Sanmati Library, Jaipur
Shrimathuresh Mahotsav Pad Sangrah
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nist पुरशालय न.पृष्ठ 5 var . . सूचीपत्र. पदकीअस्थाई. नं.पृष्ठ पे की अस्थाई बंधाई व पालने श्रीठाकुरजी के पालने 'झूलरही. भानु दुलारा गांवो आज आनन्द बधाई० १ सरकार हमारी राधे० २१ बधाई .हर जगह छाई जसोमत० २ प्रेमविशारद जानिये नारद० २१ जमोथा यह निध केह विधपाई० २ ललीको निरखन देरीकीरता० २२ हीने माई नसोधा- बधाईरी० ३. पलने में झुलैं वो झूले लडेती० २३ देखन चलौरी मोहनी छत्र० ४ चिरजीवो.सुरव गस लाडली० २४ ललन. मुख देखोरी चलधाय० ४ कल ना पी ललना लखविन० २४ दिखलारी. २. मोहन : मैया ५ महारानी कीरतकी कुंवर० २५ सांवरिया नन्द कुमार जनभ्यो ६ तनमन वारियांव लली छव० २६ गोकुल छाई री बाई चाली० ७ लाडलीको जन्मभयो जगमें० २६ आज छटी आनछटी २ है० . ८ राधिका सी लाली. दुजी० २७ पालनेमें झूलते श्रीनन्दके. आज छटीकी गोठ सुहा० २८ चलेंयां लं पालने हरि झूलैं० नारायण भोगलगावु लक्ष्मी० २८ मोरी नजरियां . समायो० * हादी ढाढन के पद * उमङ्ग पधारियां चे ब्रज० १० पन्दों हरिगुरु पद कमल० २६ लालजी को जन्म . भयो० . १२, मैं ढाढी पभानु · भूपको० ३० आज बधाई २. मगघटे हरि०.१२ वाढनियां भरी उमंग धाई० ३० वेदपाव भेद नाही आवे जोन० १२ नाचे २ रे वृपभानु दर० ३१ जग में छायो .है आनन्द० -१३/ हांहां लढती- जन्म लियो० ३२ * बधाई व पालने श्रीकिशोरीजी के * * श्रीजानकीजी की वधाई ८ मङ्गगल, बधाई वनमण्डल १४ छाई वधाई २ जनकपुरमा० ३३ • अजी राजा वृपभानुजी० - १५ मिथलापुरी में मोद बधाई० ३३ वृपभान बृपभान २ वृषभान० :१५ पालने में झूलती श्रीजान० ३४ : जाई कीरत. छ : बाई मनं भा० : १६ * श्रीगंगानाकी बधाई * परमानंद मगन सुध भूली० १७ जयजयजय जगदम्बे गंगे० ३५ 'बधाई देने साखियां पाई हैं:- १७ भागीरथ अति बड़भागी० ३५ चलो रावल में देखें :बहार१८ * सांझी लीला * छाई : नगरियां । सुघरिया १६ कान्ह बृपभानु भवन सांझी०.३६ 'छवको निरखन देरी महारनियों० २० सांझी है. सजाय सजाय रहयो सां० ३७ ..
(२) . नं.पृष्ठ पदकीअस्थाई पदकीअस्थाई नं.पृष्ठ सांझीखेल बिचित्र बनायो० ३७ बंसी वारके चरण मन रहयो० ५७ सांझी रची निकुंजमें सखि० ३८ श्यामकी मुनलो चतुराई ५७ सांझीपूजत नवल किशोरी० ३६ होरी खेल गोरी नन्द नदनसे० ७८ आज सखी कुंजनमें देखे० ४० मेरे जिन मारो कुंकुम लग० ५. * रासबिहार * जिन मारो पिचकारी श्याम० ५६ नंदजी के छैलारे बसी क्युं० ४१ होरी कुंजन छाय रही० ६० ठुमक छुम छुम ठुमक० ४१ मोहि पनिया भरत लंपट० ६० वावरी बनावै कान्द गाय० ४२ मोहन सैनचलाई अरी ऐग० ६० आज ब्रजचन्द नन्दनंदन० ४२ न कर मोसे जोरी कान्ह० ६१ सस रच्यो छवि रास रसीले० ४३ लाज तजोरी दिन चार० ६१ रसीला रास रम लीला हरी० ४४ होरी में वमीवारो उतपातं० १२ बन्दा विपनमें राधारमन ४५ मोरी लाज नसौ चाहै लोग० ६२ गोय रसिया राम दिखाय० ४६ अंगरंग विन फागहि फीको० ६३ गिरधर नाचै सखिन के संग० ४७ मोसै छर करी जमनापै श्याम० ६४ रच्यो श्रीबिहारी जू प्यारी० ४८ मोय रसिया अधर उठाय० ६४ रमभरि असघरि धन मानो० ४८ होरी खेलवाको म्हाने भारी० ६५ ठानी गुमानी अनंगसे जंग० ४६ बरसाने मची रंगीली होरी० ६६ पुलकित अंग हे प्रिया० ५० मुनमाई री कन्हाई तेरो अतही० ६७ नाचै श्रीविहारी ५१ प्रीत कान्हा से लागी हँसो० ६७ रासमें राधिका लाल नटवर० ५२ आज गोविन्द राधिका ६८ आज मोहन बने भामिनी रासमें० ५३ होरी खेलें मनमोहन राधा ६६ * राग बसन्त * रंगीली सजीली रसीली गुईयां० ६६ आई वसन्त कथ मन मोहन० ५३| तोरे हाहा खाऊं मोमे नाखेलो० ७० मोरे जिय में वमन्तकी भई० ५३ नये होरी के रसीया बिहारी० ७१ विपन बिहार विहारी विहारन० ५४ खेलें' श्यामा सांवरिया से ७० रितुराज वन्त को सुख समांज० ५५ खेले फाग २ श्यामा महा० ७१ * होरी लीला * मत डाल अबीर गुलाल नै० ७२ नन्दके मोरी आज मिजोई०. ५६ सारी मिजोवो न श्याम सुंदर० ७३ मोहन अजय खिलारी देख०, ५६. कान्हां मनके मोहन 'हारः ७३ प्यारे० न.पृष्ठ मैं (३). पदकी अस्थाई पदकी अस्थाई नं.पृष्ठ सैयां श्याम हों लजाऊं चु० ७४ वरसाने वन सरसाने घन घुमंडल ८८ मन मोहन प्यारे छांडदो० ७५ हे मुरलीया धारी कहा तिहारी पभानकी लली होरी खे० ७५ वदरी अरी मत इतगंवै कहानि ८६ कुंजन में होरी आज मनी० ७६ हरि विन निश दिन हियो अकु. ६० श्यामा संग नन्दकुमार० ७६ क राजेरी सांवरिया मधुपुरी० ६० कान्ह चूनर भिनोवोन मोरी रे ७६ ख पिय बिन पावस ऋतु नहि प्यारी०६१ * डोल उत्सव के पद * ये बरसे वो बरसे वादर गुइयां० ११ राजत डोल युगल . रंग भीने० ७७ घन श्याम विन कारी घटा० १२ डोल; विराजत मनहर जोरी० ७७ भावन दूर मनभावन विरह० १२ देखो श्यामा श्याम की छवि०.७८ वरसो २ घन वहिं जाके जहां० १३ झुलेरी राधा गोपाल ठाठ देख० ७६ पियाके संग पावस परम मुखारी ६४ * गणगोर पूजन * रंगीली राधे झूलत गुमानभरी० ६५ रंगीली राधाप्यारी छवीली श्यामा०८० जमुनातट बंसीवट छैयां झूलतः ६५ सांवरिया घरआवाजी कन्हैया० ८० हिंडोरे झूलें राधे संग गुपाल० ६६ साखिन संग लखीगवर पूजती० ८१/ उच्छव निहारौ सखी युगल झू० ६६ * फूलसिंगार * अटारियों में श्यामा रंगभीनी० ६७ कुंमन माही राजै सोहनी फुल०.८२ देखौरी झूले २ हिंडोरे मियामी० ३८ फूलोंकी कुंज बाग में सोभाअ० ८३ श्यामा प्यारी संग झूल मन को ६८ राजै फूलवारियों में राधे हरि० ८२, झुला संग साथकी अली अरे.० ६६ * नौकाविहार * झूलत नवेली राधे कालिन्दी की. ६ करेंगे दोउ नीका बैंठ-विहार० ८४ झूलत दोउ मगन मनउमंग भरे० १०० नौका में श्यामा संग विराजे० ८५ हिंडोरे झूलें सिया रघुनन्दन० १०० जलजात्रा . हिंडोला झूलें पिया प्रीतम संग०१०१ जलविच विहरै युगल विहारी ८५ श्यामासंग झूले रसिक बनवारी० १०१ अहोगोविन्द राधे जूनै जल० ८६ सीरी छैयां किशोरी संग सैयरि० १०१ * वरसांतीगग़' *. ये झलै वो झूलै माधव सयाँ का०.१०२ इस्योरी आली गन वोहिचित० ८५ नः १०३ से लेकर नं०११२ के पृष्ठ बरपा ऋतु वैरिन आई मखि दूर० ८ तक नियसेवा आर. के पद है. छिन २ गरजतं मदन कहारे० पंच பான
।
* श्रीहरिर्जयति *
श्रीमथुरेश महोत्सव पद संग्रह ॥
।। जय शिव ओंकारा प्रभु हर शिव ओं० :॥ इस के वज़न पर ।
भारती
जय जय गोपाला. प्रभुः गिरिधर गोपाला॥
. संग अनङ्ग लजावन राधे व्रजबाला॥जय देव०॥
१-नेति नेति कह वेद पुकारत नहि पायों पारा ।।
भक्त हेत सोइ धारै नाना अवतारा ॥ जय देगा
योगीजन मुनि तापस जाको ध्यान धरत हारे ।।
नंद-गेह में खेलत सोइ नरतन धारे ॥ जय दे०॥
३-ब्रह्मा और सुरेश को आपहि मद मर्दन कीनो॥
वत्स गोप नव रचकर गिरिवर करलीनों जियः॥
४-कलादिक पापिष्ट असुर तुम छिन में हतमारे ॥
धू मीरां से भक्त बहुतं तुम निस्तारे ॥ जय देः ।।
५-सुंदर बदन मदनमद मर्दन छवि जनमनभावन ।।
निरखे मिटै मनुज कोभव आवन जावन॥जगा
६-प्रेम विवश तुम कीनी ब्रजमें अदभुत रसलीला।।
कौन न रीझै प्रभु के सुनकर गुण शीला ॥ ज०||
७-तुम गोविंद किशोरी के प्रभु प्राणहुतै प्यारे ।
बसौ सदा मथुरेश हिये बंसी वारे ॥ जय देव०॥
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बधाई श्रीगोपालजी के जन्मोत्सव की
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राग कानडा
.
(१) गाणे आज आनन्द बधाई।
जो.दुर्लभ सुर मुनि योगिन को, सोनिधि सुलभ जमोमत पाई।
गावो आज आनन्द०॥
हरि प्रगटे श्री नंद महिर घर, सकल चरा चर मन हर खाई।
गावो आज आनन्द०॥
झुंड झुंड सखियां सुन शोभा, पुन पुन छवि निरखनको धाई।
गावो आज अनन्द०॥
उच्छव तीन लोक में छायो, शोक घरी असुरन को आई।
गावो आज आनन्द० ॥
श्रुतिजेहि नेति नेति कहिखोजत,ताहि जसोमत गोद खिलाई।
गावो आज आनन्द० ॥
आस लगी इनहीं दर्शन की, मथुरा दास की प्यास बुझाई।
गावो आज आनन्द०॥
2003030
॥ तथा गजल ॥
(२) वधाई हर जगह छाई जसोमत जाया लाला है
लुभाया जिसने आलमको जमाल उसकानिरालाहै।
नज़र जिसकी पड़ी उसपर हुवा वो सर वसर आशिक।
तअज्जुब है कि पल पलं बीच हुस्न उसका दुबाला है।।
.
हज़ारों सुन्दरी नारी हुई सुन सुन के मतवारी ।
दरस को मिल चली सारी ये प्रमी पाठशाला ।
हैं नाना धुन बजै वाजे समाज आनन्द के साजे।
विरांमैं नंद दरवाजे ख़ज़ाना खोल डाला है।
कोई लावै नज़र मोहरा कोई गंडा. कोई डोरा ।
निहोरा कर कहै मथुरा न लाला डरने वाला है ॥
(३)
पा-
( तथा
पद.)
जसाधा यह निध केहि विध पाई ॥
जांकी ख़ास रमासी दासी, सो तव सुत भयो माई ।
जसोधा यह निध केहि ॥
लेत न बन्यो भेद वेदन तब, नेत नेत श्रुति गाई ।
अज वाकी पद रंज को वन्दै, नन्दै देत बडाई
जसोधा यह निध केहि० ॥
भादौं कृष्ण अष्टमी शुभ तिथि, निस अँधियारी छाई ।
प्रघट भये झट ही नट नागर, युति रवि कोट सुहाई ।
जसोधा यह निध केहि० ॥
गोकुल बिच न रह्यो कुल कोऊ, जहां न बजत बधाई।
अङ्ग अङ्क जन मिलैं शङ्क तज, रङ्क मानो धन पाई ।
जसोधा यह निध केहि०.॥
नंद भवन आनन्द महोदधि, रह्यो अधिक लहराई
)
(३)
झुंड झुंड व्रज बनिता धावें, गावै करत नचाई
जसोधा यह निध केहि० ॥
सुर दल भेस बदल चल धाये, छवि लख बल बल जाई।
श्री मथुरेश वदन सोभा पर, कोटिन मदन लजाई ।
जसोधा यह निध केहि० ॥
3-
--
॥ तथा।।
( ख्वाजा लीने खारिया हमारीरे इसके वजन पर )
लीजै माई जसोधा बधाई री ॥
पैदा हुआ जो आप के घरमें ये लाल है।
दिल कश अजीब उस्का ये हुस्नो जमाल है।
जादू का है ये पुतला या खूबी का जाल है
देखै जो इस्को उसका ही दिल. पाय' माल है
ऐसा सुन्दर मनोहर कन्हाई री ॥ लीजै ॥
घर घर में शादियाने सुहाने हैं बज रहे।
हर घाट वाट ठाट खुशी के हैं -सज रहे ।
इन्द्रादि देव देख के संपत को लज रहे ।
हो रुष्ट दुष्ट जीव हैं प्राणों को तज रहे।
सारी दुनिया में महिमाहै छाई री . . ॥ लीजै०॥
आनन्द भरे, नंद का धन ये समाज ; है।
कोदिन में ह्ये कठिन से वो दिन इनको आज
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-
( ४ )
शंकर भी आया लाल के दर्शन के काज है।
ब्रज राज के ही हाथ मथुरा
की लाज है।
इसने लक्ष्मी सी दासी बनाई री ॥.लीजै।
मैं
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( तथा )
.
(झूलन चलौ हिंडोरे वृषभान नन्दिनी, इसके वजन पर )
(५) देखन चलौरी मोहनी छव मन की भावनी ॥
प्रघट्यो है प्राण प्यारो, वो नंद को दुलारो।
जीवन को धन हमारा, सूरत लुभावनी ॥ देख०॥
घर घर बजै बधाई, सवने खुशी मनाई।
महिमा बड़ी है छाई, तिहु लोक पावनी ॥ देख०॥
भयो नंदजी के लाला, सुर मुनि भये निहाला।
जग में भया उजाला, चरचा सुहावनी ॥ देख०॥
मथुरा भी इक भिकारी, आसा लगाई भारी।
दो झांकी प्यारी प्यारी, हिये की रिझावनी ॥ देख०॥
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(तथा)
(कुंवर नंदजी के आनन्द कंद, इसके वजन पर)
ललन मुख देखोरी चल धाय ॥
रूप अनूपम हार पुरुषोत्तम प्रघटे. ब्रज में आय ।
,
(६)
. -- - । - - ॥ . ललन मुख देखोरी चलं.. नन्द जसोमत भाग सराहत, ठाड़े सुर समुदाय । दर्शन को आनन्द कन्द के, बिनय करत ललचाय । १. ललन मुख देखोरी चल०॥ नन्द पौर सब ठौरं ठौर पै, बाजे रहे बजाय । 'नाचत गावतं मोद बढावत, गोपी गोप सरसाय 'ललन मुख देखोरी चला. । पावत है धन रतन अमूले, याचकं जन जो जाय । दानी करण'गुमानी नृप बल, दोन देख.लंजियाय । ललन मुख देखोरी.चल०॥ भादों में दधि कादौं भारी, दीनों मेल बनाय द्वारे द्वारे हर गरि यारे, 'गोप फिरै हुलसाय ललन मुख देखोरी चल० ॥ नामा कृष्ण पर जग उजियारो, प्यारो तव सुतमाय। . जसुधा दरस सुधा भिक्षा-दे, मथुरा बल वल जाय। ललन मुख देखोरी चेल०॥ -1 । 1 1 । [ तथा ] (ये आई वो आई उमंग घटा, इसके वजन पर') (७) दिखलारी दिखलारी मोहन मैया झांकी, री प्यारी 1. प्यारी दिखलारी॥ याछबिदेखकामनृपलाजै कोटि चन्द्र उजियारी,मैंवारी,वारी।
( ६ )
दिखलारी दिखलारी मोहन०॥
इन्द्रादिक सुर द्वारे ठारे, टेरत दरस दिखारी, भिकारी, पुरारी।
दिखलारी दिखलारी मोहन०॥
कृष्ण जन्म सुन गोकुल धाई, सारी गोप कुमारी, दुलारी, २॥
दिखलारी दिखलारी मोहन०॥
देत बधाई मन हर पाई, हैं ब्रज के सुखकारी, बिहारी, बिहारी।
दिखलारी दिखलारी मोहन०॥
मथुरा प्रेम कृपा बर याचे, तन मन से बलिहारी, तिहारी, २ ।
दिखलारी दिखलारी मोहन०॥
[ तथा ]
है
(देवरिया पार लगाय, इसके वजन पर)
(८) सांवरिया नन्द कुमार जनम्यो गोकुल मैं ॥
लोग लुगाई देत बधाई, अरे कन्हाई पूर्ण कला औतार ।
जनम्यो गोकुल में ॥
दे दे तारी गावत गारी, अरे सुखारी नाचत सारी नार
जनम्यो गोकुल में ॥
भादौं में दधिकादौं माची, अरे घृताची- नाची बीच बज़ार।
जनम्यो गोकुल में ||
जैजै कर दें गोप आवाजें, अरे समाजै रोप दुई दिस चार ।
जनम्यो गोकुल में ॥
.
। P नौबत-भेरि नंद के द्वारे, अरे नगारे बाजें. घर घर द्वार । जनम्यो 'गोकुल मेंः ॥ जसुमतकी मत पूछो मनकी, अरे बदन की दीनी सुरत बिसार। जनम्यो गोकुल मैं ॥ मदन मोहनी मुरत लालकी,अरे ग्वालकी ललनामुदितनिहार जनम्यो गोकुल में ॥ याछविको सुरनरमुनि तरसत,अरे प्रेमरत मथुरादासबलिहार। जनम्यो 'गोकुल में ॥ . , [ तथा जयपुर की भाषा में (९) गोकुल छाईरी बधाई चालौ नागरी ए ॥ लालो जायो जसुमत रानी, वो छै, बड़ भागन म्हे जाणी। धनछे नन्द की धिराणी , सब गुण आगरी ए ॥१॥ वालक सुन्दर रूप निहार , हुई छू तन मन से बलिहार । अरी तू मतना करे अबार, बेगी जागरी ए ॥२॥ फिरै सुजान वेतो बूढा होगया ज्वान । देवैमन मांगा दर्शन मांगरीए कान्हो पौड्यां पौड्यां झांकै, गोप्यांओडी मुलके ताकै । गोप्यां झांकती न थाकै धन धन भागरी ए ॥४॥ ऊंकी आँखडली में कामन, मन हर लेवे , मन भावन । महला चालस्यांरी गावन, मीठी सगरी ए ॥ ५॥ नंदजी..फूला दान -१ . रुचिर ठाठ ठठी है ॥ " : -- (८) मथुरा राखै दर्शन आस., ॐकी आज बुझैली प्यास । भारी उमंग हुलास.. , चरणा लागरी ए ॥६॥ (छटी के उत्सव का पद) (१०) आज.छटी.आज छटी आज छटी है। नंद भवन नृत्य करण. आई नटी है ।। ना. ताई. थेई नूपुर. बाजे साजे सब साज़ गोद लेत हेत भरी लॉल को मैया। पूज छटी दान देत नाहि हटी है.।। कोई कर न्योछावर कोई रोचना। आरत्यो लिये सुलोचना वो डटी है ।। रूप मधुरताई पाय गोपियां छकी आज ही छटी की ये मिठाई बटी है ।। आई कछु लेने नटी मन को दे चुकी। निजघर के गमन काज नंट से नटी है। पूतके तो पाऊं पालने में ही दीखें। महिमा मथुरेश की भली प्रघटी है। [ ग़ज़ल राग सोहनी पालना (११) पालने में झूलते श्री नन्दः के फ़रजन्द हैं। तम के नाशक अज नरोत्तम समजब्रज चंद हैं। '-. '- । १ .
...
..
प्यारी.प्यारी आपकी चितवन है मन की मोहनी ।
क्या हसन है भंद जिसने - डाले भारी फन्द हैं।
• पालने में लाल ने मोहित किया ब्रजबाल को।
है कमाल इस बालपन में सीखे क्या छल छंद हैं।
मौनं धारे मा झुलाती है विराजी भौन में
कौन कह सकता है दिल में उसके जो आनन्द है ॥
वाह क्या पलना है जिसको देख ललना हैं फ़िदा।
देखे बिन कल ना पडै क्यों इसमें आनन्द कन्द है।
सारे भक्तों को मुबारिक धन्य ये भादौं का मास ।
जिसमें श्री मथुरेश प्रघटे धन्य धन श्री नंद हैं ।
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11
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॥ तथा ॥
(१२).
वलैयां लू पालने हरि झूलै ॥
कुंवर निरखवेको दूरसै सिधाई लांघत ताल तलैयां ॥ ब० ॥
रतन जटित सोहै पालनो चन्दनको ताबिच नंद ललैया॥ ब०॥
मथुरा हगन छायो सांवरो रसीलो जीवन मूल फलैयां॥ ब० ॥
(तथा)
'
-
(आई बदरियां कजरियां री गुइयां, इसके वजन पर.)
