Adarsh Library, Jaipur

Kiya Yah Sach Hai

Pritam Amrata · 2011/03

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

यह सच है

No text on this page.

यहसवहे प्रीतम

No text on this page.

उगमे यनुमान से सभी रात यो... पानी के रिनारे पर उगी हुई गाड़ी में उमने अपनी सिकोड़ी हुई टांगों को गीधारिया और पैरों के बस गाया तो उसे झाड़ी के कारी गिरे के गुन्- दार फूल मानी गरदन को हते हा सगे... पर पर यह सम्बेग भरता माही में निकलकर पानी के किनारे पर आया नो पानी में पाने यात्री उमरी परणाई उसके दिल को हिला गई... निपरं, गरे हुए पानी में उगी पूरी आकृति प्रतिविम्बित पी-सम्बी- पतनी टाग, हाती को हकी दूधिया परणाई, और दोनों पहलुओं में उगे हुए सगरोटी रंग के पंखों का गहरा मापा और माये के पास सिर पर पहने हुए ताज मे ममान यहे चमकदार नीले पपों का गहरा रंग और लम्बी-पतली पोच का अकराय' और मावों के गिर्द लाल मुगं घेरे... सो, यह रात नहीं पो, दिन चढ़ने वाना था, तभी तो उममा प्रविधि इनना मादिगाई दे रहा था... और दिन पाने के गयाल में एक प्रकार के भय का एक ऐमा कम्पन उसके शरीर में गुजर गरा फिगरे हुए जन में भी उनका सापा कार गया... उगने बानी से धोन को पानी में दवाकर एक सनी पूंट भरी। उमरे गूगे हम गरेको जब पानी पीनगरट मिनी, उसने अपनी पाम की ओर में पान टार, दूर तक एक भयभीत प्टिहासी, और फिर जली मे सम्ने गभरता हुआ पानी के किनारे उगी हुई माड़ी में जाकर गिर गया.. मराको यह माटो पतली-मो थी, जिसको दरखों को रात का अंग्रेरा वो मिटा देता था, पर दिन की रोशनी उन्हें पोटा-मा करती हुई ममती यो, विमरेपारण यह बरने शरीर को हिमाकर मी निश्चित नहीं था.. और मरकंग की यह मादी कभी भी नहीं थी। वह ना मंद गावापा पुछ कती थी। पर व वह पता होता पा तो बस उसी गरश्न सब उसे तक आती थी। उसने अपने शरीर को मानो अपने शरीर में ही समेट लिया, और फिर जल्दी से सरकंडे के पत्तों को अपनी चोंच में लेकर ऊपर खींचने लगा। शरीर की पूरी शक्ति से जव उसने पत्तों को ऊपर खींचकर अपने शरीर को ढकने की कोशिश की, तो उसके हांफने के कारण उसकी नींद टूट गई। विस्तर की चादर को वह नींद में न जाने कितनी देर तक खींचता रहा था कि उसे लगा वह चादर पायंती की ओर से कुछ फट गई है। उसने पलंग के पास ही लगे हुए विजली के बटन को दबाया और हैरान होकर अपने कमरे को देखा। वही रोज की तरह सजा हुआ कमरा था, वही लकड़ी के वारीक काम की पीठ वाला पलंग, और वही.. वह... अजीव सपना आया था कि आज वह नींद में तप्त रेखा में पैदा होने वाला पंछी बन गया था, जो दिन-भर रोशनी से डरते हुए पानी के किनारे की झाड़ी में छिपकर रहता है और सिर्फ रात के घने अंधेरे में झाड़ी से बाहर निकलता है। उसे अपना गला उसी तरह सूखता हुआ लगा जैसे अभी-अभी नींद में पानी के किनारे खड़े हुए अपनी लम्बी चोंच से लम्वे चूंट भरकर पानी पीने के समय था। पलंग के पास ही छोटी मेज़ पर रखी हुई कांच की सुराही में से उसने पानी के कितने ही धूंट भरे, और फिर अभी देखे हुए अपने सपने के बारे में सोचने लगा। सहज स्वभाववश उसका हाथ अपनी छाती की ओर भी गया और बांहों की ओर भी-जैसे अभी उसके सारे पंख झड़ गए हों और वह एक पंछी से बदलकर सिर्फ एक मादमी रह गया हो। पंख नहीं थे, पर पक्षी के मन का डर इस समय भी उसके मन में था। और यों तो अभी रात थी, दिन का उजाला नहीं हुआ था, कमरे की मसनूई रोशनी से भी चौंककर वह कमरे की दीवारों की ओर देखने लगा। एक दीवार से लगी हुई कितावों की अलमारी थी। उसकी भटकती हुई C - दृष्टि र रितायों की बोर गई, उसे याद याया कि वन उसने एक पारद नियन आर्टिस्ट की एक किताव पढ़ी पी 'द टीम टाइम युर' और उगी किनाव में तप रेगा में पंदा होने वाले उस रात के पक्षों की तसवीर देतीपो, जो दिन-भर पानी के किनारे पर मरकंडों में लिकर रहता है। और जय उमे यह सर करे अपने पद से छोटे जान पड़ते हैं. वह पांच से सरपंहो के पत्तों को गाँचता रहता है ताकि यह जल्दी से हो जाएं। उरी अपने सपने पर हसी-गी या गई और पलंग से उठकर उसने यलमारी में से फिर यह फिनाय निकालपर देगी। पर उमपी हमी उसके होटों के पास आकर भी पोये होती हुई उगरे गले में अटप-मो गई, पर सपने में मैं यह पक्षी स्मों बन गया?' पायद पिने जन्म में मैं तप्त रेणाका पक्षी पा! शायद अगले जन्म में मैं उस पक्षी की जून पाऊंगा! शायद इगो जन्म. गरीर मनुष्य का, आत्मा उस पसी की...! उगने मानो एक लम्बी आह भरी। और यह आदिवागियों की उस कया के संबंध में सोचने सगाजो रात के पटी से संबंधित है और जिसमे वे बहते हैं कि यह पक्षी वास्तव में एक मनुप्प होता था। पर उनके मापियो ने उगे इतना सताया कि उगने ईश्वर के आगे प्रार्थना कर-करके अपने लिए एक पसी मा रूप मांग लिया। उसकी प्रार्थना स्वीकार हो गई और यह पक्षी बन गया। पर उसकी छाती में जो भय जमा हुया था वह उसके पक्षी बनने के बाद भी जराको छाती में ही पड़ा रहा। और यह सदा के लिए दिन की रोशनी में छिपकर रहने सगा। पर मादियाशियोमी इस क्या का मुममे क्या मंबंध? यह सपा मेरी छाती में ययो उतर गई। बस याद में नही, रात के सपने में भी?... जिन्दगी के पोर्टो वर्षों में कई मुरा उसके दाय-बायें विधाए थे, और दूर जहां हम उसको दृष्टि जाती थी, उसे सारा राम्ता मगमलो रंग दिलाई देता पा, पर आज यह पक्ति मा कि वह पौन-सा दर पा जोरा के समय उमेस संरोगीमारी में टिपर पटने के लिए महता रहा पा? मोर रात के समय राहे हुए पानी में भी उगमा प्राविध यों मारता रहा था? उसने किताव का वह पन्ना पलट दिया जिसपर उस रात के पक्षी का चिन था और अगले पन्नों पर छपी हुई तस्वीरें देखने लगा। यह तस्वीरें उसने कल भी प्यासी आंखों से देखी थीं। यह उस अंडे की तस्वीर थी जिसके टूटने पर उसमें से पहला सूरज निकला था। वह पक्षी जो मनुष्य जाति के लिए अपने सिर पर आग उठाकर लाया था और जिसके सिर के ऊपर वाले पंख सदा के लिए लाल हो गए थे। वह टूटी हुई चट्टानें जिनमें से मानो अब भी एक तुफान का शोर सुनाई दे रहा हो। हाथ में ली हुई किताब को उसने परे रख दिया-रंगों के तूफान का शोर सुनाई देने का यह एक भयानक एहसास था। किताव, जैसे उसने रखी थी, बन्द और चुप पड़ी रही, पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ किताव का नाम मानो उसकी आंखों को पकड़कर बैठा रहा-ड्रीम टाइम बुक खाने का समय, काम का समय, सोने का समय, आराम का समय यह सब समय लोगों ने गढ़े हैं, पर यह किस प्रकार का आदमी है-वह सोचने लगा---जिसने सपनों का समय कहकर इस किताब को देखने की बात की ... रात का सपना उसे फिर याद आ गया और किताब की ओर से मुंह हटाते हुए, उसे लगा मानो वह स्वयं किताब का एक पृष्ठ बनकर किताब में रह गया हो, और अब वह किताब से नहीं, मानो स्वयं अपने से परे हटकर अपने पलंग की ओर जा रहा हो। पलंग के पास खड़े होकर, वह कितनी ही देर रात वाली पायंती की ओर से फटी हुई चादर की ओर देखता रहा। सोचता रहा-इस चादर में मैं क्यों अपने शरीर को छिपा लेना चाहता था? क्यों? किससे? और अचानक उसका ध्यान ऊंचा होकर छत के उस कोने की ओर गया जहां एक महीन-मा जाला मानो उस कोने में बैठकर नीचे पलंग की ओर देख रहा हो। भय का एक काला सागा मानो उम कोने में लटक रहा हो। उमे जाले से नहीं, अपने-आप से एक प्रकार की निराशा हो साईकि साधारण में जाने को, उसके मन ने, न जाने क्यों भय के काले साये के साय मिलाया है। यह उसके वह खाली दिन ये तो बड़ी सरकारी नौकरी वाले किसी पर- देश में होने वाली बदली से पहले बिताते हैं । बाजकल वह अकेला था। उमका सामान, जो उसके साथ परदेश जाने वाला था, उससे भी पहले, समुद्री सफर पर जा चुका था। उमकी पत्नी याने वाले तीन वर्षों की दूरी से पहले, एक बार अपनी मां के पास कुछ दिन रह लेना चाहती थी, इसलिए वह वहा गई हुई थी। उमकी मिनिस्ट्री के, उसके अपने विभाग के लोग, उसे विदाई का जश्न दे चुके थे, और अपनी ओर मे उसे अपने पाम से विदा कर चुके थे। और अब वह अपने पास केवल स्वयं अकेला रह गया था। उनकी मां यदि जीवित होती तो वह उसके पास जाकर उसे जिन्दगी को इस मफलता की सूचना देता, पर वह अब जीवित नहीं थी, और इसलिए यह गबर भी, अब उसकी तरह, उसके कमरे में अकेली थी। मां, यह अकेलेपन का समय था। वीते हुए मुषों और आनंदाते सुखों के बीच का खाली समय .. जैसे दो देशों की मीमाओं के बीच एक खाली जगह होती है। साली जगह उसे ध्यान आया, 'शायद इसी जगह को उस किताब वाले आस्ट्रेलियन ने ड्रीम टाइम कहा है. सपनों का समय...' पर पहली रात का ही यह पहला मपना कसा है ? एक प्यास"एक भय" और ठहरे हुए पानी में उसके शरीर को कांपती हुई परछाई ! चिन्ता की एक पपड़ी मी उसके होंठों पर जम गई। क्या सपनों का इस जैसा भयानक होता है ?

- उसके सोने के कमरे और बाहर के बड़े कमरे, जहां लोगों से मुलाकातें की जाती थीं, के बीच, एक छोटा-सा कमरा था जो किसीने कभी नहीं खोला था। केवल वह ही कभी उसे खोल लिया करता था। पर वह वात बहुत समय पहले की है। इस 'वहुत समय' का उसने कुछ अनुमान-सा लगाना चाहा, पर समय की पगडंडी पर इतना घास-फूस उगा हुआ था कि उसे समय के पद-चिह्न नहीं , मिले। सिर्फ एक खयाल आया कि यह वन्द कमरा शायद उसके और उसकी पत्नी के सोने के कमरे, और उसकी ज़िन्दगी की सफलता के चिह्न-उसके मुलाकाती कमरे के बीच बना हुआ एक वह कमरा है जो अपने सारे अंधेरे को समेटकर सदा चुप रहता है, पर सदा वहीं का वहीं खड़ा रहता है । और वह कमरा अपने दोनों पहलुओं की ओर बने हुए दोनों कमरों की रोशनी के वीच दिल के पूरे अंधेरे से मुस्कराता है। उसे लगा-शायद दोनों कमरों की रोशनियां, कभी-कभी हैरान होकर, उस बीच के अंधेरे को देखती हैं। शायद उससे कुछ पूछती भी हैं, पर विवश- सी अपनी जगह पर खड़ी रहती हैं। वह उस अंधेरे को किसी जगह से भी. तोड़ नहीं सकतीं। उसका अपना हाथ आज मानो उसके शरीर से बाहर होकर, उस अंधेरे की ओर बढ़ा---उसके वन्द दरवाजे की ओर.. और फिर उसके अन्तर में गहरा उतरकर उसे उंगलियों से टटोलने लगा। उस कमरे की एक खिड़की दिन की रोशनी की ओर खुलती थी, पर चिरकाल से उसके पल्ले अंधेरे और उजाले के बीच अड़कर खड़े हुए थे। उसने हाथों से टटोल-टटोलकर वह खिड़की ढूंढ़ ली, और उसके मिड़े " हुए पल्लों को खींचकर खोलने लगा। मायद गरीर के मांस की भाति लकड़ी को भी एक प्रकार की पीड़ा हुई, पल्लों में से एक चिरने की-सी आवाज आई। उमरे हाय ठिठक गए, लगा मानो लिडकी की लकडी को जो पीड़ा हुई वह भी उसके अपने शरीर में से गुजरी हो। याबिर खिड़की के पल्लों ने उसका कहना मान लिया, जगह से परे हो गए। उन्होंने कभी उम जगह पर सडे होने के लिए भी उसीका कहना माना था। आज भी उमौका कहना मानकर, परे हो गए और बाहर से आने वाले मवेरे के उजाले में उसके मुंह की बोर देखने लगे। मानो पूछ रहे हो-आज तुम यहां कैमे आ गए ? नुम्हें यह अवकाग कैसे मिल गया? अवकास की इस भयानक्ता का शायद आने वाले को उन पल्लों में भी ज्यादा ज्ञान था, वह आने वाले के चेहरे की उदासी को, पिघली हुई आंचो से देखने लगे। अधेरै का दिल भी युद्ध पिघल-सा गया और उसने जो कुछ भी छिपाकर रखा हुआ था, दीवारो की छाती से लगाकर, वह सब कुछ आनेवाले के आगे रख दिया। आने वाले ने दीवार के माय लगी हुई एक कैनवास की ओर देवा जिम- पर धूल की एक वह जमी हुई थी। उसने अपनी उंगली से उस धूल को छुआ-तो कैनवाम पर एक लकीर- भी बैठ गई-मानो धूल एक रंग हो, और अंगुली एक युग कनवास बाली थी, इसलिए घून की नह के नीचे से किसी हरे-गीले रंग को नहीं टमरना था, केवल धूल में से कुछ नरम बनने और मिटने थे... 'खाली कैनवास लेकर रखने का क्या फायदा? एक नहीं.. दो नहीं... कितनी ही.. पर क्यों ?' यटन अर्सा हुआ एक वार उसकी पत्नी ने खीमकर, उमने पूछा था. पर उमने कोई उत्तर नहीं दिया था। याज भी मानो वह प्रश्न कमरे के अंधेरे में लटका हुआ था। सायद यह प्रग्न सदा उसके घर के एक अघेरे कोने में लटकता रहेगा?

उसे विचार आया ~~घर बदल सकते हैं, पर इससे क्या होता है, जहां भी जाओ वहां ही घरों के कोने होते हैं, और कोनों के अंधेरे। और अंधेरों में लटकने वाले प्रश्न ! उत्तर न वह अपनी पत्नी को दे सकता था, न अपने-आपको। इसलिए उसी तरह सिर झुकाए अपनी उंगली से कैनवास पर पड़ी हुई धूल में लकीरें- सी खींचता रहा। धूल की लकीरें मुड़ती, टूटती और कहीं से गोल-सी होती हुई जब एक अजीव-सा दायरा बन गई.---तव उसे ध्यान आया कि उसने अपनी उंगली से उस धूल में किसीका नाम लिखा है। उ...सि...ला.. यह नाम उन लकीरों में टूट भी रहा था, जुड़ भी रहा था। मानो वह हवा में लटकते हुए प्रश्न को उत्तर दे रहा हो। धूल के होंठों में से निकले हुए वोल ने जब उसके अपने कानों को छुआ, उसे लगा जैसे वह चुप वह चुप की आवाज़ उसके कानों में से होती हुई और उसके सारे गरीर के अंग-अंग में से होती हुई, उसके पांवों की एड़ियों तक चली गई हो, और उसके पांव वहीं के वहीं उस फर्श पर जम गए हों। उसके मन में एक अजीव-सा डर पैदा हुआ। यह पांव आज से नहीं, शायद कई वरसों से यहीं खड़े हुए हैं, और वह जव अपने सरकारी पद की कुर्सी पर बैठने के लिए जाता है उसके पांव वहां उसके साथ नहीं जाते और जब वह अपनी पत्नी के विस्तर में सोने के लिए जाता है तो उसके सारे अंग उसके साथ विस्तर में जाते हैं, पर उसके पांव उसके साथ नहीं जाते और उसे लगा-अब जब वह तीन बरस के लिए आज से भी ऊंचे पद को संभालने के लिए इस देश के बाहर जाएगा, उसके पांव उसके साथ नहीं ‘जाएंगे। एक चुप हो चुके नाम की आवाज़ न जाने किस तरह धीरे-धीरे रांगे के समान भारी हो गई थी, और उसके पांवों की एड़ियों में जाकर इस तरह बैठ गई थी कि उसके पांव जहां कभी खड़े हुए थे, वहीं खड़े रह गए थे। और उसे लगा कि वह सदा अपने पांवों के विना चलता रहा था। और वह सदा अपने पांवों के विना चलता रहेगा। - १२ उसने एक गहरी सास ली और आदिवासियो की एक प्राचीन कथा की तरह, उन दिनो की बात सोचने लगा जब उसके पांव हुया करते थे। एक जवानी का देश होता था जिसमे गंगा जैसे मन की कई नदियां बहती थीं। जहा-जहा सपनों के बीज गिरते थे, यहा-वहा बहुत हरे और करामाती पेड़ उग आते थे। पेड़ों पर फूल भी सिलते थे, फल भी आते घे, चाहे इर्द-गिर्द के कई लोग उसमे धीरे से कहते थे कि यह सब वजित फली और वजित फलों के पेह हैं। पर लोगों का क्या, उसके अपने मन ने उससे कहा था कि वह वजित फूल भी तोड़ेगा और यजित फल भी खाएगा। यह तब की बात है जब उसके पाव होते थे। और एक दिन उसने देमा कि मन के एक ऊंचे टीले पर बैठकर उसिला कुछ कागजो पर एक पेन्सिल से तस्वीर बना रही है और यह पावों में चलकर नहीं, उडकर, पीछे से जाकर उसिला की पीठ के पीछे खडा हो जाता है रसिला मारी की सारी उराकी परछाई में लिपट गई थी। परछाई में नहीं, उसके अस्तित्व में और उमने मिला की पीठ पर छाए हुए उसके खुले हुए बालों में हाथों की उगलियां उलझाते हुए पूटा था, 'उमिसा! तुम रंगों से पेंट क्यों नहीं करती? 'किमी दिन करूंगी, कहते हुए यह हंस दी थी। "पर वेद ?' उमने पूछा या तो रसिला ने कहा था, 'जब रंग खरीदने के लिए पैसे होंगे, सवाल! उसने यह बात मुनी थी, पर मममी नहीं थी। उसे यह बहुत छोटी बात लगी पी-रंगों के लिए पैसे बगर माज नहीं है, तो कल हो जाएंगे। . , पर आज और कल में, उसने नहीं जाना था कि गरीवी का एक वह लम्वा फासला होता है जो कई वार एक जन्म में तय नहीं होता। उन दिनों उसने वजित फूलों और वजित फलों का अर्थ भी नहीं समझा था। यह उसने वहुत समय वाद जाना था कि गरीबी के फूल घरों में सजाने के लिए नहीं होते और गरीवी के फल खाने के लिए नहीं होते। पर समझ की सीमा में आकर भी, अनेक वातें होती है जो समझ से परे खड़ी रहती हैं और शायद मनुष्य पर हंसती रहती हैं। उसे लगा-वह उसिला के लम्बे और खुले बालों में हाथों से उलझाव डालता हुआ एक दिन स्वयं ही उलझन जैसा हो गया था, और शायद सदा के लिए उसके अस्तित्व का एक टुकड़ा, वहां, उसके वालों में ही उलझकर रह गया था। और उसके अस्तित्व का जो हिस्सा उसके पास से बहुत दूर भा गया, वह कभी-कभी वह रंग और वह कैनवास खरीदने लगा जो उसिला को खरीदनी - थी। उसे ज्ञात था--अब वह न यह रंग उसिला तक पहुंचाएगा, न यह कैन- वास, और यह सब कुछ सदा एक वन्द कमरे के अंधेरे में पड़ा रहेगा--जहां रंग सूख जाएंगे और हर कैनवास पर धूल की तह जम जाएगी। पर तव भी वह खरीदता रहा, रखता रहा, और समझ की सीमा में आकर भी, यह सब बातें उसकी समझ से परे खड़ी रहीं, और शायद उसपर हंसती रहीं। इक- वाल के माथे पर पड़ी हुई चिन्ता की लकीर को देखकर, समय व्यंग्य से मुस्कराया। और जब इकवाल ने घबराकर जेब में हाथ डाला और अपने लिए एक सिगरेट निकालकर जलाई, तो उस समय भी एक बूढ़े आदिवासी की भांति हथेली पर तम्बाकू मलकर हुक्के में डालता हुआ इकबाल को एक 'प्राचीन कथा सुनाने लगा---'एक था अरब नौजवान और एक थी अरब सुन्दरी..." कहानी साकार इकवाल की आंखों के आगे विचरने लगी-ऐसे जैसे किसीको पिछला जन्म स्पष्ट दिखाई दे जाए-वह जन्म जव इकवाल एक मरख नौजवान था, और उसिला अरव सुन्दरी। कालिज के थिएटर ग्रुप ने दुनिया भर के विवाहों की रस्में इकट्ठा की थीं . और माप्ताहिक थिएटर में उन्हें अभिनीत किया था। जब उन्हें एक प्राचीन अरव विवाह की रस्म का अमिनय करना था तब उसके लिए इकबाल और रसिला को चुना या। इकवाल ने अरबी वेशभूषा धारण की थी--मोटे-मफेद काड़े का चुनट- दार विल्ट जिसकी गांठ सामने की ओर बंधी हुई थी और वह स्टेज पर सजाई हुई रेत की वीरानी में बासुरी बजाता हुआ मरस्यल को मन की मुहब्बत सुनाता रहा था. उसिला ने सनाई रेगिस्तान का लम्बा चोग्रा पहना हुआ था जो उसके एक कंधे के कार से होता हुआ दोनों कोनों से सामने की ओर बंधा हुआ था, और जिसमें से उसकी मुली हुई वाई वाह हवा में ऐसे फैली हुई थी जैसे वासुरी के सुरों मे से निकलने वाली आवाज को वह रेत पर गिरने से बचाना चाहती हो। और फिर उमिला उसकी बांसुरी की अरबी धुन के साथ अपनी यावाज मिलाने लगी। और फिर जैसे वह दोनो मरुस्थलों को चीरकर मिले होंउसिला उसकी बाहों में मिमट गई थी। उसने सनाई रेगिस्तान की रस्म के अनुसार उसिला के होंठ चूमे थे और फिर खुशी में झूमता हुआ वह रतीले स्थलों को पार करता उघर चल दिया था जिधर वस्ती के लोग रहते थे। वस्ती के एक घर के बाहर बैठकर उसने फिर बांसुरी के सुर छेड़े थे। वासुरी की आवाज़ घर के बन्द दरवाजों से देर तक टकराती रही थी। इतने में उसके पीछे धीरे-धीरे चलते हुए उसिला भी आ पहुंची थी और उसमे मटकर बैठ गई थी, और उमने किल्ट के आर ओड़ी हुई अपनी चादर उतारकर उसिला को सिर से पैर तक ढक लिया था। घर का दरवाजा आखिर सुला और घर का बुजुर्ग सामने ड्योढ़ी में बा- कर खड़ा हो गया। इकबाल ने उठकर बुजुर्ग के पाव छुए और नम्रतापूर्वक कहा, 'मैं आप के पास, ऐ बुजुर्गवार ! आपकी वेटी का हाथ मागने आया हूं।' बुजुर्ग मुस्कराया, 'नौजवान ! मेरी बेटी एक हीरा है, बहुत कीमती, तुम इसकी कीमत अदा कर सकते हो?' इतने मे इस अरव आशिक का पिता वहा पहुंच गया और उसने आदर- - ।

