देव का आ' आयुष्य कि०. करके दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम ए० एकान्त पं० पंडित म. मनुष्य आ० आयुष्य लोएसु उववज्जइ ? गोयमा ! एगंत बालेणं मणुस्से नेरइयाउयं पि पकरेइ, तिरिमणु- देवाउयपि पकरेइ, । मेरइयाउयंपि किच्चा नेरइएसु उववज्जइ, तिरिमणुदेवाउयं कि- च्चा देवलोएमु उववजइ ॥ १॥ एगंत पंडिएणं भंते ! मणुस्से किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवलोएसु उववज्जइ ? गोयमा ! एगंत पंडिएणं मणुस्से आउ- के आयुष्य का बंध कर के देवलोक में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! एकान्त वाल मनुष्य नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देवता के आयुष्य का धंध करता है वैसे ही नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देवता के आयुष्य बंध कर नारकी, तिर्यंच, मनुष्य व देवता में उत्पन्न होता है. ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! एकान्त पंडित मनुष्य क्या नरक, निर्यच, मनुष्य व देवता के आयुष्य का वध करता है? और नरक का आयुष्य बांध कर नरकमें उत्पन्न होता है यावत् देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! एकान्त 387 पहिला शतक का आठवा उद्देशा841 भावार्थ oyo सूत्र पंचमांग विशाह पणत्ति (भवगती) सूत्र it ने नारकी का आ० आयुष्य प० गंधे नि० तिर्यच म० मनुष्य ददष मा. आयुष्य ५० बांधे ने० नारकी का आ० आयुष्य किः करक ने रक में उ• उत्पन्न होवे ति० निर्यच म० मनुष्य दे० देव आ० आयुष्य कि० करके दे. लोक में उत्पन्न होवे ॥ १ ॥ ए. एकान्त पं० पंडित भं भगवन् म० मनुष्य किं. क्या ने० नारकी का आ० आयुष्य प. बांधे जा० यावत् दे० देव का आ° आयुष्य कि० करके दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम ए० एकान्त पं. पंडित म. मनुष्य आ० आयुष्य लोएसु उववज्जइ ? गोयमा ! एगंत बालेणं मणुस्से नेरइयाउयं पि पकरेइ, तिरिमणु- देवाउयंपि पकरेइ, । मेरइयाउयंपि किच्चा नेरइएसु उबवजइ, तिरिमणुदेवाउयं कि- चा देवलोएमु उववजइ ॥ १॥ एगंत पंडिएणं भंते ! मणुस्से किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवलोएसु उववज्जइ ? गोयमा ! एगंत पंडिएणं मणुस्से आउ- के आयुष्य का बंध कर के देवलोक में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम! एकान्त बाल मनुष्य नारकी, वियंच मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है वैसे ही नारकी, तिर्यंच मनुष्य प देवता के आयुष्य बंध कर नारकी, तिर्यंच, मनुष्य व देवता में उत्पन्न होता है. ॥१॥ अहो भगवन् ! एकान्त पंडित मनुष्य क्या नरक, निच, मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है? और नरक का आयुष्य बांध कर नरकमें उत्पन्न होता है यावत् देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होता है ? अशे गौतम ! एकान्त 838 पाहिला तक का आठवा उद्देशा भावार्थ 60 सूत्र 388 पंचांग विवाह पण्णत्ति (भवगती) सूत्र ने० नारकी का आ० आयुष्य प० गंधे नि तियेच म. मनुष्य दे देष मा. आयुष्य प. बांध नारकी का आ० आयुष्य कि करक ने रक में उ• उत्पन्न होवे ति० नियंच म० मनुष्य दे० देव आ० आयुष्य कि० करके देसलोक में उत्पन्न होवे ॥ १ ॥ ए. एकान्त पं० पंडित भंः भगवन् म० मनुष्य किं० क्या ने० नारकी का आ० आयुष्य प. बांधे जा. यावत् दे० देव का आ' आयुष्य कि०. करके दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम ए० एकान्त पं० पंडित म. मनुष्य आ. आयुष्य लोएसु उववजइ ? गोयमा ! एगंत बालेणं मणुस्से नेरइयाउयं पि पकरेइ, तिरिमणु- देवाउयपि पकरेइ, । मेरइयाउयपि किच्चा नेरइएसु उववज्जइ, तिरिमणुदेवाउयं कि- चा देवलोएमु उववज्जइ ॥ १॥ एगंत पंडिएणं भंते ! मणुस्से किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवलोएसु उववजइ ? गोयमा ! एगंत पंडिएणं मणुस्से आउ- के आयुष्य का बंध कर के देवलोक में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! एकान्त बाल मनुष्य नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है वैसे ही नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देवता के आयुष्य बंध कर नारकी, तिर्यंच, मनुष्य व देवता में उत्पन्न होता है. ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! एकान्त पंडित मनुष्य क्या नरक, तिथंच, मनुष्य व देवता के आयुष्य का वध करता है? और नरक का आयुष्य बांध कर नरकमें उत्पन्न होता है यावत् देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! एकान्त 1383 पहिला सतक का आठवा उद्देशान ? भावार्थ SYO 0७ कि० सूत्र 2008 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र ने नारकी का आ० आयुष्य प० गंधे नि० तिर्यंच म. मनुष्य दे० देष मा. आयुष्य ५० वधि ने नारकी का आ० आयुष्य कि करक ने 'रक में उ. उत्पन्न होवे ति० तिर्यंच म० मनुष्य दे. देव आ० आयुष्य कि० करके . यलोक में उत्पन्न होवे ॥ १ ॥ ए. एकान्त पं० पंडित भं भगवन् म० मनुष्य ० क्या ने नारकी का आ० आयुष्य प० बांधे जा० यावत् दे० देव का आ. आयुष्य कि० करके दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो गौतम ए० एकान्त पं० पंडित म. मनुप्य आ० आयुष्य लोएसु उववजइ ? गोयमा ! एगंत बालेणं मणुस्से नेरइयाउयं पि पकरेइ, तिरिमणु- देवाउयपि पकरेइ, । नेरइयाउयपि किच्चा नेरइएसु उववजइ, तिरिमणुदेवाउयं कि- चा देवलोएमु उववजइ ॥ १॥ एर्गत पंडिएणं भंते ! मणुस्से किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवलोएसु उववजइ ? गोयमा ! एगंत पंडिएणं मणुस्से आउ- के आयुष्य का बंध कर के देवलोक में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम! एकान्त वाल मनुष्य नारकी, विर्यच मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है वैसे ही नारकी, तियेच मनुष्य व देवता के आयुष्य बंध कर नारकी, तिर्यंच, मनुष्य व देवता में उत्पन्न होता है. ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! एकान्त पंडित मनुष्य क्या नरक, निर्यच, मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है? और नरक का आयुष्य बांध कर नरकमें उत्पन्न होता है यावत् देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! एकान्त <8383 पहिला शतक का आठवा उद्देशाने भावार्थ , ഞ दर्थ [१९१ सत्र 88 पंचमांग विवाह पणत्ति (भवगती) सूत्र - ने० नारकी का आ० आयुष्य प० गांधे नि तिर्यंच म. मनुष्य दे देष भा० आयुष्य १० वांधे ने० नारकी का आ० आयुष्य कि करक ने रक में उ० उत्पन्न होवे ति. निर्यच म० मनुष्य दे० देव आ० आयुष्य कि० करके द..सलोक में उत्पन्न होये ॥ १ ॥ ए० एकान्त पं० पंडित भं भगवन म० मनुष्य किं. क्या ने० नारकी का आ० आयुष्य प. बांधे जा. यावत् दे० देव का आ. आयुष्य कि० करके दे. देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम ए० एकान्त पं० पंडित म. मनुष्य आ. आयुष्य लोएसु उववजइ ? गोयमा ! एगंत बालेणं मणुस्से नेरइयाउयं पि पकरेइ, तिरिमणु- देवाउयपि पकरेइ, । मेरइयाउयंपि किच्चा नेरइएसु उववजइ, तिरिमणुदेवाउयं कि- चा देवलोएमु उववजइ ॥ १॥ एगंत पंडिएणं भंते ! मणुस्से किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवलोएसु उववजइ ? गोयमा ! एगंत पंडिएणं मणुस्से आउ- के आयुष्य का बंध कर के देवलोक में उत्पन्न होता है ? अहोगौतम! एकान्त वाल मनुष्य नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है वैसे ही नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देवता के आयुष्य बंध कर नारकी, तिर्यंच, मनुष्य व देवता में उत्पन्न होता है. ॥ १॥ अहो भगवन् ! एकान्त पंडित मनुष्य क्या नरक, निर्यच, मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है? और नरक का आयुष्य बधि कर नरकमें उत्पन्न होता है यावत् देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! एकान्त 838पहिला शतक का आठवा उद्देशान भावार्थ ब्द सूत्र 3- पंचमांग विवाह पणत्ति ( भवगती) सूत्र ने० नारकी का आ० आयुष्य प० गधान तयच म मनुष्य दे० देष मा. आयुष्य ५० बांधे ने नारकी का आ० आयुष्य किः करक ने रक में उ० उत्पन्न होवे ति० तिर्यंच म० मनुष्य दे० देव आ० आयुष्य कि० करके . लोक में उत्पन्न होरे ॥ १॥ ए. एकान्त पं० पंडित भंः भगवन् म० मनुष्य किं० क्या ने० नारकी का आ० आयुष्य प. बांधे जा० यावत् दे० देव का आ' आयुष्य कि०. करके दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम ए० एकान्त पं० पंडित म. मनुष्य आ० आयुष्य लोएसु उववज्जइ ? गोयमा ! एगंत बालेणं मणुस्से नेरइयाउयं पि पकरेइ, तिरिमणु- देवाउयपि पकरेइ, । मेरइयाउयंपि किच्चा नेरइएसु उववज्जइ, तिरिमणुदेवाउयं कि- चा देवलोएमु उववज्जइ ॥ १॥ एगंत पंडिएणं भंते ! मणुस्से किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवलोएसु उववज्जइ ? गोयमा ! एगंत पंडिएणं मणुस्से आउ- के आयुष्य का बंध कर के देवलोक में उत्पन्न होता है ? अहोगौतम ! एकान्त पाल मनुष्य नारकी, तिर्यंच मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है वैसे ही नारकी, तिच मनुष्य प देवता के आयुष्य बंध कर नारकी, तिर्यंच, मनुष्य व देवता में उत्पन्न होता है. ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! एकान्त पंडित मनुष्य क्या नरक, निर्यच, मनुष्य व देवता के आयुष्य का बंध करता है? और नरक का आयुष्य बांध कर नरकमें उत्पन्न होता है यावत् देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होता है ? अहो गौतम ! एकान्त ! पहिला शतक का आटवा उद्देशान भावार्थ " FYO NEET पंचमाङ्ग विवाह पणत्ति (भगवती) मूत्र - आयुष्य कि० करके दे देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो गौतम ए. एकान्त पं० पंडित' म० मनुष्य को के. मात्र दो० दोगति प० कही है अं० अंतक्रिया क. कल्पोत्पन्न से० वह ते. इस लिये जा यावत् दे देवता का आ० आयुष्य कि० करके दे देवलोक में उ० उत्पन्न होये ॥ २॥ वाचाल' पंडित भं० भगवन् म मनुष्य किं. क्या ने नारकी का आ? आयुष्य प० वांधे जा. यावत् दे० देवता का आ. आयुष्य कि० करके दे० देवता में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम णो० नहीं ने० नारकी का आ० आयुष्य प० वांधे जा० यावत् दे० देवता का आ० आयुप्य कि० करके दे० देवता में उ० उत्पन्न होवे किरिया चेव, कप्पोववत्तिया चेथ; रो तेण?णं गोयमा ! जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववज्जइ ॥ २ ॥ बाल पंडिएणं भंते ! मणूसे किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववजइ ? गोयमा! णो णेग्इयाउयं पकरेइ जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववज्जइ । सेकेणटेणं जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववज्जइ ? गोयमा ! बाल- वैमानिक देवलोकमें उत्पन्न होवे ऐसी दोगति कही. इसलिये अहो गौतम ! एकान्त पंडित मनुप्य देवगति के आयुष्य का पंधकर देवगति में उत्पन्न होता है. ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! बाल पंडित (श्रावक) मनुष्य क्या नारकी का आयुष्य यावत् देवत्ता का आयुष्य वांधकर देवता में उत्पन्न हो ? अहो गौतम ! वाल पंडित मनुष्य नारकी का आयुष्य वांधे नहीं, तियेच का आयुप्य बांधे नहीं, मनुष्य का आयुष्य SP पहिला शतक का आठवा उद्देशान मावार्थ DO ३ A ors सूत्र RESSपंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र Eggs आयुप्य कि० करके दे देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो गौतम ए. एकान्त पं० पंडित- म. मनुप्य को के० मात्र दो० दोगनि प० कही है अं० अंतक्रिया क. कल्पोत्पन्न से० वह ते. इस लिये जा. यावत् दे देवता का आ० आयुष्य कि० करके दे देवलोक में उ० उत्पन्न होवे ॥२॥ वाण्याल पंडित भं० भगवन् म मनुष्य किं. क्या ने नारकी का आ. आयुष्य प० वांधे जा. यावत् दे देवता का आ. आयुष्य कि० करके दे० देवता में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम णो० नहीं ने नारकी का आ. आयुष्य प० बांधे जा० यावत् दे० देवता का आ० आयुष्य कि० करके दे० देवता में उ० उत्पन्न होवे किरिया चेव, कप्पोववत्तिया चेय; से तेणटेणं गोयमा ! जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववज्जइ ॥ २ ॥ बाल पंडिएणं भंते ! मणूसे किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववजइ ? गोयमा ! णो णेग्इयाउयं पकरेइ जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववज्जइ । सेकेणटेणं जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववजइ ? गोयमा ! बाल- वैमानिक देवलोकमें उत्पन्न होवे ऐसी दोगति कही. इसलिये अहो गौतम ! एकान्त पंडित मनुष्य देवगति के आयुष्य का पंधकर देवगति में उत्पन्न होता है. ॥ २॥ अहो भगवन् ! बाल पंडित (श्रावक) मनुष्य क्या नारकी का आयुष्य यावत् देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होवे ? अहो गौतम ! वाल पंडित मनुष्य नारकी का आयुष्य वांधे नहीं, तियेच का आयुष्य वांधे नहीं, मनुष्य का आयुष्य SBBS पहिला शतक का आठवा उद्देशा मावार्थ CO सत्र EHA पंचमान विवाइ पण्णत्ति (भगवती) सूत्र REET आयुष्य कि० करके दे देवलोक में उ० उत्पन्न होवे गो. गौतम ए० एकान्त पं० पंडित म. मनुष्य को के. मात्र दो दोगनि प० कही है अं० अंतक्रिया क. कल्पोत्पन्न से वह ते० इस लिये जा० यावत् दे देवता का आ० आयुष्य कि० करके दे. देवलोक में उ० उत्पन्न होये ॥२॥ वाव्याल पंडित भं० भगवन् म मनुष्य किं. क्या ने नारकी का आर आयुष्य प० वांधे जा० यावत् दे देवता का आ• आयुष्य कि० करके दे० देवता में उ० उत्पन्न होवे गो० गौतम णो० नहीं ने नारकी का आ आयुष्य प० बांधे जा० यावत् दे० देवता का आ० आयुष्य कि० करके दे० देवता में उ० उत्पन्न होवे किरिया चेव, कप्पोववत्तिया चेध; से तेणटेणं गोयमा ! जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववजइ ॥ २ ॥ बाल पंडिएणं भंते ! मणूसे किं नेरइयाउयं पकरेइ, जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववज्जइ ? गोयमा! णो णेग्इयाउयं पकरेइ जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववज्जइ ! सेकेणढेणं जाव देवाउयं किच्चा देवेसु उववज्जइ ? गोयमा ! वाल- वैमानिक देवलोकमें उत्पन्न होवे ऐसी दोगति कही. इसलिये अहो गौतम ! एकान्त पंडित मनुष्य देवगति के आयुष्य का धंधकर देवगति में उत्पन्न होता है. ॥ २॥ अहो भगवन् ! वाल पंडित (श्रावक ) मनुष्य क्या नारकी का आयप्य यावत् देवता का आयुष्य बांधकर देवता में उत्पन्न होवे ! अहो गौतम ! बाल पंडित मनुष्य नारकी का आयुष्य वांधे नहीं, तिर्यंच का आयुष्य बांधे * MMS पहिला शतक का आठवा उद्देशान मावार्थ 1T1 Byp 488 पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भगवती) मूत्र १ मारने से ता. तब से उस पु० पुरुष को का• कायिकी अ. अधिकरण की १० प्रपिकी पर परितापनिकी च० चार कि० किया पु० स्पर्शी जे० जो भ० भव्य उ० बनाने से पं० बंधन करने से मा० मारने से ता. वहालग से० उस पु० पुरुप को का० कायिकी जा. यावत् पा.माणातिपातिकी पं० पांच कि० क्रिया पु० स्पर्शी से० वह ते. इसलिये जा० यायत पं० पांच कि क्रिया ॥ ४ ॥ पुः पुरुष क० कच्छ जा० यावत् २० वन वि० विपम त० तृण ऊ० ऊंचा करके अ. अग्निकाय से पुरिसे काइयाए अहिगरणयाए, पाओसियाए, परियावणियाए, चउहि किरियाहिं जे भविए उडवणयाएवि बंधणथाएवि, मारणयाएवि तावचणसे पुरिसे काइ. याए जाव पाणाइवाय किरियाए पंचहि किरियाहिं पुट्टे । से तेणटेणं जाव पंचकिरिए ॥ ४ ॥ पुरिसेणं भंते ! कच्छंसिवा, जाव वणाविदुग्गसिवा, तणाई संविय २ अ. जितने कालं पर्यंत कूटपाश बनाने का व मृग बांधने का भाव है परंतु मारनेका भाव नहीं है उम को उतने कालतक चार फिया लगती हैं. उक्त तीनों में उत मृग को परिताप दुःख दिया सो परितापनिकी क्रिया वढी. जिस को जितने कालतक कूटपाश बनाने का, वांधने का व मारने का भाव है उस को उतने कालतक पांच क्रिया ओं लगती हैं. कायिकी, अधिकरणकी, प्रवेपिकी, परितापनिकी व प्राणातिपातिकी. इसी कारन से 20 अहो गौतम, उक्त पुरुष को काचित् तीन, काचित वार व काचित् पांच क्रियाओं लगती हैं ॥ ४ ॥ पहिला मृतकका आठवा उद्देशा भावार्थ 62 :
शब्दार्थ OYO सूत्र 488 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 988 मारने से ता तब मे० उस पु० पुरुष को का• कायिकी अ० अधिकरण की प० प्रवेपिकी पर परितापनिकी च. चार कि० क्रिया पु० स्पर्शी जे. जो भ. भव्य उ० बनाने से 40 बंधन करने से मा० मारने से ता. वहांलग से उस पु० पुरुष को का० कायिकी जा० यावत् पा. प्राणातिपातिकी पं० पांच कि० क्रिया पु० स्पर्शी से० वह ते. इसलिये जा. यावत पं० पांच कि क्रिया ॥ ४॥ पु० पुरुष क० कच्छ जा० यावत् व० वन वि० विषम त तृण अ० ऊंचा करके अ० अग्निकाय से पुरिसे काइयाए अहिगरणयाए, पाओसियाए, परियावाणियाए, चउहि किरियाहिं पुढे । जे भविए उडवणयाएवि बंधणथाएवि, मारणयाएवि तावचणसे पुरिसे काइ. याए जाव पाणाइवाय किरियाए पंचहि किरियाहिं पट्टे । से तेणटेणं जाव पंचकिरिए ॥ ४ ॥ पुरिसेणं भंते ! कच्छंसिवा, जाव वणाविदुग्गसिवा, तणाई ऊसंविय २ अ- जितने कालं पर्यंत कूटपाश वनाने का व मृगवांधने का भाव है परंतु मारने का भाव नहीं है उम को उतने कालतंक चार क्रिया लगती हैं. उक्त तीनों में उस मृग को परिताप दुःख दिया मो परितापनिकी क्रिया वढी. जिस को जितने कालतक कूटपाश बनाने का, वांधने का व मारने का भाव है उस को उतने कालतक पांच क्रिया ओं लगती हैं. कायिकी, अधिकरणकी, प्रवेपिकी, परितापनिकी व प्राणातिपातिकी. इसी कारन में अहो-गौतम ! उक्त पुरुष को काचित् तीन, काचित वार व चित् पांच क्रियाओं लगती हैं ॥ ४॥ ATE पहिला शतकका आठवा उद्देशा88982 भावार्थ शब्दार्थ २०२ सूत्र 48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी माता है जा. यावत् से वह पुः पुरुपवर से पु० स्पर्शा से०. वह गो० गौतम का करते को का किया में सांथते को सं० मापा नि० खींचते को नि० खींचा नि० निकलने को नि० निकला ५० कहना है. हा भगवन् क० करते को किया जा. यामत् नि० किला ने जो मि• मृगको मा० हने से वह मि. मृगौर से पु० स्पर्श जे. जो ० पुरुप को मा हो से० य: पु० पुरुषपैर से पु० - स्पर्श अं. जाव से पुरिसरेणं पुढे । सेणूणं गायमा ! कज्जमाणे कडे, संधेजमाणे संधिए, नि- ब्बत्तिजमाणे निव्वत्तिए, निसिरिजमाण निसिटेत्ति वत्तव्वंसिया । हता भगवं ! क- जमाणे कडे जाव निसट्टेत्ति वत्तव्वंसिया । से तेण?णं गोयमा ! जे मियंमारेइ से मियवरेणं पुढे, जे पुरिसं. मारेइ से पुरिसवरेणं पुढे. अंतो छण्हं मासाणं मरइ. मृग को मारा उस को मृग का वैर हुआ. ो भगवन् ! यह अर्थ किस तरहने है ? अहो गौतम ! 'कज- माणे कडे' करते हुवे को किया अर्थातू धनुष्य बाण करने लगा सो किया, 'संविजमाणे संधिए' धनुष्य घाण मांधनेलगा सो मंधा, 'नित्तिजमाणे निबत्तिए धनुष्य स्वीचने लगा सो खींचा व 'निसरिजमाणे निसि? ' धनुष्य में से बाण नीकलोठगा सो नीकला देना कहा जा सकता है: हां - भारन् ! करते. को किया हुना यावत् निकलने को निकला हुवा कहा जा सकता है. इसी मे अहो गौतम ! जो मृग मारता वह मृग का वैर में सीता है अर्थात् उन मृग मारनेवाले को मृग का पैर लगता है और: पुरुष अाराजाबादुर नाला मुखदेवनहायनी गालामलादनी . भावार्थ .
पार्ष ) अंदर में छ० छमास की प० मरे का० कायिकी जा. यावत् पं० पांचक्रिया पु० स्पर्शे वा० बाहिर छ. Do छमाम की म० मरे च० चारक्रिया पु० स्पर्शे ॥ ७ ॥ पुं० पुरुष भ० भगवन् पु. पुरुष को स० भाला से मं० नांये मसतः के पा० हस्त मे अ० असिमे सी० शीर्ष छि० रेखदे त० तब से उस पु० पुरुष को क कितनी कि क्रिया गो गौतम जा. जब से वह पु. पुरुष ते० उस पु० पुरुष को सः पंचमांग विवाहपत्ति (भगवती) सूत्र - काइयाए जाव पंचहि किरियाहिं पुढे : बाहिं छण्हं मासाणं मरइ, काइयाए जाव पा- रियावणियाए चउहि किरियाहिं पुढे ॥ ७ ॥ पुरिसेणं भंते ! पुरिसं सत्तीए समभि- संधेजा सयपाणिणावा से असिणा सीसं छिंदेजा । तओणं भंते ! से पुरिसे कइकि- । - पहिला शतकका आठवा उदेशाg><ARA भावार्थ मारनेवाले को पुरुष का वैर लगता है. वह मृग यदि छ मांस की अंदर मरजावे तो घातक पुरुष को पांच क्रियाओं लगती हैं क्यों की छ मासतक मृग को प्रहार हेतुक मरण होता है. छ मास पीछे यदि वह मृग मरजाये तो प्राणातिपातिकी क्रिपा छोडकर अन्य चार क्रियाओं लगनी हैं * ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! कोई गम्प शक्ति माकोस. अथरा अपने हस्त में रहा हुना खड्ग से किती पुरुष का शिरच्छेदन करे तब • यहांपर व्यकारकी अपेक्षा प्राणातिपातिकी क्रिया मात्र व्यपदेश बतानेको कहीहै. अन्यथा जव प्रहारहेतुक मरण होवे उस समय उत्त वधकको कायिकी यावत् भाणातिपातिको पांच क्रिया लगती है। ela yo २०४ सत्र १०. अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 83 शब्दार्थी शक्तिमे स० सांधे स० स्वतः के पा० इस्त से अ० असिसे सी० शीर्प छि• छेदे ता० तब से उस पु० पुरुष को का० कायिकी जा० यावत् पा. माणातिपातिकी पं० पांच कि०.क्रिया पु० स्पर्श आ. नजदीक व० वध करने वाला अ० आकांक्षा रहित पु० पुरुषवैर से पु० स्पर्शा ॥ ८ ॥ दो दो भं भगवन् पु० पुरुष स० सरिखे स० सरिखी त्वचावाले स० सरिखी वयवाले स० सरिखे भं. भंडोपकरणवाले अ. अन्योन्य स० साथ मं• संग्राम सं० करे त० तहां ए० एक पु० पुरुप प० जीते ए. एक पु. पुरुप रिए ? गोयमा ! जावंचणं से पुरिसे ते पुरिसं सत्तीए समभिसंधेइ सयपाणिणावा से असिणा सीसं छिंदइ तावंचणं से पुरिसे काइयाए जाव. पाणाइवाए पंचाहकिरियाहिं पुढे । आसण्ण बहएणय अणकंखवत्तीएणं पुरिसबे रेणं पुढे ॥ ८ ॥ दो भंते ! पुरिसा सरिसया, सरित्तया, सरिसव्वया, · सरिसभंडमत्तोवगरणा अण्णमण्णणं सद्धिं संगाम संगामेइ, तत्थणं एगे पुरिसे पराइणइ, एगे पुरिसे पराइजइ, से कहमेयं भंते! अहो भगवन् ! उम पुरुष को कितनी क्रियाओं लगती हैं.? अहाँ गौतम ! जितने कालतक वह पुरुष किसी अन्य पुरुष का शक्ति या खड्गसे शीर्प का छदन करता है उतनाकाल तक उस पुरुप को कायिकीआदि पांच क्रियाओं लगनी हैं. आसन्न वधक पाप की निवृत्ति के लिये निरपेक्ष वृत्ति से वैर का बंधन करता ॥ ८॥ अो भगवन ! शरीर के प्रमाण में व कशलता में सरिखे. सरीस्वी वयचाले, सरीखे भंडोप * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालामसादनी* शब्दाथे सूत्र 298 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 83 प० पराजयपामे से वह क० कैसे भ० भगवन ए. ऐसे गोल गौतम स० वीर्यवन्त १० जीते अ० अवी- यवन्त प०पराजयपामे वी०वीर्य ववधयोग्य क कर्म नो नहीं व बंधे नो नहीं पु० स्पर्शे जा. यावत् नो० नहीं, अ० सन्मुख हुवे णो नहीं उ० उदयआये उ० उपशान्तपामे से वह प० जीतता है ज. जीस का बी० वीर्य व० वयोग्य क० कर्म य० बंधे जा. यावत् उ० उदयआये नो• नहीं उ० उपशमें भ० एवं गोयमा ! सीरिए पराइणइ,अवीरिए पराइजइ । से केणटेणं जाव पराइजइ गोयमा ! जस्सणं वीरियवझाई कम्माई णोबढाईणो पुट्ठाई जाव नो आभिसमण्णागयाई, णो उदिण्णाई वसंताई भवंति, सेणं पराइणइ. जस्सणं बीरियवज्झाइं कम्माई बढाई करणवाले दो पुरुष परस्पर संग्राम करे; उस में से एक पुरुष का जय होवे और दूसरा पुरुष का पराजय होवे. अहो भगवन् ! इस तरह जय पराजय होनेका क्या कारन? अहो गौतम ! वीर्यवंत पुरुष का जय हुवा और वीर्य रहित पुरुष का पराजय हुवा. अहो भगवन्त ! वीर्यवन्त पुरुप का जय आर वीर्य रहित पुरुष का पराजय होने का क्या कारन ? अहो गौतम ! वीर्य की घात करनेवाले कर्म पुद्गलों का बंध जिसने नहीं किया होवे, जिन को नहीं स्पर्श होवे, यावत् उदय में नहीं आये होवे वैसे ही उदी- रणा से उदय में नहीं लाये होवे परंतु उपशान्त रहे हुवे होवे, उस को जय होता है और जिस पुरुपको वीर्य की बात करनेवाले कर्म पुद्गलों बंधे हुवे होवे यावत् उदीरणा से उदय में आये होवे उस पुरुष का पराजय 388 पहिला शतक का आठवा. उद्देशा 43 भावार्थ . २०४ मात्र 4. अनुवादक बालग्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दार्थ शक्तिमे स० सांधे स० स्वतः के पा० हस्त से अ० असिसे सी. शीर्प छि• छेदे ता. तब से उस पु० पुरुष को का० कायिकी जा० यावत् पा० प्राणातिपातिकी पं० पांच कि० क्रिया पु० स्पर्शे आ नजदीक व० वध करने वाला अ० आकांक्षा रहित पु० पुरुपवर से पु० स्पर्शा ।। ८ । दो० दो भन्भगवन् पु० पुरुष स० सरिखे स० सरिखी त्वचावाले स० सरिखी वयवाले स० सरिखे भं. भंडोपकरणवाले अ० अन्योन्य स० साथ मं• संग्राम सं० करे त० तहां ए० एक पु० पुरुप ५० जीते ए० एक पु. पुरुष "रिए ? गोयमा ! जावंचणं से पुरिसे तं पुरिसं सत्तीए समभिसंधेइ सयपाणिणावा से असिणा सीसं छिंदइ तावंचणं से पुरिसे काइयाए जाव पाणाइवाए पंचर्हिकिरियाहिं पुढे । आसण्ण वहएणय अणवखवत्तीएणं पुरिसबे रेणं पुंटे ॥ ८ ॥ दो भंते ! पुरिसा सरिसया, सरित्तया, सरिसव्वया, सरिसभंडमत्तोवगरणा अण्णमण्णणं सदि संगाम संगामेइ, तत्थणं एगे पुरिसे पराइणइ, एगे पुरिसे पराइजइ, से कहमेयं भंते ! अहो भगवन् ! उम पुरुष को कितनी क्रियाओं लगती हैं.? अहो गौतम ! जितने कालतक वह पुरुप किसी अन्य पुरुष का शक्ति या खड्गसे शीर्प का छदन करता है उत्तनाकाल तक उस पुरुष को कायिकीआदि पांच क्रियाओं लगनी हैं. आसन्न वयक पाप की निवृत्ति के लिये निरपेक्षं वृत्ति से वैर का बंधन करता ॥ ८ ॥ अहो भगरन ! शरीर के प्रमाण में वकालता में मरिग्वे, सरीखी वयवाले, सरीखें भंडोप ", भकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी* २०७ 8989- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 83> शब्दार्थ ते वे दु. दोप्रकार के से निश्चल आत्मा वाले अ० निश्चल आत्मा रहित त० तहां जे० नो से. शैलेशी युक्त ते वे ल० लब्धिवीर्य से स० सवीर्य क° करणवीर्य से अ० अवीर्य त० तहां जे० जो अ० अशैलशीयुक्त ते वे ल० लब्धिवीर्य में स० सवीर्य क० करणवीर्य से स० सवीर्य अ. अवीर्य से० तत्थणं जे ते असंसार समावण्णगा तेणं सिद्धा, सिहाणं अवीरिया तत्थणं सूत्र जे ते संसार समावण्णगा ते दुविहा पण्णता तंजहा सेलेसि पडिवण्णगाय, असेलेसि पडिवण्णगाय । तत्थणं जे ते सेलोस पडिवण्णगा तेणं लाद्ववीरिएणं स- बीरिया, करणवीरिएणं अवीरिया । तत्थणं जे ते असेलेसि पडिवण्णगा, तेणं ल. द्विवीरिएणं सवीरिया, करणवीरिएणं सवीरियावि अवीरियावि. सेतेणटेणं गोयमा भावार्थ अभाव है इसलिये वे वीर्य रहित हैं और जो संसार समापनक हैं उन के दो भेद कहे हैं. १ शैलेशी प्रतिपन्न सो चउदहवें गुणस्थानवर्ती अयोगी केवली के जीव और २ अशैलेशी सो प्रथम गुणस्थान से तेरहवे गुणस्थानवी जीव. उस में चउदहवे गुणस्थानवर्ती शौलेशी जीव लेब्धि वीर्य की अपेक्षा से वीर्य सहित और करण वीर्य की अपेक्षा से वीर्य रहित हैं. प्रथम गुणस्थान से तेरहवे गुणस्थानवी अशैलेशी प्रतिपन्न जीव लब्धि वीर्य से वीर्य सहित हैं और करण वीर्य से वीर्य सहित वं वीर्य रहित हैं. इस कारन से अहो वीतियय के क्षय से जो वीर्य होता है सो लब्धिवीर्ग २ उत्थानादि क्रिया सो करण वीर्य. पहिला शतक का आठवा उद्देशा 9881 २०६ 42 अनुवादक-वालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी- शब्दार्थ से वह पु० पुरुप प० पराजित है से वह ते० इसलिये गो० गौतम ए० एसा क. कहा जाता है। स० वीर्यवन्त प० जीतता है अ० वीयरहित प० पराजय पामता है ॥९॥ जी०जीव भ०भगवन् कि क्या स० सवीर्य अ० अवीर्य गो. गौतम स. सवीर्य अ अवीर्य से० वह के० कैसे भभगवन् ए ऐसा • कहा जाता है गो० गौतम जी० जीच. दु० दोपकार के सं० संसार को प्राप्त अं० संसार से रहित त तहाँ ने जो अ० संसार रहित ते वे सि० सिद्ध सि. सिद्ध अ० अवीर्य त. तहां ने जो सं० संसारो जाव उदिण्णाई नो उवसंताई भवंति सेणं पुरिसे पराइज्जइ, से तेण?णं गोयमा ! एवं वुच्चइ सीरिए पराइणइ, अवीरिए पराइजइः ॥ ९ ॥ जीवाणं भंते किंसवीरया अवीरिया ? गोयमा ! सीरियावि, अवीरियावि । से केणटेणं "भंते ! एवं वुच्चइ ? गोयमा : जीग दुविहा पण्णत्ता तंजहा संसारसमावण्णगाय असंसारसमावण्णगाय । होता है. इसलिये ऐसा कहागया है कि वीर्यवंत पुरुष का जय और वीर्य रहित पुरुष का पराजय होता है || २. ॥ अब वीर्य का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ? जीव क्या वीर्य सहित है या वीर्य रहित है ? अहो गौतम ! वीर्य सहित भी है और वीर्य रहित भी है.. अहो भगवन् ! जीव वीर्य सहित भी है और वीर्य रहित भी है यह किस तरह से ! अहो गौतम ? जीव के दो भेद कहे हैं. संसार समा- पनक और असंसार समापनक. जो असंसार समापनक हैं वे सिद्ध' कहाते हैं. उन को करण वीर्य का * मकासकःराजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालाप्रसादजी * भावाथ २०७ सत्र 38 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8-8> शब्दार्थ ते वे दु० दोपकार के से निश्चल आत्मा वाले अ० निश्चल आत्मा रहित त० तहां जे० नो से. शैलेशी युक्त ते वे ल० लब्धिवीर्य से स. सवीर्य को करणवीर्य से अ० अवीर्य त० तहां जे० जो अ० अशैलशीयुक्त ते वे ल० लब्धिवीर्य से स० सवीर्य क० करणवीर्य से स० सवीर्य अ० अधीर्य से. तत्थणं जे ते असंसार समावण्णगा तेणं सिद्धा, सिद्धाणं अवीरिया तत्थणं जे ते संसार समावण्णगा ते दुविहा पण्णता तंजहा सेलेसि पडिवण्णगाय, असेलसि पडिवण्णगाय । तत्थणं जे ते सेलोस पडिवण्णगा तेणं लाडवीरिएणं स- वीरिया, करणवीरिएणं अवीरिया । तत्थणं जे ते असेलेसि पडिवण्णगा, तेणं ल- द्विवीरिएणं सवीरिया, करणवीरिएणं सवीरियावि अवीरियावि. सेतेणटेणं गोयमा भावार्थ अभाव है इसलिये वे वीर्य रहित हैं और जो संसार समापनक हैं उन के दो भेद कहे हैं. १ शैलेशी प्रतिपन्न सो चउदहवे गुणस्थानवर्ती अयोगी केवली के जीव और २ अशैलेशी सो प्रथम गुणस्थान से तेरहवे गुणस्थानवर्ती जीव. उस में चउदहवे गुणस्थानवर्ती शौलेशी जीव लेब्धि वीर्य की अपेक्षा से वीर्य सहित और करण वीर्य की अपेक्षा से वीर्य रहित हैं. प्रथम गुणस्थान से तेरहवे गुणस्थानवर्ती अशैलेशी मतिपन्न जीच लब्धि वीर्य से वीर्य सहित हैं और करण वीर्य से वीर्य सहित वं वीर्य रहित हैं. इस कारन से अहो १ वीतिराय के क्षय से जो वीर्य होता है सो लब्धिवीर्य २ उत्थानादि क्रिया सो करण वीर्य.. 389 पहिला शतक का आठवा उद्देशा 88888 5 शब्दाथ 16 0७ २०८ 43 अनुवादक-बालब्रह्मचारी, मुनि श्री अमोलक ऋषिजी वह ते इसलिये गो० गौतम ए. ऐसा बु. कहा जाता है ॥ १० ॥ ने०. नारकी भं० भगवन् कि क्या म. सवीर्य अ० अवीर्य गो. गौतम ने०. नारकी ल०. लब्धिवीर्य से स० सवीर्य क. करणवीर्य से स. सवीर्य अ० अवीर्य से वह के० कैसे गो गौतम, जे० जिस ने नारकी को अ० है उ० उत्थान क० कर्म व० वल वी० वीर्य पु०. पुरुषात्कार प०पराकम तेल्वे ने० नारकी ल० लब्धिवीर्य से स० सवीर्य क० करणवीर्य से स.सवीर्य जे०जो ने नारकी को न० नहीं है.उ० एव वुच्चइ जीवा दुविहा प० तं० सवीरियावि, अवीरियावि ॥ १० ॥ नेरइयाणं. भंते किं सवीरिया अवीरिया ? गोयमा नेरइया लाईवीरिएणं सीरिया, करणवीरिए- णं सवीरियाय अवीरियाय। सेकेण?णं?गोयमा! जेसिणं नेरइयाणं आत्थि-उठाणे, कम्मे बले, वीरिए पुरिसकार परक्कमे तेणं नेरइया लाईवीरिएणवि सवीरिया, करणवीरिएण गौतम ! ऐसा कहा है कि जीव वीर्य सहित व वीर्य रहित हैं ॥ १० ॥ अहो भगवनू । क्या नरक के जीव वीर्य सहित हैं या वीर्य रहित हैं ? अहो गौतम ! नरकके जीव लब्धि वीर्य से वीर्य सहित हैं और करण वीर्य से वीर्य सहित व वीर्य रहित हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से ऐसा कहागया है.. अहो गौतम ! जिन नारकियों को उत्यान, कर्म, वल वीर्य पुरुषात्कार व पराक्रम हैं वे नारकी लब्धि वीर्य से वीर्य सहित हैं और करण वीर्य से भी वीर्य सहित हैं. और जो नारकी उत्थानादि रहित हैं. वे लब्धि * प्रकाशक-राजांबहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी वाथ . -- -- २०९ ५३३ पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) मूत्र 887 शब्दार्थ उत्थान जा. यावत् प० पराक्रम ते वे ने नारकी ल• लब्धिवीर्य से स. सीर्य क. करणवीर्य से अ०- अवीर्य से वह ते० इसलिये ज. जैसे ने० नारकी जा. यावत् पं० पंचेन्द्रिय ति० तिर्यंच म० मनुष्य ज. जैसे ओ० औधिक जीव न• विशेप सि० सिद्ध २० वर्जना भा० कहना वा० वाणव्यतर जो ज्यातिषी वे. वैमानिक ज. जैसे ने नारकी से वह ए० ऐसे भं० भगवन ॥ १ ॥ ८ ॥ सूत्र वि सीरिया । जेसिणं नेरइयाणं नत्थि उट्ठाणे जाव परक्कमे तेणं नेरइया लाडवी- रिएणं सवीरिया, करणवीरिएणं अवीरिया । से तेणटेणं जहा नेरइया एवं जाव पंचिं. दिय तिरिक्ख.जोणिया । मणूसा जहा ओहिया जीवा नवरं सिद्ध वजा भाणियन्या । वाणमंतर जोइस वेमाणिया जहा नेरइया ॥ सेवं भंते २ त्ति ॥ पढमेसए अट्ठमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ १॥८॥ भावार्थ वीर्य से वीर्य सहित हैं परंतु करण वीर्य से वीर्य रहित हैं इस लिये अहो गौतम ! ऐसा कहागया कि नारकी के जीव वीर्य सहित व वीर्य रहित है. जैसा नारकी का कहा वैसे ही मनुष्य छोडकर अन्य सब दंडक का कहना मनुष्य का समुच्चय जीव जैसे कहना परंतु समुच्चय जीव के दंडक में सिद्ध है यह यहां नहीं कहना अहो भगवन् ! आपने जो कहा व सत्य है यह पहिला शतकका आठवा ॥१॥८॥ पहिला शतकका आठवा उद्देशा 98880- * मैं उतना Gro शब्दाथ २०८ मूत्र 4. अनुवादक-पालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 800 वह ते इसलिये गो० गौतम ए. ऐसा चु० कहा जाता है. ॥ १० ॥ ने नारकी भ०) भगवन् किं. क्या म० सवीर्य अ० अवीर्य गो. गौतम ने. नारकी ल०. लब्धिवीर्य से स.. सवीर्य क. करणवीर्य से स० सवीर्य अ० अवीर्य से. वह के० कैसे गो. गौतम.जे..जिस ने नारकी को अ० है उ० उत्थान क० कर्म व० बल वी० वीर्य पु. पुरुषात्कार प०पराक्रम तेल्वे ने० नारकी ल० लब्धिवीर्य से स० सवीर्य क. करणवीर्य से स सवीर्य जे०जो ने नारकी को न० नहीं है.उ० एव बुच्चइ जीवा दुविहा प० तं० सीरियावि, अवीरियावि ॥ १० ॥ नेरइयाणं. भंते किं सवीरिया अवीरिया ? गोयमा नेरइया लाडवीरिएणं सीरिया, करणवीरिए- णं सवीरियाय अवीरियाया सेकेणटेणं?गोयमा! जेसिणं नेरइयाणं आत्थि-उठाणे, कम्मे चले, वीरिए पुरिसकार परक्कमे तेणं नेरइया लाई वीरिएणवि सीरिया, करणवीरिएण गौतम ! ऐसा कहा है कि जीव वीर्य सहित व वीर्य रहित हैं ॥ १. ॥ अहो भगवनू । क्या नरक के जीव वीर्य सहित हैं या वीर्य रहित हैं ? अहो गौतम ! नरकके जीव लब्धि वीर्य से.वीर्य सहित हैं और करण वीर्य से वीर्य सहित व वीर्य रहित हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से ऐसा कहागया है ? अहो गौतम ! जिन नारकियों को उत्यान, कर्म, वल. वीर्य पुरुषात्कार व पराक्रम हैं वे नारकी लब्धि वीर्य से वीर्य सहित हैं और करण वीर्य से भी वीर्य सहित हैं. और जो नारकी उत्थानादि रहित हैं, वे; लन्धि मकांशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी मावार्थ * जा. यावत् मिथ्यादर्शन शल्य के वे० निवर्तने से ए. ऐसे खः निश्चय गो• गौतम जी०जीव ल. लघुत्व को आ० आते हैं ॥ २ ॥ ए. ऐसे सं० संसार था. बहुत क० करे प० थोडा क० करे दी० दीर्घ क० ० करे ह० छोटा क० करे अ० वारंवार भ्रमण करे वी० तीरे १० प्रशस्त च० चार अ० अप्रशस्त च० २१.१ सूत्र 4333 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 893 गोयमा पाणाइवायवेरमणणं जाव मिच्छादसणसल्ल वेरमणेणं एवं खलु गोयमा ! जीवा लहुयत्तं हव्वमागच्छंति ॥ २ ॥ एवं संसार आउली करोति, एवं परित्ती करेंति, दीही करेंति, हस्सी करेंति, हस्सी करेंति, एवं अणुपरियति, एवं अवर्णवाद बोलना १७ माया मृषा और १८ मिथ्यादर्शन शल्य-देवगुरु धर्म से भी मन का मिथ्यात्व नाश नहीं होवे, इन अठारह कारनों से जीव अधोगति गमनरूप गुरुत्व धारण करता है ॥ १॥ अहो भगवन् ! जीव लघुत्व कैसे धारण करता है ! अहो गौतम ! माणातिपात से निवर्तना यावत् मिथ्या दर्शन शल्य से निवर्तना इन अठारह कारनों से जीव लघुत्व प्राप्त कर सकता है ॥२॥ उक्त अठारह पाप स्थानों के आचारण से जीव संसार प्रचुर करे, संसार परत करे, दीर्घ करे, इस्त्र करे, संसार में वारंवार परिभ्रमण करे और संसार से उत्तीर्ण होवे. इन आठ में से लघुत्व, परित्त, हस्तत्व व संसार का उल्लंघन ऐसे चार बोल प्रशस्त और गुरुत्व, संसार का प्रचूर करना, दीर्घ करना व संसार का उल्लंघन - पहिला शतक का नववा उद्देशा890987 भावार्थ शब्दार्थ २१० सूत्र 12 अनुवादक-बालबामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी - क० कैसे भं भगवन् जी० जीव ग० गुरुत्व को ह० शीघ्र आ० भाते हैं गो० गौतम पा० प्राणाति- पात से मु० मृपावाद से अ० अदत्तादान मे० मैथुन १० परिग्रह को क्रोध मा० मान मा० माया लो० लोभ पे० राग दो० द्वेप क० कलह अ० कलंक चडाना पे० चुगली र० रति अ० अरति प० परपरिवाद मा० कपट मि० मिथ्यादर्शन शल्य ए. ऐसे ख० निश्चय जी० जीव ग. गुरुत्व को ह. शीघ्र आ० आते हैं ॥ १ ॥ भं० भगवन् जी० जीव ल० लघुत्व ह० शीघ्र आ० आते हैं गो गौतम पा० प्राणातिपात कहणं भंते ! जीवा गरुयत्तं हव्वमागच्छंति ? गोयमा! पाणाइवाएणं, · मुसावाएणं, आदिन्न, मेहुण, परिग्गह, कोह, माण, माया, लोह, पेज, दोस, कलह, अब्भक्खाण, पेसुन्न, रति, अरति, परपरिवाए, मायामोस, मिच्छादसणसल्लेणं, एवं खलु गोयमा ! जीवा गरुयत्तं हव्वमागच्छंति ॥ १ ॥ कहणं भंते ! जीवा लहुयत्तं हव्वमागच्छति ? आठवे उद्देशे के अंत में वीर्य का वर्णन किया है. और जीव वीर्य से भारी होता है इसलिये आगे गुरुत्व का अधिकार चलता है. अहो भगवन् ! अधोगति गमनरूप गुरुत्ल किस तरह से जीव प्राप्त करे अहो गौतम ! १ माणातिपात जीव का अतिपात से, २ मृपावाद असस बोलने से ३ अदत्तादान-चौरी करने से ४ मैथुन से ५ परिग्रह ६ क्रोध ७ भान ८ माया ९ लोभ १० राग ११ द्वेष १२ कलह १३ अभ्याख्यान-कलंक चढाने से १४ पैशुन्य-चुगली करने से १५ रति अरति १६ परपरिवाद अन्य का * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी * CYO पर्थ 0.9 जा. यावत् मिथ्यादर्शन शल्य के वे० निवर्तने से ए. ऐसे खः निश्चय गो गौतम जी०जीव ल० लघुत्व को आ० आते हैं ॥२॥ ए. ऐसे सं० संसार आ० बहुत क० करे प० थोडा क० करे दी० दीर्घ क० करे ह० छोटा क० करे अ० वारंवार भ्रमण करे वी. तीरे ५० प्रशस्त च० चार अ० अप्रशस्त च० २११ सूत्र गोयमा ! पाणाइवायवेरमणेणं जाव मिच्छादसणसल्ल वेरमणेणं एवं खलु गोयमा ! जीवा लहुयत्तं हव्वमागच्छति ॥ २ ॥ एवं संसार आउली करेंति, एवं परित्ती करेंति, दीही करेंति, हस्सी करेंति, एवं अणुपरियति, एवं 28.3 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 3 83- पहिला शतक का नववा उद्देशा भावार्थ अवर्णवाद बोलना १७ माया मृषा और १८ मिथ्यादर्शन शल्य-देवगुरु धर्म से भी मन का मिथ्यात्व नाश नहीं होये, इन अठारह कारनों से जीव अधोगति गमनरूप गुरुत्व धारण करता है ॥ १॥ अहो भगवन् ! जीव लघुत्व कैसे धारण करता है ? अहो गौतम ! माणातिपात से निवर्तना यावत् मिथ्या दर्शन शल्य से निवर्तना इन अठारह कारनों से जीव लघुत्व प्राप्त कर सकता है ॥२॥ उक्त अठारह ० १० पाप स्थानों के आचारण से जीव संसार प्रचुर करे, संसार परत करे, दीर्घ करे, इस्व करे, संसार में वारंवार परिभ्रमण करे और संसार से उत्तीर्ण होवे. इन आठ में से लघुत्व, परित, हस्तत्व व संसार का उल्लंघन ऐसे चार घोल प्रशस्त और गुरुत्व, संसार का प्रचूर करना, दीर्घ करना व संसार का उल्लंघन yo व्दार्थ सूत्र अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी चार ॥ ३ ॥ स. मानरा 3. मामानांतर in TMTगुर, या पाना भार गो. गौतम नो० नहीं गुरु नो० नहीं ला नो नदी गुमला : भाग सा • क्या गो० गौतम नो० नहीं गुरु नो० नीलगु ग. गुरूला नाही भागापरा घ. धनवात स० सातया २० वनोदधि म० मानी पु. भी उ० भाकामांतर न. वीईवयंति,पसत्थाचत्तारि अपसत्था चत्तारि॥३॥सत्तमेणंभंते ! उवासंतरे किंगरूप लहुए, गरुय लहुए, अगुरुय लहुए ? गोयमा ! नोगरुए, नालहुए, नो गरुय लहुए, अगरय लहुए सत्तमेणं भंते ! तणुवाए किं गरुए, लहुए, गम्यलहुए, अगरयलहुए। गोयमा ! नोगरुए, नोलहुए, गरुय लहुए, नो अंगरुय लहुए एवं सत्तमे वार्थ नहीं करना ये चार बोल अप्रशस्त कहाये गये हैं ॥ ३ ॥ जीव के गुरुत लघुत्व से आकाशादिक का गुरुत्व लघुत्व कहते हैं. १ अहो भगवन् ! सातवी नरककी नीचेका आकाशान्तर क्या गुरुत, लघुत्व, गुरुल- व अगुरुलघुत्ववाला है ? अहो गौतम ! सातवी नरक का आंकाशान्तर गुरु, लघु व गुरुलयु नहीं है परंतु अगुरुलघु अहो भगवन् ! सातवी नरक की नीचे का तनुवात क्या गुरु, लघु, गुरुलघ व अंगुरुलघु है ? अहो गौतम ! सातवा तनुवात गुरु नहीं है, लघु नहीं है परंतु गुरु लघु है और अगुरु लघु नहीं है. ऐसे ही सातवां धनवात, सातवा घनोदधि, सातवी पृथ्वी व सव आकाशान्तर को सातवा *ARATHIIर माला मुबदेवसहायनी मालाप्रसादजी * घुत्व, ब्दिार्थ nia सातवा उ आकाशान्तर ज० जैसे त० तनुवात ए० ऐसे ग. गुरुलघु ग० घनवात घ. घनोदांध पु० पृथ्वी दी० द्वीप स० सागर वा० क्षेत्र ।। ४ ॥.ने० नारकी भं भगवन् कि० क्या ग० गुरु जा यावत् अ० अगुरुला गो० गौतम नो० नहीं गुरु नो नहीं लघु गु० गुरुलघु अ० अगुरुलयु से० वह के. २१३ सूत्र भावार्थ ॐ पंचमांग विवाह पाणति (भगवती) मूत्र घणवाए, सत्तमे घणोदही, सत्तमा पुढवी, उवासंतराई सन्वाइं जहा सत्तम उवासं- तरे। जहा तणुवाए एवं गरुयलहुए घणवाय घणउदहि, पुढवी, दीवाय, सागरा, वासा, ॥ ४ ॥ नेरइयाणं भंते ! किं गरुया जाव अगरुलहुया ? गोयमा! नो गुरुया, नोलहुया, गुरुयलहुयावि, अगरुयलहुयायि । सेकेणटेणं ? गोयमा ! वेउन्विय आकाशान्तर जैसे कहना. अर्थात् जैसे सातवा आकाशान्नर गुरु, लघु, व गुरुलघु नहीं है परंतु अगुरुलघु है वैसेही इस का जानना. जैप्ते तनुवात का कहा वैमेही घनवात, घनोदधि, पृथ्वी, द्वीप, सागर व भरतादि । क्षेत्र का जानना अर्थात् जैसे तनुवात गुरुलघु है वैसे ही उक्त सब पदार्थों गुरुलघु हैं ॥ ४ ॥ अहो भगवन ! नारकी क्या गुरु, लघु, गुरुलघु या अगुरुलघु हैं ? अहो गौतम ! गुरु भी नहीं हैं, लघु भी नहीं हैं, परंतु गुरुलघु व अगुरुलघु हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से नारकी गुरु व लघु नहीं हैं गुरुलघु व अगुरुलघु हैं ? अहो गौतम ! वक्रेय व तेजस शरीर की अपेक्षा से नारकी गुरुलघु हैं * पहिला शतक का नववा उद्देशा , 60 शब्दार्थ २१.२ सूत्र * अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 चार ॥ ३ ॥ स० सातवा उ० आकाशांतर किं. क्या ग० गुरु ल० लघु ग० गुरुलघु अ० अगुरुलयु गो गौतम नो० नहीं गुरु नो नहीं लघु नो० नहीं गुरुलघु अ० अगुरुलघु स० सातवा त० ननुवात किं. क्या गो० गौतम नो० नहीं गुरु नो० नहीं लघु ग० गुरुलघु नो० नहीं अगुरुलघु ए. ऐसे म०मातवा घ० घनवात स० सातवा घ० घनोदधि स० सातवी पु० पृथ्वी उ० आकाशांतर स० सर्व ज. जैसे स० वीईवयंति,पसत्था चत्तारि अपसत्था चत्तारि॥३॥सत्तमेणं भंते ! उवासंतरे किं गरुए,लहुए, गरुय लहुए, अगुरुय लहुए ? गोयमा ! नोगरुए, नोलहुए, नो गरुय लहुए, अगरुय लहुए सत्तमेणं भंते ! तणुवाए किं गरुए, लहुए, गरुयलहुए, अगरुयलहुए। गोयमा! नोगरुए, नोलहुए, गरुय लहुए, नो अंगरुय लहुए एवं सत्तमे नहीं करना ये चार बोल अप्रशस्त कहाये गये हैं ॥ ३ ॥ जीव के गुरुत्व लघुत्व से आकाशादिक का गुरुत्व लघुत्व कहते हैं. १ अहो भगवन् ! सातवी नरककी नीचेका आकाशान्तर क्या गुरुत्व, लघुत्व, गुरुल- घुत्व, व अगुरुलघुत्ववाला है ? अहो गौतम ! सातवी नरक का आंकाशान्तर गुरु, लघु व गुरुलघु अहो भगवन् ! सातवी नरक की नीचे का तनुवात क्या गुरु, लघु, गुरुलघु व अगुरुलघु है ? अहो गौतम ! सातवा तनुवात गुरु नहीं है, लघु नहीं है परंतु गुरु लघु है और अगुरु लघु नहीं है. ऐसे ही सातवा धनवात, सानवा घनोदधि, सातवी पृथ्वी व सव आकाशान्तर को सातवा * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी * भावार्थ नहीं है परंतु अगुरुलघु २१५ ब्दार्थ ॥५॥१० धर्मास्विकाय जा. यावत् जी० जीव च० चौथापद में ॥ ६॥ पो० पुद्गलास्ति काया भं. भगवन् कि० क्या ग० गुरु ल० लघु ग• गुरुलघु अ० अगुरुलघु गो० गौतम नो नहीं गु० गुरु नो नहीं ल लघु ग गुरुलघु अ०अगुरुलयु से वह के कैसे गो० गौतम गु०गुरुलघु दद्रव्य प० प्रत्यय नो नहीं गुरु नो० नहीं ल०लघु गु गुरु लघु नो नहीं अ० अगुरुलघु अ०अगुरु लघु दन्द्रव्य प०प्रत्यय नोनहीं थिकाए चउत्थपएणं ॥ ६ ॥ पोग्गलत्थि काएणं भंते ! किं गरुए, लहुए,ग- रुयलहुए, अगुरुयलहुए ? गोयमा! नो गुरुए, नोलहुए, गुरुयलहुएवि, अगुरुयलहुएवि सेकेणटेणं ? गोयमा ! गुरुयलहुय दवाई पडुच्च णो गरुए णो लहुए, गरुय लहुए, नो अगुरुयलहुए । अगुरुयलहुय दव्वाइं पडुच्च णो गुरुए, नोलहुए, नोगुरुयल- सत्र - पंचमांग विवाह पपणत्ति (भगवती) सूत्र *88 पहिला शतर्क का नववा उद्देशा 8 भावाथे| अगुरुलघु जानना. ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! पुद्गलास्ति काय क्या गुरु, लघु, गुरुलघु या अगुरुलघु है ?अहो गौतम ! पुद्गलास्ति काय गुरु नहीं है, लघु नहीं है परंतु गुरुलघु व अगुरुलघु है ? अहो भगवन् ! किस तरह से पुद्गलास्तिकाय गुरु नहीं है लघु नहीं है परंतु गुरुलघु व अगुरुलघु है ? अहो मौतम ! औदारिक, वैकेंय, आहारक व तेजस इन गुरुलघु द्रव्य आश्रित पुद्गलास्तिकाय गुरु नहीं है, लघु, नहीं है, परंतु गुरुलयुहै. व अगुरुलघु नहीं है और कार्माण,मन व भाषाइन तीन अगुरुलघु द्रव्यकी अपेक्षा से पुङलास्तिकाव गुरु byo शब्दार्थ कैसे गो० गौतम वे वैक्रेय ते. तेजस प० प्रत्यय नो० नहीं गुरु नो० नहीं लघु ग• गुरुलघु नो० नहीं अ० अगुरुलघु जी जीव क० कर्म प० प्रत्ययिक नो नहीं गुरु नो नहीं लघु नो० नहीं गुरु गुरुलघु अ० अगुरुलघु से० वह ते० इसलिये जा. यावत् वे० वैमानिक न० विशेष ना. नाना प्रकार जा० जानना ८७ २१४ तेयाई पडुच्च नागरुया, नोलहुया, गरुयलहुया, नो अगुरुयलहुया । जीवंच कम्मंच पडुच्च नो गुरुया नो लहुया, नो गुरुयलहुया अगुरुयलहुया । सेतेणटेणं, एवं जाव वेमाणिया । नवरं णाणत्तं जाणियव्वं सरीरेहिं ॥ ५ ॥ धम्मत्थिकाए जाव जीव- प्रकाशक राजाबहादुर लाला 4 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 83 भावार्थ गुरु, लघु व अगुरुलघु नहीं हैं. और जीव व कर्म की अपेक्षा से गुरु, लघु, व गुरुलघु नहीं है परंतु अगुरु लघु है. इससे नारकी गुरुलघु व अगुरुलघु हैं. नारकी जैसे शेप सब दंडक के जीवों का जानना. मात्र शरीर में भिन्नता रहती है अर्थात् जिनको जितने शरीर होवे उनको उतने शरीर की अपेक्षा ग्रहण करनी असुर कुमारादिक को नारकी जैसे, पृथिव्यादिक में उदारिक तेजप्त व कार्माण ऐसे तीन शरीर है इसलिये यहाँपर उदारिक व तेजसकी अपेक्षा ग्रहण करनी वायुकायमें चक्रेय उदारिक व तेजसकी अपेक्षा ग्रहण करनी. ऐसे ही तियेच पंचेन्द्रिय को जानना. मनुष्य को उदारिक.वैक्रेय अहारक व तेजस की अपेक्षा मे लेना ॥ ५॥ धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकाय, आकाशास्ति काय व नीवास्ति काय में मात्र चौथापद सुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * शब्दार्थ ० लेश्या ॥ ९॥ दि० दृष्टि दै० दर्शन ना• ज्ञान अ० अज्ञान स० संज्ञा च० चौथे पद में ने जानना हे. नीचे के च. चार स० शरीर ना जानना त० तीसरे पदमें क० कार्माण च० चौथा पद में म. मनजो- ग.३० वचनजोग च० चौथा पद में का कायाजोगत तीसरापद में सा. साकारोपयोग अ अनाकारोप योग च० चौथापद में स० सर्व द्रव्य स० सर्व प्रदेश स० सर्व पर्यव ज० जैसे पो० पुद्गलास्ति काय ती. 09 सूत्र 28 पंचङ्ग हिववपण्णाति (भगवती ) सूत्र 8.23 चउत्थपएणं । एवं जाव सुकलेस्ता ॥ ९ ॥ दिट्टी-दसण-नाण-अन्नाण-सण्णाओ बउत्थपएणं णेयव्वाइं , हेडिल्ला चत्तारि सरीरा नायव्या तइएणं पएणं ॥ कम्मय उत्थएणं पएणं, ॥ मणजोगे, वइजोगे, चउत्थएणं पदेणं ॥ कायजोगो तइयएणं पएणं ॥ सागारोवओगो, अणागारोवओगो चउत्थपदेणं ॥ सव्वदव्या, सव्वपदेसा, कृष्ण लेश्याका कहा वैसे ही नील, कापुत, तेजो, पद्म व शुक्ल लेश्या का जानना. ॥ ९ ॥ दृष्टि, दर्शन, ज्ञान, अज्ञान व संज्ञा में अगुरुलघुत्व जानना. उदारिक, चक्रेय, आहारक व तेजस शरीर में गुरु लघुल और कार्माण शरीर में अगुरु लघुत्व जानना. मनयोग वचन योग में अगुरु लघुत्व और कार्य योग में गुरुलघुत्व जानना. साकारोपयुक्त व अनाकारोपयुक्त उपयोग में अगुरु लघुत्व. धर्मास्ति- कायादि पडूद्रव्य, उन के सब प्रदेश, व सब पर्यवको पुद्गलास्तिकाय जैसे गुरुलघु व अगुरुलघु दोनों कहना. 88-28- पहिला शतक का नवत्रा उद्देशा 9888 भावाथे| OYO -- शब्दार्थ २१ सूत्र 13.अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 गुः गुरु नो० नहीं ल• लघु नो० नहीं गु० गुरुलघु अ. अगुरुलघु ॥७॥ स. समय कः कार्माण वर्गणा च चौथा १० पद में ८ ॥ क० कृष्ण ले० लेश्या भ०भगवन् कि क्या ग० गुरु जा०यावद अ० अगुरुलघु गो० गौतम नो० नहीं गुरु नो० नहीलघु गु० गुरु लघु अ० अगुरु लघु से वह के• कैसे ददन्य लेश्या प० मत्यय त० तीसरापद भा० भाव लेश्या ५० प्रत्यय च० चौथा पद ए. ऐसे जायावत् सुशुरू हुए अगुरुयलहुए ॥७॥ समया कम्माणियचउत्थपएणं, ॥८॥ कण्हलेसाणं भंते ! किं गरुया जाव अगुरुयलहुया ? गोयमा ! नोगुरुया, नोलहुया, गरुयलहुयावि, अगुरुयलहुयावि । सेकेणट्टेणं ? गोयमा ! दव्वलेस्सं पडुच्च तइयपएणं, भावलेरसंपडुच्च नहीं, लघु नहीं गुरुलघु नहीं परंतु अगुरुलघु है ॥ ७ ॥ काल-अमूर्त होने से और कर्मवर्गणा के पुद्गल अगुरु लघु होते हैं ॥ ८॥ अहो भगवन् ! कृष्ण लेश्या क्या गुरु, लघु यावत् अगुरु लघु है ? गौतम कृष्णलेश्या गुरुनहीं, लयुनहीं, गुरुलघु, व अगुरु लघु है. अहो भगवन किस कारन से कृष्ण लेश्या गुरु लघु व अगुरुलघु है ? अहो गौतम ! द्रव्य लेश्या की अपेक्षासे गुरुलघु है क्यों की द्रव्य लेश्या उदारिक शरीर के वर्ण वाली है और उदारीक शरीर गुरुलघु है इसलिये कृष्ण लेश्या द्रव्य लेश्या की अपेक्षा से गुरु लघु मानना और भाव लेश्या की अपेक्षा से अगुरुलघु जानना क्यों की भाव लेश्या जो जीव परिणाम वह अमर्त होने में असफल होने का * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ ब्दार्थ 00 २१७ लेश्या ॥ ९ ॥ दि०-दृष्टि दै० दर्शन ना ज्ञान अ० अज्ञान स० संज्ञा च० चौथे पद में ने जानना हे० नीचे के च० चार स० शरीर ना० जानना त० तीसरे पदमें क० कार्माण च० चौथा पद में म. मनजो- ग.व. वचनजोग च० चौथा पद में का० कायाजोग त तीसरापद में सा. साकारोपयोग अ अनाकारोप योग च० चौथापद में स० सर्व द्रव्य स० सर्व प्रदेश स० सर्व पर्यव ज० जैसे पो० पुद्गलास्ति काय ती. चउत्थपएणं । एवं जाव सुकलेस्ला ॥ ९ ॥ दिट्टी-दसण-नाण-अन्नाण-सण्णाओ चउत्थपएणं णेयव्वाइं , हेडिल्ला चत्तारि सरीरा नायव्वा तइएणं पएणं ॥ कम्मय उत्थएणं पएणं, ॥ मणजोगे, वइजोगे, चउत्थएणं पदेणं ॥ कायजोगो तइयएणं पएणं ॥ सागारोवओगो, अणागारोवओगो चउत्थपदेणं ॥ सव्वदन्वा, सव्वपदेसा, सूत्र 8. पंचङ्ग डिववपण्णात्ति (भगवती) सूत्र 8. 84 पहिला शतक का नववा उद्देशा 988 भावार्थ ७ कृष्ण लेश्याका कहा वैसे ही नील, कापुत, तेजो, पद्म व शुक्ल लेश्या का जानना. ॥ ९ ॥ दृष्टि, दर्शन, ज्ञान, अज्ञान व संज्ञा में अगुरुलघुत्व जानना. उदारिक, वैक्रेय, आहारक व तेजस शरीर गुरु लघुत्र और कार्माण शरीर में अगुरु लघुत्व जानना. मनयोग वचन योग में अगुरु लघुत्त और काय योग में गुरुलघुत्व जानना. साकारोपयुक्त व अनाकारोपयुक्त उपयोग में अगुरु लघुत्त. धर्मास्ति- कायादि षडूद्रव्य, उन के सब प्रदेश, व सब पर्यवको पुद्गलास्तिकाय जैसे गुरुलघु व अगुरुलघु दोनों कहना. 00 ! शब्दार्थी ૨૧૮ सूत्र 4 अनुवादक-वालप्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी ४ अंततिकाल अ० अनागत काल सं०. सर्वेपना काल च० चौथा पद में ॥ १० ॥से वह ० भगवन् लोक लघुता अं० अल्पइच्छा अ० मीरहित-अ० अगृद्धी अ० अप्रतिवन्ध सं० श्रमण निः निग्रंथ को प० में: शस्त है हां -गो गौतम ला लघुता जाव्यावन् प प्रशस्त॥११॥ भगवन् अक्रोध रहित अमान रहित अ मायारहित अलोम रहित सश्रमण नि०. निग्रंथ को पं० प्रशस्त है. हा गो० गौतम अः क्रोध रहित जा०. यावत् प० प्रशस्त ॥१२॥ भ भगवन् के: कांक्षा प० द्वेष खी०क्षीण सश्रमण नि० निथ अं० अंत सव्वपज्जवा, जहा पोग्गलंत्थिकाओ, तीतद्धा अणागंयढा, सव्वडा, चउत्थएणं पए- णं ॥ १० ॥ सेणूणं भंते ! लाघविय, अप्पिच्छा; अमुच्छा; अगेही, अपडिबढया समणाणं निग्गंथीणं पसत्थं ? 'हंता गोयमा! लाघवियं जावं पसत्थं ॥ ११ ॥ सेणू- णं भंते अंकोहत्तं अमाण अमायत्तं अलोभत्तं समणाणं णिग्गंथाणं पसत्थं ? हता! अतीत काल, अनागतकाल व सर्व काल में चौथा अगुगुलघुत्व जानना ॥ १० ॥ अव गुरुलघुपने का अन्य प्रकार से प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! श्रमणं निर्ग्रन्थ को लघुता, अल्प इच्छा, अमूर्छ, अंग- दि, व अप्रतिबन्ध फ्या प्रशस्त है ? हां गौतम ! श्रमणं निर्ग्रन्थ को लघुता यावत् अप्रतिवन्ध प्रशस्त ॥ ११॥ अहो भगवन् ! श्रमण निर्ग्रन्थ को क्रोध, मान, माया व लोभ रहितपना क्या श्रेष्ठ है ? हो गौतम ! क्रोध रहितपनो यावत् लोभ रहितपना श्रमण निम्रन्थ को श्रेष्ठ हैं ॥ १२॥ अहो भगवन * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी । वार्थ दार्थ २१९ १६. पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र करने वाले अं० चरिम शरीरी व० बहुत मोहवाले पु० पाहिले वि० विचरकर अं० अथ प० पीछे सं० संवृत का कालकरे त० पीछे सिं० मिझे बु० बुझे मु० मुक्त होवे जा. यावत् अं• अंतकरे ० हां गो० गौतम क० कांक्षा प० द्वेष खी० क्षीण जा. यावत् अं० अंतकरे ॥ १३ ॥ अ० अन्य तीर्थक भं० भगवन् एक ऐसा आ० कहते हैं भा० विशेष कहते हैं प० कहते हैं प० मरूपते हैं ए० एक जी. जीव ए० एक गोयमा ! अकोहत्तं जाव पसत्थं ॥ १२ ॥ सेणूणं भंते ! कंखोपदोसे खीणे समणे णिगंथे अंतकरे भवइ अंतिम सारीरिएवा, बहुमोहे विय णं पुचि विहरित्ता, अह पच्छा संवुडे कालं करेइ तओ पच्छा सिज्झइ,बुज्झइ,मुच्चइ, जाव अंतं करेइ ? हंता गोयमा ! कंखापदोसे खीणे जाव अंतंकरेइ ॥. १३ ॥ अण्णउत्थियाणं भंते ! एवमाइक्खंति, एवं भासंति, एवं पण्णवेति, एवं परूति, एवं खलु एगे जीवे एगेणं समएणं दो आ- काक्षा-मिथ्यात्व-मोहनीय कर्मक्षय करनेवाला श्रमण क्या दुःख का अंत करनेवाला होवे ? अथवा चरिम शरीरी व पहिले मोह में रमण करके पुनः लघुभूत शुद्ध वना हुचा काल करें तो क्या सिझता, चुनता, मुक्त होता यांवत्-सव दुःखों का अंत करता है ! हां गौतम ! कांक्षा पद्वेपं का क्षय करनेवाला, चरिम शरीरी व मोहका क्षय करनेवाला संसार का अंत करे ॥ ३ ॥ अहो भगवन्! अन्यतीर्थिक ऐसा कहते हैं, वोलते हैं, हेतु सहित कहते हैं, व मरूपते हैं कि एकही जीव एक समय में दो प्रकार के आयुष्य का बंध करता है। 8- पहिला शतकका नववा उद्देशा, 8.30 भावार्थ २१८ सूत्र 42 अनुवादक-वालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिनी 85 ! शब्दार्थी अंतिकाल अ० अनार्गत काल सं० सपना काल च० चौया पद में ॥ २॥ से वह भ भगवन् लोक लघुता 'अ० अल्पइच्छा अ० मुर्छारहित अ० अगृद्धी • अप्रतिवन्ध से श्रमण निः निथ को प० प्र: शस्त ई०हां गो गौतम ला लघुता जा यावत् प०प्रशस्त॥१शाभ भगवन् अक्रोध रहित अमान रहित अं मायारहित अलोम रहित सश्रमण नि० निग्रेथ को पे० प्रशस्त है. हो गो गौतम अ. क्रोध रहित जा. यावत् प० प्रशस्त ॥१२॥ भगवन् के: कांक्षा.प. द्वेष खी क्षीण सश्रमण नि० निय अं० अंत सव्वपन्नवा, जहा पोग्गलत्थिकाओ, तीतढा अणागयढा, सवडा, चउत्थएणं पए- णं ॥ १० ॥ सेणूणे भंते ! लाघविय, अप्पिच्छा; अमुच्छा, अगेही, अपडिवढया समणाणं निग्गंथाणं पसत्य ? हेता गोयमा! लापवियं जावं पसत्थं ॥ ११ ॥ सेणू- णं भंते अंकोहत्तं अमाणत्तं अमायत्तं अलोभत्तं समणाणं णिग्गंथाणं पसत्थं ? हंता ! अतीत काल, अनागतकालं व सर्व काल में चौथा अगुगलघुत्व जानना ॥ १० ॥ अब गुरुलघुपने का अन्य प्रकार से प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! श्रमणं निर्ग्रन्थ को लंधुता, अल्प इच्छा, अमूर्छ, अंग- अप्रतिवन्ध क्या प्रशस्त है ! हाँ गौतम !'श्रमण निर्ग्रन्थ को लघुता याक्तं अंप्रतिबन्ध प्रशस्त ११ ॥ अहो भगवन् ! श्रमण निर्ग्रन्थ को क्रोध, मान, माया व लोभ रहितपना क्या श्रेष्ठ है ? हो गौतम् ! क्रोध रहितपना यावन लोभ रहितपना श्रमण निर्ग्रन्थ को श्रेय है ॥ १२॥ अंडो भान् प्रकाशक-राजाबहादुर लाला:मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * वार्थ -- २२१ सत्र 298 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8. ब्दार्थ से प० परभव का आयुष्य प वांधे प०परभवका आयुष्य पयांधने से इ०यह भवका आ०आयुप्य पयाँधे ए. ऐसे ए० एक जीवं ए. एक समय में दो० दो आयुष्य प० वांधे ३० इस भवका आ. आयुष्य ५० परभवका आयुप्य से० वह क कैसे ए. इस मं० भगवन ए. ऐसे गो० गौतम जं. जो अ० अन्यती- गोयमा ! जणते अण्णउत्थिया एवमाइक्खंति जाव परभवियाउयंच, जे ते एव माहंसु मिच्छंते एव माहंसु ॥ अहं पुण गोयमा ! एव माइक्खामि जाव परूवेमि एवं खलु एगे जीवे एगेणं समएणं एगं आउयं पकरेइ. तंजहा-इहभवियाउयंवा, परभवियाउयंवा. । जं समयं इह भावयाउयं पकरेइ णोतं समयं परभवियाउयं पकरे- इ, जं समयं परभवियाउयं पकरेइ णो तं समयं इह भवियाउयं पकरेइ, इह भविया- भावार्थ उयस्स पकरणयाए णो परभवियाउयं पकरेइ, परभवियाउयस्स पकरणयाए णो करता है तो अहो भगवन् ! यह किस तरह से है ? अहो गौतम ! अन्य तीर्थी जो ऐसा कहते हैं कि एक जीव एक समय में इस भव व परभव का आयुष्य वांधता है वगैरह जो कहते हैं सो मिथ्या है. परंतु अहो गौतम ! मैं ऐसा कहता हूँ यावत् मरूपता कि एक जीव एक समय में इस भवका अथवा परभव का ऐसे दोनों में से एक भवका आयुष्य बांधता है. जिस समय में इस भवका आयुष्य वांधता है। + उस समय में परभव का आयुष्य नहीं बांधता है और जिस समय में परभव का आयुष्य वांधता है उस 892 पहिला शतक का नवचा उद्देशा SPORTS ya शब्दार्थ २२. सूत्र १. अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री. अमोलक ऋपिनी स०समय में दोदो आ०आयुष्य प०वांधे इ०इस भवका आयुष्य प०परभवका आयुष्य नं.जिस स०समयमें इ०इस भ भवका आ० य युप प०वांधेत उस स०समयमें प० परभवका आयुष्य प०वांचे ज०जिससमयमें प० परभवका आयुष्यपघांधेत उस समयमें इ०इसभवका आयुष्य पवांधेइइस भभवका आ०आयुप्पंपांघने उयाई पगरेइ तंजहा-इहभावियाउयंच, परभवियाउयंच, । जं समयं इह भवियाउयं पकरेइ तंसमयं परमवियाउयं पकरेइ, जंसमयं परभवियाउयं पकरेइ तंसमयं इह भ- वियाउयं पकरेइ; इह भवियाउयस्स पकरणयाए परभवियाउयं पकरेइ, परभवियाउय- स्स पकरणयाए इह भवियाउयं पकरेइ, एवं खलु एगे जीवे एगे समएणं दो आउया- ई पकरेइ तंजहा इह भवियाउयंच, पर भवियाउयंच ॥ से कहमेयं भंते ! एवं ? इस में विरोध नहीं आता है क्यों की जीव स्वपर्याय समूहात्मक है. जब वह आयुष्य का बंध करता है, तब दो भव का आयुष्य वांधता है. इस भव का आयुष्य व परभव का आयुष्य, जिस समय में इस भवका आयुष्य का वध करता है उस समय में परभव के आयुष्य का बंध करता है और जिस समय में परभर के आयुष्य का वध करता है उस समय में इस भव के आयुष्य का बंध करता. है इस भव के आयुष्य का बंध करते 'परभव के आयुष्य का वध करता है और परभव के आयुष्य का बंध करते इस भव के आयुष्य का वध करता है. इसी प्रकार एकही जीव एक ही समयमें दो भव के आयुष्य का बंध * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी * वार्थी ब्दार्थ . २२३ 8. पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 3R8 उस समय में पा० पार्श्वनाथ के अ० शिष्य का कालाससित पुत्र अ० अनगार जे. जहां थे० स्थविर भ० भगवन्त ते. तहां उ० आये उ० आकर थे० स्थविर भ० भगवन्त को एक ऐसा व०कहा थे० स्थविर सा० सामायिक ण नहीं या जानते हैं थे० स्थविर सा० सामायिक का अ० अर्थ ण. नहीं या जानते हैं थे० स्थविर ५० प्रत्याख्यान न० नहीं या० जानते हैं थे० स्थविर प. प्रत्याख्यान का अर्थ ण नहीं या जानते हैं थे० स्थविर सं०संयम व संयम का अर्थ नःनहीं जानते हैं थे स्थविर सं० संबर णः थेरा सामाइयं ण याणति, थे। सामाइयस्स अटुंणयाणंति, थेरा पच्चक्खाणं नयाणंति, थेरा पच्चक्खाणस्स अटुं णयाणंति, थेरा संयम णयाणंति, थेरा संजमस्स अटुं णया- णंति, थेरा संवरं णयाणंति, थेरा संवरस्स अटुं नयाणंति, थेरा विवेगं णयाणंति, थेरा विवेगस्स अट्टू ण याणंति, थेरा विउस्सग्गं णयाणंति, थेरा विउस्सग्गस्स अटुंनया- णति ॥ तएणं ते,थेरा भगवंतो कालासवेसियपुत्तं अणगारं एवं वयासी, जाणामोणं भगवन्त को ऐसा कहने लगे. अहो स्थविर ! तुम ममताभाव रूप सामायिक नहीं जानते हो, कर्म का अनुपादान व निर्जरारूप सामायिक का प्रयोजन को नहीं जानते हो, पोरिशी वगैरह प्रत्याख्यान तुम नहीं जानते हो, आश्रय द्वार निरोध रूप प्रत्याख्यानका प्रयोजन तुम नहीं जानते हो, पृथिव्यादि को संरक्षण रूप संयम तुम नहीं जानते हो, अनाश्रवपना सो संयम का अर्थ तुम नहीं जानते हो, इन्द्रिय ॐ पहिला शतकका नववा उद्देशा 988 भावार्थ शब्दार्थ २२२ अनुवादक वालब्रह्मगरी मुनि श्री अमालक ऋपिजी 8 र्थिक ए. ऐसा आ० कहते हैं जा० यावत् प० परभवका आ० आयुप्य जे. जो ते वे ए. ऐसा आ० कहते हैं मि० मिथ्या ते वे आ० कहते हैं अ० मैं पु० फीर गो० गौतम ए० ऐसा आ' कहता जा० यावत् प० मरूपता हूं ए० एक जीव ए० एक समय में ए. एक आ० आयुष्य प० वांधे से वह ए० ऐसे भ० भगवन् भ० भगवानू गो० गौतम जा. यावत् वि. विचरते हैं ॥ १४ ॥ ते० उसकाल ते० इह भवियाउयं पकरेइ । एवं खलु एगे जीवे एगेणं समएणं एगं आउयं पकरेइ तंजहा इह भवियाउयंवा परभवियाउयंवा सेवं भंते भंतेत्ति भगवं गोयम जाव विहरइ ॥ १४ ॥ तेणं. कालेणं तेणं. समएणं पासावचिजे . कालासवेसियपुत्ते णाम अणगारे, जेणेव थेरा भगवंतो तेणेव उवागच्छइ. २ त्ता, थेरं भगवं एवं वयासी समय में इस भवका आयुप्य नहीं बांधता है. इस भव का आयुष्य बांधते परभव का आयुप्य नहीं बंधाता और परभव का आयुष्य वांधते इस भव का आयुष्य नहीं बंधाता है. इसी से. एक जीव एक समय में इस भव का अधवा परभव का ऐसे एक भव का आयुष्य वांधता है. अहो भगवन् ?. आपने कहा. सो यथा तथ्य है ऐसा गौतम स्वामी कहकर विचरने लगे ॥१४॥ उस.काल उस समय में श्री. पार्श्वनाथ स्वामी के शिष्य कालासवेसितपुत्र नामक अनगार जहां भगवंत श्री महावीर स्वामी के शिष्यथे वहां आये और स्थविर * प्रकाशक-राजाबहादुर लांला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी * वार्थ O0 २२३ 388 पंचमान विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 982- शब्दार्थ उस समय में पा० पार्श्वनाथ के अ० शिष्य का कालासवेसित पुत्र अ० अनगार जे. जहां थे० स्थविर भ० भगवन्त ते. तहां उ० आये उ० आकर थे० स्थविर भ० भगवन्त को एक ऐसा व०कहा थे० स्थविर सा० सामायिक ण नहीं या जानते हैं थे० स्थविर सा० सामायिक का अ० · अर्थ ण० नहीं या जानते हैं थे० स्थविर ५० प्रत्याख्यान न० नहीं या० जानते हैं थे० स्थविर प. प्रत्याख्यान का अर्थ ण नहीं या जानते हैं थे०स्थविर सं०संयम व संयम का अर्थ न नहीं जानते हैं ये स्थविर सं० संबर णः थेरा सामाइयं ण याणति, थेरा सामाइयस्स अटुंणयाणंति, थेरा पच्चक्खाणं नयाणंति, थेरा पच्चक्खाणस्स अटुं णयाणंति, थेरा संयमं णयाणंति, थेरा संजमस्स अटुं गया- गंति, थेरा संवरं णयाणंति, थेरा संवरस्स अटुं नयाणति, थेरा विवेगं णयाणंति, थेरा विवेगस्स अटुं ण याणंति, थेरा विउस्सग्गं णयाणंति, थेरा विउस्सग्गस्स अटुंनया- णंति ॥ तएणं ते थेरा भगवंतो कालासवेसियपुत्तं अणगारं एवं वयासी, जाणामोणं भावार्थ भगवन्त को ऐसा कहने लगे. अहो स्थविर ! तुम समताभाव रूप सामायिक नहीं जानते हो, कर्म का अनुपादान व निर्जरारूप सामायिक का प्रयोजन को नहीं जानते हो, पोरिशी वगैरह प्रत्याख्यान तुम नहीं जानते हो, आश्रय द्वार निरोध रूप प्रत्याख्यानका प्रयोजन तुम नहीं जानते हो, पृथिव्यादि को संरक्षण रूप संयम तुम नहीं जानते हो, अनाश्रवपना सो संयम का अर्थ तुम नहीं जानते हो, इन्द्रिय PER पहिला शतकका नववा उद्देशा 98882 २२४ 23 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी 8.35 शब्दार्थ नहीं या० जानते हैं सं० संवर का अ० अर्थ न नहीं या• जानते हैं ये० स्थविर वे. विवेक ण. नहीं या० जानते हैं वि० विवेक का अर्थ वि. कायोत्सर्ग वि० कायोत्सर्ग का अर्थ न० नहीं या जानते हैं त० तव ते वे थे० स्थविर का० कालासवेसित पुत्र अ० अनगार को एक ऐसा च० कहे जा० जानता हूं अ० आर्य मा० सामायिक जा० जानता हूं अ० आर्य सा० सामायिक का अर्थ जा० सत्र अजो सामाइयं, जाणामोणं अजो सामाइयस्स अटुं, जाव जाणामोणं अज्जो विउस्सग्ग- स्स अटुं । तएणसे कालासवेसियपुत्ते अणगारे ते थेरे भगवंते एवं वयासी, जइणं अजो तुम्भे जाणह सामाइयं, जाणह सामाइयस्स अटुं, जाव जाणह विउस्सग्गरस अटुं; के भे अजो सामाइए ? केभे सामाइयस्स अटे, जाव के भे विउसग्गस्स भावार्थ नोइन्द्रिय का निग्रह रूप संवर तुम नहीं जानते हो, अनाश्रवपना सो संवर का अर्थ तुम नहीं जानते हो, विशिष्ट बोध रूप विवेक तुम नहीं जानते हो, त्याग व त्यागादि जो विवेक उस का अर्थ तुम नहीं जानते हो, त्यागरूप कायोत्सर्ग तुम नहीं जानते हो, और कायोत्सर्ग का अर्थ तुम नहीं जानते हो. तव श्री स्थ- विर भगवंत उन कालासवेसित पुत्र अनगार को ऐसे बोले कि अहो. आर्य ! मैं समपरिणाम रूप सामायिक जानना हूं. कर्मका अनुपादान व निर्जरा रुप सामायिक का अर्थ मैं जानता हूं यावत् कायो- सर्ग व कायोत्सर्ग का अर्थ में जानता हूं-तर कालासवेसित पुत्र नामक अनगार उन स्थविर भगवंत को * प्रकाशक रानावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * oyo ब्दार्थ २२५ सूत्र Q.98 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 863 यावत् जा० जानता हूं अ० आर्य वि० कायोत्सर्ग का अर्थ त तव का कालासवेसित पुत्र अ० अन- गार थे० स्थविर भ० भगवन्त को एक ऐसा व० कहा ज० यदि अ० आर्य तु. तुम ना० जानते हो? सा० सामायिक जा जानते हो सा० सामायिक का अर्थ जा. यावत् जा० जानते हो वि० कायोत्सर्ग का अर्थ के ० क्या अ० आर्य सा० सामायिक के क्या सा० सामायिक का अर्थ जा० यावत् के. क्या वि० कायोत्सर्ग का अर्थ त तब ये० स्थविर भ० मगवन् का. कालासोसित पुत्र अ० अनगार को अटे? एणं ते थेरा भगवंतो कालासोसियपुत्तं अणगारं एवं वयासी-आयाणे अज्जो! सामाइए, आयाणे अजो सामाइयस्स अट्ठ, जाब विउत्सग्गरस अट्ठ॥ तएणं से कालासवेसियपुत्ते अणगारे थेरे भगवंते एवं वयासी-जइ भे अजो ! आया सामाइए आया सामाइयस्स अट्ठे जाव आया विउरसन्गस्स अट्टे, अवहट्टु कोह माणमाया लोभे, किमटुं अजो गरहह ? कालासा ! संजमट्ठयाए । से भंते ! किं गरहासंजमे, अग- ऐसे बोले की यदि तुम सामायिक, मागयिकका अर्थ यावत् कायोत्सर्ग का अर्थ जानते हो तो अहो आर्य !kare सामायिक क्या है, सामायिक का अर्थ क्या है, यावत् कायोत्सर्ग का अर्थ क्या है ! तब स्थविर भगवंत कालासोशित पुत्र नामक अनगार को ऐसे बोले की अहो आर्य ! हमारे मतमें सामायिक गुण प्रतिपन्न जीव को ही सामायिक कही है, आत्मा को ही सामायिक का अर्थ कहां है यावत् आत्मा को ही कायो 8. पहिला शतकका नयां उद्देशा SP> भावार्थ ..
२२४ - २ अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8.3 शब्दार्थ नहीं या० जानते हैं सं० संवर का अ० अर्थ न० नहीं या जानते हैं थे० स्थविर वे. विवेक ण. नहीं या० जानते हैं कि विवेक का अर्थ वि० कायोत्सर्ग वि० कायोत्सर्ग का अर्थ न० नहीं या० जानते हैं त० तब ते वे थे० स्थविर का कालासवेसित पुत्र अ० अनगार को ए. ऐसा व० कहे जा० जानता हूं अ० आर्य मा० सामायिक जा० जानता हूं अ० आर्य सा० सामायिक का अर्थ जा० अजो सामाइयं, जाणामोणं अज्जो सामाइयस्स अटुं, जाव जाणामोणं अजो विउस्सग्ग- रस अटुं । तएणंसे कालासवेसियपुत्ते अणगारे ते थेरे भगवंते एवं वयासी, जइणं अजो तुम्भे जाणह सामाइयं, जाणह सामाइयस्स अटुं, जाव जाणह विउस्सग्गस्स अटुं; के भे अजो सामाइए ? केभे सामाइयस्स अटे, जाव के भे विउसग्गस्स भावार्थ नोइन्द्रिय का निग्रह रूप संवर तुम नहीं जानते हो, अनाश्रवपना सो संवर का अर्थ तुम नहीं जानते हो, विशिष्ट वोध रूप विवेक तुम नहीं जानते हो, त्याग व त्यागादि जो विवेक उस का अर्थ तुम नहीं जानते हो, त्यागरूप कायोत्सर्ग तुम नहीं जानते हो, और कायोत्सर्ग का अर्थ तुम नहीं जानते हो. तब श्री स्थ- विर भगवंत उन कालासवेसित पुत्र अनगार को ऐसे बोले कि, अहो. आर्य ! मैं समपरिणाम रूप सामायिक जानना हूं. कर्मका अनुपादान व निर्जरा रुप सामायिक का अर्थ मैं जानता हूं यावत् कायो- सर्ग व कायोत्सर्ग का अर्थ में जानता हूं-तर कालासवेसित पुत्र नामक अनगार उन स्थविर भगवंत को * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायनी बालाप्रसादजी * शन्दाथा २२७ सत्र 389 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8383 क्रोध मा० मान मा माया लो लोभ किं० क्या अ० आर्य ग गर्हते हो का० कालासवेसित सं०. संयम केलिये से वह भ० भगवन् कि० क्या ग० गर्दा सं० संयम अंगीं सं० संयम का कालासवेसित ग० गर्दा सं० संयम नो० नहीं अ० अगर्दा सं० संयम ग० गर्दा स० सब दो० दोष प० क्षपावे स. सब वा० मिथ्यात्वं प० जानकर ए. ऐसे आ० आत्मा स० संयम में उ• स्थिर भ० होवे उ० पुष्ट. भ० उ० उपस्थित भ० होवे ए. यहां से वह का० कालासवेसित पुत्र अ० अनगार सं० स्वयं बुद्ध थे० • अणभिगमेणं, अदिट्ठाणं अस्सुयाणं असुयाणं, अविण्णायाणं अव्वोगडाणं . अव्वो: च्छिण्णाणं, आणिज्जूढाणं, अणुवधारियाणं, एयमटुं णो सहहिए, णोपत्तिइए णोरोइए, इयाणि भंते ! एएसिणं पयाणं जाणणयाए, सवणयाए, बोहियाएं, अभिगमेणं दिट्ठाणं सुयाणं मुयाणं विण्णायाणं, वोगडाणं, वोच्छिण्णाणं,..णिज्जढाणं उवधारियाणं; एयमटुं सद्दहामि, पत्तियामि, रोएमि, एवमेयं सेजहेयं तुभे वयह ॥ तएणते थेरा भगवंतो कालासवसिय पुत्त अणगारं एवं बयासी अहो अनगार ! गर्दा संयम है परंतु अगर्दा संयम नहीं है. गर्दा से सब रागादि दोपों अथवा पूर्व कृत पाप क्षय होता है और सब मिथ्यात्व ज्ञान परिज्ञान से जानकर प्रत्याख्यान परिज्ञान से छूटता है इस तरह से हमारे मत में आत्मा स्थिर व पुष्ट होना है. ऐमा सुनकर कालासवेशित पुष नामक अनगारन स्थविर भगवन्त को वदना नमस्कार किया. वंदना नमस्कार करके कहने लगे कि अहो भगवन् ! मुझे NI पहिला शतक-का नवया उद्देशा887 भावार्थ २७ २२६ 4. अनुवादक-वालबह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी, शब्दार्थ 4ए. ऐसा व० कहा आ० आत्मा णे. हमारे में सा सामायिक आ० आत्मा णे. हमारे में सा० सामा- यिक का अर्थ जा. यावत् वि० कायोत्सर्ग आ अर्थ त० तब से वह का: कालासरेसित पुत्र अ० अनगार थे० स्थविर भ० भगन्वत को एक ऐसा व० कहा अ० आर्य आ० आत्मा मा० सामायिक आ० आत्मा सा० सामायिक का अर्थ जा. याात् आ० आत्मा वि० कायोत्सर्ग का अर्थ अ० छोडकर को रहासंजमे ? कालासा! गरहासंजमे नो अगरहा संजमे; गरहानियणं सव्वं दोसं पं. विणेइ सव्वं बालियं परिणाए । एवं खु णे आया संजमे उवहिए भवइ, एवंखु णेआया संजमे उवचिए भवइ, एवंखु आया संजमे उवट्ठिए भवइ । एत्थणं से कालासवेसियपुत्त अणगारे संबुद्धे थरे भगवंते वंदइ णमंसइ वंदित्ता णमंसइत्ता एवं वयासी-एएसिणं भंते ! पयाणं पुचि अण्णाणयाए, असवणयाए, अबोहियाए, सर्ग का अर्थ कहा है. तब वह कालामवेशित पुत्र नामक अनागर बोले की अहो आर्य ! यदि तुमारे मत आत्मा सामायिक, आत्मा सामायिक का अर्थ यावत् आत्मा कायोत्सर्ग का अर्थ है- तो क्रोध, मान, माया लोभ का त्याग कर के उसकी निन्दा क्यों करते हो ? क्यों कि निन्दा, गर्दा यह प्रवेप का कारन और क्रोधादि त्यागने वाला सामायिक वृत्तिवाला निन्दा गही नहीं कर सकता है तब स्थविर भगवंतने उत्तर दीया कि अहो कालासवेशित पुत्रं ! अवद्य पापकी गर्दा करते संयम होता है. तब पुनः वह कालासवेशित अनगार बोले कि अहो भंगवन् ! क्या गहीं संयम हैं या अगर्दा संयम हैं * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालापसादजी * भावार्थ m ब्दा OYO 29 २२१ 4. पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र * ए० यह १० पद जा जाने त सुने उ० अवधारे ए. यह अर्थ स• श्रद्धता हूँ ५० प्रतीति करता हूं ए. ऐसे ज. जैसे तु० तुम व कहते हो त० तव थे० स्थावर भ० भगवान का कालासवेसित अ० अनगार को ए. ऐसा व० कहा स० श्रद्धा करो अ० आर्य प० प्रतीति करो रो० रुचिकरो ज० जैसे अ० मैं व. कहता हूं त० तब का० कालाससित पुत्र अ० अनगार थे० स्थविर भ० भगवन्त को वं. वंदनकर न नमस्कारकर इ० इच्छता हूं तु० तुमारी अं० पास चा० चार महाव्रत घ०. धर्म से पं० पांच म० महाव्रत स० प्रतिक्रमण सहित ध० धर्म उ० अंगीकार करके वि० विचरने को अ० यथासुख दे० देवानुप्रिय मा० नहीं मा पडिबंध करेह, तएणं से कालासवेसियपुत्ते अणगारे थेरे भगवंते वंदइ नमसइ वंदित्ता नमसइत्ता चाउज्जामाओ धम्माओ पंचमहब्वइयं सपडिक्कमणं धम्मं उवसंप- जित्ताणं विहरइ ॥ तएणं से कालासवेसियपुत्ते अणगारे बहूणिवासाणि सामण्ण परि- यह अर्थ अच्छी तरह से मैंने स्वीकार किया है, अब मैं इन की श्रद्धा, मतीति व सार्च करता हूं आपने जो कहा है वैसाही भाव है. तब स्थविर भगवंत कालासवेशित पुत्र नामक अनगार को वोले की अहो आर्य! जो मैं कहताई उन वचनों की तुम श्रद्धा प्रतीति व रुचि करो. तव कालासवेशित पुत्र नामक अनगार श्री स्थविर भगवंत को वंदना नमस्कार कर के बोले की अहो भगवन् ! मैं आपकी सगीप चार महामत रूप धर्म से प्रतिक्रमण सहित पांच महावत रूप धर्म अंगीकार करने को इच्छता हूँ. तव स्थर 33% पहिला शतक का नववा उद्देशा भावार्थ oad शब्दार्थ २२८ 42 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी स्थविर भ० भगवन्त को व वंदनकर न० नमस्कारकर ए. ऐसा व० कहा ए. यह भं० भगवन् प०पद पु०पुहिले अ० जाना नहीं अ० सुना नहीं अ० वोध नहीं अज्ञान नहीं अ० देखा नहीं अ० सुना नहीं अ० स्मरण नहीं किया अ. विज्ञान हुवा नहीं अ.गुरुगम नहीं हुवा अ० व्यवच्छेद नहीं हुवा में सुखाव वोध नहीं अ० धारा नहीं ए. यह अर्थ णो० श्रद्धे नहीं नो० प्रतित कीये नहीं णो रुचे नहीं इ० अव० भगवन सदहाहि अजो, पत्तियाहि अज्जो, रोएहि अज्जो, सेजहेयं अम्हे वयामो ॥ तएणं से कालासवसिय पुत्ते' अणगारे थेरे भगवंतो वंदइ नमसइ. वंदित्ता नमंसइत्ता एवं वयासी-इच्छामिणं भंते ! तुब्भे अंतिए चाउज्जामाओं धम्माओ पंच- महन्वइयं सपडिवामणं धम्म उवसंपजित्ताणं विहरित्तए ? । अहासुहं देवाणुप्पिया इन पदों का इस प्रकार के अर्थ का ज्ञान नहीं था, मैंने उस का स्वरूप नहीं पहिचानाथा, मैंने पहिले किसी की पास ऐसा श्रवण नहीं कियाथा. मुझे ऐसी प्रनीति नहीं हुईथी; मुझे ऐसा साक्षात्कार नहीं हु. वा था, मुझे ऐसा, गुरुगम नहीं हुवा था, मेरा संदेह इस प्रकार किसीने नहीं मीटाया था, मुझे ऐसा सुखाव बोध नही हुआ था, मैंने इस प्रकार ऐसा धारण नहीं किया था, मैं इस प्रकार इसे नहीं श्रद्धता था, मुझे ऐसा रुचिकर नहीं हुआ था, अव अहो भगवन ! इन का अर्थ मैंने जाना है, ज्ञान से बोधित हुवा म्यक्त्व से विस्तृत अर्थावबोधवाला हुआ है विशेषकर धारनकिया है, सर्वथा प्रकार से संदेह दूर हुआ मकासक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी वालाप्रसादजी * भावाध Shariya . शब्दार्थ २३१ सूत्र १८. पंचमांग विवाह पण्णचि (भगवती) मूत्र 8888 धे आ० आराधकर च० चरम उ० श्वासोश्वास से सि० सिंद्ध बु० युद्ध मु० मुक्त प० परिनिवृत्त स० सर्व दुःख से प० मुक्त भं• भगवन् ति ऐसा ॥ १५ ॥ भ० भगवान् मो० गौतम स० श्रमण भ० भगवान म० महावीर को वं वंदना कर न० नमस्कार कर ए. ऐमा ५० बोले भं० भगवन् से० शेठ त० दरिद्री कि० रंक ख. क्षत्रिय स० सरिखी अ० अप्रत्याख्यान कि० क्रिया क. करे . हां. गो० गौतम अहियासिज्जइ; तमटुं आराहेइ आराहेइत्ता चरमेहिं उस्सास नीसासेहिं सिद्धे बुढे मुत्ते परिनिन्बुए सव्वदुक्खप्पहीणे भंतेति ॥ १५ ॥ भगवं गोयमे समणं भगवं महावीर बंदइ नमसइ वंदित्ता नमसइत्ता एवं वयासी सेणूणं भंते ! सेट्ठिस्सय तणुयरस, पना, भूमिशैय्या, काष्टशैय्या, केशलोचन, ब्रह्मचर्य, परघर प्रवेश, प्राप्ति, अप्राप्ति, ऊंच नीच इन्द्रियों के समूह और वावीस परिपह के उपसर्ग सहन करते थे; उसे आराधकर चरम श्वास नीश्वास में सिद्ध बुद्ध यावत् सब दुःखों से रहित हुवे. अहो भगवन् ! यह आपका वचन सत्य है ॥ १५ ॥ क्रिया राहत होने से सिद्ध होते हैं इसलिये क्रिया का प्रश्न करते हैं. गौतम स्वामीने महावीर भगवंत को वंदना नमस्कार करके ऐसा प्रश्न किया कि अहो भगवन् ! अष्टि, दरिद्री, कृपण व क्षत्रिय को क्या एक सरिखी अमत्या- ख्यान क्रिया लगती है ? हां गौतम ! श्रेष्टि, दरिद्री, कृपण व क्षत्रिय को एक सरिखी अप्रत्याख्यान क्रिया लगती है. अहो भगवन ! सब को एक सरिखी क्रिया. लगनेका क्या कारन ? अहो गौतम ! 882 पहिला शतकका नववा उद्देशा 988-82- भावार्थ २३० अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 शब्दार्थ की प० प्रतिबंध कर करो त० तव का कालासर्वसित पुत्र अ० अनगार थे० स्थविर भ० भगवान् को वं० वंदनकर न० नमस्कारकर चा० चार महाव्रतध० धर्म से पं० पांच महावत स० प्रतिक्रमण सहित, ध० धर्म उ० अंगीकार कर वि० विचरता है का कालासवेसित पुत्र अ० अनगार व बहुत व० वर्ष सा० साधु पर्याय पा० पाली पा. पालकर ज. जिसलिये की० करे न० नग्न भाव मुं० मुंडभाव अ. स्नान करना नहीं अ० दंत प्रक्षालन नहीं अ० छत्र नहीं अ० उपानह रहित भू० भूमि शैय्या फ० पाटशैय्या क. काष्ट शैय्या के केशलोच व० ब्रह्मचर्य प० परगृह प्रवेश ल० प्राप्त अ० अप्राप्त उ० ऊंच नीच गा० इन्द्रिय समुह वा० वावीस ५० परिपह उ० उपसर्ग अ० महन त० इसलिये आ० आरा- सूत्र यागं पाउणइ पाउणइत्ता, जस्सट्टाए कीरइ नग्गभावे मुंडभावे, “अन्हाणयं, अदंत धुवणयं, अच्छत्तयं, अणोवाहणयं, भूमिसेजा फलहसेज्जा, कट्ठसेज्जा, केसलोओ, बंभ चेरवासो, परघरप्पवेसो, लढावलद्धी, उच्चाक्या गामकंटया, बावीसं परीसहोवसग्गा पिर भगवन्त वोले की ज्यों तुम्हारा आत्मा को सुख हो वैसे करो.. ऐसा कार्य में प्रतिबंध [विलंब ] मत करो. तर कालासवेशित पुत्र अनगारने स्थविर भगवंत को वंदना नमस्कार किया; वंदना नमस्कार करके चार महावत रूप धर्म में से प्रतिक्रमण सहित पांच महानत रूप धर्म अंगीकार कर विचरने लगे. तब उन कालासवेशित पुत्र अनगारने- बहुत कालतक साधु की पर्याय का पालन किया. और पालन करके जिस लिये नग्रपना, मुंड भाव, स्नान नहीं करना, दंत प्रक्षालन नहीं करना, छत्र व उपानह रहित * भकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * 500 oyo पदर्थ अ० परिभ्रमण से० वह के कैसे जा. यावत् आ० आधाकर्मी भुं. भोगवता जा. यावत् अ० परिभ्रमण करे गो गौतम आ• आधाकर्मी मुं० भोगवता आ० आत्मा से घ० धर्म अ०अतिक्रमे आ आत्मा से घ० धर्म अ० अतिक्रमता पु०पृथ्वी कायाकी ण नहीं अ० अनुकंपाकरे जा यावत् तत्रसकाया की, णनहीं अ. सत्र बढाओधणिय बंधण बद्धाओपकरेइ,जावअणुपरियासे केणटेणंजाव आहाकम्मण भुंज- माणे जाव अणुपरियदृइ? गोयमा! आहाकम्मंणं मुंजमाणे आयाएधम्मंअइक्कमइ आयाए धम्म अइक्कममाणे पुढविकायं णावकंखइ जाब तसकायं णावखइ, जेसिपियणं जीवाणं 3- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूध 82 * पहिला शतक का नवा उद्देशा 88 भावार्थ [ अनुभाग की अपेक्षा से] और प्रदेश बंध की अपेक्षा से क्या उपचिने! अहो गौतम ! आधाकर्मी आहार भोगनेवाला श्रमण निग्रंथ आयुष्य कर्म वर्जकर अन्य सात कर्म प्रकृतियों यदि शिथिल बंधनवाली होवे तो हद बंधनाली वनावे, अल्प काल की स्थितिवाली को दीर्घ काल की स्थितिवाली बनावे, यावत् अनंत कालतक चतुर्गति रूप संसार में परिभ्रमण करे. अहो भगवन् ! किस कारन से आधा कमी भोगवनेवाला साधु सात कर्म प्रकृतियों को दृढ बंधनवाली बनावे यावत् चतुर्गतिक संसार में परिभ्रमण करे ? अहो भौतम ! आधाकी आहार भोगनेवाला आत्मासे धर्म अतिक्रमता है, आत्मा से धर्म अतिक्रमते पृथ्वीकायादि पकाया की अनुकम्पा रहित होता है और जिन जीवों के - दारीर का २३२ 1 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिनी शब्दार्थ से० शेठ का जा. यावत् अ० अप्रत्याख्यान क्रिया क० कर से० घह के कैसे भ० भगवन् गो गौतम अ० आवरात प० प्रत्यय ते. इसलिये गो• गौतम ए० ऐसा ७० कहा जाता है से. शेठ त० दरिद्री जा. यावत् क करे ॥ १६ ॥ अ० आधाकर्मी भुं० भोगवता स श्रमण निनिय कि० क्या ० बांधे ५० करे चि० चिने उ उपचिने गो०गौतम आ आषाकर्मी भुंभोगवता आ०आयुष्य व वनकर स० सात क० कर्म प्रकृति सि सिायल वं० बंधन व० बंधीहुइ ध० दृढ व बंधन २० बंधीहुई प० करे जा. यावत् सूत्र किवणस्सय, खत्तियस्सय समाचेव अपच्चक्खाण किरिया कजइ ? हंता गोयमा ! सेट्ठियस्स जाव अपञ्चक्खाण किरिया कज्जइ । से केण?णं भंते ? गोयमा ! अविरई पडुच्च, से तेणटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ सेहिस्सय तणु जाव कजइ ॥ १६ ॥ आ. हाकम्मंणं भुंजमाणे समणे निग्गंथे किं बंधइ. किंपकरेइ, किंचिणाइ, किंउवचिणाइ गोयमा ! आहाकम्मं भुंजमाणे आउयवजाओ सत्तकम्म पगडीओ सिढिलबंधण मावार्थ भावरति प्रत्ययिक सब को एक सरिखी क्रिया लगती है. क्यों की इच्छा सब को एक मरिखी है। और ग्स की निवृत्ति किसी को नहीं हुइ है इसलिये अहो गौतम! ऐसा कहा गया है कि श्रेष्टी यावत् क्षत्रिय को एक सरिखी अप्रस्याख्यान क्रिया लगती है ॥ १६ ॥ अहो भगवन् ! आधाकर्मी आहार, भोगने- वाला माधु निग्रंथ क्या बांधे, [प्रकृति की अपेक्षा से] क्या करे, स्थिति की-- अपेक्षा से.] 'क्या चिने * मकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी जालाप्रसादनी ब्दार्थ २३५ 388 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सुत्र -98.3 सि०शिथिल व वंधन व०बंधीहुइ प०करे ज जैसे सं० संवृति ण विशेप आ० आयुष्य क० कर्म सि० कदा. चित् २० वांधे सिं० कदाचित् नो० नहीं वं० वांधे से शेष तक तैसे जा. यावन् वी० तीरे से०.वह के० कैसे जा० यावत् वी० तीरे गो० गौतम फा० मासुक ए० शुद्ध भुं० भोगनता स. श्रमण नि० निग्रंथ आ• आत्मा से ध० धर्म ना० अतिक्रमे नहीं आ० आत्मा से ५० धर्म अ० नहीं अ. अनिक्रमनेसे से पु० पृथ्वी काया की अ० अनुकंपाकरे जा. यावत् त० त्रसकाया की अ० अनुकंपाकरे जे० जिस जी० ओ पकरेइ जहा से संवुडेणं णवरं आउयंचणं कम्मं सि बंधइ सिय नो बंधइ सेसं तहेब जाव वीईवयइ । सेकेण?णं जाव वीईवयइ ? गोयमा ! फासुएसाणनं भुंज- माणे समणे निग्गंथे आयाए धम्मं नाइक्कमइ, आयाए धम्म अणइकममाणे पुढविकायं छोडकर अन्यसात कर्मों यदि दृढ बंधनवाले होवे तो शिथिल बंधनवाले वनावे और आयुप्य कर्म क्वचित् वांधे क्वचित् वांधे नहीं. उस में यदि आयुष्य कर्म का बंध करे तो वैमानिक देवता होवे और आयुष्य का बंध नहीं करे तो मुक्तिगामी जीव होवे. अहो भगवन् ! ऐसा किस तरह से होता है ? अहो गौतम ! प्रासुक एपणिक आहार भोगनेवाला आत्मधर्म का उल्लंघन नहीं करता है इस तरह उल्लंघन नहीं करता हुवा पृथ्वीकायादि पटकायाकी अनुकम्पावाला होता है यावत् जिन जीवों के शरीर का आहार करता है, उन जीवों की भी अनुकम्पायाला होता है. इस लिये अहो गौतम ! ऐसा कहा गया है कि मासुक एपणिक १.१ पहिला शतक का नववा उद्देशा 980- भावार्थे| शब्दार्थ २३४ अनुकंपाकरे जे० जिन जी जीव के श० शरीर का आहार आ० करे ते. उन जी0 जीवों की णनहीं अ० अनुकंपाकरे से वह ते. इसलिये गो० गौतम एक ऐसा बु. कहा जाता है आ० आधाकर्मी भुं० भोगवता आ० आयुष्य व० वर्जकर स० सात क० कर्म प्रकृति जा. यावत् अ० परिभ्रमण करे ॥ १७ ॥ फा मासुक ए० शुद्ध भं भगवन् भुंभोगवता कि क्या वं०वांधे जा० यावत् उ०उपचिने गो० गौतम फा० मासुक भुं० भोगवता आ० आयुष्य वर्ज कर स० सात क० कर्म प्रकृति ध दृढ वं० बंधन २० बंधी हुइ सरीराइं आहारमाहारेइ तेविजीवे नावकंखइ, सेतेणटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ, आहा- कम्मण भुंजमाणे आउयवज्जाओ सत्तकम्म पगडीओ जाव अणुपरियदृइ॥१७॥फासुएस- णिज भंते ! भुंजमाणे किंबंधइ ? जाव उवचिणाइ ? गोयमा ! फासुएसणिज्ज भुंजमाणे आउय वजाओ सत्त कम्मपगडीओ धणिय बंधन बद्धाओ सिढिल बंधण बद्धा सूत्र * अनुवादक-पालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक त्रपिजी * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालामसादजी * वाथ वह आहार करता है उन जीवों की भी अनुकम्पा रहित होता है. इस लिये भहो गौतप !. आंधाकर्मी आहार भोगनेवाला आयुप्य कर्म छोडकर अन्य सात कर्गों का दृढ बंधन करता है यावत् चतुर्गतिक संसार में परिभ्रमण करता है ॥ १७ ॥ प्रासुक एपणिक वस्तु भोगनेवाला श्रमण निग्रंथ किस का बंध करे यावत् क्या उपचिने ? अहो गौतम ! प्रासुक एपणिक वस्नु भोगनेवाला श्रमण निग्रंथ आयुष्य ७ २३५ सूत्र 88 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 883 पहिला शतक का नवा उद्देशा POS सिशिथिल बंधन व०बंधीहुइ प करे ज जैसे सं०संवृति ण विशेप आ० आयुष्य क० कर्म सि० कदा- चित् वै० वांधे सिं० कदाचित् नो० नहीं 4० बांधे से० शेप तक तैसे जा० यावन् वी० तीरे से०.वह के० कैसे जा० यावत् वी० तीरे गो० गौतम फा० प्रामुक ए० शुद्ध मुं० भोगतता स. श्रमण नि. निग्रंथ १० आ• आत्मा से ध० धर्म ना० अतिक्रमे नहीं आ० आत्मा से ध० धर्म अ० नहीं अ० अनिक्रमनेसे पु० पृथ्वी काया की अ० अनुकंपाकरे जा. यावत् त• वसकाया की अ० अनुकंपाकरे जे जिस जी. ओ पकरेइ जहा से संवुडेणं णवरं आउयंचणं कम्मं सि बंधइ सिय नो बंधइ सेसं तहेव जाव बीईवयइ । सेकेण?णं जाव वीईवयइ ? गोयमा ! फासुएसणिज्जं भुंज- माणे समणे निग्गंथे आयाए धम्म नाइक्कमइ, आयाए धम्म अणइकममाणे पुढविकायं छोडकर अन्यसात कर्मों यदि दृढ बंधनवाले होवे तो शिथिल बंधनवाले वनावे और आयुष्य कर्म क्यचित् बांधे क्वचित् वांधे नहीं. उस में यदि आयुष्य कर्म का बंध करे तो वैमानिक देवता होवे और आयुष्य का बंध नहीं करे तो मुक्तिगामी जीव होवे. अहो भगवन् ! ऐसा किस तरह से होता है ? अहो गौतम 350 पासुक एपणिक आहार भोगनेवाला आत्मधर्म का उल्लंघन नहीं करता है इस तरह उल्लंघन नहीं करता हुवा पृथ्वीकायादि पटकायाकी अनुकम्पावाला होता है यावत् जिन जीवों के शरीर का आहार करता है, उन जीवों की भी अनुकम्पावाला होता है. इस लिये अहो गौतम ! ऐसा कहा गया है कि प्रासुक एपणिक भावाथे| शब्दार्थ जीव के स० शरीर का आ० आहार करे से उन जी० जीवों को अ० अनुकंपाकरे से वह ते. इमलिये जा० यावत् वी तीरे ॥ १८ ॥ से वह भं० भगवन् अ० अस्थिर प. परिवर्तन होवे ना० नहीं थि० स्थिर ५० परिवर्तन होवे अ० अस्थिर भ० भेदावे नो० नहीं थि० स्थिर भ० भेदावे सा० शावत वा. २३६ सुत्र ॐ अनुवादक-वालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी के अवकंखइ जाव तसकायं अवकंखइ, जेसिपियणं जीवाणं सरीराइं आहोरेइ तेवि जी. वे अवकंखइ, से तेणटेणं जाव वाईवयइ ॥ १८ ॥ सेणूणं भंते ! अधिरे फ्लोइ नोथिरे पलोइ, अथिरे भज्जइ नो थिरे भज्जइ, सासए बालए वालियत्तं *प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ आहार भोगनेवाला सात कर्मका शिथिल बंधन करता है और आयुष्य कर्म क्वचित घांघता हैव क्वचित् नहीं वांधता है यावत संसार का व्यतिक्रम करता है ॥ १८ ॥ इस में संसार का उल्लंघन कहा वह संसार का आस्थिरपना से होवे इस लिये स्थिर अस्थिर का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! क्या अस्थिर पदार्थ पलटते हैं और स्थिर नहीं पलटते है ? अस्थिर का भेद होता है और स्थिर का भेद नहीं होता है ? वालक शाश्वत, वालक पना अशाश्वत, पंडित शाश्वत व पंडितपना क्या अशाश्वत है ? हां गौतम ! अस्थिर द्रव्य जो लोहादि उनका परावर्तन होता है, (आध्यात्म चिन्तवन में) अस्थिर कर्म जीव प्रदेश से ममय २ में चले. स्थिर सो पत्यारादि चले नहीं आध्यात्म चिन्ता में जीव का उपयोग स्थिर तृणादि शब्दार्थ . बालक वा. बालपना अ. अशाश्वत सा० शाश्वत पं० पंडित पं० पंडितपना अ. अशाश्वत हं० हांगो गौतम अ० अस्थिर प० परिवर्तन होवे जा० यावत् पं० पंडितपना अ० अशाश्वत स. वह ए. ऐसा भ० भगवन् जा. यावत् वि० विचरते हैं ॥१॥९॥ x २३७ सूत्र असासयं सासए पंडिए पडियत्तं असासयं ?'हता गोयमा ! अधिरे पलोदृइ जाव पंडि- यत्तं असासयं सेवं भंते भंतेत्ति जाव विहरइ ॥ पढमेसए नवमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ १॥ ९॥ 389 पहिला शतक का नववा उद्देशा * 18 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 8983 * भावाथे| अस्थिर भेद्य स्वभाव वाले हैं आध्यात्म चिन्ता में अस्थिर कर्म भेदावे, लोहकी शलाका अभेद्य स्वभाव वाली है और शाश्वतपना से जीव के टुकडे होवे नहीं. व्यवहार से बालक शाश्वत है और निश्चय से जीव शाश्वत, व्यवहार से वाला भाव अशाश्वत निश्चय से असंयत भाव अशाश्वत, निश्चय से पंडित नत्व के जान-शाश्वत, व्यवहार से संयती जीव शाश्वत, व्यवहार से पंडितपना अशाश्वत और निश्चय से संयत ई० भाव अशाश्वत होते. अहो भगवन् ! आपने कहा यह सब सत्य है अन्यथा नहीं है ऐसा कहकर वंदना नम- स्ककार कर श्री गौतम स्वामी संयम व तप से आत्मा को भावते हुने विचरने लगे. यह पहिला शतक का नवां उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ १ ॥ १ ॥ ..
शब्दार्थ २३८ 23 अनुवादक-बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8% अ० अन्यतीथिक भ० भगवन् एक ऐसा आ० कहते हैं जा० यावत् प० मरूपते हैं च० चलते को अ० नहीं चला जा. यावत् नि० निर्जरते को अ० नहीं निर्जरा दो० दो प० परमाणु पुद्गल ए. एकत्रित न. नहीं सा० मीले क० कैमे दो दो प० परमाणु पुद्गल को न० नहीं है सि० स्निग्धपना त० इसलिये दो. दो प० परमाणु पुद्गल ए. एकत्रित न० नहीं सा० मीले ति तीन ५० परमाणु पुद्गल ए. एकत्रित सा० मीले क० कैप्से ति० तीन प० परमाणु पुद्गल ए० एकत्रित मा० मीले ति० तीन १० परमाणु पुद्गल अण्णउत्थियाणं भंते ! एव माइक्खंति जाव परूवंति एवं खलु चलमाणे अचलिए जाव निजरिजमाणे अनिजिण्णे दो परमाणु पोग्गला एगयओ नसाहणंति, कम्हा दो, पर- माणु पोग्गलाणं णत्थि सिणहकाए तम्हा दो परमाणु पोग्गला एगयओ न साहणति ॥ तिण्णि परमाणु पोग्गला एगयओ साहणंति; कम्हा तिण्णि परमाणु पोग्गला एगयओ नववे उद्देशे में अस्थिर कर्म का विषय कहा. उस में कुतीर्थिक प्रवर्तते हैं सो आगे बतलाते हैं. कित- नेक अन्य तीथिक ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं कि जो कर्म जीव प्रदेश से चलने लगे उसे चले कहना नहीं यारत् निर्जरने लगे उसे निर्जरे कहना नहीं; क्यों की वर्तमान काल को अतीत काल नहीं कह सकते परंतु जो संपूर्ण पुद्गल चलित हुवे होवे तयं चले और निर्जरित हुवे - होवे तव निर्जरे कहना. और ऐमा कहते हैं कि दो परमाणु पुद्गल एकत्रित्र स्कन्धपने मीले नहीं क्यों कि मीलने में जो स्निग्धपने का प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी * वार्थ शब्दार्थ o २३९ सूत्र - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र को अ० है सिः स्निग्धपना त• इसलिये ति तीन प० परमाणु पुद्गल ए० एकत्रित सा मीले ते०१ वे भि• भेदात दु० दोप्रकार से ति० तीन प्रकार से क० करे दु० दोमकार से कि० करते ए. एक तरफ दि० देढ प० परमाणु पुद्गल भ० होवे ए० एक तरफ दि० देढ प० परमाणु पुद्गल भ० होवे ति. तीन प्रकार से क०करते तिनीन प०परमाणु पुद्गल ह होवे ए०ऐसे जा. यावत् च० चार पं० पांच प.परमाणु पुद्गल ए. एक बाजु से सामीले ए एक वाजुमे मा० मीलकर दुदुःखपने क. करे दु०दुःख सा०शाश्वत स. साहणंति, तिणि परमाणु पोग्गलाणं अस्थि सिणेह काए, तम्हा तिण्णि परमाणु पोग्गला एगयओ साहणति, ते भिजमाणा दुहावि तिहावि कजति. दुहा किज्जमाणा एगयओ दिवड्डे परमाणु पोग्गले भवइ, एगयओं दिवड्डे परमाणु पोग्गले भवइ, तिहा कज्जमाणा तिण्णि परमाणु पोग्गला हवंति एवं जाव चत्तारि पंच परमाणु गुण है वह उन परमाणु पुद्गलों में नहीं है. परंतु तीन परमाणु पुद्गल मीलकर स्कंधरूप बनजाते हैं क्यों की इसमें स्निग्धता रही हुइ है. उस तीन परमाणु पुद्गल का स्कन्ध को भेदने में आवेतो इस के दो अथवा तीन विभाग होसकते हैं. जब दो विभाग किया जाता है तब देढ२ परमाणु का एक २ विभाग होता है। और जव तीन विभाग किया जाता है तब एक २ परमाणु का तीन विभाग होता है. जसे दो परमाणु का स्कंध होता है वैसे ही तीन, चार पांच परमाणुओं का स्कंध बनता है वे स्कंध रूप बनकर * पहिला शतक का दशवा उद्देशा 88-890 भावार्थ oya ७ शब्दार्थ २४० मूत्र 48 अनुवादक-चालनमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी सदाकाल उ० चयपामे अ० अपचयपामे प० पहिले भा० भाषा श• भाषा भा० बोलाती हुइ भा. भापा अ० अभाषा भा० भाषा समय वि० व्यतीत हुवा भा० बोली हुइ भा० भाषा अ. अभापा भा० भाषा समय वि० व्यतीत हुवा भा० बोलीहुइ भा० भाषा किं० क्या भा० भापक को भा० भाषा अ० अभापक भा० भाषा, णो नहीं सा वह भा० भाषक को मा० भापा पु० पहिली कि० क्रिया दु. दुःख क० करते कि० क्रिया अ० अदुःख कि क्रिया स० समय वी० व्यतीत हुवे क० कीहुइ कि० क्रिया दु० दुग्व पोग्गला एगयओ साहणंति, एगयओ साहणित्ता दुक्खचाए कजंति, दुक्खेवियणं सेसासए सयासमियं उवचिजइयं अवचिजइयं, पुट्विं भासा भासा, भासिन्जमाणी भा- साअभासा, भासांसमयवितिकतंचणं भासिया भासा, जा सा पुत्वं भासा भासाभासि- जमाणी भासा अभासा, भासा समयवितिकतंचणं भासियाभासा सा किं भासओ दुःख रूप (कर्म पने ) परिणमते हैं. कर्म अनादि होने से वह दुःख भी शाश्वत होता है. वह सदैव सम्यक् प्रकार से चय उपचय-हानि वृद्धि को प्राप्त होता रहता है. और भी वे अन्य तीर्थिक कहते हैं। कि पहिले बोलाइ हुई प्रथम की भाषा को भाषा कहना; परंतु वर्तमान में बोलाती हुई भाषा को भाषा कहना नहीं, भाषा का समय अतिक्रान्त हुने पीछे भाषा को भाषा कहना. और जब बोलाइ हुई प्रथम की भाषा को भाषा कहना, बोलाती हुई भाषा को अभाषा कहना, और भापा समय व्यतीत हुए पीछे * प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी * २४१. 298 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 388 शब्दाथे सा वह पु० पहिली कि० क्रिया दु-दुःखक करते कि० क्रिया अ० अदुःखं कि क्रिया ससमय वी० व्यती- तहुवे क० कीहुइ कि० क्रिया दु• दुःख कर करण दु० दुःख अ० अकरण दु० दुःख० णो• नहीं सा. वह क० करण दु० दुःख व० कहना अ० नहीं किया दु० दुःख अ० नहीं स्पर्शा अ० नहीं करते पा० प्राण. म्० भूत भासा,अभासओ?भासा अभासओणं साभासा णो खलुसा भासओ भासा।पुर्वि किरिया दु- सूत्र क्खा,कज्जमाणी किरिया अदुक्खा,किरिया समयबीतिकंतं चणं कडा किरिया दुक्खा,जा सा पुदि किरिया दुक्खा, कजमाणा किरिया अदुक्खा किरिया समय वीइकंतंचणं कडा किरिया दुक्खा । सा किं करणओ दुक्खा अकरणओ दुक्खा ? अकरणओणं सा दुक्खा, णो खलु साकरणओ दुक्खा, सेव वत्तव्वं सिया, आकिच्चं दुक्खं, अफुसं- भावार्थ वोलाइ जो भापा उभे भापा कहना, तब क्या वह भापा भापकको होती है या अभापक को होती तव अन्यतीर्थिक ऐसा उत्तर देते हैं कि भापक को भापा नहीं; परंतु अभापक को भापा होती है। और भी अन्य तीथिक ऐसा कहते हैं कि जहां तक कायिकादि क्रिया नहीं की जावे वहांतक ही वह क्रिया दुःख के हेतु भूत होती है, और क्रिया करने लगे तब वह दुःख के हेतु भूत नहीं होती है, क्रिया समय व्यतीत हुवें पीछे कराइ हुइ क्रिया दुःख के हेतु भूत है, और जो पहिले की क्रिया दुःख के हेतु भूत है। कराती हुई क्रिया दुःख के हेतु भूत नहीं है और क्रिया समय व्यतीत हुए पीछे कराइ क्रिया दुःख के हेतु 2080 पहिला शतकका दशवा उद्देशा 8402 yo शब्दार्थ २४० सूत्र * अनुवादक-बालमनचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 सदाकाल उ० चयपामे अ० अपचयपामे प० पहिले भा० भाषा मा भाषा भा० बोलाती हुइ भा० भापा अ० अभापा भा• भाषा समय वि० व्यतीत हुवा भा० बोली हुइ भा० भाषा अ. अभाषा भा० भाषा समय वि० व्यतीत हुवा भा० बोलीहुइ भा० भाषा किं० क्या भा० भापक को भा० भाषा अ० अभापक भा० भाषा णो नहीं सा वह भा० भाषक को भा० भाषा पु० पहिली कि० क्रिया दु. दुःख क० करते कि० क्रिया अ० अदुःख कि क्रिया स० समय वी० व्यतीत हुवे क० कीहुइ कि० क्रिया दु. दुग्य पोग्गला एगयओ साहणंति, एगयओ साहणित्ता दुक्खत्ताए कजंति, दुक्खेवियणं सेसासए सयासमियं उवचिजइयं अवचिजइयं, पुल्विं भासा भासा, भासजमाणी भा- साअभासा, भासासमयवितिकतंचणं भासिया भासा, जा सा पुव्वं भासा भासाभासि- जमाणी भासा अभासा, भासा समयवितिकंतंचणं भासियाभासा सा किं भासओ दुःख रूप ( कर्म पने) परिणमते हैं. कर्म अनादि होने से वह दुःख भी शाश्वत होता है. वह सदैव सम्पर प्रकार से चय उपचय-हानि वृद्धि को प्राप्त होता रहता है. और भी वे अन्य तीर्थिक कहते हैं कि पाहेले बोलाइ हुई प्रथम की भाषा को भाषा कहनाः परंतु वर्तमान में चोलाती हुई भाषा को भाषा कहना नहीं, भाषा का समय अतिकान्त हुने पीछे भाषा को भाषा कहना. और जब बोलाइ हुई प्रथम की भाषा को भाषा कहना, बोलाती हुई भाषा को अभाषा कहना, और भापा समय व्यतीत हुए * प्रकाशक रानाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालामसादजी मार्थ * २४१ 298 पचंमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 888 ब्दाथे सा वह पु० पहिली कि० क्रिण दु दुःखक करते कि० क्रिया अ० अदुःख कि क्रियाससमय वी० व्यती- तहुवे क० कीहुइ कि० क्रिया दु• दुःख क. करण दु० दुःख अ० अकरण दु० दुःख० णो नहीं सा. वह क० करण दु० दुःख व० कहना अ० नहीं किया दु० दुःख अ० नहीं स्पर्शा अ० नहीं करते पा० प्राण भ० भूत भासा,अभासओ?भासा अभासओणं साभासा णो खलुसा भासओ भासा।पुर्वि किरिया दु- सूत्र क्खा,कज्जमाणी किरिया अदुक्खा,किरिया समयवीतिकंतं चणं कडा किरिया दुक्खा,जा सा पुर्वि किरिया दुक्खा, कजमाणा किरिया अदुक्खा किरिया समय वीइकंतंचणं कडा किरिया दुक्खा । सा किं करणओ दुक्खा अकरणओ दुक्खा ? अकरणओणं सा दुक्खा, णो खलु सा करणओ दुक्खा, सेव वत्तव्वं सिया, आकिच्चं दुक्खं, अफुसं- भावार्थ घोलाइ जो भापा उभे भापा कहना, तब क्या वह भापा भापकको होती है या अभापक को होती है तव अन्यतीर्षिक ऐसा उत्तर देते हैं कि भापक को भापा नहीं; परंतु अभापक को भाषा होती और भी अन्य तीर्थिक ऐसा कहते हैं कि जहां तक कायिकादि क्रिया नहीं की जावे वहांतक ही वह क्रिया दुःख के हेतु भूत होती है, और क्रिया करने लगे तब वह दुःख के हेतु भूत नहीं होती है, क्रिया समय व्यतीत हुवे पीछे कराइ हुइ क्रिया दुःख के हेतु भूत है, और जो पहिले की क्रिया दुःख के हेतु भूत है। कराती हुई क्रिया दुःख के हेतु भूत नहीं है और क्रिया समय व्यतीत हुए पीछे कराइ क्रिया दुःख के हेतु HIN8- पहिला शतकका दशा उद्देशा 84 २४२ 4.१ अनुवादक-बालग्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दा नी जीवत सत्य ये वेदनावे० वेदते हैं व. कहना से वह क० कैसे भं• भगवन् ए. एसा गो. गौतम ज. जो अ० अव्यतीथिक ए. ऐसा आ० कहते हैं जा. यावत् वे० वेदना बे० चेदते हैं व. कहना ते०.चे ए. ऐसा आ० कहते हैं मि० मिध्या ते वे एक ऐसा आ० कहते हैं अ० मैं गो. गौतम ए. ऐसा था. दुक्खं, अकज्जमाणकडं दुक्खं अकटु अकटु पाणभूयजीवसत्ता वेद्णं वेदंतित्ति वत्तव्य सिया ॥ से कहमेयं भंते एवं ? गोयमा ! जण्णं ते अण्णउत्थिया एवमाइ- खंतिजाव वेदणं वेदति वत्तव्वंसिया,जे तेएवमाहंसु मिच्छंते एवं आहंसु.अहं पुणगोयमा! एवमाइक्खामि ४, एवं खलु चलमाणे चलिए जाव निजरिज्जमाणे णिजिण्णे दो- परमाणु पोग्गला एगयओ साहणंति, कम्हा दो परमाणु पोग्गला एगयओ भावाथा भूत है वह क्रिया क्या करण आश्री दुःख के हेतु भूत है या अकरण आश्री दुःख के हेतु भूत है ?. वह अकरण आश्री दुःख के हेतु भूत है परंतु करण आश्री दुःख के हेतु भूत नहीं है. ऐसे ही नहीं किया हुवा दुःख, नहीं स्पर्शा हुवा दुःख, व अक्रियमाण किया हुवा दुःख किये बिना प्राण भूत, जीव व सत्व वेदना वेदते हैं. अहो भगवन् ! ऐसा जो अन्य तीथिंक कहते हैं वह किस तरह से है ? अहो गौतम ! जो अन्य तीर्थिक उक्त बातों को कहते हैं वे मिथ्या बोलते हैं अर्थात उन का कथन मिथ्या है. परंतु अहो गौतम ! मैं ऐसा कहता हूं यावत् प्ररूपता हूं कि चलने लगे कर्म : पुद्गलों को चले कहना, यावत् * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी सा २४३ HAIR पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - ब्दार्थ कहता हूं च०चलते को च०चला जा यावत् नि निर्जरते को नि०निर्जरादोदोप० परमाणु पुद्गल ए. एकत्रित साहणंति? दोण्हं परमाणु पोग्गलाणं अत्थि सिणेहकाए तम्हा दो परमाणु पोग्गला एगयओ साहणंति तेभिजमाणा दुहा कजंति, दुहा कज्जमाणा एगयओवि परमाणु पोग्गले एगय- ओ परमाणु पोग्गले भवइ, तिणि परमाणु पोग्गला एगयओ साहणंति, कम्हा ति. णि परमाणु पोग्गला एगयओ साहणंति?तिण्हं परमाणु पोग्गलाणं आत्थि सिणेह काए तम्हा तिण्णि परमाणुपोग्गला एगयओ साहणति, ते भिजमाणा दुहावि तिहावि कजं- ति, दुहा कज्जमाणा एगयओ परमाणु पोग्गले एगयओ दु पदेसिए खंधे भवइ, तिहा भावार्थ निर्जरने लगे को निर्जरे कहना. और भी दो परमाणु पुद्गल एकत्रित होकर स्कंध रूप वनजाते हैं क्यों की उस में स्नेह का गुण रहा हुवा है. एक परमाणु में शीत, उष्ण, स्निग्ध व रुक्ष ऐसे चार स्पर्श में से अ- विरोधी दो स्पर्श पाते हैं. इसलिये दो परमाणु में स्निग्धता होने से एकत्रित मीलकर स्कन्ध म्प वन जाते हैं. वैसे ही दो परमाणु को पृथक करने से उस के एक २ परमाणु के दो विभाग होसकते हैं, वैसे ही तीन परमाणु मीलकर भी स्निग्धता के कारण से स्कन्ध होता है. उस का यदि भेद किया जावे तो दो प तीन होसकते हैं. दो में एक परमाणु का एक विभाग और दिनदेशी स्कन्ध का दूसरा विभाग, तीन विभाग एक २ परमाणु पृथक् २ होजाने से होते हैं. ऐसे ही तीन चार पांच आदि परमाणु-राशिका 18733 पहिला शतक का दशवा उद्देशा 9882 oyd.
शब्दार्थ २४४ अनुवादक-बालग्रह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी। सा० मीलते हैं क० कैसे दो दो ५० परमाणु पुद्गल ए० एकत्रित सा० मीलते हैं दो-दो-प०-परमाणु कजमाणा तिष्णि परमाणु पोग्गला भवंति एवं जाव चत्तारि पंचपरमाणु पोग्गलो एगयओ साहणंति साहणिता खंधत्ताए कजंति, खंधेवियणं से असासए सयासमियं. उवाचच्चइय अवचिजइय ॥ पुर्वि भासा अभासा, भासिज्जमाणी भासा भासा, भासा समय वीतिकंतंचणं भासिया भासा अभासा. जासा पुब्बिं भासा अभासा भासि- जमाणी भासा भासा,भासा समय वीतिकांतंचणं भासिया भासा अभाला। सा कि भास ओ भासा अभासओ भासा ? भासओणं भासा सा, णो खलु सा अभासओ भासा । स्कन्ध जानना. वह स्कन्ध अशाश्वत, सर्वदा सम्यक् प्रकार से चय उपचय (हानि वृद्धि ) को पाता है. अब तीसरा प्रश्न का उत्तर देते हैं. पहिले वोलाई हुई प्रथम की भापा सो अभापा होती है, वोलाती हुइ भाषा को ही भापा कह सकते हैं. क्यों की उस समय शब्द अर्थ की उत्पत्ति होती है. भापा समय व्यतीत हुवे पीछे भापा अभापा होजाती है, अब जो पहिले वोलाइ हुइ भाषा भाषा नहीं है, 'बोलाती भाषा भाषा है व भापा समय व्यतीत हुवे पीछे भापा को अभापा कही जाती है ऐसा कहागया है तो क्या वह भापा भापक को होती है या अभापक को होती है ? वह भापा भापक को ही होती है परंतु प्रभाषक को नहीं होती है. अब चौथा प्रश्न का उत्तर देते हैं. पहिले की हुई क्रिया दुःख * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्यालामसादजी * भावार्थी २४५ 1-987 पंचङ्गा हिववपण्णात्ति ( भगवती) मूत्र 82 गब्दार्थ पुद्गल में अज्दै स्निग्धपना॥१॥अ० अन्यर्थिक ए०ऐमा आ० कहते हैं जाव्यावत् ए०एक जीजीय ए०एक स० समय में दो दो क्रिया प० करे इ० ईर्यापथिक सं० संपरायिकी जं. जिस स० समय में इ० ईर्यापथिक ५० करे तं. उस स० समय में सं० संपगयिकी प० करे जं. जिस स० समय में सं० संपरायिकी ५० करे तं० उस स समय में इ० ईर्यापथिक प० करे इ० ईर्यापधिक प० करते सं संपरागिकी १० परे। पुचि किरिया अदुक्खा जहा भासा तहा भाणियव्वा, किरियावि जाव करणओणं सूत्र सा दुक्खा नोखलु सा अकरणओ दुक्खा, सेवं वत्तव्वं सिया, किच्चं दुक्खं, फुसं दुक्खं, कज़माणकडं दुक्खं कटु कटु पाणभूयजीवसत्ता वेदणं वेदति त्ति वत्तव्वं सिया ॥१॥ अण्णउत्थियाणं भंते ! एवमाइक्खंति जाव एवं खलु एगे जीवे एगेणं समएणं किरियाओ पकरेइ तंजहा-इरियांवहियंच, संपराइयंच, जं समयं इरियावहियं पकरेइ भावार्थ देनेवाली होती है शेष सब आधिकार भापा जैसे कहना यावत् करण से दुःख परंतु अकरण से दुःख नहीं किया हुवा दुःख है, स्पर्शा हुवा दुःख है. करने लगा किया वही दुःख करके माण भूत जीव व सत्व वेदना वेदवे हैं यह चारों प्रश्नोंका उत्तर हुवा ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! अन्य तीर्थिक ऐसा कहते हैं कि एक समय में इपिथिक व सांपरायिक ऐसी दो क्रियाओं जीव करता है, जिस समय में जीव ईर्या- पथिक क्रिया करता है उस समय में ही सांपरायिक क्रिया करता है और जिस समय में सांपरायिक 333 पहिला शतक का दशवा उद्देशा-888 २४६ व अनुवादक-बालरह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी स० संपरायिकी प० करते इ० ईर्यापथिक ५० करे एक ऐसे एक एक जीवए० एक स० समय में दो० दा कि क्रिया पं० करे त० वह ज जैसे इ० ईर्यापयिक सं० संपरायिकी. से. यह क० कैसे भ० भगवन गो० गौतम ज० जो अ० अन्यतीर्थिक ए. ऐसा आ० कहते हैं जा० यावत् जे० जो एक ऐसा आ० कहते हैं मि. मिथ्या ते वे आ० कहते हैं अ० मैं पु० फीर गो० गौतम ए० ऐसा आ० करता हूँ ए. तंसमयं संपराइयं पकरेइ, जंसमयं संपराइयं पकरेइ तंसमयं इरियावाहयं पकरेइ । इरियावहिय पकरणयाए संपराइयं पकरेइ, संपराइयंपकरणयाए इरियावहियं पकरेइ। एवं खलु एगे जीवे एगेण समएणं दो किरियाओ पकरेइ तंजहा-इरियावहियंच सं- पराइयच ।। सेकहमेयं भंते एवं ? गोयमा ! जण्णंते अण्णउत्थिया एवमाइक्खति तं चैव जाव जे ते एवमाहंसु मिच्छा ते एवमाहंसु ॥ अहं पुण गोयमा ! एव माइ- क्रिया करता है उस समय में ईर्यापयिक क्रिया करता है सांपरायिक करते क्रिया ईर्यापथिक क्रिया करता है और ईर्यापरिक क्रिया करते सांपरायिक क्रिया करता है इस तरह ईर्यापथिक व साम्परायिक ऐसी दोनों क्रियाओं जीव एक समय में करता है तब अहो भगवन् ! यह कथन किस प्रकार है ? अहो गौतम ! अन्य तीथिक जो इस प्रकार कहते है वह मिथ्या है अर्थात् उसका कथन मिथ्या है. मैं ऐसा कहता हूं यावत् प्ररूपता हूं कि एक समय में जीव एक ही क्रिया करता है क्यों कि ईर्यापथिक क्रिया * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालाप्रसादजी * भावार्थ शब्दाथ २४७ सूत्र 33 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 883 भावार्थ एक जी जीव ए० एक स. समय में ए० एक किक्रिया प०करे स०स्वसमय १० व्यक्तव्यता ने०जानना जा. यावत् इ० ईर्यापथिक सं० संपरायिकी ॥२॥ नि० नरकगति में भ० भगवन् के० कितना काल वि० विरह उ० उत्पन्न होने का प० प्ररूपा ज० जघन्य ए० एक समय उ० उत्कृष्ट बा० बारह मु• मुहूर्त एक क्खामि ४ । एवं खलु एगे जीवे एगसमएं एक किरियं पकरेइ, ससमयवत्तव्ययाए नेयव्वं ॥ जाव इरियावहियं संपराइयंवा ॥ २ ॥ निरयगईणं भंते ! केवइयं कालं विरहिया उववाएणं पण्णत्ता ? गोयमा ! जहणणेणं एक समयं, उकोसेणं बारस मुहु- मात्र योग से होती है और सांपरायिक क्रिया योग व कपाय दोनों से होती है. जिस समय गांपरायिक क्रिया होती है उस समय ईर्यापथिक नहीं होती है, और जिस समय ईर्यापधिक होती है उस समय सांपरायिक नहीं होती है, वगैरह उक्त प्रकार से जिन शासन के कथनानुसार कहना. ॥ २ ॥ यहां क्रिया कही; क्रियायंत पुरुप की उत्पत्ति होती है इसलिये उत्पात विरहका प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! नरक में उत्पन्न होने का विरह कितना कहा ? अहो गौतम ! जघन्य एक समय उत्कृष्ट बारह मुहूर्त. इस की सब वक्तव्यता पन्नवणाजी सूत्र के छठे पद जैसे कहना. तियेच पंचेन्द्रिय, मनुष्य व देवता में उत्कृष्ट वारह मुहूर्त का विरह. इस प्रकार चवन का विरह जानना. एक समय में जघन्य एक, दो, तीन का उत्पन्न होना व चवना होता है उत्कृष्ट एक समय में संख्याते असंख्याते जानना. यो सब पन्नवणा सूत्र से जानना. 8 पहिला शतकका दशवा उद्देशा - x x शब्दार्थ ऐसा व० चवने का प० पद भा० कहना नि० निर्विशेप स बह ए. ऐमा भ० भगवन् जा० यावत् वि० विचरते हैं. ॥ १ ॥१०॥ सून ता, एवं वकंती पयं भाणियव्वं निरवसेसं । सेवं भंते भंतेत्ति जाब विहरइ ।। पढमसए दसमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ १ ॥ १०॥ पढमसयं सम्मत्तं. ॥१॥ २४८ * भावार्थ 42 अनुवादक बालमनगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी अहो भगवन् ! जो आपने फरमाया वह वैसा ही है, अन्यथा नहीं है. ऐसा कह कर तप व संमय से आ- त्मा को भावते हुवे श्री गौतम स्वामी विचरने लगे. यह प्रथम शतक का दशवा उद्देशा समास हुवा. और भयम शतक भी समाप्त हुवा ॥ १ ॥ १० ॥ १ ॥ * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालामसादजी * ॥ द्वितीयं शतकम् ॥ २४९ सूत्र - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 988 भावार्थ उ० उश्वास खं० खंदक पु० पृथ्वी इं० इन्द्रिय अ० अन्यतीधिक भा० भापा दे देव च० चमर चंचा स० समय खे० क्षेत्र अ० अस्लि काय वी० दूसरे शतक में ॥ * ॥ ते. उस काल तं० उम समय में ऊसासे खदए विय । पुढादिय अण्णउत्थिभासाय ॥ देवाय चमरचंचा । समय खित्तत्थिकाय बीयसए ॥ १ ॥ * ॥ तेणं कालणं, तेणं समएणं, रायागहे नाम प्रथम शतक के अंतम जीवों का उत्पन्न होने का व चवन का विरह कहा. अब दुसरे शतक में उत्पन्न व चवन के मध्य का श्वासोश्वास का प्रश्न चलता है. इस शतक के सब मीलकर दश उद्देश हैं. पहिले उद्देशे में उश्वास व खंदक का अधिकार है, दूसरे में पृथिवी का अधिकारहै. तीसरे में इन्द्रिय का अधिकार है, चौधे में अन्य नीर्थियों का अधिकार है, पांचवे में भापा का अधिकार है, छठे में देव का अधिकार, सातव चमर चंचाका अधिकार, आठवे में समय क्षेत्र सो अढाइ द्वीप का अधिकार, नववे में क्षेत्राधिकार और दशवे में अस्तिकाया का स्वरूप ॥*॥ उस काल सो चौथे आरे में उस समय सो महावीर स्वामी विचरने के समय में राजगृही नामक नगर अत्यंत मुशोभिन था. उस का वर्णन उवयाइ सूत्र में जैसा चंपा नगरी का वर्णन किया है वैसा जानना. राजगृही कं गुणशील नामक उद्यान में श्री अयण भगवन्त 28 दसरा शतकका पहिला अंदेशा 8.28.25.
२५० 4. अनुवादक-बालप्रमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 शब्दार्थ रा० राजगृह न. नगर हो या व० वर्णनयुक्त सा० स्वामी सः पधारे प० परिपदा नि० निर्गता घः धर्म क० कहा ५० परिपदा प० प्रतिगता ॥ * ॥ ते० उसकाल ते. उस समय में जे. ज्यष्ट अं0 अंते- वासी जा. यावत् प० पूनते ए. ऐसा व बोले जे. जो वे० वेइन्द्रिय ते० तेइन्द्रिय चः चतुरेन्द्रिय पं० पंचेन्द्रिय जी०जीव ए. उनका आ• श्वास पा० विशप श्वास उ. उश्वास नि० निश्वास जा० जानते हैं पा० देखते हैं जे० जो पु० पृथ्वी काया जा. यावत् २० वनस्पति काया ए० एकेन्द्रिय जीव सूत्र नगरे होत्था, वण्णओ सामीसमोसढे, परिसा निग्गया, धम्मो कहिओ, परिसा पडि- गया ॥ * ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं जेटे अंतेवासी जाव पज्जुबासमाणे एवं वयासीज इमे भंते ! बेइंदिया, तेइंदिया, चउरिदिया, पंचेंदिया जीवा एएसिणं आणा- मंवा, पाणामेवा, उस्सासंवा, निस्सासंवा जाणामो, पासामो जे इमे पुढविकाइया भावार्थ महावीर स्वामी सव परिवार सहित पधारे, यथोचित अनुज्ञा ग्रहण कर बगीचे में विराजित हुए, परिपदा बदन को आई, और श्री भगवन्त से धर्म सुनकर पीछीगइ ॥॥ उस काल उस समय में भगवन्त श्री महावीर स्वामीके ज्येष्ट अंतेवामी श्री गौतम स्वामी सेवा पर्युपासना करते ऐसा बोले कि अंहो भगवन् ! बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चतुरेन्द्रिय व पंचेन्द्रिय इन जीवों का श्वासोश्वास मैं जानता हूं यावत् देखता हूं. अ- धीत् त्रस जीव का श्वासोश्वास में जानता हूं व देखता हूं, परंतु पृथ्वीकायादिक जीव की आगमादि * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालाप्रसादजी * ब्दाथ 09 २५१ सूत्र 989 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्त ( भगवती ) सूत्र 382 ० उनका आ० श्वास पा. विशेष श्वास उ० उश्वास नि० निश्वास ण नहीं जा० जानते हैं ण नहीं पा० देखते हैं ए. वे भं० भगवन् जी० जीव आ० श्वासलेते हैं पा० यहुत श्वासलेते हैं उ०. उधासलेते हैं नि निश्वासलेते है ई० हा गो० गौतम ए. वे जी० जीव आ. श्वासलेते हैं पा. विशप वासलेते हैं उ० उवासलेते हैं नि० निश्वासलेते हैं कि किसका ए• ये जी० जीव आ० श्वासलेते हैं. पा० विशेष वामलेते हैं उ० उश्वासलेते है नि. निश्वासलेते हैं गो० गौतम दद्रव्य से अ० अनंत प० प्रदेश जाव वणप्फइकाइया, एगिदिया जीवा एएसिणं आणामवा, पाणामेवा, उस्सासं वा, निस्सासंवा, ण जाणामो ण पालामो ॥ एएसिणं भते ! जीवा आणमंतिवा पाण- मंतिवा उस्ससंतिवा, निस्ससंतिवा ? हंता गोयमा ! एएविणं जीवा आणमंतिवा पाणमंतिवा उस्ससंतिवा निस्ससंतिवा । किण्णं भंते ! एते जीवा आणमंतिवा पाण- प्रमाण से प्रतीति है तथापि उन पृथ्वीकायिक, अप्कायिक, तेउकायिक, वायुकायिक, व वनस्पति कायिक जीवों का श्वासोश्वास में नहीं जानसकता हूं नहीं देखसकता हूं. तो अहो भवगनू क्या वे जीव श्वासोश्वास लेते हैं ? हां गौतम ! वे जीवों भी श्वासो श्वास लेते हैं. अहो भगवन ! वे किस प्रकार श्वासो श्वास लेते हैं ? अहो गौतम ! द्रव्य से अनंत प्रदेशी अनंत पुद्गल का श्वासोश्वास लेते हैं क्षेत्र से असंख्यात प्रदेश को अवगाहकर रहनेवाले पुद्गलों का, कालसे एक समय यावतू असंख्यात दूसरा शतक का पहिला उद्देशा-1881 भावार्थ शब्दार्थ २५० 42 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी रा० राजगृह न. नगर हो• था व० वर्णनयुक्त सा० स्वामी स० पधारे प० परिपदा नि० निर्गता घः धर्म क. कहा ५० परिपदा प० प्रतिगता ॥ * ॥ ते. उसकाल ते. उस समय में जे. ज्यष्ट अं. अंते- वासी जा. यावत् प० पूनते ए. ऐसा ३० बोले जे. जो वे० वेइन्द्रिय ते० तेइन्द्रिय चः चतुरेन्द्रिय पं० पंचेन्द्रिय जी जीव ए. उनका आ० श्वास पा. विशेष श्वास उ. उश्वास नि. निश्वास जा० जानते हैं पा० देखते हैं जे० जो पु० पृथ्वी काया जा० यावत् २० वनस्पति काया ए० एकेन्द्रिय जीव नगरे होत्था, वण्णओ सामीसमोसढे, परिसा निग्गया, धम्मो कहिओ, परिसा पडि- गया ॥ * ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं जेटे अंतेवासी जाव पज्जुवासमाण एवं वयासीजे इमे भंते ! वेइंदिया, तेइंदिया, चउरिदिया, पंचेंदिया जीवा एएसिणं आणा- मंवा, पाणामंबा, उस्सासंवा, निस्सासंवा जाणामो, पासामो जे इमे पुढविकाइया महावीर स्वामी सब परिवार सहित पधारे, यथोचित अनुज्ञा ग्रहण कर बगीचे. में विराजित वदंन को आई, और श्री भगवन्त से धर्म मुनकर पीछीगइ ॥॥ उस काल उस समय में भगवन्त श्री महावीर स्वामीके ज्येष्ट अंतेवामी श्री गौतम स्वामी सेवा पर्युपासना करते ऐसा वोले कि अहो भगवन् ! बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चतुरेन्द्रिय व पंचेन्द्रिय इन जीवों का श्वासोश्वास मैं जानता हूं यावत् देखता हूं. अ- त् त्रस जीव का श्वासोश्वास मैं जानता हूं व देखता हूं, परंतु पृथ्वीकायादिक जीव की आगमादि। * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी भावाधे हुए, परिपदा शब्दार्थ गमो० जानना जा० यावत् पं० पांचदिशि में कि कैसे भं भगवन् णे० नारकी आ० श्वासले पा० विशेष श्वासले उ० उपासले नि० निवागले तं० तैसे जायावत् छ० छदिशा में आ० 'वामले पा०170 बहुत श्वासले उ० उचामले नि० मिवासले ए० एकेन्द्रिय जी जीन वा० व्याघात नि० नियाघात भा० कहना से० शेप नि निश्चय छ० छदिशा में ॥ १ ॥ ना. वायुकाय भं• भगवन् वा० वायु आ. श्वासले पा० बहुत श्वासले उ• उश्वासले नि० निश्वासले हैं. हां गो० गौतम वाळवायुकाय जायावत् नि० सूत्र 33 पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) मूत्र 88-89 नेयव्यो जाय पंचदिसं ॥ किण्णं भंते ! रइया आणमंतिवा, पाणमंतिया, उस्ससंतिवा, निस्ससंतिवा तं चेव जाय नियमा छदिसिं आणमंतिवा, पाणमंतिवा, उस्ससंति वा निस्ससंतिवा । जीवे एगिंदिया वाघाया निवाघाया भाणियव्वा सेसा नियमा छदिसिं ॥१॥ वाउयाएणं भंते ! वाउयाए चेव आणमंतिवा, पाणमंतिवा, 28.28 दुमरा शतक का पहिला उद्देशा भावार्थ GO नरक के जीव कैसे पुद्गलों का श्वासोश्वास लेते हैं ? इस का सब अधिकार पहिले जसे कहना यावत् निश्चय ही छ दिशिका श्वासोश्वास लेते हैं. एकेन्द्रिय जीव में व्याघात निव्याघात कहना. अन्य किसी दंडक में कहना नहीं. क्योंकी वे छ दिशिका श्वासोश्वास लेते हैं। ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! क्या वायुकाय श्वासोश्वास ग्रहण करे ? हां गौतम ! वायुकाय चासोश्वास लेना है. अहो भगवन् ! क्या वायुकाय के जीव अनेक oyo शब्दार्थी २५२ सूत्र अनुवादक-वालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक पिना द्रव्य खि० क्षेत्र से अ० असंख्यान प० प्रदेश अ० अवगाही का० काल से अ० अन्य ठि• स्थिति वाले भा. भावा से २० वर्णवाले गे० गंधवाले र० रसवाले फा० स्पर्श वाले आ०. श्वासलेते हैं पा. विशेष पासलेते हैं उ० उभ्यासलेते हैं नि० निश्वासलेते हैं जा० यदि भा० भाव से व० वर्ण वाले आः श्वास- लेते हैं पा. विशेष श्वासलेते हैं उ० उवामलेते हैं नि निश्वासलेते हैं ना तो कि० क्या एक एक व० वर्ण वाले आश्वासलेते हैं पा० विशेप श्वासलेते हैं उ० उश्वासलेते हैं नि० निश्वासलेते हैं आ० आहार मंतिवा उरससंतित्रा, निस्ससंतिवा ? गोयमा ! दव्वओणं अणंत पएसियाई दवाई, खित्तआ असंखेज पएसोगाढाई, कालओ अण्णयरठिईयाई, भावओ, वण्णमं- ताइ. गंधमंताई, रसमंताई, फासमंताई आणमंतिवा, पाणमंतिवा, उस्ससंतिवा, निस्स- संतिवा. जाई भावओ वण्णमंताई आणमंतिवा पणमंतिबा उस्ससंतिका निस्ससंतिवा, ताई किं एग वण्णाईआणमंतिवा, पाणमंतिवा उस्ससंतिवा निस्ससंतिवा, आहारगमो समय की स्थिति वाले पुद्गल और भाव से वर्णवाले, गंधवाले. रमवाले व स्पर्श वाले द्रव्य का श्वासोश्वास लेते हैं. अहो भगनन् ! जब भाव से वर्ण सहित पुगल श्वासोश्वासपने ग्रहण करते हैं तो क्या वह एक वर्ण वाले पुद्गल का वासोश्वास लेते हैं ? अहो गौतम! इनका सब अधिकार पन्नवणा सूत्र के अट्ठावीस में पद में कहा है वैसा च्याघात आश्री तीन चार पांच व छ दिशा के पुद्गल ग्रहण करे वहांतक कहना. अहो भगवन प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालाप्रसादजी * वार्थ शब्दा निः निकले से वह के कैस ए• ऐसा बु. कहा जाता है गो गौतम वा. वायुकायाको च० चार स० शरीर प० प्ररूपे उ० उदारिक वे० चैत्रेय ते. तेजस क. कार्माण उ. उदारिक वे वैक्रेय विoo छोडकर ते. तेजस क० कार्माण सहित नि: निकले से वह ते. इसलिये गो० गौतम ए. ऐसा युः क- हाजाता है ॥२॥ म० पासुक भोजन करने वाला नि. निग्रंथ नो० नहीं नि० रुंधा हुवा भ० भव नो० सूत्र 8809 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8882- एवं बुञ्चइ सियससरीरी निक्खमइ सियअसरीरी निक्खमइ ? गोयमा ! वाउकायस्सणं चत्तारि सरीरया प० तं० उरालिए, वेउब्धिए, तेयए, कम्मए । उरालिय वेउवि- याई विप्पजहाय, तेय कम्मएहिं निक्खमइ. सेतेणटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ सियस- सरीरी, सिय असरीरी निक्खमइ ॥ २ ॥ मडाईणं भंते नियंठे नो निरुद्ध भवे, नो ॐ दूसरा शतकका पहिला उद्देशा 8993-9 भावार्थ नीकलते हैं और कथंचित् शरीर रहित नीकलते हैं. अहो भगवन् ! वायुकाय के जीव किस तरह से कथंचित् सशरीरी व कथंचित् अशरीरी नीकलते हैं ? अहो गौतम ! वायुकाय को उदारिक, वैक्रेय, तेजस और कार्माण ऐसे चार शरीर होते हैं. उस में से उदारिक वैक्रेय को छोडकर नीकले इस लिये अशरीरी और तेजस, कार्माण शरीर सहित नीकले इसलिये सशरीरी, इसी से अहो गौतम ! वायु- काय के जीव कथंचित् शरीर सहित नीकले और कथंचितु शरीर रहित नीकले ॥२॥ अहो भगवन् !
शब्दार्थ २५४ सूत्र 42 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 802 निधासले वा वायुकाय वा० वायु काय अ० अनेक स० शतसहस्र वार उ. मरे ७० मरकर त. तहां भुः वारंवार प० उत्पन्नहोवे हैं. हां गो० गौतम जा. यावत् १० उत्पन्न होने से वह भभगवन् कि. पपा पु० स्पर्शी उ० मरे अ०नहीं स्पर्शी उ० मरे गो० गौतम पु० स्पर्शी उ० मरे नो० नहीं अ० अस्पशी उ० मरे से वह भं० भगवन् किं. क्या स० मशरीरी नि० निकले अ० अशरीरी नि० निकले गो० गौतम सि. कदाचित् स० सशरीरी नि. निकले सि. कदाचित अ० अशरीरी उस्ससंतिवा, निस्ससंतिवा ? हंता गोयमा ! वाउयाएणं जाव निस्ससंति वा ॥ वाउया- एणं भंते ! वाउयाएचव अणेगंसयसहस्सखुत्तो उद्दाइ उद्दाइत्ता, तत्थेवं भुजो भुजो 'पञ्चायाइ ? हंता गोयमा ! जाव पच्चायाइ. से भंते!किपुढे उद्दाइ अपुढे उहाइ?गोयमा! पुढे उहाइ, नो अपुढे उद्दाइ । से भंते ! किं ससरीरी निक्खमइ, असरीरी निक्खमइ? गोयमा ! सियससरीरी निक्खमइ, सियअसरीरी निक्खमइ । से केणटेणं भंते ! लक्षवार मरकर वहांही वारंवार उत्पन्न होते हैं ? हो गौतम वायुकायके जीव अनेक वार मरकर वदाही वारंवार उत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! वायुकाय के जीव क्या स्पर्श कर मरते हैं या विना स्पर्श मरते है ? अहो गौतम ! सोपक्रम की अपेक्षा से स्पर्शा हुवा गरे .परंतु नहीं स्पर्शा हुवा मरे नहीं. अहो भगवन् ! क्या वे सकलेवर से शरीर सहित नीकलते हैं या शरीर रहित नीकलते हैं ? अहो गौतम कथंचित् शरीर सहित प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालामसादजी:* गध शन्दर्थ ० २५७ सूत्र 2-83 पंचमांग विवाह पपणत्ति ( भवगती) सूत्र 8883 स. सत्व वि० विज्ञ वे वेदक व० कहना पा० माण भू. भूत जी० जीव सनत्व वि. विज्ञ वेवेदक व० कहना से वह के० कैसे पा० प्राण जा. यावत् वे वेदक २० कहना ज. जिसलिये आश्वासलेता है पा. विशेष श्वासलेता है उ० उवासलेता है नि निश्वासलेता है त• इसलिये पा० प्राण व० कहना जजिसलिये भू० हुवा भ० होता है भ० होगा त० इसलिये भू० भूत व. कहना ज० जिंसलिये जी. जीव जी० जीता है जी जीवपना आ० आयुप्य क. कर्म उ• अनुभचे त• इसलिये जी. जीव व० सिया. पाणे भये जीवे सत्ते विष्णूवेदेति वत्तव्यंसिया ॥ से केण?णं पाणेतिब त्तव्य- सिया जाव वेदतिवत्तव्यसिया? जम्हा आणमंतिवा पाणमंतिवा, उस्ससंतिवा, निस्ससं- तिवा, तम्हा पाणेतिवत्तव्यंसिया। जम्हा भए भवइ भविस्सइ, तम्हा भएतिवत्तव्वं. सिया, जम्हा जीवे जीवइ जीवत्तं आउयं च कम्म उवजीवइ तम्हा जीवेति वत्तव्यं. विरतार का अंत नहीं करनेवाला यावत् अपूर्ण प्रयोजन की करणीवाला निग्रंथ पुनः मनुप्यादि गति में आता है. अहो भगवन् ! जो ऐसा निग्रंथ मनुष्यादि गति में आता है उन को क्या कहना ? अ) गौतम ! उन को प्राण, भूत, जीव, सत्व, विज्ञ व वेदक कहना. अहो भगवन् ! किप्त कारन से उन को माण, भूत यावत् वेदक कहना ? अहो गौतम ! वह श्वासोश्वास लेता है इस लिये प्राण कहाता है, वह अतीत काल में था, वर्तमान में है और आगामिक में होगा इस लिये भत कहाता है, वह आत्ता जनिा 93883 दूसरा शतक का पहिला उद्देशा 80P भावार्थ २५६ सन अनुवादक-वालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 शब्दाथा नहीं नि० रुंगावा भ० भव विस्तार णो नहीं प० क्षय हुवा सं० संसार णो नहीं प० क्षयहुआ सं० समार ये वेदनीय नो० नहीं वो तूटा सं० संसार नो० नहीं वो लूटा सं० संसार वे. वेदनीय नो. नहीं नि० पूर्णहुवा आ० अर्थ नो० नहीं पूर्णहुधा अ० अर्थ कार्य पु० फीर इ० यहां ह. शीघ्र आ आये हैं. हां गोः गौतम म० प्रामुक भोजी नि० निग्रंय जा. यावत् पु. फीर इ० यहां ह० शीघ्र आ० आवे से उनको भं० भगवन् किं. क्या व० कहना गो० गौतम पा० प्राण भू. भूत नी० जीव निरुद्धभवपवंचे, जो पहीण संसारे, णो पहीण संसार वेयणिज्जे, नो वोच्छिण्ण संसारे, णो वोच्छिण्ण संसार वेयणिजे; णो निट्ठियटे, नोनिट्ठिय? कराणज्जे, पुणरवि इच्छत्तं हव्यमागच्छइ? हंता गोयमा! मडाईणं नियंठे जाव पुणरवि इच्छत्तं हव्यमांग- रछइ । सेणं भंते ! किं वत्तव्यंसिया? गोयमा ! पाणेतिवत्तव्यं सिया, भूतेति बत्तव्यंसियां जीवैतिवत्तव्यंसिया, सत्तेति वत्तव्वंतिया, विन्नुयात्त वत्तव्वंसिया, येदेति वत्तव्वं- - भावार्थ मामुक भोजन करनेवाला परंतु भव व भव विस्तार का निरंधन नहीं करनेवाला. चतुर्गति गमन रूप सं- मार का क्षय नहीं करनेवाला, संसार में घेदनीय कर्म का क्षय नहीं करनेवाला, चतुर्गतिक गमनानुबंध व वेदनीय कर्म को नहीं तोडनेवाला, अपूर्ण प्रयोजनवाला और अपूर्ण प्रयोजन की करणीवाला निथ क्या पुनः इस मनुप्यादि गति में आता है ? हां गौतम : पामुक भोजन करनेवाला. परंतु भव व भव के * प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्वालामसादजी * -- शब्दार्थ २०१० सूत्र 3888 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 9888 ह० शीघ्र आ० आते हैं हं० हाँ गो. गौतम म० मृतभोजी नि. निग्रंथ जा. यावत् नो० नहीं पु. फोर इ० यहां ह० शीघ्र आ० आते हैं से० उनको भ० भगवन् किं. क्या ५० कहना सि० सिद्ध बु• बुद्ध मु. मुक्त पा० पारंगत प० परंपरा तग ५० कहना सि० सिद्ध मु मुक्त प० परिनिवृत्त अ० अंतकृत स० सर्व दु० दुःख से ५० मुक्तहुचे व० कहना स. वह ए. ऐसा भं० भगवन् भ० भगवान् राणिज्जे णो पुणरवि इच्छत्तं हव्व मागच्छइ ? हंता गोयमा ! मडाईणं नियंठे जाव नो पुणरवि इत्थत्तं हव्वं आगच्छइ ॥ सेणं भंते ! किं वत्तन्वं सिया ? गोयमा ! सि- द्वेत्ति वत्तव्वं सिया, बुद्धेत्ति वत्तव्वं सिया, मुत्तेत्ति वत्तव्वं सिया, पारगएत्ति वत्तव्वं सि- या, परंपरगएत्ति वत्तव्यं सिया, सिद्धे बुद्धे मुत्ते परिनिम्बुडे, अंतकडे सन्द दुक्खप्प. तार्थ करणीकरनेवाले निग्रंथ क्या पुनः मनुष्यादि गति में नहीं आते हैं ? हां गौतम ! प्रा- सुक भोजन करनेवाले यावत् निष्टितार्थ करणीवाले पुनः मनुष्यादि गति में नहीं आते हैं, अहो भगवन् ! उन को क्या कहना ? अहो गौतम ! उन को सब कार्य की सिद्धि होने से सिद्ध कहना, चराचर पदार्थ के ज्ञाता होने से बुद्ध कहना, समस्त कर्म से मुक्त होने से मुक्त कहना, संसार सागरको उत्तीर्ण होने से पारंगत कहना, मिथ्यात्वादि गुणस्थान अथवा मनुष्यादि गति को परंपरा से जानने से अर्थात् भव समुद्र पार पहुंचने से परम्परागत कहना, कपाय से निवर्तने से परिनिवृत, संसार का अंत करने से अंतकृत, भावार्थ 3 दूसग शतक का पहिला उद्देशा 98888 oo GA9 oyo शब्दार्थ २५८ अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी कहना ज० जिलिये स० असक्त मु. शुभाशुभ क० कर्म से त• इसलिये स०सव २० कहना-ज. जिस- लिये ति० तिक्त क• कटुक क० कपाय अं अंबट म० मधुर र० रस जा. जाने त० इसलिये वि. विज्ञ व० कहना ये वेदता है सु-सुख दु० दुःख ० त०इसलिये वे वेदक २० कहना से० वह ते ० इसलिये जा० यावत् पा० माण जा० यावत् वे वेद व० कहना ॥ ३ ॥ म. मृतभोजी नि० निग्रंथ नि० रुंधा भ० भव नि० रुंघा भ० भवविस्तार जा. यावत् नि० पूरा हुवा अ अर्थ कार्य नो० नहीं पु० फीर इ. यहां सिया, जम्हा सत्ते सुहासुहेहिं कम्मेहिं तम्हा सत्तेवि वत्तव्वं सिया, जम्हा तित्त, कटु, कसाय अंबिल महुरे रसे जाणइ, तम्हा विष्णुतत्ति वत्तव्यं सिया, वेदेइय.सुहदुक्खं तम्हा वेदेतिवत्तव्यं सिया, से तेण?णं जाव पाणेति वत्तव्यंसिया, जाव वेदेतिवत्तव्यास- या ॥ ३ ॥ मडाईणं भंते ! नियंठे निरुद्ध भवे निरुद्ध भवपवंचे जाव निट्ठिय? क- अर्थात् पाणों को धारन करता है और उपयोग लक्षणरूप जीवत्व वैसे ही आयुः कर्म को अनुभवता है इस लिये जीव कहाता है. वह शुभाशुभ कर्म में आसक्त अथवा समर्थ है इसलिये सत्ल कहाता है, वह निक्त, कटुक, कपाय, अम्बट व मधुर रस को जानता है इस लिये विज्ञ कहाता है और सुख दुःख को वेदनेवाला होने से वेदक कहाता है.. इस लिये अहो गौतम ! वह प्राण यावत् वेदक कहाता है ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! मामुक भोजन करनेवाले वैसे ही भव व भव प्रपंच,का निरुंधन करनेवाले यावत् निष्टि- * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ क -- 60 २६१ 994 ॐ पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती ) मूत्र 888 शब्दार्थ दिशा में छ. छत्रपलाश चे० चैत्य हो० था ३० वर्णन युक्त स० श्रमण भ० भगवान् म. महावीर उ० उत्पन्न णा ज्ञान दर्शन युक्त जा० यावत् स० समवसरण ५० परिपदा नि० निर्गता ॥६॥ ती० उस क. करंगला न० नगरी की अ० नजदीक सा० मावत्थी ना० नामकी न० नगरी हो० थी व० वर्णनयुक्त त. तहां सा० सावत्थी ण नगरी में ग. गर्दभाली का अं० अंतेवासी खं० खंदक ना० नामका कon कासायन गोत्रीय १० परिव्राजक प० रहता है रि० ऋग्वेद ज० यजुर्वेद सा• सामवेद अ० अथर्ववेद इ० छत्तपलासए णामं चेइए होत्था, वण्णओ । तएणं समणे भगवं महावीरे उप्पन्नणाण सूत्र दसणधरे जाव समोसरणं परिसा निग्गया ॥ ६ ॥ तीसेणं कयंगलाए नयरीए अदूर- सामंते सावत्थीणाम नयरीहोत्था. वण्णओ तत्थणं सावत्थीए णयरीए गहभालिस्स अंतेवासी खंदए नाम कच्चायणसगोत्ते परिन्वायगे परिवसइ रिउव्वेय, जजुब्वेय, साम- भावार्थ में चपा नगरी का वर्णन कहा है वैसा कहना. उस कयंगला नामक नगरी के वाहिर उत्तरपूर्व-ईशान कौन में छप पलाश नामक यक्षका चैत्य है, उस का भी वर्णन उववाइ से जानना. वहांपर केवल ज्ञान केवल दर्शन के धारक श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी पधारे. परिपदा वंदन करने को आइ. भगवन्त से धर्मकथा सुनकर परिपदा पीछी गई. ॥ ६ ॥ उस कयंगला नगरी की पास एक सारथी नामकी नगरी थी. उम का वर्णन भी. उबवाइ में से जानना. उस सावत्थी नगरी में गर्दभाली नामक तापस का १.382 दूसरा शतक का पहिला उद्देशा 09 शब्दार्थ २६० सूत्र ॐ अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 गो. गौतम स. श्रमण भ० भगवान् म. महावीर को वं० वंदना कर न० नमस्कार कर सं० संयम. त० तप से अ० आत्मा को भा० भावते हुवे वि. विचरते हैं ॥ ४ ॥ त० तब स० श्रमण भ० भगवान् म० महावीर रागनगृह न० नगर से गु० गुणशीलक चे० चैत्य से प० निकले प० निकलकर व० वाहिर ज. अन्यदेश में वि० विचरने लगे ॥५॥ते. उसकाल ने उस समय में क० कयंगला ना० नामकी न नगरी हो० थीव० वर्णन युक्त ती. उस क० कयंगला न० नगरी की ब. वाहिर उ० ईशान होणेत्ति वृत्तव्यं सिया. सेवं भंतेत्ति. भगवं गोयमे समणं - भगवं महावीरं वंदइ नमसइ वंदित्ता नमसइत्ता, संजभेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणे विहरइ ॥ ४ ॥ तएणं समणे भगवं महावीरे रायागिहाओ नयराओ, गुणसिलाओ चेइयाओ पडिनि- क्खमइ २ त्ता बहिया जणवयविहारं विहरइ ॥ ५ ॥ तेणं कालेणं तेणंसमएणं कयं- गला णामं नयरीहोत्था,वण्णओतीसेणं कयंगलाए नयरीए बहिया उत्तरपुरच्छिमे दिसीभाए और सब दुःख का क्षय करने से सर्व दुःख प्रहीन कहना. अहाँ भगवन् ! आपने कहा सो सत्य है ऐसा कहकर गौतम स्वामी संयम व संप से आत्मा को भावते हुचे विचरने लगे ॥ ४ ॥ उस समय में श्री श्रमण भगवन्तं महावीर राजगृह नगर के गुणशील नामक उद्यान में से नीकल कर अन्य देश में विचरने लगे. ॥५॥ उसकाल उस समय में कयंगला नामक नगरी थी. उस का वर्णन उववाइ सूत्र * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ २६३ ए - पंचांग विवाद पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र ? शब्दार्थ सा. श्रवण करनेवाला अ० कोई वक्त जे० जहां खे० विदक क कात्यायन गोत्री ते तहां उ० आये आ० आकर खं० खंदक क० कात्यायन गोत्री को इ० यह अ० आक्षेप से पु०. पूछे मा०, मागध कि क्या स. अन्त वाला लो लोक अ० अनंतलोक स अंतसहित जी०जीव अ०अनंत जी जीव स०अन्त सहित सिद्धी अ० अनंन सिद्धी स० अंत सहित सिद्ध अ. अनंत सि. सिद्ध के. किस म. मरण से म० मरता जी० जीव ५० वृद्धिपायें हा० हानीपामें ए० इतना आ० कठो ७० बोलते एक ऐसा से वह खं० खंदक सावए परिवसइ : तएणं से पिंगलए नाम नियंठे वेसालिय सावए अण्णया कयाई जेणेव खंदए कच्चायणसगोते तेणेव उवागच्छइ २ त्ता खंदयं कच्चायणसगोतं इण मक्खवं पुच्छे, मागहा ! किं सअंतेलोए अणतेलोए ? सअंतेजीवे, अणंते जीवे ? सअंतासिद्धी, अणंतासिद्धी ? सअंतेसिडे, अणंतेसिढे ? केण वा मरणणं मरमाणे जीवे भावार्थ छद निमित्त सो शब्द उत्पत्ति का शास्त्र, ज्योतिष शास्त्र, व अनेक वाहाण सन्यासी संबंधी नीति शास्त्र में निपुण थे ॥ ७ ॥ उस सावत्थी नगरी में श्री महावीर के वचन सुनने में रसिक पिंगलक नामक निग्रंथ रहता था. महावीर भगवन्त के वचन सुनने में रसिक ऐसे पिंगलक निग्रन्थ एकदा कात्यायन गोत्रीय खंदक नामक परिव्राजक की पास आये, आकर के उन को ऐसा प्रश्न पुछा कि अहो मागध ! क्या १ मगध देश में उत्पन्न होनेवाले.. ११ दूसरा शतक का पहिला उद्देशा y २६२ <3 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 शब्दार्थ इतिहास पं० पांचवा नि निगण्टु संग्रह छ • छठा च० चारवेद का सं० सांगोपांग स० रहस्य सहित सा स्मरण करनेवाला वा शुद्ध करनेवाला धाधारक पा०पारगामी सछअंग सल्कापिलीयशास्त्र विपंडित सं० गणित शास्त्र मि० अक्षररूप शास्त्र वा० शब्द छं० छंद नि० शब्द उत्पति का जान जो० ज्योतिषी शास्त्र अ० अन्य कोई ५० बहुत वै० ब्राह्मण म० परिव्राजक में न० नय में सु० अच्छा निश्चयार्थ का जान हो० था ॥ ७ ॥ त० तहां सा सावत्थी न० नगरी में पिं० पिंगलक नि० निग्रंथ वे० वैशालिक सूत्र वेय, अहव्वणवेय, इतिहास पंचमाणं, निघंटुछट्ठाणं, चउण्हं वेयाणं संगोवंगाणं, सरह: स्साणं सारए, वारए, धारए, पारए, सडंगवी, सद्वितंतविसारए,संखाणे, सिक्खाकप्पे, वाग: रणे छंदे निरुत्ते जोइसामयणे, अण्णे नुय बहुसु बंभण्णएसु परिव्यायएसु नएसु सुपरि- निंट्ठिएयावि होत्या. ॥ ७ ॥ तत्थणं सावत्थीए नयरीए पिंगलए नामंनियंढे वेसालिय भावार्य शिप्य कात्यायन गोत्रीय खंदक नामक परिव्राजक रहताथा. वह खंदक परिव्राजक ऋग्वेद, यजुर्वेद सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास सो प्राचिनकाल के महापुरुषों की कथाओं, और निधन्दु सो अनेकार्थ वाची को- प ऐसे पड़शास्त्र के ज्ञाता थे. और चारों वेदों के छअंग और उस में कहे हुवे प्रबंध सो अंग, इनकी मयुक्ति, युक्तियों को वारंवार स्मरण करनेवाले, अशुद्ध पाठ का निषेध करनेवाले, हृदय में धारन करनेवाले व पारगामी-थे. वैसे ही छ अंग व कापीलिय शास्त्र के ज्ञाताथे. संख्या-गणितविद्या, शिक्षाकल्प, व्याकरण, प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी बालाप्रसादजी शब्दार्थ क्या स० अंतसाहित लोक जा. यावत् के० किस म मरण से म० मरता जी जीव ३० वृद्धिपामे हा. हानिपामे ए० इतना आ० कहो बु० बोलता त० तव ते वह ख• खंदक क: कात्यायन गोत्रीय पि. पिंगलक निग्रंथ वे वैशालिक सा० सुननेवाला दोदो त तीन वक्त इ०यह अ आक्षेप से पु० पूछते सं. शकित के० कांक्षित वि० संदेहवाला भे भेद को प्राप्त क. कालुष्य वाला नो०. नहीं सं० शक्तिमान सूत्र 3887 पंचङ्ग डिववपण्णात्ति ( भगवती) सूत्र.8883 तएणं से पिंगलए नियंठे वेसालीसारए खंदयं कच्चायणसगोत्तं दोच्चंपि इणमक्खेवं पुच्छे मागहा! किं सअंतेलोए जाव केणवा मरणेणं मरमाणे जीवे वड्डइवा, हायइवा, एतावंताव आइक्खाहि बुच्चमाणो एवं तएणं तेखदए कच्चायणसगोत्तं पिंगलएणं नियंठेणं वेसालीसावएणं दोचंपि तचंपि इणमक्खे पुच्छिए समाणे संकिए कंखिए वितिर्गिछिए, जानने की कांक्षा, अन्य को 'उत्तर देने में प्रतीति होवे वैसी वितिगिच्छा उत्पन्न हुई. वैसे ही मैंने इस का उत्तर नहीं जाना सो मतिभंग, भेद व मन में कालुप्यता हुई. वैसे ही वैसालिय श्रावक पिंगलक अनगार के एक ही प्रश्नों का उत्तर देने को असमर्थ हुवा. और मौन खडा रहा. तव उन वैसालिय श्रावक पिंगलक निग्रंथने पुनः यही प्रश्न पूछा की अहो, मागध ! अंत सहित लोक है यावत् किस मरण से संसार की वृद्धि होता है और किस मरणसे संसार का क्षय होता है ? इस तरह पिंगलक निथने दो 384330% दूसरा शतक का पहिला उद्देशा 988s भावार्थ शब्दाथ २६४ सूत्र 48 अनुवादक-यालयामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 80 क० कात्यायन गोत्रीय पिर पिंगलक नि निग्रंथ वे० वैशालिक सा० सुननेवाला इ०यह अ० आक्षेप से पु० पूछते सं० संकित के कांक्षित वि० संदेह वाला भे० भेदको प्राप्त क० कालुप्य को स० प्राप्त पो० नहीं सं० शक्तिमान है पिं. पिंगलक नि० निग्रंथ वे वैशालिक सामुननेवाला किं० किंचित् १० उत्तर अ० कहने को तु० तुप्णीक सं० रहे ते ० तब से वह पिं० पिंगलक नि० निग्रंथ वे० वैशालिक सा सुननेवाला खं. खंदक क० कात्यायन गोत्री को दो० दोवार इ० यह अ० आक्षेप से पु० पूछे मा० मागध किं० वड्डइवा, हायइवा, एतावंताव आइखाहि, वुच्चमाणो एवं तएणं से खंदए कच्चायण- सगोत्ते, किंगलएणं नियंठेणं , वेसालीसावएणं इणमक्खवं पुच्छिएसमाणे संकिए कंखिए, वितिर्गिछिए, भेदसमावणे, कलुससमावण्णे णो संचाएइ पिंगलयस्स नियंठरस वेसालियसावयस्स किंचिवि पमोक्ख मक्खाइओ तुसिणीए संचिट्ठइ. यह लोक अंत महित या अंत रहित है ? २ जीव अंत सहित है या अंत रहित है ? सिद्ध शिला . अंत सहित है या अंत रहित है ? मिद अंत सहित या अंत रहित है ? अथवा किस मरण से जीव संसार की वृद्धि करता है व किस मरण से जीव संसार को क्षीण करता है ? इन प्रश्नों का उत्तर कहो अनंतर दुसरे प्रश्न पूछंगा. इस तरह महावीर स्वामी के वचन सुनने को रसिक पिंगलक निर्ग्रन्यने इस तरह प्रश्न पुछने पर कात्यायन गौत्रीय स्कंदक परिव्राजक को इस का क्या उत्तर होगा ऐसी शंका, अन्य की पास अर्थ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ ?
