Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Saptasandhan Mahakavyam
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३ , (३) अन्य काव्यामा शृङ्गार-बीभत्स आदि रसो एवा विचित्र अने विरूप-रूपे पोपण कराया होय , सज्जन सहृदयोने जे वांचतां घृणा थाय. ज्यारे आमां मर्यादित शृङ्गारादि रसोना पोषण पूर्वक शान्त रसने प्रधान राखी-शान्त रसमां तेन पर्यवसान करायेल छे. माटेज आ काव्य सर्व साधु पुरुषोने आदरणीय ने उपादेय छे. (४) अन्य काव्योगां अप्रस्तुत विषयोन लांबु लांबु वर्णन करी अतिशय ग्रन्थगौरव करायु होय छे ज्यारे आ काव्यना ४४२ मूक्तोमा साते महापुरुषोना वर्णनीय विषयोने रमणीय शैलीथी वर्णव्या के. (५) अन्य काव्योमा कोरमां शब्दालङ्कारो घणा होय तो अर्था- लङ्कारोनो अभाव होय. अर्थालड्कारो होय तो शब्दसौष्ठव ने मनो- हरता न होय, ज्यारे आमां शब्दालङ्कारो अर्थालङ्कारो विविधछन्दो ऋतुवर्णन आदि महाकाव्यने उपयोगि लगभग चधा लक्षणो योज्या छे. ते आ प्रमाणे-आरम्भना चार श्लोकमां मगलाचरण पछी ११ श्लोकमां दुर्जनसज्जन-निन्दास्तुति- -आ सजनदुर्जननुं वर्णन घjज वशिष्ट विविध कल्पनाओथी भरपूर ने श्लेपालकारथी सहित छे. त्यारवाद भरतखंडनुं ने तेमां पण आ साने महापुरुषो जे जे देशमा जे जे नगरमां उत्पन्न थया, ने ते देश नगर प्रजानी परि- स्थितिनुं रसिक वर्णन छे. पछी ते ते देश नगर पजाना स्वामी अने विवक्षित नायकोना पिताओना नाम दर्शाववा पूर्वक तेमनामा रहेल विशिष्ट गुणो वगेरे दर्शाची तेमनी पट्टराणीओनुं वर्णन करी तेमनी कुक्षिमा चरित्र नायको अवतर्या, ते वर्णवी ८२ गूक्तमा प्रथम सर्ग समाप्त करेल छे. द्वितीय सर्गमा साते नायकोर्नु जन्म वर्णन आवेहुब करेल हे. ते समयनु नैसर्गिकस्वरुप, देवताओए करेल जन्मोत्सव, सर्वत्र फेलापेल प्रमोद वगेरे वर्णन अतिशय मनोरम छे. आ सर्गमा पक चार्य श्रीविजयदेवमूरिजी महाराजमा चरित्ररुपे देवानन्दाभ्युदय' काव्य, श्रीहर्पना नैपधीय महाकाव्यनी पादपूर्ति करी 'श्रीशान्तिनाथ- चरित्र,' कविकालिदासना 'मेघदूत' नी पादपूर्ति करी 'मेघदत सम- स्या लेख' नामे सांवत्सरिक क्षमापना-पत्र वगेरे पादपूर्तिना परम कोटिना ग्रन्थो बनाव्या छे जे हाल पण सुलभ छे. आ शिवायना चन्द्रममाव्याकरण, वर्पयोध, मातृकापसाद, विजयदेवमाहात्म्य- विवरण, युक्तिमयोधनाटकादि पण तेमना बनावेल विशिष्ट ग्रन्थो छे. आ सप्तसन्धान पण तेमनी कलमथी आलेखायुं छे. ए प्रमाणे मुख्यत्वे आ छ विशेषताओ अने बीजी नानी नानी अनेक विशेपताओयो भरपूर आ सप्तसन्धान महाकाव्य काव्य- मष्टिमां सर्वश्रेष्ठ स्थानने अनुभवे हे. सांभळया प्रमाणे ग्रन्थकारे पोतेज आ काव्यनी टोका बनावी हती, परन्तु हाल ते उपलब्ध नहि होवाने कारणे, विद्वानो आ कान्यना वाचन, पठन-पाठनमा अपवृत्त हता. परन्तु शासनसम्राट सर्वतन्त्र स्वतन्त्रमूरिचक्रचक्रवर्ति-पूज्यपाद-परमकृपालु-भट्टारकाचार्य महारान श्रीमद्विजयनेमिनरीश्वरजी महाराजश्रीना पट्टालङ्कार- अमारा प्रगुरुवर्य-कविरत्न शास्त्रविशारद पीयूषपाणि पूज्याचार्य महाराज श्रीविजयामृतमरीश्वरजी महाराजश्रीए वर्षोना परिश्रमे आ फायनी 'सरणी' नामनी दीका घनाबी, फाव्यनो प्रवेशमार्ग गुल्लो फरी आयो . पण्डितोना पाण्डित्यनी आ काव्यमा परीक्षा के. विद्वानोनी मतिभा अदि फमोटीए चढे डे. साहिन्ययेदिओन वैष्य आ फायशी कामाय हे. जेणे पर. गम्यत पण आ काव्य हृदयपी यांगो-भीगारी आन्म- सान् फयु से, ने साहित्यमष्टिमा अम्बलिनपणे-याधितपणे सत्र रिचरी मे. ग्रन्यनुं अभ्यन्नर-म्बम्प द्विानीना .
७ ज्ञान-धनने पुष्ट करे छे. अने वाह्य-स्वरुप पुस्तक-कोपने शोभावे छे. जेनी पासे आ पुस्तक के तेना विचारो नथी, ते विद्वत्तामा अपूर्ण छे. माटे दरेक सहृदय आवा विशिष्ट काव्यद्वारा विशेपता मेम्बया माटे नेना अध्ययन-अध्यापनमा उद्यत थाय ने कल्याण साधे एज अभिलापा. देवयाग-लक्ष्मीजनामम जामनगर. मुनि धुरन्धरविजय. स २००० अपाद शुक्ल पञ्चमी -: प्रकाशकीय निवेदन :- संस्कृत सादित्यना परम-आभूषणरूप आ सप्तसन्धान महा- काव्यने टीका महित प्रकट करवानो लाभ अमने मल्यो रे तेथी अमो अमोने अहोभाग्य समजीए छीए. मथम आ ग्रन्थ मूलमात्र श्रीयशोविजयजी ग्रन्थमाळाए प्रकट को हतो, ने ते प्रकट करतां तेनी प्रस्तावनामां गूचव्यु हतुं के, टीका विना आधा अत्यन्त कठीन ग्रन्यनो अवरोध थवो सुलभ नयी, माटे टीकासहित भा ग्रन्थने छपावी प्रसिद्ध करवानी अमारी सम्पूर्ण इन्छा छतां, ज्यारे कोइपण टीका अमने उपलब्ध न थड एटले मूलमात्र पण आ ग्रन्थ विनाश न पामे, माटे छे एमने एम प्रसिद्ध करीए छीए. कोइ विद्वाम् आ ग्रन्थनी टीका करशे तो घणो उपकार यशे! पूज्यपाद-आचार्य महाराज श्रीविजयामृतम्हारीश्वरजी महारा- जश्रीए वर्षों पूर्व आ अद्विनीय ग्रन्थनी टीका रचत्रानो आरम्भ करेल, त्यारयाद मं. १९९३ मां कपडवणन मुकामे महाराजश्री नातुर्मास रया त्यारे गेठ जेसींगभात, न्यालचंदभाइ वगेरेए महा- राजश्रीने मारह विनति करी के 'आप आ ग्रन्थनी टीका पूर्ण ४ . खूबी ए छे साने नायको कया मासमां कड तिथिए जन्म पाम्या, ते पण एक वीना चरित्रनी साथे विरोध वगर वताव्यं छे, ने ए रीते जन्म वर्णन नामे बीजो सर्ग २५ मूक्तमा पूर्ण करेल छे. त्रीजा सर्गमा सुरेन्द्रोए करेल जिनेश्वरोनो जन्मोत्सव ने अन्य ये नायकोनो अन्यकृत जन्मोत्सव, सर्वेनुं नामकरण, वाल्यक्रोडा,- यौवनप्राप्ति, स्वयंवरनी परिस्थिति, विवाह, कुटुम्बपरिवार, आदि विशद वर्णव्या छे. आ सर्गमा ४८ मृक्तो छे. अनुमास अने यमक मुक्त मात्रमा छे. आतुं नाम 'कौमारवर्णन' छे. 'पूज्य राज्य वर्णन ' नामे चतुर्थ सर्ग ४२ श्लोक प्रमाण छे. तेमां राज्यनीतिमी पत्तो प्रजाने संतोप-आनन्द, कृष्णचरित्रान्त- र्गत पांडयो अने कौरवोने थयेल राज्यखटपटो-युद्धी वगेरेनुं वर्णन, तोर्थदूरोने लोकान्तिकदेवोए तीर्थमवर्तावया करेल प्रेरणा, वार्पिकदान, पञ्चमुरिलोच-दीक्षा आदि वर्णन छे. पांचमा मामां-श्रीजिनेश्वरोना विहाग्नुं वर्णन, कर्मक्षय माटे करेल विविध तपश्चरण, उपसर्गसहन, आदि, रामपक्षमा वनवास, त्यां पडता कष्टो, सीता विरह, कृष्णपक्षमा विविध युद्ध वगेरेनु शान्त वीर करुण रसमिश्रित वर्णन छे. श्रीभगवद्विहारावर्णन नामनो आ सर्ग ५८ श्लोक प्रमाण छे. छहा सर्गमां-६३ श्लोको छे. तेमां गिनेश्वरी-समितिगुप्ति आसेवन करतां अपतिबद्धपणे विचरतां काम वगेरे अभ्यन्तर शत्रुगणनो विनाश करी केवळज्ञान प्राप्त करे छे, ते तथा अन्य पक्षमा बाह्य शत्रुभोना विनय वगेरेनुं वर्णन छे. तेनु नाम 'भगव स्केवलज्ञानसाम्राज्यवर्णन' एy छे. सातमा अने आठमा-सर्गर्नु नाम अनुक्रमे 'भगवत्केवलज्ञान- साम्राज्यविहारवर्णन' अने दिग्विजयवर्णन छे. तेमा ४२ ने २८ मूक्तो छ. नाम प्रमाणेज भगवन्तोए केवळमाप्ति पड़ी क्या ५ . क्यां विहार कर्यो ते, गणधरोनी स्थापना, अनेक जीवोने करेल धर्ममतिबोध आदि वर्णव्या छे. ने इतर वे नायकोए करेल अनेक राजाभोनो विजय वगेरे वर्णव्या छे. आ ये सर्गमां बीजी विशे- पता ए छे के महाकाव्यना लक्षणने अनुसार एक सर्गमा विविध छन्दोनां मूक्तो छे, ने यमक नामे शब्दालङ्कारना प्रायः जेटला भेदो थाय छे ते सर्वना उदाहरणो छे. यमकनो महायमक नामे जे छेल्लो भेद छे तेनुं उदाहरण पण आमां छे. छए ऋतुनुं वर्णन घणुन रसिक आ सोमांछे. ठेवट नवमां सर्गमां जिनेश्वरांना मोक्ष कल्याणकादिनु विशदवर्णन, परम्परावर्णन वगेरे छे. तेनुं नाम 'परम्पराधिकारवर्णन' एयु छे. (६) अन्य काव्यना रचयिता कोइ मामान्य कवि होय तो आ काव्यना कर्ता समर्थ महाकवि छे. आ काव्यना प्रथम उत्पादक कलिकाल सर्वज्ञ भगवान श्रीहेमचन्द्रमूरिजी महाराज छे, के जेमनी सर्वशास्त्रविषयक विद्वत्ता माटे, आजे कोइपण येमत नथी. तेओ. श्रीए काव्यसृष्टिमा चमत्कार उपनावे एy सर्वाङ्गमुन्दर सप्तसन्धान महाकाव्य योज्युं हतुं. परन्तु कराल काल तेनी सुन्दरता सांखी न शक्यो, ने तेने निःसहाय स्थितिमा जोइ छिन्नभिन्न करी पोखी नाग्व्यु. त्यारवाद सत्तरमो अने अढारमी सदीना सद्गमकालमां अळ कता, सादित्यना अद्वितीय विद्वान् , उपाध्यायनी महाराज श्री मेघविनयजीगणिए कायने पुनर्जन्म-आप्पो.-उपाध्यायजीनी ग्रन्थविरचन शक्ति अद्भुत द्दती; तेमनां ग्रन्थो अवलोकतां नमर्नु व्याकरण साहित्य ने ज्योति विषयक पाण्डित्य अगाध तुं ए निश्चित थाय छे. सौ करतां तेमनामां एक विशेषता ए ६ती के, नेओ पादपूर्ति करवानी फळामां भतिशय कुशल हना; ने फळामां तेमनाथी आगळ बघेल कोइपण हजु सुधी नोवामां नाणवामां के 'सांभळयामां आयेल नयी. नेमणे मायायनी पादपूर्ति करी पृज्या- / ६ चार्य श्रीविजयदेवगरिजी महाराजना चरित्ररुपे देवानन्दाभ्युदय' काव्य, श्रीहर्पना नैपधीय महाकाव्यनी पादपूर्ति करी 'श्रीशान्तिनाथ- चरित्र,' कविकालिदासना 'मेघदूत' नी पादपूर्ति करी 'मेघदूत सम- स्या लेख' नामे सांवत्सरिक क्षमापना-पत्र वगेरे पादपूर्तिना परम कोटिना ग्रन्थो बनाव्या छे जे हाल पण सुलभ छे. आ शिवायना चन्द्रप्रभाव्याकरण, वर्षपयोध, मातृकाप्रसाद, विजयदेवमाहात्म्य- विवरण, युक्तिप्रबोधनाटकादि पण तेमना वनावेल विशिष्ट ग्रन्थो छे. आ सप्तसन्धान पण तेमनी कलमयी आलेखायुं छे. ए प्रमाणे मुख्यत्वे आ छ विशेषताओ अने वीजी नानी नानी अनेक विशेषताओयो भरपूर आ सप्तसन्धान महाकाव्य काव्य. सृष्टिमां सर्वश्रेष्ठ स्थानने अनुभवे छे. सांभळया प्रमाणे ग्रन्थकारे पोतेज आ काव्यनी टोका वनावी हती, परन्तु हाल ते उपलब्ध नहि होवाने कारणे, विद्वानो आ काव्यना बाचन, पठन-पाठनमां अपवृत्त हता. परन्तु शासनसम्राट सर्वतन्त्रस्वतन्त्रमरिचक्रचक्रवर्ति-पूज्यपाद-परमकृपालु-भट्टारकाचार्य महाराज श्रीमद्विजयनेमिमूरीश्वरजी महाराजश्रीना पट्टालङ्कार- अमारा प्रगुरुवर्य-कविरत्न शास्त्रविशारद पीयूपपाणि पूज्याचार्य महाराज श्रीविजयामृतमरीश्वरजी महाराजश्रीए वोना परिश्रमे आ काव्यनी 'सरणी' नामनी टीका बनावी, कान्यनो प्रवेशमार्ग खुल्लो करी आप्यो . पण्डितोना पाण्डित्यनी आ काव्यमा परीक्षा के. विद्वानोनी प्रतिभा अहिं कसोटीए चढे छे. साहित्यवेदिओ वैदष्य आ काव्यधी चकासाय छे. जेणे एक वखत पण आ काव्य हृदययी वांचो-विचारी आत्म- सान फयु छे, ते साहित्यमष्टिमां अस्सलितपणे-अबाधितपणे सर्वन विचरी शके छे. आ ग्रन्यनुं अभ्यन्तर-स्वरुप विद्वानांना ७ ज्ञान-धनने पुष्ट करे छे. अने वाह्य-स्वरुप पुस्तक-कोपने शोभावे छे. जेनी पासे आ पुस्तक के तेना विचारो नथी, ते विद्वत्तामा अपूर्ण छे. माटे दरेक सहृदय आवा विशिष्ट काव्यद्वारा विशेपता मेळधवा माटे लेना अध्ययन-अध्यापनमां उद्यत थाय ने कल्याण साधे एज अभिलाषा. देवयाग-लक्ष्मीजैनाश्रम मुनि धुरन्धरविजय. म २००० अपाढ शुक्ल पञ्चमी जामनगर. -: प्रकाशकीय निवेदन :- संस्कृत साहित्यना परम-आभूपणरूप आ सप्तसन्धान महा- काव्यने टीका सहित प्रकट करवानो लाभ अमने मन्यो छे तेथी अमो अमोने अहोभाग्य समजीए छीए. प्रथम आ ग्रन्थ मूलमार श्रीयशोविजयजी ग्रन्थमाळाए प्रकट कर्यो हतो, ने ते प्रकट करतां नेनी प्रस्तावनामां मूचव्यु हतुं के, टीका विना आवा अत्यन्त कठीन ग्रन्यनो अवयोध थवो सुलभ नथी, माटे टीकासहित भा ग्रन्थने छपावी प्रसिद्ध करवानी अमारी सम्पूर्ण इन्छा छतां, ज्यारे कोडपण टोका अमने उपलब्ध न यह एटले मूलमात्र पण आ ग्रन्य विनाश न पामे, माटे छे एमने एम मसिद्ध करीए डीए. कोइ विद्वाम् आ ग्रन्थनी टीग करशे तो घणो उपकार यशे! पूज्यपाठ-आचार्य महाराज श्रीविनयामृतमरीधरजी महारा- नश्रीए वर्षों पूर्व आ अद्वितीय ग्रन्थनी टीका रचानो आरम्भ करेल, त्यारवाद मं. १९९३ मां कपडवणन मुकामे महारानश्री नातुर्माम रया त्यारे गेठ जेसींगभार, न्यालचंदभाउ बगेरेए महा- राजश्रीने माग्रह चिनति करी के 'आप आ ग्रन्थनी टीका पूर्ण करो तो अमो तेने छपाची प्रसिद्ध करीए' महाराजश्रीए टीका पूर्ण करी अने कपडवणननी शेठ मीठाभाइ कल्याणचंदनी पेहीए जामनगर-भास्करोदय पेसमां तेनुं मुद्रण करावधानो आरम्भ कर्यो. सं. १९९५ मां महाराजश्री सुरत पधार्या ने चतुर्मास दर- म्यान शासनप्रभावनाना अनेक धार्मिक कार्यो थया, तेमां आ- 'श्री जैन साहित्य वर्धक सभा' नी स्थापना पण यइ. अमोए आ ग्रन्थ आ समा तरफथी मकट करवानी महाराजश्रीने विनति करी ने शेउ मीठामाइ कल्याणचंदनी पेढी पासेयो ग्रन्थ मांगी लीधो. पेढीए पण रु. २०० नी मदद आपवा साथे आ ग्रन्थ प्रसिद्ध करवा अमोने आप्यो ते माटे अमो तेमनी आभार मानोए छीए. विद्वानोने आग्रह सह विनवीए छीए के कविरत्न-शास्त्र- विशारद विद्वद्वर्य-आचार्य महाराज श्रीविजयामृतरसूरिजी महा- राजश्रीए घणाज परिश्रमे तैयार करेल आ 'सरणी' टीका युक्त संस्कृत साहित्यना परमकोटिना अद्वितीय ग्रन्थरत्ननुं वाचन- विलोकन करी पोतानी विद्वताने समृद्ध बनावे; वधुं न बने तो आ ग्रन्थरत्नने साचवणीथी पोतानी पासे राखी पोते शोभे ने पोताना भंडारने शोभाचे. आवा विशिष्ट ग्रन्थो साचवी राखवा ने तेनो प्रचार करवो ए पण जीवनतुं एक अमूल्य कर्तव्य छे. सहृदयो हृदयी आ महाकाव्यने सत्कारे! पज इच्छा माथे यिरमोए छोए आवाल्यब्रह्मचारीण, तीर्थक्षापरायणम् ॥ विषुधाचितपत्पा, नन्दे नेमि प्रभु गुरुम् ॥ १ ॥ ૧૯૪૫ (ભાવનગર) જન્મ સ કર- મહુવા) ડીસા મ પન્યાસપદ સ ૧૯૬૦ (કળા) આચાર્યપદ સ. ૧૯૬૪ (ભાવનગર) શાસનમસચિચર્તિ-દિવ્યાખન્નતિ- પપ્રભાવશાવિ મનસ્પતિ- શ્રીમદાચાર્યવયં વિજયનેમિસૂરીશ્વરજી મહારાજ.
१ १ १ ૨ ३ ३ A ५ प ५ न. १५ प० ८ श्रीसप्तसन्धानमहाकाव्यस्य प्रधान विषयानुक्रमणिकाः। विषयः श्लोकाङ्कः टीकास्तुमंगलम কুয়াম मङ्गलश्लोकस्वार्थ:- श्रीमादिनाथप्रभुपक्षे. श्रीशान्तिनाथ, श्रीपाश्वनाय, श्रीवीरस्वामिणमुरक्षे, श्रीनेमिनाथपक्षे, जिनसामान्यपक्षे च अभिधेयकथनम् चर्णनीयनेतृरमाणम् द्वितीयश्लोकस्य सप्तधाऽय: वीतरागस्तुरो: साफल्यकथनम् ३ भारतीस्मरणम् सजनदुर्जनवर्णनम् तय राशनदुर्जनसाम्पप्रदर्शनम् दुशंनतो भीति मदर्शनम् १० उष्टेणा सह साम्यं दुर्जनस्य दुर्जनः ममातो यहिकार्य: दुनिस्सादरी न फत्तम्यः पशुना साम्यमदर्शने पलस्य दुर्जनस्य तुलया यन्धनकयनम् पर विनाशनेन राभप्रदर्शनम् १२ समनस्य इसमाश्यकचनम् १३-१४ समानमर्शमा धीभरतशेषषर्णनम् सा धीगडावर्णनम् २२ सिन्नम् भायंदेकम गुणेन माम्पप्रदर्शनम् ताप मिभुगनायोः योरमानम् मनुस्मेपरवं भरतस्य ५ ८ ६ . ८ ९ १० १५ १७ ३.
२ २५-२६ ૨૩ २० २८ २९ 30-32 २६-२० ३२-४३ ४४-५१ ५९-६४ • ६५-०५ ०६-०७ ७४-७५ ७६ ७. ८. भरतस्य नृपेण सह साम्प्रदर्शनम् . २१-२२ भरवस्य ब्रह्मपदरवकथनम् भरतं रमाया निवासस्थानम् २४ भरतस्य विश्वसाम्राश्यत्वकथनम् २५. मरतस्य दक्षिणस्थितमेरवर्णनम् ९ वर्णनीयनायकानां जन्मदेश-कुरु- मागध-मध्यम-कौशलवर्णनम् 1. भवतारस्थानवर्णनम् 36-४१ 11 तत्तबगरजमाना शौर्यादिगुणवर्णनम् '४२-५३ १२ तत्तनगरनृपाणां नामगुणवर्णनम् ५४-६० १३ वर्णनीयनायकमातृवर्णनम् ६१-" १४ स्वप्नदर्शनम् , स्वप्मनामानि च ०२-03. १५ 'तत्तसायकमातृष्टस्वप्नसण्याकथनम् १६. तत्तचायकमातृणां गर्भान्तरावस्थावर्णनम् स्वप्नफलकथनम् १८ तीकराणामवतारसमयवर्णनम् १४ हरिनगमपिकतंकमहावीरगर्भपरावर्तनम् २. तीर्थराणां सम्यक्रवारयनन्तरसंजातमव- संख्यामदर्शनम् ८०-८१ प्रथमसर्गस्योपसंहारः अथ द्वितीयः सर्गः) २१ गभानन्तरं राज्ञीना भोजनादिकस्य वर्णनम् २.२ इन्द्राणीकृतराझौसेवावधार्पणादिकस्य स्वरूपम् २ २ भूपामा राड्या सह दोदपृष्ठा २४ . देवाङ्गनावराशीसेयानम् २५ भदना परस्पर विरोधोरसारणपूर्वक राज्ञीसेवनवर्णनम् २१ देवीकृतराझोस्नानादिवर्णनम्, २. सध्याः प्रमोदाय देवानां नर्तनम् २८ गर्मानन्तरं मुझपूर्वक नमारममययापनवर्णनमर-10 २४ तीर्थजम्मसमये दिशा शान्ति: नमसि दुन्दुनिनादस्य प्रादुभाष ७८ ८१ ८२ ८3 ८५ १ ८७ ८" 3 ८८ द ९० ७ ८ ९१ ९२ ८२-८3 11 ३ . ९३ 4 ८८-१०० १०१ . . १०४ १ २ 3 २० जिनप्रभूणां जन्मसमये नवग्रहाणामुच्चस्थाने समागमन लोकस्य सुखिस्वप्राप्तिवर्णन ३१ जनानामारोग्यस्यप्राप्तेश्वनानां प्रफुल्छविमाप्तेषवर्णनं १३ ३. तदानीन्तनाधिकारिजनाना सौग्यत्वप्राप्तिः, नरकस्थजनाना दुःख निवृत्तिश्च १४ 33 सुगृह स्थितिप्रदर्शनपूर्व जिनजन्मवर्णनम् ३५ मिनजन्ममासतिधिकथनम् १६-१८ ३५ नायकानां शोभावर्णनम् २६ जिनदेवस्य दिकन्याकृतसपनादिमहो- सवविधानम् २०-२३ ३० इन्द्रासनकम्पवर्णनम् २४ ३० अग्युतेन्द्रादेरागमनवर्णनम् अभिपेकवर्णनञ्च २५ . मथ तृतीयः सर्गः ।. •३८ देवेन्द्रादेर्मेहम्प्रतिगमनवर्णनम् ४. मेरुपर्वस स्यनन्दनवनादिवर्णनम् ४१ देवपर्वतानां श्लेषतो वर्णनम् ५२ तीर्थराणां तेजोवर्णनम् ५३ मेस्पतादेयर्णनम् ५-६ ४४ तीरादेः सुरेन्दादिकृताभिषेकवर्णनम् १-११ ४५ जिदादीना नामकरणविधिकथनम् ૧૨-૧૩ ५ माज्यसमयक्रीड़ादेर्यर्णनम् १४-१७ ४७ यौवनावस्यावर्णनम् १८-२० सत्तचायकानां भातृपणनम् ४९ जिनादेः पानीनामवर्णनम् ૨૨ ५. निनादीना लाम्दनप्रदर्शनम् ५१ मध्ययनं विनय जिनादीनां कलाकुशलताप्राप्ति:२५ ५२ जिनादेरभीष्टदेश सर्वोपद्यशान्ति: २५ ५५ जिनादेरिटमाधनायप्रस्थानम् ५४ जिनादेभाया यौयनादिस्थिति। ૨૮ ५५ स्थायरोस्सययनम् ५६ विवादोसपरगंनम् ५. सिनेमादिदेवहाभूमण्डलमण्डनयर्णनम् ४ १११ ११३ ११४ १-१२० १२२ . ૧૨૫-૧૨૭ १२८-१३० १३० ૧૩૨ ११० १८ २३ २९-२० १३९ 130-१३८ १३८ १४१ १४२-१४५ १४९ 33 ११० १४८ १४६ १५० . ૧પ १५१-१५४ १५४-१५८ *१५८ - १ १६० २ द ५८ जिनादीनां सोसारिकमोहकवस्तुतोवैराग्यप्रदर्शनम् ३४ ५६ जिनेन्द्रराज्ये जनानां निरावाधावकधनम् ० जिनेन्द्राणा रोकोत्तरेश्वर्य प्राप्तिवर्णनम् ६१ अर्हदादमलिनविषयेऽन्तलॉनस्वाभावः ६२ महँदादिपराक्मे गानीतेविलीनत्वम् ६३ जिनेन्द्रराज्ये जनानां सयोन्नतिवर्णनम् ३९-४२ १४ जिनेन्द्रकृत विविधदानप्रदर्शनम् १५ जिनादेयौवनावस्थावर्णनम् यथ चतुर्थः सर्गः। ६६ प्रभोरभिपेकादिकृत्याय देवेन्द्रादेरागमनम् १. सर्वेषां प्रभोरपरि प्रोतिवर्णनम् ६८ राजरूपजिनादः स्वरूपवर्णनम् ६९ जिनेन्द्रादेः संजातसंतानवर्णनम् प्रमुग्मुसस्त्र साम्राज्यकाले तत्त्वजनताना प्रचुरसुखमालिः १ श्रीकृष्णचरित्रप्रसरतः पाण्डवानां वर्णनम् पत: १५-३० तत्र कुरक्षेत्र-गजपुरनगरशान्तनुनृप- मीमप्रमुखाणां वर्णनम् २ चित्रवीर्यनृपस्य वर्णनम् ३ पाण्डु-विश्वसेन-विदुर-पृतराष्ट्रादीनी वर्णनम् १० ४ पाण्डुराजपनीवर्णनम् .५ पाण्डुममुखपुनवर्णनम् ६ द्रौपद्याः पञ्चपतिरवप्राप्तिवर्णनम् ० दौपदीकृवपाण्डवसवावर्णनम् ८ श्रीकृष्णावनारवर्णनम् ૨૨ ८ दुर्योधनस्य दुभाग्यकथनम् १. दुर्योधनादिकृतद्रोपदीवनापर्षणम् 11 .कामदामदण्डमेदैरनुकूलरहमुपगताना दुर्योधनादीनां स्वतः क्षयप्राप्तिः १२ युधिष्ठिादिकम्प्रतियन्दिजनककं तरममाववर्णन२६ १७६-१७२ 1 - १०१ ૧૨ १७३ १०४ १८ . १८५. 1८६ १८७ 1 ." साकांक. पृष्टांक सभासमक्ष द्रौपदीकेशाकर्षणस्य मात्सर्याधाय. करपवर्णनम् น ताशात्याचार पश्पता युधिष्ठिरादीनाशान्तस्वदर्शन २८ लिनादिशासितममयस्य सत्ययुगस्येनोप्रेक्षणम् १९ युधिष्ठिरादेयनसेवन द्रौपद्या, कीचकद्वाग कष्टप्रासिवर्णनम् ३० श्रीरामस्य मृगभ्रमेण वनभ्रमणम् १९५ भनुरोदयेोः कालस्य प्रमुसेरापरायणता ६९ सर्वत्र भमंनि कुर्वतां प्रभूणा समृद्धिभोगवर्णनम् ३५ १९६ ऋषभस्म भरते राज्यपदवीस्थापनम् श्रीरामपक्षे प दशरयस्य वधूवचनसो भरते राज्यपदस्थापनम् ३४ १९८ भावसेनस्य शान्तिप्रदानयचमा जनरक्षणम् ३५ १. दीक्षामहणायोचान गमनम् २०२ ०३ यापिकदानेन धनपवित्रकरणम् २०३ रोकान्तिादेवयच स्मारिवमभोः पवमुष्टि सुपनकरणम् 10 जिनेन्द्राणां दीक्षामाणसमयनिरूपणम् १९-०१ २०१-२०९ एतस्मोपसहार भय पञ्चम सर्गः। दीशानकर शिनादीनां विधार भ.ये पक्षेच युवादिकायांग गमनम् निनादीनी विधारस्थया विहारवर्णनम् १२ विहारे गिनीमानिनशीतोनादिकमानम् जिनादिक्तूंचाया समितिगुप्तिसेवाको विजयमावर्ण मेम् । २१५ निधारेपिनागिरहस्य धादियाइनानहोरणम् ५ प्रमुडकोटापरित्यागम् १ मशिक्षासमुपरेर पर: Trari अम्ममापागकपनम् जिनेमागो परिणसिनपरित्यागपूहमप्रविता . मुगा सयो समनापूर्वक प्रमूग निमनदेशे बामस्वीकाराम् २२५ १२ ३१० ર १ . २८ ३ पृष्टांक ૨૨૫ ta . , विषय: श्लोकांकः भीमाविनाथपझे निरमिशा लाभाद् वर्ष माघहुपो- पितम् भम्पपक्षे च यथोचितमुपोपितम् नयोनिरसा रोऽपि विषये विषयामिमा न ६४: ११ विकिारः प्रथमपारणाऽभूत् धोभादेनाधम भन्येपाच बायोग्बमम्वमनः १२ प्रभुपारणाकारकः समय:पठली: सदिक्षु- विस्तारिता १३ ९० . नामविन मिकूनसेवन श्रीभावीवरस्य मम्रेको नयनविनवमीसकृतसेचनम् १. अगपरेशस्थितनरासंधेन सा श्रीकृष्णस्व बुद्धाय प्रस्थानवर्णनम् भम्वेषां तक निहारवर्णनम् १५ जरासम्भस्य श्रीकृष्णरमुचिन्तनम् जिनेन्द्राणां • कामोपदयिन्तनम् श्रीकृष्मसैन्यस्त्र जरासंधेन सह संग्रागाय प्रस्थानम् निनेन्द्रः मर जिनेन्द्रपरिधाराणां पर्यतादिम्प्रति प्रस्थानम् म्हसेनापेस: स्वापराधक्षमापनार्थ रामम्मति प्रस्थानम्। जिनेन्द्राणामशुमक्षपकारकयोगसमाधी मनाप्रति- संधानम् रामस्य पमधामनियमपरिपालनम् श्रीकृष्णम शापराजिगीषापूर्वकं स्व सैन्य संरक्षणम् १८ जिनेन्द्रानुगामिनी मनोऽनुकूल स्थितिधर्णनम् रामानुरागिणो दण्डकपने पासः, श्रीकृष्णानु- रागिणा रेवतगिरिवने विहरणम् १९ जिनेन्द्रस्येन्दकर्तृकपरिवोरक्षणम् , फोमविनाशव रामेण वाम्बूशारिलिपातनम् । श्रीकृष्णस्य अद्युतवियोगयर्णनम् जिनेन्द्राणो गुणसानियन पर्यारोपनम् रापणस्य माम राक्षसक मनमम् जनानां मोक्षलिप्सया सीद्वरानुमाणम् रावणस्य काव्यानुपरणम् जातपय संप्रामायोद्योगानुमरणम् १२ तीपं सायनानां दीक्षणपूर्वकं विदरणम् जरासन्धपक्षीयजनानां संग्रामाय प्ररमानम् गमेग सा मप्रामाय रावणक्षीया प्रस्थानम् २०३ ९५ २. २३. ९. २११ पृष्ठोंकः २१ २. नहोकांक: १.०ीशन प्रति कामस सनाशमिया प्रेषितस्व. सैन्ममिवारणम् फर्गस्य सप्रामापूर्व सैन्यरक्षणाय शिविरस्वनम् रामस्स शत्रुधनाय सभानम् 100 तीर्थराणी सूर्यचन्दचव शरीरकान्तिवर्णनम् ऋग्नकर्तृकोपाहरणवर्णनम् श्रीकृष्णपझे हमी वाय रामकस्तारासमर्पणम् १.२ तीर्थराणामज्ञाननिवृतिपूर्वक स्वारमानुभवली- मस्याम् चित्काल श्रीहष्णस्य मथुगनासवर्णनम् २६ 1. जिनेश्वरभक्ताना सर्वथा स्यादादधर्मानुसरणम् श्रीकृष्णे चन्द्रवशीमानां मितान्तानुरागवर्णनम् श्रीरामचन्द्र इनमदादीना इदानुरागकधनम् वीणा भमत. कामादीना पलायनवर्णनम् दुर्योधनादीनां जरासन्धम्मति साहाय्यार्य गमन रायणगूढचाराणां रामवृत्तान्मं विज्ञाय पुना साम्प्रति पराञ्चनम् १०५ सायं प्रभु योद्यानमागत इति चाटिकापालेन निदितः मातांवता सपरिवारो बाहुबाही गति तारता प्रमुर्विजहारेति राम्न प्रमादपररवकथनम् २०६ सीशाणा स्वारमानन्दानुभये स्वमनस, स्थिरी करणम् रावणकतुं सीताहरणवर्णन प्रद्युम्नस्योपा- हरणानन्तरं श्रीकृष्णसेवावर्णनम् १.. तीर्थराणां मोहममता स्यागपूर्वक समभावेन वर्तन मटायुनामकगृद्धविनाशवर्णनम् प्रद्युम्नस्य पश्चात्तापवर्णनम् १०८ श्रीभादीश्वराणा चिकुरचयस्य जलदपटलीश्वनो. स्प्रेक्षणम् भन्यपक्षे पर्वतनियराणां वर्णन 1.९ तीर्थराणा सुभद्रा सनयेन सह विहारवर्णन श्रीकृष्णायाभिमन्युना सह विहरणवर्णन श्रीरामस्य कक्ष्मणेन सह विहारवर्णन 11. जिनेन्द्रोपरि देवाना पुष्पवृष्टिकरणम् रामस्य लियमतो वनवासमतपरिपालनपूर्वकम् २८ २९ ૨૧૨ १० २५१ १२ २५० २५ वनशोमावर्दनम् पृष्टांक:- २० सारस्वकथनम •२६५ म २.६७ ३ विषयः श्लोकांक जिनेन्द्रदर्शनस्यामोघफ्लपदस्त्रकथन हनुमतः सीतान्वेषणवर्णन श्रीकृष्ण स्थितिवर्णन २ जिनेन्द्रविहारभूमीनां प्रसंशन लशास्थितसीता. 5ऽनयनस्य इ.माध्यत्वकथनं द्रौपदीव्याख्यानस्य १५ जिनेन्द्रः सह संग्रामनिवर्तनाय कामादीनां प्रार्थन रामम्पति गणपशीयाणां विभीषणद्वारा सम्रामनि- घर्तनाय प्रार्थनम् जरासन्धपक्षीयाणां कृष्णेन संह युदपरावर्तनाय जरासन्धम्प्रति प्रार्थना 1. जिनेन्द्राणां तपोमाहास्यात् वामवस्य भयमाति- वर्णनम् हनूमता रावणपक्षीयाणां भर्य प्रापणम् भीनेन दुर्योधनादीना भयप्रालियर्णनं ७५ मुजनदुर्जनानां प्रसंशानिन्दावर्णनं १६ जिनेन्द्रप्रभागे दुलनामपि सबसवप्रतिपादनम् रामेण रावणम्य दुबलवप्रापणं श्रीकृष्णेन जरासंध. निशतनपूर्वक यादवानां मुस्वित्वप्रापणम् जिनेन्द्राणा गाम्भीर्यगुणे समुद्रौपम्य वर्णनम् रावणस्य सागरी पम्पवर्णनम श्री गस्य द्वारकानगरवनम् .. ४१ 11८ जिनेन्द्राणां विहारतः पवित्रिनभूमीना माहात्म्य. वर्णनं रामचन्द्रपविनितभूमीना तीर्धवेन वर्णन १९ जिन्दाणा कायिकवाधिकाहिंसावतप्तकलापरिपालन ४५ १२० मिनेन्द्राणो मोदराजपराजयवर्णनं निभीषणस्य रामम्प्रतिप्रस्थान समुद्र विजयस्य सन्यममारोहकरणं ४४ १२. कामादिविपगीषया जिनेन्द्राणां विहरणं युद्ध रामस्य प्रत्यानवर्णन जरामास्य कृष्णेन सह . २२ जिनेन्द्रविहरणमन्यगदोधितरजोमिटिंगण्यापनवर्णने । १२५ जिनेन्द्रारीराणां नितान्तकान्तिपुर्णन १२४ जिनेन्द्रागां मर्पया सहयदेशे मनोऽनुकूलनियमति: समामार्य प्रस्थितरासगमनवर्णन १२५ जिनेदागा नीतिधर्मयोधमुपदेशवाचनम् १२९ मारुतीरादिवगंग Ya , . . २०२ है 4 २.४ .. संग्रामा प्रस्थानम् ४५ २०६ १७ २७८ १८ २८.. - ૨૮ २८१ ५.
५३ ५७ २९५ २९६ - १ विषयः श्लोकांकः पृष्ठांक: १२. तीर्थकुरामा प्राणिहिमावर्गनाय अनारप्रति तस्योपदेशकथनम् २८५ १२८ श्रीकृष्णस्य स्वामिमामरक्षावोधकोजनम जिनेन्द्राणी सर्वसाधारणतया सदुपदेशः १२९ जिनेन्द्रप्रभूणां निर्याजविहरणम् १. तीर्थङ्करप्रभूणां स्थिरत्वे मैनाकपर्वतस्य दृष्टान्तीकरणम् ५५ २८९ " तीर्थतगणां कामादिविजयोत्कर्षभारणपूर्वकं विहरणम ५५ ॥२ जिनेन्द्रप्रभूणां बहुजनकर्तृकधगम्यमानम् शिशुपालभ्य जरामधेन सह प्रस्थानम् २१२ नीश्वरविषयकानुरागात् जनानां प्रमुनिकटगमनम् ३४ जिनेन्द्रानुरागात् गन्धर्वादिदेवानां गानम् अथ षष्ठः सर्ग. १३५ कामविनाशाय जिनेन्द्रप्रभूणां सस्पास्वनिरूपणम् २९८ १५६ तीर्थकराणां सर्वानर्धहेतुभूतषीपरित्यागविषयकोपदेशः २ १३. प्रभूर्णा विनश्वरलक्ष्मीसमुपार्जने जनाम्प्रति भनासलिकथनम् १५. गीर्थकराणां कामादिशानिन्दितयोषिवा. पक्तजनावियेकरवनिरूपणम् ३९ जिनेन्द्राणी मौनव्रतधारणात् म्लेच्छाविम्यानेषु पवनानां दर्शनं दरवा पवित्रकरणम् 11. जिनेन्द्रस्य महामोहपराजयाय नपरववर्णनम् 81 नीङ्काणां तपोवलोपार्जनाय मायधानपूर्वतपारवम् १२ जिनेन्द्रकृतकैवल्यपरिपन्धिकामादिनिवारणम् १५३ नीथंकरः कामादिशनिवारणपूर्वक पातकस्य सोभाग्यविधापनम १५१ प्रभाविधामा छायापदानाय पर्वतीयवृक्षाणांनीभवना १४५ कामजेतृ जिनेन्द्रस्योपरि कामस्य कुण्ठिशक्षिनिरूपणम् ।। १ जिनेन्द्राधिष्ठितपदवीमभी सुननाना इते খুৱাবনাজি খান २९८ 3 ४ ५ १०. .." . 1०५ 101 ५ १८ १९ विषयः श्लोकांकः पृष्ठांकः १५७ सर्वश्रेष्ठप्रभुराधारमजस्य सर्वोचतालाभायोद्योगकरणम्॥ २०७ ११८ भज्ञानोदाय पवित्राचारपूर्व सत्पथाउम्बनं तीर्थराणाम्। १०८ १९ सोलीनमिथ्यानिरतपुरुषसमस्यागपूर्वक स्वसकरपे स्थिरावं प्रभूणाम् १५० तीर्थकराणां भयादिस्यागपूर्व कापश्यादिक्षमपूर्वक मोक्षमार्गानुसरणम् ३०९ १५. जिनेन्द्राणां सपृयश्ववितर्कनामकण्यान- विशेषे परायणत्वम् १५२ तीर्थराणां स्वारमगवेषणपूर्वक लाधुधर्माधरणम् १५. जिनानां सपृथश्वसवितयानविशेषाराधन- तोऽमोधफलप्राप्तिः- १५४ बादरसंपराय-सूक्ष्मसंपरायनामकनयमनाम- गुणस्थानस्य माहात्म्यम् १५५ तीर्थराणां हेयोपादेयविचारपूर्व मोक्षमाधनोपदेशः । १५६ विषयवासनाशून्यप्रभूणां निर्मलातःकरणप्रकाशनिरूपणम् २२ 14. जिनेन्द्राणां सम्यक्रवज्ञानेन धारियाक्षणपूर्वक- मसभावाति १५८ तीर्थराण मनोरथपयेऽपि महादेरनागमन निरूपण २४ १५९ भादीश्वरस्य ममाधिपोगप्रभावः सुमेरुपर्वतस्येय निमारकम् २५ १६० प्रभूगां देवब्जाममाप्तिमन्यानन्देन देवाना दुन्दुभिवादनम् 1.1 तीर्थराणा स्पावादानुमारेण मयंजनोषकोपदेशनिरूपणम् १९. पक्षादिदेवामा सर्वदेवस्थितियोग्यसभायाः करणम् ११३ प्रभोः पूजाविधानाप देवानां प्रार्थनानिरूपणम् ११. मिनेन्द्रसमयसरणभूमी मेषकुमारस्य सुगम्भमपजमवणम् ११५ ताकाप्रभू दिया नारदादिमुनेः समागमनम् ३२० रज्ञाममाहितीनः धिम्यां तिपिताणम् १९ २३ ११५ २७ २८ ३२८ ५८ विपयः श्लोकोंकः पृष्ठांक: १६७ तीर्थकराणां निष्कपटं विद्याधरादिदेवः सेवनम् १५८ प्रभूर्णा समयमरणस्थाने पादितदुन्दुभिवाप. विशेष कामादेः भयप्राप्ति १९९ मशगनोपदेशकामनया प्रभूषा पादविहरणनिम्पणम् ३५ ३२५ १५० प्रभूणां के वर जानमाहागविसमा वैमानिक. देवानां ममागमः ३२५ १.१ प्रभूगां देवमशान प्रातिनिरूपणम् १०. प्रभोः केवलशानमहोत्सव सुरनरनुपतीना स्वावधाने पेवनम् १.३ केया ज्ञानोमवकाले गमायोहिणी क्रमाऽम्बन ननिरूपणम् १७५ मामादेः यदुपदेशरणम् १०५ अपमादेशय घनश्रवणतो पना हिंमातिषी- प्रमापरिस्पानिरूपणम् ॥ १.६ फेवमशानोस्मयकाले प्रभोदानाधणा मग ममागमनम् ... ईमाननया प्रभूसेपासनानां गा- पायनतो कल्याणप्रतिः १.८ सीधंकरदेशमाशो जनानां हिंसाधयाणधारणात नितिनिरूपणम् १.९ प्रमुसेवापरणतो मुनीना स्पस्वपापप्रभासननिम्पणम् ५५ १८० मिनेम्मोपदेशममाये मयंक पास देपत्यागपूर्व मसाप्तिः ११ मीयकराण टिपानेन मषा नग्रोमबनम् १॥ प्रभुरनाय पक्षाप्रदेवमानवानामोरारपर्णनम् १.८३ तीर्थकरान् विना मारे मंगीन प्रमानिकपणम् १९ १८. जिमनामाचारणेन हामम्य nिera: १८५ गनिममुदापम्प प्रमुविषहमतिमापनोमानिम्णम् १५५ जमानापतिरापतीtfiemar, ३ " 38२ १८ २३५ 32 ५3 ३३९ . ५८ विषयः श्लोकोकः पृष्ठांक: १८७ प्रभूणां कामविजयरक्ष्मीप्रातिनिरूपणम् 334 १५८ तीर्थकराणा राज्यलक्ष्मीपरित्यागपूर्वकं केवलज्ञानलक्ष्मीप्राप्तिः १८९ जिनेन्द्रप्रतापेन तद्भक्तानां मर्वतोऽभयप्रातिनिरूपणम् ५५ ३४० १९० प्रभोः सदुपदेशामृतस्वादेन जनानां जयशब्दोचारणम् ५६ ३५१ १९१ सदुपदेशदानतरपजिनेन्द्राणां केवलज्ञानप्रापया प्रकाश:५७ ३४२ १९२ जिनेन्द्रकककामक्रोधादिनिवारणम् 33 १९३ केवल ज्ञानलक्ष्मीसम्पप्रभूणां तेज.पुञ्जप्रादुर्भाव: ३४४ १९. तीर्थकराणां समक्षेऽन्यभूपाना प्रकाशराहिण्यस्य निरूपणम् ३५५ १९५ जिनेन्द्राणां जरायोगाप्राप्तिः ६१ १९६ तीर्थकराणां केवलज्ञानपरिपाकस्य निरूपणम् 374 १९७ तीर्थकराणां केवलज्ञानप्राप्तिसमयवर्णनम् ३५० अथ सप्तमः सर्गः । २९८ जिनेन्द्रसमयमरणस्थाने नृपमण्डलैः सह भरतस्वामिनी समागमनम् १९९ स्वकान्तिप्रभावेण प्रकाशमान जिनेन्द्राणां परिभ्रमणम् २०० मुनिमलैः मह देवेन्द्रादिपरिवेष्टिततीर्थकाणी विहारवर्णनम् २५५ २०. प्रास्तादिसहितमेघनादस्य संग्राम भूमी ममागनम् २०२ ५मश्लोकत भारम्य १५मलोकपर्यन्तं महाकाग्यलक्षणा- नुसारात पसातादिषजनां वर्णन मयमाधारणतया कविः प्रस्तीति १ तन्त्र पाना मध्ये कुसुमाकरम्प मजमक्षाप्यतया प्रथम षमम्तवर्णनम् पालानस्य सीतोणत्यसमाधनपूर्वक प्रमंशनम् ३५० १ वसन्ते कामबाणमम्पादनायपुष्पाणा प्रादुर्भावकथनम् ॥ v वसन्ते भमरणक्षनस्य मदिरापरित्याराकथनोस्प्रेक्षणम् ५ मर्वजनमाधारणतया मद्यपानपरिहारकचनम् चनमानस्य वर्णनमुखेन पेसामा वर्णनम १. १ ३५२ २ १ ५ ३५७ । ८ १७२ - विषयः श्लोकांकः पृष्ठांकः • प्रीमवर्णनमुखेन जनानां गोतस्थाननिपेवणम् ८ पसन्ते जास्यादिकुसुमानां विपकथनम् ९ वैशाखमासीयवायो. मावस्यनिरूपणम् 10 वसन्तस्य कुसुमाकरतया कमलेषुभ्रमरमपोगसम्पादनम् ।। "पन्द्रकान्त्या विराजमानपचुरपुष्पसुरमिवासितधमन्तवर्णनम्।५ १२ घमन्तम्य यशामसखश्वप्रतिपादनम् १३ घमासे कोकिल फूजनेन जनानां कामोन्मादवर्णनम् १७ १४ प्रीम्मोनिदाघानिमायेन पक्षशासनलमोषणादिवर्णनम् 16 १५ वर्ष जसपर्षया पलयितशादीमा धोमा निरूपणम् १९ १६ पिता कामिनीपकथनपूर्वक दद्गदीना पंगास्यकथनम्२० .. प्री मजम्पदावानसशान्तये द्रोणनामकमेघम्म मर्णनम् २१ 10 PRINभिः पूर्ण नदीना प्रवाहमयघोपवर्णनम् २२ १९ मानवी कामिनीना वर्षाणायकाबीनादैः सोमानिरूपणम् २० बरुदनामकनृपस्य शत्रुभयात् शरीरमागकपनम् २५ " भटानां स्वस्वपराक्रमप्रदर्शनपूर्वक संग्रामसम्पादनम् २५ 300 २२ नामकमेघस्य जयासारवणवर्णनम् २३ म्यम्य अगराणाक्षागनिरूपणम् २४ भाषणमासीपापल्लीवर्णन भेकम्पादीमा अपंधनम् ३०२ १५ पीपEAt प धप पनिवारण के रक्षणम् २५ शारतसमागमेन मदिपीप्रभृतीमा घोषाणस्प निरूपणम्॥० २७ गतो पधायाम जयगतम्यामारण्येन मृणा धर्मानुगः १८ मा गर्गमासे प्रचुरधामसम्पनियोगाय शोभायनम् २. अनधाम्पसम्पासनानो मिमीभिः पर निरुपणम् 10 जाना देवतामयागमागेन मनवर्णनम् "लो भापमासे सीनासिनियम 341 341 30 ॥ ८.
४२ विषयः श्लोकांकः पृष्ठांक: २०१ तीर्थङ्करप्रभूणां केवलज्ञानोपदेशनातो जनानां भमैं मनोसप्तरयम १६ ३९० २०४ देवदानवमानवानां भवत्याधिषया चैत्ययन्दनपूर्व प्रभुपदसेवनम् २०५ महावीरस्वामिनः सञ्चारित्र्यग्रहणाय सदुपदेशनिरूपणम्॥८ २०६ तीर्थकराणां सदुपदेशात् दुर्गन्धिकायाः दीक्षाग्रहणं यवनसुवस्य ज्ञानोस्पादक्ष ३९ ३९५ २.७ भानन्दादिनामकश्रावकान् प्रति प्रमो:सदुपदेशनिरूपणम्।. २०८ पर्वमानप्रमोरुपदेशामृतपानेन श्रावकानां तृप्तिप्राप्तिकथनम्। ३९५ २०९ देवदानवसे वितजिनेन्द्राणा केवळशाने प्राप्त तरप्रभावेण धर्मप्रवर्तनम् ३९६ अथाष्टमः सर्गः । २५० भन्न सर्ग भरतचक्रवतिनो दिगविजयवर्णनम् । तत्र भरत- नृपस्म जनपापनिराधिकीपया नीतिनैपुण्येन प्रस्थान- निरूपणम् ३९८ 11 दिग्विजयाय प्रस्थितभातमै यम्य घोटकखुरथधूलीनां गगनध्यापनम् २१२ भरतसैन्यपदोत्यलिभिः सूर्यमण्डकाछादनकधनम् २। भरतस्य पूर्वदिग्विजयानन्तरं मर्व चर्तिपु प्रथमरवकधनम् २.५ भरतस्य मगपेशादिनुपविजयानन्तर प्रस्थान पश्चिमति ५ २१५ भरतस्य नृपमणले. मह मिथुनाममनदीतरणानस्ता शिविरचमम् २०. भरतपशवनिमः शिकातीर्थप्रापयनन्तरं जिनप्रतिमायमनम् २१. मातस्य विनयपूर्वक प्राचीनेतिहामचारियधवणस्य निरूपणम् ५०५ १1८ भरतनृपस्प तमिस्रानामगदोलनानन्तर शान्तिद्वारा जनस्य वशीकरणम् ४.६ १९ भातस्य पराजितरिषुधन महणपूर्वक हिमारये प्रस्थान निरूपणम् 1 1. २ 3 ४ १०४ . १०४ १०५ 1०७ ४०८ 18 ५०८ ૫૧૦ विषयः लोकांकः पृष्ठांकः २२० मातधकातिनो विद्याधरविजयपूर्वक भविश्वर्य- प्राप्तिवर्णनम् २२॥ भरतम्य गङ्गातटस्थदेशानां पराजयपूर्वक स्वराज्ये पराश्चनम् ૧૨ २२२ भातनृपसम्पादित सुन्दरीदीक्षामहोत्सवनिरूपणम् २२६ जिनेश्वरायां समेतनामकपर्वते केवटज्ञानप्राप्सनन्तरं प्रस्थानम् २२५ जिनेन्द्राधिष्ठितभूमौ निवसतां जनानां महाभाग्यवर्णनम् १५ १२५ केवलज्ञानसम्पपादीश्वास्याष्टापदपर्वते मनानन्तरं मोक्षप्राप्ति २२६ मेवपुदिस्यासपूर्वक प्रभूणां शान्तिवृती मनोहत्वकथनम्।। २१७ मादीवास्य मोक्षप्रातः समयस्य निरूपणम् २० प्रभोयिषयरामोपडेदनपूर्वकं निरनिशयानन्दप्राप्तिवर्णनम् १९ .०९ प्रभूर्णा नियासभूमेः परिकृष्टतानिरूपणम् 10१२ २० प्रभूणां शरीरत्यागानन्तरं सरस्थानम्य मालिन्यनिरूपणम्२१ २११ भादधाम्य मोक्ष प्राप्त्यनन्तर तरपरिपालिनभूमीना ૨૪ २३२ भादीश्वरस्य शरीरयागानगर नगरवामिनां घोकादिनिम्पणम् 2. २३३ भाटीवाहितनगरस्य शोभाषयमन्तादिमायेऽपि माटिन्यम् 18 २४ मुमुक्षुजनानां प्रयायेगग्येण विपयामिलापम्प परित्यागः२५ २३५ भविष्याले प्रभूणां जन्मना गिन्याः पुनधनभाग: पर्णस्वयंभावनम् २१ २. भविष्यकाले मीयाणामाविर्भायेण ममगाम्य सम्पतिमिः मापडावस्य जनकतृक मंमापनम २१. पसंहारमुन जना प्रमुप्रति विष्टसाधनानिम्पतम् अथ नयमः सर्गः। २३. ममारे प्रभूणा कीर्तियो; प्रमाय निरूपणम् ४२. २३९ रोधि मंाियानीधाममाया निम्पणम् २० भरत रक्षणम् ४१८ . २ ४ ७ ४२६ ८ ९ १० ४२८ ५२९ . 30 १५ विषयः श्लोकांकः पृष्ठांक: २०० तीर्थकृतां यशःश्रोतुं प्राणोऽप्टसंख्याककर्णधारणोस्प्रेक्षा १ ૪૨૨ २१ प्रमुगुणगणगायकदेवोपरि पुष्पवर्षा ૧૨૩ २५२ जिनगुणगानश्रवणेन सर्वेषां निविदुःखोन्मूलनम् ४२५ २४३ जिनकीर्तिसुधापानसमये सांसारिकभोगादेस्तुच्छता २४४ जिनकीर्तिकलापस्य भयमानभञ्जकत्वकथनम् २५५ सस्यभामादिकृष्णस्त्रीणां सादर प्रभुकीर्तिश्रवणम् २५६ तीर्थंकृतकीर्तिनजस्य सर्वातिशयेन विराजनम् २४७ जिनेन्द्रकीर्तिसमक्ष चन्द्रचन्द्रिकाया हतप्रभस्वम् २५८ जिनकीर्तिसौन्दर्य सीतागङ्गागतिकुन्दपुष्पादीनामुपमा " ४२८ २४९ जनापवादभयेन रामस्य सगर्भाया' सीतायास्त्यागः २५० मीतासुतयोग्ना घलय-मदनाङ्कुशेतिनामकरणम् १३ २५, सीताया भग्निपरीक्षानन्तर यग्रहणम् १५२ दारकादहनानन्तर श्रीकृष्णम्य शरीरपरिस्थागः ०५३ मातृप्रेरणा कृष्णदेई स्कन्धे पादाय बलरामस्य भ्रमणम् ॥ २५. देवधचसा बलदेवस्य कृष्णमतगारीरस्याग: २५५ बळदेयस्य वैराम्योरपाया दीक्षाग्रहणं स्वर्गमन २५. गणभृतां केवलज्ञानप्राप्तिपूर्वक मोमप्रापयादिधनम् १९ २५७ धीमसेनस्य पर्वगुणसम्पनत्व निरूपणम् २५८ श्रीशान्तिनाथमुतचक्रायुधादीनां गणगौरवर्णनम २५५ पायुभूतिनामगणधरशरीरकान्तिनिरूपणम् १५० मौर्यपुत्रनामगणभृतो विघागुणादिप्रशमा २१५ सुधीभाभिधगणधरस्य श्रीकृष्णस्य च गुणादिकधनम २४ २६२ भजुनस्य ध्रुषमासापरनान गौर्यादिनिरूपणम् २६५ प्रपुम्न-शाम्बयो. धीर-गमीरापगभिधयोः प्रमा २१४ श्रीयशोभद्रस्वामिनः अमेण गुरूपदे स्थिति २९५ श्रीस्थूलभद्रादीनां ऋमिकगापदाल काणम् २९. श्रीहरिभद्रादिगण माद्रिभूपाविधापनम् २९ २६. धीऋषभजिनम्योपमहारपूर्व कवितपणाम २१८ कायस्यास्य मनकापाणकरणस्येनोपमह. २१९ धीमेपक्तियस्य भीजिनपाइप्रणामेनोरमहार. १२ ४३२ १७ ५२२ . vav २० .. V14 ४६ २१ १९ २८ 31 ४४" शास्त्रविशारदानन्द-पूर्ण-पीयूपपाणये। नमोऽस्तु श्रीमदाचार्य-विजयामृतसूर ॥ १ ॥ • जन्म संवत् १९५२. (घाटाद).. दीक्षा संवत् १९७१ (जावाल-मारवाड) पन्न्यासपद सं. १९८५. उपा-पद-सं. १९९१ (महुवा... आचार्य सं. १९९२ (अमदाबाद) શાસનસમ્રાટ્રસૂરિચકચક્રવર્તિ-સર્વતન્ત્રસ્વતન્નભટ્ટારકાચાર્ય મહારાજ શ્રી વિજયનેમિસૂરીશ્વરજી મહારાજશ્રીના :पार - શાસ્ત્રવિશારદ-કવિરત્ન-પીયૂષ પાણિ પાચાર્ય મંહારાજશ્રી વિજયામૃતસૂરીશ્વરજી મહારાજ ॥ अहं नमोनम ॥ अक्षीणमहानसादिलब्धिममन्विताय श्रीगौतमस्वामिने नमः ।। तपोगणगगनाङ्गणगगनमणये जगद्गुरवे श्रीनेमिसूरीश्वरसद्गुरवेनमः ।। महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचितं सप्तसन्धानमहाकाव्यम् - शास्त्रविशाग्द-कविरत्न-भद्वारकाचार्य-श्रीविजयामृनरिप्रणीतया- सरणी इत्यभिधानया टीकया समन्विनम् । श्रियन्नव्यांभयांविदधतु कृपांकाः स्मरणतः, शशाङ्काकन्छायोन्छलितललितामन्दयशमः । शियाहांगोद्भायाधिकरमणसभोगिमुसदा, महावीरा धीराः प्रगतभरतीराः सुरुचिराः ॥१॥ या संस्मृताऽन्तरतमोऽतिनिरस्यमयः, प्रोद्भामिमन्मतिविकाशमलं ददाति । घेताम्बरप्रगुणहारमाभिरामां, जैनीङ्गिरंम्वहृदये समुपास्महे ताम् ॥२॥ , श्रीमदवादिपञ्चजिनपतिस्तुस्यारमा पनार्थकोऽयलोक शिवाणीन्दसि २ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये यस्योपदेशवचनामृतसेकलेशः, सद्योज्ञहन्मरुधरेऽपिनिपत्यसम्यक् । प्रोद्भावयत्यतिसुपुण्यविशालकन्द, तंनेमिसुरिनववारिदमानमामि ।। ३ ।। सप्तार्थसद्मथनकौशलचञ्चुयुद्धेः, केदंहिमेघविजयस्यगभीरकाव्यम् । काच्यार्थभावन विधावतिमन्दयुद्धिः, काहन्तथापि रभसाद्विवृति करोमि ।। ४ ।। श्रीमद्गुरोः कतिपयाक्षरसत्सुधानां, सद्राहकस्य मम मेघवचःप्रवृत्तिः। सच्छाखशुद्धमनसां मनसां मुदेस्या- केकेवकिनहिसदाभविनां कवीनाम् ॥५॥ सप्तसंधानकाव्येऽस्मिन् सरणी क्रियते मया । इमामालम्ब्य विद्वांसः प्रवय॑न्तीह निर्भयम् ॥ ६ ॥ ऐदंयुगीन चतुर्विंशति तीर्थकृतांमध्ये प्रथम पोडश-द्वाविंश-प्रयो- विश चतुर्विंशानां क्रमतः श्रीमदादिदेव शान्तिनाथ-पार्श्वनाथ नेमिनाथ-महावीरस्वामीनां प्राधान्यात,-विचित्र पवित्र चरित्र तया, पुण्य प्राग्भारसम्पन्नतया च. वासुदेव-बलदेवानां च मध्ये ख-पर दर्शनेपु श्रीकृष्ण-रामयोदेवाऽतिप्रसिद्धतया तेपां चरित्रव- र्णनात्मकस्तुतिष्याजेन प्रपाणकरसन्यायेन एकेनैव काव्येन सप्तपुरु- पोत्तमसत्तमचरिताऽमृताऽऽस्वादजन्याऽनन्यसामान्यमान्द्रानन्दसन्दोह मनुभवितुं परॉश्चानुभावयितुं 'सप्तसन्धाना' ऽभिधानमन्वर्थनामानं महाकाव्यं चिकीर्षु ग्रन्थकृद् विनविघातायाऽविगानेन शास्त्रपरिस- माप्त्यर्थमाशीर्वादात्मकं मङ्गलमाचरन् शिष्यशिक्षायै श्रोत-व्याख्या- RAN vvm - आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीताय परणी टीका. तृणामनुपङ्गतो. मङ्गलाय च निवनाति- श्रीनाभिजन्माऽन्वयपद्मभास्करः, स्तुतोऽश्चितः श्रीमुनिसुव्रतान्वये । जिनः शिवायास्तु दधदमहोदयं, स भासतां यद्भजनेजयाश्रयः ॥१॥ (अन्वयः) यदजने सभासतां जयाश्रयः, श्रीनामिजन्मान्वय पनभास्करः, श्रीमुनिसुनतान्वयेऽशित: स्तुतः, महोदयं दधत् स जिनः शिवाय अस्तु । व्याख्या-प्रथममादिनाथपक्षीयाविवृतिः-यस्स-अपभस भ- जने भक्तो सेवायां 'कृते' इतिशेपः। सभासतां सभ्यानां जयाश्रयः- जयाश्रयणं बाबाऽऽन्तररिपुकर्मकविजयाध्याप्तिः 'सञ्जायते इतिशेपः। सः श्रीनाभिजन्मा श्रीयुक्त नाभिराजतनुजः, अन्वयपद्मभास्कर स्वकीयकुलकमलोद्योतनप्रयोतना, श्रीमुनिसुव्रतान्वये श्रीमतां मुनी- 'ना, सुव्रतानां-व्रतान्वितश्राद्धानां चाऽन्वये कुले लक्षणया समूहे इत्यर्थः अश्चितः पूजितः सत्कृत इति यावत् स्तुतः स्तुतिविप- यीकृतः शकेन्द्रादिभिरिति गम्यते महोदयं चतुर्विंशदतिशयसमृद्धि- रूपमहेश्वर्य दधत्-धारयन् जिना जयति रागादीन इति स तथोक्तः रागादि जयनशीलः शिवाय-भव्यानां कल्याणाय अस्तु-भवतु शान्तिनाथ पार्श्वनाथ वीरपक्षे च श्रीनामेजन्म-उद्भवो यस्य तादृशोऽ- न्वया वंश इक्ष्वाकुवंशः सएव पमं तत्प्रकाशे मूर्यः, अन्पत् पूर्ववत् । श्रीनामिजन्मान्वयपद्मभास्करः श्रिया इन:-पतिः श्रीना-श्रीकृ- प्णस्तस्याऽभिजन्म-जनियमिन् सचासावन्वयो यदुवंग सदूपकमलो- छासने रविः,मुनिसुव्रतान्वये-मुनिमुव्रतम्य द्वाविंश जिनस्यान्वयः कुलं हरिवंश स्तम्मिन् अञ्चिता-पूजितः, शिवाया: तन्नामिकाया निजज- ..
NAM महोपाध्यायश्रीमेघविजयगगिविरचिते सहसन्धानमहाकाव्ये नन्याः महोदय तीर्थकज्जनिजनितजगद्वन्द्यताद्यात्मकसौभाग्यं दधत्= सम्पादयन् स जिनो नेमिनाथारच्या भामता प्रकाशताम् शेषं पूर्वपत् शान्तिनाथपक्षव्याणितदिशा चतुर्विशति जिनसामान्यस्य स्तु- त्यात्मकमिदंपद्यमगन्त यं नेमिनाथ-मुनिमुनत्तनज सईपामिश्नाकु- चशप्रभवत्नात् तर नेमिनाथ पक्षोचितप्रकारः परिदर्शित प । मुनि मुनतान्वये मुनिमुत्रतायाः स्खमातुः अन्वये-पितृवंशे श्वशुरवंशे च अश्चित:-अर्चितः उभयकुलानन्दकरत्वात् । श्रीनाभिजन्मान्वयपद्म- भास्करत्वं तु नेमिनाथपक्षवर्णितदिशामसेयमिति. श्रीअहंदाद्यः कृतशान्तिसर्गः, समुद्रजन्मानवराजवर्गः । श्रीपाश्वनाथः शुभवर्द्धमानः, श्रियाऽभिरामस्तमिह स्मरामः॥ २॥ (अन्वय) इह [य] अर्हदाद्य कृतशातिसर्ग समुद्नन्मा नवरानवग श्रीपाश्वनाथ शुभवर्तमान श्रियाभिरामश्च तम् स्मराम ॥ २ ॥ व्याख्या-प्रवृत्तिनिमित्तभूत मप्तशलामापुरुपचरितवर्णनात्मक विधेय तत्स्मरणव्याजेन दर्शयन्नाह-श्री इत्यादि । इह-अस्मिन् काव्ये, यत्तदोनित्यसम्बन्धादग्रेतनतमित्यनुरो- धान् यः श्रीअहंदाद्या श्रीमता मर्हता-चतुर्विंशति तीर्थकताम् आद्यः- प्रथमः पभदेव इत्यर्थः। कनशान्तिसर्ग-कृतः-सम्पादितः शान्त:-- सफलोपटपप्रशमनस्य सर्ग' सष्टिरुत्पत्तियन मतथोक्तः। समुद्रजन्मा नवगजाः=मुदा-हर्षेणमहितः ममुद्-महर्प रजन्-रागगान् मान- बाना राज्ञां च वर्ग:-सम्होयस्मिन् सतयोक्तः। श्रीपार्श्वनाथ:- पार्श्व-समीपे (सेवार्थमागताः) नाथाः-इन्द्रादयो यस्य म तथोक्तः । शुभार्धमान:-शुमेन वर्धते इति, शुभ वर्धमानमस्मादिति, शुभ- -- आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका कल्याणं वर्धते अन्तर्भावितण्यर्थतया वर्धयतीति वा स तथोक्तः । श्रिया-चतुर्विंशदतिशयसम्पदा त्रिलोकीकमनीयसौन्दर्यलक्ष्म्या वा ऽभिरामो-मनोहरः, तं स्मरामा-वर्णनीयतया चिन्तयामो वयं कब- यितार इति गम्यते । ३ पार्श्वनाथपक्षे-श्रीअहंदाद्यः-अर्हता-पूज्यानाम् अर्हत्सुवा आद्यः-प्रधानः श्रीपार्श्वनाथः-तदाख्यत्रयोविंशतीर्थकरः शेषं पूर्ववत्। २ शान्तिनाथपक्षे च कृतशान्तिसर्गः-गर्भावस्थायामपि विहितमारीरूपोपप्लवोपशमनः शान्तिकरणाच्च तदाख्य शान्तिनाथ इत्यर्थः शेषं समानम् । नेमिनाथपक्षे-समुद्रजन्मा-नामैकदेशे नामग्रहणाद समुद्रेत्य- नेन समुद्रविजयो नृपो गृह्यते तसाजन्म यस्य स तथोक्तः नेमिनाथ इत्यर्थः । नवराजवर्गः-नौतीति नवः-स्तोताराजवर्गोऽस्य सः, नवानां राज्ञां वर्गः पितृव्यत्वेनाम्त्यस्येति वा स तथोक्तः अन्यत् समानम् । महावीरपक्षे-शुभवर्धमान इति विशेष्यपदम् गर्भस्थितेड- सिन् प्रभौ पितुः सिद्धार्थराजस्थानुदिनमुत्तरोत्तरं कल्याणाऽभिवृद्ध्या पित्रा शुभसंवर्धनहेतुभूतस्यास्य ‘वर्धमान' इति नामकरणात्. यद्वा शोमते इति शुभः स चासौ वर्धमान इति. रामपक्षे-श्रीअर्हन्तवतुर्विंशतितीर्थकृत आद्याः-मुख्या यस्य यसाद्वा स श्रीअहंदाद्यः। त्रिपष्टिशलाकापुरुषेषु तीर्थकृतां मुस्यत्वात् । दिया-सीतारूपया लक्ष्म्या अन्वित इति शेपः आभिरामः-आभाड स्थाऽस्तीत्याभी स चासौरामः-तदाख्यो दाशरथिवलदेवः, "श्रियास- रामः इति पाठान्तरम् तत्र श्रिया-लक्ष्क्षया युक्तः सः प्रसिद्धः रामः- रामचन्द्रः तं सराम इति मम्बन्धः अन्यद्विशेपणयोजनं पूर्ववत् । " ६ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविचिते-मक्षसन्धानमहाकान्ये warr Rv v mwww. - कृष्णपक्षे-"श्रीअहंदाद्य" ईत्यादिविशेषणार्थ योजनं रामयत् श्रियाऽभिराम इत्यस्य श्रिया-लक्ष्म्या अभिरामो-मनोज्ञः इत्यर्थः । श्रियासराम इति पाठान्तरे श्रिया-लक्ष्म्या मगमः-मभार्यः (रामया- भार्यया महितः इति कृत्वा) रामा हिडलिनी खियोः इति हैमः।।२।। यो वीतरागः कृततीर्थयागः, प्रोद्यत्सभामण्डलसंविभागः । यो नीतिकारी भुवनोपकारी, सेव्यः स भव्यैर्नवकाव्यनव्यः ॥३॥ अन्वयः-यः वीतराग कृततीर्थयागः, प्रोद्यमभामण्डलमविभाग । य नीतिकार्ग भुग्नोपारी, भव्ये. संन्य. स नरकाम्यनव्यः ॥ व्याख्या-ननु मत्स्वप्यन्येषु युद्धादिपु परश्शतेषु देवेषु कथ. मेतेपामेन चरिनाम्याने कविः जातादर इत्याह-य इति. यः अनि- र्दिष्टनामधेयः, वीतगगः-धीतः-विगतः निवृत्तः गगः-मरचन्दन- वनितादिविपयाऽभिपनः यस्य म तथोक्तः तीर्थकृत्पञ्चक श्रीरामपक्ष माधारणोऽयमर्थः । कृष्णपक्षे तु विः-पक्षी गरुड इत्यर्थः तं तम्मिन् घा इतः प्राप्तोरागः-प्रीतिर्यस्य म तथोक्तः । कृततीर्थयागः तीर्थ- माधु-माघी-श्रावक-श्राविकात्मकचतुर्विध मतः लक्षणया तत्स्था- पनमिह गृद्यते तीर्थ यागट्य तीर्थयागः कृतः सम्पादितः तीर्थयागः- तीर्थस्थापन यज्ञो येन म तथोक्तः । रामकृष्णपक्षे-कृतम्तीर्थस्य-मा- धादिसंघस्स यागः-यजनं पूजनं येन मः, कृतस्तीथे-मरवादितटा- स्माधुण्यक्षेत्रे.यागः-देवयूजा येन म इति वा तथोक्तः प्रोद्यत्मभामण्डलसंविभागः-प्रोद्यन्ती दीप्यमाना मभा देवादिपरि- पन् तम्पा मण्डले-ममूहे संविभागः-जीवाजीपादिपदार्थानां विविन्य -vvv AA my mv vw VAN ~ Auv V ~- आचार्यध्रीविजयामृतसूरप्रणीता मरणी टीका. कथनं येन मः . यद्वा प्रोद्यन्-प्रकाशमानः भामण्डलेन महितः सभामण्डलः संविभागः-प्रदेशो यस्य स तथोक्तः तीर्थकृत्पञ्चकमा. मान्योऽयमर्थः । रामकृष्णपक्षे-प्रोद्यन्-प्रकटीभवन् मभायाः राज्य- शासनव्यवस्थापिकापरिपदादेः मण्डलस्य-द्वादश राजकस्य देशस्य वा संविभागः संविभजनं यस्य म तथोक्तः "स्यान्मण्डलं द्वादशराजके च देशे च विम्बे च कदम्बके च" इति विश्वः॥ यः-यातीति यः निर्वाणपदगन्ता, कलुपपटलजलदनिरमनपरनो वा । यो ना बायो यमने इति मेदिनी ॥ नीतिकारी नीयन्ते-उन्नीयन्तेऽथी अनयेति नीतिः न्यायातां करोति तच्छीलः नीत्यावर्तनशीलो नीतिप्रचारणशीलो वा ।। अनीतिकारी इतिच्छेदे अनीतिः-पडविधेतिराहित्यं तत्करण- शीलः ! अतिवृष्टिग्नावृष्टिपकाः शलभाः खगाः। प्रत्यामन्नाश्च राजानः पडेता ईतयः स्मृताः। भुवनोपकारी-भुवनानामुपकारं करोति तच्छीलः सालजगदुपकारकरणप्रवणः॥ भव्यः-प्राणिभिः मेव्यः- सेवितुं योग्यः मः-वर्ण्यतया प्रक्रान्तः नवकाव्यनव्या नवेन-मप्ता- र्थानुसन्धानादिगुणविशिष्टनया नवीनेन काम्पेन नव्या-स्तुत्यः 'गुंफ' स्तवने।अन्त्यानुप्रासः,शब्दार्थोभयश्लेपः,काव्यलिङ्गं चानालङ्काराः। तीर्थ शास्त्रा-ऽध्वर-क्षेत्रो पायो-पाध्याय मन्त्रिपु इति विश्वः । तीर्थ माध्वादिसंघेऽपीत्यागमः। ब्राझीह साऽव्यान्निपुणागमादी- यस्या रसांगारकमलोदयश्रीः । अद्यापि नद्या द्रवसुप्रसादात्- सिताम्वराणां जनंतानुवृत्तिः॥४॥ पन्वयः-इह भागमादौ सा निपुंणा ग्राही अयात् यस्या भया मांगात् । कमलोदयश्रीः वसुप्रमादान, सिताम्बरीश जननानुवृत्तिरयापि ॥४७ " -
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये
व्याख्या-इह आगपादौ शास्त्रादौ अर्थात् असिन् काव्यादी
सा भुवनविदिता निपुणा दक्षा पूर्णत्यर्थः ब्राह्मी सरस्वती "ब्राह्मी तु
भारती भापा गीर्वाग्वाणी सरस्वतीत्यमरः "अव्यात् पायात् यस्याः
सरस्वत्या भारत्या नद्याः पचित्रायाः मर्वश्वेतायाः रसांगात् रसस्या-
खादय अनुभवस्येत्यर्थः अङ्गात् उद्यमात् यत्नात् कमलोदयश्रीः
कमलाया लक्ष्म्याः सम्पदः उदयश्रीः समभ्युदयसम्पत् द्रवसुप्रमादात्
द्रवति निद्यतीतिद्रवः स्नेहः प्रसन्नता इति यावत् तस्य परिहासस्य
मुप्रसादात् सत्कृपातः सिताम्बराणां निर्मलवमनानां देवानां जनता-
नुवृत्तिः जनतायां मनुष्ये अनुवृत्तिरागमनम् स्तुत्यालम्बनतया
जनानुकम्पनमिति भावः अथ च सिताम्बराणां श्वेताम्बराणां
आर्हतानां जनतानुवृत्तिः लोकसदुपदेशानुसरणम् अद्यापि अधुनापि
भवतीति शेपः।
नदीपक्षे च-यस्या नद्याःनदीरूपायाः सरस्वत्याः सरस्वत्य-
भिधानायाः रसांगात् जलरूपात कमलोदयश्रीः कमलानां मरोजानाम्
उदय श्रीः समुद्भवश्रीः सद्विकाशशोमेत्यर्थः द्रवसुप्रसादाद् प्रवाह
सुप्रभावात् सिताम्बराणां अम्बते शब्दं रोतीत्यम्बः शब्दः तं राति-
गृहातीति अम्बरः पक्षः सितौ अम्बरी येषां ते सिताम्बराः हंसाः
तेषां जनतानुत्तिः मानससरात् नरक्षेत्रे अनुवृत्तिनुमतिरद्यापीदा-
नीमपि भवतीति शेपः।
मुखेन दोषाकरवत् समानः,
सदा-सदम्भः-सबने सशोचः ।
काव्येषु सद्भावनयानमूढः,
किं वन्दयते सजनवन्ननीचः? ॥ ५ ॥
आचार्यश्रीविजयामृतसूरिमणीता सरणी टीका,
अन्वयः-नीचः सजनवत् किं न चन्द्यते ? मुखेन दोपाकरंवत् समानः।
-सदा संदम्भः सवने सशौचा, काव्येषु सद्भावनया न मूढः ॥ ५ ॥
व्याख्या-नीचा दुर्जनः सजनवत्-सत्पुरुष इव किं न वन्द्यते
अभिवाद्यते स्तूयते वा उभयोः समत्वात् । साम्यं दर्शयति-मुखेन
दोपाकरवत्न्दोपा रात्रि करोतीति सः तेन तुल्यं तद्वत् चन्द्रसदृशः,
समानःसह मानेन-सम्माननेन पूजा सत्कारेण वर्नते इति स तथोक्तः
सदम्भःसवने सम्मत्यमेवाऽम्भः-जलं तसिन् सवनेलाने अनु-
शीलने स शौचाम्सनैमल्यः पवित्रः सत्यनिष्ठ इत्यर्थः । काव्येपु-
सद्भावनया-उत्कृष्टभावनया न मूढः उत्तमविचारणया हेतुना न मूढः
न अनभिज्ञः यद्वा काव्येषु सद्भावनयानमूढ इति समस्तं, काव्यस्य
इषुपु-गुणेषु सद्भावनं सद्विचारस्तत्रयानं गमनम् ऊढः प्राप्त इत्यर्थः।
अत्र दुर्जनस्य व्याजस्तुत्या सर्वथाऽवन्द्यत्वमेव सोसूच्यते सज्जनतो-
महदन्तरत्वात् तथाहि नीचः मुखेन दोपाकरवत्समानः दोषाणां
दुर्गुणाना-माकरः राशि रस्त्यासौ दोषाकरवान् तेन समानः सदृशः
गुद्यप्रकाशनादिदुर्गुणोदीरणकरणतया बदनेन दोषपुञ्जविशिष्टतुल्यः ।
यद्वा दोपाऽऽकर इव दोपाकरवत् । समानः साऽहङ्कारः सदास-
दम्भः सकपटः, सबने मद्यसन्धाने उपलक्षणतयातदादिकार्येऽसशौ
चा शौचेन सहितः सशोचः सनभवतीत्यसशौचः अशुचिरित्यर्थः।
यद्वा सदम्भः सवने सत्पक्षपातकरणे सशौचः शुचव शौच-शोका
स्वार्थिकः प्रज्ञायण तेन सहितः सशौचासशोक इत्यर्थः ।
काव्येषु सद्भावन-यान-मूढः-सद्भावने-सद्विचारे यानं गमनं
तस्मिन् मूढः विकलः अपटुः, ॥ उपमा, अर्थश्लेपः, सभङ्गशब्द-
श्लेषः, व्याजस्तृतिथालङ्काराः ॥ सवनं बंवरे खाने सोमनिर्दलने-
ऽपिचेतिमेदिनी ॥५॥
. . महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये उच्छृङ्खलाकि खलतो न विभ्येत्, सभ्यस्तथेभ्यः परमार्थनाशात् ।। नाशाह्य नाशा किमु वर्धनीया, श्रुत्याविहीनस्य सकर्णतायाम्'॥ ६ ॥ (अन्वयः)--इम्यः परमार्थनाशात् तथा सम्य उच्छृहसलात्, खलत: किं म विभ्येत् श्रुत्याविहिनस्य सकर्णतायाम् अनाशा आशा किमु न वद्धनीया ॥६॥ व्याख्या-इम्य आट्यः परमार्थनाशात् परमार्थस्य-उत्कृष्टाभीष्ट वस्तुनः मूलधनादेः नांशात् अपायाद् तथा-इव सभ्यः सज्जनः उच्छृङ्खलात्-उद्गतः शङ्खलातः इत्युच्छृङ्खला मर्यादादिवन्धनरहितः नीत्यादिनियन्तरहितो वा तसात्तथोक्ता सलतः दुर्जनात् किं न चिभ्येत्=भयमाप्नुयात् ननु सलस्यापि शास्त्रश्रवणादिना सौजन्य किं न स्यादित्याशङ्कायामाह 'नाशा' इति ध्रुत्यां-शास्त्रश्रवणेन वि- हीनस्य धर्जितस्य अकृतशास्त्राभ्यासस्य श्रवणशक्तिरहितस्य बधिरस्ये- त्यप्यर्थो गम्यते. सकर्णतायाम् श्रुतितत्परतायाम् शास्त्राभ्यासादिक्ष- मतायामित्यर्थः अभिज्ञतायामिति यावत् अन्यत्र श्रवणक्षमतायामिति गम्यने अनाशा=न आशा दिक् परिच्छेदो यस्यां सा तयोक्ता अप- रिच्छिन्नेत्यर्थः आशा-अशक्योपायार्थविषयिणी दीर्घाऽऽकावा'अन- धिंगतविषयातृष्णा वा किमु नवर्द्धनीया-वृद्धि नेया.वर्धनीयवेत्यर्थः भैपज्यादिसेवनेन कर्णवाधिर्यमिन शास्त्रश्रयणादिना सलानामपि औ- त्यं दूरीभूय जातसौजन्यतया भयाऽजनकन्यं मम्भवतीतिमावः । अर्थान्तरन्यासः ॥६॥ काठिन्यभाजो हृदये खलस्य, का वक्रता शृङलकस्य नाङ्गे ॥
। आँचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका भारक्षमस्याऽपि नसोऽग्रवेधः, सुमेधसाऽकारि सवेधसाऽपि ॥७॥ अन्वय -दृदये काठिन्यभाज खरस्य [काठिन्यभाज खरस्य हृदये वा] शृङ्खलकस्य भङ्गे [च का वक्रता न [अस्ति] [यत ] भारक्षमस्यापि नसो ऽप्रवेध सुमेधसाऽकारि, स वेधसाऽपि अस्य [अकारि] व्याख्या-हृदये मनसि काठिन्यं नैष्ठ्यं भजते स का- ठिन्यभाक् तस्य तादृशस्य सलस्य दुर्जनस्य, हृदये मनसि काठिन्य= दाढथं भजते तादृशस्य शृङ्खलकस्य-उष्ट्रस्य अङ्गे च का चक्रता क्रूरता अन्यत्र कुटिलता भुग्नतेत्यर्थः न अस्ति साप्यस्तीत्यर्थ. स- लानां नूरहृदयत्वात् उष्ट्राणा च कुटिलबहुलाऽपघनत्वात् । अत एवं' भारक्षमस्य-कर्पण वाहनयोग्यतादिधुरंवोढुं शक्तस्य शृङ्खलकस्य नसः= नासिकायाः अग्रवेधः-पुरोवेधनं मच्छिद्रीकरणं सुमेधमा-कर्षणाह- नादिक्षमताऽवगतिमेधाविना कृपीपलादिना अकारि व्यधायि. वे- घसा-ब्रह्मणाऽपि सःप्रक्रान्तः अग्रवेध =अग्रे-प्रथमवेधः व्यधनं हिंसनं सलस्य नैसर्गिकतया अकारीत्यर्थः । यद्वा साम्पलः अपि वैधमा अग्रवेधः अग्र-पूर्व विध्यति-छिनत्ति स तथोक्तः हिंस्रस्व- भावकः अकारि। यद्वा अग्रवेधः वेधाविवाहादिशुभकार्यवर्ण्य नक्षत्र विशेषस्थितग्रहमेदकृतसंसर्गः 'वे सर्वत्र वर्जयेदितिज्यौतिपोक्तेः तथा च अग्रे आदौ वेध इस अनोधः वर्जनीय इतिभागः अकारि । हृदयं वक्षसि स्वान्ते चुक्ायामितिहैमः । चक्रः कुटिले कर भौमयोरितिहमः । काठिन्यभाजः सलस्य हृदये काऽपि वक्रता (अस्ति) या शृङ्खलकस्यापि अङ्गे न रर्तते । यतः भारक्षम- स्यापि । तस्य सोऽगुवेधः सुमेधसावेधसाऽपि नाकारि इति तुज्यायः। " .
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकान्ये त्याज्यः स राज्यात्पुरतोऽपिराज्ञा, भायात्सभाया न रुचिः खलेऽस्मिन् । यत्र द्रुमाः कण्टकिनः पुरस्ता- त्स दुष्प्रवेशः सुमनःप्रदेशः ॥ ८॥ [अन्वयः]-अस्मिन् खले सभाया रचि. न भायात् [ इति ] राज्ञा राज्यात् पुरतोऽपि स त्याज्यः । यत्र पुरस्तात्कष्टकिनो द्रुमाः स सुमनःप्रदेशः दुप्रवेशः ॥ ९ ॥ व्याख्या-अस्मिन् खले-पिशुने विपये सभायाः समाजस्य जनताया इत्यर्थ रुचिप्रीतिः न भायात्-शोमेत यद्वा असिन् खले. सति समाया रुचि:-कान्तिः नभायात्-प्रकाशेत विवादोत्थानसंभ- वात् । अर्थ वा अस्मिन् खले सभाया न रुचिराजपरिपत्प्रवेशाऽभि- रुचिःभायात् एवं समम्भाव्यते इति हेतोः राज्ञा नृपेण शासकेनेतिभावः राज्यात्नाजधान्याः राष्ट्रादा पुरतः स्वायतः नगराद्वा गृहाद्वा अपि स्याज्य वर्जनीयः निष्कामनीय इत्यर्थः अमुमथं दृष्टान्तेन दृढयन्नाह- योति यत्र सुमनःप्रदेशे पुरस्तात् प्रवेशमार्गस्याग्रतः कण्टकिन-त कण्टकाः द्रुमा मार्गवृक्षा भवेयुः स सुमनमां-पुष्पाणांप्रदेशः सुमनः= प्रदेशः पुष्पवाटिकादिः दुप्प्रवेशः अशक्यान्तर्गमनो भवतीति लोके प्रसिद्धोऽयमर्थः । शब्दश्लेपो, द्रष्टान्तश्च पुरं नपुंसकं गेहे देह पाटलि- पुत्रयोरितिमेदिनी स्यात्पुरः पुरतोऽग्रत इत्यमरः ॥ ८ ॥ खलादरो यश्च गवां स्वभुक्तो, भवेत्पशूना मुचितो न नृणाम् । . स गोः पतित्वाद् यदि भूपसर्गे, तत्पाशुपत्यं ध्रुवमीश्वरस्य ॥९॥ ..
१३ .. भावार्यश्रीविनयामवरिप्रणीता सरणी टीका. अन्वयः-गवां स्वभुत्तो यः खलादरः भवेत् [असौ] पशूनां [गवाम्] उचितः, नतु नृणाम्। स गो:पतित्वात् यदि भूपममें स्यात् तत् ईश्वास ध्रुवं पाशुपस्यं भवेत् ॥ ९॥ व्याख्या:-गयां धेनूनां स्वभुक्तौ स्वाहारे विषये यः खलादरः खलं-तिलकल्कः धान्यमर्दन मिश्च तत्राऽऽदरः स्नेहा असौ पशूनाम् उचिता योग्यः अगर्हणीयः भवेत्. न तु नृणां= मनुष्याणामपि । दुर्जनेषु प्रीतेः तेभ्य स्वामस्य तिलकल्काशनस्य च मनुजाना मनौचित्यात्। तथा च स खलादरः-सले-नीचे आदरः गोः पति- स्वात्-गौः (सौरभेयी पृथ्वी च तस्याः पतित्वात्-स्वामित्वात तत्सा- म्यादिति भावः, यदि भूपसर्गे-नृपस्वभावे नृपमाम्राज्ये वा सात् तत्-तदा ईश्वरस्य-राज्ञः पाशुपत्यं पशुपतित्वं मुखशिरोमणित्वं चर्व निश्चित स्याद् शब्दसाम्येन छलितत्वात् ।। स्वर्गेषु पशुवाग्वज दिग्ने- जणिभूजलेगौरित्यमरः ॥ ९ ॥ खले प्रतीता वहुधा-न्यपाताद, विक्षेपणा क्षेपमतिर्नृपस्य। मुखे निवन्धेन गवां नृणां वा, निजार्जितस्यापिमनागन भोगः॥१०॥ अन्यय -सले बहुधा-न्यपरताद् नृपस्य, विशेषणाक्षेपमान प्रतीता । नृणा गवो वा मुखे नियन्धेन निजार्जितस्यापि मनाग भोग न ॥१०॥ व्याख्या -खले दुर्जने विद्यमाने सति बहुधा बहुप्रकारेण अ- न्यपातात् अन्येषां-परेषां खलानुमतानां पातान्-आपतनात् प्रवेशात् । नृपस्स खलाधीनसर्पराज्यतन्यतया विक्षेपणाक्षेपमतिः-विक्षेपणे= अभिमतानां दूरीकरणे आक्षेपे-मान्यानां गर्हणे च आसमन्तात् ।
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये क्षेपे-विलम्बे राजकार्याणा सम्पादन कालाऽतिपाते वा मतिः-वृद्धिः विचारो वा प्रतीता-प्रसिद्धा एवाऽस्ति ! लोकेऽपि खले-धान्यमर्दनस्थले बहुधान्यपातात्-बहूनां-प्रचुराणा धान्याना-प्रालि गोधूमादिनीहीणां पातात्-मर्दनार्थ पक्षेपात् नृपस्य-: तत्वामिनः खेटकादेः विक्षेपणाक्षेपमतिः-विक्षेपणे पूर्व प्रसारणे तदनु आक्षेपे-दूरं विकीर्णानां समूहन्यादिना राशिकरणे च मतिः मनः- प्रवृत्तिः प्रतीता-ख्याता एव । पूर्वत्र खलनीत्या नृणां-राजपुरुपाणां मुखे-निःसरणे निर्गमन= प्रवेशमार्गे इत्यर्थः विपये निबन्धेन-नियमनेन प्रतिवन्धजननेन सता निजार्जितस्य-खोपार्जितस्य वेतनादेः मनाग्-अल्पमपि भोगः-उपभोगः सुसंवा न संभवतीत्यर्थः। यद्वा नृणा-विपश्चिन्मनुजानां मुस-प्रवेशे निवन्धेन निजार्जि- तस्थ-खोपार्जितविद्यादेः मनाग भोगः-उपयोगः विद्यालामजन्यमै- हिक सुसं ना न समस्ति भवितुमित्यर्थः । विद्यावतां बाणभट्टादीना- मिव राज्ञः श्रीहर्षादेरिव ऐहिकसुसमाधनधनलाभे सत्येन विद्याया ऐहिकोपयोगः । राजधान्या सलप्रवेशे तु विदुषां प्रवेशस्याप्यमम्भरः विद्याचमत्कारप्रदर्शनपरितुष्टनरेन्द्रदित्स्यस्खापतेयाद्यात्मकपुरस्कारादे- स्तु कयैव का। अन्यत्रापि स गवां-वृपमाणां-मुसे-तुण्डे निवन्येन-नितराव- न्धनेन निजार्जितस्य-हल कर्पणादिव्यापारजन्यतया सोपार्जितपला- लादेरपि मनाम् भोगः न भवति । शब्दा-योभयश्लेपः। उपमालङ्कारध्वनिः । सलः कल्के झुवि-- स्थाने ऋरे कर्गेजपेऽधमे इतिहेममैदिन्यो मुसं निःसरणे वक्रे प्रारम्भो- म :: आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, पाययो रपीतिमेदिनी । भोगः मुखे धने पुंसि चाहेः फण-शरीरयोः। पालनेऽम्यवहारे च योपिदादिभृतावपीति मेदिनी ॥ १० ॥ कार्यो.खलानां स्खलना नृपेण, प्रसङ्गतः शृङ्खलमीलनेन । उच्छृङ्खलः शृङ्खलको न किस्या- दुद्वेजकः कण्टकसंकटन ॥ ११॥ (अन्वयः)-नृपेण प्रसङ्गतः शृङ्खलमीर नेन खलाना स्थलमा कार्या. उखलः शृङ्खलकः कण्टकसंकटेन उद्देजः किं न स्यात् । च्याख्याः-नृपेण-राज्ञा प्रमङ्गतः-अवसरं प्राप्य शृड्वल- मीलनेन-शृङ्गात् प्राधान्यात् स्वल्यतेऽनेनेतिशृङ्खला पूपोदरादित्वात् भूसला लौहमयबन्धनरज्जुविशेषः तस्य तेन वा मीलन संबन्धः तेन तथोक्तेन शुहलया नियम्येतिभावः खलानां दुष्टानां स्खलना-गतिप्र- तिरोधः कार्या=विधेया। अन्यथाऽनिष्टमाह-उच्वल इतिः उद्गतः गृहलातः इति. उच्छिन्ना शृङ्खला येनेति वा उच्छृहला लौहमयपाद- बन्धनरहितः नासारज्वादिरहिततयानिधिगतिका शृंदलका उष्ट्र: कण्टकसंकटेन कण्टकैः सूचीबत्तीक्षणाग्रवृक्षावयंचविशेपैः संबंन्दा सं- कीर्णः बन्यप्रदेशादिस्तेन, कण्टकैः संकटं दुःखं तेन तजननेन हेलना वा उद्वेजक:-चित्तव्याकुलताजनकः किं न सात् स्यादेव. उष्ट्राणां कण्टकप्रियतया तदाचितप्रदेशादौ तद्गमने तदन्वेषणार्थ तत्रगतानां तदारूंढानां कण्टकमम्बन्धमम्भवात् । उच्छृहला अनियन्त्रितः निरङ्कुशः खलोपि कण्टकसंकटेंन कण्टका इव दुःखजनकत्वात् कष्टका शुद्रशत्रवस्त्रेभ्यःसंकट-दुःवं विपत्तिर्वा तेन तनननेनेविभावः उद्देजका-शुशग्वादिमिविरोधादि- . . महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये जननद्वारा व्याकूलीभावजनकः । किं न स्यात् स्यादेवेत्यर्थः ॥ शब्दा ऽर्थोभयश्लेपः अर्थान्तरन्यासः अनुप्रासः । शृङ्खलं पुस्कटीकाञ्च्यों लौहरनौ च बन्धने इति हैमः ॥ कंटकः क्षुद्रंशत्रौ च कर्मस्थानकदो. पयोः । रोमाञ्चे च द्रुमाङ्गे च कण्टको मस्करेऽपिचेति विश्वः ।। यद्गोरसाधिक्यमुदेतिलोके- खलस्यपर्यायविनाशनेन । संभाव्यतेस्मादमृताशनस्या- धिकाधिकारद्विवुधात्मनैव ॥१२॥ अन्वयः-लोके खलस्यपर्यायविनाशनेन यद्गोरसाधिक्यमुदेति अस्मात् । 'अमृताशनस्य अधिकाधिकारात् विवुधात्मतैवसंभाव्यते ॥ १२ ॥ व्याख्या-लोके खलस्य तिलकलकस्य द्रव्यविशेषस्य पर्याय विनाशनेन पर्यायः क्रमभाविस्वभावः प्रकृते खलत्वरूपस्तस्य विनाशने मध्वंसेनेत्यर्थः गोरसाधिक्यं दुग्धघृतादिप्रचुरता उदेति उद्भवति असाद गोरसाधिक्यात् अमृताशनस्य दुग्धघृतादि भोजनस्य अधिका- धिकारात् अधिकप्रवर्तनात् निरन्तरप्रचारात् विबुधात्मतैवपण्डिता- मतैवसंभाव्यते उत्प्रेक्ष्यते शुद्धाहारविहारस्य निर्मलवुद्धिप्रयोजक- त्वादितिभावः। : अयं च खलस्य दुर्जनस्य पर्यायविनाशनेन तद्वाचकपर्याय- शंस घातुक क्रूरादिशब्दानामपि निराकरणेन गोरसाधिक्यम् गोः वाल्याः रसस्य आस्वाद विशेपस्य आधिक्यम् समृद्धिमदेति या गोः पुलिया रसास गुणस्य शान्दयदे एपिपय मनुस्मनुदेति प्रकाशते असादं गोरसाधिक्यात् अमृताशनस्य देवस्य अधिकाधिकारांत् अ- अधिकसम्बन्धी विघात्मतेव सर्वेपान्देवत्वमेव समान्यते देवस- .. .
MAN AAR .. आचार्यश्रीविजयामृतसरमणीता सरणी टीका, म्बन्धादन्येपामपि देवत्वं मुत्तरां भवतीति भावः।१२। श्लेपतुल्ययोगिते चात्रालंकृती। खलःकल्के विस्थाने इति हैमः पिशुने दुर्जने खल इति शृङ्गारादौ विपे वीर्ये गुणेरागेद्रवेरस इत्युभयत्रामरः ।। १२ ।। कायेन वाचा मनसा विशुद्धः, स पक्षमध्यस्थित एव हंसः ॥ ब्रह्माऽमुनाऽवायधियापि बाह्यः, प्रियो विधिस्तन्ननु सज्जनस्य ॥१३॥ अन्वयः- हम पुत्र [यथाहंमः] कायेन चाधामनसा विशुदः पक्षमध्यस्थितः । तियामानोऽवि] अमुना ग्रहाऽयाहाधियाऽपि वाह्य तत् विधिःसजनस्य प्रियः ।। व्याख्या-~स यलनः हंस एव हेतुमाह यथा हंसः स्वनाम ख्यातपक्षिविशेषः कायेन-खरूपेण वाचावरेण मनसा च विशुद्धः अवदातः पवित्रश्च पक्षमध्यस्थितः पक्षयोः गस्तोमध्ये ऽन्तरालेस्थितः तथा मननोपि कायबाानोभिः विशुद्धा अनवद्यः, पक्षमध्यस्थितः- पक्षे-यादि प्रतिवादिनोविंगेधे मध्यस्थितः मध्यस्थः । यहा पक्षयोः- वादिप्रतियाधुभयप्रश्नकोटि-समाधान कोटयोर्मध्यम्यिता-माध्यस्थ्य माश्रितः नत्वन्यतर पक्षपातीत्यर्थः निप्पक्षपात इति यावत् । अन्यदपिसाम्य दर्शयति ब्रह्मेति अपना-दंसपक्षिणा ब्रह्मादेव विशेषः अपायधिपा हार्दिकानुरागेण यद्वा अयं मयावाद्य इति संकल्पमन्तरेणापि खमावतएवयापासष्ठेधार्यः हमस्य तद्वाइनत्वात् तत् तस्मात् सबनस्य विधिः शास्रोतक्रियाकलापः प्रियः स्वकर्तव्यत्वेनामिमत इत्ययः अ. प्रविधिशन्दस ब्रह्मशब्दपर्यायत्वेऽप्पमेदादर्थश्लेषः तथा सजने हंसारोपणाद्पकोऽवाद्ययावत्वेन विरोधाभामथेत्यलंकृत्तयः ॥ १३ ॥ मरालवालः स्वत एववक्त्रे, रक्तः प्रसक्तश्चरणेऽपि तद्वत् ॥
virwwww rwwwwwwwwwwwwwww महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये स राजहंसः कविनास्वकायें, स्मार्यःस दुग्धाम्भसि तद्विवेता॥१४॥ अन्वयः-विना स्कायेंमरालवाल:वस्वतएवरक्तः तद्वच्चरणेऽपि प्रसक्तः मदुग्धाम्भसि तद्वियेतासराजहसः स्मार्यः ॥ १४ ॥ व्याख्या-कविना काव्यंका खकार्यकविकर्मणि काव्यादौ साम्प्रसिद्धः (प्रक्रान्त प्रसिद्धाऽनुभूतार्थकस्तच्छन्दो यच्छब्दोपादानं नाऽपेक्षते इति नियमादत्र (पद्ये) यच्छब्दस्याऽनपेक्षिततया नोपादा- नम्) राजहंसा हंसानां राजा श्रेष्ठत्वात् (राजदन्तादित्वात् परनिपातः) रक्तवर्णचञ्च चरणयुक्त श्वेतवर्ण हंसविशेपः राजहंसास्तु ते चञ्चु चरणोहितैः सिताः इत्यमरः । राजा हंस इन सारग्राहित्वादिगुण- साधयदि राजहंसःनृपश्रेष्ठश्च स्मार्य एकत्र सारग्राहित्वादिगुणैरनुक- रणीयतया अपरः पवित्रचित्रचारित्रशालितया वर्णनीयतया स्मर- णीयः तेन च कवेः प्रनिभादिविकाशात् । मकलकलंपुरमेतज्जातं म. म्प्रति सुधांशुविम्बमिव इत्यादाविव उभयोः (हंमस्य राज्ञश्च) समान शब्द वाच्यतारूपमाधयं श्लेषेणाह-मरालेति । हंसपक्षे मगलवालः मरालः राजहंमजातीय हसविशेषः तस्य पाल: शावकः अपत्य मित्यर्थः तद्वंश्य इति तात्पर्यम्, अत एव के चश्चौ स्वतएव-निमर्गा- देव रक्ता-लोहितः, चरणे अङ्गियुगलेऽपि तद्वत्-तथा रक्त इत्यर्थः, प्रसक्तः प्रसक्तिः प्रसङ्गा-गुणिनां प्रस्तावः गुणवतांचर्चायामाख्यान मित्यर्थः अस्याऽस्तीति म तथोक्तः। म दुग्धाम्भसि-क्षीरसंमिश्रनारे तद्विवेता-तयों (दुग्धजलयोः) पृथग्भावमम्पादयिता विवेचको वा राजपक्षे-मरालवाला-मरालाः ऋजलानि इव वाला मूर्धजाः केशा- यस्य म इति. मराला:-चित्रणाचाला केशायम्येतिवा म तथोक्तः। यद्वा मगलान् पलान् वाग्यतीति मः । ग्लयोडलयोथैव म-गयो .
HARYA " आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी, टीका, वयो स्तथेतिवचनेन वचयोः पलयोचकत्वस्मरणात् । वक्त्रै-वाग्मिर्ने 'युक्तियुक्तबहुवादिने रक्तः अनुरागवान् यद्वावक्त्रे मुखे रक्तः प्रसन्न हित्यर्थः चरणे आचारे श्रेष्ठाचरणे शीलेवा प्रेसक्तच्यासमवान् लीन इत्यर्थः यद्वा रणे-युद्धे प्रमक्तः-सानन्दः सदुग्धाम्भसि-दुग्धमिश्न जले लक्षणया सदसतोरित्यर्थः तद्विवेत्ता-विवेचनशीलः सदसद्विवे- कशालीत्यर्थः ॥१४॥ सत्त्वेऽध्यसत्त्वे कियती कथा न, तत्सन्तु सन्तः सततं प्रसन्नाः । काव्येक्षणाद्वः कृपया पयोवद्, भावाःस्वभावात्सरसा यतःस्युः॥१५॥ अन्धयः-सत्वेऽमस्येऽपि कियती कथा न [अस्ति तत् सन्तः प्रसप्ताः सन्तु. [ मयि ] यत. वः कृपया काव्येक्षणात् भावाः पयोवत् स्वभावात् व्याख्या-अपि समुच्चयार्थकोभिन्न क्रमथ (गर्हा-समुच्चय- प्रश्न-शङ्कासंभावनास्वपि इत्यमरः) तथा च सत्वे-माधुभावे सज- नत्वे इत्यर्थः अमचे असाधुभावे असजनत्वे दौर्जन्ये इत्यर्थः कि- यती-किंप्रमाणिका कथावाक्यविस्तारः न अस्तीति शेषः बहुविधै- कथाऽस्तीत्यर्थः। यद्वा सत्त्वे-गुणे असचे दोपारोपे च बढयउक्तयः सन्तितत्-तेन हेतुना तसाद्धेतोर्वा सन्तः-सजनाः सततं प्रसन्ना:- कृतप्रसादाः अनुग्राहका इत्यर्थः सन्तु-भवन्तु मयीतिशेपः । यतः- यस्मात् कारणात् प्रसादाद्वा वा-युप्माकम् ईक्षणकर्तृभूतानाम् कृपया अनुग्रहेण काव्येक्षणात्-काव्याऽवलोकनात् प्रस्तुतकाव्यसमीक्षणा- -दित्यर्थः यद्वा काव्यया-घिया-ईक्षणात्-पर्यालोचनादित्यर्थः (काव्य ग्रंथे पुमान् शुक्र काव्यासापूतना-धियोरितिकोशः) भावा:- सरसा: स्युः ॥ १५ ॥ - महोपाध्यायत्रीमेप्रविजयगणिविरचिते सक्षसन्धानमहाकाम्ये रत्यादिस्थायिभावादयः। देवादिविपयारत्यादयो वा पदार्थो वा... 'यद्वा अभिप्रायाः, पयोवद्-दुग्धवत् जलवद्वा स्वभावात्-निसर्गाद सरसा:-अनुकूलाः वर्णनीयानुगुणा इत्यर्थः । यद्वा मनोहराः, मधुरा वा स्युः ।। यद्वा यतः-प्रसन्नत्वात् कृपया काव्येक्षणात् वः भावाः- आशयाः हृदयानीत्यर्थः खभायात् न तु दुर्जनादेरिवकृत्रिमतयेति- भावः सरसाः सार्दा अनुकूला वा स्युर्येन कवीनां प्रवृत्तिः सफला मवेत् ॥ १५ ॥ श्रेणीभवद्भव्यमणी मणीवकै- वरैरगानां निकरीविकखरे द्वीपेऽस्ति जम्बूपपदे प्रभारतं, श्रीभारतं भारतवित्स भारतम्॥१६॥ अन्वयः-श्रेणीभवद्भव्यमणी मणी च (व) कैः वरैः भगानां निकः विक. स्वरे जम्यूरपदेहीपे प्रभारतं भारतविन्सभारतं श्रीभारतम् अस्ति ॥ १३ ॥ व्याख्या-श्रेणीभवद्भाव्यमणीमणीवकः-अश्रणयः श्रेणयः सम्पद्यन्ते तथा भवन्ति इति श्रेणीभवन्ति. मण्यः-रत्नानि मणीयकानि कुमुमानीव इति मणीमणीयकानि श्रेणीभवन्ति भव्यानि-शोभनानि मणीमणीवकानि येषु ते श्रेणीभवङ्गन्यमणीमणीवकाः तैः तथोकैः । अगाना-न गच्छन्तीत्यगा:-पर्वता वृक्षाच "शैल-वृक्षोनगावगौ" इत्यमरः । तेषां तयोक्तानां निकः-समूहै: विकस्वरे-विकासिनि "विकासीतु विकस्वरः" जम्यूपपदेवीपे-जम्बूद्वीपे इत्यर्थः । प्रभारतं भरतस्य-आपमेः, दौप्यन्ता दाशरथे; गोत्रापत्यानि भारताः, प्रकष्टा भारता:-भरतवंशीयनृपतयो यसिन् तत् । यद्वा भरतेन मुनिना प्रोक्तं भारतं प्रकृष्टं भारत-नाट्यशास्त्रं यस्मि स्तत् । अथवा प्रभा रता-सदासितिकायत्र तत्-प्रमासु रत-मपतं वा तद । .
२१ ." आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. यद्वा अरतिः-रतिविरहः रागाभावोवाऽस्याऽस्तीत्यरतः अर्श- आद्यच् प्रभः-चन्द्रप्रभस्वामी ' नामैकदेशग्रहणे नामग्रहणात् देव- दत्तो दत्त इतिचत्. तथाच प्रभः चन्द्रप्रमः अरत:-रतिविरहितः रागा-भाववान् वाऽत्र तत्प्रभारतम् । भारतवित्सभारतम्-भरतान्-भरतवंश्यानधिकृत्य कृतोग्रंथो भारत-पाण्डवचरित-महाभारतादिकम् भरतेन मुनिना प्रोक्तं भारद- नाट्यशास्त्रम् वा विदन्ति-जानन्तीति भारतविदस्तेषां समास-परि- पत्पुरतम् बहुतरभारतवित्परिपत्कमित्यभिसन्धिः। श्रीभारतम्- विभाति-पालयति पटखण्डं भरतक्षेत्रमिति भरतः तेन चिन्हितं पालितं वा तस्येदं वा भारतम् श्रीभिः सहितं भारतं श्रीभारत-भरतक्षेत्र- "मित्यर्थः अस्ति-वर्तते अनुप्रामः । स्वभावोक्तिश्च । रत्नं मणियोरश्मजातौमुक्तादिकेऽपिचेत्यमरः पुष्पंसून सुम- नसः प्रसवश्च मणीवकम् इति हेमचन्द्रः भारतो भरतापत्ये... इति. भारत ग्रंथभेदेस्थाद्वपमेदे नपुंमकमिति च कोशः॥श्रीर्वेशरचना शोभा भारती सरलद्रुमे । लक्ष्म्यां त्रिवर्गसम्पनिविधोपकरणेषु च। विभूती च मतौ च स्त्री इति मेदिनी कोशः ॥ “श्रेणीभवद्भव्यमणीमणीचकैः” इत्येतद्घकटकं "मणीचक्र" पदं यदि कवेः स्वीयशयकुशेशयकलितललितलिप्या 'चकार' तृतीया- क्षरकमेवनिर्गतं चेत्तदाऽयमर्थ:-"मणीव चकते धातोरनेकार्थत्वात दीप्यते इति मणीचकः दीपविशेपः-विद्युद्दीप इत्यर्थः । चक सौ प्रतीधाते च. पचाद्यच । मण्यः मणीचका इव इति मणीमणीचकाः, अंगी भवन्तः पंक्तिवद्धतयास्थिताः भव्या शोभना मणीमणीचका- येषु ते श्रेणीभवद्भव्य मणीमणीचका स्तैस्तथोक्तः" ।। १६ ॥ ..
२२ www MAM PARAN महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये गङ्गाऽनुपङ्गान्मणिमालभारिणी, सुरद्रुसेकामृतपूरसारणी । क्षेत्रक्षमेशस्य रसप्रचारिणी, साप्रागुढा वनितेव धारिणी ॥१७॥ अन्यय -प्रागुढा वनितेर गहा [शोभते क्षेत्रक्षमेशस्य अनुपङ्गात् मणि मालभारिणी सुरद्रुसेकामृतपूरसारणी [क्षेत्रनमेशस्य] रसमचारिंगी धारिणी ॥१८॥ व्याख्या-क्षेत्रक्षमेशस्य क्षेत्र पृथ्वीपतेः भरतक्षेत्रस्य प्रागुदूढा--- पूर्व परिणीता चनितान्त्री डव गङ्गा-तन्नाम्नी शाश्वती महानदी शोभते इति सा कीमशीत्याह-क्षेनक्षमेशस्य क्षेत्रस्थः क्षमेश क्षेत्रक्ष- मेशस्तस्य वैताढ्य पर्वतस्य अनुपङ्गात् सम्बन्धात् मणिमालभारिणी मणीनामाला बिभर्ति धारयति तच्छीला यद्वा मणीना मालेव इति मणिमाला-दीप्तिस्ता यद्वा मणीना मालेव माला-पंक्तिर्मणिमाला ता विभीत्येवंशीला रत्नसमूहधारिणीत्यर्थः माले-पिके-ष्टिकस्या- न्ते भारि-तूल-चितेषु इत्यनेन माला शब्दस्य हस्खत्वम् । वैताढय- पर्वतामन्ने गङ्गाया नगनिधान शालित्वस्य शास्त्रसिद्धतया मणिमाला धारित्वमुपपद्यते । पुनः की-शी' सुरट्टसेकापूरसारणी-सुरगुः कल्पवृक्ष देवदामवृक्षो वा तस्य सेचन सेका जलादिनाऽऽीकरणम् सिर्भावेघञ् । सेकार्थम् अमृतंवारि तस्य पूरः अवाहः तस्य सारणी कुल्या इत्र । पुनः कीदृशी? क्षेत्रक्षमेशस्य वर्षपर्वतस्य प्रस्तावात् हेमवतः रसप्रचारिणीरसं-जलं तम्य प्रचारिणी आसमुद्रं विस्तारि• णीत्यर्थः । यद्वा क्षेत्रक्षमेशस्य क्षेत्र-कलत्रं भार्येत्यर्थः तस्य तथा वा क्षमा=योग्यः हितो वा शक्ती वा ईशः पतिः तस्य तथोक्तस्य रस- प्रचारिणी रस आनन्दः शृगारादिवा तस्य प्रचारिणी सम्पादिका A अन्वयः- आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. जनिकेत्यर्थः । पु० की० ? धारिणी-दुर्गतीपतज्जन्तून् धारयतीत्येवं- शीला यद्वा पापानरके संभावितपातान् प्रापिनो निजभुवनपावन जीवनाऽवगाहनविगतकल्मपतया धारयति अवलम्बते तच्छीला । अत्रपद्ये क्षेत्रक्षमेश'पदे तन्त्रं विवक्षितम् तेनामी अर्थत्रयवाची ॥१८॥ उपमाऽतिशयोक्तिश्चालंकारौ ॥ सिन्धुर्द्वितीयाऽब्जमुखानुसारिणी, जडप्रसङ्गाबृतचारुचारुणी । इतस्ततो नौ निभृतार्थतारिणी, वसुप्रकाशैः सुरविप्रतारिणी ॥ १८ ॥ -क्षेत्रक्षमेशस्य उदूढा द्वितीया स्त्रीय सिन्धु प्रवहति] अन्न. मुखानुमारिणी इतस्ततो नौनिभृतार्थनारिंगी वसुप्रकाश सुरविप्रतारिणी॥१८॥ व्याख्या- क्षेत्रनमेशस्य' इति. 'प्रागुढ़ बनितेवे'-ति च पूर्व- तोऽन्वेति । तथा च क्षेत्रक्षमेशस्य क्षेत्रपृथ्वीपतेः प्रागुद्दा-पूर्वपरि- णीता द्वितीया वनितान्त्री इव सिन्धुस्तन्नाम्नी पश्चिमाभिवाहिनी महानदी प्रवहति । यद्वा पूर्व क्षेत्रक्षमेगस्य द्वेवनिते तयोः पूर्वां परि- चाययतीत्युक्तमपरांपरिचाययनाइ-सिन्धुरिति. द्वितीया भांगीर- थीतरा सिन्धु-स्तन्नाम्नी पश्चिमाभिमुखनाहिनी महानदी प्रहतीति शेषः । मा कीदृशी? अब्जमुसानुसारिणी अब्जं पड़ पग्रहद इत्यर्थ- स्तस्स मुग्य-निस्सरण निर्गममार्ग इत्यर्थः अग्रभागोगा तत् अनुपश्चात् (तस्य) ममीपे चा मगति-गन्छतिपततीतीत्यर्थ स्तन्छीला । जड़प्रम- सनाद्रलयोईलयोश्चैकत्वस्मरणात् जलप्रमङ्गात् जलमम्बन्धात् पृत- .चारुमागणीचरणोदेवताऽस्याः वरुणस्येयं वा पारुणी-पश्चिमटिक्. वृता-स्वीकृता चारु-शोभना वारुणी यया सा तथोक्ता अन्यापि- . .. महोपाध्यायधीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाये काचित् जड़ा मूढः, शिशिरः (शैत्यं) वा तस्य प्रसङ्गात् ऋतचारुवा- रुणी स्वीकृतरुचिरमदिरा भवति । पुनः कीदृशी इतस्ततः नौनि- भृतार्थतारिणीम्नावान्नौकयानावि वा निभृतान् धृतान् गुप्तान् वा नि- भृतं निश्चलं यथा तथेति वा अर्थान्चस्तूनि धनानि वा तारयति- परपारंनयति तच्छीला सा तथोक्ता । वसुप्रकाशै बसोः सूर्यस्य वसूनां देवाना वा मणीनां वा प्रकाशैः प्रतिविम्वनैः यद्वा वसुपु- तोयेषु प्रकाशैः प्रतिविम्बाशुद्योतैः सुरान् देवान् विप्रतारयितुं शील- मस्याः सा तथोक्ता वसूना=जलानां प्रकाशैः सुरान् देवान् विप्रान् ब्राह्मणान् च तारयति तच्छीला। जडा स्त्रियाम् । शूफशिम्ब्यो, हिमग्रस्त-मृका-प्रज्ञेषु तु त्रिपु इति मेदिनी । वसु तोये धने मणौ इति वैजयन्ती, वसुः सूर्यो वसु- देवो वसुर्वन्हिर्वसुर्मरुत् इत्यनेकार्थधनिमञ्जरी अर्थोऽभिधेय वस्तु- प्रयोजन निवृत्तिषु इत्यमरः ॥ १८ ॥ तत्रार्यभागो वदनं खगानां, श्रेण्योपुनश्चोष्ठपदं दधाने । क्षेत्रावनीशस्य तु सिन्धु-गङ्गे, ते श्मश्रुणीभात इव प्रसिद्धे ॥ १९ ॥ अन्वय -तत्र आर्यभाग [अर्यभागश्च] क्षेत्रावनीशस्य वदन खगाना । श्रेप्यो ओष्ठपद दधाने प्रसिद्ध ते सिन्धु गते श्मश्रुणीइबभात | व्याख्या-तत्र-पखण्डात्मभूभागे. आर्यभागः आर्यखण्डम् अर्यभागः अर्यैः स्वामिभिः भाति-शोभते इत्यर्यभाः स चासावगः पर्वतश्चेति स तथोक्तः-वैताढयपर्वतश्च.क्षेत्रावनीशस्य क्षेत्र पृथ्वीपते भरतक्षेत्रनृपस्य यदन-मुखं तत्स्थानीय इत्यर्थः । सगानां- भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. २५ मगधाधिवास च विद्याधराणां श्रेण्यौ-वैताध्यपर्वतस्य दक्षिणोत्तरश्रेण्यौ ओष्ठपदं- ओष्ठस्थानं दधाने ओष्ठस्थानीये इत्यर्थः । प्रसिद्धे-रख्याते भूपिते वा ते प्रान्दर्शितखरूपे सिन्धुगङ्गे श्मश्रुणी-पुम्मुसरोमराजी इस भात:- शोमेते। स्यादर्यः स्वामि वैश्ययोरित्यमरः । प्रसिद्धौ ख्यातभूपितौ इति चाऽमरः । तनूरूह रोम-लोम. तवृद्धौ-श्मश्रु पुंमुखे इत्यमरः।।१९।। क्षेत्राऽवनीशोऽब्धिदुकूलवास- स्तत्र प्रभासो मगधाधिवासः । पादौ, वराद दामगिरिनितम्बः, क्षेत्रस्य नास्त्येव ततोऽस्थविम्बः ॥२०॥ अन्वय -क्षेत्रावनीश अब्धिदुकूल वास तत्र प्रभास पाटी, यराद्दामगिरिनितम्य ततोऽस्य क्षत्रस्य बिम्म नास्त्येव ॥ २० ॥ व्याख्या-अत्यामपनि का ईटे इत्यवनीट् क्षेत्रस्याऽवनीट् तस्य क्षेत्रावनीशा क्षेत्रपृथ्वीपतेर्भरतक्षेत्रस्य अब्धिदुकूलवास =दु- कूलम् अन्तरीयक्षौमयुगलं तदात्मकं वासा वा दुकूलवामः, अब्धिः लवणसमुद्रः एव दुलपास इति मतथोक्तः। तत्र भरतक्षेत्रे वर्तमानौ- प्रभासः स्वनामख्याततीर्थविशेषः, मगधाऽधिवासामगधाधिपदे- गस्य वासस्थानं मागधतीर्थम् च इमो द्वारपि पादौ चरणस्थानीयो । वराद्दामगिरिः परदामनामा शाश्वतपर्वतः नितम्मा कटिप्रदेशः। ततो हेतोः अस्य क्षेत्रस्य विम्बः प्रतिकृतिः सादृश्यमिति यावत् नास्त्येव । क्षौमं दुकूलं स्थादित्यमरः । अतिशयोक्तिरलंकारः उ- स्प्रेक्षा वा. ॥ २० ॥ मूर्धाऽस्य हैमाद्रि रमुष्य चूला- स्थाद्रोहिता भ्रू[सरिच वामा।
२६ - . महोपाध्याय श्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये सा दक्षिणा सिन्धुसरिद रसाये, तयोः पथस्ते नयने च मन्ये ॥ २१ ॥ अन्वयः-अस्य मूर्धा हैमादिः, रोहिता अमुष्प चला स्यात् धुसरित घामाघू: सिन्धुसरिद् दक्षिणा सा, रसाप्ने तयो पथ ते नयने मन्ये ॥२॥ व्याख्या-अस्य-क्षेत्रावनीशस्य मूर्धा-शिरस्थानं हैमाद्रिः हेमवान् पर्वतः । रोहिता-तन्नामिका हैमवताऽभिधक्षेत्रवाहिनी नदी अमृष्य क्षेत्रस्य चूला-चूडा शिसास्थानीयेत्यर्थः । धुसरिद-आकाश- गंगा हैमवतशिखरिशिसरप्रपतङ्गगाप्रवाहः चामा सन्यभागीया भ्र: नेत्रोपरिस्थरोमराजिः, सिन्धः दक्षिणा भूः । रमा-जिहा इव रसा-नदीनिर्गमनलिका तस्या अग्रे=अग्रभागे उपरीत्यर्थः तयोः= सिन्धुगद्गयोः पथ मार्गः ते प्रसिद्ध नयनेनेने मन्ये-उत्प्रेक्षे इत्यर्थः उत्प्रेक्षा. ॥ २१ ॥ पूर्वापरौ तोयनिधी च बाहू, तन्मध्यदेशः स तु मध्यभागः । नाभिः कुशावर्तपदेऽदसीया- स्याज्जङ्गलस्तद्गलनालदेशः ॥ २२ ॥ अन्वय'-पूर्वापरौ तोयनिधी [ अस्य ] बाहू, स मध्यभाग तु तन्म- ध्यदेश । कुशावर्तपदे ऽदसीया नामि , जङ्गर तद्गलनालदेश स्यात् ॥२२॥ व्याख्या-पूर्वापरौ-पूर्व पश्चिमौ, तोयनिधी-समुद्रौ अस्य भरतक्षेत्रस बाहू-भुजस्थानीयौ. सम्प्रसिद्धः मध्यभाग: मध्यप्रदेश: तन्मध्यदेशः तस्य भरतक्षेत्रस्य मध्यमावयवः । कुशावर्तपदे असु- ध्य इयमदसीया-भरतक्षेत्रसम्बन्धिनी नाभिः तत्स्थानमित्यर्थः। जङ्गला-कान्तारभूयिष्ठदेशः तद्गलनालदेशः तस्य भरतक्षेत्रस्य क- ण्ठभागः बोधव्यः ॥ उत्पेक्षा. ॥ २२॥ - आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी रीका. स्कन्धांशुकं श्रीभरतस्य गङ्गा, यज्ञोपवीतं शुचि तस्य सिन्धुः । नामिस्ततो वैपयिको विकारः, सिद्धं शिवं ब्रह्मपदं तदेतत् ॥ २३ ॥ अन्वयः-गङ्गा श्रीभरतस्य स्कन्धांशुकं, सिन्धुः तस्य शुचि यज्ञोपवीतं ततः अस्मिन् वैषयिकः विकारः न तदेतत् सिद्धं शिवं ब्रह्मपदम् अस्ति ॥ २३ ॥ व्याख्या-गङ्गा श्रीभरतक्षेत्रराजस्य स्कन्धांशुकं स्कन्धोत्तरीयं पूजा-जप-ध्यानादिकालीनस्कन्धधार्ययोगपट्टः । सिन्धुश्च तस्य भरतक्षेत्रस्य, शुचि-पवित्रं यज्ञोपवीतं यज्ञसूत्रं वामस्कन्धत आरम्य- दक्षिणकृक्षि--पृष्ठवेष्टकविप्रधाोपवीतसूत्रमित्यर्थः, ततः तस्मात् कारणात् असिन्=भरतक्षेत्रे निवासिनां जप-ध्यानादि लीन मनसावा, वैपयिका-विषिणोति-स्वात्मकतया विपयिणं निरूपयति इति वि. पया मोगमाधनं स्रक्चन्दनवनितादिः, इन्द्रियगोचर शब्द-रूपा- दिश्व, देशश्च तेन- विषयेण निवृत्ती चैपयिका-विपयजनितः विकारः विकृति श्वेतसोड- न्यथाभावः न अस्तीति शेपः। तत् तसात् विषपजन्यविकाराऽनुः त्थानातोः एतत् भरतक्षेत्रं सिद्ध-सिद्धिः योगादिसिद्धिरस्ति अ- सिन् अर्शआयच् सिद्धिमम्पादकं शिव-कल्याणावहं निरुपद्रवं या ब्रह्मपदं-ब्रह्म-ब्रह्मचर्य तस्य पदं-स्थानं, यद्वा ब्रह्म-महानन्दः मोक्ष इत्यर्थः तस्य पदं-माधनस्थानम् आना पूर्वसूरिभिरिति शेषः। स्वर्गादीनां भोगभूमित्वाचत्रकर्मानुष्ठानाऽनधिकारात्. अस्य तु भर- वक्षेत्रस्य कर्मभूमित्वेनामिमतत्वान्मोक्षमाधनकर्माऽऽचरणे प्रवृत्त्या भवन्ति भव्या मोक्षाधिकारिण इति भरतक्षेत्रस्य मोक्षसाधनस्यानत्वं ३८ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकान्ये युज्यते महानन्दोऽमृतं सिद्धिः कैवल्यमपुनर्भवः । शिवं निःश्रेयसं अयो, निर्वाणं ब्रह्म निर्वृतिः इति हेमचन्द्रः ॥ २३ ॥ क्रीड़ाऽऽस्पदं यद् भरतं रमाया, जनस्ततोऽस्मिंश्चरतः : प्रमायाम् । रत्नप्रसक्तो निगमः क्षमाया, मायास वर्ज वहुलक्षमायाः ॥ २४ ॥ अन्वय-यद् भरतं रमाया: क्रीडास्पदं तत: अस्मिन् जनः प्रमायां रतः, रवप्रसक्तः बहुलक्षमाया निगमः क्षमायाम् . आयासवज (निरतः) । यद्वा बहुल- क्षमायाः क्षमायां (निरताः) निगम आयासवर्ज ररनप्रसक्त (आसीत्) ॥ २४ ॥ व्याख्वा-यद्-यसाद कारणात् भरतं-भरतक्षेत्रं रमाया:- लक्ष्म्याः क्रीडास्पदं-विलासस्थान सार्वदिकस्थितिस्थानमित्यर्थः नि- त्यनिवासस्थानभूतमिति भावः ततः-तसात् भरतक्षेत्रे लक्ष्म्यानित्य- निवासित्वेन लोकानां शरीरस्थितिचिन्ताद्यभावात् हेतोः जनः-लोकः प्रमायां-प्रमिदौ यथार्थज्ञाने तत्साधनकर्मादावित्यर्थः रतः-सक्तः तल्लीनमना इत्यर्थः रत्नप्रमक्तः-रत्नसंग्रहतत्परः बहुलक्षमायाः-बहवः अनेके लक्षाः-लक्ष्या अनुकम्पनीयतया आश्रयणीयतया चा उद्देश्यों यस्याः सा बहुलक्षा, सा चासोमा बहूनां लक्षाणाम्-अयुतपंक्तीनां समा हारः बहुलक्षं तदात्मिका वा मा लक्ष्मीस्तां याति-प्राप्नोत्यध्यवसा- यादिनेति स तथोक्तः या प्रापणे, विच्" निगमः-वाणिजः व्य- वसायिजन इत्यर्थः क्षमायां-पृथिव्यां आयासवर्जमर्जनक्लेशरहितं यथा तथा निरत इत्यर्थः पृथिव्या रत्नगर्भत्वात् । यद्वा बहूनि लक्षार्णि लक्ष्याण विषयलमा यस्सा सा कुरुक्षा सही मापा-युद्धिर्येषां ते तथोक्ताः प्रभूतविपयाऽवगाहिबुद्धिशालिनः विवेकिन इति यावत् थमायो-शान्तौ तत्प्रधानकर्मणि मुनिव्रतग्रहणादावित्यर्थः निरता " आचार्यश्रीविजयांमृतंरिप्रणीता सरणी टीका. इति शेषः। निगमश्च आयासवर्ज रत्नप्रसक्त इति सम्बन्धः । निगमः वणिक्पथः आयासवर्ज रत्नार्थ प्रसक्ताः प्राप्ता लीना या लोका अत्र से रत्नप्रसक्तः आसीत् इति शेषः ॥ २४ ॥ निगमो वाणिजे पुर्यां कटे वेदे वणिक्पथे इति विश्वः । क्षिति- क्षान्त्योः क्षमा इत्यमरः माया स्थाच्छाम्बरीवुद्धयोरितिमेदिनी ।। मन्ये तदा रामपदं जगत्याः, साम्राज्यरूपं भरतं यतः सा । श्रीदे-वरत्वाश्रितलक्ष्मणाशां, सीतापि लेभे धरणी प्रतीता ॥ २५ ॥ अन्धयः-तद् भरतं जगत्या आरागपदं माम्राज्यरूपं मन्ये यतः प्रतीता सी. तापि धरणी श्रीदेवरस्वाभितरक्ष्मणाशां लेभे भय च तदा जगत्याः साम्राज्य रूपं रामपदं भरतं मन्ये यत.धरणीप्रतीतासीताऽपि श्रीदेवरत्याश्रितलक्ष्मणाशां लेमे, यदा श्रीदेवरत्वाश्रितलक्ष्मणा सीता यत आशा लेभे ॥ २५ ॥ व्याख्या-तद्भरतं तदाख्य विस्तृतशोभनक्षेत्ररत्नं जगत्याः पृथिव्या भुवनस्य वा आरामपदं विश्रामस्थानम् उपवनस्थानं वा आरामः स्यादुपवनं कृत्रिमं वनमेव यदित्यमरः" साम्राज्यरूपम् श्वर्यरूपं च मन्ये उत्प्रेक्षे यतः यसात् भरतक्षेत्रात् प्रतीता प्रसिद्धा सीता हलोत्कृष्टापि सा धरणी रन्नप्रभाभिधाना'श्रीदेवरत्याश्रितलक्ष्म- णाशां श्रीदे-धनदेऽवरत्वेने न्यूनत्वेन अनिष्टत्वेन वा आश्रितं युक्तं न्यू. नत्वसूचकं यत् लक्ष्म चिन्हं रत्नादि तेन श्रीदे-वरत्वाश्रितलक्ष्मणा उपलक्षिता आशा दिक् तां दक्षिणदिशामित्यर्थः लेमे, प्राप.॥ २५ ॥ अथ च तदा श्रीरामचन्द्रवनवासकाले जगत्याः साम्राज्यरूपं रामपदं दाशरथिरामस्थानं भरत कैकयीमुतं मन्ये यतः यस्मात् मरवाद यनिमित्तमित्यर्थः धरणीप्रतीता धरण्याः पृथिव्याः सकाशांव प्रतीता महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये प्रसिद्धि प्राप्ता प्रादुर्भूतेत्यर्थः सीता जनेकराजनन्दिनी अपि श्रीदेवर- त्वाश्रितलक्ष्मणाशां श्रिया युक्तो देवरः श्रीदेवरस्तस्य भावस्तत्त्वं श्रीदेवरत्वेनाऽऽश्रितो लक्ष्मणः सौमित्रियस्यां सा चासौ आशा भर- तेन राज्येऽङ्गीकृते रामवनवासार्थनियतीकृता दिक् दक्षिणादिगित्यर्थः तां लेभे। यद्वा श्रीदेवरत्वेन आश्रितो लक्ष्मणो यां यस्यां वा सा श्रीदेवरत्वाश्रित लक्ष्मणा सीता जानकी यतः भरतात् आशां दिशम् दक्षिणांदिशमित्यर्थः यद्वां आशा कामम् इच्छां वनवासान्ते राज्यवि. पयिणीं वाञ्च्छामित्यर्थः लेभे इति सम्बन्धः ॥ यद्वा तद्भरतं भरतक्षेत्रं जगत्याः भूमेः आरामपदं उद्यानस्था- नम् रमणकस्थलमित्यर्थः साम्राज्यरूपम् सर्वसम्पद्रूपम् सर्वसाम्रा- ज्योपभोगायतनमिति भावः यतः सा प्रसिद्धिं गता त्रिजगद्विख्या- ता प्रतीता सर्वतः प्रसन्ना कृतादरा च धरणी:भारतभूमिः सीतापि- हलोत्कृष्टापि यद्वा लक्ष्मीरपि सर्वसम्पद्रूपापि श्रीदे कुबेरे उत्तर्दि- विभागे वरत्वाश्रितलक्ष्मणाशां वरत्वेन श्रेष्ठत्वेन आश्रिता अधिगता लक्ष्मप्रधानमेव लक्ष्मणः स्वार्थेऽण् तस्य आशा अश्नुते व्याप्नोतीति आशा तां प्रधानव्यापकतां लेभे सर्वतः श्रेष्ठत्वेनाश्रितप्रधानन्यापकतां प्रापेत्यर्थः । अत्र श्लेप उत्प्रेक्षा चेत्यलंकृती ॥ २५॥ दाक्षिण्यमामृश्य यदस्य मेरुः, स काञ्चनार्चिविबुधैधृतार्चः । महाविदेहं पुरतश्च पश्चा- दस्यादिशद् दक्षिणभागमेव ॥ २६ ॥ अन्वयः यत् मेरुः अस्य दाक्षिण्यमामृश्य महाविदेहं पुरतः पश्चात् च निवेश्य अस्य दक्षिणभागमेव (संनिवेशार्थम्) भादिशत् । स काश्चनार्चिः विधु- अभृतार्चः ॥ २६ ॥ 4 - भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. यत्-यसात्कारणात् मेरुः सुवर्णपर्वतः अस्य भरतक्षेत्रस्य दा- क्षिण्यम् औदार्य सरलतां वा सर्वानुकूलतां वा यज्ञादिविधिदानं वा आमृश्य-विमृश्य विचार्येत्यर्थः । महाविदेहं भरतक्षेत्राधिकविस्तृतम- परक्षेत्रविशेष पुरतः पूर्वस्यां दिशि पश्चात् पश्चिमायां च दिशि यद्वा पुरतः अग्रतः पूर्वदिशीत्यर्थः पश्चात अवरसिन् भागे पृष्ठभागे पश्चि- मदिशीत्यर्थः निवेश्य अस्य भरतक्षेत्रस्य दक्षिणभागमेय खदक्षिणदे- शमेव आदिशत्-उपाऽकल्पयन्संनिवेशार्थमिति शेपः । मेरुः कीदृशः म काञ्चनाचि सुवर्णमयरोचिष्कः: पु० की विबुधैः देवैः धृतार्चः कृतपूजः ॥ दक्षिणे सरलोदारौ इत्यमरः । दक्षिणो दक्षिणोद्भूत- सरलच्छन्दवर्तिपु । आरामे त्रिपु यज्ञादिविधिदाने दिशि स्त्रियाम् इति मेदिनी ॥ २६ ॥ स्पर्धा दधच्चैरवतं यदस्य, विन्यस्य वामं कृतरत्नकामम् । स शूरतं प्राप्तघृणित्वभव्यं, मेरुर्दधी तद्भरतं त्वसव्यम् ॥ २७ ॥ अन्वयः-म मेरः यत् अस्य स्पर्धा दधत् कृतरतकामम् ऐरवतं धाम यि. न्यस्य स शूरत प्राप्तगिरनभयं तदभरतं तु भातम्यं दधौ ॥ २७ ॥ व्याख्या-सः प्रसिद्धः मेरुः सुवर्णशैलः यत्-यसात् भरत- क्षेत्रे दाक्षिण्याद्यनेकगुणानुरोधाद्धेतोः, अस्स भरतक्षेत्रस्य पाद- क्षिण भागावस्थापनादिमन्मानजनिवामीप्यां परोत्कर्षासहिष्णुत्वमिति यावत् दधन-धारयत् तथा कृतरक्तकाम-कृतः विहितो रक्त शोणिते रक्तस्य वा कामा अभिलापो येन वत् (परिहारपक्षे तु कृतो रक्ते- ऐवतक्षेत्रगत 'रस्ता रक्तवतीत्येवनदीद्वयसम्बन्धिलोहितवर्णजठे कामो येन तद , रक्ता रक्तवती च नदीद्वपमैरवतक्षेत्रेवर्तते तदीयं जलं ३२ महोपाध्यायश्रीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये रक्तं तत्राऽनेनेच्छाकृतेतिकल्पना । लोकेऽपि रक्तेच्छचेऽधमपदं राज्ञा प्रदीयते ) अत एव दोपात् ऐरवतं-तदाख्यक्षेत्रभेदं वामधामगतंत्र सध्यभागस्थं विन्यस्य-विधाय कृत्वत्यर्थः । स शूरत-शूरत कृपा- लुस्तेन सहितं यद्वा शूरस्य भावः शूरता शौर्य तेन सहितम् । प्राप्त घृणित्वभव्यम्=प्राप्ता=अधिगता घृणिः कान्ति यस्ते प्राप्तघृणयस्तेषां मावस्तत्वं तेनभव्य शोभनं योग्यं वा यद्वा घृणा करुणा दयेत्यर्थः अस्त्यस्यासौ घृणी दयालुस्तम्यभावो घणित्वं दयालुता कृपेत्यर्थ- स्तेन भव्यं, यद्वा प्रकृष्टाः आप्ताः प्रत्ययिता विश्वास्यवचना इत्यर्थः यस्मिन् वत्प्राप्तं तच तद् घृणित्वभव्यं चेति विशेपणोभयपदकः कर्म- धारयः, तत्प्रसिद्धं भरत भरतक्षेत्रं तु असभ्य दक्षिणं दक्षभागस्थं कृत्त्वेत्यर्थः दधौ धारयामास । वामंधने पुंसि हरे कामदेचे पयोधरे वल्गुप्रतीपसव्येषु त्रिपु नार्या स्त्रियामथ इति मेदिनी । कृपालुः शूरत:- समाः इत्यमरः । आप्त-प्रत्ययिती समौ इत्यमरः । जुगुप्सा-करुणे घृणे इति चाऽमरः ॥२७॥ कुरुप्रकाशी विषयः स-मागधः, प्रशंसितः काव्यशतैः स-मध्यमः। स-कौशलः कोशलसत्कृषीवलैः, श्रियाऽभिनीतो जगतीह नीतितः ॥२८॥ अन्वयः--कुरप्रकाशी विषयः (अस्ति) स मागधः काव्यशतैः प्रशंसितः स मध्यमः स कौशलः कोशलसस्कृषीवलैः (उपलक्षितः) इह जगति नीतितः, मियाऽभिनीतः (पक्षान्तरेषु-स मागधः विषयोऽस्ति । स मध्यमो विषयोऽस्ति । स कौशलो विषयोऽस्ति (शेष विशेषणान्वयः प्रथमवत्) ॥ २८ ॥ व्याख्या-कुरुप्रकाशी-कुरुमिः तदाख्यराजविशेषैः प्रकाशी प्रकाश (मसिद्धि) शाली, यद्वा कुरून् प्रकाशयति वच्छीलः स तथोक्तः भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. विषयः-देशः अस्तीति शेपः कीदृशः स इत्याह-समागध:-मागधैः राजादिस्तुतिपाठकैः वंशपरम्पराशंसकैर्वा सहितः। काव्यशतैः-पर- शतकाव्यः स्तुतिसहस्रेण वा प्रशंमितः प्रशंसामुखेन व्यावर्णितः, स- मध्यमः-मध्यमेन-मध्यजवरेण मध्यस्थजनेन वा मध्यमया-हृदयो- स्पन्नबुद्धिसंयुक्तनादखरूपवाणीमेदेन वा सहितः । स कौशलः-कुश- लस्य भावः कौशलं, कौशलेन-क्रियानैपुण्येन सहितः। कोशलसत्कृषी- चलैः-कोशैः-धनधान्यराशिमि लमद्भि-विराजमानः-कृपीचलकर्षकैः उपलक्षितः इह-असिन् जगति-संसारे नीतित:-न्यायवर्जनशील- तयाश्रिया-लक्ष्म्या भारत्या वा समृद्ध्या वा अभिनीत:-आभिमुख्यन सामीप्येन वा प्राप्तः । एतेन शान्तिनाथ-नेमिनाथ-कृष्ण वासुदेवाना मवतारदेशः प्रदर्शितः। हस्तिनापुर-शौरिपुर-द्वारिकाणां कुरुदेशा- न्तर्गत्यात् । हस्तिनापुरमारभ्य कुरुक्षेत्राच दक्षिणे । पश्चालपूर्वभागेतु कुरुदेशः प्रकीर्तितः इत्युक्तेः ॥१॥ चरम तीर्थकराघतारभृमिमाह-स मागध इति मगधे-देशमेदे भवा मागधाः-मगधदेश वास्तव्यजनाः तैः सहितो विपया देशः मगधदेश इत्यर्थः ग्राह्मणकुण्डनगरं मग- घदेशस्याऽभ्यन्तरवर्तीति संभाव्यते ॥ सम्प्रसिद्धः मध्यमः मध्ये- भः, विषयान्देशः मध्यदेशः मध्यप्रान्तः तदन्तर्व िवाराणसीत्यर्थः मध्यदेशस्तु मध्यम इत्यमरः । हिमर-द्विन्थ्ययोर्मध्यं यत्याग विन- शनादपि । प्रत्यगेर प्रयागाच मध्यदेशः प्रकीर्तितः इति मनुः। अयं च प्रभुपार्श्वनाथाजताग्देशः। म कौशलाकोशले देशविशेष भवाः कौशलाः तैः सहितो विषयः कोशलदेश इत्यर्थः । अनेन थीयुगादिभवा- ऽऽदिनायस्य श्रीरामबलदेवस्स चाऽवतारभूमिःसंचिता। सर्वत्र पक्षेषु 'कुरुप्रकाशी' इत्यस्य कुरुमि मोदनः रूपविशेपेवा प्रभासी प्रकाश- शीलः । गुरुर्नुपांतर भक्त प्रमान् पुंभृन्नि नीति इति मेदिनी ॥
३५ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये देशः सदेशस्थितिभृन्नरेशः, सुरार्चनाहूत महीसुरेशः । तपस्विवर्गेण यशस्विभिर्वा, कृतप्रवेशः स्थिरसन्निवेशः ॥ २९ ॥ अन्वय-सदेशस्थितिमनरेशः सुरार्चनाहूत महीसुरेशः तपस्विवर्गण यशस्विभिर्वा कृतप्रवेश: स्थिरसन्निवेशः देश ( आसीत् ) व्याख्या-सम्प्रति दशभिः पद्यैः पूर्वोक्तान् देशान्वर्णयति- देश इति । देश: जनपदः वक्ष्यमाणस्वरूप आसीदिति शेपः। सदेश- स्थितिभृन्नरेश सदेशे समीपे स्थिति मर्यादामवस्थितिं वा विभ्र- तीति सदेशस्थितिभृतो नरेशा-राजानो यसिन् सः यद्वा सदा-सर्व- सिन्काले ईशस्थितिम् ऐश्वर्य विभ्रति धारयंतीति ते ईशस्थितिभृतो नरेशा यस्मिन् स तथोक्तः। मुरार्चनाहूतमहीसुरेशः-मुराणां-देवा- नाम् अर्चनायां पूजायाम् अर्चनार्थ वा आहूताः-आकारिता आम- न्त्रिता इत्यर्थः महीमुरेशाम् ब्राह्मणश्रेष्ठाः ऋत्विगादय इत्यर्थः यसिन् स तथोक्तः। तपस्विवर्गण-तपोधनैः यशखिभिः-यशोधनैर्वा कृतः= संपादितः प्रवेशो यत्रासौ कृतप्रवेशः। स्थिरसनिवेश:-स्थिर:-शाश्वत: सन्निवेश:-सम्यस्थितिर्वास इत्यर्थः यत्र सः यद्वा स्थिर:-निश्चितः सन्निवेश:-पुरादौ गृहादिरचनापरिच्छिन्नदेशोयस्मिन् स तथोक्तःस देशाऽभ्यास-सविध-समर्याद-सवेशवत् इत्यमरः । सन्निवेशो निक- पण इति चामरः ॥ २९ ॥ सदागमानां फलितैर्द्विधापि, स संनिधाने बहुधा निधानः।.
on- आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. परोपकारादिलसद्विधान, ानेपु नेयः सुधियां प्रधानैः ॥ ३० । अन्वयः-सदागमानां द्विधापि फलितैः ससंनिधानै यहुधा निधानः (उप- लक्षितः) परोपकारादिलसद्विधानः मुधियां प्रधानः ध्यानेषु नेयः ॥ ३०॥ व्याख्या-सदागमानां सत्सिद्धान्तानां द्विधापि-द्विविधैरपि ज्ञानक्रियारूपैः फलितैः फलैः, यद्वा सदागमानसन्-प्रशस्त:- आगमः-आयः येषां ते सदागमा स्तेपां न्यायोत्पन्नानां धनानां मित्यर्थः द्विधापि फलैः-दान-भोगरूपैः स संनिधान:-सन्निधानेन- समीपवासेन सहितैः यद्वा सत्-प्रशस्तं निधानम्-आश्रयः, कार्याव- सानं चा तेन सहितः । बहुधा-बहुप्रकारकैः निधानैः-शव-पद्मादि- निधिमिः उपलक्षितैः । परोपकारादिलसद्विधानः-परोपकरणप्रभृतिमि लसद्धिः-मनोहरैः विधानः कर्मभि रुपलक्षितैः । यद्वापरोपकारादीनि लसन्ति-शोभनानि विधानानि-कर्माणि येषां ते स्तथोक्तः। सुधियां- सुबुद्धिशालिनां पण्डितानांवामध्ये प्रधान:-मुख्यैः उपलक्षितः असौ देशाध्यानपु-चिन्तनेषु नेयः प्राप्यः सर्वदा ध्यातव्यः श्लाध्यगुण- वेनेति भावः उदात्तालंकारः ॥ ३० ॥ शैलाविभागै दृढ़सानुरागै, स्तपस्विपादोचित संविभागैः । भूपैः स्वरूपेण शचीशरूपै, योगीयते दिव्यसदस्सु देशः॥ ३१ ॥ भग्यय:-दिप्यमदस्म हापिभागः सानुरागः तपस्विपादोचितसंरिमा! स्वरूपेण चीयरूपः भूपः यः दाः गीयते ॥1 व्यारूपा-यः देशः दिग्यसदस्मु-वर्गीयसभासु सुधर्मादि- महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सतसन्धानमहाकाग्ये nnanod वित्यर्थः भूपैः गीयते-स्तूयते चर्यते इत्यर्थः। कीदृशै भूपैरित्याह- शैलाविभागैः-शैलतःपर्वतात् अविभागो येषां तें तैः स्थैर्य दाढय च गिरिकल्परित्यर्थः। दृढ़सानुरागैः-दृढ़ः सानुपु-कोविदेपु राग:- प्रीतियेषां ते स्तथोक्तः। तपस्विपादोचितसंविभागः-तपस्विपादाः पूज्यतपखिनः तेपा मुचितः-योग्यः संविभागो येषां तैः स्तथोक्तैः। खरूपेण-आकृत्या शचीशरूपैः-शचीश:-इन्द्र स्तस्येव रूपं-स्वभाव: सौन्दर्य वा येषां ते, तैः इन्द्रात्मकै , भूपैरिति सम्बन्धस्तूक्त एव ।। सानुरस्त्री वने प्रस्थे वात्या मार्गा-प्र-कोविद इति मेदिनी ॥३१॥ गम्यः सुहृद्भिर्न तथाऽसुहृद्भिः, कलाधराणां न कलाऽधराणाम् । परार्थहृद्मिन परार्थहद्भिः, स चापरागै नतु चापराऽगैः ॥ ३२ ॥ अन्वय.-तया सः (देशः ) सुहद्भि. गम्यः असुहृदि नं. कलाधराणां (गम्यः) कलाऽधराणां न, परार्थहद्भि. (गम्यः) परार्थहृद्धि नं, चापरागैः (गम्यः) अपरागर्न ॥ ३२ ॥ व्याख्या-तथा' इति पूर्वसन्दर्भसम्बन्धार्थम् । देश इति विशेष्यं पूर्वतोऽन्देति, स सुहृद्भिः-मित्रैः गम्य:-प्राप्यः, (मित्रं सखा मुहर इति. प्राप्यं गम्यं समासाद्य मितिचाऽमरः ।) न तु असुहृद्भिः शत्रुभि', असूना-प्राणानां हृद्भिः-अपहारकै- हिंवा कलाघराणां कलाः चतुपष्टिप्रकारा गीतवाद्यादिरूपाः घरन्ति-दति ते कलाधरा स्तेषां गम्यः। न तु कलासु-उक्तरूपामु विषय अधराः-नीचाः कलारहिता इत्यर्थ स्तेषां यद्वा दत्तधनस्याधिकलम्यांशं वा घरन्तीति ते तथा तेषां तथोक्तानां गम्यः । परार्थहृद्भिः-परार्थम्- अन्यार्थ परोपकारपरायणमित्यर्थः हृत्-हृदयं-मनो येषां ते परार्थहद .
~v vom आचार्यश्रीविजयामृतसूरिग्रणीता सरणी टीका. स्तै स्तथोक्तैः गम्यः, न तु परार्थहद्भिः-परेषाम्-अन्येपाम् अर्थ-धनं वस्तु वा हरन्ति-मुष्णन्ति ते स्तथोक्त चौरादिभिः गम्यः । चाप- • रागै:-चापे-धनुपि रागः-प्रीतिर्येषां ते ते स्तथोक्तैः शूरैरित्यर्थः गम्यः-नमासाद्यः तद्देशस्थजनानां धनुर्विद्याप्रियत्वात्तत्रं तेंपों प्रवेश- सम्भवः न तु तत्रत्यानां भयशालितयेति बोद्धव्य मन्यथा देशनिन्दा- संभवात् । न तु अपरागैः-अपगतो रागः-प्रीतिय॒पां तेऽपरागास्त स्तथोक्तः गभ्यः विरोध नामालंकारः ॥ ३२ ॥ कुतूहलेनोद्वहनं सृजन्ति, कुतूहलेनोद्वहनं सृजन्ति । यद्देशवास्तव्यजनाः परोपजापे, प्रसक्ता न परोपजापे ॥ ३३ ॥ अन्यया-यदेशवास्तग्यजना कुतूहलेन उद्वहनं सजन्ति कुतूहलेन उदहनं मजन्ति परोपजापे प्रसक्ताः परोपजापे न (असताः) (झामन्) ॥ ३३ ॥ व्याख्या-यद्देशवास्तव्यजनाः यद्देशचतुष्टयनिवासिनो लोकाः कुतूहलेन-कौतुकेन उद्वहनम्-उद्वाहं परिणय मित्यर्थः सृजन्ति- कुर्वन्ति. कुतूहलेन-कौतुकेन-जनितः पुत्रः कदाचित्तीर्थकरगो. अपन्धनेन संपमधारणादिना वाऽसत्कुलंतारयेदित्यमिलापेनेत्यर्थः उद्वहनम् उद्वहति अर्धनयति पित मान वंश्या नित्युद्वहनः पुत्रस्तं सृजन्ति-उत्पादयन्ति । परोपजापे-परः-श्रेष्ठः उपजापा-उपांशुजपः तसिन् प्रमका च्याप्ताः लीनमनस इत्यर्थः, किन्तु परोपंगा- परेपाम् अन्येपां, परः उक्तष्टो वा उपजापः-मेदः विच्छेदः संहत- योधीकरणमिति यावत् परोपजापः तसिन् तथोक्ते न प्रसक्ता इत्यर्थः। लाटानुमामः विरोधाभासश्च । मेदो-पजापौइत्यमरः ॥ ३३ ॥ ..
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महोपाध्यायनीमेपविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये
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अन्चयः-यत्सूपदेशः लावण्यसुसंस्कृतार्थः बहधान्यकायं करोति तस्य विशा-
लिता सरोऽनुसारात् ततोऽन्यस्य [प्रदेशः] कूपदेशः क्षुद्रः ॥ ३५ ॥
व्याख्या-यत्मपदेशः-यस्य देशस्य सूपदेशः-शोभन उपदेश,
समीपवर्तिदेशः प्रदेश इत्यर्थः लावण्यमुसंस्कृताथैः-लावण्येन सौ-
न्दर्येण सुसंस्कृतैः-परिष्कृतैः अर्धे वस्तुभिः करणैः बहुधान्यकार्य-
बहूनां धान्याना-शालि-गोधमादिनीहीणां कार्य करोति-सम्पाद-
यति । तस्य-देशस्य विशालता-वपुल्यं विस्तार इत्यर्थः सरोऽनुसा-
रात्-महासरसदृशीत्यर्थः । ततोऽन्यस्य-तद्देशसम्बन्धरहितदेशस्य
प्रदेशः कूपदेशः-कुत्सित उपदेशः समीपदेशः तत्स्वरूप इत्यर्थ कूप-
अन्त्रितो देशो वा अत एव क्षुद्रः--तुच्छः वासाऽनह इत्यर्थः ।।
पद्यस्यास्याऽर्थान्तरमपि इलेपमहिना. ध्वनितं भवति. तथाहि-
यत्स्पदेशः यस्य पण्डितस्य शोभन उपदेशः-हिताऽनुशासनम् लान
ग्यसुसंस्कृतार्थ-लावण्येन प्रसादादिगुणसौन्दर्यण मुसंस्कृतैः-अतीव
भूषितैः सुसम्पन्नरित्यर्थः अथै-वाच्यैः अभिषेयरित्यर्थः बहुधा
बहुप्रकारेण अन्यकार्यम्-अन्यत्कृत्यम् उपदेशातिरिक्त माहादादिका
करोति-जनयति । तस्य-उपदेशस्य विशालिवा-विस्तारः संरोऽन
सारात् सरः ज्ञानं तदनुसारेण. ततः तसात् अन्यथ उपदेशादि
पदेशः कुत्सित उपदेशः अत एव क्षुद्रः तुच्छत्यादयान इत्यर्थ
सारस्य मावश्यकमेव तस्य, .
प्रशस्यते शस्यधिया जलस्र.
यत् प्राणिनां जीवनमेतदन्यः,
.:: . स जातवेदा अपि भस्मशेयः ॥३६॥
~um भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. अन्ययः-(तप्रदेशे) यत् प्राणीनां जीवन (वर्तते) तस्य जलस्य सारस्य. मावश्यकमेव इति करया शस्यधिया (तत्) प्रशस्यते एतदन्यः स जातवेदाऽपि भस्मोप. ! अध च तस्य जर(द)स्य सारस्य मावश्यकमेव यत् प्राणिनां जीवनम् ( असौ सरसश्च ) शस्यधिया प्रशस्यते एतदन्यः सजातवेदा अपि भस्मशेष ॥ ३६ ॥ व्याख्या-किंच तत्र देशे यत् प्राणिनां जन्मिनां जीवनप्रा. गधारणकारणं वर्तते इति शेषः तस्य जलस्य सारस्य-सरसता मधुर- रससाहित्यं वासादुत्वं वा आवश्यकमेव अवश्यप्रयोजनीयमेव। इति कृत्वा शस्यधिया शालि-गोधूमादिधान्यबुद्धया अनेन धान्योत्पत्ति रित्यनुसन्धायेत्यर्थः प्रशस्यते श्लाव्यते । एतदन्या-जलाऽतिरिक्तः सा प्रसिद्धः जातवेदाम्जावान प्राणिनो विन्दते जठरानलत्वेन इति जातं वेदो-धनं यस्मात् इति वा, जाते जाते विद्यते इति वा जातं वेत्ति, वेदयते वा, इति वास तथोक्तः पहिः अपि भस्मशेषः= भस्मपर्यवमान इति कृत्वा न प्रशस्यते । तत्र हि देशे जलातिरिक्तव- स्तुना नोपकरणार्हता सर्वेषां सर्वसमृद्धिसम्पन्नत्वात् । श्लपमहिम्ना- ऽस्य पद्यस्याऽर्थान्तरमपि प्रतीयते, तथाहि-तस्य जलस्य-जडस्य मृर्सस्येत्यर्थः रलयो ईलयोकत्वस्मरणात्, सारस्यम् सरसस्य भावः रसिकता पैदग्ध्यमितियावत् आवश्कमेय, यच प्राणिनां सहृदयजना- नाम् जीवन-प्राणरूपम् अन्यथा सहृदयत्वाऽनुपपत्तेः । असौ (सरसः) शस्वधिया प्रशंसनीयमतिना प्राजेनेत्यर्थः प्रशस्यते-सबहुमानं श्ला. ध्यते। एतदन्या विदग्ध (मरम) भिन्नः पुरुषः सजातवेदाः-जातवे- दमा दम्पादितर्पणीयवहिना सहितः ऋतिगादिः अपि भस्मशेषा भस्मतुल्यः न गण्य इत्यर्थः । मरसजनाऽपेक्षया चैदिकानामनुत्तम. समिति माहित्यकामनासिताऽन्तःकरणानां महृदयताचणानां सुप्र- सिद्धम् ॥ - VAAN अन्वय- महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये सदा नदेशः किमु दान देशः, समाश्रयत्सर्वरसाऽनुवेशः। तटी पटीयः शुकविप्रवेशः, पदेपदे प्राप्तवसूपदेशः ॥ ३४ ॥ -(असोदेशः) नदेश: किमु ? दानदेशः समाश्रयत्सर्वरसाऽनुवेश: तीपटीयः शुकविप्रवेशः पदे पदे प्राप्तवसूपदेशः ॥ ३४ ॥ व्याख्या-असौ देशासमुद्रः किमु वर्तते इति शेषः इत्यु- स्प्रेक्षा. उभयोः समान शब्दवाच्यत्वरूपसाधर्म्य मुत्प्रेक्षाचीजभूतमाह दानदेशान्दान-वितरणीयार्थ ददाति-प्रयच्छन्तीति दानदाम्दान- शीला ईशा अधिपतयो यत्र स तथोक्तः, समुद्रपक्षे-दानदा धनदः कुबेरः ईशोयस्य सः, समुद्रस्य रत्नाकरत्वात्कुवैरस्य धनाधिपत्वात्कुवेरे समुद्रपतित्वमुपचर्यते । यद्वा दं-पर्वत मैनाकलक्षणम् आनयति सर्व- पर्वतपक्षच्छेदनाग्रहिलपुरन्दरभिदुरप्रहारात् त्राणकरणेन जीवयतीति दान स्तादृशो देश प्रदेशो यस्य स तथोक्तः । समाश्रयत्सर्वरसानु- वेश-समाश्रयन् सर्वः सकलः रमः माधुर्यादिरूपो यां सा समाश्र- यत्सर्वरमा पृथ्वी तस्याम् अनु अनुक्रमेण व्याप्ता वा वेशाः गृहाणि यत्र सः, यद्वा समाश्रयताम् आश्रयमन्विच्छता सर्वरसानां पण्डि- तानाम् अनुवेशाप्रवेशो यत्र सः अथवा समाश्रयतां निवस्तुमिच्छता सर्वेपासकलानां जनानां रसापां-पृथिव्यां चास्त्वभूमावित्यर्थः अनुवेश समावेशो यत्र स तथोक्तः तत्रत्यप्रदेशाना मति विस्तीर्ण- त्वात्सर्वेषां तद्देशनिवासार्थिनां कृते तत्रावकाशस्य पर्याप्तत्वात् । समुद्र- पक्षे-समाश्रयन्तीनां सर्वरसानां नदीनाम् अनुवेश प्रवेशः समावेशो पा यत्र सः यद्वा समाश्रयवां सर्वेषां रसनां जलानां अनुमर्यादानति कमेण समावेशी य स मोक्तः। तटीपटीयः शुकविप्रवेश:-तयां ..
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आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका,
पटीयसां मुनिपुणानां सुकवीनां प्रवेशो यत्र सः पक्षे तट्या-कूले
वेलाया मित्यर्थः पटीयसां शुकवीनां शुकपक्षिणां यद्वा सुष्टु काय-
न्ति-शब्दायन्ते इति सुका स्तादृशा वयः पक्षिण स्तेषां प्रवेशो यत्र
सः रलयोर्डलयो श्चैव, श-सयो-धयोस्थेतिवचनेन श-सयोरेकत्व.
सरणात् । पुनश्च पदे पदे अतिपदं प्रतिस्थानमित्यर्थः प्राप्तवमुपदेशः
प्राप्त उपस्थितः लोकर्लब्धो वा वसुः मधुरः मनोत्रः उपदेश: शा-
स्त्रीय धार्मिक-राजनैतिकाद्यनुशासनं यत्र सः यद्वा समृद्धजनशालि-
तया व्यापारिजनयत्तया वा प्रतिस्थलं प्राप्तः वसूनां धनानां रत्नानां
वा स्वर्णानां वा उपदेशः योग-क्षेमाद्यनुशामनं यत्र स तथोक्तः ।
अथवा पदे पदे प्रतिव्यवसाय प्रत्युद्यम प्राप्तः वसोः धनाधिपस्य
कुबेरस्य तद्विपयक इति तात्पर्यम् उपदेशः अध्यवसायादिसहायेना-
ऽनन्तकोटिधनाधिपत्यशालित्वादेराख्यानं यत्र सः अथवा प्राप्तानि
खानितोधिगतानि वसूनि रत्नानि स्वर्णानि यत्र तादृश उपदेशः=
समीपदेशः खान्यादिप्रदेशो यत्र स तथोक्तः ।
समुद्रपक्षे प्रतिस्थानं प्रतिकूलप्रदेशं प्राप्तानि=ोच्छलनेन गतानि
वसूनि-जलानि यत्र तादृश उपदेशः समीपदेशो वेलाप्रदेशो यस्य सः
यद्वा ससुद्रस्य रत्नाकरतया प्रतिपद-प्रतिचरणन्यासदेशं प्राप्तानि-
लोकरधिगतानि वनि-रत्नानि यत्र तादृश उपदेशो वेला यस्य न
तथोकः । अत्र श्लेशालंकारः ॥ ३४ ॥
यत्सूपदेशो वहुधान्यकार्य,
करोति लावण्यसुसंस्कृतार्थः ।
विशालतातस्यसरोऽनुसारात,
क्षुद्रस्ततोऽन्यस्यनुकूपदेशः ॥ ३५ ॥
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये wwwww AN vum vvm- , -- अन्वयः-यरसूपदेशः लावण्यसुसंस्कृतार्थः बहधान्यकायं करोति तस्य विशा. लिता सरोऽनुसारात् ततोऽन्यस्य [प्रदेश ] कूपदेशः 'क्षुद्रः ॥ ३५ ॥ व्याख्या-यत्सूपदेशः यस्य देशस्य सूपदेशः-शोभन उपदेश समीपवर्तिदेशः प्रदेश इत्यर्थः लावण्यमुसंस्कृताथैः-लावण्येन सौ- न्दर्येण सुसंस्कृतैः-परिष्कृतैः अथै वस्तुभिः करणैः बहुधान्यकार्य- बहूनां धान्यानां-शालि-गोधूमादिनीहीणां कार्य करोति-सम्पाद- यति । तस्य-देशस्य विशालता-चैपुल्यं विस्तार इत्यर्थः सरोऽनुसा- रात्-महासरसदृशीत्यर्थः । ततोऽन्यस्य-तद्देशसम्बन्धरहितदेशस्य प्रदेशः कूपदेशः-कुत्सित उपदेशः सभीपदेशः तत्स्वरूप इत्यर्थ कूप- ऽन्वितो देशो वा अत एव क्षुद्रः--तुच्छः वासाऽनर्ह इत्यर्थः ॥ । पद्यस्यास्यार्थान्तरमपि श्लेपमहिम्ना ध्वनितं भवति. तथाहि- यत्सूपदेश:-यस्य पण्डितस्य शोभन उपदेश:-हिताऽनुशासनम् लाव- ग्यसुसंस्कृतार्थ-लावण्येन प्रसादादिगुणसौन्दर्येण मुसंस्कृतैः-अतीव- भूपितैः सुसम्पन्नरित्यर्थः अर्थ-वाच्यै. अभिधेयरित्यर्थः बहुधा- बहुप्रकारेण अन्यकार्यम्-अन्यत्कृत्यम् उपदेशातिरिक्त माहादादिकार्य करोति-जनयति । तस्य-उपदेशस्य विशालिता-विस्तारः संरोज्नु- सारात् सः ज्ञानं तदनुसारेण. ततः तसात् अन्यस्य उपदेशोदिः कुपदेशः कुत्सित उपदेशः अत एव क्षुद्रः तुच्छत्वादग्राह्य इत्यर्थ सारस्य मावश्यकमेव तस्य, प्रशस्यते सत्यपिया उत्तस्य । यत् प्राणिनां जीवनमेतदन्यः, उ जातवेदा अपि भस्मशेषः ॥३६॥ .
भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. AAMANAN RAM अन्वषः :-(तनदेशे) यत् प्राणीनां जीवन (वर्तते) तस्य जलस्य सारस्य. मावश्यकमेव इति कृत्वा शस्यधिया (तत्) प्रशस्यते एतदन्य. स जात चेदाऽपि । भस्मशेप. । अथ च तस्य जर(दस्य सारस्य मावश्यकमेव यत् प्राणिनां जीवनम् (भसौ सरस ) शस्त्रधिया प्रशस्यते एतदन्यः सजातवेदा अपि भस्मशेष ॥ ३६॥ व्याख्या-किंच तत्र देशे यत् प्राणिनां-जन्मिनां जीवनं प्रा. णधारणकारणं वर्तते इति शेषः तस्य जलस्य सारस्य-सरसता मधुर- रससाहित्यं वा सादुत्वं वा आवश्यकमेव अवश्यप्रयोजनीयमेव। इति कृत्वा शस्यधिया शालि-गोधूमादिधान्यबुद्धया अनेन धान्योत्पत्ति रित्यनुसन्धायेत्यर्थः प्रशस्पतेश्लाध्यते । एतदन्या जलाऽतिरिक्तः साम्प्रसिद्धः जातवेदाः-जातान् प्राणिनो विन्दते जठराऽनलत्वेन इति जातं वेदो-धनं यस्मात् इति वा, जाते जाते विद्यते इति वा जातं वेत्ति, वेदयते वा, इति वा स तथोक्तः वहिः अपि भस्मशेषः-- भस्मपर्यवसान इति कृत्वा न प्रशस्यते । तत्र हि देशे जलातिरिक्तव- स्तुना नोपकरणार्हता सर्वेषां सर्वसमृद्धिसम्पन्नत्यात् । श्लेपमहिना- ऽस्य पयस्याऽर्थान्तरमपि प्रतीयते, तथाहि-तस्य जलस्य जडस्य मूर्सस्पेत्यर्थः रलयो ईलयोश्चकत्वमरणात्, सारस्यम्-सरसस्य भावः रसिकता वैदग्ध्यमितियावत् आवश्कमेन, यच प्राणिनां सहृदयजना- नाम् जीवनप्राणरूपम् अन्यथा सहृदयत्वाऽनुपपत्तेः । असौ (सरस:) अस्थधिया प्रशंसनीयमतिना प्राज्ञेनेत्यर्थः प्रशस्यते सबहुमान ठा- श्यते। एतदन्यः विदग्ध (मरम) भिन्नः पुरुषः सजातवेदा-जातवे- दमा न्यादितर्पणीयवाहिना सहितः ऋत्सिगादिः अपि भस्मशेपः- भस्मतुल्यः न गण्य इत्यर्थः । सरसजनाऽपेक्षया वैदिकानामनुत्तम. त्वमिति माहित्यकामनापासिताऽन्तःकरणानां महदपताचणानां मुप्र. सिद्धम् ।। - २ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचितेसप्तसन्धानमहाकाम्ये नित्यं समुद्रातिशयाशयेन, पिताम्बराः स्वीययशःप्रकाशैः । निवासिनोऽस्मिन् कमलानुपङ्गः, स्वयंभुवः श्रीपुरुषोत्तमास्ते ॥ ३७ ॥ अन्वय-अस्मिन् निवासिन; ते श्रीपुरुषोत्तमाः समुद्रातिशयाशयेन नित्यम् [उपलक्षिता, स्वीययश प्रकाशैः पीताम्बरा, कमलाऽनुपौं: (उपर क्षिता) स्वयंम्भुवः (सन्ति) ॥ ३७ ॥ व्याख्या-अस्मिन् देशे निवासिनः वास्तव्याः ते प्रसिद्धाः जना श्रीपुरुपोचमा पुरुषेषु उत्तमाः श्रेष्ठाः । समुद्रातिशयाशयेन= समुद्रा-रत्नाकरात् अतिशयः अतिमात्रः तदतिक्रमणशीलो वा आशयः विभवः रत्नादिसम्पत् , चित्तं वा गम्भीरहृदयत्वात्, अभिप्रायो वा गम्भीराशयत्वात् तेन तथोक्तेन उपलक्षिताः उपलक्षणे तृतीया, स्त्री- ययशः प्रकाश स्वीयानाम् आत्मीयानां यशमांकीतीनां प्रकाशः= विस्तारैः पीताम्बरा पीतं व्याप्तम् अम्बरम् आकाशो यैस्ते तथो- ताः यशोभिः पिहिताऽऽकाशा इत्यर्थः । कमलानुपङ्गै कमलायाः= सम्पल्लभम्या वरस्त्रिया वा कमलानां शालिधान्यानां लेखनीनां वा अनुपङ्गै सम्बन्धैः उपलक्षिताः स्वयंभुवः स्वयम् आत्मना भवन्ति अन्तर्भावितण्यर्थतया भावयन्ति उत्पादयन्ति स्वोपयोज्यवस्तुजा- तानि कलाकौशलेन इति ते तथोक्ताः सन्तीति शेषः । अत्र पद्ये 'पी. ताम्बरा' स्वयम्भुवः, श्रीपुरुषोत्तमाः" इत्पेतैयोगार्थेन प्रस्तुतदेशनि- वासिजनविशेषणीभूतैरपि रूढ्या ब्रह्म-विष्णु-महेशानवाचकैखिभिः शब्दैः 'एतद्देशवास्तव्यालोकाः' 'ब्रह्म विष्णुमहेशरूपा एवेति श्लेपम- हिम्ना ध्वन्यते, तथाहि 'पीताम्बराः, श्रीपुरुषोत्तमाः' इत्येतत्पदद्वयेन स्मर्यमाणो विष्णुः " नित्यंनिरन्तरं समुद्रातिशयाशयेन-समुद्रेति- .
आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. शया सार्वदिकतयाऽतिमात्रः आशया- शयनं तेन तथोक्तेन उपल- क्षित इत्यर्थः । तथा कमलाऽनुपङ्गै कमलाया लक्ष्याः यद्वा कमलस्य हस्तस्थपद्मस्य शयनाश्रयभूतजलस्य वा अनुपजैरुपलक्षि. तः ॥ 'स्वयम्भुवः' इतिपदेन सर्यमाणो ब्रह्मा शिवश्च 'कमलानु. पड़े (ब्रह्मप)कमलस्य आसनीभूतपद्मस्य ब्रह्मण कमलासनत्वाद, शिवपक्षे कमलस्य हस्तलालनीयमृगविशेषस्य अनुपङ्गः-सम्बन्धैरुप- लक्षितः ॥ रूपकाऽलङ्कारः । कमल सलिल ताने कोम्नि-भैपज्य प- अयो। । कमलो मृगमेदे तु, कमला श्रीवरस्त्रियोरिति मेदिनी ॥३७॥ ये कामरूपा अपि नो विरूपाः, कृताऽपकारेऽपि न तापकाराः । सारस्वता नैव विकर्णिकास्ते, कास्तेजसां नो कलयन्ति राजीः ॥३८॥ अन्चयः-ये कामरूपा भपि विरूपाः नो कृतापकारेऽपि न सापकाराः । सारस्वता अपि पिकणिकाः नेय. ते कारतेमसा राजी: मो कस्तयन्ति ॥ ३८ ॥ व्याख्या-ये जनाः कामरूपा कन्दर्पखरूपाः कामस्स अन- इत्वात् नीरूपा अपि विरूपाः विगतं रूपं येषां ते तथोक्ताः रूपर- हिता नोन इति विरोध: कामरूपा:-इच्छारूपिणः विरूपा:-विरुद्ध रूपंखभावः पेशो चा येषां ते तथोक्ता न देशकालाऽनुसारवेशशा- लिन इत्यर्थः इति परिहारः कृताऽपकारे-साऽपराधेऽपि जने विपये न ताऽपकाराः नताना=विनयादिनम्राणामपकारः अनिष्टोत्सादनं तद्धेत द्वेपो चा येभ्यस्ते तयोक्ता इति विरोधः, तापकारा: तापं सन्ता फष्टं या पूर्वन्तिमननयन्तीति वे बधोक्ताः कष्टप्रदाः प्रत्यपचिकीर्षव- इत्यर्थः न, इति परिहारः ।। सारस्वता: सरस्वती-धागधिष्ठात्री देवी wvi . महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये देवता उपास्यतयाऽस्त्येषां ते तथोक्ताः पंडिता इत्यर्थः अपि विक- र्णिका विशिष्टा विविधा वा कर्णिका-लेखनी येषां ते तथोक्ताः नै वेति विरोधः विदुषां लेखनसाधनकलमादेर्लिप्या वा राहित्यस्य वि. रुद्धत्वात् । विगता कर्णिका कर्णभूपणं येषां ते तथोक्ता नैव किन्तु सयें सकणिका इत्यर्थ इति परिहारः । तथा ते जनाः काकिं रूपाः तेजसा-दीप्ति-पराक्रम-प्रभाव-परप्रयुक्ताऽधिक्षपा-ऽपमानाद्यसहन- सत्वगुण-शरीरकान्तीनां राजी श्रेणीः राशीनित्यर्थः नो कलयन्ति धारयन्ति सर्वान् गुणान् दधतीत्यर्थः । विरोधाभासः, आभासत्वे विरोधस्स विरोधाभास इप्यते इति तल्लक्षणात् । पूर्वार्धेऽन्त्यानुप्रासः। कर्णिका करिहस्ताग्रे करमध्यांगुलावपि । क्रमुकादिच्छटांशेऽजे, वराटे- कर्णभूपणे इति मेदिनी ।। ३८ ॥ श्रीहास्तिनस्थान ममर्त्यवासवा. श्रयेण साक्षादमरावती पुरी। बुध्याऽप्ययोध्यामलकालिताश्रिता, सा वीक्ष्यते ज्ञैः शिवपूर्वसुश्रिया ॥३९॥ श्रीमण्डनब्राह्मणकुण्डसंज्ञया, या सुप्रमाता मधुरारसाश्रयैः। तां मध्यदेशे जिनजन्मपावितां, स्थैर्येण वा शौर्य पुरं समीक्षताम् ॥४०॥ अन्वय -तो मध्यदेशे ( वर्तिनी ) जिनजन्मपाविता (नगरी ) स्थैयण समीक्षताम् । हाम्लिनस्थानम् , (या) पुरी भमर्यवासवाश्रयेण साक्षादमरावती. (तथाऽसौ) बुध्यापि अयोध्या मामल काश्रिताधिता (अत एव सा पुरी) ई. वसुश्रिया शिषपू वीक्ष्यते (पुनश्च ) या श्रीमण्डनब्राह्मणकुण्डसंज्ञपा सुप्रभाता ४५ आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. रसाश्रयैः मधुरा शौर्यपुरम् इति ऋषभदेवपक्षीयोऽन्यय द्वितीयादिपक्षीयो- इन्वयो व्याख्यातोऽवगन्तव्यः ॥ ३९-४० व्याख्या -श्रीशान्तिनाथपक्षे नांप्रसिद्वां जिनजन्मपा- वितां तीर्थकरेण खजननादारभ्य पवित्रीकताम नगरीमिति शेपः स्थै- यण स्थिरतयाऽयधानेनेत्यर्थः समीक्षतां पश्यतु । तां कामित्याह- हास्तिनस्थान हस्तिना-तदाख्यनृपेण निर्वृत्तं नगरं हास्तिनं तदाख्यं स्थान हास्तिनस्थानं हस्तिनापुराऽभिधानेत्यर्थः या च पुरी अमर्त्यवाम- चालयेण-अमर्त्या देवमामान्याः वासवा: शकेन्द्रादय स्तेपामाश्रया= आश्रयणं तीर्थकदिदृक्षा-शुश्रूपादिहेतुना भूय आगमनाऽवस्थानादि- लक्षणं तेन साक्षात् प्रत्यक्षरूपा अमरावती-इन्द्रपुरी एव । तथाऽसौ युध्ध्यापि मनसाऽपि अयोध्या-योधनाऽनर्हा शान्तिप्रियजननिवास- लात् । दुष्प्रर्पत्याच आमलकालिताश्रिता-आमलकाः चामकवृक्षाः आमलकानि-धात्रीफलानि चा तेपामालि:-श्रेणी तद्भानस्तत्ता तो श्रिता आश्रिता इति चा छेदः। यद्वा आमलकाऽलिता-आमलकैः अलिता-भृपिता पूर्णा था, जैः पंडितैः श्रिता इति सम्बन्धः । (अत एच सा पुरी जैः-पंडितैः ) बमुश्रिया-वसूना रत्न-धन-स्वर्णानां सम्पत्त्या पृद्धया वा यद्वा वमो रामः श्रिया-लक्ष्म्या राजलक्ष्म्या यहा वमोः पृथिव्याः श्रिया-विभून्या, यमोरिव पुरस्पर श्रिया-समृध्ध्या या शिवपु:-कल्याणमयी पुरी वीक्ष्यते-दृश्यते । पुनथ या-नगरी श्रीम- ण्डनबामणकुण्डसंजया-श्रियाः-लस्म्याः सिद्धे या भारती-कीयो वो मण्डनं-भूपणभूतमलद्वारक वा यद्ब्राह्मणण्टं-तदाग्यपुण्यस्यानं तस्य संजया-नाना तत्सरणेनेति भावः, मुप्रभाता-शुभसूचकमातः कालपती । रमायौ-रमस्य-गृहारादेः हर्पस्स याऽऽश्रयैः-आधारभू- तजनः यद्वा रमा-पृथ्वी आश्रयो येषां तमहीरुहः यद्वा रसो-जले सदाययः जलाशयरित्यर्थः मधुरा-मनोशा. शौर्यपुरं-चौर्पस्स परा- -
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्मनमहाकाव्ये
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क्रमस्य पुरम्-आश्रयः ।।
श्रीपभदेवरामपक्षयो '
बुध्यापि अयोध्या' इति विशे-
प्यम् , अपिना नाम्नाऽपि अयोध्या एवेत्यवधार्यम् । श्रीहास्तिनस्थान-
मित्यस्य हस्तिनां समूहो हास्तिनं, श्रिया हास्तिनस्य च स्थानम् इत्यर्थो
विदेलिमः।
श्रीपाश्र्धनाथपक्ष-'शिवपूः' इति विशेष्य सा च वाराणसी
काशीपुरीत्यर्थः अत्रपक्षे वसुश्रिया-धनशोभया जैः वीक्ष्यते इत्यर्थः।।
श्रीमहावीरपक्षे 'श्रीमण्डनब्राह्मणकुण्डसंज्ञया-श्रियाः-लक्ष्म्या
मण्डनं भूपणभूतं यद् ब्राह्मणकुण्डं-तदाख्यं स्थानं तद्रूपसंज्ञया-ना-
म्ना सुप्रभाता-सुप्रसिद्धा ।।
श्रीकृष्णपक्षे—'मधुरा'-तदपरनाम्नी मथुरापुरीत्यर्थः रसा-
श्रयैः उपलक्षिता इति सम्बन्धः ॥
श्रीनेमिनाथपक्षे 'शौर्यपुरम्' इति विशेष्यं शेपविशेषण सम्ब-
न्धः पूर्वपद्बोव्यः । अर्थश्लेपः ।
रसो गन्धरसे खादे तिक्तादौ विप रागयोः । शृङ्गारादौ द्रवे वीर्ये
देहधात्व-म्बु-पारदे । रसा तु सल्लकी-पाठा-जिह्वा-धरणि-कमुषु इति
विश्वः॥ ४०॥
यद्विस्त्रसाभीरु रनगराज,
स्तन्मन्त्रविद्भीरुरतः प्रपन्नः ।
स्थानं परायोध्य सहाश्वसेनं,
सहास्तिनं सन्मधुरं स शौर्यम् ॥ ४१ ॥
अन्वय--यद् विससाभीर अनङ्गराज तन्मन्त्रविदीरः (अस्ति) अत
तत् स्थान प्रपन्न पराऽयोध्य सहाऽश्वसेन सहास्तिन सन्मधुर सशौर्यम् ॥४॥
, भाचार्यश्रीविजयामृतमूरिग्रणीता सरणी टीका, व्याख्या-यद्-यस्माद्धेतोः विस्रसाद्भीरुः-जरात्रस्नु: अनड्ग- राजः-कामनरपतिः तन्मन्त्रविद्भीरुः-तस्याः-विनसायाः मन्त्रवित्- गुप्तचरः मन्त्रज्ञो तसाद भीरु-भयशीलः अस्ति इति शेपः अतः कार- णात तत् स्थानं देशं प्रपन्ना-प्राप्तः कीदृशं तत्स्थानमित्याह---परा- योध्य-परैः-शत्रुभिः अयोध्य-योधनाऽनहम् सहाश्वसेनम्-अश्वानां- घोटकानां सेनया-सैन्येन समूहेनेत्यर्थः सहितं, सहास्तिन--हस्तिनां समूहो हास्तिनं वेन सहितं, सन्मधुरं-मधु-मचं लक्षणया युद्धाय युद्ध खेदाऽपनुत्तये चा सुरापानं रान्ति-कुर्वन्ति धातूनामनेकार्थत्वात् ते मधुरा:-युद्धपरिश्रमाऽपनोदनाथ संस्कृतसुरापानशीला वीराः 'वीरपानं तु यत्पानं, वृत्ते भाविनि वारणे, इत्यमरः । वीराणां संग्रामार्थ मद्यपान- स्याऽऽचाराविरोधित्वात् सन्तः-प्रशस्ता मधुरा यत्र तत्तथोक्तम् । यद्वा सतां मधुरं-प्रियम् । स शौर्यम्-शौर्येण-पराक्रमेण सहितम् ।। अनेन तीर्थकरजन्माधिकरणीभूतनगराणामन्वर्थनामधेयत्वं, तत्रत्या- नां च जनानां सान्द्रदर्प-कन्दर्पसौन्दर्यसोदयहृद्याऽनवद्यरूपशालित्वं सूचितं भवतीति सहृदयविभावनीयम् ॥४१॥ सदारमण्याश्रितदुर्गशैलं, सक्षत्रियत्वाद्वहुलक्षणाढ्यम्। सुराजराज्यादरविप्रयुक्त, रम्यैहाणामुदयैर्विराजत् ॥ ४२ ॥ अन्वया-सदा रमण्याश्रितदुर्गशैलं सक्षत्रियत्वाद् बहुलक्षणाय । सुराजराज्यादरविप्रयुक्त रम्यैर्गृहाणामुदयविराजत् ॥ १२ ॥ व्याख्या-पुनश्च तत्स्थानं कीदृशमित्याह-सदेति सदा- सर्वस्मिन् काले रमण्याश्रितदुर्गशैलें-दुःखेन गच्छति गम्यते वात्रेति- दुर्ग:-पर्वत-नाकार-परिखादिदुर्गमकोटः स शैल इवेति दुर्गशैला-रम- १८ AmAM MAM महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये गीभिः-स्त्रीभिः आश्रितो दुर्गशैलो यत्र तत्तथोक्तम् । सक्षत्रियत्वात्- राजन्यसहितत्वात् मुशासकरक्षितत्वादितिभावः । बहुलक्षणाढध-ब- हुलैः बहुसंख्यैः प्रभृतैः क्षणैः-उत्सवैः आढयम्-विशिष्टम्। यद्वा ब- हुभिः-अनेकैः लक्षणैः-पूर्वोत्तरप्लवत्वादिशुभचिह्नः आढयन्युक्तम् । अथवा बहुलक्षणाः-प्रचुरोत्सवशालिनः आट्याः-धनिनो यत्रतत्तथी- कम् बहुभिःलक्षणेः-सारसपक्षिभिराढय-युक्तमिति वा । तथा मुरा- जराज्यादरविप्रयुक्तम्-सुरा-मदिरा जरा-चार्द्धक्य, ज्या मौर्वी चाप- रज्जुरित्यर्थः दरः-त्रासस्तैर्विप्रयुक्तं-विहीनम् । यद्वा सुरेभ्यः-देवे. भ्यः अजाः-घल्पर्थमुपकल्पिताइछागा स्तेषां राजौ-श्रेण्यामादरोयेपां ते तादृशा ये विप्राः-चामोपचारितया काल्यादि देव्याराधका द्विज- विशेपास्तयुक्तं विशिष्टम् । अथवा शोभनो राजा सुराजा तस्य राज्ये आदरः-सम्मानः अदरः-त्रासाभावो या येषां तादृशैविप्रर्युक्तम् । सुराज्ञी राज्ये राजकर्मणि य आदरस्तेन विप्रयुक्त-चिशेपेण युक्तम् इति वा । गृहाणां-प्रासादादीनां रम्यैः-मनोहरै उदयैः-प्रथम दर्शन- योग्यभवनमार्गः सिंहद्वाररित्यर्थः समुन्नतिभिर्वा विराजत्-शोभमा- नम् ॥ ४२ ॥ इहाऽभवद्वैभवसंभवेन, पुरी पुरीणां गणने धुरीणा। निरीक्षणीया ह्यनिमेपने- चित्रविचित्ररिव मेरुचुला ॥ १३ ॥ अन्वय.-इह वैभवसभयेन पुरीगा गणने धुरीणा पुरी विचिन चिनः । मेरा म भनिमेपने ग्रे. निरीक्षणीया अभयत् ॥ ४३ ॥ व्याख्या-इह-अम्मिन् स्थाने वैभवसंभवेन-यभवानां-विभृ. तीनां मम्भवेन-उत्सत्या वभरकारणेन वा पुरीणांगण्यनगरीणां -
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भाचार्यश्रीविजयामृनसूरिभणीता सरणी टीका.
गणने-संख्याने एक-द्वि-व्यादिसंख्यया गणनायामित्यर्थः धुरीणा
मुख्या अग्रगण्येत्यर्थः पुरी-नगरी विचित्रैः-विलक्षणे दिव्य रित्यर्थः
आश्चर्यजनकैर्वा चिौः आलेख्यैः हेतुभिः मेरुचला मेरुपर्वतशिखर-
मिव अनिमेपनत्रैः-स्पन्दनरहितलोचनैः करणः यद्वा निःस्पन्दनेत्र-
शालिभिः जनै रितिशेषः (मेरुपक्षे) अनिमेपनेत्रैः देवैः निरीक्षणीया
मस्पृहमवलोकनयोग्याऽभवत् ॥ ४३ ।।
अर्हद्विहारा विविधोपहारा-
युसद्विहारादुरिताऽपहाराः।
दिवो विमाना वसुधांवतेरु,
स्तत्पूर्वदेवैरिव संगमाय ॥ ४४ ॥
(अन्वय.) (इह) घुसहिहाराद्-विविधोपहारा: दुरितोपहारा: अहंद्विहाराः
(शोभन्ते) तरपूर्वदेवैः सनमाय विमाना: दिवः वसुधां वरः इव ॥ ४४ ॥
(व्याख्या) इह घुसद्विहारात्=दिवि-स्वर्गे सीदन्तीतिधुमदः-
देवा स्ने पां विहारः-विहरणं श्रीजिनेन्द्रमन्दनाथं भूयोगमनागमनं
तस्मात् विविधोपहारा; विविधाः नानाप्रकाराः उपहारा:-पूजोपक-
रणानि येपु ते तथोक्ताः, दुरितापहारा: दृष्ट मित-गमनं नरकादि-
स्थानप्राप्तिरनेनेतिदुरितं पापं तस्याऽपहारा अपचयो विनाग इत्यधी
येभ्यस्ते तथोक्ताः पापनिवर्तका इत्यर्थः अर्हद्विहारा जिनायतनानि
जिनमन्दिराणीत्यर्थः शोभन्ते इति शेषः । अत्रोत्प्रेक्षते-तत्पूर्व देवः-
तेपां बुद्धिस्थपरामर्शकत्वात्तच्छन्दस्य विमानानां पूर्व प्राक्तना देवा.
इदानीम्मानवास्तैः सह संगमाय-मेलनाय विमाना: व्योमयानानि
देवप्रामादा या दिवः स्वर्गलोकात् वमृधाथिवीम् अवतम. अवती.
वन्तः इव । एतेन तत्रत्यजनानां दिव्यत्वं तत्रत्यजिनालयानामध-
.कपशिसरल-मुरमणीयत्यादीनि च गून्यन्ते ॥ अगतिशयोक्तिमन्य-
क्षाचालंकती॥४४॥
महीपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचितेसप्तसन्धानमहाकान्ये चैत्येषु नित्याऽभयदातुरर्चा, प्रसङ्गतोऽनङ्गतयाऽभिधानात् । श्मशानवेश्मान मवेत्यरुद्रं, स्मरोऽभियातत्पुरमध्युवास ॥ ४५ ॥ (अन्वयः) मर: चैत्येपु नित्याभयदातुः अर्चाप्रसङ्गतः अभङ्ग तयाऽभिधा. नात् रद्द श्मशानवेइमान मवेत्य चाभियातापुरमध्युवास ॥ ४५ ॥ (व्याख्या) स्मरः कन्दर्पः चैत्येजिनायतनेषु नित्याभय- दातुः नित्यं शाश्वतम् अभयं-धीशिष्टमात्मनः स्वास्थ्य निःश्रेयसध- मनिबन्धनभूमिकाभृतं गुणप्रकर्षादचिन्त्यशक्तियुक्तत्वात सर्वथा परा- र्थकारित्वात् ददातीति नित्याभयदाता तस्य तथोक्तस्य श्रीजिनेन्द्र- भगवतः अर्चाप्रसङ्गतः=पूजाग्रस्ताव अनङ्गतया शरीररहिततया काम- स अभिधानात् आख्यानात् पूजाशुपक्रमे ऽनङ्गजिदि' -त्यादिजिने- न्द्रनामस्मरणप्रसङ्गेन कामस्याऽङ्गरहितत्वेनाऽनुकम्पनीयतयाऽभय- प्रदत्वेनाम्नातस्य श्रीजिनेशस्याभयदानपात्रत्यानुग्रहणात्. रुद्रं स्वप्रा- तनशत्रुभूतशिवमपि श्मशानवेश्मान-श्मशानं शवदाहस्थानमेव वे. इमवासस्थानं यस्य मतं तथोक्तं श्मशानवासिनम् अवैत्य-विदित्वा चाऽभिया=भयरहिततया तत्पुरं-व्यावर्ण्यमानस्वरूपं नगरम् अध्यु- चास-अध्युपितवान् ।। ४५।। सूनोरन्नोदयमत्र धैर्याद, रमाऽवधायेंव दधो स्थिरत्वम् । बालश्चलत्वं विजही महोजा- स्तकिमया धार्यमितिहियेव ॥ १६ ॥ (अम्पयः) रमा मनोः भा भन्मोदयम् भवधायेंय(स्थिरस्वंदधी)मदीमा - भाचार्यश्रीविजयामुवरिप्रणीता सरणी रीका. बालः चलवं विजही तत् मया कि धार्यमितिहियेव स्थिरत्वं दधौ ॥ ४६ ॥ (व्याख्या रमा लक्ष्मीः सूनो स्वपुत्रस्य कामम्य अत्र नगरे अनूनोदयं बहुतराऽभिवृद्धिम् अवधार्य-निश्चित्य इव धैर्यात् अव्या- कुलत्वात् स्थिरत्व-निश्चलत्वं दधौ-धृतवती. अत्रोत्प्रेक्षान्तरं दर्शयति बालः-मत्पुत्रः कामः महौजा महाबलशाली प्रकृतिचपलश्च सन्नपि यदा चलत्वं चाञ्चाल्यं विजहौं परितत्याज इतिहेतोः तत्-चलत्वं मया लक्ष्म्या किं धार्य-धर्तव्यं तथा तु बालादपि न्यूनाभवेयमिति हिया लज्जया इव स्थिरत्वं दधौ इति सम्बन्धः ॥उत्प्रेक्षालङ्कारः।।४६ अस्या व्यवस्येयमहं वयस्यां, द्यामेव पद्यां नयसंशयाब्धी। पतिः सुधावजयवाहिनीशः, श्रेयान् निवासः सुमनोविलासः ॥४७॥ (अन्वयः) नयसशयाब्धी (निमन.) महम् अस्याः वयस्यां धाम पर पो व्यवस्येयम् । पतिः सुधारजयवाहिनीशः निवाम. श्रेयान् सुमनोग्लिासः १४७१ (व्याख्या) स्वर्गसादृश्यं दर्शयति अस्या इति । नयसंशया- ब्धौ-नीति विषयक शङ्कासागरे निमग्न इति शेपः अहं मेघविजया- ऽभिधः कविः अस्याः नगर्याः वयस्यां मसी सदृशीमिन्यर्थः, द्यां स्वर्गपुरीम् एव पद्या मार्गभूतां व्यवस्येय-निर्धारयेयम् । अस्यां नगर्या कीदृशी नीतिरितिविचारपारावारनिमग्नोऽहं स्वर्ग चेतसि निधाय स्वर्गसदृशी नीतिरितिनिथित्य शङ्काकलई पङ्कसङ्करं यामी- तिभावः । साम्यमुद्भावयति पतिः अधिपः प्रस्तुतनगर-स्वर्लोकयोः, मुघावजयवाहिनीश-प्रथमपक्षे-सुधावतां मसत्वरं गच्छतां या जय वाहिनी-जयं यहतीत्येवंशीला सेना तम्या ईशा शासकः, द्वितीय- पक्षे-सुधारतां सुधाअमृतं तनां देवानां जयवाहिनीमः इति पूर्व-
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महोपाध्याय श्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये
वत् पुनरनयोः नगर्योः निवास जातावेकवचनम् वसतिसंहतिः श्रे-
यान अतिशयेन प्रशस्यः, कथमित्याह यतः सुमनोविलासा-सुम-
नसां-प्रशस्तचित्तानां जनानां विलासा:-आनन्दा यत्र मः यद्वा सुम-
नोभिः-पुष्पैः विलासोयत्रसः अथवा सुमनसां-कोविदानां विलासाः-
विनोदा यत्रसः तथोक्तः । पक्षे-सुमनसां-देवानां विलासोयत्रस
इत्यर्थः । सुमनाः पुष्प-मालत्यो त्रिदशे कोविदेऽपि चेति मोदिनी
इलेपः, उपमाध्वनिः ।
लक्षे जनोऽस्मिन् कृतहस्त एव,
लक्षे पुननों मनसा दधाति ।
स्वं मन्यते दानविधी परार्थ,
परार्थ सङ्के मनुते ह्यनर्थम् ॥ ४८॥
(अन्ययः) अस्मिन् जनः रक्षे कृतहस्त एर पुनः रक्षे मनसा नो दधाति।
दानविधी संपराध मन्यते परार्थसझे हि अनर्थ मनुते ॥ १८ ॥
(व्याख्या) तत्रत्यजनानां शौया-दार्यादिगुणशालितां दर्शयति।
अस्मिन्प्रस्तुतनगरे जनः लोकः लक्ष लक्ष्ये तत्साधने इत्यर्थः
कृतहस्तः कृतः अभ्यस्तो हस्तो यस्य स तथोक्तः सुशिक्षितशरविद्य
इत्यर्थः एव पुन अन्यच लक्षं दशायुतसंख्यां रूप्यक-मुद्रादीनां
मनमा चेतमाऽपिनो दधाति-चिन्तयतीत्यर्थः अतिममृद्धिशालित्वात्
तेपां मनसि लक्ष न किञ्चिदितिभावः। दान विधौ दानकर्मणि प्रवृत्तः
स्व-आत्मीयं सर्ववस्तु जातं, यद्वा स्व-धनम् आत्मानं या परार्थ
परोपकारफलकं मन्यते । परार्थमने-परार्थस्य परकीयधनस्य परकी-
यवस्तुनो वा सड्ने-सम्बन्धे अन्यदीयधनप्राप्तापित्यर्थः स्व-धनम्
आत्मानं वा अनर्थम् अफलम् अनर्थकरं या मनुते युध्यते । विरोधा-
मासोऽलङ्कारः । लक्षं लक्ष्यं गरव्यं च इत्यमरः ॥ ४८ ॥
आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी का. M ve न वामनस्य प्रकृति बिधापि, न संनिभं कोऽपि विभर्तिरूपम् । नालीकनाम्नोऽस्त्रवरे प्रयोगो, भोगे च नालीकमनाजनोऽस्याम् ॥४९॥ (भन्वय') अस्यां कोऽपि द्विवापि आमनस्यमकृतिनगा (अग्नि), कोऽपि चा. मनस्य संनिभं रूप न बिभर्ति । अनपरे नालीकनाम्नः प्रयोगः, भोगे च भली. क्मना न(अस्ति) ॥ ४९॥ (व्याख्या) अस्यां नगयों कोऽपिजनः द्विधापि मनमा वाचा. ऽपि आमनस्यप्रकृति: आमनस्य-दुःखं तन्मयी प्रकृतिः खभावो यस्य म तथोक्तः नवा नैव अस्तीति शेपः, किन कोऽपि वामनस- सर्वस्य संनिभं मदर्श रूपम् आकृति न विभत्ति-धारयति । अखबरे- श्रेष्ठेऽत्रविशेपे नालीकनाना-नालीक इत्येतच्छब्दस्य प्रयोगः लोड मयाऽन्तःसच्छिद्रगरविशेष एव नालीकशब्दस्य व्यवहार इत्यर्थः किन्तु भोगे-मुसे भोजनादौ अलीकमना असत्यचित्तः निष्फलचित्तो चा जनो न अस्तीत्यध्याहृतक्रियासम्बन्धः । परिमद्वयाऽरवारः॥४९ कलाविलासा मनसाऽवधार्याः, कला विलाशा न कदापि कार्या । सभाजनेः स्वरसभाजने वी. सदा नभोगे विदानभोगेः॥ ५० ॥ (भय) ( तत्यानाना ) क्लानिरामा मनमाअायां:, रममाजनः मभान पा स्व समभाजन, नभोगरिय, सभाजन: सरममाः महाभाग (अप्राना)लारिलायन कायां (भामोह) ॥५०॥ (व्याख्या) तनत्यानां जनानां कलाविलासा!-कला. नृत्यागीत वादिनादिनतापष्टिप्रकाराः विभूतयो या तामु ताभिवा निलामा: .
५४ vw महोपाध्यायनीमेघविजयगणिपिरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये विनोदाः यद्वा कलाऽनुशीलनजनितदीप्तयः मनमा चेतसा अवधा- या अवधारयितुं निश्चतुं शक्याः नतु वाचाऽपि तेपामवाग्गोचरकला कलापशालित्वादितिभावः कः सहेत्याह रसभाजनै-विभावा-ऽनुभाव व्यभिचारिभावव्यङ्ग्यशमादिस्थायिभावकशान्तादिरसोद्बोधपात्रीभूतैः सभाजनैः सभ्यः वा अथवा स्वैः आत्मीयैः ज्ञातिभिरितियावत् , कैः करणैः ? रमभाजनैः मधुरादिरमान्वितभोजनपात्रैः । कैः सहेब ? नभोगः-नभश्वरैः विद्याधगदिभिः सहेव किञ्च सभाजनैः सपात्रैः स्वरमभाजनैः स्वराणां स्वच्छन्दानां स्वेच्छाचारिणामित्यर्थः 'स्वैरः स्वच्छन्द-मन्दयोः' इत्यमरः सभा समुदायस्तत्सम्बन्धिजनैः, सदा नभोगैः बस्त्रादीनां दानः मत्पात्रे प्रतिपादनः भोगः फलादीना- मुपभोगैश्च सहितः । किञ्च तद्देशीयजनानां कला विलाशा-कला- मूलविवृद्धिः दत्तधनस्साधिकलभ्यांश इत्यर्थ स्तयाऽऽबिलस्य मलि- नस्य धनादेः आशान्तृष्णा न कार्याकरणीया आसीदितिशेषः । विरोधाभासोऽलङ्कारः। कला सान्मूलविवृद्धौ शिल्पादावंशमात्रके इतिमेदिनी ॥ ५० ॥ नासत्य लक्ष्मीवपुपाऽतिपुष्ण- न्नाऽसत्यलक्ष्मी धरते स्वरूपात् । सत्यागमार्थं श्रयते यतेभ्यः, सत्यागमार्थ लभते फलं सः ॥५१॥ (अन्वयः) सा नामत्यरमी वपुषा अतिपुष्णन् असत्यलक्ष्मी स्वरूपात् न धाते यतेभ्यः मस्यागमा प्रयते (भतएव) सत्यागमा फलं लभते ॥५॥ (व्याख्या) तेजोविशेपादिकं दर्शयति-नासत्येति । सवर्ण नीयतया प्रमान्तो जनः (अत एवयच्छम्दाऽनपेक्षा प्रकान्त प्रसिद्धा. ऽनुभूतार्थकस्तच्छन्दो यच्छन्दोपादानं नापेक्षते इत्युक्तेः ) नामत्य- -
भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रगीता सरणी टीका,
लक्ष्मी नासत्ययोः अश्विनीकुमारयो. लक्ष्मी-शोभां वपुपा-शरी-
रेण अतिपुष्णन्-विशेपेण धारयन् सन् असत्यलक्ष्मी कृत्रिमशोभाम्
आहायशोभामित्यर्थः यद्वा अन्यायोपाजित धनं 'लक्ष्मीः सम्पत्ति-
शोभयोः। ऋध्यौपधौ च पद्माया' मितिमेदिनी । स्वरूपात स्वभा-
गाद एव न धरते-गृह्णाति । 'स्वरूप च स्वभानश्चे'-त्यमरः। किश्च
यतेभ्यः संयमिभ्यः सकाशात् सत्यागमार्थ सत्यानाम् अवित्तथाना
निकालासराधितस्वरूपाणामित्यर्थः अव्यभिचरितार्थप्रतिपादकानामि-
ति यावत आगमाना-सिद्धान्तानाम् अर्थम् अभिधेयं यद्वा सत्याss.
गमाऽर्थम् सत्योपदेशरूपं वस्तु श्रय ने-गृहाति । अतएर सत्यागं
त्यागेन-दानेन सहितम् आर्थम् अर्थ (धन) सम्बन्धि फलं भोगरू-
पम् यद्वा सत्यापश्चनारहितत्वान्न्याग्यः आगमः आयो यस्यता-
दृशम् अर्थम्धनम् तद्रूपं फलं लाभम् अथना सत्यागा-त्यागेन-दाने
न सहिता चासौ मा लक्ष्मीः सम्पद्रूपा तदर्थ फलं-कार्य, प्रयोजन
लाभ वा लभसे प्राप्नोति ।। अर्थस्य तावत् दान-मोग नाशरूपास्ति.
स्रो गतयो(ऽरस्था:) भान्ति तन च दान भोगावेर तात्यानामास्ता
मिति भावः । उक्तमन्या-'दानं भोगो नाश स्तिस्रो गतयो भनन्ति
वित्तस्य । यो न ददाति न भुक्तं तस्य तृतीया गतिर्भवति' इति ।
यमकम् श्लेपः काव्यलिङ्गम् उपमा विरोधाभासः, अतिशयोक्तिया.
ऽलङ्कारा, । फलं जातीफलेगस्ये हेतूत्थे व्युष्टि लाभयोः इतिमेदिनी।
अर्थोऽभिधेय रै वस्तु प्रयोजन निमृतिपु इत्यमरः ॥ ५१ ।।
नगोरवं ध्यायति विप्रमुक्तं,
नगौरवं ध्यायति विप्रमुक्तम् ।
पुनर्नवाचारभसा नवार्थाs-
पुनर्नवाचारभसानवार्थाः ॥ ५२ ॥
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धान महाकाव्ये (अन्ययः) विप्रमुनं गौरवं न ध्यायति विप्रम् उनं गौरवं ध्यायति न? किन्तु ध्यायति पुनः रभसावाचानवाः पुनर्न वाचा रभसा अनवार्धा अपुननं ॥५२॥ (व्याख्या) विप्रमुक्तं त्यक्तं वस्तु प्रति गौरवं महार्यत्वं नध्या- यति न चिन्तयति प्रदत्तवस्तुनो महत्वादिचिन्तां न करोतीत्यर्थः वि. प्रम् विविधं प्राति पूरयतीति विप्रम् शास्त्रम् उक्तम् गुर्वादिजनोप- दिष्टम् गौरवम् तदीयमहत्वम् न ध्यायतीति न किन्तु ध्यायत्येव, पुनः रभसापौर्वापर्याविचारेण हठादित्यर्थः चाचा वाक्येन नवार्थाः नवी- नार्थाः न ध्याय्यन्ते न विचार्यन्ते वाचायाः रभसा औत्सुक्येन अनवार्थाः अमिवेयार्थाः अपुनर्न किन्तु पुनः पुनः तदीयार्थी विचा- रिताः॥ यमकालंकारः ॥ १२ ॥ नये प्रसका विनयेऽनुरक्ता, जयेन तद्वद्वविजयेन पूर्णा । नवा भयाप्ता बहुशोभयाऽऽप्ताः, अविक्रिया स्तेऽतिथिसक्रियाङ्गतः ॥५३ (अन्वयः) ते नये प्रमताः, विनयेऽनुरक्ताः, जयेन त विजयेन पूर्णा:, नया भयाप्ताः, बहुशोभयाऽऽप्ता:, भविक्रिया अतिथिमरिकयाताः (भामन्) (व्याख्या) ते-तत्रत्यजनाः नये-नीती, शुक्राचार्यादिग्रणीत नीतिशास्त्रे वा न्याय्ये या प्रसक्ताः-आसक्तिमन्तः, विनये-नग्रतायां चन्दनीय जनप्रणामेवा शिक्षायां या विनीतजने या जितेन्द्रिये वा अनु. रक्ताः-अनुरागिणः जयेन-शत्रूणाममिभावनेन तद्वत्-तथा विजयेन- परिभवपूर्वकग्रहणेन च पूर्णाः-सहिताः अति विक्रान्ता इत्यर्थः । नवा- नव भयामा:-भयग्रस्ताः यहा नवा भपाप्ता इत्येकम्पदम् नवेन- जिनेन्द्रादिम्तवेन अभयाः-निनोकाय ते आता: मत्याः विश्वस्ता या रागडेपादिवजिता वा यथार्थतातारोवा च ते तथोक्ताः । यहा नवा.
५७ ~ ~ भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका ऽभयाऽऽता:-नवेन-रक्तपुनर्नवया तत्सेवनेनेत्यर्थः, अभयं-शोधादि- रोगभयराहित्यम् आप्ताः प्राप्तमन्तः,आप्तं लब्धं यैरिति वा ते तथोक्ताः। बहुशोभया-सातिशयदीप्त्या आप्ता:-व्याप्ता यद्वा बहुशः-अनेकशः असकृदित्यर्थः अभयं-निर्भीकत्वम् अभयदानमित्यर्थः आप्त-लब्धं येभ्यस्ते तथोक्ताः लोकेभ्योऽभयदायिन इत्यर्थः । बहुश.-बहुलया भया-प्रभया आप्ता इति वा । अविक्रियाः-विकाररहिताः, यद्वा अविः- मेपस्तस्येव क्रिया-कर्म सङ्घीभागादिकं येषां ते तथोक्ताः । अतिथिसक्रियाङ्गाः-अतिथीना-प्राघूणिकाना साधूनां सक्रिया- यै-सत्काराय सम्माननायेत्यर्थः अङ्ग-शरीर येषां ते तथोक्ताः यद्वा अतिथिमक्रियायाम् अतिथिपूजायाम् अङ्ग-मनो येषां ते तथोक्ताः अथवा अतिथिसक्रियाया अङ्गानि-उपायाः साधनानीत्यर्थः सामग्री- इति यावत येपान्ते तथोक्ताः । यद्वा 'तिथिसक्रियायाः' इतिच्छेद- स्तस्य तिथीना-तीर्थकर जन्मादिधर्मपदिनसानां सक्रियायै-सम्मा- ननार्थम् अझं येपा ते तशयोक्ताः इत्यर्थः । विनया तु वलायां स्त्री शिक्षायां प्रणतो पुमान् इति मेदिनी । अनुप्रासः ॥ ५३ ॥ अवनिपतिरिहासीद् विश्वसेनोऽश्वसेनोऽ- प्यथ दशरथ नाम्ना यः सनाभिः सुरेशः। बलिविजयिसमुद्रः प्रोढ़सिद्धार्थसंजः, प्रस्तृतमरुणतेजस्तस्य भूकश्यपस्य ॥५४॥ (अन्य ) इह विश्वसेन भवनिपनि आमोत् य , अश्वसेन , दशरधनामा सुरेश सनाभि पलिविगायतमु प्रोतमाश तस्य मूकश्यपस्य अरण तेन (सर्वत्र) प्रस्तम् (मासीत् ॥ द्विपक्ष-अश्वसेन अवनिपतिरासीत् विश्व सेन दशरथनामा दोष पूर्ववत् ॥ तृ०प०-'-शरथनामाऽचनिपनिरासीत की विश्वसेन भश्वसेन शेप पू. ॥ च०प०-य नाभि भानिपनिरामीत् म महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये ~~ विश्वसेन अश्वसेन दशरथनामा सुरेश शे १० ॥ ५०पक्षे-बलिविजयि समुद्र (विजय) अवनिपतिरासीत् रेप पू० ॥ प ५०-प्रौढ "सिद्धार्थ' सज्ञ अर निपतिरासीत् शे० पूर्ववत् ॥ सप्तमपक्षे-तस्य भूकश्यपस्य प्रसृतम् 'भरणतेन'-3 वसुदेव भवनिपतिरामोत् शेप पूर्ववदधययोजनम् ॥ ५४ ॥ व्यारन्या-नगराणि प्रदर्य सप्तार्थकेन पद्येन भूमिपालान् दर्श यति-अनिपतिरिति । इह अस्मिन् नगरे विश्वसेनः= विश्वसेन' इ. त्येतन्नामकः अमनिपतिः राजा आमीत् अभूत् । कीदृशः स इत्याह- अश्वसेना=अश्वाना-जात्यतुरगमाणा सेना यस्य म तथोक्तः । दगर- थनामा दशसु दिक्षु गतो रथ कीर्तिरूपं वाहनं यस्य तद् दशरथ तादृशं नाम अभिधानं यस्य म तथोक्तः कीरूिढं तदभिधानं दश- दिक्षु न्याप्नोतीत्यर्थः । दशरथस्येच सुप्रसिद्ध नाम यस्य स इति वा, सुरेशः सुरान् देवान् सुरेपु गा ईष्टे-प्रभवतीति सुरेट-इन्द्रस्तरय सनाभिःश्वर्यादिना मदृशः, यलिविजयिसमुद्रः मलिना=पराक्र- मिणो विजयत तच्छीलः बलिविजयी म चासो समुद्रः सह मुद्रया= प्रत्ययकारिण्या राजकीयत्वप्रमापक चिह्न विशेषेण, यद्वा अङ्गुलिधार्य- मुद्रासनयुक्ताऽगुलीयफेन, अथवा सह मुद्राभिः स्वर्ण-रौप्यादित- द्वाभिः कोटीश्वरत्मात्. च इति म तथोक्तः, प्रौढ़सिद्धार्थ संज्ञः= प्रौदा-प्रवृद्धा प्रगल्भा पा निपुणा रा मिद्धार्या=सम्पादितोद्देश्या च संज्ञा-भुद्धिर्यम्य म तथोक्तः । 'अनिपति रासीदि'-ति सम्पूर्णना- क्यम् । तम्य-निरुक्तम्य अनिपतेः, भूकश्यपस्यम्भुवि भूतले कश्यप इन प्रजापतित्वात् इति भूकश्यपस्यपस्तस्य, अरुणतेज: सूर्यनत्प्रतापः मनन प्रसृतं व्याप्तम् आमीदिति शेपः । द्वितीयपक्षे-'अश्यमेन' इति विशेष्यम् 'विश्वमन' इत्यस्य विभागम्पूर्णा सेना=चमः यस्य म इत्यर्थः । शेपं पूर्व रद । तृतीयपक्षे-'दशरथनामा' इति विशेष्यपदम् तस्य दशरथ इति भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, wwwwwwnnn नाम यस्य स इत्यर्थः शेपं पूर्ववत् । चतुर्थपक्षे-'नामिः' इति विशेग्यम् 'यः, सः' इत्यनयोश्च 'यः नामिा तन्नामा अवनिपतिरासीत् स विश्वसेनः अश्वसेन इत्यादिरूप इत्येवं रीत्याऽन्वययोजना कर्तव्या । 'सुरेश' इत्यस्य इन्द्र सदृश इ- त्यर्थश्च बोद्धव्यः ॥ पञ्चमे-बलिविजयी चासौ समुद्रः नामैक देशग्रहणेन नाम ग्रहणात् 'समुद्रविजयः' इत्येतनामकश्चेति स बलिविजयिसमुद्रः । शेपं पूर्ववत् । पष्ठपक्षे सिद्धार्थ इति संज्ञा नाम यस्य स सिद्धार्थ संज्ञः प्रौढ- श्वासौ सिद्धार्थसंज्ञश्चेति स प्रौढ सिद्धार्थसंज्ञः अवनिपतिरासीदित्येवम- न्वयः कार्यः । शे० पू० सप्तमे-'अमणतेज' इति विशेप्यपदम् तस्य च तस्य प्रसिद्धस्य भूकपश्यस्य भुवि स्वांशेनावतीर्णस्य कश्यपस्य-तदाख्यप्रजापतेः प्रसू. तं-विस्तीर्णम् 'अरुणतेजः' सूर्यवद्दीप्रतेजोरूपः वसुदेव इत्यर्थः कश्य- पतेज एव वमुदेव रूपेण परिणम्याऽवतीर्णमिति लोकप्रसिद्धिः एवंप्र- कारेणार्थः कार्यः। अत्रक्रमेण शान्तिनाथ-पार्श्वनाथ-रामचन्द्रा- ऽऽदिनाथ-नेमिनाथ-वीरप्रभु-कृष्णयासुदेवानां पितरः (विश्वसेनः, अश्वसेनः, दशरथः, नाभिः, समुद्रविजयः, सिद्धार्थः, वसुदेव इतिना- मानः ) प्रदर्शिताः ।। ५४ ॥ सनाभिभूतेः सुहृदुत्तमानां, सनाऽभिभूते-पिदुद्यमानाम् । सामान्यमासी-दुभयादरेण, नृपे महीशासति तां चिरेण ॥ ५५ ॥ .
महोपाध्यायधीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्ये (अन्वय ) नृपे ता महीं शासात (सति) सनामिभृते सुहृदुत्तमाना, सनाऽभिभूते द्विपदुधमाना (च) सामान्यमासीत् उभयादरेण ॥ ५५ ॥ व्याख्या-सामादिराजनीतिमाह-सनाभीति । नृपे-विश्वसन प्र भृतौ राज्ञि तांपूर्वोक्तरूपा महींपृथ्वी शासति सतिम्राज्यं पाल यति सति, मनाभिभूतेः सनाभिः-ज्ञातिस्तस्स भूति भवनं तस्मात् तथा च ज्ञातिभवनात् बान्धवयदनुकूलीभावात् सुहृदुत्तमानां स्वविप यानन्तरितनृपभिन्नमहीपतिनाम् तथा सना-सदा अभिभूतेः-परा- भवनात् द्विपदुद्यमाना=द्विपता शत्रूणा स्वरिपयाऽनन्तरितनृपाणा- मुद्यमानां प्रयत्नाना च चिरेण सामान्य साधारण तुल्यरूपतेत्यर्थः उभयत्र सनाभिभूतित्वस्य सत्यात् आसीत् । अत एव उभयादरेण= उभयः शनुभिः भयात्कृतेन मित्रैश्च स्नेहात्कृतेन आदरेण-सम्मान- नेन, उभयेपामादरेण वा यद्वा उभयेपु-शत्रुषु मित्रेषु च आदरेण= शत्रुपक्षे आ-समन्तात् दरेण भयेन तजननेनेतिभावः मित्रपक्षे सत्कार करणेन नृपे महीशासतीत्यनेन सम्बन्धः । तुल्ययोगीता श्लेपः विरो- धाभासश्वालङ्काराः ।॥ ५५ ॥ श्रीविश्वसेनाऽवनिपं तमाय- ज्योत्स्नेव तापं सहसाऽपजहे ॥ चलाचलानां च खलानलानां, सुधाऽभिपिक्ता वसुधातदाऽमृत् ॥५६॥ अ-चय -तम् अवनिपम् आप्यश्रीविश्वसेना ज्योत्नेव चलाचलाना सला मलाना ताप सहसाऽपजह यमुधाऽपि तदासुधाभिविताऽभूत् ॥ ५६ ॥ (व्यारया) तं-पूर्वोक्त विश्वसेन प्रभृतिम् अवनिपं-राजानम् आप्य-ब्या श्रीवियसेना-श्रिया-शोभयायुक्ता विश्वा ममग्रा सेना ज्योत्स्नेय चन्द्रिकेन चलाचलानाम् अत्यन्तचञ्चलस्वभावानां
आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका.
खलानलानांगला: दुर्जना: अनला: अग्नय इब गला एवं अनला
इति वा सलानलास्तेषां तजनितमित्यर्थः तापं मन्तापं दौर्जन्यजनि
तोपदवमित्यर्थः सहसा झटिति अपज अपहृतवती । वसुधा-पृथ्वी
अपि तदा तस्मिन् काले राजप्रभावबशप्रशान्तदुर्जनादिजनिताऽशेपा-
ऽशातजात समये इत्यर्थः सुधाऽमिपिता-सुधा-अमृतमिव सुधा-
जलं तया अमृतोपमजलेनेत्यर्थः अभिपिक्ता-जातसेका अभूत् ॥ उप.
माऽतिशयोक्तिथालंकारौ ॥५६ ॥
अभीतिनीतिः प्रसूताऽऽसमुद्र-
प्राजाधिपत्याद् युगपत् प्रवृत्त्या ।।
ततः समयं वसुदेवतेजो-
न्यकृत्यरेजे रजसाऽसैव ॥ ५७ ॥
अन्वय -तत भासमुद्रप्राजाधिएत्यात् युगपत् प्रवृत्त्या (च) प्रसूता अभी
तिनीति समग्र वसुदेव तेज अञ्जसा रजसान्यक्कृत्य रेजे ॥ ५७ ॥
व्याख्या-ततः तदनन्तरम् आसमुद्रग्राजाधिपत्यात्-समुद्रा-
वधिशासनकरणात् युगपत् एकदैव प्रवृत्त्या आज्ञादिप्रचारेण च
अमृता-विस्तृता व्याप्तेत्यर्थः अभीतिनीतिः करमा अपि भयं न देय-
मिति मयि दुर्विनीतानां शासितरि केनापि न भेतव्यमिति वाऽभयदा-
नविपयिणी राजनीतिः समग्रं-सम्पूर्ण वसुदेवतेजा-असूनां धनानां
रलानां वा देवा: अधिपाः 'वसुना दीव्यन्तीति व्युत्पत्या' घनिन
इत्यर्थः तेषां तेजा दुर्विध विविधवाधासंबाधजनकः प्रतापः तत्
कर्मभूतं रजसा-राजसभावेन धूलीरूपेण बान्यक्कृत्य तिरस्कृत्य
अधाकृत्येति या अञ्जसा झटिति रेजे-दिदीपे ॥ धनेरत्नेवसुस्मृतम
इत्यमर इति कोपः ॥ ५७॥
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचितेसप्तसन्धानमहाकाव्ये N www . (व्याख्या)-यथार्थपृथ्वीपतित्वं प्रकटयति-तमीति । तमीश्व- राभनमीरात्रिस्तस्या ईश्वरः पतिः तमीश्वर:-चन्द्रस्तस्येव आभा- छविर्यस्य स तं तथोक्तं चन्द्रसदृशमित्यर्थः तं पूर्वोक्तम् विश्वसेन प्रभृतिम् ईश्वरंपतिं राजानमित्यर्थः आप्य लब्ध्या धरा=पृथ्वी ममर्थ सिद्धार्थ कृतार्थभावात् द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिस- म्बध्यते इति न्यायादिहत्य भाव शब्दस्य प्रत्येकमन्वय तथा च ममर्थभावात्-कार्यसम्पादने समर्थत्वात् शक्तिशालिजनाट्यत्वादिति- भावः यद्वा सर्वविधवस्तुप्रकटने धमन्यात् सिद्धार्थभावात् लोकानां सर्वार्थमाधकत्वात्, कृतार्थभावात् धान्यादिनिप्पादनेन चरितार्थ- त्वात् सफलत्वात् इत्यर्थो बोद्वव्यः । कराग्रहात्-करस्य-राजग्राह्य- भागस्य अग्रहात अनादानात् ग्रहणाभावादित्यर्थः, तथा स्वयम्भूद यनात् स्वयम्भूः-विष्णुः तद्वद् दयनात्मरक्षणान् यद्वा खयम्= आत्मना नतु कर्मकरादिद्वारा भुवः स्थानस्य आगन्तुकेभ्यः दयना- दानात् मत्कृत्यप्रतिपादनात्, अथवा वयं नत्वन्यद्वार भुवः पृ. थिव्याः दयना=पालनात् प्रत्यवेक्षणादित्यर्थः, अतएव तुष्टमना:- प्रसन्नचित्ताः प्रियय-प्रीत्यावहव हृद्यवेत्यर्थः लोकानां नरपतेश्व, यद्वा प्रिया भार्या तद्रूपेत्यर्थः एब. प्रियेवेति पाठे प्रियेव भार्येव आसीत् । वनिताऽपि यथा शशाङ्ककान्तं कान्तमासाद्य समर्थ सिद्धार्थ-कृतार्थभा. यात्ममर्थ-भावा-सुरतादिक्षमत्वात् सिद्धार्थभावात् सम्पन्नमनोर- थत्वात् कृतार्थभावात् सदपत्यजननादिनाकृतकृत्यत्वात्, कराग्रहाद= योग्यपुरुप कपाणिग्रहणात् स्वयम्भूदयानात-स्वयम्भुवः कामदेव- स्य तद्विकारम्पतिभावः उदयनात् आविर्भावात् यद्वा स्वयम्भुवोः स्तनयोः उदयना-उत्थानात् यौरनो दादित्यर्थः तुष्टमना: मदा- जहादितान्तःकरणा पत्युः प्रिया-प्रीतिजनिमा भवति. तधेयंधरापी- vvwrnN AN VvvNA N . भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, त्यर्थः उपमानकक्षायामित्याशयः सविता-ग्रजोत्पादयिता अजान्ब्रह्मा एव यद्वा मविता-सूर्यः तेजस्वित्वेन अजा-विष्णुः स्थिति (लोकम- यांदा) कारित्वेन, शिवश्च दुष्टसंहारकन्वेन एव नान्यः कश्चन यस्यो. पमानभूत इति भावः तस्य राजः आधिपत्ये प्रभुत्व स्वामित्वे इत्यर्थः राजत्वकाल इति यावत् जगत्यां पृथिव्यां लोकेवा सुपमा-शिष्टाऽनु- ग्रहदुष्टनिग्रहादिविधिविधानजनितसात्रिकशान्तिसमुद्भूतपरमशोभा 'सुपमा परमाशोभा' इत्यमरः । यहा सुपमा शोभना स्थितिरितिशेपः, अथवा भुपमा ममा तुल्यरूपा वृति रितिशेषः आसीदितिक्रियाध्या. हारः, अत एव कस्यापि लोकस्य जनस्य दुःखलेश: आध्यात्मिका- ऽऽधिदैविका-ऽऽधिभौतिकादिदुःखमात्राऽपि न अभूत् । अन्योन्ययु- धायुधानाम् अन्योन्यं परस्परं युत् युद्धम् आयुधानि प्रहरणानि श. खाणीत्यर्थः तेषां तजनित इत्यर्थः क्लेशा पीडा कुतः नैव मम्भवती- त्यर्थः न्यायपरायणे प्रजारक्षणप्रवणान्तःकरणे धरणीरमणे राजसिंहा. सनमासीने प्रजानामकुतोभयत्वं राष्ट्रस्य च ममस्तैति मीतिराहित्य- मनुपमसुपमामाहित्यं च सनथैव मम्भावनाऽऽस्पदीभावमधिगच्छ- तीति नीतिदिनाम्मतिः । उपमा, कान्यलिङ्गम् अर्थापत्तिवाऽलङ्क. तयाअजरछागे हरि-ब्रह्मविधु-मर-नृपे हरे इति मेदिनी ॥५९॥ तमीश्वरं प्राप्य तमीश्वराभं समर्थ सिद्धार्थ कुतार्थभावात् । कराग्रहात् तुष्टमनाधराऽऽसीत् स्वयंस्वयम्भूदयनाप्रियेव ।। ६० ॥ (भन्वयः) समीशराभं तम् ईश्वरं प्राप्य धरा समयं सिद्धार्थ हवाय. भावान् कराग्रहात् स्वयम्भूदयनान् तुष्टमनाः प्रियेव (प्रियेव) भामीत् ।।
६२ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये ww www vM श्रीकाशिगजस्य महाश्वसेना- ख्याने श्रुतेऽप्यागमनिश्चयेन ॥ क्षमापि दिङ्मोहविनाशनेन, पराऽभिघाताय विनाशनेन ॥ ५८ ॥ भन्मय --धोकाशिरावस्य महाश्वसेनारयाने श्रुतेऽपि पराभिघाताय आगम निश्चयेन अशनेऽपि क्षमा न आपि (शत्रुवगै दिमोहविनाशनेन पिना १५९॥ व्याख्या-श्रीकाशिराजस्य-श्रिया राजलक्ष्म्या काशते-दीप्यते तच्छीलः श्रीकाशी स चासो राजा च इति श्रीकाशिराजस्तस्य तथी क्तस्य महाश्वसेनाख्याने =महत्या स्तुरङ्गमसेनाया आख्याने प्रसि- तिवृत्तवर्णने श्रुतेऽपि-श्रयणगोचरी कृतेपि परामियाताय-शनूगां दलनाय आगमनिश्चयेन इयमागच्छति सेना इत्येवं सप्रतीपक्षितिप सेनोपस्थितिनिर्णयेन अशनेऽपि भोजनेऽपि क्षमा शान्तिः चित्तैका- ग्न्यमित्यर्थः न आपि प्राप्ता शुभगेरिति शप.। किं सर्वथैर नेत्याह- दिड्मोहविनाशनेन पिना=दिशाभ्रान्ति विनाशो यावन्न तापदित्यर्थः । क्षमा भूमौ तितिक्षायां स्त्रिया युक्ते नपुंसकम् इति मेदिनी ॥५०॥ अजः सपक्षे सवितैव तावत् , तस्याऽधिपत्ये सुपमा जगत्याम् । लोकस्य कस्यापि न दुःखलेशः, क्लेशः कुतोऽन्योन्ययुधायुधानाम् ॥५९॥. (अन्वय ) यस्य सपक्षे सविता अज य (नान्य) तस्य आधिपाये अगत्यां सुपमा (सुपमा स्थिति , वृत्ति ) ( भासीत् )। कम्यापि सोकस्य दुखलेश न ( अभूत् ) भन्योन्ययुधायुधाना लस कुत ( सम्भवति ) व्यारया-यस्य राज्ञः सपक्षे सादृश्पकोटौ तुल्यरूपतायामि- A भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, MA त्यर्थः उपमानकक्षायामित्याशयः सविता-प्रजोत्पादयिता अजान्ब्रह्मा एव यहा सविता सूर्यः तेजस्वित्वेन अज: विष्णुः स्थिति (लोकम- र्यादा) कारित्वेन, शिवश्च दुष्टसंहारकत्वेन एव नान्यः कश्चन यस्यो- पमानभूत इति भावः तस्य राज्ञः आधिपत्ये प्रभुत्वे स्वामित्वे इत्यर्थः राजत्वकाल इति यावत् जगत्यां-पृथिव्यां लोकेवा सुपमा शिष्टाऽनु- ग्रहदुष्टनिग्रहादिविधिविधानजनितसात्रिकशान्तिसमुद्भूतपरमशोभा 'सुपमा परमाशोभा' इत्यमरः । यद्वा सुपमा शोभना स्थितिरितिशेषः, अथवा मुपमा=ममा तुल्यरूपा वृति रितिशेपः आसीदितिक्रियाध्या. हारः, अत एव कस्यापि लोकस्य जनस्य दुःखलेशा आध्यात्मिका- ऽऽधिदैविका-ऽऽधिभौतिकादिदुःखमात्राऽपि न अभूत् । अन्योन्ययु- धायुधानाम् अन्योन्यं-परस्परं युत्-युद्धम् आयुधानि-प्रहरणानि श. खाणीत्यर्थः तेषां तजनित इत्यर्थः कुगा पीडा कुतः नैव सम्भवती- त्यर्थः न्यायपरायणे प्रजारक्षणप्रवणान्तःकरणे धरणीरमणे राजसिंहा. सनमासीने प्रजानामकुतोभयत्वं राष्ट्रस्य च ममस्तेति मीतिराहित्य- मनुपमसुपमामाहित्यं च सर्वथैव मम्भावनाऽऽस्पदीभावमधिगच्छ. तीति नीतिवेदिनाम्मतिः । उपमा, काव्यलिङ्गम् अर्थापत्तिथाऽलङ्ग तयः।।अजश्छागे हरि-ब्रह्मविधु-मर-नृपे हरे इति मेदिनी ॥५९॥ तमीश्वरं प्राप्य तमीश्वराभं समर्थ सिद्धार्थ कुतार्थभावात् । कराग्रहात् तुष्टमनाधराऽऽसीत् स्ययंखयम्भूदयनाप्रियेव ।। ६० ॥ (भाषा) नमीशराम तम् वर प्राण धरा ममर्थ सिदार्थ वापं. भावात् राप्रा समापनात नुएमनाः प्रियेव (प्रियेर) भागीन् ।
६४ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरवितेसप्तसन्धानमहाकाव्ये - ArvinvuAL vvv AMANAM (व्याख्या) यथार्थपृथ्वीपतित्वं प्रकटयति-तमीति । तमीश्व- रामं नमीरात्रिस्तस्था ईश्वरः पतिः तमीश्वरम् चन्द्रस्तस्येव आभा छविर्यस्य स तं तथोक्तं चन्द्रमशमित्यर्थः तं पूर्वोक्तम् विश्वसेन प्रभृतिम् ईश्वरं पति राजानमित्यर्थः आप्य लब्ध्वा धरा=पृथ्वी समर्थ सिद्धार्थ कृतार्थभावात् द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिस- म्बध्यते इति न्यायादिहत्य भाव शब्दस्य प्रत्येकमन्वयः तथा च समर्थभावात् कार्यसम्पादने समर्थत्वात् शक्तिशालिजनाढ्यत्वादिति- भावः यद्वा सर्वविधवस्तुप्रकटने क्षमत्वात् सिद्धार्थभावात लोकानां सर्वार्थमाधकत्वात, कृतार्थभावात् धान्यादिनिष्पादनेन चरितार्थ- त्वात् सफलत्वात् इत्यों बोद्धव्यः । कराग्रहात्करस्यजग्राह्य- भागस्य अग्रहात अनादानात् ग्रहणाभावादित्यर्थः, तथा खयम्भूद- यनात्-खयम्भूः विष्णुः तद्वद् दयनात्-रक्षणान् यहा स्वयम् आत्मना नतु कर्मकरादिद्वारा भुवः स्थानस्य आगन्तुकेभ्यः दयना- त-दानात् मत्कृत्यप्रतिपादनात्, अथवा स्वयं नत्वन्यद्वारैव भुवः पृ. थिव्याः दयना-पालनात् प्रत्यवेक्षणादित्यर्थः, अतएव तुष्टमनाः= प्रसन्नचित्ताः प्रियैत्र-प्रीत्यावहव हृद्यैवेत्यर्थः लोकानां नरपतेश्व, यद्वा प्रिया भार्या तद्रूपेत्यर्थः एव. प्रियेवेति पाठे प्रियेव-भार्येव आसीत् । वनिताऽपि यथा शशाङ्ककान्तं कान्तमासाद्य समर्थ सिद्धार्थ-कृतार्थमा वाद-ममर्थ-भावात्-सुरतादिक्षमत्वात् सिद्धार्थभावात् सम्पन्नमनोर- थत्वात् कृतार्थभावात् सदपत्यजननादिनाकृतकृत्यत्वात्, कराग्रहात्= योग्यपुरुपकर्तृकपाणिग्रहणात् स्वयम्भूदयानात् स्वयम्भुवः कामदेव- स तद्विकारस्पेतिभावः उदयना=आविर्भावात् यद्वा खयम्भुवो: स्तनयोः उदयनार-उत्थानात् यौवनोद्भेदादित्यर्थः तुष्टमनाः-मदा- जहादितान्तःकरणा पत्युः प्रिया-प्रीतिजनिका भवति. तयंधरापी- ६५ 4 आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. तिभावः । इलेषेणानुप्राणितंरूपकमुपैमा वा काव्यलिङ्गं समासोक्ति ऽलङ्काराः । चलि-हस्तां-शव: करा इत्यमरः ॥ ६ ॥ वामाऽभिरामाङ्गचिराऽर्थसिद्धौ, शिवाऽऽख्ययाऽस्य प्रियकारिणीस्त्री। श्रिया सुदेवी सहशीललीला- कौशल्यकान्ताम्बुजलोचनश्रीः ॥६॥ (अन्य ) अस्य वामा स्त्री अभिरामाङ्गी, अर्थसिन्दौ अचिरा, आख्य- याशिवा, प्रियकारिणी, श्रियासुदेवी सहशीललीला, कौशल्यकान्ता, अम्बुज रोचनश्री. ( आसीत् ) ॥ द्वितीये-अस्य अचिरास्त्री, धामा,ऽभिरामाङ्गी, अर्थ. सिद्धौ भाख्यगा शिवा, शेष पूर्ववत् ॥ तृतीये-अस्य आख्यया शिवा स्त्री शे० पू० ॥ चतुर्थे-अस्य सुदेवी-मरदेवी स्त्री शे० पू० ॥ पञ्चमे-अस्य सुदेवी- देवकी स्त्री श्रिया 'युक्ता' शेप पूर्ववत् ॥ पष्ठे-अस्य कौशल्यका कौशल्या स्त्री वामाऽभिरामाङ्गी अर्थसिद्धौअचिरा आख्यया शिवा प्रियकारिणी, श्रिया सुदेवी, महशीललीला, अन्ता,ऽम्बुजलोचनश्री: ( आसीत् ) ॥ ६ ॥ व्याख्या:-अस्य राज्ञः अश्वसेन संजस्य वामा तदभिधाना स्त्री-भार्या आसीत् कीदृशीत्याह-अर्थसिद्धौ अचिरा कार्यसम्पादने शैव्यवती शीघ्रंकार्यसाधिकेत्यर्थः । आख्यया नाम्ना शिवा कल्या. णाहा नाम [मरण] मात्रेणैव मगलकारिणीत्यर्थः । अभिरामाङ्गी- अभिराम-सुन्दरम् अङ्ग-शरीरं यस्याः सा तथोक्ता मनोहरगात्रीत्यर्थः। प्रियकारिणी-पत्युहितकारिणी । श्रिया शोभया सौभाग्यलक्ष्म्या वा रूपसम्पदा वा सुदेवी-उत्तमा देवीय इति देवी. सहशीललीला- टि. . समर्थेत्यादिपदे कर-स्वयम्भूपदयोश्च श्लेपात् । २-प्रियेवेतिपाटे । ३-तुष्ट मनस्वे पञ्चम्यन्ताना हेतुत्वेनोपादानात् । ४-समानविशेषणवासाय कनायिकान्यवहारारोपात् तदुत्त 'समायोक्ति समयंकायरिङ्गविशेषणे. । ध्य यहारममारोप• प्रस्तुतेऽन्यस्यवस्तुनः' इति साहित्यदर्पणे ।
महोपाध्याय श्रीमंधविजयगणिविरचिते सप्तमेन्धानमहाकाव्ये rm WA RAA rwa www AVAA शील-सद्वृत्तं सत्स्वभावो वा लीला-विलासविशेषः गतिवेष्टिता दिमिःप्रियस्थानुकरणं "प्रियस्यानुकृतिलीला' इति साहित्यदर्पणे ताभ्यां (शील लीलाभ्यां ) सहवर्तमाना इति सा तथोक्ता कौशल्य- कान्ता-कौशलमेव कौशल्य-क्रियानैपुण्यम् तेन कान्ता-कमनीया प्रशंसनीयेत्यर्थः । अम्बुनलोचनश्री:-अम्बुजस्येव लोचनस्य श्री यस्याः सा तथोक्ता कमलमयनेत्रगोभाशालिनीत्यर्थः। शीलस्र- भावे सदवृत्ते इति मेदिनी ॥ द्वितीयपक्षे-अस्य राजः 'विश्वसेन नामधेयस्य 'अचिरा' तद- मिधानास्त्री-भार्या पट्टराझीतियावत् साकीदृशीत्याह-वामा- रम्या मनोहारिणीत्यर्थः, अर्थसिद्धौ-प्रयोजनसम्पादनविपये आख्य या-नाम्ना शिवा-क्षेमकारिणी । शेप पूर्ववत्।। अर्थोऽभिधेय रै-वस्तु- प्रयोजन-निवृत्तिपु इत्यमरः । तृतीयपक्षे-अस्य राजः 'समुद्रविजय' नानः आख्यया नामा 'शिवा' इतिलोके प्रसिद्धा सी-पट्टमहिपी आसीत् । शेपं पूर्ववत् ।। चतुर्थपक्षे-अस्य रानः 'नाभिराज' संज्ञकस्य त्री-पत्नी पट्ट- राजी सदेवी-मरुदेवी इति प्रसिद्धा आसीत् नामैकदेशग्रहणेन नाम- ग्रहणात् सत्या भामा इतिवत् । सा कीदृशीत्याह-श्रिया 'युक्ता' इति शेपः । शेषं पूर्ववत् ॥ पञ्चमपक्षे-अस्य वसुदेवस्य 'सुदेवी-देवकी इत्यभिधया लोके विदिता श्री-भार्या आसीत् शेष पूर्ववत् । पाठपक्षेच~-अस्य राजो 'दशरथ' नामधेयस्य 'कौशल्यका 'कौशल्पा' इत्येतनाम्नीत्यर्थः स्पाधिकः कः "के" इत्यापोड्स्यः अभाषितपुंस्कात्यनेन नित्यत्रीलिङ्गशब्दाद्विहिताऽस्थानिकाञ्चो. वैकल्पिकेचविधानमामाचदभारे नित्यत्वसाऽप्यमावः । साकीर- A आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. AW . V शीत्याह-वामाऽभिरामाङ्गीचामेन-कामदेवेन तद्विकारोदयेन काम- निवासावस्योद्गमेन वेतिभावः यौवनोद्भेदेनेतियावत् अभिराममनो- हरम् अङ्गं यस्याः सा तथोक्ता यहा वामस्स-कामस्य अभिरामा सुन्दरी यद्वा आमिरामा आभाऽस्त्यस्या इत्यामिनी-सातिशयशोभा- शालिनी रामा रमणी रतिरित्यर्थस्तद्वद यस्याः सा तथोक्ता । अन्ता-रम्या पत्युमनोहारिणी । वाम धने पुसिहरे कामदेचे पयो- धरे । बल्गु-प्रतीप-सव्येषु त्रिपु नार्या स्त्रियामिति मेदिनी । मृत्या ववसितैरम्ये समाप्ता वन्त इष्यते इति शब्दार्णवः शेषविशेषणयोजन पूर्ववत् । श्लेषः दीपकम् उपमाऽलङ्काराः । श्रीसिद्धार्थराजस्य भार्यानामधेयमग्रेऽभिधास्यते ॥ ६१ ॥ इन्दोररालापि कला द्वितीया, शुभायनूनं समयाऽनुसारात् । तथा सुदेव्यप्यचिराशिवैव, वामाध्वना सूरतमूर्तिसाधुः ॥६२|| (अन्य ) इन्दोः द्वितीया क्ला भरालाऽपि समयानुसारात् नून शुभाय (भवति) तथा सुदेश्यपि अचिराशिवा यामाध्वना (वर्तनशीला) सूरतमूर्ति- साधु (अभूत्) ॥ १२ ॥ यथा इन्दोः चन्द्रमसः द्वितीया कला-पोडशमागैकभागः क- लातु पोडशोभाग इत्यमरः, अरालाइटिलापि असुदृश्याऽपीति- भावः समयाऽनुसारात्-कालान्तरेण पौर्णमासीमासाद्यत्यर्थः नून- निश्चयेन शुभाय-मगलाय पूर्णशशिरूपाय कल्याणायेत्यर्थः भवति तथा तद्वत् मृदेवी प्राग्वर्णितरूपा राज्ञी अपि अचिराऽशिवा अचि. रम् अल्पकालपर्यन्तमेष अशिपं-मादिहित्यादिरूपममगलं तज्ज- नितासमितिभावः यस्याः सा तथोक्ता अभूत् । कीदृशी सेत्याह- टि... सम्यग्दष्टुमसक्यापि,
M
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AM
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचितेसप्तसन्धानमहाकान्ये
वामाध्वना-शिष्टसमष्टयाचरितरुनिरमार्गेण वर्तनशीलेविशेपः यद्वा
वामा रम्यः मधुर इत्यर्थः आ-समन्ताधनो भापा यस्याः मा
मधुरवादिनीत्यर्थः । सूरतमूर्तिमाधुः सूरतया दयानत्या मूर्त्या-ख-
रूपेण साधुः मनोहरा सम्या शिष्टावा यद्वा मरता मूर्तिर्यस्याः सा-
चासौ साधुः कुलीना-महाकुलसमुद्भवा-चेति सा तथोक्ता । स्याद-
यालुः कारुणिकः कृपालुः सूरतः समा इति. महाकुलकुलीना ये स-
भ्य-सज्जन-साधव इति चामरः । साधु (पिकेचारौ सज्जनेऽप्य-
भिधयरत् इति मेदिनी ।। ६२ ।।
सौरभ्यवित्तं जल प्रदाय,
चन्द्रः कलाकोशल मुज्ज्वलत्वम् ।
जाने तदास्यानुगमाद् विभूति,
प्राप्तीकजेन्दू समयं प्रपद्य ॥ ६३ ॥
(अन्वय ) कजेन्द समय प्रपद्य तदास्याऽनुगमात् विभूति प्राप्ती (इति)
मन्ये जलज सौरभ्यवित्त चन्द्र कलाकौशलमुम्वर व प्रदाय ॥ ६३ ।।
कजे न्दू-कमल-चन्द्रमसौ ममयंक्रमेण दिवस-रानि रूपंकालं
प्रपद्य-प्राप्य तदास्याऽनुगमात्-तस्या-अनुपदोक्त राज्याः आस्य-
स्य-मुसस्य अनुगमात्=अनुसरणात् सेननादित्यर्थः तन्मुससेवनाऽऽ-
मादितप्रसादादितिभानः विभूति अपमानस्थानीयत्नादिमहिमानं प्रा-
तौलब्धवन्ती इत्यहं जाने मन्ये उत्प्रेक्षे इत्यर्थः । ननुकिंदया
ताभ्या प्रसादो लब्ध इत्याह-जलजन्कमलं सौगन्यरूप धनं, चन्द्रश्च
कलाकौशल कलामु चतुःपटिप्रकाराम कौशल-नैपुण्यम् उज्ज्वल
त्वम् औज्ज्वल्यमनुपमकान्तिमत्वम् आह्लादकर वा प्रदायन्दत्वे-
त्यर्थः । कमलगुणाः चन्द्रगुणाश्च तन्मुखेजत्तिपतेति भावः ॥ उत्प्रे-
क्षाकान्पलिङ्गं च ॥६६॥
भाचार्यश्रीविजयामृतरिमगीता सरणी टीका AAVmmm.A MA सौभाग्यमस्याः प्रवदेत् समस्या- ख्यानात् सुधावा सकलार्थसिद्धिः । सुधाऽधरस्था करपद्मगाऽन्या तत्तुल्यता वास्तु न जीवलोके ॥ ६४ ॥ समस्य आरयानात् ( सादृश्यरूपेण ) सुधा सकलार्थ सिद्विर्षा लस्या सोभाग्य प्रवदेन तु सुधा ( अस्था ) अधरस्था अन्या करपद्मगा ( अतएव ) जीवलोके तत्रयना न अस्तु ।। ६४ ॥ समस्य-संक्षिप्य आख्यानात्-कथनात् सादृश्य रूपेणेतिशेपः सुधा अमृतं. मकलार्थ सिद्धिासकलानां सम्पूर्णानाम् अर्थानां= धनानां प्रयोजनाना वा वस्तूनां चा सिद्धिा निष्पत्ति द्धिर्वा वा शब्दः ममुचायार्थः अस्याः पूर्वोक्तराज्याः सौभाग्य भाग्यशालिनां पतिवाल्लभ्यं वा कर्म प्रवदेत् अक्तुं समर्था स्यात् । द्वितीयो 'या' तु शब्दार्थकः तथा च वास्तु किन्तु सुधा प्रक्रमादस्याः अधरस्था- ओष्ठवर्तिनी. अन्या-अपरा द्वितीया सकलार्थसिद्धिरित्यर्थः करप- अगा-हस्तपदस्था हस्तस्थितकमलरेसामहिप्रभवेत्यर्थः पद्मरेसायुक्त- हस्ते सर्वार्थसिद्धिरिति सामुद्रिकशास्त्र प्रसिद्धम् । अतएव जीवलोके मर्त्यलोके तत्तुल्यता-तत्सादृश्यं न अस्तु-नाऽस्तीत्यर्थः । तद्भिन्न- त्ये सति तद्गतभूयोधर्मवत्वं हि सादृश्यं तयाऽभिन्न वस्तुनि न सम्भ- वतीति कथं स्वस्था सुधा स्त्रसादृश्येन वक्तुं प्रभवेदितिभावः । अत्रा विशयोक्तिरलकृतिः ॥ ६४ ॥ रूपेण कान्त्या चरणेनलक्ष्म्या, प्राप्ताशलाका त्रिषु विष्टपेषु। ततः प्रसिद्धा निशलाकनान्ना- काराविकारा द्रमणी मणीव ॥ ६५ ।।
vvv m Mu महोपाध्यायनीमेघविजयगणिविरचिते महसन्धानमहाकाम्ये (अन्वयः) रूपेग कात्या भाचरणेन रक्षम्या ग्रिषु विष्टपेषु शलाकांप्राप्ता ततः आकाराविकाराद् त्रिशलाकनाम्ना प्रसिद्धा रमणी मगी व (भभूत्) ॥६५।। व्याख्या-एकपष्टि ६१ मितश्लोकेऽनुक्तां सिद्धार्थराजस्य भार्या मिहिनामत आचष्टे । 'अस्ये'-ति पूर्वतोऽनुपज्यते. प्रकरणाद्वाऽनुस- न्धेयः । तथा च अस्स-सिद्धार्थराजस्य, रूपेण सौन्दर्येण सत्स्वभावेन घा 'रूपं स्वभावे सौन्दर्ये' इति मेदिनीः, कान्त्या लावण्येन. आच. रणेन सदाचारेण सम्यक्चारित्रेणेत्यर्थः लक्ष्म्या धनसम्पदाच त्रिपु विष्टपेपु-त्रिलोक्यां शलाकाम् सर्वोत्तमतां प्राप्ताअधिगतवती ततः= तस्मात्कारणात आकाराविकारात्-आकारस्य'त्रिशलाका' घटककका- रोत्तरवर्तिन आरूपस्वरवर्णस्य अविकारा संज्ञा शब्दतया 'डयापोः संज्ञा-छन्दसोहुलम्' इत्येतच्छास्त्रेण हस्खविधानवशसञ्जाताद् अरू- पवर्णविकारात् अन्यथा त्रिशलाका' इत्यापत्तेः, 'त्रिशलाक' नाम्ना त्रिपुश लाका यस्य तत्रिशलाकं तादृशं नाम अभिधानं तेन त्रिशला. नाम्नेत्यर्थः प्रसिद्धा शास्त्रे लोकेच विदिता भूपिता या 'प्रसिद्धी ख्यात-भूपितो' इत्यमरः रमणी-स्त्रीरत्रम् अभूत् केव? मणीव-सद्र- नमिव सापि रूपादिना प्रसिद्धा-भृपिता, शलाकां वेधनास्त्रं प्राप्ता, आकार विकार रहिता भवति । श्लिष्टोपमा काव्य लिङ्गंचाऽलङ्कारौ॥६५ सुवर्णकूर्मप्रतिमाक्रमत्वा-- त्तस्या मधोलोकसुरप्रणामम् । वराङ्गरत्नेन तदोज़लोक- प्रणम्रतां वक्तितदीयकायः ॥ ६६ ॥ तदीयकायः सुवर्णकूर्मप्रतिमाक्रमत्वात् तस्या मधोलोकसुर प्रणामम् तथा बरागररनेन अरोकप्रणम्रता वति ॥ ६६ ॥ व्याख्या-तदीयकायाम्पूर्वोक्तराज्ञीशरीरं सुवर्णकूर्मप्रतिमाक्रम- ७१ rom Aww भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. त्वात सुवर्णस्य-काश्चनस्य तन्निर्मितस्येत्यर्थः कूर्मस्य कमठस्य प्रति- मा प्रतिकृतिमतिरित्यर्थ स्तद्वत् क्रमौचरणौ गस्य यस्मिन् वा स सुवर्णकर्मप्रतिमाक्रमस्तस्यभावस्तत्वं तस्मात्तथोक्तात् हेमरचितक- च्छपप्रतिमापृष्ठदेशसदृशपदयुगलशालिवादित्यर्थः 'शुभः कमठप- ठाभः' इति सामुद्रिकोक्तेः। तस्यां राज्यां विपये अधोलोकसुरप्रणा- मम् अधोलोकसुराणां भूलोमाधस्ताद्वत्तिभुवनस्थदेवानां प्रणाम प्रणतिम् । तथा चरादरत्नेन भाग्यशालित्वसूचकमस्तक श्रेष्ठेन 'च- राङ्गं मृर्द्ध-गुह्ययोः' इति हैम: रत्नं स्वजाति श्रेष्ठे स्यान्मणौ राजातु- पार्थिवै ऊर्चलोकप्रणम्रतां ऊर्घलोका: भूलोकादुपरिवर्तमानलोकाः तत्रत्यादेवा इति भावः प्रणम्राः प्रणता यं स ऊलोकप्रणम्रस्त. स्य भावस्तत्ता तां तीर्थकरजननक्षेत्रतया अधिोलोकवर्तीदेवादीनां प्रणम्यतामितिभावः वक्ति-कथयति ज्ञापयतीत्यर्थः ॥ ६६ ॥ मुक्ताकलापे स्तनयोर्विभूपा, केशेषु शोभा शिखिनां कलापे । नितम्बशोभा रसनाकलापे, कलापरूपं तदिदं कवीनाम् ॥ ६७ ॥ (अन्वय) मुक्ताक्लापे स्तनयोविभूषा शिबिनाकरापे केशेषु शोभा, रसना फरापे नितम्यशोमा तदिद कयीना कलाऽपरूपम् (भमिमसम्) ॥६॥ व्याख्या-मुक्ताफलापे मुक्तावल्यां हारे इत्यर्थः स्तनयोः वक्षो- जयोः विभूषा-भूपकत्वम् स्तनशोभासंवर्द्धकत्यकथन मितिभावः, शि- सिनां मयूराणां कलापे-चहें उपमानभूते उपमेयतयाऽमिमतेपु केशे- पु-कुन्तेलेपु शोभा, रसनाम्लापे-काश्चीदाम्नि सति नितम्यशोमा नितम्बस्य-कटिपश्चाद्वेशस्य शोमा छविस्तवर्णनमित्याशपः इद-तच- .
૨ महोपाध्यायधीमेधविजयगशिविरचिते मप्तमन्धानमहाकाम्ये MA दभिधानं कवीनां-काव्यनिमातॄणां कलापरूपं-कलाया: सामर्थ्यस्य कल्पनाशक्तरित्यर्थः अपरूपम् अपकृष्टस्वरूपम् विपरीतल्पंवाऽभिम- तमितिशेपः । अनुपमानां प्रकृतिरमणीयानां रमणीरत्नानामुपमानप. रिकल्पनमाहार्यसौन्दर्यसाधनोपसन्निधापनं च कविकल्पनाशक्तेदी- चल्यं द्योतयतीतिभावः। कलापो भृपणे बहें तूणीरे संहतावपि इति मेदिनी । कला स्यान्मूलविवृधौ शिल्पादावंशमात्रकेपोडशांशे च च- न्द्रस्य कलनाकालमानयोरितिमेदिनी । अपः म्यादपकृष्टार्थे वर्जनार्थ- वियोगयोः । विपर्ययेच विकृतीचौर्य निर्देश-हर्पयोः इतिमेदिनी। अथ च कवीनां काव्यकर्तृणां तत्तस्मात् इदं एतद्वर्णनीयस्वरूप स्वी रूप वस्तु कलापरूपम् समूहरूपं. सर्ववर्णनीयवस्तु समष्टिरूपम् यद्वा कलारूपम् भूषणस्वरूपम् प्रसन्नताजनकम् एकत्रैव सर्वव्यावर्ण- नीयवस्तुमिलनात् किंवाकवीनां मयूराणां कलापरूपम् चर्हस्वरूपम् अनेकरूपत्वादित्यर्थः ॥ ३७॥ नृपेन्द्रभावे जयवाहिनीयं, तद्वैष्णवे साकमलाऽवतीर्णा । तद्राजयोगे खलुरोहिणीव, व्यावर्णनीया बहुलब्धवर्णैः ॥ ६८ ॥ (मन्वयः) सा इयं नृपेन्द्रभावे जयवाहिनी. सद्वैष्णवे कमलाऽवतीर्णा । तदाजयोगे रोहिणीव बहुलब्धवणे: व्यावर्णनीया खलु ॥ ६८ ॥ व्याख्या-सा इयं-पूर्वोक्ता राज्ञी नृपेन्द्रभावे-नृपस्य-वाज्ञः खभर्तुः इन्द्रमावे-इन्द्रत्वे देवराजत्वे इत्यर्थः अष्टानांलोकपालानां,वपु धीरयतेनृपः इत्युक्ते रिन्द्रकलयाऽवतीर्णतयाऽभिमतत्वे जयवाहिनी जयं-जयन्तं पाकशासनिं तदाख्यशक्रपुत्रमित्यर्थः वहति-धारयति AANA MwAMAA भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. प्रामोति वा पुत्रत्वेन तच्छीला शचीरूपेत्यर्थः तद्वैप्णवे तस्य राज्ञः स्वभः वैष्णवे विष्णुत्वे 'ना विष्णुः पृथिवीपति' रित्युक्त राज्ञो विष्णुकलयाऽवतीर्णत्वेनाभिमतावित्यर्थः कमला लक्ष्मीस्तद्रूपेणे. ति भावः अवतीर्णा-गृहीतावतारी । तद्राजयोगे-तस्य राज्ञः राजयोगे चन्द्रवाचकराजन् शब्देन योगेन्नृपरूपेतरार्थवाचकतया सम्बन्धे, यद्वा राज्ञः चन्द्रस्य लोकपालान्यतमस्य योगेकलयासम्बन्धे रोहिणी- चन्द्रभार्या इत्र बहुलब्धवर्णैः बहुभि लब्धवणैः कविभिः च्यावर्ण- नीया-विशेषेण वर्णयितुं प्रशमितुं योग्या. खलु वाक्यालङ्कारे ।। राजाप्रभौ च नृपतौ क्षत्रिये रजनीपतौ इति मेदिनी । धीमान् सूरिः कृतिः कृष्टिलब्धवाविचक्षण इत्यमरः उल्लेखालंकारः ।। अथ च नृपेन्द्रभावे नृपाणामिन्दः स्वामी तद्भावे सर्वराजखामिभावे जयया हिनी जयंविजयंबहते ग्रामोतीति तच्छीला जयवाहिनी व जयवाहिनी- तिमध्यमपदलोपीममायः संग्राम विजयसंपादिकासेनेवेतिभावः "पती- न्द्रस्वामिनाथार्या इति हैमः" निदर्शनालङ्कारः ॥ ६८ ॥ धर्मः कवीनामुपमा नवीना- sऽधेयाऽभिधेयार्थसमानभावे ॥ अस्यास्त्वसामान्यतयैवदूरा- दालोक्यतां साम्यदशा त्रिलोक्याम् ॥६९॥ भन्ययः-अभिधेयार्थ समानभाये नवीना उपमा आधेया इत्यय] क्यीनां धर्मः गु भस्या असामान्यतया ग्रिलोक्य साम्यदशा दूरादालोक्यताम् ।। व्याख्या-अभिधेयार्थसमानभावे अभिवेयार्थस्य-वर्णनीयप- दार्थस्से (वस्तुनः)ममानभान्तुल्यतापां-माइपे कल्पयितव्ये नवी- ना-काप्यनाहिततयाऽभिनया उपमा मादृश्यम् आधेया योजनीया स्वकाव्ये मंघटनीयेत्यर्थः इत्ययं कवीनां धर्मी आचारः स्वभायो या VAN गहोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरपिरो मतमानमहागाध्ये 'धर्माः पुण्य-यमा-न्याय-स्वभावा-ऽऽचार सोमपा' इत्यमरः । तु: किन्तु अस्याः पूर्वोकराश्याः असामान्यतया अनन्यसाधारणतया त्रिलोक्यां लोकत्रये साम्यदशा सादृश्य दगदालोक्यता=कविभि १रतो दृश्यताम् भूयोभूयो विमृश्य यत्किभित सादृश्य परिकल्पयन्तु किन्तु वास्तविकी समानता नास्तीति तत्र फविनां पाग्व्यापारणं चिरुद्धमेति निष्पनासम्बन्धेऽसम्बन्धरूपातिशयोक्तिरलङ्कारः।।६।। गुणाधिरोहः परमस्तु कोटो, तस्थास्तुलाकोटिरपि क्रमाब्जे । यस्माद् गुणानां शतकोटिरस्यां, मन्ये नतोऽस्मात् शतकोटिशाली॥७०॥ अन्यया-परग: गुणाधिरोहा फोटो तस्याः प्रामाम्गेऽपि तुम्लाको टि: (अस्ति) (द) यस्माग् अस्यो गुणानो पोटिः भस्मा पराकोटिशाली गत इति गम्ये व्याख्या-परम:=उत्कृष्टः गुणाधिरोह:-रज्जुसम्बन्धः कोटी- अग्र भागे तुलादण्डस्य भवतीतिशेपः, तस्यापूर्वोक्तराश्याः क्रमानो पादकमले तुलाकोटिरपि-तुलाचिहस्य तन्त्र रात्वात् तदनभागोऽपि तस्मात्-तुलाकोटीनां तत्र सच्चात् अन्न कोटिशब्दः शतलक्षसंख्यावाची तथा च एकैकतुलायां कोटिद्वयस्य प्रत्येककोटौ गुणानां सच्यात् अस्यां महापुरुषमातरि गुणानां धैर्यादीनां शतकोटि संख्याऽस्तीति मन्ये-जाने इति कविकल्पना तदेव द्रढयति अस्मात् कारणात् शत कोटिशाली-कोटीश्वरः नतागणतः नयशतकोटिशालिनं शतकोटि- शाली नमस्करोतीति भावः ।। अथवा तस्या:-पूर्वोक्तराज्याः परमः अनन्यसाधारणः गुणा- धिरोहा गुणोत्कर्षः कोटौ-शतलक्षसंख्यायां संख्येयतयाऽस्तीतिपः यद्वा गुणाधिरोहः कोटी वर्तते इति NAMMMM VNA , भाचार्य श्री विजयामवरिप्रणीता साणी टीका तस्याः राझ्याः क्रमाब्जे-चरणकमलेऽपि तुलाकोटि-तुलानां साह- श्यगुणानां कोटिः संख्यावर्तते 'तुला सादृश्य-मानयोः' इति मेदिनी। अथ च तुलाकोटि मजीर: चरणभूषणविशेषः अस्तीविध्वनिः । पादाङ्गदं तुलाकोटिर्मजीरो नूपुरोऽस्त्रियामित्यमरः । इत्थं यस्मात् कारणात् अस्या राज्यां गुणानां सौशील्यादीनां शतकोटीरासीद अस्मात् कारणात् । शतकोटिशाली=शतकोटिनाचनेण गालते शोभते तच्छील इन्द्रः, यद्वा शतगुणितकोटिसंख्याकधनाऽधिपतिरपि किमुतान्या नतः प्रणतिप्रवणः अभूत् इति मन्ये-उत्प्रेक्षे। शतकोटिः स्वरुः गम्यो दम्भोलिरशनिहयो रित्यमरः । कोटिः स्त्री धनुषोऽग्रेऽश्री संख्याभेद-प्रकर्पयोः इति मेदिनी । श्लपः काव्य लिङ्गं च ॥ ७० ॥ उच्चैर्दशा स्यान्नु परोपकाराद्, युक्ता तदुच्चस्तनतास्तनाङ्गे। सतां न चात्मम्भरिताकदाचित्, तनु स्वमध्यं तत एव तस्याः ॥७१ ॥ अम्ययः-तस्याः सना उस्तनता युमा (पत:) परोपकारात नुरच दंशा म्यात् (पतः) सना कदाचिद् भा'मम्भरिना न भयनि तत एय तम्याः समय तनु ॥ व्याख्या:-अवयवान् वर्णपति-तस्यामाझ्याः स्तनाले यधोजयुगलरूपाध्ययये उधस्तदता उभय उचस्तनः भवाथै तनु- प्रत्ययः तस्स मावस्वत्ता उग्रता औनत्यमित्यर्थः युक्ता समुचिता यतः परोपकाग दुग्घरुपस्वधनेन परस्य-म्पभिन्नम्य नियोः उप- करणाव-शरीरपोपणरूपोपकारजननाव नुनिश्चयेन उचगा उन्नना पस्या उन्नतिरित्ययः स्याद् भवेत् लोकपिपरोपकारकरणान् उन्नत्य. वस्था भवतीति प्रसिद्धच । यतम मतां मन्ननानां पदाचित् आत्म.
AAh VA vvvum महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये म्भरिता-स्वोदरमात्रपूरण प्रयणता स्वार्थितेतिभावः न भवति तत एव हेतोः तस्याः स्वमध्यम्-उदरं तनु-कृशं जातमित्यर्थः। स्तनोन्नतत्वं परोपकारफलं तनूदरत्वं सञ्जनशिलश्च शिक्षयतीतिभावः। उत्प्रेक्षा काव्यलिङ्गं चालङ्कारी ।। ७१ ॥ अनल्पतल्पे सुमनो विकल्पे, प्रसुप्तयाऽदर्शिपतोनिशान्ते। स्वप्ना मणिश्रेणिमये निशान्ते, तदा तया नर्तितया व्यवर्ति ॥ ७२ ॥ अन्वयः-मणिश्रेणिमये निशान्ते सुमनो विकल्पे अनल्पतरूपे प्रसुप्तया तथा उनिशान्ते स्वप्ना अदर्शिपत तदा नर्तितया ब्यति । व्याख्या-मणिश्रेणिमये-समन्ताम्मणिपंक्तिविराजिते निशान्ते प्रा- सादे सुमनोविकल्पे सुमनसां-पुष्पाणां विकल्पः-विविधकल्पनं विविधा विशिष्टा वा रचनेत्यर्थः यस्मिन् स तस्मिन् तथोक्तरूपे अनल्पतल्पे- अनल्पं महत् तल्पं शय्या तस्मिन् तल्प शय्याऽट-दारेपु इत्यमरः प्रसुप्तया-शयितया तया प्राग्वर्णित राझ्या उन्निशान्ते-उत्-अध्वं निशा न्तात्-रात्रिशेषात् इत्युनिशान्तं तसिन् निशा शेषात्किञ्चिदूर्ध्वमित्यर्थः स्वमा प्रसुप्तविज्ञानविशेषाः अदर्शिपत दृष्टाः तदा-तसिन्काले तया राज्या नर्तितया अभिनीतयत्या कल्याणातिशयसंसूचिखमदर्शनज. न्याऽनन्य सामान्यसान्द्राऽऽनन्दसन्दोहतुन्दिलाऽन्तःकरणताभिनयं कुर्वत्या व्यवर्ति-अभावि पुष्परचितशयनेशयिता राज्ञी रात्रिशेपे स्वमा- नवलोक्य होत्कर्षनिर्भगवतिष्टेति सरलार्यः । निशान्त-पस्त्य-सदन मित्यमरः। खप्नः खापे मसुप्तस्यविज्ञाने दर्शने पुमानिति मेदिनी॥७२॥ गजादिमश्रीवृपभादिसिंहा, दिमेन्दिरा-दाम-मृगाङ्क सूर्याः ।
भाचार्य श्री विजयामृतस्प्रिणीता सरणी टीका. ध्वजोल्लसत्कुम्भसरःपयोधि- विमानरत्नोच्चयवहयोऽमी ॥ ७३ ॥ अन्वयः-गजादिम-श्रीवृषभादि-सिहादिमे-न्दिरा-दाम-मृगाङ्क-सूर्या. घ. जो-लसरकुम्भ-सर:-पयोधि-विमान-रत्नोचय-वय इत्यमी स्माः ॥ व्याख्या--स्वमदृष्टपदार्थान् नामत आचष्टे-गजादिमः गजेषु गजानां वा आदिमा आद्यः प्रधानः हस्तिश्रेष्ठ इत्यर्थः, श्रीपभा- दिपभानामादिर्यस्मात्सवृपभादिः शोभायुक्तवृषभोचम इत्यर्थः एवं सिंहादिमा श्रेष्ठकेमरी. इन्दिरा लक्ष्मीदेवी. दाम पुपामाला. मृगाङ्कः चन्द्रः, सूर्यः दिवाकरः, ध्वजा केतनम् , उल्लसत्कुम्भः पूर्णकुम्भः, सर! तडागः, पयोधिः समुद्रः, विमानं देवरथा रनोच्च- यारलराशिः, वतिः अग्निः इत्यमी १४ स्वमाः ॥ ७३ ॥ दृश्या अवश्यं भुवनै नमस्यया जने जनन्यापि जिनस्य चक्रिणः स्वप्नास्तु हर्यश्वमिताः पयोनिधे-- वलस्यमात्रप्रथिता यथाविधि ॥ ७४ ॥ अन्वयः-जने भुवनै मस्यया चक्रिणः जिनस्य जनन्या (चतुर्दश) चक्रिणः जनन्या हर्यश्वमिताः, बलस्यमाना पयोनिधेः (मानेन) प्रथिताः स्वमाः विधि अवश्यं दृश्या (जाताः) ॥ ७ ॥ व्याख्या--जने लोके भुवनैः विष्टपैः त्रिभुवनलोकैरित्यर्थः नमस्खया नमस्करणीयण चक्रिणः धर्मवरचातुरन्तचक्रवर्तिनः जिन- स्य अर्हदेवस्य प्रस्तुतकाव्ये वर्णनीयतीर्थकृत्पञ्चकस्येत्यर्थः जनन्या मात्रा उपर्युक्त चतुर्दश (स्वप्नाः) । चक्रिमामान्योपादानाद तन्त्रा- ऽऽवृत्त्यन्यतरेण अर्द्धचक्षिणोऽपिग्रहणम् तथा च-चक्रिणा अर्द्धच- क्रिणा वासुदेवस्य श्रीकृष्णचन्द्रस जनन्या देवक्या हर्यश्वमिताः= यथा- .
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये हरे: पूर्यस्य अश्वा: घोटकास्तन्मिता परिन्छिन्नाः सप्तसंख्यका इ. त्यर्थः सूर्याश्वानां सप्तसंख्याकत्वात् । तथा बलस्य रामचन्द्रबलदेवस्य मात्राम्जनन्या कौशल्यादेव्या पयोनिधेः समुद्र मानेनेति शेपः । चतुःसंख्ययेत्यर्थः प्रथिता! प्रतीताः चत्वार इत्यर्थः स्वप्नाः यथा- विधि यथोचितरीत्या अवश्यं दृश्या जाता इति शेषः। दृश्यन्ते स्मेत्यर्थः ॥ ७४ ॥ खप्नान् विलोक्याऽम्बुनिधिप्रमाणान् , स्वच्छाशयैवद्विगुणान् यथार्हम् । असंशयानाऽप्यभृशंशयाना, राज्ञीस्मराज्ञीकृतविश्वरूपा ॥ ७५ ॥ भन्वय:-स्वच्छाशया स्मराज्ञीकृतविश्वरूपा राज्ञी द्विगुणान् अम्बुनिधिममा. पान् स्वमान् यथाहं विलोक्य असंशयानाऽपि अभृशंशयाना आसीत् ॥ ७५ ।। व्याख्या--स्वच्छाशया-स्वच्छःनिर्मलः आशयः अभिप्रायः चित्तं वा वासना वा यस्याः सा तथोक्ता. सराज्ञीकृतविश्वरूपा अस्म- राज्ञा स्मराज्ञा सम्पद्यते तथाकृतं विश्वं येन तत् यद्वा स्मरस्यकामस्य आज्ञा-शासनं यत्र तत् स्मराज्ञम् असराझं स्मराक्षं सम्पद्यमानं कृतं विश्व जगद् येन तत् स्मराज्ञीकृतविश्वं तादृशं रूपं सौन्दर्यमाकारो वा यस्याः सा तादृशी सकलजगत्कामपारतन्त्र्यकार्यनुपमसौन्दर्येत्यर्थः अतिशयरूपवतीति यावत राज्ञी पूर्वोक्ता वामा प्रभृतिः पट्टमहिपी द्विगुणान् द्विगुणितान् द्विरावृत्तानित्यर्थः अम्युनिधि प्रमाणान्- सप्तसंख्यकान् द्विरावृत्त्या चतुर्दशसंख्याकानियर्थः वासुदेवमाता तु द्विगुणान् प्रकृष्टान् अम्बुनिधिप्रमाणान् कसचिन्मते समुद्रस्य सप्त- तया तेन तत्प्रमाणान्=तत्परिमितान् सप्तसंख्याकानित्यर्थः । बलदेय मात्रा च अम्बुनिधिप्रमाणान् अम्युनिधिः प्रमाणं येषां तान् 'पयो- AM NA A NAAAA आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, धरीभूत चतुः समुद्रामित्यामुक्तः समुद्रस्य चतुःसंख्यतयाभिमतत्वेन तत्प्रमाणान् चतुःसंख्याकानित्यर्थः । स्वप्नान् यथार्ह-स्वस्त्रयोग्यान् विलोक्य दृष्ट्वा असंशयाना=म्वप्नविषयक सफलीभवनसंशयरहिताs- ऽपि अभृशंशयाना स्वप्नदर्शनान्तरं भूयोऽप्यकृतशयना आसीदिति शेपः शुभशंसिस्थानावलोकनात्परं जागरणेन स्वप्नाऽनुरूपफललाभ- स्याऽवश्यम्भावाभिधानात् । समुद्रस्य सप्तपरिमितत्वे 'सोऽयं सप्तसमु- द्रमुद्रितमहीपस्याऽर्जुनस्योद्धतं, क्षिप्त्या भैरवसंगरेऽतिकठिनं कण्ठं कुठा- रेण यः' इति हनुमन्नाटकस्थपद्यमप्यनुकूलतामावहति ॥ अर्थश्लेपः, तृतीयचरणे यमकम् चतुर्थे छेकानुप्रासश्चालङ्काराः ॥ ७५ ॥ तत्राऽवतीर्णस्त्रिदशावतारी. सुरः प्रभाभासुर एव कश्चित् । आपन्नसत्वा मणिनेव भूमी, राज्ञी विरेजे गरभाऽनुभावात् ॥ ७६ ॥ अन्य -तत्र प्रभाभासुर निदशाऽवतारी कश्चित् सुर. भवतीर्ण (अभूत्) (तदनु) राज्ञी आपनसत्या गरभाऽनुभावात् मणिनाभूमीव विरेजे ॥ ७६ ॥ व्याख्या-तम-तस्मिन्काले प्रभाभासुरः कान्त्या देदीप्यमानः त्रिदशावतारी व्यधिकाखिरावृताश्च दश परिमाणमस्य स त्रिदशः त्रयस्त्रिंशन्मुख्यगणवान् देवस्तस्य तदंशेनेत्यर्थः अवतारी अंशावेश- वशेन प्रादुर्भवनशीलः कश्चित् अनिदिष्टस्वरूपः सुरः दिव्यजीवः अवतीर्णः पूर्वोक्तराजी कुक्षौ प्रविष्टः अभूदितिशेषः । तदनु राज्ञी- पूर्वोक्ता वामा प्रभृतिर्नुपमहिपी आपनमन्वा-गर्भवती सती गरमा नुभावात्-गर्भप्रभावात मणिना-गर्भस्थरत्नेन भूमिः-वसुन्धरा इव विरेजे-दिदीपे उपमा काव्यलिङ्गं च ।। आपन्नमचा स्याद्गुविण्यन्त- बत्नी च गर्भिणी इत्यमरः । गर्भस्तु गरभो भ्रूणो दोहदलक्षणं च महोपाध्यायनीमेघविजयगणिविरचितेसप्तसन्धानमहाकाग्ये स इत्यभिधानचिन्तामणिः ॥ ७६ ॥ राजे निवेद्याऽऽशयसंशयाप्ति- मेषा निमेषाद्विनयाद्वयनैपीत् । जहर्ष हर्षातिशयात्कदम्ब, कदम्बकश्रीर्वपुषानृपोऽपि ॥ ७७॥ अन्वयः • एपा भाशयसंशयाति विनयात् राजे निवेद्य निभेपात् (भाशयसंश- याऽति) व्यनपीत् (तदनु) हर्षातिशयान् वपुषा कदम्ब कदम्नकधीः नृपः अपि जहर्प ।। ७७ ॥ व्याख्या--एषाम्राज्ञी आशयसंशयाप्ति-स्थमफलविषयकस्बह- दयस्थसन्देहप्राप्ति 'किमेतेपां (स्वमानां ) फलं भविष्पतीत्यादिरूप शङ्कामित्यर्थः विनयात्-नम्रतापूर्वकं राज्ञे निवेद्य-भूचयित्वा निमे- पात्-अक्षिस्पन्दकालेन आशयसंशयाप्ति-स्वामफलविषयकशङ्कासम्ब न्धं व्यनैपीत्-अपनीतवती पुत्रप्राप्तिरेतेपां फलमितिनृपादाकर्ण्य विग- तसंशयाऽभूदित्यर्थः । तदनु हर्षातिशयात्=पुत्रप्राप्तिसम्भावनाज- न्याऽतिशयानन्दात् वपुषा-शरीरेण कदम्बकदम्बकश्रीः कदम्बाना- नीपकुसुमानां कदम्बकस्य-ममूहस्य इव श्री: शोभा यस्य स तथोक्तः हत्किद्रोमाञ्चाऽश्चितकलेबर इत्यर्थः नृपा-विश्वसेनप्रभृतिमहीपा- लोऽपि अपिना राज्ञी च. तत्पक्षे 'कदम्बकदम्बकश्रीः' इत्यस्य कदम्ब कदम्यकस्येव श्रीर्यस्याः सा तादृशीत्यर्थः । जहर्ष=मुमुदे प्रसन्न- मना अभूदित्यर्थः उपमा, काव्यलिङ्गं दीपकं चाऽलङ्काराः । कदम्यं निकुरुम्ब सानीप-मर्षपयोः पुमान इतिमेदिनी ।। ७७ ॥ शुचो स चैत्रेऽब्धितिथो सभाद्रे- ऽसितेऽन्धिपेपूर्णदिने सचन्द्रे। .
MIN . आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, गुणप्रसिद्धेऽवततारदेव-- श्च्युत्वा स्वमार्गादयनेऽधिकाये॥ ७८ ॥ अन्वय -स देव. स्त्रमार्गादयने(सति)च्युस्वा पूर्णदिनेसचन्द्रे गुणप्रसिद्ध अधिकाये शुचौ असिते अब्धितिथौ (श जी)। भाद्रे असिते अब्धितिथी (शान्ति.) । अन्धिपे अमिते (द्वादश्याम्) (नेमि)। सचैत्रे असिते अधितिथी (पाव) । शुचौ असिते (पाट्या) (वीर) । अवततार ॥ ७८ ॥ व्याख्या-सा-पूर्वोक्तः त्रिदशाऽवतारी देवा द्योतनात्मक- आत्मा प्रस्तुतकाव्ये वर्ण्यमानस्य तीर्थकृत्पञ्चकस्य जीवात्मा इत्यर्थः स्वमार्योदयने स्वस्य आत्मनः मार्गस्य-शुद्धा मकल कर्मक्षयज. नितात्मशुद्धः उदयने-उदये. यदा सस्य स्वकीयस्य मार्गस्य-पथः साधनस्य तीर्थकरनाम-कर्मरूपस्य उदयने तीर्थकरनामकोंदये इतिभावः सति न्युत्ता-दिव्यशरीरात् च्यवनं प्राप्य पूर्णदिने-पूर्णम् अक्षीणं दिन यस्मिन् तादृशे. 'एकस्मिन् मावने त्वहि तिथीनां त्रितयं यदा। तदा दिनक्षयः प्रोक्तः' इत्युक्तलक्षणैकसावनदिनवृत्ति तिथित्र- यात्मकालवाचकदिनक्षयरहिते इति भावः । सचन्द्रे अनुकूलचन्द्रग्रह- शालिनि. यद्वा 'पूर्णदिनेसचन्द्र' इति ममस्तं तस्य 'पूर्णी स्वस्थान- स्थिततयाऽविकलो अनुकूलावितिभावः दिनेमचन्द्रौ-सूर्याचन्द्रमसौ यस्मिन् तादृशे. रलयोर्डलयोश्चैव श सयो 4-वयोस्तथेति शसयो रेकत्वम्मरणात् । तथा गुणप्रसिद्ध आध्यात्मिकादि सफलकलाकला. पफलिततयाऽतिवृष्ट्यादिपविधेतिमीतिराहित्येन च शान्त्यादिगुण- भूपिते. प्रसिद्धौ ग्ल्यात-भूपितो इत्यमरः । शुचौ आपादमासे असि- ते-कृष्णपक्षे, अब्धितिथौ ममुद्रप्रमिततिथौ चतुर्थ्याम् आपाद कृष्ण चवामित्यर्थः (ऋपभजीपः)। भाद्रे-भाद्रपदमासे असिते-कृष्णे. अधितिथौ सप्तमी तिथौ भाद्रकृष्णमसम्यामित्यर्थः (शान्ति०) Amarna महोपाध्यायप्रोमेघविजयगणिविरचितेसप्तमन्धानमहाकाव्ये जीवः) । अन्विपे-इपात्-आश्विन मासात् अनु पश्चात् (भवोमासः) अन्विपं तस्मिन् कार्तिकमासीत्यर्थः असिते-कृष्णे. द्वादश्यामिति- शेषः कार्तिककृष्णद्वादश्यामित्यर्थः (नेमि० जी०) । सचैत्रे- चैत्रान्यिते असितेऽब्धितिथौ चैत्रकृष्णचतुर्थ्यामित्यर्थः (पार्श्वजी) शुचौ असिते 'पप्ठ्या-मितिशेपः आपाढकृष्णपठ्यामित्यर्थः (वीर जी०) अवततार-पूर्वोक्ततत्तद्राजीकुक्षौ अवतीर्णः प्रविष्ट इत्यर्थः । पद्यघटकेषु 'शुचौ, असिते, अब्धितिथौ' इत्यपु पदेषु तन्त्रमावृत्तिर्वा तेन प्रोक्तार्थसद्धटनम् । शुचिस्त्वयम्-आपाढे इति कृष्ण नीलाऽसित- श्याम० इति चामरः ॥ ७८॥ देवावतारं हरिणेक्षितं प्राग द्राग् नैगमेषी तृपधाम नीत्वा ॥ तं स्वादिवृध्या शुभवर्द्धमानं, सुरोऽप्यनंसीदपहृत्य मानम् ॥ ७९ ॥ अन्वयः-हरिणा प्रागई क्षितं देवावतारं नैगमेषी दार नृपधाम नीस्वा सादिवृध्द्या शुभवर्द्धमान तं सुरोऽपि मानम् अपहृत्य अनमीत् ॥ ७९ ॥ व्याख्या-हरिणा-सुरेन्द्रेणग्रा-पूर्वम् ईक्षिते-दृष्टं देवाऽवतार- दिव्यांशेनाऽवतीर्णम् प्रस्तुतकाव्ये वर्णनीय तीर्थकृत्पञ्चकं कृष्णवा- मुदेवं रामबलदेवं च नगमेपी तदभिधानादेवता नयविद्वा-णिग्या द्राक्-शीघ्रं नृपधाम-पूर्वोक्ततत्तन्महीपमदनं नीत्वा प्रापय्य खा- दिवृध्या-धनादिवृया शुभवर्द्धमान-शुभं वर्द्धमानं यस्य यस्माद्वा तं यद्वा शुभेन (तीर्थकरपक्षे)-श्रुतिमत्ययधिज्ञानलक्षणकल्याणेन वर्द्धमा- नम्-चद्धिष्णुम् । शुमेन-उत्पत्तरारम्प ज्ञानादिलक्षणक्षेमेण वर्द्धते तादृशं तं वर्णनीयतत्तन्महापुरुपं, मानम् अहङ्कारम् अपहृत्य-परि- त्यज्य सुरोऽपि नैगमेपी अपि ननाम-विनयप्रणतोऽभूत् ।
rn भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, महावीरपक्षेत्वियान् विशेष:-नैगमेपी हिरण्यनैगमेपी देवः नृपधामन्नीत्वा ऋपभदत्तगृहात् सिद्धार्थराजगृहं प्रापय्य खादिवृ. ध्या गर्भस्थे भगवति ज्ञातकुलस्य धनधान्यादिवर्द्धनेन हेतुना शुभ- बर्द्धमानं शुभ-जगतां ज्ञातकुलस्य वा कल्याण वर्द्धते अन्त वि. तण्यर्थतया पर्द्धयतीति शुभवर्द्धमानस्तं, यद्वा उत्पत्तेरारभ्य ज्ञाना- दिभिर्वद्धते इति. गर्भस्थेऽस्मिन् ज्ञातकुलं धनधान्यादिभिर्वर्द्धतेऽ. सादिति वा चर्द्धमानः शुभः जगतांकल्याणावह सचासौ वर्द्धमानः- तदाख्यश्चतिशुभवर्द्धमानस्तं तादृशं तं महावीरदेवमित्यर्थः ॥ ७९ ॥ येनाऽवतारा विहिता हितारा, मेयानते विंशतिभिर्नृपेन्द्रैः॥ श्रद्धादिनासन्नदशाप्रधाना गुणाभिधानाः श्रुतिसंनिधानाः ॥८॥ सम्यग्दृशं प्राप्य यदङ्गभाजा । ये त्रित्रिकोणकभवा अवाप्ताः ॥ त एव संख्यामुपयान्ति तेषां । यतस्तदन्ये गणनास्वगम्याः ॥ ८ ॥ अन्वय:-ये अवतारा हितारा न विहिताः तेन मेयाः ( किन्तु ) यत् भभामा साशं प्राप्य ये निग्रिकोणैकमवा भवाप्ता: विशतिमिः नृपेन्द्रः (अभि. काशिताः) अदादिनासनदशाप्रधानाः गुणामिधानाः श्रुतिसंनिधानाः त एव तेषा भयाः मंख्यामुपयान्ति यतस्तदन्ये गणनामु अगम्याः ॥ ८॥ ॥ व्याख्य-ये अवतारा: भवाः ताराः आत्मानं जगन्ति च तारयितुं क्षमाः, यद्वा हितारा: हितम् आत्मनोमोक्षरूपकल्याणम् इप्रति प्राप्नुवन्तीति ते वादयान विहिवाः न संवृत्ताः =अवतारा न - ८४ महोपाध्यायधीमेघविजयराणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये ArA WArr AvM . . मेयाः परिच्छेद्याः संख्येया इत्यर्थः संख्याकरयोग्या नेतियावत् : य=किन्तु अङ्गभाजा-तत्तीर्थकदात्मना सम्यग्दृशं सम्यग्दर्शन प्राप्य-उपलभ्य सम्यग्दर्शनप्राप्त्यनन्तरमित्यर्थः ये वित्रिकोणैक- भवा (त्रिकोण-ज्यौतिपशास्रोक्तं लगात् नवम-पञ्चमस्थानं तेन चेह 'पञ्च. नव' च संख्या गृह्यते, कोणशब्दो विदिग्वाची तेन चतुः संख्याग्राह्या तथा च )-त्र्यधिक त्रिसहितं वा त्रिकोणं-नव त्रित्रि- कोण द्वादशः तत्सहितम् एकं प्रथम संख्या वित्रिकोणकं प्रयोदशे- त्यर्थस्तन्मिताः भवाः अवतागः इत्यादिनाथरभुणा । बायाणां संघ खिक-त्रित्वसंख्या. त्रिगुणितं त्रिरावृत्तं वा त्रिकं त्रित्रिक नवेत्यर्थ- स्तन्मताः एके श्रेष्ठा, भवाः नेमिनाथस्वामिना । व्यधिकं नियुक्त वा त्रिकोण नवसंख्या वित्रिकोणं द्वादशेत्यर्थ स्तत्प्रमिता एके- मुख्या भवाः श्रीशान्तिनाथस्वामिना । व्यधिकास्त्रिसहिता वा त्रयः त्रित्रया पट् तत्सहितः कोणः-चतुःसंख्या त्रित्रिकोणः-दशेत्यर्थस्त- परिमिता एके श्रेष्ठा भवाः पार्श्वनाथः स्वामिना । त्रिगुणितं त्रिरावृत्तं वा त्रिकोणं नव संख्या वित्रिकोणं सप्तविंशतिरित्यर्थस्तत्परिच्छिन्ना एके प्रधानभूता भवाः श्रीमहावीरस्वामिनाच अवाप्ताः गृही. ताः विंशतिमिः बहुविंशतिसंख्याकैर्नृपेन्द्रैः-नृपैः-भूतलवार्तमहीपालैः इन्द्रः शक्रेन्द्रादिभिश्च 'सादरमभिकासिता' इति शेपः कुसिद्धान्ति- प्रचारितनानाविधाऽद्यहिंसादिपापकर्माचरणमलीमसशेमुपीमुपित्तस- ज्ज्ञानानां जनानां देशनावचनैरात्महितसाधनज्ञानरत्नोद्योधनार्थम- भीप्सिता इत्यर्थः । श्रद्धादिनासन्नदशाप्रधाना: श्रद्धादिनात् सम्य- ग्दर्शनप्राप्तिदिवसात् आरभ्य आसन्नदशा मोक्षदशा प्रधाना श्रेष्ठा येपां ते यद्वा श्रद्धादिना श्रद्धा सम्यक्श्रद्धान-सम्यग्दर्शनम् आदि- यस्य तेन, सम्यग्दर्शनेन आदिपदग्रामसम्यग्ज्ञान-सम्यकचारि- ८५ AVA ANAA , भाचार्यश्रीविजयामृतत्रिप्रणीता सरणी टीका. त्राभ्यां च, अथवा श्रद्धा-शुद्धिः सम्यग्ज्ञानादिपरिशीलनजनिताऽs- स्मनैर्मल्यं तदादिना आसन्नदशा-मोक्षदशा आत्मनोमुक्ताऽवस्था प्रधानम् उद्देश्यतया मुख्यभूता येषां ते, श्रद्धादिनात् आसन्नदशायां प्रधानं बुद्धिर्येषां ते तादृशाः, गुणाभिधाना-गुणाः सन्त्यस्मिन्निति गुणम् अनन्तगुणशालि अभिधानं कथन देशनावचनं येपां ते तथाविधाः श्रुतिसन्निधानाः श्रुतौ कर्णेन्द्रिये सन्निधानं नैकट्यं श्रव्यचरित्रतया येपा ते यद्वा श्रुती-प्रवचने सन्निधान-सामीप्यं- वर्णनीयतया येषां ते तथोक्ताः श्रुतीनां प्रवचनानां सन्निधाना- शोभनाश्रया इति वा श्रुतीना=आगमानां सतां सज्जनानां च निधानाः निधिरूपा इति वा ते निरुक्तरूपा एन तेपा=प्रस्तुतकाव्य- वर्ण्यमानतीर्थङ्कराणां मनाः संख्या संख्येयता यद्वा संग्ख्यां विचा- रणां प्रस्तुतकान्येवर्णनीयतया चर्चामियर्थः उपयान्ति प्राप्नुवन्ति. यतः यम्माद्धेतोः तदन्पेअनुपदगणितव्यतिरिक्ता भवाः गणनाम: संख्याने संरयाकरणे अगम्या. दुरवयोधाः 'गणनास्वगम्याः' इति समस्तपाठ कल्पने गणनायां मुतरामगम्या इत्यर्थः । कालचक्रस्या- ऽनादिशालतो यम्भ्रम्यमाणशीलतया भवानामसंख्येयतया इय- तयाऽनगन्तुं दुःशका इत्यर्थः ।। ८० ॥ ८१ ।। एवं श्री आदिदेवप्रमुख मुनिमितार्थाऽवतारैः प्रभाव्ये । काव्ये श्राव्ये सतां स्वे मनसिविहसतां वीक्ष्य दक्षप्रयत्नम्॥ अर्हद्भक्ति चिरायुर्विपुलमनुभवं वैभवं राज्यभाजाम् । दत्तां चित्राङ्गवार्ताऽप्युदयमपि चिरं सप्तधाऽऽविभवन्ती। इति श्रीसप्तसंधाने महाकाव्ये राज्याचे महोपाध्यायमेघवि- जयगणिविरचित्ते "अवतारवर्णनोनाम" प्रथमः सर्गः।।
८८ www um महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये सेवातु देवातुलकामिनीभि- श्चक्रे च शक्रेरणया तदीया ॥२॥ अन्वय ~शची शुची इति ( इमा ) तौचित्यपद विचिन्त्य भमुप्ये शुचीगणि ददौ (किश) शफ्रेरणया देवातुल कामिनीभि तदीया सेवा चक्रे २॥ व्याख्या-गची-इन्द्राणी शुची गर्भस्थाऽनुपमपुत्ररत्नशालितया परित्रेयम् इति हेतोः इमा तदौचित्यप-नेपा-दित्सितसुचीरादीनाम् औचित्यंन्यायं योग्यमित्यर्थः पढदानीयस्थान विचिन्त्य-विचार्य अमुष्य राज्य सुचीराणि-मनोहरसस्त्राणि ददौ । फिञ्च-शरणाया- इन्द्रप्रेरणया देवातुलकामिनीमिः अनुपमदेवागनाभिः तदीया-राज्ञी- सम्बन्धिनीसेवा परिचर्या कुमारभृत्या चक्रे कृता यमकालंकारः।।२।। अपोनरुक्त्याद् बहुमोनभाजा, राजा समाजात् सहसाऽभ्युपेत्य । तया समं प्रेमवचोऽपिचोद्यं, श्रद्धाविशुद्धयै निजगादसद्यः ॥३॥ समात्रात् सहमा मभ्युपेत्य अपानरस्त्याद् बहुमीन- भामा सया मम श्रद्धा विशुदय घोच प्रेमरचोऽपि मद्य निजगाद ॥ ३ ॥ व्याख्या-राजा-पूर्वोक्तो विश्वमेनादिनृपतिः समाजात्-मचि- सुधी सुहृदादिमण्डलीतः महमा-अतकिंतम् अभ्येत्य-राझ्या अभ्य- मागत्य अपौनम्त्याव-पुनरुक्तस्यभारः पौनरुक्त्यं तथा न इत्य- पौनरुक्त्यं तम्मान् अपुनरुक्तरित्यर्थः दोहटपूरणेच्छया तदमीप्मित- वस्तुनामा मादुनयाऽपीतिभारः बहुमौनभाजा-लज्जया बहु- चिरं मौनम्-अमापणशीलता भजनीति बहुमौनभार नया सदोह. दप्रकटने दिया तूप्णीम्भाउमाश्रयन्त्येत्यर्थ. तथा-वामाप्रमृतिराच्या मम-सह श्रद्धा पिशुद्धे-श्रद्धा-गमिणीमनोग्यस्तस्या विशुद्धौ-यथा- अन्वय-राना ८७ A भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. द्वितीयः सर्गः सुधाशनानामशनान्यभूवं, स्तन्व्यास्तनूजाश्रयणेन सम्यक् । शय्याऽनुकूला प्रसरढुकूला, मूलात्सचूलाभरणादरेण ॥१॥ अन्वयः-सम्यक् तनूजाश्रयणेन तन्न्या. सुधाशनानाम् अशनानि अभू- नन् (अररंच) प्रसरडुकूला आमूलात् सचूलाभरणा आदरेण (उपरचिता) शय्या- अनुकूला (आसीत्) ॥ १ ॥ व्याख्या-सम्यक् आवाधाराहित्येन तनूजाश्रयणेनबालस्य गर्भधारणेन तन्व्याः कृशशरीराया राज्याः सुधागनानां सुधाभुजां देवानाम् अशनानि-आहारा अमृतोपमभोजनानीत्यर्थः अभूवन् । अपरं च प्रसरहुकूला प्रसरत् आस्तीर्ण दुकूलं श्लक्ष्णवस्वं सूक्षवस्त्रं वा प्रच्छ- दपटस्थानीयतया यस्यां सा तादृशी. आमूलात्-मूला-चरणात् चरणधार्यदेशादित्यर्थः आरभ्य मूलपर्यन्तं वा सचूलाभरणा-चूड़ा- भूपणसहिता, अविधार्यस्थानादारभ्य शिरःस्थान पर्यन्तं यथोचित शयनीयोपकरणकलितेतिभावः आदरेण स्नेहेन पुत्ररत्नजननयोग्य- ताशालित्व हेतुकसम्माननेनेत्यर्थः उपरचितैति शेपः शय्या शयनीय पल्यको बा अनुकूलारवाभिरुचिता आसीदिति शेषः, अभृवन्नित्यत्र विभक्तिविपरिणामेन अभूद्वा ॥ अस्मिन्सर्गे पोडशश्लोकपर्यन्तमिन्द्रवज्रावृत्तम् । स्यादिन्द्रवज्रायदितौजगौग इति तल्लक्षणात् ।। १ ॥ शची सुचीराणि शुचीत्यमुष्य, दो तदौचित्यपदं विचित्य ।
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाये
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AN
wanwuran
अन्वय -एव श्रीआदिदेवप्रमुखमुनिमिताऽर्धान र प्रभा ये श्राव्ये काव्ये
दक्षप्रयत्न वीक्ष्यविहसता सता स्वेमनसि सक्षधाऽऽविर्भदन्ती चित्रा वातां अई-
इक्तिचिरायु विपुल मनुभवं राज्यभाजा वैभवम् उदयमपि च चिरदत्ताम् ॥४२॥
व्याख्या-उपसंहरति-एवमिति-एवम् अनेकप्रकारेण श्रीआ.
दिदेवप्रमुखमुनिमितार्थावतारैः-श्रीआदिदेवप्रमुखानां श्रीमदृपभखा-
मिनभृतीनां सुनिमिताना=मप्तसंख्यकानाम् अर्थानां तत्तच्छलोकया-
च्यार्थभूतानाम् अवतारैः आविर्भावः यद्वा आदिदेवप्रमुसमुनि-
मिमिता वाच्यतया परिच्छिन्ना अर्थाः अभिधेयानि तेपामवतारैः,
श्रीआदिदेवप्रमुसः कृत्वा मुनिमिताः सप्त अर्थाः वान्यानि तेपाम-
वतारैरितिया प्रभाच्ये प्रभावाहे प्रभावशालिनीत्यर्थः । श्राव्ये
व्युत्पित्सुकृते श्रापयितुं योग्ये काव्य श्रन्यकाव्ये 'सप्तसन्धाना'भि-
धाने दक्षप्रयत्न- सप्लार्थसबटनविषयकनिपुणोद्यमं वीक्ष्य विहसतां
विस्मय हर्ष समुद्भूतस्मितशालिनां सतां सम्यानां स्वैमनसि-नि-
जाऽन्तःकरणे सप्तघा सप्तकारेण आविर्भग्न्ती-प्रकटी भवन्ती चित्रा-
गाना चित्रा अनेकविधा अगवार्ता अवययार्था अईद्भक्ति-जिनानु-
राग, चिरायुः चिरजीविताम्, विपुलमनुभय-विशालज्ञान,राज्यमाजां
वैभवराजमम्पटमित्यर्थः । उदयम् अभ्युदयम् उन्नतिमितियानन्
चिरं-बहुकालं दत्ताम् । अपिः समुचयार्थः ॥ ८ ॥
अप्रश्लोमस्रग्धरावृत्तं मम्नर्याणांप्रयेणत्रिमुनिपतियुता स्रग्धरा-
कीचितेयमितितरक्षणात् ।
इति शास्तविशारदकविरत्नमहारकाचार्यश्रीविजशमृतसूरीश्वर-
प्रणीतापी मप्तसंघानमहामान्यीय "सरणी टीकायां
प्रथमः सर्गः ममातः ॥१॥
८७ wwwvon A भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. द्वितीयः सर्गः सुधाशनानामशनान्यभूवं, स्तन्व्यास्तनूजाश्रयणेन सम्यक् । शय्याऽनुकूला प्रसरडुकूला, मूलात्सचूलाभरणादरेण ॥१॥ अन्वयः-सम्यक् तनूजाश्रयणेन तन्न्याः सुधाशनानाम् अशनानि अभू- वन् (अपरंच) प्रसरहुकूला आमूलात् सचूनाभरणा आदरेण (उपरचिता) शय्या- अनुकूला (आसीत्) ॥ ॥ व्याख्या-सम्यक् आवाधाराहित्येन तनूजाश्रयणेन बालस्य गर्भधारणेन तन्व्याः कृशशरीराया राझ्याः सुधाशनानां सुधाभुजां देवानाम् अशनानि-आहारा अमृतोपमभोजनानीत्यर्थः अभूवन् । अपरं च प्रमरहुकूला असरद-आस्तीर्ण दुकूलं लक्ष्णवस्त्रं सूक्षवस्त्रं वा प्रच्छ- दपटस्थानीयतया यस्यां सा तादृशी. आमूलात्-मूलात्-चरणात् चरणधार्यदेशादित्यर्थः आरम्य मूलपर्यन्तं वा सचूलाभरणा-चूड़ा- भूपणसहिता, अफ्रेिधार्यस्थानादारभ्य शिरःस्थान पर्यन्तं यथोचित शयनीयोपकरणकलितेतिभावः आढरेण-स्नेहेन पुत्ररत्नजननयोग्य- ताशालित्वहेतुकसम्माननेनेत्यर्थः उपरचितेति शेषः शय्या आयनीयं पल्यको वा अनुकूला-वाभिरुचिता आसीदिति शेपः. अभ्वन्नित्यत्र विभक्तिविपरिणामेन अभृद्वा ॥ अस्मिन्सर्गे पोडशश्लोकपर्यन्तमिन्द्रवज्रावृत्तम् । स्थादिन्द्रवज्रायदितौजगौग इति तल्लक्षणात् ॥ १ ॥ शची सुचीराणि शुचीत्यमुप्यै, ददो तदौचित्यपदं विचित्य ।
८८ M B~- . महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये सेवातु देवांतुलकामिनीभि- श्चक्रे च शरणया तदीया ॥२॥ अन्ग्य:-शची शुची इति ( इमां ) तौचित्यपद विचिन्त्य अमुष्यै शुचीगणि ददी (किश्य) शरिणया देशातुल कामिनीमि. तदीया सेवा चने॥२॥ व्याख्या-शची इन्द्राणी शुची गर्भस्थाऽनुपमपुत्ररत्नशालितया पवित्रेयम् इति हेतोः इमां तदौचित्यपदं=नेपां-दित्सितसुचीरादीनाम् औचित्यंन्यायं योग्यमित्यर्थः पद-दानीयस्थानं विचिन्त्य=विचार्य अमुप्यैराश्यै सुचीराणि-मनोहरवस्त्राणि ददौ । किञ्च-गक्रेरणया इन्द्रप्रेरणया देवातुलकामिनीमिः अनुपमदेवागनाभिः तदीया-राज्ञी सम्बन्धिी सेवा परिचर्या कुमारभृत्या चक्रे कृता यमकालंकारः॥२॥ अपोनरुक्त्याद् बहुमौनभाजा, राजा समाजात् सहसाऽभ्युपेत्य । तया समं प्रेमवचोऽपिचोद्यं, श्रद्धाविशुद्धये निजगादसद्यः ॥३॥ समानात् सहमा अभ्युपेत्य अपोनरस्त्याद् यहुमीन- मामा तया सम अदा दिनुस्य घोच मेमयचोऽपि सः निमगाद ॥३॥ व्याख्या-राजा-पूर्वोक्तो विश्वमेनादिनृपतिः समाजात्-मत्रि- मुंघी सुहृदादिमण्डलीतः सहमा-अतकिनम् अभ्येत्य-राझ्या अभ्य- मागत्य अपौनरफ्त्यात्-पुनमत्तास्यभारः पौनरुक्त्यं तंथान इत्य- पौनरुक्त्यं तम्मान् अपुनमक्तरित्यर्थः दोहदपरणेच्छया तदमीप्मित. वस्तुनामाग्यान मकदुनयाsपीनिभावः बहुमौनभाजा-लज्जया बहु- चिरं मौनम्-अभापणशीनतां मजनीनि बहुमौनमार, नया सदोह- दप्रकटने दिया तूप्णीम्भारमाबपन्त्येत्यर्थः तया-पामाप्रभृतिराच्या ममं-मद श्रद्धा निशुद्ध-श्रद्धा-गर्मिणीमनोधनम्या विशुद्धो-र -यथा. . भन्यय:-राजा rom आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. वद्विज्ञाय तत्पूत्यै अन्यथा वैद्यकशास्त्रवचनानुसारेण सन्ततेर्वैगुण्याप- त्तिसम्भवात् चोद्यम्=अनुयोज्यं दोहदविषयकप्रष्टव्यांशगर्भितं प्रेम- चचा प्रीतिवचनं सद्यः सपदि निजगाद । आधिकरणिकादिकार्याद्य- थासमयं प्राप्तावकाशो नरेशः राजीमुपेत्य मनिर्वन्धमनुयुक्तयापि त्रपा- भरवशात् स्वदोहददुःखशीलतामभिव्यजितुमपारयन्त्या राझ्या सह तदीयदोहदयुभुत्सया चटुवचनैरालापमकाीदिति सरलार्थः । 'दोहदं दोहदं श्रद्धा लालसा' इत्यभिधानचिन्तामणिः । अतकिते तु सहसा इत्यमरः॥३॥ 'चान्द्री क्रियां चक्रिरुपेत्य चान्द्री, सौरी च गौरी दधिरात्मदर्शम् ॥ शैषी च योपाभरणाद्यनैपीत् , तस्या उपास्याविधिरेवमासीत् ॥४॥ अन्धय चान्द्री उपेत्य चान्द्री क्रिया चनि मौरी गौरी च (उपेत्य) आत्मदर्श दधि शैपी योपाऽऽभरणादि अनपीत् एवं तस्या उपास्याविधि- गसीत् ॥ ४ ॥ व्याख्या-चान्द्री-चन्द्रशक्तिः उपेत्य-राजीसमीपमागत्य चा. न्द्री-चन्द्रमम्वन्धिनी क्रिया कार्यम् दिनानुदिनशरीर-लावण्याग्रुप । चपलक्षणं चकि:-कृतवती. सौरी गौरी च-तत्तन्नामिका देवी उपेत्य आत्मदर्श-दर्पणं दधिः-धारितवती ! शैपी-नागकन्या योपाभरणा- दि-श्रीजनधारणयोग्यभूपण-वसनादिकम् अनैपीत-उपानीतवती । एवंरूपः तस्याः-राश्याः उपास्यानिधिः-देवकन्या-नागकन्यादिक- र्तृक परिचर्या प्रकार आसीत् अनुप्रामः ॥ ४ ॥ उच्चामरीवाचमनेन चामरी- द्वयींदधानाभजतेस्म चामरीम् । 4 moveww M wrnNAL महोपाध्यायश्री मेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये सेवारसान्नाप्सरसस्तदन्तिकं, जहुर्मुहुर्भक्तिमुहूर्तभावनैः ॥ ५॥ अन्वयः-उञ्चामरीन अमरी चामरी द्वयी दधाग आचमने न(ता) भज. तेस्म अप्सरस• सेवारसात मुहुर्भक्तिमुहूर्तभावनस्तदन्तिक न जहु ॥ ५ ॥ व्याख्या-उच्चामरीय चमरी-चामराख्यव्यजनोपयोगिपुच्छ. शालि महिपाकृतिकमृगविशेपस्त्रीजातिः सैव चामरी उत्-उत्कृष्टा चामरी उच्चामरी सेव अमरी-देवागना चामरी-चामर-चमरपुच्छ- कृतव्यजनसम्बन्धिनी द्वयीं-द्वितीं द्वित्वसंख्यां चामरयुगल मित्यर्थः दधाना धारयन्ती आचमनेन-मुखादिप्रक्षालनेन वैधकर्मा- दिना वा लक्षणया आचमनक्रिया सम्पादनेनेत्यर्थः भजतेस्म-सेव- तेस्म । अप्परमश्च मेवारसातु-परिचर्याजनितानुरागात् मुहुः-अभी- क्ष्णं भक्ति मुहूर्तभावनैः-भक्तीनां-गर्भिण्युचितोपचाराणा मुहूर्ते- अल्पकाले मुहूर्त मुहूर्तमित्यर्थः भावनैः-चिन्तनैः प्रतिक्षणं गुविण्यु. चितोपचारचिन्तन--सम्पादनादिनेत्यर्थः तदन्तिक-तस्याः-राया अन्तिकं-सदेशदेशं न जहुः-परितत्यजुः । अनुमासः ॥५॥ सांकर्य कार्य प्रविचार्य वार्य, विरोधमुत्सार्य सम-वस्ते ॥ सामान्यमापायसमा-धिसाग- धिकारमीयु विनिर्विकाराः ॥ ६॥ भन्ययः-ते मा. मराय घायं विचार्य विरोधम् उस्मार्य माम. स्पामाधाय भुविनिाकारा ममाशिसाराधिशरमीयु ॥ ६ ॥ व्याख्या-ते-प्रसिद्धाः समर्तया ममे म ऋतवः 'शिशिरः पुष्पसमयो ग्रीष्मो वर्षा परद्धिमः । माघादिमामयुग्मैस्तु ऋतपः पदक्रमादिमे' इत्युक्तरूपाः मांकर्यकार्य-स्वस्वकार्यसांश्य, वसन्ते NA MAAN आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. शिशिरकार्य शिशिरे च वसन्तस्येत्यादिरूपं वार्य-परित्याज्यं विचार्य विमृश्य विरोधं च उत्सार्य-परिहृत्य सामान्य समानतां तुल्यवृत्ति- स्वामित्यर्थ आधाय स्वीकृत्य समाधिसाराधिकार-समाधिना निय- मेनव्यवस्थया सारं न्याय्यं स्वस्वोचितमित्यर्थः अधिकार कार्य- कारित्वम् यद्वा-समाधिसार शान्तिप्रधानम् अधिकर-नियोगम् ईयु: प्राप्तवन्तः । ऋतवः कीदृशाः १ भुवि भूतले निर्विकारा: निम्न सन्ति विकाराव्याधयो येभ्यस्ते तथोक्ताः रोगाद्युपद्रयाऽजनकाः।। समाधिनियमे ध्याने नीचाके च समर्थने इति मेदिनी, सारो चले स्थिरांशे च न्याय्ये क्लीवं वरे त्रिपु इत्यमरः ।। ६ ॥ काचित्तु साचिव्यमलकियायां, दधी सुरी स्नानविधानतोऽन्या। काचित् समस्या धरणात्समस्याः, पप्रच्छ काप्यच्छधियाऽप्यतुच्छा ॥७॥ अन्वय.-काचित् सुरी अरक्रियायाम् अन्या (सुरी) स्नानविधानतः काचित् (सुरी) समस्या धरणात् (तस्याः) साथिव्यं दधौ कापि अतुच्छा अच्छ- धिया समस्या: पप्रच्छ ॥ ७ ॥ व्याख्या-काचित् अनिर्दिष्टनाम्नी सुरी=सुरीवाचरतीति सुरी- यतीति सुरी देवांगनेव देवी परिचारिका अलवियायां-प्रसाधन- कर्मणि अन्या अपरा स्नानविधानतः स्नानादिकर्मसम्पादनविधी साविभक्तिकस्तसिः । काचित् सुरी समस्या धरणा=गूढामिप्राय- धारणात् साचिव्यं साहाय्यं रधौ ‘तस्याः' इति शेपः कापि अतुच्छा अहीना उत्कृष्टा गूढाशयेति यावत् अच्छधिया-निर्मलाशयेन सम- स्था गूढाभिनायकविषयान् यद्वा राज्या विदुषितरत्वात् समस्याः संक्षेपेणोक्तस्य श्लोकपादादेः परकृतेन स्वकृतेन वाऽवशेषेण भागा- महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्ये न्तरेण सङ्घटनारूपां गूढाभिप्रायप्रहेलिकादिरूपां वा कविक्रियां पप्र- च्छ-अनुयुयोज ॥ ७ ॥ पात्राण्यमा ननृतुः पदे पदे, समुन्ननादाऽऽनकदुन्दुभिर्मुदे। घनाघनस्य भ्रमतो वदावदे, मयूरवर्गे नटनान्निसर्गतः॥ ८॥ भन्चय:-आनकदुन्दुभिः मुदे समुन्ननाद अमाः पात्राणि पदेपदे ननृतुः, धनाधनस्य भ्रमतः वदावदे मयूरवर्गे निसर्गत: नटनात् ॥ ८ ॥ व्याख्या-आनकदुन्दुभिः-आनका प्रोत्साहका दुन्दुमि-दे- ववाद्यविशेषः मुदे सुर-नरादीनां प्रीत्यै समुन्ननाद-दध्यान अएवं अमाः देवाः पात्राणि नाटयार्थाऽभिनयशीलनायकादिरूपाः सन्तः पदेपदे प्रतिस्थानं नऋतुः नृत्यंकृतवन्तः । यद्वा अमत्याः पात्राणि-दिव्यनाट्यार्थाभिनेतॄन् गन्धर्वाद्यप्सरादीन् वा ननृतः अन्तः, भांवितण्यर्थतया नतेयामामुरित्यर्थः तथाहि-घनाघनस्यन्वर्युकमेघ- स्य 'वर्षकाब्दो घनाघनः' इत्ययरः भ्रमतः प्रापि नभसि सञ्चरतः सतः बदायदे-मुहुः केकामातन्वाने मयूरवर्ग-मयूरसंहतो निसर्गतः सभावादेव - नटनात् नर्तनात् नृत्यप्रवणत्वदर्शनादित्यर्थः ननृतुरि त्यर्थः । अत्रोदात्तालंकारः ॥८॥ दिवानिशं केलिकलाकलाप, रालीषु तालीविधिनोपजापः । सत्याः सुदत्या दिवसाः सुखेन, सुर्यः सतर्या गमयाम्बभूवुः ॥ ९ ॥ अन्वयः-दिवानिशम् भालीषु केरिकलाकरापैः (तथा) तालीविधिना उपजापैः सुदत्याः सत्याः (राश्याः) दिवसा. सत्याः सुर्यः सुखेन गमयाम्बभूवुः , भाचार्यश्रीविजयामृतस्रिप्रणीता सरणी टीका. A MAN M AAAAM व्याग्व्या-दिवानिश रानिन्दिवम् आलीपु-ससीपु केलिक- लाकलापैः क्रीड़ानिधानैः नृत्यादिकलाविधानैश्च तथा तालीवि धिना-तालीदानेन उपजापैः-उपाशुजपैः रहस्याख्यानैर्वा मुदत्या शोभनदशन (दन्त) शालिन्याः सत्याः राश्याः दिवसा: दिनानि सतूः--वाद्यविशेपसहिताः मुर्यः-देव्यः तत्तुल्याः परिचारिका वा सुसेन अक्लेशेन गमयाम्बभूवुः यापयामासुः ॥९॥ निश्चक्रमुः शक्रमुदा तदेवं, मासा विलासाऽतिशयान्नवापि । समन्विताः सप्तदिनैः पुरोधः, प्रजप्तमन्त्रैर्मुदितावरोधम् ॥ १० ॥ अन्वय --तदेव समुदा (उपर क्षिता) सप्तदिन समन्विता नपापि मासा विलासाऽतिशयात् पुरोध प्रजसमन्नैर्मुदिताऽवरोध (यथास्यात्तथा) निश्चकम् ॥ च्यारया-तदेवं शक्रमुदा-इन्द्रहणोपलक्षिताः सप्तदिनैः सम- न्विताः समेताः नापि मासाः पिलासातिशयात् आनन्दाऽतिरेकाद विविध निनोदातिरेकेण वा पुरोधसा=पुरोहितेन प्रजतानि असक- दुचारितानि मन्त्राणि शान्तिमन्त्राणि तैः मुदितावरोध-मुदिता हष्टः अवरोधः अन्तः पुरजनो यस्मिन् कर्मणि तद्ययास्यात्तथा नियक्रमुः= निकान्ताः व्यतीता इत्यर्थः ॥ १० ॥ शान्तासु सर्वासु दिशासु रेणु- न रेणुयायां तु मनाग् व्यधासीत् ॥ दध्वान देवाध्वनि दुन्दुभीनां, नादः प्रसादो नभसोऽम्भसोऽभात् ॥११॥ मन्वय -सयांमु दिशामु सामु रेणु मनाक् रेणुवाधा न पचासीत् ।
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचितेसप्तसन्धानमहाकाव्ये ANAN W AMARNAM Wama AnMAAVA *. देवाध्वनि दुन्दुभीनां नादः दध्वान नभसः प्रसादः अम्भसः अभात् (अम्भसः प्रसादो नभसोऽभात् । नभसो ऽभिसश्च प्रसादोऽभात्) ॥11॥ व्याख्या-सर्वासु प्राच्यादिषु दिशासु शान्तासु-प्रमन्नासु सतीपु रेणुः-धूलिः मनाक्-अल्पमात्रामपि रेणुयाधां-धूलीवर्पणादि. जनितदुःस्थिति न व्यधासीत् नाऽकापीत् । किश्च देवाध्वनि आकाशे दुन्दुमीना-देववाद्यविशेषाणां नादः दध्वान वनिरजनिष्ट नमसः आकाशस्य प्रसादः निर्मलत्यादिरूपः अम्भसः अमात् जलस्याभूदि. त्यर्थः, अम्भसो वा प्रसादः नभसोऽभाव । यद्वा नभमः अम्भसथ प्र. सादोऽभाव उभे अपि प्रसन्ने अभूतामित्यर्थः । निदर्शनालंकारः॥११॥ ग्रहेषु शुद्धोच्चकृताग्रहेषु, लोकम्पृणे प्राप्तघृणे ऽनृणे च ॥ लोके पुनश्चित्रकृताऽवलोके, भावस्तदाऽभूत सुकृतानुभावः ॥ १२ ॥ अन्यय:-प्रहेषु शुद्धोधकृताग्रहेषु (सन्मु) लोके (च) पुन: लोकपणे प्राप्तपणेऽनणे च चिनकृनायरोके च ( मति ) तदा सुकृतानुभावः ( लोकानाम् ) भभूत् ॥ १२ ॥ व्याख्या ग्रहेपु-सूर्यादिसप्तग्रहेषु शुद्धोयकवाग्रहेपु-शुद्धे निदोष उचे-उयस्थाने मेपादितुझस्थाने कृतः आग्रह सम्यस्थि- तिर्यस्ते शुद्धोचकृताग्रहास्तेपु तादृशेषु यद्वा शुद्धाः सूर्यगत्वादिवैगु- ण्यरहिताः ते च ते उचकृताग्रहावेति शुद्धोचकृताग्रहास्तेपु तादृशेषु सत्सु अदबोध्यम् 'अआश्चान्यजपमृगकन्याकर्कमीन दिग्दहना- टाविंशतितिथीऍनक्षवविंशतिमिः ॥ ११ ॥ स्त्रोचतः मप्तमंनीच. मिति आरम्मसिद्धी गशिद्वारं । इति सूर्यादीनां सप्तानां ग्रहाणां मेप- घृपमादयोराशयो यथाक्रममुयस्थानांनि, स्व स्व तुगापेक्षया सप्तम- . भाव:
आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका,
स्थानानि च नीचानि. तत्रोचेष्वपि दशमादयो राशित्रिशांशा यथा-
क्रममुच्चेपु परमोचा नीचेपु परमनीचा इति तदर्थः ! अत्रांश स्त्रिंशो-
भागः । यथाह नारदः-त्रिंशद्भागात्मकं लग्नम् इति । मूर्यमत्यासत्ति-
पहाणामस्तमयो नाम | तदुक्तं लघुजातके-रविणाऽस्तमयो योगो.
वियोगस्तूदयोभवेत्' इति । तेच स्वोचस्थाः फलन्ति नास्तगा नापि
नीचगाः। तदुक्तं राजमृगाङ्के--स्वोचे पूर्ण, सर्वकेऽध, मुहर्ते पाद,
द्विड्भेऽल्पं, शुभंखेचरेन्द्रः । नीचं स्थायी नास्तगो वा न किञ्चो.
स्पापं नूनं स्वत्रिकोणे ददाति । इति अत उक्तं 'शुद्धोचकृवाग्रहेविति।
एवं च सति यस्य जन्मसमये पञ्चादिकाग्रहाः स्त्रोचास्थाभवन्ति स
एव तुङ्गोभवति । तदुक्तं कूटस्थीये-सुखिनः प्रकृष्टका राजप्रति.
रूपश्च राजानः। एक द्वि-त्रि चतुर्था जायन्तेऽतः परं दिव्याः। इति'
लोकेजने च लोकम्पृणे जनतानन्दविधायिनि, प्राप्तघृणे-दीनाऽना-
थजनविपयकाऽनुग्रहशालिनि अधिगतावद्यकर्मकारुण्ये या कारुण्यं
करुणा घृणा इत्यमरः । अनृणे-समृद्धिसम्पन्नतयाऽऽधमर्ण्यरहिते,
चित्रकृताऽवलोके सचित्रीकृतावलोके च सति सुकृताऽनुभावः='
सुकृतं पुण्यं तजनककादीत्यर्थः अनुभावयति-चिन्तयतीति स
तादृशः भावः स्वभावः अभिप्रायो वा चेष्टा वा तदा लोकानामि-
तिशेपः अभूत् । अन्त्यानुप्रासः भायः सत्ता स्वभावाऽ-भिप्रायचेष्टा-
स्म जन्मसु इत्यमरः ॥ १२ ।।
आरोग्य-भाग्या-ऽभ्युदया जनानां,
प्रादुर्बभूवुर्विगतेजनानाम् ॥
वेपाविशेषान्मुदिताननानां,
प्रफुल्लभावाद्भुवि काननानाम् ॥ १३ ॥
९६ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये wwwwww rvv wwww wwwv अन्वय -भुवि विगतैजनाना बेपाविशेपान्मुदिताननाना जनाना ( विग. तैजनाना ) प्रफुल्लभावात् काननाना (च) आरोग्य-भाग्या-ऽभ्युटया प्रादु- बभूवुः ॥ १३ ॥ व्याख्या-भुवि भूतले, विगतैजनानां विगतं-निवृत्तम् एज. नं कम्पनं परिपन्थयादिजनितत्राससम्भृतगात्रादिकम्पो येषां ते यद्वा विशेषेण गतप्राप्तम् एजनं कम्पः शृङ्गरादिरमाऽनुगुणः मात्विकभा वविशेपो यैस्ते तेषाम् तत्रत्याना जनानां रसिकत्वाच्छृङ्गारमममुद्भव एव कम्पो न वैरिप्रभवोऽपि समजनिष्ट | काननपक्ष-विगतम् ऐजनं महावातादिजनितो महाकम्पो येपां ते तादृशानां यद्वा विभि-प क्षिभिः गतप्राप्तम् एजन-कम्पो यैस्ते तेषां तथोक्तानाम् । वेपा- विशपात् वेपस्य-नेपथ्यस्य भूपणवमनादिभिरात्मप्रसाधनस्य आ= सर्वतोभावेन विशेषात् अतिशयात् मुदिताननानाम् प्रसन्नमुसानाम् यद्वा वेपस्सयमनाऽलङ्कारणादिना निजपरिष्करणस्य अविशेपात्= साधारणात् मण्डनां-ऽशुकादिसामान्ये सत्यपि मुदिताननानाम्= प्राकृतसौन्दर्यसम्पन्नतया सदा प्रसन्नपदनानाम् जनानां लोकानाम् । प्रफूल्लभावात्मकरन्दविन्दमिलिन्दगुजित-पुप्प-पल्लप-फलसमृद्धतया विकसितत्वात् काननानां बनानां च आरोग्य-भाग्या-ऽभ्युदया! आरोग्यं नैरुज्यं, भाग्यम् अनुकूलदैव (त्य)म् अभ्युदयः धनधान्या- दिद्धिः, काननपक्षे च-आरोग्य=(रुजन) रोगाम्भञ्जनमामर्दनम् स नास्त्यस्यासौ अरोगस्तस्यभावस्तथा) हस्त्यादिकतृकशासाभग समूलोन्मूलनादिराहित्यम्, भाग्य शोभनाधिपतिशालिनया. अभ्यु. दया फलपुष्पादिसमृद्धिः प्रादुर्वभूवुः प्रकटीवभूवुः । अन्त्याऽनु- प्रामः तुल्पयोगिता इलेपश्चालङ्काराः ॥ १३ ॥ प्रीत्या विशिष्टा नगरेपु शिष्टाः, काराविकारा न कृताधिकाराः ।
९७ भाचार्यश्रीविषयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. वाधा नचाऽधान्नरके सुरोऽपि। परोऽपि नारोपितवान् प्रकोपम् ॥१४॥ अन्वयः--नगरेषु शिष्टा: प्रीत्या विशिष्टाः, कृप्ताधिकाराः काराविकारा न (भासन) नरके ( नरयिकजीवेषु ) असुरोऽपि याधा नाऽधात् । परोपि प्रकोपं ( कस्यापिविपये ) नारोपितवान् ॥ १४ ॥ व्याख्या-नगरेपु शिष्टा:-तत्तकमणि नियोजिता अधिकारि- जनाः सजना वा प्रीत्या हर्षेण विशिष्टाः युक्ताः, कृताधिकाराः- कारागाराधिकृतपुरुषाः काराविकाराःकारा बन्धनालयः लक्षणया तद्वद्धपुरुपास्तद्विपये विकारः प्रकृतेरन्यथाभावः क्रुद्धत्वचण्डत्वा- दिरूपो येषां ते तथाविधा न आमनिति शेषः । नरके-रत्नप्रभादौ 'नरयिकजीवेषु' इति शेषः असुरोऽपि=परमाधार्मिकोऽपि बाधाः- नारकीयपीडाः न अधात् । परम् अन्यः शास्त्रवादिरपि प्रकोपं% प्राचण्डथं नारोपितवान् कस्यापिविपये नोपयोजितवान् सोऽपि प्रशा- न्तस्वभावोऽभूदितिभावः। वृत्त्यनुप्रासः, दीपकम् अर्थापत्तिश्चालङ्काराः॥ कारा स्याद्वन्धनालये इत्यमरः ॥ १४ ॥ मृगेङ्गसारेऽर्कविदोः प्रभादो, कर्कोदये देवगुरोः सुधांशोः । शनेस्तुलाभे वृपभे सुकाव्ये, तमोव्ययेऽभूजिनदेवजन्म ॥ १५ ॥ .--अगसारे मृगे अर्थविदो प्रभादौ कर्कोदये देवगुरोः सुधांशोः शनेः तुलाभे सुकाव्ये वृपभे व्यये तमः जिनदेवजन्म अभूत् ॥ १५ ॥ व्याख्या-अगसारे तनुभावे मृगे मकरे अर्कविदोः सूर्ययुधयोः स्थितयोः प्रभादौ प्रकृष्टश्चासौभश्चेति प्रभः सआदिर्यस्य तस्मिन् प्रमादौ प्रकृष्टनक्षत्रादौ कर्कोदये कर्कराशी देवगुरोः वृहस्पतेः सुद्यांशोचन्द्रस्य अन्वय.
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाका ये ~ -AVM AMANNA अन्वयः- स्थितिसत्वे सतीतिशेपः तुलाभे तुलाराशौ नक्षत्रे शनेः शनैश्चरस्य वृपमे धूपनक्षत्रे सुकाव्ये शुक्रे व्यये व्ययस्थाने तमः गहुः एतत्समये जिनदेवजन्म जिनेन्द्राणां जनिः अभूत् अजनिष्ट ।। १५ ।। ज्येष्ठेऽसिते विश्वहिते सुचैत्रे, वसुप्रमे शुद्धनभोऽर्थमेये। साङ्के दशाहे दिवसे सपोथे, जनिर्जिनस्याऽजनि वीतदोषे ॥ १६ ॥ -चीतदोपे, ज्येष्ठेऽसिते मिश्वहिते (शान्तेः) । सुचैग्रेऽसिते वसु- प्रमे (ऋषभस्य) । शुद्धनभोऽर्थमेये (नेमे:)। सपोपेऽसिते दशाहे (पार्श्वस्य)। सुचैन्ने सिते विश्वहिते ( वीरस्य ) सुचने सिते साके रामस्य ) । (भादे) असिते वसुप्रमे (कृष्णस्य) जिनस्य जनिः अजनि ॥ १६ ॥ व्याख्या-चीतदोगेचीताः अपगताः दोषाः ग्रहवैगुण्यादिरूपा यत्र तादृशे. ज्येष्ठेऽसिते-कृष्णपक्षे विश्वहिते-त्रयोदशीतिथौ ज्येष्ठ- कृष्णत्रयोदश्यामित्यर्थः श्रीशान्तिनाथाख्यस्य । मुचैत्रे-चैत्रमासे असिते, वसुप्रमे अष्टमीतिथौ चैत्र कृष्णाष्टम्यामित्यर्थ ऋषभनाम्नः । शुद्धनभोऽर्थमेये-शुद्धस्य-शुभ्रस्य चद्धिष्णुचन्द्रचन्द्रिकाधवलितस्य नभसा श्रावणमासस्य अर्थमेये पञ्चमीतिथौ श्रावणशुक्लपञ्चम्या- मित्यर्थः श्रीनेमिनाथाभिधानस्य । मपोपे-पोपमासेऽसिते, दशाहे- दशमीतिथौ पौषकृष्णदशम्यामित्यर्थः श्रीगर्धनाथनामधेयस्य । सुचैत्रे सिते शुक्लपक्षे विश्वहित चैत्र शुक्लत्रयोदश्यामित्यर्थः श्रीवीरविभुस्या मिनः । सुचत्रे सिते-शुलपक्षे साढ़े-दिवसे अमिततिथौ नवमीतिथौ चत्रशुक्लनयम्यामित्यर्थः श्रीरामचन्द्रबलदेवस्य । अशिते याप्रमे 'भाद्रे' इति शेपः भाद्रकृष्णाष्टम्यामित्यर्थः कृष्णवासुदेवस्य । जिन- स्परागादिजेतृत्वात् तच्छीलस्य जनिःजन्म अजनि-अभूदित्यर्थः।।
- आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, अत्र 'असिते, विश्वहिते, सुचैत्रे वसुग्रमे' इत्येतेषु पदेषु 'सिते' इति- च्छेदपक्षे तत्र च तन्त्रमावृत्तिर्वा तेनोक्तार्थ लाभः ॥ १६ ॥ उक्तार्थमेव व्यासेन स्पष्टमाह- मधावष्टम्यां तन्नवमदिवसे विश्वमहिते- ऽसिते ज्येष्ठे पञ्चम्यहनिनभसो भाद्रबहुले ॥ तदष्टम्यां पोपे दशमदिवसे प्रौढविभवै- महोत्साहे पूर्व प्रसरति विभोर्जन्मसमयः ॥१७॥ , अन्धयः-पूर्व प्रौढविभवः महोत्साहे प्रसरति सति मधी असतेऽष्ट- म्याम् (ऋपभस्य )। ज्येष्ठे भसिते विश्वमहिते ( शान्तिनाथस्य ) । नमसः पञ्चम्यहनि सिते ( नेमिनाथस्य ) । पोपेऽसिते दशमदिवसे (पार्श्वस्य)। मधौ मिते विश्वमहिते (वीरस्य) । मधौ सिते तन्नवमदिवसे (रामस्य) । भाद्रयहुले तदष्टम्यां (श्रीकृष्णस्य) । विभोर्जन्मसमयः (भासीत) व्यख्या-पूर्व-जननात्प्राक् प्रौढविभवै प्रौढैः गर्भवासादारभ्यानु- दिनमुत्तरोत्तरं प्रवृद्धः, यद्वा निपुणैः समस्तजनताभरणक्षमैरित्यर्थः विभवैः धनधान्यसमृद्धिमिः महोत्माहे-प्रभूतोत्साहे सर्वजनानामिति शेषः प्रसरति व्याप्नुवति सति । मधौ-चैत्रमासे असित कृष्णपक्षे अष्टम्याम् अष्टमीतिथौ चैत्रकृष्णाटम्यामित्यर्थः ऋषभस्वामिनः । ज्येष्ठे-बैशाखमासाव्यवहितोत्तरवर्तिमासे, असिते, विश्वमहिते-त्रयो दशीतिथौ ज्येष्ठकृष्णत्रयोदश्यामित्यर्थः शान्तिनाथस्य । नमसः श्रावणमासस्य सिते शुक्लपक्षे पञ्चम्यहनि-पञ्चमीतिथौ श्रावणशुक्ल- पञ्चम्यामित्यर्थः नेमिनाथस्वामिनः. पोपे-सहस्यमासे मार्गशीर्षमा. साव्यवहितोत्तरवत्तिमासे असिते-शक्लेतरपक्षे, दशमदिवसे दशमी- तिथौ पापकृष्णदशम्यामित्यर्थः पार्श्वनाथस्य । मघौ सिते-कृष्णेतर- पक्षे विश्वमहिते चैत्र शुक्लत्रयोदश्यामित्यर्थः श्रीवर्द्धमानस्वामिनः ।
१०० महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये मधौ सिते=शुभ्रपक्षे तन्नवमदिवसे नवमीतिथौ चैत्रशुक्लनवम्या मित्यर्थः श्रीरामचन्द्रबलदेवस्य । भाद्रबहुले भाद्रस्य भाद्रपदमा सस्य बहुले कृष्णपक्षे तदष्टम्यां भाद्रकृष्णाष्टम्यामित्यर्थः श्रीकृष्ण वासुदेवस्य । विभोः प्रभोः जन्मसमया-उत्पत्तिकालः आसीत् । अत्रापि 'मधौ, विश्वमहिते, असिते' इत्येतेषु पदेपु 'सिते' इतिन्छे. दकल्पने तत्पदे च तन्त्रमावृत्तिर्वा तेनोक्तार्थलाभः । स्याचत्रे चैत्रिकोमधुः इति. श्रावणे तु स्यान्नभाः श्रावणिकश्च सः इति. कृष्णे नीला-ऽसित-श्याम-काल-श्यामल-मेचकाः इति. शुक्ल-शुभ्र-शुचि- श्वेत-विशद-श्येत-पाण्डराः । अवदातः सितोगौर इति. स्फुर्नभस्य प्रौष्ठपद-भाद्र-भाद्रपदाः ममा इति. पोपे तैप-सहस्सौ द्वौ इति चामरः। बहुलः कृष्णपक्षेऽग्नौ ना. त्रिपु प्राज्य-कृष्णयोः ॥ मेदिनी ।। अत्र इलोके शिखरिणीयत्तम् रसैरुट्रैच्छिन्ना यमनसभलांगः शिखरिणीति लक्षणाव ॥१७॥ मधुशुचिपरभाद्रे, सन्नभस्संनियोगे वसुनवनिधिविश्वानन्दिपञ्चाङ्कितेऽह्नि । सहपरदशमानाद्युत्सवे जायमाने- ऽजनि रजनिविराम जन्म हर्पाजनन्याः ॥१८॥ अन्वयः-मधुसुचिपरभाद्र समभः सलियोगे वसुननिधिविश्वानन्दि. पंचालितेऽदि सहपरदसमानापुरसधे जायमाने सति जनन्याः हात् रजनिरि. रामे जन्म सजनि॥1॥ व्याख्या-मधुशुचिपरभाद्रे मधुचैत्रः शुचिपरः शुचिरापाढ़ा परोऽग्रे यस्मात् स शुचिपरो ज्येष्ठः भाद्रः भाद्रमासः तस्मिन् सन्नमः सन्नियोगे सन् शोभनश्वासौ नभसः श्रावणस सन्नियोगः संबध स्तस्मिन् तथोक्त यमुनवनिधिविश्वानन्दिपंचांकितेऽधि तथा च मघो- आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका ANNA rwa N AM RATIYA चैत्रस्य वस्वं किते चैत्रकृष्णाष्टम्यां श्रीमदृपभस्वामिनः एवं चैत्रशुक्ल नवसंख्यांकितेऽह्रि रामचन्द्रस्य शुचिपरे ज्येष्ठे विश्वानन्दि त्रयोद. श्यंकिते ज्येष्ठकृष्णत्रयोदश्या शान्तिनाथस्य भाद्रे वखंकितेऽह्नि भाद्र- कृष्णाष्टम्यां कृष्णस्य सन्नभः मन्नियोगेपञ्चांकिते श्रावणशुक्लपञ्चम्यां श्रीनेमिनाथस्य मधुविश्वानन्दयकितेऽति चैत्रशुक्लत्रयोदश्यां श्रीवीर- प्रभोः सहपरदशमानादौ सहसः सहपरः पीपस्तस्यदशमानादौ अङ्किते पोपकृष्णदशम्यां श्रीपार्श्वनाथस्य जनन्यामातुः हत्प्रिमोदात् उत्सवे महोद्धवे जायमाने क्रियमाणे सति रजनि विरामे निशावसाने जनिरु. त्पत्तिर्जन्मेत्यर्थः अजनि अभूत् ॥ १८ ॥ अवश्लोकेमालिनीचइन्तः ननमयययुतेयंमालिनीभोगिलोकैरितितल्लक्षणात् ।। VIL यो लक्ष्मणासंगत एव देवो, गवाऽद्भुतविड् हरिणात्मनाऽयम् EUS.R..... सुरर्पभाऽर्यक्रमवारिजेन, रराज राजन पूज्यमूर्तिः ॥ १९ ॥ अन्यथ - राजप्रजपूज्यमार्स अद्भुतरियट् हरिणारमना (उपर क्षित) यः देवः गवालक्ष्मणा सगत पय अयम् सुरर्पभायं प्रमगरिजेन रराज ॥1॥ व्याख्या--राजग्रजपूज्यमूर्तिः राज्ञां महीपतीनां ब्रजेन=समू- हेन पूज्या अर्हणीया मूर्ति: शरीरं सरूपं यस्य स तथोक्तः, अद्- भुतत्विड्=अद्भुता-लोकातिशायितयाऽऽश्चर्यकारिणी विद्-कान्ति- यस्य स तादृशः हरिणात्मना-हरिणस्य विष्णोरिव शिवस्येव वा उदारः आत्मा-स्वभावः बुद्धिा तेन यद्वा हरिणा-स्वणन स्वर्ण- सच्छायेनेत्यर्थः अथवा हरिणा-पीतेन हरिद्रामच्छविच्छरितेने त्यर्थः आत्मना-देहेन । उपलक्षितः यः देवा-दीप्तिमान् पात्यन्त- रायादिकर्मविजिगीपुर्वा श्रीमान् ऋषभदयः गया यूपमेण वदाकृति- Vio LIBRA १०२ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्ये VAA " केनेत्यर्थः लक्ष्मणा- लाञ्छनेन संगता युक्तः अयम् असौ मुर्पमा- र्यक्रमवारिजेन=सुरर्पभैः शक्रेन्द्रादिभिः अथैन-पूजनीयेन क्रमवा- रिजेन-चरणारविन्दद्वन्द्वेन राज-शुशुभे । गोष्ठा-ऽध्व-निवहा बजाः इति. मूर्तिः काठिन्य-काययोरितिचामरः । शान्तिनाथपक्षे-गवाद्भुतत्विड्-गोः सूर्यस्येव अद्भुता त्विट् यस्य सः, राजबजपूज्यमूत्तिः वर्णितार्थः यः देवः शान्तिना. थस्वामी हरिणात्मना-मृगरूपेण लक्ष्मणा-चिह्वेन संगतः अयं सुरर्प- भार्यक्रमवारिजेन रराज । गौः स्वर्ग च वलीवर्दे रश्मौ च कुलिशे पुमान् ! स्त्री सौरभेयीदृग्वाणदिग्वाग्भूष्वप्सुभूग्नि चेतिमेदिनी । कल- का-ऽौ लाञ्छनं च चिहं लक्ष्म च लक्षणमित्यमरः । नेमिनाथपक्षे-गवाद्भुतत्वि-गवोः नेत्रयोः अद्भुता- विद शोभायस्य सः यद्वा गोपु-इन्द्रियेषु विपये अद्भुता=ऽसाधा. रणतया विस्मयजननी विड्=व्यवसाया=निग्रहोद्यमो जिगीपा वा यस्य स तथोक्तः । हरिणा-हरित्कान्तिशालिना अञ्जनाभेनेत्यर्थः आत्मना-शरीरेण उपलक्षितः राजबजपूज्यमूर्तिः यः देवः श्रीने- मिनाथप्रभुः मुर्पभार्यक्रमवारिजेन=सुरर्पभैः शक्रेन्द्रादिभिरर्च्ययोः मयोः चरणयोः वारिजेन-शवेन तदाकृतिकन लक्ष्मणा संगतः रराज ! गौरुदके दृशि सगै दिशि पशौ रश्मौ बजे भूमाविषोगिरि रित्यनेकार्थसंग्रहः त्विद् शोभायां जिगीपायां व्यवसाये रुचौ गिरि इति हैमः । हरिदिवाकरसमीरयोः यमवासयसिंहांशुशशांककपिधा- जिपुपिंगवणे हरिद्ववर्णेभेकोपेन्द्रशुकाहिषु इत्यनेकार्थ संग्रहः । आत्मा यत्नो धृतियुद्धिः स्वभायो ब्रह्म वर्म च इत्यमरः । पार्श्वनाथपक्षे-गवाद्भुतस्विट्-गवियाचि देशनावचने अद्भुता-मुरनरविस्मयजनिका विद्-छटा यस्य सः तीर्थकृतां वचः १७३ कर-NAM n VNAM ~ nvr भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. नातिशयशालित्वात् । हरिणा-हरिद्वर्णेन इन्द्रनीलमणिमेचकच्छवि. नेत्यर्थः आत्मना-देहेन उपलक्षितः राजबजपूज्यमूर्तिः यः देवः हरिणा=सर्पेण तदाकारेण लक्ष्मणा-लाञ्छनेन संगतः अयं सुरर्पभा- यंक्रमवारिजेन इन्द्रार्चनीयचरणकमलेन रराज । महावीरस्वामीपक्षे—गवाद्भुतत्वि-विभूमौ देशना- कालिकस्वाश्रय क्षेत्रे इत्यर्थः अद्भुता-विस्मयावहा वि-प्रभा 'भामण्डल' रूपा यस्य सः । आत्मना-धृत्या सचित्तेन चा सयुध्या या उपलक्षितः राजव्रजपूज्यमृत्तिः या देवः श्रीवर्द्धमानस्वामी हरिणा= सिंहेन तदाकारकेण लक्ष्मणा संगतः अयं सुरर्पभार्य क्रमवारिजेन रराज । आत्मा चित्ते धृतो यत्ने धिपणायां कलेवरे । परमात्मनि जीवेऽ हुताशनसमीरयोत्यनेकार्यसंग्रहः ॥ रामपक्षे-गवातविगवियाणेऽद्भुता वीरविस्मयकरी विद-दीप्तिर्यस्य मा गम्भूिमौ अदभुता विद्-जिगीपा यस्य सः राजबजपूज्य मृतिः यः देवः श्रीरामचन्द्रबलदेवः हरिणा-कपिना= हनूमता तथा लक्ष्मणासंगतः लक्ष्मणेन-सौमित्रिणा आ-सर्वतोभावेन संगतः-मिलितः अयं सुइपमार्यक्रमवारिजेन-देवेन्द्रसमभ्यर्य चरणकमलशालिना आत्मना शरीरेण रराज । कृष्णपक्षे-गवाद्भुतत्विद्गवि-पृथिव्यां गोपु धेषु वा रिपये अद्भुतासाचर्यकारी विद्स्प्पयमायो रक्षणात्मको यस्य मा गयोः हर्गः अद्भुता विमर्वमोहिनी गोमा यस्य स इति वाराजग्रजपूज्यमृत्तिः, मुरर्पभार्यक्रमयारिजेनराक्रमपूज्यपदाम्पुज. गोमिना आत्मनागरीरेण उपलक्षितः. यः देवः श्रीकृष्णचन्द्रनामा यासुदेवः अपं हरिणा-गाईन लक्ष्मणा लाञ्छनेन ध्वजेन संगतः= बदनीयतया मम्बद्धः रराज-दिदीपे ।।
१०४ महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये शब्दार्थोभयश्लेपः । तुल्ययोगिता- गौः स्वर्गे च बलीवर्दे किरण-क्रतुभेदयोः । स्त्री तु स्यादिशि- भारत्यां भूमौ च सुरभावपि । नृस्त्रियोः स्वर्ग-वजा-ऽम्बु-रश्मि- दृग्-वाण-लोमसु इतिमेदिनी ॥ १९ ॥ इन्द्रा-ऽश्वे-भ-शुक-प्लवा ऽहि-पवन-स्वाँऽशु-लोकान्तरे। भा-रि-दुध-कपी-न्दु-पीत-गमड़-श्री-शुक्र-विष्ण्व-कैजः। सत-स्कन्द-शनी-श-चंश-वरुण-प्राणा-ऽग्नि-भीता-ऽसित। रस्त्वां हरिजैः क्रमाजिनपते त्रिंशन्मितैः स्तौम्यहम् ।। * सारूप्यमारोप्य दिशां कुमार्यः, स्मेराम्बुजांक्षीषु मनस्विनीपु। रम्भालयेषु त्रिपु देवदेवं- नीत्वा स्वरागात्स्नपयाम्बभूवुः ॥२०॥ -दिशा कुमार्यः स्मेराम्बुजाक्षीषु मनस्विनीपु सारूप्यमारोप्य ( राम-कृष्णपक्षे-कुमार्यः स्मेराम्बुजाक्षीपु मनस्रिनीपु-दिशा सारूप्यमारोप्य ) निपु रम्मालयेषु देवदेवं नीमा स्वरागारपयाम्बभूवुः ॥ २० ॥ व्याख्या-दिशांकुमार्य: अष्टौ दिकन्यकाः स्मेराम्बुजाक्षीपु- विकसितकमलसदृशलोचनशालिनीपु मनस्विनीपु-स्त्रीपु सारूप्यम् समानरूपताम् ऐकरूप्यमित्यर्थः आरोग्य कृत्वा स्त्रीणां रूपाणि विधायेत्यर्थः । राम-कृष्णपक्षे-फुमार्यः कन्याकाः स्मैगम्बुजाक्षीपु मनस्विनीपुम्सीपु दिशा मारूप्य भूपणवमनादिना समानरूपं विधाय। निपुरम्मालयेपु मङ्गलार्धन्यस्तकदलीस्तम्भशालिभवनेषु यद्वा रम्भा स्तम्भादिसम्मारविरचितमागल्यगृहत्रितये देवदेयं देवेषु मध्ये दीव्य. विद्योतते इतिदेवदेवस्तं नीत्या प्रापय्य स्वरागाव-स्वमस्त्या सपपाम्बभूयुः-स्नानक्रियां हम्पादयामासुः ॥ २० ॥ अन्वयः- १०५ mariwar है आचार्यश्रीविजयामृतसूरिभणीता सरणी टीका, काश्चिद भुवः शोधनमादधाना; । जलानि पुर्यां वपुः सपुष्पम् । छत्रं दधुः काश्चन चामरेण, तं वीजयन्तिस्म शुचिस्मितास्या ॥२१॥ अन्धयः-फाश्चिद् ( कन्यकाः) भुम् शोधनम् भादधानाः पुयां सपुष्पं जलानि ययपुः शुचिस्मितास्याः काश्चन छयं दधुः ( काश्चन ) चामरेण त वीजन्निस्म ॥ २१ ॥ व्याख्या-काश्चिद् कन्यका मुवः स्थानम्य शोधन-सम्मा- जन्या दिनाऽवकरनिकरनिरसनाद्यात्मकं सस्कारकर्म आदधाना:- कुर्वन्त्यः पुर्या-नगर्गा सपुप्पं-पुप्पोपहारमहितं जलानि केतकी- शतपत्र्यायधिवासितसुगन्धिमलिलानि वपुः पृष्टयत्यः अमिपिपि- चुरित्यर्थः । शुचिस्मितास्याः शुचि अनवद्यं स्मितं मन्दहसितं यस्मिन् तादृशमाम्यं वदनं यामां तास्तथोक्ताः काश्चन कन्यकाः छत्रम् आतपत्रं दधुन्धारितवत्यः । काश्चन चामरेण-चमरमृगपु- च्छरचितम्यजनेन तं देवदेवं वीजयन्तिस्मच्यजनमश्चालनकर्म कुर्वन्तिस्मेत्यर्थः ।। २' ॥ उद्दीप्य दीपानपराः परेश- श्चक्रुश्च चालव्यजनेन वातम् । मणीमयादर्शकराः परास्ताः, पुरस्सरा गीतविधि वितेनुः ॥ २२ ॥ भाप -भा. (विशम्परा ) दौरान ५ परेशा. पारपतन AT Tः परा ता. पा) मनीमयानगंगरा पुगा पीधि नि:। पापा-अपरा:दिपन्यका दीपान् उद्दीप्य-प्रमाण पगा परमेगितः जिनम्प यालव्यजनेनसनालयनेन चामरेण या १०६ महोपाध्यायश्री मेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये M वात-पवनं चक्रुः चालयामासुरित्यर्थः । परा: अन्याः ता:=पूर्वोक्ताः दिकन्याः मणीमयादर्शकरा: हस्तनिहितमणिखचितदर्पणाः सत्यः पुरस्सराः अग्रेसराः गानक्रियायोअग्रीयाभूत्वा गीतविधि माङ्गलि. कगानकर्म जिनगुणगानक्रियां वा वितेनु। चारित्यर्थः ॥२२॥ कृत्वैव होमं वरचन्दनायै-- ग्रन्थिववन्धुः करयोर्विभूतेः। आस्यं सलास्यं प्रविलोक्य रम्भा, स्तस्थुः पुरो लोकविभोरदम्भाः ॥२३॥ अन्वयः-अदम्भाः रम्भा चरचन्दनाधैः ( अरणिसंघर्पणोन यवती) होमं कृत्वैव ( जिनस्य ) करयोः विभूतेन्धि ववन्धुः ( तदनु ) लोकविभोः मास्यं प्रविलोक्य सलाम्यं (यथास्यात्तथा) पुरः तस्थुः ॥ २३ ॥ व्याख्या-अदम्भा तिववर्जिताः रम्भा देवकन्याः वरच- न्दनायैःसुरभिदिव्यचन्दनप्रभृतीन्धनैः · अरणिधर्षणोद्भवत्रहो इति शेषः होम-हवनं कृत्त्वैव-विधायैव करयोः जिनहस्ताम्बुजयुगे विभूते-हुतचन्दनभस्मनः ग्रन्थि-रक्षापोट्टलिकां बबन्धुः बनन्ति- स्म । तदनु लोकविभोः जगत्प्रभोः आस्यं मुखं प्रविलोक्य तदनु- मता सलास्यं स्त्रीनृत्येन सहितं यथास्यात्तथा पुरोऽग्ने तस्थुः- आसांचक्रिरे ।। २३ ॥ जाते जिनेशे त्रिजगदिनेशे, लेभे भुवि स्वामिवरैश्चलत्वम् । चलाचलस्वासनभावनेन, जन्मावबोधे हदि पावनेन ॥ २४ ॥ भन्यय:-निजगहिनशे जिनेश भुवि जाते पावनेन चलावर स्यामनभावनेन जन्माययोधे मति स्वामिवरः हृदि चलरव लेमे ॥ २४ ॥ , भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, व्याख्या--त्रिजगदिनेशे त्रिभुवन विद्योतनसूर्यरूपे जिनेशे भुवि-भूतले जाते अवतीर्णे सति. पावनेन पवित्रतासम्पादकेन चलाचलस्वासनभावनेनचलाचलं कम्पनशीलं यत् स्वासनं स्वीय- सिंहासनं तस्य भावनेन विमर्शन जन्मावबोधे-जिनजन्मज्ञाने सति खामिवरः अच्युतादिदेवेन्द्रः हृदि-मनसि चलत्वं-तरलता संभ्रम लेमे संम्भ्रान्तचित्तता प्राप्त्यर्थः। जिनप्रभौ जाते देवेन्द्रस्य सिंहासनं कम्पितं भवतीति जैनसमये सुप्रतीतम् ॥ २४ ॥ आकृष्टा भगवद्गुणैरिव दिवः श्रीअच्युताद्याः समे। देवेन्द्राः समुपेयुरत्र मनसा चित्रीयमाणश्रिया ॥ आलोक्याऽद्भुतधामधाम सुचिरं राज्यं त्रिलोक्या इह । न्याय्यं कर्तुमतोऽभिपेकमचले मेरौ पयोभिःप्रभोः॥२५॥ ॥ इतिश्री सप्तसन्धाने महाकाव्ये जन्मव- नो नाम द्वितीय सर्गः॥ अन्वयः--श्रीमच्युताद्याः समे देवेन्द्राः भगवद्गुणः भाकृष्टा इव चिनीयमाणश्रिया मनसा दिवः भन आगरय अद्भुतधामधाम सुचिरम् भालोक्य इह निलोक्या राज्य न्याय्यम् अतो मेरी भचले पयोभिः प्रभोः अभिपेकं कर्तुं समुपेयुः ॥ २५ ॥ व्याख्या-श्रीअच्युताया-अच्युतवासवप्रभृतयः समेसर्वे- देवेन्द्राः सुरेश्वराः भगवद्गुणैः जिनदेवगुणैः आकृष्टाः इव आक- प्याऽनीता इव चित्रीयमाणथिया चित्रीयमाणा-विस्मयनीयतया प्रतिमाता श्री! जिनलक्ष्मीर्यसिन् तादृशेन मनसा उपलक्षिताः दिवा-गुलोकात् अत्र आगत्येति शेपः अद्भुतधामधाम अद्भुतानां विस्मयावहानां धानां तेजसां शक्तीनां वा प्रभावाणां वा त्विषां या धाम आश्रयीभूतं जिनमिति शेषः यद्वा अद्भुतं-विसयनीयं धाम्नः= महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये NA Aw जिनप्रभुशरीरस धानःस्वयंप्रकाशे विर्ष वा तेजो वा शक्ति वा सुचिरं चिरकालपर्यन्तम् आलोक्य आलोक्य-निरीक्ष्य इह-असिन् जिनदेवे त्रिलोक्या:-जगत्रयस्य राज्य राजत्वम् आधिपत्यमित्यर्थः न्याय्यं समुचितंयोग्यं अतः अस्मात् भगवतस्त्रिजगदधीशभवना- हत्वाद्धेतोः मेरौ अचले सुमेरुपर्वते पयोमिा क्षीरार्णवाहृतनीरैः प्रभोः जिनदेवस्य अभिषेकं-स्नात्रमहोत्सवं कर्तुं सम्पादयितुं ममु- पेयुः समुपेताः संगताः सम्मिलिता अभूवन् यद्वा समुपेयुः-सम्प्राप्ताः मेरुमिति शेपः विस्मयोऽद्भुतमाचर्य मित्यमरः । धाम शक्ती प्रभाव तेजोमन्दिर-जन्मसु इति विश्वः । पयः क्षीरे च नीरे च इति हेमचन्द्रः। अत्र पद्ये शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।। सूर्याश्चर्मसजस्तताः सगुरवः । शार्दूलविक्रीडितमितिलक्षणात् ॥ २५ ॥ इति श्री शास्त्रविशारद कविरत्नभहारकाचार्य विजयामृ. तसूरीश्वर प्रणीतायां सप्तसंधान महाकाव्यसरणीटीकायां द्वितीयः सर्गः॥
आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका १०९ तृतीयः सर्गः निन्युः सुरासुरगणा अथ देवगोत्रं, यत्राद्रयः सकलकालमपि प्रफुल्लाः । पुष्पैः फलैरविरलैः प्रवलै दलैश्च, प्रीणन्ति भूचर-नभश्चर चारुनारी॥१॥ अन्वय -अथ सुरासुरगणा (प्रभु) देवगोत्र निन्यु यत्र सकर काळमपि अविरले पुष्पैः फल प्रयलैर्दलैश्च भूचरनभश्चरचारुनारी: प्रफुल्ला अद्य प्रीणति ॥ १ ॥ - व्याख्या-अथ-दिक्कुमारीकृतमतिकर्माऽन्तरं सुरासुरगणाः- सुराणां सौधर्मादिदेवलोकनिवासिदेवानाम् असुराणां भुवनपत्यादीनां गणाः संघाः 'प्रभु'–मितिशेपः देवगोत्रं देवपर्वतम् तीर्थकत्पञ्चक- पक्षे-मुमरुशैलम् रामपक्षे-देवानां गोत्र-पर्वतम् 'अष्टापद' संज्ञकम् अयोध्यापार्श्व उत्सवेषु रमणीयस्थानत्वेन तस्याभिमतत्वात् कृष्णपक्षे- देवात्-मुसलधारां दृष्टिंकुर्वतो घनाधनात् इन्द्राहा गाः सौरमेयीः गां गोकुलंब्रज वा नामैकदेशग्रहणेनामग्रहणात् सत्या भामेतिवत् त्रायते रक्षति स तं 'गोवर्द्धन' नामानं ब्रजपाचवर्तमानपर्वतविशेष निन्युः नीतवन्तः । अधुना देवगोनं वर्णयति-यत्र यस्मिन् देव- गोने सकलकालमपि-पद्यपि ऋतुपु प्रफूल्लाः विकसिताः अद्रयः- वृक्षाः 'अद्रयो द्रुम-शैला-Sोः' इत्यमरः । अविरलै निरन्तरः पुष्पैः-चम्पकादिकुसुमैः फल: आम्रादिभिः प्रबलैः अङ्करैः दलैः= किसलयैश्च यद्वा प्रबलैः प्रबालैः अभिनवपल्यैः दल निष्पन्नप- त्रैश्च भूचरनभश्वरचारुनारी: भूचराणा-मनुजतिरयां, नभश्वराणा देव-यक्ष-गन्धर्म-किन्नर-विद्याधरादीना चा:: मनोहराः नारी:
महोपाध्यायनीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये रमणीजनान् प्रीणन्ति आनन्दयन्ति ।। अत्र सगै वसंततिलकं वृत्तम् । ज्ञेयं वसन्ततिलकं तभजाजगौग इति तल्लक्षणात् ॥ १ ॥ श्रीभद्रशालवनमप्यतिपावनं तद्, यत्रास्ति सौमनसमद्भुतशाखिजन्यम् ॥ सानन्दनन्दनवनं बहुसौरभाढ्यं, सापाण्डुकम्बलशिलाग्रमिला विभति॥२॥ अन्वयः-यत्र तद् अतिपावनं श्रीभद्रशालवनम् , अद्भुतमाखिजन्य सौमनसं (वन), सानन्दनन्दनवनं, बहुसौरभाट्यं पाण्डुक (वनंच) अस्ति सा इला बलशिलानं बिभात (इति तीर्थकृत्पञ्चकपक्षे) । (वासुदेवपक्षे.) यग्न सा इला (यन्त्र) अद्भुतशाखिजन्यं (बहुसौरभाट्य) सौमनसम् अस्ति. तद् भति- पावनं श्रीभद्शालवनं, सापाण्डकम्बलशिलाग्रं बहुसौरभाब्यं नन्दनन्दनवन (च) बिभर्ति । (श्रीरामबलदेवपक्षे तु) यत्र सा इला ( यन) अद्भुतशाखिजन्य वहुसौरभादयं सौमनसम् भस्ति तद् अतिपावनं श्रीभद्रशालवनं सापाण्डुकल- शिलान सानन्दनन्दनवनं (च) विमति ॥ २॥ व्याख्या--तीर्थकृत्पञ्चकपक्षे-यन-यस्मिन् देवगोत्रे सुमेरु- पर्वते तद्-प्रसिद्धम् अतिपावनम् अतिपवित्रं सातिशयपावित्र्यजनक चा 'श्रीभद्रशालवन' तदभिधानम् अस्ति-विद्यते एवम् अद्भुतशा- खिजन्यम् अद्भुतानि चित्रविचित्राणि शाखिजन्यानि वृक्षसंभवानि पुष्प-फलादीनि यस्मिंस्तत् तादृशं 'सौमनस-तदाख्यवनम् अस्ति । तथा नन्दनन्दनवनम् सानन्दम्-आनन्दकारित्वेन आनन्द-हर्प- सहितं, यद्वा आनन्देन सहितः सानन्दस्तं करोति सानन्दयति. सानन्दयतीति सानन्दम्-आनन्दयुक्तविघायकम् नन्दनवनं-देवी- द्यानम् अस्ति । तथा बहुसौरभाढय-सातिशयसौगन्ध्यशालि पाण्डुकं-तन्नामकवनम् अस्ति । सा-प्रसिद्धा स्नात्रशैलसम्बन्धिनी इला-पृथ्वी बलशिलानं-चलानां-विशालानां गिलानां मध्ये अयं- प्रधानं लानसिंहासनं विभर्ति ।।
. . भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. कृष्णवासुदेवपक्षे-यत्र देवगोत्रे गोवर्द्धनपर्वते सा-पर्वत सम्ब- धिनी इला यत्र अद्भुतशाखिजन्य-चित्रविचित्रवृक्षसमुद्भवं बहु- सौरभाढयं प्रचुरसौरभ्ययुक्तसौमनसं-पुष्पसमूहः अस्ति तद् अति- पावनं श्रीमद्शालवनं-श्रीणां-बिल्ववृक्ष-सरलवृक्ष लवङ्गानां भद्राणां देवदारु-कदम्पवृक्ष-स्नुहीवृक्षाणां शालानां सर्जवृक्षाणां, यद्वाऽनुप- दोक्त श्री भद्रादीनां शालानां-वृक्षाणां वनं-काननम् अन्तर्वति यस्मिन् तत् ताहम् यद्वाश्रिया भद्रं-मनोहरम् शालवनं यस्मिंस्तत्ता. दृशं, सापाण्डुकम्बलशिलाग्रम्-आ-सर्वतोभावेन पाण्डुकम्बलाः- प्रस्तरविशेपास्तदात्मिका: शिलाः पाण्डुकम्बलशिलास्तासां नाम वा अग्रा:-श्रेष्ठाः याः शिलाः ताभिः महितं, यद्वा पाण्डुकम्बलसदृश्यो या शिलास्तासामग्रामि:-मुग्व्याभिः शिलाभिः सहितं, बहुसौरमा ढय-प्रभूतसौगन्ध्यकलितं यद्वा सुरभीणां-खीगवीणां समूहः सौरमं बहुना सौरमेण आढय-युक्तम् एवं विधं नन्दनन्दनवनं-नन्द- श्रीकृष्णपितरं नन्दयति-हर्पयतीतिनन्दनन्दन तादृशं वनं विपिन- विभत्ति-धारयति ॥ श्रीरामचन्द्रपलदेवपक्षे-यत्र देवगोत्रे अष्टापदपर्वते सा इला यत्र हि अद्भुतशाखिजन्यं पहुसौरभाट्य सौमनसम् अस्ति तद् अति- पावनं श्रीभद्रशालवनं सा पाण्डुकम्बलशिलाग्रमेतादृशं सानन्दनन्द- नवन-सानन्दान्-आनन्दनिर्भरानपि किमुत सोद्वेगान् जनान् नन्द- यति-प्रीणयतीति सानन्दनन्दनं तादर्श वन विभत्र्ति । विशेषणानाम- र्थश्व वासुदेवपक्षीयरीत्याऽवगमेलिमः ॥ २॥ यस्मिन्नलं फलललद्दलशालिशाल- वृन्दावनी सुरजनी रजनीश्वरास्या ॥ - महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाये vv , गीतखरैः सुरमणी रमणीप्रणीतै- स्तन्तन्यते तनुभृतामतनूदयं सा ॥३॥ अन्वयः-यस्मिन् अलं फल ललद्दन शालिशार वृन्दाऽवनी. रजनीश्वरास्या सा सुरजनी च सुरमणी रमणीप्रणीतैः गीतस्वरैस्तनुभृतामतनूदयं तन्तन्यते । इति मेरुपक्षे । ( अन्यपक्षे ) यस्मिन् अलं फललद्दलशालिसालवृन्दा, सुरजनी रजनीश्वरास्या अवनी ( यद्वावनी ) सुरमणीरमणीप्रणीत: गीतस्वरैः तनुभृताम् अतनूदयं तन्तन्यते ॥ ३ ॥ व्याख्या-यसिन् मेरौ तदने वा अलम्=अत्यर्थ फलललद्दल, शालिसालवृन्दा-फलैः सस्यैः ललद्भिः वायुसंवन्धाचलद्भिः विल- सद्भिर्या दलैः पत्रैश्च शालन्ते शोभन्ते तच्छीलानां शालानां वृक्षाणां वृन्दं समूहो यसां सा तादृशी अवनी-सौमेरवीभूमिः, तथा रजनी- श्वरास्या=चन्द्रानना सा=प्रसिद्धा सुरजनी-दिव्याङ्गना च सुरमणीर- मणीप्रणीत सुप्ठ रमयन्ति शोभनं रम्यते आम वा इति सुरमण्य स्तादृशीभिः रमणीभिः प्रणीतैः विहितः गीतस्वरैः गानकालीनगेय- पदसमूहवर्तिनिपादादिस्खरैः तनुभृतां प्राणिनाम् अतनूदयम्-अतनोः अनङ्गस्य उदयम् अभिवृद्धि कामोद्रेकमित्यर्थः प्रचुराऽऽनन्दसमृद्धि वा तन्तन्यते-पुनः पुनरतिशयेन वा तनोति-विस्तारयति जनयती- त्यर्थः । इति.सुमेरुपक्षीयोऽर्थः ।। अष्टापदपक्षे गोवर्द्धनपक्षे च-यस्मिन् अष्टापदशैले. गोवर्द्धने च अलम् फलललद्दलशालिनः फलचलत्पत्रशोभिनः मालाः-वृक्षाः वृन्दाः-तुलस्यश्च यस्यां सा तादृशी, पुनः सुरजनी-सु- वातिशयिता वा रजनी-हरिद्रा जतुका वा यस्यां सा तथाविधा रजनीश्वरास्या-रजनीश्वरस्य-चन्द्रस्य आस्या स्थितिरस्यां तादृशी चन्द्रमस ओपधीपतित्वाद्वन्यौपधीपु तस्थितिकल्पनात् यद्वा सुरजनीरजनीश्वरास्या-सु-शोभना रजनी रात्रिः सुरजनी-राका रात्रि + -शोभना समृद्धा आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. NAMA-~ ~~~ रजनीश्वरः चन्द्रः म एव आस्यम् आस्यमिव वा यस्याः सा तथा विधा अवनी-अधित्यकादिरूपा पर्वतभूमिः यद्वा वनी-अटवी सुरम- णीरमणीप्रणीतैः सुरमण्या संगीतपण्डितरत्नभूता या रमण्या उत्क- एस्त्रीविशेषास्ताभिः प्रणीतैः प्रयोजितः गीतखरैः निपादादिगान- खरैः तनुभृतां शरीरिणाम् अतनूदयं कामोद्रेकं प्रभूताऽऽनन्दसमृद्धि वा तन्तन्यते भूयोविस्तारयतीत्यर्थः ॥ ३ ॥ गोपाः स्फुरन्ति कुसुमायुधचापरोपात्, कोपादिवाऽम्बुजशः कृतमानलोपाः ॥ क्रीडन्ति लोलनयनानयनाच दोला- स्वान्दोलनेन विवुधाश्च सुधाशनेन ॥ ४॥ अन्वयः-गोपाः पिबुधाः कुसुमायुधवापरोपात् कोपादिव कृतमानलोपाः स्फुरन्ति । लोल्नयनानयनात् अम्बुजदृशः सुधाशनेन ढोलासु आन्दोलनेन च क्रीड़न्ति ॥ ४ ॥ व्याख्या-गोपा=गा-किरणान् पान्तीति ते तथोक्ताः तेज- स्विन इत्यर्थः यद्वा गां स्वर्ग पान्ति-रक्षन्तीति ते तादृशाः विवुधाः= देवाः यद्वा गां बजावं पान्तीति ते गोपाः शक्रेन्द्रादयः विबुधाः- देवसामान्याश्च कुसुमायुधचापरोपात्=कन्दर्पधनुर्मुक्तवाणात् तन्निपा- तादितिभावः हेतोः अत्रोत्प्रेक्षते-कोपादिव कामस्य क्रोधादिव कृत- मानलोपाः कृतः मानस्य-स्वाभीष्टश्लेप-धीक्षादिविरोधिकृत्रिमको- पस्य लोपः विनाशो येषां ते तथोक्ताः स्फुरन्ति-प्रकाशन्ते । किञ्च लोलनयनानयनात लोलनयनानां चश्चलाक्षीणाम् आसर्वतोभावेन नयनात्-कर्पणात् आनयना=आकर्षणेन अम्बुजदृशः पद्माक्ष्याः सु- धाशनेन-अधरामृतपानेन. दोलासु-हिन्दोलादिदोलनयन्त्रविशेपेषु आन्दोलने नन्दोलनक्रिपया च क्रीइन्ति=विहरन्ति आत्मानं मिनो- .
महोपाध्यायनीमेधविजयगणिविरचिते मतसन्धानमहाकाव्ये
दयन्तीत्यर्थः। स्वामीप्टरलेपवीक्षादिविरोधी मान उच्यते इति दश-
रूपके । अर्थलेपः उत्प्रेक्षा च सीर्थकर-पलदेव वासुदेवतत्रिपक्षे
समानोऽर्थः ॥४॥
अन्योन्यवन्यफलमाल्य विभाजनेन,
का स्वर्वशा नहि वशीक्रियते जनेन ॥
यत्रोर्वशीजनकृतेन विमोहितेन,
सोऽस्मिन् वशीभवति नाम वशीहितेन ॥ ५ ॥
अन्नयः-~अस्मिन् अन्योन्यवन्यफलमाल्यविभाजनेन का स्वर्वशा जनेन न
हि वशीक्रियते यत्र उर्वशीजनकृतेन इंहितेन विमोहितेन म वशी वशीभवति॥५॥
व्याख्या-असिन् गिरौचने वा अन्योन्यवन्यफलमाल्य-
विभाजनेन अन्योन्यं परस्परं यद् बन्यानां वनभवानां फलानां-
सस्यानां माल्यानां पुष्पसजा विभाजनेनघण्टनेन विनिमयेन वा
का स्वर्वशा-दिव्यस्त्री वशा वन्ध्या-सुता=योपास्त्रीगवीकरिणीषु
चे-तिविश्वमेदिन्यो "जनेन कामिलनेन न वशीक्रियते स्वायत्तीक्रि-
यते सर्वापीत्यर्थः । यत्र उर्वशीजनकृतेन अप्सरोभिर्विहितेन ईहि-
तेन चेष्टितेन चेष्टयेत्यर्थः करणेन विमोहितेन-विमोहनेन वश्यतापा-
दनेन हेतुना सः प्रसिद्धः वशी-जितेन्द्रयोऽपि वशीभवति-वश्यतां
यातीत्यर्थः । अर्थश्लेपः अन्याऽनुप्रासः काव्यलिङ्गं चाऽलङ्काराः।।५।।
अष्टापदोन्नतगिरिर्वहते महत्त्वम् ,
गोवर्द्धनोऽपि धनवानिव दिप्रसारी।
तत्राऽऽनिनाय किल वासवनाम देव-
स्तं जातमात्रमतिमात्रविवोधपात्रम् ॥६॥
११५
ANA
Amar
आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता परणी टीका
अन्य -अष्टापदोन्नतगिरि महत्व बहते गोवर्द्धन धनवानिर दिकम
सारी तय वासपनामदेव जातमात्रम् अतिमात्रविद्याधपात्र त क्रि आनिनाय ॥६॥
व्याख्या-मात्रमहोत्सवाधिरणीभृतं पर्वतं नाना निर्दिशति-
( तीर्थकृत्पश्चकपक्षे ) अष्टापदोन्नतगिरि अष्टौ धातयः पदानि स्था
नान्यस्य तत् अष्टमु धातुपु पदं प्रतिष्ठाऽस्येति ना अष्टापद-सुवर्ण
तस्य तन्मयो पा उन्नतगिरि =मर्वोचशैलः सुवर्णशैलः सुमेरुपर्वत
इत्यर्थः महच तीर्थङ्करस्नात्रमहोत्सनाधिकरणीभग्नजनितमहिमान
वहते. फिश्च गोर्द्धनः-गा-फिरणान् स्व-स्वाश्रिततेजासीत्यर्थ.
चयतीति स तथोक्तः धनपानिय व्याहारीवेत्यर्थः दिप्रसारो=अष्टसु
दिक्ष प्रसरण च्यापन-शीलः व्याप्तसर्वदिक इत्यर्थः तत्र पर्वते वासर-
नाम देवा शप्रेन्द्रः जातमात्र गर्भानिर्गतमा जन्माऽनन्तरक्षण-
एवेत्यर्थः अतिमानविनोधपान-मातिशयज्ञानमाजनम् आविज्ञानस्य
तदानीं मझावात् तं पूर्वोक्तम् ऋषभादिम् फिल-निश्रयेन आनिनाय ।
बलदेवपक्षे-अष्टापदोन्नतगिरिः -अष्टापदनामधेयः उन्नतपर्वतः
महत्तं श्रीरामचन्द्रपलदेवजन्मोत्सवाश्रयीभवनजनितमहनीयत्वं वहते
शेपं पूर्ववत् ॥
चासुदेवपक्षे-अष्टापदोन्नतगिरि अष्टापदा लामपर्वत सहन
उन्नता उच्चैः उन्छूितो गिरिः शलः यद्वा अष्टापदः शरमाख्यान्य
पशुविगेपो यः सिंहमपि पिराध्यति तयुक्त उन्नतगिरिः-तुगशैलः
'गोगन' तदाग्व्यः,महत्व-श्रीकृष्णासुदेवजन्मोत्माधारीभानज-
न्यमहिमान बहते, धनपानिर दिप्रमारी तर पासपनाम देनः जात-
मानमतिमात्रवियोधपात्र तयामुदेवम् आनिनाय ।। अष्टापदश्चन्द्रमा-
ल्या लूताया शरमे गिरी कनके गारिफलके इति अनेकार्यसग्रहः ।
इपोपमारंकारौ ॥६॥
महोपाध्यायधीमेधविजयगणिविरचिते मप्तसन्धानमहाकाम्ये A त्वं नन्द-नन्दनपदं सफलीकुरुष्व, कान्तापि बर्द्धयतु कान्तिरसो यशोदा ॥ स्नानाभिपेकसविशेपसरेखभूषा- नेपथ्यतथ्यकरणासुभगाकृतित्वम् ॥ ७ ॥ अन्यय -य नन्द (हे नन्द ! ) र नन्दनपद सफलीकुरुष यशोदा कान्ताऽसी (तब ) कान्ति स्नात्राभिषेकप्तविशेषमरेग्वभूपानेपथ्यतयकरणात सुभगाऽऽकृतिय वर्धयतु । कृष्णपक्षे-( हे प्रभो! स्य नन्दनन्दनपद सफ्री- कुरुष यशोदा कान्ताऽपि तच कान्ति-रसौ बर्द्धयत्तु । ( तथा ) स्नामाभिषेक- तथ्यकरणारसुभगाकृतिष (ज) ॥ ७ ॥ व्याख्या-आनयनाऽनन्तरकालिकवृत्तवृत्तान्तमाह-हे प्रभो! वं नन्द तीर्थकल्लमीसमृद्धो ज्ञानादिसमृद्धो वा भव यद्वा हे नन्द!= आनन्दरूप ! यद्वा नन्दिा आनन्दोऽस्यास्तीति नन्दः अर्शआदित्वा- दच् तत्सम्बोधने हे नन्दा शाखताऽऽनन्दपरिपूर्ण ! त्वं नन्दनपर्द- देवोद्यानरूपस्थानं यदा नन्दयति भोक्षलक्ष्मीप्राप्त्या हर्पयतीतिन- न्दनं तादृशं पदं तीर्थकरपद सफलीकुरुप्म-मार्थकं कुरु । यशोदा-की- र्तिजननी कान्ता-मनोहरा असौ तव कान्तिः शोभा. मात्राभिषेक- सविशेषमरेसभूपानेपथ्यतथ्यकरणात् स्नानामिषेके तत्समय इत्यर्थः सविशेपापणा-सातिशयानामुत्तमाना वा सरेसाणांमाभोगानां परि- पूर्णानामित्यर्थः श्रेणीबद्धानामिति वा भूपाणां तीर्थकरोचितालङ्कर- जानां नेपथ्येन प्रसाधनकर्मणा तथ्यकरणानन्यायापिादनात् यद्धा मात्राभिषेक-सविशेषसरेखभूपामिः नेपथ्यस्य-तीर्थकृत्कर्मकमण्डनी- करणस्य तथ्येन यथावद्रूपेण करणा-निष्पादनात् मुभगाकृतित्व सुभगा-सुदृश्या आकृतिः-स्वरूप यस स तद्भावस्तत्वं सुदृश्यरूपतां सौन्दर्यमित्यर्थः वर्द्धयतु इति तीर्थकरपश्चकसाधारणोऽर्थः ।
आचार्य श्री विजयामृतस्त्रिप्रणीता सरणी टीका MMm PAN श्रीरामचन्द्रपक्षे-हे प्रभो! त्वं नन्द शौर्यादिगुणममृद्धोभव। नन्दनपद-पुत्रमम्पाद्यपित्राजापालनादिकार्यस्थानं सफलीकुरुप्प । य- शोदा कान्ताऽसौ तव कान्तिः स्नात्राभिपेक्सविशेपमसभूपाने पथ्यतथ्यकरणात् सुभगाकृतित्वं वर्द्धयतु । श्रीकृष्णवासुदेवपक्षे हे विभो ! त्व नन्दनन्दनपद-नन्दस्य- गोपाधिपविशेपस्य नन्दनपदं-पुत्रपदं सफलीकुरुप्प । यद्वा हे नन्दन- न्दन नन्दपुत्र ! तं पदभासदेवव्यवसितं शिष्टाऽनुग्रहदुष्टनिग्रहा- दिरूपं सफलीकुरुष्व । यशोदा-तदभिधाना कान्तानन्दगोपभार्या- ऽपि तर कान्ति-रसौ-कान्ति=शोभा तेजो वा रसं-वीर्य बर्द्धयतु । तथा स्नानाभिपेकसविशेपसरेसभूपानेपथ्यतथ्यकरणात् सुभगाक- तित्वं ब्रजेति शेपः ॥ ७॥ इत्युद्दिशन् सदसि संगमने गवेशां, शकः क्रमोपनतमच्युतमैक्ष्य भक्त्या ॥ तच्छासनेन विधिना सहितः सराम- मीशानमेव हरिमत्र पुरो व्यधत्त ॥८॥ अन्वय -शक इत्युद्दिशन् गवेशा सगमने सदसि मोपनतम् अध्यु- तम् ऐक्ष्य भक्त्या तच्छामनेन विधिना सहित सरामम् ईशान हरिं पुर ग्य. धत्त । रामपक्षे च शक्र रामम् ईशान हरिम् अन पुरो व्यधरा । कृष्णपक्षे-स शक्र इत्युद्दिशन गयेशा सगमने सदमि क्रमोपनतम् अच्युतम् ऐक्ष्य भक्त्या तच्छासनेन सहित रामम्-अभिरामम् ईशान हरिम् मत्र पुरो व्यधत्त ॥ ८ ॥ व्याख्या-शक: सौधर्मेन्द्रः अनुपदोक्तवासवनामदेव इत्यर्थः इत्युद्दिशन् इति पूर्वोक्तप्रकारेण उद्दिशन् उचैर्वदन् गवेशां-त्रिदिवे- , शानामिन्द्राणां संगमने-सम्मेलके सदसि-गोष्ठयां क्रमोपनतंप्रभुः चरणयोरानतं तदन्तिकमुपस्थितं वा अच्युतम्-एकादश द्वादश देव-
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महोपाध्यायधीमेघविजयगणिपिरचिते मप्तसन्धानमहाकाव्ये
लोकाधिपम् ऐक्ष्य-सम्यनिभाल्य भक्त्या अनुरागेण तच्छासनेन=
अन्युताज्ञया
विधिना विधानेन सहितः विधानपूर्वकमित्यर्थः
सरामतीर्थकरसहितम् ईशानं हरिम् ईशानेन्द्रं पुअग्रतः पूर्वा-
ऽभिमुखं वा व्यधत्त-विहितवान् अतिष्ठिपदित्यर्थः इति तीर्थङ्करप.
श्वकसाधारणोऽर्थः ।।
श्रीरामचन्द्रपक्षे-मः- मसिद्धः शक्रः महीमहेन्द्रः इत्युद्दिशन्
गवेशां=महीपतीनां संगमने सदसि क्रमोपनतम् अच्युतम् ऐक्ष्य
भक्त्या तच्छासनात् विधिना सहितः राम-तदाख्यम् ईशानम् ईशि-
तारं हरि चलदेवम् अत्र अष्टापदपर्वतस्थस्नात्रसिंहासने पुरः पूर्वाभि-
मुखमेव व्यधत्त ।
श्रीकृष्णवासुदेवपक्षेतु-स शक्रः इत्युद्दिशन गवेशां महीप-
तीनां गोपालानां वा संगमने सदसि क्रमोपनतम् अच्युतम् ऐक्ष्य
भक्त्या तन्छासनात् विधिना सहितः रामम् अभिरामम् ईशानं-द्वार-
काया ईशितारं हरिंम्चासुदेवम् अत्र-गोवर्धनपर्वतवर्तिमानसिंहासने
पुर। पूर्वाऽभिमुखं व्यधत्त । शब्दार्थोभयश्लेपः। गौः स्वर्गे च वली-
वर्दे रश्मौ च कुलिशे पुमान् । स्त्री सौरभेयी-दृग-चाण-दिग्-वाग्-
भूप्वप्सु भूग्नि व इति मेदिनी ॥ ८ ॥
क्षीराम्बुधेरिव पयोभिरिहाभिपेकं,
चके क्रमेण मणिकाञ्चनरूप्यकुम्भैः ॥
देवस्य तस्य वरचन्दनचन्द्रलेपा-
दभ्यर्चनानि दधतेस्म शची सरूपाः॥९॥
अन्वयः- शक इह क्षीराम्बुधेरिव पयोभिः (भृतैः) मणिकाञ्चनरूप्यकु
'भैः क्रमेण देवस्य अभिषेकं चक्रे, सरूपा शची (शचीशरूपाश्च) तस्य वरच
न्वनचन्द्रलेपातू अभ्यर्चनानि बघतेस्म ॥ ९॥
११९ AvM anvvvm MAA भाचार्यश्री विजयामृतसूरिप्रणीता मरणी टीका. व्याख्या-शक्रः इह-अतिपाण्डुकम्बलशिलापीठे क्षीराम्बुधे- - रिच-क्षीरसागरस्येव पयोभिः क्षीरैरम्बुभिः पयः क्षीरे च नीरे च इत्यनेकार्थसंग्रहः भृतैरिति शेषः मणि-काञ्चन-रूप्यकुम्भैः मणि- मय-सौवर्ण-राजतकलसै क्रमेण परिपाट्या प्रथम मणिमयेन ततः सौवर्णेन तदनु राजतेन कलसेनेत्येवं क्रमपूर्वकमित्यर्थः देवस्य द्योत. 'नशीलस्य प्रभोः जिनदेवस्य अभिपेकं-स्नानं चक्रे । तदनु सरूपा रूप-सौन्दर्यशालिनी शची इन्द्राणी प्रशस्ताः शचीशाः इन्द्राः शचीशरूपाश्च शचीसरुपा इत्यत्र तन्त्रम् तेनास्य भङ्गाभङ्गाभ्यामर्थद्वय- परत्वम् श-सयोश्चैकत्वात् । सुगन्धिवाससा सम्मृष्टयपुपः तस्य-देवस्स वरचन्दनचन्द्रलेपात्-वरं-कुङ्कुम, चन्दनं-तैलपर्णिक-गोशीप-हरि- चन्दनादिकं चन्द्रः-कर्पूरस्तैः लेपात्-विलेपनात् अhर्चनानि पूजाः दधतेस्म-कुरुतेस्म । शचीपक्षे दधधातोः प्रथमपुरुपैकवचनं, शची- रूपपक्षे च धाधातोः प्रथमपुरुषबहुवचनरूपम् । चलदेवपक्षे-शक्रः-महीमहेन्द्रः इह-अष्टापदपर्वतस्थस्नानपीठे क्षीराम्बुधेः पयोभिरिव मणिकाञ्चनरूप्यकुम्भैः क्रमेण अभिपेकं चक्रे ततः शचीसरूपाः-शच्याः समान रूपं यासां ताः तथोक्ता राज- महिष्यः सुगन्धिनिर्णिक्तवसनेन प्रमृष्टगात्रस्य तस्य श्रीरामचन्द्रवलदे- वस वर-चन्दन-चन्द्रलेपात् अभ्यर्चनानि दधतेस्म । वासुदेवपक्षे-शक्रः इह-गोवर्द्धनपर्वतोपरिवत्तिनानपीठे क्षीरा- म्युधेरिव पयोभिः क्षीरैः भृतैः मणि-काञ्चनरूप्यकुम्भैः क्रमेण देव- स्य वासुदेवस्य श्रीकृष्णचन्द्रस्येत्यर्थः देवदत्तो दत्त इतिवत् नामैक- देशग्रहणे नामग्रहणात् अभिषेक-लात्रविधि चक्के । तदनु मुगन्धिनि- णिक्तां शक्रेण प्रमृष्टकलेवरस्य तस्य श्रीकृष्णवासुदेवस्य वरचन्दन- चन्द्रलेपात् अभ्यर्चनानि-नानाविधपूजाः दधतेस्म ।। शब्दार्थोभय-
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महोपाध्यापश्री मेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाये
श्लेपः, वीराम्युधेरिवेत्यंशे उत्प्रेक्षा च. अथ कुङ्कुमम् । चन्द्रः कर्पूर-
काम्पिल्ल-सुधांशु-स्वर्ण धारिषु इति मेदिनी ॥ ९॥
सारात्रिका प्रवरमङ्गलदीपयुक्तिं,
• सम्यग् विधाय सह गीतविनीतनृत्यैः ॥
साष्टोत्तरं शतमितैश्च नवीनकाव्यै--
स्तुष्टाव तुष्टिभरपुष्टमना गवेन्द्रः ॥ १० ॥
अन्वय,-गवेन्द्रः गीतविनीतनृत्यैः सह सारात्रिका प्रवरमगलदीपयुनि
विधाय तुष्टिभरपुष्टमना.सन् साष्टोत्तरं शतमित: नवीनकाव्यैः स्तुति चकार।॥१०॥
व्याख्या-गवेन्द्रः बृहस्पतिः स्वर्नायको वा। राम-कृष्णपक्षे
गवेन्द्र:-भूमहेन्द्रः गीतविनीतनृत्यैः-गीतानि-गानानि विनीतनृ.
त्यानि-उदारचरितयोग्य नर्तनानि तैः सह तत्पूर्वकमित्यर्थः सारा
त्रिकाम्-नीराजनक्रिपया सहिता प्रवरमङ्गलदीपयुक्ति-स्नेहदशास-
मृद्धिकलित-माङ्गलिकविशिष्टप्रदीपयोजनां सम्यग् विधाय-उत्तार्य
तुष्टिमरपुष्टमनाः-मन्तोपातिशयनिर्भरचेताः मन् साटोत्तरशतमितैः-
अष्टोत्तरशतसंख्यकैः नवीनकाव्यैः-अभिनवस्तुत्यात्मककाव्यैः तुष्टाव
स्तुतिंचकार ।। १०॥
एवं सुरासुरकृताऽभिपवोत्सवश्री-
देवः प्रभावविभवाऽनुभवत्रयेण ॥
अङ्गुष्ठजामृतसमाशनलब्धिपूर्ण-
स्तुणे सनन्दभवने ववृधे शशीव ॥ ११ ॥
अन्वय---एव सुरासुरकृताऽभिपत्रोत्सवधी अगुष्टजामृतसमाशन ब्धि.
पूर्णः प्रभाव-विभवाऽनुभवत्रयेण देवः स नन्दभवने (सनन्दभवने) शशीर
तूर्ण ववृधे ॥ ३॥
भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-३ १२1 vah our व्याख्या-एवम् पूर्वोक्तप्रकारेण सुरासुरकृताऽभिपवीत्सवश्रीः सुरैः-देवैः असुरैः भुवनपतिविगेपैश्च कृता-सम्पादिता अभिपवोत्स- वश्रीः स्नात्रोत्सवशोभा यस्य सः। अङ्गुष्ठजामृतसमाशनलब्धिपूर्णः अङ्गुष्ठजाऽमृतं-जिनेन्द्राः स्तन्यपायिनो न भवन्तीति क्रम विजानता नाकनायकेन स्वभक्तिशक्तियशतः प्रभोरतिनिर्मले हस्ताङ्गुष्ठतले सञ्चा- रितसुधा तस्य समाशन सम्=सम्यक्. आ=मर्वतो भावेन अशनं भोजनं पानमितिभावः तद्रूपा लब्धिः अतिशयविशेषस्तया पूर्ण:= सम्पन्नः यद्वा अटजामृतरूपं यत् समाशनं-शोभनभोजनं तस्य' लब्ध्या लाभेन पूर्णा-भृतः पुष्ट इत्यर्थः जिनेन्द्रदेवः प्रभाव-विभवा- ऽनुभवत्रयेण-प्रभावः तेजः शान्तिर्वा मामर्थ्य वा विभवः ऐश्वर्यम् अनुभव: ज्ञानविशेपम्तेषां त्रयेण=त्रिकेण देवः द्योतमानः सः प्रसिद्धः पक्रान्तो वा जिनेन्द्रदेवः नन्दभवने प्रागदक्षिणद्वारप्रामादे यद्वा सनन्दभवनेनन्दया सम्पत्या-त्रिदिवेशनिदेशेन तीर्थेशपितुयें- श्मनि धनपतिमुक्तरूप्य-रत्ननन्दासनभद्रासनाऽनेककोटिमितकाञ्च. नादिरूपममृद्धि महिने भवनप्रासादे शशी चन्द्रमा इव तूर्ण शीघ्रम् अल्पकालेनेत्यर्थः ववे-वृद्धिम् अवयवोपचयं लेभे। नन्दामंपद्य लिजरे इत्यनेकार्थसंग्रहः । इति तीर्थकरपक्षीयोऽर्थः ॥ बलदेवपक्षे-एवं सुरासुरकृताऽभिपयोत्सवश्रीः सुरासुरकृतो योऽ- भिपयस्तद्वदुत्मवश्रीः जन्मोत्सवशोभा यस्य सः अङ्गुष्ठजाऽमृतसमा- शनलब्धिपूर्णः अङ्गुष्ठजनितसुधापानोपलन्धिपरिपुष्टः देवः प्रभाव- विभवा-ऽनुभवत्रयेण मह सनन्दभवने -प्रभूतसम्पत्तिशालिसदने शशीव तूर्ण वृधे। वासुदेवपक्षे-तृतीयचरणपर्यन्तं रामपक्षवद्याख्याय मा प्रसिद्धो , देवा श्रीकृष्णवासुदेवः नन्दभवने नन्दगोपवेश्मनि प्रभाव-विभवा. ऽनुभवत्रयेण सार्दू शशीव तूर्ण यवृधे ।। १३ ।।
१२२ महोपाध्यायधीमेवरिजयगणिरिचिते मप्तसन्धानमहाकाये AMAAR - नाम्नान्वयेन कलितः कलितन्त्रहारी, पित्रा दधे स्वजनभोजनरञ्जनायैः ॥ निर्वाधसाधनविधिः शतशो जिनार्चा- निम्र्माणनमणि परं कृतकर्मणापि ॥ १२ ॥ अन्धयः-फतकर्मणा पित्रा स्वजनभोजनरलनायः कलितन्त्रहारी (म:) नानाऽन्वयेन वलितः आदधे । शतशः जिनार्चा निर्माणनमणि निर्वधमाधन- विधिः आपि ॥ १२॥ व्याख्या-कृतकर्मणा=पुण्यकर्मवता पित्रा-जनकैन 'द्वादशे- ऽन्हि पितानामकुर्यादिति शास्त्राज्ञानुसारेण द्वादशे दिने इति शेपः स्वजनभोजनरञ्जनायैः-स्वजनेभ्यः बन्धुजनेभ्यः यद्वा स्वेभ्यः बान्धः वेभ्यः जनेभ्यःमाधारणलोकेम्यः भोजन भोज्यदानं रञ्जन-संगी- तकादिना मनोविनोदनम् आदिना नगरमार्गसंस्कारादिस्तैस्तत्पूर्वक- मित्यर्थः कलितहारी-कलिविजृम्भितविनाशनशीलः सः इति शेपः प्रकृतपुत्रः नाम्ना अभिधानेन अन्वयेन वंशे च कलितः अन्वितः आदधे-चके । किञ्च शतशः बहुशः 'शतं सहस्रमयुतं मर्वमानन्त्य- वाचकम् । इत्युक्तेः । जिना निर्माण नर्मणि-जिनपूजन विधानरूपेष- स्करकार्यनिर्वाधमाधनविधिः-निर्वाधः प्रतिबन्धरहित:माधन विधिः- सम्पादनक्रिया आराधनाप्रकारो वा आपि-प्रापि लब्ध इत्यर्थः॥१२॥ अभिधानान्येव सप्तार्थ केनाह-- सर्वज्ञराजिवृपभः कृतशान्तिकर्मा- मिर्वतानसि शशिद्युतिवर्धमानः । पार्श्वः स्वमातृशयने-क्षितदुर्जनाङ्गे- कृष्णः पयोदविभया प्रभया स रामः ॥१३॥ - . - भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-३ अन्वयः-सः सर्वज्ञराजिवृषभः कृतशान्तिकर्मा, व्रतानसि नेमिः, शशि. द्युतिवर्धमानः क्षितदुर्जनानेस्वमातृशयने पार्श्वः पयोदविभया प्रभयाऽकृष्णः सरामः (अभूत्) । २ पक्षे-कृतशान्तिका ३ घतानसि नेमिः, पयोदविभया. प्रभया कृष्णः । ४ पक्षे-क्षितदुर्जनाङ्गे स्वमातृशयने पार्श्वः पयोदविभया प्रभया कृष्णः । ५ पक्षे-शशिद्युति वर्धमानः, पयोदविभया प्रभया अकृष्णः । ६ पक्षे स रामः सर्वज्ञराजिवृषभः...पयोदविभया प्रभया कृष्णः । ७ पक्षे-कृष्णः पयोदविभया प्रभया उपलक्षितः, स्वमातृशयनेक्षितदुर्जनाने पावः शेपं सर्वत्र पूर्ववत् ॥ १३ ॥ व्याख्या-सा प्रकृतः सर्वज्ञराजिपमा सर्वक्षेषु जिनेषु राजते शोभते तच्छीलः सर्वज्ञराजी वृपभो लक्ष्मरूपेणास्त्यस्येति वृपभः सर्व. ज्ञराजी चासौ वृपभश्चेति मः यद्वा सर्वज्ञानां राजौ-श्रेण्यां वृपमा श्रेष्ठः सर्वप्रथमत्वात् स तथोक्तः अथवा सर्वज्ञराजी चासौ वृपभः उवों- पभ ( बलीवर्द ) लाञ्छनमभूद्भगवतो जनन्या च चतुर्दशानां स्व- मानामादौ वृपभोरष्टस्तेन तदाख्याप्रथमतीर्थकरः। कीदृशः कृत- शान्तिका कृतं जगतां शान्तिकर्म-मकलोपसर्गोपशमनलक्षणक- त्यं येन सः बतानसि-अहिंसादिवतरूपशकटे नेमिः चक्रधारारूपः। शशिद्युति बर्द्धमानः शशिन: चन्द्रस्येव द्युतिः कान्तिबर्द्धमानाs- स्येति सः शशिवद् द्युत्या बर्द्धमान इति वा शशिद्युतिववर्धमान इति पा स तथोक्तः। क्षितदुर्जनाने-क्षितं-पीडितं दुर्जनानां खलानां शत्रूणाम् अङ्गं येन तत् तसिन् राजः पुत्रजनने वैरिणां पीडोत्पत्तेः वादशे स्वमातृशयने स्वस्थ माता-जननी तस्याः शयने शय्यायां पार्श्वः पार्थ =कक्षाधोभाग इव | पयोदविभया पयोदस्य-वृष्टजलमे- घस्येव विभा शोभा यस्याः सा तया तादृश्या प्रमया-दीप्त्या अकृष्णा गौरः पयोदकथनात् पयोदानाव-चर्पणात्-परं मेघस्य शुभ्र- त्वात् । पुनः स रामः रमणं रामः-आनन्दम्तेन सहितः अभूव इति प्रथमपक्षीयोऽधः।
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्य unww MANA MA शान्तिनाथपक्षे-'कृतशान्तिका इति विशेष्यम् तस्य कृतं जनितं शान्तिकर्म=अशिवोपशमनरूपकृत्यं गर्भस्थेनापि येन सः अग एव पित्रा शान्तिः इति कृतनामधेयः श्रीशान्तिनाथप्रभुरित्यर्थः । सर्वज्ञराजिपमा सर्वज्ञराजिपु-सामान्यकेवलिपु वृषभः श्रेष्ठः । अ- न्यत् पूर्ववत् । - .. नेमिनाथपक्ष-मिरिति विशेष्यम् । तथा च-प्रतानसि वतरूपरथे नेमिरिव नेमिः तदारुयः इत्यर्थः शशिद्युतिवर्द्धमानः-- शशिद्युतिवत्-चन्द्रकलेव बर्द्धमानः अनुदिनमुत्तरोत्तरमुपचीयमानः पयोदविभया प्रभया हरित कान्त्याऽञ्जनात्या कृष्णा श्यामलः अञ्जनाभ इत्यर्थः । शेषं पूर्ववत् । पार्श्वनाथपक्षे-क्षितदुर्जनाङ्गे स्वमातृशयने पाच इव पाच:= तदाख्य इत्यर्थः श्रीपार्श्वनाथ इति यावत् । पयोदविभया प्रभया= नीलिमकान्त्या कृष्णा नीलः ऐन्द्रनीलमणिमेचकच्छविरित्यर्थः शशि- शुतिवर्द्धमानः चन्द्रकलेववर्धिष्णुः । शेपं पूर्ववत् । श्रीमहावीरपक्षे-शशिधुतिवर्धमानः शशिन इव टुतिर्यस्य स... चासौ वर्द्धमानः उत्पत्तेरारभ्यज्ञानादिभिर्वर्धते इति गर्भस्थे भगवति' ज्ञातकुलु धनधान्यादिभिर्वर्धते इति वा सः वर्द्धमानस्तदाख्यः पयो. दविभया प्रभया अकृष्णः गौरः । शेपं पूर्ववत् । श्रीरामपक्षे-सर्वज्ञराजिपमा सर्वज्ञेषु जिनेषु राजते तच्छील: सर्वजराजी स चासौ वृपः-धर्मः आईतप्रवचनप्ररूपित लक्षणस्तेन भाति-शोभते इति सः यद्वा सर्वे ज्ञाः पण्डितास्तेषां राजौघेण्यां वृषभः श्रेष्ठः पुरुषोत्तमत्वात् । शशिद्यतिवर्द्धमानः चन्द्रकलेवद्धिशील: पयोदविभया प्रभया कृष्णा श्यामलकान्तिः सम्प्रसिद्धः रामः- दाशरथिरामबलदेवः राम इत्येतनामक इत्यर्थः अभूत् शेपं.पूर्ववत् ।।
. आचार्यश्री विजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-1 . श्रीकृष्णवासुदेवपक्षे-कृष्णा इत्येतत्कृतनामधेयः पयोदविभया प्रभया उपलक्षितः नूतनजलधररुचिरित्यर्थः। स्वमातृशयनेक्षितदुर्ज- नाङ्गे-स्वमात्रा-देवक्या शयने ईक्षितं यद् दुर्जनस्य-दुष्टात्मनः कंस स्याङ्ग तसिन् पार्श्व इव-पशुसमूहवान् इवच्छेदकत्वात् पशूनां समूहः पार्थ तदस्यास्तीति पार्श्वः अर्शआद्यच् शेपं रामवत् ।। १३ ॥ आराम एव मरुतां तरुवन्नमेरो- रारात् स्थितः सपदिवृद्धिमियाय गोणीम् । आमोदिनां सुमनसां निकरैः परीतः, स्फीतोऽभिनन्दितसुपात्रविलासिगात्रः ॥ १४ ॥ अन्वयः-मरताम् आरामे एव नमेरोः भारात् स्थितः (कुमारः) तर. वत् सपदि गौणी वृद्धिम् इयाय । आमोदिनां सुमनसां निकरः परीतः स्फीतः अभिनन्दितमुपानविलासिगानः ॥ १५ ॥ व्याख्या- मरुतां देवानाम् 'मरुतो पवना-ऽमरो' इत्यमरः । आराम लीलोपरने एव नमेरोः छायावृक्षस्य 'छायावृक्षो' नमेरुः स्यादितिशब्दार्णवः यद्वा सुरपुन्नागवृक्षस नमेरुः सुरपुन्नाग - इति वैजयन्ती। आरा-समीपदेशे 'आरा-समीपयो'-रित्यमरः स्थितः कुमारः तरुवत् वृक्ष उघ सपदि झगिति गौणी-वृक्षपक्षे प्राथमिकी, कुमारपक्षे गुणसंपन्धिनी वृद्धिम् उपचयम् इयाय प्राप। आमोदिनां तीर्थकरजन्मोत्सवामिनयनजनिततोपेण परमानन्दशालिनां सुमनमां- देवानां नरुपक्षे-आमोदिनाम् अत्यन्तमनोहरपरिमलशालिनां सुम- नमां-पुप्पाणां निकतममूहः परीतः सेवितः अन्यत्र व्याप्तः । स्फीता गुणेः समृद्धः अन्यत्र पुप्प-फलपष्टवादिसमुपचितः अमि- नन्दितमुपात्रविलासिगात्रा अभूदिति शेपः ॥ १४ ॥ - महोपाध्यायधीमेघविजयराणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये AAAAA IN vvv VAvM क्रीडा महीशरुचिताड्युचिताः कुलीने- ऽप्यापीडधारिणि कुमारवरे न कापि । पीडाऽन्ववापि जनरञ्जनमेव जातं, स्वातन्त्र्यमस्य भुवि तत्पितुराज्ञयैव ॥ १५ ॥ अन्वयः--भापीधारिणि कुलीने कुमारवरे महीशरुचिताः उचिताः क्रीडाः (कलयति सति) कापि पीडा न अन्ववापि (कुमारेण) भस्य स्वातन्त्र्यं भुचि तस्पितुराज्ञयैव (प्राप्त) जनरञ्जनमेव जातम् ॥ १५ ॥ व्याख्या-आपीडधारिणि-शिरोभूषणशालिनि कुलीने प्रशस्त- कुलसंभचे कुमारवरे महीशरुचिताम्राज्ञोऽमिमताः उचिता शैशवा- वस्थायोग्याः तास्ता मनोविनोदनसाधनीभूताः क्रीडा:-क्रीडनानि चाललीला इत्यर्थः कलयति सत्तीतिशेपः कापि पीड़ा=आयासन अन्ववापिम्न प्राप्ता कुमारणेत्यर्थः किञ्च अस्य-कुमारस्य स्वातन्त्र्यं तत्पितुराज्ञयैव-तज्जनकादेशेनैव प्राप्त न तु स्वयमेव गृहीतं एवमपि जनरञ्जनं-लोकरञ्जकमेव जातं नत्वितरराजराजपुत्राणामिवापितृदत्तं स्वातन्यं जनपीडनाय जातमित्यर्थः । ॥१५॥ कोमारकीमपि कलां कलयन्नजस्त्रं, विस्त्रम्भमेव विदधे भुवि मुक्तरम्भः। तारुण्यमस्य निगमस्य शमस्य लब्धे- रब्धेरिवाऽजनि सदावधिसंनिधानात् ॥ १६ ॥ भन्वयः- कौमारी कलाम् भजनं कलयन् मुक्तरम्भः ( असौ ) भुवि विश्रम्भमेव विदधे । निगमस्य शमस्य च लम्धेः अस्य तारण्यम् सदावधिसं- निधानात् अन्धेरिव भजनि ॥ १६ ॥ व्याख्या कौमारकी कुमारः पञ्चवर्षीयो-चालकस्तत्सम्बन्धिनी १२७ v ~ ~~ AhA NW AAVA भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता मरणो टीका. सर्ग-३ कलां चेष्टाम् अजस्रम् अनवरतं कलयन् कुर्वन् मुक्तः रम्भः परि- त्यक्तराजमभावः त्यक्तारम्भो वा भावितीर्थकरत्वात् मुक्तदम्भ इति पाठान्तरे निष्कपटः अमौ कुमारः भुविमहीतले विश्रम्भं विश्वास प्रणयं वा विदधे जनयामाम । किश्च निगमस्य-शास्त्रस्य शमस्य- शान्तेश्च लब्धेः-लब्धिरूपस्स अस्य-कुमारस्य तारुण्यम्-यौवनम् अ- ब्धेः-समुद्रस्येय जनतानन्ददायकम् अजनि-अभूत् अत्र हेतुमाह-, सदावधिसंनिधानात्-मदैव अवधिः-(कुमारपक्षे) नीतिमर्यादा (अन्धि- पक्ष) नीरमर्यादा तस्य संनिधानात् मामीप्यात् ममीपावस्थानात् । अथ च मुक्तरंभः मुक्तात्यक्ता रंभा तदाख्यदेवांगना येन सः कुमारा- वस्थायां प्रमोः सेवार्थमागच्छतिस्म सेति भावः यद्वा मुक्ता निवृत्तारंभा गौरी अष्टवावस्था यस्य सः अथवा रम्यते उच्यते इतिरंभः अव्यक्त शब्दः मुक्तः परित्यक्तारंभः पालावस्थाजनिताव्यक्तशब्दो येन सः । सदायधिसंनिधानात् मदा जन्मत एव अवधेऽवधिज्ञानस्य संनिधाना. दाश्रयादित्यर्थः ॥ १६ ॥ पोतस्तरत्यपि महाह्रदमध्यनीरं, गाम्भीर्यशालि वयसः पटुपक्षभाजः । किञ्चोच्यते नभसिसंगतिरेतदीया, तत्कारणेन महतःप्रतिपत्तिरुक्ता ॥ १७ ॥ भन्यप.-पटुपक्षभाउ पयमः पोतः भपि गाम्मीयंशानि महादम. पनीर तरनि । प्रतदीया नभमि मगति. उप्पने (जने ) नाकारणेन महतः प्रतिपत्तिः उहा...॥ व्याख्या-पटुपक्षमाजाउलयनसमर्थपक्ष-गरून-शालिनः वय- मा-पक्षिणः पोता शिशुपालोऽपि गाम्भीर्यपालि-अतिगम्भीर महाहरूमापनीर-नदीनदपानीयमध्यं दुतरमपीतिमारः तरति । किश १२८ vv vv महोपाध्यायधीमेपविजयगणिविरचिते सप्तमन्धानमहाकाम्ये एतदीया-पक्षिशायकसंबन्धिनी नभसि अनवलम्बने महाविशाले आकाशेऽपि संगतिः-संगमः संबन्धस्थितिरिति यावत् उन्यते जनः । एतत्सर्व पटुपक्षभाजः पक्षिणः परिश्रमेणैव भवति । तत्कारणेन- तस्माद्धेतोः महता महीयसः प्रतिपत्तिा सेवा आराधना संगतिर्वा उक्ता कर्त्तव्यत्वेन नीतिः कथितेत्यर्थः । किन गांभीर्यशालि अनौ. त्यशोभिवयसः शरीरावस्थाविशेपस्य किश्च पटुपक्षभाजः चतुरसहा- यस्य पोतः शिशुः महाहदमध्यनीरं समुद्रवद्दुरवगाहजलाशयमध्य- जलमिव नितान्तकठिनमपि बुद्धिगम्यकार्यजातं तरत्यपि तरत्येच "एवार्थकोऽपिः " मदुस्तरमपि चिन्तनीय कार्यजातं बुद्धिप्रभावेण सरलयतीति भावः । अत्र-विषय इति शेषः एतदीया प्रभावशालि- बालकमम्बन्धि नभसि संगतिः निर्मलगाम्भीर्य संगतिरेव करणत्वे- नेति शेपः उच्यते अभिधीयते मनोरमहृदयावधानमेवहेतुत्वेनोत्प्रेक्ष्यते तत् कारणेन महतः मञ्जनपुरुपस्य संगतिरुक्ता कथिता महतां संगतिः अवश्यमेवविधातव्येत्यर्थः ॥ १७ ॥ बाल्यं व्यतीत्य तरुणस्तरुणैव साम्यं, धत्ते फलैरपि कलैः किशलेदलै वा । संपूर्णतामनुनयन् सुमनोभरेण, सामोद एव कृतया-बनसम्पदा स्यात् ॥ १८ ॥ अन्वय -(कुमारः) बाल्य व्यतीत्य तरुण तरणैव साम्य धत्ते । परैः करः किशलेदश्च । सुमनोभरेण संपूर्णताम् अनुनयन् कृतया वनसम्पदा सामोद एव स्यात् ॥ १८॥ व्याख्या-महत्प्रतिपत्तिवान् कुमारः बाल्प-शैशवावस्थां व्य- तीत्य-अतिक्रम्य तरुणः यौवनस्थः सन् तरुणा-वृक्षण एव साम्यं सादृश्यं धत्ते धारयति करित्याह-फलैः परोपकारादिकायः पने- सस्यैः प्रमरित्यर्थः । कलै कलाभिः पक्षे पक्षिणां मधुराव्यक्तशब्दैः ।
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आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता मरणी रोका. सर्ग-३
किशलैर्दलै पछववत्मघनः सैन्यैः पक्षे पल्लवै पत्रैश्च । किञ्च सुम-
नोभरेण पण्डितवर्गेण संपूर्णताम् अनुनयन्प्राप्यमाणः कृतया अव-
नसंपदा रक्षणमम्पच्या सामोदा सानन्द एव स्यात् वृक्षपक्षे-पुष्प-
समृद्ध्या सम्पूर्णतां प्राप्यमाणः वनमम्पदा-बनलक्ष्म्या सामोदा
अत्यन्तजनमनोहरमुगन्धिमाहितः स्यात् । किशलः पल्लव इति शब्द-
स्तोममहानिधिः । लिटोपमा ॥ १८ ॥
नम्रीभवेत् सविटपोऽपि वटो जनन्या,
भूमो लता-परिवृतो निभृतः फलाद्यैः ।
को-लीनतामुपनतां निगदत्ययं किं,
सम्यग्गुरोविनय एव महत्त्वहेतुः ॥ १९ ॥
अन्य-रना-परिवृत फराध निभृत: मविटप. अपि वो जनन्या
भूमी नम्रीभवेत् ( किन्तु ) भयं उपनताम् भारमन• कोलीनता कि निगदनि
गुरोः सम्यग् विनय पर महाव हेतु ॥ १९ ॥
व्याया-लतापग्वृितः वल्लीभिर्याप्तः फलाद्यैः फल-पत्रा.
दिमिः निभृतः पूर्ण: मविटपागासादिसहितः अपि वटा न्यग्रोधः-
वृक्षः जनन्या खोन्पत्तिहेतुभूतायां भूमौ पृथिव्यां नम्रीमवेद
पृथ्वीममिनतोभवतीत्यर्थः परम् अयं बटः उपनतां प्राप्ताम् आत्मनः
कौलीनताम् आभिजात्यं को-पृथिव्यां लीनतां च किं निगदति स्वयं
प्रकटपति नैव निगदतीत्यर्थः युक्तं चैतत् पत्तः गुरोः सम्पम् विनयः=
शिक्षा एव महत्त्वहेतुः महिम्नः कारणं भवति । अत्र ममासोक्या-
ऽप्रस्तुतप्रशंमपा वा इदमर्थान्तरं चन्यते यत् धनजनयौवनरूपमम्प.
मोऽपि जनो विनयाऽअननो न स्वीयमहत्वं स्वयं प्रकटयति किन्तु
तदीपविनय एय तम्याऽऽभिजात्यं महत्वं च लोके ख्यापयति ।
कुमारोऽपि राजराजपुत्रस्तारुण्यमनोहरः मर्मगुणसम्परसमृद्धः मनपि
गुरुजनेषु विनयापनत आसीदित्यर्थः ॥ १९ ॥
१३० महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते मप्तसन्धानमहाकाव्ये vvv ~~ vv तेजो वहन्नसहनो दहनः स्वजन्म- हेतून् ददाह तृणपुञ्जनिकुञ्जमुख्यान् । लेभे फलं त्वविकलं तदयं कुनीते- भस्मावशेपतनुरेप ततः कृशानुः ॥ २० ॥ अन्यय -दहनः असहन तेजो पहन स्वजन्महेतून् नृणपुञ्जनिकुञ्जमु. ख्यान् ददाह तु भय कुनीते. अनिकर तत् परं लेभे यत. एप कृशानु भस्मावशेपतनुः जात व्याख्या-विनयफलमुक्त्वाऽविनयफलमाह-दहनः अग्निः अमहना=असह्यः अमहिष्णुश्च तेजा=तापकतालक्षणस्वभावं तीव्रतां च वहन् धारयन् स्वजन्महेतून् खोद्भवनिमित्तभूतान् तृणपुञ्जनिकु- ञ्जमुख्यान-तृणराशि-लतागृहादीन् ददाह-भसीचकार । तु-किन्तु अय दहनः कुनीतेः कृतघ्ननायाः अविरलं-सकलं तत् अनिर्वचनीय फलं लेभे लभतेस यतः एप कृशानु: आश्रयाशः भस्मावशेपतनु: भस्ममानावशिष्टरूपः जातः स्वयमपि नष्ट इत्यर्थः । समासोक्त्याचाय. मर्थो ध्वन्यते असहिष्णुप्रकृतिस्तीव्रतां दधत् स्वोपजीव्यमपि रिना शयति ततश्च तत्कृतघ्नताविजृम्भितदुप्फलं लभमानोऽवसाने स्वयमपि ममूलभुन्मुलितोभवति ।। २० ॥ अस्याग्रजो न मुशली हलभन्न किन्तु, ख्यातो नवाशवलधी-रथ- नेमिरूपः । श्रीनन्दिवर्धनमतिः स्फुरितोऽनुजन्मा, सोमित्रिलक्ष्मणकलाकुशलादिनामा ॥ २१ ॥ मन्त्रय -भस्य अग्रज मुशली हरभृत् न (इति) न, किन्तु ख्यात नघाशयरधी अध नेमिरूर श्रीनन्दिवर्द्धनमनिस्फुरित सौमिनरक्ष्मणकला- - भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-३ ५५ कुशलादिनामा अनुजन्माऽभूत् ( इति कृष्णपक्षे )। अस्य रथनेमिरूपः अग्रजः मुशली न हलभृत् न किन्तु ख्यातः अशवलधी श्रीनन्दिः । मौमित्रलक्ष्मण- कराकुशलादिनामा अनुजन्मा न आसीत् अस्य श्रीनन्दिवर्द्धनमतिस्फुरितः अमजः (रोपं द्वितीयवत्)। अस्य अग्रजः न (मासीत्) । सौमित्रलक्ष्मणकलाकुशलादि- नामाऽनुजन्माऽपि मुशली हलभृच न फिन्नु ख्यातः नवाशबलधी 'मथ नेमिरूपः श्रीनन्दिवर्धनमतिस्फुरितश्च ॥ २१ ॥ व्याख्या-अस्य श्रीकृष्णवासुदेवस्य अग्रजः ज्येष्ठभ्राता मुश- ली-मुशलास्त्रभृत्, हलभृत् हलाखधारी न इति न किन्तु मुशल्येय हलभृदेव हलं मुशलं च बलदेवस्य चिह्वभूतमिति नाप्रसिद्धम् नवाशय- लधीः नवा-नवीना नवनवोन्मेपशालिनीत्यर्थः अशवला-एकरूपाधी: प्रज्ञा यस्य सः प्रतिभाशालीत्यर्थः अथ च नेमिरूपा नेमिपु-दुर्गवत्सु प्रशस्तः नेमिरूपः। श्रीनन्दिवर्द्धनमतिः श्रिया शोभायाः कीर्तेर्वा, नन्देः आनन्दस्य च वर्द्धने मतिर्यस्य मः श्रियं नन्दि च बर्द्धयतीति श्रीनन्दिवर्द्धना तादृशी मतिर्यस्येतिया, श्री कल्याणी नन्दिवर्द्धने मित्रे मतिर्यस्येति स तथोक्तः। स्फुरितः स्फूर्तिशाली । अनुजन्मा= कनिष्ठभ्राता गदः 'अनुजो गद' इत्यमरः सौमित्रलक्ष्मणकलाकुशला- दिनामा शोभनं मित्रमस्यासौ सुमित्रः शोभनं मित्र सुमित्रमिति वा स एव (तदेव ) सौमित्रः (4) लक्ष्मणः-लक्ष्मीवान् , कलाकुशल इत्यादिभिर्मायते-ऽभ्यस्यते इति स तथाऽभूत् । नेमिनाधपक्षे-अस्य श्रीनेमिनाथप्रभोः स्थनेमिरूपा रथनेमिनामा अग्रजः मुशली-मुशलधारी न हलभृत्-हलधरो न किन्तु ख्यातः= लोके विदितः शवलधीः श्रीनन्दिवर्द्धनमतिः स्फुरितः। सौमित्रलक्ष्म. णकलाकुशलादिनामाऽनुनन्मा नवा-नैव आसीत । श्रीवीरप्रभुपक्षे-अस्य बर्द्धमानप्रभोः श्रीनन्दिवर्द्धनमतिस्फु- रिता मतिप्रज्ञा स्फुरिता-स्फूर्तिशालिनी यस्य स मतिस्फुरितः .
१३२ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तमन्धानमहाकाव्ये RAAN Ana श्रीनन्दिवर्द्धनः तदाख्यश्वासौ मतिस्फुरितश्चेति स तथोक्तः नन्दिव ईनसंज्ञ इत्यर्थः अग्रजा ज्येष्ठभ्राता मुशली न हलभृत् न किन्तु ख्यातः नवा शवलघीः नेमिरूपश्च । सौमित्रलक्ष्मणकलाकुशलादिना माऽनुजन्मा नवा-नैवाऽऽसीत् । श्रीरामपक्षे-अस्य श्रीरामचन्द्रबलदेवस्य अग्रजा ज्येष्ठभ्रातान आसीदिति शेषः सौमित्रिलक्ष्मणकलाकुशलादिनामा अनुजन्मा- कनिष्ठभ्राताऽपि मुशलीहलभृत् च न किन्तु ख्यातः नवाशयलधीः नेमिरूपः श्रीनन्दिवर्द्धनमतिः स्फुरितश्च । सौमित्रिलक्ष्मणेत्यादेवा. यमर्थः सौमित्रिः (सुमित्रायांभवत्वात् लक्ष्मणः कलाकुशलः इत्यादीनि नामानि अस्य सः इत्यादिमिः नायते अभ्यस्यते अभिधीयते इत्यर्थ इति वा स तथोक्तः ॥ २१ ।। अस्य प्रिया न समभूत् कमलाऽनुरूपा, पूर्वा सुमङ्गलवचास्त्वपरा सुनन्दा । नाम्ना प्रभाति-रतिकृत्सुभगा च भैमी, शीतांशुपुर्णवदना सदया यशोदा ॥ २२ ॥ अन्वयः-अस्य प्रिया कमलाऽनुरूपा न समभूत? नाना च पूर्वा सुमं. गलपचाः । अपरा सुनन्दा प्रभाति रतिकृत् सुभगा भैमी शीतांशुपूर्णवदना सदया यशोदा। २ अस्य नान्ना यशोदा यशोगतीप्रिया कमलानुरूपा न सम- भूत् । अपूर्वा सुमंगरपचाः परा सुनन्दा शेप पूर्ववत् । ३ अस्य कमलाऽनु- पूर्वा यशोदा प्रिया न समभूत् । १ अस्य प्रिया नाना प्रभा-प्रभावती कम- रानुरूपा न समभून् (ने. पू.) ५ अस्य प्रिया नाम्ना यशोदा ६ अस्य प्रिया नाना शीता अंशुपूर्णवदना । . अस्य प्रिया भनी नाम्ना ॥ २२ ॥ व्याख्या-अस्य श्रीऋषभदेवस्य प्रिया-भार्या कमलाऽनुरूपा लक्ष्मीसदृशी एव न समभूव ततोऽप्यधिकरूपवतीत्यर्थः नाम्ना च भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-१ RAMA पूर्वा-प्रथमपरिणीता ज्येष्ठा सुमंगलवचाः सुमङ्गल इति बचान्याच- कशब्दो यस्याः सा सुमङ्गलाभिधेयेत्यर्थः। अपरा-द्वितीया सुनन्दा उन्नामिकेत्यर्थः । सा कीदृशीत्याह-प्रभाति रति कृत-प्रभाति-प्रकाश (तिरागं च पत्यौ करोति या सा यद्वा प्रकर्षेण भातीतिप्रभा. अति- तिंकरोतीत्यतिरतिकृत् । अथवा-प्रभया-निजवपुःकान्त्या अति अतिशयेन रति काममायाँ कृन्तति धात्वनेकार्थत्वात् जयतीति सा तथोक्ता । सुभगा=पतिवल्लभा. सुदृश्या वा शोभनैश्वर्यशालिनी वा पुनश्च भैमी-भैमीवेति लुप्तोपमा दमयन्तीव रुक्मिणीव वा पतिव्रते- त्यर्थः शीतांशुपूर्णवदना चन्द्रमुखी. सदया=नि कारणपरदुःखप्रहा- णेच्छावती यशोदा कीर्तिदायिनी । २ गान्तिनाथपक्षे-अस्य =श्रीशान्तिनाथप्रभोः नाना यशोदा यशोमती नाम्नी प्रिया कमलानुरूपा एव न ततोप्यधिकसौन्दर्यशा- लिनी समभूत् सा कीदृशीत्याह-अपूर्वा लोकोत्तरशीलमौन्दर्यशालि- त्वेन विलक्षणा सुमङ्गलवचा:-सुमंगलंहितावहत्वात् कल्याणं वचः वचनं यस्याः मा पुनः अपरासु-सपत्नीपु नन्दा-नन्दयतीति नन्दा- आनन्दयित्री शेपं पूर्ववत् । ३ नेमिनाथपक्षे-अस्स-श्रीनेमिनाथप्रभोः कमलानुरूपेत्या- दिविशेषणविशिष्टा प्रिया=पाणिगृहीती न समभूत् किन्तु आजन्मन. मचारितया निष्प्रिय एवायमवतस्थे । ४ पार्श्वनाथपक्षे -अस्य श्रीपार्श्वनाथप्रभोः प्रिया महधर्मिणी नाम्ना प्रभा-पभावतीनाम्नी कमलानुरूपा एव न किन्तु तदधिकरू. पवती समभूव शेपं पूर्ववत् । ५ वीरविभुपक्षे-अस्य श्रीवर्द्धमानप्रभोः प्रिया भायां नाम्ना च यशोदा कमलानुरूपा एव न किन्तु ततोऽप्यधिकरूपशालिनी.
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकान्ये
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त्यर्थः समभूत् । शेपं प्राग्वत् ।
६ श्रीरामपक्ष-अस्य-श्रीरामचन्द्रबलदेवस्य प्रिया-पत्नी
नाना च शीता कमलानुरूपा लक्ष्मीरूपिणी न समभूदिति काका
समभूदेवेत्यर्थः राघवत्वे भवेत् सीता रुक्मिणी कृष्णजन्मनी.
त्यन्यत्रोक्तेः। सा- कीदृशीत्याह अपूर्वा, सुमङ्गलवचामुम-
गलसतीत्वेन प्रातःस्मरणीयतया कल्याणावहं चचाउक्तिर्यस्याः ।
सा अपरासु-सपत्नीपु नन्दा आनन्दकारिणी । जनानां ममये राम-
चन्द्रस्य बहुपत्नीकत्वात् सीतायाः सपत्नीजनहर्पकारित्वोपपत्तेः ।
प्रभातिरतिकृत् सुभगा भैमी, अंशुपूर्णबदना=अंशुभिः प्रभाभिः=
कान्तिभिः पूर्ण=भृतं वदन मुसं यस्याः सा । सदया, यशोदा च
।
विवरणं प्राग्वत् ।
श्रीकृष्णपक्षे-अस्य श्रीकृष्णवासुदेवस्य कमलानुरूपा लक्ष्मी-
रूपिणी "राघवत्वेभवेत्सीतारुक्मिणीकृष्णजन्मनीत्यन्यत्रोक्तेः" भैमी
रुक्मिणी प्रिया-भार्या यद्वा भार्याणां मध्येऽतिशयप्रेमपात्रीभूता
न समभूत् काका समभूदेवेत्यर्थः शेषं पूर्ववत् ॥ २२ ॥
तेना-हता वृषभ केशिखरा विरूपा,
नव्याहताः समितिसंगतिगुप्तिकायें ।
वाग्नोदितासमिति संगतिगुप्तिकायें:-
लक्ष्यस्वरूपमत एव मतं हि तस्य ॥ २३ ॥
भन्वयः-तेन वृषभ केशिखराविरूपा अहताः समिति संगति गुप्तकार्य
ग्याहता, न समिति संगति गुप्तकार्ये वागनोदिता, अत एव तस्य मतं अल-
व्याख्या-तेन तीर्थङ्करप्रभुणा वृपभकैशिखराविरूपाः वृषभः
वृपः, केशी सिंहः, खरो मृगस्तैघान्द्वन्द्वस्ते, विरूपाश्च निरूपाश्चन्ये-
-
क्ष्यस्वरूपम् ॥ २३ ॥
आचार्यश्रीविजयामृतस्मिणीता सरणी टीका. सर्ग-३
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कशेपस्तेविरूपा चिम्पक्षिणं रूपयन्ति अन्त्रिपन्तीति विरूपाः सर्पाः
अथ च विविशब्दं स्वच्छं रूपं वर्णों येपान्ते विरूपाः शंखास्ते, अहता
नपरित्यक्ताः किन्तु स्वस्वलाच्छनरूपेण स्वीकृता एव, यथा आदी.
श्वरस्य वृपः महावीरस्य केशी सिंहः शान्तः खरः खे रमते प्लवतीति
खरो मृगः पार्थस्य विरूपः सर्पः नेमे शंख एवं रूपा इत्यर्थः समि
तिसंगतिगुप्तिकाथै ममितेः सभायाः या संगतिः सम्मेलनम् तत्र यत्
गुप्तिकार्य रहोमंत्रणम् तस्मिन् न व्याहता न हता न प्रतिबद्धा इत्यर्थः
किन्तु संगता एव तथा समितिसंगतिगुप्तिकार्य मभासम्मेलनरहो-
मंत्रणे वाग वाणी नोदिता प्रेरिता प्रयोजिता न केवलं संख्यापूरणाय
तत्र स्थिताः किन्तु स्वमतमपि तत्र प्रकाशयन्तः अत एव बागनोदनादेव
स्वमतप्रकाशनादेवेत्यर्थःतस्य जिनेन्द्रस्य मतमभिप्रायः अलक्ष्यस्वरूपं
पामरैरनधिगम्यस्वरूपम् कार्यादेव तन्मन्त्रितं ज्ञायते न पूर्वमित्यर्थः ।
रामपक्षे-~-वृपमकेशिखराः तत्तदभिधाना राक्षसाः विरूपा सूर्य.
णखा च तेन रामेण आहता आसमन्ताद्विनाशिताः अन्यदुक्तस्वरूपम् ।
कृष्णपक्षे-वृपभकेशियराः विरूपाः वृपभासुरकेशिदानवगर्दभासुराः
विरूपा अपारप्रभुतयश्च आहता विध्वंसिता हिंसिता अन्यत् पूर्ववत्।।
अनश्लोकेयमका श्लपश्च ॥ २३ ॥
सम्यकलाकुशलताध्ययनं विनास्य,
लोकेऽन्यगौरवधियाऽध्ययनं प्रपद्य ।
सूर्यः करोति भुवनं प्रकटं स्वतस्तत् ,
किं पाटवेयघटते परसंपरायः ॥ २१ ॥
-लोकेऽन्यगौरवधियाऽध्ययन प्रपथ सम्पन रलावारता अस्य
अध्ययन विनय. सूर्यः स्वनः तत् भुवनं प्रकट करोति. अस्य पाटचे परमपरायः
कि घटते ॥२४॥
AAR ryN AM vv महोपाध्यायधीमेघविजयंगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्ये व्याख्या-लोके जने जगति वा अन्यगौरवधिया अन्यसिन् जने गुरुवबुद्धया अध्ययनं पठनं प्रपद्य प्राप्य सम्यक् सर्वथा कला कुशलता चतुःपष्टिकलानैपुण्यं भवतीति शेषः अस्य वर्णनीयमहापुरु- पसप्तकस्य अध्ययनं विनत्र अध्यापकाद्यालम्बनकपठनं विनैव कलाकु- शलता अभूदित्यर्थः, अत्र दृष्टान्तं प्रदर्शयति सूर्यः स्वत एव आत्म- नैव तत् प्रसिद्धं भुवनं प्रकटं करोति प्रकाशयति किं च अस्य सूर्यस्य . पाटवे जगत्प्रकाशनकौशले परसंपरायः अन्यमहायः अन्याश्रयणं किं घटते युज्यते न घटत इत्यर्थः । अथ च अस्य चरित्रनायकस्य सम्यकलाकुशलता सर्वथाकलानैपुण्यं अध्ययनं पठनम्बिनैव गुरु- कुलशुभूपणं विनच किन्तु लोके जगति अन्यगौरवधिया अन्येऽप्येवं कुर्युरित्येवं बुद्धया अध्ययनं गुरुकुलनिवासं प्रपद्य सम्यक् कलाकुश- लता अभूदित्यर्थः । अत्र दृष्टान्तालंकारः ॥ २४ ॥ कं स प्रयोगमधिगत्यपरस्परेण, कं सं जहार करणाय जने हितस्य । नैपुण्यपुण्यवशतोऽतिशयाश्रयेण, निष्कण्टकत्वमजनिष्ट निजेष्टदेशे ॥२५॥ अन्वयः-परस्परेण कं स प्रयोगम अधिगत्य जने हितस्य करणाय के से जहार नैपुण्यपुण्ययशत: अतिशयाश्रयेण निजेटदेशे निष्कण्टकत्वम् अजनिष्ट ॥२५॥ व्याख्या-स प्रभुः आदीश्वरादिः कम् कमपि प्रयोगम् अनु. ष्ठानम् व्यापारम् परस्सरेण क्रमेण अधिगत्य प्राप्य यद्वा का कमपि प्रयोगमश्वम् " प्रयोगः अनुष्ठाने निदर्शने अग्रे चेति शब्दस्तोमहा- निधिः " परस्परेण अन्योन्यतः अधिगम्य प्राप्य जने लोके हितस्य पथ्यस्य मंगलस्येत्यर्थः करणाय विधानाय स्थापनाय कं सं पानभाजनं मद्यपानपानं "काम्यते कामिमिरिति" मावावद्यमित्यौणादिकः सः" ANA NA .. आचार्य श्री विजयामृतसरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-३ "मल्लिकाचपका कंसः पारीस्यात्पानभाजनमिति हैमः"जहार हत. वान् मर्वत्र निवारयामास नैपुण्य पुण्यवशतः नैपुण्यं सर्वसम्पत्समर्पकं यत्पुण्यं शुभादृष्टम् तस्यवशत आनुकल्यान अतिशयाश्रयेण सर्वतोऽधि- कत्येन मर्यश्रेष्ठ नेत्यर्थः निजेष्टदेश स्वीयामिमतप्रदेशे निष्कण्टकत्वम् निरावाधवम् निर्वैरत्वम् अजनिष्ट मर्यतो निरूपद्रवो जात इति भावः। कृष्णपक्षे-परस्परेण कर्णाकर्णितः जनवचनतः कम प्रयोग कंमस्य स्वमातुलस्य व्यवहारं नीचाचारं अधिगत्यश्रुत्वा जने स्वजने हितस्य क्षेमस्स करणाय क्षेमं कत्तुं कसं कंगनामानं नृपं जहार जघान नैपुण्यपुण्यवगतः अत्यधिकपुण्यमाहात्म्यात् अतिशयाश्रयेण आति- शय्यमधिर्वतानिजष्टदेशे स्वाभिमतप्रदेशे निष्फन्टकत्वं निबैंग्लं शत्रु- राहित्यं अजनिष्ट अजनि ।। २५ ॥ सन्तोऽपि ये स्वसमयज्ञविधिं प्रपन्ना, दैत्योपरुद्धमनसो भुवि दुर्जना ये ॥ पूर्वेप्टसाधनविधानमनन्तरायं, कर्तुं ययो स विपिनं परबारणेन ॥ २६ ॥ भन्न-ये सन्नस्ते स्वममयइनिधि प्रपना ते दुर्जनास्त दायोपर- मनम. पूष्टपाधनविधानम् अनन्तराय क्नु म परपारणेन विपिनं ययौ॥२६॥ व्याख्या-अयेन्द्रः प्रभोर्विवाहममयमधिगम्य तदनुज्ञां जि. घृक्षुर्व्यजितपत् प्रभुश्वमौनेन तदुत्तरन्ददावित्याह मन्तोऽपीति । ये मन्तः सत्पुरुषा कर्तव्याकर्तव्यविवेकिन स्वमायनविधिम् स्वममय म्बारशिष्टकर्मभोगममयं जापयति चोधयतीति स्वममयन्नः म चामो विधिध तन्तथोक्तम् अवधिनानादिना नयुद्धा प्रपन्नाः स्वीकताः अनी. कृता इत्यर्थ ये भुवि पृथिव्यां दुर्जना दुर्यद्धयः ने दत्योपद्धमनसः अज्ञानोपहवनया कर्त्तव्याव्यनिर्धारणपरामुमा भवन्तीति गेपः महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये ~ wwwww " अनन्तरायं अन्तरायरहितं निधि पूर्वेप्टसाधनविधानं पूर्वपूर्वनिर्धारितं यदिष्टसाधनम् चतुर्थपुरुषार्थसाधनम् विपिनम् दुःसाध्यम् तत् कर्तुमनु- छातुम् परवारणेन अत्युत्कृष्टात्मवलेन मदोन्मतगजेन वा ययौ जगाम।। पार्श्वनाथपक्षे दैत्योपरुद्धमनसः दैत्येन छेदनभेदनादिना उप- रुद्धम् अभिभूतं व्याप्तं मनो येपान्ते सदमद्विवेकरहिता ये भुवि भूमौ दुर्जना, दुराचारिणो ययननृपप्रभृतयः सन्तीति शेषः पूर्वेष्टसाधनविधान पूर्व पूर्वकर्त्तव्यं यद् इष्टमाधनविधानम् प्रभावती परिणयरूपम् अन- न्तरायम् निष्प्रत्यहं कर्नु प्रयोजितुं परवारणेन अत्युत्कृष्टहस्तिसाधनेन विपिनम् भयजनकम् यवननृपंप्रति ययौ इयाय ।। रामपक्षे-ये सन्तः मत्पुरुषा महान्तस्ते स्वसमयज्ञविधि स्वकी. यसमयज्ञापकविधि कर्तव्यं प्रपन्नाः कर्तव्योन्मुखाः भवन्ति ये दुर्जना दुश्चरित्रास्ते दैत्योपरुद्धमनसो जायन्त इति शेपः पूर्वेष्टसाधनविधानं सीतापरिणयरूपेष्टप्रथमकर्तव्यं अनन्तरायं निधि कर्तुं विधातुम् पर- वारणेन परेषां शत्रूणां वारणेन दैत्यजननिरोधेन विपिनं ययौ ।। कृष्णपक्षे-रुक्मिणीविवाहरूपेष्टसाधन कत्तं ययाविति, शेषं पूर्ववत् ॥ २६ ॥ तीव्रतानुचरणा नधिगम्य जानेः “जातेः" पूर्वेऽवशिष्टमपि तन्मनसा ननाम ॥ इत्याश्रयन्निव विधिन्तदगाधि जातं, ज्ञातं भजन वनमियाय स गाधिजातं॥२७॥ अन्वयः-जानेः "जाते." तीव प्रतानुचरणान् अधिगम्य पूर्वे भवशिष्ट- मपि तत् मनसा ननाम भगाधि जातम् विधिम् तआश्रयलिय स ज्ञानम् भजन गाधिजातम् वनम् इयाय ॥ २७ ॥ व्याख्या-जानेः “ जातेः" उत्पत्तेः जन्मनः फलानि हेतून तीव्रतानुचरणान् महत्पुण्यपरिपाकप्रभावसाध्यदुःसाध्यनियमपरि-
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भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-३
रिपालनरूपान् अधिगम्य ज्ञात्वा विचार्य "मदीयजन्मनस्तीवत्रताच-
रणमेवफलमिति" निश्चित्य पूर्वे पूर्वभवेऽवशिष्टम् अजीर्णतया किश्चित्
स्थितम् अपि तत् कर्म मनमा हृदयेन ननाम ससार तत् तस्मात्
अगाधिजातम् गाध्यते लिप्स्यते इति गाधिार्लप्मा तस्माजातम् इति
गाधिजातम् तन्न भवतीत्यगाधिजातम् अयत्नोपनतम् विधिम् अदृष्टम्
कर्मत्यर्थः "देवन्दिष्टम्मागधेयं भाग्यं स्त्रीनियतिर्विधिरित्यमरः" आश्र-
यनिय इति ज्ञानम्भजन सेवमानः स प्रभुर्जिनेन्द्रः गाधिजातम् प्रति-
एाजनकम् वनम् आलयम् अरण्यम् वा इयाय ययौ ।।
कृष्णपक्षे-जानेः जायतेऽस्मादिति जानिः तस्य जाने।
समुद्रस्य
जलरूपतया जलस्य च जीवनत्वेन समुद्रस्य तत्वमिति भावः स कृष्णः
तीनवतानुचरणान् अष्टमतपःप्रभृतीन अधिगम्य प्राप्य कृत्वेत्यर्थः
पूर्व प्रथमम् अवशिष्टम् अतिरिक्तम् अधिरुम् तत् समुद्रम् जीवनत्वेन
क्लीवनिर्देशः मनसा हृदयेन भच्या ननाम तत् समुद्रजलम् इति
पूर्वोक्तरूपं विधिमनुष्ठानमाश्रयन्निव स्वीकुर्वन्निव ज्ञानम् कृष्णोऽयन्न-
सामान्य इति युद्धया जानन् इति स्मरन् अगाधि जातम् अतिगम्मीर
स प्रतिष्ठमिति भावः वनं समुद्रगजलम् म गाधिजातम् अनिम्नं सुप्रचा-
रमियाय ययौ द्वारकाजनप्रचाराय किश्चित् प्रसमारेति भावः ॥२७॥
कन्यान्यदाकृत सुमंगलका विदर्भ,
प्राप्ताति शैशववयोऽभिधया सुनन्दा ।।
सीताप्रभा समधिकक्षमया विभृपा,
सद्रुक्मिणा वरहिताहिकजा यशोदा ॥ २८ ।।
भारयः-भग्यदा हलमुमंगलका भनिसवयःप्राप्ता भनिधयामुना
ग्दा-या मीना ममविकामपा विभूषामदृषिमा परहिताहिकमा पोदा
भामीपिति शेष. ॥ १८ ॥
महोपाध्यायश्रीवविजयगणिविरचिते महसन्धानमहाकाये व्याख्या-आदीश्वरपक्षेअन्यदा कदाचित् विदर्भ विगतो दर्म: कुशोयत्रतस्मिन् यद्वा विशेषेणदों यत्र युगलित्वादनाधिवासतस्त.. सिन् विदर्भदेशे कृतसुमंगलका कृतम् विहित सुमंगलं विवाहपूर्वल- व्यकुमारीकृत्यं यया मा कृतसुमंगलका अथ च सुमंगलाभिधाना अतिशैशववयः र प्राप्ता शैशवादतिक्रान्तमतिशैशवम् " अत्यादयः का. न्ताद्यर्थे पञ्चम्पा" इति ममासः अतिशैशवं च तद्वयश्चेति कर्मधार- यस्तत् प्राप्ता अतिक्रान्तशैशवा प्राप्तयौवनेत्यर्थः अमिधया संज्ञया सुनन्दा सुनन्दामिधाना सीता लक्ष्मीस्वरूपा समधिकक्षमया अत्य- धिकक्षमाशीलतया विभूपा क्षमाभूपणभूषिता प्रमा कान्तिरूपा सद्गु- क्मिणी शोभनस्वर्णभूपणचिता वरहिताघराय हिता वरणयोग्या अहि- कजा नागकन्येव यशोदा यशोविधायिनी आसीदिति शेपः ।। श्रीशान्तिनाथपक्षे-विदर्भ विगतः दो भयो यग्न तस्मिन् । विदर्भ भयरहिते कृतसुमंगलका विहिनसुमङ्गका अतिशैशववयः प्राप्ता समधिगततरुणावस्था सीताप्रभा सीताइव लक्ष्मीरियप्रभाकान्तिर्यस्याः सा समधिकक्षमया निरतिशयसहिष्णुतया विभूपाजगढवतंमभूता सद्भुक्मिणी सत् प्रशस्तं रुक्म स्वणं अस्ति अस्याः सा मद्रुक्मिणी यद्वा विभूषायां भूपणे मद्रुक्म यस्याः या विभूषासद्रुक्मिणी वरहिताव- रस्य ग्रहण कर्तुः कल्याण प्रयोजिका अभिधया संज्ञया यशोदा यशो- मती अभूदिति शेपः ॥ श्रीपार्श्वनाथपक्षे-उक्तविशेषणविशिष्ट अभिधया नाम्ना प्रभा प्रभावतीति शेपः॥ श्रीवीरस्वामिपक्षे-अभिधया यशोदा यशोदा नाम्नीति विशे- पोऽन्यत् वर्णितदिशाबसेयम् ॥ रामपक्षे-पथोक्तविशेषणवती अभिधया सीता तन्नाम्नीतिनियोज्यम् ।।
www ~~ भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-३ कृष्णपक्षे-अभिधया मद्रुक्मिणी मती चासौ रुक्मिणीचेति सद्रुक्मिणी विदर्भ विदर्भजनपदे अन्यत्पूर्ववत् ।। श्रीनेमिनाथपक्षे-अन्यदा कस्मिन् अपि समये विदर्भ विगतभये प्रभौ नेमिनाथे कन्यादीप्तिः अभूदिति शेपः कापिलोकातिशयकान्ति. र्जातेति भावः कथंभूता कृतसुमंगलका कृतं मुमंगलं यया विहितभव्या अतिशैशववयः प्राप्ता अतिशैशवेवयसि यौवनावस्थायां प्राप्ता संगता शैशवानन्तरमधिगता प्रभोर्युवत्वारम्भसूचिकेत्यर्थः सुनन्दा सुष्टुनन्द- यतिजनानिति सुनन्दा सर्वमोदप्रदात्री सीता प्रभा सीता लक्ष्मीरिव प्रभादीप्तिर्यस्याः सा समधिकक्षमया अतिसहनशीलया विभूषा विभू- पणरूपा मण्डनायमाना सद्रुक्मिणी वर्णमदृशी स्वर्णकान्तिकमनीये- त्यर्थः वरहिता वराश्रेष्ठाचासौ हिताहितप्रयोजिका इति वरहिता अति- शयोपकारकारिणी अहिकजा अहिरेव अहिकः सूर्यस्तस्माजाता इवेति सूर्यकान्तिसदृशी यशोदा यशोविधायिनी सर्वाधिकदीप्तिमरेत्यर्थः २८ रागं पुपोपभगवद्वपुपागुणेन, रूपश्रियातिशयिनं जयिनं विमृश्य ॥ कन्याखयम्बरमहं सततो गवेशः, प्रारब्धवान् विहित संहित सन्निवेशः ॥ २९ ॥ अन्धयः--गयेशः भगवद्वपुपागुणेन रूधियातिशायिनं अयिनं विमृ' रागं पुपोप विहित संहितमलियेशः सन् कन्याययनरमह प्रारब्धवान् ॥२९॥ व्याख्या-गवेशः गोः पृथिव्या ईशः पतिः गवेशः पृथ्वीश भगवद्वपुपा भगवतां जिनेन्द्राणां वपुषा शरीरेण शारीरिकसौन्दयां तिशयन गुणेन दयादाक्षिण्यादि गुणमहिम्मा च रूपश्रियातिशयिनः रूपस्य शरीरसन्निवेशस्य श्रीः रूपश्रीस्तया शरीर कान्त्या अतिशय्य सर्वोत्कण भूयते इति अतिशयितम् तथोक्तम् जयिनम् सर्वोत्क।
NA . महोपाध्यायधीमेघविनयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकान्ये विराजमानम् विमृश्य विचार्य कपुनरेन वरो लभ्यते इति विचार्य विहित संहितसन्निवेशः विहितः कृतः संहितः दृढः मनिवेशः स्थितिः स्थानम्बा येन स कन्यास्त्रयम्बरमहं न्यायादुहितुः स्वयम्बरमेर महः उत्मवः तम् कन्यास्वयम्बरोत्सवम् आरब्धवान् आरेभे महउद्धवउत्सव इत्यमरः ।। मर्वपक्षमाधारणम् ॥ २९ ॥ तत्राप्तदानव वलस्य बलारिरेप, न्यायान्तरायकरणं रणतो निवार्य ।। धात्री जिघृक्षु शिशुपालक राक्षसादि- दुर्योधनं यवनभूपमपा चकार ॥ ३०॥ अन्वय -तर आतदानववलस चलारिरेप न्यायान्तराय करण रणत निवार्य धात्री जिघृक्षुशिशुपालक राक्षसादि दुयोधनम् यवनभूपम् अपाचकार ॥३०॥ व्याख्या- आदीश्वरपक्षे-तत्रादीश्वरप्रभोविगाहमहोत्मवे आप्त- दानवलस्य आप्तः प्राप्तः योदानमवलः दैत्यालस्तस्यवलारिः चलभित् एप इन्द्रः न्यायान्तरायकरणं न्यायस्य न्याय्यस्य यद्वा न्यायस्य भो गस अन्तरायकरणं विघ्नसंपादक प्रतिबन्धकमित्यर्थः रणतः शब्दतः रक्षोनिद्रावकशान्तिकारकगाथादितः निवार्य विद्राव्य धात्री जिघृक्षु शिशुपालकराक्षसादि दुर्योधनं यवनभूपम् धात्री उपमाता पालयित्रीति यात् " धात्रीस्यादुपमातापि क्षितिरप्यामलक्यपीत्यमरः" जिघृक्ष: किमपि ग्रहीतुमिच्छुर्यः शिशुपालोवालापस्थापोषकः म एर शिशुपा- लकः "खार्थेका" राक्षसः रक्षतीतिरक्षः "औणादिकोऽमुन्" म एव राक्षसः रक्षणकचों एपांद्वन्दः इति धातृजिघृक्षु शिशुपालकराक्षसास्ते आदिर्यस्य स चासौ दुर्योधनश्च त ययनम् वेगवद्भूपम् सत्वरकार्य- साधकनृपम् अपाचफार आनन्दयामास अत्यधिकप्रेम्णाप्रीणयाम्व- आचार्य श्री विजयामृतरिमणीता सरणी रीका, मर्ग-३ १११ NAV A- भवेत्यर्थः अप-वियोगे-विकृतौ विपरीते-वर्जने-आनन्दै चेति शब्द स्तोममहानिधिः ॥ एवमेवशान्तिनाथपक्षेऽवसेयम्-श्रीनेमिनाथपक्षेऽपि विवाहो- त्सवस्य वर्णनीयत्वेन तत्र, श्रीमहावीरपक्षे च यथास्थितमेव वर्णनम् । श्रीपार्श्वनाथप-तत्र तम्मिन् समये आप्तदानववलस्य आप्तः प्राप्तोयो दानवयलस्तस्य समुदितदैत्यभूत दुराचारिबलस्य पलारिः विरोधकः एप पार्श्वप्रभु न्यायान्तरायकरणम् न्यायस्यनीतेः धर्मप्रचा. रस्य अन्तरायकरणम् विप्रकारकम् रणतः संग्रामतः निवार्य निराकृत्य धात्रीजिघृक्षुशिशुपालकराक्षसादि दुर्योधनं यवनभूपम् धात्री धरति. गुणोत्कर्ण्यमितिधात्री तां जिवृक्षुग्रहीतुमिच्छः स चासो शिशुपालक- राक्षमाव शिशुपालकरोऽक्षः आत्मा यस म शिशुतआरम्य पालकरो. रक्षा तत्पर आत्मा यस्येत्यर्थस्तस्य आदिमुरुषः प्रभुः दुर्योधनम् दुम्म- हम् यवनभूपम् ययननामानम् नृपम् कलिङ्गाधिपतिम् अपा चकार तिरबकार दूरी चक्रे ॥ रामपक्षे तत्र तम्मिन् समये आप्तदानश्वलस्य ममागतराक्षस- मन्यस्य बलारिः विनाशकः पपरामः न्यायान्तरायकरणं नीति निया. रकं दुराचरिणम् रणतः संग्रामतः निमार्य निराकृत्य धात्रीम् गुणवती जिघृक्षग्रहीतुमिच्छुः यः शिशुपालकरः मर्वदारक्षकः शिशुत एव रक्षा दक्षात्मायस तस्यादिमुन्यः दुर्योधनम् दुःमाध्यम् यवनभूपम् म्ले- कानपम् जनकगजनिगेघरम् यद्वा धात्री सीतां गिन रादिसुर्यः शिशुपाल गक्षमादिदुर्योधनः शिशुमर्भकं पाग्यति ममापयति घात- यतीनि शिशुपारः म एवं शिशुपालकः रलयोग्क्यान् म घामो गक्ष- मादिः राक्षगप्रमृनिः म एच दुर्योधनः समात्यः यरनभूपः म्लेच्छा नृपम्नम् अपारकार निरस्कार स्रोध।
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये mmmwwwma ANAYA vnA कृष्णपक्षे-तत्र रुक्मिणी विवाहप्रसङ्गे दानववलस्य दैत्यबलस्स चलारिः इन्द्र इव दैत्यवल विनाशकारकः एप कृष्णः न्यायान्तराय करणं नीतिनिवारक रणतः संग्रामात् निवार्य निराकृत्य धात्रीजिघृक्षु शिशुपालकराक्षसादि दुर्योधनम् धात्रीम् रुक्मिणीम् जिघृक्षुः यः शिशुपालस्तन्नामा नृपस्म एव शिशुपालकः म एव राक्षमादिःनिशा- चरप्रभृतिस्म च दुर्योधनश्च धार्तराष्टस्तम् शिशुपालराक्षसादि प्रभृतिदु योधनभूपम् यवनभूपम् जरामन्धतनयम् अपाचकार निरासयामाम अत्र श्लोके मभङ्गाभगश्लेपालंकारः ॥ ३० ॥ भूमान् विचार्य जनकोऽपिकृतानुरागां, रुक्मीखसार मधिरोप्यधनुर्वृतांताम् ॥ युध्ध्वावलेनहलिनावपनेकृतेऽदात्, देशे हरिः पुनरियायनिजे स कान्तः ॥ ३१ ॥ भन्धय - भूमान् जनकः कृतानुरागाम् विचार्य रक्मी धनुः भधिरोप्य वृताम् ताम् स्त्रमारम् हलिनाबलेन युवापनेकृतेऽदात् स कान्त: हरिः निजे. देश पुनः इयाय ॥ ३१ ॥ व्याख्या-आदीश्वरादिजिनेन्द्रपक्षे-भूमान् पृथ्वीपतिः रुक्मी. स्वर्णवान् जनकः पिता नाभिराजादिः अन्यजिनेन्द्रपक्षे कन्यापिता म्बसारम् स्वस्यस.रम् मारभूतम् बलवत् धनुः कोदण्डम् अधिरोप्य अधिरोपयित्वा क्षत्रियाणामधारणपूर्वकम्बिवाहविधानमिति सम्प्र. दायः अत एव धनुजिनेन्द्राणामायध्यवलेन इलिना आकर्षयता युध्धा कृत्रिमयुद्धप्रक्रियाम्प्रदर्य अपने वेदने कृते मति किमपिच्छे- दादिमंप्रदाय संपादने मति कृतानुरागाम् संजातप्रेमातिगयाम् घृतां पूर्वमेयवरीतां तां कन्या सुमंगलासुनन्दाप्रभृनि अदात् जिनेश्वरायेति शेपः म कान्तः सदाः हरिः हरतिपापमिति हरिजिनेन्द्रः निजदेशे स्वकीयस्थाने अन्यजिनेन्द्रपक्षे निजदेश इयाय आजगाम || १४५ Avi भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका सर्ग-३ रामपक्षे-भूमान् पृथ्वीपतिः रुक्मी स्वर्णवान् जनकः जनकनृपः खसारं धनुः अधिरोप्य पणत्वेन निर्धार्य स्थित इति शेष रामश्चधनुः अधिरोप्य आकृष्य समौर्वीकम्विधायेत्यर्थः हलिना आकर्पयता कृत्रि- मयुद्धं विधाय बपने कृते चन्द्रगतिभामण्डलादीनां विलक्षे कृते सति कृतानुरागाम् जातस्नेहाम् वृताम् पूर्वमेवकृतवग्णाम् जानकीमिति शेषा अदात् रामाय आर्पिपत् सकान्तः सपत्नीकः हरिः रामः निजे स्वकीये देशे अयोध्या नगरे पुनः भूपः इयाय आययौ ॥ कृष्णपक्षे-भृमान् भूमीपतिः रुक्मी रुक्मिनामानरपतिः जनका ज्येष्ठभ्रातृत्वात् पितृसमत्वेन जनकशब्दप्रयोगः कर्मव्याकर्त्तव्यशि- क्षकः कृतानुरागाम् कृतप्रणयाम् स्वमारम् भगिनीम् रुक्मिणीम् विचार्य मम्यक् परिभाव्य धनुः आरोप्प अधिज्यम्विधाय हलिना सीरिणा बलदेवेन युवायुद्धं विधाय वपने केगच्छदे कृते सति घृताम् शिशुपालेन पूर्वकृतवरणामपि ताम् रुक्मिणीम् अदात् कृष्णाय प्राय- न्छत् सकान्तः सपत्नीकः हरिः कृष्णः पुनः निजे आत्मीये देशे द्वारकायाम् इयाय आजगाम ॥ ३१॥ एवं पुराणचरितान्यधिगत्य देवः, प्रीत्या व्युवाह ननु धर्मधियं विधाय । तस्थुः परःशतनृपा अपरे तथैव, साम्वत्सरे वितरणे कृतकर्मयोगः ।। ३२ ।। :-दे: एय पुराणधरितानि भधिगत्य ननु धर्मधियं विधाय प्रीत्या प्युपाद साम्पामरे वितरणे हवकर्मयोगः भपरे पतनृपाः तथय तरः॥३२॥ व्याया-देवः द्युतिमान् जिनेन्द्रश्च पुराणचरिवानि पुरात- नव्यवहाराणि अधिगत्य विचार्य ननु इति कोमलालाप निथये वा धर्मधियं धर्मदि निधाय ननु धर्मबुद्धिं कृत्वैव रालु धर्मः स्ववंशस्या- १४६ महोपाध्यायनीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये Mvvv vn पनमिति निश्चित्य प्रीत्या पित्रोः प्रेम्णा इन्द्रस वा प्रणयेन आव्युवाह परिणिनाय, मांवत्मरे वितरणे कृतकर्मयोगः सम्बसति ऋतुः स्त्रीमा- सिकधर्मोत्र इति सम्वत्सरः म एच साम्वत्सरः तस्मिन् साम्बत्तरे वितरणे अतुदाने कृतकर्मयोगः कृतच्यापारः ऋतुदाने सावधानः ऋतौ भार्यामुपेयादित्यनुसृत्य तत्रैव कृतोपयोगः आसीदिति शेषः । अन्ये पर शतनृपा अनेकशी भूपाः तथैव तदनुसारेणैव तस्थुः यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरोजन इति मतमवलंब्य ततोऽर्वाक् तदीया चरणमेवप्र- माणत्वेन प्रचचारेति भावः पक्षान्तरे यथायोग्यमेतदिति ॥ ३२॥ धर्म सतां (समधि) रोपयताऽग्रकोटी (?) कौ-मोदकीमपि रुचिन्दधता भुजाये। चक्रेहता सपदि चक्रभृताङ्गजेन, भावेन भूतलमलं कृतिभिः सशोभम् ॥३॥ अन्वयः-को अग्रकोटी सताधर्म समधिरोपयता भुजाने मोदकी रुचि दधता चक्रभृता अगजेन अर्हता भावेर अरंकृति मि सशोम भूतरं मपदि च ॥३३॥ व्याख्या-कौ-पृथिव्यां अग्रकोटौ अग्रभागे सर्वत उच्चप्रदेशे सतां सत्पुरुषाणां धर्म-सुकृतं पुण्यमिति यावत् ममधिरोपयता स्थापयता भुजाग्रे-स्ववाही मोदी मोदयति हर्पयतीति मोदकी हर्षदात्री तां सर्वसम्मोदसम्पादिकां रुचि दीप्ति शोमां दधता धारयता चरुभृता- चक्रावं चक्रचिहं वा विभौति तैन, अङ्गजेन=अंगान्मनसो जायते इति अङ्गजः कामः म इवाचरतीति तेन काममहशेन अर्हता-पूज्पेन जिनेन्द्रेण भावेन विदुपा अलंकृतिभिः शोभाघायकै स्वीयनिर्मलपवि- त्राचारः सोमं मालं कृतं भूतलं घरामण्डलं मपदि सधः चक्रे विदधे खजन्मना निर्मलाचरणेन च भूमितलं मालंकृतं कुरुतेस्मेति भावः यद्वा चक्रभृतांगजन चक विमर्तीति चक्रभृत् स आगजस्तनयो यस स चक्रभृतांगजस्तेनति आदीश्वरपक्षे व्याख्येयम् ॥ * १४७ भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता मरणी टीका. सर्ग-३ M रामकृष्णपक्षे-अग्रकोटौ पर्वमूर्धन्ये सतां सत्पुरुषाणां पुण्यं समधिरोपयता संस्थापयता भुजाग्रे स्वहस्ताग्रे कौमोदकी तदमिधानां गदा अस्त्रविशेपं दधता गृह्णता अर्हता योग्येन रामेण, कृष्णेन वा चक्रभृता चक्राखं दधता अङ्गजेन भावेन विलामादिना अलंकृतिमि- रलंकाकारः निजपवित्रसमुदाचारः सालंकृतं भूतलं भूमण्डलं सपदि सहसा चक्रे विदथे ।। ३३ ॥ शंखध्वनिध्वनितदिग्वलयः प्रयोगं, सद्यो विभिद्य रिपुभूमिभुजां भुजायाः । मुक्तेपु-निश्चितधियां स्वधरादरेण, त्यागाय सर्वविषयस्य तदा बभूव ॥ ३४ ॥ अन्वयः-शंखध्वनिध्वनितदिग्वलयः रिपुभूमिभुजां भुजाया. प्रयोग सद्यः विभिय मुक्त निश्चितधिया स्वधरादरेण सर्यविपयस्य त्यागाय तदा यभूव ॥३४॥ व्याख्या-जिनेन्द्रपञ्चकपक्षे-शंग्वध्वनिध्वनितदिग्वलयः शंख- स्य कंबोर्यो ध्वनिरव्यक्तमधुरशब्दस्तेन अनितं शब्दायितं दिग्वलयं दिग्विभागो येन स तथोक्तः रिपुभूमिभूजाम् भूमि भुञ्जन्तीति भूमि- भुजस्तेचते रिपक्वेति रिपुभुमिभुजः शत्रुनृपतयस्तेपां महीभुजां भुजायाः पाहोः प्रयोगम् प्रसरम् गर्वमित्यर्थः सद्योविभिद्य तत्क्षणमेव निरा- कृत्य मुक्तेपु निश्चितधियां मोक्षेषु विपयेषु निश्चितधियां कृतनिश्चययु- द्धीनां जिनेन्द्राणामिति शेपः स्वधरादरेण स्वस्य धरः स्वधरः स्वकी- यसंकल्पस्तस्यादरेण तस्यामिनिवेशेन यद्वा स्वस्थयोधरादरः धरस्य पर्व- तादिनिर्जनस्सानस आदरः पर्वतादौ गत्वात् तपश्चर्याविधेयेतिनिश्चयेन आग्रहेण हेतुना सर्व विषयस्य सांसारिकमोहनीयवस्तुजातस्य त्यागाय तदा तसिन् काळे पभूव तत्र प्रसक्तो जज्ञे ।।
manavv महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरहित सप्तसन्धानमहाकाव्ये रामपक्ष-शंखध्वनिध्वनितदिग्वलयः कम्बुनादविनादितदि- विभागो राम इति शेयः रिपुभूमिभुजां विपक्षपक्षाश्रितक्षितिपालानां भुजायाः चाहोः प्रयोगम् प्रसरमहंकारं सद्योविमिद्य विपुज्य निराकृत्य मुक्तेपुनिश्चितधियां मुक्तचासाविपुणवेति मुक्तेपुर्विमर्जितवाणस्तत्र निश्चिता लग्नाधीवुद्धियेषां तेषां, शब्दवेधित्वाद्यवधान विधायकानां स्व. धसदरेण धरतीति धरो निजोत्पादकः पिता यद्वा धरति गर्भे या सा घरा माता तस्य तस्या वा आदरेण पूज्यत्वेन तदीयाज्ञावश्यं पालनियेति कृताग्रहेण हेतुना सर्व विषयस्य राज्यादिभोगादेस्त्यागाय निराकरणाय तदा मतिरिति शेपः बभूव जज्ञे । अथवा स्वधरादरेण स्वस्थ या धरा दायादत्वेन न्यायतः परिप्राप्ता पृथ्वी "भूर्या पितामहोपात्ता इत्यादि समं तत्र विभागःस्थापितुः पुत्रस्य चोभयोरिति दायत्रिभागस्थयोगि- याज्ञवल्क्यवचनात् तस्या आदरेण स्वकीयत्वाभिनिवेशेन हेतुना सर्व विषयस्य स्वराज्यान्तर्गतसर्ववस्तुनस्त्यागाय कतिपयदिनावधिमर- तसात् कर्तुं मतिर्षभूव बुद्धि तेति भावः ॥ कृष्णपक्षे-खधरादरेण स्वधरा स्वं आत्मानं धरति पिमर्तीति स्वधरा द्वारकाभूमिस्तस्या आदरेण दद्विपयकप्रेम्णा सर्वविपयम्य याव- त्परिणाहस्वपुरिपरिसरस्य त्यागाय समुद्रजलरहिताय समुद्र इतो दूर बजे मन्नगरपरिसरभूमिपरित्यजेदिति मतिभूव अन्यद्रामपक्षवदव- गन्तव्यम् ॥ ३४॥ मोहोऽवमोहकरणं ककुभां शुभांशु- व्यावर्तन नयननर्तनमेव जज्ञे । क्षोभो मनस्सु सुमनस्सु हरेश्चिरण, चक्र दरेण वसतिलसतिःप्रकम्पे ॥ ३५ ॥ " १४९ भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-३ अन्वयः-मोहः ककुभाम् अवमोहकरणम् शुभांशुव्यावर्त्तनं नयननतं. नमेव मन.सु क्षोभः सुमन.सु हरेश्चके दरेण वसतिः प्ररम्पे लसतिर्जने ॥३५॥ व्याख्या-तेपु वर्णनीयचरित्रनायकेषु सत्सु मोहो भ्रान्तिम हनीयकर्म ककुभां दिशामवमोहकारणम् दिग्भ्रान्तिविधायकम् केवलं दिग्भ्रान्तिविधायकमेव मोहोऽभून्नचाज्ञानजनितकसिन्नपिविपये गाय जातम्, शुभांशुव्यावर्तनं शुभसम्बन्धराहित्यं कल्याणयोगनिरोध इत्यर्थः नयनन-नमेव नेत्रविलास एव प्रणयिनम्प्रत्येव मानवत्याः कान्ताया नयनविकारादयः सेय॑न्नयननिरीक्षणम् न चान्यत्र शुभां- शो मङ्गलांशस्य व्यावर्तनम् निवर्तनम्, सुमनःसु कुसुमेपु मनः क्षोभः मनोमालिन्यम् रात्री कमलादिपुप्पेषु विकाशविपर्यासो, न जातु लो. केषु मनःक्षोभः मनोदुःसम्, हरेः विष्णोः चक्रे चक्राने चिरेण दरेण- भयेन वमतिरधिष्ठानं कृता केवलं विष्णुचक्रास्त्रे विष्णुचक्रविषयकमय- सन्निवेशो जातो न च प्रजाजने कृतोऽपिभय सन्निवेशः लसतिः श्लेपः दाहः प्रकम्प नरके न चान्यत्र यद्वा लसतिर्वेपनम् प्रकम्पे महाबाते न च लोके कचनापि भयादिना लसतिर्वेपनम् न जजे सुराज्यत्वात् सर्व- निरायाधमासीत् अत्र श्लोके परिसंख्यालंकारो विलसति ॥ ३५ ॥ उद्दिश्य कार्यमधिजीवनमेवमहन्, रेमे बनेपु भवनेषु सभावनेषु । आश्चर्यमुचरितं रचयजनाना- मैश्वर्यमण-परमं बुभुजे भुजेन ॥ ३६ ॥ अन्यय:-अधिजीयनमुस्यैिव कार्यम् भईन् वनेषु भवनेषु समायनेषु रेमे जनानाम् भाश्रयम् उपचरितम् रचयन् भुजेन अपरमम् ऐश्वयम् युभुजे ॥३n व्याख्या-जीवनम् प्राणघारणमुद्दिश्य प्राणयानामनुजीव्य लो- कव्यवहारमनुसृत्य कार्यम् लौकिककव्यम् अईन् कुर्वन् सांसारिक- १५० महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्ये व्यवहारमनुभवन् वनेषु उपवनेषु भवनेषु क्रीड़ामदनेषु सभावनेषु स- दौकाम सभामण्डपेषु च रेमे तथा च जनानां लोकानां आश्चर्य वि- स्मयजनक उच्चचरितं निर्मलचरित्रम् रचयन् विदधत् अङ्ग इति संवो. धने भुजेन बाहुबलेन परममत्युत्कृष्टम् ऐश्वर्य विभवम् चुभुजे भुनक्ति- स्म लोकोचरमैश्वर्यनुवभूवेति भावः सर्वपक्षसाधारणमवगन्तव्यम्।।३६।। जाते विवाहसमये न मनाग्मनोऽन्त- लींनो मलीनविपयेषु महाकुलीनः । द्वेधा पुरन्दरवलाद् वसतिस्म येन, नारेः पुरन्दरवलाद्वसतिस्म येन ॥ ३७ ॥ अन्वयः-विवाहसमये जाते न मनाक् मलीनविषयेषु महाकुलीनः अन्तानोऽभूदिति शेषः न द्वेधापुरन्दरपलात् स्मये न वसति पुरन्दरबलात् अरेः येन म वसतिस्म ॥ ३७ ॥ व्याख्या--विवाहसमये विवाहविधौ जातेऽपि सम्पन्नेपि कृत- दारपरिग्रहोऽपि महाकुलीनो महद्धैर्यवान् सत्कुलप्रसूतिजिनेन्द्रादिर्म- लीनविपयेषु कुत्सितव्यापारेषु सांसारिकविषयवासनादिर्पिताचारेषु मनाक् ईपदपि अन्तर्लीनः तदासक्तिप्रवणो न विषयानुभवग्लपित- चिचो, न द्वेषापुरन्दरबलात् पुरन्दारयतीति पुरन्दर इन्द्रः यद्वा पुरन्त्रि- पुरासुरन्दारयतीति पुरन्दरः शिवः इति द्वेधा द्विविधपुरन्दरयोलमिव पलं यस्य तस्मादेकत्र विलक्षणशक्तिमत्वादपरनयशीकृतमदनत्याच स्मयेऽहंकार गर्ने न वसतिस्म सत्यपि गर्वसामर्थ्य महाशयत्वाद् गर्विष्ठो न जात इति भावः “वर्चमानसामीप्ये लद" अथ च इन्द्रवद् पलि. छत्वात् अरेः शनोः सकाशात् शत्रुजनमुद्दिश्य सयेऽहंकारे न यस. तिस्स उति न फिन्तु धमत्येव शत्रुसम्मुसे गर्विष्ठ एवासीत् इति भाषः यमकालंकारः सर्वविषय साधारणमेतत् ।। ३७ ॥
Romwww भाचार्यश्रीविजवामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-३ ५१ कस्तेन संगतिमगान्न मनोरसेन, कस्तेन सङ्गतिमगानमनो रसेनः। द्वेधाप्यनीतिरगमद विभुविक्रमेण, नाश-कयापि कलया न भुवि क्रमेण ॥३८॥ अन्वयः-मनोरसेन कस्तेनसंगतिम् न भगात् कः मनोरसेन तेन संग. तिम् न भगात विभुविक्रमेण द्वधा अपि अनीति: भगमत भुवि कयापि कलया नाशं न क्रमेण ॥ ३८ ॥ व्याख्या-मनोरसेन मनसो हृदयस्य रसोरागः प्रवृत्तिस्तेन मानसयोगेन कः कोऽपि स्तेनसंगतिम् स्तेनेन चोरेण संगतिम् मैत्रीम् न अगात् नापत् पाटचरप्रेम, कोऽपि नाकार्षीत् कः मनोरसेनः मनश्च रसा चेत्यनयोः द्वन्द्व इति मनोरसे तयोरिनः स्वामी "इनः सूर्यप्रभौ राजा मृगाङ्के क्षत्रिये नृप इत्यमरः" प्रभुः संयमी भूपतिः तेन प्रभुणा संगतिम् प्रेम न अगाव नाकरोत् सर्वोऽपि तेन सह सौहाद्र्धमरीरचत् तथा-विभुविक्रमेण विभोः प्रभोः विक्रमेणप्रभावेन तेजसा महिम्नेति यावत् द्वेधा द्विविधापि अनीतिः अन्याय्पम् दुराचारः अगमत् न्य. वतिष्ट अन्यत्र अनीतिः "अतिवृष्टिरनावृष्टिः शलमापिकाः खगाः। अन्त्यासन्नाथराजानः पडेता ईतयः स्मृता" इत्युक्तप्रकारा ईतयो न भवन्तीति अनीतिरीत्यभावः अगमत् प्रापन सर्वत्र प्रासरत् क्रमेण पर्या- येणापि भुवि पृथिव्याम् कयापि कलया केनाप्यंशेन नाशम् विपचिः न कस्यापि वस्तुनो लेगतोऽप्यभावो न जजृम्मे इति तत्वम् सर्वसा- धारणम् अत्र यमका ! ३८॥ विद्याधनं प्रस्मरं निधनं न लोके, स्तोके श्रमे सपदि वेश्रमणत्वमासीत् । तेजोभरात्प्रतिपदं मणयो नराणां, रेजुर्विभेजुरत एव महोन्नतिं ते ॥ ३९ ॥ ."
१५२ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते मतसन्धानमहाकाव्ये w ४४४ WM अन्वयः-लोके मसमरं विद्याधनम् आसीत् निधनम् न आसीत् स्तोके श्रमे सपदिवैश्रमणत्वम् आसीत् नराणां तेजोभरात् प्रतिपदम् मणयो रेजुः मत एव ते महोनितिम् विमेजः ॥ ३९ ॥ व्याख्या-लोके जने प्रसृमरं सर्वत्र प्रसरत् सर्वव्यापकम् विद्या- धनम् विद्यासम्पत् आसीत् अखिलजना विद्यावन्तःस्तदानीमभवन्निति भावः तथा निधनम् विनाशः अकालमरणादिर्न यद्वा निधननिर्धनता दारिद्रयन्न नैवासीत् स्तोके अल्पे लधीयसि श्रमे आयासे यत्न इति यावत् वैश्रमणत्वम् कुबेरत्यम् धनपतित्वम् आसीत् अल्पायासेनैव महाव्यत्वमजायतेत्यर्थः अथवा स्तोके तनीयसि श्रमे यत्ने वै इति रञ्ज. नार्थम् श्रमणत्वम् मुनित्वम् साधुत्वम् आसीत् सर्वेषान्निर्मलपवित्रच- रित्रत्वात् सज्ज्ञानित्वाच्च चारित्र्यवेषग्रहणादेवमुनित्वं अजायत इति तत्वम् जनानां लोकानां तेजोभरात् पुण्यप्नभावात् प्रतिपदम् पदे पदे मणयो रत्नानि रेजुः शुशुभिरे अत एव असादेवपुण्यप्रभावात् ते जना महोन्नतिम् मम्यगभ्युदयम् विभेजुः यः लभन्तेस्म सर्वत्रसा. धारणम् ॥ ३९॥ तस्मिन् महीं जगति शासति सा सतीव, लक्ष्मीन तु व्यभिचचार नरोत्तमेभ्यः। जातं कदापि न जने व्यसनं ननन्दा- नन्दात् कलाव्यसनमेव निषेवणादेः :॥४०॥ अन्वयः-जगति तसिन् महीं शासत्ति सा लक्ष्मी; सतीव नरोत्तमे- भ्यः न तु व्यभिचार जने व्यसनम् कदापि न जातम् भानन्दात् निपेवणार कलाग्यसनमेव ननन्द ॥ १० ॥ व्याख्या-जगति विष्टपे तस्मिन् प्रमौ महीं पृथ्वी शासति योगक्षेमं विधायके सति अधिकुर्वतिसति सा प्रसिद्धा नितान्तचञ्चला www भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-३ लक्ष्मीः श्रीः सतीव पतिव्रतास्त्रीव नरोत्तमेभ्यःसत्पुरुषेभ्यः न तु व्यमि- चचार कदाचिदपिन जहाँ कदापि कमिन्नपि समये जने लोके व्यसनम् विपद् न जातम् न बभूव "व्यसनं विपदि भ्रंशे दोषे कामनकोपजे इत्य- मरः" आनन्दात् हर्षात् निपेवणादे सेवनादेः कलाव्यसनमेव चतुःप- प्टिकलाभ्यासाभिनिवेशमेव ननन्द जजृम्भे सर्वपक्षसामान्यम् ॥४०॥ जज्ञे करव्यतिकरः किल भास्करादी, दण्डग्रहाग्रहदशा नवमस्करादौ । नैपुण्यमिष्टजनमानसतस्करादौ, छेदः सुसूत्रधरणात् तदयस्करादौ ॥११॥ अन्ययःकरण्यतिकर: भास्करादौ किल दण्डमहाग्रहदशा नवमस्करादौ इष्टजनमानसतस्करादौ नैपुण्यम् सुसूत्रधरणात् तदयस्करादौ छेदः जज्ञे ॥४॥ व्याख्या-प्रभौ राज्ये शासति सतीति पूर्वश्लोकसम्बन्धमनुस्- त्याह जज्ञ इति करव्यतिकरः करस्य किरणस्य व्यतिकरो व्यसनम् भास्करादौ सूर्यादिग्रहे न चान्यत्र लोके करस्य अंशोदीप्त राजग्राह्यभा- गस्य वा व्यतिकरो व्यसनम् विपर्यासो जज्ञे उत्पेदे " बलिहस्तांशवः करा इत्यमरः" दण्डग्रहाग्रहदशा दण्डस्य यष्टिकादेः ग्रहो ग्रहणम् तस्या- ग्रहदशा दण्डग्रहणस्य निश्चयाभिनिवेशः नवमस्करादौ नवे नूत्ने मस्क- रादौ वंशादी नवीनवंशकरीरादौ दण्डग्रहणनिश्चयः "मस्करशतपर्वा. चेत्यमरोहमश्च" जज्ञे बभूव न चान्यत्र जने दण्डस्य दमस्य राजादि- कृतनिग्रहस्य यो ग्रहः ग्रहणन्तस्य आग्रहदशा अवश्यकर्त्तव्यदशा न जज्ञे न जाता इष्टजनमानमतस्करादौ इष्टजनस्य स्वामीटनायकनायिका. दिरूपजनस यो मानसो हृदयम् तस्य तस्करादौ चौर्यादौ किञ्चिदपि ग्रहणादौ नैपुण्यम् चातुर्यम् स्वप्रणयिहृदयग्रहणे कौशलम् न चान्यत्र वस्तुविषयकचौपनैपुण्यम् प्रभो शासति कोऽपि पाटघरकौशल्यमक- १५७ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसग्धानमहाकाम्ये MmA vvv Nvvv रोतिस्मेति भावः छेदच्छेदनम् सुसूत्रधरणात् सूत्रधारत्वात् उदय- स्करादौ तदीयतक्षकादौ लौहकारादौ न च केयांश्चिदपिगुणच्छेदोऽङ्ग-. च्छेदो वा जज्ञे अत्र परिसंख्यालंकारः सर्वपक्षमाधारणम् ॥ ४१ ।। व्यर्थीकृते सुकृतिना कृतिना स्वकामे, सोऽर्थी जनः पुनरनन्तधनः परार्थी । काठिन्यधीः कनकवत्यपि देवशैले, सिन्धोः परत्र विषये न सदर्णवत्त्वम् ॥४२॥ भन्वयः सुकृतिना कृतिना स्त्रकामे व्यर्थीकृते सोऽर्थीजनः अनन्तधनः पुनः परार्थी काठिन्यधीः कनकवत्सपिदैवशैले सिन्धोः सवर्णवत्वम् परमविपये न॥४२॥ व्याख्या कृतिना कुशलेन विदुपेत्यर्थः सुकृतिना पुण्यशालिना स्वकामे स्वमनोरथे वाभिलाये व्यर्थीकृते सति परित्यक्ते सति सत- तसर्वसौख्यसानिध्यान्मनोरथाभावे सति इति भावः स अर्थी अर्थ- प्सुर्जनो याचकवर्गः अनन्तधनः अतुलितसम्पत् पुनः परार्थी परस्मै अर्थो धनं यस्य स परप्रयोजनदानार्थमेव धनसंग्रहो न स्वार्थमिति तत्वम् कनकवत्यपि स्वर्णवत्वेऽपि हिरण्मयत्वेऽपि देवशैले सुमेरुगिरी काठिन्यधीः कार्कश्यमतिः अन्यत्र स्वर्णवति जने काठिन्यधीः कार्प- ण्यवुद्धिः मितन्पचित्वन्न मिन्धोः समुद्रस्य सदर्णवत्वम् मदाजलयत्वम् सर्वदेव सजलत्वम् तत इति शेषः परत्रविपये ममुद्रादितरत्र जने सदर्णवत्वम् सदा झणवत्वम् अधमर्णत्वम् नासीदिति शेषः प्रभौ शासति केऽपि ऋणिनो न जज्ञिरे इति भावः अत्र यमकः परिसंख्या चालंकारौ । सर्वत्रसमम् ॥ १२॥ दानं ददत्सु जनवत्सलवत्सदित्सा- हानेन मार्गणगणस्य महाशयेषु ।
१५५
भाचायधीपिजयामृतरिप्रणीता मरणी टीका. सर्ग-३
WANA
निन्दन्ति देवतरवः स्वभवं विवणं,
यन्नाम नः स्वरविधी पटुतालवोऽपि ॥ ४३ ॥
भन्वयः-जनवरसरवत् सदित्साहानेन मार्गणगणस्य दानन्ददरसु महा-
शायेषु देवतरवः विवणं सभय निन्दम्ति यत् न. नाम स्वरविधौ पटुता.
वोऽपि न ॥ ३ ॥
व्याख्या-जनवत्सलवत् सर्वदयालबत् सर्वजनस्नेहपारवश्येनेव
सदित्साहानेन दानेच्छया आकरणेन मार्गणगणस्य मार्गयति याचते
इति मार्गणो याचकस्तस्य गणः संघस्तस्य दानम् ददत्सु दानंयच्छत्सु
"शेषत्वविवक्षायां पष्ठी" महाशयेषु महानुभावेपु अतुच्छाशयेषु सत्सु
इति भावः देवतरवः कल्पपादपाः विवर्ण मलिनं नितरानिरुपयोग
खभवं निजजन्म निन्दन्ति विगईयन्ति यत् यस्मात् नः असाकम् नाम
- अभिधानम् खरविधौ शब्दप्रयोगविषये पटुतालयोऽपि दक्षत्वलेशोऽपि
खकीयामिधेयार्थकणिकाऽपि न लभत इति शेपः प्रचकर्तुकतादृश-
निरर्गलदानकालेऽस्माकन्नामलेशतोऽपि न मार्थकमिति कल्पवृक्षादयः
खमनसि मन्यन्त इति भावः अतिशयोक्तिरलंकारः सर्वपक्षसदृशो.
ऽयमर्थः ॥ ४३॥
'दिव्या-गमाः पवनदुर्यवनावधूता,
भूता इवातिविपमाकृतयः स्फुरन्ति ।
जाड्यान्न तत्समुचितं वहुपात्रयोगे,
ऽप्येषां यतः फलवले रसभेद एव ॥ ४४ ॥
भन्वया-पवनदुर्यवनावधूतादि व्यागमा भूता इव अतिविपमाकृतयः
'स्फुरन्ति बहुपायोगेऽपि जाड्यात् तत् न समुचितं यतः एषां फरबले रस-
भेद पुष ॥१५॥
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सससन्धानमहाकाये व्याख्या-पवनदुर्यवनावधूताः पचनस्य वायोर्योदुर्यवनः अस- झवेगस्तेन अवधूना विलोकिताः कम्पिता इत्यर्थः दिव्यागमाः सुर पादपाः कल्पवृक्षादयः भूता इव व्यन्तरा इच विपमाकृतया बीभत्स- रूपा भयजनकाकृतयः स्फरन्ति समुल्लसन्ति इति समुल्लसन्तु नाम किन्तु बहुपात्रयोगे अनेकसत्पात्रसमवधाने जाड्यात् स्थावरत्वेन बाह्य- ज्ञानवैमुख्यात् यत् विपमाकृतित्वम् वैमुख्यत्वम् अर्थिजनपराङ्मुख- त्वम् तत् न समुचितम् न योग्यम् उत्तरपदगतस्तत् शब्दः पूर्वपदगतं यद शब्दमपेक्षत इति भावः यतः वैमुख्याद्धेतो रसभेद एव भिन्न- रसतैव तथाहि यनेपां कल्पपादपानां दानवीरता आसीत् तदिदानीम् वैमुख्यात भूताभिनिवेशाच भयानकत्वं पर्यवसितम् भयानकत्वेन परिणमतीति भावः अतद्गुणालंकारः ।। ४४ ॥ जानन्ति दानविधिमत्र न देववृक्षाः, शाखाश्रयं फलमलं दधते यदेते ॥ दृष्टं कदाचन सपक्षगणेन लभ्यं, नामीषु तत्फलवलं प्रतिपात्रमिष्टम् ॥ ४५॥ :-देववृक्षा अत्रदानविधिनजानन्ति यदेते शाखाश्रयं फलम् अल- न्दधते सपक्षगणेन लभ्यं कदाचन दृष्टम् यत् प्रतिपात्रम् इष्टम् तत्फलबलम् अमीषु न दृष्ठम् ॥ १५ ॥ व्याख्या-अत्र लोके देववृक्षाः सुरपादपाः दानविधिम् सत्पात्रार्पणव्या- पारन जानन्ति नायबुध्यन्ति यद्यस्मात् एते कल्पशाखिनः शाखाश्रयं स्कन्धशाखाश्रयं विटपाधीनमित्यर्थः फलम् स्वसंपत् अलम्पर्याप्तम् दधते धारयन्ति स्वाधीनफलाभावात् कस्मैचिदपिदातुं कथं प्रभवेयुरिति भावः सपक्षगणेन पतत्रिसंघेन अथ च स्वकीयवर्गेण आत्मीयजनेने. त्यर्थः : लम्यम् प्राप्यम् फलमिति शेपः कदा च कसिन्नपि समये न दृष्टम् अन्वयः- १५७ vvvA भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-३ नावलोकितम् अतः संभावयामि अमीषु कल्पवृक्षेषु यत्फलबलम् फल. सम्पत् तत् प्रतिपात्रम् प्रतियोग्ययाचकजनम् इष्टम् लभ्यन्न एतेप्रति. पात्रन्दानसमर्था न भवन्तीति प्रभवस्तुप्रतिपात्रं दानं यच्छन्तीति व्य. तिरेकालंकारो व्यङ्गयः ॥ ४५ ॥ चिन्तामणिर्जलधिमध्यमिवाध्युवास, कल्पद्रुमा दिवमिवारुरुहुर्हियेव । नृणां तदाऽनृणकृतां भजनाजनानां, न्याय्ये परिस्फुरति राज्यवले तदीये ॥४६॥ अन्वयः-तदा भनृणकृतां नृणां जनानी भजनात् तदीये न्याय्ये राज्यबले परिन्फु- रति हियेव चिन्तामणिर्जलधिमध्यम् अध्युवास इव कल्पद्रुमा दिवम् भारुरुहुरिव४६ व्याख्या-तदा तसिन् समये तदीये वर्णनीयनायकसम्बन्धि- नि न्याय्ये न्यायानुगते नीतिमनुसृत्य प्रवर्चमाने राज्ययले साम्राज्ये परिस्फुरति जरीजृम्भमाणेसति अनृणकृतां ऋणं कुर्वन्तीति ऋणकृतः न ऋणकतः अनृणकृतस्तेषामनधमर्णानां जनानाम् लोकानाम् मन- नाव सेवनात् चिन्तामणिः चिन्तितार्थप्रदानप्रभविष्णुरत्नम् दियेव लअयेव जलधिमध्यम् समुद्रान्तः अध्युवास निवसतिस्म इत्र यथाऽन्यो- ऽपि लजापारवश्याजलमजनं करोति तथायमपि समुद्रे ममज तथा च कल्पद्रुमाः कल्पवृक्षाः हिया इव लज्जया इव कथम्बयं लोके स्वा वमाननं सहामहे इति बुद्धयैव किमिति शेषः दिवम् स्वर्गम् आरुरु- हुरिव रोहन्तिस्म किम् ॥ सतां माने म्लाने मरणमथवादरगमनमित्य- भियुक्तोक्तिमवलम्ब्यैव खर्गयात्रामकुर्वनिति भावः अत्र श्लोक क्रियोत्प्रेक्षालंकारः ॥ ४६॥ अस्मिन् प्रभो विभवमाश्रयति प्रभावा, भावाः समीहितविधानकृतावधानाः।
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये अन्वय:- देवद्रुदेवमणिदेवलतादयोऽपि, मन्येऽवतेरुरिह देवचिरानुरागात् ॥ १७ ॥ -भसिन् प्रभो विभवम् माधयति प्रभावाभावाः समीहित- विधानकृतावधाना: देवचिरानुरागात् देवद्रुदेवमणिदेवलतादयोऽपि इह भवतेरुः इति मन्ये ॥ १७ ॥ व्याख्या-अमिन् वर्णनीयनायके प्रभौ जिनेन्द्रेऽन्यत्र प्रभा- वशालिनि यदा अस्मिन् जगति प्रभो स्वामिनि विद्यमाने सतीति शेपः तथा च विभवम् ऐश्वर्यम् आश्रयति अधिष्ठिते परमैश्वर्यसम्पन्ने सति प्रभवाः प्रकृप्टेन सर्वतोऽधिकेन भवन्तीति प्रभवाः श्रेष्ठा भावाः पदार्थाः पृथिव्यादयः समीहितविधानकृतावधानाः समीहितस्य अमिलपितस्य विधाने सम्पादने सौलभ्ये कृतावधानाः सयनाः आसनिति शेपः प्रभौ विद्यमाने सर्वेऽपि स्थावरजङ्गमादयो भावाःखस्वसेवार्थन्तदीप्सि तविधानदक्षा बभूवुरित्यर्थः तथा च देवचिरानुरागात् देवस्य जिने- न्द्रस्य अन्यपक्षे द्योतनात्मकस्य चिरानुरागात् दृढप्रेमतः निरतिशय. भक्तिपारवश्यादित्यर्थः देवद्रुदेवमणिदेवलतादयः कल्पवृक्षचिन्ताम णिकल्पलताप्रभृतयः इह प्रभुसनाथितभूप्रदेशे सेवार्थमिति शेपः अब- तेहः अवतीर्णाः स्वर्गादाजग्मुरिति मन्ये जाने उत्प्रेक्षालंकारः॥१७॥ कौमारस्फारतेजोदहनमसहनाः प्राप्य निर्दग्धभूमी, पादन्यासेऽप्यशक्ता नगनगरकरस्याग्रहे कैषु वार्ता । मुक्त्वा राज्यान्यवन्या उपवनपवनैः साहचर्यात् कर्या, दर्यामध्ये मृगोक्षीक्षणविषयसुखं भुञ्जतेभ्रान्तिभाजः४८ इतिश्री सप्तसंधाने महाकाव्ये श्रीराज्याके कौमा- रवर्णनो नाम तृतीयः सर्गः ॥३॥ .
" भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-1 अन्वयः-कौमारस्फारतेोदहनम् प्राप्य असहना निर्दग्धभूमौ पादन्या. सेऽपि असक्ताः नगनगरकरस्य आग्रहे एषु कावार्ता भवन्या राज्यानि मुक्त्वा उपवनपवनैः साहचर्यात् कदयां भ्रान्तिभाजः दर्यामध्ये मृगाक्षीक्षणविषयसुखम् भुञ्जते ॥ १७ ॥ व्याख्या-कौमारस्फारतेजोदहनम् कुमारो युवराजः "जनको युवराजस्तुकुमारो भर्तृदारक इत्यमरः यद्वा कुमारयति क्रीड़यतीति कुमारः, कुत्सितः अप्राप्तयौवनत्वात् मारोयस्य स अथ च कुत्सितोनि- न्दितोमारः कामदेवो यस्माद स अथवा को पृथिव्यां मार इवेति कुमारः तसिन् भवम् कौमारं यत् स्फारम् विकटम् अत्युग्रम् तेजः प्रभावम् तदेव दहनो वह्निस्तम् कौमारीयविपुलप्रतापामिम् प्राप्य तम- निमधिगम्य असहनाः असहिष्णवः तदीयप्रतापानिंसोढुमक्षमा निर्द- ग्धभूमौ तत् प्रतापाग्निप्लुटमेदिन्यां स्वकीयभुमौ पादन्यासेऽपि चर- णन्यासेऽपि असक्ता अप्रभविष्णवः असमर्थाः नगनगरकरस्याग्रहे नग. नगरस्याग्रहे नगस्य पर्वतस्य नगरस्य पुरस करस्य राजग्राह्यस्य राज. स्वस्येत्यर्थः तेषां आग्रहे समन्तात् ग्रहणे विपये एषु नगनगरकरेषु का वार्ता का चर्या पलायनमार्गोऽपि न पश्यन्तीति किमुपुनरेतेपां ग्रहणेषु प्रसक्तिरिति भावः ते पुनः अवन्या भूमेः राज्यानि स्वसाम्रा- ज्यानि मुक्त्वा परित्यज्य उपवनपवनैः उद्यानवातैः साहचर्याद संबन्धात् कदर्याः कद कृता भ्रान्तिभाजः विवेकविकलाः प्रतीपराजा. न इति शेषः दर्याः कन्दरायाः गिरिगुहाया अन्तः मृगाक्षीक्षणविषय- सुखम् मृगाक्ष्या मृगनयनायाः कामिन्याः क्षणम् क्षणमभिव्याप्यविष- यसुखम् सांसारिकविषयन्द्रियसुखं भुञ्जते अनुभवन्ति विपक्षपक्षाश्रिता नृपा स्तद्भयादितस्ततः पलायमानाः क्वचिन्कन्दरादौ क्षणम् विषयसुखं चकितचकिता अनुभवन्तीति तात्पर्यम् ।। अत्र श्लोके स्रग्धरावृत्तम्४८ इति शास्त्रविशारद-कविरक्षमारकाचार्य-श्रीविजयामृतसूरीश्वरप्रणीतायां सहसन्धान महाकाव्य-सरणी टीकायां तृतीयः सर्गः ॥"
१६० महोपाध्यायधीमेपविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्पे ५ N wrnNAwaanwer MAN- ॥ चतुर्थः सर्गः॥ अन्वयः- देवावतारसमये सममेव देवाः, सेवार्थिनी भगवतः समुपेयुरुाम् । सर्वे ततः सुमनसो विवुधा विशिष्य, तहानवारिमतयः सततं प्रकृत्या ॥१॥ -देवावतारसमये भगवतः सेवार्थिनः देवाः सममेव वयां समुपेयुः ततः सर्वे सुमनसः विबुधाः प्रकृत्या विशिष्प तहानवारिमतयः बभूवुः व्याख्या-देवावतारसमये देवस्य शक्रस्य अवतारसमये प्रमो राज्याभिषेकार्थमागमनकाले भगवतः ज्ञानादिमतः श्रीमपभदेव- स्वामिनः सेवार्थिना-उपासनाकाशिणः देवाः सममेव-एकदेव इन्द्रेण सहव चा उन्या श्रीमञ्जिनेन्द्रपदपङ्कजाधिष्ठितभूतले समुपेयु-समु- पाजग्मुः । ततः तदनन्तरं सर्व-निखिलाः सुमनसः समुल्लसितचेतसः विबुधा:-देवाः देवसदृशपुगलिनश्च प्रकृत्या-स्वभावेन अन्यप्रेरणां- विनवेत्यर्थः विशिष्य-विशेषरूपेण तद्दानवारिमतयः-तहानवारिषु राज्यदानार्थजलेषु तदुपसंग्रहे इति भावः। मति: बुद्धिर्येषां ते तादृशाः बभूवुः। २-३-४-५-६ पक्षेषु-देवस्य प्रभोः राज्ञो वा अवतारसमये भूम्यागमनसमये एव भगवतः ऐश्वर्यादिमतः सेवार्थिना-उपासि- पवः केचिद देवाः समम् सहन उब्या भगवदधिष्ठितभूमौ समुपेयु: अवतरुः । ततः योग्यसमये मर्वे ते तद्दानवारिमतयः तस्मै राज्य- दानार्थ कृतबुद्धयः अथवा तस्मिन् (प्रभो ) दानवारि:-देवः अयम् इति मतिर्येषां ते तादृशाः बभूवः ।।
भाचार्यश्रीविजयामृतस्प्रिणीता सरणी टीका, सर्ग-४
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-More
७ पक्षे-ततः तदनन्तरं गज्याभिषेकानन्तरं तहानवारिमतयः-
दानवारि: कृष्णस्तस्मिन्मति सद्भावना येषां ते दानवारिमंतयस्ते च
ते दानवारिमतयश्चेति तद्दानवारिमतयः बभूवुः शेषं पूर्ववत् ॥ १॥
प्रीत्याशयं दधति भूरिजनास्तदुच्चं,
त्यागं विधाय पुरतः सुरतानुपड़े।
मित्रश्रियैव कलयन्त्यकलङ्गभावं,
ते दक्षजातिरुचयो वसुधाभुजोऽपि ॥२॥
भन्चय-भूरिजना. प्रीत्यागयं दधति तत् दक्षजातिरुचयः ते वसुधामुजः
पुरतः मुरतानुपने उघं स्याग विधाय मिअभियच अकल्माय कलयन्ति ॥२॥
व्याख्या-भूरिजनाः सर्वे लोकाः नृपविषये प्रीत्याशयं प्रीति-
युक्तम् आशय-चित्तम् अभिप्राय वादधति धारयन्ति प्रमुदितचेतसो
भवन्तीत्यर्थः तत्-तम्माद्धतोः दक्षजातिम्चयः दक्षापद्वी जातिः
रुचिः दीप्तिथ येषां ते यद्वा दक्षजा: अश्विनीप्रभृतितारा अतिगान्ता
रुचिर्येषां ते तादृशाः ते पूर्वोक्काः वसुधाभुजा पृथ्वीपतयः श्रीना-
भिराजादयः पुरतः अग्रतः नगरेषु वा गृहेषु चा सार्यविभक्तिकस्तसि।
स्यात्पुरः पुरतोऽग्रतः इत्यमरः । अगारे नगरे पुरमितिचामरः।
मुरतानुपने-सुराणां समूहः सुरता तस्सा अनुपने-मम्बन्धे देवानुद्दि-
येत्यर्थः उचं महान्तं त्याग-दानं विधाय मिश्रियैर-मुहम्यैव
पार्फ समाम्राज्यश्रियः अकलङ्गमा-व्यावर्तकचिनामावेनामिन-
भावं कलयन्ति-मंपादयन्ति ॥ २॥
पूर्वानुरागकलया सकृदिन्द्ररुपा,
भूपा जनुर्धनुरूपाश्रयणानुरुपाः ।
स्तृपा इयोदितमहोन्नतपुण्यकर्म-
सोधर्मसंगतिभवद्विशदस्वरूपाः ॥३॥
Whvan. महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तमन्धानमहाकाम्ये अन्वयः-पूर्वानुरागकलयाऽसदिन्द्ररूपाः जनुर्धनुस्पाश्रयणानुरूपाः भूपाः स्तूपा इव उदितमहोसतपुण्यकर्म सौधर्ममगति भवद्विशदस्वरूपाः आसन् ॥३॥ व्याख्या-पूर्वाऽनुरागकलया-पूर्वः प्राग्भवीयः अनुरागा- स्नेहः तस्य कलया अंशेन असदिन्द्ररूपाः वारंवारमिन्द्रवरूपाः जनुर्धनुरूपाश्रयणाऽनुरूपाः अनुपः जन्मत एव यद्धनुरूपाथयण धनुर्विद्याऽभ्यासस्तस्य अनुरूपाः अनुकूला योग्या इत्यर्थः शूग इति यावत् भूपाः स्तूपादेव मन्दिगणीव उदितमहोन्नतपुण्यकर्मसौधर्म- संगतिभवद्विशदस्वरूपाउदितं प्राप्तोदयं महोन्नतम् अतिप्रशस्तम् अत्युच्छ्रितं वा यत् पुण्यकर्मधर्म्यकृत्यं तेन या सौधर्मसंगतिः मुधर्मा-देवसभाऽस्त्यसिन्निति सौधर्मः तदाख्यः कल्पस्तत्रभवोपि वास्थ्यात् सौधर्मः सौधर्मेन्द्र इत्यर्थः यद्वा सुधमैव सौधर्मस्तस्य संगत्या संनिधानेन भवद् विशदं रूपं येषां ते तथोक्ता आमन् ॥३॥ साम्राज्यमस्य सुषमासुषमानुभावि- धर्मादरेण परिशीलयतः सलीलम् । 'यातेऽप्यनेहसि घनेऽथ सुमङ्गला स्त्री, साऽसूतकाशु-भरतं ननु सूनुरत्नम् ॥४॥ :-सुपमासुपमाऽनुभा विधर्मादरेण साम्राज्यं सलीलं परिशीलयतः भस्य सा सुमंगलास्त्री घनेऽनेहसि याते भरतं सूनुग्नम् आशु असूतक ॥ ५ ॥ व्याख्या-सुपमासुपमाऽनुभाविधर्मादरेण-सुपमासुपमाया:= एकान्तमुषमायाः चतुःसागरोपमकोटाकोटिपमाणक सुपमासुपमाख्य प्रथमारकस्य योऽनुभावः अनीतिराहित्यादिरूपप्रभावः मोस्लास्मिन् स तादृशो धर्म राजधर्मस्तस्यादरेण=मत्कारेण अनतिक्रमेणेति भावः साम्राज्य-मार्वभौमत्वं दशलनाधिपत्यं वा 'लक्षाधिपत्यं राज्यं साद साम्राज्यं दशलक्ष इत्युक्तेः । सलीलम् लीलया सहितमनायासे. .. - अन्वयः- भाचार्य श्री विजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-४ ~~~~ नेत्यर्थः परिशीलयतः समन्तात्पालयतः अस्य श्रीमदृषभदेवस्य सा मुमंगला तदनिधाना खी घने बहुतरे अनेहसिकाले याते व्य- तीते सति भरत-तदाख्यं सूनुरनं-पुत्रश्रेष्ठम् आशु-शीघ्रम् अम्तक प्रासोष्ट ॥ ४ ॥ अन्यापि देववनिता सुकृतान्नितान्तं, चक्रायुधं प्रसुषुवे वपुषाभिरामम् । नाम्नापि वाहुवलिनं फलिनं द्रुमं भूः, प्राचीव भानुमुदितं च जयं शचीव ॥ ५ ॥ अन्वयः-अन्यापि देववनिता नितान्तं सुकृतात नान्नाऽपि बाहुबलिनं चक्रायुधं वपुपाऽभिरामम् भूः फलिनं द्रुममिव. प्राची उदितं भानुमिव शची जयमिव प्रसुपुवे ॥ ५ ॥ व्याख्या-अन्याऽपि अपराऽपि द्वितीयापीत्यर्थः देववनिता आदिदेवभार्या सुनन्दा नामधेया नितान्तं सुकृतात् पुण्यातिशयम- हिम्ना नाम्ना अपिना गुणेनापि चाहुबलिनं तदाख्यं भुजवलशालिन चक्रायुध-चक्राख्यमायुधमस्त्यस्य हस्तादौ चिहरूपेणेति । तादृशं वपुपा-शरीरेण अभिराममनोहरं सूनुरत्नमित्यनुपज्यते प्रसुपुवे प्रसूतवती। का कामिव भूः पृथ्वी फलिनं-फलसमृद्धमनवकेशिनमि- तिभावः दुम-वृक्षमिव । प्राची-पूर्वदिशा उदितं प्रकाशमान भानु सूर्यमिव । शची-इन्द्राणी-जयन्तमिवेत्यर्थः । इत्याद्यपक्षीयोऽर्थः । द्वितीयपक्षे तु-अन्यापि देववनिता श्रीशान्तिनाथप्रभोः पट्ट- राज्ञी श्रीयशोमती नाम्नी नितान्तं सुकृतात् अतिशयपृण्यप्रभावाद वपुपाऽभिराममनोहरकलेवरं बाहुबलिन भुजबलवलितं नाना- आख्यया अपि शब्दाद अन्वर्थतागुणेन च चक्रायुधं तदाख्यं सुनु रत्नं प्रसुपुवे अजीजनत् । तदुक्तं शान्तिनाथचरिते-गर्माधानमजति . महोपाध्यायश्री मेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्य : भगवत्यत्रमात्रा निरैक्षि, स्वप्ने चक्रं समुदितविभाचक्रकाष्ठावभासं। - अस्माचक्रायुध इति सुतस्याऽस्य नामाऽभिधानं, श्रीमान शान्तिर्व्य- धितविधिवल्लोककल्पद्रुकल्पः । १४ । २०८ । अन्ये समाहितनया विनयाद विरेजुः, श्रीलक्ष्मणादिविदिता दितशात्रवास्ते । भूमीभुजां विहितशक्रपराक्रमेण, शत्रुघ्न इत्यभिधया सुधिया प्रशस्याः ॥ ६ ॥ अन्वयः--अन्ये ते समाः तनया: विनयात् विरेजुः श्रीलक्ष्मणादिवि- दिता.दितशाश्रवाः भूमीमुजां विहिजशक्रपराक्रमेण सुधिया शत्रुध्न इत्यभिधया प्रशस्साः । रामपक्षे-अन्ये ते श्रीलक्ष्मणादिविदिताः शत्रुघ्न इत्यभिधया ण्यात: कनिश्च सर्व विनयाद्विरेजुः समाहितनयाः दितशानवाः भूमीभुजां विहित. शक्रपराक्रमेण सुधिया प्रशस्या. ॥ ६ ॥ व्याख्या अन्ये=अपरे ते समा:-तुल्याः अष्टनवतिसंख्यकाः तनया: भगवत आदिदेवस्य पुत्राः विनयात्-गुरुजनेपु नम्रभावात् विरेजुः शुशुमिरे । कीदृशा इत्याह-श्रीलक्ष्मणादिविदिताः श्रीः शोभा बुद्धिर्वा कीर्तिा लक्ष्मण-नामधेयं तदादिमिादिता:जगति- प्रसिद्धाः । दितशात्रवादित-खण्डितं शात्र-शत्रुसमूहो यैस्ते यद्वा दिता-छिन्नाः शात्रयाः वैरिणो यैस्ते शौर्यसम्पन्ना निष्कण्टकाश्चेति भावः भूमीभुजां राज्ञां विपये मध्ये वा विहितशक्रपराक्रमेण अकटी कृतेन्द्रतल्यविक्रमेण हेतुना मुधिया-प्राज्ञजनेन शत्रुघ्न इत्यभिधया इत्याख्यया प्रशस्सा प्रशंसाः ।। सिंहावलोकनन्यायेन प्रागनुक्तान् श्रीरामबलदेवभ्रातॄन इह नामा निर्दिशति कविः-अन्ये प्रागनुक्तशिष्टा अपरे ते प्रसिद्धाः, श्री- लक्ष्मणादिविदिता: श्रीलक्ष्मण आदिय पां ते श्रीलक्ष्मणादयस्ते च ते
आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-४
MAM
विदिता ज्ञातारश्चेति ते तथोक्ताः आदिना भरतः शत्रुघ्न इत्यभिधया
नाम्ना ख्यातः कनीयांश्च सर्वेविनयाद्विरेजुः कीदृगा इत्याह
समाहितनया: समाहितः समवलम्बित: सम्यस्थिरीकृतोचा नया
नीतिय॑स्ते दितशात्रवा-सण्डितपरिपन्थिजनाः भूमीभुजां विहित
शक्रपराक्रमेण सुधिया प्रशस्याः ।
सम्यक् चचाल जनता विनये नये च,
जज्ञेऽस्य राज्यमहिमा विजये जये च ।
सारस्यमेव यशसो निनदेन देव,
वृष्टेः सुखार्जनमनोमदनेऽदने च ॥७॥
अन्वयः-जनता विनये नये च सम्यक् चचाल । अस्य राज्ञ. राज्य-
महिमा बिजये जये च जज्ञे। सुसार्जनमनोमदने ऽदने च भस्य राज्ञो यशसो
निनदेन देववृष्टेः सारस्यम् (भभूत्) ॥ ७ ॥
व्याख्या-जनता-जनसमुदायः विनये राजभक्तो नये-राज-
नीतौ च सम्यक् सुष्ठु चचाल-वर्तनशीलाऽभूत् । अस्य राज्ञः राज्य-
महिमा राजकर्मप्रशंसा शासनप्रभाव इति यावत् विजये विशिष्टजये
जये सामान्यजये च जज्ञे जातः। किञ्च मुसार्जन-मनोमदने सुखा-
जने-सुखेच्छायां मनोमदने=चित्तहर्षे अदने-भोजने च अस्य राज्ञः
यशसो निनदेन-यशःप्रवादेन देववृष्टेः-मेघवृष्टितोऽपि सारस्प=
सम्सता अभूत् । मेघवृष्टितः सुखार्जनादिकं भवति ततोऽप्यस राज्ञो
विशेषेणाऽभूदित्यर्थः ॥७॥
नाभृद् भयं प्रस्मरे सवले वले च,
व्यक्ते जवे सुकृतकर्मणि तेजनेन ।
लोके विरोकरूचिरे सुचिरं सतोके.
जातं समाभिरसमाभिरलड्यनेन ॥ ८ ॥
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तमन्धानमहाकाव्ये -~~ AA D %3D अन्वयः-सबले बले प्रसमरे तेजनेन सुकृतमणि जये व्यक्त भयं नाऽभूत् लोके विरोकरुचिरे सतोके च सुचिरं समाभिः अपमाभिः प्राप्तम् घनेन अल जातम् ॥ ८॥ व्याख्या-सबले-चल-शक्ति-सहिते वले सैन्ये प्रसृमरे प्रसरणशीले सति. तथा तेजनेन-उत्तेजनेन मुकृतकर्मणि-पुण्यकर्मणि जवे-वेगे व्यक्ते स्पष्टे सति भयं-राजभयादिसप्तमेदवती मितिः नाभूव । किश्च विरोरुचिरे=विशिष्टो रोका-दीप्तिः विरोकस्तेनरु- चिरस्तसिन् यद्वा विशिष्टो रोको दीप्तिर्यस्य सः अथ वा विगतो रोका छिद्र पणमित्यर्थः यस्य स विरोकः स चासौ रुचिरश्चेति स तसिन्, सतोके तोका अपत्यैः सहिते च सति सुचिरं-चिरकालाय समाभिः संवत्सरैः असमाभिः असाधारणीभिः जातम् अभावि । घनेन मेघेन च अलंकृप्याद्यनुकूलवर्पणसमर्थेन जातम्=समजनि ॥ ८ ॥ सम्यक्श्रिया विलसनैर्व्यसनैर्विनैव, निस्सीमभीममहसा रिपुकम्पनैश्च । पुन्नागनागतुरगैः किमु-दारलब्ध्या, भूचक्रचङ्कमणकृद् नृप एष शकः ॥९॥ भन्वयः-एप नृपः भूचकचक्रमणकृत् शक्रः किमु । (कैः ?) सम्यक् श्रिया विलसनैः व्यसनैर्विनैव निस्सीमभीममहसा रिपुकम्पनैश्च पुन्नागनागतुरगैः दारलगाया (पक्षे उदारलक्ष्या) भूचकचकमणकृत् अभूत् ॥ ९ ॥ व्याख्या-एप नृपः श्रीविश्वसेनादिमहीपतिः, भूचक्रचङ्क्रमण- कृत् भूमण्डलविहरणशीलः शक्रः इन्द्रः किमु इत्युत्प्रेक्षा तीज- माह-सम्यक् चारुरूपेण श्रिया-साम्राज्यलक्ष्म्या पक्षे स्वाराज्य. लक्ष्या विलसनैः विलासैः, व्यसनैर्विनव-विपढ़ाहित्येन निःसीम- मीममहसा=निःसीम-मर्यादातीतं यभीममहः शत्रुभयावहतेजस्तेन, रिपुकम्पनैः शत्रुजनत्रासजननैश्च पुनः पुन्नागनागतुरगैः-पुन्नागाः= -
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भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता मरणी टीका. सर्ग-४
नरश्रेष्ठाः मन्त्र्यादयः नागा: हस्तिनः तुरगाः अश्वास्तैः इन्द्रपक्षे
पुन्नागा=पाण्डुनागः श्वेतहस्ती ऐरावत इति यावत् नागाः-मेघा वा.
हनीभृताः 'तुरापाणमेघवाहन' इतीन्द्र पर्यायेऽमरोक्तेः तुरगः-अश्व:
उच्चैःश्रवास्तैश्च तथा दारलब्ध्या-स्त्रीरत्नप्राप्त्या, इन्द्रपक्षे उदारल-
ध्या-महत्या शक्त्येत्यर्थः उपलक्षितः भूचक्रचट्कमणकृत-विज-
यार्थ पृथ्वीयण्डले विहारकरणशीलोऽभूत् ।। ९ ॥
एतत्प्रयाणसमये नमयन् शिरांसि,
शेषो विशेषभृदशेपवलादुवाह ।
भूमि चलाचलतयोच्छ्वसनैः शनैर्वा,
श्वासप्रयासपवनैः कृतपारणार्थः ॥ १०॥
अन्वय.-एतरप्रयाणसमये शेष विशेषभृत् शिरांसि नमयत् शनै उच्चसनै.
श्वासप्रयासपवनै कृतपारणार्थ चराचलतया ऽशेपबलात् भूमिम् उवाह ॥१०॥
व्याख्या-एनत्प्रयाणसमये-एतस्य राज्ञः प्रयाणसमये-विज-
यार्थ प्रस्थानकाले शेप:-अनन्तनागः विशेपभृव-पृथ्वीयथावद्धारणा-
थेमामांतिशयमाश्रयन्नपि शिगंसि-फणामहनं नमयन्-प्रह्वीकृ.
वन् अत एव शनैः-मन्दम् उच्वसनैः-श्रमजनितदीर्घोच्छासैः श्वास-
प्रयासपवनैः-श्वासग्रहणसंजातप्रयाससमुद्भूतमारुतैः कृतपारणार्थः-
कृतभोजनेच्छः सन् चलाचलतया-संभ्रान्ततया ससंम्रममित्यर्थः
अशेषालाव-यावच्छक्तिमवलम्ब्य भूमिम् उमाह-दधार ॥ १० ॥
बुध्या समृद्धमनसाऽप्यनसा श्रुतीनां,
छन्दोऽनुचारिवचनै रचनैश्चमूनाम् ।
राज्ञः समाहितविधेः सविधे विधेयां,
मन्त्रीजनस्तदुदधेर्विदधेऽस्य सीमाम् ॥११॥
महोपाध्यारोमेघविजयगणिविरचित्ते सप्तसन्धानमहाकाये अन्नय:- -समाहित विधे. अस राज्ञः मन्त्रीजन: उदधेः समीपे विधेयो सीमा विदधे । (कै.) बुध्या ध्रुतीनागनसा मनसा धन्दोऽनुसारिवचनैः चमूना रचनैश्च ॥ १ ॥ व्याच्या-समाहितविधेः- अनुकूलदेवस्य भाग्यशालिन इत्यर्थः अस्य राज्ञः चक्रवर्निनः वासुदेवस्य वा मन्त्रीजनः उदधेः सविधे समुद्रसमीपे विधेयां करणीयां सीमां-विशेषेण शासनीय (धारणीय) देशमर्यादा विदधे-कृतवान् । कैः कैरुपायरित्याह-बुद्ध्या-औत्पाति- क्यादिमेदभिन्नया मया श्रुतीनाम् अनसा-शास्त्रोक्तनीतीनां शकटवद् वाहकेनेत्यर्थः श्रुति-शास-विज्ञेनेतियावत् समुद्रमनसा-उदारचिनेन अपिश्चार्थे छन्दोऽनुमारिवचनैः-अभिप्रायानुगुणवाक्यैः, चमूनां- सेनानां रचनैश्व-यथोचित सैन्यविभजनैः सैन्यविन्यासर्वा ॥११॥ क्षोणीधवे जयिनि भूविमाजुहाव, बाथैगंभीरनिनदैः स्खविभुप्रसाद्यैः । हित्वा सुधाशनरसान्नरसार्थगोष्ठयां. स्वास्थ्येन तस्थुरभराः क्रमरागिणोऽत्र ॥१२॥ अन्वय-क्षोणीधये जयिनि स्वविभुप्रसाद्यै गभीरनिनदैः भूः दिवम् भाजहाव (इव) अमराः सुधाशनरपान हित्वा अत्र मरागिणः नरसागोयां स्वास्थ्येन तस्थुः ॥ १२ ॥ व्याख्या-जपिनि-विजयशालिनि क्षोणीधवे-पृथ्वीपतौ सति यद्वा क्षोणीधवे जयिनि-विजयमाने सति स्वविभुप्रसाद्यैःस्वः-निजः विभु:-राजा प्रमाद्यो येषा तैः गभीरनिनदै:-गम्भीर ध्वनिशालिभिः बाधै-नानाविधवा दिवा ॥ कृत्वा भू-पृथ्वी दिवं-देवलोकं लक्षणया तत्स्थान् देवानित्यर्थः आजुहाव आह्वयतिस्मेवेति लुप्तोत्प्रेक्षावा. चिकोत्प्रेक्षा । अत एव अमरा-देवाः सुधाशनरसान्-अमृतभोजन. .
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भाचार्यश्रीविजयामृनरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-४
जनितानन्दान् हित्वा-परिहाय अत्र चक्रवर्त्यधिष्ठितदेशे क्रमरागिण:-
क्रमे-आचार चलने वा रागिणः-कृतानुरागाः सन्तः नरमार्थगो-
प्ठयां-जनसमुदायमण्डल्यां स्वास्थ्येन-सुखेन तस्थुः-स्थितवन्तः ।
चक्रवादीनां चक्रायधिष्ठायकतया देवानामिहागमनं जैनराद्धान्त-
प्रसिद्धम् ॥ १२ ॥
न्याये भुवि प्रसृमरे समरे न कोऽपि,
स्थायी मिथःप्रतिघतोऽपि न चाततायी।
तायी रसादसुमतां सुमताङ्कभार्जा,
तद्वाजतेस्म तनयस्सनयस्स-राजः ॥ १३॥
अन्वयः-भुवि अस्य न्याये समरे कोऽपि समरे मिथः न स्थायी ।
प्रतिघतोऽपि कोऽपि आततायी न [आसीत् अस्य राजः तनयः सुमताङ्कभाजा-
मसुमता रसात तायी सनयः सराजः राजतेस्म ॥ १३ ॥
व्याख्या-भुवि-भूमण्डले अस्य राज्ञः न्याये-नीती प्रसूमरे-
प्रसरति सति कोऽपि जनः समरे-संग्रामे मिथ:-परस्परं न स्थायी-
राजभयेन नाऽवतिष्ठते. प्रतिघता-शोधादपि कोपाविष्टोऽपि सन्नि-
त्याशयः कोऽपि आततायी-आततेन-विस्तीर्णेन शस्त्रादिनायितुं
शीलमस्य सः-वधोद्यतः अग्निदादिलक्षण इति यावत् तथा चोक्तम्-
अग्निदो गरदथैव शस्त्रपाणिर्धनापहः ।
क्षेत्र-दारापहारी च पडेते आततायिनः ॥ इति ।
न आसीदिति शेपः । किञ्च अस्य राज्ञः तनयः-पुत्रोऽपि सुम-
बालभाजां-मुमताना-सजनानाम् अङ्कम्-उत्सङ्ग-फोडं-भजन्ते इति
मुमताकभाजस्तेषां तादृशानाम् अमुमतां-प्राणिनां रसाद स्नेहाद
वात्सल्पादिति यावत् तायी-रक्षणशीलः पुनः सनया-नीतियुक्तः,
सराजा-राजन राना-दीप्ति तेन अहितः राजतेस्म शोभतेस ॥१३॥
महोपाध्यायनीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्ये D नृणां गणो निरवधिर्धनवर्धनेन, प्राप्तावधिर्भजनतो जिनराजिराजाम् । कार्पण्यमाश्रयति नैव मनाक् सपण्यः, प्रावीण्यपुण्यविधिनैव धुनोति पङ्कम् ॥ १४ ॥ भन्वय -नृणांगण: धनवर्धनेन निरपधि जिनराजिराजा भजनतः प्राप्तावधिः । सपण्यः मनाक कार्पण्य नैराश्रयति प्रावीण्यपुण्यविधिनैव पर धुनोति ॥१४॥ व्याख्या-नृणांगण जनममुदायः धनबईनेन-धनधान्यादि- समृद्धथा निरवधिः-अनन्तः धनिकश्रेण्यां मर्वाग्रगण्य इति भावः अथ च अवधिरहितोऽपि जिनगजिराजां-जिनेन्द्र देवानां भजनत:-आरा धनायाः प्राप्तावधिः अवधि प्राप्तः मावधिरिति विरोधः प्राप्तः अवधिः अवधान मनोयोगविशेएः (यदशान्मनो विषयान्तरतो निवर्तते) येन स इति परिहारः । अवधिम्त्ववधाने स्यात्सीम्निकाले विले पुमानिति मेदिनी । एवं सपण्या=पण्येन-स्तोतव्येन स्वेष्टदेवेन हृदि सहितः यद्वा पण्यैः व्यवहार्यवस्तुभिः सहितः । किन्तु मनाक्-अल्पमपि कार्पण्यं कृपणताम्-उचितब्ययविमुखतया धनसंचयेच्छां मितम्पच- त्वमिति यावत् यद्वा कापण्यं दैन्यं नैव आश्रयति–नावलम्बते । किञ्च प्रावीण्यपुण्यविधिनैव-प्रावीण्येन नैपुण्येन विज्ञतयेति यावत् पुण्यानां धर्माणां विधिना विधानेन अनुष्ठानेनेति यावत् यद्वा पुण्येन-मनो- ज्ञेन विधिना कर्मणा एव 'विधिविधाने दैवे चेत्यमरः पुण्यं धर्म मनोज्ञेऽपीति विश्वः । पत-पापं दुष्कृतमिति यावत् पदोऽस्त्रीकर्दमे पापे इति मेदिनी धुनोति-क्षालयति दूरयतीत्यर्थः ।। १४ ।। क्षेत्रं रराज कुरुनाम गुरुप्रसिद्धया, तत्रापि तद्गजपुरं वपुरञ्चितेभ्यम् ।
१७१ भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता मरणी टीका. सर्ग-४ श्रीशान्तनुन्नयवनप्लवनः सभीष्मः, स ग्रीष्मवद वृषभसोररुचिस्तदीशः ॥ १५॥ अन्धयः-गुरप्रसिद्धया कुरुनाम क्षेत्रं (कुरुनाम गुरुप्रसिद्धया उपलक्षित क्षेत्रं ) राज तत्रापि वपुरजितेभ्य तत् गजपुरम् (अभूत्) तदीशः श्रीशान्तनुत् ( भासीत् ) नयवनप्लवन: सभीष्मः ग्रीष्मद् वृषभमौररुचिः । पक्षान्तरे कुरनाम गुरुप्रसिद्धया उपलक्षित क्षेत्र रराज । तदीश: श्रीशान्तनुभयवनप्लवनः (शेषं पूर्ववत ) ॥ १५ ॥ व्याख्या-क्षेत्रमिति इतः परे श्लोकाः कृष्णचरितान्तर्गतपा- ण्डवचरित्रांशे स्पष्टार्थाः अन्येपु प्रकृतकाव्यवर्णनीयमहापुरुपसप्तकेषु मन्दं प्रकाशं पातयन्ति तत्र तावदापाततः प्रतीयमानस्पष्टार्थोऽभिलि- ख्यते,गुरुप्रसिद्धया-महत्याप्रसिद्धयाख्यात्या यद्वा गुरोः कौरववंश- मूलभूत कुरुनामनृपश्रेष्ठस्य प्रसिद्धया कुरुनामक्षेत्र=देशः यद्वा कुरुनाम- गुरुप्रसिद्धया इति समस्तं तस्य कुरु इति नाम्नाया गुर्वी महती प्रसिद्धिः ख्यातिः प्रतिष्ठा वा तया उपलक्षितं क्षेत्र-सिद्धस्थानं देश इति यावत् रराज-शुशुभे । तत्रापि तसिन्नपिदेशे वपुरश्चितेभ्यधपुपा-शरीरेण अश्चिता: प्रशस्ता इभ्या यत्र तत्तादृशं तत्-प्रसिद्धम् गजपुरं-नागपुरं हस्तिनापुरमिति यावत् अभूत् । तदीशा तस्य गजपुरस्य ईशा राजा सः प्रसिद्धः, श्रीशान्तनुत्-तदाख्यः आसीदिति शेषः स कीदृश इत्याह-नयवनप्लवनम्नयःन्यायः एव वनं-सलिलं तत्र प्लवते- मातीति सः न्यायजलस्नायीत्यर्थः। नीतिजलसंतरणशील इति यावत् समीप्म: भीष्मकुमारसहितः। ग्रीष्मवत् निदाघर्तुरिव वृपमसौर. ररुचिा-वृप वृषसंक्रान्तौ भातीति वृपमा तादृशी सौरी-सूर्यसम्पन्धिनी रुचिः कान्तियंत्रेति ग्रीष्मपक्षे । राजपक्षे तु वृपः कामः स इव भातीति वृपभः सुवंति-कर्मणिलोकान्प्रेरयंतीति मूराः पण्डितास्तेषां समूहः सौरस्तस्मिन् रुचिः प्रीतिर्यस्य स सौररुचिः वृपभश्वासौ सौर- रुचिश्चेति स तादृशः।
१७२ महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्बे V AM अन्यपक्षे तु-कुरुनामवद्गुरुप्रसिद्धया उपलक्षित क्षेत्र-तत्तद्देशः रराज तत्रापि वपुरश्चितेभ्यं तत् गजपुरं=पुरेषु गज इवेति तत् पुरश्रे- छुमित्यर्थः मुख्यनगरमिति यावत् । तदीशः श्रीशान्तनुन्नयवनप्ल वना श्रीशान्तरसेन नुन्न स्फैटितं निराकृतमित्यर्थः यवनानां प्लवन- ससंभ्रमागमनं येन स तथोक्तः। पुन: सभीष्मा भीतिहेतुहेतितति- सहितः । वृषभमौररुचिःवृषेण धर्मेण सौररुचिः सौरीचासौ रुचि. थेति सौररुचिरिव रुचिर्यस्य स सौररुचिः सूर्यतुल्यकांतिः । शुक्रले मूपके श्रेष्ठे सुकृते पमे वृप इत्यमरः ॥ १५ ॥ भूश्चित्रवीर्यमधिगत्य नृपं रसेन, प्रादुश्चकार कलधौतमुखेन्दुहासम् । कोशा वभुर्नवनवाः प्रकृतेः कुलेपु, न्याय्यं तदन्त्र हरिवंशभुवि क्षमापे ॥ १६ ॥ भन्धय -भू चिन्नवीय नृपम् अधिगत्य रसेन क्रधौतमुखेन्दुहास प्रादुखकार प्रकृतेः पुलेषु नयनवा कोशा यभु भन्न हरिवंशभुवि क्षमापे तत् न्याय्यम् ॥१६॥ ध्याख्या-भू-पृथ्वी तान्स्थ्यलक्षणया भूतलस्थो लोका चित्र- वीर्य-विस्मयावहपराक्रमशालित्याचदाग्यं नृपंराजानम् अवाप्प रसैनप्रेम्णा कलधौतमुग्वेन्दुहासंपलधौत-रजतं तत्सच्छायेन मुसैन= वदनेन इन्दोः चन्द्रमसोऽपि हाम-परिहास प्रादुश्चकार आविष्करो- तिम्म । किञ्च प्रकृते प्रजायाः कुलपु-ममुदायेषु नानवा: अपूर्वा: विलक्षणाः कोशाधान्यादीना प्रत्यामाराः यमुः शुशुमिरे । अत्र अस्मिन् क्षेत्रे हरिसंगभुवि-चन्द्रवंशसमुद्भरे क्षमापे राजि चित्रपीयें मति तत्-पूर्वोक्त मर्व न्याय्यंच्यायाइनपेतं युक्तमित्यर्थः उचित- मिति यावत् चित्रवीर्य रानि मर्य सम्भवतीति भावा ।
भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-४
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अन्यपक्षेपु-भूः चित्रवीर्य-विस्मयनीयविक्रम शालिन नपं अधि-
गत्य रसेन रागेण कलधौतमुखेन्दुहासं-कलधौतं सुवर्ण रजतं च
तन्मुखे यस्य म कलधौतमुसः स चासौ इन्दुहासा खड्गस्तम् प्रादुश्च-
कार श्रीमहपभपक्षे भरतस्य चक्रवचित्वात शान्तिनाथस्यापि चक्रि-
त्वात् वासुदेवानां च खगोत्पनि प्रसिद्धैव । कलधौत सुवर्ण स्याद्रजते
च नपुंसकमिति मेदिनी । खङ्गे तु निस्त्रिंश-चन्द्रहासा-ऽसि-रिष्टयः
इत्यमरः किञ्च-कुलेपु-जनपदेषु गंगा-सिन्थ्योस्तीरदेशेषु वा प्रकृतेः-
स्वभावत एव नवनवानिव-नवसंग्ख्यकाः नगाः नवीनाः कोशा
अर्थराशयो वभुः विरेजिरे । तत् एतत्सर्व अत्रभरतं हरिवंशभुवि
हरिः सूर्यः नामैकदेशग्रहणे नामग्रहणात् सूर्य: सूर्ययशा: भरतपुत्र-
स्तस्यवंश इक्ष्वाकुवंशस्तसिन् जाते इति भरत-शान्त्योः। रामपक्षे
सूर्यवंशसमुद्भुते । कृष्णपक्षे हरिवंश यादवकुलं तज्जाते इत्यर्थः
क्षमापेराज्ञि सति न्याय्य युक्तम् । कुलं जनपदे गोत्रे सजातीयग-
पोऽपि चेति मेदिनी । हरिश्चन्द्रा ऽर्क-वाता ऽश्व-शुक मेक-यमा हिपु!
कपौ सिंह हरेऽजेंऽशी शके लोकान्तरे पुमान् वाच्यवत् पिङ्ग-हरि-
रिति मेदिनी ॥ १६ ॥
पाण्डुर्यशोभिरभितः समशोभि कान्त्या,
राजापि सोमवपुपा वृप-भासनाभः ।
प्रीत्याऽनुभाविविदुरेण दुरोदरेणा-
नीत्यादिजन्मधृतराष्ट्रभुवा-रिरंसुः ।। १७ ॥
अन्वय,--पाण्डः राजापि यशोभिः कान्त्याऽभित समशोभि । मोम-
वपुपावृषभासनाभ. अनुभाविविदुरेण प्रीत्या रिरमः मादिजन्मस्तराष्ट्रभुवानीत्या
दुरोदरेणचारिरसु. । राजापि अभित यशोमि. पाण्डः कान्त्या सोमवप्रपा च
समशोभि । वृपमासनाभ , अनुभावि बिदुरेण प्रीत्याः । भनीत्या मादिजन्म-
तराष्ट्रभुषा च रिरसु. दुरोदरेण भरिरसुः ॥ १७ ॥
महोपाध्यायश्री मेघविजयगणिविरचित्तै सप्तसन्धानमहाकाव्ये
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व्याख्या--पाण्डा-तदाख्यः राजापि यशोभिः कीर्तिभिः
कान्त्या च अभितः सर्वतोभावेन समशोभि-अशोभिष्ट । स कीदृश
इत्याह-सोमवपुपा उमया-की- शिवपक्षे पार्वत्या सहितं सोमं-
सकीर्तिकं सपार्वतीकं च तादृशेन वपुषा शरीरेण वृपभासनाम:
घृपभासनस-शिवस्येव आभा-शोभा यस्य सः । तथा अनुभाविचिदु-
रेण-अनु-पश्चात् भवति-जायते इति भावः जन्माऽस्यास्तीति वा
अनुभाची अनुजः तेन विदुरेण-तदाख्येन सह प्रीत्या ऽनुरागेण
रिरंस-रन्तुमिच्छु: किन्तु आदिजन्मधृतराष्ट्रभुवा आदिजन्मनः
अग्रजात् धृतराशाद् भवति जायते इत्यादिजन्मधृतराष्ट्रभृस्तया अनी-
त्या अन्यायेन दुरोदरेण च अरिरंसुः-निविवर्तिपुरित्यर्थः ।।
अन्पपक्षेपु-राजापि श्रीविश्वसेनादिनृपोऽपि अमिता विश्व-
ख्यायिभिः यशोभिः पाण्डागौरः कान्त्या सोमवपुषा-चन्द्रवद्रम-
णीयशरीरेण च समशोभि । स कीगित्याह-वृषभासनामा पस्य
धर्मस्य भासनया प्रतिभासनेन भाति-शोभते इति सः। किञ्चासौ
अनुमाविविदुरेण अनुभवशीलधीरेण प्रभावशालिनागरेण वा सह
प्रीत्या प्रेम्णा । अनीत्यान्न सन्ति ईतयो यस्यां साऽनीतिस्तया
तादृश्या आदिजन्मधृतराष्ट्रभुवा-आदिजन्मना-सपूर्वजैन धृतस्य-
खायत्तीकृतस्य राष्ट्रस्य देशस्य भुवा-पृथिव्या च रिरंसुः । दुरोदरेण
घूतकारेण द्यूतेन वा उपलक्षणमिदं व्यसनमात्रस्य अरिरंसुः ॥१७॥
यस्यास्तनावतिगुरू स्वरूचा हिमाद्री,
कान्ता पृथावतिशयेऽस्य मनोनुरागे !
दृष्टा-धरा-सुरपतेरपि राज्यलक्ष्म्या,
सर्व सुपर्वभवगर्वमपाचकार ॥ १८॥
१७५ Vvvvv भाचार्य श्री विजयामृतसरिप्रणीता सरणी टीका. मग-४ अन्धयः-यस्याः स्तनो स्वरचा अतिगुरू (सा) पृथा माद्री (प) भस्य कान्ता अतिशये मनोऽनुरागे ( वर्तमाना ) घरासुरपतेः अस्य राज्यलक्ष्म्या या (अस्य मनोऽनुरागेऽतिशये सति दृष्टाधरा सुरपतेः राज्यलक्ष्म्या) सर्व सुपर्वभव. गम् अपाचकार । पक्षे यस्या अतिगुरू स्तनौ स्वरचा हिमाद्री (भतिशयाते) माऽस्य कान्ता पृयी अतिशये मनोऽनुरागे (शेष पूर्ववत्) ॥ १८ ॥ व्याख्या-यस्याः स्तनो-वक्षोजी स्वरुचा-निजदीप्त्या अति. गुरू-अतिविशालौ गुरु महत् (विल्वफलादि) ममतिक्रमणशीली या तादृशी पृथा कुन्ती माद्री च अस्य-पाण्डुराजस्य कान्ता भार्या अतिशये अतिमात्रे मनोऽनुरागे-पत्युश्चित्तप्रीतो वर्तमाना घरामर- पतेः महीमहेन्द्रग्य अम्य पाण्डुमहाराजस्य राज्यलक्ष्या-राजश्रिया दृष्टा मती कृताभिषेका मतीति भावः यद्वा यस्य पाण्डोः मनोऽनुरागे- मनः प्रीतौ मति दृष्टाधरा-चुम्बितुं निरीक्षितोष्टदेशा सती सुरपतेः= इन्द्रस्य राज्यलक्ष्म्याः स्वाराज्यश्रियः मर्व सुपर्वभवगर्व देवलोका. ऽभिमानम् अपाचकार-दयामासेत्यर्थः । अन्यपक्षपु-यस्याःराम्याः अतिगुरू-अतिपीवरौ स्तनौ स्वरुचा- खकीयच्छटया बीयोन्नत्यगुणेन निजशान्तिगुणेन वा हिमाद्री-हिम- पर्वतो अतिगयाते इति शेपः मा तारगी अस्य-पूर्वोक्तस्य रामः कान्ता-श्रीग्लम् पृथौ-महति अतिगये मनोऽनुरागे-पतिविपयकचि- तामझ मति गपं पूर्ववत् ॥ १८ ॥ जाताः मुतास्तत इमे शरसंख्ययाप्या, शल्यारिपायनिनरान्वयिवन्धुरूपाः । तेऽपि स्वमानमपहाय विमानरत्ना. मदाः समीयुग्पर वग्विस्ययाऽस्य ॥ १९ ॥ भाग:-41. इमं गामापा:या, सम्पा-नि-मा-पिर. धुम्रा गुता जाता में समाना विमानामाम्बम्प महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तमन्धानमहाकाग्ये vww AM य Wh N वरिवस्यया समीयुः। पक्षे-तत इमे सुता जाता: अशरसंख्ययायाः शल्यारि- गावनि नरान्वयिबन्धुरूपाः (शेपं प्राग्वत) ॥ १९ ॥ व्याख्या-ततः तदनन्तरं तस्मात पाण्डुराजाद्वा इमे वक्ष्य- माणाः शरमंख्यया-शराः पंच तत्संख्यया आप्या:-प्राप्याः पञ्चसं. ख्याका इत्यर्थः शल्यारि पावनि नरा-ऽन्वयिबन्धुरूपा:-शल्यारि- युधिष्ठिरः, पवनस्यापत्यं पावनिः-भीमः, नरः-अर्जुन:, अन्वयिवन्धू- अन्वयिनोः संबद्धरूपयोः-अश्विनीकुमारयोः बन्धू-पुत्रौ यद्वा अन्व- पिनौ-यमजतया समानोदरमम्बद्धौ बन्धू-भ्रातरौ नकुल सहदेवौ तद्रूपाः सुताः पुत्राः जाताः-समजनिपत अपिश्चार्थो भिन्नक्रमश्च तथा ते-शल्यारिप्रमुखाः अपरे-अन्ये च जनाः स्वमानं-खमहत्त्वाभिमा- नम् अपहाय-परित्यज्य विमानरत्नारूढाः- -श्रेष्ठविमानमारूढाः मन्तः अस्य-वासुदेवस्य नेमिनाथस्य वा पाण्डोरेव वा वरिवस्यया-परिचर्यया हेतुना शुश्रूषार्थमित्यर्थः समीयुः सम्यग्गतवन्तः नरोजे मनुजेऽर्जुने इति मेदिनी. बन्धुशब्दस्य भाव-पुत्रेत्येतदुभयवाचकत्वं शब्दस्तोभ- महानिधी द्रष्टव्यम् अन्यपक्षेषु-ततः-तसात् श्रीविश्वसेनादिनृपात् इमे-वक्ष्यमा- णगुणाः सुताः जाताः काहगा इत्याह---अशरसंख्ययाप्या-न शरैः पाणैः संख्ये-युद्धे याप्या:-चिद्राव्याः पलायनाऱ्याः वाणयुद्धेऽधमा बा इति ते तथोक्ताः । शल्यारिपावनिनरान्वयिवन्धुरूपाः-शल्यानि- याणान् तोमरान् वा इग्रति अच्छन्ति वा-प्राप्नुवन्ति तच्छीलाः शल्यारिणः शराभ्यासिन इत्यर्थः शूरा इति यावत् । पावयतीति पावनः-जगत्पावित्र्यकारकः यद्वा पं-पातारमपि अवति-रक्षतीति पावन:-शरण्यस्यापि शरण्य इत्यर्थः श्रीविश्वसेनादिस्तस्थापत्यानि. पावनयः नरान्वयिवन्धुरूपा:-नराणां-मानवानाम् अन्वयियन्धुरूपाः सोदरभ्रातृकयास्तथाऽनुपाहिणोऽनुरागिणश्चेत्यर्थः शल्यारि-पावनि. ॥
१७७ भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-४ नरान्वयिवन्धुरूपाणां विशेषणानामयं कर्मधारयः शल्यं तु न स्त्रियां शङ्कौ क्लीवं श्वेडे-पु-तोमरे इति. पाना वाताण्ड-पूतेषु पाने पातरि- कीर्वितः इति च मेदिनी । तेऽपरे च स्वमानमपहाय विमानरत्तारूढाः अस्य श्रीविश्वसेनादेः वरिवस्थया ममीयरित्यर्थः ॥ १९ ॥ या वेदिजातिरुचिता कृतकर्मयोगा- लेभे प्रपञ्चरमणैर्विपयोपभोगम् । स-प्राप्तरूपमहिमा न हि माननेति, प्रज्ञा-विशेपवशतो दधतां स्म-राज्ञाम् ॥२०॥ अन्ययः-या येदिजाऽतिरचिता कृतकर्मयोगात् प्रपञ्चरमणैः विषयोपमोगं लेमे सप्राप्तरूपमहिमा सा स्मरानां दधता राजा प्रज्ञाविदोपवशत; मान न पति । पक्षे या वेदिजातिः उचिता प्रपश्चरमण. पियोपभोग लेभे कृतकर्मयो. गात् सप्रासरूपमहिमा प्रज्ञाः दधतां राजा मान न प्रतिस्मेति काकुः ॥ २० ॥ व्याख्या-या वेदिजा द्रौपदी वेद्या: होमवेदितो जायते इति व्युत्पत्तेः अतिरुचिता शोभिता असीमगोभाशालिनीति यावत् कृत- कर्मयोगात् प्राककृतकर्मवशात् प्रपञ्चरमणैः-प्रकृष्टाः पञ्चपञ्चसंख्यकाः रमणाः-पतयस्तैः विपयोपभोग-मांमारिकविषयानुशीलनजन्यमुखा. नुभवरूपं भोग लेमे-प्राप्तवती मप्राप्तरूपमहिमा-प्राप्तो यो रूपस्य- सौन्दर्यस्य महिमा-आतिगयं धारयतां राज्ञां-नृपाणां विपये प्रजा. विशेषरशतः युद्धिविशेपरशा मान-विनयाभावं न एति-प्रामोति नम्रतया वर्तत इत्यर्थः॥ अन्यपक्षेपु-या वेदिजातिः-वेदयः-पण्डिताः तेषां जाति:- मामान्यम् उचिता--मत्कारयोग्या प्रपञ्चरमणः-विस्तृतक्रीडामिा अनायासेनेति भावः विपयोपभोग-देगकार्य म्यामिन्वं लेमे । कृतक- र्मयोगात्-मिलनात् संगमादित्यर्थः मप्राप्तरूपमहिमा प्राप्तरूपाणां- - महोपाध्यायधीमे घविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकारये MA 1vAvww बुधानां-पण्डितानां महिना-महत्वेन महितः यद्वा प्राप्तरूपेण-मनो- न रम्येनेत्यर्थः महिना-कण महितः प्रजा युद्धीर्दधतां राज्ञां मान-सन्मानं न एतिस्मेति काका एतिस्मैवेत्यर्थः । वेदिःस्यात्पण्डिते पुमान् इति प्रारूपो घरम्ययोरिति च मेदिनी प्राप्तरूप स्वरूपाऽभि- रूपा बुधमनोत्रयोरित्यमरः ॥२०॥ या नित्ययौवनतया वसुधा-प्रतीता, पुष्पान्विताऽऽशु फलिता सुतरत्नजात्या। व्यूढा भूजावलवशादवशाऽमुनासो, सेवे स्वतः स्वरसतः पुरुषोत्तमं तम् ॥ २१ ॥ अन्धयः-या नित्ययौवनतया वसुधाप्रतीता भवशाऽमुनाभुजावलवशात न्यूढा ततः पुष्पान्त्रिता सुतरत्नजात्या आशुफलिताऽसौ स्वत: सरसतः तं पुरपोत्तम सेवे । पो~या वसुधा नित्ययौवनतया प्रतीता पुप्पान्विता सुत- रत्नजारयाऽऽशुफलिताऽपशाऽसी भमुना भुजारलपसाव न्यूठा स्थत परसतः तं पुरषोत्तम सेवे ॥ २१ ॥ व्याख्या-या द्रौपदी नित्ययौवनतया-नित्य-चिरस्थायि यौ वनंतारुण्यं यस्याः मा नित्ययौवना तद्भावस्तत्ता तया मदातनतारु ण्यमालितयेत्यर्थः वसुधाप्रतीता भूतलेप्रसिद्धा अशा स्वयंवरा सती अमुनाम्पाण्डवेन भुजायलय जावयाहुयीर्यग्रभावात् व्यूढा परि. गीता विवाहिता इति यारस ततः पृष्पान्विता-पुष्पम-आर्तवं स्त्रीधर्म इति यावत् तत्महितो मती सुतरखजात्या-नृपरत्नजन्मना आशु फलिता फलवती असो द्रौपदी खता खगमेव सरनता-अकृत्रिम निजानुरागात् तंप्रसिद्ध पुरुषोत्तम नरमत्तम पाण्डयं मेवे-भेजे । अन्यपक्षेषु-या वसुधा-पृथ्वी नित्यपौवनतया-खाद्युत्पादने सर्वदेव युवतीयममर्थतयेत्यर्थः प्रतीता-विश्रुता पुष्पाऽन्त्रिता-पुष्पेन १७९ CHANA M आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-४ पार्थिवपदार्थसार्थानां विकाशेन अन्विता=युक्ता पुष्पैः नानाविधकुसु- २. मैरन्वितेति वा सुतरत्नजात्या खन्यादिसमुद्भूत रत्नजात्या फलिता सफला अवशा-सर्वदा कसाऽप्यनायत्तासत्यपि असौ वसुधा अमुना श्रीविश्वसेनादिमहीपतिना भुजावलवगात्=निजभुजवीर्यमहिम्ना व्यूढा विकृता स्वायत्तीकृता सती स्वतः स्वयं स्वरसतः निजरसैः मधुरादि- पड्भीः तं पुरुषोत्तम श्रीविश्वसेनादिनरेशं सेवे ॥ २१ ॥ कृष्णावता-रसमये त्रिदशावतारे, राशि स्फुरत्यपि न धर्मभुवाऽत्यवाहि । या-याज्ञिको-ह-तनया कलिभृत्क्रियासो, यस्मात्कृतं सुकृतमेव युगं नृपेण ॥ २२ ॥ अन्वयः-कृष्णावतारसमये त्रिदशावतारे राज्ञि स्फुरति सति धर्मभुवा या अयाज्ञिकीहतनया कलिभृत् क्रिया असी क्रिया न अत्यचाहि यस्मान्नृपेण युग सुकृतमेव कृतम् ॥ २२ ॥ व्याख्या-कृष्णावतारममये-कृष्णस्य-विष्णोरष्टमावतारकाले त्रिदशावतारि देवांशेनावर्तीणे राजि युधिष्ठिरमहीपतौ स्फुरति=वि- जयमाने सति धर्मभुवा-विप्रेण या अयानिकी यज्ञाय देवपूजायै हिता यज्ञमर्हति वा यज्ञः प्रयोजनमस्या इति वा यज्ञस्येय मिति वा याज्ञिकी तद्भिन्ना हतनया हतो-भग्नो नयो-मार्गो यस्याः सा ताशी अत एव कलिभृत् कलिंक्शं कलियुग वा कलहं वारणं वा विभर्ति धारयति पोपयति वा इति सा तथाविधा क्रियाकर्म अमौन अत्यवाहि-न आता न कृतेत्यर्थः पूजा विना न तपोमुखं धर्मकृत्यं बभूवेति भावः । यस्मात्कारणात् नृपेण युगं द्वापरकालः कृत-कृत- युगमेव तत्सदृशमेवेति भावः सुकृतं-मुविहितम् ।।
१८० महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचित्ते सससन्धानमहाकाये -owwwwvv ऋषभदेवपक्षे--त्रिदशावतारे-ध्यधिकास्व्युत्तरास्त्रिसहिता वा दश विदश-त्रयोदशेत्यर्थः अवताराः भवा यस्य स तस्मिन् । शान्ति नाथादिपक्षे । त्रिदशावतारे देवावतारे देवरूपे इत्यर्थः । यस्मात् नृपेण कृनं नाम प्रथगं युगं सुकृतं सुसम्पादितम् 'ऋपभशान्त्योः ।' शेषेषु युगं स्वाविर्भावाधिकरणीभूतकालः कृतं कृतयुगमेव सत्ययुग. भेवेत्यर्थः सुकृतम् ॥ किञ्च रसमये सुरनरयक्ष-गन्धर्षकिन्नरादीनां हर्षमये आन- न्दप्रचुरे यद्वा अरसमये दैत्य-दानवादीनां कैशि-कंसवृषभादीनां मृत्युहेतुत्वादहर्षमये दुःखबहुले अथवा आरसमये अरीणां समूहः आरं तस्य समये बहुशत्रुकण्टकाकीर्णकाले इत्यर्थः त्रिदशावतारे देवस्थ विष्णोः पूर्णावताररूपे राशि कृष्णवासुदेवे स्फुरति-विजयमानेऽपि सति या यानिकी यज्ञ यज्ञसेनः नामैकदेशग्रहणे नामग्रहणात् भीमो भीमसेन इतिवत् तस्येयं याज्ञिकी यज्ञसेनसम्बन्धिनी तनयापुत्री द्रौपदी यद्वा याज्ञिकी याज्ञसेनी द्रौपदी असौ हतनया हतः भग्नो नया नीतिर्यस्यै सा तथा कलिभृतक्रिया कलिं विवाद राज्यप्रत्यर्पः णादिविषयककलहं विभीतिकलिभृत-दुर्योधनस्तस्य क्रियाबखाक- र्पणादिरूपकर्म यस्यां सा तादृशी सत्यपि कृष्णावता-कृष्णा द्रौपदी साऽस्त्यस्यासौ कृष्णावान् तेन द्रौपदीपतिनेत्यर्थः धर्मभुवा-धर्मात्म- जेन युधिष्ठिरेण धर्म इति शेषः न अत्यवाहि नात्यकामि नातिक्रान्त इत्यर्थः । दुरवग्रहदुएनिग्रहानहिले श्रीमनिवासुदेवेऽवतीर्यभूतले विरा- जमानेऽपि सति दुपदुर्योधनेन परिपत्समक्षं द्रौपदीं विवस्त्रीकर्तु चेष्टिते वृतहारितसर्वस्वेन धर्मराजेन तदानीं तद्विरुद्धं किमपि नाचेष्टितमिति भावः। रसः स्वाटे जले वीर्ये शृगारादौ विपे वे इत्यनेकार्थसंग्रहः । कृष्णा स्याद्रौपदी-नीली-कणा-द्राक्षासु योपिति इति मेदिनी। कलि- याः अक्षमा: अशान्तीः विदधे-कृतवान् । यद्वा कासावशेन-ममग- भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका सर्ग-४ शूरे विवादेऽन्त्ययुगे युधीति हैमः क्रिया कर्मणि चेष्टायां करणे सम्म धारणे. आरम्भोपाय-शिक्षा-ऽर्चा-चिकित्मा निस्कृति पपीति विश्वः। 'आरसमये' इत्यस्य आरम्-अरिसमूहं मम्यगयते अभियातीति म तादृश इति वार्थः ।। २२॥ यो वा-सुयाधननृपः कृपया समेतः, कासावशेन मनसा विदधे क्षमा-याः । जाताऽत्र तस्य विषमा-न-दशाननस्य, तत्राप्यभाग्यभवन निरणायि देवैः ॥२३॥ अन्यय -यः सुयोधननृप. कृपयाऽसमेत कासावशेन मनसा या. ( कासावशेन मनसा अक्षमाया विदधे, वशेन मनसा क्षमाया काला, अवशेन तेन क्षमाया काडा ) विदधे तस्य अन आननस्य विपमा दशा न जाता है तनापि देवै, अभाग्यभवन निरणायि । ऋपभादिपक्षे- सुयोधननृप. कृपया समेत कासावशेन मनसा या क्षमा विदधे तस्यात्र आननस्य दशा विपमा न जाता तत्र देव आप्यभाग्यभवन निरणायि ॥२३॥ व्याख्ययः सुयोधननृपा-दुर्योधननृपतिः कृपया अनु- ग्रहेण असमेतः रहितः द्यूतपणीकृतं द्वादशसमाः प्रकाशं वर्षमेकञ्चा प्रकाशं वनवासमतीत्यागतपाण्डवविषये तदीयराज्यमत्यर्पणानिच्छुतया निर्दयहृदयः इत्यर्थः । कासापशेन-लोभपरवशेन 'इन्द्रप्रस्थं वृकप्रस्थं जयन्तं वारणावतम् । देहि मे चतुरो ग्रामान् पञ्चमं किञ्चिदेव तु' इत्येवं सानुनयमभ्यर्थनेऽपि कृते ममग्रराज्यलिप्साविवशेन मनसा चेतमा भक्षमा .. साम्राज्यजिघृक्षापरवशेन मनसा अक्षमाया:=पाशकमीडनकपटानि छलङ्तानीत्यर्थः विदधे । अथ वा वशेन मनमा=मशे-आयत्ततायां वशा=अधीना वा इनानृपतयो यस्य तादृशेन मनसा क्षमाया- 7 १८२ महोपाध्यायशीमेघविजयगणिविरचिते मप्तसन्धान महाकाये सर्वभूमेः काला-लिप्सा गति यावत् विदथे । अथ वा अवशेन- अखतन्त्रेण ईप्यापरयशेनेत्यर्थः अग्नशस्त विरुद्ध न्यायविरोधि अन्या. व्यमिति यावद् वा यशम् इच्छा यस तेन दुर्योधनेन मनसा क्षमा याः सर्वभूमेः काडा विदधे चक्रे कृता तस्य दुर्योधनस्य अत्र अत्युः स्कटपाप-पुण्याना मिहैवफलमश्नुते,इति कतिपयरेय दिवसः फलप्रत्य. क्षीकरणप्रवणाधिकरणे संमरणे(संसारे)आननस्प-मुखस्य विपमा मानि जनसुदुः सहादारुणा संकटा वा दशा अवस्था स्थितिरित्यर्थः न जाता काका जातैवेत्यर्थः । यद्वा विपमानदगा विपक्त गरलवत् मानदगार मानस्य अहंकारस्य दशा अवस्था विपतुल्यगर्वाऽवस्थेत्यर्थः जाता अभूत् । तत्रापि तस्य ताहगवस्थत्यविषयेऽपि देवैः अवटितघटन- घटितविघटनपटीयःपाटवपरिपाटीशालिभाग्याधिष्ठातृभिः अभाग्य भवन भाग्यराहित्यं देवाननुकूलत्वं-देवपातिकूल्यमिति यावत् निर णायि-निर्णीतम् निश्चितमित्यर्थः ॥ क्षमा क्षान्तो क्षितौ इति हेम- चन्द्रः। वशा वल्या-मुता-योपा-स्त्रीगवी-करिणीषु च। त्रिप्यायचे, क्लीमायत्तत्वे चेच्छा-प्रभुत्वयोरिति मेदिनी । तत्सादृश्यमभावश्च तदन्यत्वं तदल्पता अप्राशस्त्यं विरोधश्च नार्थाः पट् प्रकीर्तिताः। विपभः दारुणे संकटे चेति शब्दस्तोममहानिधिः । पभादिपक्षे-यः सुयोधननृपः-सुखेन युध्यतेऽसौ सुयोधनः सुयुध् युच् स चासो नृपा नाभिराजादिः कृपया निष्कारणपरदुःख- प्रहाणेच्छालक्षणदयया समेतः रहितः जीवाऽनुकम्पीत्यर्थः काहाप शेन मोक्षेच्छाशालिना मनसा याः क्षमाः शान्तीः विदथे तस्य-राज्ञः अत्र आननदशा निपमा प्रतिकला न जाता विपये देवैः आप्यभाग्य- भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता मरणी टीका. सर्ग-४ वृत्त्या-जितः कुहनया-न-तयाजितः स- पाञ्चालिकामवसनां परिपत्समक्षम् । चक्रेत्र-पावनविधी हरिजः प्रमीलां, नश्यत्समस्तसुदृशं च विमोहलीलाम् ॥२४॥ अन्वय -- कुहनया कृत्या जित तया (तनया) अजित स परिप समक्ष पाञ्चालिगाम् जयसना चके, अपावनविधी (अत्र पाचन विधौ) हरिजः नश्यास मस्त सुदृश प्रमीला रिमो लीला च चके । यद्वा य भनतया कुहनया जित. स वृत्याजितः स परियासमक्ष पाञ्चालिकाम् अवमना चक्रे ( तया न कुहनया आजिनः वृत्त्या जित स पाचारिकाम् अयमनां न चक्रे) इति विचार्य हरिज अन पावनविधौ नश्यत्पमस्तसुदृश प्रमीला रिमोहलीला च चके । ऋषभादि पशे-हरिज अत्र पारन विधी नश्यासमस्तसुदृश प्रमीला निमोहलीला च न चके ॥ २४ ॥ व्याख्या-कुहनया दम्भवलक्षणया वृत्त्या-वर्तनेन जिता= वशीकतः दाम्भिक इन्यर्थः तया-पुण्येन-पुण्यकर्मणा च न जितः अधार्मिन इत्यर्थः यद्वा नतया नास्ति ता=गर्वोयसां मा नता अनहंकृतिः नम्रतेत्यर्थः तया अजित अवशीकृतः उद्धत इति यावत् स-दुर्योधनः परिपत्समक्ष-मभा ( मदा ) प्रत्यक्ष एव पाश्चालिका द्रौपदीम् अवमना=नोऽल्पार्थकत्वेन आकृष्टबहुतराशुकांशतया अल्प वस्त्रा नग्नप्रागमिति भार चके असिंश्च पाचनविधौत्रपां लज्जाम् आपयति गमयति प्रापयति ग्राहयति वाऽसौ यद्वा पाया अवन= प्राप्तिर्यसात्म पावन =लजाजनकः अपतेर्ण्यन्ताच्छुद्धाद्वाल्युः स चासो विधि-विधानं तस्मिन् यद्वा अत्र पारन विधौ-अकीर्तिप्रापकामणि । वखाकर्षणलक्षणाऽमद्वयवहारे इत्यर्थः जायमाने हरिजः जातावेकर चनं युधिष्ठिर-भीमार्जुनाः नश्यत्समस्तसुदृग-निमीलितमर्वजनलो- चना प्रमीलां अशक्योपायतया नितान्तामादर्शनतया च तन्द्राभावना - १८५ महोपाध्यायधीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये v निमीलनमिति यावत् विमोहलीलां-मृदमावं च चके । कुहना दम्भचर्यायामिति. तश्चौरा-मृत पृच्छेषु कोडे म्लेच्छे च कुत्रचित् अधुमास्तरणे पुण्ये कथितः शब्दवेदिभिः इति च मेदिनी. तकार- श्रौर्य-गर्वयोरित्येकाक्षरकोगः । तत्मादृश्यमभावश्च तदल्पत्वं तदन्यता. अप्राशस्त्यं विरोधश्च अर्थाः पाकीर्तिताः । अथ वा यः नः अन- तया पन्जया तया प्रसिद्भया कुहनया दम्भचर्यया लोभान्मिथ्येर्या पथसंपादनयेत्यर्थः अर्थलिप्मया मिथ्याधर्माश्रयणेनेति यावत् जितः= वशीकृतः सः नरः वृत्त्याजितः पृत वर्त्तनं-चिरस्थितिजर्जीवनोपायो या तेन त्याजितः परिहापितः स्यात् । स परिपत्ममक्षं जनतासमक्षं पाञ्चालिका-पुत्रिका वस्त्र-दन्तादिरचितपुत्तलिकाम् अवसनां-नग्नां चके मनरः व्यर्थप्रयास इत्यर्थः धनपत्रेऽप्यधनत्वमिति भावः । यद्वा तया-प्रतीत्या न कुहनया-दम्भचर्यया सम्पादित्तयेति गेपः दम्भरहितयेत्यर्थः आजितः संग्रामात् वृत्या आजीविक्रया जितः म पाञ्चालिकामवसना न चक्रे नकारस्योभयत्रयोगात् सफलप्रयासो ऽयं पुरुषः इति विचार्य हरिजः इन्द्रजोर्जुनः यद्वा हरि अनिलस्त समाजातो भीमसेनः अथ ना हरिः-पमा तज्जातो युधिष्ठिरः अत्र- असिन् पावनविधौ- न्यायकार्य नश्यत्ममस्तसुदृशः नश्यन्त्यः-अनि- मिपन्त्यः समस्ताः ममन्तानां वा सुदृशः नेत्राणि यया सा तां ताशी प्रमीलां-तन्द्रां विमोहलीला-मूढभाव च चक्रे । कुहनालोभा- निमध्येर्यापथकल्पनेत्यमरः । पाश्चालिका पुत्रिकासाम्बदन्ताटिभिः कृतेति चामरः । यमा -ऽनिले-न्द्र-चन्द्रा-ऽर्क-विष्णुसिंहां-ऽशु- वाजिषु । शुका-sहि-कपि-भेकेषु हरि कपिलेत्रिप इति. तन्दी. प्रमीला इति चामरः। अन्यपक्षेपु-हरिः-सूर्यः-सूर्ययशा भरतच कीवर्तिमृतस्तमालातः हरिजः-ऋषभप्रपौत्रः। अथ का हरिजा-हरिः-हरिवंशः नामैकदेश - A . भाचार्यश्रीविजयामृतसरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ ग्रहणे नामग्रहणात् पदैकदेशे पदममुदायोपचाराद्वा हरिवंशे मूर्यवंशे इक्ष्वाकुवंशे इत्यर्थः जातः नाभिः विश्वसेनः अश्वसेनः सिद्धार्थराजी दशरथश्च तथा हरिवंशे-यादवकुले जातः समुद्रविजयो वसुदेवश्व अनपंस्पष्टम् यथा तथाऽवनविधौ-जीवरक्षाकरणे नश्यत्समस्त मुदृशं प्रमीलां-तन्द्रां प्रमादमिति भावः विमोहलीलां मूढभावमविवेकित्य. मिति यावत् च न चक्रे ॥ २४ ॥ साना प्रभावितरणेन विभेदनेन, नो वश्यतामुपगता नरपाः क्षिति ते । प्रापुः स्वतस्तुरगहस्तिरथाद्यभावः, वापुण्यलब्धजननाजननादयोग्या. ॥ २५ ॥ अन्वयः-ये नरपाः साना प्रभावितरणेन विभेदनेन वश्यतां नो उपगता ते तुरगहस्तिरथावभावैः स्वापुण्यलब्धजननात् जननादयोग्यां क्षितिं प्रापु• । अथवा ये नरपा: मान्ना प्रभावितरन विभेदनेन वश्यामुपगताः ते तुरगहस्ति- रथाद्यभावः । मह ) स्मापुण्यन्धजननात जननादयोग्यां क्षिति स्वत: नो प्रापु ॥ २५ ॥ व्याख्या-ये नरपा:-सुयोधनादयस्तस्पक्षवर्तिनोऽन्ये च नृपाः माम्ना-परस्परोपकारप्रदर्शनादिना पञ्चविधेन सान्त्वेन प्रभावितरणेन-- प्रतिदानादिना पञ्चविधेन दानेन-विभेदनेन-देन स्नेहरागापनय. नादिना त्रिविधेनोपजापेन इत्येतदुपायत्रितयेन यदा वश्यताम्-वग. वर्तितां विधेयतामित्यर्थः अनुकूलतामिति यावत् नो-नैव उपगताः तदा, ते. प्रतीपानिपाः तुरगहस्तिरथामात्रैः-अश्व-गज-रपाया- योधनसाधनविनाभावेन. द्वन्द्वान्तेश्रूयमाणस्य ग्थशब्दस्य तुरग- हस्तिभ्यां संबन्धेन अश्वग्थ-गजरथादीनां राहित्येनेत्यर्थः तन्त्रेणावृ. त्या वोक्त पदस्योभयार्थपरताविदेलिमा । स्वापुण्यलब्धजननात-जन-
१८६
महोपाध्यायनीमेघयिजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये
नादयोग्यां जननादा-जनरवः कोलीनमित्यर्थः लोकापवाद इति यावत्
तस्य योग्यांतदर्हाम् क्षिति-क्षय-नाशमित्यर्थः यद्वा क्षिति-भूमि
खतः स्वयमेव प्रापुः लेभिरे पञ्चत्वमापन्ना इत्यर्थः भूमिलाभस्यापि
लोके शास्त्रे च मरणवाचित्वेन प्रसिद्धिः तथा च भूमि प्रापुरित्यस्य
मृता इत्यर्थः ॥ यद्वा मामाद्युपायत्रितयेन ये राजानो वश्यतामुपग-
तास्ते तुरग-हस्तिरथादीनामभावैः सहय
खापुण्यलब्धजननात्-जन-
नादयोग्यां क्षिति-क्षयं नो प्रापुः । अथवा ये सामादित्रिकेण वशव-
तितामुपगतास्ते तुरग-हस्ति-रथाद्यानां भावैः सद्भावैरुदय सह
खापुण्यलब्धजननात्-जननादयोग्यांजननादा-साधुवादः-धन्यवाद-
लक्षणलोकवादस्तद्योग्यांतदाँ क्षिति-निजगेहं स्वभुवं निजशास्य-
राप्रमिति भावः नो प्रापुः काका प्रापुरेवेत्यर्थः अन्यपक्षेप्वप्ययमर्थः
साधारणतयैव प्रतिभाति केवलं 'ये नरपाः' इत्यस्य 'श्रीविश्वसेनादि-
राजानां ये प्रत्यर्थिपृथ्वीपतयः' इत्यर्थो विदेलिमः । अत्र प्रसङ्गात
सामादिमेदा उच्यन्ते । 'परस्परोपकाराणां दर्शनं गुणकीर्तनम् । सम्ब
न्धस्स समाख्यानमायत्या संप्रकाशनम् ।। वाचां पेशलया साधुस्तवाह
मिति चार्पणम् । इति साम विधानज्ञैः सामपञ्चविधं स्मृतम्' ।। प्रतिदानं
तथा तस्य गृहीतस्यानुमोचनम् । द्रव्यादानमपूर्वं च स्वयंग्राहप्रवर्तनम्
देयस्यप्रतिमोक्षश्च दानं पञ्चविध स्मृतम्॥स्नेहरागापनयनं संहपोत्पादनं
तथा । संतर्जनं च भेदभेदस्तु विविधः स्मृतः ।। क्षितिगेंहे भुवि क्षये
इति हैमः ॥ पुंसादिः पूर्व-पौरस्त्य-प्रथमा-ऽऽद्याः इत्यमरः ॥१५॥
सोऽयं प्रभावविभवस्तव वास्तवोऽभू-
दित्याह मागधगणः प्रभया प्रभाते
नान्यायवर्तनमनास्तु मनाग् जनोघ-
स्वच्छासने नरपते ! भुवि वर्तमाने ॥२६॥
आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग- १८७ V ~~ अन्वय -हे नरपते । प्रभया प्रभाते स्वच्छासने भुवि वर्तमाने जनौध मनार तु अन्यायवर्त्तनमना न (अस्ति) सोऽय तर वास्तव प्रभावविभव अभूत् इति मागधगण आह ।। २६ ॥ व्याख्या हे नरपते ! युधिष्ठिरमहाराज ? पक्षे विश्वसेनादि नृपते ! प्रभया प्रभावादिजनिवदीप्त्या प्रभाते भातु प्रवृत्ते लच्छा- सने तब शास्तिकर्मणि भुवि भूतले वर्तमाने विद्यमाने मति जनौध:= लोकममूहः मनाम अल्पम् तु अपि अन्यायवर्तनमनाः अन्यायेन- असमञ्जत-अनुचित-विधिना अनीत्या वा वर्तने-आजीविकाकरणे यद्वा अन्याय-अममञ्जसे अन्याये. इत्यर्थ अनुचिते इति यावत् वर्तने जीवनोपाये मनो यस्य स तादृशः न अस्तीति शेषः सोऽयं वास्तमः यथार्थः तब-भवतःप्रभावविभवः प्रतापमहिमाऽभूत् इति मागध. गण बन्दिजनसमूह आह ॥ २६ ।। भीष्मोऽग्रतो-यमविधिः स्वगुरोरनिष्टः, कृष्णालकग्रहणकर्म सभासमक्षम् । वैराग्यहेतुरभवद् भविनो न कस्य, दैवस्य वश्यमखिलं यदवश्यभावि ॥ २७ ॥ अन्वय --स्वगुरोरनिष्ट अप्रत (स्वगुरोरगत भनिष्ट) भीम सभास- मक्ष कृष्णायकग्रहणकर्म अयमविधि कस्य भविनो वैराग्यहेतुर्नाऽभवत् यत् अव श्यभावि सत् अखिर देवस्य वश्यम् ! रुपमादिपक्षेपु-स्वगुरोरनिष्ठ अप्रत भीष्म सभासमक्ष कृष्णालकमहणकर्म यमविधि कस्य भविन वैराग्यहेतुर्ना- भवत् ॥ २७ ॥ व्याख्या-पाण्डवपक्षे-खगुरोः (खस्स-आत्मनो गुरोः पितुः) निजजनकस्य धृतराष्ट्रस्य यद्वा स्वगुरोः खोपदेोणाचार्यादेः स्वगु: रुजनस्य भीष्मादेर्वाऽपि अनिए: अनभीप्मितः अप्रिय इति यात् अग्रता पत्यादियन्धुजनाना पुरत एवं यद्वा स्वगुरोः खपत्युयुधिष्ठि- महोपाध्यायश्री मेघविजयगणिविरचित मतसन्धानमहाकाम्ये रादेः अग्रतः पुरस्तादेव अनिष्टः अत्यन्ताप्रियः भीष्मः दारुणः अस. ह्यतमः सभाममक्ष-परिपत्प्रत्यक्षे कृष्णालवग्रहणकर्मन्द्रौपदीकेशाकर्य- णव्यापाररूपः अयम् अविधिः अप्रशस्त-गहित-विधानं कस्य भविनः भावुकजनस्य वैराग्यहेतुः विशिष्टो राग मात्सर्य विरागः स एव वैराग्य-अत्यन्तमात्सर्यम् (खार्थेप्यञ्) यदा विगतो रागा=अनुरागः स्नेहो यस्य स विरागस्तस्य भावो वैराग्यं (दुर्योधनविपये) स्नेहरहि- तीभावः (स्नेहराहित्य) तस्य हेतुः कारण नाऽभवत् सर्वस्यैवाऽभवदि- त्यर्थः । 'भी'मोदितो-यमविधिः इति पाठे भीष्मम् दारुणं दुःसह मित्यर्थ उदितम्-उदय उक्तिर्वा यत्र स इति भीष्मेण शान्तनुपुत्रेण कौरव-पाण्डवपितामहेनेत्यर्थः उदितः कथित इति वा भीष्मोदितः । अन्यपक्ष-भीष्म, दारुणः अदितः अखण्डित इत्यों बोध्यः । यत्- घटनादिकम् अवश्यभावि-निश्चितभवितव्यताकं तत्सर्वं दैवस्य-अदृष्टस्य वश्यम् अधीनम् । अवश्यभाविभावानामप्रतीकार्यत्वान् । ऋपभ-शान्ति-राम-कृष्णपक्षेपु-स्यगुरोः पित्रादिखगुरुजनस्य अनिष्ट:-अप्रियः भीष्मः दारुणः अग्रत:=पुरा-यौवराज्यकाल एवे. त्यर्थः सभासमक्ष कृष्णालकग्रहणकर्म-रलयोरेकन्वस्मरणाव कृष्ण श्याम पराजयजन्यदैन्यमलीमसमित्यर्थः यत् आलकम् आरकम्- अरीणां समूह आरं तदेवारकं तस्य ग्रहणकर्म-निग्रहव्यापार इत्ययम् अविधिअनुचिताचरणं यद्वा यमविधिः यमस्य दण्डधरस्येव विधानं कस्यभविना=दुएनिग्रहाकाक्षिणो जनस्य वैराग्यहेतुः विशिष्टो रागः अनुरागः स्नेहः विरागः स एव वैराग्यं तस्य हेतु भवत् । देवस्येत्यादिपूर्ववत् । नेमि-पाचवीरपक्षेपु--स्वगुरोरनिष्टः भीष्मः दुष्करत्वादारुणः अग्रता-प्रथममेव वार्धक्यावस्थाप्राप्तितः पूर्वमेवेत्यर्थः नेमि-पार्श्वपक्ष भाचार्यश्रीविजयामृतमूरिप्रणीता सरणी रीका. सा-४ योस्तु स्त्रगुरोः स्वपितुः अग्रतः अग्रे एव अत एव अनिष्टः स्वपितु- रप्रियश्चेति विशेपः । महापीरपक्षे तु स्वगुरोः स्वज्येष्ठभ्रातः अग्रत = अत एवं। यमविधिः अहिंसादिपञ्चमहाव्रतविधानं संयमधारण. मित्यर्थः दीक्षाग्रहणमिति यावत् सभाममक्षं गोष्ठीसांमुख्य एव कृष्णालकग्रहणकर्म-कृष्णानां- तारुण्यविजृम्भितश्यामलिमशालिनाम् अलकानां-निजशिर केशानां ग्रहणकर्म-पञ्चमुष्टिलोचकर्म च ऋस भविन:-विवेकिजनस्य वैराग्यहेतुः-विगतो रागः-स्रक्-चन्दन-वनि- 'तादिविपयेप्यभिपको येषां ते चिरागास्तेषां भावः कर्म या चैराग्य तस्य हेतु भवत् सर्वस्यवाभवदित्यर्थः। महेन्द्रमहेश्वर्यातिशायिसाम्रा. ज्यशालिकुलसंभवोऽप्येप माम्राज्यविजृम्भितानुपमभौमसुखजातं तृण- मिवनिरस्य राजकुमारादिसुदुष्कराऽरुष्करमुष्टिपञ्चकमितकेगलुञ्चनपूर्वक दीक्षाग्रहणमकरोत् इति धिङ् न आपातरमणीयपर्यन्तपरितापिविशं. कटविषयाटवीलगदावानलविस्मरशिखायलीपिकलितचेतस्कान् इत्येवं मस्यैववैराग्यं प्रादुरभूत् । शेपं पूर्ववत् ऋषभ-शान्त्योरप्यय- मी विदेलिमः । अहिंमा मत्यवचनं ब्रह्मचर्यमकल्कता । अस्तेय- मिति पञ्चैते यमाख्यानि नतानिच' । गगस्तु मात्सर्ये लोहितादिपु. केशादावनुरागे च गान्धारादौ नृपेऽपि चेति मेदिनी । श्रीरामपक्षेत्वित्थंविधोऽप्यर्थः सम्भवति तथाहि-स्वगुरोः- स्वपितुर्दशरथस्य अग्रतः अनिए:-अत्यन्ताप्रियः भीष्मः-अनिमकुमा- रंगजकुमार (राम ) दुप्फरतया पुत्रवियोगजन्यमोझातिरकसंभावित. राजमरणहेतुना वा सुदारुणः यमविधिः-संयमग्रहणं चतुर्दगववि. धिकतापसयतधारणमिति यावत् तथा सभाममक्ष-सर्वसमक्षमित्यर्थः कप्णालकग्रहणकर्म-कृष्णानां-मृगवदतिश्यामलानाम्अलकानांचूर्ण- कुन्तलानां ग्रहणकम-तापमधार्यजटावत्संहत्ययन्धनमित्यर्थः कसम चिन:-महदयहृदयस्स चैराग्यहेतुः-विपयरागगहित्य कारण ककपिवि. पपपस्ने राहित्यकारणं वा नामवत् सर्वस्यवादित्यर्थः ॥ २७ ॥'.
महोपाध्यायधीमेघविजयगगिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये MM भीमेऽपि पश्यति सुरे यदि-वा-नरेऽपि, नम्रत्वमाश्रयदहीनकुले कुलीने। वन्यव्रताचरणतः सह-देव एव, राजापि मोनमदधाद् धृतधर्मजन्मा ॥ २८ ॥ अन्वयः-अहीनकुले कुरीने सुरे पश्यति भीमे यदि वा नरे सहदेवे भपि नकुले च नग्न वम् आश्रयत् एतधर्मजन्मा राजापि वन्यव्रताचरणत. मौन मदधात् । ऋपभादिपक्षे-मृतधर्म जन्मा देव. राजापि भीमेऽपि पश्यति सुरे यदि वा नरे रामपक्षे यदि वानरे अहीनकुले कुरीने नम्रत्वमाध्यत् वन्यव्रताचरणतः सह मौनमदधात् ॥ २८ ॥ व्याख्या-पाण्डवक्षे-अहीनकुले-महाकुलसंभवे कुलीनेसजने भूमिस्थिते वा निर्वासितत्वाद. सुरे=पण्डिते विवेकिनि पश्यति सर्व समक्ष संवृत्तघटनां साम्राज्यहरण-द्रौपदीकेशांऽशुकाकर्षण-द्वादश- वर्षावधिकप्रकाशयनवास-चकायधिकगुप्तवासादिरूपां माक्षात्कुर्वति भीमेवृकोदरे भीमसेने इति यावत् यदि वा नरे=अर्जुने देवेसहदेवे नामैकदेशग्रहणे नाभग्रहणात् अपि शब्दसंगृहीते नकुले च नम्रत्वं विनम्रभावः नम्रतेति यावत् आश्रयत् अवालम्बत न ते व्यक्रियन्तेति भावः तदनु धृतधर्मजन्मा=धृतं गृहीतं धर्मात्म्यमात् जन्म येन स धर्मात्मजो युधिष्ठिरः राजाऽपि वन्यत्रताचरणत:वन्यानां बनेवा- सितपस्विनां व्रतस्य-नियमस्य आचरणतःसा सार्वविभक्तिकस्तसिः आच. रणेनेत्यर्थः यद्वावनेभवानि चन्यानि तैव्रताचरणं भोजनक्रियासम्पादन तेनेति ततः सह-सार्द्ध मौनं मुनित्यं दधौ । ऋपभ-नेमि-पार्श्व-वीरपक्षे-धृतधर्मजन्मा-धृतं गृहीतं धर्मरूपं जन्म येन सः यद्वा धृतं धर्माय पुण्याचरणाय जन्म येन सः देवा पभदेवः नेमिः पार्श्वनाथः बर्द्धमानश्च भीमे रौद्रेऽपि पश्यति मुरे देवे यदि वा नरे-मानवे अहीनकुले-महोच्चकुलजे कुलीनेकुलवति
भाचार्यश्रीधिजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-४
१९१
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भूमिस्थिते चा नम्रत्वम् आश्रय किश्च राजापि वन्यव्रताचरणत:=
चनिनां धननायकानां भिल्लादीनाम् अत्रताचरणतः भोजनाभावात्
मौनं मुनित्वं अदधात अपुष्यत् ।
शान्तिपक्षे कृष्णपक्षे-भीमेऽपि पश्यति सुरे अहीनकुले यदि
वा कुलीने नरे नम्रत्वं-ननभावः आश्रयत् नम्रताऽऽश्रितेत्यर्थः धृत-
धर्मजन्मा-गृहीतपुण्यार्थजनुः धृतं धर्माय न्यायाय जन्म येन म
इति वा देवा-श्रीशान्तिनाथप्रभुः-राजापि-प्राज्यसाम्राज्यसंजातशा.
तजातानुभवितापीतिभावः बन्यव्रताचरणतः वानप्रस्थाचर्यनियमात
मौनं धर्मम् अदधात् ।
रामपक्षे-धृतधर्मजन्मा गृहीतन्यायावतार! देवाचलदेवः
श्रीरामचन्द्रः राजापि-क्षणकनिपयाऽनन्तरमेव सम्भावितराज्याभिपे.
कोऽपि वन्यत्रताचरणतः वन्यैः वनभवैः कन्द-फलादिमित्रताचरण.
ता अशनक्रियानिष्पादनेन सह मौनं-मुनित्वं तापमत्वमदधात् भीमे.
ऽपि पश्यति मुरे यदि-अथ वा वानरे अहीनकुले ऽकुलीने वा नम्रत्वं
आश्रीय वासुदेवधृतधर्मजन्मा-गृहीतधर्मावतारः देवः राजापि॥२८॥
प्राप्तं जयाढ्यविजयैः किमुदारनीत्या,
निर्मीयमाणसुकृतैस्तु युगं कृतं तत् ।
लोकः पथश्च कलितश्चलितं न किञ्चि-
नातिक्रमः स्खलितमीश्वरराज्ययोगे ॥२९॥
भन्यया-जयादयविजयः उदानीत्या नियमाणसुकृतेः तत् युगं कृतं
प्राप्त किमु ( यत; जयायविजय निर्मीयमागमुनश्च ) पयः किवित्
न चलिम, नापि परितः ( पालिनरभावि ) लो. पथ. हरित: किशित न
घटितम् । ( यत. ) ईशाराग्ययोगे भनिनम: म्मरिन (के.
उसति ॥ २९॥
१०२ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते मतमन्धानमहामाये व्याख्या-जयादयविजयः जयसंयलितविजयैः उदारनीत्या- अमाधारणनीचा दावनीत्या या निर्मीयमाणसुकृतैः विधीयमानपु- ज्यकार्यश्च माधनैः तत् कृतं युगंमत्ययुगं प्राप्त किम् ? यतः (जया ट्यविजयैः जयसहितविजयशालिमिः,निर्मीयमाणसुकृतैः-पुण्यकार्य- विधायिभिः) रोकैः पथ:-सन्मार्गात् किञ्चित् अल्पमपि न चलित= स्खलितम् नापि पलिता कलिना-कलहेन क्लेशेन वा कलियुगेन वा चालितैरभावीति शेषः यद्वा लोकः जनः पथ:-सन्मार्गः कलितः गृहीतः आश्रितः ततश्च किञ्चित् मनागपि न चलितम् । युक्तं चैतत् यतः ईश्वरराज्ययोगे अतिक्रमः धर्माद्युल्लच नम् क्रम-परिपाटी-समु- लड़नं वास्खलित स्खलनं कूटयुद्धादौ प्रवृत्या वीरमर्यादातः पतनं मर्यादा,शो या सन्मादेश्वलनं वाऽपि न अजनि लोकेषु । वर्म- मार्गा-ऽध्व-पन्थानः पदवी सृतिरित्यमरः । पथ इत्यकारान्तत्वे च 'वाट: पथश्च मार्गश्च तित्रिकाण्डशेपः प्रमाणम् ।। २१ ॥ धर्मात्मनाप्यवनलीनतया वनानि, संसेविरे विहितकैतवसेवनेन । मात्रासमं द्रुपदजातिशये-न शीता- संतापमाप हत-कीचकनीचवृत्त्या ॥३०॥ अभ्यय -विहितकेत सेवनेन धर्मात्मना आप्यवनलीनतया धनानि ससे. विरे अतिशयेन शीना दुपदजा हतकीचकनीचवृत्त्या। मानाऽसम सन्तापमाप । पभादिपझेपु-विहितकैतबसेवनेन धर्मात्मना आप्यवनलीनतया ( भवन- लीनतया च) वनानि (अवनानिच) ससेविरे दुपदजातिशयेन कीचकनीचवृश्या च मात्रासम शीताऽऽमन्तापमाप हत ॥ ३० ॥ व्याख्या-विहितकैतवसेवनेन=विहित-कृतं क्षात्रधर्मानुरोधेन द्यूतक्रीडनार्थमाहाने कैतवस्य द्यूतस्य सेवनं येन सः तेन, आहितो भाचायश्री विजयामृतसरिभणीता मरणी टीका सर्ग-१ vv न निवर्तेत द्यूतादपि रणादपीत्युक्ते रणार्थ द्यूतार्थ चाऽऽहूतेन क्षत्रियेण रणात विधानस्य च क्षात्रधमोचितत्वात् । धर्मात्मना-धर्म-पुण्ये आ. चारे वा न्याये या आत्मा चुद्धिश्चित्त वा यस्य तेन धर्मात्मजेन युवि- ष्ठिरेण आप्यवनलीनतपा-आप्या-खीकता वनवास-गुप्तवासरूपयूत पणनिहर्थि प्राप्यावने द्वैतवने या लीनता श्लिटता आश्रयायिभा- वेन सम्बद्धता निवमतिरित्यर्थः निवास इति गात् तया हेतुना बनानि- द्वैत नानि मसेविरे-निषेवितानि । तदनु कदाचित् गुप्तवासयापनीय- वाधिककालाभ्यन्तरे विराटगृहे पाण्यैः साक नियमन्ती हुपदजा- द्रौपदी हतकीचकनी वृत्त्या-हतस्य-दुर्विदग्धस्य कीचकस्य-तदा- ग्यस्य विराटराजश्यालकस्य द्रौपदीरूपदर्शनचलितचेतसस्तद्धर्पणार्थ चेष्टमानस्य नीचत्या-सुरतप्रार्थनालक्षणाऽमदाचरणेन मात्रासम- प्रमाणेनातुल्यम् अतिमात्रमित्यर्थ मन्ताप दमाप-लेमे पतिव्रता. यात् सा नीशी ? अतिशयेन सीता अतिगयेन-अतिमात्रम् इने पत्यो पाण्डवे शीता अनुष्णा अतीक्ष्णा इति मा शान्तप्रकतिक्त्यर्थः । यद्वा सीता-सीता इति लुप्तोपमा। अतिशय नेत्यस्य आपति क्रिययान्वयः। पभ नेमि पार्श्व-वीरपक्षेपु-चिहितकेतासेनेन-हित-मि- नादि कैतर -छल धूत वा यद्वा केतन -शत्रुः तयोस्सेवन-भजन सम्बन्ध इतिभायः विगत हित-कैतरसेवन यसात् सः तेन राग- द्वेपविनिर्मुक्तेनेत्यर्थः। धर्मात्मना-पुण्यगीलेन जिनटेरेन आप्यानली नतया-तण्श्वरणार्थ प्राप्याननियामतया यहा आनलीनतया-जीव. रक्षणपरायणतया हेतुना वनानि-तपोवनानि अपनानि-जीवरक्षणक- र्माणि पा मसेविर-भेजिरे । अत एव द्रुपदजातिशयेनन्णा=वृक्षाणा पदं स्थान द्रुपद-धन तत्र जातोऽतिशय शयन तेन यथा कीचकनीचवृत्या की चकाना- १९४ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिपिरचिते मप्तमन्धानमहाकाये वंशानां कीचकेषु वा नीचवृत्या निम्नावस्थित्या च वंशाधोऽवस्थाने. नेत्यर्थः मात्रासमप्रमाणेनाऽतुल्यं यथाम्यात्तथा शीतासन्तापं-शीत च आसन्तापवाऽनयोः ममाहारः हेमन्तादित्रिक शैत्यं ग्रीप्मादित्रिके औष्ण्यं च आप-प्रापेत्यर्थः । हत इति कोमलामन्त्राणे । शान्तिनाथ-कृष्णवासुदेवपक्षे-धर्मात्मना-धर्म-धनुपि न्याये वा आत्मा मनो यस्य म तेन अत एव विहितकैतवसेवनेन-विहित कैतवैः रिपुभिरपि सेवन यस्य म तेन विशिष्टं हित-कैतबयोः मित्र- शयोः सेवनं यसिन् स तेनेति वा अवनलीनतया जगद्रक्षणपरायण तयाऽवनानि रक्षाकर्माणि संसेविरे आश्रितानि । श्रीरामपक्षे धर्मात्मना-धर्मे शिष्टाचार आत्मा मनो यस्य तेन मर्यादापुरुषोत्तमेन विहितकैतवमेवनेन=विगतं हिते-जगदिष्टसाधने कैतवस्य छलस्य सेवन यस्मादिति. विशेपेण हितगतं कैतवस्य छल. स्य सेवनं यस्मादिति. विशेपेण हितं-गतं कैतवस्य छलस्य द्यूतस्य वा सेवनं यस्मादिति वा. विहितं कैतवेन=रिपुणा=क्षणकतिपयशात्रवी भूतेन परशुरामेण शत्रुपक्षीयेण रावणानुजविभीषणेन सेवनं भक्ति- भावो यस्य स तेन तथाविधेन श्रीरामवलदेवेन आप्यवनलीनतया आप्यान्ममासाद्या बने या लौनता=चतुर्दशवर्षावधिकनिवसति- स्तया हेतुना वनानि-दण्डकारण्यानि संसेविरे । अथ शीता श्रीराम- मनुगच्छन्ती जानकी द्रुपदजातिशयेनबनम्थलीशयनेन कदाचित कीचकनीचवृत्त्यावंशाधोऽस्थिया मात्रा समप्रमाणेनातुल्यम् अ तिमानं सन्ताप-खेदम् आप आममाद प्राप्तवतीत्यर्थः । कैतवं द्यूत- दम्भयोः । कैतवः कितवे शत्रौ इति हैमः । शीता नभस्मरिति लागलपद्धतौ च सीता दशाननरिपोः सहधर्मिणी चेति तालव्यादी धरणिः। कीचको दैत्यभिद्-वाताहतिसखनवंशयोः, विराटराजश्याले चेति शब्दार्णवः ॥ ३० ॥ .
माचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-४ १९५ MANA नारायणः पशुधियो कृतकं स नाशा- नासादयन्नगवनभ्रमणेन दुःखम् ॥ भ्रंशेन पैतृकपदस्य दशामशासीद् , वारांनिधेश्च सविधे शरणे हरीणाम् ॥ ३१ ॥ अन्वयः--नारायणः नाशात् स पशुधिया उपलक्षितः नगवनभ्रमणेन कृतकं दुःख मासादयत् पैतृकपदस्य भ्रशेन वारांनिधेः सविधे हरीणां शरणे दशामशासीत् । रामपक्षेस नारायणः कृतकं पशुधिया नाशात् नगनवनभ्र. मणे दुख नासादयत् इति च न पैतृकपदस्य भ्रंशेन वारांनिधेः पूर्ववत् ॥३॥ व्याख्या-नागयणा नृणां समूहो नारं तत् अयते जानाति इति नारम् आययति प्रवर्त्तयति स्वेष्टकर्मणीति वा नुः इदं नारम्= अज्ञानं तद् आययति गमयति निवर्तयतीति वा सः । नाशात्-न आशा लोभ परिग्रहविषयकम् अततीति सः नाऽऽशात् नैकधेत्यादा. विवेहापि नअतिरिक्तनशब्दसद्भावान्नलोपाभावः सा=ऋपभः पशु- धिया-मम्यग्बुद्धया उपलक्षितः अतएव नगवनभ्रमणेन पर्वत काननप्रभृतिषु विहरणेन कृतकं-कृत्रिमं दुःखं न आसादयत् न प्राप्तवान् किञ्च पैकपदस्य कुलपरम्परागतराजपदलक्षणपितृसम्ब- न्धिस्थानस्य भ्रंशेन-अधःपातनेन अबहेलनेन परित्यागेनेति यावद वारांनिधेः-समुद्रस सविधे-समीपदेशे हरीणां सिंहानां शरणे= आश्रयस्थाने बने इति यावत् दशांचरमावस्थाम् अशासीत्-तपश्च- र्यया तनूकरोतिस्मेत्यर्थः प्रापयामासेति यावत् ॥ श्रीरामपक्षे-साम्प्रसिद्धः नारायणा नारायण इव विष्णुसदृश इत्यर्थः श्रीरामचलदेवः कृतक-कृत्रिम मायया हेममृगरूपधारिणं मारीचमिति यावत् पशुधिया मृगलक्षणः पशुग्यमिति बुद्धयवेत्यर्थः न अशात्-अशातयत् इति नगवनभ्रमणे-रावणाऽपहृतसीतान्वेष- D महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते मप्तमन्धानमहाकाव्ये वंशानां कीचकेपु वा नीचवृत्त्या निम्नावस्थित्या च वंशाधोऽवस्थाने- नेत्यर्थः मात्रासमप्रमाणेनाऽतुल्यं यथास्यात्तथा शीतासन्तापं शीतं च आसन्तापश्चानयोः ममाहारः हेमन्तादित्रिके शैत्यं ग्रीप्मादित्रिके औष्ण्यं च आप-प्रापेत्यर्थः । हत इति कोमलामन्त्राणे । शान्तिनाथ-कृष्णवामुदेवपक्षे-धर्मात्मना-धर्म-धनुपि न्याये वा आत्मा मनो यस्य म तेन अत एव विहितकैतवसेवनेन-विहितं कैतवः रिपुभिरपि सेवनं यस्य म तेन विशिष्ट हित-कैतवयोः मित्र- शब्चोः सेवनं यस्मिन् स तेनेति वा अवनलीनवया जगद्रक्षणपरायण. तयाचनानि रक्षाकर्माणि संसेविरे आश्रितानि । श्रीरामपक्षे धर्मात्मना-धर्म-शिष्टाचारे आत्मा-मनो यस्य तेन मर्यादापुरुषोत्तमेन विहितकैतयसेवनेन-विगतं हिते-जगदिष्टताधने कैतवस्य छलस्य सेग्नं यम्मादिति. विशेषेण हितं गतं कैतवस्य छल- स्य सेवनं यस्मादिति. विशेपेण हितं गतं कैतवस्य छलस्य द्यूतस्य वा सेवनं यस्मादिति या. विहितं कैतवेन=रिपुणा-क्षणकतिपयशात्रवी भूतेन परशुरामेण शत्रुपक्षीयेण रावणानुजविभीषणेन मेवनं भक्ति- भावो यस्य स तेन तथाविधेन श्रीरामबलदेवेन आप्यवनलीनतया आप्या ममासाद्या वने या लौनता-चतुर्दशवर्षावधिकनिवसति- स्तया हेतुना वनानि दण्डकारण्यानि संसेविरे । अथ शीता श्रीराम- मनुगच्छन्ती जानकी द्रुपदजातिशयेन बनस्थलीशयनेन कदाचित कीचकनीचवृपया वंशाधोऽस्थिया मात्रा मर्म-प्रमाणेनातुल्यम् अ तिमानं सन्तापंन्सेदम् आप आममाद प्राप्तवतीत्यर्थः । केतवं द्यूत- दम्भयोः । कैतवः कितवे शत्रौ इति हैमः । शीता नभस्मरिति लांगलपद्धतौ च सीता दशाननरिपोः सहधर्मिणी चेति तालव्यादौ धरणिः। कीचको देत्यभिद्-वाताहतिसखनवंशयोः, विराटराजश्याले चेति शब्दार्णवः ॥ ३० ॥ .
आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, मर्ग-४ १९५ नारायणः पशुधियो कृतकं स नाशा- नासादयन्नगवनभ्रमणेन दुःखम् ॥ भ्रंशेन पैतृकपदस्य दशामशासीद् , वारांनिधेश्च सविधे शरणे हरीणाम् ॥ ३१ ॥ अन्वयः-नारायणः नाशात् स पशुधिया उपलक्षितः नगवनभ्रमणेन कृतकं दुःखं नासादयत् पैतृकपदस्य अशेन वारांनिधेः सविधे हरीणां शरणे दशामशासीत् । रामपक्षे-स नारायणः कृतकं पशुधिया नाशात् नगनवनन- मणे दुख नासादयत् इति च न पैतृकपदस्य भ्रंशेन वारांनिधेः पूर्ववत् ॥३॥ व्याख्या-नारायणः नृणां समूहो नारं तत् अयते जानाति इति नारम् आययति-प्रवर्त्तयति स्वेष्टकर्मणीति वा नुः इदं नारम्= अज्ञानं तद् आययति-गमयति निवर्तयतीति वा सः। नागात्-न आशां लोभ परिग्रहविपयकम् अततीति सः नाऽऽशात् नैकधेत्यादा- विवेहापि नअतिरिक्तनशब्दसद्भावान्नलोपाभावः सा अपभः पशु- धिया सम्यग्बुद्धथा उपलक्षितः अतएव नगवनभ्रमणेन पर्वत काननप्रभृतिषु विहरणेन कृतकं कृत्रिमं दुःखं न आसादयत् न प्राप्तवान् किश्च पैलकपदस्य कुलपरम्परागतराजपदलक्षणपितृसम्ब- न्धिस्थानस भ्रंशेन अधःपातनेन अबहेलनेन परित्यागेनेति यावत् वारांनिधे-समुद्रस्य सविधे-समीपदेये हरीणां सिंहानां शरणे- आश्रयस्थाने बने इति यावत् दशांचरमावस्थाम् अशासीत्तपश्च- र्यया तनकरोतिस्मेत्यर्थः प्रापयामासेति यावत् ॥ श्रीरामपक्षे-सा-प्रसिद्धः नारायणः नारायण इव विष्णुसदृश इत्यर्थः श्रीरामवलदेवः कृतकं कृत्रिम मायया हेममृगरूपधारिणं मारीचमिति यावत् पशुधिया-मृगलक्षणः पशुस्यमिति बुद्धवेत्यर्थः न अशा अशातयत् इति नगवनभ्रमणे-शत्रणाऽपहृतसीतान्वेष- महोपाध्यायनीमेपविजयगणिविरचिते सप्तमधानमहाकाये पार्थ गिरिकाननेषु भ्रमणे तज्जन्यमित्यर्थः दुरायेदं नामादयत् इति च न किन्तु अशादेव दु.समासादेवेत्यर्थः । पैतृकपदस्य पितृसम्ब. धिराजपदस्य भ्रंशेन कैकेयीपचनपवशेन राजा दशग्थेन भरताय राज्यं दत्वा रामश्च वनवामार्थ पित्राज्ञप्ततया सामाज्यपदस्य राहित्येन वारांनिधे ममुद्रस्य सविधे हरीणां वानराणां सुग्रीवादीना शरणे-गृहे स्थाने इति यावत् दशां-किश्चित्कालिकस्थितिम अशामीत् । शब्द शक्तिमहिन्ना रामपक्षीयोऽर्थः प्रदर्शितो न तु म पक्ष इहाश्रयणीयः श्री कौशलाधिपतिनेत्यादि चतुतिपश्लोके तदर्थस्य सष्टमभिहित- स्वाद ॥ ३१॥ कालोऽप्यमुप्य चरणेऽनुचरोदयेच्छु- देव्या-नले-न निहतश्छलमाकलय्य । तन्मानवो भजतु कोऽपि नवोदयाघ, क्रीडारसेऽभ्यसनतो व्यवसनासनानि ॥३२॥ अन्वय -कालोऽपि अमुष्यचरगे अनुचरोदयेच्छु देव्या अनले न निहत. छलम् भाकल्य क्रीडारसे अभ्यसनत ग्यसनासनानि नव. कोऽपि नवोदयाघम् तत्माभजतु ॥ ३२ ॥ व्याख्या-कालोऽपि समयोऽपि अमुष्य जिनेन्द्रस्य चरण चारित्र्ये अथवा चरणे पदे अनुचरोदयेच्छुः अनुचरस्य सेवकस य उदयः समृ. द्वितदिच्छुस्तदभिलाषुकः देव्या देवागनया अप्मरसा अथवा देव्या देवमायया रचितम् उद्भावितमिति शेपः छलम् कपटम् आकलग्य चुनाविमृश्येति यावत् अनले अग्नौ यथा वह्निः सर्व मश्मसात् करोति स्पृष्टस्तथा मामप्ययं कुर्यादिति न निहतःन प्रयोजितः निवृत्तिमकरो- दिति भावः क्रीड़ारसे सेलारसे अभ्यसनतः अभ्यासात् व्यसनासनानि व्यसने दुराग्रहे आसनम् उपवेशनम् तदभिनिवेशः तानि नवोदयाघ म् ..
भन्प-निजप्रजानो साम्राज्यम् इत्यम् अनुनीय नित्योदयेन मनुजेश्वरेण
गंधा करमेन महाभुजेन अननुजे अनुजे वा धर्मोन्नति निदधता बुभुजे॥३३॥
व्याया-निजप्रजानां स्वकीयजनानाम् अथवा स्वकीयमन्तती.
नाम् "प्रवासात्मन्ततो जने इत्यमरः" इत्थम् पूर्वोक्तप्रकारेण साम्रा-
न्यम् आधिपत्यम् अनुनीय खानुकूल्यम् विधाय अथवा इत्यम् पूर्वोक्त.
प्रकारेण प्रजानाम् जनानाम् अनुनीय स्वाधीनम्बिधाय "प्रजानामिति
आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-४
नवोदयः अधः पापम् यत्र तद्यथास्यात्तथा नवः नूतनः कोऽपि मा
मजतु न सेवताम् नासिन प्रसक्तो भवत्विति भावः ।।
अन्यपक्षेऽप्येवमेवेति ।। अथ च अमुष्य नलस्य चरणे आचरणे
अनुचरोदयेच्छु। अनुचरस्य किंकरस्य दासस्यत्यर्थः य उदयः प्राप्तिः
दासभावताम् तदिच्छुः अयं राज्याद् भ्रष्टो दासतां भजेदित्यभिलापुकः
कालः कलियुगः देव्या दिव्यते इति देवी भावेऽप् गौरादित्वान्ङीप्
तया देव्या देवनक्रियया सूतव्यापारेण छलम् कपटम् आकलप्य अभि.
सन्धाय आश्रित्येत्यर्थः नले नैपधनृपे न निहितः छल इति शेष इति
नकिन्तु निहित एवेति काका व्यज्यते नले सूतव्याजेन कपटो निहित
इति भावः तस्मात् तत्कारणात् कोऽपि मानवः नवोदयाचं अभिनव
ममृद्धकिल्विषं माभजतु मासेवताम् तथाहि क्रीड़ारसे क्रीड़नकौतुके
अम्यसनतः अभ्यासात् पौन:पौन्येनासेवनात् व्यसनासनानि व्यस.
नस्य विपत्तेः आसनानि उपवेशनानि स्थापनानीति यावत् विपत्ति
प्राप्तयो भवन्तीति शेषः । अत्र श्लेपोऽर्थान्तरन्यासश्च ॥ ३२ ॥
साम्राज्यमित्थमनुनीय निजप्रजानां,
नित्योदयेन वुभुजे मनुजेश्वरेण ॥
लोकाग्रजेपु ऋणभेण महाभुजेन,
धर्मोन्नति विदधताऽननुजेऽनुजे वा ॥ ३४ ॥
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते मप्तस-धानमहाकाम्ये शेपत्वविक्षया पष्ठी" नित्योदयेन नित्यमहरहः उदयः ममृद्धिर्यस्थ स नित्योदयस्तेन मनुजेश्वरेण मनुजानाम्मानपानाम् अथ ना मनुजेपु ईश्वरः खामी प्रभुः मनुजेश्वरः तेन लोगजेषु नपभेन लोकानाम् जनानाम् अग्रजः श्रेष्ठ तेपु पभेन श्रेष्ठेन महत्म्वपि महत्तरेण अथ वा अपमेन ऋपभस्वामिना आदीश्वरणेत्यर्थ. " स्युरुत्तरपदे व्याघ्र पुगवर्षभकुञ्जराः॥ सिहशार्दूलनागावाः पुसि श्रेष्ठायगोचरा इत्यमर." महाभुजेन दीर्घबाहुना अनेन भाग्यशालिन सच्यते अननुजे अननुचरे अनुजे अनुचर अननुरोधिनि अनुरोधिनि च धर्मोन्नतिम् पुण्यममृद्विम् विदधता कुर्वता प्रचारयता माम्राज्यम् आधिपत्यम् समृद्विमिति यावत् बुभुजे भुज्यतेस्म सर्वपक्षसाधारणमेतत् अनुमामालकारः ॥३३॥ श्रीकोलाधिपतिना यतिनामधर्तुं मुरये सुते नियमतः पदचीनिधेया। कान्तावरिष्ठवचसा भरते न्यधायि स्वाप्ताग्रजन्मनि परे वनवासवृत्तिः ॥ ३४ ॥ अ-वय ---यतिनामधतुं श्रीकौशलाधिपातना नियमर मुख्य सुते पदवी निधेया कान्तावरिष्टयचसा भरते न्यधायि परे स्वासामन-मनि वनवासवृत्ति न्यधायि ॥ ३४ ॥ व्याख्या-- यतिनामधत्तुं यतिसंज्ञामनुभवितुम् यतित्वमाका इझन् श्रीकौशलाधिपतिना कुशलायामयो याया भवः कौशलः ऋप भदेवः "इतिकल्पसूत्रसुबोधिकावृत्तौ" अथवा कुशलस्यभावः कौशलम् तयुक्तः अधिपति कौशलाधिपतिः श्रियायुक्तः कौशलाधिपतिः श्रीकौशलाधिपतिः तेन पभस्वामिना नियमतः निश्चयतः गुणतः क्रियातः धर्मतः नीतितः कुलानायतः राजव्यवहारत मुख्य प्रधाने जन्मत इत्यर्थ सुते पुत्रे पदवी राजपदवी राज्यभार निधेया स्थापनीया -- १९९ भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरगी टीका. सर्ग-४ अबलम्बनीया इति विचार्य तिशेषः भरते भरताभिधेये ज्येष्ठतनये न्यधायि प्रास्थापि कान्तावरिष्ठवचमा कान्तानाम् कमनीयस्वरूपा- णाम् सारस्वतादिरिष्टान्तब्रह्मलोकनिवासिदेवानाम् वचसा तेषां वच- नेन स्वतोऽपि तेषां वचनेन च परे चग्मे अयुनर्भाविनीत्यर्थः स्वाप्ता- ग्रजन्मनि स्वस्य आप्तम् कल्पाणाभिमुखम् अग्रम् श्रेष्ठम् यत् जन्म तम्मिन् स्वकीयश्रेयोमुसप्रशस्तशरीरे बनवामवृतिः मुनिवृत्तिः न्य.. धायि अधारि ॥ अथच साप्ताग्रजन्मनि स्वस्मात स्वतः आप्ताग्रजन्मनि प्राप्तप्रथम- जन्मनि परे उत्कृष्टे पूर्व वा बनवामधृत्तिः युगलिकधर्मप्रवृत्तिः न्यधायि प्राम्थापि स्वतो युगलिकर्मो न्यवर्ततेति द्वितीयार्थो व्यज्यते ॥ श्रीशान्तिनाथ नेमिनाथ पार्श्वनाथ बीग्पक्षेषु । श्रीकौशलाधिप- तिना कुशलस्य भावः कौशलम् कुशलता क्रियानेपुण्यम् तम्मिन अधि- पतिः चतुरः कौगलाधिपतिः श्रियायुक्तः कौशलाधिपतिः श्रीकोश- लाधिपतिः नेन यतिनामधन यतिसंतामनुभवितुं मुख्य श्रेष्ठे चरमे इत्यर्थः सुते सूयते उन्पद्यते इति सुतम् शरीरम् तस्मिन पदवी मुनि- पदवी निधया स्थापनीया आघेया ति विचार्येतिगेषः कान्तावरिष्ठ. वचमा आममन्ताद्वरिष्ठः आवरिष्ठः कान्तानां देवानाम् आवरिष्टम् चचाम्बसंयमग्रहणप्रयोजकम तेन तेषां वचनन स्वतश्यम्बाप्ताग्रजन्मनि स्वस्य ग्यकीयम्य आप्तम् इलाव्यम् यत् अग्रजन्म श्रेष्ठजन्म तम्मि. ने परे चरमे अथा म्यः स्वर्गात आप्तम् प्राप्तं यत अग्रजन्म तम्मिन भरने भरति पुण्येन लोकमिति भग्ते अथवा विभनि पुण्यातिशयमिति- भग्नम्नम्मिन् वनामकृतिः मुनिरनिः पुण्यारण्यमेग्नविधिः न्यधायि प्रास्थापि अग्राहीत्यर्थः ।। गमपने-कोगटे देशविगंप मचा सौगला नम्या अधिपतिः कौलाधिपति तन फौगन्यापतिना दमयनृपेन पनिनामपर्नम् महोपाध्यापश्रीमेघविजयगणिविरचिते मप्तमन्धानमहाकाव्ये . मुनित्वमाश्रयितुम् प्रयजितुमिति भावः मुख्ये सुते मर्यतो ज्येष्ठे दयादा- क्षिण्यादितः भ्रष्ठे रामे नियमतः स्ववंशपरम्पराम्नाायतः पदवी राज. पदवी निधेया सापनीया इति कृतनिश्वयेऽपि कान्तावरिष्ठवचसा कान्तायाः कामिन्याः कैकेय्याः वरिष्ठवचसा वरिष्ठम् अत्याज्यम पूर्वदत्तवस्तया अवश्यग्राह्यम् यद्वचः वचनम् तेन अथवा कान्तायाः स्वार्थान्धायाः कैकेय्याः अवरिष्ठम् उभयलोकविरुदम् अथवैतल्लोक विरुद्धम् यद्वचस्तेन भरते कैकेयीतनये स्वमध्यमतनये न्यधायि राजपदवी अम्थापि परे उत्कृष्ट स्वाप्राप्तामजन्मनि स्वस्स आप्तः अत्यन्तानुगतोवल्लभ इत्यर्थ यः अग्रजन्मा ज्येष्ठतनयः तस्मिन् रामे वनवासवृत्तिः न्यधायि न्यक्षेपि वनवासीव्यधायीत्यर्थः॥ कृष्णपक्षे-कौशलायाः मित्र विन्दायाः स्वेप्टाप्टपमहिपीणाम न्यतमाया अधिपतिः स्वामी तेन ऋणेण यतिनामर्तुम् यतते स्वाव पणायदुर्गादिकम्विद्यते इति यतिः अथवा यतिः अथ वा यतिर्विष्णु स्तस्य नाम ख्यातिम् धर्तुमाश्रयितुम् "यतिर्विष्णुरितिशब्दस्तोममहा. निधिः" "कृष्णस्तु भगवान स्वयमिति पौराणिकाः" मुख्य प्रधान निरुपद्रवे शत्रुभिरलये सूते सूने अम्मिन् इति मुतः अधिकरणे क्त: भूमौ पदवी सितिः विधेया निर्मापनीया कचिनिर्वाहस्थाने स्वनगरी निवेशयितव्येति भावः कान्तागरिष्ठवचमा आसन्ताद्वरिष्ठः श्रेष्ठः आवरिष्ठः कान्तम् मनोहरम् यत् आवरिष्ठस्येन्द्रादेवचः वचनम् तेन देवेन्द्रादिवचनेन भरते भ्रियते धनधान्यादिसमृद्धिमिलोंका इति भर. तस्तस्मिन् स्वाप्ताय नन्मनि स्वस्य आप्तम् श्लाध्यम् अग्रजन्म पूर्वजन्म यस्मिन् तस्मिन् आपोनारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनव इति मनूक्त कृष्णस्य जलप्रसूतत्वात् परे उत्कर्षे द्वारकायामित्यर्थः वनवासवृत्ति वने समुद्रजले वासवृत्तिः जलवासित्वम् अथवा बनमेव वासवृत्तिः भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-४ २०१ vvv अन्वयः- प्राकारो पत्र साअथ वा बने जले वासः वृनिराजीविका च यस्य स, न्यधायि अस्थापि अत्र श्लोके श्लेपालंकारः ॥ ३४ ॥ . श्रीविश्वसेनकृतकर्मनिवृत्तिभावे, लोकोऽनुगामुकमना नयविक्रमेण ॥ शान्तिप्रधानवचसैव तमाश्वसेनो, वैदेहिवृत्तिपरिभावनया जुगोप ॥ ३५ ॥ -श्रीविश्वसेनकृतमनिवृत्तिभाये नयविक्रमेण अनुगामुकमना लोकः तम् भावसेनः शान्तिप्रधानयचमैव ये देहिवृत्तिपरिभावनया जुगोप ॥ ३५ ॥ व्याख्या-श्रीविश्वसेनकृतकर्मनिवृत्तिभावे विश्वसिन् चतुर्दि- विभांगे सेना यस्स अथवा विश्वमिन् सेनया यातीति सेनयतीति सेनः मर्वत्र सेनामहितगमनः नामिः आदिनाधयिता तेन कृतः सम्पादितः फर्मणो निवृत्तिभावः पित्रादिनियतकर्तव्यलौकिकसंस्कारादिकर्मम- माप्तिर्यस्मिन् तसिन् अथ वा श्रीविश्चमेनात् निजमाम्प्रतिकपितुः सकाशात् कृतः जातः कर्मणः गरीगरम्भकदुरदृष्यनिवृत्तिभावः यत्र तस्मिन् नयविक्रमेण नयेन नीत्या विक्रमेण पराक्रमेण अनुगामुकमनाः अनुसरणचित्तो जनः लोकः आसीदिति शेषः आश्वसेनः अश्वप्रधाना सेना यस्य स आश्वसेनः शान्तिप्रधानश्चसैव शान्तिप्रयोजकर चनेन वैदेवृित्तिपरिभावन या य इतिपादपुरोऽनुनयेऽव्ययम् , देही आत्मा तस्य यत्तियवहारः आत्मवद्व्यवहारस्तस्याः मावनया विचारेण तम् जनम् अथवा वैदेह्याः जनकनन्दिन्या गावृत्तिनम् सुसदःखमहि. प्णुत्वम् धर्मपरतन्त्रत्वम् तस्य परिभावनया विचारेण जुगोप ररक्ष । श्रीशान्तिनाथपक्षे-विश्वसेनेन तदभिधानेन स्वजनकेन ऋतः सम्पादितः कर्मनिवृत्तिभावः जन्मत आरम्य विवाहादिसम्भारपर्यन्त- २०० महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचित मप्तसन्धानमहाकाये मुनित्वमाश्रयितुम् प्रअजितुमिति भावः मुख्य सुते सर्वतो ज्येष्ठे दयादा- क्षिण्यादितः श्रेष्ठे रामे नियमतः स्वयंशपरम्पराम्नायतः पदवी राज. पदवी निया सापनीया इति कृतनिश्चयेऽपि कान्तावरिष्ठवचसा कान्तायाः कामिन्या: कैकेय्याः वरिष्ठवचसा वरिष्ठम् अत्याज्यम् पूर्वदत्तवरतया अवश्पग्राह्यम् यद्वचः वचनम् तेन अथवा कान्तायाः स्वार्थान्धायाः कैकेव्या: अपरिष्ठम् उभयलोकविरुद्वम् अथतल्लोक- विरुद्धम् यद्वचस्तेन भरते कैकेयीतनये समध्यमतनये न्यधायि राजपदवी अस्थापि परे उत्कृष्टे स्वाप्राप्तानजन्मनि स्वस्य आप्तः अत्यन्तानुगतोवल्लभ इत्यर्थ यः अग्नजन्मा ज्येष्ठतनयः तस्मिन् रामे वनवासवृत्तिः न्यधायि न्यक्षेपि वनवासीव्यधायीत्यर्थः ।। कृष्णपक्षे-कौशलायाः मित्रविन्दायाः स्वैप्टाएपमहिपीणाम न्यतमाया अधिपतिः स्वामी तेन कृष्णेण यतिनामवर्तुम् यतते स्वाथ- पणायदुर्गादिकम्विद्यते इति यतिः अथवा पतिः अथ वा पतिविष्णु: स्तस्य नाम ख्यातिम् धर्तुमाश्रयितुम् “यतिर्विष्णुरितिशब्दस्तोममहा. निधिः " "कृष्णस्तु भगवान स्वयमिति पौराणिकाः" मुख्य प्रधाने निरुपद्रवे शत्रुभिरलध्ये सूते सूने अम्मिन् इति मृतः अधिकरणे क्तः भूमौ पदवी सितिः विधेया निर्मापनीया क्वचिन्निहिस्थाने स्वनगरी निवेशयितव्येति भावः कान्तावरिष्ठवचमा आसन्ताद्वरिष्ठः श्रेष्ठः आवरिष्ठः कान्तम् मनोहरम् यत् आवरिष्ठस्येन्द्रादेर्वचः वचनम् तेन देवेन्द्रादिवचनेन भन्ते प्रियते धनधान्यादिसमृद्धिभिलोकळ उति भर. तस्तस्मिन् स्वामागचन्मनि स्वम्य आतम् श्लाध्यम् अग्रजन्म पूर्वजन्म यस्मिन् तस्मिन् आपोनारा इति मोक्ता आपो वै नरसूनव इति मनूक्तः कृष्णस्य जलप्रसूतत्वात् परे उत्कर्षे द्वारकायामित्यर्थः वनवासवृत्तिः बने ममुद्रजले वासवृचिः जलवासित्त्वम् अथवा वनमेष वासपतिः भाचार्यश्रीविजयामृतसारप्रणाता सरणा टाका. सग-४ ~~-~- vive अन्वयः- प्राकारो यत्र सा अथ वा बने जले वासः निराजीविका च यस्य स, न्यधायि अस्थापि अत्र श्लोके श्लेपालंकारः ॥ ३४ ॥ श्रीविश्वसेनकृतकर्मनिवृत्तिभावे, लोकोऽनुगामुकमना नयविक्रमेण ॥ शान्तिप्रधानवचसैव तमाश्वसेनो, वैदेहिवृत्तिपरिभावनया जुगोप ॥ ३५ ॥ -श्रीविश्वसेनकृतकर्मनिवृत्तिभाये नयविक्रमेण अनुगामुकमना लोकः तम् भावसेनः शान्तिप्रधानवचसैव वै देहिवृत्तिपरिभावनया जुगोप ॥ ३५ ॥ व्याख्या-श्रीविश्वसेन कृतकर्मनिवृत्तिभावे-विश्वसिन् चतुर्दि- विभागे सेना यस्य अथवा विश्वसिन् सेनया यातीति सेनयतीति सेनः मर्वत्र सेनासहितगमनः नाभिः आदिनाथयिता तेन कृतः सम्पादितः कर्मणो निवृत्तिभावः पित्रादिनियतकर्तव्यलौकिकसंस्कारादिकर्मस- माप्तिर्यसिन् तस्मिन् अथ वा श्रीविश्वसेनात् निजसाम्प्रतिकपितुः सकाशात् कृतः जातः कर्मणः शरीरारम्भकदुरदृष्टनिवृत्तिभावः यत्र तसिन् नयविक्रमेण नयेन नीत्या विक्रमेण पराक्रमेण अनुगामुकमनाः अनुसरणचित्तो जनः लोकः आसीदिति शेपः आश्वसेनः अश्वप्रधाना सेना यस्य स आश्वसेना यान्तिप्रधानवचसैव शान्तिप्रयोजकवचनेन वैदेहिवृत्तिपरिभावनया इतिपादपणेऽनुनयेऽव्ययम् , देही आत्मा तस्य वृत्तिर्व्यवहारः आत्मवद्व्यवहारस्तस्याः भावनया विचारेण तम् जनम् अथवा वैदेयाः जनकनन्दिन्या या चिर्वननम् सुखदुःखमहि. प्णुत्वम् धर्मपरतन्त्रत्वम् तस्य परिभावनया विचारेण जुगोप ररक्ष । श्रीयान्तिनाथपक्षे-विश्वसेनेन तदमिधानेन स्वतनकैन कृतः सम्पादितः कर्मनितिभावः जन्मत आग्म्य विवाहादिसंस्कारपर्यन्त- महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये कर्मनिवृत्तिभावः परिसमाप्तियत्र तलिन् अथवा विश्वसेनात् कृतः कर्मणः शरीरान्तगरम्भककर्मनिनिभावः ममाप्तियत्र तसिन् अन्यत् पूर्वव्याख्यानवत् ।। श्रीपार्श्वनाथपक्षे--विश्वमिन् सेना यस्स म विश्वमेनस्तेन कृतकर्मनिवृत्तिभावे आश्वसेनः एतदभिधानकः पाश्वनाथपिता वैदे- हिवृत्तिपरिभावनया जुगोप अन्यत्पूर्ववत ॥ श्रीनेमिनाथवर्द्धमानरामकृष्णपक्षे पूर्वपक्षवद्योज्यम् ।। ३५ ।। देवस्तथा नृपतिभिः सह पूर्वदेवैः, प्राप्ते प्रमोदनिवहे महता महेन । धर्तु क्षणाद् विषयतो विमुखः स दीक्षा, स्वामी स्वमद्भुतरसाद वनमाससाद ।३६॥ भन्वय:-महता महेन प्राप्से प्रमोद निरहे पूर्वदेव पतिभि. सह विपयत विमुखः स देव. दीक्षाम् धर्तुम् स्वामी स्वम् अद्भुतरसाद वनम् भायपाद ३६॥ व्याख्या-पूर्वदेवैः पूर्वोक्तैरिन्द्रादिदेवैः अथवा पूर्वावतेदेवा श्व तैः पूर्वदेवैः प्रधानदेवैः अथवा पूर्वम् शरीरधारणात् प्रथमम् देवैः देवभूतैः इदानी प्रभुसेवार्थन्नृपतितागतैः अथ च सामन्तराजमिः सह सार्धम् महता लोकातिगयेन महेन उत्सवेन प्रमोदनियहे आन न्दसंभारे प्राप्त अधिगते सतीत्यर्थः म प्रभुः जिनेश्वरः देवः विषयतः सांसारिकविषयकामिनीकाञ्चनादितः विमुखः पराङ्मुसः स्वामी सर्वशक्तिमान् स्वम् म्वयमेव क्षणात् तन्क्षणमेव दीक्षाम् प्रवज्यां धतुम् ग्रहीतुम् अद्भुतरसात् विलक्षणशान्तिरमान् बनम् सिद्धार्थनामोद्यानम् आससाद प्राप गतवानित्यथः।। श्रीपार्श्वनाथपक्षे--आश्रमपदनामानम्मनम् अन्यत्पूर्ववत् । .. ..
२०३ mA V आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका सर्ग-४ श्रीनेमिनाथ-शान्तिनाथ-बर्द्धमानपक्षे-सहस्राम्रवणनामान- म्बनमन्यत् समानम् ॥ श्रीरामचन्द्रपक्षे-देवः स्वामीत्यादिशब्दैर्दशरथो ग्राह्यः स च पूर्वदेवैर्दीप्यमाननृपतिभिः सह भूयमा परिवारेण दीक्षान्धत महा. मुनेः सत्यधृतेः सकासात् वनमामसाद प्राप ॥ कृष्णपक्ष-पूर्वदेवैः ज्येष्ठभ्रातृभिः नृपतिभिः सामन्तराजैः सह प्रमोदनिवहे अमन्दानन्द प्राप्ते अधिगते मति विपयतोऽविमुसः विपयामक्तचित्तः मांसारिकविषयवासनाधिकृतमनाः महता विपुलेन महेन उत्सवेन स कृष्णः देवः द्योतनात्मा दीक्षाम् विवाहविधिन्धर्तु- निर्वर्तितम्"वीवाहदीधानिरवत्तयद्गुरुरितिरघुकाव्ये" विवाहविधेरपि दीक्षाशब्दवाच्यत्वमुक्तमन्यैः स्वामी नृपः अद्भुतरसात् अत्युत्कण्ठातः वनम् आलयम् आवायम् आप्तसाद पाप अरण्ये जले निवासे आलये च वनमिति शब्दस्तोममहानिधिः ॥ १६ ॥ निष्कोपयामिकविधि दधताऽत्र राज्ञा, सांवत्सरावसरदानकृता यथार्हम् । योगाभियोगकलया मलयानुलिप्ता- लंकारितेन वनपावनता वितेने ॥ ३७॥ अन्धयः-अन निकोपयामिकरिधिन्दधता गर यानुटिसाऽकारितेन राशा पथा सायरपराइमरदानता योगाभियोगकर या यनपारनमा रितने ॥ १७ ॥ व्यारया-अत्र भुवने निष्फोपयामिकविधिन्दधता निर्गताः कोपात् इति निकोपाः शान्तकोया ये यागिका यामे यामे भया यामिकाः द्वारपालास्तेपाम् विधिन्धिानन्दधता आश्रयता अर्थात् अवारितद्वारतांता यथायोग्यम् रूपानुरुपं माम्बत्मरामरदानकता २०४ महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्धानमहाकाग्मे ~~ सम्बत्सरे भवम् साम्वत्सरम् तस्य अवसरः समयः तत्र यदानम् तत् करोतीति साम्वत्सरावसरदानकृता मलयानुलिप्तालंकारितेन मलया- नुलिप्तेन मलयचन्दनानुलेपेन तात्स्थ्यात्ताच्छब्दमित्यनुसृत्य अलं. कारितः कृतालंकारस्तेन राज्ञा राजमानेन योगाभियोगकलया योगस्य ये केचन जिघृक्षवस्ते समायान्विति रूपस्य योऽभियोगः ख्यापन तस्य कलया विधानेन वनपावनता वनस्यारण्यस्य पावनता पूतता महत्वमित्यर्थः वितेने विस्तारयामास ।। अन्येपामपि चतुर्णामहतां समानमेतत् ।। श्रीरामपक्षे-निष्कोपयामिकविधिम् निक्रोधद्वारपालक्रियाम् दधता धारयता राज्ञा भरतेन अत्र अयोध्यायाम् साम्बत्सरावसरदा- नकृता सम्वत्मरे भवः साम्बत्सरः चतुर्दशवर्पव्यापकः योऽवसरः समयस्तस्मिन् यत् दानम् पालनम् “दानम्मदजले च्छेदे पालने चेति शब्दस्तोममहानिधिः” तत् करोतीति तेन यथाईम् यथायोग्यम् क्रममनुसृत्येत्यर्थः योगाभियोगकलया योगस्य कवचादिधारणस्य अथ वा कर्मकौशलस्य योऽभियोगः उद्योगः तस्य कलया तदाश्रयेण अथवा योगः परराजकृतघर्पणस्तस्स अभियोगः विज्ञानम् तम् कलयति जानातीति कला तया तथोक्तया मलयानुलिप्तालंकारितेन मलयचन्द- नानुलेपनकृतालंकारेण वनपावनता वनति हिनस्ति जनानितिवनः तम् पायतिशोपयतीति "पैल्युः" बनपावनस्तस्यभावस्तत्ता वितेने अथ च वनस्स नगरस्य पावनता पवित्रता वितेने विस्तारयामास ।। कृष्णपक्षे-साम्बत्सरावसरदानकृता श्रीनेमिनाथस्य यत्साम्ब. त्सरावसरदानम् तत् कारयति सम्पादयतीति अन्तर्भावितण्यर्थः तेन अथवा सम्बसन्ति ऋतयो यत्र तत् सम्बत्सरम् उपवनम् रैवतकवनम् तस्य अवसरःअवकाशः तत्र दानकृता रक्षणकृता वृन्दावनावकाशपा- लनकता वा वनस्य समुद्रजलस्य पावनता पवित्रता अथवा स्वालयस्य २०५ AAAA भाचार्यश्रीविजयामृतमूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-४ द्वारकापुरः पावनता पवित्रता नितेने विस्तारयामास अन्यद्विशेषणं रामपक्षवद्योज्यम् श्लपः ॥ ३० ॥ रेजे रजश्च विपये ननु राजराजां, लोकान्तकान्तवसतिप्रतिपन्नदेवैः । विज्ञापितः स्वसमयं चिकुरार्थराग- मुत्पाटथ तुष्टसुमनाः सवनानुकूल्ये ॥३८॥ अन्वय –ननु राजराजा विपये रजन् रोकान्तकान्तवसातप्रतिपादेय स्वसमय विज्ञापित चिकुराधरागमुत्पाट्य तुष्टसुमना स वनानुकूल्ये रेजे ॥३८॥ व्याख्या-ननु इति कोमलालापे राजराजां विपये राजसु नृप समूहेषु राजते शोभते इति राजराद् तेषां विपये मध्ये तत्सघे रजन् विलसन् स जिनेन्द्रः लोकान्तकान्तवसतिप्रतिपन्नदेवैः ब्रह्मसदननिवा. सिभिर्देवैः स्वममयं दीक्षाग्रहणकालम् विज्ञापितः निवेदितः स्मारित इति यावत चिकुरार्थरागम् चिकुरे कचे अर्थ सम्पत्तौ यो रागः मम. त्वयुद्धिः प्रीतिरिति यावत् तमुत्पाट्य उन्मूल्य निरस तुष्टसमना तुष्टम् हष्टम् सुष्टु मनो हृदयं यस्य स वनानुकूल्ये वने न निर्जनतया आनु. कूल्ये तपो योग्ये रेजे रेमे विललास ।। अथवा म वनस्य आम्यन्तर- मलक्षालनरूपध्येयनानस्य आनुकूल्ये सौलम्ये रेजे ॥ पश्चाईपक्षमा- धारणमेतदिति ॥ कृष्णपक्षे-राजस राजन्ते इति राजराजस्तेपा विपये समुदाये रजन शोभमानः लोकान्तकान्तवमतिप्रतिपन्नदेवैः लोकान्तं लोकेषु अन्तः मनोहरः "अन्तो मनोहरेऽभ्यासे इति शन्दस्तोममहानिधिः" फान्तः कमनीयः तत्र वमतिनिमिः प्रतिपन्नः स्वीकृतः यो देवः दीप्तिमान् ते अतिमुक्तनाममुनिमिः स्वममयम् स्वस्थ सस्य समयम् जीपनदिनम् "यनिमिचोऽयमुत्मनस्तद्गर्भः सप्तमो इन्ता पतिपित्रो. ..
महोपाध्यायधीमेयविजयगणिविरचिते सप्तमन्धानमहाकाध्ये .. स्त्वदीययोरिति" देवकीविवाहोत्सवे विज्ञापिनः कृतनिवेदनः कम: तां कचे गृहीत्या हन्तुमुद्यतः मा एनां हंसि अस्खास्तनयं त्वां समर्पयिष्यामीति चिकुरार्थरागम् कचग्रहणग्रपञ्चम् अथवा चक्यन्ते प्रतिहन्यन्ते इति चिकुरा "औणाक उरः प्रत्ययः" प्रतिहननानि तदर्थ यो रामोऽभिनिवेशः तमुत्पाट्य निरसा स कंमः बनानुकूल्ये आलयस्य आनुकूल्ये सौलभ्ये रेजे शुशुमे ।। रामपक्षे- राजराजां विषये मूर्यवंशे रजन् शोममानः लोका न्तकान्तवसतिप्रतिपन्नदेवैः लोकान्ते यने या कान्तवमतिः मनोहरनि वासस्तत्प्रतिपन्ना तत्र गता ये देवा दीप्यमानास्तैः विज्ञापितः निवे- दितः सन् चिकुरार्थरागम् संग्रामरागम् स्वममयम् स्वनिश्चयम् उत्पाट्य दूरीकृत्य सन्धिम्बिधायेत्यर्थः तुष्टसुमनाः प्रसन्नचित्तः स गमः बनानुकूल्ये रेजे रमतेस्म ॥ कदाचिदने पर्यटन् रामो निर्जनकमपिप्रदेशम्बिलोक्य यावचि- न्तयति तावत् कोऽपि श्रावकः सिंहोदरवज्रकर्णयोवृत्तान्तं व्यजिज्ञपत् तयोश्वसन्धिम्बिधाय तत्र बने रेजे इति रामायणे पञ्चमसर्गे आदितः ७६ सर्ग यावद्वर्णनमनुसन्धेयम् ।। ३८ ॥ जातेमहाव्रतमधत्त जिनेपु मुख्य- स्तस्मात्परेऽहनि स-शान्ति-समुद्रभूर्वा । श्रीपार्श्व एव परमोऽचरमस्तु मागें, रामेऽक्रमेण ककुभामनुभावनीये ॥३९॥ भन्ययः-जिनेषु मुग्यः स शान्तिः समुद्रभू: अचरमः परमः जाते. हायतम् भवत्त तस्मात् परेऽहनि श्रीपार्थ एव स्कुभामनुभावनीये रामे प्रमेण मार्गे महायतम् अधत्त ॥ ३९ ॥ च्याख्या-जिनेषु अवधिज्ञानवत्सु मुख्यः प्रथमः श्रेष्ठः आदीश्वरः
आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता मरणो टीका, सर्ग-४
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अपभदेवः अवतम् तुर्यगुणस्थानम् अधत्त अथ च जातेः जन्मनः
परे उत्कृष्ट अहनि दिवसे चैत्र कृष्णनवभ्यां महायतम् चारित्र्यलक्षणम्
अधत्त धृतः स कथंभूतः शान्तिसमुद्रभूः शान्तरुपशमस्य यः समुद्रः
आकरस्तस्स भूः उत्पतिस्थानम् परमः श्रेष्ठः अचरमः चरमो न
भवतीति तथा रामे मनोहरे मार्गे पथि ककुभा दिगामनुभावनीये
प्रकाशकारके श्रीपार्थ एव श्रियाः मोक्षलक्ष्म्याः पार्थे सन्निधौ आम.
नमुक्तिलक्ष्म्या एव क्रमेण रीतिमनुस-येत्यर्थः ।।
श्रीमान्तिनाथपक्षे-श्रीगान्तिः शान्तिनाथः जातेजन्मनः परे
द्वितीये अहनि दिवसे ज्येष्ठकृष्णत्रयोदश्यां महायतम् संयमं अधत्त
अन्पद्विशेषणम्पूर्ववदवसेयम् ॥
श्रीनेमिनाथपक्षे-शान्तिममुद्रभूः शान्तः समुद्र इव समुद्रः
समुद्रविजयः तस्मात् भूः उत्पत्तिर्यम्य म नेमिनाथः जातेः जन्मनः
परे द्वितीयेऽहनि टिक्से श्रावण शुक्पष्ठयां महानतम् अधत्त ।।
श्रीपचनाधपक्षे -- श्रीपार्श्वः पार्थनाथः जातेर्जन्मदिनात् परे
द्वितीयेऽहनि पापकृष्णकादश्यां महाव्रतमधत्त ।।
श्रीमहावीरपक्षे चम्मः अन्तिमः श्रीवर्धमानस्वामी जाते.
परे भिन्ने दिवसे मार्गकृप्णकादश्यां महाव्रतम् अपत्त अग्रहीत् ।।
रामकृष्णपक्षे -- म मुन्थ्यः प्रथमः श्रेष्ठः शान्तिनमुद्रभूः गान्ते-
रुपशमम्य ममुद्र. नस्य भूरुत्पत्तिस्थानम् अथवा शान्तिममुद्रः दग-
ग्यो वसुदेवश्च तसात् भवतीति शान्तिममुद्रभूः परमः उत्कृष्टः चामो
न भरतीनि अचम्मः सर्वतोऽधिकः परे उत्कृष्ट रामे मोक्षमाधनभृते
जमेण फ्रातः कामान्दिनामनुभावनी मप्रकाशकारक अहनि
न कदाचिन जहाति संमारमिति अहनि निश्चले मागें जिनगासने
विषये जिनेषु अर्हत्सु महाव्रतम् महानियमम् अधन अग्रहीत् ॥३९॥
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तमन्धानमहाकावे
N-
देवर्षभे-जनि-पवित्रदिने व्रतश्री-
शान्तः पुनर्वहुलशुक्लपरासत्त्वे ।
अनोदिताम्बुधिशिवाभवे रसाट्ये,
सम्यक्तिथी हरिवरस्य तथैव पोवें ॥४॥
अन्वय -देवर्षभे अनिपवित्रदिने प्रतश्री शान्ते पुन बटुलशुक्पर-
दुसरो उदिताम्बुधिशिवानभवे रसाये तथैव पार्श्वे हरिवरस्य सम्यक्तियौ ॥१०॥
व्याख्या--देवपमे देवथासौ पापभवेतिदेवर्षभस्तमिन् ऋषभ-
स्वामिनि जनि पवित्रदिने जनेः जन्मतः पवित्रम् पूतम् तसिन् दिने
चैत्रकष्णनवम्या वतश्रीः बतलक्ष्मीः अजनि अभूच शान्तः शान्ति-
नाथस्य भगवतः बहुलशुग्लापरघुसत्वे बहुम् लाति गृहातीति बहुलो
ज्येष्ठः सर्वतः श्रेष्ठलात् तस्य शुक्लपरयुः शुक्लपक्षपरदिनम् तस्य सत्वे
विद्यमाने ज्येष्ठकृष्णत्रयोदशीदिने इत्यर्थः उदिताम्बुधिशिवाङ्गमवे
उदितः प्राप्तोदयः य अम्बुधिः ममुद्रः समुद्रविजयः स च शिवा च
तत्पत्नी ते उदिताम्बुधिशिवे तयोः अङ्गमवस्तनयस्तस्मिन् नेमिनाये
रमाढये पष्ठीतिथी तथैव पार्व पार्श्वनाथे हरिवरस्य विष्णोः मम्यतिथी
एकादश्याम् हरिवरस्य महावीरस्वामिनः सिंहाकितत्वेन तथा निर्देशः
तथैव एकादश्यामित्यर्थः नतश्रीरजनीति पूर्वण सम्बन्धः ॥४०॥
मार्गेऽसिते सदशमे हि सुपर्वसझे,
तीथे श्वरोऽप्यचरमः परमो निवृत्तः ।
आलोचनाद्विकवचारुमुखारविन्द-
स्तुर्याववोधनधनी स मनीपिपूज्यः ॥ ११ ॥
अन्वय-परम -अचरमतीर्थेश्वर भारोचनाद्विकचचारमुग्बारविन्द तुर्या-
वोधनधनी मनीषिपूश्य स मार्गेऽसिते सदशमे सुपर्वसगे निवृत्त ॥1॥
भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-४ २०९ व्याख्या-अचरमः चरमोऽन्तिमो न भवतीति अचरमः आ- दीश्वरनाथः परमः श्रेष्ठः तीर्थेश्वरः तीर्थकृत् आलोचनात्-ज्ञानतः पर्यालोचनात् विचारात् विकचचारुमुखारविन्दः चिकचं विकसित सुप्रमन्नमित्यर्थः चारु मनोज्ञ मुखारविन्दम् आननपंकजम् यस्य स तथोक्तः तुविवोधनधनी तुर्यावोधनम् तुर्यज्ञानमेव धनम् संपद्यस्य स मनीपिपूज्य: विद्वज्जनाराधनीयः म सदशमे सादयति आमादयति शमः शान्तियत्र तस्मिन् सुपर्वसङ्गे देवसङ्गे सिते निर्मले मार्ग साधु- मार्गेऽध्वनि निवृत्तः जातः यतित्वमामसादेत्यर्थः ।। श्रीमहावीरपक्षे-असिते कृष्णे मदशमे दशमेन सहितः स- दशमः पूर्वोपस्थितत्वादेकादशो जातस्तत्र मागे मार्गशी मार्गशी- कादश्यां चरमोऽन्तिमस्तीर्थेश्वरः वर्धमानप्रभुः निवृत्तः सांसारिकवि पयवासनात इति शेषः॥ अन्यतीर्थकृताम्पक्षेऽप्येवमेवाब सेयम् ॥ रामकृष्णपक्षे-तीथेश्वरः "सत्यं तीर्थ क्षमातीर्थ तीर्थमिन्द्रिय- निग्रहः सर्वभूतदयातीर्थ सर्वत्रार्जवमेवचे"ति निरुक्ततीर्थानामीश्वरः अधिष्ठाता अन्यत्र तीर्थस्य उपकूपजलागयस्य द्वारकाया ईश्वरः प्रभुः चरमो जघन्यो न भवतीति अचरम उत्कृष्टः निवृत्तः राज्यादिनि शेषः अन्यत्र नितरां प्रियते इति निवृत्तः सामन्तराजपरिवृत्तः आलोचनात् प्रेमतो दर्शनात् विकच चारुमुग्वारविन्दः प्रसन्नमनोहराननः आलोचना- दित्यनेन प्रेमावलोकनत इत्यर्थः शत्रूणां तु अकालकालकरालवदन एवासीदिति ध्वनिः तुर्यावबोधनधनी तुर्यम् नूरम् तेन यदवबोधनम्प्रा. तर्जागरणन्तेन धनी भाग्यवान् "चाय बादित्रमातोयं तुर्य तूरं स्म रध्वज इति हैमः" मनीषिपूज्यः मनी पिभिविवद्भिः पूज्य आदरणीयः स रामः कृष्णश्च असिते निर्मले सदशमे प्राप्तशमे सुपर्वसङ्ग्रे सुपर्वणी -~- महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते समसन्धानमहाकाव्ये देवानां संगः संगतिर्यत्र तस्मिन् मार्गे स्याद्वादमागे निवृत्तः निश्चयेन प्रविपन्नः ॥४१॥ अर्थाः सप्त समर्थिताः कणभुजामाभासनेशासने, सप्त श्रीजिनसन्मते ह्यभिमतेप्रामाणिकानामपि। राज्याङ्गानि तथैव देवरसतः स्युभूर्भुजः सिद्धये, काव्येऽस्मिन्नत एव सप्त कथिता अर्थाःसमर्थाःश्रियै॥४२॥ इति श्रीसप्तसंधाने महाकाव्ये महोपाध्याय-श्रीमेघविजय. गणिविरचिते पूज्यराज्यवर्णनो नाम-चतुर्थः सर्गः ॥४॥ भन्वयः-फणभुजामामामने शासने सप्त अर्थाः समर्थिता: प्रामा- निकानामपि अभिमते श्रीजिनसन्मते सप्त तथव देवरसतः भूर्भुजः सिद्धये राज्या- जानि स्युः भत एव अस्मिन् काव्ये श्रिय समर्था मप्त अर्थाः कधिता: ॥४२॥ व्याख्या-कणभुजां कणादानान्नैयायिकममानतंत्राणाम्शे. पिकानाम् आभासने प्रकाशमाने गामने तन्त्रे मप्त अर्थाः द्रव्यगुणा. दयः समर्थिताः प्रमाणेन सिद्धान्तिताः सन्तीति शेपः तथा प्रामाणि- कानां प्रमाणतो वस्तुपरिच्छेदकानामभिमते इष्ट श्रीजिनमन्मने श्री जिनानां सन्मते शुद्धेमते जैनदर्शने मप्त जीवादयोऽर्थाः पदार्थाः समर्थिताः प्ररूपिताः तथैव भूर्भुजः नृपस्य सिद्धये विजाय देवरमतः सप्तसंख्यातः राज्यांगानि वाम्यमात्य सुहतकोशादीनि समर्थितानि सनिवेशितानि अत एव शाख व्यवहारे च निर्णीतत्वादेव अस्मिन् काव्ये सप्तसंधानामिधाने श्रिय मङ्गलाय ममर्थाः अभिधावृत्तिवोध्याः सप्त अर्थाः सप्तमंख्यकारी अभियाः ममधिता वाच्यत्वेन स्थापिताः ४२॥ इति शाम्रविशारद-कविनमारकाचार्य-प्रीतियामृतसूरीघर-प्रणीताया सप्तमंधान-महाशय-गरणी-टीपो चगुधः सर्गः ॥
भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-५ vNu पञ्चमः सर्गः अथ कुवलयोद्भासी राशीभवद्गुणसेवधिः, परिणतहदारामः कामं जगाम न वामधीः । जिनपवृषभः स्वैरं वैरं त्यजन्नपरे परे, सितरुचिरिबोदीचीमश्चन् दिशं हरिणाश्रिताम्॥१॥ अन्धयः--भय कुवलयोद्भासी राशीभवदगुणसेवधिः परिणतदारामः न वामधीः अपरे परे चैरं त्यजन् जिनपवृषभः उदीचीमञ्चन् सितरुचिरिव स्वैर कामम् हरिणाश्रिताम् दिशम् व्याव्या-अथ अथानन्तरम् दीक्षाग्रहणानन्तरमित्यर्थः कुबल- योद्धासी कुवलये भूमण्डले भासते दीव्यतीत्येवं शीलः पृथ्वीमण्डल- मण्डनः राशीभवद्गुणसेवधिः राशीभवन्तः सर्वतो मिलन्तः ये गुणाः दयादाक्षिण्यादयस्तेषां सेवधिः निधिः खानिरितियावत् परिणत- हृदारामः परिणतम् कपायादिरहितन्निर्मलमित्यर्थः यत् हृद् हृदयम् तत्र आरमते विहरतीति तथा अथवा परिणतः पुष्टः हृदारामो हृदुपवनं यस्य स तथा स्वात्मसंतुष्टः दयादिगुणयुक्तः इतियावत् न वामधीः नारुन्तुदबुद्धिः ऋजुप्रकृतिः अपरे स्वीये परे अन्ये च वैरम्विद्वेष त्यजन् परिहरन् स्वीयपारक्यबुद्धिरहितः उदीचीमुत्तरान्दिशम् अश्चन् गच्छन् सितरुचिरिव शीतांशुरिव चन्द्र इवेत्यर्थः जिनपवृषभः जिनश्रेष्ठ स्वैरं यथेष्टम् कामं यथास्यात्तथा हरिणाश्रितान्दिशम् ऐन्द्रीम् दिशम् प्राचीम् जगाम विचचार अथवा असितरुचिः तीक्ष्णकरः सूर्य इव उदीचिम् दिशम् उत्तरायनम् अञ्चन् गच्छन् स इवेति । सित- रुचिरिव असितरुचिरिवेतिवोपमालंकारेण निरतिशयमृदुत्वं धर्ममाङ्ग- लिकप्रयोजकत्वं च वस्तु व्यज्यते इत्यलंकारेण वस्तुध्वनिः ॥
२१२ महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये रामपक्षे रामः परिणतहृदा परिपक्वयुद्ध्या वामधीः कुटिलघुद्धिर्न जिनपवृषभः जयति संसारमिति जिनः मुनिः तं पातीति जिनपः स श्रेष्ठः आराध्यतया मुख्यो यस म अथवा जयति शत्रुमिति जिनः नृपः तम्पाति रक्षति इति जिनपस्तेषु वृपभः श्रेष्ठः हरिणाश्रिताम् मुग्रीवाधिष्ठिताम् दिगम् कामम् जगाम निर्ययौ अन्यत् पूर्ववद्योज्यम् ।। कृष्णपक्षे-कुबलयोझासी कुवलये भूवलये उद्भासी शोभमानः अथवा कुवलयेन हस्तस्थित्तकमललाञ्छनेन उद्भासते इति तथा अथवा कुवलयमिवउद्भासी कुवलयोद्भासी अथवा कुवलये कुवलयनामा कंमस्य गजरूपोऽसुरः तत्र तद्धिसनेन उद्भासते इति कुवलयोद्भासी राशीभवद्गुणसेवधिः सर्वगुणनिधिः परिणतहदारामः आसमन्तात मर्वभावेन रामे बलरामे परिणतम् प्रहम् हृद् हृदयं यस्य स वामधी- विप्रतिपन्नयुद्धिर्न अन्यद्विशेषणम्पूर्ववद्योज्यम् ।। सर्गोऽयंहरिणीच्छन्दो बद्धोभाति न संशयः । तल्लक्षणन्तु रसयुगहयैन्सौम्रोस्लौ गो यदा- हरिणी तदा ॥१॥ क्वचन वचनैगोंपालीनां तपोधनिनां क्वचिद, द्रुवनरचनैर्यक्षादीनां पुरः सुरशासनैः । कृतवसुधनोत्पातैर्वा-तैः पराक्रमसंगमैः, स हि दृढमनाः सेहे देहे प्रतिग्रहनिग्रहम् ॥२॥ अन्धयः-वयन गोपालीनाम् वचन. तपोधनिनाम् यक्षादीनाम् पुरः सुरशामनैः द्रुपनरचनः पराक्रममगमै. कृतवमुधनोत्पातैर्वातः स हि दृढमनाः देहे प्रतिमह निग्रहम् सेहे ॥ २ ॥ व्याख्या-कचन कुत्रापि गोपालोनां गोपश्रेणीनाम् गोपाङ्ग- नानां वा वचनैः यहन्छाप्रयोजितै म्यभाषाभिः अथवा गांपृथ्वीं पान्तीति गोपाः नृपास्तेपां आलीनां श्रेणीनां वचनैः स्तुतिप्रयोजकः .. .
~ VA vnNA भाचार्य श्रीविजयामृतरिप्रणीता सरगी टीका. सर्ग-५ क्वचित् वचन तपोधनिनाम् तपस्विजनानाम् पुरः अग्रे सुरशामनैः महे. न्द्रादिदेवनियोगैर्यक्षादीनां विद्याधरादीनां द्रुवनरचनैः दूर्णा वृक्षाणाम् बनानाम्बिपिनानांचा रचनैः विधानः पराक्रमसंगमैः पराक्रमित्तैः चल वद्भिः कृतवसुधनोत्पातः कृतोविहितः वसुधनानाम् रत्नबहुलानाम् उत्पातः वृष्टिः यस्तैः अथवा वसुधनानां वद्विसमूहानामुत्पातः उपद्रवः तैः पातः पपनैः यत् प्रतिग्रहं प्रत्युपकारं माहाय्यमित्यर्थः अथवा प्रतिग्रहमुपद्रवम् निग्रहम् भर्त्सनादिकम् तत् दृढमनाः अविचलितबुद्धिः देहे निजकाये स जिनेश्वरः हीति निश्चये सेई सोढवान् कथञ्चिदपि खनिश्चयान्न विचचालेति भावः ।। अथ च पराक्रमः संगतैः पराक्रमस्य निजदृढसंयमस्य संगमैः संबन्धैः करणभूतैरित्यर्थः हीति निश्चये दृढमनाः सहनशीलप्रकृतिः स सेहे ततो विकृति न ययौ । रामपक्षे-कचन कुत्रापि गोपालीनां राजश्रेणीनां गोपश्रेणीनां तपोधनिनां मुनीनाम् वचनैः कथनः शिक्षाप्रयोजकैः सुरशासन: गोकर्णाभिधयश्ववचनैः यक्षादीनाम् इभकर्णामिधानादीनां दुचनरचनैः वृक्षाटव्यादिविधानः पुरः नगरस्य च रचनै रित्यर्थः कृतवसुधनोत्पातः कृतो विहितः वसुधनानां द्रव्यबहुलानां उत्पातः उत्पनियस्तैः वा इति पादपूरणे तैर्यक्षेः पराक्रमसंगतैबलवद्भिःसहेति शेषः देहे शरीरे प्रतिग्रहनिग्रहम् प्रतिग्रहस्य अदृष्टार्थदत्तद्रव्यस्य निग्रहं निवर्चनं सेहे प्रतिपालयामास तदानीं राज्यच्युतत्वात् प्रतिगहस्यापाततः स्वीकारः सम्भवेत्तचक्षत्रियाणाङ्गह्ममितियवकृतसुवर्णादिवृष्टया तनिग्रहो जात इति भावः ॥२॥ कृष्णपक्षे-कचन गोपालीनां गोपराजीनां तपोधनिना चारण- पीणां वचनैः कथनैः पुरः प्रथमम् सुराणां रामकृष्णामिरक्षकदेवानां शासनैर्निर्देशैर्यक्षादीनां दुबनरचनैः पर्वतवनादिविधानः कृतयसु- ..
महोपाध्यापश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकान्ये rvw अन्वयः- धनोत्पातः अनेकविधसमृद्धिसम्पादनः पराक्रमसंगतैः चलवद्भिः सहेतिशेषः देहे शरीरे प्रतिग्रहनिग्रहम् जरासन्धादिकृतोपद्रवादिकं दृढमनाः स्थिरचित्तः कालम्प्रतीक्षन् सेहे सोढवान् ॥२॥ अनुपदमगात् सीतात्युप्णातपादिपराभवो, द्रुपदतनुजावाधा-व्याधात् प्रभोविषमाश्रयम् । व्यहरदवनीपीठे देवः सहान्वयिलक्ष्मणो, विशिखशिरसा धर्माधानाद्वराशयनाग्रही ॥३॥ -सीतास्युप्णातपादिपराभवः प्रभोः अनुपदमगात् दुपदतनुजा. बाधा विपमाश्रयं व्याधात् विशिसशिरसा धर्माधानात् वराशयनाग्रही सहान्वयि लक्ष्मणः देवः अवनीपीठे व्यवहरत् ॥ ३ ॥ व्याख्या-सीतात्युप्णातपादिपराभवः शीतञ्च अत्युष्णञ्च आतपश्च इति सीतात्युप्णातपानि शसयोः साम्यात् तानि आदिर्य- सिन् स चासौ पराभवश्वेतितथोक्तः हिमग्रीष्मरौद्रादिपराभवः प्रभोः सर्वशक्तिमतो जिनेन्द्रस्य प्रतिपदम् अनुपदम् पदेपदे इत्यर्थः अगाव अभूत् द्रुपदतनुजावाधा-द्रूणां पदानां तनूनां द्वन्द्वः तेभ्यो जायते इति जा तस्याः द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणत्वात् प्रत्येकतः संबन्धः तथा च हुला पदजा तनुजाया बाधा गमनयाधा विहारप्रतिवन्धिका मा प्रभोः जिनेन्द्रस्य विपमाश्रयं वैरुच्यं अव्याधात् न अकृत अथवा तनुजा तनुजः कामः संच तनुजा कामजनिता बाधा अव्याघाद न अकापीच, किच विशिसशिरसा शिखारहितशिरसा उपलक्षितः सहान्यायि- लक्ष्मणः सहान्वयी सहचरो लक्ष्मणः लक्ष्मीवान् नृपो यस्य स अथवा लक्ष्म चिहं साधुवेपो यस्य म लक्ष्मणः सहान्वयी यस्येत्या धर्माधा- नात् धर्मस्य सुकतेः आधानात् स्थापना आकलनाद्वा रात्रिन्दियं धर्मचिन्तनात् हेतोः परामयनाग्रही वरः श्रेष्ठः अनन्यसाधारणः
२१५
भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता मरणी टीका, सर्ग-५
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आशयोऽमिनायो यस्स त वराशयः स चासो नाग्रही चेति आग्रही
वृथाविवादनिरतो न भवतीति वराशयनाग्रही अथवा आसमन्तात्
गृहातीति आग्रही शयनस्य स्वापस्य आग्रही शयनाग्रही स न भवतीति
अशयनाग्रही वरचामो अशयनाग्रही राशयनाग्रही देवः दीप्यमानः
अवनीपीठे पृथ्वीतले व्यहरत व्यचरत् ।।
रामपक्षे-सीता जनकनन्दिनी अत्युप्णातपादिपराभवम् अनुपदम्
अगात् अलभत पराभव इति विभक्तिविपरिणामेनान्वयः सहान्वयि-
लक्ष्मणः सहान्वयी सहचरो लक्ष्मणो यस्य सः अवनीपीठे व्यहरद
चने व्यचरत् अन्यद्विशेषणं पूर्ववत् विशिसशिरसेत्यस्य विशिखः बाणः
शिरः प्रधानं यस्य तेन उपलक्षितः "शिरः मस्तके प्रधाने सेनाग्रे चेती
शब्दस्तोममहानिधिः"॥
कृष्णपक्षे-सीतात्युष्णातपादिपराभवः सीतायाः मदिरायाः य
अत्युष्णातपादिः अतितीक्ष्णत्वादिः तेन पराभवः अनुपदम् प्रतिस्थानम्
अगात् बलरामस्य तत् प्रियत्वात् द्रुपदतनुजावाधा द्रुपदतनुजाया?
द्रौपद्याः बाधा दुःशामनकर्लकवस्ताकर्षणादिः प्रभोः कृष्णस्य विष-
माश्रयम् वैरुच्यम् व्याधात् अकरोत् सहान्वयिलक्ष्मणः सहान्वयी
मह सम्बन्धः लक्ष्म शंग्यचक्रादिर्यस्य स अन्यत् पूर्ववदवसेयम् ।।३।।
सरसमितिभाग् गुप्त्याधायी द्विपां विजयं ययो,
बलिकरिवरस्तादृग्वेलावलादवलाश्रयः ।
अधिगतमहायोगात् संयोगवान् विरतिस्त्रिया, (श्रिया)
विहितमनसा मुक्तेर्मुक्ते शिवे ह्यशिवद्रुहा ॥४॥
अन्वय --शरसमितिभाग गुप्त्याधायी बलिकरिवर. ताहा वेलाबरात्
अयलाध्य अधिगतमहायोगात् विरतिश्रिया सयोगवान् मुक्ते शिये अशिवदुहा.
विहितमनसा मुत्तेद्विपा विजय ययौ ॥ ४ ॥
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकान्ये viv व्याख्या-शरसमिति माग् इसिमित्यादिपञ्चममितिधारकः गुप्त्याधायी गुप्तित्रयधारणशीलः बलिकरिवरः बलिपु आत्मवलवत्सु करित्ररो महागज इवेतिलुप्तोपमा संयमिपु मातङ्गः तादृग् तथाभूत: वेलायलात् वेलायाः सीमाया भूमेः मर्यादाया इत्यर्थः साधुजनोचि. तक्षमतायाः आश्रयादितिभावः अबलाश्रयः अबलम् असामर्थ्य आश्रयति धारयतीति तथा सत्यपि त्रिजगहिपरिवर्तनसामध्ये क्षमित्वा- नोपयुञ्जत इतिभावः अधिगतमहायोगात् अधिगत आश्रितो यो महायोगश्चितवृत्तिनिरोधो येन तस्मात् विरतिश्रिया वैराग्यलक्ष्म्या संयोगवान् संयुक्तः विरक्त इत्यर्थ आमुक्तेः मुक्तिसाधनपर्यन्तम् अगिवढहा शिवम् कल्याणम् मोक्षमितियावत नद्रोग्धि न हिनस्तीति अशिवदहा विहितमनमा मावधानचेतमा मुक्त मोक्षरूपे शिवे आत्यन्तिककल्याणे विपये द्विपाम्प्रतिबन्धकानां बाह्याभ्यन्तरशत्रूणां विजयं ययौ माप ॥ विरोधाभामः॥ गमकृष्णपक्षे-गरसमितिभाग् शराणाम्बाणानां समितिम् संहतिम् भजतीति तथा चाणपूजधारकः गुप्त्याधायी गुप्तिर्गोपनम् रक्षणम् ताम् आदधातीति तच्छीलः युद्धमार्गविशेषनिष्णातः बलि- करिवरः बलिपु बलशालिपु विपक्षेषु करियर इव मत्तमातङ्ग इव अपला श्रयः अपलां वियम् सीताम् सत्यभामाम्बा आश्रयति महचरितया मंगृहातीति तथोक्तः " स्त्रीयोपिदवलेत्यमरः " वेलायलात् वेलायाः मर्यादायाः चला आश्रयणान् अन्यत्र समुद्रोपकूलस आश्रयणाद रामस्य मर्यादापुरुषत्वात् अधिगनमहायोगात् अधिगतः आसादितोयो महान् अयोगः राज्यनितिन तम्मात् अथवा अधिगतः महायोगः कवच संवन्धो येन तस्मात् अथवा अधिगतः महायोगः प्रभूवराजः मम्मेलो येन तसाद विरतिश्रिया वनवासितया वैराग्यलक्ष्म्याः अथवा
भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-५
२१७
विशेषेणरतिरिव श्रीश्शोभा यस्याः तया सीतया सत्यभामया च संयो.
गवान् सयुक्तः आमुक्तेः मुक्तिमभिव्याप्य, मुक्त मोक्षंगते गिवे कल्या-
णजनके देवे जिनेन्द्रे इत्यर्थः विहितमनसा सापधानचेतसा अशिवट्ठहा
शत्रुदमनेन द्विपा शत्रूणाविजय जयम् विशेषतः ययौ लेमे ॥ ४ ॥
उपहृतिपदप्राप्तं नागादिमं वसु चाश्रयत्,
तदुपरिगतः कायोत्सर्गे जिगाय पुराद्विपम् ।
स्वयमपि मनःशुद्वथा बुद्ध्या जुगोप स गाः समा,
रहसि सुदृशा क्रीडन्नानागमाश्रमवद्धधीः ॥५॥
अन्वय –स उपहृतिपदप्राप्तम् इमम् नागात् वसु चाधयत् तदुपरिगत
कायोल्पगें पुराद्विपम् जिगाय अनागमाश्रमबद्धधीन रहसि सुदशा क्रीदन् स्वय
मपि मन शुद्धया बुद्धया समा गा जुगोप ॥ ५ ॥
व्याख्या-म जिनेश्वरः भगवान् उपहृतिपदप्राप्तम् उपहारीकृतम्
माधुदशायामप्युपढौकितम् इमम् नागादिमम् हस्त्यश्वादिम नागात्
नवीचकार अथवा उपहृतिपदप्राप्तम् त्यक्तपदप्राप्तम् त्यक्तम् उमम्
गजादिकम् बहुतरदुःखेऽपि न अगात् नालभत बसु तेजः अलौकिक
मित्यर्थः आश्रयत् अधिकृतम् तदुपरिगतः तत्पश्चात् कायोत्मर्गे तदमि
धानप्रणिधानक्रियाया पुराद्विपम् पूर्वशनुम् कामक्रोधादिकम् जिगाय
जितवान् नानागमाश्रमबद्धधीः आगमश्व आश्रमश्च इति आगमाश्रमे
न आगमाश्रमे अनागमाश्रमे न अनागमाश्रमे बद्धधीर्यस्य म तथोक्तः
आगमाश्रमश्रद्धालुः शास्त्राश्रमबद्धमनाः रहसि सुदृशा एकान्ते निर्जने
इत्यर्थः सुदृशा सम्यकदृष्टया तालिकदृष्टया क्रीडन् आत्मानन्दमनु
भान् खयमपि मनाशुद्धया निसर्गतो निर्मलया बुद्धया विवेकेन
समाःकृत्स्नाः गाः वाणीः जुगोप ररक्ष प्रयोजनातिरिक्तावाचनोगाच
वाचंयमो बभूवेत्यर्थः ॥५॥
२१८
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते मप्तसन्धानमहाकाव्ये
श्रीमहावीरजिनेश्वरपक्षे-उपहृतिपदप्राप्तम् उपहियते प्राणादि-
यसिन् इति उपहतिः बाहुलकात् क्तिः तत्पदमाप्तम् प्राणहारकपद-
प्राप्तम् नागादिमम् अतिशयजीवारुन्तुदम् कमपिनागम् सर्पम् प्रति-
पोधायेति शेपः आश्रयत् तदुपकण्ठं ययौ तदुपरिगतः तत्समीपमुप.
गतः कायोत्सर्ग कायोत्सर्गमुद्रामालम्ब्य पुराद्विपम् पूर्व सर्वशत्रुम्
जिगाय ते प्रतियोध्य सर्वद्विट्वं निवर्तयामास अन्यत्पूर्ववदवसेयम् ॥
रामकृष्णपक्षे-उपहृतिपदप्राप्तम् उपहारीभूतम् प्रत्यन्तनृपतिमि-
रुपढौकितम् नागादिमम् हस्त्यश्चादिकं वसु धनम् आश्रयत् आत्मसा-
दकरोत् तदुपरि तत्पश्चात् गतः द्विपाम् रिपूणाम् कायोत्सर्गे शरीर
त्यागे सति जिगाय विजितवान् मरणान्तानि वैराणीत्यनुसत्येतिभावः
रहसि विजने
सुदृशा शोभननयनया सह क्रीडन् रममाणः नानाग-
माश्रमबद्धधीः नाना अगमे अनेकपर्वते आश्रमे गार्हस्थ्यादौ च
पद्धधीः जाताभिनिवेशः, रामपक्षे नानाअगमे पर्वते-वृक्षे-वृक्षतले वा
"सामीप्ये सप्तमी" आश्रमे कृतगृहयुद्धिः स्वयमपिमनःशुद्धया
बुद्धथा निर्मलान्तःकरणेन म रामः कृष्णश्च गाः पृथ्वीः समा अनेकवर्ष
यावत् जुगोप ररक्ष पालितवान् ॥ ५॥
व्यसनरहितः कन्दुगाचं वशीकृतवान् वशी,
विषयमपि न प्रोढाद यत्नात् खनिश्चितमादधे ।
बहुपरिचितं शास्त्रं मात्राधिकं भुवि चालय-
हट्यमुपगता देवाः सेवारतेऽस्य विमृश्य तत ॥३॥
भन्यया-यशी यमनरहितः सन्दुगापम् वशीयवान् मोदाधानान्
मनिप्रितम् पिपमपि मादधे परिचितम् गासम् मात्राधिम् नपि पार.
पन् सन् रिमस देश भर सेगरसे एयमुपगताः ॥ ६ ॥
भाचार्यश्रीविजयामृतत्रिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५
व्याख्या-वशी जितेन्द्रियः विषयपराङ्मुखः कन्दुगाद्यम्
तदाख्यशत्रुविशेषम् व्यसनरहितः सांसारिकसावधकमजदोपरहितः
वशीकृतवान् विजितवान् अथवा कन्दुगाद्यम् गेन्दादिकं क्रीडाविशेष
वशीकृतवान् त्यक्तवान् प्रौढायत्नात् बहुतरमनः समाधानात् खनि-
श्चितम् स्वस्य साधोः निश्चितं निरबद्यभिक्षान्नादिकमपि विपयम् न
आदधे जग्राह यावता कथमपि प्राणयात्रानिर्वहणं तावदेव जग्राहेति
भावः बहुपरिचितम् नित्यमभ्यसितम् शास्त्रम् मात्राधिकम् अतिशयम्
इयत्तारहितं यथा स्यात्तथा भुवि-भुवने चालयन् प्रथयन् तत् विमृश्य
लोकोत्तरमहिमास्येति विचार्य अस्य जिनेन्द्रस्य सेवारसे परिचर्यायां
रसिका इति शेषा देवा लयमुपगता स्वात्मानं अच्छाध वृक्षादिरूपेण
शिष्यादिरूपेण च तिरोभूय सिपेविरे इति भावः ॥
रामकृष्णपक्षे-चशी जितेन्द्रियः स्वतंत्र व्यसनरहितः अव्यस.
नासक्तः कन्दुगाद्यम् तदाख्यमान्तरशत्रुविशेषम् वशीकृतवान् स्वा-
यत्तं विदधे स्वनिश्चितम् स्वनिर्धारितम् विषयमपि कार्यमपि पररा-
ट्रादिकमपि न प्रौढाद्यत्नात् अनायासेनैव आदधे स्वानुकूलं विदये
बहुपरिचितम् शास्त्रम् शासनम् स्वकीयमित्यर्थः मात्राधिकम् सर्वतः
स्वपरमण्डले च भुवि चालयन् प्रसारयन् तत् विमृश्य विचार्य देवा
धुतिमन्तो नृपाः अस रामस्य कृष्णस्य च सेवारसे सेवायाम् लयम्
तदधीनत्वम् उपगताः प्राप्नुवन्तो वशवर्तिनो बभूवुरितिभावः ॥६॥
सहचरतया ये संजातास्तदा च-रणादिपु,
निरशनतया तेऽपि प्रापुर्भुवं हरशेखराम् ।
सुरसमुदितां सिन्धोः पारे भवस्य परम्परा-
क्रमणवशतो लङ्कारागं प्रतीत्य महापदम् ॥७॥
२२० महोपाध्यापश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये अन्धयः-तदा च रणादिषु सहचरतया ये संजातास्तेऽपि सिन्धोः पारे सुरसमुदिताम् भवस्य परम्पराक्रमणवशतः महापदं लंकारागं प्रतीत्य निस्शनतया हरशेखराम् भुवम् प्रापुः ॥ ७ ॥ व्याख्या-तदा च रणादिपु तस्य जिनेश्वरस्यादिनाथस्य आचरणा. दिपु तदीयालौकिकचमत्कारकारिष्यापारेषु सहचरतया अनुगामितया ये संजाताः संगता अनुसृताः तेऽपि निरशनतया उपवासतया प्रभुस्तु निरवद्यमिक्षाऽलामेन कतिचिद्दिनानि उपवसतिस्म एते पुनस्तथावि- धसामर्थ्य विरहेण तथाकर्तुमशक्नुवन्तस्तंपरिजमुरितिकथासन्दर्भः । सुरसमुदितां देवताकृताधिष्टानाम् हरशेखराम् भुवम् गंगातटम् प्रापुः जग्मुः किंकृत्य सिन्धोः संसारसागरस्य पारे तटे भवस्य जन्मनः परम्प- राक्रमणवशतः अनेकजन्मकृतपुण्यपुञ्जप्रभावतः समासादिते महापदम् आत्यन्तिकसुखजनकम् पुनरावृत्तिरहितम् कारागम् आसमन्ताद्रागः आरागः कस्य आत्मनः स्वस्वरूपस्य ब्रह्मणः मोक्षस्येति यावत् रागमनु- रागम् अलमतिशयं प्रतीत्य परित्यज्य विहाय, संसारसागरपारगताऽपि किश्चित कैशमसहमाना पुनरागता इति तात्पर्यम् ।। अन्येपामर्हतापक्षे-तदा प्रतग्रहणसमये सहचरतया अनुचरतया ये नृपतयःतदाचरणादिपु तेषां जिनेन्द्राणाम् आचरणादिषु व्रतादिन- हणेपु संजाताः संगताः व्रतं जुगृहुः तेऽपि निरसनतया सांसारिक- भोगादिपरित्यागतया "शसयोरक्यात्" हरशेखराम् हरत्यघमितिहरः पवित्रम् तस्य शेसराम् मूर्धन्यामतिशयपवित्राम् भुवम् प्रापुः लेमिरे किंकृत्य सुग्ममुदितां सुष्ठरातिददातीति सुरः देवः तेन समुदिताम् सहिताम् सप्रमन्नाम् भुवमित्यर्थः भवस्य संसारसमुद्रस्य पारे परम्प- राक्रमणवशतः पुनर्पुनर्गमनागमनतः महापदम् महत्संकष्टननकम् कारागम् कस्यशरीरस्य के शरीरे वा रागमनुरागम् प्रीतिमित्यर्थः प्रतीत्य परित्यज्य ॥
माचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ unM रामपक्षे--सहचरतया अनुचरतया तदा वनगमनकाले चरणा. दिपु रामगमनादिपु ये संजाताः अनुसृतास्तेऽपि रामेण परित्यक्ततया निरसनतया हरशेखरां भुवम् अतिशयपवित्रामयोध्यापुरम् प्रागच्छ. न्तिम किं कृत्वा मुरसमुदिताम् मुरन्ति ऐश्वर्यदीप्तिम प्राप्नुवन्तीति सुराः धनिनस्तैः समुदिताम् संमिलितामयोध्याम् सिन्धोः समुद्रस्य पारे तटे भवस्य भवत्यसिन्निति भवः पृथ्वीतलस्तस्य परम्पराक्रमण- वशतः सततगयनवशतः लङ्कारागम् लंकायां तन्नामपुर्या रागोऽनुरागो यस्य तम् महापदम् भयङ्करम् रावणमित्यर्थः प्रतीत्य युध्या तत्र वने लंकापतिर्वसतीति भयमुत्प्रेक्ष्य निवृत्ता इति भावः ।। तदा चरणादिषु तस्य श्रीमदादिनाथस्य आचरणादिपु दीक्षाग्र- हणादिव्यापारेषु सहचरतया अनुगामितया ये संजाताः संगता, तदानीं दीक्षा जगृहु: कच्छमहाकच्छादयः तेऽपि निरशनतया निर- चद्यभिक्षालाभात् उपवासतया, भवस्य संसारस्य सिन्धो सागरस्य संसारसागरस्येत्यर्थः पारे प्रान्ते सन्निधौ परंपराक्रमणवशतः सतत. गमनागमनतः कारागंइन्द्रियसुख सांसारिकवैषयिकसुसं अलम् असि- शयम् महापदम् महदुःखननक प्रतीत्य बुद्धा सुरसमुदितां देवाधि- ष्ठिताम् हरशेसरां भुवं गंगाप्रदेशं प्रापुः ते जटिलास्तापसा भूत्वा तत्र- तस्थुरित्यर्थः । पारं प्रान्ते परतटे पारीपूरपरागयोरित्यनेकार्थसंग्रहः।। कृष्णपक्षे-तदा युद्धादिसमये सहचरतया सहायकतया वदा चरणादिपु तस्य जरासंधस्य आचरणादिषु युद्धादिपु संजाताः संगता. स्तेपि निरसनतया कृष्णकृतोपजापतया भेदप्रयोगेण सुरसमुदिताम् महद्धिजनसंकुलाम् देवाधिष्टितां वा सिन्धोः समुद्रस पारे स्थितामिति शेपः हरशेखरामतिपवित्रां द्वारकां प्रापुः किंकृत्य भवस्य मंगलस्य परम्पराक्रमणवशतः उत्तरोत्तरसंपादनवशतः कृष्णाश्रयेण दिनानुदिनं ..
२२४ महोपाध्यायनीमेघविजयगणिविरचिते मप्तसन्धानमहाकाव्ये Aswww आयाप्ततः अशितममुना यावद् वर्ष न तादृशयोगतो, वहुमहिमवान् शान्तिप्रेम्णा स्थिरो हिमवानिव ॥ अभजत परच्छायामायासतः श्रमवान् नवा, वपुपि समतां विभ्राणः स्वैः स वै श्रमणोचिताम्॥१०॥ अन्वयः-अमुना तादृशयोगत. यावद्वर्पन्न भशितम् शान्तिप्रेरणा बहुम- हिमवान् हिमवान् इव स्थिरः श्रमवान् न वा स व स्वैः वपुपि श्रमणोचिताम् ममताम् विभ्राणः परछायां अभजत ॥ १० ॥ व्याख्या-अमुना जिनेश्वरेण न सादृशयोगतः ताशयोगस्य निरवभिक्षालाभजनकयोगस्य अभावात् यावद्वप वर्षपर्यन्तं न अशितं न भुक्तं शान्तिप्रेम्णा शमाभिनिवेशेन बहुमहिमवान् महतो. भावो महिमा बहु अतिशयं महिमा महत्वं यस्य स अतिशयगौरवा. न्वितः हिमवानिव हिमालय इव स्थिरः शान्तः यथा हिमवान् निश्चः लस्तथायं शान्याश्रयनेन भूरिमहिमतया दुर्जनादिकृतोपजापेऽपि निराकुल इति तात्पर्य आयामतः गमनागमनादिपरिश्रमतोऽपि श्रम- वान वा नैवश्रान्तः स वै प्रभुः स्वैः स्वत एव वधुपि शरीरे श्रमणो- चितां यतिविहितां मुनिप्रचलितां समतां सामरस्य विभ्राणः धारयन् परच्छायामुत्कृष्ट कान्ति सर्वतोऽधिकां दीप्तिं अमजत आश्रयत लोको. चरकान्तिरभवत् ॥ १०॥ रामकृष्णपक्षे-यावद्वर्प जम्बूद्वीपांशमेदं यावत् भरतक्षेत्रखण्ड- त्रयमितियावत् अमुना रामेण कृष्णेन वा अशितं व्यासं अधिकतस्व. शामनं " अशेः आदिकर्मणि क्तः सेटकत्वं च नताशयोगतः नतानां स्वशरणमुपगतानामासमन्तात् सर्वतोभावेन दृशपोगतो नेत्र पाततः . दयावलोकनतः बहुमहिमवान् अतिशयमहिमासम्पन्नः शा. न्तिप्रेम्णा शान्तिवात्सल्येन हिमवान् हिमालय इव स्थिरः अप्रकम्पः, " भाचार्य श्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. मर्ग-५ २२५ Aev " MAAVM A आयामतः बनभ्रमणतः प्रजारक्षणतः श्रमवान्नवा नैव श्रान्तः स्वैः खत एव स्वप्रभावादेव वपुपि शरीरे समतां विश्राणः चैश्रमणोचितां कुत्ररतुल्यां परच्छायामत्युत्कटकान्ति अभजत समाश्रयत ॥ ११ ॥ पथि कथमपि श्रान्तः कान्तानुयायिविलम्बित- स्तपसि रसिकस्तस्थौ मार्गेऽभयः स्वयमप्ययम् । वनचरधने दृष्टे दृष्टेर्दधो न विपर्ययं, मनसि समयस्यैवं न्यायं विचिन्त्य सपर्ययम्॥११॥ भन्वयः-पथि कथमपि श्रान्त: कान्तानुयायिविलम्बित: तपसि रसिक भयम् स्वयमपि मार्गे अभयस्तस्थौ मनसि समयस्येव सपर्ययं न्याय विचिन्त्य वनयरधने दृऐ दृष्टेः विपर्ययनदधी ॥१॥ व्याख्या-पथि मार्गे कथमपि यथातथा श्रान्तः जातश्रमः कान्तानुयायि विलम्बितः कान्तो मनोरमो योऽनुयायी अनुसरणशील- म्तेन विलम्बितः आश्रितः कृतधर्मकथानकः तपसि तपश्चर्यायां रसि- कः निरतः अयम् जिनेश्वरः स्वयम् आत्मनापि अभयः निर्भीक मार्गे पथि तस्थौ स्थितः ममयस्य कालस्य अवस्थायाः वा सपर्ययम् पर्ययो वैपरीत्यम् तेन सहितम् सपर्ययम् सवैपरीत्यं न्याय नीति मनसि हृदये विचिन्त्य विचार्य निश्चित्य वनचरधने वनचराणाम् विपिनवा- सिनां धने रिक्थे पर्वतीपमण्यादौ निर्मायिको योपिति च दृष्टे नय. नगोचरे सत्यपि दृष्टेर्नेत्रस्य विपर्ययम् विपर्यामम् तद्विपयाभिलापं न दधौ न धृतवान् दृष्टेऽपि विपये विपपाभिलापो न जात इति भावः ।। विकारहेतो मति विक्रियन्ते येषां न चेतांसि त एव धीरा इत्यपि मगच्छते ।। ११ ॥ रामकृष्णपक्षे-पथि मार्ग वनमार्ग अन्यत्र रैयतकादौ विहारमार्गे कथमपि श्रान्तः जातायातः कान्तानुयायिविलम्बितः कान्ता स्वप्रिया ૨૨૨ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये MPARAN ww AMA मङ्गमवश्यम्भावीति निश्चित्य अलमतिशयं के कृष्णे भगवति ऐश्वर्य- शालिनि आरागं समन्ततोऽनुरागं प्रतीत्य ज्ञात्वा विचार्येत्यर्थः श्लेपः।। गिरिश इव योऽशेताद्रीणां वनेऽनवनेऽप्ययं, तमपि विदधद् दृश्यं वश्यं गिरीशमिवापरम् । दिनकर इवोदामं धाम प्रपद्य भुजावले, परिजनगणव्यावृत्त्याऽग्रे चचाल विशालधी॥ अन्वयः-योऽयम् अनवनेऽपि अद्रीणां वने गिरिश इव अशेत तमपि अपरं गिरीशमिव वश्यं दृश्यम् विदधत् भुजाबले दिनकर इव उद्दामम् धाम प्रपद्य परजनगणव्यावृश्या विशालधीः अग्रे चचाल ॥ ८ ॥ व्याख्या-योऽयं जिनेश्वरः अनवने अपि अवनम् रक्षणम् नभवतीति अनवनम् अरक्षणम् तस्मिन् रक्षारहितस्थाने निर्जने इत्यर्थः अद्रीणां पर्वतानां वनेऽरण्ये गिरिश इच गिरौ शेते इति गि- रिशः वनीयो भिल्लादिः स इव अथवा गिरिम् श्यति उपभोगेन तनू करोतीति गिरिशः "लोमादित्वाच्छः" शिवः स इव शेते स्वपिति यः सर्वदा गिरिशो भवति स कदाचिदपि दृश्यो न भवति तमपि गिरिशमपि स्वमितिशेपः अपरम् द्वितीयम् गिरीशम् शिवम् इव अथ वा गिरीणामीशः हिमालयस्तमिव दृश्यम् दर्शनयोग्यम् वश्यम् प्रसा. दसुमुखम् सेवायोग्यम् विदधत् कुर्वत् उद्दामघाम उद्रिक्तं तेजः भुजा. नले पाही दिनकर इव प्रपद्य प्राप्य परिजनगणव्यावृत्या परिचार• कजनपरित्यागेन विशालधीः महानुभावः अग्रे ततोप्यग्रतः चचाल पवाज ॥ ८॥ सर्वपक्षसामान्यमेतद्व्याख्यानम् ।। कमपि मनसा नाधान्नाथः प्रियं यदिवाऽप्रियं, कलिमलमपि त्यक्तुं व्यक्तः कचित्प्रययो रहः ॥
२२३
AV
भाचायश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका सर्ग-५
कचनविजने तस्था स्वस्थो ररक्ष न रक्षकं,
न खलु परतो रक्षापेक्षा प्रभौ हरिणाश्रिते॥९॥
अन्वय.-नाथः प्रियं यदि वाऽप्रिय किमपि मनसा नाधात् कलिमलमपि
व्यक्तः त्यस्तु क्वचिद्रह प्रययौ स्वस्थः क्ववनविजने तस्थौ रक्षक न ररक्ष हरि-
णाश्रिते प्रभौ परतो रक्षापेक्षा न खलु ॥ ९ ॥
व्याख्यानाथः प्रभुः मनसा युद्धया कमपि प्रियं शरीरसु.
खकर दुःसजनकं वा नाधात् नाविन्दत प्रियं प्राप्य मुखामिमानी
अप्रियं प्राप्य दुःखामिमानी न बभूवेति तत्वं व्यक्तः स्फुटं कलिम-
लमपि कलेः कर्मणः मलमपि परिणाममपि "प्रभौ पापस्य दुर्लभत्वात्
कलिशब्देन कर्म एव लक्ष्यते" त्यक्तुन्निराकर्तुम् कचित् कुत्रापि रहा
विजनमेकान्तस्थानम् प्रययौ जगाम स्वस्थः निराकुलः निर्भीकः सन्
कचनविजने निर्मनुष्य के स्यले तस्थौ स्थितवान् रक्षकम् शरीरपरिणा-
लकम् कमपि न ररक्ष नापेक्षितवान् तथाहि प्रभो हरिणाश्रिते प्रमो
जिनेश्वरे हरिणाश्रिते संयमाश्रिते सति अथवा इन्द्राश्रिते सति
इन्द्राधिष्ठिने सति दिशाश्रिते विहरमाणे मतीति वा परतः अन्यतः
स्वभिन्नात् रक्षापेक्षा पालनापेक्षा न खलु नैवभवतीत्यर्थः स्ववीर्यगुप्ता
एते भवन्तीति भावः अर्थान्तरन्यामालंकारः ।।
रामपक्षे कृष्णे च-कमपि प्रियम् मित्रं यदिवा अथवा अप्रियं
शनुम् मनसा चित्तेन न अधात् न धृतवान् कलिमलमपि विरोधप.
रिणामं युद्धमपि त्यक्तु परित्यक्तुं कचित् कुत्रापि व्यक्तः स्पष्टः
सन् रहः एकान्तं प्रययो विजने निर्जने स्वस्थः अकृतश्चनभयः तस्थौ
रक्षकं न रक्ष नापेक्षितपान हरिणाश्रिते लक्ष्मणाधिष्ठिते ममुद्राश्रिते
च प्रमो प्रभावशालिनि रामे कृष्णे च परतः अन्यतः मैन्यादिमिन्नः
पुरुषात् रक्षापेक्षा पालनामियोगः न नैव भवतीति ॥९॥
~ vv www vihawana महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये सीता सत्या वा सैव अनुयायिनी यस्य तेन विलम्बितः कृतविलम्बः तदनुरोधेन कृतविश्रामः तपसि तपोविषये तपोवने वा रसिकः कृतादरः अन्यत्र तपसि फाल्गुनेऽर्जुने वा रसिकः माघमासे वा रसिका शृङ्गारिजनप्रियत्वात् वनचरधने दृष्टे इत्यादि पूर्ववद्योज्यम् ॥ १५ ॥ कतिपयदिनैरोशः श्रेयानकारयदासा, विनयनयभाग् भिक्षोरिक्षोः प्रियां रसपारणाम् । सपदि सदने वृष्टिश्चासीत् तदाशु हिरण्मयी, त्रिदशललनाचक्रुर्नव्यं रसादवशाः शुचि ॥१२॥ भन्नग -यतिपादन भञ्जमा विनयनयभार ईका श्रेयान् भिक्षो प्रिया इक्षो रसपारणाम् अकाश्यत् तदा आशु सदने सपदि हिरण्यमयी वृष्टि भासीत् अवशा त्रिदशरना शुधि नृत्यम् चक्रु ॥ १२ ॥ व्याख्या-कतिपयदिनैः कतिचिदिवस विनयनयभाक् विनयम् विनीतताम् नयम् नीतिञ्चभजति सेवते इति तथा सारल्यनयनिपुणः ईशो युवराजः श्रेयान् श्रेयांमकुमारः अञ्जमा झटिति मिक्षोः मिक्षा चरणशीलस्य जिनेश्वरस्य आदीश्वरस्य प्रियां मनोज्ञा पवित्रा निरवद्या मिति यावत् इक्षोः रमालस्य रैमालइक्षुरित्यमरः रसपारणाम् रसप्रचुगं पारणां व्रतान्तभोजनम् अभाग्यत् तदाप्रभुपारणानन्तरम् मपदि सहमा सदने गृहे हिरण्मयी सुवर्णमयी दृष्टिवर्पणम् आसीत् अभूत् आशु शीघ्रम् त्रिदशललनाः देवाङ्गना अप्सरस इत्यर्थः रसात् प्रभुभक्तिरसतः अनुरागाहा अपशा भक्तिपरतंत्राः शुचि शोभनम् नृत्यम् चक्रुर्विदधुः।। श्रीशान्तिनाथ पार्श्वनाथ नेमिनाथ वर्धमानस्वामिना पक्षे-कतिपयः दिनैः कतिचियतीतर्दिनमः ईशः श्रेष्टः नृपो वा श्रेयान् अतिशयेन प्रशस्य शुभंयुः पिनयनयभाग् दाक्षिण्यनययुक्तः इक्षोः इ. कामस्तं शौति नाशयतीक्षुः तम्य जितमदनस्य निक्षोः मिक्षाचारिणो जिने.
भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ २२७ v . न्द्रस्य प्रियाम् रुचिरामनवद्याम् रमपारणाम् मधुररसप्रधानां पारणां व्रतान्तभोजनम् अकारयत् व्यधापयत् तथा च श्रीशान्तिनाथस्य सुमि- वनृपमन्दिरे परमान्नेन पारणा जाता श्रीपार्श्वनाथस्य कोपकनामनगरे धन्यकगृहे पायसेन पारणा जाता नेमिनाथस्य वरदद्विजगृहे परमानेन पारणा जाता महावीरस्वामिनः बहुलब्राह्मणगृहे परमान्नेन पारणा जाता सपदि सदने इत्यादि पूर्ववत् ।। रामपक्षे-ईशः राजा श्रेयान् कल्याणवान् विनयनयभाग इक्षोः जितकामस्य मिक्षोः चारणः त्रिगुप्तस्य सुगुप्तस्य च कतिपयदिनैर्द्वि- मासानन्तरम् अञ्जमा झटिति प्रिया निग्यद्याम् रसपारणाम् अकारयत् रामः शेषं पूर्ववत् ॥ कृष्णपक्षे-पतिपयदिनैः कतिपयदिनपर्यन्तं डक्षोः कामजयिनः मिक्षोजिनेन्द्रस्य प्रीयाम् प्रीतिसम्पादिकाम् रमपारणाम् अष्टाहिकत- पश्चर्याम् द्वारकानिर्माणाय अगरयत् व्यचरयत सपदि हिरण्मयीत्या- दिपूर्ववदनसेयम् ।। १२ ॥ प्रकृतिसुभगः श्रेयोलिप्सुः सुमित्रपवित्रवाक्, शुचिरसमयं मत्वाऽदत्त प्रभोर्वहुरोचितः। सपदि मुदितो धन्यो जन्योज्झितः प्रतिलम्भना- दरिपरिभवाद् दूरे दूरे यशः स्वमकारयत् ॥१३॥ अपय -प्रकृतिसुभग श्रेयोरिमुः सुमियपरिवार प्रभोयहरोचित गुचि भयमय मापा भदत्त मुदित धन्य जयोजित प्रतिनम्मना भरिपरि- भयात् दूरे दूरे स्य यशः अकारयत् ॥ ३ ॥ व्याख्या-प्रकृतिमुभगः खभावसुन्दर श्रेयोलिप्मः कन्याणा- मिलापुकः सुमित्रपवित्रवार मुमित्रेण शोभनमुहदा त-संगेनेत्यर्थः २२८ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये vv VARAN anwr-Annown प्रभावेन पवित्रवाक् सत्यवचनः प्रभोजिनेन्द्रस्य बहुरोचितः अत्यन्त भक्तः "चतुर्थी चाशिष्यायुष्येति विकल्पेन षष्ठी शुचिः पूतः असमयम् भिक्षायाः कालातिक्रमो जात इति अनवसरं मत्वा वुवा निवृत्तेपु भिक्षाचरेपु सत्सु अदत्त प्रभवे भिक्षामिति शेषः सपदि तत्क्षणे मुदितः जिनेश्वररूपसत्पात्रदानादतिशयहृष्टमनाः धन्यः अत एव कृतकृत्यः जन्योज्झितः कलिरहितः प्रतिलम्भनात् भिक्षादानात् कथंभूतात् अ. रिपरिभवात् अरिम् बाह्याभ्यन्तरशत्रु परिभवति पराकरोतीति तसाद दूरे दूरे त्रिलोक्यां स्वम् यशः स्वकीयकीर्तिम् अकारयत् प्राख्यापयत्।। रामकृष्णपक्षे-प्रभोः स्वामिनः साधोः प्रतिलम्भनात् भिक्षा- प्रदानात् अन्यत् यथापूर्वम् ।। १३ ।। वनमुपगतं सेवे देवं नमिर्विनमिपः, श्रुतिदृगपि च प्रादात्ताभ्यां वलं वहुविद्यया । रजतशिखरिस्थाने राज्यश्रिया परिवारितो, सुखमनुपमं भुजाते तो खगामिपु कामितम्॥१॥ -तमिविनमिपः वनमुपगतम् देवम् सेवे श्रुतिगपि यहुविद्यमा परम् ताभ्याम् प्रादात् रजतशिखरिस्थाने राज्यश्रिया परिवारिती सी गगाभिपु कामितम् अनुपमम् मुखम् भुझाते ॥ १४ ॥ व्याख्या-नमिः विनमिः नृपः तदभिधानको आदीश्वरभग- वतः कुलजी वनमुपगतम् वनस्थम् दीक्षितमित्यर्थः देवम् आदीश्वरम् सेवे भेजे ततः श्रुतिगपि धरणेन्द्राभिधो नागोऽपि तपो राज्याभि- लापं जात्वतिशेपः ताम्याम् नृपाम्याम् बहुविद्यया अनेकविधतिरस्क- रिण्यादिविद्यया सहेतिरोपः बलम् बहुविधसामर्थ्यम् प्रादात् अर्पयत् रमतशिसरिस्थाने वैताट्यपर्वते राज्यश्रिया राज्यलक्ष्म्या परिवारितो अन्य:- AN AA RA M भाचायनीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-५ युक्तो तौ नमिविनमिभूपी सगामिपु आकाशचारिषु अनुपमम् निरुपमम् कामितम् यथेष्टम् मुसम् भोगम् भुञ्जाते भोगम् कुरुतः अचिन्त्यसमावो जिनेश्वरो येन ताभ्याममर्त्यदुर्लभसुस सद्यः दीय- तेस्मेति भावः ॥ १४ ॥ अन्यपक्षे-नमते इति नमिः विशेपेण नमते इति निमिः तो वनमुपगतम् वनस्थम् देवम् प्रभु सेवे श्रुतिः शास्त्रम् दृग नेत्रं च यस्य स श्रुतिग् अथवा श्रूयते प्रख्यायते इति श्रुतिः श्रुतिः प्रख्याता अनन्यसाधारण्येन विख्याता हग नेत्रं यस्य स श्रुतिदग् महस्राक्षः ताभ्याम् सेवकाभ्याम् पहुविद्यया अनेकविधरिद्यया बलम् निरुपम सामर्थ्यम् प्रभुसेपासमुसः मन्नित्यर्थः प्रादात् ददातिम्म शेष पूर्ववत् ।। कृष्णपक्षे-नमिविनमिर्नृपः वनमुपगतं समुद्रजलान्तारकास्थ देवम् दीप्तिमन्तम् कृष्णम् सेवे श्रुतिम् शास्त्रदृश्वा कृष्णस्ताभ्यां सेवकाभ्याम् बहुविद्यया समम् पिदन्त्यनया पयिकसुरामिति विद्या कन्या तथा सह पलम् सैन्यम् प्रादान प्रायच्छन् तौ रनतशिसरिस्थाने तकपर्वते राज्यश्रिया राज्यश्रीरियश्रीः शोमा सम्पत् वया परिवा- रितौ युक्तौ सगामिपु आकाशगामिपु कामिन्तमनोमिलपितमनुपम- मनन्यसाधारणम् मुसमानन्दमुपभुआते अनुभरतः ॥१४॥ राम. पक्षे द्वितीयपक्षपजतेयम् । मगधविपये राजां गेहे रुपा प्रतिमाधवं, विशदसिवयं भूपायोगाचचाल वलं नमत् । समरसहितं पत्यादेशादतिकमत समं, वहलनिनदेस्तरेरापूरयद् वलयं दिशाम् ॥ १५ ।। भयप --मगधपि रा ६ Pा प्रतिमा पर दि. सिनमाम् पण समरमहिनम् पाएंगादतिकमार समम् पास- महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये MAAN A निनदैः तूरैः दिशाम् वलयम् आप्रयत् ॥ ५ ॥ व्याख्या-मगधविपये मगधदेशे राजां गेहे राजन्त इति राज- स्तेषां गेहे साम्प्रतं राजगृहनाम्नाप्रसिद्ध प्रतिमाधवं प्रतिवासुदेवम् जरा- सन्धमुद्दिश्यरुपा विशदसिचयम् विशदाः देदीप्यमानाः असिचयाः खड्गसमूहा यसिन् तत्तथोक्तम् अथवा विशदास्तीक्ष्णाः असिचयाः यत्र तद् अथवा विशन्तः प्रविशन्तः संकुलीभवन्तः असिचयाः खगाः यत्र तद् भूपायोगात् सांग्रामिककवचायाभरणसंबन्धात् नमत् आकुञ्चत् समरसहितम् समरे संग्रामे सहितम् हितविधायकम् नतूप जापादिना पराङ्मुखम् अथवा समरसे शान्तियुक्तेहितम् अबाधकम् पत्यादेशात् पत्तेः सेनापतिविशेषस्य " एकेभैकरथा व्यश्वा पत्तिः पञ्चपदातिका इत्यमरः इत्युक्तलक्षणस्य आदेशात् आज्ञातः अति. क्रमकृत् "अहितान् प्रत्यभीतस्य रणे यानमतिक्रम इत्यमरः" इति निर्भीकतया शत्रुसन्मुसगमनकारकम् बलम् सैन्यम् बहलनिनदैः भूरिनिनदमानैः तूरैस्तूः दिशाम् वलयम् दिविभागम् आपूरयत् स्थगयत् चचाल ययौ ॥ अर्थतांप-विभक्तिविपरिणामेन सर्वत्रान्वयः तथा च मगध. विषये मगधदेशे राजां गेहे राजगृहादिपुण्यस्थाने अरुपा अक्रोधेन प्रतिमाधयः प्रतिमा कायोत्मर्ग धन्वति प्राप्नोतीति प्रतिमाधवः कायोत्सर्गकृत् धन्यतेः पचादित्वादच् विशदसिचय विशेषेण सद्गतः स्यक्तशातनो लोकपीडा येन स विशद्, असिचयः सिचयो वस्त्रं नास्ति यस्य स तथोक्तः भूपाया अलंकारस्य अयोगात् असंपन्धाद्राहित्येन घालवलः चाले गमने तस्करादिमम्बाघसंगाधितेऽपि अप्रतिहतगमनः नमन् नमन्ति जना यम् स अथया नमन् सर्वत्र प्रहः निरहंकारः सम- रसहितः शमरसे शान्तरसे हितः युक्तः शान्तिरसयुक्तः अतिक्रमकत् भाचार्यश्रीविजयामासूरिप्रणीता मरणी टीका. सर्ग-५ २३१ . अतिशयं क्रम पादविक्षेपम् गमनम् करोतीति म पाति जगदिति पतिः सूर्यस्तस्यादेशात दर्शनात सूर्यदर्शनान्तरम् समम् मुनिभिः सहितं यह लनिनदैः चहल यथास्यात्तथा निर्गतः नदः शन्दः येषु तैः शब्दरहितैः तूरैर्गमनैः दिशावर यम दिविभागम् आपूरयन् पूरपतिस्म ।। कदाचित् सुगुप्तनामाचारणपिर्जटायुपूर्वभववृत्तान्तं कथयन् पाल कब्राह्मणकथा कथयति मगधेति । मगं पापं दधातीति मगधः तस्य विषयस्तस्मिन् राजा गेहे कुंभकारकटे नगरे माधवं प्रतिरुपा मायाः चः भर्ता लक्ष्मीपतिः जितशत्रुनृपनन्दनस्कन्दककुमारस्तं प्रति रुपा क्रोधेन पूर्वर स्मरन् पालक. अनेकान्यस्त्राणि फन्दकाचार्यनिवास स्थाने रात्रौ भूमौ निचसान प्रातः नृपतिर्मुक्तविशेषणविशिष्टन्नमनाय तत्रानयत् नामौ माधुः कपटयुद्वाय समागत इति युद्धोद्योगमकारय- दिति भावः ॥ १५ ॥ बलमविरलाश्वीयं स्वीयं विलोक्य पुरा जरा- परिगतमहासन्धो गन्धोत्तमापरिणामतः। प्रतिहरिधिया तुष्टः स्पष्टं जगर्ज स गर्जवत्, क्षणमपिकदा प्रेक्ष्ये कंसापराधिविनाशनम् ॥१६॥ अन्य -पुरा जरापरिग'महामध गन्धोत्तमापरिणामत अविरलाश्वीय स्वीय बल विलोक्य प्रतिहरिधिया तुष्ट स गर्जवन् स्पष्ट गर्न क्षणमपि कदा कपापराधिविनाशनम् प्रक्ष्ये ॥ ५६ ॥ व्याख्या-पुरा जरापरिगतयहासंघः जरया तन्नामकोपमात्रा परिगतः प्राप्त महासकः महासघटनः सम्मेलनो येन स जन्मकाले देशकालेस्तस्तदोपमाता संघट्टयामासेतिसन्दर्भः जरासंधनामानृपः प्रतिहरिधिया कृष्णप्रतिस्पर्खितया अविरलाश्वीयं अपिरलम् निरन्त रम् अश्वीयम् अश्वानासमूहो पत्र तम् अश्वप्रधानकम् स्वीयम् नैजम् २३२ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाये ~ ~ vvvvie - AAM ww बलम् सैन्यम् विलोक्य निरीक्ष्य गन्धोत्तमापरिणामतः गन्धोत्तमायाः मदिरायाः परिणामतः परिपाकतः सेवनतः तुष्टः प्रसन्ना सन् गर्जवत् मत्तमातङ्ग इव स्पष्टम् प्रकाशं यथास्यात्तथा जगजे ननद तथाहि क्षण. मपि मुहूर्तमानमपि कंमापराधिविनाशनम् कंसम् अपराघ्नोतीति कंमापराधी वासुदेवः तस्य विनाशनम् मरणम् कदा कसिन् समये प्रेक्ष्ये अवलोकयिप्ये इति दध्यावितिशेपः॥ अर्हतापक्षे-स महाप्रभुजिनेश्वरः जरापरिगतमहासंधः आस- र्वतः परिगता आपरिगता जरा जीर्णा आपरिगता आपरिणमिता महामन्धा महती प्रतिज्ञा संयमपालनरूपा यस्य म अवान्तरतत्पुरूषो बहुव्रीहिः दृढसंयमी अविरलाश्चीयम् असुवते विपयमित्यश्वाः इन्द्रि- याणि तेभ्यो हितम् रोधकमिाते अश्वीयं स्वीयम् इन्द्रियदमनयो. ग्यं नैवलं मामयं अविरलम् विलोक्य दृष्ट्वा गंधोत्तमापरिणामतः गंधोत्तमायाः पग्रिन्यादिकामिन्याः परिणामतः त्यागतः अथवा गंध एव उत्तमो यस्यां सा गन्धोत्तमा इन्द्रियविषया तम्या परिणामतः वर्जनतः जितेन्द्रियत्वात्तद्विपयमपि परिजिहीते प्रतिहरिधिया शिवबु- या यथा स स्मरहरस्तथाहमपीतिबुद्धया गर्जवत् गजवत् स्पष्टं प्रकाशं जगर्न ननाद कंसापराधिविनाशनम् कामयते जयमितिकंमः कामः स एवापराधी दुर्जनस्तस्यविनाशनम् निराकरणम् क्षणमपि कदा प्रेक्ष्ये अबलोकयिष्ये इति दध्यावितिशेपः ।। रामपक्षे--कश्चिन्म्लेच्छसेनापतिस्सीतां जिहीर्घः प्रतिरामं समाग- मदिति । अविरलाश्वीय अश्ववदुलं स्वीयं बलं विलोक्य गन्धोत्तमाप रिणामतः मद्यविकारतः जरापरिगतमहासंघः दृढप्रतिज्ञः म्लेच्छसेना. पतिः प्रतिहरिधिया प्रतिहियते इति प्रतिहरिः मावे प्रत्ययः तस्य धिया सीतामाश्यमेवप्रतिहरिप्यामीतिबुद्धयाहएः सीतासौन्दयदर्शनेन तुष्टः स गर्नवत् मदोन्मचमात्तङ्ग इन जगर्ज रामनामाप स्पष्टं ननर्द w more wmniwww mmmwww भाचार्यभीविजयामृतसूरिप्रणीता सरगी टीका. सर्ग-५ कथमित्याह कमापराधिविनाशनम् कामयते कामिनमिनि के सा का- मिनी सीता तां पराप्नोति स्वीकरोतीति कंमापराधी तस्य विनाशनम् क्षणमपि कदा प्रेक्ष्ये द्रक्ष्ये, अत्रानुप्रासः विरोधाभासचालंकारः॥१६॥ मम समधिकं पापं भेत्तुं प्रवर्तनमर्हति, नयनविषयीभूते तस्मिन् मनोरसमेष्यति । इति मतिमता सेना तेनाहिता विनिशम्यतां, ऋमिकचलनात् सैन्यं प्रापद्धरेश्व तटं गिरेः ॥१७॥ (अन्वय.) पापं भेतुम् प्रवर्तनमर्हति नयनविषयीभूते तस्मिन् मम सम- धिकम् मनोरसमेष्यति इतिमतिमता तेन सेना भाहिता ताम् विनिशम्य हरे. सैन्यम् क्रमिकचलनात् गिरेस्तटम् भापत् ॥ १७ ॥ व्याख्या-पापमस्यास्तीति पापः अपराधी वासुदेवस् समधिकं वर्धमानं अतएवात्याज्यम् मेत्तुं च्छेत्तुं प्रवर्तनम्प्रवृत्तिः अर्हति अव- इयकर्तव्यत्वेनावतरति अनुपेक्षेणीयो भवतीत्यर्थः नयनविषयीभूते लोचनपथपथिकायमाने तस्मिन् अपराधिनि कृष्णे मम जरासंघस्स मनोरसम् मनसः रसम् शत्रुदर्शनजन्याहादविशेष एप्यति भविष्यति अथवा मनः स्वान्तं कर्तृ रसम् रौद्ररसं एष्यति प्राप्स्यति इतिमतिमता एवं विचारयता तेन सेना पृतना आहिता सञ्चिता सम्मेलिता ताम् आहितसेनाम् सैन्यस्थितिम् विनिशम्य चारादिद्वाराऽवगत्य हरेः कृष्णस्य सैन्यम् क्रमिकचलनात् शनैः शनैर्गमनतः गिरेः पर्वतस्प तटम् सनिधिम् प्रापत् अयासीत् ।। अर्हतापक्षे-मम समधिकं यकिश्चिदवशिष्टम् पापं कर्म भेत्त क्षपयितुं प्रवर्तनं विचरणम् अर्हति अवश्यमेव कर्तव्यं भवति अथवा पापं पात्यतेऽस्मादिति पापम् दुरदृष्टम् तत् मेत्तुम् च्छेतुं अर्हति स्याद्वा- दमते प्रवर्तनम् गमनमनुसाणं योग्यमिति शेषः नयनविषयीभूते २३४ महोपाध्याषश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ने नीयते क्षीयते इति नयनम् तस्य विषयीभूते क्षयत्वमुपगते तस्मिन् कर्मणि मनोरसम् मनोरथम् मोक्षम् एष्यति प्राप्स्यति इतिमतिमता एवं कृतविचारेण तेन जिनेन्द्रेण सेना सिनोति बनातीति सेना इन्द्रि यसंयमना निग्रहणा आहिता संचिता कर्मक्षयायेन्द्रियरोधना कृतेति. भावः तां सेनां संयमितां निशम्यालोच्य हरेः जिनेन्द्रस्य सैन्यम् सेनां समवयतीति सैन्य गमनम् इन्द्रियसंयमप्रगणं विचरणम् क्रमिक- चलनात् शनैः शनैर्विचरणात् अथवा हरेरिन्द्रिस्य सैन्यं प्रच्छनप्रयुक्तं जिनेन्द्राङ्गरक्षकम् अथ च जिनेन्द्रस्य सैन्यम् साधुपरिवारः गिरेः कस्यचित्पर्वतस्य तटम् समीपम् अगात् अवाजीत् ।। रामपक्षे-समधिकमतिशयवलवन्तं पापम् सीतापहारजन्य पापकारकं म्लेच्छसेनापति च्छेत्तुमुन्मूलयितुं मम प्रवर्तनम् प्रवृत्तिः अर्हति करणीयंभवति तस्मिन् शत्रौ नयनविषयी भूते दृष्टिपथावतीर्ण मनः रसं संग्रामरसं युद्धकौतुकम् एष्यति प्राप्स्यति इति मतिमता एवं विचारयता तेन रामेण सेना उद्योगमुत्साहमित्यर्थः आहिता संचिता तां रामकृतरणोत्साहशक्तिं निशम्य श्रुत्वा क्रमिकचलनात् पादचारतः हरेः रामस्य गिरेः पर्वतस्येव तटम् सन्निकर्षपादमूलसैन्यम् म्लेच्छ- सेनापतिसहितम् प्रापत् अपराधक्षमापनाय तत्समीपमयासीत् ॥१७॥ समयमनया वृत्त्यारण्येऽनरण्यजवन्मनो- रथमथ परे न्यस्यन्नुञ्चेनिनाय सनायकः । उदधिरधिकप्रीत्यादित्यस्थितावपि सुस्थिता, व्यधित नगरी तत्र द्वागवतीं किमु काश्चन॥१८॥ भन्धयः-भय स नायकः अनया वृाया अरण्ये अनरण्यजयत् अचमनो- रथं परे न्यसा ममदं निनाय उदधि. अधिकमीत्या आदित्यस्थितावपि तन भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-५ कासन द्वारावती नगरी सुस्थितां व्यधित ॥ १९ ॥ व्याख्या-अथ स नायकः वर्णनीयप्रभुर्जिनेन्द्रः अरण्ये चने अनरण्यजवत् नागरवत् अथवा अरण्ये जायते भवतीति अरण्यजः पशु- पक्ष्यादिवेिकविकलः स न भवतीति अनरण्यजः सदसद्विवेकी स इव अनया पूर्वोक्तया वृत्या आचारेण अथवा बुद्धिवृत्तिचिदाभासरूपया वृत्त्या उच्चैमनोरथं कैवल्यपदप्राप्त्यमिलाप परे किश्चित कालानन्तरं न्यसन् अथवा परे निर्मले कर्मक्षयकारके शुभादृष्टे न्यस्यन् परिणमयन् समयं कालं निनाय यापयामास अथ च उदधिः ज्ञानसमुद्रः क्षमा- सागरः अधिकप्रीत्या प्राणिजातप्रेम्णा मा केपाश्चिदुपरोधो भवेदिति चुद्धया आदित्यस्थितावपि किश्चिदवशिष्टदिने एवं किमु काञ्चन कामपि द्वारावती आगमननिर्गमनप्रचारवती नगरीम् नगाः वृक्षाः सन्त्यस्या वृक्षाश्रयां सुस्थितां मुस्थिति निवसतिम् तत्र बने व्यधित व्यरचयत् वृक्षतलस्थितिमकरोदिति भावः ।। रामपक्षे-अनरण्यजवत दशरथवत् निजजनकवत् अनया वृत्या व्यवहारेण अरण्ये बने उचैमनोरथम् , राज्यपालनरूपं संयमग्रहणरूपं वा परे पश्चात् व्यवस्थापयन् स नायकः रामः समयं वनवासरूपं खकीयमर्यादारूपं निनाय व्यतीतयामास उदधिः गाम्भीर्यादिगुण. समुद्रः अधिकप्रीत्य। सीताविषयकादरातिशयेन आदित्यस्थितावपि दिववद्वारावती द्वारयुक्तां काञ्चन कामपि नगरी वृक्षायां सुस्थितां निवसतिम् व्यधित अकृत ॥ कृष्णपक्षे--अथ गिरितटमाप्त्यनन्तरं स नायकः वासुदेवः अनरण्यजवत् दशरथन्य इव यथा स दशमु दिक्षु रथम् स्वसैन्यं निवेश्य स्थितः तथा सर्वतः स्वकीयरक्षासावधान: अनया एवंभूतया सावधानतया वृत्त्या उपचारेण अथवा अनया सव्यसनया जरासंघ- महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्धानमहाकापे रूपप्रबलशत्रुकृतया वृत्या विधया उच्चैर्मनोरथम् शत्रुपराजयरूपं परे परमेश्वरेन्यस्यन् ईश्वराधीनं कुर्वन् समयं कालं निनाय ग्यतीतयामास अथ च उदधिः समुद्रः अधिकप्रीत्या कृष्णविषयकनिरतिशयप्रेम्णा आदित्यस्थितावपि दिवापि रात्रौ किमुतवक्तव्यम् काश्चन द्वारावतींद्वा- रका नगरी पुरीम् सुस्थिताम् सुरक्षिताम् व्यघित अकृत मा कदाचित् कोऽपि कृष्णासनिधाने द्वारकां धर्पयेदिति समुद्र एव परिखारूपेण तां ररक्षेति तात्पर्यम् ॥ १८ ॥ अजनि विषये तत्राटव्यां स्थितिः प्रभुरागिणा- मनिशगमनाशक्तेर्व्यक्तेतराश्रयधारणोत् । अरमत मनो नृणां मागें वने ननु दण्डके. प्यभयददृशाऽन्यत्र भ्रान्त्या विमोहविवेकतः॥१९॥ अन्धयः-व्यक्तेतराश्रयधारणादनिशगमनाशक्तेः प्रभुरागिणां तनाटल्या विषये स्थितिरजनि नृणां मनः ननु दण्डफे बने भ्रान्त्या विमोहविकतः अभय. दहशा भन्यन्त्र मार्गे मनः अरमत ॥ १९ ॥ न्याख्या-व्यक्तेतराश्रयधारणात् व्यक्तिः स्वप्रकाशस्तस्मादि. तरोऽप्रकाशस्तदाश्रयधारणात् कर्माधीनत्वात् अनिशगमनाशक्तः नास्तिनिशा अन्धकारोऽज्ञानं यत्र तदनिशम् तत्र गमनाशक्तः स्वप्र. काशज्ञानमार्गप्रवर्तन विरहात् अत एव व्यक्तेतराश्रयधारण संगन्छते विमोहविवेकतः विमोहज्ञानतः अन्यत्र भ्रान्त्या अन्यत्र भ्रान्तिकार• केण अभयददृशा ज्ञानदृष्टया प्रभुरागिणां जिनेन्द्रानुगामिनाम् नृणां मनः ननु दण्डके दण्डकानाम्नि वने मार्गे अरमत अलगत स्थितिश्व अजनि अभूत् ।। 'रामप-प्रभुरागिणां रामासक्तचेतसां तबाटव्यां विपये दण्ड- भाचार्य श्री विजयामृतसरिप्रणीता सरणी रोका. सग-५ कामियाने वनेऽरण्ये स्थितिः स्थानम् अजनि कुत इत्याकांक्षायामाह अनिशगमनाशक्तेः निरन्तरबजनसामर्थ्य विरहान व्यक्तेतराश्रयधारणात् चारणपिस्पर्शप्रभावेन गन्धामिधपक्षिणः स्वरूपपरावर्चनजटायुरूप धारणात् अन्यत्र भ्रान्त्या भ्रान्तिकारकेण अत्र अभयददृशाज्ञानचक्षु- पा विमोहविवेकतः निमोहत्यागतः नृणाम् ज्ञानवतां मागें तत्र मनः अरमत अतुप्यत् ॥ कृष्णपक्षे-तत्राटव्यां रैवतकगिरिवने प्रभुरागिणां कृष्णास- क्तचेतस्कानां स्थितिः अजनि जाता कुतः अनिशगमनाशक्तः व्यक्त तराश्रयधारणात् अन्यवेशपरिवर्तनात् दण्डके दण्ड एव दण्डकस्तस्मिन् अश्वगमनयोग्ये मार्गे बने नृणाम् मनः अरमत व्यहरत ॥ १९ ॥ समुदितगणे क्रीडालीनो हरिः शतपर्वणि, भगवति पराभेदं चक्रे स्फुरत्करवारतः । प्रतिपदजपेऽस्यान्तःशीर्णस्तदेव खरात्मजो- ऽवचनविरतो भावो लोके भवेन्नियतेली ॥२०॥ भन्यय:-शतपर्वणि समुदितगणे क्रीडालीनो हरिः मगयति पामे स्फुरत्करवारत चके भस्य प्रतिपदस भन्तःशीण: देवसरात्मनः पचनवित रसो भावो (भगमत् ) लो निपतेयंठी भवेत् ॥ १० ॥ व्याख्या-शतपर्वणि शतमनेक पर्व उत्सवो यस्य तसिन् अनेकोत्सवशालिनि समुदितगणे गण्यते दिव्यपदप्राप्तया इति गणः देवादिः, समुदितः स प्रमोदः यद्वा प्राप्तोदयः तयोः कर्मधारय इति वसिन् अधवा समुदित एकत्रीभूतवामी गणश्चेति तसिन् क्रीडालीनः परिहासासक्ता हरिरिन्द्रः स्फुरत् दीप्यद करवारतः सद्गता भगवति जिनेश्वरे परामेदं सर्वतोरक्षण चके अन्तर्भूय मदा रक्षां चके इति भारः अस्य विहरमाणस्य जिनेन्द्रस प्रतिपदजपे आत्मगुणस्मरणे देव महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये तदानीमेय खरात्मजः कामः खरश्चासौ आत्मजश्चेति मनोजत्वात् अन्तःशीर्णः अन्तः हृदयं शीणों विदीर्णो यस्य म वचनविरतो भावः अवाच्यभावः अभूदिति शेषः तथाहि लोके जगति नियतेरदृष्टस्य विधेरिति शेपः उत्कृष्ट इति तत्वम् ।। श्रीमहावीरजिनेन्द्रपक्षे-तदीयशिप्यो गोशालो नियतिवादी तेन विहरन प्रभुः कदाचित् सिंहनाम्ना ग्रामाधिकारितनयेन गोशाला पराभूत इत्युपक्रम्याह समुदितेति । शतपर्वणि शारदपूर्णिमारात्री समुदितगणे नक्षत्रोदये स्फुरत्करवारतः विजृम्भत्खड्गतः भगवति वैराग्यशालिनि गोशाले यत्र मन्दिरे गोशालेन सह भगवानासीत्त- त्रैव निर्जनतयाऽबधार्य कयाचिद् भुजिख्यया क्रीडालीनो रममाणः हरिः सिंहनामा ग्रामाधिकारितनयः पराभेदं चक्रे खगाघातं विदधे प्रतिपदजपे मंत्रोचारणपरायणे अस्य तदीयव्यापारं दृष्ट्वा विहस्यमानस्य गोशालस्य अन्तः शीर्णः विदीर्णो जातः खड्गप्रहारतस्तदैव खरात्मजः गोशाला लोके जगति नियतेचनविरतो भावः अवाग्गोचरः चली सर्वोत्कर्पो भवेत् इति अमन्यत इति शेपः ॥ रामपक्षे-यदा वनस्यो रामलदा कदाचिल्लक्ष्मणः परिभ्रमन् दण्डके अन्तर्वशगहरे वटशाखानिबद्धचरणतयाऽधोमुखं कमपि श. म्यूकनामानं खरात्मजं सूर्यहासखड्गसाधनतत्परमसिनाऽवधीदित्यनुसं. थायाह समुदितेति । हरिः लक्ष्मणः समुदितगणे सीतारामजटायुसमन्विते निजस- माजे क्रीडालीनः विहरमाणः भगवति समृद्धिशालिनि शतपर्वणि वंशे स्फुरत् करवारतः सूर्यहाससङ्गतः पराभेदं आत्यन्तिकच्छेदं चके प्रतिपदजपे मंत्रोचार्यमाण अस्य खरात्मजस्य शम्यूकस्य अन्तः हृदयं शीर्णः विदीर्णः तदैव तदानीमेव सरात्मजः शम्भूका लोके जगति भाचार्यनीविजयामृतस्त्रिप्रणीता सरणी रीका, सर्ग-५ बचनविरतो भावः आवाच्यभावः अन्तः जात इति शेप तथाहि लोके नियते विधेर्मली सर्वतः श्रेष्ठः॥ कृष्णपक्षे-रुक्मिण्या प्रथम प्रद्युम्न जातमात्रेऽपहृते नारदः केनचिन्मुनिना कथ्यमाने तदुदन्ते रुक्मिणीमाग्भवजन्मवृत्तान्त कृष्णा- सन्निधौ ध्यावर्णयति समुदितेति । शतपर्वणि दुर्वायां समुदितगणे खसमाजे क्रीडालीनः खेलन् हरिः मयूरशिशुः आसीदिति शेषः तदा रुक्मिणी स्फुरत् विज़म्भित करवारतः हस्तमुद्राविशेषतः भगवति केकि निपराभेदं मातृवियोग चक्रे तं शिशु गृहीत्वा स्वगृहमनयत् प्रतिदिनच तन्नर्नयतिस्मेति प्रतिपदजपे प्रतिपादोत्थाने अस्य मातृ- भूतस्य अन्तः हृदयं शीर्णः विदलितः शिशुवियोगात् जात इति शेषः तदैव खरात्मजः खगात्मजः खे रमते इति खरस्तस्यात्मजः मयूरशिशुः लोके वचनविरतो भावः मृतः भवेत् म्रियेत नियतेली- न मृतस्तदा मातृपितृवचनेन तपा विसर्जितः पोडशवर्षन्त्वयापि शिशुचिरहः सोढव्य इति मयूरी निदानात्प्रामवियोगो जात इति भारः ॥ २०॥ रिपुरतिवशो व्याप्तः पुत्रैरिभाश्वपदातिना, विदलितमतिः पुर्या धुर्यां गृहे जगहे रुपम् । अनयचलनात् कंसध्वंसं प्रपद्य न पीडये- दितिगुरुगिरा वन्यैः सिन्धुर्धिया स तु शिश्रिये २१ भन्वयः-रिपुरतियशः पुत्रः इभाधपदातिना ग्यासः विदलितमतिः पुरमा पुरणां मुद्दे एवं जद्द अनयचर नात् माघम के प्रध न पीरपेदितिगुरगिरा मिन्धुधिया शिधिये ॥1॥ व्याया-रिपुरतिवशः रिपुपु कामक्रोधादिपु या रविरिति. स्तस्या यशः परतन्त्रः कामकोषादिविषयकविरक्तिपरवशः अथवा रिपुः महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकावे w wwwww www mm Mm कामादिः अतिवशः अकिञ्चित्करः पुत्रै' तनयादिभिः अव्यातस्त. द्विपयकप्रीत्यभानवान् इभाश्चपदातिना विदलितमतिः गजतुरगप- दातिसैन्येन विदलितमतिः चिदलिता दोपभूयस्त्वदर्शनेन विरक्ता निर्विष्णा मतियुद्धिर्यस्य स धुर्या श्रेष्ठायां पुर्यां नगर्यां गृहे चन्द्रशा लादिमन्दिरे यद्वा गृहे कलत्रे "न गृह गृहमित्याहुहणीगृहमुच्यते" इत्यभियुक्तोक्तेस्ता रुपमप्रीतिम् पिरुचि जगृहे दधार तमेवढयति अनयचलनादिति अनयचलनात् नयो नीतिस्तदभावोऽनयस्तसिन चलनात् प्रवृत्तित. सध्वसं सन्निहिताधःपतनं अमार्गगामिनामवश्य म्भावी वंस इति स्वत पव वसोन्मुसम् कम् कमपि जनम् प्रपथ न पीडयेत् न तम्प्रतिरोपं विदध्याद देवोपहतत्वादित्यर्थः इति गुरुगिरा महजनपचनेन स तीर्थङ्करः स्वयमेव ततो निववृते स तु जिनेश्वरः सिन्धुधिया गुणादिरताकरतया अवन्यैः चुद्धिमद्भिर्जनरिति शेपः शिश्रिये आश्रितः ये केचनमतिमन्तस्ते गुणसमुद्रमेनम्मत्वा तदनुया यिनो बभूयुरिति तचम ॥ ११ ॥ रामपक्षे-रिपुरतिशः रिपौ शत्रौ या रतिः स्थायिभावः क्रोध इत्यर्थः तस्या वशः पराधीनः बोधपरवश इति यावत् पुत्रैर्मेघनादा दिमिः इभाश्वपदातिना गजतुरगपत्तिना च व्याप्तः परिवृतः विदलि- तमतिः शकतपराभवसरणेन शम्बूकादिवधेनेतिभावः विचलित- चित्तः धुर्ण श्रेष्ठायां पुर्या लंकायां गृहे रुपम् रोपम् दर्पणसावाक्यात् जगृहे दधार अनयचलनात् अनपराधशम्बुकादिवधकारकाव स वंसं आसन्नमृत्युम् प्रपद्य एयभूत जनमासाद्य न पीडयेदिति न किन्तु अ- वश्यमेव पीड येत् इति गुरुगिरा वृद्धजनवचनेन रिपुविशेपं न फारसे दिति सूक्या सावधानोऽभवदिति शेपः स राणः वन्यैः वनीयैराक्ष- सादिमिः सिन्धुधिया मदोन्मत्तमतगजयुद्धचा शिश्रिये अन्यथा अने- नैव विनाशः स्यादिति कृत्वेति भावः ।।
www N vi-M Any - । भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ कृष्णपक्षे-रिपुरविवशः शत्रुविषयकमन्युपरतंत्रः पुत्रः यवना दिभिः इभाश्वषदातिना गजतुरगादिसेनया च व्याप्तः परिवृतः विद. लितमतिः शत्रुकृतापराधस्मरणात् क्षुब्धचित्तः धुर्यां शत्रुजनित्तधर्पण- सहनयोग्यायां पुर्या रुपं मान जगृहे गृहीतः अनयचलनात् अनप- राधकृतागरकाद्धेतोः कंमध्वंसं कसं कमनामानं नृपं घंसयति स कंसध्वंमस्तम् कृष्णं प्रपद्य न पीडयेदिति न किन्तु अपश्यमेन पीडयेत् यथा तथा तमामाघ धैरं निर्यापयदिति गुरुगिरा नृपाज्ञया जगगंधा- देशेन स सिन्धुः तात्स्थ्यात्तच्छन्दम् , समुद्रान्तसः कृष्णः शिश्रिये मैन्येरिति शेषः सैन्यमावृणोत्तमिति भावः ॥२१॥ खरविशरणात् कं-सागस्कृन्नरं हतदूपणं, पुनरपि तथा कुर्वाणं कस्त्यजेट वलवानृपः । इति विमृशताऽनेनाधायि क्रियाव्यपदेशता. भवति यदपां सर्वासामप्यपांनिधिरेव दिक् ॥२२॥ अन्वय:- बलवान्नृप स्वरनिशरणात् सागरकर तदुपण पुनरपि तथा कुर्वाण परित्यजेत् इति विमृशता अनेन मियाध्यपदेशना अधापि मर्यामामध्यपाम् अपानिधिरेर दिक् भवति ॥ २२ ॥ व्याख्या-परविशरणात् सरस्य कामस्य पिशरणान विजयात् हतद्पणम् दोपरहितम् अत एव कंमागम्कन्नरम् कंमाव अगति कुटिलं जति परित्यजतीति कंमागाः कृन नरो येन म कमागस्कृन्नः पान- पात्रत्याजितनः तदाश्रयात् पानभाजनग्रहणमपि नरस्त्यक्त इति भारः पुनरपि तथा कामादिविजयं कृर्माणमाचपन्नम् एवम्भूतगलौकिरक्रि- यानिष्णातं जनं पलान् नानपान नृपः भूपः अन्यो वा जनः त्यजेन परिहरेत् न संग्रहणीयात् इति विमृशता विचारयता क्रियाव्यपदेशना त्रियातत्परता तदनुसरता अधायि अकारि तदनुसारको जनो परे
२४२
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये
त्यर्थः तदेवार्थान्तरेण दृढयति सर्वासाम् अपाम् जलानाम् अपानि-
धिरेव समुद्र एवं दिग् गमनदिग् भवति समुद्रे गत्वा नितान्तसुखि-
नो गमनागमनादिशोपणवन्धनादिदोषरहिताःस्याम इति आपस्तदुन्मु-
खा गच्छन्ति एवं बुद्धिमन्तः मतपुरुषपरिपूतम्मोक्षमार्गमेव तथाभूतम-
नुसरन्तीति तत्वमर्थान्तरन्यासेन प्रकटितम् कविना ।।
रामपक्षे-खरविशरणात खरस्य स्वभगिनीपतेविंशरणाव हननाद
सागस्कृन्नर अपराधकारिणं मनुष्यं हतदूपणम् दूपणनिहन्तारम् पुनरपि
भूयोऽपि तथा कुर्वाणं विराधयन्तं कः बलवान् नृपः प्रभुत्वसम्पन्नो
नराधिपः त्यजेत् परिहरेत् मुश्चेत् न कोऽपीत्यर्थः इति इत्थं विमृशता
विचारयता अनेन रावणेन क्रियाव्यपदेशता क्रियायाः व्यापारस्य
व्यपदेशता छानता अधायि कापट्यं अप्रयोजि तथाहि सर्वासामपा
अपां पतिः निधिरेव दिग् भवति यथा जड़प्रकृतिरपान्निधिनींचैर्गच्छति
तथा मन्दबुद्धिरपि नीचवृत्ति कापट्यं आश्रयतीति भावः॥ दृष्टा-
न्तालंकारः ॥ २२ ॥
कृष्णपक्षे-खरविशरणात् रलयोरक्यात् खलविशरणान् खलनिग्र-
हणात् बलवान नृपः जरामंधः कंमागस्कृन्नरम् कंसे स्वनामावरि आगः
अपराधम् पापम् वा करोतीति कंमागस्कृत कंमापराधी स चासो नर-
थेति कंसागस्कृन्नरम नरमात्रोपादानेन तस्मिन् तुच्छत्वं सूचितम् हत
दूपणम् प्राप्तद्पणम् हन्नेर्गमनार्थत्वेन प्राप्त्यर्थत्वात स दोपम् पुनरपि
भूयोऽपि तथा कुर्वाणम् अपराधमाचरन्तम् न च शरणागतमितिधनिः
का त्यजेत् परिस हेत् उपेक्षेत इति विमृशता विचाग्यता अनेन जरा-
संघेन क्रियाव्यपदेशता युद्धोद्योगता अधायि व्यारचि अपाम् सर्वा-
सामपि अपानिधिरेय दिग् भवति न कोऽपि मामान्य सकीयशत्रु
परिहरति एकान्तविश्रामकामुकत्वादिति भावः ॥२॥
. भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-५ प्रतिहरिजरासन्धादेशाद् गृहाणि जहुर्जना, दशमुखभिया शत्रोामात् परे जगृहुर्बतम् । स्वजनविरहादन्येऽवन्यां मुहुर्मुमुहुस्तथा, मुनिगुरुगिरादाय स्वीयान् समारुरुहुर्दरम् ॥२३॥ भन्वयः-जनाः प्रतिहरिजरासंधादेशात् गृहाणि जहुः परदेशमुखभिया- शत्रोग्रामात् व्रतं जगृहुः भन्ये स्वजनविरहात् अमन्याम् मुहुर्मुमुहुः ॥ २३ ।। व्याख्या-हरति पापमिति हरिजिनेन्द्रः तम् इति प्रतिहरि- जिनेन्द्रम्प्रति जनाः भव्यलोकाः जरासंधादेशात् दृढ़प्रतिज्ञावलतः गृहाणि वेश्मानि जहुः तत्यजुः दृशमुखभिया दशसु इन्द्रियेषु मुखं प्रवृत्तिर्यस्य स कामः अथवा दशसु अवस्थापरिणामेषु मुखं प्रवृत्ति- यस्य तत् कर्म तस्य भिया भयेन कर्मभयेन च शत्रोः तस्यैव ग्रामात् आयत्तात् व्रतम् चारित्र्यम् परे केचन जगृहुः गृह्णन्तिस्म अन्ये अव- न्याम् भूमौ खजनविरहात मुमुहुर्मोहमुपगताः मुनिगुरुगिरा मुनिरेव- गुरुरुपदेशकस्तस्य गिरा वचनेन स्वीयान् स्वकीयान् आदाय गृहीत्या दरम् कन्दराम् आरुरुहुः सगं विहरन्ति स्मेति भावः ॥ कृष्णपक्षे-जनाः लोकाः प्रतिहरिजरासंधादेशात् प्रतिहरिश्चासौ जरासंघश्चेति तस्य आदेशात् आज्ञातः गृहाणि स्ववेश्मानि जहुस्त त्यजुः रणायसज्जा बभूयुरित्यर्थः दशमुखमिया दशसु मुसन्निर्गमनं यस्य तस्य याणस्य भिया भयेन शत्रोग्रामात् शडग्रामममिव्याप्य व्रतम् यावन्न श- घुग्राम गमिष्यामि तावन्नभोक्ष्ये न विश्रमिप्ये वेति नियम जगृहुर्धा- रिताः खजनविरहात् युद्धाय गतपतिपुत्रादिविरहात् विश्लेषात् अवन्यां भूमौ मुहुर्मुमुहुर्मोदमुपगताः इतश्च ये भीरबस्ते मुनिगुरुगिरा सद्बुद्धि बदुपदेशकवाक्येन स्वकीयान् स्त्रीपालकादीन् आदाय दरम् पर्वतक- न्दरम् आरुरुहस्तत्र जग्मुः॥
२४४ महोपाध्यापश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये ~ Are रामपक्षे-प्रतिहरिः प्रतिवासुदेवोस्तस्य जरासंधादेशात् दृढ़प्रति- ज्ञानुरोधात् जना राक्षसलोकाः गृहाणि स्ववेश्मानि युद्धार्थमुद्युक्ताः, सन्तः स्वकीयवासस्थानानि जहुस्तत्यजुः परे केचन विभीपणादयः दशमुखभिया दशकण्ठभयेन रावणकृतानादरभयतः शत्रोः ग्रामात् शत्रुभूतरावणनगरात् पहिनिःसृत्येति शेपः व्रतम् नियमम् रावणप- रित्यागल्पम् जगृहुः स्वीचक्रः स्वजनविरहात् खजनस्य विभीपणादे- विरहाद्वियोगाद अन्ये विभीषणदारादयः मुहुः पुनः पुनः मुमुहुः मुह्यन्तिस्म तथा च ते विभीपणादयः मुनिगुरुगिरा मुने रामस्य तदा- नीम्नासकाले कतिचिव्रतधारकत्वेन तथा निर्देशः यहा मनुते सकीयत्वेन स्पीकरोतीति मुनिः स चासौ गुरथेति मुनिगुरुस्तस्य गिरा वचनेन अथवा गुर्वी चामौ गीथेति गुरुगीः मुनेर्गुरुगीरिति मुनिगुरु- गीतया अत्यादरणीयरामवचनेन स्वीयान् स्वकीयान् परिजनान् आदाय गृहीत्वा दग्म् पर्वतकन्दराम् यद्वा दरम् श्वभ्रम् रक्षणस्थानम् समारुरुहुः संगताः दरोऽस्त्रियां भवे श्वभ्रइत्यमरः। श्लेपालंकारः॥२३॥ प्रतिहरिवचोयोगाद् दुर्योधनादिनिमन्त्रितः, सवितुरचिरातारासक्तः सुतो नवसाहसः । किमु नयति नो सेनानाशं विभोर्दृढसंयति, कृतमतितरां योधात्सोऽधात् पुरो रिपुवारणम्॥२४॥ भाग्य -प्रनिहरिपचोयोगात् दुर्योधनादिनिमन्त्रित: सरितुर्विभोः तारा. सात नयमाम मुनः दमयति सेनानाशं किमु नयति रिपुनिवारणम् अतित- गंहार योधात् स पुरोऽधान् ॥ २४ ॥ च्याया--मवितुर्नाभ्यादेर्जनास तारामतः तारामु कनीनि- फासु आमक्तः अत्यन्तलोचनप्रियः "तचारा तु कनौनिकेति हैमः" २४५ - Many A ~~ भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-५ सुतः तनयः ऋषभादिः प्रतिहरिवचोयोगात् प्रतिहरेब्रह्मलोकान्तवासि- देवादेः बचोपोगात् दीक्षाग्रहणसमयस्मारकवाक्या दुर्योधनादिनि- मन्त्रितः दुर्योधनादिः कामक्रोधादिनिमन्त्रितो निरुद्धो येन स अत एव नवसाहसः नूतनसाहसिकः अभूदिति शेपः कामश्चिन्तयति विभो. रिति विमोजिनेन्द्रप्रभोः सेना आम्यन्तरसंयमादिदृढवलम् असावं इति शेपः नाशं नयति नो किम् नो नयति किन्तु अवश्यमेव नेष्य- तीति भावः वर्तमानसामीप्ये लट् अतः दृढसंयति स्थिरसंयमे जिनेन्द्र इत्यर्थः पुरः प्रथममेव योधात् संग्रामात् पूर्वमेव सोधात् सोद्योगात् रिपुवारणम् सैन्यनिवारणम् अनितराम् कृतम् ॥ कृष्णपक्षे-प्रतिहरिवचोयोगात् जरासंधवचनप्रयोगात् दुर्योध. नादिनिमन्त्रितः कृतनिमंत्रणकः कृतः कर्मधारयः सवितुः सूर्यस्य सुतः तनयः तारासक्तः तरति शत्रुपारं गच्छत्यस्मिन्निति तारो युद्धम् तमासक्तः संग्रामप्रियः अत एव नवसाहसः नूतनसाहसी कर्णः विभोः कृष्णस्य दृढसंयति संग्राम सेनानाशं कृष्णसेनाक्षयं किमु नो नयति नेप्यति अवश्यमेव नेष्यतीत्यर्थः सोधात् सोयोगात योधाद संग्रामात पुरः प्रथमं रिपुवारणम् शत्रुरोधम् अतितराम् कृतम् विरचितम् ॥ रामपक्षे-प्रतिहरि हरिम् कपिम् प्रति यो वचनयोगः सन्देश- प्रेपणम् तस्मात् प्रतिहरिवचोयोगात् कपिद्वारा संदेशप्रेषणात् दुर्योध. नादिनिमन्त्रितः दुर्योधनादौ कष्टयुद्धादौ निमन्त्रितः कृताहानः स. वितुः सूर्यस्य मुतः मूर्यवंशीयत्वात् तत्तनयः तारासक्ता संग्रामप्रियः नयमाहसः रामः विमोः मायासुग्रीवस्य दृढसंयति महत्संग्रामे तस्स सेनानाशं किमु नो नेप्यतीत्यादि पूर्ववद्योज्यम् ॥ २४ ॥ कमनजनकं जित्वा वाणाहबेन ससाहसं, सहितमकरोचन्द्रं साक्षादिवोद्यततारया ।
२४६ महोपाध्यायधीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये खचरमचिराद् भानोः सूनुं निजाङ्गनया ततः, सकलनगरे द्वारावत्याः प्रभा भवनेष्वभात् ॥२५॥ भन्वयः-स साहसं कमनजनकं पाणाहवेन जित्वा उद्यततारया सहित साक्षाचन्द्रमिव भानोः सूनुं खचरं निजागनया सहितम् तत: सकलनगरे भव- नेषु द्वारावत्याः प्रभाः ममात् ॥ २५ ॥ व्याख्या-उद्यततारया उद्यता प्राप्तोदया या तारा तया सहितम् संगतम् साक्षाचन्द्रमिव कमनजनकम् कम्यते इति कमनम् अमिलाप: तजनयतीति कमनजनकः संभोगेच्छोत्पादकस्तम् चन्द्रस्यापि कामो- दीपकत्वात् तत्सहचरत्वाच अथवा अनजनकम् नास्तिजनको यस स अजनकस्तन्न भवतीति अनजनकः अनेकजनकः असंख्यातपितृकः तम् कम् कमपि कामम् ससाहसम् साहसेन सहितम् अवाणाहवेन वाणयुद्धं विना आभ्यन्तरिकसंयमवलेन जित्वा पराजित्य अथवा उद्यततारया देदीप्यमानरजतेन रौप्येन सहितम् चन्द्रम् काञ्चनच. जित्वा " स्याद्रूपं कलधौतताररजतश्वेतानिदुर्वणकम् इति तपनीयचा- भीकरचन्द्रभर्मेत्युभयत्र हैमः” खचरम् खं सुखमानन्दचरति अनुभ- वतीति अथवा से परमात्मनि स्वात्मानन्दानुभवे चरति विचरतीति तम् आत्मज्ञानिनम् भानोः प्रभायाः सूयते इति सूनुः तम् प्रभोत्पाद- कम् स्वस्वरूपमित्यर्थः निजागनया निजस्य स्वीयस्य या अङ्गना बुद्धि- स्तया निजबुद्धया सहितम् अकरोत् खम्वरूपन्निजप्रवृत्पधीनमफरोदि- त्यर्थः सकलनगरे नगम् पर्वतम् रातीति नगरम् वनम् कलेन मधुरा. घ्यक्तशब्देन सहितम् सकलम् तच नगरश्चेति तसिन अथवा सकल- नगरे यत्र यत्र प्रभुर्विहरति तसिन् भवने गृहे द्वारावत्याः द्वारकायाः प्रभा शोमा अमात् भाविस्म ।। कृष्णपक्षे–कमनननकम् कमनः कामः प्रद्युम्न इत्यर्थः जनकः -पिता यस्य स कमनजनकः अनिरुद्धः तं ससाहसं पाणामरकन्या.
भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका *मर्ग-५ M धर्षणरूप साहमकारक वाणाहवेन बाणासुरसंग्रामेन जित्वा बाण परा जित्य तं लब्ध्वा उद्यततापया चन्द्रमिन उपया नवपरिणीतया सहितं अकरोत् भानोरित्यन्न विभक्तिविपरिणामेनान्वयः भानु भानुनामानं सत्यभामातनयं निजाग्या दुर्योधनकन्यया सहित अकरोत् देहली- दीपन्यायादुभयत्रान्वयः द्वारावत्याः द्वारकायाः सकलनगरे प्रधाना- प्रधाननगरे भवनेषु समसु प्रभा कान्तिः अमात् अदीप्यत ।। रामपक्षे-समाहसं सुयीवरूपं विधाय तारामिलापरूपसाहनयुक्त कम नजनकं कामपरतन्त्र बाणाहवेन जित्वा शरसग्रामेन पराजित्य उद्यततारया महिन माक्षाचन्दमिन सचर आकाशगामिन भानोः सूर्यस्य तनयं मुग्रीव निजागनया तारया सहितं अकरोत् व्यधात् सकलनगरे किष्किंधापुरे भवनेषु गृहेषु द्वारावत्याः द्वारकायाः प्रभा कान्ति. अभात् शोभतेस्म ॥ २५ ॥ परपरिचयादन्योऽप्यापत्कृताहवनाशनः, शुचिपरिगतं नाथं कात्या गुणेन च संनिभम् ॥ तमपि भगवान् भित्वा पूर्व पदं छुपलम्भयन् , कतिपयदिनांस्तत्रैवास्थादसुस्थितमानसः ॥२६॥ आहवनाशन अन्योऽपि परपरिचयात् आपत्कृत् शुचिपरि गत फा-त्या गुपोन च मजिभम नाथम् तमपि भिस्वा भगवान पूर्व पदं धुप एम्भयन असुस्थितमानस कतिपयदिनान् तत्रैवास्थात् ॥ २६ ॥ व्याख्या-परपरिचयात् परस्य श्रेष्ठजनस्य परिचयात् संगाद अन्योऽपि अत्रोऽपि सदमद्विवेकाहितोऽपि आपत्वृत्ताहवनाशन: भापद करोनीति आपत्कृत् स चासौ आहवश्वेति आपत्कृताहवः तन्ना- शपनि परित्यजनीति तथोक्त ज्ञानिजनसमर्मान्मृढोऽपि हिंसादिक परित्यजति इति भारः शुचिपरिगत अत एव शुद्धतामुपगतं कान्त्या अन्याय महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये .. गुणेन च मनिभं सजनजनसदृशं नार्थ नाथते याचते इति नाथस्तं याचमानं तमपि भगवान् जिनेश्वरः मित्वा अज्ञता परिहृत्य पूर्व पर्द श्रावकत्वं उपलम्भयन् अनुमोदयन् असुस्थितमानसः स्वात्मानुभव- स्थितचित्तः कतिपयदिनान् कतिचिद्वामरान् तत्रैवास्थात् तत्रैवस्थितो- ऽभूदित्यर्थः ।। २६ ।। श्रीपार्श्वनाथपक्षे-परपरिचयात् परे पूर्वजन्मनि यः परिचयः संबन्धः तस्मात् अन्योऽपि साम्प्रतमन्यशरीरगतोऽपि आपत्कृत् उप- मर्गप्रयोजकः : अत एव आहवनाशनः आहूयन्ते आत्मा अत्र स आहवः आत्मचिन्तनं तस्य नाशनः विराधकः शुचिपरिगतं अतिनिर्मलं का- न्या गुणेन च सन्निभं सदृशं यत्राकृतिस्तत्र गुणा वसन्तीति आकृत्या गुणेन च कृतार्थ नाथं पार्श्वनाथं आपकृत् उपसर्गजनको जात इति शेषः तमपि विराध्यातमपि मेघमालिकुमारकृतोपमर्ग भित्वा निश्च- लचित्तेन महित्वा पूर्व पदं स्वकीयदेवस्थानं उपलम्भयत् न च विरा- धिनं प्रतिपिरोधयुद्धिरभवत् अन्यत्र पूर्ववद्व्याख्येयं ।। श्रीमहावीरपक्षे-परपरिचयात् परेण अन्येन कृतो यो परिचयो यथार्थस्तवस्तसाव इन्द्रप्रयुक्तश्रीमहावीरतपोवर्णनं श्रुत्वा संगमदेवस्त परीक्षितुमुपमर्ग विदधौ अन्योऽपि निरपेक्षोऽपि आपत्कृत् आइय- नाशन इत्यादि पार्श्वनाथपक्षवद् व्याख्येयं ।। रामपक्षे-कदाचित्सुन्दसहिता चन्द्रणखा पाताललंकायां राज्यं पालयन्ती राममाहाय्येन पूर्ववैरीविराघो युद्धं विधाय निष्कासयता सपुत्रां सा च लंकां गत्वा रावणाय व्यजिज्ञपदित्याक्षिप्याह परपरि- चयादिति । आहवनाशनः आहवे संग्रामे शत्रु नाशयति हिलस्तीति स परपरिचयात् स्वीयशत्रुपरिचयात् तत् कृतोपजापात् अन्योऽपि उदासीनोऽपि आपत्कृत् विपनिजनको भवतीति शेपः शुचिपरिगवं भाचार्यनीविजयामृतरिमणीता सरणी टीका, सर्ग-५ शुद्धं कान्त्या गुणेन च सन्निभम् मद्योग्यम् नाथं खरं तमपि प्रसिद्ध तब भगिनीपति मित्या विनाश्य विराधाय पूर्व पदम् खगधिकृतं तदी- यपैलकपदमुपलम्भयन मां निष्काश्य तद्राज्य तस्मै ददौ कतिपयदि- नान् असुस्थितमानसः सीताविरहविपणचेतास्तत्रैवास्थात् अतिष्ट ।। कृष्णपक्षे-परपरिचयाद परः शत्रु: तदीयपरिचयात् शत्रुव्य- वहारात् अन्योऽपि यौनसंवन्धसंबद्धोऽपि आपत्कृत् विपत्तिजनको भवतीति शेषः यथा कंमः स्वपितरं कारागारे निरुध्य राज्यमाच्छिद्य स्वयम् बुभूजे. आहबनाशनः कृष्णः भगवान् ऐश्वर्यसम्पन्नः तमपि पितृविरोधकारकं कसं भित्वा विनाश्य शुचिपरिगतम् हृदयतः आचा- रतश्चशुद्धन्निर्मलं कान्त्या गुणेन च सन्निभम् ममानम् उग्रसेनम् पूर्व पदम् पूर्वोपभुक्तराज्यसिंहासनम् उपलम्भयन्प्रापयन् असुस्थितमानसः जरासंधविग्रहात चलचितः यद्वा वृन्दावनीय सहचरविश्लेपविधुरः कति- पयदिनान् कतिचिद्वासरान् तत्रैवमथुरायाम अस्थात् आसीन् ॥२६॥ पवनजनुपा धर्माजन्ये नरोऽभिनवोत्सवः, प्रणयवशतो वाहिन्यागात् सुखेन चलन पथि । तदनु जगति श्रद्धापूर्णो हरेः प्रियवंशजे, लघुरपि परां प्रीति भेजे तदा सुहृदां पदे ॥२७॥ अन्वयः-धर्मात् अभिनवोरमबो नरः जन्ये प्रणयवशतः पथि सुग्वेन चलन् भगात् परमजनुषा वाहिनी च भागात् सदनु हरेः प्रियवंशजे श्रद्धापूर्णः तदा जगति लघुरपि सुहृदां पदे परां प्रीतिम्भेजे ॥ १७ ॥ व्याख्या-धर्मात् पवनजनुपा पूयते अनेनेति पवनम् तच्च अनु- थेति पवनजनुः मनुष्यशरीरम् तेन धर्मतो लब्धेन मनुष्यशरीरेण जन्ये लभ्ये वाहिनि अनादिकालतः प्रवचैमाने पयि मार्गे हरेजिनेन्द्रस्य प्रियवंशजे कुलपरम्परागते स्याद्वादे प्रणयवशतः प्रेमवशतः धर्मविष
२५०
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्मानमहाकाग्ये
wwwWAM
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येकातिशयानुरागतः सुखेन आगात् अन्वमरत् तदनु तत्पश्चात् चलन्
तस्मिन् प्रवर्चमानों जनः श्रद्धापूर्ण भक्तिपूर्णः अभवदिति शेषः
तथाहि जगति संसारे लोके धर्म प्रवचमानः लघुरपि नीचोऽपि सुहृदां
पदे महतां मित्रमण्डले परां प्रीतिम् अत्यधिकसस्क्रियां साधर्मिक-
तया मेजे लेभे ॥ २७॥
रामपक्षे-धर्मात् मुकृतेः अभिनवोत्सवः धर्मप्रभावादिनानुदिनं
नूतनोत्वशाली नरः जन्ये संग्रामे रावणेन सह रणे प्रणयवशः प्रेमब-
शतः अभीरुत्वात् रामगतप्रेमातिशयात् त्रैलोक्यकंटकरावणहननोत्सा-
हाद्वा मुखेन केपाश्चिदप्यरुन्तुदाभावेन चलन् गच्छन् पवनजनुपा
पवनंजयपुत्रेण सह वाहिन्या सेनया च ममम् आगात् अगमत् तदनु
तत्पश्चात् इरेः सूर्यस्य प्रियवंशजे सूर्यवंशीयरामे श्रद्धापूर्णः विशेषथ-
द्धालुर्जात इति शेषः तथाहि जगति लोके लघुरपि सुहृदां पदे मित्र-
तायां तदा मित्रत्वकाले पगमतिशयितां प्रीतिम् अनुरागम् भेजे
भजतिस्म ॥२७॥
..
कृष्णपक्षे-धर्माजन्ये धर्मयुद्धे पवनजनुपा वायुतनयेन भीमसे-
नेन सह नरा मैन्यगतलोकः अभिनवोत्सवः नित्यनवीनोत्सवेनोऽप-
लक्षितः वाहिन्या सह सेनया सार्धम् च प्रणयवशतः कृष्णगतप्रेमतः
पथि मार्ग सुखेन अनायासेन चलन् अगात् हरेः वायोः इन्द्रस्य वा
प्रियवंशजे भीमे अर्जुने वा हरेः चन्द्रस्य प्रियवंशजे कृष्णे कृष्णस्य
चन्द्रवंशीयत्वात् श्रद्धापूर्णः भक्तियुक्तः अभवदिति रोपः तथाहि
जगति लोके सुहृदां पदे मित्रवर्गे लघुपि कनीयानपि तदा मित्र
तायां परामनिशयिताम् प्रीतिम् भेजे मित्रमागें नीचोचैर्षिमागोन
गण्यत इति भावः ॥ २७ ॥
MAA भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सगं-५ अरिपरिणतिर्येषां पूर्वा नवा सहजातिगा, वलवति पुनः कर्णेऽभ्यणे समीयुपि वाग्भरे । प्रगुणितमहामन्त्रैस्तन्त्रैर्ययुः प्रतिमाधवं, मलिनहृदया गान्धारेया निधाय कथाश्रुताः॥२८॥ अन्वयः-येपाम् भरिपरिणतिः पूर्ग ना सहजातिगा बलयति चाम्भरे कणे अभ्यर्ण समीयुपि प्रगुणितमहामनः तंत्रैः कपाश्रुता निधाय मलिन हृदया गान्धारेयाः प्रतिमाधवम् ययुः ॥ २८ ॥ व्याख्या-येपां जिनेन्द्रप्रभूणां अरिपरिणति शत्रुसंमुखगमनम् पूर्वा एव “दीक्षाग्रहणात् पूर्व यथा शत्रुषु परिणगतिस तदानीमपि कामक्रोधादिशत्रौ परिणमत इति भावः" न वा नैव महजातिगा स्वा- माविकीतो मिन्ना किन्तु स्वाभाविकी चलवति दुःप्रध कामादौ वाग्मरे शन्दग्राहके कर्णे श्रोग्रेऽम्पणे सन्निधौ समेयुपि समागते सति काम- स्थानत्वात् दृष्टिगोचरामायेन पिकादिमधुरशब्दद्वारा श्रावणप्रत्यक्षे सति प्रगुणितमहामंत्रैः प्रगुणिताः प्रयोजिता ये महामंत्राः आत्मसंय- मास्तैः तंत्रः स्थः मलिनहदयाः मोघप्रयत्नाः गांधारेयाः गंधमृच्छ- तीति गंधारः तेषां समूहः तेभ्यो हिता या गंधप्रयोजकाः कामादयः कधाश्रुता निधाय तदीयतपोमहिमवर्णनं यथा इन्द्रादिम्पः श्रुतन्तधा- नुभूतमिति श्रुताः आकर्णिताः कथाः प्रमावातिशयद्योतकाः निधाय फणे इति शेपः माधवम्प्रति वसन्तम्प्रति ययुः चमन्तमग्निधिं गत्वा पयुर्निवस्तुः ॥ २८॥ कृष्णपक्षे-येषां दुर्योधनादीनां अरिपरणतिः शत्रुभायता पूर्ण पुरावनी पूर्वत एव युधिष्ठिरादिनिमिचीकृत्य करणेऽपि अत्युद्धिः चिरंतनी नवा नव सहजातिगा स्वाभाविकी भिन्ना किन्तु महर्जव पुनः किन्तु वाग्भरे सत्यवादिनि पलचति सामर्थ्यशालिनि कमें कोमिधाने ..
२५२ महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये नृपे अभ्यर्णे सन्निधौ समेयुपि जरासंधसहाय्याय प्राप्ते सति प्रगुणित महामन्त्रैः प्रयोजितकर्तव्यावधारणजनकरहस्यविचारैः तत्रैः इति कर्त- व्यताप्रयोजकन्यापारः कथाथुताः स्वपरम्परायौनसंवन्धिनः कृष्णादय इति श्रुताः कैश्चिजनैः कथिताः निधाय मुक्त्वा परित्यज्य मलिनहृदया कृष्णसंबन्धेन युधिष्ठिरराज्यं प्रयपणीयं भवेदिति कलुपितान्त:करणाः गांधारेयाः धार्तगष्ट्राः प्रतिमाधवं जरासंधं ययुः संश्रिताः ॥ रामपक्षे-येगा रामादीनाम् अरिपरिणतिः पूर्वा न वा सहजा. तिगा तसिन् रामे वाग्भरे वामात्रेण कर्णेऽभ्यणे समीयुपि समागतेः समुद्रपारे स्थिते प्रगणितमहामंत्रैः तंत्रैः प्रयोजितस्वपरराष्ट्रविज्ञान- विचक्षणः स्पशैंः सद्भिः गांधारेयाः वार्ताहारकाः मलिन हृदयाः छमनापरराष्ट्रविचारधारकाः चाराः कथाश्रुताः आकर्णिताः परराष्टी. याः कथानिधाय कणे कृत्या प्रतिमाधवं रावणं ययुः यदा रामः समु- द्रतटामन्न आसीत्तदा रावणः स्वारान् प्रेष्य सर्ववृत्तान्तमज्ञासीदिति तात्पर्यम् ॥ २८॥ मधुरवहलीभागस्थायी न वाहुवलीक्षितः, प्रभुरनुपदं प्रातन्त्यिा न लक्ष्मणलक्षितः। अवनिधनिकस्याञ्चैः क्रामन् शुचेः स्वरुचेरभूत् , खरसुतहरः क्वाप्येवं स्यात्प्रमादपरः सुधीः ॥२९॥ भन्धयः-मधुबहरी भागस्थायी याहुयलीक्षितः म प्रातः भनुपदं प्रा- म्ता रमणलक्षितो भानिनिरस्य सुचः साचेः उपः प्रामन् सरसुतहरः भभूत मुधोः पाप्येष प्रमादपर. स्यान् ॥ २९ ॥ व्याख्या-मधुग्यहलीभागस्थायी मधुरो मनोज्ञो यो चहलीमागः नगरयायोद्यानभूभागः तत्र स्थायी प्रभुर्जिनेन्द्रः आदीश्वरः प्रातः प्रभाते अनुपदं भ्रान्त्या तत्क्षणगमनेन न बाहुवलीक्षितः बाहुबलिना
आचार्यनीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-५
२५३
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न दृष्टः लक्ष्मणलक्षितश्चलक्ष्मणेन राज्ञा न लक्षितः नयनगोचरी
कृतः अभूत् जातः स्वरुचेः खतो रोचमानस्य शुचः परिशुद्धस्य अब-
निधनिकस्य पृथ्वीपतेः बाहुबलिनः उच्चैः क्रामन् अधिकं गच्छन्
खरसुतहरः कामविनाशकः सुधीः तत्वज्ञः काप्येवं प्रमादपरः स्थान
न खादित्यर्थः सायं प्रभुर्यायोद्यानमागत इति उद्यानपालेन निवे-
दितः प्रातर्यावता सपरिवारो गच्छति याहुबली तावता प्रभुर्विजहारेति
राज्ञः प्रमादपरत्वं, न कदाचिदपि प्रभुः प्रमाद्यतीति भावः। अर्थान्त-
रन्यासः ॥ २९ ॥
अन्यजिनेन्द्रपक्षे-मधुरमहलीभागस्थायी मनोज्ञनिर्मलदेशस्थः
पाहुपली संयमसामर्थ्यवान् न क्षितः स्वसंयमात् न स्सलितः प्रातः
परिपूर्णः भ्रान्त्या भ्रमणेन लक्ष्मणेन स्खचिन्हेन लक्षितः न इति न
किन्तु लक्षित एव सरसुतहर। पराजितकामः प्रमादपरः प्रमादात्
अनवधानात् परः दूरवर्ती अप्रमादी सुधीः सुष्टु आत्मानुभववान्
फाप्येवं स्यात् कश्चिदेवं भवेत् अवनिधनिकस्य अवनमेवावनिः स एव
धनं यस तस्य दयावनिकस्येत्यर्थः शुचेः शुद्धस्स खरुचेः खसिन्
आत्मनि रुचिर्यस्य तस्य सम्बन्धी प्रामन् गच्छन् उचैरभूत् ।। एवं
कृष्णपक्षेऽप्यवसेयम् ॥ २९॥
रामपक्षे-मधुरमहलमागस्थायी निर्मलपरिस्कृवप्रदेशम्या बाहुली
नक्षितः न केनापि हतः अनुपदं रामस्य अनुमरणम् भ्रान्या भ्र.
मणेन लक्ष्मणलक्षितः न लक्ष्मण इति यथार्थनामा यथा लक्ष्म कदा.
चिदपि न व्यमिचरति तथायमपि रामस्थानुचर इति मात्रा अवनिध-
निकस्य पृथ्वीपतेः शुचः परिशुद्धस्स खरुची स्वतः शोममानस उचः
क्रामन् अतिशयमनुमरन् अभूद सरमुतहरः शम्यूनिहन्ता सुधीः
युद्धिमान् झाप्येवम् कुतोप्येवं प्रमादपरः स्यान्नैव सादित्यर्थः ॥२९॥
GAN महोपाध्यायश्री मेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये अथ विधिवशात् स्थित्याः पूर्ती बने हत-दण्डके, सवलहरिणा विद्यासिद्धे खरात्मनि निष्ठिते । भवति समरे जह्वे रक्षःप्रभुर्वसुधाङ्गजां, खमनुजमिते रामे मिथ्यामति खविमानधीः॥३०॥ अन्ययः-अयहतदण्डके वने सबलहरिणा विधिवशात् स्थित्याः पूती विद्यासिद्धे खरा'मनि निष्ठिते समरे भवति स्वमनुजमिते रामे रक्षःप्रभु. स्वविमानधीः अमिथ्यामति वसुधागजाम् बहे ॥ ३० ॥ व्याख्या-अथ अथानन्तरं हतदण्डके दण्डयति विभीपति इति दण्डकः भयकारकः हतः निरस्तः दण्डको यत्र तम्तिन् जिनेन्द्रागम- नप्रमावाद पारस्परिकविरोधोऽपि शान्त इति भावः निर्भये पनेऽरण्ये विधिवशात् विधिपूर्वकं स्थित्याः धारणायाः मुक्तरित्यर्थः " मर्यादा. धारणास्थितिरिति हैमः" पूर्ती पूर्ति निमित्ताय मुक्तिनिमित्तायेति तत्वम् सवलहरिणा हरति पापमिति हरिः सबलश्चासौ हरिथेनि सब- लहरिस्तेन विद्यासिद्ध अध्यात्मज्ञानसिद्धे सम्पन्ने सति अत एव सरा- त्मनि निष्ठिते कामे प्रतिहते वसुधांगजाम् वसु कृष्णतान्दधातीति वसुधा चासौ "वसुरयामे इति शब्दस्तोममहानिधिः" कृष्णा अङ्गना कवरी चेति वसुधाङ्गजा तां जहे हृतवान् ललचे समरे समम् समतां राति अर्पयति सर्वत इति समरस्तसिन् समरे समभावे भवति प्रसरति रक्षः प्रभुः रक्षतीति रक्षाः तत्र प्रभुः रक्षणेकरवणः स्वविमानधीः विगतः मानोऽहंकारो यस्यां सा विमाना सा चासो धीवेति विमानधीः स्व. सिन खशरीरे विमानधीर्यस्य स तथोक्तः देहामिमानरहितः स्वमनु. जमिते रामे खस्य मनुमन्नं विचारशक्तिः तस्माजातः स्वमनुजः स्व. खविचारजातः तेन मिते अनुमिते रामे आत्मानन्दानुभवे अमिथ्या. मविम् निर्मलां दृद्धां युदिम् चक्रे इति शेपः ॥
आचार्य श्री विजयामृतत्रिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५
३५५
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रामपक्षे-अथ अनन्तरम् हतः निहतो दण्डको यंत्रं वस्मिन्
हतदण्ड के बने विपिने सपलहरिणा बलवता हरिणा लक्ष्मणेन वि-
धिवशात् अदृष्टयशतः स्थित्याः स्थानम् स्थितिरायुः तस्याः पूतौ पूर्णे
मति आयुपः पूर्ण सति विद्यासिद्धे सूर्यहासखड्गसाधकविद्याधिगते
मति खरात्मनि खरपुत्रे "आत्मा वैजायते पुत्र इति श्रुतेः शम्बूके
निहिते मृते सति समरे सरादिभिः सहेति शेषः संग्रामे भवति प्रर्व.
माने स्वमनुजमिते रामे स्वं स्वकीयम् अनुजम् कनिष्ठभातरम् इते
गते रामे रामस्याविद्यमानदशायां रक्षाप्रभुः रक्षसां पतिः रावणः
सविमानधीः स्वस्मिन् विमाने रथे धीर्यस्य सःअमिथ्यामतिम् न
मिथ्यामतिद्धिर्यस्यास्ता शुद्धमनस्कां वसुधाङ्गजाम् सीताम् जड़े
हृतवान् अथवा मिथ्यामतिम् इयमे भार्या भविष्यतीति पुद्धिमा-
स्थायेति जहें हरतिसा ।।
कृष्णपक्षे-सपलहरिणा मपलो चलवान इरति धैर्यमिति हरिः
कामः सपलचासौ हरिश्चति सयलहरिस्तेन बलपना कामेन प्रद्युम्नेने
विद्यासिद्ध कनकमालाप्रदत्तगौरीप्रज्ञप्तिविद्याद्वयलब्धे सति विधिव-
शात देवाधीनतः स्थित्या ममयस्य पूर्ती पूर्णे मति स्वकीयपोडशव
पर्यन्तं मारपिवृषियोगम्पशापस्य अथवा ममयस्य आयुषः पूतों
खरात्मनि सरः दुष्टः आत्मा यस्य तसिन शम्बरे निष्ठिते मृते सति
रक्षाप्रभुः रक्षासु राक्षसेपु प्रभाति इति रक्षाप्रभुः प्रद्युम्नः समरे
समः गीतमाययोरेककालमयो गायकहरतादिचालनरूपतालस्तं राति
गृहातीति तसिन् गीतवाद्यादिमहोत्मवे भवति विद्यमाने वसुधाला-
जाम् चतु तेजो दधातीति वमुघो दुर्योधनस्तस्याङ्गजा तनया जहे हतवान
स्वविमानधीः परिमाने आकाशगमनादौ धीः यस्य म राम बलराम
अनुजम् कृष्णमिते गते स्वम् स्वयमेव अमिध्यामति रामकृष्णौ प्रति
पूज्यबुद्धिम् विदधे इति शेपः ॥ ३० ॥
२५६ महोपाध्यायश्रीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्ये M www vw www पथि गमनतो-लङ्काधीशा जटायुरवध्यत, समितिसमये ध्वंसं भेजे दशाननकाण्डतः। अनुकृतिकरो विद्याभ्रशं जटी निकटीभव- ननुशयमयाद रत्नाद यत्नादरक्षपिताहितः॥३१॥ भन्वय.-पथि गमनतो लंकापीशा जरायुः अवध्यत समिति समये दशा- ननकाण्डतः धंस भेजे अनुकृतिको निकटीभवन् नटी अनुशयमयात् भयत्नाद् रस्मात् भरक्षपिताहित: विद्याध्वंसं भेजे ॥३॥ व्याख्या-काधीशा के आत्मनि अधीष्टे इति काधीट् आत्म- ज्ञानी तेन जिनेन्द्रेण अलम् अतिशयम् पथि गमनतः मागे विहारतः जटायुर्जटां संघति याति प्रामोतीति तथा संघातः अवध्यत नित्यविहारे कैश्चिन्मुनिभिः संघातः प्रेमाऽक्रियत समिति समये इर्यासमित्यादि- काले दशाननकाण्डतः कामदेववाणतः अध्वंसं भेजे अप्रतिहतो जातः यतात् संयमतः अरक्षपिताहितः अरम् शीघ्रम् क्षपिता निरा. कृतः अहितः शत्रुयन स कामक्रोधादिजेता अनुशयमयाद्यत्नात् शय- मनुगतम् अनुशयम् हस्तगतम् अयमेवानुशयमयस्तस्मात् हस्तगतसंयम- रूपरत्नाव अविधाया ममतायाः भ्रंशं विनाश लब्ध्वेति शेष: अनु- कृतिकरः कायोत्सर्गविधायकः जटी निकटीभवन् वृक्ष इव सुखामुख- स्पर्शनिवारणाक्षमो भवतीति शेषः ।। रामपक्षे-पथि गमनतः सीतामादाय मार्गे प्रमरतः समितिसमये संग्रामसमये लंकाधीशा रावणेन जटायुः अवध्यत सीतांप्रतिहत्तुं विक्र- मन् पक्षी अहन्यतेति भावः कुत्त इत्याह दशाननकाण्डत: रावणवाणतः पत्नात् अरक्षपिताहितः लघुप्रतिद्दवरिपुः अनुकृतिकर, जटायुरिव- २५७ ४ -~- .. भाचार्यश्रीविजयामृतमरिप्रणीता सरणी टीका मर्ग-५ सीतामोचनप्रवृत्तः अनुशयमयात् दीर्घद्वेषरूपात् ग्लाद रत्नभूतात् निकटीमग्न रावणसमीपं गन्छन् जटी रतजटीनामविद्याधर विद्या- भ्रशं खेचरस्वादिनिजशक्तिभ्रंशं विनाशं भेजे लेभे ॥ कृष्णपक्षे-काधीशा के शरीरे अघीष्टे इति कापीद तेन काधीशा अत्यन्तसुन्दरेण प्रद्युम्नेन पथि गमनतः छलेन रुक्मिणीहरणममये युद्धमार्गावतरणतः जटायुः टरयोः साम्यात् जरायुः जराकुमारे सत्य- भामातनये आयुर्जीवनम् प्रेम यस्य स कृष्णः अवध्यत निरुध्यत स. मितिसमये दशाननकाण्डतः प्रद्युम्नबाणतः घंसं पराभवं भेजे लब्ध. बान् अरक्षपिताहितः क्षिप्रविनाशितारिः अनुकृतिकरः स्वरूपं विज्ञाप विजातीयरूपवान् प्रद्युम्नः विद्याभ्रंशं माया_शं कृत्वा जटी सन् निकटीभरन् ऋणसमीपं गतः-मन् अनुशयमयात् पश्चाचापरूपात रत्नाद शत्रुमित्र किमेनमयुध्य इति चिन्तया यत्नात् प्रेमात् अरक्ष दित्यर्थः ॥ ३१॥ शिरसि चिकुरश्रेणी वेणीलतेव गुरोगिरे- स्तदनु सुभगो रेजे स्कन्धे पटीव पटीयसी। दिवमिव सखीं कर्तुं प्रोच्चैः स्थितांहिनि सया, जलदपटलीवागाद रागात्फणीवात[नू]नुरुचिः ॥३२॥ भन्वय --गुरो शिरसि वेणीलतेव चिकुरश्रेणी तदनु सुभगा पटीयसी पीय स्कन्धे रेजे दिवम् सखीकर्तुमिव उच्च स्थिता अहिनिनमया भानुरचि M जस्पटलीय फणीव भगात् ॥ ३२ ॥ व्याख्या-गुरोः आदीश्वरस्य भगवतः शिरसि मूर्ध्नि चिकुरश्रेणी कुन्तलश्रेणी रेजे शुशुमे तामुत्प्रेक्षते वेणीति गिरेः शिखरिणः वेणी- लतेव जलदपटलीव "वेणी केशरचना जलदपटलीति शब्दम्तोममहा. निधिः" तदनु तदधोभागे स्कन्धे स्कन्धप्रदेशे सुभगा मनोज्ञा पटी २६० महोपाध्याय श्रीमेघविजयगणिविरचिते सहसम्धानमहाकाग्ने सह कतिचित्समाः कतिवर्षाणि विहारम् क्रीडाम् अचीकरत अरीरचत्।। रामपक्षे-सौभद्रेयो लक्ष्मणः, अन्यत्पूर्ववद्योज्यम् ॥ ३३ ॥ कृतगुरुतपा भूरीशानः प्रतिस्थलसत्कृतो, लघु वसुमती धात्री पात्रीचकार महासुदः। रजतसहितैषैिः स्वं चातुपत् तुपवर्जितै- नमपि धनं पुष्पासारैः ससौरभमादधे ॥३४॥ अन्वय:-कृतगुरतपा ईशानः भूरि प्रतिस्थलसाकृतः महासुदः लघु वसु. मती धात्री पात्रीचकार रजतसहितर्मापै. तुपवर्जितैः स्वम् अतुपत् धनम् वनमपि पुष्पासारैः ससौरभमादधे ॥ ३४ ॥ - व्याख्या :- बर्द्धमानपक्षे-कृतगुरुतपाः कृतं गुरु महत्तपोऽभिग्रहरूपो नियमो येन म कृतगुरुतपाः ईशानैर्देवैर्नृपैर्वा भूरि बहुशः प्रतिस्थलसत्कृतः मपत्रप्राप्तसत्कारः महासुदः असुम् जीवनं ददातीति असुदः जीवरक्षक: महांश्वासौ असुदधेति महासुदः निरतिशयजीवरक्षापरः लघु क्षिप्रम् वसुमती सुसमृद्धां धात्री पृथ्वीं पात्रीचकार विहारस्येति शेषः तुषय- जितेनिटैः द्रव्यादिचतुर्विधशुद्धै रजतसहितैः रज्यते निस्तुपीक्रियतेऽ. नेनेति रजतः सूर्पः तेन सहितैः सूर्पस्थैरित्यर्थः अथवा अत्यन्तस्वच्छ मापैर्मापानःखम् सयम् अतुपयत् यथाभिग्रहलाभेन पूर्णवतत्वानुतोप घनं निविडम् वनम् आलयम् यद्वा बनरमण्यम् पुप्पासारैः पुष्पवृष्टिभिः ससौरभम् सुगन्धिमत् ससौगन्धिकम् आदधे चक्रे प्रभोस्तथाविध- भिक्षादानेन परितुष्टो देवस्तत्रपुष्पवृष्टिम् विदधौ ॥ अन्यतीर्थकृतांपक्षे-रजतसहितः अतिस्वच्छै मापैः मपति क्षुधानिवारयती मापः "मपेः संज्ञायां धन्” तैः क्षुनिवारकैः तुपव- जिंतनिर्मल निदो पैरन्पत् पूर्ववदवसेयम् ।। . :
vw भाचार्यश्रीविजयामृतमूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-५ रामपक्षे-कृतगुरुतपाः कृतम् विरचितम् गुरोः पितुर्वचनादिति शेषा तपश्चतुर्दशवर्षे यावदनवासरूपं येन स भूरीशानः प्रतिस्थलस- स्कृतः ईशानः राजमिः भूरि बहुशः प्रतिस्थलमत्कृतः स्थाने स्थाने कृतादरः महासुदः महद्विराजमानः रजतसहितैरतिवछैपैिरनैःस्त्रम् खयम् अतुपत् धनम् वनमपि पुष्पासारैरिवेत्यर्थः ससौरभम् ससौग- न्धिकम् आदधे आचके । कृष्णपक्षे-कृतमाचरितम् गुरुपु पित्रादिपु तपः तदीयसेवारूपं नियमं येन स कृतगुरुतपा भूरि बहुशः ईशानः नृपः प्रतिस्थलसत्कृतः कृतादरः महासुदः शोभमानः वसुमती यशोमती नन्दगोपपत्नी धात्री पात्रीश्चकार पिचत्यस्याः स्तन्यमिति पात्री "पातेधन ततो डी" ताम् सन्यदात्रीश्चकार वनम् समुद्रजलम् पुष्पासारैः कुसुमवृष्टिमिः सौग- न्धवत् आदधे चक्रे ॥ ३४॥ हरिपतिरतेः खेदात् सीताविशुद्धिरजायत, रुचिरभवने- लङ्कालाभे सपुण्यजने बने । अकृत न हरेलोकः कं के वलं विभवं गुणैः, ऋषिकवणिजामास्यादेव स्थितिविदिताऽप्यतः ॥३५॥ अन्वयः-हरिपतिरतेः खेटात् लकालामे सयुग्यजने वने रुचिरभवने सीतापिशुदिरजायत हरेर्लोकः गुणैः कं कं बलं विभवं न अधन भतः ऋयिकव. गिजामास्वादेव स्थितिर्विदिता ॥ ५ ॥ व्याख्या-हरति पापमिति हरिः संयमध्यानं वा स एव पतिः तत्र रतिरनुरागो यस्य तस्य हरिपतिरतेः संयमैकचित्तस्य ध्यानैकमनसो वा जिनेन्द्रस्य खेटाद मुद्रातः कायोत्सर्गमुद्राधारणतः सीतायाः मो- लक्ष्मयाः विशुद्धिः शोधनम् अजायत अलम् अत्यर्थम् कालामे २५८ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते मतसम्मानमहाकाये VL यसीव पटुतरेव पटी पटभेदः रेजे दिवमिव सखी कत्तु प्रोचः स्थिता खर्गसख्यमुपगन्तुमिव उन्नतस्थानस्थिता अहिनिनसया चरणनमने- च्छया अतनुरुचिः अतिशयकान्तिः निविडच्छविः जलदपटलीव धनसंहतिरिव चा अथवा फणीव कृष्णसर्पसंहतिरिव अगात् अयासीत् उत्प्रेक्षालङ्कारः स्फुटं प्रतिभातीति ।। रामकृष्णपक्षसाधारणमेतद् ॥ अन्यतीर्थकृतां पक्षे–गुरोः जिनेन्द्रस्य गिरेः प्रबजितपर्वतस्य शिरसि उर्ध्वप्रदेशे चिकुरथेणीव कचपंक्तिरित वेणीळता कुटिलनदी रेजे भातिम्म तामेयोत्प्रेक्षते स्कन्धे स्कन्धप्रदेशे सुभमा मनोहरा पटी- यसी पद्वी पटीव अन्यत् पूर्ववत् ॥ ३२ ॥ हरिचरसुरास्थाने नागः सशम्बलकम्बलः, प्रभुमनुचरन्नावि-स्थित्या सुखं चकृवान् भृशम् । स्थितमुपवने सौभद्रेयोऽप्यविक्रिययान्वयात्, कतिचन समास्तेन स्वामी विहारमचीकरत् ॥३३॥ •~ हरिचरसुरास्थाने म सम्बसकम्बलः नागः पश्मनुधरन् नादि स्थित्या भृशं सुगं कृवान् उपमने स्थितं अविक्रिपया सौमदेयः अपि मन्वयार तेन स्वामी तिचनममाः विहारमचीकरत् ॥ ३३ ॥ व्याख्या-स प्रसिद्धः नागः गम्मलकम्बल शं कल्याणम् चलयति वर्धय- तीति शम्बलः कम् सुसं च बलयतीति कम्बलः स्वकीयकल्याणमुख- पारकः नागः श्रेष्ठः म्बात्मकल्याणविघायकत्वात् सौमद्रेयः सुभद्रायाः कल्याणगुणविशिष्टाया अपत्यम् सौभद्रेयः सुमद्रातनयः हरिचरमुरा- म्याने चर्यते इति चरः हर्दिनेन्द्रस्य चरः चरणम् विहरणमित्यर्थः वदेव मुराम्यानम् नीर्थस्थानम् तसिन् तीर्यभूते उपवने नामोद्याने आवि मनोहरे अथवा स्वयुद्धौ स्वकीयाम्पुदये स्थित्या स्वाम्पुदयका- भन्य.- ..
२५९ VA फ- भाधामीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ मनयेत्यर्थः स्थितम् समार्गतम् प्रभु जिनेन्द्रमनुचरणन सेवमानःभृश- मतिशयम् मुखम् प्रीतिम् चकृवान् चकार अविक्रियया विकारराहि- त्येन निर्मायिकतयेति भावः अन्वयात् प्रमुमन्वसरत् तेन सह कति. चनसमाः कतिवर्षाणि यावत् स्वामी प्रभुः विहारम् विचरणम् अची- करत व्यदधत् ॥ ३३ ॥ श्रीमहावीरजिनेन्द्रपक्षे-हरिचरसुरास्थाने चरत्यनेनेति चरश्च रणः हरेः विष्णोश्वरः हरिचरः सुनोतीति सुरा सुधातोरोणादिकोरक्, नदी हरिचरस्य सुरा हरिचरसुरा गंगानदी तस्या विष्णोः पादप्रसूत- त्वात् तस्याः स्थाने गंगानदीस्थाने स प्रसिद्धः शम्मलकम्बलः नागः नागकुमारः नाविस्थित्या प्रभुम् महावीरस्वामिनम् भृशमतिमयम् सुखं चकवान् पूर्वमवसिंहजीवः साम्प्रतं सुदष्टनामा नागकुमारः पूर्ववैरम- नुस्मरन् भगवन्तं व्यराध्यत तस्मादुपसर्गात् शम्बलकम्बलनामा नागः प्रभुमुपाकृतंति कथासन्दर्भः उपवने स्थितम् यायोद्यानस्थं प्रभुम् सौभद्रेयः सुभद्रातनयो गोशालः अविक्रियया विकारराहित्येन अन्य यात् अनुगमोऽभवत् तेन सौभद्रेयेन गोशालेन सहेति शेपः स्वामी महावीरस्वामी कंतिचनसमाः कतिवर्षपर्यन्तम् विचरणम् अचीकरत व्यदधत् ।। ३३॥ कृष्णपक्षे हरिचरसुरास्थाने चरत्यसिनिति चरः हरेः कृष्णस्य चरः हरिचरः कृष्णनिवासस्थानम् तदेव सुरास्थानम् देवास्थानम् ती. र्थभूतमित्यर्थः स प्रसिद्धः तसिन् शम्बलकम्बलः कल्याणसुसवान् नागः श्रेष्ठः मौभद्रेयः सुभद्रातनयः अभिमन्युः प्रभुं कृष्णम् अनुगच्छन् नाचि स्थित्या नौकायां स्थित्या समुद्रजलक्रीडया भृशमतिशयं सूर्य प्रीतिम् चकवान् अकृत उपवने रैवतकाद्रौ स्थितम् कृष्णम् अविकि- यया आनुकूल्येन अन्वयात् अन्यसरद स्वामी कृष्णा तेन सौभद्रे येण २६० महोपाध्यायधीमेधविजमगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकावे : सह कतिचित्समाः कतिवर्षाणि विहारम् क्रीडाम् अचीकरव अरीरचत्।। रामपक्षे-सौभद्रयो लक्ष्मणः, अन्यत्पूर्ववद्योज्यम् ॥ ३३ ॥ कृतगुरुतपा भूरीशानैः प्रतिस्थलसत्कृतो, लघु वसुमती धात्री पात्रीचकार महासुदः। रजतसहितैर्मापैः स्वं चातुपत् तुपवर्जितै- वनमपि धनं पुष्पासारैः ससौरभमादधे ॥३४॥ अन्यय:-कृतगुरतपा ईशान. भूरि प्रतिस्थलस'कृत. महासुदः लघु वसु. मती धात्री पात्रीचका रजतसहिताप तुपवर्जिते. स्वम् भतुपत् धनम् वनमपि पुष्पासार. ससौरभमादधे ॥ ३४ ॥ -: व्याख्या:- बर्द्धमानपक्षे-कृतगुरुतपाः कृतं गुरु महत्तपोऽमिनहरूपो नियमो येन स कृतगुरुतपाः ईशानैर्देवैर्नृपैर्या भूरि बहुशः प्रतिस्थलसत्कृतः मर्वत्र प्राप्तसत्कारः महासुदः असुम् जीवनं ददातीति असुदः जीवरक्षकः महांश्चासौ असुदश्चेति महासुदः निरतिशयजीवरक्षापरः लघु क्षिप्रम् वसुमती सुसमृद्धवा धात्री पृथ्वी पात्रीचकार विहारस्येति शेपः तुपव- जितेनिर्दष्टैः द्रव्यादिचतुर्विधशुद्ध रजतसहितः रज्यते निस्तुपीक्रियतेऽ. नेनेति रजतः सूर्पः तेन सहितैः सूर्पस्थैरित्यर्थः अथवा अत्यन्तस्वच्छ मापैर्मापानःस्वम् अयम् अतुपयत् यथाभिग्रहलामेन पूर्णवतत्वात्तुतोष घनं निविडम् वनम् आलयम् यद्वा यनरमण्यम् पुप्पासारः पुष्पवृष्टिमिः ससौरभम् सुगन्धिमन् ससौगन्धिकम् आदधे चक्रे प्रभोस्तथाविध- भिक्षादानेन परितुष्टो देवस्तत्रपुष्पवृष्टिम् विदधौ । अन्यतीर्थकृतापक्षे-रजतमहितैः अतिस्वच्छै मापः मपति क्षुधान्निवारयती मापः "मपेः संज्ञायां घ" तेः सुन्निवारकैः तुपव- जिंतनिर्मल निर्दोषैरन्यत् पूर्ववदवसेयम् ।। .. . ।
भाचार्यश्रीविजयामृतरिमणीता सरणी टीका. सर्ग-५ २६१ रामपक्षे–कृतगुरुतपाः कृतम् विरचितम् गुरोः पितुर्वचनादिति शेषा तपश्चतुर्दशवर्ष यावदनवासरूपं येन स भूरीशानः प्रतिम्थलम- स्कृतः ईशानः राजमिः भूरि बहुशः प्रतिस्थलमत्कृतः स्थाने स्थाने कृतादर महासुदः महद्विराजमानः रजतसहितैरतिखस्छैपिरन्नैःस्वम् खयम् अतुपत् धनम् वनमपि पुष्पासारैरिवेत्यर्थः ससौरभम् ससौग- न्धिकम् आदधे आचक्रे ॥ कृष्णपक्षे--कृतमाचरिचम् गुरुपु पित्रादिपु तपः तदीयसेवारूपं नियम येन स कृतगुरुतपा भूरि बहुशः ईशानः नृपैः प्रतिस्थलसत्कृतः कृतादरः महासुदः शोभमानः वसुमती यशोमती नन्दगोपपत्नी धात्री पात्रीचकार पिबत्यस्याः स्तन्यमिति पात्री "पातेष्टन ततो डी" ताम् स्तन्यदात्रीश्चकार वनम् समुद्रजलम् पुष्पासारैः कुसुमवृष्टिमिः सौग- न्धवत् आदधे चक्रे ॥३४॥ हरिपतिरतेः खेटात् सीताविशुद्धिरजायत, रुचिरभवने-लङ्कालाभे सपुण्यजने वने । अधृत न हरेलोंकः कं कं बलं विभवं गुणैः, ऋयिकवणिजामास्यादेव स्थितिविदिताऽप्यतः ॥३५॥ अन्वय:--हरिपतिरते. खेटात् लकालाभे सपुण्यजने वने रुचिरमयने सीताधिशुदिरजायत हरेलोंक. गुणैः क क बल विभवं न भभूत भत पिकव. गिजामायादेव स्थितिर्विदिता ॥ ३५ ॥ व्याख्या-हरति पापमिति हरि संयमध्यानं वा स एव पतिः सत्र रतिरनुरागो यस्य तस्य हरिपतिरतेः संयमैकचित्तस्य ध्यानैकमनसो वा जिनेन्द्रस्य खेटात् मुद्रातः कायोत्सर्गमुद्राधारणतः सीतायाः मो. क्षलक्ष्म्याः विशुद्धिः शोधनम् अजायत अलम् अत्यर्थम् कालामे AJAY www WAN १६२ महोपाध्यायधीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाये कस्य आत्मनः आलामे सर्वतः प्राप्ती सर्वत आत्मज्ञाने लब्धे अभवने अगृहे स पुण्यजने पवित्रजनसहिते बनेऽरण्ये रुचिः प्रीतिः अजायत इति शेपः हरोजनेन्द्रस्य लोकः लोकते पश्यतीति लोकः दर्शनकत्र्ती गुणैः प्रभुदर्शनजन्यमहिमभिः कं के यलम् आत्मवलं विभवं समृद्धिश्च न अधृत नालभत अत: जिनेन्द्रस्य "सार्वविभक्तिकस्तसिल्" आस्या- देवमुखदर्शनादेव स्थितिमर्यादा विदिता क्रयिकवाणिजाम् क्रयविक्रय- व्यापारवतां वणिजाम् आस्यादेव इवार्थकोऽत्र एव शब्दः यथा तेषां मुखादेव केपाश्चिन्महार्यता केपाश्चित् समर्पता विज्ञायते तथा प्रभु- • मुखदर्शनादर्शनाभ्यां भवतीति भावः ।। रामपक्षे-हरिपतिस्ते खेटात हरीणां पतिः हरिपतिः सुग्रीवः तसिन् रतिः अनुरागो यस्य तस्मात् खेटात् खे आकाशे अटती तमा- दाफाशचारितः हनूमतेः लंकालामे लंकानाम्नि सपुण्यजने सया- यातुधानः पुण्यजनो नैर्ऋतो यातु रक्षसीत्यमरः" वने अशोकवाटिकाख्ये रुचिरभवने मनोहरमंदिरे सीताविशुद्धिः सीताया -रामपत्न्या विशुद्धिर्मार्गणम् अजयंत हरेः सुग्रीवस्य लोकः रामस्या. नुचरो वा गुणैः शौर्यादिगुणैः कं कं बलं सामध्ये विभवं प्रकाश न अधृत न धारितवान् तथाहि ऋयिकवणिजां आस्यादेवं मुखादेव हनु. मनमुखाद् स्थितिः जानकीस्थितिविदिता ज्ञातेति भावः ।। कृष्णपक्षे-हरिपतिरते: हरेः कृष्णस्य पतिः ज्येष्ठत्वेनाधिपतिः पलरामः तत्र रतिः राजविपयिका प्रीतिर्यस्य तस्मात् सैटात् आकाश. चारितो दूतात् सीतायाः मदिरायाः विशुद्धिःशोधनम् अजायत अभवत् क इत्याह कम् जलम् आलम्यते इति कालामे जलप्राये सपुण्यजने पवित्रजनसहित अबने सुरक्षिते रुचिरभवने मनोहरगृहे हरेः कृष्णस्य पलस वालोका गुणैः नौर्यादिमिः कं कं गुणं विभवश्च न अधृत न तुधाने ॥
माधामीविजयामृसरिप्रणीता साणी टीका, सर्ग-५ प्रतवान अतः कृष्णस्य स्थितिः क्रयिकवाणिजामास्सादेव विदिता ज्ञाता। तिश्रुमुपगता दीव्यद्रूपा सुलक्षणलक्षिता, सुरवलभृताम्भोधावद्रोपदीरितसद्गवी । सुररववशाद भिन्नाद द्वीपान्नतेन समाहृता, हरिपवनयोधर्मस्यात्रात्मजेयु--पराजये ।। ३६ ।। भन्धयः-श्रुतिमुपगता दीव्यदुपा सुलक्षणलक्षिता सुरबलभृता सम्भोधी अद्री पदीरितसद्गवी सुररववशात् भिन्नात द्वीपात् न तेन समाना हरिपवन- योधर्मस्य आरमजेषु पराजये ॥ २६ ॥ व्याख्या-श्रुतिमुपगता श्रुतिम् विख्यातिमुपगता प्राप्ता दीव्य- दूया प्रकाशवरूपा स्वच्छेति यावत् सुलक्षणलक्षिता सल्लक्षणलक्ष्या सुरवलभृता सुराणान्देवानां यदलं तत् सुरवलं भरयतीति अन्तर्भावि- तण्यर्थः देवबदलण्योजिका अद्रौपदी अद्री पर्वते पद्यते उत्पद्यते इति अद्रौपदी गंगा सा अम्मोधौ इच ममुद्रे इब ईरितमद्गवी ईरिता गतिविषयीकृता या सद्गवी सती शोभना चासौ गौः पृथ्वी चेति तथा जिनेन्द्रविहारप्रचारपरिपूता भूमिः सुरवशात् सुष्टु राजन्ते इति सुराः नृपास्तेषां रवः प्रार्थनाशब्दः तस्य वशात् तदनुकोल्याद भिन्नाव अन्यम्मा द्वीपात् प्रदेशात् नतेन नत्रेण समाहृता ममानीता कसिन इत्याह हरीति हरिः लक्ष्मीः पवनं पवित्रता वयोः लक्ष्मीशुद्धयोः धर्म- स्थ सुकृतेश्च आत्मजेषु प्रजावर्गेपु परं अत्युत्कृष्टं यजयं तसिन् अत्यु. स्मत्कटविस्तारायेत्यर्थः निमित्ते सप्तमी ॥ अथवा हरिपवनयोधर्मस्य पराजये अतिशयजयसंपादनाय आत्मजेपु कामेषु विषये पराजये नि- राकरणाय चेत्यर्थोऽपि श्लेषमहिना व्यज्यते ।। रामपक्ष-श्रुति श्रवणं उपगता लंकायां वर्तते इति विदितस- माचारा दीव्यद्रूपा प्रद्योतमानस्वरूपा सुलक्षणलक्षिता सौभाग्यलक्षण
महोपाध्यापश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्मानमहाकाये
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चती असुरवलभृताम्भोधौ असुराणां राक्षसानाम्बलमेवाम्भोषिर्दुस्तारः
सागरस्तस्मिन् अद्री पर्वते पदीय नदीव ईरितसद्गवी गमनविषयी
भूता भूमिः यथा पर्वतनदी समुद्रगता सती पुनर्निर्गमनाऽयोग्या भवति
तथेयमपि सीता राक्षससमुद्रगता पुनरावृत्तिदुर्लभैव जातेति भावः ॥
सुर इति सुरः ऐश्वर्य तस्य रयवशात् गर्वतः ऐश्वर्यगर्वतः भिन्नाव द्वीपाद
नतेन कौटिल्येन "नतमाविद्धं कुटिलमिति हैमः” भिन्नात् द्वीपाद
समाहृता आनीता हरिपवनयोः धर्मस्य आत्मजेषु हरिः सूर्यः पवनो
वायुः तयोः आत्मजः सुग्रीवो हनूमांश्च धर्मस्य आत्मजो रामः तेषु
सुग्रीवहनुमद्रामेंषु विपये पराजये पराभवायेत्यर्थः ।।
कृष्णपक्षे-श्रुतिमुपगता श्रवणपथपथिकायमाना यद्वा श्रुतिम्
नीतिशासमुपगताऽनुसृतादीव्यद्रूषा दीप्तिदात्री ओजोगुणान्विता सुल.
क्षणेन शब्दानुशासनलक्षणेन लक्षिता कृतानुसंधाना अथ च शब्दा-
स्पत्वेऽपि अर्थगरीयसी सुरवलभृताम्भोधा सुराणां देवांशभूतानां
पाण्डवानां बलभृते प्रोत्साहने अम्भोधा मेघरूपा वेति चाक्यालंकारे
द्रौपदीरितसद्गवी द्रौपदीकथितसद्वाणी सुररववशात् पाण्डववेगवशात्
देवांशपाण्डवसंवन्धात् यद्वा तदनुसारतः भिन्नात् अन्यस्माद्वीपात्
प्रदेशाद समाहता तदानीं दुःखावस्थायामपि वीरमहितेव प्रोक्ता हरि-
पवनयोः धर्मस्य आत्मजेषु अर्जुनभीमयुधिष्ठिरेषु पराजये उत्कृष्टजय-
निमित्ताय तेषु प्रोत्साहनमाधातुमित्यर्थः ।। ३६ ॥
सवितृतनये रामासक्ते हरेस्तनुजे भुजे,
प्रसरति परे दोत्येऽदित्याः सुता भयभराः ।
श्रुतिगतमहानादा-देवं जगनिजमग्रजं,
रणविरमणं लोभक्षोभाद्विभीषणकायतः ॥३७॥
NÀO AN भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टोका. सर्ग-५ भन्वय:- -हरे जे तनुजे सवितृतनये रामासक्ते परे दौरये प्रसरति दित्याः सुताभ यभंगुराः श्रुतिगतमहानादा: लोभक्षोभाद्विभीषणकायत: रणविरमणं देवम् निजमग्रज जगुः ॥ ३ ॥ व्याख्या-हरेजिनेन्द्रस्य भुजे भुज्यते इति भुजम् कर्म तस्य भोगादेव क्षयत्वात् नस्मिन् भोग्यकर्मणि तनुजे अल्पीभूते कशीभूते "तनुर्देहे मूत्तों अल्पे विरले कृशे चेतिशब्दस्तोममहानिधिः" सवित- तनये सूयते प्रकाश्यते इति मविता भावे उच्तम् तनोति विस्तारयतीति तस्मिन् प्रकाशविस्तारकारके विशेषत आत्मप्रकाशविस्तारके जिनेन्द्र रामे आत्मध्याने आसक्ते निमग्ने अत एव परे अत्युत्कृष्टे मोक्षे इत्यर्थः दौत्पे तकर्मणि प्रसरति ध्यानमेव मोक्षाय दूतकर्मकृदितिभायः दित्याः दातुं छेत्तुं योग्याः दित्याः सुताः मनसिजाः कामाः कामा- दयः भयभंगुराः भयभीता जाताः लोभक्षोभाद्विभीपणकायतः विभी- पणकायतः भयोत्पादककायोत्सर्गविधायकशरीगन जिनेन्द्रा लोभ- क्षोभात् लोभस्य तद्विपयकजयाशारूपस्य क्षोमात् आघातात् जयाशा त्यागात् प्रत्युत निजपराजयभीतेः श्रुतिगतमहानादा भयादेव महा- शब्दकारका दीर्घविराविणः रणविरमणम् जिनेन्द्रतो विग्रहनिवर्तनम् निजमग्रजमग्रेसरं देवं द्योतनात्मकं मोहराजम् जगुः निवेदयामासु जिनेन्द्रेण सह संग्रामनिवर्तनाय प्रार्थनां चक्रुरित्यर्थः ॥ ३७॥ अर्थनिवन्धनेयं संक्षेति देवस्याप्यकथितकर्मवाद्वितीया । रामपक्षे–मवित्तनये सूर्यपुत्रे सुग्रीवे रामामक्ते रामाधीने रामपक्षाश्रिते हरेर्वायोस्तनये पवनञ्जयपुत्रे हनुमति भुजे वाही परे महति दौत्ये दूतकर्मणि प्रसरति विलमति दिल्याः मुताः दैतेयाः गक्षसाः भयभंगुराः त्रामभुनाः श्रुतिगतमहानादाः आकर्णितमहानादाः हनु- मत इति शेषः यद्वा युद्धाय मन्नीभूतानां श्रुतिगतमहाशब्दाः विभी.
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाण्ड AAMW पणकायतः विभीपणस्य कायतः वाक्यतः लोभक्षोमात् लोमस्य स्वात्मनि पुत्रादौ योऽमिनिवेशस्तस्य क्षोभात् प्रमरतः अथवा लोभः ममता क्षोभः भयादस्थैचित्तचाश्चल्यं तयोर्द्वन्द्वः तस्मात् रणविर- मणम् संग्रामनिवर्त्तनम् निनम् स्त्रीयम् अग्रजम् अग्रगण्यम् प्रभु- मित्यर्थः देवं रावणम् जगुः निवेदयामासुः रामायुद्धं न विधातन्य- मिति विभीषणमुखात् कथयामासुरित्यर्थः ॥ ३७॥ कृष्णपक्षे-युद्धाय समागतं जरासंधं हंसको मन्त्री प्राप्तकालं निवेदयति सवितनय इत्यादि । मवितृतनये सूर्यपुत्र कर्णे रामे बलरामे असक्ते असमर्थे अप्रभवति रामसन्निधौ कर्णो न किञ्चित्कर इति भावः यद्वा रामेण परशुरामेण गुरुणा अमक्ते युद्धसमये विद्या- विस्मरणरूपदत्तशापे सति एतेन म कथंचिदपि युद्धाय न सक्त इति व्यज्यते परे महति हरेः कृष्णस्य तनुजे पुत्रे भुजे भुनक्तीति भुजस्त- स्मिन् भोगशालिनि अथवा भुजे बले प्रसरति विलसति दौत्ये शोमकराजकर्तृकदूतक्रियायां अदित्याः देवक्याः मुताः कृष्णादयः भयभगुराः भयं जरासन्धजन्यं त्रासं मगुरयन्ति प्रतिनिवर्तयन्तीति तथा निर्भयाः सन्तीतिशेपः श्रुतिगतमहानादाः आकणितकृष्णसैन्य. सिंहनादा: लोभक्षोभात् लोभात् शरीरमोहात् क्षोभात् कृष्णेन सह संग्रामो मया कथं विधेय इति मनोदौर्बल्यात् यद्वा अवश्यंभावी पराजय इति क्षोभात् विभीषणका यतः अतिकृष्णत्वेन यद्वा भय- जनकत्वेन कृष्णतः संग्रामविरमणम् युद्धनिवर्तनम् निजम् स्वकीयम् अग्रजम् अग्रगम् देवम् राजानम् जरासंधम् जगुः व्यजिज्ञपन् कथयामासरित्यर्थः ।। ३७ ॥ हरिरपि परावृत्या वद्धस्तदेन्द्रजितात्मना शिरसि चरणाधानाद् वाताङ्गजः प्रतिवासवम् ।
भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ सपदि सभयं चके वके विधौ दिनशङ्कया लघुरपि गिरा वैदेह्यङ्गे समुद्रशेक्षितः ॥ ३८॥ भन्वय:-इन्द्रजितात्मना तदा परावृत्त्या हरिरपि यद् शिरसि चरणाधानात् प्रतिवासवम् वाताङ्गजः चक्रे विधौ दिनशया सपदि सभयं चके समुदहशा गिरा वैदेयंगे लघुरपीक्षितः ॥ ३८ ॥ व्याख्या-इन्द्रजितात्मना इन्द्रं परमैश्वर्यम् जितः आत्मा यस्य स इन्द्रजितात्मा तेन जिनेन्द्रेण तदा परावृत्या पौनःपौन्येन हरिरपि कामोऽपि बद्धः निरुद्धः यदा यदा स प्रभवति तदा तदा प्रतिहत: कृत इति भावः शिरसि चरणाधानात् शिरसि मूर्ध्नि चरणस्य चारित्र्य- स्य आधानात् स्वीकारात् "चरित्रं चरिताचारौ चारित्र्यचरणे ह्यपीनि- हैमः" प्रतिवासवम् प्रतीन्द्रम् वाताङ्गजा आसनकम्पहारा देहकम्पः सपदि तदानीमेव सभयम् भयभीतम् चक्रे विदधे चक्रे विधौ दिन- शङ्कया यदीयप्रभावेनासनकंपो जातस्तस्य के विधौ सति दिनशङ्कया छेदनशङ्कया तमवश्यं छत्स्यामीति शङ्कया वै इति वाक्यालंकारे देह्यने देहिनामझे लघुरपि शीघ्रमेव समुद्रशा अवधिज्ञानेन ईक्षितः दृष्टः कम्पनहेतु: अवधिज्ञानेन ज्ञात इत्यर्थः ॥ रामपक्षे-प्रतिवासवम् रावणप्रति शिरसि चरणाधानाद रावणम- स्तके पादप्रक्षेपात् विजगीषुणा शत्रुनगरप्रवेशे प्रथमं दक्षिणपादन्यासो विधीयते स च शत्रुमूर्ध्नि पादन्यासो भवतीति युद्धशाखवेदिनः, कृत्वा- मूर्मि पदन्यासं, रावणस्य दुरात्मन इति वाल्मीकीयरामायणे" हरिरपि कपिरपि वातागजः हनूमान् इन्द्रजितात्मना मेघनादेन परावृत्या भूयो भूयःबद्धः संयमितः वैदेागे सीताङ्गे समुद्र दृशेक्षितः दीनदृष्टया दृष्टः लघुरपि तुच्छोऽपि दिनशङ्कया भयगड्या के विधौ मपदि समयं लावासिनं चक्रे विदधे ।।
२६८ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये AN A कृष्णपक्षे-इन्द्रजितात्मना परमैश्वर्यमधिकृता कृष्णेन हरिरपि कालीयोऽपि कंसससा नागः परावृत्त्या पद्धः संयमितः वाताङ्गाना भीमसेनः प्रतिवासवम् वसु अस्यास्तीति वामवो नृपः तम् प्रति विपक्ष- नृपं प्रति दुर्योधनादिकमुद्दिश्येत्यर्थः शिरसि चरणाधानात् मूर्ध्नि पद- न्यासात् वक्रे विधौ वामे विधौ अदृष्टे सति वै इति वाक्यालंकारे देह्यते समुद्रदशा समुद्र विजयवात्सल्यदृशा ईक्षितः अवलोकितः लघुरपि कनीयानपि भीमः गिरा बाचा सभयं भयभीतम् दुर्योधनादिकम् चके विदधे ॥ ३८॥ सुमनसि मनोवृत्तिनव्योपकारविधौ भवेत् तदितरमनोवृत्ति व्यापकारविधी भवेत् । परसुरगति लब्ध्वा पूर्वः सुखं विलसत्यहः परशुरगति लब्ध्वा पूर्वः सुखं विलसत्यहः(?) ॥३९॥ अन्यय:- नव्योपकारविधी सुमनसि मनोवृत्तिर्भवेत् नग्यापकारविधी तदितरमनोवृत्तियेत् पूर्व परसुरगति रवा अहः सुखं विलसति अपूर्वः परशुरगति रव' अहः सुखम् विलसति ॥ ३९ ॥ व्याख्या-नव्योपकारविधौ नव एव नव्यः स्वार्थे यत् स- चासौ उपकारश्चेति नव्योपकारः तस्य विधौ विधाने नूतनोपकारकरणे सुमनसि मुष्ठु मनो यस्मिन् तस्मिन् निर्मलान्तःकरणे मनोवृत्ति- व्यापारो भवेत् निर्मलहृदय एव उपकारविधिः प्रवर्तत इति भावः नव्यापकारविधौ नूत्नाऽपकारविधौ विरोधविधौ तदितरमनोवृत्तिः तदितरस्मिन् कलुपितान्तःकरणे घृत्तिरभिनिवेशो भवेत् जायेत तथाहि पूर्वः सुमनसि मनोवृत्तिः परसुरगतिं लब्ध्वा परा अत्युन्नता या सुर- गतिर्देवगतिस्ता लब्ध्वा देवगति प्राप्य सुखम् निरुपद्रवं यथास्यात्तथा अहः दिनम् विलसति गमयति अपूर्वः परः तदितरमनोवृत्तिः कलु- भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-५ पितान्तःकरणः परशुरगतिम् परस्मात् सूर्यते इति मुर: भावेऽप् तस्य गतिं मरणं लब्ध्वा आसाथ अह इति खेदे सुखम् सुष्टु सम्बिपये- न्द्रियम् वैपयिकेन्द्रियवैधुर्यम् विलसति विपयसुखादिकमपि न लभते मृत्वा दुःखमापद्यत इति भावः ॥३९॥ संविषयीन्दियमितिहमः साधारणाभिधेयतया सर्वपक्षसाधारणमदो व्याख्यानम् ॥ अतुलवलवान् मौनी वृत्त्या पराजितयाजनि जनितजनतानन्दो मन्दोदरीरमणे रते । किमुत महसा दीनं हीनं मलीनविधेशात सवलमवलं कर्ता रक्षोगणे शरणे रणे ॥४०॥ भन्वय.-अतुलयलवान् मौनी जनिवजनतानन्दः भमन्दः दरीरमणे रते रक्षोगणे शरणे रणे मलीनाविधेशात् महसा दीन हीनम् अपलम् सबलम का मजनि ॥ ४०॥ व्याख्या-अतुलबलवान् निरतिशयाध्यात्मिकशक्तिशाली मौनी मौनव्रतधारकः जनितजनतानन्दः अनित उत्पादितः जनतायाः जनसमूहस्य आनन्दः मुसं येन स अमन्दः अनलसः स्त्राचारपरि- पालनपटुः अपराजितया सर्वसहिष्णुतया त्या सर्वहितकारिकयेत्यर्थः दरीरमणे गिरिकन्दरारमणे रते अनुरक्त रक्षोगणे शरणे राक्षसजने गृहे "शरणं गृहरक्षिोरित्यमरः" अरणे शन्दरहित विपये पशुपक्ष्यादि. विपये अनुकूलेऽननुकूले वा विधिनिषेधरहिते किमुत किश्श महसा तेजसा हीनं तेजोहीनमत एव दीनं दुर्बलम् कृत इत्याकांक्षायामाह मलीनविधेर्दुरदृष्टस्य वशात् अधीनतः अपलम् निर्यलम् सबलम् रक्षा- विधायकत्वात् पलवन्तं कर्ता अनि अभूत् प्रमोः प्रमावाद परस्पर- विरोधपरिहारेण निर्षलोऽपि सक्लो मस्तीति मात्रः ॥ ४०॥ रामपक्षे-मन्दोदरीरमणे मन्दोदर्या रमणे रावणे रते अनुरक्त रक्षोगणे राक्षससम्हे शरणे गृहे समीपेरणे संग्रामे मलीनविधेर्दुरदृष्टस २७० महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरधिते सप्तसम्धानमहाकावे NRNAMA - AMRAAN वशात् प्रभावात् महसा हीनम् निस्तेजस्कम् अत एव दीनम् दैन्य- मुपगतं समलम् ससैन्यम् रावणम् अतुलपलवान् अपरिमितपराक्रम- शाली मौनी मुनिव्रतवान् जनितजनतानन्दः विरचितलोकसमुदाय- सुखः रामः अवलम् दुर्वलम् कर्चा अजनि दुर्वलविधायकोऽभूत कये- त्याह अपराजितया अपरामुखया वृत्त्या अच्छलेनेतिभावः ॥४०॥ कृष्णपक्षे-रक्षोगणे शरणे राक्षसजनावलम्बेरणे असंग्रामे मन्दो. दरीरमणे मन्दम् कशम् उदरं यस्याः सा मन्दोदरी जीवद्यशा जरा- संधदुहिता तस्या रमणे वल्लमे कंसे रते विरते मृते सति जनितजनता. नन्दः कृतलोकाहादः मौनी मौनव्रतवान् अतुलबलवान् विपुल- पराक्रमशाली कृष्णः अपराजितया वृत्या कदाचिदप्यपराङ्मुखपृच्या मलीनविधेर्वशात् महासा हीनं दीनम् अबलम् दुर्यलम् यादवम् कंस- भयादितस्ततो भ्रमन्तम् सवलम् पलसहितम् कर्ता अजनि सपलवि. धायको जात इत्यर्थः ॥४०॥ अमृतमपि तन्मन्यो(रादभूदमृतव्रता- दमृतमदधात् स्वस्मिन्नेवं परात्मनि तुष्टये । अमृतरुचिवदेवोऽपूर्वो यशोऽनुदिशं नय- दमृतनिधिना यन्मर्यादा ययौ ससुतां भुवम् ॥४१॥ अन्वयः-मन्योः अमृतवतात् तत् अमृतमपि दूरात् अभूत् अमृतम् स्वस्मिन् परास्मनि तुष्टये अधात् अपूर्वो देवः अमृतरुचिवत् यशः अनुदिशम् मयत् स अमृतनिधिना यन्मर्यादा तां भुवम् सु ययौ ॥ १॥ व्याख्या-मन्योः मन्यते जनैरितिमन्युः मन्यतेरौणादिको युः तस्मात् जगन्मान्यात् अमृतवतात् अमृते मोक्षे व्रतं नियमो यस्य तस्मादमृतव्रताद अमृतम् अयाचितं वस्तु दूरादभूत् दूरगतम् अया- भाधार्यनीधिजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ २७१ चितस्यादचादानत्वेन पापजनकत्वात्सर्वथा तं जहावित्यर्थः खस्मिन् परात्मनि तुष्टये अमृतम् जलम् अधात् धृतवान् अमृतरुचिवद् चन्द्र इव अपूर्वो देवः सर्वोत्कृष्टो देवो जिनेन्द्रः यश अनुदिशम् प्रतिदिशम् नयद म जिनेन्द्रः अमृतनिधिना समुद्रेण यन्मर्यादा आश्रितेतिशेष: मु इति पादपुष्टौ ता मर्यादाम् भुवमतिशयाम् ययौ प्राप समुद्र इव गांभीर्य आसीदिति भावः ॥ ४१ ॥ रामपक्षे--तन्मन्योः तस्य रावणस्य मन्योः क्रोधात अमृत- व्रतात् अमृतं बतयतीति अमृतवतः अमृतमोजी देवस्तस्मात् दरात अभूत् पृथक् अभूत् रावणभयात्तेपाममृतं दुर्लभ ययौ स्वस्मिन् स्व. शरीरे एवम् परात्मनि पुत्रादौ तुष्टये सुखेन जीवनाय अमृतम् अम- रणम् अधात् कदाचिदपि न म्रिये इत्येवं निवयमकत नाधिकारः कृतान्तस्य दशकंधरमन्दिरे इन्यमियुक्तोक्तेः अपूर्वः अतुलपराक्रमः देयो रावणः अमृतरुचिरिव चन्द्र इच अनुदिशं प्रतिदिशं यशः नयत् प्राख्यापयत् स रावणः सु सुष्टु यथास्यात्तथा अमृतनिधिना सागरेण यन्मर्यादा पस्या मर्यादा सीमा तां भुवम् वागी भूमिम् लंकां ययौ तन तस्थौ ॥४१॥ कृष्णपक्षे- अमृतवतात् अमृतमयाचितं चतयति निवर्तते इति अमृतवतस्तस्मात् मन्योः मान्यात कृष्णात् अमृतं जलम् दगद अभूत द्वारकानिर्माणाय जलं दगतम् अमृतम् देवम् स्वस्मिन् एवम् परा. स्मनि तुष्टये अधात् अस्थापयत् "अष्टोत्तरशतेनोचेंजिनपिम्पैविभू- पितम् मेरुनमिवोत्तुद्गमणिरत्नहिरण्मयमितिनचरित्रे" अमृतरुचि- बत् अमृताशुरिव अपूर्वो देवः कृष्णः यशः अनुदिशम् नयन पन्मर्यादा पदीपनगरसीमा अमृतनिधिना सागरण अकृतेति नेपः मुगुष्टुतां भुषम् दारको पपो अध्यवास ।। ४१ ॥
२७२ महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्धानमहाकाये PvA Mw www. www चलमविरलं तेनोद्योगात् तदा विरलं कृतं विविधविषयव्यामोहस्य व्यपासनतापसात् । प्रकृतिशिशिरं दृष्ट्वा स्वस्योपदेशविधिं ततो जनपदमपि प्राहुस्तीथं तदा कलिकुण्डिनम् ॥ ४२ ॥ अन्वयः-विविधविषयव्यामोहस्य ग्यपासनतापसात् तेन उद्योगात् अविरलं बलं विरलं कृतम् स्वस्य प्रकृतिशिशिरम् उपदेशविधि रटवा तदा कलिकुण्डिनं जनपदमपि तीथं प्राहुः ॥ ४२ ॥ व्याख्या-विविधविषयव्यामोहस्य विविधविषये अनेकविपये वस्तुनि यो व्यामोहः प्रेमा अभिरुचिरित्यर्थः तस्य यद्वयपासनम् दूरीकरणम् परित्याग इति यावत् तस्मै व्यपासनाय यस्तापसस्तप- श्वरणम् तस्मात् मोहनिवारकत पोऽनुष्ठात् तेन जिनेन्द्रेण प्रभुणा तदा साधुत्वदशायां अविरलं निविडम् बलम् सैन्यम् राज्यावस्थानुकूलं सैन्यादिकम् कामक्रोधादिविषयवलम् वा विरलम् कुशम् कृतम् तनूकृतम् स्वस्य आत्मनः प्रकृतशिशिरम् स्वभावशीतलम् उपदेश- विधि प्रवृत्तिविधिमाचारमित्यर्थः दृष्ट्वा विलोक्य तदा जिनेन्द्रसमा- गमदशायाम् जनपदमपि यसिन् प्रभुस्समेति तनगरमपि कलिकुण्डि- नम् कलिनिवारकम् कलिदाहक वा तीर्थम् तीर्थभूतमतिशयपावन- मित्यर्थः प्राहुः प्रोचुः जना इति शेपः ॥ ४२ ॥ रामपक्ष-विविधविषये राज्यकालिकाने कस्रक्चन्दनादिविला- सहस्त्यश्वादिपदाथै यो व्यामोहो ममत्वबुद्धिस्तत्तद्विषयकाभिनिवेश- स्तस्य यद्वथपासनं निरसनम् तदेव तपः व्रतम् तत्र साधुः तापस- स्तस्मात् अनेकमनोहरवस्तुनिरसनतपोयोगात् तेन रामेण उद्योगात् उद्यमात् विरलम् विच्छिन्नम् असंचितमित्यर्थः बलम् वानरीय- सैन्यम् अविरलम् निबिडं घनीभूतं संचितमिति यावत् कृतं विरचितम् आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ AAN स्वस्य स्वकीयस्य उपदेशविधिम् विधीयते यत्र स विधिः देशस्य समी पमुपदेशम् तयोः कर्मधारय इति विधियमानदेशम् स्वशासन- शासितभूप्रदेशम् प्रकृतिशिशिरम् स्वाभाविकनिर्मलं दृष्ट्वा तदा दर्शन- दशायां कलिकुण्डिनम् कलिनिवर्तकं जनपदमपि नगरमपि तीर्थम् तीर्थभूतम् प्राहुर्जगः ॥ १२ ॥ कृष्णपक्षे-विविधविपयव्यामोहस्य अचिरसमारेसितनिज- नगरवस्तुजातसंपादनरूपचिन्तनस्य व्यपासनम् व्यापनमेव तप- श्चित्तैकाय्यता तदेव तापसस्तस्मात् हेतोः तेन कृष्णेन उद्योगात् प्रयासात् व्यापारविशेषात् विरलम् छिन्नभिन्नम् बलम् यादवसैन्यम् अविरलम् सन्नद्धं दुःपय कृतम् विधापितम् स्वस्प स्वकीयस्य उपदेशविधम् निवासभूमिम् प्रकृतिशिशिरम् स्वतो निर्मलं दृष्ट्वा कलि- कुण्डिनम् पापनिवारकम् जनपदम् द्वारकापुरम् तीर्थम् पूतम् प्राहुः कथयन्तिस्म ॥ ४२ ॥ तदनु जनपे क्षित्या हत्या न-मेऽस्तु हरेररे- स्तदपि वचता वक्र चक्र विमोक्ष्यति का गतिः। हतनिगरणात् तेनास्तेनाऽमुनाऽनलके मते दिवि सुमनसां वृष्टि विन्यहो शिरसो नतेः ॥४३॥ भन्वयः-जनपेक्षित्या हरेः भरेः मे इत्या न अस्तु वचसा तदपि य पर विमोक्ष्यति का गतिः इतनिणरणात् अस्तेन तेन अमुना भनलफेमते शिरस उपरि रतेः दिवि सुमनसा पृष्टिमांयिनी ॥ ४॥ पाख्या-तदनु तत्यात् जनपेक्षित्या जनान् पाति रक्षतीति जनपः जनरक्षकः तस्य ईक्षितिरीक्षणम् तया जनरक्षकदृष्टया हरे काम- स्य अरेः विनाशकस्य जितकामस्य मे मम हत्या जीवहिंमा न अस्तु नैव- भवतु वचमा तदपि वचनेनापि तद् हिमानम् नासुन न कायेन नच २७४ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकावे ~ AM . बाचेत्यर्थः वचसापि तद् वचनेनापि हिंसनम् कर्तृ वक्र कुटिलम् चक्रम् विमोक्ष्यति चक्रप्रहारं करोतीति भावः ' संभावनायां लद् अत्र विपये का गतिः क उपायः अनिवार्यमेतदित्यर्थः अत इनि शेषः हतनिगरणात् हतस्य हतगब्दस्य निगरणात् निगालात् सर्वथा अन्य- वहारान् अस्तेन अस्तभूतेन अदर्शनेनेत्यर्थः अमुना हतशब्दनिगरणेन तेन हेतुना अनलके मते अनल एवानलकस्तस्मिन् अनिरूपे मते यथा- ऽनिच्छयापि स्पृष्टोऽग्निर्दहति तथा हतशब्दप्रयोगोऽपि रदृष्टम् जनय- तीति भावः अन एव नतेर्ननस्य मर्वत्र कृतमैत्रस्य शिरसो मूळ उपरीति- शेषः दिविसुमनमां देवकुसुमाना अहो इत्याश्चर्य वृष्टिः वर्पणम् भाविनी संभाविता सर्वत्र नतान् देवा अप्यनुगृह्णन्तीतिभावः ।। ४३ ॥ रामकृष्णपक्षे–हरेः मे हरिनाम्नो मम जनपेक्षित्या जनरक्षक- दृष्टया लोकपालकत्वेन अरेः शत्रोः हत्या हिंमा न अस्तु नैव स्तात् शेपं पूर्ववत् ।। ४३ ॥ शृणु मम वचो राजन् ! मुश्चारुचिं वसुधासुतां कुरु गुरुकुलं नानीताबाकुलं धनसंकुलम् । इति लघुगिरा क्रुद्ध युद्धे स्थिरे स-दशानने बलमलभताऽस्योपास्यायै गणेण विभीषणः ॥४४॥ वसुधामुनाम् महाचं मुश्च ना नीती भ कुलम् धनसंदरम् कुरम् पुरु इतिग्घुगिरा स दशानने क्रुधे युद्ध स्थिरे सनि भन्यो। पाम्याप गणेन रिभीपग परम् भरभत ॥ १४ ॥ व्याख्या-हे राजन् ? देदीप्यमानप्रभो? जिनेन्द्र ? वसुधासु बमु रश्मि धारयतीति वसुधा तीक्ष्गतेोधारणशक्तिः तासु तीक्ष्णतेजोधा- रणासु ताम् प्रसिद्धामतिमवितामित्यर्थः अरुचिम् अप्रीतिम् मुन्न त्यज अन्यथाऽतिमदोम्ने मोहादिः परामरं कुर्यादितिभावः अत एव धनसं. भन्य-दराजन् भाचार्यश्रीविजयामृतत्रिमणीता सरणी टीका. सर्ग-५ कुलम् तपोधनव्याप्तं गुरुकुलम् चारित्र्यम् अनीती मोहराज्यनीती मोहा- दावित्यर्थः न कुरुन विदधीहि इति लघुगिरा अल्पस्मारणेनैव सदशा नने सर्वतो मावे केंद्र युद्धे मोहगजेन सह युद्धे स्थिरे निचले वीरायि- ते प्रभो गणेन स्वीयधैर्यादिगणेन विभीषणः मोहाज प्रतिभयानका बलम् आभ्यन्तरिकपलम् अलभत अप्राप्नुत ॥ ४४ ॥ रामपक्षे-हे राजन् । नृप भ्रातः ? राजने सदमद्ग्रहणेन शोभते इति राजा तत्संबुद्धौ अनेन उपदेशताहता तस्मिन् व्यज्यते मम यौनसम्बन्धिनः न तु मंत्रिण एव ते च भयादितः कदाचिन सदु- पदिशन्ति अहन्तु न तथेति गर्वः वचः अचनम् सदुपदेशं शृणु समाकर्णय किमिन्याशंक्याह मुश्चेति अरुचिम् नास्ति रुचिः रावण- विषयकामिलापो यस्सा मा अरुचिस्लाम् यद्वा न रोचते जनेभ्यः पर- स्त्रीत्वाचा ताम् अप्रमन्नाम् अननुरागिणीमित्यर्थः वायुधामुताम् भूमि तनयाम् जानकीम मुञ्च त्यज तद्विषयकाभिलापं मा कुरु तथाहि धन. संकुलम् धनेन सर्वसंपन्या संफुलं समृद्धम् गुरुकुलम् मातोऽवदात्तं निजवंशम् अनीतो परखीघर्षणरूपान्याये आकुलमस्तव्यस्तम् विषद्- प्रस्वम् न कुरु न विदधीहि इति उक्तरूपम् लघुगिरा लघोः कनिष्ट- भ्रातुः गिरा वचनेन यद्वा लघुगिरा क्षुद्रवचनेन कायरजनपचनीय. वचनेन क्रुद्ध सद्यः कोपममाविष्टे युद्ध संग्रामविपये स्थिरे निश्चले दशानने राणे मति यावत् प्राण न दास्यामि मैथिली भीतभीतवदिति- कृतनिश्चये स विमीपणः अस्य समस्य उपास्याय सेवाय अबलम्बनाय गणेन स्वीयपरिवारेण अस्य रामस्य पलम् मैन्यम् अलमत अप्रामोद रामसंगतोऽमनत् ।। ४४ ॥ कृष्णपक्षे-कंमधसंतप्तो जगसंधः कृष्णानयनाय मोमकं राजानं समुद्ररिजयादिकं प्रति प्रेषीत म च तं मन्याह "कृष्विति" ।
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये. हे राजन् ! समुद्रविजय ? अस्य मम वचः जरासंधसंदेशरूपम् शृणु अवधारय मुश्च कृष्णमिति शेषः जरासंध प्रति कृष्णं प्रहिणु अथ च अरुचि कृष्णत्यागरूपं वैमनस्यं मुञ्च त्यज वसुधासु स्वकीय- राज्यभूमिपु ता कृष्णप्रीतिम् कुरु कृष्णाऽत्यागात् राज्यहरणमवश्य- म्भावीतिभावः गुरुकुलम् महद्यादववंशं धनसंकुलं धनधान्यममृद्धं अनीतौ कृष्णाप्रेपणरूपापराधे आकुलम् विपर्यस्तम् विपद्ग्रस्तम् न कुरु न निधेहि इति लघुगिरा नीचवाक्येन स समुद्रविजयादिः दशानने दशदिशि सर्वतः क्रुद्धे युद्धे स्थिरे गणेन सैन्येन विभीषणः भयानकः अस्य जरासंघस्याऽपास्यै निरसनाय बलं सैन्यम् अलभत अचिन्त्रत ॥४४॥ अवगमनतः पुत्री जीवद्यशा अवशाऽवदद् मनसि चरितं मत्वा भूपः प्रयाणमधात् पुरः। त्रिभुवनगुरोः स्मृत्या दूष्यर्विभूष्य हयद्विपं सपदि पदिकानग्रे कृत्वा ययो विजयाशयः ॥४५॥ भन्वय - भगमनत पुत्री जीवद्यशा भवदत् भवसा भूप. मनसि चरित माया पुर प्रयाणम् अधात् त्रिभुवनगुरो स्मृत्वा हयद्विप दूर्यर्विभूप्य विजयाशय पदिकान् अप्रे कृत्वा ययौ ॥ ४५ ॥ व्याख्या-अवगमनतः अवगम्यतेऽनेनेति अगमम् ज्ञानम् तस्मिन्नतो लग्नः इति अप्रगमनतः ज्ञानसंलग्नः पुत्री पुनात्यात्मानमिति तथोक्तः आत्मकल्याणकारकः जीवत् त्रिकालपर्तमानं यशः कीर्ति- यस्य स जीपयशा स्थिरकीर्तिः अवसा नास्ति वसो उमनं यस्य स शमपोरक्या , अवदत् प्रयोजनातिरिक्तवचनरहितः भूपः भुत्रम् भूमिस्थजीवम् पातीति भूपः जीवजातरक्षकः मनसि चित्ते चरित मतकर्मचेष्ठित मन्वा बुघा "चरितमनुष्ठाने सचारे प्रतकादौ चेष्ठिते २७७ MAN भाचार्यश्रीविजयामृतत्रिमणोता सरणी टीका, सर्ग-५ लीलादाविति शब्दस्तोममहानिधिः" प्रयाणं विहारम् पुरः अग्रे अधाद अकृत हयद्विपम् हये मागे "हयो घोटके पथि चेति शब्दस्तोममहा- निधिा" द्विपम् द्वाभ्यां कराम्यां पिचतीति तम् जिनेन्द्रस्य करपात्र- स्वात् हये मार्ग स्थितं द्विपम् हयद्विपम् दृष्यैर्देवदृष्यदेवपटैर्विभूष्य विभूपितमित्यर्थः त्रिभुवनगुरोः स्मृत्वा कर्मणोऽविवक्षया पष्ठी त्रिभु- वनगुरुं स्मृत्वा विजयाशयः कामादिविजयेच्छुः पदिकान् पादचार- कान् मुनीन् अग्रे कृत्वा अग्रेसरं विधाय ययौ चचाल ॥ ४५ ॥ रामपक्षे-पुत्री जनकपुत्री जीवधशा जीवन सफलीभवत् यसः प्रयत्नो यस्याः सा प्रयत्नलम्या इति अवगमनतः ज्ञानतः कथं- भूता अवशा परवशा इति मनसि हृदये चरितं तदीयचेष्टितं मरवा युध्धा पुरः अग्रे प्रयाणम् अधात् अकरोत् त्रिभुवनगुरोः स्मृत्वा त्रिभुवन- गुरुं स्मृत्वेत्यर्थः जिनेन्द्रं संस्मृत्य हयद्वियं हये मार्गे द्विपमिवेति गज- सनिभं अष्यैः शोभनर्विभूष्य अलंकृत्य सपदि शीघं पदिकान् पाद- चारान् अग्रे कृत्वा अग्रेसरं विधाय विजयारायः जयाभिलापी सन् ययौ जगाम ।। ४५॥ कृष्णपक्षे-अवगमनतः यवनद्वीपादागतैः कैश्चिद्वणिरिमार- कापूाँ मम पत्युविनाशकारी कृष्णो जीवतीति लानतः अवशा शोक- परवशा निजशत्रुजीवनश्रवणेन समधिकशोकममा पुत्री मगधराज. कन्यका जीवद्यमा तदमिधाना अवदत् कृष्णकृत्तान्त स्वपित्रे न्यवेद. यत् ततः विजपाशयः विजयामिलापी भूपो जरासंघः मनसि चरितं मत्या मनसि स्वहृदये चरितं निजजामानहननरूपं कृष्णवृत्तान्तं मत्वा विचार्य पुरः अग्रे तत्क्षणमेव प्रयाणम् पात्रामधात् अकृत त्रिभु- बनगुरोः जिनेन्द्रस्य स्मृत्या स्मरणेन दपर्वस्वनिर्मितगृहः हयद्विपम् हयाय दिपाश्चेति हयद्विपम् सेनाइत्वादेकवद्भावः विभूप्य मण्ड- महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये यित्वा सपदि शीघ्रम् पदिकान् पादचारिसैन्यान् अग्रेकृत्वा पुरवो विधाय ययौ द्वारका प्रति चचाल ॥ ४५ ॥ क्वचन फलितारामे रामे विराममना रिपो- विनतशिरसां राज्ञां जैनोपहारविधि दधत् । चलति तु रजश्चक्रे केतुं श्रिया हरिदम्बरा- वरणकरणैः साक्षाद्रेजे क्षमाधनदर्शने ॥ ४६ ॥ अन्वय.-कचन फलितारामे रामे रिपोविराममना बिनतशिरसां राज्ञा जैनोपहारविधि दधत् चलति तु रजः हरिदम्बराबरणकरणः श्रिया केतुं चके क्षमाधनदर्शने साक्षानेजे ॥ ४६ ॥ व्याख्या-रिपोः शत्रोः विराममनाः विरामे विजये मनो यस्य स शत्रुरूपकर्मादिविजयकामुक कचन कुत्रापि रामे मनोहारिणि फलि. तारामे फलितः संजातफलो य आरामः उपवनम् तस्मिन् फलान्वित. चाह्योद्याने विनतशिरसां विशेषेण प्रभुगत भक्त्या नतानि नम्राणि शिरांसि येषांतेषां राज्ञां नृपानां जैनोपहारविधि जैने जैनशासने य उपहारा उपढौकनानि वन्दनानि वासाधुपयुक्तान्यनुमत्यादयस्तेषां- विधि विधानं दधत् धारयत् स्वीकुर्वन् चलति विहरति सति विहारकाले रजः पादोत्थितरजः हरिदम्परावरणकरणः हरिश्च अम्बरञ्च हरि- दम्बरे तयोरावरणकरणैः आच्छादनकारकैः दिगाकाशावरकैः हेतुभिः श्रिया शोमासंपत्या केतुं चक्रे पताकां विदधौ प्रभोः माध अनेकेषां साधूनां विहरणात् रजोबाहुल्येन दिगन्छादकत्व- मिति भावः क्षमाधनदर्शने मुनिजनदर्शने साक्षात् सद्यः रेजे शुशुमे तुतोप ॥ ४६॥ रामकृष्णपक्षे-विराममना रिपोः रिपुदमनेच्छस कृष्णस्य च कचन फलितारामे रामे फलान्विते मनोरमे उपवने विनतशिरमा नवकंधराणाम् राज्ञाम् भूपानाम् सकासात् जैनोपहारविधिम् जैनw M भाचार्यश्रीविजयामृतमूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ सपर्याविधिम् दधत् विधापयत् अथवा बिनतशिरसां राज्ञां जैनोपहा रविधिम् जैनप्रशस्तोपहारविधिम् उपढौकनानि दधत् धारयत् क्षमा धनदर्शने साधुसमागमे साक्षात् सर्वात्मनो रेजे चलति तु सैन्येन सह प्रचलति सति रजः सैन्यपदोस्थितधूली हरिदम्बराबरणकरणैः दिगाकाशाच्छादकैः श्रिया केतु चके केतुं विदधौ ॥ ४६ ।। क्वचन रचयन् वन्यान् धन्यान् वदान्यधिया धन- रनुपदभुजि स्थाने वृष्टैर्हिरण्मयसाधनैः । जनपदगतं स्वैरं वैरं हरन् विहरन्निति प्रभुरनुपमच्छायं कायं दधौ कलधोतरुक् ॥ ४७ ।। भन्यय:-कचन अनुपदभुजि स्थाने हिरण्मयसाधनैः वृष्टः धनैः वदा. न्यधिया वन्यान् धन्यान् रघयन् विहरन् जनपदगर स्वैरं वैरं हरन् कलधौ- तरुक् प्रभुः अनुपमच्छायं कायं दधौ ॥ ४० ॥ व्याख्या-वचन कुत्रापि अनुपदभुजिस्थाने भुज्यते इति भुजि : ज्यम् तस्य स्थाने भिक्षालाभस्थाने यत्र प्रभोमिक्षा मिलति तत्र स्थले हिरण्मयसाधनैः स्वर्णमयकृतः काश्चनप्रचुरैः पृष्टैः पृष्टिभूतैः देवेन्द्र- कृतस्वर्णरत्नादिवृष्टिमिः धनैः अन्नप्रचुरैश्य संपद्भिः चन्यान् बने तदा- लये भवान् वदालयगतान् यत्र जिनेन्द्रागां मिक्षा मिलति तदालय- गतानित्यर्थः “वनम् वृक्षममुदाये जले निवासे आलये चेति शब्दस्तो. ममहानिधिः" अथ च वन्यान् आरण्यकान् वदान्यधिया अत्युदार- मत्या धन्यान् श्रेष्ठान् भाग्ययत्तादिगुणविशिष्टान् कृतकृत्यान् रच. यन् विदधत् कुर्वन्नित्यर्थः विहरन् विहारं कुर्वन् जनपदगतम् नगरस्थ यत्र जिनेन्द्रो गच्छति तन्नगरगतवरम् विरोध काकोलूकवत् शाश्वति- कमपि वैमनम्यम् स्वरम् यथेच्छम् अनायासेन स्वचंक्रमणप्रमा. वेनेति तात्पर्यम् हरन परिहरन् त्याजयन् प्रभुजिनेश्वरः कलधौतरुक् २८० .. महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकावे काञ्चनवर्ण अनुपमच्छायम् अनुपमा उपमातुमयोग्या निम्पमेत्यर्थः छाया कान्तिर्यस्य तं कायं देहं शरीर दधौ दधातिस्म साधुदेशायाम. नियतविहाराहाराभ्यामपि रुक्षदेहसम्भवे तपोमहिम्ना सर्णवर्णदेह प्रभोर्वभूवेति तात्पर्यम् ॥ ४७ ॥ रामकृष्णपक्षे-वदान्यधिया अत्युदारमत्या वन्यान् वनेभवान कचन क्वापि धन्यान् धनसहितान् यद्वा कृतार्थान् विदधत् विरचयन् किञ्च अनुपदजिस्थाने पदे पदे इति अनुपदम् भुजेः भोग्यस्य स्थानम् भुजिस्थानम् अनुपदश्च तत् भुजिस्थानश्चेति तस्मिन् हिरण्मयसाधन स्वर्णमयोपकरणैः वृष्टैः निसृष्टैरुपलक्षित: जनपदगतं स्वाभिमुखनगर- स्थितं वैर विद्वेष हरन् परिहरन् विहरन् निगच्छन् प्रभुः रामः कृष्णश्च कलधौतरक् स्वर्णकान्तिः अनुपमच्छायं निरुपमकान्तिम् कायम् शरीरम् दधौ अवाललम्बे ॥४७॥ विहगविरुतैर्नुन्नो भिन्नक्रमरतिविक्रमः क्रमपरिचिते भूमीभागे सुभोगिजनागमे । विहतकलहा-देशे देशे कृतस्थितिमाश्रये परिजनगणे नागस्थाने नृपो ध्रुवमुन्मनाः ॥ १८ ॥ भन्वय -विहगविरुतर्नुस भिन्नक्रमरतिवित्रम उन्मना नृप क्रमपरि चिते सुभोगिजनागमे भूमीमागे विहतकर हादेशे देशे परिजरगणे नागस्थाने भाश्रये भुवम् स्थितिम अकृत ॥ १८ ॥ पाल्पा-विहगविरुतः विहायमा गन्तीति विहगः पक्षी तस्य तेषा वा विरुतेः प्रातःकालिकमधुरकृजनैः नुन्नः त्यक्तनिद्रः अथ वा विहगाना वाणाना विरुतः शब्दः नुन्नः खिन्नः यद्वा विहा गाना कोकिलादिकामोद्दीपकपक्षिणा विरुतैः नुन्नः उद्वेजितः अमि अमरविविक्रमः अमिनः अविच्छिन्नः क्रमरती निहारव्यापारे २८७ M * . भाचार्यश्री विजयामृतसूरिणीता सरणी का; सर्ग- विहारविधौ विक्रम उत्साहो यस्य स सन्नतविहारप्रेमवान् उन्मनाः उद उच्चैः मोक्षादी मनश्चित्तं यस्य स उच्चामिलापी नृपः नृन् पातीति नृपः जीवेषु प्राधान्यात् तन्निर्देशः प्राणिमात्ररक्षकः जिनेश्वर इत्यर्थः। क्रमपरिचिते क्रमेण गमनेन परिचिते जातपरिचये अथवा क्रमात क्रमशः परिचिते जातविश्रमे सुभोगिजनागमे समृद्धशालिजनशालिनि भूमीभागे भूविभागे विहतकलहादेशे सर्वथाशान्तकलहे देशे स्थाने, परिजनगणे परिजनाना गणः समुदायो यत्र नागस्थाने पर्वताश्रये यद्वा वृक्षागमे वृक्षाश्रये स्थितिम् स्थानम् सन्निवेशम् अकृत व्यधात् अनांनुनामालंकारः ॥ ४८॥ '.. रामपक्षे–विहगविरुतैः पक्षिशब्दैः नुन्नः कृतत्वरः त्यक्तनिद्रो था भिन्नक्रमः अन्यक्रमः रतिविक्रमः अनुरागक्रमः यस्य स सीतावि. रहात विप्रलंभरूप क्रमपरिचिते क्रमेण गमनेन परिचिते जातपरिचये सभोगिजनागमे सुखमौभाग्यवति अनाश्रये भूमीभागे भूगदेशे विह- तकलहादेशे विनष्टकलहके देशे परिजनगणे परिचारकजनमहिते ना. गस्याने पर्वतप्रदेशे आश्रये आश्रमे उन्मनाः सीताविग्हखिनचेताः नृपः रामः कृतस्थितिमा कृतनिवास आमीदिति शेपः ॥ कृष्णपक्षे-जरामन्धस्य संग्रामाय कृष्णं प्रति गमनवर्णनं विह- गेति । विगविरुतः अशुभसूचकपक्षिशब्दैः नुन्नः खिन्नः विमनस्कः प्रतिकूलः ममीरोऽभूद्गृध्राचभ्रमरम्बरे इति तचरित्रे" भिन्न कमो -रतिविक्रमः भिन्नक्रमो विच्छिन्नक्रमो रतिविक्रमो यम्य म प्रथम शृङ्गारमस्य स्थायीभाव आगीदिदानी वीरस्य उत्साहस्थायीभाषो जात प्रति भिन्नामेति उन्मनाः शत्रुकृतापराधम्मरणेन क्षुब्धचित्तः नृपः 'प्रति वासुदेयो जरासंधः क्रमपरिचिते सुभोगिजनागमे शुभोगिजनानां - + १८२ महोपाध्यायश्री मेघविजयगणिविरचिते मप्तसन्धानमहाकाव्ये A . नृपानामागमः माहाय्यमम्मेलनं यत्र तसिन् विहतकलहादेशे पारस्प रिककलहरहिते परिजनगणे परिजनाश्रितभूमौ सुरक्षित इत्यर्थः ।। नागस्थाने पर्वतममीपे स्थितिम् अकृत व्यदधात् ।। ४८॥ त्यजत मनुजा राग द्वेषं धृति दृढसज्जने, भजत सततं धर्म यस्मादजिह्मगतारुचिः । प्रकुरुत गुणारोपं पापं पराकुरुताचिराद , मतिरतितरां न व्याधेया परव्यसनादिषु ॥४९॥ भन्वय - हेमनुजा । राग द्वेष त्यजत घरसजने धृति सतत धर्म घ भजत यस्माद् भजिह्मगतारुचि गुणारोप प्रकुरुत अचिरात् पाप निराकुरत पर. व्यसनादिपु मतिः अतितरा न व्याधेया ॥ ४९ ॥ व्याख्या-हेमनुजाः ? मानगाः? तेषामेवज्ञानाश्रयत्वाद्विशियोक्तम् रागं अनुराग पियाभिनिवेश द्वेपं विरोध अनिष्टसाधनताज्ञानजन्यं रागप्रतिबंधिचित्तवृत्तिभेदं त्यजत निराकुरुतदृढसज्जने मुस्थिरसअने जने पायाधनभिनिविष्टचित्तवृत्तिगालिनि धृति धैर्य भजत सेवत धारयतेति यावत् मततं निग्न्तरं धर्म सुकृत भजत संचिनुत यस्मात् धर्मसेवनात् अजिह्मगता अकौटिल्यगता ऋज्वी रुचिः बुद्धिः भवतीति शेपः गुणारोपं गुणस्य दयादाक्षिण्यादिरूपस्य आरोपः आधानं प्रकरुत" गुणसंचयं विधत्त अचिगत् सद्यः तत्क्षणमेर पापं फिल्मिपं निराकु. रुत पृथरु कुरुत दुग्नम्त्यजत परव्यमनादिपु परेपु निकृष्टेषु व्यमना- दिपु परस्त्रीसंग-मद्यपानस्नेयादिपु यद्वा परेषां अन्येषा व्यमनादिपु दुःखजनकव्यापारपु मनिः बुद्धिः अठितगम् अत्यन्तमेर फिश्चिदपी. त्यर्थः न व्याधेया न योजनीया यथा परबाघा भवेचया किमपि नेत्र विधेयमितिभावः ॥ १८ ॥ गपक्षमाधारणमेतद्यार,पानम् ॥
२८३ आचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता, सरणी टीका. सर्ग-५ भवति स महानक्रोधस्त्यागतो गतिमानये, दशमवहुधादाने शत्रुक्षये स्तुततीर्थराट् । त्वमसि वलतः पूर्णस्तूर्णं नवा-जिनमाश्रितः, प्रभवसि कथं नागारोहे न-राजरयावृतः? ॥५०॥ अन्वयः-भये यः अक्रोधः स महान् भवति त्यागत: गतिमान् दशम- बहुधादाने शगुंजये स्तुततीर्थराट् स्वममिवलतः पूर्णः तूर्ण न वा जिनमाश्रितः नागारोहे नराजरयावृतः कथ प्रभवसि ॥ ५० ॥ व्याख्या-अये इति संबोधने हे प्रभो ? शक्तिमन् ? अक्रोधः को- धरहितः जनः यः स महान् भवति महत्वमामोतीति भावः त्यागतः सांसारिकविषयवासनापरित्यागात् गतिमान् ज्ञानवान् भवति त्यागस्य ज्ञानपुरःसरत्वात् सैत्र यर्थार्थज्ञानवान् सर्वथा यः सर्वान् परित्यजतीति भावः अथवा त्यागतः संसारत्यागतः गतिमान् प्रशस्तगमनशीलः देवत्वे मोक्षत्वे च गन्ता भवति यद्वा त्यागतः अगतिमान पुनः पुन- र्गमनागमनरहितः जन्ममरणरहितो भवति दशमबहुधादाने दशमस्य तन्नामकतपोविशेषस्य बहुधा आदाने ग्रहणे अनेकधा दशमतपोऽनुष्ठा- नात् शत्रुजये आभ्यन्तरिककामादिशत्रुविजये विषये स्तुततीर्थराट स्तुतम् प्रशंसितम् यत्तीर्थम् शास्त्रम् तत्र राजते इति तथा यथार्थ- शास्त्रज्ञानवान् यद्वा स्तुतं प्रशंसितं यत्तीर्थ विद्यादिगुणयुतपात्रं तत्र राजते यः स तथोक्तः अथवा "सत्यं तीर्थ क्षमातीर्थ तीर्थमिन्द्रियनि- ग्रहः सर्वभूतदयाती सर्वत्रार्जवमेव चैत्युक्तप्रकारस्य तीर्थस्य ग्रहणा- द्राजते यः स अथवा दगमस्य अवस्थाविशेषस्य बहुधा आदानात ग्रहणाद पसिन् सति शत्रुअये विमलाद्रौ स्तुतः स्तुतिविपयीकता तीर्थराट् जिनेश्वरो येन स तथोक्तः वृद्धत्वेऽपि शुश्रृंजय कृतर्धिकर-
२८४
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये
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स्तुतिः अथवा दशानां " दानशीलक्षमावीर्यध्यानप्रज्ञायलानि च ।
उपायः प्रणधिर्ज्ञानं दशबुद्धवलानि वै" इत्युक्तलक्षणानां पूर्णः दशमः
तस्य बहुधा आदानात् संग्रहात् शत्रुजये शत्रूणां बाह्याभ्यन्तररिपूणां
जये विजये स्तुततीर्थराट् स्तुतः स्तुतिविषयीकृतः यः तीर्थः पूतदेशः
तत्र राजते इति तथोक्तः त्वं बलतः आत्मवलतः पूर्णः असि भयसि
वाजिनम् अश्वम् आश्रितो न तथा न वा नैव जिनम् आश्रितः नागा-
रोहेण पर्वतारोहण पर्वताधिष्ठानेन राजरयावृतः राज्ञश्चन्द्रस्य यो रयः
वेगस्तेजस्तेन आवृतः आयुक्तः युक्त इति भावः ॥ कथं न प्रभवसि
किन्तु प्रभवस्येव यथा चन्द्र उदयाद्रिसमारूढः विद्योत ते तथा भवा-
नपि नागारोहेन दीप्यते इति भावः ॥ ५० ॥
रामपक्षे-अक्रोधः क्रोधरहितः यः स महान् गुरुर्भवति त्या-
गतः सीतात्यागतः सीतार्पणतः गतिमान् अत्यधिकसमुन्नतिपदगामी
भवतीत्यर्थः दशमबहुधादाने ददातीति दः पर्वतः स इव यः शमः
शान्तिः पर्वतो यथा सर्वाश्रय स्तथा शमाश्रितोऽपीति भावः स दशमः
दः पर्वते दत्ते सण्डने चैति शब्दस्तोममहानिधिः तस्य बहुधा अने-
कशः सर्वदेत्यर्थः आदाने ग्रहणे शत्रुञ्जय आम्पन्तरिकानां पाधानां
शत्रूणां जये पराजये स्तुततीर्थराट् मत्पात्रश्रेष्ठो भवति. त्वं रावणः
चलतः सैन्यतः मामर्थ्यतश्च पूर्णः युक्तोऽसि जिनमाश्रितः न या जि-
नाश्रयणं विना नागारोहण राजरयावृतः राजतेजोयुक्तः कथं प्रभवसि
नव प्रभवसि अतो जिनाश्रयणमवश्यं कर्तव्यं तमिश्च सुतरामेव युद्ध-
नितिः परदारासंग्रहय भविष्यतीति भावः ॥५॥
..
एवं कृष्णपक्षेऽपि ज्ञेयम् ॥ ५० ॥
२८५ भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ Arwww जलनिधिगतं सर्वं स्वं वा परं कुरु संयतं, स्मितवति मयि प्रोच्चैः स्थाने तपोबलशालिनि । यदनलसता सूरे दूरे करोति न किल्विष- मसहनजने लीने रक्षान-दीनवलात्क्वचित्॥५१॥ भन्वयः-प्रोधः स्थाने तपोबलशालिनि मयि स्मितवति जलनिधिगतं परं सर्व स् वा संयतं कुरु यदनलसता अमहनजने दूरे सूरे किलिवपं किश- करोति लीने दीनयलात् रक्षा कचित् न भवतीति ॥ ५ ॥ व्याख्या-पोश्चः स्थाने अत्युन्नतप्रदेशे तपोबलशालिनि तपो- पलयुक्त मयि सितवति जातहासे अहोऽनानविलसितं कथमेतेऽकार्य- मपि कार्यमिव कुर्वन्तीति जातपरिहासे इति मावः स्थिते सतीति शेपः यदि ते धनजिघृक्षा महती वर्चते तर्हि जलनिधिगतं रत्नाकरसंस्थित सर्व निसिलम् परमुत् कृष्टं स्वम् धनम् संयतं एकत्रीकृतं कुरु स्व- गृहे निचितं कुरु किमित्यल्पनिनं पीडयसीतिभावः यदनलसता यदि तेऽनलमता वीररमस्य स्थायी समुत्साहो वर्त्तते तदेतिशेपः अमह- नजने अक्षमे जनेऽरे पुरोदृश्यमाने सूरे सूर्यधामनिधौ किमिति किल्विपं अपराधं न करोति नाररति सर्वेपां वीर्यनिपकोऽसाविति तं प्रत्येव निजमामर्थ्य प्रदर्शयेतिभावः तथाहि लीने शरणापन्ने अमा- मर्थ्यशालिनि रक्षामहनं दीनबलात् दैन्यादव कचिन्न मामर्थ्यशा- लिनि जने यदि रक्षाभवेत् मैव रक्षा दीनस्य रक्षा तु सुतरामेव संमा- व्यतेऽमामादिति तत्यम् ॥ रामपक्षे जलनिधिगतं समुद्रमीपवर्तमानं अत्र सामीप्ये स. समी यथा कूपे गार्य इति मर्व निसिलं वं स्वकीपसैन्यम् संयत सुरक्षितं सर्वतोमयरहितं कुरु विधेहि वधापरं शत्रुच संयतं पदं स्वा. धीनं गुरु यदि कथित् गुप्तचरः समागच्चत्तं संगृहाणेति भावः तपो.
महोपाध्याय श्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये * wwwww n MM namaANN . चलशालिनि पलयति वर्द्धयतीति बलम् तपः बलम् तेन शालितुं शीलमस्सिन् तस्मिन् प्रोच्चैः स्थाने अत्युन्नतादेशे स्थिते,मयि मित- वति विकस्वरे सोत्साहेऽदूरे सन्निधौ सूरे सूर्यवंशोद्भवे सति तथाच यत् यतः सेना संयमतः किल्विषमपराध छलमित्यर्थः न करोति सावधाने कोऽपि.साहसं न कुर्यात एवंच असहनजने सामर्थ्यशालि- नि जने लीने शरणायन्ने सत्यपि दीनबलात् दैन्यात् रक्षा तदीयाभय दानम् कचिदपि कुत्रापि न बहुच्छला हि राक्षसाः शरगताः सन्तो विश्वासमुत्पाद्य सतिरन्धेऽवश्यमेव विराध्येरनिति न तत्र विश्वासो विधेय इतितत्वम् ॥ ५१ ॥ कृष्णपक्षे-जलनिधिगतं समुद्रसमीपवर्तिन द्वारकापुरस्थितम् सर्व परमन्यं वा-स्वं धनं संयतं सम्यचितं कुरु तपोबलशालिनि .तप आलोचनम् "तपः माधे शिशिर ऋतौ आलोचने स्वाश्रमविहि- तधर्मे चेति शब्दस्तोममहानिधिः" सम्यक् . पर्यवेक्षणम् तस्य वलेन उपयोगेन शालिनि विराजमाने प्रोचैः स्थाने उन्ननप्रदेशे सितवति सावधाने सरे सामर्थ्यशालिनि मयि मति यदनलसता आलस्याभावः तेन । परोक्षेऽपि किल्यिपं पापमपराधं न करोति नाचरति असह- नजने अक्षमिणि जनेऽलीने अस्वाधीने दीनबलात् अयं दीन इति बलात् इति कृत्वेति भावः न रक्षा न पालना विधेयेति शेषः दीने - बलवतां शोभापराक्रमशालिनि पराक्रमो विधेय इति तात्पर्यम्॥५१॥ समितिरसकृत् कार्या वार्या न गोपनता-स्थिति- दृढतरमनो वीर्य कार्य विचार्य सहस्रशः । नियतिवशतः कायोत्सर्गेऽप्ययं हतिमाप्नुयाद् , .मजतु यदिवा मन्योः पक्षो रसातलमजसा॥५२॥ - - . - भाधापंधीविजयातसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ -NA wwwww MAN -- भन्वयः-पमितिः अमकृत् कार्या गोपनता स्थितिः न वायां सहस्रशः विधार्य हरमनोवीय कार्यम् कायोत्सर्गेऽपि नियतिपशतः हनिमाप्नुयात् यदि वा मन्योः पक्षः अञ्जमा रसातलं व्रजतु ॥ ५२ : च्याख्या-असकृन् भूयोभूपः समितिः ईसिमित्यादयः विधातव्या गोपनता स्थितिः गुप्तित्रयविधिः न वार्या न हेया किन्तु कर्तव्यैव सहस्रशः अनेकधा विचार्य परिचिन्त्य दृढतरमनोवीर्य प्रबलमात्मवलं कार्य विधातव्यम् मनोबलं न कदाचिदपि परिहार्य- मिति भावः अयम् साधुजनः नियतिवशतः दैववशतः कायोत्सर्गेऽपि कायोत्सर्ग क्रियारूपध्यानेऽपि हति विनम् आप्नुयात् लमेत तथापि मनवाञ्चल्यं नाश्रयेदिति भावः मन्योः क्रोधस्य अहंकारस्य वा पक्षः सहायः अञ्जमा झटिति रसातलम् अधोलोकं बजतु गच्छतु संर्वथाहंकारप्रशमोऽस्तु ।। ५२ ।। अथवा-समितिः संग्रामः कामक्रोधादिभिः सह युद्धम् अस- कृत भृयोभूयः कार्या विधेया गोपनतास्थितिः स्वसंयमरक्षणविधिः न वार्या न त्याज्या स्वत्रतरक्षण सर्वथा विधेयमेव नियतिवशतः देवा- धीनतः कायोत्मगेऽपि देहपरित्यागेऽपि अयं कामादिः हतिम् क्षतिम् आप्नुयात् लभेत तथापि न त्यजेद कायोत्सर्गो यदि भवेत्स विधेयः परन्तु कामादेशो न भवेदित्यर्थः अन्यत् पूर्ववत् ।। रामकृष्णविपये-समितिः संग्रामः असकृत् पुनः पुनः कार्या विधातव्या गोपनता पृथ्वीपालनता स्थितिमर्यादा न वार्या न परिह- रणीया सर्वथैव भूपालना विधेया महस्रशः अनेकदा विचार्य विविच्य दृढतरमनोवीर्य सुदृढस्वात्मशक्ति कार्य विधातव्यम् नियतिवशनः विधियाना अयम् आत्मशक्तिवान् कायोत्मर्गेऽपि इतिम् पापामा- प्नुयात् लमेत चेत् यदि तथापि मन्योरहंकारस्य पक्षः स्वाभिमानम् अजसा रसातलम् अघोभुवनम् वा प्रजत नेत्र गच्छतु ।। ५२ ॥
२८८ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचित्ते सप्तसन्धानमहाकाये virwww प्रचलति मिथस्तत्तेनागोऽनुगेऽभिमुखागते, नभसि रभसाकान्ते कान्तेर्भराद् बहुदीप्तितः । कतिपयदिनीमारामः स-दाश-रथी-रसाद , गिरितटमगाद राजा व्याजाहते मगधाश्रयः ॥५३॥ अन्य - कान्तेर्भगत् बहुदीप्तित रभसाकान्ते अभिमुखागतेऽनुगे मिथ नभसि प्रचलति तन मग धामाराम सदाचारथि रमात् कतिपयदिनै मगधा श्रय व्याजाहते गिरितटमगात् ॥ ५३ ॥ व्याख्या-मिथः परस्परम् प्रचलति प्रमरति अनुगे अनुगा- मिनि पश्चादागच्छति जने तथा अभिमुसागते गन्तव्यदेशात् संमुखा गते लोके च तेन अनुगतेन अभिमुसागतेन च आगः आसमंतात् गम्यते इति आगः गमेः कर्मणि डः अनुगतः बहुदीप्तितः अतिप्रभा- तः कान्तेभरात् कात्याधिक्यात् नभसि आकाशे रममा वेगेन आक्रा न्ते व्याप्ते सति आकाशमण्डलव्यापकतेजःपुञ्जे मति धामारामः धाम तेजः आरमते यस्मिन स धामारामः धामनिधिः दाश्यते इति दाशः रम्यते अनेनेति रथः इन्द्रियः दाशः हतः रथ इन्द्रियो यस्य स दाशरथी विजितेन्द्रियः अमगधाश्रयः मगं पापं दधातीति मगधः न मगधः अमगधस्तमाश्रयते इति तथोक्त. निर्मला राजा दीप्तिमान् स जिनेन्द्रप्रभुः व्याजाहते निर्माजम् गिरितटम् गिरिसन्निधिम् अगाव अयासीत् ॥ ५३॥ रामपक्षे-कान्तेर्दीप्तेस्तेजम इत्यर्थः अतिशयात् अत एव रभ- साक्रान्ते वेगवति अभिमुसागते स्वमानिध्यमुपागते अनृगेऽनुमामि- निजने मिथः परस्पर नभसि आकाशे आकाशवर्मना प्रचलति गच्छति सति तेन प्रचलता सैन्येन सहेत्यर्थः अगः गन्तुमशक्यः शत्रुमिरिति wwwwww भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता मरणी टीया. मग-५ शेषः, धामा धामवान् "गुणवचनेभ्यो मतुपो लुगिष्टः" रामः सदाश- रथी दशरथापत्यः रसात् वीररमात् मगधाश्रयः मगवानां स्तुतिपाठ- कानामाश्रयः स्तोतव्यः व्याजाहने व्या विना निष्कपटमित्यर्थः गि. रितटम् वेलन्धरपर्वतसमीपम् अगात् अगमत् ।। कृष्णपक्षे-मदाशरथी दासेन सहितः मदासः शमयोः सा- म्याद सदासो रयो यस्य सदाशरथी सारथी सहितरथवान् रमात् वीररसाभिव्यञ्जकस्थायीभावरूपोत्साहात् मगधाश्रयः जरासंघाभि- मुखः अगात् अन्यत्पूर्ववद्योज्यम् ।। ५३ ।। प्रभुवचनतः सेतुर्भूपः सरूपसमुद्रभाग , युधि रुधिरतोऽत्यागान्नागादिनीकृतसंगरः ! सुकृतभरतः श्रेयोमार्गस्तदङ्गनिवन्धनाद् . भुवनजलधेर्मध्ये जज्ञे स्थिरान्तरभूभृता ॥५४॥ अन्य - प्रभुय चनत. सेतु प. सरूपसमुद्रभाग युधिरधिरतः त्यागात् नागादिनीकृतमंगरः धेमोमागं तद्गनियधनात् मुकामरत भुवनजर धेः मध्ये स्थिरान्तरभूभृता जसे ॥ ५४ ॥ पाख्या-प्रभुवचनतः उन्यते इतिश्चः प्रभुश्वासो वचथेति प्रभुवचः प्रभुवचे प्रभुशब्दवाच्ये नतः परिणतः प्रभुवचनतः प्रभुरिति जनैः कथ्यमानः प्रभुरिति यावत् सेनुः मर्यादारूपः लोकमर्यादा ममर्यादाश्रयीभूतः भूपः भुवम् भूस्थं जनमिति शेपः पाति रक्षतीति तशा मर्वरक्षाकरः मरूपममुद्रमार मरूपा रूपवान् यः ममुद्राम सरू- पसमुद्रः माक्षात्ममुद्रः तं मजाति तथा गच्छन्दन तन्म्यो गुणो लक्ष्यने इति माक्षात्ममुद्र डा दुर्धपः अगाधः ममद्गुणरत्नाकर येति भारः युधिरुधिरता युधेः संग्रामस रुपिनिरोषस्तव रतः परिणतः म ..
२९० महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्धानमहाकाग्ये वथाहिंसात्मकयुद्धनिवारका त्यागात् संसारिकविषयवासनापरित्यागाद नागादिनीकृतसंगरः न गच्छति भोगमन्तरा इति नागं कर्म तत् आदिर्यस्य स नागादिः कर्मादिशत्रुः तस्य नीकृतः नीचैः कृतः संगरः प्रसरों येन स कर्मादिप्रसक्तिप्रतिरोधकः श्रेयोमार्गः यो मोक्षं मार्ग अन्वेपते इति तथोक्तः तदङ्गनिबंधनात् तस्य श्रेयसो मोक्षस्य अङ्गम् प्रधानकारणं संयम चारित्र्यमित्यर्थः तत्र निवन्धनं प्रवृत्तिरभिनिवेश- स्तस्मात् मोक्षमार्गानुमरणात् सुकृतभरतः पुण्यप्रभावात् भुवनजलवे संसारसमुद्रस्य मध्ये संसारसमुद्रे स्थिरान्तरभृभृता स्थिरान्तरः अतिनि- श्वलो यो भूभृत् मैनाकगिरिः कदाचिदपि ततो न चापल्यस्तेन सम- मिति शेषः जजे यथा म निश्चललथायमपि लोकभननीयत्वेन स्थिरः " कीर्तिर्यस्य स जीवतीत्यभियुक्तोक्तेः " सोऽद्यादिस्मरणीयत्वेनारा- ध्यत्वेन च स्थित इति भावः ॥ रामपक्षे-सरूपसमुद्रभाक् रूपेण समानः सरूपः तुल्यरूपः स चासौ समुद्रश्चेनि मरूपममुद्रः तम् भजति अनुमरतीति सरूपसमुद्र- भाग् समानरूपसमुद्रभृपमाहितः सेतुर्भूपः सेतुनामानृपः "यदा लंका गच्छन् रामो वेलन्धरपर्वतममीपं गतस्तदा ममुद्रसेतुनामानौ नृपौ यो. ध्धुमागताविति रामायण कथा" नागादिनीकृतसंगरः नगे भवः नागः कपिःम आदिर्यस्य म नागादिः तेन नीकृतः अधाकृतः संगरः संग्रामो यस्य मः वानरादिनिवारितयुद्धः अत एव युधिरुधिरतः युधैः संग्रामस्य यो रुधिनिवर्तन नत्र रतः प्रमत्तः अथवा युधि संग्रामे यो रुधिः रोधनं बन्धनमित्ययः तत्र रतः वानरादिभिर्जीवग्राहं गृहीतः सन् प्रभुवचनतः प्रभो रामस्य वचनतः आदेशतः त्यागात् मोचनात् श्रे- योमार्गः श्रेयः कल्याणं शुभादृष्टं या मार्गते इति तथा सुकृतभरता पुण्यप्रभावान् “निजकल्याणाय गमभ्रात्रे लक्ष्मणाय तिघः कन्या ददौ" ..
भाचार्यध्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ AN -wwwN कुड इति तदङ्गनिवन्धनात् तस्य रामस्य अङ्गनिवन्धनात् कन्यार्पणेन म्बसम्बन्धात् भुवनजलधर्मध्ये स्थिरान्तरभूभृता समं जज्ञे रामसंव- धान्निर्भयो जात इति भावः॥ कृष्णपक्षे-प्रभुवचनतः शक्रेन्द्रवचनतः सेतुः समुद्रः मुद्रया सहितः समुद्रः रूपेण सहितः सरूपः सरूपश्च समुद्रश्चेति मरूपममुद्रौ तो भजतीति सरूपसमुद्रभाग स्वीयदेवचिह्नचिहितविशिष्टरूपवान् जलधिः त्यागात् स्वजनसंकोचेन वासयोग्यभूमित्यागात् युधिरुधिरतः परिखारूपेण द्वारकायाश्चतुर्दिक्षु स्थितत्वेन संग्रामवारणे समर्थः जल- दुर्गमयः अत एव नागादिनीकृतसंगरः गजादियुद्धनिधारकः जलदु- दिौ गजादिना प्रवेशो भवति परन्त्ववागाधत्वेन न संभाव्यते तत्: आसीदिति शेषः सुकृतभरत: पुण्यप्रभावतः तदङ्गानिवन्धनात् समुद्र- संबन्धात् श्रेयोमार्गः कल्याणेच्छुः भुवनजलधेः अदसीयभुवनसमुद्रस्य मध्ये स्थिरान्तरभूभृता जज्ञे ॥५४॥ तदनु दनुजै रक्षोलक्षैः समं मनुजैर्भुजै- हरिचरणतश्चित्ते दूने दशास्य-महीपतेः । प्रतिहरिरवात् सैन्यस्यान्तश्चलाचलतावलात् , स्वयमभिययावुयो गर्व वहन्निव पर्वतः ॥५५॥ अन्यया-तदनु दनुजैः रक्षोलक्षमनुज जैः ममं हरिचरणतः दशास्य महीपतेः चित्ते दूने प्रतिहरिरवात् सन्यस्यान्तश्चलाचलतायलात् स्वयम् पर्वत इय गवं पहन वार्याम् अभिययौ ॥ ५५ ॥ व्याख्या--तदनु तत्पश्चात् दनुजैनौ रक्षोल? राक्षसानां लक्षैरनेकराक्षसमनुजैर्मनुष्यैः भुजैः भुनक्ति भुवमिति भुजो नृपान्तः समं सार्धम् हरिचरणतः हरेजिनेन्द्रस्य चरणतः निर्गल विहारतः द. शास्यमहीपतेः कामनृपस्य चित्ते मनसि दूने विहले मति विचाति महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये ~~ जिनेन्द्रे कामो विह्वलो जात इति भावः प्रतिहरिरवात् प्रतिहरेः का मस्य वात् भयचीत्कारान् भयजनितसाध्वसरवात सैन्यस्य तदीयस. हायकस्य वसंतादेःचलाचलताबलात् चाञ्चल्यतः इतस्ततः पलायनतः स्वयम् प्रभुजिनेन्द्रः उाम् भूमौ पर्वत इव गिरिरिव गर्व कामवि. जयोत्कर्षम् वहन् मनसि धारयन् अभिययो विजहार ॥ अत्र पर्वतो- पमानेन प्रभी दुर्धपत्वम् स्थिरत्वं च वस्तु उपमालंकारव्यंग्यम् ।। रामपक्षे-तदनु तत्पश्चाद लंकाधिष्ठिते रामे सति भुजैः भुञ्ज- न्ती भुजाभोग्यवन्तः तैर्महाभाग्यवद्भिर्मनुजैर्मनुष्यैः समं सह हरि- चरणतः हरेः कपेश्चरणतः पादतः इतस्ततः सर्वत्रनिर्भीकप्रचारतो चा दशास्यमहीपते रावणनृपम्य चित्ते दुने चिते हृदये दूने खिन्ने क्लिष्ट सति दनुजैर्दानवे रक्षोलखैरनेकराक्षसः समम् सह प्रतिइरिचात् प्रतिहरित्वाभिमानकृतादेशात् चलाचलतावलात् चलाचलस्य भाव- अलाचलता अत्यन्तचंचलता तस्या वलात् तदाश्रयणात् पर्वत इव गर्वमहंकार वहन् धारयन् बहुगर्विष्ठः सैन्यस्यान्तः सैन्यमध्ये स्वयम् स्वयमेव रावणः उाम् रणभूमी अभिययौ अभिजगाम स्व. यमेव रामेण योद्धु संग्रामभूमिमयनतारेतिभावः ।। कृष्णपक्षे-हरिचरणतः हरेः कृष्णस्य चरणतः आचरणतः अवि. वेकाचारतः कंमादियधत इत्यर्थः दशास्यमहीपतेर्जरासंधनृपस्य चित्ते मनसि दने सिन्ने सति प्रतिहाररवात् जरासंधानातः सैन्यस्यान्तः चलाचलतावलान् चाञ्चल्यतः स्वयम् स्वयमेव पर्वत इब गर्व वहन् उयाम मंग्रामाङ्गणभूमौ ययौ कृष्योन योद्धमभिपसारेति भावः ।। मुतनयवरैः सत्रा कृत्याविपाकविमर्शनात् , सह्पदपुगे देवादेशः सरुक्मिनृपोद्यमैः ।
AA भाचार्य श्री विजयामृतत्रिप्रणीता सरणी टीका सर्ग-५ यदि भुवि चरवेदीशोऽगाद् न शिष्टमतः स्थित- मिति बहुजनोऽवादीत् सादी परोऽपि हिरण्यवान्॥५६॥ अन्ययः- अकृत्या विपाकविमर्शनात् सुतनयवरैः सरुक्मिनृपोद्यमैः सन्त्रा देवादेशैः सह पदपुरः हिरण्यवान् सादी परोऽपि यदि भुविचर ईशः भगात् चेत् अतः शिष्टं न स्थितमिति बहुजन अपादीत् ॥ ५६ : व्याख्या-अकृत्या विपाकविमर्शनात अकृत्याः अकर्तव्यतायाः यो विपाकः परिणामः तस्य विमर्शनात विचारात् सांसारिकविषय वासनोपभोगविपाकविवेकतः सुवनयवरैः सुष्ठु तनोत्यात्मककल्या. णमिति सुतनयः तेषु वरः श्रेष्ठस्तैः सरुक्मिनृपोद्यमैः रुक्मं स्वर्णम स्थास्तीति रुक्मी रुक्मिणा सहितः सरुक्मी सचासौ नृपश्चेति तस्यो. द्यमः उत्साहस्तैः सत्रासह ससुवर्णनृपोत्साहैः सह देवादेशैः प्रवज्या- ग्रहणसमयस्मारकदेवादेशैः सह तत्क्षणमेव पदपुरः पद्यतेऽस्मिन्निति पदं अक्षयस्थानम् तत्र पुरति अग्रे गच्छतीति तथोक्तः ईशः जिनेन्द्रः हिरण्यवान् यत्नवान् सादी परोऽपि गजाश्वादिवाहनोऽपि यदि भु. विचरः पादचारस्सन् अगात् संसारात् विरक्तोऽभवत् अतः शिष्टम् न स्थितम् इति एवं बहुजनः अवादीव अकथयत् ॥ १६ ॥ रामपक्षे-अकृत्या विपाकविमर्शनात् अकृत्यायाः सीताहरण. रूपाकार्यकृत्याया यो विपाकः संग्रामप्रवर्त्तनं प्रत्यर्पणं वेति परिणाम- स्तस्य विमर्शनात् विचारात् हेतोः देवादेशैः रावणनृपशासनैः सरु- क्मिनुपोद्यमः ससुवर्णराजोत्साहैः सुतनयवरैः मुष्ठुतनयः पुत्रः सुत- नयः तत्र वरः श्रेष्ठः तैः मेघनादादिभिः सत्रा सह पद्यते गम्यतेऽ- स्मिन्नितिपदम् रणस्थानम् तत्र पुरति अग्रे गच्छतीति सहपदपुर: आज्ञासमकालमेव कृताग्रगमनः यदि भुविचरः रणभूमिगतः चेत् तदा ईशः रावणोऽपि हिरण्यवान् वर्णमुकुटादिभूपितः सादीपरः गजा- ..
२९४ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सससन्धानमहाकाव्ये MANAM M M ANA ALAMA ----- M श्वादिवाहनसहितः अगात् संग्रामाङ्गण प्रत्यचालीत् अत: सतनय- रावणगमनात शिष्टम् अवशिष्टम् न स्थितम् इति बहुजना बालवृद्धा दिः अबादीत् परस्परमवोचत् ।। कृष्णपक्षे-अकृत्यायाः कृष्णकृतस्त्रजामानवधरूपाक्रियायाः विपाकस्य विमर्शनात् विवेकात् सतनयवरैः सत्रा सह देवादिपुत्रैः सह देवादेशः जरासंधभूपाज्ञाभिः सरुक्मिनृपोधमै रुक्मिनामकभूपो. त्साहैः सह पदपुरः सोद्यमः "पदं व्यवसितत्राणमित्यमरः" बहुजनः अनेकजना भुविचरः पादचार! यदि यदा तदा चेदीशः चेदिराजः शिशुपालः हिरण्यवान् सौवर्णकटककुण्डलगान् सादीपरः गजाश्वादि- वाहनसहितः अगाव जरासंवेन सह कृष्णयुद्धाय रणभूमि प्रत्यग- च्छत् अतः शिष्टं न स्थितमित्यवादीत् ॥ ८६ ।। प्रभुविहरणे लोकः खोकः सतीव्रतया-जना- बनधनमतिर्दाने शैलग्रहे-हितचिन्तकः । अपि समरसीमानं प्रापत सवासबभूपति- हृदयदयितारागात पञ्चाननः सदशाननः॥५७॥ अन्वय - प्रभुविहरणे लोक जनावनघनमति स्योक दाने सतीप्रसया पौलमहे हितचिन्तक स वासयभूपति हृदयदायितारागात् पचानन स दशाम भपि समरसीमानम् मापत् ॥ ५० ॥ व्याख्या-प्रभुविहरणे प्रभोजिनेन्द्रस विहरणे विहारे जनाव नयनमतिः जनानाम् अवनम् रक्षणम् तत्र धना निविडा निरवच्छिन्ना निरंतरेत्यर्थः मतिर्नुद्धिर्यस्य स लोको जनः खौको दाने प्रभोनिनासाय स्ववासभूमिसमर्पणे सतीत्रतया सत्वरेण अहमहमिकया उपर्युपरि इ. तिभावः शैलग्रहे शैलाना तोरणाना जिनेन्द्रणामागमनजन्यहो- रवर्पचक्महोत्सवानां यहे ग्रहणे विधाने "तोरणोतु मागन्यं दा- - भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-५ ३९५ -MAAN मवन्दनमालिका स्तम्भादेः स्यादधो दारो शिलेतिहमः" यद्वा शैलानां जिनेन्द्राणामधिष्ठानेन पविनितानां ग्रहणे तत्र गमने तदर्शनार्थ- मितिशेषः हितचिन्तकः स्वात्मानुकूलविचारपरःमवासवभूपतिः वसु अस्यास्तीति घामवः स चासो भूपतिश्चेति स वासवभूपतिः अनेक- विधधनधान्यसमृद्धनृपः हृदये स्वमनसि दयितस्य मोक्षस्य प्रभोर्या आसमंतात् रागोऽनुरागो यः स हृदयदयितारागस्तस्मात् चित्तगतप्रभु विषयकप्रीतितः अत एव पश्चाननः पंचसु महानतेपु आननः लक्ष्यो यस्य स यद्वा पञ्चसु पंचेन्द्रियेषु आननः संयमलक्ष्यो यस्य, सदशा. ननः दशया कालकृतविशेषरूपया गर्भवासजन्माद्यवस्थया सहितम् सदशम् आसमन्तादन्यते जीव्यते इति आननम् जीवनम् सदशं आननं यस्य स तथोक्तः गर्भादिवासजीवनकः समरसीमानम् सम् सम्यक्प्रच्छति गच्छति संसारादिति समरः विरक्तो जिनेन्द्रः तस्य सीमानं समीपम् प्रापत् अगमत् ॥ ५७ ।। रामपक्ष-प्रभुविहरणे प्रभो रामस्य विहरणे रावणं प्रति युद्धाय- गमने अथवा प्रभोः सीताया विहरणे विशेषतो हरणे जनावनघनमतिः जनसाहाय्य दृढद्धिः लोकः सुग्रीवादिः स्वौकः स्वस्य ओकः आश्रयं दाने अर्पणे आश्रयदाने पेलग्रहे तदधिष्ठितपर्वतस्थिती, हितचिन्तकः समर्थः रामहितसाधकः समरसीमानम् रावणयुद्धभूमि प्रापत् अगमत् सवासवभूपतिः मवामवानां देवानामपि भूपतिः शासकः हृदयदयि- तारागात् हृदये मनसि दयितायाः सीतायाः रागात् प्रेमतः हेतोः पश्चाननः सिंह डब लुप्तोपभा सदशाननः रावणः समरसीमानं रामर. णभूमि प्रापन अयासीत् ॥ ५६ ।। कृष्णपक्षे-प्रभुविहरणे प्रभोजरासंधस्य विहरणे साक्षात् गमने सति स्वौका शोभनगृहवान् जनावनधनमतिः जनानां संग्रामगतशत्रुपक्षी- २९६ .. महोपाध्यापक्षीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये यलोकानां आसमन्तात् वने हिंसने मारणे धना निबिडा मति युद्धिर्य- स्य स दाने द्यत्यसिन्निति दानम् तस्मिन् युद्ध शैलग्रहे व्यूहग्रहे च हित- चिन्तकः हितानुबन्धी लोकमैन्यजनः सतीव्रतया सत्वरतया समर- मीमानं रणभूमि प्रापद अगमत् वासबभूपतिः सुममृद्धपतिः सदशा- ननः शत्रुच्छिद्रान्वेपणाय दशसु दिक्षु आननं मुखं लक्ष्यं यस्य सदशा- ननस्तेन सहितः मदशाननः पंचाननः सिंह इवेति लुप्तोपमा सिंह इव सजरासंधः समरसीमानं रणभूमिप्रदेशम् प्रापद अयासीद ॥१७॥ अत्र लुप्तोपमा विरोधाभासश्चालंकारः ।। एवं राज्यादिवारे स्फुरति मतिमतां संनियोगे नियोगे, स्वामिन्याशु-प्रकाशेजयनिसमभवत् सप्रभावोऽनुभावः। सर्वे गान्धर्वदेवाः पटुतरतरसा तूरमापूरयन्तः, वस्था रागं वितेनुर्धनुपिधृतगुणे सैन्धवं प्राप्य तीरम् ५८ इति श्रीसप्तसंघाने महाकाव्ये राज्याङ्के महोपाध्यायश्रीमेघविजए. गणिविरचिते श्रीनगवद्विहारवर्णने पञ्चमः मर्गः॥ भन्बयः- एवं राज्यादिवारे मतिमतां मक्षियोगे नियोगे स्फुरति भाशु- प्रकाशे जयिनि स्वामिनि समभावोऽनुभाषः समभवत् पृतगुणे धनुनि मन्ध- तारं प्राप्य भासाद्य पर्वे गान्धर्ष देवाः पटुतरनरमा तूग्मापूरयन्त: स्वस्थाः गग वितेनुः ॥ ५८॥ व्याख्या--एवमुक्तप्रकारेण गज्यादिवारे गज्यांके मतिमतां पुद्धिशालिनां सन्नियोगे मत्सु नियोगे नियोजनं प्रेरणं तस्मिन् नियोगे व्यापारे स्फुरति प्रकाशमाने मति आशुप्रकाशे आशु अटिति प्रकाशो नर्मल्यं यस्य तस्मिन् जयिनि मोकण विद्यमाने स्वामिनि जिनेन्द्र सप्रमावः प्रमावेन सहितः ममहिमा अनु मात्रम्नेजोविगेपः समभवद धृतगुणे धृतः गुणो दयादाक्षिण्यादियेन तसिन् धनुपि धन्य ते
भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीकासगं-५
२९७
vvv
शब्दायते इति धनुः अन्तरॉकारागुच्चारकः तस्मिन् अन्तर्ध्यानमग्ने
प्रभाविति शेषः गान्धर्वदेवा गंधर्वा एव मान्धर्वा सर्वे गांधर्वाश्च ते
देवाचे ति गान्धर्वदेवाः पटुतरतरमा पटुतरेण कौशलेन तरसा झटिति
वस्था निरुपद्रवाः तूरम् तूर्यम् आपूरयन्तः वादयन्तः सैन्धवं तीरं
सिन्धुतटम् प्राप्य संगत्य राग गानं वितेनुः सर्वे प्रभुरागण गायन्तिस्म।।
गमकृष्णपक्षे-खामिनि रामे कृष्णे वा धृतगुणे धृतवोंके
धनुपि कोदण्डे मति अन्यत् सर्व पूर्ववदवसेयम् ।। ५८ ॥
अत्र श्लोके स्रग्धरावृत्तम् " म्रम्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता
सग्धरा कीर्तितेय"मिति तल्लक्षणात् ।।
इतिश्री शास्त्रविशाग्द-कविश्न-भट्टारकाचार्य-श्रीविजयामृतसूरीश्वरप्रणीतायां
समसंधानमहाकाव्य-सरणीटीकायां पंचमः सर्ग ॥ ५ ॥
महोपाध्यायधीमेधविजयगणिविरचिते मप्तसन्धानमहाकावे ॥ अथ षष्ठः सर्गः॥ अथ श्रीमदनेकान्त-कवचं कान्तमुद्वहन् । उदियाय जयश्रीमान् कामस्यारेभिदे विभुः ॥११॥ अन्वय -अथ कान्त श्रीमदनेकान्तकवचमुद्वहन् जयश्रीमान् विभु भरे कामस्य भिदे उदियाय ॥१॥ व्याख्या-अथानन्तरं कान्तं मनोज्ञ श्रीमदनेकांतकवचं श्री: शोभासम्पत्तिः वैराग्यसंपत्तिर्वा यसिन् तत् अनेकान्तः स्याद्वाद ण्व कवचः वर्म तम् उद्वहन् धारयन् उद्वहमानः जयश्रीमान् जयाय श्री- मान् नप इवेत्यर्थः विभुः गभुजिनेन्द्रः अरेः शत्रुभूतस्य कामस्य मनसि- जस्स भिदे नाशाय निरासाप उदियाय उदयमम्युदयं प्राप उद्युक्तो बभूवेति भावः ॥ १ ॥ श्लेपः । रामकृष्णपक्षे- अन्तयति शत्रुमिति अन्तः अने केपामन्तः अने. कान्तः स चासौ काचति अनेकान्तकवचस्तमुद्वहन् धारयन् काम- सारेः कामप्रधानस्य अरे रावणस्य अन्यत्र कामस्य प्रद्युम्नस्य शत्रो- जरासधस्येत्यर्थः अन्यत्पूर्ववत् ॥ १ ॥ क्षितिः प्रिया सर्वराज्ञां तस्याः प्रियतमा-सुताः। यस्याः कृते क्षतिः पुंसां सा वै देही रणोचिता ॥२॥ सर्वराज्ञा शिति प्रिया तस्या सुता प्रियतमा यस्या कृते पुमा क्षति. सा वैदेहीरणोचिना ॥ २ ॥ व्याख्या-सर्पराज्ञाम् राजन्ते राजः मपां सर्वेषु चा राजा सर्वगजस्तेपाम् मत्रिविराजमानाना सितिः क्षिणोति कामवासनां या सा क्षितिः योपिन प्रिया प्रियत्वेनामिमता तस्याः क्षियोपितः सुता दुहिता प्रियतमा अतिशयेन प्रिया यस्याः दुहितु योपितो वा कृते अन्वय wvvv भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-1 निमित्तम् पुंसां पुरुषाणां क्षतिः सर्वतः इहलोकतः परलोकतश्च हानिः साक्षितिः योपित् देहिनाम् देहवतां ईरणोचिता त्यागोचिता यस्याः कृते एव सर्वतोबन्धनं भवति साऽवश्यमेवत्यागाहेति भावः ।। रामपक्षे--सर्वराज्ञां सर्वेषां नृपानां क्षितिः पृथ्वी प्रिया प्रेयसी राज्ञां पृथ्वीपतितत्वाद तस्याः क्षितेः प्रियतमा अतिशयस्नेहपात्रा मुता कन्यका भवतीति शेषः यस्याः कृते दुहितुनिमित्त पुंसां पुरु- पार्थानां क्षतिः "वसुताधर्षणन्न केऽपि सहन्त इत्यर्थः" सा चैदेही ." विदेहराजकन्यका पृथ्वीतनया रणोचितारणाय तन्मोचनार्थ संग्रामाय उचिता अवश्यसंग्रामयोग्येति भावः॥ कृष्णपक्षे-सर्वराज्ञां समस्तभूपतीनां क्षितिहिंसा प्रिया सर्वदा विजिगीपुतया हिंसाबद्धरुचिः चित्ताः तस्याः प्रियतमाः सुताः तस्या हिंसाया प्रियतमा अत्यन्तप्रिया सुता सम्पदः यस्याः सम्पदः कृते पुंसां क्षतिहानिः सा वै हिंसा देहीरणोचिता देहिनाम् ईरणोचिता त्यागयोग्या ॥२॥ राजानकीकृते यस्या राजा न कीर्तिराददे। सा नीता जानकी ये न तस्य श्रीर्जातकी स्थिरा ॥३॥ अन्वयः-- यस्याः कृते राजानकी स्थिरा कीतिराजा न भाददे सा जानकी येन नीता तस्य श्रीर्जातकी ॥ ३ ॥ व्याख्या-यस्याः क्षितेः कृते निमित्तम् तेन राजा नृपेण राजानकी राजमंडलोद्भवा कीतिः प्रशस्तिः स्थिरा निश्चला चिरस्थायिनी न आददे न जगृहे परस्परविवदमानास्सन्तो नष्टा इत्यर्थः सा जानकी लक्ष्मीर्येन नीता तदर्थमतिप्रमक्तिः प्रद- शिता तस्य प्रसक्तस्य श्रीः सम्पत् जातकी दुहितेव किं वंशपरम्परा की नैवेत्यर्थः ॥३॥ राजाराजते इति राद :
महोपाध्याय श्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये NA ~~ wwwwww रामपक्षे-यस्याः जानक्याः कृते जानकीलाभाय जानकीस्व- यंवरकाले कीर्तिःधनुरारोपेण जन्या समाख्या राजसमूहसंबन्धिनी राजा नृपेन न आददे नासादितवती अत्र राजेत्यकवचनेन केनापि रामव्यतिरेकेण न गृहीतेति वस्तुव्यज्यते सा जानकी येन रावणेन आनीता अपहृता तस्य रावणस्य श्री सम्पत् स्थिरा जातकी निथला भवित्री किम् नैव निश्चलेल्यर्थः ।। कृष्णपक्षे पूर्वपक्षयदवसेयम् ॥ ३ ॥ अहो ! मोहोऽवमोहाना हानाङ्गं पुरकामिनी । कामिनीत्या निषिद्धापि स्वबुद्धयाङ्के निधीयते ॥ ४ ॥ भन्यय:-अनमोहाना अहो मोह, पुरकामिनी हानागम् कामिनीत्या निपिद्धाऽपि स्वबुद्धया भङ्के निधीयते ॥ ४ ॥ च्याख्या-अबमोहानाम् अवमुहयंति पैचित्यमुपगच्छंतीति अवमोहाः मोहिताः तेषाम् कर्तव्याकर्तव्यविवेकशून्यानां अहो मोहः अहो अविवेकिता यतः पुरकामिनी पुरं शरीरं कामयते न तद्धर्मादिकं किमप्यन्यदिति सा योपित् यद्वा पुरकामिनी पुरस्य कामिनी साधार- णस्त्रीवाग्यरित्यर्थः हानाङ्गम् हानस्य त्यागस्य अङ्गम् प्रधानाङ्गम् त्याज्यम् तथा च कामिनी त्या कामिनां कामुकानां यानीतिः काम. शास्त्रम् तया निपिद्धापि वर्जनीयत्वेन परिगणितापि विरक्तायां रतिस्तस्यान्न विद्यत" इति निन्दाश्रुत्यापि स्वयुद्धथा स्व. कीयकामपरतन्त्र विचारशून्यमत्या अङ्के क्रोडे निधीयते स्थाप्यते कामिजनैरित्यहो मोहविलसितम् ।। सर्वमाधारणत्वेनोपदेशगर्भवचनमेतत् ॥ ४ ॥ स्थानत्रयीं स्वतो मुक्त्वा तुर्य मण्डलमानयत् । 'उपघातात् पराघाताजिगाम यावनं स्थलम् ॥ ५॥ " रक्तायां चा भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी का सग-६ ४ vA A ~~~~~ अन्वयः-स्वतः स्थानत्रयी मुक्त्वा तुर्यम् मण्डलम् आनयत् उपघातात पराघातात् यावन स्थलम् जिगाय ॥ ५ ॥ व्याख्या-खतः स्वयमेव स्थानत्रयीं चतुर्थपञ्चपष्ठगुणस्थानानां त्रयी स्थानत्रयी तां मुक्त्वा परित्यज्य तुर्य मण्डलं अप्रमत्तगुणस्थानं आनयत् आश्रयत् उपघातात् अपकारात् पराघातात् तिरस्कारान् अथवा गमनात् विचरणादिति भावः यावनं यावनसंबन्धिनं स्थलम् यवनप्रायभूमिम् जिगाय विजितवान् मौनत्रतधारणाद्यवनाऽउम्बा- दिम्लेच्छस्थानादिपु विहारेण तेभ्यो दर्शनन्दत्वा पावयाञ्चकार यय- नानिति तत्वम् ॥५॥ रामकृष्णपक्षे-स्वतः खयमेव स्थानत्रयीम् स्थानानामुपचया- पचयहीनानां प्रयीम् मुक्त्वा परित्यज्य तुर्य मण्डलं चतुर्थोपायम् विग्रहमित्यर्थः : आनयत् स्वीकारमकरोत् उपघातात् अपकारात परा- घातात् तिरस्कारात् यावनं स्थलम् तौरुष्कम् जिगाय विजिग्ये ॥५॥ एवं भावनया देवश्छेत्तुं मोहमहाद्रुहम् । समारुह्य गुणस्थानमारभे क्षपकोद्यमम् ॥ ६॥ अन्वय.-देवः एवं भावनया मोहमहागुहं छेत्तुम् गुणस्थानं समारह क्षपकोद्यमम् भारेमे ॥ ६ । व्याख्या-देवः जिनेन्द्रप्रभुः एवं पूर्वोक्तप्रकारं भावनया वि- चारेण मोहमहाद्रुहम् द्रुह्यतीति ध्रुक महाश्रासौ ध्रुक् महाधुक् मोह एव महाधुक् मोहमहावुक तम् मोहरूपमहद्वैरिण छेत्तुम् मेत्तुम् निरा- कर्तुम् गुणस्थानम् अष्टमम् अनिवृत्तियादरगुणस्थानम् समारुह्य सम- चलम्ब्य क्षपकोद्यमम् कर्मक्षयजनकोद्यमम् आरेमे मोहक्षयविधी प्रसक्तो बभूव तन्निराकरणैकमना अननि ।। रामकृष्णपक्षे–देव दीप्तिमान् रामः कृष्णश्च मोहमहानुहम्
KAJA
महोपाभ्यायभीमेघविजयगणिविरचिते सतसन्धानमहाकाव्ये
मोहयति स्वपराक्रमेण अधीरयतीति मोहः शत्रु: स एव महाद्रुहः
द्रोहकारकः तम् क्षेत्तुम् उन्मूलयितुम् भावनया निराकरिष्णुमनसा
गुणस्थानम् राज्ञां संधिविग्रहादिपट्स्थानम् समारुह्य स्वीकृत्य क्षप-
कोद्यमम् क्षपयतीति क्षपकः निवारकस्तस्य उद्यमम् उद्योगम् आरभे
प्रारब्धवान् ॥६॥
जीवा-स्थानं चापरागं मनस्याधाय तत्पदम् ।
गुणाधिरोहे प्रवलं बलं स्वं समधारयत् ॥ ७ ॥
अन्वयः-जीवास्थानम् अपरागम् च तत्पदम् मनसि आधाय गुणा-
धिरोहे प्रबलम् स्यम् बलम् समधारयत् ॥ ७ ॥
व्याख्या--जीवास्थानम् आसमंतात्तिष्ठत्यसिन्निति आस्थानम्
जीवानाम् आत्मनाम् आस्थानम् जीवास्थानम् द्वादशमं स्थानम् अ.
परागम् अपगतो रागो यसात् तत् अपरागम् क्षीणमोहम् रागादिर-
हितम् तत्पदम् रागरहितम् पदम् क्षपणकपदम् यद्वा जीवानां वास्त-
विकं स्थानम् गुणाधिरोहे गुणस्थानाधिष्ठाने प्रवलम् प्रधानम् स्वम्
स्वकीयम् बलम् तपोबलम् समधारयत् धृतः ॥
रामकृष्णपक्ष-जीवानाम् धनुर्गुणानाम् आस्थानम् चापरागम्
चापस्य धनुषः रागम तत्पदं गुणे पदम् आघाय विचार्य गुणाधिरोहे
गुणारोपणे प्रबलम् प्रकृष्टम् स्वम् आत्मीयम् पलम् ओजः समधारयत्
समाचिनोत् ॥ ७ ॥
अजिह्मगधिया लक्ष किश्चिदादाय धीरधीः ।
विव्याध वाधक क्रोधाद योधं सम-र-सं-गतः ॥ ८॥
मन्वय:-धीरधीः समरसगतः भजिह्मगधिया किंचिल्लक्ष्यम् भादाय
शोधात् माधक योधम् विख्याध ॥ ८ ॥
भाचार्य श्रीविजयातमूरिशणीता मरगी टीका, सर्ग-६ व्याख्या-धीरधीः धीरा अनुद्धता स्थिरेत्यर्थः धीवुद्धिर्यस्य म निश्चलमतिः शमरस शान्तिरसं गतः शान्तिरमप्रधानः अजिह्मगधिया जिले कापट गच्छ तीति जिह्मगा न जिह्मगा अजिह्मगा अकुटिला सा चासौ धीति अजिह्मगधी कापट्यरहितबुद्धिः तया किश्चित किमपि मोक्षमिति शेपः लक्ष्यम् उद्देश्यम् आदाय गृहीत्वा क्रोधात् कोपात बाधकम् तपोविनकारकम् अथवा बाधक मोक्षबाधकं युद्धती ति योधस्तम् कामादिकम् कर्म या विव्याध निवर्तयामास ॥ रामकृष्णपक्षे-ममरसंगतः संग्रामाङ्गणगतः धीरधीः निश्चलम- तिः रामः कृष्णश्च अजिह्मगघिया कापट्यरहितबुद्ध्या किंचित् किमपि विजयादिकम लक्ष्यमुद्देश्यम् आदाय गृहीत्या क्रोधात् कोपाद बाधक अपकारिणम् योधम् मैन्यम् विव्याध विध्यतिम ॥८॥ पञ्चाननक्रियावीर्याद वारये दुर्मनं गजम् । कारये-दानपयसा सलौरभं धरातलम् ॥ ९॥ युग्मम् । अन्धय ~पचाननक्रियातीत दुर्मनं गजम् वारये दानपयसा ससौरभ धरातल कारये ॥ ९ ॥ व्याख्या-पंचाननक्रियावीर्याद पंचाननस्य सिंहस्य या कि- या गजमर्दनादिः तत्र यद्वीर्यम् शक्तिः तसाद "पश्चास्यः केमरीहरि- रित्यमरः" दर्मनम् गजम् वारये दुःखेन मनुते इति दुर्मनस्तम् दुःसा- ध्यम् गजम गजतीति गजः मदनस्तम मदनम् वारये निरुन्धे अथवा पश्चाननस्य शिवस्य या क्रिया मदनदहनादिरूपा तस्या वीर्याद परा- क्रमात दुर्मनम दुःसाभ्यम् गजम् मदनम् वारये निघाग्ये दानजलेन उत्सर्गपयसा अथवा दानपयमा हस्तिमदजलेन "मदो दानमित्यमरः" समौरमम् सौरभेन सुगन्धिना महितम् सामोदम् धरातलम् क्षोणी तलम् कारये विधापये "मृत्युञ्जयः पञ्चमुखोऽष्टमूर्तिरिति हैमः ॥
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये
रामकृष्णपक्षे-दुर्मनम् दुःसाल्यम् गजम् शत्रुहस्तिनम् वारये
संग्रामभूमौ निवारये अन्पत् पूर्वववज्ञेयम् ॥९॥
सदोपदेशनोद्देशात् स्फुरति स्वानगर्जिते ।
घटा गजानामगजा समजायत साप्यजा ॥ १० ॥
अन्वयः-पदोपदेशनोद्देशात् स्वानगर्जिते स्फुरति भगजा गजानां घटा
सापि अजा समजायत । 100
व्याख्या-मदोपदेशनोद्देशात् देशस्य समीपमुपदेशं सन्निहि-
तप्रदेशं तत्र नुदति गच्छतीति नोद "करिविच्" तस्य देशः स्थान
तस्मात् सर्वदा मन्निहितप्रदेशगमनस्थानात् हेतोः स्वानगर्जिते मुष्ठ.
आनस्य अन्तस्थितप्राणवायोः गर्जिते नासिकोच्छ्वासे स्फुरति गम-
नपरिश्रमेणोच्छ्वासपवनप्रचलिते सति अगजानां पार्वतीयानां अग-
जा वृक्षजा वा घटा पंक्तिः सापि अजा निम्ना प्रभोश्छायाहेतोर्नीचैः
समजायत अभवत् ॥
अन्यपक्षे-सदोपदेशनोद्देशात् सदा सर्वदा यत् उपदेशनं अनु.
शामने हितकथनं तस्य उद्देशात् अनुसंधानात् स्वानगर्जिते निर्घोप-
स्तनिते स्फुरति स्फुरमाणे सति गजानां गजन्ति माद्यन्तीति गजाः
मदोन्मत्ताः तेषां घटा संहतिरपि गजानां हस्तिनां अगजा पर्वतो.
द्भया एतेन मदोन्मत्तत्वं सूच्यते घटा पंक्तिरित स्थानगर्जिते मारमे.
ययुके स्फूरति मति अजा छागी समजायत रामकृष्णयोः सच्छासन-
श्रवणान्मदोद्धतानामपि जनानां संहतिः स्वानगर्जिते यथा गजपंक्तिः
छौंगीव भयभीता भवति तथा मीता भवत् न च दुर्विनयमकापीद
गजातां स्वानमीत्वं प्रसिदमेवेति भावः ॥ १० 0.
इन्द्रः कामस्य कामस्य मीलां छेत्तुं न सोद्यमः ।
कन्दर्पः कं वहेदपं रोधने मनसोऽनसः ॥ ११ ॥
- माचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-1 अन्वयः-इन्द्रः कामस कामपि मीलां छेत्तु न सोधमः भनसः कन्दर्पः मनसः रोधने कन्दपं चहेत् ॥ ११ ॥ व्याख्या-इन्द्रः परमैश्वर्यसम्पन्नो देवेन्द्रः कामस्य मदनस्य कामपि मीलां तन्द्रां सर्व विजयित्वान्निर्भयत्वाच सुखसुतिकाम् "त- न्द्री निद्राप्रमीलयोरिति तन्द्री प्रमीलेति चोभयत्रामर" छेन मेनु- निराक मित्यर्थः न सोद्यमः न मव्यापारः तदीयतन्द्राभङ्गे सोद्य- मोऽपि कोपि नास्ति किम्पुनः समर्थ इति भावः अनसः न सः असः न असः अनसः साक्षात् कन्दर्पः मदनः तस्यानङ्गत्वेन तद्वारणं सुक- रमित्याश्रित्य अनस इति पदेन स एव शरीरभृदेवेति कवेस्तात्पर्यम् मनसः वीतरागस्य जिनेन्द्रस्येति शेपः रोधने स्वाधीने करणे कन्द- मईकार बहेव धारयेत् जिनेन्द्राणां मनोऽन्यथा कर्तुन्न तस्य कोऽपि प्रभावस्तेषां मारजितत्त्वादिति भावः अत्र संभावनायां लिहः ।। रामकृष्णपक्षे-इन्द्रः परमैश्वर्यवान् राजा पतीन्द्रस्वामिना. थार्या इति हेमः" कामस स्त्रीयामिलापस्य "कामोऽमिलापस्तश्चेत्य- मर" कामपि मीलां मील्यते इति मीला "भावे गुरोश्च हल इत्यकार- प्रत्ययस्ततष्टाप् " तां मील प्रमक्ति विषयप्रति उत्तुं पृथकात न सोद्यमः न सावधान' कन्दर्पः कं मुस तेन तन्त्र या दृप्यतीति "कर्त- रि अच्" मुसमनः अनमः स्वयं मनमो रोधने मनःप्रमाक्तिनिश- रणे कं दर्पमहकार बंद न कमपि यः विषयप्रमक्तिं न रुणद्धि स मनसो रोधने कथं प्रमवेति मायः ॥११॥ ग्रहीतुमार्जुनी काङ्क्षा प्रवृत्ताङ्गाधिपस्थितिम् । वकर्ति पराकृत्य भीमवृत्तेजयोऽभवत ॥ १२॥ भएप: -पिस्थितिम सीम भउनी माता निम् परा भीगा शप: भापत् ११॥
महोपाध्यायश्री मेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये " व्याख्या--अङ्ग इति संबोधने संवोधनेऽङ्गभोःप्पाडिति हैमः" अधिपस्थितिम् अधिपाति सर्वतो जीवान् रक्षतीति अधिपः जिनेन्द्रः प्रभुः तस्य स्थितिः स्थीयतेऽस्यामिति स्थितिः प्रवृत्तिः प्रमज्यारूपा मर्यादा वा तदधिष्ठितभूमिर्धा तां ग्रहीतुं प्राप्तु अधिष्ठा. तुम्बा आर्जुनीपरिशुद्धा " वलक्षो धवलोऽर्जुन इत्यमरः कांक्षा वाञ्छा प्रवृत्ता कथिता जिनेन्द्राधिष्ठिताम्प्रवृत्तिमुपलब्धुं शुद्धभावना विधेया तथाहि बरवृत्ति यकस्य पक्षिविशेपस्य या वृत्तिः स्थितिः वको जलाशये मत्स्यादिजलचरजन्तुं ग्रहीतुं ध्यानमग्न इव तिष्ठति निश्व- लतया परन्तु तस्य हृदये हिंसैव गरीयसी प्रवृत्तिरिति ता वृत्तिम् छद्म- प्रवृत्तिम् पराकृत्य निर्यास्य भीमवृत्तेः भीमस्य शिवस्य धृत्तिनिश्चल - ध्यानस्य वृत्तिरिववृत्तिर्यस्य तस्य शुद्धाचारस्य जयोऽभवत् शुद्धाचा. रस्यैव जिनेन्द्राधिष्ठितस्थिती प्रवृत्तिरूपा विजयप्राप्तिर्जातेति भावः । अग्दृिष्टिनेंकृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः ॥ शठो मिथ्याविनीतश्च पका वृत्तिरुदाहृतः' इति शब्दस्तोममहानिधिः ॥ रामपक्षे-अधिपस्य रावणस्य स्थितिम् स्थानम् ग्रहीतुम् प्राप्तुम् आर्जुनी अर्जुनस्येयमार्जनी अर्जुनसम्बधिनी प्रभुत्वप्रचुरा कांक्षा वांछा विधेयत्वेन प्रवृत्ता प्रवृत्तिविषयीकृता यावृत्तिम् शैथिल्पप्रवृत्तिम् पराकृत्य निवत्य भीमवृत्तेः उद्धृतवृत्तेर्जयोऽभाव शत्रुषु शिथिलस्य नैव जपः किन्तु भीमवृत्तस्यैवेति तामाश्रयेदिति भाषः ॥ कृष्णपक्षे--अङ्गाधिपस्य कर्णनपतेः स्थितिम् स्थानम् अधि- ठानं ग्रहीतुम् आमादितुम् आर्जनी अर्जनसम्बन्धिनी काक्षा स्पृहा प्रत्ता जाता "जरासंघकणसंग्रामे वर्णमन्वेष्टुम् अर्जुनस्य कांक्षाऽम- चदित्यर्थः परस्य राक्षसविशेषम्य या पृत्तिः मत्ता तां परान्य पृथकृत्य भीमवृत्तेः भीमस्य वृकोदरम्य पृत्तिापारस्तस्याः मीम. व्यापारस्य जयोऽभवत् विजयो जातः फासुरनिहत्य भीमसेनस्य जयो जात इत्यर्थः ।।१२।।
भाचार्यश्रीविजयामृतरिमणीता सरणी रोका, सर्ग-६
धर्मात्मजः स्वभावेन शल्यमुच्छेत्तुमाहतः ।
पुन्नागान् मनसोदिश्य न-कुलस्य पराक्रमः ॥ १३ ॥
अन्वयः-धर्मात्मजः स्वभावेन शल्यम् उच्छेत्तुम् आइतः पुन्नागान् मन.
सा उद्दिश्य नकुलस्य पराक्रमः ॥१३॥
व्याख्या-धर्मात्मजः साक्षाद्धर्मतनूजः यद्वा धर्मप्रवर्तकत्वात्
साक्षाद्धर्मावतारः स्वभावेन निसर्गत एव शल्यम् पापम् उच्छे नुम्
उद्धत्तम् आदृतः कृतादरः उद्युक्तः नकुलस्य कुलाभिमानरहितस्य
जिनेन्द्रस्य पुन्नागान पुंसु नाग इवेति पुन्नागस्तान् पुरुपश्रेष्ठान् सर्व-
तोऽधिकान् मनसा उद्दिश्य अमिलक्ष्य प्राप्यत्वेन स्थिरीकृत्य पराक्रमः
वीरता सर्वोचतालाभायमक्रमत इत्यर्थः॥
रामपक्षे-धर्मात्मजः पुण्यात्मजः रामः स्वभावेन प्रकृत्या
शल्यम् शल्यभूतं रावणरूपशत्रुम् उच्मेत्तुमुद्धर्तुम् आदृतः कृतादरः
सावधानः नकुलस्य नास्तिकुलम् गृहं यस्य तस्य "फुलं वंशे देशे गृहे
इति शब्दस्तोममहानिधिः" तदानीं रामस्य वनवासिवगा गृहामावः
पुन्नागान् पुरुषश्रेष्ठान् रावणादीन् उद्दिश्य अभिलक्ष्य पराक्रमः वीरता
खभावमेव महतां यन्महता विरोधः शल्योद्धारे प्रवृत्तिश्चेति तत्वम् ॥
कृष्णपक्षे-धर्मात्मजः युधिष्ठिरः स्वमावेन स्वत एव शल्यम्
शल्यनामानम् विपक्षनृपम् उच्ने तुम् निगकर्तुम् प्रदर्जुमित्यर्थः आ.
हतः कृतनिश्चयः स्वयमेव तद्धनने मादराभिनिवेशवान् नकुलस्य
तन्नामकचतुर्थपाण्डवस्य पुन्नागान् पुमान्नाग इव इति पुन्नागः पुरुप-
श्रेष्ठस्तान् मनसा उद्दिश्य हृदयेनाभिलक्ष्य पराक्रमः वीरत्वम् पुरुपये
छैन मह योधुं नकुलः पराक्रामतीति भावः ॥ १३ ॥
चिदंशं वेद दुर्भदं मुग्न्यं तस्य विभेदने ।
शोचधर्म पुरस्कृत्यादधात् सन्मार्गणेपणम् ॥ १४ ॥
महोपाध्यायधीमेघ विजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये M.Avnwu अन्वयः-चिदंश दुर्भेदं वेद तस्य विभेदने मुख्यं शौचधर्मम् पुरस्कृत्य सन्मार्गणेषणम् अदधात् ॥ १४ ॥ व्याख्या-चिदंशं अंशयति समाघातयतीति अंशः समाघात- कः चिदः अंशः चिदंशः तम् ज्ञानावरणम् सज्ज्ञानप्रतिबंधकमित्यर्थः दुर्भेदम् दुःखेन भिद्यते इति दुर्भेदम् कष्ट मेदनसाध्यम् वेद जानाति तस्य चिदंशस्य ज्ञानावरणस्य विभेदने छैदने मुख्यम् प्रधानम् शौ. चधर्मम् पवित्रधर्मम् निर्मलाचारम् पुरस्कृत्य अग्रे विधाय सन्मार्गप- णम् सत्पथान्वेपणम् अदधात् अकृत । रामकृष्णपक्षे-चिदंशं चेतनाशं दुर्भदम् कठिनसाध्यम रावण- रुपमामर्थ्यशालि जायचैवन्यवटित्यर्थः एवं जरासंधरूपमित्यर्थः तस्य विमेदने शौचधर्मम् निर्मलधर्म स्याद्वादरूपम् पुरस्कृत्य स्वीकृत्य स- न्मार्गणपणम् माणशोधनम् अधात् अकृत ॥ १४ ॥ त्यक्त्वाऽनुवन्धिनो लोके मिथ्यावोधस्थमानसान् । क्लीवान् स्त्रीसंप्रयोगेषु लीनांस्तस्थो स सुस्थिरः ॥१५॥ भन्चय.-रोके मिथ्याबोधस्थमानमान् अनुबन्धिनः क्लीयान् स्त्रीसंभ. पोगेषु ठीनान् त्यग्वा सुस्थिरः तस्यौ ॥ १५ ॥ व्याख्या-स जिनेन्द्रः लोके संसारे मिथ्याबोधस्थमानसान् मिथ्यावोधे असज्ज्ञाने तिष्ठतीति मिथ्यायोधस्थः स मानसो येषां तान् असज्ज्ञाननिरतान् क्लीमान् पुरुपार्थशून्यान् अधया सज्ज्ञानेऽपि श्र द्धाभक्तिविरहितान स्त्रीसंप्रयोगेषु स्त्रीसंगेपु लीनान रतान् स्त्रीपरवशान् अनुबन्धिन अनुगतान् त्यात्या विसृज्य सुस्थिरः स्वसंकल्पे दर तस्थौ स्थितवान् ॥ १०॥ स्त्रीमेदं नपुंसकमेदं च क्षयं कृत्वा मुस्थिरस्तम्यौ । रामकृष्णपक्षे-मिथ्यायोधस्थमानसान मिथ्यायोधे शत्रुकृतोप- भाचार्य श्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-६ जापेन विपर्यज्ञानस्थितमानसान अनुपन्धिनः केवलं मुखप्रेक्षितयाड- नुगतान न च प्रीत्येति भावः क्लीवान् तृतीयाप्रकृतीन स्त्रीसंप्रयोगेषु लीना स्वीपराधीनान यद्वा स्त्रीसंगतान् पुरुषार्थविरहितान् त्यक्त्वा निरस्य सुस्थिरः केनाप्यकंप्यस्तस्थौ स्थितः ॥ १५ ॥ हास्यादिषट्कव्यावृत्त्या प्रकृत्यास्थानयोग्यधीः । सपोरुपं रुपं मानं मायां प्रक्षिप्य मार्गभाक् ॥ १६ ॥ अन्वयः-हास्यादिपकल्यावृत्या प्रकृत्यास्थानयोग्यधी: स पौरपम् रुपम् मानम् मायाम् प्रक्षिप्ण मार्गभाक् ॥ १६ ॥ व्याख्या-स जिनेन्द्रः हास्यादिपकव्यावृत्या हासो रत्यरती मीतिर्जुगुप्ता शोक एव चेति निरुक्तपदकस्य व्यावृत्या परित्यागेन प्रकृत्यास्थानयोग्यधीः प्रकृतिः कर्मस्वभावः तस्या आस्थाने गुणस्थाने योग्या निरन्तरा धीर्यस्य स तत्स्थानाईबुद्धिः पौरुपम् बाह्यशौर्यम् रुपम् क्रोधम् मानम् अहंकारम् मायाम् कापट्यम् मिथ्यावुद्धिमित्यर्थः प्रक्षिप्य क्षय कृत्वा मार्गभार मोक्षमार्गभाक् जात इति शेषः पूर्व श्लोके सीभेदन्नपुंसकभेदश्च त्यक्त्वेत्युक्तम् इदानीम्पुरुपभेदश्च तत्या- जेत्युक्तम्भवतीति भावः ॥ रामकृष्णपक्षे-हास्यादिपटकानां हासक्रोधशोकमयजुगुप्सावि- मयरूपाणां स्थायीभावानां व्यावृत्या निवारणेन प्रकृत्या स्वभावेन स्थाने प्रशमस्थाने योग्या निर्मला धीर्यस्य स योग्यस्थानामिनिवेशनि- मलचेतस्कः रामः कृष्णो वा सपौरुपम् मपलं यथास्याचथा रुपम् मन्युम् मानम् "स्वाभीष्टश्लेपवीक्षादिविरोधी मान उच्यते' इत्युक्त- लक्षणम, मायाम् कापटचं च प्रक्षिप्य निराकृत्य मार्गभार वीरमार्ग- भान युद्धशास्त्रामातपयनवृत्तो बभूवेति शेषः ॥ १६ ॥ .
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाध्ये
अन्वयः-
दृष्टोऽन्यैः क्वापि गूढात्मा सर्वाशाजयकर्मणा ।
गणाश्रितः स्वभावैक-सपृथक्त्ववितर्ककृत् ॥ १७ ॥
:-सर्वाशाजयकर्मणा गूढारमा छापि अन्यः दृष्टः गणाश्रितः स्व-
भावकसपृथक्त्ववितर्ककृत ॥ १७ ॥
व्याख्या सर्वाशा जयकर्मणा सर्वाश्च वा आशा मनोरथाः तासां
जयकर्मणा विजयेन विजितत्वेन परित्यागेनेत्यर्थः "कांक्षा शंसा गर्ध-
वांछाशेच्छेहावृण्मनोरथा इति हैम:" यद्वा सर्वाशानां समस्तदिशानां
जयकर्मणा स्वविशुद्धाचारेण कैश्चिदपि विषयजालैरपराजितेनेति भावः
"काष्ठाशादिक हरित् ककुरिति हैमः" गूढात्मा गूढः गुप्त आत्मा यस्य
स केनापि तत्वेनाग्रहीतः अलक्षितः क्वापि कुत्रापि अन्यैः कैश्चिन्महा-
भाग्यशालिभिः दृष्टः तत्स्वरूपेण विज्ञातः गणाश्रितः गणैः साधुसंधै-
राश्रितः कृताश्रयः स्वभावकसपृथक्त्ववितर्ककृत स्वभावेन स्वप्रकृत्या
एका अनाश्रित इति स्वभावकः स चासौ सपृथक्त्ववितर्ककचेति
स तथोक्तः अपूर्वकरणमारुह्य सविचारपृथक्त्ववितर्कयुक्तशुक्लध्यानं
प्रापेति भावः लोभस्प जयाय पृथक्त्वस्य खण्डं खण्डं विधाय सपृ-
थक्त्ववितर्कनामकशुक्लध्यानविशेषकर बभूवेति तत्वम् ।
रामकृष्णपक्षे- गूढात्मा अप्रकटितस्वसामर्थ्यः शत्रुभिः कापि
युद्धसमये दृष्टः अवलोकितः सर्वाशाजयकर्मणा सर्व दिगविजयेन अथवा
युद्धसमये सर्वदिक्षु प्रहार विधानेन जयकर्मणा गणेन सैन्येन आश्रितो-
ऽधिष्ठितः स्वभावैकसपृथक्त्ववितर्ककृत् स्वभावेनैव शत्रूणां पृथ-
क्त्वस्य परस्परभेदस्य वितर्ककृत विचारकारकः आसीदिति शेपः१७
क्वचिदात्मैपणपरं द्रव्यमेकं क्वचिद्विदन् ।
गुणं विभावयन् धैर्यात् पर्याये रमतेम सः ॥ १८ ॥
vvvvA vM AAAyur भाचार्यश्रीविजयातसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-६ अन्वयः-चिदा मैपणपरम् क्वचित् एकं दयं विद् धैर्यात् गुणं वि. भावयन् स पर्याये रमतेस्म ॥ १८ ॥ व्याख्या -स जिनेन्द्रः क्वचित कुत्रापि आत्मैपणपरम् आत्मनः स्वस्वरूपस्य यदेपणम् गवेषणम् तत्परम् तदधीनम् कचित् कापि एकम् द्रव्यम् द्रव्यपदार्थम् विदन जानन् धैर्यात् धीरतात गुणम् द्रव्यगुणम् विभावयन् विचारयन् पर्याये साधुधर्मे च रमतेस्म विह- रतिस्म ॥ १८ ॥ रामकृष्णपक्षे-आत्मनः देहस्य " आत्मस्वरूपे यत्ने देहे मा- नसे युद्धाविति शब्दस्तोममहानिधिः" रुपणमन्वेपणम् सर्वतोरक्षणम् तत्परः शरीररक्षासावधानः यद्वा आत्मनः स्वस्य यदेपणः लोहमयो वाणस्तत्परः बाणप्रियः क्वचनापि एकं द्रव्यम् प्रधानभूतं तद्व्यम् धनादिकम् विदन् लभमानः धैर्याद गुणम् धनुमौंवीम् विभायन् वि. चारयन् पर्यालोचयन् पर्याये अवसरे 'पर्यायोऽनुक्रमे प्रकारे अवसरे निर्माण इति शब्दस्तोममहानिधिः" रमतेस्म क्रीडतिस्म ॥ १८ ॥ अपृथक्त्वमवी(वि)चारं सवितर्कगुणान्वितम् । पुरस्कृत्य तिरस्कृत्य तदधःस्थायिभावनाम् ॥ १९ ॥ अन्वयः-- अपृथक्रवम् अविचारम् सवितर्कगुणान्वितम् पुरस्कृत्य सदधः स्थायिभारनाम् तिरस्कृत्य धीराः किसक्युरित्यप्रेणान्ययः ॥ १९ ॥ व्याख्या-अपृथक्त्वम् अविचारम् अविचारशुक्लध्यानविशेष: तम् सवितर्कगुणान्वितम् सवितर्कगुणसहितम् पुरस्कृत्य अग्रे कृत्वा तधः स्थायिभावनाम् तन्नीचस्थयुद्धिम् तिरस्कृत्य निवार्य धीराः किन्न कुर्युरित्युत्तरेणान्वयः ॥ रामकृष्णपक्षे-अपृथक्त्वम् अभिन्नन्वम् अविचारम् विचाररा. हित्यम् सवितर्कगुणान्वितम् सवितर्कगुणेन सदनुमीतगुणेन अन्वित
३१२
महोपाध्यापश्रीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये
vA
युक्तम् पुरकृत्य अग्रे विधाय तदधः स्थायिभावनाम् तद्भिन्नरूपवि-
चारणाम् तिरस्कृत्य निरस्य धीग: किन्नकुटुंरित्युतरेण सम्बन्धः१९
यत् सूक्ष्मसंपरायस्य स्थाने बादरसंगते ।
संजाते-नवमस्थाने धीराः कुर्युन किं पुनः ॥ २० ॥
अन्ययः--यत् सूक्ष्मसंपरायस्य दादरसगते स्थाने नवसस्थाने सजाते
धीराः पुनः किन्न कुप्युः ॥ २९ ।।
व्याख्या-यत् तत्पश्चात् चादरसंगते नवमगुणस्थाने जाते बा-
दरसंपरायाभिधाने नवमगुणस्थानसहिते सूक्ष्मसंपरायस्य स्थाने तन्ना-
मके दशमे गुणस्थानके संजाते प्राप्ते मति धीराः विज्ञाः किम्पुन:
किं किं न कुर्युः तत्स्थान प्राप्य काँस्कान् मोहनीयकर्मभेदान् न हन्युः
सर्वानेव विजितान् विदध्युरिति भावः ।।
रामकृष्णपक्षे--अदरसंगते भयरहिते सूक्ष्मसंपरायस्य गुप्तयुद्ध-
स्य " युद्धायत्योः संपराय इत्यमरः " स्थाने अनवमस्थाने अरक्षके
स्थाने संजाते प्राप्ते सति धीराः यद्धकौशलिनः किन्न कुर्युः सर्वम्
संपादयेरन् ।॥ २० ॥
मुक्तेऽमुक्ते विमृश्यैव वलमायोजयञ्जयम् ।
लभेत चेतःप्रस प्राप्य जाप्यस्थिराशयः ॥ २१ ॥
भन्यय:-मुक्त भमुक्त विमृश्यैव परम् आयोजयन् स्थिराशयः घेतः
प्रसरम् प्राप्य जयम् लभेत ॥ २ ॥
व्याख्या-मुक्त परित्यक्ते अमुक्ते अपरित्यक्ते संगृहीते दि.
मृश्य विचार्य अयं न्याज्योऽपं संग्राह्य इति मम्यग् विविच्य
पलम्
स्वशक्तिम् आयोजयन् संचिन्वन् जाप्यस्थिराशयः जापे जपनीये
निजमनने स्थिराशयः चेतः प्रमरम् चिचप्रकाशम् प्राप्य लब्ध्वा जयं
विजयम् लमेत प्राप्नुयात् ॥२१॥
भाचार्यश्रीविजयातमरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-६ रामकृष्णपक्षे-मुक्ते अविश्वास्येन परित्यक्ते अमुक्त संग्राह्य विपये विमृश्यत्र पुनः पुनर्विचार्यैव बलम् सैन्यम् आयोजयन् संगृह्णन् जाप्य- स्थिराशयः जाप्ये मननीये स्थिराशयः निश्चलचित्तः सुनिश्चलविचार- वान् चेतः प्रसरम् स्वमनोवलम् प्राप्य अधिगत्य जयमौत्कर्ण्यम् लमेत आसादयेत ॥ २१ ॥ वीतरागः सदशमा-दादित्यरुचिरुदगतः । जितकाशी सुनासीर-संगमात समदीप्यत ॥ २२ ॥ अन्वया-चीतरागः सदशमात् भादित्यरचिः उद्गत जितकाशी सुना. सीरसंगमा समदीप्यत ॥ २२ ॥ व्याख्या-वीतरागः विशेषेण इतः गतः रागः सांसारिकवि. पयवासनामिलापो यस्मात् स रागरहितः सदशमात् दशमगुणस्थान- मारम्प आदित्यरुचिः दिवाकरकांतिः उगतः प्रोद्भूतः दिवाकर इव सर्वप्रकाशकारकः सर्वपर्यवेक्षक इति भावः अत एव जितकाशी जितेन जयेन काशते दीप्यते इति जितकाशी प्राप्तोत्कर्षः सुनासीर- संगमात् महेन्द्रसंगाद बदानीमिन्द्रः ममभ्येति इति तत्संगमात् सम दीप्यत प्रदीप्तो जात इत्यर्थः ।। रामकृष्णे यथा शृणु । विशेपेण इतः प्रातः रागः शुत्रुविषय- काप्रीतिर्येन स वीतरागः सदशमान सीदत्यम्मिनित सद् युद्धम् तस्य अशमात अशान्तः अनिवर्तनाद आदिल्याचिः सूर्यकांतिः उद्गतः उद्भूतः सूर्य इवामह्यतेजा अभवत् गितकाशी जयामिलापी मुना. सीरसंगमात् सुष्ठु नासीरम् अग्रगमैन्यं यस्य म सुनामी: "नामीरम् अग्रसरे सेनामुख चेति शन्दस्तोममहानिधिः" तुस्य संगमान संमेल- नात् समदीप्यत अरोचत ।। २२ ॥
१४ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ने येन स्वयं संबोधेन स्वामिनश्च-रणाश्रयः। कृतस्तेनाद्वैतभावोऽन्वभाव्यत स्वनन्दनात् ॥ २३ ॥ अन्वय:-येन स्वय सम्बोधेन स्वामिनः चरणाश्रयः तेनाद्वैतभावः कृतः स्वनन्दनात् अन्वभाव्यत ॥ २३ ॥ व्याख्या-येन स्वयं सम्बोधेन येन यद्रूपेण स्वयमात्मनैव न तु कस्याप्युपदेशेन सम्बोधेन सम्यग्ज्ञानेन खामिनः जिनेन्द्रस्य चर- णाश्रयः चरणस्य चारित्र्यस्य आश्रयः ग्रहणम् तेन तद्रूपणैव अद्वैत- भावः द्विधा इतं मेदं गतं द्वीतम् तस्य भावः द्वैतम् तन्नास्ति यसिन् स अतः स चासौ भावश्चेति अद्वैतमावः सजातीयादिमेदशून्यके बलखात्मानुभवः कृतः विहितः खनन्दनात् स्वम् आत्मानम् नन्द- यति कृतार्थयतीति स्वनन्दनस्तस्मात् यद्वा स्वस्मिन् आत्मनि नन्दति स्वात्मानुभवेन तुष्यतीति स्वनन्दनस्तसात् अन्वभाव्यत अयुज्यत ।। रामपक्षे-येन मम्बोधेन येन हनुमद्दौत्येन सीतास्थितिसंवोधेन सीता रावणगृहे तिष्ठतीति ज्ञानेन स्वामिनो रामस्य च रणाश्रयः रणस्य संग्रामाङ्गणस्य आश्रयः आश्रयणम् युद्धभूमिगमनम् तेन युद्धभूमि- गमनेन अद्वैतभावः तथा सर्वतः स युयुधे यथा रणे रामाद्वैतभावः कृतः प्रतिपक्षिभिः यत्र तत्र राममेवाक्षेष्ट इति रामाद्वैतमभूदिति भावः स्वनन्दनात् स्वम् आत्मानन्नन्दयति हर्षयतीति स्वनन्दनो लक्ष्मणस्त- सात् अन्वभाव्यत अन्वसर्यत लक्ष्मणस्तदान्वमादिति भावः ॥ यद्वा येन संबोधेन कामपरतंत्रेण स्वामिनो राक्षमराजस्य रावण- स्य च रणाश्रयः रणगमनम् तेन रावणेन आ ममंताद द्वैतभावः रामेण सह विपक्षभावः कृतः रामेण सहयोध्धुम् प्रववृनै स्वनन्दनाद स्वस्या- त्मनो नन्दनस्तनयः "नन्दनः पुनः उद्वहोऽगात्मजः सूनुस्तनयोदारका मुत इति हैम:" तसान्मेघनादाव अन्यमान्यत अनुगतः॥ .
आचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-
कृष्णपक्षे-येन कृष्णण सम्बोधेन सम्यक् ज्ञानेन स्वामिनः
सतोऽपि रणाश्रयः रणस्य संग्रामस्य आश्रयः गमनम् तेन कृष्णेन
आसमन्ताव द्वैतभावः मेदबुद्धिः एते मम शत्रव इति मतिः कृतः
विहितः स्वनन्दनात् स्वतनयात् प्रद्युम्नादितः अन्वभाव्यत अनुगतो
जात इत्यर्थः ॥ २३ ॥
यो वैपरीत्यादीशेऽपि कृतकैतवसंगरः ।
तं मनोरथतो दूरान्मने व्यसनिनं प्रभुः ॥ २४ ॥
अन्वयः - यः परीत्यात् ईशेऽपि कृतकैतवसगरः तम् व्यसनिनम् प्रभु
मनोरथतो दूरात् मेने ॥ २४ ॥
व्याख्या-यो मोहादिर्व्यसनः ईशेऽपि जिनेन्द्रेऽपि वपरीत्याव
अयोग्यत्त्वात् कृतकैतवसंगरः कृतो विरचितः कैतवमगरः कपटयुद्धो
येन स सर्वपूज्ये तसिन् छपयुद्धमकृतेति भावः, विहितछमयुद्धः तम्
व्यसनिनम् व्यसनासक्तम् मोहादिकम् प्रभुजिनेन्द्रः मनोरथतो मनो.
रथादपि दरात् पृथक् मेने युयुधे मोहादिर्न कदाचित प्रमोमनोरथ
पथपथिको बभूत्रेति भावः ॥
रामपक्षे -यः रावणः ईशे राजनि रामे चैपरीत्याद अनपराधा-
दपि कृतकतवसंगर: विरचितान्तर्धानादियुद्धः तम् रावणम् च्यसनिनं
व्यसनासक्तम् प्रभुः रामः मनोरथतः मनोरथादपि सीवालामरूपाभि-
लापात् द्रात् पृथक् मेने मन्यतेस ।
कृष्णपक्षे-य: जरासंधः ईशेऽपि कृप्णेऽपि कृत कैतवसंगरः
विहितकपटयुद्धः तम् व्यसनिम् व्यसनाधीनम् मनोरथतः अमिलापात्
कृष्णपराजयरूपात दाद मेने बहुद्रम्मनुतेम ॥४॥
आप्तः पुरिमतालाख्यसस्योपवनधारणाम् ।
काचनाद्रिक्रियामाधाद समाधानोपदेशतः ॥ २५ ॥
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये
M
अन्वयः --पुरिमताकाख्यसख्योपवनधारणाम आप्तः समाधानोपदेशतः
काञ्चनाद्रिक्रियाम् आधात् ॥ २५ ॥
व्याख्या-आदीश्वरपक्षे । पुरिमतालाख्यसख्योपवनधारणा
पुरिमतालाख्यस्य पुरिमतालनाम्नः अयोध्यायाः शाखानगरस्य
सख्यम् मित्रम् सन्निहितमित्यर्थः यदुपवनम् उद्यानम् तत्तथोक्तम्
आप्तः प्राप्तः तदुपवनस्थः समाधानोपदेशतः समाधानस्य समाधेः
य उपदेशः महिमा तस्मात् अथवा शमस्य शान्तेः यदाधानम् स्व.
स्मिन्नाश्रयणम् तस्य य उपदेशः प्रभावस्तस्मात् काश्चानाद्रिक्रियाम्
काञ्चनाद्रेः स्वर्णपर्वतस्य मुमेरोर्या क्रिया निश्चलता तां स्थिरताम् अधाव
अदीधरत् ।। २५॥
जिनेन्द्रचतुष्टयपक्षे । आप्तः पुरिमतालाव्यसख्योपवनधारणाम्
पुरिमताम् नगरवासिनाम् आसमन्तादलति भूपयति आत्मानं यन्त्र
यद्वाऽऽलति खेलति यत्र सा आला खेला सा ख्यायते यत्र तत्
पुरिमतालाख्यम् नागरजममनोरमस्थानम् तस्य सख्योपवनन् सदृश-
मुद्यानम् तत्र धारणाम् स्थितिम् आप्तः प्रातः समाधानस्य उपदेशतः
समाधेः शमाश्रयस्य चा उपदेशतःप्रभावतः काञ्चनाद्रिक्रियाम् सुमे.
रुद्धताम् अगाद आश्रयत् ॥ २५ ॥
रामकृष्णयोः पक्षेप्येवमेवावसेयम् ॥ पार्श्वनाथस्य वारणस्या
धातकोतरुतले केवलज्ञानमुत्पन्नम् नेमिनाथस्य रैवतेऽद्रो वेतसतरुतले
शान्तिनाथस्य हस्तिनापुरे महताम्रपणे नन्दिक्षतले || ऋजुवालुका.
नदीतटे शालवृक्षतले महावीरस्य केवल जानम् ॥ २५ ॥
संपन्ने सकलेऽध्यक्षे लोकालोकप्रकाशिनि ।
देवदुन्दुभयो नेदुर्दिवि दुर्नयवारकाः ॥ २६ ॥
भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-६ भन्वयः-लोकालोकप्रकाशिनि सकलेऽभ्यक्षे सम्पने सति दुझयवारका: देवदुंदुमयः दिवि नेदुः ॥ २६ ॥ व्याख्या--लोकालोकप्रकाशिनि लोक्यते दृश्यते सर्वैरिति लोकः सर्वप्रत्यक्षः न लोक्यते प्रत्यक्षतया न गृह्यते जनैरित्यलोकः तयो. ईन्द्वः लोकालोकम् प्रकाशितुशीलमस्येति लोकालोकप्रकाशी तस्मिन् करामलकवत् परोक्षापरोक्षसकलप्रकाशकारके सकलझाने केवलज्ञाने सम्पन्ने प्राप्ते सति प्रभोः केवलज्ञाने समापन्ने सति दिवि देवलोके आकाशे वा दुनयवारकाः दुर्नीतिनिवारकाः देवदुन्दुभयः देवतूर्याणि नेदुः सस्वनुः प्रमो केवलज्ञानोत्पन्ने सति हर्षादेवानाम् वाद्यानि वदन्तिस्मेति भावः॥ रामकृष्णपक्षे-सकले समग्रे अध्यक्षे नृपस्य छत्रधारणादिव्य- वहारेऽधिकृते अधिष्ठिते सति कथंभूते लोकालोकप्रकाशिनि सन्निहि- तासन्निहित प्रदेशोद्योतकारके सर्वत्र व्यापकशासनशासिते दुर्नयवारका दुराचारनिवारका देवदुन्दुभयः राजतूर्याणि दिवि आकाशे नेदुः शन्द- स्याकाशाश्रयत्वादाकाशे सस्वनुः ॥ २६ ॥ स-कलीश्वरतां प्राप्तोऽलङ्कारवशमाश्रितः । स्वामी जगाद स्याद्वादपद्धस्या मधुरं वचः ॥ २७ ॥ भन्वया-सालीधरतां प्राप्त: भलंकारयसमाधितः स्वामी स्वादादपद्धत्या मधुरं वच: जगाद ॥ २०॥ व्याख्या-सकलीघरतां प्राप्तः सकलम् समस्तमस्त्यस्मिन्निति सकली सकलिनामीश्वरः सकलीश्वरस्तस्य मावस्तत्वा ताम् समग्रप्रभुताम् प्राप्तः अधिगतः समस्तविधप्रभुः अलंकारवशमाश्रितः अलंकाराणि भूषणानि वसन्ति अधितिष्ठन्त्यस्मिन्निति इत्यलंकारवशस्तम् अनेक- शोऽतंकतसमवसरणभूमिमाश्रितः समधिष्ठितः स्वामी जिनेन्द्रप्ररः महोपाध्यायधीमेघ विजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाये स्याद्वादपद्धत्या अनेकान्तवादसरण्या मार्गेण जैनशासनानुसारेणेत्यर्थः मधुरम् सर्वसाधारणरोचकम् वचः वचनम् जगाद उपदिदेश ॥ रामकृष्णपक्षे–कलीश्वरताम् कलेयुद्धस्य ईश्वरतां विजयतां मुख्यतां वा प्राप्तः स रामः कृप्णो वा लंकारवसमाश्रितः लंकायाः रावणराज्यधान्याः यो रवः शब्दस्तमाश्रयनीति तथा लंकाशब्दश्रोता अथवा लंका इति स्वः अभिधानं यस्य तन्नगरसमाश्रितः लंकाधिष्ठितः सन् अन्यत्र अलंकारवशमाश्रितः अनेककौस्तुभादिभूषणवशगः स्वामी पृथ्वीपतिः स्याद्वादपद्धत्या अनेकान्तवादरीत्या मधुरं वचः श्लल्लं वचनं जगाद उचे ॥ २७ ॥ . विशालशालरचना व्यूहरक्षाविशेषिताः । चैत्यपादपसंपन्ना दक्षा यक्षा वितेनिरे ॥ २८ ॥ अन्वयः-दक्षा यक्षाः चैत्यपादपसम्पन्नाः व्यूहरक्षाविरोपिता: विशाल- शालरचना: बितेनिरे ॥ २८ ॥ व्याख्या-दक्षाः प्रवीणाः पटकः यक्षाः देवविशेषाः चैत्यपा. दपसम्पन्नाः चैत्यपादपेन महावृक्षेण देवाधिष्ठानवृक्षण वा यद्वा जिन- समास्थपादपविशेषेण अथवा चैत्येन देवस्थानेन पादपेन च सम्पन्नाः सहिताः न्यूहरक्षाविशेषिताः व्यूहस्य जनसमूहस्य या रक्षा निर्वाधस्थि- तिस्तया विशेपिताः शोभिताः जनानामसंकीर्णस्थितिविशेषमण्डिता इत्यर्थः विश ना विशालः प्रकाण्डो यः शालः गेहः तस्य रचना निर्माणं अथवा विशेषेण गालते शोभते यत् शालम् गृहम् तस्य रचना अथवा विशालो महान् यः शालः प्राकारः तस्य रचना यद्वा विशालः यः शालः वृक्षस्तस्य रचना विधानानि वितेनिरे विस्तारया- मासुः यक्षास्तत्र देवा देवस्थितियोग्यां समां विनिरे ।। रामकृष्णपक्षेऽपि साधारणम् ॥
भाचार्य श्रीयिजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-६ यद्वा दक्षाः जिनेन्द्रविषयकातिशयभक्तिमन्तः यक्षाः देवविशेयाः विशालशालरचनाः विशालानां शालानां रत्नस्वर्णरूप्यमयानां प्राका- स्त्रयाणां या रचनानिर्मितिः ताः चत्यपादपसम्पन्नाः चैत्याभिधानो यः पादपः अशोकवृक्षः तेन सम्पन्ना सहिता समा इति शेषः वितेनिरे विस्तारयामासुः ।। २८ ॥ नीराजनक्रियाप्यर्चानुरागेण विधीयताम् । विधेयास्त्राद्युपास्थायेत्यूचे वाग् विजयैषिभिः ॥ २९ ॥ अन्धयः--विधेय? असाधुपास्थाय अनुरागेण नीराजनक्रियाप्यचर्चा विधीय- ताम् इति विजय पिभिः बाग उचे ॥ २९ ॥ व्याख्या हे विधेय! विधानकारक ! अस्वाद्युपास्थाय अखा. दिनिराकृत्य अनुरागेण प्रेम्णा नीराजनक्रिया आरात्रिकक्रिया अर्चा पूजापि प्रभोरिति शेपः विधीयताम् क्रियताम् इति एवं प्रकारेण विजयैपिमिः विजयेच्छुभिर्देवैरिति शेषः वाम् उचे जगदे ॥ २९ ॥ रामकृष्णपक्षेऽप्येवमेव । विपक्षपक्षे विक्षिप्तः करणेबहुहेतिभिः। प्रपन्नेप्यवधिमानं वर्षाः सुमनसो व्यधुः ॥ ३० ॥ -बहुतिभिः करणविपक्षपक्षे विक्षिप्तः भवधिमानम् प्रपन्ने अपि सुमनसो वा न्यधु ॥ २० ॥ व्याख्या-प्रपन्ने स्थिते निपक्षपक्षे समवसरणभूमौ विप्रभूते तुपकण्टकशकरादिरूपे विद्यमाने सति पहुईतिभिः विपुलतेजस्कैः शिक्षित विक्षेपकारकै नि:मारक करणैः करोतीति करणो शायुः । वायुकुमारैः अवधिमानम् सर्वत एकयोजनम् पृथ्वीतलम् निर्मले कृते सतीति शेषः सुमनमः सुष्ट मनो येपान्ते सुमनसः देवाः मेयक- माराः वर्षाः मुगन्धिजलवृष्टीः उपघुः चक्रः यद्वा सुमनसः अधोमुस- अन्वयः-
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्वे
.
अन्तस्य कुसुमस्य वर्षाः व्यधुः विदधतिस्म !
रामकृष्णपक्षे । बहुहे तिभिरः विक्षिप्तः प्रयोजितः करणैरनेक-
शस्त्रप्रयोगैः विपक्षपक्षे शत्रुपक्षे अवधिमानम् अन्तम् विनाशमित्यर्थः
प्रपन्ने गते प्राप्ते सति सुमनसः पुष्पस्य वर्षाः घृष्टीः व्यधुः अकार्षः
देवा इति शेपः ॥ ३०॥
ये दीक्षिता वीक्षितास्ते मण्डलायविशारदाः।
नारदा अप्युपाजग्मुः स्वामिनं द्रष्टुमुत्सुकाः॥ ३१ ॥
भन्वय:-ये मण्डलायविशारदाः वीक्षिताः ते दीक्षिता स्वामिनं द्रष्टु
मुस्सुका नारदा अपि उपाजग्मुः ॥ ३ ॥
व्याख्या-ये दीक्षिताः लब्धदीक्षा वीक्षिता विशेषेण ईक्षिताः
अवलोकिताः अथवा वीक्षम् विस्मयम् इताः प्राप्ताः जातविसया ते
स्वामिनम् प्रभुम् जिनेन्द्रम् द्रष्टुम् दर्शनाय उत्सुका उत्कण्ठिताः
मण्डलायविशारदाः मंडलाये राजमण्डलाप्रभागे विशारदाः प्रगल्भाः
यद्वा मण्डलाग्रे समवसरणमण्डले विशारदा विचक्षणाः नारदाः मुनि-
विशेषाः अथवा नारम् जलम् ददातीति नारदस्ते मेधकुमाराः अथवा
नरम् अज्ञानम् यति खण्डयतीति नरदस्स एव नारदस्ते अज्ञाननाशका
मुनिविशेषाः यद्वा नरं ज्ञानं ददतीति नरदास्त एव नारदा ज्ञानदायिनः
तेऽपि उपाजग्मुः आययुः॥
रामकृष्णपक्षे-ये दीक्षिताः संग्रामदीक्षामाप्ताः रणागणगताः
ते वीक्षिताः दृष्टाः मण्डलायविशारदाः मण्डलस्य समूहस्य अग्रः श्रेष्ठः
तसिन् विशारदाः श्रेष्ठाः प्रगल्भाः नारदाः खनामख्यात विशेपाः ॥
स्वामिनम् रामम् कृष्णच द्रष्टुमवलोकयितुमुत्सका। उत्कंठिताः उपा
जग्मुरागतवन्तः ॥३१॥
भाचार्यभीविजयातसूरिप्रणीता मरणो टीका. सर्ग-६ धरां के वलिनश्चक्रुः परां विकृतिवर्जिताम् । पुण्यप्रवृति सत्कीर्ति-धवला सकलां किल ॥ ३२ ॥ अन्वयः-केवलिनः पराम् विकृतिवर्जिताम् पुण्यप्रवृत्तिम् सत्कीतिधवला सकलो धराम् किळ चकुः ॥ ३२ ॥ व्याख्या--केवलिनः केवलज्ञानशालिनः जिनेन्द्राः पराम् अ. तिशयिताम् विकृतिवर्जिताम् विकाररहिताम् निर्विकाराम् पुण्यप्रवृत्ति पुण्यस्य सुकृतेः प्रवृत्तिः प्रवर्तनं यत्र ताम् सत्कीर्तिधवलां सती शोभना चासौ कीर्तिः सत्कीर्तिस्तया धवलामवलक्षाम् अथवा सतां सजनानां या कीर्तिः तया धवलाम् प्राप्तप्रकाशाम् सकलाम् निसिलाम् धराम् पृथ्वीम् चक्रुर्विदधुः किल निश्चयेन विदधन्तिम । अत्र केवलिनः इत्यस्य मिन्नार्थोऽपि, यथा केवलिनः केवलज्ञानवती जिनेन्द्रस्य धराम् तदधिष्ठानभूमिम् के केऽपि वलिनः वायच इत्यर्थः ॥ अथवा के आत्मनि बलवन्त: आत्मज्ञानवन्तः अथवा के कामतंत्रे वलिनः काम. जयिनः यद्वा के शरीरे चलिनः शारीरिकममत्वरहिताः "अनादरे सप्तमी" यद्वा के मनसि पलिनः जितेन्द्रियाः मनोजयेन सर्वेन्द्रिय- जयो भवति यद्वा इन्द्रियाणां मनसः प्राधान्यादिति भावः इति ब्रह्मणि वायौ आत्मनि कामतंग्रे देहे मनसि चेवि शब्दस्तोम. महानिधिः"॥३२॥ रामकृष्णपक्षे-के केपि वलिनो बलवन्तो रामादयः कृष्णादयो या परामुत्तष्टां विकृतिवर्जितां निर्विकाराम् पुण्यप्रवृत्ति पुण्यप्रचाराम् पवित्राचाराम् सत्कीर्तिधवलाम् सत्कीविस्फीतां मकलां कृताम् धराम् पृथ्वीम् चक्रुः विरचन्तिम्म; लेपः ॥ ३२॥ नानाविद्याधरास्तत्र विविधायुधभूपिताः। विदधुर्मधुरां भक्तिं परपक्षविनाशनः ॥ ३३ ॥ क ३२२ महोपाध्यायधीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसम्भानमहाकाये अन्वय:-तत्र विविधायुधभूपिताः नानाविद्याधराः परपक्षविनाशनः मधुरां भक्तिम् विदधुः ॥ १३ ॥ व्याख्या-तत्र जिनेन्द्रस्य समवसरणस्थाने विविधायुधभूषिता आयुध्यते यैस्तान्यायुधानि विविधानि अनेकप्रकाराणि च तानि इति विविधायुधानि ते पिताः कृतमंडनाः नानाविद्याधराः अनेकदेवयोनि- विशेपाः परपक्षविनाशनः परपक्षाणां विपक्षपक्षाणां विघ्नविधायकानाम् पापानां वा विनाशनैः विघानिराकरणैर्मधुराम् निर्मलाम् निश्छमा. मित्यर्थः भक्तिम् सेवाम् प्रीतिम् विदधुः चक्रुः ॥ ३३ ॥ रामकृष्णपक्षे-नानाविद्याधराः अनेकशास्त्रपरिशीलनपटिष्ठाः यद्वा नानाविद्याः शिल्पविद्या-गानविद्या-अस्त्रविद्या-शास्त्रविद्या-नीति- विद्या कलाविद्याः ताः धरन्तीति नानाविद्याधराः विविधायुधभूषिताः विविधानि अनेकप्रकाराणि यान्यायुधानि तैपिताः मण्डिताः यदा विविधानि यानि आयुधानि सुवर्णविशेपाणि ते पिताः शोमिताः " अलङ्कारसुवर्ण तु शृङ्गीकनकमायुधमिति हैमः" परपक्षविनाशनः परपक्षाणां शत्रुपक्षाणां विनाशनैः निराकरणैः मधुरां मनोहरां भक्ति प्रीति विदधुः कुर्वन्तिस्म ॥ ३३ ॥ समुद्रविजयं मेघनादं सानकदुन्दुभिः । गर्जितैस्तर्जयामास वृहद्रथमतङ्गाजम् ॥ ३४ ॥ अन्वयः-सानदुन्दुभिः समुद्र विजयम् मेघनादम् गृहद्रथमतगजम् गतिरतर्जयामास ॥ ३४ ॥ व्याख्या-आनयति जिनेन्द्रदर्शनाय सोत्साहं करोतीति आ. नकः स चासौ दुन्दुभिः वाद्य विशेषश्चेति आनकदुन्दुभिः तेन सहितः इति सानकदुन्दुभिः आनकदुन्दुमिमहितवायसमूहः मुद्रया सहितो विजपो यस म समुद्रविजयो मकरकेतनः काम इत्यर्थस्तम् मेपनादम् भाचार्यश्रीविजपामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-1 .. मेघ इन नादो यस्य तम् सर्वविजयित्त्वाव यद्वा मेहनम् सिञ्चनम् मेघः तस्मै नदति गर्जतीति मेघनादः श्रीसंगमाय कृतगर्जनस्तम् वृह- द्रथमतङ्गाजम् रमन्ते अनेनेति स्थः वृहत महान् चासो रथचेति वृह- द्रथा तसिन् मतङ्गजा श्रेष्ठः इति तथोक्तः महद्रमणसाधकः काममू- लादेव स्त्रीविलासप्रवृत्तिरिति भावः तम् यद्वा वृहन्महान् रथो यस्य स वृहद्रथा स चासौ मतङ्गनश्चेति तथा मदोन्मत्त्वाचत्सादृश्यम् त गर्जितैः स्वीयशब्दैः तर्जयामास विद्रावयामास | जिनेन्द्रसमवसरण- वाद्यानि विपक्षान क्षोभयन्तिस्मेति भावः ॥ रामपक्षे-सानकदुन्दुभिः दुन्दु इति शब्देन भापयति मीपयति दिशो विद्रावयति शनिति दुन्दुभिः आनकेन सहितः दुन्दुभिः इति सानकदुन्दुभिः प्रोत्साहितवानरसैन्यम् समुद्रविजयम् समुद्रेण परिखाभूतेन विजयो रिपुकतानमिभवो यस्य तम् दुस्तरसमुद्रपरिख- त्वात् कैरपि पराजयितुमशक्यम् वृहद्रथमतंगजम् बृहद्रये महद्राधे- मतंगजो यस्य तम् हस्तिस्थस्थम् मेघनादम् तदभिधानम् रावणतनयम् गजितेनिजगर्जनामिस्तर्जयामास निर्भर्सयांचके ।। कृष्णपक्षे-सानकदुन्दुभिः आनकदुन्दुमिर्चमदेवः तेन सहितः इति सानकदुन्दुमिः यसदेवसहिवयादवसैन्यम् समुद्रविजयम् समुद्र- न्ति आद्रीभवन्ति रुधिरेण शत्रवो यसाद स समुद्रः यद्वा मुद्रया सहितः समुद्रः विजयते इति विजया समुद्रश्वासौ विजययेति समुद्रवि. जयस्तम् मेघनादम् मेघ इव धन इव नदतीति मेघनादस्तम् वृद्रिय- मचंगजम् वृद्रियस्सापत्यम् वृहद्रयः अपत्यप्रत्ययस्य लुक् स मतगज इवेति जरासंघ गर्जितः स्वीयवीरशन्दः तपामाम क्षोमयामास || वृहन्महान् रयो यस्य स वृहद्रथः स मतंगज इवेति वृहद्रथमवंगजस्त- मित्ययों वा मासते । शेषः ॥ ३४ ॥ - ३२४ v महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्ससम्मानमहाकाये वसुदेवः साङ्गजन्मा साम्याग्रजजयध्वनिः । नरो विद्याधराजेतुं प्रतस्थे नेमिरक्षितः ॥ ३५ ॥ अन्धयः-साङ्गजन्मा वसुदेवः साम्बाग्रजजयध्वनिः नेमिरक्षितः नरः विद्याधरान् जेतुम् प्रतस्थे ॥ ३५ ॥ व्याख्या-वसुदेवः वसुना दीप्त्या दीव्यति प्रकाशते इति वसु- देवः कान्तिमान अद्भुततेजस्क: अंगयतीलङ्गा तेन अङ्गेन चिह्न सहितं जन्म यस्य म साङ्गजन्मा तीर्थकराणां पृथक् पृथक् लाञ्छनं जन्मत एव भवतीति ज्ञेयम् सलाञ्छनः अम्बया सहितः साम्बा तस्य अग्रज: प्रथम जातः चनिः जयजयारावो यस्य साम्बाग्रजजयध्व. निः तीर्थङ्कराणां जननी जन्मनि स्वजन्मनि च देवैर्जयशब्दः क्रियते इति समुदाचारः नरः ना यद्वा : कामानलो नास्ति यस्य स नरः कामानलरहितः जिनेन्द्रः विद्याधगन् मारणमोहनवशीकरणविद्वेषणो. चाटनस्तम्भनादिपविधविद्योपजीविनो जेतुम् पराजयितुम् यद्वा अविद्याधरान् अज्ञान् सावद्यज्ञानवतो वा जेतुम्उपदेष्टुम् अनेमिरक्षितः नेमिः रथोपकरणविशेपस्तेन रक्षितो न भवतीति तथा पादचार। प्रतस्थे विजहार ॥ रामपक्षे-वसुदेवः कान्तिभृत् समानादेकरसादङ्गजन्म शरीर- धारणं यस स एकपित्तकः सलक्ष्मण इत्यर्थः अमति वात्सल्य यातीति अम्बः अम्बते स्नेहेन जल्पतीति वा अम्बः स्नेहका तेन सहिता अग्रजो यस्य स साम्बाग्रजः तस्मिन् जयन्वनिर्विजयशन्दो यस्य स साम्बाग्रजजयध्वनिः नः लक्ष्मणः नेमिरक्षित: चक्रपालितः विद्याध- रान् अन्तर्धानादिविद्यायुक्तान् जेतुम् प्रतस्थे चचाल । कृष्णपक्षे-साङ्गजन्मा अंगात् जन्म यस्य स साङ्गजन्मा तनूजः सेन सहित: अफरः ऋरः ज्वलनवेग इत्यादयस्तत्सुतास्तैः सह वसुदेवः भाचार्यश्रीविजयामृतसरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग- ३२५ अन्वयः- साम्बाग्रजजयध्वनिः प्रद्युम्नसाम्बप्रभृतिः नेमिरक्षितः नेमिनाथेन कृत- रक्षाविधिः नरः विद्याधरान् जेतुम् पराजयितुम् प्रतस्थे चचाल || अर्वाक् जरासंघसैन्या-दागुर्विद्याधरोचमाः। वैतात्याद्री जरासंध-गृह्या ये संति खेचराः। तेषां जयार्थ सेनानी-वसुदेवोऽस्तु तेऽनुज इत्यादि नेमिनाथचरित्रे कथा सन्दर्भः ॥ ३५ ॥ ज्योतिर्वैमानिका देवा भावनाश्च वनेचराः नन्वीयुः केवलोत्पत्तिमहिमानं दिदृक्षवः ॥३६ ॥ -ज्योतिर्वैमानिकादेवा भावनाः च वनेचराः केवलोत्पत्ति- महिमानम् दिदृक्षवः नन्वीयुः ॥ ३६ ॥ व्याख्या-केवलोत्पत्तिमहिमानम् केवलस्य केवलज्ञानस्य उत्पत्ति- रुद्भवः तस्याः महिमानम् अनुभावम् दिदृक्षवः द्रष्टुमिच्छवः प्रेक्षका: ज्योतिः ज्योतिष्कदेवाः वैमानिकदेवाः भावनाः भुवनपतिदेवाः वने. चराः व्यंतरदेवा ननु इति कोमलालापे ईयुः आजग्मुः ।। रामकृष्णपक्षे-के राजनि राक्षसराजे रावणे जरासंधे नृपे का "क: राजनि-ब्रह्मणि आत्मनि-देहे मनसीत्यादिशब्दस्तोममहानिधि" विपये बलोत्पत्तिमहिमानम् प्रमावोत्पत्तिविशेषोत्कय॑म् दिदृक्षवः प्रेक्षकाः ज्योतिः ज्योतिष्कदेवाः वैमानिका देवाः भावनाः भुवनपति- देवाः वनेचराः ननु ईयुः आययुः लोकोत्तरवीरद्वयोः प्रभावदर्शनाय समापेतुः ।। ३६ ॥ जज्ञे समवसरणं लग्नवध्वा दशाश्रयम् । स्वान्ययो भुजोयोगे सुरासुराङ्गसंगतेः ।। ३७ ।। -सुरासुरांगसंगतेः स्वान्ययो भुजोयोंगे लमयध्वा दशाश्रयम् समवसरणम् जशे ॥ ३० ॥ अन्वयः- महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सहसन्धानमहाकाग्ये व्याख्या-मुरासुरागसंगतेः मुराः देवाः असुराः दानवाः तयोर्द्वन्द्वः इति सुरासुरे तयोरङ्गसङ्गतिः अवयवमम्मेलनमिति सुरासु- राङ्गसङ्गतिः अवयवसम्मेलनमिति सुरासुरागसंगति देवासुरसम्मेलन तस्मात् देवासुरसगतेः सकाशाद यद्वा देवासुरसंगतिमाश्रित्येत्यर्थः॥ "ल्यव्लोपे पंचमी" स्वान्ययोर्भूभुजोर्योगे स्वे च अन्ये च इति तयोः खान्ययोः भूभुजोः नरराजदेवराजयोः योगे सम्बन्धे । यद्वा देवरा- जासुरराजयोोंगे लग्नबध्वाः परिणयागतवध्वाः दशां वस्त्राञ्चलम् आश्रयते यसिन् तत् इव यथास्यात्तथा वा समवसरणम् केवलज्ञानो- त्सवम् वरमुक्तिवध्वा दशाश्रयमिवेत्यर्थः जज्ञे समुत्पेदे ।। रामकृष्णपक्षे-सुरासुरागसंगतेः सुराणाम् देवानाम् दैत्यानाम् राक्षसानां वा अङ्गसङ्गतिः शरीरसम्बन्धस्तस्मात् प्रेक्षकतया देवासुरस- गतेः पश्चात् लग्नबध्याः संग्रामलक्ष्म्याः विजयलक्ष्म्याः दशाम् वस्त्रा. ञ्चलमाश्रयते उद्देश्यत्वेन अमिलक्ष्यते यत्र तत् खान्यभूभुजोोंगे स्वकीयपरकीयराजमम्बन्धे उभयपक्षनृपतिसमायोगे समवसरणम् समानयुद्धम् एकतरपक्षजयपराजयशून्यम् जज्ञे बभूव ।। ३७ ॥ सुराः सुरपदे लग्ना मग्नास्तत्र नरा नरैः । भूपा भूपालमासाद्य तुल्यस्थानप्रयत्नकाः ॥ ३८॥ मन्वयः-तत्र सुराः सुरपदे लग्ना नराः नरैः मनाः भूपाः भूपालमासाय तुलस्थानप्रयवकाः ॥ ३७॥ व्याख्या --तत्र समवसरणे मुराः देवाः सुरपदे देवस्थाने लग्नाः स्थिता उपविष्टा इत्यर्थः नराः मनुष्याः नरैः मनुष्यैः महेति शेषः मनाः निममाः संगताः भूपाः पृथ्वीपतयः भूपालम् नृपम् आसाद्य प्राप्य भूपतिश्रेणिमाश्रित्य तुल्यस्थानप्रयनकाः तुल्यस्थाने स्वसमान- स्थाने योग्यस्थाने इति तत्वम् प्रयत्नो येषां ते तथोक्ताः असंकीर्णा आसनिति शेपः खस्खयोग्यस्थाने समुपविष्टा इति मावः ॥
भाषायश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका सर्ग- १२७ ~urwwwmorwar रामकृष्णपक्षे-तत्र समवसरणे समानयुद्धे स्वखसमाजे प्रेक्षका- स्ते तस्थुरन्यत् पूर्ववत् ॥ ३८ ॥ पत्तीनां समिती पत्ति-योगः सादिषु सादिनाम् । रथिनां रथिसंसर्गाद मर्यादातिक्रमो न तत् ॥३९॥ अन्वया-पत्तीनां समिती पत्तियोग, सादिनाम् सादिषु रधिनाम् रधि- संसर्गात् तत् मर्यादातिक्रमो न ॥ ३९ ॥ व्याख्या-पत्तीनाम् सेनानाम् "एकोरथो गजोऽप्येकवयो. ऽश्वाः पञ्च सैनिकाः पत्तयस्ते समाख्याता युद्धशास्त्रविशारदै" रित्यु- क्तप्रकाराणां समिती समुदाय पत्तियोगः उक्तप्रकाराणां योगः सम्ब- न्धः सादिपु अवगजारोहणकर्तृपु जनेषु सादिनाम् अश्वारोहिणाम् गजारोहिणाम् योगः सम्बन्धः रथिनाम् रथारोहिणाम् रथिसंसर्गात रथिमिः । सम्बन्धात् तद मर्यादातिक्रमः श्रेणीमङ्गः न, क्रमस्खलना न जातेति भावः ।। व्यभिचारं नयात्येत-द्वथाख्यानं रामकृष्णयोः ।। ३९ ॥ प्रभोरादेशमासाद्य योगिसेनाग्रणीगणी । कृतहस्ततयारोपत्यागाच्चके हिते-रणम् ॥ ४०॥ अन्वयः-प्रभो' आदेशम् भासाद्य योगिसेनामणी: गणीकृतहस्ततया भारोपस्यागात् हितरणम् चक्रे । १० ॥ व्याख्या-प्रभोः जिनेन्द्रस्य आदेशम् अनुज्ञाम् आसाद्य लब्ध्या योगोऽस्यास्तीति योगी अस्य स्वं तपोयोगसमाधय इति हैमः" योगिनां सेना समुदायः तत्र अग्रणीः श्रेष्ठः इति योगिसेनाग्रणीः योगि- समुदायानेसरः गणी-"अनूचानः प्रवचने साङ्गेऽधीती गणश्च स इति हैमः" गणधरः ऋषमादिः कृतहस्ततया मुशिक्षिततया आरोपत्यागात् आरोपस्य भ्रमस्य त्यागाद निरसनात् यथास्थितवस्तुस्वरूपतः हिते. रणम् सदुपदेशम् चके विदधे ।।
३२८ महोपाध्यायश्रीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये रामकृष्णपक्षे-प्रमोः रामस्य कृष्णस्य च आदेशमाज्ञाम् आसाद्य प्राप्य योगिसेनाग्रणीः युज्यते नियुज्यते संग्रामायेति योगिनी सा चासौ सेना चेति योगिसेना तासु अग्रणीः श्रेष्ठः अग्रेसर इत्यर्थः गणी वीरेषु गण्यते संख्यायते इति गणी संख्यावान् सेनापतिरितिभाव: कृतहस्ततया सुशिक्षिततया क्षिप्रहस्ततया आरोप त्यागात भ्रमराहित्येन अहिते शत्रौ रणम् युद्धम् चक्रे विदधे ।। " निष्णातो निपुणो दक्षः कर्महस्तमुखाः कृतादिति हैमः" ॥ ४० ॥ कश्चित् सारसनाभिस्पृग्व्यवच्छेदविधौ पटुः । दीतिभागन्वयं मत्वा चके ज्याघातवारणम् ॥४१॥ भन्वयः-कश्चित् सारसनाभिस्पक् व्यवच्छेदवधौ पटुः दीसिमाक् भन्वयं मस्या ज्याधातवारणं चके ॥४॥ व्याख्या-कश्चित् कोऽपि सारसनाभिस्पृक् सारसे नयुक्तो नाभिः सारसनाभिः काञ्चीयुक्तनामिः तम् स्पृशतीति तथा स्त्रीकट्याभरणस- हितनाभिस्पृर्शकर्ता व्यवच्छेदविधौ तत्परित्यागविधौ पटुः कुशल: यद्वा सारसनाभिस्पृशः व्यवच्छेदविधिः परिवर्जन विधिस्तत्रपटुः दक्षः। स्त्रीसंमोगरहितो जातः अत एव दीप्तिभाग कान्तिमान् जात इति शेषः अन्वयम् सम्बन्धं सर्वत्रजीवसम्बन्धं युध्वा ज्याघातवारणं ज्यया मौा धनुर्गुणेन यो घातः प्राणिवधस्तस्य वारणं निपेधं हिंसानिति चक्रे गणघरोपदिष्टवचनं श्रुत्वा कविधोपित्संगानिववृते कधिद्धिसा- तश्चेति तत्वम् ।। ४१ ॥ रामकृष्णपक्षे-आरसति शन्दं करोतीति आरसः आरसेन सहितः सारसः स चासो नाभिः रथचक्रवामपिण्डी चेति सारसनामिस्तं स्पृशति स्वस्थं करोतीति सारसनाभिस्पृक् "नाभिर्नामौ रथचक्रस्य वामपिट्यां क्षत्रिये मृगमदे इति शन्दस्तोममहानिधिः" व्यवच्छेदविधी
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माधाश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका सर्ग-
वाणमोचने शत्रुच्छेदन विधौ च पटुः दक्षः दीप्तिभाग अतितेजस्कः
अन्वयं निजपिठ्मातकुलावदात्तत्वं महद्वंशप्रमतोऽहमिति मत्वा विचार्य
ज्यायाः मौा योधातः हस्ते स्पर्शजनितः क्षतिः तस्य वारण निवारण
हस्ते चर्मबन्धनम् चक्रे विदघे युद्धाय सन्नह्यत इति भावः ॥ ४ ॥
न केवलं परामृश्य पुरतः पदमादधुः ।
अश्रद्धया के वलिनां परे मीमांमकाः श्रुतेः॥ ४२ ।।
भन्वय:-केवल परामृश्य पुरतः पदम् न भादधुः किन्तु परे मीमां.
सकाः फेवलिनाम् भव्या श्रुतेः पदमादधुः ॥ ४२ ॥
व्याख्या-केचन केवलम् प्रभोरिति शेपः केवलज्ञानं जातमिति
परामश्य विचार्य पुरतः अग्रतः समवसरणस्थप्रभुदर्शनार्थमुपदेशश्रव
णार्थ वा पदम् आदधुः तत्र गमनाय प्रचक्रमिरे न किन्तु केवलिनाम्
केवलज्ञानवतां प्रभूणां प्रभुमित्पर्थः "अनादरे पष्ठी" अश्रद्धया तद्वि-
पयकालीकयुद्धया श्रुतेः श्रवणस्य केवलज्ञानमुत्पन्न मिति विश्वासराहि-
त्येन मीमांसकाः परे केऽपि कर्मवादिनोऽपि पदम् तत्र तद्दर्शनाय
चरणप्रचारमादधुः चक्रुः ॥ यद्वा केवलिनाम् केवलज्ञानवताम्
अश्रद्धया अभक्त्या श्रुतेः शास्त्रस्य अमीमांमकाः शास्त्रज्ञानरहिताः परे
केचन परामृश्य विचार्य अस्माकमत्राकाशो न भवेदिति विचार्य
पुरतः
अग्रतः स्वस्थानादग्रे केवलम् पदम् एकपदमपि न आदधुः स्वस्थाना-
देकक्रममपि न चेलुः ॥
यद्वा श्रुतेः शास्त्रस्य मीमांसकाः विचारकाः शास्त्रविचारदक्षाः
चलिनाम् बलवताम् परे श्रेष्ठाः आत्मज्ञानवतां धुर्याः के कामतंत्रे
देहे वा अश्रद्धया अनभिनिवेशतया बलम् स्वीयसामध्ये परामृश्य
विचार्य पुरतः अग्रतः देशनाश्रवणार्थं के पदं गमनम् न आदधुः न
चक्रुः किन्तु सर्वे तत्र पदमादधुर्जग्मुरिति भावः ॥ ४२ ॥
३३०
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्भानमहाकाये
रामकृष्णपक्षे–के केऽपि बलम् स्वसामर्थ्य परामृश्य विचार्य
पुरतः अग्रतः संग्रामभूमौ पदं चरणं न आदधुः न धृताः संग्रामभूमौ
न गताः परे केचन के शरीरे अश्रद्धया किमिदं क्षणभङ्गुरं शरीरं
रक्ष्यते इति शारीरिकममरहिताः श्रूयते इति श्रुतिः शब्दः तस्याः
मीमांसकाः विचारवन्तः धिर धिग किमिति पलायन्ते नेयं वीरपद्ध-
तिरिति शत्रुवचनविचारकाः वीरामिमानिन इत्यर्थः पुरतः संग्रामाया-
ग्रतः पदं चरणं आदधुः संग्रामाय जग्मुरिति भावः ॥ ४२ ॥
धन्याः केऽपीश्वरम्मन्या यथेच्छाचारकारिणः ।
स्वका-रणे कार्यकृतः सभ्या वाल्लभ्यमैयरुः ॥४३॥
अन्वयः-केऽपि ईश्वरम्मन्या. यथेच्छाचारकारिणः स्वकारणे भकार्य-
कृत: सम्या वालुभ्यम् ऐयरुः ॥ १३ ॥
व्याख्या-ईश्वरम्मन्याः जिनेन्द्रे ईश्वरबुद्धिमन्तः यथेच्छाचा.
रकारिणः जिनेन्द्रस्य या इच्छा आचारश्च तयोः कारिणः जिनेन्द्रा-
ज्ञानुवर्तिनः स्वकाः स्वाधीना: न तु पुत्रकलत्रादिपरतंत्राः रणे संग्रामे
कार्य हिंसनादिकम न कुर्वन्तीति अकार्यकृतः हिंसादिव्यापारपराङ्मु-
खाः धन्याः कृतकरयाः श्रेष्ठाः सम्पाः सभाः योग्या: वाल्लभ्यम्
प्रागल्भ्यम् ऐयरुः अलमन्त ॥
रामकृष्णपक्षे- केऽपि केचन ईश्वरम्मन्या आत्मानम् ईश्वरम्म-
न्यन्ते इति तथोक्ता अत एवं यथेन्छाचारकारिणः स्वामिमतकार्य.
कारिणः निष्प्रतिबंधा धन्याः श्रेष्ठाः स्वकाः स्वाधीना: रणे संग्रामे
कार्यकृतः मंग्रामकार्यदक्षाः मन्याः समाः वाल्लम्यम् वल्लमताम्
प्रगल्भतां ऐयरु' आपाप्नुयुः ॥ ४३ ॥
मार्गणान्वेपणाजीवाजीवाश्रयदृशः परे ।
वारवाणभृतो वारयाणादिरतिमादधुः ॥ १४ ॥
माधार्य श्रीविजयातसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-६ nnwww " अन्वयः-परे मार्गणान्येपणात् जीवाजीवाश्रयदृशः वारयाणभृतः बार- वाणात विरतिम भादधुः ॥ ११ ॥ व्याख्या-मार्गणान्वेषणात् मार्ग्यतेऽनेनेति मार्गणम् शास्त्रम् ज्ञानं वा “करणे ल्युः” तस्य अन्वेषणात् पर्यालोचनात् परे केपि जीवाजीवाश्रयदृशः जीवाश्च अजीवाश्चेति जीवाजीवम् तत् आश्रयति विचारयत्तीति जीवाजीवाश्रय हक् येषां ते जीवाजीवविचारचणाः वारवाणमृतः वाखाणम् कवचम् विभ्रति धारयति इति वारवाणभृतः कवचधारिण: निचोलकः स्यात कूपासो वारवाणश्व कंचुक इति अथवा वियते जनैरिति वारः संमारः तम् वाणयति रुण- दीति प्रेरयति विक्षिपतीति वारवाणः संसारनिवर्तकस्तं विभ्रतीति वारयाणभृतः चारित्र्यवन्तः संसारनिवर्तकाध्यवसायवन्तो वा वारवा- णात् वारम् जनसमूहम् बाणयति आह्वयति स्वसानिद्धचं कारयतीति वारवाणः वेश्वाजनः तस्साच यद्वा बाणम् शरम् वृणोतीति वारवाण: राजदन्तादित्वात् परनिपातः तस्मात् हिंसार्थवाणधारणात् वितिम् विरामम् आदधुः स्वीचक्रुः अत्र गम्यो विरोधाभासोऽलंकारः॥ रामकृष्णपक्षे-मार्गणान्वेपणाच मार्गणस्य चाणस्य अन्वेषणात् संधानात् जीवाजीवाश्रयदृशः जीवन्मृतज्ञानवन्तः एते जीवन्ति एते मृता इति विवेकवन्तः वारवाणभृतः कवचिना बाणवारात याणावस- राव चाणाघातात् विरतिम् निवृत्तिम् आदधुः कृतवन्तः कवचधारणेन पाणवेधस्स निवृत्तिः कृतेति भावः ॥ "वेलावारावसरः प्रस्तावः ।। प्रक्रमोऽन्तरमिति हैम:" ॥४४॥ शुद्धेपणानवच्छेदाद्वैयावृत्त्यं वियोगिनाम् । स्वतन्वाशु वितन्वानाः प्रायश्चित्तं समादधुः ॥४५॥ अन्वय:-वियोगिनाम शुढेपणानवच्छेदात वैयावृत्यं स्वतम्या वितन्धाना: माशु प्रायति समादधु. १५ ॥
महोपाध्यायश्री मेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्धानमहाकाले ~ व्याख्या-वियोगिनाम् विगतः योगः सांसारिकविषयसंबन्धो येपा ते वियोगिनस्तेपाम् निर्ग्रन्थिनां मुनीनाम् शुद्धेपणानवच्छेदाद शुद्धपणायाः पवित्रैपणायाः निरवद्यमिक्षायाः अनवच्छेदात् नैरन्तर्याद वैयावृश्यम् साधुसेवाविशेषम स्वतन्वा स्वशरीरेण वितन्वानाः कुर्वाणा: मुनयः इति शेषः, आशु झटिति प्रायश्चिचम् प्रायस्य पापस्स चिचम् शोधनम् यस्मात् तम् 'प्रायो नाम तपः प्रोक्तं चित्तं निश्चय उच्यते। तपो- निश्रय सयुक्तं प्रायश्चित्तमिति स्मृत'मित्युक्तस्वरूपं वा समादधुः चक्रु॥ रामकृष्णविषये-शुद्धेपणानवच्छेदात् शुद्धः निशातो य एषणो चाणः तस्य अनवच्छेदात सातत्याद अनवरतवाणप्रयोगाद वियोगि- नाम् वि अमहनेऽक्षमाया योगोऽमिनिवेशो येपा ते वियोगिनस्तेपा- मसहिष्णूना वैयावृत्यम् व्यावृत्तर्भवम् वैयावृत्यम् निवारणम् आशु शीघ्रम् वितन्यानाः विस्तारयन्तः स्वतन्वा शरीरेण प्रायः बाहुल्येन चित्तं मनः समादधुः समादधतिस चितकाम्यं चनुरित्यर्थः ॥४५॥ उद्यते-रावणी दीचे सर्वत्राभयविस्मयः। कोशल्यानन्दनोद्योगे कौशल्यानन्दनो न कः? ॥४६॥ श-जयदी रावणी उद्यते सवन अभयविस्मय कौशल्यानन्दनोयोगे क फोरयानन्दनो न ॥ ४६ ॥ व्याख्या-रावयति निवारयति कर्म दुःसं यः स रावणः तस्यायं रामणि उपदेशः तस्मिन् रावणौ उपदेशे दीघे महति उद्यते प्रभवति सति प्रभूतजिनेन्द्रव्याख्याने प्रसरति सतीति भावः सर्वत्र सर्वतो. भावन अभयस्य निरायाघस्थ परस्परविद्वेपशान्तभावस्य विस्मयः आश्चर्यः अजनीति शेपः कौशल्येन निजालौकिकनैपुण्येन आनन्दय. तीति कौशल्यानन्दनः निजनिर्मलदाक्ष्येणानन्दयिता तस्य उद्योगे उप- देशविधौ २ः संसारी कौशल्यानन्दना कौशल्येन कुशलतया नन्दनः भाषाश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-१ सुखवान् न सर्व एव कुशलवान जात इति तत्वम् ।। रामपक्षे-दीघे महति रावणौ रावणपुत्रे मेघनादे उद्यते संग्रामाय उद्युक्ते सति सर्वत्राभयविसंयः सर्वत्र सर्वेषु स्वसैन्येषु अभयस्य निर्भ- यस्य विसयः अजनि इति शेपः अथवा सर्वत्र सर्वेषु रामसैन्येषु आसमन्तात् भयस्य मीतेविस्मयः आभयेन विस्मय इति वा अजनीति शेषः कौशल्यानन्दनस्य रामस्य उद्योगः रणगमनम् तसिन का सैन्य- परिगतः का कौशल्येन कुशलस्य भावः कौशल्यम् मांगल्यम् तेन नन्दनः आनन्दयुक्तः न सर्वे आनन्दिता अभवन्निति भावः ।। श्रीकृष्णपक्षे जिनेन्द्रपक्षबज्ज्ञेयम् ॥ ४६ ॥ प्राप्ते मार्गे दशमुखेऽभिमुखे संयतीशिताम् । न कोऽपि निरतः स्थातुं पुरतो विनतात्मना॥४७॥ अन्वयः-संयतीशिताम् मासे दशमुखे अभिमुखे मार्गे कोऽपि विन. सामना पुरतः स्थातुम् न निरतः ॥ १७ ॥ व्याख्या--संयतते इति संयतिनः साधवः तेषु ईशिता ईशि- त्वम् इति संयतीशिवाम् प्रासे लब्धे दशमुखे दशसु दिक्षु मुखं यस्य स दशमुखस्तलिन् 'यदा जिनेन्द्रो देशनां ददाति चदा सर्वदिएपवि. टानां स्वामिमुखमेव लक्ष्य ते दीपशिखावदिति' दशमुखे जिनेन्द्र अभिमुखे संमुखे मार्गे तदृष्टिपातभूमौ कोऽपि कश्चिदपि विनतात्मना विशेषेण नत आत्मा यस्य तेन विनतात्मना नतकन्धरेण पुरतः अग्रतः स्थातुम् उपवेष्टुम् न निरतः न समर्थः सर्वतः सर्व एव नता आसमित्यर्थः ।। रामपक्षे-ईसिताम् प्रभुताम् प्रासे सर्वराक्षसेश्वरतामुपगते दश- मुखे रावणे अभिमुखे संमुख मार्गे तत्संमुखीने सति पुरतः अग्रतः संयति संग्रामे विनतात्मना शरपातभयात् विना नम्रतया सातुम न
महोपाध्यापश्रीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्मे
कोऽपि निरतः समर्थः रावणवाणभिन्नमर्माणः सर्व एव नीचैर्मुखा
अभवन्निति तात्पर्यम् ।।
कृष्णपक्षे-संयति संग्रामे ईशिताम् प्रगल्भता प्राप्ते दशमुखे
सर्वतो दत्तलक्ष्ये कृष्णे सति मार्गे रणमार्गे अभिमुखे समक्षे विनता-
मना विना नम्रतया कोऽपि पुरतः अग्रतः स्थातुं न निरतः न समर्थः
अभवत् ॥४७॥
दृष्टे पुण्यजनाधीशे वृहद्रथभुवि स्वतः।
सर्वे नरा वानरा वा चलाचलदशां दधुः ॥ ४८ ॥
अन्वयः-पुण्यजनाधीशे बृहदयभुवि र स्वतः सर्वे नरा बानरा वा
चलाचलदशाम् दधुः ॥ ४०॥
व्याख्या-रम्यतेऽनेनेति रथः " रमेः कथन् रम्यस्थानम्
बृहन्महांचासौ रथश्चेति वृहद्रथः तस्य भूः तस्मिन् वृहद्रथभुवि महद्र.
म्यभूमौ मोक्षमार्गे पुण्यजनाधीशे पुण्यजनाः पवित्रजना अघीयते यत्र
तस्मिन् पवित्रजनाधिष्ठिते वर्तमाने जिनेन्द्रे दृष्टे नयनगोचरे सति
सर्वे नराः मनुष्याः अनराः देवाश्च यक्षगन्धर्वादपश्च स्वतः अकार-
णात् चलाचलदशाम् तचेजोधर्पितत्वात् चञ्चलताम् उत्सुकताम्
दधुः जग्मुः ॥ ४८॥
रामपक्षे । बृहन्महांश्चासौ रथवेति बृहद्रथः महत्स्यन्दनः तत्र
भवतीति वृहद्रथभूस्तसिन् महद्रथस्थे पुण्यजनाधीशे पुण्यजनानाम्
राक्षसानाम् अधीशे नृपे “यातुधानः पुण्यजनो नैतो जातु रक्षसी-
त्यमरः
" रावणे दृष्टे समरभूमिगोचरे सति सर्वे नराः मनुष्याः
वानराः कपयश्च स्वतः स्वयमेव चलाचलदशाम् माध्यसा चञ्चलताम्
अस्थिरताम् दधुः अनुभवन्तिस्म रावणमयात् सर्वे इतस्ततोऽभवनि-
स्पर्थः॥४८॥
-vvv MK ve भाचार्यश्रीविजयामवरिप्रणीचा सरणी रीका, सर्ग-६ कृष्णप-पुण्यजनाधीशे पुण्यजनम् अधीष्टे शास्तीति पुण्यज- नाधीशस्तस्मिन् यद्वा अपुण्यजनाधीशे अपुण्यजनान् पापिष्ठान अधीटे तसिन कलुफ्तिजनाधीशे वृहद्रथ वि वृहद्रथराजपुने वाईद्रथे जरासंधे दृष्टे संग्रामाङ्गणगोचरे सति सः कृष्णपक्षीयाः नराः मनुष्याः अनराः देवयक्षगन्धर्वराक्षसादयः अचलाचलदशां स्थैर्यताम् अकिञ्चित्करो ऽयमस्माकमिति निर्भीकताम् दधुः धारयन्तिस्म ॥ १८ ॥ तदा मुक्ते जरायोगे शक्तिशल्यातुभाविनि । सुमित्रासंभवे व्यग्रे वले व्यापद् विना जिनम् ॥४९॥ अन्वय:--तदा शक्तिशल्यानुभाविनि जरायोगे मुक्ते सुमित्रासमये पले व्यग्रे जिनं विना व्यापत् ॥ ४९ ॥ व्याख्या-तदा केवलज्ञानानन्तरं शक्तिशल्यानुमादिनि शक्ति- रखविशेषः शल्यो वाणस्तयोर्द्वन्द्वः शक्तिशल्यम् तस्य अनुभावः प्रभावः पापक्षयकारत्वाद्यस्मिन् तसिन् योगे तपोविशेष मुक्त परित्यक्ते सति अजरा न जीर्यति जन्मकोटिशतैरपीति जरा कर्मग्रन्थिः जिनं विना जिनेन्द्रप्रभु विना सुमित्रासंमचे सुमिद्यति नियति जनोऽस्यामिति पृथ्वी तस्या संभवे पृथ्वीजाते व्यग्रे दुःखिनि बले संघे व्यापन प्रासरत् ।। ४९ ॥ रामपक्षे-जीर्यते शरीरमनया इति जरा काचिन शक्तिः तस्या योगे प्रयोगे शक्तिशल्यानुमाविनि शक्तिशल्योमयप्रभावशालिनि तदा रावणयुद्धसमये मुक्ते लक्ष्मणाय विक्षिप्ते सति सुमित्रासंभवे लक्ष्मणे व्यग्रे दुःखमापन्ने वले सैन्ये जिनम् जयतीति जिनस्तम् रामम् विना व्यापत् प्रासरन् समस्तवलं व्यग्रममवत् ।। कृष्यापक्षे-तदा जरासंघयुद्धे शक्तिशत्यानुमाविनि शक्तिपाण- प्रमावशालिनि जरायोगे जराखप्रयोगे मुक्ते सति यदवप्रमावात्सर्वे
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महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाचे
जरायुक्ता भवन्तीति भावः जिनं विना श्रीनेमिनाथं विना सुमित्रा.
संभवे सुमित्रसमागमे व्यग्रे दुःखमापन्ने बले सैन्ये व्यापत् जरा सर्वत्र
प्रासरदिति भावः ॥ ४०॥
कृते नागवराहाने वामेयार्चा समागता ।
तया विशल्यया सेना जिनोक्त्या साऽभवत् पटुः॥५०॥
अन्वयः-नागवरावाने कृते वामेयाची समागता तया विशव्यया जिनोक्स्या
सा सेना पटुः अभवत् ॥ ५० ॥
व्याख्या-न गच्छतीति नागः कामः सर्वदा शरीरस्थितत्वाद
स चासो बरश्चेति नागवरः तस्य आह्वाने आकारिते सति कामपरतंत्रे
सति वामाया इयम् वामेया अर्चा पूजा आराधना तदनुसरणा समा-
गता समुपस्थिता परंतु जिनोक्त्या जिनशब्दोचारणेन तथैव विश-
ल्यया विशल्यकरणया दुःखनिवारिकया सा सेना जनप्रवृत्तिः पटुः
साधीयसी अभवत् अजायत जिनस्य कामजितत्वात्तन्नामोचारणमात्रेण
कामो व्यपलायत ॥
रामपक्षसाधारणमेतत् ।
कृष्णपक्षे-नागवराहाने नागवरस्य धरणेन्द्रस्य आह्वाने आक-
रणे कृते सति वामेयस्य पार्थेजिनेन्द्रस्य या अर्चा पूजा सा समागता
समुपस्थिता जिनोक्त्या जिनस्य श्रीनेमिनाथस्य या उक्तिः सा जिनो-
तिः तया जिनेन्द्रोपदेशभूतया तया श्रीपार्श्वजिनेन्द्रपूजया विशल्यया
विशल्यकरणया जराविद्राविकया सा सेना पटुः पदवी कार्यक्षमा
अभवद अजायत । ५०॥
राजद्राजी समाजानां सा-धो-रणविनिग्रहात् ।
कुम्भकर्णे रक्तलेपात् शुशुभे या-स-भागजा ॥५१॥
भाचार्यश्रीविजयातहिमणीता सरणी टीका, सर्ग-६ arun भन्वय:--या रणविनिग्रहात साधोः राजद्राजो कुंमकर्णे रकलेपा सा समागमा शुशुमे ॥ ५ ॥ व्याख्या-रणविनिप्रहाद संग्रामपरित्यागाद साधोः मुनेः समा- जानां समुदायानां या राजद्राजी विरोचमानश्रेणी कुम्भ इव कर्णः यथा कुम्मो जलादिकं धारयति तथायमपि बहुशास्तविचारग्राहक इति भावः तसिन् रक्तलेपात् रक्तस्य शास्त्रानुरागस लेपादासञ्जनात् "रक्तम् कुंकुमे ताने रुधिरे रागे इति शब्दस्तोममहानिधिः" भजनम् भागः "भावे घ" भक्तिरित्यर्थः तेन सहितः सभागः सैव सभागा ततो जायते इति समागजा देवविषयकभक्तिजनिता सा शुशुमे वभौ।। रामपक्षे-धोरणचिनिग्रहात् धोरणानां इस्त्यश्वादियानानाम् विनिग्रहात् विनाशनात् हननादित्यर्थः कुम्भकर्णे रावणानुजे रक्तले पाव रक्तस्य रक्तचन्दख रुधिरस्य वा लेपात् अभ्यञ्जनात् "रक्तसंकोच- पिशुनं धीरं लोहितचन्दनमित्यमरः" मा प्रभा तया सहिताः सभाः समाः सदीमा: गजाः हसिनो यत्र सा सभागजा दीप्तिमद्गजमती मदोन्मत्तगजबहुलेति यावत् समाजानाम् रणगतानां सैनिकानाम् राजद्रानी शोभमाना श्रेणी रोचिष्णुसैन्यपंक्तिः सा शुशुमे दिदीये ।। कृष्णपक्षे-धोरणविनिग्रहात हस्त्यश्चादिवाहननाशात् अत एव कुम्भकर्णे कुम्भ इव कर्णौ यस्य स कुम्भकर्णस्तसिन् रक्तलेपात् हम्त्य धादिशरीरशोणितलेपान सभागजा समानभागे जायते तिठतीति सभागजा एकदेशस्थिता समाजानां रणगतसेनानाम् राजद्राजी विरो- चमानसंहतिः शुशुमे रेजे ॥ ५१ ।। हरयोऽहरयोगेन निद्रामुद्राविमुद्रिताः । पुरश्चेरुः सपर्याणाः कुर्वाणा दर्शनोत्सवम् ॥ ५२ ।। भन्वय:-महः भयोगेन निद्रामुद्राविमुदिताः दयः सपनांणां दर्शनो. सवम् कुर्वाणाः पुरश्रेहः ॥ ५२ ।।
महोपाध्यायश्रीमेषविजयगणिविरचिते सप्तसम्धानमहाका
व्याख्या-हरति पापमिति हरिस्ते हरयो जिनेन्द्राः अहः
प्रातः अयोगेन योगराहित्येन जिनेन्द्राणां निद्रामुद्राविमुद्रिताः निद्रायाः
वापस्य या मुद्रा नेत्रसंकोचादिस्तां विमुद्रितास्त्यक्ताः सपर्याणा:
परित एति इति पर्याणस्तेन सहिताः मपर्याणाः परितो गमनशीला:
दर्शनोत्सवम् नेत्रोत्सवं कुर्वाणाः दर्शनानन्ददायकाः पुरः अग्रे चेरुः
चेलुः ॥५२॥
रामपक्षे-अहः प्रातः अयोगेन अनायासेन स्वत एवेत्यर्थः
निद्रामुद्राविमुद्रिताः निद्रोत्थिता हरयः कपयः सपर्याणाः पर्यायेण
अश्वसजनेन सहिताः यथाऽश्वादिरारोडणार्थ कम्बलादिपृष्ठासतरणेन
सजिता भवन्ति तथा सपर्याणाः पृष्ठास्तरणसंयुक्ताः अत एव दर्शनो-
त्सवं नयनानन्दं कुर्वाणा विदधानाः पुरः अग्रे चेरुः विचरुः ।।
कृष्णपक्षे-हरयोऽश्वा अन्यत् पूर्ववद्वयाख्येयम् ।। ५२ ।।
दशा-स्याभिमुखे रामानुजे या-जनि संमतिः।
जयश्रोनिश्चिता देवे नृदेवेऽद्भुतया-तया ॥५३ ॥
अन्वयः-दशास्याभिमुखे रामानुजे या सम्मितिः मजनि अद्भुतया तया
देवे नृदेवे जयश्रीनिश्चिता ॥ ५३ ॥
व्याख्या-दशास्याभिमुसे दशम इन्द्रियेविति शेषः आस्य
प्रवृत्तिर्यस्य स दशास्यः कामः तस्य आभिमुख्य समक्षे कथंभूते रामा-
नुजे रामाम् कामिनीम् अनुजाति अनुमरतीति रामानुजस्तसिन् यद्वा
रामे रमन्तेऽसिन्निति रामो ध्यानम् वम् तस्मिन् वा अनुजाति अधि.
तिष्ठतीति रामानुजः श्रीजिनेन्द्रः तस्मिन् या सम्मितिः संग्रामोजनि
कामे जिनेन्द्रे च मम्मितिरभूत नृदेवे मनुष्य देवे देवे जिनेन्द्रे विपये
अद्भुततया निरतिशयममावतया जयश्रीः कामविजयलक्ष्मीः निविता
अवश्यंभाविनी ॥ ५३॥
भाचार्य श्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका सर्ग-4 रामपक्षे-दशास्याभिमुखे दशास्यस्य रावणस्य अभिमुखे सन्निधौ रावणेन सहेत्यर्थः रामानुजे लक्ष्मणे या सम्मितिः संग्रामोऽजनि उदपादि अद्भुततया विलक्षणतया देवे द्योतनात्मके नृदेवे लक्ष्मणे जयश्रीविजयलक्ष्मीः निश्चिता नियमिता अवश्यं भवित्री ॥ कृष्णपक्षे-दशास्याभिमुखे जरासंघसंमुखे रामानुजे रामादनु जायते इति रामानुजः बलरामानुजे कृष्णे मम्मितिः अजनि अजनिष्ट अद्भुततया अलौकिकचमत्कारतया नृदेवे देवे कृष्णे जयश्रीविजय. लक्ष्मीनिश्चिता क्लुप्ता ॥ ५३ ।। नागाहत-विवाहेन तत्क्षणे सदृशः श्रियः । नागाहत-विवाहेन तत्क्षणे सदृशः श्रियः ॥ ५४ ॥ अन्वयः-विवाहेन सदृशः तत्क्षणे प्रियः न भगाहत विवाहेन तत्क्षणे ना सदृशः श्रियः अगाहत ॥ ५४ ॥ व्याख्या-विशुद्धतां निर्मलतां बाहयति लभते "प्रेरणांशत्या- गाद" इति विवाहस्तेन विवाहेन उपलक्षितः उपलक्षणे तृतीया निर्म- लतयोपलक्षितः पश्यत्यनेनेति दृशः ज्ञानम् तेन सहितः सदृशः विशे- पज्ञानवान वक्षणे प्रव्रज्यासमये श्रियः राज्यलक्ष्मीः न अगाहत नालभत वि-श्रेष्ठताम् वाहयति निर्वाहयतीति विवाहस्तेनोपलक्षितः श्रेष्ठतामुपगतः जिनेन्द्रप्रभुः तत्क्षणे केवलज्ञानोत्पत्तिक्षणे ना पुरुपः कर्मनिरसनादेव विशिष्टपुरुषः सदृशः सदृशीः स्वखरूपयोग्याः श्रिया केवलज्ञानलक्ष्मीः अगाहत अलभत ।। रामपक्षे-सदृशः दृशेन सहितः सदृशः "दृशेः कञ्" सनयनः तस्स विंशतिनयनत्वेन तथा निर्देशः रावणः विवाहेन राक्षसादि. विवाहेन विधिना श्रियः सीताः । पूज्यत्वाद्वहुवचनम् ' न अगाहत न अलमत सदृशः ज्ञानवान् ना मनुष्यो लक्ष्मणः विपक्षी गरुडा महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सहसम्धानमहाकाव्ये MA वाहो वाहनं यस्य तेन विवाहेन गरुत्मद्वाहनेन कारणेन तत्क्षणे रावणयुद्धसमये श्रियः विजयलक्ष्मीः यद्वा श्रियः रावणसम्पदः अगा- हत अप्राप्नुत ॥ ५४॥ अथवा अगति कुटिलं गच्छतीति अग् “कर्तरि किप्" न अग् नाग् तेन नागा अकुटिलगामिना अहतविवाहेन अपराहतगरुत्मद्वा- हनेन उपलक्षितः श्रियः विजयलक्ष्म्याः सदृशः योग्यः सदृशः ज्ञान- वान् ना नरः विवाहेन श्रियः रावणराजलक्ष्मीः अगाहत आसादयत् ॥ कृष्णपक्षे-नागयोः पद्मोत्तरचंपकयोः यत् आहतम् आहननम् तत् नागाहतम् विः पक्षी गरुडः स एव वाहनम् इति विवाहनम् नागा- हतश्च विवाहश्च इति नागाहतविवाहः तेन नागाहतविवाहेन उपलक्षितः तत्क्षणे तत्समये श्रियः लक्ष्म्याः सदृशः योग्यः ना पुरुपः वक्षणे शिशुपालविवाहोत्मवे मदृशः शोभनयनाः श्रियः रुक्मिणी विवाहेन राक्षसविवाहेन अगाहत अप्राप्नोत् ॥ श्लोकार्धयमकं प्रकृते ॥ प्राहरद्विजयः कणे-जपमाश्रित्य शाम्भवम् । अस्तस्तत्तेजसा द्रोण-भीष्माहितपराभवः ॥ ५५॥ भन्यय:-विजयः शाम्भवमाश्रित्य करेंजपम् प्राहरत् तत्तेजसा मोग- भीमादिनपरामयः न्यस्तः ॥ ५५॥ व्याख्या-विजयते कपायादीनिति विजयः शाम्भवम् शं कल्याणम् जनानामिति शेपः भवत्यनेनेति शंभवस्तस्य भावस्तम् आश्रित्य अभिलक्ष्य कर्णेजपम् सूचकम् प्राहरत् निरस्यत् यदि कर्णेज- पानांस्सिमवेत्तदा कदाचिदपि लोककल्याणं न संभाव्यते इति विचार्य हं निरास्यदिति भावः करेंजपः सूचकः स्थापिशुनो दुर्जनः खल इत्यमरः " तत्तेजमा तस्य जिनेन्द्रस्य तेजसा प्रमावेन द्रोणमीमाहि. तपराभवः गुणति हिमयति कौटिल्पयतीति द्रोणः भीपयत्तीति , भाषाश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-4 मीमः तयोर्द्वन्द्वः ताम्यामाहितः स्थापितः जनितः यः पराभव: दुःखम् स अस्तः निरस्त: जिनेन्द्रतेजसा केपामपि कुतश्चिदपि भयो न जात इति तत्वम् ।। ५५॥ रामपक्षे-विजयते इति विजयो रामः शांभवम् शंभुसंबन्धिनं विजयावह वा कर्णेजपम् कर्णे किमपि कथयतीवेति कर्णपर्यन्तमाक- एम् धनुः आश्रित्य मौर्वोकर्णपर्यन्तमाकृष्य प्राहरत् तत्तेजसाऽऽकर्णा- कृष्टनाणस्य तेजसाऽनुभावेन द्रोणभीष्माहितपराक्रमः हिंषकमीपकज- निवदुःखम् अस्तः निराकृतः॥ कृष्णपक्षे-विजयः अर्जुनः कर्णेजपम् सूचकमाश्रित्याभिलक्ष्य शांभवम् शंभुदत्तम् गाण्डीवं धनुः प्राहरत प्रहतवान् तत्तेजसा तन्म- हिम्ना द्रोणभीष्माहितपराक्रमः द्रोणश्च भीष्मश्चेति द्वन्द्वस्तयोराहितः स्थापितः पराभवः विपत्तिः अस्तः निर्विष्टः द्रोणादिषु कर्णानन्तरं पराभवो जातः अथवा शांभवं शम्भुदेवताकं जपं भजनमाश्रित्य कर्णे कर्णनामनि राज्ञि प्राहर अथवा संप्रति कर्णार्जुनीययुद्धे द्रोणभीमा- हितपराभवः युद्धन्यसनः अस्तः निराकृतः ॥५५॥ नरः सवासवं चकं प्राप्य तद्भेदमादधे । सालबारसमासन्नं जज्ञे जयजयारवः ॥ ५६ ॥ अन्वयः-नरः सवासवं सालकारसमासस चक्र प्राप्य तन्नेदम् मादधे जयजयारषः जज्ञे ॥ ५६ ॥ व्याख्या-नृणाति विशुद्धधर्म प्रचारयतीति नरस जिनेन्द्रः वा. सवेन महेन्द्रेण सहितं सवासवम् सेन्द्रम् सालङ्कारसमासत्रम् अलं. कारेण सहितः सालंकार, सालंकारेण समासनः समागतः इति सालंकारसमासन्नः सभूषणसन्निहितस्तम् चक्रम् संघम् इन्द्रमम्मित- २४२ महोपाध्यायभीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकावे जनसहितं.समुदायं प्राप्य लब्ध्वा तत्सभामासाद्य मेदम् पापपुण्यपि वेचनम् जीवाजीवविवेचनम् वा यद्वा अविद्याभेदम् आदधे स्वकीय- सदुपदेशेन विवेचयामास तत इति शेषः जयजयारवः जयजयध्वनिः जज्ञे सर्वे जना उपदेशामृतामास्वाध जयशब्द चरित्यर्थः ॥ रामकृष्णपक्षे–स नरः लक्ष्मणः कृष्णो वा वासवम् चक्र वसुरसिन्नस्तीति वासवम् समृद्धम् राजमण्डलम् सालकारसमासन्नम् आभूपणमहितसमागतम् शौर्यादिगुणभूषणसमन्वितम् चक्रं राजमण्ड लम् प्राप्य लब्धा समासाद्य तद्भेदं तदीयच्छेदम् आदधे समृद्धशूर- राजमण्डलस्य छेदनम् छिन्नभिन्नमाचके तेनेति शेप: जयजयारवः जयजयस्वनः जज्ञे जयजयशन्द चक्रे ॥ ५६ ॥ सुमित्राङ्गजसंगत्या सदशाननभासुरः । अलिमुक्तेर्दानकार्य-सारोऽभालक्ष्मणाधिपः ॥ ५७ ॥ अन्वय -सुमित्रागजसगत्या दशाननभासुर. रक्ष्मणाधिप भलिमुक्त दानकार्यसार अमात् ॥ ५९ ॥ व्याख्या-सुष्टु भेयति स्निह्यति अनुबनातीति सुमित्रम् केवल- ज्ञानम् तदेवाङ्गजम् स्वतनद्भवत्वात् इति सुमित्राङ्गजम् तस्य सगत्या सम्बन्धेन केवलज्ञानयोगेन दशाननभासुरः दशसु दिक्षु आनन मुख. मुपदेशकाले यस्य स दशाननः तेन मापुरः दीप्यमानः लक्ष्मणाधिपः लक्ष्म चिह्नमेव लक्ष्मण 'स्वार्थेऽण् ' तत् अधिपाति रक्षति स्वसतेन धारयतीति लक्ष्मणाधिपः अलिमुक्तेः अलेः सुरायाः मुक्तस्त्यागात् सर्वथा वर्जनात् दानकार्यसार: दानकार्यमुपदेशनमेव सारो यस्य स अमात् अशोमिष्ट ॥ ५७ ।। अलि+मरेऽष्टश्चिके काके कोकिले सुरा- यावेति शम्दस्तोममहानिधिः॥ रामपक्षे-स लक्ष्मणाधिपः लक्ष्मणश्चासौ अधिपश्चेति लक्ष्मणा- धिपः लक्ष्मणाभिन्नो नृपः दशाननमासुरः दशाननस्य मा दीप्तिः भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-4' दशाननभा ताम् अस्यति विक्षिपति तिरस्करोतीति दशाननभासुरः "अस्थते वास्यतीत्यादि नौणादिक उर प्रत्ययः” दशाननंशोभानिरा- करिष्णुः सुमित्राङ्गजसंगत्या सुमित्राया अङ्गजः तनयः सुमित्रांगजः तस्य संगत्या यः सुमित्रांगाजः स कदाचिदपि दुर्मित्रं न सहत इत्यन्वर्थतथा अलिमुक्तेर्याणमोचनात् पतत्रित्वेन साम्पादलिशब्दस्य चाणार्थतेति भावः दानकार्यसारः दानं छेदनमेव कार्यसारं यस्य स अभात् अशोमत ॥ यद्वा। स रावणः सुमित्राङ्गजसंगत्या अशाजायते अङ्गजा सुमित्रं च सोऽङ्गजश्चेति सुमित्राङ्गाजः कामस्तस्य संगत्या संगमेन कामपराधीन. तया दशाननभासुरः दशाननेन शोभमानः लक्ष्मणाधिपः लक्ष्मणानां लक्ष्मीयतामधिपा अलिमुक्तेर्वाणमोचनादानकार्यसारः छेदनपटुः अभाव अशोमत ॥ कृष्णपक्षे-सुष्टु भेद्यति स्निह्यतीति सुमित्रं तचासावङ्गजवेति मुमित्राङ्गाजः प्रद्युम्नः यद्वा सुमित्रः अर्जुनस्तस्याङ्गजोऽभिमन्युः तस्य संगत्या सम्मेलनेन दशाननभासुरः दशदिक्षु शोभमानः लक्ष्मणाधिपः लक्ष्मणायाः स्वपत्न्या अधिपः कृष्णस्म अलिमुक्त वाणमोचनात् दानकार्यसारः छेदनकार्यतत्परः अभात् अराजत ।। ५७ ॥ नरक्षिति परपरिग्रहादू विदन् स चारिणा । विभिदे हरिणा दर्प धरन्मन्दोदरीवरः ॥ ५८ ॥ भन्वयः-परपरिग्रहात नरक्षितिम् विदन दपं धरन् मन्दोदरीवरः स चारिणा हरिणा विभिदे ॥ ५८ ॥ व्याख्या-परपरिग्रहात् परेपामन्येपाम् परिग्रहः कलत्रम् तस्मात् अन्यस्त्रीसंसर्गाद नरक्षितिम् त्रियते इति नरः नयः तस्य क्षितिम् नाशम् विदन् जानन् दर्पम् अहंकारं धरन् विभ्रत् मन्दोदरी घर: मन्दं कृशमुदरं यस्याः सा मन्दोदरी इति तस्याः वः पतिः WN - newM महोपाध्यायश्री मेघविजयगणिविरचिते समसम्मानमहाकाये काम इत्यर्थः अथवा मन्दोदरीम् वनिताम् धमिपारतन्त्र्यात् वृणोति स्वास्त्रेण स्वीकरोतीति मन्दोदरीवरः यद्वा मन्दोदरीभिः कामिनीमिः वियते इति मन्दोदरीवरः स कामः चारिणा विहरणशीलेन हरिणा जिनेन्द्रेण विभिदे चिच्छिदे निराचक्रे ॥ रामपक्षे-स मन्दोदरीवरः रावणः परपरिग्रहात् अन्यदीयभा- तिः नरस्य नीतेः क्षितिम् नाशं विदन् मन्यमानः यद्वा नरस्य नर- जीवनस्स क्षिति क्षयम् विदन दर्पम् अहंकारम् मानम् धरन विभ्रत् चारिणा वनवासिना हरिणा लक्ष्मणेन विभिदे जन्ने । कृष्णपक्षे-परस्य शत्रोः परिग्रहात स्वीकारात् नरक्षितिम् जन- विनाशम् विदन् जानन् दर्पमहंकारं धरन् धारयन् मन्दोदरीवरः मन्दोदरी काचिजरा नाम्नी स्त्री तया त्रियते संयुज्यते यः स मन्दो- दरीवरः जरया संधितो जरासंधः चारिणा रणागणचारिणा हरिणा कृष्णेन विभिदे विदारितः ।। ५९ ।। कुमारीवेदसाहस्रान् सराज्यान् यत्कृते दधत् । इक्ष्वाकुवंशवृपभः शं-के-बलभिया श्रितः ॥ ५९ ॥ भन्वयः-कुमारी सराज्यान घेदसाहसान् यत्कृतेऽदयत् इवाकुषंशवृपभः शंकेयरश्रियाश्रितः अभवदिति ॥ ५९॥ व्याख्या-कुमारी कुमारितुम् आत्ममनने क्रीडितुं शीलमस्य म आत्मानुभवशीला राजते इति राजः तस्य भावः राज्यम् राज्येन सहिताः सराज्यास्तान् सदीपान वेदसाहसान् विदन्त्यनया इति वेदः ज्ञानम् तेषां साहसान् वेदसाहस्रान् अत्र सहस्रशन्दोऽनन्तार्थ इति अनन्तज्ञानानि यत् कृते यनिमिचम् दधत् धारयन् इक्ष्वाकुवंशपमा इक्ष्वाकुर्यशश्रेष्ठः सर्ववर्णनीयतीर्थङ्कराणामिक्ष्वाकुवंशप्रमवावं पूर्व प्रद. शिंतमेवेति भावः जिनेन्द्रः सम् सम्यक् केवलश्रिया केवलनानलक्ष्म्या आषितः अवलम्मितः अमवदिति शेषः ॥ ..
३४५ . भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-६ , नेमिपक्षे-कुमारीवेदसाहस्रान् कुमारीणाम् कन्यकानाम् वेद-- साहसान चतुःसहस्रान् सराज्यान स्वराज्यसमृद्धिमहितान् यतकृते यनिमित्तम् दधत् नृपः धारयति यदि नेमिर्मत्सृतां परिणेष्यति तदा स्वराज्यमपि तस्मै दास्यामीति मतिमान् राजाऽभवत् स इक्ष्वाकुवंश- वृषभः इक्ष्वाकुवंशश्रेष्ठः नेमिः अवलश्रियाश्रितः अवला चासौ श्रीः अवलश्रीः तया न श्रितः इति अश्रितः अनाश्रितोऽभवदिति शेपः । इत्यहं शंके मन्ये नेमिना कन्याग्रहणन्नकृतमित्यर्थः॥ रामपक्षे-कुमारीणां कन्यकानां वेदसाहस्रान् त्रिसाहस्रान् “इति वेदानयत्रयीत्यमरः" सराज्यान् राज्यासहितान् यत् यस्याः सीतायाः कृते निमित्तम् दधत् प्रत्यर्पणाय मनसि धारयन् इक्ष्वाकुवंशपमः इक्ष्वाकुवंशश्रेष्ठ: केवलश्रिया कान्तिमात्रेण शं रावणहननजन्यकल्याणं मङ्गलम् आश्रितः प्राप्तः यावता रावणो मनसि कन्यानां सहस्रनयं राज्यञ्च दातुमिच्छति तावता लक्ष्मणेन हत्त इति भावः ।। "दशास्यस्त्वां पदत्येवं वन्घुवर्ग विमुश्च मे । जानकीमनुमन्यस्व राज्यार्धञ्च गृहाण मे ॥ त्रीणिकन्यासहस्राणि तुभ्यं दास्यामि तेन च । संतुष्य नो चेत्ते मर्वन्न-ह्येवन च जीवित"मितितचरित्रे ।। श्रीकृष्णपक्षे-कुमारीणाम् कन्यकानाम् वेदसाहस्रान् पोडशसाह- सान् विदन्त्यनेनेति वेदः शास्त्रम् तच्च " पडङ्गीवेदाश्चत्वारो मीमां- साऽन्वीक्षिकी तथा । धर्मशास्त्रम्पुराणं च विद्या एताश्चतुर्दश" इति चतुर्दशधा अनगवियाँ गानविद्या वेति पोडशविद्या मराज्यान राजन्ते इति राजानो मणयः तेषां मावः राज्यम् तेन महिवान् अनेकमणिम- हितान् यत्कृते यस्य कृष्णस्य कृते कृष्णनिमित्तम् दधत् , धारयन् पलाश्रितः बलदेवाधिवः इक्ष्वाहवंशवृपभः यदुवंशस्थापि इक्ष्माकुश- महोपाध्यायनीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्धानमहाकाये मूलकत्वात् इक्ष्वाकुकुलश्रेष्ठः कृष्णः अवलश्रिया अवला एव श्रीस्तया आश्रितः अवलम्बित इत्यहं शंके मन्ये ।। भूपाः पोडश माहसा वासुदेवाय भक्तितः । रत्नानि ढोकयामासुढे द्वे च वरकन्यके ।। ताम्यः पोडश साहस्राः कन्याः कृष्ण उपायत । अष्टौ सहस्राणि वलोऽन्ये कुमाराव तावती इति कृष्णचरित्रे ।।१९।। चके प्रभाविनि दशाननराजराजि, भाति स्मयागजदशाननराजराजिः ॥ चक्रे प्रभाविनि दशाननराजराजि- भातिस्मयागजदशा न नराजराजि ॥ ६० ॥ अन्वयः-दशाननराजराजि प्रभाविनि च स्मयागजदशाननराजराजिः भाति प्रभाविनि दशाननराजराजि चके नर भजराजि यागजदशान भातिस्म ॥३०॥ -आसमन्तादन्यते प्रकाश्यते इति आननः प्रकाशः दशसु दिक्षु आननः प्रकाशो यस्य म दशाननः राजते उद्योतते इति राजा तत्र राजते गोमते इति राजराट् दशाननश्यामौ राजराट् चेति दशाननराजराट् तस्मिन् , प्रभाविनि प्रभावशालिनि चक्रे भरतस्य राज्ञः चक्रास्त्रे प्रकटिते सतीति शेषः सयागजदशाननराजराजिः स्मयः चित्रो. स्कर्ष एव अगः पर्वतः तस्माजायते इति सयागनः तेन दशसु दिक्षु अनिति प्रकाशते इति मयागजदशाननः राजन राजते इति राजराजिः स्मयागजदशाननवासी राजराजिवेति सयागजदशाननराजराजिः चिचोद्रेकगिरिप्रभृतप्रकाशमाननृपमण्डलीश्रेष्ठ: भरतः श्रीशान्तिनाथ: श्रीनेमिनाथश्व भाति द्योतते प्रमाविनि प्रभावशालिनि दशानन- राजराजि प्रकाशमाननृपश्रेष्ठनृपे चक्रे मण्डले मगृहे हेनर अजराजि अजेषु छागेपु राजने इति अजराट् नमिन् यागजदशा यागे पलिप- व्याख्या- .
wwwwwww And AMAN भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-६ योजकविधौ जायते इति यागजा सा चासो दशा चेति यागजदशा इव न भातिस्म न शोभतेस यथा वध्यपशौ तात्कालिकीदशा न शोमते तथा प्रभावशालिनि नृपमण्डलेऽपि यागजदशायुद्धरूपयजन- दशा न मातिस्मेति भावः ॥ ६० ॥ अत्र श्लोके वसन्ततिलकं वृत्तम् "ज्ञेयम् वसन्ततिलकं तभजा जगौग" इति तल्लक्षणात् ॥ रामपक्षे-प्रभाविनि प्रभवितु शीलं यस्य स प्रभावी तसिन् प्रभावशालिनि दशाननराजराजि दशाननराजः राजा यस्य स दशानन· राजराद् तसिन् तथोक्ते चके मण्डले या गजदशाननराजराजिः गजः मत्तः विवेकशून्य इत्यर्थः यः दशाननः स चासो राजा चेति गज- दशाननराजा तस्य राजिः तदीयपक्षीयश्रेणी भातिस शोभतेस्म हे-- नर प्रभाविनि प्रभावशालिनि दशाननराजराजि भाति चक्रे दशानन· राजस्य या राजिः तत्पक्षीयश्रेणी तत्र चक्रे भाति देदीप्यमाने सति तदीयपक्षे चक्रे प्रभवति सति म्मयागजदशा न गच्छतीत्यगः स्मयोऽहंकार एवागः स्मयागः तसाझआयते इति स्सयागजा मा चामी दशा चेति स्मयागजदशा अहंकारगिरिसंभवा दशा आजराजि आजस्य संग्रामस्य राजि प्रांगणे रणभूमौ न मातिस न राजतेस्म देहलीदी पन्यायेन मातीत्यस्योभपत्रान्वयः ।। कृष्णपक्षे-जरासंवरूपविपक्षराजदशाधादिरूपेण व्याख्यासेया । प्रकतेच्यपेतमेदाग्व्यः ममुद्यमकालंकारः 'अर्धाभ्यामः-समुद्गःसा' दिति सरस्वतीकण्ठामरणोक्तः ।। ६० ।। योगारक्षमादिसहसा-दशकन्धरं-तं, तीवारिभावमधिगम्य निशम्य कामम् । वोधो विभेद सरयानरया ससन्ध, श्रीलक्ष्मणेत्य निहितः स तु वासुदेवः ॥ ६१ ।।
महोपाध्याय श्रीमेधविजयगणिविरचित्ते सप्तसम्भानमहाकाये
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अन्वय:-क्षमादिसहसा योगाद् स तु घासुदेवः श्रीलक्ष्मणोपनिहितः
बोधः कामं तीवारिभावम् अधिगम्य दशकन्धरं तं निशम्य ससन्ध स्यात
जरया विभेद ॥ ६ ॥
व्याख्या-क्षमादिसहसा योगात् क्षमा दयादाक्षिण्यादिरेव सहः
बलम् तेन योगात् संबन्धात् वासुदेवः वसु एव वासु तेन दीव्यति
प्रकाशते इति वासुदेवः तेजोविशेषेण देदीप्यमानः श्रीलक्ष्मणा उपद
स्वस्वविशेषचिह्न पभादिना एत्य प्राप्य निहितः युक्तः बोधः
युध्यति जानातीतितथा ज्ञानवान् कामम् मदनम् तीवारिभावमुक-
टरिपुभावम् शत्रुतामधिगम्य प्राप्य स्थितमिति शेपः दशा मूतिरेवद-
शकः तन्धरतीति दशकंधरः तम् अनङ्गताङ्गतम् ससन्धम् मप्रतिज्ञम्
ग्यात् स प्रभुर्जिनेन्द्रः जरया विभेद निर्वतयामास' युवावस्थायामेव
शरीरमाताजरायोगो नैव प्रापेति भावः ।।
रामकृष्णपक्षे-क्षमादिसहो बलं यस्य स क्षमादिसहा वेन
क्षमादिसहसा उपलक्षितः क्षमादिवलवान् बोधः ज्ञानवान् श्रीलक्ष्मणा
श्रीरेवलक्ष्म चिहम् तन श्रीलक्ष्मणा एत्य निहितः श्रीलक्ष्मोपलक्षितः
स तु वासुदेवः श्रीरामलक्ष्मणः कृष्णवलदेवय तीवारिभावम् अति.
शयविपक्षभुतम् अधिगम्प युध्या तं दशकंधरं कामम् यथेष्टम् निशम्य
दृष्ट्वा जरया मसन्धम् जरयायुक्तं संघम् जरासंधम् प्रतिवासुदेवम्
स्यात् शीधम् विभेद चिच्छेद निहतवान् ।। ६१॥
विश्वाहाजापहरणोद्भवसंपरायात् ,
पट्खण्डभूमिभरतेशकलाधिकारे ।
देवो निवृत्य भुवनाद्भुतराज्यलक्ष्मीः,
कक्षीचकार विविधोत्सवकेवलेन ॥ ६२ ॥
भन्त्रय-विश्वागतारहरणोद्भासंपरापात् पट्सण्यभूमिमरतेशकलाधिकारे
देवः भुवनाद्भुमराज्यलक्ष्मी, निवृत्य विविधोरसबकेवलेन कक्षीयकार ॥१३॥
२४९ भाचार्यश्रीविजयातत्रिभणीता सरणी टीका. सर्ग-६ व्याख्या-विश्वाङ्गजापहरणोद्भवसंपरायात् विश्वः समस्त: सारण कीर्तनमित्याचष्टरूपो यः अंगजः कामः तस्य अपहरणे निरा- करणे निरसन इत्यर्थः यद्वा तस्य अपहरणाय निराकरणाय उद्भवो जातः यः संपरायः संग्रामः "युद्धायत्योः संपराय इत्यमरः" तस्मात् अष्टविधकामवासनानिराकरणोद्भूतरणात भुवनाद्भुतराज्यलक्ष्मीः त्रिभुवन विलक्षणराज्यसंपदः पखंडभूमिभरतेशकलाधिकारे पखंडा या भूमिः पृथ्वी ताम्बिभर्ति धारयति स्वामित्वेन अधिकरोतीति पखंडभूमिभरतः स चासौ ईशश्चेति पखंडभूमिमरतेशः तस्य या कला योगक्षेमरूपा तस्या अधिकारे प्रभुत्वे शासने निवृत्य स्थाप- यित्वा देवः जिनेन्द्रः विविधोत्सवकेवलेन विविधोत्सवेन अनेकविध- देवकृतसमवसरणादिमंगलेन केवलेन केवलज्ञानेन कक्षीचकार क्रोडी- चकार केवलज्ञानवान सम्पन्नः ॥ अन्य जिनेन्द्रपक्षे-पखण्डभूमिमरतेशकलाधिकारे पखण्ड: यः भूमिभरतः भरतखण्डभूमिस्तत्र ईष्टे प्रभवतीति पखंडभूमिभरनेशः तस्य या कला तदधिकारे भुवनाद्भुतराज्यलक्ष्मीः निवृत्य निराकत्ये. त्यर्थः पखण्डभूमिमरतेशयोग्यतायामपि तन जनाईति तत्वम् ।। रामपक्षे-देवः देवनशीलः पट्खण्डभूमिमरतेशकलाधिकारे पट्खण्डभूमिम् विमर्तीति ॥ मृ अतच पाण्डभूमिभरतः स चासौ ईशश्वठि पदसण्डभूमिमरतेशः कलायाः कत्लायाः अधिकारः कलाधिकारः पखण्डभूमिमरतेशस्य कलाधिकारस्तसिन् मुवनामु. तराज्यलक्ष्मी: त्रैलोक्यविलक्षणराज्यसंपदः रावणाधिकारस्य राज्य- लक्ष्मी: विवाङ्गजापहरणोद्भवसंपराया विश्वांगजायाः जानक्याः अपहरणेन उद्भवः उत्पन्नः यः संपरायः संग्रामस्तसाच कारणाद नित्य आन्छिय रावणाधिकारे या राज्यलक्ष्मीस्ला निवृत्य तव महोपाध्यायोमेघविजयगगिविरचिते सप्तमम्मानमहाकाये आकृप्य विविधोत्मय केवलेन अनेकोत्मवप्रधानेन कलीचकार क्रोडी- चकार ॥१२॥ कृष्णपक्षे-विश्वायाः कंसमातुः अंगजः कंमः तस्य अपहरणाद नाचनात् उद्भवति यः संपरायः संग्रामस्तसात् पट्बण्डभूमि मरते- शकलाधिकार जगसंधनृपाधिकार शासने या भुवनाद्भुतराज्यलक्ष्मी निवृत्य निराकृत्य देवः कृष्णः विविधोत्मवकेवलेन अनेकविधमंग- लप्रधानेन कक्षीचकार स्वायत्तीचकार जरासंधराज्यमक्ष्मी: पराकृत्य स्वाधीनामकरोदित्यर्थः ।। ६२ ॥ ज्ञानं केवलमार्पभं हरमिते मुख्ये तपस्येऽभव- सत्पोपे नवमे सिते हिमरुचा हीनेऽर्यमासेविते । प्राक्कल्याणकवासरेऽन्तिमविभी दिक्संमिते माधवे, राज्ये सा नियतिर्जिने निगदिता रामेऽभिरामे विपा ६३ इतिश्री मप्तसंघाने महाकाव्ये महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते भगवत्केवलज्ञानसाम्राज्यवर्णनोनाम पष्ठः मर्गः ॥ ६ ॥ भन्ययः-रमिते मुक्पे नरस्यै भारंभ कर जानम ममयत् मम्- पौपे मप मित हिमरधा भहोंने मासेवित प्राम्यागकवासरे भनितमपिभी रममते माधये जिने राय मा मिनिगिदिना ाि भभामे रामे र प्रगदिता... व्याग्या-दरमिते हग्ण परिमिने एकादश्याम् मुख्य प्रधाने तपस्ये फान्गुने "सातपस्यः फान्गुनिक इत्यमरः" आर्पमम ऋपम स्पदम् आर्पमम् ऋपमनायसंबन्धि केवल मानम् केवलनानम् अभवत्, मत्यौपभोमनपोपमासे नवम नवमर्मातियो सिने शुलपले "अवदानः मितो गौरोऽपलधो धक्सोर्जुन इत्यमरः" पौपशुधनयम्याम् शान्तः
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भाषापंधीविजयामृतरिमणीता सरणी टीका. सर्ग-१
केवलं ज्ञानममवत् , हिमरुचा चन्द्रेण अहीने युक्त अर्यम्णा आसेविते
इति अर्यमासेविते सूर्यचन्द्रोभयसम्मिते तिथाविति शेपः अमावास्या-
तिथौ आश्विनकृष्णामावास्यायाम् नेमेः केवलज्ञानम् अभवत् , प्राक्क-
ल्याणकवासरे प्राथमिककल्याणकदिने च्यवनकल्याणदिने चैत्रका
ष्णचतुर्थ्याम् पार्श्वनाथस्य केवलज्ञानमभवत् , अन्तिमविभौ चरमती-
र्थकरे श्रीवर्धमाने जिने दिक्समिते दशम्याम् तिथौ माधवे वैशाखे
राज्ये केवलज्ञानरूपे साम्राज्ये सा नियतिः स्थितिः निगदिता
कथिता, विपा कान्त्याऽभिरामे मनोहरे रामे बलरामे रामलक्ष्मणे च
राज्ये सा नियतिः स्थितिर्निगदिता निरूपिता ॥ अत्र पद्ये शार्दूलवि-
क्रीडितं छन्दः 'सूर्याश्चैर्मसजस्तताः स गुरवः शार्दूलविक्रीडितम्' इति
लक्षणात् ॥ ६३॥
इति शास्त्रविशारद, कविरत्न, भट्टारकाचार्य-श्रोविजयामृतमूरीश्वरप्रणीतायां
सप्तसंधानमहाकाव्य-सरणी-टोकायां पष्ठः सर्गः ॥६॥
३५२
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्यानमहाकाम्मे
॥ अथ सप्तमः सर्गः॥
समवसरणे सत्रा तत्रागमद् रमणैर्भुवः,
सकलभरतस्वामी भावी नवोदितचक्रभृत् ।
धरणिवलयादश्वक्षुष्णार्जुनोत्थरजोऽणुभि-
गणिपरिणतैश्चित्रं कुर्वन्नेवाम्बरमम्बरैः ॥१॥
अन्वयः-रान समवसरणे भुवः रमणैः सत्रा सकलभरतस्वामी भावी
नवोदितचक्रभृत् धरणिवलयात् अश्वक्षुप्णार्जुनोत्थरजोऽणुमिर्गणिपरिणतः भाबर
रिव अम्बरं चित्रीकुर्षन भगमत् ॥1॥
व्याख्या -तत्र जिनेन्द्रस्य समवसरणस्थाने भुवः पृथिव्याः
रमणः भूपतिभिः सत्रा सह सकलभरतस्वामी सकलानाम् अखिलानां
भरतानाम् भरतखण्डानाम् स्वामी अधिपतिः भावी नवोदितचक्रभृत्
नवः नूतनः यश्चक्रश्चक्रानः स नवोदितचक्रा तम्बिभर्तीति नवोदि-
तचक्रभृत् नूतनप्रकटितचक्रधारकः भावी भविष्यन इतो गत्वा चक्र
धारयिष्यतीत्येवंभूतः धरणिवलयाव भूमण्डलात् अश्चक्षुष्णार्जुनोत्थ-
रजोऽणुभिः अश्वैः वाजिभिःक्षुष्णाः सम्पिष्टाः अर्जुनाः शुक्लाः धवला
इत्यर्थः उत्थाः उच्छ्रिता उद्गता ये रजसां धूलीनाम् अणवः क्षुद्रांशाः
तैः तथोक्तः तुरामकुट्टितश्वेतोन्द्रितधूलिकणैः गणि: गण्यते दिव्य-
पदप्राप्तया इति गणिः तत्र परिणतः आकाशपरिणतः आकाशस्यैः
अम्बरैरिववसनैरिव अम्बरम् आकाशम् चित्रम् अद्भुतम् नानावर्णवत्
कुर्वन् विदधत् आगमत् आयासीत् ।।
अन्यजिनेन्द्रपक्षेऽपि समानमेवत् ॥ १॥
माचार्य श्री विजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका सर्ग-७ रामपक्षे-तत्र समवसरणे लंकापरिसरकुसुमायुधोद्यानसमाग- ताप्रमेयवलनामर्पिसमुत्पन्न केवलज्ञानोत्मवचिकीर्षुर्महेन्द्राधिष्ठितस्थाने भुवः पृथिव्याः रमणैः पृथ्वीपतिभिः सत्रा समम् सकलभरतस्वामी भावी नवोदितचक्कभृत् रामः आगमत् अन्यत पूर्ववद्योज्यम् ।। कृष्णपक्ष-समवसरणे युद्धसमाते निवृत्तयुद्धे सति तत्र कृष्ण सनिधिभूमौ भुवः रमणैः सह जरासन्धपक्षीयनृपैः समम् सकलभरत. खामी नवोदीतचक्रभृत् कृष्णः अगगत् अन्पद्विशेषणं यथापूर्वमनु- सन्चेयम् ॥१॥ अत्र सगै इरिणीवृत्तन्तल्लक्षण यथा 'रसयुगहयन्सौम्रौस्ली गो यदा हरिणी तदा ॥१॥ तपनतनयस्तस्याप्यग्रेसहः सह सेनया, करटिघटनाटोपागेपादियाय जयाश्रयः । असहनजनक्षोभं तन्वन् सधन्वभटः श्रिया, हरितनुजवद् गन्धर्वाणां स्मरध्वजगर्जितैः ॥२॥ अन्वयः-तपनतनयः सह सेनयाऽपि अग्रेसहः करटिघटनाटोपारोपात् जयाश्रयः गन्धर्वाणाम् स्मरध्वजगजितैः सधन्त्रभेटः श्रिया हरितनुजवत् अपह. नजनक्षोभ तन्वन् इयाय ॥ २ ॥ व्याख्या-तपनतनयः तप्यते लोकोचरमैश्वर्यमश्नुते इति तपन: अथवा तपति कामादीनिति तपनः यद्वा तापयति कर्मादिकपायानिति तपना तनोति धर्ममिति तनयः तपनवासी तनयक्षेति तपनतनयः परमैश्वर्यसम्पन्नधर्मप्रवर्तकः सह सेनया अग्रेमहः एति स्वामित्व यण. मा. इना, शासनपद्धतिः तण. महिला रति. मेम नाप भदः शासनपद्धतिमनुसृ.त्याग्रेसरः कररिघटनाटोपारोपात् करोति शब्दमिति करटः करट एक करटी " स्वार्थ इन् " तस्य या घटना आयोजना ३५४ महोपाध्यापश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये .. तस्सा आटोप आडम्बरः तस्य आरोपात् अध्यवसायात शाब्दिकायो- जनाडम्बराध्यवसायतः जयाश्रयः कर्मादिकपायजयाश्रयः गन्धर्वाणां स्वाधिष्ठायकदेवयोनिविशेषाणाम् स्मरध्वजगजितैः वाद्यशब्दविशेपैः सधन्वमटैः :: धनुषा सह वर्तते यः स सधन्वा स वासो भटश्चेति सधन्नभटैः सकोदण्डयोधरिब श्रिया कान्त्या हरेः सूर्यस्य तनुजवत् सूर्यतनुजं यत्तेजस्तद्वत् यद्वा हरेश्चन्द्रस्य तनुजवत् चन्द्रकान्तिवत् अमहनजनक्षोभम् तेजः सहनासमर्थजनचाचल्यम् तन्चन विस्तारयन् जिनेन्द्रः प्रभुः इयाय परिवत्राज ।। रामपक्षे-तस्यापि ततोऽपि सेनया सह स्वसैन्ययुक्तः अग्रेसहा अग्रगामी जयाश्रयः जयम् संग्रामविजयम् आश्रयतीति जयाश्रयः करटिघटनाटोपात् करटिनो गजस्य या घटना योजना तस्या आटोपो गः तस्य आरोपात् अध्यवसायात् गजसन्निभवानरसैन्यसमुदायाव सधन्वमटैः सकोदण्डसैन्यैः स्मरध्वजगर्जितैः स्मरध्वजानाम् वाद्या- नाम् "वाद्य वादित्रमातोयं तूर्य तूरं स्मरध्वजः इति हैम:" गर्जितैः कोलाहलैः हरितनुजवत् इन्द्रपुत्रवत पालीव तपनतनयः सूर्यपुत्रः सुग्रीवः असहनजनस्य शत्रुजनस्य क्षोभम् वैकल्यम् तन्वन् प्रथयर गन्धर्वाणां च क्षोभम् रावणमहायामागतानां दैवयोनिविशेपाणां च क्षोमम् चाश्चत्यम् तन्त्रन विस्तारयन् इयाय संग्रामामिमुखम् प्रससार ॥ २॥ कृष्णपक्षे-तापयति शनिति तपनः तनोति स्वकीयवैभव. मिति तनयस्तयोः कर्मधारयः शत्रुतापकारकैश्वर्यवान् अथवा तप्यते लोकोत्तरशरीरशोभामश्नुते इति तपनो वमदेवस्तस्य तनयः पुत्रः कृष्णः सेनया यादवसेनयाग्रेमहः अग्रगः करटिनां गजानां घटना सैन्यसंमेलना तस्या आटोपस्याडम्बरस्य आरोपादव्यवसायात् विजया श्रयः विजयाभिलापुकः स्मरश्वजगर्जितैः वाघशब्दै। सधन्वमटैः १५५ .. भाचार्यभीविजयातरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग- कोदण्डकाण्डकलितसैन्यैः गन्धर्वाणां असहनजनक्षोभं शत्रुजनम- नस्यं तन्वन् श्रिया कान्त्या हरितनुजवत् सूर्य इव इयाय चचाल यहा तनतननयः सूर्यपुत्रः कर्णः जयाश्रयः जयम्बिजयम् अर्जुनम् आश्र यति युद्धाय सम्मुखीनं करोतीति तथा हरितनुजवत् वालीव इयाय संग्रामाङ्गणं ययौ अन्यद्विशेषणं पूर्ववयोज्यमित्यर्थः ॥ २ ॥ अनुदिशमपि ध्यायन्नन्तर्दशाननसंगम, दिनमुदयिनं भानुं कर्णे निधाय विचारयन् । करिशिरसि च न्यस्तं हस्तं तथेन्द्रजिता समं, नयनविपयीकुर्वन् गुर्वी पुरः सुरवाहिनीम् ॥३॥ भन्वयः-अनुदिशम् प्रतिदिशम् दशाननसंगमम् ध्यायन् दिनमुदायिनम् भानुं कर्णे निधाय विचारयन् तथा इन्द्रजिता समम् करिशिरसि च न्यस्तं हस्तम् पुरः गुर्वीम् सुरवाहिनी नयनविषयीकुर्वन् अगमदिति पूर्वेणान्वयः ॥ ३ ॥ व्याख्या-अनुदिशम् प्रतिदिशम् दशाननसंगमम् ध्यायन् दश इन्द्रियाणि आनयति तोपयतीति दशाननम् ज्ञानम् वस्तुतत्त्वम् अन्तर्मनसि ध्यायन् विचारयन् उपयुञ्जन् कथंभूतम् दशाननसंगमम् दिनम् द्यति पापम् कर्म चा इति दिनम् उदयिनम् प्राप्तोदयम् भानुम् प्रत्यक्षाप्रत्यक्षविषयप्रकाशकम् कर्णे निधाय शब्दं श्रुत्वा विचारयन् तत्चद्वस्तुसत्ताविचारपरः यद्वा करो राजप्रा'यां शोऽसास्तीति करी नृपः "पलिहस्तांशवः करा इत्यमरः" तस करिणो नृपस शिरसि न्यस्तम् मूर्ध्नि स्थापितम् धर्ममित्यर्थः नृपस्य धर्ममूलत्वात् कर्णे निघाय विचा- स्यन् तत्वनिर्णय कुर्वन् तथा इन्द्रजिता समम् इन्द्रम् परमैश्वर्यमम्पन्न- मपि जयतीति इन्द्रजित् साधुः, निस्पृहस्य वणञ्जगदिति तेन समम् अथवा इन्द्रजिदसुरस्तेन असमम् असुरसंगतिरहितम पुरः अग्रे गुर्वीम् गरीयसीम् मुरवाहिनीम् देवसंहतिम् नयनविषयीकुर्वन् मेत्रगोचरं कुर्वन् अगमदिति पूर्वश्लोकेनान्वयः ।।
महोपाध्यायनीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाचे
" अथवा
श्रीरामपक्ष-अनुदिशम् प्रतिदिशम् अन्तर्हृदये दशाननसंगमम् .
रावणसभिधानम् ध्यायन् विचारयन् उदयिनम् अचिरराज्यप्राप्त्या
प्राप्तोदयम् भानुम् सूर्यतनयम् “ अपत्यप्रत्ययस्य लुक्
भातीति भानुस्तम् सुग्रीवम् कर्णे निधाय कर्णसमीपं नीत्वा "सामीप्ये
सप्तमी" विचारयन् किमपि चिन्तयन् रामः करिशिरसि हस्तिमस्तके
न्यस्त स्थापित इस्तम् इन्द्रजिता मेघनादेन समम् सार्थम् गुर्वीम्
गरीयसीम् सुरवाहिनीम् सुरति ऐश्वर्यदीप्तिम् प्राप्नोतीति सुरः
राक्षसः तस्य वाहिनीम् सेनाम् नयनविषयीकुर्वन् अवलोकयन् अग-
मदिति पूर्वश्लोकेनान्वयः ।।
कृष्णपक्षे-अनुदिशम् प्रतिदिशम् दशाननस्य कामस्य प्रद्युम्न-
स्येत्यर्थः संगतिम् संगम् ध्यायन् विचारयन् उदयिनम् प्राप्तोदयम्
भानुं तदमिधानम् कश्चिन्नृपम् कणे निधाय कर्णसमीपन्नीत्वा विचा-
स्यन् रहो मंत्रयन् कार्यजातमिति शेषः करिशिरसि न्यस्तं स्थापितम्
हस्तम् इन्द्रजिता ऐश्वर्येण महेन्द्रमपि पराभवता नृपेण समम् सार्धम्
पुरः अग्रे गुर्वीम् महीयसीम् सुरवाहिनीम् दैत्यसैन्यम् राजसैन्यम्वा
नयनविषयीकुर्वन् पश्यन् अगमत् इयाय ॥ ३ ॥
मारीचः समयः स सुन्दरविधिः श्रीमेघनादोऽप्यगा-
चन्द्रोऽर्काप्रथितःप्रहस्तकथितःकामाक्षनामा-शुको(कः)
गम्भीरो मकरध्वजः कमलभूः कान्त्या (पिना?)शारणो,
वीभत्सः प्रवलायुधैः क्षितिमृतोऽन्येऽपीयुरुत्साहसा॥
अन्य -मारीचः समय: मुन्दरविधिः सः धीमेघनादः चंद्रः अर्कः
प्रथितः प्रहस्तथिस: कामानामा शुकः गंमीरः कान्त्या कमलमूः मकरायजः
शारणो ना वीभरसः प्रबलायुप्रैः भगार मन्येऽपि टरमाहसाः क्षितिमृतः इंयुः ॥४॥
भाचार्यश्रीविजयामृतपरिणीता सरणी टीका, सर्ग-७ ३५० व्याख्या-मारीचः ताडकेयः समय: समयनामा स प्रसिद्धः सुन्दरविधिः तदाख्यः यद्वा सुन्दरो विधिः अनुष्ठानं आभिचारिक यस्य स श्रीमेघनादः रावणज्येष्ठतनया चन्द्रः चन्द्रज्वलननामा रावणिः अर्कः अर्कप्रभः प्रथितः प्रसिद्धः प्रसस्त इति नानाख्यातः रावणमातामहः प्रधानमंत्री कामाक्षनामा कामाक्षेत्यभिधेयः रावण- तनुजा शुकः राज्ञः प्रणिधिः गंभीरः मकरध्वजः यः कान्त्या कम- नीयतया कमलभूः चतुराननसन्निभः शारणः रावणचरः बीभत्सः प्रपलायुधैः महदनशस्त्रैः सह रामरावणयुद्धे अगात् यो मगमत् अन्येऽपि क्षितिभृतः रावणसहायकनृपाः उत्साहसा युद्धोत्साहस्थायि- भावमावितान्तःकरणाः ईयुः समाजग्मुः इति रामपक्षे । तीर्थकरपक्षे-यथायथं विशेषणविशिष्टाः मुनीन्द्रा नरेन्द्रा देवे- न्द्राश्च समीयुः इति अवसेयम् ॥ ४ ॥ शार्दूलविक्रीडितम् छन्दः । जातातपस्य बलिता ललिता दिनस्य, श्री तिशीतमधुरा मधुरागभाजाम् । आपानमप्युपबने पवनेरितेषु, यूनां द्रुमेषु चरणाद् रमणान्मयूनाम् ॥ ५ ॥ भन्ययःजातातपस्य दिनस्य बलिताललिताश्री: मधुरांगभाजाम् नाति. शीतमधुरा जाता पवनेरितेषु गुमेपु मयूनां चरणात् यूनां रमणात भापानमपि मधुरं जातम् ॥ ५॥ व्याख्या- नानावृत्तमयः कापि सर्गः कश्चन दृश्यते " इति साहित्यदर्पणधृतमहाकाव्यलक्षणान्नानावृत्तयः किञ्च प्रातमध्याहमृगयाशैलर्तुवनसागरा वर्णनीया इत्यपि तत्रत्यवचना- हतुनर्णनं सर्वसाधारणतया कविः प्रस्तौति जाति-जातातपस्य जात. तापस्य अहः वलिता ओजखिता ललिता मनोहरा अथ च आतपस्य -अत्र सगें .
३५८ महोपाध्यायधीमेषविजयगणिविरचिते सप्तसत्भानमहाकाचे minut रौद्रस्य बलिता बलस्य भावः बलिता सामर्थम् जाता अपगता निध चेत्यर्थः वसहिष्णुत्वात् दिनश्रीः दिनशोभा मधुरांगभाजाम् सुकुमा रशरीराणाम् नातिशीतमधुरा अधिकशीताभावात् मधुरा मनोज्ञा अथ च अङ्गभाजां शरीरिणाम् मधुरा सेवनयोग्या उपवने उद्याने पचनेरि- तेपु पवनवी जितेपु गुमेपु पादपेषु चरणाद्विचरणात् मयूनाम् मृगानाम् यूनां-तरुणानाम् रमणाद्विहारात आपानमपि पानगोष्ठी अपि मधुर- मिति शेपः मयुःस्यात्किन्नरे मृगे इति शब्दस्तोममहानिधिः ॥ ५॥ यमकालंकारः॥ अत्र सगै इत आरभ्य एकविंशतिश्लोकपर्यन्तं वसन्ततिलक वृत्तम् तल्लक्षणश्चज्ञेयं वसन्ततिलकं तमजा जगौग इति ।। सा फाल्गुनस्य यशसां जगति प्रशस्तिः, प्रादुर्वभूव महसा जितसौरभासः । मन्ये तदर्कतनुजन्मविभाविनोद- स्तत्याज मोढ्यमचिरान्न तथा प्रसह्य ॥ ६॥ अन्वयः -महसा जितसौरभासः फाल्गुनस्य जगति यशसा प्रशस्तिः प्रादूर्वभूव तत् अर्कतनुजन्मविभाविनोदः अचिरान्मोदयम् तत्याज तथा न इत्यहम्मन्ये ॥ ६ ॥ व्याख्या-महसा जितसौरमासः महसा तेजसा जिता लब्धा- सौरस्य सूर्यसम्बन्धिनः भा कान्तियेन तस्य जितसौरमासः प्राप्तसूर्यका. न्तेः यद्वा महसा स्वकीयतेजसा जिता पराभूता सौरमा सूर्यप्रभा येन स जितसौरभाः तस्य जितसौरमामः अथवा महसाजितसौरभास: अप्राप्तसूर्यरुचेः फाल्गुनस्य तपस्यस्य यशसा कीर्तीनां प्रशस्तिः प्रशंसा प्रादुर्वभूव समुत्पेदे तत् अर्कतनुजन्मविभाविनोदः अर्कस्स दिवाकरस्य • तनुजन्मविभा शरीरजातप्रकाशः अचिरात् तदक्षणमेव प्रसझ हठात् ... प्रसव ३५९. भाचार्यश्रीविजयामृतमरिप्रणीता सरणी रीका. सर्ग-" मौढ्यम् मूढताम् महनशीलताम् न तत्याज न मुमोच फाल्गुने सूर्य प्रभायाः सह्यतात्तैक्षण्यं सर्वथा न भेजे इति भावः इत्यहं मन्ये जाने ॥ ६॥ उत्प्रेक्षालंकारः॥ अथ च महसा निजतेजसा । जितः पराजितः सौरस्य सूर्यापत्यस्य कर्णस्य भास्तेजो येन सः जितसौरमाः तस्य जितसौरमासः फाल्गु. नस्य अर्जुनस्य " अर्जुनः फाल्गुनः पार्थः सव्यसाची धनञ्जय इति हैमः" जगति भुवने यशसा प्रशस्तिः विख्याति प्रादुर्वभूव उदियाय तत् अर्कतनुजन्मविभाविनोदः अर्कतनुजन्मनः कणस्य विभायाः प्रभायाः विनोदः विक्षेपः प्रसावलात् अचिरात् तत् क्षणमेव मौल्यम् मुग्धताम् न तत्याज निचिक्षेप किन्तु तत्याज एव इत्यहम्मन्येऽनुमि- नोमि ।। उत्प्रेक्षा ॥ ६॥ सिद्धोपदेशवचसा कृतकर्णभेद, श्वेताश्ववाहनवलं खनृपानुमत्या । शुढेषणादिविधिना सुरवृष्टिरुच्चे- मुक्तानुयुक्तकरणैर्जनयाम्बभूवे ॥ ७ ॥ अन्वयः-सिद्धोपदेशवचसा कृतवर्णभेदम् स्वनृपानुमत्या श्वेताश्ववाहन- पलम् शुद्धैयणादिविधिना मुक्तानुयुक्तकरण: उचैः सुरवृष्टिः जनयाम्बभूवे ॥४॥ व्याख्या--सिद्धोपदेशवचसा उपदिशति वसन्तागममनुमापय- तीति उपदेशः कोकिलः तेषां वचः उपदेशवचः सिद्धः स्वभावसि; द्धश्च तत उपदेशव चश्चेति सिद्धोपदेशयचः तेन स्वाभाविककोकिल- वचनेन कृतकर्णमेदः कृतः विरचितः कर्णस्य कर्णिकारपुष्पस्य मेदो विकासो येन वत् श्वेताश्ववाहनवलम् श्वेताश्ववाहनस्स चलम् सूर्ययलम् तेज: "ऋतुकर्ता प्रभाकर इति पुराणम् " स्वतृपानुमत्या सूर्याज्ञया स महोपाध्यायभीमेधाविजयगणिविरचिते सप्ससम्मानमहाकाये शुद्धपणादिविधिना शुद्धः उत्तेजितः य एपणः वाणः स आदिर्यस्य विधेः तेन मदनहेतुकतीक्ष्णवाणादिविधानेन उचैः अतिशयम् सुर- वृष्टिः सुष्ठ राजन्ते शोभन्ते इति मुराः पुष्पाणि तेषाम्वृष्टिर्षण सृष्टिः मुक्तानुयुक्तकरणैः मुक्ता विकसिता अनुयुक्ता विकाशोन्मुखाः तेषां करणैपिधानः जनयाम्बभूवे विरचयामासे बसन्ते कामस्य बाणाय पुष्पाणि सज्ज्यन्ते ।। अन्यपक्षे-सिद्धोपदेशवचसा सिद्धानां केपांचित् त्रिकालज्ञान- वताम् यत्' उपदेशचचः तेन कृतकर्णमेदम् कृतः विहितः कर्णस्य भूपतेभेदः छेदो येन तत् श्वेताश्ववाहनवलम् श्वेताश्ववाहनस्य अर्जुनस्य बलम् सैन्यम् स्वनृपानुमत्या अर्जुनाज्ञया शुद्धषणादिविधिना शुद्धस्ती- क्ष्णीकृतः य एपणः चाणः स आदिर्यस्य स नितान्तोत्तेजितवाणादिः तस्य विधिना विधानेन मुक्तानुयुक्तकरणैः मुक्ताः शत्रौ प्रक्षिप्ताः अनु- युक्ताः मोचनाय तूणिरानिष्कासिताः तेषां करणैविधानः मुरषष्टिः सुन्वन्ति विपक्षान पीडयन्तीति सुराः बाणाः तेषाम् वृष्टिपणम उचैः अतिशयम् जनयांवभूवे उत्पादयामासे ।। ७ ।। एपणो लोहमये वाणे इति शन्दस्तो० श्लेपः ॥ सीतापहारविधिरेप तवोपहार- व्याहारनिर्भयविहारविनाशनाय । तेनाधुनापि मधुनाशनतां जहीही- • त्याहेव रावणमिह स्वधियालिजन्यम् ॥८॥ भग्यपा-एप सीतापहारविधिः दोपहारस्याहारनिर्भयावहाविनाशनाय सेन मधुनापि मधुनासनवाम् जहीहि इति भरिजन्यम् स्वधिपा इह रावणम
-
M
भाधारंभीविषयायमूरिमगीता मरणो सका. सगं..
व्याख्या-सीतापहारविधिः सीतायाः मदिरापाः "सीता
लांगलपद्धतौ जनकहितरि लक्षम्यां मदिरायामुमायां चेति शन्द
स्तोममहानिधिः" अपहारविधिः परित्यागविधिः तय उपहारव्याहार-
निर्मपविहारविनागनाय बच्छन्दन इतस्तोगमनागमननिर्णयविहार-
निवारणाय तेन अधुनापि इदानीमपि मधूनाशनताम् मद्यप्रधानमो.
जशीलताम् जहीहि परित्यज इति गरणम् गवयति लोमिति रावण-
स्तम् मद्यजनितविभ्रान्तवचनम् इह वमन्तममये स्वधिया स्वमत्या
अलिजन्यम् भ्रमग्वादः अमराणाम्परस्परशुब्दः आइय उवाचेव."जन्य-
स्थाअनवादेऽपीत्यमरः" अन क्रियागतोत्प्रेक्षालंकारः ॥
अन्यत्र एप सीतापहारविधिः सीतायाः जानक्या अपहारविधिः
अपहरणव्यापारः तब सर्वेश्वर्यमम्पन्नस्यापि रावणस्य उपहारव्याहार•
निर्भयविहारविनाशनाय उपहाराणाम् उपढौकनानाम् व्याहाराणाग्नि
भयवचनानाम् निर्भय विहाराणाम् क्रीडाविशेषाणाम् विनाशनाप
निवृत्य तेन तद्धेतुना अधुनापि इदानीमपि मधुनाशनताम् मधुप्रधान
भोजनताम् मद्यपानमित्यर्थः यद्वा मधुना तदभिधानन राक्षसेन
सह संघताम् संपन्यताम् अथवा मधुना कुम्भनसीभा सह अमनता.
मुपवेसनताम् तेन संगतिम् जहीहि परित्यज इन्थमेवम् अलिजन्यम्
भ्रमरवादः अथवा अले. काकस्य जन्यम् युद्धम् सधिया स्वयुद्धमा
इह समये आह इस कथयतीवेत्यर्थः ॥ ८॥ श्लेपः।
व्यर्था सपक्षरुचिरम्बुजसंधिवन्धे,
राज्ञो न दर्शनमिहास्तगतिश्च मित्ने ।
किं किं करोति न मधु-व्यसनं च देवा-
दस्माद् विचार्य कुरु सजन ! तन्निवृत्तिम् ॥९॥
महोपाध्यायनीमेषविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाये अन्वयः - अम्बुजसंधिवन्धे सपक्षरुचिः व्यर्था इह राज्ञो न दर्शनम् मिन्ने अस्तगतिश्च देवात् मधु-व्यसनम् किम् किम न करोति भस्मात् विचार्य हे सजन ! तमिवृत्तिम् कुरु ॥ ९ ॥ व्याख्या-राज्ञः चन्द्रस्य भूपस्य च मधुव्यसनम् वसन्तसंग मम् मद्यपानव्यसनं किं किन्न करोति सर्वमपि करोति तथाहि इह मधुप्रवृत्तौ सपक्षे पक्षसहिते पतत्रिणि कोकिले रुचिः प्रीतिः कोकिले दृढा प्रीतिर्भवतीति भावः अथ च सपक्षे तुल्यरूपे सूर्ये रुचिः विशेष कान्तिः, यद्वा सपक्षे वाणे मृगयार्थ वाणसंधाने रुचिः, अम्बुजमन्धि. चन्धे अम्बुजस्य मरसिजस्य सन्धिबन्धे संकोचे मुकुलतायाम् सपक्षा रुचिः समानोदरप्रीतिः व्यर्था ममानोदरप्रेम नैव भवति दर्शनमपि न भवति तत्र गगनस्य धूलिधूसरत्वान्न चन्द्रदर्शनं भवतीत्यर्थः मित्रे सति अस्तगमनम् सूर्योदयेऽस्तमितिः दैवात भवति अस्मात् उक्ताद्धतीः हे सञ्जन ! सत्पुरुष । विचार्य प्रभावशालिनि राज्ञि यद्येव विघा प्रवृ. त्तिस्तदाऽस्मदादीनां का कथेति निरुप्य तन्निवृत्तिम् मधुनिवृत्तिम् मधव्यसननिरोधं कुरु विधेहि ।। अत्र प्रस्तुतस्य राज्ञचन्द्रमसोऽप्रस्तु- तेन केनचिद्राज्ञा सह समानधर्माभिनिवेशात् दीपकालंकारा ॥९॥ दीप्त्या मधोः प्रतिहरेश्चलचक्ररूप- व्यूहे धगसु-तनयोहरणप्रसिद्धेः । चक्र सुदर्शनमजायत माधवस्य, तज्ज्योतिपामुदयतः परिपन्थिभित्त्यै ॥ १० ॥ भन्वय:-प्रनिहरेः मधोः दीप्त्या घर मापे म्यूटे घरासुतनयोहरण- प्रसिद्धः तायोतिषामुदयतः परिपायभिष माधवम्य सुदर्शन चक्रे भज्ञायत III व्याख्या--प्रतिहरे हरेमविवाद वैशासाद प्रति पूर्वम् मघोश्वे. प्रस्य दीप्त्या प्रमावेन धराम भृमिषु चलचक्ररूपयई चलति सात- ३६३ माचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-७ स्येनेति चलो वायुः सदागतित्वात तस्य चक्ररूपे घूर्णनरूपे व्यूहे सम्हे चक्रवाते वात्यायामित्यर्थः तनयोद्धरणप्रसिद्धेः तन्यते विस्तार्यते इति तनयो रजः धूली वस्योद्धरणं निराकरणम् तत्र प्रसिद्धिः ख्याति- यस्य तसात् तदनन्तरम् परिपन्थिभित्यै परिपन्थिनाम् व्याघातकानां शीवानाम् भित्त्य विनाशनाय माधवस्थ वैशाखस्य तज्ज्योतिपामुदयतः तत् कान्तीनाम् प्रादुर्भावतः सुदर्शनम् सुन्दरावलोकनम् चक्रम् समू- हम् कान्तिसमूहम् अजायत उद्भवत ।। श्लेपः । अन्यत्र प्रतिहरेः प्रतिवासुदेवस्य जरासंधस्य चलचक्ररूपव्यूहे चक्रव्यूहरूपयुद्धसंस्थान विशेपे मधोः मद्यस्य दीप्त्या आतिशय्येन धरासुतनयस्य जरासंघस्य उद्धरणम् उच्छेदनम् तस्य प्रसिद्धः ख्यातेः ज्योतिषाम् तेजमाम् उदयतः प्रादुर्भावात् परिपन्थिभित्त्यै शत्रुभेद- नाय माधवस्य कृष्णस्य सुदर्शनम् सुदर्शननामकं चक्रम् चक्रास्त्रम् अजायत अभवत् उपपद्यत इति यावत् ॥ १० ॥ दुर्योधनान्तकरणं धरणं क्षमाया, भीतस्य तस्य ननु पश्यत एव पुंसः । इप्टा तपोवनकथा जिनसेवना वा, नावाधिरुय यदिवाम्बुधिमजना वा ॥ ११ ॥ -दुर्योधनान्तकरणम क्षमाया: धरणम् भीतस्य तस्य पुंमः पश्यत एव तपोवनकथा वा जिनसेवना नावाधिरस अम्युधिमजना वा इष्टा ॥1॥ व्याख्या-दुर्योधनान्तकरणम् दुःसेन युध्यते महते इति सुयोधनः शीतम् हिममित्यर्थः तस्य अन्तकरणम् विनाशकारकम 'क्षमायाः पृथिव्या आश्रयणम् ग्रीप्मयाहुल्यात् भूमिशय्याश्रयणम् कस्येत्याकांक्षायामाह भीवस्येति भीतस्स ग्रीष्मतापपरितस्य, नन्विति भन्वय:- ,
३६४
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्ये
AAA
.
संबोधने पश्यत एव शीतलस्थानमन्विष्यत एव पुंसो, जनस्य तपो.
वनकथा तपोवनस्य विपिनस्य कथा इप्टा गता "इप्यतेः क्तः" केपि
तपोवन चर्ची न कुर्वन्ति दावाग्निबाहुल्यात् वा अजिनसेवना मृग-
चर्मसेवना वा इप्टा गता तस्य ग्रीष्मजनकत्वात् "त्वक्छविश्छादनी-
कृत्तिवाजिनमसृग्धरेति हैमः " अथ च नावा नौकायामुपविश्य
आयुधिमञ्जना समुद्रजलश्लेपणा जलाशयजलावगाहना इष्टा अभिल
पिता तापबाहुल्याजनानां जलावगाहनाभिलापो जात इति भावः ॥
अन्याथे भीतस्य संमाराद्विरक्तस्य पुंमः पश्यत एव लोकसमक्ष-
मेव दुर्योधनान्तकरणम् दुर्योधनस्य कामस्य दुर्योधनस्य धार्तराष्ट्रस्य
अन्तकरणम् विनाशनम् क्षमायाः शान्तेः धरणम् अथ च दुर्योधना-
न्तकरणेन क्षमायाः पृथिव्याः धरणम् आश्रयणम् इष्टम् तस्य तपो-
धनकथा तपोवनगमनम् वा अथवा जिनसेवना-जिनेद्रभक्तिः इप्टा--
आशंसिता, वा अथवा नाबाधिरुह्य नौकाधिष्ठितः अम्बुधिमजना
समुद्रपातो वा इप्टा अभिलपिता कर्त्तव्यत्वेन निर्धारितेत्यर्थः ॥११॥
दुःशासनस्य पुरशासनजन्मनैव,
संप्रापितोऽध्वनियमो विघटोत्कटत्वात् ।
अन्येऽभिमन्युजयिनो गुरुगौरवाह -
स्ते कौरवा अपि कृता हतचीरवाचः ॥ १२ ॥
भन्वयः-पुरशासनजन्मनैव विघटोत्कटयात् दुःशासनस्य भध्वनियमः
सप्राषितः भन्ये अभिमन्युजयिन. गुरगौरवाही ते कौरवाः अपि हवचौरवाचः
व्याग्या-पुरशासनजन्मनैव पुरम् कुसुमदलवृत्तिम् शास्ति
विघटयतीति पुरशासनो वमन्तः पुरम् देहे गेहे कुसुमदलवृत्ती
चर्मणि प्रधाननामे इति शब्दस्तोममहानिधिः, तस्य जन्म उदयस्तेन
कृता. ॥१३॥
w -~ ~~ भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिभणीता सरणी टीका. सर्ग-७ दुरशासनस्य दुःखेन शास्यते सह्यने इति दुःशासनम् हिमम् , तस्य विघटोत्कटत्वात् विघटे विनाशे उत्कटत्वात् उच्छ्वलत्वात अध्धनः मार्गस्य नियमः गमनप्रतिवन्धः संप्रापितः समाप्तः मधुमाधवे गमनस्य प्रशस्ततरत्वात् गमननिरोधो निवारितः अन्ये अभिमन्युजयिनः अभि- मन्यन्ते प्रशंस्यन्ते जनैरिति अभिमन्यवः जात्यादिकुसुमविशेषाः ते च ते जयिनश्चेति अभिमन्युजयिनः प्रशम्य तराः जातीयकुसुमानि गुरु महान् यो गौरवः गरीयस्त्वम् तदर्हा तद्योग्याः को पृथिव्याम् रयाः प्रसिद्धाः ते हतचौरवाचः कृताः हताः निवृत्ताः चौरवाचः एकान्त- स्मरणानि येपान्ते कृता तेपानामापि कैरपि न गृह्यत इति भावः न स्याजातीयवसन्ते इति साहित्यदर्पणस्मरणात् ॥ १२ ॥ अन्यार्थे पुरशासनजन्मनैव पुरम् शरीरम् शास्ति कार्ये प्रवर्चय- तीति पुरशासनो वायुः तस्माजन्म यस्य तेन भीमसेनेन यदा पुरं तन्नामकमसुरविशेपं शास्ति हिनस्तीति पुरशासनः पुरन्दरः ततो जन्म- यस्य तेन अर्जुनेन विघटोत्कटवान् वि-विपरीतम् विरुद्ध वा घटप. त्याचरतीति विघटः विरुद्धाचारः द्रौपदी चीराद्याकर्षकत्वादित्यर्थः तेन उत्कटः उग्रः उल्पणः विघटोत्कटस्तस्यभावस्तत्वम् तम्मात् विरुद्धोल्व. णाचारत्वात् दुःशामनस्य तदमिधानकौरवम्य अधनियमः अध्धनो मार्गस्य नियमः अन्ता, अतः परगन्तव्यन वर्तते इति नियया महा. प्रस्थानमित्यर्थः संप्रापितः उपलम्मिता तथा अन्ये ततो भिन्नाः अमि. मन्युजयिनः अभिमन्युपराजयकारकाः गुरुगौरवाहीः गुरवो द्रोणा- चार्यप्रभृतयः गौरवाद ग्ववंशोद्भयरवेन गुरुत्वमाता भीमादयः ते चते गुरुगौरवाही ते प्रसिद्धाः कौरवाम तयौरवाचः इता: विनष्टा: चौरा: चोरिताः वानः येषां ते कृता विनष्टमुष्टवचनाः कृताः तेऽपि मृता अप्रमापि जाता इति भावः ॥ १२ ॥ क्षेपः।
महोपाध्यायनीमेपपिजपगणिविरचिते सप्तसम्भानमहाकाम्ये PA LAAAPAN तत्राभूः समुदितो भटकोटियोद्धा, रोद्धाऽपहस्तति हस्तिशतं स्वतन्त्रः । वाणप्रकर्षपिहिताम्बरदिग्विधानः, स्वर्गेशनन्दनजयेन कृताभिमानः ॥ १३ ॥ अन्वयः-तत्र अर्कभूः समुदितः भटकोटियोद्धा रोद्धा स्वतमा हस्तिशतम् भपहरतयति माणप्रकपिहिताम्मादिग्विधान: स्वर्गेशनन्दनजयेन कृनाभिमानः॥३॥ व्याख्या-तत्र ऋतुप्रसंगे अर्कभूः अर्कात सूर्याद्भवतीत्यर्कभूः राधेयः वैशाखः "वैशाखे माधयोराध इत्यमरः" यद्वा अर्कभूः अर्कस्य पुष्प- विशेषस्य भूरुत्पत्तिस्थानमिति "आकडा" इतिख्यातस्येत्यर्थः तत्र तस्य प्रभूतत्वात् "अर्काहवसुकास्फोटगणरूपविकीरणा इत्यमरः" वैशाख. मासः समुदिता ऋतुप्रसंगेन प्राप्तः भटकोटियोद्धा भटन्ति हिम धार- यन्तीति मटा हिमधारका तेषां कोटिः भटकोटिः तं योधयतीति भट- कोटियोद्धा हिमनाशकः "वैशाखे नरवानरावित्यमियुक्तोके" रोद्धा अत एव हिमरोद्धा निवर्तकः स्वतंत्रः स्वाधीनः हस्तिशतम् हस्तो हस्त- नक्षत्रमस्मिन्नस्तीति, हस्ती हस्तः अश्चिन्यादित्रयोदशनक्षत्रम् "हस्त: देहावयव मेदे. हस्तिशुण्डे, अश्विन्यादि त्रयोदशनक्षत्रे, इति शब्दस्तो- ममहानिधिः" तद्वान् अश्चिन्याम्मेपेरविर्यदा भवति तत एष नक्षत्रप तिरिति नक्षत्रप्रवकत्वेनेति भावः तेषां शतम् अपहस्तयति प्रवर्ग यति बाणानाम् वनवहीनाम् "वाणःशरे वहौ गवांस्तने दैत्यभेदे इति शब्दस्तोममहानिधिः" प्रकण प्रावल्येन पिहित आच्छादितः अन्ध. कारीकृतः दिविधानः दिविभागो येन स माणप्रकर्पपिहिताम्बरदि. विधाना, खर्गेशनन्दनजयेन कृताभिमानः स्वर्गेश इन्द्रः तनन्दय. तीति स्वर्गेशनन्दनो वायुः तस्य जयः उत्कर्षमासिस्तेन कृताभिमानः कृतगौरवः, वैशाखे वार्योः प्रागल्येन वैशाखस्य गर्विष्ठतेति भावः ॥ .
Vve भाचार्यश्रीविजयातहरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-७ अन्यत्र अर्कभूः अर्कात् सूर्यादि भवतीत्यर्कभूः कर्णः समुदितः प्राप्तोदयः भटकोटियोद्धा भटानाम् योद्धृणाम् "भटा योधाचयोद्धार- इत्यमरा" कोटिः भटकोटिम्तयोधयतीति तथा, रोद्धा विपक्षाणां रोध- नकर्ता स्वतन्त्रः स्वाधीनः हस्तिशतम् गजशतम् अपहस्तयति गलह. स्तिकान्ददाति, बाणानाम् शराणाम् प्रकर्षणमाकर्षणम् तेन पिहितम् आच्छादितम् दिविधानम् दिविभागो येन स वाणकर्पपिहिता म्बरदिग्विधानः स्वर्गेशः इन्द्रः तस्य नन्दनोऽर्जुनः, तस्य जयेन विजयेन कृताभिमानः कृतगर्व इति स्वर्गेशनन्दनजयेन कृताभिमान: अभूदिति शेषः ॥ १३ ॥ अथ च । अर्कभूः अर्कः इन्द्रः "अर्कः सूर्य इन्द्रे ताने स्फटिके विष्णौ पण्डिते चेति शब्दस्तोममहानिधिः" तस्मात् भवतीति अर्कभूः अर्जुनः अन्यद्विशेषणम् पूर्ववद्योज्यम् स्वर्गेशनन्दनजयेन कृताभिमानः स्वर्गस्य ईशः स्वर्गेशः इन्द्रः तस्य नन्दनः इति स्वर्गेशनन्दनः, जयति शत्रूनिति जयः स्वर्गेशनन्दनवासी जयश्चेति स्वर्गेशनन्दनजयः तेन कृताभिमानः कृताकारः अहं महेन्द्रपुत्रः जयी चेति कृतगर्व इत्य- भिप्रायः ॥ १३ ।। श्लेपः। तत्रोद्बभूव सुरभिः सुरभित्प्रसङ्गी, पद्मप्रवोधविधिना भुवनानुरागी । चक्रे निशाचरवलक्षयतो वियोग, भिन्दन् शिलीमुखबहुप्रसरोपयोगात् ॥ ११ ॥ भन्वयः-तत्र सुरभृत्ममंगी पद्मभयोधविधिना मुवनानुगगी सुरभिः उदभूष, शिलीमुम्बबहुप्रपरोपयोगात् भिन्दन् निशाचरवलक्षयत. वियोगम सके। । चने पार्वज्ञानासंतवर्णनम् । .
. महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाप्पे व्याख्या-तत्र ऋतुप्रसंगे सुरभृत्प्रसंगी सुरैर्देवैर्भियते धार्यते इति सुरभृत् कुमुमम् तस्य प्रमङ्गः सम्बन्धो यत्र स सुरभृत्प्रसङ्गी पुष्पसमृद्धिसमृद्धः, सुरभिः वमन्तः “वसन्ते पुष्पसमयः सुरभिर्फीष्म उमक इत्यमरः उद्बभूव उपाययौ कथभूतः पद्मप्रबोधविधिना पग्रस्य कमलस्य यः प्रबोधविधिः विकाशविधिः, तेन भुवनानुरागी भुवनस्य कृत्स्नस्य जनस्य अनुरागः प्रेम यस्मिन् स भुवनानुरागी, सक- लजनानुरागभाजनः शिलीमुखबहुप्रसरोपयोगात् शिलीमुखानाम् भ्रमराणाम् ' मयूसस्त्यिटकग्ज्वालास्वलिवाणौ शिलीमुखावित्यमरः" बहुप्रमरस्य बहुसंगस्य यः प्रसरः संवन्धः तस्य उपयोगात् आयोज नात् निशाचरवलक्षयतः निशाचरस्य चन्द्रस्य बलक्षयतः दौर्बल्यात् वियोगम् कमलभमरवियोगम् भिन्दन् छिन्दन् निशाचराणाम् घूक पक्षिणाम् वलक्षयतः बलविनाशाव वियोगम् वीनाम् कोकिलविह- गानाम् योगम् सम्बन्धम् चक्रे विदधे, पेचकानां वायसारातित्वात काकपिकयोः साम्यात् घूकपलक्षयात् कोकिलसम्बन्ध इति भावः "निशाचरविलक्षयतो वियोगम्" इति पाठांतरे, निशाचराणाम् सर्पा. णाम् "निशाचरः राक्षसे पिशाचे शृगाले पेचके संपें चक्रवाके चौरे इति शब्दस्तोममहानिधिः" विलक्षयतः विलानाम् विवराणाम् क्षयतः वसन्ते पतितपणम्तद्विलाच्छादनेन विलक्षयः सुतराम् वियोगः विव- रवियोगो भवति भावः यद्वा वियोगः वीनां पक्षिणां योगा सम्ब- न्धः वहिः पक्षिणोऽदीनुल्लुण्ठयन्तीति प्रसिद्धिः॥ अन्यत्र मुग्मैश्वर्यविमर्चीति सुरभृत् राजा तत्र प्रसङ्गः प्रचारो यस्य सुरमृत्प्रसंगी राजजनप्रपोधकः पो रामे आत्मज्ञाने आत्मा. नन्द "आनन्दो नन्दनः पद्मो राम इत्यभिधानचिन्तामणिः" यो योधः ज्ञानम् ईश्वरविषयकयोधः तस्य विधिविधानम् तेन बनानुरागी , भाचार्यश्रीविजयातत्रिप्रणीता सागी टीका. सर्ग- भुननस्य जगतः अनुरागः गुरुवप्रेम यस्मिन् स यद्वा भुवनस्य अनु- रागो यात्मल्यं यस्य स अथवा पद्मप्रवोधविधिना आत्मज्ञानेन अभु- चनानुरागी संसारविरक्तः "सुरभिर्विद्वान सुरभिः स्वर्ण मुन्दरे चम्पके चैत्रेमासि पण्डिते धीरे इति शब्दस्तोममहानिधिः" उद्वभूव विव- कास विदिगुते इति यावत् निशाचरवलक्षयतः निशा तमः तत्र चरतीति निशाचरः अज्ञानम् नस्य बलक्षयतः अज्ञानपमरविनाशात् वियोगम् विज्ञानमिति शब्द० म० तस्य योगः मम्बन्धः अज्ञाननाशाद्विज्ञान- योगः तं चक्रे विदधौ शिलीमुखबहुप्रसरोपयोगात् शिलीमुखानाम् जडानाम् शिलीमुखो जडीभूत इति शब्द० म० बहुप्रसरस्य अधिक- संबन्धस्य उपयोगात् लाभात् वियोगम् परिभवम् भिन्दन् अपसार- यन् वियोगम् शुद्धयोगम् चक्रे विदधे ।। १४ ।। यत्रार्कसूतिरभवद् बहुलातपनी- रामाभियोगकलया विलयात् शुकादेः । आमोदमोदकरसादवशाशनेन, चित्रातिशायिनि विधी परशासनेन ॥ १५॥ भन्वयः-बहुलातपश्रीः रामाभियोगकलया शुकादेः विलयात् आमोद- मोदकरसादवशासनेन चित्रातिशायिनि विधौ परशासनेन अर्कसूतिः या अभवत् ॥ -पत्रों बहुलातपश्रीः बहुलस्य अतिशयस्य आतप- स्य तापस्य श्रीः शोभा यसिन् म शुकादेः शुकस्य पत्रस्य विलपात् पातात् यहा शुकस्य कीरस्य पक्षिविशेषस्य विः आकाशे लयो लीनता तस्मान् अथवा शुकादेः शोकादेः विलयात् विनाशाद रामाभियोग कलया रामस्य मृगस्य योऽभियोगः सम्बन्धः तस्य कलया कलनेन "गन्धर्वः शरभो रामः समरो गवयः शश इत्यमरः" यद्वा रामाया रमण्याः अभियोगकलया सङ्गमाकलनेन आमोदमोदकरसादरशास- व्याख्या- महोपाध्यापश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्भानमहाकाये MAA A नेन प्रचुरसुगन्धेन तत्र पुष्पातिशयात पो मोदः हर्पः तं करोतीति आमोदमोदकर तेन सादस विषादस्य "विषादोऽप्रसादः सादो विष- ण्णतेति हैम:" यत् अवशामनम् उलइनम् तेन चित्रातिशायिनि विधौ चित्रया चित्रानक्षत्रेण अतिशयते इति चित्रातिशायिनि चित्रानक्षत्र- योगिनि विधौ चन्द्रे यद्वा चित्रं यथास्थानधा अतिशायिनि अधिक- चमत्कारशालिनि विधौ चन्द्रे सति परमुत्कृष्टम् यत् शासनम् तेन उप- लक्षितः अभवत् अजायत अत्र सर्वत्र उपलक्षणे तृतीयाऽवसेया॥१५॥ अन्यत्र । अधति सूर्यवशोद्भवो रामः कर्णनृपतिः सुग्रीवो वा बहुलातपश्रीः बहुलोपनीभूतो य आतपस्तस्य श्रीरिवश्रीर्यस्येति निदर्शनालंकारः, स शुकादेः शोकादेः विलयात अपगमात् रामा- भियोगकलया रामायाः सीतायाः कर्णपक्षे रामस्य परशुरामस्य सुग्रीवपक्षे रामायास्ताराया अभियोगकल या संबंधसंकलनेन आमोद मोदकरसादरशासनेन आमोदेन हण यो मोदकर सुखकरस्तस्मात् सादस्य विपादस्य अवशामनेन उल्लंघनेन चित्रातिशायिनि विधौ चित्री विलक्षणो य अतिशयते स चित्रातिशायि तसिन् विधौ अहो सानु. कूले दैवे परशासनेन परस्य शो: शासनेन अवसादनेन उपलक्षितः अभवत् अराजत ॥१५॥ राधानुनायकतयाऽप्यमुनाऽनुविद्धा- श्वेताश्वनोदनकृता न कृता विरुद्धा । तदासवस्य कमलाद्यनुरागमस्मिन् , दः वलात् खवलहस्तविनाशनेन ॥ १६ ॥ মস-২াখানাথাবি ঠিকানীরা पिरदा न कृता पहात् स्वयत सविनासनेन तत् धामयम्य श्मलानुरागम् भरिमन 10 भमुना भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणो टीका. सग-. rview www vM W w www " व्याख्या-राघस्य वैशासस्य अनुनायकतयापि अनुराधकत- यापि प्रसायकत्वेऽपि अनुविद्धः अश्वेताश्वनोदनकृता अश्वेताश्वो वायुः अनुविद्धश्चामौ अश्वेताश्ववेति अनुविद्धाश्वेताश्वः अनुगताश्वेताश्व इत्यर्थः तस्य नोदनकता प्रेरकतया अमुना वसन्तेन विरुद्धा न कृता "यः राधायाः द्रौपद्याः आराधकः स यदि अनुविद्धाश्वेताश्वस्याऽर्जुनस्य नोदनकृत् भवेत् तदा सुतरामेव विराधको जात इति सम्बन्धमुरी कृत्याह विरुद्धा न कृतेति भावः तत् वासपस्य कमलाधनुरागम् सरोजादिप्रेम तदेव असिन् वमन्ते जातम् " अन्यथा पुत्रविराधकः तथा न संभवेदित्यर्थः बलात् चलतः स्ववलानाम् खमैन्यानाम् हस्तविनाशनेन " हस्तवारणम् मारणोद्यतस्य निवारणमिति शब्द म." मारणोधतनिधारणेन दधे वसन्तो यद्यपि फालानस्य विनाश कस्तथापि कमलविनाशकत्वेन खचलहस्तविनाशनेन च पासवः अस्मिन वसन्ते दधे इति तत्वम् ॥ १६ ॥ अन्यत्र । राधानुनायकतयापि राधस्य माधवस्य कृष्णस्य अनु. नायकतयापि अनुराधकत्वेऽपि "वैशाखे माधवो राध इत्यमरः अनु- निद्धाश्वेताश्वनोदनकृता अनुविद्ध आहतो य अश्वेताश्वः कर्णस्तस्य नोदनकतापि निराकरणकृतापि यद्वा अश्वस्य नोदनं प्रेरणं करोतीति अश्वनोदनकृत् अश्वेतः कृष्णश्वासौ अश्वनोदकृचेति अश्वेताश्वनोदनकृत अनुविद्धः योजितः अश्वेताश्वनोदनकृत् येन तेन विरुद्धा न कृता "या आराध्यः स आराधको न भवतीति विरोधः उक्तार्थे सति विरोधप रिहारः" तत् वासवस्य वसुसर्वममृद्धिरस्यास्तीति वासवः कृष्ण तस्य कमलाद्यनुरागम् स कमलहस्त इति कमलापतिश्चेति कमलादेरिव असिन् अर्जुनेऽनुराग इति अन्यत् पूर्ववत् ।। १६ ।। तेनागभूपशमने सुमवः सुतत्वात् , वैशाखनाम तदमुष्य न फाल्गु. .
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्ये नोऽयम् इति पाठान्तरम् ॥ तेन अंगभूपशमने कर्णनृपदमने सति अथ च अङ्गभूः कामः तस्य शमने शान्ती सुमनमां देवानामिन्द्रा. णाम् सुतत्वात् पुत्रत्वात् सुमनमा पुष्पाणा सुतत्वादुत्पादकत्वाद अथ च सुमनमा मुष्ठुचित्तानाम् सुनत्माजनकत्वात् अमुष्य अस्य वैज्ञास इति नाम अथना वैसः रणसस्थाविशेषः सोऽस्यास्तीति वेशास इति नाम अयम् उक्तवार्यकारी फाल्गुनः न फाल्गुनमामः न अथ च फल्गु अमारम् तदेव फाल्गुनः "प्रसादित्वादण्" असारो न "अमारन्तु फल्गु इति हैम:" ॥१६॥ धारां पुपोष विपरीततया न राधां, राजाङ्गजाभ्युदयितां दयिताङ्गरागात् ॥ उक्तिः प्रिया पवनशालिवनप्रियाणां, कामं जनेषु विनयाजनयाम्बभूव ॥ १७ ॥ अन्दय -दयितागरागात् गजागजाभ्युदयिनाम् धाराम् पुपोप राधा न पपनशालिवनप्रियाणा उत्ति प्रिया विनयात् जनेषु कामम् जनयाम्बभूव ॥१७॥ व्याख्या-दयित गराग त् दयितः प्रेय'न् योऽङ्गरागः अंग रज्यतेऽऽनेनेति अङ्गराग. अगलेपनम् तस्मात् राजागजाभ्युदयिताम् राज्ञः चन्द्रस्य अजम् शैत्यम् तस्याभ्युदयिताम् समृद्धिम् धाराम् जलधागम् शैत्यातिशयकारिणीम् जलधाराश्च पुपोप सिपेवे यद्वा दयि. तायाः प्रेयसाः अङ्गरागात् अङ्गस्पर्शसुपात् चन्द्रजशैत्यवतीम् धारा श्रेणीम् पुपोष भेजे विपरीततया वैपरीत्येन पुरुषायितत्वेन राधाम् रिरमाम् न पुपोप नानुभवतिस्म ग्रीप्मबाहुल्यात् अथ च विपरीततया धारापदगताक्षरपरीत्योचारणेन राधाम् गजमदप्रसृतिम् इस्तिमदस्रा- वम् न पुपोप न ररक्ष तत्र गजमदप्रवृत्तेः प्रसिद्धत्वात् पवनशालिवन- प्रियाणाम् परनान्दोलितारण्यपिकानाम् “वनप्रियः परभृतः कोकिल:
भाचार्यश्रीविजयामृतरिमणीता सरणी टीका, सर्ग-७
V-4
पिक इत्यपीत्यमरः" उक्तिः पञ्चमालापः प्रिया मनोज्ञा जनानामिति
शेषः सा उक्तिः जनेषु लोकेपु विनयात् अनुरागमुत्पाद्य कामम् मद-
नम् जनयांबभूव उत्पादयामास कामोत्पादिका जातेति भावः ॥
अन्यत्र । गजाङ्गजाभ्युदयिताम् राज्ञः राज्यस्य अङ्गः राजागा
राजागाजायते इति राजाङ्गजः "स्वाम्यमात्यसुहृद कोशो राष्ट्र दुर्ग
बलानि च राज्यागानि प्रकृतय इति हैम:" तेन अभ्युदयी राजाङ्ग-
जाभ्युदयी तस्य भावस्तत्ता ताम् राजाङ्गजत्वेन भाग्यशालिनीम् दयि-
ताङ्गरागात् दयित ईप्सितोऽङ्गरागो यस्य तस्मात् धाराम् रथांगविशे
पम् सैन्याग्रिमस्कन्ध वा अश्वगति विशेषम्बा "घोरितं वलितं प्लुतो.
त्तेजितोरितानि च, गतयः पञ्चधाराग्व्यास्तुरंगानां क्रमादिमा इति
हैमः पुपोप ररक्ष विपरीततया धाराशब्दवैपरीत्येन राधाम् राम्
काञ्चनं दधातीति राधा ताम् यद्वारा विश्रम विलासं धारयतीति राधा
ताम् विलासिताम् अथवा दानम् धीयते अनेनेति राधा संप्रदानता
ताम् अथवा राधा घृपभानुनन्दिनी तां न पुपोप न ररक्ष राधा वृन्दा-
वनस्थितस्यैव कृष्णप्रिया द्वारकास्थितस्य तु काचन अन्या एवेति
भावः प्रियापनशालिवनप्रियाणाम् प्रियाणां प्रेयसीनां यत् पवनम्
कूर्दनम् तेन शालते शोभते यत् वनम् समुद्रजलम् तत् प्रियम् मनोज्ञ
येषां तेपा प्रियासहितजलविहारकर्तृणाम् उक्तिः मनोहरवचनम्
विनयात् माधुर्यात् जनेषु लोकेषु कामम् मदनम् अभिलापम्वा जनया-
बभूव उत्पादयामास ॥१७॥
ग्रीष्मर्तुरा भुवि ददाह न शाखिनोऽन्यान् ,
स्वैः पत्रवाहनिवहैः परपत्रवाहान् ।
व्याशोपयन्नवजडाशयपङ्कभागान् ,
मुक्त्वैवमेव सहकारमुखं स भीष्मः ॥ १८ ॥
NAMu NA महोपाध्यायधीमेषविजयगणिविरचिते सप्तसन्मानमहाकाम्ये अन्वय.-भीष्मः प्रीष्मर्तुराट् स्मैः पन्नवाह निवहः परपत्रमाहान् भन्यान शाखिनः सहकारमुखं त्यस्यैव न ददाह किन्तु ददाहेव परम् नवजदाशयपंक भागान् व्याशोपयत् ॥ १८ ॥ व्याख्या-म मीऽमः तापजनकः ग्रीष्मर्तुगट ऋतुषु राजते इति ऋतुराट् ग्रीष्मशासौ शत्राट् चेति ग्रीष्मर्तुराट् स्वैः स्वकीयः पत्रवाहनिव है: पत्रम् दलम् बाहयन्ति इतस्ततवालयताति पत्रवाहा वायवः तदावाग्निसंसर्गेण वहिपायैः परपत्रवाहान परमुत्कृष्टम् पत्रम् पर्णबहन्ति धारयन्तीति परपत्रवाहाः तान अन्यान् मिन्नान शाखिन: वृक्षान् सहकारमुखम् महकारप्रधानम् चूतप्रमुखम् मुक्त्वैव परित्यज्यैव न ददाह किन्तु ददाहैव एवम् इत्थम् नवजडाशयपंकभागान् डलयोः साम्यात् नवानां नूतनानां जलाशयानां अल्पमरमां पतभागान् कर्द- मांशान व्याशापयत् शुष्कतामनयत् ।। वक्रोक्त्यलंकारः॥ अन्यत्राथें । ग्रीष्म राद् ग्रीष्म रिव राजते इति ग्रीष्म गाद स मीप्मः मीष्मपितामहः अथवा ग्रीमती राजते विशेपेण तापयति जनानिति ग्रीप्मर्तुराट् सूर्यः भीष्मः प्रचण्डः अन्यान् निरपेक्षानुदा. सीनानित्यर्थः परामुगान्या परपरवाहान परेपो पत्रम् मन्देशपत्रम् पहन्ति प्रापयन्तीति तान् परप्रेप्यान शासिनःशासा देहावययविशेष: येषां मन्ति ते शासिनः तान् स्वपमवाह निवः स्वकीयवाणैर्न ददाह न भस्मनकार सहकारमुसम् सहायर नृपप्रमुखम् त्यत्वा परित्यज्य नवजडाशयपत्रमागान नवानाम् नयी नानाम् जडाशयानाम् कुटिल. हृदयानाम् पक्षमागान् पापा मालिन्यमागान "अम्रीपकं पुमान् पाप्मा पापं किल्विपकरमपमित्यमरः" च्याशोपयन शुष्कनामनयन् ॥१८॥ शोचं प्रभातसमयं शमयन्तमन्त. हिं घनाधनघटाप्रकटाम्बुदृष्टया ।
भाचापं श्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका सर्ग-७ A व्यालोक्य चारुकुटजातिशयेन केन, साकेतकेश्वरदृशोदयतीति नोचे ॥ १९ ॥ अन्धयः- घनाघमघटाप्रक्टाग्वृष्टया अन्तदाह शमयन्तम् शौचं प्रमान- समय व्यालोक्य कुदजातिशयेन केन साकेतकेश्वरहशा उदयतीति नोचे १९|| व्याख्या-घनायनप्रकटाम्बुवृष्टया घनाघनस्य मेघस्य "वा'को. ऽग्दो घनाधन इत्यमरः" या घटा आडम्बरम् तया प्रकटाम्बुवृष्टया प्रकटा प्रवृत्ता या अम्वृष्टिः जलवर्पणम् तया अन्तर्हि ग्रीष्मसमया जनिततापं समयन्तं निराकुर्वन्तं गौचं शुचिभवम् आपाढमासीय प्रभातसमयं प्रातःकालम् व्यालोक्य दृष्ट्वा चारुकूटजातिशयेन चारु- मनोज्ञः यः कुटजः गिरिमल्लिकावृक्षः तस्य अतिशयेन आधिक्येन "कुटजो गिरिमल्लिकेति हैम:" साकेतकेश्वरशा आ समन्तात् केतका केतकीपुष्पम् तदेव ईश्वरः प्रधानत्वात् तेन सहिता तदवलोकनसहि- तारक यस्य तेन केन केनापि उदयतीति न उचे न जगदे अथवा केतनमेव केतका ध्वजा आसमंतात् केतका आकेतकः इन्द्रध्वजम् तेन सहिता दृक् यस तेन आकाशे इन्द्रध्वजवाहुल्येन तत्महितत्वन्ने- त्रस्येति तेन दृशेत्यर्थः॥ अन्यत्र-धनाधनः हन्त्यज्ञानमिति घनाघनः अज्ञाननिरासका तस्य घटा परम्परा तया प्रकटा आविर्भूता या अम्बुवृष्टिः अमृतवृष्टिः "पयः कीलालममृतं जीवनं भुवनम्पनमित्यमरः तया अज्ञाननि. रासकरूपोपदेशामृतवृष्टया शौचम् शोकादृत्पन्नम् अन्तर्दाहम् मान- सिकसंतापम् शमयन्तम् निराकुर्वन्तम् अत एव प्रभातसमयम् प्रभा नोति कामाविररतीति प्रसातः म चासो समयशेति प्रभा. तसमयम् "मामान्ये नपुंसकमिति नपुंसकतया निर्देशः" व्यालोक्य श्रुत्वा घातूनामनेकार्थत्वात् चारुटजातिशयेन कुटात् कौटिल्पामा .
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाये VA Awar अन्वय.- यते इति कुटजः तस्य अतिशयः महानिद्रा "शयः हस्ते सपै निद्रायां शव्यायां पणे चेति शब्दस्तोममहानिधिः” तेन साकेतकेश्वरदृशा अयोध्याधीश्वरेण तीर्थकरप्रभुणा इव उदयतीति केन जनेन नोचे न उद्यतेस्म ॥ १९॥ अम्भोधरेणजनिता-बनिता विशल्या, द्रोणाह्वयेन गिरिणा हरिणाभिनीता । कोशल्यहारिमनसा हरिमप्यशल्यं, स्नानाम्भसैव विदधे स्वमुनाहतैव ॥ २० ॥ :-द्रोणाह्वयेन अम्भोधरेण गिरिणा वनिता विशल्यया जनिता कौशल्पहारिमनसा हरिणा भमुनातैव अशल्यम हरिम् स्नानाम्भसैव विदधे ॥२०॥ व्याख्या-गिरिणा पतनशी टेन द्रोणाहयेन द्रोणनाम्ना अम्भो- धरेण मेघेन वनिता महिला विशल्या विगतम् शल्यम् दुःखं यस्याः सा विशल्या निःशोका जनिता कृता वर्षायां गमनागमनामावाद सर्वा अप्रोपितभर्तृका जाता इति वियोकत्वं तासामिति भावः कौश- ल्यहारिमनमा कुगलस्य भावः कौशल्यम् मांगलिकम् तेन हारि मनोहारि मनो यस्य तेन लोकमांगल्यपराधीनचित्तेन हरिणा सूर्येण अमुना अभिनीता मुक्ता दृष्टिरिति शेपः स्नानांमसैव सेकजलेनैव हरिम् मेकम् अशल्यम् तापरहितम् विदधे चक्रे वाममये दर्दुराणाम् हर्षप्रकपों भवतीति तत्वम् ।। २० ॥ आदित्याआयते पृष्टिपटेरनं ततः प्रजा इति मनुः ॥ अन्यत्र गिरिणा सदुपदेशकेन द्रुणति हिनम्ति पापमिति द्रोणः म आलोऽभिधानं यस्य तेन द्रोणाहयेन पापनाशकेन अम्भोधरण समुद्र विजयनामा नृपेण अवनिता अबनेः पृथिव्या भायः अवनिता विशल्या निष्पापा जनिता कृता अथवा अवनं रक्षणमेवावनिः तस्य भावाश्रीविजयामृतपूरिप्रणीता सरणी टोका. सर्ग- मावस्तत्तासा अवनिता रक्षणा विशल्या निष्कलंका जनिता विहिता यद्वा अम्भोघरेण समुद्रविजयेन विशल्या अकुलपा अवनिता अयोपिद्भूता पुरुषार्थविशिष्टा पुंप्रसूतिः जनिता उत्पादिता कौशल्यहारिमनसा नैपु. ण्यवशंवदचिनेन प्रभृगुणदर्शनात्तदधीनमनसा अमुना हरिणा इन्द्रेण अभिनीता प्रेरिता आता कृतादरा शासनदेवतेति शेषः कृता विहिता हरति पापमिति हरित तम् नेमिनाथप्रमुस स्नानाम्भसव स्नात्रजलेनैव विशल्यम् गार्मक्लेदरहितम् विदघे चक्रे ॥ २० ॥ द्रोणो धनञ्जयमहाहवलब्धकीर्ति- र्धन्वादधद् बहुगुणं भुवि गर्जिवर्जः । तन्वन शरप्रसरमेव तदाजगाम, सौरप्रभावसमयं सहसाऽनुभाव्य ॥ २१ ॥ भन्वय.-धनञ्जयमहाहवलब्धकीर्तिः पहुगुणम् धनु. आदधत् गर्जिवर्ज: शरणसरमेव तन्वन सौरानभावसमय सहसानुभाव्य द्रोगस्तदाभुवि भाजगाम॥२१॥ व्याख्या-धनञ्जयमहाहवलब्धकीर्तिः धनञ्जयेन वनाग्निना यो महाहवः दावाग्निशान्तये रचितमहायुद्धः तेन लब्धकीर्तिी प्राप्तयशाः "वहिर्वीतहोत्रो धनञ्जय इत्यमरः" बहुगुणमने कवर्णम् धनुः इन्द्रधनु- दधत् धारयन् "शरावापोधनुः स्त्रीस्यादितित्रिकाण्डशेपात्" गर्जि- वर्ज वानरहितः वाऍकत्वेन मन्दगर्जः शरप्रसरम् जलवृष्टिम् तन्वन् विस्तारयन् "शरम् जले इति शब्दस्तोममहानिधिः" सौरस्य सूर्यसं- बन्धिनः प्रभावममयं तेजःप्रसरम् अनुभाव्य विचार्य " आदित्या- आयते वृष्टिकृष्टेरन्नन्ततः प्रजेति स्मृतिः" तदा तसिन् समये सहमा झटिति द्रोणः वायुको मेघः भुवि भूसमीपमाजगाम आयपौ। अन्यत्र । धनञ्जयमहाहवलब्धकीर्तिः धनञ्जयस्वार्जुनस्य महाद. वेन विपुलरणेन लब्धा प्राप्ता कीतियन स, शिष्याणा विजयेनोपाध्या.
३००. महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये A ~~ " सौरस्य यस्यैवकीर्तिर्भवतीति भावः बहुगुणम् अनेकमौर्वीकं धनुः आदधत् धारयन् गर्जिवर्जः संग्रामगर्जनारहितः वृद्धत्वात शरप्रसरमेव घाणप्र- चारम् तन्वन् विस्तारयन् " कम्बलमार्गणशरा इत्यमरः कर्णस्य प्रभावसमयं सेनापतित्वं सहसा अनुभाव्य विचार्य अथवा सौरस्य कर्णस्य प्रभा दीप्तिः तस्या अवसमवसानम् विभाव्य विचार्य अयं द्रोणः-द्रोणाचार्यः भुवि संग्रामाङ्गणे आजगाम समाययौ । २१॥श्लेषः। न दानवानांन महावहानांनदा नवानांन महावहानाम्। नदानवानां नभहावहानां नदानवानांनमहावहानाम्२२ अन्वयः-~नवानां महावहानां नदा: दानवानां नन महावहानान्न महा- वहानां दामवानासन दानवाना न महायहरनार ॥ २२ ॥ व्याख्या-नवानां नूतनानाम् महावहानाम् वहतीति वहा महती चासौ यहा महावहा तासाम् नवीननदीनाम् नदाः शब्दाः दानवा नाम् दैत्यानां न न नैवं अथ च महावहानाम् महती ससौ वहा सेना महावहा तासां सैन्यसमुदायानां च न, एवं च वहन्ति धारयन्तीति यहाः पर्वताः महान्तमने बहाचेति महाबहाः विपुलगिरयः तेषां दानवानां दानच्छेदनं वाति करोतीति दानयः वज्रः तेषां न न नैव वव्राणामपि तादृशाः शब्दा न दानवानाम् दानम्मदजलं वान्ति प्राप्नुवन्तीति दानवाः गजास्ते पान हस्तिनामपि न महावहानां समु. द्राणां च न, यथा प्रापि नवीननदीनां गन्दास्तथा न केपामपीति भावः ॥ २२ ॥ अत्र पये 'स्यादिन्द्रवजा यदि तौ जगौ ग' इति लक्ष- णादिन्द्रयनावृत्तम् , यमकालंकारः। कलाकलापैः सकलाकलापैः कलाकलापः सकलाकलापैः । व्यतीत्यमाना दिवसा रसायव्यतीत्य मानादिवसा रसाय॥ .
" भाचार्यश्रीविजयामृप्तसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-- अन्वयः-सा मानादिवसा कलाकलापैः सकलाकलापैः कलाकलापैः कलापैः सकला दिवसा व्यतीत्यमाना रसाय व्यतीरय रसाय(अस्ति) ॥ २३ ॥ व्याख्या-सा प्रावृट् वर्षेति यावत् काचिन्नायिका वा माना- दिवसा-प्रणयमानाद्यधीना-कलाकलापैः कला चतुःपष्टिप्रकारागीत- वाद्यादिरूपा तस्याः कलापः समूहः तैः कलाकलापैः, सकलाकलापैः कलया सहिता सकला कलापा: पिच्छाः येषां ते सकलाकलापा: मयूराः तैः, कलाकलापैः कला मधुरध्वनिरूपा तया सहितः कलापः काञ्चीदाम तैः उपलक्षिताभिः मधुरध्वनियुक्त-काश्चीदामभिरुपलक्षि- ताभिः, कलापैः स्वसखीसंघेः सकला समस्ता दिवसा व्यतीत्यमाना यापयन्ती रसाय जलाय शृंगाराय च व्यतीत्य निराकृत्य मानादीनिति- शेपः रसाय शृंगाराय अस्तीति शेषः ।।२३।।इन्द्रवज्रावृत्तम् यमकालंकारः। स्वस्थामवारिदनृपः प्रतिमुच्य नाम्ना- ऽस्वस्थामसंगमविमर्शनतोऽग्रतोऽपि । अश्वस्थ एव समभूद भयभूमयोगे, स्वस्थः स्मरन्निव रसं परसङ्गरस्य ॥ २४ ॥ -वारिदनृपः नाम्ना स्वस्थाम प्रतिमुच्य अमतोऽपि भस्वस्थाम- संगमविमर्शनतः अश्वस्थ एव भयभूमयोगे परसंगरस्य रसं स्मरमिव स्वस्थः अन्वयः- समभूत् ॥ २४ ॥ व्याख्या-वारिदनृपः वारि ददातीति वारिदः स चासौ नृपः जलदनृपतिः नाना नामतः स्वस्थाम स्वपलम् प्रतिमुच्य मुक्त्वा परि- त्यज्य अग्रतः अग्रे अस्वस्थामसंगमविमर्शनतः अस्वस्थानाम्मानां य अमसंगमा रोगसंक्रान्तिः तस्य विमर्शनतः विवेकतः मर्यजनरोग- संक्रमानुभवतः यद्वा अश्वानां यत् स्थाम पलं तस्य संगमस्य विमर्शनतः विचारतः भयभूमयोगे भयाधिक्ययोगे सति अश्वस्थ एव वाजिस्थ
महोपाध्यायधीमेषविजयगणिविरचिते सप्तसम्मानमहाकाचे
एव परसंगरस्य अन्ययुद्धस्य रसं परिणामम् स्मरनिव स्वस्थः स्वर्गस्था
समभूत् ॥ २४ ॥ उत्प्रेक्षा वसन्ततिलकं छन्दः ।
यो वा-रिवाहनिवहेषु कृपाणपाणि-
विद्युन्मिपाद् यदभिधापरिवृत्तिमैक्ष्य ।
धारावलेन कुरुतेस्म तदङ्गभङ्ग,
धन्वागुणं पुरत एव निदर्य लोके ॥ २५ ॥
अन्वयः -- यः बारिवाह निवहेषु कृपाणपाणिः विद्युन्मिपात् अभिभापरि.
वृत्तिमैक्ष्य लोके पुरत एवं धन्वागुणं निदर्य धारावलेन भङ्गमङ्गं कुरतेस्म २५
व्याख्या-यः वारिवाह निवहेषु वारि जलं वहन्तीति वारिवा-
हा मेघास्तेपानिवहेषु सम्हेषु अथ च वारिम् गजबन्धनीम्बहन्तीति
पारिवाहा गजास्तेषां निवहेपु संघेषु अथवा यो वा अरिवाहनिवहेषु
शत्रुमैन्यसमूहेषु कृपाणपाणिः सड्गहस्तः विद्युन्मिपाद्विधुच्छलाद
अभिधापरिवृत्तिम् संज्ञापरिवर्तनं ऐक्ष्य विधाय लोके जगति पुरता
अग्रता धन्वागुणम् कोदण्डगृणम् धनुाम् निदर्य प्रदर्य धाराय-
लेन खड़गधारावलेन अश्वगतिविशेपेण वा अथ च धाराबलेन वर्षज-
लधारावलेन तदङ्गभंग तदङ्गविच्छेदम् कुरुतेस्म विदधतिस ॥२५॥
द्रोणिः स्फुट विघटयन् शिखरेषु वाहा-
वार्य स्खवीर्यमधिगम्य स साम्यमाधात् ।
निस्तन्द्रसान्द्रपरवासविनाशनाय,
स्वं नाम नामपरिणाममवेक्ष्य संधेः॥ २६ ॥
अन्ग्यः -स दौगिः म्फुटम् विघटयन् शिम्बरेषु वादा घायं स्ववीयम्
अधिगम्भ साम्यम् अधात् मन्ये. निस्तन्द्रसादपरवाहविनाशनाय नाम स्वम्
मामपरिणामम् भयेश्य साम्यमाधान ॥ २५ ॥
भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-७ व्याख्या-स द्रौणिः तन्नामा कश्चिन्मेघा शिखरेषु पर्वतोचप्र. देश वाहाया नया अवार्यमरोधकम् तथा वर्षति यथा प्रस्थरोऽपि तद्वेगन्न निरुणद्धि स्ववीर्य स्वसामर्थम् अधिगम्य अधिगत्य मन्धेः संमिलितस्य विघटयन् विश्लेषयन् कर्मणः शेषत्वविवक्षया पष्ठी निस्तन्द्रसान्द्रपरबासविनाशनाय निस्तन्द्रं निष्प्रत्यूहं सान्द्रं निविडं सघनमित्यर्थः यत् परवासम् परगृहम् कलत्रम्बा तस्य विनाशनाय विनाशनयोग्यम् नाम इति संभावनायाम् वम् स्वकीयम् नाम्नः परि- णामम् यौगिकाथै गुणति हिनस्ति कौटिल्यं करोतीति द्रोणस्स एव द्रौणिरिति स्वाभिधेयवाच्यार्यम् अवेक्ष्य विचार्य साम्यम् समताम् अधात् व्यदधद ॥ २६॥ अन्यत्र द्रौणि द्रोणाचार्यतनयोऽश्वत्थामा शिखरेपु उन्नतेप्यपि बाहानामश्वानाम् वार्यनिरोधकम् यद्वा वाहस्य भुजस्य वार्यनिरोधकम् बाहुवीर्यरोधकम् स्ववीर्यम् स्वसामर्थ्यम् अधिगम्य ज्ञात्वा निस्तन्द्र- सान्द्रपरवासविनाशनाय निस्तन्द्रं निरुद्विमं सांद्रम् दृढम् यत् परवास परसेनासनिवेशम् तस्य विनाशनाय विनाशयितुं बनामपरिणामम् स्वकीययौगिकार्थमवेक्ष्य दृष्ट्वा सन्धेः विघटयन् संधिविश्लेपङ्कुर्वन् साम्यम् आघात् आचरत् ॥ २६ ।। वर्षाधिकामितफलाविगमेन शल्यं, भित्त्वाऽभजद विभुवने भुवने जयश्रीः । नित्यानुकूलपवनाङ्गजसंप्रयोग, धर्मात्मजः सविजयस्तत एव राजा ॥ २७ ॥ -पपीभिकामितफटाधिगमेन शपम् मिया मुिक्ने भुवने अपधी: भमगत् निस्यामुलपयोगजसंप्रपोगं सविजयः धर्मामजस्ता एप भग्वय:-
३८२
महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्भानमहामाग्ये
MAAmww
व्याख्या-वर्षा प्रावृद् अधिकामितफलाधिगमेन अधिकामि
तम् अभिलपितम् यत् फलम् उद्देश्यम् तस्य अधिगमेन प्राप्त्या शल्यं
दुःखम् अवृष्टिजनितदुःखम् खेदमित्यर्थः भित्वा विनाश्य विभुवने
समस्ते भुवने जगति जयश्रीः सर्वोत्कर्पता अभजत् प्राप्नोत् तथा च
नित्यानुकूलपवनांगजसंप्रयोगम् नित्यमहर्निशम् अनुकूलः अनुगतः
यः पचनः वायुः तस्य अनजसंप्रयोगम् वेगानुकौल्यम् अधिगम्येति
शेप तत एच वर्षात एव सविजयः विजयसहितः धर्मात्मजः जीवः
राजते इति राजा निराजमानः भवतीति शेषः जलवृष्टित एव सर्वे
राजन्ते इति भावः ॥
अन्यत्र । वर्षे भारतवर्षे अधिकामितस्य अभिलपितस्य फलस्य
अधिगमेन लाभेन शल्यम् शल्यनामानम् नृपम् भित्वा विनाश्य
विभुवने समस्ते भुवने जगति जयश्री विजयलक्ष्मीः अभजन आप्नोत्
नित्यम् अहर्निशम् अनुकूल अनुगतः यः पवनागज़ः भीमसेनः तस्य
संप्रयोगम् युद्धोद्योगम् अधिगम्येति शेषः सविजयः अर्जुनसहिताः
धर्मात्मजः युधिष्ठिरः तत एव तस्मादेव शल्यविजयात् भीमपरामा-
माच राजा सार्वभौमः भीमसेनेन दुर्योधनविनाशाधुधिष्ठिरः राजपद
मागिति भावः ॥ २७॥ श्लेषः ।
नभसि रभसा वेणीश्रेणी रसोदग्रमाश्रयद्,
भुवि घनरवाश्चक्रुः प्रीति समं यदि वा दिवा ।
प्लवगशिविरे हपोत्कपों न रक्षसि वक्षसि,
सभयमनसा नालङ्कायास्तदा निरगुर्गृहात ॥२८॥
भन्यय -नभसि घेणीश्रेणी रभसा रसोदप्रम् माध्यत् भुपि यदि या
घनरवा दिया सम प्रीतिम् च स्यगतिविरे हाँको म रक्षमि वक्षति
समपमनसा सदा कापा गृहात नानिरगु. ॥२८॥
आचार्य मोविज्ञपातरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग- AANAN 4 an - व्याख्या-नभसि धावणे वेणीश्रेणी वेण्या जलधारायाः श्रेणी पंक्तिः रसोदाम् रसस्य जलस्य उदग्रम् औनत्यम् रमसा रामस्येन आश्रयत् अध्यगच्छन् धनरत्राः घना निविडा ये खाः शब्दाः यद्वा घनानाम् ये रयाः शब्दाः मेघशब्दाः दिवा सगम् नमसा समम् यदि वा अथवा दिवा दिवसे भुवि क्षितौ प्रीतिम् अनुगगम् चक्रुः दधुः प्लवगशिविरे पोत्कर्षः 'लबगानां भेकानां मयूगनां वानराणां वा शिविरे संघे पोत्कर्षः प्रमोदप्रचुरः रक्षसि रात्रौ वक्षसि हृदयेन अत एव सभयमनसा भययुक्तचित्तेन तदा तस्मिन् समये कायाकम् जलमेव का तस्याः ततः गृहात् गेहात् अलम् ना निरगु¥व निरगन्छन् । अत्र प्लवगशिविरे कापेयसेनासनिवेशे होको बातो रक्षसि वक्षसि राक्षसीयसेनामनसि अत एव सभयमनसा भयमीतचित्तेन लंकाया गृहात न निरगुर्न निष्क्रान्ता इत्यर्थान्तरोऽपि स्फुरतीति ।।२८।। श्लेपः । हरिणीवृत्तम् । रजनिवहुधान्योच्चै रक्षाविधो धृतकम्बलः, सपदि दुधुवे वारांभाराद् गवा गलकम्बलः । ऋपिरिव परक्षेत्र सेवे कृपोबलपुगव- श्चपलसवलं भीत्या जज्ञे वलं च पलाशजम् ॥२९॥ अभ्यय.-सादि यारामात् मया गहरा दुधे रसनियरधान्यो. राविधी कम्मर पोसार पुगया फपिरिय पाक्षेमं से पलाश यलम् भीत्या चपलम परम् ॥ २९ ॥ च्यापा--मपदि लघु चारा वारीणां मागन जलपाइल्पाद "आपसीभूम्नि यारिमलिलमिति अमरः" गवा गलकम्पलः साना दुधुवे ध्यतेम्म रजनियहुधान्योयरधाविधौ धृतकम्पलः स्वनि रजन्यां रात्री अति धान्यानां स्यानां रक्षाविधौ पालन विधौ धृतकम्बलः ३८४ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये womewww अवलम्बितकम्बलः कृपीपलः कर्षका ऋपिरिव मुनिरिव परक्षेत्रम् परं च तत्क्षेत्रञ्चेति सिद्धस्थानम् यद्वा परङ्केवलम् क्षेत्रम् शस्पक्षेत्रम् भीत्या पशवः शस्यभक्षणेन क्षेत्र विकलं मा कुर्युरिति भयेन सेवे सेवितवान् पलाशजम् बलम् पलम् मांसम् तृणम् अश्नातीति पलाशः अग्निः तस्माजायते इति तत् बलम् चपलसपलम् चपलानां पृष्टिज. नितशीतार्तानां सवलम् सावधानम् जज्ञे उत्पेदे ॥ २९ ।। उपमालंकारः ॥ प्राप्ताश्विनेयसुभगक्रियया जनाये, गर्जन्महासुरघटा गतिरञ्जना सा। यस्या नु हितरवप्रियमादधाति, तस्याः सतः प्रतिपदं शिवसंपदेति ॥ ३०॥ अन्धयः-प्राप्त्या भाविनेयसुभगक्रियया गर्जन्महासुरघटा गतिः सा अञ्जना यस्यानु हितरवः प्रियमादधाति तस्याः सतः प्रतिपदम् शिवसंपद् एति ॥३०॥ व्याख्या [-जनाग्रे लोकाग्रे आश्विनेययोः अश्विनीकुमारयोः स्ववैद्ययोः अथवा आश्विने भवः आश्विनेयः शरतुः तस्य शुभगक्रि- यया मौभाग्येन प्राप्त्या लामेन गर्जन्महासुरघटा महाश्वासौ मुरश्चेति महासुरः महासुराणां घटा महामुरघटा गर्जन्ती चासौ महासरघटा इति गर्जन्महासुरघटा यत्र सा तथोका अञ्जना गजमहिपी गतिः प्राप्त्या "शरतो तासां सौभाग्यं जायते इति समया" यस्या अञ्ज- नायाः नु इति वित हितरवः गर्जिनशब्दः प्रियम् अनुकूलम् आद- धाति अनुकूलतां जनयति तस्या. प्रतिपदम् प्रतिक्रमम् सतः सजन- स्य सौभाग्यवतः शिवसंपदम् कल्याणमेति प्राप्नोति ।। ३० ॥ इतः श्लोकत्रयपर्यन्तम्बसन्ततिलकं घृचम् ज्ञेयं वसन्ततिलकं तमजा जगोग इति तल्लक्षणात् ॥
भावार्य मीविजयाससूरिप्रणीता सरणौ टीका. सर्ग-७
पद्मोदयः सरसि निर्मलता प्रयुक्ता.
संपत्त्रकम्पनगतिर्मधुराध्वराजाम् ।
नैपुण्यपुण्यचरिताद् दुरितान्निवृत्तिः,
किं कि शरन्न तनुते म्म सुखं जनेऽस्मिन् ? ॥३१॥
भन्वयः-सरमि पद्मोदयः निमन ता प्रयुक्ता अधराजाम् मापन-
गतिमधुरा नैपुण्यपुण्यचरितात् दुरितान्नित्तिः अस्मिन् जने शाद् किं किं सुखं
न सनुतेस्म ॥१॥
व्याख्या-सरसि सरोवरे पद्मोदयः पद्मानां कमलानामुदय:
उद्भवः तथा सरसि निर्मलता निप्पंकता स्वच्छतेत्यर्थः प्रयुक्ता योजिता
अध्वराजाम् अध्वनि मार्गे राजन्ते शोमन्ते इति अध्वराजस्तेपाम्
मार्गवृक्षाणां सम्पत्रकम्पन गतिः संपत्राणां सम्यक् यथास्यात्तथा
दलानां कम्पनगतिश्चांचल्यं मधुरा मनोहारिणी यद्वा अधनि मार्गे
राजन्ते स्वचंक्रमणेन शोभन्ते इति अध्वराजः पथिरास्ते पां सम्पत्राणां
सम्यक् वाहनानां कम्पनगतिः सविलासगमनं मधुरा मनोज्ञा निरा-
पाधा "सर्व स्याद्वाहनं यानं युग्यं पत्रं च धोरणमित्यमरः" नैपुण्य-
पुण्यचरितात् नैपुण्येण कौशल्येन पुण्यचरितात् पवित्राचरणतः दुरि-
वाव दुष्कृतात् नित्तिनिरोधः, यथारुचिचारिदवर्पणजनितस्वास्थ्येन
सर्वे जनाः शरदि धर्मकर्मणि विशेषेण रता भवतीति भावः । इति
असिन जने लोके शरद् शरहतः किं किं सुखम् किं किं सौख्यम् न
तनुतेस्म न विदधातिम्म म मौम्यं जनयति स्मेति भावः ॥३१॥
पक्षः पुरः सुरसमागमरागदक्षः,
साक्षादशाननरुचिज्वलनेन मोदः ।
सीतान्तरप्रणयिता नृपतिप्रयोगः,
संजात एव नृपलक्ष्मणसन्नियोगः ॥ ३२ ॥
३८६ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये अन्वयः-पक्षः पुरः सुरसमागरागदक्ष: साक्षाद्दशाननरुचिज्वलनेन मोदः सीतांतरप्रणयिता नृपतिप्रयोगः नृपलक्ष्मणससियोगः संजात एव ॥ ३२ ॥ व्याख्या-पक्षः कृष्णशुक्लरूप: पक्षः बलम् सैन्यम्बा पक्षः खगः पक्षी वा पक्षः राजकुञ्जरो वा पुरः सुरसमागमरागदक्षः पुरः अग्रे मुष्टु रातीति सुरः मार्गमासः " तत्र धान्यसंचयप्राचुर्यात् " तस्य समागमः संयोगः तस्य रागः अनुरागः तत्र दक्षः पटुः अथवा पुरः अग्रे सुरा एपामस्तीति सुराः "अर्शादित्वादच्" सुराणां मद्यपायिनाम् समागमस्थ यो रागः प्रेमा तत्र दक्षः समुत्सुकः अन्यत्र सुष्टु रसो यस्य स सुरसः शोभनजलम् तत् माति यन्न म सुरसमः तत्र आगमनम् आगतिः तत्र दक्षः पटुः हंसादीनाम्मानसादागमनं तत्र प्रसिद्धम् कुञ्जर- पक्षे सुराणां नृपानां विजयोत्सुकानां समागमे यो रागोऽभिनिवेश. स्तत्र दक्षः साक्षाद्दशाननरुचिः दशसु दिक्षु आननं प्रकाशो यस्य स दशाननः सूर्यः तत्र रुचिः प्रीतिर्यत्र स च ज्वलनो वह्निः ताभ्यां मोदः प्रमोदः सीतान्तरस्य अन्यशोभा सम्पत्तेः मदिरान्तरस्य वा प्रणयिता प्रीतिः नृपतिप्रयोगः सूर्यस्य राश्यन्तरगमनम् भूपतिगमनं वा उत्तर- दिशिगमनं चा खगानाम् नृपलक्ष्मणपन्नियोगः नृपश्चासौ लक्ष्मणश्चेति नृपलक्ष्मणः सारसः तस्य सन्नियोगः इतस्ततोगमनम् संजात एव प्रयवृते अन्यत्र-पक्षा सहायः पाश्चों वा "पार्श्व गृहे विरोधे बले सहाये सख्यौ पक्ष इति शब्द० म० पुरः अग्रे सुरममागमरागदक्षः सुरा. णान्देवानां समागमेन सानिध्येन यो रागः अनुरागः प्रेम तत्र दक्षः पटुः साक्षात् सद्यः दशाननरुचिज्वलनेन मोदः दशाननस्य रावणस्य या रुचिः कांतिस्तस्या ज्वलनेन दाहेन रावणविनाशनेन मोदः हर्षः यद्वा साक्षात् प्रत्यहं दशसु दिक्षु आननं मुसं यस्य स दशाननस्तन रुचिर्दीप्तिर्यस्य स दशाननरुचिः स चासौ ज्वलनति दशाननरु- चिन्वलनः सर्वतः प्रज्वलहिस्तेन सीताशुद्धयर्थज्वलनेन मोदः हर्पः .. " भाचार्यश्रीविनयामृतस्रिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-७ अन्य:- सीतान्तरप्रणयिता सीतायां जानक्यां आन्तरप्रणयिता आभ्यन्तरि• कप्रेम अथवा सीतान्तरे अग्निशुद्धसीतायां प्रगयिता प्रेमयुद्धिः नृपति- योगः नृपतेः रावणस्थाने विभीपणस्य प्रयोगः स्थापनम् नृपलक्ष्मण- सन्नियोगः नृपश्चासौ लक्ष्मणश्चेति तस्य सनियोगः विधानम् संजात एव समुत्पन्न इत्यर्थः ॥ ३२॥ मार्गप्रवृत्तिरुचिता निचितात्मलक्ष्मी- निर्माणनर्मणि जनो रमते मतेन । निश्छद्मपद्मनयनानयनानि गेहे, स्नेहेन मित्रवसनाद्यशनासनानि ॥ ३३ ॥ -मार्गप्रवृत्तिरुचिता आत्मलक्ष्मीनिचिता जनः मतेन निर्माण. मर्मणि रमते गेहे निश्छद्मपद्मनयनानयनानि स्नेहेन मित्रवसनाधशनासनानि ॥३३॥ व्याख्या-मार्गप्रवृतिरुचिता मार्गस्य मार्गशीर्पमासस्य प्रवृतिः प्रवर्तनम् उचिता प्राप्तकाला अथवा मार्गस्य अध्वनः प्रवृनिः प्रवर्तनम् उचिता शोमना निराधाधा आत्मलक्ष्मीः आत्मनः स्वस्य लक्ष्मीः संपद निचिता संपादिता जनः लोकः निर्माणस्य कामस्य नर्मणि केली काम- केली मतेन स्वेच्छातः रमते विहरति गेहे सद्मनि निश्छद्मपानयना- नयनानि निच्छद्मम् निष्कपटम् यत् पद्मं न कमलम् तद्वन्नयनन्नेत्रम् यासाम् ताः निच्छे पद्मनयनाः निस्तन्द्रकमललोचनाः तासाम् आन- यनम् आगमनम् इति निश्छापद्मनयनानयनानि स्नेहेन प्रेम्णा गेहें गृहे मित्रवसनाधशनासनानि मित्रस सुहृदः वसनमाच्छादनम् तदा- दिर्यसिन् तद मित्रवसनादि अगनम् भोजनम् आसनमुपवेसनम् तानि तथोक्तानि अथ च मित्रस्य सूर्यस्य वसनादि प्रवेशनादि अशनम् भोग्यम् सूर्यातपसेवनम् आसनम् पूजनम् तानि तथोक्तानि भवन्तीति सर्वत्रान्वयः ॥ ३३ ॥ यमकम् ।
महोपाध्यायत्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्धानमहाकाव्ये उष्णभोजनरसः परकान्तासंगमेन बहुधा लयभावः । कृष्णवर्मरुचिरप्यतिजाड्यात्सैप तैषनववेपविशेषः ॥ अन्वयः-टष्णभोजनरसः परकांतासंगमेन बहुधा लयभावः भतिजाड्यात कृष्णम रुचिरपि सैप तैपनववेयविशेषः ॥ ३४ ॥ व्याख्या-उष्पाभोजनरसः उष्णभोजने तप्तभोजने रसः अनु. रागः तप्तमोजनशीलता परकांतासंगमेन बहुधा लयभावः परमुत्कृष्टम् अनन्यसाधारणमित्यर्थः कांतस्य मनोहरस्य साधोरित्यर्थी संगमम् संगतिः तेन अत्युत्कृष्टजनसंगमैन बहुधा अनेकशः लयभावः तदैक. मानसत्वम् अथवा परस्य केवलज्ञानस्य यः कांतासंगमः मनोहरसं- गतिः तेन बहुधा अनेकथा लयभावः अज्ञानादीनां कर्मणां विनाशः अथवा परस्य सर्वोत्कृष्टय मोक्षस्य कान्तासंगमेन सुन्दरसंबन्धेन बहुधा लयभावः संसारनिवृत्तिः यद्वा परा अनुपमा या कान्ता मुक्तिरूपाङ्गाना तस्याः संगमेन प्राप्त्या बहुधा लयभावः अत्यन्तोपरतिः अथच पर- कांतायाः परस्त्रिया असंगमेन संगपरिहारेण बहुधा लयभावः अनेकधा. कर्मनिवृत्तिः अतिजाड्यात् अतिशीतात् कृष्णवर्मरुचिः चह्निसेवन- प्रीतिः यद्वा कृष्णवमरुचिः दुष्टकर्मणि प्रवृत्तिः अतिजाड्यात् अत्य- ज्ञानात् अयम् तैपनववेपविशेषः तैपस्य पौषस्य नवः नूतनः वेष- विशेषः सरूपविशेषः तैपमाहात्म्य विलसितमेतत् शांतेः प्रभोर्ज्ञान- कल्याणकप्रसंगेन हेमन्तवर्णनमिदम् । अत्र स्वागवावृतम् " स्वागता स्नभगैर्गुरुणा चेतिलक्षणात् " ॥ ३४ ॥ स-सीतासंतापस्तपसि जपसिद्धेः कपिपते- विशल्या कौशल्यासमितितचिता भारतमुवि । नृचक्षोविक्षोभाद्धिमकरविधो कान्तिरुदधी, निलीनाशालीना विलसदमलीनादृततपाः ॥३५॥ ..
भाचार्य श्री विजयामृतसूरिप्रणीता सरणी रीका, सर्ग-- भन्वय:-तपसि जपसिद्धेः कपिपतेः स सीतासंतापः क्रौशल्यात् भारतभुवि विशल्या समितिः उचिता हिमकरविधौ कान्तिरुदधौ नृक्षोविक्षो. भात् निलीना शालीना विलसदमलीनाहनतपाः ॥ ३५ ॥ व्याख्या-आसमंतात्तापयति क्लेशयति इति आसंतापः सीतेन हिमेन सहितः ससीतः स चासो आसंतापश्चेति ससीतासंतापः तपसि मासे शीतजनितसंतापस्यापि दुःखजनकत्वात् तापः कविना वर्णित: हिमकरविधौ हिमकरस्य विधिरित विधिरिति तसिन शीतकारके जप. सिद्धेः जपेन मौनेन सिद्धिनिष्पतिर्यस्य तस्य कपिपतेर्वानरपतेः तेषां शीताधिक्यात् कौशल्यात् नैपुण्यात् विशल्या दुःखनिवारिका समितिः सभा भारतभुवि साग्निमुवि प्रज्वलिताग्निप्रदेशे उचिता योग्या नृचक्ष विक्षोभाव मनुष्यनेत्रप्रसरबैकल्यात् कांतिर्दीति उदधौ समुद्रे नेत्रपिधानकारकहिमावरणतः उदधिप्रायस्सर्वमवभासते निलीना शालीना शालीना निर्लज्जता निलीना नष्टा सर्वेषामापादवनधारकत्वा. निर्लजता गता विलसदमलीनाततया विलसन्तः प्राप्तविलासा ते च अमलीनाः अकलुपिताश्चेति विलसदमलीना ते च आहततपाश्चेति विलसदमलीनाहततपा भवन्तीति शेपः ॥ ३५ ॥ शिखरिणीवृत्तम् रसै रुद्वैश्छिन्ना यमनसमलागः शिखरिणीति लक्षणाद अन्यपक्षे-कपिपतेः सुग्रीवस्य अथच कम्पते संग्रामाय प्रच. लतीति कपिः सेनापतिस्तस्य नायकस्य रामादेः तपसि तपश्चर्यायां व्रतनियमे जपसिद्धेः मानसिकतपोव्यापारसिद्धः प्रागिति शेपः स प्रसिद्धा सीतासंतापः सीताहरणजन्यदुःख जातमिति शेप कौशल्या राममाता विशल्या दुःखशोकरहिता जातेति शेषः नारदवचनादिति भावः आव अस्माद भारतभुवि लकानगरे समितिः नरवानरराक्षम्रानां परिपत् चिता संमता विगतः क्षोभो यसाब स विक्षोभस्तस्माद नृचक्षोर्नरनेत्रस्य रामनयनस क्षोमराहित्यात् हिमकरविधौ चन्द्रे समुद्र --
३९०
अन्वयः-
महोपाध्यायनीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्धानमहाकाग्ये
च कान्तिः प्रसन्नता जगदानान्दकारिणो रावणस्योच्छेदाव शालीना
औद्धत्यम् राक्षसानामिति शेषः निलीना निरस्ता विलमन्तः विलसमानाम
अमलीनाः निष्कल्मपाः निरस्तापकारबुद्धयश्च आततपाः गृहीतव्रता
तेषां इन्द्व इति विलमदमलीनादृततपाः अभवन्निति शेषः तदानी-
म्मेघनादादिना दीक्षाग्रहणत्वादिति भावः ॥ ३५ ॥
कैवल्यशालिभगवत्कपिले नयार्चा
श्रेष्ठा प्रतिष्ठितिमनीयत सौम्यदृष्टिः ।
इत्यादिदेश जिनराट् स तदादि देश-
देवादयः सहृदया हृदये दधुर्गाम् ॥ ३६ ॥
- कैवल्पशालिभगवत्कापिले (येन) श्रेष्टा नयार्चा प्रतिष्टितिमनी-
यत स सौम्यष्टिः इति जिनगट आदिदेश तदादि देशदेवादयः सहृदयाः
गाम् हृदये दधुः ॥ ३६ ॥
व्याख्या-कैवल्यशालिभगवत्कपिले केवलस्य भावः कैवल्यं
तत्र शालन्ते शोभन्ते इति केवल्यशालिनः ते च ते भगवन्तश्चेति
कैवल्यशालिभगवन्तः । कम्पते जनो यतः इति कपि-कामः तं
लाति छिनत्ति इति फपिलासरघ्न इत्यर्थः । कैवल्यशालिभगवन्त.
श्व ते कपिलाश्च कैवल्यशालिभगवत्कपिलाः तत्र कैवल्यशालिभगव
स्कपिले । येन श्रेष्ठा-मद्भावभाविता-मत्सम्पत्सम्पादिता नयार्चा
नयेनविधिना या अर्चासपर्या सा नया; "पूजा नमस्यापचितिः
सपर्या ईणा समा" इत्यमरः प्रतिष्ठितिम्-सुस्थितिम् अनीयत
नीता । स सौम्य दृष्टिः सौम्या ऋजु दृष्टि:-दर्शनं यस्य स सौम्य.
दृष्टिम्सम्यग्दृष्टिरित्यर्थः । इति एवंप्रकारेण जिनराट्-जिनेपु=
सामान्यकेवलिपु राजते शोभते इति जिनराट-तीर्थकरः आदिदेश
उपदिष्टवान् । तदादि-तत आरभ्य देशदेवादयः-दिशान्ति अमिल.
पितमिति देशाः तेच ते देवा देशदेवास्ते आदौ येपान्ते देशदेवादया
सुरासुरप्रभृतयः । सहृदया-समानं हृदयं येपान्ते महदया: मनिपिणः
गाम्-पूर्वप्रथितां परमात्मवाचं हृदये अन्तःकरणे दधुः दधति स्म ।
यगकालझारः ॥ ३६॥
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भाधार्यश्रीविजयामृतसरिभणीता सरणी टीका सर्ग-७
भूमीभुजः समनुजा दनुजानुजात्या
कान्त्या लसत्सुमनसो मनसोऽनुरागात् ।
तत्रैत्य चैत्यनमनान्न मनाक प्रमत्ता-
स्तस्थुर्गणेशपददर्शनदत्तचित्ताः ॥ ३७ ।।
समनुजा भूमीभुज नु दनुजा जात्या कात्या लसतसुमनसो
मनसोऽनुरागात् तत्रैत्य चैत्यनमनात् मनाफ न प्रमत्ता गणेशपददर्शनदत्तचित्ता
अन्यय
व्याख्या-समनुजाः सलोकाः भूमीभुजः राजानः नु इति वित
दनुजाः दानवाश्च जात्या श्रेष्ठभूताः वान्त्या दीप्त्या लमत्सुमनसः
लसन्तः शोभमानाः सुष्ठ मनो येपान्ते लमत्सुमनमः शोममानहृदयाः
देवाच मनसः सान्तस्य अनुरागात् प्रेमतः तत्र तस्मिन् स्थाने एत्य
समागत्य चैत्यनमनात् नमस्कारात मनाक ईपदपि न प्रमत्ताः न
सालमाः सर्वदैव साधाना इत्यर्थः गणेशपददर्शनदत्तचित्ताः गणेशा
नाम् गणधराणाम् पददर्शने चरणदर्शने दत्तचित्ताः संलगमनसः
तस्थुः स्थिताः "चैत्यविहारौ जिन सझनीति हैम:" अश्लोके वसं-
ततिलकं वृत्तम् "ज्ञेयं वसन्ततिलकं तभजा जगौगः” इति तल्लक्षणात्
॥ ३७॥ सुपर्वणः सुमन सस्त्रिदिवेशा दिनौकम इत्यमरः ।।
स-श्रेणिकस्यनृपतेः सुदृशोऽनुषझं,
मेघाभयादिचरणप्रतिपत्तिरङ्गम् ।
अद्वैतसोधरसभृचरितोपदेशं,
चक्रे प्रभुः ससहकारफलोपहारम् ॥ ३८ ॥
भन्यय -स प्रभु सुश श्रेणिकस्य नृपत अनुपनम् मेशभयादिचर-
णप्रतिपत्तिमम् अद्वैतसौधरसभृचरितोपदेश ससहकारफ्लोपहारम् चके ॥३६॥
३९२
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकावे
व्याख्या-स महावीरप्रभुः सुदृशः सु शोभना हक नेत्रं यस्य
तस्य सम्यक्दर्शनस्य यहा सुदृक् ज्ञानं यस्य तस्य मुज्ञानिनः श्रेणिकस्य
श्रेणिकनानः नृपते भुजः अनुपगम् अनुगतम् मेघामयादिचरणप्र-
तिपत्तिरंगम् मेघः मेघकुमारः अभयः अभयकुमारः तौ आदिर्यसिन
स मेघाभयादिः तेपा मेघामयादीनां चरणप्रतिपत्ति। चारित्र्यग्रहणम्
तस्या रंगः अनुरागः यस्मिन् तम् तथोक्तम् मेघामयादिभव्यजनचा-
रिव्यग्रहणप्रयोजकम् अद्वैतसौधरमभृच्चरितोपदेशम् अद्वैतः अभिन्नः
अनुपम इत्यर्थः सुधायां भवः सौधः स चासो रसश्चेति सौधरसः अद्वै.
तश्चासौ सौधरसश्चेति अद्वैतसौधरमः सुधाखादसहोदरः तम् विभौति
अद्वैतसौधरसभृत् स चासौ चरितोपदेशश्चेति तम् सहकारफलेन सहि.
तम् समहकारफलम् तस्य उपहारः ढौकनम् यत्र नमिव आनफलोप-
हारकल्पम् चक्रे विदधे प्रभुस्सद्देशनान्ददाविति भावः ॥
अन्यपक्षे -स जिनेन्द्रः श्रेणिकस्य प्राप्तश्रेणिकस्य संख्यावत:
अनुपंगम् अनुगतम् मेघानां पापिना भयादिचरणम् भयप्रापणादिकम्
तस्य प्रतिपत्तिरङ्गम् प्राप्तिजनकमन्यत् पूर्ववत् यद्वा श्रेणिकस्य श्रेणी
भूतस्य पंक्याकारेणोपविष्टस्य नृपतेः अनुपगमुदिष्टम् मेहति सिञ्चतीति
मेघः वागमृतसेकः अभयः कुतवनमयाभावः इत्यनयोर्द्वन्द्वः स आदि-
यंत्र तम् वागमृतवर्पणाभयप्रदानादिप्रवृत्तिप्रयोजकम् अन्यत् पूर्ववत् ।।
रामकृष्णपक्षे-सुदृशः शोभनज्ञानवता नृपतेर्भूपस्य स श्रेणि
कस्य समंडलस्य मेघामयादिचरणप्रतिपत्तिरङ्गम् मेघात् मेघनादात्
रक्षमः यः अभयादिः निरुपद्रवता तस्य चरणप्रतिपत्तिरंगम् निधिः
प्रचारम् कृष्णपक्षे मेघेन मेघवटकाबादनेन ये केचन दीसां ग्रहीष्यन्ति
तेषां परिवाराणां यथावत्पालनं पारिप्यामीतिरूपं,अमयादिना गृहप.
रिवारचिन्तानिरासेन चरणस्प चारित्र्यम्य प्रतिपत्तिरङ्गम् ग्रहणप्रचा.
रम् अन्पत् पूर्ववत् ॥ ३८ ॥
भाचार्य श्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टोका. सग-
स-श्रेणिकक्षितिपसन्मतिशासनेन,
दुर्गन्धिकाधिगमनेन सुगन्धिवाक्यात् ।
मैख्याभावियवनाङ्गजसन्निवोध-
स्तस्माद वभूव भविना मदनान्निरोधः ॥ ३९ ॥
अन्वय.-तस्मात् सुगन्धिवाक्यात श्रेणिकक्षितिपसन्मतिशासनेन दुर्गन्धि
काधिगमनेन मैन्या स भाद्रभावियवनाग जमनियोधः भविना मदनाविरोधःबभूव।।
व्याख्या-तस्मात् सुगंधिवाक्यात् शोभनसंबन्धयुकात् वाक्यात्
उपदेशादित्यर्थः श्रेणिकक्षितिपसन्मति शासनेन श्रेणिकश्चासौ क्षिति-
पश्चेति श्रेणिकक्षितिपः तस्य सन्मतिशासनेन सद्बुद्धिसदुपदेशेन नि.
योगेन दुर्गन्धिकाधिगमनेन दुर्गन्धिकाभिधानमहिपीचारित्रग्रहणेन
मैच्या सौहार्दन स प्रसिद्धाअभयकुमारसौहार्दैन आईभावि आर्द्रदेशो-
त्पन्नः यः यवनाङ्गजा यवनतनया तस्य सन्निबोधः सज्ञानम् भविनां
भाग्यवता मदनात् कामात् अभिलापात निरोधः निवृत्तिय बभूव जज्ञे
सदुपदेशादेव दुर्गन्धिकाधिगमनं यवनकुमारयोधश्च बभूवेति भावः ।।
अन्यपक्षे-तसात्पूर्वोक्तादुपदेशात् सुगंधिवाक्यात् शोभनो लोक-
विलक्षणो गन्धः संबंधो यत्र स सुगंधिः "समासान्त इद" स चासो
वाक्यश्चेति तस्मात् सदुपदेशवचनात् स श्रेणिकक्षितिपसन्मतिशासनेन
समण्डलराजयुद्धिपरिवर्तनेन दुर्गन्धिकाधिगमनेन दुः दुष्टः गंधः संव-
न्धो यस्याः सा दुर्गन्धा सैवदुर्गन्धिका तस्या अधिगमनेन सदसद्विवे.
केन मैयाद्रभावि भैत्र्यात् सर्वजनापकारराहित्येन सर्वप्रियत्वेन आर्द्रम्
दयाक्लिनं भायोऽभिप्रायो येपान्ते मैन्यार्द्रभाविनः यवनः वेगवान
या अङ्गजः क्रोधादिः मैच्याद्रभाविनश्च यवनाङ्गाश्च तेषां सन्नियोधः
सज्ज्ञानं भविनां कल्याणवतां मदनात् कामाव सनिरोधः कामुकता
निवृत्तिश्च बभूव ॥ ३९ ॥
३९५ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये सानन्दधीऋषभवृत्तशमप्रवृत्ति, नोसज्जमालिवदनं तदनन्तकायम् । सानन्दशचुलनीप्रियदीर्घवृत्त्या, गोशालिभद्रचरितस्फुरितं जगाद ॥ ४० ॥ भन्वयः-सानन्दधीपभवृत्तशमप्रवृत्तिम् जमालिवदनम् तदनन्तकायम् नो सत् सानन्दशंसचुरनीप्रियदीर्घवृत्या गोशालिभद्रचरितस्फुरितं जगाद ॥१०॥ व्याख्या-आनन्दः आनन्दनामा श्रायकः तस्य धीः बुद्धिः तस्याम् ऋपमा श्रेष्ठा वृत्ती दृढा " वृत्तं वृत्तौ दृढे मृते” इति हैम: या शमप्रवृत्तिः शांतिभावसंचारस्तेन सहिता इति.सानन्दधीमपभ. वृचशमप्रवृत्तिः ताम् जगाद अथ च जमालिवदनम् जमाले प्रथम निवस्य वदनं, उद्यत इति वद्धातोः भावे अनट कथनं नो सत् न परमार्थसाधनयोग्यम् यतः अनन्तकायम् अनन्तानन्तशरीरसम्पादकम् सानन्दशंखचुलनीप्रियदीर्घवृत्या सानन्दः सप्रमोदः यः शंखः स च चुलनीप्रियश्च तयोर्द्वन्द्वः तस्य दीर्घवृत्त्या चिरवृत्त्या गोशालिभद्रच- रितस्फुरितम् गोशालिभद्रस्य यचरितं चरित्रम् तेन स्फुरितम् विल- सितम् जगाद उपदिदेश ॥ अन्यतीर्थकरचतुष्टयपक्षे-आनन्देन सहिता पीयेंपां ते सान- न्दधियः ते च ते ऋपभाः श्रेष्ठावनि सानन्दधीपभाः "अविवक्षया न संधिः" तेषां वृत्ते व्यवहारे शमं प्रवर्तयति योजयतीति शमप्र चिम् असज्जम् परस्परवाधसहितम् आलिवचनम् आलम् अनर्थोत्रा- स्तीति आलि तच्चवदनश्चेति आलियचनम् नो नैव भवति तद् अनन्त- कायम् अनन्तशरीरजनकत्वादेव न तथाभूतम मानन्दशंखचुलनीप्रि- यदीर्घवृत्या आनन्दयति श्रावकजनमनोहादयतीति आनन्दः शं सुसं. जनयतीति शंसः श्रेयस्करः चोलयति समुच्छाययतीति चुलनी यहा ३९५ भाचार्यश्रीविजयातरिभणीता सरणी टोका, सगं . चुलं समुच्छ्यं नयतीति उत्पादयताति चुलनी एतेपान्द्वन्द्वः इति आनन्दशंखचुलन्यः तैः सहितः प्रिय इति सानन्दर्शखचुलनीप्रियः तेषां दीर्घवृत्त्या चिरानुवृत्त्या अनन्तकालस्थित्या अनन्तकालपर्यन्त- मानन्दकल्याणसमुच्छायजनकम् इत्यर्थः गोशालिभद्रचरितस्फुरितम् गवा वाण्या शालते शोभते इति गोशालि भद्राणां पुण्यशालिनाम् चरि- तेन आख्यानेन स्फुरितम् विलसितम् जगाद उवाच ।। रामकृष्णपक्षे–सानन्दधी ऋपभवृतशमप्रवृत्तिम् सानन्दधियः ये ऋपमाः श्रेष्ठाः तेषां वृत्ते व्यवहारे शमप्रवृत्तिम् शान्तिसंपादकम् अनन्तकायम् अनन्ता अनेकशः कायाः संघा यत्र तम् आलिवदनम् रोचकवचनम् असज्जम् अस्फीतम् नो नैव किन्तु स्फीतम् विशदम् आनन्दयतीति आनन्दः लक्ष्मणः बलदेवश्व अथवा आसमन्तानन्द- यतीति आनन्दः नन्दकनामातयोः खङ्गः कौमोदकी गदा खड्गो नन्दकः कौस्तुभोमणिरित्यमरः" शंखः पांचजन्पनामा चुलनी चुल- मैश्वर्यनयतीति चुलनी कौमोदकीगदा तेषां प्रिया मनोज्ञा दीर्घवृत्तिः अत्यन्तसंबन्धः तया गोशालिभद्र चरितस्फुरितम् यथास्यात्तथा जगाद कथयामास ॥४०॥ सद्भावभावितमना भविता कुमार- स्तच्चिल्लणातनुजभूपतिसाधनानि । वैशालिकोक्तिरणमंशुकरोपतापे, शुद्धाम्बुदेवमुनिभिर्हामृतं न पीतम् ॥ ४१ ॥ अन्वयः--कुमारः सद्भावभावितमना भविता तत् चिलणातमुजभूपतिसा. धनानि पेशालिकोक्तिरणं अंशुकरः भपतापे देवमुनिभिः शुद्धाम्बु न पीतम् भमृतं हि (पीतम् ) ॥ ४ ॥ व्याख्या-महावीरपक्षे-वैशालिकस्य वर्धमानस्वामिनो या उक्तिः उपदेशना तस्या रणं श्रवणं तदेव अंशुकरः प्रभांकरः अज्ञान महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्भानमहाकाये तिमिरनिगकरणनिपुण इत्यर्थः तत एव अपतापे अपगतः निराकृत:- तापः सांसारिकत्रिविधतापो येन तस्मिन् सति देवमुनिभिः आत्मत चप्रकाशभासमानमुनिभिः यद्वा देवमान्यमुनिभिः किंवा देवाश्च मुन- यश्च तैर्देवमुनिभिः शुद्धाम्युनिस्वद्यजलं प्राकृतमित्यर्थःन पीतं तदानीं तापविरहात् प्राकृतनिरवद्यजलाभिलापिणो न जाता इत्यर्थः किन्तु अमृतं तदीयोपदेशवचनामृतं पीनं श्रुतमित्यर्थः किञ्च तस्मादेव कुमारः अभयकुमारः सद्भावभावितमना सद्भावेन चारित्रजिघृक्षया- भावितं वासितं मनोऽन्तःकरणं यस्य स सद्भावभावितमना भविता भविष्यति तदेव कुमारसंयमग्रहणमेव चिल्लणातनुजभूपतिसाधनानि चिल्लणायाः तनुजस्य तनयस्य कोणिकस्येति पावत् भूपतिसाधनानि नृपत्वप्रयोजकानि भविप्यन्तीति शेषः ।। अन्यतीर्थकरपक्षे–बैशालिकोक्तिरण विशालायां अयोध्यायां भवः वैशालिका यद्वा विशेषेण शालते शोभते महापुरुषजन्मपावित- त्वात् विशाला तत्र भवः वैशालिकः तस्य उक्तिः तस्याः रणं श्रवणं उपदेशनम् तदेव अंशुकरः उद्योतकारकः अज्ञाननिरसनः अत एव अपतापे तापरहिते सति देवमुनिभिः पूर्ववर्णितप्रकारमेवाबसेयम् तचि- लणेति तत्-तदुपदेशश्रवणमेव चित्ज्ञानं रणति प्राप्नोति इति चिल्लणः "रलयोरक्यात् " तस्य ज्ञानवतः अतनुजभुवः अयोनिजायाः मुक्तेः पतिसाधनानि स्वामित्वकारणानि कैवल्यप्रापकाणीत्यर्थः तथा च कुमारः को भुवि मार इव अप्रतिहतप्रभावः भन्यजीव इत्यर्थः सदावमावित- मना भविता "भूते श्वस्तनी" आदिनाथरामपक्षे कुमारो भरतः ।। कृष्णपक्षे-कुमारः प्रद्युम्नः शाम्बश्व देवमुनिः नारद इति ॥४१॥ एवं देवनृदेवसेवितपदश्रीमद्विभोः केवले, सिद्ध राज्यविधिनयो दयमयः प्रासीसरनिर्भयः।
भाचार्यश्रीविजयामृतमरिप्रणीता सरणी टीका, सा--
ध्वस्तं दुर्जनकल्किदुष्कृतमिह प्रादुष्कृतं सस्कृतं,
संलग्ने सकले कलेरपि वले सोऽयं प्रभावो विभोः ४२
॥ इतिश्री सप्तसंघाने महाकाव्ये महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिकते
भगवतकेवलज्ञानसाम्राज्यविहारनामा सप्तमः सर्गः ॥७॥
अन्वयः–एवं देवनदेवसेवितपदश्रीमद्विभोः केवले सिद्धे नयो दयमयः
राज्यविधिः निर्भयः प्रासीसरत् इह दुर्जनकलिकदुकृतं वस्तम् सत्कृतम् प्रादु-
कृतम् कलेः सकले अपि बले संलग्ने सति सोऽयं विभोः प्रभावः ॥ १२ ॥
व्याख्या एवं पूर्वोक्तप्रकारेण देवनृदेवसेवितपदश्रीमद्विभोः
देवा अमराः नृदेवाः नराधिपाश्वतैः सेवित आरधितः पदश्चरणो यस्य
स देवनदेवसेवितपदः स चासौ श्रीमद्विभुश्चेति तस्य तथोक्तस्य देवा-
देवसेवितचरणस्य जिनेन्द्रस्य केवले केवलज्ञाने सिद्धे प्राप्ते सति इह
भूमौ दुर्जनकरिकदुष्कृतम् कल्कम् पापमस्यास्तीति कल्की दुर्जनश्चासौ
कल्की चेति दुर्जनकल्की तस्य दुष्कृतम् पापम् यस्तम् निरस्तम् कले।
कलहस्य सकले अपि समस्ते अपि वले सामयें संलग्ने समागते
सत्यपि " युद्धं तु संख्यं कलिरिति हैमः" सत्कृतम् शोमनकृत्यम्
मुकृतमित्यर्थः प्रादुष्कृतम् प्रादुर्भूतम् नयो दयभयः नयस्य नीतेः
उदयः प्रादुर्भावस्तन्मयः तत्प्रचुर। "प्राचुर्ये मयद" राज्यविधिः शास-,
नविधिः निर्भयः विगतमीः प्रासीसरत् प्रावर्तत सोऽयं विभोः
जिनेश्वरस्य प्रभावः ॥ शार्दूलविक्रीडित छन्दः । अन्यपक्षेऽपि साधा.
रणम् ॥ ४२ ॥
इति शास्त्रविशारदकविरानभहारकाचार्यश्रीविजयामृतसूरीश्वरप्रणीतायां
सप्तसंधानमहाकाव्यसरणीटीकायां सहमः सर्गः ॥ ॥
३९८ महोपाध्यायधीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसम्भानमहाकाये - NAAMVAvarwww ॥ अथ अष्टमः सर्गः ॥ अथ जगत्त्रयभावनिवेदिना भविभयङ्करभावविभेदिना। दिवि पुरस्सरचक्रमहाध्वजानुगमनैगमनैपुणतो जगे॥१॥ भन्वयः-अथ जगन्नयभावनिवेदिना भविभयङ्करभावविभेदिना दिवि पुर- स्मरचक्रमहा वजानुगमनैगमनै पुगतो जगे ॥ १ ॥ व्याख्या-अथ अथानन्तरम् जगत्रयभावनिवेदिना जगतां त्रयम् जगत्रयम् जगत्रयाणां भावः अभिप्रायः जगत्रयभावः तन्निवे. दितुं ज्ञातुं शीलमस्येति जगत्रयभावनिवेदी तेन तथोक्तेन भविभयङ्क- रभावविभेदिना भविनाम् भाग्यवताम् यो भयङ्करभावः दुःख- जनकदुरदृष्टः तं विभेत्तुं पृथकर्तु शीलमस्येति भविभयङ्करभावविभेदी तेन तथोक्तेन दिवि पुरस्सरचक्रमहाध्वजानुगमनैगमनैपुणतो दिवि आकाशे पुरस्सरः अग्रेसरः यः चक्रः देवप्रभावावनतास्त्रविशेषः महा- ध्वजश्चेति तयोर्द्वन्द्वः पुरस्सरौ च तो चक्रमहाध्वजाविति पुरस्सरच. क्रमहाध्वजौ तयोः अनुगमनेऽनुसरणे यो नैगमः नितिः विवेकास्त- मिन् यो नैपुणः दाक्ष्यम् स पुरःसरचक्रमहाध्वजानुगमनैगमनैपुणः तस्मात् नैपुणतः दाक्ष्यात् जगे जग्मे यद्वा सार्वविभक्तिकस्त सिल् इत्य नुगमनैगमनैपुणेनेति तथोक्तः तृतीयान्तविशेषणम् । अत्र सर्गे भरत- चक्रवर्तिनो दिग्विजयवर्णनम् । द्रुतविलम्बितञ्चवृत्तम् दुतविलम्बित. माह नभौ भरौ इति तल्लक्षणात् ॥ अन्यपक्षे-अथ अथानन्तरम् जगत्रयस्य त्रिजगतो यो भाव: पदार्थः जीवाजीवादिरूपः तनिवेदयति चोधयतीति तच्छीलः तेन भविभयंकरभावविभेदिना भविनां सद्भाग्यवतां यो भयंकरभाव: दुर्गतिजनकाचारः तं विमेदयति निराकरोतीति तच्छीलस्तेन सद्भा.
भाचार्यश्रीविजयामृतस्प्रिणीता सरणी टीका, सर्ग-८ AMA - ~~~ - .. ग्यशालिदुर्गतिनिवारकेण जिनेन्द्रेण दिवि आकाशे पुरस्सरः अग्रेसरः यश्चक्रमहा वजस्तस्यानुगमनेऽनुसरणे ये नैगमास्तेपां नैपुण्येन कौश- ल्यतः सततसंगमतो जगे विजहे अन्य पक्षे भरतवज्ज्ञेयम् ॥१॥ हयरयक्षुरभिन्नमहीतलाद् दिवि समुद्गमनेन रजोबजः । किमिव वक्ति स शक्तिमहोदयं स्वरपितारपितामहसंसदि। मन्मय -- रजोग्रज इयरयारभिसमहीतलात् दिवि समुद्गमनेन घरपि तारपितामहसपदि शक्तिमहोदयम् स किम् घतोय ॥ २ ॥ व्याख्या--- रजोवनः धूलीममूह' हयरयारभिन्नमहीतलात् हयानां अश्वाना योरयः वेगो दुतगतिरित्यर्थः स हयरयः क्षुरेण शफेन भिन्नः क्षुण्णः कुट्टित उत्सात इति यावत् इति क्षुरमिन्नः हयरयेण क्षुरमिन्न: यो महीतलम् भूतलम् स हयरयारभिन्नमहीतलम् तस्मात् दिवि समु- द्गमनेन दिपि आकाशे समुद्गमनेन संलग्नेन हेतुना स्वरपि स्वर्गऽपि तारपितामहसमदि तारा अत्युन्नता या पितामहस्य ब्रह्मणः संमद् समा तन स रजोरजः शक्तिमहोदयम् शक्तेः चक्रास्त्रस्य महोदयमाविर्भावम् अथ च शक्तेः भरतचक्राचिनः प्रभुत्वस्य महोदयम् प्रभूताधिपत्यम् किम् किमु तीन कथयती ब्रह्मसमदि तत्मामय सूचयतीति क्रियो- त्प्रेक्षातिशयोक्तिमूला मर्मामाधारणमेव ॥२॥ पुरत एवं दिगम्बरमंवराद विहितसन्निहितारुणमण्डलः। किमु विभोरवदत् स सुसौरभाहयदशां यदसान्ध्यरजोभरः भ-अप -पुरत पय दिगम्यामशान् विदितमग्रिहितारगम भमा योमर, म विभो मुमौरभाद्रपदा किमु भयदात् ॥ ३ ॥ व्यापा-पुरतः प्रथमतः दिगम्पासवरात् दिग्गूपमेव अम्बरं चमनं यस्य तदिगम्बर नमः तस्य संवरादाच्छादकन्वान् आवरक स्वादित्यधी विहिनसग्निहितारुणमण्डल. विहितः कृतः मनिहितः
१००
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकापे
अभ्यणः अरुणस्य सूर्यसारथेर्मण्डलो येन स अरुणमण्डलसमीपस्थः स
असाध्यरजोभरः सांभ्यरजोभिन्नरज सैन्यपदोत्थधूलीसमूहः सुसौर-
भाद्वयदशा सुष्टु सौरभस्स अद्वयदशाम् अद्वितीयकान्तिम् यद्वा सुष्ठ
सौरभा सूर्यसम्बन्धिकान्तिः तस्या द्वयदशा द्वितीयावस्थां अन्यसौर-
कान्तिम् विभोर्ब्रह्मणः अवदत् किम्मु अकथयत् किमूत्प्रेक्षेयमिति
भावः॥३॥
हरिपरिस्फुरितां दिशमाविशत्,
स्थितिमुदीर्य विभुर्भरतं प्रति ।
शुभरते भरतेऽविरते रतः,
प्रथमतोऽथ मतोऽवनिचक्रिणाम् ॥ ४॥
अन्वय -अथ विभु हरिपरिस्फुरितान्दिशम् भाविशत् भरत प्रतिस्थि-
तिमुदीर्य शुभरते रते अविरते महते भवनिचक्रिणा प्रथमत मत ॥ ४ ॥
व्याख्या-अथ निभुर्व्यापकः देवताधिष्ठातृत्वात् चक्रास्त्रम्
हरिपरिस्फूरिताम् दिशम् ऐन्द्रीदिशा पूर्वामित्यर्थः आविशव आयाद
योजनमानं गत्वा भरतं प्रति भरतराजानं प्रति स्थितिमेव स्थानमुदीर्य
यत्र चालस्थितस्तत्रैव सर्वसैनिकानां स्थिति तेति भावः शुभरते शुभे
कर्मणि कल्याणजनकाचारे रते व्यावृते रतेः रागात् अविरते रागा.
शक्ते भरते भरत चक्रातिनि विपये अवनिचत्रिणाम् पृथ्वीतलचक्र
वर्तिनाम् प्रथमतः मतः प्रथमोऽयञ्जातः सर्वचक्रवर्तिनामाद्योऽयमिति
भाव: ॥४॥
अभिनमय्य पुरः सुरमागधं तदनु तद्वरदाम मुदः पदम्।
वरुणदिक्प्रभयासभयाऽमुनापरिगताऽरिंगतासुहृता कृता
मन्वय -पुर सुरमागधम् अभिनमय्य तदनु मुद् पद नवरदाम अभिन
मस्य भमुना प्रमया सभपा वरुणदिक् परिगता भरिगता सुहृता कृता ॥५॥
१०१ मापापंधीविजयामृतरिप्रणीता सरणी रीका. सर्ग- व्याख्या-पुरः पूर्वम् सुरमागधं सुरत्वामिमानिनम्मगधतीथे- शम् अभिनमय्य अभिनामयित्वा तननीभूतं विधायेत्यर्थः तदनु तत्पश्चात् मृदः पदम् हर्पकारकम् अथ च मुदः प्रमदस्य प्रकर्षगस्य पदम् स्थानम् अत्यंतगर्विष्ठम् ठन् प्रसिद्धम् वरदाम वरदामाधिपतिम् अभिनमग्य नामयित्वा स्वाधीनं विधाय प्रभया कांरपा प्रतापेन सभ- या भययुक्ता वरुणदिर प्रतीचीदिक् परिगता गमनविपयीकृता तत्रेति शेषः अरिगता शत्रुभूता विपक्षायिता सुहृदा कृता ये शत्रवस्तेऽपि मित्राग्यासमिति भावः ॥ अन्यपक्षे सुष्ठु राजते इति सुरः स चासौ मागधः मगधाना- मीशीता इति सुरमागधः जरासंधस्तम् अभिनमग्य पराजित्य तदनु तत्पश्चात् तद्वरदाम तेन जरामधेन बरन्दाम बन्धनं पस्य तद वरदाम जरासंधनियमितराजसमुदायम् मुदः पदम् सहर्पम् विधायेति शेषः अन्यत् पूर्ववत् ॥ ५ ॥ रामपक्षे पुरः अग्ने प्रथमं सुरमागधं सुरेदेवैः सहस्रयश्च मग- ध्यति परिवेष्टयने इति सुग्मगधः म एव सुरमागधस्तं महसयक्षा. धिष्ठित बजावर्णिवापर्तनामकन्धनु: अभिनमय नमयित्वा तदनु धनुर्नमनानन्तरं मुदः पदम् हर्पकारकं तद्वरदाम सीतावरणसजम् अभिनमय्य स्त्रकण्ठापितं विधाय्य वरुणदिर प्रमया मभगा अरिंगता शत्रुभूता अमुना रामेण सुहदा मित्रभूता ॥५॥ सवरणं वरणं सरितस्तटे, हरिरबाद घरणेः सबलस्थिती। सबलयः खलु सिन्धुमनीतरत्, स्वमहसा महसारमहानृपः ॥ ६ ॥ ..
महोपाध्याय श्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये अन्वयः-धरणेः हरिः स्वबलस्थिती सरितस्तटे सवरणं वरणं अधात स खलु सवलय: स्वमहसा महसारमहानृपैः सिन्धुमतीतरत् ॥ ६ ॥ व्याख्या-धरणेः पृथिव्याः हरिः इन्द्रः धरणीन्द्रः स्वबलस्थिती स्वबलस्य सैन्यस्य स्थितौ स्वसैन्यनिवेशाय सरितस्तटे सरतः अपरो. दधेस्तटे रोधसि सवरणं वरणं वरणेन प्राकारेण सहितम् तदानीं सेना- रक्षकरूपप्राकारसहितम् वरण स्थिति उपनिवेशम् अधात् कृतवान सेनामनिवेशं कृतवानित्यर्थः सवलयः सपरिकरः स्वमहसा निजतेजसा महसारमहानृपः महेन उत्सवेन सारः श्रेष्ठः यो महानृपः तैः यद्वा महस्तेजोवत् यः सारोबलम् स महसारः स चासौ महानृपश्चेति मह- सारमहानृपः तैः तेजोवद्भि“पैः सहेति शेषः सिन्धुम् सिन्धुनामानं नदीविशेषम् अतीतर तरतिस्स ॥ ६ ॥ शिवमगुः किल कोटिमुनीश्वरा, यदिह तां स शिलां सहसा दधे । प्रतिकृतीः प्रणनाम ततोऽर्हतां, बजनतो जनतोपकरीनृपः ॥ ७ ॥ अन्वयः--यरिह लिकोटिमुनीश्वरा: शिवमगुः ता.शिला स सहसा दधे ततः प्रजनरा. नृपः जनतोपरी: अर्हता प्रतिकृतीः प्रणनाम ॥ ७ व्याख्या~यद् यस्मात् इह कोटिशिलातीर्थे कोटि मुनीश्वराः कोटिसंख्यकमुनिप्रवराः शिवम् मोक्षम् अगुः किल गताः किल ताम् शिलाम् स भरतचक्रवर्ती महसा अटिति आदघे धृतवान् ततः तदन न्तरम वजनतः गमनतः नृपः मरतमहीपतिः जनतोपकरी: जनानां लोकानां तोपकरी तुष्टिकरी: कल्याणसंपादिकाः अर्हता जिनानाम् प्रतिकृतीः प्रतिमाः प्रणनाम प्रणतिस्म ॥७॥ ॥
भाधायधीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-८ उपतमिस्रचलबहुसेनया, व्यपनयननयाद्विनयादरांत् । अवितथाः पथि पूर्वकथा बुधात, समशृणोन्मस्मृणोऽवनिजे निजे ॥ ८॥ भन्ययः---उपतमित्रघर पहुसेनया दिनयादरात् अनयात् व्यपनयन् पघि घुधात् भवितथा: पूर्वकथा. निजे भवनिजे मरणः सप्रशृणोत् ॥ ८ ॥ व्याख्या- पहुसेनया अनेकविधसैन्येन सह उपतमिस्रचलत् तमिस्रानामकगुहां प्रति चलत् उपतमिस्र चलतीति उपतमिस्रचलन वेनयादराव विनयस्य शिक्षाया अनुनयस्य सौजन्यस्य वा आदराव सन्मानात् अनयात् अनीतेः लोकमिति शेपः व्यपनयन् विनयादरेण अनीतितः लोकान् पृथक्कुर्वन् इति भावः निजे स्वकीये अवनिजे लोके. महणः ऋजुः अकर्कश इत्यर्थः खकीयजनानुकूल इति भावः पथि- मार्गे घुघाव पण्डितात् अवितथा मत्याः पूर्वकथाः प्राचीनेतिहामाः पूर्वपाम्या चरित्राणि समगृणोत आकर्णितवान् ॥ ८॥ जगति यः सविता भविताऽर्चिपा, स नु गुहां सवहां नवपद्यया । ध्रुवमतीत्य गिरेस्तदुदग्दिशो, वशमधाच्छमधीरणया-जनम् ॥ ९ ॥ भन्ययः-पः गति भर्भिपा सविता भयिता स नु नवपद्यया मयहां गिरेः गुहां ध्रुवमतीत्य समधोरणया सददिशाः जनम् पसमपात् ॥ ९ ॥ व्याख्या -यः भरतचक्रवर्ती अर्चिपा तेजमा प्रतापनेत्यर्थः जगति भुवने सविता म्यः भविता भविष्यति म नु इति वित नव- पपया नूमसेतुरुपपद्धत्या मवहां वहया उनमन्मानिममामिधाननदी. दूपया सहिता इति सबहा वाम् गिरेः चैताट्यपर्वतस्स गुहां तमिला.
४०४
महोपाध्यायश्री मेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाव्ये
नाम्नी गुफां ध्रुवमतीत्य समुल्लंघ्य तदुदग्दिशः तदुचरदिशायाः जनम्
तदुददिशस्थितम्लेच्छादिलोकम् शमधीरणया शमा शान्ता या धी-
बुद्धिस्तस्या ईरणया प्रेरणया शांतिबुद्धिप्रयोगेन वशम् स्वाधीनम् आ-
त्मसात् अधात् अकृत ॥९॥
परदलत्रितयं दलयन् बलं,
प्रचलयन् कलयन् सततो धनम् ।
ऋपभकूनिजाह्वयलेखने,
महिमभूहिमभूभृतमभ्यगात् ॥ १० ॥
अन्वयः-स परदलग्रितयं दलयन् बलम् प्रचलयन् तत. धनम् कलयन्
रुपमकूट निजाहालेखने महिमभूहिमभृतम् अभ्यगात् ॥ १० ॥
व्याख्या-स चक्रवर्ती परदलत्रितयं परेपां शत्रूणां आपात,
नागमार, हिमाद्रिकुमाराणां दलत्रितयं सैन्यत्रयम् दलयन् पराज-
जयमानः बलं स्वकीयसैन्यम् प्रचलयन् गमयन् ततः पराजितनृपात्
धनम् संपन कलयन् संचिन्वन् ऋपभकूटनिजाह्वयलेखने ऋपभकूट-
नामपर्वते यनिजाहयलेखनम् स्वाभिधानाङ्कनम् तसिन् “ निमिचे
सप्तमी" महिमभूहिमभूभृतम् महिम्नः महत्तायाः भूःस्थानम् इति
महिमभूः स चासो हिमभूभृचेति महिमभूहिमभूभृत् हिमालयपर्वतस्तं
अभ्यगात् अभ्ययासीत् ॥ १० ॥
पुनरुपेत्य धरं खचरेशिन,
परदरीमपि खण्डनिपातिनीम् ।
समतिगत्य निधीनव सन्निधी,
न समदी समदीधरदीश्वरः ॥ ११ ॥
भरया-पुनः सचरेशिनाम् धरम् उपेत्य खंडनिपातिनीम् परदरीमपि
समरि गत्य न समदी इंश्वाः सनिधो नयनिधीन समदीपरत् ॥ ॥
भाचार्य मीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-८ व्याख्या-पुनः पुनरपि खचरेशिनाम् विद्याधराणाम् नमिवि- नमिप्रभृतीनाम् धरम् पर्वतम् उपेत्य आगत्य तत्रत्यान् विजित्य खं- डनिपातिनीम् खण्डप्रपातानाम्नीम् परदरीम् महती गुफाम् समति- गत्य समतीत्य स राजा मदी अहङ्कारवान् न ईश्वरः, ऐश्वर्यसम्पन्नः सनिधौ समीपे नवनिधीन् नवप्रकारान् निधीन ऐश्वर्यविशेपान सम- दीधरत धृतवान् " महापद्मश्च पद्मश्च शंखो मकरकच्छपौ । मुकुन्दकु- न्दनीलाश्च खर्वश्व निधयो नवेत्यमरः" ॥११॥ सुरधुनीतटगानधुनीत स, क्षतपरातपराज्यपरिग्रहः। स्वपुरमाप्य समास्त पुनः पुना, रसमयान् समयाननयन्महैः ॥ १२ ॥ अन्वयः-स सुरधुनीतटगान् अधुनीत क्षतपरातपराज्यपरिग्रह: स्वपुर- माप्य पुनः पुनः महैः रसमयान् समयान् भनयत् समास्त ॥ १२ ॥ व्याख्या-स भरतचक्रवर्ती मुरधुनीतटगान् गंगातटस्थान अधुनीत अकंपयत पराजितवान् क्षतपरातपराज्यपरिग्रहः क्षताव दुःखात् परे भिन्नाः रहिता इत्यर्थः इति क्षतपराः तपतीति तपः सूर्यः आतपाद सूर्यप्रकाशपर्यन्तं मर्यादायामव्ययीभावः चवपराः आतपं राज्यपरिग्रहो यस्य सक्षतपरातपराज्यपरिग्रहः स्वपुरं खनगरम् आप्य प्राप्य समागत्येत्यर्थः पुनः पुनः भूयोभ्यः मईः उत्सवैः "मह उद्ध- व उत्सव इत्यमरः" रसमयान् सरसान समयान कालान् अनयन व्यतीतयन् समास्त आतिष्ठते ।। अन्यपक्षेऽपि स मुरघुनीतटगान् मरान् देवान् धुनाति स्वसा- मध्यन कम्पयतीति मुरधुनी राक्षससेना तस्यास्तटं समीपं कक्षं या वत्र गच्छत्तीति तान् राक्षससेनापक्षपाविना अधुनीत व्यकंपपत पदा महोपाध्यायश्रीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्ये सुरधुनी गंगा तां तदति स्वसंगमेन सौभाग्योन्नतिङ्करोतीति मुरधुनी- तट: समुद्रः तत्र गच्छतीवि तान् समुद्रतटगान् राक्षसान पापिष्ठान अधुनीत इत्यर्थोपि परिस्फुरति अन्यत् समानम् ॥ १२ ॥ विहितवान् हितवार्षिकदानतो, व्रतदशां तदशान्तमहोत्सवैः । घनतपा नतपादकजः सूरै- मदनतोदनतो वनभावनः ॥ १३ ॥ अन्वयः-घनतपाः सुरै नतपादकजः मदनतोदनतो वनभावनः हितवा- पिकदानतः तदशारामहोरसवैः व्रतदशा विहितवान् ॥ १३ ॥ व्याख्या-घनतपाः पनो महान तपः प्रभावो यस्य स मह- स्पराक्रमः नतपादकजः सुरैर्देवैर्विद्याधरादिभिः नतः प्रणतः पादकर्ज चरणकमलं यस्य स अथवा सुष्टु रांतीति सुराः नृपाः तः नतपा दकजा नमस्कृतचरणकमलः मदनतोदनतो वनभावनः मदयतीति मदनं मधु सुरेति यावत् तस्य तोदनतः निराकरणतः अथवा मदनस्य कामस्य तोदनतः स्वसौन्दर्याद पराजयतः यद्वा मदनस्याहंकारस्य तोदनतस्त्यागत: अहंकारपरित्यागात् अवनभावन: अपने रक्षणे भावना विचारणा यस्य स प्रजारक्षणसावधानः यद्वा बने तपोवने भाव. ना युद्धिर्यस्य स हितवापिंकदानतः हितं हितार्थ यद्वार्षिकदानं तस्माद दशांतमनोरथैः तस्याः सुन्दर्याः अशान्तमहोत्सवैः अहर्निशमुद्धवैः व्रतदशां सुन्दरी व्रतग्रहणदशा विहितवान् कृतवान् ॥ १३ ॥ अन्यपक्षे-हितवापिकदानतः हितमिष्टसाधनभूतं परिणाममं- गलजनकं यद्वार्षिकदानं संवत्सरव्यापकदानम् रामपक्षे चतुर्दशवर्षे यावर वनवासस्येति शेषः दानं पालनम् तवः “दानं गजमदै पालने छेदने इति शन्दस्वोममहानिधिः" प्रतदशां दीक्षाग्रहणदर्श वनवासनियम
भाचार्यश्रीविजयामृतस्मिगीता सरणी टीका. सर्ग-८
चा विहितवान् कृतवान् कैः अशांतमहोस्तवैः अन्यदुक्तप्रायम् ॥१३॥
विभविनां भविनां सहिते हिते,
वितरपणात्तरणात्तरसा भवात् ।
धितसमेतसमेतगिरी कृता-
व्यसनभासनभाक् प्रभुराययौ ॥ १४ ॥
अन्धयः-- विभविनां भविनां महिते हिते घिससमेतसमेतगिरी तरसा
भवात् वितरणात् हिते वितरणात् कृताम्यसनभासनभाक् प्रभुः भाययौ ॥१४॥
व्याख्या-विभविनां विभवशालिनी धनिनामित्यर्थः सहिते
संयुक्त श्रितसमेतममेतगिरौ श्रितः आश्रितः शमेन शांत्या इतः युक्तः
शमेतः श्रितः शमेतो यत्र सश्रितशमेतः स चासो समेतगिरिथति
श्रितशमेतसमेतगिरिस्तत्र हिते कल्याणजनके तरसा झटिति भवात्
संसारात् वितरणाव निवारकाद संमारविरक्तिकरणात् कृताव्यसनमा.
सनभार कतः समाश्रितः यो व्यसनः संमारानमिनिवेशः तस्य मा-
सनं तेजः तामाभासनं तेजो भजते इति तथोक्तः प्रभुः जिनेश्वर
आययौ आजगाम ॥१४॥
रामकृष्णपक्षे-वितरणात् वितः निवृत्तः यो रणः संग्राम:
तम्मात् “वाते रितड औणादिका" तरमा झटिति भवात् ममुद्रललाव
तरणात् पारीणत्या विभविनां धनिनां भविनां कल्याणवतां सहित
युक्त हिते हितकारके श्रितममेठममेतगिरी शमन शांत्या इतः युक्तः
शमेतः शांतियुक्तः श्रितैः आश्रिनः गिरिवामिभिः ममेतः सहितः
इति प्रितममेतः स चासो शमेतः श्रितसमेतसमेतः स चामौ गिरि-
थेति श्रितममेतसमेतगिरिस्तस्मिन चित्रकूटसु वैलावतके या
कृतः आश्रितः गोऽयमना के वपि अनभिनिवेशः तेन मासने मजते
इति तथा प्रभुः रामः कृष्णो या आपयो समागतवान् ॥ १४ ॥
१०८ महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचित्ते सप्तसम्धानमहाकाव्ये हततमास्ततमास्तवनैः स्तुतः, कचन भाविनयाद् विनयात् क्वचित् । शुभविभा भविभाग्यवलात् पदो, भुवनपावनपावनधीर्दधे ॥ १५ ॥ अन्वयः-ततमास्तवनैः स्तुतः हततमा: भुवनपावनपावनधीः शुभविभाः रचन भाविनयात् क्वचिद्विनयात् भविभाग्यबलात् पदो दधे ॥ १५ ॥ व्याख्या-ततमा विस्तृता ये स्तवनास्ते ततमास्तवनास्तैः अ तिविस्तृतस्तुतिभिः स्तुतः कृतस्तवनः हततमा हतं विनष्टं तमः कि- ल्पिं यस्य स विनिवृत्ततमाः शुभविमा: शुभा शोभना विभा प्रकाशो यस्य स भुवनपावनपावनधीः भुवनस्य जगतः पावने पवित्रतायां पावना पूता निर्मला धीर्यस्य संसारपूतकरणपवित्रज्ञानवान् कचन कुत्रापि भाविनयात् भाविनां भाग्यवतां जनानां नया अनुनयात् यहा भावी भविष्यन् यो नयः शुभावहो विधिः तस्मात् “नयः शुभावहो विधिरित्यमरः" कचित् कुत्रापि विनयाद श्रद्धालुजनविनयतः प्रार्थ- नातः भविभाग्यचला भचिनां शुभानुपापिनो भाग्यपला शुभा. दृष्टयशाद पदौ पादौ दवे धृतवान निहितवान् यत्रायं गच्छति तत्रत्य- जनानां शुभादृष्टमेव प्रभवतीति भावः ॥ १५ ॥ भृशमये समये किल केवलं, स कलयन् वलयन्नगमाश्रयत् । अधिकृताधिकृतानशनने वै, शिवरमां वरमाङ्गलिकी दधी ॥ १६ ॥ भन्वयः-भृशमय समये स किल केवलं कलयन् नग कलयन् माध्रयत् भधिकृताधिकृमानशनेन वै शिवरमा वामांगलिकीन्दधौ । १६ ॥
माधायधीविजयामृतरिमणीता सरणी टीका, सा-८ व्याख्या-भृशमये समये अयते गच्छतीति अयः तसिन् भृशमतिशयम् समयेकाले अये गते सति "दीक्षाकालात् पूर्वलक्ष क्षप- यित्वा तता प्रभु"रिति तच्चरिते किल इति निश्चये स प्रभुरादीश्वरः केवलम् केवलज्ञानम् कलयन् आश्रयन् नगम् अष्टापदगिरिम्बलयन् अष्टापदपर्वतं प्रतिगच्छन् नगम् पर्वतम् आश्रयत् प्रापत् अधिकता- धिकतानशनेन अधिकतम् अधिकारप्राप्तम् यत् अधिकृतानशनम् खी- कृतानशनम् अधिकारप्राप्तत्वेन स्वीकृतानशनः त्यक्तचतुर्विधाहार: तेन शिवम् मोक्ष एव रमा लक्ष्मीस्तां शिवरमा मोक्षलक्ष्मी वरमाङ्ग- लिकी बरा श्रेष्ठा या मांगलिकी मङ्गलसाधिका ताम् निरतिशयमाल- प्रयोजिकाम् दधौ धारयामास मोक्षं प्रापेति भावः ।। श्रीशांतिनाथपार्श्वनाथपक्षे-नगमित्यस्य समेत गिरम् समेतशि- खरमिति प्रसिद्धम् ॥ श्रीनेमिनाथपक्षे-नगमिति गिरिनारपर्वतम् अधुनापि गिर इति नाम्ना प्रसिद्धोऽयनगा॥ श्रीमहावीरपक्षे-न गच्छतीति नगः नगरम् पावापुरमित्यर्थः ।। रामपक्षे-भृशमये समये भृगमतिशयं समये काले अये गते सति स रामः केवलं केवलज्ञानम् कोटिशिलायाम् कलपन आश्रयन् यलयन् ततोऽपि विहरन् नगम् शत्रुञ्जयगिरिम् आश्रपत् प्रापत् अधिकृताधिकृतानगनेन अधिकारप्राप्तत्वेन स्वीकृतचतुर्विधाहारपरि- त्यागेन वरमांगलिकीम् अतिशयकल्याणजननी शिवरमा मोक्षलक्ष्मी. न्दधौ धारयामास प्राप ॥ १६ ॥ कृष्णपक्षे-म कृष्णः केवलम् के जले ममुद्राम्युनि वलयति रमते इति केवलम् कलयन् भृशमतिशयं ममगे अये व्यची मति बलयन् परिभ्रमन नगम् अवतमम् आश्रपत् प्रापत् अधिनाघिकतानगनेन महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्भानमहाकाये अत्यंताधिकृतायोऽनशनो जलानशनः जर तृषाजनितशुष्ककण्ठता तेन वरमांगलिकीम् मंगं गमनम् लाति गृहातीति मंगल मंगलाय पर- लोकगमनाय हिता मांगलिकी वरा मांगलिकी वामांगलिकी ताम् शिवरमां शेतेऽसिञ्जगत् इति शिवः मरणं सैव रमा रमते जीवो यहां सा रमा इति शिवरमां मरणक्रीडान्दधौ धारयमास ॥ १६ ॥ उपरतापरतापरतापना- दविरताद्विरतापि यदुनता। शुचिरसो चिरसौख्यमधारय- दसमधीः शमधीरजितात्मना ॥ १७ ॥ भन्ययः- अविरताद् उपरतापरतापरतापनात् यदुमतापि विरता असो शुचि. भसमधीः शमधीरजितात्मना चिरसौख्यम् अधारयत् ॥ १७ ॥ व्याख्या -अविरताव संततात् उपरतापरतापरतापनाद उपर- तम् निरस्तम् पृथक्कृतमित्यर्थः अपरस्य भावः अपरता भिन्नता तस्याः अपरतायाः भिन्नतायाः पृथक्त्वस्येत्यर्थः परम् उत्कृष्टम् अतिशयम् तापनम् सन्तापनम् उपरतं निरस्तम् यत् परतापरतापनम् तस्मात् तथोक्तात् यदुग्रतापि यस्य यदीयस्य उग्रतापि तीक्ष्णता कर्कशतेत्यर्थः विरवा निर्गता उग्रतापि त्यक्तेति भावः शुचिः पवित्रोऽसौ असमधी: असमे अयोग्येऽपि धीवुद्धियस्य स असमधीः असमेपि समानयुद्धिः शमधीजितात्मना शमधीरेण शमज्ञानेन जितः स्वायत्तीकृतः आत्मा येन स शमधीरजितात्मा तेन तथोक्तेन चिरसौख्यं अतिसौख्यम् अ- धारयत् आश्रयत् ॥ १७॥ असितताकृतिविश्वतपोदिवा- परततत्परमानववासरे।
आचार्षश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-८
अन्वयः-
प्रवरसंवरसंवृतविक्रिये-
इजनि शिवे निशि वेश्म परात्मनः ॥ १८॥
-असितताकृति विश्वतपोदिवा परततस्परमानववासरे प्रवरसम्बर-
संवृतविक्रियेऽनिशि शिये परास्मनः वेश्म अजनि ॥ १८ ॥
व्याख्या:-असितताकृति सितस्य शुक्लस्य भावः सितता शुक्लता
न सितता असितता आकृतिः स्वरूपं यस्य स असितताकृतिः कृष्णः
विश्वान् तापयतीति विश्वतपः "तपेः कसुन्" कामः तस्य तपः विश्व-
तपस्तप इत्यत्रैकतपश्शन्दस्य लोपाऽविवक्षातः इति विश्वतप इत्यस्यैव
माघकृष्णत्रयोदशीत्यर्थः कथमपि समायातः तस्य दिवा दिनेऽपरः
पूर्वभागः पूर्वाह इति यावत् तत्परो यो मानवः स फाल्गुननामधेया-
ऽर्जुन: तस्य वासरः रविः श्वेतवाहनत्वात् श्वेताश्वः सूर्य इति सादृश्येन
सूर्यः तसिन् माघकृष्णे त्रयोदशीरवौ प्रवरसम्बरसम्वृतविक्रिये प्रवरः
श्रेष्ठः यः सम्बरः वैराग्यः स प्रवरसंवरः तेन संघृता निरुद्धा विक्रिया
विकारो यसिन् तसिन् तथोक्ते शिवे मोक्षेऽनिशि दिवसे परात्मनः
परमात्मनः ऋषमस्वामिनः वेश्म प्रवेशनम् अजनि मोक्षगमनमभूव
इति भावः ॥१६॥
शान्तिनाथपक्षे असितताकृतिः कृष्णो यो विश्वस्य द्वादश्यास्तपो
ज्येष्ठः तस्मिन् अर्थात् ज्येष्ठकृष्णद्वादशस्यामन्यत् सुगमम् ।।
घनमहानमहा रजताचलं,
ध्रुवमितोऽक्रियया रजताचलम् ।
भरतराइ रतरागविमोचनाद,
मुदमधादमधावपि तदिशा ॥ १९ ॥
भन्वयः-धनमहान् भमहा रजताचरम् ध्रुवम् इतः किमया रजता-
पलम् रतरागनिमोचनात् भरतराट् भमधावपि तदिशामुदत मधात् ॥ १९ ॥
४१२ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्मानमहाकाग्ये . व्याख्या-घनमहान् घनः अतिशय: महान् घनमहान् अथवा घन इव मेघ इव महान् घनमहान् अमहा अमम् रोगं हतवान् इति अमहा रोगनाशक: ध्रुवम् निश्चितम् रजताचलम् हैमाद्रिम् इतः गतः दिग्विजयक्रमेण हैमाचलं गतः अक्रिययारजताचलम् अक्रियया अ- व्यापारेणैव रजताचलम् स्वर्णपर्वतम् इतः प्राप्तः ये गत्यर्थकास्ते प्राप- त्यर्थका इति भावः रतरागविमोचनात रते स्त्रीपुंसगे यो रोगोऽनुराग- स्तस्य विमोचनात् त्यागात् अमधावपि अवसन्तेपि वसन्तमातुं विनापि वदिशा तदिव वसन्त इव मुदम् हर्षम् अधात् धारयतिम ।। अन्यपक्षे-धनमहान् अतिशयमहत्तरः अमहा रोगविनाशकारकः रजताचलम् स्वर्णपर्वतम् इतः प्राप्तः "रजत रूप्ये, गजदन्ते, रुधिरे, हरि, शैले, वणे धवले इति शब्दस्तोममहानिधिः" क्रियया व्यापा- रेण धैर्येणेत्यर्थः रजताचलमिव रजतगिरिरिव भरतराट् भरति लोकान् पोपयतीति भरतः तेषु राजते इति भरतराट् भरणकर्टपु श्रेष्ठः रतराग- विमोचनात् स्ते रमणे मोहने यो रागोऽनुरागस्तस्य विमोचनात त्या. गात् अमधारपि अवसन्तेऽपि मुदम् हर्पम् अधात् अयात् ॥ १९ ॥ तदनु तन्नगरं नगरञ्जनं, व्यधित साधितसाभ्रककुङ्कुमैः । द्रुतमपातमपापमतो न तत्, ऋभुवनेर्भुवनैस्तुलितनिभिः ॥ २० ॥ भन्धयः-तदनु साधितसाधकुंकुमैः तनगर नगरंजनं व्यधित भपातम् भारम् भन: मुलिप्रिभिः अभुवनैः भुवनै द्रुतग्न तत् ॥ २० ॥ व्याख्या-तदनु वदपश्चात् उद नगरं स्त्रकीयं पुरम् साधित- साभककुंकूमः अभ्रमेन सहितः साधकः स चासौ कुंकुमथेति साम-
भाचार्यश्रीविनयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-
ककुंकुमः साधितः शोधितश्चासौ पाककुंकुमश्चति तैः साधितसाधक-
कुंकुमैः शुद्धाम्रककुंकुमैः नगरंजनम् नग इव पर्वत इव रञ्जनं शोभि-
तम् तत् नगरमिति शेषः अपातम् पातरहितम् अपापम् पापशून्यम्
निष्कल्मपम् तुलितश्रिमिः तुलिता साम्यीकृता श्रीर्यतः तः समान-
संपद्धिः ऋभुवनैः स्वर्गः भुवनैरन्यारन्य भुवनदे॒तम् नानुसृतम् व्यधित
व्यरचयत कैरपि भुवनैन तुलितमित्यर्थः ॥ २० ॥
स्थलमभूद् भुवि योगिवियोगि तत् ,
बहुशुचाहुशुचावचिराज्ज्वलत् ।
नदवनन्दवनन्दनतोऽभवद्,
न हरिणा हरिणातिशये कृते ॥ २१ ॥
भन्धयः-भुवि तत् स्थलम् योगिवियोगि भभूत बहुशुचा हु इति वितर्के
गुचौ भचिराग्लन् हरिणा हरिणातिशयेकृते नदवनम् दवनन्दनतो न भभ-
व्याख्या-भुवि पृथिव्यां तत् स्थलम् यत्र वर्णनीयनायकाः शरीर
व्यक्तवन्तः तत्स्थानम् अचिरात् योगिवियोगि योगिनां चरित्रना.
पकानां वियोगि रहितमभूत् जातम् वत्स्थलम् बहुशुचा अत्यधिक
शोकेन हु इति वितः शुचौ आपाढे वर्षासमयेऽपीत्यर्थः ज्वलन्
उत्तमभवद हरिणा हरिणातिशये कृते हरिणा मेघेन हरिणा राज्ञा च
अतिशये उत्कृष्टे कृते रचितेऽपीत्यर्थः भरतादितदुत्तरराज्याधिकारिणा
मेघेन च शोकशान्तिरचितेऽपि दवनन्दनतः दवस्य अन्तर्दाहस नन्द-
नतः आश्लेषतः विशेषार्थकस्यापि सामान्यार्थकत्वम्प्रकरणादिति कवि.
समयोऽत एव दवशब्दस्य वनाग्निवाचकत्वेऽपि प्रकृते संतापकत्व-
मानार्थकत्वमिति भावः नन्दवनम् नन्दस्य हृदस्य बनम् न अभवत्
संतापशामकं न जातमित्यर्थः ॥ २१ ॥
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्मे प्रथमतीर्थकृता परिपालिता, तदनु बाहुबलीशजयश्रिता। भरतचक्रभृता ह्यभिनन्दिता, युगलिता गलितान यतो दिनात् ॥ २२ ॥ अन्य.-प्रथमतीर्थकृता परिपालिता तदनुहुथरीशजयभित्ता हि भर- तचक्रभृता अभिनन्दिता अन यतो दिनान् ततो दिनात् युगलिता गलिता॥२२॥ व्याख्या-यतो दिनात् यद्दिनमारभ्य इयम्भूमिरिति शेषः प्रथ. मतीर्थकृता ऋषभप्रभुगा परिपालिता परिरक्षिता तदनु तत्पश्चात् बाहु पलीशजयश्रिता बाहुबली चासौ ईशवेति बाहुवलीशः तस्य जयम्यि- जयमाश्रयतीति वाहुबलीशजयश्रिता बाहुबलीनपविजय विश्रुता भर- तचक्रभृता भरतचक्रवर्तिना अभिनन्दिता कृताभिनन्दना तद्दिनादा. रभ्य "यत्तदोनित्यसाकांक्षत्वात् " अत्र भूमौ युगलेमविः युगलिता युगलिधर्मत्वम् गलिता निवृत्ता निरस्तेत्यर्थः । अन्यत्र--प्रथमतीर्थकता प्रथमम् तीर्थकवा तीर्थकरेण परिपा- लिता परि सर्वतः पालिवा रक्षिता " पार्श्वनाथवीरस्वामिपक्षे रलयोः साम्यात्" परिपारिता मर्वतोभावेन पारिता कर्मसमापिता परिधातोः कर्मसमाप्त्यर्थकत्वात् यद्वा प्रथम तीर्थकृतं आसमंतात परिपालय. तीति तथा प्रथमतीर्थंकरलालनपोषणवर्धनसंपादिकेत्यर्थः तदनु बाहु. बलीचासौ ईशश्चेति तथा भुजवलशालीनृपः वसोवकर्पण श्रिता आश्रिता भरति लोकमिति भरतः अथवा भरति धर्मादिकमिति भरतः तेषां चक्रः समूहस्तं विभत्तीति भरतचक्रभृत् वैन अभिनन्दिता खनिवासेन मण्डिता यतः दिनात् तस्मादिनादारभ्येति शेषः अत्र भूमौ नगरे वा युगलिता युगं गुग्म लाति गृहातीति युगलः तस्य भावो युगलिता पापपुण्यौ "सुपदुःसौ" वियोगसंयोगौ वा गलिता निरस्ता जिनेन्द्र- भाचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग- प्रभावात् तत्र पुण्यस्य धर्मस्य सुखसंयोगस्यैव स्थितिर्न तत्सहचरस्य पापादेरित्यर्थः॥ रामकृष्णपक्षे-प्रथमतीर्थकृता प्रथमम् आदौ तीर्थकता तीर्थ हितशामनं करोतीति तीर्थकर तेन रामेण कृष्योन वा परिपालिता सम्यगवेक्षितां तदनु तदपश्चात पाहुबलीशजयश्रिता भुजबलशालि- नृपोत्कर्षश्रिता मरतचक्रभृता भरणपोपणकारकेन अभिनन्दिता या नगरी यतो दिनादारभ्य ततोदिनादवनगरे युगलिता प्रतिद्वन्दिता गलिता सर्वेषां राजानधीनत्वात् परस्परमस्पर्धन्त इति भावः ॥२२॥ तृपितभूपितभूरिवियोगिना- मृतमृतेन मृतेन (?) पदात्स्वयम् । तदनु तन्नगरे नगरेवते- त्युभयतो भयतोयधिविप्लवः ॥ २३ ॥ भन्यय:-हे मृतेन तृपितमूपितभूरिवियोगिनाम् ऋतम् ऋते स्वयंपात् तदनु तसगरे नगरेवत इति उमयत: भयतोयधिविप्लवः ॥ २३ ॥ व्याख्पा-हे मृतेन ! मृतः परलोकंगतः इनः राजा यस्य स मृतेनस्तव संयुद्धौ हे मृतेन मृताधिप ! तदनु तदनन्तरम् तन्नगरे तसिनपुरे नगरैवता रै अस्यास्तीति रैवान् नग इव रैवान् नगरैवान् तेन प्रच्छन्नगुप्तधनवता पितभूपितभूरिवियोगिना पितः संजातपः भूपितः अलंकृतः अथवा भूवि भूमौ उपितः स्थितः तृपितथासौ भूपि- तथेति वृपितभूषितः म चासौ भूरिवियोगी चेति तृपितभूपितभूरि- वियोगी तेन अमृतमतेन अमृताय मोक्षाय मृतेः मृत्यूवशंगतः इनो यस्य स अमृतमृतेनस्त-संबुद्धौ हे अमृतमृतेन उमयता इहलोकता परलोकतश्च यद्वा उमपतः भरिवियोगिजनत्वेन किमपि कर्तुमलसेन नगरेवता गृप्तधनेन कस्मैचिदपि किमप्पप्रयच्छतेति उमयथा मपाद महोपाध्यायनीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसम्भानमहाकाव्ये साध्वसात् तोयधेश्च तुद्यते तूयते वा तोयः व्यथा हिंसा वा तद्धीयते यसिन् स तोयधिः तस्माच विप्लवः पराभवः जात इति शेपः ॥२३॥ यमकालंकारः। कृष्णपक्षे–भयतीयधिविप्लवः भयः भयजनका तोयधिविप्लव समुद्रकर्तृक उपद्रवः सर्वतो जलमग्नता जातेति शेषः कृष्णप्रयाणान- न्तरं द्वारकायाः समुद्रमनतेति पौराणिका इति भावः ॥२३॥ सकमलाकमलाशयभूरभू- नरमणी रमणीललनः श्रिया । असुरभिः सुरभिप्रसवेऽपि सा, नरचिता रचितावधूमतः ॥ २४ ॥ अन्वयः-नरचिता स कमला कमलाशयभूः रचितावधूमतः सुरमिप्रस- वेऽपि भसुरभिः रमणीललनैः श्रिया रमणी न भभूत् ॥ २४ ॥ व्याख्या-नरचिता नरैर्नागरिकजनैश्चिता व्याप्ता परिपूर्णा अपि स कमला कमलेन पंकजेन सहिता यद्वा कमलया लक्ष्म्या शोभा संपत्त्या वा सहिता सकमला सश्रीका कमलाशयभूः आसमंताच्छेते यसिन् स आशयः "आपूर्वकाच्छतेराधारेऽप्" कमलायाः लक्ष्म्याः आशयः कमलाशयः सा चासौ भूवेति कमलाशयभूः अथवा कम- लस्य सरोजस्य आशयः कमलाशयः स चासो भवेति कमलाशयभूः रचितान जनिताद दवधूमतः वनानिधूमात् सुरभिप्रसवेऽपि सुरमेर्व- संतस्य प्रसवे उन्पचावपि सुरमिमाम्राज्येऽपि असुरमिः अमनोहरा यद्वा सद्गन्धरहिता "वसन्ते पुष्पसमया सुरभिग्रीष्म उष्मक इत्यमरः" तथा च रमणीललनः श्रियाः रमण्याः रामाया ललनः प्रेयान् इति रमणीललनः तैः श्रिया शोमया संपरया वा रमणी मनोहादिनी न अभूत् न अजनिष्ट ॥ २४ ॥ यमकः विशेपोक्तियालंकारी ।।
भाचार्य श्रीविजयामृतमरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-८ स विषयो विषयोजनभक्ष्यवत्, सुमनसां मनसां भयकारणम् । भुवि दितो विदितोऽपि तदाभया- शवरसंवरसंकलितोऽभवत् ॥ २५ ॥ अन्वयः -स विषयः विषयोजनभक्ष्यवत् सुमनसां मनसा भयकारणम् भुवि दितो विदितोऽपि तदा अभयासवरसंवरसंकलितः अभवत् ॥ २५ ॥ व्याख्या -स विषयः सांसारिकविषयाभिलापः देशश्च विषयो. जनमक्ष्यवत् विषेण गरलेन योजनं संयोजनम् यस्य तत् विपयोजनम् तच्च भक्ष्यथेति विषयोजनभक्ष्यम् तदिवेति विपपोजनमत्यवत् विषमिश्रितान्नवत् सुमनसा सहृदयानां मनसों चित्तानां भयकारणम् भयहेतुः भुवि जगति विदितोऽपि प्रसिद्धोऽपि अनेकजनसे चितोऽपि दितः खण्डिवः सन् तदा तसिन् समये अभपाशवरसंवरसंकलितः अभये मोक्षे आशा अभिलापा यस्य स अभयाश: तस्य यो वर श्रेष्ठः संपरा सनिरोधः संयम इत्यर्थः तेन संकलितः संयुक्तः इति अभया. शवरसंवरसंकलितः मुम्राजनप्रवलवैराग्यविहितनिरोधः अमात् सर्वथा मुमुक्षुजनपरित्यक्तोऽजायत इति भावः॥ २५ ॥ पुनरपि प्रबलाकृतिकोशला, भगवतामुदयेन नु भाविनी । नवनवेभ्यनिवासविलासिनी, वसुमती सुमतीशजयश्रिया ॥ २६ ॥ भन्वय:-भगवतामुदयेन पुनापि प्रबराकृतिकौसला नवनपेम्यनि- सविलासिनी सुमतीशजयधिया वसुमती भाविनी ॥ २६ ॥ ..
14 महोपाध्यायभीमेघविजयगणिविरचिते सससन्धानमहाकाग्ये ~~ व्याख्या-भगवतां जिनेन्द्राणां उदयेन आविर्भावेन पुनरपि भूयोऽपि प्रबलाकृतिकौशला प्रचला महती या आकृतिः स्वरूपम् सा प्रबलाकृतिः तत्र कौशला चतुरा सा प्रबलाकृतिकौशला सुन्दराकृतिप- टीयसी नवनवेभ्यनिवासविलासिनी नवनवः नून्नः य इभ्यः धनी यद्वा इभ हस्तिनमहतीति इभ्यः नृपः नवनवश्चासौ इभ्यश्चेति नवन- वेभ्यस्तेपां निवासास्थितिरिति नवनवेभ्यनिवासस्तेन विलासिनी शोभमाना अतिनूतननृपनिवासमनोहरा सृमतीशजयश्रिया सुष्ठु मति- यस्य स सुमतिः स चासौ ईशश्चेति सुमतीशः तस्य जयश्रिया विज. यलक्ष्म्या वसुमती पृथ्वी सर्वसहा वसुमती वसुधो: वसुन्धरेत्य. मरः" भाविनी भवित्री पुनरपि जिनेन्द्रोदये पृथ्वी सर्वगुण विशिष्ट भविष्यतीति भावः ॥ २६ ॥ अनुप्रासः। अन्यत्र भगवतां भाग्यशालिनामुदयेन समभ्युदयेनेति पूर्वप्राय मन्यत् ।। २६॥ ध्रुवरमं वरमङ्गलसंगम, विभवसंभवसंज्ञतुरङ्गमम् । पुरमदो रमदोलनायक, सुरसभारसभासि भविष्यति ॥ २७ ॥ अन्धयः- भदः पुग्म् ध्रुपरमं वरमंगलसंगमम् विभवसंभवसंज्ञतुरङ्गमम् रमदोबलनायकम् सुरमभारपमासि भविष्यति ॥ २७ ॥ व्याख्या-अदः पुरम् इदं नगरम् ध्रुवरमम् ध्रुवं निश्वितं सततं वा रमणं यत्र तत् अथवा ध्रुवन्नियतं रमा लक्ष्मीः शोभा संपत्तिर्वा यत्र तद ध्रुवरमम् नित्योत्सवं नियतलक्ष्मीकं वा वरमंगलसंगमम् वरमंगलानां निरतिशयोत्सवानाम् संगमम् संबंधो यत्र तत्तथोक्तम् ८ ४१९ भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी रोका, सर्ग- वेमवसंमवसंज्ञतुरङ्गमम् विभवस्य सर्वसंपत्तेः संभव उत्पत्तिरिति वि- मवसंभवः सम्यक् जानातीति संज्ञः "आतथोपसर्गे इति जाना: का" बुद्धिमान तुरं शीघ्रं गच्छतीति तुरंगमः अश्वः विभवसंभवश्व संज्ञश्व तुरंगमथेत्येषां द्वन्द्वः इति विभवसंभवसंज्ञतुरंगमानि यत्र तत् अथवा विभवसंभवसंज्ञौ तदभिधानौ तुरंगमौ जात्यश्वौ यत्र तत् 'रमदोर्बल- नायकम् रमम् शोभमानं दोर्चलम् पाहुबलं यस्य स रमदोबलः रमदो- चलो नायको यत्र तत् यद्वा रमं दोर्चलम् यम्य स रमदोर्धरः रमदोर्च- लो नायको यत्र तत्' सुरसभारमभासि सुराणां देवानां सभा परिपत् इति सुरसमा तस्याः रसः अनुरागः सुरमभारमः तेन भासितुं प्रका. सितुं शीलमस्येति तद सुरममारसभासि अथवा सुष्टु राति ददातीति मुगः तस्य समा तया भासि विकस्वरम् अथ च सुरः पंडितः तस्य ममा तया मासि भासनशीलम् भविष्यति जनिष्यति ॥ २७ ॥ यमकः । राज्यादिस्थितिरद्भुता विजयतेऽयापि प्रभोस्तेजसा, नाना सिद्धिरपि प्रसिद्धिसहिता सर्वहितार्थे हिता। बुद्धिः साभ्युदया सतां समुदयानन्दाय संजायते, श्रीसार्वप्रभुसार्वभीममहितो भूयात् स भूयः श्रिये॥२८॥ इति श्रीसप्रसंधाने महाकाव्ये महोपाध्यायधीमेघविजयगणिकने दिग्विजयवर्णनो नामाष्टमः सर्गः संपूर्णः ॥ श्रीः ।। भन्ययः-भचापि प्रभोस्तेजसा राज्यादिरिषति भभुना नामा सिदिापि प्रसिदिसहिता सर्वेदिता हिताः मतो सगुइपानन्दाय माम्युदपा पुद्धिः संजायते धीसायंप्रभुमारंभौमाहितः म भूप:धिये मूपान् ॥ २८ ॥ व्याख्या-प्रभोजिनेन्द्रस तेजमा प्रमावेण अद्यापि अधुनापि राज्यादिसितिः राज्यादिमर्यादा अद्भुना माविशायिनी विलक्षणे-
महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये
त्यर्थः विजयते सर्वोत्कण बचते नाम्ना अभिधेयेन प्रसिद्धिसहिता
प्रख्यातियुता सिद्धिरपि अणिमाद्यष्टसिद्धिरापि सर्वेहितार्थे सर्वेषामी.
हितः सर्वहितः स चासौ अर्थश्चेति सर्वेहितार्थः तत्र हिता अनुकूला
साभ्युदया श्रेयस्करी बुद्धिर्मतिः सतां मजनानां भव्यानामित्यर्थः
समुदयानन्दाय अभ्युदयसुखाय संजायते सम्पद्यते श्रीमाप्रभुः अहं.
त्प्रभुः सर्वेभ्यो हितः सार्वः स चासौ प्रभुश्चेति सार्वप्रभुः सर्वपुरुषाभ्यां
णनाविति णः ५ पं. ४. सर्वजनीनः सार्वभौममहितः सार्वभौमेन
चक्रवत्तिना नृपेणेति शेषः महितः पूजितः इति सार्वभौममहितः
सार्वप्रभुश्चासौ सार्वभौममहितश्चति श्रीमाप्रभुमार्वभौममहितः स
जिनेन्द्रः भूयः पुनः पुनः श्रिये निरतिशयानन्दाय भूयात् स्तात् अत्र
श्लोके शार्दूलविक्रीडितम् ।। २८ ॥
इति शास्त्रविशारद-कविरस्न-हारकाचार्यत्री विजयामृतसूरीश्वरप्रणीतायां
सप्तमंधान महाकाव्यीय "सरणी' टीकायां भष्टमः सर्गः ॥८॥
भाचार्यश्रीविजपामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-९ ४३१ ॥ अथ नवमः सर्गः॥ अथार्ककीर्तेः प्रससार कीर्तिर्देवस्य वश्यं भुवनं विधातुम्। मूव कल्याणवती सुनन्दा सुमङ्गलाङ्गोन्नयनेऽनुपक्ता ? अन्वयः-अथ भकीर्देवस्य भुवन वश्यं विधातुं मूत्व कल्याणवती सुनन्दा सुमंगलांगोनयनेऽनुपक्ता कीर्तिः प्रससार ॥ ॥ व्याख्या 1-अथ अथानन्तरम् अर्ककीर्तेः अर्कः मूर्यः इन्द्रो वा स्फटिकमणि विष्णुर्वा स इव कीर्तिः प्रतिष्ठा यस्य तस्य "प्रकाशक- त्वात सर्वशक्तिमत्वात निर्मलत्वाद सत्य गुणमात्राश्रयत्वाचोपमानत्वं सर्वेषाम्" देवस्य दीप्तिमतः भुवनम् लोकम् जगत् "विष्टपं भुवनं ज- गदित्यमरः" वश्यं स्वानुकूल स्वाधीनं विधातुं मूव कल्याणवती मृत्ती सत्स्वरूपा कल्याणवती कल्याणयुक्ता सुनन्दा मुष्ठु नन्दयतीति सुन- न्दा आनन्ददायिका सुमंगलांगोनयनेऽनुपक्ता समंगलस्य कल्याणस्य भद्रस्येत्यर्थः अङ्गोन्नयने अङ्गोत्थाने अनुपक्ता अनुरक्ता कीर्तिः समज्ञा प्रतिष्ठेति यावत् प्रससार पनाथ ॥ १॥ अत्र सगें उपजातिवृतिः।। आदीश्वरपक्षे-सुनन्दा सुमंगलाभिधाने पत्नीद्वये कीरुभयने विस्तारणे अनुपक्ता व्यापृतेति भावः ॥१॥ यशोमती नाम परैव सिन्धुावर्णनीया शतलब्धवणेः । नैर्मल्यवृत्तेः पयसांप्रवृत्तेस्तदुग्रजात्याः स महानुभावः॥२॥ :-यशोमती माम परासिन्धुरेच शतकम्यवर्गावर्णनीया नर्मल्या वृत्तः पयसा प्रवृत्तेः सदुप्रजास्याः स महानुभावः ॥ २ ॥ व्याख्या-यशोमतीनाम परैव सिन्धुः यशोमती नाम्नी परा काचित् अन्या जलप्रवाहरूपनो भिन्नासिन्धुर्नदी एव उभपोविशेषण भन्वयः-- १२२ महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्भानमहाकाये यथा व्यावर्णनीया शतलब्धवर्णैः शतानि शतसंख्यका अथवा शतश- ब्दस्यानेकसंख्यावाचकत्वात अनेकसंख्यका ये लब्धवर्णाः पण्डिता- स्तैरनेककविभिावर्णनीया विख्यापनीया कीर्चनीयेत्यर्थः अन्यत्र शतानि लब्धानि वर्णानि रूपाणि यैस्तैः शतलब्धवर्णैः अनेकवणः पक्षि- भिः व्यावर्णनीया कीर्तनीया "लब्धवर्णो विचक्षण इत्यमर" नैर्म- ल्यवृत्तेः नर्मल्यस्थिती नैर्मल्यविधौ निर्मलतायामित्यर्थः तदुग्रजात्याः अत्युच्चकोटिभूतायाः अन्यत्र उच्चैर्गिरिसंभूतायाः पयमा प्रवृत्तेः जल- धाराया इवेति शेषः "यथा उग्रजातिः अत्युग्ररूपा जलधारा निसर्गनि- मेला भवति तथेयमिति भावः" स महानुभावः यस्यैतादृशी कीर्तिः स इति शेषः महानुभावः महाशयः॥ यशोमती महावीरस्वामिनो धर्मपत्नी सापि यथोक्तविशेषणवि- शेपिता इति ॥२॥ प्रभावती यन्महसाऽभ्रतारा, सायंप्रकाशाद् बहुवन्दिपाठैः। कीविभोस्तच्छ्रवणाय मन्ये- ऽष्टौ स्वश्रुतीस्तेन विधिविधत्ते ॥ ३ ॥ भन्वय:प्रभावती यन्मइसा अभ्रतारा• बहुबन्दिपाठः सायंप्रकाशान् विभोः कीर्स: सवणाय विधिस्तेन भष्टी स्वश्रुतीविधत्ते इस्यहम्मन्ये ।। व्याख्या-प्रभावती विद्योतमाना यत् यस्मात् यो कीर्तिर्विमो. जिनेन्द्रस्य काव्यनायकानां वास्तीति शेपः सा कीर्षिः सायं प्रकाशात रात्रौ प्रकाशवाहुल्यात् महसा तेजसा प्रकाशविशेपेण अभ्रतारा गग. नस्य तारका इवेत्यर्थः विभोः प्रभोः कीर्यशसः बहुचन्दिपाठ: अने. कस्तुतिपाठकैर्मागघजनैस्त द्वारा तत् श्रवणाय श्रोतुं विधिर्मदा अष्टौ अष्टसंख्यकाः स्वश्रुतीः श्रवणेन्द्रियाणि विधत्ते विरचतीत्यहम्मन्ये
४२३
भाचार्यश्रीविजयामृतपरिभणीता सरणी टीका, सर्ग-९
जानामि अष्टदिग्भ्यस्तदीयकीर्तिश्राणायैव विधिःस्वकर्णमष्टधाऽधादि-
त्यहम्मन्ये जानामीति क्रियागतोत्प्रेक्षोपमा ।
अन्यत्र प्रभावती पार्श्वनाथप्रभोः पत्नी यत्महसा स्वसौभाग्येन
अनतारा विभोः पार्थप्रभोः कीस्तच्छ्षणाय विधिः स्वश्रुतीः अष्टौ
विधत्ते इति ॥ ३॥
प्रभोः प्रवृत्ति बहुधा यशोदा-
मनोविनोदात् सुमनःसमूहाः ।
गायन्ति नाके तरवः सुराणां,
तान् वर्धयन्ते कुसुमैर्भदम्भात् ॥ ४ ॥
अन्वयः~-यशोदा सुमनः समूहा मनोविनोदात् प्रभोः प्रवृत्ति यहुधा-
नाके गायन्ति सुराणां तरवः तान् भदम्भात् कुसुमैर्धयन्ते ॥ ४ ॥
व्याख्या-यशोदाः यशो ददतीति यशोदा: यशोदातार सुमन:-
समूहाः सुमनपान्देवानां समूहाः वृन्दाः वृन्दारकवृन्दाः मनोविनो-
दात् हृदयोल्लासाद प्रभोजिनेन्द्रस्य रामस्य कृष्णस्य च प्रवृत्ति पुण्यच-
रितं कीर्तिमित्यर्थः बहुधा अनेकशः नाके स्वर्गे गायति वर्णयति तान्
प्रभुकीचिंगायकान् देवान सुराणां देवानां तरवः कल्पवृक्षाः भदम्मात्
ताराच्छलाद कुसुमैः प्रसूनः वर्धयन्ते वर्धापयन्ति नीराजयन्तीति
मावः ॥४॥ गम्योत्प्रेक्षा।
क्वचिद् विशल्या विहिता त्रिलोकी,
गन्धर्वमुच्चैःश्रवसं विधाय।
कोा विभोर्भावनीया नयानां,
मुधा विधानेन सुधाशनानाम् ॥ ५॥
अन्वयः-विभोः कीया नयाना मावनया सुधाशनानां मुधाविधानेन
गन्धर्वमुच्चःश्रवसं विधाय त्रिलोकी कचिद्विशक्या विहिता ॥ ५ ॥
५२५ महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्धानमहाकावे व्याख्या-विभोजिनेन्द्रप्रभोः कीर्त्या यशसा सहेति शेषः नया- नाम् प्रभुप्रचारितसन्नीतीनां विभावनया विचारेण सुधाशनानाम् सुधाया अमृतस्य अशनम्भक्षणन्तेषाममृतभोजनानां मुधाविधानेन मिथ्याविधानेन निरर्थकत्वेन " यदा प्रभुगुणाः कर्णनस्वादुमाखाद्यते तदा सुधाशनं अनेकप्रयत्नपलब्धसुधाभोजनम्व्यर्थन्नीरसत्वादिति भावः " गन्धर्वमुच्चैःश्रवसं विधाय गन्धर्व गानम् प्रभुकीर्चिगानम् उच्चैःश्रवसं उच्चैः श्रवणं विधाय कृत्वा प्रभुकीर्तिगानमाकण्ठं श्रुत्वा त्रिलोकी त्रयाणां लोकानां समाहारत्रिलोकी त्रिजगत् कचित् यत्र कीर्तिश्रवणम्भवति तत्रैव विशल्या दुःखरहिता विहिता कता कीर्चि- श्रवणेन सर्वेपा त्रिविधदुःखमुन्मूलितं भवतीति भावः ।। अन्यत्र । विशल्या लक्ष्मणपत्नी त्रिलोकी गंधर्वमुच्चैःश्रवसं वि- धाय त्रिलोक्यां तदीयकीर्तिमतिशयं श्रुत्वा विहिता पत्नीत्वेन स्वी. कृता लक्ष्मणेन विवाहितेति तात्पर्यम् ॥ ५॥ मनोरमा वा रतिमालिका वा, रम्भापि सा रूपवती प्रिया स्यात् । न सुत्यजा स्याद् वनमालिकापि, कीर्तिविभोर्यत्र सुरैर्निपेया ॥६॥. भन्बय:--सुरैयंत्र प्रभोः कीर्तिनिपेया तन मनोरमा वा इति मालिका घा रूपवती सारंभा धनमालिकापि न सुत्यजा स्यात् किन्तु सुस्पजैव ॥६॥ व्याख्या-यत्र विभोजिनेन्द्रस्य कीर्तिः सुरेदेवेनिपेया पीता प्रमुकीर्तिः सादरेण श्रुता तत्र मनोरमा इति मालिका वा रूपवती. सा प्रसिद्धा रम्मापि प्रिया मनोज्ञा स्यात् किन्नैव सा प्रेयसीमवितुम. ईति कीचों समधिकमाधुरीत्वात् . वनमालिकापि न मुत्यना सात् ४२५ भाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-९ अवश्यमेव सुत्यजा भवेत् कीर्तेर्मधुरिमा एताम्योऽप्यधिकेति भावः ॥६॥ अतिशयोक्तिरलंकृतिः । यया स-आमोदवती विधेया, गानेन कीर्तेः सरसा रसज्ञा । आस्येन सा स्थाजितपद्मरूपा, सैवोदिता चाभयवत्यपि ज्ञैः ॥७॥ अन्वय-यया स-आमोदवती विधेया कीत्तानेन रसज्ञा सरसा भास्येन सा जितपभरूपा स्यात् सैव अभयवती भपि उता ॥ ७ ॥ व्याख्या-यया की स-आमोदवती आमोदवत्या सहिता स-आमोदवती आमोदकारिणी कीर्तेः जिनेन्द्रकीतैः गानेन कीर्तनेन रसज्ञा जिह्वा सरसा रसवतीविधेया कर्तव्या आस्येन मुखेन सा कीर्तिः जितपद्मरूपा जितम् पराजितम् पारूप कमलसौन्दर्य यया सा जित- पद्मरूपा सैव सा एव कीतिरेव ज्ञैः पण्डितै अभयवती निर्भयकारिका उदिता कथिता सा कीतिरेव सर्वाभयकारिणीत्यर्थः ॥ ७ ॥ यशस्सुवर्ण विहसत्सकर्ण, सदोपकर्ण विदधाति नृणाम् । सा सत्यभामा च गिरा सुसीमा, सा लक्ष्मणा रुक्मिनृपखसा या ॥ ८॥ भ वय ---नृणा सा सत्यभामा र गिरा सुपीमा सा सक्षमणा या ध रश्मिनृपत्वमा विसत् सकणं यश सुवर्ण सदोपकणं विदधाति ॥ ८ ॥ व्याख्या-नृणाम्मनुष्याणा मध्ये सा प्रसिद्धा सत्यभामा क प्णपत्नी गिरा वाण्या वाचकशब्देन सुमीमा तदभिधाना सा लक्ष्मणा या च रुक्मिनृपम्बसा रुक्मिराजमगिनी रुक्मिणीति यावद् एता: - - १२६ महोपाध्यायभीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्धानमहाकाव्ये www कृष्णपत्न्यः विहसत् सकर्ण कर्णेन सहितः मकर्णस्तं विहसत् यश- खिनम् कर्णनृपमपि विहसत् निन्दत् यशःसुवर्ण कीर्तिसुवर्ण मदा सर्वदा उपकर्ण कर्णसमीपं विदधाति शृणोति कृष्णपत्न्य अपि एताः प्रभोर्यशः सदैवाकर्णयन्तीति भावः ॥ ८ ॥ गौरीव कान्त्या परिपूरणेन, पनेव निश्छद्मतया जयाय । गान्धारिका जाम्बवती च साम्ब- प्रद्युम्नलीलालयमाश्रयन्ती ॥९॥ भन्वय.-कात्या परिपूरणेन गौरीन निश्छद्मतया जयाय पमेव साम्बप्र- घुम्नलीलालयमायती गाधारिका जाम्बवती च ॥ ९ ॥ व्याख्या-सा कीर्तिः जिनेश्वरकीर्तिरितिभावः कात्या दीप्त्या परिपूरणेन कान्तिसमूहेन गौरीव कृष्णपत्नी वीतभयतनयेव अथ च गौरी पार्वतीच निश्छमतया निष्कपटतया जयाय त्रैलोक्यविजयाय पमेव पद्मा कृष्णपन्नी हिरण्यनामकन्या सेव अथ च पद्मा लक्ष्मीः सेव साम्बप्रद्युम्नलीलालयमाश्रयन्ती माम्बश्च प्रद्युम्नश्चेति साम्बप्रद्युम्नौ तयोर्लोला साम्बप्रद्युम्नलीरा तस्या लयं संश्लेपं संम्बन्धम् आश्रय. न्ती संस्पृशन्ती गांधारिका कृष्णपत्नी नग्नजित्तनया जाम्बवती कृष्ण, महिपी जाम्बवतः दुहिता वा अथ च साम्बप्रद्युम्नलीलालयमाश्रयन्ती अम्व्यते स्निह्यतीत्यम्या प्रकृष्टं शुम्नं बलं यस्य स प्रद्युम्नः तयोः स्नेहबलयोः लीलालयं लीलासंबन्धम् आश्रयन्ती गांधारी जाम्बवती इबुप्पो झापादेपरने पर सरकीर्तिपितर अति शेप भालंकार। पटीयसी कीर्तिरियं नटीव, लोके नरीनर्ति विभोर्विभाते ।
माचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी का. सर्ग-९ अन्वयः- यद्वन्दिवृन्दैरुपगीयतेऽसौ, निपानतोऽस्या विधुरेतिकामी ॥ १० ॥ -~-प्रभो पटीयसी इयं कीर्तिः लोके नटीव नीनत्ति विभाते बसौ बन्दिवन्दैर्यद् उपगीयते अस्या निपानतः इति कामी विधुरा ॥ १० ॥ व्याख्या-प्रमोर्जिनेन्द्रस्य पटीयसी पटुतरा इयं कीर्तिः लोके जगति नटीव नरीनर्ति भृशं नृत्यति विभाते प्रातःकाले बन्दिवृन्दैः मागधैः यद् असौ कीर्तिरुपगीयते वयेते अस्याः कीर्तः निपानतः श्रवणतः कामी कमनीयः विधुः चन्द्रः इति समासः यत् कीर्तिनि- पानेन चन्द्रसुपमा समाप्तव भवतीति भाषा अथवा इति प्रकाश: तं कामयते इति इतिकामी विधुरा विषण्णा कीर्तेः सकाशादन्यप्रकाशा- भावादिति भावः 'इति हेतुप्रकरणप्रकाशादिसमाप्ति'वित्यमरः॥१०॥ विदेहशोभाकरणेन सीता, प्रभावती या च भुवः शिवस्य । लीना कवेर्योधभरस्मरातें, रतिप्रभाश्रीहदि कुन्ददामा ॥ ११ ॥ अन्वय.-विदेहशोभाकरणेन सीता भुवः शिवस्य याच प्रभावती ये: छीना बोधमरस्मरा अंगे रतिप्रभा श्रीहदि कुन्ददामा ॥ ११ ॥ व्याख्या-विदेहस्य विदेहदेशस्य मिथिलादेशस्य अथवा विदे- हस्य देहाभिमानरहितस्य जनकनृपय शोभाकरणे मण्डनकरणे सौन्द- यसंपादने कांतिविस्तारे इति यावत् सीताजनकनन्दिनीर यद्वा वि. शेषेण देहशोभाकरणे देहसौन्दर्यसंपादने सीता लक्ष्मीरित्र अथ च विदेहस्य शिवस्य देहशोभाकरणे अर्धाङ्गसंपादने सीता उमा इव यद्वा विदेहस्य देहममतारहितस्य साधोः सीता गंगेव निर्मलेति मावः मुकः शिवस प्रभावती भुवः पृथिव्याः शिवस्य देवस सूर्यस्येत्यर्थः प्रमा.
महोपाध्यायनीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्भानमहाकाये
वती प्रमा प्रकाशिका शक्तिः कवेः कवित्वशक्तिमतः लीना आश्लिष्टा
योधभरस्मरा योधभरेण ज्ञानभरेण स्मरा स्मृतिरिख अंगे शरीरे
रतिप्रभा रतेः कामपत्न्याःप्रभा इव सौन्दर्यसम्पत्तिरिव श्रीहदि श्रियः
लक्ष्म्याः हृदि हृदये कुन्ददामा कुन्दपुष्पस्रगिव कुन्दकुसुममालेव सा
कीतिविरराजेति शेपः ॥११॥
सीता-प्रभावती-रतिप्रमा-श्रीदामा-इति चतस्रो रामपल्य:
विराजन्त इति शेषः ॥ ११ ॥
तदा समुद्भूतमया (?) दनीति-
भावः पुरे व्यासि तमः प्रसन्नम् ।
कोलीनवांस्तद्धरणेन सीता-
मापन्नसत्वां स वने मुमोच ॥ १२ ॥
भन्धयः--तदा समुद्भूतमयात् भनीतिः भावः तमः प्रसवम् पुरे व्यासि
कौलीयान् स तदरणेन आपनसत्वां सीता वने मुमोच ॥ १२ ॥
व्याख्या-तदा रामराज्यकाले समुद्भूतमयात् उत्पन्नमयात्
अनीतिमावः अन्यायभावः जात इति शेष: सीतां विद्विपतीभिः
सपत्नीभिस्तथा प्रपश्चितं यथा राममनसि किमप्यनीतिभावः जात
इति तत्वम् तद्धरणेन तस्याः सीतायाः धरणेन रावणगृहादानीय-
स्वीकारेण तमः प्रसन्नम् सीतारावणाङ्कगताऽऽसीदिति कथं निष्कल्म-
पति सीतामाश्रित्य जनापवादरूपं तमः मालिन्यं प्रसन्नम् बहुलीभूत
पुरे नगरे अयोध्यायां व्यासि व्याप्तम् कोलीनवात् कुलाभिमानी स
रामः आपन्नसत्वाम् सगर्माम् सीताम् जनकराजदुहितरम् वने निर्ज-
नारण्ये मुमोच तत्याज जनापवादमीत्या सगर्मामपि सीतां बने त्य-
क्तवानित्यर्थः ॥ १२ ॥
१२९ माचार्यश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-१ अन्यपक्षे-तदा समुद्भूतमयादनीतिभावः तस्याः मदिरायाः समुद्भूतमयात् उत्पतेः पुरे देहे " पुरे देहे च गैहे शब्दस्तोममहा- निधिः" अनीतिमावः अन्यायभावः अकीर्तिः व्याप्तिर्जातेति शेपः अनीतिभावो व्याप्तः प्रसन्नम् प्रभूतं तमः अज्ञानम् व्याप्तिः 'सर्वतो व्याप्तम् तद्धरणात् तस्या आसेवनाद कोलीनवान् कुलीनस्य भावः कोलीनः कुलीनता सोऽस्यास्तीति कोलीनवान् कुलाभिमानी अथवा कोलीनः परीवादः निन्देत्यर्थः तद्वान् स आपन्नमत्वाम् आपन: अधिष्ठितः य॑न्तरादिर्यस्यां सा आपनसत्वा ताम् सीताम् मदिराम् बने निर्जने मुमोच तत्याज परिजही 'सीता लांगलपद्धतौ जनकदुहितरि लक्ष्म्यां उमायां मदिरायां चेति' शब्दस्तोममहानिधिः ॥१२॥ श्रीसूर्यवंश्यक्षितिपाश्रयेण, प्रभूतसून्वोरभवत्प्रसिद्धिः । अनङ्गशब्दाल्लवणोऽग्रजन्मा, परः परद्धर्या मदनाङ्कुशाख्यः ॥ १३ ॥ भन्वय:-श्रीसूर्यवंशक्षितिपाश्रयेण प्रभूतस्न्वोः मननशब्दालवणोऽप्रम- न्मा पर: परखुर्या मदनांकुशाख्यः प्रसिद्धिरभवत् ॥ १३ ॥ व्याख्या-श्रीसूर्यवंशक्षितिपाश्रयेण श्रीसूर्यवंशस्य यः क्षितिपः राजा तदाश्रयेण तदधिकारेण तदनुसारेणेत्यर्थः प्रभूतान्योः प्रभूत योरुत्पन्नयोः सीताकृक्षिसंभूतयोः सून्वोः पुत्रयोर्मध्ये इति शेषः अ अजन्मा प्रथमप्रसूतः अनंगशब्दात् परः लवणशब्दस्तथा अनङ्गलवणः इत्यभिधानो ज्येष्ठः परः कनिष्ठः परां महा मदनांकुशाख्यः मदनांकुशनामा प्रसिद्धिः प्रख्यातः अभवत् अनगालवणमदनांकुशना मानौ प्रसिद्धौ अभवतामित्यर्थः ॥ १३ ॥ पक्षान्तरे-श्रीसूर्यवंशक्षितिपाश्रयेण पञ्चानामपि चरित्रनाय महोपाध्यायधीमेधविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये AAAAA AAM कानां तीर्थकराणां स्वतः परम्परया वा सूर्यवंशप्रभवत्वात् कृष्णस्य च तथात्वात् श्रीमूर्यवंशक्षितिपाश्रयेण प्रभूतमून्योः मुन्वश्च सून्वश्च पुत्रश्च पुत्र्यश्चेत्यनयोरेकशेष इति सून्वौ प्रभूतौ च तो सून्वो चेति प्रभूतसून्यौ तयोः प्रभूतसून्वोः प्रसिद्धिः प्रख्यातिरभवत् अजायत अग्र- जन्मा पुत्रः अनङ्गशब्दाल्लघणः अनङ्गं कामं लुनाति स्वसौन्दर्यणाद्या करोतीति अनंगलवणः परः द्वीतिया कन्यारूपः सन्तान: मदनांकु- शाख्यः मदन काममहुशयति उत्तेजयतीति मदनांकुशा आख्याऽभि- धानं यस्य स मदनांकुशाख्यः संतानशब्दस्य पुंस्त्वात्पुन्निर्देशः मदनां कुशनाम्नी कन्या प्रसिद्धा जातेति भावः श्रीनेमिनाथपक्षे सन्बोरित्य- सानुजयोरित्यर्थः ॥ १३ ॥ विभावसोरभ्युदये सुरायः, प्रपञ्चतः कोऽपि महर्पियोगात् । चक्रे स तद्भूमिसुतात्मशुद्धि, सापि प्रपेदे व्रततीव्रभावम् ॥ १४ ॥ अन्वयः--कोऽपि सुरायः प्रपचतः महर्पियोगात् निभायसोः अभ्युदये स तभूमिसुता मशुद्धि चक्रे सापि प्रततीप्रभावप्रपेदे ॥ १४ ॥ व्याख्या-विभावसोः अग्नेः अभ्युदये प्रज्वलिते अग्निकुण्डे इत्यर्थः कोऽपि कचिदपि सरायः सुरान् देवान् अयते नियोजयतीति मुरायः सुरेन्द्रः महपियोगात् महर्षेः-तदानीमयोध्यावहिल्याने स्थि. तस्य जयभूपणमुनेः केवलज्ञानमुत्पन्नमिति सुनासीरादयः सुरास्तत्रस- माजग्मुः देवाय सीताशुदि महेन्द्र पजिनपन् महेन्द्रोऽपि प्रत्यनी. कपतिन्तत्र नियुज्य स्वयं मुनेः केवलज्ञानमहोन्म विदये इति प्रपं. चतः निधानतः स रामः तत् प्रसिद्धम् भूमिमृतात्मशुद्धि भूमिसुताया जानक्या आत्मशुद्धि आत्मपूतां दिव्यरूपामित्यर्थः चके विदधे सापि -पाधीविजयामृतरिभणीता सरणी टीका. सर्ग-१ आत्मविशुद्धा सीतापि तीवभावम् व्रतस्य चारित्र्यग्रहणस्य तीव- भावम् चारित्यग्रहणनिश्चयनियमम् प्रपेदे स्वीचकार यद्वा प्रतनीम- भावम् प्रतरूपकाठिन्ये यथावनियमपालनसंकल्पं प्रपेदे सीता विशुद्धा सती जयभूपणकेवलिनः पादे प्रव्रज्यामग्रहीदिति तत्वम् ॥ १४ ॥ सुरानुभावाद भुवि सत्रनिटे, जिनाग्रजाते हरिविप्रयोगात् । हिरण्यरेतःपुरसन्नियोगे, देवस्तुरियादिभुवं दिदेव ॥ १५ ॥ . अन्वयः-सुरानुभावात् भुवि सत्रनिष्टे जिनाग्रजाते ६रिदिप्रयोगात् हिर- पपरेत:पुरमनियोगे देव: रियादिभुव दिदेव ॥ १५ ॥ व्याख्या-सुरानुभागात सुसया मदिराया अनुभावात् प्रभा- यात् अथवा सुरस्य अग्निकुमारस्य अनुभावात् प्रभावतः मुवि पृथिव्यां जिनाग्रजाते जिनस्य नेमिनाथस्य अग्रजाते अग्रगे कृष्णे सत्रनिष्ठे बनस्थे अमिकुमारेण दह्यमानां द्वारका विलोक्य वनवासिनि कृष्णे सति हरि- विश्योगात हरेश्मेषिप्रयोगात् विशेषेण प्रयोगात् प्रवर्धमानात यद्वा हरति पापमिति इरिजिनेन्द्रो नेमिनाथः तस्य विप्रयोगात् विश्लेपात् हिरण्यरेतः पुरसन्नियोगे पुरे मन्नियोगः संयोगः पुरसनियोगः हिर- ण्यरेतसः अनेः पुरसन्नियोगः हिरण्यरेतःपुरसन्नियोगे अनिमावभूते नगरे "हिरण्यरेता हुतभुग दहनो हव्यवाहन इत्यमरः" देवः कृष्णः तुरीयादिभु तुरीयस्य चतुर्थस्य आविस्तृतीयः स चासो भवति तुरीयादिभुवं तृतीय भुवं तृतीयनरकं दिदैव जगाम ॥ १५ ॥ 'सत्र स्थाने यज्ञभेद सदादाने आध्ये' इति शब्दस्तोममहानिधिः ।। तदायजन्मा बहुशोचनेन, मोहात्समुल्लासिविलोचनेन।
ब महोपाध्यायधीमेषविजयगणिविरचिते सप्तसम्भानमहाकाव्ये Awammar पदे पदे चानकमोचनेन, प्रवृत्तिमाधत्त विरोचनेन ॥ १६ ॥ अन्वयः--तदा भनजन्मा बहुशोचनेन मोहात् समुल्लासिविलोचनेन पदे पदे च आनकमोचनेन विरोचनेन प्रवृत्तिम् माधत्त ॥ १६ ॥ व्याख्या-तदा कृष्णदेहपरित्यागे सति अग्रजन्मा अग्रे प्रथम जन्म यस्य म अग्रजन्मा जन्मतः श्रेष्ठः बलदेवः पहुशोचनेनं अत्यं. तमन्गुना मोहात कृष्णप्रेमतः समुल्लासी विकखरे विलोचने यस्य स मोहान समुल्ला सिविलोचनस्वेन भातृस्नेहवशान्निनिमेषचक्षुपा पदे पदें च स्थाने स्थाने आनकस्य उत्साहस्य धैर्यस्येति यावत् मोचनेन परि- त्यागेन विरोचनेन विगतं नष्टं रोचनं कुत्रापि रुचिर्मनोनियुतिर्यस्य तेन विगतमुखेन प्रकृतिम् प्रवर्तन विहरणम् आधत्त प्रत्यपत्त कृष्णं स्कन्धे निधायेतस्ततः परिवनामेत्यर्थः ॥१६॥ बनाम नभ्राडिव वृष्टिधारा, नन्दन् स वर्षार्धमुदूढवन्धुः। वृथा कथाभिननु योधनेन, पटुर्वभूवामरवोधनेन ॥ १७॥ भन्ययः-उदयंधुः स नाडिव गृष्टिधारा नन्दन वर्षाधम् बधाम वृथाकधामिनंनु योधनेन भमरयोधनेन पटुर्यभूय ॥ 1 ॥ व्याख्या-उढयंधुः उढः स्कन्धेन धृतः बंधुः कृष्णो येन स उढयंयु स्कंधकृतकणः नमाडिव मेघ इव पृष्टिधारा वर्पधारा नन्दन अभिनन्दन वर्षासमये वृष्टिधाराः सहन् यद्वा पृष्टिधारा नय- नाश्रुधारा नन्दन् प्रसवन् स पलदेवः गर्घमू पद्मासपर्यन्तं प्राम विचचार पृथाकयामिः 'कोऽपि देवः सिद्धार्थस्तदीपनाता मृतो देवः सन् अश्ममयं ममस्थं योजगन् चलेन विहसितः प्रत्याह यः संग्रामे भाधानीविशयामृपरिप्रणीता सरणी टीका. सग-१ धन्वय-आत्तपत तप्तनपा कदाचिदपि न मृतः स इदानीम्मृतो यदि जीवेत्तदा रथोऽयं सजो भवेत् अथ च ग्राणिकमलमारोपयन् तथैव चिहसिनः यदि मृतो जीवेत्तदाऽश्मनि कमलमपि रोहे दित्यादि कथाभिः अमरवोधनेन सिद्धार्थजीवभूतदेवयोधनेन पटुन नवान् अयम्मे भ्राता मृतः किमेनं वहामीति जातप्रत्ययः बभूव जातः ॥ १७ ॥ आत्तत्रतस्तप्ततपाः सारानः, क्षमाश्रमान्नितिरूपधाम । लब्ध्वाऽमृतस्याशनमाससाद, द्राक् पञ्चमी तां च दिवं व्यतीत्य ॥ १८ ॥ मराम धमाश्रमात् निनिरूपधाम लावा दार पञ्चमीम् ताम् च दिर प्रतीत्य भागासासनम् भाममाद ॥10 व्याख्या-आत्तवतः आत्तम् प्राप्तम् स्वीकृतमिति यावत् व्रतं चारित्यं येन म आचवतः गृहीतचारिन्यः तप्ततपाः तप्तमनुष्ठित तपः योगः ममाधि न म तप्ततपाः ममनुष्ठितयोगः स रामः पल. देवः क्षमाश्रमान चारिन्यग्रहणाद माधुपात नितिरूपधाम अत्य- न्तसुसमयमदनम् यद्वा क्षमा क्षातिः तद्रपाश्रमात् चतुर्थाश्रमादित्यर्थः प्रज्याग्रहणतः द्राक् झटिति ताम् प्रसिद्धाम् पशमीन्दिरम् पश्चमम्ब. र्गस्थानम् व्यतीत्य उपभुज्य तत्र भाग्यममयं यारन गुज्या अमृतस्य अशनं यत्र तत् अमृतमोजनम् देवत्वम् आममाद देवो बभूव ॥१८॥ अथ क्षपारक्षिगणे गणेशा, विद्यातपःसत्यगवीदिवेशाः। संप्राप्तनिःश्रेयसभूप्रदेशाः, परम्परान्नायविदां सदेशाः ॥ अम्रप.-मय समापिसे गfiumपमा मना- शनि पमभूदेता. ARRAIदा मदेशा..... .
४३४ महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये ~NP व्याख्या-अथ अथानन्तरम् भगवनिर्वाणानन्तरम् क्षमारक्षि. गणे क्षमा तितिक्षा "वाखे बाध्यात्मिके चैव दुःखे चोत्पाति के क्वचित न कुप्यति न वा हंति मा क्षमा परिकीर्तिता ॥ आकृष्टोऽभिहतो वापि वा कौशेन च हंति वा । अदुष्टैर्वाचन कार्यस्तितिक्षोः सा क्षमा स्मृ- तेति स्मृतिः" तां रक्षितुं पालयितुं शीलमस्येति क्षमारक्षी स चासो गणश्चेति क्षमारक्षिगणः तत्र यद्वा क्षमारक्षिणां गणः संघस्तत्र गणेशाः प्रधानभूताः विद्यातपःसत्यगवीनिवेशाः सत्या चासौ गौर्वाणी चेति सत्यगवी विद्या च तपश्च सत्यगवी चेति द्वन्द्वः तेषु निवेशः अभि- निवेश आग्रहो येषां ते विद्यातपःसत्यगवीनिवेशाः ज्ञानाध्ययनसन- तप्रवृत्तयः संप्राप्तनिःश्रेयसभूप्रदेशाः संप्राप्ता अधिगता निःश्रेयसस्य मोक्षस्य भूप्रदेशाः भूसान्निध्य यैस्ते अधिगतकल्याणभूमिसन्निकर्पाः परंपराम्नायविदां सदेशाः परंपरा अविच्छिन्नो य आम्नायः संप्रदाय: गुरुक्रमो वा स परम्पराम्नायः तं विन्दन्ति जानन्तीति परम्पराम्ना. यविदः निरवच्छिन्नसंप्रदायज्ञानिनस्तेषां सदेशाः सन्निभाः सदृशा इत्यर्थः गणधरा राजानश्च अभवन्निति शेषः ॥ १९ ॥ गणोग्रणीः श्रीऋषभादिसेन- स्त्विपा जितग्लोपभादिसेनः । श्रीनाभिसेनान्वयिपुण्डरीकः, प्रभाविभासी यतिपुण्डरीकः ॥ २० ॥ भन्वयः--गणाग्रणी. स भादिसेन. विपा जितग्लोः वृषभादिसेना श्रीनाभिसेनान्वयपुरीकः निभाविलासी.यतिपुण्डरीकः ॥ २० ॥ व्याख्या-गणाग्रणी: गणेषु गणधरेषु अग्रणीः अग्रे नीयतेऽसो अग्रणीः गणाग्रणीः गणश्रेष्ठः श्रीऋपभः आदिर्यस्य सेनस्य स ऋपभा- दिसेनः ऋपभसेनः तदभिधानः विपा जितम्लो विपा कांत्या जितः . भाचार्य भीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-१ पराजितः ग्लौश्चन्द्री येन स कान्तिपराजितचन्द्रः "ग्लौगांकः कला- निधिरित्यमरः" अनेन तस्मिन् सर्वश्लाध्यत्वं व्यज्यते वृपभादिसेनः घृपभसेनः श्रीनामिसेनान्वय पुण्डरीकः श्रीनाभिसेनस्य नामिनृपतेर्यो- ऽन्यः वंशकुलमित्यर्थः स नाभिसेनान्त्रयः तत्र पुण्डरीकमिव कम लमिवेति श्रीनाभिसेनान्वय पुण्डरीकः प्रभाविलासी प्रभया दीप्त्या विभासितुं शोभितुं शीलमस्येति प्रभाविलासी दीप्तिमान् यतिपुण्ड- रीका यतिपु संयमिषु पुण्डरीकमिवेति यतिपुण्डरीका अथवा यति- थासौ पुण्डकश्चेति यतिपुण्डरीका ऋषभसेनः भरतचक्रवत्तिस्तनय- स्तस्यैवापरनाम पुण्डरीक इति अत एवात्र कर्मधारयोऽपि संगच्छते ।। चक्रायुधः श्रीवरदक्षशक्ति- स्त्वथार्यदत्ताभिधयाऽवधार्यः । श्रियेन्द्रभूतिविवुधार्चितत्वात्, तत्वानि वेत्ता तपसाऽग्निभूतिः ॥ २१ ॥ अन्वय -चक्रायुध धीवरदक्षशक्ति तुमय भार्यदाभिधया भरधा: श्रिया इन्द्रभूति विबुधार्चितस्वात् तस्वानि वेत्ता तपमा भनिभूति ॥ २१ ॥ व्याख्या-चक्रायुधः श्रीशान्तिनाथस्य तनयः श्रीपरदक्षशक्तिः श्रीनेमिनाथस्य गणघरः तु पुनः अथ आर्यदत्तः इति अमिया नामा अवधार्यः योध्यः श्रिया संपत्या कात्या इन्द्र इव देवेन्द्र व भूतिर- भय यस्य स श्रियेन्द्रभूतिः इन्द्रभूतिनामा श्रीमहावीरस्वामिनो गण- धरः वियुधार्चितत्वात् वियुधैर्देवैः पण्डितवां अर्चितत्वात् पूजितत्वात तत्वानि परमार्थवस्तूनि वेत्ता ज्ञानवान् तत्वज्ञानवान तपमा संयमेन अमिभूतिः अग्निरिव भूतिः विभूतिः पराकमो यस स तपसाऽग्नि भूतिः कर्मदाहकत्वादिति मायः अथ च अग्निभूतिरित्याग्व्यः श्रीम- हावीरस्वामिनो गणधरः ॥ २१ ॥ .
महोपाध्यायश्री मेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाये
अन्वय'-
चर्याप्रवन्धात् स हि वायुभृति-
व्यक्तः सुधर्मा शुभपट्टधर्मा।
अकम्पितोऽर्चिनिचयः प्रभासः,
श्रीमण्डितः पण्डितवीर्यवासः ॥ २२ ॥
--चर्यानधात् स हि वायुभूति व्यक्त सुधर्मा शुभपट्टधर्मा अझ-
पित अधिनिचय प्रभास पडितवीर्यवाप्स श्रीमण्डित ॥ २२ ॥
व्याख्या-चर्या प्रबंधात् चर्याया मम्यनियमपरिपालनस्य
गुरूपदिष्टताधनुष्ठानस्य अया चर्याया इर्यापथस्थितेः अटाट्याया वा
प्रबंधात् प्रकृष्टबंधात् नियमात् संदर्भादित्यर्थः स हि वायुभूतिः वायु-
रिव भूतिः यस्य स अथवा वायुभूतिनामा गणधरः व्यक्तः व्यज्यते
गुणैरिति व्यक्तः गणधरः शुभपट्टधर्मा शोभनः प्रशस्त पट्टधर्म:
पीठधर्मो यस्य स मुधम शोभनो धर्मोऽस्य स तदाख्यो गणधरः अक-
पिता न कम्पते कुतोऽपीति अकंपितः तदाख्यो गणधरः अर्चिनिचयः
प्रभामः अर्चिपान्तेजमा निचयः पुस्खा राशि प्रभास. प्रण भासते
इति प्रमामः पण्डितनीयवामः श्रीमण्डितः श्रिया तपश्रिया दीप्त्या-
प्रमया मण्डित. शोभितः इति श्रीमण्डितः अथवा गुणैर्दयादाक्षिण्या-
दिभिः मण्डयते स्मेति मण्डिनः श्रीयुक्तचासौ मण्डितथेति श्रीमण्डितः
मध्यमपदलोपी समामः तन्नामको गणधरः ॥ २२ ॥
स मोर्यपुत्रः प्रतिभापवित्रो,
मेतार्यनामाप्यनिवार्यधामा ।
श्रुतोऽचलभ्रातृतया नयाट्यो-
ऽनङ्गोऽप्यनगाड़शलब्धसिद्धिः ॥ २३ ॥
भरप-प्रतिभापनि म मौर्यपुत्र अनिवार्यधाम र मेवानामा
भयान मशरभागया Yr Nो R भनानि ॥ २५ ॥
४३७
माधायनीविनयामृतरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-९
..
व्याख्या-प्रतिमया युद्धया पवित्रा निष्कल्मपः इति प्रतिभा-
पवित्रः निर्मलवुद्धिः स मौर्यपुत्रः तदाह्वो गणधरः अनिवार्यधामा
अनिवार्यमनिरुद्धं अपराभूतमित्यर्थः धाम तेजो यस्य स अप्रतिमते-
जस्क: मेतार्थनामा मां लक्ष्मीमितः प्राप्तः इति मेतः स चासौ आर्य-
थेति मेतार्यः तदाख्यो गणधरः नयाद्यः नीतिमान् अचलनात तया
श्रुतः ख्यातः अनंगोऽपि अनंगाङ्कुशलब्धसिद्धिश्चेति सर्वे गणधरा२३
सुश्रीधरः सर्वहितैर्यशोभि-
दिक्शोभिना यस्य सुपार्श्वकीर्तिः ।
श्रीकेशवः क्लेशवतो विनेता,
नयेन पृथ्वीतिलकः प्रथावान् ॥ २४ ॥
अन्वयः-सर्वहित र्यशोभिः सुश्रीधरः दिक्शोभिना नयेन यस्य सुपार्श्व-
फीतिः शवतो विनेता पृथ्वीतिलकः प्रथावान् श्रीकेशवः ॥ २५ ॥
व्याख्या-सर्वहितैः सर्वेषां चराचराणां हितहितप्रयोजकर्यशो-
मिः कीर्तिभिः सुश्रीधरः मृष्टु शोभना चासौ श्रीक्षेति सुश्रीस्तांध-
रवीति सुश्रीधरः शोमनश्रीमान् अथवा सर्वहितपशोभिरुपलक्षितः
सुश्रीधरस्तन्नामा श्रीपार्श्वनाथस्वामिगणधरः यस्य प्रभोरिति शेपः
दिक्शोभिना दिशांशोभयतीति तेन दिशामुद्योतकारकैण नयेन नीत्या
सुपार्श्वकीर्तिस्तदाख्यः क्लेशवतो विनेता क्लिश्यते उपतापयतीति क्लेशः
स अस्यास्तीति क्लेशवान् उस्स विनेता शिक्षकः सत्यार्थप्रवर्चयिता
पृथ्वीतिलकः पृथ्व्यां भूमौ तिलक इवेति पृथ्वीतिलकः भूविशेषक:
प्रथावान् कीर्तिमान् श्रीकेशवः के मुसे शेते प्रभवतीति केशवः यद्वा
के जले शेते इति केशवः केशाद्वोऽन्यतरस्यामिति वः 'मारुने वेधसि
वप्ने पुंसि का कं शिरोऽम्युनो रित्यमरः 'को ब्रमणि समीरात्मयमद.
क्षेषु भास्करे मयूरेऽम्नां च पुंसि सारसुसशीर्पजलेपु कामिति मेदिनी
श्रीकृष्ण इत्यर्थः॥ २४ ॥
११० महोपाध्यायधीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाग्ये भद्रपदम् कल्याणपदम् आदधतो स्वस्थाने निवेशयता यशोभद्रस्वामी तत्पश्चात्तत्पट्टेऽभवदिति भावः अन्तरीपम् द्वीपम् जम्बूद्वीपम् अद्भु- ताय लोकानामिति शेपः अलंकृतं शोभितम् श्रीमहावीरस्वामिगुरुप- रम्परागतैरतेर्जम्बूद्वीपमलंकृतमिति तात्पर्यः ॥ २७ ॥ संभूतपूर्व विजयं दधानः, स भद्रवाहुर्यशंसां समुद्रः। श्रीस्थूलभद्रोऽपि गिरिस्तथार्य- नाम्ना ततश्चार्यसुहस्तिसूरिः ॥ २८ ॥ भन्वयः-संभूतपूर्व विभय दधानः संभूतविजयः यशसा समुद्रः स भद्रबाहुः श्रीस्थूलभद्रः तथा आर्यमहागिरिः तत: नाम्ना भार्पसुहस्तिसूरिः २८ व्याख्या-संभूतपूर्व विजयं दधानः संभूत इति पूर्व पूर्वभाग यस्य एवंभूतं विजयं तं पदं दधानः अथ चे संभूतो रागादिविजयो यस्य स संभूतविजयः यशसां कीर्तीनां समुद्रः कीतिरनाकरः स प्रसिद्धः भद्रबाहुः भद्रो कल्याणगुणसंपन्नों वाहू यम्य स तथोक्तः ततस्तदनन्तरम् स्थूलभद्रः स्थूलमुपचितं भद्रं कल्याणं यस्य स तथा आर्यनाम्नागिरिः आर्यमहागिरिः परिपहाद्युपद्रवैरकंप्यत्वात् महा- गिरिरिवेति महागिरिः स चासौ आर्यवेति आर्यमहागिरिः ततस्तद- नन्तरम् आर्यसुहस्तिसूरिः कर्ममोन्मूलने सुहस्तीवेति सहस्ती आर्य- थासौ सुहस्तिसूरिश्चेति आर्यसुहस्तिमरिः तत् परम्परापां क्रमादागता एते नव श्रुतकेवलिनः ॥२८॥ अन्येऽपि मान्या हरिभद्रसूरि- शीलाइनामाभयदेवमुख्याः। श्रीहेमचन्द्रा मलयाद गिरीशा, जीयासुरुद्योगधिया गिरीशाः ॥ २९ ॥ :
आचार्य श्रीविजयामृतसूरिभणीता सरणी टीका सग-९ ४३१ अन्वयः-अन्येऽपि मान्या हरिमद्रसूरिशीलानामा अभयदेवमुख्या: श्रीहेमचन्द्रा. मलयात् गिरीशा उद्योगधिया गिरीशा. जीयासुः ॥ २९ ॥ व्याख्या-अन्येऽपि पूर्ववर्णितेभ्योऽन्ये भिन्नाः हरिभद्रसरिः हरिभद्रसुरिनामा १४४४ चतुश्चत्वारिंशदधिकचतुर्दशशतग्रंथप्रणेता शीलांकनामा श्रीशीलाकाचार्यः आचारांगसूत्रटीकाकारः अभयदेव- मुख्याः अभयदेवमूरिः नवांगटीकाकृत तथा श्रीहेमचन्द्रा: श्री हेम- चन्द्राचार्याः अनेकग्रंथप्रणेतारोऽपरवाचस्पतिरूपाः उद्योगधिया उद्यु- ज्यते इत्युद्योगः तस्य धिया बुद्ध्या उद्योगबुद्ध्या गिरीशाः सुमेरुप- र्वताः देवानां कार्योद्योगस्तत्रैव भवतीति यथा मुमेरुर्मन्त्रणास्थानम् तथा एते इति भावः अथवा उत् उत्कृष्टो यो योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः यद्वा योगः शामनाराधनाध्यवसायः तद्धिया तन्मत्या गिरीशाः सुमेरुपर्वतकल्पाः अनेकानेकप्रत्यूहपवनेऽपि निःप्रकम्पा इति भाव: मलयात् गिरीशाः मलयगिरीशा इत्यादयः सूरीश्वरा जीयासुः सर्वो- स्कपेण वर्चिपीरन् ।॥ २९ ॥ सुवर्णवर्णं गजराजगामिनं, प्रलम्बवाहुं सुविशाललोचनम् । नरामरेन्द्रैः स्तुतपादपङ्कजं, नमामि भक्त्या वृपभं जिनोत्तमम् ॥ ३० ॥ भन्वय -सुवर्णवणं गजराजगामिनम् प्रलम्बबाहुम् सुपिशाबोधनम् मरामरे ट्रैः स्तुतपादपकनम् जिनोत्तमम् वृषभम् भक्या नमामि ॥ ३०॥ व्याख्या-सुवर्णपर्णम् सुवर्णः स्वर्ण इच वणों यस्य स सुवर्ण- वर्णस्तम् प्रकाशमयत्वाद तथा गजराजगामिनम् गजानां गजेपु वा राजा गजराजः हस्तिराजः स इव गंतु शीलं यस्य स गजराजगामी तम् धीरोदाचत्वात् निर्मोकगमनः प्रलम्बवाहुम् प्रलम्बी पाहू यस्य स .
महोपाध्यायनीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्मानमहाकावे स्फुरन्मनीपाविमलः सुभद्रा- नुरागभागर्जुन एव लोके । श्रीसत्यकीर्तिर्युवमङ्गलाख्यो, निर्व्याजसाम्राज्यवतामपीज्यः ॥ २५ ॥ अन्वयः-स्फुरन्मनीपा विमलः सुभद्रानुरागभार भन एव लोके नियाजसान ज्यवतामपीज्य. श्रीसत्यकीर्ति ध्रुवमङ्गलारयः ॥ २५ ॥ व्याख्या-स्फुरन्मनीपा विमलः स्फुरन्ती देदीप्यमाना या मनीपा बुद्धिः सा स्फुरन्मनीपा प्रस्फुरबुद्धिः तया विमलः निर्मल: सुभद्रानुरागभाग् सुभद्रायाः कृष्णभगिन्या योऽनुरागः प्रीतिस्तां मजते इति स अर्जुनः तदभिधानः पाण्डवः नियाजसाम्राज्यवता. मपीज्यः निर्व्याजम् निष्कपटम् संपूर्णमित्यर्थः यत् साम्राज्यं सार्व- भौमत्वम् तदस्यास्तीति निर्व्याजसाम्राज्यवान् तेपामपि ईज्यः पूजयः श्रीमत्यशीतिः मत्या निश्चला कीर्तिर्यशो यस्य म ध्रुवमङ्गलाख्यः ध्रुवमङ्गलनामा अभूदिवि शेषः ।। २५ ।। तेजोविशेपाजितभानुभानु- स्तस्यानुयातो भरतः सशखः । प्रद्युम्नशाम्बावनुविष्णु कृष्णो, तथोदधि/रंगभीरसंज्ञः ॥ २६ ॥' भन्यय -तेनोविशेषात् जिनभानुभानुः तस्य अनुज्ञात. भरतः सासः प्रद्युम्नशाम्यो भनुविष्णु हागों तथा उदधि धीरगभीरसज्ञ. ॥ २१ ॥ व्याख्या-तेजोविशेपात् तेजमा प्रभावाना विशेषात् आधि. जितः पराभूतः मानुः सूर्यो येन म तेजोविशेषाव जितमानुः स चासौ मानुथेति तेजोविशेषाजितमानुभानुः यदावेजोविशेपाजितः .. क्यात् भाषायधीविजयामृतरिमणीवा सरणी टीका. सर्ग-१ .. पराजितः भानोः सूर्यस्य भानुः किरणो येन स तथोक्तः भानुनामा- कृष्णतनयः तस्यानुजानः भरतः सशंसः तस्य भानोः कृष्णतनयस्य अनुजातः अनुजः पश्चाजायमान: भरतः सशंसः इमावपि कृष्णत- नयो प्रद्युम्नशाम्यौ प्रद्युम्नः रुक्मिणीतनयः शाम्बः जाम्बवतीतनयः तयोर्द्वन्द्वः तौ प्रद्युम्नशाम्बौ अनुविष्णु कृष्णौ अनु पश्चात् विष्णुः कृष्णो यस्य स बलरामः कृष्णः वासुदेवः तयोर्द्वन्द्वः तो अनुविष्णु कृष्णौ रामक्रप्णौ तथा उदधिः धीरः गम्भीरः एते सर्वे कृष्णतनया: तो धीरगभीरौ संज्ञे ययोः सधीरगभीरसंज्ञः धीरगभीरनामा ॥२६॥ इत्यादिनालङ्कृतमन्तरीपं, जम्बूसुनाम्ना प्रभवेन नित्यम् । शय्यम्भवेनादधताऽदभुताय, श्रीमद्यशोभद्रपदं स्वगोत्रे ॥ २७ ॥ भन्वयः-इत्यादिना भलंकृतं भन्तरीपम् जम्सुनाम्ना प्रभवेन नित्यम् भभुताय गोत्रे श्रीमद्यशोभद्रपदम् भादधता शयंभवेन ॥ २७ ॥ व्याख्या-इत्यादिना पूर्वोक्तप्रकारेण अथवा जम्बूसनाम्ना जम्यू इति सुष्टुनाम यस्य तेन तथोक्तेन गुणरत्नमयत्वेन जम्वृद्वीपे जम्यूरिय जम्बूस चासौ स्वामी चेति जम्बुम्बामी तेन प्रभवेन प्रभु- स्ववता अथ च तत्पट्टे क्रमागतेन प्रभवस्वामिना प्रभवति अस्मात श्रुतमिति प्रभवेन सगोत्रे गां पृथ्वी त्रायते इति गोत्रः स्सस्य गोत्रः सगोत्रः तस्मिन् यद्वा स्सस्स गौः स्त्रगौः तां त्रायते इति स्वगोत्रस्त- सिन् अथवा स्वगोत्रे स्वकीयपरम्परापदे शव्यभवेन शय्याया भव. तीति शारभवः गुम्फनफर्ता "ग्या गुम्फनमिति शब्दस्तोममहानि- धिः" सृष्टिविधानदशः पालकन्वनेत्यर्थः तेन अथ च शस्यमवना. म्ना स्वामिना स्वशिष्यपरंपरागतेन श्रीमद्यशोमद्रपदम् यशसा की १४२ महोपाध्याय श्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये www V~ ve vM. .. . प्रलम्बबाहुस्तम् आजानुबाहुम् सुविशाललोचनम् सुविशाले अतिदीघे लोचने नेत्रे यस्य तम् पृथुनयनम् नरामरेन्द्रैः स्तुतपादपंकजम् नराश्च अमराश्च इति नरामरास्तेपामिन्द्रास्तैः स्तुतम् स्तुतिविषयी. कृतं पादपंकजम् चरणकमलं यस्य तम् जिनोत्तमम् जिनेश्वरम् वृष- भम् ऋपभप्रभुम् भक्त्या श्रद्धया प्रेम्पोत्यर्थः नमामि नमस्करोमि ॥३०॥ सोरं महः श्रीतपसां गणेऽस्मिन् , देदीप्यते सौम्यमपीह कीर्त्या । सप्तार्थसंधानजकाव्यमेतत् , तदुद्भवं तेन शुभं चिराय ॥ ३१ ॥ भन्वय:-श्रीतपमा गणेऽस्मिन् सौरम् महः इह कीा सौम्यम् अपि महः देदीप्यते एतत् सप्तानुसंधानजकाव्यम् तदुद्भवम् तेन चिराय शुभम् ॥ व्याख्या-अस्मिन् पुरो दृश्यमाने तपसांगणे तपोगच्छे अथवा तपमा व्रतविशेषाणां गणे ममुदाये सौरम्महः सूरस्य सूर्यस्य इदम् सौरम् महस्तेजः तपसः कर्मदाहकत्वात् सौरतेज इव तेजस्तति अथ च सूरेराचार्यपदपदकस्य इदम् सौरम् सरिसंबन्धिमहस्तेजोऽसिन् अथ न कीया यशमा सौम्यम् सोमस्य चन्द्रस्येदम् सौम्यम् चान्द्रम् सर्वेषामनुकूलत्वात् महस्तेजः इह गणे देदीप्यते अतिशयेन विराजने एतत् मप्तार्यसंधानजकाव्यम् मतार्थस्य सप्ताभिधेयस्य यद संधानमनु- सरणम् तम्माजातमिति मतार्थसंधान च तत् काव्यञ्चति मातार्थसं. घानजकाव्यम् तदुद्भवम् सूर्यवंशीय गजतेजोभवम् चन्द्रवंशीयनृपो. द्भवम् सरिपरम्परोद्यश्चैतत् तेन उभयतः पूर्तत्वान् चिराप चिरम् गुमम् कल्याणजनकं भूयादिति शेषः ।। ३१ ॥
४४३
गाचार्यश्रीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-१
- AM
भन्वय:-
पूर्व श्रीहीररूपं तदनु कनकवत्पुण्यशीलानुभूतं,
पञ्चाहद्रामकृष्णाभ्युदयकमलया सिद्धिचारित्रपूतम् ।
शुद्धं राज्ये कृपायाश्चरितमदुरितं नन्दतात् सत्प्रसादात् ,
श्रीमन्मेघायमानं मनसि रसभरैर्नित्यमुन्नीयमानम् ॥३२॥
-पूर्व श्रीहीररूपम् तदनु कनकवत् पुण्यशीलानुभूतम् पंचाह-
दामकृष्णाभ्युदयकमलया सिदचारित्र्यपूतम् शुद्धम् कृपाया राज्ये अदुरित चरितं
श्रीमत् रसभरैमनसि मेघायमानम् उन्नीयमानम् सत्प्रसादात् नन्दतात् ॥३२॥
व्याख्या-पूर्वम् प्रथमम् श्रीहीरमित्र वज्रमणिरिव रूपं स्वरूप
यस्य तत् तथोक्तम् तदनु तत्पश्चात् कनकवत् स्वर्णवत् मुवर्णतुल्यम्
पुण्यशीलानुभूतम् पुण्यम् सुकृतम् शीलमाचारः ताम्यामनुभूतम्
सम्बद्धम् अथवा पुण्यशीलैः पवित्राचारिभिः अनुभूतमधिष्ठितम् चरि-
बनायकत्वेनोपवर्णितम् पंच ते अईन्तश्चेति पश्चाईन्तः गमश्च कृष्ण
थेति रामकृष्णौ पञ्चाहन्तश्च रामकृष्णौ चेति पंचाईद्रामकृष्णाः तेषाम्
अभ्युदय एव इष्टसाधनमेव कमला लक्ष्मीः इति पंचाहंद्रामकृष्णाम्यु-
दयकमला तया सिद्धिचारित्र्य पूतम् मोक्षजनकचारित्र्येण प्रवज्यया
अथवा सिद्धिर्बुद्धिः सुरत्वादिलन्धिः तया पूनम् पवित्रम् निष्कलम-
पम् कपायाः दयाया राज्ये दयामाम्राज्ये अदुरितम् दुरितरहितम्
निष्पापम् चरितम् आख्यानम् मनसि चित्ते रममरैः शांतादिरसानां
भरैमारी अथ च रमानां जलानां भरैर्मा रै श्रीमन्मेघायमानम् मेघ.
मिवाचरितम् घनायमानम् नित्यम् मततम् उन्नीयमानम् उद्दीक्रिय-
माणम् अथ च दृश्यमानम् सन्प्रमादाद मताम् सजनानाम् प्रमादाद
अनुग्रहाद नन्दनात् आनन्दम् प्राप्नुयात् महन्वमनुभ्यादित्यर्थः ।।
॥ ३२ ॥
४४४ महोपाध्यायश्रीमेधविजयगणिविरचिते सप्ससम्मानमहाकाग्ने अथ च पूर्वम् श्रीहीररूपम् श्रीहीरविजयस्वरूपम् श्रीहीरविजय स्वरूपेण स्थितम् तदनु तत्पश्चात् कनकवत् कनकविजयस्वरूपवत् वतः पुण्यशीलानुभूतम् पुण्यः पवित्रो यः शीलः शीलविजयः तेन अनुभूतम् अधिष्ठितम् पञ्चसंख्यकार्य अन्तिः रामकृष्णौ च इति पञ्चाद्रामकृष्णाः तेपामभ्युदयकमलया कमल विजयश्च इति पश्चाई- द्रामकृष्णाभ्युदयकमला तया सिद्धविजयः चारित्र्यविजयः ताभ्याम् पूतम् पवित्रम् कृपायाः कृपाविजयस्य अदुरितम् निर्दुष्टम् चरितम् मेघायमानम् मेघविजयेन अपमानम् नीयमानम् एतचरितम् सत्प्र- सादात् सजनजनानुग्रहात् नन्दतात् आनन्दमाप्नुयात् ॥ ३२॥ इति श्रीसप्तसंधान महाकाव्ये तपागच्छे भट्टारकश्रीविजयग्नराये महोपाध्यायश्रामेघविजयगणिविरचिते परम्पराधिकारवर्णनो नाम नवम सर्ग ॥ श्री ॥ ॥ ग्रन्थ प्रशस्तिः॥ सूत्रतः सूत्रिता ग्रन्थे, द्विचत्वारिंशदन्विता । चतु-शतीह कान्यानां, सप्तसंधाननामनि ॥ १ ॥ श्रीमचन्द्रसूरीशैः, मतसंधानमादिदम् । रचित तदलामे तु, स्तादिदं तुष्टये सताम् ॥२॥ वियद्रममुनीन्दनः (१७६०) प्रमाणात परिवत्सरे । कृतोऽयमुद्यमः पूर्वाचार्यचर्याप्रतिष्ठितः ॥ ३ ॥ ।। इति ग्रन्थ प्रशस्तिः ।।
भाचार्य मीविजयामृतरिप्रणीता सरणी टीका. सर्ग-५
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टीका प्रशस्तिः।
श्रीमन्महेन्द्रमुकुटोपलरंजितांघ्रि-
पंचाईतस्तवनसंस्तवसंस्कृता या ।
श्रीरामकृष्णचरिते सरणी नवीना,
नेमेः पवित्रचरणे क्रियतेऽर्पणा सा ॥१॥
यस्पोजनतोपकारकरण प्रख्यातकीर्तिबजा,
शुद्धाचारधनप्रचारचरणादक्षुण्णरक्षाव्रतः ।
विद्याकांतनितांतशांतसहजस्वांतप्रमाखण्डिता-
ऽविद्याध्यांतततिःसदा विजयते श्रीवर्धमानः प्रभुः ॥२॥
अमन्दस्वच्छन्दोच्छलितललितच्छन्दविशद-
च्छटाच्छायाक्षिप्तक्षणिकजगदच्छुद्रविभवः ।
क्षमापीठे क्षांतिः प्रसरति यदीयाक्षरतरा
क्षमाभूमिः क्षित्यां चरमजिनपोऽसौ विजयते ॥३॥
तदीये सत्पद्दे क्षपितततकर्मागतमा:,
शमारामग्राममणघनधामानिगममाः।
अजियस्वाचारक्षमतसुलक्ष्माशिवरमा-
समालम्रप्रेमाऽमवदिह सुधर्मामुनितमः ॥ ४॥
ततो जम्बूस्वामी रुचिरतरजाम्यूनटूचि-
स्तदीये पट्टाधावननि जनवानन्दनकररा।
जगअन्तुद्धारांकुरजनननिजिजलदो
ज्वलरकर्मज्वालाशमनजलाधिजेत्रविभवः ॥ ५॥
४४६ महोपाध्यायनी मेघविजयगणिविरचिते सप्तसन्धानमहाकाम्ये Arry AN , तपोगच्छच्छायायदवधिरभूत्साधुनिकरे, यदीयाच्छच्छाया क्षपयति महामोहतपनम् । समागच्छत्पट्टे तदनु भुवि रोचिष्णुरधिक- श्रतुश्चत्वारिंशत्तम इह जगचन्द्र मुनिराट् ॥ ६ ॥ यस्योपदेशमहिमा ननु वर्ण्यते किं. सम्राटमहानकवरोऽपि च संप्रबुद्धः । पद्देऽष्टसागरमिते प्रवभूव हीर- सूरिः समस्तमुनिवृन्दविविक्तहीरः ॥७॥ सद्बुद्धिबुद्धिविजयस्तदनुक्रमेण, पट्टेऽक्षिवासरमितेऽजनि शांतमूर्तिः । यः सर्वदा भुवि जनावनबद्धलक्ष्यो, लक्षीचकार निरवद्यशिवारूपलक्ष्मीम् ।।४।। तत्पट्टपंकजविकासनभानुमाली, चंचनिशाकरसमुज्ज्वलकीर्तिशाली। श्रीवृद्धिवृद्धिविजयोऽभवदुनशील- शाली सुशासनविभावकशिष्यमाली ॥९॥ राजद्राजगुणोजनावनमहत्संधानुसंधानवान्, तीथोंद्धारहढवतो अतिजनज्ञानप्रचारोत्सुकः । सम्यग्योधितराजमण्डलनमत्पादारविन्दोऽभव- त्तपट्टाम्युनिधावखण्डशशभृत् श्रीनेमिसूरीश्वरः ॥१०॥ योऽयं सम्प्रतिशासनोन्नतिकरः शिष्टान्विनेयान् भृशं- नानादेशविशेषकेषु सुक्रतोद्धाराय संप्रेपयन् ।
भाषायंश्रीविजयामृतसूरिप्रणीता सरणी टीका, सर्ग-९
४४७
नित्यं सजनतोपकारकरणे लग्नो निमनः शिवे-
सद्धर्मोपचयाश्चितो विजयते ोको घरामण्डले ॥१॥
तस्य प्रमोश्चरणपंकजचंचरीको-
विद्यावदात्तविजयामृतमरिनामा ।
स्वीयान्यदीयनिगमागमपारदृश्वा-
विश्वासभूमिरधिभूमिसमस्तजन्तोः ॥ १२ ॥
सोऽयं शास्त्रविशारदो बहुगुणग्रामैकधामा कवि-
रत्ना प्रोच्छलदच्छशारदश शिज्योत्लाभकीनिवजः।
विद्वन्मण्डलमण्डनोऽमलमना भट्टारकाचार्यकः,
शुद्धाचारविचारचर्चितसदाचारांचितो राजते ॥ १३ ।।
कार्पव्यवाणिज्यपुरे पुरन्दराऽमरावतीदीपदमाददाने ।
श्रीमद्गुरोः शासनसन्नतांगो वासं चतुर्माममचीकरत्मः ।। १४ ॥
श्री न्पालचन्द्रादिकसंघसत्कृत-
स्तेपामतीवादरणीयमावतः।
श्री सप्तसंधानककाव्यटीका-
कृते मुहुः प्रार्थनयानुरंजितः ॥१५॥
अनस्पयत्नैकमना अनाविलामरीरचत्तत्सरणी मुविवृतिम् ।
नधीधना कापि परार्थभावनापृथमना जायत एव जातुचित्॥१६॥
कृतिरिय कृतिनां नयनकमावतरणात्परिपूतकता यदि ।
सफलता प्रलमेत तदा भृशं सुजनतुटिरहोऽतिगरीयसी ॥१७॥
४३८ महोपाध्यायश्रीमेघविजयगणिविरचिते सप्तसम्मानमहाकाम्ये गुणनिधिनिधिचन्द्रे १९९३ सम्मिते हायने स- नमसि विमलपक्षे च्यालतिथ्यां बुधेऽहि । इयमलभत पूर्ति नेमिसजन्मतिथ्यां, भवतु च सरणीयं तेन तेषां मुदेद्राक् ॥ १८ ॥ तदियं सरणी लभतां गुरुजनपादप्रसन्नतां शस्वत् । आकल्पांतं भूमौ भूयान्निःपङ्किला भूयः ॥ १९ ॥ तदीय- विनीतविनेयविनेयो धुरन्धरविजयः M WTIMITLI II ॥ शुभमस्तु NUWUNMIN --: शुद्धि-पत्रम् :- पृष्टम् वलिः पटम् पतिः २ शशाङ्काक ७ ४ १४. रस्त्यासो १८ मशोचः १ M भशुद्धम् शुदम् अशुदम् शुदम् 1 शशाङ्का १० उपरीत्यप उपरीत्यर्थः २ १७ स्वामीना घामिन २३ वोधण्यः बोस्या १६ गमयोदेवा रामयोरेवा ૩૨ ३ कृरवत्यर्थः कृग्वेत्यर्थ व्यवस्थापिका व्यवस्थापक ३४ ६ मृमरेशः भृनरेशः ८ 14 सरात् सरोवरात् ३६ १७ चतुष्टि चतुःषष्टि १. यानमः यानम् ३७ ३ तेस्तयोचो तेस्तथोक्त. १३ महदन्तावात् महान्तरवात मेऽपरामात २७ तेऽपरागात रस्त्यस्यासो ३७ ११ जना जनाः मशीन ३८ १ मुनिपुणानां सुनिपुणाना १९ शुषेप शुगेव ४ वयोरस्थेति चयोस्तथेति ४० ६ श्रुस्यविहिनस्य श्रुत्याविहीनस्य वधान्य १० बहुधान्य ४० चाहन वहन ६ મી ११ समीप ४० ११ भनवेधः २३ भगवेध १. कूपन्वित वूपान्वित ४० १३ संस्कृताधैलाव सस्कृता व १२ ११ समम्भाग्यने सम्भाव्यते ४० १३ विशालता वृदयक्षाद दय साह # विशालिना ४ पकिनः प्राणी प्राणिना ૧૨ ४१ दृष्टान १६ आवश्यमेव भावश्यकमेव ૧૨ १७,द्रान्त ४२ पीताम्बरा २. नृणाम् २ पिताम्बरा ૧૨ नृणाम् ४४ प्रक्षेपान .४ पक्षेपात् १७ सुप्रमाताः १४ मुप्रभाता ४५ ६ शिकरणे शीकरणे 6 तीर्यक १४ मेदिन्यो ४५ २३ मंदिन्यो 14 वृद्धया वृध्या ४६ १५ नीपणाम १५ तीक्षणाम 1 विघसाद्भीरः विसताभीर २३ पाम्बादि पाडवादि . .! ४८ -२३ नेः निम्न्तर २ दिग्यरित्यर्थः दिग्यरित्यर्थः ४८ १ 'दुस्तिोपहारा: दुरितापहारा. वाड्या. वापयाः ૫૦ पीशिष्ठ २३ सम्वन्धान मम्बन्धात रोषणात् ५२ # मोदिनी मेदिनी वयोः ૫૪ 14 मास्ताम् मामेताम् १८ ५७ सक्रिया ૨ી सेकामतपुर १६ सेकामपुर २३ परतीत्यर्थः १० २१ ८ प्रपना प्रपतगत 11 - १४ काकिन . नीद १५ निरन्तर विशिष्ट १७ २१ रोषणात १ वचयो ८ सक्रिया " " २. पततीनीस्वार्थ 13 A पृष्ठम् पति शुद्धम सतत स्थिति. किनिष प्रोपः। दुपः २८५ २० पम् संनिः भशुदम शुदम् भशुदम् २४० & सन्ये रिति सम्यरिति २८१ १ २४२ 11 उता छदमना १७ स्थितिमा २४३ भप्रयोजि प्रायोजि २८२ मिहिमा २४४ * कतिचित कतिचिद्मत २८५ ૨૪૫ ४ शेयः दोष: २८८ २२ दुर्धप. २४६ ८ वाजे बुभुजे |-२८५ २. लुप्तोपगा २४८ ૧૨ मलमि सलचिता । मौके ૨૫૦ १६ नोपऽलक्षितः नोपरक्षितः ५:धी २५१ भावता भावना 364 १९ महोधागो ૨પર १ महाय्याय साहाय्याय 301 २० महरि ૨૫૨ ८ समागते समागते 30२ २५२ १७ कस्याची वस्योः 303 ६ युद्धति ૨૫૫ ६ प्रर्वमाने। प्रयतंमाने ३०५ २० महकार ૨૫૬ १४ शत्रुयन शत्रुन ३०५ २. प्रभयेत ૨૫૭ १२ प्रेमात प्रेग्ण १ विपर्य २५ १ चरणन् धान् ३११ 1. विभायन् १. पातेष्टन् पातेष्टन् 39 ४ प्रकाशित | दिव्पनुपा दिध्यदूपा ३२३ 18 जयितुं २१२ १९, तदनुकोल्यात् तदानुकूरुयात् २४ १४ ૨૬૨ प्रत्युत्माकर ग्युस्कट *३२५ " २ ४ पुनरावृत्ति पुनरावृति ३२९ 3 जनितः २९४ द्रामेषु ३२४ १७, मश्रावकाशे ४ पौन्दिय ३३० ४ ममरहिता ૨૭૦ महसा ३३२ २१ माश्चयः २७३ २ विधियमान विधीयमान ૩૩૫ 13 तस्या २७४ रहटम् भाष्यम् ૩૩૫ २१ प्रासग्न् २७४ १७ गणेण • गणेन 33७ १४ गजमती २७४ २१ कुन ३३८ ६ मजिता ૨૭૮ ૧૭ हरिश्च ८ भवन्ति २७८ २० दिगच्छाद- दिगाच्छाद ૩૨૮ ११ संमति ૨૭ 3 सर्वाश्मनो सर्वात्मना ३४० ३ ૨૮૦ अप्राप्नुवद ८ साधने साधनः ३४० १९ निरस्यत लुप्तोपमा गौकि श्री. महासो महाचर द्वादर्श युध्यति ตุจักร प्रभवेत् विवर्षय विभावयन् प्रकाशित जेतु 304 " " जनिता मनावकाशो ममवरहिता वीन्द्रिय महासा : माय- तस्या. . 336 प्रासात गजवती मजितो भवति समितिः प्राप्नोत निरास्यत् + ७ मनां 4 । पृष्टम् पंक्तिः अशुदम .३४० २० स्थिर्भव ३४१ ७ हिंषक ૩૪૨ ४ अमृता ३४३ छेदन ३४४ १५ स्यनया ३५० है परपोपे ૫૩ ४सकभृत् ૩૫૫ सनतननयः ३५७ ४ प्रसस्त ४ विवकास ३७० ४ शयते ३७० १५ शयते 3८७१६ पद्मन शुदम् स्थितिर्भवेत हिंसक अमृत टेदन स्पनेन सरपीपे चक्रभृत् तपनतनयः प्रहस्त विचकाम होते शेते प पृष्टम् पंक्तिः भशुदम् शुद्धम् मना ४०० २३ प्रमया प्रभया ४०१ १ पूर्वम् पूर्वम् ४०१ २ भामिनामयिस्वा नामयिस्वा ४०१ १८ विधारय विधाप्य ४०४ १४ क्षम ४०६१० महरपरा महापरा ४०७ १ महास्तवै। महोत्सवैः मेनवै ४१० कृतोयो ४१३ २३ हृदय हृदयस्थ ૪૨૫ भधिक इति । T ४०८ २. नने १ कृतायो १ भधिकेति શ્રી ગૌતમસ્વામિને નમઃ -: શ્રી જૈન સાહિત્ય વર્ધક સભા :- સ્થાપના સંવત ૧૯૫ના ભાદરવા શુદિ ૨, (બીજને) ને શુક્રવારે આચાર્ય મહારાજ શ્રીમદ્ વિજયાતિસૂરીશ્વરજી મહારાજશ્રીના ઉપદેશથી આ સભા શેઠ નેમુભાઇની વાડીના ઉપાશ્રયમાં સ્થાપવામાં આવી છે. ઉદ્દેશ–પૂર્વાચાર્ય કૃત તેમજ નવીન ન્યાય વ્યાકરણ માહિત્ય વિગેરે વિષયક ગ્રન્થા તેમજ તેના પર વ્યાખ્યાઓનું પ્રકાશન કરવું તેમજ જ્ઞાન વૃદ્ધિના માધનોમાં યથાશકિત ઉઘમવત રહેવું. પ્રકાશન વિભાગના નિયમ પિટા વિભાગ તરીકે જુદા જુદા નામની અન્યમાલા છાપી શકાશે, શમલા માટે તે નિમિતે એકત્ર કરવામાં આવેલ ફડ ખર્ચવામાં આવશે. અન્યમાલાના પ્રેરકની આજ્ઞા અનુસાર કાર્ય કરવામાં આવશે મંથના સંશોધક મુનિ મહારાજને પચાસકપીઓ ભેટ આપવામાં આવશે. ૫. તે અન્યની વિશેષ નકલ ૫૦ તેમની ઇચ્છા મુજબ અથવા મા સ્વતંતે અન્ય ખપી જાને ભેટ આપી શકશે. १. २.
૫ ૬ સભાના નિયમે. 1. સંસ્થાના નાણાં બેંકમાં કમીટી પિકીમાંનાઅર ગૃહસ્થોને નામે રહેશે. ૨. તેઓમાંના એની સહીથી બેંકમાંથી નાણાં ઉપાડી શકાશે. ૩. કાર્યવાહક મંડળમાં એક ટ્રેઝરર અને બે મેક્રેટરીઓ રાખવામાં આવશે. ૪ ફંડનો હિસાબ સેક્રેટરી તરફથી કમીટીમાં પાસ કરાવવામાં આવશે. વ્યવસ્થાપક કમીટીની નિમણુંક ત્રણ વર્ષ માટે કરવામાં આવી છે. અને પછીથી ફરીથી નિમણુંક કરવામાં આવશે ૬. સંસ્થાની ઓફીસ સુરતમાં રહેશે ઝર તરીકે શેઠ નવલચંદ ખીમચંદ કામ કરશે. અને તેઓ તરફથી નાણાની પહેચ આપવામાં આવશે અને સેક્રેટરી નાણાં વસુલ કરશે અને પહોંચ આપશે ૮. સેક્રેટરી તરીકે કેશરીચંદ હીરાચંદ, નેમચંદ મોતીચંદની નિમણુંક કરવામાં આવી છે. ૯. ત્રણ વર્ષ માટે કમીટીમાં નીચેના સહસ્થની નિમણુંક થઈ છે ૧ શેઠ નવલચંદ ખેમચંદ ટ્રેઝરર-ગોપીપુરા ૨ શેઠ બાલુભાઈ ખીમચંદ કલ્યાણચંદ-ગોપીપુરા ૩ શેઠ હીરાચદ ચુનીલાલ દાલીઆ-ગેપીપુરા ૪ શેઠ છગનલાલ ધનજીભાઈ સગરામપુરા ૫ શેઠ ચુનીલાલ કલાણચંદ નવાપુરા ૬ શેઠ ચંદુભાઈ નગીનચંદ કપુરચંદ હરીપુરા શેઠ હરજીવનદાસ ગેમાજી નવાપુરા ૮ શેઠ બાલુભાઇ ઉત્તમચંદ વડાચૌટા ૯ શેઠ ચંદુલાલ છગનલાલ છાપરીયા ૧૦ શેઠ કેશરીચંદ હીરાચંદ સેક્રેટરી ગેપીપુરા ૧૧ શેઠ નેમચંદ મોતીચંદ એ પ્રમાણે અગીયાર ગૃહની કાર્યવાહક કમીટી રહેશે.. આ સભાની શુભ શરૂઆત તરીકે આચાર્ય મહારાજ શ્રા વિજયામૃત- સૂરીશ્વરજી મહારાજ તરફથી અમૂલય ગ્રન્થ પ્રકાશન કરવાને સંસ્થાને સેપવામાં આવ્યા છે. તે જ વૃદ્ધિ નેમિ અમૃત ગ્રન્થમાલા' તરી0 પ્રગટ કરવામાં આવશે. .
{ S TI s! s O શ્રી વૃદ્ધિ નેમિ અમૃત ગ્રન્થમાલા” કાર્ય-આચાર્ય મહારાજ શ્રીમદ્ વિજયાતસૂરીશ્વરજી મહારાજ તેમજ તેમના શિએ વિરચિત ન્યાય સાહિત્ય વિગેરે વિષયના પ્રો. છપાવી પ્રગટ કરવા ફેડ વ્યવસ્થા --આ મન્યમાલાના ફંડ માટે નીચે પ્રમાણે વ્યવસ્થા કરવામાં આવી છે. , ૧૦૧ અર્પનાર ગૃહસ્થ આ પ્રમ્પમાલાને “સંરક્ષક ગણુશે. મહાવક ૨૫ સભ્ય તેમને આ પ્રસ્થમાલા તરફથી બાદ પડતા સોની અનુક્રમે ચાર (૪) બે (૨) અને એક (1) નવ ભેટ આપવામાં આવશે. રૂ. ૧૧) ઓછામાં ઓછી રકમ તરીકે આ પ્રસ્થમાલા સ્વીકારવામાં આવશે અને પ્રકટ કરવા સંપેલ જેમાથી અમે ૧ પ્રથમ ગ્રન્થ-શ્રી પરમાત્મ સંગીત રસિયોતસ્વિની પ્રકટ કરેલ 2 દ્વિતીય ગ્રન્થ-આ સમસનધાન મહાકાવ્યને ‘સર’ ટીકા સાવ પ્રન્ટ કરીએ છીએ. ૩ તૃતીય શૂન્ય-સાહિત્ય શિક્ષા મંજરીક તેમજ કાવ્ય રચ- વાની તેમજ તેનું રહસ્ય જાણવાની પદ્ધતિને ગ્રન્થ) ટુંક મમયમાં પ્રઢ થશે આ શિવાય ક્રમે કમે “તિવિચિન્તામણિં' પ્રભા' ટીકા યુકત, ખડનખાદ' લઘુ ટીમ સાથે વગેરે ગ્રંથ પ્રકટ કરવા ભાવના રાખીએ છીએ અંરક્ષક” ના નામે. ૫૦ થી રજેન જ્ઞાનસાલાના ૨૦ સાદ મીશભાઈ છાયંદની જ્ઞાન ખાનામાંથી (પ્રમ- પેલી પાર્વજ બાન મહાકાવ્ય-માટે) ૧૦૧ શા યાચંદ વજેચંદ ૧૧ માઇ શીવચંદ વજેમદ ૧૧ શ્રી વજેચંદ ખુમાજ * 1 ૮ સહાયક ના નામે ૭પ વચૌટાના શ્રી ગંધ તરફથી ૫૧ શe ઘેલાભાઈ રતનચંદ ઝવેરી ૫૧ શલિ છગનલાલ ધનજીભાઈ પા શાહ ચંદુલાલ છગનલાલ ૫૧ નગીનચંદ કપુરચંદ ૫૧ શાહ માણેકચંદ ઝવેરચંદ ૫ ચુનીલાલ ગુલાબચંદ દાળીયા ૫૧ શાહ સાકરચંદ ખુશાલચંદ ૫૧ શાહ કીકાભાઈ સકળચંદ સરેયા ૫૧ મુલચંદ બુલાખીદાસ ખંભાત ૫૦ શાહનગીનચંદકપુરચંદ જરીવાળા પ૧ હરખચ દતાપીદામ લાકડાવાલા પા શાહ વીરચંદ હરજીવનદાસની કુ. ૫૧ શાહ દલીચંદ વીરચંદ શ્રોફ ૫૧ શાલ મગનલાલ દેવચંદ જરીવાલા ૫૧ શાહ કલ્યાણચંદ દેવચંદ સભ્ય ના નામે, ૨૫ શાહ નવલચંદ ખીમચંદ ઝવેરી ૨૫ શાહ વીવાદચંદ મેહનલાલ ૨૫ શાહ ભાઈચંદ લાલભાઈ ૨૫ શાહ કલ્યાણચંદ દેવચંદ હા. ૨૫ શાહ મંગુભાઈ બાલુભાઈ તેમના પુત્રી બેન નેમકાર ૨૫ શાહ દીપચંદ ધરમચંદ હા ૨૫ શાહ નાનુભાઈ દેવચંદ તેમના પુત્રની કીકીબેન ૨૫ શાહ અમીચંદ નવલચંદ ૨૫ મંગળભાઈ મુલચંદ અદાલતવાળા ૩૫ શાહ દલસુખભાઈ જેઠાભાઇ ૨૫ શાહ ચીમનલાલ નગીનદાસ ૨૫ શાહ ફુલચંદ તલકચંદ ૨૫ શાહ નવલચંદ ઘેલાભાઈ ૫ શાહ તેમચંદ હીરાચંદ ૨૫ શાહ ઘેલાભાઈ દીપચદ ૨૫ શાહ દેવાભાઈ અમીચંદ ૨૫ શાહ છગનભાઈ કીકાભાઈ ૨૫ શાહ ગીધામ લાલાભાઈ ૨૫ શાહ ચુનીલાલ વમળચંદ ૨૫ શ ઘેવાભાઇ રાયચંદ ૨૫ લલ્લુભાઇ ગુલાબચંદ ૨૫ શાક ખીમચંદ લલ્લુભાઈ ૨૫ શાહ કાલીદામ રતનચંદ ૨૫ શાહ મવાયચંદ મે તીચંદ ૨૫ શાહ પ્રસન્નમુખ સુરચંદ બઘમી ૫ શાહ માણેકલાલ ડાહ્યાભાઈ ૨૫ શાહ કેશરીચંદ ચુનીલાલ બદામી ૨૫ શાહ કેશવલાલ કમ્પનામ ૨૫ શાહ અમીચંદ ગોવીંદજી ૨૫ શાક વસેન નગીનદમ ૨૫ શાહ વીરચંદ ખુમચંદ, ૨૫ શાહ કયાચદ દેવચંદ તા. ફકીરચંદ કપુરચંદ તેમના પુત્રી બેન મગન ૨૫ શાહ બાલાભાર્ક મગનલાલ ૨૫ મેહનલાલ મગનલાલ બદામી