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Ek Chikh Andhere Ki

Vishnudat · 2011/07

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५ सगुना मा Banarai भी 3 TERMER पाम ENTो । THEcitie का मनंगा फर, प. मंग पया कि पुगग मंगाम करिनारे भी जाग, दगी बिना मा ri नाकान । गांवामागुनमादामना का परयोहा मन गया " नदि पिचा नाद पापन, माई गाटा का नाम । मो मोदी पनंग की, पति रामा भीगन" इसमगा भात हा मेरे मन में का गानि के साथ एक भागा का संचार दो गया तदनन्तर एक रोज दिन पर पगिढत यमुनादासगी श्रीलालगन में मिल पोर उनके हाथ में चीन और हम्नलिमित सुने पत्रों की एक पुस्तिका दश पड़ी मैंने उसी विपय में पूछा तो उहोंने कपिलायतनमादात्य उसका नाम बनाया घोर मी १०८ भन्नदाताजी ने अमुकामुक प्रश्न किये हैं उन्ही के उपर ढूंदने के लिये यह पुस्तक लाया हूं, यह उपर दिया, तदनन्तर उस पुस्तक को एक बार श्रापोपान्त पदन के लिये मैंने उन से प्रार्थना की और मेरी प्रा- धना स्वीकार करके उन्होंने पुस्तक देदिया पुस्तक पदनाने पर इच्या दुई कि इस पुस्तक का सरल हिन्दी भाषा में अनुवाद करूं जिस में सर्वसाधारण को श्रीकोलायती का विपय पूर्णतया अवगत होजाय और [ ग] वाद की समालोचना उन्होंने की और स्थल २ में कुछ रदबदल करने की भी अपनी सम्मति प्रकट की और वैसा ही मैंने कर भी दिया फिर उन्होंने संस्कृत टीका लिखने की भी सम्मति दी तब से जर २ संयोगवश वह मिलते थे तब तब इस का समाचार पछते और मेरी मुम्ती पर मुझे बहुत लज्जित किया करते थे तो भी इस ग्रन्थ की परि समाप्ति में बहुत विलम्ब हुआ और मित्रों ने समय २ पर अतिशय भर्त्सना की तो भी मेरे सहचर और बालसखा पालम्यदेव ने कुछ परवाह न फर अपनी ही गति से मुझे चलाता रहा एवं “दिनभर चले अदाई कोश" की कहावत को मै चरितार्थ करता हुआ इसी विक्रमी सम्वत् १९८१ के श्रावण शुला एकादशी सोमवार के प्रातःकाल में इस पुस्तक की समाप्ति लगभग दो दषों में करसका और समाप्त होते ही मेरे परमप्रेमभाजन पन्धुपर श्रीकृष्णदासजी हर्ष ने इसको दपवादेने के लिए प्रेरणा की और उक्त मेरे परमहितपी श्रीमान् आयुर्वेदमूषण पण्डित जीवनरामजी हर्ष ने अपने भी केवल जीवनानन्द प्रेस में छपाने की भी अनुमति देदी । मैं उत्त. सजनों की कृपा पूर्ण सम्मति से प्रेरित एवं मदुत्माहित टोकर उक्त कार्य का भारंभ या उसके पायोपान्त सम्पादन कर सकने में माहमयान का हंपस यही मेरा वक्तव्य है। यह भी पाया परताकि सभी परमोदार मजन भी प्रकार अपनी महत्वपूर्ण साविककृति से मेरी इम तुच्छ भेंट कोम एवं विधान के नाते मानाफर ना करेंगे। निधिदिने । रोमनर. म.११रकाशित विदत्तः।

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शुदाऽशुद्धपतयः। -c*c.- श्रशुद्धयः शुद्धयः पूर पंति १ १ महात्म्य तमामनम किंचिद्रीप्यम् श्रीका वशिष्ट माहात्म्य तमोसमम विचिोप्यम् लोकाः चमिष्ठ ५ ३ ७ . यद्य योग २० २० साहम साहगः ४ ७ ग धो . .. गा गृानान्नु गोन महानन्तरम् པའི द सपान ९:२१ ७० ११

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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ थथ सन्द पुगणान्तर्गत वाखण्डार कपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं लिख्यते ॥ ननावन्मंगलाचरणम् ॥ महेशानं महेशाननननं मनुजागिम् । नमामि विहारं फर्तारं सर्वगम्पदाम् ॥ १ ॥ सीकापिलायननगाहात्म्यरचयिता पुगणकाना व्यासदेव प्रथम गणेशं नीति गंवानमिति - महेशानतनुज मंहगानमारम्नन्यनज महादेवाज गनुमानिनामनु दिनाजिनं मिनीर विमविनाशन सर्वम पदा कारं महेमन गणेशं नमामि नमरगगि ॥१॥ श्री फपिनामान माम्य पं. रचयिता पुराएका मादेन "प्रथम गणेशजी की ति परते. "- महेशानी पुर. मनुष्यों रो पहि, वि. जर सम्पतियों प. पनी मोटर गोकमारो॥ गंगा माहात्म्यमतुलनामामातमम्। अस्या प्रामगमगम्यागनिमतमः॥६॥ S गा।

के २ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । सूतजी शौनकादि ऋपियों से कहते हैं कि मुनियों में अगस्त्यमुनि पूर्वकथा में अनुपम भौर सर तीयों से उत्तमोरम गर माहात्म्य को स्कन्ददेव से सुनकर बहुत प्रसन्न हुए. ॥२॥ पुनः पप्रच्छ पिनयात्तनयं प्रणयान्वितः। शूलिनस्सर्यतत्वज्ञं स्कन्दं देवारिकंदनम् ॥ ३॥ प्रणयान्वितोविनयान्नम्रीभूतोऽगस्त्य स्स-तत्वज्ञं सर्वतत्ववेता देवोरिकन्दनं शलिनररांकरस्य तनयं स्कन्दन्विनयापुनः पप्रच्छ पृष्टवान्। अगस्तजी ने विनीत भाव के साथ नम्र होकर सर्व तत्व जाननेवाले तथा देवारिक्रन्दन (तारकासुर के वध करनेवाले ) शंकरजी के पुत्र स्कन्ददेव से पुनः प्रश्न किया ॥ ३ ॥ भगवसर्वधर्मज्ञ ! सर्वज्ञसुत! मत्प्रभो!। गंगामाहात्म्यकथनात्पावितोहं न संशयः॥४॥ अस्मिन्पये पूर्वार्द्धस्य पदचतुष्टयं स्कन्दस्य सम्बोधनमेन भगवनित्यादितोमत्प्रभो! पर्यन्तम् उत्तरार्द्धनागस्त्यः किंचित्स्ववृत्त कथयति गंगामाहत्म्यकथनादहं पावितः पवित्रीकृतो स्मिनसंशयः ॥ १॥ अगस्त्यजी ने कहा कि हे भगवन् ! हे सब धर्म के जानने वाले ! हे शंकरजी के पुत्र ! और मेरे प्रभु! आपके गंगा माहात्म्य के कथन से मैं पवित्र होगया इस में सन्देह नहीं है ॥ ४ ॥ गंगा तु सर्वलोकेषु वेदेपुच महामते ।। प्रसिद्धिमागता नित्यं सर्वे जानन्ति सत्तमाः॥५॥ हे महामते ! गंगा तु सर्व लोकेषु वेदेषु वेदचतुष्टयेपुच प्रसिद्धि प्रख्यातिमागतेतिसर्वे सत्तमा निपुणा नित्यं निरन्तरंजानन्ति ॥ ५ ॥ (१) देतागिस्तारकापरस्तरकन्दएव देवसैन्याधिपतिवारी यस्तव पुराप पिलरेगोला।

- श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । हे महामते ! गंगा तो सब लोकों में और वेदों में प्रसिद्ध हो चुकी है यह सभी सत्पुरुष जानते हैं ।। ५ ॥ थानी पालकगोपालंगंगामाहात्म्यमुत्तमम्।। प्रकटं सुरसेनानीर्जागर्ति भुवनप्रपं ॥६॥ हे सुरसेनानीः ! थाम्नीमालकगोपालं मियमान्यपालक गोपालपर्यन्तम् । उत्तमंगगामाहात्म्यं भुवनत्रयेप्रकटं प्रत्यक्षं जागति मियोपालका गोपालाध सचे गानन्तीतिभावः अत्र गोपालगन्दस्तु, आभार याचकः ग्वालाइति भापायां । साभारग्नु शुददभिवति मत एतेऽपि जानन्ति किमन्येपामिति ॥ ६॥ हे स्फन्ददेव ! इस त्रिभुवन में दी, पालक तथा गोपाल पर्यन्त, सभी इस उत्तम गंगा माहात्म्य को प्रत्यक्षरूप से जानते है। इस बात को सभी जानते है कि ग्रामों में सियों को, पालकों को, थोर शूद्रों को किसी तीर्थ या नदी के मातरम जानने का विकार नही, समापि इस कथन से गंगा माहान्य दीना दिपाय मे मूरित हो रही ॥६॥ भनन्तपरणाम्भोजमरना भपरिदः ।। रिझल्लुइनरंगापाः सीमापदै कानिः ।।७।। माापारीपपिपंसारीपरयाः परन्नर ॥ पान जानारिगंगापामाहायपरमाननाsil है परनाक रोशन Pाहार amr. ः भारत मामा मना माकन 12. !

मेर में मनान, दान अंत नहीं बना :: . अधुना प्रोतुमिच्छामि किंचिट्टोप्पं मनोगतम् ॥ मबन्दाकदिनं देव! मनापि परनानुन् ॥६॥ रदेव अधुना मर्दन कानन मनापि परमारनामा मनोगतं चिट्टोप्यं श्रनु मिच्छानि ।।६।। ट देव ! इन मनय मदना-हिना और मेरे लिये परन श्राध्यकारी छोई मनोगत गुन क्या हो तो कहिये. वही सुनने की इच्छा होता है॥॥ किन्नु तीर्थ मन्त्र मर्यतीर्थफलप्रदम् ।। जनस्मरविज्ञानं त्यादृशैातमेवहि ॥ १० ॥ मर्वपापहरं पुण्यं मर्वयज्ञफलप्रदम् ।। मर्पन मुम्बई दय! भोगिभोगप्रदं शूपि ॥ ११ ॥ मकामानान्तधान्नृणां कामनापरिपूरकम् ।। निष्कामानाम्गुनहिन्! ज्ञान मुत्पाय मुगिदम् ।। १२॥ स्यगवं सुष्टुयुद्धीनां पापिनां पापनाशनम् ॥ मराः प्ररगयझोके मानांस्यूल पनुपाम् ॥ १३ ॥ प्रतयोनिगमानां दिव्य गांक पदं दिव्यं दिगमाहात्म्गमुतमम् ॥ १४॥ यन्मुन्दि भयमागरे । दिस्पदयाभिष्टिगं मत तयारम् ॥ पया कपाऽपि पिया गोषकं शोनाग्राम ॥ १५ ॥ है ५ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । तदरं श्रोतुमिच्छामि त्वन्मुग्यात्सुरमत्तम ॥ नाज्ञातं विद्यते किश्चित्मर्वज्ञाननिधेस्तव ॥ १६ ॥ (सरलार्था इमे श्लोकाः) हे देव ! हे विद्वन् ! हे मुरसलम ! इस संसार में ऐसा कोई तीर्थ हो जो सब तीर्थों का फल देनेवाला हो, मनुष्यों से अज्ञात हो, आप सदृश महात्मा ही उसको जानते हो, वह सब पापों का हारफ तथा पवित्र और सब यनों का फल देनेवाला हो, सकाम सेयन करनेवाले मनुष्यों की कामनाओं को परिपूर्ण करता हो, और निष्काम सेवन करनेवालों को ज्ञान देकर मुक्त फरता हो, मुबुद्धियों को स्वर्ग देता हो, पापियों के पाप नाश करता हो, और स्थूल दृष्टि से देखनेवाले मनुष्यों को इस लोक में तत्काल परिचय देनेवाला हो तथा प्रेतयोनि में गये मनुष्य को भी भवसागर से मुक्त करनेवाला एवं दिव्य लोक देनेवाला, दिव्य महात्म्य से युक्त, और दिव्य देवताओं से सेवित हो और सर्व तीर्थों में श्रेष्ठ हो एवं जिस किसी क्रिया से भी संसार बन्धन का मोचक और शोकनाशक हो उस तीर्थ को अापके मुख से सुनना चाहता हूं। श्राप सम्पूर्ण ज्ञान के निधि हैं आप ने कोई वस्तु अज्ञात नहीं है ।। १०, ११, १२, १३, ११, १५, १६ ॥ यद्यस्ति मपि ते पूर्णा करुणा करुणानिधे,॥ प्रवृहि प्रविणाशाय, महासेन ! महैनसाम् ॥ १७ ॥ हे ! करूणानिधे ! महासेम ! यदि, ते तव, मयि विपये, पूर्णा करण स्ति, तदा महैनसां महापापानां प्रविलाशाय, प्रबूहि, कथय, गंगामालम्पमिति, पूर्वश्लोकात्संबन्धः ॥ १७ ॥ . 1 भांगपिनायतनतीयमादाम्यं । है फरुणानिधि ! महासन ! यदि यापही मेरे ऊपर पूर्ण करणा है तो महापापों के विनाश के हेतु गंगामाहात्म्य को कहिये॥१७॥ (गून उयान) ३ति प्रश्नेन संहष्टः पार्वतीनन्दनस्तदा । उवाच वचनं चार प्रहस्य श्रूयतामिति ॥१८॥ सूतः गौनकादीन्कथयति यदेवमात्योदितपभेन स दृष्टः प्रसन्नता प्राप्तः पार्वतीनन्दनस्तदातस्मिन्कालेपहस्य विहस्य श्रूयतामिति चार वचनमुवाच ।। १० ।। सूतजी ने शौनकादिक ऋपियों से फहा, कि इस तरह अगस्तजी के प्रश्न को मुन पार्वतीनन्दन स्कन्दी प्रसन्म हुवे और श्रूयताम् (सुनो) इस रुचिर पचन को बोले ॥१८॥ मुने ! जगद्वितं पृष्टं तदिहैकमना भव ॥ वक्ष्याम्यहं तव प्रीत्यानान्यथातत्कथंचन ॥ १६ ।। हे मुने ! त्वया जगद्धितं पृष्टं तत्तस्मात्कारणादिहैकमना' एकाग्रचित्तोभव, तव प्रीत्यायदहं वक्ष्यामि तत्कंथचनान्यथानेति ।। १ ।। हे मुनि ! तुम सावधान होकर सुनो तुमने जो संसार के हित कामना से प्रभ किया है उसका उत्तर तुम्हारे प्रेम के कारण जो कहूंगा वह कभी अन्यथा नहीं हो सकता ॥१९॥ गोप्यं यन्न प्रकाश्यन्तदिति येदविदाम्मतम् ॥ तथापि वच्मि ललितं तव शीलाद्वशंवदं ॥२०॥ हे वशम्वद ! प्रिय वादिन् ! यद्गोप्यं गोपनीयम्बस्तु तन्न प्रकाश्य- मिति वेदविदाम्मतमस्ति तथापि तव शीलात् ललितं सुन्दरं यथास्यात्तथा वच्मि कथयामि ॥२०॥ + .

श्रीकपिलायतगतीर्थमाहात्म्य । हे वशंवद ! जो गोप्य वस्तु है उसको कभी प्रकाश नहीं करना चाहिये यह वेद जाननेवालों का सम्प्रदाय है. तो भी तुम्हार सौजन्यवरा मुन्दरता से उस गुप्त कथा को कहता हूं ॥२०॥ संभवेदिहसंप्रीतिर्यक्तुः श्रोतरिसत्तम । अरुन्धतीयवस्पेव जानकीपतिभूपती ॥२१॥ इहास्मिन् गुप्तकथासंभाषणे जानकीपतिभूपती श्रीरामचन्द्र, अरुन्धतीधवस्यवशिष्ठस्य इव श्रोतरि सत्तमे वक्तम्समातिः संभवेत् आकांक्षितास्ति ।।२१।। इस गुप्त कथा के संभाषण में श्रोता और वक्ता का प्रेम वैसाही होना चाहिये जैसा राना श्रीरामचन्द्रजी में वरिष्ठजी का था॥ २१ ।। इयं भागयतीसृष्टिर्यस्याः पारोनयियते ॥ यत्र कुनाऽपि पटुपा तत्तद्रत्नघरा घरा ॥२२॥ इयं भागवती राधिः यस्याः पारः यन्तं न विद्यते, यस्यां सूरैः परा पृथ्वी यत्रकुत्राऽपि तत्तद्वदयमाएरत्नपरान्ति नानि तानि रत्नानि धरतीति तदनपरेति, ॥ २२॥ यह वैष्णवी मुष्टि है जिसका पन्त नहीं है दम नष्टि में पड़ी जहां तहां जिन जिन रत्नों को पारए करनी है उनके नाम मागे हे गये है।॥ २२॥ कुमापि नारीरत्नानि नररत्नानि कुत्रपित् ।। कृप्रनिदाजिरत्नानि गजरनानि गुपित् ।।२।। पिला दुरिमारलीन माननिस्न पुरी नागनन सन्ति दुरितारिननि परसराम.ने सनि धारितारने अगस्तजी के प्रश्न को मुन पायतीनन्दन स्कन्दजी प्रसन एकाग्रचित्तोभव, तव प्रीत्यायदहं वदयामि तत्कंथचनान्यथानेति हे मुनि ! तुम सावधान होकर सुनो तुमने जो संसार भीषिनामनगा। में फरणानिधि ! मगर मरि मारे है तो महापापिनायगामाम को (मूल उगार) इति प्रश्न संहष्टः पार्यतीनन्दनस उयाप वचनं गाम प्रहस्य भूपतामि सूतः गौनकादीकथयति यदेवमायादिनभर प्रसन्नता प्राप्तः पार्वतीनन्दनातदातस्मिन्कालेपदम्य विहस चारु वचनमुवाच ॥ १८॥ सूतजी ने गौनकादिफ पियों से कहा कि शृयताम् (मुनो) इस रुचिर वचन को बोले ॥१०॥ मुने ! जगदितं पृष्टं तदिहेकमना भव ॥ वक्ष्याम्यहं तय मीत्यानान्यथातत्कथंचन हे मुने! त्वया जगद्धितं पृष्टं actichik५, कामना से प्रश्न किया है उसका उत्तर तुम्हारे प्रेम के थे। कहूंगा वह कभी गोप्य गोपनीयम्वस्तु तन मन श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । लोके प्रकाशो बटुलो यत्र सृष्टिः प्रवर्तिता । तत्रापि महतीभूमिमहास्वर्णमयी स्थिता ॥२७॥ लोके यत्र सहिः प्रवर्तिता यावन्मानं सृष्टिर्वतते । तत्र सूर्याचन्द्र- मसोनिरन्तरगमनेन बहुलः प्रकास्ति तत्रापि प्रकाराभूमावपि महती भूमिमहास्वर्णमयी स्थिताऽस्ति ॥२७॥ संसार में जहांतक सृष्टि है यहां तक पूर्ण प्रकारा है उसमें भी अधिकतम भूमि भाग अनेक रनों से भरा है, जिसको महास्वर्णमयी मांग कहते है ।। २७॥ तत्र मध्यप्रदेशेषु ससद्वीपवती मही ।। सेपुदीपेपुच महान् जम्बूद्वीपो विशिष्यते ॥२८॥ तत्र तम्यां महास्वर्णमय्याम्भूगी मध्यप्रदेशेषु सप्तद्वीपवनी सशद्वीपाधिष्ठाना मस्ति तेषु द्वीपेषु मुमहान् जम्बूद्वीपो विशिष्यते सस सुदीपेषु जम्बूद्वीपो विशिष्ट इति ॥ २८ ॥ उस स्वर्णमयी भूमि के मध्यप्रदेशों में द्वीपनक सात विभागों से पृथ्वी भित्ता है, उन विभागों में सब से मधान और वृहदाकार जम्यूदाप है ॥२८॥ तदीपे नसम्पएहानि भारतादीनि सत्तम । भारतं पुरपमेनेषु फर्मग्रं परस्स्मृतम् ॥ २६ ॥ हे सत्तम ! नयापीपे भारतानि नव परदन परीने ते मनु परे भारत पुपमति परः पनवं नतम पक्षितम् ॥२९॥ म मान : उमर में नमन नों में में ११ संप मेरे पनप पार॥

. पृथ्वी में कहीं भी रत्न हैं, कहीं पुरुष रत्न है, फहीं अश्व रत्न है और कहीं गज रत्न हैं ॥ २३ ॥ धरापाम्यहुरत्नापां तीर्थरत्नानि सन्तिहि ॥ तत्ते ई सम्प्रवदयामि तीर्थरत्नं परात्परम् ।। २४ ॥ बहुरत्नायां धरायां हि यस्मातीर्थरत्नानि सन्ति अतः परात्प अष्ठादतिभेष्ठं तत्तीपरत्नं ते तुभ्यमहसंप्रवक्ष्यामि ॥ २४ ॥ इस बहुरत्ना पृथ्वी में तीर्थ रत्न भी हैं इस कारण श्रेष्ठ से भी नष्ठ तीर्थरनों को तुम से कहता हूं ॥ २४ ।। प्रयागादीनि तीर्धानि रत्नभूतानि भूतले ॥ तेष्वपीह परं रत्नं तीर्थक प्रशस्यते ॥ २५॥ इह भूतले जगतीतले प्रयागादीनि तीर्थानि रत्नभूतानि सन्ति तेषु पि परमुत्कृष्टं रत्नमेकंतीर्थ प्रशस्यते प्रशस्तमस्ति यदवक्ष्यति ।। २५ ॥ इस पृथ्वी में प्रयाग आदि तीर्थ तीयों में रत्न है उनमें भी म उत्कृष्ट एक तीर्थ रत्न है जो आगे कहेंगे ॥ २५ ॥ मशाशत्कोटिविस्तारं भूमण्डलमिदंस्मृतम् ॥ प्रापि लोकेविस्तीर्णन्तम एप प्रवर्तते ॥ २६ ॥ इह भूमण्डलं पंचाशकोटिविस्तारमीत्पंचाशत्कोटि योजनायत- त, एतदर्थ श्रीमद्भागवतस्य पञ्चमस्कन्धे भूगोल वर्णनं द्रष्टव्यम् । पि एतावद्विस्तृते लोकेपि विस्तीणं अधिकं तभ अन्धकार व नते ॥ २६॥ इस भूमण्डल का पचास कोटि योजन का विस्तार है, उर र के अधिक भाग में अन्धकार ही है पौराणिक भूगोल का द्भागवत के पंचम स्कंध में पूर्ण रीति से व्यास जी ने किया है। . 7 *- श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । लोके प्रकाशो बहुलो यत्र सृष्टिः प्रवर्तिता ॥ तम्रापि महनीभूमिमहास्वर्णमयी स्थिता ॥२७॥ लोके यत्र सहिः प्रवर्तिता यावन्मानं सृष्टिवर्तते । तत्र सूर्याचन्द्र- ममोनिरन्तरगमनेन बहुलः प्रकागास्ति तत्रापि प्रकाशभूमावपि महती भूमिमहात्वर्णमयी स्थिताऽस्ति ॥ २७ ॥ संसार में जहांतक सृष्टि है वहां तक पूर्ण प्रकाश है उसमें भी अधिकतम भूमि भाग अनेक रत्नों से भरा है, जिसको महास्वर्णमयी भूमि कहते हैं ॥२७॥ तत्र मध्यप्रदेशेषु सप्तद्वीपवती मही॥ सेपु दीपेपुच महान् जम्बूद्वीपो विशिष्यते ॥ २८॥ तत्र तस्यां महास्वर्णमय्याम्भूमा मध्यप्रदेशेषु सप्तद्वीपयती सराद्वीपाधिष्ठाना मस्ति तेषु द्वीपेषु मुमहान् जम्बूद्वीपो विशिप्यते सप्तमुद्वीपेषु जम्बूद्वीपो विशिष्ट इति ॥ २८ ॥ उस स्वर्णमयी भूमि के मध्यप्रदों में द्वीपात्मक सात विभागों से पृथ्वी विभक्ता है, उन विभागों में सब से प्रधान और वृहदाकार जम्यूद्वीप है ॥ २८॥ सद्द्वीपे नवखण्डानि भारतादीनि सत्तम । भारतं पुण्यमेतेपु फर्मक्षेत्रं यतस्स्मृतम् ।। २६ ॥ हे सत्तम ! तज्जम्बूद्वीपे भारतादीनि नव सण्डानि वर्तन्ते एतेषु नवलु खरडेपु भारतं यतः पुण्यम्पवित्रमम्ति भवः कर्मक्षेत्रं स्मृतम् कथितम् ॥ २६ ॥ हे मुनि सत्तग ! उस जम्बूद्वीप में भी भारतादि नवखंड है उन नया खण्डों में भारत सब से पवित्र है इसलिये फर्मक्षेत्र का गया है ।। २२॥ २ भवन्ति तत्र तीर्थानि नाना पापहराणि वै॥ लोकोपकार सियर्थं विहितानि महात्मभिः ॥ तत्र कर्मक्षत्रे लोकोपकारसियन गहात्ममि विहितानि नाना हराणि तीर्थानि भवन्ति चे अन पाद पूरकोऽव्ययः ॥ ३० ॥ उस फर्मक्षेत्र में लोकोपकार के लिये महात्मायों के कहे अनेक पापहारक तीर्थ है ॥ ३० ॥ कानिचिद्गिरिरूपाणि सरोस्पाणि कानिचित् ।। हदमसवरूपाणि नदीरूपाणि कानिचित् ।। ३१ ।। वनारण्यस्वरूपाणि पुरीरूपाणि कानिचित् ।। पुराणस्मृतिसंगीतमाहात्म्यानि महामुने ॥३२॥ हे महामुने ! पुराणस्मृतिसंगीतमाहात्म्यानि कानिचित्तीर्थानि गिरिरूपाणि कानिचित्सरोरूपाणि कानिचित्दप्रसवरूपारि कानिचिन्नदारूपाणि कानिचिद्वैनारयस्वरूपाणि पुरीरूपाणि च सन्ति ॥ ३१, ३२॥ हे महामुनि ! पुराण में और स्मृतियों में जिन २ तीर्थों का महात्म्य वर्णन किया गया है उन में कितने तो गिरिपर्वतों के रूप में हैं, कितने सरोवरों के रूप में हैं, कितने झरनों के रूप में हैं, नदी के रूप में हैं, कितने बन तथा अरण्य के रूप में हैं और केतने पुरियों के रूप में हैं ॥ ३१, ३२ ।। तत्रापिरत्नभूतानि विरलान्येव भूतले ॥ महामाहात्म्ययुक्तानि सधः पाप हराणि वै ॥ ३३ ॥ १) हिमगिरी, कैलाशगिरी प्रभृति । २) पुष्कर, कपिल प्रभृति । कितने (५) वृन्दावन, बदरीबन प्रभृति । (६) दण्डकारण्य, नैमिषारण्य प्रभृति । (७) काशी, वैद्यनाथ, जगन्नाथ इत्यादि। ', सरसती प्रभृति।

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । ११ तत्र तेप्वपि पूर्वोक्तानेकरूपतीर्थपु भूतलेमहामाहात्म्ययुक्तानि सद्यः पापहराणि रनभूतानि विरलान्येव तीर्थानि सन्ति अत्रापि वै पाद पूरकोव्ययः ॥ ३३ ॥ उन ऊपर लिख हुवे अनेक रुप तीर्थों में महामाहात्म्य से युक्त तत्काल पापों के नाश करनेवाले और रल स्वरूप इस भूतल में कोई २ तीर्थ हैं ॥ ३३ ॥ गंगा च यमुनाचैव तथा प्राची सरस्वती ॥ नर्मदा च पयोष्णी च कृष्णा वेणी सवेदिका ॥ ३४ ॥ सप्तपुय्र्यों गयशिरः कुरुक्षेत्रं त्रिपुष्करम् ॥ सेतुवन्धेश्वरादीनि तीर्धरत्नानि सुव्रत ॥ ३५ ॥ हे मुव्रत ! गंगाद्या एना नद्यस्तथा, अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, कांची, अवन्तिकापुरी, द्वारावती एताः सप्तपूर्यः गयशिरो गया, कुरुक्षेत्रं, त्रिपुष्करम् सेतुबन्धेश्वरादीनि च तीर्थपु नीर्थ रत्नानि म्युः ॥ ३४, ३५॥ हे सुमत ! नदी रूप तीर्थों में गंगा, यमुना, प्राची, सरम्वनी, नर्मदा, पयोपणी, कृष्णा, और येदिका ; एवं पुगे कर तीयों में अयोध्या, मथुरा, मा. जी, कांची, अवन्तिकापुरी, द्वारावतीपुगे तथा गया एवं कुरक्षे., ..., सेतुबन्धेश्वर (रामेश्वर ) ये मय तीर्थ रल है ।। ३४, ३५ ।। पषु सर्वपु तीर्थपु स्नानदानजपादिभिः ।। भवन्नि प्रत्ययायाम यधा बनम् ॥ ३६॥ (सायम् )- इन सब तीधा में जैगी कामना तथा मन मे स्नान. दान और जपादि किये जाते हैं, तदनुरूल फल प्राप्ति होने में विधान होता है ।। , . - -- ; -

जन्म-
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं ।
तत्र कर्मक्षेत्रे योनरः सर्वसिद्धिदं मानुष्यं जन्माप्य
संप्राप्य सर्वतीर्थेषु ना स्नाति तेन नरेण ध्रुवं निश्चयेनात्मा पंचितः
स यात्मानं वंचितवानिति ॥ १० ॥
उस कर्मक्षेत्र में सर्व सिद्धि दायक मनुष्य जन्म को पाकर बिसने
सय तीर्थों में स्नान नहीं किया उसने पारमा को धोखा दिया।॥ ४० ॥
यज्ञदानादिकं कर्म निर्धनै वसाध्यते॥
तीर्थ स्नानादिकं पुण्यं भक्तिप्रवासमन्वितैः ॥४१॥
देहमात्रायशेपैश्च निर्धनैरपिसाध्यते ।।
तस्मातीर्थ वरं लोके मर्वपुण्येपु मानद ।। ४२।।
हे मानद ! निर्धनजनैर्यज्ञदानादिकं नैव साध्यते । तीर्थ स्नानादिक
पुण्यं भक्तिश्रद्धासमन्वितहमात्रावरांपैनिधनरपि साध्यते तस्माल्लोके
सर्वपुण्यपु तीर्थ वरम् ।। ४१, ४२ ॥
हे मुनि ! धनरहित दरिद्रमनुष्यों से यज्ञ दानादिक कर्म का साधन
नहीं हो सकता क्योंकि इस में प्रचुर धन की आवश्यकता रहती है और
तीर्थम्नानादिक पुण्यकार्य को भक्ति तथा श्रद्धा जिसको होती है
वह महादरिद्र मनुष्य जिसको देहमात्र ही शेष धन है वह भी साधन
कर सकता है, इसलिये इस संसार में सभी पुण्यों में तीर्थ ही उत्तम
है क्योंकि यह सब के वास्ते मुलभ है ।। ४१, ४२ ॥
सदा
तीर्थपरैर्भाव्यं सर्वशोफै रिह स्फुटम् ॥
तीर्थस्नानसमं पुण्यं न भूतं नायप्यति ॥ १३ ॥
सर्व लेफिसवजनस्सदा तीर्थपरर्भाव्यम् भवितव्यमिताह स्फुष्टं
इपएं भवति तीर्थ स्नानसमं पुण्यं नभूतं न भविष्यतीति ।। १३॥
इसलिये निश्चय होताहै कि सभीमनुष्यों को सदा तीसदी होना चाहिये
क्योंकि तीर्थस्नानकसमान पुण्य और कोई यज्ञादि नहुआहै,नहोगा ॥१३॥

एषु सर्वेषु तीर्थेषु सर्वेषां पापहानये ||
सर्वेश्वरः सर्वरूपः सर्वतीर्थमयोयभौ ।। ३७॥
एषु सर्वेषु तीर्थेषु सर्वेषां पापहानये पापनाशाय सर्वतीर्थमयः
तीर्थादन्यत्पृथग्रूपं नास्तियस्य स सर्वरूपः सर्वेश्वरः परमेश्वरः वौ
विराजते ॥ ३७॥
इन सब तीथों में सब के पाप को नाश करने के लिये सब तीथों के
स्वरूप सर्वस्वरूप सर्वेश्वर, परमेश्वर, सदा विराजमान रहते हैं।॥ ३७॥
तथापि सर्वतीर्थेषु तारतम्यं प्रवर्तते ।।
विवेकेन महाभाग कलांशादिप्रभेदतः ॥३८॥
हे महाभाग ! तथापि सर्वतीर्थेषु विवेकेन फलांशादिमभेदतः
तारतम्यं न्यूनाधिक्यं प्रवर्तते ॥ ३८ ॥
हे महाभाग ! यद्यपि सर्वतीर्थमय सर्वेश्वर सम तीर्थों में विराजमान
है, तो भी विचार दृष्टि से देखने पर परमेश्वर के कला और अंशों के
भेद से सब तीर्थों में फलों का न्यूनाधिक है ॥ ३८ ॥
इदं तीर्थमयं वर्ष भारतंव्यपदिश्यते ।।
कर्मक्षेत्रं परंपुण्यं सर्वत्र सुग्वदायकम् ॥ ३६॥
इदं भारतं वर्ष तीर्थगये परंपुण्यं सर्वत्र मुसदायकम् कर्मक्षेत्र
पपदिश्यते ॥ ३६॥
इस तीर्थमय परम पवित्र सर जगह सुख देनेवाले भारतयां को
क्षेत्र कहा जाता है ॥ ३२ ॥
तत्र जन्माप्यमानुप्यं योनरः सर्यसिद्विवम् ।।
नास्नानि मर्वतीर्थपु तैनात्मा यंचितो ध्रुवम् ॥ ४॥

।
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं ।
१३
तत्र कर्मक्षेत्रे योनरः सर्वसिद्धिदं मानुष्यं जन्माप्य
संप्राप्य सर्वतीर्थेषु ना स्नाति तेन नरेण ध्रुवं निश्चयेनात्मा पंचितः
स यात्मानं वंचितवानिति ॥ ४०॥
उस कर्मक्षेत्र में सर्व सिद्धि दायक मनुष्य जन्म को पाकर जिसने
सब तीर्थों में स्नान नहीं किया उसने अात्मा को धोखा दिया ॥ ४०॥
यज्ञदानादिकं कर्म निर्धनै वसाध्यते ॥
तीर्थ स्नानादिकं पुण्यं भक्तिश्रद्धासमन्वितैः ॥४१॥
देहमात्रायशेपैश्च निर्धनैरपिसाध्यते ।।
तस्मात्तीर्थ वरं लोके मर्वपुण्यपु मानद ।। ४२ ।।
हे मानद ! निर्धनैर्जनैर्यज्ञदानादिकं नैव साध्यते । तीर्थ स्नानादिक
पुण्यं भक्तिश्रद्धासमन्वितर्देहमात्रावशेपैनिधनरपि साध्यते तस्माल्लोके
सर्वपुण्यपु तीर्थ वरम् ।। ४१, ४२ ॥
हे मुनि : धनरहित दरिद्रमनुष्यों से यज्ञ दानादिक कर्म का साधन
नहीं हो सकता क्योंकि इस में प्रचुर धन की आवश्यकता रहती है और
तीर्थस्नानादिक पुण्यकार्य को भक्ति तथा श्रद्धा जिसको होती है
वह महादरिद्र मनुष्य जिसको देहमात्र ही शेप धन है यह भी साधन
कर सकता है, इसलिये इस संसार में सभी पुण्यों में तीर्थ ही उत्तम
है क्योंकि यह सब के वास्ते मुलभ है ।। ४१, ४२ ॥
सदा तीर्थपरैर्भाव्यं सर्वलोकै रिह स्फुटम् ।।
तीर्थस्नानसमं पुण्यं न भूतं नमविप्यति ॥ ४३ ।।
सर्व लोफर्सवजनस्सदा तीर्थपरैर्भाव्यम् भवितव्यमितीह स्फुष्टं
स्पष्टं भवति तीर्थ स्नानसमं पुण्यं नभूतं न भविष्यतीति ।। ४३ ॥
इसलिये निश्चय होताहै कि सभीमनुप्योंको सदा तर्भिसेवी होनाचाहिये
क्योंकि तीर्थमानकेसमान पुण्य और कोई यज्ञादि नहुआहै,नहोगा ॥४३॥

याना महापुगण पूर्वः पूर्यगरः मृगा ।। लामशादिभिरन्या राजगिरः पुनः ॥ ४४ ॥ पूषः पूर्वनरः मानानानिमामीन मियातिभिः पुनरन्छ रापिमिश्विामित्रादिभिमहायुगया मायामा राना ॥ १४ ॥ मानानातिमानीन लोमयादि महारंगीन पार गनिमयर वि. प्रादि ने तीर्थ यात्रा को महापुण्य बनाया ॥ १४ ॥ तस्मात्कर्मममाप्य भूमि भारतमंशिकाम् ।। यैःस्नातं सर्वतीर्थपु तस्य जन्म शनार्थकम् ॥ ४५ ॥ (स्पष्टम् )- इसलिये भारतभूमि जमा फर्गमगि पाकर जिसने सब तीयों में स्नान किया उसका जन्म सार्थक है ॥ ४५ ॥ तीर्थ तीर्थ प्रतिस्नातुं कथं शक्यं तपोधन ।। तस्माद्रहस्यं यत्तीर्थ सर्वतीर्थफलप्रदम् ।। ४६ ।। रत्नभूतेषु तीर्थपु रत्नभूतं यदुच्यते ॥ तत्तेहं संप्रवक्ष्यामि त्वमिहकमनाः शृणु ॥४७॥ हे तपोधन ! तीर्थ तीर्थ प्रतिस्नातुं मनुष्यैः कथं शक्यं तम्मावि फलप्रदं रत्नभूतेषु तीर्थयु रत्नभूतं रहस्यं गोप्यं यत्तीर्भ तदहं ते यं संप्रवक्ष्यामि त्वमिहैकमनाः शृणु ॥ ४६, ४७ ।। हे तपोधन ! सभी तामें स्नान करलेना मनुष्य शक्तिसे वाह्य है इस -सभी तीर्थीके फल देनेवाला, रत्न तीयों में भी परमरत्न और गोप्य जो कहागयाहै उसकोमैं तुमसे कहताहूं सावधानहोकर सुनो ॥४६, ४७॥ ने श्रीस्कन्दपुराणे स्कन्दागस्त्यसम्वादे कपिलायतनमाहात्म्ये तीर्थवर्णन नाम प्रथमोऽध्यायः।

द्वितीयाध्यायकथारंभः। 4-28-+- ॥ (सूत उवाच) पतन्निशम्य यचनं स्कन्दस्य कलशोद्भवः ।। भूयोविज्ञापयामास मुदा परमया युतः ।। ११: सूतश्शौनकादीन कथयति यत् कलशोद्भयो ऽगस्त्यस्स्कन्दस्यै तद्वचनं निशम्य श्रुत्वा परमयात्यन्तया मुदा हर्षेण युतः भूयः पुनर्विज्ञापयामास ॥ सूतजी शौनकादि ऋपियों से बोले कि अगस्त्यजी ने स्कन्दजी के यह वचन सुनकर परम हर्ष के साथ फिर निवेदन किया ॥ १ ॥ स्वामिस्ते वचनादत्र महती मे प्रसन्नता ॥ संजाता मनसोऽत्यर्थ वारिणश्शरदोयथा ॥२॥ हे स्वामिन् ! तेतववचनादत्र मे मनसः शरदः शरदृतुतोवारिणो जलस्य यथा प्रसन्नता भवति तथा प्रत्यर्थ अतिशयं प्रसन्नता जाता ॥२॥ हे स्वामिन् ! जैसे शरन्काल से जल की प्रसन्नता होती है वैसे आपके वचनों से मेरे मन को अत्यन्त प्रसन्नता प्राप्त हुई है। (यहां प्रसन्नता का तात्पर्य स्वच्छता से है ) ॥२॥ भगवन्तं पुनः प्रष्टुं समीहे हरनन्दन ।। भूयो ममैनं सन्देहमपा कुरु दयानिधे ॥३॥ हे हरनन्दन ! पुनर्भगवन्तं प्रष्टुं समीहे दयानिधे ! भूयो मर्म सन्देहं श्रपाकुरु ॥ ३॥ है हरनन्दन ! आपसे पुनः पश्न करने की इच्छा करता हूं, हे दयानि ! एक चार और मेरे सन्देह को दूर कीजिये ।।३।। - वयोमम्महातीर्थ गुयं गुथं महीतले ॥ य तीर्थस्य यन्नाम तन्मे पद विदाम्पर ॥४॥ हे विदाम्बर ! महीतले गुवं गुह्यं यन्महातीर्थ त्वया उक्तम् । त्य यनाम तन्मे वद ॥४॥ हे ज्ञानियों में श्रेष्ठ ! इस पृथ्वीतल में गोप्यगोप्य अर्थात् अत्य महातीर्थ जो आपने कहा है उस तीर्थ का जो नाम है वह इये ॥ ४ ॥ न्ततीर्थ किम्प्रमाणं किम्फलं किंसमीपगम् ॥ म्माहात्म्यं किमाधिक्यं किंदेशस्थं किमात्मकम् ॥५॥ (स्पष्टार्थोयम्) वह कौन तीर्थ है, उसका क्या प्रमाण है, क्या फल है, किसके - है, क्या माहात्म्य है, उस तीर्थ में क्या विशेषता है, किस देश और उसका कैसा रूप है ॥५॥ नत्सर्व समाचक्ष्व विचक्षणशिरोमणे ॥ गां निश्श्रेयसाय तव सूक्तं प्रवर्तते ॥६॥ विचक्षणाविद्वान्सस्तेषां शिरस्सु मरिणरिव तत्सम्बुद्धी हे विचक्षण नणे ज्ञानिशिरोमणे ! एतत्सर्व समाचक्ष्व कथय यतस्तव सूक्तं शोभनं उक्तं कथनं सूक्तं भवति ) तव सुवचनं नृणाम्मनुष्याणा नेयसाय निश्शेषकल्याणलाभाय प्रवर्तते गवति ॥ ६ ॥ हे ज्ञानिशिरोमणि ! ये सब विषय पूर्ण रीति से बतलाइये, के भापका मुकथन मनुष्यों के परम कल्याण के लिये है ॥ ६॥ (सूत उवाच) ने पृष्टः स भगवान्मुनिना कुंभयोनिना ।। सुरसेनानी: स्मयन्निव गतस्मयः ॥७॥ , .

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । इत्ययं कुंभयोगिना कुंभोपटोयोनिर्जन्मस्थानं यस्य स तेन मुनिना अगत्येन पृष्टः स गतम्मयोनिम्पृहोभगवान्मुराणां सेनानीरस्कन्दः स्मयन् स्वचितोद्रेकं प्रकटयालयोवाच चिचोद्रेकः स्मयोमद इत्यमरः ॥७॥ सूतजी बोले कि जब कुंभयोनि अगम्त्य मुनि ने इसप्रकार प्रभ किया तो निरहंकारी भगवान् स्कन्दजी ने अपने हृदय में जो ताधों के भेद भरे थे उनको प्रकट करते हुये कहा ॥७॥ शृणुविरेन्द्र यदयामि गोप्यं तीर्थमनुत्तमम् ॥ यनाम श्रुनिमात्रेण पापराशिः प्रलीयते॥८॥ हे विप्रेन्द्र ! अनुत्तमं गोप्यं तीर्थ प्रवक्ष्यामि शृणु । यन्नामेति म्पाटम् ॥ ॥ हे विप्रेन्द्र ! एक उत्तम और गोप्य तीर्थ को कहता हूं, सुनो ! जिसके नाम श्रवण करने से पापराशि नष्ट हो जाता है ।।।। अस्ति देशस्स विपुलस्समुद्रोयालुकामयः॥ महिष्टोमेदिनीपृष्ठे निसर्गादेय पावनः ।।६।। 'अस्ति स मेदिनीपृष्ठे पृथ्वीपृष्ठे महिष्टः अतिश्येन महान् महिष्ठः पूज्यतमः निसर्गात्स्वभावादेव पावनः पवित्रः वालुकामयः समुद्रः विपुलो देशः ॥ ६ ॥ पृथ्वी पर अतिशय पूज्य स्वभाव से ही पवित्र वालुकामय समुद्र एक विपुल (बहुत बड़ा ) प्रदेश है ॥२॥ यनोत्तको नाम मुनिर्वालुकामयसागर ।। चिरकालं चकारोस्नपस्तीनन्तपोधनः ॥१०॥ यत्र देशे वालुकामयसागरे तपोधग उत्तरोनारमुनिश्चिमान तीनं तक्षिणन्तप रचधकार ॥१०॥ ३ 1

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श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । वह दुष्ट दानव मुख से कभी अमि को कभी वायु को वमन करता हुवा उत्तंकमुनि की तपस्या में विन फरता रहता था ॥ १३ ॥ इत्यन्तमपर्वाणं दृष्ट्या विप्रः स तापमः ।। कथमेपभवेध्यश्चिन्तयामास घेतसि ॥ १४ ॥ इत्थं पूर्वोक्तामियमनवायूगिरणादिव्यापारेणापकुर्वाणंतदैत्यं दृष्ट्वा एप दैत्यः कथं वध्योभवेदिति म तापसोविप्रः उत्तकम्धेतसि चिन्तयामास तद्वधं विचारयामास ।। १४ ।। इस प्रकार मुख से अति और वायु को उत्तर फरके अपफार फरनेवाले देस्य को देखकर वह तपस्वी माण उतंकमुनि थपने मन में विचारने लगे कि किमप्रकार से वह गाराजाय ।। १४ ।। स्वतः सामर्थ्यपुगोऽपि प्रलयानलसलिभः॥ क्षमाषान् स्पसपोभंगभिया ना पुरत स्पपम् ॥ १५ ॥ शोधसमये प्रलयागलसलिभ प्रलयागिममः गावान् रान्नाः स मुनिः स्वतः सागययुलोऽपि दत्तभकर दियं समनि रयतपोभंगभिया भयेन ग्वयं न अपुरत दयपधार बनाएन । मत्र स्पयम् इति भने भूपरिपाटः ॥ १५ ॥ कोष के समय में मल्याल फे. मालिकेनन् मुनि ने निज फे. सागर ने भी मान सामान भय से दिगपा । तो मुलगा दिपानी नपं दुपारपम् ।। धुभाभार पारमा नरे पापा पनि ॥ १६ ॥ ༽ ཀ་བ་ཀ་ཙ༌ལས་ ད དཔོrས་ ༔་འs. FREEmme

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श्री कपिलायनननार्थमाताम्यं । धुन्धुर्नाम महादुष्टो मधुमनुहायसः । नित्यं रजस्सु स्वपिनि मदाश्रमसमीपगः ॥२०॥ महावलो भीषणपराक्रमो महादुष्टो मधुसू नुः मधुनामको दानवः पूर्वमभून् यद्वधं भगवता विष्णुनाकारि येन भगवान् मधुसूदनेति नाम्ना प्रसिदिगतः तत्कथाविस्तारं पुराणेषु प्रसिद्ध, तम्य मधोः पुत्रोमहादुष्टः धुन्धुर्नामकः मदाश्रमममीपगः मदीयागनिकटे वसन् नित्यं रजम्सु पालुकास्वन्तर्हितः स्वपिति शेते ॥ २० ॥ एक मधुनामक दैत्य था ( जिस मधु को विष्णु भगवान ने वध किया जिस कारण भगवान का नाम मधुसूदन पड़ा जिस की कथा पुराणों में प्रसिद्ध है ) जिसका पुत्र महावली और महादुष्ट धुन्धु नाम का दैत्य है जो मेरे पाश्रम के निकट ही वालुकायों में छिपकर सदा सोता है ॥२०॥ स मे विघ्नं करोत्युचैः सदा पर्वणि पर्वणि । तं ध्वंसय महाबाहो ! विष्णोरंशोऽसि भूतले ॥२१॥ स धुन्धुम मम पर्वणि पणि सदा उच्चविशमुपद्रवं करोति हे महाबाहो ! तं ध्वंसय नाशय यतस्त्वं भूतले विष्णोरंशोऽसि ॥ २१ ॥ यह धुन्धु नामक दानय मेरे प्रत्येक पयों में अत्यन्त विन करता है । हे महायाहु ! तुम पृथ्वी में विष्णु भगवान् का अंश हो इसलिये उसका नाश करो ॥२१॥ स एवमुतोगपतिमण्यः सत्यसंगरः ।। साहाय्यं मनसा कर्तु ग्रामपार्थे समुद्यतः ॥ २२ ॥ सत्यसंगरः सत्यमतः ब्रह्मण्यः ब्रह्मनिष्ठः मादर,प्रिय इनिया स नृपतिः राजा एवं उत्त: उत्तंकमुनिना कथिती नासा) साहाय्य फतु मनसा समुद्यतः ।। २२ ।।

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श्रीकपिलायतनतार्थमाहात्म्यं ।
धुन्धु म माहादुष्टो मधुमनुर्मदायलः ।
नित्यं रजस्सु स्वपिनि मदाश्रमसमीपगः ॥२०॥
महावलो भीषणपराक्रमो महादुष्टो मधुसूनुः मधुनामको दानवः
पूर्वमभूत् यद्वधं भगवता विष्णुनाकारि येन भगवान् मधुसूदनति नाम्ना
प्रसिद्धिंगतः तत्कथाविम्नारं पुगणेषु ममिद्धं, राम्य मधो पुत्रोमहादुष्टः
धुन्धुनामकः मदाश्रमममीपग. मदीयागनिकटे पसन् नित्यं रजम्मु
पालुकास्वन्तर्हितः स्वपिति शेते ।। २० ॥
एक मधुनामक दैत्य था ( जिस मधु को विष्णु भगवान ने का
किया जिस कारण भगवान का नाम गधुसूदन पड़ा जिम की कथा
पुराणों में प्रसिद्ध है ) जिसका पुत्र महादली और महादुष्ट धुन्धु
नाम फा दैत्य है जो मेरे बाधम के निकट ही वालुकामों में दिपार
सदा सोता है ॥२०॥
म मे विसं करोत्युधः मदा पाणि पनि ।
तं ध्वंसप महापाहो ! विचारोऽमि मतले ॥ २१ ॥
स धुन्धुम मम पर्वणि पशि सदा उभिमुपद्रवं परोनि हे
महाबाहो ! तं मप नाराय यतात्य नूतले विजो मि ॥ २१ ॥
परशुभु नामक दागप मेरे प्रत्येक १२ में पवन विभ वना है।
हे महापार ! तुग पृथ्वी में दिन भगमन का काही मनिय
उमफा नारा पगे॥२१॥
म एयमुनोगपनिहाय मरपनगरः ॥
साहायं मनमा पातु मामा मामतः॥९॥
सत्संगरः सबनतः प्राय:
परमिकाम
गरः गाडग: रुपमा पर पा
पां मनन ममतः ॥२६॥

HTTARHI हम ममता म मामा नाम म. गामी दिना गुपनपारा को कि पर उबा१६॥ राम शिपमा कर्म फिभियान नियंग ।। तपस्थिनिवां गृस्या त यि विनाशय । हैरागत : मिचिग कियनां यश तुभ्यं निवर विषमे दयां गया तो वि विनाराय ॥ १७ ॥ ६ रागर ! शिरा फाप फो यापंग निवेदन कर कीजिये। काग यह है कि तपग्रियों के ऊपर दया करक फो विनाश कीजिये ॥१७॥ राजानो हि महाराज पिणारंशसमुद्भवाः ।। तथाच यो लोके नाविषणुः प्रथिवीपतिः ॥ हे महाराज ! राजानः विष्णोरंशममुद्भवा भवन्ति तथाच ना विष्णुः ना गनुप्यः श्रधान्मनुष्य रूपो विष्णुरिति लोके शू हे महाराज ! राजा लोग विष्णुभगवान के अंश होते हैं। पीर संसार में भी यही कथन प्रसिद्ध है ।। १० यहुयं ममराजेन्द्र श्रूयतां श्रुतिदानतः॥ परोपकारकरणे यूयं धात्रा विनिर्मिताः ॥ १६ हे राजेन्द्र ! ममयदुःख तच्श्रुतिदानतः श्रूयतां यूयं करणे धात्रा ब्रह्मण विनिम्मिताः ॥ १९ ॥ हे राजेन्द्र ! मेरा जो दुःख है सो कान देकर सुनिये, परोपकार करनेवास्तेही विधाता से निर्माण किये गये हैं।

। वीजनिः नागरी मार श्रीकपिलायतनवीयं । २३ हे द्विज ! तेन कर्मणा स राजा कुवलयाश्व. धुंधुमार इतिच्यातो संज्ञांगतः मधोर्वधेन मधुसूदनवत् । सोयं वालुकामयः समुद्ररशुद्ध स्ति ।॥ २५॥ हे विष ! उस फर्म को करने (धुंधु को मारने) से उस लियाश्व नाम के राजा का नाम धुंधुमार हुवा, और वही यह लुकामय शुद्ध प्रदेश है ।। २५ ॥ मध्य से निकले तबतक रामचन्द्र जी ने उस ब्रह्मास्त्र से समुद्र की शोष कर पदल गरी सेना को पार संमाने की प्रतिज्ञा की, तर समुद्र की मानहानि देस देवनानी ने प्राकाशवादी द्वारा मना किया पौर समुद्रदेव सम्मुश पाकर प्रार्थना पर बोले कि. हे राजयुमार ' म पाम से, लोभ से, भय से, विप्रियार उस जल यो रोक नहीं सकते है पापी जमादा है वही हम भी करने को तैयार र चौरमा पार करेंगे उमारम परंगे पापकी सेना पार जागगी उस समय पाई जीव उसकी नहीला सकता चिन्नु यह नल राशि बीच में रत्तम स्तम रपल दिसावंगा । ऐगा मुनकर रामचन्दनी ने कहा कि इस घोष राय को विरा देश में कोई तबसपुर ने कहा कि उत्तर के देशों में एक दुमार नाम का परा पुर परमार है पहापर बहुत चोर ग पाभरादि की पापा पर मेरे जल को पर्श पर पाते है। राम हम उतर शर को पार । योकि उन पापियों के पर्स से जो पाप होता रम को नहीं सहन पर समानकर मारामान गदरा में शराब से परामर (परमागल) नाम से प्रतिकार जिस स्थान में सर हिरा बहार से पनी र पानेगा.पा में निगमान हो र सो पम्पन से मनु सिगुरोचक र रच रंग साइम देगा समान नाम विपिन रिपु लोपुर कातार पर शोपियागुतं पृदिरामोगरामनपर तम्म दवा पिताम्मरमादिनः"परम परदेस पर RNAKग में लेकर पर भर नोकर"एपनि मंयुमो पनि रालोकःमरर पदनारशिप पर" मन र PARTracा।

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । सत्य का पालन करनेवाले ब्राह्मणों के भक्त उस राजा (कुवलयान से इतंक मुनि ने जब ऐसा कहा तब उत्तंक मुनि की सहाय करने के लिये राजा ने मनसा संकल्प फिया ॥ २२ ॥ एकविंशतिसाहस्रः संख्याकैः पुत्रकैर्युतः ।। गत्वा धुंधु जघानाशु विष्णुवीर्योपहितः ॥२३॥ विष्णुवीर्योपहितः विष्णुतुल्यपराक्रमः विष्णोरंशत्वादि राजा स्वकीयरेकविंशतिसहसैः संख्याकैः पुत्रकैर्युत उत्तकमुनेराश्रम गत्या श्राशु शीघ्रं धुंधुं जघान ।। २३ ।। विष्णुभगवान के तुल्यवली उस राजा ने अपने इपीस ह पुत्रों के साथ उतंक मुनि के आश्रम के समीप जाकर उस धुंधु दा को मारडाला॥२३॥ धुंधोमुखामिना दग्यास्सर्वते राजसूनवः ।। देवेन दुर्मिनक्यण प्रय एवावरोपिताः॥२४॥ ते सव्य रागगनयः राजपुमाः धुंधोमुहागिना दग्धा मामाभूनाः -उस्या दोन ते अय एया यगेगिताः ॥ २४ ॥ इस युद्ध में राजा कुपनयारस के सभी पुगों को प्रदाना ने - मुरा ग यात प्रगट करके जलादिया, भाग्य से सीन सा सुमार मियागः फमन गहिरा। गुमशालि गानां पानुगामः ॥२५॥ ":"i-THEMATRA सनि. नागरी मार श्रीकपिलायतनमध्यं। २३ हे द्विज ! तेन कर्मणा स राजा कुबलयाश्वः धुंधुमार इतिख्यातो म संज्ञांगतः मधोर्वधेन मधुसूदनवत् । सोयं वालुकामयः समुद्रश्शुद्ध देशोस्ति ॥ २५ ॥ हे विप्र ! उस कर्म को करने (धुंधु को मारने ) से उस बलयाश्व नाम के राजा का नाम धुंधुमार हुवा, और वही यह चालुकामय शुद्ध प्रदेश है ॥ २५ ॥ के मध्य से निकले तबतक रामचन्द्र जी ने उस ब्रह्मास्त्र से समुद्र को शोर कर पदल निरी सेना को पार जाने की प्रतिज्ञा की, तर समुद्र की मानहानि देख देवतानों ने प्राकाशवाणी द्वारा मना किया चौर समुद्रदेव सम्मुस्त पाकर प्रार्थना कर बोले कि हे राजकुमार ! हम काम से, लोभ से, भय से, किसीप्रकार उस जल को रोक नहीं सकते हैं यापकी नसीहा है वही हम भी करने को तैयार है और नो पाए करेंगे उस को हम सहन करेंगे। पापी सेना पार जायगी उस समय कोई जीव उस को नहीं जा सकता किन्तु यह नल राशि बीच र में उत्तम उत्तम स्थल दिखावेगा। ऐसा सुनकर रामचन्द्रनी ने कहा कि इस चमोघ शस्त्र को किस देश में छोई तर समुद्र ने कहा कि उत्तर के देशों में एक दुमकुरूप नाम का मेरा पुरपरथान है वहांपर बहुत चोर डाकू प्राभारादि पारी या ग्रा कर मेरे जल गे सरां करले चौ पीते है । हे राम ! इस उत्तम शर को यहांही दाहिये। क्योंकि उन पापियों के स्पर्श से जो पाप होता है उस को मैं नहीं सहन कर सकता। यह सुनकर श्रीरामचन्दनीने उसी देश में शर घोड़ा। तब से वहदेश मरकान्तार (मानांगल ) नाम से प्रसिद्ध हुया चौर जिस स्थान में शर गिरा वहां पादास से पानी ऊपर थाने लगा, पृथ्वी में दिन होगया निसको माप कहते हैं । इसरार अपने घम्यस्त्र से समुद्र के पुतिगत जल को शोर लिया और सर्वत्र तिम् दोसने लगे। मासे इम देश का मरुनांगल नाम तीनों लोक में विख्यात हवा । "विण्यातं त्रिपु लोकेषु मर कान्तार मेवच ॥ शोपयित्यातुतं कृति रामो दशरथात्मजः ॥ परंतस्मै परवेऽमरचित्रमः॥"पाई रामचन्दनी ने उस पर देश को बरदान म में पशुओं के चरने वारते नृप बहुत होंगे और रोग बीमारी उस देग 'चिनेक पीधियों से पुरु स्नेह रिमरित गा।" एवमेभिश्च संयुलो यहुभिः शिवः पंधा यभूवह ॥"श्री रामचन्दनी का पाधार पा फोर उमडे समस्त माग गमायपे पुटपाट २१-२२ स। - फत मुख श्रीकपिलायतनतीर्थगाहात्म्य । स्वभावनिर्मलो लोके निर्जलोरुपमहीमहः । निर्भयोनिर्धनश्चापि नैसर्गिकगुणान्वितः ॥२६॥ अयं देशः लोके स्वभावेन स्वप्रकृत्या निर्मलः स्वच्छः निर्ज मलरहितः अल्पमहीरुहः अल्पाश्चतेमहीरुहश्चालपमहीरुहस्तोक वृद ल्मादिजनकः । निर्भयः निर्धनः अपिच नैसर्गिकगुणान्वित ऋतिकगुणसम्पन्नोस्ति ।। २६ ॥ संसार में यह देश स्वभावसुन्दर निर्जल तथा वृक्ष लता गुल्मादि मायः रहित है और निर्भय एवं निर्धन तथा प्राकृतिक गुणों से है ॥ २६ ॥ : वस्था मानवाः सर्वे सरनाः शुद्धमानसाः। पव्यक्रौर्यतास्कयेयर्जिताः प्रायशस्थिताः ॥२७॥ नत्रस्थास्तद्देशसमुत्पन्नाः सर्वे मानवाः सरलाः शुद्धप्रकृतयः नसाः पवित्रान्तःकरणाः प्रायशः कापट्यक्रौर्य तास्कर्यबर्जिताः सन्ति ।। २७॥ न देश के सभी मनुष्य सीधे और शुद्धचित तथा कपट, नं चोरी इत्यादि दुर्गुणों से बहुधा वर्जित होते हैं ।। २७ ।। चारविनिर्मुस्ता युक्ताश्चाविधिपूजने ।। वास्तथाभूपाः सर्वथा पापभीरवः॥२॥ नया याह्याचारेण वायशुद्धिरूपम्पास्पर्शशीचाचारादिना- -हिता अतिथिपूजने अतिथिसरकारे युक्ताश्च भवन्तीति । का भूपा राजानः सर्वथा पापभीरयो भवन्ति ॥ २० ॥ बाहरी आचार-विचार से रहित और अतिथि रोजायरन स देश के राजा सर्वधा पाप से डरते रहते हैं । .

श्रीकपिलायतननार्थमाहात्म्यं । विप्राश्च वेदरहिताः प्रतिग्रहवियर्जिताः। सुशीलाः साधवःसौम्यास्तथा निर्व्याजजीवनाः ॥२६॥ विप्रा ब्राह्मणःश्च वेदरहिताः प्रतिग्रहविर्जिता. मुशीलाः साधवः सौम्यास्तथा निर्व्याजजीवनाश्च भवन्ति ॥ २६ ॥ उस देश के ब्राह्मण वेद शास्त्र को नहीं जानते और दान नहीं लेते एवं सुशील साधु और शान्त तथा निष्कपट जीवन व्यतीत करने वाले होते हैं ॥ २६ ॥ तद्देशीयाः स्त्रियश्शुद्धा अतिचांचल्यवर्जिताः। ऋजुस्यभावशालिन्यो देवतातिथिपूजिकाः ॥३०॥ तद्देशीयास्तदेशप्रसूताः स्त्रियः शुद्धाः शुद्धाचाराः अनिचांचल्य वर्जिताः ऋजुस्वभावशालिन्यः कोमलप्रकृतयो देवतातिथिपूजिकाश्च भवन्तीति ।। ३०॥ उस देश की स्त्रियां शुद्धाचरणयाली और अति चंचलता से रहित, कोमल स्वभाव की एवं देवता तथा अतिथि की सेवा करनेवाली होती हैं ।। ३०॥ तस्मिन्देशे महाभाग! कश्चित्सिद्धो भविष्यनि॥ सोप्येनां पृथिवी पूतां पावयन् संचरिप्यति ॥ ३१॥ हे महाभाग ! तस्मिन्दशे फश्चिसिद्धो भविष्यनि सोप्येनां पूना पवित्रां पृथिवी पावयतिशयन पवित्रीकुर्वन्संचरियति ॥ ३१॥ हे महाभाग ! उस देश में कोई सिद्ध होगा जो इस पवित्र पृथिवी को यतिशय पवित्र करता हुवा विचरेमा ॥ ३१॥ प्रजास्तद्देशवासिन्यो देशापारकृतादराः ।। उप्ट्रारोहाचर्मचारिपागिन्यः स्पृष्टभोजनाः ।। ३२॥

धोकपिलायतनतीर्थमाहात्म्य । तद्देशवासिन्यः प्रजाः देशाचास्कृतादराः देशस्य ये श्राचा कृत श्रादरोयागिस्ता देशागारकृतादराः उप्ट्रारोहाः योनयु उप भमहिपादयो धर्मयाम्ने निपिद्धास्तथापि तद्यानाः चर्मपात्रज प्रत तो ऽशुद्धं तथापि चर्मचारिपायिन्यः चर्मजलपानशीलाः स्पृष्टभोज असताव्यवहार्सापांक्तयदासदासीप्रभृतिशूद्रादिस्पर्शभोजनं संस नाशक धर्मशाले दृषितं च तथापि कुर्वन्तीति स्पृष्टभोजनाः ॥ ३२॥ उस देश के रहनेवाली प्रजा अपने देशाचार का बहुत भाव करती है ऊंटों की सवारी करता है चर्मजल पाती है हर किसी के हा लगाया अन्नादि भोजन करती है ।। ३२ ॥ (ऊंट की सवारी चर्मजल पान स्पर्शा स्पर्श के विचार छोड़कर भोजन इत्यादि धर्मग्रन्थों के अनुसार प्रायश्चित सूचक होता है इसलिये श्रावणीफर्म के संकल्प में इन सयों को क्षुद्र पापों में परिगणित किया गया है परन्तु एतद्देशी प्रजा को देशाचारवश करना ही पड़ता है।) तथापि तद्दोपारस्पृष्टास्तत्मभायत:॥ तथापि अर्थात्पूर्वोक्तपापाचरणादपितस्य सिद्धस्य प्रभावतः दोपगणे हक्तदोषसमेहरस्पृष्टा निर्लेपाः प्रजा भवन्तीतिरोपः ।। तथापि उस सिद्ध के प्रभावस वे उपरोक्तदोष प्रजावों को नहीं लगते।। ईदग्गुणविशिष्टेऽस्मिन्विषये द्विपदाम्बर ॥ ३३॥. सर्व तीर्थ शिरोरत्नं महातीर्थ विराजते ॥ यातं यत्सर्वलोकेपु कपिलायतनन्त्यिति ॥ ३४ ॥ हे द्विपदावर ! ईदृग्गुणपिशिष्टेऽस्मिन्विषये देशे सर्यतीशिरोरत्न लिलामभूतं महाती विराजते यलु सर्वलोकेषु कपिलायनमिति उं प्रसिद्धमस्तीति ।। ३४ ॥ 1 श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । हे मनुष्य श्रेष्ठ : एमे गुणों से युक्त उस देश में सब तीर्थो फा मुकुट एक महातीर्थ है । जो सब लोकों में कपिलायतन इस नामगे प्रसिद्ध ह॥३४ समुद्रे चालुका मातीपय स्थितम् ॥ तकपिलायतनम् । १५ माद्वीपदय निमग्नि ॥ यह फपिलायतन वालुकामय गगुन्द्र में एक महाहीर के मरण वर्तमान है। निर्जलेपु जलप्रायद्वीपीयं शर्करामयः ॥३५॥ नाना मृगगणापीर्णः मर्यकालनिरामयः ।। निर्जलनितिशेष गमय सिमानामय नानामृगगरगावी विविधगृगजानिव्याप्तः सर्वकालनिगमायं जनमायतीरः ययाटमिन्म- दापदेश जलमपि भवत्येव ।। इन निर्जल प्रदेशों में भी यह पालुकामय सीप भनेक मगर से मुफ्त सर्वदा निगमय भार जलयुक्त, पर्थत निर्जल देश होने पर भी यहां जल से जाता है। ममिदारपुरातीधारमन्यदिशि नापन ॥३६॥ पर्वते काफ्लिनामे पिरामियांजने ॥ मारमपी भूमिदान पर पापनी॥५॥ सोपन : पुलामी पनि वारि ने : भूमिदान ॥८.१७॥ हेमनमदिदिकटरा एपरिनामहरा, पगनां दिनमा मनादिर :

श्रीकपिलायनठीमाहात्म्य । है वियर ! यह कृष्ण-सारमयी पवित्र भूमि यज्ञ करनेकाना मदा ग्ग देना है। मनावरं ग्यनत्मत्रवरं तया ॥३८॥ सागपारतरं स्थानं पुण्यात्पुण्यनरं पुनः (सष्टार्थः )- यह स्थान गर तीर्थों से तथा सब क्षेत्रों से श्रेष्ठ है और उत्त म तथा पवित्र से भी पवित्र है ।। निपु लोकेषु भूलाको भूलाक लोक एयहि ॥३६॥ लांक पिवती पृथ्वी जम्बूद्वीपस्तंतोऽधिकः ।। तहनिय विप्र श्रेष्ठं भारतमुच्यते ॥ ४० ॥ (१) स भूलीक में सराप से नद्रागादि सानी द्वीपों तथा उनमें से केवल नम्बूद्वी के अन्तर्गत नयाँ खगों को दिखाते हैं । भूगोल के श्राधा उत्तर का भाग जा है, और जम्बूद्वीप को दक्षिणी सीमा पर वारसमुद्र है, और इसके उत्तर तर के देशों या निरपदेश कहते हैं, निरर्दश में रांका ( सलोन ), इससे पश्चिम रेपक (रूम), इगरी पश्रिम सिमपुर (अमेरिका), उससे प्राग यमोटि ये चार रन है, अर्थात् लका में पूर्व यमरोटि, पधिम रामक और ठीक नीचे सिद्धपुर है । ये चारों स्थान भूगोल के शशि पर है। और इन चारी रमानों में मेरपर्यत मिधर दीस पड़े यही उत्तर है। दरासिंग संका से उतर हिमगिरि नो पूपिभिम समुद्र तक गया है। चार हिमागार से वार हमारपर्यत है, यह भी पूर्व पश्रिम रामुद्र तक गया है, परगसे सगर नियत समुद्र पम्यन्त गया है इन रामों के पोप २ में नीयापार में देश में मिगो मोनिदेश पहते हैं। उनमें पहला भारतवर्ष , र र देश है, उससे आर पि एवं नाप नो मिदपुर पाजल * 12, उRRA भिम सब पर्यन्त , सो सर यमनी शर्मागाल? सौर उग उनलगिरि AN २ में भादराम पर गान दशमी पापगंगान र शेतगिरि के iman मार मीच में mini alife गरोदामाम RE- मनी, . * श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । २९ त्रिषु भूर्भुवस्स्चलोफेप्वयंभूनोंकः अम्मिन् भूकि हि यतः लोको जन एव अत्र लोक शब्दो भुवन जन याचकः लोकन्तु भुवनेजने इत्यमरोक्त्या अतोऽस्मिल्लाके भुवने पृथ्वी द्वीपवती द्वीपा विद्यमानाः सन्त्यम्या अस्याम्वेति द्वीपवती ततस्तेषु द्वीपेषु जम्बूद्वीपोऽधिको महानिति । वर्षाणां नवकानां समाहारो वपनवकम् तम्य जम्बूद्वीपस्य वर्षनवकं तद्वर्षनवकं तस्मिन् हे विप्र : श्रेष्टं भाग्नं उच्यते ॥३९, ४०॥ भूनकि, भुवकि. स्वलोक ये तीन लोक है इन तीनों लोकों में यह भूलॊक है इस भूर्लोक में ही मनुष्य रहते हैं इसलिये इस लोक में सातद्वीपवाली पृथ्वी नव देशों में बंटी हुई है डग सान द्वीपों में जम्बूद्वीप सब से बड़ा द्वीप है इस जम्बूद्वीप के नव खण्ड हैं उन में सय से श्रेष्ठ भारतवर्ष है ॥ ३२, ४०॥ च में भद्राश्व सातवा देश है. पीर पश्चिम में रोमदेश से गन्धमादन नाम का एक पहाइ निकलकर पते । निगम से मिलता हुया नाल न क गया है। उतरे और समुद्र के बीच में तुमास पाटरा देश है एवं निएर, नाल, माल्यवान और गरमादन का चार महापनों से राि पा एमाहत नार का नाया नयमसरत है। इसको पाणलोग देवनाचों पात्राडा-भवन चर्थात् सर्गभूमि यहते है। इमतरह पृषी के गोसाई रूप नमहार में, भारतपर्ष, विपदणे, हरिपर, रम्यक रिमययर चौर पुगा सलोन में चमतिका नक है पर पुममुर किनारे भावार्ग, पभिमीसपुत के तार पर समान र नीर मसन, निक चारों चार दक्षिण निपप, माया, ना मगर, न ममदा मेसिया इसात नयम सर्ग: मिना सही। पर इस भारत में भी नए तर पोत मा.निन म माती लिखता हूं। भारतको भावना कम है यहागर में मिलेगाव में पहसा एन्टराए मगर, नामालागार, मा नागराए, मानवां सर, पाहतां बरम पर ना हरारे। पदमारमा पर पाक-समाजमनाई। घल नागमारिरिनाम (भारत) मकर, परिमार, सौरभ सागर मेसिन

३० ARTHI
तनापितानि पुनः माराणागि प्रगक्षते ॥
तेपु सत्तीधरत्नानि प्रगागादीनि मत्तम ।। ४१ ॥
दे सम्म ! अगत्य ! तन भारतेऽपि पुनः साराणि परमोत्कृष्टानि
की नीति मनात ते सारतीयपु प्रयागादीनि तीर्थरमानि सन्तीति ॥४१॥
हे मुनि सम ! उस भारतप में और भी उत्तमोनम तीर्थ है उन
चमोचम तामी में भी प्रयाग यादि सतीर्थ रत्न है ॥४१॥
नेप्वपि प्रथमं फेचिदिमम्विज्ञानचतुपः ॥
जारात्सारतरं माहुः कपिलालयमुत्तमम् ॥ ४२ ॥
फेचिद्विज्ञानचक्षुपः विज्ञानमेव चतुर्यपान्ते तेष्वपि सत्तीर्धरलेषु
न-सारासारतरमत्युत्कृष्टं फपिलालयमुत्तमम्प्राहुः ।। ४२ ॥
विज्ञान दृष्टि से देखने वाले अनेक महर्षि लोग उन सत्तीर्थ
में सारासारतर इस उतम कपिलालय को ही कह गए हैं।॥४२॥
तीर्थस्य माहात्म्यं कली जानन्ति केचन ।।
T: सबै नजानन्ति महामोहान्धचनुपः
लौ कलियुगे एततीर्थस्य माहात्म्यं केचनजना जानन्ति महा-
चनुपः दारा पुत्र मित्र धन कुटुम्ब परिवारदिरूपोऽयं संसार
गेहः अस्मिन्निममे चक्षुपीयेपान्ते महामोहान्धचक्षुषोभवन्ति ते
नानन्तीति ॥ ४३ ॥
नेयुग में इस तीर्थ के माहात्म्य को कोई कोई मनुप्य जानते
न मित्र धन कुटुम्ब परिवारादि रूप संसार के महामोह से
हैं वे नहीं जानते ॥ १३ ॥
चामहत्वंच नवेत्ति विकलोजनः ।।
फोनला. पारमार्थिकः ॥११॥

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श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं ।
विकलः स्त्री पुत्रादि परिवारेभ्य उद्विमचिचोजनः महत्वंचामहत्त्वं
च न वेति न जानाति लोकोजनःगतानुगतिकः येनास्मपितरोयाता
येन याताः पितामहात्तेनमार्गेण गन्तव्यमितिमार्गावलम्बीति पारमार्थिकः
ईश्वर प्राणिधान रूप परमार्थसाधको लोकोजनौनेति ॥ ४४ ॥
स्त्री, पुरुष, धन परिवारादि की अभिलाषाओं में विहल चित्त
मनुष्य गतानुगतिक होते हैं अर्थात् एक दूसरे के पीछे चलनेवाले होते हैं
वे ईश्वर सम्बन्धी परमार्थी ज्ञान के साधक नहीं होते, इसलिये ये
इसके महत्व व थमहत्व को नहीं जान सकते क्योंकि उन्हें अन्य विषय
के मनन करने का अवकाश ही नहीं मिलता ॥४४॥
सारंच यदमारंच शास्त्रादेव हि मन्यते ॥
यस्य शास्त्रमयं चक्षुः सचतुष्मान्नचेतरः ॥ ४५ ॥
सत्सारं यदसारं च वातु तच्छायादेव हि यतो मन्यते ॥ अतः
यस्य चक्षुः शास्त्रमयं भवति स चक्षुप्मान् नचेतरः ॥ ४५ ॥
जो सार वस्तु है और जो असार यस्तु है वह शास्त्र से ही
जाना जाता है जिसका शास्त्रमय नेत्र है वही नेत्रवान् है
दूसरा नहीं ॥ १५ ॥
सारासारतरं विद्धि तीर्थ फापिल दैविकम् ।।
मा संशप महाभाग ! मदुत्वं फदाचन ॥४६॥
हे महाभाग ! फपिलोदेवोयरय तत्कापिलदेविकम् तीर्थ सारा-
स्सारतरं रिति जानीहि मदुत मदीय करने कदाचन मा संगय संदेहं
मा कुरु ॥ ४६॥
हे महाभाग ! ल कपिल तीर्थ को उत्तन मे उत्तम गना, मेरे
इस फथन में कभी सन्देह मत करो ॥ १६॥

पेशंसतीकर्तुं शंसितुं जिह्वा मां अभिवासति प्रेरयति अतः
श्रीफपिलायनननायगादानाय ।
मार्ग माय मासंपु नर्वतीपु तीर्थ राद ।।
मोक्षकतुं विज्ञाय गोपिनाये सुरः किल ।। ४७ ॥
गासेपु हादरानुवादिगु मागागागागा हमिति भगवदुक्या.
मार्गशीर्ष इव सर्वतयिषु प्रयागादिषु ययं फपिन्नाश्रमरतीर्थराट् तीर्थराजः
-मं मोक्षक हेतुं विज्ञाय फिल गुरस्यंगोपितः ॥ १७ ॥
त्रादि चारही मासों में सब से श्रेष्ठ जसे मार्गशीर्ष गास है वैसे
-प्रयागादि सब तागों में श्रेष्ठ यह तीर्थराज फपिलाश्रम है, देवताओं
गोक्ष प्राप्ति का निदान इसी को समझा, इसलिये गुप्त फरदिया ॥४७॥
नास्य तीर्थस्य माहात्म्यं वक्तुं शक्योस्मिपमुखैः ।।
पोप्यशेपं स्वमुखनिश्शेपं वक्तुमक्षमः ॥ ४८ ॥
अस्मिन्पये अशेपमेकत्र पुनश्शब्दान्तरे निश्शेपं एकार्थ वाचिपदद्वयं
नभाति मन्मतेतु यथा पमुखैः कार्तिकेयो वक्तुमशक्यस्तथैव शेपोपि
यै सहस मुखैर्वक्तुमशक्य इतिभादद्योतनाथ निररोपमितिस्थलेसहसे
पाठोभवेत्तदा साधु पाठ इति तेन ।।
अस्य तीर्थस्य माहात्म्यंमहं पड्मुखैयक्तुंनशक्यो स्मि मम का ।
सहस्रेस्स्वमुखैरशेयं वक्तुमक्षम इति स्कन्दोक्ति स्समीचीना ।।
कन्दजी कहते हैं कि मैं अपने ६ मुखों से इस तीर्थ के माहार
में कह सक्ता, तो मेरी क्या गिन्ती है जबकि साक्षात् शेप भी अप
मुखों से इस के पूर्ण माहात्म्य को कहने में असमर्थ है ||४८
पिं शंसती कर्तु जिता मामंभिधासति ।।
रत्नस्य माहात्म्यं प्रवक्ष्यामि यथामति ॥४॥
स्य महात्म्यं प्रयच्यामि कथयिष्यामि ॥ ४ ॥

पिलायाधमा नया मापान ने लिए मंगा मुझे प्रेमा करनी मनामी मंग निदान हम नार्थ माराय की पता 10६॥ यं महाभाग! महीनले म पिनाशयत्मीयर मादी- पणम् ॥ विभानि यहीनताऽपिमानया: परम्पवं पान्ति विमान मानयाः॥५०॥ गदामाम ! महीतले एयं एतादृशं महोग्यले महादी तीर्थ चर मां पा यिनारापन, विभानि गजन यनतो यग्यदर्शनमात्रेण मानवाः साधारण मनुष्या यषि विमानमानयाममन्तः पहिमानमा गम पावनि यान्ति ॥ ५.० ।। है. महाभाग ! दम पृथ्वीनल में इस प्रकार पाप को विनाश करता या महोगन यह तीर्थराज विराजमान है जिगक दर्शन मात्र से माधाग्ग गनुन्य भी विमान पर भारत होकर परमशाम को चन जाा है || ५० ॥ रति प्रीसम पुगण स्कन्दागमयमम्बाद कपिलायननमाहारभ्ये तधियणन नाम द्वितीयोऽध्यायः ।

विगसंपुष्टं नाना मुनि निपचितम् ।।६।।
विचारयामास कपिलः श्रीनिकेतनः।।.
शोकपिलायतनतीमाहात्म्यं ।
माने चाध्यात्मिकीम्विद्यां दत्यानुज्ञाप्य मातरं ।।
स्वच्छन्दं तदनुज्ञातः प्रागुदीची दिशययौ ॥ ७ ॥
भगवान् कपिलः गात्र देवहूत्यै आध्यात्मिकीं।
रूपिणी विद्यां दत्वा चकारात् पुनर्मातरं अनुज्ञाप्य
तस्यां विद्यायां नियुज्य तदनुज्ञातः मातुराज्ञया स्वच्छ
दीची दिशं यया गतवान् ॥ ७ ॥
भगवान् कपिल माता देवहूती को अध्यात्म-विद्या ।
उपदेश देकर उनकी आज्ञा लेकर स्वच्छन्दता से अर्थात् काम,
लोभ, मोह, मद, मात्सर्यादि से निवृत्त हो माया मोहादि सब सा
वन्धों को तोड़कर पूर्व उतर की दिशा में चले गये ।। ७ ॥
गच्छन्पधिददर्शाग्रे समुद्रं वालुकामयम् ॥
तीर्थभूतं परंधाम धरित्र्याननसंनिभम् ॥ ८॥
पथि मार्गे गच्छन् अग्रे तीर्थभूतं परंधाम उत्कृष्ट स्था
परियाः आनन सन्निभम् सदृशम् वालुकामयं समुद्रं ददर्श ॥ ८
मार्ग में जाते हुए कपिलजी ने आगे परमोत्तम स्थान, पृथ्वं
मुख के सदृश वालुकामय समुद्र को देखा ॥ ॥
बाना मृगगणाकीर्ण नाना वृक्षलतायुतम् ।।
-
.त्या
स्थानं परं दिव्यं तपसः सिद्धिदायकम् ।। १० ।।
संचकारेह नन्मनोहरतागुणान् ॥
an. कल्पान्तं तप पास्थितः ॥११॥

मीर पिनायाधमाना। तस्यां पुत्रः समभवत् कार्यमस्य प्रजापतेः॥ श्रीविष्णोरंगासम्भूतः कपिलान्यः परः पुमान् ॥ ४॥ तस्यां स्वायंभुपसुनायां श्रीपिप्लोरेशमम्मनः परः पुमान् परमपुम्पः कपिलान्गः भगवान्कपिलः प्रजापतेः कर्दमस्य पुत्रः समभात् ।।४॥ उस म्यायंभुव मनु की पुत्री से प्रजापति कर्दमऋगी के पुत्र श्रीविष्णुभगवान् का अरा परमपुरुष भगवान् कपिल उत्पन्न हुण ।। ४ ।। स्व माने देवत्वयः मांग योग सविस्तरम् ।। प्रोवाच जगदुद्वारकारक करणाकरः ॥ ५॥ यः करवाकरः पातुः भगवान्कपिलः स्वकीये अत्यल्पे- वयमि समाने देवहून्य जगदुद्धारकारकं सांख्ययोगं च सविस्त- पोयाच उपदिष्टवान् ॥ ५ ॥ जो करुणाकर भगवान् कपिलजी ने अपनी थोड़ी अवस्था में ही अपनी माता देवहूनी को संसारोद्धारकारक सांग्य और योग पा उपदेश दिया |॥ ५ ॥ गुगस्तस्य घनश्येयान्नवाननसगोचरान् ।। दोन वक्तुं शस्तः स्वात्फिमुनान्यविपश्चितः ।।६।। हि यतस्तस्य कपिलस्य भगमनमगोचरानमंन्येयान् गुणान् वेदो वक्तुं न शनः स्यात् मनोन्य विपश्चिताविद्धानमः किमुन कथं वस्तुं ममर्धा भविप्पति "यग्रवाचां गति नारिन मानसश्चापि तादशी । एवं भूनान् गुगान्वयतुं वेदोपिनभवेदलम्" । पपिता के मापनातीत गस्य गुगों को बंद विहानों की क्या याद है सभीदद या पार्वतीनन्दनो मुनिः मान्द इत्ययमुस्ता कपिलान सीधम्य महिमानमादितः पुनरेवाद कथयामास |॥ १ ॥ गप्रकार पार्यनीगन्दन गन्दजी ने पूर्वाध्याग की कथा यह पुनः फपिलायन (कोलागत) तीर्थ सही गहिमा को आदि से कहा तृतीयाध्यायकथारंभः। (गा आन) इन्युगम्या गुनगंगार महिमानमवादिनः ।। फपिशागतीर्थरय पार्यगीनवनागनिः॥१॥ भारंभ किया।।?॥ शृणु हिज! यथैवेदं नीर्थ कापिलसंज्ञकम्॥ उद्वारं पातकारण्यदावानलसमप्रभम् ॥२॥ हे द्विज ! पातकारण्य दाशानलसमप्रभम् यथैवेदं कापिलसंज्ञ कम् तीर्थमस्ति तथैवास्योद्धारमपित्वं शृणु ॥ २ ॥ हे द्विज ! पापरूपी वन को गरम करनेवाले दावानल (बनामि) के समान जैसा यह कपिलतीर्थ है उसी प्रकार इसका उद्धार भी मैं कहता हूं, सुनो ! ॥२॥ स्पृष्टयादौ ब्रह्मणः पुत्रः कर्दमोऽभूत्प्रजापतिः । तस्य स्वायंभुवसुता पल्यासीनियतव्रता ॥३॥ (सृष्टयादामितिस्पष्टार्थ पद्यम् ) सृष्टि के श्रादि में ब्रह्मा के पुत्र कर्दमपि प्रजापति हुए उनकी ची स्वयंभू मनु की पुत्री हुई जो नियतमता अर्थात् सियों के जो तिप्रतादि धर्म हैं उसको पालन करनेवाली थी॥३॥ ( . सीपियनधिमाल्य । तस्यां पुत्रः समभवत् कमस्य प्रजापतेः ॥ श्रीविष्णोरंगमन्नतः कापिणाच्यः परः पुमान ॥ ४॥ तस्यां ग्वायंभुव सुगायां श्रीविनाशनम्भूनः परः पुमान रमपृरूपः कपिलान्यः नामाकरितः प्रजापनः कदमम्य पुत्रः मिभान् ॥ ४॥ उस म्यागंभुव मनु की पुत्री प्रजापनि कदंगाली . पुत्र वीविष्णु भगवान् या या पुरुष भगदान र पिन उत्पन्न हुए । ४ ।। म्य माने देवाल्वरः नांग्यांग नाविस्तरम् ।। प्रोचार जगदुद्धारकारया कारणासरः ॥ ५ ॥ प करना र मातुः भगवान्कपिलः पीय प्रारूप- पनि समात्र देहित्य जगदुहारकारके सांपोगं च सविस्त. प्रोवाच उपदिष्टवान् ॥ ५ ॥ जो फरणागर भगवान पपिलनी ने अपनी बाड़ी वाया में ही शान गाता देवानी या संमागे सरक. मगय कर योग पा उपदेश दिया ।। ५ ।। गुणस्तर परवानाधानमगोचरान ।। पेदन परतुं शतः मरिनान्यदिपश्चितः ॥६॥ हि यसमर पालार मारननननीनगनपान गुरबान पदो परनमा: सान भी विपहिलोविजन: मा पर परां मगधी भविष्यति "सायमीनरत मनमा शापि नाप्नीमानमा निर्मा" गर कर रन पर :

रुपिणीं विधां दत्या चकारात् पुनर्मातरं अनुजाप्य र उपदेश देकर उनकी श्राज़ा लेकर स्वच्छन्दता से अर्थात् काम, को लोभ, मोह, मद, मात्सर्यादि से निवृत्त हो माया मोहादि सब सांसारि सीपिलायनननीयमाहाल्यं । माने पाध्यालिम्धियां दत्वानुज्ञाप्य मातरं । स्वच्छन्दं तनुशातः प्रागुदीचीदिशययौ ॥७॥ भगवान कपिलः गाने देवहून्य साध्यात्मिकी साह तस्यां विद्यायां नियुज्य तदनुज्ञातः मातुरातया स्वच्छन्दं । दीची दिशं यया गतवान् ।। ७ ॥ भगवान् कपिल माता देवहूती को अध्यात्म-विद्या का बन्धनों को तोड़कर पूर्व उतर की दिशा में चले गये ।। ७ ।। गच्छन्पधिददर्शाग्रे समुद्रं वालुकामयम् ॥ तीर्थभूतं परंधाम धरिश्याननसंनिभम् ॥ ८॥ पथि मार्गे गच्छन् अग्रे तीर्थभूतं परंधाम उत्कृष्ट स्थान धरियाः आनन सन्निभम् सदृशम् वालुकामयं समुद्रं ददर्श ॥ ८ ॥ मार्ग में जाते हुए कपिलजी ने आगे परमोत्तम स्थान, पृथ्वी - मुख के सदृश वालुकामय समुद्र को देखा ॥ 3 ॥ नाना मृगगणाकीर्ण नाना वृक्षलतायुतम् ।। गना विगसंपुष्टं नाना मुनि निपेचितम् ॥६॥ या विचारयामास कपिलः श्रीनिकरानः॥ ई स्थानं परं दिव्यं तपसः सिद्धिदायकम् ॥१०॥ युक्त्वा संचकारेह तन्मनोहरतागुणाद ।। कानुग्रहकाम्याय करूपान्नं तप मास्थितः॥

श्रीर.पिलायतनतीर्थमाहारन्यं । (मग्लानीमानि पद्यानि) श्रीनिवेतन भगवान् कपिल जी अनेक प्रकार के मृगों से न्याप्त, अनेक प्रकार के वृक्ष लताओं से युक्त, विविध पक्षियों से कूजित और मुनिगणों से सेवित उस वालुकामय सामुद्रिक प्रदेश को दस कर विचारने लगे और तान्या की सिद्धि देनवान्ना परमरम्य यह स्थान है ऐमा कह कर उमफी मनोहरनाई से प्राकर्पित होकर संसार के अनुग्रह की कामना से कल्पान्त तपस्या करने के लिए बैठ गये ॥ ९, १०, ११ ॥ एकया घायमूाच प्राशुद्धीची दिशं ययौ । घतस्तद्भुवनख्यातं कपिलालयनामकम् ॥ १२ ॥ महात्मा कपिलो नहि पूर्णशिन वापतित् ग्रंशेन तर कल्पान्तं तपसिस्थितः प्रसनकामन्यांमृतिम्बिधाय तय कयामृया पूर्वसंकल्पिता प्रागुदीची दिशं ययौ अना भुगने लोके तद स्थानं कपिलालयनामक ख्यातं प्रमिदम् ॥ १२ ॥ भगवान कपिलजी अपनी पूर्ण कला से उग वालुकामय प्रदेश में पारस्वान्त तपस्या करने नहीं बैठे किन्तु एक मूर्ति से वहाँ पर शान्त तप करने के लिये बेटे और दूसरी मूर्ति अंशामिका धारण कर अपने पूर्व मंकलित पूर्वानर दिशा को गये इमलिए तबसे यह स्थान कपिलालय नाम से संमार में विग्यान हा ॥ १२ ॥ तस्य तार्थस्त्र माहात्म्यं कथं करतुमांक्षमः ।। सिद्धेशाधिप्टिनं यस्मात्कतिकालमलापान ।। १३ ॥ यस्मात्कारणाम्गिदशन भगवना कपिलेनाधिष्टिनं नांध कालिकालमलापहमस्ति अतस्तस्य तधिस्य माहात्म्यं यातुं वर्णगितुमहं कथं क्षमः समर्थ इति ।। १३ ॥

मिन्नार्थ पदागंतुमना मानिसहनम्ब... श्री कपिल.यतनतीर्थमादाम्यं । सिद्धेश (भगवान् कपिल मुनि) का निवासस्थान जिस विशेषता से कलिकाल के पापों का नाश करनेवाला है उस तीर्थ के महात्म को यथावत् वर्णन करने में मैं असमर्थ हूं ॥ १३ ॥ नारायणाश्रमं पुण्यं यथा पदरिकाश्रमम् ।। पाएपस्मिन्महापुण्यं तयेदं कपिलाश्रमम् ॥ १४ ॥ (स्पष्टार्थः) जैसे नारायणाश्रम बदरिकाश्रम पवित्रधाम है तैसे इस जांगलिक देश में यह कपिजाश्रम महापवित्र स्थान है ॥ १४ ॥ अस्य तीर्थस्य माहात्म्यं वस्तुं नालं पितामम ॥ नयापि वर्णयहंते किंचित्किचित्समासतः ॥ १५॥ म.मन्नय कपिलाश्रमम्यवर्णनातीतं महालंगायति यथा- ग तीर्थस्य माहात्म्यं पिता शंकगणि यानालं नहिसमर्थः प्य ने तुभ्यं सगामतः संपतः शिशिकिश्चिवर्णय ॥१५॥ इस तीर्थ के माहात्म्य को मेरे पिता भी वर्णन करने में समर्थ २ तथापि मैं तुम्हारे लिय मासे युदर यान करता है ।। १..॥ ती गन्नुमना गवामयति मायः॥ । तस्य पापानि पर्दिनानि मनान्निहि ॥ १६ ।। दिनिधपायकाः॥१६॥ प.कोमा : 71 म

माहात्यययये च विचारणा र कार्या यन श्रवणपि पुरया
अंकितानी :
चिनिन,
मृतानि पापजामिन नया गानाशयः ।।१।।
( पटायः)
है, नपाधन : जय प्रेमपूर्व. ना माग करने मांग के लिये
मनुष्य अपने नट से बाहर दाना है. ना उगंक सय पाप समूह मृत
(नट) हो जाते है दर में नगर नहीं ॥१५॥
एततीर्थस्य मीमाया नविशत्पानपुर.पः ।।
तनावं निर्मला भृत्वा नार्थ मीनां प्रपश्यनि ।।१८।।
(ग्पष्टम् )
पापी पुरुष इस गाय की सीमा में न प्रवेश करे इमलिय सीमा से
पहले ही म के पाप नष्ट हो जाते है और यह निष्पाप होकर तीर्थ
सीमा को देखता है ॥ १८ ॥
मासंशचिष्टा मनसि सिद्धशाधिष्ठितांभुवम् ।
मिद्धशाधिष्टिना सुवम् मनमि मा संशयिठाः ।
सिद्धेश भगवान् कपिल मुनि की यह तपोभूमि है इरा में किसी
प्रकार का सन्देह नही करना ।
गोयं कर्तुमकलुम्या अन्यथा कर्तुमीश्वरः ॥ १६ ॥
तस्ये तपसोभूमिः सर्वदेवरधिटिना।
माहात्म्प श्रमाणे चास्या नैय कार्या विचारणा ॥२०॥
योयं भगवान्कपिलः हीति निश्चयेन फमकर्तुम्यान्यथा
कन्तुमीश्वरः ममर्थः तस्येयं सर्वदेवरधिष्ठिता तपसोभूमिः अस्या
पशवमिनिमायः ॥ २० ॥

फागी परन्तु इगी फया के श्रवण मात्र सभी अनन्त पुत्र पल मंभाप्रसंगव और असंभव हो - गभरा या गग है जो सर देवनाओं से मेविन = ग. गादरम्य गगन में कभी भातम्य नहीं करना चाहिय अ फरिनासमतीम पर जाना पार स्नान ध्यान करना तो अनिम्न भरतापनगनायगाहामा TANTRA ही कोई विशा रचना कर मकने में समय का लाभ होता है।॥ २० ॥ फलिकालविमूर्हि विष्णुमायाविमोहितैः॥ सर्वतीर्थललामं तद्दन्तुं नैवान शक्यते ॥ २१ ॥ पूर्वलोके माहात्म्यश्रयणमुसद्धां दर्शयति कलिकालेतिह यतः विष्णुमायाविमोहितः कलिकालायम नरैः सर्वतीर्घलना सर्वतीर्थशिरोरत्नं रत्तीर्थ गन्तुं नैवशक्यते अतस्तन्माहात्म्य? णमेवतः कर्तव्यमितिभावः ॥ २१ ॥ (१) कपिलायतन ती नीयानर राज्य की राजधानी में इसी राज्य के स्याप काल से पूर्व ही प्राचीनकाल से विद्यमान चला रहा है। निस स्थान पर इस तो फी शुभ उपस्थिति है वह उक्त रानको राजधानी से पहले एक एमी भयंकर दशा था कि जहां पर प्रत्येक सर्वसाधारण-जन का ना सकना अति दुर्लभ था। क्योंकि यह एक गिल एवं निर्जनस्थान था। इसके निम्ट में न तो कोई ग्राम या और न को नगर । नगला प्रादमी तथा हिसक जानरों का ही यहां पर अधिकतर निवास था। कभी कोई यात्री यह भी साधु सन्यासी यता योगा जिनका ने द.ताएन । जीवन-मरण का कुछ भी विचार नहीं होता था यहां पाने का साहस करने । जब से पीकानेर राज्य की राजधानी तर से यहां ये गी-मन-मन 11 सन्यासियों के परम श्रद्धालु, तार्थमेगी, माक्रमीय पुरपशील शाम नरेशी अग्ने पूर्ण अधिकार प्राप्ति के साग १ शनै २ रा प गिलायतन पुएशरमान तो भी सटा कानी भ कर दी। पर हरा समय यतमानकाल में नो परमामा की कृपा से हमार धौर, पार, प्राश ना, मानस-भा, पुरयस मागनासन नराजेश्वर नरेन्द्रशिलमारी मेनर-जनरल वितहानेम पता श्री १.- श्री - गंगासिंहनी नहार, नी.सी.एम.प्र., न.मा.प्र....नी सं...यो.. मी. सी.बी.,....,एलरल..., किराना नंतर साराको पाप ht श्रीकपिलायनतीर्थमाहात्म्य इस तीर्थ के महात्म्य को श्रवण करने में भी बालस्य नहीं रना चाहिये इसका हेतु कहते हैं कि श्रीविष्णुभगवान् की माया से त गूदनर इस फलिकाल में सब तीर्थों के शिरोरत्न कापिलाक्षम हीं जा सकते हैं । इसलिये उनको इसका माहात्म्य श्रवण ही री होगा ।। २१ ॥ नामप्रयणाद्वचनोचारणादपि॥ पापानि हिमानीय तपोन्तिके ॥ २२॥ पमहात्म्यश्रयणफलं दर्शयति यथा तीर्थस्य कपि- निश्रयणात् ययनेन तमामोचार यादपि पन्ति के हितिरिय पापानि पिलयं नाशं यान्ति मधात् केवल शरणादा पापानां नाशस्तदा समग्र महात्म्यश्रवणरय पर्पम् ।। २२॥ भगवान् स्कन्ददेय माहात्मश्रवण का फल बताते हैं कि नाम श्परा से या नामोचारण से ही ग्राम प्र में मान पाराशि पिलय को प्राप्त होती है । जब नाम भयए र में यह फल होता है तो सनम गाहाम्य भए यात है ॥२२॥ T रक्षार पानपूर में मर रोगा। दही र परियो मगार मन्दिरमासेर NET पोर से पारित गराएका पारमा १ र पर: किम गजीन पर परमार श्रीरपितायतगतीर्थगाहारम् । जो गगवान् कपिल संभव को असंभव और असंभव को संभव अथवा अन्य प्रकार से ही कोई विरोप रचना कर सकने में समर्थ है उभी सिद्धेश्वर की यह तपोभूमि है जो सब देवताओं से सेवित है इस के माहात्म्य सुनने में कभी श्रानस्य नहीं करना चाहिये अर्थात् फपिलाश्रम तीर्थ पर जाना और स्नान ध्यान करना तो अतिपुण्य कार्य है ही परन्तु इसकी कशा के श्रवण मात्र से भी अनन्त पुण्य का लाभ होता है ॥२०॥ कलिकासविमोहि विष्णुमायाविमोहितः।। सर्वतीर्थललाम तद्गन्तुं नैवात्रशक्यते ॥ २१ ॥ पूर्वलोके माहात्म्यश्रवण मुक्तद्ध दर्शयति कलिकालेति हि यतः विष्णुमायाविमोहितैः कलिकालाय नरैः सर्वतीर्थललामं सर्वतीर्थशिरोरत्नं तत्तीर्थ गन्तुं नैवशक्पते अतस्तन्माहात्म्पश्रव- णमेवतः कर्तव्यमितिभावः ॥२१॥ - (१) कपिलायतन तीर्थ बीकानर राज्य की राजधानी में इसी राज्य के स्थापना काल से पूर्व ही प्राचीनकाल से विद्यमान चला पारहा है । जिस स्थान पर इस तीर्थ की शुभ उपस्थिति है वह उक्त राज की राजधानी से पहले एक एंमी भयंकर दशा में था कि जहाँपर प्रत्येक सर्वसाधारण जन का जा सकना अति दुर्लभ था। क्योंकि यह एक निर्जल एवं निर्जन-स्थान था । इसके निरुट में न तो कोई ग्राम था और न कोई नगर । जंगली प्रादमी तथा हिंसक जानवरों का ही यहा पर यधिकतर निवास था। कभी कोई यात्री वह भी साधु सन्यासी अथवा योगा जिनको अपने दुस-सुत न जीवन-मरण का कुछ भी विचार नहीं होता था यहां पाने का साहस करते थे जब से बीकानेर राज्य को समधानी हुई है तब से यहां के गो-बम भक्त सार सन्यासियों के परम श्रद्धालु, तसेवा, महापराक्रमी व पुण्यशील शासक नरेशी ने अग्ने पूर्ण अधिकार प्राप्ति के साथ १ शने २ इस पवित्र कपिलायतन पुरग-थान के लिये भी सोटा करनी प्रारंभ कर दी। और इस समय वर्तमान काल में तो परमात्मा की कृपा से हमारे परि, वीर, यश प्रापी, गाना-मान, पुण्यशीनु महारान विरान राजराजेश्वर नरेन्द्रशिरोमणि मेजर जनरल हिज-हाइनेस महाराना श्री १०८ श्री सर गंगासिंहनी नहार, जी.सी.एन.ई., नी.सी.या.ई., नी.सी.जी.ओ., जी.डी.ई., के.सी.बी., ए.डी.सी., एलएल.डी., वारसति जय नंतर बादशाह की परमप्रपा श्रीकपिलायननतीर्थगाहात्म्यं । ४३ होंगे और थोड़े परिश्रम से ही अत्यधिक पुण्य का लाभ होने से इमी तीर्थ में स्नान कर और इसी तीर्थ के देवता का ध्यान कर अपनी २ अभीप्सित गति को प्राप्त करलेंगे इसलिए और तीर्थ तथा देवताओं का प्रभाव कम हो जायगा । परन्तु परगकरुणाकर लोकानुग्रहकारी भगवान् स्कन्ददेव ने कलियुग के वास्ते इस गुप्त तीर्थ को प्रकट कर दिया। इसी प्रकार अर्थात् जैसे कि सत्ययुग में कपिलाश्रम प्रसिद्ध था वैसाही त्रेता में प्रयाग प्रसिद्ध हुआ और द्वापर में पुष्करराज की प्रसिद्धि हुई परन्तु कलियुग में कपिलतीर्थ गुप्त होने से गंगा ही का केवल महात्म्य रहा । इस प्रकार युगक्रम से पृथ्वी में तीर्थों की प्रसिद्धि हुई ।। २४, २५ ॥ सर्वतीर्थफलायानिकारणं परमन्त्यिनम् ॥ तावलमा तारकाणां यावत्या न दृश्यते ॥२६ ।। तावन्ति सर्वतीर्थानि यापदेनन्नमन्यने ।। परममुन्कृष्टमिदं कपिलतीर्थन्तु सर्वतीर्थफलावाप्तिकारणम् पत्र दृष्टान्तीयथा यावत्मोनदृश्यो अर्थात्मदियोनभवति तावत्तारकाणामल्पप्रमाप्रदानृणां नक्षत्राणां प्रभा जागर्नि तथैव यावदेतत्तीर्थनमन्यते तापन्ति सर्वतीर्थानीति, अर्थान्मन्यमानेऽस्मि तीर्थ शेपाणां सर्वेषां तीर्थानाम्प्रभावोल्पतमोभवतीति ।। यह उतम तीर्थ सब तीथों के फल प्राप्ति का हेतु है, यहां एक दृष्टान्त है कि जबतक सूर्योदय नहीं होता तबतक ही अल प्रकाशक लयु तारों की उम्मलता शाकाश में व्याप्त रहती है और सूर्योदय होतेही सय तारागण मन्द हो जाते है वैसे ही जब नक इस नीर्थ का ज्ञान नहीं होता तभी तक भौर सब तीथों का महत्व प्रचलित रहता है दम तीर्थराज के गहत का ज्ञान होतेही सब नीयों का महत गन्द होजाता है ।

. शोकपिलायनननायगामा पापौघाहरणं सर्वतीर्थफलप्रदम् ।। पदं सर्वयज्ञानां महादानफलपदम् ॥ २३ ॥ (सहायिम्) ह तीर्थ सब पापराशियों को हरण करता है, सब तीयों का ता है, सब यज्ञों का पुण्य देनेवाला है, और सब महादानों का नेवाला है ॥ २३ ॥ सत्ययुगे ख्यातं कलौदेवैः सुगोपिनम् ।। यान्तु प्रयागाख्यं तीर्थं ख्यातं धरातले ॥ २४ ॥ । पुष्करं नाम कली गद्देयकेवलम् ।। युगानुरोधेन सन्ति तीर्थानि भूनले ॥ २५ ॥ कपिलाश्रमं सत्ययुगे ख्यातं प्रसिद्धमासीत् कलौ देयैः तम् सुगोप्यरक्षितम् ॥ कलौ कायक्लेशादिकठिनतपसामा- उमर्थाजनाः स्वल्पायासेन बहुपुण्यलाभादत्रैव गत्वास्नात्वा त्विा स्वांस्वामभीप्सितां गतिं यास्यन्त्यतोऽन्येपां तीर्थानां व प्रभावोल्पतमोभविष्यतीतिबुद्धयैवदेवैः सुगोपितमिति- । पुनः कलियुगे गुप्तमपितत्तीर्थ परमकारुणिकन ग्रहकारिणा भगवता स्कन्देन प्रकटीकृतमिति ॥ एवं । कपिलतीर्थस्य प्रसिद्धयनन्तरं वेताधान्तु प्रयागाख्यं पातं स्वांप्रसिद्धिमगात्ततो द्वापरे पुष्करन्याम तीर्थ प्रसिद्धम् ।। कपिलतीर्थस्य गुप्तत्वात्केवलं गङ्गैव स्वांप्रख्यातिंगता। आनुरोधेन भूतले तीर्थानि सन्ति ।। २४, २५ ।। इ कपिलाश्रम सत्ययुग में प्रसिद्ध हुआ था परन्तु कलियुग में ने गुप्त कर दिया इनका आशय यही हो सकता है कि कलियुग । शरीर को क्लेश देकर कठिन तपस्याओं को करने में असमर्थ

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श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । श्रथ किश्चित्तु महिमा तवाग्रेवरर्यते मया ॥ २७ ।। सकलो वेदविदुपां यतोवाचामगोचरः॥ अथ रायागेतु मया किंचिन्महिमा चर्यते ॥ २७॥ यतः सकलः सम्पूर्णमहिमा वेदविदुषां वेदविदामपियाचामगोचरः वेदविदोपियक्तुमसमर्श इति भावः ।। अब तुम्हारे सन्मुख इस तीर्थ की महिमा का कुछ वर्णन मैं करता हूं ॥ २७ ॥ क्योंकि समग्र वर्णन वेदविज्ञाता भी नहीं कर सकते ।। अन्यत्र दशभिर्वपर्यत्पुण्यं जायते नृणाम् ॥ २८ ॥ तदेकन दिनेनैव जायते वसतामिह ॥ अन्यत्रान्पस्मिन्तीथें नृणां दशभिर्यत्पुण्यं जायते ॥२८॥ इहवसतां तेषां तदेकेनैव दिनेन जायते ॥ और सब तीर्थों का १० वर्ष सेवन करने से जो फल मनुप्य प्राप्त करते हैं वह यहां एक दिन के सेवन से ही प्राप्त होजाता है । अविमुक्त ज्ञानदान्मुक्तिः पुंसां प्रजायते ॥ २६ ॥ ज्ञानम्बिनाप्यन मुक्तिः प्राप्यते नियतं नरैः ।। अविमुक्ने वाराणस्यां ज्ञानदानात्पुंसां मुतिः प्रजायते ॥२६॥ अत्र कपिले तीर्थे ज्ञानम्बिनापि नरैनियतं निभायने मतिः प्राप्यते ।। अविमुक्त वाराणसी के की मुक्ति होती है है इसका भाव ज्ञान देकर मु मानस में vo मुक्ति छ श्रीपिलायतनतीर्थमाचारग्यं । ४५ V विना मुक्ति नहीं होती इस श्रुति का व्यभिचार हो जाता । परन्तु इस कपिलतीर्थ में ज्ञान विना ही मुक्ति प्राप्त होजाती है । मुक्तिभूमिरियं नित्या यज्ञभूमिरियं पग ॥ ३०॥ योगभूमिरियं शुद्धा कामिना भोगभूमिका ॥ महापातकयुक्तानां पापिनां पापमोचिका ॥ ३१ ॥ सदाचारवतां पुंसां परमास्वर्गभूमिका ॥ जपानुष्टाननिष्टानां जपसिद्धिकरी सदा ॥ ३२ ॥ तपस्विनां महाभाग ! तपस्सिद्धिप्रदायिनी ॥ भगवद्भलिकामानां महाभक्तिकरीपरा ॥ ३३ ॥ कासाहो कामाना लोके यार न प्राप्यते नरः॥ सांख्ययोगमयीभूमिः सांख्याचार्याश्रितायतः ॥ ३४॥ (स्पष्टार्था रमे श्लोकाः) हे महाभाग ! हम कपिलतीर्थ की यह भूमि नित्या अर्थात श्रनपायिनी मुक्ति को देनवाली परा उत्तमा यज्ञभूमि शुद्धा योगभूमि श्रीर विलासियों की भोगभूमि है एवं महापातकियों के पापों का नाश करने वाली है तथा सदाचारियों को परमा स्वर्गभूमि है जपानुष्ठान में निष्ठ मनुष्यों के जप यज्ञ की सिद्धि करनेवानी, तपस्यियों के तप की सिद्धि देनेवाली है, और भक्तिकामनावालों को परा भक्ति देने वाली है कौन सी ऐसी कामना है जिसको यहां मनुष्य नहीं प्राप्त कर सकता ? यह सांख्याचार्य फपिलमुनि की श्राश्रयभूमि है इसलिये सांख्ययोगमयी है ।। ३०, ३१, ३२, ३३, ३४ ॥ अत्र सद्गुमणा प्रोङ्गं दिना ज्ञानमवाप्यते ।। नित्या मित्पवियेकोहि तीर्पस्यात्य प्रसादतः ॥३५॥ .

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । अथ किश्चित्तु महिमा तवाग्रेवयते मया ॥२७॥ सकलो वेदविदुषां यतोवाचामगोचरः ।। अथ रायात मया किंचिन्महिमा चर्यते ॥ २७॥ यतः सकलः सम्पूर्णमहिमा वेदविदुषां वेदविदामपियाचामगोचरः चेदविदोपियक्तुमसगी इति भावः ॥ अब तुम्हारे सन्मुख इस तीर्थ की महिमा का कुछ वर्णन मैं करता हूं ॥ २७ ॥ क्योंकि समग्र वर्णन वेदविज्ञाता भी नहीं कर सकते ।। अन्यत्र दशभिर्वर्यत्पुण्यं जायते नृणाम् ॥ ८॥ तदेकन दिनेनैव जायते वसतामिह ॥ अन्यत्रान्यस्मिन्तीर्थे नृणां दशभिर्वपैर्यत्पुण्यं जायते ॥२८॥ इहवसतां तेषां तदेकेनैव दिनेन जायते ॥ और सत्र तीर्थों का १० वर्ष सेवन करने से जो फल मनुष्य प्राप्त करते हैं वह यहां एक दिन के सेवन से ही प्राप्त होजाता है। अविमुक्त ज्ञानदान्मुक्तिः पुंमां प्रजायते ॥२६॥ ज्ञानम्चिनाप्यन मुक्ति प्राप्यते निघतं नरैः ॥ शविमुक्ने वाराणस्यां शानदानात्पुमा मुष्तिः प्रजायते ॥२६॥ प्रत्र कपिले तीर्थ ज्ञानम्मिनापि नरनियतं निश्चयेन मुनिःप्राप्यते ॥ अविमुमत वाराणसी क्षेत्र में श्रीविश्वनाथ के ज्ञानोपदेश से मनुष्य की मुक्ति होती है " फाश्याम्मरणान्मुक्तिः " यह जो प्रख्यात वाक्य : इसका भाव यह है कि काशी में गरनेवाले को भगवान शंकर जी पन देकर मुक्त कर देते हैं गोस्वामी तुलमीदासजी भी अपने रागनरित- निस में लिखते हैं कि " महामंत्र जेहि जात गहेम् । कार मरण क्ति उपदेगू" भन्यथा "ऋो बाजान्न मुक्तिः" अर्थात् माग .

भीमामानीमा
मा गुनि नीट मत का याचार ना ! पर. हम
पिननाय गान विना । मुना मात्र ॥
मुििमरिगं निन्या यामिरियं पा ॥३०॥
पोगभूमिरियं शुद्धा यामिना भागभूमिका ।।
महापातकयुगानां पापिनां पापमोनिका ॥ ३१ ॥
मदापारयनां घुमा परमारपर्गभूमिका ।।
जपानुष्टाननिष्टानां जपमिद्विकरी मदा ॥ ३२ ॥
तपस्विनां महामाग ! तपस्मिनिप्रदागिनी ।।
मगयङ्गमिकामानां महामकिरीपरा ।। ३३ ।।
फासाही कामाना लोक यात्र न प्राप्यने नरः॥
सांख्ययोगमपीभूमिः मांण्याचार्याभितायतः ॥३४॥
(पष्टा इमे श्लोकाः)
हे महाभाग ! दम कपिलतीर्थ की यह भूमि नित्या अर्थात्
मनपायिनी मुक्ति को देनेवाली परा उत्तमा यजभूमि शुद्धा योगभूमि और
विलासियों की भोगभूमि है एवं महापातकियों के पापों का नाश करने
वाली है तथा सदाचारियों की परमा स्वर्गभूमि है जपानुष्ठान में निष्ठ
मनुष्यों के जप यह की सिद्धि करनेवाली, तपस्वियों के तप की सिद्धि
देनेवाली है, और भगवद्भक्तिकामनावालों को परा भक्ति देने
वाली है कौन सी ऐसी कामना है जिसको यहां मनुष्य नहीं प्राप्त फर
सकता ? यह सांख्याचार्य कपिलमुनि की आश्रयभूमि है इसलिये
सांख्ययोगमयी है ॥ ३०, ३१, ३२, ३३, ३४ ।।
अत्र सद्गुरुणा प्रोक्नं विना ज्ञानमवाप्यते ॥
नित्या मित्यधियोहि तीर्थस्यास्य प्रसादतः ॥ ३५॥

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्य : किम्यक्त्या मुनिश्रेष्ठ । विदुपामग्रतः सदा ।। एतादृक् पाप हृत्तीर्थ नभूतं न भविष्यति ॥ ३६॥ (सष्टार्थाधिमाश्लोकी) इम तीर्थ में गुरु के उपदेश विनाही सद्ज्ञान की प्राप्ति होती है और इस तीर्थ के प्रसाद से संसार में क्या नित्य है ? क्या अनित्य है ? इसका भी विवेक हो जाता है । हे मुनिश्रेष्ठ ! विद्वानों के सम्मुख बहुत कहने की आवश्यकता नहीं होती, सारांश यह है कि ऐसा पापहारी तीर्थ आजतक न हुआ न भविष्य में होगा ।। ३५, ३६ ॥ समीरपोपि संमृज्य कपिलायतनाम्बुभिः॥ नाधन्यं स्पृशते लोके नरं मूढ़ सकल्मपम् ॥ ३७॥ कपिलालय संयोगाद्यतोऽसौ पापहामतः ॥ तस्माद्विहाय पाप्मानं याति वायुस्त्वरान्वितः ॥ ३८॥ (स्पष्टार्थाविमौ) वायु भी इस कपिलायतन के जल से संमार्जित होकर निन्दित तथा मूर्ख और पापयुक्त मनुष्य को स्पर्श नहीं करती ॥ ३७ ।। क्योंकि कपिलालय के संयोग से वह पापनाशक हो जाता इसलिए पापी मनुष्य को छोड़कर वेग से आगे चली जाती है ॥ ३८ ॥ कपिलालय संस्था ये प्राणिनः स्थिरजङ्गमाः॥ सर्वे मुक्तिमवाप्स्यन्ति सत्यं जानीहि सत्तम ।। ३६ ।। (स्पष्टार्थः) हे सत्तम ! कपिलालय में रहनेवाले जितने स्थिर और जंगम प्राणी हैं वे सब मुक्त हो जाते हैं इस बात को सत्य जानो ॥ ३९ ॥ इदं गोप्यं कृतं तीर्थं दिवौकोभिः पुरातने ।। ततः केपिन जानन्ति विनाविष्णोः प्रसादतः ॥ ४०॥ । .

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । इदं तीर्थ पुरातने पूर्वस्मिन्काले दिवौकोभिः दियमेवाकोगृह येपान्तैः " धादियौ द्व स्त्रियामित्यमर." ओकस्समनिचाश्रयेचे- त्यमरः। गोप्यं कृतं गोपितमित्यर्थः । ततश्रारभ्य विष्णोःप्रसादतो चिनार्थाद्भगवत्कृपाविरहेण केपिनहि जानन्ति ।।१०।। इस तीर्थ को पूर्व समय में देवताओं ने गुप्त कर रखा था तर से बिना विष्णुभगवान् की कृपा के कोई नहीं जानता है ।। ४० ।। अस्मिन्स्थाने कृतं पुण्यं पराद्वगुणितंभवेत् ॥ विना पापं हि विप्रेन्द्र! त्वयि गुह्यंमयोदितम् ॥४१॥ है विप्रेन्द्र ! अस्मिन् स्थाने तीर्थे कृतं पुण्यं विना पापं पापरहित्यं परार्द्धगुणितमसंख्यामितिभावः भवेत् । त्वयि मयेदं गुह्यं गुप्तमुदितम् ॥ ४१ ॥ हे विप्रवर ! इस स्थान में जो पुण्य किया जाता है वह निष्पाप परार्द्ध गुणित होता है अर्थात् असंख्य होता है यह बहुत गुप्त वस्तु है जिसको मैं तुमसे कहता हूं ॥ तथापि नहि कर्तव्यं जानता पातकंस्यचित् ।। श्रद्धया पापकरणं नहि पेदानुशासनम् ॥ ४२ ॥ (स्पप्टार्थः तथापि जान फर कभी पाप नहीं करना चाहिये क्योंकि प्रद्धा से पाप फरना येदाज्ञा मे विरुद्र हे ॥१२॥ यस्मिन्तीयं कृतं पापमलीनं न मंशयः जले जातं युद्बुदकं जले लीनं यथा भयेत् ।। ४३ ॥ (म्पटाई:) जमे जल से निकला हुमा पुवुदक (फेन ) जल में ही लप होजाता है उसी प्रकार इस तीर्थ में किया दुमा पार इमी तीर्थ में लय होजाता है इनमें संदेह नहीं !! १३ ॥

HAftingril Primaम्पनागर उत्पते ।। मासमा मनियतः गुगमनन्तकम् ॥ ५॥ (पा) म की मरिमा पनातीत है अर्थात् अकथनीय है RER Iगा कि इसके संबन का बनन्त पुण्य है इसलिए सवारपालो को सरा संबन करना चाहिए ॥ १४ ॥ सर्यकाल पुगामि पानुास्य विशेषतः ।। प्राधि कार्तिकमासि तनमान्त्येषुपश्चसु ।। ४५॥ दिनेषु सुमहापुराणं फार्निश्यां यत्पुनर्तुवे ।। (अपमपित्तष्टाः साईरलीका) ऐसे तो सदाही इस तीर्थ के सेवन का पुण्य है परन्तु चौमासे में सेवन करने का विशेष माहात्म्य है उनमें से भी कार्तिकमास में सेवन का फल अधिक होता है कार्तिक में भी अन्त्य के पांच दिनों ( भीमपंचक ) में बहुत ही अधिक पुण्य होता है ।। ४५ ॥ एवं कार्तिकी अर्थात् कार्तिक को पूर्णिमा को जो फल होता है उसे पुनः कहता हूँ। कार्तिक्या पौर्णमास्या या स्नाति श्रीकपिलालये ॥४६॥ तस्य पुण्यस्य माहात्म्यं नालं वक्तुं शिवः स्वयम् ।। (सष्टम् ) कार्तिक की पूर्णिमा के दिन श्री कपिलालयधाम में जो स्नान करता है उस पवित्र पुरुप के माहास्य को साक्षात् शिव . - सकते और किसको कहूं।

श्रीयापिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । ४९ GE को किम्मोक्न महोदेय ! पुनसतातया भृशम् ॥ १७ ॥ कापिलस्नानमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ (म्पटम्) हे महीदेव ! वारपार कही हुई बात को ही दुहगने में युद्ध लाभ नहीं, मेरा कथन यही है कि फपिलालय में स्नान मात्र से ही मनुष्य सर पापों से मुक्त होजाता है ।। १७ ।। इदं मया कियदेव पर्णितं तीर्थस्य माहात्म्य मनुत्तमं मुने । शेपोपिनिशंपनयास्य वर्णने रिशेपराशि- नहिजानुसंभवेत् ॥ ४॥ हे गुने : इदमनुगमं नीर्थरय माहात्म्य कियदेव किंचिदय ते तुभ्यं मया पर्णितम् अन्यथा शेपोपि जातु कदाचिन सम्य तीर्थमाहात्म्यस्य निरशेपनया वर्णने विशेषानिनहिमभवन् यदि शपाप्यसमर्थस्तदेतरस्यका कति ॥ ४॥ है मुने हम सदावन ती माय पो तुमने दुर ही पर्णन किया पापिनी भाभी मपि गि. विकी म पूर्वत में वरन पर सो हो भागदी कसा 21 रवि भारदपुगत रमतामयसम्माषिकानमा तापनि नाम । ७

चतुर्थाध्यायकथारंभः।
6--
(सूत उवाच)
इत्युक्त्वा तीर्थमाहात्म्यं स्कन्दः कुंभोद्भवं पुनः ।।
प्रत्युवाच कथाश्चित्रास्तीर्थमाहात्म्यसूचिकाः ॥१॥
सूतश्शौनकादीन् श्रोत्तृन् वदति-यत् स्कन्दः इतितीर्थ
माहात्म्यमुक्त्वा पुनस्तीर्थमाहात्म्यसूचिकाचित्राः कथाः पुनः
कुंभोद्भवमगस्त्यम्प्रत्युवाच ॥१॥
सूत ऋपि अपने श्रोता शौनकादि ऋपियों से बोले कि भगवान्
स्कन्द ने इस प्रकार तीर्थ माहात्म्य को कह कर पुनः इस तीर्थ
की माहात्म्यसूचक विचित्र कथायों को अगस्त्य ऋषि से कहा ॥ १ ॥
पुनर्मनः प्रत्ययार्थमितिहासानिमान्मुने ।
शृणु त्वं सावधानः सन् अदधानोविधानतः ॥२॥ .
हे मुने ! पुनर्मनः प्रत्ययार्थ मनसः प्रतीतिलाभाय श्रद्दधानः
सावधानः सन्निमानितिहासान्निधानतस्त्वं शृणु ॥ २ ॥
हे मुनि ! पुनः अपने मन की प्रतीति वास्ते श्रद्धायुक्त और
सावधान होकर इन इतिहासों को जिनको में आगे कहंगा
विधिपूर्वक तुम सुनो ।। २॥
पुराकल्प महाभाग तपस्विवरसमसु ।
पदकन्याः किलसंजाना रूपमाधुर्यमंयुता ॥ ३ ॥
हे महाभाग ! पुराकल्प यम्माकन्याम्मिको तपनि
परमामु रूपमाधुय्यमंयुनाः किल परान्याः मंजानाः ॥३॥

३ श्रीयापिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । तासान्युद्विरमहामन् मंस्कारात्पूर्वजन्मनः ॥ इन्द्रियाणां हिदमने ब्रह्मचर्यस्य पालन ॥ १२ ॥ श्रष्टाङ्गयोगविमले प्राणायामादिमाधने । बसन्यभावविभये रागहेपपियजित ॥ १ ॥ (पप्टाधाः) हे ब्रान् पूर्वजन्म के सहामना स इन्द्रियों के दमन करने में, ममचर्य के पालन करने में, विमल श्रष्टायांग के साधन और प्राणायामादि योगक्रिया के साधन में एक रागडेप में गहन शुद्ध राग्य भाव में उन फन्यायों की प्रवृत्ति हुई ॥ १२, १३ ।। पर्व पृत्ताधिरं कालं गमयामामुरंजमा ।। सुशीलारशुदमनमः पूर्वकर्मविपाफनः ॥ १४ ॥ पूर्व कर्मविपाकताताम्मुशीला गुदमनमो मुनिकन्या एवं पूर्वोतनतेन पृन्ता मंजमा चिरंकालं गमयामामुः॥१४॥ उन मुशील भौर गुरु रविदा। मुनिश्न्याओं ने इमार मनों के चाचरण में पान दिन यान पर दिये ॥१४॥ फरिममित्कालपाय ममाजाभन्महात्मनाम् ।। प्रपागे मा. मिरं मापे मशरगरवा ।। १५ ।। कम्मिक्षिकालपार माति प्रमाग करतानानानि मान्मनाममात् ।। १५॥ दिमीर में नारी मनगदे मेसेनामी मानौEREFERE:

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहाल्यं । मिथोगायन्ति गीतानि सन्निधौशेरलेमियः ।। एवं तासां प्रीतिरभूत् पूर्वजन्मप्रभावतः ॥ ६ ॥ ( स्पष्टार्था इमे श्लोकाः) इस प्रकार रूप माधुर्यादि गुणों से युक्त वे कुमारिकायें परस्पर सखिल भाव को प्राप्त हुई। साथ साथ खलती, साथ साथ बात करती, एक साथ घर को जाती, परस्पर प्रेम के साथ एक दुसरी को खिलाती और खाती थीं एवं साथ साथ देवदर्शन को जाती थी, साथ साथ नदी के जल में स्नान करने जाती थी, एक साथ मिलकर सुन्दर २ मधुर गीतों को गाती थीं और एक साथ सोती थीं। इस प्रकार का परस्पर प्रेम उनको पूर्वजन्म के प्रभाव से हुआ था ।। ६, ७, ८, ९ ॥ सुरम्यं रममाणास्तास्तपस्विवरकन्यकाः ॥ मुग्धभावं परित्यज्य किश्चिद्वैदग्ध्यमागताः ॥ १०॥ तास्तपस्वियरकन्यका एवं सुरम्यं रममाणा मुग्धभावं परित्यज्य किंचिदग्ध्यं विदग्धभावमागताः प्राप्ताः ॥ १०॥ वेतपस्वियों की कन्याएं इस प्रकार मुरम्य बाल क्रीड़ा करती हुई अपने मुग्ध भाव अर्थात् कैशोर अवस्था को त्याग कर विदग्धा वस्या अर्थान् तरुणावस्था को प्राप्त हुई ॥ १० ॥ तासां नामानि वदयामि शृणुमे द्विजसत्तम । मन्दा मन्दाकिनी मोदा नर्मदा शुभदा विदा ॥१२॥ ( स्पष्टम् ) है द्विजसत्तम ! उन कन्याश्चों के क्या नाम थे सो बताता है मुनो एक का नाम गन्दा, दुमरी का नाम गन्दाकिनी, तीसरी का नाम मोना एवं चौथी पांचवीं के गाम का से नर्वदा शुभदा नारपटली का गाग विदा मा॥११॥ . . .

श्रीकापिलायतनतीमाहात्म्यं ।
५३
तामान्बुद्धिरभूदृष्यन संस्कारात्पूर्वजन्मनः ।।
इन्द्रियाणां हिदमने बामचर्यस्य पालन ॥ १२ ॥
अष्टाहायोगविमले प्राणायामादिमाधने ।
वैराग्यभावविभये रागद्वे पवियर्जिते ।। १३ ।।
(म्पप्टा :)
हे ब्रमन् पूर्वजन्म के सहासना से इन्द्रियों के दमन करने में,
ब्रह्मचर्य के पालन करने में, विमल श्रष्टाङ्गयांग के साधन और
प्राणायामादि योगक्रिया के साधन में एवं रागद्वेप से रहित शुद्ध
वैराग्य भाव में उन कन्याओं की प्रवृत्ति हुई ।। १२, १३ ॥
एवं वृत्ताश्चिरं कालं गमयामासुरंजसा ।।
सुशीलासुद्धमनसः पूर्वकर्मविपाकतः॥ १४ ॥
पूर्वकर्मविपाकतस्तास्मुशीलाश्शुद्धमनमो मुनिकन्या एवं
पूर्वोतव्रतेन वृत्ता अंजसा चिरंकालं गमयामासुः ॥ १४ ॥
उन मुशील और शुद्ध चरित्रवाली मुनिकन्याओं ने इसप्रकार
चतों के पाचरण
में बहुत दिन व्यतीत कर दिये ॥ १४ ॥
कमिश्चित्कालपर्याय समाजाऽभून्महात्मनाम् ।।
प्रयागे महतिक्षेत्रे माघे मकरगरवी ॥ १५ ॥
कस्मिचित्कालपर्याये महति तंत्रे प्रयागे मकरगेखो मायमासि
महात्मनांसमाजोऽभूत् ।। १५॥
किसी समय माघ मास में जब मकर के सूर्य हुए. तो तीर्थराज
प्रयाग में देश देशान्तरों से आये हुए ऋषि मुनि महर्षि और तपस्वी
इत्यादि महात्माओं का समाज एकत्र हुआ ॥ १५ ॥

५.४ श्रीकपिलायतनाथमाहात्म्य । तत्र त्रैलोक्यसंस्थानास्सर्वे लोकास्समागताः॥ देवा देवर्षयो देव्यो ब्रह्मन् ! ब्रह्मर्षयोऽमला ॥ १६ ॥ राजानश्च तथा माः सर्वे सत्पुण्यमानसाः॥ तनागत्य यथा काले सस्नुः प्रीताः सितासिते ॥ १७ ॥ (स्पष्टाथी) हे ब्रह्मन् ! त्रैलोक्य में रहनेवाले सभी देवता, देवर्पि, देवियां, और ब्रह्मर्पि एवं राजालोग तथा साधारण मनुष्य सत्य और पवित्र से उस समाज में एकत्रित होकर सम्पूर्ण माघ मासभर उचित समय से प्रसन्नतापूर्वक स्नान करते रहे || १६, १७ ॥ तत्रताः पूर्वमुदिता मुने ! पड्मुनिकन्यकाः ।। स्नानार्थ समुपायाता स्तीर्थराजे जितेन्द्रियाः॥१८॥ हे मुने! तत्र नस्मिस्तीर्थराजे प्रयागे पूर्वमुदिताः पूर्वोक्ताः जितेन्द्रियास्ता पमुनिकन्यकाः स्नाना) समुपायाता श्रागतवत्यः ॥१८॥ हे मुनि ! अपनी इन्द्रियों को वश में रखनेवालो ६ मुनिकन्याएं जिनकी चर्चा पहले कर पाया है वे भी उस तीर्थराज प्रयाग में स्नान करने के लिए श्राई ॥१८॥ .श्रागत्य विधिना मस्नुमाघे मानि सिनासिने । सदा समाजम्परयन्त्यम मौलितलोचनाः ॥१६॥ मागत्य तत्र मिनामित शुक्र पते कृपणे पक्ष ममग्ने माघ मासि विधिना स्नाता एवं विपयादिमांगलिप्मारहिताः परनामगि सततं तीनत्वान्नीलितलोचनाम्मदा विं परयन्त्योः ॥१६॥ .

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । वहां आकर समस्त माघमासभर विधिपूर्वक स्नान करती रहीं और सतत परब्रह्म की चिन्तना करती हुई तथा समाज को देखती हुई भ्रमण करती रहती थी ।। १९ ।। दान जाप्य व्रत स्नान ध्यान योगादि तत्पराः ।। मासमेकंजना स्सचे तत्र स्थितिमरांचयन् ॥२०॥ (स्पष्टम् ) उस समाज में आये हुए सभी लोगों ने दान जप व्रत म्नान और ध्यान आदि कार्यों में तत्पर होकर एक माम पर्यन्त वहां रहने की इच्छा प्रकट की।॥२०॥ कदाचिद्वरकन्यास्तास्ममाजे मदन्तिके ॥ विष्णुगाथा: प्रगायन्तं प्रीत्यासुस्वरमुचकैः ॥२१॥ थालिह-यमहतीम्बीणां सप्तस्वरविभूपिनाम् ।। वादगलन्मुदायुगं स्वरम्ब्रह्ममुग्यालयम् ॥ २२ ॥ धुन्यानं निजमुर्टानं फिशोरवयसान्वितम् ।। ददृशुर्नारदं विन ! गाननिया-विशारदम् ॥ २ ॥ हे चित्र! मददन्ति के तस्मिन्समाजे विचरन्त्यस्ता वरकन्याः कदाचिन् कस्मिपिन्समये प्रीत्या उपरः उसस्वरेण मुम्बरं यथा भवति तथा विष्णुगापाः भगरतोरियोगुंगानुशदान् प्रगापन्न सप्तस्यरपिभूषिताम् सप्तभिर्निपादपभगान्धारमज मध्यम, धरन, पत्रपतिसरपिपिताम् पकायाम्मदनीम्बीमामालियाई निधाप प्रससुसालपम्ममानन्दप्राधिकरं गुम्परं गुलपम्मादयन्नं नाला. परपाये गानन्य काल प्रियामाने ममागते निज यांनं धुनानं নানাৰ কাষৰমাৰি দোল্লাম नारदं दणः ॥२१, २२, २३॥

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं ।
तत्र त्रैलोक्यसंस्थानास्सवें लोकास्समागताः ।।
देवा देवर्षयो देव्यो ब्रह्मन् ! ब्रह्मर्षयोऽमला ॥१६॥
राजानश्च तथा माः सर्वे सत्पुण्यमानसाः॥
तत्रागत्य यथा काले सस्नुः प्रीताः सितासिते ॥ १७ ॥
( स्पष्टार्थों)
हे ब्रह्मन् ! त्रैलोक्य में रहनेवाले सभी देवता, देवर्षि, देवियां,
और ब्रह्मर्षि एवं राजालोग तथा साधारण मनुष्य सत्य और पवित्र
मन से उस समाज में एकत्रित होकर सम्पूर्ण माघ मासभर उचित
समय से प्रसन्नतापूर्वक स्नान करते रहे ॥ १६, १७ ।।
तत्रताः पूर्वमुदिता मुने ! पड्मुनिकन्यकाः॥
स्नानार्थ समुपायाता स्तीर्थराजे जितेन्द्रियाः ॥ १ ॥
हे मुने ! तत्र नस्मिस्तीर्थराजे प्रयागे पूर्वमुदिताः पूर्वोक्काः
जितेन्द्रियास्ता पड्मुनिकन्यकाः स्नानार्थ समुपायाता पागतवत्यः
॥१८॥
हे मुनि ! अपनी इन्द्रियों को वश में रखनेवाली ६ मुनिकन्याएं
जिनकी चर्चा पहले कर पाया हू व भी उस तीर्थराज प्रयाग में स्नान
करने के लिए आई ॥ १८ ॥
.यागत्य विधिना मस्नुर्माघे मानि सितासित ॥
सदा समाजम्पश्यन्त्यश्वक मौलितलोचनाः ।। १६ !!
थागत्य तम मिनामित शुक्र पतं कृण पदर ममम्न माय
मामि विधिना नाता एवं पियादिमांगलिप्मादिनाः परयामाग
सततं लीनतानगीलितलोचनाम्मदा ममा पस्सन्यभः ॥१६॥

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । योगभ्रष्टास्ततो जाता महतांश्रीमतांकुले । विप्राणांकुलजानान्ताःयाः पूर्व सख्यमश्रिताः ॥२७॥ योगभ्रास्ताः कन्यकाः यतः पूर्व पूर्वस्मिन्भरे सख्यमा- श्रिताः पारस्परिक प्रेम भागतानासन् अतस्ततोऽर्थान्मुनिगृहा- न्मृत्युम्प्राप्य कुल जानाम्महतांश्रीमताम्बिप्राणां कुले जाताः सहेव पुनर्जन्मसम्प्राप्ताः ॥ उतचापि "शुचीनां श्रीमतां गेहे गेहे विद्वज्जनस्यवा अथवा श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टो हि जायते " ॥२७॥ वे कन्याएं जो पूर्व जन्म में परस्पर प्रेम भाव से रहा करती थी योग से भ्रष्ट होकर मर जाने पर उन्हों ने महाकुलीन एवं श्रीमान् ब्राह्मणों के कुल में एक साथ ही पुनर्जन्म ग्रहण किया ॥२७॥ जामदग्न्यप्रदत्ता, या, धरा, विप्रेपुमंस्थिता ।। तदरास्वामिनांगेहे जातास्तामुनिकन्यकाः ।। २८ ।। जमदगः अपत्यं जामदग्न्यम्नेन प्रदत्ता या धरा विप्रेषु संस्थिता । जामदग्न्यः परशुगमः एक विंशतिगारं निःक्षत्रां मही कृत्या मर्यापृथिवीप्रामणेभ्योददापितिकथा पुरायामिद्धा ! नद्धग- स्वमिनामर्धाामदग्न्यप्रदत्तधरानायकानांगहना मुनि रुन्यका जाता जन्म प्राप्ताः ॥२८॥ जगदमि ऋषि के पुत्र परशुराम ने दहीमवार क्षत्रिय राजामों फो मारकर पृथ्वी निःसत्र परदी। पृथ्वी पर फही सात्रियों का नान निगन तक नहीं रहा तो वामनों को पृथ्वी दान फरक ददी । गह कथा पुराणों में निम्नारपूर्वक है । उमी जामदम्य (पग्गुगन) की दी हुई पृथ्वी के स्वामी से प्राबर थे जिनके गृह में अनि फन्याभों ने पुनर्जन्म प्रहार किया ॥ २ ॥ 1

५६
श्रीपिलायतनतीर्थमाहाल्यं ।
उस महासमाज में विचरती हुई उन कन्याओं ने किसी
समय में प्रेम भरे उच्चस्वर से विष्णु भगवान् के गुणानुवादों को गाते
और निषाद, ऋषभ, गान्धार, खड्ज, मध्यम एवं धैवत :
पंचमपर्यन्त स्वरों के भेदों से विभूपित अपनी विशाल वाणा
अङ्क में ले ब्रह्मानन्द के समान प्रानन्ददायक लय को बजाते तथा त
के समय अपने शिर को कंपाते हुए. किशोरवयस, प्रसन्न वर
नारद मुनि को देखा ॥ २१, २२, २३ ॥
दृष्ट्या च ममुहस्सर्वाः कामवाणवशंगताः ॥
योग मार्गम्बिनिन्दन्त्यः स्तुवन्त्योभोगभूमिकाम् ॥२
एवम्भूतं मुनि नारदं दृष्ट्वा चकाराजितेन्द्रिया अपिता
सर्वा कन्यकाः कामवाणवशंगता योगमार्गम्बिनिन्दन्त्योभोर
भूमिका स्तुवन्त्यः मुमुहुः मोहम्प्राप्ताः ।। २४ ॥
ऐसे सुन्दर स्वरूप नारदजी को देखकर काम के वशीभूत होकर
वे मुनिकन्याएं मोहित होगई और योग-मार्ग की निन्दा तथा विषय
भोग की स्तुति करने लगीं ।। २४ ।।
एवं योगम्परित्यज्य भ्रष्टास्तो मुनिकन्यकाः॥.
विष्णुमाया हुतात्मानः पतितायोग भूमितः॥२५॥..
'महाकामगृहग्रस्ता विहला ग्रहली कृताः।।
काम वासनाया विद्धा मृताः स्वायुष्य संचये ।। २६ ।।
(स्पष्टा)
इस प्रकार वे मुनिकन्याएं योगमार्ग से प्रष्ट हो गई विष्णु
भंगवाने की माया ने उनकी श्रारना को हरण कर योग भूमि से गिरा
दिया और महाकामरूपी ग्रह से ग्रस्त होकर वे बिद्दल और उन्मय
होगई एवं कामवासनासे विद्ध होकर सकीस कन्याएं गरगई ॥२५,२६
।
.

शोकपिलायतनतीर्थमाहास्य ।
योगभ्रष्टास्ततो जाना महतांश्रीमतांफुले ॥
वित्राणां कुलजानान्ताःयाः पूर्व सख्यमश्रिताः ॥२७॥
योगभ्रशास्ताः कन्यकाः यतः पूर्व पूर्वस्मिन्भवे सख्यमा-
श्रिताः पारस्परिक प्रेम भावंगतानासन् अतस्ततोऽर्थान्मुनिगृहा-
न्मृत्युप्राप्य कुलजानाम्महतांश्रीमताम्बियाणां कुले जाताः सहेव
पुनर्जन्मसम्प्राप्ताः ॥ उतचापि "शुचीनां श्रीमतां गेहे गेहे
विद्वज्जनस्यवामिथवा श्रीमतां गेहे योगभ्रटो हि जायते " ॥२७॥
वे कन्याएं जो पूर्व जन्म में परस्पर प्रेम भाव से रहा करती थीं
योग से भ्रष्ट होकर मर जाने पर उन्हों ने महाकुलीन एवं श्रीमान्
ब्राह्मणों के कुल में एक साथ ही पुनर्जन्म ग्रहण किया ॥२७॥
जामदग्न्यप्रदत्ता, या, धरा, विमेपुमंस्थिता ।।
तदरास्वामिनांगेहे जातास्तामुनिकन्यकाः ।। २८ ।।
जमदनः अपत्यं जामदग्न्यस्तेन प्रदत्ता या धरा विप्रेषु
संस्थिता । नामदग्न्यः परशुरामः एक विशतिगर निःक्षत्रां मही
कृत्या माथिवीम्बामणेभ्योददायितिकथा पुराणासिद्धानदग-
स्वमिनामर्थाजामदग्न्यप्रदानधरानायकानांगहना मुनिकन्यका
जाता जन्म प्राप्ताः ॥२०॥
-
जमदमि ऋपि के पुत्र परशुगम ने दमवार क्षत्रिय राजामों
फो मारकर पृथ्वी नि:सन पाटी। पपी पर कही नात्रियों का नान
निशन तक नहीं रहा तो मामलों को पृथ्वी दान फरक देदी।
यह कथा पुराणों में विनारपूर्वफ है । उमी जामदम्य (परगुगः)
फी दी हुई पृथ्वी के स्वामी ये प्राबर ५ जिनके गृह में न
फन्यामों ने पुनर्जन्म प्रहार किया ॥२॥

सम्परतया प्रदर्शित हो रहा है गार इमायान्द्रामान, मन्दिरवनाशगदान महात्म्या यत्र वै कपिलच्नं महापुण्यं महीतले ।। एक योजन विस्तारं मध्यतः पादयोजनम् २६ ।। जामदग्न्यः सा पृथ्वीमकस्मिन्यैकदेशनिवासिग्रामणे- एव नादात् किन्तु यस्मिन्यस्मिन्देशेयंयंराजानमवधीत् त भुवन्तदेशवासिब्राह्मणेभ्यः प्रादात्तथैवास्मिन्मरकान्तारशासिक णाम्भूमिमेतद्देशनिवासिम्योददौ यत्र ते ब्राह्मणा निवासय मासुस्तत्रैकयोजनविस्तार मध्यतः पाद योजन मानं. महा पुण्यं पवित्रं कापिलं कपिलसम्बन्धिक्षेत्रं महीतले अस्ति ।। २६ ॥ परशुराम ने जीती हुई समग्र पृथ्वी एक ही किसी ब्राह्मण को अथवा एकही किसी देश के निवासी ब्राह्मणों को नहीं दी, क्योंकि ऐसा किया होता तो पुराणों में अवश्य इसकी कोई कथा मिलती। इसलिये यह अनुमान होता है कि जिस देश अथवा राजधानी को जीता वहां की पृथ्वी उसी देश के निवासी ब्राह्मणों को दान कर दी, इसी प्रकार इस मरकान्तार प्रदेश को जीतकर यहां की भूमि इसी देश के अर्थात् कपिलक्षेत्र के निवासी ब्राह्मणों को ही दान कर दी जो कपिलक्षेत्र पृथ्वी पर महापवित्र परिगणित किया गया है जिसकी सीमा चारोंतरफ एक योजन की लम्बाई चौड़ाई पर है और मध्य में चतुर्थांश योजन अर्थात् कोस भर के दीर्घ विस्तार में वह धाम है ।। २६ ।। मध्यतः क्रोशमात्रंतज्ज्योति रूपं सनातनम् ।। मृतास्तत्रविमुच्यन्ते सद्यः प्रक्षीणयन्धनाः॥३०॥ (१) पाठकगण : हिन्दूधर्म मर्यादानुसार अन्य तीर्थस्थानों की भांति इस परित हा के विषय में उपरोक्त २९ व ३० के शोक में इस पुरयर या मझा भी स्थान ही माना गया है उससे चागे और १ योग की सामा पर्यन्तरयन एक यादि और यतिका स्थान है । इस मांसा के चन्दा दाना रसम पर धीररी ।

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यं । मध्यतः क्रोशमात्रमिति स्पष्टम् ॥ ३० ॥ योजन के चतुर्थाश परिमित मध्य में कपिलमुनि का धाम है और योजन ४ कोस को कहते हैं इसका चतुर्थाश एक कोस हुअा। अतः इस श्लोक में उसी पूर्वोक्त मध्यवर्ती धाम का वर्णन करते हैं कि मध्य में कोसमात्र का जो क्षेत्र है यह कपिलधाम है, ज्योतिरूप है, और मनातन है । उस धाम में दह त्याग करनेवाले उसी समय अपने संसारी कर्मवन्दना को त्याग कर मुक्त हो जाते है ।। ३० ॥ तद्धामनीम सामीप्ये विप्रचेत्राणि सन्निवै॥ तेपु क्षेत्रेपु देविप्राः स्वदासः शूद्रजस्सह ॥ ३१ ॥ यापयन्ति मदाधान्यं स्वकुटम्यस्य पुष्टये ।। प्रावृट् काले महामेधजलमालासमाकुले ॥ ३२ ॥ (स्पटाथी) उस धान की सीमा के समीपही में उन ब्राह्मणों के खत हैं ये ब्राह्मण जब बरसात के दिनों में पूरी वर्षा होने लगती है और आकाश सघन एवं सजल गेवों से आच्छादित हो जाता है तो अपने कुटुम्यों पालन अाने पापों से मुक्त होकर पुण्य के भागी होत है यहातक कि नी अपने शुद्ध चतःकरण से यहां पारर मरने यो दास माने हैन भी मौत की मात होजाते है और इन यांस भरको पवित्र भूमि के चारों घोर ४ वास की सामानक इस पवित्र क्षेत्र ही पी सामालिता है। निर्म हम देश में " चोरन " शब्द के नाम में कहने है लिता गया है इसलिए इस ४ कोम वी भूमि को शारत्र में परमपवित्र एवं गोक्षदायिनी भूमि माना है इसमें सब प्रकार या पशुहरण या जीवहिमा वनित है जो कि राचित है । इस समय : देगते है तो कई पवित्र नापों के. ग्रामपाम जो हमी बोरन निमित्त ही भूमि छोड़ांगयो है वह सत्र पनि भूमि है। मनी जानी है पहल यहांतक इगरा गौरस था कि किसी नर्षि के पौरन में कम ही दानी, पासव अन्याचारानी पूर्ण दंड के येग्य होना यह घरग में गारण होने पर पाबंधन से मुह रोने के साथ २ इह लोक के देणकयन से भी गुम होनाता का।

I कानन पण गे मम्मी के साथ उन पत्रों में भागांनी या ॥३१, ३२॥ गदा नंग्रेस मंगाना धान्यानां पहमम्पदः ॥ कार्मिक पिम मासि सर्यलोफ मनोहरं ॥ ३३ ॥ सा मा कन्गस्ताः क्षेप रक्षण तत्पराः॥ पयस्सन्धिसमारूकाः सारसौन्दर्य पानयः ॥ ३४॥ स्थान स्थान पितृननुशाण क्रीडनार्थ स कौतुकाः॥ क्षेत्ररक्षामिपीकृत्य प्रत्यहं जन्मुराहताः ॥ ३५॥ सर्व लोक मनादर विमले कार्तिक मासि यदा पु धान्याना पहुगम्पदस्गंजातास्तदाताः क्षेत्ररक्षणतत्परावयस्सन्धिसमारूढ़ा यौवनारंभिकावस्थाम्प्राप्ताःसारसौदर्यसानयःपरमरूपपत्यो ब्राम- णकन्याः क्षेत्ररक्षामिपीकृत्य क्षेत्ररक्षाच्याजेन स्वान् स्यान् पिढ्ननु शाप्प राहताः स्नेहेनानुशताः सकौतुकाः फ्रीडनार्थ प्रत्यह जग्मुः ॥ ३३, ३४, ३५॥ सर्वजन मनोहर विमल कार्तिक मास में जब खेतों में प्रचुर धान्य की सम्पत्ति हो जाती थी तो खेतों की रखनाली के लिए परम उत्सुक हो कर चौवन की प्रारंभिक अवस्था में प्राप्त रूप सौन्दर्य की खानि वे ब्राह्मण कन्याएं खेत की रखवाली का बहाना करके अपने अपने वितागों से श्राज्ञा लेकर और उनसे श्रादृत होकर कौतुक के साथ प्रतिदिन खेलने के लिए जाती थीं ॥ ३३, ३४, ३५ ॥ चटकादि विहंगेभ्यो मृगादिभ्यो दिने दिने । धान्यरक्षां प्रकुर्वन्त्यः क्रीडन्त्यः कौतुकान्विताः ॥३६॥ दिने दिने चटकादिविहंगेभ्योमृगादिपशुभ्यो धान्यरक्षा प्रकुर्वन्त्यः कौतुकान्विताः क्रीडन्त्यः खेलान्तिस्म ।।

राप। बड़े कुतूहल .. वे कन्याएं प्रतिदिन पशु-पक्षियों से धान्य की रक्षा करती हुई के साथ खेलती थी ॥३६॥ सायम्पुन हानान्तु यदेच्छाजायतेहदि ।। स्वक्षेत्रेभ्यः परावर्त्य समायुताः श्रमान्विताः ॥ ३७॥ ममागत्य स्वधामांसि तीरेन्यस्यसमध्यमाः।। प्रत्यहं स्नान्ति चिन्द्र ! कापिलेये सरोवरे ॥ ३८॥ है विप्रेन्द्र ! पुनः सायं गदा हृदि गृणामिच्छा जायते तदा समायुकाः सहवागमनशीला श्रमान्विताः समरतीदयमबाटनान् स्थगितास्समध्यमास्ताः क्षत्रेभ्यः पगार्द शारिल गिर समागत्य तोरे स्वथामांसिन्यस्य प्रत्यहं स्नान्ति स्नानं कुर्वन्तिस्म ।।३७, ३८॥ हे विप्रेन्द्र ! सायंकाल में जय पर जाने की इच्छा होती थी तो दिन भर की क्षेत्ररक्षा भौर खेल से थफ पर वे कन्याए अपने २ क्षत्रों से परावर्तित हो (लेट ) फर फपिन संगयर पर पानी और करने वम्) फोसरोवर के तीर पर रखकर प्रतिदिन स्नान करती थी ।। ३७,२८॥ सुधाविष्टा भक्षरित्या क्षेपानीनं फलादिकम् ।। सन प्रक्षिप्पपीष्टिं गृहापोन्मिस्वकान् स्वकान् ॥६॥ समस्त दिन परिधमालपारिष्टाम्नाः कन्याः देवानीतं फलादिस भएपित्ता साहिएच प्रादप खकान २ पदावा- तिरम ।। ३६॥ दिन भर के पास से भरकर यमन एने पनन्तर देनों में समापन : महर घर पर दोपहाही गर भने २ र ३६१ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्य । एवं तासां हर्वतीनां व्यतीता द्वित्रहायनाः ॥ तद्वारिस्नानपुण्येन परां शुद्विमुपागताः ॥ ४०॥ (स्पटम्) इस प्रकार प्रतिदिन स्नान करते हुए कन्याओं को दो तीन वर्ष व्यतीत हो गए उस सरोवर के जल में स्नान करने के पुण्य से वे परमशुद्धि को प्राप्त हो गई ॥ ४० ॥ ततस्सर्व स्मृतौ जातं पूर्व जन्म विचेष्टितम् ॥ स्वसखित्वंपरप्रेम योगभ्रंशन्तथैश्च ॥४१॥ ततोऽर्थात्कापिलेयस्नानपुण्याच्छुद्धिमाप्तानन्तरं पूर्व जन्म विचेष्टितम् स्वसखित्वं परंप्रेम तथैव योग भ्रंशत्वं चकारान्मुनीनां गृहेजन्म, योगादिसाधनं, प्रयागगमनं, नारदेक्षणमित्यादिच, सर्वतासां स्मृतौजातम् ।। ४१॥ तदनन्तर अर्थात् कपिलसरोवर में नित्य स्नान करने से जो शुद्धि प्राप्त हुई उसके अनन्तर उन कन्याओं को अपने पूर्वजन्म की सब कथा (अर्थात् मुनिओं के गृह में जन्म लेकर अष्टांग योग की साधना, परस्पर की मैत्री तथा घनिष्ठ प्रेम, प्रयागराज की यात्रा, यहां नारदजी का सौन्दर्य देख मोहित होना, विषय भोग की उत्कटेच्छा से योगमार्ग फी निन्दा करते शरीर को त्याग करना और पुनः पवित्र और कुलीन ब्राह्मणों के घर में जन्म लेना) इत्यादि एक एक करके ज्ञात होगई ॥४१।। एवं स्मृती प्रवृत्तायां पूर्वस्यांतास्तपोधन ! ।। दैवेन दुर्वितक्यण सद्यः पंचत्यमागताः ॥४२॥ हे तपोधन ! एवं पूर्वोक्त क्रमेण पूर्वस्यां स्मृती प्रवृत्तायां पूर्वजन्म स्मृती संज्ञातायां दुर्वितर्यगाविचिन्त्येन देवेन भाग्येन हेतुना समस्तकलएयताः पश्चत्वमागता भन्मृनागभ्युः ॥४२॥ ।

श्राकान्तायतनताथमाहात्म्य हे तपोधन ! जब इस प्रकार पूर्व जन्म की स्मृति प्राप्त हो गई तो अविचिन्त्य देवसंयोग से तत्काल ही सब कन्याओं ने एक साथ अपने शरीर का त्याग करदिया ॥ ४२ ॥ तत्तीर्थस्य प्रभावण योग भ्रष्टा दिवंगताः॥ पुनरेव मुनीनान्नाः कुलेजाता महात्मनाम् ॥ ४३ ॥ पूर्व भवे योगभ्रष्टा अपितास्तस्य तीर्थस्य कपिलायतनस्य प्रभावेण दिवं स्वर्गगताः पुनः कियत्कालं स्वर्ग मुखं भुक्त्वा महात्मनां मुनीनां कुले एव जाताः ।। ४३ ॥ वे ब्राह्मण कन्याएं पूर्व जन्म में योग से भ्रष्ट हो गई थीं अब उत्तरोत्तर अधोगति को ही प्राप्त होती, परन्तु उस कपिलतीर्थ के प्रभाव से स्वर्ग को गई और वहां कुछ दिनों तक वर्ग सुख का भोग करके पुनः महात्मा मुनियों के कुल में उन्हों ने जन्म ग्रहण किया। ४३ ॥ महा मुनिभिख्याच पुनर्देवसिनिमः॥ कियत्कालं परंभोग भुजानाः सहमभिः ॥ ४५ ॥ स्थितादिव्येपु लोकेषु मोदमानाः प्रभान्विताः ।। तद्वामनि तदुच्छिष्ट प्रक्षेपोद्भूतदोपतः ॥ ४५ ॥ किश्चित्कारणमुद्दिश्य पुनस्त्यताः स्वभर्तृभिः॥ पडेव कृत्तिका जाता भूय संभृयभूरिशः॥४६॥ पुनः अर्थान्मुनिगृहे जन्म ग्रहणानन्तरं देवपिसानिहा मुनिभिरुढा विवाहिताश्वताः भर्तभिस्सह कियत्कालं परं भोगं भुंजानाः मोदमानाः प्रमान्विताः दिव्धेषु लोकेषु स्थिताः । निवासमापुः। अनन्तरं तद्धामनि तदुच्छिष्ट प्रक्षेप दोपतः अर्थात् पूर्व स्मिन्भवे नालण गृहे जन्म संग्राप्प क्षेत्ररक्षामिपीकृत्य क्रीडनाध श्री कपिलायतनतीर्थमाहाभ्यं । गत्या रातः फलादिकं संगृवसायं कपिल सरोवरमागत्य तत्र स्नात्वा फलादिकं भवयित्वा प्रत्यहं यदुच्छिष्ट तत्वविक्षिपु- स्तद्नदोषादिहभय मुनीनांगृह स्वमभिः किचित्कारणमर्था- दपवादमुद्दिश्य त्यताः । अनन्तरं ता एव पदकन्याः भूयः संभूया- र्थात्पतिभिस्त्यागानन्तरं देहविमृज्याकाशे भूरिशीबाहुल्येनपद- कृत्तिकाः कृत्तिका नक्षत्र स्यपद्ताराः संजाताः ।।४४,४५,४६ ।। पुनः उन मुनि कन्याओं का विवाह देवर्षितुल्य मुनिओं से हुआ और उन कन्याओं ने अपने २ स्वामियों के साथ कुछ दिनों तक उतम भोगविलास किया और पूर्ण प्रभा एवं हर्प के साथ दिव्यलोक में जहां उन मुनियों के रहने का निवासस्थान था वहां निवास किया, तदनन्तर पूर्वजन्म में जो कपिलसरोवर के तीर पर फल मूल खाकर उच्छिष्ट प्रक्षेपण किया करती थी उसके दोष से इस योनि में किसी कारण स्वामियों ने उन को त्याग कर दिया। पति से त्यक्त होकर उन्हों ने पुनः अपने शरीर को त्यागकर दिया। तीर्थमें उच्छिष्ट त्याग करने का इतना ही फल उनको भोगना पड़ा कि पति से त्यक्त हुई। अनन्तर कई जन्मों के सुकृत यश तथा कपिलाश्रम के शुद्धसरोवर में स्नान करने के कारण जो उनके असंख्य पुण्य संचित हो गये थे उन पुण्यों के प्रभाव से आकाश में तारा होकर छओं कन्याएं विकास करने लगी जिनको कृत्तिका के तारे कहते हैं । ज्योतिषशास्त्र में छुरा के आकार में इन जारों की स्थिति बाई गई है ।। ४४, ४५, ४६ ॥ भाकल्पान्तं स्थिता ब्रह्मन्दिविभान्ति महाप्रभाः महायोगि प्रभावेण महायोगिन्यएवताः ॥४७॥ तीर्थ स्नानज माहात्म्यं सूचयन्ति निरन्तरम् ।। - हे ब्रह्मन् महायोगिप्रभावेण यहायोगिनः कपिलमुनेः प्रसादात् - एव महायोगिन्यो महप्रभा TET - दिवि शाकाश स्थिता विभान्ति ॥४७॥ तथाच निरन्तरं तीर्थस्नानजमाहात्म्यं सूचयान्त ।। हे ब्रह्मन् ! गहायोगी कपिलमुनि के प्रभाव से महायोगिनी वे कन्याए महोज्ज्वल तारा रूप धारण कर कल्पान्त तक के लिए आकाश में प्रकाश कर रही हैं ।। ४७ ॥ और निरन्तर तीर्थस्नान के महात्म्यों की सूचना दे रही हैं । यासां कार्तिकमासस्य सारासार विवेकिनः॥४८॥ नाम निर्वचनं चक्रनरा नरुक्क दिनः ॥ तासांस्तन्यं मयापीतं पमुखैर्घटजोत्तम ॥ ४६ ।। यामां पराणां कन्यकानां कार्तिक मागस्य सारसार विवेकिन: कार्तिकमाममाहात्म्यवेत्तारोनरकवादिनोनिरुतशास्त्रज्ञा नरा एकैव कृत्तिकेंति नाम निर्वचनं चक्रुतासाम्परस्परमतिप्रेमदर्शना दितिभावः। हे घटोत्तमागस्त्य! तासांस्तन्यं दुग्धंमया पभिमुखैः पीतम् ।। ४८, ४६ ॥ पृष्ट ६४ के ४४, ४५, ४६ व श्लोकों पर विशेष वक्तव्य (१) बरसुतः जर ये कन्याए योग से व्युत होकर ब्राह्मणों के घर में उत्पन्न हुने और निन्य क्षेत्रों से पाकर सांयकात के समय कपिल सरोवर में रनान कर के अपने २ गृह को जानी थी जिस ग्नान के पुण्य से पूर्व जन्म की स्मृति हुई और तत्सत ही दयों ने देहत्याग कर दिया और सर्गलोक की गयीं, वही समय इनकी मुक्ति का था परन्तु उस तार्थ में उछिट त्याग करना ही एक अपराध था जिससे पुनः एक वार मुनि कन्या होकर पतित्यागरूप दण्ड भोगना पड़ा और इसके अनन्तर जन्म-मरण से रहित हो अाकाश में तारा रूप होकर श्राव ल्यान्त वार करने लगी। लिसा भी है कि नाभुक्त दीयते. कर्म फल्प कोटिशनरषि" अर्थात् शतशः योटि का व्यतीत होनाएं परन्नु कमों का नाश भोग परने ही से होता है । अथच " नह्यात्मनां वर्म फलोपभागः कायादिना" अर्थात् कर्म का भोग भी शगर धारण करने ही से होता है। इसीसे सिद्ध होता है कि जब कमों का नाश हो जाता है तो शरीर धाररा करने को भी कोई बावश्यकता नहीं है और शरीर धारण न करना ही मुक्ति है।

की कन्या श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । हे अगस्त्य ! कार्तिक मास के वास्तव तत्वों के ज्ञाता और निरुक्त शास्त्र के मर्मवेदी विद्वानों ने उन कन्याओं के लगातार कई जन्मों के परस्पर प्रेम को देखकर छओं का एक ही नाम (कृतिका ) रक्खा उन्हीं कृत्तिकाओं का दुग्ध मैं ने अपने ६ मुखों से पिया है ।।४८,४६ ॥ नोट-किसी कल की कथा है कि शंकरजी का विवाह दक्षप्रजापति से हुआ था इसलिये शंकरजी सर्वदेव शिरोमणि होने पर भी दक्षप्रजापति के जामाता ही थे। एक समय ब्रह्मलोक में देव सभा हुई जिसमें सभी देवता पहले ही से पाए हुए थे, दक्ष प्रजापति कुछ पीछे पाए उनको सभा में उपस्थित देख सभी देवताओं ने उठकर श्रभिवादन और स्वागत किया परन्तु आदिदेव शंकरजी ने कुछ भी नहीं किया। अपने जामता की ऐसी धृष्टता देख दक्षप्रजापति बहुत क्रुद्ध हुए और उस सभा से चलेगए, तब से शंकरजी से कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखते थे। कुछ काल के बाद दक्षप्रजापति ने एक यज्ञ किया जिसमें शंकरजी को निमंत्रित करके नहीं बुलाया परन्तु पिता के यज्ञ करने का समाचार सुनकर दक्षपुत्री बिना निमन्त्रण के ही पिता के घर जाने को उद्यत होगई और शंकरजी से आज्ञा मांगी शंकरजी अपने श्वसुर के क्रुद्ध होने की कुल कथा कहकर दक्ष सुता को बहुत समझाया परन्तु दक्षपुत्री ने एक न माना और पिता के घर गई वहां जाकर यज्ञ में सब देवताओं का अंश देखा परन्तु शंकरजी का भाग कहीं नहीं देखा और सब किसी ने कुशलमंगल पूषा परन्तु दक्षप्रजापति ने अपनी कन्या को देखा तक नहीं, इसलिए पीहर में पति का और अपना अपमान देख इर्षा के यरा होकर योगामि से भस्म होगई। वही दक्षमता पुनः हिमाचल के पर जाकर अवतरित हुई और नारदजी उसकी हस्तरेखा देख " शंकरजी से विवाह होगा" इतना कहकर पार्वती को तपस्या करने का आदेश दिया था सो .. आकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । पाएमातुर इतिख्यातो दृष्ट पुष्टश्च सर्वदा।। नैष्ठिको ब्रह्मचार्यस्मि तासां योग प्रभावतः ॥ ५० ॥ सेनानीः सर्वदेवानां सर्वासुरनिकन्दनः ।। सर्वदा तासामेयस्तन्यपानेनाहं दृष्टः पुष्टः पाइमातर इतिख्यातथ तथा तासां योग प्रभावतः सर्वदेवानां सेनानीः सर्वासुर निकन्दनो नष्ठिको निष्ठावान्ब्रह्मचार्यस्मि ॥ ५० ॥ • पार्वती शंकरजी से विवाह होने के निमित्त तपस्या कर रही थी और इधर तारकासुर एक दानव महाप्रतापगाली ब्रह्मा, विष्णु और महादेव सब से अवध्य होकर महाउपद्रव मचा रहा था तब सभी देवता मिलकर ब्रह्मा के साथ विष्णु भगवान् के पास गये और उस दैत्य के वध का उपाय पूरा भगवान् ने कहा कि यह दत्य और किसी से नहीं मरेगा यदि शंकरजा का पुत्र सेनापति हो और देवता की सेना तैयार हो तो इस दैत्य का वध होगा भाजकल दक्षमता हिमालय की कन्या होकर शंकरजी से विवाह होने के निमित तपस्या कर रही है और तपस्या की मिद्धि पा समय भी आगया है तुम लोग सप्तपियों की सहायता से शंकरजी को विवाह करने के लिए उपत करो इस वियाह से पुत्र उत्पन होगा वही तारकासुर को मारेगा। यनन्तर सप्तर्षियों ने गंहरजी का विवाद पानी में कराया परन्तु फई कोटि व विद्वार में ही बीत गये पुत्रचि को कोई ना ही नही दाग पड़ी और इधर दानवों के पोर उपदों से देवलेक मन्य सोरुमार पाताल पन्नाकार मच गया दानव माजीको मागहर सभी देवता शंकरजी से पुत्र सन करने की सामना करने के लिए लारा पर गये वहाऐगपारिजी या दर्शन ही दुर्नया तो अनिदेव पोपवूनर पारामा गइन्दादिमी देवगायों ने गुजरने सन्दर भेजा इन पानी पटिर मोटेगरे ही कादेवटामों।

श्राफपिलायनगीगाहात्म्यम् । सर्वदा उन्ही माताओं के दुग्परान करके में हष्टपुष्ट हुश्रा और पागमातुर इरा नाग से में विख्यात हुआ और उग के ही योग के प्रभाव से सब देवताओं का सेनापनि हुया और सभी राक्षसों का बंध किया तथा निष्ठिक प्रागारी हुआ हूं ॥ ५० ॥ पाने और गिलास में विश टालने का कारण समझ गए और विहार को परित्याग कर अमोधवीर्य को कन्दित कर दिया उसको अमि ने आपने चंच में उठा लिया और भग के मारे यहां से भागे देवता लोग भी चले थाए जय अमि को उस नीर्य का ज्वलन्त तेज नहीं सहन हो सका तो एक सरकगडे के मन में उन दिया यही स्कन्द हुए शंकरजी के स्कन्दित वीर्य से उत्पन्न हुग. इसलिए उनका नाम स्कन्द, और अमि के मुख से उत्पन्न हुए इसलिए उनका नाम अमिभूः हुग्रा और सरकरडी में उत्पन्न हुए इसलिए उनको सरजन्मा, भी कहते हैं । जिस जगह सरकण्डों में इन की उत्पत्ति हुई उसके समीप ही गङ्गा के तीर पर जाने के लिए रास्ता था उसी रास्ते से प्रतिदिन वे ही ६: कन्याएं जो मुनि पली हुई थीं स्नान के लिए जाया करती एक रोज उन्होंने एक अद्भुत वालक सरकरडे के वन में खेलो दे और उठा लिया तथा इस मालक को मैं रखूगी मैं रखूगी कहकर अ स्तनों से दूध पिलाने के लिए लड़ने लगी उस समय स्कन्दजी ने ६ : को धारण कर छयों का दुग्ध पान किया तब से इनका नाम पाएमा हुआ ६ माताओं का भाग एक बालक में बराबर उसको संस्थ में पारमातुर कहते हैं । जिसका विग्रह वाक्य परणां मातृणामपत्यम्पुमा पारामातुरः ऐसा होता है। और इस पुस्तक में स्कन्दजी ने स्व कहा है कि " तामां स्तन्यं मयापीतं मुखैःषड्भिद्धिजोत्तम " अर्था उनका दुग्ध मैंने अपने ६ मुखों से पीया है। एवं आगे कहा है । पारमातुर. इति ख्यातः " अर्थत् ता मेरा नाम प मातुर हुआ ।

प्रत्यब्दं कार्ति के मासिस्नानवेलामवाप्यताः ॥५१ ।। अवलम्ब्यावतिष्ठन्ति पुनः स्नानोत्सुकाइव ।। ताः कृत्तिका आकाशस्थापि कार्तिकेमासि स्नानवेलामवाप्य पुनःस्नानोत्सुका इव प्रत्यब्दं प्रतिवर्ष अवलम्ब्याकाशादवत रन्त्य- व पश्चिमाशायां क्षितिजामन्नतिष्ठन्ति एतदुरभवति यम्नुतन्तु स्नान वेला अरुणोदय हालः तस्मिन्ममये प्रायः कार्तिकान्त कृत्तिकाताराः पश्चिमक्षितिज दृश्यन्ते तत्र काग्गम् मर्यो यस्मिन्नृते भवति तदृक्षमेय सूर्योदयरेलायाम्पूर्वम्मिक्षितिज दृश्यते । इति ज्योतिष शासे स्पष्टम् एवं नम्मादृक्षाचनुर्दशं नक्षत्रम् तस्मिन्नेयकाले पथिमचिनिजलनं दृश्यने कार्तिके मामे पूर्णिमामन्न- काले पदारयः शान्तिन्ते तुलान्त पृधिकादीयोदेति तदा विशाखान्त वा अनुगपादा सूर्यो भवति । विशाखानुगधयोः नोट-कृतिक ये धाकाश मान लिपातिक मास में ही उतरना है। दीख पाती है क्या इसमा उनर ज्योतिष माग्य मे रपट होता है । करों के व्यानिश रे सिद्धात प्रमों में भूगोल गोल दागेस पर निशान लिखते है सनम समग निसरोवर पूर्व पी गि. में दिन होता है सही समय पर मा चादरयां नर पथम दिशा में gril से लगाया न पाई यह सिद्धान्तसमें यूनाधिक कभी नही पौर रागिरम ही रे माप दा मा के घरों तापमए रिस करार मापन सत्र के तार में पूर्व दिशा में चार दिन में मार में रिण में सविना मलितन में पारा मकरानाको का समभग विशाया गया में गर्व हटा में Fाल समर में मारा गया मगर निपर भी कान पाने : हों में दलितोकी कामे नागपुर मोगरगांगाना में। पर रामनार "ari ८.२ " मना दाई.

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । सूर्योयदोदेति तदा पश्चिमाशायां क्षितिजासन्ने कदाचिदधः कदाचिद्धभरण्यः कृत्तिकाश्चापिहरयन्ते अतस्ताः कृत्तिकाः पुनः स्नानोत्सुकाइयालम्ब्यावतिष्ठन्ते इति कथनं ज्योतिप सिद्धान्त गत्यापि युक्तियुतमेवेति । पुनः प्रायः कार्तिक पूर्णिमायां कृत्तिका नक्षत्रमपि चन्द्रचारयशन भवतीति पंचाङ्गे स्पष्टं तेनापिस्कन्दो- किर्घटते। प्रतिवर्ष जब कार्तिक मास में स्नान का समय आता है तो वे कृस्तिकाएं श्राकाश से उतरती हुई दीख पड़ती हैं मानो फिर भी स्नान करने के लिए उत्सुक हुई हैं। तस्मात्पातक सघातकारिणि स्नान्ति पारिणि ॥५२॥ कार्तिके कृत्तिकाछाये तेयान्ति विमलांगतिम् ॥ ये पुनः स्नान्ति तन्मासि कपिलायतने मुने ।। ५३ ।। तेषां किम्वण्यतेभाग्यं महाभागवतां भुवि ॥ * की पूर्णिमाओं में एक एक खास नक्षत्र का योग होता ह निससे प्रचलित महीनों के नाम हैं जिसका प्रसंग वश यहां लिखता हूं ज्योतिषशास्त्र में मास गणना सौर सावन नाक्षत्र घोर चान्द्र के भेद से चार प्रकार की है और जिस गणना से जो कार्य करने को कहा गया है उसमें वही कार्य कियाजाता है परन्तु चन्द्रमान दो प्रकार से प्रसिद्ध है हम लोग शास्त्र में दोनोंही के जगह २ विषय उपस्थित देखते हैं उनमें एक को अमान्त कहते हैं जिसका उपयोग गणित में प्रायः हुधा करता है दूसरा पूर्णान्त है जिसका उपयोग पहुधा व्यवहार में होता है और पूर्णिमा को जो नक्षत्र पाता है उससे ज्योतिषियों ने महीनों के नाम बनाये है जैसे चित्रा युक्त पूर्णिमा होने से चैत्र (चैत्र) विशाखा युक्त पूर्णिमा होने से वैशास ज्येष्ठा मुक्त पूर्णिमा होने से ज्येष्ठ एवं उत्तरासाद से आपाट श्रवण से श्रावण उत्तर भादपदा से भाद्रपद अश्विनी से पाश्विन मारवाड में बासोज कृतिका युक्त पूर्णिमा को कार्तिकी कहते है उससे कार्तिक माप्त होता है, एवं मार्गशीर्ष, पाप, माघ, फाल्गुण इत्यादि । संस्कृत में चित्र या युक्ता पार्णमासी ची तस्पभिवोरमासः चैत्रः विशाखया मुक्का पौर्णमासी वैशासी तय भवायमासा रेशातः इत्यादि विदा है मास नाम सिद्ध होते है।

यतः पुनर्जननमरणादि मंसारबन्धनमुक्ताः कनिकाताराः कापिलये कार्तिकस्नानवैभवनेवजातास्तस्मात्पातकसंघात कारिणि यागिरी कार्तिकमासे कृत्तिकालाये अर्थात्पूर्णिमायां ये स्नान्ति ते विमलांगति यान्ति ॥ यतः पूर्णिमायां कृत्तिका योगी भत्येवेति ॥५२, ५३॥ कार्तिक मास में कपिलतीर्थ के स्नान का ही यह विभव है कि वे मुनि कन्याएं .पुनर्जन्म-मरणादि सांसारिक बन्धनों से मुक्त होकर तारों के रूप में आकाश की शोभा बढ़ा रही हैं इसलिए महापातकों का नाश करनेवाला जो कपिलसरोवर है इस में जो कार्तिकी पूर्णिमा के दिन स्नान करते हैं उन की विमल गति होती है और जो कार्तिक मासभर स्नान करते हैं उन महाभागवतों के भाग्य का वर्णन कौन कर सकता है ।। ५२, ५३ ।। इति ते सर्वमाख्यातं घात्रीणां मे विचेष्टितम् ॥ ५४ ।। कपिलालपस्नानपुण्याज्जातं लोकैक साक्षिकम् ।। (स्पप्टम् ) हे अगस्त्य ! इस प्रकार कपिलालय का स्नान के पुण्य से संसार में साक्षिरूप जो मेरी धातृयों के कृत्य हैं उनको तुम से मैने कहा है ।। इति श्रीस्कन्दपुराणे स्कन्दागस्त्यसम्वादे कपिलायतनमाहात्म्ये तीर्थपणन नाम चतुर्थोऽध्यायः।

पंचमाध्यायविवृतिः। (गून उसान) प्रत्युत्ता पुनरप्याद मासिनो महाद्भुतम् ।। कपिलालग माहात्म्य मेतिहास महामुनं ॥१॥ अस्मिन्वयमाणे पंचमाध्याय स्कन्दःपुनरगस्त्यं कपिलालय माहात्म्यं सतिहासं वर्णयति इत्युक्त्वति हे महामुने शानक ! इत्यु- क्वान् सधान्तृणां नारारुपाणां कृनिकानां चरितमुक्त्या महासेनः सान्दः महाद्भुतं महाधरं तिहार कपिलालय माहात्म्य पुनरपाद ॥१॥ गनजी कहते है कि हे मुनि शानक ! गहासेन स्कन्द देव ने चतुर्थाध्याय में इस प्रकार अपनी धात्री कृत्तिकाओं का चरित्र वर्णन फरने के अनन्तर महाश्चर्यफर इतिहास के साथ कपिलालय माहात्म्य को फिर भी इस पांचं अध्याय में कहा था सो सुनो ॥१॥ महापाक संघात विघातक पटीयसीम् ।। कपिलायतनींगायां मन्मैत्रा परुणे शृणु ॥२॥ हे मैत्रावरुणे ! अगस्त्य ! महांबासोपातकाधः महापातका महापातकानां संघातः समूहो महापातकसंघातः तस्य विधात के विध्वंसने पटीयसी समर्थतरा ताम् महापातकसंघातविघातक पटीयसीम् महामहा पातकजाल विनाशदक्षां कपिलायतनी गाथा कथा मत् कोर्थः मत्तः शृणु.॥२॥. हे मैत्रावरुणि ! बड़े २ पातकों के समूहों को विनाश करने में समर्थ जो कपिलायतन की कथा है उसको सुनो ॥२॥ .

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कदाचित्कार्तिक मासिकान्त शन्त दिनेपुच ।।
समाजोऽभून्महांस्तत्र देशदेशनिवासिनाम् ॥ ३॥
कदाचित् पूर्वस्मिन्समय-एकदा कार्तिके अर्थात्कार्तिकमासे
मासिकमान्तदिनेषु चात्र पादपूरकोऽव्ययाविभाति । मासे भवानि
मासिकानि प्रान्ते यानि दिनानि-शुभकादशीमारभ्य पूर्णिमा
पर्यन्तानि तानि मासिकमान्तदिनानि तेपु देशदेशनिवासिना
मनुप्पायां समाजोऽभूत् ।। ३॥
एक समय में कार्तिक मास के अन्त के पांच दिनों में देश-
देश के निवासी मनुष्यों का एक समाज एकत्र हुअा ॥ ३ ॥
कस्मिंश्चिद्दियसेपुण्ये सत्समाजस्समुद्यतः ।।
तीर्थप्रदक्षिणीकत्तुं यात्राफलसमीया ॥ ४ ॥
कस्मिाँधित्पुण्ये दिवसे यात्रा फल समीहया यात्रा फल प्राप्ति
कामनया तीर्थ प्रदक्षिणीकत्तुं सत् समाजः सतां साधूनां समाजश-
मुद्यतः तीर्थप्रदक्षिणायामुघतोयभूव ॥ ४ ॥
किसी पुण्यकाल के दिन में यात्रा के पूर्ण फल प्राप्ति की कामना
से सजनों का समाज तीर्थ की प्रदक्षिणा करने के वास्ते उद्यत हुआ ॥४॥
सर्वे प्रदक्षिणां चतुर्भिक्षवश्व कुटुम्बिनः॥
भगवन्नामगृहाना नानादानाहताशयाः ॥५॥
तस्मिन्नुद्यते समाजे भगवनागृहानाः सततं भगवन्नामो-
चारणतत्पराः नानादानाइताशयाः नानादानानि तेभ्य
पाहतः समादरं प्राप्तः श्राशयः मनोभिलापोयेपान्त नानादाना-
दृताशयाः अनेक दान ग्रहणात्सालमनोरथाः भिक्षयः। कुटुम्मिनश्च
सचे प्रदिणं चत्रः॥५॥

: उसा समय अनेक दानों से तृप्त भिनुक लोग " (गृहस्थ) लोगों ने भी भगवान् के नाम को जपते हुवे प्रदक्षिण- तत्र कश्चिशिक्षुरभूत स्वशुना सहितावशी॥ सोपि प्रदक्षिणं पुण्यंच सर्वजनैः सह ॥६॥ तत्र समाजे स्वशुनासहितः अवशी अहर्निशं स्व परिपोपणाय खोदरपूरणायच भिक्षार्थ क्षुब्धचितः कश्चिनिट गतवानितिभावः सोपि सर्वजनैः सह प्रदक्षिणं चक्रे ॥६ उस समाज में अपने कुत्ते को साथ लेकर कोई लुत्पचित मि घुस गया और उसने भी सब लोगों के साथ उस पुण्य प्रदक्षिणा किया ॥६॥ तस्यानुयायी तच्छापिचके तीर्थ प्रदक्षिणां॥ नानाभाव युतो लोको दृष्ट्वातं विस्मितोऽभवत् ।।७।। तस्य भिक्षारनुयायी सहानुगन्ता तत्तस्यश्या इतिविग्रहात् तच्छापि तीर्थप्रदक्षिणां चक्रे कृतवान् । नानाभावयुतोलोक स्तंश्यानं प्रदक्षिणांकुर्वन्तं दृष्ट्या विस्मितोऽभवत् ।। ७॥ उस भिक्षुक के पीछे पीछे चलनेवाले कुत्ते ने भी तीर्थ की प्रदक्षिणा की, यह देख अनेक भाव से युत समाज के सभी लोग आश्चर्यान्वित हो गये ॥ ७॥ केचित्तंभलयन्तिस्म धिवक्कुन्तिस्मकंचन ॥ तथापि भिक्षोः पाच स न विमुंगति मनाक् ॥८॥ कंचितवानं भर्तसन्तिस्म भर्सना दण्डमाररूपनाड़ना कुर्वन्तिम पवर्थे भन्मना लगुडप्रहाररूपाभयनि । केनन तं पिक गुन्तिम अर्थात् दुकानावंन बनामीप्यायर कुर्वन्तिम्म लोक धिशब्दन्य पश्यर्थे दुग्दर नवादा करंग उपयुशेभाति । तथापि माया र भित्रीः पार्य मामिप्यं मनास्लाममपि न पिचनिम्म लोकः दुन्दरादिशन लगुटादिप्रहारंगच पायमा- नापि म्यवामिनः निधीग्नुगच्छवामीन ।। - ॥ साउनबन यो मन्मना गरने से लकड़ियों में माग्न थे का हुग्दगन थ तामी काय मानिक म भिक) पान मनी हटता था।" (ot-1 . कमा फाधितत्र पदलिरमतना पाचार तत्पराः ।। स्वाहानि मर्यानः प्रपोद्वारयतां यः॥६॥ परिजनाः माचारलपरा:मदा शापाचारपुष्पापत्र गमाज पदन्तिम पदयं नः मर्यान् ग्पृशति एनं हवाइ गृत्य पहिरदास्यतां निफारयताम् ॥६॥ उनमगाज जीवनाचार-विचार पाकिटकना पर गनुप्रय पाने थे कि या ना मानना का परमामयः ५५६पर न.1 दो॥र।। म पुनःनि परामदं कार्य समापन । परमानमनिमयपानाः स्मिताननाः॥१०॥ मानित::: नाम सामानवाहा मा प्रम फिर उस समाज के और लोग जो हमेशः शान्ति को वाले और सब से थोड़ी हंसी के साथ प्रिय यवन बोल राग द्वेष रहित महात्मा थे। जो प्राणीमात्र को एक सा देखते लोगों (जो कुत्ते को पकड़कर समाज से बाहर करने को उ से, उस भिन्नुक (जिसका वह कुत्ता था) के साथ कहीं कि बढ़ जाय इस विचार से समझाते हुवे कहने लगे कि ऐसा का नहीं करना चाहिये अर्थात् उस कुत्ते को बाहर कभी नहीं नि चाहिये ॥१०॥ तान्प्रत्यूचुः पुनस्तेतु स्याचाराग्रह कारिणः॥ भवतां किंनुवसाव्यं यूयं ब्रह्मविदःक्षितौ ॥ ११ ॥ शुनिचैवश्वपाकेच परं ब्रह्मव पश्यथ ।। एवं वचनवोत्तथा विविथुस्तांस्तमोयुताः॥ १२ ॥ सर्वच समाजे सर्व विधा मनुप्या एकत्रीभवन्ति तथैवना प्रदक्षिणां कुर्वति शुनि, प्रदक्षिणं कुर्वतांजनानां मध्यतो दर मुत्पन्नम् तत्र राजसतामसानामेकंदलम् सात्विकानांच द्वितः प्रदक्षिणकर्मखिरतवानं दृष्ट्वा उदलद्वये विवादस्समुपस्ति प्रदक्षिणपये शुनोगमनं राजसतामसानां बाह्यसदाचारप्रदर्शि मतेऽनगर्लमासीदतस्ते तं वहिःकर्तुमुद्यताः सात्यिकास्तु भो ! कार्यमिति कथित्वा तान् सान्त्वयन्तिस्म । एवं परस्परं विवा क्रमशोर्द्धमाने । तामसानां वाक्यम् वान्प्रत्यूचरित्याध भ्याऽभवत् । स्थाचाराग्रहकारिणः स्वाचाराभिमानिनस्तमोर तास्तमस्स्वभावाजनास्ते तान् सात्विकान्पुनः प्रत्यूचुः पूर्व सात्विः वचनं श्रुत्वा, पुनरूचुरिति । यूयं तिती ब्रह्मविदः भवतां किंनुवकया यथात्मनि तथैव शुनिश्यपाकचैत्र परंप्रसव पश्यप एवं व्यर चक्रांत्या पावापेन तान् विविधुर्भेदयामामः ।।

जहां कहीं ज्यादा मनुष्य एकत्र हो जायं उसको समाज या मेला इते हैं और ऐसे समाज में सब प्रकार के मनुष्यों का रहना स्वाभाविक और उनमें अनेक प्रकार का प्रसंग भी उठजाना म्वाभाविक है, यहां । जो समाज एकत्र था उसमें भी सतोगुण रजोगुण और तमोगुण भी प्रकृति के मनुष्य थे और प्रसंग उस भितुरू के कुत्ते का या पड़ा। तुक के कुत्ते को समाज के साथ प्रदक्षिणा करते देख समाज में दो दल होगये । एक दल तो रजोगुण तमोगुणवालों का यनगया, दूसरा सतोगुणियों का, और तमोगुणी जो बाहर २ से अपने सदाचार का भारी श्राटम्बर फैलाये थे वे कहते थे कि कुत्ते को बाहर निकालदेना चाहिये हम लोगों को छूकर अपवित्र करेगा। और सात्विक कहते थे कि ऐसा नहीं करना चाहिये । यहीं से विवाद श्रारंभ हुआ। अब आगे यादविवाद उत्तर प्रन्युचर जैसा चला सा कहते हैं । सात्विकों मना फरने पर तमः प्रकृतिवाले बोले, कि थापका क्या कहना है ? थाप लोग तो इस पृथ्वी में साक्षान् प्रप्तज्ञानी है जैसे अपने में ब्रन को देखते हैं जैसे ही एक कुत्ते और एक चाण्डाल में भी परंतहा को देखते हैं। इस तरह अपने व्यंगपचन फे पापों से उनको धने लगे॥११,१२॥ तान्प्रत्यूचुः पुनस्नेय मात्विकं भावमाश्रिताः।। फो जानाति क एपोऽनपिनुमगरने दशः ॥१३॥ एतद्वयंतु जानीमस्ती फार्प नहिंगनम् ।। अत्र सामाजिक विवादे ते सात्विक मारमाश्रिता जनाः पुन स्तान तमस्स्वभारान्प्रति ऊचुः । महो! क एपरा, अयमयतः किंनुप्रकुरुत इति को जानाति ययं नबानीम इति । वसंतुएनना- नीमः यत् तायें हिमनं न कार्यम् ॥ १३ ॥ फिर साविक बुरिदाते तानसों से बोले कि यह कुत्ता का? और पा रहा है न जाने न तो किया जाना है कि ती में हिंसा नहीं करनी चाहिये ।। १३ ॥ .

शापिलायननतीमाहात्म्यम् । पुन: प्रमिमाश्रित्य नान प्रत्यारत्मराजसाः ॥ १६ विमानमस्य मोचाय गगनादागमिष्यति ॥ पुनः राजमाः प्रीदिममाश्रित्य गपंगातिरौद्ररूपमाश्रित तान् साविकानूनुः यदस्य शुनामोक्षाप गगनाद्विमानमा मिप्यति ।।१४।। फिर गजम प्रतिवाल बडे उत्तजित होकर सात्विकों से बोले फि आपलोग इस.। इतना पक्ष कर रह है मानो इसके मोक्ष के वास्ते अाकाश से विमान थायेगा ॥ १४ ॥ स्मित्वा ते प्रयदन्तिस्म पुनस्तान्मत्सरावृतान् ॥१५॥ विमानं भवतां पूर्वमागमिष्यति निश्चितम् ।। येपामाचारनपुरयमेतादृक् सं प्रवर्तते ॥१६॥ ते सात्विकाः पुन स्तान् मत्सरान्वितान् प्रौदिमुपागतान् जनान् स्मित्वा प्रवदन्तिस्म यत्पूर्वभवतामेव विमानं निश्चितम् प्राग मिप्यति । येषां भवतामाचारनैपुण्यमेतादृक् संप्रवर्तते ॥ १६ ॥ वे सात्विक लोग उन मत्सरियों से थोड़ा हंसते हुवे फिर बोले कि इस कुत्ते के वास्ते विमान क्यों आवेगा? यदि विमान आवेगा तो पहले आप लोगों के वास्ते ही, क्योंकि आप लोगों का प्राचार विचार इस प्रकार बढ़ा-चढ़ा है ।। १६ ।। 'एवं तत्र जना ब्रह्मन्प्रवदन्ते परस्परम् ।। स्वस्वभावानुरोधेन रजःसत्वतमोयुताः ॥ १७ ॥ हे ब्रह्मन् !एवं तत्र रजःसत्यना रोधेन परस्परं प्रबदन्तेस्म ॥१

हे प्रयन् अगस्यजी ! उस समाज के राजस तामस और मालिक
प्रकृति वाले मनुष्य अपनी २ प्रकृति के अनुकूल इस प्रकार परम्पर
वादविवाद कर रहे थे॥१७॥
तथा विपदमानेषु नानाजल्पपु वैनपु॥
श्यस्वामी सस्मितास्यासन् प्रदक्षिणमवर्तन ॥१८॥
तथा पूर्वोक्तियत् नानाजल्पेषु जन्पं निरर्थकं वचनम् नेषु
अनेक निरर्थकालापेषु विपदमानेषु परस्परं विवादयत्सु नृषु मनुष्येषु
व इति निरर्थकमन्ययमिति केवलं पादपूरणे बोध्यम् । स श्वस्वामी
भितुकः स्मितास्यः सन् परस्परं निप्प्रयोजनमेव विवदन्तं दलद्वयं
पश्यन् दलद्दयस्थमनुमान् हसन् इतिभावः प्रदक्षिणमयतेत
प्रदक्षिणासमाप्तिमकरोत् ॥१८॥
इस तरह दोनों पक्षवाले मनुष्यों में परस्पर निष्प्रयोजन विवाद
हो रहा था तबतक उस कुत्ते के स्वामी भिक्षुक ने प्रसन्नता पूर्वक
अपनी प्रदक्षिणा को समाप्त करलिया ॥ १८ ॥
सर्व सामाजिकाचक्रुस्तीर्थतत्र प्रदक्षिणम् ।।
श्यापि स्वस्वामिना साद चक्रे चार प्रदक्षिणम् ॥१६॥
तत्र तीर्थे सर्व सामाजिकाः समाजस्था मनुष्याः प्रदक्षिणं
चक्रुः श्यापि स्वस्वामिना भितुकेण सह चारु इति क्रिया विशपणं
प्रदक्षिणं चक्र ।। १६॥
सभी समाज के मनुष्यों ने उस तीर्थ की प्रदक्षिणा की और उस
कुत्ते ने भी अपने स्वामी के साथ प्रदक्षिणा करली ॥ १९ ॥
यत्स्थानात्सम्यगारभ्य प्रदक्षिणमकुर्वत ।
पुनस्तत्स्थानमासाथ सवें विश्रांतिमागताः ॥२०॥

६० श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम्। यत् यस्मात्स्थानात् सम्यगारभ्योत्थानं कृत्वा प्रदक्षिणम कुर्वत पुनस्तत्स्थानमासाद्य तत्रागत्यच सर्वे विश्रांतिमागताः विश्राममापुरिति ।। २० ॥ उन मनुप्यों ने जिस स्थान से प्रदक्षिण करना प्रारंभ किया फिर उसी स्थान पर आकर सबों ने विश्राम किया ॥२०॥ थाचम्य विधिवद्वारि क्षणमात्रं स्थिताः क्षितौ। श्वापि तत्र समागत्य किंचित्पीत्वा जलं शुचि ॥२१॥ समासाद्य सरस्तीरं निजेनेवेन्यमीलयत् ॥ विश्रांतिस्थाने समागताः सामाजिकाः वारिजले विधिवद्विधि- पूर्कमाचम्य क्षितौ क्षणमात्रं स्थिताः क्षणमात्रं तत्रैवावसन् तावत् श्वापि तत्र समागत्य शुचि पवित्रं जलं किञ्चित्पीत्वा पुनः सरस्तीरं समासाद्योपविश्य निजेनत्रे न्यमीलयत् ।। विश्राम स्थान पर आये हुए सभी मनुप्य जल में विधिवत् आचमन करके सरोवर के तट की भूमि पर कुछ काल तक ठहर गये तबतक वह कुचा भी वहां आकर उस सरोवर का पवित्र जल पीकर पुनः तीर पर आ बैठा और अपने नेत्रों को बन्द कर लिया । पश्यतां सर्वलोकानां विस्मयाविष्टचेतसाम् ॥ २२ ॥ अकस्मादेव विप्रेन्द्र ! सद्यः प्राणानवासृजत् ।। है विपन्द्र । विस्मगविष्टचेतसाम् सर्वलोकानां पश्यताम् अकस्मादेव सरवा सद्यः तत्कालं प्राणान् श्रयासृन त्यक्तवान् ।। . हे विप्रेन्द्र ! आश्चर्य के साथ सब लोगों के देखते २ उस कुत्ते । ने एकाएक अपने प्राणों को परित्याग कर दिया । --- ततः क्षणात् समायान्तं विमानं भास्वर दियः ॥२३॥ तत्रास्थाय स्थिरं दिव्यं तेजोस्पं नमाश्रितः॥ या पश्यत्सु सर्वेषु परंधामदिवौकसाम् ॥ २४॥ ततस्तदनन्तरं घणान्मुहूं व भात्वरं द्युतिमन्तं विमानं दिवः स्वर्गात् समायान्तं भागतयन्तं दृष्ट्वा तत्र विमाने स्थिरमान्याय रिथत्या दिव्यं मास्वरं तेजोरूपमाश्रितः तंजारूपंदधार ।। मर्वेषु जनेषु पश्यत्सु दिवौजसाम् देवानां परंधाम स्थानं देवलोक यया गतवान् ।। २४॥ इसके बाद क्षणभर में सुन्दर चमकता हुवा विमान पाकाश से भाया उसको देख उस पर सुन्दर तजोमय रूप धारण कर दृढ़ता से बैठ गया और सब लं.गों के देखते २ देवलोक को चना गया ॥२४॥ उन्मुखाः फेरिदामन्त्र केचिदाननदामुगाः ।। तप्ट्या महदायर्य तन तीर्धे द्विजोत्तम ॥ २५ ॥ दे द्विजोत्तम ! फेचिन् ये श्वपक्षयादिनः मान्धिगले नष्ट तीधैं तन्महदार्य रप्ट्या उन्मुसाः रिमानोन्मुताः सन्तः पिनानं परपन्नासन् । तथा येकेचित् स्वहिनिजामा लअया परामुसा अनिम्परपन मामन् ॥ २५ ॥ जो लोग समदी और पते पक्ष में मिलाद करनेवाले साविक मनुन देतो गुम होकर इस एक मदभुत पटना दिन में और जो सवरा तानस महानिकात गुरे दो समाज मे र निकल देने में लानापरहि। २५ ।

श्रीकपिलायतनतानादरम्यम् । तीर्थप्रदक्षिणान्मुकस्वारास्पाऽतिभास्वरः॥ अद्यापि दृश्यते श्यासी यलो धृवान्तिक ॥ २६ ॥ तीर्थप्रदक्षिणात्तीर्थप्रदविणण्यान्मुक्तोऽसौरचा सारमेयः तारारूपोऽतिमास्वरः अद्यापि ध्रुवलोके ध्रुवान्तिके ध्रुवसमीप घश्यते ॥ २६॥ तीर्थ प्रदक्षिणा के पुण्य से मुक्त होकर अर्थात् जन्म-मरण से रहित वह कुत्ता तारा रूप और अतिशय प्रकाशवान होकर ध्रुवलोक में ध्रुव तारे के समीप आजतक दीख पड़ता है ॥२६॥ एतत्तीर्थस्य माहात्म्यं कथितं ते द्विजोत्तम । सर्व पाप हरं नृणां किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।। २७ ।। हे द्विजोत्तम नृणां सर्वपापहरं तीर्थस्यैतन्माहात्म्य ते तुभ्यं मया कथितं भूयः पुनः श्रोतुमिच्छसि किम् ? ॥ २७ ॥ हे द्विजोत्तम ! मनुप्यों के सब पापों को हरण करनेवाला यह तीर्थ माहात्म्य मैं ने तुम से कहा है क्या फिर भी किसी कथा को सुनने की इच्छा करते हो? ॥२७॥ इति धीस्कन्दपुराण स्कन्दागस्त्यसम्वादे कपिलायतनमाहात्म्ये तीर्थवर्णनं नाम पंचामोऽध्यायः। ।

अथषष्टाध्यायविवृतिः।
(सूत उवाच)
एतच्छुत्वा पचस्तस्प प्रहष्टः कुंभसंभयः ।।
पुनः पप्रच्छ तं देवं तीर्थमाहात्म्यमुत्तम् ॥ १ ॥
कुंभसंभवोऽयगस्त्यः तस्य स्कन्दस्यैतद्वचः श्रुत्वा प्रहृष्टः
प्रदर्पमाप पुनरत्तमन्तीर्थमाहात्म्यं तं देवं स्वन्दं पप्रच्छ ॥ १॥
इस अध्याय में सूतजी शौनकादि ऋपियों से बोले कि अगम्त्य
मुनि स्कन्ददेव की यह वाणी (फिर तुम क्या सुनना चाहते हो)
गुनकर बड़े प्रसन्न हुए. और उत्तम तीर्थ माहात्म्य को फिर पूछा ॥ १ ॥
यय किंचित्संप्राप्तं येनफनतदुत्तमात् ।।
तीर्थात्तन्मे समाचत्य मनः प्रत्ययकारकम् ॥२॥
है देव ! एतदनमाचीदिय येनकेन प्राणिना यत्किंचित्म
प्राप्तं शुभमशुभम्स नन्मनःप्रत्ययकारक विधामयोग्पम्मे ममावर
हे फन्ददेव ! इस उत्तम तीर्थ के सेवन से यही पर दिन किमी
ने शुभ या अशुभ जो खुद प्राप्त किया है वह मन के विधाम योन
'मुझे पताइये ॥२॥
पृष्टः पुनईष्टः पादानन्दनीमुनिः ।।
पुरापलं पुराएपिपुर:स्धिनं ॥३॥

श्रीकापिलायतनतीमनाहात्म्यम् । तीर्थप्रदक्षिणान्मुसस्तारापोऽतिभास्वरः॥ थद्यापिहरयते श्वासी ध्रुवलोके धृवान्तिके ॥ २६ ॥ तीर्थप्रदक्षिणातीर्थप्रदक्षिणपुण्यान्मुक्तोऽसाश्या सारमेयः तारारूपोऽतिमास्वरः अद्यापि ध्रुवलोके ध्रुवान्तिके ध्रुवसमीपे दृश्यते ॥२६॥ तीर्थ प्रदक्षिणा के पुण्य से मुक्त होकर अर्थात् जन्म-मरण से रहित वह कुचा तारा रूप और प्रतिराग प्रकाशवान होकर धवलोक में ध्रुव तारे फे सगीप आजतक दीख पड़ता है ॥ २६ ॥ एतत्तीर्थस्य माहात्म्यं कधितं ते द्विजोत्तम ॥ सर्व पाप हरं नृणां किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ २७ ॥ हे द्विजोत्तम नृणां सर्वपापहरं तीर्थस्यैतन्माहात्म्यं ते तुभ्यं मया कथितं भूयः पुनः श्रोतुमिच्छसि किम् ? ।। २७ ।। हे द्विजोत्तम ! मनुष्यों के सब पापा को हरण करनेवाला यह तीर्थ माहात्म्य मैं ने तुम से कहा है क्या फिर भी किसी कथा को सुनने की इच्छा करते हो? ॥२७॥ इति धीस्कन्दपुराण स्कन्दागस्त्यसम्पादे कपिलायतनमाहात्म्ये तार्थिवर्णनं नाम पंचामोऽध्यायः।

-+386-
(सूत उवाच)
एतच्छुत्या पचस्तस्थ प्रहृष्टः कुंभसंभवः॥
पुनः पप्रच्छतं देवं तीर्थमाहात्म्यमुत्तम् ॥ १॥
कुंभसंभयोऽयगस्त्यः तस्य स्कन्दस्यैतद्वचः श्रुत्वा प्रहृष्टः
प्रहर्षमाए पुनरुत्तमन्तीर्धमाहात्म्यं तं देवं स्कन्दं पप्रच्छ ॥ १॥
इस अध्याय में सूतजी शौनकादि ऋषियों से बोले कि अगस्त्य
मुनि स्कन्ददेव की यह वाणी (फिर तुम क्या सुनना चाहते हो)
सुनकर बड़े प्रसन्न हुए. और उत्तम तीर्थ माहात्म्य को फिर पूछा ।। १ ॥
अत्रैव किंचित्संप्राप्तं येन तदुत्तमात् ।।
तीर्थात्तन्मे समाचक्ष्व मनः प्रत्ययकारकम् ॥२॥
हे देव! एनदुत्नमात्तीर्यादय येनकेन प्राणिना यकिंचित्सं
प्राप्तं शुभमशुभम्बा नन्मनःप्रत्ययकारकं विश्वासयोग्यम्मे समाचक्ष्य
हे सन्ददेव ! इस उत्तम तीर्थ के सेवन से यहीं पर जिस किसी
ने शुभ या अशुभ जो कुछ प्राप्त किया है वह मन के विश्वास योग्य
कथा मुझे बताइये ॥२॥
इति पृष्टः पुनहष्टः पार्यतीनन्दनोमुनिः॥
माह पुण्यं पुरावृत्तं पुराणपि पुरःस्थितं ॥३॥

ट? पारिजापतननीयमापन। इति एवं पूरः पानीनन्दनीमुनिन्दः in पुर' मंस्विनं पुगलि अगस्न्यानि पुगानं पूजा पुरा पचि गृलान्नं पुनः प्रा. उगान ॥३॥ गुलजी ने भोलायों से परिमारने सन्द भरागान में प्रा हियामा पानीनन्दन माग पनी ने पुर्गम्यत पुग गया और प्र.. इनिग को गुनासा ॥ ३ ॥ (आर) भाग पिनमामि गुमटांगगानगम ।। एकगिन्धिपगंलंदेशे गुर्गरगडा॥४॥ लिग कपात पापि कासाम मातु। यसमिन गगन in in ॥४॥ ET.. मौसमकामा ॥ पताmirm.! पाया ARENTATREET: Amit • TA: Mi: 11: METIMER: : 14:21. Herniti 6, } }, ": :: : : :R' - đt: 1:1 ।" .:. .

सय दशाशरारत्नमृत तहलकासमा तदेशे अर्थात् गुजरे देश नाना हर्यसमाकुलम् अनेक धनि भवनेन सुशोभिवम् "हमेतु धनिनां पामः इत्यमगमन्या सर्वदेशशिरारत्नभूतं तन्मीनियामारणादिति बलकारमंगलका- पुरी कुंबरनगरी तट सत्रं ग्रामं जयति सर्वोत्कय विराजने ॥६ उस गुर्जर देश में अनेकानेक उलम उलम गृहों से मुगामिन सर देशों का मुकुट अलकापुरी सारा एक ग्राम था ।। ६ ॥ पस्य हर्यस्थलेप्यद्धा नारायः मंचरनिष्टि। शारदाप्रमपिष्टानां क्षिपत्वाविद्युतां पुतिन् ॥ ७ ॥ यस्य पुरम्य इम्बन्धलेपु हम्मेप्रदेशपु सदा मादान् शार- दाभ्रप्रविष्टानां विद्युतां शारदीयमंघमंनिमोग्दतानां सौदामिनीनां पुति पि चिपन्यः सर्वतः प्रमारयन्त्यो गांराग्यम्मुन्दप्ये: सचरन्ति इततस्वोभ्रमन्तिस्म हीनि पादपुरकः । अस्यायंभाव: पया शुभवणेशारया इन उतःस्यकान्तिमुद्ग्न्यिाश्चलायाः परिग्रणं सम्पपते वायग्रामस्य शारदीयाप्रमनिम संतान- प्रदेशेषु विधादिकारासातीनां कामिनीनामपि गमनमासीत् ।।७ जिस माम के धनिक गहों में मुदर २ नियां सन्दकाल के मेय में दिए बिजली की तरह पनी मासमादी गन्दग्ना से बनाती दुई पिरती थी॥७॥ नरादेपसभा पर नाबादपीममानमाः ॥ गा लिहा यन सारामा नन्दनम्भाः॥।॥

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यत्र पुरे नरा मनुष्या देवप्रभा देवसन्निभा श्रामन् नार्य
खिया देवीसनिभाः पातिव्रतादि सद्गुणसंपन्ना देवी तुल्या आसन्
गृहा अभ्रं लिहन्तीति अभ्रंलिहा याकाशगामिन अासन् तत्पुरे
आरामाः नन्दनप्रभानन्दनोपमा श्रासन् ॥ ८॥
जिस ग्राम के मनुष्य अपने सत् सदाचार से देव तुल्य थे और
नारियां अपने पातिव्रतादि धर्मों से देवी सदृश थीं, गृह आकाश को
चूम रहे थे, वृक्ष याटिकाएं नन्दनबन के सदृश थीं ॥ ८ ॥
तस्मिन्पुरवर विप्र ! वैश्योऽभूद्धनदोपमः ।।
यज्वा दांतो दानशीलो वणिग्वृत्तिविशारदः ।।६।।
हे विप्र ! तस्मिन्पुरवरे वणिग्वृत्तिविशारदः वणिग्व्यापारदक्षो
दानशीलोदांतोयज्या अनवरतयज्ञकर्मप्रवृत्तोधनदस्य कुबेरस्य
उपमैवोपमा यस्य तथाविधः कश्चिद्वैश्योऽभूत् ॥ ६ ॥
हे विप्र ! उस ग्राम में एक वैश्य जो धन में कुबेर के सदृश था
नित्य यज्ञ कर्म करनेवाला दाता और दयाशील तथा वणिक् वृत्ति
को पूर्ण रीति से जाननेवाला था ॥ ९ ॥
वणिग्वृत्पातेन घनं गृहेषु बटु संचितम् ।।
धनस्य तस्य पष्ठांशं कृष्णार्धे सचकारह ॥१०॥
तेन वणिजा पणिग्वृत्या व्यापारमार्गेण गृहेषु बहुधनं
संचितम् एकत्रितम् । तस्य धनस्य पष्टांशं करवत् कृष्णार्थे स
चकारह कृष्णार्पणमकरोत् ॥१०॥
उस वैश्य ने व्यापार से यहुत धन संचय किया और उस धन
का पष्ठांश राज-कर की तरह कृष्णार्पण किया करता था ॥ १० ॥

दिपान पापपाया।
स्ववसोः स्वकीयधनस्य तेन अंशेन धनपष्ठांशेन वैश्यजः
पापीकूपसरांसि वापीकूपतडागादीन् दिव्यान् मनोहरान्देवा-
लयान् देवमन्दिराणिच कारयामास ॥ ११ ॥
उस श्रीकृष्णार्पित धन के पष्ठांश से वह वैश्य वापी कूप तडाग
और सुन्दर सुन्दर देवालयों को बनवाता था ॥ ११ ॥
नाना विधानि दानानि चके शास्त्रोकमार्गतः॥
तथान्नसत्रं विदधे क्षुधितेभ्योदिवानिशम् ॥ १२ ॥
शास्त्रोकमार्गतोनानाविधानि दानानि चक्रे तथा क्षुधितेभ्यो
दिवानिशम् अन्नस अन्नमयंयज्ञं विदधे ॥ १२ ॥
वह वैश्य शास्त्रोक्त विधान से अनेक प्रकार के दान करता था
और सुधितों के लिये दिनरात अन्न दान करता रहता था ॥ १२ ॥
एवं प्रवर्तमानस्य यणिजस्तस्प सत्तम ।
पुत्राः पंचाऽभवन्मव्याः पहुदाक्षिण्पसंयुताः॥१३॥
हे सत्तम! एवं प्रवर्तमानस्य मुकृतरतस्य तस्य वणिजः !
मच्याः मनोहराः अतिसुचतुराः पंच पुत्रा अभवन् ॥१३॥
इस तरह मुकर्म में तत्पर रहनेवाले उस वैश्य के उत्तम २
गुणों से संयुक्त मुन्दर २ पांच पुत्र हुर ।। १३ ॥
एतेषां ज्येष्ठ घासीयः मजन्मान्धस्त्वकर्मणा ॥
बुद्धिमान् सुविवेकय सर्वप्रतपु सुन्दरः ॥१४॥

- . एतेषां पुत्राणां मध्ये यः ज्येष्ठः पुत्रः स स्वकर्मणा स्वकीय पूर्वजन्माचरितकर्मणा जन्मान्धोऽपि सर्वेषु अंगेषु सुन्दरः कमनीयः मुविवेकः सुज्ञानी बुद्धिमांचासीत् ॥ १४ ॥ उन पांचों पुत्रों में जो ज्येष्ठ था वह अपने पूर्व जन्म के कर्मों के वश जन्मांध था परन्तु सब अंगो से सुन्दर और सद्विचार सदबुद्धि से युक्त था ॥ १४ ॥ पंचपुत्रेण वणिजा वसता तत्पुरोत्तमे ॥ अन्धोऽपिनिजपुत्रोऽसौ धनयोगेन भूरिणा ॥१५॥ विवाहितोपरां कन्यां स्व सम्बन्धिकुलोद्भवाम् ॥ स्वकीयेन पंचपुत्रेणसह तत्पुरोचमे बसता तेन वखिजा वैश्येन भृरिणा धनयोगेन भूरिद्रव्यदानेन स्व सम्बन्धिकुलोद्भवां वरां श्रेष्ठां कन्यां अन्धोप्यसौ निजपुत्रोविवाहितः ।। अपने पांचों पुत्रों के साथ उस उत्तम नगर में रहनेवाले उस वैश्य ने बहुत धन देकर अपने सम्बन्धी की एक सुन्दरी कन्या से अन्धे पुत्र का भी विवाह कर दिया। सा,सती तं स्वभर्तारं सिपेवे. शुद्धमानसा ॥ १६॥ वैचित्रवीर्यराजानं गांधारीव पतिव्रता॥ (स्पष्टम् ) वह पतिव्रता कन्या अपने अंन्धे पति की सेवा शुद्ध मन से करती थी जैसे राजा विचित्रवीर्य की पतियता गान्धारी ने सेवा की थी। तस्यां तस्यापि सत्पुत्रा वभूयुर्वहुदक्षिणाः ॥ १७ ॥ ईश्वरस्य प्रसादेन स्वेन पुण्येन कर्मणा। -- श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । (स्पष्टम् ) भगवान की कृपा और उसके पुण्य कर्म के बल से उस मोरे उस अन्धे से भी बहुन गुण्यान् पुत्र उत्पन्न हुए॥ एवं प्रयतमस्तस्य सत्पुत्रस्पच सपितुः॥१८॥ कालोमहारपतीयाय पहुभोगभुजोभुवि ।। एवं प्रयततः गाईस्थ्यधर्म वर्तयतोबहुभागभुजस्तस्य सत्पुत्रस्प सरिपतुश्च महाकालोव्यतीयाय ।। इम तरह गार्हस्थ्य धर्म का परिपालन करते हुए और अनेक उत्तम भोगों को भोगते हुए उन पिता पुत्रों को बहुन दिन बीत गये ।। महामौल्येन यस्तीतं नाना देशसमुद्भयम् ॥ १६ ॥ धनं घान्यं फलं यम्नं भुसाऽसावुरजोत्तमः ।। महामौल्येन महार्येण नाना देशसमुद्भवम् नाना देश जातं धनं धान्धं फलं यां यत्क्रीतम् तदसावुरुजोत्तमः भुक्त भुक्तवानिति अत्र वश्यार्थे उरुनः शब्दवैिदिकः ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीदित्यूयायांस्पष्टम् ।। महंगे भाव में उस वैश्य ने जो अनेक देशों से धन, धान्य, फल और वस्त्रादि खरीदे थे उसका वह स्वयं भोग करता था । कस्मिंश्चित्कालपर्याये मुद्गाः काच प्रभानवाः ॥२०॥ वणिजा केन ते विप्र तश्योपायनीकृताः ॥ है विप्र ! कस्मिथित्कालपर्याये कस्मित्समये काचप्रभाः काच सदृशप्रभावन्तो नत्रा मुद्राः केन वणिजा श्येन तश्योपा- यनीकृता अर्थात्तस्म वैश्यायोपहारे दन्ताः ।।

यितनताथमाहात्म्यम्। गफ समय की बात है कि किसी वश्य ने कार के सदृश चमकते हुये गये मूंग उस वश्य की भेंट किये ।। ये जानाः शरायत्यां पायनामां ध्रुवं भुवि ॥ २१ ॥ सोषितान्निकटीकृत्य स्वहस्तेनैव पस्पृशे ।। तेषां स्पर्शनमात्रेण प्राइस्मृतिः समजायत ।। २२।। ये मुग्दाः पायनायां पवित्रायां शर्करावत्यां पालुकामय्याम् घि ध्रुवं निथयेन जाताः उत्पन्नावभूयुः अन्धोपिसबैश्यस्तान् मुद्दा निकटीकृत्य स्वासननीत्वास्वहस्तेन र पस्यूरो स्पर्शचकार तेपां मुद्गानां स्पर्शमात्रेण तस्य प्राक् (पूर्व जन्म समुद्भवा ) स्मृति स्मरणं समजागत स्वकीय पूर्व जन्मनो ज्ञानमभृत् ॥ २२ ॥ जो मूंग उपहार में पाये थे वे पवित्र बालुकामयी भूमि से उत्पन्न थे। उस अन्धे ने मूंगों की प्रशंसा सुनने के कारण उन मंगों फो पाने समीप मंगाकर निज हाथों से स्पर्श किया और स्पर्श करते ही उसको पूर्व जन्म का ज्ञान होगया ॥ २२ ॥ श्रालिलिंगसतान मुग्दान जातायां स्वस्मृतौ मुहुः ॥ . महाप्रेमसमाविष्टोधुन्वन्मूर्धानमात्मनः ॥ २३ ॥ एवं स्वस्मृतौ जातायां सोन्धोषणिक् महाप्रेमसमाविष्टो मुहुरात्मनोमूर्द्धानं मस्तकं धुन्वन्कंपयन्वान्मुद्गानालिलिंग हृदा स्पर्शचकार ॥ २३ ॥ पूर्वजन्म की स्मृति हो जाने पर उस अन्धे वणिक ने अन्यन्त प्रेम से गद्गद् हो अपने मम्तक को बारम्बार कंपता हुवा उन मंगों को हृदय से लगा लिया ॥२६ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । एवं विचेष्टमानं तं दृष्ट्वासर्वसमीपगाः ॥ अहिलत्यंमन्यमाना वासन् सर्व सुविस्मिताः ॥ २४ ॥ एवं विचेष्टमानं विचेष्टयन्तं तमन्धं वणि दृप्या समीपगा स्स मनुप्याः तं हिलत्वं मन्यमानाः गुधिस्मिता आश्चर्ययुक्ता भासन् ॥ २४ ॥ ऐसे श्राचरण करते हुए उस अंधे वणिक को देख समीप के रहनेवाले सभी मनुष्य उसे विक्षिप्त समझ आश्चर्य में पड़ गये ॥२४॥ पप्रच्छुस्ते विशांश्रेष्टं किंत्यया प्रियतेस्विदम् ।। अपाकरं कृपणवत् कणानां स्पर्शनं हृदा ॥ २५ ॥ ते समीपमा बनाः विशांश्रेष्ट वणियर तंगन्धं पप्रच्छुः यन् कृपणनदरिद्रवदिदम् फणानां मुद्रानां हृदा स्पर्शनं प्रपाकर लजास्पदं कर्म त्वया किंक्रियते ॥ २५ ॥ उन मनुन्यों ने उस वणिग्वर से पूछा कि दरिद्रियों की भांति दन मुद्रकरणों को हृदय से लगाना तुम्हारे सदृश लदमीरात्रों के लिये राजा की पात है, यह क्या कर रहे हो ॥ २५ ॥ ऐवं तेषां पयः श्रुत्वा महस्य पणिजां पतिः ॥ तान्मत्यूचे पचः दणं मंशयं नाशनिय ।। २६ ॥ एवं तेषां ममीपयर्तिमनुप्पाणां पचः वचनं शुन्या पिज्ञा पतिस्मान्धः प्रदप घिदस्य संपां संशपं नाशयनिर शरणं स्निग्धं पस्तान्प्रत्यूगे उभयान् ।। २६ ॥ इस प्रकार अपने मागपाम पटेहए मनुष्यों के पन मुन बिमार उन पनिर ने उनके मन्दों को गानो बिरला दुपा मुमधुर वचन पोला ।। २६ ।।

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
श्रूयतां वचनं मेद्य ग्रहिलोनास्मिसत्तमाः॥
यदेशीया इमे मुग्दास्तदेशे जन्म मेऽभवत् ॥२७॥
हे सत्तमाः रात्पुरुपाः ! अद्य मे वचनं युप्माभिः श्रूयताम्
ग्राहिलोनामिा इमे मुग्दा यद्वेशीयास्तदेशे मे मम जन्माऽभवत् ॥२७॥
हे सत्तम सज्जन ! मेरी बात आप लोग सुने, मैं पागल नहीं हूं.
जिस देश के ये मूंग हैं उसी देश में मेरा जन्म हुवा था ॥२७॥
स्वादज्ञोस्म्यहमेतेपां भ्रामं भ्रामन्यतोऽशिताः ॥
क्षेत्रेपु परकीयेपु सस्यसम्पत्तिशालिषु ॥ २८ ॥
एते मुग्दाः सस्य सम्पत्तिशालिपु सस्यस्य सम्पत्त्य
शालन्ते इति सस्यसम्पत्तिशालीनि क्षेत्राणि तेषु बहु सर
समृद्धिशालिपु परकीयेषु क्षेत्रेषु यतो भ्रामन् भ्रामन् मया अक्षित
भक्षिताः अतोहमेतेषां मुग्दातां स्वादज्ञोस्मि ॥२८॥
धान्य की सम्पत्ति से शोभित गृहस्थों के खेतों में घूमधूम कर मैं
इन मूगों को खाया था इसलिये मैं इनके स्वादों को जानता हूं ॥ २८
यैरहं पुष्टिमगर्म तेन मेऽतिप्रियाइमे ॥
पुनर्भवत्प्रत्ययार्थं वच्मि यत्तन्निशम्यताम् ॥ २६ ॥
येन हेतुना यमुग्दैरई पुष्टिमगमम् तेन कारणेन त इम
मग अतिप्रियाः सन्ति भवत्प्रत्ययार्थ विश्वासार्थं यत् पुनधि
कथयामि तन्निशम्यताम् ॥ २६ ॥
जिस हेतु इन मूंगों से मैं पाला-पोशा गया था इम लिये ये मं
मुझे अत्यन्त प्रिय हैं फिर भी आप लोगों के विश्वास लियजी
रहता हूँ सो सुनिये ॥ २२ ॥

:
..
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
सागरोयालुकापूर्णेमहानस्ति गटोतले ॥
उत्तकस्थाश्रमः पूर्य यग्रासीद्वै महामुनेः ॥३०॥
सबैश्यः स्वनिकटस्थितान्मनुष्यान्यदकथयत् । तदेवस्कन्दोड-
गस्त्यं कथयति । नहीतले पृथ्वीतले यालुकापूर्णीमहान् सागरोस्ति
यत्र पूर्व उत्तकस्य महामुनेराश्रमवासीत् ॥ ३० ॥
इस पृथ्वी तल में बालू मे भरा हुया एक बहुत बड़ा सागर था
जहाँ पर महामुनि उत्तंक का अाश्रम था ।। ३० ॥
तद्देशस्ति महातीर्थ वारुण्यां दिशि सत्तमाः॥
कपिलायतनं नाम महापातकनाशनम् ॥ ३१ ॥
तरो तत्प्रदेशे अत्रदेशशब्दस्तत्स्थानवाचकः । अर्थात्
तत्स्थाने महर्षेरुतंकस्याश्रमाद्वारएयां परपस्यदिशावारुणी तस्यां
दिशि हे मत्तमाः सअनाः महापातक नाशनं कपिलायतनं नाम
महातीर्थमासीत् ।। ३१॥
हे सज्जन ! उस प्रदेश में उत्तय मुनि फेयाश्रम से पश्चिम दिश में
महापापों के नारा करनेवाला पषिलायतन नाम का एक महातीर्थ है ॥३१
तदेशे यादयः सन्ति कृपएमारा मृगोत्तमाः ।।
मृगोहमासं सस्ती कृष्णमारोमदोद्धनः ॥३२॥
तदेशे मृगोतमाः मृगेप्तमाः पयः रुप्पसाराः कृप्टमार-
नामकमृगाः सन्ति तन्तीधे कपिलायनुनामके अहमपि मदोदनः
कृष्णसारोगगः मासम् ।। ३२॥
उस स्थान के भूगों में उत्तम कारसार गान होते है उम
साथ में में भी उन्हीमों में मोमर कहरमार मगर ॥ ३२॥

तननाथमाहाल्यम्। तृणानि परतोनये मृगीगिः माहितस्यगे ।। जन्तुदंशोङ्गयाः वर्जूः शिरः श्रुत्योरजायत ॥३३॥ शरण्ये यने मृगीभिः सहितस्य तृणानि चरतोमे शिरः थुत्योः मस्तके कर्णयोष जन्तुदंशोनवा-जन्तुदंशनजाता सरजायत ।। ३३ ।। वन में गृगियों के साथ तृणों को चरता था तब मेरे शिर और फानों में किसी जन्तु के काटने से साज उत्पन्न होगई ॥ ३३ ॥ ततः फएडनिवृत्त्यर्थ त्रिवने वृक्षकोटरे । पारं वारं शिरोघर्ष चमेतत्पशुद्धितः॥३४॥ ततस्तदनन्तरं कण्डुनिकृत्यर्थ प्रियके वृक्षकोटरे वृक्षशाखे पशुबुद्धितः श्रज्ञानात् वारं वारं शिरोधपं शिरस्संघर्पणं चक्रे ॥३४॥ तिसके बाद वृक्ष की त्रियांक कोटर में अज्ञानवर खाज मिटाने के हेतु बारबार मस्तक को रगड़ा ॥ ३४ ॥ ततः शिरोमे संसर वक्रेतवृक्षकोटरे॥ प्रत्यर्थ चक्तिोद्विग्नोवलानिस्सारयन् शिरः ॥ ३५ ॥ श्वासोच्छ्वासकृतायासः सहसा पतितोभुवि ॥ .. ततरशरीमत्यक्षं विलुठन् सन्नितस्ततः ॥३६॥ तस्तदनन्तरं वक्रे तवृक्षकोटरे तवृक्षीयवक्रशाखायां में शिरः संसक्तं संलगंजातं । तच्छिरो बलान्निस्सारयन्नत्यर्थमतिशयेन चकित पाकस्मिकघटनांप्राप्त उद्विग्नश्च एवं श्वासोच्छा उद्वेगवशात् श्वासोच्छासश्वसंजातस्तस्मादायासः संजाल भुविपतितः शिरोमे पक्रकोटरे पास शरीरमत्यक्षम् शरीरत्यागमकरवम ॥ 30 [मम RC) श्रीरपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । तिसके बाद मेरा शिर उस वृक्ष फे यांक-टे फोटर में फंसगया इस श्राकस्मिक घटना से एकाएक चकित और व्याकुल होकर जोरजोर से अपने मस्तक को बाहर खींचने लगा। ऐमा करने से मेरा दम घुटने लगा और में धक फर जमीन पर लटक गया और इधर उधर मेरा शरीर लुढ़कने लगा इसी दशा में मेरा शरीर पात होगया ( प्राण शरीर को त्याग कर गये) ॥ ३५. ३६॥ तत्सर्व स्वमवत्प्रेचये पूर्वजन्मविचेष्टितम् ।। तद्देशोत्पन्नमुग्दानां स्पर्शनादेय सत्तमाः ॥ ३७॥ हे सत्तमाः ! तत्सर्व पूर्वजन्मविचष्टितम् पूर्वजन्मकृतं स्वमव- दिदानीम् तद्देशोत्पन्नमुग्दानां स्पर्शनादेव प्रेक्ष्ये प्रपश्यामि ।।३७।। हे सरतम ! यह सब पूर्वजन्म की यात उस देश के मूंगों को स्पर्श करने से मैं स्वप्न के ऐसा देख रहा हूं ॥ ३७॥ तस्मादतान् प्रियतमान् श्लेप्यामिच पुनः पुनः॥ एतत्सर्व मयाप्रोसं भवच्छंकापनुत्तये ॥ ३८॥ तस्मात्कारणात् एतान् प्रियतमान् मुग्दान् पुनः पुनार वारं श्लेष्यामि एतत्सव मया भवच्छंकापनुत्तवे भवच्छंका निवारणाय प्रोक्तम् ॥ ३८॥ इसीलिये इन प्रियतम मूंगों को बारबार हृदय से लगा रहा है ये सब बाते श्राप लोगों की शंका छुड़ाने के हेतु मैने कही है ॥ ३८ ॥ पुनर्वदामि यज्जातं सावधानर्निशम्यताम् ।। मृतं शरीरं मेतत्र श्वशृगालैः प्रभक्षितम् ॥ ३६॥ पुनः शरीरपावानन्तरं यज्जावं तत् सावधानः निशम्यताम् भुयताम् । तत्र तीर्थे मे मम मृतं शरीरं वगातः प्रभाक्षितम् ॥३६

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
मेरा शगर पात होने के पाय जो हुवा से कहता हूं सावधान
होकर सुनिये ! उस तीर्थ में कुत्ते और शृगालों ने मेरे मृतशरीर को
भक्षण किया ॥ ३९ ॥
जल प्रवाहेबहुलैः प्रावृट्काले घनाकुले ।।
प्रक्षिसानितदस्थीनि कापिलीये सरोवरे ॥४०॥
घनाकुले सर्वतोमेघाविष्टे प्राट्काले चर्पी बहुलैर्जल प्रया
है स्तदस्थीनि मम मृतदेहस्य कापिलाये सरोवरे प्रक्षिप्तानि ॥ ४०॥
सर्वतो मेघाच्छन्न वर्षाकाल में जब अति वेग से जल का प्रवाह
चला तो मेरे शरीर की हड्डियां बहकर कपिल सरोवर में पड़ गई ।। १० ॥
तत्तीर्थयरमाहात्म्याजाताहं वणिजांकुले ।
धनीनां पुण्यकतणां महाभोगभुजांभुवि ॥४१॥
तत्तीर्थवरमाहात्म्यादहंभुवि महाभोगभुजां पुण्यकर्तृणा
धनीनां वणिजां कुले जात उत्पन्नः ॥४१॥
उस उत्तम तीर्थ के माहात्म्य से इस पृथ्वी में महाभोगशाली
पुण्यकर्मा और धनी वैश्य के कुल में मेरा जन्म हुवा ॥ ४१ ॥
एतत्सर्व समाख्यातं भवतां प्रीतयेऽनघाः॥
मदुक्तंचेन्नमन्यध्वं गत्वा पश्यथ सत्वरम्।। ४२॥
हे अनघाः पुण्यजनाः एतत्सर्वं भवतां प्रीतये मया समा-
ख्यातं चेन्मदुक्तं न मन्यध्वं तदा सत्वरं गत्वा पश्यथ ॥ ४२ ॥
ऐ पुण्यशाली निकटवर्चियो ! यह कथा आपलोगों की प्रसन्नता
और प्रतीति के लिये मैं ने कही है यदि मेरे कहने पर विश्वास
नहीं है तो इसी समय जाकर देख लीजिये कि मेरा शिर अबतक उस
वृत्तकोटर में पड़ा है ॥४२॥

२७
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
तनः सर्य विस्मितास्ते तत्पित्रे संन्यवेदयन् ॥
पिता सर्वान् संदिदेश सत्वरं गम्यतामिति ॥४३॥
ततस्तदनन्तरम्यिमिता याथर्य वास्ते सर्व तत्सनीपतिनो
जनाः तत्पित्रे संन्यवेदयन् पिताच सत्वरं शीघ्र गम्यतामिति सर्वा-
न्संदिदेश भाज्ञप्तवान् ।। ४३ ।।
इसके बाद उस अन्धे याणिक के निकटवर्ती सभी मनुप्यों ने
श्राश्चर्य माना और इन सब बातों को उसके पिता से कहा, पिता ने
उसी समय सब को उस तीर्थ में जाने की याज्ञा दी ॥ १३ ॥
पियानस्तानाभिप्रेस पुनरन्धोऽनचीदिदम् ।।
निष्कास्य मच्छिरः सनिस्तन्मादृक्षस्य कोटरात् ॥४४॥
प्रदेयं शलिले शुद्ध तत्ती/ये महाद्भुते ।।
ततोयङ्गापितापमागता वृदयध प्रतम् ॥ ४५ ॥
तान् पित्रावतान् मनुप्यान् पियासनभिप्रेत्यादिमेऽवश्य
गमिप्यन्तीति बुद्धान्धःपुनरप्रवीदयोचत् यत्तस्यवृक्षस्य कोटरा-
न्मदिरोनि काश्य सद्भिसाधुभिर्भवद्धिमहाद्भुने तनीधीये शुद्ध
शलिले जले प्रक्षिप्य ततोपदापि तदवागता यूयं द्रुतम् शीघ्र
द्रपथ ॥ ४४, ४५॥
पिता से भाज्ञा पाकर उस तीर्थ पर जाने के लिये उद्यत उन
मनुष्यों को जान, उम अन्धे ने फिर कहा कि मेग शिर डो प्रश्नका उम
वृक्ष के फोटर में फंसा हुवा उम निकाल कर उस महान् पावकरी
तीर्थ फे शुरु उल में डाल देना तप जो होगा गो गाने पर
भार लोग गम ही देना । १४.४५ ॥
सनले नदनुज्ञाता हटा देशमागमन् ।।
कलीपरमानाप हरमनोगन ॥४॥

माहात्म्यम्।
ततस्तदनन्तरं तदनुज्ञातास्तपित्रानुशावास्ते दृष्टाः प्रनाम-
मानसास्तं देशं प्रागमन् तत्तीर्थवरमासाद्य प्राप्त्वा वृक्षं वृक्षं
थलोक्यन् ।। ४६ ॥
तदनन्तर उसके पिता की आज्ञा पा प्रसन्न होकर वे मनुष्य
उस देश में गये और उस तीर्थ के प्रत्येक वृक्ष में उस का शिर
ढूंढने लगे ।। ४६॥
कस्गिश्चिदृचकहरे मार्गयकिस्त्वरान्वितैः॥
पृष्टं मार्ग शिरः शुष्कं सशृङ्गं हष्टमानसाः ॥ ४७ ॥
गृहीत्यातच्छिरशीजं तस्य वैश्यस्य वाक्यतः ॥
प्राक्षिपन्तीर्यशलिले किंभवेदिति विस्मिताः॥४८॥
त्वन्वितैर्दु द्रुतं मार्गयद्भिरन्धेपयनिस्तमनुजैः कस्मिँधि
वृक्षकुहरे वृक्षकाटेर सशृङ्गं शुष्क मार्ग शिरोमृगमस्तकं दृष्टम् ।
हृष्टमानसास्ते तस्य वैश्यस्य वाक्यतस्तद्ववचनप्रमाणारीग्रं
सच्छिरोगृहीत्वा तीर्थशलिले प्राक्षिपत् ततः किंगवेदित्यवलोक-
नार्थबिस्मिता बभूवुः ।। ४७, ४८ ॥
अति शीघ्रता से मृग मस्तक को ढूंढते हुए उन मनुष्यों ने किसी वृक्ष
के कोटर (पोल) में सूखा हुया मृग का शिर शृङ्ग सहित देखा और हर्पित
हो उसे निकाल उस तीर्थ के जल में छोड़ दिया। इसके बाद क्या
होता है यह देखने के लिये, विस्मित होगये ॥ ४७, ४८ ॥
शिरसिक्षिप्तमात्रेतु तत्तीर्थीयमहाजले ।।
अंधः पयोजपन्नाक्षः सद्योजानो गृहे स्वतः॥४॥

११
श्रीवपिनायतननाधमादाम्यम् ।
गनापीय महाजल प्रतिमा मिमिवंधांगी पतः
मायनेय पयोजः कमलं तम्ब पत्रं नापिनी यम्पम कमलपहना
नरः सदगपालना ॥१॥
उमाका गोरम जाग उगका मानर पर यहां
अपने घर पर उग अन्धक. दोनों नर अपमापी गायक
पत्री पोसादच्यांगा ॥ ॥
:
सन मन्पश्यनां नृणां गंमापं समाया ।।
घरवानिपव्य माता दर न्यायादियं यामी ४० ।।
राम नपरगनां नृणां मनुष्याणां गांचं गमगाया । मया
धभमाया गर्ने दिलायम मिनिमारः सत्यापनाम
पदनात नार्थ नियती वान पुला तर दस
दिवगं यया ॥ ५० ॥
म मागपाश्चमी देय मीच
कर रस शान्य पाविता ती समय याग
दाग वाला गया । पदमनार का
गया ॥५॥

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अथसप्तमाध्यायकथारम्भः। (मृन उवाच . पवमुक्त्या पुनः माह स्कन्दमागदा।। शृणु ती यमाहात्म्यं मने किंचिन्नयादिनम् ॥ ॥ (स्पष्टा ) मूतजी शानकादि प्रापियों में बाल किस प्रकार नार्थ का माहात्म्य कहकर फन्दी अगत्य से बॉल कि हे मनि : में पुन: उस तीर्थ का माहात्म्य कुछ कहता हूं. मुना ॥ १ ॥ पुरा कदाचिदेतस्मिती स्नानं करिष्यताम् ।। कार्तिकमान्नधरपु पर्पचपयरगुवं ।। २ ॥ समाजोऽभून्मनुप्पाणां नाना देशनियाजिनाम् ।। तस्मिन्समाजे पाट्यस्ममापाता दिदृदयः ॥ ३॥ फोटुम्पिका भिक्षया सापामाघदोजनाः ॥ (स्पष्टाधं साईटयमिदं पपम्) पूर्व समय की कमाई पि. द. ३६५ दिनों में उरम का माम मन्तिम पांच दिन निको भाग पंचाप है। उन दिनों में इस संधि में मान परमेषत गुपयों का एक समज (मेन) पादुका सिपो देखने के लिय परम्परा, मिस्ट, समर दुई सभी मसरा ए २.३ मागमा नरकोलाहलाको तस्मिन्काले तपोधन ॥ ४॥ दास्तानमन्लीहनराः कौतुकमाश्रिताः॥ (स्पष्टार्थम् ) नधन ! इस प्रकार कई देशों से आयतुप अनेक मनुष्य मोनाल गे परिपुरित गा रागान में केवल समाजदर्शक जितने र गभर उधर घूम रहे थे। नाना परायाः पदार्धातत्समाजे समुपागताः ॥ ५॥ पन्त्राणि पृपभा उष्ट्राः कयविक्रयकारणात् ॥ तार: कंचिदायता विमेतारश्च केचन ॥ ६॥ (स्पष्टार्थम्) उस मेले में कई प्रकार के पदार्थ, कपड़े, बैल, ऊंट वेंचने के निमित्त लाये गये थे और कई खरीदने और वेंचनेवाले भी आए थे एवं सम्मिलिते लोके कोलाहलसमाकुले । दर्शन्तीह पण्यानि विक्रेतारो नरान् नरान् ।।७।। (स्पष्टम् ) इस प्रकार कोलाहलपूर्ण जन समाज में बेंचनेवाले अपने २ न्यपदार्थ प्रत्येक ग्राहक को दिखाते और पसन्द कराते थे ॥ ७॥ चैकः "करभः कश्चिन्तिः पर्वतोपमः ॥ गर्जारवंकुर्वन् सर्वप्राणि भयंकरः ॥ ८॥ (स्पष्टम् ) उस मेले में एक ऊंट विकने के लिये पाया था जो महादुर्दान्त और माणियों के देखने में महाभयंकर एवं बड़े जोर से गर्जता हुवा था । .

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शोकपिलायतनतधिमाहात्म्यम् ।
तत्रैकदा स करमः तृभिः परिवारितः ॥
फ्रेतारः सम्यगपुस्ते सारतानुष्ट्रनायकान् ॥ ६ ॥
(स्पष्टार्थम्)
उस मेले में जब एक बार उस ऊंट के चारों तरफ उसको
खरीदनेवाले प्राहक जमा हुए तो उन्होंने उसके मालिक से कहा ॥२॥
ययमेनं पहियामो यदि यूयं प्रदास्यथ ॥
परन्तु सकृदस्मभ्यं परिनाम्य प्रर्दश्यताम् ॥१०॥
(स्पष्टम्)
यदि तुम लोग इस ऊंट को उचो तो हम लोग लेने को तैयार हैं
परन्तु एक बार इस पर चदकर और थोड़ा चलाकर हम लोगों को
दिखादो ॥१०॥
एवं तद्वचनं श्रुत्या तत्र सामाजिको जनः ।।
न को प्येनं समारोहूँ मनश्च भयान्वितः ॥ ११ ॥
(स्पष्टार्थः)
इस प्रकार ग्राहकों की बात सुनकर उस समाज के किसी मनुष्य
ने भी भय के वश उस ऊंट पर चढ़ना स्वीकार नहीं किया ॥११॥
कस्य चिहाटु जातस्य तत्रासीगोलकस्थितः ।।
स पारोदुमनश्चमे तमुष्टं मदगर्वितः ॥ १२ ॥
(स्पटम् )
उस समाज में एक किसी राजपूत का गोलापुत्र था उसने
जाति के अभिमान से गदगर्षित हो उस ऊंट पर चदना स्वीकार
करलिया ॥१२॥

श्राकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम्। श्रागत्य स्वयमूचे तान् समाहय क्रमेलकं ॥ . अहमेनं समारोच्ये यदि यूयं वदस्यथ ।। १३ ।। ( स्पष्टार्थम्) वह गोलक समाज से निकल उन ग्राहकों के सम्मुख पा र कहने लगा कि यदि आपलोग कहें तो मैं इस ऊंट पर चढूंगा ।। १३ ततः सर्वग्नुज्ञातः समारोह यथेच्छया । कुर्चस्मत्करणीयं त्वं प्रवीणोस्युष्ट्ररोहणे ॥ १४ ॥ (स्पष्टार्थः) तब सब लोगों ने कहा कि खुशी से चढ़ो, तुम ऊंट पर सवारी करने में सुचतुर हो, चढ़ना तो हम लोग खरीददारों का कर्तव्य है, परन्तु यह हमारा काम तुम्ही करदो ॥१४॥ सावधानतया स्थेयमुष्ट्रोस्ति मदगर्वितः । निर्दीपास्मोपयं तत्र स्वेच्छयारोदुमिच्छसि ॥ १५॥ (स्पष्टार्थोयम्) संभाल कर इस ऊंट पर बैठना यह ऊंट मदर्षित है हम लोगों को दोप न देना तुम अपनी इच्छा से चढ़ना चाहते हो॥ १५ ॥ भवद्भिव चिन्त्यं तन्मद्गृहे ताहशोप्ट्रकाः॥ मया दृष्टाः समारूढाः कोयं स्यादुष्ट्रशायकः ॥ १६॥ ( स्पष्टम् ) तुम लोग इसकी कुछ भी चिन्ता न करो मेरे घर ऐसे ऐसे ऊं हैं जिनको मैंने देखा है और सबारी भी की है यह ॐ का + बच्चा क्या चीज है ॥ १५॥ wn श्रीपिलायतननाथमाहात्म्यम् । एवं सस्मयमागत्य समारोहुँ तमुष्ट्रकम् ।। सँस्थाप्याकर्पयन् पृष्ठ पाससाद स सत्वरः ॥१०॥ (म्पटायों) ऐसा कह और थोड़ा हंसता हुआ यह गोलक उम ऊंट के पाम आया और चढ़ने के लिये ऊंट को खीच कर कठाया तथा अति शीघ्रता से उसकी पीठ पर बैठ गया ॥ १७ ॥ विभ्रमोप्पीपचंधं युवाजानिमदोद्वतः॥ सकौतुः सर्वजनदृष्ट भागदपयमः ॥ १८ ॥ सो युग जातिमदोद्धतः यत्रोप्वीप विभ्रन् समानुक स्सर्वजने रामद एव दृष्टः ।। १८ ।। जाति के मद से उद्धन यद युवा टंदी पगड़ी की धारा किये एये जब ऊंट पर बैठ गया तब सब लोग पातुक के साथ देखने लगे ॥१८ अनुत्थापित एवोप्तो पादने व्यवलाफिनः। स्पालपत्यमुप्दम्य तहदेवोष्ट्रिणः पुनः।। १६ ।। सर्प मामाजिका लाा विस्मयं प्रनिदिरे ॥ मनुत्थापितएकोप्पोपापने परलोषितः उप्टम्पलपुर विकारिर तदयोपिगोपि क्षिप्रारोहएदनां रदका म सामाजिक लोकममारमा जनामिपमा प्रतिदिन प्रा। ची उरोटया में नही गया कि दर र RE.महामरिकन २- सरररे समस्त दर नम:। - निसायनननाथमादायम प्रागन्य स्वयमृगतान ममाहय कमेर निन समारोग यदि यूपं यदस्यथ ( स्पष्टार्थम्) पद गोला समान से निकल उन ग्राहकों के पहलमा कि यदि पारसोग करें तो मैं इस ऊंट पर ततः सर्वानुमानः समारोद यथेच्छया ॥ फुर्यस्मत्करणीयं त्वं प्रयीणास्युष्ट्ररोहणे ॥ (सप्टार्यः तब सब लोगों ने कहा कि सुशी से चढ़ो, तुम : फरने में गुरतुर हो, चढ़ना तो हम लोग खरीददारों क परन्तु यह हमारा काम तुम्ही करदो ॥१४॥ सावधानतया स्धेयमुष्ट्रोस्ति मदगर्वितः । निदीपास्मोवयं नन ने . .

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श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । १०७
केचन उष्टुं प्रशशंसुः केचन उष्ट्रिण मुष्ट्वाई शशंसुः
अहो! इति याश्चर्ये । एपमहान् उप्ट्री उष्ट्रचालकः । मयं सम्यक्
उष्ट्रं चालयवे मयं करः करमः स्वाधीनं किंकरं युवान
पातयिष्यति ।। २३, २४ ॥
कोई ऊंट की प्रशंसा करते थे कोई ऊंट के सवार की प्रशंसा
फरते थे और कहते थे कि अहा ! यह महाचतुर उष्ट्रारोही है
अच्छी तरह ऊंट को चला रहा है । दीख पड़ता है कि यह कर करभ
उस बेचारे को कहीं अवश्य पटकदेगा ॥ २३, २४ ॥
शृण्वन्नेवं स्वकर्णाभ्यामुष्पारोहणपाटवं ।।
पुनः संचादयामास तमुष्ट्रोपयन् मदात् ।। २५॥
एवं स्त्रकाम्यामुष्ट्रारोहणपाट पाण्डित्यं जनैः कथ्यमानं
भएपन् स युवा मदात् रोपयन् क्रुद्धयन्तमुष्ट्रम्पुनः संचोदमास
प्रेरितवान् ।। २५॥
उस युवा ने इस तरह से अपनी प्रशंसा मुनते हुवे गर्व से उस
ऊंट को उत्तेजित कर अति शीघ्र चलने को प्रेरित किया ॥ २५ ॥
उपट्रोपि रोपमापन्नोविकृतां गतिमास्थितः ॥
चतुर्भिश्चरणस्वरुत्पफाल पुनः पुनः ।। २६ ॥
उप्ट्रोपि उप्दिणः कपापातन पाणिपातेन च रोपमापनो
विकृतां कुटिलांगतिं गमनमास्थितः चतुर्भिश्वरणः पुनः पुनार
पारसुचरुत्पफाल ॥२६॥
ऊंट भी डालियों के आघात और पैरों की टोकर से क्रुद्ध होकर
अपने चारों पैर उटा २ फर जोर से कृदने लगा ॥ २६ ॥

युवक
के
हाथ
१०८
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
स उष्ट्र वलसंक्षिप्त स्वपृष्ठासासंस्थितिः॥
च्युतरस्मिप्रतोदोऽभूत् भयश्वेतीकृताननः ॥ २७ ॥
उष्ट्रवलसँक्षिप्तस्वपृष्ठासनसस्थितिः उप्ट्रयलेन संक्षिप्ता
उत्क्षिप्ता स्वपृष्ठामनस्य सँस्थितिः सँस्थानं यस्य स उष्ट्रबलसंक्षि-
सस्वपृष्ठासनसँस्थितिः करभवलोक्षिप्तस्वपृष्ठास्तरणः स युवा
भयश्वेताकृताननः भयेन श्वेतीकृतमाननं यस्य स च्युनरस्मि
प्रतोदः रस्मिश्च प्रतोदश्चतीच्युतौ यस्य स तथाभूतोऽभूत् ।। २७ ।।
ऊंट के वेग से पीठ का आसन ढीला होगया,
से मोहरी गिरगई और उसका मुंह भय के मारे सफेद होगया ॥२७
उष्ट्रोपिदुष्टोरुष्टस्सन् एनं द्विवक्रमान्तरे ।।
सुदुष्टं पातयामास पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥२८॥
दुष्टउष्ट्रोपिरुष्टः कुद्धस्मन् पूर्ववैरं जन्मान्तरीयरमनुस्मरन्
सुदुष्टं तं युवानं द्विवक्रमान्तरेद्विवपादविक्षप पातयामास ॥२८॥
उस दुष्ट ऊंट ने क्रोधित होकर पहले के पैर को याद करते हुये
दो तीन ही उच्छाल में उस दुष्ट युवा को गिरा दिया ॥ २० ॥
एवं तस्मिन्निपतिते कौतुकाकुलचेतसः॥
परपीड़ानभिज्ञानाः सर्व संजहसुर्मुदा ॥ २६ ॥
एवं तस्मिन् युनि निपतितसति परपीड़ानभिज्ञाना परस्य
स्वेतरस्य पीडा तस्थाअनभिज्ञानं येषां ते अननुभूतपरव्यथाः कौतु.
केन प्राकुलानि चेतांसि येपान्ते तथोनाः सः मुदाहेर्पण संजहगुः ।।
इस तरह ऊंट की पीठ से उस युवा फे गिरजानेपर दूसरों के
दर्द को न जाननेवाले हास्यरस के प्रेमी फेयज्ञ तमाग
-
सब बड़े मांद से हंसने लगे ॥ २१ ॥

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम्।
तं तदा विकली भृतं शकलीकृनकीकम ।।
उद्धृत्य वेष्टयामासुस्तदीया येव केचन ।। ३०॥
तदा तस्मिन्काले विकलीभृतं व्याकुलीभून गर्म व्वये नि
तथा शकलीकृत कीकसंखएगांजानादिर नंगाने नदीगाना
यंच केचन थासँस्ते उदृत्योन्थाप्य पंटयामामुः योगविशेषः ।।
जय वह युवा गिरकर ममं वंदना से अचन होगया तथा उसके
शिर के टुकड़े टुकड़े होगये तब उसके प्रात्मीय जो लोग यहां में
उन्होंने उसको उठाकर कपड़े में लपेट लिया ॥ ३० ॥
पाच्यमानापिनपते मातुमहतींगतः ॥
सक्षप्राप्य गुमाणानुत्मसर्जायुपाक्षये ।। ३१ ।।
महतीमकथनीयामागतः म युगावाच्यमानापि किंचि.
रस्वघ्या कथयत्युकोपि नाते नावदत् क्षण प्राप्य पणमात्रस्थित्या
मायुपःक्षये पायुपोहासे सुप्रायानुत्ससर्ज तत्याज ।। ३१ ॥
महामी को प्राप्त वह गुया बुलाने से भी नहीं बोलता था,
क्षणभर जाकर मागु के नष्ट होजाने पर अपने प्राणों को स्यागदिया ॥३॥
पारा पगभदास्तान म्हनं सं नेतुमागताः॥
पप्या स्वनागपास्तु मयः पमनी ययुः ॥३२॥
एरा निर्दयायगभटायगदता स्नातं मृत मृतदरीरंतु
मागताः पुनः स्तनागपारिमाविशेषगजुरमन मुटरमागर
पामा मपातकालं मरननी समान पर ॥३२॥
दुनिया का परको कप
सभर मम॥२२॥

११० श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । गत्वा निवेदयामासुस्ततदारविनन्दनम् ।। वैवस्वतस्तुतन्द्रप्ट्या चित्रगुप्तमचोदयत् ॥ ३३ ।। ते यमद्ता स्तदा तदनन्तरं तब यमपुयांगत्वा रविनन्दनं यमराजनिवेदयामासुः चैवस्वतापपराजस्तु तदृष्ट्या चित्रगुप्त चोदयत् ॥ ३३॥ उन यमदूतों ने उस मृतात्मा को यमराज के सन्मुख उपस्थि किया यमराज ने उसके विषय में चित्रगुप्त से पूछा ॥ ३३ ॥ पश्यास्य पुण्यं पापानि किमनेन कृतं भुवि ।। चित्रगुसस्तस्य लेखं दृष्ट्वा सम्याग्विचारतः ११ ३४ ॥ यम निवेदयामास तस्यकर्म शुभाशुभम् ।। हे चित्रगुप्त ! अस्य पुण्यं पापानिच त्वंपश्य अनेन भुवि किं कृतम् । चित्र गुप्तस्तस्य लेखं विचारतोविचारपूर्वकं सम्यग्दृष्ट्या तस्य शुभाशुभं कर्म यमं निवेदयामास ।। यमराज ने चित्रगुप्त से कहा कि इसके पुण्य और पापों को देखो कि इसने मर्त्यलोक में क्या २ किया है ! चित्रगुप्त ने उसकी दिनचर्या विचारपूर्वक देखी और उसके शुभाशुभ कमों को यमराज से निवेदन किया । कृतं नानेन सत्कर्म जन्मारभ्य प्रभो ! मुवि ।। ३५ ।। पापमेवकृतंनूनं सर्वदा मरणावधि ।। हे प्रभो ! भुवि मर्त्यलोके अनेन जन्मारभ्य कदापि सत्कर्म नक नूनं निश्चयेन मरणावधि पापमेव कृतम् ।। हे प्रभु! इसने मर्त्यलोकमें जाकर जन्म से मरण तक कभी सुकृत नहीं किया, मरण पर्यन्त सर्वदा पाप ही पाप किये हैं ।। .

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
एकंतु कृतमतस्य मनः संशयतीवमे ॥ ३६॥
यस्मादेव महापुण्यपांना गात्रफितः॥
कपिलक्षेत्रजेनाशु मृत्युमाप महेश्वर ॥ ३७॥
हे महेश्वर ! एतस्यतु एकं कृतं काय्य मे मनः संशयति सन्दे-
हङ्गमयत्येव यस्मात् कारणत् कपिलक्षेत्रजेन कपिलक्षेत्रसंभूतेन
महापुण्यपांशुना अतिपवित्ररजसा गात्रगुफितः गुंफितशरीरः
माशु शीघ्रं मृत्युमाप ॥ ३६,३७ ॥
हे महेश्वर ! यह कपिलक्षेत्र की धूल से धूमरित होकर मृत्यु
को प्राप्त हुआ है यही इसका एक कृत्य मेरे मन में सन्देहवत् प्रतीत
होता है ।। ३६, ३७ ॥
इति वाक्यं यमः श्रुत्वा कंपयानोनिजं शिरः॥
प्रोवाच वचनं सर्वान्मुक्तोयं नात्र संशयः ॥ ३८ ॥
यमोयमराज इति चित्रगुप्त वाक्यं श्रुत्वा निजं शिरः कंपयानः
आजन्मकृतपापवन्धनेनायं मुक्तो नात्र संशय इति वाक्यं सर्वान्द-
वान्प्रोवाच ।। ३८॥
चित्रगुप्त का यह वाक्य सुनकर अपना मस्तक हिलाते हुए
यमदेव ने अपने सभी दूतों से कहा कि यह मुक्त हो गया अपने आजन्म
के किये हुए पापों से रहित हो गया इसमें कोई सन्देह नहीं ॥३८॥
भोदूताः! भयतां हस्तस्थादस्तु विगतोऽधुना ॥
नायं मारयितुंशक्योभवाट्रिबैंकदाचन ॥३६॥
(स्पष्टम्)
हे दृतगण ! अब तुम लोगों के हाथों का स्वाद गया, तुम लोग
इसको कभी नहीं मार-पीर सकते ॥ ३२ ॥

११२ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । तथा रजांसि त्रीण्येव पवित्राणीह भूतले ॥ ए ब्रजरजः पुगपं चित्रकूटरजस्तथा ॥ ४०॥ कपिलालय तद्वत्पवित्रं सर्वमुक्तिदम् ।। इह भूतले त्रीण्येवरजांसि तथापवित्राणि एकं व्रजरजः पुण्यं तथा चित्रकूटरजः पवित्रं तद्वत्सर्वमुक्किदकपिलालयजरजः पवित्र मस्ति । इस पृथ्वी में तीन ही रज पवित्र हैं एक तो ब्रजरज, दूसरा चित्रकूट का रज और तीसरा सब-को मुक्ति देनेवाला कपिलालय का रज ॥ तस्मात्पुण्यतरेदेशे पुरे पुण्यकुलेतथा ॥ ४१ ॥ पुण्ये गृहे पुण्यवति जन्मतस्यप्रदीयताम् ॥ (स्पष्टम् ) इस कारण से पवित्र देश, पवित्र ग्राम, पवित्र कुल और पवित्र घर इसका जन्म दो।। एवमुक्ते यमेनाशु सदासौगतपातकः॥४२॥ विदर्भदेशेपूत्पन्नः कुडिने नगरे घरे । तथा पुण्यवताम्वंशे वणिजां पुण्यपूजिते ॥ ४३ ॥ महाशीलगृहेजातः सुशीलागर्भसंभवः ।। चारुशील इतिख्यातोऽभवत् सार्थाभिधानवान् ॥ १४ ॥ अाशु शीघ्रं यमेनैवमुक्नेसति सदा सर्वस्मिन्काले गतपातको विगतपापोऽसौ विदर्भदेशेषु परे उत्तमे कुण्डिने नगरे तथा पुण्यवतां पवित्राणां वणिजां वैश्यनां पुण्यपूजिते महापवित्र वंशे महाशीलनाम्नोवैश्यस्य गृहे सुशीलाया स्तत्पत्न्या गर्भसंभवः चारुशील इतिख्यातः प्रसिद्धनामा सार्थाभिधानवान् नामानुरूप- , गुणः उत्पन्नोऽभवत् ।। ४३, ४४॥

श्रीकपिलायतनतर्भमादात्म्यम् । यमराज के कहने पर उसी समय निप्पाप होकर वह मृत युवा वेदर्भ देश के पवित्र कुण्डिन नगर में और पवित्र वैश्य वंश में महाशील मक वैश्य के गृह में उसकी स्त्री सुशीला के गर्भ से उत्पन्न हुआ, जेसका नाम चारुशील रखागया और नामानुरूपं उसके गुण हुए ।। दयावान दानशीलय सुन्दरोवृद्धसेवकः ॥ पिता विवाहयामास सारशीलांविशःसुताम् ॥ ४५ ॥ स चारुशीलनामा यश्यसुतोदयायान् दानशीलः उदार प्रक- तिकः सुन्दरीरूपसम्पत्तिसम्पन्नोवृद्धसेवकश्वसंजातः तस्य पिता सारशीला सारशीलानाम्नीम्विशः सुतां वणिकन्यां विवाहया मास ॥१५॥ वह चारुशील नाम का वैश्यपुत्र दयावान दानशील सुन्दर और वृद्धा की सेवा करने वाला हुवा । उसके पिता ने उसका विवाह सारशीला नाम की एक वैश्य कन्या से करदिया । सापि पतिव्रताधासीत्तस्य पुण्यप्रभावतः ।। यदा सौ यौवनावस्थः मंजातो भुवि भूरिदः ॥ ४६॥ (स्पष्टम् ) यह भी सारशीला अपने पति के पुगय प्रभाव से पनियता हुई। जवयह चारशील यौवनावस्या को प्राप्तहुवा तो वहानामी और दानाहुया ।। तदास्य बुद्धिगत्पन्ना धनस्योत्पादने मुने । विदर्भदेशज यस्तु क्रीत्या स पणिजां पतिः ॥ १७ ॥ विक्रयागतः सिन्धून् सार्थेन महतायुनः ।।

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । तथा रजांसि त्रीण्येव पवित्राणीह भूतले ॥ एकं ब्रजरजः पुरुषं चित्रकूटरजस्तथा ॥ ४०॥ कपिलालयजं तद्वत्पचिन्नं सर्वमुक्तिदम् ॥ इद्द भूवले त्रीण्येवरजांसि तापवित्राणि एक बजरजः पुण्यं तथा चित्रकूटरजः पवित्रं तद्वत्सर्वमुनिन्दकपिलालपरजः पवित्रमस्ति । इस पृथ्वी में तीन ही रज पवित्र हैं एक तो ब्रजरज, दूसरा चित्रकूट का रज और तीसरा सत्र को मुक्ति देनेवाला कपिलालय का रज ॥ तस्मात्पुण्यतरेदेशे पुरे पुण्यकुलतथा ।। ४१ ।। पुण्ये गृहे पुण्यवति जन्मैतस्यप्रदीयताम् ॥ (स्पटम्) रम गागा मे चित्र देश पवित गार पवित्र फल और पवि ..

श्रीकपिलायतनतीमाहात्म्यम् । इस प्रकार व्यापार के काम में आते जाते अपने पूर्वजन्म के संस्कार से प्रत्येक यात्रा में वह पवित्र कपिल मुनि के आश्रम में ही निवास किया करता था |॥ ५० ॥ तत्र स्नातंचदत्तंच सदानिवरतासना ।। अदायुक्तेनमनसा जातं पुण्यमन्तकं ॥५१॥ तत्र कपिलायतने सदा निवसता वासं कृतवता सता तेन सद्व्यापारिणा श्रद्धायुक्नेन मनसा शुद्धचेतसा स्नानंकृतं दत्तं दानंचकृतं तेनानन्तकम संख्याकं पुण्यं जातम् ।। ५१॥ उम कपिलायतन तीर्थ में सदा निवास करताहुया वह व्यापारी श्रद्धा के साथ स्नान और दान भी किया करता था जिसका अनन्त पुण्य उसको प्राप्त हुया ।। ५१ ।। गच्छतोवागच्छनोया तीर्थ नियमनः कदा ।। युक्तस्य भ्रातृभिः पुत्रविप्रर्विद्वद्वरैस्तथा ।। ५२ ।। शीनवातनिमित्तेन रोगोजातः कलेवरे।। दिवसे दियमे तस्य रोगः समधिकोऽभवत् ॥ ५३॥ सबैश्यस्तु पूर्वसंस्कारत इहमन्मनिच सदा कपिलायतन निवासाचातिसंस्कारवान्विचारयांच वभूया तः परिणतेवगसि व्यापार स्वपुरादितपुत्रभावगैस्तथान्यचिरस्सहव्यापारार्थ परदेश गमनागमने प्रवृत्तोऽभवत् एवं परिवाराहतस्य तस्यपणिजः गच्छत शागच्छतो या पदा कस्मिन्नपिकाले कपिलायनने तीर्थ नियसतः नियामकुर्वतस्तस्य फलेवरे शीतयातनिमित्तेन हेतुना रोगम्मजातः तस्य रोगोदियसे दियसे समधिकोऽभवत् ॥ ५२, ५३ ।। -

श्रीकपिलायतनतीर्थनाहाट्यम् ।
(स्पटम् )
तब धनोपार्जन करने की उसकी इच्छा हुई इसलिये विदर्भ देश
में जो व्यापारिक वस्तुएं थीं उन को खरीद पुष्कल धन साथ में ले
बेचने के लिये वह सिन्धुदेश में गया ।
तद्वस्तु तत्र विक्रीय तज्जं वस्तु गृहीतवान् ।। ४८ ॥
तद्वस्तुनः स्वदेशेषु विक्रयं कृतवान् पुनः ।।
एवं गतागतैस्तेन संलब्धं बहुलं धनम् ॥ ४६॥
तद्विदर्भदेशजम्बस्तु तत्र सिन्धुदेशे विक्रीय प्राप्तमूल्येन
निजधनेनच तजं सिन्धुदेशजं वस्तु गृहीतवान् तत्पुनः स्वदेशेगु
आगत्य विक्रीतवान् एवं गतागतै र्व्यापारकर्मणा गमनागमनैस्तेन
पणिजा बहुलं धनं संलब्धम् ॥ ४८, ४६ ॥
सिन्धदेश में अपने देश की व्यापारिक वस्तुओं को पंचकर जो
धन प्राप्त किया उससे, और अपने साथ में जो धन लेगया था उससे
सिन्धुदेश की व्यापारिक वस्तुओं को जिनकी अपने देश में आवश्यक्ता
थी संग्रह किया और उनको अपने देश में पाकर बेचा एवं पारम्पार
आने जाने और व्यापार करने से अल्प काल में ही प्रचुर धन का
उपार्जन कर लिया ॥ ४८, ४९ ॥
गच्छतागच्छता तेन पूर्वसँस्कार योगतः ॥
कपिलायनने पुण्ये निवासाः सततंकृताः ॥ ५० ॥
एवं गच्छतागच्यता सेन व्यापारिमा सतीय पूर्वगमा
योगतः सततं पनि यात्रायां पुण्ये पकि कपिलायन कपिल
निनामाः मागविश्रान्नियः हताः ॥ ५० ॥

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । २१५ इस प्रकार व्यापार के काम में आने जाते अपने पूर्वजन्म के संसार से प्रत्येक यात्रा में यह पवित्र कपिल मुनि के आश्रम में ही निवास किया करता था||2|| तत्र स्नातंचदत्तंच सदानिवसतासता॥ श्रद्धायुक्तनमनसा जातं पुण्यमन्तकं ॥५१॥ तत्र कपिलायतने सदा निवसता वासं कृतवता सता तेन सद्व्यापारिणा श्रद्धायुक्तेन मनसा शुद्धचेतसा स्नानंकृतं दत्तं दानंचकृतं तेनानन्त कमसंख्याकं पुण्यं जातम् ।। ५१ ।। उस कपिलायतन तीर्थ में सदा निवास करताहुअा वह व्यापारी श्रद्धा के साथ स्नान और दान भी किया करता था जिसका अनन्त पुण्य उसको प्राप्त हुआ ।। ५१ ॥ गच्छनोवागच्छनोवा तीर्थ नियमतः कदा ॥ युक्तस्य भ्रातृभिः पुत्रैर्विद्विवरैस्तथा ॥ ५२ ।। शीनयातनिमित्तेन रोगोजातः कलेवरे।। दिवसे दिवसे तस्य रोगः समधिकोऽभवत् ॥ ५३ ।। संश्यस्तु पूर्वसंस्कारत इहमन्मनिच सदा कपिलायतन निवासाचातिसंस्कारयान्विचारयांध चभूया तः परिणतेवगसि व्यापार स्वपुरोहितपुत्रभातृवगैस्तधान्यतिरस्सहच्यापारार्थ परदेश गमनागमने प्रवृत्तोऽमवत् एवं परिवाराहतस्य तस्यवणिजः गच्छत सागच्छतो वा कदा कस्मिन्नपिकाले कपिलायनने तीर्थे निवसतः निवासंकुर्वतस्तस्य कलेवर शीतयातनिमित्तेन हेतुना रोगसंजातः तस्य रोगोदियमे दियो समधिकोऽभवत् ।। ५२, ५३ ।।

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम्। वह वैश्य पूर्वजन्म के संस्कार से तथा इस जन्म में व्यापार के अर्थ वारवार विदेश जाने आने के समय उस पवित्रतीध में निवास करने से अत्यन्त उज्ज्वल संस्कार और विचार का होगया था इसलिये अपनी वृद्धावस्था में सदा के भांति केवल दस पांच नौकर और वस्तुरक्षक तथा क्रय-विक्रय का हिसाब-किताब रखनेवालाही के साथ अब नहीं आता जाता था किन्तु इस अवस्था में आवश्य. कीय भृत्यों के अतिरिक्त अपने गुरु पुरोहित स्त्री पुत्र भाई इत्यादि सब कुटुम्बियों के साथ व्यापार करने के लिये आने जाने लगा। एवं सदा. आने और जाने तथा उस तीर्थ में निवास करने की दशा में किसी समय शर्दी और वायु के विकार से उसके शरीर में रोग उत्पन्न हुआ और उसकी निवृत्ति के अनेक प्रयत्न करने पर भी रोग दिन दिन बढ़ता ही गया ॥ ५२, ५३ ॥ ततः संचित्य मनसि विवेकी स वणिपतिः॥ चक्रे वटूनि दानानि शास्त्रोक्तानि विधानतः॥५४॥ (स्पष्टम् ) तदनन्तर उस विचारवान् वणिपति ने अपनी भावी दशा को अपने मन में विचार कर अपने साथ के पण्डितों के शास्त्रोक्त उपदेशानुसार अनेक दान पुण्य उस तीर्थ में किये ।। ५४ ॥ पूर्व ताम्रतुलां कृत्वा कृत्वा रुप्यतुलां ततः॥ ततस्स्वर्णतुलां चक्रे श्रीविष्णुप्रीतये वणिक् ॥ ५५ ॥ (स्पष्टम् ) पहिले ताम्रमय तुलादान, तदनन्तर चान्दी का तुलादान, श्रीर फिर सोने का तुलादान किया। वह वैश्य जितना दान करता था सो कामना-विहीन और श्रीविष्णुभगवान् के प्रीत्यर्थ करता था ॥ ५.५ ।।

. श्रीफपिलायतगतीर्थमाहात्म्यम् । तथा चान्यानि दानानि महाभक्तियोमुद्रा ॥ चफ्रेऽसी यणिजां श्रेष्ठो विबामणवाक्यतः ॥५६॥ (स्पष्टम् ) एवं उस श्रेष्ठी ने अपने विद्वानों के आदेशानुसार श्रद्धा और भक्ति से युक्त होकर प्रसन्नता के साथ और भी अनेक दानों को किया ॥५६।। पुनरन्त्येष्टिदानानि चक्रे सायमुपाभितम् ।। एवं सर्वविधिकृत्वा मनसाध्यानमास्थितः ॥ ५७ ॥ पुनरन्त्यष्टिदानानि मरणानन्तरं पुत्रभ्रात्रादिविहित दाना निच स्वयं चक्रे एवं सर्वविधिकृत्वा साख्यमुपाश्रितम् साङ्ख्य- वर्णितमानसध्यानं मानसिकदेवार्चनमास्थितः ।। ५७ ।। फिर अन्त्येष्टि दान जो मृत्यु के पश्चात् पुत्र प्रात्रादि विहित दान हैं वह भी कर लिया इस प्रकार सब विधि करने के अनन्तर सांख्यशास्त्रानुकूल मानसध्यान में निमम हो एकाग्र चित करके बैठ गया ॥ ५७ ॥ तस्पग्रस्य योदेवस्तं देवंशरएङ्गतः ॥ एवं प्रर्वतमानस्य पाणिजस्तस्य सत्तमः॥५८॥ बुद्धिः कापिसमुत्पना नित्यानित्यविवकिनी ।। शरण्यस्य प्रसादेन मांख्याचार्यस्य सत्तमा॥५६॥ (स्पटम्) हे अगम्त्य ! इस प्रकार ध्यानावस्थित हो उस तीर्थ के देवता भीकपिलाचार्य का शरण्य हुश्रा और सतत ध्यान यन करने से जप शुद्ध अन्तःकरण होगया तो श्रीकपिलमुनि की प्रसन्नता से नित्यानित्य विवेचिनी सद्बुद्धि उत्पन्न हुई अर्थात् प्रसज्ञान हो गया ।। ५८, ५२ ॥ .. .

११० श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । तस्याःप्रादुर्भदादेवजीवन्मुक्तोऽभवत्तदा ।। पश्यतां सर्ववन्यूनां ततः स्वंदेहमत्यजत् ॥ ६० ॥ तस्याः ज्ञानवत्या बुद्ध्या प्रादुर्भवादुदयादेव स जीवन्मु- नोऽभवत् । ब्रह्मासाचात्कारेणजीवन्मुक्तोभवतीति सांस्पोनेः । तदन्तरमिदंपांचभौतिकमनित्यं शरीरं रक्षतु जहातुवेतिब्रह्मज्ञा निनामिच्छाधीनमम्त्यतः स इदमनित्यं देह स्वस्तीपुत्रभाषादि सर्वबन्धुनां पश्यतामेवात्यजदर्थात्परलोकं जगाम ॥ ६० ॥ उस ज्ञानबुद्धि के उत्पन्न होतेही वह वैश्य जीवनमुक्त हो गया। क्योंकि ब्रह्म साक्षात्कार जिसको हो जाता है वह जीवन्मुक्त कहाही जाता है, यह सांख्य का मत है । अब रहा मरना जीना सो बहा. ज्ञानियों की इच्छा पर है वह चाहे इस अनित्य पांचभौतिक शरीर को रखे या परित्याग कर दे, उत्तम ज्ञानी बहुधा त्यागही करते हैं इसलिए अपने बन्धु बान्धव स्त्री पुत्रादि के देखते देखते उसने अपने इस अनित्य शरीर को त्याग दिया ।। ६०॥ लोकं वैकुठमगमनास्वरं तमसः परम् ।। यद्गत्या न निवर्तन्ते शान्ताः संन्यासिनोमलाः ॥६॥ शरीरत्यागान्तरं तमसोन्धकारस्य परम् पारं भास्वरं देदीप्य- मानं लक्ष्मीपतेनिवासस्थानम्वैकुण्ठलोकमगमत् यद्गत्या शान्ताः रागद्वेपादिरहिताः अमन्नाः शुद्धाः सन्यासिनो विरक्वाः न निवर्तन्ते जननमरणाभ्यां रहिवा भवन्ति ।। ६१ ।। इस स्थूल शरीर को त्याग करने के अनन्तर सूक्ष्म शरीर को धारण कर इस सांसारिक मोहान्धकार से अलग हो कोटि सूर्य के समान चमकता हुआ श्रीलक्ष्मीपति के निवासस्थान (वैकुंटधाम ) को चला गया। जहां जाकर शान्त और विशुद्ध सन्यासी जन फिर नहीं आते ॥६१ श्रीकपिलायतनतार्थमाहात्म्यम् ।। एवं तदासी पापात्मा तत्तीर्थस्य प्रसादतः ॥ प्राप दुःप्राप्यमन्यैर्यत्तद्विष्णोः परमंपदम् ॥ १२ ॥ एवं तदा तस्मिन्समये तत्तीर्थस्य प्रसादतो महत्वतोऽसौ पापात्मा अन्ययोगिभिस्तपास्वभिर्दुःप्राप्यं दुर्लभंयद्विष्णोः परमं पदन्तत्माप ॥ ६२॥ इस प्रकार उस तीर्थ के प्रसाद से उस पापात्मा ने, योगी और तपस्वि को अलभ्य जो विष्णुभगवान् का परम धाम है उसको पाया ।।६२ स सखा चारुशीलोऽभूत्पुण्यशीलसुशीलयोः ।। रमतेद्यापि चैछठे लोके दिव्यप्रभामये ॥ ६३ ॥ अस्मिश्लोके वैकुण्ठलाके तस्य समवस्थानम्वर्णयति । स चारुशीलः पुण्यशीलसुशीलयोः विष्णुपादयोः सखा मित्रमभूयो ऽद्यापि दिव्यप्रभामये चैकुंठे रमते ॥ ६३ ॥ यह वैकुंठधाम में जाकर भगवान के पार्षद पुण्यशील और सुशील का मित्र होगया जो आजतक वैकुंठ में बिहार कर रहे हैं ।। ६३ ॥ इत्यंभूतानुभावोयं दृष्टीदिव्यप्रभाववान् । यस्प माहात्म्पकने शास्तोनाहं न मे पिता ॥ ६४ ॥ इत्थंभूतानुभावः इत्थंभूतप्रभावः । अनुभावः प्रभावचेत्यमरः । दिव्यप्रभाववान् दिव्यप्रतापवान् अयं तीर्थराजोदृष्टः दृष्टिविपयं- गतः। यस्य माहात्म्य कथने नाहं शहोनमपिता शनः ॥६॥ (मत्रस्कन्दस्तीर्थमाहात्म्यस्यपरां कष्ठांजनयति) (१) पुण्यस पार मशील पितु भगवान् के दोनों पार्षद जो निस्तर भगवान् सेवा में रहने थे। 4 श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । इग तरह के प्रभाव पाला म्वर्गीय प्रताप से युक्त यही तीर्थराज देखागया जिसका माहात्म्य वर्णन करने में न मैं समर्थ हूँ न मेरे पिता शिवजी समर्थ है॥ १४ ॥ .. इतिहासमिमं पुण्यं शृणुयाच्छा क्येचयः ।। स्वस्वदेहांतमासाद्य पैकुंठे यास्यति ध्रुवम् ।। ६५ ।। (अयमध्यायोपसंहारएच) इमं पुण्यं पवित्रमिति हास यःशृणुयात् यश्चश्रावयेत् । स स्वस्वदेहान्तमासाद्यार्थान् पुर्णायुः पर्यन्तं मोगंभुक्त्वान्ते ध्रुवं वैकुंठ यास्पति गमिष्यति । पारम्बारं श्रवणाच्छावणाचप्राप्तबद्धर्या तत्तीर्थ सेवनेन मुफ्रिर्मविष्यतीनि तात्पर्यम् ।। ६५॥ इस पवित्र इतिहास को जो सुनेगा और सुनावेगा वे दोनों पूर्ण श्रायु पर्यन्त सांसारिक भोगों को भोगकर देहान्त होने पर बैकुंठधाम को जायंगे । इसका भाव यह है कि बारवार इस इतिहास को सुनने सुनाने से तीर्थ में श्रद्धा होगी पीछे तीर्थस्नान तीर्थवासादि के द्वारा मुक्ति होगी ।। ६५ ॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे स्कन्दागस्त्यसम्बादे कपिलायतनमाहात्म्ये.. वैश्यमोक्षो नाम सप्तमोऽध्यायः। .

अथाप्टपाध्यायकथारम्भः।
-980-
(मूत उवाच)
इत्युक्त्वा पुनरप्याह अद्धाभसियुतं मुनिम् ।।
ततीर्थमहिमोपेतं भगवानग्निभूर्वचः॥ १॥
सतः स्वशिप्यान् कथयति यदित्युक्त्वार्थात्सप्तमाध्यायकथां
कधित्वा पुनरप्पमिभूभगवान्स्कन्दः श्रद्धाभक्तियुतं मुनिमगस्त्यं
तत्तीर्थमहिमापतंयच आह ॥१॥
सूतजी अपने शिष्यों से बोले कि स्कन्द भगवान् ने इस प्रकार
सप्तमाध्याय की कथा सुनाने के पश्चात् श्रद्धा भक्ति से संयुक्त अगन्त्य
मुनि से फिर भी उस तीर्थ की महिमा से संयुक्त वचन कहना थारंभ
किया ॥१॥
(स्कन्दोवाच)
पुनरन्पत्प्रवक्ष्यामि तीर्थस्यास्य महाद्भुतम् ।।
महिमानं मुनीशान ! सावधानतया शृणु ॥२॥
स्कन्दोऽगस्त्यं कथयति यत् हे मुनीशान! अगस्त्य !
पुनरन्यन्महाद्भुतं महाभयंकरमस्य तीर्थस्य महिमानं वक्ष्यामि
कथयामि तत्सावधानतया सावधानेन मनसाभृणु ॥२॥
स्कन्दजी ने अगस्त्य मुनि से कहा कि हे मुनिश्रेष्ठ ! फिर उसी
तीर्थ की महाश्चर्यकारिणी दूसरी महिमा कहता हूं, सावधान होकर
॥२॥

१२२ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । महाकुलीनोविनोऽभून्मद्रदेशेषु कश्चन ।। धर्मात्मा कृषिकर्ताच दयावान्दीनवत्सलः ॥३॥ सुशीलः साधुसंसौ दानशीलः क्षमान्वितः॥ महाधनी शुद्धभोगो भाग्यवाँश्च जितेन्द्रियः॥४॥ मानदोमानहीनेभ्यो दिनेभ्योन्नप्रदायकः॥ विष्णु माहात्म्यसुश्रोता विष्णुभक्तिपरायणः॥५॥ , धर्मात्मा कृपिका दयावान् दीनवत्सलः सुशीलः साधु- संसर्गी दानशीलः क्षमावान् महाधनी शुद्धभोगी। धनवतां व्यसनवाहुल्याच्छुद्धभोगाभावोऽत उक्तम् शुद्भोगः । विद्यमानो- पकरणेष्वपि सात्विक भोगकर्ता । भाग्यवान् जितेन्द्रियोमानहीने- भयोमानदोमानदाता दीनेभ्योदरिद्रभ्योऽनप्रदायकोऽन्नदाता विष्णोमाहात्म्यस्य सुश्रोता विष्णुभाफिपरायणोमहाकुलीनः कश्चन विप्रोमद्रदेशेवभूदभवत् ।। ३,४,५॥ मद्रदेश में महाकुलीन धर्मात्मा, खेती का काम करनेवाला, दयावान्, दोनों का प्रतिपालक, सुशील, साधुओं की संगति करनेवाला, दानशील, क्षमाशील, महाधनी, सात्विक भोग करनेवाला, भाग्यवान्, जितेन्द्रिय, मानहीनों को मान देनेवाला, दरिद्रियों को धन देनेवाला, विष्णुमाहात्म्य का श्रोता, विष्णु भगवान की भक्ति में परायण एक ब्राह्मण रहता था ॥ ३, ४, ५ ॥ इदृग्गुणविशिष्टस्य तारमणस्य तपोधन ।। धर्मपत्न्यां तदातस्य सूनवोयहयोऽभवन् ॥ ६॥ हे तपोधन ! इदृग्गुणविशिष्टस्य तस्य ब्राह्मणस्य धर्मप वहवः मूनवोऽभवन् गभूवुः ॥ ६॥ .

भोकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । १२३ हे अगस्त्य ! इस प्रकार के उत्तम गुणों से सम्पन्न उस ब्राह्मण के उसकी धर्म पत्नी से अनेक पुत्र उत्पन्न हुए ॥६॥ तेपि धर्मपराः सर्व पितृधर्मपरायणाः ॥ महात्मानोधर्मलब्या बभूवुर्धनवर्धिनः ।। ७ ।। ते सर्वे पुत्रा अपि धर्मपराः धर्मनिष्ठाः पितृधर्मपरायणा महात्मानोधर्मलन्धाधोपार्जनाःधनवर्द्धिनोधनवृद्धिकारश्च वभूवुः ॥७॥ उसके वे पुत्र भी पिता के सदृश धर्मिष्ठ माहात्मा तथा धर्मपूर्वक धन लाभ करने और धन को बढ़ानेवाले हुए ।। ७ ।। जातेपु तेपु पुत्रेषु गृहभारवहेपुच ।। यात्रार्थ सर्वतीर्थाणां ताननुज्ञाप्यनिर्ययौ ॥८॥ स ब्राह्मणोगृहमारवहेषु तेषु पुत्रेषु जातेषु तान् पुत्रान- नुज्ञाप्य गृहमारं समर्प्य सर्व तीर्थानां यात्रार्थ निर्ययो गतवान् ।।८।। जब उसके सभी पुत्र गृह का भार संभालने योग्य हो गये तो उनको गृह कार्य में नियुक्त कर वह ब्राह्मण तीर्थों की यात्रा करने को चला गया ॥८॥ .. तदातीर्थप्रसंगेन चक्र पृथ्वीप्रदक्षिणम् ॥ तेपु तेपुच तीर्थेषु सत्नी स प्रमदान्वितः ॥६॥ तदा तदनन्तरं तीर्थप्रसंगेन तीर्थव्याजेन स विप्रः पृथ्वी प्रदक्षिणं चक्रे कृतवान् । येषु येषु तीर्थपु गतस्तेपुतेपुच प्रमुदा- वितो पण संयुक्तः सरना स्नानं कृतवान् ।।६।। तिसके बाद उसी तीर्थयात्रा के प्रसंग में पृथ्वी की प्रदक्षिणा की। वह जिन तीयों में गया उन २ तीथों में बड़े हर्ष के साथ स्नान किया ॥र

१२४
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्यम् ।
नीर्थ स्नानजएण्येन समभूगतकल्मषः ।।
तथोकंहि महाभाग शालेषु बहु बिस्तरम् ॥१०॥
तीर्थस्नानजपुण्येन स गतझल्मपोगतपापस्समभूत् हे
महाभाग ! तथाहि शास्त्रेषु बहुविस्तरं तीर्थफलतम् ॥ १० ॥
हे महाभाग ! तीर्थ स्नान के पुण्य से उस ब्राह्मण के सब प्रत्यवाय
दूर होगये शास्त्रों में विस्तार के साथ वैसाही कहा भी है !! १० ॥
दानाभोगानवाप्नोति तीर्थस्नानादघक्षयः॥
परोपकरणात्स्वर्ग ज्ञानान्मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ११॥
दानात् दानकरणाद्भोगानवामोति तीर्थस्नानादधक्षयो
पापनाशोभयति परांपकरणात परोपकारेण स्वर्ग स्वर्गप्राप्तिः
ज्ञानाद्रमज्ञानान्मोक्षमवाप्नुयादिति ॥ ११ ॥
दान करने से भोग की प्राप्ति होती है तीर्थ स्नान से पापों का
नाश होता है परोपकार से स्वर्ग की प्राप्ति होती है और ज्ञान से मोक्ष
होता है ॥ ११॥
एवं भ्रमन् सतीर्थानि क्रमेणागतवान् पुनः ।।
समुद्रे वालुकापूर्ण विमलं कापिलंसरः ॥ १२ ॥
एवं स ब्राह्मणस्तीर्थानि भ्रमन् क्रमेण प्रदक्षिणक्रमण
गुनलुकापूर्ण देशं विमलं कापिलंसरःप्रति मागतवान् ।। १२ ।।
इस प्रकार क्रममार्ग से तीयों का भ्रमण करता हुआ यह ग्राम
लुकापूर्ण समुद्र प्रदेश में निर्मल कपिलसरोवर पर आया ।। १२ ।।
मानवी योनिमासाद्य सद्यः शुद्धिसमन्विताः।
पीय पशवोषिस्युर्पत्ययः पयसासमम् ॥ १३ ॥

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । यत्पयः यस्य सरमः पयमादुग्धेनममम् तुल्यं पयाजलं पशोपिनिपीय पीत्या मानवीयोनिगामाय सधस्तकाल शुदि समन्त्रिता भवन्तीति शेषः ।।१३।। जिस कपिलमर का दृध के समान जल पीस का भी ना काला मनुष्य-योनि पाकर शुद्ध होजाते हैं ।। १३ ।। तत्सरःसमनुप्राप्य नविप्रान्तमना चना ॥ तत्रैव क्षेत्रप्रयरे क्षेत्रसंन्यासमाश्रितः ॥१४॥ तत्सरस्समनुप्राप्य तत्कपिलमरोयरमागत्यतीर्थयारयापरि- श्रान्त स मामणोविश्रान्तमना अभूत् । तर क्षेत्रप्रपरे म पत्र सन्याममाश्रितः चेत्रमंन्यासं धनवान् ॥ १४ ॥ उस पपिलसर पर पाकर समस्त ताथों के परिप्रमर में परिधान उस भाषण ने विधाम करने की इच्छा को पार उमी उनम क्षेत्र में क्षत्र-सन्यास लेलिया ॥१॥ पायज्जीयमिदं नत्पदामि पादाएन । इतिपोनिसपमित्त महंप्रन्पाम उच्यते ॥ १५॥ पारज्जी जीवनपर्यन्तमिदंपनं कदाचन नपदामिन स्पजामीति पथिचे निययस्म इत्रन्यास उच्यते ॥ १५ ॥ जपला जीवन रगा ताजा इन मंत्र को कर्म का नही पारंगा हम मानसि’ निधोदय मन्मना ! १५ ॥ नपा स मद्रदेशीपादिकतापशिरो॥ मपिपनं पत्रं परमरादि| यदि स्नातं कापिनीये किंतत्पातकतोभयम् ।। सांस्यबद्धि के प्रवतक उस तीर्थवर की स्तुति की। १८ ।। यदि स्नातं कापिलीये किंतत्पातकतोभयम् ॥ अजातीय तथा पापं जाताजातक्षयं करम्॥ १२६ श्रीकपिलायतनाथमाहात्म्यम्। तथा तदनन्तरं स मद्रदेशीयोधिप्रोतामणस्ताशिरोमया तीर्थराजे तत्तीर्थदेवतं कपिलमुनि मरणारधि मरणपर्यन्तं शरणं चक्रं कृतवान् ॥ १६ ॥ उसके अनन्तर वह मद्रदेशी ब्रामण उस तीर्थ शिरोमणि कपिल क्षत्र में मरणावधि तीर्थ देव कपिल भगवान् का शरण्य हो गया ॥१६॥ एवं निवसतस्तस्य तमिस्तीर्थ सरोवरे ।। व्यतीयुः शरदः पंच स्नातत्रिपवणं सदा ॥ १७ ॥ एवं तस्मिन्तीर्थसरोवरे निवसतोनिवासंकुर्वतस्त्रिपवणं स्नात स्तस्य विमस्य पंचशरदः पंचवर्षाणि व्यतीयुः ॥ १७ ॥ एवं कपिलतीर्थ में निवास करते और त्रिकाल स्नान करते उस ब्राह्मण को ५ वर्ष बीतगये ॥ १७ ॥ सम्मासे पंचमे वर्षे शुद्धभावेन सत्तम । तुष्टाव तं तीर्थचरं सांख्यबुद्धिप्रवर्तकम् ॥ १८ ॥ - पंचमे वर्षे सम्प्राप्ते सांख्यबुद्धिप्रवर्तकं सांख्यबुद्धिप्रदातारं तं तीर्थवरं शुद्धभावेन तुष्टाव स्तुतिश्चकार ॥ १८ ॥ पांचवां वर्ष जब प्राप्त हुआ तो शुद्ध भाव से उस ब्रामण ने * तीर्थराजस्तुतिः * संकीणी करणं पापं नाना वरणकारणं ॥ .