शब्दार्थ OYO । २६७ सत्र 8888 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र - आत्मविषय चि० स्मरणरूप प० प्रार्थनारूप म० मनोगत सं० संकल्प स० उत्पन्न हुवा ए. ऐसा स. श्रमण अ० भगवन् म ० महावीर क० कयंगला न० नगरी की व० बाहिर छ० छत्रपलास चे० चैत्य में सं० संयम से त० तप से अ० आत्मा को भा. भावते वि० विचरते हैं तं. उनकीपास गं. जाऊं स० श्रमण भ० भगवान् म महावीर को पं० वंदनाकर न० नमस्कारकर स० सत्कारकर म० सन्मानदेकर वीरे कयंगलाए नयरीए बहिया छत्तपलासए चेइए संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणे विहरइ ॥ तं गच्छामिणं समणं भगवं महावीरं वदामि नमसामि सेयं खलु मे समणं भगवं महावीरं वंदित्ता नमंसित्ता सकारेत्ता सम्माणेत्ता कल्लाणं मंगलं देव- यं चेइयं पज्जुवासेत्ता इमाइंचणं एयारूवाइं अट्ठाई हेऊई पसिणाई वागरणाई पु- कात्यायन गोत्रीय स्कंदक परिव्राजक को ऐसा चिन्तवन व मनोगत संकल्प हुवा कि कयंगला नगरी के छत्र पलाश उद्यान में संयम व तप से आत्मा को भारते हुवे श्री श्रमण भगवंत महावीर विचरते हैं इसलिये उन की समीप मैं जाऊं और श्री श्रमण, भगवन्त को वंदना नमस्कार करूं. श्री श्रमण भगवन्त महावीर og को वेदना, नमस्कार, सत्कार व सन्मान कर वैसे ही कल्याणकारी, मंगलकारी, देव व साक्षान् महाशानके धारक ऐसे श्री श्रमण भगवंत की:पर्युपासना करके जो मेरे मन में संदेह रहा हुवा है वैसे गन्नों पुछकर निर्णय करना मुझे श्रेय है. ऐसा विचार करके जहां परित्राजक संन्यासीनों का आश्रम था यहां आया वहां 88888 दूसरा शतकका पहिला उद्देशा 88880p> भावार्थ शब्दार्थ - अनुवादक बालबामगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 है पि० पिंगलक नि० निग्रंथ वे० वैशालिक सा० सुननेवाला को किं किंचित् पं० उत्तर अ०कहन को तु. तुप्णीक सं० रहे ॥ ८॥ त० तवं सा० सावत्थी न० नगरी से सिं० सिंघाडे जैसे जा. यावत् प० रस्ते में म० महा पुरुपों सं० संमई ज० जन समुदाय प० परिपदा नि० गइ त० तब तक उस ख० खंदक क०कात्यायन गोत्रीय व०वहुत ज०मनुष्य की अं०पास स यह अर्थ सो सुनकर नि०अवधाकर इ०इसरूप अ० भेदसमावन्ने, कलुससमावन्ने नोसंवाएइ पिंगलरस नियंठस्स वेसालिय सावयस्स किं- चिवि पमोक्खमक्खाइओ तुसिणीए संचिट्ठइ ॥ ८ ॥ तएणं सावत्थीए नयरीए सिं- घाडग जाव पहेसु महयाजण सम्मद्देइवा, जण बूहेइवा: निग्गइछइ तएणं तस्स खंदयस्स कच्चायणसगोत्तरस बहुजणस्स अंतिए एयमहूँ सोच्चा निसम्म इमेएयारूवे अज्ज- थिए, चिंतिए, पच्छिए, मणोगए संकप्पे समुप्पजित्था एवं खलु समणे भगवं महा- तीन चार पैसाही प्रश्न पूछा परंतु कात्यायन गोत्रीय स्कंदक परित्रामक को शंका, कांक्षा, वितिगिच्छा, भेद व कालुप्यता प्राप्त होने से उन के प्रश्न का उत्तर नहीं दे सका और मौन खडा रहा ॥ ८॥ उस समय श्रावस्ती नगरी के तीन रस्ते मीलन के स्थान, चौक यावत् वहुत रस्ते मीलने के स्थान पर बहुत मनुष्यों के समुदाय की परिपदाश्री श्रमण भगवन्त को चंदना करने को नीकली. और परस्पर ऐसा बोलने लगे की श्री श्रमण भगवन्त महावीर कयलगा नगरी के छत्रपलाश नामक उद्यान में पधारे हैं. ऐसा बहुत मनुप्यों की पाससे श्रवण करके * प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ ग्दाथ २.9 २६२ सूत्र B98 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 398 लकर छ० छत्र वा० पगरखा सं० युक्त पा० धातुरक्त व वस्त्र प० पहनकर सा० सावत्थी न नगरी की म० मध्य से नि० निकलकर जे. जहां क० कयंगला न० नगरी जे० जहां छ. चपलास चे० चैत्य ० जे. जहां स० श्रमण भ. भगवान् म. महावीर ते. तहां पा निश्चय किया ग. जाने को ॥९॥ मो016 गौतमादि स० श्रमण भ• भगवान् म० महावीर भ० भगवान् गो० गौतम को एक ऐसा वबोले द. छत्तोवाहण संजुत्ते, धाउरत्त वत्थ परिहिए, सावत्थीए नयरीए मझं मझेणं निग्गच्छइ निग्गच्छइत्ता जेणेव कयंगला नगरी, जेणेव छत्तपलासए चेइए, जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव पाहारेच्छ गमणाए।॥९॥ गोयमाइ समणेभगवं महावीरे भगवं गोयमं एवं वयासी दच्छिसिणं गोयमा! पुवसंगइयोकं तं, कं भंते? खंदयं नाम । से काहेवा, कि- मीकलकर त्रिदंड, कमंडल, रुद्राक्षमाला, मृत्तिका का भाजन, मृत्तिका आसन विशेष, प्रमानन करने का कपडा, पड्नालिका, वृक्ष पल्लव को छेदनेवाला अंकुश, ताम्बेकी मुद्रिका व कालाचिका इत्यादि हस्त में धारन करके, शिरपर छत्र रखकर, पांव में उपानह रखकर, भगरे वस्त्र पहिन कर, सावत्थी नगरी के मध्य में से नीकलकर जहां कयंगला नामक नगरी के छत्र पलाश उद्यान में श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी थे वहां आनेका अभिलापी हुवा ॥९॥ उस समय श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामीने गौतम स्वामी को घोलाकर कहा कि अहो गौतम : तूं तेरा पूर्व संगतिवाला भित्र को देखेगा. तब गौतम स्वामी वोले की 28- दूसरा शतकका पहिला उद्देशा 988 भावार्थ शब्दार्थ सूत्र अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी क. कल्याण कारी म० मंगल कारी दे देव चे. ज्ञानरूप प० पूजते इ० उस एक ऐसा अ. अर्थ हे. हेतु प० प्रश्न या व्याकरण पु० पूछना क• करके ए. ऐसा सं० आलोचकर जे०जहां प०परिव्राजक की व० वसति ते. तहां आ० आकर ति त्रीदंड कुं० कमंडल कं० रुद्राक्ष माला क० मिट्टिका भाजन भि. आसन के० चीवरखंड .छ. निगडी अ० अंकुश प० तांबे की मुद्रिका ग आभरण विशेप छ. छत्र वा० पगरखा पा० पावडी धा० शाटिका गे• ग्रहणकर प० परिवानक व. वसति से प० निकलकर ह० हस्त में च्छित्तए तिकटु एवं संपेहेइ २ ता, जेणेव परिव्वायगा वसही तेणव उवागच्छइ उवा- गच्छइत्ता तिदंडंच, कुडियंच, कंचणियंच, करोडियंच, भिसियंच, केसरियंच, छपणालियंच, अंकुसयंच, पवित्तयंच, गणेत्तियंच, छत्तयंच, वाहणाउय पाउयाउय धाउरत्ताउयगेण्हइ गेण्हइत्ता परिवायगवसहीओ परिनिक्खमइ पििनक्खमइत्ता, तिदंडं कुंडियं, कंचणिय, करोडियं, भिसियकेसारियछनालयअंकुसयपवित्तियगणेत्तिय हत्थगए, आकर ? त्रिदंड,२ कमंडल ३ रुद्राक्षमाला ४ मृत्तिका का भाजन ५ मृत्तिका का आमन विशेष ६ प्रमाने का कपडा ७ पड्नालिका-त्रिकाष्टिका ८ वृक्षपल्लव को छेदनेवाला अंकुश ९ ताम्बेकी मुद्रिका १० कायाचिका आभरण विशेप ११. शिरपर धारन करने का छत्र १२ पांव में पहिनने का उपानह १३ लकडी की चाखडी १४ गेह से रंगे हुवे भगवे वस्त्र ऐसे भाव ग्रहण कर परिवाजककी वसति में से नीकला, * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालाप्रसादजी * भावार्थ शब्दार्थ २७? 8 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ते (भगवती) सूत्र 982- गो० गौतम स० श्रमण भ० भगवान् म० महावीर को वं. वंदनाकर न० नमस्कार कर ५० शेले ५० ० समर्थ मं० भगवन् खं खंदक क कात्यायन गोत्रीय दे० देशनुपियाकी अं० पास मुं० मुंड भ० होकर अ० अगारसे अ० अनगार कोप-प्रवाजित होनेको ०हां प०प्रभु॥११॥ना जितना काल सश्रमण भ० भगवान् म. महावीर भ० भगवान् गो० गौतम की पास ए० यह अर्थ प० करते हैं ता. उस वक्त में खं खंदक भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ २ त्ता एवं बयासी पहणं भंते ! खंदए कच्चायणसगोत्ते देवाणुप्पियाणं अंतिए मुंडे भवित्ता अगाराओ अणगारियं पवइत्तए ? हंता पभु ! ॥ ११ ॥ जावंचणं समण भगवं महावीरे भगवओ गोयमस्स एयमटुं परिकहेइ तावंचणं खंदए कच्चायणसगोत्ते तं देसं हव्यमागए. तए- स्वामी महावीर भगवंत को वंदना नमस्कार करके ऐसा पूछने लगे की अहो भगवन् ! क्या कात्यायन गोपीय स्कंदक परिव्राजक आपकी पास दीक्षा ग्रहण कर मुंड होने को समर्थ है ? हां गौतम ! वह खंदक परिव्राजक दीक्षा लेने को समर्थ है ॥ ११ ॥ श्री महावीर भगवन्त गौतम स्वामी को ऐसा कह रहे थे इतने में कासायन गोत्रीय स्कंदक परिजाजक उस गीचे के एक देश में आ पहुंचे. उस समय श्री गौतम स्वामी कात्यायन गोत्रीय स्कंदक मुनि को पास आये जानकर उपस्थित हुवे,* उपस्थित होकर * श्री गौतम स्वामी स्कंदक परिव्राजक असंयतीको देखकर खडेहुवे जिसका कारन यह है कि वह आगे ><a दृनरा शतक का पहिला उद्देशा Seeg भानार्थ २७० 1 अनुवादक यायमचारी मुनि श्री अमोलक अपीजी 8 शब्दार्थादेसो गो० गौतम पु० पूर्व सं० मित्रको के० किनको भ० भगवन् खं० खंदक को का. किसवक्त कि० किसतरह के० कितने वक्त में एक ऐसा गो० गौतम ते. उस समय में सा सावत्थी न० नगरी ग• गर्द- भालि का अं अंतेवासी खं० खंदक का० कात्यायन गोत्रीय प०परिव्राजक प० रहता है उ० उनको जा० यावत् म० मेरीपास पां० निश्चय किया ग० आने को से० वह अ० नजदीक ३० बहुत नजदीक अ० मार्ग में प० रहाहुवा अं० रस्ते में व० रहा है अ० आजही दि• देखेगा ॥ ११ ॥ भ० भगवान् गो० 'हवा,केवञ्चिरेणवा? एवं खलु गोयमा! तेणंकालेणं तेणंसमएणं सावत्थी णागंणयरी होत्था, वण्णओ, तत्थणं सावत्थीए नगरीए गद्दभालिस्स अंतेवासी खंदए णाम कच्चायणसगोत्ते परिव्वायए परिवसइ तंचव जाव जेणेव मम अंतिए तेणेव पाहारेच्छ गमणाए सेअदूरामए बहुसंपत्ते, अडाणपडिवण्णे अंतरापहे वदृइ अजेवणं दिच्छसि गोयमा ! ॥१०॥भंतेत्ति पूर्व संगतिवाला कौनसा मित्रको मैं देखूगा ? तब श्री भगवन्त बाले की तू खंदक को देखेगा. तब गौतम स्वामी बोले की किस समय, किस प्रकार व कितनी देर में मीलेगा ? तब श्री भगवन्त बोले की उस काल उस समय में श्रावस्ती नामक नगरी में गर्दभाली परित्राजकका शिप्य कात्यायन गोत्रीय खंदक नामक परिव्राजक रहता है. उन को पिंगलक निथने प्रश्न किया. जिस का उत्तर नहीं दे सकने से तो मारदा है - सर अभी रस्ते के मध्य में है और उसे तू आज ही देखेगा ॥ १० ॥ श्री गौतम * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्यालामजादी * वार्थ पर शब्दार्थ पिंगलक नि० निग्रंथ वे० वैशालिक सा० श्रवण करनेवाला इ. इस अ० आक्षेप पु० पूछा मा० मागध कि० अ० अर्थ स० समर्थ हैं. हां अ० है त० तब से वह खं०खंदक क०कात्यायन गोत्रीय भ० भगवान गो गौतम को ए. ऐसा व० कहा से वह के० कौन गो० गौतम त० तथारूप णा. ज्ञानी तक तप- स्वी जे० जिससे त• तुमने ए. यह अर्थ म० मेरा २० रहस्य ६० शीघ्र अ० कहा ज० जिससे तु. तुम ना जानते हो त० तव भ० भगवान् गो० गौतम खं. खंदक क० कात्यायन गोत्रीय को ए. ऐसा US २७३ - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 989 वएणं इणमक्खेवं पुच्छिए मागहा ! किं सअंतेलोए, एवं तंचेव जेणेव इहं तेणेव हब्ब मागए: सेणूणं खंदया : अटे समढे ? हंता आत्थि ॥ तएणं से खंदए कच्चायणस- गोत्ते भगवं गोयमं एवं वयासी-से केसिणं गोयमा! तहारूवे णाणीवा, तवस्सीवा, जेणं तव एसअढे मम ताव रहस्सकडे हव्यमक्खाए, जओणं तुमं जाणासि तएणं ॐ दुमरा शतकका पहिला उद्देशा 88><* भावार्थ oyo होती है ? उस का उत्तर नहीं आने से तुम महावीर भगवन्त की पास से सुनने को आये हो. अहो स्कंदक क्या यह सत्य है। स्कंदकने उत्तर दिया की हां यह सत्य है. तब कात्यायन गोत्रीय स्कंदकने पुछा कि अहो गौतम ! ऐसा कौन तथारूप ज्ञानी व तपस्वी है कि जिनोंने मेरे मन का रहस्य तुम को कदा! अहो स्कंदक ! मेरे धर्माचार्य धर्मोपदेशक धर्मगुरु श्री श्रमण भगवंत केवल ज्ञान के H- - स ર૭ર सूत्र अनुवादक-बालबाह्मचरिमुनि श्री अमोलक ऋपिजी ४ खंदक क कात्यायन गोत्रीय अनजदीक आ०आयाइवा जा जानकर खि०शीघ्र अ० उठकर खिशीघ्र १० सन्मुख जाकर जे० जहां खं० खंदक ककासायन गोत्रीय ते तहां उ०आकर खं० खंदक क० कात्यायन गोत्रीय को एक ऐसा व० वोले हे० अहो खं० खंदक सा स्वागतम स० सुस्वागतं अ० योग्य आगमन सा० स्वागतम् अ० योग्य आगमन मे० वह तुम को खं० खंदक सा० सावत्थी न० नगरी में पिं० णं भगवं गोयमे खंदयं कच्चायणसगोत्तं अदूरमागयं जाणेत्ता खिप्पामेव अब्भु- टेइ २ चा, खिप्पामेव पच्चुगच्छइ पच्चुगच्छइत्ता जेणेव खंदए कच्चायणसगोत्ते तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता खंदयं कच्चायणसगोतं एवं वयासी हेखंदया! सागयं खंदया! सुसागयं खंदया! अणुरागयं खंदया!. सागयमणुरा यं खंदया ! सेणूणं तुमं खंदया, सावत्थीए णयरीए पिंगलएणं नियंठेणं वेसालियसा- स्कंदक परिव्राजक की सन्मुख गये, और सन्मुख जाकर स्कंदक परिव्राजक को ऐसा बोले अहो स्कंदक तुह्मारा आगमन श्रेष्ट है, तुम्हारा आगमन अनुपम है, तुम्हारा आगमन शोभन व अनुपम है. अहो स्क- दक! श्रावस्ती नगरी में श्री महावीर के वचन सुनने को रसिक पिंगलक नामक निग्रंथने क्या ऐसे प्रश्नों पूछे थे कि अंत सहित लोक है, या अंत रहित लोक है, यावत् किस मरण से संसार की वृद्धि व हीनता प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ शब्दार्थ पिंगलक नि० निथ वे० वैशालिक सा० श्रवण करनेवाला इ. इस अ० आक्षेप पु० पूछा मा० मागर कि० अ० अर्थ स० समर्थ हं हो अ० है ० तब से वह खं०खंदक क० कात्यायन गोत्रीय भ० भगवान् गो गौतम को एक ऐसा व कहा से वह के. कौन गो० गौतम त० तथारूप णा. ज्ञानी त. तप- स्वी जे० जिससे त• तुमने ए. यह अर्थ म० मेरा २० रहस्य ६० शीघ्र अ० कहा ज० जिससे तु. तुम जा० जानते हो त तय भ० भगवान् गो० गौतम खं खंदक क. कात्यायन गोत्रीय को ए. ऐसा ७० २७३ सूत्र THE82 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 980- वएणं इणमक्खेवं पुच्छिए मागहा ! किं सअंतेलोए, एवं तंचेव जेणेव इहं तेणेव हन्व मागए: सेणूणं खंदया ! अढे समढे ? हंता आत्थि ॥ तएणं से खंदए कच्चायणस- गोत्ते भगवं गोयम एवं वयासी-से केसिणं गोयमा! तहारूवे णाणीवा, तवस्तीवा, जेणं तव एसअटे मम ताव रहस्सकडे हव्वमक्खाए, जओणं जाणासि तएणं - दुसरा शतकका पहिला उद्देशाg><* तुमं भावार्थ 8.9 होती है ? उस का उत्तर नहीं आने से तुम महावीर भगवन्त की पास से सुनने को आये हो. अहो go स्कंदक क्या यह सत्य है ? स्कंदकने उत्तर दिया की हां यह सत्य है. तब कात्यायन गोत्रीय स्कंदकने पुछा कि अहो गौतम ! ऐसा कौन तथारूप ज्ञानी व तपस्वी है कि जिनोंने मेरे मन का रहस्य तुम को कहा ? अहो स्कंदक! मेरे धर्माचार्य धर्मोपदेशक धर्मगुरु श्री श्रमण भगवंत केवल ज्ञान केवल दर्शन के शब्दार्थ २७४ सत्र * अनुवादक-यालयमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 4. कहा खं खंदक म मेरे घ० धर्माचार्य ध० धर्मोपदेशक स० श्रमण भं० भगवान म० महावार उ. उत्पन्न णा० ज्ञान द० दर्शन युक्त अ० अरिहंत जि० जिन के केवली ती० अतीत ५० वर्तमान अ० अनागत वि० विज्ञानक स० सर्वज्ञ स० सर्वदर्शी जे० जिनने म० मुझे ए. यह अर्थ त० तुमारा र० हृदय भाव हः शीघ्र अ० कहा ज. जिससे अ० मैं जा० जानताहूं खं० खंदक ॥ १२ ॥ त० नव खं० खंदक क० कात्यायन गोत्रीय भ० भगवान् गो० गौतम को ए. ऐमा ब० बोले ग० जावे गो. गौतम से भगवं गोयमे खंदयं कच्चायणसगोनं एवं वयासी एवं खलु खंदया ! मम धम्मायरिए धम्मोवएसए, समणे भगवं महावीरे उप्पण्णणाणदंसणधर अरहा जिणे केवली, तीय पच्चुप्पण्ण मणागय वियाणए सव्वष्णू सव्वदरिसी, जेणं ममएसअढे तवताव रहस्सकडे हन्यमक्खाए जओणं अहं जाणामि खंदया ? ॥ १२ ॥ तरणं से खंदए कच्चायणसगोत्ते भगवं गोयमं एवं बयासी. गच्छामोणं गोयमा ? तव धम्मायरियं धारक श्री महावीर स्वामी है. वे इन्द्रादिक के बंदनीक पूजनीक, रागादि शत्रु को जीतनेवाले. सब दोप रहित, व अतीत, अनागत. व . वर्तमान के ज्ञानी. सर्वज्ञ, सर्वदर्शी. है. इनोंने मुझे यह अर्थ तुम्हारे आये पहिले बतलाया.. उन के कथनसेही मैं यह, जानता हूं ॥ १२ ॥ तब स्कंदक परिव्राजक वोले की अहो गौतम ! मैं तुम्हारे धर्माचार्य धर्मोपदेशक श्री श्रमण भगवंत महा- प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्यालाप्रसादजी * भावाधा 94 २७५ सत्र 8- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8888- दुसरा शतक का पदिला उद्देशा शब्दार्थ त० तुमारे ध० धर्माचार्य पास की ध० धर्मोपदेशक की पास स० श्रमण भ० भगवान् म० महावीर को ० वांदे नं० नमस्कार कर जा० यावत् प० पूजे अ• यथासुखम् दे० देवानुप्रिय मा० मत ५० प्रति बंध क° करो त० तब भ० भगनांन गो नौतम वं • खंदक क० कात्यायन गोत्रीय की स० साथ जे. जहां स० श्रमण भ० भगवान् म. महावीर ते० तहां प. निश्चय कीया ग० जाने को ॥ १३ ॥ ते०१७ उम काल ते. उस समय में स० श्रमण १० भगवान् म. महावीर वि० निस भोजी हो. थे त० तर सः श्रमण भ० भगवान् म० महावीर वि० नित्यभोजी का स० शरीर को उ० उदार सिं० शो- धम्मोवदेसयं समणं भगवं महावीरं वंदामो नमसामो जाव पज्जुवासामो । अहासुहं देवाणुप्पिया ! मापडिबंधंकरेह ॥ तएणं भगवं गोयमे खदएणं कच्चायणसगोत्तेणं सदि जेणेव समणे भगवं महावीरे तेनैव पहारेच्छ गमणाए॥ १३॥तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे वियदृभोजीयावि होत्था।। तएणं समणस्त भगवओ महावीर- स्स वियदृभोइस्स सरीरयं उरालं सिंगारं कल्लाणं सिवं धन्नं मंगल्लं अणलंकिय विभू- भावार्थ वीर स्वामी को वंदना नमस्कार करूं. अहो स्कंदक ! जैसे तुम को सुख होवे से करो, विलम्ब मत करो. तब श्री गौतम सामी स्कंदक परिव्राजक को साथ लेकर जहां श्रमण भगवंत महावीर स्वामी. थे . वहां आये ॥ १३ ॥ उस काल उस समय में श्री श्रमण भगवंत महावीर नित्यभोजी थे. उन का शरीर pya .
शब्दार्थ -- २७६ भावन्त कः कल्याण कारी ति० श्रेयकारी घ० धन्य ० मंगलकारी अ० अलंकार रहित वि० विभू- पित ल० लक्षण वं व्यंजन गु० गुणयुक्त सि० श्री जैसे अ० अतीव उ० शोभते चि० रहते हैं ॥ १४ ॥ त. तहां से वह खं० खंदक क० कात्यायन गोत्रिय स०श्रमण भ० भगवान् म. महावीर का वि. नित्य भोजी स० शरीर उ० उदार जा. यावत् अ. अतीव उ० शोभता पा० देखकर ह. आनंद तु. तुष्ट चि० चित्तमें आ० आनंद हुवा पी० प्रीति हुइ ५० उत्कृष्ट सा० अच्छा मन हुआ ह• हर्पयुक्त सियं लक्खण वंजण गुणोववेयं, सिरीए अतीव अतीव उबसोभेमाणे चिट्ठइ ॥१४॥ तएणं से खंदए कच्चायणसगोत्ते समणस्स भगवओ महावीरस्स वियदृभोइस्स सरीरयं उरालयं जाव अतीव अतीव उपसोभेमाणं पासइ पासइत्ता हट्ठतुट्ठचित्तमाणदिए पीइमाणे परमसोमणसिए हरिसवसविसप्पमाणहियए, जेणेव समणे भगवं महावीरे सूत्र अनुवादक-बालबाह्मचारी मुनि श्री अमालक ऋपिनी * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्यालामसादजी * भावार्थ अनिशर शोभावन्त, श्रेयकारी, उपद्रवकारी, वस्त्राभरण रहित होनेपर शोभनिक व लक्षण व्यंजन युक्त था. ॥ १४ ॥ उम समय कात्यायन गोत्रीय कंदक परिव्राजक नित्यभोजी श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी का शरीर को अत्यंत शोभनिक यावंतू लक्षण व्यंजन युक्त देखकर हृष्ट पुष्ट चित्तवाला हुआ, वहुत संतोपित हुआ, आनंदित चित्तवाला हुआ, मन में प्रीति उत्पन्न हुई और परम उत्कृष्ट हर्प उत्पन्न हुआ. इस तरह से ore 388% पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 898 शब्दार्शवि विस्तार हि. हृदय वाला जे० जहां स० श्रमण भ० भगवान् म. महावीर ते० तहां उ० आकर ० स० श्रमण भ. भगवन्त महावीर को ति० तीनवार आ० आदान प० पदाक्षिणा क० करके जा० यावत् प० पूजनेलगे ॥ ५ ॥ स० श्रमण भ० भगवान् म० महावीर ख• खंदक क० कात्यायन गोत्रीय को ए० ऐसा व वोले तु• तुम को ख० खंदक सा०सावत्थी ण नगरी में पिंगलक निग्रंथ वे० वैशालिक सा० सुनने वाला ३० इस अ० प्रश्न से मा० मागध किं० क्या स० अंतसहित लोक अ० अनंत- सत्र तेणेव उवागच्छइ २त्ता, समणं भगवं महावीरं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ जाव . पज्जुवासइ ॥ १५ ॥ खंदयाइ समणे भगवं महावीरे खंदयं कच्चायणसगोत्तं एवं वयासी सेणूणतुम खंदया ! सावत्थीए णयरीए पिंगलएणं नियंठेणं वेसालिसारएणं इणमक्खेवं, मागहा ! किं सअंतेलोए, अणंतेलोए एवं तंचेव जाव जेणेव मम अंति- भावार्थ हर्षित बनाहुआ जहां श्री श्रमग भगवन्त महावीर स्वामी थे वहां आये ; आकर श्री श्रमण भगवंत महा- वार को तीन आदान व प्रदक्षिणा की, यावत् सेवाभक्ति की ॥ १५ ॥ तव श्री श्रमण भगवंत महावीर ई० स्वामीने कात्यायन गोत्रीय खंदक को पूछा कि अहो खंदक ! श्रावस्ती नगरी में महावीर के वचन सुनने का रसिक पिंगल निर्ग्रन्थने ऐसा पूछा कि अहो मागध ! अंत सहित लोक है या अंत रहित लोक है यावत् किम मरण से जीव संसार की वृद्धि व हानि करता है ? उस का उत्तर नहीं दे सकनेसे तू शीब मेरी * दूनरा शतक का पहिला उद्देशा > --- २७८ सूत्र १४ अनुवादक-पालयामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 शब्दाथ लोक जा. यावत म० मेरी अं० पाम ह. शीघ्र आ० आया से वह ख० खंदक अ० अर्थ -स० समर्थ १० हाँ अ० है ० संदक ए. ऐसा अ० आत्मविषय में चिक चितवन प० प्रार्थनारूप म० मनोगत सं० संकल्प स० उत्पन्न हुया कि क्या स० अंतसहित लोक अ० अनंतलोक त उस का अ० यह अर्थ मा मैंने ख. खंदक च. चार प्रकार का ५० प्ररूपा द० द्रव्य से ख० क्षेत्र से का० काल से भा० भाव से द० द्रव्य से ए. एक लो लोक स. अंतसहित खे. क्षेत्र से लो० लोक अ० असंख्यात जो. योजन ए तेणेव हबमागए । सेणूणं खंदया! अढे सम?? हंता आत्थ ॥ जेविय ते खंदया ! अयमेयारूवे अज्झथिए चिंतिए पत्थिए मणोगए संकप्पे समुप्पजित्था, किं सअंतलोए अणंतेलोए तस्सवियणं अयम?, एवं खलुमए खंदया! चउविहे लोए पण्णत्ते तंजहा-दव्वओ, खत्तओ, कालओ, भावओ. । दव्यओणं एगेलोए सते,॥ भावार्य पाप्त आया है तो क्या यह वात सत्य है? खंदक बोले हां यह सत्य है. अहो खंदक ! तेरे मन में ऐसा अध्यन माय, चिन्तवन, मनन, व मनोगत संकल्प उत्पन्न हुवा कि क्या अंत सहित लोक है या अंत रहित लोक है. परंतु अहो स्कंदक ! में लोक को इस प्रकार मरूपता हूँ. लोक के चार भेद कहें हैं द्रव्यसे, क्षेत्रसे, कालमे व भाव से. द्रव्य से पंचास्तिकायरूप एक, वह द्रव्य तत्व से अंत सहित है, क्षेत्र से सब लोक का मध्य मेरुपर्वत है उससे यह ऊर्ध्व, अधो व तिर्यक् दिशा की लम्बाइ व चौडाइ में असंख्यात योजन का प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * 9 २७१ पंचमांग विवाह पण्पत्ति ( भगवती) मूत्र शब्दार्थों को क्रोडा कोडा आ० लंवा वि० चौडा अ० असंख्यात जो० योजन को० फ्रोडा क्रोड ५० परधि में अ० है से० उस का अं० अंत का० काल से लो० लोक न० नहीं क० कदापि न० नहीं आ० हुवा न. नहीं कदापि न० नहीं है न० नहीं कदापि न न होगा भुः हुवा भ होता है भ० होगा धुध्रुव नि० नित्य सा० शाश्वत अ० अक्षय अ० अव्यय अ० अवस्थित णि नित्य ण नहीं है से० उस का अ० अंत भा० भाव से लो० लोक अ० अनंत वर्ण प० पर्यव ग. गंध २० रम फा स्पर्श अ.. अनंत सं० खेत्तओणं लोए असंखज्जाओ जोयण कोडाकोडीओ आयामविक्खमेणं, असंखेजाओ सूत्र जोयण कोडाकोडीओ परिक्खवेणं पण्णत्ता, आत्थि पुण सेअंते. ॥ कालओणं लोए न कयाइ न आसि, न कदाइ न भवइ,न कदाइन भविस्सइ,भुविसु य, भवतिय, भाविस्सइय धुवे, णियए, सासए, अक्खए, अन्वए, अवट्ठिए, णिचं, णात्थिपुणसे अंते, भावओणं लोए अणंतावण्ण पज्जवा, गंधरसफास. अणंता सटाण पन्नवा, अणंता गुरुय लहुय भावार्थ है और परिधि भी उस की असंख्यात योजन की है ताहैपि वह लोक अंत सहित है. काल से, पहिला लोक नहीं था वैसा नहीं, वर्तमान में नहीं है वैमा नहीं, भविष्य में नहीं होगा वैसा नहीं; परंतु अतीतकाल में था, वर्तमान में है और भविष्य में होगा. और भी वह धृव, नित्य, शाश्वत, अक्षय, अव्यय, 'अवस्थित नित्य है. इसलिये कालसे लोक का अंत नहीं है: भाव से लोक के अनंत वर्ण पर्यव गंध, रस व स्पर्श > दूसरा शतक का पहिला उद्देशा887 ora शब्दाथा २७८ सूत्र 22 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक पिजी 87 लोक ना० यावत म० मेरी अं० पास ह. शीघ्र आ० आया से वह ख० खंदक अ० अर्थ -स० समर्थ ६. हा अ० है ख० खंदक ए. ऐसा अ० आत्मविषय में चिं. चितवन प० प्रार्थनारूप म. मनोगत सं० संकल्प स० उत्पन्न हुवा कि क्या स० अंतसहित लोक अ० अनंतलोक तक उस का अ० यह अर्थ मः मैंने ख. खंदक च० चार प्रकार का प० प्ररूपा ६० द्रव्य से ख० क्षेत्र से का० काल से भा० भाव से द० द्रव्य से ए. एक लो लोक स० अंतसहित खेल क्षेत्र से लो० लोक अ० असंख्यात जो० योजन ए तेणेव हव्यमागए । सेणूणं खंदया! अढे सम?? हंता आत्थि ॥ जेविय ते खंदया ! अयमेयारूवे अज्झात्थिए चिंतिए पत्थिए, मणोगए संकप्पे समुप्पजित्था, किं सअंतलोए अणंतेलोए तस्सावियणं अयमद्वे, एवं खलुमए खंदया ! चउन्विहे लोए पण्णत्ते तंजहा-दव्यओ, खत्तओ, कालओ, भावओ. । दव्वओणं एगेलोए सअंते,॥ पास आया है तो क्या यह वात सत्य है? खंदक वोले हां यह सत्य है. अहो खंदक! तेरे मन में ऐसा अध्यव माप, चिन्तवन, मनन, व मनोगत संकल्प उत्पन्न हुवा कि क्या अंत सहित लोक है या अंत रहित लोक है. परंतु अहो स्कंदक ! मैं लोक को इस प्रकार प्ररूपता हूं. लोक के चार भेद कहे हैं. द्रव्यसे, क्षेत्रसे, कालमे व भाव से. द्रव्य से पंचास्तिकायरूप एक, वह द्रव्य तत्व से अंत सहित है, क्षेत्र से सब लोक का मध्य मेरुपर्वत है उससे यह ऊर्च, अयो व तिर्यक् दिशा की लम्बाइ व चौडाइ में असंख्यात योजन का * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ शब्दार्थ Gra क 1 २८१ सूत्र 4. पंचमांग विवाह पण्णनि (भगवती) मूत्र 86-800 अवगाहिक अ० है मे० उसका अं० अंत का काल से जी० जीव न० नहीं क कदापि नहीं हुवा णि नित्य में न० नहीं हैं से उसका अं० अंत भा० भाव से जी० जीव अ० अनंत ना० ज्ञान पर्यव अ० अनंत द० दर्शन पर्यव अ. अनंत च."चारित्र पर्यव अ. अनंत गु० गुरुलघु पर्यव अ. अनंत अ० अगुरुलघु पर्यव न० नहीं है से उसका अं० अंत द. द्रव्य में जी जीव स. अंतसहित खे० क्षेत्र से सः अंतमहित का० काल से अ० अनंत भा. भाव से जी० जीव अ० अनंत ॥ १७ ॥ जे. जो खं० नत्थि पुणसे अते, भावओणं जीवे अणंता णाणपज्जवा, अणता दसण पजवा, अणंता चरित्तपजवा, अणंता गुरुय लहुय पजवा, अणंता अगुरुय लहुय पजवा, नत्थि पुण से अंते । सेत्तं दवओ जीवे सअंते, खेत्तओ जीवे रुअंते, कालओजीवे अणते, भावओ जीवे अणते ॥ १७ ॥ जेवियणं तेखंदया पुच्छा अंतासिद्धी, ख्यात प्रदेशात्मक है इसलिये अंत सहित है, कालसे जीव पहिले नहीं था वैता नहीं, नहीं है वैसा नहीं व नहीं होगा वैसा नहीं, परंतु अतीत कालमें था, वर्तमानमें है और आगामिकमें होगा, वैसे ही वह नित्य, शा. श्वत है, इसलिये काल से जीव अंत रहित है. भावसे जीव को अनंत ज्ञान पर्यव, अनंत दर्शन पर्यव, अनं- त चारित्र पर्यव, अनंत गुरुलघु पर्यत्र है, इसलिये जीव अंत रहित है. इस तरह द्रव्य से जीव अंत सहित है, क्षेत्र से जीव अंत सहित है, काल से व भाव से जीव अंत रहित है ॥ १७ ॥ अहो खंदक ! १११ दूसरा शतक का पहिला उद्देशा 888 भावार्थ 9 २८० 2, अनुवादक-बालबाह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ संस्थान पपर्यव अ०अनंत गुलगुरुलघुके प०पर्यव अ.अनंत अ० अगुरुलघु पर्यवन नहीं है से उस का अं० अंत ख० खंदक द. द्रव्य से लो० लोक अ० अंतसहित खे० क्षेत्र से लो० लोक स. अंतसहित का काल से लो. लोक अ० अनंत भा० भाव से लो० लोक अ. अनंत ॥ १६ ॥ ख० खंदक जा० यावत् स० अंतसहित जी जीव अ० अनंत जीव त° उस का अ० यह अर्थ जा. यावत् द० द्रव्य से एक एक जीव स० अंतसहित खे० क्षेत्र से जी जीव अ० असंख्यात १० प्रदेशिक अ० असंख्यात प्रदेश सुन्न पनवा, अणंता अगुरुयलहुयपज्जवा, नत्थिपुणसे अते ॥ सेत्तं खंदया ! दन्वओ लोगेसअंते, खत्तओलोए सअंते, कालओ लोए अणते, भावओ लोए अणंते ॥ १६ ॥ जेविय ते खंदया ! जाव सअंतेजीवे अणतेजीवे, तस्सवियणं अयमद्वे एवं खलु जाव दवओणं एंगजीवे सअंते, खेत्तओणं जीवे असंखज्ज पएसिए, असंखज पएसोगादे, अत्थिपुण से अंते, कालओणं जीवे नकदाइ न आसि णिच्चे वाय पर्यव, अनंत संठान पर्यव, अनंत गुरुलघु पर्यव, व अनंत अगुरु रघु पर्यव हैं. इसलिये भावसे लोक अनंत ई. इसतरह से अहो स्कंदक! द्रव्यसे लोक अंत सहित, क्षेत्रसेमी अंत सहित, कालसे व भाव से लोक अनंत है ॥ १६ ॥ अहो स्कंदक ! जीव अंत सहित है या अंत रहित है उस प्रश्न के उत्तर में जीव के चार भेद कहे. न्य से, कैगसे, कालो व भावसे, द्रव्य से एकही जीव है वह द्रव्य से अंत सहित है. - क्षेत्रसे अपं. * प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * ७ २८ 389 पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) मूत्र - शब्दार्थ। 4 अवगादिक अ० है मे० उसका अं० अंत का काल से जी० जीव न० नहीं क कदापि नहीं हुवा णि नित्य ६ न० नहीं हैं से उसका अं० अंत भा० भाव से जी० जीव अ० अनंत ना० ज्ञान पर्यव अ० अनंत द० दर्शन पर्यव अ० अनंत च" चारित्र पर्यव अ. अनंत गु० गुरुलघु पर्यव अ० अनंत अ० अगुरुलघु पर्यव न० नहीं है से उसका अं• अंत द. द्रव्य से जी० जीव स . अंतसहित ख० क्षेत्र से स: अंतसहित का० काल से अ० अनंत भा० भाव से जी. जीव अ० अनंत ॥ १७ ॥ जे. जो खं० नत्थि पुणसे अते, भावओणं जीवे अर्णता णाणपजवा, अणंता देसण पजवा, सूत्र अणंता चरित्तपज्जवा, अणता गुरुय लहुय पजवा, अणंता अगुरुय लहुय पजवा, नत्थि पुण से अंते । सेत्तं दवओ जीवे सस्ते, खेत्तओ जीवे सअंते, कालओजीवे अणंते, भावओ जीवे अणेते ॥ १७ ॥ जेवियणं तेखंदया पुच्छा अंतासिही, भावार्थ ख्यात प्रदेशात्मक है इसलिये अंत सहित है, कालसे जीव पहिले नहीं था वैता नहीं, नहीं है वैसा नहीं व नहीं होगा वैसा नहीं, परंतु अतीत कालमें था, वर्तमान में है और आगामिकमें होगा, वैसे ही वह नित्य, शा-ope श्वत है, इसलिये काल से जीव अंत रहित है. भावसे जीव को अनंत ज्ञान पर्यव, अनंत दर्शन पर्यव, अनं. त चारित्र पर्यव, अनंत गुरुला पर्यव है, इसलिये जीव अंत रहित है. इस तरह द्रव्यसे जीव अंत सहित है, क्षेत्र से जीव अंत सहित है, काल से व भाव से जीव अंत रहित है ॥ १७ ॥ अहो खंदक ! 22 दूसरा शतक का पहिला उद्देशा 988 २८२ सूत्र १३ अनुवादक-बालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दाथ खंदक पु. गृच्छा अं० अंत सहित सि सिद्धि अ. अनंत सिद्धि त? उनका अ० यह अ० अर्थ म. च० चार प्रकार की मितिदि प० प्ररूपी द० द्रव्य से ए०एकसिद्धि स०अतंसहित खे० क्षेत्र से प. पंतालीम जो योजन स० लक्ष आ० लंबी वि० चौडी ए. एक जो० योजन क्रोड वा वीयालीस स. लक्ष ती. तीस स० सहस्र दो दो उ० इगुणपञ्चास जो० योजन स० शत किं० किंचित् वि० विशेषाधिक ५० परिधि में प० प्ररूपी अ० है से उसका अं०अंत का काल से सि० सिद्धि न० नहीं क कदापि न नहीं अणतासिद्धी, तस्सवियएण अयमटे, मए चउबिहासिद्धी पं० २० दवओ खेत्तओ, कालओ, भावओ. दबओणं एगासिद्धी, सअंता । खेत्तआणसिद्धी पणयालीस जोयणसयसहस्साई आयाम विक्खभेणं, एगाजोयण कोडी बायालीसं सयसहस्साइं. तीसंच सहस्साई दोण्णियअ उणापण्णे जोयणसए किंचिविससाहिए परिक्खवेणं पण्णत्ता, अस्थिपुणसे अंते, कालओणसिद्धी नकदाइनआस, ॥ भावओय जहा 'वाधा नुम को सिद्ध शिला अंत सहित है या अंत रहित है ऐसा प्रश्न पुछाया उस का भी यह अर्थ है. विशिला चार प्रकार • की कही है. द्रव्य से सिद्धशिला एक होने से अंत सहित है, क्षम से सिद्धशिला ४५ लाख योजन की लम्बी व चौडी, वैसेही १.४२३०२४१ से कुच्छ अधिक परिधि होने से अंत रहित है.. काल से भूत भविष्य व वर्तमान ऐसे तीनों काल में शाश्वत होने प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी शब्दार्थ ais सूत्र - पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 888 Pag>दसरा शतकका पहिला उद्देशा 9-93-800 आधी भा० भाव से ज० जैसे लो० लोक का त० तैसे भा कहना त उस में द्रव्य से मि० सिद्धि स० 100 अंतसहित खे० क्षेत्र से स०अंतसहित का काल से अ०अनेन भा०भाव से अ०अनंन॥२८॥ जे० जो खं० खंदक जा० यावत् किं. क्या अ० अनंत सिद्ध जा० यावत् द. द्रव्य से ए० एकसिद्ध स० अंतसहित १० २८३ खे० क्षेत्र से सि सिद्ध अ० असंख्यात प्रदेशात्मक अ० असंख्यात प० प्रदेशावगाडिक अ० है अं० अतं लोयस्स तहाभाणियबारातत्थ दव्वओसिद्धी सअंता, खत्तओसिद्धीसअंता, कालओसिद्धी अनंता भावओसिद्धी अणंता॥१८॥जेवियतेखंदया! जाव किं अनंतेसिढे तंचेव जाव दव्य- ओणं एगे सिद्धे सअंते,खेत्तओणं सिढे असंखेज पएसिए, असंखजपएसोगाढे, आत्थिपुण अंते. कालओणं सिद्धे सादीए अपज्जवसिए नस्थिपुणसे अंते, भाव से अंतरहित है, और भाव से अंनत वर्ण, गंध रस व स्पर्श के पर्यव, अनंत संठानादिक अनंत है गुरुलघु व अनंत अगुरुलघु के पर्यव होने से अंत रहित है. इस तरह सिद्ध शिला द्रव्यव क्षेत्रसे अंत सहित है, और काल व भाव से अंत रहित है. ॥ १८॥ अहो खंदक सिद्ध अंत सहित है या अनंत है उस के प्रश्न के उत्तर में सिद्ध के पूर्वोक्त प्रकार के द्रव्यादिचार भेद कहे हैं. द्रव्य से सिद्ध एक होने से अंत सहित है, क्षेत्रसे असंख्यात प्रदेशात्म सिद्ध होने से भी अंत सहित काल से एक सिद्ध आश्री आदि साहेत व अंत रहित है इसलिये अनंत है और भाव से अनंत भावार्थ 60 शब्दार्थ २८२ सूत्र 1. अनुरादक-पालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी - खंदक पु० पृच्छा अं० अंत सहित सि सिद्धि अ. अनंत सिद्धि त उनका अ० यह अ० अर्थ म. मैंने च० चार प्रकार की सिसिदि प० प्ररूपी द० द्रव्य से ए०एकसिद्धि स अतंसहित खे० क्षेत्र से प. पैतालीस जो योजन स० लक्ष आ० लंबी वि० चौडी ए० एक जो० योजन क्रोड वा वीयालीस स० लक्ष नी० तीस स० सहस्र-दो० दो उ० इगुणपञ्चास जो० योजन स० शत किं. किंचित् वि० विशेषाधिक १० परिधि में प० मरूपी अ० है से उसका अं०अंत काकाल से सि० सिद्धि न नहीं क०कदपि न०नहीं अणंतासिद्धी, तस्सवियएणं अयमढे, मए चरबिहासिद्धी पं० तं० दव्वओ खेत्तओ, कालओ, भावओ. दव्वओणं एगासिढी, सअंता । खेत्तओणसिद्धी पणयालीस जोयणसयसहस्साई आयाम विक्खभेणं, एगाजोयण कोडी बायालीसं सयसहस्साई तीसंच सहस्साई दोण्णियअ उणापण्णे जोयणसए किंचिविसेसाहिए परिक्खवेणं पण्णचा, अस्थिपुणसे अंते, कालओणसिद्धी नकदाइनआसि, ॥ भावओय जहा तुम को सिद्ध शिला अंत सहित है या अंत रहित है ऐसा प्रश्न पुछाथा उस का भी यह अर्थ १३. त्रिद्धशिला चार प्रकार की कही है. द्रव्य से सिद्धर्शिला एक होने से अंत सहित है, क्षिय से सिद्धशिला ४५ लाख योजन की लम्बी व चौडी, वैसेही १४२३०२४१ से कुच्छ अधिक परिधि होने से अंत रहित है.. काल से भूत भविष्य व वर्तमान ऐसे तीनों काल में शाश्वत होने *प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * पाथ m शब्दार्थ सत्र <P-82 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र *389 दूसरा शतक का पहिला उद्देशा - दु० दोपकार के म० मरण वा० बाल मरण प० पंडित मरण कि कैसे वा वाल मरण वा० बाल मरण दु० बारह प्रकारका व० क्षुधाले मरण व० इन्द्रिय वश मरण अ० अंतः शल्यमरण त० तद्भवमरण गि०१० गिरिपडन त तरूपडन ज० जल प्रवेश ज० अग्निप्रवेश वि०विप भक्षण स० शस्त्र से मरना वे० फांसी * २८५ देकर गि० गृद्ध के पृष्ट में प्रवेश करना ख० खंदक दु० बारह प्रकारका वा वालमरण से म. मरता जी० तस्सावियणं अयमढे एवं खलु खंदया ! मए दुधिहे मरणे पण्णत्ते तंजहा-बालमरणेय, पंडियमरणेय. । से किं तं बालमरणे ? बालमरणे दुवालसविहे पण्णत्ते तंजहा बलयमरणे, वसट्टमरणे, अंतोसल्लमरणे, तब्भवमरणे, गिरिपडणे, तरुपडणे, जलप्पवेसे, जलणप्पवेसे विसभक्खणे, सत्थोवाडणे, वेहाणसे, गिदपिढे । इच्चेएणं खंदया? दुवालस- विहेणं बालमरणेणं मरमाणे जीवे अणंतेहिं नेरइय भवग्गहणेहि अप्पाणं संजोएइ, तिर्यंच होना सो तद्भव मरण ५ पर्वत से पडकर मरना सो गिरिपडण मरण ६ वृक्ष से गिरकर मरना सो तरुपडण मरण ७ पानी में प्रवेश कर मरे सो जलपवश मरण ८ आनि में प्रवेश कर मरना सो जलन प्रवेश मरण ९ विष खाकर मरना सो विप भक्षण मरण १० शस्त्रसे छेदकर मरना ११ वृक्षकी शाखादिक से फांसो खाकर मरना सो वेहानस और १२ गृद्धप्रमुख के मृतक शरीर में प्रवेश कर मरना. इस तरह बारह प्रकार के व अन्य भी बाल मरण से जीव अनंत बार नरक, तियंच, मनुष्य व देव का भर ग्रहण करता भावार्थ yo २८३ 1. अनुवादक-बालग्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 82 शब्दार्थ का काल से सिद्ध सा० सादी अ० अपर्यवसित न० नहीं है पु. फीर मे० उसका अं० अंत भा० भाव से सि. मिद अ० अनंत णा० ज्ञान पर्यवं दं० दर्शन पर्यव अ० अगुरुलघु पर्थव न० नहीं है से. उसका अं० अंता॥१९॥ खं० खंदक ए एनारूप अ° आत्मविपय चिंचितवन जा. यावत् स उत्पन्न हुवा किस म० मरण जी० जीव व० वृद्धि पामे हा. हीनपावे त० उसका अ० यह अर्थ खं० खंदक म० मैने ओणं सिद्धे अणंता णाणपजवा अणता देखणपजवा, अणता अगुरुलहुय पजव्या, नत्थिपुण से अंते ॥ सेत्तं दबओ सिद्धे सअंते, खेत्तओ सिद्धे सअंते, कालओ सिहे अणते, भावओ सिद्धे अणंते ॥१९॥ जे विय ते खंदया ! इमेयारूवे अज्झ- थिए चिंतिए जाव समुप्पजित्या केणवा मरणेणं मरमाणे जीवे बड्डइवा, हायइवा, । भावाचा शानपर्यव, दर्शनपर्यव; व अनंत अगुरुलघु पर्यव होने से अंत रहित है. इस तरह सिद्ध द्रव्य क्षेत्र से अंत सहित व काल भाव से अंत रहित है ॥ ११ ॥ अहो खंदक ! तुम को ऐसा विचार हवा कि किस मरण से जीव मंसारकी वृद्धि या हानि कर सकता है ? अहो खंदक ! 'मरण दो प्रकार कहे है वाल मरण व पंडित मरण. उस में से बाल मरण के बारह भेद कहे हैं १ धर्म से भ्रष्ट होकर या क्षुधा से बलवलाट करता मरन मरे मो वलय मरण २ इन्द्रियों के वश में पड़कर मरे सो सह मरण ३ अंतःकरण में शल्य रखकर मरे सो अंत शल्य मरण ४ मनुष्य मरकर मनुष्य होना व * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * 58 ब्दार्थ। २८५ सूत्र 83 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 83 *288 दूसरा शतक का पहिला उद्देगा 8 दु० दोपकार के म० मरण वा० बाल मरण प० पंडित मरण कि० कैसे वा. वाल मरण वा वाल मरण दु० बारह प्रकारका व क्षुधासे मरण व० इन्द्रिय वश मरण अ० अंतः शल्यमरण त० तद्भवमरण गि०१० गिरिपडन त तरुपडन ज० जल प्रवेश ज. अग्निप्रवेश वि०विप भक्षण स० शस्त्र से मरना वे० फांसी देकर गि० गृद्ध के पृष्ट में प्रवेश करना ख० खंदक दु. बारह प्रकारका वा वालमरण से म० मरता जी तस्सावियणं अयमढे एवं खलु खंदया ! मए दुविहे मरणे पण्णत्ते तंजहा-बालमरणेय, पंडियमरणेय. । से किं तं बालमरणे ? बालमरणे दुवालसविहे पण्णत्ते तंजहा वलयमरणे, वसट्टमरणे, अंतोसल्लमरणे, तब्भवमरणे, गिरिपडणे, तरुपडणे, जलप्पवेसे, जलणप्पवेसे विसभक्खणे, सत्थोवाडणे, वेहाणसे, गिद्धपिढे । इच्चेएणं खंदया ? दुवालस- विहेणं बालमरणेणं मरमाणे जीवे अणंतेहिं नेरइय भवग्गहणेहि अप्पाणं संजोएइ, तिर्यंच होना सो तद्भव मरण ५ पर्वत से पडकर मरना सो गिरिपडण मरण ६ वृक्ष से गिरकर मरना सो तरुपडण मरण ७ पानी में प्रवेश कर मरे सो जलपवश मरण ८ आग्नि में प्रवेश कर मरना सो जलन प्रवेश मरण १ विष खाकर मरना सो विप भक्षण मरण १० शस्त्रले छेदकर मरना ११ वृक्षकी शाखादिक से फांसो खाकर मरना सो वेहानस और १२ गृद्धप्रमुख के मृतक शरीर में प्रवेश कर मरना. इस तरह बारह प्रकार के व अन्य भी बाल मरण से जीव अनंत चार नरक, तिर्यंच, मनुष्य व देव का भर ग्रहण करता भावार्थ 09 oyo yo शब्दार्थ २८६ * अनुवादक-बालबागचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 80 जीव अ० अनंत ने नारकी भवग्रहण से अ. आत्मा को सं० योजे ति० तिर्यंच म मनुष्य दे देव अ. अनादि अ. अनंत दी० दीर्घकाल चा० चतुर्गति सं० संसार कं० कतार में अ० परिभ्रमण करे से वह कि. कैमे पं० पंडित मरण पं० पंडित मरण दु०दोपकार का पा०पादोपगमन भ० भक्तप्रत्याख्यान पा० पादोपगमन दु० दोपकार नी नीहारिम अ० अनीहारीम नि० निश्चय अ० प्रतिक्रमण रहित से तिरिय मणुदेव अणाइयंचणं अगवदग्गं दीहलु, चाउरंत संसारकंतारं अणुपरियटइ. सेतं वालमरणेणं मरमाणे वढइ । सेत्तं बालमरणे ॥ से किं ते पंडियमरणे ? पंडिय- मरणे ! दुविहे प० तं० (ग्रंथ संख्या १०००) पाओवंगमणेय भत्त पञ्चक्खाणेय । से किं तं पाओवगमणे ? पाओवगमणे ! दुविहे पण्णत्ते, तंजहा-नीहारिमेय, अनीहां- है व अनादि अनंत चतुर्गतिक संसार में पर्यटन करता है. इसलिये घाल मरण से संसार की वृद्धि होती है. पंडित मरण क्या है ? पंडित परण के दो भेद कहे हैं. १ पादोपगमन अर्थात् वृक्ष की गिरी हुई शाखा की तरह अपने शरीर को स्थिर करे २ भक्त प्रत्याख्यान सो जीवन पर्यंत अशनादि चारों आहार का त्याग करे. उसमें से प्रथम पादोपगमन के दो भेद कहे हैं ? नीहारिम सो नगरमें मरे. उन के शरीर का निहारन ( संस्कार ) होरे और २ अनीहारिम. "पर्वतादिक में करे. उन के शरीर का निहारन (संस्कार ) होते नहीं. पादोपगमन मरण मरने वाला प्रतिक्रमण नहीं करता है क्यों कि वह हलन' चलनादि क्रिया * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी मालाप्रसादजी * भावाधा 5.0 २८७ न *989- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - दार्थ वह पा० पादोपगमन भ• भक्त प्रत्याख्यान दु० दोपकार का नी नीहारिम अ० अनीहारिम नि निश्चय स० प्रतिक्रमण भ० भक्त प्रत्याख्यान वं. खंदक दु० दोमकार का पं० पंडित मरण से म० मरता जी०६ore जीव अ० अनंत ने नारकी भ० भव से अ० आत्मा को वि०पृथक्करे जा. यावत् वी तीरे इ० इन खं खंदक दु० दोपकार के म० मरण मे म० माता जीव व० वृद्धि पावे हा हानीपावे ॥ २० ॥ से रिमेय. नियमा अपडिकामे. सेत्तं पाओवगमणे । से किं तं भत्तपच्चक्खाणे ? भत्तप- चक्खाणे दुविहे प० तं० नीहारिमेय, अनीहारिमेय, नियमा सपडिकामे. सेत्तं भत्त पच्चक्खाणे इच्छतणं खंदया ! दुविहेणं पंडियमरणेणं मरमाणे जीवे अणंतेहिं नेरइय भवग्गहणेहिं अप्पाणं विसंजोएइ जाव वीयवियइ. सेतं मरमाणे हायइ. सेतं पंडियमरणे ॥ इच्चेएणं खदया! दुविहेणं मग्णेणं मरमाणे जीवेवढइवा,हायइ वा॥२०॥ भावार्थ नहीं करता है. भक्त प्रत्याख्यान के दो भेद कहे हैं नीहारिम और अनीहारिम. यह प्रतिक्रमण करता है क्यों कि इन को हलन चलनादि क्रिया होती है. इस तरह अहो खंदक! दो प्रकार के पंडित मरण मरने वाला नरक, तिर्यंच, मनुष्य व देव के भव में अनंतवार उत्पन्न नहीं होता है यावत् मंसार में परिभ्रमण नहीं करता है. इसतरह मरण मरने वाला संसार का क्षय करता है. अहो खंदक : एसे दो मरण मरनेसे जीव संसार की वृद्धि व हानि करता है. ॥ २० ॥ इस तरह उत्तर मुनकर. कात्यायन गोत्रीय खंदक परिवानको , P49 दुसग शतक का पहिला उद्देशा 8888 शब्दार्थ वह वं. खंदक क० कात्यायन गोत्रीय सं• संबुद्ध स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को वं. वंदन कर न० नमस्कारकर ए. ऐसा क० बोले इ० इच्छता हूं भं० भगवन् तु. तुमारी अं० पास के० केवली ५० पम्पा धर्म को नि० धारने को अ० यथासुग्व दे. देवानुप्रिय मा० मत ५० प्रतिवध करो त तव स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर खं० खंदक क० कात्यायन गोत्रीय ती. उस मं० वडी म० महान् पपरिपदामें धधर्म प०कहा धधर्म कथा भा०कहीं॥२१॥ ततव मे वह खं० खंदक क कात्यायन गोत्रीय २८८ । सूत्र tra अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 83 एत्थणं से खदए कच्चायण सगोत्ते संबुद्धे ! समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ, नमसइत्ता एवं वयासी इच्छामिणं भंते ! तुझं अंतिए केवली पन्नत्तं धम्मं निसामित्तए. अहासुहं देवाणुप्पिया मापडिबंधं ॥ तएणं समणे भगवं महावीरे खदयस्स कच्चायण सगोचरस तीसेयमहइ महालियाए परिसाए धम्म परिकहेइ. धम्मकहा भाणियन्वा पति बोध पाये और श्री श्रमण भगवतं को वंदना नमस्कार कर कहने लगे कि अहो भगवन् ! आप की समीप काली प्ररूपित धर्म सुनने को मैं चाहता हूं. अहो देवानुप्रिय ! जैसा तुम को मुख होवे वैसा करो, विलम्ब मत करो. उस समय श्री.श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी ने उस महती परिपदा में खंदक परिबानक को धर्म कथा कही.॥ २१॥ उस समय कात्यायन गोत्रीय खंदक ने महावीर स्वामी की * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ भ सत्र 238 पंचमात विवाह पणत्ति (भगवती) सूत्र 388 - दुसरा शतकका पहिला उद्देशाaag शब्दार्थ/4/स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीरकी अं० पास ५० धर्म मो. सुनकर नि०. अपधारकर ह.० . हृष्ट तु०तुष्ट ना० यावत् १० हर्ष वा हि० हृदयमें उ० स्थान से उ० खडे हुवे उ० खडे होकर स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को ति तीनवार आ० आदान प० प्रदक्षिणा की क: करके एक ऐसा व बोले स० ३२८ श्रद्धताहूं भ० भगवन नि० निग्रंथ पा० प्रवचन को प० प्रतीन करता हूं रो० रुाचे करता है अ० उद्यम- करता हूं ए. ऐसे ही भ० भगवन् न तैसे भ० भगवन् अ० सत्य अ• संदेहरहित इ० इच्छित प० तएणसे खंदए कच्चायणसगोत्ते समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए धम्म सोचा निसम्म हद्वतुट्ठ जाव हयहियए उट्ठाए उठेइ उठेइत्ता समर्ण भगवं महावीरं तिखुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ करेइत्ता एवंवयासी, सदहामिणं भंते । निग्गंथं पावयणं, पत्तियामिणं भंते निग्गंथं पावयणं रोएमिणं भंते निग्गथं पावयणं, अन्भुट्ठमिणं भंते ! नि. ग्गथं पावयणं, एवमेयं भंते ! तहमेयं भंते ! अवितहमेयंभंते ! असंदिद्धमेयंभंते ! इच्छिंय समीप धर्म सुनकर व अवधार कर अत्यंत इपित हुए. और तत्काल उठकर श्रमण भगवतं महावीर को तीन आदान प्रदक्षिणा कर के ऐसा कहा कि अहो भगवन् ! निर्ग्रन्थ वचन को मैं श्रदता है, उनकीकर- ता हूं, उन प्रवचनों की में प्रतीति करता है, उन प्रवचनों में मैं उद्यमवन्त बना हुआ हूँ, अहो भगवन्! निग्रंथ प्रवचन वैसे है। यथायोग्य है, संदेह रहित, इष्ट है. प्रतीसित है. ऐसा कहकर श्री महावीर स्वामी সাবাগ।
शब्दार्थ वह खं० खंदक क. कात्यायन गोत्रीय सं• संबुद्ध स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को वं० वंदन कर न नमस्कारकर ए. ऐसा ३० बोले इ. इच्छता हूं भं० भगवन् तु तुमारी अं० पास के केवली ५० प्ररूपा धर्म को नि० धारने को अ० यथासुग्व दे. देवानुप्रिय मा० मत ५० प्रतिवध करो त तव स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर खं० खंदक क. कात्यायन गोत्रीय ती. उस मं. वडी म० महान् ५०परिपदामें धधर्म प०कहाधधर्म कथा भा०कहीं॥२१॥ त०तब से वह खं० खंदक क०कात्यायन गोत्रीय २८८॥ 2 अनुपादक-बालग्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक शापिनी 23 एत्थणं से खदए कच्चायण सगोत्ते संबुढे ! समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ, सूत्र नमसइत्ता एवं वयासी इच्छामिणं भंते ! तुझं अंतिए केवली पन्नत्तं धम्मं निसामित्तए. अहासुहं देवाणुप्पिया मापडिबंध ॥ तएणं समणे भगवं महावीरे खदयरस कच्चायण सगोचरस तीसेयमहइ महालियाए परिसाए धम्म परिकहेइ. धम्मकहा भाणियन्वा भावार्थ मति बोध पाये और श्री श्रमण भगवतं को वंदना नमस्कार कर कहने लगे कि अहो भगवन् ! आप की समीप काली प्ररूपित धर्म सुनने को मैं चाहता हूं. अहो देवानुप्रिय : जैसा तुम को मुख होवे वैसा करो, विलम्ब मत करो. उस समय श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी ने उस महती परिषदा में खंदक, परिबानक को धर्म कथा कही.॥ २१ ॥ उस समय कात्यायन गोत्रीय खंदक ने महावीर स्वामी की *.प्रकाशक राजायहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * , शब्दार्थ २२१. सत्र * पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 888 कोई गा• गायापति आ• गृह में जि० जलते जे. जो. त० तहां भ० भेडापकरण भ० होवे अ० अल्पभार मो० बहुमूल्यवाली त० उस को ग० ग्रहणकर आ० आत्ता से ए० एकान्त अ० अतिक्रमे. ए. यह नि. निकालते ५० पीछे पु० पहिले हि• हितके लिये सु० सुख के लिये ख० क्षमाकेलिये नि० मुक्तिकेलिये अ० अनुगामिक भ० होगा ए० ऐमा दे देवानुप्रिय म० मेरा आ०आत्मा एक एकभंड इ. इष्ट के० कान्त पि. प्रिय मा मनोज्ञ म० भनाम घिः धैर्य वि. विश्वास स. स्वमत व. बहुमत अ० अनुमत भं• आभरण कर आलित्तेणं भंते ! लोए पलितेणं भंते ! लोए, आलित्तपलित्तेणं भंते ! लोए जराए मरणेणय से जहा नामए केइ गाहावई आगारंसि झियायमाणांस जे से तत्थ भंडे भवइ अप्पभारे मोल्लगुरुए तं गहाय आयाए एगंतमंतं अवकमइ, एस मे नित्थारिए समाणे पच्छापुराए हियाए सुहाए .खमाए निस्सेयसाए आणुगामियत्ताए भविरसइ. एवामेव देवाणुप्पिया ! मझवि आया एगे भंडे हट्ठे कंते पिए मणुण्णे मणामे धिज्जे विस्सासिए वना हुवा देखकर उस में जो अल्प भार व बहुत मूल्यवाली वस्तु होती हैं उन्हें नीकालता है, और नीकाल कर एकान्त स्थान में रखता है. और ऐसा विचारता है कि इस अग्नि में से नीकाली हुई वस्तु पीछे से हित, सुख, कल्याण की कर्ता व दारिद्य को हरनेवाली होगी. इस प्रकार अहो देवानुप्रिय ! मुझे, मेरा आत्मारूप एक बहु मूल्य पदार्थ इष्टकारी, प्रियकारी, मनोज्ञ, मन को गमता, धैर्यता, स्थिरता व 885 दसग शतक का पहिला उद्देशा 9300 भावार्थ २२० मत्र अनुवादक-बालग्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ र विशेष इच्छित से यह ज जैसे तु तुम व०कहते हो ति०ऐसाकरके सश्रमण भ भगवन्त म०महावीरको व वंदनाकर न० नमस्कार कर उ० ईशान कोन में अ० आकर ति० त्रिदंड कुं० कमंडल जा० यावत् धाः धातु से रक्त वस्त्र ए० एकान्त वें ए रखकर जे. जहां स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर ते तहां आ० आकर स: श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को ति तीन वार आ० आदान प० प्रदक्षिणा क० करके जा० यावत् न८ नमस्कार कर आ० आदीस हुने लो लोक प०मदीप्त हुव ज०जरा म०मरण से ज जैसे के० मेयं भंते:! पडिच्छियमेयं भंते ! इच्छियपडिच्छियभेयं भंते ! से जहेयं तुज्झे वदह- त्तिकटु, समणंभगवं महावीरं वंदइ, णमंसइ, वंदित्ता, णमंसइत्ता. उत्तरपुरच्छिम दिसीभायं अवकमइ, अवकमइत्ता तिदंडंच कुंडियंच जाव धाउरत्ताउय एगते एडेई एडेइत्ता जेणेव समणेभगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता समंणं' भगवं महावीरं तिखुत्तो आदाहिणपयाहिणकरेइ करइत्ता जाव नमसइत्ता एवं वयासी, वार्थ को वंदना नमस्कार कर के ईशान कोन में गया. वहां जाकर त्रिदंड कमंडल यावत् गेरु से रंगे हुवे वस्त्रों को एकान्त में रखकर श्रमण भगवन्त महावीर की पास आया. वहां आकर महावीर भगवन्त को तीन आदान प्रदक्षिणा की. प्रदक्षिणा कर यावत् नमस्कार कर ऐसा बोले की अहो भगवन् ! यह जीवलोक जरा व मरण से मलित बना हुवा है. जैसे कोई गृहपति अपने घर को अग्नि से प्रज्वलित * प्रकाश रानाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी घालाप्रसादजी-* २२१ 94 85 पंचगंग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 989 शब्दार्थ कोई गा• गाथापति आ गृह में जि० जलते जे. जो त० तहां भं० भापकरण भ० होवे अ० अल्पभार मो० बहुमूल्यवाली तं० उस को ग० ग्रहणकर आ० आला से ए० एकान्त अ० अतिक्रमे. ए• यह नि० निकालते ५० पीछे पु० पहिले हि • हितके लिये सु० सुख के लिये ख० क्षमाकेलिये नि० मुक्तिकेलिये अ० अनुगामिक भ० होगा ए. ऐमा दे देवानुप्रिय म० मेरा आ०आत्मा ए. एकभंड इ. इप्ठ क० कान्त पि० 100 प्रिय मा मनोज्ञ म० मनाम धिः धैर्य वि. विश्वास स० स्वमत ५० बहुमत अ० अनुमत भं• आभरण कर आलित्तेणं भंते ! लोए पलित्तेणं भंते! लोए, आलित्तपलित्तेणं भंते ! लोए जराए मरणेणय से जहा नामए केइ गाहावई आगारंसि झियायमाणांस जे से तत्थ भंडे भवइ अप्पभारे मोल्लगुरुए तं गहाय आयाए एगंतमंतं अवकमइ, एस मे नित्थारिए समाणे पच्छापुराए हियाए सुहाए .खमाए निस्सेयसाए आणुगामियत्ताए भविरसइ. एवामेव देवाणुप्पिया ! मज्झवि आया एगे भंडे इढे कंते पिए मणुण्णे मणामे धिज्जे विस्सासिए भावार्थ बना हुवा देखकर उप्स में जो अल्प भार व बहुत मूल्यवाली वस्तु होती हैं उन्हें नीकालता है, और नीकाल कर एकान्त स्थान में रखता है. और ऐप्ता विचारता है कि इस अग्नि में से नीकाली हुई वस्तु पीछे से हित, सुख, कल्याण की कर्ता व दारिद्य को हरनेवाली होगी. इस प्रकार अहो देवानुप्रिय ! मुझे, मेरा आत्मारूप एक बहु मूल्य पदार्थ इष्टकारी, मियकारी, मनोज्ञ, मन को गमता, धैर्यता, स्थिरता व -38058 दसरा शतक का पहिला उद्देशा 99% शब्दाथ २९२ सूत्र. - अनुरादाबालासगरी मुनि श्री अमालक ऋपिनी 8 भाजन ज जैसे मा० मत सी शीत उ ऊष्ण खु. क्षुधा पि. तृषा चौ. चोर बा०. सर्प दं० दस म. मशक वा वात पि० पीत सं० श्लेप्स म. स. सन्निपात वि० विविध रो रोग- आ० आ. तक प० परिषद उ० उपसर्ग फ० स्परों चि० ० करके नि निकालते. प. परलोक का हि० हितकेलिये मु० मुख केलिये ख० क्षमाकेलिये नि० मुक्तिके हेतु भ० अनुगामिक भ० होंगे ते. उसको १० इउता दे० देवानुपिय म० स्वतः प० मजित मुं० मुंडहोकर से शिक्षा ग्रहणकर सि० शिक्षा समए बहुमाए अणुमए भंडकरंडगसमाणे माणसीयं, माणंउण्हं, माणगुहा माणपिवासा, माणंबोरा, मागंबाला, माणंदसा, माणमसया माणवाइय-पित्तिय-संभिय-साण्णवाइय. विविहारोगायंका परीसहोवसग्गा फुसंतु त्ति कटु, एस नित्यारियसमाणे परलोयस्स हियाए,सुहाए,खमाए, निस्सेयसाए आणुगामियत्ताए भविस्सइ,तं इच्छामिणं देवाणुप्पिया! · सयमेव पन्चावियं सयमेव मुंडाविये, सयमेव सेहावियं, सयमेव सिक्खावियं, : सय- विधाम का कर्ता है. आरमकून कार्य के सम्मतपने से बहुमत व अनुमत है. आभरण के करंडिये समान दि. इसे मैंने शीन, अण, क्षुधा, तृपा चोर, मर्प, दंश, मशक, वात, पित, कफ, संनिपात आदि मारणान्तिक उपमर्ग र परिषट से बचाया है. इस आदीत प्रदीप्त में मेरा आत्मा की में रक्षा करूंगा... यह मुझे इम लोक र परलोक में हित, सुख, कल्याण, क्षमा, निस्तार के कर्ता व अनुगामी होगा. वैसे ही मुक्ति *प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * ब्दार्थ आ. आचार-गोल गोचर वि. विनय वे० करता च. चरण क. करण जा. संयम यात्रा मा मर्यादा घ. धर्म आ० कहो त० तब स. श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर खं० खंदक क० कात्यायन गोत्रीय को स. स्वनाने प० प्रवजा दी जा० यावत् ध धर्म आ• कहा एक ऐसा दे० देवानुप्रिय चि० खडा रहना ग० नाना ए०ऐसे नि बैठना तु०सोना भुं• भोजन करना भाग्योलना ए. ऐसे उउठकर पा०माण भूभूत २९३ सूत्र TES - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 8803 मेवआयारगोयरं विणय वेणयिय चरणकरण जाया मायावत्तियं धम्ममाइक्खियं तएणं समणे भगवं महावीरे खंदयं कच्चायणसगोत्तं सयमेव पवावेइ, जाच धम्म: माइक्खाइ एवं देवाणुप्पिया ! चिट्ठियव्वं, गंतव्यं, एवं निसीइयव्वं, एवं तुयटियव्यं, एवं भुंजियव्यं, एवं भासियध्वं, एवं उट्ठाय उट्ठाय पाणेहिं, भूतेहिं, जीवहिं, सत्तेहिं देनेवाला होगा. इसलिये अहो देवानुमिय ! मैं स्वयं मुंडित होने को, आचार क्रिया करने को, सूत्रार्य ग्रहण करने को, आचार, गोचर, विनय करने को, नरण, पसरला की मर्यादा करने को और जैसे आप धर्म कहते हो वैसा अंगीकार करने को यांच्छता हूँ. तब श्री श्रमण भगवन्तने दीक्षा दी यावत् सब जिन धर्म का स्वरूप कहा कि अहो देवाननिय खंदक ! युग प्रमाण भूमि देखकर चलना, ऐसे दी निर्गम प्रवेश रूप स्थान देखकर खडे रहना, भमि पुंजकर बैठना. यत्नापूर्वक शयन करना, यत्नापूर्वक भोजन करना ११. दूसरा शमक का पहिला उद्देशा - भावार्थ शब्दार्थ २९४ १ अनुवादक-पालनमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी जी जीव स. सत सं० संयम से सं० यतना काना अ० इस अ० अर्थ केलिये णो नहीं कि० कि- चित् प० प्रसाद करना ॥ २१ ॥ त० तब से वह खं० खंदक क. कात्यायन गोत्रीय स. श्रमण भ. भगवन्त मा महावीर का एक ऐसा घ० धर्म उ० उपदेश स० सम्यक् सं• अंगीकार क्रिया त० उम आ० आज्ञाको त० जैसे ग. जावे चि० रहे नि० वैठे तु० सोवे मुं० भोजनकरे भार बोले उ० खडाहोव? पा० माणभूभूत जी० जीव स०सव सं०संयम मं०यत्तकरे अ०इस अ० अर्थ में णो नहीं प० प्रमादकरे संजमेणं संजमियव्यं. आसिंचणं अटे णोकिंचि पमाइयव्वं. ॥ २१ ॥ तएणं से खंदए कच्चायणसगोत्तेसमणस्स भगवओ महावीरस्स इमं एयारूवं धम्मियं उवएसंसम्मं संपडिव. जइ,तमाणाए तहगच्छइ,तहचिट्ठइ,तहनिसीयइ,तहतुयटइ, तह जइ तहभासइ,तहउट्ठा एइतहपाणेहि भएहिंजीवेहिंसत्तहिं संजमेणं संजमइ, आर्सिचणंअटेणोपमायइ ॥ २२ ॥ व यत्नाकि वोलना. ऐसे ही उद्यमवन्त बनकरके प्राभून.जीव व मत्त से संयम पालना. इस किंचिन्मात्र प्रमाद करना नहीं ॥ २२ ॥ तब कात्यायन गोत्रीय संगाने श्रमण भगवान् बहादीर का ऐसा धार्मिक उपदेश सुनकर उसे सम्यक् प्रकारसे अंगीकार किया. और उनकी आशामें चत्नापूर्वक जाना, खडे रहन्न, वैठना, सोना, भोजन करना, वोलना व सावध रहना ऐसे करने लगे. तावत्र होकर प्राणभून जीर व सत्व की रक्षा कर संयम पालने लगे. इस में किंचिन्मात्र प्रमाद नहीं करने लगे ॥ २२ ॥ तव ईर्या स- * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ , 80 शब्दार्थ ॥ २२ ॥ से वह खं० खंदक क० कात्यायन गोत्रीय अ० अनगार जा० हुवा इ० ईर्यासामति भा० aka भागागामिति ए० एमणा मामेति आ० भादान भंड मात्रा निक्षेपन समिति उ.उपर श्रवण चलाया ज. जल परिस्थापनिक समिति म० मनसमिति ३० वचन समिति का० काय समिति म० मनगुप्ति कर वचनगुप्ति का० कायगुप्ति गु० गुप्त गु • गुप्तन्द्रिय गु० गुप्त ब्रह्मचारी च. त्याग ल• लज्जा बहित ध० धन सं० क्षमा स० सहनकरे जि• जितेन्द्रिय सो० मैत्रीभाव अनिदान रहित अ° मार्थना रहित अ. २१५ TET पंचङ्ग हिववषण्णात्तिः (भगवती) सूत्र 8888 तएणं से खंदए कच्चायणसगोत्ते अणगारे जाए इरिया समिए, भासा समिए, एसणा समिए, आयाण भंडमत्त निक्खेवणा समिए, उच्चारपासवणखेल सिंघाणजल्ल पारिट्ठा- वणियासमिए,मणसमिए,वयसमिए, कायसमिए, मणगुत्ते, वयगुत्ते,कायगुत्ते, गुत्ते, गुत्ति- दसरा शतकका पहिला उद्देशा gegri. भावार्थ G0 मिति, भाषा समिति, एपणा समिति, आदान भंडमात्र निक्षेपना समिति, उच्चार प्रश्रवण खेलजल परिस्था- पनीय समिनि, मन समिति, वचन समिति, काय सामति, मन गुप्ति, वचन गुप्ति ग काय गुप्तिवाले, गुप्त, गुप्तेन्द्रिय, गुप्त ब्रह्मचारी, त्यागी, लज्जायुक्त, धर्मरूप धन का संग्रह करनेवाला, शान्ति क्षमा के धारक, जितेन्द्रिय, नियाना नहीं करनेवाले, उत्सुकपना रहित, संयम में लेश्यावन्त, श्रामण्य साधुपना में रत व दमितेन्द्रिय कात्यायन गोत्रीय खंदक अनगार जिन प्रवचन को आगे करके विचरने लगे अर्थात् जैसे शब्दाथी सत्र 4. अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 85 नी० जीव स० सत्व सं० संयम से सं० यतना काना अ० इस अ० अर्थ केलिये णो नहीं कि० कि. चित् प० प्रमाद करना ॥ २१ ॥ त० तब से वह वं० खंदक क. कात्यायन गोत्रीय स. श्रमण भ. भगवन्त म० महावीर का एक ऐसा ध० धर्म उ० उपदेश स० सम्यक् सं० अंगीकार क्रिया त० उम आ. आज्ञाको त० जैसे ग. जावे चि० रहे नि० बैठे तु० सोवे भुं० भोजनकरे भा० बोले उ० खडाहोद पा० माणभूभूत जी० जीव स०सत्व सं०संयम मंयत्नकरे अ०इस अ० अर्थ में णो० नहीं प० प्रमादकरे संजमेणं संजमियन्वं. आसिंचणं अटे णोकिचि पमाइयव्वं. ॥ २१ ॥ तएणं से खंदए कच्चायणसगोते समणस्स भगवओ महावीरस्स इमं एयारूवं धम्मियं उवएसंसम्म संपडिव- बइ,तमाणाए तहगच्छइ तहचिट्ठइ,तहनिसीयइ,तहतुयट्टइ, तहसुंजइ तहभासइ,तहउट्ठा एइ तहपाणेहिं भूएहिंजीवहिं सत्तहिं संजमेणं संजमेइ, आर्सिचणंअटुंगोपमायइ ॥ २२ ॥ व यत्नापूर्वक बोलना. ऐसे ही उद्यमवन्त बनकरके सा भून जीव व सत्र से संयम पालना. इस में किंचिन्मात्र प्रमाद करना नहीं ॥ २१॥ तत्र कात्यायन गोत्रीय संगाने श्रमण भगवान महावीर का ऐसा धार्मिक उपदेश सुनकर उसे सम्यक् प्रकारसे अंगीकार किया. और उनकी आज्ञा यत्ना-पूर्वक जाना, खडे रहना, बैठना, सोना, भोजन करना, वोलना व सावध रहना ऐसे करने लगे. सावर होकर प्राणभूत जीर व सत्य की रक्षा कर संयम पालने लगे. इस में किंचिन्मात्र प्रमाद नहीं करने लगे ॥ २२ ॥ तव ईर्या स- * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी मालाप्रसादजी * ... भावाया १० २२९ भाव 988 पंचमाङ्ग विवाह पग्णाचे ( भगवती ) सूत्र <387 शब्दार्थ म. महावीर ते. तहां उ० आये उ० आकर स. श्रमण भ. भगवन्त जा० यावत् न० नमस्कार कर ए. ऐसा व० वोले इ० इच्छना हूं भ० भगवन तु तुमारी अ. आज्ञामिलते दो० दोमास की भि. भिक्षु प्रतिमा उ० अंगीकार कर वि० विचरने को अ० यथासुखम् दे० देवानुप्रिय मा० मत ५० प्रति- वंधकरो एक ऐसे दो दोमास की ति० तीनमाप्त की च. चार मास की पं० पांच छ, छ स० सात सूत्र समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता, समणं भगवं जाव नमांस त्ता, एवं वयासी इच्छामिणं भंते ! तुझेहिं अब्भणुण्णाए समाणे दोमासयं भिक्खु- पडिमं उवसंपजित्ताणं विहरित्तए. अहासुहं देवाणुप्पिया! मापडिबंध. तंचेव एवं दोमालियं, तिमासियं, चाउम्मासियं, पंचछसत्त पढमं सत्तराइंदियं, दोच्चं सत्तराइंदिय, तच्चं भावार्थ भगवन्त को वंदना नमस्कार कर ऐमा बोले कि अहो भगवन् ! आपकी आना होवे तो दो मास की भिक्षु प्रतिमा अंगीकार कर विचलं. अहो देवानुप्रिय : जैसे तुम को सुख होवे वैसे करो. विलम्ब मत करो. तव सहप आज्ञा लेकर दो मास पर्यंत दो दात थाहार की व दो दात पानी की ग्रहण की. वैसे ही तीसरी तीन मास की भिक्षु प्रतिमा में तीन दात आहारकी व तीन दात पानीको ग्रहण की. चार मासकी चौथी भिक्ष प्रतिमा में चार दात आहार की व चार दात पानी की ग्रहण की वैसेही पांच छ व सात मास की भिसु प्रतिमाओं में पांच, छ व सात मास तक पांच छ व सात दात आहार की व सात दात पानी की दसरा शतक का पहिला उद्देशा ब्दार्थ २९८ --- अनुवादक-बालमनचरािगुनि श्री अमोलक पनी हट तुतुष्ट जायावत् न नमस्कारकर मा० एकमासकी भिभिक्षु मतिमा उ० अंगीकारकर विविचरनेलगे ॥ २५ ॥ से वह सं. खंदक अ० जनगार मा० एकमास की भि० भिक्षु प्रतिमा अ० यथासूत्र अ० ययाकल्प अ ययामार्ग अ० यथातथा अ० यथा सम्यक् का० काया से फा० स्पर्शे पा. पाले सो संभाग करे ती• दोपटाले पू० पूर्ण करे कि कीर्तनको अ०पाले आ०आज्ञा से आ० आराधे स० सम्यक् का० काया मे फा० स्पर्शकर जा० यावत् आ- आराधकर जे. जहां स० श्रमण भ० भगवन्त अन्भणुण्णाए समाणे हट्ठतुट्ठ जाव नमंसित्ता मासियभिक्खुपडिमं उवसंपजित्ताणं विहरइ ॥२५॥ तएणं से संदए अणगारे मासियं भिक्खुपडिमं अहासुतं, अहाकप्प, अहा- मग्गं, अहातचं, जहासमं, सम्मं काए फासेइ, पालेइ, सांभेइ, तीरेइ, पूरेइ, किटेई अणुपालेइ, आणाए आराहेइ; सम्मं काएण फासित्ता जाव आराहेत्ता, जेणेव पा अंगीकार कर विचरने लगे ॥ २५ ॥ तव श्री खंदक अनगार जैमी सूत्र में एक मास की भिक्षु प्रतिमा की विधि कही है नैसी भिक्षु प्रतिमा को कल्प अनुसार, मार्ग अनुसार पालने लगे. वैसे ही क्षयोपशम भाव से अतिक्रमे नहीं. सम्यक् प्रकार से काया से स्पर्शी, विधि मे ग्रहण की, वारंवार उपयोग रखकर पाली, पूर्ण की, कीर्ति की, अनुपालना की. यावर आज्ञा पूर्वक आराधी. सम्यक् प्रकार काया से स्पर्श कर यावत् आझाले आराध कर जहां श्रीश्रमण भगवन्त महावीर स्वामी थे वहां आये, आकर श्रमण । * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादनी * भावार्थी 00 शब्दाथ, DO २२९ सूत्र 988- पंचमाङ्ग विवाह पण्णाचे ( भगवती) सूत्र <38 म. महावीर ते० तहां उ० आये उ० आकर स. श्रमण भ• भगवन्त जा. यावत् न० नमस्कार कर ए. ऐसा व० बोले इ० इच्छना हूं मैं. भगवन तु. तुमारी अ. आज्ञामिलते दो० दोमास. की भि. भिक्षु प्रतिमा उ० अंगीकार कर वि. विचरने को अ० यथासुखम् दे. देवानुप्रिय मा० मत. प० प्रति- वक्षकरो एक ऐसे दो० दोमास की ति तीनमास की च० चार मास की पं० पांच छ, छ स० सात समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता, समणं भगवं जाव नमांस त्ता, एवं वयासी इच्छामिणं भंते ! तुज्झहिं अब्भणुण्णाए समाणे दोमासयं भिक्खु- पडिमं उवसंपजित्ताणं विहरित्तए. अहासुहं देवाणुप्पिया! मापडियंध. तंचव एवं दोमालियं, तिमासियं, चाउम्मासियं, पंचछसत्त पढमं सत्तराइंदियं, दोचं सत्तराइंदिय, तच्चं भगवन्त को वंदना नमस्कार कर ऐमा बोले कि अहो भगवन् ! आपकी आज्ञा होवे तो दो मास की भिक्षु प्रतिमा अंगीकार कर विचलं. अहो देवानुपिय ! जैसे तुम को सुख होवे वैसे करो. 'विलम्ब मत करो. तब सहर्ष आज्ञा लेकर दो मास पर्यंत दो दात आहार की व दो दात पानी की ग्रहण की. वैसे ही तीसरी तीन मास की भिक्षु प्रतिमा में तीन दात आहारकी व तीन दात पानीकी ग्रहण की. चार मासकी चौथी भिक्ष प्रतिमा में चार दात आहार की व चार दात पानी की ग्रहण की वैसेही पांच छ व सात मास की भिक्षु प्रतिमाओं में पांच, छ व सात मास तक पांच छ व सात दात आहार की व सात दात पानी की - दसरा शतक का पहिला उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ २९८ । का अनुवादक-बालनाचारमुनि श्री अमोलक सापनी से हृष्ट तुतुष्ट जा०यावत् न नमस्कारकर माएकमासकी मि०भिक्षु प्रतिमा उ० अंगीकारकर विविचरनेलगे ॥ २५ ॥ से वह सं. खंदक अ० जनगार मा० एकमास की भि० भिक्षु प्रतिमा अ० यथासूत्र अ० ययाकल्प अ. यपामार्ग अ० यथातथा अ० यथा सम्यक् का काया से फा० स्पर्शे पा. पाले मो० संभाग करे ती. दापटाले पू० पूर्ण करे कि कीर्तनकरे अ०पाले आ०आज्ञा से आ० आराधे स० सम्यक् का० काया गे फा० स्पर्शकर जा० यावत् आ० आराधकर जे. जहां स० श्रमण भ भगवन्त अन्भणुण्णाए समाणे हट्ठतुट्ठ जाव नमंसित्तामासियोभक्खुपडिमं उवसंपजित्ताणं विहरइ ॥२५॥ तएणं से संदए अणगारे मासियं भिक्खुपडिमं अहासुत्तं, अहाकप्पं, अहा- मग्गं. अहातचं, जहासमं, सम्मं काएक फासेई, पालेइ, सोभेइ, तीरेइ, पूरेइ, किटेई अणुपालेइ, आणाए आराहेइ; सम्मं कारण फासित्ता जाव आराहेत्ता, जेणेव पा अंगीकार कर विचरने लगे ॥ २५ ॥ तब श्री खंदक अनगार जैमी सूत्र में एक मास की भिक्षु प्रतिमा की विधि कही है नैसी भिक्षु प्रतिमा को कल्प अनुसार, मार्ग अनुसार पालने लगे. वैसे ही क्षयोपशम भाव से अतिक्रमे नहीं. सम्यक् प्रकार से काया से स्पर्शी, विधि मे ग्रहण की, वारंवार उपयोग रखकर पाली, पूर्ण की, कीर्ति की; अनुपालना की- यावत् . आज्ञा पूर्वक आराधी. सम्यक् प्रकार काया से सर्श कर यावत् आज्ञासे आराध कर जहां श्रीश्रमण भगवन्त महावीर स्वामी थे वहां आये, आकर श्रमण * प्रकाशक-राजावहादुर लाला नुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * वार्थ शब्दार्थ सूत्र SEAR> पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 988s उपवास से वा० वारवा मास में छ० वारउपवास से ते तेरह मास में अ० तेरह उपवास से चोर चौदह मान में ती. चौदह उपवास मे प० पन्नरह मास ३० पनरह उपवास सोप सोलह मास में च० सोलह उपचास अनिरंतर त० तप कर्म से दि० दिनको ठा० स्थान उ उत्कट सू० सूर्य की सन्मुख आ3 आतापना भू० भूमि में आ० आतापना लेते हुवे र० रात्रि में वी० वारासन अ० नग्न त तब खं० खंदक अ० अनगार गु० गणरत्न सं० संवत्सर त० तप कर्म अ० जैसा मुना अ० कल्प अनुसार जा. यावत् आ० आराध कर जे. जहां स श्रमण भ० भगवन् म० महावीर ते० वहां उ० आय उ० आकर व० मातं अट्ठावीसइमं अट्ठवीसइमेणं, चोहसमंमासं तीसइमं तीसइमेणं, पन्नरसमं मास बत्तीसइमं बत्तीसइमेणं, सोलसमंमासं चउत्तीसइमं चउत्तीसइमेणं, अनिक्खित्तेणं तवो कम्मेणं दिया ठाणुक्कुडुए सूराभिमुहे, आयावणभूमीए आयोवमाणे रत्ति वीरा- सणेणं अवाउडेणं, ॥ तएणसे खंदए अणगारे गुणरयणं संवच्छरं तबोकम्मं अहा- सुत्तं, अहाकप्पं, जाव आराहित्ता जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ करे. इस तरह सोलह मास तक आंतरा रहित तप करे. दिन को उत्कट आसन करें, सूर्य की आता- लेवे और रात्रि में वीरासन से वस्त्र रहित रहे. इस तरह मूत्र व कल्प अनुसार गुणरत्न संवत्सर कर्म को आराधकर जहां श्रमण भगवन्त महावीर थे वहां आये. वहां आकर भगवन्त , महावीर दुसरा शतक का पहिला उद्देशा 9887 भावार्थ शब्दार्थ 64 मूत्र < अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी दिवस में ठा० उत्कट आसन मे सू सूर्याभिमुख आ० आताप भू० भूमि में आ०. आतापनालेते र०.रानि. को पी०वीरासन से अ० वस्त्र रहित १० तीसरा मा. मास में अ० अष्ट अ० अष्ट से च० चौथा मास मे द० चार उपवास से पं० पांचवे मास में वा पांच उपवास से छ• छठा मास में चो छ उप- वास से सा० सातवा मास में सौ. सात उपवास से अ० आठवा मास में अ० आठ उपवास से न नवमा मास में पी० नव उपरात द. दसरा मास में वा० दशउपवास से ए• इग्यारह मास में च इग्यारह आयावणभूमीए आयावेमाणे रत्तिं वीरासणेणं अवाउडेणय, एवं तच्चं मासं अट्ठमं अट्टमेणं, चउत्थं मासं दसमंदसमेणं, पंचममासं बारसमं बारसमेणं छटुं मासं चोहसमं चोइसमेणं, सत्तमंमासं सोलसमं सोलसमेणं, अट्ठमंमासं अट्ठारसभं अट्ठारसमेणं, नवममा बीसइमं बीसइमेणं, दसमंमासं बाचीसइमं बावीसइमेणं, एकारसमंमासंचउवीसइमं चउवीसइमेणं, बारसमं मासं छब्बीसइमछब्बीसइमेणं,तेरसमं दतरे महिने में दो दो उपवास का पारना, तीसरे महिने में तीन तीन उपवास, चौथे मास में चार चार उपवास, पांचवे में पांच पांच, छठे में छ छ उपवास, सातवे में सात सात उपवास, आठवे में आद आठ उपशाम, नवये में नव नव उपवास, दशवे में दश दश उपवास, अग्यारहवे में अग्यारह २ वाहरवे में घारह २ नेरपे में रह२, चौदये में चौदहर, पंदरहवे में पंदर६२, और सोलहवे मास में सोलहर उपवासका पारणा प्रकाशक-राजावहादुर लाला.मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * वाय 60 ३०५ ॐ पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भवगती) सूत्र १ दार्थ। अस्थि च० चमडा से अ० बंधा हुवा कि० कडकडाटभूत कि० कृश ध० नाडीयों की सं० संनती जा हुइ हो० थी ॥ २७ ॥ जी० जीव से ग जाता है चि० पैठता है भा० भापा मा० बोलकर गि ग्लानी पाता है भा. भापा भा• बोलते गि० ग्लानि पाता है भा० भाषा भा० बोलूंगा गि० ग्लानि पाता है से • अथ ज. जैसे क० काएका स० गाडा १० पत्र का स० शकट प० पत्र ति. तील भं० भाजन का स० शकट ए० एरंड काष्ट का स० शकट ई० कोयला स० शकट उ० उप्ण दि० दिनको सु० सुन्न तबोकम्मेणं, सुक्के, लुक्खे निम्मंसे आढचम्मावणढे किडिकिडियभूए, किसे, धमाणसंतए जाए यांवि होत्था॥२७॥जीवं जावेणं गच्छइ,जीवंजीवेणं चिट्ठइ,भासं भासित्ता विगिलाइ, भासं भासमाणे गिलाइ भासं भासिस्सामीति गिलाइ।से जहा नामए कट्ठसगडियाइवा,पत्तस गडियाइवा, पत्ततिलभंडगसगडियाइवा,एरंडक? सगाडियाइवा, इंगालसगाडयाइवा, उण्हे नावार्थ 5 महानुभाग तप कर्म से शुष्क, रूक्ष, मांस विना का अस्थि व चर्म से बंधागा हुवा, बैठते खडे होते कडकडाट होवे वैसे, कृश, नाडियोंकी कीलियोवाला होगया ॥२७॥ उन का शरीर इतना दुर्वल होगया कि जीव मात्र जीवकी सहायता से जाता है. जीव जीव की सहायता से खडा रहता है, भापा योलकर ग्लानि होती, भापा बोलते ग्लानि होती, और भापायोलनेका विचार आते ग्लानि होती. जैसे कोई काष्ट से भरा हुवा गाडा,पलाश पत्र से 30 भरा हुवा गाडा, पत्र महित तील का भरा हुवा गाडा, मृत्तिका के भाजन से भरा हुवा गाडा, एरंड की दूसरा शतक का पहिला उद्देशा 988 Gya oo शब्दार्थ बहुत १० चार छ ० छ अ० आठ ६० दश दु. पारह मा० अर्ध मास मा० मासखमण वि०विचित्र त. नप कर्म से अ० आत्मा को भा० विचारते वि०विचरते है. ॥२६॥त तवखं० खंदकते उस उदारवि० पिपुल ५० गुरु की आज्ञा से कराया हुवा (प० प्रमाद रहित कराया) ५० मान पूर्वक रहा हुवा क. कल्याण कारी सि. मोक्ष के हेतु भूत ध० धर्म धनवाला मं० मंगल स० सुशोभित उ० प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त उ० उत्तम उ० उदार म० बहुत प्रभाव वाला त० तप कर्म से सु. शुष्क लु० रुक्ष नि० मांस रहित अ० ० सत्र 23 अनुवादक-यालयाझचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी उवागच्छइत्ता समणं भगवं महावीरं बंदइ नमसइ. बहहिं चउत्थ छट्ठमदसम दु. वालसहि मासढमासखमणेहि विचित्तहिं तवोकम्मेहिं अप्पाणं भावेमाणे विहरइ ॥ २६ ॥ तएणं सेखदए अणगारे तेणं उरालेणं विउलेणं पयत्तेणं पग्गहिएणं कल्लाणेणं, सिवणं,धन्नेणं, मंगल्लेणं, सस्सिरीएणं, उदग्गेणं, उदत्तेणं, उत्तमेणं उदारेणं, महाणुभागेणं, * प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायनी ज्वाराप्रसादजी * भावार्य सामी को वंदना नमस्कार कर एक उपवाम, दो उपवास, तीन उपवास , यावत् पंदरह उपवास, मास खमण ऐसे विविध प्रकार के तप करते हुवे खंदक अनार विवरने लगे ॥२६॥ उस समय में खंदक अगगार आशंसा राहन सो उदार, ममान, विपुल, गुरुकी आज्ञा से कराया हुवा, बहुत मान पूर्वक कराया हुवा, कल्याण- कारी, मंगलकारी, धर्मरूा धन करनेवाला, मुशोभनिक, उत्तरोत्तर वृद्धि करनेवाला,. उत्तम, उदार व ३०५ * पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भवगती) सूत्र 30 अस्थि च० चमडा से अ० बंधा हुवा कि० कडकडाटभूत कि० कृश ध० नाडीयों की सं० संनती जा हुइ हो० थी ॥ २७ ॥ जी० जीव से ग जाता है चि. वैठता है भा० भापा भा. वोलकर गि० ग्लानी पाता है भा. भापा भा० बोलते गि ग्लानि पाता है भा० भापा भा० बोलूंगा गि ग्लानि पाता है से. अथ ज. जैसे क० काप्टका स० गाडा १० पत्र का स० शकट प० पत्र ति. तील भं० भाजन का स० शकट ए० एरंड काप्ट का स० शकट ई० कोयला स० शकट उ० उष्ण दि० दिनको सु० सूत्र तवोकम्मेणं, सुके, लुक्खे निम्मंसे आढचम्मावणद्वे किडिकिडियभूए, किसे, धमाणसंतए जाए यांवि होत्था॥२७॥जीवं जावेणं गच्छइ,जीवं जीवेणं चिट्ठइ,भासं भासित्ता विगिलाइ, भासंभासमाणे गिलाइ भासं भासिस्सामीति गिलाइंसेजहा नामए कट्ठसगडियाइवा,पत्तस गडियाइवा, पत्तातलभंडगसगडियाइवा,एरंडकट सगाडियाइवा, इंगालसगाडियाइवा, उण्हे भावार्थ महानुभाग तप कर्म से शुष्क, रूक्ष, मांस विना का अस्थि व चर्म से वैधाया हुवा, बैठते खडे होते कडकडाट होवे वैसे, कृश, नाडियोंकी कीलियोबाला होगया ॥२७॥ उन का शरीर इतना दुर्वल होगया कि जीव मात्र जीवकी सहायता से जाता है. जीव जीव की सहायता से खडा रहता है, भापा बोलकर ग्लानि होती, मापा बोलते ग्लानि होती, और भाषा बोलनेका विचार आते ग्लानि होती. जैसे कोई काष्ट से भरा हुवा गाडा,पलाश पत्र से भरा हुवा गाडा, पत्र सहित नील का भरा हुवा गाडा, मृत्तिका के भाजन में भरा हुवा गाडा, एरंड की 833दूसरा सत्तक का पहिला उद्देशा 988 oyo oyo सूत्र १०३ अनुरादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दाथ मसुकाया हुया स० शब्द सहित ग जाता है स० शब्द सहित चि० खडा रहता है ए. ऐसे खं० खंदक अ० अनगार स० शब्द सहित ग जाता है स० शब्द सहित चि० वैठता है उ० पुष्ट त तप से अ० दुर्वल मं० मांस मो० रुधिर मे हु० अग्नि समान अ० भस्म में पछुपाहुवा त तपके ते० तेजसे त० तपतेज की सी० लक्ष्मी से अ० बहुत उ० शोभते चि० रहता है ।। २८ ते० उसकाल ते. उस समय में रा० राजगृह न० नगर में स० समोसरण जा. यावत् प० परिपदा प० पीछीगई ॥ २९ ॥ त० तब त• उस दिण्णा सुकासमाणी ससदंगच्छइ, ससदंचिट्ठइ, एवामेव खंदए अणगारे ससदंगच्छइ ससइंचिट्ठइ । उवचित तवेणं अवचिए मंससोणिएणं हुयासणेवि भासरासि पडि- च्छण्णे, तवेणं तेएणं, तवतेय सिरीए अतीव उपसोभेमाणे २ चिट्ठइ ॥ २८ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं रायागहेनयरे समोसरणं जाय परिसा पडिगया ॥२९॥ तएणं भावार्थ लकडी मे भरा हुवा गांडा, और कोयले से भरा हुवा गाडा है. उस में रही हुई वस्तु सूर्य की अप्पता मे नय सुक जाती है और उस समय जब गाडा चलता है तब उस में जैसे कडकडाट शब्द नीकरता है पैसा ही शब्द खंदक अनगार के रक्त मांस विना के शरीरमें से नीकलता है. खंदक अनगार के शरीर में रक्त मांस नहीं होने पर तपरूप तेज से उनका शरीर' भस्म में दकी हुई अग्नि समान तेजस्वी दीखता है ॥२८ उस काल उस समयमें श्री महावीर स्वामी रामगृह नगरमें पधारे और परिपदा वंदन करने को आई और धर्मोपदे । * प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी.* खं० खंदक अ. अनगार को अ० अन्यदा क. कदापि पु. पूर्व रात्रिके का० काल में ध० धर्म जा.. जागरणा जा० करते इ० यह एक ऐसा अ० अध्यवसाय चि० चितवन जा. यावत् स० उत्तन्न हुवा ए. ऐसे ख० निश्चय अ० मैं इ. इस उ० उदार जा० यावत् कि० कृश ध० नाडियों की सं० संतती जा० यावत् जी० जीव जी० जीव से ग. जाता हूं चि० खडा रहता हूँ - जा. यावत् गि० ala ग्लानि करता हूँ जा. यावत् ए. ऐसे अ० मैंभी स० शब्द सहित ग० जाता हूं चि० खडा रहता सत्र 3888 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र <3 तस्स खंदयस्स अणगाररस अण्णया कयाई पुन्वरत्तावरत्त काल समयंसि धम्म जागरियं जागरमाणस्स इमेयारूवे अब्भत्थिए चिंतिए जाव समुप्पजेत्था, एवं खलु अहं इमणं एयारूवेणं उरालेणं जाव किसेधमाणसंतए जाच जीवं जीवेणं गच्छामि जविंजावणं चिट्ठामि, जाब गिलामि. एवामेव अहंपि ससदगच्छामि,ससइंचिटामितं अत्थि तामे उट्ठाण <P> दूसरा शतक का पहिला उद्देशा8888 भावार्थ सुनकर पीछी गइ ॥ २१ ॥ उम समय में एकदा मध्यरात्रि में धर्म जागरणा करते खंदक अनगार को ऐसा अध्यवसाय यावत् चितवन उत्पन्न हुवा कि ऐसा उदार व प्रधान तपकर्म से मैं कुश बन गया मेरी सब नाडियों दीख रही है, शरीर से मुझे कुछ भी होता नहीं है, हलन चलनादि क्रियाओं जो होती हैं वे सब जीव से होती है, यावत् भाषा बोलते भी मैं खेदित होता हूं, और काप्ट का गाडा यावर शब्दार्थ तं० इसलिये अ० है ता० उतने म. मेरे उ० उत्थान क. कर्म ३० बल वी० वीर्य पु० पुरुषात्कार प. पराक्रम तं . इसलिये जा० जहांलग ता०वे में मेरे अ० है उ० उत्थान क० कर्म व० वल वी. वीर्य पु० पुरुषात्कार ५० पराक्रम जा० जहांलग मे मेरे ध० धर्माचार्य ध० धर्मोपदेशक स०. श्रमण भ० भग- वन्त म. महावीर जि जिन मु० सुम्बार्श वि. विचरते हैं ता० वहांलग मे० मुझे से श्रेय क० कल पा० प्रकट प० प्रभात में र० रात्रि को कुछ विकशित उ० उत्पल क० हरिण के नेत्र को० कोमल उ. खुले ३०८ 3 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 85 * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * कम्मेवले वीरिए पुरिसकार परक्कमे तं जाव तामे आत्थ उट्ठाणे कम्मे बले वीरिए पुरिसकार परकमे जाव मम धम्मायरिए धम्मोवएसए समणे भगवं महावीरे जिणे सुहत्थी विहरइ ताव तामे सेथं कल्लं पाउप्पभायाए रयणीए फुल्लुप्पलकमल कोमलुमिलियंभि, अहपंडुरे पभाए रत्तासागप्पकासे,किंसुय सुयमुह गुंजद्ध रागसरिसे, कोयले का गाडा चलने जैसा शब्द होवे वैसे ही मेरे चलने पर शब्द होता है. ताहपि मेरे में उत्थान, कर्म, बल, वीर्य, पुरुषात्कार व पराक्रम है. और जहां लग मेरे में उत्थान, कर्म, वल, वीर्य, पुरुषात्कार व पराक्रम है और जहां लग मेरे धर्माचार्यः धर्म गुरु, रागद्वेष के जीतनेवाले व सुखाय श्री श्रमण भग: यन्त महावीर स्वामी विचर रहे हैं वहां लग विकशित कोमल कमल ( हरिण के नेत्र ) से- उन्मीलित, पांडुर* शब्दार्थ Q. * पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र - हुवे अ० अनंतर पं०. पाण्डुर ५० प्रभात में र० रक्त अ० अशोक प. प्रकाश कि किंशुक सु० शुकमुख गुं० [नार्थ रा० रंग स० सदृश क कमल का आ• गृह (दृह) स. नलिनी खंड के० वोधक उ०० उदित होते मू० सूर्य स० सहस्र किरणों वाला दि० दिनकर ते. तेजस ज• ज्वलंत स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को अ० आज्ञा देते स० स्वयं ५० पांच म० महाव्रत की आ० आराधना कर स०१७ साधु स० साध्वी से खा० क्षमा याचकर त० तथारूप थे० स्थविर कः कृतयोगी की स० साथ वि० कमालगर संडबोहए उठ्ठियमि सूरे सहस्सरस्सिमि दिणयरे तेयसा जलते समणं भगवं महावीरं वंदित्ता नमंसित्ता जाव पज्जुवासेत्ता, समणेणं भगवया महावीरेणं अब्भणुण्गाए समाणे सयमेव पंचमहन्ययाणि आराहेत्ता समणाय समणीओय खामेत्ता तहारूवेहि थेरेहि कडाईहिं साई विपुलं पव्वयं सणियं २ दुरूहित्ता मेहघण संनिगासं, प्रभात में, रक्त वर्णवाले अशोककी प्रभा समान, किंशुक व शुक मुख व गुंजा के रंग समान, कमल का आगर सो द्रह में कमलों को विकशित करनेवाला व सहस्र किरणवाला दिनकरमणि सूर्य उदय होत syo श्री श्रमण भगवन्त को वंदना नमस्कार कर श्रमण भगवन्त की आज्ञा से स्वयं पांच व्रत की आराधना करके, गौतम स्वामी प्रमुख सब साधु व चंदन वाला प्रमुख सय साध्वीयों की क्षमा याचकर, तथारूप कृत- योगी स्थविर को साथ लेकर, वडा पर्वत पे शरः २ चडकर, मेघ समान श्याम व देवताओं का निपान से भावार्थ GC ९. 00 शब्दार्थ. इसलिये अ० है ता० उतने म मेरे उ० उत्थान क. कर्म व बल वी० वीर्य पु० पुरुषात्कार प. पराक्रम तं• इसलिये जा० जहांलग ता. वे मे मेरे अ० है उ० उत्थान क. कर्मव० वल वी. वीर्य पु० पुरुषात्कार प० पराक्रम जा. जहांलग मे० मेरे ध० धर्माचार्य ५० धर्मोपदेशक स०. श्रमण भ० भग- वन्त म. महावीर जि० जिन मु० सुग्वार्टी वि. विचरते हैं ता० वढोलग मे० मुझे से० श्रेय क० कल पा० पकट प० प्रभात में र० रात्रि को कु० विकशित उ० उत्सल क० हरिण के नेत्र को० कोमल उ. खुले सूत्र 13 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 7 कम्मेवले वीरिए पुरिसकार परक्कमे तं जाव तामे आत्थे उहाणे कम्मे वले वीरिए पुरिसकार परकमे जाव मम धम्मायरिए धम्मोवएसए समणे' भंगवं महावीरे जिणे सुहत्थी विहरइ ताव तामे सेथं कल्लं पाउप्पभायाए रयणीए फुल्लुप्पलकमल कोमलुमिलियभि, अहपंडुरे पभाए रत्तासागप्पकासे,किंसुय सुयमुह गुंजद्ध रागसरिसे, कोयले का गाडा चलो जैसा शब्द होवे वैसे ही मेरे चलने पर शब्द होता है. ताहपि मेर में उत्थान, कर्म, वल, वीर्य, पुरुपात्कार व पराक्रम है. और जहां लग मेरे में उत्थान, कर्म, वर, वीर्य, पुरुषात्कार च पराक्रम है और जहां लग मेरे धर्माचार्य, धर्म गुरु, रागद्वेष के जीतनेवाले व मुखायी श्री श्रमण भगः बन्न महावीर स्वामी विचर रहे हैं वहां लग विकशित कोमल कमल ( हरिण के नेत्र) से उन्मीलित, पांडुर * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्यालाप्रसादजी * • ये एक ऐसा अ० अध्यवसाय च० चितवन जा. यावत् स. उत्पन्न हुवा ए ऐसे अ मैं इ. इस ए. ऐसा उ० उदार वि० विपुल जा० यावत् का काल को अ० नहीं बांच्छते वि विचरते को शि. ऐसा क० करके ए० ऐसा सं० विचारकरके क० कल प० प्रकट १० प्रभात में जा० यावत् ज० ज्वलंत जे. जहां म० मरी अं० समीप ते वहां ढ० शीघ्र आ० आया हुवा है. से ० अथ णू शकादर्शी ख० खंदक ३१.१ सूत्र 888 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र ? तव खंदया ! पुवरत्तावरत्तं जाव जागरमाणस्स इमेयारूने अब्भत्थिए जाव समुप्पजित्था एवं खलु अहंइमेणं एयारूपेणं उरालेणं विउलेणं तंचेव जाव कालं अणबकंख- माणस्स विहरित्तए तिकटु, एवं संपेहेइ २ ता, कल्लं पाउप्पभायाए जाव जलंते जेणेव ममअंतिए तेगेव हव्वमागए ॥ सेणूणं खंदया ! अटेसमटे ? हताअत्थि. Aggr> दूसरा शतकका पहिला उद्देशा 988808 भावार्थ गार को ऐसा योले की अहो स्कंदक! मध्य रात्रि में धर्म जागरणा करते तुम को ऐसा अध्यवसाय 3 यावत् संकल्प हुवा कि मेरा शरीर क्षीण होगया है, यावत् मेरी सब नाडियों दीखती है, परंतु उत्थानादि होने से प्रभात में मेरे धर्माचार्य धर्मोपदेशक की पास जाकर वंदना नमस्कार कर काल की वांच्छा नहीं करता हुवा संलेखना करना मुझे श्रेय है. और ऐसा विचार करणे सूर्य का उदय होते ही तुम मेरी पास आये हो. अहो खंदक ! क्या यह बात सत्य है ? हां, भगवन ! यह वात सस है. अहो देवानु शब्दार्थ . सूत्र • अनुवादक-बालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी बडा प० पर्वत स०शनैः दु०. चढकर मे मेवघर सं० समान दे देव सन्निपात पु. पृथी शिलापट प०.देख कर द० दर्भ का सं• संथारा मं० विछाकर.द० दर्भके सं० संथारेपर रहाहुवा सं० संलेखना को झू० सेवा मे झू० सेवित भ. भक्त पानका प० प्रत्याख्यान करने वाला पा० पादोपगमन का का काल अ० वांच्छता वि. विचरने को ते ऐसा क० करना ॥ ३० ॥ ए. ऐमा सं० विचारबा है से० विचारकर क. कल ५० प्रगट प० प्रभात में र० रात्रि को जा० यावत् ज० जलंत जा. यावर् प० पर्युगासनां की ॥ ३१ ॥ खंदकादि त. तुम को णू शंकादशी पु० पूरात्रि में अपरक्त जा. यावत् जाम् जानि देवसन्निवाय, पुढविसिलापट्टयं पडिलेहेत्ता, दब्भ संधारय संथारित्ता, व्भ संथारो- वगयस्स सलेहणा झूसणा झूलियस्स भत्तपाणपडियाइक्खियस्त पाओवा.यस्त कालं अणवंकखमाणस्स विहरित्तए तिकटु ॥ ३० ॥ एवं संपेहेइ एवं संपेहेइत्ता. कल्लं पाउप्पभायाए रयणाए जावजलंते जेणव समणे भगवं महावीरे जाव पज्जुवासइ ॥ ३१ ॥ खंदयादि समणे भगवं महावीरे खंदयं अणगारं एवं क्यासी सेणणं होने से मुंदर ऐमी शिलापट को देखकर दर्भ का संथारा विछाकर दर्भ संगरा में रहा हुवा संलेखना अपनी आत्मा को कर्म से निर्मल बना कर व भक्त पान का प्रत्याख्यान कर काल को नहीं . वांच्छता हुवा विचरना मुझे श्रेय है. ॥.३० ॥ ऐसा विचार करके प्रभात होते जहां श्रमण , भगवन्त महावीर स्वामी यहां आकर वंदना नमस्कार यावत् पर्यासना की ॥ ३१ ॥ श्ररण भगवंत महावीर. खंदक अन- * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुम्वदेवमहायजी ज्वालापसादजी * भावाथ 615 JAN शब्दार्थ vu ३१.१. इ. ये ए० ऐमा अ० अध्यवसाय च० चितवन जा. यावत् स. उत्पन्न हुवा ए ऐसे अ मैं इ० इस ए. ऐसा उ० उदार वि० विपुल जा. यावन का काल को नहीं बांच्छते वि विचरते को शि. ऐसा क करके ए. ऐसा सं० विचारकरके क० कल प० प्रकट प० प्रभात में जा० यावत् ज० ज्यलंत जे. जहाँ म० मेरी अं० समीप ते. वहां हशीघ्र आ० आया हुवा है. से ० अथ णू शकादर्शी ख० खंदक }ola तव खंदया ! पुन्यरत्तावरत्तं जाव जागरमाणस्स इमेयारो अभत्थिए जाव समुप्पजित्था एवं खलु अहंइमेणं एयारूघेणं उरालेणं विउलेणं तंचेव जाव कालं अणवख- माणस्स विहरित्तए तिकटु, एवं संपेहेइ २ ता, कल्लं पाउप्यभायाए जाव जलते जेणव ममअंतिए तंगेव हव्यमागए ॥ सेणूणं खंदया ! अटेसमट्टे ? हंताअस्थि. सत्र 8- पंचमांग विवाह पण्णति ( भगवती) सूत्र - 87-8 दसरा शतकका पहिला उद्देशा 99232 . भावार्थ गार को ऐसा बोले की अहो स्कंदक ! मध्य रात्रि में धर्म जागरणा करते तुम को ऐसा अध्यवसाय यावत् संकल्प हुवा कि मेरा शरीर क्षीण होगया है, यावत् मेरी सब नाडिगों दीवती है, परंतु उत्थानादि १० होने से प्रभात में मेरे धर्माचार्य धर्मोपदेशक की पास जाकर वंदना नमस्कार कर काल की वांच्छा नहीं olo करता हुवा संलेखना करना मुझे श्रेय है. और ऐसा विचार करके सूर्य का उदय होते ही तुम मेरी पास आये हो. अहो खंदक : क्या यह बात सत्य है ? हां, भगवन ! यह बात सस है. अहो देवानु oyo शब्दार्थ हंत भ० भगवन्त जा० .यावत् सं० प्राप्त ननस्कार होवे स० .. श्रमण भ. भगवन्त म० महावीर को जा. यावत् स. प्राप्त होने का का० कामी को व० वंदना करता हूं भ० भगवन्त को १० वहां रहे हुवे इ० यहां रहावा पा० देखो मे० मुझे भ० भगवन्त त० वहां रहेहुचे इ. यहां रहाहुवा एक ऐसा वोले पु० पहिले म .मैंने स० श्रमण भ भगवन्त म० महावीर की अं० समीप स० सब पा० प्राणातिपात प० प्रत्याख्यान जा० जीवन पर्यंत मि० मिथ्यादर्शन शल्य प० प्रत्याख्यान इ० अभी स० श्रमण भ० i... अनुरादक-बालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 82 भगवओ, महावीररस जाव संपाविउकामस्स वंदामिणं भगवंतं तत्थगतं इहगओ पासउ मेसे भयवं तत्थगए इहगयंति त्तिकटु वंदइ णमंसइ वंदित्ता णमंसित्ता एवं वयासी पुबिपि मए समणस्स भगवओ महावीरस्स. अंतिए. सब्वे : पाणाइवाए पञ्चक्खाए जावज्जीवाए जाव. मिच्छादसणसल्ले पञ्चक्खाए जावजीवाए इदाणंपि * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी जालामतांदनी / . बाथा श्रमण भगवंत को वंदना नमस्कार करता हूं. क्यों कि वहां रहे हुवे भी भगवन्त. मुझे यहां पर देख सकते है. इस नरह वेदना नमस्कार कर के ऐसा गेले की मेने जाव जीव तक भगवंतः श्री महावीर स्वामी की पास से पाणातिपात योचत् मिथ्यादर्शन शल्य का प्रत्याख्यान किया है और फीर भी मैं महावीर स्वार मी की पास प्राणातिपत यावत् मिथ्यादर्शन शल्यका.प्रत्याख्यान करता अशन, पान, खादिम व शब्दार्थ सत्र - पंचमाङ्ग विवाह पण्पत्ति (भगवती) सूत्र 3382- भगवन्त म. महावीर की अं० समीप. स० सब पा.. प्राणातिपात का ५० प्रत्याख्यान करता हूं . जा० जीवन पर्यंत जा० यावत् मि० मिथ्या दर्शन शल्य का प० प्रत्याख्यान करता हूं स० सब अ० अशन पा०पान खा०खादिम सा स्वादिम च चार प्रकार का आ०आधार का प:प्रत्याख्यान करता हूं जंजो.इ. यह स० शरीर इ० इष्ट के० कान्त पिः प्रिय जा० यावत् फु० स्पर्शा ति• ऐसा क० करके ए० इसे है भी च० चडिम उ० उश्वास नि० निश्वास से वो० त्यजता हूँ सं० संलेखना की झू० सेवासे झू. सेवित भ० भक्त पा० पान ५० प्रत्याख्यान कराया हुवा पा० पादोपगम का० काल को अ० नहीं बांग्छता हुवा 'यणं समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतिए सव्वं पाणाइवायं पञ्चक्खामि जावज्जीवाए, जाव मिच्छादसणसल्लं पच्चक्खामि जावज्जीवाए, सव्वं .असणपाणखाइमसाइमं चउन्विहंपि आहारं पञ्चक्खामि जावज्जीवाए, जंपियं इमं सरीरं इ8 कंतं . पियं जाव फुसंतु त्तिकटु, एयंपिणं चरिमेहिं ऊसासनीसासेहिं बोसिरामि त्तिकटु संलहणा झूसणा झूसिए भत्तपाण पडियाइक्खिए पाओवगए कालं अणवकंखमाणे विहरइ स्वादिम ऐसे चारों आहार का मैं प्रत्याख्यान करता हूं. इष्टकारी, कान्तकारी, और प्रियकारी ऐसा जो मेरा शरीर है उसे जीवन पर्यंत त्यजता हूं. और संलेखना.से भक्तपान का प्रत्याख्यान करता हुवा व काल को नहीं वांच्छता हुना विचरता हूं ॥ ३३. ॥ उप्त समय में खंदक अनगारने. श्री श्रमण 828 दूसरा शतक का पहिला उद्देशा - भावार्थ ", O शाब्दार्थ सूत्र - अनुवादक-वालमावि मुनि श्री अमोलक ऋषीजी83 वि० विवरं ॥३३॥ त० तय खं० खंदक अ० अनगार स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर त० तथारूप थे० स्थविर की अं० पास सा० सामायिकादि ए. अग्यारह अ० अंग अ० अध्ययन कर ५० बहुत प. पूर्ण दु० घारह वा० वर्ष सा० साधु की प० पर्याय पा० पालकर मा० मास की से० सलखना से अ० आत्मा को झू० झूसकर स० साठ भक्त अ० अनशन से छे० छेदकर आ० आलोचते ५० प्रतिक्रमण करते स० समाधि प्राप्त आ० अनुक्रम से का? कालको पहुंचे ॥ ३४ ॥ त० तब थे० स्थविर भ० भगवन्त ख० खंदक अ० अनगार को का. काल को प्राप्त जा. जानकर प० परिनिवर्तिक ॥३॥ तएणं से खंदए अणगारे समणस्स भगवओ महावीरस्स तहारूवाण थेराणं अंतिए सामाइयमाइयाई एजारस अंगाई अहिज्झित्ता, बहु पडिपुण्णाई दुवालस वासाई सामण्ण परियागं पाउणित्ता मासियाए संलेहणाए अत्ताणं झूसित्ता सर्टि भत्ताई अणसणाए छदित्ता आलोइय पडिकते समाहिपत्ते आणुपुबीए कालं गए ॥ ३ ॥ तएणं ते 'थेरा भगवंतो खंदयं अणगारं कालगयं जाणित्ता, परिनिवावत्तियं काउ- भगवन्त महावीर स्वामी के तथारूप स्थविर की पास सामायिकादि छ आवश्यक व अग्यारह अंग का अध्यपन किया, और बारह वर्ष तक साधुपना पालकर एक मास की संलेखना सहित आत्मा को झूमकर माउ भक्त अनशन करके आलोचना प्रतिक्रमण करते हुवे अनुक्रम से समाधि सहित काल को प्राप्त * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यांलाप्रसादजी, mere राथ G yo ३१७ 68 पंचमांग विवाह पपणत्ति ( भगवती) सूत्र शब्दार्थी का कायोत्सर्ग क० करे १० पात्र ची० उपकरन गि० ग्रहण करे वि० बडे प० पर्वत से स. शनैः २, १० उतरकर जे. जहां स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर ते. तहां उ० आकर स. श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को २० वंदना कर न० नमस्कार कर ३० वोले दे० देवानुप्रिय. का अं• अंतेवासी खं० खंदक अ०अनगारप० प्रकृति भद्रक प० प्रकृति उ उपशांतप० पतला कोक्रोध मामान मा०माया लो. लोभ मि० मृदु म० मार्दव सं० युक्त अ० अलीन भ० भद्रक वि. विनीन से० वह दे. देवानुप्रिय से सगं करेइ, पत्तचीवराणि गिण्हंति, विपुलाओ पव्ययाओ सणियं २ पच्चोरुहंति सूत्र पच्चोरुहइत्ता जेणेबसमणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ उबागच्छइत्ता समर्ण भगवं महावीरं बंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता एवं बयासी एवं खलु- देवाणुप्पियाणं अंतेवासी खंदए णाम अणगारे पगइभदए पगइ उसते पगइ पयणु कोहमाण माया लोभे, मिउ मद्दव संपण्णे, अल्लीणे, भद्दए, विणीए सेणं देवाणुप्पिएहिं. ॥ ३४ ॥ उस समय में उन की पास रहे हुने स्थविर भगवन्त खंदक अनगार को काल प्राप्त हुए जानकर भावार्थ निर्वाण संबंधि कायोत्सर्ग करके व खंदक अनगार के पात्र वस्त्रादि लेकर उस पर्वत से उतरे. उतरकर श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी की पास आये और भगवन्त को वंदना नमस्कार करके ऐसा वोले कि अहो देवानुप्रिय ! आपका अंतेवासी भद्रिक प्रकृतिवाले, उपशान्त प्रकृतिवाले, स्वभाव से क्रोधादि को १ साधु निर्वाण हुवे पीछे कायोत्सर्ग करना सो * दुमरा शतकका पहिला उद्देशा !
शब्दार्थ सूत्र +2 अनुवादक-बालामगि मुनि श्री अमोलक ऋषीजी 83 वि० विचरुं ॥३३॥ त० तब खं० खंदक अ० अनगार स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर त. तथारूप ये० स्थविर की अं० पास सा० सामायिकादि ए० अग्यारह अ० अंग अ० अध्ययन कर ५० बहुत प. पूर्ण दु० धारह वा० वर्ष सा साधु की प० पर्याय पा० पालकर मा० मास की से. सलखना से भ० आत्मा को झू० झूसकर स० साठ भक्त अ० अनशन से छे० छेदकर आ० आलोचते ५० प्रतिक्रमण करते स० समाधि प्राप्त आ० अनुक्रम से का: कालको पहुंचे ॥ ३४ ॥ त० तब थे० स्थविर भ० भगवन्त ख. खंदक अ० अनगार को का. काल को प्राप्त जा. जानकर प० परिनिवर्तिक ॥३३॥ तएणं से खंदए अणगारे समणस्स भगवओ महावीरस्स तहारूवाण थेराणं अंतिए सामाइयमाइयाई एकारस अंगाई अहिज्झित्ता, बहु पडिपुण्णाई दुवालस वासाई सामण्ण परियागं पाउणित्ता मासियाए संलेहणाए अत्ताणं झूसित्ता सर्द्वि भत्ताई अणसणाए छेदित्ता आलोइय पडिकंते समाहिपत्ते आणुपुवीए कालं गए ॥ ३४॥ तएणं ते थेरा भगवंतो खंदयं अणगारं कालगयं जाणित्ता, परिनिवावत्तियं काउ- भगवन्त महावीर स्वामी के तथारूप स्थविर की पास सामायिकादि छ आवश्यक व अग्यारह अंग का अध्ययन किया, और वारह वर्ष तक साधुपना पालकर एक मास की संलेखना सहित आत्मा को झूमकर माउ भक्त अनशन करके आलोचना प्रतिक्रमण करते हुवे अनुक्रम से समाधि सहित काल को प्राप्त * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी जांलाप्रसादजी * yिnarwas वाथ शब्दार्थ SYS 11 OYO ३१.९ 87 पचंमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8988- >> दूसरा शतकका पहिला उद्देशा सत्र गये क० कहां उ० उत्पन्न हुव गो० गौतमादि स० श्रमण भ० भगान्त म. महावीर भ० भगवान् गो० गौतम को व० बोले गो० गौतम म० मेरा अ० अंतेवासी व० संदक अ० अनगार प० प्रकृति भद्रक जा० यावत् म मेरी अ० आज्ञामिलते स० स्वयं पं० पांच महावत आ० आराधकर स० सर्व अ० अर-10 शेष ने० जानना जा० यावत् आ० आलोचकर प० प्रतिक्रमणकर स. समाधि को प्राप्त का काल के अवसर में का० काल करके अ० अच्युत दे० देवलोक में दे० देवपने उ० उत्पन्न हुवे त० तहां . अ० कितनेक दे० देवताकी २० बावीस सा० सागरोपम की ठि स्थिति ५० प्ररूपी ख० खंदक दे० देव समणे भगवं महावीरे भगवं गोयम एवं वयासी एवं खलु गोयमा ! मम अंतेवासी खंदए णामं अणगारे पगइभदए जाव सेणं मए अब्भणुणाए समाणे सयमेव पंचमहन्वयाइं आरा- हेत्ता तंचेव सव्वं अवसेसयं नेयवंजाव आलोइय पडिकते समाहिपत्त कालमासे कालं किच्चा अच्चुए कप्पे देवत्ताए उववण्णे. तत्थणं अत्थेगइयाणं देवाणं बावसिं सागरोवमाई देवानुप्रिय ! आपका अंतेवासी खंदक अनगार काल कर कहां गये, और कहां उत्पन्न हुवे ! अहो गौतम ! मेरा अंतेवासी खंदक नामक अनगार मेरी आज्ञा से पांच महानत की आराधना यावत् संलेखनादि कर आलोचना प्रतिक्रम सहित काल करके अच्युत देवलोक में देवतापने उत्पन्न हुवे. वहांपर कितनेक देवताओं की बावसि सागरोपम की स्थिति कही. उस में खंदक देवता की भी वावीस सागरोपम की भावार्थ शब्दार्थ ३१.८ सूत्र ४ अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक पानी अ• आशा मिलते स. स्वतः पं० पांच महावत आ० आराधकर स० साधु स० साधियों को खा० क्षगाकर अ० हमारी स. साथ वि० वडा १० पर्वत को नि० निरविशेप जा. यावत् आ० अनुक्रम से का० काल को प्राप्त हुवे इ० यह आ० आचार भ० भंडोपकरण ॥ ३५ ॥ ५० भगवानू गो० गौतम स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को 4. वंदनाकर न० नमस्कार कर व० बोले द० देवानुप्रिय का अ० अंतेवासी स्व. पदक अ० अनगार का काल के अवसर में का० काल कर के क० कहां ग० अब्भणुण्णाए समाणे सयमेव पंच महव्ययाणि आराहेत्ता समणाय समणीओय खामेत्ता अम्हेहिं सदि विपुलं पव्वयं तंचव निरवसेसं जाव आणुपुवीए कालगए। इमेयसे आयारभंडए ॥ ३५ ॥ भंतेत्ति भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं. वंदइ णमंसइ वंदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी एवं खलु देवाणुप्पियाणं अंतेवासी खंदएणाम; अणगारे कालमासे कालंकिच्चा कहिं गए कहिं उबवण्णे ? गोयमादि, पनला करनेवाले, मृदुता को धारन करनेवाले, अलीन, भद्रिक.व विनीत खंदक अनगार आपकी आज्ञा मीलने से पांच महाव्रत की आराधना कर और साधु साधी को खमाकर हमारी साथ पर्वत पर आये थे. यहाँ मलेखनादि करके काल को प्राप्त हुये हैं. 'अहो भगान् ! इन के यह भंडोपकरण हैं ॥ ३५ ॥ उस समय में श्री गौतम स्वामी श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार करके वोले कि अहो * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसंहायजी ज्वालाप्रसादनी * वार्थ ब्दार्थ ३२१ सत्र 388 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति ( भगवती ) मत्र 888 *38दुसरा शतक का दूसरा उद्देशा 800 क० कितनी भ० भगवन स० समुद्घात प० प्ररूपी गो० गौतम स सात स० समुद्घात प० प्ररूपी तं. वह ज० जैसे ० वेदना समुदयात ए ऐसे स० समुद्घात प० पद छ० छमस्थ समुद्घात व० वर्ज कर भा० कहना जा० यावत् वे वैमानिक क० कषाय समुद्वात अ० अल्पावहुत ॥ १ ॥ १० अनगार कइणं भंते ! समुग्धाया पण्णत्ता ? गोयमा ! सत्त समुग्घाया पण्णत्ता तंजहा वयणा समुंग्याए, एवं समग्यायपयं, छउमात्थिय समुग्घाय वजं भाणयब्वं, जाव वैमाणियाणं, कसाय समुग्धाया अप्पाबहुयं ॥ १ ॥ अणगारस्सणं भंते ! भावि- पहिले उद्देशे के अंत में किस मरण से मरनेवाला जीव संसार की वृद्धि व हानि करता है ऐसा मरण का अधिकार कहा. वह मरण मारणान्तिक समुद्घान से होता है इसलिये मरण समुद्यात का अधि- कार कहते हैं. अहो भगवन् ! समुद्घात कितने प्रकार की कही है ? अहो गौतम ! ममुद्धात सात प्रकार की कही है. १ वेदना समुद्घात २ कपाय समुद्घात ३ मारणान्तिक समुद्घात ४. वैक्रेय समुद्र घात ५ तेजस समुद्घात ६ आहारक समुद्घात और ७ केवली समुद्यात. इन सातों समुद्यात में श.60 रीर से जीव प्रदेश का निर्गम होता है. केवली समुद्घात करते आठ समय लगता है और अन्य समुद्- घात में अंतर्मुहूर्त काल व्यतीत होना है. नरक व वायुकाय में चार समुदूधात.. चार स्थावर तीन विकले. न्द्रिय में तीन समुद्घात, देवता व तिर्यंच पंवेन्द्रिय में पांच समुद्रात, और मनुष्य व समुच्चय जीव में सात भावार्थ शब्दार्थ ३२० । - 4 अनुवादक बालयानगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 81 की बा० बावीस सागरोपम की ठि० स्थिति प० प्ररूपी ॥ ३६॥ ० भगवन ख• खंदक दे० देवता में दे देवलोक में से आ० आयुष्य क्षयसे भ० भवक्षय से अ० पीछे च० चवकर क. कहां ग० जा. चेंगे ककहां उ उत्पन्नहोंगे गो० गौतम म० महाविदेह में सिसिझेगा बु०बुझेगा मुमुक्तहोगा निर्वाण पा- मेगा स० सव दु० दुःखों का अं० अंतकरेगा ॥२॥१॥ ठिई पण्णत्ता. तत्थणं खंदयस्सवि देवस्स बावीसं सागरोबमाई ठिई पण्णत्ता ॥ ३६ ॥ सेणं भंते ! खंदए देवत्ताओ देवलोयाओ आउक्खएणं भवक्खएणं ठिइक्खएणं अणंतरं चयं चइत्ता कहिं गमिहिति, कहिं उववाजिहिति?. गोयमा ! महाविदहे सिज्झिहिति, बुझिहिति मुचिहिति, परिनियाहिति, सम्बदुक्खाण मंतं करिहिति,खंदओ सम्मत्तो ॥३७॥ विईय सयस्स पढमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ २ ॥9॥ . स्थिति है ।। ३६ ॥ वहां देवलोक में आयुष्य, भव व स्थिति का क्षय होने से चक्कर खंदक अनगार कहां उत्पन्न होगे ? अहो गौतम ! वहां से चक्कर महाविदेह क्षेत्र में उत्तम कुल में जन्म लेकर वैराग्य को प्राप्त होकर सिझेंगे, बुझेंगे, मुक्त होवो, निर्वाण को प्राप्त करेंगे यावत् सव' दुःख का अंत करेंगे यह संदक जीव का अधिकार समाप्त हुआ. यह मरा शतकका पहिला उद्देशा सम्पूर्ण हुवा ॥ २॥ १ ॥ " प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालामसादजी * वाथा दाथ क. कितनी भ० भगवन् स० समुद्यात प० प्ररूपी गो० गौतम त सात स० समुद्घात प० प्ररूपी तं. वह ज जैसे वे वेदना समुद्घात ए ऐसे स० समुद्घात ५० पद छ. उमस्य समुद्घात व० वर्ज कर भा० कहना जा० यावत् वे वैमानिक क. कपाय समुयात अ० अल्पावहुत ॥ १॥ अ० अनगार कइणं भंते ! समुग्धाया पण्णत्ता ? गोयमा ! सत्त समुग्घाया पण्णत्ता तंजहा वयणा समुंग्याए, एनं समग्यायपयं, छउमत्थिय समुग्घाय वजं भाणियव्वं, जाव वेमाणियाण, कसाय समुग्धाया अप्पाबहुयं ॥ १ ॥ अणगारस्सणं भंते ! भावि- पहिले उद्देशे के अंत में किस मरण से मरनेवाला जीव संसार की वृद्धि व हानि करता है ऐसा मरण का अधिकार कहा. वह मरण मारणान्तिक समुद्घात से होता है इसलिये मरण समुद्घात का आध. कार कहते हैं. अहो भगवन् ! समुद्घात कितने प्रकार की कही है ! अहो गौतम ! ममुद्घात सात प्रकार की कही है. १. वेदना समुद्घात २ कपाय समुद्घात ३ मारणान्तिक समुद्घात ४. वैक्रेय समुद्: घात ५ तेजस समुद्घात ६ आहारक समुद्घात और ७ केवली समुदयात. इन सातों समुदात में श•ore रीर से जीव प्रदेश का निर्गम होता है. केवली समुद्घात करते आठ समय लगता है और अन्य समुद: घात में अंतर्मुहून काल व्यतीत होना है. नरक व वायुकाय में चार समुद्धात. चार स्थावर तीन विकले. न्द्रिय में तीन समुद्वयात, देवता व तिर्यंच पंवेन्द्रिय में पांच समुद्यात, और मनुष्य व समुच्चय जीव में सात 28.2 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति (भगवती ) मत्र दुसरा शतक का दूसरा उद्देशा भावार्थ ३२० * अनुवादक बालब्रह्मगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 शब्दार्थ की पा० वापीस सागरोपम की ठि० स्थिति प० प्ररूपी ॥ ३६॥ मं० भगवन ख• खंदक दे० देवता में दे० देवलोक में से आ० आयुष्य क्षयसे भ० भवक्षय से अ० पीछे च० चक्कर क. कहां ग० जा- वगे क०कहां उ० उत्पत्रहोंगे गो० गौतम म० महाविदेह में सिसिझेगा बु०बुझेगा मुमुक्तहोगा निर्वाण पा- मेगा स सब दु० दुःखों का अं० अंतकरेगा ॥ २ ॥१॥ ठिई पण्णता. तत्थणं खंदयस्सवि देवस्सं बावीसं सागरोवमाई ठिई पण्णत्ता ॥ ३६ ॥ सेणं भंते ! खंदए देवत्ताओ देवलोयाओ आउक्खएणं भवक्खएणं ठिइक्खएणं अणंतरं चयं चइत्ता कहिं गमिहिति, कहिं उववाजिहिति?. गोयमा ! महाविदहे सिज्झिहिति, बुज्झिहिति मुच्चिहिति, परिनिवाहिति, सव्वदुक्खाण मंतं करिहिति,खंदओ सम्मत्तो ॥३॥ विईय सयस्स पढमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ २ ॥१॥ साथ स्थिति है ।। ३६ ॥ वहां देवलोक में आयुष्य, भव व स्थिति का क्षय होने से चक्कर खंदक अनगार कहां उत्पन्न होगे ? अहो गौतम ! वहां से चक्कर महाविदेह क्षेत्र में उत्तम कुल में जन्म लेकर वैराग्य को माप्त होकर सिझेंगे, बुझेंगे, मुक्त होने, निर्वाण को प्राप्त करेंगे यावत् सब' दुःख का अंत करेंगे यह संदक जीव का आधिकार समाप्त हुआ. यह दूसरा शतकका पहिला उद्देशा सम्पूर्ण हुवा ॥ २॥ १ ॥ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालामसादजी * yo दूसरा उ० उद्देशा णे० जानना पु० पृथ्वी अ० अवगाहकर कर नि० नरकायाम सं० संस्थान बार जाडपना वि० चौडा प० परिधि व वर्ण ग. गंध फा स्पर्श कि० क्या स० सर्व पा. प्राणी 'उ० उत्पन्न व्दार्थ ३२३ ? "बितीआ उद्देसो सो नेयधो ॥ गाहा ॥ पुढवी ओगहित्ता निरयासंठाणमेव बाहल्लं, विक्खंभ परिक्खेवो, वण्णो गंधोय फासोय ॥ किं सव्वपाणा उववणपुव्या हंता गोयमा ! असतिं अदुवा अणंतखुत्तो पुढवी उद्देसो ॥ बीईयसए तइओ उद्देसो सूत्र - पंचमांग विवाह पाणत्ति ( भगवती के सूत्र भावार्थ लाख नरकाबास रहे हुने हैं. ऐसे ही सब सातों पृथ्वी का कथन करना. जो आवालिका (पंक्ति) बंध नरकावास हैं वे वर्तुलाकार, व्यंस, चउरंस हैं ओर दुसरे विविध प्रकार के हैं. नरक का जाडपना तीन हजार योजनका है नीचे एक हजार योजन का धन है. बीच में एक हजार योजन का मुसिर है, और उपर एक हजार योजने का संकुचित है. नरक का विष्फंभपना. संख्यात योजनवाले नरकावासका संख्यात योजन का है, और परिधि भी संख्यात योजन की है. जो असंख्यात योजन के हैं उन का विस्तार व परिधि असंख्यात योजन की है. नरक के वर्ण, गंधरस व स्पर्श अनिष्ट है इस का सव अधिकार जीवाभ- गम सूत्र के नरक नामक द्वितीय उद्देशे में कहा है वैसा जानना. रत्नप्रभा पृथ्वी के तीस लाख नरकावासे क्या सब प्राणी उत्पन्न हुवे हैं ? हां गौतम ! उन नरकावासों में सब प्राणी एकवार नहीं परंतु अनेक वार दूसरा शतक का तीसरा उद्देशा 98883 60 od -- शब्दार्थ ३२२ सूत्र । thi अनुवादक-बालबाह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी को भ भगवन् भा० भाविताला के केवली मुद्घात जा० यावत् सा० शाश्वन अ० अनागतकाल चि. रहे स० समुद्गात प० पद ने जानना ॥ २॥ २ ॥ क० कितनी भ० भगवन् पु० पृथ्वी प० प्ररूपी गो० गौतम जी जीवाभिगम ने० नारकी को वि० यप्पणो केवली समुग्धाय जाव सासय मणागयर्चा चिटुंति, समुग्घायपयं णेयव्वं : ॥ २ ॥ विईयसए बीओ उद्देसो सम्मत्तो ॥ २ ॥ २ ॥ कइणं भंते ! पुढवीओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! जीयाभिगमो ‘नेरइयाणं जो समुद्यात. - इस का सव अधिकार कपाय समुद्घात की अल्पाबहुत्व तक पन्नवणा सूत्र के समुद्घात' पद नैसे कहना ॥ १ ॥ भवितात्मा अन्गार को केवली समुदयात यावत् शाश्वत अनागत काल तक रहे यह नमुद्यात पद जैसे जानना. यह दुमरा शतक का दारा उद्देशा पूर्ण हुवा ।। २ ॥२॥ गत उद्देशे में ममुद्यात का कंथन किया. जो जीव मारणान्तिक समुद्रात करना है वंह जीव मरकर पृषी में उत्पन्न होता है इसलिये पृथ्वी का अधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! पृथ्वी कितनी कही ? अहो गौतम ! . पृथ्वी सात की.. उन के नाम रत्नप्रभा यावत् तमतम प्रभा. इन पृथ्वीयों को अवगाह कर किनने दूर नरकावास रहे है ! रत्नप्रभा पृथ्वी का, एक. लाख अस्सी हजार. योजन का पृथ्वी पिंड है। उस में उपर नीचे एक २ हजार छोडकर बीच में एक लाख अठ्ठत्तर हजार की पोलार है. उस में तीस * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावाथ दूसरा उ० उद्देशा ० जानना पु० पृथ्वी अ० अवगाहकर कर नि० नरकावाम सं० संस्थान वा जाडपना वि० चौडा १० परिधि का वर्ण ग० गंध फा स्पर्श कि० क्या स० सर्व पा. प्राणी उ० उत्पन्न ब्दार्थ ३२३ *वितीओ उद्देसो सो नेयमो ॥ गाहा ॥ पुढवी ओगहित्ता निरयासंठाणमेव बाहल्लं, विक्खंभ परिक्खेवो, वण्णो गंधोय फासोय ॥ किं सवपाणा उववष्णपुव्वा ? हंता गोयमा ! असतिं अदुवा अणंतखुत्तो पुढवी उद्देसो ॥ बीईयसए तइओ उद्देसो सन्न < पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती सूत्र 988 > दूसग शतक का तीसरा उद्देशा 98. लाख नरकाबास रहे हुने हैं. ऐसे ही सब सातों पृथ्वी का कथन करना. जो आवालिका (पंक्ति) बंध भावाथ नरकाबास हैं वे वर्तुलाकार, व्यंस, चउरंस हैं ओर दुसरे विविध प्रकार के हैं. नरक का जाडपना तीन हजार योजनका है नीचे एक हजार योजन का घन है. बीच में एक हजार योजन का मुसिर है, और उपर एक हजार योजने का संकुचित है. नरक का विष्कभपना. संख्यात योजनवाले नरकावास कासंख्यात योजन का है, और परिधि भी संख्यात योजन की है. जो असंख्यात योजन के हैं उन का विस्तार व परिधि असंख्यात योजन की है. नरक के वर्ण, गंधरस व स्पर्श अनिष्ट है इस का सब अधिकार जीवाभoगम सूत्र के नरक नामक द्वितीय उद्देशे में कहा है वैसा जानना. रत्नप्रभा पृथ्वी के तीस लाख नरकावासे old क्या सक् माणी उत्पन्न हुवे हैं ? हां गौतम : उन नरकावासों में सब प्राणी एकवार नहीं परंतु अनेक वार व्दिार्थ ३२२ सूत्र अनुवादक-बालब्रह्मचारीमान श्री अमोलक ऋपिनी 87 को भ० भगवन् ‘भा० भाविताला के केवली स्मुद्घात जा० यावत् सा० शाश्वत अ० अनागतकाल चि० रहे स० समुद्गात प० पद ने जानना ॥ २ ॥२॥ क० कितनी भ० भगवन् पु० पृथ्वी प० प्ररूपी गो गौतम जी जीवाभिगम ने० नारकी को वि० यप्पणो केवली समुग्घाय जाव सासय मणागयद्धं चिटुंति, समुग्घायपयं णेयव्वं ॥ २ ॥ विईयसए बीओ उद्देसो सम्मत्तो ॥ २ ॥ २ ॥ कइणं भंते ! पुढवीओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! जीयाभिगम। नेरइयाणं ..जो समुयात. इम का सब अधिकार कपाय समुद्घात की अल्पाबहुत्व तक पनवणा सूत्र के समुद्घात पद जैसे कहना ॥ १ ॥ भवितात्मा अनगार को केवली समुयात यावत् शाश्वत अनागत काल तक नमुयात पद जैसे जानना. यह दुमरा शतक को मरा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ २ ॥२॥ गत उद्देशे में ममुद्यात का कथन किया. जो जीव मारणान्तिक समुद्यात करता है वह जीव मरकर पृषी में उत्पन्न होता है इसलिये पृथ्वी का अधिकार. कहते हैं. अहो भगवन् ! . पृथ्वी कितनी कही ? गो गौतम : पृथ्वी सात कही.. उन के नाम रत्नप्रभा यावत् तमतम प्रभा. इन पृथ्थीयों, को अवगाह कर किनने दूर नरकावास रहे है ! रत्नप्रभा पृथ्वी का. एक. लाख अस्सी हजार, योजन का पृथ्वी पिंड है उस में उपर नीचे एक २ हजार छोडकर बीच में एक लाख अठ्ठत्तर हजार की पोलार है. उस में तीस * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी भावाथ यह ३२७ चन् ए० ऐसा गो० गौतम ज. जो अ० अन्य तीथिक ए. ऐसे आ० कहते हैं जा. यावत् इ० स्त्रीवेद पु० पुरुष वेद जे. जो ए. ऐसे आ० कहते हैं मि० मिथ्या ते वे ए. ऐना आ० कहते हैं अ. मैं गौतम ए. ऐसा आ० कहता हूं जा० यावत् प० प्ररूपता हूं नि० निग्रेथ - का० काल को प्राप्तहुवे • अन्यतर दे देवलोक में दे देवपने उ सन्न भ० हावे म० महार्द्धक ना०या म०महाशक्तिवंत दु०ऊंचे देवलोक में चि० लंबी स्थिति वाले त० तहां दे० देव भ० होवे म. महर्द्धिक जा? यावत् द० दशदिशा वत्तव्वया णेयन्वा जाव इथिवेयंच, पुरिसवेयंच ॥ से कहमेयं भंते एवं ? गो- यमा ! जण्णं ते अण्णउत्थिया एव माइक्खंति जाब इत्थिवेयंच पुरिसवेयंच, जे ते एव माहंसु मिच्छा ते एव माहंसु ॥ अहं पुण गोयमा ! एव माइक्खामि जाव परूवेमि एवं खलु नियंठे कालगए समाणे अन्नयरेसु देवलोएसु देवत्ताए उब- सत्र - पंचमान विवाह पण्णिात्त (भगवती) सूत्र *983 8. दुसरा शतकका, पांचया उद्देशा भावार्थ सीर्थिक एक समय में एक जीव दो वेद वेदने का बोलते हैं वे मिथ्या हैं अर्थात् उन का कथन असत्य ३० है. क्योंकि देव को खीरूप करने पर भी पुरुषपना होने से पुरुष वेद का ही उदय होता है परंतु स्त्री वेद का उदय नहीं होता है. अहो गौतम ! मेरा कथन ऐसा ही कि कोई निग्रंथ काल करके किसी महर्दिक यावत् महानुभाग बहुत स्थितिवाले उपर के देवलोक में देवतापने उत्पन्न हुवा.. नहां पर वह देव महर्दिक, yo 50 व्दार्थ ३२६ सून अनुवादक-वालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी निय का०काल कियाहुवा दे देव हुवे अ स्वतः से वह त तहां नो नहीं अ०अन्य देव नो नहीं अ०अन्य दे० देयकी दे देवीको अ० वशकरके प० परिचारणा करेणो नहीं अ० अपनीदे० देवीको अवश कर के प. परिचारणाकरे अ० आत्माको वि० विकुर्वकर प० परिचारणा करे ए० एक जी० जीव ए. एक स० समय में दो दोवेद ये० वेदे तं० वह ज० जैसे इ० स्त्रीवेद पु० पुरुष वेद ए० ऐप्से अ० अन्यतीर्थिक की १० वक्तव्यता ने० जानना जा. यावत् इ० स्त्रीवेद पु० पुरुषवेद से० वह क० कैसे ए० यह भ० भग- देवन्भएणं अप्पाणेणं सेणं तत्थ नो अण्णदेवे नो अण्णेसिं देवाणं देवीओ अभिजु. जिय अभिजुजिय परियारेइ णो अप्पणिचियाओ देवीओ अभिमुंजिय अभिजुजिय परियारेइ, अप्पणामेव 'अप्पाणं विउविय विउव्विय परियारेइ; एगेवियणं जीवे एगेणं समएणं दो वेदे वेदेइ तजहा-इथिवेयंच, पुरिसवेयंच ॥ एवं अण्णउत्थिय- अधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! अन्यतीथिक ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं कि साधु निग्रंथ यहां से काल कर देव होने पर आत्मा से अन्य देव या अन्य देव की देवियों को आलिंगन कर उन की माय परिचारणा नहीं करते हैं. वैसे ही अपनी देवी की. साथ भी परिचारणा नहीं करते हैं. परंतु स्वतः के शरीरको वैक्रय बनाकर उस को सायपरिचारणा करते हैं. इस तरह करने से एक ही जीव एक समय में स्त्री वेद व पुरुप वेद ऐसे दो वेद वेदता है. अहो भगवन् ! यह किस तरह है ? अहो गौतम : जो अन्य * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसाद नी.* ३२ - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 88 शब्दार्थ पुरुप वेद णो० नहीं तं० उस समय में इ. स्त्रीवेद वे० वेदे इ० स्त्रीवेद का 30 उदय से नोक नहीं पु० पुरुष वेद वे वेदे पु. पुरुष वेदका उ० उदय से नो० नहीं इ. खोवेद वे० वेदे ए. ऐसे ए० एक जीव ए. एक समय में ए. एक वेद वे वेदे इ० स्त्रीवेद पु० पुरुष वेद इ. स्त्री इ० स्त्रीवेद का उ. उदय से पु० पुरुष की प. प्रार्थना करे पु० पुरुष पु० पुरुप वेदका उ० उदय से ७ इ० खीकी प. प्रार्थना करे दो दोनों अ० अन्योन्य प० प्रार्थना करे इ० स्त्री पु० पुरुप को पु० पुरुप पुरिसवेदंबा. जं समयं इत्थिवेदं वेदेइ णो तं समयं पुरिसबेदं वेदेइ, जं समयं पुरिसवेदं वेदेइ णो तं समयं इत्थिवेदं वेएइ. इथिवेयस्स उदएणं ना पुरिसंवेदं वेदेइ, पुरिसवे. सूत्र दस्स उदएणं णो इत्थिवेदं वेदेइ । एवं खलु एगे जीवे एगेणं समएणं एगं वेदं वेदेइ. तंजहा-इत्थिवेदेवापुरिसवेदवा. इत्थी इत्थिवेएणं उदिपणेणं पुरिस पत्थेइ, पुरिसोपुरि- सवेदेणं उदिण्णेणं इत्थि पत्थेइ; दो वेते अण्णमण्णं पत्येइ. तजहा इत्थीवा पुरिसं, वेद वेदता है. जिस समय में स्त्री वेद वेदता है उस समय में पुरुष वेद नहीं वेदता है, और जिस समय भावार्थ पुरुष वेद वेदता है उस समय में स्त्रो वेद नहीं वेदता है. वो वेद के उदय में पुरुष वेद नहीं और पुरुप वेद के उदय में स्त्री वेद नहीं. इस तरह एक जीव एक समय में एक वेद वेदता है. क्यों किं स्त्री वेद के उदय में पुरुर की वांछा होता है और पुरुष वेह के उदय में स्त्री की पांच्छा होती है. इस तरह 882 दूसरा शतक का पांचया उद्देशा 988- शब्दाथा d, अनुवादक-पालनलचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 80 में उ. उद्योतकरनेवाला प. प्रकाश करनेवाला जा. यावन् प०प्रतिरूप से वह त० तहां अ० अन्यदेव अ. अन्य देव की दे. देवीको अ० नशकर प० परिचारणा करे अ० अपनी. दे० देवीको अ० वशकर के प. परिचारणा करे णो नहीं अ० आत्मा से अ० आत्मा को वि० विकुर्वकर प० परिचारणा करे ए. एक जी० जीव ए. एक स० समय में ए. एक वे. वेद वे० वेदे इ० स्त्रीवेद पु. पुरुष वेद जं०. जिस समय में इ० स्त्रीवेद वे वेदे णो० नही तं० उस समय में पु• पुरुष वेद वे वेदे जं० जिससमय में पु. वत्तारो भवति महिडिएसु जाव महाणुभागेसु दूरंगतीसु, चिरट्टितीसु सेणं तत्थ देवे भवइ महिड्डिए जाव दस दिसाओ उज्जोवेमाणे पभासेमाणे जाव पडिरूवे सेणं तत्थ अण्णेदेवे अण्णेसिं देवाणं देवीओ अभिजंजिय अभिमुंजिय परियारेइ, अप्पणिच्चि- याओ देवीओ अभिमुंजिय अभिमुंजिय परियारेइ, नो अप्पणामेव अप्पाणं. येउ- वियं परियारेइ. ! एगेवियणं जीवे एगेणं समएणं एगं वेदं वेदेइ तंजहा इत्थिवेदेवा, पावत् दशों दिशि में प्रकाश करनेवाला, उद्योत करनेवाला यावत् प्रतिरूप हुवा. वह देवता अन्य देव को अथवा अन्य देवता की देवियोंको अपने वश में करके भोगता है या अपनी देवी को आलिंगन कर उस की मायपरिचारणा करता है; परंतु स्वयं स्वतः का शरीरको वैक्रय बनाकर उस वैक्रेय बनाना शरीरसे परिचारणा नहीं करसकता है. इसलिये एक जीव एक समयमें स्त्री वेद अथवा पुरुपवेद इन दोनों में से एक ही * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * थि शब्दाथ ७ ३ सूत्र ! 28.2 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 8><a ज० जघन्य अं० अंतर्मुहूर्त उ० उत्कृष्ट चा० वारह सं० संवत्सर ॥ ४ ॥ का० काय भव में रहा हुवा का कालमे के० कितना काल हो. होवे गो० गौतम ज जघन्य अं अंतर्मुहूर्त उ० उत्कृष्ट च० चौवीस सं० संवत्सर ॥ ५॥ म० मनुष्य पं० पंचेन्द्रिय तिः तिर्यंच वी.वीज से भं० भगवन् जो० योनिमें 80 गन्भेति कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहन्नं अंतो मुहुत्तं उक्कोसं बारस संवच्छराई ॥ ४ ॥ कायभवत्थेणं भते ! कायभवत्थेति कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहणण मंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं चउवीस संबच्छराइं ॥ ५ ॥ मणुस्सपांचं- दिय तिरिक्ख जोणिय बीएणं भंते ! जोणियन्भूए केवइयं कालं संचिट्ठइ ? जहन्नेणं मनुप्य को गर्भ कितने कालतक रहता है ! अहो गौतम ! मनुष्य का गर्भ जघन्य अंतर्मुहूर्त. उत्कृष्ट बारह वर्प ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! कायभवस्थ जीव कायभवस्थ में कितना कालतक रहे ? अहो गौतम ! कायभवस्थ जीव जघन्य अंतर्मुहूर्त उत्कृष्ट चौवीस वर्ष. स्त्री के गर्भ में एक जीव बारह वर्प रहकर काल कर जाये और पुनः वहांही उत्पन्न होकर बारह वर्ष रहे अथवा उस बारह वप रहकर चपाहुवा जीव के org शरीर में अन्य जीव आकर बारह वर्ष रहे ॥५॥ अहो भगवन् ! संज्ञी पंचेन्द्रिय मनुप्य व संज्ञी पंचे- १ जनन्युदरमध्यव्यवस्थितनिजदेह एव यो भवो जन्म स कायभवः तत्र तिष्ठति यः स कायमस्मः। अर्थात् माताके उदरमें रहवाहा निजदेहरूप भवमें रहनेवाला सो कायभवस्थ. ॥ भावार्थ दूसरा शतक का पांचवा उद्देशा 80- शब्दार्थ R इ० स्त्री को ॥ ? ॥ उ०पानी का ग०गर्भ का काल मे के कितना काल हो होवे गो गौनम ज. जयन्य ए० एक समय उ० उत्कृष्ट छ० छमास ॥ २॥ ति० तिर्यंच का गं० गर्भ भं० भगवन् का. काल से के० कितनाकाल हो. होवे गो० गौतम ज० जघन्य अं० अंतमुहूर्त उ० उत्कृष्ट अ० आठ सं० संवत्सर ॥ ३ ॥ म० मनुष्यणी का ग० गर्भ भं० भगवन् का. कालसे के० कितना काल हो० होवे गो. गौतम मूत्र * अनुवादक-पारग्रामचारी मुनि श्री अमोलक पिजी Sar प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थी पुरिसोवा इत्थं ॥ १ ॥ उदगगन्भेणं भंते ! उदग गम्भेति कालओ केवाचिरं होइ ? गोयमा ! जहन्नणं एक समयं उक्कोस छम्मासा ॥ २ ॥ तिरिक्ख जोणिय गब्भणं भंते ! तिरिक्ख जोणिय गन्भेति कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहन्न अंतो मुहुत्तं उक्कोसं अट्ठ संवच्छराइं ॥ ३ ॥ मणुस्सी गम्भेणं. भंते ! मणुस्सी पुरुष स्त्री को व स्त्री पुरुष को वेद का उदय होने पर प्रार्थना करते हैं. इसलिये एक समय में एक जीव एक ही वेद वेदता है ॥ १॥ परिचारणा से गर्भ रहता है इसलिये गर्भ का प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! पानी का गर्भ किनमें कालतक रहता है ? अहो गौतम ! पानी का गर्भ जघन्य एक समय उत्कृष्ट छ माप्त तक रहता है ॥२॥ अहो भगवन् ! तिर्यंच योनि में तिर्यंचका गर्भ किनने कालतक रहता है? अहो गौतम ! तिर्यंच का गर्भ जघन्य अंतर्मुहूर्न उत्कृष्ट आठ संवत्सर तक रहता है ॥ ३ ॥ अहो भगवन् 60 सूत्र 4.33 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 88-8 पर्थ जी० जीव पु० पुत्रपने ह० शीघ्र आ० आवे से वह के० कैसे भ० भगवन एक ऐसा चु० कहा जाता है जा० यावत् ह शीघ्र आ० आवे गो० गौतम इ० स्त्री पु० पुरुपका क० किये कर्म जी० योनि में मेमैथुन संबंधि सं० संयोग स० उत्पन्न होवे ते वे दु० दोनों सि० स्निग्यता चि० इकठी करे त० तहां ज० जघन्य ए० एक दो० दो ति तीन उ० उत्कृष्ट स. प्रत्येक लक्ष जी० जीव पु० पुषपने १०० इक्कोवा, दोवा, तिणिवा, उक्कोसेणं : सयसहस्सपुहत्तं जीवाण पुत्तत्ताए हव्वमार- च्छंति ।। सेकेणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ जाय हव्यमागच्छइ ? गोयंमा ! इत्थीएय पुरिसस्सय कम्मकडाए जोणीए मेहुणवत्तिए नामं संजोए समुप्पज्जइ, ते दुहओसिणेहं चि- ति, तत्थणं जहन्नेणं एकोवा दोवा तिण्णिवा, उक्कोसेणं सयसहस्स पुहत्तं जीवाणं भावार्थ गौतम ! जघन्य एक, दो, तीन उत्कृष्ट प्रत्येक लाख [ नव लाख ] जीव पुत्रपने उत्पन्न होवे. मत्स्यादिक को एक संयोग में माछली की योनि में नव लाख जीव गर्भपने उत्पन्न होवे और निप्पन भी होवे. मनुष्य को बहुत उत्पन्न होवे परंतु बहुत निष्पन्न नहीं होवे. अहो भगवन् ! एक भव में एक ही जीव को नव 90 लाख जीव पुत्रपने किस तरह से उत्पन्न होवे ? अहो गौतम! नाम कर्म निवर्तित (मदनोद्दीपक व्यापारवाली) योनि में स्त्री और पुरुपका मैथुन मंबंधी संयोग हुवा, उस समय उन दोनों का स्नेह एकत्रित हुवा. उस में जघन्य एक दो, तीन उत्कृष्ट नवलक्ष जीव पुत्रपने उत्पन्न होवे इसलिये अहाँ गौतम ! नवलाख जीव 388009 दुनरा शतक का पांचवा उद्देशा 988 शब्दार्थ सूत्र 1 अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 62 रहा हुवा के०कितना काल सं०रहे गो गौतम जजघन्य अं० अंतर्मुहून उ० उत्कृष्ट वा बारह मुहू॥६॥ए एक जी जीव भ० भगवन ए० एक भव में के• कितनेका पु० पुत्र पने ६० शीव आ० आये गोगौतम जजघ- न्य इ० एक दो दो ति० तीन उ० उत्कृष्ट स: प्रत्येक सो जी० जीवों का० पु० पुत्रपने ह० शीघ्र आ- आवे ॥ ७ ॥ ए. एक जी० जीव को भं• भगवन् ए० एक भव में के० कितने जीव पु० पुत्रपने ६० शीघ्र आ० आवे गो० गौतम ज० जघन्य इ. एक दो० दो ति तीन उ० उत्कृष्ट स० प्रत्येक लक्ष अतोमुहुत्तं उक्कोसेणं वारस मुहत्ता ॥ ६ ॥ एग जीवेणं भंते ! एग भवग्गहणेणं केवइयाण पुत्तत्ताए हन्धमागच्छइ ? गोयमा ! जहण्णणं इवास्सवा दोण्हस्सवा, ति- '.ण्हरसवा सयपुहत्तरस जीवांणं पुत्तत्ताए हव्वमागच्छइ ॥ ७॥ एग जीवरसणं भते एग भवग्गहणेणं केवइया जीवा पुत्तत्ताए हव्वमागच्छंति ? गोयमा ! जहझेणं न्द्रिय तियेच का बीजरूप वीर्य योनि में कितने कालतक रहे? अहो गौतम.! जघन्य अंतर्मुहूर्त उत्कृष्ट वारह मुहूर्त ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! एक जीव एक भव आश्रित कितने पिता का पुत्र होवे ? अहो गौतम ! जघन्य एक,दो, तीन का पुत्र होघे, उत्कृष्ट प्रत्येक (नव) सो पिताका पुत्र होवे. क्योंकि वारह मुहूर्त तक योनि सचित रहती है। उस से नव सो का वीज योनि में प्रविष्ट होने से उन सब का वह पुत्र कहाता है ।। ७ ॥ अहो भगवन् ! एक भव में एक जीव को कितने जीव पुत्रपने उत्पन्न होवे ? अहो * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी उकोस भावार्थ सूत्र - पंचमांग विवाद पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 8 दार्थ महावीर रा० राजगृह न० नगरके गु० गुणशील चे० उद्यान से प० निकलकर व० वाहिर में वि० विचरनेलगे ॥ १० ॥ ते० उत काल ते० उत समय में तुं० तुंगीया न० नगरी हो। वर्णनयुक्त ॥ ११ ॥ ती० उस तु. तुंगीया नीकी य० बाहिर उ. ईशान कौन में पु० पुष्पवती च. उद्यान हो० था त० तहां तुं० तुंगीया न० नगरी में व० बहुत स० श्रमणोपासक प० रहते हैं अ० ऋद्धि- समणे भगवं महावारे रायगिहाओ नयराओ गुणसिलाओ चेइयाओ पडिनि क्खमइ पडिनिक्खमइत्ता बहिया जणवयविहारं विहरइ ॥ १० ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं तुंगिया नामं नयरी होत्था, वण्णओ, तीसणं तुंगियाए नयरीए बहिया उत्तरपुरच्छिमे दिसीभाए पुप्फवइए नामं चेइए होत्था. वण्णओ ॥ ११ ॥ तत्वणं तुंगियाए नयरीए बहवे समोवासया परिवसंति. अड्डा, दित्ता, विच्छिण्ण भावार्थ तव श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी राजगृह नगर के गुणशील नामक उद्यान में से नीकल- कर अन्य देशमें विचरने लगे ॥ १० ॥ उस काल उस समय में तुंगेया नाम की नगरी थी. उस का वर्णन उक्वाई सूत्र में चपा नगरी का वर्णन जैसे कहना. उस तुगिया नगरी की ईशान कीनं में पुष्प- वती नामक उद्यान था. उस का वर्णन उपवाई में से जानना ॥ ११ ॥ उस तुंगीयां नगरी में बहुत श्रमणोपासक (श्रावक ) रहते थे. वे धन धान्य से परिपूर्ण, वलवंत, विस्तार युक्त बहुत भवन, शयन * दूसरा शतक का पांचवा उद्देशा8888 oro तरह असंयम हो ! अहो गौतम ! जैसे कोई पुरुप रूइ या मूके काष्ट के बूरे को नालीका में परे ,. फीर सूत्र ४ अनुवादक पालनाचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दा) - शीघ्र आ० आये ॥ ८ ॥ मे० मैथुन भ० भगवन् से मेवता के० कैसे अ० असंयम क को गो गोनम से वह ज जैसे के०कोइ पु०पुरुप रुक रुइकी नालिका बू० बांस के बूरेकी नालिका में त-तपा ताक खिला से स० जलावे एक ऐसे गो० गौतम मे० मैथुन से सेवता अ० असंयम क० करे म० या १० ऐसे भ० भगवन् ति० ऐसे जा . यावत् वि. विचरने लगे ॥ ९ ॥ त? तर स० श्रमण ५० मगरन पः पुत्तत्ताए हल्यमागच्छंति. से तेणट्टेणं जाव हव्यमागच्छइ ॥ ८ ॥ मेहुणेणं भंते ! सेवमाणरस केरिसे असंजमे कज्जइ ? गोयमा ! से जहानामए केइ पुरिसे रूय.. नालियंवा, यूरनालियंवा, तत्तेणं कणएणं समभिधंसेजा, एरिसएणं गोंयमा ! मेहुणं सेवमाणस्स असंजमे कन्जइ ॥ सेवं भंते भंतेत्ति जाब विहरइ ॥ ९ ॥ तएणं एक जीव को पुत्रपने एक भव में उत्पन्न होते हैं. ॥ ८॥ अहो भगवन् ! 'पैथुन सेवने वाले को किए भनि मे तपाकर रक्त बनाया हुवा लोहे का दंड उस नाली में डाले, इस से उस में रही हुई रूइ जैसे जलनाती है. मे ही मैथुन करते योनि में रहे हुवे जीवों नष्ट होजाते हैं. और इस तरह जीव का नाश होने से असंयम होना है. अहो भगवन् ! आपके वचन यथातथ्य हैं ऐसा कहते श्री गौतम स्वामी विचर रहे ॥९॥ मामामामादरमाला परदेव महापभी ज्वालाममादजी * भावा 49 ७ सूत्र 888 पंचमाङ्ग विवाह पणत्ति (भगवती) मूत्र 80 शब्दार्थ आ आथव सं० संवर नि निर्जरा कि क्रिया अ० अधिकरण ५० वैध प० मोक्ष कु० कुशल अ० सहे नहीं दे० देव अ० असुर ना० नाग सुः सुवर्ण ज० यक्ष र० राक्षस कि० किन्नर किं० किंपुरुप ग गरुड ग. गंधर्व म. महोरगादि दे० देवगण से नि० निथके पा० प्रवचन को अ० अतिक्रमे नहीं नि निग्रंथ पा. प्रवचन में नि० शंकारहित नि० कांक्षारहित 'वि० संदेहरहित ल० माप्त- जक्ख रक्खस किण्णर किंपुरिस गरल गंधव्य महोरगादीएहिं देवगणेहि निग्गं.. थाओ पावयणाओ अणतिकमाणिजा ॥ निग्गंथ पारयणे निस्संकिया, निखि- या, . निव्वितिगिच्छा, लट्ठा, गहियट्ठा, पुच्छियट्ठा अभिगयट्ठा, विणिच्छियट्ठा, अट्रिमिंजपेम्माणुरायरत्ता ॥ अयमाउसो ! निग्गंथे पात्रयणे अटे, अयं परमटे, भावार्थ पुण्य, पाप, आश्रय, संवर, निर्जरा, क्रिया, अधिकरण, बंध व मोक्ष को जानने में बहुत कुशल थे. आपत्ति काल में देव, असुर, नाग, सुवर्ण, यक्ष, किन्नर, किंपुरुष, गरुड, गंधर्व व महोरगादिक की सहायता नहीं लेने वाले थे. स्वयं कृत कर्म भोगने की मनोवृत्र्तिवाले थे, वैसे ही उक्त देवों निग्रंथ के प्रवचन से चलित करने पर भी वे श्रमणोपासक चलित नहीं होते थे. वैसे ही वे जीवादि तत्व है या नहीं ऐसी शंका, कांक्षा व अन्य दर्शनी की वांच्छा रहित थे. वैसे ही शास्त्र के अर्थ का उन को लाभ हुवा था. उनोंने अच्छी तरह सम्यक् प्रकार से ग्रहण किया था. किसी प्रकार का संशय उत्पन्न होने पर दूसरा शतक का पांचया उद्देशा se का शब्दाथी सन 2 अनुवादक-बालग्रहमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी ही वाले दि० बलवन्त वि० विस्तीर्ण वि० बहुन भ० भवन सा शयन आ० आसन जा. यान वा वाइन युक्त य० बहुत ध० धन २० बहुत जा० सुवर्ण र० रूपा आ० आयोग प. प्रयोग सं० युक्त वि. उच्छिष्ट वि० बहुत भ० आहारपानी २० बहुत दा० दासी दा० दास गो० गौ म० महिंपी ग. बकरें प. बहुत व० बहुत ज० मनुष्य से अ० अपगजित अ० जाने हुवे जी० जीवाजीव उ० ओलखे पु० पुन्य पा० विपुल भवण सयणासण जाण वाहणाइण्णा, बहुधण बहुजायस्वरयया, आओगप. ऑगसंपउत्ता विच्छड्डियाविउल भत्त पाणा, बहुदासीदास गो महिसगवेलगप्पभूया, बहु जणस्स अपरिभूया, अभिगयजीवाजीवा, उवलदपुण्णपावा, आसव संवर निजर किरियाहिंगरण बंधप्पमोक्ख कुसला ॥ असहेज देवासुर नाग सुवण्ण आमन,यान,मुवर्ण व वाहन से व्याप्त, वैसे बहुत धन सुवर्ण चांदी व आयोग प्रयोगसे संयुक्त थे.जिनकी भोजन शालामें इतना आहार निपनना था कि जिस को भोग कर पीछे जो बढता था उसमें से बहुत लोगोंकी आ- जीविका चलती थी, उन को बहुत दास दासी, गाय बैल, महिपी, गाडर वगैरह का संग्रह था. उनको पास इतनी ऋद्धियी कि इतनी ऋाद बहुत से लोगों की पास नहीं थी. यह द्रव्य ऋदि का कथन किया. अब भाव ऋद्धि का कथन चलता है. जीव अजीव को जानने वाले थे. १ लोगों को व्याज से देना २ व्यापार में लगाना. * प्रकाशंक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायंजी ज्वालामसादजी * सन HD पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 888- शब्दार्थ) आ० आश्रय सं. संवर नि० निर्जरा कि क्रिया अ० अधिकरण ५० वैध प० मोक्ष कु० कुशल अ० सहे नहीं दे० देव अ० असुर ना० नाग मुः सुवर्ण ज. यक्ष र० राक्षस कि० किन्नर किं. किंपुरुष ग. गरुड गं. गंधर्व म० महोरगादि दे० देवगण से नि० निग्रंथके पा० प्रवचन को अ० अतिक्रमे नहीं नि निग्रंथ पा. प्रवचन में नि० शंकारहित नि० कांक्षारहित 'वि० संदेहरहित ल० माप्त- जक्ख रक्खस किण्णर किंपुरिस गरल गंधव्व महोरगादीएहिं देवगणेहि निग्गं-- थाओ पाक्यणाओ अणतिकमाणिजा ॥ निग्गंथ पावयणे निस्संकिया, निकंखि- या, . निन्वितिगिच्छा, लट्टा, गहियट्ठा, पुच्छियट्ठा अभिगयट्ठा, विणिच्छियट्ठा, अटिमिंजपेम्माणुरायरत्ता ॥ अयमाउसो ! निग्गंथे पावयणे अटे, अयं परमटे, भावार्थ पुण्य. पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, क्रिया, अधिकरण, बंध व मोक्ष को जानने में बहुत कुशल ये. आपत्ति काल में देव, असुर, नाग, सुवर्ण, यक्ष, किन्नर, किंपुरुप, गरुड, गंधर्व व महोरगादिक की सहायता नहीं लेने वाले थे. स्वयं कृत कर्म भोगने की मनोवृत्तिवाले थे, वैसे ही उक्त देवों निग्रंथ के प्रवचन से चलित करने पर भी वे श्रमणोपासक चलित नहीं होते थे. वैसे ही वे जीवादि तत्व है या नहीं ऐसी शंका, कांक्षा व अन्य दर्शनी की वांच्छा रहित थे. वैसे ही शास्त्र के अर्थ का उन को लाभ हुवा था. उनोंने अच्छी तरह सम्यक् प्रकार से ग्रहण किया था. किसी प्रकार का संशय उत्पन्न होने पर 3. दूसरा शतक का पांचवा उद्देशा 988 शब्दार्थ ३ सत्र • अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी । वाले दि० बलवन्त वि. विस्तीर्ण वि० बहुन भ० भवन स शयन आ० आसन जा० यान वा०' वाहन युक्त य० बहुत ध० धन २० बहुत जा० सुवर्ण र० रूपा आ० आयोग प. प्रयोग सं० युक्त वि. उडिट वि० बहुत भ• आहारपानी व० बहुत दा० दासी दा० दास गो० गौ म० महिपी ग. बकरें प. बहुत व० बहुत ज० मनुष्य से अ० अपराजित अ० जाने हुवे जी. जीवाजीव उ० ओलखे पु० पुन्य पा० विपुल भवण सयणासण जाण वाहणाइण्णा, बहुधण बहुजायरूबरयया, आओगप. ओगसंपउत्ता विच्छठियविउल भत्त पाणा, बहुदासीदास गो महिसगवेलगप्पभूया, बहु जणस्स अपरिभूया, अभिगयजीवाजीवा, उवलढपुण्णपावा, आसव संवर निजर किरियाहिगरण बंधप्पमोक्ख कुसला ॥ असहेज देवासुर नाग सुवण्ण आमन,यान,सुवर्ण व वाहन से व्याप्त, वैसे बहुत धन सुवर्ण चांदी व आयोग प्रयोगसे संयुक्त थे.जिनकी भोजन शालामें इतना आहार निपजता था कि जिस को भोग कर पीछे जो वढता था उसमें से बहुत लोगोंकी आ- जीविका चलती थी, उन को बहुत दास दासी, गाय बैल, महिपी, गाडर वगैरह का संग्रह था. उनको पाम इतनी ऋद्धियी कि इतनी ऋद्धि बहुत से लोगों की पास नहीं थी. यह द्रव्य ऋदि का कथन किया. अब भाव ऋद्धि का कथन चलता है. जीव अजीव को जानने वाले थे: १ लोगों को व्याज से देना २ व्यापार में लगाना. * प्रकाशंक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायंनी ज्वालाप्रसादजी * शब्दार्थ सूत्र 8 पंचमांग विवाह पण्पत्ति ( भगवती) सूत्र 8.8%% सम्यक् अ० पालते स० श्रमण नि० निग्रंथ फा० पासुक ए. एपनिक अ० अशन पा० पानी खा० खादिम सा० स्वादिम व वस्त्र प० पात्र कं० कंबल पा० रजोहरण पी० आसन फ० पाट से० शैय्या सं० संथारा ओ. औषध भे० भेपन प० प्रतिलाभते अ० यथा ५० ग्रहण किये त० तप कर्म से आ. आत्मा को भा० भावते वि०विचरते हैं ॥ १२ ॥ ते० उस काल ते. उस समय में पा० पार्श्वनाथ के शिष्य थे० स्थविर भ० भगवन्त जा० जातिसंपन्न कु० कुलसंपन्न व० बलसंपन्न रू० रूपसंपन्न वि० विनय संपन्न खाइम साइमेणं वत्थ पडिग्गह कंबल पायपुंछणेणं, पीढफलग सेजा संथारएणं ओसहभेसजेणं पडिलाभेमाणा अहापरिग्गहिएहिं तवोकम्मेहि अप्पाणं भावे- माणा विहरंति ॥ १२ ॥ तेणं कालेणं तेणंसमएणं पासावच्चिज्जा थेरा भगवतो जाइसंपण्णा, कुलसंपण्णा, बलसंपण्णा, रूवसंपण्णा, विणयसंपण्णा, णाणसंपण्णा होते थे. वे श्रावकों बहुत शीलवत, अनुव्रत, गुनव्रत, प्रत्याख्यान, पोषय उपवास वगैरह करते थे. चतु- दशी, अष्टमी, अमावास्या व पूर्णिमा को प्रतिपूर्ण पोपध सम्यक् प्रकार से करते थे. अशन, }ore पान, खादिम, स्वादिम, वस्त्र, पात्र, कंवल, रजोहरण, बाजोठ, पटिया, शैय्या, . संथारा, व औपधादि श्रमण निग्रंथ को प्रनिलाभते हुवे (देते हुवे) वैसे ही जैसा ग्रहण किया वैसा. तप कर्म से आत्माको चिंत- चते हुने विचरने थे ॥ १२ ॥ उम काल उस समय में जाति संपन्न, कुल सम्पन्न, बल सम्पन्न, रूप सम्पन्न 2- दुतरा शतकका पांचवा उद्देशा 82 भावार्थ ० शध्दार्थ ३३८ सूत्र अनुवादक-पालनामचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी अर्थ गा ग्रहण किया है अर्थ पुल पूछा है अर्थ अ० जाना है अर्थ वि० विशेष जाना है अ० अर्थ, अ. मि० मिंज पे० प्रेमानुरक्त अ० यह आः आयुष्यमान नि. निग्रंथ पा. प्रवचन अ० अर्थ ५० परमार्थ से शेप अ० अनर्थ उ० अच्छा फा० स्फटिक जैसे अ० खुला दु० द्वार चि० प्रसन्न अं० अंतः पुर ५० परगृह ५० प्रवेश क० बहुत सी० शीलवत गु० गुन वे० वेरमण १० प्रत्याख्यान पो० पोपध उप- पास से चा० चतुर्दशी अ० अष्टमी को स० अमावास्या पु० पूर्णीमा को ५० प्रतिपूर्ण पो० पोपध स० सेसे अणटे ॥ ऊसियफलिहा अवंगुयदुवारा चियत्ततेउरंपरघरप्पवेसा, बहूहिं सीलन्वय गुण वेरमण पञ्चक्खाण पोसहोवयासेहिं चाउद्दसट्टमुद्दिट्टपुण्णमासिणीसु पडिपुण्णं पोसहं सम्ममणुपालेमाणा समणे निग्गंथे फासुएसणिज्जेणं असणपाण पूछकर निर्णय किया था, निर्णय वाले अर्थ को सम्यक् प्रकार से धार रखा था, निग्रंथ प्रवचन में उन की हली व दृष्टी की मिनिओं प्रेमानुराग से रक्त बनी हुई थी. जर किसी साथ वार्तालाप करने का. प्रसंग आता तब ऐसा ही कहते कि अहो आयुप्यमन्तो ! यह निIय के प्रवचन मोक्ष साधन का मार्ग है. वही अर्थ रूप है, परमार्थ रूप है, परमादरणीय है. इन सिवाय अन्य धन, पुत्रादि वैसे ही कुवचनादि अनर्थ हैं, मोक्ष के वाधक हैं. उन श्रावकों के हृदय स्फटिक रन की समान निर्मल थे, उन के गृह के द्वार दान देने के लिये सदैव सुल्टे रहते थे, प्रीति करनेवाले अंत:पुर व परगृह. में प्रवेश करते अप्रतीति के. पात्र नहीं * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावाधा शब्दार्थ 980पंचमाङ्ग विवाह पण्णाति ( भगवती ) सूत्र * Hदूसरा शतक का पांचवा उद्देशा या आ० अनुक्रम से च० विचरते गा० ग्रामानुग्राम दु० जाते सु सुखमे वि० विचरते जे. जहाँ तुं० तुंगियानगरी जे० जहां पु० पुष्पवती चे० उद्यान ते तहां उ० आकर अ० यथामतिरूप उ० अनग्रह ओ० ग्रहण कर सं० संयम से त० तप से अ० आत्मा को भा भावतेहुवे वि. विचरते हैं ॥१३॥ ततव ० । ३४१ तुंगिया न नगरी में किसिंघाडे जसे कि तीनरस्ता च० चार रस्ता च० बहुत म. राजमार्ग में जा० यावत् ए० एकदिशा तरफ णि० जाते हैं।॥ १४ ॥ त० तब ते वे स० श्रमणोपासक इ० इम क० कथा ल० प्राप्त होते ह० हृष्ट तु० तुष्ट जा० यावत् स० बोलाकर ए. ऐगे 4. बोले दे. देवानुप्रिय पान चेइए, तेणेव उवागच्छति उवागच्छइत्ता अहापडिख्वं उग्गहं ओगिहित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणा विहरंति ॥ १३ ॥ तएणं तुगियाए नयरीए सिंघाडग- तिगचउक्कचच्चरच उम्मुहमहापहपहेतु जाव एगदिसाभिमुहा णिज्जायंति, ॥ १४ ॥ तएणं ते समणोवासया इमीसे कहाए लडट्ठा समाणा हट्ट तट्ठा जाव सदावति यथाक्रम से ग्रामानुग्राम सुखपूर्वक विचरते तुंगिया नगरी के पुष्पवती उद्यान में आये. वहां आकर यथा-300 योग्य अवग्रह याचकर संयम व तप से आत्मा को भावते हुवे विचरते थे ॥ १३ ॥ तब सिंघाडे के आका- रवाले रस्ते में, तीन रस्ता मिले वैसे स्थान में, चौक, बहुत रस्ते मीले वैसे स्थान के राजमार्ग में उन स्थविर भगवन्त के दर्शन कलिये एक ही दिशा में बहुत लोक जा रहे थे ॥ १४ ॥ तब वे श्रमणोपासक ऐसा भावार्थ शब्दार्थ ३४० अनुवादक-वावमगरी मुनि श्री अमोलक शार्पनी णा ज्ञानपन्त दं. दर्शनवन्त च० चारित्रवन्त ल लज्जा ला० लाघववन्त ओ० शरीर प्रभा युक्त ते तेजस्वी व० वर्चस्वी ज० यशस्वी जि० जिता है क्रोध जि० जिता है मान मा० माया लो० लोभ, नि निद्रा ई० इन्द्रिय प० परिपद जी० जीवित आ० वांच्छा म. मरण भ. भय सो० शोकसे वि० रहित ३० बहु श्रुत ३० बहुत परिवार वाले पं० पांच अ० अनगार स० शत स. साथ सं० रहेहुवे अ. दसणसंपण्णा, चरित्तसंपण्णा, लज्जालाघव संपण्णा, आयसी तेयंसी, वच्चसी जसंसी; जियकोहा, जियमाणा, जियमाया, जियलोभा, जियनिदा, जियइंदिया, जियपरी- सहा, जीवियासा मरण भय सोक विप्पमुका, बहुस्सुया, बहुपरिवारा, पंचहि अणगारसएहिं सद्धिं संपरिबुडा अहाणुपुट्विं चरमाणा, गामाणुगाम दूइजमाणा, सुहं सुहेणं बिहरमाणा. जेणेव तुंगियानयरी जेणेव पुप्फबईए विनय सम्पन्न, मतिज्ञानादि ज्ञान सहित, सम्यक्त्व सहित, सामायिकादि चारित्र सहित, लौकिक लोकोसर रजा महित, द्रव्य से उपधि व भाव से सर्व था लघुतावाले, ओजस्वी, तेजस्वी, वचन की विशिष्ठता युक्त सो वर्चस्त्री, यशस्वी, क्रोध, मान, माया व लोभ को जीतनेवाले, निद्रा, इन्द्रिय, परिपह को जीतनेवाले, जीवित, मरण, भय ३ शोक से मुक्त, बहुत श्रुत. के . धारक और चारों तीर्थरूप बहुत परिवाखाले श्री पार्श्वनाथ स्वामी के शिष्यानुशिष्य स्थविर भगवंत पांचसो साधु के परिवार सहित मकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * बाध ३ शब्दाथा 8.98 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्त (भगवती ) सूत्र *> यथा आ० अनुक्रम से च विचरते गा० ग्रामातुमाम दु० जाते सु० सुखमे वि० विचरते जे जहाँ तुं० तुंगियानगरी जे० जहां पु० पुष्पवती चे उद्यान ते तहां उ० आकर अ० यथामतिरूप उ. अनग्रह ओ० ग्रहण कर सं० संयम से त० तप से अ. आत्मा को भा०भावतेहुवे वि विचरते हैं।॥१३॥ त तव तुं० तुंगिया न नगरी में सिं० सिंघाडे जैसे ति तीनरस्ता च० चार रस्ता च० बहुत म. राजमार्ग में जा० यावत् ए० एकदिशा तरफ णि जाते हैं.॥ १४ ॥ न तव ते वे स० श्रमणोपासक इ० इम क कथा ल० माप्त होते ह० हृष्ट तु तुष्ट जा. यावत् स० वोलाकर एक ऐगे 4. बोले दे. देवानुप्रिय पा चेइए, तेणेव उवागच्छंति उवागच्छइत्ता अहापडिरूचं उग्गहं ओगिहित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावेमाणा विहरंति ॥ १३ ॥ तएणं तुगियाए नयरीए सिंघाडग- तिगचउक्कचच्चरच उम्मुहमहापहपहेनु जाव एगदिसाभिमुहा णिज्जायंति, ॥ १४ ॥ तएवं ते समणोवासया इमीसे कहाए लट्ठा समाणा हट्ठ तुट्ठा जाब सहावति यथाक्रम से ग्रामानुग्राम सुखपूर्वक विचरते तुगिया नगरी के पुष्पवती उद्यान में आये. वहां आकर यथा-ore योग्य अवग्रह याचकर संयम व तप से आत्मा को भावते हुवं विचरते थे ॥ १३ ॥ तय सिंघाडे के आका. वाले रस्ते में, तीन रस्ता मिले वैसे स्थान में, चौक, बहुत रस्ते पीले वैसे स्थान ६ राजमार्ग में उन स्थविर भगवन्त के दर्शन केलिये एक ही दिशा में बहुत लोक जा रहे थे ॥ १४ ॥ तब वे श्रमणोपासक ऐसा दूसरा शतक का पांचवा उद्देशा 980- भावार्थ शब्दार्थ ३४२ सूत्र पार्श्वनाथ के सतानिये थे० स्थविर भं० भगवन्त जा० जातिवंत जा. यावत् अ० यथाप्रतिरूप उ० अनुज्ञा ओ० लेकर सं० संयम से त०तप से अ० आत्मा को भा० भावने हुवे वि० विचरते हैं य० महाफल दे० देवानुमिय तक नथारूप थे० स्थविर भ० भगवन्त के ना० नाम गो. मोत्र को स. सुनने से किं० क्या अ० अभिगमन वं० वंदन ण. नमस्कार ५० पूछना ५० पूजते जा० यावत् ग० ग्रहण करते २० सदावित्ता एवं वयासी एवं खलु देवाणुप्पिया। पासावच्चेजा थेरा भगवंतो जाति संपण्णा जाव अहापडिरूवं उग्गहं ओगिण्हित्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणा- विहरति. ते महाफलं खलु देवाणुप्पिया तहारूवाणं थेराणं भगवंताणं नामगोयरस विसवणयाए किमंगपुण अभिगमण बंदण. नमसण पडिपुच्छण पज्जुवास- विधा वार्तालाप सुनकर पहुन आनंदित हुए. और परस्पर ऐमा वोलनेलगे कि अहो देवानुप्रिय! जातिसंपन्न यावत् यथाप्रतिरूप श्री पार्श्वनाथ स्वामी के शिष्यानुशिष्य श्री स्थविर भगवन्त पुष्पावती उद्यान में आज्ञा मांगकर संयम व तपसे आत्माको भावते हुवे विचर रहे हैं. ऐसे तथारूप स्थविर भगवन्त का नाम गोत्र सुनने से ही महा फल होता है तो फीर अभिगमन, वंदन, नमस्कार, प्रतिपृच्छा, पर्युपासना यावत् अर्थादिक का ग्रहण करने का तो कहना ही क्या? इसलिये अहो देवानुप्रिय! अपन वहां जावे और स्थविर भगवन्तको वंदना नम- स्कार यावत् पर्युपासना करे. यही इस भव व परभव में अनुगामीक होगा. ऐसा परस्पर वार्तालाप 4. अनुवादक..ालयाचारी. मुनि श्री अमोलक पीजी A * प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालाप्रसादजी * शब्दाथ to पंचङ्ग हिवतपण्णात्ति ( भगवती) सूत्र 88~-80 सूत्र उनकी पास ग० जावे दे. देवानुप्रिय थे० स्थविर भ० भगवन्त को 40 वंदनकरे f० नमस्कारकरे जा०३ यावत् ए० पूजे इ० यह भव में प० परभव में जा. यावत् आ० आनुगामिक भ० होगा ति० ऐमाoyo करके अ• अन्योन्यको अं०पास ए या अर्थ प. सूनकर जे. जहां स० अपने गे• गृह ते. तहां उ० आकर हा स्नानकीया क०पीठी लगायी ककोगले किये पा तिलक कीया मु शुद्ध पी०प्रवेश करनेयोग्य म मांगलीक व वस्त्र पं० पहिनकर अअल्प म०मूल्यवंत आ० आभरण अ० पहिनकर स०अपने गे गृह से णयाए जाव गहणयाए तं गच्छामोणं देवाणुप्पिया थेरे भगवंते बंदामो णमं सामो जाव पञ्जुवासामो । एयण्णे इहभवे परभवे जाव आणुगामियत्ताए भविस्सइ तिकटु ॥ अण्णमण्णस्स अतिए एयमटुं पडिमुणति पडिसुणित्ता जेणव सयाई गेहाइं तेणेव उवागच्छंति उवागच्छइत्ता प्रहाया कयचलिकम्मा कयको उयमंगल पायाच्छित्ता सुद्धप्पावेसाई मंगलाई वत्थाई पवरपरिहिया अप्पमहग्धाभरणालंकिय सरीरा सुना. सुनकर अपने गृह गये. वहां जाकर स्नान किया, पीठी प्रमुख का विलेपन किया, अंजली भरकर पानी के कोगले किये, तिलक मसादिक किये, और राजसभा में प्रवेश करने योग्य शुद्ध वस्त्र पहिने, फीर अल्प भार व बहुत मूल्यवाले आभरणों से अलंकृत वनकर अपने २ गृह से नीकले, और पांव से चलते हुवे तुंगिया नगरी के मध्य वजार से होकर जहां पुप्पवती नामक उद्यान था वहां आये. < दूसरा शतकका पांचवा उद्देशा भावार्थ GO 0 RAS ३४४ अनुवादक-पालनामचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिनी 82 शब्दार्थ) प० नीकलकर ए. इकठे मि० मिले पा० पांव से चलकर तु. तुंगिया न.० नगरी की म० मध्य से नि: ०७३नीकलकर जे. जहां पु० पुष्पपती चे० उद्यान हो० था ते० तहां उ० आकर थे० स्थविर भ. भगवन्त को पं० पाँच प्रकार के अ० अभिगम से अ० जाते हैं त• यह ज. जैसे स० सचित्त द० द्रव्य वि० इत्यनकर अ० अचित द० द्रव्य अ० रखकर ए. एक पटका उ० उत्तरासन क० करके च० चक्षुदर्शन से सून सहि सरहिं गेहेहितो पडिनिक्खमंति पडिनिक्खमइत्ता एगयओ मेलायंति, पायविहार- चारेणं तुंगियाए नयरीए मझमझेणं निग्गच्छंति निग्गच्छइत्ता, जेणेव पुप्फवईए नाम चेइए होत्था तेणेव उवागच्छति, उवागच्छइत्ता थेरे भगवंते पंचविहेणं अभि- गमेणं अभिगच्छंति तंजहा सचित्ताणं दवाणं विउसरणयाए, अचित्ताणं दबाणं अविउसरणयाए, एगसाडिएणं उत्तरासंगकरणेणं, चक्खुप्फासे अंजलिपगहेणं, गर्थ स्थविर भगवंत की समीप आने ही?. तांबूलादि सचित्त द्रव्य को अलग करना, २ वखादि अचित्त द्रव्य को अलग नहीं करना,३ बीच में नहीं सीला हुवा ऐसा एक वस्त्र का उत्तरासन करना ४ चक्षु दृष्टि में आते ही दोनों हस्त की अंजली करना, और ५. अन्य सब छोडकर मन से माधु स्थविर भगवन्त की तरफ एकत्रता करना ऐसे पांच अभिगम किया. फोर उन स्थविर भगवन्त को तीन आदान प्रदक्षिणा करके तीन प्रकारसे * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्यालामसादजी * 90. पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 800 ब्दार्थ अं०अंजलिप जोडकर ममन से ए० स्थिर करके जे. जहांथे० स्थविर भ भगवन्त ते तहां उ० आकर ति० तीनवार अ आदान प०प्रदक्षिणा क० करे जायावत् ति त्रिविध प० सेवना से पसेवे ॥१५॥त तवते वे थे० स्थविर भ० भगवन्त स० श्रमणोपासक को ती० उस म० वडी प० परिपदा में चा० चार या०याम ध०धर्म कहे ज० जैसे के. केशीस्वामी जा० यावत् स० श्रावकपना आ० आज्ञा आ० आराहित भ० होवे जा० १०० यावत् ५० धर्म क० कहा ॥ १६॥ त तव ते. वे स० श्रमणोपासक थे० स्थविर भ. भगवन्त की सून मणसा एगत्ती करणेणं, जेणेवधेरे भगवंतो तेणेव उवागच्छति, उवागच्छइत्ता तिक्खुत्तो आयाहिण पयाहिणंवा करेंति जाव तिविहाए पज्जुवासणाए पज्जुवासंति ॥ ॥ १५ ॥ तएणं ते थेरा भगवंतो तेसिं समणोवासयाणं तीसेय महंइ महालियाए परिसाए चाउज्जामं धर्म परिकहेंति जहा केसिसामिस्स जाव समणोवासइत्ताए, आणाए आराहए भवइ जाव धम्मो कहिओ ॥ १६ ॥ तएणं ते समणोवासया भावार्थ सेवा भक्ति की ॥ १५ ॥ तव उन स्थविर भगवन्तने श्रावकों को उस महती परिपदा में चार याम वाला धर्म कहा. जैसे रायप्रसेणी सूत्र में केशी अनगारने प्रदेशी राजा को धोरदेश कहा था वैसे याव- त् धर्म की सम्यक् प्रकार से आराधना करनेवाला श्रमणोपासक आराधक होता है वगैरह धर्मोपदेश कहा ॥ १६ ॥ तब उन स्थविर भगवन्त की पात धर्म सुनकर श्रमणोपासक हृष्ट तुष्ट चित्तवाले 983 दुसरा शतक का पांचवा उद्देशा 988 00 शब्दार्थ) ३४४ सत्र 48. अनुवादक-बालब्रह्मचरिमुनि श्री अमोलक ऋपिजी प० नीकलकर एक इकठे मि० मिले पा० पांव से चलकर तु० तुंगिया न० नगरी की म० मध्य से नि० नीकलकर जे. जहां पु० पुष्पवती चे० उद्यान हो० था ते तहां उ० आकर थे० स्थविर भ. भगवन्त को पं० पांच प्रकार के अ० अभिगम से अ० जाते हैं तं. वह ज. जैसे स० सचित्त द० द्रव्य वि० त्यनकर अ० अचित द० द्रव्य अ० रखकर ए• एक पटका उ० उत्तरासन क० करके च० चक्षुदर्शन से सएहि सरहिं गेहेहितो पडिनिक्खमंति पडिनिक्खमइत्ता एगयओ मेलायंति, पायविहार- चारेणं तुंगियाए नयरीए मझमझेणं निग्गच्छंति निग्गच्छइत्ता, जेणेव पुप्फबईए नामं चेइए होत्था तेणेव उवागच्छंति, उवागच्छइत्ता थेरे भगवंते पंचविहेणं अभि- गमेणं अभिगच्छंति तंजहा सचित्ताणं दवाणं विउसरणयाए, अचित्ताणं दवाणं अविउसरणयाए, एगसाडिएणं उत्तरासंगकरणेणं, चक्खुप्फासे अंजलिपगहेणं,. स्थविर भगवंत की समीप आते ही? तांबूलादि सचित्त द्रव्य को अलग करना, २ वस्त्रादि अचित्त द्रव्य को अलग नहीं करना,३ वीच में नहीं सीला हुवा ऐसा एक वस्त्र का उत्तरासन करना ४ चक्षु दृष्टि में आते ही दोनों हस्त की अंजली करना, और अन्य सब छोडकर मन से माधु स्थविर भगवन्त की तरफ एकत्रता करना ऐसे पांच अभिगम किया. फोर उन स्थविर भगवन्त को तीन आदान प्रदक्षिणा करके तीन प्रकारसे * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी भावार्थ 60 सू - पंचमंग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र -387 ब्दार्थ अं अंजलि १० जोडकर म मन से ए. स्थिर करके जे० जहांथे० स्थविर भ. भगवन्त ते तहां उ० आकर ति० तीनवार अ आदान प०प्रदक्षिणा क० करे जायावत् ति निविधप० सेवना से पसेवे ॥१५॥ ततवते वे थे० स्थविर भ० भगवन्त स० श्रमणोपासक को ती० उस म० वडी प.परिपदा में चा० चार या०याम ध०धर्म कहे ज० जैसे के० केशीस्वामी जा० यावत् स० श्रावकपना आ० आज्ञा आ० आराहित भ० हो जा०६० यावत् ध० धर्म क० कहा ॥ १६ ॥ त तव ते. वे स० श्रमणोपामक थे० स्थविर भ. भगवन्त की मणसा एगत्ती करणेणं, जेणेवधेरे भगवंतो तेणेव उवागच्छति, उवागच्छइत्ता तिक्खुत्तो आयाहिण पयाहिणंवा करेंति जाव तिविहाए पज्जुवासणाए पज्जुवासंति ॥ ॥ १५ ॥ तएणं ते थेरा भगवंतो तेसिं समणोवासयाणं तीसेय महइ महालियाए परिसाए चाउज्जामं धम्म परिकहति जहा केसिसामिस्स जाव समणोवासइत्ताए, आणाए आराहए भवइ जाव धम्मो कहिओ ॥ १६ ॥ तएणं ते समणोवासया भावार्थ सेवा भक्ति की ॥ १५ ॥ तब उन स्थविर भगवन्तने श्रावकों को उस महती परिपदा में चार यामse वाला धर्म कहा. जैसे रायप्रसेणी सूत्र में केशी अनगारने मदेशी राजा को धनादेश कहा था वैसे याव- त् धर्म की सम्यक् प्रकार से आराधना करनेवाला श्रमणोपामक आराधक होता है वगैरह धर्मोपदेश कहा ॥ १६ ॥ तब उन स्थविर भगवन्त की पास धर्म सुनकर श्रमणोपासक हृष्ट तुष्ट चित्तवाले 98. दुसग शतक का पांचवा उद्देशा 9803 शब्दाथ • पास ध धर्मः सो सुनकर नि० अवधारकर ह० हृष्ट तु० तुष्ट जा. यावत् हि. आनंदपामे ति. नीनवार आ० आदान प० प्रदक्षिणा क करके ए० ऐमा व० बोले संसंयम से भं• भगवन् कि० क्या फल त० तप से भं० भगवन् किं. क्याफल त० तव थे० स्थविर भ० भगवन्त ते. उन स० श्रमणो पासक को एक ऐसा वबोले सं० संयम से अ० आर्य अ• अनावफल त० तप से वो कर्म छेदना सुन 4 अनुवादक बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमालक ऋपिजी'85 थेराणं भगवंताणं अतिए धम्मं सोचा निसम्म हट्ट तुट्ठ जाब हियया,तिक्खुतो आया- हिणपयाहिणं करेंति करेइत्ता एवं वयासीसंजमेणंभंते किं फले तवेणंभंते किं फलेतएणं थेरा भगवंतो ते समणोवासए एवं वायसी संजमेणं अजो अणण्हयफले,तवे वोदाणफलातएणं * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ हुचे और स्थविर भगवंत को तीन आदान प्रदक्षिणा करके ऐसा बोले कि. अहो भगवन् ! तप व संयम का क्या फल ! तव श्रमणोपासक को स्थविर भगवंत ऐना करने लगे कि संयम से मश्रा का निरंधन होना है अर्थात् संयम पालने वाले को नविन कर्म का आगमन नर्दी होता है. वैसे ही पूर्व- कृन कर्मों को छेदन करना यह नपका फल है. तब श्रमणोपासक वोले कि अहो भगवन् ! यदि संयम का आश्रय निराध रूप व तपका कर्मक्षयरूप फल है तो संयम. व तपके आराधन करने वाले किस कारन से देव होते हैं ? तब उन स्थविर भगवंत की पास रहने वाले स्थविरों ने इस प्रश्न का उत्तर * शब्दार्थ OS ३४७ सत्र 3888 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8888 का फल त तव ते वे स० श्रमणोपासक थे० स्थविर भ० भगवन्त को एक ऐसा न० बोले ज० यदि भं० भगवन् सं० संयम से अ० अनाश्रवफल त० तप से वो० कर्म छेदना फल कि० क्या ५० प्रत्येक अ० आर्य दे देव दे० देवलोक उ० उत्पन्न होवे त० तहां का० कालिक पुत्र अ. अनगार थे० स्थविर ते उन स. श्रमणोपासक को एक ऐसा व वोले पु० पूर्व तप से अ० आर्य दे० देव दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे त० तहां म० महिल थे० स्थविर स० श्रमणोपासक को एक ऐसा व० बोले पु० पूर्व ते समणोवासया थेरे भगवंते एवं वयासो जइणं भंते! संजमे अणण्हयफले तवे वो- दाणफले किंपत्तियं भते देवा देवलोएसु उवबजति ? तत्थणं कालिय पुत्तेनाम अनगारे थेरे समणोवासए एवं वयासी पुवंतवेणं अज्जो देवा देवलोएसु उववज्जति ॥ तत्थणं महिलेनाम थेरे ते समणोवासए एवं वयासी पुव्वसंजमेणं अजो देवा देव- लोएसु उववज्जति ॥ तत्थणं आणंदरक्खिए नाम थेरे ते समणोशसएं एवं क्यासी अलग २ दिया. उन में से कालिक पुत्र नामक अनगारने कहा कि अहो श्रमणोपासको ! * पूर्व तप से देवता में देवपने उत्पन्न होते हैं २ मेहल नामक स्थविर बोले की पूर्व संयम-सराग संयम से * यहां पूर्व शब्द वीतराग अवस्था की अपेक्षा से लिया है. अर्थात् पूर्व तप सो सरागभाव से तप करना. क्यों कि वीतराग अवस्था से सराग अवस्था पूर्व होती है इससे उसमें कराया हुवा तप सो पूर्वतप.. 989- दुसरा शतकका पांचवा उद्देशा SB>< भावार्थ ३४८ 4. अनुवादक-बालपनगरी मुनि श्री अमालक ऋपिजी शब्दार्थ 4 संयम से आ० आनंद रक्षित थे० स्थविर २० बोले ककर्म से का० काप्यप थे स्थविर कवोले सं० संगत से दे देवलोक में उ० उपजते हैं पु० पूर्वतप से पु० पूर्वसंयम से क० कर्म से सं० संगत से अ० आर्य दे देव दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे स० सत्य ए. यह अर्थ आ० आत्मभाव व वक्तव्यता तक तय स० श्रमणोपासक थे० स्थविर भ० भगवन्त से ए. ऐसा चा० प्रश्नोत्तर वा० कहते ह. हृष्ट सूत्र कम्मियाए अजो ! देवा देवलोएसु उववजंति ॥ तत्थणं कासवे नाम थेरे एवं वयासी संगियाए अजो ! देवा देवलोएसु उववजंति ॥ पुन्व तवेणं, पुव्वसंजमेणं, कम्मियाए, संगियाए, अज्जो ! देवा देवलोएसु उववज्जति. सच्चेणं एसअटे नो चेवणं आयभाव वत्तव्ययाए ॥ तएणं ते समणोवासया थेरेहिं भगवंतेहिं इमाइं एयारूवाई भावार्थ देवलोक में देवताओ होते हैं. ३ आदरक्षित नामक स्थविर बोले कि कर्म के विकार से देवलोक में उत्पन्न होते हैं क्योंकि समस्त कर्म का क्षय नहीं किा है परंतु थोडे बहुत दोष रहेहुवे हैं. काश्यप नामक स्थविर बोले कि संगति से देवलोक में देव होते हैं अर्थात् मनुष्यादि की संगति से मराग भाव रहने से या द्रव्यादि में सराग भाव रहने से तप संयम के आराधक देवलोक में देवता होते इस तरह पूर्व तप, पूर्व संयम, कर्म विकार व संगति से देवलोक में संयम व तप करनेवाले देव हैं ऐमा जो कहा है वह सन्य है. हमने हमारा अहंभाव में नहीं कहा है. तब स्थविर, * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवंसहायजी ज्वालाप्रसादजी जीव उदाय 904 सूत्र 9823 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 8389 तु० तुष्ट ६८ स्थविर भं० भगान्त को २० वंदनाकर ण. नमस्कार कर प० प्रश्न पुः पूछे अ० अर्थ है उ० ग्रहण करे उ० स्थान से उ० उठकर थे० स्थविर भ. भगवन्त को ति०तीन वार जायावत् वं० वंदना कर न० नमस्कार कर थे० स्थविर भ० भगवन्त की अं० पास से पु० पुप्पवती चे० उद्यान से प० नीकलकर जा. जिसदिशि से पा० आये ता. उसदिशा में प० पीछे गये ॥ १६ ॥ ततव तेचे थे० स्थविर भ. भगवन्त अ० कोइ वक्त तुं० तुंगीआ न० नगरी के पु० पुप्पवती चे० उद्यान से प० नीकलकर प. वागरणाई वागरिया समाणा हट्ठट्ठा थेरे भगवंते बंदति णमंसति वंदइत्ता नमंसइत्ता पसिणाई पुच्छंति अट्ठाई उवाहियंति, उट्ठाए उट्टेति थेरे भगवंते तिक्खुत्तो जाव वंदति णमसंति वंदित्ता नमसइत्ता थेराणं भगवंताणं अंतियाओ पुप्फवईयाओ चेइयाओ पडिनिक्खमंति पडिनिक्खमइत्ता जामेवदिसं पाउन्भया तामेवदिसं पडिगया ॥१६॥ तएणं ते थेरा भगवंतो अण्णयाकयाइं तुंगियाओ नयरीओ पुप्फवईयाओ भगवन्त से पूछेहुचे प्रश्नोंका उत्तर सुनकर हृष्ट, तुष्ट हुवे और स्थविर भगवंत को अन्य भी प्रश्न पूछे, उन के अर्थ की धारणा की. फीर उठकर तिन चार आदान प्रदाक्षणा करके पुष्पवती उद्यान में से नाकलकर जिसदिशा में से आये थे उसी दिशा में अपने २ स्थान पछि गये. ॥ १६॥ स्थविर भग-ई 388 दूसरा शतक का पांचवा उद्देशा भावार्थ
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३५१ 38% पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 28 ब्दार्थ पारणा में प० प्रथम पो० पोरसी में मास्वाध्याय क करे वी० दुसरी पो पोरसी में झा० ध्यान करे त. तीसरी पो० पोरसी में अ० धीमे स अ. अचपल अ० अतंभ्रांत मु. मुखवस्त्रिका प० देखकर भा० भाजन व वस्त्र प० देखकर भा०भाजन को प० पुंजकर भा० भाजन उ० ग्रहणकर जे० जहां स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर ते. तहां उ० आकर स० श्रमण भ० भगवन्त को वं० वंदनकर ण. नमस्कार कर व० वोले इ० इच्छता हूं भं भगवन् तु तुमारी आ० आज्ञा होवेतो छ० छठ भक्त पा पारणा में रा० सूत्र क्खमणपारणयसि पढमाए पोरिसीए सज्झायं करेइ, बीयाए पोरिसीए झाणं झियाए, तइयाए पोरिसीए अतरिय मचवलमसंभंते, मुहपोत्तियं पडिलेहेइ पडिलेहेइत्ता, भायणाई वत्वाइं पडिलेहेइ पडिलेहइत्ता भायणाई पमजइ पमजइत्ता, भायणाइं उग्गाहेइ उग्गाहे- इत्ताजेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ,उनागच्छइत्ता समणं भगवं महावीरं वं- दइणमसइ वंदइ ताणमंसइत्ता एवं वयासी इच्छामिणं भंते !तुझेहिं अब्भणुण्णाए समाणे भावार्थे पारणे के दिन प्रथम प्रहर में भगवन्त गौतमने स्वाध्याय की, दूसरे प्रहर में ध्यान किया और तीसरे पहर में धैर्यता सहित व चपलता रहित मुख पत्रिका का प्रतिलेखन किया, भाजन नत्रकी पतिलेखना की फीर भाजन को गोच्छेसे पुंजकर ग्रहण किये और श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी की पास आये. महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार कर ऐसा बोले अहो भगवन् ! आपकी आज्ञा होवे तो इक्ष्वादि ३. दुसरा शतक का पांचवा उद्देशा 988- 60 43 अनुवादक बालनमचारी मुनि श्री अमोलक अपिनी 85 शब्दार्थ वाहिर ज० अन्यदेश में व विचरने लगे ॥ १५ ॥ ते. उस काल ते. उससमय में रा० राजगृह न० नगर ना० यावत् प० परिपदा ५० पीछीगइ ते उसकाल ते. उसममय में स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर का जे. ज्येष्ट अं० अंतेवासी ई० इन्द्रभूति अ० अनगार जा० यावत् सं० संक्षिप्त वि० विपुल ते तेजोलेल्या छ० छठ छठ मे अ. अंतर रहित त तपकर्म से सं संयम से त० तप से अ० आत्मा को भा० भावतेहुवे वि० विचरते थे ॥ १८ ॥ त तब भा भगवान् गो. गौतम छ छठ भक्त का पा० नेइयाओ पडिनिग्गच्छंति पडिनिग्गच्छइत्ता बहिया जणवय विहारं विहरंति सूत्र ॥ १७ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नामं नयरे जाव परिसा पडिगया ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भगवओ महावीरस्स जेटे अंतेवासी इंदभूइणाम अणगारे जाव संखित्तविउलतेउलेस्स छठें छट्टेणं. आनिक्खित्तेणं तवो कम्मेणं संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणे विहरइ ॥ १८ ॥ तएणं से भगवं गोयमे छ8- बन्न भी तुंगिया नगरी के पुष्पवती उद्यान में से नीकलकर अन्य दशमें विहार करने लगे ॥ १७ ॥ उस काल उस समय में राजगृह नामक नगर था.. वहां श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी आये. परिपदा को भगवन्त ने धर्मोपदेश कहा. धर्मोपदेश सुनकर परिपदा पीछी.गई. उस काल उम समय में श्री महावीर स्वामी के ज्येष्ट अंतेवासी विपुल तेजोलेश्याको संक्षिप्त करने वाले इन्द्रभूति नामक अनगार निरंतर छठ उठ (वेले बले)का नप करने संयम व तप में मग्न होत विवरते थे ॥ १८॥ उस समय में छठ के * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी पार्थ 60 .५ सूत्र 982 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 8-83> शब्दार्थ जाकर रा० राजगृह न० नगर में उ० ऊंच नी नीच म०मध्यम कु०कुल के घ० गृह स० समुदानकी भि० भिक्षा के लिये अ० विचरते हैं ॥२०॥ त तब भ भगवान् गो गौतम राराजगृह नानगर में जा०यावत् अ० विचरते २० बहुत ज० मनुष्यों के स० शब्द नि सुने एक ऐसे ग्व० निश्चय दे। देवानुश्यि तुं० तुगिया न० नगरी की व वाहिर पु० पुप्पवती चे० उद्यान में पा० पार्श्वनाथ के संतानिये थे. स्थविर भ० भगवन्त स० श्रमणोपामक इ० इसरूप से वा प्रश्न पु० पूछे सं० संयन से भ० भगवन् कि क्या रायगिहे नयरे तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छइत्ता, रायगिहे नयरे उच्चनीयमज्झिमाई कुलाई परघरसमदाणस्स भिक्खायरियं अडइ ॥ २० ॥ तएणं से भगवं गोयमे रायागहे नयरे जाव अडमाणे बहुजणसई निसामेइ एवं खलु देवाणप्पिया ! तुंगि- याए नयरीए बहिया पुष्पवईयाए चेइयाए पासायच्चिजा थेरा भगवंतो समणोवास- एहिं इमाई एयारूवाई वागरणाइं पुच्छिया संजमेणं भंते ! किं फले, तवे किं फले ? भावार्थ नगरी में गये. और यहां ऊंच नीच व मध्यम कुल के घरों में भिक्षाचरी की ॥ २० ॥ उस समय में 30 राजगृह नगर में गोवरी करते भगवन्त गौतम स्वामीने बहुत मनुष्यों से ऐसा सुना कि तुंगिया नगरी के बाहिर पुप्पवती नामक उद्यान में श्री पार्श्वनाथ भगवन्त के शिप्यानुशिष्य स्थविर भगवन्त को श्रमणो- पासक (श्रावकों) ने ऐसा प्रश्न पूछा कि संयम का क्या फल व तप का क्या फल ? तब स्थविर भग-10 980 दुसरा शतक का पांचवा उद्देशा 9888 ७७ ९ शब्दार्थ सूत्र अनुनादक-मानवमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी राजगृहग नगरमें उ० ऊंच नी नीच म०मध्यम कुरुकुल के घ• गृहों को भि० भिक्षा के लिये अ० विचरने को अ० यशमुखं दे० देवानुपिय मा० मत प० प्रतिबंध ॥ १९ ॥ त० तक भ० भगवान् गो० गौतम स. श्रमण भ० भावन्त म० महार से अ. आज्ञामिलते स. श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर की अं० पास से गु० गुगशील चे० उद्यान से प० नीकलकर अ० धीमे से अ० अचपल अ० असंभ्रांत जु० धूमरा प्रमाण प. प्रलोचना दि० दृष्टि से पु० आगे रि० जाते सो० शोधते जे. जहां रा ० राजा न. नगर ते. तहां उ. छट्टक्खमण पारणथंसि रायगिहे नयरे उच्चनीयमज्झिमाई कुलाई, घरसमुदाणस्स भिक्खायरियाए अडित्तए. अहामुहं देवाणुप्पिया मापडिबंधं ॥ १९ ॥ तएणं भगवं गोयमे समणेणं भगवया महावीरेणं अभंणुण्णाए समाणे समणस्स. भगवओ महावीरस्स अंतियाओ गुणासलाओ चेइयाओ पडिनिक्खमइ, पडिनिक्खमइत्ता अतुरिय मचवलमसंभंते जुगमंतर पलोयणाए दिट्ठीए पुरओरियं सोहेमाणे २ जेणेव उंच, वैश्यादि.मध्यम व क्षुद्रा नीच कुल के गृहों में से छठ का पारणाके लिये भिक्षा लाने को मैं इच्छता हूँ. अहो देवानुप्रिय ! जैसे को तुम सुख हो। चैता करो लिम्प मत करो ॥ ११ ॥ इस तरह भगान्त की आज्ञा मीलनेस गौतम स्वामी भगवन्त श्री महावीर स्वामी की पाममे गुगशील नामक उद्यान में मे नीकलार शीघता व मंदता रहिस असंभ्रान्त बने हुवे गुग प्रमाण आगे जमीन को दृष्टि से देखने राजगृही * प्रकाशक राजाह दुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * 1/ वार्थ 573 शब्दार्थ सूत्र 48 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8982 कथा का ल० प्राप्त होते अर्थ जा० श्रद्धा उत्पन्न हुइ जा० यावत् स० उत्पन्न हुवा को० कुतुहल अ० यथा पर्याप्त स० भिक्षा गिग्रहणकर राराजगृह ननगरसे प०नीकलकर अशीघ्रतारहित से जा० यावत् सो० शोधते जे० जहां गु० गुणशील चे उद्यान जे० जहां स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर ते. तहां जाव समुप्पन्न कोउहल्ले अहापज्जत्तं समुदाणं गिण्हइ गिण्हइत्ता रायागहाओ नय- राओ पडिनिक्खमइ अतुरिय जाव सोहेमाणे जेणेव गुणासिलए चेदए जेणेव समणे भगवं महावीरे तेणेव उवागच्छइ २ ता समणस्स भगवओ महावीरस्स अदूरसामंते गमणागमणाए पडिक्कमइ एसण मणेसणं आलोएइ, भत्तपाणं पडिदंसेइ २ त्ता समणं भगवं महावीरं जाव एवं बयासी एव खलु भंते ! अहं तुब्भेहिं अन्भणुण्णाए समाणे रायगिहे नयरे उच्चनीय मझिगाणि कुलाणि घरसमुदाणस्स भिक्खायरियाए अडमाणे भावार्थ होने पर यथापर्याप्त [चाहिये उतना ) आहार ग्रहण करके शीघ्रता व मंदता रहित युगप्रमाण आग भूमि देखने राजगृह नगर की वाहिर गुणशील नामक उद्यान में श्रमण भगवन्त महावीर की पास आये. वहां आकर महावीर स्वामी की पास गमन, आगमन में जो कोई जीव की विराधना हुई हो ४७ उसकी निवृत्यर्थ कायोत्सा करके जो आहार लाये थे उस के शुद्धाशुद्ध ऐसे दोनों को विचार कर भक्त पान बतलाया. वतलाकर श्री श्रमण भगवन्त महावीर को ऐसा कहा अहो भगवन् ! आपकी 982-83 दूसरा शतक का पांचचा उद्देशा 8. ५ शब्दाथ सून * अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी फ० फल त तप से कि० क्या फल त० तव ते वे थे० स्थविर भ. भगवन्त स० श्रमणोपासक को ए. ऐसा प० वोले सं संयम से अ० आर्य अ० अनावफल त० तप से वो० कर्म छेदन फल तं० तैसे जा. यावत् पु० पूर्वतप से पु० पूर्व संयम से क० कर्म से सं० संग से अ० आर्य दे० देव दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे स० सत्य ए. यह अर्थ णो० नहीं आ० आत्मभाव ५० वक्तव्यता से वह क० कैसे ए. यह म० मानाजाये ए० ऐसे ॥ २१ ॥ त० तव भ० भगवान् गो० गौतम इ० इस क. तएणं ते थेरा भगवंतो समणोवासए एवं वयासी संजमेणं अज्जो अणण्हय फले, तवे बोदाणफले, तं चेव जाब पुव्वतवेणं; पुब्बसंजमेणं, काम्मयाए, संगियाए अजो! देवां देवलोएसु उववजति सच्चेणं एसमटे णो चेवणं आयभाववत्तव्वयाए.. से कहमेयं मन्ने एवं ? ॥ २१ ॥ तएणं भगवं गोयमे इमीसे कहाए लट्ठसमाणे जायसवे वन्तने उत्तर दिया कि संयम का आश्रय निराध व तप का पूर्व कृतकों के क्षय का फल है. जब ऐसा है तो तपस्वी व संयमी देव क्यों होते हैं ! पूर्व सो सराग तप से, पूर्व संयम से, कर्म विकार से व संगति से है देवलोक में देव होते हैं यह सत्य है. यह अहंभावबुद्धि से नहीं कहते हैं परंतु परमार्थ से कहते हैं. ऐसा स्थविर का वचन कैसे माननीय होवे ? ॥ २१ ॥ इस तरह नगर में वार्ता सुनकर श्रद्धा व कौतुक उत्पन्न प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * वार्थ ० ३५७ Re पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्त (भगवती) सूत्र 88 दाय विचरता व बहुत म० मनुष्यों का सा शब्द नि० सुने दे० देवानुप्रिय तुं तुगिया न० नगरी की य. वाहिर पुः पुप्पवती चे० उद्यान में पा० पार्श्वनाथ के संतानिये थे० स्थविर भ. भगवन्त स० श्रमणो- पासक ए. ऐसे वा० प्रश्न पु० पूछे सं० संयम से कि क्या फ० फल त तप से किं. क्या फ० फल तं तैसे जा. यावत् स० सत्य ए. यह अर्थ णो नहीं आ० आत्मभाव व. वक्तव्यता ५० तेसिं समणोवासयाणं इमाइं एयारूवाइं वागरणाई वागरेत्तए उदाहु असमिया? आउजि- सत्र याणं भंते! ते थेरा भगवंतो तेति समणोवासयाणं इमाई एयारूवाई वागरणाई वागरित्तए उदाहु अणाउजिया?पलिउजियाणं भंते ! ते थेरा भगवंतो तसि समणोवासयाणं इमाई एयारूवाई वागरणाई वागरेत्तए उदाहु अपलिउजिया ? पुब्बतवेणं अनो! देवा देवलोएसु उववनंति, पुव्वसंजमेणं, कम्मियाए, संगियाए अज्जो ! देवा देवलोएसु उपवनति. भावार्थ भगवन् ! उन श्रावकोंने पूछे हुवे प्रश्नों का शास्त्र विधि से उत्तर देने को क्या वे समर्थ हैं या असमर्थ हैं ? अथवा ने स्थविर भगान्त उन श्रावकों के प्रश्नों का उत्तर देने में सम्यक् प्रकार से अभ्यासवाले हैं। या अभ्यासवाले नहीं है ? अथवा उन श्रावकों के प्रश्नों कहने को वे स्थविर भगवन्त क्या ज्ञानवन्त हैं या ज्ञानवन्त नहीं है? अथवा उन के प्रश्नों के उत्तर देने में ये स्थविर भगवन्त क्या परिज्ञानवाले हैं या परिज्ञान- दुसरा शनाका पांचवा उद्देशा शब्दार्थ ५ सूत्र का अनुवादक-गालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी. उ. आकर म० श्रमण ५० भगवन्त म० महावीर की अनजदीक ग• गमनागमनका प० प्रतिक्रमणकर ए. शुद्धाशुद्ध आ० आलोचकर भ० भक्त पानी प० देखाडकर म० श्रमण भ. भगवन्त म० महावीर को जा. यावत् ए. ऐसा व० वोले ए०. ऐसे भं० भगवन् अ० मैं तु. तुमारी अ० आज्ञा मिलते रा: राग गृह न० नगर मे उ ऊंच नी० नीच म० मध्यम कुल के घ० गृह समुदाय में भि० भिक्षा कोलिये अ० बहुजणसई निसामेइ एवं खलु देवाणुप्पिया तुंगियाए नयरीए बहिया पुप्फबईए चेइए पासावचिजा थेरा भगवंतो समणोवासएहिं इमाई एयारूबाई वागरणाइं पुच्छिया, संजमेणं भंते ! किं फले ? तवे किं फले? तंचेव जाव सच्चेणं एसमटे णो चेवणं आय भाववत्तन्वयाए ॥ तं पभूणं भंते ! ते थे। भगवंतो तेसिं समणोवासयाणं इमाई एयारूवाई वागरणाई वागरेत्तए उदाहु अप्पभू ? समियाणं भंते ! ते थेरा भगवंतो भाता से राजगृह नगर में ऊंच नीच य. मध्यम कुल में भिक्षा ग्रहण करने के लिये परिधपण करते बहुत मनुष्यों से मैंने ऐमा सुना कि तुंगिया नगरी की वाहिर पुष्पवती उद्यान में श्री पार्श्वनाथ स्वामी के स्थविर भगवन्त को श्रमणोपासकोंने ऐमा प्रश्न पूछा कि संयम से क्या फल, तप से क्या फल ? वे · स्थविर भगवन्तने संयम का आश्रय निरोध व तप का पूर्व कृतकर्म क्षय का फल कहा यावत् संगति से देवलोकमें देवतापने उत्पन्न होते हैं यह सत्य है, और उसे हम हमारी बुद्धि से नहीं कहते हैं ऐसा कहा. तो अहो * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी भावार्थ भू० ३५७ 28 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्त (भगवती) सूत्र 880- विचरता ब० बहुत म० मनुष्यों का स शब्द नि० सुने दे० देवानुप्रिय तु तुगिया न० नगरी की य. वाहिर पुः पुष्पवती चे० उद्यान में पा० पार्श्वनाथ के संतानिये थे० स्थविर भ० भगवन्त स. श्रमणो- पासक ए. ऐसे वा० प्रश्न पु० पूछे सं० संयम से किं. क्या फ० फल त तप से कि० क्या फ० फल तं तैसे जा. यावत् स० सत्य ए. यह अर्थ णो नहीं आ० आत्मभाव व. वक्तव्यता ५० तेसिं समणोवासयाणं इमाई एयारूवाइं वागरणाई वागरेत्तए उदाहु असमिया? आउजि- याणं भंते ! ते थेरा भगवंतो तेति समणोवासयाणं इमाई एयारूवाई वागरणाई वागरित्तए उदाहु अणाउजिया?पलिउजियाणं भंते ! तेथेरा भगवंतो तसि समणोवासयाणं इमाई एयारूवाइं वागरणाइं वागरेत्तए उदाहु अपलिउजिया? पुव्वतवेणं अनो! देवा देवलोएसु उववनंति, पुन्वसंजमेणं, कम्मियाए, संगियाए अजो ! देवा देवलोएसु उपवज्जति. भगवन् ! उन आवकोंने पूछे हुवे प्रश्नों का शास्त्र विधि से उत्तर देने को क्या वे समर्थ हैं या असमर्थ हैं ? अथवा चे स्थविर भगान्त उन श्रावकों के प्रश्नों का उत्तर देने में सम्यक् प्रकार से अभ्यासवाले हैं। या अभ्यासवाले नहीं है ? अथवा उन श्रावकों के प्रश्नों कहने को ये स्थविर भगवन्त क्या ज्ञानवन्त ज्ञानवन्त नहीं हैं! अथवा उन के प्रश्नों के उत्तर देने में वे स्थविर भगवन्त क्या परिज्ञानवाले हैं या परिज्ञान- 888 दसरा शनकका पांचवा उद्देशा 8/> </a> भावाथ हैं या शब्दार्थ ३८ सूत्र अनुवादक गालयामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी. उ. आकर म० श्रमण ५० भगवन्त म० महावीर की अनजदीक ग• गमनागमनका प० प्रतिक्रमणकर ए: शुद्धाशुद्ध आ० आलोचकर भ० भक्त पानी प० देखाडकर म० श्रमण भ• भगवन्त म० महावीर को मा० यावत् ए. ऐसा २० वोले ए०. ऐसे भं० भगवन अ० मैं तु. तुमारी अ० आज्ञा मिलते रा. राग गृह न० नगर मे उ ऊंच नी नीच म० मध्यम कुल के घ० गृह समुदाय में भि• भिक्षा कलिये अ० बहुजणसई निसानेइ एवं खलु देवाणुप्पिया तुंगियाए नयरीए बहिया पुप्फबईए चेइए पासावचिन्जा थेरा भगवंतो समणोवासएहि इमाइं एयारूवाई वागरणाई पुच्छिया, संजमेणं भंते ! किं फले ? तवे किं फले? तंचेव जाव सच्चेणं एसमटे णो चेवणं आय भाववत्तव्ययाए ॥ तं पभूणं भंते ! ते थेरा भगवंतो तेसिं समणोवासयाणं इमाई एयारूवाई वागरणाई वागरेत्तए उदाहु अप्पभू ? समियाणं भंते ! ते थेरा भगवंतो भाता से राजगृह नगर में ऊंच नीच व मध्यम कुल में भिक्षा ग्रहण करने के लिये परिधरण करते बहुत मनुप्यों से मैंने ऐमा सुना कि तुंगिया नगरी की वाहिर पुष्पवती उद्यान में श्री पार्श्वनाथ स्वामी के स्थविर भगवन्त को श्रमणोपासकोंने ऐमा प्रश्न पूछा कि संयम से क्या फल, तप से क्या फल ? वे स्थविर भगवन्तने संयम का आश्रव निरोध व तप का पूर्व कृतकर्म क्षय का फल कहा यावत् संगति से देवलोकमें देवनापने उत्पन्न होते हैं यह सत्य है, और उसे हम हमारी बुद्धि से नहीं कहते हैं ऐसा कहा. तो अहो * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी * . भावार्थ शब्दार्थ सन ७ 88.8 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 8%><3 ततपसे अ० असमर्थ ततसे ने जानना अ० अवशेप जाव्यावत् प० समर्थ सः सम्यक अ० अभ्यात वाले जा. यावत् स०सत्य ए. यह अर्थ णो नहीं आ०आत्मभाव व वक्तव्यता ॥ २३ ॥ अमैं गोगौतम ए. ऐसा आ० कहताहूं भा० बोलताहूं प० विशेष कहताई प० प्ररूपताहूं पु० पूर्व तक तप से पु० पूर्व संयम से दे० देव दे० देवलोकमें उ० उत्पन्न होवे क० कर्म मे सं० संगसे दे० देव दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होते हैं स० सत्य ए. यह अर्थ को नहीं आ० आत्मभाव ५० वक्तव्यता ॥ २४ ॥ त० तथारूप सच्चेणं एसमढे, णो चेवणं आयभाव वत्तव्वयाए ॥ २३ ॥ अहंपिणं गोयमा ! एव माइक्खामि, भासेमि, पन्नवेमि, परूवेमि पुव्वतवेणं देवा देवलोएसु उववज्जति, पुव्वसंजमेणं देवा देवलोएसु उश्वजति, काम्मयाए देवा देवलोएसु उववज्जति, संगि- याए देवा देवलोएसु उववज्जति. पुवतवेणं, पुवसंजमेणं काम्मयाए, संगियाए अजो देवा देवलोएसु उववजति. सच्चेणं एसमढे णो चेवणं आयभाव वत्तब्बयाए यह अर्थ सत्य है आत्म कल्पित नहीं है ॥ २४ ॥ यह सुनकर गौतम स्वामी साधु की सेवा से क्या फल होता है ऐसा प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! तयारूप श्रमण की सेवा करने वाले को क्याफल होवे ? अहो गौतम ! तथारूप श्रमण की सेवा करने से शास्त्र श्रवण का फल होके. अहो भगवन् ! शास्त्र श्रवण से क्या फल होवे ? अहो गौतम ! शास्त्र श्रवण से श्रुतज्ञान की प्राप्ति होती है. अहो भगवन् : ज्ञान से 832 दूसरा- शतक का पांचवा उद्देशा REP भावाथ शब्दार्थ ०७ रामथ भ भगवन् ते वे थे० स्थविर भ० भगवन्त ते० उन स० श्रमणोपासक के एक ऐसे चा० प्रश्न वा० कहने को नहीं समर्थ म अभ्यास वाले उ. अथवा अ० अभ्यास रहित आ. ज्ञानवंत अ० ज्ञानरहित १० विज्ञानवंन अ० विज्ञानरहित पु. पूर्वतपसे अ० आर्य दे देव दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होये पुः पूर्व संयम से क० कर्म से सं० संगसे दे देव दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे स० सत्य ए. यह अर्थ पो० नहीं आ० आत्म भाव ५० वक्तव्यता ॥ २२ ॥ प. ममर्थ गो० गौतम ते. वे थे० स्थविर भ० भगवन्त ते उन स० श्रमणोपासक को एक ऐसे वा० प्रश्न को वा. कहने को णो नहीं * भनुवादक-पालनमवारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 सच्चेणं एसमढे णोचवणं आयभाववत्तव्ययाए ॥ २२ ॥ पभणं गोयमा ! ते थेरा भगवंतो तेसिं समणवासयाणं इमाई एयारूवाइं वागरणाइं वागरत्तए को अप्पभू तहचेव नेयवं, अवसेसियं जाव पभू समियं आउजिय पलिउजिय, जाव वाले नहीं हैं ? ॥ २२ ॥ अहो गौतम ! उन श्रावकों के प्रश्नों का उत्तर देने को वे स्थविर . भगवन्त मम, अभ्यासवाले, ज्ञानवन्त-व परिज्ञानवन्त हैं परंतु असमर्थ, अनभ्यासवाले, अज्ञानवन्त व अपरिज्ञानवन्त नहीं हैं ॥ २३ ॥ अहो गोतम ! मैं भी ऐसा कहता हूं यावत् प्ररूपता हूँ कि पूर्व-सराग-तप से देवता देवलोक में उत्तन्न होते है वैसे ही पूर्व संयम, कर्म विकार व संगति से देवता देवलोक में उत्पन्न होते हैं. प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेव सहायनी ज्वालापसादजी.* वार्थ mal सूत्र G 389 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 83 शब्दार्थ ततपसे अ० असमर्थ त तैसे ने जानना अ.अवशेप जायावत् प० समर्थ सः सम्यक् अ० अभ्यात वाले जा. यावत् स ० सत्य ए. यह अर्थ णो नहीं आ आत्मभाव व वक्तव्यता ॥ २३ ॥ अ०मैं गो गौतम ए. ऐसा आ० कहताहूं भा० बोलताहूं प० विशेष कहताई प० प्ररूपताहूं पु० पूर्व तक तप से पु० पूर्व संयम से दे० देव दे० देवलोकमें उ० उत्पन्न होवे क० कर्म मे सं० संगसे दे० देव दे देवलोक में उ० उत्पन्न होते हैं स० सत्य ए. यह अर्थ णो० नहीं आ० आत्मभाव ५० वक्तव्यता ॥ २४ ॥ त० तथारूप सच्चेणं एसमटे, णो चेवणं आयभाव वत्तव्ययाए ॥ २३ ॥ अहंपिणं गोयमा ! एव माइक्खामि, भासेमि, पन्नवेमि, परूवेमि पुवतवेणं देवा देवलोएसु उववज्जति, पुवसंजमेणं देवा देवलोएसु उक्वजति, काम्मयाए देवा देवलोएसु उववनंति, संगि- याए देवा देवलोएसु उववजंति. पुवतवेणं, पुव्वसंजमेणं कामियाए, संगियाए अज्जो देवा देवलोएसु उववजति. सच्चेणं एसमढे णो चेवणं आयभाव वत्तव्वयाए भावाथ यह अर्थ सत्य है आत्म कल्पित नहीं है ॥ २४ ।। यह सुनकर गौतम स्वामी साधु की सेवा से क्या फल 570 होता है ऐसा प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! तथारूप श्रमण की सेवा करने वाले को क्याफल होवे ? अहो गौतम ! तथारूप श्रमण की सेवा करने से शास्त्र श्रवण का फल होवे. अहो भगवन् ! शास्त्र श्रवण से क्या फल होवे ? अहो गौतम ! शास्त्र श्रवण से श्रुतज्ञान की प्राप्ति होती है. अहो भगवन् : ज्ञान से 38-39-3 दूसरा शतक का पांचवा उद्देशाg><ARE शब्दार्थ रामथ भ० भगवन् ते वे थे० स्थविर भ० भगवन्त ते० उन स० श्रमणोपासक के ए. ऐसे वा० प्रश्न वा. कहने को अ० नहीं समर्थ स. अभ्यास वाले उ० अथवा अ० अभ्यास रहित आ. ज्ञानवंत अ० ज्ञानरहित प० विज्ञानवंत अ० विज्ञानरहित पु० पूर्वतपसे अ० आर्य दे देव दे. देवलोक में उ० उत्पन्न होये पुः पूर्व संयम से क० कर्म से सं० संगसे दे. देव दे० देवलोक में उ० उत्पन्न हो स० सत्य एक यह अर्थ णो० नहीं आ० आत्म भाव व० वक्तव्यता ॥ २२ ॥ ५० समर्थ गो० गौतम ते वे थे. स्थविर भ० भगवन्त ते. उन स० श्रमणोपासक को एक ऐसे वा० प्रश्न को वा. कहने को जो -- * अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 सच्चेणं एसमटे णोचवणं आयभाववत्तव्बयाए ॥ २२ ॥ पभृणं गोयमा ! ते थेरा भगवंतो तेसिं समणवासयाणं इमाई एयारूवाई वागरणाई वागरेत्तए णो अप्पभू तहचेव नेयव्वं, अवसेसियं जाव पभू समियं आउज्जिय पलिज्जिय. जाव * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी.* गाथा वाले नहीं हैं ! ॥ २२ ॥ अहो गौतम ! उन श्रावकों के प्रश्नों का उत्तर देने को वे स्थविर भगवन्त ममर्थ, अभ्यासवाले, ज्ञानवन्त व परिज्ञानवन्त हैं परंतु असमर्थ, अनभ्यासवाले, अज्ञानवन्त व अपरिज्ञानवन्त नहीं हैं ॥ २३ ॥ अहो गोतम ! मैं भी ऐसा कहता हूं यावत् प्ररूपता हूं कि पूर्व-सराग-तप से देवता देवलोक में उत्सन्न होते हैं वैसे ही पूर्व संयम, कर्म विकार व संगति से देवता देवलोक में उत्पन्न होते ७ ०७ क 8893 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र र शब्दार्थ वो कर्म छेदनफल घो० कर्म छेदनसे अ० अफ्रिया फल भं० भगवन् अ० अक्रिया से कि० क्याफल मि० सिद्धि पर्यवसान फल प? अरूपा ॥ २५ ॥ अ० अन्यतीर्थिक भं० भगवन् ए. एसे आ० कहते हैं १०१ मरूपते हैं रा० राजगृह न० नगरकी २० बाहिर वे० वेभार प० पर्वत की अ. नीचे ए० तहां म० बडा ए. एकद्रह अ० पानीका अं० अनेक जो० योजन का आ० लम्बा वि० चौडा ना. नानाप्रकार सत्र सिद्धिपजवसाण फला पण्णत्ता गोयमा ! ॥ गाथा ॥ सवणे णाणेय विण्णाणे, पच्च- क्खाणेय संजमे ॥ अणण्हए तवे चेव, वोदाणे अकिरिया सिढी ॥ १ ॥ २५ ॥ अण्णउत्थियाणं भंते ! एव माइक्खंति भासंति पण्णवंति परूवति एवं खलु रायागहस्स नयरस्स बाहिया बेभारस्स पव्वयस्स अहे एत्थणं महं एगे हरए अप्पे पण्णत्ते अणेगाई भावाथे कर्मों का क्षय होने से अक्रिया का फल होवे अर्थात् योग निरंधन रूप फल होवे. अक्रिया से क्या फल? अहो गौतम ! अक्रिया से समस्त फल में सर्वोत्कृष्ट कर्मक्षयरूप मोक्षफल होवे. यो अनुक्रम से श्रवण, ज्ञान, विज्ञान, प्रत्याख्यान, संयम, आश्रयनिरोध तप, निर्जरा, अक्रिया, व मुक्ति का फल होता है.go ।। २५ ॥ अब साधु सेवा नहीं करने से विपरीत भापी होते हैं सो बताते हैं ? अहो भगवन् ! अन्य तीर्थिक ऐसा कहेत हैं यावतू प्ररूपते हैं कि राजगृह नगर की वाहिर वेभार नामक पर्वत है उस की नीचे एक महान इते अनेक योजन की लम्बाइ र चौडाइ वाला है. विविध प्रकार के वृक्ष, र वनखंड - दूसरा शतक का पांचवा उद्देशा O0 शब्दार्थ ०७ - ३६० सुत्र . अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 भं भगवन् सश्रमण की प.पर्युपासना करते कि क्या फ फल पु०पर्युपासना का गो गौतम स० श्रवण फल सश्रवण से णाजानफल गा० ज्ञानसे कि क्याफल वि०विज्ञानफल वि. विज्ञानसे कि०क्याफल प० प्रत्याख्यान फल प० प्रत्याख्यानसे सं०संयम्फल संयम से अ०अनाश्रवफल अ० अनाश्रवसे त०तपफल ॥ २४ ॥ तहारूवेणं भंते ! समणं वा पज्जुवासमाणस्स किं फला पज्जुबासणा? गोयमा ! सवणफल । से णं भंते ! सवणे किं फले ? गोयमा ! णाणफले। सेणं भंते ! णाणे. किं फले ? गोयमा ! विण्णाणफले । से णं भंते ! विण्णाणे किं फले ? गोयमा ! पच्चरखाण फले । सेणं भंते ! पच्चक्खाणे किं फले ? संजम फले । सेणं भंते ! संजमे किं फले ? अणण्य फले । एवं अणण्हए तव फले । तवे वोदाण फले। बोदाणे अकिरिया फले । से ण भंते ! अकिरिया किं फले ? क्या फल ? अहो गौतम ! ज्ञान से हेय ज्ञेय उपादेय जानने रूप विज्ञान फल होवे. अहो भगवन् ! विज्ञान से क्या फल ? अहो गौतम ! विज्ञान से पापकर्म के प्रत्याख्यान का फल होवे ? अहो भगवन् ! प्रत्याख्यान क्या फल ? अहो गौतम ! पाप का प्रत्याख्यान करने से मयम का फल होता है. अहो भगवन् ! संयम से क्या फल होवे ? अहो गौतम ! संयम से नविन कर्मो के आश्रय द्वारों का रूंधन करने का फल हो और इस तरह लयु कर्म होने से तपस्यावंत होवे. तप ने पूर्वकृत कर्मों का क्षय होवे. और पूर्वकृत * प्रकाशक रामावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालाप्रसादजी * वार्थ ?
।३६३ 389 पंचमान विवाह पण्णाचे (भगवती) सत्र*3800- अ० नजदीक ए• तहां म० महातपोपतीरमभव पा० झरण १० प्ररूपा पं०पांच सो धनुष्य आ० लंवा वि० चौडा ना० नाना प्रकार दु० वृक्षवन खंड से मं०मंडित दे प्रदेश स० शोभायमान पा०प्रसन्न चित्त करने वाला द० देखने योग्य अ० अभिरूपं प० प्रतिरूप त० तहां व० बहुत उ० ऊपण जो० योनिवाले जी० जीव पो• पुद्गल उ० पानीपने व० उत्पन्न होते हैं वि विणसते हैं च०चवते हैं • पुष्ट होते है त० भरा णयरस्स बहियाबेभारपव्ययस्सअदूरसामंते एत्थणं महातवोवतीरप्पभवे नामंपासवणे प- ण्णत्ते पंच धणुसयाई आयाम विक्खंभेणं नाणा दुमखंडमंडिउद्देसे, सस्सिरिए पासादीए दरिसणिजे,अभिरूवे पडिरूवे । तत्थणं बहवे उसिणजोणिया जीवाय पोग्गलाय उदगत्ताए. वक्कमंति विउक्कमंति, चयंति उवचयंति । तब्बतिरित्तेवियणं सयासमियं उसिणे उसिणे आउआए अभिनिस्सवइ, एसणं गोयमा ! महातवोवतरिप्पभवे पासवणे, एसणं मिथ्या है. मैं ऐसा कहता हूं यावत् प्ररूपता हूं कि राजगृह नगर की वाहिर वेभार पर्वत की पास अति ऊप्ण क्षेत्र है. उस की सपीप एक महातपोपतीरमभव नामक ऊप्ण पानी का झरणा है. पांचसोई धनुष्य का लम्बा व चौडा है. विविध प्रकार के वृक्ष, वनखंड से सुशोभित, मासादीक, दर्शनीय, अभिरूप यावत् प्रतिरूप है. उस में बहुत ऊष्ण योनिवाले जीव पानीपने उत्पन्न होते हैं. चवते हैं. उस में. पानी भराये पीछे जो अधिक होता है वह अप्ण अपकायपने झरता है. अहो गौतम ! यह महातपोपतीर BR><दुसरा शतक का पांचवा उद्देशा-2020 भावार्थ शब्दार्थ 1 अनुवादक-बालब्रह्मगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी - दु: वृक्षकेचनखंड से मं० शोभित दे प्रदेश स० शोभायमान जा. यावत् प० प्रतिरूप त तहां व० बहुत उ०.विस्तीर्ण व० बादल सं० सन्मुख होते हैं उ० उपजते हैं वा० वर्पते हैं त. भरा हुवा म सदैव उ० ऊप्ण आ• पानी अ० झरना है से वह क कैसे भ० भगवन् गो० गौतम ज० जो अ०' अन्य तीधिक ए. ऐमा आ० कहते हैं जा. यावत् ते वे ए. ऐसा ० कहते हैं मि० मिथ्या ते वे आ. कहते हैं अ० मैं पु०फीर ऐ०ऐसा आ०कहता हूं रा० राजगृह न० नगर की व०वाहिर वेल्वेभार प०पर्वत की जोयणाई आयाम विक्खंभेणं नाणादुमखंडमंडिउद्देसे.सस्सिरीए जाव पडिरूवे,तत्थणंबहवे उदारा बलाहया संसेयति समुच्छियंति वासंति तब्बतिरित्तेवियणं सयासमिउँ उ- सिणे आउकाए अभिनिस्सवइ, से कहमेय भंते एवं ? गोयमा ! जयंते अण- उत्थिया एवमाइक्खंति जाव जेते एव माइक्खंति मिच्छंते एवमाइक्खंति ॥ अहं पुण गोयमा !. एवमाइक्खामि, भासामि, पण्णवेमि, परूवेमि एवं खलु रायगिहस्स वगैरह से मुशोभित यावत् प्रतिरूप है. इस द्रह में बहुत बद्दल उत्पन्न सन्मुख होते हैं, उत्पन्न होते हैं। और वर्पते हैं. वह द्रह भर जाने से जो अधिक पानी नीकलता है वह पानी सदैव ऊपण योनिवाला रहता अर्थान् जो पानी द्रह मे वाहिर नीकलता है वह सदैव ऊप्ण रहता है. अहो भगवन ! यह किस तरह से ! अहो गौतम ! जो अन्यतीथिक शेमा कहते हैं वे मिथ्या ऐसा करते हैं अर्शात * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी वार्थ - OYO दार्थ सूत्र क० कितने भ० भगवन दे देव १० रूपे गो० गौतम च. चार प्रकार के दे. देव प. मरूपे भ. भुवनपति वा वाणव्यंतर जो ज्योतिपी थे. वैमानिक क. कहां भं० भगवन् भ० भुवनपति दे देव के ठा० स्थान प० कहे गो० गौतम इ. इस र० रत्नप्रभा पु. पृथी की ज. जैसे ठा० स्थान पद में कइविहाणं भते ! देवा पण्णत्ता ? गोयमा ! चउविहा देवा पण्णत्ता तंजहा-भव- णवइ, वाणमंतर, जोइस, वैमाणिया, । कहिणं भंते ! भवणवासीणं देवाणं ठाणा पण्णत्ता ? गोयमा ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए जहा ठाणपदे देवाणं वत्तव्वया विशुद्ध भाषा बोलने से देव होवे इसलिये देवता का अधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! देवता के कितने भेद कहे हैं ? देवताओं के चार भेद कहे हैं. १ भुवनपति २ चाणपंतर ३ ज्योतिषी और ४ वैमानिक. अहो भगवन् ! भुवनपति देवों के स्थान कहां कहे हैं ? अहो गौतम ! पनवणा के दूसरे स्थान पद में इस रत्नमभा नामक पृथ्वी का एक लाख अस्सी हजार योजन का पृथ्वी पिंड कहा है. उसमें एक२ हजार उपर वनींचे छोडने से एक लाख अठत्तर हजार योनन की पोलार है. उस में बारह आंतरे व तेरह पाथडे हैं. इस के आंतरे में भवनपति देवता के सात क्रोड बहोत्तर लाख भुवन कहे हैं. भवनपति देवलोक के असंख्यातवे भाग में उत्पन्न होते हैं. मारणान्तिक समुद्घातवी लोक के असंख्यातवे भाग में भवनपति वर्तते हैं. स्वस्थान आश्री पात कोड क्होत्तर लाख भवन कहे हैं. वे भी लोक के असंख्यातवे 38 पंचङ्ग हिववषण्णात्ति ( भगवती) मूत्र 88 गवार्थ 982208 दूसरा शतकका सातवा उद्देशां 888883 शब्दार्थ सा * 4 अनुवादक-बालब्रह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 हुरा ० सदा उ० उष्ण आ० अण्कायपने अ० झरता है गो० गौतम म. महातपापतीर प्रभव पा. झरण का अ० अर्थ प० प्ररूपा से ऐसा भ० भगवन् भ० भगवान् गो० गौतम स० श्रमण भगवान म. महावीर को पंदना करते हैं न० नमस्कार करते हैं ॥ २॥५॥ से वह भ भगवन् म० मानता हूं ओ० अवधारणी भापा भा० भापापद भा० कहना ॥२॥६॥ गोयमा ! महातवोवतीरप्पभवस्स अट्टे पण्णत्ते ॥ सेनं भंते भंतेत्ति, भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं बंदइ नमसइ ॥ बिईय सए पंचमो उदेसो. सम्मत्तो ॥ २ ॥ ५ ॥ सेणुण भते ! गणामीति औहारणी भासा भासापदं भाणियब्वं ॥ बिईयसए छट्ठो उद्देसो सम्मत्तो ॥ २ ॥ ६ ॥ प्रभव नामक झरणा व उस का अर्थ कहा. अहो भगवन् ! आपका वचन सत्य है. ऐसा कहकर भगवन्त गौतमने श्रमण भगवन्त को वंदना नमस्कार किया. यह दूसरा शतकका पांचवा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥२॥५॥ गत उद्देश में पिथ्याभाषी कहे इसलिये भाषा का स्वरूप कहते हैं. अहो भगवन् ! मैं ऐसा मानता कि अवधारिणी भापा इस सूत्रानुक्रम मे श्री पनवणा सूत्रका अग्यारहवा भाषापदं कहना. भापा को द्रव्य, क्षेत्र, काल व भाव ऐमे अनेक भेदों से विचारना. यह दूसरा शतकका छठा उद्देशा पूर्ण हुवा।।२॥६॥ प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * * ग ब्दार्थ RSS पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 38 वे. वैमानिक उ० उद्देशा भा० कहना ॥२॥ ७ ॥ क० कहाँ भ० भगवन् अ० असुरेन्द्र अ० असुर कुमार राजा की स० मुधर्मा सभा गो० गौतम जं. जबूद्वीप के मं० मेरु की दा० दक्षिण में तिः तिर्छा अ० असंख्यात दी० द्वीप समुद्र वि० उलंध कर अ० अरुणवर द्वीप की वा० वाहिर की वे० वेदिका से अं० अरुणोदय स. समुद्र में बा० वीयालीस Fol जो० योजन सहस्र ओ० अवगाह कर च० चमर का अ० असुरेन्द्र अ असुर राजा का ति तिगिच्छकूट उद्देसो सम्मत्तो ॥ २ ॥७॥ कहिणं भते ! चमरस्स असुारदस्स असुरकुमार रणो सभा सुहम्मा पण्णत्ता ? गोयमा ! जंबुद्दीवेद्दीवे मंदररस पन्वयस्स दाहिणेणं तिरियमसंखेज दीव समुई विईवइत्ता अरुणवर दीवस्स बाहिरिल्लाओ वेइयताओ अरुणोदयं समुदं उद्देशे से जानना. यह दूसरा शतक का सातवा उद्देशा पूर्ण हुआ ॥ २॥७॥ V सातवे उद्देशे में देवता का अधिकार कहा. इमलिये प्रथम भवनपति देवता संबंधी प्रश्न करते हैं। अहो भगवन् ! असुरकुमार के राजा चमर नामक असुरेन्द्र की सुधर्मा सभा कहां है ? अहो गौतम ! जम्बूद्वीप के मेरुपर्वत से दक्षिण दिशा में तिर्छा असंख्याते द्वीप समुद्र उल्लंध कर जाये तो वहां अरुण वर द्वीप आता है. उस की घाहिर की वेदिकासे वेतालीस हजार योजन अवगाह कर अरुणोदय समुद्र भावार्थ दुसग शतक का आठवा उद्देशान ord टिदार्थ D देव की २० वक्तव्यता सावद भा० कहना न विशेष भ० भवन प० प्ररूपे उ. उपपात से लो. लोक का अ० असंख्यात का भाग ए. ऐसे स० सर्व भा० कहना जा० यावत् सि• सिद्धि स्थान स० संपूर्ण क० कल्प ५० प्रतिस्थान वा० जाडपना उ० ऊंचा सं० संस्थान जी जीवाभिगम में जा. यावत् d अनुवादक-मालयनवारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी 8. सा भाणियव्वा. नवरं भवणा पण्णत्ता, उववाएण लोयस्स असंखज्जइ भागे, एवं सव्वं भाणियव्वं, जाव सिद्धगंडिया सम्मत्ता ॥ कप्पाण पइट्ठाणं, बाहल्लुच्चत्तमेव संठाण जीवाभिगमे जाव वेमाणि उद्देसो भाणियव्यो ॥ बिईयसए सत्तमो भावार्थ * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी मालाप्रसादजी * RANNN भाग में वर्तते हैं, उत्तर दक्षिण में रहनेवाले सब भुवनपति, वाणव्यंतर ज्योतिपी, ववैमानिकके स्थानक का वर्णन यावत् सिद्ध स्थान प्रतिपादक प्रकरणतक का सर वर्णन जीवाभिगम सूत्र से जानना. उस का किंचित् विस्तार यह है. १ कल्प में विमानों का आधार. सौधर्म ईशान देवलोक में विमानों धनोदधि प्रतिष्ठित हैं २ विमान का पिंड-सौधर्म ईशान देवलोक में २७०० योजन का पिण्ड है ३ ऊंचाइ-सौधर्म ईगान देवलोक में पांचसो योजन के ऊंचे विमान कहे हैं ४ संस्थान-सौधर्म ईशान देवलोक में आवालिका प्रविष्ट घ्यम, चउरंस व वर्नुलाकार विमानों हैं, और आवलिका वाहिर विविध प्रकार के संस्थान वाले इम सिवाय और भी विमानका आवलिका परिमाण, वर्ण, प्रभा, गंधादि जीवाभिगम सूत्रके वैमानिक सूत्र * 88 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8888 वे० वैमानिक उ. उद्देशा भा० कहना ॥ २ ॥ ७ ॥ क० कहां भ० भगवन् अ० असुरेन्द्र अ० असुर कुमार राजा की स० सुधर्मा सभा गो० गौतम जं. जबूद्वीप के मं० मेरु की दा० दक्षिण में ति तिर्छा अ० असंख्यात दी. द्वीप समुद्र वि. उलधं कर अ० अरुणवर द्वीप की वा वाहिर की वे० वेदिका से अं० अरुणोदय स. समुद्र में वा० वीयालीस जो० योजन सहस्र ओ० अवगाह कर च० चमर का अ० असुरेन्द्र अ० असुर राजा का ति तिगिच्छकूट उद्देसो राम्मत्तो ॥ २ ॥ ७ ॥ कहिणं भंते ! चमरस्स असुारदस्स असुरकुमार रणो सभा सुहम्मा पण्णत्ता ? गोयमा ! जंबूद्दीवेद्दीवे मंदररस पन्वयस्स दाहिणेणं तिरियमसंखेज दवि समुदं विईवइत्ता अरुणवर दीवस्स बाहिरिल्लाओ वेइयअंताओं अरुणोदयं समुदं उद्देशे से जानना. यह दूसरा शतक का सातवा उद्देशा पूर्ण हुआ ॥ २ ॥ ७ ॥ सातवे उद्देशे में देवता का अधिकार कहा. इमलिये प्रथम भवनपति देवता संबंधी प्रश्न करते हैं अहो भगवन् ! असुरकुमार के राजा चमर नामक असुरेन्द्र की सुधर्मा सभा कहां है ? अहो गौतम ! जम्बूद्वीप के मेरुपर्वत से दक्षिण दिशा में तिर्छा असंख्याते द्वीप समुद्र उल्लंध कर जाये तो वहां अरुण वर द्वीप आता है. उस की वाहिर की वेदिकासे वेतालीस हजार योजन अवगाह कर अरुणोदय समुद्रा 3.38%83 दूसरा शतक का आठवा उद्देशा 998 भावार्थ x टिदार्थ दे देव की व• वक्तव्यता सावह भा० कहना न विशेष भ० भवन प० प्ररूपे उ. उपपात से लो लोक का अ० असंख्यात का भाग ए० ऐसे स० सर्व भा० कहना ना० यावत सि सिद्धि स्थान स० संपूर्ण क० कल्प प० प्रतिस्थान वा० जाडपना उ० ऊंचा सं० संस्थान जी० जीवाभिगम में जा. यावत् सून 42 अनुवादक-कालप्रमचारी मुनि श्री अमोलक पीनी 80 सा भाणियव्या. नवरं भवणा पण्णत्ता, उबवाएणं लोयस्स असंखजइ भागे, एवं सव्वं भाणियव्यं, जाव सिद्धगंडिया सम्मत्ता ॥ कप्पाण पइट्ठाणं, बाहल्लुच्चत्तमेव संठाणं जीवाभिगमे जाव वेमाणि उद्देसो भाणियन्वो ॥ बिईयसए सत्तमो भावार्थ * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भाग में वर्तते हैं, उत्तर दक्षिण में रहनेवाले सब भुवनपति, वाणव्यंतर ज्योतिपी, ववैमानिकके स्थानक का वर्णन यावत् सिद्ध स्थान प्रतिपादक प्रकरणतक का सब वर्णन जीवाभिगम सूत्र से जानना. उस का किंचित् विस्तार यह है. १ कल्प में विमानों का आधार. सौधर्म ईशान देवलोक में विमानों घनोदाधि प्रतिष्ठित हैं २ विमान का पिंड-सौधर्म ईशान देवलोक में २७०० योजन का पिण्ड है ३ ऊंचाइ-सौधर्म शिरन देवलोक में पांचसो योजन के ऊंचे विमान कहे हैं '४ संस्थान सौधर्म ईशान देवलोक में आवलिका प्रविष्ट यम, चउरंस व वर्नुलाकार विमानों हैं, और आपलिका वाहिर विविध प्रकार के संस्थान वाले म सिवाय और भी विमानका आनलिका परिमाण, वर्ण, प्रभा, गंधादि जीवाभिगम सूत्रके वैमानिक सूत्र 885 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8880 तीन जो० योजन स. सहस्र दो दो छ० छत्तीस जो० योजनशत किं० किचित् वि० विशेषकम १० परिधि म० मध्य में ए० एक जो योजन स० सहस्र ति तीन इ० इकतालीस जो० योजनशत किं० किंचित् वि. विशेषकम प० परिधि उ० उपर दो दो जो० योजन स० सहस्र दो० दो छ० छियासी जो० योजन शत किं किंचित् वि. विशेषाधिक प. परिधि जा० यावन् मूः मूल में वि विस्तार मा मध्य में सं० संक्षिप्त उ० उपर वि० विशाल म. मध्य में व० मधान २० वन वि० आकार व० वडा य० मृदंग क्खंभेणं, मज्झे चत्तारि चउन्धीसे जोयणसए विक्खंभेणं, उवरिं सत्ततेवीसे जो- यणसए 'विक्खंभेणं, मूले तिण्णि जोयण सहस्साई दोणिय छत्तीसुत्तरे जोयणसए किंचिविसेसणे परिक्खवेणं, मज्झे एगं जोयणसहस्सं तिण्णियइएयाल जोयणसए किंचिविसेसूणे परिक्खेवेणं, उवरिं दोणिय जोयण सहस्साइ दोणिय छलसीए जोयणसए किंचिविसेसाहिए परिक्खेवेणं जावमूले वित्थेड मझे संक्खित्ते जानना. उस की परिधि मूलमें ३२३६ योजन से कुच्छ कम, मध्य में १३४१ योजन से कुच्छ कम, और उपर २२८६ योजन से किंचित् विशेष जानना. मूलमें विस्तार वाला. मध्य में संकुचित और उपर फीरं विस्तार वाला है. वीचमें श्रेष्टवज्रके आकार वाला है. महामुकुद. डमरु के आकार वाला सब रत्नमय शोभनिक यावत् प्रतिरूप है. उस पति को एक पावरवेदिका और एक वनखंड ॐ829% दृमरा शतकका आटवा उद्देशा !><s भावार्थ शब्दा सून * अनुवादक-बालप्रमागरी मुनि श्री अमोलक ऋापनी के ना. नाम का उ० उत्पात प० पर्वत प० प्ररूपा स० सत्तरह ए० इक्कीस जो० योजन शत उ० ऊंचा उ० ऊंचपने च० चार ती तीस जो० योजन शत को० कोश उ० ऊंडे गो० गौस्यूम आवास पर्वत का ५० प्रमाण से ने जानना न० विशेष उ. उपर प० प्रमाण म० मध्य में भा० कहना मू० मूल में द० दश वा० बावीस जो० योजन स० शत वि० चौडा म. मध्य में च० चार. च० चौवीस जोक योजन शत वि० चौडा उ० उपर स० सात ते. तेवीस जो० योजन शत वि० चौडा मु० मूल में ति. बायालीसं जोयण सहस्साइं ओगाहित्ता एत्थणं चमरस्स असुरिंदस्स असुररण्णो तिगिच्छिकुडे नाम उप्पाय पन्चए पण्णत्त सत्तरस एकवीसे जोयणसए उ8 उच्चत्ते- णं, चत्तारितीसे जोयणसए कोसंच उव्वेहेणे, गोथूभस आवासपव्वयस्स पमाणेणं यवं, नवरं उवरिल्लं पमाणं मज्झ भाणियव्वं, मूले दस बावीस जोयणसए वि- में जावे तो वहां चमर नामक असुरेन्द्र का तिगिच्छ कूट नामका उत्पात पर्वत कहा है. वह सत्तरह सो इक्कीस (१७२१ ) योजन का ऊंचा है और ४३० योजन और एक कोशका ऊंडा जमीन में है. जैसे लपण समुद्र में नागराजा का गौस्यूभ नामक आवास पर्वत है वैसे ही यहां जानना. विशेष इतना कि गोस्यूभ नीचे १०२२ योजन का, मध्यमें ७२३ योजन व उपर ४२४ योजन का चौडा कहा परंतु तिगिच्छकूट पर्वत नीचे २०२२ योजन, मध्यमें ४२४ और उपर ७२३ योजन का चौडा है ऐसा - प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * ब्दार्थ DAS ३७१ सूत्र 28 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र <38085- जो० योजन स० शत वि० चौडा पा० देखने योग्य व० वर्णन युक्त उ० उपर की भू० भूमि व० वर्णन युक्त अ. आठ जो० योजन की म. मणिपीठिका च. चमर का सी० सिंहासन तक परिवार सहित भा० कहना ॥ २॥ त० उस ति० तिगिच्छकूट की दा. दक्षिण में छ. छतो क्रोड प. पंचावन क्रोड, ५० पैंतीस लक्ष प० पञ्चास सहल जो० योजन अ अरुणोदय स० समुद्र में ति० तिची ची. अतिक्रम से अ० अघो र० रत्नप्रभा पुः पृथी में च० चालीस जो० योजन स. सहस्र आ० अवगाहकर कर पण्णत्ते, अड्डाइजाइं जोयण सयाई उड्डउच्चत्तेणं, पणवीस जायण सयाई विक्खंभेणं पासायवन्नओ उल्लोय भूमिवन्नओ; अट्ठजोयणाणि मणिपेढिया चमरस्स सीहासणं सपरिवार भाणियव्वं ॥ २ ॥ तस्सणं तिगिच्छि कूडस्त दाहिणणं छक्कोडिसए पणवणंच कोडीओ पणतीसच सयसहस्साई पण्णासंचौं सहस्साई जोयणाई अरु- णोदए समुद्दे तिरियं वीतिवइत्ता. अहे रयणप्पभाए पुढवीए चत्तालीसं जोयण में सब प्रासादो में श्रेष्ट ऐसा एक प्रासाद है. वह २५० योजन का ऊंचा है १२५ योजन का चौडा है, और org बहुत ऊंचा है. उस प्रासाद के मध्य में आठ योजन की माणिपिठिका है. उसमें चमरेन्द्र का सिंहासन व अन्य देव देवियों के सिंहासन रहे हुवे हैं ॥२॥ उस तिगिच्छ कूट से दक्षिण दिशामें छसो पंचावन कोड पैतीस लाख पचास हजार ( ६५५,३५,५०,००० ) योजन अरुणोदय समढ में तिळ जाते चालिम बजार 888888> दुसरा शतकका आठवा उद्देशा 9889 भावार्थ ७ शब्दार्थी ३७० सूत्र 48 अनुवादक-बालबाह्मचारी मुनि श्री अमालक ऋपिनी सं० संस्थान से सं० संस्थित स. सर्व २० रत्नमय अ० स्वच्छ जा. यावत् प० प्रतिरूप से. उस ए. एक ५० पद्मवर के वेदिका व. वनखंड स० सर्व वाजु सं० रहाहुवा प० पद्मवर वे० वेदिका व० वनखंड का २० वर्णन ॥ १ ॥ त° उस ति० तिगिच्छ कूटके उ० उत्पात प० पर्वत की उ उपर व बहुत २० रमणिक भू० भूमि भाग प० प्ररूपा व० वर्णन युक्त त० उस व० बहुत म. मध्य दे० देश भाग म. वडा ए० एक पा० पासाद ५० प्ररूपा अ० अढाइ सो योजन उ० ऊंचा उ० ऊंचपने प० एचीस उपि विसाले. मज्झे वरवइरविग्गहे, महामउंद संठाण संठिए सबरयणामए अच्छे जाव पडिरूवे ॥ सेणं एगाए पउमवरवेइयाए वणखंडेणय सवओं समंता संपरिक्खित्ते पउमवर वेइयाए वणखंडस्स य वण्णओ ॥ १ ॥ तस्सणं तिगिच्छिकुडस्स उपाय पव्ययस्स उप्पि बहुसमरमणिजे भूमिभागे । पण्णत्ते, वन्नओ तस्सण बहुसमरमाणिजस्स बहु मज्झ देसभाए एत्थणं महं एगे पासायवाडंसए पार मेदिका अर्थ योजन की ऊंची व पांचसो धनुष्य की चौडी कही है. सब रन्नयय है. वह वेदिका तिगिच्छ कूट पर्वत के उपर के तल को चारो तरफ पारीध समानघेर कर रही है. उस वेदिका के चारों। तरफ चार वनखण्ड दोकोश से कम के चोडे कहे हैं. ॥ १ ॥ उस तिगिच्छकूट पर्वत पर एक बहुन रमणिक भूमिमाग है जैसे नगारे का उपर का तल वरावर रहता. है वैसाही उस का भूमिभाग है. मध्य * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालाप्रसादजी सूत्र ॐ98 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र - शब्दार्थ १ अर्धयोजन उ० उंचे उ० उंचपने ए० परस्पर वा० वाजु पं० पांच दा० द्वार स: शत अ० अढाइसो जो० योजन उ० उंचे उ० उंचपने ए० एक पपचहत्त जो० योजन वि० चौडे उ० उपर तक तलमें सो सोलह जो० योजन स० सहस्र आ० लंबा वि० चौडा प० पचास जो०योजन स०सहस्र पं० पांच स०सत्तानव जो० योजन शत किं किंचित् वि. विशेप ऊन प० परिधि स० सर्व प्रमाण वे० वैमानिक का प० प्रमाण का अ० अर्ध ने जानना ॥ २॥ ८॥ एगं पणहत्तरी जोयणाई विक्खंभेणं, उवरियतलेणं सोलस जोयण सहस्साई आयाम विक्खंभेणं, पन्नासं जोयण सहरसाइं पंचयसत्ताणउय जोयणसए किंचिविसेसणे परिक्खेवेणं सब्बप्पमाणं वेमाणियस्त पमाणस्स अद्धं नेयव्वं ॥ इइ विईयसए अट्ठमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ २ ॥ ८ ॥ भावार्थ के चौड कहे हैं. घरके पीठ सोलह हजार योजन के चौडे कहे हैं. उसकी परिधि५०५१७योजन में कुछ कम की जानना. सब प्रमाण सौधर्मादि वैमानिक से आधा जानना. यह दूसरे शतक का आठया उद्देशा समाप्त हुवा ॥२॥८॥ गत उद्देशे में देवता का अधिकार कहा अब मनुष्य का अधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! समय- क्षेत्र क्यों कहता है ? अहो गौतम ! अढाइ द्वीप व दो समुद्र को समय क्षेत्र कहते हैं. समय का अर्थ काल 3000 दृसग शतक का आठवा उद्देशा88-82-8- ग * + + ३ ३७२ सूत्र 4. अनुवादक -बालब्रह्मचारीमुाने श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ न. तहाँ च चपरकी अ० असुरेन्द्र अ० असुरराजा के च. चमरचंचा रा. राज्यधानी प३ प्ररूपी ए. एक योजन स० लक्ष आ. लम्बी वि० चौडी ज० जंबदीप प्रमाण दि द्वापार्य जो० योजन शत उ. ऊमापने मू० मूल में प. पन्नास जो० योजन वि० चौडी उ० उपर स० साडीचारह जो० योजन क. कोसीमा कांगडा अ० अर्द्ध जो० योजन आ० लंबे को० कोश वि० चौडा दो० देसऊणा अ. सहस्साई उग्गाहित्ता तत्थणं चमररस असुरिंदस्स असुररण्णो चमरचंचानाम राय- हाणी पण्णत्ता । एगं जोयण सय सहस्सं आयाम विक्खंभेणं, जंबूद्दीवप्पमाणा दीवड्ड जोयण सय उड्टुं उच्चत्तेणं मूले पण्णासं जोयणाई विक्खंभेणं उवरिं अढतेरस जाये- णाई कविसीसंगा अद्धजोयणं आयामेणं, कोसं विक्खंभेणं देसूण अद्धजोयणं उड़ उच्चत्तेणं एग मेगाए बाहाए पंच २ दार सया अढाइ जोयण सयाई उड्ढे उच्चत्तेणं भावार्थ योजन रत्नप्रभा पृथ्वी को अवगाहकर चमर नामक असुगेन्द्र की चमरचंचा नामक राज्यधानी कही. यह राज्यधानी जम्बूद्वीप प्रमाण एक लाख योजन की लम्बी चौडी कही. उस के कोट एक सो पचास योजनके ऊंचे कहे,मूलमें पञ्चास योजनकी चौडी कही उपर साडी बारह योजन की चौडी कही. उस उपर कोटके कांगरे आधे कोशके लम्बे, एक कोश के चौडे व कुच्छकम आधेकोशके ऊंचे कहे. उस को- ट की एक २ वाजु पांचसो २ दरवजे हैं. वेद्वार अढाइसो योजन के ऊंचे व एकसो पञ्चहत्तर योजन * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी AM * Rom शब्दाथ N 69 अर्धयोजन उ० उंचे उ० उंचपने ए० परस्पर वा० वाजु पं० 'पांच दा० द्वार सः शत अ० अढाइसो जो० योजन उ० उंचे उ० उंचपने ए० एक प० पञ्चहत्त जो० योजन वि० चौडे उ० उपर तक तलमें सो सोलह जो० योजन स० सहस्र आ० लंवा वि० चौडा प. पञ्चास जो योजन स०सहस्र पं० पांच स०सत्तानव जो० योजन शत किं किंचित् वि. विशेप ऊन प० परिधि स० सर्व प्रमाण वे० चैमानिक का प० प्रमाण का अ० अर्ध ने जानना ॥ २ ॥ ८॥ सूत्र > पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 8.5 एगं पणहत्तरी जोयणाई विक्खंभेणं, उवरियतलेणं सोलस जोयण सहस्साई आयाम विक्खंभेणं, पन्नासं जोयण सहरसाइं पंचयसत्ताणउय जोयणसए किंचिविसेसणे परिक्खेवेणं सबप्पमाणं वेमाणियरस पमाणस्स अद्धं नेयव्वं ॥ इइ विईयसए अट्ठमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ २ ॥ ८ ॥ के चौड कहे हैं. घरके पीठ सोलह हजार योजन के चौडे कहे हैं. उसकी परिधि५०५९७योजन में कुछ कम की जानना. सब प्रमाण सौधर्मादि वैमानिक से आधा जानना. यह दूसरे शतक का आठवा उद्देशा समाप्त हुवा ॥ २॥ ८ ॥ गत उद्देशे में देवता का अधिकार कहा अब मनुष्य का आधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! समय- क्षेत्र क्यों कहता है ? अहो गौतम ! अढाइ द्वीप व दो समुद्र को समय क्षेत्र कहते हैं. समय का अर्थ काल > ०१ दुसग शतक का आठवा उद्देशा 988-85- भावार्थ + 60 03 oyo 00 शब्दा किं० क्या ० इसे भ० भगवनू स० समय क्षेत्र प० कहना गो गौतम अ. अदाइ दी द्वीप दो दो समुद्र प० उपलक्षित स० समय क्षेत्र प० कहा है त० तहां अ.. यह जं. जंबूदीप स० सर्व दी. द्वीप स० समुद्र की स० मध्य में एक ऐसे जी०जीवाभिगम व वक्तव्यता ने जानना जा० यावत् अ०आभ्यंतर पु. पुष्कराध जो० ज्योतिपी वि० छोडकर ॥ २ ॥ ९ ॥ सून अनुरादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8- किमिदं भंते ! समयक्खेतति पवुच्चइ ? गोयमा ! अड्डाइज्जा दीवा दोय समुद्दा एसणं पवइए समयकखेत्तेत्ति पञ्चइ, तत्थणं अयं जंबूद्दीव दीवे सव्वदीव समुदाणं स- व्यभितरे , एवं जीवाभिगमवत्तव्वया नेयम्वा, जाव आभितर पुक्खरद जोइस विहूर्ण ॥ इइ विईयसए नवमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ २ ॥ ९ ॥ होता है अर्थात् जिप्त क्षेत्र में दिन, पक्ष, मास, वर्ष वगैरह काल उपलक्षित होवे-सूर्य की गति से जाना जाये उसे समय क्षेत्र कहा है. अढाई द्वीप की वाहिर मर्यादि ज्योतिपी के विमानोंका हलन चलन नहीं होता है. अाई द्वीप में पत्र द्वीप समुद्रों में छोटा प्रथप जम्बूद्वीप नामक द्वीप हैं वगैरह अढाइ द्वीप की वक्तव्यंता जैसी जीवाभिगम में कही है वैमी यहां पर कहना. मात्र ज्योतिपी की वक्तव्यता नहीं कहना. यह दूसरे शतकका नववा उद्देशा समाप्त हुवा ॥ २॥ ९॥ प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी सवार्थ * शब्दार्थ क. कितनी भं भगवन् अ० अस्तिकाय गो० गौतम पं० पांच अ० अस्तिकाय ध० धर्मास्तिकाय अ० अधर्मास्ति काय आ० आकाशास्ति काय जी जीवास्ति काय पो० पुद्गलास्ति काय ॥ १ ॥१० धर्मा- सूत्र कइणं भंते ! आथिकाया पण्णत्ता ? गोयमा ! पंच आत्थिकाया पण्णत्ता तंजहा, धम्मत्थिकाए, अधम्मात्थिकाए, आगासत्थिकाए, जीवत्थिकाए. पोग्गलात्थि काए भावाथ * पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 832 गत उद्देशे में क्षेत्रका स्वरूप कहा है, उस में आस्तकाय होने से अस्तिकाया का स्वरूप कहते हैं. अहो भगवन् ! अस्तिकाय कितनी कही ? अहो गौतम ! अस्तिकाय पांच कही. अस्ति शब्द से प्रदेश ग्रहण करना और कायशब्द से राशि अर्थात् प्रदेशों की राशि-प्तमुदाय सो अस्तिकाय. अथवा अस्ति शब्द काल त्रय वाची अव्यय है इस से जो प्रदेश अतीत काल में थे, वर्तमान में हैं और आगामिक में होंगे सो अस्तिकाय. उस के नाम धर्यास्तिकाय * अधर्मास्ति काय, आकाशास्तिकाय, जीवास्ति काय * धर्मास्तिकाय पद मांगलीक होने से प्रथम ग्रहण किया है, तत्पश्चात् धर्मास्किाय का विपरीत स्वभाव वाला अधर्मास्तिकाय, इन को आधार भूत आकाशास्तिकाय, अनंत अमूर्तत्व का साधर्म्य स्वभाव होने से जीवास्ति काय, और उस का उपष्टंभ करने वाला पुद्गल होने से पुद्गलास्ति :काय ऐसा क्रम रक्खा.गया है. दूसरा शतक का दशा उद्देशा 8 GYO शब्दाथ कि क्या इ० इसे भ भगवनू स० समय क्षेत्र प० कहना गो० गौतम अ० अढाइ दी द्वीप दो दो समुद्र १० उपलक्षित स० समय क्षेत्र १० कहा है त० तहां अ. यह जं. जंबूदीप स० सर्व दी० द्वीप १० ममुद्र की स० मध्य में एक ऐसे जी०जीवाभिगम व० वक्तव्यता ने जानना जा० यावत् अ०आभ्यंतर पु. पुष्कराध जो० ज्योतिपी वि० छोडकर ॥ २ ॥२॥ सूत्र किमिदं भंते ! समयक्खेत्तेति पवुच्चइ ? गोयमा ! अड्डाइजा दीवा दोय समुद्दा एसणं पवइए समयक्खेत्तेत्ति पञ्चइ, तत्थंणं अयं जंबूद्दीव दीवे सव्वद्दीव समुदाणं स- व्यभितरे , एवं जीवाभिगमवत्तव्वया नेयव्या, जाव आभितर पुक्खरदं जोइस विहणं ॥ इइ विईयसए नवमो उदेसो सम्मत्तो ।। २ ॥ ९ ॥ - * अनुवादक-चालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालामसादजी * भावाथ होता है अर्थात् जिम क्षेत्र में दिन, पक्ष, मास, वर्ष वगैरह काल उपलक्षित होवे सूर्य की गति से जाना गाचे उमे समय क्षेत्र कहा है. अढाई द्वीप की बाहिर सूर्यादि ज्योतिपी के विमानोंका हलन चलन नहीं होता है. अदाई द्वीप में सर द्वीप समुद्रों में छोटा प्रथप-जम्बूद्वीप नायक द्वीप हैं वगैरह अढाइ द्वीप की पक्तव्यता जैसी जीवाभिगम में कही है चैमी यहां पर कहना. मात्र ज्योतिषी की वक्तव्यता नई कहना. यह दूसरे शतकका नववा उद्देशा समाप्त हुवा ॥ २॥ ९॥ y + सूत्र 838 904 सूत्र - पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती दूसरा शतक का दशा उद्देशा शब्दार्थ नहीं क० कदापि नः नहीं हैं जा. यावत् नि० नित्य भा. भाव से अः अवर्ण अ० अगंध अ. अरम अ० अस्पर्श गु० गुण से ग० गमन गुण अ० अधर्मास्तिकाय ए. ऐसे न० विशेष गु० गुण से ठा स्थानगुण आ० आकाशास्तिकाय ए. ऐसे न० विशेष खे० क्षेत्र से लो० लोकालोक प्रमाण अ० अनंत जा० यावत् गु० गुण से अ० अवगाहना गुण जी जीवास्तिकाय में भं० भगवन का कितना व०१७ वर्ण गं गधं र० रस फा: स्पर्श गो० गौतम अ० अवर्ण जा. यावत् अ० अरूपी जी. जीव सा० न आसि न कयाइ नत्थि जाव निचे, भावओ अबन्ने अगंधे, अरसे,अफासे, गुणओ गमणगुणे अहम्मत्थि काएवि एवं चेव नवरं गुणओ ठाणगुणे ॥ आगासत्थि काएवि एवं चेव, नवरं खेत्तओणं आगासत्थिकाए, लोयालोयप्पमाणमेत्ते अणतेचेव, जाव गुणओ अवगाहगुणे ॥ जीवत्थिकारणं भंते ! कइवण्ण, कइगंधे, भावार्थ संपूर्ण लोक प्रमाण, काल से अतीत काल में नहीं था वैसा नहीं, वर्तमान में नहीं है वैसा नहीं. और अनागत में नहीं होगा वैसा नहीं परंतु अतीत काल में था, वर्तमान है और अनागत में होगा यावत् नित्य रहेगा. भाव से धर्मास्किाय में वर्ण, गंध, रस व स्पर्श नहीं होते हैं और गुण से धर्मास्तिकाया में गमन गुण जसे मत्स्य को जल का आश्रय रहता है वैसे ही जीव पुद्गलको धर्मास्ति कायगति कराता है. अधर्मास्ति कायाका भी वैसे ही जानना मात्र स्थिर गुण ग्रहण करना. आकाशास्ति काय में भी धर्मास्ति yo शध्दार्थ स्तिकाय भं भगान् क० कितना व० वर्ण ग. गंध र० रस फा स्पर्श गो मौतम अ० अवर्ण अ.} अगंध अ० अरस अ० अस्पर्श अ० अरूपी अ० अजीव सा० शाश्वत अ० अवस्थित लो० लोक द्रव्य स० संक्षेप से पं० पांच प्रकार की द० द्रव्य से खेल क्षेत्र से का० काल से भा० भाव से गु० गुण से दद्रव्य से ए० एकट्रव्य खे० क्षेत्र से लो लोक प्रमाण का कालसे न नहीं क-कदापि न० नहीं आ० था न. सृन - अनुवादककालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 ॥१॥ धम्मत्थि काएणं भंते ! कतिवण्णे, कतिगंधे, कतिरसे, कतिफासे ? गोयमा! अवण्णे, अगंधे, अरसे, अफासे, अरूबी, अजीवे, सासए, अवाहिए, लोगदव्वे । से समासओ पंचविहे पण्णत्ते तंजहा दबओ, खेत्तओ, कालओ, भावओ, गुणओ। दव्व- ओणं धम्मत्थिकाए एगेदब्वे, खत्तओ लोगप्पमाणमेचे, कालओ नकयाई, * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालाप्रसादनी * भावाध और पुद्गलास्तिकाय ॥१॥ अहो भगवन् ! धर्मास्तिकाया में कितने वर्ण, गंध, रस व 'स्पर्श है. ? अहो गौतम ! धर्मास्तिकाया में पांच वर्ण में से एक भी वर्ण नहीं है. दोगंध में से एक भी गंध नीं है, पांच रस में से एक भी रन नहीं है, आठ स्पर्श में से एक भी स्पर्श नहीं है. अरूपी, अजीच, शाश्वत अवस्थित व पंचारित कायिक लोक होने से उन का एक अंशभूत द्रव्य है. उम के द्रव्य से, क्षेत्र से, काल मे, भार से व गुग से ऐसे पांच भेद किये हैं..द्रव्य से धर्मास्तिकाय एक द्रव्य, क्षेत्र से धर्मास्तिकाय 90 Qa ७ - पंचमांग विवाह पण्णति ( भगवती) सूत्र - *283 दूसरा शतक का दशा उद्देशा 882 ब्दार्थ नहीं क० कदापि न नहीं हैं जा. यावत् नि० नित्य भा. भाव से अ अवर्ण अ० अगंध अ. अरम अ० अस्पर्श गु० गुण से ग० गमन गुण अ० अधर्मास्तिकाय ए. ऐसे न० विशेष गु० गुण से ठार स्थानगुण आ० आकाशास्तिकाय ए. ऐसे न० विशेप खे० क्षेत्र से लो० लोकालोक प्रमाण अ० अनंत जा० यावत् गु० गुण से अ० अवगाहना गुण जी जीवास्तिकाय में भं० भगवन का कितना २०१७ वर्ण गं० गधं र० रस फा: स्पर्श गो० गौतम अ० अवर्ण जा० यावत् अ० अरूपी जी० जीप सा० न आसि न कयाइ नत्यि जाव निच्चे, भावओ अवन्ने अगंधे, अरसे,अफासे, गुणओ गमणगुणे अहम्मत्थि काएवि एवं चेव नवरं गुणओ ठाणगुणे ॥ आगासत्थि काएवि एवं चेव, नवरं खेत्तओणं आगासत्यिकाए, लोयालोयप्पमाणमेत्ते अणतेचेव, जाव गुणओ अवगाहगुणे ॥ जीवत्थिकाएणं भंते ! कइवण्ण, कइगंधे, भावाथे संपूर्ण लोक प्रमाण, काल से अतीत काल में नहीं था वैसा नहीं, वर्तमान में नहीं है वैसा नहीं. और अनागत में नहीं होगा वैसा नहीं परंतु अतीत काल में था, वर्तमान है और अनागत में होगा यावत नित्य रहेगा. भाव से धर्मास्किाय में वर्ण, गंध, रस व स्पर्श नहीं होते हैं और गुण से धर्मास्तिकाया में गमन गुण जैसे मत्स्य को जल का आश्रय रहता है वैसे ही जीव पुद्गलको धर्मास्ति कायगति कराता है. अधर्मास्ति कायाका भी वैसे ही जानना मात्र स्थिर गुण ग्रहण करना. आकाशास्ति काय में भी धर्मास्ति ३१० * अनुवादक रालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपित्री शब्दार्थी शाश्वत अ० अवस्थित लो० लोक द्रव्य स० संक्षेप से पं० पांच प्रकार का द० द्रव्य से जा. यावत् गु० गुण से द० द्रव्य से अ० अनंत जी जीव द्रव्य खे०क्षेत्र से लो लोक प्रमाण का कालसेन नहीं क. कदापि न० नहीं आ था जा० यावत् नि० नित्य भा० भाव से अ० अवर्ण अ० अगंध अ० अरस अ अस्पर्श गु गुण से उ० उपयोग गुण पो• पुद्गलास्तिकाय भ० भगवन् ककितने वर्ण क० कितने गंध र०रस फा०पर्शगो गौतम पं० पांचवर्ण पंपांचरस दु० दोगंध अ०आठ स्पर्श रूलरूपी अ० अजीव सा. सून कइरसे कइफासे ? गोयमा ! अवन्ने जाव अरूवी, जीवे .सासए, अवट्ठिए, लोगदव्ये, से समासओ पंचविहे प० तं० दव्वओ जाव गुणओ.. दव्वओणं जीव- स्थिकाए अणंताई जीवदव्वाइं; खेत्तओ लोगप्पमाणमेत्ते, कालओ नकयाइ न आसि जाव निच्चे. भावओ पुण अवन्ने, अगंधे, अरसे अफासे, गुणओ उवओग गुणे । पोग्गलात्थि काएणं भंते ! कइवण्णे, कइगंधरसफासे ? गोयमा! पचवन्ने पंचरसे, दुगंधे, काय जैसा परंतु क्षेत्र से आकाशास्ति काय लोकालोक प्रमाण अनंत, और गुण से अवगाहन-अवकाश देने वाला-गुण है.अहो भगवन् जीवास्ति कायमें कितने वर्ण,गंध,रस व स्पर्श हैं ? अहो गौतम ! जीवास्ति काय में वर्ण, गंध, रस व स्पर्श नहीं है. वह अरूपी, जीव, शाश्वत, अवस्थित्त व लोक.द्रव्य है.. उसके पांच भेद किये गये हैं द्रव्य से यावत् गुण मे. द्रव्य से जीव द्रव्य अनंत, क्षेत्र से लोक प्रमाण, काल से - अतीत में * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * दार्थ Gya शाश्वत अ० अवस्थित लो० लोक द्रव्य स० संक्षेप से पं० पांच प्रकार का द० द्रव्य से अ० अनंत द्रव्य खे० क्षेत्र से लो० लोक प्रमाण मात्र का. काल से न० नहीं क. कदापि वय आ० धा जा० यावत् नि० नित्य भा० भाव से व० वर्ण वाला गं गंधवाला र. रसवाला फा० स्पर्श वाला गु० गुण से ग० ३७२ सूत्र' अट्ठफासे, रूबी, अजीवे, सासए, अवट्ठिए, लोगव्वे. से समासओ पंचविहे पण्णत्ते तंजहा दव्वओ, खेत्तओ, कालओ, भावओ, गुणओ।दवओणंपोग्गलीत्थकाए अणंताई दव्याई, खेत्तओ लोयप्पमाणमेत्ते,कालओनकयाइ न आसि जाव निच्चे भावओवण्णमंते, 23 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 8883> > दुसरा शतक का दशका उद्देशा 988 भावार्थ नहीं था वैसा नहीं, वर्षमान में नहीं है वैसा नहीं है और अनागत में नहीं होगा वैसा नहीं परंतु अतीत काल में था, वर्तमान में है, और अनागत में होगा यावत नित्य है. भाव से वर्ण,गंध,रस, स्पर्श रहित अरूपी है. गुण से उपयोग लक्षण वाला है. अहो भगवन् ! पुद्गलास्ति काय में कितने वर्ण, गंध, रस व स्पर्श हैं ? अहो गौतम! पुद्गलास्ति कायमें पांचवर्ण, पांचरस, दो गंध, और आठ स्पर्श हैं. वह रूपी, अजीव, शाश्वत, अवस्थित यावत् लोक द्रव्य है. उस के द्रव्य से यावत् गुण से ऐसे पांच भेद किये हैं. द्रव्य से पुद्गला- स्तिकाय अनंत है, क्षेत्र से लोक प्रमाण है, काल से अतीन काल में नहीं था वैसा नहीं यावत् नित्य है। भाव से वर्ण, गंध, रस स्पर्श सहित है, और गुण से ग्रहणगुण वाला है अर्थात् परस्पर मीलते परिण शब्दार्थ) सूत्र अनुवादक बालबालचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 83 शाश्वत अ० अवस्थित लो० लोक द्रव्य स० संक्षेप से पं० पांच प्रकार का द० द्रव्य से जा० यावत् गु० गुण से द० द्रव्य से थ० अनंत जी० जीव द्रव्य खे०क्षेत्र से लो लोक प्रमाण का कालसे न०नहीं क० कदापि न० नहीं आ था जा० यावत् नि० नित्य भा० भाव से अ० अवर्ण अ० अगंध अ० अरस अ० अस्पर्श गु०. गुण से उ० उपयोग गुण पो• पुद्गलास्तिकाय भ० भगवन् क०कितने वर्ण क० कितने गंध ररस फा०स्पर्शगो गौतम पं० पांचवर्ण पं०पांचरस दु० दोगंध अ० आठ स्पर्श रूरूपी अ० अजीव सा. कइरसे कइफासे ? गोयमा ! अवन्ने जाव अरूबी, जीवे .सासए, अवट्ठिए, लोगदव्वे, 1 से समासओ पंचविहे प० तं० दव्वओ जाव गुणओ. . दव्वओणं जीव- त्थिकाए अणंताई जीवदव्वाई; खेत्तओ लोगप्पमाणमेत्ते, कालओ नकयाइ न आसि जाव निच्चे. भावओ पुण अवन्ने, अगंधे, अरसे अफासे, गुणओ उबओग - गुणे । पोग्गलत्थि काएणं भंते ! कइवण्णे, कइगंधरसफासे ? गोयमा! पचवन्ने पंचरसे, दुगंधे, काय जैसा परंनु क्षेत्र से आकाशास्ति काय लोकालोक प्रमाण अनंत, और गुण से अवगाहन-अवकाश देने वाला-गुण है. अहो भगवन् जीवास्ति काय में कितने वर्ण,गंध,रस व स्पर्श हैं ? अहो गौतम ! जीवास्ति काय पं वर्ण, मंत्र, रस व स्पर्श नहीं है. वह अरूपी, जीव, शाश्वत, अवस्थित व लोक. द्रव्य है. उसके पांच भेद किये गये हैं द्रव्य से यावत् गुण से. द्रव्य से. जीव द्रव्य अनंत, क्षेत्र से लोक प्रमाण, काल से अतीत * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * गर्थ ब्दार्थ ऊणा को ध० धर्मास्तिकाय ३० कहना णो० नहीं इ. यह अर्थ स.समर्थ से. यह के कैसे ए० ऐसा बु. कहा जाता है ए० एक धर्मास्तिकाया के प्रदेश को नो० नहीं ध० धर्मास्तिकाय ३० कहना जा यावत् ए० एक प्रदेश ऊणा ध० धर्मास्ति काया को .नो. नहीं ध० धर्मास्तिकाय व० कहना गो गौतम खं० खंडित च० चक्र स० संपूर्ण च० चक्र भ० भगवन् नो नहीं ख० खंडित चक्र सं० संपूर्ण चक्र ए०१ ३८१ 9803 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्त (भगवती) सूत्र 8883 वियणं धम्मत्थिकाए धम्नत्थिकाएत्ति वत्तव्बं सिया?णो इणढे सम?. से केण?णं भंते! एवं वुच्चइ एगे धम्मत्थिकायप्पदेसे नो धम्मत्यिकाएत्ति वत्तव्वं सिया जाव एगपदे- सगेवियणं धम्मत्थिकाए नो धम्मत्थिकाएत्ति वत्तव्यं सिया, ॥ सेणणं गोयमा ! खंडे चक्के सगले चके ? भगवं ! नो खंडे चक्के सगले चक्के । एवं छत्ते, चम्मे, दंडे, दूसरा शतकका दशा उद्देशा 988- भावार्थ 69 अहो भगवन् ! किस कारनसे धर्मास्तिकाय के एक प्रदेश को धर्मास्तिकाय नहीं कहना. ऐसे ही दो, तीन, चार, पांव, छ, सात, आठ, नव, दश, संख्यात, अख्यात यावत् एक प्रदेश कम को धर्मास्ति काय नहीं कह सकते है ! अहो गौतम ! चक के टुकडे को क्या चक्र कहना ? अहो भगवन् ! चक्र के टुकडे को चक्र नहीं कहना परंतु पूर्ण चक्र को ही चक्र कहना of और भी चमर के अमुक विभाग को क्या चमर कहना, छत्र के अमुक विभाग को क्या छत्र कहना, दंडके शब्दार्थ ३८० सूत्र 3 अनुवादक-पालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 81 ग्रहणगुण ॥२॥ ए. एक भं• भगवन् ध धर्मास्तिकाय का प०प्रदेश को ध० धर्मास्तिकाय व.कहना गो० गौतम नो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ ए. ऐमे दो दो ति तीन च० चार पं. पांच छ० छ सः सात अ० आठ न• नव द० दश सं० संख्याते अ० असंख्याते में भगवन् ५० धर्मास्तिकाय का ५०प्रदेश को ध० धर्मास्तिकाय ३० कहना गो० गौतम नो० नहीं इ. यह अर्थ स. समर्थ ए. एक प्रदेश गंध रस फासमंते, गुणओ गहणगुणे ॥ २ ॥ एगे भंते ! धम्मत्थिकाय प्पदेसे धम्मत्थिकाएत्ति वत्तव्वं सिया ? गोयमा ! णो इणढे समतुः एवं दोन्निवि तिन्निवि, चत्तारि, पंच, छ, सत्त, अट्ठ,नव, दस, संखेजा, असंखेजा भंते ! धम्नत्यिकाय- प्पदेसा धम्मत्थिकाएत्ति वत्तव्वंसिया ? गोयमा ! णो इणढे समढे. एगपदेसूणे * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी वार्थ मने हैं ॥२॥ अहो भगवन् ! धर्मास्ति काय के एक प्रदेश को क्या धर्मास्ति काय कहना ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! धर्मास्तिकाय के दो, तीन चार, पांच, छ, सात, भाउ, नव, दश, संख्याते या असंख्याते प्रदेश को क्या धर्मास्तिकाय कहना, ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! धर्मास्तिकीय के समस्त मदेशों में से एक प्रदेश कम होने तो क्या उसे धर्मास्तिकाया कहना ?: अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं दाथा . ऊणा को ध० धर्मास्तिकाय ३० कहना णो नहीं इ. यह अर्थ स समर्थ स० यह के कैसे ए० ऐसा बु. कहा जाता है ए० एक घ० धर्मास्तिकाया के प्रदेश को नो० नहीं घ० धर्मास्तिकाय ३० कहना जा यावत् ए० एक प्रदेश ऊणा ध० धर्मास्ति काया को .नो० नहीं ध० धर्मास्तिकाय व. कहना गो गौतम खं० खंडित च• चक्र स० संपूर्ण च० चक्र भ० भगवन् नोनहैं। खं० खंडित चक्र सं० संपूर्ण चक्र ए. ३८१ ॐ पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्त (भगवती) सूत्र 833 वियणं धम्मत्थिकाए धम्मत्थिकाएत्ति वत्तव्यं सिया?णो इणढे समतु. से केणतुणं भंते! एवं वुच्चइ एगे धम्मत्थिकायप्पदेसे नो धम्मत्यिकाएत्ति वत्तव्यं सिया जाव एगपदे- सवियणं धम्मत्थिकाए नो धम्मत्थिकाएत्ति वत्तव्यं सिया, ॥ सेणणं गोयमा ! खंडे चक्के सगले चक्के ? भगवं ! नो खंडे चक्के सगले चके । एवं छत्ते, चम्मे, दंडे, दसरा शतकका दशग उद्देशा भावार्थ अहो भगवन् ! कित कारनसे धर्मास्तिकाय के एक प्रदेश को धर्मास्तिकाय नहीं कहना. ऐसे ही दो, तीन, चार, पांच, छ, सात, आठ, नव, दश, संख्यात, असंख्यात यावत एक प्रदेश कम को धर्मास्ति काय नहीं कह सकते है ? अहो गौतम ! चक्र के टुकडे को क्या चक्र कहना ? अहो भगवन् ! चक्र के टुकडे को चक्र नहीं कहना परंतु पूर्ण चक्र को है। चक्र कहना और भी चमर के अमुक विभाग को क्या चमर कहना, छत्र के अमुक विभाग को क्या छन कहना, दंडके oyo ३८२ अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दार्थ से छ० छप च० चमर दे दंड दृः वस्त्र आ० आयुध मो० मोदक मे० वह ते. इसलिये गो. गौतम एक ऐसा ' कहा जाता है ए० एक ध० धर्मास्तिकाय प्रदेश ना० नहीं ध० धर्मास्ति काय ३० कहना जा. यावत् ए० एक प्रदेश ऊणा ध० धर्मास्ति काय को णो० नहीं ध० धर्मास्तिकाय व कहना से यह कि क्या खा ख्याति केलिये भ० भगवन् ध० धर्मास्तिकाय व कहना गो गौतम अ०असंख्यात घ०धर्मास्ति काय के प० प्रदेश ते वे स० सर्व क० कृत्स्न प०प्रतिपूर्ण नि० निराशेप ए. एक ग० ग्रहण सूत्र दूसे, आउहे, मोयए, सेतेणटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ एगे धम्मत्थिकायप्रदेसे णो धम्म त्थिकाएत्ति वत्तव्य सिया जाव एगपदेसूणेवियणं धम्मत्थिकाए नों धम्मत्थिकाएत्ति वत्तव्यं सिया।से किं खाइएणं भंते ! धम्मत्थिकाएत्ति वत्तव्वसिमा ? गोयया ! असंखेजा धम्म- त्थि कायप्पएसा ते सव्वे कसिणा, पडिपुण्णा; निरवसेसा. एकग्गहण गहिया एसणं 'भावार्थ टुकडे को दंड कहना, वस्त्र के टुकडे को वस्त्र कहना, आयुष के टुकडे को आयुध कहना, या लडके टुकडे को क्या लड्डु कहना ? अहो भगवन् ! ऐसा नहीं कहा, जाता है. इसी तरह अहो गौतम ! धर्मास्ति काय. के एक प्रदेश यावत् एक प्रदेश कर को धर्मास्तिकाथ नहीं कह सकते हैं * क्यों कि * यह वचन निश्चय नयको अपेक्षा ग्रहण कियाहै क्योंकि व्यवहार नयसे खण्डित घडेको घडा कह- नई नही धर्मास्तिकायके एक प्रदेश वगैरह को भी धर्मास्तिकाय कह सेंकत है. * प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * ? OTO शब्दाय ग० ग्रहित को गो गौतम १० धस्ति काय व० कहना एक ऐसे अ. अधर्मास्ति काय आ० आका- शास्ति काय जी० जीवास्ति काय पो० पुद्गलास्ति ए० ऐसे ही न० विशेष ति तीन का प०प्रदेश अ० अनंत भा० कहना ॥ ३ ॥ नी० जीप भं. भगवन् स.. उत्थान सहित स० कर्म सहित स. वलसहित स वीर्यसहित म० पुरुषात्कार पराकन सहित आ० आत्म भाव से - उ० देखाडे व. कहना है. हां गो. | ३८३ 3 8 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 888 गोयमा! धम्मत्थिकाएत्ति वत्तव्वं सिया एवं अहम्मत्थिकाएवि, आगासत्थिकाय, जीवत्थिकाय, पोग्गलत्थि काएवि एवं चेव नवरं तिण्हपि पएसा अणंता भाणियव्या सेसं तंचेव ॥ ३ ॥ जीवेणं भंते ! सउट्ठाणे, सकम्मे, सबले, सीरिए, सपुरि- सकार परकमे, आयभावणं जीवभावं उवदंसेईति वत्तव्वं सिया ? हंता गोयमा! 389 दूसरा शतक का दशा उद्देशा भावार्थ . तब अहो भगरन् ! धर्मास्तिकाय किसको कहते हैं ? असंख्यात प्रदेशात्मक धर्मास्ति काय है यह सब कृत्स्न, प्रतिपूर्ण, निरविशेप और एकही शब्द कहने में सब आजावे वैसे होवे उसी ही धर्मास्तिकाया कहते हैं. ऐसही अधर्मास्तिकाय. आकाशास्तिकाय, जीवास्तिकाय व पुद्गलास्ति कायका जानना. विशेप इतना कि आकाशास्तिकायादिक में प्रदेश अनंत होनेसे अनंत कहना. ॥ ३ ॥ उपयोग लक्षण वालाई जावास्ति काय पहिले कहा. अब जीव के उत्थानादि गुणों बताते है. अहो भगवन् ! उत्थान, कर्म, वल, yo सिके पर्यव विविभंगज्ञान के पर्यत्र च ० चक्षुदर्शन के पर्यव अ ० अचक्षुदर्शन के पर्यव ओ ० अव- शब्दार्य ३८४ मूत्र 4. अनुवादक-चालनमचारी मुनि श्री अमोलक अपनी गौतम जी. जीव स. उत्थान सहित जा. यावत् उ० देखाडे व० कहना से वह के. कैसे जा० यावत् व कहना गो० गौतम जी जीव अनंत आ० मतिज्ञान प० पर्यव ए. ऐसे सु० श्रुतज्ञान पर्यव ओ० अवधिज्ञान पर्यव म. मनापर्यवज्ञान पर्यव के. केवलज्ञान के पर्यव ० मतिअज्ञान के पर्यव मु. दर्शन पर्गव के. केवलदर्शन के पर्यव उ० उपयोग का ग० जावे उ० उपयोग लक्षण से से. वह ते. जीवेणं सउट्ठाणे जाव उवदंसेईति वत्तव्वं सिया । सेकेणटेणं जाव वत्तव्वं सिया ? गोयमा! जीवेणं अनंता आभिणियोहियनाणपजवाणं, एवं सुयनाणपजवाणं, ओहिनाण पजवाणं, मणपजवनाणपज्जवाणं केवलणाणपजवाणं, मइअन्नाणपज्जवाणं, सुयअन्नाण पजवाणं विभंगनाणपज्जवाणं, चक्खुदंसणपजवाणं, अचक्खुदसणपज्जवाणं, ओहिदसण वीर्य, व पुरुषात्कार पराक्रम सहित जीव आत्मपरिणाम मे से क्या चैतन्यपना बताता है ! अहो गौतम ! उत्थानादि सहित जीव आत्प्रभाव से चैतन्यपना बताता है. अहो , भगवन् ! किस तरह से उत्थानादि सहित जीव चैतन्यपना बताता है ! अहो गौतम ! जीव अनंत मतिज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधि ज्ञान, मनापर्यय ज्ञान, केवल ज्ञान, मति कज्ञान; श्रुत कज्ञान, विभंग ज्ञान, चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अव- घि दर्शन व केवल दर्शन के पर्यायात्मक चैतना लक्षण को कहा जाता है अर्थात् आत्मभाव में वर्तता * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * -- भावार्थ ३८५ सूत्र A8 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र शब्दार्थी इसलिये एक ऐसा वु० कहाजाता है गो० गौतम जी० जीव स० उत्थानसहित जा. यावत् वः कहना? ॥ ४ ॥ क० कितना प्रकारका भं• भगवन् आ० आकाश गो० गौतम दु० दोपकार का आ०आकाश लो. लोक आकाश अ० अलोक आकाश लो लोकाकाश में किं. क्या जी०जीव जी. जीयदेश जी० जीवमदेशः अ० अजीव अ० अजीवदेश अ० अजीव प्रदेश गो० गौतम जी जीव जी० जीवदेश जी जीवप्रदेश अ० अजीव अ० अजीवदेश अ० अजीव प्रदेश जे. जो जी जीव ते वे नि निश्चय ए० एकेन्द्रिय वे वेइन्द्रिय पजवाणं, केवलदसण पजवाणं, उवओगं गच्छइ, “उवओग लक्खणेणं जीवे” सेतेण?- णं एवं वुच्चइ, गोयमा ! जीवे सउट्ठाणे जाव वत्तव्वं सिया ॥ ४ ॥ कइविहेणं भंते ! आगासे पण्णत्ते ? गोयमा ! दुविहे आगासे प० तं० लोयागासेय, अलोया- गासेय । लोयागासेणं भंते ! किं जीवा, जीवदेसा, जीवपएसा; अजीवा, अजीवदेसा, अजीवपएसा ? गोयमा ! जीवावि, जीवदेसावि, जीव पदेसावि; अजीवावि, अजीव- भावार्थ उपयोग लक्षण बाला जीव कहाता है इससे अहो गौतम ! उत्यानादि सहित जीव आत्म- भाव से चैतन्यपना बताता है ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! आकाश के कितने भेद कहे हैं ? अहो गौतम ! आकाश के दो भेद कहे हैं ? लोकाकाश और २ अलाकाकाश. अहो भगवन् ! लोकाकाश में क्या जीव, जीव के देश, जीव के प्रदेश, व अजीव, अजीव के देश या अजीव के प्रदेश हैं ? अहो गौतम ! BR> मग शतक का दशवा उद्देशा80888 Od शब्दार्थ 0/9 ३८४ सत्र 12 अनुवादक-बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपनी गौतम जी० जीव स० उत्थान सहित जा. यावत् उ० देखाडे ३० कहना से० वह के. कैसे जा० यावत् व. कहना गो० गौतम जी जीव अनंत आ० मतिज्ञान प० पर्यव ए० ऐमे सु. श्रुतज्ञान पर्यव ओ० अवधिज्ञान पर्यव म० मनापर्यवज्ञान पर्यव के वेवलज्ञान के पर्यव म० मतिअज्ञान के पर्यव सु. शुनज्ञान के पर्यव वि विभंगज्ञान के पर्यव च० चक्षुदर्शन के पर्यव अ० अचक्षुदर्शन के पर्यव ओ० अव- दर्शन पर्यव के. केवलदर्शन के पर्यव उ० उपयोग को ग० जावे उ० उपयोग लक्षण से से. वह ते० जीवेणं सउट्ठाणे जाव उवदंसेईति वत्तव्वं सिया । सेकेणटेणं जाव वत्तव्यं सिया ? गोयमा! जीवेणं अनंता आभिणियोहियनाणपजवाणं, एवं सुयनाणपज्जवाणं, ओहिनाण पजवाणं, मणपज्जवनाणपज्जवाणं केवलणाणपजधाणं, मइ.अन्नाणपज्जवाणं, सुयअन्नाण पजवाणं विभंगनाणपजवाणं, चक्खुदंसणपज्जवाणं, अचक्खुदसणपजवाणं, ओहिदसण वीर्य, व पुरुषात्कार पराक्रम सहित जीव आत्मपरिणाम मे से क्या चैतन्यपना बताता है ! अहो गौतय ? उत्थानादि सहित जीव आत्मभाव से चैतन्यपना बताता है. अहो भगवन् ! किस तरह से नत्यानादि सहित जीव चैतन्यपना बताता है ! अहो गौतम ! जीव अनैत मतिज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधि शान, मनापर्यत्र ज्ञान, केवल ज्ञान, मति कज्ञान; श्रुत कज्ञान, विभंग ज्ञान, चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अव. घि दर्शन व केवल दर्शन के पर्यायात्मक चेतना लक्षण को कहा जाता है अर्थात् आत्मभाव में वर्तता * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * শাখা दाथ) भगवन् सूत्र भावार्थ 28 पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भगवती) मूत्र -888 नहीं अ० अधर्मास्ति काय का देश अ० अधर्मास्ति काय का प्रदेश अकाल ॥५॥ अ०अलोकाकाश में भं० कि क्या जी० जीव गो० गौतम नो नहीं जीव जा. यावत् नो० नहीं अजीव प्रदेश ए. एक पंचविहा पण्णंता तंजहा धम्मत्थिकाए, नो धम्मत्थिकायस्स देसे,धम्मत्थिकायस्सपदेसा अधम्मत्थिकाए, नो अधम्मत्थिकायस्स देसे, अधम्मात्थकायरस पदेसा । अदासमए ॥ ५ ॥ अलोयाकासेणं भंते ! किं जीवा पुच्छा तहचेव, गोयमा ! नो जीवा जाव और ५ काल. * ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! अलोकाकाश में क्या जीव, जीव के देश व प्रदेश वगैरह हैं ? अहो गौतम ! अलोकाकाश में जीव, जीव के देश व प्रदेश यावत् अजीव के प्रदेश नहीं हैं परंतु अगुरुलघुभून * अजीव अफपिके सव भीलकर दश भेद किये हैं; उसमेंसे यहां पांचही ग्रहण किये हैं उसका सवव यह है कि यहां पर आकाश आश्रित पृच्छाहै इससे आकाशास्तिकायाका स्कंध, देश व प्रदेश यह तीन नहीं ग्रहण कियाँ मात्र धर्मास्तिकाया व अधर्मास्तिकायाके स्कंधव प्रदेश ग्रहण किये हैं. धर्मास्ति काय व अधर्मास्ति- कायके देश नहीं ग्रहण करनेका सवय यह है कि जब संपूर्ण वस्तुको विवक्षा की जाती है तब धर्मास्तिकाय ऐसाही कहाजायगा और उसके अंशकी विवक्षा करे तब उसके प्रदेश ही ग्रहण किये जायेंगे. क्योंकि ये दोनों अपस्थित हैं इनकी हानि वृद्धि नहीं होतीहै इससे स्कंध व प्रदेश ग्रहण किये गये हैं और देशका प्रतिषेध कियाहै. १-898 दसरा शतकका दशवा उद्देशा gE ३८६ सूत्र 12 अनुवादक- लब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी 802 दार्थ तेश्तेइन्द्रिय च. चतुरेन्द्रिय पं० पंचेन्द्रिय अ० अनिन्द्रिय जे० जो जी जीवदेश ते वे नि निश्चय ए. एकेन्द्रिय देश जा. यावत् अ० अनिन्द्रिय प० प्रदेश जे. जो अ० अजीव ते वे दु० दो प्रकार के पं० प्ररूप ६० रूपी अ० अरूपी जे. जो रू० रूपी ते वे च० चार प्रकार के सं० स्कन्ध खं० स्कन्धर्देश खं० स्कन्ध प्रदेश प० परमाणु पुगल जे. जो अ० अरूपी ते वे पं० पांच प्रकार के ध० धर्मास्तिकाय नो० नहीं घः धर्मास्तिकाय का देश ध० धर्मास्तिकाय काय का प्रदेश अ० अधर्मास्ति काय नो० देसावि,अंजीव पदेसावि । जे जीना ते नियमा एगिदिया,बेइंदिया, तेइंदिया चरिंदिया, पंचिंदिया, अजिंदिया. जे जीवदेसा ते नियमा एगिदियदेसा जाव अगिंदियपदेसा ।। जे अजीवा ते दुविहा पण्णता, तंजहा रुवीय, अरूबीय -। जेरूवी ते चउबिहा पपणचा, तंजहा खंधा, खंधदेसा, खंधपदेसा; परमाणु पोग्गला । जे अरूवी ते लोकाकाश में जीव, जीव के देश, जीव के प्रदेश, अजीव, अजीव के देश व अजीव के प्रदेश हैं. जो जीव वे एकेन्द्रिय, द्रौन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरेन्द्रिय, पंचेन्द्रिय व अनिन्द्रिय हैं. जो जीव के देश हैं वे भी एकेन्द्रिय यायत् अनिन्द्रिय के देश हैं और वैसे ही प्रदेश हैं. अजीव के दो भेद १ रूपी अजीव २ अरूपी अनीव. रूपी अंजीव के चार भेद स्कंध, स्कंध देश, स्कंध प्रदेश व परमाणु पुद्गल. अरूपी अजीव के पांच घेद. १. धर्मास्तिकाय २ धर्मास्तिकाया का प्रदेश, ३ अधर्मास्तिकाय, ४ अधर्मास्तिकाया का प्रदेश * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी पर्य . साथ भगवन् किं. ३८७ सूत्र भावार्थ 8- पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भगवती) मूत्र 3889 नहीं अ० अधर्मास्ति काय का देश अ० अधर्मास्ति काय का प्रदेश अकाल ॥५॥ अ० अलोकाकाश में भं० • क्या जी० जीव गो० गौतम नो नहीं जीव जा. यावत् नो० नहीं अजीव प्रदेश ए. एक पंचविहा पण्णंता तंजहा धम्मत्थिकाए, नो धम्मत्थिकायस्स देसे,धम्मत्थिकायस्सपदेसा अधम्मत्थिकाए, नो अधम्मत्थिकायस्स देसे, अधम्मात्थकायरस पदेसा । अद्धासमए ॥ ५ ॥ अलोयाकालेणं भंते ! किं जीवा पुच्छा तहचेव, गोयमा ! नो जीवा जाव और ५ काल. * ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! अलोकाकाश में क्या जीव, जीव के देशव प्रदेशवगैरह हैं ? अहो गौतम ! अलोकाकाश में जीव, जीव के देश व प्रदेश यावत् अजीव के प्रदेश नहीं हैं परंतु अगुरुलघुभून * अजीव अरुपिके सब मीलकर दश भेद किये हैं; उसमेंसे यहां पांचही ग्रहण किये हैं उसका सवय यह है कि यहां पर आकाश आश्रित पृच्छाहै इससे आकाशास्तिकायाका स्कंध, देश व प्रदेश यह तीन नहीं ग्रहण कियाँ मात्र धर्मास्तिकाया व अधर्मास्तिकायाके स्कंधव प्रदेश ग्रहण कियेहैं. धर्मास्ति काय व अधर्मास्ति- कायके देश नहीं ग्रहण करनेका सवव यह है कि जब संपूर्ण वस्तुको विवक्षा की जाती है तब धर्मास्तिकाय ऐसाही कहाजायगा और उसके अंशको विवक्षा करे तव उसके प्रदेश ही ग्रहण किये जायेंगे. क्योंकि ये दोनों अवस्थित हैं इनकी हानि वृद्धि नहीं होताहै इससे स्कंध व प्रदेश ग्रहण किये गये हैं और देशका प्रतिषेध कियाहै. 83. दुसरा शतकका दशवा उद्देशा 888 ૨૮૮ - अनुवादक-बालग्राचारामुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 शब्दार्थ अ० अजीव द. द्रव्य देश अ० अगुरुलघु अ० अनंत अ० अगुरुरूघु गु० गुण से सं० युक्त स० सर्व आकाश अ० अनंत भाग ऊणा ॥६॥५० धर्मास्तिकाय भं० भगवन् के० कितनी बडी गो० गौतम लो लोक में लो० लोक मात्र लो लोक प्रमाण लो लोक को स्पर्शी लो० लोक को फु०स्पर्श कर चि० रही है एक ऐसे अ० अधर्मास्ति काय लो० लोकाकाश जी० जीवास्ति काय पो० पुद्गलास्तिकाय पं० सूत्र नो अजीवष्पदेसा; एगे अजीवदव्वदेसे अगुरुयलहुए, अणंतेहि, अगुरुय लहुयगुणेहि संजुत्ते, सव्वागासे अणंतभागणे ॥ ६ ॥ धम्मत्थिकाएणं भंते ! के महालए पण्णत्ते ? गोयमा ! लोए, लोयमेने, लोयप्पमाणे, लोयफुडे, लोयंचेत्र फुसित्ताणं, चिट्ठइ ॥ एवं अहम्मत्थिकाए, लोयाकासे, जीवत्थिकाए, पोग्गलात्थकाए पंचविएक्काभिलावा ॥७॥ भावाथ अजीव द्रव्य का एक देश है. क्यों कि संपूर्ण लोकालोक का आकाश मीलकर एक स्कंध होता है और अलोक में मात्र एक अलोकाकाश ही है. इसलिये एक अजीव द्रव्य का देश गिना गया है. यह अनंत वपर्यायग्रूप अगुहलघु स्वभाव सहित है. लोकाकाश की अपेक्षा से अनंत भाग रूप है इस से सब आ- काम के अनंत भाग का बतलाया है ॥ ३ ॥ अब धर्मास्तिकायादि के प्रमाण का प्रश्र पूलते हैं. अहो भगवन् ! धर्मास्तिकाय कितनी बडी है ? अहो मौतम ! धर्मास्तिकाय पंचास्तिकायमय लोक जैसी है, न्टिोक मात्र है, लोफ प्रदेश प्रमाण है, सब लोक के प्रदेश को स्पर्श कर रही है. ऐसे ही अवमास्तिकाय * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी बालाप्रसादजी * ग • पंचङ्ग हिववपण्णात्ति ( भगवती.) सूत्र 8. शब्दार्थ ०१ पांव का ए. एक अ० अभिलाप ॥ ७॥ अ० अधो लोक में भं भगवन् प० धर्मास्निकाय कि कितनी फु० स्पर्शी है सा कुच्छ अधिक अ० अर्ध से फु० स्पर्श ति ति लोक में अ० असंख्यातवे भा० भाग को फु० स्पर्श उ० अर्ध लोक में दे० देशऊणा अ० अर्ध फु० स्पर्शे ॥ ८ ॥ २० रत्नप्रभा पु. पृथ्वी ५० धर्मास्तिकाय किं. क्या सं• संख्यातवे भा० भाग फु० स्पर्श अ० असंख्यातये भाग फु० स्पर्श सं० अहो लोएणं भंते ! धम्मत्थिकायरस केवइयं फुसइ ? गोयमा ! सातिरगं अहं फुसइ॥ तिरिय लोएणं भंते ' पुच्छा ? गोयमा ! असंखेन्नइ भागं फुसइ ॥ उड्डलोएणं भंते ! पुच्छा ? गोयमा : देसूणं अद्धं फुसइ ॥ ८ ॥ इमाणं भंते ! रयणप्पभाणं पुढबी धम्मत्थिकायस्स किं संखेजइ भागं फुसइ, असंखेजइ भागं फुसइ संखेजे भागं फुसइ, असंखेजे भागं फुसइ सव्वं फुसइ ? गोयमा ! णो भावार्थ व लोकासादा का जान !! ७॥ अहो भगान् ! अधोलोक में धर्मास्तिकाय कितनी स्पर्श कर रही है ? अहो गौतम ! आधे से कुछ अधिक धर्मास्तिकाया का विभाग स्पर्श कर रहा है. क्यों कि सब मीलकर चौदह राजु का लोक है; उस में से अयोलोक सात राजु से कुछ अधिक है. अहो भगवन ! ति लोक में कितनी धर्मास्तिकाय स्पर्श कर रही है ? अहो गौतम ! तिर्छा लोक में धर्मास्तिकाय असंख्यातवे भाग स्पर्श कर रही है क्यों कि १८०० योजन का ति/ लोक है. ऊर्भ लोक में धर्मास्तिकाय आधेसे कुछ कम स्पर्श कर रही है क्यों कि सात राजू से कुछ कम ऊर्भ लोक है ॥ ८॥ अहो भगवन् ! दूसरा शतकका दसवा उद्देशा 988 ११ शम्दार्थ ३८८ सूत्र अनुवादक-बालब्रह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 82 अ० अजीव ६० द्रव्य देश अ० अगुरुलघु अ० अनंत अ० अगुरुरूघु गु गुण से सं० युक्त स. सर्व आकाश अ० अनंत भाग ऊणा ॥ ६ ॥ध धर्मास्तिकाय भं० भगवन् के० कितनी वही गो० गौतम लो लोक में लो० लोक मात्र लो• लोक प्रमाण लो लोक को स्पर्शी लो० लोक को फु०स्पर्श कर चि० रही है ए. ऐसे अ० अधर्मास्ति काय लो. लोकाकाश जी जीवास्ति काय पो० पुद्गलास्तिकाय पं० नो अजीवप्पदेसा; एगे अजीवदव्वदेसे अगुरुयलहुए, अणंतेहिं, अगुरुय लहुयगुणेहिं संजुत्ते, सव्वागासे अणंतभागणे ॥ ६ ॥ धम्मत्थिकाएणं भंते ! के महालए पण्णत्ते ? गोयमा ! लोए, लोयमेने, लोयप्पमाणे, लोयफुडे, लोयंचैत्र फुसित्ताणं, चिट्ठइ ॥ एवं अहम्मत्थिकाए, लोयाकासे, जीवत्थिकाए, पोग्गलात्थकाए पंचविएकाभिलावा ॥७॥ भनीय द्रव्य का एक देश है. क्यों कि संपूर्ण लोकालोक का आकाश मीलकर एक स्कंध होता है और अन्योक में मात्र एक अलोकाकाश है। है. इसलिये एक अजीव द्रव्य का देश गिना गया है. वह अनंत पर्यायरूप आगुरुलयु सभाव सहित है. लोकाकाश की अपेक्षा से अनंत भाग रूप है इस से सब आ- काग के अनंत भाग कम बतलाया है ॥ ॥ अब धर्मास्तिकायादि के प्रमाण का प्रश्र पूलते हैं. अहो भगवन ! धर्मास्तिकाय कितनी बडी है ? अहो गौतम ! धर्मास्तिकाय पंचास्ति कायमय लोक जैमी है, ग्योक मात्र है, लोक प्रदेश प्रमाण है, सब लोक के प्रदेश को सर्श कर रही है. एसे ही अथास्तिकाय * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी बालाप्रसादजी भावार्थ *
शब्दार्थ
र० रत्नप्रभा न० तैसे घ० घनोदधि घ० घनवात त० तनुवात ॥ १० ॥ इ० इस २० रत्नप्रभा का उ०
आकाशांतर धधर्मास्तिकाया को कि क्या गो गौतम सं० संख्यात वे भाग को फु० स्पर्श अ० असंख्यात
भाग को फु. स्पर्श गो० गौतम सं० संख्यात वे भाग को फु० स्पर्श नो० नहीं अ. असंख्यात वे भाग
को फु० स्पर्शे नो० नहीं सं०संख्यात भाग को नो नहीं अ.असंख्यात भाग को नोक नहीं समर्व को उ०१७
आकाशान्तर स० सर्व ज० जैसे र० रत्नप्रभा पु० पृथ्वी की व० वक्तव्यता भ० कही ए० ऐसे जा०
तहा घणोदहिघणवायतणुवायाधि ॥ १० ॥ इमीसेणं भंते ! रयणप्पभाए पुढवीए
उवासंतरे धम्मत्थिकायस्स किं संखेजइ भागं फुसइ, असंखेजइ भागं फुसइ ? पुच्छा
गोयमा संखेजइ भागं फुसइ, णो असंखेज्जइ भागं फुसइ, णो रांखेजे,नो असंखेज्जे, नो
सव्व फुसइ. ॥ उवासंतराइं सव्वाइं जहा रयणप्पभाए पुढवीए वत्तश्या भणिया
सूत्र
पंचमांग विवाह पण्णात्ति (भगवती) सूत्र 3382-
1989 दुसरा शतक का दशवा उद्देशा
भावार्थ
जानना. इसी तरह घनवात व तनुगत का जानना ॥ १० ॥ अहो भगवन् ! रत्नममा पृथ्वी के आका•
शान्तरको धर्मास्तिकाया क्या संख्यातवे भाग से स्पर्श कर रही है यावत् सव स्पर्श कर रही है ! अहो
गौतम ! रत्नप्रभा पृथ्वी के आकाशान्तर को धर्मास्तिकाय संख्यातवे भाग से स्पर्श कर रही है. जैसे
रत्नप्रभा पृथ्वी का आकाशान्तर कहा वैसे ही सातवी पृथ्वी तक के सब आकाशान्तर का जानना ॥११॥
शब्दार्थ सून 13 अनुवादक-बालग्राचारी मुनि श्री अमोलक अपनी संख्यात भाग फु० स्पर्शे अ० असंख्यात भाग फु० स्पर्शस० सर्व फु०स्पर्श गो गोतम नो नहीं सं०संख्यातवे भाग फु० स्पर्श अ० असंख्यातवे भाग फु० स्पर्श णो नहीं सं० संख्यान भाग फु० स्पर्शे नो० नहीं अ० असंख्यात भाग फु० स्पर्शे नो० नहीं स० सर्व फु० स्पर्शे ।। ९ ।। इ० इस र० रत्नप्रभा पृथ्वी का प० घनोदधि ध० धर्मास्ति काया को कि० क्या सं० संख्यातवे भाग फु० स्पर्श गो० गौतम ज० जैसे संखेजइ भागं फुसइ, असंखेजइ भागं फुसइ, णो संखेज्जे भागं फुसइ, णो असंखे- जे भागं फुसइ, नो सव्वं फुसइ, ॥ ९ ॥ इमीसेणं मंतें! रयणप्पभाए पुढवीए घणोदही धम्मत्थिकायस्स किं खेजइ भागं फुसइ ? गोयमा ! जहा रयणप्पभाए रत्नप्रभा पृथ्वी को धर्मास्तिकाय क्या संख्यात वे भाग से स्पर्श कर रही है, असंख्यातवे भाग में स्पर्श कर रही है, संख्यात भाग में या असंख्यात भाग में स्पर्शकर रही है या सब स्पर्शकर रही है ! अहो गौतम ! रत्नप्रभा पृथ्वी को धर्मास्तिकाय संख्यातवे भाग से स्पर्शकर नहीं रही है परंतु असंख्यातवे भाम से स्पर्शकर रही है. क्यों कि रत्नप्रभा का पृथ्वी पिंड एक लाख अस्सी हजार योजन का है. संख्यात व असंख्यात भाग में अथवा सव स्पर्शकर नहीं रही है ॥१॥ अहो भगवन् ! रत्नप्रभा पृथ्वी का धनोदाधि को धर्मास्तिकाय क्या संख्यातवे भाग से स्पर्श कर रही है ? अहो गौतम ! जैसे रस्नप्रभा पृथ्वी का कहा मे ही . प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * भावार्थ ३५ 83 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 888 शब्दार्थ १२० रत्नप्रभा त० तैसे घ० घनोदधि घ० घनवात त० तनुवात ॥ १० ॥ इ० इस र० रत्नप्रभा का उ. आकाशांतर धधर्मास्तिकाया को कि क्या गोगौतम सं० संख्यात वे भाग को फु० स्पर्श अ० असंख्यात भाग को फु० स्पर्श गो० गौतम सं० संख्यात वे भाग को फु० स्पर्शे नो० नहीं अ० असंख्यात वे भाग को फु० स्पर्श मो० नहीं संसंख्यात भाग को नो नहीं अ.असंख्यात भाग को नोक नहीं समर्व को उ० आकाशान्तर स० सर्व ज० जैसे र० रत्नप्रभा पु० पृथ्वी की व• वक्तव्यता भ० कही ए. ऐसे जा० सूत्र तहा घणोदहिघणवायतणुवायावि ॥ १० ॥ इमीसेणं भंते ! रयणप्पभाए पुढवीए उवासंतरे धम्मत्थिकायस्स किं संखेजइ भागं फुसइ, असंखेजइ भागं फुसइ ? पुच्छा गोयमा संखेज्जइ भागं फुसइ, णो असंखेजइ भागं फुसइ, णो रांखेजे,नो असंखेज्जे, नो सव्वं फुसइ. ॥ उवासंतराइं सवाई जहा रयणप्पभाए पुढवीए वत्तव्च्या भणिया भावाथे मानना. इसी तरह घनवात व तनुवाल का जानना ॥ १० ॥ अहो भगवन् ! रत्नप्रभा पृथ्वी के आका- शान्तरको धर्मास्तिकाया क्या संख्यातवे भाग से स्पर्श कर रही है यावत् सब स्पर्श कर रही है ? अहो गौतम ! रत्नप्रभा पृथ्वी के आकाशान्तर को धर्मास्तिकाय संख्यातवे भाग से स्पर्श कर रही है. जैसे रत्नप्रभा पृथ्वी का आकाशान्तर कहा वैसे ही सातवी पृथ्वी तक के सब आकाशान्तर का जानना ॥११॥ -> दुसरा शतक का दशवा उद्देशा 8 By० शब्दार्थ अ० अधो स० सातमी नरक ॥ ११॥ ज० जंबूद्वीपादि दी ट्रीप ल० लवण समुद्रादि सं० समुद्र एक ऐसे सो० सौधर्म देवलोक जा. यावत् इ० ईस्त्मागभार पु० पृथ्वी ते वे अ० असंख्यातवे भाभाग को फु० सत्र भावाथा TO अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुाने श्री अमोलक ऋपिजी एवं जाव अहेसत्तमाए॥११॥ जंबूद्दीवाइया दीवा, लवणसमुद्दाइया समुदाएवं सोहम्मे- कप्पे जाव इसिपम्भाए पुढवीए तेसव्वेवि असंखेजद् भागं फुसइ । सेसा पडिसेहे- यव्वा । एवं अधम्मत्थिकाए एवं लोयागासेवि ॥ गाथा ॥ पुढवीउदहिघणतणू । के- जम्बूद्वीप आदि सव द्वीप, लवण समुद्रादि सब समुद्र, सौधर्मादि देवलोक से लेकर बारह देवलोक, नव येयक, पांच अनुत्तर विमान, और ईपत्मागभार पृथ्वी इन सव को धर्मास्तिकाया का असंख्यातवा भाग (स्पर्श कर रहा है परंतु संख्यातवा भाग व संख्यात व असंख्यात भाग में, वैसे ही सब धर्मास्तिकाय स्पर्श कर नहीं रही है. जैसे धर्मास्तिकाय की. वक्तव्यता कही वैसे ही अधस्तिकाया व लोकाकाश का जानना. सात पृथ्वी, सात बनोदधि, सात घनवात, सात तनुवात, वारह देवलोक, नव अवेयक, पांच अनुत्तर विमान, सिद्धशिला इन सब में जो आकाशान्तर है उन को धर्मास्तिकायादि संख्यातवे भाग में स्पर्श कर रहे हैं. पृथ्वी, घनोदधि, घनवात, तनुवात व आकाश इन एकेक के सात २ सूत्र करने से ३५ हुए. बारह देवलोक के वारह, नव ग्रैवेयक के ३, पांच अनुत्तर विमान का ? और सिद्धशिलाका, * प्रकाशक-राजायहादुर लाला मुखदेवसहायनी यालाममादजी * सत्र स्पर्शे से शेप ५० प्रतिपेय एक ऐसे अअधर्मास्तिकाय ए. ऐसे लो० लोकाकाश ॥२॥ १० ॥२॥ प्पागेवेजाणुत्तरासिद्धी संखेजइ भागं अंतरेसु सेसा असंखेजा ॥ बिईयसयरस दसमो उद्देसो सम्मत्ती ॥ २ ॥ १० ॥ विईयं सययं सम्मत्तं ॥ २ ॥ एक मीलकर ५२ हुवे. इन सब के आकाशान्तरको धर्मास्तिकायादिक संख्यातवे भाग से स्पर्शती है. शेप सब के आकाशान्तर को असंख्यातवे भाग से स्पर्शती है. यह दुसरे शतकका दशवा उद्देशा पूर्ण हुना ॥ २॥ १० ॥२॥ भावार्थ x X अ पंचमाङ्ग विवाह पष्णात्ति ( भगवती ) सूत्र 29983> दुसरा शतकका दशवा उद्देशा 9 शब्दार्थ अ० अधो म० सातमी नरक ॥ ११ ॥ ज० जंबूद्वीपादि दी द्वीप ल० लवण समुद्रादि सं० समुद्र ए ऐसे सो० सौधर्म देवलोक जा. यावत् इ० ईस्त्मागभार पु० पृथी ते वे अ० असंख्यातवे भा०भाग को फु० सूत्र भावार्थ - अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी एवं जाव अहेसत्तमाए॥११॥ जंबूद्दीवाइया दीवा, लवणसमुदाइया समुद्दा एवं सोहम्मे- कप्पे जाव इसिपभाए पुढवीए तेसब्वेवि असंखेजइ भागं फुसइ । सेसा पडिसेहे- यव्वा । एवं अधम्मात्थकाए एवं लोयागासेवि ॥ गाथा ॥ पुढवीउदहिघणतणू । क- जम्बूद्वीप आदि सब द्वीप, लवण समुद्रादि सब समुद्र, सौधर्मादि देवलोक से लेकर बारह देवलोक, नव ग्रेवेयक, पांच अनुत्तर विमान, और ईपत्माग्भार पृथ्वी इन सब को धर्मास्तिकाया का असंख्यातवा भाग स्पर्श कर रहा है परंतु संख्यातवा भाग व संख्यात व असंख्यात भाग में, वैसे ही सब धर्मास्तिकाय स्पर्श कर नहीं रही है. जैसे धर्मास्तिकाय की वक्तव्यता कही वैसे ही अधस्तिकाया व लोकाकाश का जानना. सात पृथ्वी, सात घनोदधि, मात धनवात, सात तनुवात, वारह देवलोक, नत्र अवेयक, पांच अनुत्तर विमान, सिद्धशिला इन सब में जो आकाशान्तर है उन को धर्मास्तिकायादि संख्यातवे भाग में स्पर्श कर रहे हैं. पृथ्वी, घनोदधि, घनवात, तनुवात व आकाश इन एकेक के सात २ सूत्र करने से ३५ हुए. पारद देवलोक के बारह, नव ग्रेयेयक के ३, पांच अनुत्तर विमान का ? और सिद्धशिलाका * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालामतादजी * M सत्र * पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 808 ब्दार्थ, में सा. स्वामी स. ममत्रसरण प० परिपदा नि निर्गता प० परिपदा ५० पीछीगई ॥२॥ ते० उस काल ते. उस समय में स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर के दो दूसरे अं० अंतेवासी अ० अग्निभू- ति अ० अनगार गो० गौतम गो० गोत्र से स० सात हाथ ऊंचे जा० यावत् प० पूजते ए. ऐसा व० बोले च० चमर भ० भगवन् अ० असुरेन्द्र अ० असुरराजा के० कितना म० महर्दिक म० महाश्रुतिवन्त म० लेणं २ सामी समोसढे परिसा निग्गच्छइ, परिसा पडिगया ॥ २ ॥ तेणं कालेणं २ समणरस भगवओ महावीरस्स दोच्चे अंतेवासी आग्गभूईणाम अणगारे, गोयम गोत्तेणं सत्तुस्सहे जाब पज्जुवासमाणे एवं वयासी चमेरेणं भंते ! असुरिंदे असुरराया के महिड्डीए,केमहर्जुईए,केमहाबले, के महायसे केमहासोक्खे, के महाणुभागे, भावार्थ नाम की नगरी थी. उस का वर्णन उवयाइ सूत्र में चंपा नाम की नगरी जैसे कहना. उस मोया नगरी की ईशान कीन में नंदन नामक उद्यान था. उस का वर्णन भी उवाइ जैसे जानना. उस समय में श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी ग्रामानुग्राम विचरते उस नंदन उद्यान में पधारे. परिपदा धर्मोपदेश सुनने को आइई और मुनकर पीछीगइ ॥१॥ उस काल उस समय में भगवंत के दूसरे शिष्य गौतम गोत्रीय सात हाथ की अवगाहनावाले अग्निभूति नामक अनगार श्री भावन्त को वंदना नमस्कार यावत् पर्युपासना करते पूछनेलगे कि अहो भगवन् ! चमर नामक असुरका राजा असुरेन्द्र कितनी ऋद्धिवाला है, कितनी युतिवाला है, कितना 29-११% तीसरा शतक का पहिला उद्देशा 988 शब्दार्थ ३९४ सत्र 2. अनुवादक बालग्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 80 ॥ तृतीय शतकम् ॥ के कैसी वि० विकुर्वणा च चमर कि० क्रिया जा० यान स्थि: स्त्री न० नगर पा. लोकपाल अ. अधिपति ई० इन्द्रिय प० परिपदा त० तीसरा स० शतक में द० दशउद्देशा ॥ १ ॥ ते. उस काल ते. उस समय में मो० मोया नाम ही न० नगरी हो० थी व० वर्णनयुक्त ती० उत मो० माया नगरी की प०वाहिर उ०ईशान कोन में नं० नंदन नाम का चे उद्यान होण्या प०वर्णनयुक्त ते उत काल ते उस समय केरिस विउव्वणा, चमर, किरिय, जाणि,त्थि; नगर, पालाया। आहिवइ, इंदिय,परिसा; तइयंमि सए दसुदेस।।। १॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं मोया नाम नयरीहोत्था,वण्णओ,तीसेणं मोयानयरीए बाहिया उत्तर पुरच्छिमे दिसीभाए, नंदणे नामं चेइए होत्था, वण्णओ।तेणंका- दुसरे शतकके अंतिम उद्देशे में अस्तिकायाका स्वरूप कहा. अब इस उद्देशे में जीवास्तिकायका विचार कहते हैं. इस के दश उद्देशे बताते हैं. जिन के नाम ?. चैत्रेय करने की शक्ति व चमरेन्द्र आदि इन्द्रों का अधिकार २ चमर उत्पात अधिकार ३ कायिकादि क्रिया का अधिकार ४ वैक्रेय समुद्यात से देवता यान विकुर्ने सो साधु जाने ५ साधु वाहिर के पुद्गल ग्रहण कर स्त्री आदि के रूप विकुर्वे ६ साधु वाणा- रसी में समुद्घात करके राजगृह का रूप देखे ७ सोम आदि लोकपाल ८ अमुरादि देव के कितने अधि- पति ९ इन्द्रिय का अधिकार १० चमर की परिपदा का अधिकार ॥ १ ॥ उस काल उस समय में मोया * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी घालामसादजी * भावार्थ ७ > पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र शब्दार्थ से उ० युक्त सि० होवे एक ऐसे गो० गौतम च० चमर अ० असुरेन्द्र अ० असुरराजा के. वैक्रय स. समुद्यात स० पूर स. पूरकर सं० संख्यात जो० योजन उ. ऊंचा दं० दंड को नि. निकाले तं०. वह ज० नैसे २० रत्न जा. यावत् रि० रिष्ट अ० यथा वा वादर पो० पुद्गल प० दूरकर अ० यथा . सु. सूक्ष्म पो० पुद्गल प० ग्रहणकरे दो दूनरी वक्त वे वैक्रेग स० समुद्घात से स० पूरे प० समर्थ गो० गौतम च० चमर अ० असुरेन्द्र अ० असुरराजा के केवल कल्प जं० जंबूद्वीप २० बहुत अ० असुरकुमार दे. वानाभी अरगाउत्तासिया एवामेव गोयमा ! चमेरे असुरिंदे असुररायावेउब्धियसमुग्धाएणं सूत्र समोहणइ समोहणइत्ता संखेजाणि जोयणाणि उडदंडं निसिरइतंजहारयणाणं जाव रिट्ठाणं अहा बायरेपोग्गले परिसाडेइ परिसाडेइत्ताअहामहमे पोग्गले परियाइयइ, परियाइयइत्ता दोचंवि वेउब्वियसमग्घाएणं समोहणइ,पभूणं गोयमा ! चमेरे असुरिंदे असुरराया केवलकप्पं भावार्थ चमर नामक असुरेन्द्र वैक्रेय समुद्घात करे. वैक्रेय ममद्घात करके संख्यात योजन का ऊंचा दंड करे. बहुन दलबाला व शरीर जितना चौडा, जीव प्रदेश व कर्म पुद्गलों का समुह बनावे. उस में कर्केतनादि विविध १ यद्यपि कर्केतनादिक रत्नके पुद्गल औदारिक शरीरमय हैं और वक्रेय समुद्घात वैक्रेय पुद्गल ग्रहण करनेसे होतीहै. परंतु यहाँपर रत्नसार पदार्थ होने से कतनादि जैसे पुगलों ऐसा अर्थ लेना. कितनेक ऐसाभी कहते हैं कि उदारिक पने ग्रहण किये पुद्गल वक्रेय पने परिणमते हैं. 32 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा शब्दार्थ सूत्र - अनुवादक-चालनमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 85 लवन्त म० महायशस्वी म० महानुभाग के० कितना प० समर्थ वि विकुर्वणा करने को गो. गौतम च० चमर अ० अरराजा म० महर्दिक जा. यावत् प० महानुभाग से° उन को त० तहां चो० चोत्तीस भ०भुवन स०लक्ष च चौसठं सा०सामानिक स.सहस ता तेत्तीस तासायत्रिंशक जा० यावत वि० विचरते १६ ए. ऐसे म० महर्द्धिक जा. यानत् म० महानुभाग ॥ ३ ॥ प० समर्थ वि० विकुर्वणा करने को से. वह न जैसे जु० युवति को जु० युवान ह० हाथ मे० ग्रहण करे च० चक्र की ना० नाभी अ° आरा केवइयंचणं पभू विकुवित्तए ? गोयमा ! चमरेणं असुरराया माहिड्डीए, जाव महाणु- भागे सेणं तत्थ चोत्तीसाए भवणावास सय सहस्साणं चउसट्ठीए सामाणिय साहस्सीणं, तायत्तीसाए तायत्तीसगाणं जाव विहरइ एवं माहिडीए जाव महाणुभागे ॥ ३॥ एवइयं चणं पभू विकुन्वित्तए । से जहा नामए जुवति जुवणे हत्येणं हत्थं गेण्हेजा, चकरस- पलवाला है, कितना मुखवाला है, कैसा महानुभागवाला है, और किस प्रकार कितने रूप करने को समर्थ है ! अहो गौतम ! चमर नामक असुरेन्द्र महर्द्धिक यावत् महानुभागवाला है. उन को चौतीस लास भुवन, चौसठ हजार सामानिक, और तेत्तीस त्रायात्रंशक ऐसी ऋद्धि है. ॥ ३ ॥ अव इन की चैत्रेय करने की शक्ति बताते हैं. जैसे काम से पीडित कोई युवान पुरुष अपने हस्त से युवति का हस्त पकडे, और जिने चक्र की नाभि को आरे से पूरे अर्थात चक्र की नाभि के छिद्र में आरा डाले ऐसे ही भोगौतम ! * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालामसादजी गर्थ .
सूत्र - पंचमांग विवाह पण्णति ( भगवती ) मूत्र 888 शब्दार्थ से उ० युक्त सि० होवे एक ऐसे गो० गौतम च० चमर अ० असुरेन्द्र अ० असुरराजा ३० वैक्रय सः समुद्यात स. पूरे स. पूरकर सं० संख्यात जो योजन उ ऊंचा दं० दंड को नि निकाले तं०- वह ज. नैसे २० रल जा० यावत् रि० रिष्ट अ० यथा पा० चादर पो० पुद्गल ५० दूरकर भ० यथा . सु. सूक्ष्म पो० पुद्गल प० ग्रहणकरे दो दूनरी वक्त वे वैक्रेग स० समुद्घात से स. पूरे प० समर्थ गो• गौतम च० चमर अ. असुरेन्द्र अ० असुरराजा के केवल कल्प ज० जंबूद्वीप २० बहुत अ० असुरकुमार दे० वानाभी अरगाउत्तासिया एवामेव गोयमा ! चमेरे असुरिंदे असुरराया वेउन्धियसमुग्धाएणं समोहणइ समोहणइत्ता संखेजाणिजोयणाणि उर्दुदंडं निसिरइतंजहारयणाणं जाव रिट्ठाणं अहा बायरे पोग्गले परिसाडेइ परिसाडेइत्ताअहामुहमे पोग्गले परियाइयइ, परियाइयइत्ता दोच्चविवेउब्वियसमग्घाएणं समोहणइ,पभूर्ण गोयमा ! चमेरे असुरिंदे असुरराया केवलकप्पं चमर नामक असुरेन्द्र वैकेय समुद्घात करे. वैक्रेय समुद्घात करके संख्यात योजन का ऊंचा दंड करे. बहुत दलवाला व शरीर जितना चौडा, जीव प्रदेश व कर्म पुद्गलों का समुह बनावे. उस में कतनादि विविध १ यद्यपि कर्केतनादिक रत्नके पुद्गल औदारिक शरीरमय हैं और वक्रेय समुद्घात वैक्रेय पुद्गल ग्रहण करनेसे होतीहै. परंतु यहांपर रत्नसार पदार्थ होने से कतनादि जैसे पुद्गलों ऐसा अर्थ लेनाः कितनेक ऐसाभी कहते हैं कि उदारिक पने ग्रहण किये पुद्गल पैकेय पने परिणमते हैं. 380 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा भावार्थ ३१ सूत्र 42 अनुवादक-वालपमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 82 शब्दायी देव दे देवी से भा० व्याप्त वि० विशेष व्याप्त उ० आच्छादित सं० संयरित फु० प्रगट अ० मीले हुने अ० अवगाहे हुवे क करे अ० अथवा गो० गौतम १० समर्थ च०चमर अ० असुरेन्द्र अ०असुरराजा ति. तिर्छ अ० असंख्यात दी० द्वीप स. समुद्र में ५० बहुत अ० अमुर कुमार दे० देव दे० देवी से आ० व्याप्त वि० विशेष व्याप्त उ. आच्छादित सं० संथरित फु० प्रगट अ० मीले हुरे अ० अवगाहे हुवे जंबुद्दीवं दीवं बहूहिँ असुरकुमारहिं देवेहिं देवीहिय आइण्णं वितिकिण्णं 'उबत्थर्ड संधडं फुडं अरंगाढावगाढं करेत्तए ॥ अदुत्तरंचणं गोयमा पभूणं . चमरे असुरिंदे * असुरराया तिरियमसंखेजे दीवसमुद्दे बहूहिं असुरकुमारहिं देवेहिं देवीहिय आइण्णे वितिकिण्णे उवत्थडे संथडे फुडे अरगाढावगाढे करेत्तए; एसणं गोयमा ! चमरस्स असुरिंदरस असुररण्णो अयमेयारूवे विसंए विसयमेत्ते वुइए । णो चेवणं संपत्तीए प्रकार के पुद्गल ग्रहण करे. उन ग्रहे हुचे पुद्गलों में से निःसार वादर पुद्गलों को दूर करके यथायोग्य सूक्ष्म पुद्गलौ को ग्रहण करे, और वांच्छितरूप बनाने के लिये दूसरी वक्त वैक्रेय समुद्घात करे.. अहो गौतम ! वह चपर नापक असुरेन्द्र अपने रूप से पिकुर्वणा करके संपूर्ण जम्बूद्वीप भरे और बहुत असुर कमार के देवता, देवियों व तथा प्रकारके अन्य भी इच्छित रूप से एक लक्ष योजनका जम्बूदीप व्याप्त होरे, विशेष व्याप्त होगे, क्रीडा से आच्छादित, परस्पर-संधारत, प्रगद, व परस्पर संश्लेषणा युक्त होवे. प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेव सहायनी मालाप्रसादनी * भावार्थ ब्दार्थ B85 पंचमाङ्ग विवाह पण्णति (भगवती) सूत्र 887 क० करे ए. यह गो गौतम च चमर अ० असुरेन्द्र अ० असुर राजा का ए०ऐसारूप निविषय विविषय 00 मात्र बु. कहा णो० नहीं सं० संपत्ति वि० विकुर्वणा की वि० विकुर्वणा करे वि०विकुर्वणा करेगा॥ ४ ॥ जव्यदि भगवन् च चमर अ०असुरेन्द्र अअसुरराजा ए० इतना म० महर्द्धिक जाव्यावन् ए० ऐसे प० विकञ्चिसुवा विकुवंतिवा, विकुन्विस्संतिवा ॥ ४ ॥ जइणं भंते ! चमरे असुरिंदे असुरराया ए महिड्ढाए जाब एवइयं चणं पभू विकुवित्तए चमरस्सणं भंते ! अमु- रिंदस्त असुररण्णो सामाणियदेवा के माहड्डीया जाव केवइयं चणं पभू विकुवित्तए? गोयमा ! चमरस्स असुररणो सामाणिय देवा महिड्डीया जाव महाणुभागा, तेणं तत्थ साणं साणं भवणाणं, साणं साणं सामाणियाणं, साणं साणं अग्गमहिसणं, जावं और भी अहो गौतम ! बहुत असुर के देव व देवियों से तिर्छ असंख्याते द्वीप समुद्र को आकीर्ण करने को यावत् परस्पर संश्लेपणा युक्त बनाने को चमर नामक अनुरेन्द्र समर्थ है. परंतु इतना रूप बनाने की संपत्ति नहीं है. मात्र चमर नामक असुरेन्द्र की इतना क्रेय रूप बनाने की शक्ति है. इतने रूप उोंने अतीत काल में नहीं किये हैं, वर्तमान में नहीं करते हैं और आगामिक में नहीं करेंगे ॥४॥ अहो भगवन् ! जव चमर नामक असुरेन्द्र की इतनी ऋद्धि यावत् इतना वैक्रय रूप करने की शक्ति है तो उनके सामानिक देवकी कितनी ऋद्धि व कितनी शक्ति है अर्थात् वे कितने वैक्रेय रूप करने को शक्तिवंत हैं. Pos तीसरा शतकका पहिला उद्देशा भावार्थ सत्र - अनुवादक-चालयाचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दाथ देव दे देवी से आ० व्याप्त वि० विशेष व्याप्त उ० आच्छादित सं० संयरित फु० प्रगट अ० मीले हुवे अ० अवगाहे हुवे का करे अ० अथवा गो. गौतम प० समर्थ च चमर अ० अमुरेन्द्र अ०असुरराजा ति० तिर्छा अ० असंख्यात दी द्वीप स. समुद्र में व० बहुत अः असुर कुमार दे० देव दे० देवी से आ० व्याप्त वि० विशेष व्याप्त २० आच्छादित सं० संथरित फु० प्रगट अ० मीले हुवे अ. अवगाहे हुवे जंबूहीवं दीवं बहूहिं असुरकुमारेहिं देवेहिं देवीहिय आइण्णं वितिकिण्णं उपत्थडं संधडं फुडं अरगाढावगाढं करेत्तए ॥ अदुत्तरंचणं गोयमा पभूणं . चमरे असुरिंदे असुरराया तिरियमसंखजे दीवसमुद्दे बहूहिं असुरकुमारेहिं देवेहिं देवीहिय आइण्णे वितिकिण्णे उवत्थडे संथडे फुडे अरगाढावगाढे करेत्तए; एसणं गोयमा ! चमरस्स असुरिंदस्स असुररण्णो अयमेयारूवे विसंए विसयमेत्ते बुइए । णो चेवणं संपत्तीए भावार्थ प्रकार के पुद्गल ग्रहण करे. उन ग्रहे हुवे पुद्गलों में से निःसार बादर पुग़लों को दूर करके यथायोग्य सूक्ष्म पुगलों को ग्रहण करे, और वांच्छितरूप बनाने के लिये दूसरी वक्त वैक्रेय समुद्घात करे.. अहो गौतम ! वह चपर नापक असुरेन्द्र अपने रूप से पिकुर्वणा करके संपूर्ण जम्बूद्वीप भरे और बहुत. असुर कमार के देवता, देवियों व तथा प्रकारके अन्य भी इच्छित रूप से एक लक्ष योजनका जम्बूद्वीप व्यास होते; विशेष व्याप्त होतो, कीडा से आच्छादित, परस्पर-संथरित, प्रगट, व परस्पर संश्लेषणा युक्त होवे. प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायनी बालाप्रसादजी * yo - 83 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 3880- ब्दासतः के भ० भुवन सा० स्वतः के सा० सामानिकदेव रा. स्वतः की अ० अग्रमहिपी जा० यावत् दि० दीव्य भो० भोग भुं. भोगवते वि० विचरते हैं ॥ ५ ॥ अः असुरेन्द्र के ता. वायत्रिंशक देन ज. केवलकप्प जंबूद्दीबंदीवं वहहिं असुरकुमारहिं देवेहिं देवीहिय आइण्णं वितिकिण्णं सून उवत्थडं संथडं फुडं अरगाढावगाढं करेत्तए ॥ अदुत्तरं च णं गोयमा ! पभू चमरस्स असुरिंदरस असुररण्णो एगमेगे सामाणियदेवे तिरियमसंखेजे दीव समुद्दे वहूहिं असुर कुमारेहिं देवेहिं देवीहिय आइण्णे वितिकिण्णे उवत्थडे संथडे फुडे अरगाढावगाढे करेत्तए, एसणं गोयमा चमरस्स असुरिंदस्स असुररण्णो एगमेगस्स सामाणिय देवस्स अयमेयारूवे विसए विसयमेत्ते बुइए, णोचवणं संपत्तीए, विकुट्विंसुवा, विकुब्बितिया, विकुब्बिस्संतिवा ॥ ५ ॥ जइणं भंते ! चमरस्स असुरिंदस्स असुररण्णो सामाणिय संपूर्ण जम्बूद्वीप को व्याप्त, विशेष व्याप्त, आच्छादित, यावत् प्रगट करने को शक्तिवंत हैं वैसे ही तिच्छे भावाथे असंख्यात द्वीप समुद्र को व्याप्त यावन् प्रगट करने को शक्तिवंत हैं. अहो गौतम ! चमरेन्द्र के सामानिक का ७मात्र यह विषय कहा परंतु उन को इतनी संपत्ति नहीं होने से उनाने अतीत कालमें इतने वैक्रेय किया नहीं ७ वर्तमानमें करते नहीं हैं. और आगामिकमें करेंगे भी नहीं॥५॥ अहो भगवन! चमरेन्द्र के सामानिक इतने महाईक ... तीसग शतक का पहिला उद्देशा 988-88 + o० P-Txnp *64...
शव्दार्थ ४००. सूत्र < अनुवादक कालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी .. सर्थ वि०विकुर्वजा करने को च० चमरेन्द्र का अ० असुरेन्द्र अा असुर राजा का सा० सामानिक दे० देव के० कितना म० महर्दिक जा० यावत् के० कितना प० समर्थ किरिकुर्वणा करने को गो० गौतम च. चमर के अ• अमुर गना के मा० सागानिक देव म० महर्दिक जा. यावत् म. महानुभाग सा० दिव्वाई भोगभोगाई भुंजमाणा विहरंति, एवं महिड्डीया जाय एवइयंचणं पभू विकु. वित्तए । से जहा नामए जुवइ जुवाणे हत्थेणं हत्थं गेण्हेजा, चक्करसवा नाभी अरया उत्तासिया एवामेव गोयमा ! चमरस्सवि असुरिंदरस असुररण्णो एगमेगे सामाणिए देवे वेउव्चिय समुग्धाएणं समोहणइ २ त्ता जाव दोचंपि वेउन्धिय समुग्धां एणं समोहणइ पभूणं गोयमा ! चमरस्स असुरिंदरस असुररण्णो एगमेगे सामाणिए अहो गौतम ! चमर नामक असुरेन्द्र असुरराजा के सामानिकदेव चमरेन्द्र जैसे महाऋद्धिवंत यावत् महानुभाग वाले हैं. ये अपने २ भान, सापानिक अग्रनहिपो वगैरह के दीव्य सुख भोगवते हुवे रहते हैं. और जिस प्रकार कामने पीडित युवान पुरुष अपने हस्तसे युवती का हस्त ग्रहग करता है, अथवा जैसे चक्रकी नाभी में भारा निरिड रहता है, वैसे ही चमर नामक अमुरेन्द्र के मामानिक देव वैक्रय समुद्घात करे. उस में से निस्तार चादर पुगलों को छोडकर सूक्ष्न पुद्गलों ग्रहण कर इच्छिन रूप बनाने को दनरा बैक्रेय रूप नारे. और अहो गौनर ! वे एक २ सामानिक देव असुर कुमार के बहुन देव देवियों के रूप वनांकर * * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायनी चालापसादनी भावार्थ 516 ..
४०१, सुत्र 88 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 398 शब्दासत के भभुवन सा० स्वतः के सा० सामानिकदव रा. स्वतः की अ० अग्रमहिपी जा० यावत् दि० दीव्य भो० भोग भुं. भोगवते वि० विचरते हैं ॥ ५ ॥ अ. असुरेन्द्र के ता. वात्रिंशक देव ज० केवलकप्पं जंबूद्दरिंदीवं बहहिं असुरकुमारेहिं देवहिं देवीहिय आइण्णं वितिकिण्णं उवत्थडं संथडं फुडं अरगाढावगाढं करेत्तए ॥ अदुत्तरं च गं गोयमा ! पभू चमरस्स असुरिंदस्स असुररण्णो एगमेगे सामाणियदेवे तिरियमसंखेने दीव समुद्दे वहूहिँ असुर कुमारेहिं देवेहिं देवीहिय आइण्णे वितिकिण्णे उवत्थडे संथडे फुडे अरगाढावगाढे करेत्तए, एसणं गोयमा चमरस्स असुरिंदस्स असुररणो एगमेगस्स सामाणिय देवस्स अयमेयारूवे विसए विसयमेत्ते बुइए, णोचवणं संपत्तीए, विकुब्बिसुवा, विकुब्बितिवा, विकुब्धिस्संतिया ॥ ५ ॥ जइणं भंते ! चमरस्स असुरिंदस्स असुररण्णो सामाणिय संपूर्ण जम्बुद्वीप को व्याप्त, विशेष व्याप्त, आच्छादित, यावत् प्रगट करने को शक्तिवंत हैं वैसे ही तिच्छे १०० भावार्थ असंख्यात द्वीप समुद्र को व्याप्त यावन् प्रगट करने को शक्तिवंत हैं. अहो गौतम ! चपरेन्द्र के सामानिक का मात्र यह विषय कहा परंतु उन को इतनी संपत्ति नहीं होने से उनोंने अतीत कालमें इतने चक्रेय किया नहीं वर्तमानमें करते नहीं हैं. और आगामिकमें करेंगे भी नहीं॥०॥ अहो भगवन्! चमरेन्द्र के सामानिक इतने महाईक * ११००१ तीसग शतक का पहिला उद्देशा 988 Heart शब्दार्थ ४००. hd सूत्र tre अनुवादक कालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी समर्थ वि०विकुर्वणा करने को च० चमरेन्द्र का अ० असुरेन्द्र अ.असुर राजा का सा सामानिक दे० देव के कितना म० पहार्दिक जा. यावत् के० कितना प० समर्थ वि रिकुर्वणा करने को गो० गौतम च. चमर के अ० अमुर गजा के मा० सागानिक देव म० महर्दिक जो० यावत् म. महानुभाग सा. दिव्वाई भोगभोगाई भुंजमाणा विहरंति, एवं महिड्डीया जाब एवइयंचणं पभू विकु. वित्तए । से जहा नामए जुवइ जुवाणे हत्थेणं हत्थं गेण्हेजा, चक्करसवा नाभी अरया उत्तासिया एवामेव गोयमा ! चमरस्सवि असुरिंदरस असुररण्णो एगमेगे सामाणिए देवे वेउब्धिय समुग्घाएणं समोहणइ २त्ता जाव दोच्चंपि वेउब्धिय समुग्घा एणं समोहणइ पभूणं गोयमा ! चमरस्स असुरिंदरस असुररण्णो एगमेगे सामाणिए भहो गौतम !चमर नामक असुरेन्द्र असुरराजा के सामानिकदेव चमरेन्द्र जैसे महाऋद्धित यावत् महानुभाग वाले हैं. ये भाने २ भान, सामानिक अग्रनहिपो वर्गरह के दीव्य मुख भोगते हुने रहते हैं. और जिस मकार कामने पीडित युवान पुरुष अपने हस्तसे. युवती का हस्त ग्रहग करना है, अथवा नैसे चक्रकी नाभी में भारा निविड रहता है, वैसे ही चमर नामक असुरेन्द्र के मामानिक देव वैक्रेय समुयात करे, उस में से निस्सार चादर पुद्गलों को छोड़कर सूक्ष्न पुद्गलों ग्रहण कर इच्छिन रूप बनाने को दुनरा वैक्रेय रूप नारे. और अहो गौनर ! वे एक २ सामानिक देव असुर कुमार के बहुन देव देवियों के रूप बनाकर * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्यालाप्रसादनी भावार्थ .'