. सहित उत्तर दिया, 'मैं अपने बेटे के लिए आपकी हीरे जैसी वेटी का हाथ मांगता हूं।" सुन्दर युवती के पिता ने कहा था, 'दो हजार पौंड देने पड़ेंगे।' और अरव आशिक के पिता ने कहा था, 'सव दे सकता हूं, जो मांगेंगे वह दे सकता हूं। पर देखिए । मेरा वेटा रेगिस्तान का फूल है, रेगिस्तान का झरना है, ठंडे-मीठे पानी का झरना । और देखिए । मेरा बेटा इस वीराने में खजूर का पेड़ है।' सुन्दरी का पिता मुस्कराया था, 'यह तो मानता हूं, स्वीकार करता हूं,. और इसलिए पांच सौ पौंड छोड़ता हूं।' इतने में सनाई रेगिस्तान का काजी पहुंच गया। उसने आते ही कहा, 'और पांच सौ पौंड मेरे नाम पर छोड़ने पड़ेंगे, खुदा के नाम पर, ऐ खुदा के वन्दे! !" सुन्दर युवती का पिता फिर मुस्कराया और कहने लगा, 'अच्छी बात है, पांच सौ पौंड इन्सान के नाम पर छोड़े थे, अब पांच सौ खुदा के नाम पर छोड़ता हूं." तभी युवती की मां भी घर के बाहर आ जाती है, और सामने की ओर से युवती के प्रेमी की मां भी। एक मां जब कहती है, 'एक सौ पौंड मेरे दूध के नाम पर छोड़े जाएं', तव दूसरी मां कहती है, 'हां! एक सौ पौंड मेरे दूध के नाम पर भी, तो सुन्दर युवती का पिता हंसकर दोनों औरतों की ओर देखता है और दोनों के नाम पर दो सौ पौंड और छोड़ देता है। फिर दोनों के भाई आते हैं-एक भाई अपने छोटे भाई की दाहिनी वांह वनकर आता है, और दूसरा अपनी बहन का पिता जैसा रखवाला बनकर, और दोनों के नाम पर दो सौ पौंड और छोड़ दिए जाते हैं। फिर दो बूढ़े दादा आते हैं--एक युवती का दादा, और दूसरा उसके आशिक का दादा। इनमें से पहला कहता है, 'मेरी पोती मेरे घर के दिये की लौ है' और दूसरा कहता है, 'मेरा पोता मेरे घर का चिराग है'-तो दोनों दादाओं के नाम पर एक-एक सौ पौंड और छोड़ दिए जाते हैं। फिर कई आवाजें उठती हैं : - C 'मैं आज के इस आशिक का दोस्त हूं, उसके भाइयों के समान...' 'मैं बाज की होने वाली दुल्हन की सहती हूं, उसकी बहनों के समान"" 'मैंने लड़के को इल्म दिया है । 'मैंने लड़की को हुनर सिखाया है.' और घर के दरवाजे की चौखट पर खड़ा हुआ सुन्दर युवती का पिता आज की मांगों पर झूमते हुए कहता है 'आप सबके नाम पर मैं सब कुछ छोड़ता हूं, केवल एक सौ पौड लूंगा।" उसी समय धान कूटने की आवाज़ आती है। कारीगरों, मजदूरो के गाने की बावाजें आती हैं। लड़की का पिता पूछता है, 'ये कैसी आवाजें हैं ? कितनी प्यारी लग लड़के का पिता उत्तर देता है, 'घरों के आंगनों में हाड़िया पक सकें, इसलिए इस बस्ती के मजदूर धान कूट रहे हैं । देखिए ! हवा में कसी अच्छी तो लड़के का पिता उत्तर देता है, 'फिर एक सौ पौंड मैं संसार के सारे मजदूरों के नाम पर छोड़ता हूं-धरी में और खेतों में काम करने वाले, यमिको के नाम पर। और फिर विवाह को दावत सज जाती है। कालिज के दिनों में सेला हुआ यह नाटक इकबाल को ऐसे याद आया मानो पिछला जन्म याद आया हो। नाटक खेलते हुए भी उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह केवल नाटक है और बाज जब उसका एक-एक दृश्य याद आया तो पूरे का पूरा अपनी आप- बीती की भाति लगने लगा। जगवीती किस स्थान पर भाकर आपबीती बन गई, इकबाल उस स्थान को अपनी छाती में खोजने लगा। 'शायद प्राचीन कथा में जो शिष्टाचार था-सगे-संबंधियों और मित्रो को हासिल करने के लिए धन-सम्पदा का त्याग'-इकबाल सोचने लगा, 'शायद यही वह स्थान था जहां उसके और उसिला के वीच दुनिया द्वारा डाली हुई दूरियां मिट गई थीं। सनाई मरुस्थलों की यह प्राचीन रस्म जैसे कई वर्ष हुए इकवाल को झकझोर गई थी। आज भी वह उसकी आंखों के सामने ऐसे चमक गई कि उसका मन चौंधिया गया। 'इस रस्म का विस्तार किस प्रकार संसार को अपनी बांहों में समेट लेता है केवल सगे-संबंधियों और मित्रों को ही नहीं, वेगानों-परायों को भी। केवल आदर और मोह की जगह को नहीं, वेगानों की मेहनत की जगह को भी' और रस्म का अन्तिम भाग--अन्तिम सौ पौंड को संसार के श्रमिकों के नाम पर छोड़ना-~~-इकवाल की दृष्टि में इस रस्म को एक बहुत ऊंची रस्म वना गया । पर रस्म उसकी आंखों में जितनी ऊंची हुई, उतना वह स्वयं छोटा हो गया। लगा-वह बांसुरी उसकी नहीं थी जो मरुस्थलों में गूंज उठी थी, उसके वोल तो सारे के सारे मिट्टी में मिल गए" वांसुरी तो उस दिन उसने उधार ली थी, वह सोचने लगा-'क्या उसिला को मुहब्बत करने वाला अपने सीने में छुपा मन भी उसने उधार लिया था ?', बाहर के बरामदे में अचानक एक खटका हुआ और इकबाल ऐसे चौंक गया जैसे कोई कानून किसी कानून से बाहर की जगह में अचानक दाखिल हो गया है। किमी जगह पर पुलिस के छापा मारने के समान । इकबाल के हाय खाली थे, पर उसे ऐसा लगा जैसे अचानक हाथों में से कुछ छटक गया हो। चोरी से खीची जा रही शराब के समान, या जाली नोटों की गड्डी के ममान। उसके होश ने संभलना चाहा और फिर उसे भी संभालना चाहा, कहा, 'अखबार वाले ने बरामदे में रोज की तरह सिर्फ अखबार फेंका है...' पर वह खटका जो बाहर के बरामदे मे हुआ था, बाहर की बैठक की बन्द कुडी को खोलकर जैसे अन्दर चलकर आ गया था, इम चिरकाल से बन्द रहने वाले कमरे मे.. और अब जैसे इकवाल अकेला इस कमरे में नहीं था, वह खटका भी कमरे में खड़ा हुआ था। इकबाल भी चुप था, और उसकी तरह वह खटका भी, पर चुप हो जाने से अस्तित्व नहीं मिटता-दोनो का अपना-अपना अस्तित्व था। इकबाल का एक छुपी हरकत की तरह, और खटके का छुपी हरकत को झांककर देखने वाले की तरह। आज घर में इकवाल की परली नही थी, न कोई नौकर। पर उन लोगों ने मानो घर से परे जाकर भी इकवाल को अपने अस्तित्व की याद दिलाना जहरी समझा था -चाहे एक छोटे-से खटके की मूरत में सही। इकवाल ने एक गहरी सास ली और अपने-आपको अपने अकेलेपन का विश्वास देता हुआ बन्द कमरे के टूटे हुए जादू को फिर जगाने की चेष्टा करने लगा। पर उसके मन की सारी एकाग्रता भूमि पर ऐसे गिर गई थी मानो चोरी १६ .. - से खींची जा रही शराव गिर गई हो। भोर अव केवल हवा में उसकी महक रह गई हो जिसे न गिलास में डाला जा सकता था, और न जिसका चूंट भरा जा सकता था." इकबाल को एक बड़ी कड़वी-सी हंसी आई और खाली कैनवास की ओर देखकर कहने लगा 'देखो उसिला! तुम्हारी सारी यादें जाली नोटों की तरह हो गई... अब मैं अकेले बैठकर चाहे कितने ही नोट छाप लूं, यह मेरी दुनिया में नहीं चल सकते. इकबाल परेशान-सा कमरे के बाहर आ गया, और दोनों ओर के कमरों की ओर इस प्रकार देखने लगा, मानो अभी वह घर में चोरी करके घर से बाहर निकलने का रास्ता खोज रहा हो... एक बड़ी तेज़-सी नफरत की गंध इकबाल के सिर को चढ़ गई और सिर को ऐसे चक्कर आया कि उसका हाथ पास की दीवार का सहारा लेता हुआ कांप-सा गया... क्या नफ़रत की भी गंध होती है ? उसे विचार आया और वह साथ ही सोचने लगा-यह नफरत घर की दीवारों से उठ रही है, या उसके अपने शरीर में से? हर जगह की अपनी विशेष गंध होती है-~सोने के कमरे की अजीव गर्म- सी गंध, और वैठक की कुछ ठंडी और ऊपरी-सी, और हर शरीर की अपनी- अपनी-इतनी कि किसी शरीर के मांस को अपने शरीर से सूंघने को जी करता है, और किसीको.. पर आज मानो सारी दुनिया की गंध एक जैसी हो गई हो. इकबाल को लगा. इस घर की, घर की हर चीज़ की, और घर में खड़े हुए उसके अपने शरीर की.. इकवाल ने ज़ोर का एक सांस लेकर हवा को सूंघा, और फिर जोर से हंसते हुए सोचने लगा-नहीं, यह दुनिया की गंध नहीं है, न इस घर की, यह इस घर में मरे हुए एक कमरे की गंध है... और साथ ही इकवाल को एक भयानक खयाल आया-~और तीन दिन के बाद, जव देश से बाहर जाते समय वह इस घर को छोड़ देगा, क्या यह मरा हुआ कमरा-समुद्र पार, वहां के नये घर में रहने के लिए उसके साथ - 56 ? चला जाएगा इस समय इकबाल जहां खड़ा था वहां से दायें हाय की बैठक के शीशे वाले दरवाजे मे से बाहर के वरामदे का कुछ हिस्सा दीख रहा था, वही जहां आज सवेरे का अखवार पड़ा हुआ था और दूर से यौधे-से पड़े हुए असवार की ओर देखते हुए इकबाल को लगा--मानो आज के अखबार का पहला शीर्षक हो कि आज एक जीवित व्यक्ति एक मृत कमरे में से बरामद हुआ है.:. फिर न जाने किस समय इकवाल के सामने किसीने अखबार रखा- और इकबाल ने देखा-एक सवर के गिर्द पेन्सिल से कीरमकाटे-सी लकीरें खिची हुई थी इकवाल ने चौंककर कई वर्ष परे वैठी हुई उसिला और देखा, और पूछा 'इम खवर के गिर्द तुमने पेन्सिल से लकीरें क्यों खीची है ?' उसिला का चेहरा बहुत उदास था, बोली 'सवर के गिर्द नहीं, बेकारी के गिर्द, मजबूरी के गिर्द...' 'किमकी मजबूरी ?' उसने पूछा। और सिला ने 'जिसे एक रोटी चुराने के जुर्म मे आज एक महीने को कंद हुई है।' 'तुम उसे जानती थी?' और उत्तर में उसिला मुस्करा दी 'पहले नहीं जानती थी, पर अब जानती हूं। कल रात मैंने उसके भूखे बच्चों को देखा था, और बच्चों को मां को उस समय जब उसे जेल ले जा चुके थे...' और सिला ने कहा, "अखबारों में हमेशा अधूरा सच होता है. देख लो, चोरी की बात वह सब- को बता रहे हैं, मजदूरी की बात किसी को नहीं बताएंगे...' कहा, उसिला उसी प्रकार वर्षों की दूरी पर खड़ी रही, केवल यह बात इधर आकर इकबाल के पास खड़ी हो गई। इकबाल ने घबराकर गुसलखाने का पानी खोला . आंखों को धोया । न जाने, आंखों से बीते दिनों को धोने के लिए, या माज के दिनों को धो-मिटाकर बीते दिनों को अच्छी तरह देखने के लिए। अचानक उसकी आंखों में एक स्पष्टता-सी आई-रेगिस्तान के रेतों को चीरती हुई, और उसके बचपन और जवानी वाले उसके पहाड़ी गांव के पत्थरों तक पहुंचती हुई। सनाई के मरुस्थल की वह रस्म जिसमें किसीकी निजी खुशी वेगानों- परायों की मेहनत को भी अपनी छाती में समेट लेती है और उसके पहाड़ी गांव की उसिला जो किसी वेगाने को एक महीने की कैद होने की उस खबर के गिर्द काली लकीरें खींचती है। लाखों मीलों का फासला तय करके-मानो मानव-मन के दोनों सिरे एक ही स्थान पर जुड़ जाते हैं. 'इकवाल चकित-सा आंखों में आई हुई इस स्पष्टता को देखने लगा। स्पष्टता की रेखा एक ही थी. केवल उसिला के दो चेहरे थे--एक होते हुए भी दो चेहरे, एक शरीर पर धारण किए हुए अरबी वस्त्र की ओर झुका हुमा और अपने होने वाले पति की चादर में लिपटा हुआ लाल और लजाता हुआ चेहरा, और दूसरा आंखों के आगे अखबार रखकर पराई भूख से तड़पता हुमा उदास चेहरा। और उसिला इकवाल के जन्म और लालन-पालन की भूमि से लेकर लाखों मील दूर अरव के मरुस्थलों तक फैल गई। दोनों सिरे बहुत दूर थे, हाथ कहीं नहीं पहुंच सकता था। और बीच में- वह सारा आडम्बर था जिसे लोग घर-संसार कहते हैं। पर तौलिये से आंखों और माथे को पोंछते हुए इकवाल को लगा कि वीच में वह जो कुछ था, वह केवल कुछ धब्बों जैसा रह गया है, शायद पोंछा जा सकता है। और इकवाल के शरीर पर थोड़ी-सी धूप निकल आई उसने किचन में जाकर गैस का चूल्हा जलाया, और पानी की फेतली चूल्हे पर रख दी। सिंक में रात की काफी का प्याला उसी तरह विन-धोया पड़ा था। बरावर चाहे शीशे की पट्टी पर और प्याले रखे थे, पर वह सिंक में पानी की टोंटी खोलकर रात वाले प्याले को ही धोने लगा। - २२ केतली का पानी अभी उवला नहीं था। उसने स्वाभाविक तौर पर आग को तेज करने के लिए जब जोर से फूंक मारी, गैस की आग बुझ गई, और गंस की अजीव-सी गंध उसके सिर में चढ़ गई। ठिठुरते हुए हाथ से दियासलाई से फिर गैस को जलाते हुए इकबाल ने अपने माथे में एक उस बहुत पुराने दिन को जोर से झंझोड़ा जब कालिज की पिकनिक वाले दिन झरने के पत्थरों के पास बैटकर, जंगल को कुछ सूखी टहनियों को इकट्ठा करके उर्मिला ने चाय बनाने के लिए आग जलाई थी और वह आग को बनाए रखने के लिए, नई टहनियों को जलती हुई टहनियों के साथ लगाता हुआ आग को वार-चार फूक मारता रहा था। एक बुझी हुई लकड़ी का घुआ उसकी आंखो में लगा था। न जाने किस तरह का धुआं था कि आज वर्षों बाद इकवाल को याद आया तो उस धुएं से उसकी आंखों में पानी आ गया। काफी का प्याला बनाकर जब इकवाल अपने कमरे में आया,उसे अचानक कस देनी हुई वह पैण्टिग याद आ गई जिसमे लाल परों वाले सिर का वह पंछी था जो मानव जाति के लिए देवताओ के घरों से आग चुराकर लाया था, अपने सिर पर रखकर, जिसके कारण उसके सिर के पर सदा के लिए लाल हो गए इकवाल को लगा-यह कल का मच था, आज का सच उसके उलट है। और एक पेण्टिग की तरह, उसने अपनी शक्ल मोशे में देखी, और शीशे की ओर उंगली से इशारा करते हुए, मानो अपने कानो से कहने लगा-'पर यह वह इन्सान है जो देवताओं के यहां से धुआ चुराकर लाया है...' कानो में एक खटका-सा सुनाई दिया। पीठ की ओर से। उसने पीठ मोड़कर टाइलों की छत के नीचे, कच्चे आमों को चटनी कूटती हुई अपनी मां की ओर देखा। मा के चेहरे को गौर से देखना चाहा, पर आखो के आगे बीसों वरसों का फैल गया। धुआं इधर था, मां के मुख से इधर, और मुख दूसरी ओर था। उसने धुएं में हाथ मारा, हाथ से धुएं को परे करते हुए, सिलवट्टे के खटके से वह दिशा ढूंढने लगा जहां मां लकड़ी की एक पटरी पर बैठकर हरी मिरच और कच्चे आमों की चटनी पीस रही थी। वह जव स्कूल से आकर, मां से रोटी मांगने के लिए दौड़ता हुआ रसोई की ओर जाता था, तब भी इसी प्रकार हाथ धुएं को आंखों के आगे से परे हटाया करता था। और मां कहा करती थी, 'रे, कोई धुएं वाला कोयला पड़ा हुआ है, चूल्हे में, चिमटे से पकड़कर निकाल दे !' और उसे चूल्हे में से उठते हुए धुएं के गुवार में कहीं इधर-उधर पड़ा हुआ चिमटा नहीं मिलता था। फिर मां के पांवों के नीचे पड़ी हुई लकड़ी की पटरी हिलती थी, मां ही उठकर धुएं में हाथ मारते हुए चिमटा ढूंढ़ लेती थी और चूल्हें में से धुएं वाले कोयले को निकालकर, चूल्हे पर तवा रख देती थी। 'कई वरस भी शायद धुएं वाले कोयले की तरह होते हैं...' वह सोचने लगा-'पर वह चिमटा ? जिससे पकड़कर वह धुएं वाले कोयले को निकाल दे ?...' उसे हंसी-सी आ गई-'वह तो मुझे तब भी नहीं मिला करता था...' उसे लगा-वह ज़िन्दगी के पन्नों का वस्ता लिए हुए, अव भी किस ड्योढ़ी में खड़ा हुआ है और सामने कई बरस धुएं वाले कोयलों की भांति सुलग रहे हैं। उसे लगा-शायद वह सदा इसी प्रकार भूखा-प्यासा ड्योढ़ी में खड रहेगा, कहीं दूर से हरी मिरचों की और कच्चे आमों की महक आती रहेग और वह धुएं में हाथ मारता हुआ वह चेहरा सदा ढूंढ़ता रहेगा-जो धुएं परले पार है। काफी गर्म थी, पर धुएं से आंखों में पानी भर आया। इकबाल ने उं २४ के पोर से वह पानी पोंछा तो काफी के गर्म यूंट ने भी, उसके शरीर में एक ठंही-सी कम्पन उतार दी। उसके शरीर पर अभी तक वही कपड़े ये जो उसने रात को सोते समय पहने थे—उसका हाय एक आदत के तौर पर अलमारी में टंगे हुए अपने ऊनी ड्रेसिंग गाउन की ओर बढा। पर डेसिंग गाउन को पहनते समय जव उसका हाय स्वाभाविक ही उसकी जेब में गया~ऊनी गाउन की कुछ गर्माइश लेने के लिए तो हाय जैसे जेब में अटक गया- एक जेब थी, जिसमें उसिला का हाय था। उस दिन पिकनिक से लौटते हुए जब बहुत ठंड उतर आई थी. उस दिन उसिला को हल्का-सा बुखार हो गया था। उसके पास कोई गर्म कपड़ा नहीं था। उनकी एक सहेली ने अपना कोट उतारकर जबरदस्ती उसे पहनाया था जिसकी दाईं ओर की जेब मे उसने अपने दायें हाय को गर्म कर लिया था, पर उसकी बाई ओर चलते हुए, उसके बायें हाथ को इकबाल ने पकड़कर अपने कोट की जेब मे डाल लिया था। और उसिला ने जब अपने घर के पास की सड़क के पास आकर उधर मुड़ना चाहा था'अच्छा, इकवाल ! इस मोड से मुझे पास पड़ेगा, मैं...' और उसकी बात को बीच में काटकर इकबाल ने कहा था, 'अकेली जाओगी? अच्छा...' पर उसका हाथ इकबाल की जेब में था जिसे 'अच्छा' कहकर भी उसने पकड़ रखा था। और वह उसी तरह खड़ी रह गई थी। 'जाओ... 'हाय...' 'यह मेरी जेब में रहेगा..... और वह जोर से हंस पड़ी थी, कहने लगी, 'अच्छा, फिर मैं हाथ के बिना चली जाती हूं, पर यह वतामो तुम इसका क्या करोगे?' 'जेब में डाले रडूंगा। "कितने समय तक?' 'हमेशा , 'और जब कोट धोने के लिए दोगे?', 'धोने के लिए दूंगा ही नहीं 'और जब कोट पुराना हो जाएगा?' 'यह पुराना होगा ही नहीं...' 'और जब...... 'चुप क्यों हो गई ?' 'अगर बुरा मानोगे तो नहीं कह सकूगी" 'कह दो...' - 'जब वह जमींदार की बेटी तुम्हारी जेब की मालकिन हो जाएगी, तब ?' जमींदार की बेटी के साथ होने वाले इकबाल को रिश्ते की बात मारी हवा में थी, वह जानता था, पर उसने जेब में अपने हाथ में लिया हुआ उसिला का हाथ जोर से भींच लिया. पर ऐसे जैसे उसने अपने हाथ के लिए उसिला के हाथ का सहारा लिया ... हो। कहा, 'वह मेरा सपना नहीं है, उसिला!' उसने जो कहा था, सच कहा था। उसिला के सिवाय दुनिया की कोई लड़की उसका सपना नहीं थी। जमींदार की बेटी सिर्फ उसके माता-पिता का सपना थी... उसिला ने गौर से उसके मुंह की ओर देखा, अपलक देखती रही फिर धीरे से बोली, 'बेटों के चेहरे में माता-पिता की छवि होती है न" 'कुछ नैन-नक्श विरसे में मिलते हैं...' 'घर-ज़मीन भी विरसे में मिलते हैं...' इकबाल को अनुमान नहीं हुआ कि वह क्या कहना चाहती है, इसलिए चुप-सा रह गया। उसिला ने ही फिर कहा, 'मेरा खयाल है सपने भी विरसे में मिलते - . 'नहीं !' और वह हंस पड़ा, कहने लगा, 'अभी सपनों की वसीयत करने वाले कागज नहीं बने।' वह भी हंस पड़ी थी, कहने लगी, "इसका जवाब दे सकती हूं, पर दूंगी २६