(१३) मोरी नज़रियां : समायो सांवरियो ।
-
, . (१०) जसोधा के भयो ललना विराजै आंगने पलना । परै देखे बिना कल, ना ; सुहाता है वहीं चलना । भारी उमाइ ये सारी नगरिया ॥ मोरी०॥ मनोहर आन लालन की हरै सुध गोप ग्वालन की जोमहिमाब्रज कीवालन की, कहां सब लोक पालन की। धन हैं जो याको लड़ा गुजरियां ॥ मोरी० ॥ अजब चितवन रसीली है मुरत क्या ही रंगीली है। अदा हर इक नवीली है मधुर मूरत. हसीली है मथुरा कहै ये तो रस को है दरिया। मोरी०॥. . । [भांड वधाई] (१४) उमङ्ग पधारियां वे व्रज जन नारियां नंद द्वार। तन मन वारियां वे हरि छवि निरख मोद अपार ॥ गावै देदे तारियां दे रस भरे भीत मङ्गल. चार । ओढे रंग सारियां वे साहैं व्रज कामिनी सुकुमार ॥ कहैं सुनि जसुमति रानीवाह मिली है निधिमनमानी वाह २ सुघर तैं ढोटा जायो-, सवन के मनको भायो-, सलोनी मोहनी मूरत जाकी नंदजू अति बड़ प्रालब्ध उनकी जागी-, आनंद खुमारियां वे छके मद माहिं लख दिलदार । मुदित निहारियां वे छवि मन मोहनी रस सारः ।। सूरत याकी- भागी- " " . गुनीजन देत बधाई वाह २ कामना मन की पाई वाह २ दान दीजै मन भायो-, त्रिलोकी पति घर आयो- भये सर सभी निहाला-, करै नृत गोपी ग्वाला-, मची भारी दधि काचौं मास धन धन ये भादौं- मथुरा बलिहारियां वे बोले. हरषात जय जय कार । सुरत विसारियां वे पायो मन भावतो भरतार ।। meeste (१५) (भांड लालजीको जन्म भयो जगमें आनंद छयो वाह र है अनी चाह २ है दुख सोच दूर गयो पायो रस मोद नयो- आये ब्रज गोप धाय हरये सब दर्स पाय-, फूले तन ना समाय मुंह मांगो दान पाय-, वाजत निशान भेरि नाचें जन घेर घेर-, करती है वार फेर नारी नर टेर टेर-, गोकुल में धूम मची सुर नारी धाय रची-, मथुरा रस रंग रची राजी सुरनाथ शची-, बधाई) है। " " A " " " " . " - राम कृष्ण जन्म की अभेद बधाई। ॥राग सारंग का दादरा ॥ (१६) आज बधाई.आज बधाई! प्रघटे हरि तृभुवन सुखदाई ।
4
(१२)
आज वधाई आज बधाई ॥
१-शेश महेश शारदा नारद जेह सुमिरै सोई प्रघटे आई।
आज वधाई आज वधाई॥
२-मरजादा पालक रघुनायक लीला हेत भये कुंवर कन्हाई।
आज वधाई आज वधाई.॥
३-छबि ललाम श्रीराम गुशाई शोभाधाम श्याम यदुराई।
आज वधाई आज बधाई॥
४-दुष्ट दलन धनु-धारी रघुवर कृष्ण मोदप्रद, वेणु वजाई।
आज वधाई आज वधाई ।।
५-जनक नन्दिनी प्रिया राम की राधा वपुधर कृष्ण-रमाई।
आज वधाई आज बधाई ॥
६-कौशल्याजसुमतवंडभागिन,रामकृष्ण दोउ गोद खिलाई।
आज वधाई आज वधाई ॥
७-श्री अवधेश जन्म अति पावन सोहि मथुरेश रूप दरसाई।
आज वधाई आज वधाई ।।...
॥ तथा ॥
॥ राग श्याम कल्यान ।
(१७) वेद पावै भेद नाहीं, आवै जो न ध्यान माहीं।
ऐसो वो अजन्मा साई, जग प्रघटायो है ।।
योगिन समाध त्यागी, हिये अभिलाप जागी
,
.
वोही बड भागी, जाने रूप लख पायो है ।।
लोचन रसीले हरे, भरे सुधा से पूरे।
रस माहीं चूरे, जिन जगत लुभायो है ।
सांवरो सलौनो अंग, लाजत अनङ्ग जासै ।
चितवन माहिं याके, कामन धरायो है।
धर्म रखवारे प्यारे कौशल्यादुलारे धन्य ।
प्रघटे आनन्द तीन लोक मांहि छायो है ।।
वोही मथुरेश कृष्ण रूप धार आयो ब्रज।
मंगल अपार छायो आनन्द बधायो है ॥
..
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( तथा )
(ब्रज की लता लागै प्यारी, इसके वजन पर)
१८) जग में छयो है आनन्द , हरि लीनो अवतार ॥जग०॥
धरणी दुखारी, पुकारी, पुकारी जब आतुर २ ।
बर दीनो भरतार ॥
॥जग०॥
करुणा निधाना, सुजाना, हरी भगवाना २ ।
लीयो नरतन धार ॥
॥जग०॥
सुरगण मगन मन, गगनसे सुमन बरसाये २।
असुरन मानी हार
॥जगनी
सुन्दर सलौना, सोहन मन मोहन २।
जाकी सोभा है अपार॥
||जग०॥
रघुबर मनोहर, दया कर, रुचिर तनु धारी २
(१४) . वोही नन्द के कुमार ॥ ॥जग०|| राघौ धरम की, करम की, वो पाली मरजादा२। जल को है नहि पार॥ ॥जग०॥ लीला बिहारी, मुरारी, कृष्ण वपुधारी २ । कियो प्रेम को प्रचार ॥ ॥जग०॥ द्वोऊ दयालू, कृपालू , भक्तन प्रतिपालू २ । मथुरा दास बलिहार ॥जग०॥ बधाई श्रीकिशोरीजीके जन्मोत्सव की। (येही राम लखन जो मुनि सँग आये हैं री, इसके वजन पर) (१) मङ्गल वधाई ब्रज मण्डल में छाई है री ॥ कीरति ने कन्या जाई, देख वाकी सुन्दर ताई। अति ललचाई, रति कामिनी मदन की ॥ १ ॥ रमा इन्दरानी और, शंभु की भवानी गौर । निरख लजानी छधि, राधिका बदन की ॥ २॥ रतन अमूले दान, दीने नृप बृष भान । रिद्ध सिद्ध दासी मान, लाडिली चरण की ॥३॥ अष्टमी उजेरी रात, भादों ऋतु वरसात । सामग्री सुहात सव, ताप के हरण की ॥४॥ रावल- पुरी के वाती, धन्य धन सुख रासी। पाई राधिकासी जोत, मोहिनी हगन की ॥ ५॥ .
( १५) तीन लोक जस होय, हरि याके बस होय । मथुग विहंस, भाखै कुण्डली लगन की ॥६॥ " [तथा] अरे हारे दिलजानीरे तूनावे मतवारारे, इसके वजन पर (२) अजी राजा बृषभानजी बधाई हम लाई जी ॥ तुम्हरे भाग को सुरहु सरा हैं। राधे सी कन्या है पाई जी ॥ अजी राजा०॥ रानी कीरत हु धन है बखानी । श्यामा सुता जाने जाई जी ॥ अजी राजा० ॥ ब्रज में आनन्द छयो है घर वाहिर। लाये देव वधाई जी ॥ अजी राजा०॥ मुरत छबीली सुरत रसीली। तुरत हिये में समाई जी || अजी राजा०॥ अरह लली के ऐसे सुने हैं। विष्णु करै सेवकाई जी ॥ अजी राजा०॥ मथुरा आपसे यही दान मांगे। दीजिये. दरस दिखाई 'जी॥ अजी राजा० ॥ , . [तथा] १ , + नाटक की चाल में. (घनश्याम घनश्याम घनश्याम, इसकें वजन पर.) (३) वृषनाभ, बृषभान, बृषभान, वृषभानकुंवरि के
(१६)
दर्शन करके जन्म सफल कर प्यारी ॥ बृषभान० ॥
पुरी रावल अधिक सुहाई , वहां घर घर बजत बधाई ।
तहां कीरत कन्या जाई जाकी अनुपम सुन्दरताई
दरवार के साज सजाये
वहु भूप न्योछावर लाये।
सतकार महीप कराये अति मंगल मोद मनाये ।
वाजत निशान,होय नृत्य गान,करैं पान आनंद सुधारी॥वृष०॥
रणवास में रानिये धाई
पाई कीरत से पहुनाई।
लख राधिका मुख दुख भूली अति आनन्द से मन फूली।
कोई देत असीस सयानी कोई रूप ही देख लजानी
कोई मुख पर देत डिठौना कोई रक्षा करै कर टौना
जाके मथुरा पास, अति मन हुलास, दियो राई लोन उतारी।
वृषभान, वृषभान, वृषभान० ॥
.
.
[ तथा]
.
( जयपुर की भाषा में )
(४) जाई कीरत छ वाई मन भावनी हो ।
लेकर चालारी वधाई, काई डोले छै. उमाई.।
म्हारा जीवडा मैं छाई , हुलसावनी हो ॥ जाई॥
दर्शन कर मन परसन करखां, ऊंकी छव मन माहीं धरख्यां।
तांना मीठी सुरसूं भरयां, गायां लावनी हो ॥ जाई० ॥
सुन्दर श्यामा भानु दुलारी ,ऊंकी झांकी छे अति प्यारी ।
ना कोई तीन लोक में नारी, इसी सुहावनी हो ॥ जाई० ॥
लछमी दर्शन करवा आई., गौरी ब्रह्माणी छे .धाई ।
(१.५),
शारद मन ही मन पछताई , भई लजावनी हो ॥ जाई॥
राजा बांटे रतन अमोले,देवे मन भायो बिन बोले।
मांगै कीरत रानी होले , गोद खिलावनी हो ।। जाई० ॥
दीने न्योछावर 'मैं हार , कोई भूषण बे सुम्मार
मथुरामनमाणिक दियोवार, मुख दिखलावनी हो ॥जाई०॥
(राग सारंग का दादरा)
(तोरे सांवरिया ने मारी नज़रिया , इसके वजन पर)
(५) परमानंद मगन सुध भूली, पैयां परूं मोरी वैयां गौरी ।
भानु महीप की कीरत रानी , जाई सुता मन हरष छयोरी॥
निरखवदन वाको सुधनहिंतनकी,सदनचलनमोसेकाहेकहोरी।
देव बधू दर्शन को धाई, देख रूप हियो चकित भयोरी ।।
सुर मुनि सिद्ध न रीत निवाहें, छांड्यो न चाहें भानु की पौरी
निरधन जिम बहु संपत पाई,तिम सवको मन उमगरह्योरी॥
धीरज त्यागो सब ब्रज बासी, प्रेम की रज इक एक बँध्योरी।
मथुरा कहेअनादि अजन्मा, भक्तन हित लियो जनम किशोरी.
॥ तथा ॥
-
(वना म्हाने प्यारो लागेए , इसके वजन पर)
६) बधाई देने सखियां । धाई हे ( एमाए)
कीरत कन्या जाई ॥ बधाई०॥
-
(१८) .. hi १-इसौहदिस मंगल छायो हेएमाए) दंगल: गोपीगोप उमगः वरसाने, आयो हे ।। २-- ताना विध वजः रहे वाजे हे (एमाए) राजत सुखाके साज तिरख सुर संपत लाजै हे। ३ लाडली मुख की सोभा. हे । (एमाएं) कमला निरख लजात-उमा मन छायो लोभा हे॥ ४-देह सुधः भानु मुलानो हे (एमाए) आनद उर न समात लुटायो खूब खजानो हे ॥ ५-धन्य तिथि वारः समया हे (एमाए) मथुरा व्हैं बलिहार लली की लेत. बलैया हे। .... ॥ तथा ॥ . (करहैयां न टूटे हमार इसके वज़न पर (७) चलौ सवल में देखें बहार लॉती जन्मी वहां ॥ महीप भानु नै ठानी खुशी का है दरवार । नगर मैं होरहे घर- घर में भारी मंगल चार ॥ जो चाहे सोही मिले है खुला हुवा भंडार मची है धूम कि हर 'सूम भी हुवा दातार भई कीरत की कीरत अपार ॥ लडेती० ॥१॥ की मोहनी कन्या है ये हुवा मंशहूर ।' जमाल देखः के लजयातीहै। परी क्या हूर ॥ .
( १९) जलाल क्या है कि कहिये उसे सरापा नूर उसीके नूर का दुनिया में है ये सारा ज़हूर ॥ वोही जीवों. की, जीवन' अधार ॥ लडेती० ॥२॥ जडाऊ पालने । मैं मा उसे झुलाती है वो मंद मंद कभी प्यारी मुसकराती है जिधर को हंस के वो प्यारी नज़र उठाती हैं। वनाके दासीहिये की कली ... खिलाती है. ॥ किया मथुरा ने दिल को निसार ।। लडैती० ॥३॥ +4 --- Fir है है 4 . [ तथा आई चदरियां कनारयां रीगुईयां इसकेवजनपर । (८) छाई नगरिया सुघरियां बधैयां ॥ १-सजी बृषभान की नगरी , हैं उमगी सुन्दरी सगरी । मटकती नाचती गाती , चली महलों मैं इतराती॥ वोलैं दिखादो दुलरियां बधैयां ॥ छाई -लखा जव लाडिली छब को हुई बस मूर्छा सब को । वो बोलो होश में आके,, ये बानी उठके घबराके । लागै न याकी नजरियां गुशैयां ॥ छाई० ॥ ३- गगनसे हैं सुमन, वरसैं, मगन नभै देवगण दरसैं । ये श्यामा,आदि कारन है यही निज बन बिहारन है मथुरा:दया की ये दरियाहै गुइयांशी छोई y ** 1
(२०)
[ तथा ]
(९) छबि कौनिरखनदेरी महा रानिया, प्यारी राधा हैरस।
अवतार || महा॥
१-एक तौ पायो याने रूप मनोहर दूजे ये सब गुण खान ॥
तीजे हरी की मनभावनी याकौं गावत वेद पुरान ।
२-सुरत है याकी मन मोहनी प्यारी मुरत है रस भंडार ॥
कोद भानु सम तेज है यामें महिमा अपरं पार ।
३-निगम न पायो याको भेदहै जी शारदा रही लजाय ॥
ब्रह्मादिक सुर थकरहे याको पार सके नहिं पाय।
४-धन २ श्रीवृषभानु हैं अरु धन तुम कीरत माय ॥
देत बधाई मन हरणे यापे मथुरा बल बल जाय ।
॥ महा० ॥
.
( पालने में विराजी हुई श्री किशोरीजी की बधाई )
(१०) पालने झूलरही भानु दुलारी प्यारी
उसकी छब देख अमर नारिहैं सारी वारी ॥ पालने० ॥
जगमगाताहै वो रतनों से जडाऊ पलना
जिस में ललना मानो सूरज है ये कायाधारी ॥ पाल०॥
रानी कीरत है झुलाती न समाती तन में
है मगन अपनी दुलारी को निरख बलिहारी ॥ पाल० ॥
देख सुख पाती है ललचाती कोई लजियाती
रूप जोबन की जो गरबीली है व्रज की नारी॥ पाल०॥
(२१) : आज नृप भानुः भवन भानु भवन सिद्ध हुवा जिल्में प्रघटी है तिहूलोक की ये उजियारी ॥ पाल०॥ बारी बारी से मगर धीरेहिलाओं पलना मथुरा थेवारीलली प्यारी है अति सुकुमारी ॥ पाल०॥ .. . ॥ पद ॥श्रीहरिः॥ श्रीकिशोरीजी के जन्म उत्सव की खबर सुनकर श्रीनारदजी हरिगुण माते बीन बजाते यह पद गाते हुए आते हैं । (११) सरकार हमारी राधे , सरकार हमारी राधे., अजी राधे राधे राधे ॥ सरः ॥ १॥ सुंदरी न उनसम कोऊ , किन्नरी परी मन छोहू , छविरूप अनूप अगाधे ।। सर- ॥ २ ॥ रस रास विहारिनि स्वामिनि , कामिनी हरि की भामिनि, हरि ताहि सदा आराधै ॥ सर० ॥३॥ मुनि वृन्द ताहि नित ध्या सव रसिक जासु जलगावें; वोमेटदेतभवबाधे॥ सर०॥ ४ ॥ मथुरेश सदां करजोरैः, रस बस जाके करत निहोरे, रहो सदां भक्त हित साधे ॥ सर० ।। ५।। (१२). दोहा (इन्द्र सभा की चाल में) प्रेम विशारद जानिये, नारद मेरो नामः ॥ श्रीहरि जस के मान बिन , नहीं मुझे आराम । ७ . -
,
(२२)
२ बिचरत मैं जिततित सुन्यो, गगन मांहि रस गान ।।
जन्म लियो श्रीराधिका, रूप रास रस खान ।
३ भयो मोद मेरे हिये , विन दर्शन कल नांहि ।।
धायो हूं आकाश तैं , ब्रज मंडल के मांहि ।
४ धन्य भूप वृषभानु हैं , धन कीरतदा माय ॥
धन रावल जन्मी जहां , लली लाडिली आय ।
५ देव वधू आकाश में , करें मंगला चार ॥
लाली के दर्शन करूं , यह मम हृदय विचार ।
.
॥
[बार्ता]
पाहा आज को दिन अति धन्य सुहायो है । त्रिलोकी में आनंद छायों है।
देव कन्या और गंधवं आकाश में गा रहे हैं । विमानों में पुप्प घरसारहे हैं ।
राबल पुरी आज की सजी है। अमगवती की सोभा लजी है।
यह वृषभानुभवन कैसो सज्यो है । त्रिलोकी को दुख याहि देखदुर भज्यो है ॥
जाचक जन मुख मांगे दान पाय -हे हैं। रंक हु दान पाय धन लुटाय रहे हैं
अब मैं हूं दरस की भिक्षा मागू हूं । लली के प्रेम में अनु रागू हूं।
इतके अनन्तर पद नम्बर (९) गाना चाहिये
(तथा पद)
लली को निरखल देरी कीरतदा लंली को०- यह तो
वासिनी सुख कारणी जग तारणी राधे ।। अव्वल तो
किशोरी श्यामा राजेश्वरी , दूजे रूप निधान ॥ तीजे तो
प्यारी मन मोहनी याने मोहे श्याम सुजान ॥ १ ॥ यहतो.
(२३) अव्वल तो हितकी कारणी , दूजे हरि सों हेत ॥ तीजे गोप कुमारिका दान कान कौं देत ॥ २॥ यहतौ ॥ भक्त हेत अवतार मानोहर तारे भक्त अनेक ॥ श्रीनाथदास गुण कहांलों वरणौ लीला ललित विशेष ॥३॥ यहतो. । दुलार ।। (१४) ॥ श्रीकिशोरीजी का पालना॥ कसभी की चाल में। पलने में झूलैं वो झूलैं लडैती राधा प्यारी ॥ २ ॥ बृषभानु की । झू० ॥ पलनो जडाऊ जडाऊ महलों में अति सोहै। मोहैं.लख ब्रज नार ॥ झू०॥ नारी बिराजै बिराजै बिराजै हुल सानी। मानी खुशीहै अपार ॥ झूका मुखडा ललीको २ लुभावनो जी को। अति नीको सुकुमार ॥ झू०॥ चितवन है प्यारी २ मनों की हरने हारी। भारी यामें रस सार ॥ झू०॥ पलनो हिलाओहिलाओहिलाओ होले होले। खोले अंखियां कुमार ॥ झु०॥ मथुरा' निहारे निहारे आनंद उर, धारै । । । डार, तन मन वार ॥ झ०॥. . -
(२४)
.
(१५) असीसका पद (विहाग)
चिरजीवौ सुख रात लाडिली चिरजीवौ सुख०
१ नित्य बिहारिन हरि सुख कारिन प्रेमानंद विलास ।
लाडिली चिरजीवी
सुख०॥
२ शरणागत रंजनि दुख भंजनि हिय विच परम हुलास ।
रसिकन जीवन प्राण स्वामिनी करुणा ढ्या निवास।
लाडिली चिरजीवौ सुखः ॥
३ चिरजीवहु वृषभानु कीरतदा सखि मंडल सुख वास ।
मंगल मोद सहित व्रज मंडल जब लग धरणि अंकास।
लाडिली चिरजीवी सुख० ॥
४ रहै अधीन सदा हरि याके रिध सिध नित ही पास ।
मथुराकि स्वामिनि छविरस धामिनि पूरिये रसिकन आर
लाडिली चिरजीवौ सुख०॥
यह गाकर नारदजी प्रणाम करके पधारजाते हैं
(१६)॥ श्रीराधा जी के पालने का पद.॥
(नैना लगेरी, उनसेरी आली ) इस के वज़नपर
कलना परैरी ललना लखे विन ।
१ भानु कुमारि सुरतरत नारी। पलना में प्यारी मनकौहरैरी।।
, कलंना परैरी ललना०
२ गात छवीले अधर हँसीले। नैना रसीले मद से भरेरी॥
कलंना परैरी ललना०
३ -- IN मैं + 4 १२५) ३ रसकीयेपुतगरसिक हेत उतरी।गुनअदभुतरीनजानपरैरी॥ कलना परैरी ललना० मथुराकी स्वामिन हरिकी हैभामिनाछविको कृपाविन उरमें ... धरैरी। कलना परेरी ललना, है.', Erientic, (१७) तथा पालना श्रीलाडलीजी का ॥ जराछत्र दिखा के वो जादुगर हे ननर मैं . इम के वजन पर ।। महारानी कीरत की कुंवर बोसुघम्है मन को, लुभा रही नया जलवा आज दिखा रही है सभौं को रसमें छका रही। :::महारानी -कीरत की कुँवर०... :: . १-प्रघटी है भक्तों के काज, यह, हैं कृपा की भारी जिहाज यह । धन धन छटीका समाज यह, कि खुशी जगत में है 'छारही.॥ महारानी कीरत की०, ... २-चितवन है कैसी वो रस भरी, मुलकन, है. प्रेम सुधा झरी, अस झांकी जिसने हिये धरी ,उसे चाह और की नारही ॥ महारानी कीरत की 1-पलने में प्यारी है. सोहती, चर अचर के मन मोहता; जिसे इसके चरणों में हो रती, उसे मुक्ति माल ही क्या रही ॥ महारानी कीरत की० १-है प्रिया ये हरि मथुरेश की, गोलोक बासी हमेश की, धन महिमा है ब्रज देश की, जहां प्यारी दस दिखा रही.॥ महारानी कीरत की - .. .
(२६) (१८)। भौड वधाई श्रीकिशोरीजी के जन्म उत्सव की । तन मन वारियां वे लली छब निरख सुरपुर नार । मुदित पधारियां वे नृपः वृषभानु- भवन मंझार ।। नाचती : अपसरा- वे गावती...गीत मंगलाचार गंधरप कन्यका वे अति ही सुहावनी सुकुमार कहें सुनिये महारानी वाह २ धन्य तुम कीरत रानी वाह लली गुण रूप निधानी राधिका प्रेम प्रधानी भानु नृप अतिवड भांगी पालवध उनकी जागी देव गण चिन्ता त्यागी राधिका पद अनुरागी हम बलि. हारियां वे अनुपम राधा रूप निहार ।। देत वधाइयों वे हिल मिल सारी ब्रजकी नार । आनंद मनाइयां वें पाया निध रूप अपरम्पार ॥ तता था ताथा थेई-वाह २ तान लेले रस दे वाह पर्गन में नूपुर बाजें पखावज मधुर आवाजें ठुमक ठुम ठुम २ नाचैं प्रेम रंग माही रा. गुणी जन गाय रिझावै दान मन माने पावै हिये छवि धारियां वे हरषत मधुरा दास तिहार ।। . . .. " 4. --- १ (१६) ॥ तथा ।। लाडिलीकोजन्मभयोजगमें आनंदछयोवाहर हैअजीवाहर दुःख सोच दूर गयो पायो रसमोद नयो-वाह २ है. " ,
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(२७)
आय ब्रज गोप धाय हरषे सबै दर्स पायवाह है।)
फूले तन'ना ममाय मूंह मांगे दान. पाय-बाह २है.
वाजत निशान भैर. नांचे जन धेर घेर चौह.२ है.'
करती वार फेर नारी नर टेर टेरचाह २
रावल में धूम मची सुर नारी धाय नची चाहूँ.
मथुरा रसरंग रची राजी सुर नाथ शची-वाह २हैं.
!:::TTE AFRICS
(२०),(छटीका पद राग यमन कल्यान)
राधि का सी लाली, दूनी देवी नाहि. भाली आली, छवि
निराली वाकी नैनन समाईगे ॥ राधिका
पूजत छटी है भैया... मोहर रुपैया बाटे., मैंतो ले वलयां,
वाकी कोटि -निधि पाईग ॥ राधिकाISM
लोचन सुडौल बांके, गोरे हैं कपोल वाके, भृकुटी कमान
जैसी, मदन को गाईरी ॥ राधिकाo--॥
सुआ कीसी नाक सोहै , मुख युति मन मो- , विम्बा फल
जैसी सोहै, अधर ललारी | राधिका-1)
मंद मुसिकान प्यारी , मन की हरन हारी , दृष्टि रत नारी
लाख सुधिः विसराईरी. ॥ राधिका०॥
नखन प्रभाऐं जाके कोटि रवि. चन्द्र वार, ब्रह्म ज्योति
वार डारूं,, अजब निकाईरी ॥ राधिका० ॥
महिमा अपार वाकी शारदा हू गाय थाकी, करै मथु-
रेश याकी , पद सेव काईरी ॥ राधिकाosition
excTHI
( २८ )
.
.
23
(२१) किशोरीजी की छटीकी गोठमें भोग का पद।
आज छटी की गोठ सुहाई
श्रीषभानु कुंवर बर जन्मी पूजी. छटी कीरतदा माई
आज छटी की गोठ सुहाई।।
रोवल ग्राम के सव नर नारी प्रजा. राजघरजेमन आई
आज छटी की गोठ सुहाई ॥
ब्रज भर के मुखिया ग्रामननै धाये सभन पाईपहुनाई ।
आज छटी की गोठ सुहाई ॥
जीमन हेतु बने, बहु विजन, नानाविध पकवान मिठाई।
... आज छटी की गोठ सुहाई ।। 3 YE
पेड़ा मोदक पूरी कचौरी तरकारी बहु भात मुंहाई
आज छेटी की गोठ सुहाई ॥
प्रथम भोग धरि श्रीठाकुर के योगावत सव ध्यान लगाई।
आज छटी की गोठ सुहाई ॥
५
2
१ ...
.
(२२) ॥ रसिया की लयमें भोग का पद ॥
नारायण भोग लगाउ लक्ष्मी पति प्यारें।
छप्पन भोग छतीसौं व्यं जन अरे गुसैंया रुच र भोजन पाउ
शिलछमी०॥ ग लोक बासी प्रिया प्रीतम अरे सजनवा
रुच २ भोग लगा। लछमी ॥ श्री गोपाल लाल
श्यामा संग अरे युगलवा हिलमिल हँस रखाउ॥३लंगा
भक्ति के भूके प्रेम के प्यासे अरे मोहनवा शुध्द चहत तुम
भाउ ॥ ४॥ लछसी । सागपात अति प्रेम प्रीत ते, भक्ति
(२१) को रुच रुच खाउ ।। ५ ॥ लछमी ॥ दुर्योधन की मेवा त्यागो-बिदुर सागं मैं चाउ ॥ ६॥ लछमी० ॥ कर्मा की खिलरी रुवि से पाई बान्यो प्रेम प्रगाउ.॥ ७॥लछमी०॥ प्रेम से पाये सुदामा के तन्दुल-प्रभुता को कियो निभाउ ॥ ८॥ लछमी ॥. आपकी संपत आपके आगे-धरै शुद्धकर भाउ ॥ ९ ॥ लछमी ।। तुम्हें पवाय प्रसादी पावै अरे रसिकवा वाहि से तुमारो चाउ ।। १० ॥ लछमी.॥ श्रीनरेश दीन हित कारी अरे विहारी भोजन पाय अघाउ ॥ ११ ॥ लछमी पति प्यारे॥ ३ (२३) दाढी को वचन [दोहा ] वन्दा हरि गुरु पद कमल , बिमल सुजस सुखमूल । ढाढी धायो उमंग सो, सगुन भये अनुकूल ॥ १॥ सूरज बंश प्रदीप जो , भूपति श्रीवृषभान ॥ ढाढी आयो तेहि भवन', पांदन कौं सन मान ॥ २ ॥ त्रिभुवनं वदित राधिका , जन्म लियो सुख रास ।। भानु सुता के दरस की , बाढीहिये अति प्यास ॥३॥ प्रेमाभक्ति प्रचारणों', प्रवटी रू. निधान ।। श्रीराधा बाधा हरण , रसिकन जीवन प्रान॥४॥ । तासु दरस, की लालसा , वढी हियो अकु लायः॥ ढाढी वर चाहत यही , सज्जत सभा रिझाय ॥५॥ -- - , ܪ ܝܬ
(1)
(२४) श्रीकिशोरी जी के जन्म की बधाई
दाढी की तरफ से ॥
मैं ढाढी वृपभानु भूरको कुंवर जन्म सुन घायो ।
घर २ मंगलचारमनोहरनिरख हियोमगनायो ।
जो आदिशक्ति चराचर जगत की कारन है।
असुर विनाशिनी देवों की दुख निवारन है।
दया की खान परम प्रेम की प्रचारन है
ये राधिका वोही गोलोक नित विहारन है।
ब्रह्मादिक देवन अरुवेदन पारनयाको पायो है ।।
हरी जनों को ये आनंद देने हारी है।
इसीके वस में परम पुर्व दो मुरारी है।
इती ने भक्तों की सारी विपत निकरी
ये प्रेम प्रीत की मूरत लली तिहारी है।
धन्य २वृषभानु महीपति तुम्हरोजसजग छायो है।।
लड़ती जन्म की घर घर वजे वधाई है।
ये धन घड़ी है खुशी तीनलोक छाई है।
उमंग अंग में हरजीव के
हुए निहाल
मनो कामना जो पाई है।
मथुरायाकी कृपाकोमँगतावरपायोमनभायो ।।
-
समाई है।
[२५] ॥ रसिया की चाल में ढाढन का गाना ॥
ढाढनिया भरी उमंग ॥ धाई भानु महल ।।
१ लेहु वधाई कीरत माई । अररररररर-॥
(३१) 11 है f . " वढे सा रत रंग-- ॥ धाई०- .२ लाली जाई परम नुहाई ॥ अर०- ", " वारू कोट अनंग- ॥धाई- ३ प्रेम दृष्टिको धनमैं मांगू ॥ अर०-."." ॥ चहै प्रेम को रंग- ॥धाई-. ४ “सगरी संपत भक्तिकी चाहूं ॥ अर०- अरे गुसैयांचहूंनहस्तितुरंग ॥ धाई०- ५ आनंद तीनलोक में छायो । अर०- " " भयो सकल दुख भंग-॥ धाई- ६ सुरत छवीली मुरत रसीली ।। अर०- अरेललीके लोचननवलकुरंग ॥धाई"-. ७ राधा नाम हरे भी वाधा-॥ अर०- . येतौ रहै सदा, हरि संग-॥ धाई ८ चरणकमल मकरन्दलुभाने ॥,अर०-" " मथुराः लोचन भंग-~॥ धाई०- -a- [२६] (ढाढी ढाढिन के मिलकर गाने का पद) नाचै २.रे बृषभानु दरवार । ढाढन ढाढी मोद भरे। नाचैः- ढाढन ढाढी मोदभरे ॥ १-रुपया न चाहै पैसा न चाहैं । चाहैं २ जी ललना को दीदारं ॥ ढाढन ढाढी मोदभरे॥ २-गाऊं रिझाऊंनाचूमै रुचतों। पाऊं २ रेललीलख आनंदअपार ॥ . . *
(१२)
ढाढन ढाढी मोदभरें।
३-लालीतिहारीजगत उज्यारी । प्यागेश्यहरसकी मूरतकुमार ।।
ढाढन दाढी. मोदभरे ॥
४-रसिकों की जीवन कीरत किशोरो भोरी २रेयाको जानो नना ।।
.. ढाढन ढाढी मोदभरे ना
५-कृपादया निधि वेदोनै भाषी । साखी २रे मथुरा बलिहार ॥
ढाढन ढाढी. मोदभरे ॥
1-
(२७)॥ ढाढी ढाढन का मिलकर गाना ॥
॥ रसिया की चाल.मैं॥
हां हां लडैती जन्म लियो । श्रीभानु भूप घर आय ॥
लडैती जन्म लियो ।
मंगल छायो त्रिभुवन माहीं । अरे किशोरी छवि पर
मदन लजाय ॥ लडेंती जन्म लियो ।
ब्रज मैं घर घर बजत बधाई । अरे सुहाई अदभुत रूप
लखाय ॥ लडैती जन्म लि.य॥
सुर नारी याकी महिमा वरण । अरे कि हिल मिल रही.
'पुष्प वरसाय ॥ लडैती जन्म लियो॥
-ढाढी. ढाढन नाचें गा 1.अरे कि सत्रही. मन इच्छा::.
फल पाय ॥ लईती जन्म लियो॥
मथुरा कहैं राधिका छवपरः। अरे-मदन की सोभा: रही..
लजाय ॥ लडैता जन्म लियो ॥
..
-
(३३) (१)श्रीजानकीजीकी बधाई (कसूभीकींचालमें) । छाई वधाई २ जनकपुर मांही, जन्मी सीतासुकुमार॥छाई०॥ वाजे नगरमैं २वज द्वारे, ना. गावै पुर नार ।। छाई० ।। १ ।। राजा जनकजूरकनक लुटवाये, पन्नामोतियन हार ॥छाई०२।। लक्ष्मी भवानी २ब्रह्माणी इन्द्रानी,लाजी रूपकौनिहार॥छाई०३ स्यानी वो ज्ञानी रजनक महारानी,तनमन दियो वारछाई०४ पूजी छटीहै २मिठाइयांवटीहैं,शुभघरियां विचार॥छाई०॥५॥ पलने विराजीरलली भई राजी,देखै आँखियां पसार॥छाई०६॥ मथुरा निहारे २ निरख मन वारै, या मैं दया है अपार ॥छाई बधाई जनकपुर मांही ॥७॥ ॥ (२) ॥तथा बधाई गज़ल की चाल में ॥ मिथला पुरी मैं मोद वधाई है छारही । प्रजा भरी उमंग से खुशियां मना रही ॥ भिष. २ सुन जानकी का जन्म मगन देव गण सभी। बरसारहे सुमन हैं अप्सराऐं गारही ॥ भियः ३ राजा जनक विदेह भी आनंद में मगन । सच मुच हुऐ बिदेह खबर तन की नारही। मिथ. ४ पूंछौ न महारानी के मन की उमंग को । है लख किशोरी छब को ख़जाने लुटा रही ॥ मिय. -
(३४)
५ निधन रहा न कोई मूहं मांगा दान पाय ।
दातारी लख कुवेर की संपत लजा रही। मिथ
६ घर घर में होरही है खुशी धूम धाम से ।
आनंद की धुनी है दसों दिस समा रही ।। मिथ.
७ जो आदि शक्ति सृष्टि का कारन निगम कही।
अंघटी जनक भवन मैं है जलवा दिखा रही ॥ मिथ.
८ मथुरा भी हाथ जोड़ के मांगै कृपा का दान ।
दिलकी कली को हंस केलली है खिला रही ।। मिथ,
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(३) श्रीजानकी जी का पालना राग सोहनी ॥
पालने मैं झूलती श्रीजान की जग बन्दनी । छब अनू
पम रूप निधि तिहु लोक आनंद कंदनी ॥ १ ॥ शेष शिव
ब्रह्मादि सुर जिसका करें सुमिरन सदा । विश्नु अर्धादी
सोही प्रघटी जनक नृप नंदनी ॥ २॥ असुर बंश बिनाश
कारणि सुरन ताप निवारणी । संत जन हित कारिणी धन
धन्य दुःख निकंदिनी ॥ ३ ॥ प्यारी चितवन मन हरण
बहु सुख करण अति मंद हास । बदन सोभा सदन श्रीमिथि
लेश नृप कुल चन्दनी ॥ ४ ॥ पालने के हालने में वाल
की सोभा विशाल । माल क्या वो उर्वसी अति सुगति
मत्त गयन्दनी ॥ ५॥ मनका माणिक वारकै मथुरा कहै
झांकी निहार।होमुबारिक श्रीजनकतुम कौयेमैथिलनन्दनी।
(३५) ॥ श्रीगंगा जी के जन्मोत्सव की बधाई ॥ (रंग भीना तेरी आँखडली गोरी पर जाद् डारारे ) इसके बजनपर जय जय जय जगदम्बे गंगे भवभय भंगे अघ हारन । शिव अर्धगे पावन अंगे विमल तरंगे सुख कारन ॥ जय० ॥१॥ दरस परस तुम्हरे जो पाता गर्भ माहिं फिर नही आता ॥ भुक्ति मुक्तिदाता विख्याता माता आप तरन तारन।।जय०२॥ अमृत हू तें स्वाद तिहारो जल तिहूं ताप हरन हारो ।। कबहु न देखे जमको दारो करे नामतेरो उच्चारन ।जय॥३॥ जो जन गंगा मांहि नहाते तिन के पातक मिट जाते ॥ आते जाते फिर नहिं जगमैं धन्य २ जन उध्दारन ॥ जय०१॥ मुक्ति निशानी गंगा रानी महादेव की पटरानी ॥ सकुचानी निगमागमवानीमहिमाबरणतमत वारन।।जय।। सुख देनी वैकुंठ नसेनी पैनी पापन की छैनी ॥ श्रीमथुरेश चरण रति देनीप्रेम सुधा रस बिस्तारन॥जय६॥ mmm (२) ॥ तथा बधाई॥ (बना म्हाने प्यारो लागैहे ) इसके वज़न पर ॥ भागीरथ अति बड़ भागीहे (एमाए ) जग तारन श्रीगंग, संग जाके रथ के लागी हे ॥ चहूं दिस छाई बधाई हे
(३६)
(एमाए ) गगन मंडल रहे छाय , देव गण मन अनु
रागी हे ॥ १॥ सदा शिव जटा बढाई हे (एमाए ) सुर
सरि सीस चढाय , भये बड़े जस के भागी हे ॥ २॥ पतित
जन पावन कारी हे (एमाए) काल मल नासन हारि ,
सुजस
गावै सन्त विरागी हे ॥ ३॥ध्यान तैं हि भव दुख
भागै हे (एमाए ) दरसपरस अस्नान., किये जम चिन्ता
त्यागी हे ॥ मगन मन मथुरा गावै है (एमाए ) पावै
हरि पद नेह , मात सै ये भिक्षा मांगी हे ॥ ५ ॥
(३७) (१.).. अथ सांझी लीला के पद).. कान्ह "वृषभानुः भवन सांझीको देखने आये इसहि मिस गोरी किशोरीके हे दर्शन पाये। कान्हें ।। १॥ प्पारीने प्रीतसे इस रीत सजाई सांझी विश्वकर्माभी जिसैदेख बहुतं लजियाये ।। कान्ह ॥२॥ जल पै थल जैसा बगीचाहै बनाया क्याखूब वनजो नंदनहै इसेदेख वोभी शरमाये ।। कान्ह ॥ ३ ॥ बेल फल फूल सजी हैं वो पने कैसे खूबी कहनेको जुवा कोन कहांसे लाये ।। कान्ह ।।४।। 'प्पारी के हाथंकी लख श्याम ये कारीगरियां । बोले अचरज से कहो किसने ये गुन सिखलाये॥५॥ हँसके पारीने कहा सुनियेजी प्पारे मथुरेश आपकी दृष्टिने येआपही गुन उपजाये॥ कान्ह ॥ ६ ॥ - १ - . (२) ॥ तथा पद पीलू बरवा ॥ सांझीहै सजाय रह्यो सांवरो सुजानरी वारै मैया मोदभरी तनमनधन प्रानरी ॥ सांझी० ॥१॥ नारो पारो सोसनी गुलाबी मोतिया सुरंग "। नानाढंग रंग भरे रच्योहै विमानरी ॥ सांझी० ॥२॥ देवनारी यामें बैठी सुन्दरी अनूठी सारी ....... । चलत-विमान मोहैं प्यारी मुसकानरी सांझी० ॥ शा बनके निवासी धाये रावलपुरी के बासी दरसकी प्यासी नारीधाई चढ यानरी। सांझी० ॥४॥ - .
(३८) कीरतके संग प्यारी धाई है उमंग भरी प्यारे जूनेआप कियो भारी सनमानरी ॥ सांझी० ॥ ५॥ प्यारी बोली आली येतौ नारिनको, काम जाने । चातुरीको याहि देख त्यागिये गुमानरी ॥सांझी०॥६॥ मोहे सुन प्रीतबानी प्यारी की गुमानी हरी मथुरानेगाई मीठी लांझी कीये तानरी ।। सांझी०॥७॥ Lear (३) ॥ तथा पद॥ सांझीखेल विचित्रवनायो,रचनाचतुरकिशोरीरुचिसौंतांझी० चौरासीलख थंव कनक के, रचिके रतन जडाव जंडायो॥ लता पतनसे मंडित तरवर , विविध कुसुमयुत वागलगायो। द्वारे पांच प्रवेश के राखे , घुसैजो मांहि रहै भरमायो॥ पंथअनेक लुभावन जियके, गयो सो गयो वगद नही पायो। जावैसोहि चकित रहजावै, चक्कर खाय रहै बिलमायो॥ टिकट लेत जोहरिभक्तीको,सोनिकसै अति मन उमगायो।। मथुरा कहै गहन ये सांझी , याको भेद रसिक जन पायो वार्ता इमपदका भाव यह कि महा माया, शक्तिने संसार भो रचाहे उसमें चौरासी लाख योनियें जीवोंके भ्रमनाके वास्ते रखी कामक्रोध लोभ मोह मद पांच दरवाजे बनाये इनके द्वारा प्राणी चौरासी में प्रवेश करै निकसना काठन केवल वोही चौरासी से निकल सकताई जिसने इरिभक्तिका टिकट (पास) प्राप्त करलियाई अन्यथा विषय रूपी मुंदर बगीचमें,चौरासीमें चक्कर खाया करता है 1 -
(४) सांझीकी ग़ज़ल
सांझी रची निकुंज में सखियों में रसभरी ॥
चक्रित हुए विचित्र छबी देख श्रीहरी ॥ सांझीरच०
मूरत बनाई प्यारी की सूरत लुभावनी ॥
आंखें रसीली मान की हालत में रस भरी ॥ सां०॥
विन्ती करें चरन में पड़े प्यारे सांवरे ॥
मूरत सजीली ऐसी तहां सामने धरी ॥सां०॥
चतुराई कलकी एक थी उस में अजीब यह ॥
नैनौं से युगल रूप के रसकी झरै झरी ॥ सां०॥
रचना यह अजब देख के मोहे तुरत ही श्याम ||
लख मान में प्रिया को सुरत तन की बीसरी ॥सां०॥
मथुरा निहोरै प्रेम दशा श्याम की निहार ।।
जैजै रसिक उचारे करें धन्य यह घरी ॥
(५)
तथा
॥ परम रसिक महानु भाव डिप्टी राजा लाल जी रचित ॥
सांझी पूजत नवल किशोरी ।। आगे पाछै भीर जुवतिनकी
नवरुत साज अंगारे गोरी ॥१॥ धूपदीप नैवेद्य मिठाई
अगर तगर केशर ओर रोरी ॥ सखी बन आये मदन मोहन
पिया, ओढे नवल पीतांबर खोरी ॥२॥भये मनोरथ सबके
पूरण हँसहँस कहें आई नंद छोरी॥दासी हरष उतारे आर्तो
जीवनधन मेरी यह जीरी ॥
(४०)
(६)
तथा.
आज सखी कुंजन में देखे नंदनदन वृषभान ललीरी॥
सांझीके हित वीनत डोलतसुमन वाटिका कुसुम कलीरी॥१॥
शोभा सागर नागरी नागर संग लिये दस पांच अलीरी॥
चित-वतही चित थिरनारयोसखी, प्रेम प्रीत कीवेलफलीरी
निरखरही इकटक मोहन छवि नयनन अँसुवन धार चलीरी॥
अंजुल भरभर कुसुमनवारूं प्यारी जोरी सुघर भलीरी ॥३॥
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(४१)
... .. अथ रास बिहार के पद
॥ मांड।
::परदेसी ढोलारे आनतो जगाई परिननींद में | इसके नजनपरः ॥
नंदजीके छैलारे बसी क्यों बजाई जमुनातीर प्रै ॥ तंदजीके।
तेरी वांकी अलंबेलीरे छैला झाँकी प्यारी लांगै जमुना तीरपैं।
दोहा पहलेतो मन हर लियो मधुरे वचन सुनाय ।।
ज्ञान ध्यान सिखवन लगे अब ये कैसोन्याय ॥ ::
तेरी बानी कपटीलीरे छैला नीकी नाहि लागैजमुना तीरपै ।।
झूटे.पति को सेवनो , सांचे पति के काज ॥
सांचो मिलैंतो नारि को कहा उचित महाराज ।
तेरी बुद्धि तौ नवेली छैला हमैं ना सुहावै जमुनातीर पै ॥
गाढी रंगत प्रेम की , फ्रीके संब उपदेश ।।
पालै सांची प्रीत को रसिक राज मथुरेश ।
तेरीआँखतो रसीलीरेछैलातीरसेंचलावैजमुना तोरपै।।नद०॥
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..
(२ - ग़ज़ल
छुमक छुम छुम ठुमक ठुम ठुम न. घनश्याम बनवारी ।।
द्रगन ताता तंता घेई तथा थेई,थेई गत न्यारी ॥छुमक०॥
उधर बंसी की धुन सुन सुन हुवे. रस मग्नं सुर नर मुन ।।
इधर छुम छुम की आचार्जे अनोखे गुनभरी सारी॥छुमका
हज़ारों, गोपियों में, हर हाज़रौं : रूपको धर कर ॥
सभी कर में कर देकर नचैं पूरन कलाधारी ॥ छुमक
(४२) A किया जव मान सखियोंने हुवे तत्काल, अन्तर ध्यान ।। सुता वृषभानुकोलेकर जोथी.सवमें अधिक प्यारी।। छुमक०॥ प्रिया जी को हुवा जव मद हुए गायव निठुर बेहेद । कियाजवसबने मद कोरदतीप्रघटे काममदहारी छुमकः॥ मदन लजित हुवा. निर्धन शरण. आया. वो मोहन की। चरन मथुरेश के पकडे. हुवा भक्तीका अधिकारी ॥छुमक० ॥ -- see (३) ॥ पीलूबरवा ॥ ... (चांसुरी वनावै श्याम माधुरी लतान में इसके वज़न पर) वावरी वनावै कान्ह गाय मीठी तानरी । तून जा गुमान भरी मेरी कहीमानरी ॥ वा०॥ वांसुरी मैं रागगावै प्यारो अनुराग़ भरे । सुन होतो त्याग बैठी लोक कुल कानरी॥वा०॥ नारदं हू शार्दा हु सुनि धुनि सुध भूले।.. भई सारि देव नारि रस में गलतानरी । बा०॥ योगिन समाध त्यागी लागी है लौ रागनी मैं सव अनुरागि भये शंभु,त्यागोध्यानरी॥वा० ॥ घायल बनाय छोड़े जात मुख नाहिं मोडे । तोड़ें मथुरेश प्रीत ऐसी वाकी वान री ॥ वा० ।। .. . . نر . चौताला,(ध्रुपद.... (४) आज ब्रजचंद नन्द नन्दनं आनन्दा 'कंद। मधुर अमंद ऐसी बांसुरी बजाई है। आज (४३) . IN . सुरतगविसराईसी तुरंत सिधाईनार । उलटे सिंगार धार अति घबराई हैं। आज प्रेमामंतवारी सारी.धाईबनवारी पास 10 शिप्रेमहीकी फांस गाढे बांधे यदुराई हैं। आज ! "प्रेम उपदेश याही रीत मधुरेश दियों गोपिनके संग रासकियो श्री कन्हाई है।। आज ॥ . - ॥ राम पंचाध्यायी का सार ।। 7 14. PIC 4.4 the MAL . : रास लीला का पद : रांस रच्यो छबि रासि रसीले दोउ छबीले पिय अरुं, प्यारी द्वग हुलास मद भरे नसीले हास हँसीले युगल. बिहारी ।। वेणुमैं लैलै नाम पुकारयो अति व्याकुल भयो प्राणविचारो। बेसुध होय.चली जहां प्यारो मतवारी सब-गोप कुमारी धन वृन्दावन परम सुहावन तीन लोक पावन मन भावनः। तहां सुहाई सकल सखी गण हँसन चलन चितवन न्यारी २ ।। कहीं श्यामाअभिराम बाम तुम कौन काम धाई बन माही ।। यामिनि मैं विश्राम समैया पति सेवै सोही धनः नारी हा सुन कठोर चित चोरकी बानी अति घबरानी भई हैरानी । वोली एक सयानी प्यारे। क्यो ठानी, निठुराई बिहारी ॥ आप बुलाई तब हम आई.निजकी प्रतिज्ञा क्यों बिसराई। जगके पति तुम कुंवर कन्हाई, सांची पति सेवा हम.धारी ।। सुन डेढ़ बचन प्रेमके पागे हरि दुख भंजन मन अनुरागे ।
(४४) रसबस गावन नाचनलागेजिम शिशुनिज प्रतिबिचनिहारी॥ दरस परस रसलेत परस्पर नृत्य करत तातो थेई गत भर । देख गरब गोपिनाउर गिरधर गुप्त भये सँगले निज प्यारी ।। भरी प्रेम सदः जबहि. किशोरी, वाहूको संगत हरि छोरी। सकल सुंदरी हैरत बन बन, खोज कित प्यारे बनवारी ॥ विनय करें काहूं मिल रोदन कहैं पुकार पुकार वियोगन। कृपा करो प्रभु तृभुवन बन्दन हाहा नाय दीन हित कारी ॥ अतिआतुर लख गोपीजनको त्रसितभयोमन अतिहिमदनको गह्यो चरण तब मद मदनको प्रवटे हरि सव भये सुखारी ॥ महा रास तब श्याम रचायो अति आनंद हिये सर तायो। अंक अंक भर रस बरसायो पूरण-चंद्र छई. उजयारी ॥ द्वय द्वय गोपी बिचबिचं नटवर मंडल मध्य प्रिया संग गिरधर । मुरली धुन नूपुर रव मनहर नचत गोपिका दैदै तारी । कोई मृग 'कोई सारंगी कोई बजावत गत मोहचंगी तान लेत कोई नयन कुरंगी पान करत कोऊ छबिरसठारी ।। चंद्रभयो थिर मोदछयों चिर निरखत सोभा चकित रहे सुर । जमुना बहतरही भई इस्विर चलंत समारधीर श्रम हारी।। शुक मुनि रास पंचअध्यायी बरणी सो रसिकन मन भाई मथुरा प्रेमासहित है गाई युगल चरण पर पलपल वारी १५॥ .. . IT ATM H (६) ॥ तथा पद ॥ सांधा तेरोरी यह लाल मेरेघर नित्य आता है। इसके वज़न पर । रसीला रास रसलीला हरी हस हस दिखाता है । 'उसके बैंसमैं सब, खुद प्रेमियों के बसमें आता है ।। रसी m 40 bad. हैं .
- (४५) दोहा-प्रेम राज्य मैं निज भवन, बृन्दावन सुखःपुंज । . गुंजे रसिकन मन भ्रमर तहांसो नित्यनिकुंज ।।.. वहां आनंद प्यारी:संग बनवारी मनाता है। रसी० ॥ १ ॥ ओ रांग अरु रागिनी, हाजिर. हैं .छत्तीस। .. रितः वहार विहार सुख, संपत बिसवा. बीसः॥ सिवा अनुराग सोदा, दूसरा बिकने न पाता है। रसी० ॥ २॥ चित्त उमंग हुलास ते रास रंग नित गान । ... अट सहेली संगले करें मिया उत कान ॥ मधुर मुस्लीके सुरमैं मीठी २ तानं गाता है । रसी० ॥ ३ ॥ गीत युक्त संगीत धुन, मन मोहै। ततः काल ; 1: कोई करताल बजावती , कोई नाचे दे ताल ॥ इंगन तातात.ताई ये गत तबला बजाता है। रती० ॥४॥ -उमड़ घुमड़ चहुं ओरते , मद माती ब्रज बाला ।। मंडल कर कर नाचती बिच बिच राजैलाल।। अनेकन रूपतै मोहन सखीजन को रिझाता है। रसी० ॥ ५॥ , छुम छुम बाजें पैंजनी , रुम झुम नूपुर पाय । छुमकछुमकठुमठुमधुनी,मुनिमनलेतलुभाय । येअद्भुत प्रेमरस मथुरेश रसिकौं को चखाता है ॥ रसी०॥६॥ . 1 . - ENTER (७) ससका पद दादरा बृन्दा बिपन मैं राधा रमण करते रास ॥ धन मन मगनः वो सुंदरियां आस पास है | बृन्दाना आनंद कंद प्रेमके फंस रहे। सुन सुन के मद भक्ति विमुख जन उदा (४६) स हैं ॥ वृन्दा० ॥ १ ॥ प्यारे की है मुंक्ट की लटक: सी सोहनी । चितवन है मनकी मोहनी क्या भ्रूविलास ॥ बृन्दा० ॥ २ ॥ प्यारी की है वो चन्द्रिको दिल की लुभा- वनी मनभावनी वो छबहै अधिक प्यारे हास हैं ।। वृन्दा०॥ ॥३॥ नटवर का पीतपट है सजीला बहार दार । प्यारी के अंग सारे रंगीले लिबास हैं । वृन्दा० ॥ ४ ॥ क्या 'ता- ल सुरके साथ मैं वो नृत्य गान है। हरतान मैं अदा के मजे खास ख़ास हैं । बृन्दा० ॥ ५॥ चेहरों पैं पसीना है परिश्रम से नृत्य के । रविचंद्र रस अमीसे भरे बिच अका- स हैं ।। बृन्दा०॥ ६॥ श्रीव्यास-पुत्र साथ हैं धारे सखीका रूप । कहि सूरदास नंददास चर्णदास हैं ।। वृन्दा० ॥ ७ ॥ मथुराने झांकी रास की पाई जो ध्यान मैं | वढने लगी है आस हिये मैं हुलास है। बृन्दा०॥८॥ ॥ 1. . ५ (5) तथा.पद ॥ (देवरिया पारलगाय नदिया चटिआई । इस चाल मैं) मोय रसिया रास दिखाय बौरी कर डारी ।। मोय०॥ बृन्दा विपन सघन कुंजन मैं । अरी मोहनवा बंसी दई बजाय || बौरीकर०॥ १ ॥ सुनत सिधारी राधा प्यारी। अरी खि- लारी सखिया लई बुलाय ॥ बौरीकर० ॥ २॥ हिल मिल रास-रंग-सर सायो। अरी लुभायो मनहर लियो रिझाय ।। बौरीकर०-१.३॥,मधुर मधुर बहु तान सुनाई। अरी नचाई 1 .
(४७) बनिता सुंदर काय || बौरीकर० ॥ ४॥अस रस लीला मैं लख पाई । अरी कन्हाई सटक्यो चितहि चुराय ॥ बोरीकर० ॥ ५॥ खोजत वाको बन २ डोलौं । अरी न बोलू कछू न मोय सुहाय । बौरीकर०॥ ६॥ जित तित सखियां फिरें दिवानी । अरी गुमानी कितगयो देहु बताय ॥चौरीकर ॥७॥ श्रीमयुरेश प्रेम परखैया । अरी बलैयां, लेउंगी पर२ पाय | बौरीकर० ॥८॥ ॥ ॥. । - (E) इस नाटक की चाल मैं ॥ (बन वन राज श्रीब्रजराज नये नये साज सजे ) गिरधरनाचे सखिन के संग नटवर रूप धरे। बांकी अदा दिखाय', चितवन में चित्त' चुराय , बसी मधुर बजार्य, फंदे मैं ले फसार्यः ॥ यमुना तीर', बटकी छैयां , कर गल बैयां, नाचत सैयां बलकोबीर"॥ लटक दिखा के , नाच के गाके', 'सवहि रिझाके होतबहीर ॥ अभिरामं, छबि धाम , घनश्याम , वोही पीर हरै ॥ १॥ वृन्दा विपन मैं रास , वो नित्य रस विलास, करैं रूप छबि निवास, ब्रज गोपिका हैं पास , प्रेम जंजीर , सब को बांधै , हित को साधे , प्रेम पंथ मैं धीर गंभीर , सुंदर, नटवर', मनहर , सुरवकर , दिलंबवर गिरधर श्याम शरीर ॥ सिर ताज ब्रज राज , पूरै काज, मधुरा पविपरैः॥ गिरधरः ॥ . . disini Arti
(४८)
1
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॥ तथा पद ।।
च्यो श्रीवृन्दवन रास गोविन्द । इस के बज़न पर )
रज्यो श्री बिहारी जूनै प्यारी संग रास ॥
सारी जनारी हिये उमंग हुलास ॥ रंध्यो ।
१ सारंगी मृदंग बीना गोपिका प्रवीन
बांसुरी नवीन सोहै सुभग विलास ॥ रच्यो० ॥
२ तारी देदे नाचै कान्ह गावै, मीठी तान
इत मुलिकान मोहै उत उपहासं ॥ रच्यो०॥
३ दोय दोय गोपी विच सोहै गोपीनाथ ॥
हाय मांहि हाथ लिये सहित विकास || रच्यो ।
४. सीतल समीर धौर कालिन्दी की तोर ॥
रजनी,की पीर हरै शशि को प्रकास ॥ रज्यो०॥
५ नारी भेत धारी सोहै शंभु तृपुरार
जावै बलि हारी लखमयुरा खवास ॥ रच्यो०॥
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.
,
(११) नाटक की चाल ॥
( पल पल तन मन धन वारों री ॥ इस बज़न पर )
रस भरि अस धरिः घन मानौ री
बसोवारो जग उजियारो, कानन में ताननसे रस बरसायः
रझो गोपिन प्रात
लुभानोरी ॥ रस भरि०
। ४६ )
॥
मन्दके नदन संग सखियां उमंग भरी । नाचत मन
हरषानोरी || रसभरि अस घरि धन मानोरी ।।
राधेरानी सबमैं स्यानी पियाको रिझायरही। मंद हास,
प्रेमफांस डारिप्यारि, बसमैं मुरारि कियो मथुरा
सुखारि हियो गावत प्रेम तरानोरी रसभरि ॥
son
noo
(१२) रास लीला के सिद्धान्त का पद.
॥ नाटक की चाल ॥
(नैनोंने तेरे कटारी मारी जिय कारी || इस के वज़न पर')
ठानी गुमानी अनंग से जंग बिहारी ॥
उसे मात दिया, भारी घात किया, रति नाथ हिया, पछतात
जिया, घबरात बात जात ॥ ठानी गुमानी अनंग०॥
कही श्याम से आय के कामदेव, सुरनर नहि पायो तुमरो
भेव, मोहिं जीते बिना कस, सुजस लेव, कही . कान,
धर ध्यान, रण ठान, नादान, बनी काम की फौज
हजारौं नारी ॥ ठानी गुमानी अनंग से०॥
बन मैं हरीने आ. बंसी बिगुल दिया, सेना को साथला
हाज़िर मदन हुवा, निरखत काम, तीखे नैना-बान चलावै
मन हर सुंदर सारी बाम, रास रंग मैं सबहि रिझाया आप
न आये बस में श्याम, काम लजांया मन शरमाया सारे
शस्तर भये निकाम, कदम गहे मथुरेश के उसंदम गया
धामजपता हरि नाम, बनि काम की फौज॥
.
( ५०) 40 (१३) राग हमीर का ज़िला निरतत ढंग है ( इसके वान पर ) पुलकित अंग है प्रिया बदन चंद्र चकोर प्रीतम नैना नटखट तजत भ्रमना, रूप रस के पान करन मैं मानौ चंवल भंग ॥ पुलकित अंग हे ॥ १॥ मुसकात मंद लुभावै भामिनि, प्यारे को मन हरत कामिनि, श्याम सुंदर अंग निरखे श्यामा उर, उमंग ॥ पुलकित अंग हे ॥ २॥ करै नृत्य स्वामिनि, लजत दामिनि, भेघ युति घन श्याम दरसैं, दोउ हिल मिल नचत हरपैं, मधुर वजत मृदंग ॥ पुलकित अंग हे ॥ ३ ॥ लजै सूर श्याम प्रभा विलोकत चंदू प्रिया मुख लखत सकुचत रास रंग अनूप सरसत मथुरा लोचन दंग ॥ पुलकित अंग हे ॥४॥ । raree (१४) ॥ तथा पद ॥ ( रच्यो श्रीवृन्दावन रास गोविन्द । इस के बज़न पर ) नाचें श्री बिहारी प्यारे श्यामाजूके संग सखिन हिये मैं धारी भारी है उमंग ॥ ना.०॥ सारंगी बजावै कोउ नार है सितार . . .1. कोऊ इकतारो.कोई खंजरी मृदंग ।। नाचें ॥
' (५१ ) 14698 . . कोई गोपी दे३ ताल कोई नाचें बाल चालमैं बजावै मीठी कोई मोहचंग ॥ नाचें ॥ बांसुरी बजावै कान्ह मोहै वाकी तान । लख मुसकान उठे कामकी तरंग ॥ ना. भाव को बताकै गाकै प्यारी को रिझाय । नाना गत नाचैं प्यारे राचे रस रंग ॥ नाचैं॥ युगलकी शोभा लखि लोभी मन दंग मथुरा छबी पै वारै कोटिन अनंग ॥ नाचैं। %3D ॥ . - । ॥ राग चौताला ॥ ,॥ परम रसिक महानुभाव 'डिप्टी राजालालजी रचित ॥ रास में राधिकालाल नटवर बनी, धार पिया भेष शुभ केश कवरी खुले ललित नव पीतपट मुकट कटि काछनी ॥१॥ कियो अंगराग अनुराग मृगसार को बजत सुख पूर नव मुलिका की धुनी ॥ नचत दोऊ रसिकवर जोर मंडल सुघर लेत गत सप्त खर लजत जग के गुनी ॥ २ ॥ बजत मंजीर मृदंग ढप चंग जुत कुणित नूपुर बलय चूरी ओर किंकणी ॥ जुगल भये कृष्ण यह प्रश्न जुवती करें कौन याम सखी कुंज भूषण मणी ॥ ३ ॥ बाड्यो रस हास सुख रात में सुन संखी जान नासकत को - (५२) ॥ खामी को स्वामिनी ॥ थकित भयो चंद्र लख रहस आनंद को चकित भई वृजबधू प्रेम के रँग सनी ॥ ४ ॥ तता थेइ..तता इ.शब्द सव.उच्चरे गान ओर तान में सकल चूढामनी ॥ उमड्यो आनंद को सिंधु अलि तासमें दासी भई प्रेम बस बाढी उत जामनी ॥ ५ ॥ wees op een andere :: ( चौताला) आज मोहन बने भामिनीरास में ॥ खामिनी राधिका लाल नटवर वनी लखत छवि जुवती भई मगन रस हासमें ॥१॥ जोर मंडल नचत बज़त नव मुलिका ऊंचे सुर लेत सखी अधिक हुल्लास में ॥ श्रमित दोऊ जान सुख मान विजना करत दासी मन. मुदित.सखी ठाडी-अति. पास में ॥ २ ॥ .
(५३) का । .१... ॥ राग बसन्तः॥ आई बसन्त कंथ मन मोहन अन्तहि मौज उड़ावै ।। हम विरहन योगिन बन बन वन पिय पिय टेर लगावें। नहि सोहत केसू फूले ॥ नदनन्दन हमको भूले ॥ मंजरी आत्र तरू छाई ॥ गरंबीली अति इतराई ॥ बनवारी विन सखि फुलवारी लखत हियो मुरझावै ॥आई॥ हम पीतमके रस पागी॥ भटकत बन मांहि अभागी वन डोलत नारि नवेली ॥ मदभरी निपट अलबेली ॥ देख अकेली मदन बली हूँ अबला देह जरावै ॥ आई० ॥ नदियन तट वाग बहारी ॥ बिन मन मोहन नहि प्यारी अति रूखी कोयल बानी ॥ यह पवन करतहैरानी : सन्त कोई मथुरेशको जाके खबर बसन्त सुनावै ॥ आई०॥ tak FO + (२) ॥ राग बसन्त बहार ।। मोरे जियमैं बसन्तकी बसन्तकीः भई उमंग ।. निरखे .मन, मोहन , प्यारी. संग. 1.. ....युगल बसन्ति.. बसन तन धारै.. सुमन. लसत हैं. दोउ के अंग ।। भोरेः ॥१॥ .हार. सिंगार केसू. बन .फूले लख.के.मदन की.उठे. तरंग ॥.मोरे० ॥२॥ पिया....प्यारी : बिह.. उपबनमें.. - - . । -- . -- - . (५४) दशन तैं दुख होय भंग ॥ मोरे० ।। ३ ।। चंपा चमेली गुलाब फूलन को बानं लिये कर डोलै अनंग ॥ मोरे० ॥ ४॥ बसन्त में. दंपत काम वली से ठनी जंग ॥ मोरे ॥ ५ ॥.. श्री. मथुरेश राधिका : गोरी भीज रहे दोऊ प्रम. रंग ॥ मोरे० ॥ ६. खेलें: फाग (३) राग बसन्त विपिन विहार बिहारी विहारन करत हरष अधिकाई ॥ तान बसन्त बान रति पतिने मुनिन समाध डिंगाई. ।। नांना वरण सुमन वन फूले सोभा बरणी न जाई । केसू हार सिंगार कुसुम सब रहे तरुन पै छाई ॥ वि. वेला बेल चमेली आदिक लता . तरून लपटाई सुरभि सुगंध सरस मन भावनि मदन लुभावन आई ॥ वि०. पतिम अंग बसन्ती जामा पाग बसन्ती सुहाई ॥ चपला विपुलं प्रकास रहैं जिम धन मंडल मैं छाई ॥ वि० प्यारी अंग बसन्ती सारी लाख रति अतिहि लजाई ।। कुसुम शृगार युगल तन उपमा का से बरणी जाई ॥ वि वनी ठनी मृगलोचनि सखिया झुंड झुंड चल आई ।। राग वसन्त उचारै हिल मिल बाजे विविध बजाई ॥ वि० उमंग भरे' मथुरेश लाडिली संग रमैं सुख दाई ॥
(५५)
विरलो कोऊ धन्य रसिक जन निरखत छबि बल जाई। वि०
%3D
॥
(४) राग बसन्त बहार
रितु राज बसन्त को सुख समाज
लख चकित युगल मन मुदित आज
१ बन बन छबि हरष निहारै
तन धारे दोऊ रुचिर साज़ ॥ रितु० ॥
२ गोपी दल कर मंडल नाचें
युगल मध्य मैं रहे विराज ॥ रितु० ॥
गावै राग वसन्त मेनावें
काम के बसतजदई है लाज़ ॥ रितु० ॥
१ जा सुख को सुर गण ललचावै ॥
ब्रज युवतिन सो सुलभ आज । रितु० ॥
५ श्रीमथुरेश प्रेमके रसिया
क्रीडत हैं रसिकने के काज ॥ रितु० ॥
=
॥
३
.॥
11
॥
॥
(५६)
* होली लीला प्रारंभ *
धमाल सारंग
नन्दके मेरी आज भिजोई सारी ! नन्दके.
पनघट पै मोहिं देख अकेली (होरी आली) होरी होरी
कहि मारी पिंचकारी ॥ नन्दके० ॥ १॥
लै गुलाल मेरे अङ्गमें मल्योरी ( ) अखियां मूंद
वजाई तारी । नन्दके ॥ २॥
चोली मसक मरोर डारी वैयां ( ) अंग लिपट
बोल्यो वलिहारी। नन्दके. ॥३॥
मैं भोरी कछु हू नहि जानूं (.:, .) छली आज वा
मुकुट धारी ॥ नन्दके० ॥ ४॥
मथुरा मैं जाऊं कंस राजा पैः (:, :) चलौ संग
सव ब्रज नारी ॥ नन्दके० ॥ ५॥ ...
होली काफी
मोहन अजब खिलारी । देख होरी कौतुक भारी ॥..
माया मोह जाल के माहीं
सृष्ट फंसा कर सारी
दिखलावत नित नये तमाशे चतुरन बहुत विचारी,
बुद्धि सवकी पचहारी ॥ १ ॥ मोहन० ॥
जाको दरस कठिन योगिनको जपत जाहि त्रिपुरारी
नरतन धर सोई नटनागर सुन्दर श्रीगिरधारी,
नन्द सुत कुंज बिहारी ॥ २ ॥
(467 . मन मटकी भर प्रम रंगसे सुरताकी पिचकारी । तक तक मारिये श्याम सुन्दर तन चूक न औसर प्यारी, कपटको चूंगट हटारी ॥ ३ ॥ ज्ञान गुलाल अवीर भक्तिको याके बदन लगारी। गाढें गह मथुरेश चरणको आवागमन मिटारी, बोलकृष्ण मुरारी ।। मोहन० ॥ ४ ॥ . ॥ होली राग जंगला ॥ बंसीवारेके चरण मनः रह्योहै। अटक, मोपै जादूसो पटक कित गयोरी सटक.।। बंसीवारके. चरणः॥१॥ छाती धरकत पल कलना परतहै । जबसे निहारी वाकी झांकी. की.लटक. ॥. बंसीवारेके चरण...॥२॥ होरीमैं प्यारो अतिही मतवारो॥ रीझैं लख सारी याकी. चटक मटक । बैसीवारेके चरण ॥ ३ ॥ फाग खेलन वासुं.मथुरा मैं हौं । तबही मिटैगी मेरी जियकी भटकं... बंसीवारेके. चरणः ॥...॥ - .. M-2 . . . । ॥ काफी ॥ श्याम को सुनलो चतुराई ॥रीमाई॥ ये धूरत निज सुरत दिखाकर छीनत जनम कमाई । फेरे नगतको मुखना दिखावत छुट्टै मातापितु भाई॥ भरीयामैं भति-निठुराई ॥ श्यामः ।.... .
(५८) या गुण. सुन होत बावरे जेगमैं होत हसाई । वैरकिये। यातें स्वर्ग मिलतहै. कंस सुगति जिम पाई। लाज-याको नैक न आई॥श्याम०॥ गोपिन को सहवास छांडके मथुरा में दासीरिझाई। तिसहूको मन चोरके भाज्यो द्वारा पुरी वसाईः ॥ कहो यामें कौन भलाई ॥ श्यामः ॥ है ming H ॥ होली ॥ (.परवा अथवा ॥ उजाममें गानेकी) .. - - । होरी खेल गोरी नंद नदनसे वोही जन मन दुख भंजन हारो॥ हो. फिर पछितैहै औसर चूके जीवन धनको कहा पतियारो ॥ होरी० ॥१॥ कार्म क्रोध छल लोभ मोह मल धोकर. निरमलता उर धारौ । नेहको अंजनं नैन 'लगाये दीखते नटवर नंद दुलारोहोरी॥२॥ शुद्धभाव के कलसे मांहीं प्रीत रंगभर यापर डारो कुंकुम विनय गुलाल उमंगको अंग लपेट अंकगहि प्यारों होरी० ॥ ३ ॥ सुन्दर पद वाके पकर न छांडो शरणागति के बचन उचारो। ऐसी होरी खेल. जुगतिसे तब मथुरेश टरै नहीं दारो॥ होरी जी - (५१) ॥ होली काफी .॥ (श्रीपितानी रोचत । मेरे जिनमारो.कुंकुम लगजायगी | वोतो गोलीसी हिये मरें चुबजायगी | अंग भिजोओ न.रंगसे मेरो। मेरी चंदासी सूरत बदल जायगी ॥ मेरे जिन- ॥ १॥ अचरा पर जो गुलाल डारिहौं ।। मेरी तुम्हारी 'बिगर नायगी । मेरे जिन--॥२॥ भोलानाथ मोपै हाथन पटको ॥ मेरी मोतीसी आब उतर जायगी ॥ मेरे जिन:-।। ३.. - . तथा काफी जिन मारोपिचकारी। श्याम तेरी किन मत मारी। जिन०॥ लाख रूपैया की चूनर मेरी आंगिया देख हजारी । लहिंगा रेशम जरी तारको भीजो देख महितारी... करै, कैसी मेरी ख्वारी | जिन १॥ धैन चरावत, बन बन डोलत ओढे कामर कारी । नाजुक हाथन कहा, दिखावत हमकोरे पिचकारी... होड़ कहा मेरी तिहारी । जिन:-॥२ होरी खेलौ वासें रेमोहन जो सर होय तुम्हारी।जो मारी पिचकारी मेरे. अनही देवांगी मैंगारी ॥ कान तुम निपट अनारी ।। जिन- तुम कहा मोकौं एमाजानौं जैसी और ब्रजनारी। भोला- नाथ रस बस भ मोहन कहनलंगे सुन प्यारी आज कही मान हमारी। जिन THIS ॥ .
(६)
तथा
॥ होली भोपाली रागमें ।
होरी कुंजन छाया रही ॥ लपक झपक खेलें राधेश्याम ॥ हो.
इत राधा उत कुंवर कन्हाई, मदमत वारे दोऊ कामिनिकाम।।
सननन नन इतबस्सै केसर रंग, टननन कुंकुमवखेरतश्याम।।
अबीर गुलालन बादर छाये, रंगरहे सब ब्रजके गाम ॥ल.॥
उत. पिचकारिन इतहि कमोरिन, रंगभरदेः भोलानाथ
गुलाम ॥ लपक----
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॥ होली ॥
:: (तेरो रसिया मदन मोहन गोहन लाग्यो टोलैरी ).
॥ इसके वज़नपर ॥
मोहि पनियां भरत लपट कपटि श्याम घेरोरी। मोहि ॥
चूंघट के पट झपट खोले ग्वालहिं टेरोरी ॥ मोहि ॥
लेके गुलाल, अंग मल्योरी रंगहु गेरोरी ।। मोहि०३
सर ठनी वा मथुरेशसे कीजै निबेरोरी || मोहि ।
न
॥ होली।
शंकर धूम मचाई ॥.इसके बजन पर
मोहन सैत चलाई। अरी एसे आज मोहन० ।।...
मोरे मन मारगयो वो कटारी मैं सुरत बिसारी लखा-
(६१) नराई ॥ आज० मो० ॥ फागखेलन वासेकैसे में जाऊंवन,मनकीउरझनभारी हैमोरी प्यारी । देहको नहि नेहमोको निपट बौरीबनाई ॥आज०॥ केसररंग मटकियन भर भर कर पकर पिचकारीगही है सारी। प्रेमरज मयुरेश बांबे मोको ये फाग सुहाई । आजक- ॥ होली ॥ ( गरमोरी छांडो श्याम विधनाओगे नैननमैं ॥ इसके वज़नपर ) नकर मोसे जोरी कान भोरी हौं होरी खेलन में ॥ कैसे सहूं पिचकारी तिहारी, काचोतन मेरो झेलन में । डूबेगी तेरी सब ठकुराई मोरी सासु के हेलन में ॥ सारी भिजो मधुरेश नसारी मेंतो लाजूंगी गैलन में । ॥ होली राग सिंदूरा ॥ लाजत जौरी दिनचार नारनव जसुमत द्वार गमन कीजैहो। १- फागको मिस है पायो जतन बिन चूको न अबकी वार ॥ नार नव० ॥ २- रंग गुलाल अधीर अरग़जा सामग्री सवत्यार ॥ नार०॥ ३- ढफमोचंगरवाव सारंगी हाथन लिये सितार || नार०॥ ४- गोकुल चलीप्रेममतवारी निरखन नंदकुमार ॥ नार०॥ ५- तकतकमारत हरि पिचकारी गोपीगावत गार॥नारा ६- लपकगहे सब कुंवरकन्हाई मेटीमनकी खुमार॥ नार॥
(६२)
७-गोपिनकी मथुरेश मैं प्रीती निरखलजी सुरनार । ना॥
॥ होली सोरठ में ॥
( अथवा झंझोटी में)
होरी में बंसीवारो उतपात करै ॥ होरी में० ॥
हाथ लकुट लिये गलिगलि भटकत पनघट जायअरै॥ होगा
गागर फोर मरोरत बैयां हंस हंस अंकभरै॥अंगरंगसे
सारी भिज वै टारो नाहि टरै ॥ १ ॥ होरी में० ॥
लपक गुलाल
अबीर मेरे मुख
मल्यो सास झगरै ॥
या मथुरेशसे पूरोबदलोलाये बिन नाहि सरै॥२॥होरीमें०।।
(इसी होलीको झंझोटीमें गानाहोयतो अंतरेमें (री) शब्द लगाकर
गावो यानी उतपातकरै री अरैरी वगैरावगैरा
-
॥ होली ॥
॥ होरी आज जरी चाहे कालजरोरी मन मोहन मोसे आन मिलौरी ॥
॥ इसके वजन पर ॥
मोरी लाज नसौ चाहै लोग हंसौरी मैतौ नंदकी पौरी
जाय परूंगी ॥ मो० ॥
मन मोहन बिन कल न परत है छिन पल धीरज:
नाहि धरूंगी ॥ मो० ॥
(६३) जब पिया फाग खेलवे निकसे मैंहूं रंग पिचकारी धाय भरूंगी ॥ मो० ॥ औसर पाय झपट लंपटपर मन माने निज वार करूंगी । मो० ॥ सखियन संग गुलाल वदनपर मीडत नेकहु नाहि डरूंगी। मो० ॥ गहकर कर मथुरेशको गाढो बचन लिये विन नांहि टरूंगी ॥ मो० ॥ ॥ होली ॥ प्रेम रंग विन फागहि फीको । होरी होरी पुकारत बौरी भांडो लख निज जीको । कपट कीच यामैं निपट भरीरी लेशन कृष्ण रती को ।। नीरयामैं भरयो वदी को ॥ प्रेम०-॥ १॥ विरह तप्त अंसुअनसे धोले पुनि पुनि मन मटकी को ।। शुद्ध भावकी केसर घोरिये निर्मलजल भक्ती को । रंग यह सव से नीको ॥ प्रेम०- ॥२॥ भर अभिलाष गुलालसे झोरी यही साज होरी को ॥ लेकर फाग खेल मोहन से करगह प्राण पती को। संग रखिये सुमती को ॥ प्रेम०-॥३॥ ढफ अनुराग मृदंग भजनको बाजो नवल रुची को ।। ध्यान सहित गुणगान निरन्तर प्यारी भानुलली को ।
(६४) होय वस सुत नंदजी को ॥ प्रेम०-॥४॥ प्रभुताई चतुराई तज प्रभु चरोहोय चेरी को ।। श्रीमथुरेश प्रेमको रसिया वोही सार श्रुती को ।। आसरो मोहि वाहीको ॥ प्रेम०-॥ ५ ॥ ॥ होली ॥ ॥ मेंतो उनीको वचन दे हारी ॥ इसके वजन पर ॥ मोसे छेरकरी जमनापै श्याम ॥ मोरेहियेमैं खटक हे भारी ।। नीर भरत मेरी वैयां मरोरी ।। हसदीनी कछु गारी॥ मो०॥ फागखेलत वासेलेऊंगीवदलो॥ छीनूंगी पिचकारी। मो०॥ मोड़ गुलालसे मुख मोहनको॥ देह भिजोऊंगी सारी॥मो०.। वेंदी भाल नैन दे कजरा ॥ कर छोडूंगी नारी । मो०॥ फगुआ लियेविन जानेन दूंगी।ठसक,निकासुंगीसारी। मो॥ मथुरा पति होरीको रसिया॥देखू हैं कैसे खिलारी॥मो० ॥ ॥ होली । रसियाकी चालमें ॥ सोय रलिया अधर उठाय ॥ हूंतो हारगई होरीखेलन तो ले आई अरे कन्हाई,अव बगयो नहि जाय ।। सारी-सोको रंगमैं वोरी,अहो निगोरी काया सगरी दिखाय ॥ अंखियन मांहि गुलाल करकरह्यो , अरे तरकंगई चुरियां कहा उपाय ॥
(६५) सासनिगोरी तल तल खैहै, अरेवो ननदलभोरीहू रिसखाय ।। बेर बेर दै दै पिचकारी, ओ अनारी छतियां दई दुखाय ।। उतपाती ये सखा तिहारे, खडे निहारै तारी दै दै जाय ॥ भाजगई मोरी संग सहेली, रही अकेली थर थर कांपत पाय॥ बेंदी कजरा मिटयो जानके बुरोमानके वलमा बहुत रिसाय॥ फगुधादैमोय घरपहुंचाऔ, अजीबताओ मारग मोसंगधाय॥ मथुराकहैरसिकसुनलीजै,बिलम नकीजैहियोमेरोअकुलाय।। o- होली जयपुर की भाषा में। ॥ मोगहियेमें वमैछ प्यारो सांवरोए । इसके वजन पर ॥ : होरी खेलवा को म्हाने भारी चावरी ए ॥ आसीसगरी ब्रजकीनार । ज्यांमें राधाजी सिरदार ॥ दूजो सांवरियो खिलार । दर्शन पावरी ए ॥ १ ॥ मटक्यां भर भर केसर रंग । भेस्यां ऊंको सारोअंग ॥ ऊठे काम की तरंग । होरी गावरी ए ॥ २ ॥ लासी लाल गुलाल अबीर । प्यारो दाऊजीरो वीर॥ चालो जमुनाकी तीर ।.गोरी सांवरी ए ॥ ३ ॥ घूमर दे दे करस्यां नांच । गास्यां सारंगरागखमाच ॥ माच । चाल उतावरी ए ॥ ४ ॥ नेरे आपहुंच्योरी कान्ह । सुनले बांसुरी की तान ॥ गोप्यां कररही छै गान । बेगी आवरी ए ॥ ५ ॥ आई सखियांकी छे भीर । उड़वा लाग्यो छै अबीर ॥ बरसै रंगको नीर । भरगई बावरी रही धूम छै
(६६)
दोन्यो कानी रंग बौछार । होबालागी री बहारः ।।
देवे पिचकारयारी मार । उपजै भावरी एः ॥ ७.॥
लोनी पिचकारीछे छीन । मोहन कीनो छे आधीन ।।
गोप्यां प्रेम प्रवीन । खेल्यो दावरी
राधा प्यारी सूचित चोर। बोल्यो रसिया नंद किशोर ॥
हा हा खात हूं तोर । बेग छुडावरी ए ॥ ९ ॥
प्यारी झांकी ललिता और । ऊंकेभारी जोवन जोर ।।
बोली मुखड़ाने मोर । पिये नचावरी ए ॥ १० ॥
मथुरा भारी आनद मान । गाई होरीकी छे तान ॥
दम्पत चरणांको ध्यान । चित लावरी ए ॥११॥
1
.
॥ होली ॥
॥ ब्रजमंडल देस दिखादसिया ॥ इसके वजन पर ॥
वरसाने मची रंगीलीहोरी ॥ वरसाने ॥.
महलनमैं सखियन संगधजसे। सजबैठीराधागोरी।ब० ॥१॥
ढफ ढोलक सारंगी बाजै। नचैं सखी गावें होरी ब० ॥२॥
रंगनके बहुमाट भरेहैं। मनन गुलाल 'मननरोरी ॥ ब०॥३॥
धायेसखा संगले मोहन । धूम मचाई चहुंओरी ॥३०॥ ४॥
खेलेंफाग सखासखियन । होनलंगी उतंचितचोरी ॥ब०॥५॥
हरिपिचकारी प्रिया तनमारी। प्रियारंग मटकीढोरी॥ब०॥६॥
लालगुलाल लालमुखमलके।ललिता हँसीनवलगोरी॥ब०७
श्रीदामाको पकरि बिसाखा। पहिराई पायलजोरी॥ब०॥८॥
दै दैताल नचावनलागी।अवीर उड़ावतं भरझोरी ॥ब० ॥९॥
(६७) चंद्रावली की दौड़ मनसुखा । तनी कंचुकी की तोरी॥३०॥१०॥ अस नानाविध रस बरसा।मथुरा निरखै करजोरी॥३०॥११॥ 52- होली: ॥ ॥ %3D ॥ मुनआईरी आज मैंती होरीकी भनकं ॥ इसके वजन पर ॥ सुनमाईरी कन्हाई तेरो अतिहिनिडर । सुन । मोसे कीनी छेर लीनी घेर डगर ॥ सुन०॥ उलट जातरही में पनघटसे । नटखट करदीनी रंगसे तर ॥ मो०- ॥१॥ बूंघटपटमेरो खोलके लंपट । तकनलग्यो मोहि खोटिनज़र ॥ मो०- ॥२॥ हँसमुसकाय गुलाल लगायो। खटकरह्यो मोरी अखियोंमेंभर ॥ मो०- ॥३॥ ॥ होरीके मिस मोय वौरी बनाई। रहीमोकौ देहीकी नाहि खवर ॥ मो०- ॥४॥ ॥ चितवन में वाके भारीहै टोना ! निरखतही ॥ सुधजातविंसर । मो०- ॥ ५॥ ॥ मथुराकहै मैया वेग बतादे । किंतहै छिप्यो कान्हा ढीठ लँगर । मो०-॥६॥ ॥ . ॥ .. . ॥ राग काफी होली ॥ प्रीतकान्हासैलागीहँसौकोई लाखअभागी प्री०॥
(६८) १ अतही गन्दे जगके धन्धे त● परम वैरागी ॥ बिचरै जित तित प्रेमवावरे सदारहै लोलागी॥ धन्य ऐसे अनुरागी ॥ प्रीत कान्हा० ॥ १॥ २ लोक वेदकुंल कान नमानैं रहें विषयविषत्यागी। हलैकबहु कबहूअतिरोवै विरह विथा जवजागी॥ लबँकोई विरलेसुभागी । पीतकान्हा० ॥२॥ ३ होरीज्वाला उठै हिये मैं जरैविरह की आगी ॥ डार धूर लेंडी दुनियापै नमकी कार उलांघी ।। भई सुरता रसपागी ॥ प्रीत कान्हासै ॥ ३॥ ४ चित्तभ्रमरनितहरिपद अम्बुजलै मकरंदपरागी।। मथुरामोदमगन निश्चलकै होयकृपा को भागी। सोही हरिसे हममांगी ॥ प्रीतकान्हासै०॥४॥ तथा श्रीगोविन्द देवजीमें रचनाकी झांकी और होलीकापदरागनी उजाज अथवा वरवा याऔर कोई रागिनी मैं गायाजासकता है आज गोबिन्द राधिका गोरी खेलत होरी राजभवन में। रचना रची सुंदरीसखियन नानारंगनतें आंगनमें । आ० ॥ ओढे प्रिया बसन्ती सारी चित्र विचित्र रंग गुलकारी ।। मोहन पीताम्बर तनधारी भारी रचनाहै अंगनमें ॥ आ० ॥ भरीगुलालअवीरन झोरी हँसहस छिड़कै रंग किशोरी ॥ प्रियाकीलारी रंगवोरी हरिने मल्यो गुलाल बदनमें ।। आoli
(६१)
चलनलगी पिचकारी उमंगसे अंगभयोतर केसररंगसै|आला
लाजकोझगरोमच्योअनंगसैचकितभयेलखदेवगगनमैं|आ.॥
फागुनमैं रचनाकीझांकी अतिहिमनोहर बांकीअदाकी |आ।
छवियह मनोहर नवलवनाकी बसीरहै मथुराके गनमैं आः॥
॥ होली ॥
॥ मूंगेकी चालमैं ॥
होरीखेलेंमन्मोहनराधाप्यारी।कुंजनभारीधूममचीअरे हाहां।
१ झुंडझुंड धाई ब्रज बनिता। सारी रसरंग रची अरे हां हां ॥
२ पिचकारीमारत बनवारी । नहिकोई नारीवची अरे हां हां ॥
३ मलगुलाल मोहन मुख सखियां । दैदैतारी नची अरे हां हां।
४ बाजतढपमोचंग खंजरी । ललची निरख शची अरे हां हां।
५ जोरीरसिकप्रियापीतमकी।मथुराजियमैंजची अरे हां हां।
re
॥ होली ॥
रंगीली सजीलीरसीली गुइयां । आईरी होरीहोरी ॥रंगी॥
नंदनदन अति डीठलँगर वा । हौंअवला भोरीभोरी॥ रंगी० ॥
जोबन माती रसरंगराती।सखियां खडीपौरीपौरी॥रंगी॥
जिततित रंगके माटभरे हैं। कुंकुहै झोरी झोरी ॥रंगी० ॥
घरघर मंगल गीतमनोहर । धूममची होरी होरी ॥रंगी० ॥
खेलेंफाग मथुरेश राधिका । गोपीग्वाल जोरा जोरी ॥रंगी० ॥
HERE
Ser
(७०)
॥ होली ॥
॥ परदेसी सैंयां नैनालगाय दुख देगयो ।।
॥ इसके वज़न पर ॥
| तोरे हा हा खाऊं, मोसे ना खेलौ होरी सांवरे ॥ तोरे ॥
निपट अजान मैं भोरी बारी, नट खट आप खिलारी
पुकारै सारो गांवरे ॥ तोरे० ॥
तकमारी मोरे उर पिचकारी, सारी काया दुखाय
कैंपाय मोरे पांवरे ॥ तोरे॥
होरीके मिस वरजोरी करतही, वैयां पकर झक झोर
कहां को यह न्यावरे । तोरे ।।
जिन छेडौ मथुरेश पिया मोय, होकर चतुर सुजान
बनौजी मत बावरे । तोरे ॥
॥ होली ॥
॥ कोई मोहन पियासे मिलादोरे ॥ इसके बज़न पर ॥
नये - होरीके रसिया विहारी री ॥
फागुनमें उनके गुनकी री महिमा अपार है ॥
बरजोरी चितकी चोरीमें बस होशियार है ।
कुलवन्ती नारियोंका तो जीना असार है।
देखो जिधर उधरही नई छेर छार है ॥
मोरी रंमसे भिजोई है सारी री ॥ नये० ॥
पनघट में मुझ को देख झपट कर पकड लिया ॥
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(७१) चूंघट उलट गुलाल मेरे मुख पै मल दिया ॥ डरसे शरम से पिचकारी मारी सीनेपै मुस्काके चलदिया ॥ मथुरा जाऊं करूंगी मैं ख्वारीरी॥नयेहोरीके०॥ लज़रारी नाजुक मेरा हिया ॥ . . . ... . . . । होली ॥ ॥ बलमैयाने मारी कटार इसके वजन पर ॥ खेलें श्यामा सांवरियासे फागमें सगरी भीजी वहां ।। हुई निकुंजमें होरीकी सारी तैयारी ॥; सम्हल २ के खडी सुंदरी वो ब्रज नारी ॥ कोई गुलाल लिये रंगकी कोई झारी ॥ बिराजी मध्यमें सरकार राधिका प्यारी ॥ मीठी गावें वो. होरी की राग ॥ में सगरी०- उधर सखौंको लिये सांवरे मुकट धारी ॥ बिराजे रंग भरी सोहै करमें पिचकारी ॥ हरेक नारिकी छतियों में ऐसी तक मारी ॥ कि तन बदनमें मदन की हुई चमत्कारी ॥ दीनी लज्जा हु संखियौं नै त्याग ॥ में सगरी०-॥ लपकके सखियोंने ग्वालोंकेमुख गुलालमला॥ नचाके छोडा हर इकको किसीका बस न चला॥ पकड़ मेंआगये ललिता सखीके नंद लला । छुटे वो फगुआं नज़र कर चली न कोई कला ॥ ~ . .. - (७२) मथुरा भाषै सखी धन्य भाग ॥ में सगरी ॥ .. . ॥ होली ॥ ॥ श्यामा श्याम २ इसके वजन पर , नाठक की चाल ॥ खेलेंफाग खेलेंफाग, श्यामा महारानी संग सखी स्यानी बरसै रंग ॥ खेलें- ॥ नवीला रसीला नैन विशाल ॥ हंसीला छवीला नंदका- लाल ॥ रंगकी झालन लाल गुलालन कुंकुम थालन ग्वालन 'संग ॥ हिये उमंग सोहने अंग बन ठन ॥ हो। लपक झपक चटक मटक बांकी वो लटंक, सुख वो कैसे कहो जाय ॥ खेलें - ॥१॥ नारिनपै. पिचकारिन मार , गिरधारी बनवारी देखें वहार, श्रीमथुरेश की भानु नरेश सुतासे विशेश ठनी रस जंग, लाजै अनंग , वाजै मृदंग रेंग द्रंग ॥ हो ।। गगन मगन राजै विमानन सुरगण शोभन, पुष्यन को वे रहे बरसाय ॥ ॥ खेलैं- ॥ होली ॥ ॥ बलबीर निगह का तीर ॥ इसके वजनपर , नाटक की चाल । मतडालअबीर गुलाल नैनमें करकत अहो नदलाल नैनमें। कैसे घर अब जाऊं लजियाऊं सकुचाऊं । छेडकरत मोसे ग्वाल बाल ॥ मत डाल०-- ॥
.
.
॥
(७३)
थर थराता है अरे खौफ से यह तन मेरा ॥
तर किया रंग से
तुम ने नया दामन मेरा ॥
है ग़ज़ब सांवरे नोकीला यह जोबन तेरा ॥
पर नहीं चाल चलन ठीक है मोहन तेरा ॥
छेड मत कर नट खट हम से ॥
निलज बनिये न इक दम से
विनती करत चरन परत मिथुरा कहत ॥
कृपा चहत ॥ हो ओ.-- ॥
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॥ होली बिहाग मैं ॥
सारी भिजोओ न श्याम , सुंदर मोरी ॥
कौन भांत घरमें पगधरि हौं मैं कुलवन्ती बाम ॥ सुंदर० ।।
लोक लाज व्रज राज निभाये सरै जगत को काम ॥
नंद राय के कुंवर कहावत फिरत धरावत नाम ॥ सुंदर० ॥
चोली भीजी छतियां झलक दीखत सब तनचाम ॥
रंग टपकरह्यो अंग अंगसे कैसेजाऊं निजधाम ॥ सुंदर ॥
वैयांमरोरत तन झकझोरत मथुरा पति अभिराम ॥
बांहगहेकी लाज तुम्ही को चेरी भई बिनदाम ॥ सुंदर० ॥
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॥ होली ॥
॥ छिपियाके असल गवार ।। इसके वज़न पर ॥
कान्हा मनके मोहनहार होरीमें तैने ब्रजकी
लुभाई सारी नागरियां ॥
(७४.):
१ रस भरे नैनबान पिचकारी, कमारी चितचोर ॥ होरी०||
२ प्रेमगुलाल प्रीतकी कुंकुम, बदन मलत मुखमोर॥हो।
३ नेहके रंग अंगः तरकरके, सारी करी सरावोर हो।
४ आज लेन बदलो हम आई, देखन जोबन जोर हो।
५ फगुआ लियेविना नहींमार्ने, जातकहां हमें छोर॥हो०॥
६ खेलौआज दिलखोलकेहमसे,खायोबहुत दधिचोराहो ॥
७ नाच गाय हमैं सबहिं रिझाओ मथुरा कहै करजोर हो।
15
के ... वजन
॥ होली ॥
गुंइयां आज खेलें होग कन्या संग चाग।
इन.
पर: : होली।
सैयां श्याम हौं लजाऊँ । चुनरिया ना भिजो ओ॥०॥
१ पतरेसे पतरे पोतकी चूनर भीजे मन संकुचाऊं ॥
. रंगले तरभई पाटकी अंगिया अंगमें कैसे छिपाऊं ॥
सैयां श्यामः-॥ १॥ ॥
३. झुंडके झुंड धाय रहीं सखियां अंखियां कैसे उठाऊं ॥
सांकरी खोरठौर नहिदीखै छिपन कहां अबजाऊं।
॥सैयां श्याम.-॥२॥
३ अंगसे अंग मिलाओन रसिया तुम्हरे हा हा खाऊं ॥
मथुराके स्वामी लाज रखोमरीपैयां पकर मनाऊ ।।
॥सयां श्याम- ॥३॥
.
(७५)
॥ होली ॥
॥ तुम देखो लोगो भूल भुलैयां का तमाशा, इसके वज़न पर ॥
मनमोहन प्यारे छांड दो वैयां जी हमारी ॥ मनः॥
देखें आली मद मतवाली नखरेवाली सारी ।
रंग से भीजी सारी मेरी देख हंले दे तारी ॥ मनः॥
होरी में वर जोरी कैसी मैं हूं बारी भारी ॥
वरसाने की राजकिशोरी संग सहेली मोरी ॥मन०॥
नैनन माहिं गुलाल न डारो हा हा खाऊ तोरे ॥
छलबल भरे श्याम तुम निकसे दीखत वाहिर भोरेम०॥
विन्ती कर मैं सरवस हारी अत्र दूंगी मैं गारी ॥
मथुरा पति रसिया वनवारी प्रघटे नये खिलारी॥ मन०॥
-
दिपटी राजालालजी रचिन होली
वृषभान की लली। होरी खेलन कान्हा सो चली॥१॥
मिलगये मोहन कुंज गली। पकडे मिल दशपांच अली ॥२॥
छीनो पीतांबर और मुरली । पहराइ नथ चेंग कली ॥३॥
लाल चुनरिया हरी कंचली। कटिपर लंहगा साठ कली ॥१॥
वेदी वेना ओर टिकली । चरण कमल नूपुर बजली ॥५॥
रोरी घोर कपोलन मली। केशर चोवा रंग रली ॥६॥
बाजत ढफ मृदंग खंजली । नाचत वृजकी गली गली ॥७॥
वृज जुवतिन की बेल फली। दासीकहत यह जोरी भली ॥८॥
(७६) तथा. कुंजनमें होरी आज मनी । देखोसखिराधा कैसी बनी।माथेमुकट सोहे कट कछनी॥१॥ पीतांबर पट अति रमणी रमणा बनी प्यारी रमणी ॥२॥ छुद्र घंट पायलं बजनी । अंखियां काजर.रेख अनी ॥३॥ चहुंदिश अलीगण चंद्र बदनी । संग राजै श्रीनाथ धनी ॥४॥ झांझ मृदंग बजत ढफनी ।मधुर मधुर बंसी की धुनी ॥५॥ कुमकुम केशर रंग कनी । उडत गुलाल अबीर सनी॥६॥ वृज जुवती सब बनी ठनी। कंचली चोवा रंग सनी ॥७॥ खेलत बसन्तबीती रजनी। छबी नृखत दासी सजनी ॥६॥ ..
।
.
(७६.क)
फागोत्सव की सवारी श्रीयुगल सरकार की
मदरामपुरे पाधरी उससमय की होली का पद
(१) रसियाकीचाल में होरी
श्यामा संग नंद कुमार । खेलन फाग चले ॥श्यामा.संग
१ माधवेशगोपाल भक्त धन। धन जयनगर बजार॥खलन०
२ धन्य रसिक हरिजन को मंडल। जिनके बस सरकार ॥ खे०
३सज्यो विमान उमगसों सखियन । सोभा जासु अपार ॥खे०
४ युगल गात पोशाक बसन्ती। अनुपम है शृगार ॥खेल०॥
५ दम्पति छवि लख लजित मदन भयो रतीभई बलिहार खे०
६ रूपमाधुरी बरणि न.जावै। मोहे विध त्रिपुरार ॥ खेलन० ॥
७ वधुन सहित सुर चढे विमानन । निरखें तन मन वार.॥खे.
८ वरसावें मिल पुष्प गगन सो बोलें जय जयकार ॥ खेल ।।
९चली सवारी श्री दम्पति की। देखन बिपन बहार खेल०॥
१० झुंड झुंड पुर वासी उमडे। चकित सकल पुर नार ॥ खेल०॥
११शारद.वीन बजावत नारद । नाचें लिये सितार ॥खेल॥
१२ गोप गोपिका संग सिधा । धर बहु विध शृंगारः ॥ खेल०॥
१३ ढप अरु झांझ बसें बहु बाजे। गावै सरस धमार ॥ खेलः॥
१४ उडत गुलाल लाल.भये वादर । आनंद अपरम्पार । खे०॥
१५ सखा सखी करै केलि पस्पर । रीझैं युगल निहार ।। खेल ।।
१६ खेलत फाग सवारी निकासी । रस बरसावन हार॥खेल॥
१७ श्रीमद रामपुरा में पहुंचे।धन्य युगल सरकार ॥ खेल।
१८ गढ गोपालं जहां अति सुंदर। कुंजकी अजब बहार॥खेलना
१९ फूलरहे तरुवर कुसुमन तें। ऋतु बसन्त विस्तारखेल!
॥
(७६ ख ) २० खेलन लागे फाग परस्पर । दम्पति प्राण अधार ॥खेल। २१ प्रिया गुलाल मलत मुख हरिके। रस वस भये मुरार॥०॥ २२कुंकुम मली गुपाल प्रिया मुख । रंगन की बौछार॥ खे०॥ २३श्रीहरिभक्त विवश बहुलीला । करै सरस वपुधार ॥खे०॥ २४ श्रीमथुरेश निकुंजभवन में विलसैं विविध विहार खे०॥ ॥ होली ॥ ( नयहा। के रसिया बिहारीरी, इसके बजन पर ) कान्ह चूनर भिजोओ न मोरी रे ॥ कान्ह ॥ १ हैं संग की सहेलियां पीछे से आरहीं। पनघट को देखौ नारी इधर से हैं जारहीं । बनमें अकेली छातियां मेरी कपारहीं। सन्मुख सकून झांक हैं अंखियां लजारहीं ॥ हाहाखाऊं न कीजै बराजोरी रे ॥ कान्हा ।। १ ॥ २ पिचकारियों की मारसे घायल हुआ बदन । नादान भोगे वारी हूँ नाजुक है मेरा तन । नाजानें कैसे आपसे लागी मेरी लगन । पछता रही हूं तुमसे लगा बेसमझ ये मन ॥ प्यारे काहे मोरी वैयां मरोरी रे॥ कान्हा ॥२॥ चमकै गुलाल देखौ मेरे बाल बाल में । रेशमकी चोली डारी मसक इस कुचाल में । क्योंकर में घरको जाय सकू ऐसे हालमें। पछताई फैसके आपकी उलफतके जालमें ।। मथुरा मुझपै चलैना ठगोरीरे । कान्ह ॥ ४ ॥ ३ । (७७) (डोल उत्सव का पद ॥ काफी ) राजत डोल युगल रंग भीने ।। १ खेलत फाग भयो श्रम भारी नाना कौतुक कीने ॥ ताहि निवारन काज अली गण रुचिर ठाट रच दीने ॥ भये दम्पति श्रम हीने ।। राजत०- धीमे धीमे दोला हालत पौन चलत झीने झीने ॥ सघन कुंज रस पुंज मनोहर छवि लख मन हरलीने ॥ युगल रस रास नवीने ॥ राजत०-। अर्धनिमीलित दृग अति सोहैं दोउ गलयां दीने ॥ मथुरा या छवि पर वलिहारी जीवन दरस अधीने ॥ धन्य दोउ प्रेम प्रवीने ॥ राजत०-॥ %3D २ ॥ ३ ॥ -- तथा (दादरा) डोल विराजत मन हर जोरी ॥ रतन जटित नव डोल सुहायो कोमल रेशन वसन बिछ्योरी ॥ डो०- ॥ ॥ २ देखत ही जाके श्रम भाजै युगल विराज आनंद लह्यो री | डो०-॥ सीतल मंद पवन सुखदाई वन . सुगंध सो महक रह्यो री ॥ डो०-॥। गौरश्याम छवि · धाम सुघर वर, रसिकन की ॥ .॥ ३ ॥ ॥ ॥ ४
(७८)
मन भावनि जोरी ॥ डो०- ॥
५ सखियां लिये सामग्री सुख की, हाजिर मन रस रूप
छक्योरी | डो०-॥
फाग परिश्रम मिट्यो युगलको मथुरा हिये रस नर
उमडयो री॥ डो०- ॥
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%3D
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.
१
।
तथा
ग़नल रांग मोहनी
१ देखौ श्यामा श्याम की छव आज क्या अन मोल है ।।
युगल जिसमें विराजे धन्य धन वो डोल है। देखौ० ॥
२ डार गलवैयां परस्पर बैठे हैं सुख प्यार से ।।
निकट दोनों के मनोहर सोहैं गोल कपोल हैं ॥ देखौ ।।
३ दोनों चेहरों पर दमक और कुंडलों की है झलक ।।
मानौ मिलके चन्द्र सूरज बैठे करने किलोल हैं। देखौः ।।
१ हौले हौले हिलके दोला देरहा है सुख अमोल ॥
उठ रही आनंद लहरै दिल का चैन अतोल है। देखौ०॥.
५ सेवामें हाज़िर हैं सखियां सुख की सामग्री लिये ॥
अपतराओं संग सुर वोलैं मुवारिक वोल हैं ॥ देखौ ।।
६ कुंज की हरियाली डाली डाली फूले हैं सुमन ॥
झांकी श्रीमथुरेश की करतेरसिक दिल खोल हैं। देखो० ॥
--
(७६)
7
तथा पद
(देखोरी ना मानै श्याम, इसके वज़न पर)
झूलैरी राधा गोपाल, ठाट देखभई अखियां चकित मोरी।।
१ झूलाकी झलक भारी मुखकी दमक न्यारी ॥
भानु शशी मानौ मिलं कैः करै ख्याल ॥ झूलै०॥
कोई सखी दे झोटा तक तक नंदढोटा ॥
कोऊ तकत ठारी चित्रसी लिखी बाल ॥ झूलै० ।।
गाबैं कौई मद माती कोऊ ठारी इतराती ॥
प्यारी के हिये भाती बतियां करै लाल ॥ झूलै० ॥
यमुना नदी के कूले नवल युगल झूलें ॥
मथुगं करत ध्यान काटे जगत जाल || झूलै० ॥
॥
.
स
.......
4
(१) ॥ गणगोर पूजन के पद ॥
इटीश हट छांडौ छवीला म्हानै पूजन दो गणगौर
रंगीली राधा प्यारी छबीली श्यामा पूजरहीछे गणगोर ।
१ नये नये फूल गुलाव चमेली, केशर कुंकुमघोर॥रंगी०॥
२ मांग सिंदूर भालसजिवेंदी, चंदन की रचिखौरागी॥
३ धूपदीप नैवेद्य पानदे,. अस्तुत करें कर जोर ॥ रंगी०॥
2 श्रीजगदम्ब दयालू अम्बे, वर देहु नंद किशोर ॥ रंगी०॥
५. अष्ट सहेली रूप नवेली, विनती करें निहोर ॥ रंगी० ॥
६ परमानंद दसौं दिस छायो, रस बरसत चहुंओर रिंगी० ॥
७ दीनोवरचित चोरें सांवरो, परम मुक्तिमन गौरागी० ॥
८ मनइछा फल पायोभामिनि, मथुराकोचितचोरा रंगीला
(२)
तथा
उसही के वज़न पर गणगौर का पद ।
सावरिया घर आओ जी कन्हैया म्हेतो पूजांछां गणगोर ।।
१ तरस रही अंखिया दरशनकौथेछौजीम्हांका चितचोरातांना
२ मृदु मुसिकान मनोहर थांकी गजबछे नैनारी कोर ।। सां०।।
३ ऋतु बसन्त वन उपवन सोभा मदन जनावत जोर ॥सांगा
४ गौर भवानी वर दियो म्हाने मिलसी नंद किशोर ।। सांप
५तनमनप्राण म्हे थांपर वारांझांको जीम्हांकी ओर || सांगा
पूरण काम. विहारी मथुरा नभै कर जोर ।। सां०॥
६ थेछौ
(८१)
,
--
(३)
तथा पद
॥ गवर पूजन चली आज राधिका नवेली, इसके वज़न पर ॥
सखिन संग लखी गौर पूजती किशोरी ।।
१ सुंदर लोचन विशाल, हाथ लिये कनक थाल,॥
गिरिजा गल हार डाल, बिनवत करजोरी । सखि०॥
२ पोडस उपचार साज, पूजी गणगौर आज, ॥
गिरिधर बर प्रीति काज, याचना बहोरी ॥ सखि०॥
३ अलिगण मिलकरतगान,गणगौरीगुणबखान,।
बाजत नौबत निशान, मंगल चहुं ओरी ॥ सखि० ॥
४. दीनो अविचल सुहाग, छिन २ बढे नेह राग ।
रसिकन के जागे भाग, बोली हँस गौरी ॥ सखि० ॥
५. शुभ औसर को निहार, सुर उचरै जैजैकार, ॥
मथुरा बलिहार कहै, धन्य धन किशोरी ॥ सखि०॥
+-
.
(८२) ॥ ॥ ॥ ॥ २ ॥ ॥ " ॥ फूल शृंगार का पद ॥ ॥ पनिहारी की चाल में ॥ कुंजन माही राजै सोहनी फुलवारी हो । चल सखी बेग निहार || प्यारी हो०- ॥ सिंहान सोहै मध्य में मनोहारी हो । कुसुम रचित सुखकार ॥ प्यारी हो०-॥ श्यामा संग राजै सांवरे बनवारी हो । किये फूल शृंगार ॥ प्यारी हो०-॥ ३ मुकट कुंडल गल कंठिका पच तारी हो । पुष्पन से तैयार ॥ प्यारी हो०- ॥ ॥ ४ पहुंची और भुजबंद की छबिन्यारी हो । उर पै चौसर हार ॥ प्यारी हो०-॥ ५ नथ बेसर वर चंद्रिका प्रिया धारी हो । सुमन रचित अलंकार ॥ प्यारी हो०- ॥ ६ कुसुम रचित कटि किंकणी लागै प्यारी हो। धारी युगल सरकार, प्यारी हो०- ॥ ७ कुसुम कली पाजेब है पद धारी हो । सोभा अपरंपार ॥ प्यारी हो०- ॥ ८ दोउ मगन रस प्रेममें पियाप्यारी हो। मथुरा निरख बलिहार ॥ प्यारी हो०-॥ ॥ ॥ ॥ li (८३) ॥ गज़ल || फूल बंगले के उत्सव की । फूलोंकी कुंज बागमें सोभा अपार है ॥ क्या खिलरही युगल की री जोवन बहार है ॥ १॥ हस्ती हुई चमेली है अलबेली शान सै ॥ छैली नवेली वेला, अजब आनदार है. ॥ २॥ देखौरी केतकी है भरी पूरी हेत की ॥ जूही की मस्त बूई पै चम्मा निसार है ।। ३ ॥ फूलों से आली जन ने सजाया है श्याम तन ॥ प्रीतम ने प्यारी जीका किया खुद सिंगार है ॥ ४ ॥ बेसर बुलाक बाले हैं पुष्पों के सोहने ॥ सीने पै मनका मोहना चौसर का हार है ॥ ५॥ फूलोंकी गेंद हाथ है सखियों के साथ में ॥ रस खेल हो रहा है खुशी बेशुमार है ॥ ६ ॥ ब्रह्मादि, सुर तरस्ते हैं जिस रसके लेशकौ ॥ मधुरेश लाडली का ये वो बन बिहार है ॥ ७ ॥ .. *- तथा पद ॥ रोकै मेरो गैलवा में कैसे जाऊ पानियां, इसके बज़न पर ॥ ' राजै फूलवारियों में राधे हरि भामिनी फूलन रचित चन्द्रिका सोहै। सीस फूल बेना मन मोहै ।। कर्ण फूल फूलनके झुमके । सबही भूषन सजे कुसुम के। ॥ .
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(८४)
सारी गुलनारी ओढे. ठारी प्यारी कामिनी ॥ राजै०॥
बहुबिधि कुसुम अलंकृत प्यारो । प्रिया प्रेमरस मद मतवारों।
कबहुक दर्पन करले धा । कबहु प्रिया को पान खिलावै ।।
हिये हुलसावै अति श्यामा मुख धामिनी ॥राजै॥
अजर अमरअविगतअविनासी।ब्रह्मादिकजाकीकरतखवासी
सो हरि श्रीराधा पद परसै। प्रेम प्रभाव प्रघट इम दरसे ।।
जैजै प्यारी बलिहारी मथुरा की स्वामिनी ॥ राजै ।।
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नौका. बिहार के पद
॥ नौका में विराज कर बुगल सरकार का विहार ॥
करेंरी दोऊ नौका बैठ बिहार ॥ करैरी० ॥
लहरें लेत हेत भरि जमुना जल बिच नवल बहार ॥
अं-चतुर चतुर दोउ ओर अलीजन राजै खेवन हार ॥
मल्ली भेस करन बिच बल्ली खेवै राग उचार ॥::
हसहँस दरस परस रस लेवें बढत परस्पर प्यार ॥
जलचर केलि उमंग नवेली निरखत मुदित अपार ।।
तटवन उपबन संधन निकुंजन सोमा अपरम्पार ॥
घाट घाट नये नये ठाठले निरख रही ब्रज नार ॥
मोर कोकिला सोर करत मानो गावत मंगला. चार ।।
धरि उमंगमन युगलं बरणको परसत पवन सिधार ।।
'घनकी घटा चहूदिस छाई धन्य समय सुखसार ॥
युगल चरण ध्याये मथुराकी नैया होगई पार ..
(६५). ॥ नौका विहार का दूसरा: पद । . . . .., ॥ ग़ज़ल ॥ नौकामै श्यामा संग बिराजे गुपाल हैं। छब देख मनहिमन मैं सखीजन निहाल हैं। नौका०॥ गुलनारीसारी प्यारी के तन कैसी सज रही ॥ मुखचंद्र की किरन का गुलाबी सा जाल है। नौका०॥ प्रीतम के तन पै डटरहा कैसाहै पीत पट ॥ .: ज्यों श्याम घन में इंद्रधनुष का जमाल है। नौका० ॥ मौजै उडाती जमुना उछलती उमंग से ॥ ' पीतम का पाया बहुत दिनों में विसाल है ।। नौका०॥ बेला चमेली फूलों से नौका सजी हुई ॥ तिरता है. चांद चौथका ऐसी मिसाल है ॥ नौका० ॥ खेती हुई.सहेलियां हिल मिल के चाव से ॥::: तारा गणों में चंद्र चलै ऐसी चाल है ॥ नौका॥ देवांगना उमंग से बरसाती फूल हैं ॥ मथुरेश राधे रानी की महिमा.विशाल है. ॥ नौंका॥ ॥ ॥ roen .. ( जलयात्रा का पद ॥राग सारंग का दादरा.) जल विच बिहरै युगल विहारी ॥ केलि विनोद हौद के माही । मोद भरे करें पिया और प्यारी ॥ जल० ॥ १ ॥ अष्ट सहेली रूप. नवेली अलबेली छवि भानु दुला- री"| जल. ॥ २ ॥ ।
(८६) चलत फुवारे धार हज़ारे । प्यारे पवन की गति मत- वारी ॥ जल. ॥ ३ ॥ वारि उलीचैं अँखियां मीचैं । सीधैं प्रेम सलिल दिल क्यारी ॥ जल० ॥ ४ ॥ दरस परसः रस लेत रसीले । कबहुक हँस मारत किल- कारी ॥ जल• ॥ ५ ॥ झक झोरत कबहुक जल बोरत । अतिहि निहोरत मथु. रा हारी ॥ जल० ॥ ६ ॥ सै ॥श्रीगोविन्दजीमहाराजकीजलयात्रा पर ग़ज़ल॥ अहो गोविन्द राधेजू ने जलक्रीडा मचाई है । ये धनहै जय नगर माधोकी जिस्मैं प्रभुताई है ॥ दोहा -बृन्दाबन आगमन , जयपत्तन के मांहि-॥ कियोप्रभूहरिजननहित,अस.कपाल कोउ नाहि॥ फिरी इस राज्यमैं गोविन्द प्यारेकी दुहाई है-॥ अ० ॥ १ ॥ अतिहिमगनमन लाडिली,सखियन संग नहात॥ उमंग २ गोविन्द पिय मीडत प्यारी गात-॥ जलजात्रा मनोहारी चहूंदिस धूम छाई है ॥ अ० ॥ २ ॥ -किलकत दंपत रसभरे; जल छिरकत बहुमोद॥ गहिरे जल डरपत प्रिया धावत पियकी गोद-॥ लपक गोविन्द ने श्यामा गले से आ लगाई है। अ० ॥३॥ -चलत फुवारे सोहने , सीतल मंद समीर॥ शुभ दर्शन मन मोहने जय राधे बलबीर-॥ जुगल छबि देख मथुरा ने खुशी बेहद मनाई है ॥ अ० ॥४॥ है , " (८७) Fatter बरसातीराग Saam- (१) ॥ सोरठ मलार ॥ बस्योरी आली हंगन वोही चित चोर ॥ सुंदरतापैजाके छिनछिन वारूं,मदनसेलाख किरो॥हेबस्यो.॥ सावन के मन भावन घन सम, श्यामल नवल किशोर ॥ बंसी र व जहां गरज मनोहर,गोपीजन मन मोर ॥ हेबस्योगा कुण्डल द्युति तहां लसत दामिनी, केश घटा घनघोर ॥ रस के बैन खांतकी बूंदें, हम चातक मुख जोर ॥ हेबस्यो । मधुर बचन अति मृदुल विमल तन, मनको परम कठोर ॥ मथुरा ओर निहारत नाही, बरसत ठौर कुठौर । हेवस्यो॥ (२) तथा बरषा ऋतु बैरिन आई.॥सखी दूर बसैं ब्रजराई ॥रीवरषा॥ घनकी गरज बज सम लागत दामिनि सेल चलाई । बूदन बाण सहे नहि जावै तरपत हूं घबराई ॥री बरषा। रैन अवेरी मोहि बिरहानै घेरी तुमबिन कौन सहाई ॥ . दादुर मोर पपीया पापी छिन छिन बोल सताई ॥री बरषा। बादरवा तोरी करूं वीनती मथुरा मैं बरसहु जाई॥ कुबरी संग रंग म माते जहां वे कुंवर कन्हाई ॥री बरषा ॥ vodeo oo (55) ॥ निसदिन परमत नैन हमारे ॥ इस के वज़न पर ॥ गोड मलार (३) छिन छिन गरजत मदन कहारे ॥ छिन २ प्रिया सहित करुणानिधि गिरधर हैं.हमरे रखवारे ।। छिन । मेहा बरसत जियरा तरसत त मत देह जरारे ॥ पिहु पिह वैन पपैया के सुन ऐहैं बेग पियारे ॥ छिन०२॥ सुरपति कोप कियोब्रज ऊपर सहस धार वरसारे ॥ धरं गिरिवर नख पर राधावर चर अरु अचर उवारे ॥ छिन.२॥ ज्यों मथुरेश धार नर हरितन लेश भक्त के टारे । त्यों तव मद निःशेष करन को प्रगर्दै प्राण बचारे ॥ छिन २॥ Series (४) ॥ सोरठ मलार ॥ बरसाने वन सरसाने । घन घुमंड वहीं बरसानेजी ॥वरसा॥ मेघकी धारन रूप हजारन वान काम सन्धाने । सखिन फौज सज मौज दिखावत भानुः कुंवर कपताने जी ।। बरसाने ॥१॥ घनकी गरज तरज दामिनकी भामिन मन ललचाने । प्रीत पुञ्ज हरि राधा हिल मिल कुञ्ज २ हरषाने जी॥ वरसाने ० ॥ २ ॥ गहवर बन लखि अधिक सुहावन नन्दन बन सकुचाने । त्रिभुवन पति मथुरेश लाडली संग जहां रति माने जी ।। बरसान ॥ ३ ॥ .
1 A (५) ॥ सोरठ मलार ॥ हे मुरलिया धारी । नाहि. तिहारी पुरतीत.॥ हे मुं० ॥ तन मन गोपीजनको हरके पाली तनक न प्रीत ।। है मु.॥ जो अनंग तुमारास रंग रचि ब्रज मैं लीनों जीत । बरषा में सो हमहि सतावतः बैठे आप निचीत ॥ हे मु०॥ निसा अधियारी:कारी बदरिया गरज करत भयभीत । बिजुरी तरज हियो लरज़ावत तुमबिन और नमीत ॥३०॥ पीत बसन धर नाहि-लजावो अन्तर नैक न प्रीत । तुमरे गुण मथुरेश सो जान जो बांच्यो अलिगीतः॥ हे मुः। (६) गोपीका बचन राग सोरठ मलार ) बदरी अरीमत इतरावैः।। कहा निबल पैज़ोर जनावैरी॥३०॥ उमंड घुमंड मोरे आंगन बरसै विरह अगिन भड़कावै । मद माते घनश्याम के अंगना क्यों नहि बरसन जावैरी ॥ बदरी अरी मत इतरावै ॥१॥ इतनी वासू हमरी" कहियों दया जो मन में आवै । दरसकी प्यासी कौउ इकदासी तुम विन अंतिघबरावैरी ॥ बदरी अरी मत इतरावै ॥२॥. :::::: बैरिन कारी-, निस अंधियारी किस बिध काटी जावे । अकेली ,मदन. सतावै, बिजुरी सेल चलावै री || बदरी अरी मत इतरावैः॥३॥ रोम रोम मेरों भयो पनारों 'नैन नीर बरसावै श्याम घटा मथुरेश हमारे हिय में प्राण रखावैरी बंदरी अरी मत -इतरावै०-॥ ४ ॥... .. ८ . देख . .
( ७ ) (१०) गौड मलार हरि बिन निस दिन हियो अकुलाई ॥ विरह ताप संतापित जनको ग्रीषम सहज सुहाई ॥ हरिः ।। खाँत बूंदको चातक जैसे ताकत ध्यान लगाई ।। त्यों हरि कृपा विन्दु की आसा राखत प्राण नचाई ॥१॥ हायपीव की धुन निकसत ही गगन मेघ बन जाई ।। सहस धार बरसें धरणी पर अस बरसा.सुख दाई ॥ २ ॥ नेह नीर सांगर बिच हरिजन डूबत जबहि लखाई ।। तुरत धाय मथुरेश पिया तव भेटत भुज फैलाई ॥ (८) राग सूर मलार + (आयेरी बादरवा वसन आयेरी, इस के वज़न पर .... राजैरी सांवरिया मधुपुरि ॥ राजैरी-॥ कारे कारे बादर उमंड घुमंड, घने वेगले, मोरे अंगना बरसत बिजुरी संग धन गाज, मोर कोकिल बन मारै अवार्जे सेज परि घरि घरि हरिको तकत सखी | सांवरिया। सुघर श्याम केह काजै, धाय बैरिन घर मथुरा बिराज रसभरि छवि छिन नहिं बिसरत सखी । सांवरिया॥ M (६१) 1 (६) ॥ रांग गौड़ मलार ॥ पिय बिन पावस ऋतु नहि प्यारी ॥ श्यामघटा धनश्याम छटा बिन मारत हृदय कटारी। पि०॥ धनकी गरज तरज़ दामिन की हियो लरज़ावन हारी॥ जो गरजिन हरि के मिलने की वाको छिन २ भारी ॥ १ ॥ ताप,हटै नहि आस घटै नहि कटै न निसअंधियारी ।। घायल होय बीर सो जाने और न पीर हमारी ॥२॥ मोर कोकिला कूक सुनावै हूक. उठै दुख कारी॥ सूख सूख. पिंजर भई काया पंछी प्राण दुखारी ॥३॥ चैन नही दिन रैन नैन तैं नीर अखंडित जारी ।। अधिक अगिन भडकत विरहा की ज्यों ज्यों छिड़कत वारी॥१॥ राग मलार उचारत सखियां में बिरहिन दुखियारी ॥ रोय रोय हेरत बन बन मैं कहाँ मथुरेश बिहारी ॥ ५ ॥ (ये भाई वो आई उमेड घटा । इग के वजन पर ) (१०) राग गौड़ मलार ॥ ये बरसे वो बरसे बादर गुइयां नैनारी तरसें तरसें।ये बरसें॥ 'दामिन चौंक चमक इतरावैचातकं बानी सरसै इधरसै उधरसै मोमनधार.बंधैया मोहन गये बहु बीती बरसैं न दरसेन दरसें।। मथुरापति अंधियारीनिसामैं कॉपरहीहूंडरसै जिधर तिथरस।। -
..
1.६९)
(११) बरसाती चीज़ रागिनी सोरठ ॥
घनश्याम बिनं कारी घंटा डरपाती है मुझे ॥
अलबेली छबि प्यारी छटी तरसाती हैं मुझे ।।
दोहा भेट भई नहि श्याम से जेठ मास मयों बीतः ॥
आसा बढ़ी असाढ़ मैं मन उदास तन पीत ॥
पतिसंग सखियां चढ़ अटा ललचाती हैं मुझै ॥धन ॥
थरथर लरजत हियों घन गरजत अतिघोर
मोरशोर सुन मोर तन जरते सुमिरं चितचोर ॥
पिहु पिहुः पपैया की रटन तड़पाती हैं मुझे धिन०॥
कहा बावरी बादरी बरस बरस इतरातः।।
नैनः झरै हरि दरस बिन यहां नित्यं बरसात ॥
बरसात मनमोहन बिना नहिं भाती है मुझैपना
सीतल बुंदै तनलगैं उनबिन अगिन समान ।।
रैन: अंधेरी मैन दुख चैन नहीं इक आन...
मथुरेश बिन छिन नीद हू नहि. आती है मुझे ।।
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(१२) ॥ लावनी ॥
सावन मैं दूर मन भावन बिरह की माती ॥
नैनों से नीरं वरसाती लिखी यह पाती ॥सावा
सुन, प्राण पियां बलं वीर मुरलिया धारी..
मैं कौन करी तकसीर तिहारी, भारी
मेरे कारी कलेजे. मारी जो विरह कटारी
सिसकत हूं ज्यों जल हीन-चो मीन बिचारी ।
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: : :. । - (६३) । तोहि दीन दयाल दया कैसे नहि आती । नैनॉ०॥ घनघोर घटा चढि आई कौन गत मेरी ॥ है नहि कटती वैरिन रैन बैरिन रैन' अंधेरी ॥ अवहू तुम कृपा निधान लगावत देरी ॥ मेरि खातिर की किस हेत बज सम छाती ॥नैनों०॥ अब मूसर घार बरसने ‘लागा पानी ॥ बिजुरी की चमक ने अजब करी हैरानी ॥ सारी सखियां हिंडोला झूलें फिरे इतरानी ॥ मैं तुम से ठानी प्रीत करी नादानी ॥ कर चेत वेग मथुरेश खांस है जाती ॥नैनों। -SERIA- (१३) ॥ लावनी वरसाती॥ बरसौ. बरसौ घन वहिं जाके जहां बिराजै मन्मोहन !! दुखिया जन. को नाहिं सताते.जो कहलाते हैं सज्जन !! गरज तिहारी, सुनतहि उमंगै, बोलै बन बन मोरा रे ॥ हम को यातें ग़रज़. कहा है हरि चरणन मन जोरारे ॥ पर जब पि पिह, रटें, पपीहा, होत. कष्ट अति घोरारें ॥ तौ हू बैरी प्राण न निकसै.. पापी जीवं कठोरारे. ॥ दयावंत नहि कंत हमारे बेदरदी है नंद नंदन। बरसौ०॥१॥ 'दामिनः को जंबे तड़पत, देखू धरती परी लजीती हूं ।। इसकी न्याई तडप २ मैं क्यों अकास. नहिं जाती हूं । .. २ ॥
(६४
श्याम बियोगिन हौं हत भागिन परी भूमि अकुलाती हूं. ॥
मेघ श्याम की अंक में वाकू देख अधिक ललचाती हूं ॥
हाय प्राणपति हाय नाथ यूं धाय बिलाप करूं बन २॥बर०॥
खांत की बूंदनतें वो चातक तृप्त भयो मतवारो है ॥
पृथ्वी रानी खूब अघानी पायों जल निज प्यारो है ॥
कहियौं हरसे कौन चूक पै हम को नाथ बिसारो है ॥
दयावन्त करुणा निधान प्रण काहे को प्रभु धारो है ॥
सुमिर बेग मथुरेश आपनो गुण विशेष जन दुख भंजन ॥
बरसौ बरसो०-॥
॥
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.
॥
(१४) मलार सोरठ वा गौड़ दोनो मैं )
पिया के संग , पावस परम सुखारी ॥
नवल निकुंज नवल तन जोबन युगल नवल छबिधार्ग ।। पि:।।
१ सघन भूमिपै लूम झूम घन बरसावत रसवारी ॥
भोरशोर कोकिल मृदुबानी सुन हर पिय प्यारी॥पिया।
२ श्यामल अंग पीतपट सोहै.हरित प्रिया तन सारी ||
अंग २ फूलन के भूषण चितवन कामनगारी ॥ पिया०॥
३सीतल पवन अंग पुलकावत प्यारी लगत फोआरी ॥
रागमलारसखीजनगावत छबिलख तनमनवारी। पिया०॥
हिलमिल करत किलोल परस्पर आनद उमग अपारी ॥
अनुपमसोमाप्रियाप्रीतमकी लखिमथुराबलिहारी।पिया०॥
. (६५) (१५) अथ हिंडोला लीला ॥ सोरठ मलार में हिंडोला । रंगीली राधे झूलत गुमान भरी ॥ हे रंगीली०-॥ ललितादिक की और न देखें झोटा देत हरी ॥ हेरंगी० ॥१॥ सीतल मंद सुगन्धित वायू जमुनातीर अरी ।। बरषा ऋतु सब ठाट रंगके रिध सिध लिये खरी॥ हेरंगी०॥२॥ तीन लोक नायक पुरुषोत्तम वाही के बसरी ॥ वाही की मथुरेश पियाने चितवन चित में धरी॥ हेरंगी० ॥३॥ (१६) ॥ हिंडोला ॥ जमुना तट बंसीवट छैया झूलत कृष्ण कन्हैयारे ॥ राज दुलारी राधाप्यारी संग डार गलबैयां रे ।। जमुना० ॥ पीताम्बर गिरिधर तन सोहै प्यारी सुन्दर सारी रे ॥ जिसर ने वो छबी निहारी लीनी जुगल बलैयां रे ॥ जसु०॥ रेशम डोर जड़ाउ हिंडोरा तापर सुन्दर जोरी यह ॥ दौर २ झोटा दे सखियां परसत हरि के पैयां रे ।। जमुना ।। श्यामघटा घनश्याम छटा लख मोर रटै चहूं ओर घने। दामिनि देख डरात लाडली अंक गहै तब सैयां रे । जमुना० ।। घन की गरज छिपावन को हरिबंसी शब्द सुनावै रे ।। परमानन्द मगन मथुरालाख गावैमोद बधैयारे॥जमुना०॥
(६) (१७) ॥ सोरठ में हिंडोला। हिंडोरे झूलैं. गंधे संग गुपालहें हिंडोरे०- रूप अनूपम प्रिया प्रीतम को निरख मुदित ब्रजबाल ।।हे. ॥ प्रेम सरोवर तीर कदमतर सुन्दर सांज समाज । वाज रहे मधुरे सुर बाजे गावत गोपी ग्वाल ॥ हे ॥ झोटा देत विशाखा. ललिता मुखहि निहार निहार । राग मलार लाडली गावत बंशी बजावत लाल ॥ हे० ॥ झूम झूम धन बरसन लागे चलत अधीर समीर। मोर शोर कोकिल कलरव सुन उमंग बढी तत्काल ॥ ३० ॥ पुलक गात लखि पियके किशोरीसखियनसेसकुचात। . बिजुरि के डरले हरि उरलागी भये मधुरेश निहाल ॥ हे० ॥ . (१८) ॥ हिंडोला.॥ .:. उच्छव निहारौ तखी युगल झूलन को ॥ उच्छव० ॥ फूलन को झूला सोहै छबियाकी मन मोहै ।।... पूतरो; खरो है. मानो रूप के सदन को ॥ उच्छव० ॥ नानी नानी बूंदन बरस रह्यो है धन ॥ चपल, पवन मानो दूत है. मदन को ।। उच्छव०॥ झोटा दैवै बारी बारी सखियां उमंग भारी ।। गावै मिल सारी राग.सोहनों श्रवन को ।। उच्छव० ॥ बांसुरी वजावैनाथ लाडिली जीगावै साथं ॥ प्यारी को गरे में हाथ जीवन ललन को ॥ उछच्च० ॥ s (६५) कुंज की अनूठी सोभा मन उपजावै छोभा॥ युगल हिये में लोभा बढत रमन को ॥राजत | मथुरा निहारै छब तन मन वारै सब । ये है सारी करतव. वाँकी चितवन को || राजत०॥ । . । - , New PA . (15) ॥ हिंडोला ॥ (पनाम्हाने प्यारो लागे हे ॥ इस के वजन.पर) अटारियों में श्यामा रंगभीनी हे (माए) झूलरहीं प्यारे संग ॥ अटारियों-॥ झुला, चहुं दिस सखियां हे (माए) अनुपम सुंदर श्याम मदन को रूप लजावै हे ।। अदा०॥ २-किशोरी छबि लख रसिया, हे (माए) वारत तन मन प्राण चन्द्रमुख नैन चकोरी हे ॥ अटा०॥ ३-हिंडोरो रतनन जरियो है (माए) फूलन गुथियां डोर उमंग मन लेत हिलोरो || अटा०॥ -लुभावनि रितु घन 'छैयां हे (माए ) रुम झुम बरसत मेह लगतहै फवार सुहावनिहे ॥ अटा० ५-उचारै सखियां पलारै (.माए. मुरली र व सुखकोर हियन की ताप निवार है। अटा० ॥ ६-बिहारी नवल बिहारन हे (माए) मथुरा जोरै हाथ बिरह की पीर निवारी है। अटा० ।। हे - (६८) (२०) राग गौड़ मलार हिंडोला । 'देखौरी झूलै २ हिंडोरे प्रियाजी सांवरिया के संग ।। देखो० ॥ राग गावत सगरि संखियां हिल मिल दिलके कमल फूलै २॥ 'घनकी घुमड वरषा ऋतु प्यारी वायु पुरवा पुलकित अंग ।। मोर बोलत बन कोयलिया कूजत मथुरा सकल दुखभूलेगा। m (२१) हिंडोला,जयपुरी भाषा में ॥ श्यामा प्यारी संग झूलै मनः को भावनो ए॥ 1 चालौ चालो री सहेल्यां , देखो देखोरी रस केल्या, । झोटा देवै छे नवेल्या, रस. बरसावनो ए ॥ श्यामाः॥१ भारी रतनाको हिंडोलः, ऊंकी डोरयां छे अनमोल थांने देख्यां पड़सी-तोला अधिक सुहावनो ए।। श्यामा ॥२॥ बरसे रुम झुम रुम झुम मेह, भीजी सोहै प्यारी देह, । बाद निरख सनेह, दिल ललचावनों ए.॥ श्यामा०॥३॥ ललिता झांके हरिकी ओर, प्यारा मुलकैछे मुखमोर, बन में ना. पंछी मोर, चित्त लुभावनो ए॥ श्यामां ॥४॥ हींदोज्यों.२ झोटा खाय, प्यारी श्याम अंग लिपटाय,। प्यारों छतियां लगाय, सुख पावनों ए ॥ श्यामा ॥५॥ सखियां गावे छे. मलार, कोई देवै छे रस गार बाहै आनंद अपार सुन रस गावनो ए ॥ श्यामा ॥६॥ झूलैं प्यारी संग सुजान , मथुरा वारै तन मन प्राण, । येही युगल को ध्यान , चित में लावनो ए ॥ श्यामा० ॥७॥ Gook .
( ED
(२२) ॥ मूगेकी चाल में झूला ॥
झुलावै संग साथ की अली अरे हां हां ॥
दोऊझूलें नवल किशोर किशोरी,झुलासंगसाथकीअली!!
सेवा कुंज. पुंज. सोभा की, होवै तहां रंग रली । अ० ।।
नंदढोटा छबि लखन चंद्रावलि, झोटा देन चली । अ० ॥
बरसंत मेह नेह द्रुम सरसंत, रति की बेल फली ॥ अ० ॥
रूप उजागरि सब गुण आगरि, नागरि भानुलली ॥ अ० ॥
निकसत हैं रसबैन प्रेम के, बिकसत मनकी कली ॥ अ० ॥
झूलत श्रीमथुरेश लाडिली, धन यह ब्रज की थली ॥ अ॥
-,
.(२३) ॥ झूला ॥
झूलत (नवेली राधे.. कालिन्दी , की ; तीर ।..
संग मैं बिराजै प्यारे दाऊजी के बीर ॥ झूलतः ॥
कदम की डारियों में कनक जंजीर।
जड़ित हिंडोरा सोहे भई भारी भीर ॥ झूलत.॥
उमंग हिलोरें. लेवै
जमुना.
को नीर।
हौरे होरे झोटा देवै सुरभ समीर ॥ झूलत ।।
श्याम ओढ़े पीर पर्ट गोरी नीलो चीर ।
श्यामघन माहीं मानो दामिन अधीर ॥ झूलतः ॥
घन की गरज"सुनि कठिन गंभीर ।
प्यारे उरलागी प्यारी नाजुक सरीर ॥ झूलतः ॥
चलन लगेरी तीखे नैनन के तीर ।
मथुरा मिटाई दोऊ मदन की पीर ।। झूलतः ॥
.
--
*
(१००)
( आवत श्याम लटक चल,मुकट धरे ॥ इस के वजन पर )
(२४) [ झूला ]
झूलत दोउ मगन मन उमग भरे ॥ झू॥
सखियां रस मैं छकी छवि को उर मैं धरे ॥ झूलतः ॥
उमडत घुमड घूम बादरवा बरसत रुम झुम वारी ।।
पौन चलै मन हरषात भारी ॥ झूलतः ॥
हिल-मिल अली देत हैं झोटा निरखत पिय मुख प्यारी ॥
मथुरा चकित लेख धज आज न्यारी ॥ झुलत ॥ ..
-
(हिंडोला श्रीरघुनाथजी महाराज का )
(२५) ॥ राग सोरठ मलार ॥
हिंडोरे झूलें सिया रघुनंदन आज ।।
सरजू तीर सघन उपबन मैं अलिगण रच्यो समाज ॥ हिं०॥
१-अतिही सुखद सरस ऋतु पावस मेघ रहे नभ गाज ||
राग मलार सखी मिल गावे बाजे रहे हैं बाज ॥ हिं०॥
'२-मोतिन डोर जडाऊ चौकी अति सुंदर सब साज ॥
गरबाही दिये उमंग हिये भरि नवल युगल रहे ब्राज ॥ हिं॥
३-रस भरे नैन नेह भरी चितवन हसन अज अंदाज,
झोटन तें तन क्सन उड़त कछु प्रिया हग छाई लाज | हिं०॥
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(१०१,
४ उमारमाशचिलखिललचा प्रिया मन जो सुख आज ||
मथुरा दास कौन मुख बरणै धन दम्पति रस राज हिं॥
.
तथा हिंडोला श्रीराधा गोविंद का॥
हिंडोला झूलें प्रिया प्रीतम संग आज ॥
जमुना तीर सघन कुंजन में अलिगण रच्यो समाज ॥हिं०॥
पाकी सब अंतरे ऊपर के ज्योंके त्यों नम्बर २५ के.इस
में बोले जावें ॥
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(२६) ॥ हिंडोला ॥
(चलो पिया वाही कदमतर झूलें । इस के वजनगर
श्यामा संग झूलैं रसिक बनवारी ॥
जमुना के तीर कदम की छैयाँ बरस रह्यो रस भारी॥रसिक०॥
१ झूलें युगल नवल प्रिया प्रीतम रसिकन प्राण अधारी ॥
२ घनकी घटा लगै अति प्यारी-नानीरपरत फुआरी ॥
३ सखियां झुलाबैं मलारै 'गाबैं-मथुरा छवि पर वारी ॥
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(२७) ॥ हिंडोला ॥
नाटक की चाल
(होरे सैयां पूरू में तोरे पैयां रे सताओ काहे मोको । इस के वजनपर)
सोरी छैयां किशोरी संग सैयां रे हिंडोरे झूलें सजनी ।।
(१०२) जमुना किनारे झूलें दोऊ रसीलेरी, सेखी गावै सावन की मीठी रागें ॥ अरे हां ४ ॥ प्यारे रसिया हैं भारी वो विहारी, दिखारी मोको सैयां, मैं लागू तोरे पैयां, मन हरियां, रस भरियां, शुभ घरियां, हिये धरियां,-मेहा बरसे विजुरि चमकाय रे हां ५ वरसाय, सरसाय, चितलाय, दरसाय ।। सीरी० ॥ मथुरा मुखसे न कछु कहिजाय रे हां ५ हुल- साय, चलधाय, बलिजाय, गुणगाय, ॥ सीरी० । Doc ॥ हिंडोला । * ये बसैं: यो बसें वादर गुइयां इस के वजन पर * ये झूलें वो झूलें माधव सैयां, कालिन्दी कूल २ ॥ येझू०॥ श्यामल तन सोहत पीताम्बर, घनदामिन समतूलैं॥येझू॥ जमुना मन उमंग दरसावत , विमल कमल फूल २ ।। ये झू॥ डार २ तरु ऊपर ब्रज जन , सखिन भीर मूलैं शाये झू। श्रीराधानवतरुणिमुकटमणि, क्रीडत प्रिय अनु कूलें।ये झू।। *इति.समाप्र* .
( १०३ ) . . ॥ श्री॥ * :श्रीहरिर्जयति " . ॥ नित्य सेवा भारती के पद । ॥अारती का पद ॥ १ 1. 27. आरति मंगलकारी युगलकी आरति मंगलकारी ।। बजनागरी, रूप गुण आगरि करले कंचन थारी । जारि अनेक कपूरकी बाती आरति करन सिधारी ॥ यु०॥१॥ श्यामा श्यामनिकुजभवन में अनुपमशोभाधारी॥ रत्न सिंहासन, राजें. दोऊ कोट मदन बलिहारी॥.युः ॥२॥ घंटा शंख झालरी बाजें सखियां बजावन हारी॥ ललिता आदिक अष्टसहेली आरति उमंग उतारी ॥ यु०॥३॥ दम्पतिकी मुसिकान मनोहर चितवन कामन गारी ॥ आरति गावत मोद बढावत मथुरा मन दियोवारी ॥यु०॥४॥ । . 1
(१०४ )
॥
॥
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(२)
॥ वन्दना॥
१-धेयं सदा परिभवघ्नमभीष्टदोहं
॥
तीर्थास्पदं शिवविरंचिनुतं शरण्यम्
भृत्यार्तिहं प्रणतपाल
भवाब्धिपोतं ॥
वंदे महापुरुष ते चरणारविंदम्
२–वेदानुधरते जगन्निवहते भूगोलमुद्विभृते
दैत्यं दारयते वाले छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते ॥
पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्य मातन्वते ॥
म्लेच्छान् मूर्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यंनमः ॥
३-~-श्रीनारायण पुण्डरीकनयन श्रीराम सीतापते ॥
गोविंदाच्युत नन्दनन्दन मुकुन्दानन्द दामोदरः ॥
विष्णो राघव वासुदेव न्टहरे देवेन्द्र चूडामणे ॥
संसारार्णव कर्णधारक हरे श्रीकृष्ण तुभ्यं नमः
४-अंभोधिःस्थलतां स्थलं जलधितां धूलीलवःौलताम्
शैलो मृत्कणतां तृणं कुलिशतां वजं तृणक्षीणताम् ॥
वन्हिःशीतलतां हिम दहनता मायाति यस्येच्छया ।।
लीलांदुर्ललिताद्भुतव्यसनिने कृष्णाय तुभ्यं नमः ॥
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(३) (ध्यानम्)
१-कस्तूरीतिलक ललाटपटले वक्षस्थले कौस्तुभं ।
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणुं करे कङ्कणम् ॥
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(१०५)
सर्वाङ्ग हरिचन्दनं सुललितं कण्ठे च मुक्तावलि ।
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपाल चूडामणिः ॥
२-फुल्लेन्दीवरकान्ति मिन्दुवंदर्न वर्हावतंसप्रिय
श्रीवत्साङ्क मुदारकौस्तुभधरं पीताम्बरं सुन्दरम् ।।
गोपीनां नयनोत्पलोचिततर्नु गो गोप संघावृतम् ।
गोविन्द कलवेणुवादनपरं दिव्याङ्गभूष. भजे ॥
अंसालम्बित वामकुंडलधर मन्दोन्नतधूलतम्
किंचित् कुंचित कोमलाधरपुटंसाचि सारेक्षणम्॥
आलोलागुलिपल्लवै मुरलिकामापूरयन्तं । मुदा।
मूले कल्पतरो त्रिभङ्गाललितं ध्याये जगन्मोहनम्।।
४-वालं नवीनशतपत्रविशालनेत्रम्
विम्वाधरं सघनमेघरुषि मनोज्ञम् : ॥
मन्दस्मितं मधुर सुन्दर माननं तम्
श्रीनंद नन्दन महं मनसा. स्मरामि
(४) ॥ प्रार्थना ॥
१- हे गोपालक हे कृपाजलनिधे हे सिंधुकन्या पते ।
हे कंसान्तक हे गजेन्द्र करुणा पारीण हे माधव ॥
हे रामानुज हे जगत्त्रयगुरो हे पुण्डरीकाक्षमां।
हे गोपीजननाथ पालय परं जानामि नत्वां विना।
१-त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव वन्धुश्च सखा त्वमेव ।
(१.०६) त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव ।। २-हे राधे वृषभानु भूपतनये गान्धर्विके राधिके । हे. कृष्णाननपङ्कजभ्रमरके, कृष्णप्रिये माधवि ।।. हे वृन्दावननागरीगुणगुरो दामोदरप्रेयसी हेहे श्रीललितादिकप्रियसखि प्राणाधिक पाहिमां। ३-हे राधे वृषभानुभूपतनये हे पूर्ण चन्द्रानने। हे कान्ते कमनीय कोकिलरवे. वृन्दावनाधीश्वरी ॥' हे मत्माणपरायणे च रसिके हे सर्व यूथेश्वरी। आगत्य त्वरितं प्रतप्तमनस-मां दीन मानन्दय ।। H , 11 17 ॥ (५) ॥ शरणागतिः॥ ५-अहो बकीयं स्तन कालकूटं जिघांसया पाययदप्यसाध्वी। लेभे गति धाञ्युचितां ततोऽन्य कंवायालुं शरण ब्रज़मः॥ ६-न धर्म निष्ठोस्मिन चात्मवेदी- न भक्तिमान्स्त्वञ्चरणारविन्दे । . अकिंचनो ऽनन्यगतिः शरण्य- त्वत्पादमूलं शरणं प्रपयें ७-अपराधसहस्रभाजिनं पतितं भीमभवार्णवोदरे. । अगतिं शरणागतं हरे कृपया. केंवल-मात्मसात् कुरु ।। -हे. नाथ झरणं देहि मां भक्तं शरणागतं. .....
(१०७)
सर्वाय सर्व निलय सर्व वीज सनातन
सर्वाधार निराधार साक्षिभूत परात्पर
दुष्पारासारसंसारकाधार नमोऽस्तुते
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(६) श्रीकृष्णचन्द्र मुकन्द गिरिधर सुघर सुन्दर लोचनम् ।
यह अष्ट पदी विनय सुधाकर पद नम्बर (६४) तथा पृष्ट नम्बर (४७)
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(७) ॥ दोहा ॥
प्रणत पाल रघुवंशमणि , करुणा सिंधु खरारि ।
गहे शरण प्रभु राखिहो , सब अपराध बिसारि ॥
नहि बिद्या नहि वाहुबल , नहि खरचन कछु दाम ।
मोसे पतित पतंग की, तुम पति राखौ राम ॥
राधे तू बड भागिनी , कौन तपस्या कीन ।
तीन लोक तारण तरन , सो तेरे आधीन !!
राधे तेरे पुन्य को , पायो नाही
पहले तू पीछे हरी , गावत सब संसार ।।
बार बार बर मांगि हों , हरष देहु श्रीरंग ।
पद सरोज अनपायनी , भक्ति सदा सतसंग ।।
चरण कमल रतिदीजिये, मेट सकल भव क्लेश ।
टेर सुनौ हरि भक्त की , राधा वर मथुरेश ।।
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(८) प्रभाती। राग भैरों अरुण उदय शुभ समय युगलको सखियां धाय जगावें।। मधुर मधुर अनुराग भरेस्वर राग प्रभाती गावें ।। अरु. बीती रैन चैनसै सारी मंद भई शशिकी उजियारी ॥ अस्तुत करें गंगन सुरनारी मुनि गण विनय सुनावें ॥१॥ चलत सुगंधिः समीर सुहायो जमुना नीर लहरायो । पंछी गण है शोर मचायो दर्शन मन ललचावें ॥२॥ चरण कमल मकरंद लुभाने मन मधुकर तरसाने । चहुँदिस डोल रहे बौराने कब दर्शन सुखपावै ॥३॥ जल झारी लिये कोई कलेवा लाई मिसरी मेवा ॥ सखियां चहें प्रभू पद सेवा मथुरा हरि जस गावै ।। (६) ॥ तथा॥ पीतम संग उमंग भरी अति चैनसै रैन बिताई । अलसाने लख नैन प्रियाके सखियन सैन चलाई ॥पीना प्यारी को मुख निरख बिशाखा कछुक मंद मुसिकाई । ललिता कहै आजकी शोभा कापर बरणी जाई। पी० ॥ रतनारे हग प्यारेके लख श्यामा मन सकुचाई । झुंड झुंड सखियां उठ धाई गावत मोद बधाई ।। पीतमः । एक ओर करजोर खडे बहु दीन भक्त समुदाई । कृपादृष्टि तिन पर महारानी कर हिय तपन बुझाई ॥पी-।। मथुरा अधम भिकारी तब अरजी धाय सुनाई। स्वामिन तुरत दया दरसाई वांछित भिक्षा पाई पीतम०॥
(१०६) (१०) ॥प्रभाती ॥राग कालंगडा जीवन धन मोरी सो ही गौर श्याम जोरी । निर्मल शशिवदन दोउ नयन मम चकोरी ॥जीवन। १-सनमुख है सखि समाज हाजिर सब सुखके साज। सिंहासन रही बाज पीतम संग गोरी ॥ जीवन० ।। २-लज्जा कछु एक ओर सरसत उत मदन जोर । नैनन की कोर करत अदभुत चित चोरी ॥जीवन०॥ ३-कोमल कर परत गात हँस हँस पिया करत बात । प्यारी सकुचत लखात वारी जिम भोरी ॥जीवन॥ ४-प्यारी गरे चंद्रहार ता विच पिय छवि निहार । होत मुदित बार बार भामिनी किशोरी ॥ जीवन०॥ ५-मथुरा कर जोर कहै झांकी मन बसी रहै । पद पंकज रेणु गहै आसा सब छोरी ॥ जीवन०॥ (११) कलेवेका पद राग सिन्धभैरवी । करत कलेऊ युगलबिहारी ॥ माखन मिसरी मोदक मेवा । और सामग्री कछुक सुखारी॥१॥ दम्पति हास बिनोद परस्पर । जेमत समय करत सुखकारी ॥२॥ प्यारी कहै प्यारे माखन जेमौ। माखन चोरीमें रसभारी॥३॥ बोले श्याम बतादो प्यारी । अधरसुधामें स्वाद कहारी ॥४॥ आप समान तृलोकी माहीं । नहि या रसकी जाननहारी ॥ ५॥ अस विध कियो कलेऊ दोऊ।
(११०)
वोले ललिते पान खिलारी ॥ ६ ॥ बोरी चाव मुदित
भये दम्पति । मथुरा वा छबि पर बलिहारी ॥ ७ ॥
(१२) ॥राज भोग का पद राग सारंग ॥
अति रुचिसों जेमत पिया प्यारी ॥
श्यामा श्याम सिंहासन राजै।सनमुखहै चौकी तहांधारी॥१॥
तापर कंचन थार सुहायो। कनक कटोरीन्यारीन्यारी॥२॥
सखियन लाय परोसे व्यंजन । खटरसकी हैं सब तैयारी ॥३॥
पेड़ा बरफी खीर बासौंदी ।सुंदर हैं मोदक पचधारी ॥१॥
खस्ता पूरी और कचौरी।भांत भांतकी है तरकारी ॥५॥
ललितांविशाखाआदिसहेली। प्रीतभरी वो परसन हारी॥६॥
आदर कर वहु व्यंजन परसैं । कर मनुहारै बारी बारी ॥७॥
प्रियाके मुखमैं ग्रास देत हरि। उत प्यारे के मुखमैं प्यारी ॥८॥
जेमत मैं जो रस बरसत है। मनललालखके मुरनारी ॥९॥
तृप्त होय दोउ करत आचमन। चंद्रावलि लाई जल झारी ॥१०
वीरी पान निवेदन करके।मथुराहै छबिपर बलिहारी ॥१||
GETHEROIN
(१३) ब्यारू भोगका पद
व्यारू आरोगत मन मोहन श्यामा संग निकुंज भवनमैं
कंचन थार धरे बहुव्यंजन स्वाद लेत दोऊ हरपत मन में
प्रीत रीतकी जानन हारी हाजिरठाड़ी परसन हारी ॥
कर मनुहार परोसैं सारी मनको मोहैं रसबतियनमें ॥१॥
( १११)
एक कहै पिय पूरी लीजै नाथ अधूरी बात न कीजै ॥
कबोरी पिय नाहि पतीजै प्यारीसों भापत सैननमें ॥२॥
दूजी कहै लीजिये खाजा खाके सतजाओ ब्रजराजा ॥
मोहन भोग लेहु महाराजा रुचिर माधुरी यामैं भारी ॥३॥
अस रसवतियां सुन हरपावै जेभत अति आनंद मनावै ।।
उत्तर पाय हिये सकुचावै सखियां हरिसों गूढ वचनमैं ॥४॥
तू कचनार फरी रस देरी भावत मोकों तोरी हैरी ।।
ललिताअस हरिवचन सुनेरी लज्जा छाय गई नैनन मैं ॥५॥
अल हरपत दोउ व्यारु कीनी कर आचमन बीरी मुखलीनी ॥
आलल भरे नैन रंग भीनी लख मथुरेश चले सेजनमैं ॥६॥
(१४) (दूध के भोग का पद ॥ राग सोरठ)
दुग्ध कीजै पान दम्पति दुग्ध कीजै पान ।।
लुखकि पुंज निकुंज खामिनि स्वामी श्याम सुजान ।।
अं०-कंद मिसरी युक्त अतिआनन्द प्रद मिष्टान ।।
सुधाहू से अधिक स्वादू अतिहि रोचक जान ॥ दम्पति ॥१॥
भरे कंचन द्वय कटोरा धरे. थार में आन ॥
पियत रुचिसो प्रिया प्रीतम गुण बखान २॥ दम्पति ॥२॥
मुदित मन ललिता निवेदन किये वीरा पान ॥
नमत्त मथुरा चरण दम्पति वार तन मन प्राण ॥ दम्पति ॥३॥
(११२.)
(१५)॥ शयन का पद राग सोरठ।
सेज पधारो प्यारे युगल किशोर .॥
कछु आलस कछु दृगन छयों है जोबन मदको जोर सेजला
स्वच्छ मृदुल सुंदर सुख शैय्या खिचरहि रेशम डोर ॥
विविध अतर अरु सुमन सुगंधी महक रहे चहुँ ओर ॥सेज०॥
दर्पण पानदान जलझारी अपनी अपनी ठौर ॥
शैय्या गृहबिच रमण सामग्री हाजिर है सब तौर ॥सेज०॥
चंद्रवदन गोरी श्यामा को मोहन नैन चकोर !!
हरि मुख कमलप्रियामनमधुकरदोउरसिकसिरमोर ॥सेज ॥
हास बिनोद मोद उरछायो उत निद्रा को जोर ।।
सेज पधार कीजै मनभायो मथुरा कहै निहोर ।।सेज०॥
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पुस्तक मिलने का पता
यह किताब और मेरी रचित अन्य भजनों और
नाटक की पुस्तके, जयपुर में निम्न लिखित स्थान पर
गुलाबचन्द बुकसेलर त्रिपोलिया बाजार देसी डाकखाना
के सामने। जयपुर (राजपूताना
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