४०३ 8. पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती.) सूत्र - शब्दार्थ देवी के कितनी म. महर्दिक ज जैसे लो. लोकपाल अ० अवशेप स० वह ए ऐसे भं० भगवन् ॥ ७ ॥ भ० भगवान दो० दुसरा गो० गौतम स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को वं. वंदना कर न० असुररण्णो भंते अग्गमहिसीओ देवीओ के महिट्ठीयाओ जाव केवइयंचणं पभू विउ- वित्तए? गोयमा ! चमरस्सणं असुरिंदस्स असुररण्णो अग्गमहिसीओ देवीओमहिदीयाओ जाव महाणुभागाओ, ताओणं तत्थ साणं साणं भवणाणं, साणं साणं च सामाणिय साहस्सीणं,साणं साणं महत्तरियाणं,साणं साणं परिसाणंजाव महिढीयाओ अण्णं जहा लो- गपालाणं, अपरिससं ॥सेवं भंते २ ! त्ति ॥७॥ भगवं दोच्चे गोयमे समणं भगवं महावीर बंदई नमसइ वंदित्ता नमसइत्ता जेणेव तच्चे गोयमे वायुभूई अणगारे तेणेव उवाग- भावार्थ सकती हैं ? अहो गौतम ! चमरेन्द्र की अग्रमहिपियों महा ऋद्धिवाली यावत् महानुभागवाली हैं. वे अपने २ भुवन, अपने २ सामानिक देव, अपनी २ महत्तरिक देवियों, अपनी २ परिपदा की ऋद्धि- वाली हैं वगैरह लोकपाल जैसे सब अधिकार कहना. इतना सुनकर गौतम गोत्रीय दूसरे गणधर श्री अनिभूति बोले कि अहो भगवन् ! जो आप कहते हैं वह सत्य है. जैमा आपका कथन है वैसा ही वस्तुस्वरूप है ॥७॥ इतना कहकर, श्रीश्रमण भगवंतको वंदना नमस्कार करके अग्निभूतिने तीसरे गणधर गौतम गोत्रीय श्री वायुभूति की पास आकर कहा कि अहो- गौतम ! चमर नामक असुरेन्द्र की ऋद्धि *388 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा PORAN oyo राण्याचा सूत्र ४०२ 13 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी जसे सा० सामानिक त तैसे ण जानना लो लोकपाल त० तैसे न० विशेष सं० संख्यात दी द्वीप स. समुद्र भा० कहना ब० बहुत अ० असुर कुमार से आ० आकीर्ण जा. यावत् वि० विकुर्वणा करेगें ॥६॥ ज० यदि च० चमर के अ. असुरेन्द्र अ० असुर राजाके लोक लोकपालदेव म. महर्दिक अ० अग्रमहिपी देवाए गहिट्ठीया जाव एवइयंचणं पभू विकुन्वित्तए । चमरस्सणं भंते ! असुरिंदस्स असुररण्णो तावत्तीसया देवा केमहिट्ठीया, वत्तीसया जहा सामाणिया तहा णेयवा॥ लोयपाला तहेव, नवरं संखेजा दीवसमुद्दा भाणियव्वा, बहुहिं असुरकुमारेहिं २ आइण्णे जाव विउव्विस्संतिवा॥ ६ ॥ जइणं भंते ! चमरस्स असुरिंदस्स असुररण्णो लोगपाला देवाए महिड्डीए जाव एवइयंचणं पभू विकुवित्तए, चमरस्सणं असुरिंदस्स यावन् महानुभागवाले वैसे ही इतने चक्रेय करने की शक्तिवाले हैं तब एमरेन्द्र के वायत्रिंशक कितने महर्दिक यावत् कितने वैक्रेय करनेवाले हैं. अहो गौतम ! जैसे सामानिक का कहा वैसे ही प्रायशिक का जानना. और इसीतरह लोकपाल का जानना. मात्र इतना विशेप है की इसमें संख्याते द्वीप समुद्र लेना. प्रायविंशक व लोकपाल संख्याते द्वीप समुद्र को असुर कुमार के देव व देवियों में व्याप्त करने को समर्थ हैं ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! जब चमर नामक असुरेन्द्र के लोकपाल इतने महर्दिक यावत् इतने वैक्रेय करने को शक्तिवंत हैं तव चमरेन्द्र की अग्रपहिपियों कितनी ऋदिवाली हैं और कितने रूप क्रेय बना • * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी-* भावार्थ ब्दार्थ पत्र 488 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती.) मूत्र 888 देवी के कितनी म महर्दिक ज. जैसे लो० लोकपाल अ० अवशेप स० वह ए ऐसे भं० भगवन् ॥ ७॥ भ० भगवान दो० दूसरा गो० गौतम स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को वं. वंदना कर न असुररण्णो भंते अगमहिसीओ देवीओ के महिढीयाओ जाव केवइयंचणं पभू विउ- वित्तए? गोयमा ! चमरस्सणं असुरिंदस्स असुररण्णो अग्गमहिसीओ देवीओमहिट्ठीयाओ जाव महाणुभागाओ, ताओणं तत्थ साणं साणं भवणाणं, साणं साणं च सामाणिय साहस्सीणं,साणं साणं महत्तरियाणं,साणं साणं परिसाणंजाव महिढीयाओ अण्णं जहा लो- गपालाणं, अपरिससं । सेवं भंते २ ! त्ति ॥७॥ भगवं दोच्चे गोयमे समणं भगवं महावीर बंदइ नमसइ वंदित्ता नमसइत्ता जेणेव तच्चे गोयमे वायुभूई अणगारे तेणेव उवाग- सकती हैं ? अहो गौतम ! चमरेन्द्र की अग्रमहिपियों महा ऋद्धिवाली यावत् महानुभागवाली हैं. वे अपने २ भुवन, अपने २ सामानिक देव, अपनी २ महत्तरिक देवियों, अपनी २ परिषदा की ऋद्धि- वाली हैं वगैरह लोकपाल जैसे सब अधिकार कहना. इतना सुनकर गौतम गोत्रीय दूसरे गणधर श्री आनिभूति बोले कि अहो भगवन् ! जो आप कहते हैं वह सत्य है. जैमा आपका कथन है वैसा ही पस्तुस्वरूप है ॥७॥ इतना कहकर, श्रीश्रमण भगवंतको वंदना नमस्कार करके अमिभूतिने तीसरे गणधर गौतम गोत्रीय श्री वायुभूति की पास आकर कहा कि अहो- गौतम ! चमर नामक असुरेन्द्र की ऋदि *380988 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा SHRA भावाथे 60 ४०४ 4 अनुवादक-यालयामनारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ नमस्कारकर जे. जहां तक तीसरा गोल गौतम वा० वायुभूनि अ० अनगार ते. तहां उ० आकर त० तीसरा गो गौतम वा. वायुभूति अ० अनगार को एक ऐसा व कहा ए. ऐसे ख.. निश्चय गो. गौतम च० चमर अ० असुरेन्द्र अ० असुर राजा म० महर्दिक तं० उमको ए ऐसे स० सर्व अ० विना पूछे घा० कथन ने० जानना अ. संपूर्ण जा० यावत् अ० अग्रमहिपी घ. वक्तव्यता स० संपूर्ण ॥ ८ ॥ त० तब से०-वह त०. तीसरा गो० गौतम वा० वायुभूति अ० अनगार को दो० दुसरा गो. गौतम अ. अमिभूति अध्अनगार ए०ऐसे आ०कहतेको भायोलते को प०विशेष कहतेको प० प्ररूपते को ए यह अर्थ सन च्छइ २ ता, तचं गोयमं वायुभई अणगारं एवं क्यासी एवं खलु गोयमा ! चमरें असुरिंदे असुरराया ए महिट्ठीए तंचेव एवं सव्वं अपुढे वागरणं नेयव्वं अपरिसेसं जाव अग्गमहिसीणं वत्तव्यया सम्मत्ता ॥८॥ तएणं से तच्चे गोयमें वायुभूई अणगार दोचस्स गोथमरस आग्गिभूयरस अणगारस्स एव माइक्खमाणस्स भासमाणस्स पण्ण- वेमाणस्स पख्वेमाणस्त एयमटुं नो सद्दहइ नो पत्तियइ, नो रोयइ; एयमटुं असदह- भावार्थ यावत् वैफ़ेय करनेकी इतनी शक्ति है. यावत् अग्रनहिपियोंतक का सब अधिकार ऐसा है. इस तरह जैसे भगवन्तने फरमाया था वैसा संपूर्ण अधिकार वायुभूति अनगारको कहा ॥ ८॥ इस तरह अग्निभूतिने जो कहा उस के अर्थ की श्रद्धा, प्रतीति व रुचि वायंभूति अनगार को हुई नहीं और श्रद्धा प्रतीति व रुचि नहीं होने से * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी ।
ब्दार्थ सत्र 238 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती ) सूत्र 82835 नो० नहीं स० श्रद्धा नो नहीं प० प्रतीत हुवा नो० नहीं रो० रुचा उ० स्थान से उ० उठकर ज. माणे, अपत्तियमाणे, अरोएमाणे उट्ठाए उढेइ उट्टेइत्ता, जेणेव समणे भगवं महा- वीरे तेणेव जाव पज्जुवासमाणे एवं वयासी-एवं खलु भंते ! मम दोच्चे गोयमे अ. ग्गिभूई अणगारे एवमाइक्खइ भासइ पण्णवइ परूवइ रूभइत्ता, एवं खलु गोयमा ! चमरे असुरिंदे असुरराया ए महिडीए जाव महाणुभागे. सेणं तत्थ चौत्तीसाए भवणा- वास सयसहस्साणं तंचेव सव्वं अपरिसेसं भाणियव्वं जाव अग्गमहिसीओ वत्तव्या सम्मत्ता ॥ से कहमेयं भंते ! एवं ? गोयमादि समणे भगवं महावीरे तच्चं गोयमं वाउभूई अणगारं एवं वयासी-जण्णं गोयमा ! तब दोच्चे गोयमे आग्गिभूई अणगारे भावाथ अपने स्थान से उठकर श्रमण भगवंत महावीर स्वामी की पास गये. वहां जाकर वंदना नमस्कार यावत् पर्युपामना कर ऐना बोले ओ भगान् ! मुझे दूझर गोतम गोत्रीय अग्निभू ते नामक अनगार ऐसा कहते हैं." यावत् प्ररूपते हैं कि चमर नामक असुरेन्द्र महद्रिक यावत् महानुभागवाले हैं. चौतीस लाख भुवन के so मालीक हैं वगेरह अग्रमहिपियों तक सब मंपूर्ण अधिकार कहा और पूछा कि अहो भगवन् ! यह किम तरह है ? फीर श्रमण भगवंत महावीर स्वामीने वायुभूति अनगार को ऐसा कहा कि अहो गीतप! तुम को दूसरे गौतम गोत्रीय अग्निभूति अनगारने ऐसा कहा कि चपरेन्द्र महर्दिक यावत् महानुभागवाले हैं यावत् १११ तीसरा शतक का पहिला उद्देशा - 48 अनुवादक-यालयामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दार्थ नमस्कारकर जे: जहां तक तीसरा गोल गौतम वा० वायुभूति अ. अनगार ते. तहां उ० आकर त० तीसरा गो० गौतम वा० वायुभूति अ० अनगार को ए० ऐमा व. कहा ए ऐसे ख०. निश्चय गो. गौतम च० चमर अ० असुरेन्द्र अ० असुर राजा म० महद्धिक तं० उमको ए ऐसे स० सर्व अ. विना पूछे चा० कथन ने० जानना अ. संपूर्ण जा. यावत् अ० अग्रमहिपी २० वक्तव्यनात संपूर्ण ॥ ८॥ त० तब से०-वह त० तीसरा गो० गौतम वा वायुभूति अ० अनगार को दो० दुसरा गो गौतम अ० अमिभूति अध्अनगार ए ऐसे आ०कहतेको भायोलते को प०विशेष कहतेको प० प्ररूपते को ए यह अर्थ सुन च्छइ २ त्ता, तच्चं गोयमं वायुभई अणगारं एवं बयासी एवं खलु गोयमा ! चमरे असुरिंदे असुरराया ए महिट्ठीए तंचेव एवं सव्वं अपुटुं वागरणं नेयव्वं अपरिसेसं जाव अग्गमहिसीणं वत्तव्वया सम्मत्ता ॥८॥ तएणं से तच्चे गोयमें वायुभूई अणगार दोचस्स गोथमस्स आग्गियस्स अणगारस्स एव माइक्खमाणस्स भासमाणस्स पण्ण- वेमाणस्स परूवेमाणस्स एयमटुं नो सहहइ नो पत्तियइ, नो रोयइ; एयमटुं असदह- भावार्थ यावत् वैक्रय करनेकी इननी शक्ति है. यावत् अग्राहिपियोंतक का सब अधिकार ऐमा है. इस तरह जैसे भगवन्तने फरमाया था वैसा मंपूर्ण अधिकार वायुभूति अनगारको कहा ॥८॥ इस तरह अग्निभूतिने जो कहा उस के अर्थ की श्रद्धा, प्रतीति व रुचि वायुभूति अनगार को हुई नहीं और श्रद्धा प्रतीति व रुचि नहीं होने से * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * शब्दार्थ सूत्र 1933 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 8s त० तब से वह ततीरा गो० गौतम वा वायुभूति अ. अनगार दो० दूसरा गो. गौतम अ० अग्निभूति य० अनगार की स• साथ जे. जहां स० श्रमण भ. भगवन्त म० महावीर जा. यावत् प० पूजते ए० ऐसे ववोले ज० यदि भ० भगवन् १० चमर अ० असुरेन्द्र अ० असुर राजा म० महर्दिक ना यावत् प०समर्थ वि०विकुर्वणा करने को कवलेन्द्र भं भगवन् व. वैरोचन व वैरोचनराजा के०कितना म० महर्दिक ज० जैसे च०' चमर का त० तैसे ३० वलेन्द्र का ने० जानना ण. विशेष सा० अधिक के० से तच्चे गोयमे वायुभूती अणगारे दोच्चेणं गोयमेणं आग्गिभूइणा अणगारेण सद्धिं जेणेव समणे भगवं महावीरे जाव पज्जुवासमाणे एवं वयासी जइणं भंते चमरे असुरिंदे असुरराया ए महिड्डीए जाव एवइयं च णं पभ विकुवित्तए । वलीणं भंते ! वइरोयणिंदे वइरोयणराया केमहिड्डीए जाव केवइयंचणं पभू विकुवित्तए ? गोयमा ! बलीणं वइरोयणिंदे वइरोयणराया महिड्डीए जहा चमरस्स तहा बलिस्सीच ऐयव्वं की पास गये और वंदना नमस्कार यावत् पर्युपासना कर ऐसा बोले. अहो भगवन् ! चमर नामक असु. रेन्द्र इतना महर्दिक यावत् इतने वैक्रेयरूप करने को शक्तिवंत है तो चलि नामक वैरोचनेन्द्र कितना महर्दिक यावत् कितने वैकेंय करनेको शक्ति त है ? अहो गौतम ! जैसा चमरेन्द्रका कहा वैसा ही वलि नामक वैरोचनेन्द्र का जानना. विशेष इतना कि यह देव देवियों से कुछ अधिक जम्बूद्वीप भरे, शेप सब पूर्वोक्त जैसे » तीसरा शतक का पहिला उद्देशा भावार्थ शब्दार्थी सूत्र ४०६ 4. अनुवादक-नालामचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 जहां म० श्रमण भ० भगन्वत म. महावीर ते. तहां जा० यावत् प० पूजते एक ऐसा व वोले ॥ १ एवमाइक्खइ ४ । एवं खलु गोंयमा! चमरे असुरिंदे असुररायामाहिड्डीए सोचेव सव्वं जाव अग्गमाहसीओ। सच्चेणं एसमटे, अहंपिणंगोयमा! एवमाइक्खामि भासामि पण्णवेमि परूवेमि एवं खलु गोयमा ! चमरे असुरिंदे असुरराया महिडीए सो चेव वि. तिओ गमो भाणियन्वो ! जाव अग्गमहिसीओ सच्चेणमेसअटे, सेवं भंते भंते ! ति तचे गोयमे वायुभूई अणगारे समणं भगवं वंदइ वंदइत्ता जेणेव दोचे गोयमे आग्गि- भूती अणगारे तेणेव; उवागच्छइ उवागच्छइत्ता दोच्चं गोयमं आग्गिभूई. अणगारं वंदइ नमसइ नमसइत्ता, एयमटुं सम्मं विणएणं भुजा भुजो खामेइ. ॥ ९ ॥ तएणं अग्रमाहिपियों नक का सव अधिकार ऐसा है: अहो गौतम ! यह अर्थ सत्य है. और मैं भी ऐसा ही कहता हूं यावत् प्ररूपता हूं. और यह अर्थ भी सत्य है. अहो भगवन् ! आपका वचन सत्य है ऐसा कह- कर वायुभूति अनगार भगवन्त श्री महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार कर अग्निभूति नामक दूसरे गणधर की पास आये आकर दूसरे गणधर श्री अग्निभूति को वंदना नमस्कार कर कहने लगे कि मैंने आप के वचन मुनकर श्रदे नही यावत् आप के वचन की प्रतीति की नहीं इसलिये मैं आपकी पुनः पुनः क्षमा यानता हूँ॥९॥ फीर अग्निभूति अनगार की साथ वायुभूति अनगार श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी * प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी वालाप्रसादनी * 60 ४० 4.33 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 8-8 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा शब्दार्थ त० तब से वह त ती रा गो० गौतम वा० वायुभूति अ• अनगार दो० दुसरा गो. गौतम अ० अग्निभात अ० अनगार की स० साथ जे. जहां स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर जा. यावत् प०१० 0७ पूजते ए. ऐसे व० वोले ज० यदि भं० भगवन् १० चमर अ० असुरेन्द्र अ० असुर राजा म० महर्दिक नाच्यावत् प०समर्थ वि०विकुर्वणा करने को ववलेन्द्र भं भगवन् व वैरोचन व वैरोचनराजा के कितना म० महर्द्धिक ज० जैसे च०' चमर का त० तैसे व० वलेन्द्र का ने जानना ण. विशेष सा० अधिक के० से तच्चे गोयमे वायुभूती अणगारे दोच्चेणं गोयमेणं आग्गिभूइणा अणगारेण सद्धिं सूत्र जेणेव समणे भगवं महावीरे जाव पज्जुबासमाणे एवं वयासी जइणं भंते चमरे असुरिंदे असुरराया ए महिड्डीए जाव एवइयं च णं पभ विकुवित्तए । वलीणं भंते ! वइरोयर्णिदे वइरोयणराया केमहिड्डीए जाव केवइयंचणं पभू विकुवित्तए ? गोयमा ! बलीणं वइरोयर्णिदे वइरोयणराया महिड्डीए जहा चमरस्स तहा बलिस्सति यन्वं भावार्थ की पास गये और वंदना नमस्कार यावत् पर्युपासना कर ऐसा बोले. अहो भगवन् ! चमर नामक असु- रेन्द्र इतना महर्दिक यावत् इतने वैक्रेयरूप करने को शक्तिवंत है तो बलि नामक वैरोचनेन्द्र कितना महर्दिक यावत् कितने वैक्रय करनेको शक्तिवंत है ? अहो गौतम ! जैसा चमरेन्द्रका कहा वैसा ही वलि नामक वैरोचनेन्द्र का जानना. विशेष इतना कि यह देव देवियों से कुछ अधिक जम्बूद्वीप भरे, शेप सब पूर्वोक्त जैसे सूत्र 42 अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 80 शब्दार्थ केवल कल्प नं० जंवृद्वीप भा कहना से शेप तं तैसे णि निर्विशेष णे० जानना णा० नाना प्रकार मा० जानना भ० भवन सा० सामानिक से स. वह ए. ऐसे भं. भगवन् त तीसरे गो० गौतम वा० वायुभूति अ० अनगार वि• विचरते हैं ॥ १ ॥ त तब दो दूसरे गो• गौतम अ. अग्निभूति अ० अनगार स० श्रमण भ० भगवन्त को वं० वंदग कर ए. ऐसा कबोले ज० याद २० वलि व. णवरं साइरेंगे केवलकप्पं जंवृद्दी भाणियव्वं, सेसंतंचव गिरवसेसं णेयत्वं, णवरं णाणत्तं जाणियन्वं, भवणेहिं, सामाणिएहिं सेवं भते. भंते ! ति, तच्चे गोयमे वायुभूती अणगारे जाव विहरइ ॥ १० ॥ तएणं से दोच्चे गोयमे अग्गिभूई अंणगारे सेमणं भगवं महावीरं वंदइ वंदइत्ता एवं वयासी, जइणं भंते ! बली वइरोयर्णिदे वइरो- भावार्थ जानना. बलि नामक वैरोचनेन्द्र को तीस लाख भुवन व साठ सहस्र. सामानिक देवता जानना. अहो भगवन् ! जो आप कहते हैं वैसे ही हैं. इस तरह सुनकर वंदना नमस्कार करके श्री वायभूति अनगार विचरने लगे ॥ १० ॥ पुनः अग्निभूति नामक अनगारने श्रमण भगवंत - महावीर को वंदना नमस्कार करके ऐसा प्रश्न पूछा कि अहो भगवन् ! बलि नामक वैरोचनेंद्र इतना महर्दिक यावत् इतने वैक्रेय रूप करने को समर्थ है तब अहो भगवन् ! धरणेन्द्र नामक नाग कुमारेन्द्र कितना महर्दिक यावत् कितने वैकेय रूप * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालामसादनी * ब्दार्थ - सूत्र 83 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती व० वैरोचनेन्द्र व वैरोचन राजा म० महर्दिक प० समर्थ जा० यावत् वि. विकुर्वणा करने को ध धरणेन्द्र ना० नागकुमारेन्द्र ना० नागकुमार राजा के. कितना म० महर्दिक जा. यावत् के० कितना ५० समर्थ वि० विकुर्वणा करने को गां. गौतम म० महर्दिक जा. यावत् त. तहां चो० चौंवालीस भ. भुवन स० लाख छ० छ सा० सामानिक स. सहस्र ता० तेत्तीस ता. प्रायशिक च. चार लो. लो- यणराया ए महिड्डीए पभू जाब विउम्बित्तए धरणेणं भंते ! नागकुमारिंदे नाग- कुमारराया केमहिड्डीए जाव केवइयं चणं पभ विउन्वित्तए ? गोयमा ! महिट्ठीए जाव सेणं तत्थ चोयालीसाए भवणवाससयसहस्साणं छण्हं सामाणिय साहसीणं, तावत्तीसाए तावत्तीसगाणं चउण्हं लोगपालाणं, छण्हं अग्गमहिसीणं सपरिवाराणं, तिण्हं परिसाणं, सत्तण्हं आणियाणं, सत्तण्हं अणीयाहिबईणं, चउवीसाए आयरक्ख- करने को समर्थ है ? अहो गौतम ! धरण नामक नाग कुमारेन्द्र को ४४ लाख भुवन, छ हजार सामानिकदेव तेचीस प्रायशिक, चार लोकपाल, परिवार सहित छ अग्रमाहिपियों, तीन परिपदा, सात अनिक, सात अ- निक के अधिपति, चौवीस हजार आत्मरक्षक देव और अन्य भी अनेक प्रकार के देवों की ऋद्धि है. और जैसे काम पीडित पुरुप युवती का निरंतर हस्त ग्रहण कर रखता है या गाडे की नाभी में आरा रहता है वैसे ही नाग कुमार रत्नादिक सार एंटूलों को ग्रहण कर त्रेय बनीवे. उस में से बादर पुढलों 8 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा भावार्थ .
८७ ४० सूत्र 20 अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 63 शब्दार्थ कंवल कल्प • जंबूद्वीप भा० कहना से शेप तं० तैसे णि० निर्विशेष णे जानना णा० नाना प्रकार जा• जानना भ० भवन सा० सामानिक से स. वह ए. ऐसे भं• भगवन् त• तीसरे गो० गौतम वा० पायुभूति अ० अनगार वि. विचरते हैं ॥१॥ ततब दो दूसरे गो. गौतम अ. अग्निभूति अ० अनगार स० श्रमण भ० भगवन्त को वं० वंदरा कर एक ऐसा व. बोले ज० याद ३० वलि व. णवरं साइरेगं केवलकप्पं जंबृद्दी भाणियव्वं, सेसंतंचव णिरवसेसं णेयत्वं, णवरं णाणत्तं जाणियन्वं, भवणेहिं, सामाणिएहिं सेवं भंते. भंते! ति, तच्चे गोयमे वायुभूती अणगारे जाव विहरइ ।। १० ॥ तएणं से दोच्चे गोयमे अग्गिभूई अणगारे संमणं भगवं महावरं वेदइ बंदइत्ता एवं वयासी, जइणं भंते ! बली वइरोयर्णिदे वइरो- भावार्थ जानना. बलि नामक वैरोचनेन्द्र को तीस लाख भुवन व साठ. सहस्र. सामानिक देवता जानना. अहो भगवन् ! जो आप कहते हैं, वैसे ही हैं. इस तरह मुनकर वंदना नमस्कार करके श्री वायभूति अनगार विचरने लगे ॥ १० ॥ पुनः अमिभूति नामक अनगारने श्रमण भगवंत महावीर को वंदना नमस्कार करके ऐसा प्रश्न पूछा कि अहो भगवन् ! बाल नामक वैरोचनेंद्र इतना महद्धिक यावत् इतने वैक्रेय रूप करने को ममर्थ है तब अहो भगवन् ! धरणेन्द्र नामक नाग कुपारेन्द्र कितना महर्दिक यावत् किनने वैक्रेय रूप * प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालामसादजी * दार्थ सूत्र 8 पंचङ्ग हिवत्रपण्णात्ति (भगवती) मूत्र 987 दक्षिण का स०. सर्व अ०. अग्निभूति पु० पूछे उ० उत्तर का स० सर्व वा० वायुभूति पु० पूछे ॥१२ ॥ भं० भगवन् ति ऐसे भ० भगवन्त गो. गौतम दो० दूसरा अ० आमिभूति अ० अनगार स. श्रमण भ० भगवन्त को 40 वंदना कर न० नमस्कारकर ए. ऐसे व० बोले ज. यदि भं० भगवन् जो० ज्योतिषी/० राजा म० महर्दिक जा यावत् प० समर्थ वि० विकुर्वणा करने को स० शक्रेन्द्र भं० भगवन् दे. देवेन्द्र दे देव राजा के० कितना म. महद्धिक जा० यावत् के० कितना प० समर्थ वि० विकुर्वणा करने को पुच्छइ, उत्तरिल्ले सन्वे वायुभूई पुन्छइ ॥१२॥ भंतेत्ति भगवं गोयमे दोच्चे आग्गिभूई अणगारे समणं भगवं वंदइ नमसइ नमसइत्ता, एवं वयासी जइ णं भंते ! जोइसिंदे जोइसराया ए महिड्डीए जाव एवइयंचणं पभू विउवित्तए सक्केणं भंते ! देविंदे देवराया के. महिड्डीए जाव केवइयं चणं पभू विकुवित्तए ? गोयमा ! सकेणं देविंदे देवराया माहिठ्ठीए जाव महाणुभागे सेणं बत्तीसाए विमाणावास संय सहस्साणं, चउरासीए आमिभूतिने पूछा है ॥ १२ ॥ पुनः अग्निभूति नामक गणवर प्रश्न करते हैं कि अहो भगवन् ! जब ज्यो- तिषीका इन्द्र इतनी ऋद्धिवाला यावत् इतना वैक्रेय कर सकता है तब शक्रेन्द्र कितनी ऋद्धिवाला यावत् . कितना वैय कर सके ! अहो गौतम ! शकेन्द्र को. बत्तीस लाख विमान, चौरासी हजार सामानिक उस से चौगुने आत्मरक्षक, और अन्य भी परिवार कहा है. वैक्रेय करने की शक्ति वगैरह , चमरेन्द्र जैसे 388 तीसरा शतकका पहिला उद्देशा 44387- भावार्थ पाब्दार्थ फपाल छ. छ अ० अनमहिषी सः परिवार सहित ति तीन प० परिपदा स० सात अनिक स. सात अनिक के अधिपति च० चौवीस आ० आत्मरक्षक देव सा. सहस अ० अन्य जा. यावत् वि०विचरते ई. ॥ ११॥ ए. ऐसे जा. यावत् २० स्थनित कुमार वा० वाणक्यंतर जो ज्योतिषी पं. विशेप दा० सूत्र । 43 अनुवादक-बालबमचारी मुनि श्री अमोलक शार्पनी देव साहस्सीणं, अन्नेसिंच जाव विहरइ, एवइयंचणं पभू विउन्वित्तए । से जहा नामए जुबइ जुवाणे जाव पमू केवलकप्पं जंबूद्दीवं दीवं जाव तिरिय संखजे दीव समुद्दे वहूहि नाग कुमारीहिं जाव विउविस्संतिवा । सामाणिय तावत्तीस लोगपाल, अगमहिसीओय तहेव जहा चमरस्स णवरं संखेजे दीवसमुद्दे भाणियव्यं ॥११॥ एवं जाव थणियकुमारा ॥ वाणमंतर जोइसियावि, णवरं दाहिणिल्ले सव्वे आग्गिभूई को छोडकर दूसरी वक्त वैकेय धनावे और एक लाख योजन का जन्बूदीप यावत् तिर्ने संख्याते द्वीप समुद्र को देव देवियों के नविनरूप बनाकर भर देवे. इनके सामानिक, प्रायशिक, लोकपाल व अग्रमाह- पियों का चमरेन्द्र जैसे जानना. इस में संख्यात द्वीप समुद्र पूरे उतने वैक्रेयरूप बनाने की शक्ति है वैसा कहना ॥१॥ ऐसे ही शेप सब भुक्नपति वाणव्यंतर व ज्योतिपि का जानना.. इस में इतना अधिक जानना कि उतर दिशाके देवता संबंधी प्रश्न वायुभूतिने पूछा है और दक्षिण दिशा संबंधी सब प्रश्न * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी वार्थ - - २७ OYO 4 -- 88 पंचङ्ग हिववपण्णात्ति (भगवती) सूत्र 2.38 दक्षिण का स सर्व अ० अग्निभूति पु० पूछे उ० उत्तर का स. सर्व वा वायुभूति पु० पूछे ॥१२॥ भं० भगवन् ति ऐसे भ० भगवन्त मो० गौतम दो० दूसरा अ० आमिभूति अ० अनगार स० श्रमण भ० भगवन्त को 40 वंदना कर न० नमस्कारकर एक ऐसे व० बोले ज. यदि भ० भगवन् जो० ज्योतिषी राजा म० महदिक जा. यावत् प० समर्थ वि० विकुर्वणा करने को स० शकेन्द्र भं० भगवन् दे० देवेन्द्र दे देव राजा के कितना म० महर्द्धिक जा. यावत् के० कितना प० समर्थ वि० विकुर्वणा करने को पुच्छइ, उत्तरिल्ले सव्वे वायुभूई पुच्छइ ॥१२॥ भंतेत्ति भगवं गोयमे दोचे आग्गिभूई अणगारे समणं भगवं वंदइ नमसइ नमसइत्ता, एवं वयासी जइ णं भंते ! जोइसिंदे जोइसराया ए महिड्डीए जाब एवइयंचणं पभू विउवित्तए सक्केणं भंते ! देविंदे देवराया के. महिड्डीए जाव केवइयं चणं पभ विकुञ्चित्तए ? गोयमा ! सकेणं देविंदे देवराया माहिडीए जाव महाणुभागे सेणं बत्तीसाए विमाणावाल संय सहस्साणं, चउरासीए अनिभूतिने पुछा है ॥ १२ ॥ पुनः अग्निभूति नामक गणर प्रश्न करते हैं कि अहो भगवन् ! जब ज्यो- तिपीका इन्द्र इतनी ऋद्धिवाला यावत् इतना वैक्रेय कर सकता है. तब शकेन्द्र कितनी ऋद्धिवाला यावत् कितना वैय कर सके ? अहो गौतम ! शकेन्द्र को बत्तीस लाख विमान, चौरासी हजार सामानिक उस से चौगुने आत्मरक्षक, और अन्य भी परिवार कहा है. वैक्रेय. करने की शक्ति वगैरह चमरेन्द्र जैसे 2018 तीसरा शतकका पाहिला उद्देशा 48 भावार्थ ४१२ का अनुवादक-लिब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक पीजी शध्दार्थ गो. गौतम स• शुक्रेन्द्र दे० देवेन्द्र दे. देवराजा म. महर्द्धिक जा. यावत् म महानुभाग २० वत्तीस वि० विमान स० लक्षच० चौरासी सा० सापानिक सा. सहस्र जा. यावत् च. चार च० चौरासी आ० आत्मरक्षक सा० सहस्र अ० अन्य जा० यावत् वि. विचरते हैं ॥ १३ ॥ ज० यदि भ० भगवन् स. शफ़ दे. देवेन्द्र दे० देवराजा म० महर्दिक जा. यावत् प० समर्थ वि० विकुर्वणा करने को दे. देवानुप्रिय का अं• अंतेवासी ती• तिष्यक अ० अनगार प० प्रकृति भद्रिक जा० यावत् वि. विनीत छ । सामाणिय साहस्सीणं, जाव चउण्हं चउरासीणं आयरक्खदेव साहस्सीणं अण्णसिंच जाब विहरइ, ए महिढीए, जाव केवइयं चणं पभू विकुम्वित्तए, एवं अहेव चमरस्स तहेव भाणियवं, णवरं दोकेवलकप्पे जंबूद्दीवे दीवे, अवसेसं तंचेव एसणं गोय- मा ! सकारस देविंदस्स देवरण्णो इमेयारूवे विसए विसयमेत्ते बुइए णो चेवणं संपत्तीए, विकुन्विंसुवा, विकुव्वइवा, विकुन्विरसंतिरा, ॥ १३ ॥ जइणं भंते ! कहना परंतु बहुत देव. देवियों के रूप व अन्य अनेक प्रकार के रूप से दो जम्बूद्वीप संपूर्ण भर देवे इतनी शक्ति है परंतु संपत्ति नहीं है. ऐसा किसीने किया नहीं है, करते नहीं हैं और करेंगे भी नहीं ॥ १३॥ भहो भगान् शक्रेन्द्र ऐसी ऋद्धिवाले यावत् इतना वैक्रेय रूप करने को शक्तिवंत हैं तब आपका अंतेवासी महनिभद्रिक यावत् विनीत तिष्यक नामक अनगार निरंतर छठ छठ के तप से आत्मा को भावते हुवे * प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालाप्रसादजी.
389 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ते (भगवती ) सूत्र <agr> शब्दार्थ छठ भक्त से अ० अंतर रहित त० तप कर्म से अ० आत्मा को भा० भावने हुवे व बहुत ५० प्रतिपूर्ण अ आठवर्प सा० दीक्षा पर्याय पा० पालकर मा० मासकी सं० संलेखना से अ० आत्मा को झू झूसकर स-साठ भक्त अ० अनशन छे छेदकर आआलोच कर प. प्रतिक्रमणकर स० समाधि प्राप्त का काल के अवसर में का० काल करके सो० सौधर्म देवलोक में स० अपने वि. विमान में उ० उपपात सक्के देविंदे देवराया ए महिढीए जाब एवइयं चणं पभूविकुवित्तए एवं खलु देवा- णुप्पियाणं अंतेवासी तीसएनामं अणगारे पगइभदए जाव विणीए छटुं छटेणं आणि- क्खित्तेणं तवो कम्मेणं अप्पाणं भावेमाणे बहुपडिपुण्णाई अट्ट संवच्छराई साम- प्रणपरियागं पाउणित्ता, मासियाए सलेहणाए अपाणं झूसित्ता, सठिभत्ताई अण- सणाए छेदित्ताई अणसणाए छेदित्ता, आलोइय पडिवांते समाहिपत्ते कालमासे का- भावार्थ पूर्ण आठ वर्ष तक साधु की पर्याय पालकर, एक मास की संलेखना से आत्मा को झोंस कर, साठ भक्त अनशन करके, आलोचना प्रतिक्रमण करके समाधि प्राप्त हुए; और काल के अवसर में काल करके सौ- धर्म देवलोक में तिष्यक नामक विमान में उपपात सभा की देवशैय्या में देव दृष्य वस्त्र नीचे अंगुल के असंख्यातवे भाग प्रमाण की अवगाहना से शक्रेन्द्र देवेन्द्र के सामानिक देवतापने उत्पन्न हुए; वहां उत्पन्न होकर आहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति, इन्द्रिय पर्याप्ति, वासोश्वास पर्याप्ति व भाषा मन पर्यामि ऐसी पांच 393 तीसरा शतकका पहिला उद्देशा --- 60 DYC ५७ ४१२ * अनुवादक- लिब्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी 87 वादार्थ गो० गौतम स. शक्रेन्द्र दे. देवेन्द्र दे देवराजा म. महर्द्धिक जा. यावत् म. महानुभाग २० वत्तीस वि० विमान स० लक्ष च० चौरासी सा० सामानिक सा. सहस्र जा. यावत् च० चार च० चौरासी आ० आत्मरक्षक सा० सहस्र अ० अन्य जा० यावत् वि. विचरते हैं ॥ १३ ॥ ज० यदि भ० भगवन् म. शक्र दे० देवेन्द्र दे० देवराजा म महर्दिक जा. यावत् प० समर्थ वि० विकुर्वणा करने को दे. देवानुप्रिय का अं० अंतेवासी ती० तिष्यक अ० अनगार प० प्रकृति भद्रिक जा० यावत् वि० विनीत छ० सामाणिय साहस्सीणं, जाव चउण्हं चउरासीणं आयरक्खदेव साहस्सीणं अण्णसिंच सूत्र जाब विहरइ, ए महिढीए, जाव केवइयं चणं पभू विकुन्वित्तए, एवं अहेव चमरस्स तहेव भाणियब्ध, णवरं दोकेवलकप्पे जंबूद्दीवे दीवे, अवसेसं तंचेव एसणं गोय- मा ! सकारस देविंदस्स देवरपणो इमेयारूवे विसए विसयमेत्ते बुइए णो चेवणं संपत्तीए, विकुबिसुवा, विकुब्वइवा, विकुब्धिस्संतिरा, ॥ १३ ॥ जइणं भंते ! कहना परंतु बहुत देव देवियों के रूप व अन्य अनेक प्रकार के रूप से दो जम्बूद्वीप संपूर्ण भर देवे इतनी शक्ति है परंतु संपत्ति नहीं है. ऐसा किसीने किया नहीं है, करते नहीं हैं और करेंगे भी नहीं ॥ १३ ॥ भहो भगान् शफ़ेन्द्र ऐसी ऋद्धिवाले यावत् इतना वैक्रेय रूप करने को शक्तिवंत हैं तब आपका अंतेवासी, मतिभद्रिक यावत् विनीत निप्यक नामक अनगार निरंतर छठ छट के तप से आत्मा को भावते हुवे *प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालाप्रसादजी 8? सूत्र 33 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 8.88 शब्दार्थ मनःपर्याप्ति तं तब ती तिष्यकदेव को पं० पांच प्रकार की प०पर्याप्ति के प०पर्याप्तिके भाव को, गगये हुचे सा० सामानिक प० परिपदा में उ० उत्पन्न हुवे दे० देव क० करतल ५० जोडकर द० दशनख सि० शिर्पसे आ० आवर्तन म० मस्तक से अं० अंजली करके ज० जय वि० विजय मे १० बधाकर एक ऐसा दिव्वादेवजुत्ती, दिव्वे देवाणुभावे, लढे पत्ते आभिसमण्णागए जारिसाणं देवाणुप्पि- एहिं दिव्या देविड्डी, देवजुत्ती, दिव्वे देवाणुभावे लढे पत्ते आभिसमण्णागए, तारि- सियाणं सकेणं देविदेणं देवरण्णो दिव्वादेविट्ठी जाव आभिसमण्णागया,जारिसिणं सकेगंदेविं देणं देवरण्णो दिव्यादेविढि जाव आभिसमण्णागया, तारिसियाणं देवाणुप्पिएहि दिवा- देविठ्ठी जाव आभिसमण्णागया सेणं भंते तीसए देवे के महिडीए जाव केवइयं चणं पभू विकुन्वित्तए ? गोयमा ! महिढीए जाव महाणुभागे, सणं तत्थ सयरस विमाणस्स चउण्हं सामाणिय साहस्सीणं चउण्ह अग्गमहिसीणं तिण्हं परिसाणं, सत्तण्हं अणियाणं, सत्तण्हं अणियाहिवईणं, सोलसण्हं आयरक्खदेव साहस्तीणं, अण्णसिंच बहूणं वेमाणियाणं देवाणय जाव विहरइ, ए महि भावार्थ वगैरह है वैसे ही आप को है. अहो भगवन् ! ऐसा तीसक नामक देवता कितनी ऋद्धियाला यावद कितने रूप क्रेय करने का समर्थ है ? अहो गौतम ! वह अपने विमान चार हजार सामानिक देवता, चार अग्रमहिपियों, तीन परिपदा, सात अनिक, सात अनिक के अधिपति, मोलह हजार आत्म- 4. तीसरा शतक का पहिला उद्देशा 88 oyo शब्दार्थ ४१. सत्र 43 अनुवादक-वालब्रह्मचारी मुनि श्री अमालक ऋपिजी-87 सभा में दे० देवशय्या देवदृष्य के अंतर में अं• अंगुल के अ० असंख्यातवे भा० भाग मात्र ओ. अवगाहना स० शक्रेन्द्र के दे. देवेन्द्र दे० देवराजा के सा० सामानिक दे. देवपने उ० उत्पन्न हुवा त० गवती० तिष्यकदेव अ० तुर्त का उ० उत्पन्न हुवा पं० पांच प्रकार की प० प्रर्याप्ति से प० प्राप्ति भाव को ग० जावे आ० आहार पर्याप्ति स० शरीर इं० इंन्द्रिय · आ० श्वासोश्वास पर्याप्ति भा० भाषा लंकिच्चा सोहम्मे कप्पे सयंसि विमाणसि उववायसभाए देवसयाणिज्जास देवदृसंतरिए अगुलरस असंखेज भागमेत्तीए ओगाहणाए, सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो सामाणिय देवत्ताए उववणे ।तएणं तीसए देवे अहुणोव वण्णमेत्ते समाणे पंचविहाए पज्जुत्तीए पजत्ति भावं गच्छइ तंजहा आहारपजत्ती सरीर इंदिय आणापाणपजत्तीए, भासामणपज्जत्तीए। तएणं तं तीसयं देवं पंचविहाए पजत्तीए पजत्तभावं गयं समाणं सामाणिय परिसोव वण्णया देवया करयल परिग्गाहयं दसनहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिं कटु जएणं विजएणं वढावेइ बढावेइत्ता एवं वयासी अहोणं देवाणुप्पिएहिं दिव्यं देविट्ठी, पर्याप्ति से पर्याप्त बने. उन पर्याप्त बने हुवे देव को सामानिक परिपदावाले देवोंने इस्तद्वय जोडकर दश नख एकत्रित करके मस्तक को आवर्तन करके " " जय-विजय" शब्दों से वधाये. वधाकर ऐसा बोले अहो ! आप देवानुपिय को दीव्य देव ऋद्धि, देवाति, व देवानुभाव प्राप्त हुवा है. जैसे आप को दीन्यदेव ऋद्धि, द्युति व महानुभाव है वैसे ही शक्रेन्द्र को है; और जैसे शक्रेन्द्र को दीव्य देवे ऋद्धि कांति * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ ayu 388 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 887 शब्दार्थ मन:पर्याप्ति तं. तब ती तिष्यकदेव को पं० पांच प्रकार की प०पर्याप्ति के प०पर्यासिके भाव को, गगये हुवे सा० सामानिक प० परिपदा में उ० उत्पन्न हुने दे० देव क० करतल ५० जोडकर द० दशनख सि० शिर्षसे आ० आवर्तन म० मस्तक से अं० अंजली करके ज. जय वि. विजय मे व०वधाकर एक ऐसा सूत्र दिव्वादेवजुत्ती, दिव्वे देवाणुभावे, लढे पत्ते आभिसमण्णागए जारिसाणं देवाणप्पि- एहिं दिवा देविड्डी, देवजुत्ती, दिवे देवाणुभावे लम्हे पत्ते आभिसमण्णागए, तारि- सियाणं सक्केणं देविदेणं देवरण्णो दिव्वादेविट्ठी जाव आभिसमण्णागया,जारिसिणं सकेणं देविं देणं देवरण्णो दिव्वादेविढि जाव आभिसमण्णागया, तारिसियाणं देवाणुप्पिएहिं दिव्या- देविट्ठी जाव आभिसमण्णागया सेणं भंते तीसए देवे के महिड्डीए जाव केवइयं चणं पभू विकुवित्तए ? गोयमा ! महिड्डीए जाव महाणुभागे, सेणं तत्थ सयरस विमाणस्स चउण्हं सामाणिय साहस्सीणं चउण्हं अग्गमहिसीणं तिण्हं परिसाणं, सत्तण्डं अणियाणं, सत्तण्हं अणियाहिवईणं, सोलसण्हं आयरक्खदेव साहस्सीणं, अण्णेसिंच बहूणं वेमाणियाणं देवाणय जार विहरइ, ए महि भावार्थ वगैरह है वैसे ही आप को है, अहो भगवन् ! ऐसा तीसक नामक देवता कितनी ऋद्धिवाला यावत् कितने रूप वैक्रेय करने को समर्थ है ? अहो गौतम ! वह अपने विमान चार हजार सामानिक देवता, चार अग्रमाहिपियों, तीन परिषदा, सात अनिक, सात अनिक के अधिपति, सोलह हजार आत्म- 28 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा GYO शब्दार्थ सूत्र 43 अनुवादक-वालपमचारी मुनि श्री अमालक ऋपिजी सभा में दे० देवशय्या में दे देवष्य के अंतर में अं• अंगुल के ० असंख्यातवे भा० भाग मात्र ओ. अवगाहना स. शक्रेन्द्र के दे. देवेन्द्र दे देवराजा के सा० सामानिक दे० देवपने उ० उत्पन्न हुवाई त० तव ती० तिष्यकदेव अ० तुर्त का उ० उत्पन्न हुवा पं० पांच प्रकार की प० पर्याप्ति से ५० प्राप्ति भाव को ग० जावे आ० आहार पर्याप्ति स० शरीर इं० इन्द्रिय · आ० श्वासांश्वास पर्याप्ति भा० भापा लंकिचा सोहम्मे कप्पे सयंसि विमाणसि उववायसभाए देवसयाणिजांसि देवदूसंतरिए अगुलरस असंखेज भागमेत्तीए ओगाहणाए, सकस्स देविंदरस देवरण्णो सामाणिय देवत्ताए उववण्णे ।तएणं तीसए देवे अहुणोव वण्णमेत्ते समाणे पंचविहाए पज्जुत्तीए पज्जत्ति भावं गच्छई तंजहा आहारपज्जत्ती सरीर इंदिय आणापाणपज्जत्तीए, भासामणपजत्तीए। तएणं तं तीसयं देवं पंचविहाए पजत्तीए पजत्तभावं गयं समाणं सामाणिय परिसोव वण्णया देवया करयल परिग्गाहियं दसनहं सिरसावत्तं मत्थए . अंजलिं कटु जएणं विजएणं वढावेइ वडावेइत्ता एवं वयासी अहोणं देवाणुप्पिएहिं दिव्वं देविट्ठी, पर्याप्ति से पर्याप्त बने. उन पर्याप्त बने हुने देव को सामानिक परिषदावाले देवोंने इस्तद्वय जोडकर दश नख एकत्रित करके मस्तक को आवर्तन करके " जय-विजय" शब्दों से वधाये. वधाकर ऐसा बोले अहो ! आप देवानुपिय को दीव्य देव ऋद्धि, देवद्युति, व देवानुभाव प्राप्त हुया है. जैसे आप को दीव्यदेव ऋद्धि, द्युति व महानुभाव है वैसे ही शक्रेन्द्र को है; और जमे शक्रेन्द्र को दीव्य देव ऋद्धि कांति * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी बालाप्रसादजी वार्थ सत्र 85 पंचमांग विवाह दण्गत्ति ( भगवती) मूत्र 885 समर्थ वि० विकुर्वगा करने को स० शक के अ० अशेप सा० सामानिक दे० देव के कितने म० महर्दिक त० तैसे स० सर्व जा. यावत् ए० यह गो• गौतम स० वह ए. ऐसे ० भगवन् तिः ऐसे दो० दूसरे गो० गौतम जा० यावत् वि. विचरते हैं ॥ १५ ॥ भं० भगवान त० तीसरा गो० गौतम वा० वायुभूति अ० अनगार स० श्रमण भ० भगवन्त जा० यावत् एक ऐसा व० बोले ज० यदि भं• भगवन स० शक्र दे० देवेन्द्र दे० देवराजा जा. यावत् प० समर्थ वि. विकुर्वणा करनेको ई० ईशान दे देवेन्द्र दे. विसए विसयमेत्ते बुइए णोचेवणं संपत्तीए विकुव्रिसुवा ३ तावत्तीसया, लोगपाला, अग्गमहिसीणं, जहेव चमरस्स गवरं दो केवलकप्पे जंबूद्दीवे दीवे अण्णं तंचेव ॥ सेवं भंते भंते त्ति दोच्चे गोयमे जाव विहरइ ॥ १५ ॥ भंते ति भगवं तच्चे गोयमे वायुभूती अणगारे समणं भगवं जाव एवं वयासी जइणं भंते ! सके देविंदे देवराया जाव माढीए एवइयं चणं पभू विकुवित्तए । ईसाणेणं भंते ! देविंद देव- शक, लोकपाल, अग्रमहिपी का अधिकार चपरन्द्र जैसे कहना. परंतु ये दो जम्बूदीर चक्रेय रूप से भरने को समर्थ हैं. अहो भगवन् ! आपके वचन वैसे ही हैं ऐसा कहकर निभूति अनगार विचरने ate लगे ॥ १५ ॥ अव वायुभूति नामक अनगार श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार कर ऐसे बोले कि अहो भगवन् ! जब शकेन्द्र इतनी ऋद्धिवाले हैं यावत् इतने रूप क्रेय कर सकते हैं तब ईशा- 388-8 तीसरा शतकका पहिला उद्देशा 9883030 भावार्थ OY0 शब्दार्थ सूत्र 4.3 अनुवादक-बालब्रह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 व० वोले अ० अहो दे देवानुप्रिय दिग्दीव्य दे० देवऋद्धि दे. देवधुति दिदीव्य देवानुभाव ल लब्ध प. प्राप्त अ० सन्मुख हुवे ॥ १४ ॥ ज० यदि भं० भगवन् ती० तिप्यक्रदेव ममहर्द्धिक जा० यावत् म. ट्ठाए जाव एवइयं चणं पभू विकुन्धित्तए, से जहानामए जुबइ जुवाणे हत्थे गेण्हेजा, जहेव सक्करस तहेब जाव एसणं गोयमा ! तीसयरस देवस्स अयमेयारूवे विसए विसयमेत्ते वुच्चइ, नो चेवणं संपत्तीए विकुविसुवा ३ ॥ १४ ॥ जइणं भंते तीसए देवे महिढीए जाव एवइयंचणं पभू विकुन्वित्तए । सकरसणं भंते ! दविंदस्स देवरण्णो अवसेसा सामाणिया देवा के महिढीया तहेव सव्वं जाव एसणं गोयमा ! सकस्स देविंदस्स देवरण्णो एगमेगस्स सामाणियस्स देवस्स इमेयारूवे. रक्षक देव, और वहुतं अन्य देवता का स्वामी है और वैय करने की शक्ति शक्रेन्द्र जितनी है. यह मात्र विषय परंतु इननी संपत्ति नहीं है ॥ १४ ॥ अहो भगवन् ! जब तिष्यक नामक देवता इतना मह- दिक यावत् इतने चक्रेय रूपं करने को शक्तिवंत है तब अन्य सामानिक देव कितने महर्दिक यावत् कितने चक्रेय रूप करने को समर्थ हैं ! अहो गौतम ! शक्रेन्द्र के एक २ सामानिक देव तिप्यक देव जितनी ऋद्धिवाले हैं. और वैकेय का विषय तीप्यक देव जितना है परंतु इतनी संपत्ति नहीं है. इतने रूप अतीत काल में किये नहीं, वर्तमान में करते नहीं हैं और आगामिक में करेंगे नहीं. उन के त्रायात्र. * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालामसादगी भावार्थ * ७ ४२१ सूत्र भावार्थ 8983 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र dase ब्रह्मदेवलोक ण. विशेप अ० आठ ए. ऐसे लं. लंतक ण. विशेष सा० अधिक अ० आठ के. संपूर्ण म० महाशुक्र सो० सोलह स. सहसार में ना० अधिक सो० सोलह एक ऐसे पा० सणंकुमाराओ आरह उवरिल्ला, लोगपाला सव्वेवि असंखेज्जे दीवसमुद्दे विकुव्वति एवं माहिदेवि, णवरं साइरेगे चत्तारि केवलकप्पे जंबूहीवे दीवे एवं बंभलोएवि, णवरं अट्ठकप्पे ॥ एवं लंतएवि, णवरं साइरेगे अट्ठ केवलकप्पे महासुक्के सोलस व अन्यदेव हैं. + ऐसेही इनके सामानिक देव, त्रायत्रिंशक, लोकपाल व अग्रमाहपियों असंख्यात द्वीप समुद्र चक्रेय रूप से भरने को समर्थ हैं. माहेन्द्र चार जम्बूद्वीप से कुछ विशेष वैक्रेयरूप से भरने को समर्थ है, ब्रह्मेन्द्र आठ जम्बूद्रीप भरने को समर्थ है, लांतक साधिक आठ जम्बूद्वीप भरने को समर्थ है, महाशुक्र मोलह जम्बूद्वीप भरने को समर्थ है, सहस्रारेन्द्र साधिक सोलह जम्बूद्वीप भरने हैं. आणत प्राणत बत्तीस जम्बूद्वीप और आरण अच्युत साविक बत्तीस जम्बूद्वीप भरने को समर्थ हैं. अन्य सब अधिकार पहिले जैसा है परंतु प्रथक् २ ऋद्धि बताते हैं. सौधर्म देवलोक में बचीस लाख, ईशान देवलोक में अठा- + सनत्कुमार नामक तीसरे देवलोकसे आगे देविऑकि उत्पत्ति नहीं है. तथापि प्रथम देवलोककी अपरि ग्रही देवी एकसमयाधिक पल्यापम से दश पल्योपमकी स्थिति वाली वारह वे देवलोक के देवाको है उपभोगमें आती हैं इससे यहां उसका प्रतिपेध नहीं किया है. NO. तीसरा शतक का पहिला उद्देशा-8- शब्दार्थ ४२० - अनुवादक-वालयह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 80 ता. पायपिंशक लो० लोकपाल अ. अग्रमोहपी जाल्यावत् वि०विकुर्वणा की ।।१८।। ए ऐसे स०सनत्कुमार ण विशेष च० चार के० संपूर्ण जं. जंबूद्वीप अ० अथवा ति० तिर्छा अ० असंख्यात ए. ऐसे सा० सामानिक ता. वात्रिंशक लो० लोकपाल अ० अग्रमहियी अ० असंख्यात दी द्वीप समुद्र सर्व वि. विकुर्वे स० सनत्कुपार से उ० उपर के लो लोकपाल स०अ० असंख्यात दी द्वीप समुद्र वि० विकुर्वे एक ऐसे मा० माहेन्द्र ण. विशेष सा० अधिक च० चार के. संपूर्ण जं. जंबुद्वीप वं. तंचेव ॥ १७ ॥ एवं सामाणिय तावत्तीसग लोगपाल अग्गमहिसीणं - जाव एसणं गोयमा ! ईसाणरस देविंदस्स देवरण्णो, एगंमेगाए अग्गमहिसीए देवीए अयमेयारूचे विसए विसयमेत्ते बुइए । णो चेवणं संपत्तीए विकुन्धिसुना ॥१८॥ एवं सणकुमारेवि णवरं चत्तारि केवल कप्पे जंबूद्दीवे दीवे अंदुत्तरं चणं, तिरिय मसंखेजे ॥ एवं सामा- णिय, तावत्तीसग लोगपाल, अग्गमहिसणं, असंखेजे दीवे समुद्दे सव्वे विकुव्वंति प्रायविंशक, लोकपाल, व अग्रनहिपियों का जानना. और वैक्रेय का विषय भी उतना ही जानना. परंतु इतनी संपत्ति नहीं है ॥ १८ ॥ जैसे ईशानेन्द्र का कहा वैसे ही मनत्कुमारेन्द्र का जानना. विशेष इतना कि मनत्कुमार चार जम्बूद्वीप प्रमाण वैक्रय रूप से भरने को सपर्थ है. अमख्यात द्वीप समुद्र भरने की शक्ति है परंतु मम्पत्ति नहीं है, इस में बारह लाख विमान, बहत्तर हजार सामानिक, चौगुने आत्मरक्षक * प्रकाशक-रानावहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालामसादनी में वार्थ Mechani ४२१ सूत्र भावार्थ 989- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - ब्रह्मदेवलोक ण. विशेप अ० आठ ए. ऐसे लं. लंतक ण विशेष सा० अधिक अ आठ के. संपूर्ण म० महाशुक्र सो० सोलह स. सहस्रार में मा० अधिक सो० सोलह ए. ऐसे पा० सर्णकुमाराओ आरद्ध उवरिल्ला, लोगषाला सव्वेवि असंखेज्जे दीवसमुहे विकुव्यंति एवं माहिंदेवि, णवरं साइरेगे चत्तारि केवलकप्पे जंबूद्दीचे दीवे एवं बंभलोएवि, गवरं अट्ठकप्पे ॥ एवं लंतएवि, णवरं साइरेगे अट्ट केवलकप्पे महासुक्के सोलस व अन्यदेव हैं. + ऐसेही इनके सामानिक देव, त्रायत्रिंशक, लोकपाल व अग्रभाहिपियों असंख्यात द्वीप समुद्र वक्रय रूप से भरने को समर्थ हैं. माहेन्द्र चार जम्बूद्वीप से कुछ विशेष वैकेयरूप से भरने को समर्थ है, ब्रह्मेन्द्र आठ जम्बूद्वीप भरने को समर्थ है, लांतक साधिक आठ जम्बूद्वीप भरने को समर्थ है, 'महाशुक्र सोलह जम्बूद्वीप भरने को समर्थ है, सहस्रारेन्द्र साधिक सोलह जम्बूद्वीप भरने हैं. आणत प्राणत बचीस.जम्बूद्वीप और आरण अच्युत साधिक बत्तीस जम्बूद्वीप भरने को समर्थ है. अन्य सब अधिकार पहिले जैसा है परंतु प्रथक् २ ऋद्धि बताते हैं. सौधर्म देवलोक में बत्तीस लाख, ईशान देवलोक में अठा- + सनत्कुमार नामक तीसरे देवलोकसे आगे देविऑकि उत्पत्ति नहीं है. तथापि प्रथम देवलोककी अपरि ग्रही देवी एकसमयाधिक पल्यापम से दश पत्योपमकी स्थिति वाली वारह वे देवलोक के देवोंको उपभोगमें आती है इससे यहां उसका प्रतिपेध नहीं किया है. B80 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा 988- शब्दार्थ माणत या विशेष ३० क्त्तीस के० संपूर्ण ए. ऐसे अ० अच्युत में ण विशेप सा० अधिक व. पत्तीस के. संपूर्ण नं० जंबूद्वीप अ. निश्चय स. वह ए. ऐसे भं. भगवान् त० तीसरे गो० गौतम वा. वायुभूति अ० अनगार स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को २० वंदनाकर न० नमस्कार कर वि० ४२२ सूत्र में अनुवादक-मालयाचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी भावार्थी केवलं सहस्सारे साइरेगे सोलस एवं पाणएवि, णवर बत्तीस केवलं एवं अच्चुएवि, णवरं साइरेगे बत्तीस केवलकप्पे जंबूद्दीवे दीवे, अण्णं तं चेव ।। सेवं भंते भंते ! ति तचे गोयमे वाउभूई अणगारे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ जाब विहरइ इस लाख, सनत्कुमार में वारह लाख, माहेन्द्र में आठ लाख, ब्रह्मदेवलोक में चार लाख, लांतक में पचास हजार, महाशुक्र में चालीस हजार. सहस्रार में छ हजार, आणत माणत में चारसो, आरण अच्युत में तीनसो. अब मामानिक देव कहते हैं सौधर्मेन्द्र को चौरासी हजार, ईशानेन्द्र को अस्सी हजार, सनत्कुपारेन्द्र को वह- त्तर हजार, माहेन्द्र को पीत्तर हजार, ब्रह्मेन्द्र को साठ हनार, लांततेन्द्र को पचास हजार, महाशुक्रेन्द्रको चालिस हजार, महसारेन्द्र को तीस हजार, प्राणतेन्द्र को बीस हजार, और अच्युतेन्द्र को दश हजार सा- मानिक जानना. सामानिक देवता से आलरक्षक चौगुने जानना. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य ऐसा कहकर वायुभति नामक अनगार श्राण भगवंत महावार सामी को वंदना नमस्कार कर चिरने * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी .
४२३ ges पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 880 ब्दिार्थ विचरने लगे ॥ १९ ॥ त० तबस श्रमण भ. भगवन्त म० महावीर अ० कोई वक्त मो० मोया न. नगरी के ने० नंदन चे० उद्यान से प. निकलकर व. वाहिर ज. अन्य देश में वि० विचरने लगे॥२०॥ ते० उप्त काल ते. उस समय में रा० राजगृह न० नगर हो॰था व० वर्णनवाला जा० यावत् प० परिपदा ५० पूजते ते. उस काल ते० उम समय में ई. ईशान दे० देवेन्द्र दे. देवराजा सू मूल पा० हस्त में व वृषभ वा. वादन वाले उ० उत्तरार्ध लोक के अ० अधिपति अ० अठावीस वि० विमान स० लक्ष के सूत्र ॥ १९ ॥ तएणं समणे भगवं महावीरे अण्णया कयाई मोयाओ नगरीओ नंदणाओ चेइयाओ पडिनिक्खमइ, पडिनिक्खमइत्ता बहिया जणवय विहारं विहरइ ॥२०॥ तणं कालेणं तेणं समएणं रायागहे नयरे होत्था वण्णओ जाव परिसा पज्जुवासइ ।। तेणं कालेणं तेणं समएणं ईसाणे देविंदे देवराया सूलपाणी, सूलपाणी, वसहवाहणे, उत्तरड्ड. भावाथे लगे ॥ १९ ॥ एकदा श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी मोया नामक नगरी के नंदन नामक उद्यान से विचरने लगे ॥ २० ॥ अव ईशानेन्द्र के पूर्व भव का तागली तापसका आधिकार कहते हैं. उस काल उस समय में राजगृह नामक नगर था. वहां श्रमण भगवंत श्री महावीर स्वामी पधारे. परिपदा वंदन करने को आई. उस काल उस समय में हस्त में मूलका आयुध धारन करनेवाले, धृपभ का वाहन वाले, उत्तर के ऊर्व दिशा के स्वामी, अठाइस लाख विमान के अधिपति, रजरहित वस्त्रं धारन करनेवाले। 3 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा 888888- शब्दार्थ माणत ण विशेप २० बत्तीस के० संपूर्ण ए• ऐसे अ० अच्युत में ण विशेष सा अधिक ३० वत्तीस के संपूर्ण ज० जंबूद्वीप अनिश्चय स० वह ए. ऐसे भ० भगवान् त• तीसरे गो० गौतम वा. वायुभूति अ० अनगार स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को 40 वंदनाकर न० नमस्कार कर वि० ४२२ सूत्र * अनुवादक बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 67 मावाथे केवलं सहस्सारे साइरेगे सोलस एवं पाणएवि, णवर बत्तीस केवलं एवं अच्चुएवि, णवरं साइरेगे बत्तीसं केवलकप्पे जंबूद्दीवे दीवे, अण्णं तं चेव ।। सेवं भंते भंते ! त्ति तचे गोयमे वाउभूई अणगारे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ जाब विहरइ इस लाख, सनत्कुमार में बारह लाख, माहेन्द्र में आठ लाख, ब्रह्मदेवलोक में चार लाख, लांतक में पचास हजार, महाशुक्रमें चालीस हजार. सहस्रार में छ हजार, आणत पाणत में चारसो, आरण अच्युत में तीनसो. अब मामानिक देव कहने हैं सौधर्मेन्द्र को चौरासी हजार, ईशानेन्द्र को अस्सी हजार, सनत्कुपारेन्द्र को वह- नर हजार, माहेन्द्र को पीत्तर हजार, ब्रह्मेन्द्र को साठ हनार, लांतकेन्द्र को पचास हजार, महाशुक्रेन्द्रको चालिस हजार, महस्रारेन्द्र को तीस हजार, प्राणतेन्द्र को बीस हजार, और अच्युतेन्द्र को दश हजार सा- मानिक नानना. सामानिक देवता से आरक्षक चौगुने जानना. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं ऐमा कहकर वायुभूति नामक अनगार श्राण भगवंत महावीर मामी को वंदना नमस्कार कर विचरने प्रकाशक-राजायहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालामसादजी * सत्र १ पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8-82> भगवन्त म० महावीर को वै० वेदनाकर व वोले अ० अहो भं• भगवन् ई० ईशान दे० देवेन्द्र दे० देवराजा म. महर्द्धिक ई० ईशान की भ० भगवन् सा. वह दि० दीव्य दे० देवाद्धि कर कहां ग० गइ क. कहां अ० प्रवेश हुइ गो• गौतम स० शरीर में ग० गइ से० वह के० कैसे भं• भगवन् ए० ऐप्ता बु० कहा जाता है स० शरीर में ग० गइ से वह ज० जैसे कू• कूटागार सा० शाला सि• होवे दु. दोनो वाजु लि० लिप्त गु° गुप्त गु० गुप्तद्वार णि वायुविना की नि० वायुरहित गंभीर ती. उस कृ० त्ति भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं बंदइ नमसइ २त्ता एवं बयासी अहोणं भंते ! ईसाणे देविंदे देवराया महिडीए, ईसाणरसणं भंते ! सा दिव्या दोवड्डी कहिं गते कहिं अणुप्पविटे? गोयमा! सरीरंगए । सेकेणटेणं भंते! एवं वुच्चइ सरीरंगए? गोयमा ! से जहा नामए कूडागार साला सिया, दुहओ लित्ता, गुत्ता, गुत्तदुवारा णिवाया, वंदना नमस्कार कर ऐसा पूछा कि अहो भगवन् । ईशानेन्द्र देवताने जो ऐसी महा ऋद्धि बताई थी. वह ऋद्धि पीछी कहां गई ? अो गौतम ! शरीर में गइ. अहो भगवन् ! किस तरह से यह ऋद्धि शरीरमें गई ? अहो भगवन् ! जैसे कोई कूटागारशाला होवे इस के दोनों पास लीपा हुवा होवे और उम के द्वार भी गुप्त होवे. वायु का संचार इस में नहीं हो सकता हो. ऐसी कूटागार शाला की याहिर बहुत जन- समुदाय एकत्रित हुवा हो और मेघप्रमुख होता देखकर सब मनुष्यों उस कूमशाला में चले जाने से ABS तीसरा शतकका पहिला उद्देशा 988 भावार्थ कात ४२४ सूत्र अनुवादक-बालग्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी । शब्दार्थ अ० अधिपति अ० रजरहित २० श्रेष्ट व वस्त्र ध० पहीनने वाले आ० रहाईई मा० माला म. मुकुट न० नवा हे० सुवर्ण चा० सुंदर चि० चित्त चं० चंचल कुं. कुंडल वि. अंकित होते गं० गंडस्थल जा. यावत् द० दशदिशा में उ० उद्योत करते प. प्रकाश करते ई० ईशान देवलोक ई ईशान व० वर्डिशक वि० विमान च. जहां रायमसेणी में जा. यावत् दी० दिव्य दे. देव ऋद्धि जा. यावत् जा० जिस दि० दिशिमे पा० आये ता० उसदिशि में प० गये ॥ २१ ॥ भ० भगवान् गोल गौतम स. श्रमण भ. लोगाहिवई, अट्ठावीस विमाण वास सयसहस्साहिवई, अरयंवरवत्यधरे, आलईय माल मउडे नवहेम चारु चित्तचल चंचल कुंडल विलिहिज्जमाणगंडे जाव दसदिसाओ उज्जोत्रमाणे पभासेमाणे, ईसाणेकप्पे, ईसाणवडिसए विमाणे जहेव रायप्पसेणइज्जे जाब दिव्यं देविढि जाव जामेव दिसि पाउन्भूए तामेवदिसिं पडिगए।. २१ ॥ भंते ! भावार्थ पयायोग्य स्थान पर माला, मुकुटबाले, नविन सुवर्ण के मनोहर व चित्त समान चंचलकुंडल की रेसायुक्त गंडस्थल वाले यावन दशोंदिाश में उद्योत करनेवाले ईशानेन्द्र ईशान देवलोक के ईशान वार्डशक नामक विमा न में रहते हुने वगैरह सब अधिकार रायमसेणि मूत्र में जैसे सूर्याभ देवता का कहा, वैसे ही यहां कहना. ऐमी सब अाद्धि सहित भगवंत को वंदना नमस्कार करने को आये. मनोज्ञ दीव्य देव ऋद्धि, कान्ति प्रभाव वगैरह गौतमादि साधुओं को बताकर पीछे गये ॥ २१ ॥ उस समय में गौतम स्वामीने श्री भगवन्त को * मकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी जालाप्रसादजी नामा शब्दार्थ कूटागार जा० यावत् कू० कूदगार सा० शाला दि० द्रष्टान्व भा० कहना ॥ २२ ॥ ई० ईशान दे० देवेन्द्र दे. देवराजाको सा. वह दि० दीव्य दे. देवऋद्धि दे० देवद्युति दे देवानुभाष कि० किससे ल. लब्ध ५० प्राप्त अ० मन्मुख हुइ के० कौन ए० यह आ० था. पु० पूर्व भव में कि० कौनसा ना. कि० कौनसा गो० गोत्र क० कौनसे गा• गाव में न० नगर जा. यावत् म० सन्निवेश में किं. क्या द० देकर भो भोगवकर कि० करके कि क्या मसमाचर क० किम त० तथारूप स० श्रमण सूत्र णिवाय गंभीरा, तीसेणं कूडागारं जाव कूडागार सालादिटुंतो भाणियव्यो ॥२२॥ ईसाणेणं भंते ! देविंदे देवरण्णो सा दिव्या देविट्ठी, दिव्वादेवजुत्ती, दिव्वे देवाणुभावे किण्णा लडे किण्णा पत्ते किण्णा अभिसमण्णागए, केवा एस आसि पुन्वभवे, किंणामएवा, किंगो- तेवा, कयरंसि गामंसिवा नयरंसिवाजाव सण्णिवेसंसिवा, किंवा देच्चा, किंवा भोचा, किंवा किचा, किंवा समायरित्ता, कस्सवा तहारूवस्त समणस्सवा, माहणस्त वा पाहिर कोई नहीं दीखते हैं. इसी दृष्टांत से अहो गौतम ! सब ऋद्धि ईशानेन्द्र के शरीरमें चली गइ॥२२॥ अहो भगवन् ! ईशानेन्द्र को ऐसी दीव्य देव ऋद्धि, देव कान्ति व ऐसा महानुभाव कैसे प्राप्त हुवा ? (वे पूर्व भव में कौन थे, उन का पूर्व भव में नाम क्या था, गोत्र क्या था, किस ग्राम, नगर व सन्नि- (वेश में रहते थे, इनोंने क्या दान दिया, क्या अंत प्रांतादि आहार भोगवा, क्या तप किया, क्या प्रति- * अनुवादक बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 * प्रकाशक रानावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी * वार्थी elo OYO na ७ दार्थ मा० माइण की अंक पास ए. एक आ० आर्य ध धर्म का सु. सुवचन सो सुनकर नि० अवधारकर ज. जिससे ई० ईशान दे देवेन्द्र दे देवराजा की सा. वह दिल दीव्य दे. देवऋद्धि जा. यावत् अ० सन्मुख हुइ ।। २३ ॥ गो० गौतम ते. उस समय में इ० इस जं. जंबूद्वीप में भा. भरत क्षेत्र में ता: ताम्रलिप्ती न० नगरी हो० थी व० वर्णन युक्त त० तहां ताः ताम्रलिप्ती न० नगरी में ता तामली ना. नाम का मो० मौर्यपुत्र गागाधापति हो या अ० ऋद्धिवंत दि. दिप्त जा. यावत् २० बहुत मनुष्यों ४२७ सूत्र 80 पंचमान विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र - अंतिए एगमवि आयरियं धम्मियं सुवयणं सोचा, निसम्म जण्णं ईसाणेणं देविदेणं देवरण्णा सा दिव्वा देविट्ठी जाव अभिसमण्णागया ? ॥ २३ ॥ एवं खलु गोयमा ! तेणं कालेणं तेणं समएणं इहेव जंवृद्दीवे दीवे भारहे वासे तामलि- तीनामं णयरी होत्था, वण्णओ । तत्थणं तामलित्तीए नयरीए तामलीनाम मोरिय- 3803> तीसरा शतक का पहिला उद्देशा88--2202 भावार्थ लेखनादि समाचारी की, अथवा कौनसे तयात्म श्रमण माहण की पात एकान्त आर्य धर्म श्रवण कर अवधारकर ऐसी ईशानेन्द्र की दीव्य ऋद्धि द्युति वगैरह प्राप्त की? ॥ २३ ॥ अहो गौतम ! उस काल उस समय में जम्बूदीप नामक द्वीप के भरत क्षेत्र में ताम्रलिप्ती नामक नगरी थी. इस नगरी में मौर्य पुत्र तामली नामक गायापति रहता था. वह गायापति बहुत ऋद्धिवंत, दीप्त यावतू अन्य जनों से अपराभूत शब्दार्थ से अ० अपराजित हो० था० ॥ २४ ॥ त० तब त० उप्स मो० मौर्यपुत्र ता तामलि गा• गायापति अ० कोइ वक्तं पु० पुर्वरात्रि अ० अपरात्रि का वक्त में कुछ कुटुंच जा. चिंता जा० करते ए. इसरूप अ० आत्मचितवन जा० यावत् म० उत्पन्न हुवा अ० है पु. पूर्व के पो० पुराणा सु० सुचरितरूप मु. अच्छा पराक्रम रूप सु० शुभ क. कल्याणरूप क० किये क. कर्म के क. कल्याण कारी फ. फल वि० विशेष जे० जिम से अ० मैं हि० चांदी से सु० सुवर्ण से ध० धन से घ० धान्य से पु० पुत्र से प. पशु सूत्र पुत्ते गाहावई होत्था, अद्वे दित्ते जाव बहुजणस्स अपरिभूए यावि होत्था ॥ २४ ॥ तएणं तरस मोरियपुत्तस्स तामलिस्स गाहावइस्स अण्णया कयाई पुव्वरत्तावरत्तकाल समयंसि, कुटुंबजागरियं जागरमाणस्स इमेएयारूवे अभत्थिए जाव समुप्पण्णे, आत्थ तामे पुरा पोराणाणं सुचिण्णाणं सुप्परिकताणं सुभाणं, कल्लाणाणं, कडाणं कम्माणं, कल्लाणफलवित्तिविसेसो, जेणाहं हिरण्णेणं वड्ढामि, सुवण्णणं बड्ढामि, धणेणं वड्ढामि, धण्णेणं वद्वामि, पुत्तेहिंच, पसूहिच वहामि, विउल, धण, कणग वार्थ था ॥ २४ ॥ एकादा तामली गाथापति को मध्यरात्रि में कुटुम्ब जागरणा जागते हुवे ऐसा अध्यवसाय हुचा कि मैंने गतकाल में पूर्व जन्म में दानादि सुकृत किये हैं, तपश्चराणादि किये हैं, इस से ऐसे शुभ कल्याणकारी कर्म के अच्छे फल मुझे हो रहे हैं. और इस से मेरे हिरण्य, सुवर्ण, धन, धान्य बढ रहे १.१ अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 85 * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्यालाप्रसादजी शब्दार्थ ४२९ सूत्र - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - से ३० वृद्धिपाता हूं वि० विपुल ध० धन क० कनक र० रत्न म० मणि मो० मौक्तिक सं० शंख सि. शिला प० प्रवाल र ० रक्त र० रत्न सं० विद्यमान सा० अच्छा सा द्रव्य से अ० अतीव अ० वृद्धिपाता हूं जा. जहांलग मे० मुझे मि० मित्र ना. ज्ञाति निः स्वजाति सं० संबंधि प० परिवार आ० आदर करते हैं प० अच्छा जाने स० सत्कारकरे स० सम्मानदेवे क० कल्याण कारी मं. मांगलीक दे. देव वि० विनय से चे० ज्ञानवन्त प. पूजते हैं ता. वहांलग मे० मुझ से श्रेय क० काल पा प्रभात में र. रजनी रयण, माण, मोत्तिय संख, सिलप्पवाल, रत्त, रयण, संतसार सावएजेणं. अईव अईव आभिवडामि. तं किणं अह पुरा पोराणाणं सुचिण्णाणं जाव कडाणं कम्माणं एगंत सोक्खयं उवेहमाणे विहरामि तं जाव अहं हिरण्णेणं बढामि, जाव अईव २ आभिवड्ढामि, जावं चमे मित्तनाइ नियग संबंधि परियणो आढाइ परियाणाइ, सक्कारेइ सम्माणेइ, कल्लाणं, मंगलं, देवयं, निणएणं, चेइयं पज्जुवासेइ, ताव तामे सेयं कल्लं वैसे ही पुत्र पशु बगैरह से मैं वढरहा हूं. और विपुल धन, कनक, रन्न, मणि, मौक्तिक, शंख, शिला, वगैरह श्रेष्ट द्रव्य मुझे बहुत २ चढरहा है. इस से मैं पूर्व के संचित किये हुवे शुभ कर्मों को एकान्त क्षय करता हुवा विचरता हूं. अब जहांलग मुझे मेरे मित्र, ज्ञाति, संबंधि परिजन आदर देते हैं, स्वामी तरीके मानते हैं, सत्कार करते हैं, सन्मान देते हैं, कल्याणकारी, मांगलीक, देवता समान पूजा करते हैं वहांलग *3828 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा 8 भावार्थ .
४२८ शब्दार्थ जसे म० अपराजित हो० था० ॥ २४ ॥ त० तव त उस मो० मौर्यपुत्र ता तामलि गा• गायापति अ० कोइ वक्तं पु० पुर्वरात्रि अ० अपरात्रि का वक्त में कु० कुटुंब जा. चिंता जा० करते ए• इसरूप अ० आत्मचितवन जा. यावत् स० उत्पन्न हुवा अ० है पु० पूर्व के पो. पुराणा सु० सुचरितरूप मु० अच्छा पराक्रम रूप सु० शुभ क. कल्याणरूप क० किये क. कर्म के क० कल्याण कारी फ. फल वि. विशेष जे० जिम से अ० मैं हि० चांदी से सु० सुवर्ण से ध० धन से घ० धान्य से पु० पुत्र से प० पशु पुत्ते गाहावई होत्था, अढे दित्ते जाव बहुजणस्स अपरिभूए यावि होत्था ॥ २४ ॥ सूत्र तएणं तरस मोरियपुत्तस्स तामलिस्स गाहावइस्स अण्णया कयाई पुनरत्तावरत्तकाल समयंसि, कुटुंबजागरियं जागरमाणस्स इमेएयारूवे अब्भत्थिए जाव समुप्पण्णे, आत्थ तामे पुरा पोराणाणं सुचिण्णाणं सुप्परिकंताणं सुभाणं, कल्लाणाणं, कडाणं कम्माणं, कल्लाणफलवित्तिविसेसो, जेणाहं हिरण्णेणं वड्डामि, सुवण्णणं बड्डामि, धणेणं वड्डामि, धण्णेणं वद्वामि, पुत्तेहिंच, पसूहिच वढामि, विउल, धण, कणग नावार्थ या ॥ २४ ॥ एकदा तामली गाथापति को मध्यरात्रि में कुटुम्ब जागरणा जागते हुवे ऐप्ता अध्यवसाय हुवा कि मैंने गतकाल में पूर्व जन्म में दानादि सुकृत किये हैं, तपश्चराणादि किये हैं, इस से ऐसे शुभ कल्याणकारी कर्म के अच्छे फल मुझे हो रहे हैं. और इस से मेरे हिरण्य, सुवर्ण, धन, धान्य बद रहे हैं 40 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 83 * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी दार्थ lo YO Q. . ४३१ सूत्र 8888 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 380- पा० प्रणाम प० प्रवर्नामें प० प्रवर्तनको प० प्रवर्तग हुवा ए० इसरूप अ. अभिग्रह अग्रहण करूंगा क० कल्पता है मे० मुझे जा० यावज्जीव छ० छठ भक्त से अ० अंतर रहित तः तप कर्म से उ० अर्ध्व वा० बाहु प० करके सू० सूर्याभिमुख आ० आतापनाभूमि में आ• आतापनालेता वि• विचरने को छ. छठ के पारणे में आ० आतापना भूमि से उ० नकलकर स० स्वयं दा० काष्ट के प. पात्र ग० ग्रहण कर ता ताम्रलिप्ती न० नगरी में ऊंच नी. नाच म. मध्यम कु० कुल के घ० गृह समुदाय में भि० भिक्षाचरी के आपुच्छित्ता सयमेव दारुमय पडिग्गहं गहाय मुंडे भवित्ता, पाणामाए पवनाए, पव्वइत्तए, पव्वइएवियणं समाणे इमं एयावं आभिग्गहं आभगिाहिस्सामि. कप्पड़ मे जावजीवाए छटुं छ?णं अनिक्खित्तेणं तवो कम्मेणं, उट्ठे बाहाओ पगिझिय पगिझिय मूराभिमुहस्स आयावणभूमीए, आयात्रमाणस्स विहरित्तए, छट्ठस्सवियणं पारणयसि आयावणभूमीओ पञ्चोरुहित्ता, सयमेव दारुमयं पडिग्गहं गहाय तामलि- त्तीए गयरीए उच्चणीयमज्झिमाइ कुलाई घरसमुदाणस्स भिक्खायरियाए अडेत्ता मुझे श्रेय है. इस तरह प्राया अंगीकार किये पीछे छठ २ का निरंतर तप करके ऊंचे बाहु से आ- नापना भूमि में आतापना लेना मुझे श्रेय है. वैसे ही छठ भक्त के पारणे के दिन उस आतापना भूमि से नीकलकर काष्टमय पात्र लेकर ताम्रलिप्ती नगरीमें उच्च, नीच, मध्यम कुलमें बहुत घरोंके समुदाय में फीरकर 8 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा 8- भावार्थ " ७ शब्दार्थी जा. यावत् ज०सूर्य उदित होते स०स्वयं दा-काट के प०पात्र क०करके वि० विपुल अ० अशन पा पान खा. खादिम सा. स्वादिम उनीपजाकर मि०मिन णाज्ञाति निःस्वजन सं० संघांध प०परिवार को आ० आमंत्रणकर तक उन को अ० अशन पा० पान खा० खाइम सा० स्वादिम २० वस्त्र गं० गंध अ. अलंकार से स० सत्कारकर स. सन्मानदेकर तं• उन की पु० आगे जे. ज्येष्ठ पुत्र को कु० कुटुम्ब में ठा० स्थापकर तं० उन को आ० पूछकर स० स्वयं दा० काट के प० पात्र ग. ग्रहणकर मुं• मुंड होकर पाउप्पभायाए रयणीए जाव जलंते सयमेव दारुमयं पडिग्गहं करेत्ता, विउलं असणं, मून पाणं, खाइम, साइमं उवक्खडावेत्ता, मित्त,णाइ, नियग, सयण, संबंधि, परियणं आमं- तेत्ता, तं मित्त, णाइ. नियग, सयण, संबंधि, परियणं विउलेणं असण पाणखाइमं साइ- मेणं वत्थगंध मल्लालंकारेणय सकारेत्ता, सम्माणेत्ता तस्सेव मित्तणाइ नियग संबंधि परियण- स्स पुरओ जेट्टपुत्तं कुटुंबे ठाबित्ता, तं मित्त,नाइ, नियग, संबंधि, परियण, जेट्टपुत्तंच कलपभात में सूर्य का उदय होते स्वयं काष्टमय एक पात्र बनाकर, बहुत अशन, पान, खादिम यार्थ स्वादिम बनाकर मित्र, ज्ञाति, सगे संबंधी को आमंत्रणा करके और उन मित्रादि वर्ग को अशन, पान, खादिम, स्वादिम वस्त्र, गंध, माला अलंकार वगैरह वस्तु से सत्कार करके उन की सन्मुख ज्येष्ट पुत्र को कुटुम्ब में स्थाप कर और उन मित्रं ज्ञाति स्वजन तथा ज्येष्ठ पुत्र को पूछकर पीछे स्वयमेव काट पय पात्र को ग्रहग कर मुंड बनकर प्रणाम करने योग्य नाम की प्रवर्जी अंगीकार करना र अनुवादक-चालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * 4 .
०७ सूत्र शब्दार्थ कर अ० अल्प म० माघे अ० अलंकृतकर स० शरीर भो० भोजन वक्त में भो० भोजन का मंडप मु. शुभामन पे ग० चैठे त० तब मि० मित्र णा. ज्ञाति नि स्वजन सं० संबंधि प० परिवार स० ताथ कियसरीरे, भोयणनेलाए भोयणमंडवंसि सुहासणवरगए. तएणं मित्तनाइ नियग सयंण संबंधि परियणेणं सहिं तं विउलं असणं पाणं खाइमं साइमं आसाएमाणे वीसाएमाणे परिसाएमाणे परिभंजेमाणे विहरइ ॥ जेमिय भुतुत्तरागएवियणं समाणे आयते चोक्खे परमसुइभए तं मित्तं जाव परियणं विउलेणं वत्थगंधमलालंकारेणय सकारेइ, सकारेइत्ता तस्सेवमित्तनाइ जाव परियणस्स पुरओ जेट्टपुत्तं कुटुंबे ठावेइ २ त्ता तं मित्तनाइ जाव परियणं जेट्टपुत्तं च आपुच्छइ २त्ता मुंडे भवित्ता, पाणामाए भावार्थ अल्पभार र वहुत मूल्यवाले आभूपणों से शरीर अलंकृत किया, भोजन तैयार होने पर स्वजन मित्रजन की साथ भोजन मंडप में प्रवेश कर शुभसिंहासनपे बैठकर मित्रादि सब की साथ विपुल निपजाये हुए अशनादि स्वयं आस्वादते व अन्य को परुसते विचर रहे हैं. इस प्रकार जीमकर उपर जो कुच्छ भोगवना था उसे भोगवकर पानी के कुल्ले कर शुद्ध बने. फीर बहुत वस्त्र गंध व मालाअलंकार से आये हुए स्वजनादि का सत्कार सन्मान किया और सब स्वजन मित्र ज्ञाति प्रमुख की सन्मुख ज्येष्ट पुय को कुटुम्ब में स्थापित किया. फोर ज्ञाति स्वजन व ज्येष्ट पुत्र को पूछकर मुंड बनकर प्रणाम नाम की प्रवर्ध्या अंगीकार कर 3889 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र - 28.3 तीसरा शतकका पहिला उद्देशा 98862 शब्दार्थ लिये अ० विचरना सु० शुद्ध औदन ५० ग्रहणकर ति तीन स० सात वक्त उ० पानी में प० धोकर त. पीछे भा० आहार करने को ति. ऐसा कर करके सं० विचार करे ।। २५ ॥ सं० विचारकर क० काल पा० प्रभात में जा० यावत् ज० सूर्य उदित होते स० स्वयं दा० काष्ट का ५० पात्र का० कराके वि० वियुल अ० अशन पा० पान खा. खादिम सा० स्वादिम उ० नीपजाकर त० पीछे हा० स्नान किया सूत्र क. पीठीलगाइ क० कोगले किये पा. तीलमप्तादि किये सु० शुद्ध मं० मांगलीक व. वस्त्र ५० पहन सुद्धोदणं पडिग्गहेत्ता, तं तिसत्तक्खुत्तो उदएणं पक्खालेत्ता, तओपच्छा आहारं आहा- रित्तए त्तिकद्दु, एवं संपेहइ ॥ २५ ॥ संपेहेइत्ता कल्लं पाउप्पाभायाए जाब जलंते सयमेव दारुमयं पडिग्गहयं कारेइ कारइत्ता विउलं असणं पाणं खाइमं साइम उव- क्खडावेइ, उवक्खडावेइत्ता, तओ पच्छा · पहाए. कयबालिकम्मे, कयकोउयमंगल पायच्छित्ते, सुद्धप्पावेसाई मंगलाई वत्थाई पवर परिहिए, अप्पमहग्घाभरणालं.' घृत शाकादि रहित शुद्ध ओदन ग्रहण करके फीर उसे इवीस वक्त पानी से धोकर उस का आहार करना मुझे श्रेय है ॥ २५ ॥ इस प्रकार का विचार करके सूर्योदय होते काष्टमय पात्र बनवाया और अशन, पान, खादिम व स्वादिम ऐसे चारों आदार निपनाये. पीछे त्लान किया, पीठी प्रमुख का विलेपन किया, पानी के कोगले किये, तिलममादि शुभ चिन्द किये और शुद्ध · मंगलिक वस्त्र पहिने. - अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 * मकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी * वार्थ - ४३३ शब्दार्थ कर अ० अल्प म० मोंघे अ० अलंकृतकर स० शरीर भो० भोजन वक्त में भो० भोजन का मंडप में ore मु. शुभामन पे ग. वैठे त० तब मि. मित्र णा. ज्ञाति नि स्वजन सं० संबंधि प० परिवार स० ताथ कियसरीरे, भोयणनेलाए भोयणमंडसि सुहासणवरगए. तएणं मित्तनाइ नियग सयण संबंधि परियणेणं सद्धिं तं विउलं असणं पाणं खाइमं साइमं आसाएमाणे वीसाएमाणे परिसाएमाणे परिभुजेमाणे विहरइ ॥ जेमिय भुतुत्तरागएवियणं समाणे आयते चोक्खे परमसुइभए तं मित्तं जाव परियणं विउलेणं वत्थगंधमल्लालंकारेणय सकारेइ, सकारेइत्ता तस्सेवमित्तनाइ जाव परियणस्स पुरओ जेट्टपुत्तं कुटुंबे ठावेइ २ त्ता तं मित्तनाइ जाव परियणं जेट्टपत्तं च आपुच्छइ २त्ता मुंडे भरित्ता, पाणामाए भावार्थ अल्पभार र बहुत मूल्यवाले आभूपों से शरीर अलंकृत किया, भोजन तैयार होने पर स्वजन मित्रजन की साथ भोजन मंडप में प्रवेश कर शुभसिंहासनपे बैठकर मित्रादि सब की साथ विपुल निपजाये हुए अशनादि स्वयं आस्वादते व अन्य को परुसते विचर रहे हैं. इस मकार जीमकर उपर जो कुच्छ भोगवना था उसे भोगवकर पानी के कुल्ले कर शुद्ध बने. फीर बहुत वस्त्र गंध व मालाअलंकार से आये हुए स्वजनादि का सत्कार सन्मान किया और सब स्वजन मित्र ज्ञाति प्रमुख की सन्मुख ज्येष्ट पुत्र को कुटुम्ब में स्थापित किया. फीर ज्ञाति स्वजन व ज्येष्ट पुत्र को पूंछकर मुंड बनकर प्रणाम नाम की प्रथा अंगीकार कर पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र - 388 तीसरा शतकका पहिला उद्देशा 92086- GYo 60 शब्दार्थ वि विपुल अं• असन पा० पान खा. खादिम सा. स्वादिम आं० आस्वादते वी. भोगवने प० परुसते प० जीमते वि०विचरतेहैं जे० जीमकर भु० जीमे पीछे आ आचमन किया चो० शुद्ध हुवे प०बहुत शुद्धहुचे सूत्र पव्वज्जाए पवइएवियणं समाणे इमं एयारूवं आभिग्गहं आभिगिण्हइ, कप्पइ मे जाव. जीवाए छटुं छट्टेणं जाव आहारित्तए तिकटु इमं एयारूवं आभिग्गहं आभिगिण्हइ, आभगिण्हइत्ता, जावजीवाए छटुं छटेणं अनिक्खित्तेणं तयो कम्मेणं उड़े वाहाओ पगिझिय २ सूराभिमुहे आयावण भूमीए आयावेमाणे विहरइ ॥ २६ ॥ छट्ठस्स वियणं पारणयसि, आयावण भूमीए पच्चोरुहइ, पञ्चोरुहइत्ता, सयमेव दारुमयं पडिग्गहयं गहाय, तामलित्तीए नयरीए उच्चनीय मज्झिमाई कुलाई घरसमुयाणस्स भिक्खायरियाए अडइ, अडइत्ता सुद्धोयणं पडिग्गहेइ २ त्ता तिसत्तखुत्ता उदएणं पक्खालेइ, भावार्थ (एमा अभिग्रह किया कि मुझे निरंतर छठ छठ का तप करना कल्पता है. इसतरह अभिग्रह ग्रहण करके ऊंचे याहु रयकर सूर्याभिमुख आतापना भूमि में आतापना लेते हुवें विचरत हैं ॥ २६ ॥ छठ के पारण के दिन आतापना भूमि से आकर स्वयमेव काष्ट पात्र लेकर ताम्रलिप्ती नगरी में ऊच्च नीच व मध्यम कुल के घर समुदाय में भिक्षाचरी के लिये परिभ्रमण करते हैं और शुद्धोदन (पकेहुवे चांवल) लेकर इक्कीस वार १ अनुवादक-यालयामारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी : * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालामसादजी * दार्थ सूत्र RSS पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र -982- २६ ॥ २७ ॥ से वह क. कैसे भं भगवन् ए० ऐसा चु० कहा जात है पा० प्रणाम प० मवा गो० गौतम पा० प्रणाम प्रवा से प० दीक्षित हुवा जं. जिसको ज. जहां पा० देखे तं. उनको ई० इन्द्र ख० कार्तिकेय रु० महादेव सि. व्यंतर वे० वैश्रमण अ० चंडिका को कोटिक रा० राजा जा. यावत् स० सार्थवाह का० काक सा० श्वान पा. चंडाल उ ऊंच को पा० देखें उ० ऊंचको १० प्रणामकरे नी० नीच को पा० देखे नी नीचको ५० प्रणामकरे ज० जिसको ज. जैसे पा० देखे . उसको त. पक्खालेइत्ता तओ पच्छा आहारं आहारेइ ॥ २७ ॥ से केपट्टेणं भंते ! एवं वुच्चइ पाणामाए पन्वज्जा? गोयमा ! पाणामाएणं पव्वजाए पवइए समाणे जं जत्थ पासइ तं इंदवा, खंदवा, रुदेवा, सिवंत्रा, वेसमणवा, अजंबा, कोकिरियंवा, रायंवा जाव सत्थवाहवा; काकंवा, साणंवा, पाणवा, उच्चं पासइ, उच्चं पणाम करेइ, नीयं पासइ नीयं पणामं करेइ, जं जहा पासइ तस्स तहा पणामं करेइ. से तेणटेणं जात्र पानी से धोकर उस का आहार करते हैं ॥ २७॥ अहो गंवन् ! तामली तापसकी प्रणाम प्रवर्ध्या कैसे कही? अहो गौतम ! प्रणाम प्रवा अंगीकार करनेवाला इन्द्र, स्कंध, रुद्र, शिव, वैश्रमण, चंडिका, कोटिकादि, राजा को, शेठ को, सेनापति, सार्थवाह, काकपक्षी, श्वान, चांडाल को, ऊंचको देखकर ऊंचकोई प्रणाम करे, नीचको देखकर नीचको प्रणाम करे जिसे जहाँ देखे उसे वहां प्रणाम करे. इस से अहो गौतम ! 32388 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा 988805 भावार्थ - ४३४ - शब्दार्थ वि. विपुल अ असन पा० पान खा. खादिम सा स्वादिम आं० आस्वादते वी. भोगवने प० परुसते प० जीमते वि०विचरतेहैं जे० जीमकर भु० जीमे पीछे आ आचमन किया चो० शुद्ध हुवे प०वहुत शुद्धहुवे सूत्र पन्यनाए पन्वइएवियणं समाणे इमं एयारूवं आभिग्गहं आभगिण्हइ, कप्पइ मे जाव- जीवाए छठें छट्टेणं जाव आहारित्तए त्तिकटु इमं एयारूवं आभिग्गहं अभिगिण्हइ, आभिगिण्हइत्ता, आवजीवाए छटुं छद्रेणं अनिक्खित्तणं तबो कम्मेणं उड़े वाहाओ पगिज्झिय २ सूराभिमुहे आयावण भूमीए आयावेमाणे विहरइ ॥ २६ ॥ छट्ठस्स थियणं पारणयसि, आयावण भूमीए पच्चोरुहइ, पच्चोरुहइत्ता, सयमेव दारुमयं पडिग्गहयं गहाय, तामलित्तीए नयरीए उच्चनीय मज्झिमाई कुलाई घरसमुयाणस्स भिक्खायरियाए अडइ, अडइत्ता सुद्धोयणं पडिग्गहेइ २ त्ता तिसत्तखुत्तो उदएणं पक्खालेइ, भावार्थ एमा अभिग्रह किया कि मुझे निरंतर छठ छठ का तप करना कल्पता है. इसतरह अभिग्रह ग्रहण करके ऊंचे याहु रयकर सूर्याभिमुख आतापना भूमि में आतापना लेते हुवे विचरत हैं ॥ २६ ॥ छठ के पारणे के दिन आतापना भूमि से आकर स्वयमेव काष्ट पात्र लेकर तामलिप्ती नगरी में ऊच्च नीच व मध्यम कुल के घर समुदाय में भिक्षाचरी के लिये परिभ्रमण करते हैं और शुद्धोदन (पकेहुवे चांवल) लेकर इक्कीस वार - अनुवादक पालयानगरी मुनि श्री अमालक ऋपिजी - प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी मालामसादजी * Gya Do 610 ४३७ सून ब्दिार्थ उ० उदात्त उ० उत्तम म. महानुभाग त तपकर्म से सु० मुका भु. भुखा जा. यावत् प० हड्डी नाडी जा० हुई अ० है जा० जितना मे० मेरा उ. उत्थान क कर्म व० वल वी० वीर्य पु. पुरुषात्कार १५० पराक्रम ता० तहां लग से मुझे से श्रेय क. कल्याण जा. यावत् ज० सूर्य उदीर होते ता० ताम लिप्ती न० नगरी दि० देखकर भ० वोलाकर पा परिचित गि• गृहस्थ पु० पूर्व संगति १०पीछे के संगति प० दीक्षाके संगति को आ० पुछकर ता० तामलिमीन नगरी को म० मध्य से नि० निकलकर पा० कम्मेणं सुके भुक्खे जाव धमणिसंतए जाए, तं आत्थि जामे उट्ठाणे कम्मे चले वीरिए पुरिसक्कारपरकमे ताव तामे सेयं कल्लं जाव जलंते तामलित्तीए णगरीए दिट्ठा भट्टेय पासंडत्येय, गिहत्थेय, पुबसंगतिएय, पच्छासंगातिएय, परियायसंगतिएय आपुच्छित्ता तामलित्तीए णयरीए मझमझेणं निग्गच्छित्ता पाओगकुंडियमादीयं उवगरणं दारुमयंच भावार्थ मांस रहित नाडियोंवाला हुवा हूं.। अब जहां लग मेरे में उत्थान कर्म, वल, वीर्य व पुरुपात्कार पराक्रम वहां लग सूर्योदय होते ताम्रलिमा नगरी में रहनेवाले कि जिन को देखने का बहुत प्रसंग पडा है, जो मेरे भक्त है, पाखण्ड धर्म के आचरण करनेवाले हैं परंतु मेरे परिचय में आये हुवे है, जो गृहस्थ हैं, ४० जो दर्शनाभिलापी हैं, दीक्षा लीये पहिले जिन की संगति में रहा सो पूर्व संगतिबाले और दीक्षा लिये पीछे जिन की संगति में रहा सो पश्चात् संगतिवाले और अन्य तापसादि कि जो मेरे परिचित हैं उन । 298 पंचङ्ग हिववषण्णात्ति ( भगवती) मूत्र 988- <3 तीसरा शतकका पहिला उद्देशा 985 - ४३६ -- सूत्र शब्दार्थों से प० प्रणामकरे से यह ते. इसलिये जा. यावत् ५० प्रवाः ॥ २८॥त. तब से वह ता तामलि मो० पोर्यपुत्र ते. उस उ० उदार वि०विपुल ६० अनुज्ञा प० ग्रहीहुई वा अज्ञान त० वप कर्म से मुमुका भु० भुखा जा. यावत् ध० नाडी हड्डी ज• हुइ हो० था ॥ २९ ॥ त० तवत. उस ता० तामली. वा. अज्ञान ततपस्वी को अकोई वक्त पुरात्रिको अ०अनित्य जा जागरण जा जागते को ए०इसरूप अ० आत्मिक चिं० चितवन जा. यावत् स० उत्पन्न हुआ अ मैं इ० इस उ. उदार वि० विपुल जा० यावत् पव्यजा॥२८॥तएणं से तामली. मोरियपुत्ते तेणं उरालेणं विपुलैणं पयत्तेणं पग्गहिएणं वालतवो कम्मेणं सुके भुक्खे जार धमणिसंतए, .जाएयावि होत्था ॥ २९ ॥ तएणं तस्स तामलिस्स बाल तवस्सिस्स अण्णया कयाई पुव्वरत्वावरत्तकाल समयसि सि आणिच्च जागरियं जागरमाणरस इमेयारूवे अज्झथिए चितिए जाव. समुप्पाजत्था एवं खलु अहं इमेणं उरालेणं विपुलेणं जाव, उदत्तणं उत्तमेणं महाणुभागेणं तवो. भावार्थ प्रणाम मवा कही है ॥ २८ ॥ तब वह तायली मौर्य पुत्र रदार, विपुल, गुरुकी आज्ञा से - कराया हुवा, घहुन मान पूर्वक कराया हुवा वाल तप कर्म से शुष्क यावत् रक्त मांस रहित नसोंबाला : हुवा - ॥ २९ ॥ एकदा मध्यरात्रि में उत तामली मौर्य पुत्र तपस्थी को आनित्य जागरणा जागते हुवे ऐमा अध्यवसाय चिन्तान उत्पन हुवा कि ऐसे उदार, विपुल; उदात्त, उत्तन, व महानुभाग तप कर्म से शुष्क यावत् रक्त- * अनुवादक-बालबलगरी मुनि श्री अमोलक ऋार्पजी * प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेवसहायनी यालाप्रसादजी * शब्दार्थ 80 olo GYC सूत्र 985 पंचङ्ग हिवत्रपण्णात्ति ( भगवती) मूत्र 988- उ० उदात्त उ० उत्तम म. महानुभाग त तपकर्म से सु. मुका भु. भुखा जा. यावत् ५० हड्डी नाडी जा हुई अ० है जा० जितना मे० मेरा उ० उत्थान क० कर्म व० वल वी० वीर्य पु. पुरुषात्कार १५० पराक्रम ता० तहां लग मे० मुझे से श्रेय का कल्याण जा. यावत् ज० सूर्य उदीर होते ता० ताम् लिप्सी न० नगरी दि० देखकर भ० वोलाकर पापरिचित गि• गृहस्थ पु० पूर्व संगति १०पीछे के संगति प० दीक्षाके संगति को आ० पुछकर ता० तामूलिमा न० नगरी को म० मध्य से नि. निकलकर पा० कम्मेणं सुके भुक्खे जाव धमणिसंतए जाए, तं आत्थि जामे उट्ठाणे कम्मे वले वीरिए पुरिसक्कारपरक्कमे ताव तामे सेयं कल्लं जाव जलंते तामलित्तीए णगरीए दिट्ठा भट्टेय पासंडत्येय, गिहत्थेय, पुव्वसंगतिएय, पच्छासंगतिएय, परियायसंगतिएय आपुच्छित्ता तामलित्तीए णयरीए मझमझेणं निग्गच्छित्ता पाओगकुंडियमादीयं उवगरणं दारुमयंच मांस रहित नाडियोंवाला हुवा है। अब जहां लग मेरे में उत्थान कर्म, बल, वीर्य व पुरुषात्कार पराक्रम है वहां लग सूर्योदय होते ताम्रलिप्ती नगरी में रहनेवाले कि जिन को देखने का बहुत प्रसंग पडा है, जो मेरे भक्त है, पाखण्ड धर्म के आचरण करनेवाले हैं परंतु मेरे परिचय में आये हुवे है, जो गृहस्थ जो दर्शनाभिलाषी हैं, दीक्षा लीये पहिले जिन की संगति में रहा सो पूर्व संगतिवाले और दीक्षा लिये पीछे जिन की संगति में रहा सो पश्चात् संगतियाले और अन्य तापसादि कि जो मेरे परिचित हैं उन १ 3883> <D तीसरा शतकका पहिला उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ- सूत्र 18 अनुवादक-बालग्रामचशिमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 पादुका कुं• कमंडल आ० वगैरह उ० उपकरणं दा० काष्ट के प० पात्र ए० एकान्त में ए० रखकर ता. ताम्रलिप्ती नगरी की उ० ईशान कोन में णि प्रमाण मात्र भूमि आ० देखकर सं० संलेखना झू० झूसणा झू० झूसकर भ० भक्त पा० पानी प० प्रत्याख्याकर पा० पादोपगमन का० काल को अ० नहीं वांछता वि० विचरने को त्ति ऐसा करके सं० संकल्पकर ॥ ३० ॥ क० काल जा० यावत् जा मूर्य उदीत होते जा० यावत् आ० पूछकर ता० तामली ए० एकान्त में ए० रखे जा० यावत् भ० भक्त पडिग्गहयं एगते एडेत्ता तामलित्तीए णगरीए उत्तर पुरच्छिमे दिसीभाए णियत्नणि- यमंडलं आलिहित्ता संलेहणा झूसणा झूसियस्स भत्तपाण पडियाइक्खियस्स पाओवगयरस कालं अणवकंखमाणस्स विहरित्तए, तिकटु एवं संपेहेइ संपेहेइत्ता ॥ ३० ॥ कल्लं जावं जलंते जाव आपुच्छइ, आपुच्छइत्ता तामली एगंते एडेइ, सब से मीलकर व उन को पूछकर ताम्रलिप्ती नगरी की मध्य में से नीकलकर मेरी पादुका, कमंडल, काट- मय पात्र वगैरह सब को एकान्त में डालकर इस नगरी की ईशान कौन में मेरे शरीर प्रमाण क्षेत्र की मर्यादा करके शरीर दुर्वल होवे वैसी संलेखना झूलणा युक्त भक्त पानी का प्रत्याख्यान करके कालको नहीं वांच्छता हुवा विचरुंगा ॥ ३० ॥ ऐसा विचार कर सूर्योदय होते सब को पूछकर व भंडोपकरण एका- * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * नागर्थ - olo ० सूत्र शब्दार्थ है पा० पानी के प० प्रत्याख्यान कर पा० पादोपगमन से नि. रहा ॥३१॥ ते उस काल ते. उस समय में }ote व वलीचंचा राराज्यधानि अइन्द्र रहित अ० पुरोहित रहित हो थी.॥३३॥त तव ते उस बयली चंचा रा० राज्यधानि में व० रहने वाले व० बहुत अ० असुर कुमार दे० देव दे० देवी ता तामली वा वाल तपस्त्री को ओअवधिज्ञान से आ० देखकर अ० अन्योन्य स० तेडाकर एक ऐसा व० बोले ए. ऐसे दे. देवानुपिय व० यलिचंचा रा० राज्यधानी अ• इन्द्रविना की अ० पुरोहित विना की अ० अहो जाव भत्तपाण पडियाइक्खिए; पाओवगमणं निवणे ॥ ३१ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं बलिचंचारायहाणी आणिंदा अपुरोहिया याविहोत्था ॥ ३२ ॥ तएणं तेवलिचं- चारायहाणिवत्थव्वया बहवे असुरकुमारा देवाय देवीओय तामालिं बालतबस्सि ओ- हिणा आहोयंति आहोयांतत्ता अण्णमण्णं सदावेंति, सदातित्ता, एवं बयासी एवं न्तमें रखकर आहार पानीका प्रत्याख्यान कर काल को नहीं रांच्छता हुवा पादोपगमन मंथारा ग्रहण किया ३१ ॥ उस काल उस समय में वलीचंचा राज्यध्यानी में इन्द्र काल कर जाने मे इन्द्र गहित बनी हुई थी ॥ ३२ ॥ तब बलीचंचा राज्यधानी में रहनेवाले बहुत देव व देवियोंने शामली तापस को संलेखना करते हुवे देखे. और परस्पर बोलने लगे किअहो देवानुप्रिय !वलीचंचा राज्यधानी इन्द्र रहित, पुरोहित-रहित है. और हम इन्द्राधीन, इन्द्राधिष्ठित व इन्द्र के आधीन कार्य करनेवाले हैं. और अहो देवानुप्रिय ! ता- 389 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति ( भगवती ) सूत्र 33 388 तीसरा शतकका पहिला उद्देशा 85 भावार्थ शब्दार्थ - सूत्र अनुवादक-पालग्रामचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 पादुका कुं० कमंडल आ० वगैरह उ० उपकरण दा. काष्ट के प० पान ए. एकान्त में ए० रखकर ता० ताम्रलिप्ती नगरी की उ० ईशान कोन में णि प्रमाण मात्र भूमि आ० देखकर सं० संलेखना झू झूसणा झू० झूसकर भ० भक्त पा० पानी प० प्रत्याख्याकर पा० पादोपगमन का काल को अ० नहीं वांछता वि० विचरने को ति० ऐसा करके सं० संकल्पकर ॥ ३० ॥ क० काल जा० यावत् ज० सूर्य उदीत होते जा० यावत् आ० पूछकर ता. तामली ए० एकान्त में ए० रखे जा० यावत् भ० भक्त पडिग्गहयं एगते एडेत्ता तामलित्तीए णगरीए उत्तर पुरच्छिमे दिसीभाए णियत्तणि- यमंडलं आलिहिता संलेहणा झूसणा झूसियस्स भत्तपाण पडियाइक्खियस्स पाओवगयरस कालं अणवकंखमाणस्स विहरित्तए, त्तिकटु एवं संपेहेइ संपेहेइत्ता ॥ ३० ॥ कल्लं जावं जलंते जाव आपुच्छइ, आपुच्छइत्ता तामली एगंते एडेइ, सब से मीलकर व उन को पूछकर ताम्रलिप्ती नगरी की मध्य में से नीकलकर मेरी पादुका, कमंडल, काट- मय पात्र वगैरह सब को एकान्त में डालकर इस नगरी की ईशान कौन में मेरे शरीर प्रमाण क्षेत्र की मर्यादा करके शरीर दुर्बल होवे वैसी संलेखना झूसणा युक्त भक्त पानी का प्रत्याख्यान करके कालको नहीं वांच्छता हुवा विचरंगा ॥ ३० ॥ ऐसा विचार कर सूर्योदय होते सर को पूछकर व भंडोपकरण एका- * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * गवार्थ ब्दार्थ रा. राज्यधानी में ठि० स्थिति १० संकल्प प० करानेको ॥ ३३ ॥ अ० अन्योन्य की अं० पास ए. यह अर्थ प० मूनकर व० चलिचंचा रा० राज्यधानी की म० मध्य से नि० निकले जे० जहां रु० रुचकेन्द्र उ० उत्पानपर्वत ते. तहां उ० आये वे० क्रेय स० समुद्घात स. नीकाले जा. यावत् उ० उत्तर वैक्रेय रू. रूप वि. विकुणाकर ता. उस उ० उत्कृष्ट तु. वरासे चं रौद्रगति से ज. अन्गगति से छे. सूत्र ठिइप्पकप्पं पकरावेत्तए त्तिकटु,॥३३॥अण्णमण्णस्स ऑतिए एयमटुं पडिसुणंति पडिसुणं- तित्ता बलिचंचाए राग्रहाणीए मज्झं मझेणं निग्गच्छंति २ त्ता, जेणेव रुयइंद उप्पायपव्यए तेणेव उवागच्छति, वेउब्बिय समुग्याएणं समोहणंति २त्ता जाव उत्तर वेउब्बियाई रुवाई विकुव्वंति, विकुव्वतित्ता ताए उकिट्ठाए तुरियाए, चवलाए, चंडाए, जयणाए, छेयाए, सीहाए, सिग्धाए, दिव्याए, उडुयाए, देवगईए, तिरियं असंखेजाणं दीवसमुहाणं म- झं मझेणं जेणेब जंबूद्दीवे दीवे, जेणेव भारहेवासे, जेणेव तामलित्तीए णगरीए, भावार्थ चालतावाली, क्रोध में आकर चले ऐभी रौद्र, अन्य गति का जय करे चैमी, निपुणतावाली, शीघ्र- तावाली, दीव्य, और वस्त्रादिक के उटूनपने की देवगति से तिर्छा असंख्यात द्वीप समुद्र की मध्य में be होकर जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में ताम्रलिप्ती नामक नगरी में तामली मौर्य पुत्र की पास आये. वहां आकर तामली तपस्सी की उपर, व दिशी विदिशी में खड़े रहकर मनोज्ञ दीव्य देव ऋद्धि, मनोज्ञकान्ति, दीव्य 28- पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 82 133% तीसरा शतक का पहिला उद्देशा 90% Imanda शब्दार्थ ४४० सूत्र अनुवादक-पालब्रह्मचारी मुनि श्री. अमोलक पिजी 8. दि. देवानुप्रिय ई० इन्द्राधीन ई० इन्द्राधिष्टित ई० इन्द्राधीन क० कार्य अ० इसलिये दे० देवानीमय ता. तामली वा. वालतपस्वी ता ताम्रलिप्ती न० नगरी की व. वाहिर उ० ईशान कोन में नि प्रमाण मात्र भूमि आ० देखकर मं० संलेखना झू० झूमकर भ० भक्त पा० पानी प० प्रत्याख्यान कर पा० पादोप गम से णिक रहा तं. उन को से श्रेय दे. देवानुप्रिय ता तामलि वा० बालतपस्वी को व. बालचंचा खलु देवाणुप्पिया ! बलिचंचारायहाणी अजिंदा अपुरोहिया, अम्हेणं देवाणुप्पिया ! इंदाहीणा, इंदाहिट्ठिया, इंदाहीण कज्जा, अयंचणं देवाणुप्पिया ! तामली बालतय- स्सी तामलित्तीए णयरीए बहिया उत्तरपुरच्छिम दिसीभाए नियत्तणियमंडलं आ- लिहिता संलेहणा झूसणा झासिए भत्तपाणपडियाइक्खिए पाओवगमणं निवण्णे ॥ तं सेयं खलु देवाणुपिया ! अम्हं तामलिं बालतबसि बलिचंचाए रायहाणीए मली तपस्वीने ताम्रलिप्ती नगरी की बाहिर ईशान कोनमें शरीर प्रमाण क्षेत्र मंडल आलेख कर सैलेवना से झूसित भक्तपान का प्रत्याख्यान करके पादोपगमन अनशन किया है. इसलिये तामली तपस्वी को चलि- चंचा राज्यधानी में रहनेका संकल्प कराना श्रेष्ठ है ॥ ३३ ॥ परस्पर ऐसे वार्तालाप सुनकर पलिचंचा राज्यधानी की मध्य में से नीकलकर रुचकेन्द्र नाम का उत्पात पर्वत परं आये. वहां आकर वैकेय समुद् घात प्रदेश वादिर नीकालकर उत्तर वैकेय. रूप बनाये. वैक्रेय रूप बनाकर उत्कृष्ट, आकुलतावाली, * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायनी ज्यालाप्रसादनी * भावार्थ ब्दार्थ | रा. राज्यधानी में ठि० स्थिति प० संकल्प प० करानेको ॥ ३३ ॥ अ० अन्योन्य की अं० पास ए. यह अर्थ प० मूनकर य० बलिचंचा रा० राज्यधानी की म० मध्य से नि० निकले जे० जहां रु० रुचकेन्द्र उ० उत्पानपर्वत ते. तहां उ० आये वे० फ्रेय स० समुद्घात स. नीकाले जा. यावत् उ० उत्तर वैफ्रेय रू० रूप वि० विकुणाकर ता० उत्स उ० उत्कृष्ट तु• त्वरासे चं रौद्रगति से ज० अन्यगति से छे० सूत्र ठिइप्पकप्पं पकरावेत्तए त्तिकटु,॥३३॥अण्णमण्णस्स ऑतिए एयमटुं पडिसुणंति पडिसुणं- तित्ता बलिचंचाए राग्रहाणीए मज्झं मझेणं निग्गच्छंति २ त्ता, जेणेव रुयइंदे उप्पायपन्बए तेणेव उवागच्छंति, वेउब्बिय समुग्याएणं समोहणंति २त्ता जाव उत्तर वेउब्बियाई रुवाई विकुब्बति, विकुव्वतित्ता ताए उक्किट्ठाए तुरियाए, चवलाए, चंडाए, जयणाए, छेयाए, सीहाए, सिग्घाए, दिव्याए, उडुयाए, देवगईए, तिरियं असंखेजाणं दीवसमुदाणं म- झं मझेणं जेणेव जंबूद्दीवे दीवे, जेणेव भारहेवासे, जेणेव तामलित्तीए णगरीए, भावार्थ चपलतावाली, क्रोध में आकर चले ऐसी रौद्र, अन्य गति का जय करे चैमी, निपुणतावाली, शीघ्र- तावाली, दीव्य, और वस्त्रादिक के उद्भूनपने की देवगति से तिर्छा असंख्यात द्वीप समुद्र की मध्य में Bio होकर जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में ताम्रलिप्ती नामक नगरी में तामली मौर्य पुत्र की पास आये. वहां आकर तामली तपस्त्री की उपर, व दिशी विदिशी में खडे रहकर मनोज्ञ दीव्य देव ऋद्धि, मनोज्ञकान्ति, दीव्य 8- पंचमांग विवाह पप्णत्ति (भगवती) सूत्र 8-800 388 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा -- शब्द अमोलक निपुनगति सी सिंहगति सि० शीघ्रगति से दि० दीव्यगति से उ० उद्धृत दे. देवगति से ति• तिर्छा अ० असंख्यात दी. द्वीप स० समुद्र म. मध्य में जे. जहां भा. भरत क्षेत्र जे. जहां ना. ताम्रलिप्ती न० नगरी जे. जहां ता० तामलि मो: मौर्यपुत्र ते. तहां उ० आकर ता. तामाल वा: वालतपस्वी की उ० उपर स० सबदिशा में स. प्रतिदिशा में ठि० रहकर दि० दीव्य दे. देवऋद्धि जेणेव तामली मोरियपुत्ते तणेव उवागच्छंति, उवागच्छंतित्ता तामलिस्स बालतव- सिरस उप्पि सपक्खि सपडिदिसिं ठिच्चा, दिव्वं देबिढेि, दिव्वं देवजुतिं. दिव्यं देवाणु- पावं दिव्यं बत्तीसइविहं नविहिं उवदंसंति, उवदंसतित्ता, तामलिं वालतवस्सि पे आयाहिणपयाहिणं करंति बंदति नमसंति, नमसंतित्ता, एवं बयासी एवं साप्पुप्पिया ? अम्हे बलिचंचारायहाणिवत्थव्बया, बहवे असुर कुमारा देवाय र देवाणुप्पिया ! वंदामो नमसामो जाव पजुवासामो । अम्हाणं दवाणुप्पिया !. व और देवता के बत्तीस प्रकार के नाटक बतलाये. बतलाकर तामली तापस को तीन बार प्रद. रके वंदना नमस्कार किया. और ऐसा बोले कि अहो देवानप्रिय ! हम बलिचंचा राज्यधानी में वाले देव व देवियों तुम को बांदते हैं यावत् तुम्हारी पर्युपासना करते हैं. अहो देवानुप्रिय हमारी लिचंचा राज्यधानी इन्द्र रहित व पुरोहित रहित है. और हम इन्द्राधीन, इन्द्राधिष्ठित, वइन्द्राधीन कार्य करने भकाशक रानावहादुर लाग सुखदेव सहायनी मालाप्रसादजी * .
CYO शब्दार्थ ४. दे० देवयुति दे० देवानुभाव दि० दीव्य य० वत्तीस प्रकार के न० नाटकविधि उ० बताकर ता० तामाल पा० बालतपस्वी को ति तीनपार आदान प. प्रदक्षिणा क. करे . वांदे न० नमस्कार कर एक ऐसा १५० बोले दे. देवानुपिय अहम य० बलिचंवा रा० राज्यधानी च० रहने वाले ५० बहुत अ० असुर कुमार दे० देव दे० देवी पं० वंदन करते हैं न नमस्कार करते हैं प० पर्युपासना करते हैं ॥ ३३ ॥ त० तब से वह ता तामलि बालतपस्वी ते. उन व. पलिचंचा रा० राज्यधानी में य० रहने वाले २० सूत्र बलिचचा रायहाणी अणिंदा अपुरोहिया, अम्हेणं देवाणुप्पिया ! इंदाहीणा, इंदाहि- ट्ठिया, इंदाहीणकजा तं तुम्भेणं देवाणुप्पिया बलिचंचा रायहाणिं आढह, परिया- णह, सुमरह, अटुंबंधह, निहाणं पकरेह; ठिइप्पकप्पं पकरेह; तएणं तुझे कालमासे कालं किच्चा बलिचंचा रायहाणीए उववाजिस्सह, तएणं तुन्भे अम्हं इंदा' भविस्सइ तएण तुम्भे अम्हेहिं सदि दिव्वाई भोगभोगाई जमाणा विहरिस्सह।।३३॥ तएणं से ता- वाले हैं. इमालये अहो देवानुप्रिय ! तुम बलिचंचा राज्यधानी का आदर करो, अच्छी जानो, उस का मन में स्मरण करो, वहां उत्पन्न होने का निदान (नियाणा) करो ओर वहां रहने का संकल्प करो. olo इस से तुम वहां से काल के अवसर में काल कर के बलिचंचा राज्यधानी में उत्पन्न होवोगे और हमारी साथ दीव्य भोगोभोग भोगते हुरे विचरोग ॥३३॥.इस तरह बलि पंचा राज्यधानी के रहने वाले बहुत अमुर - पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भगवती) मूत्र 8 *88-तीसरा शतकका पहिला उद्देशा83838 भावार्थ शब्दार्थ निपुनगति सी. सिंहगति सि० शीघ्रगति से दि० दीव्यगति से उ० उद्धृत दे० देवगति से ति• तिर्छा अ० असंख्यात दी. द्वीप स० समुद्र म. मध्य में जे. जहां भा० भरत क्षेत्र जे. जहां ना ताम्रलिप्ती न० नगरी जे. जहां ता तामलि मोः मौर्यपुत्र ते. तहां ज. आकर ता. तामाल बार बालतपस्वी की उ० उपर स० सवदिशा में स० प्रतिदिशा में ठि० रहकर दि० दीव्य दे. देवऋद्धि सूत्र जेणेव तामलो मोरियपुत्ते तेणेव उवागच्छंति, उवागच्छंतित्ता तामालिस्स बालतव- सिरस उप्पि सपक्खि सपडिदिसिं ठिच्चा, दिव्वं देविढेि, दिव्वं देवजुत्ति, दिव्यं देवाणु- भावं, दिव्वं बत्तीसइविहं नट्टविहिं उवदंसंति, उवदंसतित्ता, तामालिं वालतवारस तिक्खुत्तो आयाहिणपयाहिणं .करंति बंदति नमसंति, नमसंतित्ता, एवं वयासी एवं खलु देवाप्पुप्पिया ? अम्हे बलिचंचारायहाणिवत्थव्वया, वहवे असुर कुमारा देवाय देवीओय देवाणुप्पिया ! वंदामो नमंसामो.जाव पज्जुवासामो । अम्हाणं देवाणुप्पिया ! स्वार्थ महानुभाव और देवता के बत्तीस प्रकार के नाटक बतलाये. बतलाकर तामली तापस को तीन बार प्रद- क्षिणा करके वंदना नमस्कार किया. और ऐसा बोले कि अहो देवानप्रिय ! हम बलिचंचा राज्यधानी में रहनेवाले देव व देवियों तुम को चांदते हैं यावत् तुम्हारी पर्युपासना करते हैं. अहो देवानुमिय हमारी बालचंचा राज्यधानी इन्द्र रहित व पुरोहित रहित है. और हम इन्द्राधीन, इन्द्राधिष्टित, वइन्द्राधीन कार्य करने- - अनुवादक-बालबाह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 * प्रकाशक-रानावहादुर लाग सुखदेव सहायनी ज्यालामसादजी * दा ७ ४४५ सूत्र 98 पंचमाङ्ग विवाह पप्णत्ति (भगवती) सूत्र - वा० बालतपस्वी से अ० अनादर कराये हुवे अः अच्छा नहीं जाने हुवे जा. जिस दि० दिशिसे पा० आये ता. उसदिशि में प० पीछेगये ॥ ३६॥ ते. उस काल ते. उस समय में ई० ईशान देवलोक अ० इन्द्र रहित अ० पुरोहित रहित हो ० था ॥ ३७ ॥ त० तब से वह ता० तामली वा० चालतपस्वी व. बहुत ५० प्रतिपूर्ण स० साठ सहस्रवर्ष प० पर्याय पा० पालकर दो दोमास की सं० संलेखना मे अ० आत्मा को झू० झूसकर स० वीससहित भ० भक्त शत अ० अनशन छे० छेदकर का० काल के अवसर में का. रायहाणि वत्थव्वया बहवे असुरकुमारा देवाय देवीओय तामलिणा वालतवस्सिणा अणाटाइजमाणा अपरियाइजमाणा जामेव दिसि पाउन्भया तामेवदिसि पडिगया॥३६॥तेणं कालेणं तेणं समएणं ईसाणे कप्पे अणिंदे अपुरोहिए याबि होत्था; ॥३७॥ तएणं से तामली चालतवस्सी बहुपडिपुण्णाई सद्धिं वास सहस्साइं परियागं पाउणित्ता दो मासियाए संले- हणाए अत्ताणंझूसित्ता, सवीसं भत्तसयं अणसणाए छेदित्ता, कालमासे कालं किच्चा इस तरह बलिचंचा राज्यधानी में रहने वाले देवता देवियों का कहना तामली तापम ने सुना नहीं वैसे ही अच्छा माना नहीं इस से वे जहां से आये थे वहां पाछे गये ॥ ३६॥ उस काल उस समय में ईशान नामक देवलोक में इन्द्र चवने से वह भी इन्द्र रहित पुरोहित रहित हुवा ॥ ३७॥ तामली तापस साठ हजार वर्ष पर्यंत प्रवा पालकर, दो मास की संलेखना से आत्मा को झूसकर, एकसो बीस भक्त अनशन 838 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ सूत्र 42 अनुवादक- लिग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी 82- बहुत अ० असुर.कुमार के दे० देव देवी से एक ऐसे यु० कहते हुवे ए. इस अर्थ को नो० नहीं आ० आदरकर नोनही १० अच्छा जाने तु तुष्णित सं० रहे ॥ ३४ ॥ त० तब ते वे व० चलिचंचा रा. राज्यपानि में व• रहते ५० बहुत अ० अमुर कुमार दे देव दे० देवीं ता० तामलि मो० मोर्यपुत्र को दो. दूसरीवक्त तक तीसरी वक्त ति तीनवक्त आ. आदान प० प्रदक्षिणा क० करके ॥ ३५ ॥ वा० सामंलि मली बालतवस्सी तेहिं बलिचंनारायराणि वत्थव्वेहिं बहुहिं असुरकुमारेहिं देवहिय देवीहिय, एवं वुत्तेसमाणे, एयमटुं णो आढाइ, णो परियाणइ, तुसिणीए संचिट्ठइ ॥ ॥ ३४ ॥ तएणं ते बालचंचारायहाणिवत्थव्वया वहवे असुरकुमारा देवाय देवीओय तामलिं मोरियपुत्तं दोचंपि तचंपि तिक्खुत्तो आयाहिण पयाहिणं करेइ करेइत्ता, जाव अम्हं चणं देवाणुप्पिया ! बलिचंचारायहाणी आणंदा जार ठिइप्पकप्पं पकरेह जाव दोचंपि तच्चीप एवं वुत्तेसमाणे जाव तुसिणीए संचिट्ठइ॥३५॥तएणं ते बालिचंचा- कुमार देवत देवियोंने जो कहा उस का अज्ञान तपस्या करने वाला तामली तापस ने आदर नहीं किया अच्छा नहीं जाना पातु मौन रहा ॥ ३४ ॥ पुनः वे अमर कुमार देवताओंने तीन वक्त पद- क्षिणा कर दो तीन बार वैसा ही कहा कि अहो देवानुप्रिय हम इस बलियंचा राज्यधानी में रहने वाले देव यावत् तुम वहां उत्पन्न होने का नियाना करो परंतु तामली तापस. मौन खडा रहा. ॥ ३५ * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ पदार्थ में व रहने वाले व. बहुन अ. असुर कुमार दे देव दे देवी ता तामलिया. बालतपस्वी को का० काल को प्राप्त जा. जानकर ई० ईशान देवलोक में दे० देवेन्द्रपने उ० उत्पन्न हुवा पा० देखकर आ० आसुरक्त कु: कुपित हुये चं० रौद्ररूप वाले हुवे मि० देदीप्यमान होते व वलिचंचा रा० राज्यधानी के म मध्य से नि० नीकलकर ता० उस उ० उत्कृष्टगति से जा. यावत् जे० जहां भा० भरत क्षेत्र जे० जहां ता. ताम्रलिप्ती न० नगरी जे. जहां ता० तामलि वा. पालतपस्वी का स० शरीर ते० तहां उ० आकर ४४७ 3880593 तीसरा शतकका पहिला उद्देशा सूत्र * पंचमांग विवाह पप्णति (भगवती) मूत्र 80-809 देवीओय तामलिं बालतरस्सि कालगयं जाणित्ता ईसाणेय कप्पे देविंदत्ताए उबवणं पासित्ता, आसुरुत्ता कुविया चंडिकिया, मिसिमिसेमाणा बलिचंचाए रायहाणीए मझं मझेगं निगच्छंति, निगच्छंतित्ता, ताए उकिट्ठाए जाच जेणेव भारहेवासे जेणेव ता. मलित्ती णयरी, जेणेव तामलिस्स घाल तयसिस्स सरीरए तेणेव उवागच्छंति, उवाग- भावार्थ देव देवियांने तामली तपस्त्री को काल प्राप्त हुवा जानकर व ईशान देवलोक में इन्द्र बना हुवा देख कर क्रोध में आसुरक्त हुए, कोप में धमधपायमान हुए, अत्यंत रोप भाव प्रगट हुवा, और मीसमास दांत पीसने लगे. फीर वलिचचा राज्यधानी में से नीकलकर उत्कृष्ट चंडा, चपला, शीघ्र, दीव्य देवगति से ताम्रलिप्सी fok नगरी के बाहिर तामली तापसका शरीर था यहां आये, और उस का बायां पांव रस्सी से बांधकर तीन शब्दार्थ) o ४४६ सूत्र - अनुवादक-यालयामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 काल करके ई० ईशान का देवलोक में ई० ईशान बर्दिशक विमान में उपपात सभा में दे० देवशय्या में दे देवष्य बस्त्र के अं०अतर में अं अंगुलका अं असंख्यातवा भाग ओ०अवगाहना ई०ईशान दे देवेन्द्र वि. विरह काल में ई ईशान देवेन्द्रपने उ० उत्पन्न हुवा ॥ ३८ ॥ त० तव से बह ई० ईशान दे देवेन्द्र दे० देवराजा अ० तुर्त का उत्पन्न पं० पांच प्रकार की १० पर्याप्ति से. पं० पर्याप्त भार को ग. जाये तं० चद्द ज जैसे आ आहार पर्याप्ति जा यावत् भाभापामन पर्याप्ति॥३१॥त तय वयलिचंचा रा०राज्यधानी ईसाणे कप्पे ईसाणवडिंसए विमाणे उववाय सभाए देवसयणिजंसि देवदूसंतरियं अं- गुलस्स असंखेनइ भागमेत्तीए ओगाहणाए ईसाणे देविंदे विरहिय कालसमयसि ईसाण देविदत्ताए उबवण्णे ॥ ३८ ॥ तएणं से ईसाणे देविंद देवराया अहुणो यवणे पंचविहाए पजत्तीए पजत्तिभावं गच्छइ तंजहा आहार पजन्तीए, जाव भासामन पजत्तीए ॥ ३९ ॥ तएणं बलिचंचा रोयहाणि वत्थव्वया, बहवे असुरकुमारा देवाय करके काल के अवसर में काल कर ईशान देवलोक के ईशान घडिशक नामक विमान की उपपात सभा में देवशैय्या में देवदूप्य वस्त्र की नीचे अंगुल के असंख्यात भाग की अवगाहना से ईशान देवेन्द्र के विरह काल में ईशानेन्द्रपने उत्पन्न हुवे ॥ ३८ ॥ वह नत्काल का उत्पन्न हुवा ईशानेन्द्र आहार पर्याप्ति आदि पांच प्रकार की पर्याप्ति से पर्याप्त हुवा ॥ ३१ ॥ उस समय में बलिचंचा राज्यधानी में रहनेवाले बहुत * प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसदायनी ज्वालाप्रसादजी * र्य दार्थ ४४७ में व० रहने वाले व. बहुन अ० असुर कुमार दे० देव दे० देवी ता तामलि वा० बालतपस्वी को का० काल को माप्त जा. जानकर ई० ईशान देवलोक में दे० देवेन्द्रपने उ० उत्पन्न हुवा पा० देखकर आ० आसुरक्त कु: कुपित हुवे चं० रौद्ररूप वाले हुवे मि० देदीप्यमान होते प. बलिचंचा रा राज्यधानी के मन मध्य से नि० नीकलकर ता० उस उ० उत्कृष्टगति से जा. यावत् जे० जहां भा० भरत क्षेत्र जे. जहां ता. तामूलिप्तीन नगरी जे. जहां ता० तामलि वा० बालतपस्वी का स० शरीर ते. तहां उ० आकर o 388 तीसरा शतकका पहिला उद्देशा सूत्र 1802 पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) मूत्र 8888- देवीओय तामलिं बालतवस्ति कालगयं जाणित्ता ईसाणेय कप्पे देविंदत्ताए उबवणं पासित्ता, आसुरुत्ता कुविया चंडिकिया, मिसिमिसेमाणा बलिचंचाए रायहाणीए मझं मझेगं निगच्छंति, निगच्छंतित्ता, ताए उकिट्ठाए जाव जेणेव भारहेवासे जेणेव ता. मलित्ती णयरी, जेणेत्र तामलिस्स बाल तसिस्स सरीरए तेणेव उवागच्छंति, उवाग- भावार्थ देव देवियोंने तामली तपस्थी को काल मास हुवा जानकर व ईशान देवलोक में इन्द्र बना हुवा देख कर क्रोध में आसुरक्त हुए, कोप में धमधमायमान हुए, अत्यंत रोप भाव प्रगट हुत्रा, और मीसमास दांत पीसने लगे. फोर वलिचंचा राज्यधानी में से नीकालकर उत्कृष्ट, चंडा, चपला, शीघ्र, दीव्य देवमति से ताम्रलिप्सी नगरी के शाहिर तामली तापसका शरीर था यहां आये. और उस का बायां पांव रस्सी से बांधकर तीन 00 शब्दार्थ ४४८ सत्र 2 अनुवादक-पालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 83 वा बाये पांव सु. रस्ती से पं० वधि वं. बांधकर ति तीनवार मु मुख में उ० धुंके उ० थुककर ता. ताम्रलिप्ती न० नगरी में सिं० सिंघाडे जैसे ति० तीन चचार च. चच्चर च० चतुर्मुख मवडा रस्तापर आ० इधर उधर क० करते म० मोटे मोटे स० शब्द से उ० उद्घोषणा करते ए० ऐना व० बोले से यह के कोन ता तामली या बाल तपस्वी स स्वयं गलीया हुवा पा०प्रणाम प्रवासे प दीक्षित के० कोन से वह ई० ईशान देवलोक में ई. ईशान देवेन्द्र दे० देवराजा ति० ऐसा करके ता० तामली था. पालतपस्वी का स. शरीर की ही हीलनाकरे नि० निंदाकरे खि० विशप निंदाकरे ग गर्दा करे च्छइत्ता, वामे पाए सुंवेणं बंघति बंधइत्ता, तिक्खुत्तो मुहे उदुईति २. त्ता तामाल- त्तीए णयरीए सिंघाडग तिय चउक्क चच्चर चउम्मुह महापह पहेसु आकढुविकढेि करेमाणा महया महया सदेणं उग्घोसेमाणा उग्घोसेमाणा एवं बयासी सेकेणं भो तामलां वालतबस्सी सयं गहियलिंगे पाणामाए • पव्वजाए पव्वइए, के सणं से ईसाणे कप्प ईसाणे देविंद देवरायातिकटु, तामलिरस बालतबस्सिरस.सरीरयं हीति, निंदति वक्त उस के मुद्द में थुके. थुककर उस नगरी के सिंघाडे के आकारवाले यावत् बहुत रस्तेवाले चौक में स्मी मे उस के शरीर को घसीटने हुवे लाये. और उघोषणा करने लो कि अहो लोको ! स्वयं मन: किल्पित प्रणाम मया अंगीकार करनेवाला एसा तामली तापस कोन ? ईशान देवलोक में देवतापने *. प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसदायनी ज्वालाप्रसादजी * वार्थ का 30 सूत्र शब्दार्थी अ० अवज्ञाकरे त० तर्जनाकरे ता ताडनकरे ५० कदनाकरे प० दुःखदे आ. इधर उधर क करे हॉ० हीलनाकर जा. यावत् आ० इधर उधर क० करके ए. एकान्त में ए० रखकर दा० जिमदिशि से पा. आये ता. उसदिशि में प० पीछेगये ॥ ४० ॥ त तब ई० ईशान देवलोक में रहने वाले घे० वैमानिक • देव दे० देवी २० वलीचंचा रा० राज्यधानी में व० रहने वाले ५० बहुन अ० असुर कुमार दे० देवई ४४९ दि० देवी से ता तामलि घा० बालतपस्वी का स. शरीर को ही हीलना करने नि. निदाकरते जा. यावतू आ०इधर उधर की करते पा०देखकर आशीघ्र आसुरक्त जा. यावत् मि० देदीप्यमान होते जे०जहां खिसंति, गरहंति, अवमणंति, तजिति, तालेति, परिवहति, पन्वहंति, आकढ विकढेि करंति, हीलेत्ता जाव आकढ़ विकढिकरेत्ता, एगते एडंति २ ता, जामेवदिसिं पाउन्भूया, तामेवादिसि पडिगया ॥ ४० ॥ तएणं ते ईसाण कप्पवासी बहवे वेमाणिया देवाय देवीओय बलिचंचा रायहाणि वत्थव्यएहिं, बहूहिं असुरकुमारेहि, देवोहिय देवीहिय तामालिस्स बालतवस्सिस्स सरीरयं हीलिजमाणं, निदिजमाणं, खिसिज्जमाणं जाव उत्पन्न हुवा सो कौन ? इस तरह तामली तापस के शरीर की हिलना, निंदा तिरस्कार व गर्दा करनेलगे. भावार्थ अवगणना करने लगे, हस्तादि से ताडना करने लगे, और जात्यादिक की हिलना, विशेष दिलना करने ७ लगे. ऐसा करके उस के शरीर को एकान्त में डालकर जहां से आये थे वहां पीछे चले गये ॥ ४० ॥ उस समय में ईशान देवलोक.में रहनेवाले बहुत देव व देवियोंने बलिवंचा राज्यधानी में रहनेवाले देव देवी को 7 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 8888 तीसग शतक का पहिला उद्देशा 988 GYO ४४८ . शब्दार्थ वा बाय पांघ मुं० रस्ती से वं० यांचे घ• यांधकर ति तीनवार मु० मुख में उ० थुके उ• थुककर ता. तामूलिप्ती न० नगरी में सिं० सिंघाडे जैसे ति० तीन च• चार च० चचर च. चतुर्मुख मा बडा रस्तापर आ० इधर उधर क० करते म० मोटे मोटे स० शब्द से उ० उद्घोषणा करते ए० ऐला व० बोले से यह के कोन ता तामली वा बाल तपस्वी स स्वयं गल्लीया हुवा पा०प्रणाम प्रवासे पदीक्षित कि० कोन से वह ई. ईशान देवलोक में ई. ईशान देवेन्द्र दे० देवराजा ति ऐसा करके ता. तामली घा० बालतपस्वी का स.शरीर की ही-हीलना करे नि. निंदाकरे खिल विशप निंदाकरे ग गहीं करे सून छइत्ता, वामे पाए सुंवेणं बंघति बंधइत्ता, तिक्खुत्तो मुहे उडुहंति २. ता तामाल- चीए णयरीए सिंघाडग तिय चउक्क चच्चर चउम्मुह महापह पहेसु आकविकढेि करेमाणा महया महया सद्देणं उग्घोसेमाणा. उग्धोसेमाणा एवं बयासी सेकेणं भो तामला वालतवस्ती सयं गहियलिंगे पाणामाए • पव्यजाए पव्वइए, के सणं से ईसाणे कप्पे ईसाणे देविदे देवरायातिकटु, तामलिरस बालतवस्सिरस सरीरयं हीलेंति, निदंति वार्थ वक्त उस के मुंद में धुके. धुककर उस नगरी के सिंघाडे के आकारवाले. यावत् बहुत ,रस्तेवाले चौक में रस्मी में उस के शरीर को घसीटते हुवे लाये. और उयोपणा करने लगे कि अहो लोको ! स्वयं मनः कल्पित प्रणाम प्रया अंगीकार करनेवाला एसा तामली तापप्स कोन ? ईशान देवलोक में देवतापने अनुवादक-पालग्रामवारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 800 *. प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * Dia ब्दिाथै] सूत्र 8-39 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भवगती) सूत्र 888- पा. आये ता. उसदिशि में प० पीछेगये ।। ४१ ॥ त० तब से वह ई. ईशान दे० देवेन्द्र दे० देवराजा ते. उन ई० ईशान देवलोक निवामी व बहुत वे० चैमानिक दे० देव दे० देवी अं० पास ए. यह अर्थ सोमूनकर निः अवधार कर आ० असुरक्त जायायत मि० देदीप्यमान त. तहां स शेयापे ग गये हुवे ति त्रिवली भि० भृकुटी सा० चढाकर व० बलिचंचा रा० राज्यधानी अ० अधो स० दिशा म. विदिशा को स० देखे ॥ ४२ ॥ त० तव सा वह वा नलिचंचा रा० राज्धानी ई. ईशान दे० देवेन्द्र दे० जाव एगंते एडंति एडंतित्ता जामेव दिसिं पाउन्भए तामेवदिसिं पडिगए ॥ ११ ॥ तएणं से ईसाणे देविदे देवराया,तेसि ईसाणकप्पवासीणं बहणं वेमाणियाणं देवाणय देवी- णय अंतिए एयमढे सोच्चानिसम्म आसुरुत्ते जाव मिसिमिसेमाणे तत्थेव सयणिज्जवरगए तिवलीयं भिउडि निडाले साहटु बलिचंचा रायहाणिं अहे सपक्खि सपडिदिसिं सम- भिलोएइ॥४२॥ तएणं सा बलिचंचा रायहाणी ईसाणणं देविदेणं देवरण्णा अहे सपक्खि लना, निंदा की. फीर आप के शरीर को एकान्त में डालकर अपने २ स्थान पीछे गये ॥ ४१ ॥ फीर ईशान देवलोक में रहनेवाले देव देवियों से ऐसा सुननेसे ईशानेन्द्रने क्रोधित वनकर वहां ईशान देवलोक में शैय्या पर बैठे हुए ललाट में भृकुटि चढाकर वलिचंचा राज्यधानी की नीचे, उपर सब दिशा व विदि- शिओं में अवलोकन किया ॥ ४२ ॥ इस तरह वलिचंचा राज्यधानी की ऊपर, नीचे, दिशी विदिशिओं में 2 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा 8. भावार्थ सून , 43 अनुवादक-बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी ३० इशान दवन्द्र द० दवराजा ज० जहां उ० जाकर क० करके तल ५०इकठेकर दण्दशनख मि० शिप आ० आवर्तन म० मस्तक अं० अंजलि करके ज० जयविजय व० वधाकर ए. ऐमा पर बोले दे देवानुमिय व० चलिचंचा रा० राज्यधानी में व० रहने वाले व० बहुत अ० असुर कुमार दे० देव दे० देवी दे. देवानुप्रिय का काल को प्राप्त जा० जानकर ई० ईशान देवलोक में ई. इंद्रपने उ० उत्पन हुये पारदेखकर आ० शीघ्रअसुरक्त जा. यावत् ए० एकान्त में ए रखकर जा० यावतू जा० जिसदिशि से आकड्ड विकट्टि कोरमाणे पासंति, पासइत्ता आमुरुत्ता जाव मिसिमिसेमाणा जेणेव ईसाणे देविंदे देवराया तेणेव उवागच्छति उवागच्छइत्ता, करयल परिग्गहियं दसनहं सिरसा- वत्तं मत्थए अंजलिंक? जएणं विजएणं वढाति, वढावइत्ता एवं क्यासी एवं खलु देवाणुप्पिया ! बलिचंचारायहाणिवत्थव्वया बहवे असुरकुमारा देवाय देवीओय देवाणुप्पिए कालगए जाणेत्ता, ईसाणेयकप्पे इंदत्ताए. उववण्णे पासेत्ता, आसुरुत्ता तामली तापस के शरीर की हीलना, निन्द्रा, खिंसना करते और उन के शरीर को मार्ग में घसीटते हुवे दिखा. इस से बहुत क्रोधित बनकर ईशानेन्द्र की पास आये और इस्तद्वय से मस्तक को आवर्तना करके जय विजय शब्द से वधाये. यधाकर ऐसा बोले कि अहो देवानुमिय ! आप को काल प्राप्त हुने ईशानेन्द्र वने हुवे जानकर वलिचंचा राज्यधानी में रहनेवाले देव देवियोंने आपका मृतक शरीर की * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * " पा. आये ता. उसदिशि में प० पीछेगये ॥४१॥त. तब से वह ई० ईशान दे देवेन्द्र दे देवराजा जाते. उन ई० ईशान देवलोक निवासी व० बहुत वे० वैमानिक दे० देव दे० देवी अं० पाप्त ए. यह अर्थ सोसूनकर नि० अबधार कर आ० असुरक्त जा. यावत् मि० देदीप्यमान त. तहां स शेयापे ग गये हुवे ति त्रिवली भि. भृकुटी सा० चढाकर व० वलिचंचा रा० राज्यधानी अ० अधो स. दिशा स. विदिशा को स० देखे ॥ ४२ ॥ त० तव सा वह व० चलिचंचा रा० राज्धानी ई० ईशान दे० देवेन्द्र दे० सुत्र जाव एगते एडति एडंतित्ता जामेव दिसिं पाउन्भए तामेवदिसिं पडिगए ॥ ११ ॥ तएणं से ईसाणे देविंदे देवराया,तेसिं ईसाणकप्पवासीणं बहूणं वेमाणियाणं देवाणय देवी- णय अंतिए एयमढे सोच्चानिसम्म आसुरुत्ते जाव मिसिमिसेमाणे तत्थेव सयणिजवरगए तिवलीयं भिउडिं निडाले साहहु बलिचंचा रायहाणिं अहे सपक्खि सपडिदिसिं सम- भिलोएइ॥४२॥ तएणं सा बलिचंचा रायहाणी ईसाणणं देविदेणं देवरण्णा अहे सपक्खि लना, निंदा की. फीर आप के शरीर को एकान्त में डालकर अपने २ स्थान पीछे गये ॥४१॥ फीर भावार्थ ईशान देवलोक में रहनेवाले देव देवियों से ऐसा सुननेसे ईशानेन्द्रने क्रोधित बनकर वहां ईशान देवलोक में शैय्या पर बैठे हुए ललाट में भृकुटि चढाकर वलिचंचा राज्यधानी की नीचे, उपर सर दिशा व विदि- शिओं में अवलोकन किया ॥ ४२ ॥ इस तरह बलिचंचा राज्यधानी की ऊपर, नीचे, दिशी विदिशिओं में 388 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र - Pag> 332 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा 83>< शब्दार्थ ४५२ सन - अनुवादक-पालग्रामनारी मुनि श्री अमोलक पिजी 8 देवराना अ० अधो सदिशा स० प्रतिदिशा को स० देखते ते. उस दि० दिव्य प्रभाव से इं. अं. गार सारिखा मु० मुर्मुरभूत ततप्त वेलुकण तता अग्निसरिखी जा० उत्पन्न हुई॥४३॥त तर ते वे ३०वलि चंचा रा० राज्यधानी में व० रहने वाले व० बहुत अ० असुर कुमार दे० देव देवी तं. उस व० वलिचंचा रा. राज्यधानी को ई० अग्निभूत जा० यावत् म० समज्योति भूत पा० देखकर भी० डरेहुवे उ० कंपहुवे ता० धासेहुवे उ० उद्वेग पायेहुवे सं० भय व्याप्त स० सवबाजु आ: दोडे प० विशेप दोडे अ० अन्योन्य सपडिदिसिं समभिलोइयासमाणातेणं दिव्वप्पभावेणं,इंगालभूया,मुम्मुरभूया छारिभूया,तत्त कवेल्लयभूया, तत्तासमजोइभ्या जाया याविहोत्था. ॥ ४३ ॥ तएणते बलिचंचा राय- हाणिवत्थव्बया बहवे असुरकुमारा देवाय देवीओय तं बलिचंचा रायहाणि इंगालभूयं जाब समजोइभूयं पासंति पासतित्ता भीया उतत्था तसिया उद्विग्गा संजायभया सव्वओ समंता आधावति परिधावति परिधावतित्ता अण्णमण्णस्सकायं समतुरंगेमाणा.. चिटुंति देखने से उन के दीव्य प्रभाव से वह राज्यधानी अनि के अंगार समान, मुर्मुरे समान, राख समान, तारती समान व अति अप्ण अग्नि समान हुई ॥ ४३ ॥ उस समय में बालचंचा राज्यधानी में रहमेवाले देवों नगरी को अंगारे समान यावत् अग्नि समान देखकर भयभीत हुवे, कंपनेलगे, उद्वेग करने लगे: इस तरह भयभीत बने हुये चारों तरफ दौडने लगे और एक २ की काया में प्रवेश करने लगे ॥ ४४ ।। * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायनी बालामसादजी * गर्थ दार्थ की का० काय को स० प्रवेश करते चि० रहते हैं ॥ ४४ ॥ त० तब ते वे व० बलिचंचा रा. राज्य धानी में व० रहने वाले व० बहुत अ० असुर कुमार दे देव दे० देवी ई० ईशान दे. देवेन्द्र को प कुपित हुवे जा० जानकर ई० ईशान दे देवेन्द्र दि० दीव्य दे० देवऋद्धि द० देवगुति दे० देवानुभाग ते तेनोलेश्या अ० नहीं सहते हुवे स० सव स मवदिशा में स० प्रतिदिशा में ठि० रहकर क-करके तल द- दशनख-सि० शिर्ष से आ० आवर्तन म० मस्तक से अं० अंजलि क. करके ज. जयतिजय से 40 ४५३ 838 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा सूत्र 488 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र - ॥ ४४ ॥ तएणं ते बलिचंचा रायहाणि वत्थन्ग बहवे असुरकुमारा देवाय देवीओय ईसाणं देविंदं देवरायं परिकुवियं जाणित्ता ईसाणस्स देविंदरस देवरण्णो तंदिव्यं देविद्धि दिव्वदेवजुत्ति, दिव्वं देवाणुभागं, दिव्वं तेयलेस्सं असहमाणा सव्वे सपक्खि सपडि दिसिं ठिच्चा करयल परिग्गाहियं दसनहं सिरसा वत्तं मत्थए अंजलिंकटु जएणं विजणएणं उस समय में बलिचंचा राज्यधानी में रहनेवाले अमुर कुमार जाति के बहुत देव देवियोंने ईशानेन्द्र को कुपिन जानकर उन की ऐसी दीव्य देवद्धि, देवद्युति, देवमहानुभाग, और दीव्य तेजोलेश्या नहीं सहन करने से सब दिशी विदिशी में रहकर हस्तद्वय के दश नखों को. एकत्रित कर मस्तक से आवर्तना करके जय विजय शब्द से वधाये. और ऐसा बोले-अहो देवानुप्रिय ! आपको प्राप्त भावार्थ . शब्दार्थ र देवराजा अ० अघो स० दिशा स० प्रतिदिशा को स० देखते ते. उम दि० दिव्य प्रभाव से इं० अ- गार सरिखा मु मुर्मुरभूत त तप्त बेलुकण तन्तत अग्निसरिखी जा० उत्पन्न हुई।४३॥त तर ते वे बवलि चंचा रा० राज्यधानी में व० रहने वाले ब० बहुत अ० असुर कुमार दे० देव देवी तं: उस व० वलिचंचा रा०. राज्यधानी को ई० अग्निभूत जा० यावत् म० समज्योति भूत पा० देखकर भी० डरेहुवे उ० कंपहुवे ता० बासेहुवे उ० उद्वेग पायेहुवे सं० भयसे व्याप्त स० सवबाजु आ० दोडे ५० विशेष दोडे अ० अन्योन्य सून सपडिदिसिं समभिलोइयासमाणातेणं दिव्वप्पभावणं,इंगालभूया,मुम्मुरभूयाछारिभूया,तत्त कयेल्लयभूया, तत्तासमजोइभृया जाया याविहोत्था. ॥ ४३ ॥ तएणंते बलिचंचा राय- हाणिवत्थव्वया वहवे असुरकुमारा देवाय देवीओय तं बलिचंचा रायहाणि इंगालभूयं- जाव समजोइभूयं पासंति पासतित्ता भीया उतत्था तसिया उद्विग्गा संजायभया सवओ समंता आधाति परिधावंति परिधावतित्ता अण्णमण्णस्सकायं समतुरंगेमाणा: चिटुंति देखने से उन के दीव्य प्रभाव से वह राज्यधानी अग्नि के अंगार समान, मुर्मुरे समान, राख समान, नरेती समान व अति अप्ण अग्नि समान हुई ।। ४३ ॥ उस समय में बालचंचा राज्यधानी में रहनेवाले देवों नगरी को अंगारे समान यावत् अग्नि समान देखकर भयभीत हुवे, कंपनेलगे, उद्वेग करने लगे. इस तरह भयभीत बने हुवे चारों तरफ दौडने लगे और एक २ की काया में प्रवेश करने लगे ॥४४ ॥ 48 अनुवादक-यालयानारी मुनि श्री अमोलक प्रापिनी 62 * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी * गर्थ ४५५ सूत्र - पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र HD कुमार दे० देव देवी के ए. इस अर्थ म. सम्यक् वि विनय से भुं० वारंवार खा. खमाते तं. उस दि दीव्य दे० देवऋद्धि जा. यावत् ते० तेनोलेश्या प० साहरण करे॥४६॥ तक उस दिन गो० गौतम ते वे ब० बलिचंचा रा० राज्यधानी में व रहने वाले य० बहुत अ० असुर कुमार दे० देव देवी ई. Fईशान दे देवेन्द्र को आ० आदरकरे जाव्यावत् प०पर्युपासना करे ई० ईशान दे. देवेन्द्र की आ• आज्ञा उ० उपपात ५० वचन नि० निर्देश में चि० रहे गो. गौतम ई० ईशान दे० देवेन्द्र दे० देवराजा की सा० असुरकुमारेहिं देवेहिय देवीहिय एयमटुं सम्मं विणएणं भुजो भुजो खामिए समाणे तं दिव्यं देविट्टि जाव तेयलेस्सं पडिसाहरइ ॥४६॥ तप्पभिइचणं गोयमा ! ते बलि- चंचारायहाणिवत्थन्वा बहवे असुरकुमारा देवाय देवीओय ईसाणं देविंदं देवरायं आढ़ति जाव पज्जुवासंति ईसाणस्सयस्स देविंदरस देवरण्णो आणा उबवाय वयण निद्देसे चिटुंति ॥ एवंखलु गोयमा ईसाणेणं देविदेणं देवरण्णा सा दिव्या देविड्डी जाव ईशानेन्द्रने अपनी दीव्य देवदि यावत् तेजोलेश्या पीछी ले ली ॥ ४६ ॥ उस दिन से चालचंचा राज्यधानी के असुर कुमार देष ईशानेन्द्रका आदर सत्कार करते हैं यावत् उन की पर्युपासना करते हैं. और उन की आज्ञा, उपपात, वचन व निर्देश में रहते हैं. अहो गौतम ! ईशानेन्द्रने ऐसी दीव्य देवदि । > तीसरा शतक का पहिला उद्देशा 988- भावार्थ - शब्दार्थ यधाकर ए. ऐसा व चोले अ० अहो, दे. देवानुप्रिय दि० दीव्य दे. देवऋद्धि जा. यावत् अ. सन्मुख हुद दि० देखी दे० देवानुप्रिय की दि० दीव्य दे० देवऋद्धि जा. यावत् ल० लब्ध प०प्राप्त स० सन्मुखहुइ खा० खमाते हैं दे. देवानुप्रिय ख० क्षमाकरो तु० तुम्हे ण नहीं भु० वारंवार ए. ऐसा कर करने को एक ऐसे स० सम्यक् वि विनय से भुं० वारंवार खा० खमाते हैं ॥ ४५ ॥ त० तब से वह ई० ईशान दे. देवेन्द्र ने उन ३० वलिचंचा रा० राज्यधानी में व० रहने वाले ५० वहृत अ० असुर वडवंति बढावतित्ता एवं वयासी अहोणं देवाणुप्पिएहिं दिव्या देविड्डी जाव अभि सूत्र समण्णागया तं दिट्ठाणं देवाणुप्पिया दिव्वा देविडा जावलढा पत्ता अभिसमण्णागया, खामेमोणं देवाणुप्पिया ? खमं तुमं देवाणुप्पिया ! खमंतुमरिहंतुणं देवाणुप्पिया ! णाइभुजो भुजो एवं करणयाएत्तिकटु, एयमटुं सम्म विणएणं भुजो भुजो खामंति ॥ ४५ ॥ तएणं से ईसाणे देविदे देवराया तेहिं बलिचंचारायहाणि वत्थव्वेहि वहूहिं हुई यावत् सन्मुख ऋद्धि हमने देखी हुई है अहो देवानुप्रिय ! हम आपको अपराध खमाते हैं. तुम हमारा अपराध की क्षमा करो. अहो देवानुप्रिय ! तुम हमारा अपराध क्षमा करने योग्य हो. हम ऐसा कार्य वारंवार नहीं करेंगे. इस तरह सप्रभारसे विनय नमूता सहित क्षमा मांगने लगे॥४५॥ जब बलिचंचा राज्यधानी में रहनेवाले देवों इस तरह बहुत विनय व नमूता महित समभाव से वारंवार खमानेलगे तब १ अनुवादक-पालग्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * ४५५ सूत्र 8- पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र - कुमार दे देव देवी के ए. इस अर्थ म. सम्यक् वि विनय से भुं. वारंवार खाः खमाते तं० उस दि. दीव्य दे० देवऋद्धि जा. यावत् ते. तेनोलेश्या प० साहरण करे।।४६॥ त उस दिन गो० गौतम ते वे व० वलिचंचा रा० राज्यधानी में वः रहने वाले व० बहुत अ० असुर कुमार दे० देव देवी ई. ईशान दे देवेन्द्र को आ० आदरकरे जायावत् प०पर्युपासना करे ई० ईशान दे. देवेन्द्र की आ. आज्ञा ॐ उ० उपपात ५० बचन नि० निर्देश में चि० रहे गो गौतम ई० ईशान दे० देवेन्द्र दे० देवराजा की.सा. असुरकुमारेहिं देवेहिय देवीहिय एयमटुं सम्मं विणएणं भुजो भुजो खामिए समाणे तं दिव्यं देविदि जाव तेयलेस्सं पडि साहरइ ॥४६॥ तप्पभिइचणं गोयमा ! ते बलि- चंचारायहाणिवत्थव्वा बहवे असुरकुमारा देवाय देवीऔय ईसाणं देविंदं देवरायं आढंति जाव पज्जुवासंति ईसाणस्सयस्स देविंदस्स देवरण्णो आणा उववाय वयण निद्देसे चिटुंति ।। एवंखलु गोयमा ईसाणेणं देविदेणं देवरग्णा सा दिव्या देविड्डी जाव ईशानेन्द्रने अपनी दीव्य देवदि यावत् तेजोलेश्या पीछे ले ली ॥ ४६ ॥ उस दिन से वलिचंचा राज्यधानी के असुर कुमार देव ईशानेन्द्रका आदर सत्कार करते हैं यावत् उन की पर्युपासना करते हैं. और उन की आज्ञा, उपपात, बचन व निर्देश में रहते हैं. अहो गौतम ! ईशानेन्द्रने ऐसी दीव्य देवद्धि 88982 तीनरा शतक का पहिला उद्देशा 988 भावार्थ शब्दार्थ यह दि० दीव्य दे० देवाद्धि जा. यावत् अ० मन्मुख हुइ ॥ ४७ ॥ ई० ईशान भं० भगवन् दे० देवे न्द्र की के कितनी ठिः स्थिति गो. गौतम सा. अधिक दो० दोमागरोपम की हि० स्थिति ॥ ४८॥ ई. ईशान भं भगवन दे देवेन्द्र दे देवराजा ना उस दे० देवलोक से आ० आयुप्य क्षय से जा यावत् क' कहां गः जागे क० कहां उ० उपनेंगे गो गौतम म० महाविदेह क्षेत्र में सि.. सिझगे जा. पावर अं० अंतकरेंगे ॥ ४१ ॥ स० शक्रेन्द्र भ० भगवन दे० देवेन्द्र का पिक विमान से ई. ईशान का २ सूत्र - अनुवादक-बालप्रमचारी नि श्री अमोलक ऋपिजी 8 अभिसमण्णागए ॥ ४७ ॥ ईसाणस्त भंते देविंदस्स देवरण्णो केवइयं कालं ठिई ५० ? गोयमा ! साइरेगाई दो सागरोवमाणि- ठिई ५० ॥४८॥ ईसाणेणं भंते ! देविंदे. देवराया ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं जाव कहिं गच्छहिति कहिं उववजिहिति गोयमा ! महाविदेहे वासे सिज्झिाहिति जाव अंतं काहिति ॥ ४९ ॥ सकरतणं भैते! यावत् महानुभाव ऐसे माप्त कीया॥४॥अहो भगवन् ! ईशानेन्द्रकी कितनी स्थिति कही! अहो गौतम! ईशानेन्द्र की दो सागरोपमसे अधिक स्थिति कही ॥४८॥ अहो भगवन् ! ईशानेन्द्र आयुष्य का क्षय होने पर कहां उत्तम होगे ? अहो गौतम ! ईशानेन्द्र महाविदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर सीझेंगे घुझेंगे यावत् मत्र दुःखों का अंत करेंगे ॥ ४५ ॥ अहो भगवन् ! शक्रेन्द्र के विमान से ईशानेन्द्र के विमान क्या ऊंचे व * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवमहायजी चालाप्रसादजी * विध 9 ब्दार्थ ४५७ निक <REggs पंचमंग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र -RRB- - विः विमान ई. थोडे उ ऊंचे ई-थोडे उ० उन्नत ई ईशान दे देवेन्द्र के विमान से सशक दे देवेन्द्र के वि० विमान ई० थोडे नी नीच णि न्यन है. हां गो. गौतम सः शक्र का स० सर्व ने जानना से। वह के कैसे मो. गौतन ज. जैसे की हथेली सि. होवे दे० देश में उ० ऊंची उ. उन्नत णी. नीची न्यून से० वह ते० इमलिये ॥ ५० ॥ ५० समर्थ भं० भगवन् स० शक्र दे देवेन्द्र ई. ईशान दे. देविंदस्स देवरणों विमाणहितो ईसाणस्त देविंदस्स देवरको त्रिमाणा ईसिं उच्चयरा ईसिं उप्रणयराचेव ; ईसाणस्सवा दोविंदस्स देवरणों विमाणेहितो सक्कारस देविंदस्स देवरणो विमाणा ईसि णीययराचेव, ' ईसिं निण्णयराचेव ? हंता गोयमा ! सक्कस्स तंचेव सव्वं नेयव्वं । सेकेणटेणं ? गोयमा ! से जहा नामए करयले सिया देसे उच्चे, देसे उण्णए, देसे णीय, देस गिणे से तेण?णं ॥ ५० ॥ पभृणं भंते ! सको उन्नत (गुण में अधिक ) हैं ? अथवा ईशानेन्द्र के विमान से शकेन्द्र के विमान क्या नीचे या न्युन हां गौतम ! शक्रेन्द्र से ईशानेन्द्र के विमान ऊंचे व उन्नत हैं. अहो भगवन् ! यह किस तरह है अहो गौतम ! जैसे हस्त का तला क्वचित् देश से ऊंचा, क्वचित् देश से उन्नत, क्वचित् देश से नीचा व काचिन देश से न्युन होता है वैसे ही अहो गौतम ! शक्रेन्द्र देवेन्द्र के विमान हैं ॥५०॥ अहो 330 तीसरा शतक का पहिला उद्देशा :- . भावार्थ शब्दार्थ यह दि० दीव्य दे० देवऋद्धि जा. यावत् अ० मन्मुख हुइ ॥ ४७ ॥ ई० ईशान भं भगवन् दे० देवे न्द्र की के कितनी ठि० स्थिति गो० गौतम सा० अधिक दो० दोमागरोपम की. ठि• स्थिति ॥.४८ ई० शान भं भगवन दे० देनेन्द्र दे देवराजा ना. उस दे० देवलोक से आ० आयुप्य क्षय से जा यावत् क कहां गः जागे क. कहां उ० उपनेंगे गो गौतम म. महाविदेह क्षेत्र में सि.सिझेंगे जा० यावत् अं अंतकरेंगे ॥ ४२ ॥ स० शक्रेन्द्र भ० भगवन् दे० देवेन्द्र का पि० विमान से ई० ईशान का ४५६ । सूत्र का अनुवादक-बालमनचारी श्री अमोलक ऋपिजी 8 अभिसमण्णागए ॥ ४७ ॥ ईसाणस्त भंते देविंदस्स देवरण्णो केवइयं कालं ठिई ५० ? गोयमा ! साइरेगाई दो सागरोवमाणि ठिई ५० ॥४८॥ ईसाणेणं भंते ! देविंदे देवराया ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं जाव कहिं गच्छहिंति कहिं उववजिर्हिति गोयमा ! महाविदहे वासे सिज्झिहिति जाव अंतं काहिति ॥ ४९ ॥ सक्करसणं भंते! . यावत् महानुभाव ऐसे प्राप्त की ग॥४॥अहो भगवन् ! ईशानेन्द्रकी कितनी स्थिति कही? अहो गौतम! ईशानेन्द्र की दो सागरोपमसे अधिक स्थिति कही ॥४८॥ अहो भगवन् ! ईशानेन्द्र आयुष्य का क्षय होने पर कहां उत्पन्न होयेंगे ! अहो गौतम! ईशानेन्द्र महाविदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर सीझेंगे बुझेंगे यावत् मत्र दुःखों का अंत करेंगे ॥ ४२ ॥ अहो भगवन् ! शुक्रेन्द्र के विमान से ईशानेन्द्रके विमान क्या ऊंचे व * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवमहायजी चालाप्रसादजी * વિાઈ eo 4 ० शब्दाथ कि क्या आ० बोलाया अविना चोलाया गोल गौतम आ० बोलाया अ. बिना वोलाया ॥ ५२ ॥ १० समर्थ भ० भगवन् स० शकेंद्र दे० देवेंद्र ई. ईशान दे० देवेंद्र को स. सब दिशा स० विदिशामें स. देखने को ज० जैसे पा० आने में त० तैसे दो दो आ० आलापक ने० जानना ॥५३ ॥ १० समर्थ सशक दे देवेन्द्र ई. ईशान दे० देवेन्द्र की स. साथ आ० आलाप सं० संलाप क० करने को हं हां ५०.समर्थ ॥ ५४॥ अ० है भं० भगवन् ते उनम० शक्र ईशान दे देवेन्द्र को कि० कार्य क. सूत्र गोयमा ! आढामाणेवि पभ, अणाढामाणेवि पभ् ॥ ५२ ॥ पभूणं भंते : सक्के देविंदे देवराया ईसाणं देविंदं देवरायं सपक्खि सपडिदिसिं समभिलोएत्तए? जहा पाउन्भवणा तहा दोवि आलावगा यन्वा ॥ ५३ ॥ पभणं भंते! सके देविंदे देवराया ईसा- णणं देविदेणं सहि आलावंवा संलावा करेत्तए ? हंता पभू, जहा पाउन्भवणा॥४४॥ भावार्थ भौर विना बोलाये हुए भी आने को समर्थ है ॥ ५२ ॥ अहो भगवन् ! शकेन्द्र ईशानेन्द्र की बाजु पर या उस की दिशी विदिशी में देखने को समर्थ है ? अहो गौतम ! जैसे आने के दो आलाएक कहे वैसे ही देखने के दो आलापक जानना ॥ ५३ ।। अहो भगवन् ! शकेन्द्र ईशानेन्द्र की साथ आलाप सलाप करने को क्या समर्थ है ? हां गौतम ! शकेन्द्र ईशानेन्द्र की साथ आलाप सलाप करने को समर्थ है. वगैरह आने के दो आलापक जैसे कहना ॥ ५४ ॥ अहो भगवन !क्या उन शमा ईशानेन्द्र देवों को करने 842 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ते (भगवती ) सूत्र 398 तीसरा शतकका पहिला उद्देशा * GY शब्दार्थी दिवेन्द्र की अं० पास पा० आने को ई० हा प० समर्थ से वह भभगवन् कि क्या आ० बोलाया अ. विना बोलाया गो० गौतम भा० बोलाया णो नहीं अविना बोलाया ॥ ११ ॥५० समर्थ ई० ईशान दे० देवेंद्र स. शक्र दे देवराजा की अं० पास पा० आने को है. हां ५० समर्थ से वह भं० भगवन् मूत्र जो अणाढा अनुवादक-बालममचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी देविंदे देवराया ईसाणस्स देविंदस्स देवरणो अंतियं पाउभवित्तए ? हंता पभू । से भंते किं आढाभाणे पभृ अणाढामाणे पभू ? गोयमा ! आढामाणे पभ, माणे पभू ॥ ५१ ॥ पभूणं भंते ईसाणे देविंदे देवराया सक्कस्स देवरपणो अंतियं पाउभवित्तए ? हंता पभू । से भंते ! किं आढामाणे पभू, अगाढामाणे पभू ?. भगवन् ! शक देवेन्द्र ईशान देवेन्द्र की पास प्रगट होने को क्या समर्थ है ? हां गौतम ! शकेन्द्र ईशा- नेिन्द्र की पास आने की समर्थ है. तब अहो भगवन् ! क्या वह बोलाये हुवे या विना बोलाये हुए आने को सपर्य है ? अहो गौतम ! ईशानेन्द्रकी पास शक्रेन्द्र बोलानेपर आने को ममर्थ है परंतु विना बोलाये आन को समर्थ नहीं है ॥ ५१ ॥ अहो भगवन् ! ईशानेन्द्र शक्रेन्द्र की पास आने की समर्थ है ? हां गौतम ! ईशानेन्द्र शफ्रेन्द्र की. पाप्त आने को समर्थ है. अहो भगवन् ! बद्द क्या बोलाये हुए आने को समर्थ है या बिना बोलाये हुए आने को समर्थ है ? अहो गौतम ! बोलाये हुए भी आने को समर्थ है, * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदर सहायनी ज्वालामसादजी अवार्थ सूत्र शब्दार्थ। 4. किं० क्या आ० योलाया अ० बिना घोलाया गो० गौतम आ० योलाया अ० यिना वोलाया ॥ २२ ॥१. १० समर्थ भ० भगवन् स. शकेंद्र दे. देवेंद्र ई. ईशान दे. देवेंद्र को सस दिशा स० विदिशा, स. देखने को ज. जैसे पा० आने में त० तैसे दो दो आ० आलापक ने० जानना ॥ ५३॥ प० समर्थ स. शक्र दे देवेन्द्र ई. ईशान दे देवेन्द्र की स. साथ आ० आलाप सं० संलाप क० करने को ई० हां ५० समर्थ ।। ५४ ॥ अ० है भं० भगवन् से उन म० शक ईशान दे देवेन्द्र को कि० कार्य क. गोयमा ! आढामाणेवि पभू, अणाढामाणेवि पम् ॥ ५२ ॥ पभूणं भंते : सक्के देविंदे देवराया ईसाणं देविंदं देवरायं सपक्खि सपडिदिसिं समभिलोएत्तए? जहा पाउन्भवणा तहा दोवि आलावगा णेयव्वा ॥ ५३ ॥ पभणं भंते! सक्के देविंदे देवराया ईसा- णणं देविदेणं साह आलावंवा संलावंबा करेत्तए ? हंता पभू, जहा पाउन्भवणा॥४४॥ भावार्थ और विना वोलाये हुए भी आने को समर्थ है ॥ ५२ ॥ अहो भगवन् ! शकेन्द्र ईशानेन्द्र की वाजु पर या उस की दिशी विदिशी में देखने को समर्थ है ? अहो गौतम ! जैसे आने के दो आलाएक कहे वैसे ही देखने के दो आलापक जानना ॥ ५३ ॥ अहो भगवन् ! शक्रेन्द्र ईशानेन्द्र की साथ आलाप सलाप करने को क्या समर्थ है ? हो गौतम ! शकेन्द्र ईशानेन्द्र की साथ आलाप सलाप करने को समर्थ है. वगैरह आने के दो आलापक जैसे कहना ॥ १४ ॥ अहो भगवन् !क्या उन सफ ईशानेन्द्र देवों को करने 388 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति ( भगवती ) सूत्र -Rs 13.३१ तीसरा शतकका पहिला उद्देशा 83></ ४६० वादा करने का ई० हां.अ. है से यह क० क्या प० करे गे गौतम से वह सः शक्र दे देवेन्द्र ई-ईशान दे०. देवेन्द्र की अं• पास पा० जाये ई० ईशान दे० देवेन्द्र स० शक दे देवेन्द्र की अं० पास पा० जावे सशक दे देवेन्द्र दा०. दक्षिणार्ध लोक के अ० अधिपति ई० ईशान दे देवेन्द्र उ० उत्तरार्ध लोकके भ० अधिपति से वे अ० अन्योन्य के कि० कार्य क० करने योग्य प०करते. हुवे वि० विचरते हैं॥५५॥ आधिणं भंते ! तेसिं सकीसाणाणं दविंदाणं देवराईणं किच्चाई करणिज्जाई.? हंता सुष अस्थि, । से कहमियाणिं पकरेइ ? गोयमा ! ताहे चेवणं से सके देविंद. देवराया, ईसाणरस देविंदस्स देवरको अंतियं पाउन्भवइ । ईसाणेवा देविंद देवराया सकारस. देविंदरस देवरपणा अंतियं पाउब्भवइ । इति भो सक्का देविंदा - देवराया दाहिणड्ढलो- गाहिबई । इति भो ईसाणां देविदा देवराया उत्तरड्ड लोगाहिबई । इति भो इति. भौत्ति, ते अण्णमण्णस्स किच्चाई करणिजाई पच्चणुष्भवमाणा विहरंति ॥ ५५ ॥ .. योग्य कार्य हैं ? हाँ गौतम! उन को कार्य है. अहो भगवन् ! वे कैसे करते हैं ? अहो गौतम ! शफ्रेन्द्र शानेन्द्र की पाम प्रगट होवे. ईशानेन्द्र शक्रन्द्र की पाम प्रगट होवे. और भी शक्रेन्द्र दक्षिणा टोक का अधिपति है और ईशानेन्द्र उत्तरार्ध लोक का अधिपति है. इति भो इति भो ऐसे. परस्पर चानालाप करते परस्पर के कार्य करते हुवे विचरते हैं ॥ ५५ ॥ अहो भगवन् ! शक्रेन्द्र व ईशानेन्द्र को 4. अनुवादक-पालयापनगिमुनि श्री अमोलक ऋपिनी * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी चालायसादजी * गई . शब्दार्थ है भ० भगवन ते उन सशक्र ईशान दे देवेन्द्रको विविवाद स उत्पन्न होता है ० हा अहै से० वह क० क्या इ० उसवक्त प० करे गो० गौतम स० शक्र ईशान दे देवेन्द्र म सनत्कुमार दे देवेन्द्रको म० मनसे चिन्तवना क० करे त० तब से वह म. सनत्कुमार त• उन स० शक्र ईशान दे० देवेन्द्र से म० चिन्तयन का कराये वि० शीघ्र सः शक्र ईशान दे० देवेन्द्र की अं० पास पा. जावे जं. जो से वह व० कहे त. उन को आ० आज्ञा उ• उपपात : वचन नि० निर्देश में चि० रहे ॥ ५६ ॥ स० सनत्कु आत्थिणं भंते तेसिं सकीसाणाणं देविंदाणं देवराईणं विवादा समुप्पाजंति? हंता आत्थिासे सूत्र कहभिदाणिं पकरेइ ? गोयमा ! ताहेचेवणं सक्कीसाणा देविंदा देवरायाणो सणंकुमारं देविंदं देवरायं मणसी करेइ, । तएणं से सणंकुमारे देविंदे देवराया तेहिं सकीसाणेहिं देविंदेहि देवराईहिं मणसी कए समाणे खिप्यामेव सक्कीसाणाणं देविदाणं देवराईणं अंतियं पाउब्भवंति १ जसे वयइ तस्स आणाउववायवयणणिद्देसे चिटुंति।।५६॥सणंकुमा- क्या विवाद उत्पन्न होता है ? हां गौतम ! उन को विवाद उत्पन्न होता है. अहो भगवन् ! विवाद भावार्थ के अवसर में वे क्या करे ? अहो गौतम ! ये दोनों सनत्कमोरेन्द्रकी मनसे चिन्तयना करे. इस तरह उनको चिन्ताना करते हुये जानकर सनत्कुमारेन्द्र शीघ्र शक्रेन्द्र ईशानेन्द्र की पास आवे. और जो वह कहे वैसे उन की आज्ञा, उपपात, बचन व निर्देश में रहे ॥५६ ॥ अहो भगवन् । सनत्कुमारेन्द्र क्या भवसिद्धिक है - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूब तीसरा शतकका पहिला उद्देशा 888 ४६२ शब्दार्थ मार ० भगवन् कि० क्या भ० भवसिद्धिक अ० अभवसिद्धिक स० समदृष्टि मि० मिथ्यादृष्टि प० परत संसारी अ० अनंत संसारी मु० मुलभबोधि दु० दुर्लभ बोधि आ० आराधिक वि० विराधिक च० चरम अ० अचरम गो० गौतम स० सनत्कुमार दे देवेन्द्र भ० भवसिद्धिक णो० नहीं अ० अभवसिद्धिक ए. ऐसे स० समदृष्टि प० परत मु० सुलभ वोधि आ० आराधिक च चरम म० प्रशस्त ने० नानना से वह के कैसे भ० भगवन् गो० गौनम स० सनत्कुमार दे० देवेन्द्र २० बहुत स. साधु स० साध्वी सा. रेणं भंते ! देविंदे देवराया किं भवसिद्धिए, अभवसिहिए, सम्मदिट्टी, मिच्छदिट्ठी. परित्तससारिए, अणंतसंसारिए, सुलहबोहिए, दुल्लभयोहिए, आराहए, बिराहए, चरिमे अचरिमे ? गोयमा ! सणंकुमारेणं देविंदे. देवराया भवसिदिए णो अभवसिद्धिए, एवं. सम्ममिच्छ, परित अणंत, सुलहबोहिए दुल्लभवोहिए, आराहए विराहिए चरिमे पसत्थं नेयध्वं ॥ से केण?णं भंते ? गाथमा ! सणंकुमारे देविंदे देवराया बहूणं सम--- या अभवसिद्धिक है, सम्यग् दृष्टि है या मिथ्याहीप है, परत संसारी है या अनंत संसारी है, सुलभ घोरी है या दुर्लभ बोधी है, आराधक है या विराधक है और चरिम या 'अचरिम है ? अहो गौतम ! सनत्कुमारेन्द्र भव सिद्धिक, सम्यग् दृष्टि, परत संसारी, सुलभ बोधी, आराधक व चरिम शगरी हैं. अहो भगवन् ! यह किस तरह है? अदो गौतम ! सनत्कुमारेन्द्र बहुत साधु साधी, श्रावक, श्राविका के 49 अनुवादक-बालमम्मचारी माने श्री अमोलक ऋपिजी ! * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालाप्रसादजी * शब्दार्थ ४६ सन < TE पंचमांग हिवाय पण्णात्ति ( भगवती) मूत्र 2980- श्रावक सा० श्राविका का हि० हितका इच्छक सु. सुख का इच्छक प. पथ्य का इच्छक अ. अनुकंपा सहित नि• मोक्ष हि० हित मुख नि० मोक्ष का इच्छक ते. इसलिये गो० गौतम स० सनत्कुमार भ० भवसिद्धिक जा. यावत् नो० नहीं अ. अचरिम ॥ ५७ ॥ स० सनत्कुमार भ० भगवन् दे० देवेन्द्र की के० कितनी ठि० स्थिति प० मरूपी स० सात सा. सागरोपम की ठि० स्थिति ॥ ५८॥ से वह भं००७ णाण, बहूर्ण समणीणं, बहुणं सावयाणं, बहुणं सावियाणं हियकामए, सुहकामए, पत्थ- कामए, आणुकंपिए, निस्सेयसिए, हिय, सुह, निस्सेसकामए, से तेणटेणं गोयमा ! सणंकुमारेणं भवसिढिए जाब णो अचरिमे ॥ ५७ ॥ सणंकुमारस्स भंते ! देविंदस्स देवरण्णो केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता ? गोयमा.! सत्तसागरोवमाई ठिई पण्णत्ता ॥५८ सेणं भंते ! ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं जाव कहिं उववजिहिति? गोयमा ! हित के कामी, मुख के कानी, पथ्य के कामी, अनुकम्पावाले, मोक्षके वांच्छक वैसे ही हित, सुख, व मोक्ष के कामी है; इसलिये अहो गौतम ! पमहाष्टि यावत् चरिम शरीरी हैं ॥५॥ अहो भगवन् सनत्कुमारेन्द्र की कितनी स्थिति कही ? अहो गौतम ! सनत्कुमारेन्द्र की स्थिति सात सागरोपम की कही ॥५०॥ अहो भगवन् ! वह सनत्कुमारेन्द्र आयुष्य का क्षय हुवे पीछे वहां से कहां उत्पन्न होवेंगे ? अहो गौतम ! महाविदेह क्षेत्र में उत्पन्न होवेंगे सिझेंगे, बुझेंगे यावत् सब दुःखों का अंत करेंगे अब इस उद्देशे में जो अधि- 8893 तीसरा शतकका पहिला उद्देशा 983809 भावार्थ !
२७ * ४६ शब्दार्थ भगवन् ता. उस दे देवलोक से आ-आयुष्य क्षय से जा. यावत् कः कहाँ उ. उपजेगा गो गौतम म. महाविदेह क्षेत्र में सि.सिझगा जा. यावत् अं०. अंतकरेगा स. यह ए. ऐसे में भगवन् ति ऐसे ॥१॥ महाविदेहे वासे सिझिहिइ जाव अंतं करेहिइ सेवं भंत भंते' ति ॥ गाहाओ सूत्र छठुट्ठममासोअढअड, मासो वासाइं अंड छम्मासा, तीसग कुरुदत्ताणं, तब भत्त परित्त परियाओ ॥ १ ॥ उच्चत्त विमाणाणं पाउभव पंच्छणाय संलावे ॥ किचवि वादुप्पत्ती, सणंकुमारेय मवियत्तं ॥२॥ मोया सम्मनो ॥ इति तइए सए पढमा उद्देसो सम्मत्तों ॥ ३ ॥ १ ॥ भावार्थ कार कहा है उस का संक्षेप से गाथा द्वारा बतलाते हैं. तिप्यक अनगारने. बेले २ पारण किये, कुरुदत्त अनगारने तेले तले पारने किये, तिष्यक अनगार का एक मासका संधारा और कुरुदत्त को १५ दिन का मंधारा तिप्यक अनगार को आठ वर्ष की दीक्षा और कुरुदत्त को छ माप्त की दीक्षा. विमानों की ऊंचाई इन्द्रों का पीलना, इन्द्रों का अवलोकन, इन्द्रों का संभाषण, · इन्द्रों का कार्य, “इन्द्रों का विवाद, सनत्कुमारेन्द्र द्वारा समाधान और भव्य अभव्य का प्रश्न कहा. यह मोया नामक नगरी का अधिकार समाप्त हुना. यह तीसरे शतकका प्रथम उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥१॥ 4 अनुवादक-पालग्रह्मचारी मुनि श्री अमालक ऋपिनी * प्रकाशक रानावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी Bra by ४६५ शब्दार्थ ते? उस काल ते. उस समय में रा० राजगृह नः नगर हो० था जा० यावत् प०परिपदा प० पर्यंपा सना करते ॥ * ॥ ते. उस काल ते. उस समय में च० चवर अ० असुरेन्द्र १० चमर चंचा रा० राज्य जधानी स० सभा सु० मुधर्मा के च०चमर सी० सिंहासन च० चौसठ सा० सामानिक सा सहस्र जाल्यावद न० नाट्यविधि उ० वताकर जा जिमदिशि से पा० आया ता० उसदिशि में प० पीछागया ॥१॥ सूत्र तेणं कालेणं, तेणं समएणं रायगिहे नयरे होत्था, जाव परिसा पज्जुवासइ, |॥ * ॥ तेणं कालेणं, तेणं समएणं चमरे असुरिंदे असुरराया चमर चंचाए. रायहाणीए सभाए. सुहम्माए चमरंसि सीहासणंसि चउसट्ठीए सामाणिय साहस्सोहिं जाव नविहं उव: दसेत्ता जामवदिसिं पाउन्झए तामेवादासे पडिगए ॥ १ ॥ भंतेत्ति भगवं गोयमे भावार्थ प्रथम उद्देशे में देवता की विकर्षणः का रूप कहा. अब दूसरे उद्देशे में देव की शक्ति का प्रश्न पूछते हैं. उस काल उस समय में राजगृह नामक नगर था. उस के गुणशील नामक. उद्यान में श्री श्रमण भगवन महार स्वामी पधारे. परिषदा आकर सेवा भक्ति करने लगी.|| उस काल उस समय में चमर नामक असुरेन्द्र अमुरदेव के राजा चमर चंवा राज्यवानि में सुधर्मा सभा के चमर नामक सिंहासन पर चौसठ हजार सामानिक देव सहित वैठे हुए थे. श्री श्रमण भगवन्त को राजगृही नगरी के गुणशील Tals नामक उद्यान में बैठे हुवे अवधि ज्ञान से देखकर. सब परिवार सहित चंदन करने को आये, यावत् » पर्वमांग विवाह पगति (भगवती ) मूत्र 8-800 328 तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा 8303 RAD ७८ .
शब्दार्थ * - ४६ सूत्र . - अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमालक ऋपिजी. भगवन् ता० उस दे० देवलोक से आ०. आयुष्य क्षय से जा० यावत् क. कहां उ. उपजेगा गोर गौतम म० महाविदेह क्षेत्र में सि.सिझेगा जा. यावत् अं• अंतकरेगा स. वह ए०. ऐसे भं. भगवन् तिः ऐसे ॥ ३ ॥१॥ • महाविदेहे वासे सिझिहिइ जाव अंतं करेहिइ सेवं भंते भंते' त्ति ॥' गाहाओ छठुट्ठममासोअडअड, मांसो वासाई अढ छम्मासा, तीसग कुरुदत्ताणं, तब भत्त परित परियाओ ॥ १ ॥ उच्चत्त विमाणाणं पाउन्भव पच्छणाय संलावे .॥ किचवि वादुप्पत्ती, सणंकुमारेय भवियत्तं ॥२॥ मोया सम्मत्तो ॥ इति तइए सए पढमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥ १॥ कार कहा है उस का संक्षेप से गाथा द्वारा बतलाते हैं. तिष्यक अनगारने, बेले २ पारण किये, कुरुदत्त अनगारने तेले तेले पारने किये, तिप्यक अनगार का एक मासका संधारा और कुरुदत्त को १५ दिन का मंधारा तिप्यक अनगार को आठ वर्ष की दीक्षा और कुरुदत्त को छ माम की दीक्षा. विमानों की ऊंचाई इन्द्रों का मीलना, इन्द्रों का अवलोकन, इन्द्रों का संभाषण, इन्द्रों का कार्य, · इन्द्रों का विवाद, सनत्कुमारेन्द्र द्वारा समाधान और भव्य अभव्य का प्रश्न कहा. यह मोया नामक नगरी का अधिकार समाप्त हुवा. यह तीसरे शतकका प्रथम उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥१॥ प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालाप्रसादजी * भावार्थ .