-
नहीं।'
'क्यो?'
वह फिर हंस पडी थी। कहने लगी, 'कई बातें ऐसी होती हैं जिन्हें लफ़्ज़ों
की मजा नहीं देनी चाहिए।'
और पांवो की भाति बात भी खड़ी हो गई।
फिर जब उसने जाने के लिए पाव उठाया तो उसकी वाह सिच-सी
गई।
'जाओ ! पर यह हाय यही रहेगा, मेरी जैव मे "मंजूर?'
'हां, मजूर'"हाथ के विना चली जाऊंगी!'
बहुत-बहुत दिन उस क्षण में समा गए थे। इकबाल ने अपनी जेब में
उसिला के हाय को ढककर, छिपाकर, पहाड रखा था.. और जिन्दगी का
एक टुकड़ा सचमुच उसकी जेब में पड़ा रहता था।
फिर न जाने कब, किस तरह, वह कोट मर गया।
और वह कोट मरकर उसके विवाह के जामे की जून में पड गया...
जमीदार के घर की दौलत पावो के मागे विछी, पर इपवाल ने जेब में
हाथ डालते हुए देखा, जेब हाथ से साली थी।
पाली जेब ने इकबाल की ओर देखा।
'मैंने उस हाय को बेच दिया, उसने धीरे से जेब से कहा।
जेब ने चकित होकर उसकी ओर देखा-मानो घुर तक, अपनी सीवनों
तक, अपने पालीपन को दिखाते हुए पूछ रही हो, 'पर किस कीमत पर?'
इकवाल जोर से हसा, मानो आखों तक भर आए रोने को रोक रहा हो,
कहने लगा-'कई बातें ऐसी होती हैं कि उन्हें लफ़्जों की सज़ा नहीं देनी
चाहिए

टेलीफोन की घंटी बजी.. इकबाल ने चौंककर मशीन के उस काले-से टुकड़े की ओर देखा-जो उसके चारों ओर की दुनिया ने उसके सोने वाले कमरे में भी एक लम्बे हाथ की तरह रखा हुआ था। घंटी फिर बजी। इकबाल ने टेलीफोन के तार की ओर घबराकर देखा मानो वह मांस की लम्बी बांह हो, जिसका हाथ उसकी छाती के बिलकुल अन्दर तक पहुंच रहा हो। घंटी बजे जा रही थी। मानो कोई दीवार में लगातार छेद किए जा रहा हो। कोई हथौड़ी मानो एक ताल में बंधी हो । उसका हाथ घबराकर रिसीवर की ओर बढ़ा.. आवाज को तोड़ देने के "लिए। वह आवाज़ एक झटके से टूट गई, पर एक घीमी हल्की-सी आवाज सरक- कर उसकी ओर आई: 'मिस्टर इकबाल ?' 'हां!' 'मैं पुरी बोल रहा हूं, भाभी जाने वाली थीं, चली गईं ?' 'हां!' 'फिर लंच पर मैं तुम्हारा इन्तज़ार करूंगा!' इकवाल को लगा, मानो एक दिन की मोहलत भी गैर-कानूनी हो, और कोई हाथ में सर्चलाइट लेकर उसे, एक दिन की गुफा में बैठे हुए को, ढूंढ

रहा हो।
'हैलो.."हैलो"आवाज नहीं आ रही है...'
'नही, पुरी ! मैंने लंच के लिए कही 'हा' की हुई है.'
'फिर रात को सही, डिनर मेरे साथ...'
'नही.."रात को भी कही 'हां' कर चुका हूं...'
टेलीफोन के तार में से गुजरती हुई एक हंसी-सी इकवाल के कानो को
छू गई, "फिर तो मामला सीरियस मालूम होता है !"
'नही पुरी !'
'भाभी आएगी तो सारी रिपोर्ट तैयार रखूगा.. सच बताओ, किसी
लड़की के साथ लच का इकरार है ?'
पुरी की चिन्ता का, मानो पुरी की चिन्ता मे ही इकवाल ने उत्तर दिया,
'हां'।
'और डिनर भी उसीके साप?"
'हां!'
टेलीफोन का तार ज़ोर से हसा, 'यार ! अब हमारे देश से गते हुए,
क्यों हमारे देश की एक लडकी को रोने के लिए छोड जाओगे ?'
'तुम कमाल हो पुरी !'
'क्यो?'
"अभी तुम किसी भाभी के साथ हमदर्दी कर रहे थे, और अभी तुम्हें
किसी और से हमदर्दी हो गई।'
'यार ! फ्लोर क्रासिंग तो हमारे बडे-बड़े नेता कर लेते हैं. अच्छा, उस
एक दिन की मलिका को हमारा सलाम कहना!'
इकवाल ने टेतीफोन का प्लग खीचकर निकाल दिया।
एक राहत-सी हुई कि अब वाहर की कोई आवाज़ अन्दर नही आएगी।
पर टूटी हुई चुप को फिर से जोड़ते हुए उसे खयाल माया, 'मैंने पुरी से
झूठ क्यो कहा कि माज का लंच किसी लड़की के साथ...'
और साथ ही उसे लगा, 'यह पूरा झूठ नही है."दूर से देखने में झूठ
.

लगता है, पर पास से देखने पर यह झूठ नहीं है.'
आज काफी का प्याला पीते हुए उसिला उसके पास थी...
और दोपहर के खाने के समय भी...
इकवाल को लगा-आज मानो वह सच और झूठ के बीच कहीं खड़ा
हुआ है, यह नहीं मालूम कौन-सी जगह है. -एक नई जगह, सच और झूठ के
बीच।
इस जगह की बात उसने एक बार सुनी थी। उसिला ने सुनाई थी जव
कालिज में एक डिवेट हुई थी।
बीते हुए क्षण धीरे से सरककर कमरे में आ गए।
डिवेट का विषय है...-'विल-पावर।"
उसिला! विल-पावर के पक्ष में वोलोगी, मैं भी पक्ष में बोल रहा
.
'नहीं, मैं पक्ष में नहीं बोलूंगी।'
'क्यों?'
'क्योंकि उसके पास तुम्हारे जैसा तगड़ा वकील है, उसे मेरी ज़रूरत नहीं
है
'यह मजाक क्यों?'
'मजाक नहीं..
मजाक ही तो था-~~-उसिला ने अपनी विल-पावर से क्या नहीं किया ?
ननिहाल की दया पर पली है, तब भी किसीकी मर्जी न होते हुए भी कालिज
में पढ़ रही है। फीस का बहुत बड़ा सवाल सामने आया था तो उसने
'स्कालरशिप' लेकर उस सवाल का हल निकाल लिया था। फिर फिर
उसिला ऐसे क्यों कह रही है ?
कालिज का हाल भरा हुआ है।
डिबेट का एक पलड़ा भारी हो रहा है। विल-पावर के पक्ष वाले बड़े
उत्साह में हैं, उनके तर्क जवानी के गर्म लहू में भीगे हुए हैं, और उनकी कसी
हुई वांहें सीधे भविष्य के सीने को छूती हुई प्रतीत होती हैं ।
-
१. प्रात्मशक्ति
३०

इकबाल सोच में पड़ा हुआ है। उसिला जान-बूझकर एक उदास और हारे हुए पक्ष की ओर क्यों जा बैठी है ? क्यों ? परन्तु उसिंगा का चेहरा उदास नहीं है, केवल गंभीर है.और स्टैग पर जाकर बोलने वाले हर किसीको सुनते हुए, वह मुनने वालों की तालियों के साथ अपनी तालियां भी मिला रही है। मानो अपने पक्ष के विपरीत बोलने वालों को दाद दे रही हो 'यह पसिला याज अपने विन्द क्यों है ?' सवाल ने कल लाइब्रेरी मे बैठकर इन्सान के मन की शक्ति पर कितने ही हवाले एकत्र किए थे, वह बारी-बारी स्टेज पर सबके सब दोहरा रहा है और फूलों से लदी हुई मेज के पास रखी हुई कुसियो पर बैठे तीनों जज उसे मुनते हुए अपने कागजो पर कुछ नोट ले रहे हैं.. और सुनने वाले तालियों 'हाल की खामोशी को बार-बार तोड रहे हैं. "उसिला मी" हाल में एक विश्वास-सा फैल गया है कि आज की डिवेट का चमकता हुआ विजयी पक्ष इकबाल के हाथों को छूने वाला है। यब उसिला की बारी है। कमरे में खामोशी के साथ-साथ एक संशय-मा भी फैल गया है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो अचानक कमरे की तेज रोशनी मद्धिम हो गई हो। उसिला की आवाज आ रही है दीवारी से टकराकर गूजती हुई नहीं, केवल कानों को छूकर हवा की तरह सरकनी हुई-सी। 'अभी, यहां, इसी जगह पर खड़े होकर जो भी वोलते रहे वह मुझे जिन्दगी के छोटे-छोटे टुकड़ों की तरह लगते रहे...' उसिला आखिर क्या कहना चाहती है ? इकबाल हैरान है, 'इस तरह पड़ी हुई है मानो अपने खिलाफ गवाही देने के लिए खड़ी हो...' पर उमिला उसकी ओर नहीं देख रही है-गामने शून्य मे देख रही है। कह रही है, 'उन्होंने जो कुछ कहा, सच है, परन्तु पूरा सच नहीं, और अधूरा सब बहुत खतरनाक होता है।' कमरे की हवा मानो अपनी सास को रोककर खड़ी हो । उसिला कह रही है, 'दुनिया कितने देशो मे बटी हुई है, सवाल यह नहीं है, मवाल यह है कि दुनिया सिर्फ दो टुकड़ों में बंटी हुई है-एक टुकड़ा वह है जो हुकूमत करता है, और दूसरा वह जिसपर हुकूमत की जाती है।' उसिला किस ओर चल दी है. 'इकबाल को लगा-~-मानो वह एक बन्द गली की ओर जा रही हो। उसिला लफ्ज़ों से कोई रास्ता खोजते हुए कह रही है.--'पर दोनों में से स्वतन्त्र कोई नहीं है.. देखने में केवल यह दिखाई देता है कि यह मालिक और गुलाम का रिश्ता है, जिसमें केवल गुलाम स्वतन्त्र नहीं है, मालिक स्वतन्त्र है। और यही मालिक की स्वतन्त्रता अधूरा सच है। मालिक अपने गुलाम का सबसे अधिक मोहताज है, क्योंकि यह केवल गुलाम का अस्तित्व होता है जो उसे मालिक होने की हैसियत दे सकता है. अगर प्रजा ही न हो, तो कोई बादशाह कैसे बने ? इस तरह बादशाह सबसे अधिक प्रजा का मोहताज होता है। आवाज कानों को छूकर, न जाने क्यों, परे नहीं हो रही है। उसमें कुछ भारी-सा है जो कानों से टकरा रहा है, कानों को मानो झिझोड़ रहा हो। 'जिस तरह स्वतन्त्रता, कई जगहों पर अपने होने का भ्रम नहीं डालती, पर कई जगहों पर अपने होने का भुलावा डालती है, उसी तरह 'विल-पावर' भी कई जगहों पर अपने होने का भ्रम पैदा करती है-इन्सान को बदलने का, समाज को बदलने का, राजनीति को बदलने का। इससे मेरा यह मतलब नहीं है कि भुलावा नहीं खाना चाहिए।' हाल में धीमी-सी हंसी कुर्सियों के ऊपर से छलक गई और फिर भाग की तरह नीची हो गई। उसिला कह रही है, 'दुनिया की एक बहुत प्यारी कविता है कि जो लोग दूर चमकती हुई रेत को पानी समझकर रेत में नहीं दौड़ते वह जरूर बुद्धि- मान होंगे । पर मैं उन्हें प्रणाम करता हूं जो रेत में पानी का भ्रम खाते हैं और पानी की एक बूंद पीने के लिए सारी उम्र रेत पर दौड़ते रहते हैं।' और उसिला किंचित् हंसते हुए-से स्वर में कह रही है 'एक कवि का यह प्रणाम वारतव में भ्रम को नहीं, मनुष्य की प्यास को है, और प्यास का दूसरा नाम जिंदगी है।' हाल में बैठे लोगों के चेहरे कुछ खिच-से गए जैसे वह सोच में पड़ गए हों। ३२ ३ य-२ उसिला सहज-सी कह रही है, 'किसी सचाई के होने और 'दीखने के बीच एक फासला होता है जो अभी तक इन्सान ने तय नहीं किया है-जैसे खंडहरों में से कई बार बीती हुई सभ्यता के चिह्न मिल जाते हैं उसी तरह किसी दस्तावेज में कई वार इतिहास के बीते हुए सच के टुकड़े मिल जाते हैं। और कल का विचार आज के विचार के आगे अचानक झूठा पड जाता है। देखा जाए तो यह धरती, विवशताओ का एक लम्बा इतिहास है...' फूलो से लदी हुई मेज़ के पास कुसियों पर बैठे तीनो जज कुछ हैरान-से उसिला की ओर देख रहे हैं । उनकी दृष्टि में कुछ वेचनी-सी भी है... पर उसिला का स्वर सहज है, 'हां विल-पावर कुछ इतना काम आती है कि इन्सान अपने दर्द को अपनी ज़बान पर ला सकने की जगह अपने होंठों से पोछ सकता है । उसे अन्दर अपने गले में उतार सकता । इससे ज्यादा जो कुछ है, वह प्यास की करामात है, पानी की नहीं, और प्यास को जगाए रखने के लिए उस जगह पर खड़े होना जरूरी है जो सच और झूठ के बीच में है, क्योकि दुनिया के सब फैसले केवल वही खड़े होकर किए जा सकते हैं. दिल- पावर से कुछ बन सकने और बदल सकने का फैसला भी केवल वही खड़े हो- - हाल में जो लोग बैठे हुए थे उन सबको मानो किसीने कुछ सुंघा दिया हो, इतना कि तारीफ के चिह्न के रूप में ताली बजाने के लिए उठे हुए कुछ हाथ मानो हवा में ही रह गए उसिला सहज ही हस पड़ी है.. कह रही है, 'शायद अपने शब्दों मे मैं बहुत अच्छी तरह नहीं कह सकती, इसलिए एक चेक कहानी सुनाती हू- कगलर नाम का एक आदमी था। कई हत्याएं कर चुका था, वहुत बदनाम या कगलर । हमेशा जासूस और पुलिस उसके पीछे लगे रहते थे। पर उसने जब नौवी हत्या की तो अपने बचाव के लिए एक पुलिसमन पर गोली चलाई थी। वह पुलिसमैन भी मरते-मरते उसपर सात गोलिया चला गया था जिससे कगलर मर गया" खैर, वह दूसरी दुनिया मे पहुंचा, परलोक में, और तीन जजों को खास अदालत में हाजिर किया गया...' सुननेवालो का कहानी से वधा हुआ ध्यान जरा-सा छिटक गया "स्टेज पर बैठे हुए जजों की ओर देखकर हवा जैसे मुस्कराई हो, पर उसिला किसी- ३३ के ध्यान को छिटकने का मौका नहीं दे रही है. कह रही है, 'मेज़ पर उसी तरह की फाइलें थीं, जैसी हमारी दुनिया में हमारी अदालतों में होती हैं-कि फदिनांद कगलर, बेरोजगार, अमुक तारीख को जन्मा.. और अमुक तारीख हां, उन फाइलों में उसकी मृत्यु की तारीख भी थी... 'मुख्य जज ने, हमारी अदालतों के जजों की तरह, ठंडी आवाज़ में पूछा-कगलर ! तुम अपने-आपको दोपी समझते हो या निर्दोष ? 'कगलर ने कहा-~-निर्दोष ! 'और जज की आज्ञा से उसकी गवाही मांगी गई। 'कमरे में गवाह आया, अजीबो-गरीव सूरत, बुजुर्ग, तने हुए कंधे, बड़े जलाल वाला चेहरा, और शरीर पर पहने हुए नीले चोगे पर बहुत चमकदार सितारे जड़े हुए 'कगलर हैरान होकर गवाह के जलाल को देखने लगा, और वह और भी हैरान हुआ, क्योंकि तीनों जज उस गवाह के स्वागत के लिए उठकर खड़े हो गएखैर, जव गवाह कुर्सी पर बैठ गया तब जज भी अपनी कुर्सियों पर बैठ गए. 'फिर मुख्य जज कहने लगा-गवाह ! तुम सब-कुछ जानते हो, जानन- हार ! तुम परम सत्य हो, इसलिए तुम्हें सौगन्ध दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि तुम जो कुछ कहोगे, सच कहोगे." इसलिए अब मुकदमे की कार्यवाही शुरू की जाती है... 'और मुख्य जज ने कगलर से कहा-अपराधी! तुम किसी भी वात से मुकरने की कोशिश मत करना, क्योंकि गवाह सब कुछ जानता है...खैर, जज ने ऐनक उतारी और आराम से कुर्सी की पीठ का सहारा लगाकर बैठ गया" 'वह जो गवाह था, उसने धीरे से कहना शुरू किया-यह कगलर वच- पन से ही एक अक्खड़ लड़का था। अपनी मां को बहुत प्यार करता था। पर मां काम में फंसी रहती थी और लड़का मां का ध्यान आकर्षित करने के लिए दिनोंदिन जिद्दी बनता गया, इतना कि एक बार इसके पिता ने इसे थप्पड़ मारने की कोशिश की तो इसने पिता के अंगूठे को बड़े जोर से दांतों से घायल कर दिया और गवाह ने कगलर की ओर देखकर कहा-फिर तुमने पहली चोरी की, तुमने किसीके बगीचे से गुलाव का एक फूल चुराया" - . .२४ 'हा, मैंने एक लडकी इरमा के लिए फूल चुराया था--कगलर ने कहा। 'गवाह हम-मा पहा, कहने लगा-हां, मुझे मालूम है, इरमा जव सात बरस की थी तुम्हें मालूम है इरमा के साथ क्या हुआ? 'कगलर चक्ति होकर गवाह को बोर देखने लगा, बोला- मैंने कई बार उसके बारे में सोचा, पर मुझे फिर पता ही नहीं चला कि इरमा कहां गई. 'गवाह ने बताया कि दरमा का एक रोगी आदमी से विवाह कर दिया गया था, और दुमी होकर वह कुछ दिनों बाद मर गई थी. 'कगलर चकित होकर गवाह के मुख की ओर देखता रहा। एक जज ने कुछ वैमश्री से गवाह से कहा-ऐ खुदा ! तुम सब कुछ जानते हो पर यह सब व्योरा हमे नही चाहिए, तुम सिर्फ कगलर के गुनाहो की बात करो।' 'मो कगसर ने जाना कि सुद सुदा उसका गवाह है। हाल में बैठे हुए सारे लोग बुत-से हो गए हैं, जज भी। और उसिला को कहानी आगे बढ़ रही है। 'गवाह हंस-सा दिया, और बताने लगा कि कगलर की दोस्ती एक बूढे दारावी से हो गई, जो समय-कुसमय कगलर को खाना खिलाया करता था। 'कगलर से रहा न गया, बीच में ही वोल पडा पर उसकी लड़की मेरी का क्या हुआ? 'खुदा ने बताया-मेरी मुश्किल से चौदह वरस की हुई थी जब जब- दस्ती उसको शादी कर दी गई और वीस वरस में वह मर गई"मृत्यु के समय तुम्हें बहुत याद कर रही थी... 'कगलर ने बहुत उदास होकर खुदा से पूछा-मैं तो चौदह बरस की उग्न मे घर से भाग गया था, मेरी मां का क्या हुआ? मेरी बहन का? मेरे बूढे वाप का? 'खुदा ने बताया-चिन्ताओं के कारण तुम्हारे पिता की मृत्यु हो गई और मां की आखें रो-रोकर जाती रहीं। गरीबी के कारण तुम्हारी बहन का विवाह नहीं हो सका, इसलिए वह लोगों के कपड़े सीकर निर्वाह करती । 'मुख्य जज ने गंभीरता से टोका-ऐ खुदा! मुकदमे की कार्यवाही करनी चाहिए-यह बताओ कि अपराधी ने कितनी हत्याएं की? 'गवाह बताने लगा-इसने नो हत्याएं की। पहली हत्या एक दंगे-फ़िसाद में इसके हाथों अनजाने हो गई थी जिसके लिए इसे जेल में डाला गया था। जेल में यह बहुत विगड़ गया। वाहर आकर इसने दूसरी हत्या अपनी वेवफा प्रेमिका की की। तीसरी, चोरी करने के बाद उस बूढ़े आदमी की, जिसके यहां इसने चोरी की। चौथी हत्या रात के एक पहरेदार की। पांचवीं और छठी हत्याएं एक बूढ़े आदमी और उसकी औरत की, जिनके यहां चोरी करने से इसे केवल सोलह डालर मिले थे, जबकि उनके पास बीस हजार डालर थे... 'कगलर ने हैरान होकर पूछा-बीस हजार डालर ? वह कहां रखे हुए थे? 'खुदा ने बताया-उसी चटाई में जिसपर वह सोए हुए थे-~~~और कहा--- सातवीं हत्या इसने अमरीका में अपने एक हमवतन की की थी, और आठवीं एक रास्ता चलते आदमी की जो पुलिस से भागते हुए इसके रास्ते में आ गया था. और नौवीं हत्या उस पुलिस वाले की जिसने इसपर गोलियां चलाई, और इसने उसपर 'अपराधी ने इतनी हत्याएं क्यों की ?-~~-एक जज ने पूछा। 'फिर खुदा कगलर की ओर देखकर कहने लगा-~-कुछ पैसों के लिए, कुछ गुस्से में आकर, कुछ अचानक हो गई."खैर, यह उदार हृदय भी बहुत था, समय-समय पर लोगों की सहायता भी कर दिया करता था. बड़े कोमल स्वभाव का था, इसलिए स्त्रियों के साथ इसका व्यवहार अच्छा था." वादे का यह पक्का था, किसीसे जो कहता था सदा... 'एक जज ने खुदा को टोक दिया कि इस विवरण की आवश्यकता नहीं है। और फिर तीनों जज कगलर की फाइल पर गौर करने के लिए बराबर के कमरे में चले गए 'अब कगलर और खुदा कमरे में अकेले रह गए तो कगलर ने हैरान हो- कर खुदा से कहा कि मेरा खयाल था कि इस दूसरी दुनिया में सारे फैसले तुम स्वयं करते होगे, पर यहां भी यही लोग फैसले करते हैं.. क्यों ? . ३.६ और चुदा कुछ उदास होकर कहने लगा-हां, कमलर ! इन्सान के कामों का फैसला इन्सान ही कर मक्ने है. मैं पूरा मच जानता हूं, और जब पूरा सच जान लिया जाता है तब किनीके गुण-अवगुण का फैसला नहीं किया जा माता यह इन्सान अधूरा सब जानते हैं, इसीलिए सजा का फैसला कर सकते है...' उर्मिला ने एक ठंडी-मी सांस ली है, इतनी ठंही कि सारे हाल में हल्का- सा फम्पन फैल गया है। वह कह रही है-'हम मय बधूरे सच के योग्य हैं, हम अपनी विल-पावर से दुनिया बदल सकते हैं-यह एक मोहक भ्रम है जो केवल अपुरे सच से ही स्थापित रखा जा सकता है। मैं यह बिलकुल नहीं कहना चाहती कि भ्रम नहीं रखना चाहिए, क्योकि भ्रमो के बिना जिन्दगी को जिया नहीं जा सकता .."केवल यह कहना चाहती है कि इन जैसे भ्रमों को यन्तिम सच कह देना मनुष्य की कोई जीत नहीं है और तसिला स्टेज से उतर रही है। हाल में उपस्थित सभी जन हाय हिलाना भी भूल गए हैं, और कुसियों से उठना भी। तीन कुलियों पर बैठे हुए तीन जज मानो पड़ी भर के लिए कुसियों का अस्तित्व ही भूल गए हों एक ने दाई आंख के पास आये पानी को धीरे से उंगली से पोछा है। और जिन्दगी का तकाजा अचानक अस्तित्व में या गया है--सारा हाल तालियो मे गूज उठा है । जजों ने एक-दूसरे की ओर देखा है-फिरे उनमें से एक ने उठकर स्टेज से परे जाती हुई उसिला का नाम पुकारा है। एक नाम एक हाल में गूज कर खुले दरवाजे से वाहर चला गया है। दूर पाटियों में... दूर पहाड़ियों के पीछे समय केभी परे... .