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । १२७ मलिनीकरणं पापं महामलफलप्रदम् ।। यदि स्नातं कापिलीये नित्पातकतोभयम् ॥ २१ ।। जाति भ्रंशकरं पापं कृनंदुयोनिदंभवे ॥ यदि स्नातं कापिलीये किंतत्पातकतोभयम् ॥ २२ ॥ उपपातक संशंयत् कूटशाल्मलिदायकम् ।। यदि स्नातं कापिलाये किंतत्पानकतोभयम् ॥ २३ ॥ प्रतिपापफलंपूयकुंडेऽयोमुखपातनं ।। यदिस्नातं कापिलीये विनत्पातकतोभयम् ।। २४ ॥ महापापं महापीडकुंभीपाकफलप्रदम् ।। यदि स्नातं कापिलीये किंतत्वातफताभयम् ॥ २५ ॥ यानिकानिच पापानि भयन्तु भुवनत्रये ।। यदि स्नातं कापिलीये किंतत्पातकतोभयम् ॥ २६ ॥ सर्वाण्यघानि नश्यन्ति तीर्थराट् ते प्रसादतः।। इति संचिन्त्य मनमा त्यामहं शरणं गतः ॥२७॥ नोट-यद्यपि तीर्थराज स्तुति का अर्थ नहीं लिखा गया है तथापि स्तुति में बहुत से पापों के नाम लिगर नए है उनके लक्षण लिखना थपश्य है अतः उनका विवरण और उनमे यतिरिक्त पापों को नामावली तान वर्ग में विरक्त करके निखता हूं क्योंकि स्तुति में जितने पार परिगति है उनसे पतिरिक्त पापों की भी गणना पृथक रूप में उनके उनके नामों से नहीं लेकर एकपदी स्तुति के अन्त में सानि पानि च पानि " इस रलोक में मरोग विरुष कुल पापों को लरी लिया गया है : नारे पीनामापती माता, पान, साना इन नन भेदों में है लोभी दो दिगमें रिटनने .. १२८ श्रीकपिलायतनार्थमाहात्म्यम् । इति सस्तुबत स्तस्य विप्रस्य कलशोद्भव ॥ हदि कोपि प्रकाशोऽभून ज्ञान ध्वांतनाशन ॥ २८ ॥ हे कललोद्भव ! इति एवं संस्तुवत स्तुति कुर्वतस्तस्य विप्रस्य हृदि हृदये अज्ञान घांतनाशनः कोपिप्रकाशाऽभूत् । तीर्थराज प्रसादत्त हृदयान्धक रोनष्ट |॥ २८॥ हे अगस्त्य ! इस प्रकार स्तुति करता हुआ उस ब्राह्मण का हृदय में अज्ञानरूपी अत्धकार को नाश करनेवाला एक प्रकाश उत्पन्न हुवा ॥२८ *संभव है और कितनों से बचना गृहस्थाश्रम महाअसम्भव है जिनका बोध नामावली देखने से स्वतः पाठक और श्रोताओं को होजायगा अतः उनको पृथक् नहीं किया है ।। महापातकनामानि सोपपातकानि । महापातक तो पांच ही हैं १ ब्रह्महत्या २ मद्यपान ३ सुवर्ण की चोरी ४ गुरुपत्नीगमन ५ इनके संसर्गी । और जितने १ छूत अछूत का अविचार २ संकरी करण ३ मलिनी करण ४ अपात्री करण ५ जातिभ्रंशकरण ६ अविहित कार्य का करना ७ कर्म का लोप करना ८ रसवेचना ९ कन्याविक्रय करना १० अश्व विक्रय ११ गोविक्रय १२ खर विक्रय १३ उष्ट्र विक्रय १४ दासी विक्रय १५ बकरे आदि पशुओं का विक्रय १६ अपना घर बेचना १७ नीली विक्रय १८ जिस वस्तु खरीदने की सामर्थ नहीं उसको बेचना १९ सौदा किसी तरह का बेंचना २० जल में रहने वाले जानवर का विक्रय २१ स्थल जन्तु का विक्रय २२ श्राकाश में रहनेवाले जन्तु का विक्रय २३ व्यर्थ वृक्ष का काटना २४ ऋण का न देना २५ अमात्र का हरण करना २६ देवस्व का हरण करना २७ राजस्व का हरण करना २८ परदन्य का अपहरण करना २६ तेल, घी आदि यस्तुओं का अपहरण करना ३० फल चुराना ३१ लोहा आदिवा श्रीकपिलायनननीर्थमाहात्म्यम् । १२१ सदा सुनपाधिप्रस्तुरीयज्ञानभूमिनः ।। हनयमानं जमजमा ददर्श हदि चित्रवत् ॥ २६ ॥ गदा तम्मिन्काले यदा विमस्य हदि प्रकाशाजातस्तदायं गुनपा विमोनालय मार्गयां ग्रानभूमिझतः मानस्यसप्त भृमयो- भवन्ति सतगंनंपात गलियोगमत्र । तस्य सप्तधाप्रान्तभूमिः 1 पदरग करना ३२ अवस्नु का हरण करना ३३ ब्रामणनिन्दा ३४ गुरुनिन्दा ३५ वेदनिन्दा ३६ शाम्बनिन्दा ३७ परनिन्दा ३८ अभन्यभक्षण ३२ अमांज्यभोजन ४० प्रचोप्यचोपण ४१ प्रलेपलेदन ४२ अपेयपान ४३ अछूत को छूना ४४ जो पात सुनने के योग्य नहीं यह मुनना ४५ जो हिंसा के योग्य नहीं उमको हिंसन करना ४६ जिसकी स्तुति नहीं करना चाहिये उसकी स्तुति करना ४७ जो अचिन्त्य है उसकी चिन्ता करना “ यहांपर अचिन्त्य शब्द का अर्थ परब्रह्म (जो शास्त्रों में लिखा है वह ) समझकर ईश्वर चिन्तन पाप है एसा न समझ लेना चाहिये नहीं तो अर्थ का अनर्थ होजायगा शास्त्रों में 'अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने समस्तजगदाधारमूर्त ये ब्रह्मणे नमः वाक्य में ब्रह्म को अचिन्त्य अव्यक्त निर्गुण गुणात्मा और समस्तजगत् का आधार मानकर प्रणाम किया गया है इसलिये अचिन्त्य शब्द से जिस बात के स्मरण करने से चित्त में प्रसन्नता हो वह ईश्वर बोधक अचिन्त्य शन्द को छोड़ याकी जगह में जहां कि किसी यातको स्मरण करने से चित्त में ग्लानि पैदा होती हो उस अचिन्त्य का चिन्तन पाप समझना १८ अयाज्य जो यज्ञ करने का अधिकारी नहीं उसस यज्ञ कराना या जो यज्ञ नहीं करना चाहिये वह यज्ञ करना ४९ अपूज्य का पूजन करना ५० माता पिता का तिरस्कार करना ५१ स्त्री पुरुष के परस्पर की प्रीति को छुड़ाना भेद लगादना " श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम्। प्रज्ञा ॥ यस्य विवेकख्यातिरूपस्य हानापायस्यप्रान्तभूमिः रूपीणी प्रज्ञा योगजसाक्षात्काररूपिणी सप्तप्रकारा। तद्या हेयन्दुःखम्मया परिज्ञातमतोनमेत्रकिमपिज्ञातव्यमित्येकाप्रज्ञा तथा विवेकख्यातिरूपोहानोपायोमयानिष्पादितोनास्य निष्पा दनमवशिष्यते तत्फलानुभवादिति द्वितीया। तथा १५२ परस्त्री गमन ५३ वेश्या गमन ५४ दासी गमन ५५ चाण्डाला गमन ५६ अयोनि गमन ५७ रजपला गमन ५८ पश्वादि गमन १२ कूट साक्षी (झूठी गवाही) ६० पैशून्यवाद (चुगली करना) ६१ झूठ बोलना ६२ ग्लेच्छ संभाषण ६३ ब्रह्म द्वेप ६४ ब्रह्मवृत्ति हरण ६५ वृत्ति छेदन वृत्तिच्छेदोहितद्वधः ( वृत्ति का छुडाना उसको वध करने के बराबर होता है) ६६ परवृत्ति को ले लेना ६७ मित्र को ना ६८ गुरु को ठगना ६६ स्वामी को ठगना ७० गर्भपात करना रास्ते चलते ताम्बूल चायना ७२ हीन जाति की सेवा करना परान्न भोजन करना ७४ लसुन, कान्दा, गाजर और तालफल दे फलों का भक्षण करना ७५ झूठा खाना ७६ मार्जारोच्छिष्ट ७७ भासी अन्न खाना ७० पंक्ति भेद करना ७२ भ्रूण हिंसा पशु हिंसा ८१ पाल हिंसा ८२ और किसी भी प्रकार की हिंसा अपवित्र रहना ८४ स्नान नहीं करना ८५ सन्ध्या को त्याग 1८६ अमिहोत्र छोडदेना ७ बलि वैश्वदेव को त्याग करदेना निपिद्ध आचरण करना र कुनाम में यास करना २० मरदोह गुरु द्रोह १२ पितृ मातृ द्रोह २३ पर द्रोह २५ पारमाति दुष्टजन संसर्ग २६ गौ की सवारी १७ वृषम की सयारी भैसे की सवारी २९ गधे की मवारी १..अंटी बो की सवारी १०१ भृत्याभरण १०३ अपने मा गएका १०४ गोत्र स्याग करना १०५ पुल का स्याग श्रीकापिलायतनतार्थमाहात्म्यम् । १३१ देनयोऽविधाकामकर्मादयोममाशेपतः वीणाः । नतेषांचेतव्यमव- शिप्यते इति तृतीया । तथा दुःख हानरूपमोदाख्यफलं तद्गोचराs- सम्प्रधातयोगेन मावास्कृतं न पुरुषार्थस्यापिनातन्यमवशिष्यत- इति चतुर्थी प्रज्ञा । तदरम्वस्पकृत्यसमाप्त्यनुभवरूपम्प्रज्ञाचतुष्टयम् । । । , १०६ दर से मलाहदेना १०७ ब्राह्मणों की आशा भेदन करन १०८ अपूज्य का आशीर्वाद लेना और १०९ पतित से बात चीत करना इत्यादि टपपातक हैं । इन में व्यर्थ के मनोरथ गान्धना भी शामिल है। इन सब उपपातकों के नारा के विषय में कपिलसरोवर की स्तुति उस ब्रामण देव ने की है । मनुना जातिभ्रशंकरसंकरीकरणापात्री करण- मलिनीकरणसंज्ञानि पातकानि परिगणितानि यथा ग्राह्मणम्य रूजः कृत्या प्रातिरमेयमधयोः जहम्यं घुसिच मैथुन्यं जाति अराकरं स्मृतम् । खराश्वो- प्टमृगेभानामजाविकवधम्तथा ॥ संकरीकरणंज्ञेयं मीनाहिमहिपस्यच ॥ निन्दितेभ्योधनादानं याणिज्यंशदसेवनम् । श्रपात्रीकरणंज्ञेयमसत्यस्य- चभाषणम् । कृमिकीटवयोहत्या मद्यानुगतभोजनम् । फलैधः कुसुम- स्तयमधयंच मलावहम् इति ॥ महापातकंपुच स्वर्णस्तेयी, ब्राह्मण सुवर्णस्तयी, महागातकी भवति । सुरापान जो महापातक फहा गया है यहां विचार है मुग के ११ भेद हैं उन में मुख्य गौडी माध्वी और पेठी ३ हैं इस में प्रथम पक्ष तो यह है कि निपिद्धसुरा फा पान नहीं करना तदनन्तर गाणी माध्वी और पैष्ठी में पैष्ठी का पान महापातक है । अन्त में धर्मशास्त्रकारों का वचन है कि ब्राह्मण किसी तरह के मद्य या मुरा का पान न करे और क्षत्रिय वैश्य यदि करे महापातकी नहीं । इस प्रकार यहां साधारण विचार दिखाया है विरोष धर्मशास्त्रों में वर्णित है। पांचवाँ जो संसर्गा है वह यदि महापातकियों का लगातार वर्ष भर संसर्ग करे तो पातकी होता है वह भी ज्ञानावस्था में शेष जो उपपातकादि लघुपातकादि हैं उनका नाम सराही साधारण प्रायश्चित है कितने सन्ध्यावन्दन और गायत्री जप से ही नष्ट होते हैं कितने श्रावग्यादि कमों द्वारा निवृत हो जाते हैं।

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । भाविधिदेहकैवल्यकालीनायस्थानुभवरूपश्चान्यदयस्थात्रयं स्वयमे- चाग्रे वक्ष्यतीतिसप्त झानभूमयस्तत्र विप्रस्य कपिलमुनि प्रसादाजाते हृत्प्रकाशे यदनकासनगन्धप्राणायामप्रत्याहारादिनाभूमयस्मि- द्ध्यन्ति तासु भूमित्रय जातप्रकाशमात्रयसिद्धञ्जातम् लन्ध प्रकाश स तुरीयज्ञानभूमितो रश्यमानंजगज्जातमात्सर्वं जगद्ददि चित्रवत्पश्यति ॥ २६॥ जय उस ब्राह्मण को कपिलमुनि की प्रसन्नता से एकाएक हृदय में प्रकाश उत्पन्न होने से तुरीयावस्था आगई तो वह तुरीया ज्ञान भूमि में आकर समस्त जगत को अपने हृदय में ही देखने लगा था पातंजलि योग सूत्र में ज्ञान की सात भूमि वर्णन की गई हैं जो यम नियम के साथ क्रम से श्रासन बंध प्राणायाम प्रत्याहार ध्यान धारणा और समाधि द्वारा घोर परिश्रम करने पर योगियों को कम से प्राप्त होती हैं जिनमें प्रथम भूमि यह है कि मैं ने दुःख को जान लिया अब इसके विषय में कुछ नहीं जानना है उसको त्याग करना चाहिये । और मिथ्या ज्ञान वासना से रहित अन्तरात्मा को विवेकस्याति कहते हैं या हानोपाय कहते हैं इसलिये मिथ्या वासना से रहित अन्तरात्मा को कर लिया अब इसमें कुछ शेष नहीं है ऐसी स्थिति को दूसरी ज्ञान भूमि कहते हैं। तथा त्याग करने के योग्य जो अविद्या काम कर्म आदि इनके विशेष नाश होने को ज्ञान की तीसरी भूमि कहते हैं। और योगियों का पुरुष-साक्षात्कार-रूप मोक्षप्राप्ति पुरुषार्थ है इस पुरुषा फा ज्ञान कर लिया अब इसके ज्ञान में कुछ शेप नहीं है इसको ज्ञा की चौथी भूमि कहते हैं । इस तरह महापरिथम-साध्य और योगियों से भी दुःप्राप्य चार भूमिका को जीतकर चतुर्थ भूमि से यह मामण वाम दृश्य पदार्थ को अपने हृदयपट खोलकर नियत् देसने लगा। भर जमीन भूमिकाओं का वर्णन मागे के सोकों में करते हैं॥२२॥ A SH श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । १३३ सुतियस्यमचैय कालेन कियता पनः ।। दृश्पादृश्यमभूदेतत्पंचमीभूमिकास्थितः ॥३०॥ एवं चर्तुध्यां भूम्यां सर्वजगज्जातं हृदिभावयन् कियता फालेनैवं कुर्वन् पंचमीभूमिमाश्रितः पातंजलियोगमत्रे पंचमी- लक्षणमुक्तं यथा समाप्त भोगाप वर्गामे बुद्धिर्भविष्यतीत्येवमाकारा पञ्चमीभूमिः यद्गत्वा भोगापवर्गाभ्यामपि योगी निवृत्तो भवति । तत्रगतस्य विप्रस्यैतदृश्यादृश्यं सर्व सुप्तियत्स्वप्नवच्चैवाभृत् । स्वप्नवदयंसंसारोजातः । सर्वमिथ्या मयमभूत् ॥३०॥ इस तरह जब चतुर्थी भूमि में 'प्राकर उस ब्राह्मण को सम्पूर्ण जगत् हृदय में ही दीखते कुछ दिन बीत गये तो अब पांचवीं ज्ञान भूमि में प्रवेश किया जहां समस्त संसार के वाह्य दृश्य और अदृश्य पदार्थ स्वप्न के ऐसे मालूम देने लगे और मन केवल परब्रह्म में लीन होने लगा ॥ ३० ॥ पुनः पप्टीमितः प्राशः स्वतोयं न पश्यति ।। परैरुत्थापितः कापि स्वप्नवदृश्यमीदते ॥ ३१ ॥ प्राशः ज्ञानयान् स प्रायसः पुनरितोत्सिंचमीभूमिकातः पप्टींगतः भस्यालक्षणं पातजातियोगसूत्रे । यथा युद्धिस्पेय पस्थिताः सत्वादयोगुणाः स्वकारणे लयमेप्यन्तीत्येवमाकारा पप्टी शानभूमिः । एवं सत्यादिपपिलयंगतेषु उन्मनीभावं. प्राप्तः । स्वतः स्वीटतोदृश्यं किमीपन परयात मुपुप्ति मार- प्राप्तइय कापि कस्मिंधिकालपि पररन्यजनैरन्यापित उदोधितः स्वप्नवद्रयमीचते परयति उप्रभ योगशागे मनाधि प्राये। प्रनप्टः स्वाशनिश्वामः प्रपन्नपिपत्रहः निप्पोनिर्विकार- १३४ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम्। श्चलयोजयति योगिनाम् ।। उच्छिन्नसर्वसंकल्पोनिः शेषाशपत्र- प्टितः ॥ स्वावगम्योलपः कश्चिज्जायते बागगोचरः ॥ ३१ ॥ वह ब्राह्मण पंचमी भूमिका में कुछ दिन रह कर तब ज्ञान की छठी भूमि में पाया और इस भूमि में अपनी आंखों से कुछ नहीं देखता था और सोए हुए मनुष्य के ऐसा दीखन लगा तथा जब दूसरे आकर जगाते थे तो दृश्यवस्तु को स्वप्नवत् देखता था। पांतजलि योग सूत्र में पष्ठी भूमिका का लक्षण यह कहा गया है कि जिस अवस्था में अविद्या रूप से परिणत सत्यादि गुण अपने २ कारण में लय हो जाते हैं उसको छठी भूमि कहते हैं। इस भूमि में योगी पूर्ण समाधि का अधिकारी हो जाता है और परब्रह्म में लीन होने लगता है जिसका लक्षण हठ योग में ऐसा लिखा है कि श्वास और प्रश्वास दोनों नष्ट हो जाते हैं अर्थात् इडा पिंगला दोनों नाड़ियां बन्द होजाती हैं और इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण करने की शक्ति नष्ट हो जाती है साधक निश्चेष्ट अर्थात् निर्जीव सा और निर्विकार हो जाता है उस समय प्राण नाभी से कंठ तक सुषुम्णा की गति से चलता रहता है इसके लयावस्था कहते हैं इसमें सभी संकल्प विकल्प उच्छिन्न हो जाते हैं और एकाएक मूर्छा तो नहीं हो जाती परन्तु करचरणादि का व्यापार बन्द हो जाता है शरीर पर यदि कोई कीटादि चढ़.जाय या मच्छर और मक्खियां भी काट खायं तो इसका कुछ ज्ञान नहीं होता परन्तु अन्तरगत सचेष्ट प्राण भ्रमण करता रहता हैं इसको असंप्रज्ञात समाधि कहते हैं इसका जाननेवाला वही पुरुष होता है जो उस अवस्था को पंहुचा है दूसरा नहीं जान सकता । जिसको दृष्टि देख नहीं सकती वाणी वर्णन नहीं कर सकती ऐसी विलक्षण लय योगिजनों को ही उत्पन्न होती है ।। ३१॥....

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । १३५ ससमा भूमिकां प्राप्तः पुनः पूर्णतपोवलात् ॥ चिदानन्दजलेलीनोदृश्यन्नापश्यदेकदृक् ॥ ३२ ॥ पुनः पूर्णतपोबलात् सप्तमीनभूमिकाम्प्राप्तस्स विश्विदा- नन्दजले परबमकरसेनिमग्न आत्मपरमात्मनोरेकी भारङ्गतः। तदैकदृ- ग्भूत्वा पश्यन्नपिनापश्यत् ॥ इयं पूर्ण समाधिः । अत्र पूर्णालयावस्थाभवति तल्लक्षणम् । यत्र दृष्टिलयस्तत्र भूतेन्द्रिय सनातनी । साशनिर्जीवभूतानां वे अलत्ये लयंगते । समाधि- स्तुयथा । सलिले सैन्धवं यत्साम्यं भजति योगतस्तथात्ममन सोरेक्यं समाधिरभिधीयते ।। यदा संक्षीयते प्राणोमानसंच प्रली- यते ।। तदा समरसत्वंच समाधिरभिधीयते ॥ तत्समंच द्वयोरक्यं जीवात्मपरमात्मनोः । प्रनष्टः सर्वसंकल्पः समाधिः सो भिधीयते । राजयोगस्य माहात्म्यं कोवा जानाति तत्वतः ॥ ज्ञानं मुकि: स्थितिः सिदिर्गुरुवाक्येन लभ्यते ॥ दुर्लभाविपयत्यागो दुर्लभ- न्तत्वदर्शनम् । दुर्लमासह जायस्था सद्गुरोः करुणाम्बिना ।। अन्मिीलितलोचनःस्थिरमनाम्नासाग्रदत्तेक्षणश्चन्द्राविपि ली- नतामुपनयनिप्पन्दमावनयः ज्योतीरूपमशेपपीजमखिलन्देदीप्य- मानम्परन्तत्वन्तत्पदमेतिवस्तु परमं वाच्यं किमत्राधिकम् ॥ इति- हठयोगे । पातअलियोगसूत्रेतु सप्तमी भूमिकालघणं यथा- प्रलीनानां रोपां न पुनर्बुद्धिरूपेणपरिणामोभविष्यतीत्येवमा- कारा सप्तमी भूमिः एवं सप्तप्रकाराऽनुभवीयस्प विदुपोजायते तस्य शाननिष्ठा सोमुन्देिति ज्ञातव्या ॥ ३२॥ इस तरह घठी भूमि को पार कर यह तपस्वी सातवी योग भूमि में भाया और निश्चल नेत्र से देखता भी था तो कुछ नहीं समझता कि क्या देख रहा है । अपने पूर्ण तो वत से परसन्न रूपी जल में डूब गया अर्थात् पूरी तय भाव के साथ प्रसंग्रहात . श्री कपिलायननतीमाहात्म्यम् । समाधिस्य होगया पूर्ण तय का लक्षण योगशास्त्र में लिखा है किनगर के अन्दर मूलाधार स्वाधिष्ठान नाभिचक्र हृदयस्थान फरठ- भान मृकुटी धार सानदल इन स्थानों में जहां कहीं परब्रह्म के विषय में दृष्टि ह वहां ही लय हो जाय और पृथिव्यादि पंचभूत नभा प्रांग फान नाफ इत्यादि पांचों कमेन्द्रियों के सनातन व्यापार से जो अविद्या है एवं प्राणियों को जो वादतियां हैं ये सब उस 'अरष्ट परमात्मा में लय हो जायं इसको लय कहते हैं। पातंजलि योग सूत्र में भी सप्तमी भूमिका का वर्णन इस तरह किया है कि जहां पर पठी भूमि में सत्यादि का लय हुवा है उसका बुद्धिम्प मे फिर कुछ परिणाम न हो उसको सप्तमी भूमि कहते हैं इस तरह सातों भूमिका का अनुभव जिस विद्वान को हो जाता है उसकी ज्ञाननिष्टा तत्काल मुक्ति देनेवाली होती है। समाधि के लक्षण योगशास्त्र में लिखे हैं कि जैसे जल में नमक मिलकर एक हो जाता है फिर अलग नहीं हो सकता वैसे श्रात्मा और परमत्मा की एकता हो तो उसको समाधि कहते हैं। जब प्राण और मन दोनों लय हो जाते हैं तब आत्मा परमात्मा का एकरस होता है उसको समाधि कहते हैं । जब जीवात्मा परमात्मा की एकता होती हैं तब सब संकल्प विकल्प नष्ट हो जाते हैं उसको समाधि कहते हैं। हठ योग से केवल प्राण को जीतना होता है और उससे कोई काम नहीं चलत जितने आसन मुद्रा नेति धौती वस्ती कापालक्रिया नौली और विविध प्रकार के प्राणायाम की सिद्धि प्रत्याहार ध्यान धारणा इत्यादि हैं ये सब प्राण जो इडा पिंगला नाडी हैं इनको जीतने के लिये है इनके जीतने पर राजयोग प्रारंभ होता है समाधि के अधिकारी हठयोगी प्रणायामादि साधन द्वारा हो जाता है, परन्तु राजयोग के बिना संब निष्फल है। एक कलागजों के खेल के ऐसा है । वह परिश्रम राज योग के द्वारा सफल होता है इसलिये साधक राजयोग का अभ्यास भी साथ श्रीशपिलायतनतथिमाहात्म्यम् । १३७ प्रारंभ करते हैं राजयोग के विना लया वस्था नहीं होती जीवात्मा मात्मा की एकता नहीं होती तो भी कोई २ भाग्ययान हटयांग बिना ही जयोगकी सिद्धि अपने पूर्वपुण्या के वलसे पालेत है जैसेइ. प्रारुणने पाया राजयोग का वर्णन योग शाख में किया गया है कि राजयाम के माहात् ग यथार्थरूप से कोई नहीं जानता ज्ञान मुक्ति,स्थिति और सिद्धि गुरुवाक्य प्राप्त जो राजयोग उसी से होती है इस राजयोग के लिये तीन वस्तु नलभ्य हैं एक तो विषय का त्याग करना, दूसरा तत्वों का दर्शन तथा तीसरा सहजावस्था तुरीयावस्था अर्थात् योग की चतुर्थभूमि, ये तीनों पदार्थ गुरु की कृपा बिना नहीं मिलते, तुरीयावस्था के बाद निजशक्ति द्वारा भी काम चल जाता है इस तपस्वी को भी तुरीयावस्था तक पाने के लिये सांख्याचार्य कपिलमुनि को ही ध्यानस्थ गुरु बनाना पड़ा था इति ।। और समाधिस्थ योगी का रूप ऐसा होता है। जो योगी परमसमाधिगत होता है उसका दृष्टि नासिका के पागे १२ अंगुल पर प्रकाश में स्थिर रहती है और सूर्य चन्द्र से मतलब इडा पिंगला से है इन दोनों नाडियों के व्यापार को लय करके निप्पन्द भाव से अर्थात् निश्चल रूप से अपना सिद्ध किया हुवा श्रासन से बैठा रहता है ऐसी अवस्था में जब काष्ठ या पापाण सदृश स्थिर हो जाता है तन सम्पूर्ण संसार के श्रादि बीज पूर्ण सचिदानन्द परब्रह्म परमात्मा के ज्योति रूप जो चमकता हुवा तत्व है उस पद फो देखता है पशिष्ट जी ने कहा है कि शारदा अधिक क्या कह सक्ता हूं जब परम तत्स का दर्शन हो गया तो अब इसके बाद कुल पाकी ही नहीं है ।। ३२ ॥ यानिशा सर्व भूतानां तत्व जागनि संयमी ।। पत्यां जागर्ति भूतानि सानिशा फललाएगा।

श्रीकपिलायननतीर्थमादास्यम् । समाधिन्य होगया पूर्ण तय का लक्षण योगशाम्र में लिखा है कि नगर के अन्दर मृनाधार स्वाधिष्ठान नामिचक हृदयस्थान फण्ठ- भान मृकुटी पार सहनदल इन स्थानों में जहां कहीं परब्रम के विषय में ष्टि गो वहां ही लय हो जाय और पृथिव्यादि पंचभूत नया प्रांग फान नाफ इलयादि पांचों कमान्द्रयों के सनातन व्यापार से जो अविद्या है एवं प्राणियों को जो वादाक्तियां हैं ये सब उस 'यटर परमात्मा में लय हो जायं इसको लय कहते हैं। पातंजलि योग सूत्र में भी सामी भूमिका का वर्णन इस तरह किया है कि जहां पर घटी भूमि में सत्वादि का लय हुवा है उसका बुद्धिरूप मे फिर कुछ परिणाम न हो उसको सप्तमी भूमि कहते हैं इस तरह सातों भूमिका का अनुभव जिस विद्वान को हो जाता है उसकी ज्ञाननिष्टा तत्काल मुक्ति देनेवाली होती है। समाधि के लक्षण योगशाम में लिखे हैं कि जैसे जल में नमक मिलकर एक हो जाता है फिर अलग नहीं हो सकता वैसे श्रात्मा और परमत्मा की एकता हो तो उसको समाधि कहते हैं। जब माण और मन दोनों लय हो जाते हैं तब आत्मा परमात्मा का एकरस होता है उसको समाधि कहते हैं । जब जीवात्मा परमात्मा की एकता होती हैं तब सब संकल्प विकल्प नष्ट हो जाते हैं उसको समाधि कहते हैं। हठ योग से केवल प्राण को जीतना होता है और उससे कोई काम नहीं चलता जितने आसन मुद्रा नेति धौती वस्ती कापालक्रिया नौली और विविध प्रकार के प्राणायाम की सिद्धि प्रत्याहार ध्यान धारणा इत्यादि हैं ये सत्र प्राण जो इड़ा पिंगला नाडी हैं इनको जीतने के लिये है इनके जीतने पर राजयोग प्रारंभ होता है समाधि के अधिकारी हठयोगी प्रणायामादि साधन द्वारा हो जाता है, परन्तु राजयोग के बिना संब निष्फल है। एक कलाबाजों के खेल के ऐसा है । वह परिश्रम राज योग के 1 टास सफल होता है इसलिये साधक राजयोग का अभ्यास भी साथ

श्रीफपिलायतनतथिमाहात्म्यम् ।
हो शारंभ करते हैं राजयोग के बिना लया वस्था नहीं होती जीवात्मा
परमात्मा की एकता नहीं होती तो भी कोई २ भाग्यवान हठयोग बिना ही
राजयोगको सिद्धि करने पूर्वपुण्यों के वलसे पालत है जैसे इ-मालणने या
है राजयोग का वर्णन योगगाल में किया गया है कि राजयोग के माहाग
को यथार्थरूप से कोई नहीं जानता ज्ञान मुक्ति,स्थिति और सिद्धि गुरुयाक्य
से प्राप्त जो राजयोग उसी से होती है इस राजयोग के लिय तीन वस्तु
अलभ्य हैं एक तो विषय का त्याग करना, दूसरा तत्वों का
दर्शन तथा तीसरा सहजावस्था तुरीयावस्था अर्थात् योग की
चतुर्थभूमि, ये तीनों पदार्थ गुरु की कृपा बिना नहीं मिलते,
तुरीयावस्था के बाद निजशक्ति द्वारा भी काम चल जाता है
इस तपस्वी को भी नुरीयावस्था तक पाने के लिये सांख्याचार्य
कपिलमुनि को ही ध्यानस्थ गुरु बनाना पड़ा था इति ॥ और समाधिस्थ
योगी का रूर ऐसा होता है। जो योगी परमसमाधिगत होता है उसका
दृष्टि नासिका के आगे १२ अंगुल पर याकाश में स्थिर रहती है
और सूर्य चन्द्र से मतलव इडा पिंगला से है इन दोनों नाटियों के
व्यापार को लय करके निप्पन्द भाव से अर्थात् निश्चल रूप से अपना
सिद्ध किया हुपा श्रासन से बैठा रहता है ऐनी अवस्था में
जब फाप्ठ या पापाण सदृश स्थिर हो जाता है तर सम्पूर्ण संसार के
यादि वीज पूर्ण सच्चिदानन्द परमस परमात्मा के ज्योति रूप जो चमकता
हुवा तत्व है उस पद पो देखता है वशिष्ट जी ने कहा है कि भारदमन
अधिक क्या कह सकता है जब परम तत्र का दर्शन हो गया तो अब
इसके बाद फुद बाकी ही नहीं है ॥ ३२ ॥
गानिस मर्च भूतानां तत्यां जागति संयमी ।।
यस्यं जागर्ति मनानि सानिशा पलनामुनेः॥३॥

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१३८
श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
जो निशा अथात् यानिशा अविद्यारूप रात्रि है जिसमें तमाम जगन्
सोया हुआ रहता है उसमें इन्द्रिय-निग्रहकारी माहात्मा जागते है
अथात् अविद्या का नारा करके पावन की चिन्तना करते हैं। और जिसमें
सब जगत जागता है उस शब्दादि विपरूप रात्रि में योगिन सोते है
अर्थात् यह उनकी रात्रि है ॥ ३३ ॥
देहंच नश्यरमवस्थितमुत्थितंया
सिद्धो न पश्यति यतोऽध्यगमत्स्यरूपम् ।
देवादुपेतमयदैववशादपेन-
म्वासोयथा परिघृतं मदिरामदान्यः ॥ ३४ ॥
जो माहात्मा परब्रह्म को साक्षात्कार कर चुके हैं ये यह नारा मन
शरीर रहे या न रहे इसको नहीं देसंत । जैस मदिरा के मद से कोई
व्यक्ति अपने पहने हुए दम को नहीं जानता कि उसके शरीर पर
है या नहीं ॥ ३४ ॥
इति संजान विज्ञानं मनदेशालयं दिनम् ॥
दृप्ट्या मनोनयस्थापान मंजाम: कपिलोमुनिः॥३५॥
इस प्रकार पार तपाया से विमान प्राप्त किया हुमा उगमरमा
बामण को देस कपिलांग के मन की धनाम्यादी
इसके साथ क्या करना चाहिय गरियर मेसिपनोगा|
स्थानादुत्याप गाजलं रामामालियाना ||
यत्म मयः प्रनय गौतमाया॥8॥
मनितलापनं पाना सम्पानापागा
मनुसगं मयः प्रा गरिमागिन पी.
शETattime
मनुधागा
पगापा ॥९॥

यिननगंधमादत्म्यन । नागष्टि को विय तुप अपने धान में उटकर धीरे धीरे संत उप प्राग को दम भगवान कपिनजी ने नवमसूता गो जो अपने पक पाद पीर बनती है बम परि २ ननने लगे॥३६ निगमनप्रदशपु गच्छन्नं नं यदृच्छया ।। घावं धायं द्विजस्याग्रे म सम देशमानयत् ।। ३७ ।। जर अपनी रच्दा मे परिममग फरता हुवा यह प्रापण कटी नीचे गट्टे की तरफ जा पड़ता था या कही ऊनी जगह पर चढ़ने लगता था तो उसके भागे दीद दौड़ कर उसका हाथ पकड घरावर जमीन पर लातेथे क्योंकि अपने ध्यान में निमम यह ब्राह्मण यागे कुया हो या पहाड सीधाही चलता था और अांखें ईश्वर को ही देखने में लगी रहती थी उससे संसारी काम तो लेता था ही नहीं इसलिये भक्तवत्सल भगवान् को उसे संभालना पडता था ॥ ३७ ।। भुशानं कापि तं विप्रं सदा मौलितलोचनम् ॥ मक्षिकारक्षणं कुर्वन् भोजयामास भृत्यवत् ॥ ३८॥ भगवान् भक्तों के खरीदे हुए दास हैं जो ईश्वर के सच्चे दास मनजाते हैं वे वास्तव में ईश्वर पनते हैं दास तो ईश्वर को ही बनना पड़ता है अब यहां ही देखिये जब कभी यह ब्रामण अांखों को बन्द किये हुये भोजन करने बैठता था तो भगवान् दासों की तरह उसकी थाली से मक्खियों को हटाते हुए भोजन कराते थे ॥ ३८ ॥ पानीयं पिवतः कापि तनिष्टं यत्तृणादिकम् ।। प्रहत्य दूरीकरते हरिः सद्वत्सलः स्वयम् ॥ ३६॥ कभी पानी पीने लगता था तो जलपात्र में कोई पास फूस पड़ जाता था उसको निकालकर दूर करते थे क्योंकि भगवान् १४० श्रीकापेलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । भक्तवत्सल हैं और जिसकी इतनी सावधानी से सेवा कर रहे हैं वह जानता भी नहीं कि मेरे सामने कौन है ? क्योंकि उसकी अांखें तो वन्द होकर और ही कुछ देखरही हैं इतना अवकाश कहां कि इनको पहचाने। हजार सेवा करते रहें वह अपने ध्यान में मम समझता क्या है ? वेतन तो पहले ही चुका दिया है ।। ३६ ॥ कदाचित्तिष्ठतिकापि समुनिः स्वस्थमानसः॥ परमात्मारनाकान्तस्तदा विश्रमते मनाक् ॥ ४०॥ जब यह मुनि कभी किसी जगह परमात्मा का ध्यान करताहुवा स्वस्थ होकर बैठता था तो भगवान् रमाकान्त भी थोड़ा विश्राम करलेते थे नौकरो साधारण नहीं थी दिनरात पहरा देना था नौकरी एकही थी अगर ऐसे ही दो चार भगवान् और होते तो कुछ घण्टों की नौकरी करने के बाद विश्राम होता ऐसा विज्ञ और नौकर गिलना कठिन था ॥ ४०॥ एवं वृतः सविमाग्यो निर्ममोनिरहं कृतिः॥ अस्मभूतः स्वतः काले संजही स्वकलेवरम् ॥४१॥ श्रय भगवान् को कुछ दिन के लिये अयकाश गिला क्योंकि इस तरह अपने व्रत को करता हुवा निर्मात्सर श्रीर निरहंकारी उस दिन श्रेष्ठ ब्रम ने ध्यान करते करते स्वयं परनन्न होकर काल-पारा । पर अपने शरीर को त्याग कर दिया ॥४१॥ नामरूपे बिहाये गथा यात्यधितां नदी। नागस्पे विहायामी तपायातः परातममाम् ॥४२॥ जैसे नदी नाना गाग का गम में भर ग यमे या का भी माना नाम राम :: : उसामान्य हो : १२॥

श्रीकपिलाचतनतीर्थमाहात्म्यम् । १४१
तद्देहं पशृगालाद्या भक्षयामा सुरोजसाः॥
तं प्रापुरत्तम जन्म रिमुक्ताः पापयोनितः ।। ४३ ॥
उसके मृत देह को कुत्ते शृगाल गृध काकादि नर मांसभक्षी
बानवर खा गये और इस पवित्र मांम को सान से वे भी पापयोनि से
मुक्त होकर उत्तम जन्म पा गये ।। ४३ ॥
विमानयानस्सरच्छन् गोकर्णशियदर्शने ॥
उल्ललयतदधीनि पादाचिदलकापतिः॥४४॥
उस ब्राह्मण के देहायसानानन्तर किसी मगय अलकापति
कुबेर अपने पुष्पकविमान पर बैठे हुए गोकर्णनाथ महादेव का
दर्शन करने को आकाशमार्ग से जा रहे थे सो मार्ग में उस मासरा
के देह की हड्डियां पटी थी उसको उल्लपन करदिया ॥ १४ ॥
सविमानः पपाताशु शथिव्यां नरवानः॥
तदस्थिलंघनोद्भूतदोपादुतनदेयतम् ॥ ४५ ॥
कुवेर का याहन पालपी भी है जिसको नरवाहन करते है इसलिये
यह विरोपण कुपेर का है। गरवाहन कुदेर उस भन्थि को लंपन
फरने के दोष से विमानसहित उसी समय पृथ्वी पर गिग्गय क्योंकि
वह अस्थि उत्तम देवन भी अर्थात् एक परमताली दी थी॥ १५ ॥
पतितचिन्तयामाम तदापतनकारएम् ।।
पतनं येन संजातं तत्स्वयंनाययुद्धवान् ॥ ॥४६॥
जब फुर विमान के साथ जमीन पर भाग को पाने जिग्ने
का कारण सोचने लगे परन्तु सिर में मिरे ये मोदी इन
मफे ॥१६॥

१४२ श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । ततः प्रादुरभूदग्रे नभस्वान् भगवानसौ ॥ सर्वगः सर्वभूतात्मा तस्य शङ्का पनुत्तये ॥४७॥ जब कुबेर स्वयं अपने गिरने का कारण न समझ सके तो उनको उलझन में फंसा हुवा देख सर्वत्र जाने वाले जन्तु मात्र के श्रात्मा रूप भगवान पवनदेव कुवर के आगे उनकी शंका को निवृत करने के लिये आकर उपस्थित हुए ॥ ४७ ॥ - नमस्वान्वदति ॥राजराज!महाराज!मनः कामपा कुरु।। एतान्यस्थीनि दृश्यन्ते भवत्पतन हेतवे ॥४॥ वायुदेव बोले कि हे राजों के राजा महाराज कुरेर! आप अपने मन की शंका को हटाइये आपके पतन का हेतु ये हड्डियां है ॥४८॥ इमान्यादाय शीघ्रं त्वं कापिलीये सरोयरे ॥ प्रक्षिप्य पुनरेवाग्रे स्वांगति समवाफ्यास ॥४६॥ इन हड्डियों को लेकर शीघ्र फपिल सरोवर में डालिये तप मागे अपनी राह लीजिये ॥ ४६॥ इत्युसस्त्र्यम्बकसखो यायुना जगदायुना ।। तथा चक्रे महाभाग! ततः स्वांगतिमास्थितः ॥५०॥ हे महाभाग अगस्त्य ! श्रापलयांत आयु है जिनकी ऐमे यायु देव ने जब भगवान शिव के मित्र कुंवर से ऐसा कहा सो दुर ने वायुदेव के कथनानुसार ही किया, तब अपनी यात्रा को प्रारम सिट मर्थात् उन हाड़ियों को सरोवर में डालकर तर गोकर्णनाप या मंस। यह तप का प्रभाव है कि जीते जी सयं भगवान ने उम वानर की सेवा की, मरने पर कुरेर सरग देवनाने उसायों को

श्रीकपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् ।
१४३
सरोवर में डाला । और मांस खानेवाले जानवरों ने अपनी पापयोनि से
मुक्त होकर उत्तम जन्म पाया ॥ ५० ।।
गत्वा गोकर्णनिकटं दृष्ट्वा तचरणद्वयम् ।।
सर्व वृत्तांतजातं स शंभुं पप्रच्छ विस्मयात् ॥५१॥
कुबेर ने गोकर्णनाथ के निकट जा उनके चरणों को वन्दना
कर रास्ते की सब कथा आश्चर्य के साथ भगवान् शंकरजी से कही
और इसका कारण पूछा ।। ५१ ॥
शंभु स्तस्मै यथावृत्तं कथयामास विस्तरात् ।।
सोपि श्रुत्वा मुदा युक्तश्चाययौ स्वालयं पुनः ।। ५२ ।।
भगवान् शुभदेव ने उस तीर्थ की और तपस्वी ब्रामण की
सर कथा कह सुनाई सुनकर पड़े हर्प के साथ अलकाधिपति अपने
भवन को भाये ॥५२॥
आगच्छत् स्वगृहं देवः सस्नो तस्मिन्सरोवरे ।।
स्नात मात्रस्य तमाशु फुष्टं नष्टमभूत्क्षणात् ।। ५३ ॥
कुवरदेव ने भी अपने घर को थाते हुवे उस सरोवरे में स्नान
किया और स्नान करने के साथ ही बहुत दिनों से उनके शरीर में लनी
हुई कुष्टव्याधि थी सो नष्ट हो गई बार दिव्य देव हो गया ॥ ५३॥
इयं पंगेतिहासी में पंचानानमुपादुना ।।
मीरपर्प फाधिता तुभ्यं स्पषीपैः पंपभिर्मुः ॥ ५४॥
ये पार इतिहास से संपुरत कथा में ने मरने स्टिा बनन
शिवजी के पारो मुखों से मुनी थी सो तुम्हारी पते के पास
मुमसे परी॥१॥

१४४ श्रकिपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । यां श्रुत्या अद्वया धीरो नरोयाति कृतार्थताम् ।। किंपुनः सेवमानः सन् सदासिद्धः सरोवरः॥ ५५॥ जिस कथा को बुद्धिमान मनुष्य श्रद्धापूर्वक सुनकर ही कृतार्थ होजाते हैं उस सिद्ध सरोवर का यदि सदा सेवन किया जाय तो फिर क्या ? अर्थात् सव मनोरथ सफल होजायं ॥ ५५ ॥ अत्रयद्दीयते मत्यैः स्वल्पंतन्नेन्ताम्ब्रजेत् ।। अत्र यत्क्रियते किश्चित्तदक्षयफलंभवेत् ।। ५६॥ भगवान् स्कन्ददेव की कथा अगस्त्य ऋषि के प्रति समाप्त हुई। अब सूतजी शौनकादिकों से अन्धोपसंहार में कहते हैं कि इस तीर्थ में रेणु तुल्य भी दान किया जाय तो मेरु के समान होता है और यहां जो तपस्यादि किये जाते हैं उनके अक्षय फल होते हैं ॥ ५६ ॥ कृत्वातामतुलामत्र दद्याद्रनतुलाफलम् ॥ अत्र समान्यधेनोद्दानं प्रकुरुते सुधीः ॥ ५७ ॥ फलंतूभयतोमुख्यास्तस्यस्या दाशुनिश्चितम् ।। एकस्मिन्मोजिते विग्रे कोठिर्भवति भोजितः॥ ५ ॥ इस तीर्थ में यदि ताम्रतुला का दान किया जाय तो रत्न के तुलादान का फल हो और यदि साधारण गौदान करे तो उभय मुखी गौदान करने का फल निश्चयपूर्वक और तत्काल ही मिले। तथा इस तीर्थ में एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाय तो कोटि ब्राह्मणों के भोजन कराने का फल होता है ।। ५७, ५८ !! एवं सर्वमपि स्वल्पं भूरी भवति भेदतः ॥ यस्पयस्येह देवस्य प्रासादं कारयेत्सुधीः ॥ ६ ॥ 'तस्य तस्यैव देवस्य समानत्वं समाप्डसार ।। .

- श्रीफपिलायतनतीर्थमाहात्म्यम् । १४५ इसी प्रकार सभी दान मत प्रादि थोड़ा भी यहां किया जाय तो तीर्थ के प्रबल माहात्म्य के वरा बहुत होजाते हैं और विचारवान् मनुष्य यहां पर जिस जिस देवता के मन्दिर बनवाते हैं यह उसी उसी देवता की समानता को प्राप्त हो जाते हैं ।। ५ ।। शिलाभिः सेनुपन्धं यः कारयेधनवान्नरः॥ सत्तर्धितुल्यमाहात्म्योजायते सधुवंभुवि ॥६॥ जो धनी पुरुष इस तीर्थ में प्रस्तर के शिलाओं से सेतु बन्धावे और सरोवर में सुख से स्नान करने वास्ते घाट बनवावे वह पृथ्वी में निश्चय रूप से तीर्थ के परावर पूज्य हो जाता है । ६०॥ इति ते सर्वमाख्यातं मया शौनक पावनम् ॥ तीर्थ रत्नस्य माहात्म्पं यतोनास्तिवरंपरम् ।। ६१ ।। हे शौनक ! यह पवित्र तीर्थमाहात्म्य मैंने तुझ से कहा है । इसके उपरान्त इससे श्रेष्ठ और किसी तीर्थ के माहास्य नहीं है ॥६॥ इति कार्तिककापिलेययोर्महिमानं महनीयभापितम्॥ प्रदहेदिह पातकं क्षणाच्छृणुते श्रावयतेच भस्तितः ॥६२ यह कार्तिक मास और कापिलेय तीर्थ की महिमा पूज्य जनों की कही हुई है जो मनुष्य भक्ति पूर्वक सुनता है और सुनाता है वह क्षण मात्र में अपने पातकों को जला देता है ।। ६२॥ - .

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Ek Chikh Andhere Ki

Author
Vishnudat
Title
Ek Chikh Andhere Ki
File name
Ek Chikh Andhere Ki
Text
OCR done
Citation
1981
Published
2011/07
Publisher
Bikaner
Language
Sanskrit
Pages
174
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
314455
Barcode
99999990314357.00
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Banasthali University
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