ब्दार्थ सूत्र ४पत्रपांग विवाह पश्यत्ति ( भगवती) सूत्र ते ९ उस काल ते. उस समय में रा० राजगृह नः नगर हो० था जा० यावत् प०परिपदा ५० पर्यपाई सना करते ॥ * ॥ ते. उस काल से उस समय में २० चवर अ० असुरेन्द्र च० चमर चंचा रा. राज्य धानी स० सभा सु० सुधर्मा के च०चमर सी० सिंहासन च० चौसठ सा० सामानिक मासहस्र जाण्यावर न० नाट्यविधि ३० वताकर जा जिसदिशि से पा० आया ता० उसदिशि में प० पीछागया ॥१॥ तेणं कालेणं, तेणं समएणं रायगिहे नयरे होत्था, जाव परिसा पज्जुवासइ, ॥ * ॥ तेणं कालेणं, तेणं समएणं चमरे असुरिंदे असुरराया चमर चंचाए. रायहाणीए सभाए सुहम्माए चमरंसि सीहासणसि चउप्सट्ठीए सामाणिय साहस्सोहिं जाव नदृविहं उब: दसेत्ता जामेवदिसि पाउन्भूए तामेवादासें पडिगए ॥ १ ॥ भंतेत्ति भगवं गोयमे प्रथम उद्देशे में देवता की विकर्षण का सस्प कहा. अब मरे उदेशे में देव की शक्ति का प्रश्न पूछते हैं. उस काल उस समय में राजगृह नामक नगर था. उस के गुणशील नामक. उद्यान में श्री श्रमण भगवन महावीर स्वामी पधारे. परिपड़ा आकर सेवा भक्ति करने लगी.||* } उस काल उस समय में चमर नामक असुरेन्द्र अमुरदेव के राजा चमर चंचा राज्यवानि में सुधर्मा ममा के चमर नामक सिंहासन पर चौसठ हजार सामानिक देव सहित बैठे हुए थे. श्री श्रमण भगवन्त को राजगृही नगरी के गुणशील नामक उद्यान में बैठे हुये अवधि ज्ञान से देखकर सत्र परिवार सहित चंदन करने को आये, यावत् भावार्थ तीमरा शतक का दूसरा उद्देशा 0 ७८ माम्दा भ० भगवान् गो. मौतम म० श्रमण भ० भगवन्त प० महावीर को पं. वंदनाकर न० नमस्कारकर ए. एरोव० योले अ० है भं० भगवन् १०इस र० रत्नममा पृथ्वी की अ० नीचे अ० असुर कुमार देव ५० रहते हैं गो गौतम गो. नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ ए. ऐसे जा० यावत् अ० नीचे स. मानवी पु. पृथ्वी की मा० सौधर्म क० देवलोक की अ• नीचे जा. यावत् ई० ईपत्मागूभार पुं॰ पृथी की भ० अमुर कुमार दे० देव प० रहते हैं जो नहीं इ० यह अर्थ स: समर्थ ॥ २ ॥ से वे क. किस समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ नमसइत्ता, एवं वयासी आत्थिणं भंते ! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए अहे असुरकुमारा देवा परिवसाते, ? गोयमा ! णो इणढे समटे. एवं जाब अहे सत्तमाए पुढवीए, सोहम्मस्स कप्पस्स अहे जाव आथिणं भंते ! इंसिप्पभाए पुढवीए असुरकुमारा देवा परिवसंति ? णो इण? समटे ॥२॥ से कहिं घजीम प्रकार के नाटक बताकर जहां से आये थे वहां पीछे गये ॥१॥ उस समय में श्री. गोतम सापीने श्रमण भगवंत श्रीमहावीर को वंदना नमस्कारकर ऐमा प्रश्न किया कि अहो भगवन् ! असुर कुमार जानि के देव क्या रत्नप्रभा पृथ्वी की नीचे रहते हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! क्या वे दुतरी, तीसरी यावत् मानवी पृथ्वी की नीचे रहते हैं अथवा सोधर्म देवलोक यावत् ईपन, मारधार पृथ्वी की नीचे रहते हैं ! अहो गीतमयह अर्थ योग्य नहीं है. ॥२॥ जब अहो र अनुरादक बालमनाग मुनि श्री अमोलक कार्पनी 87 * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * ब्दार्थ 60 eis सूत्र 39 पंचमान विवाह पण्णति (भगवती) मूत्र 8888- स्थान में भगवन् अ० असुर कुमार दे० देव प० रहते हैं गो. गौतम इ० इस ररत्नप्रभा पु०पृथ्वी का अ. अस्सी उ० उत्तर जो० योजन स० लाख वा जाडपने ए. ऐसे अ. अमुर कुमारदेव व. वक्त व्यता जा. यावत् दि० दीव्य भो० भोग भोगते वि. विचरते हैं ॥३॥ अ०है भं भगवन अ० असुर कुमार दे देव अ० अधोगति में वि० विपय ६० हां अ० है के० कितना भ० भगवन् अ. खाइणं भंते ! असुरकुमारा देवा परिवसंति ? गोयमा ! इमीसे स्यणप्पभाए पुढवीए : असीउत्तरजोयणसयसहस्स, वाहल्लाए, एवं असुर देव वत्तव्ययाए, जाव दिव्वाई भोग भोगाई भुंजमाणा विहरंति ॥३॥ आत्थिणं भंते ! असुरकुमाराणं देवाणं अहे गति भगवन् ! व असुर कुमार कहां रहते हैं ? अहो गौतम ! इस रत्नप्रभा पृथ्वी का एक लाख अस्सी हजार योजन का पृथ्वी पिंड है. इस में एक हजार उपर व एक हजार नीचे छोड़ कर एक लाख अह हत्तर हजार योजन की पोलार है. जिस में प्रथम नरक के बारह आंतरे व तेरह पाथडे हैं. जिस में उपर का एक व नीचे का एक ऐसे दो आंतरे छोडकर शेप दश आंतरे में ‘दश जातिके भुवन. पति देव के सात क्रोड वहत्तर लाख विमान हैं. प्रथम अंतर में 'असुरकुमार जाति के देवता के ६४००००० भवन हैं. वहां असुरकुमार देवता दीव्य ऋद्धि व उत्तम भोग भोगवते हुए विचरते ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! असुर कुमार जाति के देवों को नीचे जाने की क्या शक्ति 23. तीसरा शतकका नरा उद्देशा 98 भावार्थ ४६८ . शब्दार्थी अनुर कुमार दे देवका अ० अधो ग गति में वि० विषय गो गौतम आ. यावत् अ० अधो स. माती पु० पृथ्वी त० तीगरी पु० पृथ्वी को गये ग० जावेंगे ॥४॥ कि० क्या प० प्रयोजनसे भ० भगवन् अ. भगुर कुमार दे० देव न० तीसरी पुः पृथ्वी में ग० गये ग० जावेंगे गो० गौतम पु० पूर्व वैरी की ये घेदना ज० उदीरना करने को पु. प्रसिंगति की ये वेदना उ. 'उपशमाने को ॥५॥ अ० है। विसए? हंता अस्थि केवयाणं भंते! असुरकुमाराणं देवाणं अहे गतिविसएपण्णत्ते? गोयमा! जाय अहे सत्तमाए पुढवीए, तच्चं पुण पुढविं गयाय गमिस्संतिय, ॥ ४॥ किं पत्ति- यणं भंते ! असुरकुमारा देवा तचं पुढविं गयाय, गमिस्संतियं ? गोयमा ! पुव्ववेरि- यस्सवा, वेयण उदारणयाए, पुवसंगइयस्स वेयण उवसामण्णयाए ; एवंखलु असुर- कुमारा देवा तचं पुढवि गयाय गमिस्संतिय ॥ ५ ॥ आत्थिणं भंते ! असुरकुमाराणं हां गौतम ! ये नीचे सानो नरक तक जा सकते हैं परंतु तोमरी पृथी. 'तक गये है और जावेंगे ॥४॥ बहो भगवन् ! किस कारनसे देवता नीचे तीसरी पृथ्वी तक गये हैं और जावेंगे ? अओ गौतम ! पूर्व मन का पैगरी नरक में उत्पन्न हुआ हो तो उन की वेदना की उदारण करने केलिये अथवा पूर्व जन्म का पित्र नरक में उत्पन्न हुवा होने उन की वेदना उपशमाने के लिये असुरकुंमार जाति के देव तीसरी नरक तक गये और जावेंगे ॥५॥ अहो भगान् ? असुरकुमार देव तिच्छी गमन कर सकते हैं? हां गौतम : 4 अनुवाद लम्सनारी मुनि श्री अपोलक पानी * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादी २७ शब्दार्थ • भगवन् अ० असुरकुमार दे देवका ति तिर्यक् गति में वि विषय है. हा अहै के० कितना भ० भगवन् अ० असुरकुमार देवोंका ति तिर्यक् गति में वि० विषय गो. गौतम जा. यावत् अ० असंख्यात दी. द्वीप स. समुद्र नं० नंदीश्वर द्वीप को ग. गये ग० जायेंगे कि क्या १० कारन से भं० भगवन अ० अमर कुमार दे दंव नंदीश्वर द्वीप को ग गये ग. जावेंगे जे. जो अ० अरिहंत भ. भगवन्त का ज. जन्म महोत्सव नि० दीक्षा महोत्सव णा० ज्ञान उत्पात महोत्सव प. निर्वाण महोत्सव में सुत्र देवाणं तिरियगति विसए पण्णत्ते ! हंता आत्थि। केवइयाणं भंते असुरकुमाराणं देवाणं तिरियगइविसए पण्णत्ते ? गोयमा ! जाव असंखेना दीव समुदा नंदिस्सरवरं पुण दीवं गयाय गमिस्संतिय ॥ किं पत्तियणं भंते ! असुरकुमारा देवा नंदिस्सरवरं दीवं गयाय, गमिरसतिय? गोयमा ! जे इमे अरहता भगवंतो एएसिणं जमणमहेसुवा, निक्खमण महेसुवा, णाणुःपायमहिमासुवा, परिनिव्वाण महिमासुवा, एवंखलु असुर 'भावार्थ अमुरकुमार देव ति→ जाते हैं. अहो भगवन् ! असुरकुमार देव तीळे कहांतक जाते हैं ? अहो गोतम ! उन की जाने की शक्ति असंख्यात द्वीप समुद्र तक की है परंतु आठवा नंदीश्वर द्वीप तक गये हैं और जायेंगे.. अहो भगवन् ! वे असुर कुमार देव किस कारनमे नंदीश्वर द्वीप में गये, और जावेंगे ? असे गौतम ! आरईत भगवंत के जन्म मात्र, दीक्षा महोत्सव, ज्ञान का उत्पन्न थेने का पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - 13 तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा SC 0.0 ४६८ शब्दार्थ अमुर कुमार दे देवका अ० अधो ग गति में वि विपप गो. गौतम जा. यावत् अ० अधो स. मातवी पु. पृथ्वी त० तीगरी पु० पृथ्वी को गये ग० जावेंगे ॥४॥ कि० क्या प० प्रयोजनसे भ० भगवन् अ. अमुर कुमार दे देव न० तीसरी पुः पृथ्वी में ग० गये ग• जायेंगे गो० गौतम पु० पूर्व वैरी की ० पेदना न० उदीरना करने को पु. पंसिंगति की चे. वेदना उ० 'उपशमाने को ॥५॥ अ. है सूत्र विसए? हेता अत्थिकेवयाणं भते! असुरकुमाराणं देवाणं अहे गतिविसएपण्णत्ते? गोयमा! जाव अहे सत्तमाए पुढबीए, तच्चं पुण पुढवि गयाय गमिस्संतिय, ॥ ४॥ किं पत्ति- यणं भंते ! असुरकुमारा देवा तचं पुढविं गयाय, गमिस्संतिय ? गोयना ! पुरवेरि- यस्सवा, तेयणउदीरणयाए, पुव्वसंगइयस्स वेयण उवसामण्णयाए ; एवंखलु असुर- कुमारा देवा तचं पुढवि गयाघ गमिस्संतिय ॥ ५ ॥ त्थिणं भंते ! असुरकुमाराणं वार्थ हां गौतम ! वे नीचे सानो नरक तर्फ जासकते हैं परंतु तोपरी पृथी 'तक गये है और. जावेंगे. ॥४॥ धहो भगान् ! किस कारनसे देवता नीचे तीसरी पृथ्वी तक गये हैं और जावेंगे! ओ गौतम ! पूर्व मन्न का पैरी नरक में उत्पन्न हुआ हो तो उन की वेदना की उदारणी करने केलिये अथवा पूर्व जन्म का पित्र नरक में उत्पन्न हुवा होने उन की चेदना उपशमाने के लिये असुरकुमार जाति के देव तीसरी नरक तक गये हैं और जागे ॥ ५ ॥ अहो भगान् ? असुरकुमार देव तिर्छा गमन कर सकते हैं ? हां गौतम - अनुवादक प्रमचारी मुनि श्री अमोलक पीनी * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी.. .
० ब्दिार्थ Q७ सूत्र पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र * • भगवन् अ० असुरकुमार दे देवका ति तिर्यक् गति में विः विषय . हा अहै के० कितना भ० भगवन् अ० असुरकुमार देवोंका ति तिर्यक गति में वि० विषय गो. गौतम जा. यावत् अ० असंख्यात दी द्वीप स० समुद्र नं० नंदीश्वर द्वीप को ग• गये ग० जावेंगे फि० क्या ५० कारन से भं० भगवन अ० अमर कुमार दे देव नं० नंदीवर द्वीप को ग० गय ग० जावेंगे जे. जो अ० अरिहंत भ. भगवन्त का ज. जन्म महोत्सव नि० दीक्षा महोत्सव णा. ज्ञान उत्पात महोत्सव प. निर्वाण महोत्सव में देवाणं तिरियगति विसए पण्णत्ते ! हंता आत्थिा केवइयाणं भंते असुरकुमाराणं देवाणं तिरियगइविसए पण्णत्ते ? गोयमा ! जाव असंखेना दीव समुदा नंदिस्सरवरं पुण दीवं गयाय गमिरसंतिय ॥ किं पत्तियणं भंते ! असुरकुमारा देवा नंदिस्सरवरं दीवं गयाय, गमिरसतिय? गोयमा ! जे इमे अरहता भगवंतो एएसिणं जमणमहेसुवा, निक्खमण महेसुवा, णाणुप्पायमहिमासुवा, • परिनिव्वाण महिमासुवा, एवंखलु असुर असुरकुमार देव तिचें जाते हैं. अहो भगवन् ! असुरकुमार देव तीळे कहांतक जाते हैं.? अहो गौतम ! उन की जाने की शक्ति असंख्यात द्वीप समुद्र तक की है परंतु आठवा नदीवर द्वीप तक 3. तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा भावार्थ जावेंगे ? असे गौतम ! आरईत भगवंत के जन्म मामा, दीक्षा मदोतस्व, ज्ञान का उत्पन्न घेने का गये हैं और जायेंगे.. अहो भगवन् ! वे असुर कुमार देव किस कारनमे नंदीश्वर द्वीप में गये और -- दादा भ० अमुर कुमार देव नंदीवर द्वीप को गः गये ग० जायेंगे ॥ ६ ॥ अ है भ० भगवन् अ. अमुर कुमार दे० देवका उ० ऊर्ध्वगति विषय ई० हां अ० है के० कितनी भं० भगवन अ० असुर कुमार देवका उ० ऊर्ध्वगति विपय गो. गौतम जा. यावत् अ० अच्युत देवलोक सो सौधर्म देवलोंक ग. गपे ग० जायेंगे कि किस प० प्रयोजन से भं० भगवन अ. असुर कुमारदेव सो० सौधर्म देवलोक को ग ग ग मागे गो गौतम ने उन दे देवों का भल्भवप्रत्यय का वे वैरसे ते वे दें देव वि. सूत्र कुमारा देवा नंदिस्सरवरं दीवं गयाय गमिस्संतिय ॥ ६ ॥ अस्थिणं भैते ! असुर फुमाराणं देवाणं उड्डगइविसए ? हंता अस्थि । केवइयं चणं भंते ! असुरकुमाराणं देवाणं उर्दु गतिविसए ? गोयमा ! जाव अच्चुएकप्पे सोहम्मं पुणकप्पं गयाय गमि- स्संतिय, । किं पत्तियणं भंते ! असुरकुमारा देवा सोहम्मं कप्पं गयाय गामस्सतिय ? महोत्सव और निर्वाण का महोत्सव इन चार कारन से नंदीश्वर द्वीप को असुर कुमार देवता गतकाल में गये और भविष्य में जावेंगे ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! असुरकुमार देवों को उपर जाने की शक्ति का रिपय है ! हां गौतम! असुर कुमार देवों को उपर जाने की शक्ति है. अहो भगवन् ! वे ऊर्ध्व लोकमें कहां एग जा सकते है ! अहो गौतम ! उन में अच्युत देवलोक तक जाने की शक्ति है किन्तु सौधर्म देव- रोक तक गये हैं और जायेंगे. अहो भगवन ! असुर कुमार देव किस कारन से सौधर्म देवलोक में 4 भनुरादक-बानमनारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी * प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादमी * बाई ते. उन ४७१ शब्दार्थ विकुर्वणा करते ५० परिचारणा करते आ० आत्मरक्षकदेव को वि• वास उपजावे अ.० यथा ल० लघु २० रत्न ग० ग्रहणकर आ० स्वतः ए. एकान्त में अ० जावे ॥ ७ ॥ अ. है भं० भगवन् दें० देवोको अ० यथा ल• लघु र० रत्न ई० हां अ० है से वह क. क्या इ० इनको प० करे तक पीछे का० काया कों प० पीडा उपजावे ॥ ८ ॥५० समर्थ भं. भगवन् अ० असुर कुमार देव त० तहां सूत्र गोयमा! तेसिणं देवाणं भवपच्चइय वेराणुबंधे तेणं देवा विकुव्यमाणा परियारमाणावा, आयरक्खे देवे वित्ताति, अहा लहुसगाई रयणाई गहाय आयाए एगंतमंतं अब- कमंति ॥७॥ आत्थिणं भंते ! तेसिं देवाणं अहा लहुसगाई रयणाई ? हंता आत्थि । से कहमिदाणि पकरेइ, तओसे पच्छाकायं पव्वहंति ॥ ८ ॥ पभूणं भंते ! तेसिं अ. भावार्थ गये और जावेंगे ? अहो गौतम ! भवप्रत्ययिक वैरसे वे देव विकुर्वणा करते हुए या अन्य देवी की साथ परिचारणा करने की वांच्छा करते हुए आत्म रक्षक देवको त्रास उत्पन्न करते हैं. अथवा बहुत छोटे रत्नों ग्रहण करके एकान्त में चलेजाते है ॥७॥ अहो भगवन् ! उन वैमानिक देवों को क्या यथा- योग्य छोटे रत्न है ! हां गौतम ! उन को छोटे रत्नों रहे हुवे हैं. फीर उन रत्नों की चोरी करनेवाले को क्या करते हैं ? अहो गौतम ! उन लेनेवाले को रत्नका मालिक देवता प्रहार करता है जिस से उन को महावेदना होती वह 'जघन्य अंतर्मुहूर्न. उत्कृष्ट छमास तक रहती है. ॥ ८ ॥ अहो. भगवन् ! असुर कुमार 982 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 88 388 तीसग शतक का दूसरा उद्देशा 988- Q७ ४७० शादायी भ० असुर कुमार देव नं- नंदीश्वर द्वीप को ग गये ग० जायेंगे ॥ ६ ॥ अ० है भ० भगवन् अ. अमुर कुमार दे० देवका उ० ऊर्ध्वगति विपय ई० हां अ० है के० कितनी भ० भगवन् अ० असर कुमार देवका उ० ऊर्ध्वगति विपर्य गो गौतम जा. यावत् अ० अच्युत देवलोक सो सौधर्म देवलोक ग० गपे ग० जायेंगे किं० किस ५० प्रयोजन से भं० भगवन अ० असुर कुमारदेव सो० सौधर्म देवलोक को ग• गये ग० नावेंगे गो गौतम ने उन दे देवों का भल्भवप्रत्यय का वे वैरसे ते वे दे देव वि० सूत्र कुमारा देवा नंदिस्सरवरं दीवं गयाय गमिस्संतिय ॥ ६ ॥ अत्थिणं भंते ! असुर कुमाराणं देवाणं उड्डगइचिसए ? हंता आत्थि । केवइयं चणं भंते ! असुरकुमाराणं देवाणं उड्डु गतिविसए ? गोयमा ! जाव अच्चुएकप्पे सोहम्मं पुणकप्पं गयाय गमि- स्सतिय, । किं पचियणं भंते ! असुरकुमारा देवा सोहम्मं कप्पं गयाय गामस्सतिय ? वार्थ महोत्सर और निर्वाण का महोत्सव इन चार कारन से नंदीश्वर द्वीप को असुर कुमार देवता गतकाल में गये और भविष्य में जावेंगे ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! असुरकुमार देवों को उपर जाने की शक्ति का रिपप है ! हां गीतम! असुर कुमार देवों को उपर जाने की शक्ति है. अहो भगवन् ! वे ऊर्ध्व लोकमें कहां एग जा सकते हैं ! अहो गौतम ! उन मे अच्युत देवलोक तक जाने की शक्ति है किन्तु सौधर्म देव- रोक तक गये हैं और जायेंगे. अद्दो भगवन ! असुर कुमार देव किस कारन से सौधर्म देवलोक में 4 अनुवादक-पालसामनारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 82 * प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * शब्दार्थकमारदेव ता. उन अ० देवियों की स० साथ दिदीव्य भो० भोग , भोगवते यि विचरने को १० ऐसे गो गौतम अ० अमुर कुमारदेव सौ. सौधर्म देवलोक में ग० गये ग. जावेंगे ॥९॥ के कितने काल में अ० अमुर कुमार देव उ ऊर्ध्व उ० उडे जायावत् सो सौधर्म दे देवलोक में ग. गये ग जावेंगे गो. गौतम अ० अनंत ओ० उत्सपिणी अ० अवसर्पिणी म० समय व्यतीत हुये अ है ५० ऐसे लो०७ सूत्र पभू ते असुरकुमारा देवा ताहिं अच्छराहिं सद्धिं दिव्याई भोगभोगाई भुंजनाणा वि. हरित्तए ॥ एवं खलु गोयमा ! असुरकुमारा देवा सोहम्मं कप्पं गयाय गमिरसंति ॥९॥ केवइयकालस्सणं भंते ! असुरकुमारा देवा उर्ल्ड उप्पयंति जाव सोहम्मं कप्पं गयाय गमिस्सांतय ? गोयमा ! अणंताहिं .ऊसप्पिणीहि अणंताहि अवसप्पिणीहिं समइक्वंताहिं । आत्थिणं एस भवे लोयत्थेरयभए समुप्पज्जइ, जणं असुरकुमारा देवा भावार्थ समर्थ हैं परंतु यदि वे अप्सराओं उन को आदर करे नहीं या उन को स्वामीपने जाने नहीं तो उनकी साथ भोग भोगने को ये समर्थ नहीं हैं. अहो.गौतम ! इस कारन से असुर कुमार देव सौधर्म देवलोक में गये और जावेंगे ॥ ९॥ अहो भगवन् ! कितने काल में असुर कुमार देव ऊंचे जाये यावत् सौधर्म देवलोक में गये. या जावेने ? असे गौतम ! अनंत अवमर्पिणी उत्तपिणी व्यतीत हुए पीछे ऐना होना > पंचांग विवाह पथ्णत्ति ( भगवती) सूत्र 2982 तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा><3 । -------- 0 ४७२ राष्दाग० गये हुवे ता. उन म अनगकी स. साथ दि० दीव्य भो० भागोपभोग मुं० भोगवते वि० विचरने को जो नहीं इ. यह भर्थ स० ममर्थ त० तहां से प. नीकलकर इ० यहां आ- आकर ज. जो अ० दिवियों आ• आदर करती हैं पर परिचारणा इच्छे १० समर्थ ते ये अ० असुर कुमार दे० देव ता. उन अ० देवियों की स. साथ दिदिव्य भा० भांग भुं०भोगते विणीचरने को अ० अथवा ता.वे अ देवियों नो. ही आ. आदर कर नोक नहीं प. परिचारणा इच्छे णो नहीं प० समर्थ ते वे अ० असुर सम सुरकुमारा देवा तत्थगया चर समाणा ताहिं अच्छराहिं सदि दिव्वाई भोग भोगाई भुंजमाणा विहारत्तए ? णो इ8 समढे । तेणं तओ पडिनियत्तंति पडिनियत्त इसा इहंमागच्छइ इहमागच्छइत्ता, जइणं ताओ अच्छराओ आढायति परि- पाणति पभूण ते असुरकुमारा देवा ताहिं अच्छराहिं सहिं दिव्वाइं. भोग भोगाई भुंजमाणा विहरित्तए ॥ अहणं ताओ अच्छराओ नो आढायंति नो परियाणंति णोणं गवार्य देव मानिक में रही हुई अप्सराओं की साथ भोग भोगवने को क्या समर्थ हैं ? अहो गौतम : यह अर्थ समर्थ.ना. अर्थात् वे वैमानिक देवलोक में वहां की अप्सराओं की साय भोग भोगवन को समर्थ ant.. अमुर कुमार देव वहा से अपराओं को लेकर पीछे अपने विमान में आते हैं, विमान में आये पोउ यदि वे अपराभों उन को आलिंगन करे या सामीपने जाने तो वे उन की. साथ भोग भोगने को 4. अनुवादक-बालपचारी मुनि श्री भमोलक ऋपिनी प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादनी * DU ४98 C शब्दार्थी कमारदेव ता. उन अ० देवियों की स. साथ दिदीच्य भो० भोग , भोगवते विविचरने को ए. ऐसे गो गौतम अ० अमुर कुमारदेव तो सौधर्म देवलोक में ग० गये ग. जायेंगे ।। २ ।। के कितने काल में अ० अमुर कुमार देव उऊ उ उडे जायावत् सो सौधर्म दे देवलोक में ग. गये गाजावेंगे गो. गौतम अ० अनंत ओ० उत्सर्पिणी अ० अवसर्पिणी म० समय व्यतीत हुये अ० है ५० ऐसे लो० सूत्र पभू ते असुरकुमारा देवा ताहिं अच्छराहिं सद्धिं दिव्याई भौगभोगाई भुंजमाणा वि- हरित्तए ॥ एवं खलु गोयमा ! असुरकुमारा देवा सोहम्मं कप्पं गयाय गमिस्तंति ॥९॥ केवइयकालस्सणं भंते ! असुरकुमारा देवा उ उप्पयंति जाव सोहम्मं कप्पं गयाय गमिस्सतिय ? गोयमा ! अणंताहिं ऊसप्पिणीहिं अणंताहिं अवसप्पिणीहि समइकंताहिं । आत्थिणं एस भवे लोयत्थेरयभए समुप्पज्जइ, जणं असुरकुमारा देवा भावार्थ समर्थ हैं परंतु यदि वे अप्सराओं उन को आदर करे नहीं या उन को स्वामीपने जाने नहीं तो उन की साथ भोग भोगने को वे समर्थ नहीं हैं. अहो, गौतम ! इस कारन से असुर कुमार देव सौधर्म देवलोक में गये और जावेंगे ॥.९ ॥ अो भगवन् ! कितने काल में असुर कुमार देव ऊंचे जाये यावत् सौधर्म लोक में गये या जाने ? अहा गौतम ! अनंत अवमर्पिणी उल्लर्षिणी व्यतीत हर पीछे ऐना होता पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - 8% तीसरा शतक का दूसरा उद्देगा 800 ४७ स अनुवादक-यालयायचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी माधय भूत स० उत्पन्न होवे ज० जिससे अ० असुर कुमारदेव उ ऊर्ध्व जा. यावत् सो सौधर्म देवलोक में १० ॥ किस.नि. निश्राय से भ० भगवन अ० असुरकुमार देव उ ऊर्ध्व जा. यावत् सो सौधर्म देवलोक गो गीतम से वह ज. जैसे इ० यहां स०अनार्य व०बर्बर के अनार्य के टं टकण देशके अनार्य भू-भूचुकंदश के प० प्रश्नदेश के पुःभिल्लादि ए०एक म०वडा व वन ग० खड्डा दु० दूर्ग द० गुफा वि० विषम प० पर्वतकी णी० निश्राय सु० अतिशय अ० अश्ववल ह० हस्तिवल जो० योधवल ध० घनुष्याल उर्दु उप्पयंति जाव सोहम्मेकप्पे ॥ १० ॥ किं निस्साएणं भंते !. असुरकुमारा देवा उड्डे उप्पयंति जाव सोहम्मे कप्पे ? गोयमा ! से जहानामए इह सन्चराइवा, बन्व- राइवा, टंकणाइवा, भूचयाइवा, पण्हायाइवा, पुलिंदाइवा, एगं महं वर्णवा, गडुवा, दुग्गंवा, दरिंवा, विसमवा, पव्वयंवा, णीसाए सुमहल्लमवि, अस्सबलंवा, हत्थिवलंबा, जोहबलंवा धणुवलंवा, आगिलंति; एवामेव असुरकुमारा देवा णण्णत्थ. अरहंतेवा, t. और जब ऐसा होता है तब यहाँ मनुप्य लोक में आश्चर्यरूप (अच्छेरा) गिना जाता है ॥ १० ॥ अहो भगवन् ! असुर कुमार देव किस की नेश्राय (आश्रय) लेकर उपर जाते हैं ? अहो गौतम ! जैसे जंगल के निवासी भील लोक, बवर देश के अनार्य लोक, टंकण देश के अनार्य लोक, भूच देश के अ- नार्य लोक, प्रश्न देश के अनार्य लोक, और भील्ल वगैरह लोकों एक बडा वन, खड्डा, दुर्ग, गुफा, विषम- प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ -- -- सूत्र शब्दार्थको आखेदित करे ए ऐसे अ०असुरकुमार देव अ०अरिहंत अछमस्थ अरिहंत अ० अनगार भा० भवितात्मा boro की नि० नेश्राय उ० कर्थ जा. यावत् सौधर्म देवलोक ॥११॥ स. सब अ० असुर कुमार देव उ० ऊर्ध्व उ. उडे जा. यावत् सो सौधर्म देवलोक गो गौतम नोनहीं इ०यह अर्थ त समर्थ म०महर्दिक अ०असुर कुमार देव उ० ऊर्थ उउडे जा. यावत् सो० सौधर्म देवलोक ॥१२॥ ए०यह भ भगवन् अ० असुरेन्द्र अ० अरहंतचेइयाणिवा, अणगारे, भावियप्पणो निस्साए उढे उप्पयंति जाव सोहम्मे कप्पे ॥ ११ ॥ सब्वेवियणं भंते ! असुरकुमारा देवा उट्ठ उप्पयंति जाव सोहम्मे कप्पे ! गोयम' ! णोइणटे समटे । महिढियाणं, असुरकुमारा देवा उढे उप्पयंति जाव सोहम्मे कप्पे ॥ १२ ॥ एसवियणं भंते ! चमरं असुरिंदे असुरराया उड्ढें उप्प- भावार्थ स्थान व पर्वत के आश्रय से बहुत बडा अश्ववल, हस्ती बल, योध बल, और धनुष्य बल को पराजित कर सकते हैं। ऐसे ही अमुर कुमार देव अरिहंत भगवन्त, अरिहंत चैस सो द्रव्य अरिहंत छमस्थ, अनगार और भवितात्मा का आश्रय लेकर ऊँचे सौधर्म देवलोक तक जाते हैं ॥ ११॥ अहो-भगवन् ! क्या सव असुर कुमार देव ऊंचे जाने की शक्तिवाले यावत् सौधर्म देवलोक में गये और जावेंगे! अहो गौतम यह अर्थ योग्य नहीं है. महर्द्धिक असुरकुमार देव मात्र सौधर्म देवलोक में गये और जावेंगे ॥ १२ ॥ * पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र *803 3880 तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा 80% - सूत्र 18 अनुवादक-बालसामंचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी - आश्थय भूत स० उत्पन्न होवे ज० जिससे अ० असुर कुमारदेव उ• अर्थ जा. यावत् सो सौधर्म देवलोक में 200 किसनि निश्राय से भ० भगवत् अ० असुरकुमार देव उ ऊ जायावत् सो सौधर्म देवलोक गो गौतम से० 'वह ज. जैसे इ. यहां स०अनार्य व०बर्बर के अनार्य के टं टकण देशके अनार्य भु०भूचुकंदश के प० प्रश्नदेश के पु०भिल्लादि ए०एक म०वडा क. वन ग० खड्डा दु० दूर्ग द० गुफा वि० विपम ५० पर्वतकी णी निश्राय सु० अतिशय अ० अश्ववल ह. हस्तिवल जो० योधवल ध० घनुष्यबल उर्ल्ड उप्पयंति जाव सोहम्मेकप्पे ॥ १० ॥ किं निस्साएणं भंते ! असुरकुमारा देवा उड्डे उप्पयंति जाव सोहम्मे कप्पे ? गोयमा ! से जहानामए इह सब्बराइवा, बब्व- राइवा, टंकणाइवा, भूचयाइवा, पण्हायाइवा, पुलिंदाइवा, एगं महं वर्णवा, गहुँबा, दुग्गंवा, दरिवा, विसमवा, पवयंवा, णीसाए सुमहल्लमवि, अस्सबलंवा, हत्थिवलंबा, जोहबलंबा धणुवलंबा. आगिलंति; एवामेव असुरकुमारा देवा णण्णत्थ अरहंतेवा, t. और जब ऐसा होता है तब यहां मनुष्य लोक में आश्चर्यरूप (अच्छेरा) गिना जाता है ॥ १० ॥ अहो भगवन् ! असुर कुमार देव किस की नेश्राय (आश्रय ) लेकर उपर जाते हैं ? अहो गौतम ! जैसे जंगल के निवासी भील लोक, वर देश के अनार्य लोक, टंकण देश के अनार्य लोक, भूच देश के अ- नार्य लोक, प्रश्न देश के अनार्य लोक, और भील वगैरह लोको एक बडा बन, खड्डा, दुर्ग, गुफा, विषम- * मकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * भावार्थ . ४७ शब्दार्थको आखेदित करे ए ऐमे अ.असुरकुमार देव अ०अरिहंत अगस्य अरिहंत अ०अनगार भा० भवितात्मा की नि० नेश्राय उ० कर्च जा० यावत् सौधर्म देवलोक ॥११॥ स. सब अ० असुर कुमार देव उ० ऊर्ध्व उ० अडे जा. यावत् सो सौधर्म देवलोक गोगौतम नोनहीं इ० यह अर्थ स समर्थ म०महद्धिक अ० असुर कुमार देव उ० अर्ध उजडे जा. यावत् सो० सौधर्म देवलोक ॥२२॥ ए. यह भ भगवन् अ०अमरेन्द्र अ० १dio अरहंतचेइयाणिवा, अणगारे, भावियप्पणो निस्साए उढं उप्पयंति जाव सोहम्मे कप्पे ॥ ११ ॥ सव्वेवियणं भंते ! असुरकुमारा देवा उट्ठ उप्पयंति जाव सोहम्मे कप्पे ! गोयमा ! णोइणढे समटे । महिट्ठियाणं, असुरकुमारा देवा उर्दु उप्पयंति जाव सोहम्मे कप्पे ॥ १२ ॥ एसवियणं भंते ! चमरं असुरिंदे असुरराया उठें उप्प- सूत्र REET पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र Rs 389 तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा.. भावार्थ स्थान व पर्वत के आश्रय से बहुत बडा अश्ववल, हस्ती वल, योध वल, और धनुष्य बल को पराजित कर सकते हैं। ऐसे ही असुर कुमार देव अरिहंत भगवन्त, अरिहंत चैस सो द्रव्य अरिहंत छमस्थ, अनगार और भवितात्मा का आश्रय लेकर ऊंचे सौधर्म देवलोक तक जाते हैं ॥ ११॥ अहो-भगवन् ! क्या सब असुर कुमार देव ऊंचे जाने की शक्तिवाले यावत् सौधर्म देवलोक में गये और जावेंगे! अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. महर्दिक असुरकुमार देव मात्र सौधर्म देवलोक में गये और जावेंगे ॥ १२ ।
शब्दार्थ pio सन्न व अनुनादक काममवारी नि श्री अमोलक ऋपिनी 8 अमुर राना उ ऊर्ध्व जा. यावत् सो० सौधर्म देवलोक ॥ १२ ॥ अ० अहो भ० भगवन् ‘च. चमर राजा की १० महा ऋद्धि मं० महायुक्ति का पावत् क कहां प० भवेश हुइ कू कूडागार शाला दि० दृष्टान्त भा० कहना ॥ १४ ॥ च. चमर भं० भगवन् अ० सुरेन्द्र अ० असुर राजा की सा० वह दीव्य दे. देवादि कि० किमसे ल० लब्ध ए. ऐसे गो० गौतम ते उस काल से उस समय में इ० इस जं. जयदीप में भः भरत क्षेत्र में वि० विध्याचल पर्वत की ५० नजदीक वे बेमेल स. सनिवेश हो. था इयं पुचे जाव सोहम्मे कप्पे ? हंता गोयमा ! एसबियणं चमरे असुरिंदे असुगराया उड्डे उप्पइयं पुच्चे जाव सोहम्मे कप्पे ॥ १३ ॥ अहोणं भंते चमरे असुरिंदे असुर- राया महिड्डीए महजुत्तीए जाव कहिं पविट्ठा ? कूडागारसाला दिटुंतो भाणियो॥१४॥ चमरेणं भंते ! असुरिंदेणं असुररण्णा सा दिव्या देवड्डी तंचव किंग्णालदा ३,एवं खलु अहो भगवन् ! यह चमर नामक असुरेंद्र पहिल क्या सौधर्म देवलोक में गया! हां गौतम ! यह चमर नामक अमुरेंद्र पहिले सौधर्म देवलोक में गया ॥ १३ ॥ अहो भगवन् ! इस चमर नामक असुरेंद्र की महाकादे महाएति वगैरह कहां चलीगई ! अहो गौतम ! कुटागार शाला जैसे पीछी शरीर में चलीगई ॥ १४॥ भगवन् ! चमर नामक असुरेंद्र असुरराजाको ऐसी दीव्य देवदि कैसे प्राप्त हुई यावत् सन्मुख हुई ! अहो गौतम ! एस काल उस समय में इस जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में विन्ध्याचल पर्वत * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी विधि ३ ३७ . २७ ४७७ शब्दार्थ व वर्णन युक्त त० तहां बे० बेभेल सनिवेश में पू० पूरण गा० गायापति प० रहता था अ० ऋद्धिवंत दि० दिप्त ज. जैसे ता तामली की २० वक्त व्यता त० तैसे ने० जानना ण. विशेष च० चारपुड वाला गोयमा ! तेणं कालेणं तेणं समएणं, इहेव जंबूद्दीवेदीवे भारहेवासे विज्झगिरिपायमूले सूत्र बेभेले नाम साण्णवेसे होत्था वण्णओ तत्थणं बेभेले सणिवेसे पूरणेनाम गाहाबई परि वसइ, अड्डे दित्ते जहा तामलिस्स वत्तब्बया तहा नेयन्या, णवरं चउप्पुडयं दारुमयं पडिग्गहयं करेत्ता जाव विपुलं असणं पाणं, खाइम, साइमं, जाव सयमेव चउप्पुडयं दारुमयं पडिग्गहयं गहाय मुंडे भवित्ता दाणामाए पव्वजाए पव्वइए, पव्वइएवियणं समाणे तंचेव जाव आयावण भूमीए पच्चोरुहिता, सयमेव चउप्पुडयं दारुमयं पडि- भावार्थ की मूल में वेभेल नामक सन्निवेश था. उस सन्निवेश में पूरण नामक गाथापति रहबा था. वह गाथापति ऋदिवंत, दीप्त यावत् सब अधिकार तामली तापस जैसे कहना. अर्थात् पूरण गाथापति को कुटुम्ब जा- गरणा करते विचार हुवा कि मुझे पूर्व संचित पुण्य के उदय से कुटुम्ब आदि सब मुख की ' सामग्री मीली है इस से जहां लग मेरे पुण्य प्रबल हैं और शरीर में शक्ति है वहां लग प्रभात होते चार पुडवाला काष्टमय पात्र बनाकर अशनादि चारों आहार नीपजाकर, ज्ञाति स्वजनादि की साथ भोजन कर, सरको यथोचित् मक्कारादि कर, ज्येष्ट पुत्र को गृह के कार्य पर रखकर सब को पूछकर मुंडित बनकर दान 43 पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) मूत्र 208038 तीसरा शतका दसरा उद्देशा 8003883 , 60 .
शब्दार्थ सूत्र ४७८ 4. अनुरादक-मालाचारीमुनि श्री अमोलक पिजी ५० प्रथम पु०. पुह में १९ डाले क. कल्पता ह मे० मुझे प० मर्थित प. पथिक को-द० देनेको जं. जो दो दमरे पु० पुढ में प. हाले क. कल्पता है मे० मुझे का. काक सु० श्वान को द० देना जं. जो गहयं गहाय बेभेल साणिवेसे उच्चनीयमज्झिमाई कुलाई घरसमुदाणस्स भिक्खा- यरियाए अडेचा जमे पढमे पुडए पडइ, कप्पइ मे तं पत्थिय पहियाणं दलइत्तए, जमे दोच्चे पुडए पडइ, कप्पइ मे कागसुणयाणं दलायत्तए, जमे तच्चे पुडए पडइ कप्पइ मे तं मच्छ कच्छभाणं दलइत्तए, जं मे चउत्थे पुडए पडइ कप्पइमे तं अ. प्पणा आहारं आहरेत्तए तिकटु, एवं संपेहेइ संपेहइत्ता कल्लं ,पाउप्पभायाए रयणीए तं चेव निरवसेसं चउत्थे पुडए पडइ ते अप्पणा आहारं आहारेइ ॥ १५॥ तएणं नायक मवा ग्रहण करना मुझे श्रेय है. दान प्रबर्ध्या अंगीकार किये पीछे आतापना भूमि से पीछे आकर स्वयं ही चार पुडबाला काष्टमय पात्र लेकर वेभेल सन्निवेश में ऊंच, नीच व मध्यम' कुल गों की भिक्षाचरी ग्रहण करूंगा, और चार पुवाले पात्र में से प्रथम पुड में जो भिक्षा डालेंगे जसे मैं पथिक जनों को देऊंगा, दुसरे पुड में भीक्षा डालेंगे उसे मैं काग प्रमुख पक्षी व श्वान प्रमुख को गलंगा, नीमरे पुड में जो भीक्षा डालेंगे उसे मत्स्य कच्छ वगैरह को डालूंगा और चौथे पुड में जो भीक्षा डालेंगे उस का मैं आहार करूंगा. ऐसा विचार करके प्रभात होते सब क्रिया की यावत् *प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ शब्दार्थ पिजी ४८० - काल ने उस समय में अ मैं गो गौतम छ. उग्रस्थ अवस्था में ए. अग्यारह वर्षकी प० दीक्षा से ७. छठ भक्त अ अंतर रहित त तपकर्म से सं० संयम से त तप से अ० आत्मा को भा. भावता पु० अनुक्रम से च० पलना गा० ग्रामानुग्राम दू०जाता जे जहां मुं०संमुमार पुर न० नगर जे..जहां अं. शोक कसंड उ० उद्यान जे. जहां अ० अशोक वृक्ष ने जहां पु० पृथ्वी शिलापट उ, आकर अशोक वृक्ष की हे ० नीचे पु० पृथ्वी शिलापट पे अ० अठम भक्त प० ग्रहणकर दो• दोपवि सा: तेणं कालेणं, तेणं समएणं अहं गोयमा !. छउमत्थकालियाए एक्कारसवासपरियाए छटुं छट्टेणं अनिक्खित्तेणं तवोकम्मेणं संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणे, पुल्याणुपुल्लिं चरमाणे, गामाणुगामं दृइजमाणे, जेणेव सुंसुमार, पुरे नगरे जेणेव असोयवणसंडे उजाणे जेणेव असोयवरपायवे जेणव पुढविप्तिलापट्टए तेणेव उवागच्छामि उवाग- वर्ष की साधु की पर्याय पालता हवा, निरंतर छठ के पारणे का तप.कर्म व संयम में आत्मा को चिन्तक्ता हुना, पूर्वानुपूर चलता हुवा और ग्रामानुग्राम विचरता: हुवा मैं सुंसुमारपुर नगर के अशोक वनखंड नापक उद्यान में अशोक वृक्ष की नीचे पृथ्वी शिलापट की पास. आया. वहां आकर अशोक वृक्ष नीचे पृथ्वी शीला पटपर अठम भक्त (तेला ) किया. दोनों पविभहर कर (जिन मुद्रासे) लम्बी बाहु करके एक दो पुल पर राष्ट्रस्वापार, अनिमेप-दृष्टि रखकर थोडासा मस्तक नमाकर यथास्थित गात्रों को * प्रकाशक-राजारहादुर.लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी अनुवादक-बानमा नारी मावार्थ ४८१ ५ I पंचमाझं विवाह पंण्णत्ति (भग ते) मूत्र - ब्दार्थ इकठेकर उलंबा पाहस्त ए एक पुद्गल में निःस्थापन की दिष्टि अंअनिमिपत्र ई थोडी पनमीहुइ का• काया से अ० यथा प० स्थापित ग० गात्र स० सर्व इ० इन्द्रिय गु० गुस ए० एकरात्रि की म०१. महाप्रतिमा ० अंगीकार कर वि. विचरता हूं ॥ १७ ॥ ते. उस काल ते उस समय में च० चमर चंचा रा० राज्यधानी अ० इन्द्र रहित अ. पुरोहित रहित हो० थी ।। १८ ॥ त० तब मे वह पू० पूरण वा वालतपस्वी व० बहुन प० प्रतिपूर्ण दु० बारह वा० वर्ष प० पर्याय पा०पालकर मामासकी सं० च्छइत्ता असोयवर पायवस्स हेतु पुढविसिला पट्टयांसि अट्ठमभत्तं पगिहामि दोत्रि सत्र पाए साहटु वग्धारियपाणी, एगपोग्गल निविट्ठदिट्ठी, अणमिसनयणे, ईसिं पव्भार- गएणं काएणं अहापणिहिएहिं गत्तेहिं, सबिदिएहिं गुत्तेहि. एगराइयं महापडिमं उव- संपजित्ता विहरामि ॥ १७ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं चमरचंचा रायहाणी अणि- दा अपुरोहिया यावि होत्था, ॥ १८ ॥ तएणं से पूरणे वालतवस्सी बहुपडिपुण्णाई दुवालसवासाई परियागं पाउणित्ता मासियाए संलेहणाए अत्ताणं झूसेत्ता सर्टि भत्ताई वाथ स्थापकर सब इन्द्रिगों को गोपकर एक रात्रि की महापडिमा अंगीकार करता हुवा विचरता था ॥ १७ ॥ उस का छ उस समय में चमर चंचा राज्यधानी इन्द्र रहित पुरोहित रहित थी ॥ १८ ॥ उस समय में वह पूरण नामक पालतपस्वी वारह वर्ष पर्यंत दान प्रवा पालकर एक मास की सैलेखना से आत्मा को - तीमरा शतकका दूसरा उद्देशा: * 0.9 ४८० अनुवादक-मालामचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 8.7 शब्दार्यकाल ने उस समय में मैं गौ गौतम छ. उग्रस्थ अवस्था में ए. अग्यारह वर्षकी प० दीक्षा से छ. छठ भक्त अ० अंतर रहित त तपकर्म से सं० सयम से त• तप से अ० आत्मा को भा. भावता पु• अनुक्रम से च चलना गा० ग्रामानुग्राम दू जाता जे जहां मुंसुसुमार पुर ननगर जे. जहां अ० भशोक वनखंड उ० उद्यान जे. जहां अ० अशोक वृक्ष जे जहां पु० पृथ्वी शिलापट उ आकर भ० अशोक वृक्ष की हे ० नीचे पु० पृथ्वी शिलापट पे अ० अठम भक्त प० ग्रहणकर दो. दोपाव सा० तेणं कालेणं, तेणं समएणं अहं गोयमा ! छउमत्थकालियाए एकारसवासपरियाए छटुं मुत्र छ?णं अनिक्खित्तेणं तवोकम्मेणं संजमेणं तवसा अप्पाणं भावमाणे, पुवाणुपुब्दि चरमाणे, गामाणुगामं दूइज्जमाणे, जेणेव सुसुमार पुरे नगरे जेणेव असोयवणसंडे उजाणे जेणेव असोयवरपायवे जेणव पुढविप्सिलापट्टए तेणेव उवागच्छामि उवाग- वर्ष की साधु की पर्याय पालता हवा, निरंतर छठ के पारणे का. तप.कर्म व संयम में आत्मा को चिन्तवता हुरा, पूर्वानुपूर्व चलता हुवा और ग्रामानुग्राम विचरताः हुवा मैं सुंसुमारपुर नगर के अशोक वनखंड नामक उद्यान में अशोक वृक्ष की नीचे पृथ्वी शिलापट की पास आया. वहां आकर अशोक वृक्ष नीचे पृथ्वी शीला परपर अठम भक्त ( तेला ) किया. दोनों पांव मेहर कर (जिन मुद्रासे) लम्बी बाहु करके एक दो पुहल पर राष्टिस्थापकर, अनिमेष-दृष्टि रखकर, योडासा मस्तक नमाकर यथास्थित गात्रों को * प्रकाशक-राजारहादुर.लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * शम्दाथ M. ४८३ P3 पंचमा विवाद पाणत्ति ( भगवती ) सूत्र - यावत् सो० सौधर्म देवलोक प० देखे ॥ २१ ॥ त० तहां स० शक दे० देवेन्द्र म. मघा पा. पाक yoशासन स० शतकतु स० सहस्रनेव वाला व वन पा० हस्त में पु० पुरंदर जा. यावत् द० दशदिशा में उ. उद्योत करते प० प्रकाश करते सो० सौधर्म देवलोक सो० मौधर्म य० बडिशक विमान सु० सुधर्मा ७० सभा में सशक के सी. सिंहासनपे जा यावत् दिदीव्य भो भोग भुं भोगते पा० देखे पा०देखकरा॥२२॥ १ ए. इसरूप अ० आत्मिक चिं० चिन्तवन प? स्मरण रूप म० मनोगत मं संकल्प स० उत्पन्न हुवा गए समाणे उड़े वीससाए ओहिणा आभोइए जाव सोहम्मे कप्पे पासइय ॥ २१ ॥ तत्थ सकं देविंद देवरायं मघव, पागसासणं, सयकाउं, सहस्सक्खं, वजपाणिं, पुरंदरं, जाव दसदिसाओ उजोवेमाणं, पभासेमाणं सोहम्मेकप्पे सोहम्म वडिंसए विमाणे सभाए सुहम्माए सत्कंसि सीहासणंसि जाव दिव्वाइं भोगभोगाई भुंजमाणं पासइ, देवलोक देखने लगा ॥ २१ ॥ वहां पर मेघमाली को वश में रखनेवाला, पाक नामक बलिष्ट रिपु को पराजित करनेवाला, कार्तिक शेठ के भव में एक सो प्रतिमा का अभिग्रह करनेवाला, सहस नयनवाला, हस्त में वन धारण करनेवाला, और असुर कुमार देव का विदारन करनेवाला ऐसा शक्रन्द्र को उद्योत करता व प्रकाशता हुवा सौधर्म देवलोक में सौधर्म वडिसग नामक विमान की सुधर्मा मभा में सिंहासन पर दीव्य भोग भोगवना हुआ देखा॥२२॥फोर ऐसा अध्यवसाय, चिन्तवन, मनोगत संकल्प हुवा कि अप्रापित की 228283> तीमरा शतकका दारा उद्देशा 4328 भावार्थ ध्दिाथा संलेखना से अ. भात्मा को झू० झूमकर स• साठभक्त अ• अनशन छे छेदकर का• काल के अवसर में का. काल करके च चमर चंचा रा. राज्यधानी में उ० उपपात सभा में जा. यावत् ई० इन्द्रपने उ० उत्पन्न हुया ॥ १२ ॥ त तब से वह च . चमर अ- अनुरेंद्र अ० तुरत का उत्पन्न पं० पांच प्रकार की प० पर्याप्ति से ५० पर्याप्त भाव को ग. जावे तं० वह ज. जैसे आ० आहार पर्याप्ति ना० यावत् भा० भापा मनपर्याप्ति ॥ २० ॥ त० तब च. चमर अ० असुरेंद्र पं० पांच ५० पर्याप्ति मे १० पर्याप्त भाव को ग. प्राप्त उ० अर्ब वी. स्वभाव मे ओ० अवधि ज्ञान से आ० देखे जा० ४८२ मूत्र <ire अनुवादक-बालमन्मचारी मुनि श्री अमोलक कार्पनी अणसणाए छेदेता कालमासे कालंकिच्चा चमरचंचाए रायहाणीए उववायसभाए जाव इंदत्ताए उवबन्ने ॥ १९ ॥ तएणं से चमरे अमुरिंदे असुरराया अहुणोववन्ने पंचविहाए पजत्तीए पजत्तिभार गच्छइ तंजहा आहार पजत्तीए जाव भासामण पनचीए॥२०॥ तएणं से चमेर असुरिंदे असुरराया पंचविहाए पजत्तीए पजत्तिभावं दूमकर. माठ भक्त अनशन कर व काल के अवसर में काल करके चमर चंचा राज्यधानी में उपपात सभा में देव दप्य वस्त्र की नीचे इन्द्रपने उत्पन्न हवा ॥ ११ ॥ वहां चमर नामक असुरेन्द्र आहारादि पांच प्रकार की पर्याप्ति से पर्याप्त वना ॥ २० ॥ फीर पांच पर्याप्ति से पर्याप्त बना हुवा अवधि ज्ञान से देखते सौधर्म * प्रकाशक-राजावहादुर लाला- सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी बन्ने पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मंत्र दार्थ विचरता है ॥ २३ ॥ ते नब मे ये सा० सामानिक दे देव च० चमा अ० असुरेंद्र को एक ऐसे यु० बोलाते हुवे ह० हुष्ट तु तुष्ट जा. यावत् है. आनंद पामे क करके तले ५० जोडकर ददशनस्य सि० शिप से ओ० आवर्तनं म. मस्तक से अं• अंजलि क० करके ज० जय वि० विजय से ३० वधाकर ए. ऐसे व बोले एक यह दे० देवानुपिय स० शक्र दे० देवेन्द्र जा० यावत् वि. विचरता है।॥ २४ ॥ त० तव च चमेर अ० अंमुरेंद्र अ० असुर राजा ने उन सा० मापानिक दे० देवों की अं• पास ए. एवं संपेहेइ २ त्ता सामाणिय परिसोबवण्णए देवे सहावेइ २ त्ता एवं बयांसी केसणं एस देवाणुप्पिया ! अप्पत्थिय पत्थए जाव भुजमाणे विहरइ ॥२३॥ तएणसे सामाणिय परिसोत्रयण्णगा देवा चमरणं असुरिंदेणं असुररणो एवं वुत्तासमाणा हट्टतुट्ठ जाव हय- हियया करयल परिग्गहियं दसनहं सिरसावत्तं मत्थए अंजलिकटु जएणं विजएणं बढाति एवं बयासी एसणं देवाणप्पिया : सके देविंद देवराया जावं विहरइ ॥२४॥ तएणं से चमरे असुरिंदे असुरराया तेसिं सामाणिय परिसोबवण्णगाणं देवाणं अंतिए भावार्थ यह कौन है ? ॥ २३ ॥ जब चमरेन्द्रने सामानिक परिपदा के देवों को ऐमा कहा तब वे बहुत हृष्ट तुष्ट हुये और हस्त द्वय जोडकर मस्तकों से आवर्तना देकर जय विजय शब्द से बधाये और कहा. अहो देयानुपिय ! यह शकेन्द्र ऐसा भोग भोगवता हुवा विचरता है ॥ २४ ॥ तव चमरेन्द्र उन सामानिक की 20 सीसरा शतक का दूसरा उद्देशा U0 दादाथा ४८४ 4. अनुवादक-बारप्रसाचारीमुनि श्री अमोलक ऋपि कोन ए. यह अ० अप्रार्थित को प० प्रार्थना करता है दु० दुष्ट अंत.६० अपनो ललक्षण वाला. हिर लजमा सि० लक्ष्मी १० रहित ही०. हीन पु० पुन्य, चतुर्दशी को जन्ना जे० जिससे म• मेरा इ.० यह ए. ऐने दि. दीव्य दे देवद्धि ना. यावत् दे० देवानुभाव ल० लब्ध प० प्राप्त अ सन्मुख हुवा. उ० उपर अयोडा उ उठ रंग. दि. दीप्य भोग भोग मुं० भोगते । विचरता है एक ऐसा सं० विचार कर सा० सामानिक. प.० परिषदा में उ० उत्पन्न दे देनोंको स० बोलाकर ए. ऐना ३० घोला के. कौन ए. यह दे. देवानुपिय अ० अमार्धित की प. प्रार्थना करता है जा. यावत् भुं० भोगवना वि. ॥ २२ ॥ पासइत्ता इमेयारूवे अब्मथिए चिंतिए; पत्थिए, मणोगए संकप्पे समुप्प.. जित्था. केसणं. एस अप्पत्थिय पत्थए दुरंतपतलक्खणे. हिरिसिरिपरिवज्जिए, होणपुग्णयाउहसे जेणं मम इमे एयारूवाए दिवाए देवट्ठीए जाव दिव्वे देवाणुभावे लडे, पत्ते, अभिसमण्णागए उप्पि अप्पुस्सुए दिव्वाई भोगभोगाइं भुंजमाणे विहरइ पार्थना करनेवाला परण की वांच्छा करनेवाला ] अमनोज लक्षणवाला, लज्जा, लक्ष्मी रहित, हीन पुण्य चतुर्दशी में उत्पन्न होनेवाला ऐना यह कोन है, मुझे जो ऐसी दीव्य देवद्धि यावत् दीव्य महानुभाग प्राप्त हुवा तो उनकी उपर यह अल्स उत्सुक बनकर दीव्य भोग भोगवता हुवा विचरता है. ऐना विनार करके सामानिक परिपदा के देवोंको बोलाये और पूछाकि मरण की वांच्छा करनेवाला यावत् भोग भोगवता हुवा जो विचरता है *मा-मामाकममा गायीभावना* वाध 00 ४८५ सन्त्र TR पंचांग विवाह एण्णत्ति ( भगवती) मूत्र विचरता है ॥ २३ ॥ ते नव मे ये सा० सामानिक दे देव च. चमर अ. असुरेंद्र को ए. ऐसे चु० बोलाते हुये ह० हृष्ट तु तुष्ट जा. यावत् है. आनंद पामे क करके तले ५० जोडकर ददशनख मि० शिप से आं० आवर्तनं म० मस्तक से अं• अंजलि क० करके ज० जय वि. विजय से ३० बंधाकर ए. ऐसे व बोले एक यह दे० देवानुपिय स० शक दे देवेन्द्र जा. यावत् वि. विचरता है ॥ २४ ॥ई त० तर च० चर्मर अ० अमुरेंद्र अ. असुर राजा ने जन सा. मामानिक दे देवों की अं० पास ए. एवं संपेहेइ २ त्ता सामाणिय परिसोबवण्णए देवे सदावेइ २ त्ता एवं बयासी केसणं एस देवाणुप्पया ! अंपत्थिय पत्थए जाव भुजमाणे विहरइ ॥२३॥ तएणसे सामाणिय परिसोचवण्णगा देवा चमरणं असुरिंदेणं असुररण्णो एवं बुत्तासमाणा हट्टतुट्ठ जावं हय- हियया करयल परिग्गहियं दसनहं सिरसावत्तं मत्थए अंजालिकटु जएणं विजएणं बद्धाति एवं बयासी एसणं देवाणप्पिया : सक्के देविंदे देवराया जाब विहरई ॥२४॥ तएणं से चमरे असुरिंदे असुरराया तेसिं सामाणिय परिसोबवण्णगाणं देवाणं अंतिए यह कौन है ? ॥ २३ ॥ जव चमरेन्द्रने सामानिक परिपदा के देवों को ऐमा कहा तब वे बहुत हृष्ट, तुष्ट हुये और हस्त द्वंय जोडकर मस्तकों से आवर्तना देकर जये विजय शब्द से वधाये और कहा. अहो देवानुपिय ! यह शकेन्द्र ऐसा भोग भोगवता हुवा विचरता है ॥ २४ ॥ तव चमरेन्द्र उन सामानिक की सीसरा शतक का द्वारा उद्देशा 988 भावार्थ:
হত্যাগী ४८६ 4. अनुवादक-चालयानचारी मुनि श्री अमानक झपिनी यह अर्थ सो मुनकर नि अवधार कर आ आमुरत्व रु० रुष्ट कु. कुपित च विशेष कुपित मि० देदीप्य मान ते उनमा सामानिक दे० देवको एक ऐसे व बोले अ० अन्य से वह स. शक दे. देवेन्द्र अ० अन्य से० वह च. चमर अ० अमुरेंद्र अ० असुर राजा म० महर्दिक से वह स० शक्र दे० देवेन्द्र अ. अल्पको वाला से वह च. चमर अ० असुरेन्द्र सं. उम इ० इच्छता हूं दे. देवानुपिय स० शक्र देवेन्द्र को मु० स्वयं अ० भ्रष्ट करने को ति० ऐना करके उ. अत्यंत कुपित जा. हुवा हो० था एयमटुं सोचा निसम्म आसुरुत्ते रुटे कुविए चंडिकिए मिसिमिसेमाणे ते सामाणिय परिसांववण्णए देवे एवं व्यासी अण्णे खलु भो! से सके देविंदे देवराया अन्नेखलु भो! से चमरे असुरिंदे असुरराया, महिद्वीए खलु भो ! से सके देविंद देवराया, अप्पिढिए खलुभो ! से चमरे असुरिंदे असुरराया. तं इच्छामिणं. देवाणुप्पिया ! सकं देविंद देवगयं सयमेव अचासाहित्तए त्तिकटु, उसिणे उसिणभूए, जाएयावि होत्था १२५॥ । पाम मे ऐमा वचन सुनकर हृदय में धार कर आमुरत्व को प्राप्त हुवा, (क्रोधित बना ) रुष्ट हुवा, कुपित हवा, रौद्र बना, दान पीसने लगा और सामानिक देव से कहने लगा, अहो शक नामक देवेन्द्र देवता का राजा दूसरा है और चमर नामक असुरेन्द्र भी दूसरा है. वह शक्रेन्द्र निश्चय ही महर्दिक है और चमरेंद्र मल्ल ऋद्धिवाला है. उन को शोभा से भ्रष्ट करने को मैं स्वयं वहां जाऊं ऐसा करके कोप संताप से * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादगी* Ja ४८७ 88 पंचमांग दिवाव पण्णात्ति ( भगवती) मूत्र 2018 ॥ २५ ॥ त० तब से वह च० चमर अ० असुरेंद्र ओ० अवधिज्ञान को प० प्रयुंजकर म० मुझे आ० देखकर ए. इसरूप अ० अयश्चमाय जायावत् स० उत्पन्न हवा एं०ऐसे सश्रमण भ०भगवन्त म० महावीर जं जंबूदीप में भ० भरत क्षेत्र में मुं० सुसुमार न. नगर में अ. अशोक वनखंड उ. उद्यान में अ० अशोक वृक्ष की अ० नीचे पु० पृथ्वी शिलापटो अ. अठन भक्त प० ग्रहणकर ए. एक रात्रिकी म० महामतिमा उ० अंगीकार कर वि०विचरते हैं ॥ २६ ॥ तं व से श्रेय मे• मुझे स. श्रमण भ. तएणं से चमरे असुरिंदे असुरराया ओहिं पउंजइ, पउंजइत्ता ममं ओहिणा आभोएइ आभोएइत्ता इमेयारूवे अब्भत्थिए जाव समुप्पाजत्था, एवंखलु समणे भगवं महावीरे जंबूहीवे दीवे भारहेवासे सुसुमारपुरे नगरे असोगवणसंडे उज्जाणे, असोगवरपायवस्स अहे पुढवि सिला पट्टयंसि, अट्ठमभत्तं पगिहित्ता, एगराइयं महापडिमं उवसंपजित्ताणं विहरइ ॥ २६ ॥ तं सेयं खलु मे समणं भगवं महावीरं ऊण हुवा ॥ २५ ॥ उस समय में चमरेन्द्रने अवधि ज्ञान प्रयुजा और मुझे देखा. मुझे देखकर ऐसा अ. ध्यवसाय यावत् चिन्तवन उत्पन्न हुवा कि श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी जम्बूदीप के भरत क्षेत्र में संसुमारपुर नामक नगर के अशोक वन खंड उद्यान में अशोक वृक्ष की नीचे पृथ्वीशीला पटपर अठम भक्त का प्रत्याख्यान कर एक रात्रि की महा प्रतिमा अंगीकार करते हुवे विचरते हैं ॥ २६ ॥ इस से PM तीसरा शतकका दुनरा उद्देशा HORS भावाथ ४८८ 4 भनुवादक-नालप्रनगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ भगवन्त म० महावीर की नी० श्राय से स० शक्र दे० देवेन्द्र को स० स्वयं अं० भ्रष्ट करने को तिः ऐमा करके से विचारकर सं० शैव्या से अ० उठकर दें देवदृष्य प० पहिनकर जे. जहाँ सः मुंधर्मा मभा जे०. जहां चौ० पाउफोले प० आयुधशाला ते तहां उ० आकर फ० परिब र० रत्न पं० ग्रहणकर ए. एक अ० अद्वितीय फ. परिघ र रत्नमय म० वडा अ. अमर्श व. धरता च. चमरं चंचा स. सध्ययानी की म मध्य से नि० नीकलंकर जे. जहां ति० तिगिच्छ कूट उं० उत्पांत प० पर्वत ते० तहां नीसाए सका देविंद देवरायं सयमेव अचासाइत्तए तिकट्ट, एवं संपेहेइ, संपेहेंइत्ता, सुन. मयाणिजाओ अब्भुटेइ २ त्ता, देवदूसं परिहेइ, परिहेइत्ता जेणेव संभा सुहेम्मा, जे. व चाप्पाले पहरणकोसे तेणेव उनागच्छइ, उवागच्छइत्ता फलिंहरयण परामुसई; परामुप्तइत्चा एगे अबीए फलिहरयणमयाए भहया अमरिसं वहाणे चमरचाएं गयहाणीए मझं मझेणं निग्गच्छई, निग्गच्छंइत्ता, जेणेव तिगिच्छकूडे श्री अमग भगवैत महावीर की मेश्राय लेकर शक्र देवेन्द्र की आसातना करना मुझे श्रेय है ऐसा विचार कर अपने आसन से उठकर देवं देप्य वस्त्र पदिना और चउफाल नामक शस्त्रे का भंडार था वहां आया. वहां आकर परिघ रत्ल नामक आयुध को हस्त में धारन किया. परिघ रत्न को धारन करके अन्य किसी को माप नहीं लेने हुये अमर्पमार धारण करके चमर चंचा राज्यधानी की बीच में होकर तिगिच्छकूट * प्रकाशक-राजाबहादुर :लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रमादजी * म्दाथ ४८९ सूत्र पंचांग विवाह पप्पत्ति (भगवती) सूत्र-- 13. आकर वे वैक्रेय ममुवात स. नीकालकर जा. यावत् उ० उत्तर वैकेय कर वि० विकुर्वणा कर ता. उस उ० उत्कृष्ट जे० जहां पु० पृथ्वी शिलापट जे० जहां म० मेरी पास ते. तहां उ० आकर म० मुझे ति० नानवक्त आक आदान प० प्रदक्षिणा क० कर जा. यावत् न० नमस्कार कर व० बोले इ० इच्छताहूं भ० भगवन् तु • तुमारी नी० नेश्राय से स० शक दे. देवेन्द्र को स. मयं मभ्रष्ट करने को ति. ऐमा करके ।। २७ ॥ उ० ईशान कोन को अ० अतिकन ये वैज्रय समुयात म० नीकालकर उप्पायपव्वए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छइत्ता बेउत्रिय समुग्याएणं समोहणइ, समोहणइत्ता जाव उत्तर वेउव्वियरूवं विकुब्वइ ताए उचिट्ठाए जाव जेणेव पुढवि सिलावटए जेणेव भम अंतिए तेणेव उवागच्छइ उबागच्छइत्ता ममं तिक्खुत्तो आ- याहिण पयाहिणं करेइ जाव नमंसित्ता एवं वयासी इच्छागिणं भंते ! तुबभं नीसाए सक्कां देविंदं देवरायं सयमेव अत्तासाइच्चए तिकटु ॥ २७ ॥ उत्तर पुरच्छिमंदिसी नामक उत्पात पर्वत पर आये, वहां आकर वैकेय समुद्घान यावत् उत्तर वैकेय रूप करके मेरी समीप आया. और मुझे तीन आदान प्रदाक्षिणा यावत् नमस्कार करके ऐमा बोला कि अहो पुज्य ! तुमारी नेश्राय से सयं शक्रन्द्र की आसांतना करने को इच्छता हूं ॥ २७ ॥ ऐसा कहकर ईशान कोन में गया वहां जाकर । तीसरा शतकका दूसरा उद्देशा भावार्थ GYO पाठदार्थ सूत्र - अनुवादक लियानारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी 8 जा. यावत् दो० दुसरी वक्त वे वैक्रेय समुद्घात स० नीकालकर ए. एक म० वडा घो० धोर घो. घोराकार भी विकराल भा. भयंकर भ० भयानीत गं० गंभीर उ० उद्वेग उपनावे का. कृष्ण मध्य रात्रि मा० उडद सं० सरिखा जो० योजन स० लाख प० वडा शरीर को वि० विकुर्वणा कर अ० पछाडे २० फूदकर ग. गर्जना कर ह० हयस्वर क० करके ह० हस्तिका शब्द क. करकं र० रथका घन घन क करके पा० पांच पछाड कर भ० भूमि को च० चपेश द. देकर सी० सिंहनाद न० करके उ० उछा भागं अवकमइ अवकामइत्ता वेउब्धिय समुग्घाएणं समोहणइ समोहणइत्ता जाव दोचंपि वेउब्वियसमुग्घाएणं समोहणइ समोहणइत्ता, एगं महं घोरं, घोरागारं, भीम, भीमागारं, भासुरं, भयाणीयं, गंभीरं उत्तासणयं कालड्डरतमासरासि संकासं जोयण सयसाहस्सीयं महाबोदि विउन्व३, विउब्बइत्ता अप्फोडेइ, अप्फोडेइत्ता वग्गइ वग्ग- इत्ता गजइ, गजइत्ता हयहेसियं करेइ, करेइत्ता हत्थिगुलगुलाइयं करेइ, करइत्ता पैकेंय समुद्यात करके प्रदेश वाहिर नीकाले यावत् दुमरी वक्त वैक्रेय समुद्घात करके एक बड़ा, घोर, घोर आकारवाला, भीम, भीम आकारवाला, देदीप्यमान, भयलानेवाला, गंभीर, उद्वेग उत्पन्न करनेवाला. श्याम आधीरात्रि व उडद ममान एक लक्ष योनन का शरीर बनाया. शरीर बना करके दोनों हाथ की दयालयों या दोनों भुनाओं को करस्फोट करता, हाथ से कूटता हुवा, जोर से वगासी खाता हुवा, एन * प्रकाशक रानावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * पर्थ ४२: पंचमांग विवाह पण्गत्ति ( भगवती) सूत्र :- ला उ० उछलकर ५० पछोडा पछोडकर ति त्रिपद छि० छेदकर वा बायां हाथ को ऊ ऊंचाकर दा० दक्षिण हाथ को प० नीचाकर अं० अंगुठा के नख ति० तिर्छ मु० मुख वि० विटम्बनाकर म० बडे यडे स० शब्द से क. कल कल अवाज क० करके ए० एक अ० अद्वितीय फ० परिघ र० रत्नमय उ० ऊर्थ वि० • आकाश में उ० उछालता खो० क्षोर पमाडता अ० अधोलोक को कं• कंपावता मे० पृथ्वी रहघण घणाइयं करेइ, करेइत्ता पायददरगं करेइ, करेइत्ता भूमिचवेडं दलयइ, दलय- इत्ता सीहनादं नदइ, नदइत्ता उच्छोलेइ, उच्छोलेइत्ता पच्छोलेइ, पच्छोलेइत्ता ति. वति छिंदइ, तिवति छिंदइत्ता वाम भुयं ऊसवेइ, ऊसवेइत्ता दाहिण हत्थपएसिणीए अंगुट्ठनहेणय, वितिरिच्छं मुहं विडंबइ, विडंवइत्ता महया महया सहेणं कलकलरवं गर्जारव समान शब्द करता हुवा, घोडे के हेमार समान हेंकार करता हुवा, हाथी की समान गुलगुलाट करता हुवा, रथ की ममान घणय गाट करता हुवा, भूमि पर पांव आस्फालता हुआ, हाथों के चपेटे भूमि पर मारता हुवा, सिंहममान नाद करता हुवा, मर्कट की तरह उछल उछल कर जाता हुवा, मल्ल की माफक रंगभूमि में त्रिपद छेद करता हुवा, बॉयी भुजा को उपर ऊंची रखता हुवा, दक्षिण भुना के पांच की अंगुलीयों मरोडता हुवा, मुच्छों को वल घालता हुवा, अत्यंत जोर से कल कलाट करता हुआ, मात्र परिघ रत्न नामक आयुध को धारण करता हुआ, ऊर्च आकाश में ऊछाला खाता हुआ, क्षोभ उत्पन्न करता <P> <१ तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा भावाथे ७८ शब्दार्थ ४९४ आत्मरक्षक देय सा० सहस्रक कहां ता० उन की अ० अनेक अ० अप्सरा को कोडी अ० आज ह. हनता हूं म०मन्यन करताहूं व०वधकरताहूंअ०आज म०मुझे अ० अवश अ० अप्सरा ३० वशसे उनमस्कार करो ति. ऐसा करके तं. उन को अ० अनिष्ट अ० अकान्त अ० अप्रिय अअशुभ अ० अमनोज्ञ अ० अमनाम फ कठोर गि भाषा नि कही ॥२८॥ त० तब स०शक दे देवेन्द्र तं० उस अ० अनिष्ट जाण्यावद चउरासीइ सामाणिय साहस्सीओ, जाव कहिणं ताओ चत्तारिचउरासीओ आयरक्ख- देवसाहस्सीओ, कहिणं ताओ अणेगाओअच्छराकोडीओ ? अज हणामि, अज्ज महेमि, अजवहेमि, अजममं अवसाओ अच्छराओ वसमुत्रणमंतु त्तिक?, तं आणिटुं, अर्क- तं, आप्पियं, असुभ, अमणुण्णं, अमणामं, फरुसंगिरं निसिरइ ॥ २८ ॥. तएणं सूत्र 1. अनुनादरु-पालनमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी मुकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालामसादजी मारा और बडे बडे शब्द मे बोलने लगा अरे शक्र देवेन्द्र देवराजा कहां हैं ? उसके चौरासी हजार सामानिक यावत् नीन लाख छत्तीस हजार आत्म रक्षक देव और अनेक क्रोड अप्सरा का परिवार कहां है ? मान मैं उन को मारूंगा, इन सब का मैं वध करूंगा; आज मैं दधि समान मन्थन करूंगा, आजदिन तक तू मेरे वश में नहीं था अब देवियों सहित वश होकर मुझे नमस्कार करो ऐसा अनिष्ट, अक्रान्त, अप्रिय, अशुभ, अमनोग, अमणाम यावत् कठोर वचन निकालने लगा. ॥ २८ ॥ उस समय में ऐसी अनिष्ट .
HT 8 पंचमान विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 38 अ० अमनाम अ० नहीं सुनी फ० कठोर गि० भाषा सो०, सुनकर नि० अवधारकर आ० आसु रत्व जा. यावत् मि० देदीप्यमान ति० तीनरेखा रूप भिं० भृकुटी नि० कपाल में सा० चढाकर च० चमर अ० असुरेंद्र को एक ऐसा व० बोले च० चमर अ० असुरेंद्र अ० अप्रार्थितका प० मार्थित जा. यावत् ही० हीन पु० पुन्य चतुर्दशी वाला अ० आज न० नहीं भ० है ना. नहीं ते तुझे सु० सुख अ० है त्ति ऐसा करके सी०सिंहासन पे गल्यैठे हुवे व०वज्र प०ग्रहणकर तं उस को जजळता फु० फुट फुट शब्द से सके देविंदे देवराया तं आणिटुं आव अमणामं अस्सुयपुत्वं फरुसं गिरं सोचा निसम्म आसुरुत्ते जाव मिसिमिसेमाणे तिवलियं भिउडिं निलाडे साह१ चमरं अ- सुरिंदं असुररायं एवं वयासी हं भी चमरा अमुरिंदा असुरराया अप्पत्थियपत्थियां जाव हीणपुण्णचाउदसा ! अज न भवसि, नाहि ते सुहमत्थि त्तिकटु, तत्थेव सीहासण- वरगए वजं परामुसइ परामुसइत्ता, तं जलंतं, फुडतं, तथतडतं उक्कासहस्साई यावत् अमनोज्ञ, पहिले कदापि नहीं सुनी वैसी कठोर भापा सुनकर शफ़ेन्द्र क्रोधित हुवा, और दांत पीसता.. हुवा भृकुटी चढाकर चमर नामक असुरेन्द्र असुर राजा को ऐसा कहा अरे अमुरेन्द्र, असुर का राना चमर ! तू अमार्थित की प्रार्थना करनेवाला यावत्. हीन पुण्यचतुर्दशी. में उत्पन्न.. होनेवाला है. आज तुझे मुख नहीं होगा. ऐसा कहकर सिंहासन पर बैठे हुवे शक्रदेवेन्द्र देवराजाने वा उठाया उठगकर 389 तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा8238 भावार्थ YO शम्दार्थ ४१६ सूत्र 1. अनुरादक-शामाचारी. मुनि श्री अमोलक ऋपिनी : करतात. त्रट अट अवाज करता उ० उल्का सहस मु. मूकता हुवा जावाला सहसू.मु. मुकता: अंगार मा शत सहस्र प.पिखेरता फु० अग्नि कण जा ज्वाला मा० माल्य स० सहस्र च. चक्षु.वि: विक्षेप दृष्टि का प० प्रनिघात प० करता हु० अग्नि व० बहुत ते. तेज दि० देदीप्ममान वे वेगवन्त फु: फला हुना किं. किंशुक समान म महाभयंकर च० चमर अ० असुरेंद्र, का.व०, वध केलिये ५० वजा नीकाला ॥ ५१ ॥ त तव च० चमर अ. असुरेंद्र तं उस-ज. जलता जा. यावत् भ. भयंकर विणि मुयमाणं २ जाला सहस्साई मुयमाणं इंगाल सय सहस्साई पविक्खिरमाणं; पविक्खिरमाणं, फुलिंग जाला माला सहस्सेहिं उखु विकखेवदिद्विपडियायं विपकरे माणे हुययहुयतिरगतेयदिप्पंतं, जइणवेगं, फुल्लीकसुयसमाणं महन्मयं भयंकरं चमरस्स असुरिंदरस असुररण्णो वहाए वजं निसिरइ, ॥ २९ ॥ तएणं से चमरे असुरिंदै असुरराया तं जलंतं जाय भयंकर बंजमभिमुहं आवयमाणं पासइ, पासइत्ता भनि ममान. जलता हुआ, फुट फुट शन्द करनाहुवा, · और नट बद करता हुवा सहस्र विद्युत समान भलभलाट करता हुवा, जाला को छोडता हुवा, हजारों अंगार की वर्षा वर्षाता हुवा, बहुत प्रकाश. करता हुना, भानिने आधिक तेजनाला, किंशुक कुमुम समानफुल्ला हुआ, और महाभय उत्पन्न करता हुवा.ऐसा भयं- कर बन चमर असुरेन्द्र के वध के लिये छोडा ॥ २१ ॥ फीर ऐसा जलता हुवा यावत् महाभय करने * प्रकाशंक-राजीवहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * New शब्दाथ ४१७ सूत्र 885 पंचमांग विवाह पण्णाति ( भगवती) सूत्र 8 ३० वजू अ० सन्मुख आ. आता पा• देखकर झि चिन्तवनकर.पि. इच्छकर त० तैसे सं० भगा हुवा म० मुकुट वि० विस्तार सो० आलंबनं सहित ४० हस्त आ० आभरण उ०.उर्व पांच अ. नीचाशिर के० कक्षा ग० रहा हुवा से० स्लेद मु मूकता ता. उस उ• उत्कृष्ट जा. यावत् ति तिर्छा अ० असं. ख्यात दी द्वीप समुद्र म० मध्य से वी० अतिक्रमता जे० जहां जं. जयदीप जा० यावत् म. मेरी अं० झियाइ, पिहाइ, झियाइत्ता पिहाइत्ता तहेव संभग्ग मउड विडए, सालं- 'वहत्याभरणे उ8पाए अहो सिरे कक्खागयसेयंपिय विणिं मुयमाणे मुयमाणे ताए उ- किट्ठाए जाव तिरिय मसंखजाणं दीवसमुदाणं मज्झं मझेणं बीईवयमाणे २ जेणेव जं- बूद्दीचे दीधे जाव जेणेव असोगवर पायवे, जेणेव ममअंतिए तेणेव उवागच्छइ उवा- वाला वज़ को सामने आता हुवा देखकर वह चमरेन्द्र यह क्या होगा ऐसा चिन्तयन करने लगा, यह मुझे होवे ऐसी इच्छा करने लगा, अपने स्थान जाने को वांच्छने लगा, और वन का आताप नहीं सहन होने से चक्षु वैध करता हुवा व्याकुल होने लगा. इस तरह चिन्तयन करके पीछा फीरा, सिर का मुकुट नीचे पड़ने लगा, आभरणों हस्त से पकडे, अधो गमन होने से ऊंचे पांव नीचा सिर हुवा और जैसे मनुष्य के शरीर में से स्वेद छूटता है वैसे ही चमरेन्द्र के शरीर में से स्वेद रूप पुद्गल टपकनेलगा. कार देव की दीव्य गति से यावत् असंख्यात दीप समुद्र की मध्य में होकर जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में संमुमार नगर के ११ तीमरा शतक का दूसरा उद्देशा 988-89 भावार्थ शब्दा. ने श्री अमोलक ऋषिजी.88- सूत्र १२.वज्ञ दो० दो से जं. जिस को वः वन दो० दो से ते० उसको च०चमर ति तीन में ससर्व से धारा स० शुक्र दे० देवेन्द्र का उ: कर्ज लोक कं० कंड अ० अधोलोककक संमख्यात गुणा नानितना खि० क्षेत्र च० चमर अ० अधो उ.. जावे ए. एक समय में तं. उस को म. शक्र दो० दो से करन ति तीन से ससबसे थोडा च०चमर अ० अमुरेंद्र का अ० अधोलोक के० कंड उर्व लोक का कर सं० व वजे दोहिं, तं चमरे तिहिं ॥ सव्वत्यावे सक्करस देविंदस्स देवरको उड्डलोयकंडए अहेलोय कंडए संखेज्जगुणे जावइयंखेत्तं चमरे असुरिंदे असुरराया अहे उपयइ एकेणं समएणं, तं सक्के दोहिं, तं वजे तिहिं, ॥ सव्वत्थोवें चमरस्स असुरिंदरस सुररणो अहेलोयकंडए, उड्डलोयकंडए संखेजगुणे, एवं खलु गोयमा ! सकेणं मय में आता है और चमरेन्द्र तीन समय में जाता है. शक्र देवेन्द्रको उपर जाने में सब मे थोडा काल लाता है उप्त से अधो लोक में जाने में संख्यात गुना (द्विगुना.) काल लगता है. * एक समय में भामरेंद्र जितना नीचे उतरता है उतना शकेंद्र दो समय में उतरता है और वज़ तीन समय में उतरता है • यहां पर द्विगुना काल लेनेका मतलब यह है कि शकेंद्रको ऊंचा जानका व चमरेंद्र को नीचा' आने में दोनों बराबर है. एक समय में चमरेंद्र जितना नीचे जाता है उतनाही क्षेत्र नीचे आने में • माग रानाबहादुर लाला सुखदेवसहायनी मालापसादजी. समय लगते हैं.
तैसे सं० भगा हुवा शब्दार्थ ४२७ सूत्र 8 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 8983 व व अ० सन्मुख आ. आता पा० देखकर झि चिन्तवनकर पि० इच्छकर त० १० मुकुट वि० विस्तार सा० आलंबन सहित ह. हस्त आ० आभरण उ०. उर्ध्व पर अ० नीचाशिर के० कक्षा ग० रहा हुवा से० स्वेद मु मूकता ता. उस उ• उत्कृष्ट जा. यावत् ति तिर्छा अ० असं ख्यात दी० द्वीप समुद्र म० मध्य से बी० अतिक्रमता जे० जहां जं. जंबुद्धीप जा० यावत् म• मेरी अं010 'झियाइ, पिहाइ, झियाइत्ता पिहाइत्ता तहेव संभग्ग मउड विडए, सालं- 'बहत्याभरणे उद्बुपाए अहो सिरे कक्खागयसेयंपिव विणि मुयमाणे मुयमाणे ताए उ- किट्ठाए जाव तिरिय मसंखेजाणं दीवसमुद्दाणं मज्झं मझेणं वीईवयमाणे २ जेणेव जं- बहीवे दीधे जाव जेणेव असोगवर पायवे, जेणेव ममअंतिए तेणेव उवागच्छइ उवा- घाला वज़ को सामने आता हुवा देखकर वह चमरेन्द्र यह क्या होगा ऐसा चिनावन करने लगा, यह मुझे होवे ऐसी इच्छा करने लगा, अपने स्थान जाने को वांच्छने लगा, और वत का आताप नहीं सहन होने से चक्षुबंध करता हुवा व्याकुल होने लगा. इस तरह चिन्तयन करके पीछा फीरा, सिर का मुकुट नीचे पडने लंगा, आभरणों हस्त से पकडे, अधो गमन होने से ऊंचे पांव नीचा सिर हुवा और जसे मनुष्य के शरीर में से स्पेद छूटता है वैसे ही चमरेन्द्र के शरीर में से स्वेद रूप पुद्गल टपकनेलगा. कीर देव की दीव्य गति से यावत् असंख्यात दीप समुद्र की मध्य में होकर जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में संसुमार नगर के १३ तीमरा शतक का दूसरा उद्देशा । भावार्थ 5 ४९८ 42 अनुवादक-बालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 शब्दार्थ १ पास उ०आकर भी०डरा हुवा भ०भय से गन्धर्धर स्वर भ० भगवन् स०सरण मे०मुझे त्ति०एसो बू० कहता म० मेरे दो० दोनों पा. पांव के अं० अंतर में वे० वरासे सः पडा ॥ ३० ॥ त० तब तक उस स० शुक्र दे० देवेन्द्र को ए० इसरूप अ० अध्यसाय जा० यावतू स० उत्पन्न हुवा णो० नहीं ख. निश्चय ५० शक्ति वंत च० चमर अ० असुरेंद्र णो नहीं. स. समर्थ च. चमर असुरेंद्र नो० नहीं वि. विषय च० चमर अ० अमुरेंद्र का आ० स्वत की णि. नेश्राय से उ० ऊर्ध्व उ० उडकर जा. यावत् सो० सौधर्म देव- गच्छइत्ता, भाए भयगग्गरसरे भगवं सरणं मेत्ति बूयमाणे ममं दोण्हवि पायाणं अं. सूत्र तरंसि झत्तिवेगेणं समोवडिए ॥ ३० ॥ तएणं तस्स सकस्स देविंदस्स देवरण्णो इमेयारूवे अझथिए जाव समुप्पजित्था णो खलु पभू चमरे असुरिंदे असुरराया णोखलु समत्थे चमरे असुरिंदे असुरराया, णो खलु विसए चमरस्स असुरिंदस्स असुररण्णो अपणो णिस्साए उर्दू उप्पइत्ता जाव सोहम्मेकप्पे. णण्णत्थ अरिहंतेवा, अशोक वनखण्ड के अशोक वृक्ष नीचे पृथी शिला पट्टपर जहां मैं ध्यानस्थ था वहां वह चमरेन्द्र आया. आकरके डरता हुवा भन्न स्वर से अहो भगवन् ! आपका मुझं शरण हो ऐसे वोलता हुवा मेरे दोनों पांवों की बीच में शीघ्र वेग से गिरपडा ॥ ३० ॥ फीर शकेन्द्र को ऐसा अध्यवसाय यावत् चिन्तवन हुवा कि स्वयं चमरेंद्र यहां आने को समर्थ नहीं है वैसे ही अन्य किसी की नेश्राय विना ऊंचे सौधर्म देवलोक में * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी i/ पाथ * pic शब्दार्थ लोक ण नहीं अ० अन्यथा अ० अरिहंत.अ० छनस्थ अरिहंत अ० अनगार भा, भवितात्मा णिनेश्राय से उ० ऊर्थ उ० उडे जा० यावत् सो० सौधर्म देवलोक तं० वह म० महा दुःख त ० तथारूप भ०, अरिहंत भ० भगवन्त अ• अनगारकी अ० आशातनाकरे॥३१॥ तिः ऐसा करके ओ० अनधिज्ञान को प०मयुंजकर म मुझे ओ अवधि ज्ञान से आदेखकर हाहाहा अ अहो ह०हणाया अमैं अ०हूं त्ति ऐसा करकेता०/6 उस उ० उत्कृष्ट जाल्यावत् दिदीव्य दे देवगति से व०वज की वी० रस्ते भ०पीछे जाना तितिछी अ० सूत्र *98 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - अरिहंतचेइवाणिवा, अणगारेवा भावियप्पाणी मिस्साए उड़े उप्पइत्ता जाव सोहम्मे कप्पे तं महादुक्खं खलु तहारूवाणं अरहंताणं झावंताण अणगाराणय अच्चासा- यणयाए ॥ ३१ ॥ त्तिकटु, ओहिं पउंजइ, पउंजइत्ता ममं ओहिणा आभोएइ२ त्ता, हाहा अहो हतो अहंमास तिकटु ताए उक्किट्ठाए जाव दिव्वाए देव गईए वजस्स ११% तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा | भावार्थ आने का विषय नहीं है. अरिहंत, अरिहंत चैत्य सो छमस्थ, अनगार और भवितात्मा की नेश्राय विना ऊंचे उड़ने को यावत् सौधर्म देवलोक में आने को समर्थ नहीं है. इस से अरिहंत भगवंत यावत् अनगार को आसातना से महा दुःख होगा ॥ ३१ ॥ ऐसा करके माधि ज्ञान प्रयुजा. (लगाया) और अवधि ज्ञान से मुझे देखकर हा हा अरे अरे ऐसा खेद करके उस उत्कृष्ट यावत्त देव की दीव्य गति से वन के।
शब्दार्थ ४९८ मूत्र 4. अनुवादक-बालमानचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 पाम उभाकर भी०डरा हुवा भ भय से गन्धर्धर स्वर भ भगवन स०सरण मे० मुझे ति०एसो बू० कहता म० मेरे दो० दोनों पा० पांव के अं० अंतर में वे० वरासे सः पडा ॥ ३० ॥ त० तब तक उस स० शुक्र दे० देवेन्द्र को ए० इसरूप अ० अध्यसाय जा. यावतू स० उत्पन्न हुवा णो० नहीं ख. निश्चय ५० शक्ति चन च० चमर अ० असुरेंद्र गो० नहीं० स० समर्थ च० घमर असुरेंद्र नो० नहीं वि० विषय च० चमर अ० असुरेंद्र का आ० स्वत की णि० नेश्राय से उ० अर्ध्व उ० उडकर जा० यावत् सो० सौधर्म गच्छइत्ता, भीए भयगग्गरसरे भगवं सरणं मेत्ति बूयमाणे ममं दोण्हवि पायाणं अं- तरंसि इत्तिवेगेणं समोवडिए ॥ ३० ॥ तएणं तस्स सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो इमेयारूचे अझथिए जाव समुप्पजित्या णो खलु पभू चमरे असुरिंदे असुरराया गोखलु समत्थे चमरे असुरिंदे असुरराया, णो खलु विसए चमरस्स असुरिंदरस असुररण्णो अप्पणो णिस्साए उर्दू उप्पइत्ता जाव सोहम्मेकप्पे. णण्णत्थ अरिहंतेवा, अशोक वनखण्ड के अशोक वृक्ष नीचे पृथ्वी शिला पट्टपर जहां मैं ध्यानस्थ था वहां वह चमरेन्द्र आया. आकरके डरता हुवा भन्न स्वर से अहो भगवन् ! आपका मुझे शरण हो ऐसे वोलता हुवा मेरे दोनों पत्रिों की बीच में शीघ्र वेग से गिरपडा ॥ ३० ॥ फीर शकेन्द्र को ऐसा अध्यवसाय यावत् चिन्तवन हुवा स्वयं चमरेंद्र यहां आने को समर्थ नहीं है वैसे ही अन्य किसी की नेश्राय विना ऊंचे सौधर्म देवलोकी * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * वाथ ५०१ सत्र 33 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 328 ब तव कु० कुपित होते च० चमर अ० अमुरेंद्र का व० वध केलिये. व० बज नि० नीकाला. त० तब म. मुझे ए० इसरूप अ० अध्यवसाय जा. यावत् स० उत्पन्न हुवा. जो नहीं प० समर्थ च० चमर अ० असुरेंद्र ततैसे जा. यावत ओ० अवधि ज्ञान को प० प्रयुजता हूं दे. देवानुमिय को. ओ. अवधिज्ञान से आ० देखे जा० यावत् जे. जहां दे देवानुप्रिय ते. तहां उ० आया दे० देवानुमिय को च० चार अंगुल अ० अमाप्त ३० वज़ प० ग्रहण करता हूं व० वजू को प० ग्रहण करने केलिये आ• आया इ० यहां अहं तुम्भं नीसाए चमरेणं असुरिंदेणं असुररणोसयमेव अच्चासाइए, तएणं मए कुविएणं समाणेणं चमररस असुरिंदरस असुररण्णो वहाए वजे निसिट्टे, तएणं मम इमेयारूवे अज्झथिए जाव समुप्पजेत्था, णो खलु पभू चमरे असुरिंदे असुरराया तहेव जाव ओहिं पउंजामि, देवाणुप्पिए ओहिणाआभोएमि, हाहाजाव जेणेव देवाणुप्पिए तेणेव उवागंच्छा- मि देवाणुप्पियाणं चउरंगुलमसंपत्तं वजं पडिसाहरामि. वजं पडिसाहरणट्ठयाएणं इह मागए, का. शरण लेकरके चमरेन्द्रने मेरी आसातना की इस से बहुत क्रोधित होकर मैंने असुरेन्द्र का वध के लिये वजू फेंका. फीर मुझे ऐसा अध्यवसाय यावत् चिन्तवन हुवा कि चमर असुरेन्द्र ऊर्य सौधर्म देवलोक में आने को समर्थ नहीं है, अरिहंत यावत् अनगार का शरण लिये विना नहीं आसकता है. इस से मैंने अवधि ज्ञान प्रयुंजा और अवधि ज्ञान से आप को देखे. फीर खेद करता हुना आपकी समीप आया ११११ तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा - - शब्दार्थ सूत्र 8 अनुवादक-बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक शापिनी असंख्यात दी द्वीप समुद्र. म० मध्य से जो० यावत् जे० जहाँ अशोक पा० वृक्ष म० मेरी अं० पास ते. तहां उ० आकर में ० मुझे च० चार अंगुल अ० अमाप्त च० वजे प० संहरन करे मु० मुष्टिकेवात से के. केशाय पी० चलित हुवे ॥ ३२ ॥ त० तब से वह स० शक्र दे० देवेन्द्र ५० वज्र को प. संहरन कर म. मुझे ति तीनवक्त आ० आदाने ५० प्रदक्षिणा क. केरके न० नमस्कार कर एक ऐसा व० बोले भ० भगवन् अ० मैं तु. तुमारी नी. नेश्राय से च• चमर अ० असुरेंद्र स० स्वयं अ० भ्रष्टकरने को त. वीहि अणुगच्छमाणे तिरिय मसंखेजाणं दीवसमुदाणं मझं मझेणं जाव जेणव असोगवरपायवे जेणेव मम अंतिए तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता, ममंचणं चउ- रंगुलमसंपत्तं वजं पडिसारइ अभियाइमे गोयमा ! मुट्टिवाएणं केसग्गे वीइत्था ॥ ३२ ॥ तंएणं से सके देविंदे देवराया वजं पंडिसाहरित्ता, ममं तिक्खुत्तो आया- हिणं पयाहिणं करेइ करेइत्ता वंदइ नमसंइ नमसइत्ता एवं बयासी एवं खलुभंते ! रसे को अनुमरता हुवा असंख्यात द्वीप समुद्र उल्लंघ कर जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में मुंमुमार नामक नगर के अशोक वनखण्ड के अशोक वृक्ष नीचे मेरी समीप आया. और मेरे से चार अंगुल दूर रहते वज्र पीडा खींच लिया. वज़ खींचने के लिये नो मुष्टिंबंध की, उस के वायु से मेरे केशाग्र चले ॥ ३२॥ वींचे पीछे मुझे तीन आदान प्रदक्षिणाकर वंदना नमस्कार कर ऐसा बोला अहो भगवन् ! आप * प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * । भावार्थ शब्दार्थ ५०३ सूत्र -पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) सूत्र 8-81 28 तीसरा शतकका दृमरा उद्देशा88><398 कहा मु० मुक्त अ० है भो भी च० चमर अ० असुरेंद्र स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर के प. प्रभाव से न० नहीं ते तुझे इ० अब म० मुझ से भ० भय अ० है.. त्ति ऐसा करके ज" जिस दिशि से पा० आये ता० उप्तदिशा में प० पीछे गये ।। ३३ ॥ भ० भगवान् गो गौतम स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर को न नमस्कार कर व० बोले दे० देव भं० भगवन्त २० महाऋद्धि म० महाद्युति ना. यावत् म० महानुभाग पु० पहिले पो० पुद्गल खि० फेंक कर प० समर्थ तं० उसको अ० पीछे जाकर-गे० असुरिंदं असुररायं एवं वयासी-मुक्कोसि णं भो चमरा असुरिंदा असुरराया । समणस्स भगवओ महावीररस पभावणं, नाहिं तेदाणिं ममाओ भयमत्थि त्तिकटु, जामेव दिसिं पाउन्भूए तामेव दिसिं पडिगए । ३३ ॥ भंतेत्ति ! भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ नमसइत्ता, एवं वयासी देवेणं भंते ? महिट्ठीए महजुईए जाव महाणुभागे पुवामेव पोग्गलं खिवित्ता पभू तमेव अणुपरियटित्ताणं गेण्हित्तए अरे असुरेन्द्र असुरका राजा चमर ! श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी के प्रभाव से मेरी तर्फ से 30 तुझे भय नहीं है ऐसा करके जहां से आया था वहां पीछा गया ॥ ३३ ॥ यहां पर प्रस्तरादि [ पत्थर ] पुद्गल फेंके पीछे मनुष्य पीछा लेने को समर्थ नहीं होता है तो देव क्या समर्थ होवे. शक्रने उज फेंका और पीछा बनू ले लिया इमलिये उस का यहां पर प्रश्न करते हैं. श्री गौतम स्वामी महावीर भावार्थ . DO शब्दाथा ५०२ मे० प्राप्त इ० यहां अ० आज उ० उपशम को प्राप्त होकर वि० विचरता हूँ खा० क्षमाता हूं दे. देवानु- मिय खक्षमाकरो में मुझे ख०क्षणकरने अ• योग्य दे देवानुप्रिय ननहीं भुवारंवार ए ऐसा क० करने को ति०. ऐमा करके म० मुझे वं० बंदना कर न० नमस्कार कर उ० ईशान कोन में अ० अतिक्रम, वा. गंया पा० पांव से ति तीनवक्त भू० भूमि को दा० विदार च० चमर अ० अमुरेंद्र को ए. ऐसा ३० इह समोसढे, इह संपत्ते, इहेव अज उवसंपजित्ताणं विहरामि ॥ तं खामेमिणं देवाणुप्पिया ? खमं तुमं देवाणुप्पिया ? खंतुमरिहंतुणं देवाणुप्पिया ! नाइ भुजो २ एवं करणयाए तिकटु ममं वंदइ नमसइ, नमसइत्ता उत्तर पुरच्छिमं दिसीभागं अवकमइ अवकमइत्ता, वामेणं पादेणं तिक्खुत्तो भूमिं दालेइः चमर- अ- सत्र • अनुगदक पालनमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्य और भाप से चार अंगुल प्रमाण वजू दूर रहते मैंने पीछा खींच लीया. वजू पीछा खींचने के लिये में यहां पर आया हुआ हूं. यहां समोसर्या, व प्राप्त हुवा हूं. यहां पर इस उद्यान में आम पाप को उपशमाता हुवा रिचरता हूं. इस से अहो देवानुप्रिय ! मैं आप की क्षमा याचता हूँ,, आप मुझे क्षमा करें. आप समा करने योग्य हो. अब मैं वारंवार ऐसा नहीं करूंगा ऐसा कहकर वंदना नमस्कार करके ईशान कोन में गया. और वायें पांच से भूमि को तीन वक्त विदार कर चमरेन्द्र को ऐमा कहने लगा कि ५०३ सूत्र :-. 3 पंचमांग विवाह पण्णनि. (भगरती) मूत्र 8-47 कहा मु० मुक्त अ० है भो० भी च० चमर अ० असुरेंद्र स श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर के ५० प्रभाव से न० नहीं ते तुझे इ० अब म० मुझ से भ० भय अ० है. त्ति ऐसा करके ज. जिस दिशि से पा० आये ता. उप्तदिशा में प. पीछे गये ॥ ३३ ॥ भ. भगवान् गो. गौतम स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर को न नमस्कार कर व० बोले दे० देव भं० भगवन्न २० महाऋद्धि म. महायुति जा. यावत् म० महानुभाग पु. पहिले पो० पुद्गल खि० फेंक कर प० समर्थ तं० उसको अ० पीछे जाकर गे० असुरिंदं असुररायं एवं वयासी-मुक्कोसि णं भो चमरा असुरिंदा असुरराया । समणस्स भगवओ महावीरस्स पभावेणं, नाहिं तेदाणिं ममाओ भयमत्थि त्तिकटु, जामेव दिसिं पाउन्भए तामेव दिसिं पडिगए । ३३ ॥ भंतेत्ति ! भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ नमसइत्ता, एवं वयासी देवेणं भंते ? महिडीए महजुईए जाव महाणुभागे पुवामेव पोग्गलं खिवित्ता पभू तमेव अणुपरियटित्ताणं अणुपरियहित्ताणं गेण्हित्तए अरे असुरेन्द्र असुरका राजा चमर ! श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी के प्रभाव मे मेरी तर्फ से तुझे भय नहीं है ऐसा करके जहां से आया था वहां पीछा गया ॥ ३३ ॥ यहां पर प्रस्तरादि पत्थर ] पुद्गल फेंके पीछे मनुष्य पीछा लेने को समर्थ नहीं होता है तो देव क्या समर्थ होवे. शक्रने उजू फेंका और पीछा बज्र ले लिया इमलिये उस का यहां पर प्रश्न करते हैं. श्री गौतम स्वामी महावीर a>-8 तीसरा शतकका दूसरा उद्देशा 9882 भावाथ शब्दाथ ५०२ मं० माप्त ३० यहां अ० आज उ० उपशम को प्राप्त होकर वि० विचरता हूं खा० क्षमाता हूं दे० देवानु- मिय ख०क्षमाकरो में मुझे ख०क्षमाकरने अ० योग्य दे देवानुपिय नःनहीं भु वारंवार ए.ऐसा क० करने को ति०. ऐसा करके म० मुझे वं० वंदना कर नः नमस्कार कर उ० ईशान कोन में अ० अतिक्रम, वा. वाया पा० पांव से ति तीनवक्त भू० भूमि को दा० विदार च० चमर अ० अमुरेंद्र को ए. ऐसा क. • इह समोसढे, इह संपत्ते, इहेव अज्ज उवसंपजित्ताणं विहरामि . ! तं खामेमिणं देवाणुप्पिया ? खमं तुमं देवाणुप्पिया ? खंतुमरिहंतुणं देवाणुप्पिया ! नाइ भुजो २ एवं करणयाए तिकटु ममं वंदइ नमसइ, नमसइत्ता उत्तर - पुरच्छिमं दिसीभागं अवकमइ अवकमइत्ता, वामेणं पादेणं तिक्खुत्तो भूमिं दालेइः चमर अ- सुत्र २ भनुरादक-पालममचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8.3 * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ और आप मे चार अंगुल प्रमाण वजू दूर रहते मैंने पीछा रवींच लीया. वजू पीछा खींचने के लिये मैं यहां पर आया हुवा हूं. यहां समोसर्या, व प्राप्त हुवा हूं. यहां पर इस उद्यान में आम पाप को उपशमाता विचरता हूं. इस से अहो देवानुप्रिय ! मैं आप की क्षमा याचता हूं, आप मुझे क्षमा करें. आप क्षमा करने योग्य हो. अब मैं वारंवार ऐसा नहीं करूंगा ऐसा कहकर वंदना नमस्कार करके ईशान कोन में गया. और वायें पांच से भूमि को तीन वक्त विदार कर चमरेन्द्र को ऐसा कहने लगा कि भन्दा 298 पंचमाङ्ग विवाहं पण्णत्ति (भगतो) मूत्र 1989 संख्यात गुणा एक ऐसे ॥ ३५ ॥ स० शक्र दे० देवेंद्र का उ० ऊर्ब अ० अधौ.त्रि. तिछी ग० गति विषय क कितना क किससे अ० अल्प व०बहुत तुकतुल्य विविशेषाधिक गो गौतम स सर्व से थोडा खे० १.०० क्षेत्र स० शक्र दे० देवेन्द्र अ० अधो उ० जावे एक एक समय में ति. तिर्छा सं० संख्यातवा भागमें ग० देविंदेणं देवरण्णो चमरे असुरिंदे असुरराया नो संचाएइ साहत्थिं गेण्हित्तए ॥ ३५ ॥ सक्करसणं भंते ! देविंदस्स देवरण्णो उड्ढे अहेतिरियंच गइविसययस्स कयरे कयरे- हितो अप्पेवा बहुएवा तुल्लेवा विसेसाहिएवा ? गोयमा ! सव्वत्थोवे खेत्तं सके दे. विदे देवराया अहे उवयइ, एक्कणं समएणं तिरियं संखेजेभागे गच्छइ, उ8 संखे- चमर असुरेंद्र को नीचे आने में सब से थोडा काल लगता है उस से ऊर्ध्व जाने में संख्यात गुना काल लगता है. इस से अहो.गौतम ! शफ्रेन्द्र असुरेन्द्र को हाथ से पकडने को समर्थ नहीं है ॥ ३५ ॥ अब शकेंद्र, चमरेंद्र व वज्र इन की गति का अल्पाबहुत्व करते हैं. अहो भगवन् ! शक्र देवेंद्र का ऊर्च, अधो व तिर्यक् गति विषय में से कौन किस से अल्प, बहुत, तुल्य या विशेषाधिक है ?, अहो गौतम ! सब से थोडा क्षेत्र शक देवेंद्र नीचे उतरता है, इस से संख्यात भाग अधिक तिच्छी दिशा के क्षेत्रका आक्र- मण करता है उस से ऊर्भ दिशा का क्षेत्र संख्यात भाग अधिक जाता है. जैसे शक नामक देवेन्द्र एक समय में एक योजन नीचे आत्रे, उस के दो भाग करके उस में का एक भाग उक्त वोजन में मीलाने से 380 तीसरा शतकका दूसरा उद्देशा 88 भावार्थ oo urd शब्दाथी -- १ मनुवादक-पालनमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी.87 ५० वज़ दो दो से जं. जिस को व वन दो० दो से ते ०उसको च०चमर ति तीन से स०सर्व से थोडा स. शक्र दे० देवेन्द्र का उ: ऊध लोक के. केंड अ० अधोलोक ककंड सं संख्यात गुणा जा०जितना सि० क्षेत्र च चमर अ० अधो उ.. जावे ए: एक समय में तं० उस को सेशक दो दो से ३० वजू ति०तीन से सबसे थोडा च चमर अ० असुरेंद्र का अ० अधोलोक के. कंड उऊर्ध्व लोक का कंड सं० व वजे दोहि, तं चमरे तिहिं ॥ सव्वत्थावे सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो उड्डलोयकंडए अहेलोय कंडए संखेजगुणे जावइयंखेत्तं चमरे असुरिंदे असुरराया अहे ‘उवयइ एकेणं समएणं, तं सके दोहिं, तं वजे तिहिं, ॥ सन्वत्थोवें चमरस्स असुरिंदस्स असुररण्णो अहेलोयकंडए, उड्डलोयकंडए संखेज्जगुणे, एवं खलु गोयमा ! सकेणं दो मपय में जाता है और चमरेन्द्र तीन समय में जाता है. शक्र देवेन्द्रको उपर जाने में सब से थोडा काल लगता है उस से अघो लोक में जाने में संख्यात गुना. ( द्विगुना.) काल लगता है. * एक समय भमुरेंद्र जितना नीचे उतरता है उतना शकेंद्र दो समय में उतरता है और वज़ तीन समय में उतरता है। • यहां पर द्विगुना काल लेनेका मतलब यह है कि श–द्रको ऊंचा जानेकाव चमरेंद्र को नीचा आने पकाल में दोनों बराबर हैं. एक समय में चमरेंद्र जितना नीचे जाता है उतनाही क्षेत्र नीचे आने में शक्केंगे दो समय लगते हैं. * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी जालापसादजी. भावार्थ क ON दार्थ ५०९ सूत्र 8- पंचमांग हिवाय पण्णात्ति ( भगवती) मूत्र - अधो तितिा ग० गति विषय के, कितना कर किस से अ० अल्प व बहुत तु तुल्य विक विशेपा- धिक गो० गौतम स० सर्व से थोडा खे० क्षेत्र च० चमर अ० अमुरेंद्र उ० अर्ध उ. जावे ए० एक समय में ति तिर्छा मं० संख्यातवा माग में अ० अधो सं० संख्यातवा भाग में स० शक्र दे० देवेन्द्र रियंच गइविसयरस कयरे कयरेहिती अप्पेवा, बहुएवा तुल्वेवा, विसेसाहिएवा ? गोयमा ! सम्बत्थोवं खेत्तं चमरे असुरिंदे असुरराया उड्डे उप्पयइ एक्केणं समएणं, तिरियं संखेनेभागे गच्छइ, अहे संखेजे भागे गच्छइ । सके देविंदे देवराया उद्धं भावाथे भाग अना तीन गाउं, इस प्रकार एकेक गाउ के तीन भाग करने से एक योजन के बारह और दो योजना के चौवीस भाग होते हैं इस से यहां विचारते हैं तीन भाग कम तीन गाउ तब आठ भाग रहे . इतना एक समय में ऊंचे जावे, उस से तिछी उक्त आठ भाग से दुगुने करे इतना क्षेत्र अधिक जावे इतना निर्छ गति का विषय शीयू कहा है. उक्त दो विभाग कम छ गाऊ है उस में एक विभाग कम तीन गाऊ मीलाने से अर्थात् दो योजन पूर्ण होवे उतना अधिक अधो लोक में जावे. अहो भगवन् : वन का ऊर्थ, अधो व तिर्यक् गति में ज्यादा, कमी, बराबर किस प्रकार कहा है ! अहो गौतम ! जैसे शकेन्द्र का कहा वैसे ही वज़ का जानना. वज़ सब से थोडा अयो गति में जावे, क्यों कि अधो गति में जाने 43 में उन की गति की मंदता है. तिला विशेषाधिक जावे और ऊर्च गति में विशेषाधिक जावे. यहां तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा><re 89 YO • अनुवादक-वारपनारी मुाने श्री अमोलक ऋषिनी - जाय उ० अर्थ सं० संख्यातवा भाग में ग. जावे ॥ ३६॥ च० चमर अ० असुरेंद्र ठ० अर्व अ. सूत्र बेभागे गच्छइ ॥ ३६.॥ चमरस्सणं भंते ! असुरिंदस्स असुररण्णो उट्टे अहे ति- भावार्थ देव योजन होवे इसलिये तीन संरख्यात भाग तिच्छी लोक में जावे. तिच्छी लोक , में योजन का आधा 'विभाग रहा था वह आधा विभाग उक्त देव योजन में मीलाने से पूरे चार भाग संख्यात गुने होते हैं ॥ १६ ॥ अहो भगवन् ! चमर नामक असुरेन्द्र का कर्व अधो व तिर्यक् गति का विषय में कौन किससे अल्प, बहुत, तुल्य या विशेपाधिक है ? अहां गौतम ! एक समय में चमर अमुरेन्द्र सब से. थोडा. अर्ध्व लोक में जाता है इन से तिर्खा लोक में संख्यात गुणा अधिक क्षेत्र जाता है और उम से अधो लोक में मंल्यान भाग अधिक जाता है. एक समय अर्ध गति के विषय में उस के मंदपने की कल्पना मे तीन + यहां कोई प्रश्न कर कि मूत्र में संख्यात भाग मात्र ही ग्रहण किया है और यह नियमित भाग को बना सकते हो ? नितना क्षेत्र चमरंद्र नीची दिशाम एक समय में जाता है उतना क्षेत्र जाने को शक देवेन्द्र को दो समय लगता है वैसे ही शक्नेन्द्र का ऊर्च गमन काल और चमरेन्द्र का. अयो गमन, काल दुस्प है हम से निश्चय होता है कि दो समय में जितना क्षेत्र शक्नेन्द्र नीचे आदा है उतना क्षेत्र उपर एक ममप में जाता है. इत्त से अधो क्षेत्र दुगुना कहा.. और बीच का नीछी क्षेत्र देढ गुना कहा. वैसे ही पूर्षिकाकार भी कहते हैं कि एगे समएणं तिरिय दिवढू गच्छइ उद्धं दो जोवणाणि सक्कोत्ति ।। * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादगी * पंचमांग हिवार पण्णात्ति ( भगवती) मूत्र 28 अधो तिः तिळग० गति विपन्य कर कितना क. किस से अ० अल्प व० बहुत तु. तुल्य वि० विशेपा- दाथा धिक गो. गौतम स सर्व से थोडा खे० क्षेत्र च० चमर अ० असुरेंद्र उ० अर्ध उ. जावे ए० एक समय में ति० तिर्छा मं० संख्यातवा भाग में अ० अधो सं० संख्यातवा भाग में स० शक्र दे० देवेन्द्र रियंच गइविसयस्स कयरे कयरेहितो अप्पेवा, बहुएवा तुल्लेवा, विसेसाहिएवा ? सूत्र गोयमा ! सम्वत्थोवं खेत्तं चमरे असुरिंदे असुरराया उड्डे उप्पयइ एकेणं समएणं, तिरियं संखेनेभागे गच्छइ, अहे संखेजे भागे गच्छइ । सके देविंद देवराया उर्द्ध भावार्थ भाग ऊना तीन गाउं, इस प्रकार एकेक गाउ के तीन भाग करने से एक योजन के बारह और दो योजन के चौवीस भाग होते हैं इस से यहां विचारते हैं तीन भाग कम तीन गाउ तब आठ भाग रहे . इतना एक समय में ऊंचे जावे, उस से तिर्छा उक्त आठ भाग से दुगुने करे इतना क्षेत्र अधिक जावे इतना तिज़ गति का विषय शीय कहा है. उक्त दो विभाग कम छ गाऊ है उस में एक विभाग कम तीन गाऊ मीलाने से अर्थात् दो योजन पूर्ण होवे उतना अधिक अधो लोक में जावे. अहो भगवन् ! वज़ का.yo ऊर्थ, अधो व तिर्यक् गति में ज्यादा, कमी, वरावर किस प्रकार कहा है ? अहो गौतम ! जैसे शक्रेन्द्र का कहा वैसे ही बज़ का जानना. वज़ सब से थोडा अयो गति में जावे, क्यों कि अधों गति में जाने उन की गति की मंदता है. तिर्जा विशेषाधिक जाये और ऊर्य गति में विशेपाधिक जावे. यहां १ तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा 9838. ela .
सूत्र ५१० 'भावार्थ 4. अनुवादक वालमप्रचसिमुनि श्री अमोलक ऋपिनी उ० अर्ब उ० जावे ए० एक स० समय, में तं० उस को १० बज दो दो से च० चपर ति. तीन १० विशेष वि० विशेषाधिक का कहना ॥ ३७॥ स० शक दे देवेंद्र का उ० नीचे आनेका उ० उपर जाने का का काल का कितना क. किससे अ० अल्प गो. गौतम स० सर्व थोडा स० शक्र दे देवेंद्र उप्पयइ एकेणं समएणं ते वजे दोहि, तं चमरे तिहिं, वजं जहा सक्कस्स तहेव, नवरं विसेसाहियं कायव्वं ॥ ३७॥ सकस्सणं भंते ! देविंदरस देवरण्णो उवयण- कालस्सय उप्पयणकालस्सय कयरे कयरहितो अप्पेवा बहुएवा तुल्लेवा विसेसाहिएवा ? कल्पना से तीसरा भाग कम एक योजन अधोलोक में जावे. उक्त आठ भाग में से एक गाऊ का तीन भाग करे ऐसे दो भाग आधिक ति लोक में जाने से विशेपाधिक, ऊर्च गति में एक योजन पूर्ण जावे इस से विशेषाधिक. यहां कोई प्रश्न करे कि सामान्य से विशेषाधिकपना कहा है तब उस के नियमित भाग कैसे हो सकते हैं ? एक समय में जितना क्षेत्र चमरेन्द्र अधो गति में उल्लंघता है उतना क्षेत्र शक्रेन्द्र दो समय में उल्लंघता है और वजू तीन समय में उलंघता है. इस तरह शक्रेन्द्र की.अधोगति की अपेक्षा से बन के तीन भाग कम अधोगति हुई. शक्र का नीचे जानेका काल और वजू का ऊंचा जाने का काल पराबर है इम से जाना जाता है कि जितने समय में शक्रेन्द्र नीचे जाता है उतने समय में बज ऊंचे जाना है. ऊर्म व अधोगति के बीच में तिकी गति है. इन दोनों के बीच में तिगिति रही हुई है. इन दोनों के बीच में एक गाम के तीन भाग करे ऐसे दश भागवाला तिच्छीगति का प्रमाण कहा ॥३७॥ * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * 30 शव्याद बाई ७ GO सूत्र 988 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र-80 का उ० अर्ब उ० चडने का काल उ० उतरने का काल सं० संख्यात गुणा च० चमर का ज. जैसे स० शक्र का विशेष स० सर्व से थोडा उ० उतरने का काल उ० उपर जाने का सं० संख्यात गणां व० वन की पु० पृच्छा गो गौतम स• सर्व से थोडा उ० उपर जाने का उ० नीचे आने का वि० विशपाधिक ॥ ३८ ॥ ए. इस व० वज्र का व वजू के अधिपति का च चमर अ० अमुरेंद्र का उ० गोयमा ! सम्वत्थोवे सक्करस देविंदरस देवरण्णो उड़े उप्पयण काले, उवयणकाले संखजगुणे, ॥ चमरस्सवि जहा सक्कस्स णवरं सन्वत्थोवे उवयणकाले, उप्षयणकाले संखजगुगे ॥ वज्जस्स पुच्छा गोयमा ! सव्वत्थोवे उप्पयणकाले, उवयणकाल विसे- साहिए, ॥ ३८ ॥ एयस्सणं भंते ! वजस्स वजाहिवइस्स, चमरस्सय, असुरिंदस्स अब काल की अल्पावहुत्व करते हैं. अहो भगवन् ! शकेंद्र को नीचे उतरने स्वामी शक व चमर के काल में, उचे चडने के काल में कोनमा अल्प, बहुत, तुल्य या विशेषा- ऊर्य २४ | १२ धिक है ? अहो गोतम ! शकेंद्र को ऊंचे जाने में सब से थोडा काल लगता है, क्यों की शक की ऊर्भ गति शीघ्र है. इस से नीचे उतरने का काल A तिच्छी १८/१० | १६ | संख्यात गुना. चमरेंद्र को सब से थोडा नीचे उतरने का काल और उस से अधो | १२ ८ |२४| उपर जाने का काल संख्यात गुना. वज़ को सब से थोडा काल ऊंचे जाने में लगता है उस से नीचे आने में विशेषाधिक काल लगता है, ।। ३८ ।। अब 8.8 तीसरा शतकका दूसरा उद्देशा ११8- भावार्थ ८ शब्दार्थ सूत्र भावार्थ 4 अनुवादक-बालनचरिमुनि श्री अमोलक ऋपिजी + उ० ऊर्म उ० जाचे ए. एक स० समय में तं. उस को १० वज़ दो दो से च० चमर ति तीन से न० विशेष वि० विशेषाधिक का कहना ।। ३७ ॥ स० शन दे० देवेंद्र का उ० नीचे आनेका उ० उपर जाने का का काल का कितना क. किस अ० अल्प गो. गौतम स० सर्व थोडा स० शक्र दे. देवेंद्र उप्पयइ एकणं समएणं तं वजे दोहिं, तं चमरे तिहिं, वजं जहा सक्कस्स तहेव, नवरं विसेसाहियं कायन्वं ॥ ३७ ॥ सकस्सणं भंते ! देविंदरस देवरण्णो उवयण- कालस्सय उप्पयणकालस्सय कयरे कयरेहितो अप्पेवा बहुएवा तुल्लेवा विसेसाहिएवा ? कल्पना से तीसरा भाग कम एक योजन अधोलोक में जावे. उक्त आठ भाग में से एक गाऊ का तीन भाग करे ऐसे दो भाग आधेक ति लोक में जाने से विशेषाधिक, ऊर्च गति में एक योजन पूर्ण जावे इस से विशेषाधिक. यहां कोई प्रश्न करे कि सामान्य से विशेषाधिकपना कहा है तब उस के नियमित्त भाग कैसे हो सकते हैं ? एक समय में जितना क्षेत्र चमरेन्द्र अधो गति में उल्लंघता है उतना क्षेत्र शक्रेन्द्र दो ममय में उल्लंघता है और वजू तीन समय में उल्लंघता है. इस तरह शक्रेन्द्र. की. अधोगति की अपेक्षा से वज़ के तीन भाग कम अधोगति हुई. शक्र का नीचे जानेका काल और वजू का ऊंचा जाने का काल बराबर है इम से जाना जाता है कि जितने समय में शन्द्र नीचे जाता है उतने ममय में वजू. ऊंचे जाना है. ऊर्च व अधोगति के बीच में तिही गति है. इन दोनों के बीच में निमगति रही हुई है. इन दोनों के बीच में एक गाझ के तीन भाग करे ऐसे दश भागवाला तिच्छीगति का प्रमाण कहा ॥३७॥ * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ९ 4. पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती ):सूत्र 88805 P><S तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा > 480 हणाया.म० मनसंकल्प चिं. चिंताशोक सा० सागर में सं० प्रविष्ट क० करतल में प० रही हुवा मु0. मुख अ० आसध्यान उ० ध्याले भू० भामि में दि०दृष्टि झि० ध्यान करें ॥४०॥ तं० तव तं० उन च चमर अ० असुरेंद्र को सासामानिक देव ओ०हणाया म०मनसंकल्पं जायावत् झिध्यानकरते पादेखकर क. ५१३ करतल जा० यावत् व० वोले कि० क्या दे देवानुपिय उ० हणाया म मनसंकल्प जा. यावत् झि. सुहम्माए चमरंसि सीहासणंसि उवहयमणसंकप्पे चिंतासोयसागरसंपविढे करयल पल्हत्थमुहे अदृझाणोवगए, भूमिगयदिट्ठीए झियाइ ॥ ४० ॥ तएणं तं चमरं अ- सुरिंदं असुररायं सामाणियपरिसोबवण्णया देवा ओहयमणसंकप्पं जाव झियाइ- माणं पासइ पासइत्ता करयल जाव एवं वयासी किण्हं देवाणुप्पिया उवहयमणसं- कप्पा जाय झियायह ॥ ४१ ॥ तएणं से चमरे असुरिंदे असुरराया ते सामाणिय- असुरेंद्र वजू भयसे मुक्त हुवा, और शकेंद्र देवेंद्र से अपमान कराया हुवा. चमर चंचा राज्यधानी में सुधर्मा सभा में चमर नामक सिंहासन पर बैठा हुवा व. मन का अभिमान इणाने से शोक सागर में डुबा हुवा गंडस्थलपर हथेली रखकर व भूमि पर दृष्टि रखकर आर्तध्यान करने लगा ॥४०॥ तव चमर असुरेंद्र की परिपदा के सामानिक देवोंने चपरेन्द्रको ऐमा आर्तध्यान करता हुवा देखकर पूछा कि अहो देवानुप्रिय आप क्यों एसा आर्तध्यान करते हो ? ॥४१॥उस समय में चमर नामक असुरेंद्रने उन सामानिक परिपदा भावार्थ 60 ५१२ सूत्र • अनुगदक वालमाननारी मुनि श्री अमालक ऋपिनी शव्दार्थ नीचे आने का उ० उपर जाने का का कितना के किस से अ० अल्प ॥ ३९ ॥ त० तव च. चमर अ० अमुरेंद्र व वजू का भ० भय से वि० मुक्त स० शक्र दे. देवेंद्र से व० बहुत अ० अपमान से अ० अपमानित हुवा च० चमर चंचा रा० रज्यधानी की स० मुधर्मा सभा में च० चमर सी. सिंहासनप उ० असुररण्णो उवयणकालरसय, उप्पयणकालस्सय, कयरे कयरहितो अप्पेवा ४, ? गो- यमा ! सकारसय उप्पयणकाले चमरस्सय उवयणकाले एसणं दोण्हवि तुल्ले, सब- त्यो सकारसय उवयण काले, वजस्सय उप्पयणकाले एसणं दोण्हवि तुल्ले संखेजगुणे, चमररसयं उप्पयणकाले वजरसय उवयणकाले एसणं दोण्हवि तुल्ले. विसेसाहिए ॥ ३९ ॥ तएणं से चमरे असुरिंदे असुरराया वजभयविप्पमुक्के सक्केणं देविदेणं देवरपणो महया- अवमाणेणं अवमाणिए समाणे चमरचंचाए रायहाणीए सभाए नीनों की परस्सर अल्पावहुल करते हैं अहो भगवन् ! वजू, वज्राधिपति जो शक्र और चमर इन तीनों को उपर, नीचे जाने का काल में अल्प, बहुल तुल्य या विशेपाधिक यह फिरा प्रकार है ? अहो गौतम ! शक को उपर जाने का काल और चमर को नीचे जानेका काल परस्पर तुल्य व सब से थोडा, इस से शक्र का नीचे उतरने का और वजू का उपर जाने का काल परस्पर तुल्य और संख्यात गुना इस सें चमर का पर जाने का और वजू का नीचे आने का काल परस्पर तुल्प और विशेषाधिक ॥ ३९ ॥ अब चमर * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी बालाप्रसादनी * man सूत्र पर्वमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8282 ममं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं जाव नमंसित्ता एवं वयासी एवं खलु भंते ! मए तुभं नीसाए. सक्के देविदे देवराया सयमेव अच्चासाइए जाव तं भदणं भवतु देवाणुप्पियाणं जस्संमि पभावेण आकिटे जाव विहरामि. तं खामेमि णं देवाणुप्पिया जाव उत्तरपुरच्छिमं दिसीमागं अवकमइ अवकमइत्ता जाव वत्तीसइबदं नहविहिं उबदसेइ उवदंसेइत्ता जामेव दिसिं पाउब्भूए तामेव दिसि पडिगए एवं खलु गोयमा ! चमरेणं. अंसुरिंदेणं असुररण्णो सा दिव्या देविढी लद्धा पत्ता अभिसमण्णागया, ठिई सागरोबम, महाविदेहे बासे सिज्झिहिइ जावअंतं काहिइ ॥४२॥ किं पत्तियणं भंते ! शोक वृक्ष की नीचे पृथ्वी शीला पटपर मेरी पास आया और मुझे वंदना नमस्कार कर ऐसा कहा अहो भगवन् ! आपकी नेश्राय से मैं शक्र देवेन्द्र की आमातना करने को गया यावत् आपका कल्याण. होयो कि आप के प्रभाव से मैं बाधा पीडा रहित फोरता हूं. इस से अहो देवानुप्रिय ! आप की मैं क्षमा चाहता हूं यावत् ईशान कौन में गया और बत्तीस प्रकार के नाटक बताकर जिस दिशा से आया था उनी दिशा में गया. इस तरह अहो गौतम ! चमर असुरेन्द्र को ऐसी दीव्य देवद्धि प्राप्त हुई है. स्थिति एक सागरोपम की है और महा विदेह क्षेत्र में उत्पन्न होवेगा यावत् सव दु,खों का अंत करेगा ॥ ४२ ॥ भावार्थ तीसरा सतकका दृमरा उद्देशा 988- oyo शब्दार्थ सूत्र 4 अनुवादक- समाचारी मुनि श्री अमोलक पीजी ध्याते हो ॥ ४॥ पूर्ववत् ॥ ४२ ॥ किं० किस प० प्रयोजन से भ० भगवन् अ० असुर कुमार देव उ० पारिसोववण्णए देवे एवं वयासी एवं खलु देवाणुप्पिया मए समणं भगवं महावीर नीसाए सके देविंदे देवराया सयमेव अचासाइए. तएणं तेणं परिकुविएणं समाणेणं ममं वहाए वजे निसिढे, तं भद्दणं भवतु देवाणुप्पिया समणस्स भगवओ महावीरस्स जस्संमि पभावेण अकिटे अब्वाहिए अपरिताविए इह मागए, इह समोसढे, इह सं- पत्ते, इहेब अज उवसंपज्जित्ताणं विहरामि तं गच्छामोणं देवाणुप्पिया समणं भगवं महावीरं वंदामो नमसामो जाव पज्जुवासामो तिक्कटुचउसट्ठीए सामाणिय साहस्सीहिं जात्र सन्विड्डीए जावजेणेव असोगवर पायवे जेणेवमम अंतिएतेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता. देवों को ऐसा कहा अहो देवानुपिय ! मैंने श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी की नेश्राय से शक देवेद्र को भ्रष्ट करनेकी इच्छा की इससे उसने क्रोधित होकर मेरा वध करने को वजू छोडा. अहो देवानुप्रिय! उन महा वीर स्वामी का कल्याण होवो कि जिनके प्रभाव से मैं क्लिष्टता, बाधा, परितापना रहित यहाँपर आया हा हूं, यहांपर समोमर्या हूं यावत् यहां पर प्रशान्त बना हुवा विचरता हूं. इस से अपन श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामीकी पास जावे और उन को वंदना नमस्कार करे यावत् उनकी पर्युपासना इस से चौसठ हजार सामानिक यावत् सब ऋद्धि सहित मुंसुमार नगर के अशोक वन खंड में अ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी बालाप्रसादजी * भावार्थ पर्चमांग विवाह पण्णन्ति ( भगवती) सूत्र 8282 ममं तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं जाव नमंसित्ता एवं वयासी एवं खलु भंते ! मए तुम्भं नीसाए. सक्के देविंदे देवराया सयमेव अच्चासाइए जाव तं भद्दणं भवतु देवाणुप्पियाणं जस्संमि पभावेण आकडे जाव विहरामि. तं खामेमि णं देवाणुप्पिया जाव उत्तरपुरच्छिमं दिसीभागं अवकमइ अवकमइत्ता जाव वत्तीसइबद्धं नट्टविहिं। उबदसेइ उवदंसेइत्ता जामेव दितिं पाउब्भूए तामेव दिसिं पडिगए एवं खलु गोयमा ! चमरेणं अंसुरिंदेणं असुररण्णो सा दिव्वा देविट्ठी लढा पत्ता अभिसमण्णागया, ठिई सागरोवम, महाविदेहे वासे प्तिझिहिइ जाव अंतं काहिइ ॥४२॥ किं पत्तियणं भंते ! शोक वृक्ष की नीचे पृथ्वी शीला पटपर मेरी पाम आया और मुझे वंदना नमस्कार कर ऐसा कहा अहो भगवन् ! आपकी नेत्राय से मैं शक्र देवेन्द्र की आमातना करने को गया यावत् आपका कल्याण, होवो कि आप के प्रभाव से मैं बाधा पीडा रहित फीरता हूं. इस से अहो देवानुप्रेिय। आप की मैं क्षमा चाहता हूं यावत् ईशान कौन में गया और वचीस प्रकार के नाटक बताकर जिप्स दिशा से आया था उसी दिशा में गया. इस तरह अहो गौतम ! चमर असुरेन्द्रको ऐसी दीव्य देवद्धि प्राप्त हुई है. स्थिति एक सागरोपम की है. और महा विदेह क्षेत्र में उत्पन्न होवेगा यावत् सब दु,खों का अंत करेगा ॥ ४२ ॥ भावार्थ तीसरा सतकका दृमरा उद्देशा 9881 00 शब्दार्थ भद्रिक जा यावत् प० पर्युपासना करते ऐ० ऐसे २० बोले क० कितनी भं• भगान् कि० क्रिया १० प्ररूपी पं० मंडिनपुत्र पं० पांच क्रिया पं० प्ररूपी का कायिकी अ. अधिकरण की पा० प्रवेषिकी पा० पारितापनिकी पा० माणातिपात क्रिया ॥१॥ का० कायिकी भ० भगवन् कि० क्रिया क० कितने ५१.८ सूत्र • अनुवादक-चालयामनारी मुनि श्री अमोलक पिनी 85 पज्जुवासमाणे एवं वयासी कइणं भंते किरियाओ पण्णत्ताओ ? मंडियपुत्ता ! पंच किरियाओ ‘पण्णत्ताओ तंजहा काइया, अहिगरणिया, पाओसिया, पारियावाणिया, पाणाइवायकिरिया ॥ १॥ काइयाणं भंते ! किरिया कइविहा पण्णत्ता ? मंडियपुत्ता ! * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेनमहायनी बालाप्रसादनी. भावाथ था. वहां श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी पधारे, परिपदा वंदन करने को आई, धर्मोपदेश सुनकर पीछी गई. उमममय में प्रकृति भद्रिक यावविनीत श्री श्रमण भगवंत महावीरस्वामी का मंडितपुत्र नामक शिष्य पर्युपासना करते ऐसा बोले कि अहो भगवन् ! क्रियाओं कितनी कही हैं ! अहो मंडित पुत्र ! कर्म के हेतु रूप क्रिया के पनि भेद कहे हैं. १ शरीर से होवे सो कायिकी क्रिया २ खड्ग शस्त्रादि अधिकरण से होवे सो अ- विकरणिकी! ३ मत्मरभाव मे होवे सो प्रदूपिकी ४ अन्य को परितापना (दुःख) देने से होवे सो परि- नापनिकी और ५ प्राणों की घात करने से होवे सो प्राणातिपातिकी क्रिया ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! . का- पिकी क्रिया के किनने भेद कहे हैं! कायिकी क्रिया के दो भेद १. अनुपरत कायिकी क्रिया-प्रत्याख्यान करके * सूत्र - पंचमांग विवाह पणत्ति ( भगवनी) मूत्र 88 प्रकार की मं० मंडितपुत्र दु. दोपकार की अ० अनुपरत कायक्रिया -दु. दुपयुक्त कायक्रिया ॥१॥ अ. अधिकरणिकी भ• भगवन् कि क्रिया का कितने प्रकार की मं० मंडित पुत्र दुः दोपकार की सं. संयोजन अधिकरण किया नि० निवर्तन अधिकरण क्रिया ॥३॥ पा. पद्वेपिकी भं• भगवन् कि० Fक्रिया क० कितने प्रकार की मे० मंडितपुत्र दु० दोपकार की जी जीव प्रपिकी अ० अजीब प्रदपिकी दुविहा पण्णता, तंजहा अणुवस्यकाय किरियाय, दुप्पउत्तकाय किरियाय ॥ २ ॥ अहिगराणियाणं भंते ! किरिया कइविहा पण्णत्ता ? मंडियपुत्ता ! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा संजोयणाहिगरण किरियाय, निव्वत्तणाहिगरण किरियाय ॥ ३ ॥ पाओ- सियाणं भंते ! किरिया कइविहा प० ? मंडियपुत्ता ! दुविहा प० तंजहा जीव पाओ- सियाय अजीव पाओसियाय ॥ ४ ॥ पारियावणियाणं भंते ! किरिया कइ- भावार्थे| पाप से निवर्तना नहीं सो और दुपयुक्त सो दुष्ट प्रयोग के सद्भाव से ॥२॥ अहो भगवन् ! अ- धिकरणकी क्रिया के कितने भेद कहे हैं! अहो मंडित पुत्र ! हल घर वगैरह में जो कोई यंत्रादि न होवे उस का संयोग मीलाने से जो क्रिया लगे सो संगोयणाधिकरण क्रिया और खगादि नविन उत्पन्न करना सो निवर्तनाधिकरण क्रिया ॥ ३ ॥ अहो मगवन् ! प्रद्वेषिकी क्रिया के कितने भेद कहे हैं ? अहो मंडितपुत्रः! जीव पर मत्सर भावरखे सो जीव पदपिकी और अनीच पर मत्सर भार रखे सो अनीर 2080p> <2.9 तीसरा शतक का तीसरा उद्देशा- व शब्दार्थ भद्रिक ना यावत् प० पर्युपासना करते ऐ० ऐसे ३० वोले क. कितनी भ० भगान् कि० क्रिया ५० मम्मी मं० मेडिनपुत्र पं० पांच क्रिया पं० प्ररूपी का कायिकी अ. अधिकरण की पा० प्रवपिकी पा० पारितापनिकी पा० माणातिपात क्रिया ॥ १॥ का० कायिकी भं• भगवन कि० क्रिया क. कितने ५१८ सत्र भनुवादक-पालग्रामनारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी - पज्जुवासमाणे एवं क्यासी कइणं भंते किरियाओ पण्णत्ताओ ? मंडियपुत्ता ! पंच किरियाओ ‘पण्णत्ताओ तंजहा काइया, अहिगरणिया, पाओसिया, पारियावणिया, पाणाइवायकिरिया. ॥ १. ॥ काइयाणं भंते ! किरिया कइविहा पण्णत्ता ? मंडियपुत्ता ! * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ था. पा श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी पधारे, परिपदा वंदन करने को आई, धर्मोपदेश सुनकर पीछी गई. उस समय में प्रकृति भद्रिक यावविनीत श्री श्रमण भगवंतमहावीर स्वामी का मंडितपुत्र नामक शिष्य पर्युपासना करते ऐमा बोले कि अहो भगवन ! क्रियाओं कितनी कही हैं ? अहो मंडित पुत्र ! कर्म के हेतु रूप क्रिया के पांच भेद कहे हैं. १ शरीर से होवे सो कायिकी क्रिया २ खड्ग शस्त्रादि अधिकरण से. होवे सो अ- विकरणिको! ३ मत्सरभाव मे होवे सो प्रवपिको ४ अन्य को परितापना (दुःख) देने से होवे सो परि- नापनिकी और ५ प्राणों की बात करने से हो सो प्राणातिपातिकी क्रिया ॥ १॥ अहो:भगवन् का- विकी क्रिया के किनने भेद कहे हैं ? कायिकी क्रिया के दो भेद १ अनुपरत कायिकी क्रिया-प्रत्याख्यान करके ए ५२ <2083 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र - दार्थ कि क्रिया ॥ ७ ॥ अ० है भं० भगवन् स० श्रमण नि निथ को कि० क्रिया क० करे है. हा अ० है क. कैसे में भगवन् म० श्रमण नि० निग्रंथ किं० क्रिया क० करे मं. मंडितपुत्र म० प्रमाद मत्यायक जो० योग निमित्त ॥ ८ ॥ जी० जीव मं० भगवन् स० सदैव ए. कम्पे वे० विशप कम्पे च. चले फं० थोडापे ध० सवदिशा में चले खु क्षोभपामें उ० उदीरे तं० उस उस भाव को १० परिण पुचि किरिया पच्छा वेयणा णो पुचि वेयणा पच्छाकिरिया ॥७॥ अत्थिणं भंते समणाणं सत्र निग्गंथाणं किरिया कजइ ? हंता अत्थि. कहिणं भंते ! समणाणं निग्गंथाणं किरिया क- जइ ? मंडियपुत्ता पमायपच्चया, जोगनिमित्तंच. एवं खलु समणाणं निग्गंथाणं किरिया कजइ ॥८॥ जीवेणं भंते सयासमियं एयइ,वेयइ,बलइ,फंदइ, घट्टइ,खुम्भेइ, उदीरेइ, तंतं पीछे क्रिया होती है ? अहो मण्डितपुत्र ! पहिले कर्मबंध के कारण भूत क्रिया होती है फीर उन का भावार्थ उदय होने से वेदना होती है. इस से पहिले क्रिया और पीछे वेदना होती है। परंतु पहिले वेदना और पीछे क्रिया नहीं है ॥ ७॥ अहो भगवन् ! श्रमण निर्ग्रन्य क्या क्रिया करते हैं ? हां मण्डित पुत्र ! श्रमण निर्ग्रन्थ क्रिया करते हैं. अहो भावन् ! श्रमण निग्रन्थ कैसे क्रिया करते हैं ! अहो मण्डित पुत्र! प्रमाद प्रत्ययिक और योग निमित्त श्रमण निनय क्रिया करते हैं ॥ ८॥ अहो भगवन् ! सयोगी जीव सदैव प्रमाण युक्त क्या चले, विशेष चले, एक स्थान से अन्य स्थान जावे, स्पर्श करे, क्षुब्ध होवे RSS तीसरा शतकका तीसरा उद्देशा><99 6.9 शब्दार्थ- 03 ५२० ननुवादक-यालयमचारी नि श्री अमोलक पिनी ॥४॥ पा० पारितापनि की दु० दोप्रकार की स० अपने हस्त से प. दुसरे के हस्त से ॥५॥पा. प्रणातिपातिकी क्रिया दु दोषकार की स० स्वहस्त माणातिपात क्रिया प० परहस्त प्राणातिपात क्रिया ॥ ६॥ पु. पहिली भं० भगवन् कि क्रिया प० पीछे वे० वेदना पु० पहिली वे. वेदना प० पीछे कि क्रिया मं० मंडित पुत्र पु. पहिली क्रिया प० पीछे मंवेदना णो नहीं पु० पहिली वेदना प० पीछे बिहा प• ? मंडियपुत्ता ! दुविहा प• तंजहा सहत्थ पारियावणियाय, परहत्थ पारियायणियाय, ॥ ५॥ पाणाइवाय किरियाणं भंते ! पुच्छा मंडियपुत्ता ! दु. विहा प० तंजहा सहत्थ पाणाइवायकिरिया परहत्थ पाणाइवाय किरियाय ॥ ६ ॥ पुर्दिन भंते ! किरिया पच्छा चेयणा ; पुचि बेषणा पच्छा किरिया ? मंडियपुत्ता.! प्रदपिकी ॥ ४ ॥ अहो भगयन् ! परितापनिकी क्रिया के कितने भेद ? अहो मण्डित पुत्र'! परितापनि की हिण के दो भेद । सहस्त मे सतः को तथा अन्य को परितापना उत्पन्न करे और २ पर हस्त से सता को नया अन्य को परितापना उत्पन्न करे ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! प्राणातिपानिकी क्रिया के कितने भेद ! माणातिपातिकी क्रिया के दो भेद ? स्वहस्त से स्वतः की तथा अन्ग की घात करे मो और २ परं इस मे पता की तथा अन्य की बात करे ॥ ६॥ क्रिया मे वेदना होती है इस से वेदना का प्रश्न पूजने ई. अहो भगवन् ! पदिल क्रिया और पीछ वेदना होती है अथवा पहिले वेदना होती है और * प्रकाशक राजाबहादुर लाला 'मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावाथ ५२ 8.8 पंचांग विवाह पण्णति (भगवती) मूत्र शब्दार्थ कि क्रिया ॥ ७ ॥ अ० है भ० भगवन् स० श्रमण नि निIय को कि क्रिया क० करे है. हा अ० है क कैसे भगवन स० श्रमण नि० निग्रंथ किं० क्रिया क० करे मं० मंडितपुत्र म. प्रमाद मत्यायक जो योग निमित्त ॥ ८ ॥ जी जीव भं० भगवन् स. सदैव ए. कम्पे वे० विशप कम्पे च. चले फै० थोडापे घ० सदिशा में चले खु क्षोमपामें उ० उदीरे तं. उस उस भाव को प. परिण ॐ पुचि किरिया पच्छा वेयणा णो पुचि वेयणा पच्छाकिरिया ॥७॥ अत्थिणं भंते समणाणं सूत्र निग्गंथाणं किरिया कज्जइ ? हंता अत्थि. कहिणंभंते ! समणाणं निग्गंथाणं किरिया क- जइ ? मंडियपुत्ता पमाय पच्चया, जोगनिमित्तंच. एवं खलु समणाणं निग्गंथाणं किरिया कज्जइ ॥८॥जीवेणंभंते सयासमियं एयइ,वेयइ,चलइ,फंदइ, घटइ,खुम्भेइ, उदीरेइ, तंतं पीछे क्रिया होती है ? अहो मण्डितपुत्र ! पहिले कर्मबंध के कारण भूत क्रिया होती है फीर उन का भावार्थ उदय होने से वेदना होती है. इस से पहिले क्रिया और पीछे वेदना होती है; परंतु पहिले वेदना और पीछे क्रिया नहीं है ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! श्रमण निर्ग्रन्य क्या क्रिया करते हैं ? हां मण्डित पुत्र श्रमण निन्य क्रिया करते हैं. अहो भगवन् ! श्रमण निर्ग्रन्थ कैसे क्रिया करते हैं ? अहो मण्डित पुत्र! प्रमाद प्रत्यायक और योग निमित्त श्रमण निग्रंय क्रिया करते हैं ॥ ८॥ अहो भगवन् ! सयोगी जीव सदैव प्रमाण युक्त क्या चलें, विशेष चले, एक स्थान से अन्य स्थान जावे, स्पर्श करे, क्षुब्ध होवे < तीसरा शतकका तीसरा उद्देशा%88908 CAS 60 anna-. शब्दाथा ५२२ 2 अनुवादक बालबाह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी. में हैं. हा पं० मंडितपुत्र जी० जीव स० सदैव ए. कंपे जा. यावत् प० परिणमे ॥ ९ ॥ जा० जितना भं० भगवन् जी जीव ससदैव जा यावत् प०परिणमता ता उतना त उस जीव की अं० अंत में अं० अक्रिया भ० होवे णो नहीं इ० यह अर्थ स. समर्थ से० वह के० कैसे भं० भगवन् मै० मंडितपुत्र मा० भितना से वह जी० जीव स० सदैव जा. यावत् प० परिणमे ता० उतना से वह जी० जीव आ. आरंभ करे सा० सारंभ कर स. समारंभ करे आ० आरंभ में व० वर्ते सा. सारंभ में व. वर्ते भावं परिणमइ ? हंता मंडियपुत्ता ! जीवेणं सयासमियं एयइ जाव तंतं भावं परि- णमइ ॥ ९ ॥ जावंचणं भंते ! से जीवे सयासमियं जाव परिणमइ तावंचणं तस्स जीवस्स अंते अंतकिरिया भवइ ? णोइणटे समढे ॥ से केण?णं भंते ! एवं बुच्चइ, • जावंचणं से जोवे सयासमियं जाव अंते अंतकिरिया न भवइ ? मंडियपुत्ता ! जावं- चणं से जीवे सयासमियं जाव परिणमइ तावंचणं से जीवे आरंभइ, सारंभइ, समा- उदीरे वगैरह पूर्वोक्त भावों में परिणये? हां मण्डित पुत्र ! सुयोगी जीव सदैव प्रमाण युक्त चलता है यायन् पूर्वोक्त भावों में परिणमता है ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! जहां लग सयोगी जीव- सदैव , प्रमाण युक्त चलना है यावत् पूर्वोक्त भावों में परिणमता है वहां लग क्या उन को अंत क्रिया होती है ! यह अर्थ योग्य नहीं हैं. किस कारन से यह अर्थ योग्य नहीं है ? अहो. पण्डित पुत्र.! जहां लग- सयोगी जीव प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालामसादजी भायाथ ५२ - पंचमांग विवाह पण्गत्ति ( भगवती) मूत्र 838 शब्दार्थ स० समारंभ में व. वर्ते आ० आरंभ करता सा. सारंभ करता स० समारंभ करता था. आरंभ सा० सारंभ में स० समारंभ में व० वर्तता य० बहुत पा० प्राण भूः भूत जी जीव म. सत्व दुःख देने से सो० शोचकराने से जू० जूरणा कराने से ति० आक्रंद कराने से पि० मारने से प० परिता- पना उपजाने से व० वर्ते से० वह ते. इसलिये मं० मंडित पुत्र ॥. १० ॥ से० वह ज० जैसे के० कोई रंभइ ; आरंभे वइ, सारंभेवटइ, समारंभेवदृइ; आरंभमाणे, सारंभमाणे, समारंभमाणे, सूत्र आरंभेवट्टमाणे, सारंभेवमाणे, सामारंभेवमाणे, बहूणं पाणाणं, भूयाणं, जीवाणं, सत्ताणं दुक्खावणताए, सोयावणताए, जूरावणताए, तिप्पावणताए, पिटावणताए, परियावणताए बइ से तेणट्टेणं मंडियपुत्ता ! एवं वुच्चइ, जावंचणं से जीये सयासमियं एयइ जाव परिणमइ, तावंचणं तस्स जीवस्स अंते अंतकिरिया न भवइ ॥ १० ॥ भावार्थ सदैव चलता है यावत् उन पूर्वोक्त भावों में परिणमता है वहां लग वह जीवों का आरंभ, सारंभ व समारंभ करता है, आरंभ, सारंभ व समारंभ में वर्तता है. इस तरह आरंभ, सारंभ व समारंभ करता हुया यावत् उन में प्रवर्तता हुवा पाण, भूत, जीव व सत्वोंको दुःख, शोक, झुरणा, वेदना, पिटना व परितापना करने में प्रवर्तता है. इस से अहो मण्डित पुत्र ! ऐसा कहा गया है कि सयोगी जीव जहाँ लग चलता है। यावत् उन पूर्वोक्त भावों में परिणमता है वहांलग उन को अंत क्रिया नहीं होती है ॥ १० ॥ अहो PR तीसग शतक का तीसरा उद्देशाse MA शब्दार्थ) ---- सूत्र ! 13 अनुवादक-मालवायचारी मुनि श्री अमोलक ऋापिनी पुरुष मु० सुका तु० तृण कापूला जा० अग्नि में ५० डाले । वह मं० मंडितपुत्र मु०० शुष्क त सृणका गुला आ० अग्नि में प० डालते खि• शीघ्र म• जल जावे ई० हां म जल जावे,ज० जैसे के० कोई पुरुष त० तप्त अ० लोहके गोलपे उ० पानी का बिंदु १० डाले से वह मं० मंडितपुत्र उ० पानी का विन्दु त. जीवेणं भंते! सयासमियं णो एयइ जाय णो तंतं भावं परिणमइ ? हंता मंडियपुत्ता! जीवेणं सयासमियं जाव णो परिणमइ जावंचणं भंते ! से जीवे नो एयइ जाव नो ततं भावं परिणमइ, तावचणं तस्स जीवरस अंते अंतकिरिया भवइ ? हंता जाव भवइ । से केणटेणं जाव भवइ ? मंडियपुत्ता ! जावंचणं च से जीवे सयासमियं णोएयइ जाव परिणमइ, तावंचणं से जीवे णो आरंभइ, णोसारंभइ, णोसमारंभइ, णो आरंभेवटइ, णो सारंभेवइ णो :समारंभेवइ, अणारंभमाणे, अप्तारंभमाणे, भगवन् : अयोगी जीव सदैव प्रमाण युक्त क्या नहीं चलते हैं यावत् उक्त भावों में नहीं परिणमते हैं ? मण्डित पुत्र! वे अयोगी जीन नहीं चलते हैं यावत् पूर्वोक्त भावों में नहीं परिणमते हैं. अहो भगवन् ! जहांलग चे जीवों नहीं चलते हैं यावत् नहीं परिणमते हैं वहांलंग उन को- क्या अंत क्रिया होती है ? हां मण्डित पुत्र ! उन को अंत क्रिया होती है. किस तरह उन को अंत क्रिया होती है अहो मण्डित पुत्र ! जहांलग वे जीव चलते नहीं हैं यावत् नहीं परिणभते हैं यहांलग चे आरंभ, सारंभ प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायभी ज्वालाप्रसादनी * भावार्थ ५२५ सूत्र * पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 98 ददार्थ तप्त अल्लोहे के कडे पे प०डाला हुवा खि० शीघ्र वि० नाशपावे ६० हां विविनाश पावे ज• जैसे हा द्रह पु० पूर्ण पु० पूर्ण प्रमाण वो० उछलता वो० उल्लास पामता स० भरा हुवा चि० होवे अ. अब के. कोई पुरुप त° उम ह° द्रह में ए० एक बडा ना० नाव स० शतछिद्रवाली ओ० रखे मं० मंडितपुत्र सा० असमारंभमाणे; आरंभ अवमाणे, सारंभे अवमाणे, समारंभ अवमाणे बहणं पाणा- णं भूयाणं जीवाणं सत्ताणं अदुक्खावणत्ताए, जाव अपरियावणताए वइ, से जहा नामए केइपुरिसे सुकतणहत्थयं जायतेयंसि पक्खिवेजा, सेणूणं मंडियपुत्ता! से सुक्के तणहत्थए जायतेयंसि पक्खित्ते समाणे खिप्पामेव मसमसा विजइ ? हंता मसमसा विजद ॥ सेजहा नामए केइपुरिसे तत्तंसि अयकवल्लसि उदयविंदु पक्खिवेज्जा ? सेनृणं मंडियपुत्ता ! से उदयविन्दु तत्तंसि अयकवलंसि पक्खित्ते समाणे खिप्पामेव व समारंभ नहीं करते हैं यावत् उन में नहीं परिणमते हैं. इस तरह आरंभ, सारंभ व समारंभ नहीं करने वाला यावर उस में नहीं प्रवर्तनेवाला प्राण, भूत, जीव व सत्वों को दुःख यावत् परितापना नहीं करता है. परंतु योग निरुधन रूप शुक्ल ध्यान से सकल कर्म ध्वंस रूप अंत क्रिया करता है. उस के उपर तीन दृष्टांत कहते हैं. १. जैसे मूका हुवा घास अग्नि में डालने से क्या भस्म होता है ! हां भगवन् ! वह भस्म होता अहो मण्डित पुत्र ! तप्त लोहे पर पानी का विन्दु पडने से क्या वह शीघ्र नष्ट होता है ? हां भग- तीसरा शतक का तीसरा. उद्देशा g><y- भावार्थ शब्दार्थ ५२ . 'सुत्र - अनुरादक-गालब्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋापिनी 63 पुरुष मु० मुका तु० तृण कापूला जा. अग्नि में प० डाले में वह मं० मंडितपुत्र मु०० शुष्क त सृणका गुला आ० अग्नि में प० डालते खि. शीघ म जल जावे ई० हां म जल जाव,ज. जैसे के० कोई पुरुष न० तप्त अ० लोहेके गोलपे उ० पानी का विंदु १० डाले से वह मं० मंडितपुत्र उ० पानी का विन्दु त० जीवेणं भंते! सयासमियं णो एयइ जाय णो तंतं भावं परिणमइ ? हंता मंडियपुत्ता! जीवेणं सयासमियं जाब णो परिणमइ जावंचणं भंते : से जीवे नो एयइ जाव नो ततं भावं परिणमइ, तावचणं तस्स जीवस्स अंते अंतकिरिया भवइ ? हंता जाव भवइ ॥ से केणटेणं जाव भवइ ? मंडियपुत्ता ! जावंचणं च से जीवे सयासमियं णोएयइ जाव परिणमइ, ताचंचणं से जीवे णो आरंभइ, णोसारंभइ, णोसमारंभइ, णो आरंभेवटइ, णो सारंभेवदृइ णो समारंभेवटइ, अणारंभमाणे, अप्तारंभमाणे, भगवन् : अयोगी जीव सदैव प्रमाण युक्त क्या नहीं चलते हैं यावत् उक्त भावों में नहीं परिणमते हैं का पण्डित पुत्र ! वे अयोगी जीन नहीं चलते हैं यावत् पूर्वोक्त भावों में नहीं परिणमते हैं. अहो नगवन् ! जहांलग चे जीवों नहीं चलते हैं यावत् नहीं परिणमते हैं वहांलग उन को क्या अंत क्रिया होती है ? हां मण्डित पुत्र ! उन को अंत क्रिया होती है. किस तरह उन को अंत क्रिया होती है अदो मण्डित पुत्र ! जहांलग वे जीव चलते नहीं हैं यावत् नहीं परिणमते हैं वहांलग वे आरंभ, सारंभ प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायभी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ Qyo 83 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 3 शब्दार्थ पानी में उ. नीकालते खि० शीघ्र उ० उपरं उ० आवे है. हां उ. आवे ए०.ऐसे मं० मंडितपुत्र अ. अत्मा से संत अ० अनगार इ. ईर्या समिति वाले जा. यावत् वं. गुप्तब्रह्मचारी आ०उपयोग पूर्वक ग० जाते चिः खडा रहते नि० वैठते तु० सोते व० वस्त्र प० पात्र कं० कंवल पा. रजोहरण गे० ग्रहण करते नि० रखते जा. यावत् च. चा पक्ष नि० निपात वे बेमात्रा सु० मूक्ष्म इ. ईर्या पथिक क्रिया क० करे सा. यह प० प्रथम समय में व० बंधी पु० स्पर्शी वि० दुसरा समय में वे० वेदी तक सूत्र अनत्ता संवुडस्स अणगारस्स इरियासमियस्स जाव बंभगुत्तयारिस्स आउत्तं गच्छ- माणस्स, चिट्ठमाणस्स. निसियमाणस्स, तुयमाणस्स, आउत्तं वत्थ पडिग्गह कंबल पायपुंछणं गेण्हमाणस निक्खेवमाणस्स जाव चक्खुपम्ह निवायमवि बैंमाया सुहुमा इरियावहिया किरिया कजइ, सा पढमसमय बद्धा पुट्ठा, वितिय समय वेड्या, तइय समय निजरिया, सा बड़ा पुट्ठा उदीरिया वेदिया निजिण्णा सेयकाले अकम्म- साफ करनो क्या वह नावा शीघ्र पानीपर आती है ! हां भगवन्! खाली नावा पानीपर आती है. वैसेही अहो १० मंडित पुत्र ! आत्मा को संवरने वाले, ईर्यासमिति यावत् गुप्त ब्रह्मचर्य पालने वाले, यत्ता पूर्वक चलने वाले, खडे रहने वाले, बैठने वाले, सोने वाले, वस्त्र, पाच, कम्बल, रजोहरण ग्रहण करने वालेद, रखने वाले अनगार को उन्मेप निमेष मात्र ईर्या पथिक क्रिया लगती है. उसक्रिया का प्रथम समयमें बंध होता - तीसरा शतक का तीसरा उद्देशा भावाथ oya 09 सूत्र अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 82 वह नाव उ० उम आ० भाश्रव द्वार से आ० भरी हुई पु० पूर्ण वो उछलती वो• उल्लास पामती स० भी दुइ चि० रहे हैं. हां चि० रहे के० कोई पुरुप ता• उस नाव को स० सब वाजु आ० आश्रय द्वार पि० दांक कर ना० नाव का उ० वरनन से उ० पानी उ० नीकाले सा० वह ना नाव न० उस उ० विदंसमागच्छइ ?हता विद्धसमागच्छइ ।। से जहा नामए हरएसिया पुण्णे पुण्णप्पमाणे बोलबमाणे वोसट्टमाणे समभरघडताए चिट्ठइ, अहेणं केइपुरिसे तसि हरयंसि एगंमहं णाधं सयायंसयीच्छदं उग्गहेजा ? सेनणं मंडियपुत्ता ! सा नावा तिहिं आसवहारेहि आपरमाणी आपूरमाणी पुण्णा पुण्णप्पमाणा वोलटमाणा बोसट्टमाणा समभरघडत्ताए चिट्ठइ ? हंता चिट्ठइ ॥ अहेणं केइपुरिसे तीसे नावाए सव्वओ समंता आसवदाराई पिहेइ २ चा नावा उम्सिचणएणं उदयं उस्सिचेजा ? सेणूणं मंडियपुत्ता ! सा नावा तंसि उदयंसि उस्सित्तंसि समाणंसि खिप्पामेव उ8 उदाइ ? हेता उदाइ, एवामेव मंडिय पुत्ता! यन् ! वह बिन्दु शीघ्र नष्ट होता है. और जैसे बहुत परिपूर्ण घट समान एक द्रह है.. पानी याहिर नीकल रहा है ऐसा वह भराहुवा है. अब कोई पुरुष छिन्वाली नावा इस मे डाले तो छिद्रसे नावा में पानी आने २ क्या नह नावा पानी के तल में जाकर बैठती है ? हां वह नाबा छिद्रों से, पानी भर जाने । नन्देपर जाकर बैठती है. यदि कोई पुरुष उस के छिद्रों बंधकर के उस में रहा हुवा पानी नीकालकर * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * CAS 389 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 28 दार्थ पानी में उ. नीकालते खि० शीघ्र उ० उपरं उ० आवें है. हां उ० आये ए.. ऐसे मं० मंडितपुत्र अ. अत्मा से संवृत अ० अनगार इ. ईर्या समिति वाले जा. यावत् वं. गुप्तब्रह्मचारी आ०उपयोग पूर्वक ग० जाते चिः खडा रहते नि० वैठते तु० सोते व० वस्त्र प० पात्र कं० कंवल पा० रजोहरण गे० ग्रहण करते नि० रखते जा० यावत् च. चक्ष पक्ष नि० निपात वेः वेमात्रा सु० मूक्ष्म इ. ईर्या पथिक क्रिया क० करे सा. यह प० प्रथम समय में व० बंधी पु० स्पर्शी वि० दुसरा समय में वे० वेदी त. अवत्ता संबुडरस अणगाररस इरियासमियस्स जाव बंभगुत्तयारिस्स आउत्तं गच्छ- सूत्र माणस्स, चिट्ठमाणस्स. निसियमाणस्स, तुयमाणस्स, आउत्तं वत्थ पडिग्गह कंबल पायपुंछणं गेण्हमाणस्त निक्खेवमाणस्स जाव चक्खुपम्ह निवायमवि बेमाया सुहुमा इरियावहिया किरिया कजइ, सा पढमसमय बढ़ा पुट्ठा, वितिय समय वेइया, तइय समय निजरिया, सा बड़ा पुट्ठा उदीरिया वेदिया निजिण्णा सेयकाले अकम्म- भावाथ साफ करेनो क्या वह नावा शीघ्र पानीपर आती है ? हां भगवन्! खाली नावा पानीपर आती है. वैसेही अहो? मंडित पुन ! आत्मा को संवरने वाले, ईर्यासमिति यावत् गुप्त ब्रह्मचर्य पालने वाले, यत्ता पूर्वक चलने चाले, खडे रहने वाले, बैठने वाले, सोने वाले, वस्त्र, पात्र, कम्बल, रजोहरण ग्रहण करने वाले, रखने. वाले अनगार को उन्मेप निमेष मात्र ईर्या पथिक क्रिया लगती है. उसक्रिया का प्रथम समयमें बंध होता 23032 तीसरा शतक का तीसरा उद्देशा8882 ५२८ सूत्र • अनुसादक-पालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक पिनी S7 शम्दार्थ तीसरा समय नि० निर्जरी साल वह व० बंधी पु० स्पर्शी उउदीरी वे बेदी नि. निर्जरी से० आंगा- मिक काल में अ. अकर्म भ० होने से यह ते. इसलिये ॥ ११ ॥ प. प्रमत्त संयति भं० भगवन् ५० प्रपत्र भयम में ववर्तता स० सर्व प०प्रमत्त अ० काल से के० कितना हो० होवे मं० मंडितपुत्र ए० एक जीव प० आश्री ज० जघन्य ए. एक समय उ० उत्कृष्ट दे०. देशउणा पु• पूर्वक्रोड णा० विविध जीव प० आश्री स० सर्व काल ॥ १२ ॥ अ० अप्रमत्त संयनि भ भगवन् अ० अप्रमत्त स० संयम में ३० वावि भवइ । से तेण?णं. मंडियपुत्ता ! एवं बुच्चइ जावं चणं से जीवे सयासमिय नो एयइ जाव अते अंतकिरिया ॥११॥ पमत्तं संजयरसणं भंते ! पमत्तसंजमे वट्टमा- णरस सव्वाधियणं पमत्तद्वाकालओ केवचिरं होइ ? मेडिया ! एगं जीवं पडुच्च जह- ण्णेणं एक समयं, उक्कोसेणं देसूणा पुवकोडी ॥ जाणाजीवे पडुच्च सव्वदा ॥ १२॥ दमरे ममप में वेदना होती है और तीसरे ममय में मीर्जरा होती है. इस तरह बंध, स्पर्श, उदीरणा, वेदना, व निर्मरा होने मे अनागत काल में कर्म रहिन जीव होता है. इम से अहो. मंडितः पुत्र.? अयोगी जीव नहीं नरता है यावत् उन को अंतक्रिया होती है ऐसा कहा है ॥ ११॥ अहो भगवन् ! प्रमत्त. मयत गुण स्थान में रहने वाला प्रमत्त संयतीकी सब काल आश्रित कितनी स्थिति है. ? अहो मंडित पुत्र ? एक जीव आश्रित जयन्य एक समय उत्कृष्ट देशऊणी क्रोडपूर्व और बहुत जीव आश्री मदा काल रहते हैं. क्यों कि इस का विरह नहीं होता है ने महा विदेह- क्षेत्र में सदैव रहते ॥ १२॥ अहो भगवन् ! अप्रमत्त संयम * मंकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालामसादजी * - ५२९ सूत्र 8 पंचमांग हिवाव पगाचि ( भगवती.) मूत्र 982- दार्थ वर्तता अ० अंगमत्त काल से के० कितना हो होवे मं० मंडित ए० एक जीव १० आश्री ज जघन्य अंई अंतर्मुहूर्त उ० उत्कृष्टं पु० पूर्वकोडं दें० देशऊणां णा विविध जीव १० आश्रीं स० सर्व काल ॥ १३ ॥ भ० भगवान् मं० मंडितपुत्र अ० अनगार सं०श्रमण भ०भगवान् म० महावीर को न० नमस्कार कर सं० संयम त० तप से अ० आत्मा को भा० भानते हुवे वि० विचरते हैं ॥ १४ ॥ भै० भगवान् गो. गौतम स० अप्पमत्त संजयस्सणं भंते ! अप्पमत्त संजमे वहमाणस्स सव्वावियणं अप्पमत्तहाकालओ केवचिरं होइ ? मंडिया ! एग जीवं पडुच जहणेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं पुन्चकोडी- देसूणा जाणाजीवे पडुच्च सव्वद्धं ॥ १३ ॥ सेवं भंते, भंतेत्ति भयवं मंडियपुत्ते अणगारे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ, नमसइत्ता संजमेणं तवसा अप्पाणं. भावेमाणे विहरइ ॥ १४ ॥ भंतेत्ति भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदइ नम- भावार्थ में रहनेवाला अप्रमत्त संयति सब काल आश्री कितने काल तक रहता है ? अहो मण्डितपुत्र ! एक जीव आश्री जघन्य अंतर्मुहूर्त उत्कृष्ट देश ऊना पूर्व क्रोड; क्यों कि अप्रमत्त अवस्था में रहनेवाला जीव अंतर्मुहूर्त से पहिले काल नहीं करता है और आठ वर्ष कम कोड पूर्व सो केवल ज्ञान आश्री जानना. बहुत जीव आश्री निरंतर सब काल जानना. क्योंकि अप्रमत्त संयति सदैव पाते हैं ॥ १३ ॥ अहो भगवन् ! आप के वचन तथ्य हैं ऐमा कहकर श्री श्रमण भगवन्त महावीर को वंदना नमस्कार कर मंण्डित RAI तीसरा शतक का तीसरा संदेशा oyo ५२८ सूत्र - अनुरादक-पालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक जापनी 67 शब्दार्थ तीसरा ममय नि० निर्जरी माः वह व० बंधी पु० स्पर्शी उ. उदीरी वे. वेदी निः निरौ.से० आंगा-3 मिक काल में अ. अकर्म भ० होवे से वह ते. इसलिये ॥ ११ ॥५० प्रमत्त संयति भं० भगवन् ५० मपन संयम में ववर्तता स० सर्व प०प्रमत्त अ० काल से के० कितना हो० होवे मं० मंडितपुत्र ए एक जीव ५० आश्री ज० जघन्य ए. एक समय उ० उत्कृष्ट दे देशउणा पु• पूर्वक्रोड णा० विविध जीव ५० आश्री स० सर्व काल ॥ १२॥ अं अपपत्त मंयान भं• भगवन् अ० अप्रमत्त स० संयम में व. वावि भवइ । से तेणटेणं मंडियपुत्ता ! एवं बुच्चइ जावं चणं से जीवे सयासमियं नो एयइ जाव अंते अंतकिरिया ॥११॥ पमत्त संजयस्सणं भंते ! पमत्तसंजमे वहमा- णरस सव्वावियणं पमत्तढाकालओ केवचिरं होइ ? मंडियां ! एंगं जीवं पडुच्च जह- ण्णणं एक समयं, उक्कोसेणं देसूणा पुन्बक्कोडी ॥ जाणाजीवे पडुच्च सव्वदा ॥ १२॥ दूसरे समय में वेदना होती है और तीसरे ममय में मीर्जरा होती है. इस तरह धंध, स्पर्श, उदारणा, वेदना, व निर्भरा होने मे अनागत काल में कर्म रहिन जीव होता है. इमले अहो. मंडितः पुत्र ? अयोगी जीव नहीं चलना है यावन् उन को अंतक्रिया होती है ऐसा कहा है ॥१॥ अहो भगवन् ! प्रमत्त. मयत गुण स्मन में रहने वाला प्रमत्त संयतीकी सब काल आश्रित कितनी स्थिति है. ? अहो. मंडित पुत्र ? एक जीव आश्रित जयन्य एक समय उत्कृष्ट देशऊणी क्रोडपूर्व और बहुत जीव आश्री मदा काल रहते हैं. क्यों कि इम का विरह नहीं होता है वे महा विदेह क्षेत्र में सदैव रहते . ॥ १.२-11- अहो भगवन् ! अप्रमत्त संयम * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रमादनी * ०७ सूत्र पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र-3287 ब्दार्थ लोकस्थिति लो० लोकानुभाव ॥ ३ ॥ ३ ॥ अ० अनगार भ० भगवन् भा० भावितात्मा दे० देव को वे० वैफ्रेय स• समुद्घात से स० नीकालता है । जा. यानरूप से जा• जाते को जाजाने पा० देखे गो गौतम अ०कितनेक दे० देवको पा० देखे नो० नहीं जा० यान को पा० देखे अ० कितनेक नो० नहीं दे० देवको नो० नहीं जा यान को पा० देखे रिया सम्मत्ता ॥ तइयसयस्स तईओ उद्देसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥ ३ ॥ * ॥ अणगारेणं भंते भावियप्पा देवं वेउब्बिय समुग्घाएणं समोहय जाणरूवेणं जाय- माणं जाणइ पासइ ? गोयमा ! अत्थेगइए देवं पासइ नो जाणं पासइ, अत्थेगइएणं जाणं पासइ नो देवं पासइ, अत्थेगइए देवपि जाणंपि पासइ, अत्थे. भावार्थ जानना. अहो भगवन् ! आप जो कहते हैं वह सत्य है ऐसा कहकर गौतम स्वामी विचरने लगे. यह क्रिया का अधिकार संपूर्ण हुवा यह तीसरे शतकका तीसरा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥ ३ ॥ तीसरे उद्देशे में क्रिया का अधिकार कहा. वह ज्ञानवंत को प्रत्यक्ष होती है सो बताते हैं. श्री गौतम स्वामी प्रश्न करते हैं कि अहो भगवन्! वैक्रेय समुद्घात से उत्तर वैकेय करके विमानादि रूप बना कर जाते हुवे देव को भावितात्मा अनगार क्या ज्ञान से जानते हैं और दर्शन से देखते हैं ? यहां पर अधिज्ञान की विचित्रता से चौभंगी जानना. १ कितनेक देव को देखते हैं परंतु विमान को नहीं देखते हैं. २ कितनेक विमान को देखते हैं परंतु देव को नहीं देखते हैं ३ कितनेक देव व विमान दोनों तीसरा शतकका चौथा उद्देशा gf शब्दार्थ लो मूत्र श्रमण भगवंत म. महावीर कोन नमस्कार कर ए. ऐसा ५० बोले क.. कैसे भ० भगवन् ल. लवण ममुद्र चा० चतुर्दशी उ० अमावास्या पु० पूर्णिमा को अ० अपेक्षा से ३० वृद्धिपामे हा हानिपा में ज० जैसे जी० जीवां भिगम में ल० लवण समुद्र की ३० वक्तव्यता ने० जानना जा. यावत् सइ, नमसइत्ता एवं वयासी-कम्हाणं भंते ! .लवणसमुद्दे चाउद्दसट्ठमुट्ठि पुण्णमा- सिणीसु अइरेगं वडइवा हायइवा ? जहा जीवाभिगमे लवण समुद्द वत्तव्यया. नेय- व्या ॥ जाव लोयट्ठिइ । लोयाणुभावे ॥१४॥ सेवं भंते भंतेत्ति जाव विहरइः॥ कि- पुत्र संयम व तप से आत्मा को भावते ,हुवे विचरने लगे ॥ १४॥ भगवान् गौतम श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार कर पूछने लगे कि अहो भगवन् ! अन्य तिथी की अपेक्षामे चतुर्दशी अमावास्या व पूर्णिमाको लवण समुद्र में पानी क्यों अधिक बढता है व क्षीण होता है ! अहो गौतम ! लाण समुद्र की चारों दिशी में चार महा पाताल कलश एकर लक्ष योजन के ऊंडे कहे हैं. उनको तीन २ कांड है उन चारों कलश की बीच में एक २ हजार योजन के छोटे कलश की ९ लडों कही है. उन को भी नीन २ काण्ड हैं. उन के नीचे के काण्ड में वायु है, वीच के काण्ड में वायु और हवा है व उपर के काण्ड में पानी है. नीचे के काण्ड का वायु गुंजायमान होने मे सोलह हजार योजन की दगमाले पर. दो कोरा पानी बहता है इम से इन तिथियों में पानी प्रकरता है वगैरह आधिकार जीवाभिगम मूत्र 13 अनुवादक बालानगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी भावार्थ * प्रकाशक-राज़ाबहादुर लाला मुखदेवसहायनीजालाप्रसादजी * 10 AYO Ragng>पंचगंग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 32825 शब्दार्थ लोकस्थिति लो० लोकानुभाव ॥ ३ ॥ ३ ॥ अ० अनगार भ० भगवन् भा० भावितात्मा दे० देव को वे० वैक्रेय स. समुद्घात से स० नीकालता है। जा. यानरूप से जा• जाते को जाजाने पा० देखे गोर गौतम अ०कितनेक दे० देवको पा० देखे नो. नहीं जा० यान को पा० देखे अ० कितनेक नो० नहीं दे० देवको नो० नहीं जा. यान को पा० देखे रिथा सम्मत्ता ॥ तइयसयस्स तईओ उद्देसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥ ३ ॥ * ॥ अणगारेणं भंते भावियप्पा देवं वेउन्विय समुग्धाएणं समोहय जाणरूपेणं जाय- माणं जाणइ पासइ ? गोयमा ! अत्थेगइए देवं पासइ नो जाणं पासइ, अत्थेगइएणं जाणं पासइ नो देवं पासइ, अत्थेगइए देवंपि जाणंपि पासइ, अत्थे. भावार्थ जानना. अहो भगवन् ! आप जो कहते हैं वह सत्य है ऐसा कहकर गौतम स्वामी विचरने लगे. यह क्रिया का अधिकार संपूर्ण हुवा यह तीसरे शतकका तीसरा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥३॥ तीसरे उद्देशे में क्रिया का अधिकार कहा. वह ज्ञानवंत को प्रत्यक्ष होती है सो बताते हैं. श्री गौतम स्वामी प्रश्न करते हैं कि अहो भगवन् ! वैक्रेय समुद्घात से उत्तर वैक्रेय करके विमानादि रूप बना कर जाते हुवे देव को भावितात्मा अनगार क्या ज्ञान से जानते हैं और दर्शन से देखते हैं ? यहां पर 09 अधिज्ञान की विचित्रता से चौभंगी जानना. १ कितनेक देव को देखते हैं परंतु विमान को नहीं देखते हैं. २ कितनेक विमान को देखते हैं परंतु देव को नहीं देखते हैं ३. कितनेक देव व विमान दोनों 28 29 तीसरा शतकका चौथा उद्देशा - शब्दाथा ५३२ सू + अनुवादक-बालानगरी मुनि श्री भमोला ऋषजी ४ ॥१॥ अ० अनगार में भगवन् भा० भावितारमा दे० देवी को वि० चक्रेय तक समुद्घात से साई किया हुवा यानरूप से जा० जाती जा? जाने पा० देखे गो० गौतम एक ऐसे ही ॥ २॥ पूर्ववत् ॥ ३ ॥ ५० अनगार भ० भगवन् भा० भावितात्या रु० वृक्ष की अं अंतर पा० देखे वा बाहिर पा० देखे गइए नो देवं पासइ नो जाणं पासइ ॥१॥ अणगारेणं भंते ! भाषियप्पा देविं विउव्यिय समुग्घाएणं समाहिय जाणरूपेणं जायमाणिं जाणई पासइ ? गोयमा ! एवं चेव ॥ २ ॥ अणगारेणं भंते ! भावियप्पा देवं सदेवीयं विउन्विय समुग्याएणं समोहय जाणवेणं जायमाणं जाणइ. पासइ ? गोयमा : अत्यैगइए देवं सदेवीयं पासइ, नो जाणं पासइ, एएणं अभिलावणं चत्तारिभंगा ॥ ३ ॥ अणगारेणं. भंते ! भारियप्पा रक्खस्स किं अंतो पासइ बाहिं पासइ चउभंगो, ।। एवं किं मूलं पासइ, को देखते हैं और ४.कितनेक देव व विमान दोनों को नहीं देखते हैं ॥१॥ अहो भगवन् ! फ्रेय समुशान मे उत्तर वैकेय करके यानरूप जाती हुई देवी को क्या भावितात्मा अनगार ज्ञान से जानते हैं प्रदर्शन मे देखते हैं ! अहो गोतम ! देव जमे यहां पर चौभंगी जानना ॥ २..! आओ भगवन् ! 'वैक्रय ममुद्यान में उच्चर वैक्रय करके यान रूप से देवी सहित जाने हुवे देव, को भावितात्मा अनगार क्या ज्ञान मे जानता है न दर्षन मे देवता है ! अहो गौतम ! देव जैसे इस के भी चार भांगे जानना ॥ ३ ॥ * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ शब्दार्थ २७ GU सूत्र 888 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र-8 च. चारमाँगे ए ऐसे किं. क्या मू० मूल को पा० देखे के. कंदको पा० देखे च० चारभांगे मृ० मूल को पा० देखे वं. स्कन्ध को पा० देखे च० चारभांगे ए. ऐसे मू० मूल से वी० वीज को सं० जोडना कं० कंद से स०. सम्यक् सं० जोडना जा० यावत् थी० बीज को एक ऐसे पु० पुष्प से बी वीज को सं० कंदं पासइ चउभंगो, मूलं पासइ खंधं पासइ चउभंगो, एवं मूलेणं बीजं संजोए- यव्वं एवं कंदणवि समं संजोएयध्वं जाव बीयं! एवं जाव पुप्फेण समं वीयं संजोएयन्वं अहो भगवन् ! भावितात्मा अनगार अवधिज्ञानादि लन्धि मे क्या वृक्षको अंदरसे देखे या वाहिरसे ? अहो गौतम ! अवधि ज्ञान की विचित्रता से इसके चार भांगे होते हैं. १ कितनेक वृक्ष को अंदर से देखते हैं और बाहिर से नहीं देखते हैं २ कितनेक वाहिर से देखे परंतु अंदर से नहीं देखे ३ कितनेक अंदर से व बाहिर से देखे और ४ कितनेक अंदर से व बाहिर से नहीं देखे. ऐसे ही मूल और कंद के चार भांगे, मूल और स्कंध के चार भांगे; मूल और बीज के चार भांगे जानना. तैसे ही कंद और खंब, कंद और वीज, ऐसे ही पुष्प और बीज का जानना. ॥ ४ ॥ १ मूल २ कन्द ३ स्कन्ध ४ त्वचा ५ शाखा ६ प्रवाल ७ पत्र. ८ पुप्प १ फल. और १० वीन. यह दश प्रकार की वनस्पति कही है. इन की द्विमयोगी ४५ चौभंगी होती हैं. १ मूल. और कंद २ मूल स्कंध. ३. मूल त्वचा ४ मूल शाखा-५ मूल प्रवाल ६ मूल पत्र ७ मूल पुष्प.८. मूल फल और ९ मूल चीज ये-नव भांगे मूल के साथ वैसे ही कंद के भावार्थ P> तीसरा शतकका चौथा उद्देशा ४282- els शब्दार्थ सूत्र जोड़ना ॥ ४॥ पूर्ववत् ।। ५. प. समर्थ भए भगवन् वा० वायुकाय एक एक म० वडा इ० स्त्रीरूप पु. पु० पुरुषरूप ह० हस्तीरूप जाव्यानरूप जुधूसरा गि० अवाडी थि ऊंटकी पिल्लिका सीनशविका संरथरूप वि: विकुर्वणा करने को गो गौतम नो नहीं इ०यहअर्थ सं०समर्थ वा वायुकाय वि०विकुर्वणा करते ए०एक ॥ ४ ॥ अणगारेणं भंते भावियप्पा रुक्खस्स किं फलं पासइ बीयं पासइ चउभंगो. ॥ ५ ॥ * ॥ पणं भंते ! वाउकाएणं एग महं इत्थिरूबंवा, पुरिसरूवंवा, हथि रूवंवा जाणरूवंबा, एवं जुग्ग गिल्लिथिल्लिसीयसंदमाणियख्वंवा विउल्चित्तए ? " भावार्थी 4. अनुवादक-बालग्रामचरिमुनि श्री अमोलक ऋपिनी * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायनी जालामसादमी ८ भांगे, स्कंध के ७, त्वचा के , शाखाके ५, प्रवालके ४, पत्रके ३, पुष्पके २ और फ़लका १ यो सब मील कर ४५ चौभंगी होती हैं इस में से फल की ४५ वी चौभंगी बताते हैं. 'अहो भगवन् ! भावितात्मा अनगार क्या अवधि ज्ञान से फल को देखे या बीज को देखे ? अहो गौतम ! कितनेक फल को, देखे परंतु चीज को देखे नहीं २ कितनेक वीज को देखे परंतु फल को देखे नहीं ३ कितनेक फल और वीज दोनों को देखे और ४ कितनेक फल और वीज दोनों को देखे नहीं ॥ ५॥ अहो भगवन् ! क्या वायुकाय वक्रेय समुद्घात करके स्त्री का, पुरुपका, हस्ती का, विमान का, धुसरे का, हस्ती की अंबाडीका ऊंट की पिल्लिका का, शिविका का, बैलगाडी इत्यादिकका रूप बनाने को समर्थ है ? अहो गौतम ! यह अर्थ ८.३० सत्र 48 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 28 शब्दार्थमवडा प० पताका का सं० संस्थानरूप वि० विकुर्वणा करे ॥ ६ ॥ प० समर्थ भं• भगवन् वा. वायु काय ए० एक म० वडा प० पताका रूप की वि०विकुषणा कर अ० अनेक जो० योजन गजाने को ई० हां प० समर्थ से वह कि० क्या आ० आत्म ऋद्धि से ग० जावे प० दूसरे की ऋद्धि से ग० जावे गो० गौतम आ० आत्म ऋद्धि से णो नहीं प० दूसरे की ऋद्धि से ग. आवे ज. जैसे आ आत्म ऋद्धि से गोयमा ! णो इणढे समटे । वाउकाएणं विकुबमाणा एगं महं पडागा संठियरूवं वि- कुवइ ॥ ६ ॥ पभणं भंते ! वाउकाए एगं महं पडागारांठियं रूवं विउबित्ता अणे. गाई जोयणाई गमित्तए ? हंता पभ । से भंते ! किं आयट्ठीए गच्छइ परिड्डीए ग- च्छइ ? गोयमा ! आयड्डीए गच्छइ णो परिड्डीएं गच्छइ । जहा आयड्डीए एवं चेव भावार्थ योग्य नहीं है. वायुकाय वैक्रेय समुद्घात से मात्र पताका का संस्थानवाला रूप बनाती है ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! वायुकाय वैक्रेय समुद्वात से पताका रूप मंठाण का वैक्रय बना करके क्या अनेक योजन तक जासकती है ? हां गौतम ! वायुकाय पताका का रूप बनाकर अनेक योजन तक जासकती है. अहो भगवन् ! वह क्या स्वतः की ऋद्धि से जाती है या अन्य की ऋद्धि से जाती है ? अहो गौतम ! स्वतः की ऋद्धि से जा सकती है परंतु अन्य की ऋद्धि से नहीं जासकती है. ऐसे ही स्वतः के कर्म से जाती है परंतु अन्य के कर्म से नहीं जाती है, स्वतः के प्रयोग से जा सकती है परंतु अन्य के प्रयोग से नहीं तीसरा शतकका चौथा उद्देशा .. Syd शब्दार्थ जोड़ना ॥ ४ ॥ पूर्ववत् ॥ ५॥५. समर्थ भ० भगवन् वा वायुकाय ए० एक म० वडा इ०स्वीरूप पु. पु० पुरुषरूप ह हस्तीरूप जाव्यानरूप जुन्यूसरा गि० अवाडी थि ऊंटकी पिल्लिका सीनशपिका संरथरूप वि: विकुर्वणा करने को गो गौतम नो नहीं इ०यहअर्थ सं०समर्थ वा वायुकाय वि०विकुर्वणा करते एक एक ॥ ४ ॥ अणगारेणं भंते भावियप्पा रुक्खस्स किं फलं पासइ बीयं पासइ. चउभंगो ॥ ५ ॥ * ॥ पभूणं भंते ! वाउकाएणं एगं महं इत्थिरूवंवा, पुरिसरूवंवा, हात्थि रूवंवा जाणरूवंवा; एवं जुग्ग गिल्लिथिलिसीयसंदमाणियरूवंवा विउवित्तए ? सूत्र 4. अनुवादक-बालग्रामचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी+ प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादमी भावार्थी १८ भांगे, स्कंध के ७, त्वचा के ; शाखाके ५, प्रवालके ४, पत्रके ३, पुष्पके २ और फलका १ यो सब मील कर ४५ चौभंगी होती हैं इस में से फल की ४५ वी चौभंगी बताते हैं. 'अहो भगवन् ! भावितात्मा अनगार क्या अवधि ज्ञान से फल को देखे या वीज को देखे ? अहो गौतम ! कितनेक फल को. देखे परंतु वीज को देखे नहीं, २ कितनेक वीज को देखे परंतु फल को देखे नहीं ३ कितनेक फल और बीज दोनों को देखे और ४ कितनेक फल और वीज दोनों को देखे नहीं ॥ ५॥ अहो भगवन् ! क्या वायुकाय फ्रेय समुद्घात करके स्त्री का, पुरुषका, हस्ती का, विमान का, धुसरे का; हस्ती की अंबाडीका ऊंट की पिल्लिका का, शिविका का, बैलगाडी इत्यादिकका रूप बनाने को समर्थ है ? अहो गौतम : यह अर्थ * सूत्र 8. पंचमांग विवाह पण्यत्ति ( भगवती) सूत्र 3%820 शब्दार्थ म० वडा १० पताका का सं० संस्थानरूप वि० विकुर्वणा करे ॥ ६ ॥ १० समर्थ भ. भगवन् वा वायु १० काय ए. एक म० वडा प० पताका रूप की वि०विकुर्षणा कर अ अनेक जो० योजन गजाने को हं० हो प० समर्थ से वह किं. क्या आ० आत्म ऋद्धि से ग० जाये प० दूसरे की ऋद्धि से ग० जावे गो. गौतम आ० आत्म ऋद्धि से णो० नहीं प० दूसरे की ऋद्धि से ग० मारे ज. जैसे आ० आत्म ऋद्धि से गोयमा ! णो इण? समटे । वाउकाएणं विकुबमाणा एगं महं पडागा संठियरूवं वि. कुब्वइ ॥ ६ ॥ पण भंते ! वाउकाए एगं महं पडागारांठियं स्वं विउविता अणे- गाई जोयणाई गमित्तए ? हंता पभ । से भंते ! किं आयट्ठीए गच्छइ परिड्डीए ग- च्छइ ? गोयमा ! आयड्डीए गच्छइ णो परिड्डीएं गच्छइ । जहा आयड्डीए एवं चैव भावार्थ योग्य नहीं है. वायुकाय वैक्रेय समुद्घात से मात्र पताका का संस्थानवाला रूप बनाती है ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! वायुकाय वैकेय समुद्यात से पताका रूप मंठाण का वक्रेय बना करके क्या अनेक योजन तक जासकती है ! हां गौतम ! वायुकाय पताका का रूप बनाकर अनेक योजन तक जासकती है. अहो भगवन् ! वह क्या स्वतः की ऋद्धि से जाती है या अन्य की ऋद्धि से जाती है ? अहो गौतम ! स्वतः की ऋदि से जा सकती है परंतु अन्य की ऋद्धिं से नहीं जासकती है. ऐसे ही स्वतः के कर्म से जाती परंतु अन्य के कर्म से नहीं जाती है, स्वतः के प्रयोग से जा सकती है परंतु अन्य के प्रयोग से नहीं तीसरा शतकका चौथा उद्देशा. 888 शब्दाथा जोड़ना ॥ ४ ॥ पूर्ववत् ॥ ५॥५० समर्थ भभगवन् वा० वायुकाय ए. एक म० वडा ३०-स्त्रीरूप पु. पु० पुरुषरूप ह हस्तीरूप जाव्यानरूप जुधूसरा गि० अवाडी थि ऊंटकी पिल्लिका सीनशपिका संरथरूप वि: विकुर्वणा करने को गो गौतम नो नहीं इ०यहअर्थ सं०समर्थ वा वायुकाय वि०विकुर्वणा करते ए०एक ॥ ४ ॥ अणगारेणं भंते भावियप्पा रुक्खस्स किं फलं पासइ बीयं पासइ. चउभंगो. ॥ ५ ॥ * ॥ पभूणं भंते ! वाउकाएणं एगं महं इत्थिरूवंबा, पुरिसरूवंवा, हात्थ रूवंवा जाणरूबंवाएवं जुग्ग गिल्लिथिल्लिसीयसंदमाणियरूवंवा विउवित्तए ? 48 अनुवादक बालग्रामचरािमुनि श्री अमोलक पिजी * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी बालापमादजी * भावार्थ ८ भांगे, स्कंध के ७, त्वचा के ; शाखाके ५, प्रवालके ४, पत्रके ३, पुष्पके २ और फलका १ यो सब मील कर ४५ चौभंगी होती हैं इस में से फल की ४५ वी चौभंगी बताते हैं. 'अहो भगवन् ! भावितात्मा अनगार क्या अवधि ज्ञान से फल को देखे या वीज को देखे ? अहो गौतम ! कितनेक फल कों, देखें परंतु बीन को देख नहीं, २ कितनेक बीन, को देखे परंतु फल को देखे नहीं ३ कितनेक फल और वीन दोनों को देखे और ४ कितनेक फल और वीज दोनों को देखे नहीं ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! क्या बायकाय वैकेय समुद्घात करके स्त्री का, पुरुषका, हस्ती का, विमान का, धुसरे का, हस्ती की अंबाडीका उंट की पिल्लिका का, शिविका का, बैलगाडी इत्यादिकका रूप बनाने को समर्थ है ? अहो गौतम : यह अर्थ शब्दार्थ सूत्र 48.8 पचंमांग विवाह पपणत्ति ( भगवती ) सूत्र 898035 म. वडा १० यताका का सं० संस्थानरूप वि० विकुर्वणा करे ॥ ६॥ प० समर्थ भं. भगवन् वा वायु काय ए० एक म० वडा ५० पताका रूप की वि०विकुर्वणा कर अ० अनेक जो० योजन गजाने को ई०. हां प० समर्थ से वह कि० क्या आ० आत्म ऋद्धि से ग० जावे प० दूसरे की ऋद्धि से ग० जावे गो. गौतम आ० आत्म ऋद्धि से णो० नहीं प० दूसरे की ऋद्धि से ग० मावे ज० जैसे औ• आत्म ऋद्धि से गोयमा ! णो इणटे समटे । वाउकाएणं विकुन्यमाणा एगं महं पडागा संठियख्वं वि- कुब्वइ ॥ ६ ॥ पभूर्ण भंते ! वाउकाए एगं महं पडागासंठियं रूवं विउवित्ता अणे- गाई जोयणाई गमित्तए ? हंता पभ । से भंते ! किं आयबीए गच्छइ परिड्डीए ग- च्छइ ? गोयमा ! आयड्डीए गच्छइ णो परिड्डीएं गच्छइ । जहा आयडीए एवं चेव योग्य नहीं है. वायुकाय वैक्रेय समुद्घात से मात्र पनाका का संस्थानवाला रूप बनाती है ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! वायुकाय वैक्रेय समुद्घात से पताका रूप मंठाण का चक्रेय बना करके क्या अनेक योजन तक जासकती है ? हाँ गौतम ! वायुकाय पताका का रूप बनाकर अनेक योजन तक जासकती है. अहो भगवन् ! वह क्या स्वतः की ऋद्धि से जाती है या अन्य की ऋद्धि से जाती है ? अहो गौतम ! स्वतः की ऋद्धि से जा सकती है परंतु अन्य की ऋद्धिं से नहीं जासकती है. ऐसे ही स्वतः के कर्म से जाती है परंतु अन्य के कर्म से नहीं जाती है, स्वतः के प्रयोग से जा सकती है परंतु अन्य के प्रयोग से नहीं तीसरा शतकका चौथा उद्देशा.828 भावार्थ सूत्र 48 अनुवादक-बालग्रामचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी + दशब्दाथा जोड़ना ॥ ४॥ पूर्ववत् ॥ ५॥ प. समर्थ भ० भगवन् वा० वायुकाय ए० एक म० वडा ३०-स्त्रीरूप पु. पु० पुरुषरूप ह. हस्तीरूप जाव्यानरूप जुघूतरा गि० अवाडी थि ऊंटकी पिल्लिका सीनशषिका संरथरूप वि चिकुर्वणा करने को गो गौतम नो नहीं इ०यहअर्थ स०समर्थ वा वायुकाय वि०विकुर्वणा करते ए०एक ॥ ॥ अणगारेणं भंते भावियप्पा रुक्खस्स किं फलं पासइ बीयं पासइ. चउभंगो ॥ ५ ॥ * ॥ पभूणं भंते ! वाउकाएणं एगं महं इत्थिरूवंवा, पुरिसरूवंबा, हात्थ रूबंया जाणरूबंबा, एवं जुग्ग गिल्लिथिल्लिसीयसंदमाणियरूवंवा विउन्वित्तए ? মাথা भांगे, स्कंध के ७, त्वचा के 6; शाखाके ५, प्रवालके ४, पत्रके ३, पुष्पके २ और फ़लका १ यो सब मील कर ४५ चौभंगी होती हैं इस में से फल की ४५ वी चौभंगी बताते हैं. अहो भगवन् ! भावितात्मा अनगार क्या अवधि ज्ञान से फल को देखे या वीज को देखे ? अहो गौतम ! कितनेक फल कों, देखे परंतु चीन को देखे नहीं, २ कितनेक बीज, को देखे परंतु फल को देखे नहीं ३ कितनेक फल और बीज दोनों को देखे और ४ कितनेक फल और बीज दोनों को देखे नहीं ॥५॥ अहो भगवन् ! क्या वायुकाय वक्रय समुद्घात करके स्त्री का, पुरुषका, हस्ती का, विमान का, धुसरे का, हस्ती की अंबाडीका इंट की पिल्लिका का, शिविका का, बैलगाडी इत्यादिकका रूप बनाने को समर्थ. है ? अहो गौतम : यह अर्थ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी वालाप्रसादजी.*.