इकबाल कमरे में सुन्न-सा रह गया है। वीता हुआ समय कुछ क्षणों के लिए कमरे में आया और चला गया। शायद उसी खिड़की से आया था- इकवाल ने चकित-सी आंखों से अपने इर्द-गिर्द देखा-वह जो एक वन्द कमरे की खिड़की उसने सवेरे के उजाले के साथ खोली थी।

इकबाल ने काफी का गर्म प्याला बनाया और किचन के ऊंचे स्टूल पर बैठकर सामने पत्यर के स्लैब पर प्याला रखते हुए सोचा-एक समय था जो मेरा हो सकता था, मेरे साथ पांव से पाव मिलाकर चलता हुआ। इस समय, यहां इस कमरे में या सकता था... काफी के एक प्याले की-सी वास्तविकता! रोटी के टुकड़े की-सी वास्तविकता! पर वह समय- किसी नदी में गिर गया पानी की तरह बह गया। या शायद भूमि पर गिरकर एक पत्थर के समान हो गया। . और काफी के प्याले की ओर बढा हुआ इकबाल का हाथ भी ठहरे हुए ममय की भाति हो गया। हाथों में कुछ फूल थे, और हाथ उसिला की ओर बढा हुआ था। उसिला के घर के मोड वाले मन्दिर की दीवार के पास । और कुछ आवाजें थी जो अभी भी वहां हवा में सड़ी हुई थी। -इकवाल! तुम यहा?... -तुम्हें यह फूल देने के लिए... -हार के फलसफे को फूल दिए जाते हैं ? -सव के अधूरेपन को देखना हार का फलसफा नही" -पर उसे जीत भी तो नहीं सकते। -जीतो और हारों को देशों की लड़ाइयों के लिए रहने दे। -फिर? -केवल यह जानना चाहता हूं."

क्या ? -कि इस उम्र में, उम्र के परे जो कुछ होता है, वह तुमने कैसे देखा - cho है हवा में एक हंसी-सी भी ठहरी हुई है... और ठहरे हुए समय के पास खड़ा हुआ इकवाल अव भी उसे सुन सकता है। -इकबाल ! तुमने कभी वह लोग देखे हैं जो खुद अपने जनाजे के साथ चलते हैं ? -नहीं, उसिला! मैंने देखे हैं। शायद इसीलिए जो कुछ उम्र के परे है वह देख सकती 204. वह लोग? -इतिहास भरा हुआ है उन लोगों से -नहीं, यह इतिहास नहीं जो हम स्कूल या कालिज में पढ़ते हैं। -खंडहरों में दबा हुआ इतिहास ? -हां, खामोशी के खंडहरों में दवा हुआ. उसका कोई-कोई टुकड़ा-सा 'कभी खुदाई में निकलता है. उसे भी लोग कभी जब्त कर लेते हैं, पर कभी हवाओं में रुलता हुआ-सा अचानक दिखाई दे जाता है। मैंने परसों एक जन्त- शुदा किताव पढ़ी थी... -जन्तशुदा किताब? ~~~-एक जेल के कैदी की लिखी हुई। -बहुत भयानक होगी? -हां, बहुत भयानक "उसमें मेरी उम्र की कई लड़कियों की वारदातें भी थीं... ----जेलों में डाली हुई लड़कियों की ? ---जेलों में केवल साधारण कैदियों की तरह नहीं.. और राजनीतिक कैदियों की तरह भी नहीं."वह आम साधारण थीं जिनके पास सिर्फ एक छोटे-से घर का सपना होता है, छोटे-से रोजगार का और इज्जत की रोटी -- ... का. ४०

–पर वह जेलों में?
-मैंने कहा था न-दुनिया दो हिस्सों में बंटी हुई है, एक को आदेश
देने का अधिकार होता है, दूसरे को लेने का वह जिन अफसरो की नजर
चढी-और उनके आदेश का उल्लंघन कर दिया...,
और हवा में ठहरी हुई हंसी इकबाल के कानों को छूती रही...
साधारण लड़कियो की साधारण घर बसाने की विल-पावर..
.
-और अफसरों ने उन्हे राजनीति के जाल में फंसाकर जेलों में डलवा
दिया। मिर्फ इतना ही नही, जेलों के दारोगाओं को हुकुम मिला कि उन्हें जेल
के अफसरों की वेश्याएं बना लिया जाए। इकबाल ! यह कुछ वे लोग होते हैं
जो अपना जनाजा आप देखते हैं।
–पर उसिला...
-तुम कहोगे, मैं उन लड़कियों में अपनी शक्ल क्यो देखती हूं ? वह,
वह थीं, मैं नही...!
और हवा में अभी तक उसिला की आवाज की तरह इकबाल की खामोशी
भी ठहरी हुई है."
उर्मिला की आवाज है-मैंने उन्हें आखो से नही देखा, लेकिन उन्हीं
जैसी अपनी मां को आखो से देखा है।
-मा को?
-मा जब कुंआरी थी उसपर कोई रीझ गया था, बड़े तगड़े घर का
आदमी था, उस गाव का राजा कहलाता था। और मा ने भी वही अपराध
किया जो उसकी श्रेणी के लोगों को नहीं करना चाहिए। जिद ठान ली कि
वह मर जाएगी। पर उस घर नहीं जाएगी। मां की आखों में भी एक छोटे से
घर का सपना था।
-वह सपना?
--पूरा हुआ, पर एक कब्र की तरह...
-कर्ज की तरह?
–हां । घर वना, मर्जी का मर्द भी मिला, और एक बच्चा भी यानी

मैं...पर इस दुनिया का कर्ज बढ़ता गया । ---सिला! -जगवीती नहीं, आपबीती कह रही हूं। मैं सात वरस की थी, इसलिए जो आंखों से देखा था वह आंखों में पड़ा रहेगा। उस समय जब कर्ज लेने वाले लोग माए थे. वहाने से आए थे कि मेरे पिता को घोड़ी से गिर कर बहुत चोट लगी है, और मां उसके घावों की पीड़ा से चीखकर, उन लोगों के साथ चल दी थी। -~~-यह उसी गांव के राजा कहलाने वाले का बदला था ? ~~~-हां, और यह बदला उसने अपनी हवेली में बैठकर लिया... -और मां? -~-जब आधी रात को हवेली के बाहर निकाल दी गई-साधारण औरतों के बड़े साधारण संस्कार होते हैं, इकवाल ! .."वह एक टूटा हुआ सपना लेकर सावुत घर में नहीं लौट सकती थी, वह नदी में डूबकर मर गई । वह आप अकेली अपने जनाजे के साथ गई थी। वहां, मंदिर की दीवार के पास, इकवाल की एक खामोशी है, जो पत्थर बनकर धरती पर गिरी थी, और अभी तक वहां एक पत्थर की तरह पड़ी उसिला की आवाज़ भी वहां ही खड़ी हुई है। फिर मैंने अपने पिता को अपने जनाजे के साथ जाते हुए देखा । और कोई बदला उसके बस का नहीं था, और न उसने लिया, पर एक बदला उसके बस में था-~~-जिस दुनिया ने उसकी औरत छीन ली थी, उसने उस दुनिया की ओर पीठ कर दी-साधु होकर उसने दुनिया तज दी। -वह जीवित है ? -जीने और मरने का संबंध अपने ज्ञान के साथ होता है। अगर ज्ञान न हो तो दोनों चीजें एक समान हैं। -----उसिला! --इसीलिए अपनी उम्र से बहुत आगे आ गई हूं, इकवाल ! और अब ४२ आशाओं और सपनो जैसी चीजो की ओर पीछे नहीं लौटा जा सकता." शायद इकबाल का हाय कांप गया या काफी का प्याला अपने-आप कांप गया, वह स्लैब से नीचे गिरकर कई टुकड़ों में विखर गया। 'वह समम अब कही नहीं...' इकबाल के माथे की एक नस अपने करती हुई-मी माये की चीस बन गई~-'मैं बहुत दूर भा गया हूं."लौटकर उस समय की मोर नहीं जा सकता...' 'आखों के आगे से मानो मन्दिर की दीवार ढह गई। केवल मलवा रह गया। इकवाल किचन के स्टूल से उठा~मानो कोई बेहोश-सा इन्सान मलवे के नीचे से निकला हो। ४३ पांच एन आदत में बंधे हुए उसे सोने के कागरे में ले गए, पर पारीर में एका अजीब-सी थान थी-मादम लड़खड़ाते हुए-से । वह अपने पलंग को पारा आकर एक हाथ से उसकी पट्टी को पकड़कर, पलंग पर बैठ गया। मितीने, एक गलने का डेर-सा, गानो उस परली जगह से उठाकर इधर इम और रख दिया हो। एक गहरी और कठिन सांस लेते हुए इकबाल को अपने आर आश्चर्य-सा भी हुआ---उसिला की मां नदी में डूब गई थी''यह बात मुझे ज्ञात थी." परन्तु आज ऐसा क्यों लगा मानो यह बहुत भयानक बात.. अभी अचानका मालूम हुई हो। - ऐरो जैसे आज इकबाल ने नदी में बहती हुई उसकी लाश देखी हो... पलंग को पारा रखी हुई शीशे की सुराही में रो इकबाल ने पानी पिया, 'पायों के तलुवों तक एक ठंडी-सी लगीर खिच गई। आज जैसे सब कुछ दूसरी बार घट रहा हो। जैसे एक रामय, दुनिया पर दो बार आया हो । नहीं, पायद समय एक गुफा की भांति वही खड़ा हैकेवल वह स्वयं दूसरी बार उरा गुफा में से गुजार रहा है। आज “आज उसिला उसको पारा से दुरारी बार खो गई है। आज.. आज उशिला फी गां दूरारी बार मर गई है। इकबाल ने अपने-आपको एक दीवानगी की खाई में उतरते हुए देखा। कुछ दिखाई नहीं दिया केवल एक अंधेरा "धरती को खोदकर, गानो एक अंधेरा गहरी जगह में छिपा हुआ हो। मन के पत्थरों को चीरती हुई-सी एक चीख से इकबाल ने अपने पां ४४ संभाले। अपना हाथ पकड़कर यह साई से कुछ बाहर आया और अपने ध्यान को संभालने के लिए कमरे की दीवारों और स्तिावों को बोर देखने लगा। अलमारी से एक किताब उठाई, रसीदूसरे को उठाया, रखा। ऐसे हो कुछ पन्ने आगे पलटे, कुछ पौधे. और उकताए हुए हायो ने रितनी ही कितावें, अलमारी के पास रखी हुई मेज पर बिसेर दी। --उतिला फिताबों के बाहर है। -~-उसकी मो को सारा भी किताबो के बाहर है। वह, हापों को माति, उक्ता कर, मेज के पास इधर को आने लगा तो सपाल आया-दुनिया में न जाने कितने लोग है जो इस तरह मरते हैं, और भरी दुनिया में वह अकेले अपने जनाजे के साप जाते है.. हाथ, बल्दी से इन्डक्स की ओर बढ़े और उसमें वह नात्महत्या के इति- हास के पन्ने का नम्बर देवकर सुनहरी अक्षरों को एक किरमिजी जिल्द की पुस्तक में से वह पन्ना निकालकर मात्महत्या का इतिहास पढ़ने लगा : आत्महत्या के क्षेत्र में एक सौ वर्ष की खोज इकवाल के निचले होंठ के पास मुस्कराहट को एक लकीर-सी खिन गई। 'मर्दुमसुमारी की तरह मरने वालों की पूरे आकड़ो के नाय की गई खोज.. यह बाकड़े अक्षरों में डूबने और तरने लगे। 'कई देशों में दूसरे देशों के मुकाबले मात्महत्या की दर पांच गुना है।' 'और देशों के मुकाबले में आयरलैंड के आंकड़े मवसे कम हैं एक लाख की आबादी के पीछे केवल तीन व्यक्ति ! 'डेनमार्क, आन्ट्रिया और हगरी मे भात्महत्या करने वालों की गिनती ना- मे अधिक है लाख पौधे वीन से अधिक 'फास, जर्मनी और स्वीडन में-~-पद्रह और बीन के बीच... "इंगलैंड और बमरीका में दस या वारह. "स्पेन, इटली, नार्वे में पांच से लेकर दस तक. 'सबमें अधिक गिनती जापान में ..। और साथ ही इकवाल का ध्यान इन यारों पर पड़ा मह मिनीपुर अधूरी समझी जानी चाहिए, क्योंकि बहुत सारे-- .

वास्तविकता को छिपा जाते हैं। -उसिला ने मुझसे कुछ नहीं छिपाया, पर तब भी नदी में पड़ी उसकी मां की लाश किसी गिनती में नहीं है। हाथ में ली हुई पुस्तक का पन्ना कांप गया.. शायद इकबाल का एक गहरा-सा सांस उसे छू गया था शायददुनिया के सभी मरने वालों की आत्मा को छू गया था। एक नदी का पानी उछलता हुआ-सा किनारों को छू गया-न जाने मन की नदी का, या उस नदी का जिसमें उसिला की मां की लाश थी... इपावाल की आंखों के सामने कुछ अक्षर फैल गए। 'आत्मघात के लिए हथियारों का इस्तेमाल प्रायः स्त्रियां नहीं करती हैं, केवल पुरुष करते हैं और इकबाल का मन पुरुषों के उन हथियारों के बारे में सोचने लगा जो लोहे के नहीं होते। ---जिन वहशी हाथों से गांव के उस राजा कहलाने वाले आदमी ने उसिला की मां को मौत के रास्ते पर भेजा था, वह भी तो हथियार था, लोहे फा नहीं, केवल वहशत का, जहरीले मांस का... और इनावाल के मस्तिष्क में एक विचार-रक्त की बूंदों की भांति बहने लगा---'जिस हथियार से मेरा और उसिला का भविष्य मर गया, वह भी तो लोहे का नहीं था ।' इकबाल ने अपनी आंखों से अपनी ओर देखा---'वह हथियार मेरे पांव थे जो जाना किधर चाहते थे, और चले किधर गए 'मेरी आंखें जो झुकी तो झुकी रह गई.. मेरी जीभ जो चुप हुई तो चुप रह गई...' सव आंकड़े-~-पुस्तक के पन्नों में टूटने लगे... विचार आया, 'उन लोगों के भविष्य जो आत्महत्या करते हैं किसी गिनती में नहीं हैं." इकवाल थककर पुस्तक को परे रखने ही लगा था कि नजर पड़ी-एक पन्ने पर दुनिया के जीने वालों ने मरने वालों के मौसम का भी ब्योरा लिखा हुना है। पढ़ने लगा-'वहार का मौसम जब अन्न होने वाला होता है घोर गर्मी के गुरू के दिन जब पास आने वाले होते हैं, तब आत्महत्या करने वालों की गिनती सबसे अधिक होती है...' इकबाल ने हाय को एक मटका देकर किताब परे रख दी। मन में विचारों की भीड़ हो गई-'एक मौसम घर-घरानों की इज्जत का भी होता है-जव मन के सारे कोमल पत्ते झड़ जाते हैं." और इकबाल मन के भूखे हुए पेड़ के नीचे सड़े होकर अपनी उस टहनी की योर देखता रहा जिससे एक रस्सी बांधकर आज से तीन वरस पहले उसके भविष्य ने आत्महत्या की थी...

अचानक उसे लगा मानो दरवाजे को कोई बाहर से अजीब तरह से. खरोंच रहा हो। यह मानुषी हाथ का खटका नहीं था। शायद अतीत का कोई खटका था जो वर्षों से उसके कानों में पड़ा हुआ था और आज अचानक कानों में हिलने लगा था। उसने एक चेतन यत्न किया, मतीत की ओर कान लगाने का-पर दूर बरसों तक एक सन्नाटा था। अपने पुराने पहाड़ी गांव को ध्यान में लाया, पर खड्डों से उठने वाली धुंध गांव के मकानों पर इस तरह लिपी हुई दिखाई दी कि सारे मकान एक भुलावा-से प्रतीत होने लगे और हवा ऐसे ठहरी हुई कि पेड़ों के पत्तों को भी मानो हिलना मना हो। पर खटका अभी भी आ रहा था जैसे नाखूनों और पंजों से कोई दर- वाजे को और दीवार को उनकी जगह से हिलाता हो। उसने दीवारों की ओर देखा, फिर दरवाजे की ओर, उसके सोने के कमरे का दरवाजा खुला हुआ था। वह चकित-सा उस खुले हुए दरवाज़ में से होता हुआ वाहर के बड़े कमरे की ओर गया। उस कमरे की दहलीज़ उसने लांघी ही थी कि खटका ज़ोर से हुआ- पहले सामने की दीवार की ओर, फिर बायें हाथ के बन्द दरवाजे की ओर उसने दरवाजे की कुंडी खोली तो जल्दी से सरककर रुई के गुच्छे जैसी कोई चीज़ भीतर आई और उसके पांवों से लिपट गई... -----अरे तू? उसने झुककर सफेद रुई के गाले जैसे पामरेनियन कुत्ते को हाथों में उठा लिया, पुचकारा, पूछा, 'तू अकेला किस तरह आ गया ? इतनी दूर? अपने- आप रास्ता ढूंढकर ?' .. :४८ य-३ वह अपनी छोटी-सी जीम से उसके हार्थों को चाटने लगा। यह छोटा-सा कुत्ता, उसके देश से बाहर जाने की खबर सुनकर उसके दफ्तर के एक सहकर्मी ने उमसे मांग लिया था और उसने परसो उसे दे दिया था,पर आज उसे हंसी-सी आ गई लोग तो कहते हैं यह पामरेनियन नस्ल के कुत्ते बड़े हरमोकं होते हैं, जितने सुन्दर होते हैं उतने डरपोक, फिर यह अकेला रास्ता सोजता उसके पास किस तरह लौट आया? उसने उसके रेशमी वालों को दुलराया, फिर किचन में जाकर उसे एक विस्कुट देकर उसके लिए कटोरे में दूध डाला। --तू सूंघकर पहचानता है न? तूने मुझमें क्या सूंघा था, जिसे सूंघने के लिए फिर आ गया? और वह रई का गुच्छा-सा दूध चाटकर फिर उसके पावों के पास आकर पांवों को चाटने लगा .. उसकी उंगलिया कुत्ते के बालों में छिपी हुई-सी काप उठी-किसीके शरीर को पहली सुगन्ध, पहली पहचान, क्या उम्र के साथ चलती रहती है ? ऐसे ही, उसकी उंगतिया, उसिला के लम्बे-लम्बे वालों मे डूब जाया करती थी। उसे लम्बे उड़ते हुए-से वालों में से एक महक चढ जाया करती माम उसे एक अजीब खयाल आया-'अगर सारी दुनिया की औरतें किसी एक जगह पर कोई बैठा दे और उसको बांखों पर पट्टी बाधकर कहे--मला बताओ उसिला कौन-सी है ?- तो वह बालो को सूंघकर उसे झट पहचान सकता है। पर मनुष्य के पास बुद्धि होती है न'.. एक हंसी उसके होठों पर लकीर-सी लिप गई-वह जिस तरह जानवरो के गले में जंजीर बांधता है, उसी तरह अपने-आपको.' उसने अपने लिए गिलास मे कुछ हिस्की और पानी डाला, फिर गिलास को ऊपर उठाकर कहने लगा, 'दुनिया की सब जजीरो और साकलों के नाम जिन्हें मनुष्य के किसी न किसी सयानेपन ने बनाया...' कुछ देर बाद उसे सयाल आया, 'मालूम नहीं मिस्टर आचार्य ने इस पंजीर से क्यों नही वाघा?' ४६ यह बहुत छोटा है, जंजीरें तो उम्र के साथ पड़ती हैं-उसने आपही अपने-आपको जवाव दिया। और फिर उसे खयाल आया---वह लोग इसे ढूंढ रहे होंगे, क्या मालूम ढूंढ़ते हुए यहीं आ जाएं ? आज वह नहीं चाहता था कि कोई आए। उसने सोचा-स्वयं जाकर इसे छोड़ आऊं। बाहर से ही किसी नौकर को देकर आ जाऊंगा...! उसने जल्दी से कपड़े पहने। अभी तक उसने सोने वाले कपड़े पहने हुए थे, ऊपर सिर्फ ड्रेसिंग गाउन लपेटा हुआ था। और उसने छोटे-से पामरेनियन को हाथ में पकड़कर, बाहर आकर अपनी गाड़ी का दरवाजा खोला। उसे गाड़ी में रखा, और जब वह घर के बाहर वाले गेट को खोल रहा था, अचा- नक एक सवालिया हाथ उसके सामने आया । दरवाजे के पास से गुजरता हुआ एक साधु अपने हाथ का भिक्षापान उसके सामने करता हुआ दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया था। वह साधु के मुख की ओर देखता रह गया। ---क्या चाहिए वावा? --जो श्रद्धा हो। -श्रद्धा को भिक्षा की तरह मांगोगे, वावा? -~~न मांगने का कोई अहंकार नहीं, बेटा। ---अगर इस दुनिया से कुछ मांगते रहना था तो दुनिया छोड़ी ही क्यों, . बाबा? - ~~वह तो शरीर छोड़ने तक नहीं छोड़ी जा सकती। -फिर अगर त्याग नहीं है तो त्याग का यह भेस क्यों ? --त्याग है, बेटा! किस चीज़ का? -मन का ----और तन का? -वह मजबूरी है। कुछ अन्न की आवश्यकता तन की मजबूरी है। -फिर, वावा, अगर तन को इनकार नहीं, तो मन को इनकार क्यों ? -~-तन पर भी संयम है, बेटा! केवल उसकी अग्नि के लिए दो मुट्ठी -

-क्या मन की अग्नि सच नहीं है, वावा?
-वह भी सच है, जिज्ञामु. पर उसका अन्न और है...
-कौन-सा?
-ईश्वर उसका सुजनहार"
--क्या जिस मां ने जन्म दिया, आपका यह शरीर रचा, वह ईश्वर नहीं
थी? छोटा-सा ईश्वर?
-वह माया का जाल है, बेटा।
-क्योकि दिखाई देता है. पर ईश्वर दिखाई नहीं देता, इसलिए उसका
जाल भी दिखाई नहीं देता.. क्या जो दिखाई देता है, केवल वह ही झूठ है ?
उसके अन्तर से उस साधु के प्रति उठता हुआ क्रोध, मानो उसकी आंयों
में आ गया।
---जिज्ञासु । क्या कहना चाहते हो?
केवल जानना चाहता हूं बावा ! कि अगर मन को दुनिया का अन्न नहीं
चाहिए तो तन को दुनिया का अन्न क्यों चाहिए?
-~-हा, जिज्ञासु, तन की भूख आनन्द की अवस्था नहीं है...
-~-सो, जब तक शरीर है आनन्द को अवस्था नहीं पाई जा सकती।
--यह तन की मजबूरी है, जिज्ञासु !
-~-अगर तन की मजबूरी स्वीकार कर ती, वावा! तो मन की मजदूरी
क्यो नहीं स्वीकार की जा सकती ? उस बच्ची का क्या दोष था, वावा ! जो
तुम्हारे मन की मजबूरी नहीं बनी ?.. क्या वह ईश्वर का एक टुकड़ा नहीं
थी?
--कौन बच्ची?
-जिसको मा की लाश अभी भी दुनिया के पानियों में वह रही है।
-कौन मां? किसकी लाश?
उसने गेट के ठंडे लोहे से अपना तपता हुआ-सा सिर लगाया और फिर
सामने सड़े हुए साधु के मुंह की ओर देखते हुए सामने शून्य मे देखने लगा।

जब होश लौटा तो वह साधु दरवाजे से जा चुका था। वहां केवल वह खुद था, और कुछ भस्म के समान पड़ी हुई एक चेतना-'उसिला का पिता, जो उसे छोड़कर संन्यासी हो गया। क्या मैं उसे खोज रहा हूं ? मैं यह कैसे सोच सका~यह वह था ?' उसने गेट को खोलकर गाड़ी को बाहर सड़क पर किया, और सामने की सड़क का मोड़ मुड़ते हुए सोचा, 'मेरा क्रोध केवल मेरे ऊपर है. यह मेरे मन का छल था कि अपने क्रोध को अपने कंधों से उतारकर मैं किसी और के कंधों पर रख रहा था...' शहर की सड़कें गाड़ी के पहियों के नीचे से गुजरती रहीं, और उसके विचार उसके मन के पांवों के नीचे से। उसिला के पिता की एक मजबूरी थी-अपनी पत्नी, अपनी प्रेमिका की लाश को देखने की मजबूरी उसके टूटे हुए मन में अगर अपनी बेटी का मोह भी टूट गया, तो उसका दोष नहीं था. पर । यह 'पर' उसके पांवों के आगे एक खड्ड की भांति आ गया। विचारों के पांव कांप उठे--'क्या रिश्ता सिर्फ पिता का होता है ? प्यार करने वाले का नहीं ? उसने मोह का रिश्ता तोड़ दिया, ममता का, और मैंने मुहब्बत का -पर कैसे उलटे कारण हैं, उसने जो कुछ छोड़ा, दुनिया को छोड़ने के लिए और मैंने जो कुछ छोड़ा, दुनिया को पाने के लिए। गाड़ी वह अचेत-सा चला रहा था, सड़कों के नाम और रास्ते जाने वगैर, पर आदत ने उसका साथ दिया। गाड़ी अचानक रुकी तो सामने मिस्टर आचार्य का घर दिखाई दिया। यह शायद गाड़ी के हार्न की आवाज़ थी, सामने घर में से एक नौकर दौड़ता हुआ गाड़ी की ओर आया-'साहब ! हमारा पामरेनियन नहीं मिल . - रहा है।' 'यह लो । अव संभालकर रखना।' उसने सीटे के ऊपर से छोटे-से कुत्ते को उठाकर एक वार उसके वालों को सहलाया, फिर उसे नौकर के हाथों में थमा दिया। 'साहव बहुत परेशान हुए हम इसे बहुत ढूंढते रहे. आपको भी फोन

करते रहे, पर आपका फोन सराव था।'
'फोन खराब था?'
'हां, साहब ! विलकुल डेड ..
उसे याद आया, आज जिस समय मिस्टर पुरी का फोन आया था, उसने
उसके बाद अपने फोन का प्लग निकाल दिया था।
नौकर कह रहा था-'साहब अभी आपके घर जाने वाले थे...'
वह गाडी चलाकर जाने लगा तो नौकर ने जल्दी से कहा--'साहब,
अन्दर नहीं आएगे?'
'नहीं, बहुत जल्दी है।'
उसने तेजी से गाड़ी मोड़ ली।
अपने-आप पर एक हसी-सी आई-बहुत जल्दी है, उस जगह पर पहुंचने
की जो यही नहीं है...!
२२

No text on this page.

करते रहे, पर आपका फोन खराव था।'
'फोन खराब था?'
'हा, साहब ! बिलकुल डेड...'
उसे याद आया, आज जिस समय मिस्टर पुरी का फोन आया था, उसने
उसके बाद अपने फोन का प्लग निकाल दिया था।
नौकर कह रहा था-'साहब अभी मापके घर जाने वाले थे..
वह गाड़ी चलाकर जाने लगा तो नौकर ने जल्दी से कहा-'साहब,
अन्दर नहीं आएंगे?'
'नहीं, बहुत जल्दी है।'
उसने तेजी से गाडी मोड़ ली।
अपने-आप पर एक हंसी-सी आई-बहुत जल्दी है, उस जगह पर पहुंचने
की जो कही नहीं है...!
२१

आसमान पर हल्के-से बादल थे, पर अचानक गहरे हो गए, और नन्ही- नन्ही बूंदें पड़ने लगीं। उसने गाड़ी का वाइपर नहीं चलाया, केवल गाड़ी को धीमी चाल पर डाल दिया और सामने के शीशे में से इर्द-गिर्द की इमारतों को इस तरह देखता रहा मानो सारे शहर को कुछ धुंधला करके देख रहा हो। उसके हाथ पर गीला-सा स्पर्श अभी भी था। उसके रुई के गुच्छे जैसे पामरेनियन ने लौटते समय जब फिर उसके हाथ को जीभ से चाटा था तो उसकी गीली जीभ का कुछ अभी भी उसके हाथ पर पड़ा रह गया था। ज़िन्दगी के कई वीते हुए दिन भी शायद गीली जीभ की भांति होते हैं, उसे लगा, तो विचार आया, 'कुत्ते को पालतू बनाने की मनुप्य की रुचि बहुत पुरानी है, इतिहास के अनुमान अनुसार आज से चौदह हज़ार वर्प पहले की।' और मन, मानव-स्वभाव के खंडहरों में चला गया--पर कई यादों को पालतू बनाने वाली रुचि न जाने कितने हजार साल पहले की है। उसके मन में एक अजीब तुलना आई-जैसे कुत्तों की कई नस्लें होती हैं, उसी प्रकार मनुष्य की यादों की भी कई नस्लें होती हैं। -कुछ यादें, केवल कोमल-सी खाल वाली, पांवों से और हायों से लिपटती हुई, छोटी-सी जीभ से शरीर के मांस को चाटती हुई.. और छोटी- छोटी आंखों से टिमटिम आपके मुंह की ओर देखती हुई। -~-कुछ जिनकी आंखें भी सामने दिखाई नहीं देतीं, वालों में गहरी कहीं छिपी हुई होती हैं, पर यह मालूम होता है, वह कहीं छिपकर आपको देख के रही हैं। -~-कुछ आपके पहरे पर बैठी हुई और दुनिया के हर खटके पर भौंकती और कुछ यादें, यादों की वरी, एक-दूसरे के अस्तित्व को नकारती हुई, परस्पर में लड़ती हुई, मगढ़ती हुई, और एक-दूसरे को लहू-लुहान करती हुई। -और कुछ यादें, आप चाहे कहीं क्यों न चले जाएं, आपके घुरों को सूंघती हुई, आपका पीछा करती, आपको सदा ढूढ़ लेती हुई। मोर कुछ यादें, केवल रोटी के टुकड़े के लिए पूछ हिलाती हुई.. -और कुछ, पागल हो गई,."उनके मुंह से भाग निकलती हुई। उसके पाव को जैसे एक पागल कुत्ते ने दांतों में भीच लिया... और पांव घबराकर उसके पास से छूटने लगा और गाडी के ऐक्सिल- रेटर पर दव गया। बाईं ओर से मुड़ने वाली कार वाले ने अगर ज़ोर से ब्रेक न लगाया होता तो मन को घटना बाहर सडक पर विखर जाती। उसने माथे पर आए हुए पसीने को घबराकर पोंछा, और गाड़ी को अगली सड़क पर धीमी चाल में डालकर वाइपर को चला दिया। चलते हुए वाइपर में से शहर की इमारतें ऐसे दिखाई देने लगीं जैसे एक पल कोई उनपर मुलतानी मिट्टी लीपता हो, और दूसरे पल पोछता हो दिन की लो अभी बाकी थी, पर मेह ने उसे ढक लिया- इसलिए कई इमारतो में बिजली की रोशनी होने लगी। छोटे-छोटे, गोल-गोल टुकड़ों में टूटी हुई रोगनी। योर माग को पालतू करने वाली बात पर उसे हसी-मी आ गई। 'पालत आग में से घुआ नही उठता' उसे ध्यान आया, 'पर और तरह की आग से धुआ उठता है." धुएं से उसका ध्यान सिगरेट पीने की योर गया और उसने जेब से सिगरेट-केस निकालकर सिगरेट सुलगाई... सिगरेट के धुएं मे से जैसे कई धुएं निकल पाए। खड्डो में से उठती हुई धुंध का घुया."

पहाड़ी घरों के चूल्हों से उठता हुआ लकड़ियों का धुआं... हवन की अग्नि में से उठता हुआ सामग्री का धुआं... कारखानों की चिमनियों में से उठता- और चिता की आग में से.. पूरी की पूरी ज़िन्दगी-उसकी आंखों के सामने अंगारे की तरह जली और भस्म हो गई... फिर उसका अपना सांस भी मानो उसके होंठ से छुआ-कोहरे में | निकलते हुए मुंह के धुएं की तरह और फिर सांस, जैसे, अचानक रुक गयी हो--सामने सड़क पर कोई दो जने-एक जवान लड़की, और एक उसके साथ कोई-सिर पर एक ही छतरी ताने हुए, मेह से एक-दूसरे को बचाते हुए---विलकुल उसकी गाड़ी के सामने आ गए थे. उसने ज़ोर से ब्रेक लगाया, इतना कि पहियों के एकाएकी रुकने की आवाज़-~-ज़ोर से हवा में फैल गई, और गाड़ी उलटने को होती हुई-सी, कांपकर खड़ी हो गई... सड़क के दोनों किनारे जो दूकानें थीं-वहां से कुछ लोग दौड़ते हुए-से आए- -~-क्या हुआ साहब ? उसने, हैरान, गाड़ी के दोनों ओर खड़े हुए लोगों की ओर देखा, कहा, 'कुछ नहीं, वे सामने गाड़ी के नीचे आ चले थे .. लोगों ने सामने वाली सड़क की ओर देखा, उनकी चकित आंखें मानो पूछ रही थीं, 'कौन ?' वह गाड़ी से उतरा । सामने सड़क की ओर देखने लगा, पर सड़क दूर तक खाली थी। उसने घबराकर, नीचे, गाड़ी के पहियों की ओर देखा-~-जैसे सड़क वाले वह दो जने, अगर सड़क पर नहीं दिखाई दे रहे हैं तो जरूर गाड़ी के पहियों के नीचे होंगे "पर कहीं कुछ नहीं था लोग हैरान थे, 'साहब ! गाड़ी उलट चली थी, मुश्किल से वची है...' 'पर वह ?' - . ५६

'वह कौन?'
।
.
'कोई दो जने थे, छतरी लेकर चल रहे थे...'
'पर सड़क पर तो कोई नहीं
यह परेशान-सा फिर गाड़ी में बैठ गया, गाही को स्टार्ट किया, और
सामने की खाली सड़क को देवता हुआ, गाड़ी चलाने लगा...
उमके हाथों में हल्का-सा कम्पन आ गया
खयाल आया-जब वाइपर नहीं चलाया था, सारे शहर को धुंधला
करके देख रहा था जैसे हर चीज़ को धुंधला करके...
"पर वह छतरी धुंध
मे से कैसे उभर आई थी? विलकुल मेरे सामने आ गई थी
बहुत पुराना एक दिन याद आया, जब उसिला वरसते हुए मेह में
कालिज से घर को चल दी थी।
वह कितनी देर तक उसे चलते हुए देखता रहा, उसकी भीगी हुई पीठ
को देखता रहा।
वह फिर पास से, एक पान वाले की दुकान की ओर बढ़ गया था और
एक रुपये का नोट पान वाले को देकर, उसकी छतरी उधार माग कर उसिला
के पीछे दौड़-सा पड़ा था।
हाथ मे ली हुई छतरी उसने दौड़कर उमिला के सिर पर तान दी
यी।
उसिला ने भी छतरी की डंडे को हाथ में लेकर छतरी को उठाया था
और फिर वह थोड़ी-थोड़ी देर बाद डंडो पर जोर डालकर छतरी को अपने
मिर से परे उसके सिर की ओर कर देती थी
छतरी एक ही थी, और कभी वह याघी भीग जाती थी, कभी वह
उसका पाव कभी ऐक्सिलरेटर पर कापता रहा, कभी रोक पर, और
उसकी गाड़ी पहर की कई सड़कों के मोड़ काटती रही...
पर विचार एक ही सड़क पर पड़ गया-आज वह गांव की पगडही
वाला दिन शहर की सड़क पर क्यों आ गया?
वही मेहं ? वही छतरी?

- न जाने क्यों उसका हाथ दरवाजे के पास लगी हुई घंटी के बटन की ओर गया-मानो वह एक मुलाकाती हो और इस घर में किसीसे मिलने आया हो। घंटी ज़ोर से बज उठी तो उसका हाथ मूच्छित-सा हो गया...। हवा तेज हो गई थी। अचानक दीवार पर लगे हुए पीतल के टुकड़े में से, मानो छोटा-सा टुकड़ा हवा से झड़ गया हो और भूमि पर उसके गिरने की आवाज आई हो। उसने चौंककर उधर दीवार की ओर देखा। उसके नाम वाले पीतल के उस टुकड़े की छाती में से शायद एक कील नीचे गिर गई थी, पर छाती में खुभी हुई दूसरी कील के सहारे वह अभी भी दीवार के साथ लगा हुआ था, पर लटकता हुमा-सा और हवा से हिलता हुआ, मानो हाथ हिलाकर उससे कुछ कह रहा हो। सारा मकान दीवारों में भी सिमटा हुआ था, अंधेरे में भी। पर बाहर सड़क की वत्ती की कुछ रोशनी थी जिसमें वह पीतल का टुकड़ा एक आंख की भांति चमककर उसकी ओर देखता हुआ प्रतीत होता था। उसका अपना नाम, मानो उसकी ओर देख रहा हो। उसने घबराकर जेब में हाथ डाला, चावी को टटोला, और दरवाजे के अंधेरे में छिपे हुए ताले के छेद को खोजने लगा। जेल के दरोगा की भांति जब उसने भारी-से दरवाजे को खोला तो फिर एक कैदी की भांति उसके अन्दर चला गया। मेहं की बूंदें जैसे सिर के बालों में अटककर, कमरे के भीतर आ जाती हैं, उसे लगा-पिछले दिनों पढ़ी किसी कैदी की डायरी के कुछ शब्द-जेल, दरोगा, कैदी-उसकी स्मृति में अटककर खामखाह उसके साथ चल पड़े हैं । सोने के कमरे की बत्ती जलाते हुए उसने जल्दी से अलमारी से विकी ६० की बोतल निकाली और कट-वर्क के एक सुन्दर चेक गिलाम में ढालते हुए-- कैदी की डायरी में से चिपट गए लपजों को अपने से मटकारना चाहा" शीशे को सुराही से गिलास में पानी डालते हुए जब उसने गिलान ऊपर होंठों के पास किया, कानों में कहीं से आवाज आई... -ऐ वदे! मेरे सवालों का जवाब दिये बिना इस गिलास को मुंह से न लगाना। उसे एक बहुत पुरानी घटना याद आ गई-एक ऐतिहासिक घटना- जब वह पांच पांडवो में से एक था और वह सव द्रौपदी को साथ लेकर वनो में विचर रहे थे। बहुत प्यास लगी तो युधिष्ठिर ने कहा, 'जाओ, नकुल ! पानी का स्रोत ढूंढो !' उसने पानी का स्रोत ढूढ़ लिया था, पर जब पानी लेने के लिए गया तो किनारे पर उगे हुए पेड़ से आवाज आई-'हे नकुल ! मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए बिना यह जल मत पीना, नहीं तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।' पर उसने यावाज की ओर ध्यान नहीं दिया और पानी के मरने के नीचे रहे होकर उसने ओक लगा दी और पानी पीते ही धरती पर ढेर हो गया। -वही आवार थी जो तव एक पेड़ पर से माई थी। उसने चकित होकर ऊपर की ओर देखा। अपर केवल कमरे की छत थी, और कुछ नहीं न कोई पैड, न परछाई। उसने जन्म-जन्मान्तरों की उस आवाज़ को पहचानने की चेष्टा की, शायद पही प्रश्न थे जो अनेक जन्म पूर्व भी इस आवाज ने पूछे थे। पहला प्रश्न था—सूर्य को कौन उदय करता है ? दूसरा प्रश्न या-मूर्य को कौन अस्त करता है ? और तीसरा-सूर्य के चारो ओर कोन घूमता है ? और चौथा-सूर्य किससे सम्मानित होता है ? प्रश्न जाने-पहचाने लगे, परन्तु उत्तर?. उत्तर तो उसने तब भी नहीं दिए थे, युधिष्ठिर ने दिए थे। उसने आज भी, आंदाज़ को कानो से बाहर निकालकर हाथ मे थामे हुए गिलास को पी जाना चाहा, पर हाथ रुक गया, आवाज़ माथे से टकगई। -~-ऐ आज के इन्सान ! मेरे प्रश्नों का उत्तर दिए विना इस गिलास को लगा-

-
-
-
मुंह से न लगाना, नहीं तो...
'नहीं तो' के आगे जो हो सकता था, वह उसके साथ हो चुका था-
जब वह नकुल था!
आवाज़ ने, शताब्दियों से हवा में खड़े हुए प्रश्न दोहराए-~-वही चार
प्रश्न, और फिर अगले चार प्रश्न--
--ज्ञाता कौन है ?
-महान पद केसे प्राप्त होता है ?
-~-मनुष्य एक से दो कैसे होता है ? और
-~-बुद्धि कसे प्राप्त होती है ?
उसिला उसके मन में एक सूरज के समान चढ़ी, और फिर अचानक
उसके आरामानों को एक बार लाल करके सूरज की भांति डूब गई...
मन में घोर अंधकार छा गया...
घोर अंधकार में उसने घबराकर हाथ में लिया हुआ गिलास मुंह से लगा
लिया।
प्रश्न उसी प्रकार, बिना उत्तर के, हवा में खड़े रह गए.
और वह, जैसे आवाज ने कहा था, पलंग पर बेहोश-सा पड़ गया।
शायद फिर मृत्यु का शाप लग गया, जैसे उस समय लगा था, जब पह
-
'ननुल था..!
.
.

नहीं, वह मरा नही, शायद बोदित है, उमे लगा-कि कोई उइके रंग
के पास खड़े होकर उसको वाह हिला रहा है, और उसकी बांह मोविज मनुस
की बांह की भाति हिल रही है।
यादों का शाप उसे अवश्य लगा हुआ था, विचार बारा-आखिर
मरा तो तब भी नही था जव में नकुल या। युधिष्ठिर ने सब प्रश्नों के उतर
दे दिए थे और उसने जीवन का वर पा लिया था।
लगा-आज फिर उसी युधिष्ठिर ने प्रश्नों के उत्तर दे दिए होंगे, और
अब वह हो उसे बांह से पकडकर पलंग से उठा रहा है."
उसने बांह की ओर देखा, पर वहां कुछ दिखाई नहीं दिया।
हो, यह विश्वास अवश्य हो गया कि वह जीवित है।
गले से चीख-सी आवाज निकलो-प्रश्नों के उत्तर किसने दिए हैं ?
युधिष्ठिरने ?
कमरे मे दिखाई कुछ नहीं दिया, किन्तु कोई धीरे से हंसा-यह युधिष्ठिर
का युग नहीं है।
--फिर?
--आज के प्रश्नों के उत्तर तुम्हे स्वयं देने पड़ेंगे।
-~-दही प्रश्न ?
-हो, वही प्रश्न, पर युग बदल गया है।
प्रश्न नहीं बदले?
-नही, पर शब्द वदले हैं।
-किम तरह ?
-जिस तरह तुम्हारा नाम बदला है। तव नकुल या, पर आज...
-जानता हूं
-फिर उठो
१३

--
-कहां जाना होगा?
-अदालत में।
-किसकी अदालत में?
-यह तुम खुद जाकर देख लेना...
लगा, एक हाथ उसे पलंग से उठा रहा है...
कमरे में विलकुल अंधेरा था, शायद उसी अजनबी हाथ ने कमरे की
बत्ती बुझा दी थी. पर बांह की कलाई के पास किसी के हाथकी पकड़ उसी
तरह है...
वह उठकर चलने लगा...
लगा-वह धरती के एक साधारण व्यक्ति की भांति चालीस लाख तीन
सौ बीस वर्ष से चल रहा है और कोई ब्रह्मा माज हंसकर उससे कह रहा है.
-~-अभी तो केवल एक दिन हुआ है।
चालीस लाख तीन सौ बीस वर्ष जितना एक दिन...
उसकी धरती का मिथहास उसकी रगों में से बोल उठा-'माज निर्णय
का दिन है, किसी निर्णायक के आगे सफाई देने का दिन। किसी रचना के
ईश्वर में लीन हो जाने से पूर्व का दिन, जो अपना निर्णय किसी ओर भी दे
सकता है जीवन से मुक्ति का निर्णय भी, और इसी जीवन को
पुनः
जीने
का निर्णय भी...'
-यह दूसरा निर्णय मेरी सजा होगा"उसके अपने मन्तर से उसके मन
ने कहा, पर वह खामोश चलता गया।
-
.

शायद गहरे अंधकार का प्रभाव था कि उसे लगा-वह मर चुका है, अब उसे केवल पृथ्वी से यमपुरी ले जाया जा रहा है। पूछा-'हे दूत ! तुम मुझे यमपुरी ले जा रहे हो ?' उत्तर मिला-'सब तुम्हारे ही बनाए हुए शब्द हैं। अगर तुम उसे यमपुरी कहना चाहते हो तो कह लो, मुझे कोई आपत्ति नहीं है।' -रास्ता कितना लम्बा है ! -तुम्हारे गिनने-मापने का हिसाब मैं नहीं जानता... उत्तर देने वाला चुप हो गया तो उसे याद आया—एक बार युधिष्ठिर के प्रश्न करने पर कृष्ण ने बताया था कि पृथ्वी से यमपुरी छियासी हजार योजन है ! और वह मन में हिसाब लगाने लगा-चार कोस का एक योजन होता है, इस तरह छियासी हजार योजन को चार से गुणा करने से बना और साथ ही एक भयानक-सी याद उभर आई-कृष्ण ने यह सब कुछ बताते हुए कहा था कि इस रास्ते में न कोई पेड़ है, न कुआं, न तालाव, न को ई नगर या गांव, न आश्रम, सारा रास्ता अंधकार से भरा हुआ है." उसने भूख-प्यास की कल्पना करनी चाही, पर लगान इस समय उसे भूस पी, न प्यास । और छियापी हजार योजनो की कल्पना करके भी उसके पांवो में यकावट नहीं थी। पर लगा~कुछ था जो अंधेरे में उसके पीछे-पीछे चलता आ रहा था। उसने खड़े होकर पीछे की ओर देखने का यत्न किया, पर अंधेरे मे कुछ दिखाई नहीं दिया। पूछा-'हे दूत ! हे मार्गदर्शक ! मेरे पीछे-पीछे कौन आ रहा है ? कुछ है जो मेरे साथ चल रहा है, पर मैं उसे देख नही सकता।' उत्तर मिला-पर अपने-आपमे एक प्रश्न के समान-'आज के मनुष्य साथ कौन चल सकता है ?' उसने फिर कहा-'मालूम नहीं, पर किसी समय कृष्ण ने ही युधिष्ठिर से हा था कि मनुष्य जब पृथ्वी से जाता है तव उसके पाप-पुण्य उसके पीछे-पीछे चलते हुए उसके साथ जाते हैं।' अंधेरे में हल्की-सी हंसी की आवाज सुनाई दी, साथ ही यह भी-'हो सकता है तुम्हारे यही संस्कार तुम्हारे पीछे-पीछे आ रहे हों।' उसने जल्दी से कहा-'नहीं, संस्कार नहीं, पर हो सकता है यह मेरे विचार हों जो मेरे पीछे-पीछे मेरे साथ आ रहे हैं।' उत्तर मिला-'हां, हो सकता है।' - ... फिर बहुत देर तक अंधेरे की भांति खामोशी भी छाई रही केवल वह विचार जो उसके पीछे-पीछे आ रहे थे, कदम मिलाकर उसके साथ चलने लगे। एक ने, बिलकुल उसके निकट आकर, हथेली से कोई जड़ी-बूटी सुंघाई, और एक अजीब-सी सुगंध में लिपटकर उसने पूछा-'यह तुमने मुझे क्या सुंघाया है !' 'एक बूटी।' 'क्यों?' 'इससे हजारों वर्ष पुरानी बातें भी याद आ जाती हैं...' 'मुझे कुछ याद नहीं आ रहा है।' अभी याद आएगा।' 'सुनो!' 'हा...' 'कुछ याद आ रहा है...' 'क्या?' 'मैंने एक बार जुआ खेला था।' 'फिर?' 'सारा धन, हीरे-मोती, लाल-पन्ने दांव पर लगा दिए...' - ६६

-फिर?'
“मारे गाव-गोट भी.."हाथी-घोड़े भी...'
'फिर?'
'सब कुछ हार गया...'
'फिर?'
'फिर मैंने अपनी पली भी दांव पर लगा दी।'
"पत्नी?'
'हा, उसिला भी...'
'क्या कहा?'
'हा, उसिला भी दांव पर लगा दी, और हार गया..
'अच्छी तरह याद करो!'
'हा, सच द्रौपदी"उस समय उसिला का नाम द्रौपदी हुआ करता था...'
अचानक वह चुप हो गया। उसे लगा-समय उसके अन्दर कुछ इस तरह
हिल रहा है कि कभी वह हजारों वर्ष उधर चला जाता है, कभी हजारों वर्ष
इधर आ जाता है।
उसने कोशिश की कि वह समय की कोई आवाज़ न मुन सके, पर एक
भावाज उसके कानों के पास आई और खड़ी हो गई।
उसके विचार ने कहा, 'यह आवाज तुम्हे सुननी पड़ेगी...'
पूछा, 'किसको आवाज है ?
'दुर्योधन की सभा में खड़ी हुई द्रौपदी की। सुनो! वह कह रही है कि
युधिष्ठिर जव अपने-आपको हार चुके तो मुझे दाव पर लगाने का उन्हें क्या
मधिकार या?'
'सुन रहा हूं.'
'उत्तर दो!'
"इसका उत्तर तो युधिष्ठिर भी नहीं दे सके थे।'
'इसीलिए यह प्रश्न हजारो वर्षों से हवा में ठहरा हुआ है।'
'पर मैं इसका क्या उत्तर दे सकता हूं?'
!
.
६५

'भव तुमने फिर इस जन्म में जुआ खेला धन-सम्पदा और मान-सम्मान
के लिए जमींदार घर की लड़की से विवाह किया.'
'पर मैंने अपने-आपको दांव पर लगा दिया, और हार गया...'
'यही तो आज की द्रौपदी पूछ रही है कि, आज के युधिष्ठिर ! तुम्हें
अपना-आप हारने के बाद क्या अधिकार था कि तुमने मुझे भी दांव पर लगा
दिया"आज वह किसी दुर्योधन के सामने खड़ी हुई...'
'चुप रहो।
चुप छा गई...

अचानक एक मद्धिम-सी रोशनी हुई, सामने एक इमारत दिखाई दी, और उसके भिड़े हुए दरवाजे के पास पहुंचकर उसके पांव ठिठक गए.. 'यह क्या जगह है ?" उसने अपने अदृश्य दूत से पूछा। -अदालत क्या यह पुरातन कथा-कहानियो के अनुसार धर्मराज की कचहरी है ? -बीसवी शताब्दी के मनुष्य ! इसमे पुरातन कहानियों का धर्मराज नहीं इसमे तुम्हरी आज की अदालत है, जज भी और सरकारी वकील भी... ----और मैं? --एक अपराधी -पर मेरा अपराध? -~-तुम अन्दर जाकर पूछ लो... --पर जिन शहरों में मैं रहता हूं वहां तो मुकदमे अकसर झूठे होते हैं." -इनीलिए यह अदालत तुम्हारे शहरों के बाहर है। पूछने में कुछ बात नहीं बन रही थी, इसलिए वह भिड़े हुए दरवाजे को सोल इमारत के अन्दर चला गया। सामने एक बहुत बड़ी दीवार थी, जिसपर एक चित्र लगा हुआ था। कमरे में बहुत थोड़ी रोशनी थी, इसलिए वह चित्र को पहचान नहीं सका। पर इतना जान लिया कि यह चित्र समय के उस शासक का होगा जिसके नाम पर इस अदालत में न्याय होता है। उसी वडी दीवार के पास, उम चिन के नीचे, ठीक उसकी सीध में एक ऊंचा चबूतरा-सा था जिसपर एक बहुत बड़ी मेज़ रखी हुई थो, कागज़ों से भरी हुई, और जसके पास एक ऊंची पीठ वाली कुर्सी पर एक बन बैठा हुआ था। उसने सफेद घोगा पहना हुआ था जिससे उसने अनुमान लगाया कि वही जज है।

उसने कमरे को दायें-वायें भी गौर से देखा-वहां केवल एक व्यक्ति और या जिसका मुंह जज की ओर था और उसने काला कोट पहन रखा था, जिससे उसने अनुमान लगाया कि वह अवश्य सरकारी वकील होगा। कमरे में और कोई नहीं था। उसे हल्की-सी हंसी आ गई~मानो दुनिया में केवल एक ही जज रह गया हो, एक ही वकील, और एक ही अपराधी.. उसके पैरों की आहट सुनकर सामने की बड़ी दीवार के पास बैठे हुए जज का ध्यान उसकी ओर गया, और उसने हाथ के संकेत से उसे उघर खड़े होने के लिए कहा जिधर लकड़ी का एक जंगला-सा था अपराधी के खड़े होने का कठघरा। वह कठघरे में जाकर खड़ा हो गया। खयाल आया-अजीब अदालत है, कहीं कोई आवाज़ नहीं। क्या अदा- लतें भी इस तरह खामोश होती हैं ? उसने धीरज से पूछा, 'हुजूर ! मुझे किसलिए बुलाया गया है ?' उस बड़ी दीवार की ओर से न्यायाधीश की आवाज़ आई, 'आज तुम्हारी पेशी है, अब तारीख और आगे नहीं डाली जा सकती, इस देश से बाहर जा रहे हो।' ---पर किस बात की पेशी ? -तुम तीन साल तक सोचते रहे हो कि तुम्हारे मुकदमे की सुनवाई न हो। ~पर कौन-सा मुकदमा? --आज से तीन साल पहले तुमने खुद ही एक दरखास्त दी थी." --मैंने ? ---तुम्हें याद नहीं? -हां एक दरखास्त दी थी. पर वह बहुत पुरानी बात है" वकील ने मेज़ पर से एक फाइल उठाई, और धीरे से जज से कहने लगा 'हुजूर ! यह बहुत खतरनाक आदमी है. किसी बात का जवाब सीधी तर नहीं देगा। आप मुझे जिरह करने की इजाज़त दें।' 'इजाजत है।' जज ने संकेत किया। - क्योंकि तुम जल्दी ही ७०

सरकारी वकील ने जेब से रूमाल निकालकर, अपनी ऐनक के शीशे
पोंछे, फिर एक-दो कागजों पर कुछ पढ़ते हुए कठघरे की ओर देखकर पूछा,
'तुम्हारा नाम ?'
..
उसे हंसी-सी आ गई, बोला 'क्या आपके कागजों में मेरा नाम नहीं है ?
अगर आपको नाम भी पता नहीं है, तो मुझे यहां बुलाया किस तरह ?'
वकील के माथे पर हल्की-सी त्योरी पड़ गई, कहने लगा, 'तुम्हें मालूम
है तुमपर क्या इलज़ाम है ?'
—नहीं।
-कत्ल का।
--कल का? किसके कत्ल का?
—अपने दोस्त के कत्ल का।
-पर वह तो
-जिसके लिए तुमने दर्खास्त दी थी कि मिल नहीं रहा है...
-अगर मैंने उसे कत्ल किया होता, तो दर्खास्त क्यों देता?
वकील हंस उठा।
-इसीलिए मैंने तुम्हें खतरनाक अपराधी कहा था। अच्छा, यह बताओ,
उसे गुम हुए कितना अर्सा हुआ है ?
-तीन साल।
---वह कब से तुम्हारा दोस्त था?
--बचपन से।
--स्कूल में तुम्हारे साथ पढ़ता था?
-हां, स्कूल में भी, कालिज मे भी...
-उसकी उम्र?
-मुझ जितनी ही
-सिर्फ वही एक दोस्त था ?
-हां, सिर्फ वही।
-तुम्हारा क्या खयाल था?
-यही कि यह दोस्ती मारी उम्र रहेगी।
-फिर?

, -अचानक वह गुम हो गया। -तुमने उसे ढूंढा नहीं ? ---बहुत ढूंढा अभी तक ढूंढ़ रहा हूं...! वकील मुस्कराया। वह हैरान हुआ, कहने लगा---'वकील साहब ! आपको मुझपर विश्वास नहीं है ?' --तुम्हें शायद खुद अपने ऊपर विश्वास नहीं है। उसके अन्तर में कुछ घबराहट-सी हुई । उसने भी वकील की तरह जेब से रूमाल निकाला, पर ऐनक को नहीं, माथे को पोंछा। माथे पर अचानक कुछ पसीना-सा आ गया था। वकील हंस पड़ा। -आप मुझपर हंसते क्यों हैं, वकील साहब ? -तुम रूमाल से माथे को इस तरह पोंछ रहे थे... ----यह कमरा वहुत गर्म है, मेरे माथे पर पसीना... --नहीं, तुम माथे को इस तरह पोंछ रहे थे, मानो हर याद को स्मृति से पोंछ रहे हो... वकील का मुंह बहुत गम्भीर हो गया। कहने लगा-'तुम दोनों दोस्त जब मिलकर कितावें पढ़ते थे, वह कौन-सी कहानी थी जिसका तुम दोनों पर बहुत प्रभाव पड़ा था ?' -कई थीं। -कोई एक जो तुम्हारे मन को बल देती थी... ~~एक थी. "एक बच्चे की जो एक ऋपि के पास विद्या ग्रहण करने के लिए गया था. -फिर? ---प्रषि ने उसके पिता का नाम पूछा तो वह दूसरे दिन आकर कहने लगा-मेरी मां कहती है कि मैंने कई लोगों की सेवा करके यह पुन पाया है । इसलिए किसी एक का नाम नहीं बता सकती और ऋषि ने बच्चे को गले से लगा लिया। --क्यों? -क्योंकि वह इतना बड़ा सच बोल सका, बड़े सहज मन से."वह उस ७२

स्त्री का बच्चा या जिसे सच से कोई संकोच नही था...
-तुम जानते हो, यहां केवल एक जज है, एक में, और एक तुम?
~~यहां तुम्हारा कोई गवाह नहीं है।
-यो?
+
-योकि हमारा विश्वास है कि उस कहानी का अभी भी तुमपर
योड़ा-सा प्रभाव वाकी है। इसलिए तुम अपनी गवाही आप दोगे।
-फिर वकील साहब ! आपने मुझे खतरनाक अपराधी क्यों कहा?
-क्योकि पिछले तीन वर्षों के 'तुम', वह 'तुम' नही हो जो पहले थे।
तुम कभी-कभी कोशिश करोगे सच को छिपाने की
-पर?
--एक वाक्य मे छिपाकर दूसरे में स्वयं ही वता दोगे ..
!
उसने सिर झुका लिया। एक हल्की-सी आह भी भरी। फिर सिर उठा-
कर कहा-~'हा, पूछिए. वकील साहब ! जो पूछना चाहते हैं।'
-उसिला कौन थी?
~मैं उससे मुहब्बत करता था।
-अब नहीं करते?
-~जो जबान 'हा' कह सकती है, वह कट गई है।
-किसने काटी?
-तुम्हारे दोस्त ने नहीं ?
--तुम्हारे दोस्त को तुम्हारी इस मुहब्बत का पता था?
-यह सब जानता था।
---यह खुश नहीं था?
---यह बहुत खुश था" बहुत खुश था, वकील साहब !
--फिर?

-मेरी मां खुश नहीं थी। क्यों? -वह चाहती थी-मैं... -वह जमींदार के घर की दौलत चाहती थी? -अपने लिए नहीं, मेरे लिए। -और तुम्हारा दोस्त? -वह तब पहली बार मुझसे लड़ा था। उससे पहले हम इकट्ठे रहते थे,. एक ही कमरे में उसके बाद वह मुझे छोड़कर चला गया। -तुमने उसे मनाया नहीं? -किस जवान से मना सकता था। मैंने अभी आपको बताया था कि जिस जवान से दोस्ती की और मुहब्बत की बात की जाती है वह मैंने काट दी थी। -~-पर जमींदार की बेटी से व्याह करने की हामी किस तरह भरी ? -कटी हुई जवान से दुनिया का हर काम कटी हुई ज़बान से हो सकता है, वकील साहब! -फिर उसके बादं तुम्हारा दोस्त तुमसे कभी नहीं मिला? -दूर से कई बार देखा... -~-कहां? । वह चुप हो गया। उसके कानों में अनेक पड़ों के पत्ते सांय-सांय करने लगे, अनेक मन्दिरों के घंटे बज उठे, और अनेक पुस्तकों के पन्ने हिलने लगे... --तुम बोलते नहीं? -अगर मैं कहूं कि मैंने कई बार रात को चांद की लो में उसे देखा था" किसी टहनी पर उगने वाले पहले पत्ते में और नदी के पानी में तैरते हुए मन्दिर के कलश में और किसी-किसी किताब के... वकील हंसने लगा, बोला, 'आज अगर कोई अदालत की कार्यवाही देखे तो यही समझेगा कि हम किसी कालिदास को पकड़कर अदालत में ले आए हैं.' उसने एक पल के लिए आंखें मूंद लीं, शायद आंखें गीली हो आई थीं, फिर बोला, 'मैं शायद एक छोटा-सा कालिदास हो सकता था, पर हुआ नहीं -क्या तुम खुश नहीं हो कि तुमने एक ऐसा पद प्राप्त किया है जिसके - ७४

लिए तुम्हारी दुनिया के कई लोग तुमसे ईर्ष्या करते थे?
-वकील साहब ! ...
-यह चुप क्यों?
- इसलिए कि मुझे खुगी शब्द के अर्थ भूल गए हैं."
यह पद तुमने किस तरह पाया?
वकील के इस प्रश्न पर वह चौंक गया। उसे वह दिन याद आया जब
उसिला ने उसमे कहा था-'कई बातें ऐसी होती हैं जिन्हें लपत्रो की सजा
नहीं दी जाती...'
वह आंखों में एक मिन्नत डालकर वकील की ओर देखने लगा।
वकीन मुस्कराया, कहने लगा--'एक वालक था जो एक ऋषि के पास
विद्या ग्रहण करने के लिए गया था...'
उस ने सिर नीचा कर लिया, आवाज कांप-सी गई–'वह न जाने किस
युग की बात थी..
हो सकता है"
--क्या?
-कि उस युग मे वह बालक तुम ही थे।
एक पल के लिए समय और स्थान बदल गए।
वकील के कहे गए शब्द कानों में पड़े तो वह जो इस समय अभियुक्त था
एक ऋषि की कुटिया मे कुशा के आसन पर बैठ गया।
फिर एक पल का सुब मन मे डालकर, वह वकील की ओर देखने
--क्यो मैंने ठीक नहीं कहा?
-शायद नहीं।
-तुम नहीं चाहते कि तुम वह वच्चे होते ?
-वकील साहब ! जो जवान हा कह सकती है, वह यह गई है
वकील ने एक ठडी सास ली। फिर एक बार परे उस ऊची कुर्सी पर
बैठे हुए न्यायाधीश की और देखा, मानो अभियुक्त के लिए दया की अपील
कर रहा हो।
पर न्यायाधीश चुप था।
।

वकील ने फिर अभियुक्त की ओर देखा, कहा---'क्या यह सच है कि तुम्हारा यह पद भी ज़मींदार की बेटी ने लेकर दिया था ? मेरा मतलव है, तुम्हारी पत्नी ने ?' -~-पहला वाक्य ही काफी था, वकील साहब ! -उसे पत्नी कहने पर आपत्ति क्यों ? -आपत्ति नहीं, संकोच हो सकता है... ! -किस तरह ? -क्योंकि आपत्ति का संवन्ध कानून से है, और संकोच का मन से... -और तन से ! ...वकील हंस-सा दिया, तो अभियुक्त के मुंह में एक कड़वाहट-सी धुल गई.---पर वह चुप रहा । इस चुप से उसे अपने तन की वह चुप याद आ गई जब उसने विवाह की पहली रात जमींदार की बेटी के विस्तर में पांव रखा था। तन गूंगा हो गया था... उसने कपड़ों को फाड़ने की तरह अपने शरीर से उतारा था, पर शरीर बोलता नहीं था - तन की आवाज़ को ढूंढने के लिए उसने तन के अंधे कुए में रस्सी लट- काई थी, पर केवल कुएं की चर्बी चीखी थी मानो तन की खामोशी विलख :: उठी हो ... आज उसे वह रात याद आई तो उसकी कल्पना धीरे से हंसी, कहने लगी-~अगर उस रात वह बिस्तर उसिला का होता ? कल्पना ने टोना कर दिया तो वह सोचने लगा-'तन के साज़ को छूने के लिए हाथों में अदब भरा जाता.. मैं उसके अंगों की गोलाइयों को इस तरह छूता जैसे कोई साज़ के तारों को छूता है । पोरुओं से तन की नोकों को टटोलता, जैसे कोई तारों को सुर दे रहा हो. 'तार, तलवों तक हिल जाते ... , सारे अंग स्वर वन जाते...पैरों के 'सा' से लेकर माथे के 'सा' तक... और जब खरज और गंधार के जादू में वह लिपट गया, तो साज के किसी तार को तोड़ते हुए वकील की आवाज़ आई.-'सो, फिर तुम्हारा दोस्त तुम्हें पास, वही नहीं मिला? --नहीं, फिर कहीं नहीं मिला"उसने निरास स्वर से उत्तर दिया। -कभी दूर से भी नहीं देखा? -~राम्ता चलते देखा या.. -किम मड़क पर? -पल एक ही सड़क पर। -कोन-मी? --उसपर जिसपर कई वार रात को मैं जाया करता या... 7 -उसके जी यह सच बुट दिलवा सकता था... और तुम्हारा दोस्न ? -अपरे में मोड़ पर खड़ा रहता था। -किसलिए? -~~-मुझे उम गस्तै से हटाने के लिए। ---तुम्हारे हाथों में क्या हुआ करता था? -~-कई तरह की रिश्वत ! और वह तुम्हारा दोस्त? -मेरे हाथों की तोड देना चाहता था! -~-तुम उमे अपने राने में किस तरह हटात थे ? ~सी तरह जिम तरह किसीको रास्ते मे हटाया जाता है। वकील मुन्करा पड़ा, कहने लगा --'सो, अव नी तुम यह कहते हो कि तुमने उसकी हत्या नहीं की?' ~~में टीक बहता हू, मैंने उसकी हत्या नहीं की। मैं सदा चाहता था, वह जीवित रहे --तुमने अन्तिम बार मे कर देखा था, और कहां? -~-टमी महक के मोड़ पर "त्रिम दिन वह भी मेरे माय भी। - -वह कौन? ~~वही, जमींदार की बेटी... तब तुम्हारा टसम विवाह हो चुरा था? ७७ - -~-हो चुका था... -फिर तुम उसे अपनी पत्नी क्यों नहीं कहते ? -कानून कहता है, मैं न भी कहूं तो क्या फर्क पड़ता है... .-अच्छा, यह बताओ, उस दिन तुम उसे अपने साथ लेकर क्यों गए ? -वह मेरी मर्जी नहीं थी, उसकी थी। या फिर उसकी जिसने बुलाया या। ----क्या यह भी एक रिश्वत का टुकड़ा थी ? -हां, पर जिसे न वह बैंक में रख सकता था, न घर में केवल एक घंटे- 'भर के लिए सोने के कमरे में। --सो, उस दिन तुम्हारा दोस्त तुम्हें अन्तिम वार मिला था ? -हां, और उसने अंधेरे के उस मोड़ पर खड़े होकर मेरे जोर से थप्पड़ भारा था. .-और जवाब में तुमने क्या किया ? -योवल हाथ से उसे रास्ते से हटाया था... -और वह वहां अंधेरे में गिर गया था -हां, वह गिर गया था, इसीलिए मैं तेजी से आगे बढ़ गया. -और, क्या मालूम, उसे वहुत चोट लगी हो ? -ज़रूर लगी होगी... -और क्या गालूम वह वहां मर गया हो ? -नहीं." -तुम किस तरह जानते हो? में विश्वास से कह सकता हूं... -किस तरह ? -मेरे पास इसका प्रमाण मौजूद है। 1 ... -क्या? वकील ने प्रमाण मांगा तो उसकी आंखें गीली हो आई, कहने लग "यकील साहब ! अगर वह सचमुच मर गया होता तो मेरी आंखों में यह नहीं आ सकता था.. मैं अभी भी अपने-आपपर रो सकता हूं। तो मतलब यही है कि वह जीवित है...' -नया यह प्रमाण काफी है ? "वकील ने फिर पूछा तो वह कुछ सोझ उठा, बोला, 'प्रमाण अपने समझने के लिए होते हैं, किसीको समझाने के लिए नहीं...' वकील ने बात पलट दी, कहा-'पर तुम्हारी पत्नी ने जो कुछ भी किया, तुम्हारे लिए । क्या उसकी यह कुर्बानी नही थी?' नही। पहली बात तो यह है कि उसने जो कुछ भी किया, अपने लिए। इस सब कुछ की मुझे जरूरत नहीं थी, उसे थी। मेरे हाथों में पहली रिश्वत उसने ही थमाई थी। -और दूसरी बात? -कि यह कुर्बानी नही यी "वह जो कोई भी था जमींदार घराने का पुराना आदमी था उसे, मेरा मतलब है-जमीदार की बेटी को, उसी तक पहुंचना था मैं केवल एक कानूनी रास्ता था जिसपर चलकर उस तक जाया जा सकता था.. -अब तुम आपस में किस तरह रहते हो? किस प्रकार की जिन्दगी जीते हो? -बड़े आराम से, हम एक-दूसरे के तन का झूठ जी रहे हैं । -पर इस विवाह के लिए आखिर तुमने ही 'हा' की थी। -मेरी 'हा' केवल मा की जिद के आगे थी, और किसीके आगे नहीं... ---फिर बाद में तुम्हारी मा को उसका पछतावा नही हुआ? -वह बहुत जल्दी मर गई, पछतावे का दिन देखने से पहले केवल कई बार खयाल आता है। --क्या? -कि अगर उसकी इस तरह इतनी जल्दी मृत्यु होनी थी तो इससे कुछ दिन पहले ही... तुम्हारा मतलब है कि तुम्हारा विवाह करने से पहले उसकी मृत्यु हो जाती। -हां! -~-क्या अपनी मां के बारे में ऐसे सोच सकना तुम्हारी करल की वह रुचि ! . नहीं, जिससे हो सकता है तुमने अपने दोस्त का कत्ल किया हो, हालांकि तुम मानते नहीं...? ----आप नहीं समझेंगे, वकील साहब वकील ने न्यायाधीश की ओर देखा, मानो कह रहा हो कि अभियुक्त के भीतर छिपी हुई उसकी कत्ल की रुचि स्पष्ट दिखाई देती है, उसमें और समझने की कोई गुंजाइश नहीं है, न उसकी सफाई में कुछ सुनने की... पर न्यायाधीश ने पहले बड़ी गंभीर दृष्टि से अभियुक्त की ओर देखा, फिर वकील की ओर। हाथ से संकेत करते हुए कहा, 'वह जो कुछ कहना चाहता है, वह सुना जाए।' वकील ने अभियुक्त के कठघरे की ओर देखकर कुछ थके हुए स्वर में कहा-~~-'सो, मां की मृत्यु की कामना करके भी तुम इसे कत्ल की रुचि नहीं मानते ?' --नहीं, क्योंकि मैं मां को बहुत प्यार करता था, इसीलिए उसकी जिद के आगे अपनी उसिला की बलि दे दी थी.. वकील व्यंग्य से मुस्कराया---'पर उसकी मृत्यु की कामना करना प्यार का अच्छा प्रमाण है ?'... वह उत्तर में मुस्कराया, कहने लगा, 'वकील साहब! आपकी कठिनाई यह है कि आपको हर बात के लिए प्रमाण चाहिए। अच्छा, सुनिए ! एक बहुत बड़ा तपस्वी था। उसने रेनुका नामक एक राजकुमारी से विवाह किया। उस रानी के पांच पुत्र हुए। 'सुन रहे हैं न ?' -हां, सुन रहा हूं." वकील ने एक बार हंस कर न्यायाधीश की ओर देखा, फिर ध्यान अभियुक्त की ओर कर लिया। वह सुनाने लगा-'एक बार वह रानी नदी में नहाने गई तो वहां चित्र- रथ को देख उसके रूप पर मोहित हो गई। घर आई, तो उसके ऋपि-पति ने अपनी तपस्या के बल से यह बात जान ली। उसे बहुत क्रोध आया। उसने अपने चार पुत्रों को बुलाकर उन्हें आदेश दिया कि वह अपनी मां को मार वकील के ध्यान को अभियुक्त की इस कहानी ने सचमुच आकर्षित T."

किया, और वह गंभीर होकर सुनते हुए बोला-'फिर? पुत्रों ने सचमुच मा को मार दिया? नहीं, वह मा के मोह में आ गए। उन्होंने मां पर हाथ नहीं उठाया। इससे ऋपि को और भी फोघ आया और उसने चारों पुत्रों को जड़ हो जाने का शाप दे दिया “सो, वह चारों जड़ हो गए। -~फिर। -पाचवां, सबसे छोटा पुत्र परशुराम था, वह जव घर आया तो ऋषि- पिता ने उसे आदेश दिया कि वह अपनी मा को मार दे, और परशुराम ने उसी समय तलवार लेकर मां का सिर धड़ से अलग कर दिया--पर, जानते हैं, वकील माहब ! आगे क्या हुआ ? --क्या? -पि-पिता अपने आदेश का पालन देवकर प्रसन्न हो गया और उसने पुत्र से वर मांगने के लिए कहा । फिर, जानने हैं उसने क्या वर मांगा? -क्या? -कि उसकी मा जीवित हो जाए और चारों भाई भी, जो जड हो गए ये.. अब समझे, वकील साहब ! -तुम्हारा मतलब है कि... -मैं भी एक परशुराम हूं। मां ने मेरे विवाह का दोप कमाया, इसलिए उसको मृत्यु की कामना कर सकता है । लेकिन अगर वह घडी गुजर जाती, जिसमें मां को जिद करनी थी तो मैं अपना विवाह जिस तरह करना था कर लेता, तो बाद में मां को उसी तरह जीवित देखना चाहता जैसे परशुराम ने चाहा या... वकोल ने अपनी झुक गई आखों को अभियुक्त के चेहरे से परे कर लिया. वह फिर कहने लगा--'पर मैरा, आज के यादमी का दुखान्त यह है, वकील साहब ! कि मैं न विसीको मार भकता हूं, न किमीको जिला गपना हूं. मैं बहुत कमजोर आदमी हूं. देसिए न, उसे मैंने जंगल में अकेला छोड़ दिया यकील चकित-सा हो गया, पूछने लगा-जंगल में? पिरो ?' .

- -कुछ नहीं। उसके स्वर में एक घबराहट आ गई... एक पल के लिए वकील को सन्देह हुआ कि अभियुक्त का दिमाग ठिकाने नहीं रहा है। पर अव तक उसकी सारी वातें होश की थी, इसलिए वकील का यह सन्देह दूसरी ओर मुड़ा। जो सुराग अब तक नहीं मिल रहा था, शायद अचानक होंठों पर आए इस वाक्य से कुछ मिल सकता था... पूछने लगा. 'सो तुमने उसे जंगल में अकेला छोड़ दिया ?' उत्तर में वह बोला नहीं। वकील ने पूछा---'तुम्हें याद है, वह किस दिन की बात है ? -क्या ?"वह वकील के मुख की ओर ऐसे देखने लगा, जैसे वह सवाल को समझा ही न हो। -जिस दिन तुम उसे जंगल में ले गए थे, और वहां तुमने उसे अकेला छोड़ दिया था... अब अभियुक्त के होंठों पर एक मुस्कराहट आई, पर ऐसे जैसे होंठों पर माकर रो पड़ी हो। वह कहने लगा---'हां, वकील साहब ? मैंने एक बड़ी मासूम और बड़ी प्यारी-सी लड़की को एक जंगल में अकेला छोड़ दिया...' -तुम किस तरह की बात कर रहे हो? -उसिला की। -हूं! -वकील चुप-सा हो गया। -मुझे अचानक एक बात याद आ गई थी, वही बताने लगा था... - -- -क्या ? ---एक दिन जब हम सब लोग पिकनिक से लौटे थे, रास्ते में एक पहाड़ी पर एक मन्दिर पड़ता था। उसिला वह मन्दिर देखना चाहती थी और वाकी और कोई भी चढ़ाई नहीं चढ़ना चाहता था सब थके हुए थे। -फिर? ~मैं और वह उस पहाड़ी के मन्दिर को देखने चले गए, इसलिए साथियों से पिछड़ गए"जो बाहर वाली पगडंडी गांव को आती थी, वह बहुत लम्बी थी। लेकिन अगर हम रास्ते में पड़ने वाले जंगल के बीच से गुजरते तो बहुत जल्दी गांव पहुंच सकते थे। -सो, तुम जंगल के रास्ते से आए ? - ८२ -संस्कार बड़े अजीब होते हैं, वकील साहब! हम मन्दिर से नीचे आकर जगल के रास्ते पर पड़ गए। अचानक मैंने कुसुम का एक फूल तोड़कर उसिला के वालों में अटका दिया, और एक फूल हथेली पर मसलकर उसका रंग उमके माथे पर लगा दिया जानते हैं क्यों ? -क्यो ?...यकील कुछ मुस्करा-सा उठा, पर अभियुक्त ने देखा नहीं, उसका ध्यान दूर जगल में था, कहने लगा-'जब मेरी नानी जीवित थी, तब एक दोपहर हम जव जंगल से गुजरने लगे थे तब उसने कुसुम के फूल तोड़कर उनकी पंखुड़िया सव के माये पर मली थी अपने वालों में भी फूल लगाए थे, मां के वालों में भी "आप जानते हैं कुसुम के फूलों को अग्निशिसा भी कहते हैं ?' ~पर? -नानी भी कहती थी, जंगलों मे बहुत-सी रहे रहती हैं। पर अगर बालों में कुसुम के फूल हों, गले में रंगीन मोती, और माथे पर कुसुम का लाल रंग, तो जंगल की रुहें रास्ता चलने वालों को कोई दुख नहीं देती, न ही वे रास्ता भूलते हैं." -फिर उस दिन तुमने उसिला को जंगल में अकेला छोड़ दिया ? -नहीं, वकील साहब ! उस दिन तो उसके माथे पर कुसुम का रंग लगाया था। उस दिन नही "वाद में "यह दुनिया भी तो एक भयानक जंगल है, इस भयानक जंगल में मैंने उसे अकेला छोड़ दिया।"पर नहीं, अग्निशिखा की रीत में ही भूल गया -किस तरह ? -मैं अपने माथे पर कुसुम का रग लगाना भूल गया, सो, जंगल की स्हें मुझमे नाराज हो गई, और मैं जंगल मे रास्ता भूल गया" -हां, लगता है तुम झूठ नहीं बोल सकते।"वकील ने घोरे से यह कहा तो वह जो अभियुक्त था, धीरे से हंस पड़ा और कहने लगा---'मूठ नही बोल सकता, पर झूठ को आंखों से देखकर भी चुप रह सकता हूं "अकसर रहता -उदाहरण दो। --उदाहरण? उस औरत को लोग जब मेरी पली कहते हैं तो मैं पुए - रहता हूं।" -और? और जब मेरे सामने लाखों के वजट पर हस्ताक्षर होते हैं तब उसकी कितनी रकम कहां लगती है, और कितनी कहां जाती है, सब जानता हूं, पर चुप रहता हूं" -किसके वजट? -नये महकमों के, नई मिलों के, नई खरीद के, या किसी न किसी चीज़ की प्रोमोशन में, उदाहरण के तौर पर, एजुकेशन की, आर्ट की, कल्चर की. यह चुप रहने की आदत तुम्हें कव से पड़ी? - उस दिन से जव मां की ज़िद के आगे चुप रह गया था। ---फिर? -----फिर जव मेरा दोस्त मेरे पास से जाने लगा तो मैं चुप रह गया था । -फिर? -फिर उस रात जब मेरी पली कहलाने वाली औरत मेरी नौकरी के काग़ज़ों पर हस्ताक्षर करवाकर ले आई थी और केवल उस रात नहीं, अव भी कई रातों को, जव मुझे मालूम होता है कि वह कहां गई थी और वह कहती है कि वह कुछ खरीदने गई थी, मैं चुप रहता हूं"हां, सच, एक बात -- -क्या? -~-मुझे अपने घर में वाज़ार की गंध आती है, खास कर अपने बिस्तर में से. -इसका क्या मतलब? -~- इसका मतलब यह है कि मेरा दोस्त अभी कहीं जीवित है। ----उसके जीवित होने का इस गंध से क्या संबंध है ? . ! मैं आपको किस तरह समझाऊं कि वह अगर मर गया होता तो मुझे किसी भी गलत चीज़ में से गंध नहीं आ सकती थी। जैसे... -जैसे क्या? -~~-जैसे, अगर वह मर गया होता तो मुझे किसी भी अच्छी चीज़ में से ...वकील साहब . सुगन्ध नहीं आ सकती थी। -तुम अजीब आदमी हो अच्छा, यह वतामो, तुमने अभी तक अपने किए के संबंध मे कुछ नहीं कहा, आखिर सब कुछ तुम्हारे हाथों हुमा" -हां, मैंने जुआ खेला। वकील हंस पड़ा, कहने लगा 'और इतनी धन-सम्पदा, मान-सम्मान जुए में जीत लिए. अभियुक्त की आखो में रोप भडक अठा, कहने लगा-'जुए में सबसे पहले मैंने अपने-आपको हारा, फिर अपनी जिन्दगी के सबसे बडे दोस्त को, और फिर उसिला को जैसे युधिष्ठिर ने अपने-भाइयों को दांव पर लगाया था और हार दिया था, फिर अपने आपको, और फिर द्रौपदी को...' वकील मुस्कराया- 'सो, आज के पांडव ! तुमने भी जुआ सेला...' ---हा, उसी तरह, पर दौलत के लालच से नही । -फिर किमलिए? -जैसे पाडवों ने खेला था, अपने बुजुर्ग धृतराष्ट्र की आज्ञा मान कर-- मैंने मां की आज्ञा मानी थी –पर तुम्हें आज्ञा मानने का पछतावा है ? ---हा, यह युग का अन्तर है, आज के आदमी के पास 'किन्तु' है, सन्देह है, तर्क है, पछतावा है... -पर मन के बनों में भटकते हुए, तुम्हारी द्रौपदी तुम्हारे साय क्यों नहीं है ? न तुम्हारा मित्र तुम्हारे साथ है "पाहव तो इकट्ठ वन को गए थे... -यह भी युग का अन्तर है, वकील साहब ! हम सब भटक रहे हैं, अपने- अपने वनों में...यह अकेलापन भी इस युग की देन है" -तुम सचमुच दिलचस्स आदमी हो बातों से तुम अपनी साधारण बात को समाधारण बना देते हो। -किस तरह? -जैसे अपनी उसिला को तुमने द्रौपदी से मिला दिया। -उसिला की जन्मकथा भी द्रौपदी की जन्मकथा जैसी है। -वह किस तरह ?-वकील के मुख पर आश्चयं आ गया.

-~आप आनते ही हैं, द्रौपदी एक हवनकुंड से पैदा हुई थी, एक अग्निकुंड से... -~हां ! -~~-उसिला भी एक अग्निकुंड से पैदा हुई थी. उसके माता-पिता हवन-कुंड के समान पवित्र थे...पर उस कुंड में उसकी मां के रूप पर मोहित होकर एक राक्षस ने बदले की आग जला दी "मां नदी में डूबकर मर गई, पिता भिक्षा- पात्र लेकर संन्यासी हो गया" --पर यह सारी कहानी तो द्रौपदी की नहीं थी... ---यह भी युग का अन्तर है. इस तरह आज की मुहव्वत को कोई हवनकुंड नहीं कहता. आज के राक्षसों को कोई राक्षस नहीं कहता.. आज की भलाई को कोई वर नहीं कहता, और आज की बुराई को कोई शाप नहीं कहता वकील की आंखों में अभियुक्त के लिए मोह भर आया, उसने कोमल-से स्वर में कहा-~~-'सो, तुम्हारे कथन के अनुसार, तुमपर अपने मित्र के कत्ल का दोष नहीं लगता...' ---उसे खो देने का दोप लगता है, वकील साहब ! वकील हैरान हो गया, उसने पूछा-'पर यह दोष तुम्हारी दृष्टि में बहुत बड़ा दोष है ?' -हां, वकील साहब ! यह चुप का दोष है, बहुत बड़ा, और बहुत दूर तक फैला हुआ~-मेरे विस्तर से लेकर दुनिया के राजसिंहासन तक फैला हुआ-हर देश के राजसिंहासन तक... वकील की आकृति गंभीर हो गई, उसने धीरे से कहा- 'पर आज के मनुष्य ! यह दोष तो हर युग में था...' अभियुक्त हंसा, कहने लगा-'क्या समय का विस्तार दोष को दोष-मुक्त कर देता है ? वकील ने कुछ नहीं कहा। वही कहने लगा-'देखिए ! किस समय की बात है, उस समय की जव दुर्योधन की भरी सभा में द्रौपदी को घसीटकर लाया गया तो भरी सभा में रोते हुए द्रोपदी ने अपने धर्मराज युधिष्ठिर से एक प्रश्न पूछा था" ! -कि युधिफिर पर वपने-बारको हार चुके तो उन्हें सा अधिकार पा कि वह ससे दांव पर लगा दें। --युधिष्ठिर ने क्या उत्तर दिया? -कोई उत्तर नहीं दिया, वकील साहब ! कोई उत्तर नहीं दिया हालांकि मरी सभा में भीष्म पितामह ने कहा कि द्रौपदी का प्रश्न पहल गूग, गौरव का पर इस प्रश्न का किसीने उत्तर नहीं दिया मैं यही तोपहरहा हूं कि अनेक प्रश्न शताब्दियों से हवा में खड़े हए हैं परन्तु मनुष्य पतान्दिनों से चुप है... -अभियुक्त! –हां, वकील साहब ! उसिला का भी यही प्रश्न है और मैं पुप हूं... चुप रहने का दोपी हूं... वकील किसी चि में पड़ गया, फिर न्यायाधीश की ओर देखते हुए धीमे स्वर में अभियुक्त से पूछने लगा--'तुम्हारा मया रागार --अगर तुम्हारी जगह तुम्हारा मित्र होता तो वह इस प्रश्न या उरार देता।" अभियुक्त ने एक गहरी सांस ली, फिर थके हुए स्वर में माहले गणा-'वर चुप नहीं रह सकता था, इसीलिए वह मेरे पास से पता गया...मेरीत था, मेरा बल... -पर अगर तुम्हारी जगह वह होता, दुनिगा मे गो गुग-भाराम तुम्हारे सामने हैं, अगर उसके सामने होते ? अभियुक्त हंसा, इतना कि रूमाल से उसने अपनी भागों में पानी को पोंछा, और कहने लगा-'वह मेरी जगह हो ही गही AAI Mा, मोग साहब ! वह उस सड़क को तोह देता जिरा राहा गर गईगा हूं. यह रास्ता उसके परों के लिए नहीं था...मागम, RIPAT -हां। -इन रास्तों पर चलने के लिए मनुष्ण को गारगी Minairem पर न चलने के लिए माहम पाहिए और यह गणना -और तुम? -मैं बहुत कमोर आदमी हूं.""मला,गोग" -तुम इस रास्ते से वापस जाना चाहते हो? वकील के इस प्रश्न पर अभियुक्त फिर हंस पड़ा, कहने लगा---'अजीब प्रश्न है !' -क्यों? - - ~ . क्योंकि कुछ चाह सकने के लिए साहस चाहिए। -सो, तुम नहीं चाहते, पर न चाहने के लिए भी साहस चाहिए? -हां, वकील साहब ! हां और नहीं दोनों के लिए। मैं दोनों से दूर आ चुका हूं" वकील ने मेज पर झुककर एक कागज पर कुछ लिखा, फिर अभियुक्त की ओर देखकर कहने लगा--'तुम जानते हो, इन सब बातों से तुम्हारे मुकदमे की कार्यवाही कहीं नहीं पहुंचती" -ठीक है, उसे भी मेरी तरह कागजों में भटकने दीजिए.''उसने उचाट- से मन से कहा, और फिर पूछने लगा -'मुझे बहुत प्यास लग रही है, मैं कहीं से पानी पी सकता हूं? -पानी? उसने कुछ झिझककर कोट की जेब को टटोला, फिर बोला---'मेरे पास थोड़ी-सी ब्रांडी है, मेरा मतलब है ह्विस्की... मैं पी लू?' वकील ने न्यायाधीश की ओर देखा तो वह धीरे से मुस्करा दिया। इस- लिए वकील ने अभियुक्त की ओर देखकर कहा-~-'तुम्हारी मर्जी...' उसने जल्दी से छोटी-सी बोतल से पांच-छ: पूंट भर लिए, और कुछ तृप्त होकर वकील की ओर देखा। वकील ने वही प्रश्न, कागजों में से उठाकर, फिर दोहरा दिया-'सो तुम्हारा दोस्त गुम हो गया है, तीन साल से मिल नहीं रहा है।' उसने समर्थन किया--'हां, तीन साल से नहीं मिल रहा है।' वकील ने अपना संदेह भी दोहराया-'शायद उसका कत्ल हुआ है ?' उसने फिर उसी प्रकार आपत्ति की-'नहीं, वह जीवित है ..' 'कोई प्रमाण?' वकील की आवाज ठंडी और करोबारी हो गई 'मैं प्रमाण दे चुका हूं, अव बार-बार नहीं दूंगा।' उसने थके हुए स्वर में कहा।

No text on this page.

पर वही 'किन्तु उसके होंठों पर आकर हंस पड़ा-अव क्या सुनवाई होती है ? किसकी? उसने हथेली से होंठों पर से 'किन्तु' को पोंछे दिया, उसे लगा-जीभ केवल हूकूमतों की होती है, इन्सान तो कव से चुप है... आज इस अदालत में चुप का दोष उसने स्वयं ही अपने कंधों पर रखा है, इस बात ने उसे कुछ तसल्ली-सी दी। और अचानक एक बहुत पुरानी वार्ता उसे याद आ गई-जव पांचों पांडव कुन्ती के साथ जंगलों में मारे-मारे फिर रहे थे तो वहां एक हिडिवा नाम की राक्षसी भीम की काया का बल देखकर उसपर मोहित हो गई थी और एक सुन्दर राजकुमारी का रूप धारण करके आई थी। पुरातन कहानी को उसने एक झटके से शोधित किया-'नहीं, जमींदार की बेटी का रूप धारण करके आई. और वह कहानी पर विचार करने लगा~महावली भीम ने उस राक्षसी का भेद जान लिया, तब भी उसकी इच्छा पूर्ण की, पर एक शर्त रखी-उससे कहा कि जव तुम्हारे पुत्र का जन्म होगा, मैं वापस अपनी जिन्दगी में लौट आऊंगा... ' मन, जैसे नंगे पैर जंगलों की ओर दौड़ पड़ा, पर उन जंगलों की ओर जो भीम के समय के थे।.."काल और स्थान की चेतना आई तो पांवों में बहुत-से कांटे चुभ गए. 'कितना पुरातन समय था-वह विचार में डूब गया-~-'एक वरस वाद अपनी ज़िन्दगी में लौट आने का रास्ता उसने सुरक्षित रख लिया, पर अब- शताब्दियों के बाद भी, किस प्रकार का, नया समय आया है जो उस पुराने समय जितना भी नया नहीं है कि एक वर्ष वाद.. या तीन वर्ष वाद वापस अपनी ज़िन्दगी में लोटा जा सके.. 'अपनी ज़िन्दगी'-दो छोटे-से शब्द उसकी आंखों के आगे चमकने लगे। उसिला उन छोटे-से शब्दों में समा गई...मानो ढाई, पगों से वह सारी घरती नाप रही हो... आंखें शायद किसी विचार के कारण चकाचौंध हो गई थी, मुंद-सी गई... N

-क्यों अनियुक्त ! सो गए ?" वकील को आवाज आई।
नहीं तो।
उसने चौंककर कमरे की दीवारों की ओर देखा। फिर बड़ी दीवार पर
नगे हुए चित्र को और उसकी दृष्टि गई तो उसने वकील की ओर मुंह करके
पूछा-'यह चित्र किसका है ?'
--अच्छी तरह देखो, पहचानो।
-बहुत बंधेरा है, पहचाना नही जाता।
---यही तो माज के इन्सान की मुश्किल है।
वकील की कही हुई बात से वह चौंक गया, और चित्र को दृष्टि गडाकर
देखने लगा...
-यह 'यह मेरे उस दोस्त का चित्र प्रतीत होता है।
--अच्छी तरह देखो...
-क्या वह सचमुच मर गया है ?
-तुम्हें विश्वास है कि वह जीवित है ?
-हां, मुझे विश्वास था कि वह जीवित है।
-फिर अब क्यों विश्वास नहीं होता?
-हमारी दुनिया मे"लोग उनके चित्रों पर हार डालकर दीवारों पर
टागते हैं जो मर जाते हैं | आपने, वकील साहब ! इसके चित्र पर हार क्यों
हाला हुआ है ?
-चित्र को फिर अच्छी तरह देखो।
उसकी समझ में कुछ नहीं पा रहा था कि वकील उसे लोट-पलटकर पह
क्यों कह रहा है । वह चकित होकर वकील के मुंह की ओर देखने लगा...
फिर उसने लकड़ी के कठघरे की ओर देखा, और फिर अपनी ओर...
अपनी चीख अपने ही कानों में सुनाई दी-'मैं यहां अभियुक्त के कठपरे
में क्यों खड़ा हूं?'
और कठपरे से निकलकर वह बाहर की बोर दौड़ने लगा तो वकील ने
उसके पाम आकर उसकी बांह पकड़ ली...
उसने जलती हुई आंखो से वकील के मुह की ओर देखा-इस समय वह
विलकुल उसके पास खड़ा था और उसका मुंह बिलकुल उसके सामने पा...

घिसटते हुए - - - उसके पांव जो दौड़ने जा रहे थे जैसे निर्जीव हो गए। होंठों से तड़पकर निकला--'यह मैं ? मैं आज काला कोट पहनकर यहां किस तरह आ गया ?' पिछली दीवार की ओर से हल्की-सी हंसी की आवाज़ आई, तो उसने घबराकर उधर देखा जिधर एक ऊंची कुर्सी पर सफेद चोगेवाला न्यायाधीश वैठा हुआ था.. वह हुए कदमों से चलते हुए उधर उस मेज़ की ओर गया और कुर्सी पर बैठे हुए न्यायाधीश को गौर से देखते हुए---जैसे पागल हो उठा- यह भी मैं ? आज सफेद चोगा पहनकर यहां न्यायाधीश की कुर्सी पर क्यों बैठा हुआ हूं? उसने कांपकर दीवार पर लगे हुए चित्र की ओर देखा-~~~'यह मेरा दोस्त ? ..'नहीं, यह मैं हूं.. अपना नया सूट पहने हुए.. उसने कभी भी ऐसे कपड़े नहीं पहने नहीं, वह नहीं है, ''यह मैं हूं... उसने घबराकर दीवारों को हाथों से टटोला... अदालत की दीवारें मानो उसके शरीर का मांस थीं, उसके ही अंग- प्रत्यंग... "उसने हाथों से टटोला, तो उसे प्रतीत हुआ कि उसके सारे शरीर में पीड़ा हो रही है। आंखें चौंककर खुली उसने पलंग की पट्टी को, सिरहाने को टटोला, पर विस्तर से उठने लगा तो उससे उठान गया... रात वाले सपने की वह अर्जी याद आई जो उसने अपने खोए हुए मैं को ढूंढ़ने के लिए दी थी... --मेरा वह मैं सचमुच जीवित है, केवल खो गया है वह नहीं मर सकता"नहीं मर सकता। और रात को सपने में उसके भीतर के अभियुक्त ने उसके भीतर के वकील से जो कहा था वह याद आया-'अगर वह मर गया होता तो मुझे किसी गलत चीज़ में से दुर्गन्ध नहीं आ सकती थी और मुझे किसी अच्छी चीज़ में से सुगन्ध नहीं आ सकती थी...' -कल रात मैंने सचमुच एक सच ढूंढ़ लिया है। .

उसने फिर विस्तर से उठने की कोशिश की. पर उठन सका... रात का न जाने कौन-सा पहर था, उसने समय देखना चाहा, पर उसके सोने के कमरे में बिलकुल अंधेरा था मचानक अपने बिस्तर से उसे एक सुगन्ध आई... वह हैरान हो गया" पहले सदा उसे अपने विस्तर से दुर्गन्ध आती मालूम हुआ करती थी... मन में आकाश की बिजली की भांति कुछ चमक गया "शायद रात को भाव में सोया हुआ था, मेरा दोस्त मेरे कमरे में आया था, मुझे सोए हुए देखने को तभी तो मेरे पलंग से सुगंध आ रही है" उसने एक ठंडी सुख की सास ली"एक तसल्ली की; सोचा-मेरा जो मैं' मेरा दोस्त था, वह भले ही गुम हो गया है, पर मरा नही है फिर अचानक दह चित्र याद हो आया जो दीवार पर लगा हुआ था, और जिसके गले में फूलों का हार पड़ा हुआ था । और उसने एक निःश्वास लिया-'हा, मेरा चित्र था. मुझे तीन साल हो गए हैं करल हुए · !' और उसने चादर के सिरे से पारीर पर आए हुए पसीने को इस तरह पोंछा जैसे कत्ल हुए शरीर से लहू पोछ रहा हो

No text on this page.

No text on this page.

Kiya Yah Sach Hai

Author
Pritam Amrata
Title
Kiya Yah Sach Hai
File name
Kiya Yah Sach Hai
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Delhi,the Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
96
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Poetry
DLI number
552113
Barcode
4990010032838.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
A69ouRgy1Ui
Download PDF

Kiya Yah Sach Hai