शब्दार्थ ७ सूत्र, 82 मांग विवाह पण्यत्ति ( भगवती) सूत्र ॐ म० वडा प० पताका का सं० संस्थानरूप वि० विकुर्वणा करे ॥ ॥ प० समर्थ भ भगवन् वा वायु काय ए० एक म० वडा प० पताका रूप की वि०विकुर्वणा कर अ० अनेक जो० योजन गाजाने को ई० हां प० समर्थ से वह कि० क्या आ० आत्म ऋद्धि से ग० जाये ५० दूसरे की ऋद्धि से ग. जावे गो० गौतम आ० आत्म ऋद्धि से णो० नहीं प० दूसरे की ऋद्धि से ग० भावे ज० जैसे आ० आत्म ऋद्धि से गोयमा ! णो इणटे समटे । वाउकाएणं विकुन्धमाणा एगं महं पडागा संठियंरूवं वि. कुव्वइ ॥ ६ ॥ पभूणं भंते ! वाउकाए एगं महं पडागारांठियं स्वं विउवित्ता अणे- गाई जोयणाइं गमित्तए ? हंता पभ । से भंते ! किं आयबीए गच्छइ परिड्डीए ग- च्छइ ? गोयमा ! आयड्डीए गच्छइ णो परिड्डीएं गच्छइ । जहा आयड्डीए एवं चेय योग्य नहीं है. वायुकाय वैक्रेय समुद्घात मे मात्र पनाका का संस्थानवाला रूप बनाती है ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! वायुकाय चक्रेय समुद्वात से पताका रूप मंठाण का चेक्रेय बना करके क्या अनेक योजन तक जासकती है ! हां गौतम ! वायुकाय पताका का रूप बनाकर अनेक योजन तक जासकती है. अहो भगवन् ! वह क्या स्वतः की ऋद्धि से जाती है या अन्य की ऋद्धि से जाती है ? अहो गौतम ! स्वतः की ऋद्धि से जा सकती है परंतु अन्य की ऋद्धिं से नहीं जासकनी है. ऐसे ही स्वतः के कर्म से जाती है परंतु अन्य के कर्म से नहीं जाती है, स्वतः के प्रयोग से जा सकती है परंतु अन्य के प्रयोग से नहीं तीसरा शतकका चौथा उद्देशा. भावार्थ शब्दाथ जोड़ना ॥ ४ ॥ पूर्ववत् ॥ ५॥ ५० समर्थ भए भगवन् वा० वायुकाय ए० एक म० वडा इ० स्त्रीरूप पुः पु० पुरुषरूप ही हस्तीरूप जाव्यानरूप जुघूतरा गि० अवाडी थि ऊंटकी पिल्लिका सीवशिषिका संरथरूप विचिकुर्वणा करने को गो गौतम नो नहीं इ०यहअर्थ सं०समर्थ वा वायुकाय वि०विकुर्वणा करते ए०एक ॥ ॥ अणगारेणं भंते भावियप्पा रुक्खस्स किं फलं पासइ बीयं पासइ चउभंगो ॥ ५ ॥ * ॥ पभूणं भंते ! वाउकाएणं एगं महं इत्थिरूवंवा, पुरिसरूवंवा, हत्थि रूवंवा जाणरूवंबा, एवं जुग्ग गिलिथिल्लिसीयसंदमाणियरूवंवा विउवित्तए ? सूत्र १ अनुवादक-बालग्रामचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी, * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादमी * भावाथा भांगे, स्कंध के ७, त्वचा के ६, शाखाके ५, प्रवालके ४, पत्रके ३, पुष्पके २ और फलका १ यो सब मील कर ४५ चौभंगी होती हैं इस में से फल की ४५ वी चौमंगी बताते हैं. 'अहो भगवन् ! भावितात्मा अनगार क्या अवधि ज्ञान से फल को देखे या चीज को देखे ? अहो गौतम ! कितनेक फल को. देखे परंतु बीज को देखे नहीं. २ कितनेक वीज को देखे परंतु फल को देखे नहीं ३ कितनेक फल और वीज दोनों को देखे और ४ कितनेक फल और बीज दोनों को देखे नहीं ॥५॥ अहो भगवन् ! क्या वायुकाय वैक्रय समुद्यात करके स्त्री का, पुरुषका, हस्ती का, विमान का, धुंप्सरे का, हस्ती की अंबाडीका ऊंट की पिल्लिका का, शिविका का, बैलगाडी इत्यादिकका रूप बनाने को समर्थ है ? अहो गौतम : यह अर्थ शब्दार्थ सूत्र 8- पंचमान विवाह पण्णत्ति (भग ती) मूत्र पा. वायुकाय प. पताका गो गौतम वा०.वायुकाय से वह नो० नहो मा. वह प० पताका ॥८॥ पं० समर्थ प० मेय ए० एक म०. बडा इ० स्त्रीरूप जा. यावत् सं० स्थरूप ५० परिणमाने को से नो खलु सा पडागा ॥ ८ ॥ पभूणं भंते ! बलाहगे एगंमहं इत्थिरूवंवा जाव संद- माणियरूवंवा परिणामेनए ? हंता पभू ॥ १३ ॥ पभूणं भंते ! वलाहए एगं महं इत्थिरूवं परिणामेत्ता अणेगाई जोयणाई गमित्तए ? हता पभ । से भंते ! किं आ. यड्डीए गच्छइ परिड्डीए गच्छइ ? णो आयड्डीए गच्छइ, परिड्डीए गच्छइ. एवं णो आयकम्मुणा, परकम्मुण्णानोआयप्पओगेणं,परप्पओगेणं,ऊसितोदयंवा गच्छइ,पयोदयवां गच्छइ, । से भंते किं बलाहए इत्थी ? गोयमा ! बलाहएणं से णो खलु सा इत्थी। एवं उसे वायुकाया कहना परंतु पताका नहीं कहना. ॥ ८ ॥ अहो गोतम ! क्या मेघ एक वडा स्त्री का रूप यावत् शिविका का रूप परिणमाने में समर्थ है ? अथवा अनेक योजन तक जाने को समर्थ है ? हां भगवन् ! वह स्त्री यावत् शिविकाकारूप बनाने की समर्थ है. वह क्या स्वतः की ऋद्धि से या अन्य का ऋद्धि से जासकते हैं ? अहो गौतम ! वह मेघ अजीव होने से स्वतः की शक्ति से नहीं जासकते है परंतु अन्य की शक्ति मे जासकते हैं. वैसे ही स्वतः के कर्म से नहीं जासकते है परंतु अन्य के कर्मों से जा सकते हैं, स्वतः के प्रयोग से नहीं जामकते हैं परंतु अन्य के प्रयोग से जाते हैं. अहो भगवन 4380 तीसरा शनकका चौथा उद्देशा वाभाथ शब्दार्थी 48 अनुसादक-पालाचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8- ए. ऐमें आ आत्म कम से.आ. आत्म प्रयोग से भा॰ कहना ॥ ७ ॥.म. वह किं. क्या ऊ ऊर्च पताका जैसे ग० जावे प० नींचीपताका जैसे गे० जावे गो. गौतम ऊ. ऊर्व पताका जैसे - ग. जावे ३५० नीचीपताका जैसे ग. जावे से वह भं० भगवन् कि० क्या. ए. एक दिशा में १० पताका जैसे ग. जाये दु० दोनों दिशामें प० पताका जैसे ग. जावे गो० गौतम ए? एकदिशा में ५० पताका जैसे ग० जावे नो० नहीं दु० दोनों दिशा में प० पताका जैसे ग० जावे से वह भ० भगवन् किं०. क्या आयकम्मुणावि, आयप्पयोगेवि भाणियव्यं ॥ ७ ॥ से भंते ! किं ऊसिओदयं गच्छइ, पतोदयं गच्छद ? गोयमा ! ऊसिओदयंपि गच्छइ पयोदयंपि गच्छइ, ॥ से भंते ! किं एगओ पडागं गच्छइ, दुहओ पडागं गच्छइ ? गोयमा ! एगओ पड़ागं गच्छइ. नो दुहओ पड़ागं गच्छइ. ॥ से भंते ! किंवाउकाए पडागा ? गोयमा ! वाउकाएणं जासकती है. ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! क्या वह वायुकाय ऊंची पताका के आकार से जाती है या नीची पनाका के आकार से जाती है ? अहो गौतम ! ऊंची पताका के आकार से भी जाती है और नींची पताका के आकार से भी जाती है. अहों भगवन् ! क्या यह एक पताका या दो पताका से जाती है. ? अहो गौतम! एक पताका का रूप बनाकर जाती है परंतु दो पताका का रूप बनाकर जानी है. अहो भगवन् ! उसे क्या वायुकाय कहना या पताका कहना ? अहो गौतम * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी घालाप्रसादजी * भावार्थ शब्दार्थ ५३७ सूत्र 38- पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगतो) मूत्र <T वा• वायुकाय प. पताका गो० गौतम वा वायुकाय से वह नो० नहीं मा. वह प० पताका ॥ ८ ॥ पं. समर्थ ३० मेय ए० एक म० बडा इ० स्त्रीरूप जा० यावत् सं० रथरूप १० परिणमाने को से नो खलु सा पडागा ।। ८ ॥ पभूणं भंते ! बलाहगे एगंमहं इत्थिरूबंवा जाव संद- माणियरूवंवा परिणामेत्तए ? हंता पभू ॥ १३ ॥ पभूणं भंते ! वलाहए एगं महं इत्थिरूवं परिणामेत्ता अणेगाइं जोयणाई गमित्तए ? हता पभ । से भंते ! किं आ- यड्डीए गच्छइ परिड्डीए गच्छइ ? णो आयड्डीए गच्छइ, परिड्डीए गच्छइ. एवं णो आयकम्मुणा, परकम्मुण्णानो आयप्पओगेणं,परप्पओगेणं,ऊसितोदयंवा गच्छइ,पयोदयवां गच्छइ, 1 से भंते किंवलाहए इत्थी ? गोयमा! बलाहएणं से णो खलु सा इत्थी। एवं उसे वायुकाया कहना परंतु पताका नहीं कहना. ॥ ८ ॥ अहो गोतम ! क्या मेघ एक वडा स्त्री का रूप यावत् शिविका का रूप परिणमाने में समर्थ है ? अथवा अनेक योजन तक जाने को समर्थ है ? हां भगवन् ! वह स्त्री यावत् शिविकाकारूप बनाने का समर्थ है. वह क्या स्वतः की ऋद्धि से या अन्य का ऋद्धि से जासकते हैं ? अहो गौतम ! वह मेघ अजीव होने से स्वतः की शक्ति से नहीं जासकते हैं। परंतु अन्य की शक्ति मे जासकते हैं. वैसे ही स्वतः के कर्म से नहीं जासकते है परंतु अन्य के कर्मों से जा सकते हैं, स्वतः के प्रयोग से नहीं जासकते हैं परंतु अन्य के प्रयोग से जाते हैं. अहो भगवन 389 तीसरा शनकका चौथा उद्देशा चाभार्थ शब्दार्थ ई. हाँ प० समर्थ ॥ १॥ जी०. जीव भ. भगवन् जे.जो ने नरक में उ० उत्पन्न होवे से० वह भ० भगवन् कि० किम.ले लेश्या से १० उत्पन्न होवे गो. गौतम जं. जिप्त ले. लेश्या F ५३८ 1. अनुशदकालब्रह्मचारी .मुनि श्री अमोलक ऋपीजी 8- : पुरिसे, आसे, हत्थी । पभूणं भंते बलाहए एग महं. जाणरूवं परिणामेत्ता अणेगाई जोयणाईगमित्तए, जहा इत्थिरूवं तहा भाणियव्यं । नवरं एगओ . चकवालंपि, दुहओ चकवालंपि भाणियब्वं ॥ जुग्गगिल्लिथिल्लिसीयासंदमाणियाणंतहेव ॥ ९ ॥ जीवेणं भंते जेभविए नेरइएसु उववजित्तए, सेणं भंते ! किं लेस्सेसु उववज्जइ ? गों- जब मेघ स्रो आदि का रूप बना सकता है तब क्या उसे स्त्री वगैरह कहना. अहो गौतम ! उमे मेघही कहना परंतु स्त्री पुरुप वगैरह नहीं कहना. अहो भगवन् ! वे बद्दल विमान का रूप बनाकर अनेक योजन तक क्या जा सकते हैं ? हां गौतम : वे जा सकते हैं वगैरह जैसा स्त्री का अधिकार कहा वैसे ही यहां कहना. विशेष उपर जो यान का रूप बनाकर विमान की गति का कथन किया सो एक चक्र से भी जामकते हैं, और दो चक्र से भी जासकते हैं. इसी प्रकार धूतरा, अंबाडी, थिल्ली शिविका, व संदमनी वगैरह का कथन जानना. ॥ ९॥ गमन के अधिकार से गति गमनका प्रश्न करते. हैं. अहो भगवन् ! जो जीत नारकी में उत्पन्न होनेवाला है वह कृष्ण लेश्यादि छ लेश्या में सें.. कौनसी लेश्या सहित उत्पन्न * प्रकाशक-रामावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * मावार्थ आता है ? अहो गौतम ! जिस लेश्या के द्रव्य एकत्रित कर काल करता है उसी लेश्या में उत्पन्न होता शब्दाथ R सत्र - पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति (भगवती.) सूत्र 982- के द. द्रव्य को ५० ग्रहणकर का• काल करे त० उस लेश्या में उ उत्पन्न होवे तं. वह ज. जैसे क० कृष्ण लेश्या नी० नीललेश्या का कापोत लेश्या ए. ऐमे ज० जिसको जा.. जो लेश्याई सा. वह भा० कहना जा० यावत् जी० जीव भं० भगवन् जे. जो भ. ज्योतिषी में उ. उत्पन्न होने की यमा ! जं लेसाई दबाई परियाइत्ता कालं करेइ, तल्लेसेसु उववज्जइ. तंजहा कण्हलेसे- सुवा, नीललेसेसुवा, काउलेसेसुवा, एवं जस्स जा लेसा , सा तस्स भाणियन्वा, जाव जीवेणं भंते ! जे भविए जोइसिएसु उववजित्तए पुच्छा ? गोयमा ! जल्लेसाई दवाई परियाइत्ता कालं करेइ तलेसेसु उववज्जइ, तंजहा तेउलेरसेसु । जीवेणं भंते ! जे भविए वेमाणिएसु उववजित्तए सेणं भंते ! किं लेरसेसु उववज्जइ ? गोयंमा ! जल्ले- है. नरक में तीन लेश्या सहित जीव जाता है. कृष्ण लेश्या, नील लेश्या और कापोत लेश्या.. यावत् कृष्ण, नील, कापोत और तेनोलेश्यावाले दश प्रकार के भवनपति में उत्पन्न होते हैं. इनही चार लेश्या- वाले पृथ्वी. पानी व वनस्पति में उत्पन्न होते हैं. कृष्ण, नील और कापुतवाले तेउ वायु और विकलेन्द्रिये में उत्पन्न होते हैं. कृष्ण, नील, कापोत, तेजो पम, और शुक्ल लेश्यावाले मनुष्य तीयैच में उत्पन्न होते पहिली चार लेश्यावाले वाणव्यंतर में, मात्र एक बेनो लेश्यावाले ज्योतिषी और प्रथम द्वितीय देवलोक तीसरा शतक का चौथा उद्देशा ! भावार्थ G0 शब्दार्थ म. भव्य पुः पृच्छा गो: गौतम जय जिस लेश्या द० द्रव्य भाव से प० प्रहशकर का० कालं त उस ले लेश्या में उ० उत्पन्न होवे ते तेजो लेश्या ॥ १०॥ पूर्ववत् ॥ ११ ॥ अ अनगार में भगवन् भाभावितात्मा वा वाह्य पो० पुद्गल अविना ग्रहण करे . समर्थ वे वेभार प० पर्वत को ५४० सम सूत्र 4. अनुवादक-बालमानचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी साई दबाई परियाइत्ता कालं करेइ तल्लेसेस उववज्जई, तंजंहा तेउ लेसेंसुवा, पम्ह- लेसेसुवा, सुकलेसेसुवा ॥ १०-११ ॥ अणगारेणं भंते ! भावियप्पा बाहिरए पो. ग्गले अपरियाइत्ता पभू बेभार पव्वयं उल्लंघेत्तएंवा, पल्लंघेत्तएवा ? गोंयमा ! णो इणढे समढे । अणगारेण भंते ! भावियप्पा बाहिरएं पोग्गले परियाइत्ता पभ वेभारपव्वयं उत्पन्न होते हैं: पम लेश्यावाले तीसरे, चौथे, पांचवे देवलोक में; शुक्ल लेश्यावाले छठे देवलोक से सर्वार्थ मिद तक में उत्पन्न होते हैं. अर्थात् वैमानिक देवों में तेजो, पन और शुक्ल लेश्याही है॥१०-११॥ शुभ लेश्यागले साधु लंब्धिवंत होते हैं इस में लब्धि आश्री प्रश्न पुछते हैं. अहो भगवन् ! भावितात्मा अनगार बाहिर के चक्रेय शरीर के पुद्गल ग्रहण किये विना राजगद्दी नगरी की पोस को वेभार पर्वत क्या उलंघने को समर्थ होते हैं ! अहो गौतम वे वाहिर के वैक्रेय पुद्गल ग्रहण किये बिना वेभार पर्वत उलंगने को समर्थ नहीं होसकते हैं. अहो भगवन् ! भावितात्मा अनगार बाहिर के वैक्रेय पुद्गल ग्रहण * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालापसादजी * भावार्थ m गदार्थ ५४१ सूत्र 98 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 398 उ० उल्लंघन करने को प० विशेष उल्लंघन करने को गो० गौतम नो नहीं इ० यह अर्थ म समर्थ ॥१२॥ अ० अनगार भ० भगवन् भा० भावितात्मा वा० सा पो० पुद्गल अ० विना ग्रहण कर ना. यावत् इ० इतने रा० राजगृह न० नगर में रू. रूप वि० विकुर्वणा कर ये वेभार पर्वत की अं० अंदर अ० प्रवेश कर प. समर्थ स. सम को वि० विपन क करने को वि० विपम को स. स्म क० करने को गो. गौतम नो० नहीं इ० यह अर्थ स. समर्थ ए. ऐसे वि० दूसरा आ० आलापक ण. विशेष प० ग्रहणकर उल्लंघेत्तएवा पलंघेत्तएवा ? हेता पभू ॥ १२ ॥ अणगारेणं भंते ! भावियप्पा बाहि- रएपोग्गले अपरियाइत्ता जाव इयाई रायगिहे नयरे रूबाई एवइयाई विउवित्ता वेभारं पव्वयं अंतो अगुप्पावसित्ता पभू समंवा विसमंवा करेक्तए विसमंवा समं करे- तह ? गोयमा ! नो इणढे समढे ॥ एवं चेव धितीओवि आलावगो णवरं परियाइ- कर क्या वेभार पर्वत उल्लंघ सकते हैं! हां गौतम! वे भावितात्मा अननार वाहिर के पुद्गलग्रहण कर वेभार पर्वत का उल्लंघन कर सकते हैं ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! भावितात्मा लन्धिवंत साधु वाहिर के वैकेय पुद्गल ग्रहण किये बिना राजगृही नगरी में जितने मनुष्य पशु हैं उत्तने रूप बनाकर बेभार पर्वत में प्रवेश कर सम को विषम व विषम को सम करने क्या समर्थ है ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है अर्थात् लब्धिवन्त साधु बाहिर के वैकेय पुद्गल ग्रहण किये विना उक्त कार्य करने को समर्थ नहीं होते हैं. परंतु - तीसरा शतक का चौथा उद्देशा 988 भावार्थ ५४२ 4. अनुरादक बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी gory शब्दार्थ प० समर्थः॥ १३ ॥ से वह भ० भगवन कि क्या मा० मायी वि. विकुर्वणा करे अ०. अमायी वि. विकुणा करे गो० गौतम मा० मायी वि० विकुर्वणा करे नो. नहीं अ. अमायी वि० विकुणा करे से बह के: कैसे मो० गौतम मा० मायी प० स्निग्ध पार पानी भो० भोजन भोर भोगवकर वा० चमन करे त उन को ते • उस प. स्निग्ध पा. पानी भो० भोजन से अ० अस्थि अ.० अस्थिमिज व. पुष्ट सूत्र ता पभ ॥ १३ ॥ से भंते ! किं माई विकुव्यइ अमाई विकुम्बइ ? गोयमा ! माई विकुब्वइ, णो अमाइ विकुब्वइ । से केणटेणं भंते ! एवं बुच्चइ जाव ना अमाई विकुम्बई ? गोयमा ! माईणं पणीयं पाणभोयणं भोच्चा भोच्चा बामेइ, तस्सणं. तेणं पणीएणं पाण भोयणेणं अद्विमिजा बहुली भवंति, पर्यणुए. मंससोणिए. भवइ, जेवियसे अहावायरा. पोग्गला तेवियसे. परिणमंति ॥ सोइंदियत्ताए जाव फा- बाहिर के चक्रेय पुद्गल ग्रहण कर राजगृही में रहेहुवे मनुष्य व पशु जितने रूप बनाकर वेभार पर्वत में प्रवेश करके सम की विपम भूमि और विपम की पम भूमि कर सकते हैं ॥ १३ ॥ अव वैक्रेय रूप कौन बनाने मो कहते हैं. अहो भगवन् ! उक्त प्रकार के रूप क्या मायावी बनाते हैं या अमायी-माया कपट रहिन पुरुप बनाते हैं ? अहो गौतम ! उक्त प्रकार के रूप मायी. प्रमादी साधु करते. हैं परंतु अमायी नहीं करते हैं. अद्दो भगवन् ! किस कारन से मायी विकुणा करता है. और अमायी नहीं करता है। * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादी * भावार्य ५४३ - सूत्र 389 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 28 शब्दार्थ भ होवे १० पतला मै० मास सो रुधिर भ० होवे जे. जो अ० यथा वा० चादर:पो० पुद्गल ते. प. परिण में तो श्रोत्तेन्द्रियपने जा. यावत् फा० स्पर्शेन्द्रियपने अ० अस्थि अ० अस्थिमिंज के० ० केश मं० दाढी रो० रोम न० नखपने सु० शुक्रपने सो० रुधिरपने अ० अमायी लू० रूक्ष. पा० पानी सिदियत्ताए, अट्ठिअट्रिमिंजकेसमंसुरोमनहत्ताए सुक्कत्ताए सोणियत्ताए। अमाईणं लूहं पाण- भोयणं भोच्चा भोच्चाणो वामइ, तस्सणं तेणं लूहेणं पाण भोयणेणं आट्टि अट्टिमिंजा पयणु भवंति, बहले मंस सोणिए जेवियसे अहाबादरा पोग्गला तेवियसे परिणमंति, तंजहा- उच्चारत्ताए,जाव सोणियत्ताए से तेण?णं जाव नो अमाई विकुब्वइ॥माईणं तस्स ठाणस्स भावार्थ अहो गौतम ! जो मायावी साधु होते हैं वे स्निग्ध सरस आहार पानी का भोजन करते हैं. वलवृद्धि के लिये वमन विरेचनादिक क्रियाओं करते हैं. ऐसे स्निग्ध पान भोजन से उन की हड्डीव हड्डीकी मिजी बढती मांस शोणित पतले होते हैं यथावादर पुद्गल श्रोतेन्द्रिय यावत् स्पर्शेन्द्रिय, अस्थी, अस्थि की मिंजी, केश, श्मश्रु, रोम, नख, शुक्र व रुधिरपने परिणमते हैं और इस से वैक्रय रूप धना मकते हैं. जो अमायी होते हैं वे रूक्ष निरस आहार करते हैं और वमन विरेचनादि क्रियाओं नहीं करते हैं. उन को रूक्ष आहार से हड्डी और हड्डी की मीजी पतली होती है, मांस व लोही सघन होता है. उन को पानी व आहार रूप से ग्रहण किये हुवे पुद्गल बडीनीत, लघुनीत, श्लेष्प, खेकार, वमन, पित्त, यावत् रुधिरपने - > तीसरा शनक का चौथा उद्देशा8882 - ५४२ नारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 85 शब्दार्थप समर्थः ॥ १३ ॥ से वह भभगवन किया मा० मायी वि• विकुर्वणा करे अ०. अमायी वि. विकुणा करे गो० गौतम मा० मायी वि. चिकुर्वणा करे नो नहीं अ. अमायी वि० विकुर्वणा करे मे यह के कैसे गो गौतम मा० मायी प० स्निग्ध पा० पानी भो० भोजन भो' भोगवकर वा० यमनकरे त. 'उन को ते० उस प. स्निग्ध पा० पानी भोक भोजन से अ० अस्थि अ० अस्थिमिज २० पुष्ट सूत्र ता पभ ॥ १३ ॥ से-भंते ! किं माई · विकुब्बइ अमाई विकुव्वइ ? गोयमा ! माई विकुम्वइ, णो अमाई चिकुव्वइ । से केणटेणं भंते ! एवं बुच्चइ जाव ना. अमाई विकुब्बई ? गोयमा ! माईणं पणीयं पाणभोयणं भोच्चा भोच्चा वामेइ, तस्सणं. तेणं पणीएणं पाण भोयणेणं अं अद्विमिंजा बहुली भवंति, पर्यणुए मंससोणिए. भवइ, जेवियसे अहावायरा पोग्गला तेवियसे. परिणमंति ॥ सोइंदियत्ताए . जाव फा-- मे मैक्रेय पुद्गल ग्रहण कर राजगृही में रहेहुवे मनुष्य वं पशु जितने रूप बनाकर वेभार पर्वत में प्रवेश म भूमि और विपम की पम भामे कर सकते हैं ॥ १३ ॥ अब बैक्रेय रूप कौन बनाने अहो भगवन् ! उक्त प्रकार के रूप क्या मायावी बनाते हैं या अमायी-माया कंपट बनाते हैं ? अहो गौतम ! उक्त प्रकार के रूप मायी. प्रमादी साधु करते हैं परंतु, अमायी नहीं करते हैं. अहो भगान् ! किस कारन से मायी विकर्षणा करता है और अमायी नहीं करता है ? * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादी * 28-32 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र ॐ28- ब्दार्थ कम होये ५० पतला में• मास सो रुधिर भ० होवे जे० जो अ० यथा वा चादर पो• पुद्गल ते. वे प. परिण मे तो श्रोतेन्द्रियपने जा० यावत् फा० स्पर्शेन्द्रियपने अ० अस्थि अ० अस्थिमिंज के० केश म० दाढी रो० रोम न० नखपने सु० शुक्रपने सो० रुधिरपने अ० अमायी लू०. रूक्ष पा० पानी सिंदियत्ताए,अट्ठिअट्टिमिंजकेसमंसुरोमनहत्ताए सुकत्ताए सोणियत्ताए। अमाईणं लूहं पाण- सूत्र भोयणं भोच्चा भोच्चाणो वामेइ, तस्सणं तेणं लूहेणं पाण भोयणेणं अढि अट्टिमिंजा पयणु भवंति, बहले मंस सोणिए जेवियसे अहाबादरा पोग्गलातेवियसे परिणमंति, तंजहा- उच्चारत्ताए,जाव सोणियत्ताए से तेण?णं जाव नो अमाई विकुन्वइ॥माईणं तस्स ठाणस्स भावाथ अहो गौतम ! जो मायावी साधु होते हैं वे स्निग्ध सरस आहार पानी का भोजन करते हैं. वलवृद्धि के लिये वमन विरेचनादिक क्रियाओं करते हैं. ऐसे स्निग्ध पान भोजन से उन की हड्डीव हड्डीकी मिजी बढती है मांस शोणित पतले होते हैं यथावादर पुद्गल श्रोतेन्द्रिय यावत् स्पर्शेन्द्रिय, अस्थी, अस्थि की मिजी, केश, श्मश्रु, रोम, नख, शुक्र व रुधिरपने परिणमते हैं और इस से वैकेय रूप बना मकते हैं. जो अमायी होते हैं वे रूक्ष निरस आहार करते हैं और वमन विरेचनादि क्रियाओं नहीं करते हैं. उन को रूक्ष आहार से हड्डी और हल्ली की मीजी पतली होती है. मांस व लोही सघन होता है. उन को पानी आहार रूप से ग्रहण किये हुवे पुद्गल बडीनीत, लघुनीत, श्लेष्म, वंकार, वमन, पित्त, यावत् रुधिरपने ॐ तीसरा शतक का चौथा उद्देशा >> .
शब्दाथ मूत्र x x 4. अनुवादक-बालमनचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 85 भा० भोजन भो० भोगव कर णो नहीं वा. वमनकरे त उन को ते. उस रू० रूक्ष पा. पानी भो० भोजन से अस्थि अ० अस्थिमिज प० पतली भ० होती है ॥३॥४॥ अ. अनगार भ० भगवन् भा० भावितास्मा वा बाह्य पो० पुद्गल अ० विना ग्रहण किये प० समर्थ एक अणालोइय पडिकते कालं करेइ, नत्थितस्स आराहणा अमाईणं तस्स ठाणस्स आले.इय पडिवंते कालं करेइ अस्थि तस्स आराहणा ॥ सेवं भंते भंतेत्ति तईयसए चउत्थो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥ ४ ॥ अणगारेणं भंते ! भावियअप्पा बाहिरए पोग्गले अपरियाइसा षभू एगं महं इत्थिरू- परिणमते हैं इस तरह शक्ति कम होने से अमायी चक्रेयादि लब्धि नहीं करते हैं. अब मायी और अमायी को फल बताते हैं. मायावी प्रमादी वैकेय करनेमें लब्धि फोडने से अथवा सरस आहारादि के दोष लगने से पदि उम की आलोचना प्रतिक्रमण करे नहीं तो वह जिनाज्ञा का आराधक नहीं होसकता है. और जो समायी अमयादी होने हैं वे निदोर आहार भोगवने से व चक्रेयादि नहीं करने से अल्प दोपी होते हैं. जो कुच्छ उपस्थपना मे दोप लगता है उस की गुरु की समक्ष आलोचना करने मे जिनाज्ञा का आराधक रोता है. अहो भगवन् ! आपके पचन तथ्य हैं. आप जैसे कहते हैं वैसे ही हैं. यह तीसरा शतकका नौगा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥ ४ ॥ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावाचा % 3D %a शब्दार्थ (एक म० वडा इ० स्त्रीरूप जा० यावत् सं• पालखी रूप वि० विकुर्वणा करने को गो गौतम नो० नहीं इ. यह अर्थ स० समर्थ ॥१॥ अ० अनगार भं० भगवन् भ. भावितात्मा के० कितना प. समर्थ वि०ya विकुर्वणा करने को गो गौतम ज जैसे जुध्यक्तीको जु युवान है हस्त से ह.हस्त में गे ग्रहण करे च चक्र ५४५ सूत्र MES पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - वंधा जार संदामणियरूवं वा विकुत्तिए ? गोयमा ! णो इणटे सम? । अणगारेणं भंते ! भावियप्पा बाहिरए पोग्गले परियाइत्ता पभू एगं महं इत्थिरूवं वा जाव सं- दामणियरूवं वा विकुवित्तए ? हंता पभू ॥ १ ॥ अणगारेणं भंते ! भावियप्पा केव- इयाई यभू इथिरूवाई विउवित्तए ? गोयमा से जहानामए जुबई जुवाणे हत्थेणं * तीसरा शतक का पांचवा उद्देशा भावार्थ अहो भगवन् ! भावितात्मा अनगार वाहिरके वैक्रेय पुद्गल ग्रहण किये विना क्या एक महा स्त्री का रूप यावत् पालखी का रूप बनाने को समर्थ है ? अहो गौतम : यह अर्थ योग्य नहीं है अर्थात् वे वैसा वैकेय रूप नहीं बनासकते हैं. तब अहो भगवन् ! क्या वह वाहिर के वैक्रेय पुद्गल ग्रहण कर एक महा स्त्रीका रूप यावत् पालखी का रूप बनाने को ममर्थ है, हां गौतम! वह महा स्त्रीका रूप यावत् पालखी बनाने को समर्थ है ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! भावितात्मा साधु स्त्री के कितने रूप बनासकते हैं ? अहो गौतम ! जैसे काम पीडित पुरुष अपने हस्त से स्त्री का इस्त मजबुत पकडता है अथवा जैसे गाडी के चक्र की नाभी। yo " शन्दाथा मूत्र x x 4. अनुवादक-बालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋमिजी 85 भा० भोजन भो० भोगव कर णो नहीं वा. वमनकरे त उन को ते. उस सू० रूक्ष पा. पानी भोक भोजन से अस्थि अ० अस्थिमिज प० पतली भ० होती है ॥ ३ ॥४॥ अ. अनगार मं० भगवन् भा० भावितात्मा वा वाह्य पो० पुद्गल अ० विना ग्रहण किये प० समर्थ ए. अणालोइय पडिकते कालं करेइ, नत्थितस्स आराहणा अमाईणं तस्स ठाणस्स आले.इय पडिबंते कालं करेइ अस्थि तस्स आराहणा ॥ सेवं भंते भंतेत्ति तईयसए चउत्थो उहेसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥४॥ अणगारेणं भंते ! भावियअप्पा बाहिरए पोग्गले अपरियाइसा षभू एगं महं इत्थिरू- परिणमते हैं इस तरह शक्ति कम होने से अमायी चक्रेयादि लब्धि नहीं करते हैं. अब मायी और अमायी को फल बताते हैं. मायावी प्रमादी वैकेय करनेमें लब्धि फोडने से अथवा सरस आहारादि के दोष लगने से पदि उम की आलोचना प्रतिक्रमण करे नहीं तो वह जिनाज्ञा का आराधक नहीं होसकता है. और जो ममापी अपमादी होते हैं वे निर्दोष आहार भोगवने से व चक्रेयादि नहीं करने से अल्प दोपी होते हैं. जो कुच्छ उपस्थपना मे दोष लगता है उस की गुरु की समक्ष आलोचना करने से जिनाज्ञा का आराधक होता है. अहो भगवन् ! आपके वचन तथ्य हैं. आप जैसे कहते हैं वैसे ही हैं. यह तीसरा शतकका नीया उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥ ४ ॥ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी * भावाथ ब्दार्थ नो केकोई पुरुप अ० खङ्ग च० चर्मका पा० पात्र ग• ग्रहण कर ग जाये ए. ऐमे अ० अन्गार भा. भावितात्मा अ० म्यान पा० पात्र ह. हस्त में लेकर अ० आत्मा से उ. अर्ध वे. आकाश में उ० जावे हं० हां उ• जावे ।। ३ ।। अ० अनगार भं० भगवन् भा. भावितात्मा ए. एकदिशि में प. सूत्र 2. पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगरती) मूत्र 8388 रिसे असिचम्मपायं गहाय गच्छेज्जा एवामेव अणगारेवि भाधियप्पा असिचम्मपायं हत्थकिचगएणं अप्पाणेणं उर्दु वेहासं उप्पएजा ? हंता उप्पइज्जा । अणगारेणं. भंते ! भावियप्पा केवइयाई पभ असिचम्महत्थकिच्चगयाई रूवाई विउवित्तए ? गोयमा ! से जहा नामए जुवई जुवाणे हत्थेण हत्थे गेण्हेज्जा तं चेव जाव विउविं- सुवा ३ ॥३॥ से जहा नामए केइपुरिसे एगओ पडागं काउं गच्छेजा एवामेव अ- वन का म्यान हस्त में लेकर कोई पुरुप जावे वैसे ही क्या गगनगामिनी विद्या से भावितात्मा माधु पग चर्म पत्र [म्यान ] हस्त में लेकर आकाश में जाये ? हां गौतम ! वैसे आकाश में जावे. अहो भगवन् ! हस्त में म्यान होवे वैसे कितने रूप वह भावितात्मा अनगार वनावे ? अहो गौतम ! जैसे काम पीडित युवान पुरुष युवती को अपने हस्त से पकडता है यावत् एक लक्ष योजन का जम्बूद्वीप भरे. यह मात्र वैक्रेय का विषय है परंतु इतना रूप किसीने किया नहीं, करते नहीं, और करेंगे नहीं ॥३॥ अहो भगवन् ! तीसरा शनकका पांचवा उद्देशा भावार्थ ९.9 Y O0 शब्दा ५४६ सूत्र । • अनुवादक-शनमालचारी मुनि श्री अमोलक वापिनी 87. की ना नाभी अ• आराले उ० युक्त सि. होवे ए. ऐसे अ० अनगार भा० भावितात्मा वि० चैत्रेय म. ममुद्घात स० नीकाले जा. यावत् प० समर्थ मो० गौतम अ० अनगार भा० भावितात्मा के० संपूर्ण • जम्मूदीप को व० बहुत इ० स्त्रीरूप से आ० आकीर्ण वि. विकीर्ण जा. यावत् ए. यह गो• गौतम भ० अनगार भा. भावितात्मा का अ०यह एक ऐसा वि. विषय वि० विषय मात्र बु. कहा नो नहीं सं० गंपचि वि० विकुर्वणा की ए ऐसे प.. परिपाटी ने जानना जा. यावत् सं० पालखीरूप ॥२॥ ज० हत्यसि गेण्हेजा, चक्करसवा नाभी अरगोउत्ता सिया एवामेव अणगारेवि भावियप्पा विउव्विय समुग्धाएणं समोहणइ जाव पभूणं ? गोयमा ! अणगारेणं भावियप्पा के- वलकप्पं जंवृद्दीवं दीवं बहूहिं इत्थिरूवेहि आयन्नं वितिकिण्णं जाव एसणं' गोयमा : अणगारस्त भावियप्पणो अयमेवारूचे विसए विसयमेत्ते बुइए नोचेवणं संपत्तीए, वि. कुब्बिसुका ३, एवं परिवाडीए नेय जाव संदमाणिया ॥ २ ॥ सेजहा नामए केइपु- में आरे को भीडते हैं वैसे ही लब्धिवंत साधु वैकेय समयात करके एक लक्ष योजन का जम्बूद्वीप स्वीक रूप मे भरने को समर्थ है. अहो गौतम ! भाविनात्मा अनगार को बैक्रेयं करने का यह विषय कहा है। परंतु इतने रूप किसीने गत काल में किये नहीं है, वर्तमान में नहीं करते हैं, और आगामिक में करेंगे नहीं. जमे खी रूप का कहा वैसे ही पुरुष वगैरह का अनुक्रम से पालखी नक का कहना ॥ २॥ जैसे * मकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालामसादनी * साथ * 0७ ag पंचयांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र - शब्दाथकडे ॥ ४ ॥ से वह ज. जैसे के• कोई पुरुप ए० एकदिशा में प० पलांठी का० करके चि० खडारहे ॥ ५ ॥ अ• अनगार भं० भगवन् वा० वाह्य पा० पुद्गल अ० विना ग्रहण किये १० समर्थ ए. एक म० ॥ ४ ॥ से जहा नामए के पुरिसे एगओ पल्हत्थियं काउं चिट्ठेजा, एवामेव अणगारे भावियप्पा तं चेव जाव विकुविसुवा ३ । एवं दुहओ पल्हत्थियपि । से जहा नाम- ए केइ पुरिसे एगओ पलियंकं काठं चिट्ठिजा तं चेव विकुब्बिसुवा ३ । एवं दुहओ पलियंकंपि ॥ ५ ॥ अणगारेणं भंते ! भाविअप्पा वाहिरए पोग्गले अपरियाइत्ता पभू एग महं आसरूवंवा, हत्थिरूवंवा, सीहरूवं या बग्घ-बग्ग-दीविय-अच्छ-तरच्छ-परासर- भावाथ कार कहा वैसे ही यहां जानना ऐने ही दो उपवितों का जानना. ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! जैसे कोई पुरुप एक तरफ पल्हांठी से खडा रहता है, ऐसे ही क्या भावितात्मा अनगार आकाश में गमन कर सकते हैं? हां गौतम ! वे आकाश में गमन कर सकते हैं यावत् एक लक्ष योजन जम्बूद्वीप भर सकते हैं. ऐसे दो पल्हाठी से भी आकाश में जा सकते हैं. ऐसे ही एक पर्यकासन और दो तरफ पर्यकासन मे आकाश में जा सकते हैं यावत् एक लक्ष योजन का जम्बूद्वीप भर सकते है. परंतु इतना किसीने किया नहीं, करते नहीं व करेंगे नहीं. ॥५॥ अहो भगवन् ! लब्धिवंत भावितात्मा अनगार वाहिर के पुद्गल ग्रहण किये विना क्या अश्व का ख्य, हस्ती का रूप, निह का रूप, व्याघ्र का रूप, चित्ता का तीसग शतक का पांचवा उद्देशा 988- शब्दार्थ सत्र ५४८ . 46 अनुवादक-चालनमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 6 पताका जैसे ह. हस्त में लेकर अ० स्वतः से उ० ऊर्थ वे० आकाश में उ० अंडे अ० अनगार मा० भावितात्मा ए० एकदिशा में ज० यज्ञोपवित कि० लेकर अ० स्वतः से उ० ऊर्च वे० आकाश में उ० णगारे भाविअप्पा एगओ पडागाहत्थकिच्चगएणं अप्पाणेणं उढेवेहासं उप्पएजा? हंता गोयमा! अणगारेणं भंते ! भावियप्पा केवइयाई पभू एगओ पडागा हत्थकिच्चगयाई रुवाई विउवित्तए, एवं जाव विकुट्विसुवा ३ । एवं दुहओ पडा- गंपि। से जहानामए केइपुरिसे एगओ जणोवइ काउं गच्छेजा, एवामेव अणगा- रवि भावियप्पा एगओ जनोवइयं किच्चगएणं अप्पाणेणं उर्दु वेहासं उप्पाएजा? हंता उप्पाएजा । अणगारेणं मंते ! भाविअप्पा केवइयाई पभू एगओ जणोवइयं किच्च- गयाई रुवाई विउवित्तए तं चेव जाब विकुब्बिसुवा-३, | एवं दुहओ जणोवइयंपि जैसे कोई पुरुष एकदिशी में पताका करके जावे वैसे ही कोई भावितात्मा अनगार वैक्रेय रूप से एकदिशा की पनाका हस्त में रखकर क्या जाने को समर्थ है ? हां गौतम ! वह जासकते हैं वगैरह सब पहिले जैसे कहना. ऐमे ही दो पताका का अधिकार जानना. अहो भगवन् ! जैसे कोई एक तरफ यज्ञोपवित धारन कर नावे वैसे ही क्या भावितात्मा साधु एकदिशा की उपवित का रूप धारन कर आकाश में जावे ? हां गौतम ! जासकते है अहो भगवन् ! ऐसे कितने रूप बना सकते हैं ? अहो गौतम ! जैसे म्यान का अधि प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादनी * भावार्थ शब्दा सत्र भावार्थ पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवता) सूत्र <28 हां प० ममर्थ से वह भं० भगवन् कि० क्या आ० आत्म ऋद्धि से प० दनरे की ऋद्धि से ग़: जावे माईणं भंते ! तस्सठाणस्स अणालोइयः · पडिकते कालं करेइ कहिं उववज्जइ ? गोयमा ! अण्णयरेसु अभियोगेसु देवलोगेसु देवत्ताए उववज्जइ अमाईणं- तस्स ठाण- स्स आलोइथ पडिक्वते कालं करेइ कहिं उववज्जइ, गोयमा ! अण्णयरेसु अणाभियो- गिएसु देवलोएसु देवत्ताए उववज्जइ सेवभंते भंतेत्ति ॥ गाहा-इत्थी, असी, है या या अन्य की ऋद्धि से जाता है ? अहो गौतम ! आत्म ऋद्धि मे जाता है परंतु अन्य को ऋद्धि से नहीं जाता है. आत्म कर्म से जाता है परंतु अन्य के कर्म से नहीं जाता है, आत्म प्रयोग से जाता है परंतु अन्य के भयोग से नहीं जाता है, ऊर्ध पताका के आकार से जाता है परंतु अधौ पताका के आकार से नहीं जाता है. अहो.भगवन् ! क्या यह अनगार अश्व कहाता है ? अहो गौतम ! अनगार अश्व नहीं कहाता.है परंतु गार कहता है. ऐसे ही अटापट तक जानना. अहो भगवन् ! उक्त प्रकार के रूप क्या मायावी बनाते हैं या अमायावी-अपमादी बनाते हैं ? अहो गौतम! यरूप मायावी साधु बनाते हैं परंतु अयायावी नहीं बनाते हैं वगैरह सब चौथे उद्देशे जैसे जानना. अहोभावन् ! मयावो उस की आलोचनाप्रतिकरण वगैरह किये विना वहांपर कोली कर जावं तो कहां जावे ? अहो गौतम ! वैसे प्रथम देवलोक से बारहवे देवलोक तक में इन्द्रादि: देवों...के सरकपने उत्पन्न होते हैं अहो भगवन् ! अमायावी आलोचना प्रतिक्रमण वगैरह करके कहां: उत्पन्न होवे ? अहो गोतमः। वे सेवकपने नहीं उत्पन्न होते हैं परंतु सामानिक देव व अहमेंद्र देवपते .सर्वार्थ सिद्ध विमान तक नीसरा शतक का पांचवा उद्देशाः . 50 ५५० - अनुवादक बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी-87 शब्दार्थ वडा आ. अश्वम्प ह. हस्ति सीमिहरूप व व्याघ्र व चित्ता दीदीपडा अ. रीछ त तरख प. अष्टापद अ. क्रय करने को णो नहीं इ. यह अर्थ स. समर्थ ॥ ६ ॥ अ० अनगार भ० भगवन भा० भावितात्मा ए० एक म० वटा आ० अश्वरूप अ० वैक्रेयकर अ. अनेक जी० योजन ग. जाने को है। ख्वंयां अभिजंजित्तए? णो इणढे समढे ॥ अणगारेणं एवं बाहिरए पोग्गले परिया- सत्र इत्ता पभू ॥ ६ ॥ अणगारेणं भंते ! भाविअप्पा एगं महं आसरूवंवा अभिउंजित्ता अणेगाई जोयणाई गमित्तए ? हंता पभू । से भंते ! कि आयड्डीए गच्छइ परिडीए गच्छइ ? मोयमा ! आयड्ढीए गच्छइ णो परिड्डीए. एवं. आयकम्मुणा परकम्मग्णा, आयप्पयोगेणं परप्पयोगेण, उस्सिओदयंवा गच्छइ, प्रयोदयंवा गच्छइ । सेणं भंते ! किं अणगारे आस ? गोयमा! अणगारेणंसे नो खलु से आसे एवं जाव परासररूवं वासेभंत कि माई विकुबइ, अमाई विकुव्वइ ? गोयमा ! मायी विकुब्बइ, नो अमायीविकुन्बइ । भावार्थ का दीयडीका रूप, रीछका रूप,तरखका रूप, अष्टापदका रूप और अन्य भी ऐसे रूप क्या बना सकते ओ गोनम : यह अर्थ योग्य नहीं है,अर्थात् वाहिर के पुद्गल ग्रहण किये बिना वैसे, रूप नहीं बना सकते हैं. परंतु यादिर के पुद्गल ग्रहण कर ऐसे रूप · वनासकते हैं :॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! भावितात्मा अनगार एक यडा अवका रूप बनाकर अनेक योजन तक जाने को क्या समर्थ है ? हां गौनमः भवका रूप बनाकर अनेक योजन तक जाने को समर्थ है. अहो भगवन् ! क्या बद्द आत्म ऋद्धि से जाता * प्रकाशक रानाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * १. CAM ०७ सूत्र पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवता) सूत्र १ टदार्थ हा प० समर्थ से वह भं० भगवन् कि० क्या आ० आत्म ऋदि से. ५० दनरे की वृद्धि से ग़: जाये माईणं भंते ! तस्सठाणस्स अणालोइयः · पडिकते कालं करेइ कहिं : उववज्जइ ? गोयमा'! अण्णयरेसु अभियोगेसु देवलोगेसु देवत्ताए उववज्जइ अमाईणं तस्स ठाण- स्स आलोइथ पडिकंते कालं करेइ कहिं उक्वनइ गोयमा ! अण्णयरेसु अणाभियो- गिएसु देवलोएसु देवत्ताए उबवज्जइ सेवंभंते भंतेत्ति ॥ गाहा-इत्थी, असी, भावार्थ है या अन्य की ऋद्धि से जाता है ? अहो गौतम ! आत्म ऋद्धि मे जाता है परंतु अन्य को ऋद्धि से नहीं जाता है. आत्म कर्म से जाता है परंतु अन्य के कर्म से नहीं जाता है, आत्म प्रयोग से जाता है परंतु अन्य के प्रयोग से नहीं जाता है, ऊर्ध पताका के आकार से जाता है परंतु अधों पताका के आकार में नहीं जाता है. अहो भगवन् ! क्या यह अनगार अश्व कहाता है ! अहो गौतम ! अनगार अश्व नहीं कहाता.है परंतु अगार कहता है. ऐसे ही अष्टापट तक जानना. अहो भगवन् ! उक्त प्रकार के रूप क्या मायावी बनाते हैं या अमायावी-अपमादी बनाते हैं ? अहो गीतम! बरूप मायावी साधु बनाते हैं परंतु अमायावी नहीं बनाते हैं वगैरहे सर चीथे उद्देश जैसे जानना. अहो भगवन् ! मयावो उसकी आलोचना प्रतिकरण वगैरह किये विना वहांपर कालकर जाव तो कहां जावे ? अहो गौ म ! वैसे प्रथम देवलोक से बारहवे देवलोक तक में इन्द्रादि ..देवों...के भाकपने उत्पन्न होते हैं अहो भगनन् ! अमायावी आलोचना प्रतिक्रमण वगैरह करके कहां उत्पन्न होवे ? अहो गोतम! वे सेवकपने नहीं उत्पन्न होते हैं परंतु सामानिक देव व अहमेंद्र देवपने सर्वार्थ सिद विमान तक नीसरा शतक का पांचवा उद्देशाgster . CY x शब्दार्थ ५५२ सूत्र भावार्थ - अनुवादक-पालपामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी > गो० गौतम आं. आत्म ऋद्धि नो नहीं प० दूसरे को ऋद्धि से पूर्ववत् ॥ ३ ॥ ५ ॥ अ० अमगार भं० भगवन् मा• मायी मि० मिथ्या दृष्टि वी वीर्य लब्धि से वि• विभंग ज्ञान लब्धि मे या वाणारसी न० नगरी में स० विकुर्वणा कर रा० राजगृह न० नगर में रू० रूप ना० जाने पा० पहागा, जण्णोवइएय होइ बोधव्वे । पल्हत्थिय पलियंके, अभियोगविकुन्वणा मायी तइयसए पंचमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥ ५ ॥ * ॥ अणगारेणं भंते भावियप्पा मायी मिच्छदिट्ठी वीरियलडीए वेउव्यियलडीए विभंग- उत्पन्न होते हैं. अहो भगान्! आपने कहा सो सत्य है. अब इस में उद्देशा का स्वरूप गाथा द्वाग संक्षेप से कहते हैं. स्त्रीरूप का, खड्ग म्यान का, पताका का, उपवित का, पल्हांठी का, पर्यकासन का, और मायी आभियोगिक देव-सवकपने उत्पन्न होते हैं वैसा कहा. यह तीसरा शतक का पांचवा उद्देशा संपूर्ण दुभा ॥ ३ ॥५॥ अब इस छठे उद्देशे में भी वैक्रेय संबंधी प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! मायी मियादृष्टि भावितात्मा अनगार वीर्य लन्धि व विभंग ज्ञान लब्धि मे वाणारसी नगरी की विकुर्वणा करके क्या राजगृही नगरी में मनुप्प पशु वगैरह के रूप जाने देखे ! हां गौतम ! विभंग ज्ञान से जाने और अवधि दर्शन से देखे. अहो भगवन् ! क्या वे यथातथ्य भाव जाने, देखे या अन्यथा भाव जाने देखे ? अहो गौतम ! यथा * प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * 50 सूत्र 8 पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भगवती) सूत्र 3987- देखे है. हां जा० जाने पा० देखें से• वह किं० क्या. त० तथा भाव जा० जाने पा० देखें अ० अन्यथा भा० भाव को जा० जाने पा० देखे गो० गौतम णो० नहीं त० तथाभाव को जा० जाने पा० देखे अंक अन्यथा भाव को जा० जाने पा• देखे से०. वह के० कैसे ए० एसा बु० कहा जाता है जो नहीं त. तथा भाव को जा० जाने पा० देखे अ० अन्यथा भाव को जा० जाने पा० देखे गो० गौतम त उसको ए. ऐसा भ० होवे अ० मैं रा० राजगृहनगर की स० विकुर्वणा कर वा० वाणारसी न० नगरी में रू० नाणलडीए वाणारसिं नगरिं समोहए समोहणित्ता रायगिहे नयरे रूवाई जाणई पासइ ? हंता जाणइ पासइ ॥ से भंते ! किं तहाभावं जाणइ पासइ, अण्णहा भावं जाणइ पासइ ? गोयमा ! णो तहाभावं जाणइ पासइ अण्णहा भावं जाणइ पासइ॥ से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ णो तहाभावं जाणइ पासइ अण्णहा भावं जाणइ पासइ ? गोयमा ! तस्सणं एवं भनइ एवं खलु अहं रायगिहे नयरे समोहए समोह- तथ्य जाने नहीं व देखे नहीं परंतु अन्यथा भाव जाने व देखे. अहो भगवन् ! किस तरह वह यथातथ्य भाव जाने, देखे नहीं; परंतु अन्यथा भाव जाने, देखे ? अहो गौतम ! उन को ऐसा होवे कि अहो मेने राजगृह नगरी का वैक्रेय किया और वाणारसी नगरी में रहे हुवे मनुष्य पशु वगैरह के रूप रहा हूं. इस तरह उन अन्य दर्शनियों को दृष्टि की विपरीतता से मति की विपरीतता होती है. तीसरा शतकका छठा उद्देशा g></ भावार्थ DYC x ५५२ - अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलफ ऋपिनी 8 शब्दार्थ गो गौतम आर आत्म ऋद्धि नो नहीं प० दूसरे की ऋद्धि से पूर्ववत् ॥ ३ ॥ ५ ॥ अ० अमगार भं भगवन् मा• मायी मि० मिथ्या दृष्टि वी वीर्य लब्धि से वि० विभंग ज्ञान, लब्धि मे वा • वाणारसी न० नगरी में स० विकुर्वणा कर रा० राजगृह न• नगर में रू० रूप ना० जाने पा० पहागा, जण्णोवइएय होइ बोधव्वे । पल्हत्थिय पलियंके, अभियोगविकुव्वणा मायी सूत्र तइयसए पंचमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥ ५ ॥ * ॥ अणगारेणं भंते मावियप्पा मायी मिच्छदिट्ठी वीरियलडीए वेउब्धियलद्वीए विभंग- भार्थ उत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! आपने कहा सो सत्य है. अब इस में उद्देशा का स्वरूप गाथा द्वाग संक्षेप से कहते हैं. खोप का, खड्ग म्यान का, पत्ताका का, उपवित का, पल्हांठी का, पर्यकासन का, और मायी आभियोगिक देव-सेवकपने उत्पन्न होते हैं वैसा कहा. यह तीसरा शतक का पांचवा उद्देशा संपूर्ण हुआ ॥ ३ ॥ ५ ॥ अब इस छठे उद्देशे में भी चक्रेय संबंधी प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! मायी मिध्यादृष्टि भावितात्माई अनगार वीर्य लन्धि व विभंग ज्ञान, लब्धि से वाणारसी नगरी की विकुर्वणा करके क्या राजगृही नगरी में मनुप्प पशु वगैरह के रूप जाने देखे ! हां गौतम ! विभंग ज्ञान से जाने और अवधि दर्शन से देखे. अहो भगवन् : क्या वे यथातथ्य भाव जाने, देखे या अन्यथा भाव जाने देखे ? अहो गौतम ! यथा * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायमी ज्वालाप्रसादजी * ५५३ 8 पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र -998- मार्थ देखे हैं. हां जा० जाने पा० देखें से वह किं० क्या त० तथा भाव जा जान पा० देखें अ० अन्यथा भा० भाव को जा० जाने पा० देखे गो० गौतम णो० नहीं ततथाभावं को जा० जाने पा० देखे अं० अन्यथा भाव को जा० जाने पा• देखे से०. वह के० कैसे ए. एसा बु० कहा जाता है जो नहीं त. तथा भाव को जा० जाने पा- देखे अ० अन्यथा भाव को जा० जाने पा० देखे गो० गौतम त उसको ए. ऐसा भ० होवे अ० मैं रा० राजगृहनगर की स० विकुर्वणा कर वा० वाणारसी न० नगरी में रू० नाणलडीए वाणारसिं नगरिं समोहए समोहणित्ता रायगिहे नयरे रूवाई जाणइं पासइ ? हंता जाणइ पासइ ॥ से भंते ! किं तहाभावं जाणइ पासइ, अण्णहा भावं जाणइ पासइ ? गोयमा ! णो तहाभावं जाणइ पासइ अण्णहा भावं जाणइ पासइ॥ से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ णो तहाभावं जाणइ पासइ अण्णहा भावं जाणइ पासइ ? गोयमा ! तस्सणं एवं भनइ एवं खलु अहं रायगिहे नयरे समोहए समोह- भावार्थ तथ्य जाने नहीं व देखे नहीं परंतु अन्यथा भाव जाने व देखे. अहो भगवन् ! किस तरह वह यथातथ्य भाव जाने, देखे नहीं; परंतु अन्यथा भाव जाने, देखे ? अहो गौतम ! उन को ऐसा हावे कि अहो मेंने राजगृह नगरी का वैक्रेय किया और वाणारसी नगरी में रहे हुवे मनुष्य पशु वगैरह के रूप रहा हूं. इस तरह उन अन्य दर्शनियों को दृष्टि की विपरीतता से मति की विपरीतता होती है. 48 तीसरा मृतकका छठा उद्देशा g0 - x शब्दार्थ ५५२ सूत्र भावार्थ - अनुवादक-पालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 80- गो० गौतम र आत्म ऋद्धि नो नहीं प० दूसरे की ऋद्धि से पूर्ववत् ॥ ३ ॥ ५॥ अ० अमगार मं० भगरन् मा• मायी मि० मिथ्या दृष्टि वी. वीर्य लब्धि से वि० विभंग ज्ञान, लब्धि मे या वाणारसी न० नगरी में स० विकुर्वणा कर रा. राजगृह न. नगर में रू० रूप ना० जाने पा० पहागा, जण्णोवइएय होइ बोधब्वे । पल्हत्थिय पलियंके, अभियोगविकुव्वणा मायी तइयसए पंचमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥ ५ ॥ * ॥ अणगारेणं भंते भावियप्पा मायी मिच्छदिट्ठी वीरियलडीए वेउव्यियलडीए विभंग- उत्पन्न होते हैं. अहो भगान् ! आपने कहा सो सत्य है. अब इस में उद्देशा का स्वरूप गाथा द्वाग संक्षेप से कहते हैं. खीरूप का, खड्ग म्यान का, पताका का, उपवित का, पल्हांठी का, पर्यकासन का, और मापी आभियोगिक देव-सेवकपने उत्पन्न होते हैं वैसा कहा. यह तीसरा शतक का पांचवा उद्देशा संपूर्ण हुआ ॥ ३ ॥ ५ ॥ अब इस छठे उद्देशे में भी वक्रेय संबंधी प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! मायी मिथ्यादृष्टि भावितात्मा अनगार वीर्य लन्यि व विभंग ज्ञान. लब्धि से वाणारसी नगरी की विकुर्वणा करके क्या राजगृही नगरी में मनुप्प पशु.वगैरह के रुप जाने देखे ! हां गौतम ! विभंग ज्ञान से जाने और अवधि दर्शन से देखे. अहो. भगवन् ! क्या वे यथातथ्य भाव जाने, देखे या अन्यथा भाव जाने देखे ? अहो गौतम ! यथा * मकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायशी ज्वालाप्रसादजी * 30 १९३ *889 पंचमांग विवाह पप्णत्ति ( भगवती) सूत्र-887 देखे हैं. हां जा० जाने पा० देखें से वह कि० क्या त० तथा भाव जा० जाने पा० देखे अ० अन्यथा १०भा० भाव को जा० जाने पा० देखे गो० गौतम णो० नही त० तथाभाव को जा० जाने पा० देखे अं० अन्यथा भाव को जा० जाने पा• देखे से वह के० कैसे ए. एसा बु० कहा जाता है जो नहीं - त. तथा भाव को जा० जाने पा० देखे अ० अन्यथा भाव को जा० जाने पा० देखे गो० गौतम त उसको ए. ऐसा भ० होवे अ० मैं रा० राजगृहनगर की स० विकुर्वणा कर वा० वाणारसी न० नगरी में क. नाणलडीए वाणारसिं नगरिं समोहए समोहणित्ता रायगिहे नयरे रुवाई जाणई पासइ ? हंता जाणइ पासइ ॥ से भंते ! किं तहाभाव जाणइ पासइ, अण्णहा भावं जाणइ पासइ ? गोयमा ! णो तहाभावं जाणइ पासइ अण्णहा भावं जाणइ पासइ ॥ से केणतुणं भंते ! एवं वुच्चइ णो तहाभाव जाणइ पासइ अण्णहा भावं जाणइ पासइ ? गोयमा ! तस्सणं एवं भन्इ एवं खलु अहं रायगिहे नयरे समोहए समोह- तथ्य जाने नहीं व देखे, नहीं परंतु अन्यथा भाव जाने व देखे. अहो भगवन् ! किस तरह वह यथातध्य भाव जाने, देखे नहीं; परंतु अन्यथा भाव जाने, देखे ? अहो गौतम ! उन को ऐसा होने कि अहो मैने राजगृह नगरी का वैक्रेय किया और वाणारसी नगरी में रहे हुवे मनुष्य पशु वगैरह के रूप देख रहा हूं. इस तरह उन अन्य दर्शनियों को दृष्टि की विपरीनता से मति की विपरीतता होती है. जैसे 13488 तीसरा मृतकका .छहा उद्देशा - भावार्थ .
42 अनुवादक-पालप्रमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी रूप जा० जानता हूं पा० देखता हूं से उस से उस दं०दर्शन में वि० विपरीतता भव्होवे ते०इस लिये जा. यावन् पा० देखे ॥ १ ॥ पूर्ववत् ॥ २॥ अ० अणगार भं० भगवन मा० मायी मि. मिथ्यादृष्टि वी० णित्ता वाणारंसीए नयरीए रूवाइं जाणामि पासामि, से से दंसणे विवच्चासे भवइ, से तेणटेणं जाव पासइ ॥१॥अणगारेणं भंते ! भावियप्पामायी मिच्छदिट्ठीजाब रायगिहे नयरे समोहए समोहएत्ता वाणारसीए नयरीए रूवाई जाणइ पासइ ? हंता जाणइ पाप्तइ । तंव जाव तस्सणं एवं भवइ एवं खलु अहं वाणारसीए नयरीए समोहए समोहणित्ता रायगिहे नयरे रूवाई जाणामि पासामि । से से दसणे विवच्चासे भवइ से तेणटेणं जाव अण्णहाभावं जाणइ पासइ ॥ २ ॥ अणगारेणं भंते ! भावियप्पा मायी किमी दिशी मूढ पुरुष पूर्वादि दिशा नहीं जानसकता है; वैसे ही वह भी नहीं जान सकता है. इसलिये भहो गौतम ! वैसा अनगार यथातथ्य भाव नहीं जानसकता है परंतु अन्यथा, भाव जान सकता है ॥ १॥ अहो भगवन् ! मायी मिथ्या दृष्टि भावितात्मा अनगार वीर्यलब्धि, चक्रेय लब्धि व विभंग झान लब्धि से राजगृह नगर का वैक्रेय करके क्या वाणारसी में मनुष्यादि के रूप. जान व देख सक. ता है ! हां गौतम ! वह राजगृहीकी विकुर्वणा करके बाणारसीमें मनुष्यादिक के रूपं जान व देख सकता वगैरह सर अधिकार पहिले जैसे कहना. और उसे भी ऐसा विचार होवे कि मैंने बाणारसी का रूप * मकाशक-राजापंहादुर लाला मुखदेवसहायनी चालाप्रसादी भावार्थ 00 885 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगतो) सूत्र 887 वार्यलब्धि से वि० वैक्रेय लब्धिसे वि० विभंगज्ञान लब्धिसे वा० वाणारसी नगरी रा० राजगृह न० नगर की अं० बीच में ए. एक म• बडा ज० देशसमुह स० विकुर्वणा कर वा० वाणारसी नगरी. रा० राजगृह न० नगर की अं०वीचमें ए० एक म०वडा ज०देश समुह जाजाने पा०देखे हैं०हां जा जाने पा० देखे त० मिच्छदिट्ठी वीरिय लडीए विउव्दियलडीए विभंग णाणलडीए वाणारसिं नगरि रायगिहंच नगरं अंतरा य एगं महं जणवयवग्गं समोहए समोहएत्ता वाणारासें नगरि रायगिहं तंच अंतरा एगं महं जणवयवग्गं जाणइ पासइ? हंता जाणइ पासइ। से भंते! किं तहाभा जाणइ पासइ, अण्णहाभावं जाणइ पासइ ? गोयमा ! णो तहाभावं वाभार्थ बनाया और राजगृही में मनुष्यादि के रूप जान व देख सकता हूं. इस तरह दृष्टि की विपरीतता से पत्ति की विपरीतता होती है. इस से वह यथार्थ भाव नहीं जान सकता है व देख सकता है परंतु अन्यथा भाव जान सकता है व देख सकता है ॥२॥ अहो भगवन् ! मायी, मिथ्यादृष्टि . भावितात्मा अनगार वीर्य लब्धि, ओक्रेय लब्धि व विभंग ज्ञान लब्धि से राजगृही व वाणारसी नगरी के बीच में एक बडाजन-320 पद की विकुर्वणा करके क्या इन दोनों नगरी के बीच के जनपद को जान व देख सकता है ? हां गौतम! ऐसा मायावी मिथ्यादृष्टि भावितात्मा अनगार जान व देख सकता है. अहो भगवन् ! क्या वह तथा भाव जाने या अन्यथा भाव जाने ? अहो गौतम ! वह तथा भाव जाने परंतु अन्यथा भाव जाने नहीं. तीसरा शतकका छठा उद्देशा 982 शब्दार्थ 42 अनुवादक-पालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी 8. रूप जा० जानता हूं पार देखता हूं से उस से उस दं दर्शन में वि० विपरीतता भ होवे ते०इस लिये जा. यावत् पा० देखे ॥ १ ॥ पूर्ववत् ॥२॥ अ० अणगार भं० भगवन् मा० मायी मि० मिथ्यादृष्टि वी० णित्ता वाणारसीए नयरीए रूवाई जाणामि पासामि, से से दसणे विवच्चासे भवइ, से तेणटेणं जाव पासइ ॥१॥अणगारेणं भंते ! भावियप्पामायी मिच्छदिट्ठीजावरायगिहे नयरे समोहए समोहएत्ता बाणारसीए नयरीए रूवाई जाणइ पासइ ? हंता जाणइ पातइ । तंचेव जाव तस्सणं एवं भवइ एवं खलु अहं वाणारसीए नयरीए समोहए समोहणित्ता रायगिहे नयरे रूवाई जाणामि पासामि । से से दंसणे विवच्चासे भवइ से तेणटेणं जाव अण्णहाभावं जाणइ पासइ ॥ २ ॥ अणगारेणं भंते ! भावियप्पा मायी किमी दिशी मूढ पुरुष पूर्वादि दिशा नहीं जानसकता है, वैसे ही वह भी नहीं जान सकता है. इसलिय अहो गौतम ! वैसा अनगार यथातथ्य भाव नहीं जानसकता है परंतु अन्यथा, भाव जान सकता है। ..॥ अहो भगवन् ! मायी मिथ्या दृष्टि भावितात्मा अनगार वीर्यलब्धि, चक्रेय लब्धि व विभंग मान लब्धि मे राजगृह नगर का वैक्रय करके क्या वाणारसी में मनुष्यादि के रूप जान व देख सक- ना है ! हां गौतम ! वह राजगृहीकी विकुणा करके वाणारसीमें मनुष्यादिक के रूप जान व देख सकता वगैरह मर अधिकार पहिले जैसे कहना. और उसे भी ऐसा विचार होवे कि मैंने बाणारसी का * मकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालाप्रमादी र भावार्थ ३७ सूत्र । 1887 पंचमांग हिवराव पण्णात्ति ( भगवती) मूत्र 8-83 शब्दार्थ मात अ० सन्मुख हुवे से उस से उस दं० दर्शन की वि० विपरीतता भ०होवे सेवह तेइसलिये जायावत् पा०देखे ॥ ३ ॥ अ० अनगार भं० भगवन् अ० अमायी स० सम्यक् दृष्टि वी० वीर्य लब्धि से ० क्रेय भिसमण्णागए से से दसणे विवचा से भवइ से तेण?णं जाव पासइ ॥ ३ ॥ अ- गगोरणं भंते ! भावियप्पा अमायी सम्मादट्ठी बीरियलडीए, वेउन्विय लडीए, ओहि नाणलडीए रायगिहे नयरे समोहए समोहणित्ता वाणारसीए नयरीए रूबाई जाणइ पासइ ? हंता जाणइ पासइ । से भंते ! किं तहाभावं जाणइ पासइ अण्णहाभावं जाणइ पासइ ? गोयमा ! तहा भावं जाणइ पासइ, णो अण्णहाभावं जाणइ पासइ से केण?णं भंते एवं बुच्चइ ? गोयमा ! तस्सणं एवं भवइ एवं खलु अहं रायगिहे भावाथे सम्यग् दृष्टि अनगार वीर्य लब्धि, वैक्रेय लब्धि व अवधि ज्ञान की लब्धि से राजगृह नगर की विकुर्वणा कर वाणारसी नगरी में रहे हुवे मनुष्य पशु वगैरह को क्या जान व देख सके ? हां गौतम ! वे जान व देख सके. अहो गौतम ! चे यथातथ्य भाव जाने व देखे या अन्यथा भाव जाने व देखे ? अहो or गौतम ! वे यथातथ्य भाव जाने देखे परंतु अन्यथा भाव जाने. देखे नहीं. अहो भगवन् ! किस कारण से वे यथातथ्य भाव जाने देखे परंतु अन्यथा भाव जाने देखे नहीं ! अहो गौतम ! उन को ऐसा विचार हो कि मैं राजगृही नगरी की विकुर्वणा करके वाणारसी नगरी में मनुष्यादिक के रूप देखता हूं इस. 80 तीसरा शतक का छहा उद्देशा 88 शम्दाथ सूत्र 4. अनुवादक-पालामचारी मुनि श्री अमोलक कापजी 82 उस को ए. ऐसा भ० होवे ए० यह वा० वाणारसी न० नगरी ए. यह रा. राजगृह न० नगर ए० यह अं० बीच में ज० देश नो० नहीं ए० यह मु. मुझे वी० वीर्य लब्धि वे० क्रेय लब्धि वि. विभंग शान लब्धि इ० ऋद्धि जु० धुति ज० यश व० बल वी० वीर्य पु० पुरुषात्कार पराक्रम ल० लब्ध प. जाणइ पासइ, अण्णहाभा जाणइ पासइ ॥ से केण?णं भंते जाव पासइ ? गो- यमा ! तरस खलु एवं भवइ एस खलु वाणारसीए नयरीए एस खलु रायगिहे नयरे, एस खलु अंतरा एगं महं जणवयवर्ग, नो खलु एस महं वीरियलही बेउन्चिय. लढी, विभंगनाणलढी, इट्ठी, जुत्ती, जसे, बले, वीरिए,पुरिसक्कारपरक्कमे लढे पत्ते अ. अहो भगवन् ! वह किस कारन से तण भाव जाने व देखे अन्यथा भाव जाने नहीं देखे नहीं ?. अहो गौतम ! जैसे ऐसा विचार होवे कि यह वाणारसी नगरी है, यह राजगृही नगरी है. यह इन दोनों की बीच का प्रदेश है. परंतु वह ऐसा नहीं जान सकता है कि यह मुझे वीर्य लब्धि, वैफ्रेय लब्धि, ज्ञान लब्धि, (दि, गुति, कान्ति, यश, बल, वीर्य, पुरुषात्कार व पराक्रम से मीला है, प्राप्त हुवा है यावत् सन्मुख हुना है. इस तरह उसे दर्शन की विपरीतता से मति की विपरीतता होती है अर्थात् ये मेरे बनाये हुवे नहीं है परंतु स्वाभाविक है. या विभंग ज्ञान से विपरीत मानता है. इसलिये अहो गौतम ! ऐसा कहा है। कि यथार्थ भाव नहीं जान व देस सकता है परंतु अन्यथा भाव जान व देख सकता है. ॥ ३ ॥ अमायी *प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ * ५५७ 1980- पंचमांग हिवाव पण्णात्ति ( भगवती) सूत्र 887 शब्दार्थमाप्त अ० सन्मुख दुवे से उस से उस दं दर्शन की वि० विपरीतता भ०होवे से यह तेइसलिये जायावत् पा०देखे ॥ ३ ॥ अ० अनगार भं० भगवन् अ० अमाथी स० सम्यक् दृष्टि वी. वीर्य लब्धि से वे वैक्रेय भिसमण्णागए से से दसणे विवच्चा से भवइ से तेणटेणं जाव पासइ ॥ ३ ॥ अ- णगोरेणं भंते ! भावियप्पा अमायी सम्मादिट्ठी नीरियलहीए, वेउन्चिय लडीए, ओहि नाणलडीए रायगिहे नयरे समोहए समोहणित्ता वाणारसीए नयरीए रुवाई जाणइ पासइ ? हंता जाणइ पासइ । से भंते ! किं तहाभाव जाणइ पासइ अण्णहाभावं जाणइ पासइ ? गोयमा ! तहा भावं जाणइ पासइ, णो अण्णहाभाव जाणइ पासइ से केण्टेणं भंते एवं बुच्चइ ? गोयमा ! तस्सणं एवं भवइ एवं खलु अहं रायगिहे भावार्थ सम्यग् दृष्टि अनगार वीर्य लब्धि, वैक्रेय लब्धि व अवधि ज्ञान की लब्धि से राजगृह नगर की विकुर्वणा कर वाणारसी नगरी में रहे हुवे मनुष्य पशु वगैरह को क्या जान व देख सके ?हां गौतम ! वे 'जान व देख सके. अहो गौतम ! वे यथातथ्य भाव जाने व देखे या अन्यथा भाव जाने व देखे ? अहो गौतम : वे यथातथ्य भाव जाने देखे परंतु अन्यथा भाव जाने.देखे नहीं. अहो भगवन् ! किस कारण से वे यथातथ्य भाव जाने देखे परंतु अन्यथा भाव जाने देखे नहीं ? अहो गौतम ! उन को ऐसा विचार होवे कि मैं राजगृही नगरी की विकुर्वणा करके वाणारसी नगरी में मनुष्यादिक के रूप देखता हूं इस. 94038- तीसरा शतक.का छठा उद्देशा 88888 ' शब्दार्थ सत्र अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी: ल० लब्धि से ओ० अवधि ज्ञान लब्धि से रा० राजगृह नगर में स० विकुर्वणा कर वा० वाणारसी न. नगरे समोहए समोहाणित्ता वाणारसीए नगरीए रूवाई जाणामि पासामि, से से दसणे अविवच्चा से भवइ से तेण?णं गोयमा ! एवं बुच्चइ । बीओवि आलावगो एवं चेव, णवरं वाणारसीए नयरीए समोहणा वेयन्वो ॥ रायगिहे नयरे रूवाई जाणइ पासइ ॥ ४ ॥ अणगारेणं भंते भावियप्पा अमायी सम्मदिट्ठी वीरिय लडीए वेउब्विय ल- लदीए ओहिनाणलबीए रायगिहं वाणारसिं नगरिंच अंतरा एगं महं जणवयवर्ग समोहए समोहएत्ता रायागहं नगरं वाणारसिं च नगरिं तंच अंतरा एगं महं जणवयव. गं जाणइ पासइ ? हंता जाणइ पासइ ॥ से भंते ! किं तहाभावं जाणइ पासइ तरह उन को दर्शन के समपने से मति की विपरीतता नहीं होती है इसलिये अहो गौतम ! वे यथातथ्य भाव जाने देख परंतु अन्यथा भाव जाने व देखे नहीं. इसी तरह दुमरा आलापक जाननाः परंतु इस में राजगृही का वैक्रय करके वाणारसी में मनुष्यादि के रूप देखने के स्थान बाणारसी का वैफ्रेय करके राजगृही में मनुप्यादिक के रूप देखे ॥ ४ ॥ अमायी सम्यग् दृष्टि भावितात्मा अनगार वीर्य लब्धि, वैक्रेय लब्धि, व अवधि ज्ञान की लब्धि से राजगृह नगर व चाणारसी के मध्य का एक बड़ा जनपद देश की विकुर्वणा करके उन दोनों की वीच का जनपद को क्या जाने व देखे ? हां गौतम ! ये जाने देखे. अहो भगवन् ! * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * শাখা oyo " ॥ ५॥ अहोई OO yo ५५९ 83 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्त (भगवती) सूत्र शब्दार्थ नगरी में रू० रूप जा० जाने पा० देखे हैं. हां जा जाने पा० देखे ॥.४ ॥.पूर्ववत् ॥ ५ ॥ अ० अण- अण्णहाभावं जाणइ पासइ ? गोयमा ! तहाभाव जाणइ पासइ, नो अण्णहा भावं सूत्र जाणइ पासइ । सेकेणटेणं ? गोयमा ! तस्सणं एवं भवइ नो खलु एस रायगिहे, णो खलु एस बाणारसी नगरी णो खलु एस अंतरा एगे जणवयवग्गे, एस खलु ममं वीरिय लढी वेउन्विय लडी, ओहिनाण लडी, इड्डी, जुत्ती, जसे बले वीरिए पुरि सक्कारपरक्कमे लढे पत्तेअभिसमण्णागए, सेसे दसणे अविवच्चासे भवइ,से तेणटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ, तहा भावं जाणइ पासइ, नो अण्हाभावं जाणइ पासइ ॥ ५ ॥ अण- भावार्थ क्या वे यथातथ्य भाव जाने देखे या अन्यथा भाव जाने देखे ? अहो गौतम ! वे यथा तथ्य भाव जाने देखे परंतु अन्यथा भाव जाने व देखे नहीं. अहो भगवन् ! किस कारन से वे यथातथ्य भाव जाने देखे परंतु अन्यथा भाव जाने देखे नहीं ? अहो गौतम! उन को ऐसा विचार होवे कि यह राजगृह नगर नहीं है, यह वाणारसी नगरी नहीं है यह उन के वीचका जनपद नहीं है, परंतु यह वीर्य लब्धि, वैफ्रेय लब्धि, अवधि ज्ञान की लब्धि, ऋद्धि, द्युति, यश, बल, वीर्य, · पुरुषात्कार पराक्रम मुझे प्राप्त हुवा है. इस तरह दर्शन के समपरिणाम से मति सम होती है. इसलिये अहो गौतम ! ऐसा कहा गया है कि वे यथातथ्य भाव जाने व देख परंतु अन्यथा भाव जाने देखे नहीं तीसरा शतक.का छठा उद्देशा 800 40 अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी' খা गार भं. भगवन् भा० भवितात्मा वा० बाह्य पो० पुद्गल अ. विना ग्रहणकिये ५० ममर्थ छ. एक म० बडा गा० ग्रामरूप न० नगर रूप जा० यावत् स० सन्निवेश वि० विकुर्वणा करने को गो० गौतम गोल नहीं इ० यह अर्थ स. समर्थ ए० ऐसे वि० दुसरा आ० आलापक न० विशेष वा० बाह्य पो: पुद्गल प० ग्रहण कर प० समर्थ ।। ६.॥ पूर्ववत् ॥ ७ ॥ च० चमर भ० भगवनू अ० अमुरेन्द्र को क. कितने गारेणं भंते ! भावियप्पा बाहिरए पोग्गले अपरियाइत्ता पभू एगं महं गामख्वंवा, नगररूवंबा, जाव सण्णिवेसरूवंवा विकुवित्तए ? गोयमा ! णोइणटेसमटे, एवं विती ओवि आलावओ । नवरं वाहिरए पोग्गले परियाइत्ता, पभू ॥६॥ अणगारेणं भंते ! केइवयाई पभू गामरूवाई, विकुव्यित्तए ? गोयमा ! से जहा नामए जुबई जुवाणे हत्येण हत्थे गेण्हेजा, तं चेव जाव विकुब्बितिवा ३, ॥ एवं जाव सण्णिवेसरूवंवा भावार्थ भगवन् ! भावितात्मा अनगार बाहिर के वैक्रेय पुद्गल ग्रहण किये विना क्या ग्राम, नगर यावत् सन्निवेश के रूप बनामकते हैं ? अहो गौतम ! वे बाहिर के पुद्गल ग्रहण किये बिना ऐसे रूप नहीं बना सकते हैं. परंतु वाहिर के पुद्गल ग्रहण कर ऐसे रूप बना सकते हैं ॥ ६॥ अहो भगवन् ! वे भावितात्मा अनगार कितने वैफ्रेय रूप बना सकते हैं ? अहो गौतम !..जैसे काम पीडित तरुण पुरुष तरुणी स्त्री को अपने हस्त से पकडता है ऐसे ही वे अनगार एक लक्ष योजन का जम्बूद्वीप को ग्राम नगर यावत् सनिवेश * मकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी - me शब्दार्थ oyo . सत्र 1589 पचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 98827 आ० आत्मरक्षक देव सा० सहस्र गो० गौतम च० चार च० चौसठ आ० आत्मरक्षक देव साय सहस्र ए. इस आ० आत्म रक्षक का व० वर्णन स० सर्व ई० इन्द्रका ज० जिस को ज. जितने आ अत्मरक्षेक ते० उतने भा० कहना ॥ ३॥६॥ रा० राजगृह न० नगर में जा. यावत् प० पर्युपासना करते एक ऐसा व० बोले स० शक दे० ॥ ७ ॥ चमरस्सणं भंते ! असुरिंदस्स अमुररण्णो कइ आयरक्खदेवसाहस्सीओ ? गोयमा : चत्तारि चउसट्ठीओ आयरक्खदेव साहस्सीओ पण्णत्ताओ । एएणं आय- रक्खवण्णओ ॥ एवं सव्वेसि इंदाणं जस्स जत्तिया आयरक्खा ते भाणियव्वा ॥ सेवं भंते भंतेत्ति जाव विहरइ ॥ तईय सए छट्ठो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥ ६ ॥ रायगिहे नयरे जाव पज्जुवासमाणे एवं वयासी सकस्सणं भंते ! देविंदस्स देवरण्णो के रूप से भर देवे. यह मात्र विषय है. इतने रूप किसीने किये नहीं, करते नहीं करेंगे नहीं ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! चमर नामक असुरेन्द्र को कितने हजार आत्मरक्षक देव कहे हैं १ अहो गौतम ! चम- रेंद्र को दो लाख छप्पन्न हजार आत्म रक्षक देव कहे हैं. ऐसे ही सब भुवनपति यावत् अच्युतेंद्र तक के भिन्न २ आत्म रक्षक देव जानना. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं ऐसा कहकर तप व मंयम से आत्मा को भावते हुवे श्री गौतम स्वामी विचरने लगे. यह तीसरा शतकका छट्ठा उद्देशा पूर्ण हुवा.॥३॥६॥ तीसरा शतकका सातवा उद्देशा 9882 भावार्थ ७० oya शब्दाथी को क० कितने लो० लोकपाल गो० गौतम च. चार लोकपाल प. प्रकले सो सोम ज. यम व० वरुण ० वैश्रमण ॥ १॥ ए० इन में भगवनू च० चार लो० लोकपाल के क० कितने विमान ५० प्ररूपे गो गौतम च० चार वि० विमान ५० प्ररूपे सं० संध्यप्रभ व० वरशिष्ट स० स्वयंजल ५० वल्गु ॥२॥ सूत्र कइलोगपाला पण्णता ? गोयमा ! चत्तारि लोगपाला पण्णत्ता तंजहा-सोमे, जने, वरुण, वेसमणे ॥ १ ॥ एएसिणं भंते ! चउण्हं लोगपालाणं कइविमाणा पण्णत्ता ? गोयमा ! चत्तारि विमाणा प० तंजहा-संझप्पभे, वरसिट्टे, सयंजले, वग्गू ॥ २॥ 4. अनुवादक-बालप्रमचरिमुनि श्री अमोलक ऋपिजी " * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालाप्रसादजी भार्थ छोटे उद्देशे के अंत में आत्मरक्षक देव का वर्णन कहा. आगे उद्देशे में लोकपालोंका वर्णन कहते हैं. गनगृही नगरी के गुणशील नामक उद्यान में भगवंत पधारें परिषदा वंदन करने को आइ और धर्मोप देश मुनकर पाछी गई. उस समय में श्री गौतम स्वामी श्रमण भगवंत को वंदना नमस्कार कर ऐसा . प्रश्न करनेलगे कि अहो भगवन् ! शक्र देवेंद्र को कितने लोकपाल कहे हैं? अहो गीतमः शक्रदेवेंद्र को चार लोक पाल कहे हैं. उन के नाम मोम, यम, वरुण और वैश्रमण. ॥ १ ॥ अहो भनवन् ! उन चार लोकपालों के कितने विमान कहे हैं अहो गौतम ! उन के चार विमान कहे हैं ? मोम का संध्यमभ २ यम का वराशि १ट ३ वरुण का स्वयंजल और ४ वैश्रमण का वल्गु ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! शक्रदेवेंद्र देवराजा * भब्दार्थ oyo S पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र-88- क० कहां भं० भगवन् स० शक्र दे० देवेन्द्र के सो० सोम म० महाराजा का सं० संध्यमभ म० महाविमान गो० गौतम जं. जंबूद्वीप के मं० मेरु पर्वत की दा दक्षिण में ई० इस र० रत्नप्रभा पु• पृथ्वी के २० बहुत स० समरमणीय भूमिभाग से उ० अर्ध्व चं० चंद्र सू० सूर्य ग० ग्रह ग० समुह न० नक्षत्र ता तारे ३० वहुत जो० योजन जा० यावत् पं० पांच अ० अवतंसक अ० अशोक अवतंसकं स०सप्तपर्ण अवतंसक च० चंपक अवतंसक चू० च्युत अवतंसक म० मध्य में सो० मौधर्म अवतंसक तक उस सो० सौधर्म अव- कहिणं भंते ! सक्करस देविंदस्स देवरण्णो सोमस्स महारण्णो संझप्पभे णामं महावि- माणे प० ? गोयमा ! जंबूद्दीवेदीवे मंदरस्स पन्बयस्स दाहिणेणं इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ उठें चंदिमसूरिमगहंगणनक्खत्ततारा - रूवाणं बहूई जोयणाई जाव पंच वडंसया प० तंजहा-असोयवडंसए, सत्तिवण्णं वडं- सए, चंपयवडंसए, चूयवडंसए, मझे सोहम्म वडंसए ॥ तस्सणं सोहम्मवडंसयरस का सोम नामक लोकपाल का संध्यमभ नामक विमान किस स्थान पर है ? अहो गौतम ! जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत की दक्षिण दिशामें रत्नप्रभा पृथी के बहुत मध्य भाग से बहुत योजन ऊंचे चंद्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र व तारे रहे हुवे हैं. वहां से सो, हजार, क्रोड व क्रोड क्रोड योजनं उपर ऊंचे सौधर्म देवलोक रहा हुवा है. पह पूर्व पश्चिम लम्बा व उत्तर दक्षिण चौडा, अर्धचंद्रमा के आकार वाला महातेजवाला देदीप्यमान असंख्यात 8 तीसरा शतकका सातवा उद्देशा 48 भावार्थ SO २. o अनुवादक-पालममचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दार्थ 4. तसक म० महाविमान की पु० पूर्व में सो० सौधर्म देवलोक में अ० असंख्यात योजन वी० अतिक्रमकर ए. तहां स० शक्र दे० देवेन्द्र का सो० सोम म० महाराजा का मं० संध्यमभ म. महाविमान अं० अर्ध तेरद जो० योजन स० लाख आ० लंवा वि० चौडा उ० गुनचालीस जो० योजन ल० लाख वा० पारन १० सहस्त्र अ० आठ अ० उडतालीस जो० योजन स० शत किं० किंचित् वि. विशेपाधिक महाविमाणस्स पुरच्छिमेणं सोहम्मेकप्पे असंखेजाई जोयणाई वीईवइत्ता एत्थणं सकारस देविंदस्स देवरण्णो सोमस्स महारण्णो संझप्पभेनामं महाविमाणे प. अडते- रस जोयण सय सहस्साई आयाम विक्खंभेणं उयालीसं जोयणसयसहरसाई बाव- ण्णचसहस्साई अट्ट अडयाले जोयणसए किंचिविसेंसाहिए परिक्खेवेणं पण्णत्त भावार्थ पोजन का लम्बा चौडा व असंख्यात योजन की परिधि वाला है. उस में बसीस लाख विमान हैं वे सब रत्नमय निर्मल यावत् दर्शनीय हैं. उस के. बहुत मध्य भाग में भव विमानों में मुकुंट समान श्रेष्ट पांच महा रिमान हैं. जिन के नाम. , अशोकावतंसक २ सप्तपर्णावतंसक ३ चम्पकावतंसक ४ चूतावतमकं और ५ मध्य में सौधर्मावतंसक विमान हैं. उस सौधर्मावतंसक विपान से पूर्व में असंख्यात योजनं जावे तो बस शक्र देवेंद्र का सोम नामक लोकपाल का स्वयंप्रभ नामक विमान कहा है. वह साढेबारह लाख योजनं लम्बा चौड़ा है. उस की परिधि ३९५२८४८ योजन से कुछ अधिक की है. इस का सब वर्णन प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालाप्रसादनी * ॥
NEET पंचमांग विवाह पण्पत्ति ( भगवती) मूत्र 8982- पापा ५० परिधि ज. जैसे मू. सूर्याभ वि० विमान की ६० वक्तव्यता सा. वह अनिशिप भा• कहना जा. यावत् अ० अभिषेक न. विशेष सो० सोमदेव ॥ ३ ॥ सं. संध्यमभ म. महाविमान की अ० नीचे सदिशा स विदिशा में अ. असंख्यात जो० योजन स. लाख ओ० अवगाहकर स० शक दि. देवेन्द्र का सो० सोम ० महारामा की सो० सोमा रा० राज्यधानी एक एक जो० योजन स० लाख • लंबी वि० चौडी जं. अंबूदीप प्रमाण वे वैमानिक के प० प्रमाण से अ० अर्ध ने० जानना जा. सूत्र जहेब सारियाभ विमाणस वत्तवया सा अपरिलेसा भाणियन्वाजा आभिसेयो। नवरं सोमे पेवे ॥ ३ ॥ संझप्पभरसणं महात्रिमाणस्त अहे सपखि सपडिदिसिं असंखेज्जाई जोयण सय सहस्साई उगाहित्ता एत्थणं सकरस देविदस्स देवरपणो सोमस्समहारण्णो सोमानामं रायहाणी. पण्णता, एगं जोयणसयसहस्सं आयामविखंभणं जंयूद्दीव भावार्थ सूर्याभ देवता के विमान का अधिकार में जैसा कहा है वैसे ही कहना मात्र यहां सोम देव कहना. ॥ ३ ॥ इस संध्यमभ विमान से असंख्यात योजन नीचे अवगाहकर चारों विदिशि में जाये तो वहां शक्र देवेंद्र के सोम महाराजा की सोमा नामक राज्यपानी कही है. एक लक्ष योजन की लम्बी व चौडी है. इस में मासाद द्वारादिक के सब प्रमाण सौधर्म देवलोक के प्रासादिक से आधा है. अर्थात् १५० योजन का कोट है, २५० योजन का मासाद ऊंचा है, चारों तरफ चार मासाद १२५ योजन के हैं, इस के परिवारवाले २६ POEM वीसरा शतक का मातवा उद्देशा 4 भनुवादक-बालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 ब्दिार्थ, यावत् उ चौकी पीठ सो० सोलह जो० योजन स. सहस्र भा० मंचे शि: वार १० पचास स०सहस्र योजन पं० पांच स• सत्तानब जो योजन स० शत कि. किंपित विविशरकम १५० परिधि पा. प्रासाद की च० चार प० परिपाटी ने० जानना से० शेष न० नही है सशक दे देवेन्द्र के सो० सोम म० महाराजा के इ० ये दे. देव आ० आज्ञा उ० उपपात व वचन नि:निर्देश में चि० रहे सो० सोमनिकाय प्रो० सोमदेव निकाय वि० विद्युत्कुमार वि• विद्युत्कुमारी अ. अमिकुमार प्पमाणा वेमाणियाणं पमाणस अहं नेयव्वं जाव उवगारियलेणं सोलस जोयण सह- स्साई आयाम विक्खंभेणं पण्णासं जोयणः सहस्साई पंचय सताणउए जोयणसए कि चित्रिसेसूणे परिक्खेवेणंप०पासायाणंचत्तारिपरिवाडीओनेयवाओसेसानत्थिाासकरसणं देविंदस्स देवरण्णोसोमरस महारण्णो इमे देवा आणाउववाय वयण निदेसे चिटुंति तंजहा सोमकाइमाइवा, सोमदेवयकाइयाइवा, विज्जुकुमारा, विज्जुकुमारीओ, अग्गिकुमारा, भावार्थ विमान ६२॥ योजन के हैं और परिवारवाले ६४ विमान ३० योजन के हैं. यावत् वे सोलह हजार योजन के लम्ब चौडे कहे हैं ५०५१७ योजन से कुछ अधिक की परिधि कही है. इस में सौधर्म सभा, उत्पत्ति स्थान, व्यवसाय सभा वगैरह नहीं है ॥ ४॥ शक्र देवेन्द्र के सोम महाराजा की आज्ञा, उपपात र निर्देश में सोम महाराजा की जाति के देव, सोम देव की जाति के देव, विद्युत् कुमार, अग्नि कुमार व मकाशक रामायहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादनी * थि अ. अग्निकुमारी वा० वायुकुमार वा वायुकुमारी चं. चंद्र सू० सूर्य ग० ब्रा न० नक्षत्र ता० तारा जे० जो अ० अन्य त० तथा प्रकार स० सर्व ते वे उ. उन के सेवक तक उन के साहायक त० उन की भार्या जैसे सशक दे० देवेन्द्र के सो० सोम म० महाराजा के आ० आज्ञा उ० उपपात प० वचन निः निर्देश में चि० रहे || ५ || मं० जम्बूद्वीप में मं० मेरु की दा० दक्षिण में जा. जो इ० ये स. उत्पन्न होते हैं सं• वह ज जैसे ग० ग्रहदंड ग. ग्रहमुशल ग० ग्रह गर्जना ग० ग्रहयुद्ध ग० ग्रह शृंगा- अग्गिकुमारीओ, वायुकुमारा, वायुकुमारीओ, चंदा, सूरा, गहा, नक्खत्ता, ताराख्वा, जेयावण्णे तहप्पगारा सव्वे ते तब्भत्तिया तप्पक्खिया तब्भारिया. ॥ सकस्स देविंदरस देवरण्णो सोमरस महारणो आणा उववाय वयणनिदेसे चिट्ठति ॥ ५ ॥ जंबूंदीवे दीवे मंदरस्त पव्ययस्स दाहिणेणं जाई इमाई समुप्पजति तं• गहदंडाइवा, महमुस- सूत्र 98 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 89 42 तीसग शतक का सातवा उद्देशा भावार्थ वायुकुमार जाति के देव देवियों और चंद्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र तारे व ऐसे अन्य भी देव रहते हैं. वे सोम महाराजा की भक्ति करते हैं, उन के पक्ष में रहते हैं, उन से, बताया हुवा कार्य पूर्ण करते इस तरह वे उन की आज्ञा में प्रवर्तते हैं ॥ ५ ॥ जम्बूद्वीप के मेरु से दक्षिण में जब दंड की तरह तीच्छे श्रेणी बन्ध मंगलादि तीन चार ग्रह का दंडाकार होवे, मूशल जैसे उपर नीचे श्रेणीबंध, ग्रा. होवे, 4. अनुवादक-बालमनचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8.3 शब्दार्थ, पावत् उ चौकी पीठ सो० सोलह जो० योजन स० सहस्र आ० लंबे वि० चौडे ५० पचास स०सहस्र योजन पं० पांच स. सत्तानव जो योजन स० शतक. किंचिद वि० विशपकम प० परिधि पा० प्रामाद की च० चार प० परिपाटी ने० जानना से० शेष न० नहीं है ॥४॥ सं० शक दे देवेन्द्र के सो० सोम म. महाराजा के इ० ये दे. देव आ० आज्ञा उ० उपपात व० वचन नि निर्देश में चि रहे सो० सोमनिकाय पो० सोमदेव निकाय वि० विद्युत्कुमार वि. विद्युत्कुमारी अ. अग्निकुमार प्पमाणा वेमाणियाणं पमाणस्स अद्ध नेयवं जाव उवगारियलेणं सोलस जोयण सह- मूत्र स्साई आयाम विक्खंभेणं पण्णासं' जोयण सहस्साई पंचय सताणउए जोयणसए किं विविसेसृणे परिक्खेत्रेणंप-पासायाणचत्तारि परिवाडीओनेयव्याओसेसानत्थिासकरसणं देविंदस्स देवरणोसोमरस महारण्णो इमे देवा आणाउववाय वयण निदेसे चिट्ठति तंजहा सोमकाइवाइवा, सोमदेवयंकाइयाइवा, विज्जुकुमारा, विज्जुकुमारीओ, अग्गिकुमारा, विमान ६२॥ यांनन के हैं और परिवारवाले ६४ विमान ३१॥ योजन के हैं. यावत् वे सोलह हजार योजन के लम्ब चौडे कई हैं ५०५१७ योजन से कुछ अधिक की परिधि कही है. इस में सौधर्म सभा, उत्पत्ति स्थान, व्यवसाय सभा वगैरह नहीं है ॥ ४॥ शक देवेन्द्र के सोम महाराजा की आज्ञा, उपपात र निर्देश में मोम महाराजा की जाति के देव, सोम देव की जाति के देव, विद्युत् 'कुमार, अनि कुमार व * प्रकाशक रानावहादुर लाला मुखदेवसहायजी बालाप्रसादजी * 389 पंचमांग विवाह पण्णनि ( भवगती) सूत्र शब्दार्थी अ० अमोध पा० पूर्वको वायु १० पश्चिम का वायु जा० यावत सं० संवर्तक वायु मा० ग्राम में दा अग्नि जा. यावत् सं० सन्निवेश में दा. अग्नि पा० पाणक्षय ज० जनाय ५० धनक्षय कु. कुलक्षय-व० व्यसन भूत अ० अनार्य जे० जो अ० अन्य स० तथा प्रकार सशक दे देवेन्द्र का सो० सोम म०महाराजा का जाव संवयवायाइवा, गामदाहाइवा, जाव सनिवसदाहावा, पाणक्खया, जणक्खया, सूत्र धणक्खया, कुलक्खया, वसणन्भूया. अणारिया जेयावष्णे तहप्पगारा ण ते सकस्स देविंदस्स देवरण्णो सोमस्स महारण्णो अण्णाया, अहिट्ठा, असुया, अमुया, अवि- भावार्थ श्वेत वर्ण से धूअर पडे. दिशा का रजस्वलपना होवे, चंद्र ग्रहण होवे, सूर्य ग्रहण होवे, चंद्र की चारों वाजु कुंडाला, मूर्य की चारों बाजु में कुंडाला, दो चंद्र देखने में आवे, दो सूर्य देखने में आये, इन्द्र धनुष्य होवे, इन्द्र धनुष्य के खंड होवे, बद्दल रहिन आकाश में कपिहसन समान विद्युत् होवे, सूर्य के उदय व अस्त समय में किरणों के विकार से रक्त कृष्णवर्ण वाले गाडे की धूरीके आकारवाला दंड होवे, पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण की वायु संवर्तक होवे, ग्राम दाह यावत् सन्निश दाह वगैरह लक्षण होघे तक माणियों का, चल का, मनुष्य का, धन का, कुल का क्षय होवे, आपत्ति में पडे, अनार्य लोगों का आग- मन होवे वगैरह अनेक प्रकार के उपद्रव होवे. उक्त बातों शक्र देवेन्द्र के मोम महाराजा से अजान-20 पने से नहीं हैं, बिना देखी, विना सुनी, स्मरण विना की, या आधि ज्ञान में नहीं देखी वैसी नहीं हैं. 388 तीसरा शतक का सातवा उद्देशा 984 60 yo mantravre T. । शब्दार्थ .. 4 अनुवादक-बासमझचारी मनि श्री अमोलक ऋपिजी 8- कंग ग्रहा का अ० बदल होवे अ० बद्दल के वृक्ष होवे सं० संध्या होवे गं० गंधर्व नगर होवे उ. उल्का पात होवे दि. दिशा में दाद होने ग. गर्जना वि०विजली होवे पं० धूलकी वु० वर्षा होवे जुवाल चंद्र जा यंतर से अग्नि प. धूमर म महिका १२ दिशाका रजस्वलपना चं० चंद्रका ग्रहण सू०मूर्य का उ०उपराग चंद्र परिषेप मू०सर्पपरिवेष पप्रतिचंद्र प० प्रतिसूर्य ३०इंद्र धनुष्य उ०बहुत इंद्रधनुष्य के खण्ड क-कपिहसन लाइवा, गहगजियाइवा, एवं गहजुद्धाइवा, गहसिंघाडगाइवा. गहावसम्वाइवा, अन्भ- रक्खाइवा, अन्भाइवा, संझाइवा, गंधध्यमगराइया, उवापायाइवा, दिसादाहाईत्रा, गजियाइवा, विजुयाइवा, पंसुयुट्ठीइवा, जबजक्खालित्तय, धमियमहियरउग्घाय, पंदोवरागाइवा, सूरोघरागावा, चंद परिवेसाइवा, सूरपरिवेसाइया, पडिचैदाइबा, प. दिसूराइवा, इंदधणूइवा, उदगमच्कइहसियअमोह. - पाईणवापाड्या, पठीणं या चरने से मेय समान गर्जना होचे, एक नक्षत्र में दक्षिण उत्तर श्रेणि के ग्रह का रहना सो ग्रह युदहोवे, भंगारक के भाकार से प्रह होने, ग्रह पीछे जाये, बद्दल होवे, वृक्षाकार बद्दल होवे, संध्या फुले, आकाश में व्यंबर के नाय हुने नगर होथे, ज्योत सहित सराओं का पड़ना ऐसा उल्कापात होवे, दिशाओं में रक्तं. पीत समान रंगवाला दाह संव.मेधादिक की गर्जना होवे विशुवका उद्योत होवे,रजोवृष्टि होवे,मतिपदा,द्वितीया, वतीयाके दिन भी चंद्र हे वहां लग संध्या फूली हुई रहे,त्यंतरोने किया हुवा अग्नि आकाशमें रहे,धूअर पड़े, * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहावजी चालाप्रसादनी भावार्थ शब्दाथ सो० सोम महाराजा ॥ ७ ॥ क. कहां ज० जप म० महाराजा का वः पशिष्ठ म० महाविमान प. प्ररूपा गो० गौतम सो सौधर्म अवतंसक म. महाविमान की दा दक्षिण में सो० सौधर्म देवलोक की अ० असंख्यात जो० योजन नी० व्यतिक्रान्त हुवे ए० तहां सशक्र के ज० यमका वश्यरशिष्ठ वि० विमान प.० प्ररूपा अ० अर्ध ते बेरह जो० योजन स० लाख ज. जैसे सो० सोम का वि० विमान तक तैसे ५७१ सूत्र 1383 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 83-80- 888580 तीसरा शतकका मातवा उद्देशा 988 m एगं पलिओवमंठिई पण्णत्ता. ए महिढीए जाव ए महाणुभागे सोमे महाराया ॥ ७ ॥ कहिणं भंते सक्कस्स देविंदस्स देवरण्यो जमस्स महारण्णो वरसिटेणामं महाविमाणे पण्णत्ते ? गोयमा ! सोहम्मवडंसयस्स महाविमाणस्स दाहिणेणं सोहम्मे कप्पे अ. संखेजाइ जोयण सहस्साई वीईवइत्ता एत्थणं सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो जमस्स महारणो वरसिटेनामं विमाणे पण्णत्ते. अद्धतेरस्स जोयण सयसहस्साई जहा सोमरस पूर्व दिशा के लोकपाल सोम की यह ऋद्धि और यह विवक्षा की है ॥ ७ ॥ अहो भगवन ! शक्र देवेन्द्र के यव महाराजा का वरशिष्ठ नामक महा विमान कहां कहा है ? अहो गौतम ! सौधर्म देवलोक में सौधर्मावतंसक नामक महा विमान से दक्षिण में असंख्यात योजन जावे तब वहां यम महाराजा का वरशिष्ट नामक विमान कहा है. वह साढे बारह योजन का लम्बा चौडा वगैरह सोम महाराजा का । भावार्थ o० शब्दाथा सत्र 13 अनुवादक-वालग्राह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी . अ० अजान अ० अदृष्ट अ० नहीं सूना अ० नहीं स्मरा अ नहीं जाना ॥६॥ ते. उन सो• मोम निकाय स० शक्र दे० देवेन्द्र के सो सोम म० महाराजा को इ. यह अ० अपत्यदेव अ० जानेहुवे हो• थे ई० अंगारक वि० वैताल लो० लोहिताक्ष स० शनैश्चर चं० चन्द्र सू० सूर्य सु० शुक्र ० बुध वबृहस्पति रा० राहु स० शक्र दे० देवेन्द्र के सो० सोम म० महाराज की स० तीनभाग प० पल्योपम की ठि. स्थिति अ० अपसदेव की ए० एक प० पल्योपम की ठि• स्थिति म० महर्द्धिक जा० यावत् म०महानुभाग ण्णाया ॥ ६ ॥ तेसिंवा सोमकाइयाणं सक्कस्स देविंदस्स देवरपणो 'सोमस्स महा- रण्णो इमे अहावच्चादेवा अभिण्णाया होत्था तंजहा-इंगालए, वियालए, लोहियक्खे, सर्णिचरे, चंदे, सूरे, सुक्के, बुहे, बहसई, राहू ॥ सक्कस्सणं देविंदस्स देवरण्णो सोमरस महारपणो सहभागं पलिओवमं ठिई पण्णता ॥ अहावच्चाभिण्णायाणं देवाणं अर्थात् सोम महाराजा उक्त सव वानों को जानते हैं यावत् देखते हैं ॥ ६ ॥ उन शक्र देवेन्द्र के सोम महाराजा को पुत्रवतू आज्ञा पालनेवाले मंगल, केतु, लोहिताक्ष, शनैश्चर, चंद्र, सूर्य, शुक्र ब्रहस्पति, वराह नामक देव हैं. उन की स्थिति एक पल्योपम व एक पल्योपम के तीन भाग में का एक भाग अधिक की कहो. और उन के अपत्य स्थान जो देव हैं उन की एक पल्योपम की स्थिति कही. * अहो गौतम * यद्यपि चंद्र की एक लक्ष वर्ष अधिक व मूर्य की एक सहस्त्र वर्ष आधिक की स्थिति कही है. परंतु यहां पर अधिकता की विवक्षा नहीं की गई है. प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ ब्दार्थ सूत्र 488 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र <288 इ० इसे स० उत्पन्न करते हैं डि. विघ्नहोवे ड. राजकुमार कृत उपद्रव के० कलह वो० .महानि हो। खा: मत्लर होवे म० महायुद्ध होवे म० महासंग्राम होवे म० बड़े नि०पडे ए. ऐसे म० महान् पुरुषका नि० पडे म० बहुतरुधिर नि० पढे दु० दुर्भुव कु. कुलरोग होवे गा० ग्रामरोग होवे मं० मंडलरोग न मगर रोग सी. शीर्ष अ० अक्षि क० कर्ण न नख दं० दांत वेम्वेदना ई० इंद्रग्रह खं० स्कन्धवह कुछ कुमारग्रह ज० यक्षपद भू. भूतग्रह ए० वरविशेष वेदो दिनांतर ते तीन दिनांतर चा० चार दिनांतर उ० उद्वंग इमाई समुप्पजंति, तंजहा-डिव्वाइबा, डमरावा, कलहाइवा, बोलाइवा, खारावा, महाजुद्धाइवा, महासंगामाइवा, महासत्थ निवडणाइवा, एवं महापुरिस निबणइवा, महारुहिर निवडणाइवा, दुभूयाइवा, कुलरोगाश्वा, गामरोगाश्या, मंडलरोगाइवा, नगररोगा-सीस-अच्छि-कण्ण-नह-दंत वेयणा, इंदग्गहा, खंदग्गहाइवा, कुमारगह, ज- क्खग्गह, भूयग्गह, एगाहियाइवा, बेहिय, तेहिय घाउत्थयाइवा, उन्वेगाइया, का- क्लेश वृद्धि करनेवाले शब्दोच्चार, परस्पर कुसंप, महायुद्ध, महा संग्राम,महा शस्त्रमा निपात, महा पुरुप का काल होना, महा रुधिर का पदना, सर्प वृश्चिकादिक की उत्पत्ति, कुल में क्षय रूप रोग, ग्राम में क्षर रूप रोग, बहुत ग्राम के मनुष्यों में क्षय रूप रोग, नगर जन में क्षय रूप रोग, मस्तक, आंख, कर्ण, नख व दांत की वेदना, इन्द्र ग्रहादिक उपद्रव, स्कंध देवादि के उपद्रव, कुमार ग्रह, यक्ष ग्रह, भूतग्रह के उपद्रव, एकान्नर * तीसरा शतक का सातवा उद्देशा -- गवार्थ ।
५७२ -- 48 अनुवादक-बालग्रामवारी मुनि श्री अमोलक पिनी 81 शब्दार्थ ना. यावत् अ० अभिपेक रा० राज्यधानी त० तैसे जा. यावत् पा० प्रासादपंक्ति ॥ ८ ॥ स शक के ज० यम के ई०ये दे देव आआज्ञा उ०उपपात जायावत् चि०रहे जयम के परिवार जव्या के सामा- निक के परिवार अ० असुर कुमार अ० असुर कुमारी के० कंदर्प नि. नरक रक्षक अ० अभियोग जे० जो अ० अन्य त० तथा प्रकार स० सर्व ते वे ॥९॥ ज० जंबूद्वीप के मं० मेरु की दा० दक्षिण में त्रिमाणं . तहा जाव. अभिसेओ रायहाणी तहेव जाव पासायपंतीओ ॥८॥ सक्कस्सणं देविंदस्स देवरणो जमस्स महारण्णो इमे देवा आणा उयवाय जाव चिटुंति, तंजहा-जमकाइयाइवा, : ‘जमदवयकाइयाइवा, पेयकाइयाइवा, पेयदेवकाइयाइवा, असुरकुमारा, असुरकुमारीओ, कंदप्पा निरयपाला, अभियोगा, जेयावण्णे तहप्पगारा, सव्वे ते तब्भत्तिया, तप्पक्खिया, तब्भारिया, सकस्स देविदस्स देवरण्णो जमस्स महारण्णो, ॥ ९ ॥ जंबूद्दीवेदीवे मंदरस्स पन्वयस्स दाहिणेणं जाई भावार्थ विमान जैसे कहना ॥ ८ ॥ यम कायिक, यमदेव कायिक, प्रेत कायिक, प्रेतदेव कायिक, असुर कुमार, अमुर कुमार की देवियों, कंदर्प, नरकपाल, अभियोगिक-सेवक और भी ऐसे अन्य देव यम महाराजा की आझा, निर्देश व उपपात में रहते हैं, वैसे ही वे उन का पक्ष धारन करते हैं, और उन की भार्या की ममान सेवा करते हैं ॥ ९ ॥ जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत की दक्षिण में विघ्न, एक राजकुमारादिकृत उपद्रव, प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालाप्रसादजी ब्दाथ, सत्र ॐ पंचाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवता) सूत्र 28 अनार्य ॥ १० ॥ इ० ये दे० देव अ० यथा अपत्य अ० जाने हो थे अं अंब अंबरिष सा० श्याम स. सवल रु० रुद्र वे० वैरुद्र का काल म० महाकाल अ. असिपत्र ध० धनुष्य कुं० कुंभ वा० वालुक* वे. वैवरणी ख. खर स्वर म० महाधोष ५० पनरह आ० कहे ज० यम म० महाराजा की स० तीन भाग प० पल्योरम की ठि० स्थिति अ० यथाअपस की ए. एक ५० पल्योपम की म० महर्द्धिक ना० यावत् पणे तहप्पगारा न ते सकारस देविंदरस देवरण्णो जमस्स महारण्णो अण्णाया ॥१०॥ तेसिंवा जमकाइयाणं देवाणं सकस्स जमरस इमेदेवा अहावच्चा अभिण्णाया होत्था, तंजहा-अबे, अंबरिसे चेच; सामे, सवलेत्तियावरे ; रुदे, वरुदे, कालेय ; महाकाले त्तियावरे (१) असिपत्ते, वणूकुंभे वालुया; वेयरणीतिय; खरस्सरे, महाघोसे, एमेपष्णर साहिया। सक्करसणं देविस्स देवरण्णो जम्मस्स महारणो सति भागं पलिओवमं ठिई पन्नत्ता ॥ अहावच्चाभिण्णायाणं देवाणं एगं पलिओवमं ठिई पन्नत्ता । ए माहड्डीए जाप गुप्त महीं होती है इन को जानते हैं, देखते हैं, व स्मरण करते हैं ॥ १० ॥ अम्ब, अम्बारिश, साम, सबल, रुद्र, वैरुद्र, काल, महाकाल, असिपत्र, धनुष्य, कुंभ, वालुक, वैतरणी, खरस्वर और महायोप ये पंदरह परमाधी यम महाराजा को अपत्यवत् विनयवंत रहते हैं. यम महाराजा की एक पल्योपम और एक पल्योपम के तीसरे भाग अधिक की स्थिति कही है. उन के पुत्र स्थान कार्य करनेवाले देव की एक 998 तीसरा शतक का स तथा उद्देशा 9887- भावार्थ 'ब्दार्थ ५७४ का काम,खा. खासी सा० श्वास ज ज्वर दा दाह क. कच्छ को कोड अ० अजीर्ण पं० पांडुरोग अ० हरसरोग भ• भगंदर हि० हृदयशूल मःमस्तकशूल नो० योनिश्ल पा० पसली शूल कु० कुक्षिशूल गा० ग्राममरकी न० नगर खे. खेड क० कट दो द्रोणमुख म० मडंप प. पाटर आ• आश्रम सं० संवाह स० सन्निवेश मरकी पा० प्राणक्षय ध० धनक्षय ज. जनक्षय कु० कुलक्षय व० वसनभूब अ. साइवा, खासाईवा, जराइवा, दाहाइवा, कच्छ कोहाइवा, अजीरया, पंडुरोगा अरसाइबा, भगंदलाइबा, हियय सूलाहवा मत्थय सूलाइवा, जोणिसूल, पाससल, कु; न्छिसूल, गाममारीइवा, नगर खेड-कव्वड-दोणमुह-मडव पट्टण-आसमसंबाह-सण्णिवे. स मारीइवा, पाणक्खय, धणक्खय-जणक्खय-कुलक्खय-वसणभूवमणारिया जेयाव- सूत्र 4. अनुवादक-यालयामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8+ प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादनी ঘৰি मर, दो दिनांतर ज्वर, तीन दिनांसर जर, चार दिनांतर ज्वर, इष्ट के वियोग से उद्वेग, श्वास, खांसी, मर, दाह, कच्छ, क्रोड, अजीर्ण, पांडुरोग, हरस (मसा) भगंदर, हृदय शूल, मस्तक शूल, योनि शूल, पमली भूल, कुक्षि शूल, ग्राम की.मारी, नगर, खेड, कवड, द्रोण मुख, मंडप, पट्टण, आश्रम, संवाह व ममिवेश में परकी, प्राणियों का क्षय, धन का क्षय, मनुष्योंका क्षय, गृहों का क्षय, वस्त्राभूषणोंका क्षय, अनार्य म्लेच्छ लोगों का आगमन होवे वैसे ही अन्य भी ऐसे उपद्रव होवे. उक्त बातों या महाराजा से .
ब्दिार्श सत्र 8 पंचम्मङ्ग विवाह पण्णत्ति (मगवता) सूत्र - अनार्य ॥ १०॥ इ० ये दे० देव अ० यथा अपत्य अ० जाने हो थे अं अंब अंपरिप सा० श्याम स. सबल रु० रुद्र वे० वैरद का काल म० महाकाल अ. असिपत्र ध० धनुष्य कुं० कुंभ वा० वालुक वे. वैतरणी ख० खर स्वर म० महाधोप प० पन्नरह आ० कहे ज० यम म० महाराजा की स० तीन भाग प० पस्योरम की ठि• स्थिति अ० यथाअपस की ए. एक ५० पल्योपम की म. महर्द्धिक ना० यावत् पणे तहप्पगारा न ते सकारस देविंदस्स देवरण्णो जमस्स महारण्णो अण्णाया ॥१०॥ तेसिंवा जमकाइयाणं देवाणं सकस्स जमरस इमेदेवा अहावच्चा अभिण्णाया होत्था, तंजहा-अबे, अंबरिसे चेव; सामे, सबलत्तियावरे ; रुदे, वरुदे, कालेय ; महाकाले त्तियावरे (१) असिपत्ते, वणुकुंभे वालुया; वेयरणीतिय; खरस्सरे, महाघोसे, एमेपण्णर साहिया। सक्करसणं देविस्स देवरगणो जम्मस्स महारणो सति भागं पलिओवमं ठिई पन्नत्ता ॥ अहावच्चाभिण्णायाणं देवाणं एग पलिओवमं ठिई पन्नत्ता । ए माहड्डीए जाध गुप्त नहीं होती है इन को जानते हैं, देखते हैं, व स्मरण करते हैं ॥ १० ॥ अम्ब, अम्बारिश, साम, सबल, रुद्र, वैरुद्र, काल, महाकाल, असिपत्र, धनुष्य, कुंभ, वालुक, वैतरणी, खरस्वर और महायोप'. ये पंदरह परमाधी यम महाराजा को अपत्यवत् विनयवंत रहते हैं. यम महाराजा की एक पल्योपम और एक पल्यापम के तीसरे भाग अधिक की स्थिति कही है. उन के पुत्र स्थान कार्य करनेवाले देव की एक 389 तीसरा शतक का स तत्रा उद्देशा 982- भावार्थ ब्दार्थ ५७४ का० काम ,खा. खासी सा० श्वात ज० ज्वर दा दाह क० कच्छ को कोड अ० अजीर्ण पं० पांडुरोग अ०. हरसरोग भ• भगंदर हिः हृदयशूल मःमस्तकशूल नो० योनिश्ल पा० पसली शूल कु० कुक्षिशूल गा० ग्राममरकी न० नगर खे० खेड.क० काट दो द्रोणमुख मा मडंप ५० पाटर आ• आश्रम सं० मवाह स० सनिवेश मरकी पा० प्राणक्षय ध० धनक्षय ज० जनक्षय कु. कुलक्षय व. वसनभूब अ० साइवा, खासाईवा, जराइवा, दाहाइवा, कछ कोहाइवां, अजीरया, पंडुरोगा; अरसाइवा, भगंदलाइवा, हियय सूलाहवा मत्थय सूलाइवा, जोणिसूल, पाससल, कु- छिसूल, गाममारोइवा, नगर खेड-कव्वड-दोणमुह-मडंव-पट्टण-आसमसंवाह-सण्णिवे. स मारीइवा, पाणक्खय, धणक्खय-जणक्खय-कुलक्खय-वसणभूवमणारिया जेयाव- सूत्र व अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 82 मकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालपसादनी '. পাদ্মাৰ जर, दो दिनांतर मर, तीन दिनांतर जर, चार दिनांतर, ज्वर, इष्ट के वियोग से उद्वेग, श्वास, खांसी, जर, दाह, कच्छ, क्रोड, अजीर्ण, पांडुरोग, हरम (मसा ) भगंदर, हृदय सूल, मस्तक शूल, योनि शूल, पमली शूल, कुसि शूल, ग्राम की मारी, नगर, खेड, कवड, द्रोण मुख, मंडप, पट्टण, आश्रम, संवाह व मभिवेश में परकी, प्राणियों का क्षय, धन का क्षय, मनुप्योंका क्षय, गृहों का, क्षय, वस्त्राभूषणोंका क्षय, र अनार्य म्लेच्छ लोगों का आगमन होवे बैसे, ही अन्य भी ऐसे उपद्रव होवे. उक्त बातों या महारानी से " 20. प सत्र 998 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 8980- 8 तीसरा शतक का सातवा उद्देशा शब्दार्थ कुमार ना० नाग कुमारी उ० उदधिकुमार उ० उदधिकमारी थ० स्थनित कुमार थ० स्थनित कुमारी जे० 300 जो अ० अन्य त० तथारूप स० सर्व ते ने उ. उन के वक जा० यावत् चि० रहते हैं ॥ १३ ॥ ज०१० जंबूद्वीप के मं• मेरु की दा दक्षिण में आ जो इ० ये स० उत्पन्न होवे अ० अतिवृष्टि मं० मंदवृष्टि सु० १९७७ सुवृष्टि दु० खराव वृष्टि उ० पानीका उद्भेद उ० तलावादि भरावे उ० थोडा पानी वहे उ बहुत पानी वहे १० प्रवाहचले गा० ग्राम में पानीचले जा० यावत् सः सनिवेश में पानी चले पा० प्राणक्षय जा० नागकुमारा, नागकुमारीओ, उदहिकुमारा, उदहिकमारीओ, थणियकुमारा, थणि- यकुमारीओ, जेयावण्णे तहप्पगारा 'सव्वे ते तब्भत्तिया. जाव चिट्ठति ॥ १३ ॥ जंबुद्दीवेदीवे मंदरस्स पव्वयस्स दाहिणेणं जाइं इमाई समुप्पाजंति, तंजहा-अइबासा- इवा, मंदवासाइवा, सुवुट्टीइवा, दुवट्ठीइवा, उदुभ्याइवा, उदप्पीलाइवा, उदवाहा- इवा, पवाहाइवा, गामवाहाइवा, जाव सन्निवेसवाहाइवा, पाणक्खया जाव तेसिं वा, भावार्थ कुमार, उदधि कुमारियों, स्यनित कुमार व स्थनित कुमारियों यावत् उनका भार्यासमान कार्य करते हैं ॥१३॥ जम्बूदीपक मेरुकी दक्षिणमें अतिवृष्टि, मंदवृष्टि, सुवृष्टि,दुष्टि,पर्वतकेतट व नदियोंमें पानीका चलना,तलावादिक भर कर पानी का चलना, थोडा पानी चलना, बहुत पानी चलना, ग्राम यावत् सन्निवेश वह जावे इत-30 ना पानी चलना वगैरह होवे. इस से प्राणियों का क्षय यावत् धन वगैरह का क्षय होवे. यह सब वरुण Gro जा शब्दाथा सूत्र +3 अनुवादक-पासममचारी मुनि. श्री अमोलक ऋपिजी ज० पम ० महाराजा ॥ १॥क कहो में भगवन व० वरुण म. महाराजा का स० स्वयं जल म० महाविमान गो. गौतम त उस सो सौधर्म अवतंसक म० महाविमान की प० पश्चिम में सो. सौधर्म देवलोक में अ० असंख्यात जा० यावत् ज० जैसे सो० सोम का त० तैसे वि. विमान राज्यधानी भा० कहना जा. यावत् पा० भामाद अवतमक ण. विशेष ना० नाम ना. नाना प्रकार ॥ १२॥३० वरुण के ना. यावत चि० रहते हैं व० वरुण का परिवार व० वरुण के सामानिक का परिवार ना. नाग जमे महाराया महाराया ॥११॥ कहिणं भंते ! सक्कस्स देविंदस्स देवरपणो वरुण- रस महारन्नो, सयंजले नाम महाविमाणे. पन्नते ? गोयमा ! तस्सणं सोहम्मवडं सबस्स महाविमाणस्स पञ्चत्विमेणं सोहम्मेकप्पे असंखेजाई, जहा सोमस्स तहा विमाण रायहाणीओ भाणियव्वा जाय पासाय वडंसया. णवरं नाम नाणत्तं ॥ १२ ॥ सक्करसणं वरुणरसणं जाव चिटुंति तंजहा-वरुणकाइयाइवा, वरुणदेवकाइयाइवा, पल्योपम की स्थिति कही है. इस तरह अहो गौतम ! यह महर्दिक यावत् महाराजा है.॥११॥ अहो भगवन्! शक्र देवेन्द्र के वरुण नामक महाराजा का सतंजला नामक महाविमान कहां है ? अहो गौतम ! सौधर्मावतं सक विमान की पश्चिम में असंख्यात योजन जावे वहां वरुण महाराजा की सनंजेला नामक राज्यधानी कही रमका रर्णन मोपसारामा जैसे करना॥२२॥रुण काबिक, वरुणदेव काकिनाTAINME--- प्रकाशक-रानावहादुर.लाला सुखदेवसहायजी मालाप्रसादनी .09 9825 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 9988- 8.3 तीसरा शतक का सातवा उद्देशा शब्दार्थ / कुमार ना० नाग कुमारी उ० उदधिकुमार उ० उदधिकुमारी थ० स्थनित कुमार थ० स्थनित कुमारी जे. ets, जो अ० अन्य त० तथारूप स० सर्व ते ने उ. उन के वक जा० यावत् चि० रहते हैं ॥ १३ ॥ ज०० जंबूद्वीप के मं• मेरु की दा दक्षिण में जा जो इ० ये स० उत्पन्न होवे अ० अतिवृष्टि मं० मंदवृष्टि सु० ५७७ सुवृष्टि दु० खराव वृष्टि उ० पानीका उद्भेद उ० तलावादि भरावे उ० थोडा पानी वहे उ बहुत पानी वहे ५० प्रवाहचले गा० ग्राम में पानीचले जा. यावत् सः सनिवेश में पानी चले पा० प्राणक्षय जा० नागकुमारा, नागकुमारीओ, उदहिकुमारा, उदहिकुमारीओ, थणियकुमारा, थणि- यकुमारीओ, जेयावण्णे तहप्पगारा ‘संव्वे ते तन्भत्तिया. जाव चिट्ठति ॥ १३ ॥ जंबुद्दीवेदीवे मंदरस्स पव्वयस्स दाहिणेणं जाइं इमाइं समुप्पजति, तंजहा-अइवासा- इवा, मंदवासाइवा, सुवुट्टीइवा, दुवट्ठीइवा, उदुभ्याइवा, उदप्पीलाइवा, उदवाहा- इवा, पवाहाइवा, गामवाहाइवा, जाव सन्निवेसवाहाइवा, पाणक्खया जाव तेसिं वा, भावार्थ कुमार, उदधि कुमारियों, स्यनित कुमार व स्थनित कुमारियों यावत् उनका भार्यासमान कार्य करते हैं ॥१३॥ जम्बूद्वीपके मेरुकी दक्षिणमें अतिवृष्टि, मंदवृष्टि, सुवृष्टि,दुवष्टि,पर्वतकेतट व नदियोंमें पानीका चलना,तलावादिक भर कर पानी का चलना, थोडा पानी चलना, बहुत पानी चलना, ग्राम यावत् सनिवेश वह जाये इत- ना पानी चलना वगैरह होवे. इस से प्राणियों का क्षय यावत् धन वगैरह का क्षय होवे. यह सब वरूण E शब्दार्थ सूत्र 43 अनुवादक-पासामधारी मुनि. श्री अमोलक ऋपिजी 82 ज० यम म० महाराजा ॥ ११ ॥क कहो भगवन ३० वरुण म. महाराजा का स० स्वयं जल म. महाविमान गो. गौतम न० उस सो सौधर्म अवतंसक म० महाविमान की प. पश्चिम में सो सौधर्म देवलोक में अ० असंख्यात जा. यावत् ज० जैसे सो० सोम का त० तैसे वि. विमान राज्यधानी भा० कहना जा. यावत् पा० प्रासाद अवतमक विशेष ना० नाम ना. नाना मकार ॥ १२ ॥३० वरुण के जा. यावत चि० रहते हैं व वरुण का परिवार क. वरुण के सामानिक का परिवार ना. नाग जमे महाराया महाराया ॥११॥ कहिणं भंते ! सक्कस्स देविंदस्स देवरणो वरुण- रस महारन्नो, सयंजले नाम महाविमाणे. पन्नते ? गोयमा ! तस्सणं सोहम्मवडं सयस्स महाविमाणस्स पञ्चत्विमेणं सोहम्मेकप्पे असंखेजाई, जहा सोमस्स तहा विमाण रायहाणीओ भाणियव्वा जाव पासाय वडंसया. णवरं नाम नाणत्तं ॥ १२॥ सकस्सणं वरुणरसणं जाव चिटुंति तंजहा-वरुणकाइयाइवा, वरुणदेवकाइयाइवा, पन्योपम की स्थिति कही है. इस तरह अहो गौतम ! यह महर्द्धिक यावत् महाराजा है.॥११॥ अहो भगवन! शक्र देवेन्द्र के वरुण नामक महाराजा का सतंजला नामक महाविमान कहां है ? अहो. गौतम ! सौधर्माचतं मक विमान की पश्चिम में असंख्यात योजन जावे वहां वरुण महाराजा की सतजेल नामक राज्यधानी कही रमारर्णन सोपसहारामा जैसे करना||१२|वरुण कालिक,वरुणदेत कायिक,नागकुमार,नागङमारियों, उदधि प्रकाशक-रानावहादुर.लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी . थि २७ शब्दाथ के० वल्गु ना० नाम का म० महाविमान गो० गौतम त० उस सो० सौधर्मावतंसक म० महाविमान की उ. उत्तर में ज० जैसे सो० सोम वि० विमान की रा०राज्यधानी की व० वक्तव्यता ने० जानना जा० यावत) वा० प्रासादावतंसक ॥ १५ ॥ स० शक के वे० वैश्रमण को इ० ये दे० देव आ० आज्ञा उ० उपपात व० वचन नि निर्देश में चि० रहते हैं वे० वैश्रमण कायिक वे० वैश्रमण देव कायिक सु० सुवर्ण कुमार सु० सुवर्ण कुमारिका दी० द्वीपकुमार दी. द्वीप कुमारी का दि० दिशाकुमार दि० दिशा कुमारी का वा० ५७१ सूत्र 888 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 898 महाविमाणे पं० ? गोयमा ! तस्सणं सोहम्मवडंसयस्स महाविमाणस्स उत्तरेणं जहा सोमस्स विमाणस्स रायहाणियवत्तव्वया तहा नेयव्वा जाव पासायवडंसया ॥१५॥ सक्कस्सणं वेसमणस्स इमे देवा आणाउववायवयणनिद्देसे चिटुंति, तंजहा-वेसमण काइयाइवा, वेसमणदेवकाइयाइवा, सुवण्णकुमारा, सुवण्णकुमारीओ, दीवकुमारा, मण पहाराजा का वल्गु नामक महा विमान कहां है ? अहो गौतम ! सौधर्म देवलोक में सौधर्मावतंसक महाविमान की उत्तर में असंख्यात योजन जावे वहां वल्गु नाम का महा विमान आता है. उस का सब वर्णन सोम महाराजा की राज्यधानी जैसे कहना ॥ १५ ॥ वैश्रमण कायिक, वैश्रमण देवकायिक, 20 सुवर्ण कुमार, द्वीप कुमार, दिशा कुमार व वाणव्यंतर देव व उन की देवियों वैश्रमण महाराजा की 8-8 तीसरा शतकका सातवा उद्देशा 983 भावार्थ शब्दार्थ यावत् ते. उन व० वरुण के० जा० यावत् अ० यथा अपत्य क० कर्कोटक का कर्दम अं० अंजन सं० शंखपाल पु० पुंडू प० पलाश मो० मोज ज० जय द० दधिमुख अ० अयपुल का० कातरिक व० वरुण की दे० देशऊणे दो दोपल्योपम की ठि० स्थिति अ० अपत्य देव की ए० एक पल्योपम की म० महदिक ५० कहे व० वरुण म० महाराजा ॥ १४ ॥ क. कहां भ० भगवन् स० शक के वे० वैश्रमण ५७८ सन 42 अनुवादक-पालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी ४० वरुणकाइयाणं देवाणं सकस्सणं वरुणस्स जाव अहावच्चाभिंण्णाया होत्था, तंजहा- ककोडए, कद्दमए, अंजणे, संखवालए, पुंडे, पलासे, मोये, जये, दहिमुहे, अयंपुले, कायरिए ॥ सकस्सणं वरुणस्स देसूणाई दो पलिओवमाइं ठिई पण्णत्ता, अहावचा भिण्णायाणं देवाणं एगंपलिओवमं ठिई पण्णत्ता, ए महिड्डीए जाब वरुणे महाराया ॥ १४ ॥ कहिणं भंते ! सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो वेसमणस्स महारण्णो वग्गूनामं महाराजा जानते हैं यावत् याद करते हैं. वरुण महाराजा को कर्कोटक, कर्दमक, अंजन, शंखपाल, एंड, पलाश, मोय,जय, दधिमुख, अयंपुल कातरिक नामक देवों पुत्रवत् विनयवाले आदेशमें प्रवर्तनेवाले होते हैं. इन की देशउने दो पल्योपम की स्थिति कही है, और अपत्य समान देवकी एक पल्योपम की स्थिति कही. अहो गौतम ! वरूग रजा की ऐसी ऋद्धि कही है ॥ १४ ॥ अहो भगवन् ! शक्र देवेन्द्र का वैश्र- * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालामसादजी * *.भावार्थ शब्दार्थ . के० बल्गु ना० नाम का म० महाविमान गो० गौतम त० उस सो० सौधर्मावतंसक म० महाविमान की उ० उत्तर में ज० जैसे सो० सोम वि० विमान की रा०राज्यधानी की २० वक्तव्यता ने० जानना जा० यात्रत वा० मासादावतंसक ॥ १५ ॥ स० शक्र के वे० वैश्रमण को इ० ये दे० देव आ० आज्ञा उ० उपपात व० वचन नि० निर्देश में चि० रहते हैं वे० वैश्रमण कायिक वे० वैश्रमण देव कायिक सु० सुवर्ण कुमार सु० सुवर्ण कुमारिका दी० द्वीपकुमार दी द्वीप कुमारी का दि० दिशाकुमार दि० दिशा कुमारी का वा० ५७९ 89 298 पचंमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 898 महाविमाणे पं० ? गोयमा ! तस्सणं सोहम्मवडंसयस्स महाविमाणस्स उत्तरेणं जहा सोमस्स विमाणस्स रायहाणियवत्तव्वया तहा नेयव्वा जाव पासायवडंसया ॥१५॥ सक्कस्सणं वेसमणस्स इमे देवा आणाउववायवयणनिदेसे चिटुंति, तंजहा-वेसमण काइयाइवा, वेसमणदेवकाइयाइवा, सुवण्णकुमारा, सुवण्णकुमारीओ, दीवकुमारा, मण पहाराजा का वल्गु नामक महा विमान कहां है ? अहो गौतम ! सौधर्म देवलोक में सौधर्मावतंसक महाविमान की उत्तर में असंख्यात योजन जावे वहां वल्गु नाम का महा विमान आता है. उस का सब वर्णन सोम महाराजा की राज्यधानी जैसे कहना ॥ १५ ॥ वैश्रपण कायिक, वैश्रमण देवकायिक, सुवर्ण कुमार, द्वीप कुमार, दिशा कुमार व वाणव्यंतर देव व उन की देवियों - वैश्रमण महाराजा की 30-80 तीसरा शतकका सातवा उद्देशा 988 भावार्थ yo शब्दार्थ ५८० सूत्र - अनुवादक पालनह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी - वागत्यंतर वा० वाण व्यंतरी जे. जो अ० अन्य त० तैसे स० सब ए. ये तक उस की भक्तिवाले जा यावत् चि० रहते हैं ॥ १६ ॥ ज० जम्बूद्वीप के मं० मेरु की दा दक्षिण में जा० जो इ० ये स० उत्पन्न होते हैं तं० वह न० जैसे अ० लोहे की.खान त• चांदीकी खान तं० ताकी खान एक ऐसे सी० सीसे की खान दि० चांदीकी खान सु० सुवर्ण की खान र० रत्नकी खान व० वज्र रत्न की खान व० द्रव्य वृष्टि हि० चांदी सु० सुवर्ण की वर्षा र० रत्न व० वज्र आ० आभरण प० पत्र पु० पुप्प फ० फल वी० वीज प० माला व० वर्ण चु० चूर्ण ग० गंध व. वस्त्र की वा० वर्पा हि० हिरण्य की चु० वृष्टि मु० सुवर्ण दीवकुमारीओ ; दिसाकुमारा, दिसाकुमारीओ, वाणमंतरा, वाणमंतरीओ, जेयावणे तहप्पगारा सव्वेते तब्भत्तिया जाव चिटुंति ॥ १.६॥ जंबुद्दीवेदीवे मंदरस्स पव्वयस्स दाहिणेणं जाई इमाई समुप्पजति. तंजहा-अयागराइवा, तउयागराइवा, तंबागराइवा, एवं सीसागराइवा, हिरण्ण सुवण्ण रयण वइरागराइवा, वसुहाराइवा, हिरण्णवासाइवा, मुवण्डावासाइवा, रयण-बइर आभरण-पस-पुष्फ-फल-बीय-मल्ल-वण्ण-चुण्ण-गंध-वत्थ- आझा, निर्देश व उपपात में रहते हैं उन की सेवा भक्ति करते हैं यावत् उनका भार्या समान कार्य करने ॥१६॥ जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत की दक्षिण में लोहे की खान, ताम्बे की खान, सीसे की खान, हिरण्य चांदी की खान, सुवर्ण की खान, रत्न, वन, आभरण, पत्र, पुष्प, फल, वीज, माल्य, वर्ण, चूर्ण, प्रकाशक-रामाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावाथ| भो शब्दार्थ ५८१ 2983- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 3282- की र० रत्न व० वन आ० आभरण १० पत्र पु० पुष्प फ० फल धी० बीज म० माल्य ५० वर्ण गंगंध व० वस्त्र भा० भाजन की बु० वृष्टि खी० क्षीर को बु० वृष्टि सु० सुकाल दु० दुप्काल अ० अल्पर्य म० महर्य सु० सुभिक्ष दु० दुर्भिक्ष क० क्रय वि० विक्रय स० सन्निधि सं० संचय नि० निधि नि० निधान चि० बहुत काल के पो० जीर्ण ५० रहित सा० स्वामीवाले ५० सेवक रहित ५० मार्ग रहित ग० गोत्रा वासाइवा, हिरण्णवुट्ठीइवा, सुवण्ण-रयण-वइर-आभरण-पत्त-पुप्फ-फल-बीय-मल्ल- वण्ण-गंध-वत्थ भायण-बुट्ठीइवा, खीरवुट्ठीइवा-सुयालाइवा, दुक्कालाइवा, अप्पुग्घाइवा, महग्धाइवा, सुभिक्खाइवा दुभिक्खाइवा, कयविक्कयाइवा, सन्निहीइवा, सन्निचयाइवा, निहीइवा; निहाणाइवा, चिरपोराणाई, पहीणसामियाइवा, पहीणसेउयाइवा, पहीण- मग्गाणिवा, पहीण गोत्तागाराइवा, उच्छिण्ण सामियाइवा, उच्छिण्णसेउयाइवा, उच्छिन्नगोत्तागाराइवा, सिंघाडग-तिग • चउक्क-चच्चर-चउम्मुह-महापह-पहेसु, नगर- गंध व वस्त्र की वर्पा, हिरण्य, सुवर्ण, रत्न, वज, आभरण, यावत् वस्त्र भाजन की वृष्टि, क्षीर की वृष्टि, सुकाल, दुष्काल, अल्प मूल्य, बहु मूल्य, सुभिक्ष, दुभिक्ष, क्रयविक्रय, संचय, संग्रह, निधि, निधान, बहुत काल का संचित कियाहुवा द्रव्य, स्वामी रहित बना हुवा द्रव्य, सेवक रहित बना हुवा द्रव्य, नष्ट मार्ग, नष्ट गोत्राकार, विच्छिन्न स्वामी, विच्छिन्न सेवक, विच्छिन्न गोत्राकार वैसे ही शृंगाटक के आकार में 39.30 तीसरा शतक का सातवा उद्देशा भावाथा Bya oyo V शब्दार्थ गार रहित उ० विछिन्न स्वामी वाले सिं० शृंगाटक ति० तीन च० चौक च० चचर च० चउमुख म० महापथ प० पथ में न० नगर की मोरी में सु० श्मशान में गि० पर्वत के० गुफा सं० शान्ति स्थान से० शोलोपस्थान भ० भवन गृहमें स० रखा हुवा चि० रहता है ण. नहीं ता० उसे स० शक्र दे० देवेंद्र दे० देवराना का वे० वैश्रमण म. महाराजा अ० अज्ञात अ० अश्रुत अ० अजान अ० अविज्ञात ॥ १७ ॥ ते० उन वे० वैश्रमण कायिक दे० देवों को स० शक्र दे० देवेन्द्र दे० देवराजा वे० वैश्रमण को इ० ये ५८२ का अनुवादक-यालयमगरी मुनि श्री अमोलक कार्पनी निद्वमणेसुवा, सुसाण गिरि कंदर संति सेलोवट्ठाण भवणगिहेसु सणिक्खित्ताई. चिट्ठति, ण ताई सक्कस्स दविंदस्स देवरण्णो वेसमणस्स महारण्णो अण्णाया अदिट्ठा, अस्सुया, अम्मुया, अविण्णाया, ॥ १७ ॥. तेसिंवा बेसमणकाइयाणं देवाणं सकारस देविंदस्स देवरण्णो वेसमणस्स इमे देवा अहावचा अभिण्णाया होत्था, * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी बालाप्रसादनी वार्थ तीन रस्ते मीले वहां, चौक, चचर, चउमुख, महापथ, राजमार्ग, नगर की नालियों में, श्मशान, गिरि, गुफा, शान्तिगृह, शैलोपस्थान, व भवनगृहमें रखाहुवा द्रव्य वगैरह होते हैं वे शक्र देवेन्द्रके वैश्रमण-महा- राजा से अज्ञात, अदृष्ट, अशृत, अविज्ञात नहीं हैं. वे सब वातों जानते हैं ॥ १७ ॥ पूर्णभद्,' माणभद्र, चालिभद्र, सुवर्णभद्र, शुक्ररक्ष, पूर्णरक्ष, सर्वाण, सर्वयश, सर्व कार्य समिद्ध, अमोध अशान्त वगैरह Q * पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति ( भगवती) सूत्र Bag. तीसरा शतकका सातवा उद्देशा 882 शब्दार्थ दे०देव अयथाअपत्य अ०अभिज्ञात हो हैं पु०पूर्णभद्र मा० माणिभद्र सा०शालिभद्र सु०सुमन भद्र च० चक्र रक्ष पु० पूर्णरक्ष स० सर्वाण स० सर्व यश स सर्व कामसिद्ध अ०अमोघ अ०अशान्त सन्शन दे देवेन्द्र दे देवराजा की वे० वैश्रमण म० महाराजा की दो० दोपल्योपम की ठि० स्थिति प० प्ररूपी अ० यथा ५८३ अपत्य अ० अभिज्ञात दे० देवों की ए. एक प० पल्योपम की ठि० स्थिति प०प्ररूपी ए० यह म०महर्दिक जा. यावत् वे वैश्रमण म० महाराजा से० ऐसे ही भ० भगवन् ॥ ३ ॥ ७ ॥ सूत्र तंजहा-पुण्णभदे, माणिभदे, सलिभदे, सुमणभदे, चक्करक्खे, पुण्णरक्खे, सव्वाणे, सब्बजसे, सव्वकाम समिरे, अमोहे, असंते, ॥ सकरसणं देविंदस्स देवरण्णो बे- समणस्स महारण्णो दो पलिओवमाइं ठिई प० ॥ अहावच्चाभिण्णायाणं देवाणं ,एगं पलिओवमं ठिई पण्णत्ता ए महिड्डीए जाब बेसमणे महाराया. सेवं भंते भंतेत्ति । तइयसए सत्तमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥ ७ ॥ भावार्थ वैश्रमण महाराजा को अपत्यवत् चिनय करनेवाले देवों हैं. उन की दो पल्योपम की स्थिति कही है और १० अपत्य देवों की एक पल्योपम की स्थिति कही है. अहो गौतम ! यह वैश्रमण की त्रद्धि यावत् महानु- भाग का वर्णन कहा ॥ १८॥ अहो भगवन् ! आप जैसे फरमाते हो वैसे ही हैं. यह तीसरा शतकका सातवा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥ ७ ॥ RAS शब्दार्थ सूत्र 4. अनुवादक-बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी.. रा० राजगृह न० नगर जा० यावत् प० पर्युपासना करते एक ऐसे व० बोले अ० असुर कुमार भं. भगवन् दे० देव को क० कितने दे देव आआधिपत्य जा० यावत् चि० रहते हैं गो० गौतम ददश दे० देव आ० आधिपत्य जा० यावत् वि. विचरते हैं तं. वह ज० यथा च० चमर अ० असुरेन्द्र सो सोम ज० यम व० वरुण के० वैश्रमण व० वलि व० वैरोचनेन्द्र व० वैरोचन राजा ॥ ? ॥ ना० नाग रायगिहे नगरे जाव पज्जुवासमाणे एवं वयासी- असुरकुमाराणं भंते देवाणं कइ- देवा आहेबच्चं जाव चिटुंति ? गोयमा ! दसदेवा आहेवच्चं जाव विहरंति, तंजहा. चमरे असुरिंदे असुरराया सोमे, जमे, वरुणे, वेसमणे ॥ बली वइरोयाणंदे वइरोयण- राया, सोमे, जमे वरुणे, वेसमणे ॥ १ ॥ नागकुमाराणं भंते ! पुच्छा । गोयमा ! सातवे उद्देशे में लोकपालों की वक्तव्यता कही. अब इस उद्देशे में देवताओं के स्वामी का कथन करते राजगृही नगरी में श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी पधारे. परिपदा वंदन करने को आई, धर्मोपदेश सुनकर पीछी गई. उस समयमें श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार कर श्री गौतम स्वामी एसा प्रश्न पूछने लगे कि अहो भगवन् ! असुरकुमार जाति के देवों को कितने देव स्वामीपने रहते हैं? अहो गौतम ! असुर कुमार जाति के देवों को दश देव स्वामीपने रहते हैं. दक्षिण दिशा के चमर नामक अमुर का राजा असुरेन्द्र और सोम, यम, वरुण व वैश्रमण यह चार उन के लोकपाल. उत्तर दिशा के प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * भावार्थ शब्दार्थ कुमार की पु० पृच्छा गो गौतम द० दश दे० देव आं० आधिपत्य जा० यावत् वि० विचरते हैं ध० धरण ना० नामकुमारेन्द्र ना० नाग कुमार राजा का० कालवाल को० कोलवाल सं० शंखवाल शेलवाल भू० भूतानेन्द्र ज० जैसे ना० नागकुमारेन्द्र की ए० इस व० वक्तव्यता से ए० यह एक ऐसे इ० इनका ने० जानना ॥ २ ॥ मु० सुवर्ण कुमार का वे. वेणुदेव वे० वणुदाल चि० चित्र वि० विचित्र सूत्र 380 पंचमान विवाह पण्णत्ति (भगःत.) मूत्र 8888 दसदेवा आहेवच्चं जाब विहरंति तंजहा-धरणे, नागकुमारिंदे, नागकुमारराया, काल- वाले, कोलवाले, सेलवाले, संखवाले ॥ भूयाणिदे नागकुमारिंदे नागकुमारराया कालवाले, कोलवाले, संखवाले, सेलवाले ॥ जहा नागकुमारिंदाणं एयाए वत्तव्वयाए, एतं एवं इमाणं नेयव्यं ॥ २ ॥ सुवण्णकुमाराणं वेणुदेवे, वेणुदाली, चिते, विचित्ते । 83 तीमरा शतकका आठवा उद्देशा चाभार्थ बलि नामक वैरोचनेन्द्र और उन के सोम, यम, वरुण व पैश्रमण नामक लोकपाल यह दश हुए ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! नाग कुमार देव के कितने अधिपति देव कहे हैं ? अहो गौतम !. दश अधिपति देव कहे हैं. दक्षिण दिशा के धरण नामक नाग कुमारेन्द्र और उन के कालवाल, कोलवाल, संखवाल व से- लवाल यह चार लोकपाल; और उत्तर दिशा के भूतानेन्द्र व उन के कालवालादि चार लोकपाल पीलकर दश हुए ॥ २ ॥ सुवर्ण कुमार को दश देव अधिपतिपना करनेवाले हैं. वेणुदेष और वेणुदाल ये दोनों DIC १ SH ५८६ - अनुवादक-बालग्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दार्थ चि० चित्रपक्ष वि० विचित्ररक्ष वि० विद्युत्कुमार को ह० हरिकंत ह० हरिसिंह प० प्रभ सु० सुमभ प० प्रमकान्त सु० सुमभकान्त ॥ ४ ॥ अ० अग्निकुमार को अ० अमिसिंह अ० अग्निमानव ते तेउ ते तेउ सिंह ते तेउकान्त ने० तेउमभ ६ ॥ दी० द्वीप कुमार को पु० पूर्ण ३० वसिष्ठ रू० रूप रू० रूपांश: रू. रूपसिंह रू० रूपप्रभ ॥ ६ ॥ उ० उदधिकुमार को ज० जलकान्त ज. जलप्रभ ज० जल ज० जल चित्तपक्खे, विचित्तपक्खे, ॥ ३ ॥ विज्जुकुमाराणं-हरिकंते, हरिस्सहे. पभे, सुप्पभे, सूत्र पभकते. सुप्पभकते ॥ ४ ॥ अग्गिकुमाराणं-अग्गिसीहे, अग्गिमाणवे, तेउ, तेउ- .सीहे, तेउकंते, तेउप्पभे ॥ ५॥ दीवकुमाराणं-पुण्ण वसि? रूय, रूयंस, रूयसीह, रूयप्पभा ॥ ६ ॥ उदहिकुमाराणं-जलकंत, जलप्पभ, जल, जलरूय, जलकंत, भावार्थ इन्द्र और प्रत्येक के चित्र, विचित्र, चित्रपक्ष व विचित्र पक्ष ये चार लोकपाल कहे हैं ॥ ३ ॥ विद्युत् कुमार को दश देव अधिपतिपना करनेवाले हैं. हरिकंत हरिसिंह ये दो इन्द्र और प्रत्येक को प्रभ, सुप्रभ, अभकान्त, सुप्रभकान्त ये चार २ लोकपाल मीलकर दश हुए ॥ ४ ॥ अग्निकुमार को अग्निसिंह व अग्नि मानव ये दो इन्द्र और उन के तेउ, तेजींसंह, तेउ कान्त व तेउ प्रभ ऐसे चार २ लोकपाल कहे हैं ॥५॥ द्वीप कुमार को पूर्ण व वशिष्ट ऐसे दो इन्द्र और उन के रूप, रूपांश, रूपसिंह व रूपप्रए ऐसे चार २ लोकपाल ॥ ६ ॥ उदधि कुमार के जलकान्त और जलप्रभ ऐसे दो इन्द्र उन के जल, जलरूप, जलकांत * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * शब्दार्थ सू पंचांग (वाह पण्णत्ति (भगवती) 8 रूप ज० जलकान्त ज० जलमभ ॥ ७॥ दि० दिशांकुमार को अ० अमितगति अ० अमितवाहन तुं० त्वरितगति खि० क्षिप्रगति सी० सिंहगति सी० सिंह विक्रमगति ।। ८॥ वा० वायुकुमार को वे बेलंय प० प्रभंजन का० काल म० महाकाल अं० अंजन रि०रिष्ठ ॥ ९॥ ५० स्थनिन कुमार को घो० घोप म० महाघोप आआवर्त वि० व्यावर्त नं० नंदियावर्त म० महानंदियावर्त ऐ० ऐसे भा० कहना ज० जेसे अ० असुरकुमार को ॥ १० ॥ पि० पिशाच की पु० पृच्छा गो• गौतम दो दो दे० देव आ० आधि जलप्पभा ॥ ७ ॥ दिसाकुमाराणं अमियगई, अमियवाहणे, तुरियगई, खिप्पगई, सीहगई, सीहविक्कमगई ॥ ८ ॥ वाउकुमाराणं वेलंब, पभंजण, काल, महाकाल, अंजण, रिट्ठा, ॥ ९ ॥ थणियकुमाराणं घोस, महाघोस, आवत्त, वियावत्त, नंदि- यावत्त, महानंदियावत्ता एवं भाणियव्वं ॥ जहा असुरकुमाराणं ॥ १० ॥ सोमेय. जलप्रभ एसे चार २ लोकपाल कहे हैं. ॥७॥ दिशा कुमार को अमितगति अमितमाहन ऐसे दो इन्द्र उन के तरित गति, क्षिप्रगति, सिंहगति व सिंह विक्रमगति ऐसे चार २ लोकपाल हैं ॥८॥ वायुकुमार को वेलम्ब वgg प्रभंजन ऐसे दो इन्द्र और उन के काल, महाकाल, अंजन व रिष्ट ऐसे चार २ लोकपाल ॥९॥ स्थनित कुमार क घोष व महाघोष ऐसे दो इन्द्र और आवर्त, वियावर्त, नंदियावर्त व महानंदियावर्त ऐसे चार २ लोकपाल? इन तरह भुवनपति के२०इन्द्र व८०लोकपाल मीलकर १०० हुए. ॥१०॥ सोम नामक लोकपाल का नाम कहते 29899 तीसरा शतकका आठवा उद्देशा 853 भावार्थ oya अनुवादक-पालग्रहमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 शब्दार्थ चि० चित्रपक्ष वि० विचित्र क्ष वि० विद्युत्कुमार को ह० हरिकंत ह. हरिसिंह प० प्रभ सु० सुप्रभ ५० प्रभकान्त सु० सुप्रभकान्त ॥ ४ ॥ अ० अग्निकुमार को अ० अग्निसिंह अ० अग्निमानव ते तेउ ते. तेउ सिंह ते० तेउकान्त ने० तेउप्रभ ॥ ५॥ दी द्वीप कुमार को पु० पूर्ण व० वसिष्ठ रू० रूप रू० रूपांश रू० रूपसिंह रू० रूपप्रभ ॥ ६ ॥ उ० उदधिकुमार को ज० जलकान्त ज. जलप्रभ ज जल ज० जल चित्तपक्खे, विचित्तपक्खे, ॥ ३ ॥ विज्जुकुमाराणं-हरिकंते, हरिस्सहे. पभे, सुप्पभे, पभकंते, सुप्पभकते ॥ ४ ॥ अग्गिकुमाराणं-अग्गिसीह, अग्गिमाणवे, तेउ, तेउ- .सीहे, तेउकंते, तेउप्पभे ॥ ५॥ दीवकुमाराणं-पुण्ण वसिट्ठ रूय, रूयंस, रूयसीह, रूयप्पभा ॥ ६ ॥ उदहिकुमाराणं-जलकंत, जलप्पभ, जल, जलरूय, जलकंत, भावार्थ इन्द्र और प्रत्येक के चित्र, विचित्र, चित्रपक्ष व विचित्र पक्ष ये चार लोकपाल कहे हैं ॥ ३ ॥ विद्युत् कुमार को दश देव अधिपतिपना करनेवाले हैं. हरिकंत हरिसिंह ये दो इन्द्र और प्रत्येक को प्रभ, सुप्रभ, प्रमकान्त, सुमभकान्त ये चार २ लोकपाल मीलकर दश हुए ॥ ४ ॥ अग्निकुमार को. अग्निसिंह व आग्नेि मानव ये दो इन्द्र और उन के तेउ, तेउसिंह, तेउ कान्त व तेउ प्रभ ऐसे चार २. लोकपाल कहे हैं ॥५॥ द्वीप कुमार को पूर्ण व वशिष्ट ऐसे दो इन्द्र और उन के रूप, रूपांश, रूपसिंह व रूपपर ऐसे चार २ लोकपाल ॥ ६ ॥ उदधि कुमार के जलकान्त और जलप्रभ ऐसे दो इन्द्र उन के जल, जलरूप, जलकांत * मकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी शब्दार्थ yo - - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र - जो ज्योतिपियों के दो दो दे देव च चंद्र सू सूर्य-॥ २३ ॥ सो. सौधर्मः ई०... ईशान में के. कितने दे० देव आ० आधिपत्य वि० विचरते हैं गो० गौतम'द० दशदेव.वि० विचरते. सं० शक दे० देवेन्द्र दे देवराजा सो० सोम ज० यम व० वरुण घे० वैश्रमण ई० ईशान ए, यह व० वक्तव्यता.स. वाणं दो देवा आहेबच्चं जाव विहरंति. तंजहा. चंदे, सृरेय ॥ १३ ॥ सोहम्भीसाणे- सुणं भंते ! कप्पेसु कइदेवा आहेबच्चं जाब विहरंति ? गोयमा'! 'दसदेवा जाव विहरति, तंजहा-सके देविंदे देवराया, सोमे, जमे, वरुणे वेसमणे ईसाणे देविदे. देवराया सोमे, जमे, यरुणे, वेसमणे ॥१४॥ एसा वत्तव्वया सव्वेसुवि कप्पेसु. एएचेव जाति के देव कहते हैं: आगपन्नी, पाणपत्री, इसीवाय, भुवाय, कन्दिय, महाकन्दिय, कोइंग व पयंग देव. इन आगे को दो २ देव अविपतिपना करते हैं. उन के नाम सनिहित, सामानिक, घाइ, वघाइ, इसी, इसीवाल, ईश्वर, महेश्वर, सुवत्थ, विशाल, हास, हासरति, सेय, महासेय, पयग, पयगवति. यो मोलह वाणज्यंतर के ३२ देव होते हैं ॥ १२ ॥ ज्योतिषी देव को दो देव अधिपतिपना करते हैं. चन्द्र व सूर्य ॥ २३ ॥ सौधर्म ईशान देवलोक में दश देव अधिपतिपना करते हैं. शक्र देवेन्द्र, ईशान देवेन्द्र और उन के सोम, यम, वरुण व क्षमण नामक चार २ लोकपाल ॥ १४ ॥ तीसरे चौथे देवलोक में दुश देव अधिपति हैं. सनत्कुमारेन्द्र व माहेन्द्र और उन के सोमादि चोर.२ लोकपाल. ऐसे ही पांचवे छठे तीसरा शतक का आठवा उद्देशा भावाथा Oyd शब्दार्थ ५८८ सूत्र 4.3 अनुवादक-बालमानारामुनि श्री अमोलक ऋपिजी - पत्य जा. यावत् वि० विचरते हैं का काल म० महाकाल मु० सुरूप प० प्रतिरूप पु० पूर्णभद्र अ० देवपति मा० माणिभद्र मा० भीम त० तैसे म० महाभीम किं- किन्नर कि० किपुरुप स० सत्पुरुष म० महापुरुप अ० अतिकाय म० महाकाय गी० गीतरति गी० गीतयश ऐ० ऐसे वा० वाणव्यंतर ॥. १२ ।। कालवाले, चित्त, पभ, तेओ, तहरुवेचेव, जल, तहतुरियगतिया काल, आवत्त पढमाओ॥ ११ ॥ पिसायकुमाराणं पुच्छा ? गोयमा ! दो देवा आहेवच्चं जाव विहरंति, तंजहा-कालेय, महाकाले , सुरुव, पडिरूव ; पुण्णभद्देय, अमरवइ, मा- णिभदे, भीमेय तहा महाभीमे ॥१॥ किंनर किंपुरिसे खलु, सप्पुरिसे खलु तहा महा- पुरिसे। अइकाय महाकाए-गीयरईचेवगीयजसे एए वाणमंतराणं ॥१२॥ जोइसियाणं दे- १ सोम, २ कालपाल ३ चित्र ४ प्रभ, ५ तेउ, ६ रूप ७ जल ८ वरितगति ९ काल व १० आवर्त ॥२२॥ अब व्यंतर जाति के देवता का प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! पिशाच जाति के देव को कितने देव अधिपति हैं ! अहा गौतम ! दो देव अधिपति हैं. काल व महाकाल. ऐसे ही भूत के दो देव रूप, प्रतिरूप, यक्ष के दो देव पूर्णभद्र, मान भद्र, राक्षस के दो देव भीम, महाभीम, किन्नरजाति के दो देव फिगर, किंपुरुप, किं पुरुप के दो देव सत्पुरुष महापुरुष, महोरग के दो देव अतिकाय, महाकाय, गंधर्व के दो देव १ गीतरति २ गीतयश यह आंठ व्यंतर जाति के देव कह और अन्यभी आर. व्यंतर * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी भागर्थ शब्दार्थ ५८९ सत्र जो ज्योतिषियों के दो० दो दे देव चं० चंद्र सू० सूर्य ॥ २३॥ सो सौधर्मः ई०... ईशान में क. कितने दे० देव आ० आधिपत्य वि० विचरते हैं गो० गौतम द० दशंदेव.वि. विचरते हैं सं० शक दें० देवेन्द्र दे० देवराजा सो० सोम ज० यम व० वरुण घे० वैश्रमण ई ईशान ए०'यह व० वक्तव्यता स० वाणं दो देवा आहेबच्चं जाब विहरंति. तंजहा. चंदे, सुरेय ॥ १३ ॥ सोहम्भीसाणे- सुणं भंते ! कप्पेसु कइदेवा आहेबच्चं जाब विहरंति ? गोयमा ! 'दसदेवा- जाव विहरंति, तंजहा-सक्के देविंदे देवराया, सोमे, जमे, वरुणे वेसमणे ; ईसाणे देविंदे. देवराया सोमे, जमे, वरुणे, वेसमणे ॥१४॥ एसा वत्तव्वया सव्वेसुवि कप्पेसु. एएचेव जाति के देव कहते हैं. आगपन्नी, पाणपनी, इसीवाय, भुइवाय, कन्दिय, महाकन्दिय, कोइंग व पयंग देव. इन आरों को दो २ देव अविपतिपना करते हैं. उन के नाम सनिहित, सामानिक, घाई, घाइ, इसी, इसीचाल, ईश्वर, महेश्वर, सुवत्थ, विशाल, हास, हासरति, सेय, महासेय, पयग, पयगवति. यो सोलह वाणज्यतर के ३२ देव होते हैं ॥ १२ ॥ ज्योतिषी देव को दो देव अधिपतिपना करते हैं. चन्द्र व सूर्य ॥ १३ ॥ सौधर्म ईशान देवलोक में दश देव अधिपतिपना करते हैं. शक देवेन्द्र, ईशान देवेन्द्र और उन के सोम, यम, वरुण व नैश्रयण नामक चार २ लोकपाल ॥ १४ ॥ तीसरे चौथे देवलोक में दश देव अधिपति हैं. सनत्कुमारेन्द्र व माहेन्द्र और उन के सोमादि चार.२ लोकपालं. ऐसे ही पांचवे छठे 8 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 6382-3 तीसरा शतक का आठवा उद्देशा . भावार्थ OYO yo .. शब्दार्थ सुत्र * 4.३ अनुवादक-बालग्रहमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 सब में के देवलोक में ए. यही भा० कहना जे० जो ई० इन्द्र ते वे भा० कहना ॥ ३ ॥ ८ ॥ रा० राजगृह जा. यावर एक ऐसा च० बोले कर कितने भ० भगवन् इं० इन्द्रिय विषय ५० कहे गो० गौतम पं० पांच प्रकार के ई० इन्द्रिय विषय प० कहे तं० वह ज० जैसे सो० श्रोतेन्द्रिय विपय जी० भाणियन्वा ॥ जे य इंदा ते भाणियव्वा ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ सईयसए अट्टमोइसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥ ८ ॥ रायगिहे जाव एवं क्यासी कइविहेणं भंते ! इंदिय विसए पण्णत्ते ? गोयमा ! पंच- विहे इंदियविषए पण्णते, तंजहा-सोइंदिय विसए, जीवाभिगमे नोइसियउद्देसओ सातपे आउने, नववे दशके, अग्यारहवे, वारहवे तक का जानना. अहो भगवन् ! आप के वचन तथ्य हैं. यह तीसरा शतकका आठवा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥८॥ रानगृह नगर के गुणशील नामक उद्यान में भगवंत पधारे. परिपदा वंदने को आई धर्मोपदेश सुनकर पीजी गई. उस समय में श्री श्रमण भगवंत महावीर को भगवंत गौतम स्वामीने प्रश्न किया कि अहो मगरन् ! इन्द्रिय के विषय कितने प्रकार के हैं ? अहो गौतम ! इन्द्रिय के विषय पांच प्रकार के हैं: श्रोतन्द्रिय का विषय, चाइन्द्रिग का विषय, घ्राणेन्द्रिय का विषय, रसनेन्द्रिय का विपस, व स्पर्शेन्द्रिय का रिपय. अहो भगवन् ! श्रोतेन्द्रिय का विषय कितने प्रकार का कहा है. अहो गौतम ! श्रोतेन्द्रिय * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी मालीप्रसादजी * भावार्थ शब्दार्थ जीवाभिगम में जो० ज्योतिपि का उद्देशा ने जानना अ० अपरिशेप ॥ ३ ॥१॥ रा० राजगृह जा० यावत् ए. ऐसे व० बोले च० चमर का भ० भगवन् अ० असुरेन्द्र अ. असुर 0.9 OYO 09 सूत्र ५११ नेयधो अपरिसेसो । सेवं भंते भंतेत्ति ॥ तईयसए नवमो उदेसो सम्मत्तो ॥३॥ ९॥ रायगिहे जाव एवं वयासी-चमरस्सणं भंते ! असुरिंदरस असुररण्णो कइ परिसाओ पण्णत्ताओ ? गोयमा ! तओ परिसाओ पण्णत्ताओ, तंजहा-समिया, चंडा, जाया. भावाथे * तीसरा शतक का दशवा उद्देशा 3-48 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 32802 , - का विषय दो प्रकार का कहा है. सुशन्द व दुशब्द, ऐसे है। पांचो इन्द्रियों के विषय जानना. इस का विस्तार पूर्वक कथन जीवाभिगम सूत्र के ज्योतिषी उद्देशे में से जानना. अहो भगवर ! आप के वचन यथातथ्य हैं. यह तीसरा शतकका नववा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥९॥ राजगृही नगरी के गुणशील नामक उद्यान में श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी पधारे, परिपदा वंदने को आई धर्मोपदेश सुनकर पीछी गई. उस समय में गौतम स्वामीने वंदना नमस्कार कर ऐमा प्रश्न पूछा कि अहो भगवन् ! चमर नामक असुरेन्द्र को कितनी परिषदा कही हैं ? अहो गौतम ! उन को समि- या, चंडा व माया ऐसी तीन परिपदा कही हैं. समिया आभ्यंतर परिपदा है, इन के देव घोलाये आते हैं. विना पोलाये नहीं आते हैं. चंडाबीचकी परिषदा है, इन के देव बोलाये, विना बोलाये आते हैं. नाया वाहिरकी परि- शब्दार्थ x ५९२- सूत्र भावार्थ + अनुरादक बालप्रमचारी माने श्री अमोलक ऋापनी 85 राना की क० कितनी प० परिपक्षा प. कही गो० गौतम त० तीन १० परिपदा ५० कही तं० वह ज. जैसे स० समिता चं० चढा जा० माया ए. ऐसे ज० जैसे अ० अनुक्रम से जा. यावत् अ० अच्युत कहर ॥३॥ १० ॥३॥ एवं जहाणुपुयाए जाव अच्चुओ कप्पो । सेवं भंते भंतेत्ति ॥ तईय संए दसमो उद्देसो.सम्मत्तो ॥ ३ ॥१०॥ तईयं सयं सम्मत्तं ॥ ३ ॥ पदा है. इन के देव विना बोलाये कार्य करने के अवसर पर हाजर रहते हैं. समिया के. चौबीस हजार, चंडा के भठावीप हजार व जाया के ३२ हजार देव कहे हैं. ऐसे ही तीन प्रकार की देवी की परिपदा कही है. उस में समिया की ३५० चंदा की ३०० और जाया की २५० देवियों कही हैं. भाम्पर परिपदा की देवियों का अदाइ पल्यापम का, मध्य परिपदा की देवियों का दो पल्योपम का और बाह्य परिपदा की देविषों का १।। पल्योपम का आयुष्य जानना. जैसे असुरेन्द्र की तीन पारपदा कहो वैसे ही बलेन्द्र की तीन परिपदा जानना. ऐसे ही अच्युतेन्द्रतक के चौसठ इन्द्र की तीन २ परिपदा- भों का अधिकार जानना. उन का आयुष्य वगैरह सब अधिकार जीवाभिगम सूत्र से जानना. अहो मगरन् ! आपके वचन सत्य हैं: ऐसा कहकर तप व संयम से आत्मा को भावते हुए विचरने लगे. यह नीमण शनाका दशवा बंशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥ १० ॥ तीसरा शतकका भावार्थ संपूर्ण हुवा ॥ ३ ॥ भकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालामसादनी * शब्दार्थ *. चतुर्थ शतकम. * ५१६ सूत्र 4. पंचमांग विवाह पपणचि (भगवती) मूत्र 8888 च० चमर वि० विमान से च. चार हो होते हैं रा० राज्यधानी मे ने नारकी ले लेश्या से.द० दश उ० उद्देशा च० चौथे शतक में ॥ १ ॥ रा० राजगृह न० नगर में जा० यावत् ए. ऐसा ५० घोले ई. ईशान दे० देवेन्द्र दे. देवराजा को क कितने लो० लोकपाल मो० गौतम च. चार लो. लोकपाल तं. वह ज० जैसे सो० मोप ज० यम २० वरुण ३० वैश्रमण ए० इन भं० भगवन् लो लोकपालोंका क. चत्तारि विमाणेहि, चत्तारिय होति रायहाणीहिं । नेरइए लेस्साहिय, दस उद्देसा चउत्थसए ॥ १ ॥ रायगिहे णगरे जाव एवं क्यासी- ईसाणरसणं भंते ! देविंदस्स देवरणो कइलोगपाला पण्णत्ता ? गोयमा ! चचारि लोगपाला पण्णत्ता, तंजहा- तीसरे शतक में देवता का अधिकार कहा है. इस में भी देवता का अधिकार कहते हैं. इस शतक के दश उद्देशे कहे हैं. पहिले चार उद्देशे में ईशानेन्द्र के चार लोकपालों के चार विमानोंका कथन है. पांचवे,० छढे, सातवे व आठवे में उन की चार राज्यधानियों का कथन है. नववे में नरक के जीवों का और दशवे में लेश्या का वर्णन है. ॥ १ ॥ राजगृह नगरी के गुणशील नामक उद्यान में श्री श्रमण भगवंत महावीर }os स्वामी पधारे, परिपदा वंदन करने को आई धर्मोपदेश सुनकर पीछी गई. उस समय में श्री श्रमण भगवंत 83088 चौथा शतकका पहिला उद्देशा 989 भावार्थ 60 शब्दार्थ x सूत्र ५९२ * भावार्थ 'अनुवादक-बालप्रमचारी माने श्री अमोलरु. ऋापनी 80 राजा की क०.कितनी पर परिपदा प०कही गो० गौतम त तीन ५० परिपदा प० कही तक वह ज. जैसे स०. समिता चं० चहा जा० माया-ए. ऐसे ज० जैसे अ० अनुक्रम से जा. यावत् अ० अच्युत कर ॥.३ ॥ १० ॥३॥ एवं जहाणुपुवीए जाव अच्चुओ कप्पो । सेवं भंते भंतेत्ति ॥ तईय संए दसमो उद्देसो.सम्मत्तो ॥ ३ ॥ १० ॥ तईयं संयं सम्मत्तं ॥ ३ ॥ पदा है, इन के देव विना वोलाये कार्य करने के अवसर पर हाजर रहते हैं. समिया के चौबीस हजार चंदा के अठावीस हजार व आया के ३२ हजार देव कहे हैं. ऐसे ही तीन प्रकार की देवी की परिपदा कही है. उस में समिया की ३५० चंडा की ३०. और जाया की २५० देवियों कही हैं. आम्परर परिपदा की देवियों का अदाइ पल्यापमं का, मध्य परिपदा की देवियों का दो पल्योएम का और बाह्य परिपदा की देविषों का ॥ पल्यापम का आयुष्य जानना. जैसे असुरेन्द्र की नीन परिपदा कहो वैसे ही बलेन्द्र की तीन परिपदा जानना. ऐसे ही अच्युतेन्द्रतक के चौसठ इन्द्र की तीन २ परिषदा- भों का अधिकार जानना. उन का आयुष्य वगैरह सब अधिकार जीवाभिगम सूत्र से जानना. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं: ऐसा कहकर तप व संयम से आत्मा को भावते हुए विचरने लगे. यह नीमा शाकका इशया उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥ १० ॥ तीसरा शतकका भावार्थ संपूर्ण हुवा ।। ३ ।। *प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालाप्रसादनी 68 - .
Qा O0 ५९५ सूत्र 888 पंचमांग विवाह एण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 80-82- दार्थ वबंसक फ० स्फटिकावतंसक र० रत्नावतंसक जा० जात्तिरूपावतंसक म०मध्य में ई०ईशनावतंसक म० महा- विमान पु० पूर्व में ति० तीर्छ अं• असंख्यात जो० योजन वी० व्यतिक्रान्त होते ए० यहां ई० ईशान दे० देवेन्द्र दे० देवराजा का सो० मोप म० महाराजा का सु० सुभन म० महाविमान अ० अर्ध तेरह जो० योजन ज. जैसे स० शक की व वक्तव्यता तक तीसरे स० शतक में त० तैमे ई. ईशान की भी जा. कवडंसए, फलिह वडंसए, रयण वडंसए, जाइरून वडंसए, मज्झे तत्थ ईसाण वडंसए । तत्थणं ईसाणं वडंसयस्स महाविमाणस्स पुरच्छिमेणं तिरिय मसंखेजाई जोयणाई वीइवइत्ता एत्थणं ईसाणस्स देविंदस्स देवरण्णो सोमस्स महारणो सुमणे नामं महाविमाणे पण्णत्ते अद्धतेरस जोयण जहा सक्करस वत्तव्बया, तईयसए, तहा भावार्थ हुवे हैं. उन से क्रोडा कोड योजन ऊंचे ईशान नामक मरा महा विमान रहा हुवा है. उस में पांच अव- तंसक (मुकुट समान) विमान हैं. १ अंकावतंसक, २ स्फटिकावतंसक ३ रत्नावतंसक ४ नातिरूपावतंसक और मध्य में ईशानावतंसक. उन ईशानावतंसक से पूर्व में असंख्यात योजन तीर्छा जावे वहां ईशानेन्द्र के सोम महाराजा का सुमन नामक महा विमान कहा है. वह साढे चारह योजन का लम्बा चौडा यावत्। सब वक्तव्यता शकेन्द्र के सोम महाराजा जैसे कहना. जैसे ईशानेन्द्र के सोम महाराजा की वक्तव्यता कही वैसे ही यम का स्फटिकावतंसक, वरुण का रत्नावतंसक, व वैश्रमण का जातरूपावतंसक का जानना. चौथा शतक का पाहा उद्देशा 81-887 OYO 1 . 2 अनुनादक-पालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ कितने वि० विमान प० प्ररूपे गो गौतम च० चार वि० विमान ५० प्ररूपे सु० सुमन स० सर्वतोभद्र २० वल्गु सु० सुवल्गु ॥ २॥ क० कहां ई० ईशान के सो० सोम म० महाराजा का सु सुमन म० महा- विमान ५० प्ररूपा गो० गौतम जं० जम्बूद्वीप में मं. मेरु प० पर्वत की उ० उत्तर से ३० इस र. रत्न मभा पु० पृथ्वी से जा० यावत् ई० ईशान का देवलोक में त० वहां पं० पांच व. अवतंसक अं० अंका- सूत्र सोमे, जमे, वरुणे, वेसमणे | एएसिणं भंते ! लोगपालाणं कइ विमाणा पण्णत्ता ? गोयमा ! चत्तारि विमाणा पण्णत्ता तंजहां-सुमणे, सव्वओभदे, बग्गू, सुवग्गू ॥२॥ कहिणं भंते ! ईसाणस्स देविंदस्सं देवरंण्णों सोमस्स महारण्णो सुमणेनामं महावि- माणे पण्णत्ते ? गोयमा ! जंबुद्दीवेदीवे मंदरस्स पव्वयस्स उत्तरेणं इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए जाव ईसाणे नामं कप्पे पण्णत्ते ? तत्थणं जावं पंचवडंस्था प० तं, अं- महावीर स्वामी को श्री गौतम स्वामी ने प्रश्न पुछा कि अहो भगवन् ! ईशानेन्द्र को कितने लोकपाल कहे १.? अहो गौतम ! सोम, यम, वरुण व वैश्रमण ऐसे चार लोकपाल कहे हैं. अहो भगवन् ! उन के विमान कितने कई हैं ? अहो गौतम ! उन के चार विमान कहे हैं. सुमन, सर्वतोभद्र, वल्गु और मुबल्गु ॥२॥ अहो भगवन् ! ईशान देवेन्द्र का सोम नामक महा विमान कहां है ? अहो गौतम ! जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत की उत्तर में इस रत्नप्रभा पृथ्वी से अनेक सो योजन उपर चंद्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र व तारे रहे प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी भावार्थ ददाथे - x x x ५९७ सत्र भावार्थ > पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 387 रा. राज्यधानी में च० चार उ० उद्देशा भा० कहना जा. यावत् २० वरुण म महाराजा ॥४॥८॥ ने नारकी ने नारकी में उ० उत्पन्न होते हैं अ० नारकी सें, अन्य प० पन्नवणा में ले लेश्या पद अट्ठमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ४ ॥ ८॥ नेरइएणं भंते ! नेरइएसु उववजइ, अनेरइएणं भंते ! नेरइएसु उक्वजइ ? पण्ण- वणाएवि लेस्सापए तईओ उद्देसओ भाणियन्वो जाव नाणाई चउत्थसए नवमो स्वामी पूछने लगे कि अहो भगवन ! ईशानेन्द्र के सोम महाराजा की सोमा नामक राज्यधानी कहां है ? अहो गौतम ! सुमन नामक महा विमान की नीचे वगैरह सब वर्णन शक्रेन्द्र के मोम महाराजा जैसे जान- ना. यों चारों राज्यधानी अपने २ विमान नीचे तीर्छ लोक में रही हुई हैं. यों चारों राज्यधानी के चार उद्देशे भिन्नर कहना. यह चौथा शतकका पांचवा, छठा, सातवा, व आठवा ऐसे चार उद्देशे पूर्ण हुए॥४॥८॥ उक्त उद्देशे में देवता का अधिकार कहा. देव चक्रेय शरीर करनेवाले होते हैं. वैसे ही नरक के जीव, भी क्रेय शरीर करनेवाले होते हैं. इसलिये आगे नरक का अधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! नरक के आयुष्यका बंध करनेवाले नरक में उत्पन्न होते हैं या अन्य जीव नरक में उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! जिनोंने नरक के आयुष्य का बंध किया है वेही नरक में उत्पन्न होते हैं; परंतु अन्य जीव नरक में नहीं उत्पन्न होते हैं. जो नरक में उत्पन्न हुवे हैं. उन को आयुप्य बंध से छोड़ाने को कोई भी समर्थ नहीं है ११ चौधा शतक का नववा उद्देशा 8%ANDA ग . < अनुवादक-बालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 80 शब्दार्थ यावत् अ अर्चनीय स. संपूर्ण च. चार लो. लोकपालों का वि० विमान २ का उ उद्देशा च० चार, वि० विमान के चा० चार उ० उद्देशे अ० अपरिशेपं न विशेष ठि० स्थिति में णा० - नाना प्रकार आ० आदि दु० दो ति० तीन भाग ऊ० कम प० पल्योपम ध० वैश्रमण की हो है दो दो स० तीन भाग २० वरुण प० पल्योपम अ. अपसवत् दे देवोंकी ॥४॥४॥ सत्र ईसाणस्सरि जाव अच्चणिया सम्मत्ता चउण्हविलो गपालाणं विमाणे २ उद्देसओ. चउसुवि विमाणेसु. चत्तारि उद्देसा.. अपरिसेसा णवरं ठिईए. नाणतं, आइ दुय.ति भागूणा. पलिया धणयस्स होति दो चेव ॥ : दोसइ भागा वरुण पलिय महा- वच देवाणं ॥१॥ चउत्थसए चउत्थो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ४ ॥ ४ ॥ रायेहाणिसुवि चत्तारि उद्देसया भाणियब्वा । जात्र वरुणे . महारायाः ॥ चउत्थसए याथ मात्र स्थिति में भिन्नता है. सोम व यम महाराजा की स्थिति त्रीभाग कम दो पल्योपमे, वैश्रमण की दो पल्योपम की, और वरुण की स्थिति त्रीभाग अधिक दो पल्योपम जानना. इन के अपत्य देवों की एक परपोषम की स्थिति जानना..यह चौथे शतक के चार उद्देशे पूर्ण हुवें ॥ ४ ॥ ४ ॥ रागगृह नगर के गुणशील नामक उद्यान में श्री श्रमण भगवंत को वंदना नमस्कार कर - श्री गौतम '* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * *. को LAM - शब्दार्थ x x ५१७ सूत्र भावार्थ SHRS पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र रा० राज्यधानी में च० चार उ० उद्देशा भा कहना जा० यावत् २० वरुण म महाराजा ॥४॥८॥ ने नारकी ने० नारकी में उ० उत्पन्न होते हैं अ० नारकी सें, अन्य प० पनवणा में ले लेश्या पद अट्ठमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ४ ॥ ८ ॥ 'x नेरइएणं भंते ! नेरइएसु उववजइ, अनेरइएणं भंते ! नेरइएसु उववज्जइ ? पण्ण- वणाएवि लेस्सापए तईओ उद्देसओ भाणियन्वो जाव नाणाई चउत्थसए नवमो स्वामी पूछने लगे कि अहो भगवन ! ईशानेन्द्र के सोम महाराजा की सोमा नामक राज्यधानी कहां है ? अहो गौतम ! सुमन नामक महा विमान की नीचे वगैरह सव वर्णन शक्रेन्द्र के मोम महाराजा जैसे जान-24 ना. यों चारों राज्यधानी अपने २ विमान नीचे तीछे लोक में रही हुई हैं. यों चारों राज्यधानी के चार उद्देशे भिन्नर कहना. यह चौथा शतकका पांचवा, छठा, सातवा, व आठवा ऐसे चार उद्देशे पूर्ण हुए॥४॥८॥ उक्त उद्देशे में देवता का अधिकार कहा. देव चक्रेय शरीर करनेवाले होते हैं. वैसे ही नरक के जीव भी बैक्रेय शरीर करनेवाले होते हैं. इसलिये आगे नरक का अधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! नरक के ge आयुष्यका बंध करनेवाले नरक में उत्पन्न होते हैं या अन्य जीव नरक में उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! जिनोंने नरक के आयुष्य का बंध किया है वेही नरक में उत्पन्न होते हैं; परंतु अन्य जीव नरक में नहीं उत्पन्न होते हैं. जो नरक में उत्पन्न हुवे हैं उन को आयुप्य वंध से छोडाने को कोई भी समर्थ नहीं 993 चौधा शतक का नववा उद्देशा ><AYARI शन्दा सूत्र ५२८ भावार्थ 4. अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 63 का नतीमरा 3० उद्देशा भा० कहला जा. यावत् ना० ज्ञान ॥४॥२॥ से० अथ क• कृष्ण लेश्या वाला नी नील लेश्या को प• प्राप्त कर के त. तद्रूप ता. तद्वर्णपने उद्देसो सम्मत्तो ॥ ४ ॥ ९ ॥ से नणं भंत ! कण्हलेस्सा नीललेस्सं पप्प तारूवत्ताए तावण्णत्ताए एवं चउत्थो यास्न् कृष्ण लेश्यावाले जीव नीची दो नरक में उत्पन्न होते हैं वगैरह सच अधिकार पन्नवणा सूत्र जैसे कहना. यह चौथा शतक का नवा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ४ ॥ १ ॥ इस उद्देशे में लेश्याका अधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! कृष्ण लेश्यावाला नील लेश्या के द्रव्य ग्रहण कर यदि काल करतो क्या वह नील लेश्या में उत्पन्न होता है ? हा गौतम ! जिस लेश्या के पुद्गल परि- णमा कर काल करता है उसी लेश्या में उत्पन्न होता है. अहो भगवन् ! कृष्ण लेश्यावाला नील लेण्या पने वारंवार परिगमता है तो किस प्रकार वह परिणमता है ? अहो गौतम! जैसे दूध तकर (छाउ) रूप परिणमता है, अर्थश शुद्ध श्वेत वस्त्र को जैसे रंग चढावे पैसे रूपपने परिणमता है इसी प्रकार कृष्ण लेश्या गाला नीललेश्या पने परिणमता है, नील कापोत पने, कापोत तेजोपने, तेजो पद्मपने, य पत्र गुल लेश्या पने परिणमे. अहो भगवन् ! कृष्ण लेश्या का वर्ण कैसा है ? अहो गौतम ! कृष्ण लेल्या का वर्ण मेघ की पटा समान श्याम, नील लेश्या का तोते के रंग समान; कापोत लेश्या का कबुतर जैसा, प्रकाशक-रामायहादुर लाला सुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र Som शब्दाशी ऐमें चः चौथा उ० उद्देशा प० पन्नवणा में ले लेश्या पद में ने० नानना जा० यावत् परिणाम २० वर्ण र० रस गं गंध सु० शुद्ध अ० अप्रशस्त सं० संक्लिष्ट उ० ऊष्ण ग. गतिपरिणाम प० प्रदेश ओ० अब- सूत्र उद्देखओ पण्णवणाए चेव लेस्सापदे नेयम्यो । जाव परिणाम वण्ण रसगंध सुद्ध अपसत्थ संकिलिड्डुण्हा, गइ परिणाम पएसोगाहण वग्गणाट्ठाण मप्पबहुं । सेवं भंते सेजो लेश्या का उदित होता मूर्य जैसा, पद्म लेश्या का हलदी जैसा व शुक्ल लेश्या का चन्द्र जैसा श्वेत वर्ण है. अब छ लेश्या के रस कहते हैं. कुष्म लेश्या का निम्ब वृक्ष जैसाकदु, नील लेश्या का नागर जैसा कटु, कापोत लेश्या का कच्चे बोर जैसा कपायला तेजो लेश्या का आम्र फल जैमा ग्यटीमठ पा लेश्या का.खार क जैसा मधुर और शुक्ल लेश्या का खांड सक्का जैसा मिष्ट. अब गंध कहते हैं. कृष्ण, नील व कापोत लेश्या के पुद्गलों की मृतक देहकी गंध समान गंध, और तेजो, पन व शुक्ल की कुसुम समान. पहिली तीन लेश्या अशुभ है और पीछे की तीन लेश्या शुभ है. पहिले की तीन लेश्या संक्लिष्ट हैं और पीछे की तीन लेश्या संक्लिष्ट नहीं हैं. पहिले की तीन लेश्या शीत व रूक्ष हैं, और पीछे की तीन लेश्या ऊष्ण व स्निग्ध हैं. पहिली तीन लेश्या दुति में लेजानेवाली हैं, और पीछे की तीन लेश्या मुगति में लेजाने वाली है. जघन्य, उत्कृष्ट व मध्यम तथा उत्पातादि भेद से परिणाम विचारना. सब लेश्या के अनंत प्रदेश प्रत्येक प्रदेश असंख्यात प्रदेशावगाह है. कृष्ण लेश्या योग्य पुद्गल वर्गणा अनंत हैं वह उदारिक १ चौथा शतक का दशवा उद्देशा :- yo oyo शब्दार्थ गांडना व वर्गणा ठां स्थान अं अल्पा बहुंत्व ॥ ४॥४॥ मानार्थ 1. अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुाने श्री अमोलक पिजी भंतेत्ति ॥ चउत्थसए दसमो. उद्देसो ॥ ४॥ १० ॥ चउत्थं सर्य सम्मत्तं ॥४॥ जैसे जानना. तारतम्यता की विचित्रता से अध्यवसाय: निबन्ध कृष्णादि द्रव्य समुह असंख्यात हैं: इसा लिये अध्यवसाय स्थानक असंख्यात हैं. अल्पाबहुत्व सव: से थोडा जघन्य कापोत लेश्या के द्रव्यार्थ स्थान, उससे जघन्य नील लेश्या के द्रव्यार्थ स्थान असंख्यात गुन, उस से जघन्य कृष्ण लेश्या के द्रव्यार्थ स्थान असंख्यात गुने, उस से जघन्य तेजो लेश्या के द्रव्यार्थ: स्थान : असंख्यात गुने उस से जघन्य पद्म लेश्या के द्रन्यार्थ स्थान असंख्यात गुने उस से शुक्ल लेश्या के जयन्य द्रव्यार्थ स्थान, असंख्यात गुने. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं यह चौथा शतक का दशवा उद्देशा पूर्ण हुवा, यह चौथा. शतक समाप्त हुआ ॥१॥१०॥४॥ * मकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्वालापसादजी * S S ६०१ - पंचमाङ्ग विवाह पण्णाति ( भगवती ) सूत्र - ॥ पंचम शतकम् ।। च० वा २० सूर्य अ० वायु गं• ग्रन्थि स० शब्द छ. छद्मस्थ आ० आयुष्य ए० कंपना नि. निर्ग्रन्थ रा० राजगृह चं० चपा चं० चंद्र द० दश पं० पाचवे स० शतक में ॥ १ ॥ ते० उस का० काल ते. • उस स० समय में च० चपा ना० नाम की न० नगरी हो० थी व० वर्णन योग्य ती उस चला चंपाए, रवि, अनिल, गंठिय सदे, छउ, माउ, एयण, णियंठे ॥ रायगिहं चंपा चंदिमाय दस पंचमम्मि सए ॥ १॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं चंपानामं नयरी होत्था, वष्णओ ॥ तीसेणं चंपाए नयरीए पुण्णभद्दे नामं चेइए होत्था, वण्णओ सामीस- चौथे शतक के अंत में लेश्या कही. वह लेश्या . लेश्यावन्त पुरुषों को आयुष्य का बंध करती है. भायुष्य का बंध को क्षय करनेवाला काल है इसलिये पांचवे शतक में काल की वक्तव्यता करेंगे. इस पांचवे शतक के दश उद्देशे कहे हैं. प्रथम उद्देशे में चंपा नगरी में सूर्य संबंधि प्रश्न पूछे हैं, दूसरे में वायु संबंधी प्रश्न पूछे हैं, तीसरे में जालग्रन्थिका निर्णय किया है, चौथे में शब्द का निर्णय, पांचवे छद्मस्थ की वक्तव्यता, छठे में आयुष्य के बंध का अधिकार, सातवे में पुद्गल चलने का अधिकार, आठवे में निग्रन्थ पुत्र के प्रश्नोत्तर, नववे में राजगृह नगर का अधिकार व दशवे में चंपा में चंद्रमा संघधि मन ॥१॥ उस काल उस समय में चंपा नामकी नगरी थी. उस का वर्णन उववाइ सूत्र से जानना. उस चंपा. नगरी भावार्थ पांचवा शतकका पहिला उद्देशा 9889 शब्दार्थ সাখ। का अनुवादक-पालप्रपारी मुनि श्री अमोलक त्रपिजी 8 गांहना व वर्गणा टां स्थान अं. अल्पा वहुँच ॥ ४ ॥१॥४॥ भंतेत्ति || चउत्थसए दसमो उद्देसो ॥ ४ ॥ १०॥ चउत्थं सयं सम्मत् ॥ ४ ॥ जैसे जानना. तारतम्यता की विचित्रता से अध्यवसाय निवन्ध कृष्णादि द्रव्यः समुह असंख्यात हैं. इसा लिये अध्यवसाय स्थानक असंख्यात हैं. अल्पाबहुत्व सब से थोड़ा जघन्य कापोत लेश्या के द्रव्यार्य स्थान, उससे जघन्य नील लेश्या के द्रव्यार्थ स्थान असंख्यात गुन, उस से जघन्य कृष्ण लेश्या के द्रव्यार्थ स्थान असंख्यात गुने, उस से जघन्य तेजो लेश्या के द्वयार्थ स्थान : असंख्यात गुने उस से जघन्य पद्म लेश्या के द्रव्यार्थ स्थान असंख्यात गुने उस से शुक्ल लेश्या के जघन्य द्रव्यार्थ स्थान, असंख्यात गुने. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं. यह चौथा शतक का दशवा उद्देशा पूर्ण हुवा, यह चौथा शतक समाप्त हा॥४॥१०॥४॥ * प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालामसादजी -* द ६०३ 8- पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र-883 दार्थ । उदित होकर प० वायव्य कौन में आ० जाता है प० वायव्य कौन में उ० उदित होकर उ० ईशान कौन में आ जाता है हं० हां गो० गौतम जं. जन्बूद्वीप में मू० सूर्य उ० ईशान कौन में उ. उदित होकर ना० यावत् उ० ईशान कौन में आ जाता है ॥ ३ ॥ ज० जर भं० भगवन् जं० जम्बूद्वीप में पाईणदाहिण मुग्गच्छ दाहिणपडीण मागच्छंति, दाहिण पडीण मुग्गच्छ पडीण- सूत्र उदीण मागच्छंति, पडीणउदीण मुग्गच्छ उदीचिपाईण मागच्छंति ? हंता गोयमा ! जंबुद्दीवेणं दीवे सूरिया उदीचिपाईण मुग्गच्छ जाव उदीचि पाईण मागच्छति ॥३॥ जयाणं भंते ! जंबुद्दीवे दीवे मदरस्स पव्वयस्स दाहिणड्डे दिवसे भवइ, तयाणं भावार्थ वायव्य कौन में अस्त होता है ? और वायव्य कौन में उदित होकर क्या ईशान कौन में अस्त होता है ? हां गौतम ! जम्बूद्वीप में सूर्य ईशान कौन में उदित होकर अग्नि कौन में अस्त होता है. यावत् वायव्य कौन में उदित होकर ईशान कौन में अस्त होता है * ॥ ३ ॥ यद्यपि सूर्य का सब दिशि में गमन तथापि प्रकाशके भेद से रात्रि दिन के विभाग किये हैं. अहो भगवन् : जब जम्बूद्वीप के मेरु से दक्षिण * यहां पर सूर्य का उदय व अस्त देखनेवाले लोकों की विवक्षा से लिया है. अदृश्य सूर्य दीखने में आये जब उदय कहाजाता है, और दृश्य सूर्य अदृश्य होवे तब अस्त' कहा जाता है. परंतु वास्तविक रीति से सूर्य का उदय अस्त नहीं है. 88888 पांचवा शतक का पहिया उद्देशा Sy DYO शब्दार्थ २ ६०२ सूत्र 48 अनुसाइक-बालमानचारी मुनि श्री अमोलक अपनी चंपान नगरी से पू. पूर्णभद्र चे० उद्यान हो० था सा. स्वामी प० पधारे जा० यावत् पं० परिपदा ५० पीछीगइ ॥ २॥ ते. उस काल ते० उस समय में स० श्रमण भगवन्त म० महार के जे. ज्येष्ट अंक शिष्य ई-इन्द्रभूति अ०अनगार गो गौतम गो गौत्र से जा यावत् ए. ऐसे व० बोळे जं०जम्बूद्वीप में भ० भगवन् दी द्वीप में सू० सूर्य उ० ईशान कौन में उ. उदित होकर पा० अग्नि कौन में आ० जाता हे पा० अग्नि कौन में उ. उदित होकर दा० नैऋत्य कौन में आ जाता है दा० नैऋत्य कौन में उ० मोसढे, जाव परिसा पडिगया ॥ २ ॥ तेणं कालेणं, तेणं समएणं समणस्स भगव- ओ महावीररस जेटे अंतेवासी इंदभूईणामे अणगारे गोयम गोत्तेणं जाव एवंवयासी- जंबुद्दीवेणं मंते ! दीवे सूरिया उईणपाईण मुग्गच्छ पाईगदाहिण मागच्छंति । की ईशान कौन में पूर्णभद्र यक्ष का उद्यान था. उस का वर्णन उववाइ सूत्र से जानना. वहां पर तप मंयम से आत्मा को भावते हुवे श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी पधारे. परिपदा वंदन करने को आई. धोपदंश सुनकर पीछी गई ॥२॥ उस काल उस समय में श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी के ज्येष्ट भंनेगमी गौतम गोत्रीय इन्द्रभूति अनगारने ऐसा प्रश्न किया कि अहो भगवन् ! जम्बूद्वीप में सूर्य उत्तर पर्व-ईगान-कौन में उदित होकर पूर्वदक्षिण-अग्नि कौन में क्या अस्त होता है ? अनि कोन में अदित होकर दक्षिणपशिम-नैऋत्य कौन में क्या अस्त होता है ? नैऋत्य कौन में उदित होकर पश्चिमउत्तर * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालामसादनी वार्थ .
२७ - पर्वमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र १ *%%82- पांचवा शतकका पहिरा उद्देशा 988 ब्दार्थ/पूर्व में प० पश्चिम रा ० रात्रि भ० होती है ई० हॉ० गो० गौतम ज० जब • जम्बूद्वीप में दा० दक्षिणार्ध में दि० दिन भ० होता है जा. यावत् रा० रात्रि भ० होती है ॥ ४ ॥ ज० जव भं भगवन् | जं• जम्बूद्वीप में दा दक्षिणार्ध में उ० उत्कृष्ट अ० अठारह मु० मुहूर्त का दि. दिन भहोता है त०150 तव उ. उत्तर में उ० उत्कृष्ट अ० अठारह मु. मुहूर्त का दि० दिन भ० होता है ज. जब सूत्र भवइ, तयाणं जंबुद्दीवेदीवे मंदरस्स उत्तरदाहिणणं राई भवइ ? हंता गोयमा ! जयाणं जंबूमंदररस पुरच्छिमेणं दिवसे जाव राई भवइ ॥ ४ ॥ जयाणं भंते ! जंबूदीवेदीवे दाहिणड्डे उकोसए अट्ठारसमुहुत्ते दिवसे भवइ, तयाणं उत्तर जाव उक्कोसए अट्ठारसमुहुत्ते दिवसे भवइ ॥ जयाणं उत्तरड्डे उक्कोसए अट्ठारस मुहुत्ते व दश भाग में का छ भाग रात्रि क्षेत्र हाये. यह दिन के ताप क्षेत्र व रात्रि क्षेत्र की स्थापना कही. भावार्थ जब दिन छोटा होवे तब रात्रिक्षेत्र जितना तापक्षेत्र व तापक्षेत्र जितना रात्रिक्षेत्र जानना. जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत की पूर्व में दिन होता है तब पश्चिम में भी दिन होता है और जब पूर्व पश्चिम में दिन होता है, तब क्या जम्बूद्वीप के उत्तर व दक्षिण में रात्रि होती है ? हां गौतम ! जब जम्बूद्वीप के पूर्व पश्चिम में दिन होता है तब उत्तर दक्षिण में रात्रि होती है ॥४॥ अहो भगवन् ! जय जम्बूद्वीप के द- क्षिण विभाग में अठारह मुहूर्तका दिन होता है तब उत्तर विभाग में भी अठारह मुहूर्तका दिन होता जय GO दाव्दाथ सूत्र भावार्थ - अनुवादक बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक कपिनी म मेरु पर्वत के दा० दक्षिणार्ध में दि० दिन भ० होता है त• तब उ. उत्तरार्ध में दि० दिन भर होता है. ज. जब उ० उत्तरार्ध में दि० दिन भ० होता है त० तब जं. जम्बूद्वीप के मं० मेरु पर्वत की, उत्तरडेवि दिवसे भवइ जयाणं उत्तरडेवि दिवसे भवइ तयाणं जंबुद्दीवेदीवे मंदरस्स पव्ययरस पुरच्छिमपञ्चच्छिमेणं राई भवइ ? हंता गोयमा ! जयाणं जंबुद्दीवे दीवे दाहिणड्ढे दिवसे भवइ जाव राई भवइ ॥ जयाणं भैते ! जंबूमंदरस्स पव्वयरस पुरछिमेणं दिवसे भवइ, तयाणं पञ्चच्छिमेणवि दिवसे भवइ, जयाणं पञ्चच्छिमणं दिवसे. में दिन होता है तब मेरु से उत्तर में भी दिन होता है; और जव उत्तर दिशा में दिन होता है तब क्या मेरु पर्वत की पूर्व पश्चिम में रात्रि होती है ? हां गौतम ! मेरु पर्वत की उत्तर दिशा में जब दिन होता है तब पूर्व पश्चिम दिशा में रात्रि होती है. जम्बूद्वीप में दो चंद्र व दो सूर्य फोरते हैं. अब जम्बू- दीप के उत्तर, दक्षिण, पूर्व व पश्चिम ऐसे चार विभाग करना. जर उत्तर दक्षिण में दोनों सूर्य रहने से दिन होता है तब पूर्व पश्चिम में दोनों सूर्य के अभावसे रात्रि होती है. मेरु पर्वत की पास ९४०० योजन व एक योजन के दश भाग में का नव भाग इतने क्षेत्र में दिन रहता है और, लवण समुद्र की पाम १४८५८ और एक योजन के दश भाग में का चार भाग दिन रहता है. मेरु पर्वत की - पास १३.२४ योभन और दश के छ भाग रात्रिक्षेत्र होता है और लवण समुद्र की पाम ६३२४५ योजन * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी वालापसादगी * दार्थ सत्र > पर्वमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र १ 28- पांचवा शतकका पहिया उद्देशा . पु० पूर्व में प० पश्चिम रा ० रात्रि भ० होती है ई० हा गो० गौतम ज० जब ज० जम्बूद्वीप में दा० दक्षिणार्ध में दि० दिन भ० होता है जा. यावत् रा० रात्रि भ० होती है ॥ ४॥ ज० जर में भगवन्! or जं. जम्बूद्वीप में दा दक्षिणा में उ० उत्कृष्ट अ० अठारह मु० मुहूर्त का दि. दिन भ. होता है त०० तब उ० उत्तर में उ० उत्कृष्ट अ० अठारह मु. मुहूर्त का दि० दिन भ० होता है ज. जब भवइ, तयाणं जंबुद्दीवेदीवे मंदरस्स उत्तरदाहिणणं राई भवइ ? हंता गोयमा ! जयाणं जंबूमंदरस्स पुरच्छिमेणं दिवसे जाव राई भवइ ॥ ४ ॥ जयाणं भंते ! जंबूदीवेदीचे दाहिणड्डे उक्कोसए अट्ठारसमुहुत्ते दिवसे भवइ, तयाणं उत्तर जाव उकोसए अट्ठारसमुहुत्ते दिवसे भवइ ॥ जयाणं उत्तरड्डे उक्कोसए अट्ठारस मुहुत्ते व दश भाग में का छ भाग रात्रि क्षेत्र हाये. यह दिन के ताप क्षेत्र व रात्रि क्षेत्र की स्थापना कही. जव दिन छोटा होवे तब रात्रिक्षेत्र जितना तापक्षेत्र व तापक्षेत्र जितना रात्रिक्षेत्र जानना. जम्मूदीप के मेरु पर्वत की पूर्व में दिन होता है तब पश्चिम में भी दिन होता है और जब पूर्व पश्चिम में दिन होता है, तब क्या जम्बूद्वीप के उत्तर व दक्षिण में रात्रि होती है ? हां गौतम ! जब जम्बूद्वीप के पूर्व पश्चिम में दिन होता है तब उत्तर दक्षिण में रात्रि होती है ॥४॥ अहो भगवन् ! जर जम्बूद्वीप के द- क्षिण विभाग में अठारह मुहूर्तका दिन होता है तब उत्तर विभाग में भी अठारह मुहूर्तका दिन होता भावार्थ সপ্ন 00 1 सन्न • अनुवादक-पालमाचारीमुनि श्री अमेलक ऋपिनी शब्दाथी उ० उत्तरार्ध में उ० उत्कृष्ट अ० अठारह मु० मुहूर्त का दि० दिन भ० होता है त० राव जं० जम्बूद्वीप के मं० मेरु पर्वत की पु० पूर्व में प० पश्चिम में ज० जघन्य दु० द्वादश मु० मुहूर्त की रा० रात्रि भ० होती है हं० हां गो गौतम ज० जब जा० यावत् दु० द्वादश मुहूर्त की रा० रात्रि में होती है ॥५॥ दिवसे भवइ, तयाणं जंबूदीवे दीवे मंदरस्स पुरच्छिमपच्चच्छिमेणं जहणिया दुवालस मुहुत्ता राई भवइ ? हंता गोयमा ! जयाणं जंबू जाब दुवालस मुहुत्ता राई भवइ ॥ ५ ॥ जयाणं भंते ! जंबू मंदरस्स पुरच्छिम उक्कोसए अट्ठारस जाव भावाथ और जव उत्तर दिशा में अठारह मुहूर्त का दिन होता है तब क्या पूर्व पश्चिम दिशा में वारह मुहूर्त की रात्रि होती है ? हां गौतम ! जब जम्बूद्वीप के उत्तर व दक्षिण विभाग में अठारह मुहूर्त का दिन होता तव पूर्व, पश्चिम दिशा में बारह मुहूर्त की रात्रि होती है = ॥ ५॥ अहो गवन् ! जब जम्बूद्वीप के = सूर्य के सब १८४ मांडले हैं इस में से ६५ मांडले जगति सहित जम्बूद्वीप में हैं और ११९ मांडले लवण ममुद्र में हैं. जब सब आभ्यंतर मांडले में सूर्य आता है तब उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त का दिन होता है. और जब सब याहिर मांडले पर मूर्य चलता है तब वारह मुहूर्तका दिन होता है, वहां से सूर्य पलटता है तब दूसरे मांडले से प्रत्येक मांडले पर एक मुहूर्त के एकसठीये दो भाग दिन बढ़ता है. ऐसे १८२ वे मांडले पर छ मुहूर्त दिन बढकर १८ मुहूर्त का दिन होता है. * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * GYO सन <2.28.2 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती ज० जब भ० भगवन् ज० जम्बू के मेरु पर्वत की पु० पूर्व में अ० अठारह जायावत् त० तब भ० भगवन् जं• जम्बूद्वीप के उ० उत्तर में दु० वारह मु० मुहूर्त की रा० रात्रि भ० होती है हं. हां गो० . गौतम जा यावत् भ० होती है ॥ ६ ॥ ज० जब भ. भगवन् जं• जम्बूद्वीप के दा० दक्षिणार्ध में अ० अठा म्ह मु० मुहूीतर दि० दिन भ० होता है त० तब उ० उत्तरार्ध अ० अठारह मु० मुहूतीतर दि. दिन भ० होवे पु० पूर्व ५० पश्चिम में सा० अधिक दु. वारा मु० मुहूर्त रा० रात्रि भ० होती है ई० तयाणं भंते ! जंबू उत्तरं दुवालस जाब राई भवइ ? हंता गोयमा ! जाव भवइ ॥ ६ ॥ जयाणं भंते ! जंबू दाहिणड्डे अट्ठारस मुहुत्ताणंतरे दिवसे भवइ, तयाणं उत्तरड्डे अट्ठारस मुहुत्ताणंतरे दिवसे भवइ, जयाणं उत्तरड्डे अट्ठारस मुहुत्ताणंतरे दिवसे भवइ, तयाणं जंबू मंदर पुरच्छिम पञ्चच्छिमेणं साइरेगा दुवालस मुहुत्ता पूर्व दिशा में उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त का दिन होता है, तब क्या उत्तर दक्षिण में बारह मुहूर्त की रात्रि होती है ? हां गौतम ! जब पूर्व पश्चिम में अठारह मुहूर्त का दिन होता है तव उत्तर दक्षिण में बारह मुहूर्त की रात्रि होती है. ॥ ६॥ अहो भगवन् ! जब जम्बू के मेरु की दक्षिण में अठारह मुहूर्न की अंतर में दिनहोताहै तब उत्तर में भी इतनाही दिन होता है. जब उत्तर में अठारह मुहूर्त के अंतर में दिन है तब पूर्व पश्चिम में बारह महूर्त से अधिक की रात्रि होती है ? हां गौतम ! ज़म्बूद्वीप के मेरु से उत्तर दक्षिण 388-89 पांचवा शतकका पहिला उद्देशा 9803 भावा • - ब्दाथा ६०८ 4. अनुवाद लियाचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी 8.3 गो. गोतम ज० जव ज० जम्बूद्वीप जा० जावत् रा० रात्रि भ० होती है ॥ ७ ॥ पूर्ववत् ॥ ८॥ ए. ऐसे इ० इस का क्रम से उ० कहना स० सत्तरह मु० मुहूर्त का दि० दिन ते० तेरह मु० मुहूर्त की रा. रात्रि भ० होती है स० सत्तरह मु० मुहूर्तान्तर दि० दिवस सा०अधिक ते० तेरह मु० मुहूर्त की रा० राई भवइ ? हंता गोयमा ! जयाणं जंबू जाव राई भवइ ॥ ७ ॥ जयाणं भंते ! जंबू मंदररस पुरच्छिमेणं अट्ठारस मुहुत्ताणंतरे दिवसे भवइ तयाणं पञ्चच्छिमेणं अट्ठारत मुहुनाणंतरे दिवसे भवइ, जयाणं पञ्चच्छिमेणं अट्ठारस मुहुत्ताणतरे दिवसे भवइ तयाणं जंबूमंदरउत्तर दाहिणेणं साइरेगा दुवालस मुहुत्ता राई भवइ ?हता गोयमा! जाव भवइ ॥८॥ एवं एएणं कमेणं उच्चारेयव्वं सत्तरस मुहुत्ते दिवसे, तेरस मुहुत्ता राई भवइ । सत्तरस मुहुत्ताणंतरे दिवसे भवइ, साइरेगतेरसमुहुत्ता राई । सोलसमुहुत्ते दिवसे चोदस मुहुत्ता राई. सोलस मुहुत्ताणंतरे दिवसे, साइरेग चोदस मुहुत्ताराई ॥ पण्ण- में जा अठारह मुहूर्न से कम का दिन होता है तब पूर्व पश्चिम में बारह मुहूर्त में अधिक रात्रि होती है. ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! जब जम्बू मंदर की पूर्व पश्चिम में अठारह मुहूर्न के अंतर का दिन होता है तब क्या उत्तर दक्षिणमें बारह मुहूर्त से अधिक रात्रि होती है ? हां गौतम ! जब जम्बू मंदर के पूर्व पश्चिम में अठारह मुहूर्त के अंतर का दिन होता है तब वारह मुहूर्त से अधिक की रात्रि होती है. ॥ ८॥ ऐसे ही अनुक्रम से सत्तरह मुहूर्त का दिन तेरह मुहूर्त की रात्रि, सतरह मुहूर्त से कुछ कम दिन व तेरह मुहून * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी * गवार्थ शब्दाथ 8 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगते) मूत्र . रात्रि स० सोलह मु० मुहूर्त का दि० दिन चो० चौदह मुहूर्त की रा० रात्रि सो० सोलह मु. मुहूर्नान्तर रसमुहुत्ते दिवसे, पण्णरस मुहुत्ताराई पण्णरस मुहुत्ताणंतरे दिवसे साइरेग पण्णरस मुहत्ता राई चोद्दसमुहुत्ते दिवसे सोलस मुहुत्ताराई। चोहसमुहुत्ताणतरे दिवसे साइरेगा सोलसमुहु- ताराई। तेरस मुहुत्ते दिवसे सत्तरसमुहुत्ता राई । तेरस मुहुत्ताणंतरे दिवसे, साइरेगा सत्त- रंस मुहुत्ता राई ।। जयाणं जंबू दाहिणड्डेजहण्णए दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवइ तयाणं उत्तर द्वेवि। जयाणं उत्तरढे तयाणं जंबूहीवेदीवे मंदरस्स पुरच्छिम पञ्चच्छिमेणं उक्कोसिया अ- ट्ठारस मुहुत्ता राई ? हंता गोयमा ! एवं चैव उच्चारेयव्वं जाव राई भवइ ॥ ९ ॥ जयाणं भंते ! जंबू मंदर पुरच्छिमेणं जहण्णए दुवालस मुहुत्ते दिवसे भवति तयाणं भावार्थ से अधिक रात्रि, सोलह मुहूर्त का दिन चौदह मुहूर्त की रात्रि; सोलह मुहूर्त से कुच्छ कम दिन; चौदह मुहून से अधिक रात्रिः पन्नरह मुहूर्त का दिन, पन्नरह मुहूर्तकी रात्रि, पन्नरह मुहूर्त में कुछ कम दिन व पनरह मुहूर्त में अधिक रात्रि; चौदह मुहूर्त का दिन सोलह मुहूर्त की रात्रि, चौदह मुहूर्त से कम दिन सोलह मुहून से अधिक रात्रि तेरह मुहू का दिन सत्तरह मुहूर्नकी रात्रि, तेरह मुहूर्त से कम दिन व सत्तरह मुहूर्त से अधिक रात्रि और बारह मुहूर्त का दिन व अठारह मुहूर्तकी रात्रि जानना. ॥ १॥ अहो भगवन् ! जब जम्बू मंदर की पूर्व में जघन्य बारह मुहूर्त का दिन है तब क्या उत्तर दक्षिण में उत्कृष्ट अठारह मुहूर्त की रात्रि होती 80 पांचवा शतकका पहिला उद्देशा .
शब्दाथा ६०८ सूत्र 42 अनुवादक लियाझचारी मुनि श्री अमोलक पीजी गो गौतम ज० जब ज० जम्बूद्वीप जा० जावत् रा० रात्रि भ० होती है ॥ ७ ॥ पूर्ववत् ॥ ८॥ ए. ऐसे इ० इस क० क्रम से उ० कहना स० सत्तरह मु० मुहूर्त का दि० दिन ते० तेरह मु० मुहूर्त की रा रात्रि भ० होती है स० सत्तरह मु० मुहूर्तान्तर दि० दिवस सा०अधिक ते० तेरह मु० मुहूर्त की ग० राई भवइ ? हंता गोयमा ! जयाणं जंबू जाव राई भवइ ॥ ७ ॥ जयाणं भंते ! जंबू मंदररस पुरच्छिमेणं अट्ठारस मुहत्ताणंतरे दिवसे भवइ तयाणं पञ्चच्छिमेणं अट्ठारत मुहुनाणंतरे दिवसे भवइ, जयाणं पच्चच्छिमेणं अट्ठारस मुहुत्ताणतरे दिवसे भवइ तयाणं जंवूमंदरउत्तर दाहिणेणं साइरेगा दुवालस मुहुत्ता राई भवइ ?हंता गोयमा! जाव भवइ ॥८॥ एवं एएणं कमेणं उच्चारेयव्वं सत्तरस मुहुत्ते दिवसे, तेरस मुहुत्ता राई भवइ । सत्तरस मुहुत्ताणंतरे दिवसे भवइ, साइरेगतेरसमुहुत्ता राई । सोलसमुहुत्ते दिवसे चोदस मुहुत्ता राई. सोलस मुहुत्ताणतरे दिवसे, साइरेग चोद्दस मुहुत्ताराई ॥ पण्ण- में जब अठारह मुहूर्न से कम का दिन होता है तब पूर्व पश्चिम में वारह मुहूर्त से अधिक रात्रि होती है. ॥७॥ अहो भगवन् ! जब जम्बू मंदर की पूर्व पश्चिम में अठारह मुहूर्त के अंतर का दिन होता है तब क्या उत्तर दक्षिणमें बारह मुहूर्त से अधिक रात्रि होती है ? हां गौतम ! जव जम्बू मंदर के पूर्व पश्चिम में अठारह मुहूर्न के अंतर का दिन होता है तब बारह मुहूर्त से अधिक की रात्रि होती. है. ॥ ८॥ ऐसे ही अनुक्रम से सत्तरह मुहूर्त का दिन तेरह मुहूर्त की रात्रि, सतरह मुहूर्त से कुछ कम दिन व तेरह मुहून * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायनी बालाप्रसादजी * वार्थ GY0 ६११ सूत्र 8- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र ॐ280 व्दार्थ ज जम्बूद्वीप के दा० दक्षिण में वा० वर्स का प० प्रथन स० समय प० होता है त तैसे ही जा यावत् प० होता है. ॥ ११ ॥ ज० जब भ० भगवन् ज० जम्बूद्वीप के में मेरु की पु० पूर्व में वा. वर्षा का प० प्रथम स० समय ५० होता है त० तब ५० पश्चिम में वा० वर्मा का प० प्रथम स. सपय में प० होता है. ज. जब प० पश्चिम में वा० वर्मा का.५० प्रथम स० समय प० होता है न० तव जा. यावत् म मेरु पर्वत की उ० उत्तर दा दक्षिण में अ० अनंतर ५० पश्चात् कृत स. समय पुरक्खकडं समयंसि वासाणं पढमे समए पडिवज्जइ ? हंता गोयमा ! जयाणं जंबू दाहिणड्डे वासाणं पढमसमए पडिवजह, तहचेव जाव पडिवजइ ॥ ११ ॥ जयाणं भंते ! जंबूद्दीवेदीवे मंदरस्स पुरच्छिमेणं वासाणं पढमे समए पडिवज्जइ, तयाणं पच्चच्छिमेणंवि वासाणं पढमे समए पडिवज्जइ, जयाणं पच्चच्छिमेणं वासाणं पढमे समए पडिवज्जइ, तयाणं जाव मंदरस्स पव्वयस्स उत्तरदाहिणेणं अणंतर पच्छाकड भावार्थ ऋतु का प्रथम समय होता है तब पूर्व पश्चिम में अनंतर आगापिक वर्षाऋतु का प्रथम समय होता है. ॥ ११ ॥ जब जम्बूद्वीप के मेरु पर्वन की पूर्व व पश्चिम दिशा में olo वर्षा का प्रथम समय होता है तब क्या उत्तर व दक्षिण दिशा में अनंतर अतीत काल में वर्षा का प्रथम समय होता है ? हां गौतम ! जब पूर्व पश्चिम में वर्षा का प्रथम समय होता है तब उत्तर व दक्षिण में <P>28 पांववा शतक का पहिला उद्देशा O0 शब्दार्थी का अनुवादक-पालप्रमागरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 दिवस सा० कुछ अधिक चो० चौदह मुर्त रा० रात्रि प० पन्नरह शेष पूर्ववत् ॥ १॥ १० ॥ ज० जब ज० जम्बूद्वीप के दा० दक्षिणार्ध में वा० वर्मा का प० प्रथम स० समय १० होता है तः तब उ० उत्त- राध में भी वा० वर्षा का प०प्रथम समय प० होता है ज-जव उ० उत्तरार्ध में या० वर्षा का प० प्रथम स० समय प० होता है त० तब जं० जम्बूद्वीप में मं० मेरु की पु० पूर्व में प० पश्चिम में अ. अनंतर पु० आगामिक स० समय में वा० वर्षा का प. प्रथम स० समय प० होता है इं० हां गों. गौतम ज. जब पञ्चत्थिमेण वि जयाणं पञ्चत्थिमेण चि तयाणं जंबू मंदर उत्तरदाहिणेणं उक्को- सिया अट्ठारस मुहुत्ता राई ? हंता गोयम ! जाव राई भवइ ॥ ॥ जयाणं भंते ! जंबूद्दीवेदीवे दाहिणद्वे वासाणं पढमे समए पडिबजइ, तयाणं उत्तरद्वेवि वासाणं पढमे समए · पडिवजइ, जयाणं उत्तरढे वासाणं पढमे समये पडिवनइ तयाणं जंबूद्दीवेदीवे मंदर . पुरच्छिमे पच्चच्छिमेणं अणंतर है ? हा गौतम ! जब जम्बू मंदर की पूर्व पश्चिम में बारह मुहून का दिन होता है तव दक्षिण में अठारह मुहून की रात्रि होती है ॥ १० ॥ अहो भगवन् ! जब जम्बूद्वीप के मेरु की दक्षिण में वर्षा ऋतुः का प्रथम ममय होता है . तर उत्तर में वर्षा. ऋतु का प्रथम समय होता है. जब उत्तर में वर्षाऋतु का प्रथम समय होता है तब क्या जम्बू मंदर की पूर्व पश्चिम में अनंतर आ- गाषिक काल का वर्पाक्नु का प्रथम समय होता है ? हां गौतम ! जब उत्तर दक्षिण में वर्षा * भकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाममादजी* IN ७ - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र शब्दा ५० होता है ज० जैसे वा० वर्षा का अ० अभिलाप त० से है० हेमंत का गि० ग्रीष्म का भी भा० कहना जा० यावत् उ० ऋतु ए ऐसे ए०उन ति तीन १० पद की साथ तीतीस आ० आलापक भा: कहना ॥१३॥ ज०जब दा दक्षिण में प०गथम अ०अयन प० होती है त तब उ उत्तरार्ध में प० प्रथम अ. अपन प० होती है ज. जैते स० समय का अ० अभिलाप त० ते अ० अयन से भा० कहना जा० सूत्र हेमंताणं पढमे समए पडिवज्जइ, जहेव वासाणं अभिलावो तहेब हेमंताणवि गि- म्हाणवि भाणियव्यो जाव उऊ ॥ एवं एए तिण्णिवि पएसिं तीसं आलावगा भा- णियन्वा ॥ १३ ॥ जयाणं भंते ! जंबू दाहिणड्डे पढ़मे अयणे पडिवजइ, तयाणं उत्तरढवि पडमे अयणे पडिवजइ, जहा समएणं अभिलायो तहेव अयणेणवि पांका शतक का पहिला उद्देशा RSS भावार्थ मेरु पर्वत की उत्तर, दक्षिण में हेमन्त ऋतु का प्रथम समय होता है तब क्या पूर्व पश्चिम में अनंतर अ- नागत काल में हेमन्त का प्रथम समय होता है ? अहो गौतम ! जैसे वर्षा ऋतु का कहा, वैसे ही हेमन्त ऋतु का जानना, और ऐसे ही ग्रीष्म वस्तु का जानना. इस तरह तीन ऋतु की साथ ममयादिक के तीम आलापक हुए ॥ १३ ॥ अहो भगवन् ! जव दक्षिण व उचर विभाग में अयन होती है तब क्या पूर्व पश्चिम में अनैतर आगामिक अयन होती है ? हां गौतम ! इस का सय कथन समय जसे शब्दार्थ ६१२ सूत्र - अनुवादक-पालनह्मनारामुनि श्री अमोलक ऋपिनी " वा• वर्षा का प० प्रथम स० समय प० हुवा भ० होता है. है. हा गो० गौतम ज ज ज जम्बू मं. पु० पूर्व में एक ऐसे उ० कहना जा. यावत् प० हुवा भ० होवे ए. ऐसे जल जैसे स० समय से अ० अभिलाप भा० कहा व० वर्मा का त नैसे आ० आवलिका से भा. कहना आ० श्वासोश्वांस थो. थोव ल० लब मु: मुहूर्त अ० अहोरात्रि प. पक्ष मा० मास उ० ऋतु से ए० इन स० सव से ज० जैसे स० समय का अ० अभिलाप त० तैमे भा० कहना ॥ १२ ॥ जजब हे. हेमंत का प. प्रथम स० समय समयंसि पासाणं पढमे समए पडिवण्णे भवइ ? हंता गोयमा ! जयाणं जंबूमंदरं पुरच्छिमेणं एवं चेव उच्चारेयव्वं जाव पाडिवण्णे भवइ, एवं जहा समएणं अभिलावो भाणिओ वासाणं तहा आवलियाएवि भाणियब्यो, आणा पाणूणवि, थोवेणवि, लवे- णवि, मुहुत्तेणवि, अहोरत्तेणवि, पक्खेणवि, मासेणवि, उऊणावि । एएसिं सव्वेसिं जहा समयस्स अभिलायो तहा भाणियव्वो ॥ १२ ॥ जयाणं भंते ! जंबूदीवेदीवे अनार अतीत काल में वर्षा का प्रथम समय होता है. अर्थात् प्रथम दक्षिण उत्तर विभाग में वर्षा काल होता है फीर पूर्व पश्चिम में होता है. ऐसे ही जैसे समय का कहा वैसे ही आवलिका, श्वासोश्वास, मोक, लन, महून, अहोरात्रि, पक्ष, मास व ऋतुका जानना ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! जब जम्बूद्वीप * प्रकाशक-राजाबादुर लागा सुखदेवमहायनी ज्यालाममादजी ब्दार्थ द्वीप के दा० दक्षिण में प० प्रथम ओर अवसर्पिणी प० है त० तब उ० उत्तर में भी प० प्रथम ओ०१ अवसर्पिणी प० होती है ज० जव उ० धुत्तर में प० प्रथम ओ० अवसर्पिणी जं० जम्बूद्वीप के मं. मेरू पर्वत की पु० पूर्व में प० पश्चिम में भी ने नहीं अ० है ओ० अवपिणी उ० उत्सर्पिणी अ० अवस्थित त वहां का काल प० प्ररूपा स• श्रमण आ• आयुप्मन् हं. हां गो० गौतम तं वैसे ही उ० कहना जा० यावत् स० श्रमण आ० आयुष्मन् ज० जैसे ओ० अवसर्पिणी आ० आलापक भा० कहना ए. ऐसे पढमा ओसप्पिणी पडिवजइ, तयाणं उत्तरद्वेवि पढमा ओसप्पिणी पडियजइ; जया- णं भंते ! उत्तरढे पडिवज्जइ तयाणं जंबूद्दीवेदीवे मंदरस्स पन्वयस्स पुरच्छिमेणं पञ्चच्छिमेणवि नेवत्थि ओसप्पिणी उस्सप्पिणी अवट्ठिएणं तत्थकाले पण्णत्ते समणा- उसो ? हंता गोयमा ? तंचेव उच्चारेयव्वं जाय समणाउसो जहा ओसप्पिणीए सूत्र *88.8 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र *882 2380%> पांचवा शतक का पहिला उद्देशा89202 भावार्थ दक्षिण विभाग में अवसर्पिणी होती है तब उत्तरविभाग में भी अवसर्पिणी होती है और जब उत्तर विभाग ० में अवसर्पिणी है तब क्या पूर्व पश्चिम विभाग में अवसर्पिणी उत्सर्पिणी नहीं है? क्या वहां अवस्थित काल होता है ? हाँ गौतम ! जय उत्तर दक्षिण विभाग में अवसर्पिणी होती है तब पूर्व पश्चिम विभाग अवसर्पिणी उत्सर्पिणी कुच्छ नहीं होती है परंतु वहां पर अवस्थित काल होता है. ऐसे उत्सर्पिणी का ६१४ सूत्र न अनुवादक-बालग्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ यावत् अ० अनंतर प० पश्चात् क० कृत स० समय में प० प्रथम अ० अयन प० प्रतिपन्न भ० होती है. ज० जैसा अ० अयन का अ० अभिलाप त० तैसे सं० संवत्सर से भा० कहना जु० युग वा० शतवर्ष वा० सहस्र वर्ष से वा० वर्ष लक्ष पु० पूर्वांग से पु० पूर्व से तु० त्रुटितांग तु० तुटित ए० ऐसे पु० पूर्व वु० तुटित अ० अडड अ०अवव हू० हूहूय उ० उप्पल प०पद्म ननलिन अ० अथिनिउर अ०अउय न० नउय ५० पउय नृ०चूलिका सी०शीर्षप्रहेलिका प०पल्योपम सा० सागरोपम भा कहना ॥ १४ ॥ ज० जब जे०जम्बू- भाणियव्यो, जाव अणंतरपच्छाकडसमयंसि पढमे अयणे पडिवन्ने भवइ. ॥ जहा अयणेणं अभिलावा तहा संवच्छरेणवि भाणियन्वो ॥ जुएणवि, वाससएणवि, वाससहस्सेणवि, वाससयसहस्सेणवि, पुवंगणवि, पुव्वेणवि, तुडियंगेणवि, तुडि- एणधि, एवं पुव्वे, २ तुडिए २, अडडे २, अबवे. २, हूहूय २ उप्पले २, पउमे २, नलिणे २, अस्थिणेउरे २, अउए २,णउए २,पउए २,चूलिए २,सीसपहेलिया पलि. ओवमेणवि, सागरेणवि, भाणियन्बो ॥ १४ ॥ जयाणं मंते ! जंबूद्दीवेदीवे दाहिणवे जमे अपन का कहा वैसे ही दो अयन का संवत्सर, पांच संवत्सर का.युग, सो वर्ष, सहस्र वर्ष, लक्षवर्प, चौरासी लक्ष वर्ष का एक पूर्वांग, चौरासी पूर्वाग का पूर्व, वोही हूहूय २ उप्पल ३ पद्म २ नलिण २.अत्थिणेउर २ उय२ नउय२ पउप२ चूलिए, शीपमहेलिका, पल्योपम व सागरोपम का जानना ॥१४॥ जब जम्बूद्वीप के *.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी जालाप्रसादजी * गुब्दाथ Gya द्वीप के दा० दक्षिण में प० प्रथम ओ० अवसर्पिणी प०. है त० तब उ० उत्तर में भी प० प्रथम ओ: ० अवसर्पिणी प० होती है ज. जब उ० उत्तर में प० प्रथम ओ० अवसर्पिणी जं. जम्बूद्वीप के मं० मेरुई पर्वत की पु० पूर्व में प० पश्चिम में भी ने नहीं अ० है ओ० अवपिणी उ० उत्सर्पिणी अ० अवस्थित त० वहां का० काल प० प्ररूपा स ० श्रमण आ० आयुप्मन् हैं. हां गो० गौतम तं० वैसे ही उ० कहना जा० यावत् स० श्रमण आ० आयुप्मन् ज० जैसे ओ० अवसर्पिणी आ० आलापक भा० कहना ए. ऐसे पढमा ओसप्पिणी पडिवजइ, तयाणं उत्तरद्वेवि पढमा ओसप्पिणी पडियजइ; जया- णं भंते ! उत्तरढे पडिवज्जइ तयाणं जंबूद्दीवेदीवे मंदरस्स पव्वयस्स पुरच्छिमेणं पच्चच्छिमेणवि नेवत्थि ओसप्पिणी उस्सप्पिणी अवट्ठिएणं तत्थकाले पण्णत्ते समणा- उसो ? हंता गोयमा ? तंचेव उच्चारेयव्वं जाय समणाउसो जहा ओसप्पिणाए 99803 पंचमांग विवाह पण्णति ( भगवती) सूत्र 398 सूत्र 298 पांचवा शतक का पहिला उद्देशा भावार्थ दक्षिण विभाग में अवसर्पिणी होती है तब उत्तरविभाग में भी अवसर्पिणी होती है और जब उत्तर विभाग में अवसर्पिणी है तब क्या पूर्व पश्चिम विभाग में अवसर्पिणी उत्सर्पिणी नहीं है ? क्या वहां अवस्थित काल होता है ? हां गौतम ! जब उत्तर दक्षिण विभाग में अवसर्पिणी होती है तव पूर्व पश्चिम विभाग में अवसर्पिणी उत्सर्पिणी कुच्छ नहीं होती है परंतु वहां पर अवस्थित काल होता है. ऐसे उत्सर्पिणी का yo हान्दाथार ६१३ मूत्र भनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक पापिनी 8- उ० उत्तरिणी भा. कहना ॥ १५ ॥ ल लवण स० समुद्र में सू० सूर्य उ० ईशान कौन. में उ उदित होकर ज० जैसी ज० जम्बूद्वीप की व०. वक्तव्यता भा० कही स० वैसी ही स० सब. अ० विशेषता रहित ल० लवण समुद्र की भा० कहना, न० विशेष अ० अभिलाप, इ०. यह जा० जानना. ज. जब ल० लवण समुद्र में दा० दक्षिण में दि० दिन भ. होता है. तं. वैसे ही जा. यावत् त०. तब. ल. लवण समुद्र की पु० पूर्व पश्चिम में रा० रात्रि में होती है ए. इस अ० अभिलप से ने० जानना जा. यावत् ज० जा भ० भगवन् ल लवण समुद्र में दा० दक्षिण में प० प्रथम ओ०. अवसर्पिणी ५० होती है तो आलावओ भाणियब्यो । एवं उस्सप्पिणीएवि भाणियव्वो ॥ १५ ॥ लवणेणं भंते ! समुद्दे मूरिया उदीचिपाईण मुग्गच्छ जच्चेव जंबूद्दीवस्त वत्तव्वया भाणिया, सच्चेव सव्वा अपरिसेसिया . लवणसमुदस्सवि भाणियन्वा, णवरं अभिलावो. इमो जाणियबो जयाणं भंते ? लवणसमुद्दे दाहिणद्वे. दिवसे भवइ तंचे। जाव तयाणं लवण समुद्दे पुरच्छिम पञ्चच्छिमेणं राई भवइ ॥ एएणं अभिलावेणं नेयव्वं जाव जयाणं भंते ? जानना ॥ १५ ॥ अहो भगवन् ! लवण समुद्र में मूर्य ईशान कौन में उदित होकर अनि कौन में क्या भस्त होता है ? हां गौतम ! इस का सत्र वर्णन जम्बूद्वीप जैसे जानना यावत् लवण समुद्र में दक्षिण भाग में दिन होता है तब पूर्व पश्चिम में रात्रि होती है यावत् लवण समुद्र के दक्षिण भाग में प्रथम अ- *प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * का सूत्र - पंचमांग विवाह पण्णति (भगवती) मूत्र 8-83 शब्दार्थ तब उ० उत्तरार्ध में प० प्रथम ओ० अवमर्पिणी ज० जब उ० उत्तरार्ध में ओ. अवसापणीप है त. तर ल० लवण समुद्र में पु० पूर्व १० पश्चिम में ने० नहीं है ओ० अवसर्पिणी उ० उत्सर्पिणी स० श्रमण आ० आयुप्मन् है० हां गो० गौतम जा० यावत् स. श्रमण आ० आयुष्मन् ॥ १६ ॥ धा० धातकी खंड में भ० भगवन् दी द्वीप में सू० सूर्य उ० ईशान कौन में उ० उदित होकर ज० जैसे जं. जम्यू द्वीप की २० वक्तव्यता स० मा धा० धातकी खंडकी भा० कहना ण विशेप इ० इस आ. अमिलाप से स० सब आ० आलापक भा० कहना ॥ १७ ॥ ज० जब भं० भगवन् धा० धातकी खंड दी. द्वीप लवण समुद्दे दाहिणढे पढमा ओसप्पिणी पडिवज्जइ, तयाणं उत्तरढे पढमा. ओस- प्पिणी पडिवजइ, जयाणं उत्तरढे पढमाओसप्पिणी पडिबज्जइ तयाणं लवण समुद्दे पुरच्छि- म पच्चच्छिमेणं नेवत्थि ओसप्पिणी उस्तप्पिणी समणाउसो ? हंता गोयमा! जाव समणा- उसो॥ १६ ॥ धायइखंडेणं भते! दीवे सूरिया उदीचिाईण मुग्गच्छ जहेव जंबूद्दीवस्स वत्तव्वया, सव्वेव धायइखंडस्सवि भाणियन्वा, णवरं इमेणं अभिलावेणं सव्वे आलावगा भाणियव्या ॥ १७ ॥जयाणभंते ! धायइखंडेदीवे दाहिणद्वे दिवसे भवइ, तयाणं उत्तरडेवि भावार्थ वसर्पिणी है तव पूर्व पश्चिम में अवसर्पिणी उत्सर्पिणी कुच्छ नहीं है, वगैरह अधिकार जानना. ॥ १६ ॥ अहो भगवन् ! धातकीखंड में सूर्य ईशान कौन में उदित होकर अग्नि कौन में क्या अस्त होता है ? हां गौतम ! इस का सब अधिकार जम्बूद्वीप जैसे कहना ॥ १७॥ जब धातकी खंड के दक्षिण विभाग पांचवा शतकका पहिला उद्देशा 988 CA9 शब्दार्थ सूत्र ६१८ * अनुदा बालबाह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी दा० दक्षिण में दि० दिन भ० होता है त? तब उ० उत्तर में भी दि०दिन म० होता है ज० जव उ. उत्तर में भो त ० तव धा० धातकी खंड दी द्वीपमें मं०मेरु प० पर्वतोंकी पु० पूर्व ५०पश्चिम में रा० रात्रि भा होती है है. हां गो० गौतम जा० यावत् रा. रात्रि भ० होती है ॥ १८ ॥ पूर्ववत् ॥ १९ ॥ ऐ० जयाणं उत्तरडेवि तयाणं धायइखंडे दीवे मंदराणं पव्वयाणं पुरच्छिम पच्चाच्छिमेणं राई भवइ ? हंता गोयमा ! जाव राई भवइ ॥ १८ ॥ जयाणं भंते ! धायइ खंडे दीवे मंदराणं पन्चयाणं पुरच्छिमणं दिवसे भवइ, तयाणं पञ्चच्छिमेणावि, जयाणं पञ्चच्छिमेणवि तयाणं धीयइ खंडे मंदराणं पव्वयाणं उत्तर, दाहिणेणं राई भवइ ? हंता गोयमा ! जाव भवइ ॥ १९ ॥ एवं एएणं आभिलावेणं नेयव्वं जाव जयाणं भंते ! दाहिणड्डे पढमा ओसप्पिणी तयाणं उत्तरद्वे, जयाणं उत्तरढे तयाणं धायइ में दिन होता है तब उत्तर विभाग में दिन होता है और जब उत्तर विभाग में दिन होता है तब पूर्व पश्रिम विभाग में रात्रि होती है ॥ १८ ॥ जन पूर्व पश्चिम विभाग में दिन होता है तब उत्तर दक्षिण वि: भाग में रात्रि होती है ॥ १२ ॥ इसी तरह अवसर्पिणी उत्सर्पिणी तक जानना. जर धातकी खंड.के उत्तर दक्षिण विभाग में अवसर्पिणी होती है तब पूर्व पश्चिम विभाग में अवमर्षिणी उत्सर्पिणी कुच्छ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * .
६१२ <98 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 888 शब्दार्थ इम अ० अभिलाप से ने० जानना. शेष पूर्ववत् ॥ २० ॥ ज० जैसे ल० लवण समुद्र की व० वक्तव्यता त० तैसे का० कालोदधि की भा० कहना न. विशेष का० . कालोदधि ना० नाम भी कहना. ॥ २१ ॥ अ० आभ्यंतर पु० पुष्कराध में भं० भगवन् सू सूर्य उ० ईशान कौन में उ० उदित होकर जा जैसे धा० धातकी खंड की व० वक्तव्यता त० तैसे अ० आभ्यंतर पु० पुष्कराध की भा० कहना ण. विशेष अ. अभिलाप जा० जानना जा० यावत् त० तब अ० आभ्यंतर पु० पुष्कराध मं० मेरु की पु० पूर्व ५० पश्चिम से णे० नहीं है ओ० अवसर्पिणी णे० नहीं है उ० उत्सर्पिणी, अ० अवस्थित त० वहां का सूत्र मंदराणं पव्वयाणं पुरच्छिम पञ्चच्छिमेणं नेवत्थि ओसाप्पणी जाव समणाउसो ? हंता गोयमा ! जाव समणाउसो ॥ २० ॥ जहा लवणसमुद्द वत्तव्वया तहा कालोदहिस्सवि भाणियव्वा, णवरं कालोदहिस्स नामं भाणियव्वं ॥ २१ ॥ आभि- तर पुक्खरड्डेणं भंते ! सूरिया उदीचि पाईण मुग्गच्छ जहेव धायइ खंडस्स बत्तव्वया तहेव आभितर पुक्खरगुस्सवि भाणियव्या। णवरं आभिलाबो जाणियव्यो, जाव तया- णं आभितर पुक्खरड्डे मंदराणं पुरच्छिमपच्चच्छिमेणं, णेवत्थि ओसप्पिणी, णेव- भावार्थ नहीं होते हैं ॥ २० ॥ जैसे लवण समुद्र की वक्तव्यता कही वैसे ही कालोदाध समुद्र की वक्तव्यता जानना. इस में कालोदधि नाम कहना ॥ २१ ॥ आभ्यंतर पुष्कराध द्वीप का धात की खंड जैसे सब 838 पांचा शक का पहिला उद्देशा 9888 OYO ६२ सत्र 4 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8: शब्दाथी काल ५० कहा स० श्रमण आ० आयुष्मन् से० वैसे ही भं. भगवन् पं० पांचवा स० शेतक का प: मथम उ० उद्देशा स० संपूर्ण ॥ ५॥ १ ॥ रा० राजगृह जा. यावद ए. ऐसा व० बोले अ० है ० भगवन् ई० अल्प पु. सनेह वा० वायु प० पथ्य वायु मं० मंदवायु म० महावायु वा० चलता है हं० हां अ० है ॥ १ ॥ अ० थि उस्सप्पिणी, अवट्टिएणं तत्थकाले पण्णत्ते समणाउसो ! सेवं भंते भंतेत्ति ॥ पंचमसयस्स पढमो उद्देसो सम्मत्त॥ ५ ॥ १ ॥ रायगिहे णगरे जाव एवं वयासी-अत्थिणं भंते ! ईसिं पुरेवाया, पत्थावाया, मंदावाया महावाया वायंति ? हंता अस्थि ॥ १ ॥ अस्थिणं भंते ! पुरिच्छिमेणं ईसिं पुरेवाया भावार्थ आल्यपक कहना. यावत् पुष्कराध द्वीप में पूर्व पश्चिम विभाग में अवसर्पिणी उत्सर्पिणी कुछ नहीं है. परंतु अवस्थित काल रहा हुवा है. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह पांचवा शतकका पहिला उदशा पूर्ण हुा ॥६॥१॥ प्रथम उद्देशे में दिशि में दिवसादिक के विभाग कहे. अब इस में वायु के भेद कहते हैं. राजगृही नगरी में श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार कर श्री गौतम स्वामी ऐसा. पूछने लगे कि अहो भगवन् ! अल्प स्नेह सहित वायु, वनस्पत्यादिकको पथ्यकारी वायु, मंद वायु व महा वायु * प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालाप्रसादजी * + ६२१ . 28 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र - शब्दा० भगवन् पु० पूर्व में ए. ऐसे प० पश्चिम में दा० दक्षिण में उ०. उत्तर में उ० ईशान में दा० अग्नि दा० नैऋत्य उ० वायव्य ॥ २ ॥ ज० जामं भगवन् पु० पूर्व में ई० थोडा पु० सस्नेह वायु ५० पथ्य वायु मै० मंदवायु म० महावायु वा चलता है त० तव प० पश्चिम में है. हां गो० गौतम ऐ० सत्र पत्यावाया, मंदावाया, महावाया वायंति ? हेता अत्थि ॥ एवं पच्चच्छिमेणं, दाहिणणं उत्तरेणं, उत्तरपुरच्छिमेणं, दाहिणपुरच्छिमेणं, दाहिपच्चच्छिमेणं, उत्तरपच्चच्छिमेणं ॥२॥ जयाणं भंते ! पुरच्छिमेणं ईसिं पुरेवाया, पत्थावाया, मंदावाया, महावाया वायंति;तयाणं पच्चच्छिमेणंवि. ईसिं पुरेयाया, जयाणं पञ्चच्छिमेणं ईसिं पुरेवाया, तयाणं पुरच्छिमे- णवि ? हंता गोयमा ! जयाणं पुरच्छिमेणं तयाणं पञ्चच्छिमेणवि ईसिं । जयाणं पच्च- भावार्थ क्या चलते हैं ? हां गौतम ! उक्त प्रकार के वायु चलते हैं ॥ १॥ अहो भगवन् ! क्या पूर्व दिशा में अल्प स्नेहवाला वायु, पथ्यकारी वायु, मंद वायु व महा वायु चलते हैं ? हां गौतम ! पूर्व दिशा में उक्त प्रकार के वायु चलते हैं. ऐसे ही पश्चिम, उत्तर. दक्षिण, ईशान, अग्नि, नैऋत्य व वायव्य कौन में भी ऐसे चार प्रकार के वायु चलते हैं ॥२॥ अहो भगवन् ! जब पूर्व दिशि में स्नेहमय,. पथ्य, मंद व महा वायु चलते हैं तब पश्चिम दिशा में क्या स्नेहमयादि वायु चलते हैं ? हां गौवम ! जब पूर्व उक्त प्रकार के वायु चलते हैं तव पश्चिम में भी वैसे वायु चलते हैं. और जब पश्चिम में वैसे वायु चलते ११ पांचवा शतक का दूसरा उद्देशा 8500 शब्दाथ) ६२ सूत्र 4. अनुवादक बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 काल पं० कहा स० श्रमणं आ० आयुप्मन् से० वैसे ही भ भगवन् पं० पांचवा स० शतक का प: मथम उ• उद्देशा सं० संपूर्ण ॥ ५ ॥१॥ रा० राजगृह जा • यावत् ए. ऐसा ३० वाले अ० है भ० भगवन् ई० अल्प पु० सम्नेह वा. वायु ५० पथ्य वायु मं० मंदवायु म० महावायु वा० चलता है ई० हां अ० है ॥ १ ॥ अ० थि उस्सप्पिणी, अवट्ठिएणं तत्थकाले पण्णत्ते समणाउसो ! सेवं भंते भंतेत्ति ।। पंचमसयस्स पढमो उद्देसो सम्मत्त। ॥ ५॥ १ ॥ रायोगहे णगरे जाव एवं वयासी-अत्थिणं भंते ! ईसिं पुरेवाया, पत्थावाया, मंदावाया महावाया वायंति ? हंता अत्थि ॥ १ ॥ अत्थिणं भंते ! पुरिच्छिमेणं ईसिं पुरेवाया आलांपक कहना. यावत् पुष्कराध द्वीप में पूर्व पश्चिम विभाग में अवसर्पिणी उत्सर्पिणी कुछ नहीं है. परंतु अवस्थित काल रहा हुवा है. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह पांचवा शतकका पहिला उद्देशा.पूर्ण हुवा ॥५॥१॥ प्रथम उद्देशे में दिशि में दिवसादिक के विभाग कहे. अब इस में वायु के भेद कहते हैं. राजगृही नगरी में श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार कर श्री गौतम स्वामी ऐसा. पूछने लगे कि अंहो भगवन् ! अल्पे नेह सहित वायु, वनस्पत्यादिकको पथ्यकारी वायु, मेद वायु व महा वायु * प्रकाशक रानावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी भावार्थ । ६२३ सत्र 332 पंचमांन विवाह एण्यत्ति ( भवगती) सूध 288 शब्दार्थ १० १६० यह अ० अर्थ म० योग्य से० अव के० कैसे भं० भगवन् ए. ऐसे यु० कहा जाता है गो. गौतम ते उन वा० वायु को अ०परस्पर वि० विपरीतता से उस से ल० लवण समुद्र में वे० शिखा ना० उल्लंघे नहीं से • अब ते० इसलिये जा. यावत् वा० वायु वा वाते हैं ॥ ४ ॥ अ० है भ० भगवन् ई० अल्प पु० नेहयम वायु प० पथ्य वायु मं० मंदवायु म० महावायु वा० चलता है हं० हां अ०है ककर मट्ठ । से केण?णं भंते ! एवं बुच्चइ, जयाणं दीविच्चया ईसि णो णतया सामुद्दिया ईसिं जयाणं सामुहिया ईसिं णो णतया दीविच्चथा ईसिं ? गोयमा ! तेसिणं वायाणं अण्णमण्ण विवच्चासेणं लवणसमुद्देवलं नाइकमइ, से तेण?णं जाव वाया वायंति ॥ ४ ॥ अत्थिणं भंते ! ईसिं पुरेवाया पच्छावाया, मंदावाया, महात्राया, वायंति ? हता अस्थि । कयाणं भंते ईसिं जाव वाया वायंति ? गोयमा! जयाणं वाउयाए अहारियं भावार्थ हजार योजन की पानी की वेल रही हुई है, उसे लोक के स्वभाव से वायु नहीं उल्लंघ सकता है. इस से अहो गौतम ! जब द्वीप के वायु चलते हैं तब लवण समुद्र के वायु नहीं चलते हैं और जब लनण समुद्र के वायु चलने हैं तब द्वीप के वायु नहीं चलते हैं ॥ ४ ॥ अहो भगवन ! नेहमय वायु, पथ्य वायु, मंद वायु व महावायु चलते हैं ? हो गौतम ! चलते हैं. अहो भगवन् ! वे वायु कर चलते हैं ? अहो गौतम ! अव यथारीति से वह वायुकाय जावे या उसका गमन होवे तव वायुकाय चले. अहो भगवन् ! क्या * पांचवा शतक का दूसरा उद्देशा oyo ६२२ सूत्र 43 अनुवादक-बालब्रह्मचारी. मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ ऐसे दि० दिशि वि० विदिशि में ॥३॥ अ० है भ० भगवन् दी० द्वीप प्रत्यायक ई० अल्प है. हां अ० है अ० है भ० भगवन् सा० समुद्र संबंधी ई० अल्प है. हां अ० है जं. जब भं० · भगक्न दि० द्वीप प्रत्ययिक ई० अल्प पु० स्नेहमय वायु त तब सा० समुद्र का ई० अल्प पु० स्नेहमय या वायु णो नहीं च्छिमेणवि ईसि तयाणं पुरच्छिमेणवि ईसि ॥ एवं दिसासु, विदिसासु, ॥ ३ ॥ अत्थिणं भते दीवच्चया ईसि ? हंता अस्थि ॥ अत्थिणं भंते सामुदिया ईसिं ? हंता अस्थि ॥ जयाण भंते ! दिविच्चया ईसें पुरेवाया, तयाणं पुरेवाया, तयाणं सामुदिया वि ईसि पुरेवाया, नयाणं सामुद्दियाईसिं तयाणं दीविच्चया ईसि ? णोइणटे स- भावार्थ तव पूर्व में भी वैसे ही वायु चलते हैं, यों चारों दिशि विदिशि का जानना ॥ ३ ॥ अहो भगवन् द्वीप संबंधो- स्नेहमय वायु क्या होता है ? हाँ गौतम !. द्वीपसबंधी स्नेहमय वायु होता है. वैसे ही समुद्र संबंधी भी नेहमयं वायु होता है. अहो भगवन् ! जब द्वीपसंबंधी सेहमय, पथ्य वायु, मंद वायु, व महा वायु चलते हैं: तब क्या लवण समुद्र संबंधी उक्त प्रकार के वायु चलते हैं ? अथवा जब समुद्रके वायु चलते हैं तब क्या द्वीप के वायु चलते हैं? अहो गौचम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! यह भर्थ किम कारन मे योग्य नहीं है ? - अहो गौतम ! उक्त द्वीप व समुद्र ऐसे दोनों प्रकार के वायु परस्पर विपरीतपना है अर्थात् ऐसा उन वायुओं का स्वभाव ही रहा हुवा है. अथवा लवण समुद्र में सोलह * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * में हाथ सन्न <HAgs पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र <9988- का आ. ऊंचाश्वासलेना पानीचाचांसलेना ज. जैसे खं० स्कंदक. त० तैसे च० चार आ० आलापक ने जानना अ० अनेक म० लक्ष पु० स्पश्याहुआ उ. घातकर स० शरीर सहित नि० नीकले ॥ ७ ॥ उ० चांवल कुछ कुलथ सु० मदिग ए. ये कि कौन से स० शरीर वाले व. कहना गोल गौतम उ० चावल कु. कुलथ सु० मदिरा जे० जो घ० घन द० द्रव्य ए. ये पु० पहिले के मा० भाव प. कहा हुवा प० आश्रित व वनस्पति जी० जीव स० शरीर त• उस प. पश्चात् स० शंख से अ० अतिक्रमे भंते ! वाउयं चेव आणमंतिवा, पाणमंतिवा, जहा खंदए तहा चत्तारि आलावगा नेयव्या अणेगसयसहस्सपुढे उद्दाय ससरीरी निक्खमइ ॥ ७ ॥ अह भंते ! उदण्णे, कुम्मासे, सुरा, एएणं किं सरीराति बत्तव्वं सिया ? गोयमा ! उदण्णे, कुम्मासे, सुरा य जे घणे दव्वे, एएणं पुन्वभाव पण्णवणं पडुच्च वणस्सइजीव सरीरा चलती है ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! वायुकाय वायुकाय का क्या श्वासोश्वास लेती है? अहो गौतम! स्कन्दक के अधिकारमें वायु काय वायुकायाका श्वासोश्वास लेती है. अनेक लक्षवारमरकर वायुकायके जीव वायुकायमें उत्पन्न होते हैं. वायुकाय शस्त्रादिक के सर्श से मरती है, वैक्रेय व उदारिक शरीर की अपेक्षा से वायुकाय के नीच शरीर छोड़कर जाते हैं, तेजस कार्माण की अपेक्षा से शरीर सहित जाते हैं ऐसे चार आलापक जानना॥७॥ अब अहो भगवन् ! ओदन, (चांवलं ) कुलथ व सूरा इन तीनों को कोनसा शरीर कहा है ? भहो RSS पांचवा शतक का दुसरा उद्देशा 302 भावार्थ शब्दा ६२४ 4. अनुवादक-मालममचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 भं भगवन् ई० अल्प जा. यावत् वा वायु वा वाता है गो. गौतम ज० जव वा. वायु अ० यथच्छ रि० जाता है त० तब ई० अल्प जा० यावत् वा० चलता है. ॥५॥ वा० वायु काय ऊ: उत्तर वक्रेय वा० वायु कुमार वा वायु कुमारी अ० स्वनः के प. अन्य के उ० दोनों के अ० लिये वा वायु काया की उ० उदीरणा करे त० तब ई० अल्प पु लेहवाला वायु ॥ ६ ॥ वा वायु काय वा० वायु रियंति तयाणं ईसिं जाव वायति ।। अत्थिणं भंते ईसिं ? हंता अस्थि! कयाण भंते! ईसिं जाव वायंति ? गोयमा ! जयाणं वाउयाए उत्तरकिरियं रियइ, तयाणं 'ईसिं ॥ ५ ॥ अस्थिण भंते ! ईसि ? हंता अत्यि । कयाणं भंते ! ईसिं पुरेवाया पुच्छा ? गोयमा ! जयाणं . वाउकुमारा, वाउकुमारीओ वा, अप्पणो परस्स वा तदुभयस्त वा अट्ठाएं नाउकायं उदीरंति, तयाणं ईसिं पुरेवाया ॥ ६ ॥ वाउयाएणं न्नेहमयादि वायु चलते हैं ? हां गौतम ! नेहमयादि वायु चलते हैं. अहो भगवन् ! वे वायु कत्र चलते हैं। अहो गौतम ! वायुकाय का शरीर उदारिक है, उत्तरबैक्रेय करके शरीराश्रितक्रिया से उनका जब गमन होवे तब वे चले ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! क्या स्नेहमयादि चार प्रकार के वायु हैं ? हा गौतम ! अहो भगवन् ! वे मेहमयादि वायु कब चलते हैं ? अहो गौना ! जब वायुकुमार स्वतः के लिये, अन्य के लिये अथवा दोनों के लिये वायुकाय नीकालते हैं तब वायुकाय प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी* धा 'न्न A8% पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - का आ० ऊंचाश्वासलेना पानीचावासलेना ज. जैसे खं० स्कंदक त तैसे च० चार आ० आलापक पदाथ ने० जानना अ० अनेक म० लक्ष पु० पाहुआ उ. घातकरं स० शरीर सहित नि० नीकले ॥ ७ ॥ उ० चांवल कु. कुलथ सु० मदिग ए ये कि कौन से स० शरीर वाले व० , कहना गोः गौतम उ० चावल कु. कुलथ सु० मदिरा जे० जो घ० घन द० द्रव्य ए• ये पु० पहिले के भा० भाव प० कहा हुवा ५० आश्रित व वनस्पति जी० जीव स० शरीर त• उस प. पश्चात् स० शस्त्र से अ० अतिक्रमे भंते ! वाउयं चेव आणमंतिवा, पाणमंतिवा, जहा खंदए तहा चत्तारि आलावगा नेयव्वा अणेगलयसहस्सपुढे उद्दाय ससरीरी निक्खमइ ॥ ७ ॥ अह भंते! उदण्णे, कुम्मासे, सुरा, एएणं किं सरीराति बत्तव्वं शिया ? गोयमा ! उदण्णे, कुम्मासे, सुरा य जे घणे दव्ये, एएणं पुब्वभाव पण्णवणं पडुच्च वणस्सइजीव सरीरा भावार्थ चलती है ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! वायुकाय वायुकाय का क्या श्वासोश्वास लेती है? अहो गौतम! स्कन्दक के अधिकारमें गायु काय वायुकायाका श्वासोश्वास लेती है. अनेक लक्षवारमरकर वायुकायके जीव वायुकायमें उत्पन्न होते हैं. वायुकाय शस्त्रादिक के स्पर्श से मरती है, वैक्रेय व उदारिक शरीर की अपेक्षा से वायुकाय के नीच शरीर छोड़कर जाते हैं, तेजस कार्माण की अपेक्षा से शरीर सहित जाते हैं ऐसे चार आलापक जानना॥ अब अहो भगवन् ! ओदन, (चांवलं ) कुलथ व सूरा इन तीनों को कोनसा शरीर कहा है ? महो 889 पांचवा शतक का दुसरा उद्देशा - शब्दार्थी ६२४ -- सूत्र । । र अनुवादक-यालयामचारी मुनि श्री अमोलक वापिनी भ० भगवर ई० अल्प जा० यावत् वा वायु वा. वाता है गो० गौतम ज० जब वा. वायु अ० यथन्छ रि० जाता है त० तव ई० अल्प जा० यावत् वा० चलता है. ॥ ५॥ वा० वायु काय उ: उत्तर वय वा० वायु कुमार वा वायु कुमारी अ० स्वनः के प० अन्य के उ० दोनों के अ० लिये वा वायु काया की उ० उदीरणा करे त० तब ई० अल्प पु लेहवाला वायु ॥ ६ ॥ वा? वायु काय वा० वायु रियति तयाणं ईसि जाव वायंति ॥ अत्थिणं भंते ईसिं ? हंता अत्थि! कयाणं भंते ! ईसिं जाव वायंति ? गोयमा ! जयाणं वाउयाए उत्तरकिरियं रियइ, तयाणं 'ईसिं ॥ ५ ॥ अस्थिण भंते ! ईसिं ? हंता अस्थि । कयाणं भंते ! ईसिं पुरेवाया पुच्छा? गोयमा ! जयाणं बाउकुमारा, वाउकुमारीओ बा, अप्पणो परस्स वा तदुभयस्त वा अट्ठाएं नाउकायं उदीरंति, तयाणं ईसिं पुरेवाया ॥ ६ ॥ वाउयाएणं न्नेहमयादि वायु चलते हैं ? हां गौतम ! स्नेहमयादि वायु चलते हैं. अहो भगवन् ! वे वायु कर चलते ६ ? अहो गीतम! वायुकाय का शरीर उदारिक है, उत्तरचक्रेय करके शरीराश्रितक्रिया से उनका जर गमन होवे तब वे चले ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! क्या नेहमयादि चार प्रकार के वायु हैं ? संगौतम ! अहो भगवन् ! ये स्नेहमयादि वायु कब चलते हैं ? अहो गौना ! जब वायुकुमार स्वतः के लिये, अन्य के लिये अयश दोनों के लिये वायुकाय नीकालते हैं तब वायुकाय प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवासहायनीज्वालाप्रसादनी * - नाथ 29 सत्र 48 पंचगंग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 988- शब्दार्थ का आ. ऊंचावासलेना पा० नीचाश्वासलेना ज. जैसे खं० स्कंदक त० तैसे च० चार आ० आलापक ने० जानना अ० अनेक ग० लक्ष पु० स्पश्याहुआ. उ० घातकरं स० शरीर सहित नि नीकले ॥ ७ ॥ उ० चांवल कु. कुलथ सु० मदिगए ये कि कौन से स० शरीर वाले व० कहना गो० गौतम उ० चावल कु. कुलथ सु० मदिरा जे. जो घ० घन द० द्रव्य ए• ये पु० पहिले के भा० भाव प. कहा हुवा ५० आश्रित व• वनस्पति जी० जीव स० शरीर त० उस प. पश्चात् स० शंख से अ० अतिक्रमे भंते ! वाउयं चेव आणमंतिवा, पाणमंतिवा, जहा खंदए तहा चत्तारि आलावगा नेयव्वा अणेगसयसहस्सपुढे उद्दाय ससरीरी निक्खमइ ॥ ७ ॥ अह भंते ! उदण्णे, कुम्मासे, सुरा, एएणं किं सरीराति वत्तव्वं सिया ? गोयमा ! उदण्णे, कुम्मासे, सुरा य जे घणे दव्वे, एएणं पुव्वभाव पण्णवणं पडुच्च वणस्सइजीव सरीरा भावार्थ चलती है ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! वायुकाय वायुकाय का क्या श्वासोश्वास लेती है? अहो गौतम! स्कन्दक के अधिकारमें गायुकाय वायुकायाका स्वासोश्वास लेती है. अनेक लक्षवारमरकर वायुकायके जीव वायुकायमें उत्पन्न होत ६. वायकाय शस्त्रादिक के स्पर्श से मरती है, वैक्रेय व उदारिक शरीर की अपेक्षा से वायुकाय के नाव शरीर छोड़कर जाते हैं, तेजस कार्माण की अपेक्षा से शरीर सहित जाते हैं ऐसे चार आलापक जानना॥७॥os अब अहो भगवन् ! ओदन, (चावल) कुलथ व सूरा -इन तीनों को कोनसा शरीर कहा है ? महो 393 पांचवा शतक का दुसरा उद्देशा gig शब्दार्थ ६२६ सून - अनुवादक-पालामारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 85 हुवे श शस्त्र से प० परिणमेहुवे अ० अग्नि से झा० जले हुचे अ० अग्नि से झुः शोपन हुवे अ० अ अग्नि से प. परिणमित अ. अग्नि जी जीव स० शरीर ० वक्तव्यता सि० होवे सु० मदिरा एक यह मे जो द० प्रवाही ए. वह पु० पूर्वभाव ५० आश्रित प. कहा हुवा आ० अप्काय जी० जीव स. शरीर तः उस की प० पीछे स० शस्त्र अ० अतिक्रमे जा. यावत् अ० अग्मि जी. जीव स. शरीर ॥ ८॥ अ० अथ भ० भगवन् अ०लोहा ते ताम्बा त तरुआ सा० सीसा उ०पत्थर कर तओ पच्छा सत्थातीया, सत्य परिणामिया, अगणिज्झामिया, अगणिज्झासिया अगीण, सेविया अगणिपरिणामिया, अगणिजविसरीरातिवा क्त्तव्वंसिया । सुरा एय जे देव्ये एएणं पुब्वभाव पण्णवणं पडुच्च आउजीवसरीरा, तओ पच्छा - सत्थातीया जाव अगणिजीवसरीरातिवत्तव्वं सिया ॥८॥ अहणं भंते ! अये तंबे तउए सीसए उवले गौतम ! द्रव्य के दो भेद घनद्रव्य व द्रव (प्रवाही) द्रव्य. जो ओदन व कुलथ घनद्रव्य हैं वे पूर्व पर्याय आश्री वनस्पतिकायिक हैं; फीर शस्त्र से अतिक्रमाये हुवे, शस्त्र से परिणमाये हुवे, अग्नि से धमित, अनिसे प्रमिन, व आग्नि से परिणपित उक्त पदार्थों आनि के शरीरवाले कहाते हैं. और सूरा (शराब) प्रवाही द्रव्य होने से पूर्व पर्याय आश्री अप्कायिक कहाता है. फीर शस्त्र यावत् अग्नि परिणमने पर अग्नि का- विक कहाता है।॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! लोहा, ताना, तरुआ, सीता, पाषाण, दग्ध कसोटा वगैरह कौन * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी , कार ६२७ सत्र - पंचमाम विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 3382 कसोटा ए. ये किं० कोन से स० शरीर वाले गो० गौतम पु० पृथ्वी स० शरीर वाले त० उस प. पीछे अ० अनि जी० जीव स० शरीर वाले ॥ ९ ॥ अ० अथ भं० भगवन् अ० अस्थी अ० जलीहुई अस्थी च० चर्म च० जला हुवा चर्म रो० रोम रो० जला हुवा रोम सिं० शंग सिं जला हुवा शंग खु०खुर खु० जलाहुवा खुर न० नख न० जला हुवा नख ए. ये किं० कोन से श० शरीर वाले २० वक्तव्यता सि० है गो० गौतम अ० अस्थी च० चर्म रो० रोम सिं० शृंग, खु० खुर न० नख ए० ये त० त्रम प्राण जी. जीवं श० शरीर वाले अ० जलीहुइ हड्डी च जला चर्म रो० जला रोम सिं० जलाशूग खु० जला कसट्ठिया एएणं किं सरीराइ वत्तद्वंसिया ? गोयमा! अये, तंबे, तउए, सीसए, उव- ले कसाट्ठिया एएणं, पुव्वभावपण्णवणं पडुच्च पुढवी जीव सरीरा, तओ पच्छा सत्थाईया जाव अगाणि. जीव सरीराइ वत्तव्वंसिया ॥ ९ ॥ अह भंते ! अट्ठी, अट्ठिज्झामे चम्मे, चम्मज्झाने, रोमे, रोमज्झामे सिंगे, सिंगझामे, खुरे, खुरज्झामे, नहे, नहझामे एएणं किं सरीराइ वत्तव्वं सिया ? गोयमा ! अट्ठी चम्मे रोमे सिंगे से शरीरवाले हैं ? अहो गौतम ! पूर्व पर्याय आश्रित पृथ्वी शरीरवाले हैं और शस्त्र यावत् अग्नि परि- णमने से अग्नि शरीरी है ॥ ९॥ अहो भगवन ! हड्डी, जली हुई हड्डी, चर्प, जलाहुवा चर्म, ऐसे ही विना जलाइवा व जलाहुवा रोम, शंग, खुर, व नख को कौनसा शरीर कहा है ? अहो गौतम ! अस्थी, 8883 पांचवा शतक का दुसरा उद्दसा 88.38 वार्थ ग्दाथों . पुर पावट - भनुवादा मुनि श्री अमोलक शार्पनी खुर १. लाहुवा नख ए० ये पु. पाहिले के भाव प० कहा हुवा प० आश्रित त• वस पा० प्राण जीव स. शरीर त उन ५० पीछे म० शस्त्र से अ० अतिक्रमे जा. जावत् अ. अग्नि जीव व. वक्तव्यता मि० होवे ॥ १० ॥ अ० अथ भ० भगवन् इ० अंगारे छा० भस्म बु० भूमा गो० छाने ए. ये किं. कौन मे स. शरीर वाले व० वक्तव्यता मि. होवे गो० गौतम इं० अंगारे छा० भस्म बु. भूसा गो छाने पूर्व भाव ५० कहा हुवा ए ये ए० एकेन्द्रिय जीव म० शरीर ५० प्रयोग परिणमित जा. पं० पंचेन्द्रिय स० शरीर १० प्रयोग प० परिणमित त उस ५० पीछे स० शस्त्र अ. अतिक्रमे खुरे नहे एएणं तसपाणजीवसरीरा । अटिज्झामे, चम्मझामे, रोमज्झामे, सिंगखुर णहन्झामे एएणं पुवभाव पण्णवर्ण पडुच्च तस. पाण जीव सरीरा तओ पंच्छा सत्थाईया जाव अगणिजीवत्ति बत्तव्वं सिया ॥ १० ॥ अह भंते ! इंगाले, छारिए, बुसे, गोमए एएणं किं सरीराइ वत्तध्वं सिया ? गोयमा ! इंगाले, छारिए, बुसे, गोमए एएणं पुव्वभाव पण्णवणं एए एगिदियजीवसरीरप्पयोग परिणामियावि जाव पंचिंदिय जीव सरीरप्पयोग परिणामियावि, तओ पच्छा सत्थाईया धर्म, रोम, श्रृंग, खुर द नख प्रस प्रागी जीव के शरीर कहाते हैं और जली हुई अस्थी, चर्म, रोम गैरह पूर्व भव आश्री त्रप्स प्राणी जीव के शरीर कहाते हैं. फीर शख यावत् अग्नि परिणमने पर अग्नि नोव शरीर कहाते हैं ॥१॥ अहो भगवन् ! अंगारे, राख, भूसा व गौवर को कोनसा शरीर कहा *.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
ब्दार्थ जा. यावत् अ० अग्नि जी जीव स० शरीर व वक्तव्यता सिल होवे ॥ ११ ॥ ललवण भ० भगवन् ,
स० समुद्र में के० कितना च० चक्रवाल वि० विप्कंभपना प० प्ररूपा ए. ऐसे ने० जानना. जा० यावत्
लो लोकस्थिति लो० लोकानुभाव ।। १२ ॥ से ऐसे ही भ० भगवन् भ० भगवान जा. यावत्
वि०
विचरते हैं पं० पांचो स० शतक में वी० दूसरा उ० उदेशा स समाप्त ॥ ५ ॥ २॥
६२९
पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती)
जाव अगणि जीव सरीराइ वत्तद्वंसिया ॥ ११ ॥ लवणेणं भंते ! समुहे केव-
इयं चकवाल विक्खंभेणं पण्णत्ते एवं नेयव्वं जाव लोगट्टिई, लोयाणुभावे ॥१२॥
सेवं भंते भंतेत्ति भगवं जाव विहरइ ॥ पंचमसए बीईओ उद्देसो सम्मत्तो ॥५॥२॥
88.9 पांचवा शतकका दूसरा उद्देशा 988
भावार्थ
अहो गौतम ! पूर्व पर्याय आश्रित एकंन्द्रिय यावत् पंचेन्द्रिय का शरीर कहा है. फीर शख यावत् आनि
परिणम ने से अनि जीव शरीर कहाते हैं ॥ ११ ॥ अहो भगवन् ! लवण समुद्र की परिधि कितनी कही ?
अहो गौतम ! लवण समुद्र दो लाख योजन का लम्बा चौडा है और १५८११३१ योजन से कुच्छ
अधिक की उसकी परिधि कही है वगैरह जीवाभिगम सूत्र से अनुभाव तक कहना. अहो भगवन् ! आप के
वचन सत्य हैं ऐसा कहकर तप संयम से आत्मा को भावते हुए श्री गौतम स्वामी विचरने लगे. यह
पांचवा शनकका दूसरा उद्देशा पूर्ण ढवा ॥ ५ ॥२॥
उदाथ ६२८ छाने पाचन न * भनुवादस-यालयमगरी मुनि श्री अमोलक आपनी खुर ण जलाहुवा नख ए० ये पु० पहिले के भाव प० कहा दुवा प० आश्रित त• इस पा. प्राण जीव शरीर त उन प. पीछे म० शस्त्र से अ० अतिक्रमे जा. जावत् अ० अनि जीव ५० वक्तव्यता मि. होये ॥ १० ॥ अ० अथ भ० भगवन् इ० अंगारे छा० भस्म बु० भूमा गो० छाने ए. ये किं. कौन मे स. शरीर वाले व० वक्तव्यता सि. होवे गो० गौतम ई. अंगारे छा० भस्म बु. भूसा गो० पु. पूर्व भाव ५० कहा हुआ ए. ये ए० एकेन्द्रिय जीम० शरीर प० प्रयोग परिणमित जा. पं० पंचेन्द्रिय स० शरीर प० प्रयोग प० परिणमित त• उस प० पीछे स० शस्त्र अ० अतिक्रमे खुरे नहे एएणं तसपाणजीवसरीरा । अटिज्झामे, चम्मझामे, रोमज्झामे, सिंगखुर णहज्झामे एएणं पुवभाव पण्णवर्ण पडुच तस. पाण जीव जीव सरीरा तओ पच्छा सत्थाईया जाव अगणिजीवत्ति वत्तव्यं सिया ॥ १० ॥ अह भंते ! इंगाले, छारिए, बुसे, गोमए एएणं किं सरीराइ वत्तव्यं सिथा ? गोयमा ! इंगाले, छारिए, बुसे, गोमए एएणं पुव्वभाव पण्णवणं एए एगिदियजीवसरीरप्पयोग परिणामियावि जाव पंचिंदिय जीव सरीरप्पयोग परिणामियावि, तओ पच्छा सत्थाईया धर्म, रोम, मृग, खुर इनख प्रस प्रागी जीव के शरीर कहाते हैं और जली हुई अस्थी, चर्म, रोम वगैरह पूर्व भव आश्री त्रस प्राणी जीव के शरीर कहाते हैं. फीर शव यावत् अग्नि परिणमने पर अग्नि नीर शरीर कहाते हैं ॥ १॥ अहो भगवन् ! अंगारे, राख, भूसा व गोवर को कोनसा शरीर. कहा ११ *.प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी चालाप्रसादजी * शब्दार्थ, सत्र 480 पत्रमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 88 युष्य स० सहस्र आ० अनुक्रम से गं० गुंथा हुवा जा. यावत् चिः है ए० एक ही जी० जीव ए० एक स० समय में दो दो आ० आयुष्य प. वेदते हैं तं० वह ज० यथा इ० इस भवका प० परभवका जं. जिस स० समय में इ० इस भवका प० वेदता है तं० उस स० समय में ए. परभव का ५० वेदता है। तंजहा इह भवियाउयं च, परभवियाउयंच, जंसमयं इह भवियाउयं पडिसंवेदेइ तं समयं परभवियाउयं पडिसंवेदेइ, जाव से कहमेयं भंते! एवं ? गोयमा ! जण्णं ते अण्णउत्थियात चेव जाव परभवियाउयंच. जे ते एव माहंसु तमिच्छा. अहं पुण गोयमा ! एवं माइक्खामि जाव अण्णमण्ण घडताए चिटुंति, एवामेव एगमेगस्स जीवस्स बहहिं आजाइसहस्सेहिं. बहूहिँ आउयसहस्साई आणुपुधिंगठि- हजारों आयुष्य अनुक्रम से गुन्थे हुवे, वांधे हुवे, यावत् परस्पर वीस्तीर्ण व भारवाले रहते हैं. और इस से एक जीव एक समय में इस भव संबंधी व परभव संबंधी ऐसे दो आयुष्य वेदता है. जिस समय में इस भव संबंधी आयुष्य वेदता है उस समय में वह जीव परभर संबंधी आयुप्य वेदना है. और जिम समय में परभव संबंधी आयुष्य वेदता है उस समय में इस भव संबंधी आयुष्य वेदता है. 'अहो भगवन् ! यह किस तरह है ? अहो गौतम ! अन्य तीथिंक यावत् परभव संबंधी आयुष्य वेदते हैं वहांतक का १ यहां कर्म पुगल की अपेक्षा से भारपना ग्रहण कियागया है. 358 पांचवा शतकका तीसरा उद्देशा 9987 भावार्थ शब्दा म सूत्र 4. अनुवादक-बालमझचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी अ० अन्यतीर्थिक भं० भगवन् ए. ऐसा आ० कहते हैं प० प्ररूपते हैं से० अब ज. जैसे जा० जाल ग्रंथिका आ० अनुक्रम से ग० गुंथीहुई प० परंपरा से गं० गुंथीहुई अ० परस्पर गं० गुंथीहुई अ० परस्पर गु० विस्तार युक्त अ० परस्पर भा० वजनदार अ० परस्पर गु० विस्तीर्ण सं० वजनदार अ० परस्पर घ० रचीहुई चि० है एक ऐसे ही व० बहुत जी०जीवों के व०बहुत आ०आजाति स०सहस्र व०बहुत आ० आ- अण्णउत्थियाणं भंते ! एव माइक्खंति भासेंति पण्णवेति, एवं परूवेति, से जहा नामए जाल गंठियाइवा आणुपुर्दिवगंठियाअणतरगंठिया, परंपरगंठिया, अण्णमण्णगठिया, अण्णमण्ण गुरुयत्ताए, अण्णमण्णभारियत्ताए,अण्णमण्णगुरुसंभारियत्ताए,अण्णमण्णघडत्ताए चिटुंति एवामेव बहूणं जीवाणं बहूसु आजाइसहस्सेसु, बहूई आउयसहस्साई आणुपुचि गंठियाई जाव चिटुंति । एगे वियणं जीवे एगेणं समएणं दो आउयाइं पडिसंवेदेइ- दुसरे उद्देशे में समुद्रादिक का सत्यज्ञान ज्ञानियोंने कहा, अब आगे मिथ्यात्वीयोंका असत्यज्ञान कहते हैं. श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को.गौतम स्वामी वंदना नमस्कार कर ऐसा प्रश्न पुछने लगे कि अहो भगरन् अन्य तीथिक ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं कि जैसे मत्स्यं पकड़ने की जाली अनुक्रम से गुंथी दुई, परंपरा ( एक ग्रन्थी अनंतर दुसरी ग्रन्थी) से गुन्धी हुई. परस्पर गुन्यो हुई, परस्पर वीस्तीर्ण परस्पर बननवाली और वीस्तीर्ण व वजनवाली होती है. वैसे ही बहुत देवतादि जन्म में अनेक जीवों के * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी जालाप्रसादनी * ON सूत्र 28 पंचमाङ्ग विवाद पण्णात्ति ( भगवती ) सूत्र 3987- चि हैं ए० ऐसे ही ए० एक ही जी० जीव का व० बहुत आ० आजाति स० सहस्र ब. बहुत आ० आयुष्य स० सहस्र आ० अनुक्रम से गं० ग्रथित चि० है शेप पूर्ववत् ॥ १ ॥ जी. जीन भं० भगवन भ० योग्य ने नारकी में उ० उपजने को से वह कि० क्या सा० आयुष्य सहित 'सं० जाना है. नि० आयष्य रहित सं० जाता है. गो. गौतम सा. आयुष्य सहित सं० जाता है नो नहीं निक आयुष्य रहित सं जाता है. से उसने भगवन् आ०आयुष्य क०कहा क०किया स० संचित किया गो० गौतम पु० पहिले भ० भव में क) किया पु० पहिले भव में सं० संचित किया ए. ऐसे जा खलु एगे जावे एगेणं समएणं एगं आउयं पडिसंवेदेइ, तं जहा इहभवियाउयवा, पर भवियाउयंवा ॥ १ ॥ जीवेणं भंते ! जे भविए नेरइएसु उववाजित्तए सेणं भंते किं साउए संकमइ निराउए संकमइ ? गोयमा साउए संकमइ नो निरा- उए संकमइ ॥ सेणं भंते ! आउए कहिं कडे कहिं समाइण्णे ? गोयमा ! पुरिमे समय में इस भव के आयुप्य की वेदना नहीं होती है. इसलिये जीव एक समयमें इस भव का अथवा परभव का ऐसा एक ही आयुष्य वेदता है ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! जो जीव यहां में नरक में जाता है वह यहाँपर नरक के आयुप्य का बंध करके जाता है या विना बंध किये हुए जाता है ? अहो गौतम ! नारकी में उत्पन्न होनेवाला नेरया यहांपर नरक का आयुप्य बांधकर जाता है. विना बांध नहीं जा 803पांचवा शतकका तीमरा उद्देशा वार्थ be शब्दाथा सूत्र 4.2 अनुवादक ालयामनारी मुनि श्री अमोलक पीजी 8.7 जा. यावत् से० वह क० कैसे भ० भगवन् ए. ऐसे गो० मौलम ज. जो ते वे अ० अन्यतीर्थिक तं: वैसे ही जा० गावत् प० परभव का आ० आयुष्य जे. जो ते. वे ए. ऐमा आ. कहते हैं तं० कह मि. मिथ्या अ० मैं पु० फीर गो० गौतम ए. ऐसा आ० कहता हूं जा० यावत् अ० परस्पर घ० बनाने को याइं जाव चिट्ठति ॥ एगे वियणं जीवे एगणं समएणं एगं आउयं पडिसंवदेइ तं जहा इह भवियाउयंवा, परभवियाउयंवा. जं समयं इह भवियाउयं पडिसंबेदेइ नो समयं परभवियाउयं पडिसेंवंदेइ, जं समयं परभवियाउयं पडिसंवेदेइ जो तं समय इहभवियाउयं पडिसंबेदइ, इह भवियाउस्स पडि संवेदणयाए णो परभवियाउयस्स पडिसंवेदणा, परभाश्याउयस्स पडिसंवेदणयाए णो इहभवियाउयस्स पडिसंवेदणा एवं जो कथन करते हैं वह सब मिथ्या है. परंतु मैं ऐसा कहता हूँ कि ग्रन्थिजाल समान यहुन देवादिक जन्म में एक जीव के बहुत इजार' आयुष्य अनुक्रन से गुन्याये हुवे रहते हैं और एक जीप एक समय में इम भव संबंधी अथवा परभव संबंधी एमा एक ही आयुष्य वेद सकता है. अर्थात् जिस समय में इस भव भंबंधी आयुष्य वेदता है उम समय में परभव भंबंधी आयुष्य नहीं वंदता है और जिस समय में परभव मिबंधी आयुप्य वेदता है उस समय में इस भव संबंध। आयुप्य नहीं वेदता है. क्योंकि इस भव के आयु- की वेदना होते परभव के.आयुप्य की वेदना नहीं होती है, और परभव के आयुष्य की वेदना के * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायनी जगालाप्रसादजी * भावधि .
388 पंचमाङ्ग विवाह पगत्ति (भगदतो) मूत्र 828 गब्दाथा ५० करते स० मात प्रकार का प० करता है तं० वह ज० जैसे र० रत्नप्रभा पु० पुथ्वी के ने० नारकी का आ० आयुष्य जा० यावत् अ० अधो स० सातवी पु. पृथ्वी के ने० नारकी का आ० आयुप्य तिः तिर्यंच जो० योनिका आ०आयुष्य प० करते पं० पांच प्रकार का प० करते हैं वह ज जैसे ए. एके- न्द्रिय ति० तिर्यंच योनिका आ० आगुप्य भे भेद स० सब भा० कहना म० मनुष्य का आ० आयुप्य दु. दोपकार का दे. देवका आ० आयुष्य च• चार प्रकार का प० करते हैं. ५ ॥३॥ सत्र रयणप्पभापुढवी नेरइयाउयंवा जाव अहे सत्तमा पुढवी नेरइयाउयंश, ॥ ति. रिक्ख जोणियाउयं पकरेमाणे पंचविहं पकरेइ तंजहा एगिदिय तिरिक्ख जोणियाउ- यंवा भेदो सव्वो भाणियब्यो । मणुस्साउयं दुविहं पकरेइ देवाउयं चउन्विहं पकरेइ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ पंचमसए तईओ उद्देसो सम्मत्तो ॥ ५॥ ३ ॥ भावार्थ सात प्रकार के आयुष्य का बंध करता है, रत्नप्रभा पृथ्वी के नारकी का आयुप्य यावत् सातवी तमतमा पृथ्वी के नारकी का आयुप्य. तिर्यंच योनि के आयुष्य का बंध करनेवाला एकेन्द्रिय यावत् पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनि एसे पांच प्रकारके आयुष्यका बंध करताहै. कर्मभूमि व अकर्म भूमि ऐसे दो प्रकार के आयुष्य काईge वैध मनुष्य करता है. और भुवनवति, वाणव्यंतर ज्योतिषी व वैमानिक ऐसे चार प्रकार के आयुप्य का बंध देवों करते हैं. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह पांचवा शतकका तीसरा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ५ ॥३॥ 398 पांचवा शतकका तीसरा उद्देशा . DIC ब्दार्थ सूत्र अनुवादक-पालप्रमचरािमुनि श्री अमालक ऋपिनी 82 यावत् वे वैमानिक का दे० दंडक ॥ २॥ से० अब णू० शंकादर्शी भ० भगवन् जे. जो जं० जिस भा योग्य जो० योनि उ० उत्पन्न होने को से० वह त उस आर आयुप्य प० करता है तं . वह ज. जैसे ने नारकी का आ० आयुष्य जा. यावत् दे० देवताका आ० आगुप्य ६० हां गो० गौतम जे. जो जाई जिस भ० योग्य जो योनि उ० उत्पन्न होने को ले० वह त० उस आ० आयुष्य प० करता है त. वह ज. जैसे ने नारकी का आ० आयुप्य दे० देवता का आ० आयुष्य ना० नारकी का आ०आयुप्य भवे कडे, पुरिमे भये समाइण्णे । एवं जाव वेमाणियाणं दंडओ ॥२॥ से गूणं भंते! जे जे भविए जोणिं उबवजित्तए से तमाउयं पकरेइ तंजहा नरइयाउयंवा, जाव दे- वाउयंवा ? हंता गोयमा ! जे जं भविए जोणिं उक्वजित्तए से तमाउयं पकरेइ, तंजहा नेरइयाउयंवा जाव देवाउयंवा । ने इयाउयं पकरेमाणे सत्तविहं पकरेइ तंजहा सकता है. अहो भगवन् ! उस जीवने ऐसा आयुष्य कहां उपार्जित किया? अहो गौतम! जीवने ऐमा आयुष्य पूर्वभव में उपार्जित किया. जैसे नारकीका कहा वैसे ही वैमानिक तक के चौविसही दंडक का जानना ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! नरक यावत् देवयोनि में से जीव जिम योनि में उत्पन्न होने योग्य होता उनी योनि के आयुप्य का बंध क्या वह करता है ? हां गौतम ! जिस योनि में उत्पन्न होने योग्य होता है उमी योनि के आयुष्य का बंध करता है. नारकी के आयुष्य का बंध करनेवाला * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रमादजी * 68 040 8 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 8 शब्दार्थ भं० भगवन् कि० क्या पु० स्पर्श हुवे सु० सुनते हैं अ नहीं स्पर्श हुवे सु. सुनते हैं 'गो: गौतम पु० स्पर्शे हुए सु० सुनते हैं जो नहीं अ० नहीं स्पर्शे हुवे सु० सुनते हैं जा. यावत् नि० निश्चय ही. छ. छदिशी सु० सुनते हैं त० तैसे भ० भगवन् छ ० छास्थ म० मनुष्य किं. क्या आः इन्द्रिय विपयिक स. शन्द सु० सुनते हैं पा. इन्द्रिय रिपय से दूर के स० शब्द सु० सुनते हैं गो० गौतम आ० इन्द्रिय तंजहा-संखसहाणिवा जाव झसिराणिवा ॥ ताइं भंते ! किं पुढाई सुणेइ, अपुट्ठाई सूत्र सुणेइ ? गोयमा ! पट्ठाई सुणेइ, णो अपुट्ठाई सुणेइ ; जाव नियमा छदिसिं सुणेइ ॥ तहाणं भंते ! छउमत्थे मणूसे किं आरगयाइं सहाई सुणेइ, पारगयाई सहाई भावार्थ प्रमुख का सुपिर शब्द सुन सकते हैं ? हां गौतम ! छद्मस्थ मनप्य हस्त मुख दंडादि से संयोजित शंख के शब्द, यावत मुपिर के. शब्द सुन सकते हैं. अहो भगवन् ! कान को स्पर्शाये हुवे शब्दों सुने जाते हैं। या विना स्पर्शाये हुए शब्दों सुने जाते हैं ? अहो गौतम ! स्पर्शाये हुवे शब्दों मुन सकते हैं परंतु नहीं स्पर्शाये हुए शब्दों नहीं सुन सकते हैं यावत् प्रथम शतक में जैसे आहार का आधकार कहा वैसे ही यावत् छ दिशी के शब्दों सुन सकते हैं वहांतक कहना. अहो भगवन् ! छयस्थ मनुप्य क्या श्रोत्रेन्द्रिय के विषय में आये हुए शब्दों सुन सकते हैं या श्रोत्रोन्द्रिय के विषय में नहीं आये हुए शब्दों सुन सकते हैं ? अहो गौतम ! . छमस्थ मनुष्य ओबेन्द्रिय के 'वैपय में आये हुवे शब्दों मुन सकते हैं परंतु विषय के बाहिर पांचवा शतक का चौथा. उद्देशा C ७० शब्दार्थ सून 1 अनुवादक-यालयलाचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी. छ छमस्थ भं भगवन् म० मनुप्य आ• संयोग बाले सं० शब्द सु०सुनते हैं सं० शंख का शब्द निक शृंगका शब्द सं० छोटे शख का शब्द ख० खरमुखी पो० वडे बांके प० पीपी का सं० शब्द ५० छोटा दौल ५० वडा ढोल भं० वांकीया हो० होरंभक स. शब्द भे० भेरी झ झालर ९० दुंदुभीका स० शब्द न. नत पिक विनत घ० घन झू. झसिर है. हां गो० गौतम छ २ छमस्थ म० मनुष्य आ० संबंध वाले स० शब्द सु० सुनते है तं० वह ज० जैसे मं० शंख शब्द जा. यावत् झू झूपिर शब्द ता० : उनको छउमत्थेणं भंते ! मणूसे आउडिजमाणाई सदाइं सुणेइ, तंजहा संख सदाणिवा, सिंगसदाणिवा, संखिय खरमुहिय, पाया, परिपिरिया सदाणिवा पंणव, पडह, भंभा, होरंभ-सदाणिवा, भेरि- झलरि-इंदभि-सदाणिवा, तयाणि वितयाणिवा, घणाणिवा, झूसिराणिवा ? हंता गोयमा ! छउमत्थेणं मणूसे आउड़िजमाणाई सहाई सुणेई तीमरे उदेशे में छमस्थ अन्यतीय की वक्तव्यता कही. चौथे उद्देशे में छद्मस्थ केवली की वक्तव्यता करने .. अहो भगवन् ! छमस्थ मनुष्य क्या हस्त मुख दंडादि से संयोजित शंख का शब्द, अंगका गन्द, छोटे शंख का शब्द, खरमुली (बांके.) का शब्द, वडे बांके का शब्द, पीपी का शब्द, छटे पडह का भन्द: दोल का गन्द, ढका का शब्द, होरंभ का शब्द, भेरी का शब्द, झालर का शब्द, दुदुमी का गन्द, रिणादि तत का शब्द, सतारादि वितत का शब्द, कांस्य तालादिक धन का शब्द, और. चांसली * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवस हायजी ज्वालाप्रसादमी * -- सून 8- पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 880- भक भगवन् कि० क्या पु० स्पर्श हुवे सु. सुनते हैं अनहीं स्पर्श हुवे सु. सुनते हैं गो गौतम पु० स्पर्शे हुए सु० सुनते हैं जो नहीं अ० नहीं स्पर्शे हुवे सु० सुनते हैं जा यावत् नि निश्चय ही छ छदिशी सु० सुनते हैं त• तैसे भ० भगवन् छ. छद्मस्थ म० मनुष्य किं. क्या आ: इन्द्रिय विपयिक स. शब्द सु० सुनते हैं पा० इन्द्रिय रिपय से दूर के स० शब्द सु० सुनते हैं गो गौतम आ० इन्द्रिय तंजहा-संखसहाणिवा जाव झसिराणिवा ॥ ताई भते ! किं पुट्ठाई सुणेइ, अपुट्ठाई सुणेइ ? गोयमा ! पट्ठाई सुणेइ, णो अपुट्ठाई सुणेइ ; जाव नियमा छदिसिं सुणेइ ॥ तहाणं भंते ! छउमत्थे मणूसे किं आरगयाइं सहाई सुणेइ, पारगयाई सहाई प्रमुख का सुपिर शब्द सुन सकते हैं ? हां गौतम ! छमस्थ मनुप्य हस्त मुख दंडादि से संयोजित शंख के शब्द, यावत् मुपिर के.शब्द सुन सकते हैं. अहो भगवन् ! कान को स्पर्शाये हुवे शब्दों सुने जाते हैं। या विना स्पर्शाये हुए शब्दों सुने जाते हैं ? अहो गौतम ! स्पर्शाये हुवे शब्दों मुन सकते हैं परंतु नहीं स्पर्शाये हुए शब्दों नहीं सुन सकते हैं यावत प्रथम शतक में जैसे आहार का आधिकार कहा वैसे ही यावत् छ दिशी के शब्दों सुन सकते हैं वहांतक कहना. अहो भगवन ! छद्मस्थ मनुष्य क्या श्रोत्रेन्द्रिय के विषय में आये हुए शब्दों सुन सकते हैं या श्रोत्रेन्द्रिय के विषय में नहीं आये हुए शब्दों सुन सकते हैं ? अहो गौतम ! छमस्थ मनुष्य श्रोत्रेन्द्रिय के विषय में आये हुवे शब्दों मन सकते हैं परंतु पिय के बाहिर ES पांचवा शतक का चौथा. उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ ६३८ सूत्र * अनुवादक-चालामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 82 विपयिक स० शब्द सु सुनते हैं जो नहीं पा० इन्द्रिय विषय से दरके स० शब्द.मु. सुनते हैं ॥१॥ ज. जैसे भ० भगवन् छ० छद्मस्थ म० मनुष्य तक तैसे के. केवली गो० गौतम आ० इन्द्रिय विपयिक पा० इन्द्रिय विषय से दूरके स० सब दू० दूर मू० पास अ० पासनहि ऐसे स. शब्द जा० जानते पा० देखते हैं से० अथ के० कैसे तै चैसे के० केवली आ० इन्द्रिय विपयिक पा० इन्द्रिय विपय से बाहिर के जा० यावत् पा० देखते हैं गो० गौतम के० केवली पु० पूर्व में मि० मर्यादा जा० जानत सुणेइ ? गोयमा ! आरगयाइं सहाई सुणेइ, णो पारगयाइं सदाइं सुणेइ ॥ १ ॥ जहाणं भंते ! छउमत्थे. मणूसे आरगयाइं सदाइं सुणेइ णो पारगयाइं सदाइं सुणेई. तहाणं केवली कि आरगयाई सद्दाई सुणेइ पारगयाई सद्दाइंसुणेइ ? गोयमा ! केवलीणं आरगयंवा पारगयंवा सव्वदूरमूलमणतियं सदं जाणइ पासइ, ॥ से से केण?णं तचेव केवलीणं आरगयंवा पारगयंवा जाव पासइ ? गोयमा ! केवली, पुरच्छिमेणं के शन्दा नहीं सुन सकते हैं ॥१॥ अहो भगवन् ! जब छअस्थ विषय के अंदर के शब्दों सुन सकते है। परंतु विषय की बाहिर के शब्दों नहीं सुन सकते हैं तब क्या केवली श्रोत्रेन्द्रिय के विषय में रहे हए शन्दों मुन सकते हैं या विषय से वाहिर के शब्दों मुन सकते हैं ? अहो गौतम !- केवली श्रोत्रेन्द्रिय विषय के अंदर के व बाहिर के सर्वथा दूर के, पास के, व बीच के ऐसे सब शन्द जानते व देखते प्रकाशक-रानावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादनी * 809 पंचमांग विवाह पण्पत्ति (भगवती) मूत्र 8-89 ब्दाग हैं अ• अमर्यादा जा जानते हैं ऐ. ऐसे दा० दक्षिण में प० पश्चिम में उ० उत्तर में उ० ऊर्ध्व अ० नीचे मि० मर्यादित जा. जानते हैं अ० अमर्यादित जा० जानते हैं स० सब जा जानते.हैं के० केवली स० सब पा० देखते हैं के० केवली स. सर्वथा स० सब काल स. सब भाव अ० अनंत णा० ज्ञान के केवली को अ० अनंत दं० दर्शन नि० प्रगट ज्ञा० ज्ञान ते० इसलिये जा. यावत् पा० देखते हैं ॥२॥ सूत्र मियंपि जाणइ, अमियंपि जाणइ, एवं दाहिणेणं, पञ्चच्छिमेणं, उत्तरेणं, उड्डूं, अहे मियंपि जाणइ, अमियंपि जाणइ, सव्वं जाणइ केवली, सव्वं पासइ केवली, सव्य- ओ सव्वकालं, सव्वभावे, अणते णाणे केवलिस्स, अणंते दंसणे केवलिस्स, नि- बुडे नाणे केवलिस्स, निव्वुडे देसणे केवलिस्स, सेतेणटेणं जात्र पासइ ॥२॥ भावार्थ अहो भगवन् ! किस तरह केवली दूग्के व नजीक, विपयवाले व तिपय विनाके सब शब्दों जान व देखसकते हैं ? अहो गौतम ! केवली पूर्व, दक्षिण, पश्चिप व उत्तर दिशा में प्रमाण सहित गर्भज मनुष्य जीवादि वस्तु जानते हैं और प्रमाण रहित अनंत असंख्यात वनस्पति जीव तथा पृथ्वीजीवादि वस्तु जानते हैं. इस तरह केवली सब जानते हैं व देखते हैं, केवली अतीत, अनागतादि सब काल, उदय उपशमादि सब भाव व उत्पाद व्यय ध्रौव्यादि सब भाव को केवल ज्ञान से जानते हैं व केवल दर्शन से देखते हैं. क्योंकि केवल. शानी को निरावरण शुद्ध निर्मल अनंत केवल ज्ञान व अनंत केवल दर्शन है. इसलिये केवली - पांचवा शतकका चौथा उद्देशा 982- oyo yo सूत्र 4- अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 67 शब्दाविषपिक स० शब्द म सुनते हैं जो नहीं पा० इन्द्रिय विषय से द्रके स० शब्द.सु. सुनते हैं ॥ १ ॥ ज. जैसे भे० भगवन् छ० छद्मस्थ म० मनुष्य तक तैसे के. केवली गो० गौतम आ० इन्द्रिय विपयिक पा० इन्द्रिय विषय से दूरके स० सब दू० दूर मू० पास अ० पासनहि ऐमे स० शब्द जा० जानते पा० देखते हैं से० अथ के० कैसे तै वैसे के० केवली आ० इन्द्रिय विपयिक पा० इन्द्रिय विषय से चाहिर के जा० यावत् पा० देखते हैं गो० गौतम के० केवली पु० पूर्व में मि० मर्यादा जा० जानते सुणेइ ? गोयमा ! आरगयाइं सद्दाइं सुणेइ, णो पारगयाइं सद्दाई सुणेइ ॥ १ ॥ जहाणं भंते ! छउमत्थे. मणूसे आरगयाइं सद्दाइं सुणेइ णो पारगयाइं सहाई सुणेई. तहाणं केवली किं आरगयाई सद्दाई सुणेइ पारगयाइं सद्दाइंसुणेइ ? गोयमा ! केवलीणं आरगसंवा पारगयंवा सव्वदूरमूलमणतियं सहं जाणइ पासइ, ॥ से केणटेणं तचेव केवलीणं आरगयंवा पारगयंवा जाव पासइ ? गोयमा ! केवली, पुरच्छिमेणं के शन्दा नहीं सुन सकते हैं ॥ १॥ अहो भगवन् ! जब छमस्थ विषय के अंदर के शब्दों सुन सकते हैं। परंतु विषय की बाहिर के शब्दों नहीं सुन सकते हैं तब क्या केवली श्रोत्रेन्द्रिय के विषय में रहे हुए शब्दों मुन सकते हैं या विषय से वाहिर के शब्दों मुन सकते हैं ? अहो गौतम ! केवली श्रीन्द्रिय विषय के अंदर के व बाहिर के सर्वथा दूर के, पास के, व बीच के ऐसे सब शन्द जानते व देखते प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालामसादजी - ६४१. 8 पंचांग विवाह पपणात्ति । भगवती) सूत्र <PAPER दन्थ १० ह° इसे उ० उत्सुक होवे ।। ३ ॥ जी० जीव भं० भगवन ह० हसते हुवे उ० उत्सुक होते हुवे ककितनी yoक० कर्म प्रकृत्तियों पं० वांधे गो गौतम स० सात प्रकार का वं० धंध अ० आठ प्रकार का ५० बंधन ॥४॥णे० नारकी भ० भगवन् ६० हसते हुए उ० उत्सुक होते हुवे क० कितनी क० कर्म प्रकृतियों ५० हसेजघाउस्सुया एजवा ॥३॥ जीवेणं भंते ! हसमाणेवा उस्सुयमाणेवा कइकम्मप्पगडीओ सूत्र बंधइ ? गोयमा सत्तविहबंधएवा, अट्ठविह बंधएवा. ॥ ४ ॥ णेरइएणं भंते ! हसमाणे उस्सुयमाणे कतिकम्म पगडीओ बंधति ? गोयमा ! सत्तविहबंधएवा, अट्टविह बंधएवा. एवं जाव वेमाणिए ॥ ५ ॥ जीवाणं भंते ! हसमाणावा, उस्सु. यमाणावा कति कम्मप्पगडीओ बंधति ? गोयमा ! सत्तविहबंधगावा, अट्टविह भावार्थ इमलिये केवली हसते नहीं है व उत्सुक नहीं होते हैं ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! जीव हसताहुवा व उत्सुक होता हुवा कितने कर्म वांधे ? अहो गौतम ! जिन को आयुष्य कर्म का बंध नहीं होवे उस को सात }go कर्म प्रकृतियों और मित को आयुप्य कर्म का बंध होवे उस को आठ कर्म प्रकृतियों का. बंध होता है ॥ ४ ॥ अहो भगवन् : नारकी इस तरह इतता हुवा व उत्सुक होता हुवा कितनी कर्म प्रकृतियों का बंध करे ? अहो नौनम ! सात कर्म प्रकृतियों का अथवा आठ की प्रकृतियों का पंध करे. ऐते ही वैमानिकतक के पांचवा शतक का चौथा उद्देशा 888888- ora शब्दाथा ६४ सूत्र 4 भनुवादक-चालनमवारी मुनि श्री अमोलक नापिनी 8- छ. उद्मस्थ ० मनुष्य इ० हसे उ० उत्सुक हॉव हं० हां ह० बसे उ० उत्सुक होवे ज जैसे छ. छद्मस्थ म. मनुष्य त० तैसे के ० केवली णो० नहीं इ० यह अर्थ स० योग्य से वह के० किसलिये गो० गौतम ज. मिसलिये जी० जीव च० चारित्र मो० मोहनीय क० कर्म के उ० उदय मे ह• हसते हैं उ. उत्सुक होते है से बह के केवली को न० नहीं है ते. इसलिये जा० यावत् नो० नहीं त० तैसे के. केवली छउमत्थेणं भंते! मणसे हसेजवा, उस्सुयाएजवा? हंता हसेजवा उस्सुयाएजवा जहाणं भंते ! छउमत्थे मणूसे हसे नवा उस्सुआएजवा, तहाणं केवलीवि हसजवा, उस्सु. याएज्जया ? गोयमा ! णो इण? सम। से केणटेणं, जाव नोणं. तहा केवली हसेजवा उस्सुआएजवा ? गोयमा ! जाणं जीवा चरित्तमोहणिजकम्मस्स उदएणं हसंतिवा उस्सुयायंतिया , सेणं केवलिस्स नत्थि, से तेणतुणं जाव नोणं तहा केवली दूर के, नजीक के सब शब्दों जान व देख सकते हैं ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! छमस्थ मनुष्य क्या हमते हैं। उत्सुक होते हैं ? हां गौतम ! छद्मस्थ मनुष्य हसते हैं व उत्सुक होते हैं. अहो. भगवन् ! जैसे एमस्य मनुष्य हसते हैं व उत्सुक होते हैं वैमे. ही क्या केवली हसते हैं व उत्सुक होते हैं ? अहो गौतम यह अयं योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! किस कारन से केवली नहीं हसते हैं यावत् उत्सुक नहीं होते हैं अहो गीतम! चारित्र मोहनीय कर्म के उदय से जीव हनते हैं व उत्सुक होवे हैं वह केवली को नहीं * प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसाद जी * !
ol ६४१. सन्न * पंचांग विवाह पपणत्ति । भगवत्ती ) मूत्र - ब्द-थ १० १० हसे उ० उत्सुक होये ॥ ३ ॥ जी० जीव मं० भगवन हक हसते हुवे उ• उत्सुक होते हुवे क०कितनी oyetक० कर्म प्रकृतियों व बांधे गो गौतम स० सात प्रकार का पं० धंध अ० आठ प्रकार का ५० बंध ॥ ४ ॥णे० नारकी भ० भगवन् १० हसते हुए उ० उत्सुक होते हुवे क० कितनी क० कर्म प्रकृतियों ५० हसेजघाउस्सुया एजवा ॥३॥ जीवेणं भंते ! हसमाणेवा उस्सुयमाणेवा कइकम्मप्पगडीओ बंधइ ? गोयमा सत्तविहबंधएवा, अट्ठविह बंधएवा. ॥ ४ ॥ गैरइएणं भंते ! हसमाणे उस्सुयमाणे कतिकम्म पगडीओ बंधति ? गोयमा ! सत्तविहबंधएवा, अटुविह बंधएवा. एवं जाव वेमाणिए ॥ ५ ॥ जीवाणं भंते ! हसमाणावा, उस्सु- यमाणावा कति कम्मप्पगडीओ बंधति ? गोयमा ! सत्तविहबंधगाथा, अट्ठविह भावार्थ इमलिये केवली हसते नहीं ह व उत्सुक नहीं होते हैं ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! जीव हसताहुवा व उत्सुक होता हुवा कितने कर्म यांचे ? अहो गौतम ! जिन को आयुष्य कर्म का बंध नहीं हो उस को सात कर्म प्रकृतियों और जित को आयुष्य कर्म का बंध होवे उस को आठ कर्म प्रकृतियों का धंध होता है ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! नारकी इस तरह इसता हुवा व उत्सुक होता हुवा कितनी कर्म प्रकृतियों का बंध करे ? अहो नौतम ! मात कर्म प्रकृतियों का अया आठ की प्रकृतियों का बंध करे. ऐसे ही वैमानिकतक के पांचवा शतक का चौथा उद्देशा ला सूत्र 13 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी - शब्दार्थ बांधते हैं गो० गौतम स० सात प्रकार से आ० आठ प्रकार से वं० बांधते हैं ए० ऐमे जा० यावत् वे० वैमानिक ॥ ५ ॥ जी० जीव भं० भगवन् ह० हसते हुवे. पूर्ववत् ॥ ६ ॥ छ० छमस्थ भ० भगवन् नि? बंधगावा, ॥ णेरइयाणं भंते ! हसमाणा उस्सुयमाणा कतिकम्मप्पगडीओ बंधंति ? गोयमा ! सब्वेवि ताव होज सत्तविह बंधगा, अहवा सत्तविह बंधगावि, अट्ठविह बंधगावि, अहवा सत्तविह बंधगाय अट्ठविह बंधगाय, एवं पोहत्तिएहिं, जीवगिदिय वजो तियभंगो, ॥ ६ ॥ छउमत्थेणं भंते ! मणूसे निदाएजवा, पयलाएजवा ? हंता भावार्थ चौविस दंडक का जानना ॥ ७ ॥ अव बहुत जीव आश्रित पृच्छा करते हैं. अहो भगवन् ! बहुत जीव हसते व उत्सुक होते कितनी प्रकृतियों का बंध करे ? अहो गौतप ! आयुष्य रहित- सात का बंध करे व आयुष्य सहित आठ का बंध करे. अहो भगवन् ! वहुत नारकी हसते उत्सुक होते कितनी कर्म प्रकृति- या का ध करे ? अहो गौतम ! सब जीव आयुष्य विना सात का भी वैध करते हैं और आयुष्य सहित आठ का बंध करते हैं. वैसे ही यहां कहना १ सब सात का बंध करनेवाले होते हैं २ सात का बंध करनेवाले अथवा आठ का बंध करनेनाले ३ मात और आठ का बंध करनेवाले. ऐसे तीन भांगे एकेन्द्रिय के पांच दंडक छोडकर शेष ११ दंडक में पाते हैं ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! छमस्थ जीव सुख से शपन * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * दार्थ निद्रालेवे प० प्रचलालेवे हैं. हां नि० निद्रालेवे प० प्रचलाले ज० जैसे ह० हसे त० तैसे ण: विशेप द. दर्शनावरणीय क० कर्म का उ० उदय से नि०निद्रालेचे प० प्रचलालेवे से वह के० केवली को मनहीं है। अ० अनंत ॥ ७॥ जी जीव भ. भगवन् नि. निद्रालते प० प्रचलालेते का कितनी क० कर्म प्रकृतियों वं. वांधता है गो० गौतम स० सात प्रकार का अ० आठ प्रकार का वं. बंध ऐ. ऐसे जा. यावत् वे० ६४३ सूत्र 888 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 880 निदाएजवा पयलाएजवा, जहा हसेज्जा तहा. णवरं दरिसणावरणिजस्स कम्मरस उदएण, निदायइवा, पयलाइवा ॥ सणं केवलिस्स नस्थि अणंतं चेव ॥ ७ ॥ जीवेणं भंते ! निद्दायमाणेवा पयलायमाणेवा कतिकम्मप्पगडीओ बंधइ ? गोयमा ! सत्तविह बंधएवा अट्ठविहबंधएवा, एवं जाव वेमाणिए ॥ पोहत्तिएसु जीवेगिदि- किया जावे वैसी निद्रा या चलते, बैठते जो निद्रा आवे वैती निद्रा क्या लेते हैं ? हां गौतम ! छद्मस्थ उक्त प्रकार की निद्रा लेते हैं वगैरह सब वर्णन छमस्थ जीव को हसने का आलापक कहा वैसे ही जानना परंतु यहां पर दर्शनावरणीय कर्म के उदय से निद्रा आती है वह कर्म केवली को नहीं होने से केवली निद्रा नहीं लेते हैं ॥ ७ ॥ अहो भगवन् ! जीव निद्रा, व प्रचला करते कितनी प्रकृतियों का बंध करते हैं ? अहो गौतम ! जीव निद्रा व प्रचला करते सात अथवा आठ कर्म प्रकृतियों का बंध करता है. ऐसे दी चौविसही । F-89 पांचवा शतक का चौथा उद्देशा g><s भावाथे का अनुवादक बालग्रामचारी मु, श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ वैमानिक में पो० बहुत जी जीव ए० एकेन्द्रियवर्जित नि तीन भं० भांगे ॥ ८ ॥ ४० इन्द्रका भं भगवन् ह० हरिणगोपी स० शक्र का दू० दूत इ० स्त्री का ग• गर्भ सा० माहरते हुवे कि क्या ग. गर्भ से ग० गर्भ में सा० ले जाता है ग. गर्भ से जो० योनिमें सा० लेजाता है जो योनिसे ग. गर्भ में मा० लेजाता है जो० योनिसे जो योनि में सा लेजाता है गो. गौतम नो० नहीं ग• गर्भ से ग० यवजो तिय भंगो ॥ ८ ॥ हरीणं भते ! हरिणेगमेसी सकदूए इत्थीगल्भं साहर- माणे किं गम्भाओ गभं साहरइ, गभाओ जोणि साहरइ, जोणीओ गभं साहरइ, जोणीओ जोणि साहरइ ? गोपमा ! नो गम्भाओ गन्भं साहरइ, नो.गम्भाओ जोणि মাথাখ दंडक का जानना. बहुत जीव आश्रित एकेन्द्रिय छोडकर शेप के तीन भांगे जानना ।। ८ ॥ अवस्था- पिनी निद्रा में गर्भ का साहरण होता है, इसलिये गर्भ साहरण का अधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! शक देवेन्द्रकादून [पादात्यानिकका अधिपति हरिणगमेषी स्त्रीगर्भका साहरण करते क्या जीय सहित पुद्गल पिंड रूपी गर्भ को १ एक गर्भाशय से दूसरे गर्भ में रखता है ? २ गर्भाशय से योनि में रखता है ? योनि से लेकर गर्भ में रखता है ? अथवा ४ योनि से लेकर योनि में रखता है ? अहो गौतम ! शक देवेन्द्र का दूत हरिणगमेपी गर्भ को ? गर्भाशय से नीकालकर गर्भाशय में नहीं रखता है, २ गर्भाशय से देकर योनिद्वार में नहीं रखता है, और ३ योनि से लेकर योनि में नहीं रखता है परंतु ४ योनि से नीका-है प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी * दार्थ ६४५ सूत्र - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 9988 गर्भ में सा० लेजाता है नो नहीं गः गर्भ से जो योनि में सा. लेजाता है नो नहीं जो. योनि सेई जो योनि में सालेजाता है प० स्पर्श कर अमुख पूर्वक जो योनि से गगर्भ में सा लेजाता है ॥२॥१० समर्थ भं भगवन् ह० हरिणगमेपी स. शक का दू० दून इ० स्त्री का ग० गर्भ ० नखान से रोग रोमकूप से ता० रखने को नी० मीकालने को है. हा प. समर्थ नो० नहीं त उसको ग. गर्भ की किं० कुच्छ भी आ आवाधा यि दुःख उ० उत्पात छ. चर्मछेद पु० पुनः क० करे ए० यह सु० मूक्ष्म साहरइ, नो जोणीओ जोणिं साहरइ, परामुसिय २ अव्वाबाहेणं अव्वावाहं जोणी- ओ गभं साहरइ ॥ ९ ॥ पभूणं भंते ! हरिशेगमेसी सकस्सणं दूए इत्थीए गर्भ नहसिरंसिवा रोमकुवंसिवा, साहरित्तएवा, नीहरित्तएवा ? हंबा पभू । णो चेवणं तस्स गन्भरस किंचि आवाहवा, विवाहंवा, उप्पाएज, छविच्छेदं पुण करेजा, ए सु- लेकर गर्भाशय में रखना है. और गर्भ माहरण करते गर्भ को किसी प्रकार की वाधा पीडा नहीं होती ॥ १॥ अहो भगवन् ! शक्र देवेन्द्र का दूत हरिणगमेपी नखान से या रोम कूप से स्त्री का गर्भ रखने को अथवा बाहिर नीकालने को क्या दम है ? हां गौतम ! वह हारे गगमेपो देवता गर्भ को नखान स रखने को व नीकालने को समर्थ है तापि उस गर्भ को किसी प्रकारकी बाधा, पीडा उत्पात व चर्म का छेद नहीं होता है. गर्भ साहरण करने का इतना सूक्ष्मपना रहा हुवा है. देव शक्ति से गर्म नीकालते व रखते 88.8 पांचवा शतक का चौथा उदशा 802 भावार्थ oyo सूत्र 4. अनुवादक-बालप्रमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8- शवदा सा० रखना नी नीकालना ॥ १० ॥ ते. उस का० काल ते. उस स० समय में स० श्रमण भ० भागवत म. महावीर का अं० शिष्य अ० अतिमुक्तक ना. नान के . छोटे स. साधु १० प्रकृति भद्रिक जा० यावत् वि० विनीत त० तब से वह अ० अतिमुक्त कु. कुमार स० श्रमण अ० एकदा म० बहुत चु० वृष्टि में नि० पडती हुई क० कक्षा में प० पात्र र० रनोहरण आ' लेकर ब० वाहिर सं० नीकला वि० स्थंडिलकेलिये त० तब से० उस उ० अतिमुक्त कु० कुमार श्रमणने वा० प्रवाह को प० वहता हुवा हुमं च णं साहरिजवा, नीहरिजवा, ॥ १० ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतेवासी अइमुत्तेनामं कुमारसमणे पगइभद्दए जाब विणीए तएणं से अइमुत्ते णाम कुमारसमणे अण्णयाकयाई महाबुट्टिकायसि निवयमाणसि भाराथ कक्खपडिग्गहरयहरण मायाए बहिया संपट्टिए विहाराए तएणंसे अइमुत्ते कुमार समणे वाहयं वहयमाणं पासइ २ चा, मट्टियपालिं बंधइ २ णावियामे २ नायिओवि जाना नहीं जाता है ॥ १० ॥ उस काल उस समय में श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी के भद्रिक यावत् ग्निीत प्रकृतिषान् अतिमुक्त (अइमते ) कुमार श्रमणे एकदा महावृष्टि हुए पीछे रजोहरण व पात्र लेकर १ आठ वर्ष पहिले दीक्षा ग्रहण नहीं करते हैं, परंतु अतिमुक्त कुमारने छ वर्ष में ही दीक्षा ग्रहण की थी जिससे * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी बालाप्रसादनी * कुमार श्रमग नाम रखा था.
६४७ 38 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 888 दार्थ पा० देखकर म० मृत्तिका को पा० पाल वं वांधकर ना. नाव मे० मेरी ना० नाविक ममान णा नावा को अ० यह प० पात्र उ० पानी में प० बहाते हुवे अ० क्रीडा करते हैं तं० उसे थे स्थविरोंने अदेखा जे० जहां स० श्रमण भ० भगवंत म० महावीर ते० वहां उ० आये ऐ० ऐसा व० वोले ए. ऐसे ख. निश्चय दे० देवानुपिय का अं० शिष्य अ० अतिमुक्त णा० नामके कु• कुमार श्रमण से वह भं० भगवन, ककितने भ० भवग्रहण में सि. सिझेंगे बु० बुझेंगे जा. यावत् अं० अतकरेंगे अ• आर्य स० श्रमण भं० भगवन् म० महावीर ते० उन थे० स्थविर को ए० एमे २० वोले ए. ऐसे अ० आर्य म:मेरा अंशिष्य सत्र वणावमयं पडिग्गहयं उदगंसि पवाहमाणे अभिरमइ तंच थेरा अदक्खु जेणेव समणे भगवं महायोरे तेणेव उवागच्छंति २ एवं वयासी-एवं खलु देवाणुप्पियाणं अंतेवासी, अइमुचेनामं कुमारसमणे । सेणं भंते ! अइमुत्ते कुमारसमणे कइहि भवग्गहणेहिं सिझिहिति जाव अंतं करेंहिति? अजोत्ति समणे भगवं महावीरे ते थेरे एवं वयासी एवं खलु अजो ! ममं अंतेघासी. अइमुत्तेणाम कुमारसमणे पगइभदए जाव विणीए, भावार्थ वाहिर भूमिका को गये. वहांपर उन अतिमुक्त कुमार श्रमणने पानी का प्रवाह वहता हुवा देखकर मृत्तिका से पाल वांधकर पानी को रोका. इस तरह पानी को रोककर 'यह मेरी नाव है यह मेरी नाव ऐसा संकल्प किया. जैसे नाविक नाव को चालता है वैसे ही आतिमुक्त कुमार श्रमण नाव रूप पात्र *83 पांचवा शतक.का चौथा उद्देशा O0 00 ६४६ 43 अनुवादक-वालप्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 8 शब्दार्थ सा० रखना नी नीकालना ॥ १० ॥ ते. उस का. काल ते. उस स० समय में स० श्रमण भ० भगवंत म० महावीर का अं० शिष्य अ० अनिमुक्तक ना नाम के कुछ छोटे स० साधु प० प्रकृति भद्रिक जा. यावत् वि० विनीत त० तब से वह अ० अतिमुक्त कु• कुमार स० श्रपण अ० एकदा म० बहुत बु. सत्र वृष्टि में नि० पडती हुई क० कक्षा में १० पात्र २० रजोहरण आ° लेकर व० बाहिर सं० नीकला रि० स्थंडिल केलिये त० तब से० उस उ° अतिमुक्त कु० कुमार श्रमणने वा० प्रवाह को प. वहता हुवा हुमं च णं साहरिजवा, नीहरिजवा, ॥ १० ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतेवासी अइमुत्तेनामं कुमारसमणे पगइभद्दए जाव विणीए तएणं से अइमुत्ते णामं कुमारसमणे अण्णयाकयाई महावुट्टिकायंसि निवयमाणंसि कक्खपडिग्गहरयहरण मायाए बहिया संपाट्ठिए विहाराए तएणसे अइमुत्ते कुमार समणे वाहयं वहयमाणं पासइ २ त्ता, मट्टियपालिं बंधइ २ णावियामे २ नायिओवि जाना नहीं जाता है ॥ १० ॥ उस काल उम समय में श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी के भद्रिक यावत् निीन प्रकृतिवान् अतिमुक्त (अश्मंते ) कुमार श्रमणे एकदा महावृष्टि हुए पीछे रजोहरण व पात्र लेकर १ आठ वर्ष पहिले दीक्षा ग्रहण नहीं करते हैं, परंतु अतिमुक्त कुमारने छ वर्ष में ही दीक्षा ग्रहण की थी जिससे * प्रकाशक-राजायहादुर लाला मुस्वदेवमहायजी बालाप्रसादनी * भावार्थ कुमार श्रमग नाम रम्बा था.
६४ 983 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 9988- शब्दार्थ श्रमण भ० भगवंत म० महावीर से ए. ऐसा वुः कहाये हुवे. स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर को १०० वंदना करते हैं अ० अतिमुक्त कु. कुमार श्रमण को अ० ग्लानिरहित सं० अंगीकार करते हैं जा यावत् वे वैयावृत्य क० करते हैं ॥ ११ ॥ ते. उस का०काल ते. उस स• समय में म० महाशुक्र क. देवलोक से म० महास्वर्ग वि० विमान से दो० दो दे. देव म० महादक जा. यावत् म. सारीरिए चेव, ॥ तएणं ते थेरा भगवंतो समणेणं भगवया महावीरेणं एवं वुत्तासमाणा समणं भगवं महावीरं वंदंति नमसंति अइमुत्तं कुमारसमणं अगिलाए संगिण्हति जाव वेयावडियं करंति ॥ ११ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं महासुक्काओ कप्पाओ महासग्गाओ विमाणाओ दो देवा महिड्डिया जाव महाणुभागा समणस्स भगवओ भावार्थ अंत करेंगे. इसलिये अहो आर्यों ! तुम उन की हीलना, निंदा, खिंसना, गर्दी व तिरस्कार मत करो परंतु अग्लानपने उन को अंगीकार करो, उपष्टंभ करो और भक्त, पान व विनय से उन की वैयावृत्य करो. क्योंकि अतिमुक्त कुमारश्रमण अंत करनेवाले चरिम शरीरी हैं. जब श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामीने ऐसा कहा तब वे स्थविर भगवंत श्रमण भगवंत को वंदना नमस्कार कर आतिमुक्त कुमार श्रमण को अग्लानपने अंगीकार करनेलगे यावत् भक्त पान व विनय से उन की वैश्यावृत्य करनेलगे ॥ ११ ॥ उस काल उस समयमें महाशुक्र देवलोक से महर्दिक यावत् महानुभागवाले दो देव श्रीश्रमण भगवंत महावीर 300 पांच शतक का चौथा उद्देशा - o ४८ सूत्र <.. अनुवादक-पालनाचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 शब्दार्थ अ० अतिमुक्त कु० कुमारश्रमण प० प्रकृति भद्रिक जा. यावत् वि. विनीत से वह अ० अतिमुक्त कु० कुमार स० श्रमण ए. इस भ० भव में सि० सिझेगे जा० यावत् अं० अतं करेंगे ते. इसलिये मा० मत तु० तुम अ० अतिमुक्त कु० कुमार श्रमण की ही हीलना को नि० निंदाकरो खि० खिंसना करो ग गर्दाकरो अ० तिरस्कार करो तु. तुम अ० अतिमुक्त कु. कुमार श्रमण को अ ग्लानि रहित सं० अंगीकार करो उ१ ग्रहण करो भ० भक्त पा० पान वि० विनय से वे० चैय्यावृत्य क० करो अ० अति- मुक्त कु• कुमार श्रमण अं० अंत करने वाले अं० अंतिमः शरीरी त० तब थे० स्थविर भ० भगवंत म० सेणं अइमुत्ते कुमारसमणे एमेजयेव भवरगहणेणं, सिझिहिइ जाव अंतं करेहिइ ॥ • तं माणं अजा ! तुझे अइमुत्तं कुमारसमणं हीलह,निंदह,खिंसह,गरहह अवमण्णह, तुम्भेणं देवाणुप्पिया अइमुत्तं कुगारसमणं अगिलाए संगिण्हह, अगिलाए उबगिण्हह अगिलाए भत्तेणं; पाणेणं विणएणं,वेयावडियं करेह.अइमुत्तेणं कुमारसमणे अंतकरे चेव, अंतिम- पानी में बहना हुवा रखकर खेलने लगे. इस तरह करते हुवे अतिमुक्त कुमार को स्थविरने देखे और श्रवण भगवंत महावीर स्वामी की पाप्त आकर ऐसे बोले कि अहो भगवन् ! आपका अतिमुक्त, नामक निप्प कितने भर में सिझेगे बुझेगे यावत् सब दुःखों का अंत करेंगे, श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी बोले कि अहो मार्यों मेरा शिप्य अतिमुक्त नामक कुमार-साधु इसी भत्र में सिझंगे यावत्- सब दुःखों का '*. प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामतादजी * शब्दार्थ ६१ सूत्र 8- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - श्रमण भे० भगवंत म० महावीर से एक ऐसा बु· कहाये हुवे स० अमण भ० भगवंत म. महावीर को ही वं वंदना करते हैं अ० अतिमुक्त कु० कुमार श्रमण को अ० ग्लानिरहित सं० अंगीकार करते हैं जा. यावत् वे वैयावृत्य क० करते हैं ॥ ११ ॥ ते उस का०काल ते० उस स० समय में म० महाशुक्र. क. देवलोक से म० महास्वर्ग वि० विमान से दो० दो दे. देव म. महर्दिक जा. यावत् म. सारीरिए चेव, ॥ तएणं ते थेरा भगवंतो समणेणं भगवया महावीरेणं एवं वुत्तासमाणा समणं भगवं महावीरं वंदति नमसंति अइमुत्तं कुमारसमणं अगिलाए संगिण्हंति जाव यावाडयं करंति ॥ ११ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं महासुक्काओ कप्पाओ महासग्गाओ विमाणाओ दो देवा महिड्डिया जाव महाणुभागा समणस्स भगवओ अंत करेंगे. इसलिये अहो आर्यों ! तुम उन की हीलना, निंदा, खिंसना, गर्दा व तिरस्कार मत करो परंतु अग्लानपने उन को अंगीकार करो, उपष्टंभ करो और भक्त, पान व विनय से उन की वैयावृत्य करो. क्योंकि अतिमुक्त कुमारश्रमण अंत करनेवाले चरिम शरीरी हैं. जब श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामीने ऐसा कहा तब वे स्थविर भगवंत श्रमण भगवंत को वंदना नमस्कार कर आतमुक्त कुमार श्रमण को अग्लानपने अंगीकार करनेलगे यावत् भक्त पान व विनय से उन की वैय्यावृत्य करनेलगे ॥ ११ ॥ उस काल उस समयमें महाशुक्र देवलोकमेंसे महर्द्धिक यावत् महानुभागवाले दो देव श्रीश्रमण भगवंत महावीर 2030 पांचवा शतक का चौथा उद्देशा0%A8- भावाथ yo ८८ 2. अनुवादक-बालग्रामचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ अतिमुक्त कु० कुमारश्रमण प० प्रकृति भद्रिक जा. यावत् वि० विनात से वह अ० अतिमुक्त कु० कुमार स० श्रमेण ए० इस भ० भव में सि० सिझेंगे जा. यावत् अं० अतं करेंगे ते. इसलिये मा० मत तु. तुम अ० अतिमुक्त कु० कुमार श्रमण की ही हीलना कगेनिक निंदाकरो खि० खिंसना करो गा गहकिरो अ• निरस्कार करो तु. तुम अ० अतिमुक्त कु. कुमार श्रमण को अ० ग्लानि रहित सं० अंगीकार करो उ१ ग्रहण करो भ० भक्त पा० पान वि० विनय से वे० वैगावृत्य क० करो अ० अति- मुक्त कु• कुमार श्रमण अं० अंत करने वाले अं० अंतिम शरीरी त० तब थे. स्थाविर भ० भगवंत म. सूत्र सेणं अइमुत्ते कुमारसमणे एमेणंचेव भवगहणेणं, सिम्झिहिइ जाव अंतं करेहिइ ॥ तं माणं अजा! तुम्भे अइमुत्तं कुमारसमणंहीलह,निदह,खिंसह,गरहह अवमण्णह, तुब्भेणं देवाणुप्पिया अइमुत्तं कुगारसमणं अगिलाए संगिण्हह, अगिलाए उवगिण्हह अगिलाए भत्तेणं, पाणेणं विणएणं,वेयावडियं करेह, अइमुत्तेणं कुमारसमणे. अंतकरे चेव, अंतिम- पानी में वहता हुवा रखकर खेलने लगे. इस तरह करते हुवे अतिमुक्त कुमार को स्थविरने देखे और श्रमण भगवंत महावीर स्वामी की पास आकर ऐसे वाले कि अहो भगवन् ! आपका अतिमुक्त नायक शिष्य कितने भव में सिझेने बुझेंगे यावत् सब दुःखों का अंत करेंगे. श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी घोले कि अहो आयों मेरा शिप्प अतिमुक्त नामक कुमार साधु इसी भव में सिझेंगे. यावत्- सब दुःखों का * मकाशक-राजारहादुर लाला मुखदेवसहायजी मालामसादजी * ..
ए शब्दाथे सूत्र SE8पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 988 श्रमण भ० भगवत म० महावीर से ए. ऐसा बु· कहाये हुवे स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर को वंदना करते हैं अ० अतिमुक्त कु० कुमार श्रमण को अ० ग्लानिरहित सं• अंगीकार करते हैं जा. यावत् वे वैयावृत्य क० करते हैं ॥ ११ ॥ ते. उस का काल ते० उस स• समय में म० महाशुक्र.क. देवलोक से म० महास्वर्ग वि० विमान से दो० दो दे. देव म० महादिक जा. यावत् म० सारीरिए चेव, ॥ तएणं ते थेरा भगवंतो समणेणं भगवया महावीरेणं एवं वुत्तासमाणा समणं भगवं महावीरं वंदति नमसंति अइमुत्तं कुमारसमणं अगिलाए संगिण्हंति जाव वेयावाडियं करंति ॥ ११ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं महासुक्काओ कप्पाओ महासग्गाओ विमाणाओ दो देवा महिड्डिया जाव महाणुभागा समणस्स भगवओ अंत करेंगे. इसलिये अहो आयौँ ! तुम उन की हीलना, निंदा, खिंसना, गर्दा व तिरस्कार मत करो परंतु अग्लानपने उन को अंगीकार करो, उपष्टंभ करो और भक्त, पान व विनय से उन की वैयावृत्य करो. क्योंकि अतिमुक्त कुमारश्रमण अंत करनेवाले चरिम शरीरी हैं. जब श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामीने ऐसा कहा तब वे स्थविर भगवंत श्रमण भगवंत को वंदना नमस्कार कर आतमुक्त कुमार श्रमण को अग्लानपने अंगीकार करनेलगे यावत् भक्त पान व विनय से उन की वैश्यावृत्य करनेलगे ॥ ११ ॥ उस काल उस समय महाशुक्र देवलोकमेंसे महर्दिक यावत् महानुभागवाले दो देव श्रीश्रमण भगवंत महावीर < पांचवा शतक का चौथा उद्देशा 8 भावार्थ शब्दार्थ सूत्र 4. अनुवादक-बालब्रह्मचरािमुनि श्री अमोलक ऋषिनी 87 महानुभाग वाले स• श्रमण भ० भगवंत म.महावीर की अं० समीप पा० आये त० तव ते वे दे० देव स० श्रमण भ० भगवत म० महावीर को म० मन से वं० वंदना करते हैं न० नमस्कार करने हैं न नम- स्कार करके इ० यह एक ऐसा वा० प्रश्न पु० पुछते हैं क० कितने दे देवानुप्रिय के अं० शिप्य स० सो इसिसिझेंगे जा० यावत् अं० अंत क० करेंगे न तव सश्रमण भ०भगवन्त म. महावीर ते उन दे० देवों म० मन से पु० पुछाये हुवे ते. उन दे० देवोंको म० मनसे ही इ० यह एक ऐसा म. मेरे म. सात अं० शिष्य स० सो० सि० सिझेंगे जा० यावत् अं• अंत करेंगे त० तव ते वे दे. देवों स० श्रमण महावीरस्स अंतियं पाउब्भूया ॥ तएणं ते देवा समणं भगवं महावीरं मणसाचेव वंदति नमसंति नमसंतित्ता, मणसा चेव इमं एयारूवं वागरणं पुच्छंति-कइणं देवा- णुप्पियाणं अंतेवासिसयाई, सिज्झिहिंति जाव अंतं करोहिंति ? ॥ तएणं समणे भगवं महावीरे तेहिं देवहिं मणसा पुढे, तेसिं देवाणं मणसाचेव इमं एयारूवं वागरणं वागरेइ - एवं खलु देवाणुप्पिया ममं सत्त अंतेवासिसयाइं सिज्झिहिति स्वामीकी पास आयें और उनोंने श्रमण भगवंत महावीर स्वामीको मन से ही वंदना नमस्कार कर ऐसा प्रश्न पूड़ा कि अहो देवानुप्रिय ! आप के कितने सो शिष्य सिझेंगे, वुझेंगे यावत् सव. दुःखों का अंत करेंगे? उन मन से पूछे हुने प्रश्नोंका महावीर स्वामीने मन से ही उत्तर दिया कि मेरे सात मो शिष्य सिझेंगे, बुझेंगें * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालाप्रसादजी * साथ २७ 49 ०० 8. पंचमांग विवाह पप्णात्त (भगवती) सूत्र <8883 शब्दार्थ भगवंत म० महावीर से म० मन में पु० पुछा हुवा म. मन से ही इ० यह एक ऐसा वामन वा कहाहुवा ह० हृष्ठ जा० यावत् हि० हृदय स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर को ५० वंदना करते हैं न० नम-oro स्कार करते हैं म० मन से ही सु. शुश्रुपा करते णः नमस्कार करते अ. सन्मुख जा. यावत् प० पर्यु- पासना करते हैं ॥ १२ ॥ ते० उस काल ते. उस समय में स० श्रमण भ० भगवंत का जे० ज्येष्ठ अंक शिप्य इं० इन्द्रभूति अ० अनगार जा० यावत् अ० पास उ० ऊर्ध्व जा. जंघा जा. यावत् वि०विचरते सन्न जाव अंतं करोहिति ॥ तएणं ते देवा समणेणं भगवया महावीरेणं मणसा पुढेण मणसा चेव इमं एयारूवं वागरणं वागरियासमाणा, हट्टतुट्ठ जाव हियया समणं भगवं महावीरं बंदति णमंसंति, मणसा चेव सुस्सूसमाणा णमंसमाणा अभिमुहा जाव पज्जुवासंति ॥ १२ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं समणरस भगव- ओ महावीरस्स जेटे अंतेवासी, इंदभूईणामं अणगारे जाव अदूरसामंते उर्दू जाणू भावार्थ यावत् सव दुःखों का अंत करेंगे. इस तरह मन से पूछे हुवे प्रश्नों का मन से ही उत्तर मुनकर उक्त देवों हृष्ट तुष्ट यावत् आनंदित हुवे, श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को वंदना नमस्कार किना और मन से ही शुश्रुपा व नमस्कार करते हुवे सन्मुख यावत् पर्युपासना करने लगे ॥१२॥ उस काल उस समयमें श्री श्रमण भगवंत के ज्येष्ठ शिष्य इन्द्रभूति अनगार पास में अर्थ जानु व अधोशिर करके ध्यान करते हुये विचरते 88> पांचवा शतकका चौथा उद्देशा 988- es याव्दार्थ) मुत्र 2 अनुवादक-चालयमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी त० तब तक उन भ. भगवंत गो० गौतम को झा० ध्यान में व० रहते हुवे इ० यह एक ऐसा अ० अध्यवसाय जा० यावत् स० उत्पन्न हुआ ए० ऐसे ख० निश्चय दो दो दे. देव म० महर्दिक जा. यावत् म०महानुभाग वाले स० श्रमण भ. भगवंत म० महावीर की अं० पास पा०आये तं० इसलिये नो. नहीं अ० में ते• उन दे० देवोंको जा० जानता हूं क० कितने क• देवलोक में से स० स्वर्ग में से वि० विमान में से क. किस अ० अर्थ केलिये इ० यहा ह० शीघ्र आ० आये तं• इसलिये ग. जाऊं भ. जाव विहरइ तएणं तस्स भगवओ गोयमस्स झाणंतरियाए वमाणस्स इमेया रूवं अन्भत्थिए जाव समुप्पजित्था एवं खलु दो देवा महिड्डिया जाव महाणुभागा समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतियं पाउन्भूया. तं नो खलु अहं ते देवा जाणामि कयराओ कप्पाओ वा सग्गाओवा विमाणाओवा करसवा अत्थस्स अट्ठाए इहे. हव. मागया तं गच्छामिणं समणं भगवं महावीरं जाव पज्जुवासामि. इमाई चणं एयारूवाई थे. उस समय में भगवान गौतम को ध्यान करते हुवे ऐसा अध्यवसाय उत्पन्न हुवा कि श्री श्रमण भग- चन्त महावीर स्वामी की पाम दो महद्धिक यावत् महानुभाग देव आये हुवे हैं. परंतु वे देवों कौन से देव लोक के विमान में से किमलिये आये हुवे हैं सो मैं नहीं जानता हूं; इसलिये मैं श्री श्रमण भगवन्त की पाम जाम और पर्युपासना करके उक्त प्रश्नों पूछं. ऐसा विचार करके श्रीश्रमण भगवन्त महावीर स्वामीकी पास * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी जालाप्रसादजी शब्दार्थ 00 YO सूत्र > पंचमाङ्ग विवाह पणत्ति (भगवती) मूत्र'383 भगवन्त म० महावीर की जा० यावत् प० पर्युपामना करुं इ० ये एक ऐसे वा प्रश्न पु० पूछू ति० ऐसा करके ए०ऐसा संविचार करके उ० उपस्थित होकर जे० जहां स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर जा. यावत् प०पर्युपामना करते हैं. गो. गौतम स०श्रमण भ० भगवंत म० महावीर ए०एसे व०बोले से अथ णू शंकादर्शी त० तुझे गो० गौतम झा० ध्यान में व० रहते इ. यह एक ऐसा अ० अध्यवसाय जा० यावत् ने० जहां म० मेरी अं० समीप ते वहां ह• शीघ्र आ० आया से० अथ णू० शंकादर्शी अ. वागरणाइं पुच्छिस्सामि त्तिकटु। एवं संपेहेइ २त्ता उट्ठाए उढेइ २ त्ता जेणेव समणे भगवं महावीरे जाव पज्जुवासइ । गोयमादि समणे भगवं महावीरे भगवं गोयम एवं वयासी-सेणणं तव गोयमा ! झाणंतरियाए वमाणस्स इमेयारूये अब्भत्थिए जाव जेणेव ममं अंतिए तेणेव हन्धमागए, से णूणं गोयमा ! अढे समढे ? हंता अत्थि. तं गच्छाहिणं गोयमा ! एए चेव देवा इमाइं एयांरूबाई वागरणाई वागरेहिति, । तएणं गौतम स्वामी आये.श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामीने कहा कि अहोगौत्तम! तुझेध्यान करते हुये ऐसा अध्यवसाय यावत् संकल्प हुवा कि ये महर्दिक देवों कहां से व किसलिये मेरी पास आये हुवे हैं ? और इसका नि- र्णय करने को तू मेरी पास आया हुवा है यह क्या सत्य है ? हां भगवन् ! यह सत्य है. तत्र गौतम ! तू इन देवों की पास जा और तझे ये देवों उक्त प्रश्नों का उत्तर देवेंगे. इस तरह भगवन्त की. ११ पांचवा शतकका चौथा उद्देशा भावार्थ शब्दार्थी ६५२ मत्र * अनुवादक-चालयमचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 87 त० तब तक उन भ. भगवंत गो० गौतम को झा० ध्यान में व० रहते हुवे इ. यह एक ऐसा अ० अध्यवसाय जा० यावत् स० उत्पन्न हुआ ए. ऐसे ख० निश्चय दो० दो दे देव म० महद्धिक जा. यायत् प०महानुभाग वाले स० श्रमण भ. भगवंत म० महावीर की अं० पास पा आये तं० इसलिये नो. नहीं अ० मैं ते• उन दे० देवोंको जा० जानता हूं क० कितने का देवलोक में से स० स्वर्ग में से वि० विमान में से क. किस अ० अर्थ केलिये इ० यहा ह० शीघ्र आ० आये तं• इसलिये ग. जाऊं भ' जाव विहरइ तएणं तस्स भगवओ गोयमस्स झाणंतरियाए वट्टमाणस्स इमेया रूवं अभत्थिए जाव समुप्पजित्था एवं खलु दो देवा महिड्डिया जाव महाणुभागा समणस्स भगवओ महावीरस्स अंतियं पाउन्भूया. तं नो खलु अहं ते देवा जाणामि कयराओ कप्पाओ वा सग्गाओवा विमाणाओवा कस्सवा अत्थरस अट्ठाए इहं हन्व- मागया तं गच्छामिणं समणं भगवं महावीरं जाव पज्जुवासामि. इमाई चणं एयारूवाई थे. उस समय में भगवान गौतम को ध्यान करते हुवे ऐसा अध्यवसाय उत्पन्न हुवा कि श्री श्रमण भग- वन्त महावीर स्वामी की पाम दो महदिक यावत् महानुभाग देव आये हुवे हैं. परंतु वे देवों कौन से देव लोक के विमान में से किमलिये आये हुवे हैं सो मैं नहीं जानता हूं; इसलिये मैं श्री श्रमण भगवन्त की पाम जाऊं और पर्युपासना करके उक्त प्रश्नों पूछं. ऐसा विचार करकेश्रीश्रमण भगवन्त महावीर स्वामीकी पास * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी जालाप्रसादजी * .
पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) शब्दार्थ हवे खि० शीघ्र प० सामने गये जे जहां भ० भगवन्त गो गौतम ते० वहां उ० आये जा० जावत् ण । नमस्कार कर एक ऐसे व० बोले ए० ऐसा ख. निश्चय भं० भगवन् अ० हम म० महाशुक्र म० महास्वर्ग वि० विमान से दो० दो देव म०महद्धिक जा यावत् पा० आये त० तव अ० हम स० श्रमण भ० भगवंत म महावीर को वं० वांदे न० नमस्कार किया म० मन से एक ऐसा वा प्रश्न पु० पूछे क० कितने भं० भगवन् दे० देवानुप्रिय के अं०शिप्यसि सिझेंगे जा० यावत् अं० अंतकरेंगे त०तव सश्रमण भ० भगवन्इ ड्डीया जाव पाउन्भया । तएणं अम्हे समणं भगवं महावीरं वंदामो णमंसामो २ सूत्र मणसा चेव इमाई एयारूबाई वागरणाइं पुच्छामो-कइणं भंते ! देवाणुप्पियाणं अंते- वासि सयाई सिज्झिहिंति, जाव अंतं करोहिंति ! तएणं समणे भगवं महावीरे अम्हेहिं मणसा पुढे अम्हं मणसा चेव इमं एयारूवं वागरणं वागरेइ, एवं खलु देवाणुप्पिया! मम सत्तअंतेवासिसयाइं जाव अंतं करेहिति, तएणं अम्हे समणेणं भगवया महा- भावाथ- महर्दिक यावत् महानुभाग दो देव महाशुक्र देवलोक में महा स्वर्ग विमान से आये हुवे हैं. और हमने श्री श्रमण भगवंत महावीर को मन से ऐसा प्रश्न पूछा कि आप के कितने मो शिष्य सिझेंगे, वुझेंगे यावत् सब दुःखों का अंत करेंगे. इस तरह मन से पूछाये हुचे प्रश्नों का श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामीने मन से ही ऐसा उत्तर दिया कि अहो देवानुप्रिय ! मेरे सातसो शिप्य सिझेंगे, बुझेंगे. यावतू . SHARE पांचवा शतकका चौथा उद्देशा ! 60 .. अनुवादक बालमनगरी मुनि श्री अमोलक अपिनी शब्दार्थ अर्थ स० योग्य है. हा अ० है त• इसलिये ग जा गो गौतम ए. ये दे० देन इ. इन ए. ऐसे वा प्रश्नों का कहेंगे त. तब भ० भगवान गो गौतम स० श्रमण भ० भगवन्त म. महावीर की अ० आज्ञा होते स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को वं. वंदना की ण. नमस्कार किया जे. जहां ते. वे दे० देव ते. तहां पा० नीकला ग० जाने को न० तब ते वे दे० देव भ० भगवन्त गो० गौतम को ए. आते हुवे पा० देखा ह० हृष्ट तुष्ट जा. यावत् हि० हृदय खि० -शीघ्र अ. उपस्थित भगवं गोयमे समणेणं भगवया महावीरेणं अब्भणुण्णेसमाणे समणं भगवं महावीर वंदइ णमंसइ, जेणेव ते देवा तेणेव- पाहारेत्थगमणाए ॥ तएणं ते देवा भगवं गोयम एजमाणं पासइ हट्ठ तुट्ठ जाव हियया खिप्पामेव अब्भुट्टेति २ त्ता, खिप्पामेव पच्चुवगच्छंति, जेणेव भगवं गोयमे तेणेव उवागच्छति २ जाव णमंसित्ता एवं वयाती भंते. ! अम्हे महासुक्काओ कप्पाओ महासग्गाओ विमाणाओ दो देवा महि- वाय भाना मीलने पर भगवान् गौतम स्वामी उक्त दोनों देवों की पास जाने को नीकले. उम समय में उक्त देवों भगवन्त श्री गौतम स्वामी को आते दुवे देखकर हृष्ठ तुष्ट यावत् आनंदित होते हुए शीघ्र उपस्थित और भगवन्त श्री गौतम स्वामी की पास गये. उन को नमस्कार कर ऐसा बोले कि अहो पूज्य * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी में । हम <P980% पंचमाङ्ग विवाह पण्णात (भगवती ) सत्र 2017 शब्दाथ अ० अभ्याख्यान ए० यह दे देवों को भ० भगवन् अ० असंयति व० वक्तव्यता मि० होवे गोगौतम णो नहीं इ० यह अ० अर्थ स० योग्य णि निष्ठुर व० वचन ए. यह दे० देवोंको दे० देवोंको भं० भगवन् सं० संयतासंयति व वक्तव्यता सि० होवे गो गौतम णो नहीं इ० यह अ० अर्थ स. योग्य अ० असद्भूत ए० यह दे० देवोंको से० अव किं क्या खा० कहावे दे देव गो० गौतम दे देव नोक नोसंपति व० वक्तव्यता सि० होवे ॥ १४ ॥ दे० देव भं० भगवन् क. कौनसी भा. भापा से भा० जो इणढे समढे, अब्भक्खाणमेयं देवाणं ॥ देवाणं भंते ! असंजयाइ वत्तव्यंसिया ? गोयमा ! णोइणढे समढे, णिडुरवयण मेयं देवाणं ॥ देवाणं भंते ! संजयासंजयाइ वत्तव्वं सिया? गोयमा ! जो इणढे समढे असम्भूयमेयं देवाणं । से किं खाइण्णं भंते ! देवाइ वत्तव्बंसिया ? गोयमा ! देवाणं नो संजयाइ बत्तन्वंसिया ॥ १४ ॥ देवाणं POSES पांचवा शंतकका चौथा उद्देशा 988 भावार्थ देवों को असंयति कहना ? यह अर्थ योग्य नहीं हैं क्यों कि ऐसा कहने से देवों को निप्ठुर (कठोर) वचन लगता है. क्या भगवन् ! देवों को संयतासंयति कहना ? यह अर्थ भी योग्य नहीं है क्यों कि देवों को यह असद्भूत (अछता भाव) होये. तव अहो भगवन् ! देवों को क्या कहना ? अहो गौतम ! देव नोसंयति हैं। ऐसा कहना ॥ १४ ॥ अहो भगवन् ! देव कितनी भाषा बोलते हैं और कौनसी भाषा , शब्दार्थ सूत्र 4. अनुवादक-पालनमवारी मुनि श्री अमोलक ऋपीजी83 म० महावीर से पु० पुछाये हुवे अ० हम को म० मनसे ही इ० यह एक ऐसा ग० प्रश्न वा० कहा ऐ० ऐसे दे० देवानुप्रिय शेप पूर्ववत् ति ऐसा क० करके भ० भगवन्त गो० गौतम को वं० वंदना की णः नमस्कार किया जा• जिस दि० दिशी से पा० आये ता० उसी दि० दिशी में प० पीछे गये ॥१३॥ भ० भगवन् गो० गौतमने स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को ए. ऐसा व० कहा दे. देव भं० भगवन् सं० संयति ति ऐसी व० वक्तव्यता सि. होवे. गो. गौतम णो० नहीं इ० यह अर्थ स० योग्य वीरेणं मणसा पुटेणं मणसा चेव इमं एयारूवं वागरणं वागरियासमाणा समणं भगवं महावीरं वंदामो नमसामो जाव पज्जुवासामो तिकटु भगवं गोयमं वंदइ नमंसइ जामेवदिसि पाउन्भया तामेव दिसिं पडिगया ॥ १३ ॥ भंतेत्ति भगवं गोयमे समणं भगवं महावीरं एवं वयासी- देवाणं भंते ! संजयाइ वत्तव्वंसिया ? गोयमा ! सब दुःखों का अंत करेंगे. इस तरह मन से पूछे हुवे प्रश्नों का उत्तर मनद्वारां मीलने से हमने श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को वंदना नमस्कारकिया. इतना कहकर वे देवों श्री गौतम स्वामी को वंदना नमस्कार करके जहां से आये थे वहां पीछे गये ॥ १३ ॥ भगवान् गौतम श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को ऐसे बोले कि अहो भगवन् ! क्या 'देव संयति हैं। ऐसी वक्तव्यता होवे ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. क्योंकि देवों को संयति कहने से अभ्याख्यान (असत्य आल), होता है. तब क्या भगवन् ! * प्रकाशक-राजारहादुर लाला मुखदेव सहायजी चालाप्रसादजी * वाया ११. पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति (भगवती ) सूत्र 3983 शब्दाथ अ० अभ्याख्यान ए. यह दे देवों को भ० भगवन् अ० असंयति व वक्तव्यता मि० होवे गोगौतम गुणो नहीं इ० यह अ० अर्थ स० योग्य णि निष्ठुर व० वचन ए० यह दे० देवोंको दे० देवोंको भं० भगवन् सं० संयतासंयति व० वक्तव्यता सि० होवे गो गौतम णो० नहीं इ० यह अ० अर्थ स० योग्य अ० असद्भूत ए. यह दे० देवोंको से० अव किं. क्या खा कहावे दे० देव गो. गौतम दे देव नो. नोसंयति व० वक्तव्यता सि० होवे ॥ १४ ॥ दे० देव भ० भगवन् क० कौनसी भा० भापा से भा० णो इणढे समढे, अब्भक्खाणमेयं देवाणं ॥ देवाणं भंते ! असंजयाइ वत्तव्यंसिया ? सूत्र गोयमा ! णोइणटे समढे, णिडुरवयण मेयं देवाणं ॥ देवाणं भंते ! संजयासंजयाइ वत्तव्वं सिया? गोयमा ! णो इणटे समढे असम्भूयमेयं देवाणं ॥से किं खाइण्णं भंते ! देवाइ वत्तब्वंसिया ? गोयमा ! देवाणं नो संजयाइ वत्तव्वंसिया ॥ १४ ॥ देवाणं भावार्थ देवों को असंयति कहना ? यह अर्थ योग्य नहीं हैं क्यों कि ऐसा कहने से देवा को निप्ठुर (कठोर) वचन लगता है. क्या भगवन् ! देवों को संयतासंयति कहना ? यह अर्थ भी योग्य नहीं है क्योंकि देवों को यह असद्भूत (अछता भाव) होवे. तब अहो भगवन् ! देवों को क्या कहना ? अहो गौतम ! 'देव नोसंयति हैं। ऐसा कहना ॥ १४ ॥ अहो भगवन् ! देव कितनी भाषा बोलते हैं और कौनसी भाषा, 888 पांचवा शंतकका चौथा उद्देशा 8-8g - o0 e शब्दार्थ ६५८ सूत्र + अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक प्रार्पजी 87 वोले क• कौनसी भा० भाषा भा० बोलाती हुई वि. विशिष्ट होवे गो. गौतम दे० देव अ. अर्थ मागधी भा० भाषा भा० बोले स० वही अ० अर्थ मागवी भा० मापा भा० वोलाती हुई वि. विशिष्ट होवे १५ ॥ के० केवली भ० भगवन् अं० अंतकरने वाले अ० अंतिम गरीर वाले को जा० जानते हैं पा० देखते हैं ई० हां गो० गौतम जा० जानते है पा० देखते हैं ज. जैसे भं भगवन के० कंवली अं० भंते ! कयराए भासाए भासंति, कयरा वा भासा भासिज्जमाणी विसिस्सइ ?मोयमा ! देवाणं अह मागहाए भासाए भासंति, सावियणं अदमागहा भासा भासिजमाणी वितिस्सइ । केवलीणं भंते ! अंतकरंवा अंतिमसारीरियंवा जाणइ पासइ, ? हंता गोयमा ! जाणति पासति ॥१५॥ जहाणं भंते केवली अंतकरंवा अंतिमसारीरियंधा जाणइ पाणइ, तहाणं छउमत्थेवि अंत्करंवा अंतिमसारीरियंवा जाणइ पासइ ? बोलने से विशिष्ठता पाते हैं ? अहो गौतम ! देवों अर्धमागधि भापा बोलते हैं और अर्धमागधि भाषा बोलते हुवे विशिष्ठता पाते हैं ॥ १५ ॥ अहो भगवन् ! केवली अंतकरनेवाले अथवा अंतिम शरीरवाले को जाने देखे ? हां गौतम ! केवली अंतकरनेवाले व अंतिम शरीरवाले को जाने देखे. अहो भगवन् ! जैसे केवली अंत करनेवाले व अंतिम शरीरी को जानते देखते हैं वैसे ही क्या छद्मस्था जानते देखते हैं ? अहो गौतम! यह अर्थ समर्थ नहीं हैं. छद्मस्थ सुनकरके य प्रमाण मे जानते * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * वार्थ सूत्र 808 पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र-388- शब्दार्थ अंतकरने वाले अं अंतिम शरीर वाले को जा० जानते हैं पा देखते हैं त० तैसे छ. छमस्थ भी अं० अंत ० करने वाले अं० अंतिम शरीर वाले को जा० जानते हैं पा० देखते हैं गो० गौतम णो० नहीं इ. यह अ० अर्थ स० समर्थ सो० सुनकर ५० प्रमाण से से० अथ किं० क्या तं० वह मो० सुनकर के० केवली के. केवली के श्रावक के. केवली सा० श्राविका का उ० सेवा करने वाला के. केवली की उ० सेवा करने वाली के त० स्वयं बुद्ध त० स्वयं बुद्ध के सा० श्रावक सा० श्राविका उ० सेवा करने वाला उ० गोयमा ! णोइणढे समढे सोचा जाणइ पासइ, पमाणओवा ॥ से किंतं सोच्चा? सोचाणं ! केवलिस्सवा, केवलिसावयस्सवा, केवलिसावियाएवा, केवलिउवासग्गस्सवा, केवलिउवासियाएवा, तप्पक्खियस्सवा, तप्पक्खियसावयस्सवा, तप्पक्खियसावि- याएवा, तप्पक्खियउवासगस्सवा, तप्पक्खिय उवासियाएवा, सेतं सोचा ॥ से किंतं भावार्थ देखते हैं. सुनने का क्या अर्थ है ? केवली, केवली के श्रावक, श्राविका, सेवा करनेवाले, सेवा करने- वाली, स्वयंवुद्ध, स्वयंबुद्ध के श्रावक, श्राविका, सेवा करनेवाले व सेवा करनेवालियों के मुख से श्रवण , 50 करके छद्मस्थ मनुष्य अंत करनेवाले व अंतिम शरीरी को जानते व देखते हैं. अब प्रमाण का क्या अर्थ ? प्रमाण के चार भेद कहे हैं. १ चक्षु वगैरह इन्द्रियों से जाना जावे सो प्रत्यक्ष २ चिन्ह संबंध स्मरण से जो जाना जावे सो अनुमान जैसे धूम्र से आने का जानना. ३ उपमा से जाना जावे सो उपमा प्रमाण जैसे पांचवा शतक का चौथा उद्देशा ९.9 शब्दार्थ सूत्र 4. अनुरादक-पालग्राह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी सेवा करने वाली के से० अथ किं. क्या प० प्रमाण च० चार प्रकार के प० प्रत्यक्ष अ० अनुमान ओ० उपमा आ० आगम न० जैसे अ० अनुयोग द्वार में त० तैसे गे० जानना प० प्रमाण ते. उस से ५० भागे णो० नहीं अ० आत्मागम-णो नहीं अ० अनंतरागम प० परंपरागम ॥ १६ ॥ के. केवली भं० भगवन च० खेल्ला कर्म च चरिम निर्जरा जा० जाने पा० देखे हं० हां गो गौतम जा० जाने पा० देखे पमाणे ? पमाणे चउविहे पण्णत्ते. तंजहा-पच्चक्खे, अणुमाणे, ओवमे; आगमे, जहा अणुओगदारे तहा णेयव्वं पमाणं जाव तेण परं णो अत्तागमे, णो अनंतरागमे, परंपरागमे ॥ १६॥ केवलीणं भंते ! चरिमकम्मेवा, चरिमणिज्जरंवा जाणइ पासइ? हंता गोयमा ! जाणइ पासइ ॥ जहाणं भंते ! केवली चरिम कम्मवां चरिमणि- गाय जैसा गवयं, ४ गुरु की परंपरा से आप्त वचनों को मुनकर जानना सो आगम प्रमाण. इस का विशेष विवरण अनुयोगद्वार मूत्र में कहा है. आत्मागम अर्थ से वीतराग को आत्मागम, गणधरों को अनंतरागम ओर शिष्यों को परंपरागम. सूत्र से गणधरों को आत्मागम, शिष्यों को अनंतरागम व प्रशिष्यों को परंपरागम जानना ॥ १६ ॥ अहो भगवन् ! क्या केवली चरिम कर्म च चरिम निर्जरा को जानते हैं १.यन का पगु विशेप, इसे रोझ भी कहते हैं.. * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादनी * नावार्थ १० a सूत्र 8 पंचांग विवाह पण्पत्ति ( भगवती) सूत्र ज० जैसे भ० भगवन् के. केवली य० चरिम कर्म ज. जैसे अं० अंत करने वाले आ० आलापक त. तैसे च० चस्मि कर्म से अ० अपरिशेप णे. जानना. ॥ १७ ॥ के. केवली भं० भगवन् प० प्रकृष्ट म० मम 0 व० वचन धा० धारण करे ६० हां धा० धारन करे ज. जो भं० भगवन् के. केवल ज्ञानी प० प्रकृष्ट म० मन व० बचन धा० धारणकरे तं० उसे वे० वैमानिक देव जा० जानते हैं पा० देखते हैं गो० गौतम अ० जरंवा जाणइ पासइ ? हंता गोयमा ! जाणइ पासइ । जहाणं भंते ! केवली चरिमकम्मंवा जहाणं अंतकरेणं आलावगो, तहा चरिम कम्मेणवि अपरिसेसिओ णेयव्वो ॥ १७ ॥ केवलीणं भंते ! पणीयं मणवा, वईवा धारेज्जा ? हंता धारेज्जा ।। जण्णं भंते ! केवली पणीयं मणंवा वइंवा धारेजा, तं णं माणिया देवा जाणंति देखते हैं ? ही गौतम ! केवली चरिम कर्म व चरिम निर्जराको जानते व देखते हैं. जैसे केवली चरिम कर्म व निर्जन को जानते हैं वैसे ही क्या छद्मस्थ जानते हैं व देखते हैं ? अहो गौतम ! इस का सव अधिकार उपर के अंतकरे आलापक जैसे कहना ॥१७॥ अहो भगवन् ! क्या केवली श्रेष्ठ मन वचन धारे-उन का व्यापार करे ? हां गौतम ! केवली श्रेष्ठ मन वचन का व्यापार करे. अहो भगवन् ! जो मन वचन केवली धारण करते हैं उन को वैमानिक देव क्या जानते व देखते हैं ? अहो गौतम ! कितनेक वैमा-16 निक देव जानते हैं व देखते हैं और कितनेक नहीं जानते हैं व नहीं देखते हैं. अहो भगवन् ! किस कारनमे * पांचवा शतक का चौथा उद्देशा वाथे 99 शब्दार्थी सून 4 अनुवादक-पालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी सेवा करने वाली के से० अय कि क्या प० प्रमाण च० चार प्रकार के १० प्रत्यक्ष अ० अनुमान ओ० उपमा आ० आगम न० जैसे अ० अनुयोग द्वार में त० तैसे णे० जानना ५० प्रमाण ते. उस से प. भागे णो० नहीं अ० आत्मागम णो नहीं अ० अनंतरागम १० परंपरागम ॥ १६ ॥ के. केवली भ० भगवन च० छेल्ला कर्म च० चरिम निर्जरा जा० जाने पा० देखे हं० हां गो० गौतम जा० जाने पा० देखे पमाणे ? पमाणे चउन्विहे पण्णत्ते तंजहा-पच्चक्खे, अणुमाणे, ओवमे; आगमे, जहा अणुओगद्दारे तहा णेयव्वं पमाणं जाव तेण परं णो अत्तागमे, णो अनंतरागमे, परंपरागमे ॥ १६ ॥ केवलीणं भंते ! चरिमकम्मेवा, चरिमणिजरंवा जाणइ पासइ? हंता गोयमा ! जाणइ पासइ ।। जहाणं भंते ! केवली चरिमः कम्मयां चरिमणि- गाय जैसा गवयं, ४ गुरु की परंपरा से आप्त वचनों को मुनकर जानना सो आगम प्रमाण. इस का विशेष विवरण अनुयोगद्वार मूत्र में कहा है. आत्मागम अर्थ से वीतराग को आत्मागम, गणधरों को अनंतरागम ओर शिष्योंको परंपरागम. सूत्र से गणधरों को आत्मागम, शिष्यों को अनंतरागम व प्रशिष्यों को परंपरागम जानना ॥ १६ ॥ अहो भगवन् ! क्या केवली चरिम कर्म व चरिम निर्जरा को जानते हैं व १ वन का पनु विशेष, इमे रोझ भी कहते हैं. * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादगी * भावार्थ दाथा 69 प० परंपर प० पर्याप्त अ० अपर्याप्त उ०उपयोगयुक्त उ० उपयोग रहित त उन में जे. जो उ० उपयोग वाले जा० जानते पा० देखते हैं से० अथ ते इसलिये तं. वैसे ही ॥ १८ ॥ १० समर्थ भं०. भगवर अ००० अनुत्तरोपपातिक दे देव तक वहां रहे हुवे इ० यहां रहे हुवे के केवली की स. साथ आ. अलाप सं० संलाप क० करने को है. हां प० समर्थ के० कैसे जा. यावत् प० समर्थ अ० अनुत्तरोपपातिक सत्र 1389 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भवगती) सूत्र RS वण्णगा ते न जाणंति न पासंति । एवं अणंतर, परंपर, पजत्त, अपज्जन्साय, उवउत्ता अणुवउत्ता, ॥ तत्थणं जे ते उवउत्ता ते जाणंति पासंति, से तेणटेणं तंचव ॥१८॥ पभणं भंते ! अणुत्तरोववाइया देवा तत्थगया चेव समाणा इहगएणं केवलिणा सद्धिं आलावंवा संलावंवा करेत्तए ? हंता पभू । से केण?णं जाव पभूणं अनु- त्तरोववाइयादेवा जाव करेत्तए ? गोयमा ! जणं अणुत्तरोववाइया देवा तत्थगया जान सकते हैं अर्थात् उपयोगवन्त अमायी सम्यग् दृष्टि परंपरा उत्पन्न होनेवाले पर्याप्त देव जान सकते हैं व देख सकते हैं.इसलिये ऐसा कहा गया है ॥१८॥अहो भगवन् ! अनुत्तरोपपातिकदेव वहां रहे हुवे ही यहां मनुष्य लोक में रहे हुवे केवली की साथ आलाप संलाप करने को क्या समर्थ हैं.? हा गौतमः। ये देवों यहां पर केवली की साथ-आलाप संलाप करने को समर्थ हैं। भहो भगवर! किस कारन से वे समर्थ हैं ? अहो ११ पांचवा शतक का चौथा उद्देशा 988- भावार्थ गन्दार्थ सूत्र + अनुवादक-मालामवारी मुनि श्री अमोलक ऋषिनी : कितनेक जा जानते हैं पा० देखते हैं से० अर्थ के कैसे जा. यावत् ण नहीं जा जानते हैं गो गौतम ० वैमानिक दे० देव दु० दोप्रकार के प० कहे मा० मायावी मि० मिथ्यादृष्टि 'उ० उत्पन हुने अ० अमापावी स० सम्यग् दृष्टेि उ० उत्पन्न हुए त उन में जे. जो ते. वे मा० मायावी मि. मिथ्यादृष्टि उ० उत्पन्न होने वाले ते वे न० नहीं जा० जानते हैं न० नहीं पा० देखते हैं ऐ० ऐसे अ० अनंतर पासंति ? गोयमा ! अत्थेगइया जाणंति पासंति, अत्थेगइया णजाणंति णपासंति ॥ से केपट्टेणं जावणपासंति गोयमा! वैमाणिया देवा दुविहा प०० मायिमिच्छादिट्ठिउ- ववण्णगाय, अमायिसम्मदिढेिउववण्णगाय । तत्थणं जे ते माइमिच्छदिष्टिउव- कितनेक मानते, देखते हैं और कितनेक नहीं जानते हैं व नहीं देखते हैं ? अहो गौतम ! वैमानिक देव दो प्रकार के कई हैं. १ मायी मिथ्यादृष्टि उत्पन्न हुवे और २ अमायी सम्यग् दृष्टि उत्पन्न हुवे. उन में से मायी मिथ्यापि नहीं जान सकते व नहीं देख सकते हैं परंतु अमायी सम्यग् दृष्टि जान व देख सकते हैं. अमापी सम्यग्दृष्टि के दो भेद अनंतर उत्पन्न होनेवाले और परंपरा उत्पन्न होनेवाले. उस में से अनंतर उत्सम होनेवाले नहीं जान सकते हैं परंतु परंपरा उत्पन्न होनेवाले जान सकते हैं. परंपरा उत्पन्न होने- गले के दो भेद पर्याप्त व अपर्याप्त उत में अपर्याप्त नहीं जान सकते हैं परंतु पर्याप्त जान सकते हैं. पर्यास के दो भेद उपयोग युक्त र उपयोग रहिन उस में उपयोगवाले जान सकते हैं परंतु उपयोग विना के नहीं प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादनी . वार्थ clg सूत्र नावार्थ 8- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र - केवली जा० यावत् पा० देखते हैं॥ १९ ॥ अ० अनुत्तरोपपातिक भं० मंगवन दे देव किं. क्या उ०१ उदित मोहवाले उ० उपशान्त मोहवाले खी० क्षीणमोहवाले गो० गोनम नो० नहीं उ. उदितमोहवाले उ० उपशांत मोहवाले णो० नहीं खी० क्षीणमोह वाले ॥२०॥ के. केवली मं० भगवन् आ० भवंति, से तेणटेणं जण्णं इहगए केवली जाव पासइ ॥ १९ ॥ अणुत्तरोववाइयाणं भंते ! देवा किं उदिण्णमोहा, उवसंतमोहा, खीणमोहा ? गोयमा नो उदिण्णमोहा, उवसंतमोहा, णो खीणमोहा ॥ २० ॥ केवलीणं भंते'! आयागेहिं जाणइ पासइ ? अहो गौतम ! उन को अनंत मनोद्रव्य वर्गणा विशेषपनासे प्राप्त हुई है, सामान्यपना से प्राप्त हुई है, सन्मुख हुई है. इसलिये अहो गौतम ! यहांपर केवली जो अर्थ, हेतु कहते हैं उन को अनुत्तर कल्पपासी, देव वहां रहे हुवे जान सकते हैं व देख सकते हैं * ॥ १९ ॥ अहो भगवन् ! अनुत्तर कल्पवासी देव क्या उदित [ उदय हुवा ] मोहवाले हैं, उपशान्त मोहवाले हैं, या क्षीण मोहवाले हैं ? अहो गौतम !! वे उदित मोहवाले नहीं है वैसे ही क्षीण मोहवाले नहीं है परंतु उपशांत मोहवाले हैं ॥२०॥ अहो * अनुत्तर कल्पवासी देवों का अबधिज्ञान संभिन्नलोकनाडाविषयवाला है. जो अवधिज्ञान लोक नाढी ग्राहक होता है वह मनोद्रव्य वर्गणा का ग्राहक भी होता है. और भी मात्र लोक का संख्यात भागवाला अवधिज्ञान होता है वह भी मनोद्रयग्राही होता है, तो लोक नाडी विषपवाला अवधिज्ञान क्यों मनोद्रव्यग्राही न होवे ? अर्थात् मनोद्रव्य वर्गणा ग्राही हो। > पांचवा शतक का चौथा उद्देशा88384 ore शब्दार्थ सूत्र 4. अनुवादक बालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी दे देव जा. यावत् क० करने को गो गौतम ज. जो अ० अनुत्तरोपपातिक दे देव तक वहां रहे। हुने अ० अर्थ हे हेतु प० प्रश्न का कारन वा० व्याकरण पु० पुछते हैं त उसे इ० यहां रहे हुए। के० केवली अ० अर्थ जा. यावत् वा० कहते हैं ते. इसलिये ज० यदि भं० भगवन् गो० गौतम ते० उन दे देवों को अ० अनंत म० मनोद्रव्य व वर्गणा ल० लब्ध प० प्राप्त अ० सन्मुखहुई ते. इसलिये के. वेध समाणा अटुंवा, हेउवा, पसिणंवा कारणंवा, वागरणवा पुच्छति, तण्णं इहगए केवली अटुंवा जाव वागरणंवा वागरेइ से तेणटेणं । जइणं भंते ! इहगए केवली अटुंबा जाव वागरेइ तण्णं अणुत्तरोववाइया देवा तस्थगया चेव समाणा जाणंति पासंति ? हंता गोयमा ! जाणंति, पासंति । से केणटेणं जाव पासंति ? गोयमा ! तसिणं देवाणं अणंताओ मणोदव्व वग्गणाओ लडाओ पत्ताओ अमिसमण्णागयाओं गौतम ! * अनुत्तरकल्पवासी देव वहां रहे हुवे जो अर्थ, हेतु, प्रश्न, कारन, व्याकरण वगैरह पूछते हैं। उन का उत्तर केवली यहां रहे हुवे देते हैं इसलिये वे देवता समर्थ हैं. अहो भगवन् ! यहां रहे हुवे केवली जो अर्थ, हेतु वगैरह कहते हैं उन को अनुत्तर कल्पवासी देव क्या वहां रहे हुवे जान व देख सकते ? हा गौतम ! वे जान व देख सकते हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से वे जान व देख'मकत है ? * बारहवा अय्युत देवलोक से उपरके देवलोक के देवताओं का मनुष्य लोक में आगमन नहीं होता है. * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * बार्य SC NEE Hindi सूत्र 298 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 988- काल में ए० इन ही अ० आकाश प्रदेश में ह० हस्त जा. यावत् उ० अवगाहकर चिं० रहने को गोल गौतम णो० नहीं इ० यह अर्थ स. योग्य के० कैसे भगवन् जा० यावत् के. केवली अ० इस स.go समय में जे० जिन आ० आकाश प्रदेश में जा. यावत् चि० रहते हैं जो नहीं प० समर्थ के. केवली से. आगामिक काल में ए. इनही में ह. हस्त ना० यावत् चि० रहने को गो० गौतम के. केवली को वी. वीर्य के स० योग सहित स० विद्यमान द° द्रव्य च० अस्थिर उ० उपकरण ( अंगोपांग) भ० एसु चेच आगासपएसेसु हत्थंवा जाव उग्गाहित्ताणं चिट्ठित्तए ? गोयमा ! णोइणढे समढे । से केणटेणं भंते ! जाव केवलीणं अस्सि समयंसि जेसु आगासपएसेसु जाव चिट्ठइ, णो णं पभू केवली सेयकालांसवि एसुचेव हत्थंवा चाव चिट्ठित्तए ? गोयमा ! केवलिस्सणं वीरियस्स सजोगसद्दव्वयाए चलाइं उवगरणाइं भवंति, च- लोवगरणट्टयाएणं केवली अर्रिस समयंसि जेसु आगासपएसेसु हत्थंवा जाव गत काल में हन्त, पांव, बाहु व जंघा अवगाह कर रहने को क्या समर्थ हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. अहो भगवन् ! किम कारन से केवली इस वर्तमान समय में जिन प्रदेशों में हस्तादि अवगाहकर रहे हुवे है उन प्रदेशों में ही आगामिक काल में नहीं रह सकते हैं ? अहो गौतम ! केवली को वीर्यात- सय के क्षय से मन वचन व काया का व्यापार सहित विद्यमान जीव द्रव्य के भाव से भस्थिर अंगोपांग 298% पांचवा शतक का चौथा उद्देशा NONST भावार्थ oyo शब्दार्थ सूत्र 13 अनुवादक-वारयानचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 इन्द्रिय से जाजाने पा० देंखे णो० नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ के किसलिये जा० यावत् शेष पूर्ववत् ॥ २१॥ के केवली भं भगवन् अ० इस स० समय में जै० जिन आ० आकाश-प० प्रदेश में ह० हस्त पा० पाच वा. वाहु उ० जंघा उ० अवगाह कर चि० रहते हैं ५० समर्थ के केवली से० आगामिक जो इणढे सम।से केणटेणं जाव केवलीणं आयाणेहिं न जाणइ न पासइ ? गोयमा! केवलीणं पुरच्छिमेणं मियंपि जाणइ, अमियंपि जाणइ, जाव निब्बुडे दंसणे केव- लिस्स से तेणटेणं ॥ २१॥ केवलीणं भंते ! अस्सि समयंसि जेसु आगासपए- सेसु हत्थंवा, पायंवा, वाहवा, ऊरुवा उग्गाहित्ताणं चिट्ठइ, पभूणं केवली सेयकालंसिवि भगवन् ! क्या केवली आदान (ग्रहण करने योग्य सो इन्द्रियों) से जानते हैं देखते हैं ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है. किस कारन से केवली इन्द्रियों से नहीं जानते हैं, नहीं देखते हैं ? अहो गौतम ! केवली पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्ध्व, अधो वगैरह दिशा में मर्यादा सहित जानते हैं और मर्यादा रहिन भी जानते हैं, सब काल, सब भाव जानते देखते हैं. यावत् केवली को प्रगट ज्ञान दर्शन रहाहुवा इमलिये वे केवली इन्द्रियों से नहीं जानते व नहीं देखते हैं॥२१॥ अहो भगवन् ! इस समय में केवली जिन प्राकाश प्रदेश में अपने हस्त, पांव, बाहु व जंघा अवगाहकर रहे हुवे हैं. उन ही आकाश प्रदेश में अना- * प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायनी वालाप्रसादजी साथ।
OG PS 9 १- पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती - उ० बताने को गो० गौतम चौ. चौदहपूर्वी को अ० अनंत द्रव्य उ० उत्कारिका भे• भेद से तोडे हुने ल० लब्ध प० प्राप्त अ० सन्मुख हुए भ० होते हैं ते. इसलिये जा. यावत् उ० बताने १० वैसे ही भ• भगवन् पं० पांचवा स० शतक का च० चौथा उ० उद्देशा स० समाप्त ॥५॥ ४ ॥ । छछदस्थ भं० भगवन् म० मनुष्य ती० अतीत अ० अनंत सा० शाश्वन स. समय के. संपूर्ण सं० जताई दवाई उकारिया भेएणं भिजमाणाई लडाइं पत्ताई अभिसमण्णागयाइं भवंति, से तेण?णं जाव उवदंसित्तए॥२४॥ सर्व भंते भंतेत्ति ॥ पंचम सयरस चउत्थो उहेसो सम्मत्तो ॥ ५ ॥ ४ ॥ छउमत्थेणं भंते ! मणसे तीय मणंतं सासयं समयं केवलेणं संजमेणं जहा पढमसए भावार्थ अहो भगवन् ! किस तरह चौदह पूर्वधारी एक घडे से सहस्त्र घडे यावत् एक दंड से सहस्त्र दंड बनाकर बताने को समर्थ हैं ? अहो गौतम ! मेद पांच प्रकार के कहे हुरे हैं ? खंडादि भेद सो अनेक टुकडे हुवे लोप्टादि २ प्रतर भेद सो पड नीकले अभ्रपटल ३ चूर्ण भेद तिलादि चूर्णवत् ४ अनुतटिका भेद अवटतट का भेद समान और ५ उत्कारिका भेद एरण्ड पीज समान. जो चौदह पूर्वधारी इं.त हैं उन को 50 / अनंत द्रव्य उत्कारिक भेद से भेदाये हुये प्राप्त होते हैं, इस से वे अनेक रूप बनाकर बता सकते अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं यह पांचवा शतक का चौथा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ५ ॥ ४ ॥ चतुर्थ उद्देशे में चौदह पूर्वधारी का महानुभाव कहा. उस से छमस्थ जीव सीझे ऐसी किसी को शंका पांचवा शनकका पांचवा उद्देशा GHT सुन १. अनुवादक-पालग्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी हात र ५० आस्थर उ० उपकरण कालयं के० केवली अ० इस स० समय में जे.जिन आ. आकाश प्रदेश में शेष पूर्ववत् ॥ २२ ॥ ५०समर्थ भं०भगवन् चो चौदहपूर्वी घ घट से ३०घट सहस्र पवस्त्र मे १० रख सहस्र क० कट (छादडी से) क कट सहस र० रथ से र० रथ सहस्र छ. छत्र से छ. छत्र सहस्त्र दं० दंड से दं० दंड सहस्र अ० करके उ० बताने को हं० हां प० समर्थ के० कैसे चो० चौदह पूर्वी जा० चिट्ठइ, णोणं पभू केवली सेयकालंसि विएसुचेव, जाव चिट्ठित्तए से तेण?णं जात्र वुचइ केवलीणं अरिस समयंसि जाब चिट्ठित्तए ॥ २२ ॥ पभूणं भंते ! चौदस- पुब्बी घडाओ घडसहस्सं, पडाओ पडसहस्से, कडाओ कडसहस्सं, रहाओ रहसहस्सं, छत्ताओ छत्तसहस्स; दंडाओ दंडसहस्सं, अभिनिव्वदृत्ता उबदसेत्तए ? हंता पभू । से केणट्टेणं पभू चोद्दसपुब्बी जाव उवदंसेत्तए ? गोयमा ! 'चोद्दसपुब्बिरसणं अ- होते हैं. इस तरह आस्थिर अंगोपांग होने से केवली वर्तमान समय में जिन प्रदेशों में हस्तादि अवगाहकर रहते हैं उन प्रदेशों में अनागत काल में नहीं रहते हैं ॥ २२ ॥ अब श्रुत केवली आश्री प्रश्न पूछते हैं. भदो भगवन् ! चौदह पूर्वधारी श्रुत केवली क्या लब्धि के प्रभाव से एक घडे की नेश्राय से सहस्र घडे, एक पख से सहस्र वस्त्र, एक कट (छादडी) से सहस्र कद, एक रथ से महस रथ, एक छत्र से सहस्र छत्र व एक दंड से सहस्र दंड कराकर बताने को क्या समर्थ हैं ? हां. गौतम ! चौदह पूर्वधारी ममर्थ हैं. * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * "गवार्थ ...न्दाथ सूत्र - पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगरती) सूत्र 8-8. यावत् उ० बताने को गो० गौतम चो० चौदहपूर्वी को अ० अनंत द्रव्य उ० उत्कारिका भे भेद सी भि० तोडे हुने ल० लब्ध प० प्राप्त अ० सन्मुख हुए भ० होते हैं ते० इसलिये जा. यावत् उ० बताने को से० वैसे ही भ• भगवन् पं० पांचवा स० शतक का च० चौथा उ० उद्देशा स० सपाप्त ॥ ५॥ ४ ॥ छ• छमस्थ भं० भगवन् म० मनुष्य ती० अतीत अ० अनंत सा० शाश्वन स० समय के संपूर्ण सं० जताई दव्वाइं उक्कारिया भेएणं भिजमाणाई लढाई पत्ताई अभिसमण्णागयाई भवंति, से तेणटेणं जाव उवदंसित्तए ॥२४॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ पंचम सयरस चउत्थो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ५ ॥ ४ ॥ छउमत्थेणं भंते ! मणसे तीय मणंतं सासयं समयं केवलेणं संजमेणं जहा पढमसए अहो भगवन् ! किस तरह चौदह पूर्वधारी एक घडे से सहस्र घडे यावत् एक दंड से सहस्र दंड बनाकर बताने को समर्थ हैं ? अहो गौतम ! भेद पांच प्रकार के कहे हुरे हैं १ खंडादि भेद सो अनेक टुकडे हुवे लोष्टादि २ प्रतर भेद सो पड नीकले अभ्रपटल ३ चूर्ण भेद तिलादि चूर्णवतू ४ अनुतटिका भेद अवटवट का भेद समान और ५ उत्कारिका भेद एरण्ड पीज समान. जो चौदह पूर्वधारी होत हैं उन को अनंत द्रव्य उत्कारिक भेद से भेदाये हुवे प्राप्त होते हैं, इस से वे अनेक रूप बनाकर बता सकते हैं. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं यह पांचवा शतक का चौथा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ५ ॥ ४ ॥ चतर्थ उद्देशे में चौदह पर्वधारी का महानभाव कहा. उत से छमस्थ जीव सीझे ऐसी किसी को शंका BR><पांचवा शतकका पांचवा उद्देशा-887- भावार्थ 00 विदा संयम सजा ६७० सूत्र 43 अनुवादक-पालप्रमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 ० जस ५० प्रथम श० शतक में च० चतुर्थ उ० उद्देशे में आ० आलापक त० तैसे ने० जानना जा. यावत् ॥ १ ॥ अ० अन्यतीर्थिक भं• भगवन् ए. ऐसा आ० कहते हैं जाऊ यावत् प० प्ररूपते हैं स० सब पा० माणी स० सब भू० भूत स० सब जी० जीव स० सब स० सत्व ए. ऐसी वे० वेदना चउत्थ उद्देसे आलावगा तहा नेयव्वा जाव अलमत्थुत्ति वत्तव्वंसिया ॥ १ ॥ अ- ण्णउत्थियाणं भंते ! एवमाइक्खंति जाव परुति सव्वे पाणा, सव्वे भूया, सव्वे जीवा सव्वेसत्ता, एवंभूयं वेयणं वेदंति. से कहमेयं भंते ! एवं ? गोयमा ! जण्ण ते अण्णउत्थिया एव माइक्खंति जाव वेदंति, जे ते एव माहंसु मिच्छाते एव माहंसु ॥ अहं पुण गोयमा! एव माइक्खामि जाव परूवेमि, अत्थेगइया पाणा भूया जीवा सत्ता एवं- भूयं वेयणं वेदंति, अत्थेगइया पाणा भूया जीवा सत्ता अणेवंभूयं वेयणं वेति ॥ होवे इस की निवृत्ति के लिये पांचवा उदेशा कहते हैं. अहो भगवन् ! छमस्थ मनुष्य मात्र संयम से क्या सिनते हैं, बुझते हैं यावत् सब दुःखों का अंत करते हैं ? अहो गौतम ! प्रथम शतक के चतुर्थ उद्देशे में जैसा कहा वैसेही यहां जानना. अर्थात् छमस्थ मनुष्य नहीं सिझतेहैं यावत् सब दुःखों का अंत नहीं करते हैं। परंतु मान दर्शन के धारक केवली ही सिझो हैं. क्यों कि उस. से विशेष कुच्छ नहीं है. ॥ १ ॥ 'अहो * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालाप्रसादनी * " सूत्र 1 पंचमाङ्ग विवाह पण्णचि (भगवती) सूत्र 28- वेदते हैं से० अथ क० कैसा ए. यह भ० भगवन ए. ऐसे गो. गौतम जेल जो ते वे अ० अन्य तीथिक ए. ऐसा आ० कहते हैं जा० यावत् वे० वेदते हैं जे० जो ते० वे एक ऐसा आ० कहते हैं। मि० मिथ्या ते वे एक ऐसा आ० कहते हैं अ० मैं पु० पुनः गो० गौतम ए० ऐसा आ. कहता से केण?णं ! अत्यंगइया तंचे उच्चारेयव्वं ? गोयमा ! जेण पाणा भूया जीवा सत्ता जहा कडा कम्मा तहा वेयणं वेदति तेणं पाणा भूया जीवा सत्ता एवंभूयं वेयणं वेदंति, जेणं पाणा भूया जीवा सत्ता जहा कडा कम्मा नो तहा वेयणं वेदंति, तेणं पाणा भूया जीवा सत्ता अणेवंभूयं वेयणं वेदंति से तेणटेणं तहेव ॥२॥ नेरझ्याणं भंते । किं एवंभूयं वेयणं वेदेति अणेवंभूयं वेयणं वेदति ? गोयमा ! नेरइयाण भगवन् ! अन्यतीर्थिक ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं कि सब माण भूत जीव व सत्व ऐवंभूते वेदना वेदते हैं तो यह किस तरह है ? अहो गौतम ! जो अन्यतीर्थिक ऐसा कहते हैं वे मिथ्या हैं अर्थात् उन ४० का कथन मिथ्या है, मैं ऐसा कहता हूं यावत् रूपना हूं कि कितनेक प्राण भूत सत्व व जीव एवंभूत वेदना वेदते हैं भौर कितनेक प्राण भूत जीव व सत्व अनेवंभून वेदना वेदता है. अहो भगवन् ! १ जिसरीति से कर्म करना उसी रीति से उसको भोगना सो.. ११ पांचवा शतक का पांचवा उद्देशा भावार्थ 69 ६७२ हो अमालक ऋपिनी 8- सूत्र जा. यावत् प० मरूपता हूं जे० जो पा० प्राणी भू० भूत जी० जीव स० सल न० जैसे क० किया हुवा क० कर्म त तैसी वेवेदना वे वेदते हैं तेथे पाप्राण ए०एवंभूत वेम्वेदना वेग्वेदते हैं शेष सब पूर्ववत ॥२॥ पूर्ववत् ॥ ३ ॥ ज० जम्बूद्वीप में भा० भरत क्षेत्र में इ० इस उ. अवसर्पिणी के स. अवसर में एवंभूयंवि वेयणं वेदंति, अणेवंभूयवि वेयणं वेदंति ॥ से केणटेणं तंव ? गोयमा! जेणं नेरइयाणं जहा कडा कम्मा तहा वेयणं वेदेति तेणं नेरइया एवंभयं वेयणं. वेदेति जेणं नेरइया जहा कडा कम्मा णो तहा वेयणं वेदेति तेणं नेरइया अणेवं. भुयं वेयणं वेदेति । से तेणटेणं आव वेमाणिया, संसारमंडलं नेयव्वं ॥ ३ ॥ किस तरह ? अहो गौतम! प्राण भूतादि जिसरीति से कर्मों किये वैसी वेदना वेदते हैं वे प्राण तादि एवंभूत चेदना वेदते हैं और जो माण भूत जिसरीति से कमौ किये वैसी वेदना नहीं वेदते हैं। 'अनेवंभूत वेदना वेदते हैं ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! क्या नारकी एवंभूत वेदना वेदते हैं ? अहो गौतम मारकी एवंभूत अनेवंभूत ऐसी दोनोंप्रकार की वेदना वेदते हैं. अहो भगवन् ! यह किस तरह ? अहो गौतम ! जो नारकी जैसे कर्म किये वैसी वेदना वेदते हैं वे एवंभूत वेदता वेदते हैं और जो नारकी जैसे कर्म किये वैसी वेदना नहीं वेदते हैं वे अनेभूतं वेदना वेदने हैं. इस तरह वैमानिक तक जानना: यह संसार- पक्र में परिभ्रमण करनेवाले जीवों की वक्तव्यता कही.॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! जम्बूदीप के भरत क्षेत्र - भकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालागसादजी * क० कितने '६७३ 88 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 980- शब्दार्थ कु० कुलकर हो थे गो गौतम स० सात ए. ऐसे तीर्थकर मा० माता पि० पिता प० प्रथम सि. शिष्या च० चक्रवर्ती मा० मता इ. स्त्री रत्न व. बलदेव वा. वासुदेव मा० माता पि० पिता ए के प० प्रतिशत्रु ज० जैसे स० समवायांग में ना नाम की प० परिपाटी ने जानना ॥.५ ॥ ५ ॥ क० कैसे भं० भगवन् जी जीव अ० अल्प आ० आयुष्यपने का क० कर्म १० करते हैं. गो. जंबुद्दीवेणं भंते ! इह भारहेवासे इमीसे उसप्पिणीए समाए कइ कुलगरा होत्था ? सूत्र गोयमा ! सत्त, एवं तित्थयरा मायरो पियरो पढमा सिस्सिणीओ, चक्कवट्टी, मायरों, पियरो इत्थिरयणं, बलदेववासुदेवा, वासुदेव मायरो पियरो एएर्सि पडिसत्तू जहा समवाए नाम परिवाडी तहा नेयव्वा ॥ सेवं भंते भंतेत्ति जाव विहरइ ॥ पंचम सयरस पंचमो उद्देसो सम्मत्तो ॥५॥ ५ ॥ * कहणं भंते ! जीवा अप्पाउयत्ताए कम्मं पकरति ? गोयमा ! पाणे अइवाइत्ता, भावार्थ में इस अवसर्पिणी में कितने कुलकर होते हैं ? अहो गौतम ! सात कुलकर होते हैं. ऐसे ही तीर्थकर व उनके माता, पिता प्रथम शिष्य व शिष्या चक्रवर्ती, व उन के माता, पिता, स्त्री रत्न वलदेव वासुदेव व उन के माता, पिता व प्रतिशत्रु [ प्रतिवासुदेव ] का अधिकार जैसे समवायांग सूत्र में कहा है वैसे ही यहां छ जानना. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह पांचवा शतक का पांचवा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥५॥५॥ पांचवे उद्देशे के अंत में उत्तम पुरुषों के नामों कहे हैं. अब उत्तमता.व अधमता किस तरह से प्राप्त 18 पांचवा शतकका छठा उद्देशा 988 ६७२ सूत्र १ अनुवादक-बालग्रामचारी मनि श्री अमोलक ऋपिनी जा. यावत् प० प्ररूपता हूं जे० जो पा० प्राणी भू० भूत जी० जीव स० सल ज०.जैसे क० किया हुवा क० कर्म त० तैसी वेवेदना वे वेदते हैं ते वे पाप्राण ए०एवंभूत वेवेदना वेग्वेदते हैं शेष सव पूर्ववत ॥ २॥ पूर्ववत् ॥ ३ ॥ ज० जम्बूद्वीप में भा० भरत क्षेत्र में इ० इस उ• अवसर्पिणी के स. अवसर में एवंभूयंवि वेयणं वेदंति, अणेवंभूयवि वेयणं वेदंति ॥ से केणटेणं तंचेव ? गोयमा! जेणं नेरइयाणं जहा कडा कम्मा तहा वेयणं वेदेति तेणं नेरइया एवंभूयं वेयणं. वेदेति जेणं नेरइया जहा कडा कम्मा णो तहा वेयणं वेदेति तेणं नेरइया अणेवं भूयं वेयणं वेदेति । से तेणटेणं जाव वेमाणिया, संसारमंडलं नेयत्वं ॥ ३ ॥ यह किस तरह ? अहो गौतम! 'माण भूतादि जिसरीति से कों किये वैसी वेदना वेदते हैं वे प्राण भूनादि एवंभूत वेदना वेदते हैं और जो प्राण भूत जिसरीति से कौ किये वैसी वेदना नहीं. वेदते हैं। रे अनेवभूत वेदना वेदते हैं ॥ १॥ अहो, भगवन् ! क्या नारकी, एवंभूत वेदना वेदते हैं ? अहो गौतम ! नारकी एवंभूत अनेवंभूत ऐसी दोनोंप्रकार की वेदना वेदते हैं. अहो भगवन् ! यह किस तरह ? भको गौतम ! जो नारकी जैसे कर्म किये वैसी वेदना वेदते हैं वे एवंभूत वेदता वेदते हैं और जो नारकी जिसे कर्म किये वैसी वेदना नहीं वेदते हैं वे अनेवभूतं वेदना वेदने हैं. इस तरह वैमानिक तक जाननाः यह संसार- पक्र में परिभ्रमण करनेवाले जीवों की वक्तव्यता कही. ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र * मकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालापसादनी पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र ११ ब्दार्थ दी० दीर्घायुष्य का क. कर्म प० करते हैं ॥ २॥क० केस भ० भगवन् जी० जीव अ० अशुभ दी. दीर्घायुष्य का क० कर्म प० करते हैं गो० गौतम पा० प्राणियों की अ० हिंसा करने से मृ० मृपा १० व० घोलने से त० तथारूप स० श्रमण मा ब्राह्मण की ही हीलना करने से नि० नीदने से खिखिसना करने से ग गर्दा करने से अ० तीरस्कार करने से अ० अन्यतर अ० अमनोज्ञ अ० अप्रीति का कारन से अ० अशन पा० पान खा० खादिम सा. स्वादिम प० देकर ए. ऐसे ख. निश्चय जी. जीव जा० यावत् प० करते हैं ॥३॥क कैरो भ० भगवन् जी० जीव सु. शुभ दी० दीर्घ आयुष्य का क० कर्म पडिलाभेत्ता एवं खलु जीवा दीहाउयत्ताए कम्मं पकरंति ॥ २॥ कहणं भंते ! सूत्र जीवा असुभदीहाउयत्ताए कम्मं पकरंति ? गोयमा ! पाणे अइवाएत्ता, मुसं वइत्ता तहारूवं समणंवा माहणंवा हीलित्ता, निंदित्ता, खिंसित्ता, गरहित्ता, अवमाणित्ता, अण्णयरेणं अमणुण्णेणं, अप्पीइ कारएणं असणपाणखाइमसाइमेणं पडिलाभित्ता, एवं खलु जीवा जाव पकरंति ॥ ३ ॥ कहणं भंते ! जीवा सुभ दीहाउयत्ताए कम्म श्रमण माहण को फ्रासुक एपणिक अशनादिक देने से जीव दीर्घ आयुष्य वांधते हैं ॥२॥ अझे भगवन् ! }oro जीव कैसे अशुभ दीर्घायुष्य बांधते हैं ? अहो गौतम ! प्राणियों का वध करने से, मृपा बोलने से, व तयारूप श्रमण माहण की हीलना, निंदा, खिंसना, गर्दा व तिरस्कार करने से, वैसे ही अन्य अमनोज्ञ अमीति कारक अशनादि देने से जीव अशुभ दीर्घायुप्य बांधते हैं ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! जीव कैसे शुभ 2008-09 पांचवा शतक का छहा उद्देशा goog- भावार्थ शब्दार्थ सूत्र अनुवादक-बालबागरी मुनि श्री अमोलक कापजी 83. गौतम.पा० प्राणियों का अ० अतिपात करके मु मृपा व० वोलं करके त० तथारूप स० श्रमण मा० माहण को अ० अंफ्रासुक अ० अनेषणिक अ० अन्न पा० पानी खा० खादिम सा. स्वादिम से प० देकर ए. ऐसे जी० जीव अ० अल्प आ० आयुष्यपने का क० कर्म ५० करते हैं ॥ १ ॥ क. - केसै भं० भगवन् जी जीव दीदीर्घ आ०आयुष्यपने का ककर्म प० करतेहैं गो गौतम नो नहीं पा०माणियोंका अ० अतिपात करने से नो० नहीं मु०मृपा वन्योलने से त०तथारूप सश्रमण मा ब्राह्मण को फा०मासुक ए. एपणिक अ० अन्न पा० पानी खा. खादिम सा० स्वादिम प० देने से एक ऐसे ख० निश्चय जी जीव मुसं वइत्ता, तहारूवं समणंश माहणंवा अफासुएणं अणेसणिज्जेणं असण पाण खाइम साइमेणं पडिलाभेत्ता एवं खलु जीवा अप्पाउयत्ताए. कम्मं पकरंति ॥१॥ कहणं भंते ! जीवा दीहाउयत्ताए कम्म पकरंति ? गोयमा ! नो पाणे अइवाइत्ता, नो मुसं वइत्ता, तहारूवं समर्णवा माहणंवा फासुएसणिजेणं असणपाणखाइमसाइमेण होती है सो बताते हैं. अहो भगवन् ! किम तरह से जीव अल्पायुष्य का कर्म करते हैं ? अहो गौतम !! प्राणियों का वध करने से, मृषा बोलने से, व तथारूप श्रमण माहण को अफ्रांसुक अनेपणिक आहार, पानी, खादिम व सादिम देने से जीव अल्प आयुष्य बांधते हैं ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! जीव कैसे दीर्घ आयुष्य बांधते हैं ? अहो गौतम ! प्राणियों का वध नहीं करने से, मृषा · नहीं बोलने से व तयाभूत प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ - पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र १ शब्दार्थी दी० दीर्घायुष्य का क० कर्म प० करते हैं ॥ २ ॥ क० केस भ० भगवन् जी० जीव अ० अशुभ दी० दीर्घायुष्य का क० कर्म प० करते हैं गो० गौतम पा० प्राणियों की अहिंसा करने से मृ० मृपा व. व० घोलने से त० तथारूप स० श्रमण मा ब्राह्मण की ही हीलना करने से नि० नीदने से खिळखिंसना करने से ग गर्दा करने से अ० तीरस्कार करने से अ० अन्यतर अ० अमनोज्ञ अ. अमीति का कारन से अ० अशन पा० पान खा. खादिम सा. स्वादिम प० देकर एक ऐसे ख. निश्चय जी. जीव जा. यावत् प० करते हैं ॥ ३ ॥ क कैसे भ० भगवन् जी० जीव सु. शुभ दी. दीर्घ आयुष्य का क कर्म सून पडिलाभेत्ता एवं खलु जीवा दीहाउयत्ताए कम्मं पकरंति ॥ २॥ कहणं भंते ! जीवा असुभदीहाउयत्ताए कम्मं पकरंति ? गोयमा ! पाणे अइवाएत्ता, मुसं वइत्ता तहारूवं समणंवा माहणंवा हीलित्ता, निंदित्ता, खिसित्ता, गरहित्ता, अवमाण्णत्ता, अण्णयरेणं अमणुण्णेणं, अप्पीइ कारएणं असणपाणखाइमसाइमेणं पडिलाभित्ता, एवं खलु जीवा जाव पकरंति ॥ ३ ॥ कहणं भंते ! जीवा सुभ दीहाउयत्ताए कम्म श्रमण माहण को फासुक एपणिक अशनादिक देने से जीव दीर्घ आयुष्य वांधते हैं ॥ २॥ असे भगवन् ! sto जीव कैसे अशुभ दीर्घायुष्य बांधते हैं ? अहो गौतम ! माणियों का वध करने से, मृपा बोलने से, व तयारूप श्रमण माहण की हीलना, निंदा, खिंसना, गर्हा व तिरस्कार करने से, वैसे ही अन्य अमनोज्ञ अनीति कारक अशनादि देने से जीव अशुभ दीर्घायुष्य बांधते हैं ॥३॥ अहो भगवन् ! जीव कैसे शुभ - पांचवा शतक का छटा उद्देशा - भावार्थ Cig .
शब्दार्थ ६७४ 48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक आपनी 8. गौतम पा० प्राणियों का अ० अतिपात करके मु० मृपा व० वोलं करके त० तथारूप स० श्रमण मा० माहण को अ० अफ्रामुक अ० अनेषणिक अ० अन्न पा० पानी खा. खादिम सा. स्वादिम से ५० देकर ए० ऐसे जी० जीव अ० अल्प आ० आयुष्यपने का क० कर्म ५० करते हैं ॥ १॥ क. केसै भं० भगवन् जी०जीव दीदीर्घ आ०आयुष्यपने का क कर्म प०करतेहैं गोगौतम नो नहीं पामाणियोंका अ० अतिपात करने से नो० नहीं मु०मृपा वन्योलने से त तथारूप सश्रमण मा०ब्राह्मण को फा॰फ्रासुक ए. एपणिक अ० अन्न पा० पानी खा. खादिम सा० स्वादिम प० देने से एक ऐसे ख. निश्चय जी जीव मुसं वइत्ता, तहारूवं समणंबा माहणंवा अफासुएणं अणेसणिजेणं असण पाण खाइम साइमेणं पडिलाभत्ता एवं खलु जीवा अप्पाउयत्ताए कम्मं पकरंति ॥१॥ कहणं भंते ! जीवा दीहाउयत्ताएं कम्म पकरंति ? गोयमा ! नो पाणे अइवाइत्ता, नो मुसं वइत्ता, तहारूवं समणंवा माहणंवा फासुएसणिजेणं असणपाणखाइमसाइमेणं होती है सो बताते हैं. अहो भंगवन् ! किम तरह से जीव अल्पायुष्य का कर्म करते हैं ? अहो गौतम ! माणियों का वध करने से, मृषा बोलने से, व तथारूप श्रमण माहण को अफ्रासुक अनेषणिक आहार, पानी, खादिम व स्वादिम देने से जीव अल्प आयुष्य बांधते हैं ॥१॥ अहो भगवन् ! जीव कैसे दीर्घ आयुष्य वांधते हैं ? अहे गौतम ! प्राणियों का वध नहीं करने से, मृषा नहीं बोलने से व तथाभूत *प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * भावार्थ पंचांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) शब्दार्थी अ० अमत्याख्यान मि० मिथ्यादर्शन कि० क्रिया सि० क्वचित् क करें सि० क्वचित् नो नहीं क. करे अ० अथ से उन को भं० किरियाणा अ० प्राप्त होवे त० उस प० पीछे स० सब तावे प० पतली होती हैं ॥ ५ ॥ गा० गृहपतिका भं० किरियाना वि० घेचने वाला का क० मोललेनेवाला मं० किरि- दसणवत्तिया ? गोयमा ! आरंभिया किरिया कजई, परिग्गहिया, मायावत्तिया, सूत्र अप्पच्चक्खाणकिरिया कजइ, मिच्छादसणकिरिया सिय केजइ सिय नो कजइ ॥ अह से भंडे अभिसमण्णागए भवइ, तओसे पच्छा सव्वाओ ताओ पयणुईभवति ॥ ५ ॥ गाहावइस्सणं भंते ! भंडं विकिण्णमाणस्स कइए भंडं साइजेजा, भंडेयसे वाला गाथापति को क्या आरंभिकी क्रिया लगती है, परिग्रहिकी क्रिया लगती है, मायामत्ययिकी भावाथ, क्रिया लगती है, अप्रत्याख्यान प्रसयिकी क्रिया लगती है या मिथ्यादर्शनमत्ययिकी क्रिया लगती है ? अहो गौतम ! इस तरह किरियाने की गवेपणा करनेवाले गाथापति को आरंभिकी, परिग्रहिकी, अपत्याख्यान प्रत्ययिकी व माया प्रत्ययिकी क्रिया लगती है। और मिथ्यादर्शन क्रिया क्वचित् लगती है व क्वचित नहीं लगता है. और जब वह किरियाना गवेपणा करते हुवे प्राप्त हो जोवे तो उक्त सब क्रियाओं पतली हो जाती हैं क्योंकि गवेषणा करनेमें वह उद्यमी बना हुवा था सो उद्यम हीन हो गया ॥५॥ किरियाने का व्यापार करनेवाले की पास से ग्राहक किरियाना अंगीकार करें परंतु उसने RPR< पांचवा शतकका छठा उद्देशा8998 सूत्र 4. अनुवादक-वालयमाचरािमुनि श्री अमोलक ऋपिजी 82 शब्दार्थ ५९ करते हैं पूर्ववत् ॥ ४॥ गागायापति का भ० भागवन् भ० किरियाना वि० विक्रय करने वाला का के० कोई भ० किरियाना अ० लेजाये त उस भ०भगवन् भकिरियाना की अ० गोषणा करने वाले को कि क्या आ-आरंभिकी क्रिया क०करता है प०परिग्रहिकी मा०माया प्रत्ययिकी अप्रत्याख्यान मि० (मिथ्या दर्शन प्रत्यायकी गो० गौतम भा० आरंभिको कि० क्रिया प० परिग्रहिकी मा० माया प्रत्यायकी पंकरंति ? गोयमा ! नो पाणे अइवाएत्ता, नो मुसं वइचा. तहारूवं समर्णवा, माह- गंवा, बंदिचा जाव पज्जुवासेत्ता, अण्णयरेणं मणुण्णणं पीइकारएणं असणं पाणं खाइमं साइमं पडिलाभित्ता. एवं खलु जीवा जाव पकरति ॥ ४ ॥ गाहावइस्सणं भंते ! भंडं विक्किणमाणस्स केइ भंडं अवहरेजा तस्सणं भंते ! भंडं अणुगवेसमाणस्स किं आरंभिया किरिग कजइ, परिग्गहिया, मायावत्तिया, अप्पचक्खाणीया मिच्छा- दीर्घायुष्य घांधते हैं ? अहो गौतम! प्राणातिपात नहीं करने से, मृपा नहीं बोलने से, तथारूप श्रमण पाहण को पंदना नमस्कार करनेस व अन्य मनोज्ञ प्रोति उत्पन्न करनेवाले अशनादि देनेस जीव शुभ दीर्या- भावार्य गुप्प बांधते है ॥ ४ ॥ शुभाशुभ कर्मों की उपार्जना क्रिया से होती है इसलिये क्रिया का अधिकार कहने हैं. अगो भगवन् ! किरियाने का व्यापार करनेवाला गाथापति के किरियाने की कोई चौरी करे. भार चौरी में गया हुवा किरियाने की वह गायापति गोषणा करे. अब उस समय में उन-गोषणा करने * भकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादनी * 30 ..
६७२ सूत्र R888 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 3390 शब्दार्थ करते हैं सि क्यांचन नो० नहीं क० करते. हैं क० मोललेने वाले को ता० वे स० सब प० पतली होती हैं। ॥६॥ गा० गाथापति भ० भगवन् भं० किरियाना वि० खरीदने वाले को जा. यावत् भ० किरियाना से उस की पास उ० लाये क० खरीदने वाले को शेप पूर्ववत् मि० मिथ्या दर्शन कि० क्रिया की भ० सिय कज्जइ, सिय नो कजइ कइयस्सणं ताओ सव्वाओ पयणुईभवति ॥ ६ ॥ गाहावइस्सणं भंते ! भंडं विक्किणमाणस्स जाव भंडे से उवणीए सिया, कइयरसणं भंते ! ताओ भंडाओ किं आरंभिया किरिया कज्जइ, गाहावइस्सवा ताओ भंडाओ किं आरंभिया किरिया ? गोयमा ! कइयस्स ताओ भंडाओ हेछिल्लाओ चंचारि किरियाओ कजंति, मिच्छादसणकिरिया भयणाए ॥ गाहावइस्सणं ताओ सव्वाओ भावार्थ हक को उक्त सब क्रियाओं पतली होती हैं ॥६॥ किरियाना बेचनेवाला गाथापति की पास से ग्राहक ने किराना खरीदा और ग्रहण भी कर लीया तब अहो भगवन् ! उस ग्राहक को क्या आरंभिकी आदि क्रियाओं लगती हैं ! और गाशपति को भी क्या आरंभिकी आदि क्रियाओं लगती हैं ? अहो गौतम! उस किराने से ग्राहक को आरंभिकी, परिग्रहिकी, मायामत्ययिकी व अप्रत्याख्यान क्रियाओं लगती हैं. मिथ्या . दर्शन क्रिया क्यनित् लगती है व क्वचित् नहीं लगती है. और गाथापनि को उक्त सब क्रियाओं. पतली 892 पांचवा शतकका छठा उद्देशा ! Gya Dye शब्दार्थ ६७८ सून 4 अनुवादक बालब्रह्मगरी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी याना सा ग्रहण करे भ० किरियाना भी से उस को अ० नहीं आया हुआ सि० होवे गा० गाथापति का भं० भगवन् ता. उस में० किरियाने से कि क्या आ० आरंभिकी कि० क्रिया क० करता जा. यावत् मि० मिथ्या दर्शन कि क्रिया क० करता है क. मोललेने वाले को ता. उम में किरियाने से आ० आरंभिकी कि० क्रिया जा. यावत् मि० मिथ्या दर्शन कि० क्रिया गो० गौतम गा० गाथापति को ता. उस भ० किरियाने से आ० आरंभिकी कि० क्रिया क० करता है जा० यावत् अ० अप्रत्याख्यान कि० क्रिया के० करते हैं मि० मिथ्या दर्शनं सि० क्वचित् क. अणुवणीए सिया गाहावइस्सणं भंते! ताओ भंडाओ किं आरंभिया किरिया कजइ जाव मिच्छादसणकिरिया कजइ ? कइयस्सवा ताओ भंडाओ किं आरंभिया किरिया कजइ, जाव मिच्छादसण किरिया कजइ ? गोयमा ! गाहावइस्स ताओ भंडाओ आरंभिया किरिया कजइ जाव अप्पच्चक्खाण किरिया कजइ, मिच्छादसण किरिया किरियाना दीया नहीं है, तो अहो भगवन् ! उस गाथापति को उस किरियाने से क्या आरंभिकी यावत् गिथ्यादर्शन क्रिया लगे! और ग्राहक को क्या उस किरियाने से आरंभिकी यावत् पिध्यादर्शन क्रिया लगे ? अहो गौतम ! गाथापति को उस किराने से आरंभिकी यावत् अप्रत्याख्यान प्रत्यायकी क्रिया लगती है और मिथ्यादर्शन क्रिया काचित् लगती है व क्वचित् नहीं लगती है. खरीदनेवाला ग्रा- * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी चालाप्रसादजी , बाब ६७२ H989 पंचमान विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 888 898 पांचवा शतकका छहा उद्देशा - करते हैं सि क्वचित् नो० नहीं क० करते हैं क० मोललेने वाले को ता० वे स० संव प० पतली होती हैं। ॥६॥ गा० गाथापति भ० भगवन् भं० किरियाना वि० खरीदने वाले को जा. यावत् भं० किरियाना से० उस की पास उ० लाये का खरीदने वाले को शेप पूर्ववत् मि० मिथ्या दर्शन कि० क्रिया की भ०३० सिय कज्जइ, सिय नो कजइ कइयस्सणं ताओ सव्वाओ पयणुईभवति ॥ ६ ॥ गाहावइस्सणं भंते ! भंडं विक्किणमाणस्स जाव भंडे से उवणीए सिया, कइयस्सणं भंते ! ताओ भंडाओ किं आरंभिया किरिया कज्जइ, गाहावइस्सवा ताओ भंडाओ किं आरंभिया किरिया ? गोयमा ! कइयस्स ताओ भंडाओ हेछिल्लाओ चंचारि किरियाओ कजति, मिच्छादसणकिरिया भयणाए ॥ गाहावइस्सणं ताओ सबाओ हक को उक्त सव क्रियाओं पतली होती हैं॥६॥ किरियाना वेचनेवाला गाथापति की पास से ग्राहक ने किराना खरीदा और ग्रहण भी कर लीया तत्र अहो भगवन् ! उस ग्राहक को क्या आरंभिकी आदि क्रियाओं लगती हैं ! और गायापति को भी क्या आरंभिकी आदि क्रियाओं लगती हैं ? अहो गौतम! उस किराने से ग्राहक को आरंभिकी, परिग्रहिकी, मायाप्रत्ययिकी व अप्रत्याख्यान क्रियाओं लगती हैं. मिथ्या दर्शन क्रिया क्वचित् लगती है व क्वचित् नहीं लगती है. और गाथापनि को उक्त सब क्रियाओं. पतली भावार्थ byC शब्दार्थ ६८० सूत्र 2 अनुवादक-लिग्राचारी मुनि श्री अमोलक पीजी 8 भजना ॥ ७ ॥ गा० गाथापत्ति को भं• भगवन् भ• किरियाणा जा. यावत् १० धन अंक नहीं दीया सिहोवे ए० इस को ज० जैसे में० किरियाना उ० दीया हुवा तः तैसे णे० जानना च० चतुर्य आ० आलापक ५० धन से उसकी पास उ० लाया हुवा सिं० होवे जं. जैसे प० प्रथम आ० आलापक भं. किरियाना में नहीं लाया हुवा सि. हो त तैमे ने० जानना प० प्रथम च० चतुर्थ का ए. एक ग. गमा वि. द्वितीय त० तृतीय का ए. एक ॥ ८!! अ० अग्मिको भं० भगवन् अ० तत्काल उ० पयणुईभवति ॥ ७ ॥ गाहावइस्सणं भंते ! भंडं जाव धणेय से अणुवणीए सिया, एयपि जहा भंडे उवणीए तहाणेयव्वं चउत्थो आलावगो, धणेयसे उर्वणीए सिया जहा पढमो आलावगो भंडेयसे अणुवणीए सिया तहा नेयम्बो पढमं चउत्थाणं एको. गमो, वितीय तईयाणं एक्को ॥ ८ ॥ अगणिकाएणं भंते ! अहुणोजलिए समाणे होती हैं ॥ ७॥ गाथापतिने किरियाना बेचदिया परंतु ग्राहकने जहांलग उस के पैसे (धन) नहीं दिया है, वहांन्लग उस गाथापति को धन व किरियाना ऐसे दोनों की क्रिया कम लगती हैं और ग्राहक को विशेष क्रिया लगती है. जब किरानेका धन उस गाथापति को ग्राहक दे देता है तब उस को धन की क्रिया विशेष लगती है और ग्राहक को धन की क्रिया पतली होती है. यों इस क्रिया अधिकार में प्रथम व चतुर्थ आलापक का सरिखा अर्थ होता है वैसे ही दूसरा व तीसरा आलापक का एक सरिखा अर्थ होता है ॥ ८ ॥ अव अग्नि को प्रचालेने के संबंध में प्रश्न पूछते हैं. अहो. भगवन् ! कोई पुरुष -भकाशक रानावहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी * शब्दार्थ) OY ६८२ 85 पंचमात विवाह पण्णात्ति (भगवती ) सूत्र उज्यालते म० महाकर्मवाले म० महाक्रिया वाले म. महा आश्रय वाले म० महावेदना वाले भ० होवे अ० नीचे स० समय २ में वो विखरते हुवे वो नष्ट करते च छल्ले स० समय में ई० अग्निभूत मु० मुर्मुरा समान छा० भस्मीभूत त. उस पीछे अ० अल्पकर्म वाले कि० क्रिया आ० आश्रय अ. अल्प ० वेदना वाले भ० होता है है. हां गो० गौतम अ० अनिकाय अ० तत्काल का उ० उज्वल होती तं. महाकम्मतराए चेव, महाकिरियतराए चेव, महरसवतराए चेव, महावेयणतराएचेव भवइ । अहेणं समए २ वोक्कसिजमाणे वोच्छिन्नमाणे चरिमकालसमयसि इंगालभूए मुम्मुरभूए, छारियभूए, तओपच्छा अप्पकम्मतराएचेव किरिया आसव अप्पवेयणतरा- ए चेव भवइ ? हंता गोयमा ! अगणिकाएणं अहुणोजलिए समाणे तं चेव ॥ ९॥ पांचवा शतकका छहा उद्देशा 888 भावार्थ आनि को तत्काल प्रज्वलित करे तो क्या वह बहुत कर्मवाला, महा क्रियावाला, महा आश्रववाला व महा वेदनावाला होवे ? और फीर नीचे समय २ में अग्नि को विखेरदेते व बुझा देते अंगारे समान, मुर्मुरे | समान, व भस्म समान जब वह आग्नि होती है तब क्यावह अल्प कर्म, अल्प क्रिया, अल्प आश्रय व वेदनावाला होवे ? हां गौतम ! तुर्न अभि प्रधालत करनेवाला महाकर्मी यावत् महावेदनावाला होवे और आणि विखेरकर अंगारे यावत् भस्म समान करनेवाला अल्प कर्मवाला यावत् अल्प वेदनावाला होवे॥२॥ अय शब्दार्थी ६८२ सूत्र are अनुवादक-चालनमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी85 हो ॥ ९॥ पु० पुरुष भ० भगवन् ५० मुष्य ५० ग्रहण करता है उ० वाण ५० ग्रहण करता है उ० स्थान ठा० बैठे आ० खींचा हुवा क० कर्ण पर्यंत उ० वाण क० कर उ० अर्ब ० आ- काश में उ० छोडे त०. तब से वह उ० वाण ७. ऊर्थ दे० आकाश में उ० छोडा दुवा जा० जो त० तहां पा. माण भू० भन जी० जीव स० सत्व अ० हणावे व० वर्तुलाकार करे ले० पीले सं० परस्पर गात्रोंको एकत्रित करे सं० थोडा स्पर्श करे ५० दुःखदेवे कि० किलामना उत्पन्न करे ठा० स्थान से सं० जावे जी० जीवित से व• पृथक् करे त तव में० भगवन् से० उस पु० पुरुष को क कितनी पुरिसेणं भंते ! धणुं परामुसइ २ उसुं परामुसइ २ ठाणं ठाइ २ आययकण्णाययं उसुं करेइ २ उ8 वेहासं उसु उबिहइ, तएणं से उसू उ8 वेहासं उविहिए समाणे जाई तत्थ पाणाइं भूयाई जीवाई सत्ताई अभिहणइ वत्तेइ लेस्सेइ संघाएइ संघटेइ परितावेइ किलामेइ ठाणाओ ठाणं सकामेइ जीवियाओ ववरोवेइ तएणं भंते ! सेपुरिसे कइ किरिए ? गोयमा ! जावं च णं से पुरिसे धणुं परामुसइ २ जाव उम्विहइ तादं चणं धनुष्य आश्री क्रिया का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! कोई पुरुष. धनुष्य पर वाण रखकर आमन सहित कर्ण पर्यंत प्रत्यंचा खींचकर ऊंचे आकाश में वाण छोडे, फीर आकाश में वाण छोडते हुए प्राण भूत, जीव व सतोंको हणे, वर्तुलाकार बनावे, स्पर्श करे, संघटना करे, परिताप उत्पन्न करे, दुःख * भकाशक-राजायहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालापमाहजी * बाथ " शब्दार्थ १८३ सत्र < पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भनवती) मूत्र ॐ987 कि० क्रिया गो० गौतम जा० जितने में से वह पु० पुरुप ध धनुष्य प० ग्रहण करता है जा० यावन् उ०वाण उ॰छोड़ता है ता उतने में से उत पु० पुरुष को का कायिकी जा यावत् पा. प्राणालिपाति की कि क्रिया पं०पांच कि क्रिया से पु० स्पर्शाया जे० जिन जी०जीवों के स० शरीर से घ० धनुष्य निक चनाया ते वेभी जी० जीव का० कायिकी जा. यावत् पं० पांच कि० क्रिया से पु० स्पर्शाये एक ऐसे घ धनुष्यपीठिका पं० पांच क्रियाओं से जी० जीव्हा पं० पांच ण्हा० तांत पं० पांच से उ. वाण पं० से पुरिसे काइयाए जाव पाणाइवायकिरियाए पंचहि किरियाहिं. पुढे ॥ जेसिं पियणं जीवाणं सरीरेहिं धणू निव्वत्तिए तेवियणं जीवा काइयाए जाव पंचहि किरिया- हिं. पुढे, एवं धणुपिढे पंचहि किरियाहिं, जीवा पंचहि, हारु पंचहिं, उसू पंचाहिं सरे पत्ताणे फले हारु पंचहि, अहेणं से उस अप्पणो गुरुयत्ताए, भारियत्ताए गुरुयसं. उत्पन्न करे, एक स्थान से अन्य स्थान चलावे व जीवित से पृथक् करे. उस समयमें उस वाण छोडनेवाले पुरुष को अहो भगवन् ! कितनी क्रियाओं कही ? अहो गौतम ! जहांलग उस पुरुपने धनुष्य उठाया यावत् वाग छोडा वहांलग उन को पांच क्रियाओं हावे. कायिकी, अधिकरणकी, प्रवेषिकी, परितापनिकी, कमाणातिपातिकी. और जिन जीवों के शरीर से धनुष्य बना हुवा है; उन जीवों को भी कायिकांदि पांच क्रियाओं लगनी है. ऐसे ही जिन ज़ीयों से धनुष्यपीठिका, जिव्हा, तांता, वाण, पांखोंः व आगे - पांचवा शतक का छठा उद्देशा. 888 भावाथ शब्दा ३८२ सूत्र 42 अनुवादक-बालमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी 835 हो ॥ ९ ॥ पु० : पुरुप भ०. भगवन् ५० अमुष्य ५० ग्रहण करता है उ० वाण ५० ग्रहण करता है ठ० स्थान ठग बैठे आ० खींचा हुमा क० कर्ण पर्यंत उ० वाण का कर उ० अर्ब ३० आ- काश में उ० छोडे त तब से वह उ० वाण 3. ऊर्थ वे० आकाश में उ० छोडा हुवा जा० जो स० तहां पा० प्राण भू० भन जी० जीव स० सत्व.अ० हणावे व० वर्तुलाकार करे ले० मीले सं० परस्पर गात्रोंको एकत्रित करे सं० थोडा स्पर्श करे प० दुःखदेवे कि० किलामना उत्पन्न करे ठा० स्थान से सं० जावे जी० जीवित से व॰ पृथक् करे त तब भ० भगवन् से उस पु० पुरुष को ककितनी पुरिसेणं भंते ! धणु परामुसइ २ उसु परामुसइ २ ठाणं ठाइ २ आययकण्णाययं उसु करेइ २ उ8 वेहासं उसु उबिहइ, तएणं से उसू उर्दु वेहासं उविहिए समाणे जाई तत्थ पाणाई भूयाई जीवाई सत्ताई अभिहणइ वत्तेइ लेस्सेइ संघाण्डू संघद्देइ परितावेई किलामेइ ठाणाओ ठाणं सकामइ जीवियाओ ववरोवेइ तएणं भंते ! सेपुरिसे- कइ किरिए ? गोयमा! जावं च णं से पुरिसे धणुं परामुसइ २ जाव उव्विहइ तावं चणं धनुप्य आश्री क्रिया का प्रश्न करते हैं. अहो भगवन् ! कोई पुरुष, धनुष्य पर वाण रखकर आमन महित कर्ण पर्यंत प्रत्यंचा खींचकर ऊंचे आकाश में वाण छोडे, फीर आकाश में वाण छोड़ते हुए प्राण भून, जीव व सत्वोंको द्दणे, वर्तुलाकार बनावे, स्पर्श करे, संघटना करे, परिताप उत्पन्न करे, दुःख * प्रकाशक-राजायहादुर लान्य मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * गर्य इरह को पांच क्रियाओं लगती हैं . बाण को आते हुए मार्ग में जो नीबों " वा , ६८५ सूत्र 33-23 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र ॐ2812 क्रिया से पु० स्पर्शाये ध० धनुष्य पीठिको २० चार जी० जीव्हा च० चार हातांत च• चार उ० वाण पं० पांच स० शर ५० पत्र फ० फल हातांत जे० जो जी०जीव अभ्नीचे पआते हुवे उ०मार्ग में चि० रहते हैं ते० वे भी जी० जीव का कायिकी जा० यावत् पं० पांच कि क्रिया से पु० स्पर्शाये हुवे ॥१०॥ अ० अन्यतीर्थिक ५० भगवन् ए. ऐसा आ० कहते हैं जा. यावत् प० मरूपते हैं से० अथ ज०जैसे जु. युवति को जु० युवान ह० हस्त को गे० ग्रहण करते हैं च० चक्र की ना० नाभी अ० आरा से उ० जीवा चउहि, हारूचउहिं उसू पंचहि, सरे पत्ताणे फले हारु पंचहिं जेवियसे जीवा अहे पच्चोवयमाणस्स उवग्गहे चिटुंति तेवियणं जीवा काइयाए जाव पंचहिं किरियाहिं पुढा, ॥ १० ॥ अण्णउत्थियाणं भंते ! एवमाइक्खंति जाव परूति से जहा नामए जुवई जुवाणे हत्थेणं हत्थं गेण्हेजा चक्करसवा नाभी अरगाउत्तासिया एवामेव जीव्हा, व तांता बना हुवा है उन जीवों को चार क्रियाओं लगती हैं. और वाण, पाखो, भाला वगै- भी कायिकादि पांच क्रियाओं लगती हैं ॥ १० ॥ यह सम्यक प्ररूपना कही अब मिथ्यापरूपक बताते अहो भगवन् ! अन्यतीर्थक ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं कि जैसे युवान पुरुप युवति को हस्तसे हस्त में पकडता है, अथवा गाडी के एक की नाभि में आरा रुघन होता है लसती चार सो पांच पांचवा शतक का छटा उद्देशा 982- भावार्थ 60 yo शब्दार्थ ६८४ सूत्र प.अनुवादकबालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी : पांच में स० शर प० पत्र फल फल हा तांत अ० सवं से० वह उ० वाण अ. अपनी गु० गुरुतासे भा० वजनपने गु० गुरुतासे बजनपने अ० नीचे वी० स्वभाव से प० पीछा आता ज़ा० जो त० वहां पा० पाणी जा. यावत् जी जीव से व० पृथक् करे ता० उतने में, से उस पु० पुरुप को क० कितनी कि० फ्रिया गो गौतम जा० जितने में से वह उ. बाण अ० अपनी गु. गुरुतासे जा. यावत् २० पृथक करता है ता. उतने में से० उत्त पु० पुरुष को का० कायिकी जा. यावत् च० चार कि० क्रिया से पु. स्पीया जे० जिन जी० जीवों के स०. शरीरं धु० धनुष्य नि० बना ते वे जी जीव चा० चार कि० भारियत्ताए अहे वीससाए पच्चोक्यमाणे जाई तत्थपागाइं जाव जीवियाओ ववरोवेइ, तावं च णं से पुरिसे कइ किरिए ? गोयमा ! जावंचणं से उसू अप्पणो गुरुयत्ताए जाव बबरोवेइ तावंचणं से पुरिसे काइयाए जाव चउहि किरियाहिं पुढे, जसि . पिणं जीवाणं सरीरेहिं धणू निव्वत्तिए ते जीवा, चउहिँ किरियाहि, धणुपिटे चउहिं, लगा हुवा लोहे का भाला बना हुवा है उन सब को पांच क्रियाओं लगती हैं. अब अपने गुरुत्वपना से, वजनपना स, गुरुत्व व वजन पनासे स्वाभाविक वह वाण नीचे आता है. इस तरह नीचे आते · हुए माण, भूतादि यदि हणावे तो उस वाण. छोडेनेवाले पुरुष को अहो., भगवन् ! कितनी. क्रिया लगे? भदो गौतम ! उस पुरुप को चार क्रिया लगे. और जिन जीवों के शरीर से वह धनुष्य, धनुष्य पाठिका * मकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी मालामसादगी * वाथ ६८५ सूत्र 333 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 8982- क्रिया से पु० स्पर्शाये ५० धनुष्य पीठिको च० चार जी० जीव्हा च चार हातांत च. चार उ० वाण पं० पांच स० शर ५० पत्र फ० फल हातांत जे० जो जी०जीव अनीचे प० आते हुवे उ०मार्ग में चि० रहते हैं ते० वे भी जी० जीव का कायिकी जा० यावत् पं० पांच कि क्रिया से पु० स्पर्शाये हुवे ।।१०॥ अ० अन्यतीथिक भ० भगवन् ए० ऐसा आ० कहते हैं जा. यावत् ५० प्ररूपते हैं से० अथ.जजैसे जु. युवति को जु० युवान ह० हस्त को गे० ग्रहण करते हैं च० चक्र की ना. नाभी अ० आरा से उ० जीवा चउहिं, हारूचउहिं उसू पंचहिं, सरे पत्ताणे फले हारु पंचहिं जेषियसे जीवा अहे पञ्चोवयमाणस्स उवग्गहे चिटुंति तेवियणं जीवा काइयाए जाव पंचहिं किरियाहिं पुढा, ॥ १० ॥ अण्णउत्थियाणं भंते ! एवमाइक्खंति जाव परूवेति से जहा नामए जुवई जुधाणे हत्थेणं हत्थं गेण्हेजा चक्करसवा नाभी अरगाउत्तासिया एवामेव जीव्हा, व तांता बना हुवा है उन जीवों को चार क्रियाओं लगती हैं. और वाण, पांखो, भाला वगै- रह को पांच क्रियाओं लगती हैं. बाण को आते हुए मार्ग में जो नीबों रहे हुवे हैं उन को भी कायिकादि पांच क्रियाओं लगती हैं ॥१०॥ यह सम्यक् प्ररूपना कही अय मिथ्यामरूपक बताते हैं. अहो भगवन् ! अन्यतार्थिक ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं कि जैसे युवान पुरुप युवति को हस्तसे हस्त में पकडता है, अथवा गाडी के चक्र की नाभि में आरा रुघन होता है सेती चार सो पांच सो PROपांचवा शतक का छटा उद्देशा 9887 भावार्थ ।
शब्दाथा ६८४ सुन 1. अनुवादक-बालबमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी पांच से स० शर ५० पत्र फ० फल हा तांत अ० सब से वह उ० वाण अ. अपनी गु० गुरुतामे भा० बजनपने गु० गुरुतासे वजनपने अ० नीचे वी० स्वभाव से प० पीछा-आता. ज़ा०.जो तक वहां पा० माणी जा. यावत् जी० जीव से ५० पृथक करे ता. उतने में से० उस पु० पुरुष को क० कितनी कि० क्रिया गो० गौतम जा. जितने में से वह उ. बाण अ० अपनी गुरु गुरुतासे जा. यावत् २० पृषक करता है ता० उतने में से उस पु० पुरुष को का० कायिकी जा. यावत् च० चार कि० क्रिया से पु. स्पीया जे० जिन जी जीवों के स. शरीरं धु० धनुष्य नि० बना ते वे जी० जीव चा० चार कि० भारियंत्ताए अहे वीससाए पच्चोवयमाणे जाई तत्थपाणाइं जाव जीवियाओ ववरोवेइ, तावं च णं से पुरिसे कइ किरिए ? गोयमा ! जावंचणं से. उसू अप्पणो गुरुयत्ताए जाव ववरोवेइ तावंचणं से पुरिसे. काइयाए जाव चउहि. किरियाहिं पुढे, पुढे, जेसि . पिणं जीवाणं सरीरेहिं धणू निव्वत्तिए ते जीवा, चउहि किरियाहिं, धणुपिटे चउहि, लगा हुवा लोहे का भाला बना हुवा है उन सब को पांच क्रियाओं लगती हैं. अब अपने गुरुत्वपना से, वजनपना सं, गुरुत्व व वजन पनासे स्वाभाविक वह वाण नीचे आता है. इस तरह नीचे आते हुए माण, भूतादि यदि हणावे तो उस वाण छोडेनवाले पुरुष को अहो , भगवन् ! कितनी. क्रिया लगे? अहो गौतम ! उस पुरुप को चार क्रिया लगे.. और जिन जीवों के शरीर से वह धनुप्य, धनुष्य पाटिका * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी जालामसादगी * था 000 सूत्र चमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती ) मूत्र आकाणे न० नरक ने० नारकी भ० भगवन् कि क्या ए. एक प० समर्थ विश्वक्रेय करने को पु०अनेक ज० जैसे जी० जीवाभिगम में आ० आलापक त० तैसे णे० जानना. जा. यावत् दु० खरापरीति से सहन करे ॥ ११ ॥ आ० आधाकर्म अ० अनवद्य म० मन प० स्थापने वाला भ० होवे से उसको न उस ठा० स्थान की आ० आलोचना ५० प्रतिक्रमण करते का० काल क० करे अ० है त० उसको आ.as आराधना ए० इस ग० गम से ने० जानना की० मोललिया हुवा क० वनाया हुवा ठ० स्थपाया हुवा र० बहुसमाइण्णे नेरयलोए नेरइएहिं । नेरइयाणं भंते ! किं एगत्तं पभू विउवित्तए, पुहत्तं पभू विउव्वित्तए, जहा जीवाभिगमे आलावगो तहा नेयब्बो, जाव दुरहियासे ॥ ११ ॥ आहाकम्मं अणवजेत्ति मणंपहारेत्ता भवइ सेणं तस्स ठाणस्स अणालोइय _ अपडिकंते कालं करेइ, नत्थि तस्स आराहणा; सेणं तस्स ठाणस्स आलोइय पडि- वैक्रेय नहीं करते हैं. ऐसे ही बहुत शरीर वैक्रेय करते हैं, महा उज्वल प्रज्वल वेदना वेदते हुए विचरते हैं. दस का विस्तार पूर्वक विवेचन जीवाभिगम सूत्र से जानना ॥ ११॥ कोई साधु भिक्षा की गवेषणा में इस्यवाला व रसगृद्धि वनकर आधाकर्मादि दोप युक्त आहार को मिरवद्य मान कर भोगवे और की आलोचना पतिक्रमण किये विना यदि वह काल कर जावे तो वह आराधक नहीं होता है और मालोचनादि करके काल करे तो आराधक होता है. ऐसे ही मोल लिया हुवा बनाया हुवा, स्थापकर 989 पांचवा शतक का छठा उद्देशा भावार्थ .. .
, 3 अनुवादक-बालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी : शब्दार्थ भरी हुई ए० ऐसे ही च० चार पं० पांच जो० योजन स० सो व० बहुत स०आकीर्ण म० मनुष्य लोक म० मनुप्य से क• कैसे एक यह ० भगवन् गो० गौतम ज० जो ते० चे अ० अन्यतीर्थिक जा. यावत् म० मनुष्य से जे. जो ते० वे एक ऐसा आ. कहते हैं मि० मिथ्या अं० मैं पु० पुनः गो० गौतम ए. ऐसा आ० कहता हूं जा० यावत् ए. ऐसे ही च० चार पं० पांच जो० योजन स० सो व. बहुत स० चत्तारि पंच जोयण सयाई, बहु समाइण्णे मणुयलोए मणुस्सेहिं, ॥ से कह मेयं भंते ! एवं ? गोयमा ! जण्णं ते अण्णउत्थिया जाव मणुस्सेहिं जे ते एव माहंसु मि- च्छा । अहंपुण गोयमा ! एव माइक्खामि जाव एवामेव चत्तारिपंच जोयण सयाई योजनका मनुष्यलोक मनुप्यों से भरदेते हैं तो यह किसतरह है? अहो गौतम! जो अन्यतीर्थिक ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं वे मिथ्या वैसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं. मैं ऐसा कहता हूं यावत् मरूपता हूं कि जैसे काम पीडित युवान युवती को पकडता है. अथवा चक्र की नाभी में जैसे आरा सघन होता है वैसे ही नरक में किसी स्थान चार सो किसी स्थान पांच सो योजन तक नारकी भरे हुवे रहते हैं. अहो भगवन् नारकी वैक्रेय करते हुवे क्या एक रूप वैक्रेय करते हैं या अनेक रूप वैक्रेय करते हैं ? अहो गौतम ! एक रूप भी वैक्रेय करते हैं अनेक रूप भी वैकेय करते हैं. एक रूप अनेक रूप वैक्रेय करते हुए मारने का शख जो पुद्गल है उस रूप का भी वैक्रेय करते हैं. संख्यात रूप वैकेय करते हैं परंतु असंख्यात रूप * मकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी ब्दाथा सत्र *28 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 8805 आकर्णि ने० नरक ने नारकी भ० भगवन् कि०क्या ए. एक ५० समर्थ विचक्रेय करने को पु०अनेक ज० जैसे जी० जीवाभिगम में आ० आलापक त० तैसे गे० जानना. जा. यावत् दु० खराफरीति से सहन करे ॥ ११ ॥ आ० आधाकर्म अ० अनवद्य म० मन प० स्थापने वाला भ. होवे से उसको न उस ठा० स्थान की आ० आलोचना ५० प्रतिक्रमण करते का० काल क० करे अ० है त० उसको आ. आराधना ए० इस ग० गम से ने० जानना की० मोललिया हुवा क० बनाया हुवा ठ० स्थपाया हुवा र. बहुसमाइण्णे नेरयलोए नेरइएहिं ॥ नेरइयाणं भंते ! किं एगत्तं पभू विउन्वित्तए, पुहत्तं पभू विउवित्तए, जहा जीवाभिगमे आलावगो तहा नेयम्बो, जाव दुरहियासे ॥ ११ ॥ आहाकम्म अणवजेत्ति मणंपहारेत्ता भवइ सेणं तस्स ठाणस्स अणालोइय अपडिकते कालं करेइ, नत्थि तस्स आराहणा; सेणं तस्स ठाणस्स आलोइय पडि- वैक्रेय नहीं करते हैं. ऐसे ही बहुत शरीर वैक्रेय करते हैं, महा उज्वल प्रज्वल वेदना पेदते हुए विचरते हैं. इस का विस्तार पूर्वक विवेचन जीवाभिगम सूत्र से जानना ॥ ११॥ कोई साधु भिक्षा की गवेषणा में आलस्यवाला व रसगृद्धि वनकर आधाकर्मादि दोप युक्त आहार को मिरपद्य मान कर भोगवे और उस की आलोचना प्रतिक्रमण किये विना यदि वह काल कर जावे तो वह आराधक नहीं होता है और आलोचनादि करके काल करे तो आराधक होता है. ऐसे ही मोल लिया हुवा; वाया हुवा, स्थापकर 980% पांचवा शतक का छठा उद्देशा वार्थ ज ।
शब्दार्थ ६८८ सूत्र १४ अनुदक-पालग्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी ६ रचित के० अरण्य भ० भक्त दु० दुर्भिक्ष भ० भक्त व बद्दल का भ० भक्त गि: रोगीका भ० भक्त सेय्यान्तरपिंड राराज्यापट अ०आधार्म आ० अनवद्य व०बहुत ज०मनुष्य की म०पीच में भा कहकर स. स्वयमेव प० भोगवकर भ० होने से उसको त उसके ठा० स्थान की अ० है त०. उस को आ० आराधना ए. यह त० तैसे आ० यावत् रा० राजपिंड आ० आधाकर्म अ०..अनवद्य अ० . परस्पर, को पते कालं करेइ अत्थितस्स आराहणा ॥ एएणं गमेणं नेयव्वं कीयकडं ठवियं, रइयं, कंतारभनं, दुन्भिक्खभत्तं, वदलियाभत्तं, गिलाण भत्तं, सेज्जायरपिंडं, रायपिंडं, आहाकम्मं अणवजेत्ति बहुजणमझे भासित्ता, सयमेव परिभुंजित्ता भवइ, सेणं तस्स - ठाणस जाव अस्थि तस्स आराहणा ॥ एयपि तहचेव जाव रायपिंडं ॥ आहाकम्म रखा हुवा, तैयार किया हुवा, अरण्य में जाते हुवे लोगों के लिये बनाया हुवा, दुष्काल में दीन पुरुषों के लिये बनाया हुवा, बद्दल के लिये बनाया हुवा, रोगियों के लिये बनाया हुवा, शैय्यांतरपिंड व राज पिंड ऐसे दोप युक्त आहार को बहुत मनुष्य की वीच में यह अनवद्य है ऐसा कहकर स्वयं ही ऐसा भाहार भोगवे. फोर उस की आलोचना प्रतिक्रमण किये.विना यदि काल करे तो वह विराधक होता है। और आलोचनादि करके काल करे तो आराधक होता है. आधाकर्मादि दोष युक्त आहार को यह आहार निरखद्य है ऐसा कहकर परस्पर साधुओं को देवे, वैसे ही आधाकर्मादि दोष युक्त आहार को * प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी ब्दार्थ ७ ola सूत्र 3 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 83-83 अ० देकर भ. होवे त० उस को ए. यह त० तैसे जा. यावत् रा० राजपिंड आ० आधाकर्म अ० अनवध व० बहुत ज. मनुष्य की म० वीच में ५० कहने वाला भ० होने से उस को fa तक उस की अ० है आ० आराधना जा. यावत् रा० राजपिंड ॥ १२ ॥ आ० आचार्य उ. उपाध्याय • भगवन् स. अपने ग० गण को अ० अग्लानपने सं० ग्रहण करते अ० अग्लानपने उ० उपग्रहण करते क० कितने भ० भव में सि० सीझे जा० यावत् अं० अंतकरे गो० गौतम अ० कित- अणवज्जेत्ति अण्णमण्णस्स अणुपदावेइत्ता भवइ, सेणं तस्स एवं तहचेव जाव रायपिंडं, आहाकम्मं णं अणवज्जेत्ति, बहुजणमझे पभावइत्ता भवइ, सेणं तस्स जाव अस्थि आराहणा जाव रायपिंडं ॥ १२ ॥ आयरिय उवज्झाएणं भंते ! सवि सयंसि गणं अगिलाए संगिण्हमाणे, अगिलाए उवगिण्हमाणे, कइहिं भवग्गहणेहिं सिज्झइ जाव अंतं करेइ ? गोयमा ! अत्थेगइए तेणेव भवग्गहणेणं सिज्झइ, अत्थेगइए दोच्चेणं सभा में निरवद्य आहार है ऐसा कहे. इस तरह विपरीत प्ररूपना से ज्ञानादिक की विराधना होती है. ऐसा करनेवाला यदि आलोचना प्रतिक्रमण करके काल करे तो आराधक होता है और आलोचना किये विना काल करे तो विराधक होता है, ॥ १२ ॥ अहो भगवन् ! आचार्य उपाध्याय अपने गणको अग्लानपने अंगीकार करते, आदरदेते कितने भव में सीझे, बुझे यावत् सब दुःखों का अंत करे ? 2. पांचवा शतकका छठा उद्देशा8388 .र्थि 60 । मनुवादक बालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिज़ी शब्दार्थी नेक ते • उसी भ० भवग्रहण में सि० सीझे अ० कितनेक दो० दूसरे भ० भव में सिं० सीझे त० तीसरी फीर भ० भवग्रहण ना० अतिक्रमे नहीं ॥ १३ ॥ जे० जो, भ० भगवन् प० अन्य को अ० असत्य अ० असद्भूत ० अभ्याख्यान से अ० आल चढाता है त० उस को क० कैसा क० कर्म क० करते हैं। गो गौतम जे० जो प० अन्य को अ० असत्य अ० असद्भूत अ०. अभ्याख्यान अ० आल चढाता त० उस को त तैसा क० कर्म क० करते हैं ज० जहां अ० आते हैं त० वहां प० अनुभवते हैं त. भवग्गहणेणं सिझइ, तचं पुण भवग्गहणं नाइक्कमइ ॥ १३ ॥ जेणं भंते ! परं अलिएणं असम्भूएणं अब्भक्खाणेणंअब्भक्खाइ तस्सणं कहप्पगारा कम्मा कति ? गोयमा ! जेणं परं अलिएणं असंतएणं अब्भक्खाणेणं अब्भक्खाइ, तस्सणं तहप्प- गाराचेव कम्मा कजंति । जत्थेवणं अभिसमागच्छइ तत्थेवणं पडिसंवेदेइ तओ अहो गौतम ! कितनेक उसी भव में सीझे, कितनेक दूसरे भव में सीझे, परंतु तीसरा भव नहीं उल्लंघते हैं। अर्थात् तीसरे भव में निश्चयही सीझते हैं ॥.१३ ॥ अहो भगवन् ! जो कोई अन्य महात्मा पुरुषको द्वेषबुद्धि से असद्भूत, असत्य कलंक चढावे तो उन को कैसे कर्मों का बंध होवे ? अहो गौतम ! जो पुरुप जैसा कलेक अन्य को बढ़ाता है उस को वैसे ही कर्मों का बंध होता है. और जहां वह कर्म किया होगा यहांदी उदय में अवेगा और वहां ही वेदेगा. अहो भगवन् ! अपके वचन सत्य हैं. यह पांचवा शतक का छठा विका रानाघहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * ६९२ सूत्र ... 8- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र उस प० पीछे वे वेदते हैं ॥५॥६॥ १० परमाणु पो० पुद्गल ए० चलता है वे विशेप चलता है जा० यावत् सं० उस २ भा० भाव में प० परिणमता है गो० गौतम सि० क्वचित् ए. चलता है ये विशेप चलता है तं० उस २ भा. भाव से पच्छा वेदेइ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ पंचमसयस्स छट्ठो उद्देसो सम्मत्तो ॥५॥६॥ + परमाणुपोग्गलेणं भंते ! एयइ वेयइ जाव तंतं भावं परिणमइ ? गोयमा ! सिय एयइ वेयइ जाव परिणमइ, सिय णो एयइ जाव णो परिणमइ, दुपदेसिएणं भंते ! खंधे एयइ जाव परिणमइ ? गोयमा ! सिय एयइ जाव परिणमइ सिय नो एयइ जाव नो परिणमइ, सिय देसेएयइ देसे गोएयइ ! तिपएसिएणं भंते ! खंधे एयइ ? उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥५॥६॥ छठे उद्देशे के अंत में निर्जरा का कथन किया है. वह निर्जरा कमों को चलाती है इसलिये पुद्गलों का प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! पूरण गलन स्वभाव वाले निरवयय रूप परमाणु पुद्गल क्या चलते हैं, विशेष चलते हैं यावत् उन २ भावों में परिणमते हैं ? अहो गौतम ! क्वचित् चलते हैं यावत् क्वचित् उन २ भावों में परिणमते हैं और क्वचित् नहीं चलते हैं यावत् उन २ भावों में नहीं परिणमते । अहो भगवन् ! क्या द्वि प्रदेशात्मक स्कंध चलता है यावत् उन २ भावों में परिणमता है ? अहो गौतम् । पांचवा शतक का सातवा उद्देशा वार्थ १ भनुवादक-पालनमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी र शब्दाय नेक ते • उसी भ० भवग्रहण में सि० सीझे अ० कितनेक दो० दुसरे भ० भव में सिं० सीझे त० तीसर पु० फीर भ० भवग्रहण ना० अतिक्रमे नहीं ॥ १३ ॥ जे. जो. भ० भगवन् प० अन्य को अ० असत्य अ० अप्सतं अ० अभ्याख्यान से अ० आल चढाता है त० उस को क० कैसा क० कर्म क० करते गो० गौतम ने जो प० अन्य को अ० असत्य अ० असद्भूत अ०. अभ्याख्यान से अ० आल चढाता है त. उस को त तैसा क० कर्म क० करते हैं ज० जहां अ० आते हैं त० वहां प० अनुभवते हैं त० भवग्गहणेणं सिझंइ, तच्चं पुण भवग्गहणं नाइकमइ ॥ १३ ॥ जेणं भंते ! परं अलिएणं असभूएणं अव्भक्खाणेणंअब्भक्खाइ तस्सणं कहप्पगारा कम्मा कजंति ? गोयमा ! जेणं परं अलिएणं असंतएणं अब्भक्खाणेणं अन्भक्खाइ, तस्सणं तहप्प- गाराचेव कम्मा कजति । जत्थेवणं अभिसमागच्छइ तत्थेवणं पडिसंवेदेइ तओ भदो गौतम ! कितनेक उसी भव में सीसे, कितनेक दूसरे भव में सीझे, परंतु तीसरा भव नहीं उल्लंघते हैं। अर्थात् तीसरे भव में निश्चयही सीझते हैं ।।.१३ ॥ अहो भगवन् ! जो कोई अन्य महात्मा पुरुषको द्वेषबुद्धि से भमभून, असत्य कलंक चढाये तो उन को कैसे कर्मों का बंध होवे ? अहो गौतम ! जो पुरुष जैसा कलेज अन्य को चढोना है उस को वैसे ही कर्मों का वैध होता है. और जहां वह कर्म किया होगा यहाही उदर में प्रवेगा और वहां ही वेदेगा. अहो भगवन् ! अपके वचन सत्य हैं. यह पांचवा शतक का छठा प्रकारका रानावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * शब्दार्थ सत्र ... 298 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र १ उस प० पीछे वे वेदते हैं ॥६॥६॥ प० परमाणु पो० पुद्गल ए० चलता है के विशेष चलता है जा० यावत् तं० उस २ भा० भाव में प० परिणमता है गो गौतम सि० क्वचित ए० चलता है वे विशेप चलता है तं० उस २ भा० भाव से पच्छा वेदेइ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ पंचमसयस्स छट्ठो उद्देसो सम्मत्तो ॥५॥६॥ + परमाणुपोग्गलेणं भंते ! एयइ वेयइ जाव तंतं भावं परिणमइ ? गोयमा ! सिय एयइ वेयइ जाव परिणमइ, सिय णो एयइ जाव णो परिणमइ, दुपदेसिएणं भंते ! खंधे एयइ जाव परिणमइ ? गोयमा ! सिय एयइ जाव परिणमइ सिय नो एयइ जाव नो परिणमइ, सिय देसेएयइ देसे गोएयइ ! तिपएसिएणं भंते ! खंधे एयइ ? उद्देशा संपूर्ण हुवा ॥ ५ ॥६॥ छठे उद्देशे के अंत में निर्जरा का कथन किया है. वह निर्जरा कर्मों को चलाती है इसलिये पुद्गलों का प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! पूरण गलन स्वभाव वाले निरवयव रूप परमाणु पुद्गल क्या चलते हैं, विशेष चलते हैं यावत् उन २ भावों में परिणमते हैं ? अहो गौतम ! क्वचित् चलते हैं यावत् क्वचित् उन २ भागों में परिणमते हैं और क्वचित् नहीं चलते हैं यावत् उन २ भावों में नहीं परिणमते हैं. अहो भगवन् ! क्या द्वि प्रदेशात्मक स्कंध चलता है यावत् उन २ भावों में परिणमता है ? अहो गौतम ! हि * पांचवा शतक का सातवा उद्देशाSPITA गवाथे।
शब्दाथ ६९० भनुवादक-पालबमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी. काराचा राजाघहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * नेक ते उसी भ० भवग्रहण में सि० सीझे अ० कितनेक दो० दूसरे भ० भव में सिं० सीझे त० तीसर फीर भ० भवग्रहण ना० अतिक्रमे नहीं ॥ १३ ॥ जे० जो भ० भगवन् प० अन्य को अ० असत्य अ० असतं अ० अभ्याख्यान से अ० आल चढाता है त० उस को क० कैसा क० कर्म क० करते हैं। गो० गौतम जे० जो प० अन्य को अ० असत्य अ० असद्भूत अ०. अभ्याख्यान से अ० आल चढाता है। त. उस को त० तैसा क० कर्म क० करते हैं ज० जहां अ० आते हैं त० वहां प० अनुभवते हैं तो भवग्गहणेणं सिझंइ, तचं पुंण भवग्गहणं नाइकमइ ॥ १३ ॥ जेणं भंते ! परं अलिएणं असन्भूएणं अब्भक्खाणेणंअब्भक्खाइ तस्सणं कहप्पगारा कम्मा कति ? गोयमा ! जेणं परं अलिएणं असंतएणं अब्भक्खाणेणं अब्भक्खाइ, तस्सणं तहप्प- गाराचे कम्मा कजति । जत्थेवणं अभिसमागच्छइ तत्थेवणं पडिसंवेदेइ तओ अहो गौतम ! कितनेक उसी भव में सीझे, कितनेक दूसरे भव में सीझे, परंतु तीसरा भव नहीं उल्लंघते हैं, अर्थात् तीसरे भव में निश्चयही सीझते हैं ॥..१३ ॥ अहो भगवन् ! जो कोई अन्य महात्मा पुरुषको द्वेषबुद्धि से अमद्भून, असत्य कलंक पदावे तो उन को कैसे कर्मों का बंध होवे ? अहो गौतम ! जो पुरुप जैसा कर्मक अन्य को चहोता है उस को वैसे ही कर्मों का वैध होता है. और जहां वह कर्म किया होगा वहाँही उदय में भवेगा और वहां ही वेदेगा. अहो भगवन् ! अपके वचन सत्य हैं. यह पांचवा शतक का छठा sya सत्र 885 पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र १ ब्दा/ स्कंध च० चार मदेशी स्कंध ज० जैसे च० चार प्रदेशीस्कंध न० तैसे पं० पांच प्रदेशी जा. वायत् त. तैसे अ० अनंत प्रदेशी ॥ १॥ प० परमाणु पो० पुद्गल भं०भगवन् अ० असिधारा ख० क्षुर की धारा उ० अवगाहे हैं. हां उ० अवगाहे से. अथ त• वहां छि० छेदावे भि० भेदाचे गो: गौतम णो नहीं इ० यह अ० अर्थ स० समर्थ नो नहीं त० तहां स० शस्त्र क० जावे एक ऐसे जा० यावत् अ० असंख्यात प्रदे- शात्मक अ० अनंत प्रदेश वाला भ० भगवन् खं० स्कंध अ० खड्ग की धारा खु० धुरकी धारा को उ. दसा एयंति, ॥ जहा चउप्पदेसिओ तहा पंचप्पदेसिओ जाव तहा अणत पएसिओ ॥ १ ॥ परमाणु पोग्गलेणं भंते ! असिधारंवा खुरधारंवा, उग्गाहेजा ? हंता उग्गाहेजा ॥ सेणं तत्थ छिज्जेजवा भिज्जेजवा ? गोयमा ! णो इणढे समढे । नो खलु तत्थ सत्थं कमइ, एवं जाव असंखेजपएसिओ ॥ अणंत पएसिएणं भंते ! वार्थ देश से चले व बहुत देश से चले नहीं. जैसे चार प्रदेशात्मक स्कंध का कहा वैसे ही पांच, छ, सात, आठ नव, दश. संख्यात असंख्यात व अनंत प्रदेशात्मक स्कंध का जानना।।२॥ अहो भगवन् ! क्या परमाणुपुद्गल खड्ग की धारा व क्षुर ( उस्तरे) की धारा को अवगाहे अर्थात् उस को लगे ? हां गौतम ! परमाणु पुद्गल खड्ग की धारा व क्षुरकी धारा नीचे आसकते हैं. अहो भगवन् ! क्या वह परमाणु पुद्गल छेदाता भेदाता है ? अहो गौतम ! यह अर्थ योग्य नहीं है क्योंकि उसमें शस्त्र संक्रमण नहीं कर सकता है पांचवा शतक का सातवा उद्देशा 8.g><BP ६१२ भनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी शब्दार्थको प. परिणमता है सि०क्वचित् णो नहीं ए०चलता है जा यावत् नोनहीं तं० उस २ भा भाव में प. परिणमता है सि० क्वचित् दे. देश से ए. चलता है जा. यावत् प० परिणमता है दु० द्विप्रदेशी गोयमा ! सिय एयइ, सिय नो एयइ, सिय देसे एयइ नो देसे एयइ, सिय देसे सूत्र एयइ नो देसा एयंति, सिय देसा एयंति नो देसे एयइ, । चउप्पएसिएणं भंते ! खंधे एयइ ? गोयमा ! सिय एयइ, सिय नो एयइ, सिय देसे एयइ णो देसे एयइ, सिय देसे एयइ णो देसा एयंति. सिय देता एयंति नो देसे एयइ, सिय देसा एयंति नो भावार्थ पदेशी कंघ क्वचित् चलता है, यावत् क्वचित् उन २ भावोंमें परिणमता है, वैसे ही क्वचित् नहीं चलता यावत् उन २ भावों में नहीं परिणमता है, और क्वचित् देश से चलता है व देश से नहीं चलता है. भो भगवन् ! तीन प्रदेशात्मक स्कंध क्या चलता है यावत् उन २ भावों में परिणमता है ? अहो गौतम! तीन मदेशात्मक स्कंध में पांच विकल्प कहे हुए हैं ? क्वचित् चले २ क्वचित् नचले ३ क्वचित् देश से चले व नचले ४ क्वचित् देश से एक चले दो नहीं चले और ५ क्वचित् देश से दो चले एक नहीं चले. भो भगवन् ! चार प्रदेशात्मक स्कंध क्या चले ? अहो गौतम ! चार प्रदेशात्मक स्कंध में छ विकल्प होते हैं. १ क्वचित् कप २ क्वचित् नहीं कैपे ३ क्वचित् देशसे कंपे व कंपे नहीं ४ क्वचित् एक देश से चले बहुत देश से चले नहीं ५ क्वचित् बहुत देश से चले एक देश से चले नहीं और ६ क्वचित् बहुत * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * ब 009 सूत्र RECR> पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8888- आवे त० तहां वि० विमाश आ० प्राप्त होवे उ० पानी का आ आवर्त उ०पानी का वि०बिंदु उ० अवगाह कर ले० अथ त० तहां प० नष्टहीवे ।। २॥१० परमाणु पो० पुद्गल कि० क्या स० अर्ध सहित स. मध्य सहित स० प्रदेश सहित उ० अथवा अ० अर्थ रहित अ० मध्य रहित अ. प्रदेश रहित गो० गौतम अ. अर्थ रहित अ० मध्य रहित अ० प्रदेश रहित नो० नहीं अ० अर्ध सहित नोक नहीं स०मध्य सहित नो० नहीं स. प्रदेश सहित दु. द्विप्रदेशी स्कंध किं. क्या गो० गौतम अ० अर्ध सहित अ० मध्य रहित गच्छेजा, तहिं विणिहाय मावज्जेज्जा, उदगावत्तवा, उदगंबिंदुवा उग्गाहेजा, सेणं तत्थ परियावज्जेज्जा, ॥ २ ॥ परमाणु पोग्गलेणं भंते ! किं सअड्डे समझे सपएसे उदाहु अणड्डे, अमझे, अपएसे ? गोयमा ! अणड्डे अमझे अपएसे, नोसअड्डे, नो समझे नो सपएसे । दुपएसिएणं भंते ! खंधे किं सअड्डे, समझे, सपएसे उदाहु हैं. हेसे ही गंगा महानदी के प्रवाह में कितनेक अनंत प्रदेशी स्कंध नष्ट होते हैं कितनेक नष्ट नहीं होते हैं. कितनेक अनंत प्रदेशात्मक स्कंध पानी के आवर्त को या पानी के विन्दु. को अवगाह कर. रहेरो ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! क्या परमाणु पुद्गल अर्थ, मध्य व प्रदेश सहित है अथवा अर्थ, प्रदेश व मध्य रहित है ? अहो गौतम ! परमाणु पुद्गल अर्थ, मध्य व प्रदेश रहित है. अर्ध, मध्य व प्रदेश सहित नहीं है. क्यों की परमाणु पुद्गल अत्यंत ही सूक्ष्म है और उप्त का विभाग नहीं होसकता है. अहो भगवन् ! 838 पांचवा शतक का सातघा उद्देशा 8-8884 वाथ शब्दार्थ अवमाहे ई० हां उ. अवगाहे से• अथ त० तहां छि छेदाचे भि० भेदावे गो० गौतम अ० कितनेक छि. छेदावे भि० भेदावे अ० कितनेक नो० नहीं छि छेदा नो नहीं मि० भेदावे ए. ऐसे अ० अनि काय की म० मध्य में त. तहां झि० जले भा० कहना. ए. ऐसे पु. पुष्कल संवर्तक म० महामेघ की म० मध्य में त० वहां उ० द्रवित होना एक ऐसे गं० गंगा में महानदी का १० मतिश्रोत ह. शीघ्र आ० सुत्र * अनुवादक -यालयाचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 82- खंधे असिधारंवा खुरधारंवा उग्गाहेज्जा ? हंता उग्गाहेज्जा । सेणं तत्थ छिमेजवा ? गोयमा!अत्थेगइए छिज्जेजवा भिजेजवा, अंत्थेगइएनोछिज्जेजवानोभिजेजवा भिब्जेजया॥ एवं अगणिकायस्स मझं मझेणं तहिं णवरं झियाएज भाणियव्वं एवं पुक्खलसंवदस्त, महामेहस्स मझं मझेणं तहिं उज्जोसिया, एवं गंगाए महाणईए पडिसोयं हव्वमा- नसे एक परमाणु शस्त्र से अछिन्न अभिन्न है वैसे ही द्वीमदेशी स्कंध यावत् संख्यात, अमंल्यान प्रदेशी स्कंध भी अछिन्न अभिन्न होते हैं. और अनंत प्रदेशात्मक स्कंध क्वचित् छेदाते भेदाते और क्वचित् छेदाते भेदाते नहीं हैं. जैसे शस्त्र से छेदाते भेदाते का आलाफक कहा वैसे ही निकाय में जलनेका जानना. अर्थात् कितनेक अनंत प्रदेशात्मक स्कंध अग्निकाय में जलते हैं व फितनेक नहीं जलते हैं ऐसे ही पुष्कलावर्त महामेघ में कितनेक अनंत प्रदेशी स्कंध भीजते हैं और कितनेक नहीं भीजते प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ 488 पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्ति (भगवती) सूत्र ११, शब्दार्थ सहित पु० पृच्छा गो० गौतम सि. क्वचित् स अर्थ सहित अ मध्य रहित स० प्रदेश महित सिक क्वचित् अ० अर्थ रहित स० मध्य सहित स० प्रदेश सहित ज..जैसे सं• संख्यात मदेशात्मक त. तैसे अ० असंख्यात प्रदेशात्मक अ० अनंत प्रदेशात्मक ॥ ३ ॥ प० परमाणु पो पुगल मॅ० भगवन् प० 'परमाणु पुद्गल फु० स्पर्श हुवे किं० क्या दे देश से दे. देश को फु० स्पर्शता है दे. देश से दे० सूत्र खंधे किं सअद्वे पुच्छा ? गोयमा ! सिय सअढे अमझे, सपएसे, सिय अणद्वे स- मझे, सपएसे, जहा संखेज्जपएसिओ, तहा असंखेज पएसिओवि, अणंत पएसिओवि ॥ ३ ॥ परमाणु पोग्गलेणं भंते ! परमाणु पुग्गलं फुस- माणे किं देसेणं देसं फुसइ, देसेणं देसे फुसइ, देसेणं सव्वंफुसइ, देसेहिं देसं भावार्थ वगैरह जो विषम राशि है उस का तीन प्रदेशी स्कंध जैसे जानना. अहो भगवन् ! संख्यात प्रदेशी स्कंध क्या अर्ध मध्य व प्रदेश सदित है ? अहो गौतम ! संख्यात प्रदेशी स्कंध क्वचित् अर्ध सहित मध्य रहित व प्रदेश सहित है और क्वचित अर्थ रहित, मध्य सहित व प्रदेश सहित है; क्योंकि इस में सम विषम दोनों राशि होती हैं. संख्यात मदेशी स्कंध जैसे असंख्यात प्रदेशी स्कंध व अनंत प्रदेशी o स्कंध का जानना ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! परमाणु पुगल परमाणु पुद्गल का स्पर्श करते क्या. १ अपने एक देश से दूसरे के.एक देश को स्पर्से २ अपने एक देश से दूसरे के अनेक देशों को स्पर्शे ३ अपने एक पांचवा शतकका सातवा उद्देशा 9881 शब्दार्थ अनुवादक-पालग्रामचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी । स० प्रदेश सहित णो नहीं अ० अर्थ रहित णो नहीं स. मध्य सहित नो० नहीं अ० प्रदेश रहित ति० तीन प्रदेश की पु० पृच्छा खं० स्कंध गो० गौतम अ० अर्ध रहित स०.मध्य सहित स० प्रदेश सहि नो० नहीं अ० अर्ध सहित मो० नहीं अ० मध्य रहित नो० नहीं अ० प्रदेश रहित जैसे दु. द्विप्रदेशी त. तसे जे० जो स० सप ते वे भाः कहना जे० जो वि० विषम ते० वे ज० जैसे ति० तीन प्रदेशा त्मक न० तेथे भा० कहना सं० संख्यातप्रदेशात्मक भं०, भगवन् खं० स्कंध किं. क्या स० अर्ध अणड्डे अमझे अपएसे ? गोयमा ! सअड्डे अमझे, सपएसे, नो अणड्डे, नो समझे, नो अपएसिए । तिपएसिएणं भंते ! खंधे पुच्छा । गोयमा ! अण्ड्डे समझे सर- एसे ना सअड्ड नो अमझे नो अपएसे जहा दुपएसिओ तहा जेसमा ते भाणियन्या. जे विसमा ते जहा तिपएसिओ, तहा भणियन्वो. ॥ * ॥ संखेजपएसिएणं भंते ! प्रदेशी स्कंध क्या अर्ध, मध्य व प्रदेश सहित है या अर्ध मध्य. व. प्रदेश रहित है ? अहो गौतम ! द्वि प्रदेशी स्कंध दो परमाणु का वनाहुआ होने से अर्ध सहित है, मध्य रहित है, व प्रदेश सहित है. अहो भगवन् ! तीन प्रदेशी स्कंध क्या अर्थ मध्य व प्रदेश सहित है. अथवा अर्थ, मध्य व प्रदेश रहित है। अहो गौतम ! तीन प्रदेशी स्कंध में तीन प्रदेश होने से अर्ध नहीं हैं. परंतु, मध्य व प्रदेश रहे हुवे हैं. इसी तरह आगे २-४-६.८ वगैरह जो सम राशि है उस को द्वि. प्रदेशी स्कंध जैसे कहना और ३-५-७-९ * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामतादजी भावार्थ * 488 पंचमान विवाह पण्णाने (भगवती ) सूत्र 481 शब्दार्थ सहित पु० पृच्छा गो मौतम सि क्वचित् स अर्ध सहित अ० मध्य रहित स० मदेश, सहित सिर क्वचित् अ० अर्ध रहित स० मध्य सहित स० प्रदेश सहित ज. जैसे सं० संख्यात प्रदेशात्मक त० तैसे अ० असंख्यात प्रदेशात्मक अ० अनंत प्रदेशात्मक ॥३॥ ५० परमाणु पो पुद्गल भै भगवन् प० परमाणु पुद्गल फु० स्पर्श हुवे किं० क्या दे देश से दे० देश को फु० स्पर्शता है दे. देश से दे. खंधे किं सअढे पुच्छा ? गोयमा ! सिय सअद्वे अमझे, सपएसे, सिय अणद्वे स- सूत्र मझे, सपएसे, जहा संखेजपएसिओ, तहा असंखेज पएसिओवि, अणंत पएसिओवि ॥ ३ ॥ परमाणु पोग्गलेणं भंते ! परमाणु पुग्गलं फुस- माणे किं देसेणं देसं फुसइ, देसेणं देसे फुसइ, देसेणं सव्वंफुसइ, देसेहिं देसं भावार्थ वगैरह जो विषम राशि है उस का तीन प्रदेशी स्कंध जैसे जानना. अहो भगवन् ! संख्यात प्रदेशी स्कंध क्या अर्ध मध्य व प्रदेश सहित है ? अहो गौतम ! संख्यात प्रदेशी स्कंध क्वचित् अर्थ सहित मध्य रहित व प्रदेश सहित है और क्वचित अर्ध रहित, मध्य सहित व प्रदेश सहित है; क्योंकि इस में सम विषम दोनों राशि होती हैं. संख्यात मदेशी स्कंध जैसे असंख्यात प्रदेशी कंध व अनंत मदेशी स्कंध का जानना ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! परमाणु पुद्गल परमाणु पुद्गल का स्पर्श करते. क्या. १ अपने एक देश से दूसरे के.एक देश को स्पो २ अपने एक देश से दूसरे के भनेक देशों को पत्रे ३ अपने एक पांचवा सतकका मातवा उद्देशा 988 ६९६ ॐ अनुवादक-पालनामाचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दार्थ 4स. प्रदेश सहित को नहीं अ० अर्ध रहित णो० नहीं स० मध्य सहित नो नहीं अ० प्रदेश रहित ति० तीन प्रदेश की पु० पृच्छा खं० स्कंध गो० गौतम अ० अर्ध रहित स०.मध्य सहित स० प्रदेश सहि नो० नहीं अ० अर्ध सहित नो० नहीं अ० मध्य रहित नो० नहीं अ० प्रदेश रहित जैसे दु० दिनदेशी त० से जे० जो स० सप तेक वे भाः कहना जे० जो वि० विषम ते० वे ज० जैसे ति० तीन प्रदेशा त्मक न० ते भा० कहना सं० संख्यातप्रदेशात्मक भं०. भगवन् खं० स्कंध किं० क्या स० अर्थ अणड्ढे अमझे अपएसे ? गोयमा ! सअड्डे अमझे, सपएसे, नो अणड्डे, नो समझे, नो अपएसिए । तिपएसिएणं भंते ! खंधे पुच्छा । गोयमा ! अण्ड्डे समझे सप- एसे ना सअड्ड नो अमझे नो अपएसे जहा दुपएसिओ तहा जेसमा ते भाणियन्वा. जे विसमा ते जहा तिपएसिओ, तहा भणियव्यो. ॥ * ॥ संखेजपएसिएणं भंते ! भावाय प्रदेशी संघ क्या अर्थ, मध्य व प्रदेश सहित है या अर्थ मध्य.व प्रदेश रहित है ?. अहो गौतम !. द्वि प्रदेशी स्कंध दो परमाणु का वनाहुआ होने से अर्ध सहित है, मध्य रहित है, ५ प्रदेश सहित है. अहो भगवन् ! तीन प्रदेशी स्कंध क्या अर्ध मध्य व प्रदेश सहित है. अथवा अर्ध, मध्य. व प्रदेश रहित है अहो गौतम ! तीन प्रदेशी. स्कंध में तीन प्रदेश होने से अर्ध नहीं हैं. परंतु, मध्य व प्रदेश रहे हुवे हैं. इसी तरह आगे २-४-६-८ वगैरह जो सम राशि है उस को द्वि प्रदेशी स्कंध जैसे कहना और ३-५-७-९ * भकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी सूत्र 488 पंचमाङ्ग विवाइ पण्णात्त (भगवती ) सूत्र 4.98 शब्दार्थ सहित पु० पृच्छा गो• गौतम सि० क्वचित् सः अर्ध सहित अ० मध्य रहित स० प्रदेश सहित सिक क्वचित् अ० अर्ध रहित स० मध्य सहित स० प्रदेश सहित ज० जैसे सं• संख्यात प्रदेशात्मक' त० तैसे अ० असंख्यात प्रदेशात्मक अ० अनंत प्रदेशात्मक ॥ ३ ॥ प० परमाणु पो पुगल मॅ० भगवन् प० परमाणु पुद्गल फु० स्पर्श हुवे किं० क्या दे देश से दे० देश को फु०. स्पर्शता है दे, देश से दे. खंधे किं सअद्वे पुच्छा ? गोयमा ! सिय सअद्वे अमझे, सपएसे, सिय अणद्वे स. मझे, सपएसे, जहा संखेज्जपएसिओ, तहा असंखेज पएसिओवि, अणंत पएसिओवि ॥ ३ ॥ परमाणु पोग्गलेणं भंते ! परमाणु पुग्गलं फुस- माणे किं देसेणं देसं फुसइ, देसेणं देसे फुसइ, देसेणं सव्वंफुसइ, देसेहिं देसं भावार्थ वगैरह जो विषम राशि है उस का तीन प्रदेशी स्कंध जैसे जानना. अहो भगवन् ! संख्यात प्रदेशी स्कंध क्या अर्ध मध्य व प्रदेश सहित है ? अहो गौतम ! संख्यात प्रदेशी स्कंध क्वचित् अर्ध सहित मध्य रहित व प्रदेश सहित है और क्वचित अर्ध रहित, मध्य सहित व प्रदेश सहित है; क्योंकि इस में सम विषम दोनों राशि होती हैं. संख्यात मदेशी स्कंध जैसे असंख्यात प्रदेशी स्कंध व अनंत प्रदेशी स्कंध का जानना ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! परमाणु पुद्गल परमाणु पुद्गल का स्पर्श करते क्या. १ अपने एक देश से दूसरे के.एक देश को स्पर्शे २ अपने एक देश से दूसरे के अनेक देशों को परे ३ अपने एक पांचवा शतकका सातवा उद्देशा o शब्दार्थ 3. अनुवादक-पालग्रामचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी र स. प्रदेश सहित णो नहीं अ० अर्ध रहित णो नहीं स० मध्य सहित नो नहीं अ० प्रदेश रहित ति० तीन प्रदेश की पु० पृच्छा खं० स्कंध गो० गौतम अ० अर्ध रहित स० मध्य सहित स० प्रदेश सहि नो० नहीं अ० अर्ध सहित नोक नहीं अ० मध्य रहित नो० नहीं अ० प्रदेश रहित जैसे दु० द्विमदेशी त० तैसे जे० जो स० सप ते० चे भाछ कहना जे० जो वि० विषम ते वे ज० जैसे ति० तीन प्रदेशा त्मक न० तेभे भा० कहना सं० संख्यातमदेशात्मक भं०. भगवन् खं. स्कंध किं. क्या स० अर्ध अणड्डे अमझे अपएसे ? गोयमा ! सअड्डे अमझे, सपएसे, नो अणड्डे, नो समझे, नो अपएसिए । तिपएसिएणं भंते ! खंधे पुच्छा । गोयमा ! अपण्ड्डे समज्झे सर- एसे ना सअड्डे नो अमझे नो अपएसे जहा दुपएसिओ तहा जेसमा ते भाणियचा. जे विसमा ते जहा तिपएसिओ, तहा भणियन्वो. ॥ * ॥ संखेजपएसिएणं भंते ! भावार्य प्रदेशी स्कंध क्या अर्थ, मध्य व प्रदेश सहित है या अर्ध मध्य. व प्रदेश रहित है ?. अहो गौतम ! द्वि मदेशी स्कंध दो परमाणु का बनाहुआ होने से अर्ध सहित है, मध्य रहित है, व प्रदेश सहित है. असो भगवन् ! तीन मदेशी स्कंध क्या अर्ध मध्य व प्रदेश सहित है. अथवा अर्ध, मध्य व प्रदेश रहित है। अहो गौतम ! ज्ञान प्रदेशी. स्कंध में तीन प्रदेश होने से अर्ध नहीं हैं परंतु, मध्य व प्रदेश रहे हुवे हैं. इसी तरह आगे २-४-६-८ वगैरह जो सम राशि है उप्स को द्वि. प्रदेशी स्कंध जैसे कहना और ३-५-७-९ * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालापप्तादजी शब्दार्थ सूत्र 4. पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्त (भगवती ) सूत्र 18 सहित पु० पृच्छा गो० गौतम सि. क्वचित् सः अर्ध सहित अ० मध्य रहित स० प्रदेश महित सि० क्वचित् अ० अर्ध रहित स. मध्य सहित स० प्रदेश सहित ज० जैसे सं• संख्यात मदेशात्मक त. तैसे अ. असंख्यात प्रदेशात्मक अ० अनंत प्रदेशात्मक ॥ ३ ॥ प० परमाणु पो पुगल मॅभगवन्..प० परमाणु पुद्गल कु० स्पर्श हुवे किं. क्या दे देश से दे० देश को फु० स्पर्शता है दे, देश से दे० खंधे किं सअद्वे पुच्छा ? गोयमा ! सिय सअद्वे अमझे, सपएसे, सिय अणद्वे स- मझे, सपएसे, जहा संखेज्जपएसिओ, तहा असंखेज पएसिओवि, अणंत पएसिओवि ॥ ३ ॥ परमाणु पोग्गलेणं भंते ! परमाणु पुग्गलं फुस- माणे किं देसेणं देसं फुसइ, देसेणं देसे फुसइ, देसेणं सव्वंफुसइ, देसेहिं देसं वगैरह जो विषम राशि है उस का तीन प्रदेशी स्कंध जैसे जानना. अहो भगवन् ! संख्यात मदेशी स्कंध क्या अर्ध मध्य व प्रदेश सहित है ? अहो गौतम ! संख्यात प्रदेशी स्कंध क्वचित् अर्ध सहित मध्य रहित व प्रदेश सहित है और क्वचित अर्ध रहित, मध्य सहित व प्रदेश सहित है; क्योंकि इस में सम विषम दोनों राशि होती हैं. संख्यात मदेशी स्कंध जैसे असंख्यात प्रदेशी कंध व अनंत प्रदेशी स्कंध का जानना ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! परमाणु पुगल परमाणु पुद्गल का स्पर्श करते क्या . १ अपने एक देश से दूसरे के.एक देश को स्पर्षे २ अपने एक देश से दूसरे के अनेक देशों को स्पः ३ एक पांचवा सतकका सातवा उद्देशा भावार्थ शब्दार्थ सूत्र अनुवादक-पालग्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक पिजी स. प्रदेश सहित णो नहीं अ० अर्थ रहित णो नहीं स० मध्य सहित नो० नहीं अ० प्रदेश रहित ति० तीन प्रदेश की पु० पृच्छा खं० स्कंध गो० गौतम अ० अर्ध रहित स० मध्य सहित स० प्रदेश सहि नोक नहीं अ. अर्ध सहित मो० नहीं अ० मध्य रहित नो० नहीं अ० प्रदेश रहित जैसे दु० द्विमदेशी त० से जे. जो स० सप ते वे भाः कहना जे० जो वि० विषम ते० वे ज० जैसे ति तीन प्रदेशा मक न० तैमे भा० कहना सं० संख्यातपदेशात्मक भं भगवन् खं० स्कंध किं. क्या स० अर्ध अणड्डे अमझे अपएसे ? गोयमा ! सअड्डे अमझे, सपएसे, नो अणड्डे, नो समझे, नो अपएसिए । तिपएसिएणं भंते ! खंधे पुच्छा । गोयमा ! अण्ड्डे समझे सप- एसे ना सअड्डे नो अमझे नो अपएसे. जहा दुपएसिओ तहा जेसमा ते भाणियव्या. जे विसमा ते जहा तिपएसिओ, तहा भणियन्त्रो. ॥ * ॥ संखेजपएसिएणं भंते ! प्रदेशी स्कंध क्या अर्थ, मध्य व प्रदेश सहित है या अर्ध मध्य.व, प्रदेश रहित है ? अहो गौतम ! द्वि प्रदेशी स्कंध दो परमाणु का बनाहुआ होने से अर्ध सहित है, मध्य रहित है, व प्रदेश सहित है. अहो भगवन् ! तीन प्रदेशी स्कंध क्या अर्ध मध्य व प्रदेश सहित है. अथवा अर्ध, मध्य व प्रदेश रहित है भडो गौतम ! नान प्रदेशी स्कंध में तीन प्रदेश होने से अर्ध नहीं हैं. परंतु, मध्य व प्रदेश रहे हुवे हैं. इसी तरह आगे २-४-६-८ वगैरह जो सम राशि है उस को द्वि प्रदेशी स्कंध जैसे कहना और ३-५-७-९१ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी * . मत्र पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगरतो) सूत्र स्पीचे जा० यावत् अ. अनंत प्रदेश दु. द्विपदेशात्मक भ० भगान् खं० स्कंध प० परमाणु पुद्गल फुल स्पर्शता हुवा पु• पृच्छा त० तीसरा न० नवया से फु०- स्पर्श दु० द्विपदेशात्मक 'दु. दो प्रदेशी को फु० स्पर्शते प० प्रथम त तीसरा स० मातवा, न० नववे से फु० स्पर्शे दु० दो मदेशी ति तीन प्रदेश को फु० स्पर्शते आ० आदि के प० पीछे के ती तीन से म० मध्य के ती तीन प० प्रतिषेध करना दु० णिप्पच्छिमएहिं तिहिं फुसइ; जहा परमाणुपोग्गले तिपएसियं .फुसाविओ एवं फुसावेयब्बो, जाव अणंत पएसिओ। दुपएसिएणं भंते ! खंधे परमाणु पोग्गलं फुसमाणे पुच्छा तइय नवमेहिं फुसइ, दुपएसिओ दुपएसियं फुसमाणो पढमतइय सत्तमनवमेहिं . फुसइ, दुपएसिओ तिपएसियं फुसमाणो. आदिल्लएहि य पच्छिल्लएहिं पुद्गल द्वि प्रदेशी स्कंध को स्पर्शते सर्व से एक देश को व सर्व से सर्व को स्पर्शे ऐसे सातवे व नववे दो भांगे पाते हैं. परमाणु पुद्गल तीन प्रदेशी स्कंध को स्पर्शते पीछे के तीन भांगे पाते हैं ? यदि वह मदेशात्मक स्कंध तीन प्रदेश में रहा हुवा होवे तो उस स्कंध के एक प्रदेश को वह परमाणु सनींग से स्पर्शता है २ यदि उस त्रिप्रदेशी कंध के दो परमाणु एक प्रदेश पर रहा हुवा होवे तो सर्वांग से अनेक देशों को स्पर्श ३ यदि उक्त तीन प्रदेशी स्कंध परमाणु की सूक्ष्मता से एकही परमाणु पर रहे तब साग से सर्वांग को स्पर्शे ऐसे अंत्यके तीन भांगे पाते हैं. जैसे तीन मदेश को परमाणु पुद्गल स्पर्शता है वैसे ही चार 298-99 पांचवा शतकका सातशा उद्देशा भावार्थ 17 दाम्दार्थ सत्र ? 1. अनुवादक-चालाननरािमुनि श्री अमोलक ऋपिनी + देशीको फु० स्पर्शता है दे देश से स० सर्व को फु० स्पर्शता है दें देशोंसे स०. सब से गो गौतमः नो• नहीं दें देश से दे देशकों फु० स्पर्श प० परमाणु 'पो० पुद्रल दु द्विप्रदेशी को फु० स्पर्शते.स० सात न० न मे फु स्पर्श प० परमाणु पो पुद्गल ति० तीन प्रदेश को 'फु० स्पर्शते नि० अन्त्य:तिः तीन से फु० स्पर्श ज जैसे १० परमाणु पो० पुद्गल ति० तीन प्रदेश को फु० स्पर्शा हुआ एक ऐसे..फुल फुसइ, देसेहिं देसे फुसइ, देसेहिं सव्वं फुसइ, सव्वेणं देसं फुसइ, सव्वेणं देसे फुसइ, सव्येणं सव्वं फुसइ ? गोयमा ! नो देसेणं देस फुसइ, णो देसेणं देसे फुसइ, “णो देसेणं सव्वं फुसइ, नो देसेहिं देसं फुसइ, नो देसेहिं देसे फुसइ, नो देसेहिं. सव्वं : फुसइ, नो सम्वेणं देसं फुसइ, जो सव्वेणं देसे फुसई, सव्वेणं सव्वं 'फुसइ। परमाणु पोग्गल दुपएसियं फुसमाणे सत्त नवमेहिं फुसइ, परमाणुपोग्गले तिपएसियं फुसमाणे देश मे दूसरे के सवीग को स्पर्श ४ अपने अनेक देश से दूसरे के एक देश को स्पर्श ५ अपने अनेक देश से दूसरे के अनेक देशों को स्पर्श ६ अपने अनेक देश से दूसरे के साँग को स्पर्श ७ अपने सर्वांग में दूसरे के एक देश को स्पर्श ८ अपने सर्वांग से दूसरे के अनेक देशों को स्पर्शे और ९ अपने साग से दूसरे के क्ण साग को सर्श ? अहो गौतम ! इन भांग में 'से. मात्र नवां सर्वाग से सर्वांग को स्पर्श पही भांगा पील सका है. परमाणु पुद्गल परमाणु पुगल को स्पर्शनें में शेष आठ भांगे नहीं हैं. परमाण * प्रकाशक-राजांवहादुर लाला मुखदेवसहायनी मालाप्रसादनी * २७ ७०१. 825 पंचगंग विवाह पप्णत्ति ( भगवती) मूत्र 8087 स्दा तीन मदेशात्मक ति तीन मदेश को फु० स्पर्शते स. सब ठा० स्थान में फु० स्पर्शते ज० जैसे ति तीन प्रदेशात्मक को फु० स्पर्शा हुवा ए० पेसे ति० तीन प्रदेशात्मक जा. यावत् अ० अनंत मदेशात्मक की साथ सं० जोडना ज. जैसे ति तीन प्रदेशात्मक ए. ऐसे जा० यावत् अ० अनंत मदेशात्मक. भा०कहना ॥ ४ ॥१० परमाणु पो० पुद्गल भं० भगवन् का० काल से के० कितना हो होता है गो० गौतम ज. सियं फुसमाणो सव्वेसुवि ठाणेसु फुसइ । जहा तिपएसिओ तिपएसियं फुसाविओ, सत्र एवं तिपएसिओ जाव अणंतपएसिएणं संजोएयव्वो, जहा तिपएसिओ एवं जाव अणंतपएसिओ भाणियब्वो ॥ ४ ॥ परमाणु पोग्गलेणं भंते ! कालओ केवचिरहोइ? गोयमा ! जहणेणं एगं समयं, उक्कोसेणं असंखेज कालं, एवं जाव अणंत पएसि- तीन मदेशी स्कंध परमाणु पुद्गल को स्पर्शते हुवे तीसरा, छहा व नवयां भांगा को स्पर्श. तीन मदेशी स्कंध वार्थ द्वि प्रदेगी स्कंध को स्पर्शते हुए पहिला, तीसरा, चौथां, छहा, सातवां व नववा को स्पर्शे और तीन मदेशी तीन प्रदेशी को स्पर्शते हुवे सब भांगे को स्पर्श. जैसे तीन प्रदेशी का कहा वैसे ही चार, पांच यावत् संख्यात असंख्यात व अनंत प्रदेशी का जानना. और जैसे तीन प्रदेशी स्कंध मे परमाणु पुगल यावत् अनंत प्रदेशी के भांगे कहे वैसे ही चार, पांच यावत् अनंत प्रदेशी की साथ जानना ॥ ४ ॥ अहो २७ भगवन् ! परमाणु एगल परमाणु पुद्गलपने कितने काल तक रहे ? अहो गौतम! जघन्य एक समय PR पांचवा शतकका मानवा उद्देशा ११ oyo शब्दार्थ सूत्र + अनुवादक बालमनगरी मुाने श्री अमोलक ऋषिजी दिनदेशात्मक ज जसे ति० तीन प्रदेश फु० स्पर्शाया हुवा ए. ऐसे फु० स्पर्शना जा. यावत् अ० अनंत प्रदेशात्मक ति० तीन प्रदेशात्मक भ० भगवन् खं० स्कंध प० परमाणु पो० पुद्गल फु० स्पर्शते हुवे पु० पृच्छा त तीसरा छ० छठा न० नववे से फु० स्पर्शता है ति० तीन प्रदेशात्मक दु० दो प्रदेश को फ• स्पर्शने ५० प्रथम त० तीसरा च० चौथा छ० छट्ठा स० सातवा न० नववे से फु० स्पर्शता है ति. तिहिं कुसइ, मझिमएहिं तिहिंवा पडिसेहेयव्वं. दुपएसिओ जहा तिपएलियं फुसाविओ. एवं फुसावेयवो जाव अणंतपएसियं तिपएसिएणं भंते ! खंधे परमाणु पोग्गलं फुसमाणे पुच्छा तइयछट्टणवमेहिं फुसइ ॥ तिपएसिओ दुपएसिथं फुस- माणो पढमएणं तइयएणं. चउत्थछट्ठसत्तमनवमेहि फुसइ ॥ तिपएसिओ तिपए. पांच यावत् संख्यात, असंख्यात व अनंत प्रदेश तक जानना. अहो भगवन् ! परमाणु पुद्गल को स्पर्शते दि मदेशी स्कंध में कितने भांगे पावे ? अहो गौतम ! परमाणु पुद्गल को स्पर्शते हुचे द्विप्रदेशी स्कंध में नीमरा व नवबा भांगा पाये अर्थात् अपने देश से परमाणु पुद्गल के सर्वांग को स्पर्श अथवा 'अपने साँग हमे उस के सर्वांग को स्पर्श. द्वि प्रदेशी द्वि प्रदेशी को स्पर्शते हुए पहिला, तीसग, सातवां, व नववा भांगा को स्पर्श, तीन प्रदेशी को स्पर्शते हुए पहिले के तीन व पीछे के तीन ऐसे भांगे को स्पर्श: और इसी वरद चार, पांच यावत् संख्यात, असंख्यात व अनंत प्रदेशी को स्पर्शते हुवे द्विपदेशी स्कंध उक्त छ भांग पावे ** प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी जालाप्रसादजी.
न्दिा सूत्र 87 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8888 नि० कंपन रहित ज० जघन्य ए० एक स० समय उ० उत्कृष्ट अ० असंख्यात काल ए. एक गु. गुन काला भ० भगवन् पो० पुद्गल का काल से के० कितना भ० होवे गो० गौतम ज० जघन्य एक एक स० समय उ० उत्कृष्ट अ० असंख्यात काल ए. ऐसे व० वर्ण गं गंध २० रस फा० स्पर्श जा. यावत् गाढे एग गुणकालएणं भंते ! पोग्गले कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहण्णेणं एगं समयं उक्कोसेणं असंखेनं कालं एवं जाव अणंत गुणकालए; एवं वण्ण गंधरस फास जाव अणंत लुक्खे, एवं सुहुम परिणए पोग्गले, एवं बादर परिणए पोग्गले सहपरिणएणं भंते ! पोग्गले कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! की व्याख्या नहीं होती है. एक आकाश प्रदेश पर रहनेवाला परमाणु पुद्गल कम्पन रहित जघन्य, एक समय उत्कृष्ट असंख्यात काल तक रहता है ऐसे ही असंख्यात प्रदेशावगाह परमाणु पुद्गल का जानना. अहो भगवन् ! एक गुन काला पुद्गल जघन्य कितना कालतक रहता है ? अहो गीतम! एक गुन काला पुद्गल जघन्य एक समय उत्कृष्ट असंख्यात कालतक रहता है जैसे एक गुन काला का कहा वैसे ही अनंत गुन काला तक जानना. और ऐसे ही शेप चार वर्ण, दो गंध, पांच रस व आठ स्पर्श में अनंत प्रदेशी रूक्ष पुद्गल तक का जानना. ऐसे ही मूक्ष्म परिणत पुद्गल व वादर परिणन पुद्गल का जानना. अहो भगवन् ! शब्द से परिणमे हुए पुद्गलों कितने काल तक शब्दपने रहते हैं ? अदो गौतम ! जघन्य 4880 पांचवा शतक का सातवा उद्देशा ! भावाथे लष्ट असंख्यात काल तक रहे तत्पश्चात् वह एक रूप में नहीं रह सकता है . वैसे ही द्वि प्रदेशी स्कंध , शन्दा ७०२ सूत्र १ अनुवादक-पालप्रमचारी मुनि श्री अमोलक प्रापिनी जघन्य ए. एक स० संगय उ० उत्कृष्ट अ असंख्यात ए० ऐसे जा० यावत् अ. अनंत मदशात्मक ए० ये १५० प्रदेशावगाही भ०. भगवन् पो० पुद्गल से० कंपन सहित त. उस ठा० स्थान में अ२. अन्य ठा० स्थान में का० काल से के० कितना हो होता है गो० गौतम ज• जयन्य ए० एक समय उ० उत्कृष्ट आ० आवलिका का अ० असंख्यातवा भा० भाग ए. ऐसे जा० यावत् अ० असंख्यात प्रदेशावगाढ औराएगपएसोगाढेणंभंते ! पोग्गले सेए तम्मिवाठाणे अण्णम्मिवा ठाणे कालओ. केवचिरं- होइ ? गोयमा! जहण्णं एगं समयं उक्कोसे आवलियाए असंखेजइ भागं, एवं जाव असं. खेज पएसोगाढे ॥ एग पएसोगाढेणं भंते.! पोग्गले निरेए कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा! जहण्णेणं एगं समयं उकोसेणं असंखेजकालं एवं जाव असंखेज पएसो * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादनी * नीन मदेशी यावत् अनंत प्रदेशी स्कंध जघन्य एक समय तक रहता है उत्कृष्ट असंख्यात काल तक रहता है. अहो भगवन् ! एक प्रदेशावगाढ ( एक आकाश प्रदेश पर रहा. हुवा) पुद्गल कपन . सहित अ. चिकन स्थान में अथवा अन्य स्थान में कितना काल तक रहे ? अहो गौतम!, जघन्य एक समय तक रहे उत्कृष्ट भावलिका के असंख्यातवे भाग तक रहे: जैसे एक प्रदेशावगाढ :पुद्गल का कहा वैसे ही अ- गंग्यान प्रदेशावगाह पुद्गलतक का जानना. आकाश के अनंत प्रदेश नहीं होने से अनंत प्रदेशावगाद पुद्दल ब्दार्थ सूत्र * पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 8887 प्रदेशी ॥ ६॥ ए. एक प० प्रदेशावगाढ भ० भमवन् पु० पुद्गल का से० कंपन सहित अं० आंतरा का० काल से के० कितना हो. होवे गो. गौतम जल जघन्य ए. एक समय उ० उत्कृष्ट अ० असंख्यात काल अणंतकालं. एवं जाव अणंतपएसिओ ॥ ६॥ एगपएसोगाढस्सणं भंते ! पोग्ग- लस्स सेयस्स अंतरं कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहण्णं एग समय, उक्कोसेणं असंखेजंकालं ॥ एवं जाव असंखेजपएसोगाढे एग पएसोगाढस्सणं भंते ! निर- यस्स अंतरं कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहण्णेणं एग समय, उक्कोसेणं आ- वलियाए असंखेजइ भागं एवं जाव असंखेजपएसोगाढे ॥ वण्ण गंध रस फास सुहुमपरिणयाणं, एएसिं जंचव अंतरंपि भाणियव्वं ॥ सद्द परिणयस्सणं भंते ! पोग्गलस्स अंतरं कालओ केवचिरंहोइ ? गोयमा ! जहण्णेणं एगं समयं, उकोसेणं समय उत्कृष्ट अनंत काल का अंतर पडता है. ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! एक प्रदेशावमाही चलित पुद्गलों का कितना अंतर कहा ? अहो गौतम ! जघन्य एक समय उत्कृष्ट असंख्यात कालका. और ऐसे ही असं- ख्यात प्रदेशात्मक का जानना. एक प्रदेशावगाही स्थिर पुद्गलों का अहो भगवन् ! कितना अंतर ? अहो गौतम ! जघन्य एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यात वां भाग का जानना. ऐसे ही असंख्यात HEAC9 पांचवा शनक का सातपा उद्देशा 4800 वार्थ शब्दाथ भगवन् पो. अनंत लु: रूक्ष ए. एस वा० बादर परिणत पो० पुद्गल स० शब्द प. परिणत भं० पुद्गल का० काल से क० कितना हो होवे शेप पूर्ववत् ॥ ५॥ ५० परमाणु पो० पुद्गल का भं० भगवन् अं० आंतरा का काल से के० कितना हो. होवे गो. गौतम ज० जघन्य ए० एक स० समय उ० उत्कृष्ट अ० असंख्यात काल दु० द्विप्रदेशी भ० भगवन् खं० स्कंध का एक ऐसे जा. यावत् अ० अनंत सूत्र 4 अनुवादक-पासमानचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी 8 जहण्णेणं एगं समयं उक्कोसेणं आवालियाए असंखेजइभागं, असद्दपरिणए जहा एक गुणकालए ॥ ५ ॥ परमाणु पोग्गलस्सणं भंते ! अंतरं कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहण्णेणं एगसमयं उक्कोसेणं असंखेजकालं ॥ दुपएसियस्सणं भंते ! खंधरस. अंतरं कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहणणं एग समयं उक्कोसणं एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यातवा भाग तक रहते हैं अशब्दपरिणत पुद्गलोंको एक गुन काला जैसे कहना॥५॥ अहो भगवन् ! परमाणु पुद्गल का अंतर कितनेकाल का कहा? अहो गौतम ! जघन्य एक समय का उत्कृष्ट असंख्यात कालं का. द्विप्रदेशी स्कंध यावत् अनंत प्रदेशी स्कंध का जघन्य एक १. एक परमाणु पुद्गल जितने समय में अन्य पुद्गलों की साथ मीलकर फीर उस से विच्छिन्न बनकर एक ही परमाणु पुद्गल बन जाये उतने समय को अंतर कहते है. * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायनी मालाप्रसादजी * शब्दार्थ २७ ७०५ सूत्र 388 पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 88 प्रदेशी ॥ ६ ॥ ए. एक प० प्रदेशावगाढ भं० भमवन् पु० पुद्गल का से० कंफर सहित अं. आंतरा का० काल से के० कितना हो. होवे गो० गौतम ज. जघन्य ए. एक समय उ० उत्कृष्ट अ० असंख्यात काल अणंतकालं. एवं जाब अणंतपएसिओ ॥ ६॥ एगपएसोगाढस्सणं भंते ! पोग्ग- लस्स सेयस्स अंतरं कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहण्णं एगं समयं, उक्कोसेणं असंखेजंकालं ॥ एवं जाव असंखेजपएसोगाढे एग पएसोगाढस्सणं भंते ! निर- यस्स अंतरं कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहण्णेणं एगं समयं, उक्कोसेणं आ- वलियाए असंखेज्जइ भागं एवं जाव असंखेजपएसांगाढे ॥ वण गंध रस फास सुहुमपरिणयाणं, एएसिं जंचव अंतरंपि भाणियन्वं ॥ सद्द परिणयरसणं भंते ! पोग्गलस्स अंतरं कालओ केवचिरंहोइ ? गोयमा ! जहण्णेणं एगं समयं, उकोसेणं समय उत्कृष्ट अनंत काल का अंतर पडता है. ॥ ६॥ अहो भगवन् ! एक प्रदेशावगाही चलित पुगलों का कितना अंतर कहा ? अहो गौतम ! जघन्य एक समय उत्कृष्ट असंख्यात कालका. और ऐसे ही असं- ख्यात प्रदेशात्मक का जानना. एक प्रदेशावगाही स्थिर पुद्गलों का अहो भगवन् ! कितना अंतर ? अहो गौतम ! जयन्य एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यात वां भाग का जानना. ऐसे ही असंख्यात, पांचवा शनक का सातपा उद्देशा 302 . वार्थ शब्दार्थी अ० अनंत लु० रूक्ष ए. ऐसे वा० बादर परिणत पो. पुद्गल स० शब्द प. परिणत भं. भगवन् पो. पुद्गल का० काल से क० कितना हो होवे शेप पूर्ववत् ॥ ५॥ पपरमाणु पो. पुद्गल का भं० भगवन् अं० आंतरा का० काल से के० कितना हो. होवे गो. गौतम ज० जघन्य ए० एक स० समय उ० उत्कृष्ट अ० असंख्यात काल दु० द्विपदेशी भ० भगवन् खं० स्कंध का एक ऐसे जा. यावत् अ० अनंत सूत्र र अनुवादक-बालमनचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिनी प्रकाशक-राजावहादुर लाला. सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रमादजी वाथ जहणेणं एग समयं उक्कोसेणं आवलियाए असंखेजइभागं, असद्दपरिणए जहा एक गुणकालए ॥ ५ ॥ परमाणु पोग्गलस्सणं भंते ! अंतरं कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहण्णेणं एगसमयं उक्कोसेणं असंखेजकालं ॥ दुपएसियस्सणं भंते ! खंधरस. अंतरं कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहण्णणं एगं समयं उक्कोसणं एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यातवा भाग तक रहते हैं अशब्दपरिणत पुद्गलोंको एक गुन काला जैसे कहना॥५॥ अहो भगवन् ! परमाणु पुद्गल का अंतरं कितनेकाल' का कडा? अहो गौतम! जघन्य एक समय का उत्कृष्ट असैख्यात कालं का. द्विप्रदेशी स्कंध यावत् अनंत प्रदेशी' स्कंध का जघन्य एक १ एक परमाणु पुद्गल जितने समय में अन्य पुद्गलों की साथ मीलकर फीर उस से विच्छिन बनकर एक ही परमाणु पुगल बन जाये उतने समय को अंतर कहते हैं. * ७०७ सूत्र 28 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) गौतम स० सर से थो० थोडे खे० क्षेत्र स्थान का आयुष्य ओ० अवगाहना स्थान का आयुष्य अ असंख्यात गुना द द्रव्य स्थान असंख्यात गुना भा. भाव स्थान असंख्यात गुने ॥ ८ ॥ ने नारकी किं. क्या सा. आरंभ सहित स० परिग्रह सहित उ० अथवा अ० अनारंभी अ० अपरिग्रही गो. गौतम ने नारकी RT सारंभी स० सपरिग्रही नोक नहीं अ० अनारंभी अ० अपरिग्रही से० अथ के कैसे गो० उयस्स कयरे २ जाव विससाहिया ? गोयमा ! सव्वत्थोवे खेत्तट्ठाणाउए. ओगा- हणट्ठाणांउए असंखेजगुणे, दवट्ठाणाउए असंखेजगुणे, भावट्ठाणाउए असंखेजगुणे ।। खेत्तागाहंणदब्वे भावट्ठाणाउयंच अप्पवहुं-खेत्ते सव्वत्थोवे सेसाठ्ठाणा असंखेजगुणा ॥ ८ ॥ नेरइयाणं भंते. ! किं सारंभा सपरिग्गहा, उदाहु अणारंभा अपरिग्गहा ? गोयमा ! नेरइया सारंभा सपरिग्गहा, नो अणारंभा अपरिग्गहा ॥ सेकेणटेणं जावं कौन किस से अल्प, बहुत व विशेषाधिक है ? अहो गौतम ! संघ से थोडा क्षेत्र स्थान का आयुष्य, उस से अवगाहना स्थान का आयुष्य असंख्यात गुना, उस मे द्रव्य स्थान का आयुष्य ' असंख्यात गुना और उस से भार स्थान का आयुष्य असंख्यात गुना. ॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! क्या नारकी सारंभी सपरिग्रही हैं ? अथवा अनारंभी अपरिग्रही हैं ? अहो गौतम ! नारकी सारंभी वं सपरिग्रही हैं. 'अहो भगवन् ! किस कारन से नारकी सारंभी पपरिग्रही हैं -? अहो गीतम.! नारकी पृथ्वी काया का यावत् त्रस काया पांचवा शतकका सातवा उद्देशा भावार्थ ७०६ पर अनुवादक-पालबमनारी मुनि श्री अमोलक आपनी शब्दार्थो शेप पूर्ववत् ॥ ७॥ ए. कंपने वाले द० द्रव्य स्थान का आ० आयुष्य खे० क्षेत्र स्थान आयुष्य ओ० अवगाहना स्थान आयुष्य भा० भाव स्थान आयुष्य में से क० कौन जा. यावत् वि० विशेपाधिक गोल असंखेनकालं असद्दपरिणयस्सणं भंते ! पोग्गलस्स अंतरं कालओ केवचिरंहोइ ? सत्र गोयमा ! जहण्णेणं एगं समयं उक्कोसणं आवलियाए असंखेजइ भागं, ॥ ७ ॥ एयस्स. भंते ! दवट्ठाणाउयस्स, खेत्तट्ठाणाउयम्स, ओगाहणट्ठाणाउयस्स, भावट्ठाणा भावाय मदेशावगाही स्थिर. पुद्गल तक का जानना. ऐसे ही वर्ण, गंध, रस स्पर्श व सूक्ष्म परिणत पुद्गलों का जानना. शब्द परिणत का अंतर जघन्य एक समय उत्कृष्ट असंख्यात काल का और अशब्द परिणत पुद्गलो. का नयन्य एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यात वा भाग का जाननाः ॥ ७ ॥ अहो. भगवन् ! ट्रेव्य स्थान की स्थिति, क्षेत्र स्थान की स्थिति. अवगाहना स्थान की स्थिति, व भाव स्थान की स्थिति में से १ द्रव्य सो पुग़ल द्रव्य, स्थान सो भेद और आयु सो स्थिति. अर्थात् पुल परमाणु द्विप्रदेशी स्कंधादिक की स्थिति अथवा द्रव्यका उसी भव में अबस्थान रूप रहना सो द्रव्यस्थान आयुष्य: २ क्षेत्रस्थान आयुष्य एक आकाश प्रदेश में जितने कालतक पुद्गल अवस्थित, पने रहे सो क्षेत्रस्थान आयुष्य. ३ जितने आकाश प्रदेश में पुद्गल अवगाहे उतने ही पुद्गल अन्य स्थान अवगाहे इस की स्थिति सो अवगाहन स्थान आयुष्य ओर ४ भाव सो कालादि के भेद की स्थिति. प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * - पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) 82803 8 पांचवा शतकका सातवा उद्देशा ब्दार्थ, गौतम स० सब से यो० थोडे खे० क्षेत्र स्थान का आयुष्य ओ० अवगाहना स्थान का 'आयुष्य · अ०१ असंख्यात गुना द द्रव्य स्थान असंख्यात गुना भा. भाव स्थान असंख्यात गुने ॥ ८ ॥ ने नारकी कि क्या सा आरंभ सहित स० परिग्रह सहित उ० अथवा अ० अनारंभी अ० अपरिग्रही गो गीतम ७०७ ने नारकी सा० सारंभी स० सपरिग्रही नोक नहीं अ० अनारंभी अ० अपरिग्रही से. अथ के कैसे गोल उयस्स कयरे २ जाव विसेसाहिया ? गोयमा ! सव्वत्थोवे खेत्तट्ठाणाउए. ओगा- हणट्ठाणांउए असंखेजगुणे, दवट्ठाणाउए असंखेजगुणे, भावट्ठाणाउए असंखेजगुणे ।। खेत्तोंगाहंणदब्वे भावट्ठाणाउयंच अप्पवहुं-खेत्ते सव्वत्थोवे सेसाहाणा असंखेजगुणा ॥ ८ ॥ नेरइयाण मंते. ! किं सारंभा सपरिग्गहा, उदाहु अणारंभा अपरिग्गहा ? गोयमा ! नेरइया सारंभा सपरिग्गहा, नो अणारंभा अपरिग्गहा ॥ सेकेणटेणं जावं भावार्थ- कौन किस से अल्प, वहुत व विशेषाधिक है ? अहो गौतम ! सब से थोडा क्षेत्र स्थान का आयुष्य, उस से अवगाहना स्थान का आयुष्य असंख्यात गुना, उस में द्रव्य स्थान का आयुष्य ' असंख्यात गुना और उस से भार स्थान का आयुष्य असंख्यात गुना. ॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! क्या नारकी सारंभी सपरिग्रही हैं ? अथवा अनारंभी अपरिग्रही हैं ? अहो गौतम ! नारकी सारंभी वं सपरिग्रही हैं. 'अहो' भगवन् ! किस कारन से नारकी सारंभी अपरिग्रही हैं..? अहो गौतम ! नारकी पृथ्वी काया का यावत् बस काया 4 - १४ अनुवादक-वालप्रमानारी मुनि श्री अमोलक शार्पनी के शब्दार्थी शिप पूर्ववत् ॥ ७॥ ए० कंपने वाले द० द्रव्य स्थान का आ० आयुष्य खे० क्षेत्र स्थान आयुष्य ओक अवगाहना स्थान आयुष्य भा० भाव स्थान आयुष्य में से क० कौन जा० यावत् वि. विशेषाधिक गो. सत्र असंखेजकालं असद्दपरिणयस्सणं भंते ! पोग्गलस्स अंतरं कालओ केवचिरंहोइ ? गोयमा ! जहण्णेणं एगं समयं उक्कोसणं आवलियाए असंखेज्जइ भागं, ॥ ७ ॥ एयस्स. भंते ! दवट्ठाणाउयस्स, खेत्तट्ठाणाउयम्स, ओगाहणट्ठाणाउयस्स, भावट्ठाणा भावा प्रदेशावगाही स्थिर पुद्गल तक का जानना. ऐसे ही वर्ण, गंध, रस स्पर्श व सूक्ष्म परिणत पुद्गलों का जानना. शब्द परिणत का अंतर जघन्य एक समय उत्कृष्ट असंख्यात काल का और अशब्द परिणतः पुद्गलों का नपन्य एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यात वा भाग का जाननाः ॥ ७॥ अहो. भगवन् ! देव्य स्थान की स्थिति, क्षेत्र,स्थान की स्थिति. अवगाहना स्थान की स्थिति, व भाव स्थान की स्थिति में से १ द्रव्य सो पुद्गल द्रव्य, स्थान सो भेद और आयु सो स्थिति. अर्थात् पुरल परमाणु द्विप्रदेशी स्कंधादिक की रिति अथवा द्रव्यका उसी भव में अवस्थान रूप रहना सो द्रव्यस्थान आयुष्य. २ क्षेत्रस्थान आयुष्य एक आकाश प्रदेश में जितने कालतका पुद्गल अवस्थित, पने रहे सो क्षेत्रस्थान आयुष्य. ३ जितने आकाश प्रदेश में पुद्गल अवगाहे उतने ही पुद्गल अन्य स्थान अवगाहे -इस की स्थिति सो अवगाहन स्थान आयुष्य और ४ भाव सो कालादि के भेद की स्थिति. प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालामसांदजी * Gan दार्थ मनुष्यणा ति तियय ति.तियंचणियों प० परिग्रहीत भः होते हैं ए. ऐसे आ• आसन स०, शयन भंमांडे म० पात्र उ उपकरण प० परिग्रहीत ए० ऐसे जा० यावत् २० स्थनित कुमार ॥१०॥ ए० एफेन्द्रिय ज जैसे ने नारकी ॥ ११ ॥ ३० द्विइन्द्रिय भं० भगवन् वा बाह्य भं० भंड २० पात्र उ० मणूसा-मणनीओ-तिरिक्खजोणिया - तिरिक्खजोगिणीओ - परिग्गहियाओ भवंति ॥ आसण सयण भंडमत्तोवगरणा परिग्गहिया भवति, सचित्ताचित्तमी- सयाई दवाइं परिग्गहियाई भवंति से तेण?णं तहेव, एवं जाव थणियकुमारा ॥ १० ॥ एगिदिया जहा नेरइया ॥ ११ ॥ बेइंदियाणं भंते ! किं सारंभा सपरि- गगहा तंव जाव सरीरा परिग्गहिया भवंति, बाहिरिया . भंडमत्तोवगरणापरिग्गहिया सूत्र 23-90 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मूत्र 380- 388 पांचवा शुनक का सातवा उद्देशा भावाथ तिर्यंच, तिर्यंचणियों का परिग्रह होता है, जैसे ही आसन, शयन, भंड, पान, उपकरण, सचित्त अचित्त व मील द्रव्य का परिग्रह होता है इसलिये बेसारंभी सपरिग्रही कहलाते हैं. ॥ १० ॥ एके- न्द्रिय का अधिकार नारकी जैसे कहना ॥२१॥ द्वीन्द्रिय तीइन्द्रिय व चतुरेन्द्रिय को शरीर, कर्म व बाह्य भंड, पान उपकरण वैसे ही सचित्त अचित्त व मीश्र द्रव्यका परिग्रह होता है इसलिये वे सारंभी व सप-800 रिग्रही कहावे हैं ॥ १२ ॥ अहो भगवन ! क्या तिर्यंच पंचेंद्रिय सारंभी सपरिग्रही है? अहो गौतम yo शम्दार्थ सूत्र 1. अनुवादक-कालप्रमचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीनी गौतम ने मारकी पु० पथ्वी काया का स० आरंभ करते हैं जा० यावत् त. अस काया का. स० आरंभ करते हैं स: शरीर परिग्रही भ० होते हैं क. कर्न प० परिग्रह वाले भ. होते हैं। स० सचित अ० अचित्त भी मीश्र द० द्रव्य प. परिग्रहीत भ० होते हैं ते. इसलिये ॥ ९ ॥ अ० अमुरकुमार भ० भगवन् भ० भवन के प. परिग्रहवाले दे. देव दे० देवियों म० मनुष्य म० अपरिग्गहा ? गोयमा ! नेरइयाणं पुढविकायं समारभंति, जाव तसकाय समारभंति, सरीरा परिग्गहिया भवंति, कम्मा परिग्गहिया भवंति सचित्ताचित्तमीसयाई दवाइं परिग्ग हियाई भवति । सेतेणं तं चैव ॥९॥ असुरकुमाराणं भंते ! कि सारंभा पुच्छा ?. गोयमा ! असुरकुमारा सारंभा संपरिग्गहा नो अणारंभा अपरिगहा, से केणटेणं ? गोयमा ! असुरकुमाराणं पुढविकायं समारभंति जाव, तसकायं समारभंति ॥ सरीरा परिग्गहिया भवंति, कम्मा. परिग्गहिया. भवंति, भवणा परिग्गहिया भवंति, देवा-देवीओ का आरंभ करते हैं. नारकी को शरीर, कर्म, सचित्त, अचित्त व मीश्र द्रव्य का परिग्रह होता है इसलिये सारंभी व मपरिग्रही हैं ॥ ९॥ अहो भगवन् ! असुरकुमार जाति के. देव क्या सारंभी सपरिग्रही हैं ? अहो गौतम ! असुरकुमार सारंभी सपरिग्रही हैं क्योंकी असुरकुमार । पृथ्वीकाय यावत् प्रमकाया का आरंभ करते हैं और उन को शरीर कर्म, भवन, देक, देवियों, मनुष्य, मनुष्यणियों, * मकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायनी ज्वालाप्रसादजी * शब्दार्थ ७११ सूत्र 88- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 9982% कारी स्थान चि० क्यारे के आकार वाले स्थान अ० कूप त० तलाव द० द्रह न० नदी वा० वावि पु. पुष्करणी दी० लम्बी वावि गुं० चक्राकार वापि स० सरोवर स० सरोवर की पं० पंक्ति स० छोटे तलावों की पंक्ति वि.विल पंक्ति आ० खेलने का बगीचा उ० उद्यान का० वन व० वन १० वनखंड ओ, परिग्गहियाओ भवंति, आरामुजाण-काण्णा-वणा-यणखंडा वणराईओ-परिग्गहिया- ओ भवंति ॥ देवउल-सभ-पव्व-थूभ-खाइय- परिखाओ-परिग्गहियाओ भवंति, पागार हालग-चरिय-दार-गोपुर-परिग्गहिया भवंति, पासाय-घर-सरण-लेण-आवण-परिग्गहि- या भवंति, सिंघाडग-तिग-चउक्क-चच्चर-चउम्मुह-महापह-पहा-परिंग्गहिया भवंति, तालाव, तालाब की पंक्ति, छोटे तालाव, छोटे तालाव की पंक्ति, विलों की पंक्ति, आमि, उद्यान, कानन वन, वनखंड, वनराजी, देवालय, सभा स्थान, पर्वत, स्तूप, खाई, परिखां, कोट, कोट की उपर के अटारी, चरिको, द्वार, गोपुर, प्रासाद, गृह, तृणका गृह, आश्रय स्थान, दुकान. शृंगाटकके आकार का मार्ग, ४ जिस में दपत्यादि क्रीडा करते हैं उसे आराम कहते हैं. ५३ उत्सवों के प्रसंग में बहुत जनों को भोग्य पुष्पवाले वृक्षा जिस मे रहे हुवे हावे ६ नगर की पास का वन. ७ नगर से बहुत दूर का वन ८ एक जाति के वृक्ष समुहवाला स्थान ९ वृक्ष की पक्ति १० ऊंचे नीचे सब स्थान सरिखी ११ गृह के कोट में हस्ती प्रमुख को जाने का द्वार. * पांचवा शतक का सातवा उद्देशा 988-89 भावार्थ जा ७१० * अनुवादक-पालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक अपिजी शब्दार्थ उपकरण प० परिग्रहीत भ० होते हैं एक ऐसे जा. यावत् च. चतुरेन्द्रिय ॥ १२ ॥ पं० पंचेन्द्रिय ति० तियच नं० वैसे जा. यावत् क० कर्म परिग्रहीत टं० छेदेहुए पर्वत कू० शिखर से मुं० मुण्ड पर्वत सि. सि. शिखर वाले पर्वत प० किंचित् नमे हुवे ज• जल थ० स्थल वि० बिल गु० गुफा ले. उत्कीर्ण पर्वत गृह उ० पानी नीचे पड़ने का स्थान नि० झरने के स्थान चि० कीचड मीश्रित जल स्थान १० आनंद भवति. सचित्ताचित्त जाव भवंति, एवं जाव चउरिंदिया ॥ १२ ॥ पंचिंदियति- • रिक्खजोणियाणं भंते ! तंचेव जाव कम्मापरिग्गहिया भवति, टंका-कूडा-सेला- सिहरी-पभारा-परिग्गहिया भवंति, जल-थल-बिल-गुह-लेणा-परिग्गहिया भवंति, उज्झर-निझर-चिल्लल-पलूल-चिप्पिणा-परिग्गहिया भवंति, अगड-तडाग-दह-नदीओ- वावी-पुक्खरिणी-दीहिया-गुजालिया-सरा-सरपंतियाओ सरसरपंतियाओ, · बिलपंतिया- तियच पंचेन्द्रिय पृथ्वीकाय यावत् त्रास काया का आरंभ करते हैं. उन को शरीर, कर्म का परिग्रह रहाहुवा है. टंके, फूटे, रोले; शिखर व किंचित् नमे हुरे शिखर का परिग्रह रहा हुवा है. जलस्थान, स्थलस्थान, विल, गुफा व आश्रय स्थान का परिग्रह रहा हुवा है, पर्वत के झरणे, निर्झरणे, कीचड, प्रल्हादक स्थान क्यारे का परिग्रह रहा हुवा है. सूत्र, तालाव, नदी, वापि, पुष्करणी, दीपिका, चक्राकार वापि, बडे १ छिनरंकाः टांके २ शिखराणि हस्त्यादि बंधनस्थानानिया ३ मुण्ड पर्वत. प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी * वार्थ शब्दार्थ ou 8.9 ७१३ सूत्र ATS8 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 38 (जैसे ति० तिर्यंच त० तेसै म० मनुष्य भा० कहना ॥ १४ ॥ वा० वाणव्यंतर जो० ज्योतिपी वे० वैमा- ०निक ज. जैसे भ० भवनवासी त० तैसे ने० जानना ॥ १५ ॥ पं० पांच हे० हेतु प० कहा तं० यह ज. तिरिक्ख जोणिया तहा मणुस्सावि भाणियव्वा ॥ १४ ॥ वाणमंतर जोइसिय वे. माणिया जहा भवणवासी तहा नेयव्वा ॥ १५ ॥ पंचहेऊ. पण्णत्ता, तंजहा-हेडं जाणइ, हेउं पासइ, हेउं बुज्झइ, हेउं अभिसमागच्छइ, हेडं छउमत्थमरणं मरइ पंचहेऊ पण्णत्ता तंजहा हेउणा जाणइ जाव हेउणा छउमत्थमरणं मरइ । पंचहे. पण्णत्ता, तंजहा-हेउं न जाणइ जाव हेडं अण्णाण मरणं मरइ, पंचहेऊ पण्णता, वाणव्यंतर, ज्योतिपी, व वैमानिक को भवनपति जैसे कहना. ॥ १५ ॥ जो परिग्रही होते हैं वे छद्मस्थ होते हैं और छमस्थ हेतुसे जानते हैं इसलिये आगे हेतुका प्रश्न पुछते हैं. हेतु पांच प्रकार के कहे हैं. १ हेतु जानते हैं अर्थात् साध्य निश्चयार्थ के लिये जानते हैं २ सामान्यता से जानते हैं३ सम्यक् प्रकारसे श्रद्भते हैं४ हेतु में प्रवर्ते और५ हेतु छद्मस्थ मरण मरे. और पांच प्रकार के हेतु कहे हैं. हेतु से जाने यावत् । हेतु से छद्मस्थ मरण मरे. पांच हेतु-हेतु को जाने नहीं यावत् हेतु अज्ञान गरण मरे. पांच हेतुकहे-हेतुसे जाने नहीं यावत् हेतु से अज्ञान मरण मरे. पांच अहेतु कहे हैं अहेतु जाने यावत् अहेतु केवली मरण मरे. * पांचया शतक का सातवा उद्देशा भावाथे| yo शब्दार्थ ७१२ • अनुवादक-बालग्रामचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 85 क. वृक्ष की पंक्ति दे देवालय स० सभा १० पर्वत थू० स्तूभ खा० खाइ ५० उपर नीचे सम आकार वाली खाई पा. प्राकार अ० अटारी च० चरिका दा० द्वार गो० गोपुर पा० महेल घ० गृह स० शरण ले० स्थानक आ० दुकानों मि० श्रृंगारक स्थान ति० तीन रस्ता मीले च० चौक च० चचर च० चतुर्म चम राजमार्ग प. मार्ग स. शकट २० रथ जा० यान ज०. घोंसलं गि० अंबांडी थि. ऊंटका पलाण मी. पालखी सं० छोटी गाडी लो० तवा क० कडाई क० कुल्छी भ० भवन शेप पूर्ववत् ॥ १३ ॥ ज० सगड-रह-जाण-जुग्ग-गिल्लि-थिल्लि-सीय-संदमाणियाओ-परिग्गहियाओ भवंति, लोही- लोहकडाह-कडुच्छुया-परिग्गहिया भवंति, भवणा परिग्गहिया भवति, देवा-देवीओ- मणुस्सा-मणुस्सीओ-तिरिक्खजोणिया - तिरिक्खजोणिणीओ-आसण-सयण-खंभ-भंड- सचित्ता-चित्त-मीसयाई दव्याइं परिग्गहियाई भवंति, से तेणटेणं ॥ १३ ॥ जहा तीन रस्ते मीले वैसा मार्ग, चौक, चचर, चार मुखवाला मार्ग, सन्धमार्ग, शकट, रथ, विमान, धूमरा, भवाडी, उंटका पलाण, पालखी, छोटीगाडी, तवा, छोटीकडाई, कुडछी, भुवन, रंव, देघी, मनुष्य, मनुष्यणी, नियंच, तिर्यंचणी, आसन, शयन, स्थंभ, भंड, सचित्त, अचित्त, व मीश्र द्रव्यका परिग्रह रहा है इसीसे तियेच मपरिग्रही व सारंभी कहाते हैं ॥ १३ ॥ ऐसे ही मनुष्य का जानना. ॥ १४ ॥ * प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * नावार्थ 50 शब्दार्थ सूत्र ७१७ - पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र 8888 अ० अर्थ सहित अ० मध्य रहित अ० प्रदेश रहित अ० आर्य ना. नारद पुत्र अनगार निः निर्घन्धी अजो तंचेव ॥ तएणं से नारयपुत्ते अणगारे नियंठिपुत्तं . अणगारं एवं बयासी.. दव्वादेसेणवि मे अजो सन्त्र पोग्गला सअड्डा समज्झा सपएसा, णो अणडा अम: ज्झा अपएसा, खेत्ताएसणवि, कालाएसेणवि भावाएसेण ॥ तएणं से नियंठिपुत्ते अणगारे नारयपुत्तं अणगार एवं घयासी जइणं अजो दयाएसणं सव्व पोग्गला सअड्डा, समझा, सपएसा, णो अणड्ढा अमज्झा, अपएसा. एवं ते परमाणु पोग्गलेवि सअड्डे समझे सपएसे णो अणड्डे अमज्झे अपएसे जइणं अजो खेत्ताए- सेणवि सव्व पोग्गाला सअड्डा समझा सपएसा जाब एवं ते एग पएसेगाढेवि पो. ग्गले सअड्ढे, समझे, सपएसे ॥ जइणं अज्जो कालाएसेणं सव्व पोग्गला सअट्ठा कि अहो आर्य : द्रव्यादेश से, क्षेत्रा देश से, कालादेश से व भावादेश से सब पल अर्थ, मध्य व प्रदेश सहित हैं. फीर निर्ग्रन्थी पुत्र अनगारने नारद पुत्र अनगार को ऐसा कहा कि अहो आर्य ! जब द्रव्या देश से सब पुद्गल अर्थ, मध्य व प्रदेश वाले हैं तब परमाणु पुद्गल भी अर्ध, मध्य व प्रदेश वाले होवे, जप क्षेत्रा देश से सब पुद्गल अर्थ मध्य व प्रदेश काले हैं तब एक प्रदेशावगाडी पुद्गल अर्थ, मध्य व प्रदेश साहित होये. जब कालादेश से सब पुद्गल अर्थ, मध्य व प्रदेश वाले हैं नव एक समय की स्थिति वाले 38 पांचवा शतक का आठया उद्देशा 83><SPAN भावार्थ शब्दार्थ सून ७१.६ है अनुवादक-वालबह्मचारी मुनि श्री अमोल्फ पिगी 83 नारद पुत्र ते० तहां उ० आये उ० आकर ना० नारद पुत्र अ० अनगार को ए. ऐसा व कहा सर सर पो० पुदल अ० आर्य किं. क्या स० अर्ध सहित स० मध्य सहित ल० प्रदेश सहित उ० अथवाई अणगारे जेणेव नारयपुत्ते अणगार तेणेव उवागच्छइ उवागच्छइत्ता, 'नारयपुत्तं अणगारं एवं क्यासी-सव्वे पोग्गलत्ति अजो कि सअड्डा समझा सपएसा उदाहु अणड्डा अमझा अपएसा ? अजोत्ति नारयपुत्ते अणगारे नियंठिपुत्तं अणगारं एवं वयासी सब्वे पोग्गला मे अजो सअड्डा समझा सपएसा, नो अणड्ढा अमज्झा अपएसा । तएणं से नियंठिपुत्ते अणगारे नारयपुत्तं अणगारं एवं बयासी जइण ते अजो ! सब्वे पोग्गला सअड्डा समझा, सपएसा, नो अणड्डा अमज्झा अपएसा; किं व्वादेसेणं अनो! सव्व पोग्गलां सअड्डा तहेव चेव, कालादेसेणं तंचेव, भावादेसेणं विचरते थे ॥ २ ॥ उस समय में निर्ग्रन्थी पुत्र अनगार नारदपत्र अनगार की पास आकर ऐमार बोले की अहो आर्य ! सब पुद्गलों क्या अर्ध, मध्य व प्रदेश सहित हैं अथवा अथवा अर्ध, पथ्य व प्रदेश रहित हैं? नारद पुत्र अनगार निग्रन्थी पुत्र अनगार को ऐसा बोले कि अहो आर्ग ! सब पुद्गल मेरे अभिप्राय से अर्थ, मध्य व प्रदेश सहित हैं. उस समय में निर्ग्रन्थी पुत्र अनगारने नारद पुत्र को कहा कि अहो आर्य! जब तुम्हारे आभिप्राय से सत्र पुद्गल अर्ध, मध्य व प्रदेश सहित हैं तव क्या ने द्रव्यादेश से अर्थ पध्य व प्रदेश सहित हैं, क्षेत्रादेशसे, काला देश से या भावादेश से हैं ? तव नारद पुत्रने उत्तर दिया * प्रकाशक-राजाबहादुर लांला मुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी * धि . 445 दिदा सुन. ७१.२ भावार्थ 2 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती) सूत्र 88 23 पांचवा शतक का आठवा उद्देशा सहित स० मध्य सहित स० प्रदेश सहित ज. यदि दे० देनानुप्रिय न० नहीं गि० खेदिन होवे प० कहने ए ॥ ३ ॥ तएणं से नियंठिपुत्ते अणगारे नारयपुत्तं अणगारं एवं बयासी दवा एसेणवि अजो ! सव्व पोग्गला सपएसावि अपएसावि अणंता, खेत्ताएसेणवि एवं चेव, कालाएसेणवि. भावाएमेणवि एवं चेव । जे दयओ अपएसे, से खेत्तओ नियमा अप- से इस का अर्थ सुनने को इच्छता हूं ॥ ३ ॥ तर निग्रन्थी पुत्र अनगारने नारदपुत्र को ऐसा कहा कि अहो आर्य ! द्रव्य, क्षेत्र, काल व भावादेश से सब पुद्गलों प्रदेश सहित भी हैं व प्रदेश रहित है क्योंकि इसमें द्विपदेशात्मकादि स्कंध व परमाणु पुद्गल रहे हुये हैं और ये अनंत हैं. क्षेत्रादेश से आकाश के द्विपदेशी स्कंध को अवगाहकर रहनेवाले पुद्गल सम्रदेशी हैं और एक आकाश प्रदेशावगाही पुद्गल अमदेशी हैं. काल से दो तीन वगैरह समय की स्थितिवाले पुद्गल समदेती हैं और एक समय की स्थिति वाले पुद्गल अप्रदेशी हैं, भाव से दो तीन वगैरह गुनकाले द्रव्य सप्रदेशी हैं और एक गुनकाला द्रव्य अमदेशी है, जो द्रव्य से अपदेशी होते हैं वे क्षेत्र से निश्चयही अमदेशी होते हैं क्यों की द्रव्य से अप्रदेशी भूल परमाणु पुगल एक प्रदेशावगाही होता है. काल से क्वचित् समदेशी होता है, यचित् अमदेशी होता गदि वह परमाणु एक समय की स्थितिवाला होये तो अपदेशी और अनेक समय की स्थिति वाला होने तो समदेशी. भाव से भी क्यचित् समदेशी व क्वचित् अप्रदेशी हैं क्यों कि जो एक गुनकालादि है वह oya Bra ७१८ का अनुवादक-यालयमचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 87 शब्दार्थ पुत्र अ० अनगार को ए. ऐसा व० बोले स० सर्व पो• पुद्गल मे० मरे मत में अः आर्य स. अर्थ समझासपएसा,एवं तेएग समय ठिईएवि पांग्गले सअवे समझे सपएसे तंचेवाजइणंअजो सुत्र भावाएसेणं सव्व पोग्गला सअड्डेइ एवं एक गुणकालएरावेपोग्गले सअढे समझे सपएसे तंचेवाअहते एवं नभवंति तो ज वयारी दवाएसेवि सव्व पोगला सअट्ठा समझा सप- एसा नोअणट्ठा अमझा अपएसा एवं खेत्ताएसेणवि, कालाएसेणवि, भावाएसेणवि तण्णं 'मिच्छा ॥ तएणंसे नारयपुत्ते अणगारे लियंठिपुत्तं अणगारं एवं क्यासी नो खलु एवं देवाणुप्पिया एयमटुं जाणामो पासामो ॥ जइणं देवाणुप्पिया नो गिला- यंति परिकहित्तए तं इच्छामिणं देवाणुप्पियाणं अंतिए एयमटुं सोचा निसम्म जाणित- पुगल भी अर्थ, मध्य व प्रदेश वाले होवे और जब भावादेशले सव पुद्गल अर्थ, मध्य व प्रदेश वाले हैं. नब एक गुन काला पुंगल भी अर्ध, मध्य व प्रदश वाला होवे. परंतु ऐमा नहीं है. इसलिये द्रव्यादेश. क्षेत्रादेश से, कालादेश से व भावा देशसे सवं पुदल अर्थ, मध्य व प्रदेश वाले हैं.ऐसा जो तुम कहते हो वह मिथ्या है. तब नारद पुत्र अनगार निग्रन्थी पुत्र अनगार को ऐसा बोले कि अहो देवानुप्रिय । मैं इसका अर्थ नहीं जानता हूं, इमलिये यदि आपको कहने में किसी प्रकारका खेद न होवे तो मैं आपकी पास * प्रकाशक राजावहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * 30 ७१.२ * पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती ) सूत्र 888 शब्दाथ महित स० मध्य सहित स० प्रदेश सहित ज. यदि दे० देनानुपिय न० नहीं गि० खेदिन होवे प० कहने। ए ॥ ३ ॥ तएणं से नियंठिपुत्ते अणगारे नारयपुत्तं अणगारं एवं वयासी दव्या सूत्र. एसेणवि अजो ! सव्व पोग्गला सपएसावि अपएसावि अणंता, खेत्ताएसेणवि एवं चेव, कालाएसेणवि. भावाएमेणवि एवं चेव । जे दव्यओ अपएसे, से खेत्तओ नियमा अप- भावार्थ इस का अर्थ सुनने को इच्छता हूं ॥ ३ ॥ तब निग्रन्थी पुत्र अनगारने नारदपुत्र को ऐसा कहा कि अहो आर्य ! द्रव्य, क्षेत्र, काल व भावादेश से सब पुद्गलों प्रदेश सहित भी हैं व प्रदेश रहित हैं क्योंकि इसमें द्विपदेशात्मकादि स्कंध व परमाणु पुद्गल रहे हुने हैं और वे अनंत हैं. क्षेत्रादेश से आकाश के द्विपदेशी स्कंध को अवगाहकर रहनेवाले पुद्गल सप्रदेशी हैं और एक आकाश प्रदेशावगाही पुद्गल अप्रदेशी हैं. काल से दो तीन वगैरह समय की स्थितियाले पुद्गल सप्रदेशी हैं और एक समय की स्थिति वाले पुदगल अपदेशी हैं, भाव से दो शान वगैरह गुनकाले द्रव्य सप्रदेशी हैं और एक गुनकाला द्रव्य अप्रदेशी है, जो द्रव्य से अपदेशी होते हैं वे क्षेत्र से निश्चयही अपदेशी होते हैं, क्यों की द्रव्य से अमदेशी परमाणु पुद्गल एक प्रदेशावगाही होता है. काल से क्वचित् सप्रदेशी होता है, क्यचित् अमदेशी होता है, यदि वह परमाणु एक समय की स्थितिवाला हो तो अप्रदेशी और अनेक समय की स्थिति चाला होवे तो सप्रदेशी. भाव से भी क्वचित् सपदेशी व क्वचित् अप्रदेशी हैं क्यों कि जो एक सुनकालादि है वह Pा पांचवा शतक का आठवा उद्देशा 988- ein 60 Syo ७२० Kira अनुरादक शलग्रामचारीमुनि श्री अमोलक शापिनी शब्दार्थको त० इसलिये इ० इच्छता हूं दे० देवानुपिय की ० पास ए• यह सो० सुनकर के नि० अवधारकर सन एसे; कालओ सिय सपएसे सिय अपएसे, भावओ सिय सपएसे सिय अपएसे ॥ जखेत्तओ.अपएसे से दव्यओ सिय सपएसे सिय अपएसे, कालओ भयणाए, भाव ओ भयणाए, जहा खेत्तओ एवं कालओ, भावओ, ॥ जे दवओ सपएसे से खत्सओ सिय सपएसे सिय अपएसे, एवं कालओ भावओघि, ॥ जे खेत्तओ सपएसे से भावार्थ भप्रदेशी और अनेक गुनकालादि है वह सप्रदेशी है. जो क्षेत्रसे अप्रदेशी है-एक आकाशप्रदेशावगाही है यह द्रव्यसे क्वचित् समदेशी व क्वचित् अमदेशी है। क्योंकि एक परमाणु भी एक आकाशपदेशाव ग्राही होता है और अनेक परमाणु भी एक आकाश प्रदेशावग्राही होता है. वैसे ही क्षेत्र से अप्रदेशी पुगलों की काल से व भाव से अप्रदेशी की भजना रहती है, क्यों कि एक आकाश प्रदेशावत्राही पुद्गल एक समय व अनेक समय की स्थिति वाला होथे वैसे ही एक गुनकाला च अनेक गुनकाला भी होवे. जसे क्षेत्र का आलापक कहा वैसे ही काल व भावका जानना. जो द्रव्य से सप्रदेशी है वह क्षेत्र से क्वचित् मप्रदेशी व अपदेशी होता है क्योंकि द्विपदेशात्मकादि स्कंध एक प्रदेश व अनेक प्रदेशावगाही हो मकने हैं वैसे ही वे काल व भाव में भी क्वचित् सप्रदेशी व क्वचित् अप्रदेशी हैं. जो क्षेत्र से राप्रदेशी ४ वे द्रव्य से नियमा समदेशी होने. हैं क्योंकि अनेक प्रदेशावग्राही अनेक पुगलों होते हैं. काल * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायनी ज्यालाप्रसादजी * ७२१ 8 पंचमात विवाह पश्यति (भगवदी ) सूत्र - दवओ नियमा सपएसे, कालओ भयणाए, भावओ भयणाए, जहा दबओ तहा कालओ, भावओवि॥४॥एएसिणं भंते ! पोग्गलाणं दव्वादेसेणं खेत्तादेसेणं,कालादेसेणं, भावादेसेणं सपएसाणं अपएसाणय कयरे कयरे जाव विसेसाहिया वा ? नारय- पुत्ता! सव्वत्थोवा पोग्गला भावादेसेणं अपएसा, कालादेसेणं अपएसा, असंखजगुणा दव्यादसेणं अपएसा असंखेजगुणा, खेत्तादेसेणं अपएसा असंखेजगुणा, खेत्तादेसेणं घेव सपएसा असंखजगुणा, दवादेसेणं सपएसा विसेसाहिया, कालादेसेणं सपए- व भाव में मजना होती है अर्थात् क्वचित् समदेशी है व वाचित अमदेशी है. जैसे द्रव्य का आला- एक कहा पैसे ही काल व भाव का जानना. अर्थात् जो काल से समदेशी है यह द्रव्य क्षेत्र में भाव से ममदेशी अमदेशी है और जो भाव से समदेशी है वह द्रव्य क्षेत्र व काल से समदेशी अनदेशी दोनों है।॥४॥ अहो पूज्य ! इन द्रव्यादेश, क्षेत्रादेश, कालादेश व भावादेश से समदेश व अमदेश में कौन किस से 30 अल्प, बहुत यावत् विशेषाधिक हैं ? अहो नारद पुत्र ! सब से थोडे भावादेश से अभदेशी, कालादेशसे अप्रदेशी असंख्यात गुने, द्रव्यादेश से अमदेशी असंख्यात गुने, क्षेत्रादेश से अप्रदेशी असंख्यात गुने, क्षेत्रादेश से समदेशी असंख्यात गुने, द्रव्यादेश से सप्रदेशी शेपाधिक, कालादेशले समदेशी विशेषाधिक, पांचवा शतकका आठवा उद्दमा अवार्थ oru ७२० म भनुसादन-बानमनाना मुाने श्री अमोलक पिनी है। शब्दार्थ को तं० इसलिये इ० इच्छता हूं दे. देवानुप्रिय की अं० पास ए• यह सो० सुनकर के नि० अवधारकर सूब एसे; कालओ सिय सपएसे सिय अपएसे, भावओ सिय सपएसे सिय अपएसे ॥ जखेत्तओ अपएसे से दवओ सिय सपएसे सिय अपएसे, कालओ भयणाए, भाव ओ भयणाए, जहा खेत्तओ एवं कालओ, भावओ, ॥ जे व्वओं सपएसे से खत्सओ लिय सपएसे सिय अपएसे, एवं कालओ भावओधि, ॥ जे खेत्तओ सपएसे से भार्य भमदेशी और अनेक गुनकालादि है वह सप्रदेशी है. जो क्षेत्रसे अप्रदेशी है-एक आकाशमदेशावगाही २ वह द्रव्यसे क्यचित् सप्रदेशी व क्वचित् अमदेशी है; क्योंकि एक परमाणु भी एक आकाशप्रदेशाव ग्राही होता है और अनेक परमाणु भी एक आकाश प्रदेशावग्राही होता है. वैसे ही क्षेत्र से अप्रदेशी पुदलों की काल से व भाव से अप्रदेशी की भजना रहती है, क्यों कि एक आकाश मदेशावनाही पुद्गल एक ममय य अनेक समय की स्थिनि वाला होये वैसे ही एक गुनकाला व अनेक गुनकाला भी होवे. मरे क्षेत्र का लापक कहा वैसे ही काल व भावका जानना. जो द्रव्य से सप्रदेशी है वह क्षेत्र से क्याचित् ममदेशी च उपदेशी होता है क्योंकि द्विपदेशात्लकादि स्कंध एक प्रदेश व अनेक प्रदेशावगाही हो महने । वैसे ये काल व भाव मे भी क्वचित् सप्रदेशी व क्वचित् अप्रदेशी हैं. जो क्षेत्र से सप्रदेशी १वे द्रव्य मे नियना सप्रदेदी होने हैं क्योंकि अनेक प्रदेशावग्राही अनेक पुद्गलों होते हैं. काल * प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी * 'सत्र ७२१ 8. पंचमाङ्ग विवाह पण्णात्त (भगवती ) सूत्र 3987- दवओं नियमा सपएसे, कालओ भयणाए, भावओ भयणाए, जहा दबओ तहा कालओ, भावओवि॥४॥एएसिणं भंते ! पोग्गलाणं दव्वादेसेणं खेत्तादेसेणं,कालादेसेणं, भावादेसेणं सपएसाणं अपएसाणय कयरे कयरे जाव विसेसाहिया वा ? नारय- पुत्सा! सव्वत्थोवा पोग्गला भावादेसेणं अपएसा, कालादेसेणं अपएसा, असंखजगुणा दव्यादसेणं अपएसा असंखेजगुणा, खेत्तादेसेणं अपएसा असंखेजगुणा, खेत्तादेसेणं घेव सपएसा असंखजगुणा, दव्वादेसेणं सपएसा विसेसाहिया, कालादेसेणं सपए- व भाव में मजना होती है अर्थात् क्वचित् सप्रदेशी है व काचित: अप्रदेशी है. जैसे द्रव्य का आला- पक कहा वैसे ही काल व भाव का जानना. अर्थात् जो काल से समदेशी है वह द्रव्य क्षेत्र व भाव से ममदेशा अमदेशी है और जो भाव से समदेशी है वह द्रव्य क्षेत्र व काल से समदेशी अप्रदेशी दोनों है।।४॥ अहो पूज्य ! इन द्रव्यादेश, क्षेत्रादेश, कालादेश व भावादेश से सप्रदेश व अप्रदेश में कौन किस से अल्प, चहुत यावत् विशेषाधिक हैं ? अहो नारद पुत्र ! सब से थोडे भावादेश से अमदेशी, कालादेशसे अमदेशी 'असंख्यात गुने, द्रव्यादेश से अप्रदेशी असंख्यात गुने, क्षेत्रादेश से अप्रदेशी असंख्यात गुने, क्षेत्रादेश से सपदेशी असंख्यात गुने, द्रव्यादेश से सप्रदेशी विशेपाधिक, कालादेशसे समदैशी विशेषाधिक, 88 पांचवा शतकका आठवा उद्देशा भावार्थ ७२४ सम १. अनुरादक-मानपगारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी शब्दावन नारकी के० कितना काल १० पढते हैं गो गौतम ज० जघन्य ए. एक समय उ० उत्कृष्ट आ. आपलिका के अ० असंख्यात भाग एक ऐसे हा. हीन होते हैं ले० नारकी के कितने काल अ० अंब- स्थित गो गौतम ज. जघन्य ए• एक स० समय उ० उत्कृष्ट च० चौवीस मुहूर्त ए. ऐसे स० सातों पु. पृथ्वी में र० रत्नप्रभा में अ० अडतालीस मु० मुहूर्त स० शर्कर प्रभा च० चौदह रा. रात्रिदिन पा. यालु प्रभा मे मा० पास पं० पंकप्रभा में दो० दोमास धू० धूम्रप्रभा में च०' चार माम त० तमंप्रभा याइत ? गोयमा ! जहणं एग समयं, उक्कोसणं आवलियाए असंखेजइभागं, एवं हायंतिया । नेरइयाणं भंते ! केवइयं कालं अवटिया ? गोयमा ! जंहाणं एग संमयं उकोसणं चउदीसं मुहुसा, एवं सत्तसु विपुढविसु वाटुंति हायंतिभाणियंव्वं णवर अवाट्ठिएसु इम णाणतं तरयणप्पभाए पुढवीए अडयालीस मुहुत्ता सकरप्पभाए चउद्दस राइंदि- पही गोनम ! जयन्य एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यात वा भागवक नारकी चतुते रहते हैं. ग्नने । कालतक हीन होते रहते हैं, अहो भगवन् ! नारकी कितने काल तक अवस्थित रहते हैं? अहो गौतम ! नयन्य एक समय उत्कृष्ट चौवीस मुहूर्त. सातों नारकी में वृद्धि व हीन होने का उक्त कथं- नानुसार जानना परंतु अवस्थित में रस्न प्रभा पृथ्वी में नारकी ४८ मुहूर्ततक अवस्थित रहते हैं, शर्करप्रभा में चौदह रात्रिंदिन, बालुमभा में एक मास, पंकप्रभा में दोमास, धूम्रप्रभा में चार मास, तमप्रभामें आउ मास * मकाशक-राजायहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादना * ७२५ - पंचमांग विवाह दण्यत्ति ( भगवती) सूत्र 888 अ० आठमास तक तमतमा में व०. बारह मास || ?? । अ० असुर कुमार व वढते हैं हा० हीन होते हैं ज. जैसे ने० नारकी अ० अवस्थित ज. जघन्य ए. एक समय उ० उत्कृष्ट अ० अइतालीसoyo मु० मुहूर्त ए. ऐसे द° दश प्रकार के भी ॥१॥ पूर्ववत् ॥ १३ ॥ दे द्विइन्द्रिय ३० बढ़ते हैं. हा. हीन होते हैं. त० तैसे अ० अवस्थित ज जयन्य ए. एक समय उ. उत्कृष्ट दो दो अं० अंतर्मुहेत ए ऐसे याई वालुयप्पभाए मासं, पंकप्पभाए दोमासा, धूमप्पभाए चत्वारिमासा तमाए अट्ठमासा तमतमाए बारसमासा ॥ ११ ॥ असुरकुमारावि बढुति हायति जहा नेरइया, अव. ट्ठिया जहणं एगं समयं उक्कोसं अट्ठचत्तालीसं मुहत्ता, एवं दसविहावि ॥ १२ ॥ एगिदिया वढ्ढतिवि, हायंतिवि, अवट्ठियावि एएहितिहिवि जहण्णेणं एक समयं उकोसं आवलियाए असंखजं भागं ॥ १३ ॥ वेइंदिया वटुंति हायति तहेव । अबढ़िया तक, तमतमामभा में बारह मास तक नारकी अवस्थित रहते हैं. ॥ ११ ॥ अमुरकुमार में वृद्धि होना व हीन होना नारकी जैसे जानना. परंतु उनका जघन्य एकसमय उत्कृष्ट'४१ मुहूर्त तक अवस्थित काल जानना. ऐसे ही दश प्रकार के भुवनपतिका जानना. ॥ १२ ॥ एकेन्द्रिय का वृद्धि, हान व अवस्थित रहने का काल जघन्य एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यातवा भाग का है ॥ १३ ॥ इन्द्रिय, तेइन्द्रिय व चतुरेन्द्रिय का वृद्धि होना व हीन होना पहिले जैसे कहना और अवस्थित काल जघन्य एक समय उत्कृष्ट >पांवधा शतकका आठया उद्देशा880 वाथे शादायी ७२४ सूत्र प. अनुरादक-मालयपनारी मुनि श्री अमोलक ऋपिनी 2. ने नारकी के० कितना काल ५० बढते हैं गो गौतम ज० जघन्य ए. एक समय उ. उत्कृष्ट आ० आवीलका के अ० असंख्यात भाग एक ऐसे हा० हीन होते हैं ० नारकी के० कितने काल अ. अंब- स्थित गो गौतम ज. जयन्य ए. एक स० समय उ० उत्कृष्ट च० चौवीस मुहूर्त ए. ऐसे स० सातों पु. पृथ्वी में र० रत्नप्रभा में अ० अडतालीस मु० मुहूर्त स० शर्कर प्रभा च : चौदह रा० रात्रिदिन या. यालु प्रमा मे मा० मास पं० पंकप्रभा में दो० दोमास धू० धूम्रप्रभा में च० चार माम तक तमंप्रभा वाइति ? गोयमा ! जहणं एग समय, उक्कोसेणं आवलियाए असंखेजइभागं, एवं हायतिया । नेरइयाणं भंते । केवइयं कालं अवट्ठिया ? गोयमा ! जंहण्णं एग समयं उपोसणीचउदीस मुहुसा, एवं सत्तसु विपुढविसु वाढंति हायतिभाणियव्वं णवरं अवाट्ठिएसु इमं णाणत्तं तं रयणप्पभाए पुढवीए अडयालीस मुहुत्ता सकरप्पभाए चउद्दस राइंदि- प्रही गौतम ! जघन्य एक समय उत्कृष्ट आवलिका का असंख्यात वा भागवक नारकी करते रहते हैं. उतने है। कालतक हीन होते रहते हैं. अहो भगवन् ! नारकी किनने काल तक अवस्थित रहते हैं ? अहो गौतम ! जयन्य एक सपप उत्कृष्ट चौबीस मुहूर्त. सातों नारकी में वृद्धि व हीन होने का उक्त 'कथं- नानुगार जानना परंतु अवस्थित में रस्न प्रभा पृथ्वी में नारकी ४८ मुहूर्ततक अवस्थिन रहते हैं, शर्करप्रभा में चौदह रात्रिंदिन, बालुप्रभा में एक मास, पंकप्रभा में दोमास, धूम्रप्रभा में चार मास, तमप्रभार्म आउ मास। * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादना *