Sanmati Library, Jaipur
Gommatsar (karmakand)
Front matter
अर्पण पत्रिका।
श्रीनेमिचन्द्राय नमः।
श्रीरायचन्द्रजैनशास्त्रमालामें
.
श्रीमन्नेमिचन्द्राचार्यकृत
गोम्मटसार
(कर्मकाण्ड)
आ पवित्र ग्रंथनी संक्षिप्त हिन्दीभाषाटीका शा केशवजी भीमजीना कुटुम्ब
तरफथी भेट दाखल रु. २०० अंके वसो आपी छपावमां आवी छे.
ते श्रीरायचन्द्रजैनशास्त्रमालाने सादर भेट करेल छे.
Printed by B R. Ghaneker, at the Nirnaya-Sagar Press,
No 23, Kolbhat Lane, Kalbadem Road-Bombay.
Published by Sha Revashankar Jagajeevan Jareri Hon. Vyarastapak
Shree Parz mashruta Prabbavak Mandal, Javeri Bazar,
Kharakura, Bombay.
, विज्ञापन । विदित हो कि स्वर्गवासी तत्त्वज्ञाता शतावधानी कविवर श्रीरायचन्द्रजीने अतिशय उपयोगी और अलभ्य ऐसे श्रीउमाखाति (मी) मुनीश्वर, श्रीकुन्दकुन्दाचार्य, श्रीनेमिच- न्द्राचार्य, श्रीअकलकखामी, श्रीहरिभद्रसूरी, श्रीहेमचन्द्राचार्य आदि महान् आचार्योंके रचे- हुए जैनतत्त्वग्रन्थोंका सर्वसाधारणमें प्रचार करनेकेलिये श्रीपरमश्रुतप्रभावकमंडलकी स्थापना कीथी; जिसके द्वारा उक्त कविराजके चिरकालस्मरणार्थ रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला- के नामसे अतिशय प्राचीन ग्रन्थ प्रगट होकर आजपर्यंत तत्त्वज्ञानाभिलाषी भव्यजीवोंको आनंदित कर रहे है। इस शास्त्रमालाकी योजना विज्ञपाठकोंको दिगम्बरीय तथा श्वेताम्बरीय उभयपक्षके ऋषिप्रणीत सर्वसाधारणोपयोगी उत्तमोत्तम अन्थोके अभिप्राय विदित होनेकेलिये कीगई है। इसलिये आत्मकल्याणके इच्छुक भव्यजीवोंसे प्रार्थना है कि इस पवित्र शास्त्रमालाके ग्रन्थोंके ग्राहक बनकर अपनी चललक्ष्मीको अचल कर और तत्त्वज्ञानपूर्ण जैनसिद्धान्तोंका पठन पाठन द्वारा प्रचारकर हमारी इस परमार्थयोजनाके परिश्रमको सफल करै । तथा प्रत्येक सरस्वतीभण्डार, सभा और पाठशालाओंमें इनका संग्रह अवश्य करना चाहिये । इस शास्त्रमालाकी प्रशंसा मुनिमहाराजोंने तथा विद्वानोंने बहुत की है उसको हम स्थानाभावसे लिख नही सकते । और यह संस्था किसी स्वार्थकेलिये नही है केवल परोप- कारकेवास्ते है। जो द्रव्य आता है वह इसी शास्त्रमालामें उत्तमग्रन्थोंके उद्धारकेवास्ते लगाया जाता है ।। इति शम् । रायचन्द्रजैनशास्त्रमालाद्वारा प्रकाशित ग्रन्थोंकी सूची। १ पुरुषार्थसिधुपाय भाषाटीका यह श्रीअमृतचन्द्रखामी विरचित प्रसिद्ध शास्त्र है इसमें आचारसंबन्धी बड़े २ गूढ रहस्य है विशेषकर हिसाका खरूप बहुत खूबीकेसाथ दरसाया गया है, यह एक वार छपकर विकगयाथा इसकारण फिरसे संशोधन कराके दूसरीवार छपाया गया है। न्यों, १ रु. २ पश्चास्तिकाय भा. संस्कृ. टी. यह श्रीकुन्दकुन्दाचार्यकृत मूल और श्रीअमृतचन्द्र- । सूरी कृत संस्कृतटीका सहित प्रसिद्ध शास्त्ररत्न है इसमें जीव, अजीव, धर्म, अधर्म और आकाश इन पांचद्रव्योंका तो उत्तम रीतिसे वर्णन है तथा कालद्रव्यका भी संक्षेपसे वर्णन किया गया है। इसकी भाषा टीका खर्गीय पाडे हेमराजजीकी भाषाटीकाके अनुसार नवीन सरल भाषाटीकामें परिवर्तन कीगई है। न्यों. १॥ रु. ३ ज्ञानार्णव भा. टी. इसके कर्ता श्रीशुभचन्द्रखामीने ध्यानका वर्णन बहुत ही उत्तम- तासे किया है प्रकरणवश ब्रह्मचर्यव्रतका वर्णन भी बहुत दिखलाया है । न्यों, ४ रु. , , ।
२ , के - ४ सप्तभंगीतरंगिणी भा. टी. यह न्यायका अपूर्व ग्रन्थ है इसमें ग्रंथकर्ता श्रीविम- लदासजीने स्यादस्ति, स्यान्नास्ति आदि सप्तभंगी नयका विवेचन नव्यन्यायकी रीतिसे किया है। स्याद्वादमत क्या है यह जाननेकेलिये यह ग्रंथ अवश्य पढना चाहिये । न्यों. १ रु. ५ बृहद्रव्यसंग्रह संस्कृ. भा. टी. श्रीनेमिचन्द्रखामीकृत मूल और श्रीब्रह्मदेवजीकृत संस्कृतटीका तथा उसपर उत्तम बनाई गई भाषाटीका सहित है इसमें छह द्रव्योंका स्वरूप अतिस्पष्टरीतिसे दिखाया गया है। न्यों. २ रु. ६ द्रव्यानुयोगतर्कणा इस ग्रंथमें शास्त्रकार श्रीमद्भोजसागरजीने सुगमतासे मन्दबु- द्धिजीवोंको द्रव्यज्ञान होनेकेलिये 'अथ, " गुणपर्ययवद्रव्यम् " इस महाशास्त्र तत्त्वार्थसूत्र- अनुकूल द्रव्य-गुण तथा अन्य पदार्थोंका भी विशेष वर्णन किया है और प्रसंगवश 'स्यादस्ति ' आदि सप्तभंगोंका और दिगंबराचार्यवर्य श्रीदेवसेनस्वामीविरचित नयचक्रके आधारसे नय, उपनय तथा मूलनयोंका भी विस्तारसे वर्णन किया है। न्यों. २ रु. ७ सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्रम् इसका दूसरा नाम तत्त्वार्थाधिगम मोक्षशास्त्र भी है जैनियोंका यह परममान्य और मुख्य ग्रन्थ है इसमें जैनधर्मके संपूर्णसिद्धान्त आचार्यवर्य श्रीउमाखाति (मी) जीने बड़े लाघवसे संग्रह किये है। ऐसा कोई भी जैनसिद्धान्त नही है जो इसके सूत्रोंमें गर्मित न हो। सिद्धान्तसागरको एक अत्यन्त छोटेसे तत्त्वार्थरूपी घटमें भरदेना यह कार्य अनुपमसामर्थ्यवाले इसके रचयिताका ही था। तत्त्वार्थके छोटे २ सूत्रों के अर्थगाभीर्यको देखकर विद्वानोंको विस्मित होना पड़ता है । न्यों. २ रु. ८ स्याद्वादमंजरी संस्कृ. भा. टी. इसमें छहों मतोंका विवेचनकरके टीका कर्ता विद्वद्वर्य श्रीमल्लिषेणसूरीजीने स्याद्वादको पूर्णरूपसे सिद्ध किया है । न्यों. ४ रु. ९ गोम्मटसार ( कर्मकाण्ड ) संस्कृतछाया और संक्षिप्त भाषाटीका सहित यह महान ग्रन्थ श्रीनेमिचन्द्राचार्यसिद्धान्तचक्रवर्तीका बनाया हुआ है, इसमें जैनतत्त्वोंका खरूप कहते हुए जीव तथा कर्मका खरूप इतना विस्तारसे है कि वचनद्वारा प्रशंसा नही होसकती देखनेसे ही मालूम होसकता है, और जो कुछ संसारका झगड़ा है वह इन्ही दोनों (जीव-कर्म ) के संबन्धसे है सो इनदोनोंका खरूप दिखानेकेलिये अपूर्व सूर्य है। न्यों. २ रु.। इसका दूसरा पूर्वभाग (जीवकाण्ड ) भी शीघ्र ही मुद्रित होनेवाला है। १० प्रवचनसार-श्रीअमृतचन्द्रसूरिकृत तत्त्वप्रदीपिका सं. टी., " जोकि यूनिव- सिटीके कोर्समें दाखिल है" तथा श्रीजयसेनाचार्यकृत तात्पर्यवृत्ति सं. टी. और वालावबो- घिनी भाषाटीका इन तीन टीकाओं सहित छपरहा है दिवालीके लगभग तयार हो- जाइगा, इसके मूलकर्ता श्रीकुन्दकुन्दाचार्य है। यह अध्यात्मीक ग्रन्थ है ॥ ग्रन्थोंके मिलनेका पता- शा. रेवाशंकर जगजीवन जोहरी. ऑनरैरी व्यवस्थापक श्रीपरमश्रुतप्रभावकमंडल जोहरीबाजार खारा कुवा बम्बई नं. २ ॥ - - - --- ओं नमः प्रस्तावना। प्रिय पाठकगण ! आज हम श्रीजिनेन्द्रदेवकी कृपासे आपके सन्मुख श्रीगोम्मटसारकर्मकाण्डभी सं- स्कृतछाया तथा संक्षिप्त भाषाटीका सहित उपस्थित करते हैं। यह ग्रंथ जैनसप्रदायमे परममाननीय है। इसका पूर्वभाग 'जीवकाण्ड' सस्कृतछाया और उत्थानिका सहित छप चुका है तथा सर्वसाधारणकेलिये संक्षिप्तहिन्दी भाषाटीका सहित भी इसी मंडलसे शीघ्र छपनेवाला है, और इसका परिशिष्ट लब्धिसारक्ष- पणासारकाभी इसीतरह भापानुवाद सहित छपानेका विचार किया जाइगा। इस ग्रन्थको पहला सिद्धान्तग्रन्थ वा प्रथमश्रुतस्कंध कहते हैं । इसकी उत्पत्ति इस तरह है कि, श्रीवर्द्धमानखामीके निर्वाण होनेके पश्चात् ६८३ वर्षपर्यंत अगज्ञानकी प्रवृत्ति रही। इसके बाद भगपाठी कोई भी नहीं हुए किन्तु एक भद्रवाहू खामी अष्टाग निमित्तज्ञानके (ज्योतिषके ) धारक हुए। इनके स- मयमे १२ वर्षका दुर्भिक्ष पढ़नेसे इनके सघसे अनेकमुनि शिथिलाचारी हो गये और स्वच्छंदप्रवृत्ति हो- नेसे जैनमार्ग भ्रष्ट होने लगा, तव भद्रवाहूखामीके शिष्योंमेसे एक धरसेन नामके मुनि हुए जिनको आग्रायणीनामक दूसरे पूर्वमे पंचमवस्तुमहाधिकारके महाप्रकृतिनाम चौथे प्रामृत ( अधिकार ) का ज्ञान था।सो इन्होंने अपने शिष्य भूतवली और पुष्पदन्त इन दोनो मुनियोंको पढाया। इन दोनोंने षखंड नामकी सूत्ररचनाकर प्रथमे लिखा फिर उन षट्खण्ड सूत्रोंको अन्य आचार्योंने पढकर उनके अनुसार विस्तारसे धवल महाधवल जयधवलादि टीकाग्रन्थ रचे । उन सिद्धान्त अन्थोंको प्रातःस्मरणीय भगवान् श्रीनेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती आचार्यमहाराजने पढकर श्रीगोम्मटसार लब्धिसार क्षपणासारादि अं. थोंकी रचना की। इन सब प्रथोंमें जीव और कर्मके सयोगसे जो संसारमें पर्यायें होती हैं उनका विस्तारसे खरूप दि- खाया गया है अर्थात् भव्यजीवोंके हितार्थ गुणस्थान मार्गणाओंका वर्णन तथा अन्य दर्शनोंमें अविवेचित कर्मका वर्णन पर्यायार्थिकनयकी प्रधानतासे कहागया है। पर्यायार्थिकनयको अनेकान्तशैलीसे अशुद्रव्या- र्थिकनय तथा आध्यात्मिक दृष्टिसे अशुद्धनिश्चय तथा व्यवहारनय भी कहते हैं। इस महान् ग्रंथके कर्ता 'श्रीनेमिचंद्राचार्य सिद्धान्तचक्रवर्तीका पवित्र जीवनचरित्र वाहुवलिचरित्र प्रन्थसे उद्धृत श्रीवृहद्व्यसग्रह ग्रंथमे मुद्रित हो चुका है " जोकि यह ग्रन्थभी उक्त आचार्यका ही बनाया हुआ । इसकारण यहापर नहीं प्रकाशित किया । पाठकगण वहींसे देखलेवें। इस ग्रन्थकी टीका इन आचार्यके प्रधान शिष्य श्रीचामुण्डरायने कर्णाटकी भाषामें वनाई जोकि ९७२ ३ गाथासे आचार्यने स्वयं आशीर्वादपूर्वक कहा है। उस कर्णाटकी वृत्तिसे रचीगई इससमय दो सस्कृत टीकाये मिलती हैं। एक केशववर्णीने बनाई जोकि उक्त टीकाकारने अपनी टीकाके आरंभमे है २ "नेमिचन्द्र जिनं नत्वा सिद्धं श्रीशानभूषणम् । वृत्तिं गोम्मटसारस्य कुर्वे कर्णाट. त्तितः" ॥ इस श्लोकसे दिसलाया है। दूसरी मन्दप्रयोधिनी नामवाली टीका श्रीमदभयचन्द्र सि. द्धान्तचक्रवर्तीकी वनाई हुई है। इस विषयमें उक्त कर्ताने टीकाके प्रारंभमें "मुनि सिद्धं प्रणम्याहं नेमि- चन्द्रं जिनेश्वरम् । टीकां गोम्मटसारस्य कुर्व मन्दप्रबोधिनीम्" इस श्लोकसे सूचित किया है । इन्हीं दोनोंकी सहायतासे भव्योपकारी जैनसमाजकमलदिवाकर श्रीमद्विद्वद्वर टोडरमल्लजीने 'सम्यग्ज्ञानच. न्द्रिका' नामक भापाटीकाकी रचना की। जिसकी सहायतासे अतिगहन विषय अच्छीतरह समझकर भव्यजीव परमानदको प्राप्त होते हैं । इस भाषाटीकाका बहुत विस्तार होनेसे तथा कितने एक अन्य कारणोंसे सवका मुद्रित कराना दुस्साध्य समझकर श्रीपरमश्रुतप्रभावकमंडलाधिकारियोंने संक्षिप्त भाषाटीका सहित तयार करानेकी मुझे प्रेरणाकी । सो अव मैं संस्कृत तथा भाषा दोनों टीकाओं के अनुसार सिद्धान्तशास्त्रपाठक स्याद्वादवारिधि विद्वच्छिरोमणि गुरुवर्य गोपालदासजी बरैयाकी अतिशयकृपासे अपनी बुद्धिके अनुसार संक्षिप्तभापाटीका सहित इस गोम्मटसारके कर्मकाडको तयारकर पाठकों के सामने उपस्थित करता हूं । यद्यपि इस भाषानुवादमै सब विषयोंका खुलासा नहीं आया तौभी जहातक हुआ है वहातक मूलार्य कहीं नहीं छोड़ा गया है । सब वि- पयोंका खुलासा विना बड़ीटीकाके कभी नहीं आसकता है । इस प्रस्तावनाके अतमे थोड़ी सज्ञाओंका भी खुलासा किया गया है। और बंधोदयसत्त्वका नकशा स्पष्ट करके लगाया गया है। तथा इस समयके अ- नुकूल ग्रंथका विषय और गाथा सुलभतासे देखनेकेलिये ३ प्रकारकी अनुक्रमणिका (सूची) भी लगादी गई है। यह टीका बड़ी टीकाकी प्रवेशिकारूप अवश्य होजाइगी ऐसी मैं आशा करता हूं। तथा खर्गीय तत्त्वज्ञानी श्रीमान् रायचंद्रजीद्वारा स्थापित श्रीपरमश्रुतप्रभावकमंडलकी तरफसे इसप्रन्थका जो उद्धार हुमा है इसकारण उक्त मंडलके उत्साही सभासदगण और प्रवन्धकर्ताओंको "जिन्होंने अत्यंत उत्साहित होकर ग्रंथ तयार कराके भव्यजीवोंको महान् उपकार पहुंचाया है" कोटिशः धन्यवाद देता हूं। और श्री- जीसे प्रार्थना करता हूं कि वीतरागदेवप्रणीत उच्चश्रेणीके तत्त्वज्ञानका इच्छित प्रसार करनेमें उक्त मंडल कृतकार्य होवे । और मैं अपने मित्रवर्य पं० वशीधरजी गोलानारेको द्वितीय धन्यवाद देता हूं कि जिन्होंने सशोधनकार्यमें सहायता दी है। अव मेरी अतमें यह प्रार्थना है कि जो प्रमादसे, दृष्टिदोषसे तथा ज्ञा- नावरणकर्मके क्षयोपशमकी न्यूनतासे कहींपर अशुद्धिया रहगई होवें तो पाठकगण मेरे ऊपर क्षमा करके शुद्धकरते हुए पढें, क्योंकि यह मुझे भापाटीका वनानेका पहला ही अवसर प्राप्त हुआ है इसकारण भाषारचनाकी तथा अर्थाशकी अशुद्धियों का रहजाना सभव है। इसतरह धन्यवादपूर्वक प्रार्थना करता हुआ इस प्रस्तावनाको समाप्त करता हूं । अलं विज्ञेषु । काकडवाडी-बम्बई भाद्रपद कृष्णा १२ सं० २४३८ ४३ जैनाचार्यचरणसरोजचञ्चरीक तथा जैनसमाजका सेवक मनोहरलाल पाढम (मैनपुरी) निवासी - . r गोम्मटसारः। ३ ३ - अथ गोम्मटसार ग्रंथमें उपयोगी अलौकिक गणितकी कुछ संज्ञायोंका खुलासा। अलौकिक गणितके मुख्य दो भेद हैं, एक सख्यामान और दूसरा उपमामान । सख्यामानके मूल ३ भेद हैं अर्थात् १ संख्यात २ असंख्यात और ३ अनंत । असंख्यातके ३ भेद हैं-१ परीतासंख्यात २ युक्तासंख्यात और ३ असंख्यातासंख्यात । अनंतके भी ३ भेद हैं-१ परीतानन्त, २ युक्तानन्त और अनंतानंत । संख्यातका एक भेद ही है। इसप्रकार संख्यातका १ भेद, असख्यात और अनंतके तीन तीन भेद, सब मिलकर संख्यामानके ७ भेद हुए । इन सातोंमेसे प्रत्येक ( हरएक )के जघन्य ( सबसे छोटा ) मध्यम ( वीचके ) और उत्कृष्ट ( सबसे वढा ) की अपेक्षासे तीन तीन भेद हैं । इसतरह संख्या- मानके २१ भेद हुए। एकमे एकका भाग देनेसे अथवा एकको एकसे गुणाकार करनेसे कुछ भी हानि वृद्धि नहीं होती। इस- लिये संख्याका प्रारम्भ दोके अकसे प्रहणकिया है । और एकको गणना ( गिनती) शब्दका वाच्य (क- हनेवाला ) माना है, इसलिये जघन्य संख्यातका प्रमाण दो (२) है। तीन चार पांच इत्यादि एक कम उत्कृष्ट संख्यातपर्यंत मध्यम सख्यातके भेद हैं। एक कम जघन्यपरीतासंख्यातको उत्कृष्टसंख्यात कहते है। अब आगे जघन्य परीतासंख्यातका प्रमाण कितना है सो लिखते हैं । अलौकिक गणितका खरूप लौकिक गणितसे कुछ विलक्षण है। लौकिक गणितसे स्थूल और खल्प ( थोडे ) पदार्थोंका परिमाण किया जाता है, किन्तु अलौकिकगणितसे सूक्ष्म और अनंतपदार्थोंकी हीनाधिकताका बोध कराया जाता है । हमारे बहुतसे संकीर्ण ( सकुचित वा गंभीरतारहित) हृदयवाले भाई अलौकिक गणितका खरूप सुनकर चकित हो जाते हैं और कुछ परिमितसंख्याको तथा अनंतवस्तु कोई है इसवातको मानते हुए भी कहते है कि ऐसा गणित हो ही नहीं सकता परन्तु उनके ऐसे कहनेसे कुछ उस गणितका अभाव नहीं हो जायगा। एक तो यह विचारनेकी वात है कि संख्या १ से १०० तक एक एक अधिक होती हुई क्रमसे पहुंचती है नकि १ के वाद ५० या १०० हो जावें, इस नियमसे २ संख्यासे लेकर अनंततक भी क्रमकरके ही पहुं- चेगी। दूसरीवात यह है कि संसारमें एकदन्तकथा प्रसिद्ध है कि, एकसमय सरोवरका रहनेवाला एक हंस एक कुएके पास गया, वहांपर कुएके मेंडकने हंसका खागत करके ऊंचा आसन देकर प्रसंगवश पूछा कि क्योंजी आपका सरोवर कितना बड़ा है। हंसने जवाव दिया कि बहुत बड़ा है तब मेंडकने हाथ वगैर. अग क्रमसे लम्बे करके कहा कि क्या इतना वढा है । राजहंसने कहा कि नहीं नहीं ! इससे भी बहुत बड़ा है, तब मेंडकने सब शरीर लम्बा किया तथा कुएके एक तटसे सामनेके दूसरे तटपर उछलकर कहा तो क्या इससे भी वडा है ? हंसने कहा भाई ! इससे भी बहुत बड़ा है। तब मेंडकने (झुंझलाकर) कहा बस ! तुम बड़े झूठे हो । इससे बड़ा हो ही नहीं सकता, सब कहने सुननेकी बात है सच्ची नहीं है। ऐसा प्रत्युत्तर मिलनेपर वह हंस मेडकको मूर्ख समझकर चुप हो गया और उडकर अपने स्थानको चला गया। इस दंतकथाके ऊपर एक कविने भी ऐसा दोहा कहा है " हाथ पसारे पाव पसारे, और पसारौ गात । यातें बडौ तलाव है तो कहन सुननकी वात ॥" इसप्रकार कुएफे मेंडककी तरह जो महाशय संकीर्णबुद्धिवाले हैं उनकी समझमें अलौकिक गणितका खरूप प्रवेश नहीं कर सकता । किंतु जिनकी बुद्धि गौरवयुक्त है वे अच्छीतरह समझ सकते हैं । जघन्य परीतासंख्यातका खरूप समझानेके लिये जो उपाय लिखा जाता है वह किसीने किया नहीं था, किंतु बड़े गणितका परिमाण समझानेकेलिये एक कल्पित उपायमात्र है। १. यद्यपि इसका पूर्वार्द्ध जीवकाड भी सक्षिप्त भाषाटीकासहित मुद्रित होनेवाला है उसके तीसरे अधिकारमें सब उपयोगी गणितका स्वरूप अच्छीतरह दिखलाया जायगा । परतु अभी स्वाध्याय करनेके लिये थोडी सशाओं- का खुलासा यहाँपर किया जाता है । यह गणितका भाग श्रीमद्गुरुवर्य स्याद्वादवारिधी विद्वच्छिरोमणि गोपाल. दासजी वरैयाकृत जैनसिद्धांतदर्पणसे उद्धृत किया गया है। - ४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । कल्पना कीजिये कि अनवस्था, शलाका, प्रतिशलाका और महाशलाका नामके चार गोल कुंद है। जिनमेंसे प्रत्येकका व्यास (गोलपदार्थकी एकतटसे दूसरे तटतककी चौडाई) एक लक्ष योजन (योजनका प्रमाण यहां दो हजार कोसका समझना ) और गहराई (ओडाई)का प्रमाण एक हजार योजन है । इनमसे अनवस्था कुंडको गोल सरसोंसे शिखाऊ (पृथ्वीपर अन्नकी राशिकी तरह) भरना। गणितशासके अनुसार इस अनवस्थाकुंडमें १९९७११२९३८४५१३१६३६३६३६३६३६३६३६३६३६३६३६३६३६३६३६ सरसों छियालीस अंक प्रमाण समाई । 'यहा अपूर्णाकका ग्रहण नहीं करना । इस अनवस्था कुंडके भरनेपर दूसरी एक सरसों अनवस्थाकुंडोंकी गिनती करनेके लिये शलाकाकुंडमें डालनी । मध्यलोकमें असंख्यात द्वीपसमुद्र हैं, जिनमें सबके वीचमे जम्बूद्वीप है । इसका व्यास एकलक्ष योजन है उसके चारों तरफ लवण समुद्र है । उसको चारों तरफसे घेरकर धातकीखंड द्वीप है । इसप्रकार द्वीपके आगे समुद्र समुद्रके आगे द्वीपके क्रमसे असंख्यात द्वीपसमुद्र है। चौडाई दूनी २ होती गई है। किसी द्वीप वा समुद्रकी परिधि (गोलाई ) के एकतटसे दूसरे तटतककी चौडाईको सूची कहते है । जैसे लवण. समुद्रकी सूची ५ लाख योजन है । । अव अनवस्थाकुंडमेंसे समस्त सरसोंको निकालकर देव या विद्याधरकी सहायतासे एक द्वीपम एक सु. मुद्रमें अनुक्रमसे डालते चलिये । जिस द्वीप वा समुद्रमे सव सरसों पूर्णकर अन्तकी सरसों डालो उसी द्वीप वा समुद्रकी सूचीके समान सूचीवाला और १००० योजन गहराईवाला दूसरा अनवस्थाकुंड बनाइये। और उसको भी सरसोंसे शिखाऊ भर एक दूसरी सरसों शलाकाकुंडम डालिये । इस दूसरे अनवस्थाकुंडकी सरसोंको भी निकालकर जिस द्वीप वा समुद्रमे पहले समाप्ति हुई थी उसके आगे एक सरसो द्वीपमें और एक समुद्रमें डालते चलिये । जहा ये सरसों भी समाप्त हो जाय वहा उसी द्वीप वा समुद्रकी सूचीप्रमाण चौडा और १००० योजन गहरा तीसरा अनवस्थाकुंड बनाकर उसे सरसोंसे शिखाऊ भरिये और शलाका कुंडमें तीसरी सरसों डालिये। इस तीसरे कुंडकी भी सरसों निकालकर आगेके द्वीप समुद्रोंमें एक एक सरसों डालते २ जव सरसों समाप्त होजाय तव पूर्वोक्तानुसार चौथा अनवस्था कुंड भरकर चौथी सरसों शलाकाकुंडमें डालिये । इसीप्रकार एक एक अनवस्थाकुंडकी एक २ सरसों शलाकाकुंडमे डालते २ जय शलाकाकुंड भी शिखाऊ भर जाय तव एक सरसों प्रतिशलाका कुंडमें डालिये । इसीतरह एक एक अ- नवस्थाकुंडकी एक एक सरसों शलाकाकुंडमें डालते २ जव दूसरी बार भी शलाकाकुंड भरजाय तो दूसरी सरसों प्रतिशलाकाकुंडमें डालिये, एक एक अनवस्थाकुंडकी एक एक सरसों शलाकाकुंडमे और एक एक शलाकाकुंडकी एक २ सरसों प्रतिशलाकाकुंडमे डालते २ जव प्रतिशलाका कुंडभी भरजाय, तव एक सरसों महाशलाकाकुंडमें डालिये । जिसकमसे एकवार प्रतिशलाका कुंड भरा है उसी क्रमसे दूसरी वार भरनेपर दूसरी सरसों महाशलाकाकुंडमें डालिये। इसीतरह एक एक प्रतिशलाका कुंडकी सरसों महाशलाकाकुंडमें डालते २ जव महाशलाका कुंडभी भरजाय उससमय सवसे वडे अन्तके अनवस्थाकुंडमें जितनी सरसों समाई उतना ही जघन्य परीतासंख्यातका प्रमाण है। संख्यामानके मूलभेद सात कहे थे इन सातोंके जघन्य, मध्यम, उत्कृष्टकी अपेक्षासे २१ भेद कहे। यहांपर आगेके मूलभेदके जघन्यभेदमेंसे एक घटानेले पिछले मूलभेदका उत्कृष्टभेद होता है। जैसे जघन्य परीतासख्यातजैसे एक घटानेसे उत्कृष्टसख्यात तथा जघन्ययुकासख्यातमेंसे एक घटानेसे उत्कृष्ट परीतासंख्यात होता है। इसीप्रकार अन्यजगह भी जानना । जघन्य और उत्कृष्ट भेदोंके बीचके सव भेद 'मध्यमभेद' कहलाते हैं । इसप्रकार मध्यम और उत्कृष्टके खरूप जघन्यके स्वरूप जाननेसे ही मालूम हो सकते हैं । इसलिये अव आगे जघन्य भेदोंका ही खरूप लिखाजाता है । जघन्यसंख्यात और जघन्यपरीतासंख्यातका खरूप ऊपर लिखा जाचुका है। अव आगे जघन्ययुकासंख्यातका प्रमाण लिखते हैं- - -- गोम्मटसारः। मानाजाय जघन्य परीतासम्यातप्रमाण दो राशि लिखना । एक विरलनराशि ओर दूसरी देय राशि । विरलगरा- निका विरलन करना अधीत विरलनराशिका जितना प्रमाण है उतने एके लिसना और प्रत्येक एकेके ऊपर एक एक देयराशि रगकर समस्त देयराशियोंका परस्पर गुणन करनेसे जो गुणनफल हो उतना ही जघन्ययुकासंग्न्यातका प्रमाण है । भावार्थ-यदि जघन्यपरीतासंख्यातका प्रमाण चार तो चारपा विरलनकर ११११ प्रत्येक एकके ऊपर देयराशि चार चार रखकर १४१५ चारों चौ. कोका परम्पर गुणनकरनेमे गुणनफल २५६ जघन्ययुक्तासख्यातका प्रमाण होगा । इस ही जघन्ययुक्ता. मंब्यात भावली भी कहते है, क्योंकि एक आवलीम जघन्ययुक्तासंख्यातप्रमाण समय होते हैं । जपन्ययुक्तासंग्ख्यातके वर्ग (एक राशिको उसहीसे गुणाकार करनेसे जो गुणनफल होता है उसको वर्ग पहने है जैसे पांचका वर्ग पपीस है) कोजघन्यअसंख्यातासंख्यात कहते है। अव भागे जघन्यपरीतानं. नका प्रमाण कहते है- अपन्यभमंगयातासग्यात प्रमाण तीन राशि अर्थात् १ विरलन २ देय ३ शलाका लिसना । विरलनराशिका विरलगकर प्रसक एकके ऊपर देयराशि रखकर समस्त देयराशियांका परस्पर गुणाकार करना, और श- लाका राशिगंगे एक पटाना । इस पाये हुए गुणनफलप्रमाण एक विरलन और एक देय इसप्रकार दो रा- गि करना । पिरलन राशिका विरलनर प्रत्येक एकके ऊपर देयराशि रखकर समस्त देयराशियोंका परस्पर गुणाकार करना और गलाका राशिममे एक और घटाना । इस दूसरीवार पाये हुए गुणनफलप्रमाण पुन: विरलन और देयराशि करना, और पूर्वोक्तानुसार समस्त देयराशियोंका परस्पर गुणाकार करना तथा शलाका राशिमसे एक और घटाना, हम ही अनुक्रमसे नवीन नवीन गुणनफलप्रमाण विरलन और देयके कामसे एक एफयार देयरागियोंका गुणाकार होनेपर शलाका राशिमसे एक एक घटाते २ जव शलाकाराशि समाप्त होजाय उसममय जो अतिम गुणनफलरूप महाराशि होय उसप्रमाण फिर विरलन-देय-शलाका ये तीन गशि लिखनी । विरलनराशिका विरलनकर प्रत्येक एकके ऊपर देयराशि रख देयराशिका परस्पर गु- णाकार करते २ पूर्वोक्त क्रमानुसार एकवार देयराशियोंका गुणाकार होनेपर शलाकाराशिमेंसे एक एक घटाते घटाते जब यह द्वितीयवार स्थापन की हुई शलाका राशि भी समाप्त होजाय उससमय इस अन्तकी गुणनफलरूप महाराशिप्रमाण पुन: विरलन-देय-शलाका, ये तीन राशि लिखनी । पूर्वोक क्रमानुसार जब यह तीसरीचार स्थापना कीहुई शलाका राशि भी समाप्त होजाय उस समय यह अतिम गुणनफलरूप जो महाराशि हुई, वह असंग्न्यातासन्यातका एक मध्यम भद है । कथित क्रमानुसार तीन वार तीन तीन राशियों के गुणनविधानको शलाकात्रयनिष्ठापन कहते हैं। आगे भी जहा "शलाकात्रयनिष्ठापन" ऐसा पद आवै वहां ऐसा ही विधान समझ लेना । इस महाराशिम लोकप्रमाण धर्मद्रव्य के प्रदेश, लोकके प्रमाण अधर्मद्रव्यके प्रदेश, लोकप्रमाण एकजीवके प्रदेश, लोकप्रमाण लोकाकाशके प्रदेग, लोकसे असत्यातगुणा अप्रतिष्टित प्रत्येक वनसतिकायिक जीवीका प्रमाण, और उससे भी असख्यातलोकगुणा तथापि सामान्यपनेसे असंख्यातलोकप्रमाण प्रतिष्ठित प्रत्येकवनस्पतिकायिक जीवोंका प्रमाण-ये छह राशि मिलाना । इस योगफलप्रमाण विरलन-देय-शलाका, ये तीन राशि स्थापनकर पूर्वोत्तानुमार शलाकात्रयनिटापन करना । इसप्रकार करनेसे जो महाराशि उत्पन्न हो उसमे वीसकोड़ाको हीसागरप्रमाण कल्पकालके समय, असख्यातलोकप्रमाण स्थितिवन्धाध्यवसायस्थान (स्थितिबंधको कारण- भूत आत्माके परिणाम ), इनसे भी असंख्यातगुणे तथापि असंख्यातलोकप्रमाण अनुभागवधाध्यवसाय सान, और इनसे भी असंख्यातगुणे तथापि असंख्यातलोकप्रमाण मन वचन काय योगोंके अविभाग प्रतिच्छेद (गुणोंके अश), ये चार राशि मिलाना । इस दूसरे योगफलप्रमाण फिर विरलन-देय-शलाका १ लोकका प्रमाण उपमामानके कथनमें कहा जाइगा। B .
- ६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ये तीन राशि स्थापन करना और पूर्वोक्त क्रमानुसार शलाकानयनिष्टापन करना । इसप्रकार शलाकाश्य. निष्ठापनकरनेसे जो राशि उत्पन्न हो उसको जघन्यपरीतानन्त कहते हैं । जघन्यपरीतानन्तका दि. रलनकर प्रत्येक एकके ऊपर जघन्यपरीतानंत रस सब जघन्यपरीतानंतोंका परस्पर गुणाकार करनेने जो राशि उत्पन्न हो उसको जघन्ययुक्तानंत कहते हैं । अभव्यजीवोका प्रमाण जघन्ययुकानन समान है। जघन्ययुक्तानतके वर्गको जघन्यअनंतानंत कहते है। अव आगे केवलज्ञानके अविभागप्रतिच्छेदोंके प्रमाणस्वरूप उत्कृष्ट अनंतानंतका खत्म कहते हैं-जप- न्यअनंतानंतप्रमाण विरलन-देय-शलाका, ये तीन राशि स्थापन कर शलामात्रयनिष्ठापन करना । इम- प्रकार शलाकात्रयनिष्ठापन करनेसे जो महाराशि उत्पन्न हो वह अनतानंतका एक मध्यमभेद है। [अनंतक दूसरे दो भेद है, एक सक्षयअनंत और दूसरा अक्षय अनंत । यहातक जो संख्या हुई वह समयअनंत है इससे आगे अक्षयअनंतके भेद हैं, क्योंकि इस महाराशिम भागे छह राशि अक्षय अनंत मिलाई जाती है। नवीन वृद्धि न होनेपर भी खर्च करते २ जिस राशिका अत नहीं आये उसको अक्षयअनंत कहते हैं] इस महाराशिम जीवराशिके अनंतवें भाग सिद्धराशि, सिद्धराभिसे अनन्तगुणी निगोदराशि, वनस्पति- कायराशि, जीवराशिसे अनंतगुणी पुद्गलराशि, पुद्गलसे भी अनंतगुणे तीनकालके समय और अलोकाकाशके प्रदेश ये छहराशि मिलानेसे जो योगफल हो उसप्रमाण विरलन-देय-शलाका, ये तीन राशि स्थापनकर शलाकानय निष्ठापन करना । इसप्रकार शलाकात्रय निष्टापन करनेसे जो राशि उत्पन्न हो उसमें धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्यके अगुरुलघुगुणके अनंतानंत अविभागप्रतिच्छेद मिलाकर योगफलप्रमाण विरलन-देय- शलाका, स्थापनकर फिर शलाकानयनिष्ठापन करना । इसप्रकार शलाकात्रयनिष्टापन करनेसे मध्यम अनं. तानंतका भेदरूप जो महाराशि उत्पन्न हुई उसको केवलज्ञानके अविभागप्रतिच्छेदोंके समूहत राशि से घटाना और जो शेष वचै उसमे पुन. वही महाराशि मिलानेसे केवलज्ञानके अविभागप्रतिच्छेदोंका प्रमाण- खरूप उत्कृष्ट अनतानंत होता है । उक्त महारागिको केवलज्ञानमेसे घटाकर फिर मिलानेका अभिप्राय यह है कि, केवलज्ञानके अविभागप्रतिच्छेदोका प्रमाण उक्त महाराशिसे बहुत बड़ा है । उस महाराशिको किसी दूसरी राशिसे गुणाकार करनेपर भी केवलज्ञानके प्रमाणसे वहुत क्मती रहता है। इसलिये केवल. ज्ञानके अविभागप्रतिच्छेदोंके प्रमाणका महत्त्व दिखलानेकेलिये उपर्युक्त विधान किया है । इसप्रकार सं- ख्यामानके २१ भेदोंका कथन समाप्त हुआ। - अव आगे उपमामानके आठ भेदोंका स्वरूप लिखते है-जो प्रमाण किसी पदाधकी उपमा देकर कहा जाता है उसे उपमामान कहते है । उपमामानके ८ भेद हैं १ पल्य ( यहां पत्य अर्थात् अनाज भरने- की जो खास उसकी उपमा है )२ सागर (यहां लवण समुद्रकी उपमा है) ३ सूच्यंगुल ४ प्रतरांगुल ५ घनांगुल ६ जगच्छ्रेणी ७ जगत्प्रतर और ८ लोक । इनमेंसे पल्यके ३ भेद हैं-१ व्यवहारपल्य २ उद्धार- पल्य और ३ अद्धापल्य । व्यवहारपल्यका खरूप पूर्वाचार्योंने इसप्रकार कहा है, उसीको दिखलाते हैं- पुद्गलद्रव्यके सबसे छोटे खंडको (टुकड़ेको) परमाणु कहते हैं, अनंतानंत परमाणुओंके स्कंधको (समूहरूप पिंडको) 'अवसन्नासन' कहते हैं, ८ अवसनासन्नका एक 'सनासन्न,' ८ सन्नासनका एक 'तृटरेणु, ८ त. टरेणुका-एक त्रसरेणु, ८ त्रसरेणुका एक 'रथरेणु,' ८ रथरेणुका एक 'उत्तम भोगभूमिवालोंका वालाप्र- भाग, ८ उत्तम भोगभूमिवालोंके वालाग्रका एक 'मध्यममोगभूमिवालोंका वालाग्र, ८ मध्यम भोगभूमिवा- लोंके वालाग्रका एक 'जघन्यभोगभूमिवालोंका वालाग्र, ८ जघन्य भोगभूमिवालोंके वालामका एक कर्म- भूमिवालोंका वालाग्र,' ८ कर्मभूमिवालोंके वालाग्रकी एक 'लीख, ८ लीखोंकी एक सरसों, ८ सरसोंका एक 'जौ, और ८ जौका एक 'अंगुल' होता है। इस अगुलको 'उत्सेवागुल' कहते हैं। चारोंगतियों के जीवोंके शरीर और देवोंके नगर तथा मंदिरादिकका परिमाण इसी अगुलसे वर्णन किया जाता है। इस उत्तेधागुलसे पाचसौ गुणा प्रमाणागुल (भरत क्षेत्रके अवसर्पिणीकालके प्रथम चक्रवर्तीका अगुल) है । 1 -- ७ ०००० गोम्मटसारः । इस प्रमाणागुलसे महापर्वत नदी द्वीप समुद्र इत्यादिकका परिमाण कहा जाता है। भरत ऐरावत क्षेत्रके मनुष्योंका अपने २ कालमें जो अगुल है उसे 'आत्मागुल' कहते है। इससे झारी कलश धनुष ढोल हल मूशल छत्र चमर इत्यादिकका प्रमाण वर्णन किया जाता है । ६ अगुलका एक 'पाद, २ पादका एक 'विलस्त, २ विलस्तका एक 'हाथ,' ४ हाथका एक 'धनुष, २००० धनुषका एक 'कोश, और ४ को- शका एक योजन होता है । प्रमाणागुलसे निष्पन्न एक योजन प्रमाण गहरा और एक योजनप्रमाण व्यास. वाला एक गोलगर्त गढा बनाना, उस गर्तको उत्तम भोगभूमिवाले मेंढेके वालोंके अग्रभागोंसे भरना । गणित करनेसे उस गर्तके रोमोंकी सख्या ४१३४५२६३०३०८२०३१७७७४९५१२१९२०००००० हुई । इस गर्तके एक एक रोमको सौ सौ वर्ष पीछे निकालते २ जितने कालमें वे सब रोम समाप्त हो जाय उतने कालको व्यवहारपल्यका काल कहते हैं । उपर्युक रोमसख्याको १०० वर्षके समयसमूहसे गुणा करनेपर व्यवहार पल्यके समयोंका प्रमाण होता है। [ एक वर्षके २ अयन, एक अयनकी ३ ऋतु, एक ऋतुके २ मास, एक मासके ३० अहोरात्र, १ अहोरात्रके ३० मुहूर्त, एक मुहूर्तकी संख्यात आवली, और एक आवलीके जघन्ययुक्तासख्याप्रमाण समय होते है । व्यवहारपल्यके एक एक रोमखंडके असंख्यात कोटिवर्षके समय समूहप्रमाण खंड करनेसे उद्धारपल्यके रोमखंडोंका प्रमाण होता है । जितने उद्धारपल्यके रोमखंड हैं उतने ही उद्धारपल्यके समय जानने। एककोटिके वर्गको को. डाकोड़ी' कहते हैं । द्वीप समुद्रोंकी संख्या उद्धारपल्यमे है, अर्थात् उद्धारपल्यके समयोंको २५ कोड़ा- कोडिसे गुणा करनेसे जो गुणनफल होता है उतने ही सब द्वीपसमुद्र है। उद्धारपल्यके प्रत्येक रोमखंडके असंख्यातवर्षके समयसमूहप्रमाण खंड करनेसे अद्धापल्यके रोमखंड होते हैं । जितने अद्धापल्यके रोमखंड हैं उतने ही अद्धापल्यके समय हैं । कर्मोंकी स्थिति अद्धापल्यसे वर्णन की गई है। पल्यको दस कोड़ा- कोडिसे गुणा करनेपर 'सागर' होता है अर्थात् दस कोड़ाकोडी व्यवहारपल्यका एक 'व्यवहारसागर, दस कोडाकोडी उद्धारपल्यका एक 'उद्धारसागर, और दस कोढाकोडि अद्धापल्यका एक अद्धासागर होता है। किसी राशिको जितनीवार आधा आधा करनेसे एक शेष रहै उसको अर्द्धच्छेद कहते हैं, जैसे चार. को दोवार आधा आधा करनेसे एक होता है इसलिये चारके अर्द्धच्छेद दो हैं । आठके तीन, सोलहके अर्द्धच्छेद ४ है । इस ही प्रकार सर्वत्र लगालेना । अद्धापल्यकी अर्द्धच्छेदराशिका विरलनकर प्रत्येक एकके ऊपर अद्धापल्य रखकर सब भद्धापल्योंका परस्पर गुणाकार करनेसे जो राशि उत्पन्न होय उसे सूच्यंगुल कहते हैं, अर्थात् एक प्रमाणागुललंवे और एक प्रदेश चौड़े ऊंचे आकाशमे इतने प्रदेश हैं । सूच्यंगुलके वर्गको प्रतरांगुल और धन (एक राशिको तीनवार परस्पर गुणा करनेसे जो गुणनफल होय उसे 'घन' कहते हैं । जैसे दोका घन आठ और तीनका धन सत्ताईस है।) को घनांगुल कहते है। पल्यकी अर्द्धच्छेद राशिके असख्यातवें भागका विरलनकर प्रत्येक एकेके ऊपर घनागुल रख समस्त घना- गुलोंका परस्पर गुणाकार करनेसे जो गुणनफल होय उसे जगच्छ्रेणी कहते हैं । जगच्छ्रेणीका सातवा भाग राजू कहागया है अर्थात् ७ राजूकी एक जगच्छ्रेणी होती है । जगच्छ्रेणीके वर्गको जगत्प्रतर और जगच्छ्रेणीके घनको लोक कहते हैं, यही तीनलोकके आकाशप्रदेशोंकी सख्या है । इसप्रकार उप- मामानका कथन समाप्त हुआ । यहापर इतना और भी समझना कि इस मानके भेदोंसे द्रव्य क्षेत्र काल और भावका परिमाण किया जाता है। भावार्थ-जहा द्रव्यका परिमाण कहाजाय वहा उतने जुदे २ पदार्थ जानना । जहां क्षेत्रका परिमाण कहाजाय वहा उतने प्रदेश जानने । जहां कालका परिमाण कहा- जाय वहा उतने समय जानने । और जहा भावका परिमाण कहाजाय वहा उतने अविभागप्रतिच्छेद जानने। । इति अलौकिकगणितका संक्षेपकथन समाप्त हुआ।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । कर्मबन्धादियन्त्र (१) इस यन्त्रद्वारा श्रीगोम्मटसारके कर्मकाण्डसंवन्धी कर्मप्रकृतियोंके वन्धउदय- सत्ताका गुणस्थानक्रमसे निर्णय होता है। - नाम. प्रथम १४८ १ पश्चम १ षष्ठ अप्रमत्तसं. ४ अष्टम नवम . १७ गुणस्थान | गुणस्थानका (बंधसंख्या.वन्धव्युच्छित्ति उदय उदयव्युच्छित्ति सत्ता सत्ताव्युच्छित्ति संख्या. (२) | संख्या. (३) सख्या. संख्या. संख्या. संख्या. मिथ्यात्व ११७ (४) १६ (८) ११७(१८) ५ (२४) द्वितीय सासादन. १०१ २५ (९) १११(१९) ६ (२५) १४५(३८) तृतीय सम्यग्मि. ७४ (५) १००(२०) १ (२६) १४७(३९) चतुर्थ अविरतस. ७७ (६)! १० (१०) १०४(२१) १७ (२७) १४८(४०) देशविरत. ६७ ४ (११) ८ (२८) १४७(४१) प्रमत्तसंयत. ६३ ६ (१२) ८१(२२), ५ (२९) १४६(४२) सप्तम ५९ (७) १ (१३) ७६ ४ (३०) १४६(४३) अपूर्वकरण ५८ ३६ (१४) ६ (३१) १४२(४४) अनिवृत्ति. २२ ५ (१५) ६६ ६ (३२) १४२(४५) दशम सूक्ष्मसा. १६ (१६) ६० १ (३३) १४२(४६) एकादश उपशान्त. ५९ । २ (३४) १४२(४७) द्वादश क्षीणकषाय. ५७ १६ (३५) १०१(४८) त्रयोदश सयोगकेवली १ (१७) ४२ (२३) ३० (३६) | ८५ (४९) चतुर्दश | अयोगके १२ १२ (३७) | ८५ (५०) ८५ १ जहापर दोनों तरफसे अर्धचन्द्राकारका घेरा देकर जो सख्या लिखी है उस संख्याके क्रमसे उस स्थानका खुलासा इस यंत्रके नीचे ठिप्पणीमें लिखा गया है । सब प्रकृतियोका अर्थ और नंबर १६ वें पृष्ठसे लेकर २२ वें तक लिखा हुआ है सो देखलेना । २ जो अभेदभावसे १२२ उत्तरप्रकृति मानीगई हैं उनमेसे भी १८ तथा १९ वी संख्यावाली दो प्रकृति बंधके प्रसंगमें घट जाती हैं क्योंकि, बंधके समय दर्शनमोहनीय एक मिथ्यात्वरूप ही रहता उदय १२२ का होता है और सत्ताकी अपेक्षा १४८ ही हैं। किसी कर्मका बंध उदय सत्त्व तो किसी गुणस्थानमें जो नहीं होता सो योग्यता न रहनेसे, और किसीकी पूर्व गुणस्थानमे व्युच्छित्ति होजानेसे बंध उदय अथवा सत्त्व नहीं रहता। जैसे प्रथम गुणस्थानमे तीर्थकर प्रकृति तथा आहारकशरीर आहारक आ- गोपागकी योग्यता नहीं रहनेसे वहापर बंध नहीं होता है। -० . १ . १ . - ३ व्युच्छित्ति जिस कर्मकी जिस गुणस्थानमें कही हो वहांतक ही उस कर्मका धादि होता है, उसके ऊपर नहीं होता इसलिये फिर ऊपर उनकी संख्या घटादेनी चाहिये। ४ नं० ६०-८१-१३१ वी तीनों संख्यावाली ३ प्रकृति वंधनेकी यहा योग्यता नहीं है । ९२.९३ गाथामे - गोम्मटसारः। ९ नं० ५ इस गुणस्थानसे नरक, तिर्यगायुकी प्रथम व्युच्छित्ति भी होचुकी है तथा इस गुणस्थानमें किसी आ. युका बंध होता भी नहीं इसलिये वाकीकी दो आयु और भी घट जानेसे बंधयोग्य ७४ ही रहती है । ९४ गाथामें ६ तीसरे गुणस्थानमें जो विना व्युच्छित्ति भी दो आयु बंधयोग्यताके अभाव होनेसे घटाई थीं वे दो तथा एक तीर्थकर इन तीनोंका बंध यहासे होनेसे ३ संख्या ७४ में वढजाती है। ७ नं. ६०-८१ वाली दो प्रकृतियोंका यहां ही बंध होनेसे दोकी संख्या ५७ में और वढ जाती है। ८ नं. १७-४४-४५-४९-७४-८७-१०४-५३-५४-५५-५६-१३२-१३३-१३५-१३४-११६ वाली सोलहोंकी यहां व्युच्छित्ति है । ९५ गाथामें । २०-२१-२२-२३-११-१२-१०-४२-४६-१४३-१३८-१३९-१४०-७४-७५-७६- ७७-८३-८४-८५-८६-११९-११७-५०-१०९ वी संख्यावाली पच्चीस प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति यहा होती है । ९६ गाथामे १० नं. २४-२५-२६-२७-४७-५१-५८-७९-८२-११० इन दशकी यहा व्युच्छित्ति है। ९० गाथामें ११ नं० २८-२९-३०-३१ वीं ये चार यहा व्युच्छिन्न होती हैं । ९७ गाथामे १२ नं० १६-३८-३९-१३६-१३७-१४१ वी छहोंकी यहा व्युच्छित्ति है । ९८ गाथाम । १३ नं० ४८ वी १ की यहा व्युच्छित्ति है । ९८ गाथामे । १४ नं० १३-१४-३६-३७-४०-४१-१३१-१३०-११४-५७-६१-६२-६०-८१-५९-८०- ७३-५२-१११-१०० आदि-९५ आदि-९३ आदि-८८ आदि-११२-११३-११४-११५-१२०- १२१-१२२-१२३-१२४-१२५-१२६-१२७-१२८ वाली छत्तीसोंकी व्युच्छित्ति यहा होती है । ९९- १०० गाथामें। १५ नं० ३२-३३-३४-३५-४३ वाली पाचोकी व्युच्छित्ति यहा होती है । १०१ गाथामे । १६ नं० १-२-३-४-५-६-७-८-९-१४२-१४४-१४५-१४६-१४७-१४८-१२९ वाली सोल. होंकी व्युच्छित्ति यहा होती है। १०१ गायामे । १७ नं० १५ वीं एक प्रकृति यहा व्युच्छिन्न होती है । १०२ गाथामे । १८ नं० १८-१९-६०-८१-१३१ वाली पाचोंके उदयकी यहा योग्यता नहीं होनेसे १२२ में घट जाती है। १९ प्रथम गुणस्थानमें पाचकी व्युच्छित्ति होनेसे तथा १०८ वीं की योग्यता न होनेसे यहा १११ का उदय है । २६३ गाथामे २० दूसरे गुणस्थानमें १११ का उदय था उनमसे ९ की वहां ही व्युच्छित्ति हो चुकी सो ९ के घ- टानेसे तथा यद्यपि किसी भी आनुपूर्वीका यहा उदय नहीं है परतु नारकानुपूर्वीकी व्युच्छित्ति पूर्वमे हो- नेसे नहीं गिननेपर भी तीन आनुपूर्वीके घटानेसे ९९ रही । ९९ में मिश्रका उदय होनेके कारण यहा व- ढानेसे १०० का उदय होता है । २६३ गाथामे । २१ नं० १०८-११०-१११ वी चारों आनुपूर्वाकी तथा १८ वीं १ की यहा योग्यता होनेसे ५ वढा देनेपर १०४ का उदय होता है । २६३ गाथामे २२ न० ६०-८१ वी दोकी पहिले योग्यता नहीं थी कितु यहा ही है इसलिये ८ घटनेपर भी दो वढानेसे ८१ का उदय रहता है । २६३ गाथामे २३ उपर्युक्त १६ व्युच्छिन्नोको ५७ मेसे घटानेपर ४१ होनी चाहिये परंतु जो १०७ वाली पहिले यो. ग्यता न होनेमे उदय सख्यामेंसे घटा दी थी उसकी यहा योग्यता होनेसे ४१ में बढादी जाती है । २६३ गाथामे।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २४ नं० १७-११६-१३५-१३३-१३४ वाली पांचोंकी यहां व्युच्छित्ति है । २६५ गाथा । २५ नं० २०-२१-२२-२३-५३-५४-५५-५६-१३२ वीं नीकी व्युच्छित्ति यहां है । २६५ गाथामें । २६ नं० १९ वीं की व्युच्छित्ति यहां तीसरे गुणस्थानमें है । २६५ गाथामें । २७ नं० २४-२५-२६-२७-४५-४८-४९-५२-५९-८०-१००-१०९-११०-१११-१३०-१४० -१४१ वीं सत्रहोंकी यहां व्युच्छित्ति है । २६६ गाथामें। २८ न० २८-२९-३०-३१-४६-१४३-५०-११७ वी आठोंकी यहां व्युच्छित्ति है । २६७ वें गायाम। २९ नं० ११-१२-१०-६०-८१ वी संख्यावाली पांचोंकी यहां व्युच्छित्ति है । २६७ वे गाया । ३० नं० १८-८५-८६-८७- वीं संख्यावाली चारकी यहा व्युच्छित्ति होती है । २६८ वें गाथामें। ३१ नं० ३६-३७-३८-३९-४०-४१ वी छहोंकी यहा व्युच्छित्ति होती है । २६८ वें गाथामें । ३२ नं० ३२-३३-३४-४२-४३-४४ वाली छहोंकी यहांपर व्युच्छित्ति होती है । २६९ वें गाथामें । ३३ नं० ३५ वीं संख्यावाली प्रकृतिकी व्युच्छित्ति यहांपर हो जाती है । ०६९ वें गाथामें । ३४ नं० ८३-८४ वीं दोकी व्युच्छित्ति यहां होती है अर्थात् यहांसे ऊपर उदय नहीं है। २६९ - गाथामें। ३५ नं. १-२-३-४-५-६-७-८-९-१३-१४-१४४-१४५-१४६-१४७-१४८ वीं सोलहकी यहां व्युच्छित्ति है । २७० वें गाथामें ३६ नं. १५ था १६ वीं एक तथा ५०-६१-६२-७९-११२-११३-११४-११५-११८-११९-- १२३-७३-७४-७५-७६-७७-७८-८२-१२४-१२५-१२७-१३६-१३७-१३९-१३०-१००- आदि ९५- आदि ९३- आदि ८८ आदि वी इन तीसोकी यहा व्युच्छित्ति है । २७१ वें गाथामें । ३७ नं. १५ या १६ वीं मेंसे एक तथा ४७-१४२-५१-५७-१२०-१२१-१२२-१२-१२८- १२९-१३१ वाली इन बारहोंकी यहा व्युच्छित्ति है । २७२ वें गाथामे । ३८ इस गुणस्थानसे नं० ६०-८१-१३१ वीं तीनोंके सत्त्वकी योग्यता नहीं है । ३३३ ३ गाथामे। ३९ इसमें नं० १३१ वी प्रकृतिकी सत्ता रहनेकी ही योग्यता नहीं है । ३३३ ३ गाथामे । ४० क्षायिक सम्यग्दृष्टिकी अपेक्षा तो १४१ की ही यहा सत्ता है क्योकि, नं० १७-१८-१९-२०- २१-२२-२३ वी सातोंका क्षय हो चुका है । ३३५ ३ गाथामें । ४१ चौथेमें ४५ वीं प्रकृतिकी व्युच्छित्ति होनेसे यहा वह घट जाती है । ३३५ वे गाथामें ४२ पाचवेमें ४६ वीं की व्युच्छित्ति होनेसे वह यहा घटजाती है । ३३५ गाथामें । ४३ यहा भी छठे गुणस्थानकीसी ही सत्ता है परतु क्षायिक सम्यग्दृष्टिके ७ के घटनेसे १३९ का ही सत्त्व रहता है । ३३५ गाथामे । ४४ सातवे में जिन १४६ का सत्त्व कहा है उनमेंसे उपशम श्रेणीवाले भी यहापर नं० २०-२१-२२-२३ वी प्रकृतियोंको घटा देते हैं, कितु क्षायिक सम्यग्दृष्टिके उपशम श्रेणी होनेपर नं० १७-१८-१९ वीं तीन प्रकृति भी घट जाती हैं इसलिये सत्त्व १३९ का ही रहता है । और क्षपक श्रेणीवालेके तो सातवे गुण- स्थानकी व्युच्छिन्न प्रकृति ७ (नं० १७-१८-१९-२०-२१-२२-२३) तथा ४८ वीं १ को १४६ मेंसे घटानेसे १३८ का ही सत्त्व रहता है। ३३६ वें गाथामें । ४५ यहांपर भी आठवेंके समान ही व्यवस्था है । ३३६ वे गाथामें। ४६ उपशम श्रेणीवाले उपशमसम्यग्दृष्टि और क्षायिकसम्यग्दृष्टिके आठवेंके समान ही यहां सत्त्व है । और क्षपक श्रेणीवालेके ३६ प्रकृतियोंकी (नं० ११-१२-१०-२४-२५-२६-२७-२८-२९-३०-३१ ३२-३३-३४-३६-३७-३८-३९-४०-४१-४२-४३-४४-४९-५०-५३-५४-५५-५६-१०४- १०९-११६-११७-१३५-१३२-१३३ वीं) नवमेमें व्युच्छित्ति हो जानेसे (४४ )में उक्त १३८ प्रकृतियोमेंसे ३६ घटा देनेपर १०२ का ही सत्त्व है। ३३६ ३ गाथामे।
गोम्मटसारः। ४७ क्षायिक सम्यग्दृष्टि उपशम श्रेणीवालेके दशवेमें संज्वलन लोभकी व्युच्छित्ति होनेसे १०१ का सत्व रहता है । शेप विचार पूर्वोकप्रमाण है । ३३७ वें गाथामें । ४८ यहां भी उपरामश्रेणीके क्षायिक सम्यग्दृष्टिके ग्यारहवें गुणस्थानके समान १०१ का ही सत्त्व है। ३३७ वे गाया। ४९ पारहवेमें नं. १-२-३-४-५-६-७-८-९-१३-१४-१४४-१४५-१४६-१४७-१४८ वी संख्यायाली सोला प्रतियोंकी व्युच्छित्ति होनेसे १०१ मेंसे १६ घटादेनेपर ८५ का सत्त्व रहजाता है । ३३८-३३९ में गाथामें। ५. इसमें भी ८५ का ही सत्त्वरितु इसके द्विचरम समयमें ७२ की व्युच्छित्ति और चरम (अन्तके) समयमें शेष १३ की व्युन्छित्ति होकर गुणास्थानातीत सिद्धपरमेष्टी कर्ममलरहित होजाते हैं । ३४०- ३४१ वे गायागे । इति ॥ त
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. अथ गोम्मटसारस्थकर्मकाण्डके गाथाओंकी अकारादिक्रमसे सूची। गाथा. . .. . . . . ... . पृ. गा. १५२।४५४ १५६।४६९ १५७५४७३ ... १५९/४७० १६११४८३ १६६५०५ १६७१५०६ १६७३५०७ १६७४५०८ १६८१५११ १७७१५४६ १७९/५५१ १७९.५५३ १७९।५५५ १८०१५५८ १८११५६१ १९३१६०८ १९८४६२८ ... २०४।६४९ २०५/६५३ २०५६६५४ . . अक्खाणं अणुभवणं अत्थं देक्खिय जाणदि अब्भरहिदादु पुव्वं अप्पोवयारवेक्खं अणणोकम्म मिच्छं अयदे विदियकसाया अवरो भिण्णमुहुत्तो अरदी सोगे सढे अजहण्णद्विदिवंधो ... अणधीणतियं ... अवसेसा पयडीओ अविभागपडिच्छेदो अवरकस्सेण हवे अहसमयस्स थोवा अण्णोष्णगुणिदरासी अणुभागाणं बंध अयदे विदियकसाया अपमत्ते सम्मत्तं अवणिदतिप्पयडीणं अयदापुण्णे ण हि थी अविरदठाणं एक अणुभयवचि वियल अणसजोगे मिच्छे अणुदय तदियं णीचं अभवसिद्ध णस्थि हु अण्णदरआउसहिया अणियहिचरिमठाणा भणियहिगुणहाणे अट्ठारस चउअढ़ असहायजिणवरिंदे अण्णोण्णभत्थं पुण अण्णस्थठियस्सुदये १ . पृ.गा. गाथा. अछुदओ सुहुमोत्ति य ... ६।१४ अप्पं बंधतो बहु १५/अप्पदरा पुण तीस ७/१६ | अणसजोजिदसम्मे ३१।६१ अणियष्टिकरणपढमा ३५/७५ अत्तीससहस्सा ४३३९७ अहत्तरीहिं सहिया ५३।१२६ अहेव सहस्साई ५४।१३० अह य सत्त य छक य ... ६२।१५२ अडचउरेकावीस ६८।१७१ अडवीस दु हारदुगे ७१।१८३ अडवीसतिय दुसाणे ८४१२२३ अविरदभंगे मिस्स य ८९।२४२ अप्पपरोभयठाणे ९०१२४३ अविरदसम्मो देसो ९१।२४९ अप्रणसजोजिदमिच्छे ९४॥२६० अडवण्णा सत्तसया ९६।२६६ अट्ठविहसत्तरब्धं ९७५२६८,अडछन्वीसं सोलस १००।२८० अहसु एक्को बंधो १०२।२८७ अणियट्टीबंधतिय १०१३०५ अडवीसदुगं बंधो १०९।३११ अपमत्ते य अपुत्वे ११४।२० अण्णाणदुगे बंधो ११९॥३४१ अविरमणे बंधुदया १२३॥३५५ अडवीसचऊ बंधा १३११३७८ अस्थि णवह य दुदओ १३४१३८९ अडवीसे तिगिणउदे १३५।३९२ अडवीसमिवुणतीसे १३६।३९३ अवरादीणं ठाणं १३७॥३९८ अणरहिदसहिदकूडे १४६।४३३ अरहंतसिद्धचेदिय १४८१४३९ अणुवदमहत्वदेहि य . . ... ... . . ... . . . . २१८१७०० २१८७०१ २२३१७२३ ... २२५/७२९ २२५१७३१ २२७१७३८ २३७१७८० २३७१७८१ २४११७९१ २४३३७९६ ... २४५/८०२ २४६१८०७ . . . .
२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । पृ. गा. १७६१५४३ २२६४३७ २६४१८७५ २६७५८९० २७११९०१ २७२१९०७ २७९१९३८ २७९४९३२ २७९।९४१ २८१९४७ २८३१९५३ . गाथा. अरहंतादिसु भत्तो अवधिदुगेण विहीणं अयदुवसमगचउक्के अहगुणिज्जा वामे अंडदालं छत्तीस अडसही एकसयं अडदालं चारिसया असिदिसदं किरियाणं अत्थि सदो परदोवि य... अस्थि सदो० एसिं० अण्णाणी हु अणीसो अणुकहिपदेण हदे अप्पिटपंतिचरिमो अवरद्विदिवंधज्झव अहियागमणणिमित्तं अवरुक्कस्सठिदीणं अहण्हंपि य एवं ... . ५८१1३१ ३६.७ ८५।२२५ . ... . ... आ. आउवलेण अवहदि आवरणमोहविग्धं आऊणि भवविवाई आयदणाणायदणं पृ. गा. गाथा. ... २४७८०९/आहारगा दु देवे २५२१८२७ आहारे बंधुदया २५७१८४५ आदेसेवि य एवं २५८।८४९ आलसट्टो णिरुच्छाहो २५९/८५५ आदिधणादो सव्व २६३१८७१ आदिम्मि कमे घढदि २६३१८७२ आवरणवेदणीये २६४१८७६ आउस्स य सखेजा २६४१८७७ आवाधाणं विदियो २६४१८७८ आउद्विदिवंधज्झव २६५।८८० आउस्स जहण्णद्विदि २७२।९०६ इ. २७८१९३६ इगि पंचेंदिय थावर २८२।९४९ इहाणिहवियोग २८२।९५० २८५।९६० इगिठाणफड्डयाओ २८५।९६१ इगिठाणफड्डयाओ सम० इगिविगलथावरचऊ इत्थीवेदेवि तहा ८1१८ इदि चदुवंधक्सवगे इगि अड अद्विगि २७१४८ इगिविहि गिगि ख ३५१७४ इगिवार वजित्ता ६४११५९ इगिवीसेण णिरुद्ध ६५।१६० इगिवीसं ण हि पढमे इगिवीसादी एकत्ती ६६११६५ इगिछक्कडणवीस ६८।१७२ इगिविगलबंधठाणं ७१।१८२ इगिछक्कडणव०तीसदु० ७४।१९२ इगितीसे तीसुदओ ८०।२११ इगिणवदीए बंधा ९३१२५४ इगिवंधहाणेण दु ९५।२६१ इगि णउदीए तीसं १२५।३५९ इगिवीसादगुदओ १२४१३६७ इगितीसवंधठाणे १३१।३७९ इगिवीसट्ठाणुदये ... १३२॥३८१ इट्ठपदे रूऊणे १४२१४१५ इगिदालं च सयाई १४९/४४२ इगिवीस मोह खवणुवे ४१९ ... . ... आवलियं आवाहा ... 7 . ६५।१६१ ... ... ... १०२।२८८ ११२१३२१ १६९३५१५ १८५३५७७ १८५।५७८ २०२१६४३ २१११६७५ २१२२६७६ २१७१६९० २१९/७०८ २२१७१५ २२११७१६ ... २२८1७४४ २३११७५६ २३४१७६८ २३४१७७१ २३४१७७२ २३५१७७४ २३५१७७५ २६१1८६१ २६२२८७० २७०८९७ आवाहूणियकम्म ... आवाहं वोलाविय आदाओ उज्जोओ आहारमप्पमत्ते आवरणदेसघादं उगभागो थोवो ... आउकस्स पदेस आदी अते सुद्धे आहार तु पमत्ते आउगवंधावंधण ... आउदुगहारतित्थं ... आदिमपंचट्ठाणे ... आदिलदससु सरिसा आहारदुर्ग सम्म आदिमसत्तेव तदो .... ... . ... . . ... .. ..
गोम्मटसारंः। - ... ... . पृ. गा. २३९१७८८ २४६१८०५ २४८१८१३ २४९।८१६ २५११८२३ २५८1८३४ २५५१८३९ २५६१८४३ २६११८६३ ... २७११९०२ ... २७९/९४० ... २८०1९४४ . . . . .. ऊ . . . १९२।६०५ २६२।८६९ . . ए . गाथा. इगिपंतिगदं पुध पुध इसरायपमाणं उ. उचरसुचं देह उवधादमसरगमणं उवसंतसीणमोहे उदयं पडि सत्तण्हं उवषादहीणतीसे उज्जोवो तमतमगे उत्तरपयडीसु पुगो उफाडजोगो सण्णी उववादजोगठाणा उदयस्मुदीरणस्स य उज्वेलिददेवदुगे उज्वेलण विज्शादो उव्वेलणपयडीणं उगुदालतीससत्त य उदये सकममुदयेतं अ.... उपसंतोत्ति सुराऊ उदये संक्रममुदये उगुवीसं अहारस उदयटाणं दोण्हं उदयहाणं पर्या उवसामगा दु सेदि उदधिपुधत्तं तु तसे उवरदबंधे चदुपं उच्चुन्वेलिदतेऊ ... उच्चुव्वेल्लिद तेऊवाऊ उदया चउवीसूणा उदओ तीसं सत्तं उदयाइगिपण सगअड... उदया उणतीसतियं उदओ सव्यं चठपण उदया इगिपणवीसं उदया मर्दि व खइये उदया इगिवीसचऊ उदयंसहाणाणि,य उवरदवंधेसुदया पृ. गा. गाथा. २७८१९३५ उवरिलपंचये पुण २७८१९३७ उम्मग्गदेसगो मग्ग उवसमखइयो मिस्सो ३८८४ उवसमभावो उवसम २५।४४ उत्तरभंगा दुविहा ४५।१०२ उदयेणक्खे चडिदे ६४।१५६ उगुवीसतियं तत्तो ६७११६७ उवसामगेसु दुगुणं ६७।१६९ उद्भुतिरिच्छपदाणं ७६.१९६ उभयधणे समिलिदे ८०/२१० उकस्सहिदिवधो ८२१२१९ उवरिमगुणहाणीणं ९९/२७८ १२८।३८८ ऊणत्तीससयाहिय १४०।४०९ ऊणत्तीससयाई १४११४१३ १३३१४१० एइंदियमादीणं १४८१४४० एयं पणकदि १५०१४४६ एयक्खेत्तोग्गाढं १५११४५० एयसरीरोगाहिय ... ९५५।४६५ एयाणेयक्खेत्तद्रिय १६०।४८२ एयंतवडिठाणा १६३१४९० एकेके पुण वग्गे १८०५५९ एदेसि ठाणाणं १९५।६१५/एदेसि ठाणाओ १९९।६३२/एदेण कारणेण दु २००१६३६ एयं वा पणकाये २०११६३७ एवं माणादितिए २१४१६९९/एवं पंचतिरिक्खे २१८५७०२ एवं तिसु उवसमगे २२११७१३ एदे सत्तहाणा २२३१७२४ एवं सत्तहाणं २२३१७२६ एक य छक्केयार २२५।७३३ एक य छक्केयार दस २२५/७३४ एकावण्णसहस्स २२६१७३५ एयक्ख अपज्जत्त २२८११क्षे० एक व दो व तिण्णि व .. ... २२८१७४५/एगे इगिवीसपणं ... ... . . . . . . ... . . ... ... . ३७८० ५९/१४४ ७२।१८५ ७२।१८६ ७३११८७ ८३२२२२ ८४१२२६ ८६।२३२ ८९१२४१ ९९/२७५ १०८।३०९ ११२।३२३ १२११३४७ १३३३३८५ १३३१३८६ १३६१३९५ १६०४८१ १६२।४८८ १६३१४९३ १७३१५३० १८७५८४ ... १९०१५९५ . ... . . ... ... . . . ... ... . . . ।.. ...
- रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गाथा. एके एक आऊ एवमवधे बंधे एकाउस्स तिभंगा एकुदयुवसंतसे एगेगम एगे एगुणतीसतिदयं एगे वियले सयले एगेगं इगितीसे एवं खिगितीसे ण हि एवं पण उन्नीसे एवमडसीदितिदए एकं च तिण्णि पंच य ... एकार दसगुणियं एकादी दुगुणकमा एको चेव महप्पा एकम्हि कालसमये पृ.गा. ६४।१५७ ८५२३० ८८१२१९ ९३.२५५ १४६१४३४ १७८१५४८ ... २७०1८९९ २७२१९०८ २७३१९१० २८११९४५ ... क .. ... .. पृ. गा. गाथा. २०२१६४२ अंतोकोडाकोडिद्विदिस्स... २०२।६४४ अतरसुवरीवि पुणो २०३१६४५ अगुलअसंसभागप्प २१६१६९० अतरगा तदसखे २१६१६९४/ अगुल असंखभागवि २१४६९८ अतिमठाणं सुहमे २२०।७११ अतोमुत्तमेत्तो ... २२७७४१ अतोमुहुत्तकालं २३४१७६७ अतोमुत्तमेते २३४१७७० अतोकोडाकोडि २३५।७७६ २४२१७९३ कमत्तणेण ए २५९८५२ केवलणाणं दसण २६०८६० कम्मकयमोहवड्डिय २६५५८८१ केवलणाणावरणं दस २७३।९११ कदलीघादसमेदं ओ कम्मदव्वादण्णं ३४१७१ कम्मागमपरिजाणग ३५/७३ कप्पित्थीसु ण तित्य ३७१८० कम्मे उरालमिस्सं ... ४६।१०५ कम्मसरुवेणागय ... ५०1११६ कम्मे व अणा-उदय, १०९।३१० कम्मे वाणाहारे०सत्त०... ११११३१८ कि बंधो उदयादो १२११३४६ कम्माणं संबंधो १२११३४८ कोहस्स य माणस्स य १२११३४९ कम्मं वा किण्हतिए ... १२३३३५३ कम्मोरालियमिस्स १४४१४२५ कम्मुवसमम्मि उवसम... १५०५४४५ कम्मुदयज कम्मिगुणो १८८१५८७ कालो सव्वं जणयदि २२५१७३० को करइ कंटयाणं २४०१४क्षे० को जाणइ णवभावे ... २४९।१८ को जाणइ सत्तचऊ २४९।८२० मं खीणकसाय दुचरिमे १४१३२ खिव तस दुग्गदि दुस्सर ... २६१४६ खाइयसम्मो देसो मोहिमणपजवाणं ओही केवलदसण ओरालियवेगुन्विय ओधे वा आदेसे ओराले वा मिस्से ओघ तसे ण थावर ओघ कम्मे सरगदि ओघ वा रइये ओघं देवे ण हि णिर ओघं पंचक्खतसे ओरालमिस्सजोगे ओरालदुगे वजे भोकट्टणकरणं पुण ओरालं दंडदुगे मोहिदुगे बंधतियं ओरालमिस्स तसवह ओदयिया पुण भावा ओघादेसे संभव ५.१० ५।११ २४।३९ ३०१५८ ३२१६४ ३२.६५ ४८1११२ ५१1११९ ६३।१५५।(२७४) ११६१३३२ १२४१३५६ १३७१३९९ १४८१४३८ १६२।४८६ १७८१५४९ १८८५८६ २४८1८१४ २४८1८१५ २६४१८७९ २६५/८८३ २६६१८८६ २६७५८८७ ... ... ... ... ... ... - ख ... अंतिमतियसंहडण अंतोदत्तपवरवं " '९७१० १०८१३०८ ११५।३२९ ... । - गोम्मटसारः। गाथा. सवणं वा उक्समणे सीणोति चारि उदया खाओवसमियभावो साइय अबिरदसम्मे ग ... पू.गा. १९६१६१९ २०९१६६० २१२।६७८ २१५१६८९ २२७१७३९ २३१७५७ २३९१७८७ २४३१७९७ २५३१८३० २७११९०३ २८४१९५८ गदिमादि जीवभेदं गदिजादी उस्सास गुष्ठसंडसफरामिय गदियादिमु जोरगाणं गदिमाणुभाउ उदो गुणहाणिअणतगुणं गयजोगस्स य वारे गयजोगस्स दुतेरे गुणसजादप्पयडिं गोम्मटजिणिंदचंद गोम्मटसगहसुत्तं कम्मा० गोम्मटसगहमुत्त गोम्मटसुत्तल्लिहणे . छ . . . . ... पृ. गा. गाथा. १२०१३४३ चत्तारि वारमुवसम १५४१४६१ चरिमे चदु तिदुगेक ... २४९।८१७ चदुवंधे दो उदये २५३१८३१ चउरुदयुवसतसे चारुसुदंसणधरणे ५।१२ बरिमदु वीसूणुदयो २७५१चदुपचइगो बंधो ७२।१८४ चउवीसहारसयं १०१।२८४ चक्खूण मिच्छसासण १०१।२८५ चयधणहीणं दवं • . १४६१४३५/चरिमं चरिमं खंड १९११५९८ १९४१६११/छठे अथिर असुई १९४६१२ छण्हं पि अणुक्कस्सो २४७१८११ छण्णोकसायणिहा २८६।९६५ छसु सगविहमहाविहं २८७१९६८ छब्बावीसे चदु इगि २८८१७२/छटोति चारि भंगा छप्पुण उदये उस छण्णवछत्तियसग इगि ७.१७ छव्यावीसे तिगिणत ८1१९ २५:४३ छापंचादेयंत ४६।१०६ छण्णउदि चउसहस्सा ५२११२४ ७०११७८ जीरदि समयपबद्धं ७७१२०१ जंतेण कोइवं वा ८११२१६ जाणुगसरीर भवियं १५३१४५५ जदि सत्तरिस्स एत्तिय जेहावाहोवहिय ८०१२१७ जेठे समयपवद्ध ९०१२४६ जोगट्ठाणा तिविहा ११३१३२५ जोगा पयडिपदेसा • . ११६३३४ जुगवं संजोगित्ता १२२१३५१ जह चक्केण य चकी १२६०३६३ जत्थ वरणेमिचंदो १५२१४५३ जस्स य पायपसाये १८०१५५६ जोगिम्मि अजोगिम्मि य १८९१५९३ /जहखादे बंधतियं ४३९० ७९/२०७ ८०२१३ ... १५२१४५२ १५६।४६७ २००१६३४ ... २१५/६८८ २१६१६९३ २३६१७७८ २४४१७९९ २७२१९०९ घ . ... . ... . ... ... घादीवि अघादि वा घादि व चेयणीयं घाटीणीचमसादं घम्मे तित्थं बंधदि घादितिमिच्छकसाया घादीणं अजहण्णो घादितियाणं सगसग घोडणजोगोऽसणी ज . . घादीणं छदुमहा . 4 ... . . १११२६ २९५५ ५९१४५ ६०1१४७ ७३.१८८ ८२१२१८ ९८४२५७ ११७३३३ १३७१३९७ १४०1४०८ १४७४३६ २१८१७०३ २२४१७२८ ... चरिम अपुण्णभवत्यो चत्तारि तिणि कमसो चक्खुम्मि ण साहारण चत्तारिवि खेत्ताई चदुगदिमिच्छे चउरो चउछक्कदि चउभ चंतारि तिणि तिय चर चदुरेक दु पण पंचय चदुगदिया एइंदी . .. . . .. . . . .
- १० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । . ... ... ... ... ... पृ. ना. २०४१६५० २०५१९५५ २०७10 २०७६३ २११६७३ २१११६७४ २१३१६८० २१४८ २१९/७०६ ... २१९/७०७ २२२७२१ २२६१७३६ ... २२९/७४९ २३१७५५ ૨૨૨૭૬૨ २३३१७७३ २५४१८३३ २५८१८५० २५९/८५३ ... २७०1९०० २८४१९५७ । - गाथा पण्णरसोलहारस परसमयाणं वयणं पचयधणसाणयणे डिसमयधणेवि पदं पचयस्त च सकलणं पल्लासंखेज दिमा पदम पटम खंड फ, फड्डयने एकेके फहयसवाहि गुणं व वंधणपहुदि समण्णिय विदियगुणे अणथीणति वारस य वेयणीये वासूप वासूअ वरहिदीओ ... विदिये विदियणिसेगे वादालं तु पसत्या बहुमागे समभागो बहुमागे सम० बंधा वादरणिन्वत्तिवरं वीइंदियपजत्त विदियादिसु छमु पुढ विगुणणवचारिम यिदिये तुरिये पणगे विदियत्सवि पणठाणे बधे समामिजदि बंधे अधापवत्तो बंधुक्टणकरणं पंधुकटणकरणं सगसग ... पावीसमेवीस वावीसमेकतीस पारससयतेसीदी विदिये विगिपणगयदे यावत्तरि अप्पदरा पासीदि वनिता ... पाणउदि पठदि सत्ता बंधोदयकम्मला विदियावरणे व 7 पृ. गा. गाथा २६११८६५ वादालं पणुवीसं २६९१८९५ वावीस दसयचज २७१।९०४ बंधपदे उदयंसा २७२।९०५/वावीसयादिवंधे ... ... २७७१९३१, वंधुदके सत्तपदं २८३३९५४ वावीसेण णिरुद्ध २८४१९५६ वावीसे अडवीसे वावीसबंध चदुतिटु ८४१२२५, बंधा तियपणछण्णव ८५।२२९ वाणउदी णउदिचऊ वंधतियं अडवीस दु ३७४८२ वाणउदि णउदिसत्तं मि० ४३३९ वाणउदी णउदिवज ५८।१३९, वाणउदीए वंधा ६१११४८ वाणउदि णउदि सत्तं ए... ६५/१६२ वासीदे इगिचउपण ६६११६४ वारचउ ति दुगमेक ७५।१९५/वारहवीस ७५१२०० वादालं वेण्णिसया ८७१२३५/वावत्तरि तिसहस्सा ९२॥२५१ विदियं विदियं खंड १०४।२९३ १२।३०२भेदे छादालसयं १२९॥३७१ भूदं तु चुदं चइदं १३२॥३८० भत्तपइण्णा इंगिणि १४०१४१० भत्तपइण्णाइविही १४२१४१६ भवियति भनियकाले १४७४३७ भिण्णमुहुत्तो पर ... १४९४४४४ भोगं व सुरे पर चउ ... १५५।४६३ भविदरुवसमवेदग १५५१४६४ भंगा एकेका पुण १६२१४८७ भेदण अक्त्तव्वा १६५।४९९ भयसहियं व जुगुच्छा स १८४१५७५ भूवादरपज्जते १९१६२४ भवणतियाणं एवं १९८१६२६ मन्त्रे सन्धमभव्ये १९९।६३० भुजगारा अप्पदरा १९९४६६१ भूवादरतेवीसं ... ... भ ... । . २३१३७ ३०७ ... ३११५१ ३११६० ३२१२ ५८1१४२ १०७.३०४ ११४४३०८ १३४३८७ १५८।४७४ १५९/४७७ १७१३५२४ १७६३५४३ १७८१५५० ... १७९५५४ १८२१५६५ ... ..
गोम्मटसारः। ११ गा. . - . . पृ. गा. १६६।५०३ १७५।५३७ १८२।५६८ १८८1५८९ १९८१६२७ १९९.६२९ २०११६३८ २०५१६५२ ... २२२१७१८ २३८१७८६ २४०।३२० २४३१७९५ २४५१८०४ २४६१८०८ २५०१८२१ २५११८२४ २५४१८३३ ... २५५१८४० २५७४८४६ ... २५७५८४७ . : : ... . ... गाथा पृ. गाथा भोगे सुरहवीसं ... १८२१५६७ मिच्छचउके छक भुजगारप्पदराणं १८३१५७१ मिस्साविरदमणुस्सहा भुजगारा अप्पदरा ... १८६।५८० मिच्छस्स ठाणभंगा भुजगारे अप्पदरे १८६१५८१/मिस्सम्मि तिअगाणं भोगभुमा देवा २०११६४० मूलत्तरपयडीणं बंधो. ... भन्वे सचमभब्वे ... २२५/७३२ | मिस्से अपुव्वजुगले भयदुगरहियं पढम • . २४२।७५४ मिच्छादिगोदभंगा भूदाणुकंपवदजो २४४१८०१ मोहस्स य वंधोदय गविदराणण्णदरं २५९४८५६ मणि वचि वंधुदयंसा म मिच्छत्तं अविरमण मूलण्हपहा अग्गी १५/३३ मिच्छे पण मिच्छत्तं मूलत्तरपयडीणं ३३॥६७ मिच्छताणण्णदर मूलत्तर० णामादिचउ... ३३१६० मिच्छो हु महारंभो मिच्छत्तहुंडसंटा ४२१९५/मणवयणकायवक्को मरणूणम्मि णियही ४४१९९ मिच्छतिये तिचउके मिस्साविरटे उच्च ४७॥१०७ मिच्छदुगे मिस्मतिये मज्झे योक्सलागा ६१११४९ मिच्छदुगयदचउक्के मणुओरालदुवज ६६।१६६ मिच्छादिठाणभंगा ... मिच्छस्सतिमणवयं मिच्छतिये मिस्सपदा ६७११६८ मोहे मिच्छत्तादी ७७२०२ मिच्छे अहृदयपदा ९०।२४४ मिच्छे परिणामपदा मिच्छे मिच्छादावं ९६।२६५ मिच्छादीणं दुतिदुसु मिच्छमणतं मिस्स १०३।२९२ मिच्छाइहिप्पहुदि मणुचे भोघो थावर १०५।२९८ मणवयणकायदाणग मिच्छमपुण्णं छेदो १०५।२९९ मिच्छे वग्गसलाय मणुसिणिएत्थीसहिदा १०६।३०२/मिच्छत्तस्स य उत्ता मणुसोपं वा भोगे १०६।३०२ र मूलोघं पुंवेदे ११११३२०/रिणमगोवंगतस मिस्साहारस्सयया (११४२१).. १८११५६० रागजमं तु पमत्ते मिच्छे सम्मिस्साणं १४१।४१२ रूवाहियडवीससया मिच्छृणिगिवीससयं १४५।४२७/ रूऊणण्णोण्णम मिच्छतियसोलसाणं • . १५०।४४७ रूऊणाणद्धे मिच्छस्स य मिच्छोत्ति य १५११४४९ / रसवंधज्झवसाण मिस्सूणपमत्तंते १५३३४५६ मिच्छादुवसतोत्ति य १५५।४६२ लोहस्स सुहुमसत्तरसा मिच्छ मिस्स सगुणे १५८।४७६ लद्धीणिवत्तीणं मिच्छदुगे मिस्सतिए १६३।४९१ लघुकरणं इच्छंतो मिच्छे सासण अयदे १६४१४९५/लोहेछुदओ सुहुमे ... . . मज्झे जीवा वहुगा . . ... २५७१८८४ २६११८६४ २६२१८६६ ... २६७५८८८ २७५।९२५ २७७१९३३ . . . . . ... ... .. १०८१३०७ २५२१८२६ २५६१८४१ २७६१९२९ २७७१९३० २८५४९६३ . ... ल ५८1१४० ८९।२४० १८३१५७० ... २०६१६५९ ..
१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । पृ. गा. ... ... ... .. ... ... . २५.४१ २५६४२ २९१५३ ३९१८८ ४०१९० ४११९२ ४२१९४ ४५११०३ ४७११०९ ५१११२१ ५२।१२२ ५२।१२३ ५३११२५ ५४११२९ ५४४१३३ ५६४१३४ ५६/१३५ ५९११४३ ६०११४६ ६२११५० ६२११५१ ६३११५३ ६३।१५४ ६६११६३ ६८।१७३ ६९।१७४ ६९/१७६ ७०1१७९ . . गाथा लिंगकसाया लेस्सा लोगाणमसंखपमा लोगाणमसंखमिदा च वेयणियगोदघादीणे विसवेयणरतक्खय विरियस्स य णोकम्म वण्णचउकमसत्थं वेदतियकोहमाणं वेगुन्वतेजयिरसुद्द वेगुन्वं वा मिस्से वेगुम्बछ पणसंहदि वेदादाहारोत्ति य वेगुन्धअवरहिदे वरइंदणंदिगुरुणो वीखण्हं विज्झादं • • वजं पुसंजलणंति विवरीयेणप्पदरा विग्गहकम्मसरीरे वीस इगिचउवीसं वीसदु चउवीसचऊ वीसादीणं भंगा वीसुत्तर उच्च सया वेदगजोग्गे काले वेयणिये अडभंगा वेगुम्वे तम्मिस्से वेदकसाये सव्वं वीसादिसु बंधंसा वीसुदये बंधो ण हि वीस छडणवीस वामे दुसु दुसु दुसु तिसु. वामे चउदस दुसु दस .. वग्गसलायेणवाहिद वजयणं जिणभवणं . . पृ. गा. गाथा २५२१८२८ (साद तिण्णेवाऊ २८३९५२ समचउरवजरिसह २८३३९५५/सरिसासरिसे दवे सयलंगकंगक २७४९ सादिअणादी धुव ३०५७ सम्मेव तित्थबंधो ३८१८५सोलसपणवीसणभं ६८११७० सत्तरसेकग्गसयं ९२६९/सामण्णतिरियपचि. १०३१२९१ सुक्के सदरचउक ११०१३१५/सादिअणादीधुव० तदियो ११५॥३३१ सादी अवंधवंधे १२३१३५४ सेसे तित्थाहार १२८१३६९ संठाणसहदीणं १३६।३९६ सुरणिरयाऊणो १४३१४२३ सव्वहिदीणमुक्कस्सो १४५।४२८ सव्वुक्कस्सठिदीणं १८३१५६९/सेसाणं पजतो १८७५८३ सणिअसविणचउक्के ... १८९१५९२ सण्णिस्स दु हेद्वादो ... १९०१५९७/सत्तरस पंच तिस्था १९२१६०३ संजलणसुहुमचोइस १९२१६०४ सव्वाओ दु ठिदीभो १९५।६१४ सुहपयडीण विसोही २०४।६५१ सुरणिरये उज्जोवो २२२१७२० सोहम्मोत्ति य तावं २२३१७२२ सम्मो वा मिच्छो वा ... २२९/७४६ सत्थाणं धुवियाणम ... २२९/७४७ सत्ती य लदा दारु २३११७५९ सगसगखेत्तगयस्स य २५५।८३७ सगसगसादिविहीणे २५८१८५१ सयलरसरूपगंधे २७६१९२६) सुहदुक्खणिमित्तादो २८७९७० सेसाणं पयडीणं सव्वावरणं दव्वं ३३४ सव्वावरणं दव्वं विभ.... ६।१३ संजलणभागवहुभा १३।२९ सत्तर सुहुमसरागे ... १४॥३१ सहमणिगोद अपज. । ... ... ... . ७१1१८० ७३।१८९ ७४/१९० ७४।१९१ ७५/१९३ ७५.१९४ ७७११९७ ७६११९९ ७८।२०३ ८०१२१२ ८११२१५ सिद्धाणंतिमभाग सताणकमेणागय सेवढेण य गम्मद सण्णी छस्संहडको ... ...
गोम्मटसारः। गाथा गाथा . ... . ... . . .. . . . ..4 सगपज्जत्तीपुण्णे .... सव्वे जीवपदेसे सरिसायामेणुवरिं सुहुमगलद्धिजहणं सणिस्सुववादवर सेटियसंखेज दिमा सुहुमणिगोद अप० पजत सेढिअसंखेजदिमा जो समयद्विदिगो धंधो सत्तरसेकारखचदु सत्तरसेकारखतिय सखाउगणरतिरिये सरगदि दु जसादे साणे तेसिं छेदो साणे थीवेदछिदी सपणाणपंचयादी साणे सुराउ सुरगदि सेसाणं सगुणोपं सोलहेक्विगिछकं संढिस्थिछक्कसाया सोमे तिहुवणमहियो सव्वं तिगेग सव्वं सासणमिस्से देसे सत्ततिगं आसाणे साणे पण इगि भंगा सुरणिरयाऊ तित्थं सत्तेताल धुवावि य सुरणर तिरियोरालिय सम्म मिच्छ मिस्स सुहुमस्स बंधषादी सत्यगदी तसदसय सत्तण्हं गुणसंकम सम्मविहीणुव्वेल्ले सम्मत्तूणुव्वेलण सव्वस्सेक रूवं संकमणाकरणूणा सतोत्ति असत्ता सगसंभवधुववधे पृ.गा. ८३१२२१सामण्ण अवत्तन्वो ८५।२२८ सत्तावीसहियसयं ८६।२३१ सासण अयदपमत्ते ८६।२३३ /सामण्णतित्थकेवलि ८८।२३७/संठाणे संहडणे ९२१२५२ सण्णिस्स मणुस्सस्स य ९३१२५६ सणीवि तहा सेसे ९४१२५८/सण्णाणे चरिमपणं ९८१२७४ सासणपमत्तवज्ज ... ९९।२७६) सव्वपरहाणेण य १०१।२८२/सन्चापज्जत्ताणं १०२।२८६ सामण्णसयलवियलवि ... १०५।२९७ सुरणिरयविसेसणरे १०९।३१३ सठाणे संहडणे १११३१९ /सण्णिम्मि मणुस्सम्मि य ११३।३२४ / सामण्णकेवलिस्स ११३।३२६ सव्वं तित्थाहारुभऊणं ११५१३३० सत्थत्तादाहार ११८१३३७/सम्मत्तं देसजम ११८॥३३९ सुरणरसम्मे पढमो १२४१३५७ सीदादि चउहाणा १२५।३६० समविसमठाणाणि य १२६॥३६१/सादासादेकदर १२९।३७२ सुरणिरया णरतिरिय १३०३७५ सगसगगदीणमाउं १३०१४०२ सव्वाउवधभंगे १३९/४०४ सत्तरस गवयतियं १३९/४०६ / सगचउ पुरवंसा १४११४११ सत्तपदे बंधुदया १४३।४१९ सव्वं सयलं पढम १४३१४२० सत्तरसादि अडादी १४३१४२२ सत्तरसे अडचदुवी ... १४४१४२४ सत्तुदये अडवीसे ... १४४१४२६ सत्तेव अपज्जत्ता १४६।४३० सणिम्मि सबवंधो १४९।४४१ सत्ता बाणउदितियं १५३१४५७ सव्वं तिवीसछक्क १५६४६६ सत्तं तिणउदिपहुदी पृ. गा. ... १५७४७०.. १५७१४७१ १६४।४९६ १७०१५२० ... १७३१५३२ १७४१५३६ १७६१५४१ १७८१५४७ १८०१५५७ १८६१५७९ १८७५८५ ... १८९.५९४ १९०१५९६ .. १९११५९९ १९११६०१ १९३१६०६ १९४१६१० १९५।६१३ १९६१६१८ १९७४६२० • • १९७१६२२ १९८१६२५ २००१६३३ २०११६३९ ... २०२१६४१ २०३१६४७ ... .:. २०६।६५६ २०८१६६३ २१०१६६९ .. २१०१६७० २१०॥६७१ ... २१३१६८१ २१५/६८७ ... २१९/७०५ ... २२0१७०९ ... २२११७१४ २२२१७१९ ... २२९/७४८ . . . ... . . . ... . . . ... .. . . ... ... .
१४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गाथा पृ. गा. ... ... २७६१९२७ २७७१९३२ २८०१९४२ २८०1९४३ २८११९४६ ... २८१/८४७ २८७१९६७ ... गाथा सत्तं दुणउदिणउदी सत्ते बंधुदया चतु सीदादि चउसु वंधा सगवीसचउकुदये रागवीसे तिगिणउदे सुण्णं पमादरहिदे ... सुहुमे सुहुमो लोहो सचाणुभयं वयणं सोलस विसदं कमसो सत्तरसं दसगुणिदं सिद्धेसु सुद्धभंगा सच्छंददिठ्ठीहिं वियप्पियाणि संजोगमेवेति वदति तण्णा सइउठ्ठिया पसिद्धी सिद्धे विमुद्धणिलये पृ. गा. २३०१७५२ सव्वसलायाणं २३०१७५३ सव्वासिं पयडीणं २३११७५८ समयपवद्धपमाणं २३३१७६५ सत्तं समयपवद्धं २३६१७७९ संखेजसहस्साणिव २४०१५क्षे० सव्वुवरि मोहणीये २४०१६क्षे० सिद्धंतुदयतडुग्गय २४११७० २४३१७९८ हस्सरदि उच्चपुरिसे २५९।८५४ हारदुहीणा एवं २६३।८७४ हारदु सम्म मिस्सं २६७१८८९ हस्सरदि पुरिसगोददु २६८१८९२ हारं अधापवत्तं २६८1८९३ होति अणियहिणो ते २७४।९१३ हेहिमखंडुक्कस्सं ह. .. ... . ५४।१३२ १०६।३०३ १२२।३५० • . १३९/४०७ १४६१४३१ २७३१९१२ २८४१९५९ ... . Taluminum इति गाथानुक्रमणिका । than ३ अथ गोम्मटसारके कर्मकाण्डकी विषयसूची। . . ... . गाथा पृ.गा. गाथा पू गा. मङ्गलाचरण ग्रंथप्रतिज्ञा १११ सन्यासमरणके भेद ३१६५९ प्रकृतिसमुत्कीर्तनाधिकारः१ भावनिक्षेपकर्मका स्वरूप और भेद ३२॥६४ कर्मविशेषमें नामादिनिक्षेप ३३१६७ प्रकृतिखरूपवर्णन २।२ मूल और उत्तरप्रकृतियोंके नोकर्मद्रव्य ३४।६९ कर्मनोकर्मग्रहणकरनेका कारण ... २।३ नोआगमभावकर्मका खरूप ३८१८६ कर्मनोकर्मके परमाणुओंकी संख्या ३२४ कर्मके सामान्यादि भेद बन्धोदयसत्त्वाधिकारः २ ४।६ घाति अघाति कर्मसंज्ञा मंगलाचरणवक्तव्यप्रतिज्ञा ४१९ ३९८७ कर्मोंके घाति अघाति होनेमे युक्ति स्तवका लक्षण ८1१० ३९८८ अघातिकर्मोंका कार्य ५।११ कर्मकी बंधअवस्थाके भेद ३९.८९ कौके पाठक्रमकी सार्थकता ७।१५ प्रकृतिबंधका गुणस्थानों में नियम ४११९२ आठकर्मों के खभावका दृष्टान्त तीर्थकरप्रकृतिके धर्म विशेष नियम ९.२१ ४११९३ कर्मोकी उत्तरप्रकृति ( विशेषभेद ) १०॥२२ प्रकृतियोंकी बंधव्युच्छित्ति संख्या ४२।९४ पाच निद्राओंका कार्य १०१२३ वंधव्युच्छित्तिकी संख्या गुणस्थानकमसे. ४२।९५ मिथ्यात्वके तीनभेदोंका कारण . बंध और अबंधप्रकृतियोंकी संख्या ११।२६ पाच शरीरोंके सयोगी भेद गुणस्थानक्रमसे ४५1१०३ १२।२७ आगोपागोके नाम १३१२८ बंधव्युच्छित्तिआदिकी संख्या मार्गणाओंके छहसहननवालोके उत्पत्तिस्थान १३३२९ क्रमसे ४६.१०५ आतपका लक्षण प्रकृतिबंधमे सादि आदि भेदोंका स्वरूप १५१३३ ५२।१२२ काँकी प्रकृतियोका शब्दार्थ १६८पंक्ति प्रकृतियोके विरोधी अविरोधी भेद ५३।१२५ नामकर्मकी प्रकृतियोका अभेदसे अतर्भाव २२॥३४ स्थितिबंधका खरूप ५४।१२७ बंधयोग्य प्रकृतियोकी संख्या २३१३५ स्थितिके उत्कृष्टादि भेद ५४।१२८ उदयप्रकृतियोकी संख्या २३१३६ उत्कृष्टस्थिती आदिके कारण-खामी ५६।१३४ सत्त्वप्रकृतियोकी सख्या २४॥३८ जघन्यादि स्थितिभेदोंको चौदह जीव- घातिया कमौके भेद २४१४९ भेदोंमे कथन ६१1१४८ अघातियाकर्मों के भेद २५१४१ जघन्यस्थितिबंधके स्वामी ६२११५१ कषायोंका कार्य तथा सस्कारकाल २६.४५ पुद्गलविपाकी प्रकृति २६४७ स्थितिभेदोंमे सादि आदि भेद ६३११५३ भव विपाकी क्षेत्रविपाकी जीवविपाकी प्रकृ- स्थितिकी आवाधाका लक्षण । ... ६३११५५ तियों की संख्या २७१४८ आवाधाका उदयकी अपेक्षा कथन ६४।१५६ नामादि चार निक्षेपोसे कर्मके भेद उसमे आवाधाका उदीरणाकी अपेक्षा कपन ६४।१५९ नामनिक्षेप कर्म २८५२ काँके निषेकका खरूप ६५।१६० स्थापनारूपकर्म २९४५३ निषेकका क्रम ६५४१६१ द्रव्य निक्षेपरूपकर्म तथा भेद २९.५४ अनुभागबंधका खरूप ६६११६३ कदलीघातमरणका स्वरूप ३०५७ अनुभागके उत्कृष्टादिभेदोंके खामी ६६.१६४ तथा स्वामी . . . .
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । :: गाथा. पृ. गा. गाथा पृ. गा. जघन्य अनुभागवंधके खामी ६८।१७० सत्वप्रकृतियोंका गत्यादिमार्गणाओम अनुभागबंधके सादि आदि भेद ७०1१७८ कथन १२०1३४५ ध्रुवप्रकृतियोंमें सादि आदि भेद ७०।१७९ मंगलाचरणपूर्वक अधिकार पूर्ण १२४१३५७ अनुभागवंधका धातियाकौमें सत्त्वस्थानभंगाधिकार ३ दृष्टान्तद्वारा कथन ... ७१११८० मंगलाचरणपूर्वक कथन प्रतिज्ञा १२५/२५८ अनुभागका अघातियाकर्मों में दृष्टान्त- स्थान और भंग कहनेकी रीति । १२५१३५९ द्वारा कथन ७२।१८४ आयुके बंधाबंधकी अपेक्षा गुणस्थानों में प्रदेशबंधका खरूप ७२।१८५ सत्त्वस्थानका कथन... १२६६३६२ कर्मप्रदेशो (परमाणुओं) का मूलप्रकृतियों स्थानोंके भगों (भेदों) की संख्या १२६१६६४ मे वटवारा ७४।१९२ मिथ्यालगुणस्थानके स्थान की प्रकृतियोंकी कर्मपरमाणुओंका उत्तरप्रकृतियोंमे विभागका संख्या १२७१३६५ कथन ७७।२०० मिथ्यात्वगुणस्थानमें भंगसंग्ड्या १२८१३६७ प्रदेशबंधके उत्कृष्टादि भेदोके सादिआदिक सासादनादि गुणस्थानों में स्थान और भेदोंका कथन भंगोंकी संख्या १२९३७२ ७९/२०७ सत्वस्थानके पढनेका फल १३६।३९५ उत्कृष्ट प्रदेशबंधके खामी ८०.२११ कनकनन्दिकथित सत्त्वस्थानाधिकार है १३६॥३९६ जघन्यप्रदेशवंधके खामी ८११२५५ अपनेको चकवापनेकी सिद्धि १३७७३९७ प्रकृति प्रदेशबंधके कारण योगस्थानीका त्रिचूलिका अधिकार ४ खरूप संख्याभेद तथा स्वामी ८२१२१८ योगस्थानोका ८४ स्थानोंसे अल्पवहुत्व. मंगलाचरणपूर्वक कथनप्रतिज्ञा . १३७१३९० तीनचूलिकाओंमेसे नवप्रश्नचू० १३७१३९९ कथन प्रतिज्ञासहित. ८६।२३२ पंचभागहार चूलिका ... ... १४०/४०८ कर्मोंके उदयका कथन... ९५।२६१ दशकरणचूलिका मंगलपूर्वक १४७४३६ उदयव्युच्छित्तिका कथन ९५।२६३ दशकरणोंका स्वरूप १४८१४३८ केवलीभगवानके सातादिके उदयसे इन्द्रि. दशकरणोंका गुणस्थानों में यथासंभव १४९।४४१ यजन्य सुखदुःसका अभाव युक्तिसहित ९८१२७३ स्थानसमुत्कीर्तनाधिकार ५ उदयप्रकृतियोंकी गुणस्थानक्रमसे सख्या ९९।२७६ मंगलाचरणपूर्वक कथन प्रतिमा १५२१४५१ अनुदयप्रकृतियों की संख्या ९९।२७७ वधादिस्थानोका प्रकृतिसंख्यासहित गुण- उदयप्रकृतियोंकी उदीरणामे विशेषताका १५२।४५२ ९९।२७८ मोहनीकर्मके उदयस्थानोकी तथा प्रकृति- उटीरणाकी व्युच्छिति १००१२०१ योकी संख्याका उपयोग-योग-संयम-लेश्या उदीरणा अनुदीर्णारूप प्रकृतियोकी संख्या और सम्यक्त्वकी अपेक्षासे कथन... १६३३४९० गुणस्थानों में ... १०१।२८२ मोहनीयके सत्त्वस्थानोंका कथन १६४५०८ उदयादि तीनभेदोंका गति आदि चौदह नामकर्मके ४१ जीवपदोंका कथन ... १७०१५१९ १०१।२८४ नामकर्मके बंधादिस्थान तथा भंग, सत्त्वप्रकृतियों का स्वरूप गुणस्थानक्रमसे ११६६३३३ गुणस्थान और मार्गणाओकी अपेक्षा १७११५२१ सत्त्वव्युच्छितिका कथन ११८१३३७ बंधोदयसत्त्वके त्रिसंयोगी भंग सत्व और असत्त्वप्रकृतियों की संख्या १९८१६२७ बंधोदयसत्त्वस्थानोंका चौदह जीवसमासों. गुणस्थानक्रमसे ... ११९॥३४२/ की अपेक्षा कथन ... २१९७०४ स्थानों में कथन कथन मार्गणोंमे कथन गोम्मटसारः । १७ . . ... . .. गाथा पृ. गा. गाथा पृ गा बंधोदयसत्त्वस्थानोंका चौदहमार्गणाओं अघ करणका अकोंके संकेतसे कथन ... २७०१९०० की अपेक्षा कथन ... २२०१७१० अध करणके कालका प्रमाण २७२।९०८ बंधादि त्रिसंयोगका एक आधार और अपूर्वकरणमें अकोंकी सहनानी २७२।९०९ दो आधेयकी अपेक्षा कथन २२७१७४० अपूर्वकरणके कालका प्रमाण २७३१९१० बंधादिस्थानोंमे दो आधार एक आधे- अनिवृत्तिकरणकी सहनानी तथा कालका यकी अपेक्षा कथन... २३२१७६० प्रमाण २७३।९११ नामकर्मके संयोगीमेद पूर्ण २३८१७८४ कर्मस्थितिरचनाधिकार ९ प्रत्ययाधिकार ६ मंगलचरणवक्तव्यप्रतिज्ञा २७४/९१३ मंगलाचरणपूर्वकवक्तव्यप्रतिज्ञा २३८१७८५ कर्मस्थितिरचनाका प्रकार २७४।९१४ आस्रवोंका खरुप भेदसहित २३८१७८६ कर्मस्थितिरचनाकी अकसदृष्टि २७५।९२३ मूलउत्तर प्रत्ययोका गुणस्थानोंमें कथन २३९१७८७ कर्मस्थितिरचनाकी अर्थसंदृष्टि २७५१९२४ प्रत्ययोंकी व्युच्छित्ति तथा अनुदय २४०।१० सत्तारूपत्रिकोणयंत्ररचनाके जोड़ देनेकी आस्रवोंके विशेषों (भेदों) का कथन २४११७५१ विधि २८०1९४४ कर्मोके बंधके कारण परिणामोंका कथन २४४१८०० स्थितीके भेदोंका कथन २८२१९४५ भावचूलिकाधिकार ७ स्थितीके कारण कषायाध्यवसाय- मगलचरणवक्तव्यप्रतिज्ञा २४७१८११ स्थानोंका मूलप्रकृतियोंमे कथन २८११९४७ भावोंके नाम भेदसहित २४८८१३ स्थिति बंधाध्यवसायस्थानोका प्रमाण . २८२१९४९ भावोंकी उत्पत्तिका कारण २४८८१४ अध्यवसायस्थानों में अनुकृष्टिविधान २८३१९५४ भावोके भेदोंके नाम २४९१८१६ स्थिति संवधी अनुभागबंधाध्यवसायस्था- उत्तरभावोंके भेद दूसरीतरहसे २५१८२३ नोंका कथन २८५१९६३ भावोंके स्थानभंग और पदमंगोंका ग्रंथकर्ताकी प्रशस्ति । गुणस्थानोंकी अपेक्षा कथन २५५१८४० ग्रंथकरनेका प्रयोजन २८६१९६५ एकान्तमतके भेदोंका खरूप २६४/८७६ एकान्तभेदोंके भेदोंका खरूप अजितसेनगुरुको नमस्कार २८६१९६६ २६४।८७७ २८७१९६७ चामुण्डरायको बुद्धिवर्धक आशीर्वाद . एकान्तमतोंका झगड़ा मेंटनेकी युक्ति साराशसहित २६८८९४ दक्षिणकुक्कट नामसे प्रसिद्ध जिनके प्रतिविंबको जयशब्द २८७१९६८ एकान्तमतोंके मिथ्या होनेका कारण युक्तिसहित २६९।८९५ चामुण्डरायको विशेष आशीर्वाद ... २८८1९६९ त्रिकरणचूलिकाधिकार ८ चामुण्डरायने कर्णाटकी मगलाचरण गुरुकेलिये २६९।८९६ वृत्ति वनाई इसपर आशीर्वाद देते. तीनकरणोंका स्वरूप २७०८९७ हुए अपने समाचारोंकी पूर्णता २८८१९७२ . . . AN समाप्तेयं कर्मकाण्डस्य विषयानुक्रमणिका । - । . , -
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमाला। ॐ श्रीनेमिचन्द्राय नमः। अथ छायाभाषाटीकोपेतः गोम्मटसारः। Oak (कर्मकाण्डम् ) मङ्गलाचरण. दोहा। परमभये सब खंडिकें, करमकांड समुदाय । सहज अखंडित ज्ञानमय, जयवंते जिनराय ॥१॥ विघ्नहरनमंगलकरन, नौं सिद्धसुखकार । नेमिचंद्रजिन जगतपति, साधुवचनगुणधार ।।२।। जीवकांडकौं जानिकें ज्ञानकांडमय होइ। निजखरूपमे रमिरहै शिवपद पावै सोइ ॥ ३ ॥ पहले जीवकाण्डमें जीवका विस्तारसे खरूप कहा अब जीवसे अनादिसंबंध रखनेवाले कर्मका विस्तारसे कथन करनेकेलिये कर्मकाण्ड महाअधिकारको आरंभ करते हैं, उसमेंभी आचार्य प्रथम अपने इष्टदेवको नमस्कार करते हुए जो कुछ कहना है उसकी प्रतिज्ञा करते है। पणमिय सिरसा णेमि गुणरयणविभूसणं महावीरं । सम्मत्तरयणणिलयं पयडिसमुकित्तणं वोच्छं ॥१॥ प्रणम्य शिरसा नेमि गुणरत्नविभूषणं महावीरम् । सम्यक्त्वरत्ननिलयं प्रकृतिसमुत्कीर्तनं वक्ष्यामि ॥ १॥ अर्थ-मैं नेमिचन्द्र आचार्य, ज्ञानादिगुणरूपी रत्नोंके आभूषणोंको धारण करनेवाले, मोक्षरूपी महालक्ष्मीको देनेवाले, सम्यक्त्वरूपीरत्नके स्थान ऐसे श्रीनेमिनाथ तीर्थकरको १. भाषाटीकाकार पं० टोडरमल्लजीका मङ्गलाचरण । २. इस गाथामें महावीर तीर्थकरको नमस्कार रना महावीरपदसे सूचित होता है जब महावीरतीर्थंकरका अर्थ करें तव नेमिका अर्थ धर्मरूपी रयके लानेके कारणखरूप पहियेकी तरह ऐसा होता है।
२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । मस्तक नवाकर ज्ञानावरणादि कर्मोंकी मूल, उत्तर दोनों प्रकृतियोंके व्याख्यान करनेवाला प्रकृतिसमुत्कीर्तननामा अधिकार कहताई ॥१॥ अब प्रकृति क्या है ? ऐसा प्रश्न होनेपर आचार्य कहते है- पयडी सील सहावो जीवंगाणं अणाइसंबंधो। कणयोवले मलं वा ताणवित्तं सयं सिद्धं ॥२॥ प्रकृतिः शीलं स्वभावः जीवाड़योरनादिसम्बन्धः । कनकोपले मलं वा तयोरस्तित्वं स्वयं सिद्धम् ॥ २॥ अर्थ- कारणकेविना वस्तुका सहजखभाव होवै उसे प्रकृति शील वा स्वभाव इन तीनों नामोंसे कहते है। जैसे आगका खभाव ऊपरको जाना, पवनका तिरछा वहना, जलका नीचे गमन करना आदि । और यह खभाव जीव तथा अङ्ग ( कर्म ) का है, इन दोनों से जीवका स्वभाव रागादिरूप परिणमने ( होजाने ) का है और कर्मका स्वभाव रागादिरूप परिणमावनेका है । तथा इन दोनोंका संबंध अनादिकालसे सोनेसे मिले हुए पाषाण (मैल) की तरह है। और इन जीव, कर्मका अस्तित्व (होना) अपने आप सिद्ध (प्रतीतिगोचर) है ॥ भावार्थ-जिस तरह भांग अथवा शरावका खभाव बावला करदेनेका और इसके पीनेवाले जीवका खभाव वावला होजानेका है, उसी तरह जीवका खभाव रागद्वेषादि कपा- यरूप होजानेका तथा कर्मका स्वभाव रागादिकषाय स्वरूप परिणमादेनेका है, सो जबतक दोनोंका संबंध है तभीतक विकाररूप परिणाम होता है । और वह संबंध अभीका नहीं अनादिकालका है जैसे खानिकासोना अनादिकालसेही कीट कालिमारूप मैलसे मिलाहु- आ है वैसे यह जीवभी कर्मोंसे अनादिकालसे खतः संबंधवाला है किसीने संबंध किया नहीं । इसजीवका तो अस्तित्व ( होना ) "अहम्" () ऐसी प्रतीति होनेसे प्रसिद्ध है तथा कर्मका होना “कोई दरिद्री ( भिखारी ) कोई धनवान्" इत्यादि विचित्रपना प्रत्यक्ष देखनेसे सिद्ध है इसकारण जीव और कर्म दोनोंही अनुभवसिद्ध है ॥ २ ॥ आगे यह संसारीजीव कर्म और नोकर्म (कर्मके सहायक) को किसतरह अपने साथ संबंध करलेता है सो कहते हैं- देहोदयेण सहिओ जीवो आहरदि कम्म णोकम्म । पडिसमयं सवंगं तत्तायसपिंडओच जलं ॥३॥ देहोदयेन सहितो जीव आहरति कर्म नोकर्म । प्रतिसमयं सर्वाङ्गं तप्तायःपिंडमिव जलम् ॥ ३॥ १. कर्मके सम्बन्धलेही जीवके रागद्वेषरूप परिणाम होते हैं इसलिये मुख्यपने कर्मको ही प्रकृति नामसे कहा है। २ कोई ऐसा मानते हैं कि जीव तो पहलेसे ही शुद्ध है परंतु कर्म पीछेसे लगते हैं इस भ्रमके दूरकरनेको सोनेमे मैलकी तरह आत्मा और कर्मका अनादिसम्बन्ध कहा। + गोम्मटसारः। ३ अर्थ-यह जीव योगसहित होके औदारिक आदि शरीरनामा कर्मके उदयसे ज्ञाना- वरणादि आठ कर्मरूप होनेवाली कर्मवर्गणाओंको तथा औदारिक आदि चार शरीररूप ( औदारिक १ वैक्रियिक २ आहारक ३ तैजस ४) होनेवाली नोकर्मवर्गणाओंको हरस- मय चारों तरफसे ग्रहण ( अपने साथ संबंध ) करता है जैसे कि आगसे तपा हुआ लोहेका गोला पानीको सब ओरसे अपनी तरफ खीचता है। भावार्थ-जब यह आत्मा शरीर सहित होता हुआ मन वचन कायकी प्रवृत्ति करता है तभी इसके कर्मोंका बंध होता है मन वचन कायकी क्रिया रोकनेसे कर्मबंध नहीं होता ॥ ३ ॥ अब कहते हैं कि कर्म तथा नोकर्मरूप होनेवाले कितने पुद्गलपरमाणुओंको ग्रहण - करता है- । सिद्धाणंतिमभागं अभवसिद्धादणंतगुणमेव । समयपवद्धं बंधदि जोगवसादो दु विसरित्थं ॥४॥ सिद्धानन्तिमभागं अभव्यसिद्धादनन्तगुणमेव । समयप्रबद्धं बध्नाति योगवशात्तु विसदृशम् ॥ ४॥ अर्थ-यह आत्मा, सिद्धजीवराशिके जो कि अनन्तनन्तप्रमाण कही है अनंतमेभाग और अभव्यजीवराशि जो जघन्ययुक्तानंत प्रमाण है उससे अनंतगुणे समयप्रबद्धको अर्थात् एक समयमें बंधनेवाले परमाणुसमूहको, बांधता है ( अपने साथ संबंध करता है)। परंतु मन वचन कायकी प्रवृत्तिरूप योगोंकी विशेषतासे (कमती वढती होनेसे) कभी थोड़े कभी बहुत परमाणुओंका बंध करता है । सारांशः–परिणामोंमें कषायकी अधिकता तथा मन्दता होनेसे आत्माके प्रदेश अधिक वा कम सकंप (चलायमान ) होते है तब कर्म परमाणु भी ज्यादा अथवा कम बंधते है जैसे अधिक चीकनी दीवालपर धूलि अधिक लगती है कम चीकनीपर कम ॥ १ ॥ अब कर्मपरमाणुओंके बंधफा प्रमाण कहकर उनके उदय तथा सत्त्वका ( मौजूद रह- नेका ) प्रमाण कहते है- जीरदि समयपवद्धं पओगदो णेगसमयबद्धं वा । गुणहाणीण दिवटुं समयपबद्ध हवे सत्तं ॥५॥ जीर्यते समयप्रबद्धं प्रयोगतः अनेकसमयबद्धं वा। गुणहाणीनां द्व? समयप्रबद्धं भवेत् सत्त्वम् ॥५॥ अर्थ-समय समयमें कर्मपरमाणुओंका एक एक समयप्रबद्ध फल देकर खिर जाता है अथवा तपश्चरणरूप अतिशयवाली क्रियाके होनेसे अनेक बंधेहुए समयप्रबद्ध झड़ ។ 8 रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । जाते हैं और कुछ कम डेढ गुणहानिआयामकर गुणाकार किया हुआ समयप्रबद्ध सत्ता ( वर्तमान) अवस्थामें रहता है । इसका कथन आगे कर्मकी अवस्थाके अधिकारमें कहेंगे वहांपर गुणहानिआयाम वगैरःका खुलासा किया जाइगा ॥ ५ ॥ आगे कर्मके सामान्यादि भेद वा भेदोंके भेद दो गाथाओंसे कहते हैं। कम्मत्तणेण एक दवं भावोत्ति होदि दुविहं तु । पोग्गलपिंडो दवं तस्सत्ती भावकम्मं तु ॥ ६ ॥ कर्मत्वेन एक द्रव्यं भाव इति भवति द्विविधं तु । पुद्गलपिण्डो द्रव्यं तच्छक्तिः भावकर्म तु ॥६॥ अर्थ-वह कर्म कर्मसामान्यपनेसे एक है भेद नही है । लेकिन द्रव्य तथा भावके भेदसे दोप्रकार है। उसमें ज्ञानावरणादिरूप पुद्गलद्रव्यका पिंड द्रव्यकर्म है, और उस द्रव्यपिंडमें फल देनेकी शक्ति वह भावकम है । अथवा कार्यमें कारणका व्यवहार होनेसे उस शक्तिसे उत्पन्न हुए अज्ञानादि वा क्रोधादि परिणाम वे भी भावकर्म है ॥६॥ तं पुण अहविहं वा अडदालसयं असंखलोगं वा। ताणं पुण घादित्ति अ-घादित्ति य होंति सण्णाओ ॥ ७ ॥ तत् पुनरष्टविधं वा अष्टचत्वारिंशच्छतमसंख्यलोकं वा । तेषां पुनः घातीति अघातीति च भवतः संज्ञे ॥ ७ ॥ अर्थ-वह सामान्यकर्म आठ प्रकार है अथवा एकसौ अडतालीस वा असंख्यात लोक- प्रमाण भेदवाला है। उन आठ कर्मोंकी घातिया तथा अघातिया ये दोसंज्ञा है ।। ७ ।। अब आठमेदोंके नाम तथा घातिया और अघातिया कोंन २ है ऐसा दो गाथाओंसे दिखाते हैं:- णाणस्स देसणस्स य आवरणं वेयणीयमोहणियं । आउगणामं गोदंतरायमिदि अट्ठ पयडीओ ॥८॥ ज्ञानस्य दर्शनस्य च आवरणं वेदनीयमोहनीयम् । आयुष्कनाम गोत्रान्तरायमिति अष्ट प्रकृतयः ॥ ८॥ अर्थ-ज्ञानका आवरण और दर्शनका आवरण अर्थात् ज्ञानावरण १ दर्शनावरण २ और वेदनीय ३ मोहनीय ४ आयु ५ नाम ६ गोत्र ७ अन्तराय ८ ये आठ कोंकी मूल प्रकृतियां (खभाव ) है ॥ ८॥ आवरणमोहविग्धं घादी जी-वगुणघादणत्तादो। आउगणाम गोदं वेयणियं तह अघादित्ति ॥९॥ 1. कर्मोंका फल देकर क्रमसे गुणाकाररूप घटनेका समय । . .
गोम्मटसारः। ५ आवरणमोहविघ्नं घाति जीवगुणघातनत्वात् । आयुष्कनाम गोत्रं वेदनीयं तथा अघातीति ॥ ९॥ अर्थ-ज्ञानावरण १ दर्शनावरण २ मोहनीय ३ अन्तराय ४ ये चार घातियाकर्म हैं क्योंकि जीवके अनुजीवी गुणोंको धातते ( नाश करते ) हैं । और आयु १ नाम २ गोत्र ३ वेदनीय ४ ये चार अघाती कर्म हैं जली हुई जेवड़ीकी तरह इनके रहनेसे गुणका नाश नही होता ॥ ९॥ आगे उनजीवके गुणोंको कहते हैं जिनको कि ये कर्म धातते है- केवलणाणं दंसणमणंतविरियं च खयियसम्मं च । खयियगुणे मदियादी खओवसमिए य घादी दु॥१०॥ केवलज्ञानं दर्शनमनन्तवीर्य च क्षायिकसम्यक्त्वं च । क्षायिकगुणान् मत्यादीन् क्षायोपशमिकांश्च घातीनि तु ॥ १० ॥ अर्थ-केवलज्ञान १ केवलदर्शन २ अनन्तवीर्य ३ और क्षायिकसम्यक्त्व ४ च शब्दसे क्षायिकचारित्र तथा क्षायिकदानादि, इन क्षायिकभावोंको तथा मतिज्ञानआदि जो मति १ श्रुत २ अवधि ३ मनःपर्ययज्ञान ४ इन क्षायोपशमिकभावोंको ये ज्ञानवरणादि चार घातियाकर्म घातते है अर्थात् जीवके इन सब गुणोंको प्रगट नही होने देते इसवास्ते ये घातियाकर्म कहलाते है ॥ १० ॥ अव अघातिया कर्मोंका कार्य कहते हुए पहले आयुकर्मका कर्तव्य कहते है- कम्मकयमोहवड्डियसंसारम्हि य अणादिजुत्तम्हि । जीवस्स अवहाणं करेदि आऊ हलिव णरं ॥ ११॥ कर्मकृतमोहवर्धितसंसारे च अनादियुक्ते । जीवस्यावस्थानं करोति आयुः हलीव नरम् ॥ ११ ॥ अर्थ-कर्मकरि किया हुवा, मोहसे अर्थात् अज्ञान, असंयम और मिथ्यात्वसे वृद्धिको प्राप्त हुआ जो अनादि संसार है उसमें आयुकर्म उदय होके मनुष्यादि चार गतियोंमें जीवकी स्थिति करता है । जैसे कि काठका यंत्र (खोडा) "जोकि राजाओंके यहा अपराधीके पांवको भीतर बंद रखनेकेलिये होता है" अपने छेदमें जिसका पग आया होय उसकी उस छेदमें ही स्थिति करता है बाहिर नही निकलने देता इसी प्रकार आयुकर्म जिस गति (शरीर) में उदय हुवा उसी गतिमें जीवको ठहराता है ॥ ११ ॥ अब नामकर्मका कार्य कहते हैं- गदिआदि जीवभेदं देहादी पोग्गलाण भेदं च । गदियंतरपरिणमनं करेदि णामं अणेयविहं ॥१२॥ , ,
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
गत्यादि जीवभेदं देहादि पुद्गलानां भेदं च ।
गत्यन्तरपरिणमनं करोति नाम अनेकविधम् ॥ १२ ॥
अर्थ-गति आदि अनेकतरहका नामकर्म, नारकी वगैरः जीवकी पर्यायोंके भेदोंको,
औदारिक शरीर आदि पुद्गलके भेदोंको तथा एक गतिसे दूसरी गतिरूप परिणमन होनेको
अनेकतरह करता है अर्थात् चित्रकारकी तरह अनेक कार्योंको करता है भावार्थ-जीवमें
जिनका फलहो ऐसी जीवविपाकी, पुद्गलमें जिनका फल हो ऐसी पुद्गलविपाकी, क्षेत्रविपाकी,
तथा "च" से भवविपाकी ऐसी चार तरहकी प्रकृतियोंरूप परिणमन नामकर्म करता है ॥१२॥
आगे गोत्रकर्मके कार्यको कहते है-
संताणकमेणागयजीवायरणस्स गोदमिदि सण्णा ।
उच्चं णीचं चरणं उच्चं णीचं हवे गोदं ॥ १३ ॥
संतानक्रमेणागतजीवाचरणस्य गोत्रमिति संज्ञा ।
उच्च नीचं चरणं उच्चैनीचर्भवेत् गोत्रम् ॥ १३ ॥
अर्थ-कुलकी परिपाटीके क्रमसे चला आया जो जीवका आचरण उसकी गोत्र संज्ञा
है अर्थात् उसे गोत्र कहते है । उस कुलपरंपरामे ऊंचा ( उत्तम ) आचरण होय तो उसे
उच्च गोत्र कहते हैं जो निंद्य आचरण होय वह नीचगोत्र कहा जाता है। जैसे एक
कहावत है कि-शियालका वच्चा वचपनसे सिंहिनीने पाला और सिहके बच्चोंके साथ
खेलाकरता था, एक दिन खेलते हुए सव वच्चे किसी जंगलम गये वहा हाथियोंका समूह
देखकर जो सिंहिनीके बच्चे थे वे तो हाथीके सामने हुए लेकिन वह शियाल जिसमें कि
अपने कुलका डरपोकपनेका संस्कार था हाथीको देख भागनेलगा। तब वे सिंहके वच्चे
अपना बड़ाभाई समझ उसके साथ पीछे लौटके माताके पास आए और उस शियालकी
शिकायतकी कि हमको शिकारसे इसने रोका । तव सिंहिनीने उस शियालके वच्चेसे एक
श्लोक कहा उसका मतलब यह है कि अब हे बेटा तू यहांसे भाग जा नहीं तो तेरी
जान नही बचेगी । श्लोक ॥ शूरोसि कृतविद्योसि दर्शनीयोसि पुत्रक । यसिन् कुले
त्वमुत्पन्नो गजस्तत्र न हन्यते ॥१॥ अर्थात् हे पुत्र तू शूरवीर है विद्यावान् है देखने
योग्य (रूपवान् ) है परन्तु जिस कुलमें तू पैदा हुआ है उस कुलमें हाथी नही मारे जाते
भावार्थ-कुलका संस्कार अवश्य आजाता है चाहें वह विद्यादिगुणोंकर सहित हो उस
पर्यायमें संस्कार नहीं मिटता ॥ १३ ॥
आगे वेदनीय कर्मके कार्यको कहते है।
अक्खाणं अणुभवणं वेयणियं सुहसरूवयं सादं ।
दुक्खसरूवमसादं तं वेदयदीदि वेदणियं ॥१४॥
७ गोम्मटसारः। अक्ष्णामनुभवनं वेदनीयं सुखस्वरूपं सातम् । दुःखखरूपमसातं तद्वेदयतीति वेदनीयम् ॥ १४ ॥ अर्थ-इन्द्रियोंको अपने रूपादि विषयका अनुभवकरना वेदनीय है उसमें दुःखरूप अनुभवकरना असाता वेदनीय है और सुखरूप अनुभव करना साता वेदनीय है उस सुखदुखका अनुभव जो करावै जनावै वह वेदनीयकर्म है ॥१४॥ आगे आवरणका क्रम दिखानेके लिये जीवके गुणोंको कहते है। अत्थं देक्खिय जाणदि पच्छा सहहदि सत्तभंगीहि । इदि दसणं च गाणं सम्मत्तं होंति जीवगुणा ॥१५॥ अर्थ दृष्ट्या जानाति पश्चात् श्रद्दधाति सप्तभङ्गीभिः । इति दर्शनं च ज्ञानं सम्यक्त्वं भवन्ति जीवगुणाः ॥ १५॥ अर्थ संसारी जीव पदार्थको देखकर जानता है पीछे सात भङ्ग (भेद) वाली नयोंसे निश्चयकर श्रद्धान करता है इसप्रकार क्रमसे दर्शन ज्ञान और समत्त्व ये तीन जीवके गुण होते हैं । भावार्थ-देखना दर्शन, जानना ज्ञान, तथा श्रद्धान करना सम्यक्त्व है ॥ १५॥ अब इन जीवगुणोंके आवरणका शास्त्रमें जो क्रम कहा है उसे युक्तिपूर्वक कहते है। अब्भरहिदादु पुर्व णाणं तत्तो हि दंसणं होदि । सम्मत्तमदो विरियं जीवाजीवगदमिदि चरिमे ॥१६॥ अभ्यर्हितात् पूर्व ज्ञानं ततो हि दर्शनं भवति । सम्यत्तवमत्तो वीर्य जीवाजीवगतमिति चरमे ॥ १६ ॥ अर्थ-आत्माके सव गुणोंमें ज्ञानगुण पूज्य है इस कारण पहले कहा है । "क्योंकि व्याकरणमें भी ऐसा नियम है कि पूज्य हो उसको पहले कहना" उसके पीछे दर्शन कहा है। और उसके वाद सम्यक्त्व कहा है। तथा वीर्य है वह शक्तिरूप जीव और अजीव दोनोंमें पाया जाता है, जीवमें तो ज्ञानादि शक्तिरूप और अजीव पुद्गलमें शरीरादिककी शक्तिरूम इसकारण वह सबके पीछे कहा गया है इसी प्रकार इनगुणोंके आवरण करनेवाले ज्ञानावरण दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय, इन चारों कौका क्रम जानना ॥ १६ ॥ अब यहांपर प्रश्न है कि उन आठकर्मों में अन्तराय जो घातियाकर्म है वह अघातिया- ओंके अन्तमें क्यों कहा उसका उत्तर आचार्य कहते है,- घादीवि अघादि वा णिस्सेसं घादणे असकादो। णामतियणिमित्तादो विग्धं पडिदं अघादिचरिमम्हि ॥१७॥ घात्यपि अघातीव निःशेष घातने अशक्यात् । नामत्यनिमित्तादू विघ्नं पठितमघातिचरमे ॥ १७ ॥ .
८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-अन्तरायकर्म घातिया है तथापि अघातियाकर्मोकी तरह समस्तपनेसे जीवके गुणोंके घातनेको समर्थ नही है । और नाम, गोत्र, वेदनीय इनतीनों कर्मोंके निमित्तसे यह अपना कार्य करता है इसकारण अघातियाकमौके अन्तमें कहा है ॥ १७ ॥ अब अन्यकर्मोका क्रम कहते हैं:- आउवलेण अवहिदि भवस्स इदि णाममाउपुव्वं तु । भवमस्सिय णीचुचं इदि गोदं णामपुव्वं तु ॥ १८ ॥ आयुर्बलेन अवस्थितिः भवस्य इति नाम आयु:पूर्व तु । भवमाश्रित्य नीचोच्चमिति गोत्रं नामपूर्व तु ॥ १८ ।। अर्थ-आयुकर्मके वलसे (सहायतासे) नामकर्मका कार्य चारगतिरूप शरीरकी स्थिति है इसलिये आयुकर्मको पहले कहकर नाम कर्म कहा। और शरीरके आधारसे नीचपना वा उत्कृष्टपना होता है इसकारण नामकर्मको गोत्रके पहले कहाहै । भावार्थ-नामकर्मसे शरीर मिलता है परन्तु वह आयुके विना ठहर नही सकता । और गरीर है तव ऊंच नीच व्यवहार है । इसलिये आयु, नाम, गोत्रकर्म क्रमसे कहे है ॥ १८ ॥ आगे यहां प्रश्न होता है कि वेदनीयकर्म अघातिया है उसको घातियाओंके बीच में क्यों कहा ! इस प्रश्नका उत्तर गाथामें कहते है:- धादिंव वेयणीयं मोहस्स वलेण पाददे जीवं। इदि घादीणं मज्झे मोहस्सादिम्हि पढिदं तु ॥१९॥ घातिवत् वेदनीयं मोहस्य वलेन घातयति जीवम् । इति घातीनां मध्ये मोहस्यादौ पठितं तु ॥ १९ ॥ अर्थ-वेदनीयकर्म, घातियाकौकी तरह मोहनीयकर्मके भेद जो राग द्वेष है उनके उदयके बलसे ही जीवोंका घात करताहै अर्थात् इन्द्रियोंके रूपादिविषयोंमें रति (प्रीति) अरति (द्वेष ) होनेसे जीवको सुख तथा दुःख वरूप साता और असाताका अनुभव कराके अपने ज्ञानादि गुणोमें उपयोग नहीं करने देता परखरूपमें लीन कराता है । इस कारण अर्थात् घातियाकी तरह होनेसे घातियाओंके मध्यमें तथा मोहकर्मके पहिले इस वेदनीयकर्मका पाठ किया गया है । भावार्थ-जबतक रागद्वेष रहतेहै तभीतक यह जीव किसीको बुरा और किसीको भला समझता है । एक वस्तु किसीको दुरी मालम पड़ती है वही वस्तु किसीको अच्छी । जैसे कि-कटुकरसवाला नीमका पत्ता मनुष्यको अप्रिय लगता है वही पत्ता ऊंटको प्रिय, वस्तु कुछ खोटी या भली नही जो वस्तु ही होवै तो दोनोंको एकसी मालूम पड़नी चाहिये । इसकारण यह सिद्ध हुआ कि मोहनीयकर्मरूप रागद्वेषके होनेसे ही इन्द्रियोंसे उत्पन्न सुख तथा दुःखका अनुभव होताहै मोहनीय कर्मके विना वेदनीयकर्म "राजाके विना निर्वलकी तरह कुछ नहीं करसकता ॥ १९ ॥ । - or गोम्मटसारः। इसतरह कर्मोंका पाठक्रम सिद्ध हुआ उसीको अब इकट्ठाकरके दिखलाते है- णाणस्स देसणस्स य आवरणं वेयणीयमोहणियं । आउगणामं गोदंतरायमिदि पढिदमिदि सिद्धं ॥२०॥ ज्ञानस्य दर्शनस्य चावरणं वेदनीयमोहनीयम् । आयुष्कनाम गोत्रान्तरायमिति पठितमिति सिद्धम् ॥२०॥ अर्थ-ज्ञानावरण १ दर्शनावरण २ वेदनीय ३ मोहनीय ४ आयु ५ नाम ६ गोत्र ७ अन्तराय ८ इस प्रकार जो पाठका क्रम है वह पहले पाठक्रमकी तरह सिद्ध हुआ ॥२०॥ अब इन आठकर्मोंके खभावका दृष्टान्त कहते हैं; पडपडिहारसिमजाहलिचित्तकुलालभंडयारीणं । जह एदेसि भावा तहवि य कम्मा मुणेयव्वा ॥ २१ ॥ पटप्रतीहारासिमद्यहलिचित्रकुलालभाण्डागारिकाणाम् । यथा एतेपां भावा तथैव च कर्माणि मन्तव्यानि ॥ २१ ॥ अर्थ-पट अर्थात् देवताके मुख ऊपर वस्त्र १ प्रतीहार अर्थात् राजद्वारपर वैठा हुआ ड्यौड़ीवान २ असि ( शहत लपेटी तलवारकी धार ) ३ शराब ४ काठका यंत्र ५ चतेरा ६ कुंभार ७ भंडारी ( खजानची) ८ इन आठोंके जैसे अपने कार्यकरनेके भाव होते है उसी तरह क्रमसे कर्मों के भी खभाव समझना ॥ २१ ॥ अब कुछ शब्दार्थ लेकर आठकर्मोका अर्थ करते हैं वह यह है-ज्ञानको जो आवरै हुँकै वह ज्ञानावरण है, इसका खभाव देवताके मुख पर वस्त्र होना कहा है। वह इसप्रकार है कि, देवताके मुंह पर ढंका हुआ कपड़ा देवताके विशेषज्ञानको नही होने देता उसी तरह ज्ञानावरण कर्म ज्ञानको आच्छादै है विशेषज्ञान नही होने देता । दर्शनको आवरै अर्थात् वस्तुको नहीं देखने देवै वह दर्शनावरण है, इसका खभाव दरवानियाके समान कहा है, जैसे दरवानिया राजाको देखने नहीं देता देखनेसे रोक लेता है वैसे ही यह कर्म भी वस्तुका दर्शन नही होने देता । तीसरा वेद- नीयकर्म जो सुखदुःखका वेदन अर्थात् अनुभव करावै इसका खभाव सहत लपेटी तल- वारकी धार समान है, पहले चखनेसे कुछ सुख पीछे जीभके दो टुकडे होनेसे दुःख अत्यन्त होता है, इसी तरह साता और असातासे उत्पन्न हुए सुख दुःख है। जो मोहै अर्थात् असा- वधान (अचेत) करै वह मोहनीय कर्म है इसका खभाव मदिरा वगैरः जो नशा करनेवाली वस्तुएं हैं उन सरीखा है, जैसे शराब वगैरः पदार्थ, पीनेसे जीवको अचेत वा असावधान कर देते है उसको अपने खरूपका कुछविचार नहीं रहता, इसी तरह मोहनीयकर्म आत्माको वेभान बना देता है उसको अपने खरूपका विचारही नहीं रहता । और जो एति अर्थात् २ १० रायचन्द्रजैनशास्रमालायाम् पर्यायधारण करनेके निमित्त प्राप्त होवै वह आयुकर्म है, इसका खभाव लोहेकी सांकल वा काठके यंत्रके समान है, जैसे सांकल अथवा काठकायंत्र पुरुपको अपनेस्थानमें ही स्थित रखता है दूसरी जगह नहीं जाने देता, ठीक उसीप्रकार आयुकर्म मनुप्यादि पर्यायमें स्थित (मौजूद ) रखता है दूसरी जगह नहीं जाने देता। फिर नाना अर्थात् अनेक तरहके मिनोति अर्थात् कार्य बनावै वह नामकर्म है यह चतेरेकी तरह है, जैसे चतेरा अनेक प्रका- रके चित्राम ( तसबीर ) बनाता है उसी प्रकार नामकर्म नारक आदि अनेकरूप धारण कराता है । सातवां गोत्रकर्म जोकि गमयति अर्थात् ऊंच नीचपनेको प्राप्त करै, इसका कुंभारके समान खभाव है, जैसे कुंभार मट्टीके वासन छोटे बड़े बनाता है वैसेही यह गोत्रकर्मभी जीवकी ऊंच तथा नीच अवस्था करता है । अन्तरायकर्म वह है जो " अन्तरं एति" अर्थात् दाता तथा पात्रमें आपसमें अन्तर प्राप्त करै । इसका स्वभाव भंडारी सरीखा है जैसे भंडारी ( खजानची) दूसरेको दान देनेमें विघ्न करता है देनेसे रोकता है, उसी तरह अन्तरायकर्म दानलाभादिमें विघ्न करता है । इस तरह इन आठ मूल-कर्मोंका शब्दार्थ करके खरूप कहा ॥ अब इन कर्मोंकी उत्तरप्रकृतियोंकी [ विशेषभेदोंकी ] उत्पत्तिका क्रम कहते हैं;- पंच णव दोण्णि अठ्ठावीसं चउरो कमेण तेणउदी। तेउत्तरं सयं वा दुगपणगं उत्तरा होति ॥ २२ ॥ पञ्च नव द्वौ अष्टाविंशतिः चत्वारः क्रमेण त्रिनवतिः । व्युत्तरं शतं वा द्विकपञ्चकमुत्तरा भवन्ति ॥ २२ ॥ अर्थ-ज्ञानावरण आदि आठकर्मों के प्रत्येकभेद क्रमसे पांच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, ति- रानवै अथवा एकसौतीन, दो, पांच होते है ऐसा जानना। भावार्थ-ज्ञानावरणके मतिज्ञाना- वरण १ श्रुतज्ञानावरण २ अवधिज्ञानावरण ३ मनःपर्ययज्ञानावरण ४ केवलज्ञानावरण ये ५ भेद । दर्शनावरणके चक्षुदर्शनावरण १ अचक्षुदर्शनावरण २ अवधिदर्शनावरण ३ केवलदर्श- नावरण ४ और स्त्यानगृद्धि ५ निद्रानिद्रा ६ प्रचलाप्रचला ७ निद्रा ८ प्रचला ९ ये पांचनिद्रा इस प्रकार नौ भेद है ॥ २२ ॥ अब दर्शनावरणीयके भेदमें पांचनिद्राका कार्य तीन गाथाओंसे कहते हैं- थीणुदयेणुट्ठविदे सोवदि कम्मं करेदि जप्पदि य । णिदाणिहुदयेण य ण दिडिमुग्पादितुं सको ॥ २३ ॥ स्त्यानगृयुदयेन उत्थापिते स्वपिति कर्म करोति जल्पति च । निद्रानिद्रोदयेन च न दृष्टिमुद्घाटयितुं शक्यः ॥२३॥ अर्थ-स्त्यानगृद्धिदर्शनावरणी कर्मके उदय कर उठाया हुआ भी सोता रहै उस नींदमें .
गोम्मटसारः। ११ ही अनेक कार्य कर तथा कुछ बोले भी परन्तु सावधानी न होय ॥ और निद्रानिद्राकर्मके उदयसे अनेक तरहसे सावधान कियाहुआ भी आखोंको नही उघाड़ सकता है ॥ २३ ॥ पयलापयलुदयेण य वहेदि लाला चलंति अंगाई। णिहुदये गच्छंतो ठाइ पुणो वइसइ पडेई ॥ २४ ॥ प्रचलाप्रचलोदयेन च वहति लाला चलन्ति अगानि । निद्रोदये गच्छन् तिष्ठति पुनः विशति पतति ।। २४ ॥ अर्थ–प्रचलाप्रचलाकर्मके उदयसे मुखसे लार वहतीहै और हाथ वगैरः अंग चलते हैं, स्थिर नहीं रहते । तथा निद्राकर्मके उदय होनेसे गमन करता हुआ खड़ा होजावै बैठ- जावै गिरपडै इत्यादि क्रिया करता है ॥ २४ ॥ पयलुदयेण य जीवो ईसुम्मीलिय सुवेइ सुत्तोवि । ईसं ईसं जाणदि मुहं मुहं सोवदे मंदं ॥ २५ ॥ प्रचलोयेन च जीव ईषदुन्मील्य स्वपिति सुप्तोपि। ईषदीपज्जानाति मुहुर्मुहुः खपिति मन्दम् ॥ २५ ॥ अर्थ-प्रचलाकर्मके उदयसे यह जीव कुछ एक आखोंको उघाड़कर सोता है, और सोता हुआभी थोड़ा थोड़ा जानता है बार बार मन्द ( थोड़ा ) शयन करता है । यह नि- द्रा श्वानके समान है सब निद्राओंसे उत्तम है । इस प्रकार दर्शनावरणीयकर्मके कुछ भेदों का कार्य कहा ॥ २५ ॥ वेदनीयकर्म सातावेदनीय १ असातावेदनीय २ दो भेदखरूप है । मोहनीयकर्म भी साधारण रीतिसे दो प्रकारका है-दर्शनमोहनीय १ चारित्रमोहनीय २ इनमें दर्शनमोहनीय बंधकी अपेक्षा मिथ्यात्वरूप एक ही है और उदय तथा सत्ताकी अपेक्षा मिथ्यात्व १ सम्य- ग्मिथ्यात्व २ सम्यक्त्वप्रकृति ३ इन तीन स्वरूप है ॥ आगे ये तीन भेद किस तरह हो जाते है ? इसका उत्तर कहते हैं- जंतेण कोहवं वा पढमुवसमसम्मभावजंतेण । मिच्छं दव्वं तु तिधा असंखगुणहीणदव्वकमा ॥ २६ ॥ यन्त्रेण कोद्रवं वा प्रथमोपशमसम्यक्त्वभावयन्त्रेण । मिथ्यात्वं द्रव्यं तु त्रिधा असंख्यगुणहीनद्रव्यक्रमात् ॥ २६ ॥ अर्थ-यन्त्र अर्थात् घरटीकरि दलेहुए कोदोंकीतरह प्रथमोपशमसम्यक्त्वपरिणामरूप यन्त्रसे मिथ्यात्वरूपी कर्मद्रव्य क्रमसे असख्यात गुणा कम होता हुआ तीन प्रकार हो जाता है । भावार्थ-जैसे कोदों-धान्यविशेष दलनेपर मुसी, तंडल और कण ऐसे तीन रूप होजाता है उसीतरह मिथ्यात्वरूप कर्मद्रव्य भी उपशमसम्यत्तवरूपी यन्त्रकेद्वारा मिथ्यात्व, १. सम्यक्त्वके भेदोंमेंसे उपशमसम्यक्त्व दो प्रकार है-प्रथमोपशमसम्यक्त्व १ द्वितीयोपशमसम्यक्त्व । ?
१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व इन तीन खरूप परिणमन करता है। इस कारण एक मिथ्यात्व- रूप दर्शनमोहनीयकर्मके तीन भेद कहे है ॥ २६ ॥ चारित्रमोहनीयके दो भेद हैं एक कयायवेदनीय दूसरा नोकपायवेदनीय, उनमें कपाय- वेदनीय १६ प्रकार है, उसको क्षयहोनेके क्रमसे कहते हैं-अनन्तानुबन्धीक्रोध १ मान २ माया ३ लोभ ४, अप्रत्याख्यान ( अप्रत्याख्यानावरण) क्रोध ५ मान ६ माया ७ लोभ ८, प्रत्याख्यान (प्रत्याख्यानावरण ) क्रोध ९ मान १० माया ११ लोभ १२, संज्वलनक्रोध १३ मान १४ माया १५ लोभ १६। और नोकपायवेदनीयके नव भेद है-पुरुपवेद १ स्त्रीवेद २ नपुंसकवेद ३ रति ४ अरति ५ हास्य ६ शोक ७ भय ८ जुगुप्सा ९। आयुकर्म चारतरहका है-नरकायु १ तिर्यंचआयु २ मनुष्य ३ देवआयु ४) तथा नामकर्म पिंड (भेदवाली) और अपिंड (भेद रहित ) प्रकृतियोंसे व्यालीस प्रकार है, उन दोनों प्रकृतियोंमें पिंड ( भेदवाली ) प्रकृति १४ है-गति १ (नरक १ तिर्यच २ मनुष्य ३ देवगति ४ ) जाति २ (एकेन्द्री १ दोइन्द्री २ तेइन्द्री ३ चौइन्द्री ४ पंचेंद्रीजाति ५) शरीरनाम ३ ( औदारिक १ वैक्रियिक २ आहारक ३ तैजस ४ कार्मणशरीर ५)॥ अब इन पांचशरीरोंके भी संयोगी ( मिलेहुए ) भेद कहते हैं- तेजाकम्महि तिए तेजा कम्मेण कम्मणा कम्मं । कयसंजोगे चदुचदुचदुदुग एकं च पयडीओ ॥ २७ ॥ तैजसकार्मणाभ्यां त्रये तैजसं कार्मणेन कार्मणेन कार्मणं । कृतसंयोगे चतुश्चतुश्चतुर्दिकमेकं च प्रकृतयः ।। २७ ॥ अर्थ-तैजसशरीर और कार्मण शरीरके साथ औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीरका आपसमें संबंध करनेसे चार, चार और चार इसतरह मिलकर १२ भेद होते है। तथा कार्मणशरीरके साथ तैजसशरीरके मिलनेसे दो भेद और कार्मणशरीरके साथ कार्मणका संबंध होनेसे एक भेद इसतरह सब मिलकर १५ भेद होते है। इनका खुलासा यह है- औदारिकऔदारिक १ औदारिकतैजस २ औदारिककार्माण ३ औदारिकतैजसकार्माण ४ वैक्रियिकवैक्रियिक ५ वैक्रियिकतैजस ६ वैक्रियिककार्माण ७ वैक्रियिकतैजसकार्माण ८ आ- हारकआहारक ९ आहारकतैजस १० आहारककार्माण ११ आहारकतैजसकार्माण १२ तैजसतैजस १३ तैजसकार्माण १४ कार्माणकार्माण १५ इस प्रकार पंद्रह भेद हुए । इनमेंसे पांच जो " औदारिकऔदारिक, वैक्रियिकवैक्रियिक, आहारकआहारक, तैजसतैजस, का- र्माणकार्माण " है वह पहले कहे हुए पांच शरीरोंमें शामिल हो जाते है । इस कारण मुख्य यहां १० भेद हुए।जैसे चक्रवर्ती जब विक्रियाकरके १ कम ९६००० च्यानवैहजार शरीर बनाता है तब औदारिकसे औदारिकशरीर बनाता है उसको औदारिकऔदारिक गोम्मटसारः। १३ कहते है । इसीतरह देवके वैक्रियिकसे वैक्रियिक होता है उसे वैक्रियिकवैक्रियिक कहते हैं, इसप्रकार और भेदभी समझलेना ॥ २७ ॥ वन्धन नामकर्म ४ ( औदारिकशरीरबंधन १ वैक्रियिकबंधन २ आहारकबंधन ३ तैज- सबंधन ४ कार्माणशरीरबंधन ५) । संघातनामकर्म ५ ( औदारिकशरीरसंघात १ वैकि- यिकसंघात २ आहारकसंघात ३ तैजससंघात ४ कार्माणशरीरसंघात ५) शरीरसंस्थान- नामकर्म ६ (समचतुरससस्थान १ न्यग्रोधपरिमण्डल २ खाति ३ कुब्ज ४ वामन ५ हुंड- संस्थान ६)। शरीरआंगोपांग नामकर्म ७ (औदारिकशरीर आंगोपांग १ वैक्रियिक आं- गोपांग २ आहारकशरीर आगोपांग ३ ) तैजस तथा कार्माणके आंगोपाग नहीं है। अब आंगोपांग कौन २ है यह कहते हैं, णलया वाहू य तहा णियंवपुट्टी उरो य सीसो य । अद्वैव दु अंगाई देहे सेसा उवंगाई ॥ २८ ।। नलको बाहू च तथा नितम्बपृष्ठे उरश्च शीर्प च । अप्टेव तु अगानि देहे शेषाणि उपाङ्गानि ॥ २८ ॥ अर्थ-दो पग, दो हाथ, कमरिके पीछेका भाग ( चूतड़), पीठ, हृदय, और मस्तक ये शरीरमें आठ अंग है और दूसरे नेत्र कान वगैरः सब उपाङ्ग कहेजाते है ॥ २८ ॥ संहनननामकर्म ८ (वज्रवृपभनाराच १ वज्रनाराच २ नाराच ३ अर्द्धनाराच ४ कीलित ५ असंप्राप्तामृपाटिकासंहनन ६)॥ आगे ये छहसहननवाले जीव किस २ संहननसे कौन २ गतिमें उत्पन्न होते है यह कहते है:- सेवट्टेण य गम्मइ आदीदो चदुसु कप्पजुगलोत्ति। . तत्तो दुजुगलजुगले खीलियणारायणद्धोत्ति ॥ २९ ॥ सृपाटेन च गम्यते आदितः चतुर्प कल्पयुगल इति । ततः द्वियुगलयुगले कीलितनाराचार्द्ध इति ॥ २९ ॥ अर्थ-सृपाटिकासहननवाले जीव वर्गगतिमें जो उत्पन्न होवें तो पहले सौधर्मयुगल (सौधर्म, ऐशानवर्ग २ ) से चौथे लातवयुगल (लातव १ कापिष्टवर्ग २) तक चार युग- लोंमें उत्पन्न होते है। फिर चौथे युगलके बाद दो दो युगलोंमें क्रमसे कीलितसहननवाले और अर्द्धनाराचसहननवाले जीव जन्म धारते हैं अर्थात् पाचवें तथा छढे खर्गयुगल में कीलितसंहननवाले और सांतवें तथा आठ खर्गयुगलमें सृपाटिकासंहननवाले जन्म लेते हैं ॥ २९॥ .
- १४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । णवगेविजाणुद्दिसणुत्तरवासीसु जांति ते णियमा। तिदुगेगे संघडणे णारायणमादिगे कमसो ॥३०॥ नवौवेयिकानुदिशानुत्तरवासिपु यान्ति ते नियमात् । त्रिद्विकैकेन संहननेन नाराचादिकेन क्रमशः ॥ ३० ॥ अर्थ-नाराच आदि तीन संहननसे अर्थात् नाराच, वज्रनाराच, वज्रवृषभनाराच इन तीनसंहननोंके उदयसे ये जीव नवग्रैवेयिकमें, वज्रनाराच, वज्रवृषभनाराच दो संहननवाले नव अनुदिशविमानोंमें तथा वज्रवृषभनाराच संहननवाले पांच अनुत्तरविमानोंमें उत्पन्न होतेहैं । इस प्रकार वर्गमें जन्मलेनेकी मर्यादा कही ॥ ३० ॥ सपणी छस्संहडणो वजदि मेघ तदो परं चापि । सेवहादीरहिदो पण पणचदुरेगसंहडणो ॥ ३१ ॥ संज्ञी षट्संहननो ब्रजति मेघां ततः परं चापि । सृपाटादिरहितः पञ्चमी पञ्चचतुरेकसंहननः॥ ३१ ।। अर्थ -छह संहननवाले सेंनी (मनसहित) जीव यदि नरकमें जन्मलेवें तो मेघानाम तीसरे नरकपर्यन्त जाते हैं, और सुपाटिकासंहननरहित पांच संहननवाले अरिष्टा नाम पां- चवीं नरककी पृथ्वीतक उपजते हैं, चारसंहननवाले अर्थात् अर्द्धनाराचपर्यंतवाले पांचवींके बाद जो मघवी नाम छट्ठी पृथिवी है वहांतक, और आदिके वनवृषभनाराचसंहननवाले सातवीं माधवी नाम पृथिवीतक उत्पन्न होते है ॥ ३१ ॥ अंतिमतियसंहडणस्सुदओ पुण कम्मभूमिमहिलाणं । आदिमतिगसंहडणं णस्थिति जिणेहिं णिद्दिष्टं॥ ३२ ॥ अन्तिमत्रयसंहननस्योदयः पुनः कर्मभूमिमहिलानाम् । आदिमत्रिकसंहननं नास्तीतिजिनैनिर्दिष्टम् ॥ ३२ ॥ अर्थ-अन्तके तीन अर्द्धनाराचादिसंहननोंका उदय कर्मभूमिकी स्त्रियोंके होता है और आदिके तीन बज्रवृषभनाराचादिसंहनन कर्मभूमिकी स्त्रियोंके होते ही नहीं ऐसा जिनेन्द्र- देवने कहा है ॥ ३२॥ वर्ण नामकर्म ९ ( काला १ नीला २ लाल ३ पीला ४ सफेद ५)। गंध नामकर्म १० (सुगंध १ दुर्गध २)। रस नामकर्म ११ (तीखा अथवा चरपरा १ कडुआ २ कसैला ३ खट्टा ४ मीठा ५)। स्पर्श नामकर्म १२ ( कठोर १ कोमल २ भारी ३ हलका ४ रूखा५ चिकना ६ ठंढा ७ गर्म ८)। आनुपूर्वी नामकर्म १३ (नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी १ तिर्यंच- गतिप्रायोग्यानुपूर्वी २ मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी ३ देवगतिप्रायोग्य आनुपूर्वी ४ ) इस प्रकार तेरह ये और उद्योतके पीछे विहायोगति नामकर्म (प्रशस्तविहायोगति १ अप्रशस्तविहायो- गति २) ये सब १४ पिंडप्रकृतियां है । और २८ अपिंडप्रकृतियां है वे इस प्रकार हैं- गोम्मटसार। १५ अगुरुलघुक १ उपधात २ परघात ३ उच्छवास ४ आतप ५ उद्योत ६ । यहां पर कोई भ्रम करै कि, आतपप्रकृतिका उदय अग्निकायमें भी होना चाहिये, क्योंकि जो संताप करै अर्थात् उष्णपनेसे जलावै वह आताप है इस भ्रमके दूर करनेके लिये आ- गसे भिन्न आतपका लक्षण गाथामें कहते है। मूलुण्हपहा अग्गी आदावो होदि उण्हसहियपहा । आइचे तेरिच्छे उण्हूणपहा हु उज्जोओ॥ ३३ ॥ मूलोष्णप्रभा अग्निः आतापो भवति उष्णसहितप्रभा । आदिये तिरश्चि उष्णोनप्रभा हि उद्योतः ॥ ३३ ॥ अर्थ-आग है वह मूलसे ही उष्ण प्रभासहित है इसकारण उसके स्पर्शनामकर्मका भेद उप्णस्पर्शनामकर्मका उदय जानना । और जिसकी प्रभा (किरणोंका फैलाव ) ही उष्ण होवै उसको आतप कहते है, इस आतपनामकर्मका उदय सूर्यके विम्ब (विमान) में उत्पन्न- हुए बादरपर्याप्त पृथ्वीकायके तिर्यचजीवोंके समझना । तथा जो उष्ण रहित प्रभा है उसको उद्योत नियमसे जानना ॥ ३३ ॥ "विहायोगति नामकर्म " जोकि पिंड प्रकृतियोंमें गिनाया है। त्रस नामकर्म ७ बादर नामकर्म ८ पर्याप्त नामकर्म ९ प्रत्येकशरीर नामकर्म १० स्थिर नामकर्म ११ शुभ नामकर्म १२ सुभग नामकर्म १३ सुखर नामकर्म १४ आदेय नामकर्म १५ यशस्कीर्ति नामकर्म १६ निर्माण नामकर्म १७ तीर्थकर नामकर्म १८ स्थावर नामकर्म १९ सूक्ष्म नामकर्म २० अ- पर्याप्त नामकर्म २१ साधारणशरीर नामकर्म २२ अस्थिर नामकर्म २३ अशुभ नामकर्म २४ दुर्भग नामकर्म २५ दुःस्वर नामकर्म २६ अनादेय नामकर्म २७ अयशस्कीर्ति नामकर्म २८ इस रीतिसे पिंड प्रकृति १४ तथा अपिंड (जुदी जुदी) प्रकृतियां २८ सब मिलकर नाम- कर्मकी ४२ प्रकृतियां है । यदि सब भेद अलग २ बोले जावे तो ९३ अथवा शरीर ना- मकर्मकेमिले हुए दश भेद जोडनेसे १०३ प्रकृतियां है, इसी अपेक्षासे कोई आचार्य सब कर्मोंकी १५८ प्रकृतियां कहते है। जो इन भेदोंको पांच शरीरमें ही गर्भित करलें तो १४८ ही प्रकृतियां है ।। गोत्रकर्म है उसके दो भेद है-ऊंच गोत्र तथा नीच गोत्र । अन्तराय- कर्मके पांच भेद है-दानान्तराय १ लाभान्तराय २ भोगातराय ३ उपभोगान्तराय ? वीर्यान्तराय ५ । इस तरह फर्मोंके आठ मूलभेदोंके १४८ उत्तरभेद कहे ।। अब कहते है कि-इन प्रकृतियोंका और आत्माका दूध, पानीकी तरह आपसमें एक- रूप होना यहीं बंध है। और जैसे योग्यपात्रमें रक्खे हुए अनेक तरहके रस बीज फूल तथा फल सब मिलकर मदिरा (शराब) भावको प्राप्त होते है उसीप्रकार कर्मरूप होने- योग्य कार्मणवर्गणानामके पुद्गलद्रव्य योग और क्रोधादिकषायके निमित्तकारणसे कर्मभावको - १ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १६ प्राप्त होते हैं जभी कर्मपनेकी सामर्थ्य प्रगट होती है। और इस जीवकर एक समयमें होने- वाले अपने एकही परिणामसे ग्रहण (संबंध) किये कर्मयोग्य पुद्गल, ज्ञानावरणादि अनेक- भेदरूप होके परिणमते है। जैसे एकबार ही खाया हुआ एक ग्रास (गस्सा) रूप अन्न है, वह रस लोही मांस आदि अनेक धातुरूप परिणमता है उस प्रकार । अब इन सब कोंके भेदोंका शब्दार्थ करते हुए कार्य कहते हैं। क्योंकि कर्मों के निमित्तसे ही जीवकी अनेक दशायें होती है, इस कारण सब प्रकृतियोंका स्वरूप जानना बहुत जरूरी है। मतिज्ञानको जो आवरण करै अथवा जिसद्वारा मतिज्ञान आवरण कियाजाय अर्थात् ढंका जाय वह मतिज्ञानावरण कर्म १ है । श्रुतज्ञानको जो आवरण करै वह श्रुतज्ञानावरण २ है । अवधिज्ञानको आवरण करै वह अवधिज्ञानावरण ३ है । मनःपर्ययज्ञानको जो आवरण करै वह मनःपर्ययज्ञानावरण ४ है । और केवलज्ञानको " आवृणोति" ढंकै वह केवलज्ञानावरण ५ है । इस प्रकार ज्ञानावरणके पांच भेदोंका स्वरूप कहा ॥ "आवृणोति आत्रियते अनेनेति आवरणम्" ऐसी व्युत्पत्ति है अर्थात् जो आवरण करै या जिससे आवरण कियाजाय वह आवरण है, जो चक्षुसे दर्शन नहीं होने देवै वह चक्षु- दर्शनावरण कर्म ६ है । चक्षु (नेत्र) के सिवाय दूसरी चार इन्द्रियोंसे दर्शन (सामान्यज्ञान) नहीं होने देवै वह अचक्षुदर्शनावरणीय है । अवधिद्वारा दर्शन न होने देवै वह अवधि- दर्शनावरण ८ है। केवलदर्शन अर्थात् त्रिकालमें रहनेवाले सव पदार्थोंका दर्शन उसका आवरण करै अर्थात् दर्शन नही होने देवै उसे केवलदर्शनावरण ९कहते है। "स्त्याने स्वापे गृध्यते दीप्यतेसा स्त्यानगृद्धिः (निद्राविशेषः) दर्शनावरणः" धातुशब्दोंके व्याकरणमें अनेक अर्थ होनेसे यहां " स्त्यै " धातुका सोना और " गृधू " धातुका दीप्ति अर्थ समझलेना। इस कारण यह अर्थ हुआ कि, जो सोवनेमें प्रकाश करै अर्थात् जिसके उदय होनेसे यह जीव नींदमें ही उठकर बहुत पराक्रमका कार्य करै पीछे भान नही रहै कि क्या कियाथा उसे स्त्यानगृद्धि दर्शनावरण १० कहते है । जिसके उदयसे निद्राकी ऊंची प्रवृत्ति होवै अर्थात् आंखके पलक भी नहीं उघाडसकै उसे निद्रानिद्रा कर्म ११ कहते है। "यदुदयात् या क्रिया आत्मानं पुनः पुनः प्रचलयति तत्प्रचलाप्रचलादर्शनावरणम् " जिसकर्मके उदयसे क्रिया आत्माको बार २ चलावै अर्थात् शोक, अथवा खेद या मद (नशा) आदिसे हुई जो निद्राकी अवस्था उसमें बैठते हुए भी शरीरके अङ्ग बहुत चलायमान होवै कुछ सावधानी न रहै वह प्रचलाप्रचलादर्शनावरणकर्म १२ है । जिसके उदयसे मद खेद आदिकदूरकरनेकेलिये केवल सोवना वह निद्रादर्शनावरण १३ है। जिसके उदयसे शरीरकी क्रिया आत्माको चलावै अर्थात् निद्रामें कुछ काम करै उसकी यादभी कुछ रहै कुत्तेकी तरह अल्पनिद्रा होवै वह प्रचलादर्शनावरणकर्म १४ है । इसतरह दर्शनावरणकर्मके नव भेद कहे ॥ जिसके उदयसे , , गोम्मटसारः। १७ देवादिगतिमें शारीरिक तथा मानसिक सुखकी प्राप्ति रूप जो साता उसको 'वेदयति' भोग- वावै अथवा "वेद्यते अनेन" जिसकर भोगैवह सातावेदनीय कर्म १५ है। जिसके उदयका फल अनेकप्रकार नरकादिकगतिजन्य जो दुःख उसको भोगवावै वह असातावेदनीयकर्म १६ है, इस रीतिसे वेदनीय कर्म दो प्रकार कहा । दर्शनमोहनीयकर्म बंधकी अपेक्षासे एक प्रकार है तौभी उदय, सत्ताकी अपेक्षा तीन तरहका कहा है। उसमें जिसके उदयसे मिथ्या (खोटा) दृष्टि (श्रद्धान ) होवै अर्थात् सर्वज्ञ-कथित वस्तुके यथार्थ स्वरूपमें रुचि न होवै, न उद्यम करैऔर हित अहितका विचार नही करै वह मिथ्यात्वनाम दर्शनमोहनीय १७ है । जिसकर्मके उदयसे सम्यक्त्वगुणकाभी मूलसे घात न होवै परंतु परिणामों में कुछ चलायमानपना तथा मलिनपना होवै जैसे यह मंदिर मेरा यह उसका, "शांतिनाथ" शांतिकरनेवाले "पार्श्वनाथ" रक्षाकरनेवाले, इत्यादि मलिनपनाश्रद्धानमें होना उसे सम्यक्त्वप्रकृति दर्शनमोहनीयकर्म १८ कहते है, इस प्रकृतिवाला सम्यग्दृष्टि ही कहलाता है । जिसकर्मके उदयसे परिणामों में वस्तुका यथार्थ श्रद्धानपना और अयथार्थ श्रद्धानपना दोनों ही दही और गुड़के मिले स्वादकी तरह मिले हुए हों उसे सम्यग्मिथ्यात्व दर्शनमोहनीयकर्म १९ कहते है। इन परिणामोंको दोनोंमेंसे किसीके भी नही कहसकते । इस प्रकार दर्शनमोहनीयके तीन भेद कहे ॥ चारित्रमोहनीके दो भेद कहे हैं, उनमेंसे कषाय वेदनीयसोलह प्रकार है उसको कहते हैं-"कषन्ति हिंसन्तीति कषायाः" जोगुणका घात करै अर्थात् ढकंप्रगट नहीं होने देवें उनको कषाय कहते है । वे क्रोध, मान, माया, लोभ, ये चार है इनकी भी चार २ अवस्था हैं । हर एक अवस्था कमसे कहते अनन्त जो संसार उसका कारण हो वह भी अनन्त कहा जाता है जैसे प्राणका कारण अन्नको प्राण कहना सो यहां पर मिथ्यात्व परिणाम अनन्त कहा गया है उसके साथ जो रहै अर्थात् सम्यक्त्वपरिणाम को घातै वह अनन्तानुवन्धी क्रोध २० मान २१ माया २२ लोभ २३ भेदवाली कपाय जानना ॥ " अ" माने थोडे भी प्रत्याख्यान (त्याग) को जो आवरना होवै अर्थात् जिसके उदयसे थोड़ा व्रतभी नही धारण करसकै उसे अप्रत्याख्यानाचरण क्रोध २४ मान २५ माया २६ लोभ २७ चारित्रमोहनीय कर्म कहते है। जिसके उदयसे प्रत्याख्यान अर्थात् सर्वथा त्यागका आवरण होवै महाव्रत नहीं पालसकै उसे प्रत्याख्यानावरण क्रोध २८ मान २९ माया ३० लोभ ३१ कषायवेदनीय जानना ॥ जिसके उदयसे "सं" एक रूप होकर " ज्वलति " संयम प्रकाश करै अर्थात् कषाय अंशसे मिला हुआ संयम रहै, कषाय रहित निर्मल संयम जो यथाख्यात वह न होसकै उसे संज्वलन क्रोध ३२ मान ३३ माया ३४ लोभ ३५ कषाय वेदनीय , १ इसमे कोदो चावलका भी दृष्टान्त घटाया है जैसे कोदों चावल मादक (नशा करनेवाले ) है जो वे पानीसे घोडाले जावे तो कुछ मादकशक्ति रह जाती है कुछ चली जाती है । इसी प्रकार मिथ्यात्वपरिणाम भी उपशम सम्यक्त्वरूप जलसे शुद्ध किये जावे तो उनमे कुछ मिलावट रहजाती है। ३ १८ रायचन्द्र जैनशासमालायाम् । कहते है । यह कर्म यथाख्यातचारित्रको घातता है । अब नोकपायवेदनीय नौ प्रकार है उसे कहते है-नो माने ईषत् [ थोड़ा ] जो कपाय हो प्रबल नही होवै उसे नोकपाय कहते है उसका जो अनुभवकरावै वह " नोकषायवेदनीयकर्म" है । जिसके उदयसे अपनी हास्य प्रगट होवै वह हास्य कर्म ३६ है । जिसके उदयसे देश धन पुत्रादिमें विशेष प्रीति होवै उसे रति कर्म ३७ कहते है । जिसके उदयसे देश आदिमें अप्रीति हो उसको अरति कर्म ३८ कहते है। जिसके उदयसे इष्टके वियोग होनेपर क्लेश हो वह शोक कर्म ३९ है। जिसके उदयसे उद्वेग (चित्तमें घबराहट ) हो उसे भय कर्म ४० कहते है। जिसके उदयसे अपने दोषको ढंकना दूसरेके दोष प्रगट कर ग्लानि करना वह जुगुप्सा कर्म ४१ है । जिसके उदयसे स्त्रीसंबंधी भाव ( मृदुखभावका न होना, मायाचारकी अधिकता नेत्रविभ्रम आदिद्वारा पुरुषके साथ रमनेकी इच्छा) हों उसको स्त्रीवेद कर्म ४२ कहते है । जिसके उदयसे स्त्रीमें रमण करनेकी इच्छा रूप परिणाम हों उसे पुरुपवेद कर्म ४३ कहते है । और जिसकर्म के उदयसे स्त्री तथा पुरुष दोनोंमें रमण करनेकी इच्छा हो उसको नपुंसकवेद कर्म ४४ कहते हैं । इस तरह नव भेद नोकपायके और १६ मेद कषायके सब मिलकर २५ भेद चारित्रमोहनीयके तथा ३ भेद दर्शन मोहनीयके, कुल २८ भेद मोहनीयकर्मके हुए। आयुकर्म चार प्रकार है उसे दिखाते हैं जो कर्म आत्माको नारक १ तिर्यंच २ मनुष्य ३ तथा देवके शरीरमें प्राप्त करै अर्थात् नारकादि शरीर में रोक रक्खै उसे क्रमसे नरकायु ४५ तिर्यंचायु ४६ मनुष्यायु ४७ देवायुकर्म ४८ कहते है। नामकर्मके भेदोंको दिखाते है:-जिसके उदयसे यहजीव एकपर्यायसे दूसरी पर्यायको " गच्छति" प्राप्त हो वह गति नामकर्म १ है उसके चार भेद कहे है; जिसकर्मके उदयसे यह जीव नारकी आकार १ तिथेचाकार २ मनुप्यके शरीराकार ३ देवशरीराकार होवै उसको नरकगति ४९ तिर्यंचगति ५० मनुष्यगति ५१ तथा देवगति कर्म ५२ कहते है । और जो उन गतियोंमें अव्यभिचारी और सादृश्य धर्मसे जीव इकट्ठे किये जावें वह जाति नामकर्म २ है अर्थात् एकेन्द्री दोइंद्री आदि जीव समान स्वरूप है तौभी आपसमें एक दूसरेसे मिलते नही यह तो अव्यभिचारीपना, और नही मिलते हुए भी एकेन्द्रियपना सबमें सरीखा है यह हुआ सादृश्यपनाये दोनोंधर्म एकेन्द्रियादि जीवोंमें है। वह जाति ५ प्रकार है; जिसके उदयसे यह आत्मा एकेन्द्री १ वे इन्द्री २ ते इन्द्री ३ चौ इन्द्री १ पंचन्द्री ५ कहा जाय उसे एकेन्द्रीजाति ५३ वेइन्द्रीजाति ५४ तेइन्द्रीजाति ५५ चौइन्द्रीजाति ५६ तथा पंचेन्द्रीजाति नामकर्म ५७ समझना । जिसके उदयसे शरीर रचा जावै अर्थात् बनैं उसे शरीर नामकर्म ३ कहते है वह पांच प्रकार है, जिसके उदयसे औदारिकशरीर १ वैक्रियिकशरीर २ आहारकशरीर ३ तैजसशरीर ४ कार्मणशरीर गोम्मटसारः। १९ (कर्मपरमाणुओंका समूहरूप) ५ उत्पन्न हो उसे औदारिक शरीर नाम ५८ वैक्रियिकशरीर ५९ आहारकशरीर ६० तैजसशरीर ६१ तथा कार्मणशरीरनामकर्म ६२ कहते है। और शरीर नामकर्मके उदय वशसे जो आहार-वर्गणारूप पुद्गलके स्कन्ध इस जीवने ग्रहण किये थे उन पुद्गलस्कन्धोंके प्रदेशों ( हिस्सों) का आपसमें संबंध ( मिलना) होना जिस कर्मके उदयसे हो उसे बंधननाम कर्म ४ कहते है। उसके औदारिकशरीर वन्धन ६३ वैक्रियिकशरीरवन्धन ६४ आहारकशरीरवन्धन ६५ तैजसशरीरब- धन ६६ कार्मणशरीरबंधन ६७ इसरीतिसे पांच भेद है । जिसके उदयसे औदारिक आदि शरीरोके परमाणु आपसमें मिलकर छिद्र रहित एक होजावें उसे संघातनामकर्म ५ कहते है। यह भी औदारिकसंघात ६८ वैक्रियिकसंघात ६९ आहारकसंघात ७० तैजससंघात ७१ कार्मणशरीरसंघात ७२ इस तरह पांच प्रकार है । जिसकर्मके उदयसे शरीरका आकार ( शकल ) वनै उसे संस्थान नामकर्म ६ कहते है वह छ.प्रकार है-जिसके उदयसे शरीरका आकार ऊपर नीचे तथा बीचमें समान ( चौकोर ) हो वह समचतुरस्रसंस्थान ७३ कर्म है जिसके उदयसे न्यग्रोधके ( वडके ) वृक्ष सरीखा "ऊपरसे मोटा नाभिके नीचेसे पतला" शरीरका आकार हो वह न्यग्रोधपरिमण्डल-संस्थान ७४ है, जिसके उदयसे खातिके ( सर्पकी बॉमी ) समान आकार हो अर्थात् ऊपरसे पतला और नाभिसे नीचे मोटा हो उसे स्वातिसंस्थान ७५ कहते है, जिसकर्मके उदयसे कुबड़ा शरीर हो उसे कुब्जकसंस्थान ७६ कहते है, जिसके उदयसे बौना शरीर हो वह वामन संस्थान ७७ है, जिसकर्मके उदयसे शरीरके अंगोपाग किसी खास शकलके न हों भया- नक बुरे आकार बनै उसे हुंडक संस्थान नामकर्म ७८ कहते है । जिसके उदयसे अंगो- पागका भेद हो वह आंगोपांग ७ कर्म है उसके तीन भेद है-औदारिकआंगोपांग ७९ वैक्रियिकांगोपांग ८० आहारकआंगोपांग ८१ । जिसके उदयसे हांडोंके बंधनमें विशेषपना हो उसे संहनन नामकर्म ८ कहते है, वह छःप्रकार है-जिसकर्मके उदयसे ऋषभ (बेठन ) नाराच (कीला ) संहनन (हाड़ोंका समूह ) वज्रके समान हो अर्थात् इन तीनोंका किसी शस्त्रसे छेदन भेदन न होसकै उसे वज्रर्षभनाराचसंहनन नामकर्म ८२ कहते है, जिस कर्मके उदयसे वज्रके हाड और वज्रकी कीली हो परंतु बेठन वज्रके न हों ऐसा शरीर हो वह वज्रनाराचसंहनन ८३ है, जिसकर्मके उदयसे शरीरमें वज्ररहित ( साधारण ) वेठन और कीलीसहित हाड हों उसे नाराच संहनन कर्म ८४ कहते है, जिसके उदयसे हाडोंकी सधियां आधी कीलित हों वह अर्धनाराच संहनन ८५ है, जिस कर्मके उदयसे हाड परस्पर कीलित हों उसे कीलित संहनन ८६ १ औदारिक आदिशब्दोंका अर्थ जीवकाडकी योगमार्गणामें गाथासूत्रोंसे स्वयं आचार्यने कहा है इस- कारण यहा लिखनेकी जरूरत नही है।
२० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । कहते हैं, जिसकर्मके उदयसे जुदे २ हाड नसोंसे बंधे हों परस्पर ( आपसमें ) कीले हुए न हों वह असंप्राप्तस्पाटिकासंहनन ८७ है, क्योंकि " असंप्राप्तानि ( आपसमें नहीं मिले हों ) सुपाटिकावत् संहननानि यस्मिन् ( सर्पकी तरह हाड़ जिसमें ) तत् (वह) असंप्राप्तसपाटिकासंहननम् ( असंप्राप्तस्पाटिकासंहनन शरीर है)" ऐसा शब्दार्थ है ॥ जिसके उदयसे शरीरमें रंग हो वह वर्ण नामकर्म ९ है उसके पांचभेद है-कृष्णवर्णनाम- कर्म ८८ नीलवर्ण नामकर्म ८९ रक्तवर्ण (लालरंग) नामकर्म ९० पीतवर्ण (पीलारंग) नामकर्म ९९ खेतवर्ण ( सफेदरंग ) नामकर्म ९२ ॥ जिसके उदयसे शरीरमें गंध हो उसे गंधनामकर्म १० कहते है वह दोतरहका है-सुरभिगंध (अच्छीवास) नामक ९३ असुरभिगंध ( खोटी वास ) नामकर्म ९४ । जिसके उदयसे शरीरमें रस हो उसे रस नामकर्म ११ कहते है वह पांच प्रकार है-तिक्तरस ( तीखा-चरपरा नामकर्म ९५ कटुक ( कडुआ) नामकर्म ९६ कपाय (कसैला ) नामकर्म ९७ आम्ल (खट्टा) नामकर्म ९८ मधुररस ( मीठा ) नामकर्म ९९ । जिसके उदयसे शरीरमें स्पर्श हो वह स्पर्श नामकर्म १२ है उसके आठ भेद है--कर्कशस्पर्श (जो छूनेसे कठिन हो) नामकर्म १०० मृदु ( कोमल ) नामकर्म १०१ गुरु ( भारी ) नामकर्म १०२ लघु ( हलका ) नामकर्म १०३ शीत ( ठंडा ) नामकर्म १०४ उष्ण ( गरम ) नामकर्म १०५ स्निग्ध (चिकनाई ) नामकर्म १०६ रूक्ष ( रूखापना ) नामकर्म १०७ । जिसकर्मके उदयसे मरणके पीछे और जन्मसे पहिले अर्थात् विग्रहगतिमें (बीचकी अवस्थामैं ) मरणसे पहलेके शरीरके आकार आत्माके प्रदेश रहै अर्थात् पहले आकारका नाश न हो उसे आनुपूर्व्य नामकर्म १३ कहते है वह चार प्रकार है-जिसकर्म के उदयसे नरकगति प्राप्त होनेके सन्मुख मनुष्यपर्यायवाले जीवके शरीरका आकार विग्रहगतिमें मनुष्याकार रहै उसे नरक- गतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म १०८ कहते है, इसीप्रकार तिर्यंचगतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म १०९ मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्दी नामकर्म ११० देवगतिप्रायोग्यानुपूर्व्य नामकर्म १११ भी जानना । जिसकर्मके उदयसे लोहेके गोलेकी तरह भारी और आककी रुईकी तरह हलका न हो ऐसा शरीर मिलै उसे अगुरुलघु नामकर्म ११२ कहते है। जिसके उदयसे “ उपेत्य घातः उपघातः आत्मघात इत्यर्थः" अपने अगोसे अपना घात हो अर्थात् जिसके बड़े सींग, लम्बे स्तन अथवा मोटा पेट इत्यादि अपने घातक अंग हों उसे उपघात नामकर्म ११३ कहते है । जिसके उदयसे दूसरेका घात हो अर्थात् जिसके तीक्ष्ण सींग, नख, सर्प आदिकी दाढ इत्यादि परके घात करनेवाले शरीरके अवयव हों उसे परघात नामकर्म १११ कहते है । जिसकर्मके उदयसे श्वासोच्छ्रास हों उसे उच्चास नामकर्म ११५ कहते है। जिसके उदयसे परको आताप करनेवाला शरीर हो वह आतप नामकर्म ११६ है इसका उदय सूर्यके विम्बमें उत्पन्न हुए पृथ्वीकायिकजीवोंके है। जिसकर्मके उदयसे , गोम्मटसारः। २१ उद्योतरूप (आतापरहित प्रकाशरूप) शरीर हो उसे उद्योत नामकर्म ११७ कहते हैं इसका उदय चंद्रमाके विंबमें और आगिया (जुगुनू) जीवके है । जिसकर्मके उदयसे आकाशमें गमन हो उसे विहायोगति नामकर्म १४ कहते है उसके दो भेद है-प्रशस्तविहायो- गति ( शुभगमन ) नामकर्म ११८ अप्रशस्तविहायोगति (अशुभगमन ) नामकर्म ११९ । जिसके उदयसे दो इन्द्रियादि जीवोंकी जातिमें जन्म हो उसे त्रसनामकर्म १२० कहते है। जिसके उदयसे ऐसा शरीर होकिदूसरे को रोकै और दूसरेसे आप रुकै उसे बादर नामकर्म १२१ कहते है । जिसके उदयसे अपने २ योग्य आहारादि (आहार १ शरीर २ इन्द्रिय ३ श्वासोच्छास ४ भाषा ५ मनःपर्याप्ति ६ ) पर्याप्ति पूर्ण करै वह पर्याप्तिनामक- म १२२ है । जिसके उदयसे एक शरीरका एक ही जीव स्वामी हो उसे प्रत्येकशरीर नामकर्म १२३ कहते है । जिसके उदयसे शरीरके रसादिक धातु और वातादि उपधातु अपने २ ठिकाने (स्थिर ) रहै उसको स्थिर नामकर्म १२४ कहते है । इससे ही शरीरमें रोग शान्त रहता है । जिसकर्मके उदयसे मस्तक वगैरह शरीरके अवयव सुंदर हों उसे शुभ नामकर्म १२५ कहते है । जिसकर्मके उदयसे दूसरे जीव अपनेसे प्रीति करै उसको सुभग नामकर्म १२६ कहते है । जिसके उदयसे खर ( आवाज़ ) अच्छा हो उसे सुखर नामकर्म १२७ कहते है । जिसके उदयसे कान्ति सहित शरीर हो उसको आदेय नाम- कर्म १२८ कहते है । जिसके उदयसे अपना पुण्यगुण जगतमें प्रगट हो अर्थात् संसारमें जीवकी तारीफ़ हो उसे यशस्कीति नामकर्म १२९ कहते है। जिसके उदयसे शरीरके अंगोपांगोंकी ठीक २ रचना होउसे निर्माण नामकर्म १३० कहते है, वह दो प्रकार है-जो जातिनामकर्मकी अपेक्षासे नेत्रादिक इन्द्रियें जिस जगह होनी चाहिये उसी जगह उन इन्द्रियोंकी रचना करै वह स्थाननिर्माण १ है, और जितना नेत्रादिकका प्रमाण ( माप ) चाहिये उतने ही प्रमाण ( मापके बरोबर ) बनावै वह प्रमाणनिर्माण २ है । जो श्रीमत् अर्हतपदका कारण हो वह तीर्थंकर नामकर्म १३१ है । जिसके उदयसे एकेन्द्रियमें ( पृथिवी १ जल २ तेज ३ वायु ४ वनस्पतिकाय ५ में ) जन्म हो उसे स्थावर नामकर्म १३२ कहते है । जिसके उदयसे ऐसा सूक्ष्म शरीर हो जो कि, न तो किसीको रोकै और न किसीसे रुकै उसे सूक्ष्म नामकर्म १३३ कहते हैं । जिसके उदयसे कोई भी पर्याप्ति पूर्ण नही हो अर्थात् लब्ध्यपर्याप्तक अवस्था हो उसको १. रसाद्रकं ततो मास मांसान्मेद प्रवर्तते । मेदतोस्थि ततो मनं मज्जाच्छुक्रस्तत. प्रजा ॥१॥ अर्थात् रससे लोही, लोहीसे मांस, माससे मेद, मेदसे हाड, हाडसे मिजी, मिजीसे वीर्य, वीर्यसे सतान होती है इसतरह सात धातु हैं ये सात धातु ३० दिनमै पूर्ण होते हैं । २. वातपित्त तथा श्लेष्मा शिरा मायुश्च चर्म च । जठराग्निरिति प्राह प्रोक्ता सप्तोपधातवः ॥ अर्थात् वात १ पित्त २ कफ ३ सिरा ४ सायु ५ चाम ६ पेटकी आग ७ ये सात उपधातु है ।
२२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अपर्याप्ति नामकर्म १३४ कहते है । जिसकर्मके उदयसे एक शरीरके अनेक जीव स्वामी हों उसको साधारण नामकर्म १३५ कहते हैं । जिसके उदयसे धातु और उपधातु अपने २ ठिकाने न हैं अर्थात् चलायमान होकर शरीरको रोगी रक्खें उसको अस्थिर नामकर्म १३६ कहते हैं । जिसकर्मके उदयसे शरीरके मस्तकादि अवयव सुंदर न हों उसको अशुभ नामकर्म १३७ कहते हैं। जिसकर्मके उदयसे रूपादिक गुण सहित होनेपरभी दूसरे जीव प्रीति न करें अर्थात् वैर रक्खें उसको दुर्भग नामकर्म १३८ कहते हैं । जिसके उदयसे अच्छा खर न हो उसको दुःखर नामकर्म १३९ कहते हैं । जिसके उदयसे प्रभा (कान्ति) रहित शरीर हो वह अनादेय नामकर्म १४० है । जिस कर्मके उदयसे संसारमें जीवकी तारीफ़ न हो उसे अयशाकीर्ति नामकर्म १४१ कहते हैं । इसप्रकार सब मिलकर ९३ भेद नामकर्मके हुए । गोत्रकर्मके दो भेद हैं-जिसके उदयसे लोक पूजित ( मान्य ) कुलमें जन्म हो उसे उच्चगोत्र कर्म १४२ कहते है । जिसकर्मके उदयसे लोक निंदित कुलमें जन्म हो उसे नीचगोत्र कर्म १४३ कहते हैं । अन्तरायकर्मके पांच भेद है-जिसके उदयसे देना चाहै परंतु दे नहीं सकै वह दाना- तराय कर्म १४४ है । जिसके उदयसे लाभ ( फ़ायदा ) की इच्छा करै लेकिन लाभ नही हो उसे लाभांतराय कर्म १४५ कहते हैं । जिसकर्मके उदयसे पुष्पादिक अन्नादिक भोगरूप वस्तुको भोगना चाहें परंतु भोग न सकै वह भोगान्तराय कर्म १४६ है । जिसके उदयसे स्त्रीवगैरः उपभोग्य वस्तुका उपभोग न करसकै उसे उपभोगांतराय कर्म १४७ कहते हैं । जिसकर्मके उदयसे अपनी शक्ति ( बल ) प्रगट करना चाहैं परंतु शक्ति प्रगट न हो उसे वीर्यान्तराय कर्म १४८ कहते हैं । इसप्रकार १४८ उत्तर प्रकृतियोंका शब्दार्थ कहा। अब नामकर्मकी उत्तरप्रकृतियोंमें अभेद विवक्षासे जो प्रकृतियां जिनमें शामिल होसक्ती हैं उनको दिखाते हैं;- देहे अविणाभावी बंधणसंघाद इदि अवंधुदया। यण्णचउक्केऽभिण्णे गहिदे चत्तारि वंधुदये ॥ ३४ ॥ देहे अविनाभाविनौ बंन्धनसंघातौ इति अवन्धोदयौ । वर्णचतुष्केऽमिन्ने ग्रहीते चतस्रः बन्धोदययोः ॥३४॥ अर्थ-शरीर नामकर्ममें अपना अपना बंधन और संघात ये दोनों अविनाभावी हैं अर्थात् शरीरके विना ये दोनों नही होसकते; इसकारण पांच बंधन और पांच संघात ये दश प्रकृतियां बंध तथा उदयस्वरूप नही है अर्थात् कर्मकी बन्ध और उदय अवस्थामें ये दश प्रकृतियां जुदी नही गिनीजातीं शरीर-नाम प्रकृति में ही शामिल हो जाती है । तथा गोम्मटसारः। २३ वर्ण १ गंध २ रस ३ स्पर्श ४ इन चारमें ही अभेद की विवक्षासे इनके वीस भेद शामिल होजाते है इसकारण बन्ध और उदय अवस्थामें चार ही भेद माने हैं ॥ ३४ ॥ ऐसा होनेपर बंध, उदय, तथा सत्तारूप प्रकृतियां कितनी हुई ? इसका उत्तर आचार्य चार गाथाओंसे कहते हुए प्रथम बंधरूप प्रकृतियां गिनाते है- पंच णव दोण्णि छवीसमवि य चउरो कमेण सत्तट्ठी । दोणि य पंच य भणिया एदाओ बंधपयडीओ ॥ ३५ ॥ पञ्च नव द्वौ षड्विंशतिरपि च चतस्रः क्रमेण सप्तषष्टिः । द्वौ च पञ्च च भणिता एता बन्धप्रकृतयः ॥ ३५ ॥ अर्थ-ज्ञानावरणकी पांच, दर्शनावरणकी ९ वेदनीयकी २ मोहनीयकी २६ है क्योंकि सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व प्रकृति बन्धमें नही है यह पहले भी कहचुके हैं, तथा आयु- कर्मकी ४ और नामकर्मकी ६७ हैं क्योंकि पहले गाथामें १०+१६२६ प्रकृतियां अभेद विवक्षासे बंध अवस्था में नही है ऐसा कह आये हैं सो ९३ में २६ कम करनेसे ९३-२६ =६७ ही बाकी रहजाती है, गोत्रकर्मकी २ अंतरायकर्मकी ५ ये सब बंध होने योग्य प्रकृतियां हैं ॥ ३५॥ अब उदय प्रकृतियोंको कहते हैं:- पंच णव दोण्णि अठ्ठावीसं चउरो कमेण सत्तट्ठी । दोण्णि य पंच य भणिया एदाओ उदयपयडीओ ॥ ३६ ॥ पञ्च नव द्वौ अष्टाविशतिः चतस्रः क्रमेण सप्तषष्ठिः। द्वौ च पञ्च च भणिता एता उदयप्रकृतयः ॥ ३६ ॥ अर्थ-पांच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, सड़सठ, दो और पांच ये सब उदय प्रकृ- तियां हैं, मोहनीयकी पहली छन्वीस प्रकृतियोंमें समग्मिथ्यात्व १ और सम्यत्तव प्रकृति ये दो भी उदय अवस्थामें शामिल करनेसे अट्ठाईस प्रकृतियां होजाती हैं ॥ ३६ ॥ आगे बंधरूप तथा उदयरूप प्रकृतियोंकी भेदविवक्षा और अभेदविवक्षासे संख्या कहते हैं। भेदे छादालसयं इदरे बंधे हवंति वीससयं । भेदे सधे उदये बावीससयं अभेदम्हि ॥ ३७ ॥ भेदे षटुत्वारिशच्छतमितरे बन्धे भवन्ति विंशशतम् । भेदे सर्वे उदय द्वाविंशशतमभेदे ।। ३७ ॥ अर्थ-बन्ध अवस्थामें, भेदविवक्षासे ( भेदसे कहनेकी इच्छासे ) १४६ प्रकृतियां है; क्योंकि सम्यग्मिथ्यात्व तथा सम्यक्त्व प्रकृति ये दोनों इस बंधअवस्थामें नही गिनी जातीं । और अभेदकी विवक्षासे १२० प्रकृतियां कहीं है क्योंकि २६ प्रकृतियां दूसरे भेदोंमें शामिल करदी गई है। उदय अवस्थामें, मेदविवक्षासे सब १४८ प्रकृतिया है, क्योंकि " - , - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् २४ पूर्वकी दो प्रकृतियां भी यहां शामिल कीगई हैं । तथा अभेद विवक्षासे १२२ प्रकृतियां कही हैं क्योंकि २६ भेद दूसरे भेदोंमें गर्मित होजाते है यह पहलेही कहचुके हैं।। ३७ ।। आगे सत्तारूप प्रकृतियोंकी संख्या कहते हैं- पंच णव दोणि अट्टावीसं चउरो कमेण तेणउदी। दोणि य पंच य भणिया एदाओ सत्तपयडीओ ॥ ३८ ॥ पञ्च नव द्वौ अष्टाविंशतिः चत्वारः क्रमेण त्रिनवतिः। द्वौ च पञ्च च भणिता एताः सत्त्वप्रकृतयः ॥ ३८॥ अर्थ-पांच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, तिरानवै, दो और पांच इसतरह सब १४८ सत्तारूप ( मौजूदरहने योग्य ) प्रकृतियां कही है ।। ३८ ॥ धातिकर्म जो पहले कहेथे उनके सर्वघाती और देशघातीकी अपेक्षा दो भेद हैं उनदोनों में अब सर्वधातीके भेदोंको कहते है- केवलणाणावरणं दंसणछकं कसायवारसयं । मिच्छं च सघघादी सम्मामिच्छं अवंधसि ।। ३९ ।। केवलज्ञानावरणं दर्शनषद्धं कषायद्वादशकम् । मिथ्यात्वं च सर्वघातीनि सम्यग्मिथ्यात्वमवन्धे ॥ ३९ ॥ अर्थ-केवलज्ञानावरण १ केवलदर्शनावरण और पांचनिद्रा इस प्रकार दर्शनावरणके छ:मेद तथा अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, क्रोध मान माया लोभ ये बारह कषाय और मिथ्यात्व मोहनीय सब मिलकर २० प्रकृतियां सर्वघाती है । तथा सम्यग्मि- थ्यात्वप्रकृति बन्धरहित अवस्थामें अर्थात् उदय और सत्ता अवस्थामें जुदी ही जातिकी सर्वघाती है ॥ ३९॥ अब देशघाती प्रकृतियोंको कहते है- णाणावरणचउक्कं तिदसणं सम्मगं च संजलणं । णव णोकसाय विग्छ छवीसा देसघादीओ ॥४०॥ ज्ञानावरणचतुष्कं त्रिदर्शनं सम्यक्त्वं च संज्वलनम् । नव नोकपाया विघ्नं षड़िशतिः देशघातीनि ॥ ४० ॥ अर्थ-ज्ञानावरणके चार भेद ( केवलज्ञानावरणको छोड़कर ) दर्शनावरणके तीन भेद जो छ.भेदोंके सिवाय है, सम्यत्तवप्रकृति, संज्वलन-क्रोधादिचार, हास्यादि नोकषाय नव, और अंतरायफे पांच भेद इसतरह छब्बीस देशघाती है। क्योंकि इनके उदय होनेपर भी जीवका गुण प्रगट रहता है ॥ ४० ॥ इसप्रकार घातीयाकर्मोंके दोमेद कहकर अब अघातिया कर्मों के प्रशस्त १ तथा अप्रशस्त २ जो दो भेद है उनमें प्रशस्तप्रकृतियोको दो गाथाओंसे कहते हैं- गोम्मटसारः। १ - २५ सादं तिण्णेवाऊ उच्चं णरसुरदुगं च पंचिंदी। देहा वंधणसंघादंगोवंगाई वण्णचओ ॥४१॥ समचउरवजरिसहं उवघादूणगुरुछक सग्गमणं । तसवारसदृसट्ठी वादालमभेददो सत्था ॥४२॥ जुम्मं । सातं त्रीण्येवायूषि उच्चं नरसुरद्विकं च पञ्चेन्द्रियम् । देहा वन्धनसंघाताङ्गोपाङ्गानि वर्णचतुष्कम् ॥ ४१ ॥ समचतुरस्रवज्रर्षभमुपघातोनागुरुषटुं सद्गमनम् । त्रसद्वादशाष्टपष्टिः द्वाचत्वारिशदभेदतः शस्ताः ॥ ४२ ॥ युग्मम् । अर्थ-सातावेदनीय १ तिर्यच, मनुष्य, देवायु ३ उच्चगोत्र १ मनुष्यगति १ मनुष्य- गत्यानुपूर्वी २ देवगति ३ देवगत्यानुपूर्वी ४ पंचेन्द्रीजाति १ शरीर पांच, बंधन ५ संघात ५ अगोपांग तीन, शुभ वर्ण, गंध, रस, स्पर्श इनचारके २० भेद, समचतुरस्रसंस्थान १ वज्रर्पभनाराच सहनन १ और उपघातके विना अगुरुलघु आदि छह, प्रशस्तविहायोगति १ त्रस आदिक बारह इसप्रकार ६८ प्रकृतिया भेदविवक्षासे प्रशस्त ( पुण्यरूप) कहीं है। और अभेद विवक्षासे अर्थात् भेदोंके भेद न करनेसे पहली रीतिके अनुसार २६ कम होनेपर ४२ ही पुण्य प्रकृतिया है ॥ ४१ । ४२ ॥ अब अप्रशस्त कर्मप्रकृतियोंकी संख्या दो गाथाओंसे दिखाते है। घादी णीचमसादं णिरयाऊ णिरयतिरियदुग जादी- संठाणसंहदीणं चदुपणपणगं च वणंचओ ॥ ४३ ।। उरघादमसग्गमणं थावरदसयं च अप्पसत्था हु। वंधुदयं पडि भेदे अडणउदि सयं दुचदुरसीदिदरे॥४४॥ जुम्म । घातीनि नीचमसातं निरयायुः निरयतिर्यग्द्विकं जाति-। संस्थानसंहतीनां चतुःपञ्चपञ्चकं च वर्णचतुष्कम् ॥ ४३ ॥ उपघातमसनमनं स्थावरदशकं च अप्रशस्ता हि। वन्धोदयं प्रति भेदे अष्टनवतिः शतं द्वि-चतुरशीतिरितरे ॥ ४४ ॥ युग्मम् । अर्थ-चारों घातियाकर्मकी प्रकृतिया, नीचगोत्र, असातावेदनीय, नरकायु, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यचगति, तिर्यचगत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रियादिजाति ४ समचतुरस्रको छोड़कर पाच सस्थान, पहले संहननके सिवाय पाच संहनन, अशुभ वर्ण रस गंध स्पर्श चार अथवा इनके वीस भेद, उपघात; अप्रगस्त विहायोगति, और स्थावर आदिक दस ये जो अप्रशस्त ( पाप ) प्रकृतिया है वे भेदविवक्षासे वन्धरूप ९८ है, और उदयरूप १०० है । तथा १ वर्णादि चार अथवा भेद करनेसे २० पुण्य तपा पापरूपभी है इस कारण दोनों ही भेटोंमे गिनेजाते है इसी कारण १४८ में २० भेद अधिक जोडनेसे १६८ भेद होजाते है। , , २६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अभेदविवक्षासे बन्धयोग्य ८२ है; क्योंकि वर्णादिक चारके सोलह भेद कम हो जाते है, और उदयरूप ८४ प्रकृतियां है ॥ ४३ ॥ १४ ॥ आगे अनन्तानुबन्धी आदि चार कषायोंका कार्य दिखाते है; पढमादिया कसाया सम्मत्तं देससयलचारित्तं । जहखादं घादंति य गुणणामा होंति सेसावि ॥४५॥ प्रथमादिकाः कषायाः सम्यक्त्वं देशसकलचारित्रम् । यथाख्यातं घातयन्ति च गुणनामानो भवन्ति शेषा अपि ॥ ४५ ॥ अर्थ-पहली अनन्तानुवन्धी आदिक चार कषाय अर्थात् अनन्तानुवन्धी, अप्रत्याख्या- नकषाय, प्रत्याख्यानकषाय, और सज्वलनकषाय है वे क्रमसे सम्यक्त्वको, देशचारित्रको, सकलचारित्रको और यथाख्यातचारित्रको घातती है अर्थात् सम्यक्त्व वगैरः को प्रगट नहीं होने देती इसकारण जैसा नाम वैसेही गुणवाली है और इनके सिवाय दूसरी प्रकृतियां हैं वे भी सार्थक (नामके अनुसार अर्थवाली) है इन सवका शब्दार्थ पहले हो चुका है ॥४५|| अब इन कषायोंकी वासनाका (संस्कारका) काल कहते है:- अंतोमुहुत्त पक्खं छम्मासं संखऽसंखणंतभवं । संजलणमादियाणं वासणकालो दुणियमेण ॥ ४६॥ अन्तर्मुहूर्तः पक्षः षण्मासाः संख्यासंख्यानन्तभवाः । संज्वलनाद्यानां वासनाकालः तु नियमेन ॥ ४६॥ अर्थ-संज्वलन वगैरः अर्थात् संज्वलन, प्रत्याख्यान, अप्रत्याख्यान, अनन्तानुबंधी चार कषायोंकी वासनाका काल क्रमसे अंतर्मुहूर्त, पक्ष (पंद्रहदिन ), एकमहीना, छः महीने और संख्यातेभव, असंख्यातेभव तथा अनंतभव है ऐसा निश्चय कर समझना । अभिप्राय यह है कि, किसीने क्रोध किया पीछे दूसरे काममे लगगया वहांपर क्रोधका उदय तो नहीं परंतु जिस पुरुषपर क्रोध किया था उसपर क्षमाभी नहीं की, इसप्रकार जो क्रोधका संस्कार चित्तमें बैठगया उसी वासनाका काल यहांपर कहागया है ॥ ४६ ॥ आगे ये प्रकृतियां, पुद्गलविपाकी (पुद्गल-शरीरमें जिनका फल हो), भवविपाकी, क्षेत्रविपाकी, जीवविपाकी इसरीतिसे चार प्रकार है उनमेंसे पुद्गलविपाकी प्रकृतियोंकी संख्या कहते है। देहादी फासंता पण्णासा णिमिणतावजुगलं च । थिरसुहपत्तेयदुगं अगुरुतियं पोग्गलविवाई ॥ ४७ ॥ देहादयः स्पर्शान्ताः पञ्चाशत् निर्माणातापयुगलं च । स्थिरशुभप्रत्येकद्विकमगुरुत्रयं पुद्गलविपाकिन्यः ॥ ४७ ॥ अर्थ-पांच शरीरोंसे लेकर स्पर्शनामतक ५० तथा निर्माण, आताप, उद्योत, स्थिर - m
-
गोम्मटसारः।
२७
शुभ और प्रत्येकका जोड़ा अर्थात् स्थिर, अस्थिर वगैरः छः तथा अगुरु लघु आदिक तीन ये
व ६२ प्रकृतियां पुद्गलविपाकी है अर्थात् इनका फलरूप उदय पुद्गलमें ही होता है ॥४७॥
अब भव-क्षेत्र-जीवविपाकी प्रकृतियोंको कहते है-
आऊणि भवविवाई खेत्तविवाई य आणुपुब्बीओ।
अत्तरि अवसेसा जीवविवाई मुणेयव्वा ॥४८॥
आयूंषि भवविपाकीनि क्षेत्रविपाकीनि च आनुपूर्वाणि ।
अष्टसप्ततिरवशिष्टा जीवविपाकिन्यः मन्तव्याः ॥४८॥
अर्थ-नरकादिक चार आयु भवविपाकी है अर्थात् मनुष्यादिपर्यायोंमेंही इन प्रकृ-
तियों फल होता है, चार आनुपूर्वी प्रकृतियां क्षेत्रविपाकी है क्योंकि परलोकको गमन
करते हुए जीवके मार्गमें इनका उदय होता है, और वाकी जो अठत्तरि प्रकृतियां है
वे सब जीवविपाकी जानना अर्थात् नारक आदि जीवकी पर्यायमेंही इनका उदय (फल)
होता है ।। ४८॥
अब उन्हीं अठत्तरि प्रकृतियोंको गिनाते हैं,-
वेदणियगोदवादीकावणं तु णाभपयडीणं ।
सत्तावीसं चेदे अत्तरि जीवविवाई (ओ)॥ ४९ ॥
वेदनीयगोत्रघातिनामेकपञ्चाशत्तु नामप्रकृतीनाम् ।
सप्तविंशतिश्चैता अष्टसप्ततिः जीवविपाकिन्यः ॥ ४९ ॥
अर्थ-वेदनीयकी २ गोत्रकी २ धातियाकर्मीकी ४७ इसप्रकार ५१ और सत्ताईस
नामकर्मकी इसतरह ५१+२७-७८ प्रकृतिया जीवविपाकी है ॥ ४९ ॥
आगे नामकर्मकी सत्ताईस प्रकृतियों की संख्या दिखाते है-
तित्थयरं उस्सासं वादरपजत्तसुस्सरादे ।
जसतसविहायसुभगदु चउगइ पणजाइ सगवीसं ॥ ५० ॥
तीर्थकरमुच्छासं बादरपर्याप्तसुखरादेयम् ।
यशस्त्रसविहायस्सुभगद्वयं चतुर्गतयः पञ्चजातयः सप्तविंशतिः ॥ ५० ॥
अर्थ-तीर्थकर प्रकृति, उच्छास, बादर-पर्याप्त-सुखर-आदेय-यशस्कीर्ति-त्रस-विहायो-
गति-सुभग इनका जोडा अर्थात् बादर-सूक्ष्म आदिक; नरकादि चार गति, एकेन्द्रियादि
पाच जाति इसप्रकार सत्ताईस नामकर्मकी प्रकृतिया जीवविपाकी जानना ॥ ५० ॥
अब उन्हीं सत्ताईस प्रकृतियोंकों क्रमसे दिखाते है,-
गदि जादी उस्सासं विहायगदि तसतियाण जुगलं च ।
सुभगादिचउजगलं तित्थयरं चेदि सगवीसं ॥५१॥
- - २८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गतिः जातिः उच्छासं विहायोगतिः सत्रयाणां युगलं च । सुभगादिचतुर्युगलं तीर्थकरं चेति सप्तविशतिः ।। ५१ ॥ अर्थ-चार गति, पांच जाति, उच्छास, विहायोगति, त्रस-बादर-पर्याप्त इन तीनका जोड़ा (स, स्थावर वगैरः), सुभग-सुखर-आदेय-यशस्कीर्ति इन चारका जोड़ा (सुभग, दुर्भग आदि ) और तीर्थकर प्रकृति इस प्रकार क्रमसे सत्ताईसकी गिनती कही ।। ५१ ।। अब यहां मध्यम रुचिवाले श्रोताओंको विशेष समझनेकेलिये नामादिक चार निक्षे- पोंसे कर्मका खरूप चौतीस गाथाओंसे कहते है, क्योंकि विना चार निक्षेपोंके वस्तुका खरूप यथार्थ समझमें नहीं आता;- णामं ठवणा दवियं भावोत्ति चउन्विहं हवे कम्म। पयडी पावं कम्म मलंति सण्णा हु णाममलं ॥५२॥ नाम स्थापना द्रव्यं भाव इति चतुर्विधं भवेत् कर्म । प्रकृतिः पापं कर्म मलमिति संज्ञा हि नाममलम् ।। ५२ ।। अर्थ नाम, स्थापना, द्रव्य, भावके भेदसे कर्मभी चार तरहका है। उन चारोंमें नाम- खरूप जो संज्ञाकर्म उसकी प्रकृति, पाप, कर्म, मल ये चार संज्ञा है अर्थात् कर्मके चार नाम है ॥ ५२॥ अब इन चार निक्षेपोंका प्रकरणवशसे स्वरूप कहते है । क्योंकि इनका स्वरूप जाने- विना वस्तुका किस तरह व्यवहार होता है यह नही मालूम होता-जो युक्तिसे सुयुक्त- मार्ग होते हुए कार्यके वशसे नाम, स्थापना, द्रव्य और भावमें पदार्थका व्यवहार करना उसे निक्षेप कहते है । वह नामादि चार प्रकार है । जिस वस्तुमें जो गुण नहीं है उसको उस नामसे कहना उसे नामनिक्षेप कहते है । जैसे किसीने अपने लड़केका नाम ऋषभ देव तीर्थकर रक्खा परंतु उसमें ऋषभदेवके गुण नही है । स्थापनानिक्षेप वह है कि साकार तथा निराकार ( मनुष्यादि शरीरका आकार न हो किसी शकलका पिंड हो) ऐसे काठ पत्थर चित्राम (मूर्ति) वगैरः में ये वेही ऋषभदेव तीर्थकर है इसप्रकार अपने परिणामोंसे स्थापना करनी ॥ इन दोनों में इतनाही भेद है कि, नाममें मूलपदार्थकी तरह सत्कार आदिककी प्रवृत्ति नहीं होती और स्थापनामें मूलपदार्थ सरीखा आदर सत्कार किया जाता है। जो पदार्थ आगामी (होनेवाली ) पर्यायकी योग्यता रखता हो उसको द्रव्यनिक्षेप १ "अतद्गुणेषु भावेषु व्यवहारप्रसिद्धये । यत्संज्ञाकर्म तन्नाम नरेच्छावशवर्तनात्" ॥१॥ साकारे वा निराकारे काष्ठादौ यन्निवेशनम् । सोयमित्यवधानेन स्थापना सा निगद्यते ॥२॥ आगामिगुणयोग्योर्थो द्रव्यं न्यासस्य गोचर । तत्कालपर्ययाक्रान्तं वस्तु भावो निगद्यते ॥ ३ ॥ इसप्रकार चार निक्षेपोंका खरूप कहा है। - गोम्मटसारः। २९ कहते है । जैसे-राजाके पुत्रको राजा कहना अथवा केवल ज्ञान अवस्थाको प्राप्त होने- वाले ऋषभदेवको गृहस्थादि अवस्थामें तीर्थंकर कहना ॥ वर्तमानपर्याय सहित वस्तुको भावनिक्षेप कहते है। जैसे राज्यकार्य करते हुएको राजा कहना । इस तरह चार निक्षे- पोंका स्वरूप कहा ॥ आगे स्थापनारूप कर्मको कहते है। सरिसासरिसे दव्वे मदिणा जीवट्ठियं खुजं कम्मं । तं एदंत्ति पदिट्ठा ठवणा तं ठावणाकम्मं ॥ ५३ ।। सहशासदृशे द्रव्ये मतिना जीवस्थितं खलु यत्कर्म । तदेतदिति प्रतिष्ठा स्थापना तत्स्थापनाकर्म ॥ ५३ ॥ अर्थ-सदृश अर्थात् कर्मसरीखाअथवा कर्मके समान न हो ऐसे किसी द्रव्यमें अपनी बुद्धिसे ऐसी स्थापना करना कि जो जीवमें कर्म मिले हुए है वे येही है इसीको स्थापना कर्म कहते है ।। ५३ ॥ आगे द्रव्यनिक्षेपरूप कर्मका खरूप दिखाते है:- दव्वे कम्मं दुविहं आगमणोआगमंति तप्पढमं । कम्मागमपरिजाणुगजीवो उवजोगपरिहीणो ॥ ५४॥ द्रव्ये कर्म द्विविधमागमनोआगममिति तत्प्रथमम् । कर्मागमपरिज्ञायकजीव उपयोगपरिहीनः ।। ५४ ।। अर्थ-द्रव्यनिक्षेपरूप कर्म दो प्रकार है-एक आगमद्रव्यकर्म दूसरा नोआगमद्र- व्यकर्म इन दोनोंमें जो कर्मका स्वरूप कहनेवाले शास्त्रका जाननेवाला परंतु वर्तमानकालमें उस शास्त्रमें उपयोग (ध्यान) नही रखनेवाला जीव है वह पहला-आगमद्रव्य- कर्म है ।। ५४ ॥ अब दूसरा नोआगमद्रव्यकर्म कहते है,- जाणुगसरीर भवियं तव्वदिरित्तं तु होदि जं बिदियं । तत्थ सरीरं तिविहं तियकालगयंति दो सुगमा ॥ ५५ ॥ ज्ञायकशरीरं भावि तव्यतिरिक्तं तु भवति यद्वितीयम् । तत्र शरीरं त्रिविधं त्रयकालगतमिति द्वे सुगमे ॥ ५५ ।। अर्थ-जो दूसरा नोआगमद्रव्यकर्म है वह 'ज्ञायकशरीर' १ 'भावि' २ 'तद्वय- तिरिक्त' ३ के भेदसे तीन प्रकार है। उनमेंसे ज्ञायकशरीर (कर्मस्वरूपके जाननेवाले जीवका शरीर ) भूत, वर्तमान, भावी इसतरह तीन कालोंकी अपेक्षा तीन प्रकार है । उन तीनोंमेंसे वर्तमान तथा भावीशरीर इन दोनोंका अर्थ समझनेमें सुगम है कठिन नहीं रायचन्द्रजैनगास्त्रमालायाम् । ३० क्योंकि वर्तमानशरीरको धारण करताही है और आगामीकालमें भावि शरीरको धारण करेगा ही ॥ ५५ ॥ आगे भूतशरीर (जिसको छोड़कर आया है वह शरीर ) के भेद दिखलाते हैं;- भूदं तु चुदं चइदं चदंति तेधा चुदं सपाकेण । पडिदं कदलीपादपरिचागणूणयं होदि ॥ ५६ ॥ भूतं तु च्युतं च्यावितं त्यक्तमिति त्रेधा च्युतं स्वपाकेन । पतितं कदलीघातपरित्यागेनोनं भवति ।। ५६ ।। अर्थ-भूतज्ञायकशरीर, च्युत १ च्यावित २ त्यक्त ३ के भेदसे तीन तरहका है। उनमें जो दूसरे किसी कारणके विना आयुके पूर्ण होनेपर नष्ट होजाय वह च्युतशरीर है यह च्युतशरीर कदलीघात ( अकालमृत्यु ) और संन्यास इन दोनों अवस्थाओंसे रहित है।। ५६॥ अब कदलीघातमरणका लक्षण कहते है:- विसवेयणरत्तक्खयभयसत्यग्गहणसंकिलेसेहि। उस्सासाहाराणं णिरोहदो छिजदे आऊ ॥ ५७ ॥ विपवेदनारक्तक्षयभयशस्त्रघातसंक्लेशैः । उच्छासाहारयोः निरोधतः छिद्यते आयुः ॥ ५७ ॥ अर्थ-विष भक्षणसे अथवा विपवाले जीवोंके काटनेसे; रक्तक्षय अर्थात् लोही जिसमें सूखता जाता है ऐसे रोगसे अथवा लोहीके संबधसे यहा धातुक्षयभी समझलेना इस कारण धातुक्षयसे, भय करनेवाली वस्तुके दर्शनसे उत्पन्न हुए भयसे, शस्त्रों (तलवार आदि हथियारों) के घातसे, संक्लेश अर्थात् शरीर वचन तथा मनद्वारा आत्माको अधिक पीड़ा पहुंचानेवाली क्रिया करनेसे, श्वासोच्छ्रासके रुकजानेसे और आहार ( खाना पीना) नहीं करनेसे इस जीवकी आयु कम होजाती है इन कारणोंसे जो मरण हो अर्थात् शरीर छूटै उसे कदलीघातमरण अथवा अकालमृत्यु कहते हैं ।। ५७ ॥ आगे च्यावित और त्यक्त-भूतज्ञायकशरीरका लक्षण कहते है;- कदलीघादसमेदं चागविहीणं तु चइदमिदि होदि । घादेण अघादेण व पडिदं चागेण चत्तमिदि ॥ ५८ ॥ १ अधिक दौड़नेसे जो अधिक श्वासें चलती हैं वहा कायकी क्रिया तथा मनकी क्रियारूप संक्लेग परि- णाम होते है । इस कारण अधिक श्वासका चलनाभी अकालमौतका निमित्त कारण है। इस एकही दृष्टातको देखकर अज्ञानी लोक एकातसे श्वासके ऊपर ही आयुके कमती वढती होनेका अनुमान कर श्वासके कमती वढती चलनेसे आयु घट बढ़ जाती है ऐसा निश्चय श्रद्धानकर लेते हैं, उनके भ्रम दूर करनेके लिये आठ कारण गिनाये हैं। क्योकि यदि एकहीके ऊपर विश्वास किया जाय तो शस्त्रके लगनेसे श्वास चलना तो अधिक नहीं मालूम पटता वहापरभी अधिक श्वास चलने चाहिये।
गोम्मटसारः। ३१ कदलीघातसमेतं त्यागविहीनं तु त्यक्तमिति भवति । घातेन अघातेन वा पतितं त्यागेन त्यक्तमिति ॥ ५८ ॥ अर्थ-जो ज्ञायकका भूत शरीर कदलीघातसहित नष्ट होगया हो परंतु संन्यासवि- घिसे रहित हो उसे च्यावितशरीर कहते है । और जो कदलीघातसहित अथवा कदली- घातके विना संन्यासरूप परिणामोंसे शरीर छोड दिया हो उसे त्यक्त कहते है ॥ ५८ ॥ अब त्यक्तशरीर ( संन्याससहित शरीर ) के चार भेद दिखाते है, भत्तपइण्णाइंगिणिपाउग्गविधीहि चत्तमिदि तिविहं । भत्तपइण्णा तिविहा जहण्णमज्झिमवरा य तहा ॥ ५९ ।। भक्तप्रतिज्ञाङ्गिनीप्रायोग्यविधिभिः त्यक्तमिति त्रिविधम् । भक्तप्रतिजा त्रिविधा जघन्यमध्यमवरा च तथा ।। ५९ ॥ अर्थ-त्यक्तशरीर भक्तप्रतिज्ञा १ इंगिनी २ और प्रायोग्यविधिसे ३ तीन प्रकार है। उनमें भक्तप्रतिज्ञा जघन्य १ मध्यम २ तथा उत्कृष्टके ३ भेदसे तीन तरहकी है ॥ ५९॥ आगे इन जघन्यआदिभेदोंका काल कहते है। भत्तपइण्णाइविही जहण्णमंतोमुहत्तयं होदि । वारसवरिसा जेट्टा तम्मज्झे होदि मज्झिमया ॥ ६ ॥ भक्तप्रतिज्ञादिविधिः जघन्योऽन्तर्मुहूर्त्तको भवति । द्वादशवर्षा ज्येष्ठः तन्मध्ये भवति मध्यमकः ॥ ६०॥ अर्थ-भक्तप्रतिज्ञा अर्थात् भोजनकी प्रतिज्ञा कर जो संन्यासमरण हो उसके कालका प्रमाण जघन्य (कमसे कम ) अन्तर्मुहूर्त है । और उत्कृष्ट ( ज्यादासे ज्यादा) बारह वर्ष प्रमाण है । तथा मध्यके भेदोंका काल एक २ समय वढता हुआ अंतर्मुहूर्तसे लेकर वारह वर्षके बीचके जितने भेद है उसीप्रमाण समझना ॥ ६० ॥ अब इंगिनीमरण और प्रायोपगमन (प्रायोग्यविधि) मरणका लक्षण कहते है, अप्पोवयारवेक्खं परोक्यारूणमिगिणीमरणं । सपरोवयारहीणं मरणं पाओवगमणमिदि ॥ ६१ ॥ आत्मोपकारापेक्षं परोपकारोनमिङ्गिनीमरणम् । खपरोपकारहीनं मरणं प्रायोपगमनमिति ॥ ६१ ॥ अर्य-अपने शरीरकी टहल आपही अपने अंगोंसे करै किसी दूसरेसे रोगादिका उपचार न करावै ऐसे विधानसे जो संन्यास धारण कर मरै उस मरणको इंगिनीमरण संन्यास कहते है । और जिसमें अपना तथा दूसरेकामी उपचार ( सेवा ) न होवै अर्थात् अपनी टहल न तो आप करै दूसरेसेही करावै ऐसे संन्यासमरणको प्रायोपगमन कहते है ॥ ६१ ॥ 1- ३२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आगे जो आगमद्रव्यकर्मका दूसरा भेद भावी है उसे कहते हैं- भवियंति भवियकाले कम्मागमजाणगो स जो जीवो। जाणुगसरीरभवियं एवं होदित्ति णिदिदं ॥६२ ॥ भविष्यति भाविकाले कर्मागमज्ञायकः स यो जीवः । ज्ञायकशरीरभावि एवं भवतीति निर्दिष्टम् ॥ ६२ ।। अर्थ-जो कर्मके खरूपको कहनेवाले शास्त्रका जाननेवाला आगे होवैगा वह जीव ज्ञायकशरीर भावि है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है ॥ ६२ ॥ अब तीसरा भेद जो तब्यतिरिक्त है उसे कहते है- तव्वदिरित्तं दुविहं कम्मं णोकम्ममिदि तहिं कम्मं । कम्मसरूवेणागय कम्मं दव्वं हवे णियमा ॥६३ ॥ तव्यतिरिक्तं द्विविधं कर्म नोकर्मेति तस्मिन् कर्म । कर्मवरूपेणागतं कर्म द्रव्यं भवेत् नियमात् ॥ ६३ ।। अर्थ-तव्यतिरिक्त जो आगमद्रव्यकर्म, कर्म १ और नोकर्म २ के भेदसे दो प्रकार है। उनमें ज्ञानावरणादि मूलप्रकृतिरूप अथवा उनके भेद मतिज्ञानावरणादि उत्तरप्रकृतिखरूप परिणमता हुआ जो कार्मणवर्गणारूप पुद्गल द्रव्य वह कर्मतव्यतिरिन नोआगमद्रव्य- कर्म नियमसे होता है ऐसा जानना ॥ ६३ ॥ आगे नोकर्मतव्यतिरिक्तका खरूप और भावनिक्षेपरूपकर्मके भेद दिखाते है;-- कम्मदव्वादण्णं दव्वं णोकम्मदव्वमिदि होदि । भावे कम्मं दुविहं आगमणोआगमंति हवे ॥ ६४ ॥ कर्मद्रव्यादन्यद्रव्यं नोकर्मद्रव्यमिति भवति । भावे कर्म द्विविधमागमनोआगममिति भवेत् ॥ ६४॥ अर्थ-कर्मखरूप द्रव्यसे भिन्न जो द्रव्य है वह नोकर्म-तद्यतिरिक्त नोआगमद्रव्य- कर्म है। और भावनिक्षेपखरूप कर्म आगम १ तथा नोआगमके २ भेदसे दोप्रकार कहा है ॥ ६४ ॥ अब आगमभावनिक्षेपकर्मका खरूप कहते हैं;- कम्मागमपरिजाणगजीवो कम्मागमम्हि उवजुत्तो। भावागमकम्मोत्ति य तस्स य सण्णा हवे णियमा ॥६५॥ कर्मागमपरिज्ञायकजीवः कर्मागमे उपयुक्तः । भावागमकर्मेति च तस्य च संज्ञा भवेनियमात् ॥ ६५ ॥ १ नो ( थोडा) कर्म अर्थात् कर्मको फल देनेमें सहायता करनेवाला हो वह नोकर्म है।
. गोम्मटसारः। अर्थ-जो जीव कर्मखरूपके कहनेवाला आगम (शास्त्र) का जाननेवाला और वर्त- मानसमयमें भी उसी शास्त्रका चिन्तवन (विचार) रूप उपयोगसहित हो उस जीवका नाम भावागमकर्म अथवा आगमभावकर्म निश्चयसे कहा जाता है ॥ ६५ ॥ आगे नोआगमभावनिक्षेपकर्मको कहते है:- णोआगमभावो पुण कम्मफलं भुंजमाणगो जीवो। इदि सामण्णं कम्मं चउविहं होदि णियमेण ॥ ६६ ॥ नोआगमभावः पुनः कर्मफलं भुजमानकः जीवः । इति सामान्यं कर्म चतुर्विधं भवति नियमेन ॥ ६६ ॥ अर्थ-फिर, कर्मके फलको भोगनेवाला जो जीव वह नोआगम भावकर्म है। इस तरहसे सामान्यकर्म निक्षेपोंकी अपेक्षा चारप्रकार नियमसे जानना ॥ ६६ ।। आगे कर्मके विशेष भेद जो मूलप्रकृति तथा उत्तरप्रकृतियां है उनमें नामादि चार भेद दिखाते है:- मूलुत्तरपयडीणं णामादी एवमेव णवरितु । सगणामेण य णामं ठवणा दवियं हवे भावो ॥ ६७॥ मूलोत्तरप्रकृतीनां नामादय एवमेव नवरि तु । स्वकनाना च नाम स्थापना द्रव्यं भवेत् भावः ॥ ६७ ॥ अर्थ-कर्मकी मूलप्रकृति ८ तथा उत्तर प्रकृति १४८ इन दोनोंके जो नामादि चार निक्षेप है उनका स्वरूप सामान्यकर्मकी तरह समझना । परंतु इतनी विशेषता है कि, जिस प्रकृतिका जो नामादि हो उसी अपने नाम आदिकी अपेक्षासे नाम १ स्थापना २ द्रव्य ३ तथा भाव ४ निक्षेप होते है ऐसा जानना ॥ ६७ ॥ अब कुछ औरभी विशेषता दिखाते हैं,- मूलुत्तरपयडीणं णामादि चउन्विहं हवे सुगम । वजित्ता णोकम्मं णोआगमभावकम्मं च ॥ ६८ ॥ मूलोत्तरप्रकृतीनां नामादि चतुर्विधं भवेत्सुगमम् । वर्जयित्वा नोकर्म नोआगमभावकर्म च ॥ ६८॥ अर्थ-मूलप्रकृति तथा उत्तरप्रकृतियोंके नामादिक चारभेदोंका स्वरूप समझना सरल है, परंतु द्रव्य तथा भावनिक्षेपके भेदोंमेंसे नोकर्म तथा नोआगमभावकर्मका खरूप समझना कठिन है ॥ ६८ ॥ अब उन दोनोंको अर्थात् नोकर्म और नोआगमभावकर्मको मूल-उत्तर, दोनों प्रकृति- थोंमें घटित करते हुए पहले नोकर्मको मूलप्रकृतियोंमें जोड़ते है-
३४
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
पडपडिहारसिमजा आहारं देह उच्चणीचंगं ।
भंडारी मूलाणं णोकम्मं दवियफम्मं तु ॥ ६९ ॥
पटप्रतीहारासिमद्यानि आहार देह उच्चनीचाङ्गम् ।
भाण्डारी मूलानां नोकर्म द्रव्यकर्म तु ॥ ६९ ॥
अर्थ-द्रव्यनिक्षेपकर्मका जो एक भेद 'नोकर्मतयतिरिक्त' नोआगमभावकर्म है
उसीको यहां नोकर्म शब्दसे समझना । और जिस प्रकृतिके फल देनेमें जो निमित्त-
कारण हो ( सहायता करता हो ) वही उस प्रकृतिका नोकर्म जानना इस अभिप्रायको
धारण कर कहते है।-ज्ञानावरणादि ८ मूलप्रकृतियोंके नोकर्म द्रव्यकर्म क्रमसे, वस्तुके चारोंत-
रफ़ लगा हुआ कनातका कपड़ा १ द्वारपाल २ शहत लपेटी तलवारकी धार ३ शराब १
अन्नादि आहार ५ शरीर ६ ऊंचानीचा शरीर ७ भंडारी ८ ये आठ जानना ॥ ६९ ॥
आगे उत्तरप्रकृतियोंके नोकर्म कहते है:-
पडविसयपहुदि दव्वं मदिसुदवाघादकरणसंजुत्तं ।
मदिसुदवोहाणं पुण
णोकस्मं दवियकम्म तु ॥ ७० ॥
पटविषयप्रभृति द्रव्यं मतिश्रुतव्याघातकरणसयुक्तम् ।
मतिश्रुतवोधयो पुनः नोकर्म द्रव्यकर्म तु ॥ ७० ॥
अर्थ-वस्त्रआदि वस्तुको ढंकनेवाले मतिज्ञानावरणके नोकर्म द्रव्यकर्म हैं, और इन्द्रि-
योंके रूपादिविषय वगैरः श्रुतज्ञान ( शास्त्रज्ञान व एक पदार्थसे दूसरे पदार्थका ज्ञान )
को नहीं होने देते इसकारण श्रुतज्ञानावरणकर्मके नोकर्म हैं अर्थात् जो विषयोंमें मग्न
रहता है उसे शास्त्रके विचार करनेमें रुचि नहीं होती इसलिये (गास्त्रज्ञान अथवा अपने
आत्माके स्वरूपका विचार करनेमें वाधा करनेवाले होनेसे ) इन्द्रियके विषयोंको नोकर्म
कहा है ॥ ७० ॥
अव अवधिज्ञानावरण और मनःपर्ययज्ञानावरणके नोकर्म दिखाते है,-
ओहिमणपजवाणं पडियादणिमित्तसंकिलेसयरं।
जं वज्झटं तं खलु णोकम्मं केवले णत्थि ॥ ७१ ॥
अवधिमनःपर्यययो प्रतिघातनिमित्तसंक्लेशकरः ।
यः वाह्यार्थः स खलु नोकर्म केवले नास्ति ॥ ७१ ।।
अर्थ-अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान इन दोनोके घात करनेका निमित्त कारण जो
संक्लेशरूप (खेदरूप ) परिणाम उसको करनेवाली जो बाह्य वस्तु वह अवधिज्ञानावरण
तथा मनःपर्ययज्ञानावरणका नोकर्म है । और केवलज्ञानावरणका नोकर्म द्रव्यकर्म कोई
वस्तु नहीं है क्योंकि केवलज्ञान क्षायिक ( कर्मों के अयसे प्रगट ) है इसलिये उस केव-
लज्ञानका घात करनेवाले क्लेशरूप परिणामोंको कोईभी वस्तु उत्पन्न नहीं कर सकती ॥७१॥
३५ गोम्मटसारः। अब दर्शनावरणके भेदोंके नोकर्म कहते है- पंचण्हं णिहाणं माहिसदहिपहुदि होदि णोकम्मं । वाघादकरपडादी चक्खुअचक्खूण णोकम्मं ॥ ७२ ॥ पञ्चानां निद्राणां माहिपदधिप्रभृति भवति नोकर्म । व्याघातकरपटादि चक्षुरचक्षुपो नोकर्म ।। ७२ ।। अर्थ-पांच निद्राओका नोकर्म, भैसका दही लहसन खलि इत्यादिक निद्राकी अधि- फता करनेवाली वस्तुएं है । और चक्षु तथा अचक्षुदर्शनके रोकनेवाले वस्त्र वगैरह द्रव्य चक्षुदर्शनावरण और अचक्षुदर्शनावरणकर्मके नोकर्म द्रव्यकर्म है ॥ ७२ ॥ ओहीकेवलदसणणोकम्मं ताण णाणभंगो व । सादेदरणोकम्मं इटाणिठण्णपाणादी ॥ ७३ ॥ अवधिकवलदर्शननोकर्म तयो. नानभङ्गो वा । सातेतरनोकर्म इष्टानिष्टान्नपानादि ॥ ७३ ॥ अर्थ-अवधिदर्शनावरण और केवलदर्शनावरणका नोकर्म अवधिज्ञानावरण तथा केव- लज्ञानावरणका जो नोकर्म कहा है वही जानना । और सातावेदनीय तथा असातावेद- नीयका नोकर्म अपनेको रुचनेवाली खानेपीने वगैरहकी वस्तु तथा अपनेको नही रुचै ऐसी वस्तु क्रमले जानना ॥ ७३ ॥ अब मोहनीयकर्मके भेदोंके नोकर्म दिखाते है,- आयदणाणायदणं सम्मे मिच्छे य होदि णोकम्म। उभयं सम्मामिच्छे णोकम्मं होदि णियमेण ॥ ७ ॥ आयतनानायतनं सम्यक्त्वे मिथ्यात्वे च भवति नोकर्म। उभयं सम्यग्मिथ्याने नोकर्म भवति नियमेन ॥ ७४ ।। अर्थ-छह आयतन अर्थात् जिन १ जिनमंदिर २ जिनागम ३ जिनागमके धारण- करनेवाले ४ तप ५ तपके धारक ६ ये सम्यक्त्वप्रकृतिके नोकर्म है । और ६ अनायतन अर्थात् कुदेव १ कुढेवका मंदिर २ कुगास ३ कुशास्त्र के धारक ४ खोटी तपस्या ५ खोटीतपस्याके करनेवाले ६ ये मिथ्यात्वप्रकृतिके नोकर्म है । तथा आयतन । और अनायतन दोनों मिलेहुए सम्यग्मिथ्यात्वदर्शनमोहनीयके नोकर्म है। ऐसा निश्चय कर समझना ॥ ७४ ॥ अणणोकम्मं मिच्छत्तायदणादी हु होदि सेसाणं । सगसगजोग्गं सत्यं सहायपहुदी हवेणियमा ॥७५ ॥ अननोकर्म मिथ्यात्वायतनादि हि भवति शेषाणाम् । स्वकस्वकयोग्यं शास्त्रं सहायप्रभृति भवेत् नियमात् ॥ ७५ ।। 2 -
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अर्थ-अनन्तानुबंधीकषायके नोकर्म मिथ्याआयतन अर्थात् कुदेव वगैरह छह अना-
यतन है। और बाकी बची हुई बारह कपायोंके नोकर्म, देशचारित्र-सकलचारित्र तथा
यथाख्यातचारित्रके घातनेवाले काव्य-नाटक-कोकवगैरः शास्त्र और पापी जार (कुशीली)
पुरुषोंकी सहायता इत्यादिक नियमसे होते है ।। ७५ ॥
थीपुंसंढसरीरं ताणं णोकम्म दबकम्मं तु ।
वेलवको सुपुत्तो हस्सरदीणं च णोकम्मं ॥ ७६ ॥
स्त्रीपुंषण्डशरीरं तेषां नोकर्म द्रव्यकर्म तु ।
विडम्बकः सुपुत्रः हास्यरत्योः च नोकर्म ॥ ७६ ।।
अर्थ-स्त्रीवेदका नोकर्म त्रीका शरीर, पुरुषवेदका नोकर्म पुरुषका शरीर है और
नपुंसकवेदका नोकर्म द्रव्यकर्म, उन दोनोंका कुछ कुछ चिन्हरूप नपुंसकका शरीर है ।
हास्यकर्मके नोकर्म विदूषक वा बहुरूपिया जो कि हँसी ठट्ठा करनेके पात्र हैं वे हैं ।
रतिकर्मका नोकर्म अच्छागुणवान पुत्र है क्योंकि गुणवान पुत्रपर अधिक प्रीति होती है ॥७६॥
इटाणिवियोग-जोगं अरदिस्स मुदसुपुत्तादी।
सोगस्स य सिंहादी णिदिददव्वं च भयजुगले ॥ ७७ ॥
इष्टानिष्टवियोगयोगः अरतेः मृतसुपुत्रादयः ।
शोकस्य च सिहादयः निन्दितद्रव्यं च भययुगले ॥७७ ।।
अर्थ-अरतिकर्मका नोकर्मद्रव्य इष्टका ( प्रियवस्तुका) वियोग होना और अनिष्ट
अर्थात् अप्रियवस्तुका संयोग ( प्राप्ति ) है । शोकका नोकर्मद्रव्य सुपुत्र स्त्री वगैरहका
मरना है । और सिंह आदिक भयके करनेवाले पदार्थ भयकर्मके नोकर्म द्रव्य हैं। तथा
निंदित वस्तु जुगुप्साकर्मकी नोकर्मद्रव्य है ॥ ७७ ।।
अब आयुकर्मके भेदोंके तथा नामकर्मके भेदोंके नोकर्म कहते है:-
णिरयायुस्स अणिहाहारो सेसाणमिट्ठमण्णादी।
गदिणोकम्मं दव्वं चउग्गदीणं हवे खेत्तं ॥ ७८ ॥
निरयायुषः अनिष्टाहारः शेषाणामिष्टमन्नादयः ।
गतिनोकर्म द्रव्यं चतुर्गतीनां भवेत् क्षेत्रम् ॥ ७८ ॥
अर्थ-अनिष्ट आहार अर्थात् नरककी विषरूपमट्टी आदि नरकायुका नोकर्मद्रव्य है। और
बाकी तिर्यंचआदि तीन आयुकर्मोंका नोकर्म इन्द्रियोंको प्रिय लगे ऐसा अन्न पानी वगैरः है।
और गतिनामकर्मका नोकर्म द्रव्य चारगतियोंका क्षेत्र ( स्थान ) है ।। ७८ ।।
णिरयादीण गदीणं णिरयादी खेत्तयं हवे णियमा।
जाईए. णोकम्मं दबिंदियपोग्गलं होदि ॥ ७९ ॥
गोम्मटसारः। ३७ निरयादीनां गतीनां निरयादि क्षेत्रकं भवेत् नियमात् । जातेः नोकर्म द्रव्येन्द्रियपुद्गलो भवति ॥ ७९ ॥ अर्थ-नरकादि चार गतियोका नोकर्मद्रव्य नियमसे नरकादि गतियोंका अपना अपना क्षेत्र है। और जातिकर्मका नोकर्म द्रव्येन्द्रियरूप पुद्गलकी रचना है ॥ ७९ ॥ एइंदियमादीणं सगसगदबिंदियाणि णोकम्मं । देहस्स य णोकम्मं देहुदयजदेहखंधाणि ॥ ८॥ एकेन्द्रियादीनां स्वकस्वकद्रव्येन्द्रियाणि नोकर्म। देहस्य च नोकर्म देहोदयजदेहस्कंधाः ॥ ८० ॥ अर्थ-एकेन्द्रिय आदिक पांच जातियोके नोकर्म अपनी २ द्रव्येन्द्रिये है । और शरीर नामकर्मका नोकर्मद्रव्य अपने २ उदयसे उत्पन्न हुए शरीरके स्कंधरूप पुद्गल जानना ।। ८० ॥ ओरालियवेगुब्धियआहारयतेजकम्मणोकम्मं । ताणुदयजचउदेहा कम्मे विस्संचयं णियमा ॥ ८१॥ औदारिकवैगर्विकाहारकतेजःकर्मनोकर्म । तेपामुदयजचतुर्दहा कर्मणि विश्रसोपचयो नियमात् ॥ ८१ ॥ अर्थ-औदारिक, वैक्रियिक-आहारक-तैजस शरीरनामकर्म इनका नोकर्मद्रव्य अपने २ उदयसे प्राप्त हुई शरीरवर्गणा है। क्योंकि उन वर्गणाओंसेही शरीर बनता है । और कार्माणका नोकर्मद्रव्य विस्रसोपचयरूप (स्वभावसे कर्म होनेयोग्य उम्मेदवार) परमाणू है ॥८१॥ वंधणपहुदिसमण्णियसेसाणं देहमेव णोकम्मं । णवरि विसेसं जाणे सगखेत्तं आणुपुव्वीणं ॥ ८२॥ वन्धनप्रभृतिसमन्वितशेपाणां देहमेव नोकर्म । नवरि विशेष जानीहि स्वकक्षेत्रमानुपूर्वीणाम् ॥ ८२ ॥ अर्थ-शरीरबंधननामकर्मसे लेकर जो पुद्गलविपाकी प्रकृति और पहले कही हुई प्रकृतियोंसे वाकीवची जीवविपाकी प्रकृतियां है उनका नोकर्म गरीरही है क्योंकि उन प्रकृतियोंसे उत्पन्न हुए सुखादिरूप कार्यका कारण शरीर है । परतु क्षेत्रविपाकी चार आनुपूर्वी प्रकृतियोंका नोकर्मद्रव्य अपना२ क्षेत्रही है इतनी विशेष वात जाननी॥ ८२ ॥ थिरजुम्मस्स थिराथिररसरुहिरादीणि सुहजुगस्स सुहं । असुहं देहावयचं सरपरिणदपोग्गलाणि सरे ॥८३॥ स्थिरयुग्मस्य स्थिरास्थिररसरुधिरादयः शुभयुगस्य शुभः । अशुभो देहावयवः स्वरपरिणतपुद्गलाः खरे ॥ ८३ ।।
, रायचन्द्रजैनशान्त्रमालायाम् । अर्थ-स्थिरकर्मका नोकर्म अपने २ ठिकाने स्थिर रस लोही वगैरः है, और अस्थिर प्रकृतिके अपने २ ठिकानेसे चलायमान रस लोही आदिक नोकर्म हैं । शुभप्रकृति के नोकर्मद्रव्य शुभ शरीरके अवयव हैं, तथा अशुभ प्रकृतिके नोकर्मद्रव्य शरीरके अशुभ ( देखनेमें सुन्दर न हों) अवयव है । खर नामकर्मका नोकर्म सुखर ( अच्छा खर) दुःखररूप परिणमे पुद्गल परमाणू हैं ॥ ८३ ॥ अब गोत्रकर्म तथा अंतरायकर्मके भेदोंके नोकर्म दिखाते हैं- उच्चस्सुचं देहं णीचं णीचस्स होदि णोकम्मं । दाणादिचउक्काणं विग्धगणगपुरिसपहुदी हु ॥ ८४ ॥ उच्चस्योच्च देहं नीचं नीचस्य भवति नोकर्म । दानादिचतुर्णा विघ्नकनगपुरुपप्रभृतयो हि ॥ ८४ ।। अर्थ-उच्चगोत्रका नोकर्मद्रव्य लोकपूजितकुलमें उत्पन्न हुआ शरीर है । और नीच गोत्रका नीचकुल ( लोकनिंदित कुल ) में प्राप्त हुआ शरीर नोकर्म है । दानादि चारक अर्थात् दान १ लाभ २ भोग ३ उपभोगान्तराय ४ कर्मका नोकर्मद्रव्य दानादिकमें विघ्न करनेवाले पर्वत, नदी, पुरुष, स्त्री वगैरः जानने ॥ ८४ ॥ विरियस्स य णोकम्मं रक्खाहारादि वलहरं दध्वं । इदि उत्तरपयडीणं णोकम्मं दव्वकम्मं तु ॥ ८५ ॥ वीर्यस्य च नोकर्म रूक्षाहारादि बलहरं द्रव्यम् । इति उत्तरप्रकृतीनां नोकर्म द्रव्यकर्म तु॥ ८५ ॥ अर्थ-वीयर्यांतराय कर्मका नोकर्म रूखा आहार पान वगैरः चलके नाश करनेवाले पदार्थ हैं। इसप्रकार उत्तरप्रकृतियोंके नोकर्म द्रव्यकर्म कहेगये है ।। ८५ ॥ अब नोआगमभावकर्मको कहते है- णोआगमभावो पुण सगसगकम्मफलसंजुदो जीयो । पोग्गलविवाइयाणं णत्थि खुणोआगमो भावो ॥ ८६ ॥ नोआगमभावः पुनः स्वकस्वककर्मफलसंयुतो जीवः । पुद्गलविपाकिनां नास्ति खलु नोआगमो भावः ।। ८६ ॥ अर्थ-फिर, जिस २ कर्मका जो २ फल है उस अपने अपने फलको भोगता हुआ जो जीव है वह उस २ कर्मका नोआगमभावकर्म जानना । और पुगलविपाकी प्रकृतियोंका नोआगमभावकर्म नहीं है क्योंकि जीवविपाकी प्रकृतियोंकी सहायताविना साताजन्य सुखादिककी उत्पत्ति नहीं होती ॥ इसतरह सामान्यकर्मकी मूल उत्तर दोनों प्रकृतियोंके चार निक्षेप कहे ॥ ८६ ॥ इति प्रकृतिसमुत्कीर्तननामा प्रथमोधिकारः॥१॥ 1 गोम्मटसारः। ३९ अब बंध-उदय-सत्त्वनामा दूसरे अधिकारको कहनेवाले आचार्य मंगलाचरणपूर्वक कह- नेकी प्रतिज्ञा करते है:- णमिऊण णेमिचंदं असहायपरक्कम महावीरं । बंधुदयसत्तजुत्तं ओघादेसे थवं वोच्छं ॥ ८७ ॥ नत्वा नेमिचन्द्रमसहायपराक्रमं महावीरम् । वन्धोदयसत्त्वयुक्तमोघादेशे स्तवं वक्ष्यामि ॥ ८७ ॥ अर्थ-मै नेमिचन्द्र आचार्य, कर्मरूप वैरीके जीतनेमें असहाय ( किसी दूसरेकी सहायता नहीं ) पराक्रमवाले तथा महावीर अर्थात् वंदनेवालोंको मनवांछित फलके देने- वाले ऐसे नेमिनाथतीर्थकररूपी चंद्रमाको नमस्कारकरके गुणस्थान और मार्गणास्थानोंमें कर्मोंका बंध-उदय-सत्त्वका कहनेवाला जो स्तवरूप ग्रन्थ (जिसमें सर्वांग अर्थका विस्तार हो) है उसे अब कहूंगा ।। ८७ ॥ अब स्तवका लक्षण कहते है। सयलंगकंगकंगहियार सवित्थरं ससंखेवं । वण्णणसत्थं थयथुइधम्मकहा होइ णियमेण ॥ ८८॥ सकलाइँका कागमधिकारं सविस्तरं ससंक्षेपम् । वर्णनशास्त्रं स्तवस्तुतिधर्मकथा भवति नियमेन ॥ ८८॥ अर्थ-वस्तुके सर्वांगसंबंधी अर्थ विस्तारसहित अथवा संक्षेपतासे जिसमें कहा जावै ऐसे शास्त्रको स्तव कहते हैं । और एक अंग ( अंश ) का अर्थ विस्तारसे अथवा संक्षे- पसे जिसमें हो उस शासको स्तुति कहते है । तथा एक अंगके अधिकारका अर्थ (पदार्थ) विस्तारसे वा संक्षेपसे जिसमें कहाजाय उसे वस्तु कहते है । और प्रथमानुयोगादि शास्त्रोंको निश्चयसे धर्मकथा कहते है ।। ८८ ॥ इसलिये ( स्तव कहनेसे ) यहांपर बंध-उदय-सत्ताका सब तरहसे विस्तारपूर्वक कथन किया जाइगा ॥ आगे कर्मकी बंधआदि तीन अवस्थाओं से पहले बंध अवस्थाको कहते हैं,- पयडिद्विदिअणुभागप्पदेसबंधोत्ति चदुविहो बंधो। उक्करसमणुकस्सं जहण्णमजहण्णगंत्ति पुधं ॥ ८९ ॥ प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशवन्ध इति चतुर्विधो बन्धः। उत्कृष्टोनुत्कृष्टः जघन्योऽजघन्यक इति पृथक् ॥ ८९ ।। अर्थ-प्रकृतिबंध १ स्थितिबंध २ अनुभागबंध ३ प्रदेशबंध ४ इसतरह बंधके चार भेद है। और फिर हरएक बंधके उत्कृष्ट १ अनुत्कृष्ट २ जघन्य ३ और अजघन्य ४ इसतरह चार भेद है ॥ ८९ ।। - है रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अब चार तरहके बंधोंका खरूप कहते हैं-प्रकृति अर्थात् खभावरूप चंघ जैसे नीमका खभाव कडुआपना इसीतरह ज्ञानावरण कर्मकी प्रकृति (स्वभाव) ज्ञानको ढंकना (रोकना) इत्यादिक कर्मोके स्वभावका आत्माके साथ संबंध होकर प्रगट होना प्रकृतिबंध है । और आत्माके साथ कर्मोंके रहनेकी मर्यादा (मियाद ) को स्थितिबंध कहते हैं । काँके फल देनेकी शक्तिकी हीनता वा अधिकताको अनुभागबंध कहते है । बंधनेवाले काँकी संख्याको प्रदेशबंध कहते हैं । आगे उत्कृष्टादिकेभी भेद कहते हैं:- सादिअणादी धुव अदुवो य वंधो दु जेट्टमादीसु । णाणेगं जीवं पडि ओघादेसे जहाजोग्गं ॥ ९ ॥ साद्यनादी ध्रुवः अध्रुवश्च वन्धस्तु ज्येष्ठादिपु । नानक जीवं प्रति ओघादेशे यथायोग्यम् ।। ९० ॥ अर्थ-उत्कृष्ट आदिक भेदोंकेभी सादि ( कभी २ वंध) १ अनादिबंध (अनादि- कालसे बंधका अभाव न हुआ हो) २ ध्रुवबंध ३ अर्थात् निरंतर बंध हुआ करै । अध्रुव- बंध ४ अर्थात् अंतर सहित बंध इसप्रकार चार भेद है। और यह बंध नानाजीवोंकी अपेक्षा अथवा एक जीवकी अपेक्षासे गुणस्थान और मार्गणास्थानोंमें यथासंभव जानना ॥ ९० ॥ ठिदिअणुभागपदेसा गुणपडिवण्णेसु जेसिमुक्कस्सा। तेसिमणुकस्सो चउब्विहोऽजहण्णेवि एमेव ॥ ९१ ॥ स्थित्यनुभागप्रदेशा गुणप्रतिपन्नेपुयेपामुत्कृष्टाः। तेषामनुत्कृष्टः चतुर्विध अजघन्येपि एवमेव ॥ ९१ ।। अर्थ-गुणप्रतिपन्न अर्थात् मिथ्यादृष्टि सासादनादिक ऊपर ऊपरके गुणस्थानवर्ती जीवोंमें जिन कर्मोंका स्थिति-अनुभाग-प्रदेशबंध उत्कृष्ट है उन्ही कर्मोंका अनुत्कृष्ट स्थिति, अनुभाग,प्रदेशबंध है । वह सादिवंधादिके भेदसे चार तरहका है । इसीतरह अजघन्यभी चार प्रकार है अर्थात् जिन कर्मोंका स्थिति-अनुभाग-प्रदेशबंध ऊपर २ के गुणस्थानोंमें जघन्य पाया जाता है उन्हीं काँका अजघन्यबंध चार प्रकारका होता है ॥ ९१ ।। इनका लक्षण आगे कहेंगे कुछ थोड़ासा यहांपरभी दिखादेते है-जैसे उपशमश्रेणी चढनेवाला जीव सूक्ष्मसांपराय ( दसवां ) गुणस्थानवर्ती हुआ वहांपर उत्कृष्ट ऊंच- गोत्रका अनुभाग बंध कर पीछे उपशांतकषाय (ग्यारवां ) गुणस्थान वर्ती हुआ। फिर वहांसे उतरके सूक्ष्मसांपराय गुणस्थानमें आया, वहां पर अनुत्कृष्ट ऊंचगोत्रका अनुभागबंध किया उस जगह इस अनुत्कृष्ट उच्चगोत्रके अनुभागको सादि बंध कहते है क्योंकि पहले इस बंधका अभाव था फिर उत्पत्ति ( सद्भाव ) हुई । और सूक्ष्म-' सांपरायसे नीचे रहनेवाले जीवोंके वह बंध अनादि है । अभव्यजीवोंके वह बंध ध्रुव है। - ४१ गोम्मटसारः। तथा उपशमश्रेणीवालेके अनुत्कृष्ट बंधको छोड़कर जो उत्कृष्ट बंध होता है वह अनुवबन्ध है। इसप्रकार अनुत्कृष्ट उच्चगोत्रके अनुभागबंधमें चार भेद दिखलाये ॥ अब अजघन्यके चार भेद कहते है जैसे कोई मिथ्यादृष्टि जीव सातवें नरककी पृथ्वीमें प्रथमोपशम- सम्यक्त्वके सन्मुख हुआ। वहां पर मिथ्यादृष्टि ( पहला ) गुणस्थानके अंतसमयमें जघ- न्य नीचगोत्रका अनुभागबंध किया । फिर सम्यग्दृष्टि हुआ उसके बाद फिर मिथ्यात्वके उदयसे मिथ्यादृष्टि हुआ वहां अजघन्य नीचगोत्रके अनुभागको बांधता है । उस जगह इस अजघन्य नीचगोत्रके अनुभागवंधको सादि कहना । फिर उसी मिथ्यादृष्टि जीवके उस अंतके समयसे पहले जो बंध है वह अनादि है, अभव्य जीवके वह बंध ध्रुव है, और जहां अजघन्यको छोड जघन्यको प्राप्त हुआ वहांपर वह बंध अध्रुव है । इसतरह अज- धन्य नीचगोत्रके अनुभागबंधमें सादि-अनादि-ध्रुव-अध्रुव चार भेद कहे ॥ इसीप्रकार जहां जैसा संभव हो वैसा अन्य बंधोंमें भी सादिवगैरः चार भेद समझलेना । प्रकृतिबंध उत्कृष्ट-अनुत्कृष्ट-अजघन्य-जघन्य ये भेद नहीं है, तीनमेंही है । आगे गुणस्थानों में प्रकृतिबंधका नियम कहते है;- सम्मेव तित्थवंधो आहारटुगं पमादरहिदेसु । मिस्सूणे आउस्स य मिच्छादिसु सेसबंधो दु॥९२॥ सम्यक्त्वे एव तीर्थवन्ध आहारद्विकं प्रमादरहितेषु । मिश्रोने आयुषश्च मिथ्यात्वादिषु शेषवन्धस्तु ॥ ९२ ॥ अर्थ-असंयतसे लेकर अपूर्वकरणके ( ८ वेंके ) छठे भागतक सम्यग्दृष्टिकेही तीर्थकर प्रकृतिका वध होता है । अप्रमत्त ( सातवें) गुणस्थानसे अपूर्वकरणके छठे भागतक आहारकशरीर और आहारक आङ्गोपाग प्रकृतियोंका बंध होता है । और मिश्र गुणस्थान तथा निर्वृत्यपर्याप्तअवस्थाको प्राप्त मिश्रकाययोग इन दोंनोंके सिवाय मिथ्या- दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तगुणस्थानतकही आयुकर्मका बंध होता है । तथा बाकीवची प्रकृ- तियोंका बंध मिथ्यादृष्टि वगैरः गुणस्थानों में अपनी २ बंधकी व्युच्छित्तितक होता है॥९२ ॥ अब तीर्थकरप्रकृतिके बंधका विशेष नियम दिखाते है:- पढमुवसमिये सम्मे सेसतिये अविरदादिचत्तारि । तित्थयरबंधपारंभया णरा केवलिदुगंते ॥ ९३ ॥ १ व्युच्छित्ति नाम विछुड़नेका है-जैसे दो मनुष्य एक नगरमें रहतेथे, उनमेंसे एक पुरुष दूसरी जगह गया, वहांपर किसीने पूछा कि तुम कहा विछुडे थे तव उसने कहा कि, मैं अमुक नगरमें विछुड़ा था अर्थात् उससे जुदा हुआ था। इस जगह जहा संयोग हुआ वहीं विछुडना (जुदा होना) भी हुआ । इसीतरह अपने २ गुणस्थानके अंतसमयमें कर्मोंका बंधसे विछुड़ना अर्थात् फिर आगेको बंध नहीं होना सब जगह समझ लेना। ६ , ४२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । प्रथमोपशमे सम्यक्त्वे शेपत्रये अविरतादिचत्वारः । तीर्थकरबन्धप्रारम्भका नराः केवलिद्विकान्ते ॥ ९३ ॥ अर्थ-प्रथमोपशमसम्यक्त्वमें अथवा बाकीकी द्वितीयोपशमसम्यक्त्व-क्षायोपशमसम्य- क्त्व और क्षायिकसम्यक्त्वअवस्थामें असंयतसे लेकर अप्रमत्तगुणस्थानतक चार गुणस्था- नोंवाले मनुष्यही, केवली (हितोपदेशी सर्वज्ञ ) तथा श्रुतकेवली (द्वादशाङ्गके पार- गामी ) के निकट तीर्थंकरप्रकृतिके बंधका आरंभ करते है ।। ९३ ॥ आगे चौदहगुणस्थानोंमें कर्मप्रकृतियोंकी बंधकी व्युच्छिति (आगेको बंधका नहीं होना) की संख्या कहते हैं,-- सोलस पणवीस णभं दस चउ छक्केक बंधवोछिण्णा। दुग तीस चदुरपुव्वे पण सोलस जोगिणो एको ॥९४ ॥ षोडश पञ्चविंशतिः नभः दश चतस्रः षडेकैकं बन्धव्युच्छिन्नाः । द्विके त्रिशत् चतस्रः अपूर्वे पञ्च पोडश योगिनः एका ॥ ९४ ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टि नामवाले पहले गुणस्थानके अन्तसमयमें सोलह प्रकृतियां बंध होनेसे व्युच्छिन्न होती है ( विछुड जाती हैं) अर्थात् पहले गुणस्थानतकही उनका बंध होता है, पहलेसे आगेके गुणस्थानों में बंध नहीं होता। इसीप्रकार दूसरे गुणस्थानमें २५ प्रकृतियोंकीच्युच्छित्ति होती है। तीसरेमें शून्य अर्थात् किसी प्रकृतिकी व्युच्छित्ति नहीं होती, चौथेमें दशकी, पांचवें चारकी, छटेमें छहकी, सातवेंमें एक प्रकृतिकी व्युच्छित्ति होती है । आठवें अपू- र्वकरणगुणस्थानके सातभागोंमेंसे पहले भागमें दोकी तथा दूसरे भागसे पांचवें भागतक शून्य, छठे भागमें तीसकी, सातवें भागमें चार प्रकृतियोंकी बंधसे व्युच्छित्ति होती है । नवमेमें पांचकी, दसमें सोलहकी, ग्यारवें वारवें गुणस्थानमें शून्य, तेरवें सयोगकेवली गुणस्थानमें एक प्रकृतिकी बंधव्युच्छित्ति होती है । चौदवें गुणस्थानमें बंधभी नहीं और व्युच्छित्ति भी नहीं होती, क्योंकि बंधका कारण योगका अभाव है ॥ ९४ ॥ अब उन व्युच्छिन्न प्रकृतियोंके नाम गुणस्थानके क्रमसे आठ गाथाओं द्वारा दिखाते- हुए पहलेगुणस्थानकी सोलहप्रकृतियोंको कहते है:- मिच्छत्तहुंडसंढाऽसंपत्तेयक्खथावरादावं । सुहुमतियं वियलिंदी णिरयदुणिरयाउगं मिच्छे ॥ ९५ ॥ मिथ्यात्वहुण्डषण्ढासंप्राप्तकाक्षस्थावरातपः । सूक्ष्मत्रयं विकलेन्द्रियं निरयद्विनिरयायुष्कं मिथ्यात्वे ॥ ९५॥ अर्थ-मिथ्यात्व १ हुण्डकसस्थान २ नपुंसकवेद ३ असंप्राप्तासुपाटिका संहनन " एकेन्द्रिय ५ स्थावर नाम ६ आतप ७ सूक्ष्मादि तीन (सूक्ष्म ८ अपर्याप्त ९ साधारण १. दूसरी जगह इतनी उत्कृष्टपरिणामोंकी निर्मलता नहीं हो सकती। , गोम्मटसारः। १०) विकलेन्द्री तीन अर्थात् दो इन्द्री ११ तेइन्द्री १२ चौ इन्द्री १३, नरकगति ११ नरकगत्यानुपूर्वी १५ नरकायु १६ ये सोलह प्रकृतिया मिथ्यात्वगुणस्थानके अंतसमयमें बंधसे व्युच्छिन्न होजाती है अर्थात् मिथ्यात्वसे आगेके गुणस्थानोंमें इनका बंध नही होता ॥९५॥ आगे दूसरे गुणस्थानके अंतमें प्रकृतियोंकी व्युच्छित्तिकी संख्या दिखाते हैं; विदियगुणे अणथीणतिदुभगतिसंठाणसंहदिचउक्कं । दुग्गमणित्थीणीचं तिरियदुगुजोवतिरियाऊ ॥ ९६ ॥ द्वितीयगुणे अन-स्त्यानत्रयदुर्भगत्रयसंस्थानसंह तिचतुष्कम् । दुर्गमनस्त्रीनीचं तिर्यग्लूिकोद्योततिर्यगायुः ॥ ९६ ।। अर्थ-दूसरे सासादनगुणस्थानके अंतसमयमें अनंतानुबंधी क्रोधादिचार, स्त्यानगृ- द्धि १ निद्रानिद्रा १ प्रचलाप्रचला १ ये तीन, दुर्भग १ दुःखर १ अनादेय १ ये तीन न्यग्रोधादि चार संस्थान, वज्रनाराचादि चार संहनन, अप्रशस्तविहायोगति, स्त्रीवेद, नीच- गोत्र, तिर्यग्गति १ तिर्यग्गत्यानुपूर्वी २ ये दो, उद्योत, और तिर्यंचायु' इन पञ्चीस प्रकृतियोंक- व्युच्छित्ति होती है ॥ ९६ ॥ मिश्रगुणस्थानमें किसी प्रकृतिकी व्युच्छित्ति नहीं होती। अब चौथे और पांचवें गुणस्थानमें संख्या कहते हैं,- अयदे विदियकसाया वजं ओरालमणुदुमणुवाऊ । देसे तदियकसाया णियमेणिह बंधवोच्छिण्णा ॥ ९७ ॥ अयते द्वितीयकषाया वज्रमोरालमनुष्यद्विमानवायुः । देशे तृतीयकपाया नियमेनेह बन्धव्युच्छिन्नाः ॥ ९७ ॥ अर्थ-चौथे असंयतगुणस्थानमें दूसरी अप्रत्याख्यानावरणक्रोधादि चार कषाय, वजी पभनाराचसंहनन, औदारिक शरीर, औदारिक आंगोपांग, मनुष्यगति १ मनुष्यागत्यानुपूर्वी २ ये दो, मनुष्यायु, ये दसप्रकृतियां बंधसे व्युच्छिन्न होती है। और पांचवें देशव्रतगुणस्था- नमें तीसरी प्रत्याख्यानावरणी क्रोधादि चार कषायें बंधसे व्युच्छिन्न नियमसे होती है।।९७॥ अब छठे और सातवें गुणस्थानमें व्युच्छित्तिकी संख्या कहते है;- छट्टे अधिरं असुहं असादमजसं च अरदिसोगं च । अपमत्ते देवाऊणिडवणं चेव अत्थिति ॥ ९८ ॥ पष्ठे अस्थिरमशुभमसातम तमयशश्च अरतिशोकं च । अप्रमत्ते देवायुनिष्ठापनं चैव अस्तीति ॥ ९८ ।। अर्थ-छठे गुणस्थानके अंतिमसमयमें अस्थिर, अशुभ, असातावेदनीय, अयशस्कीर्ति रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ४४ अरति और शोक इन छह प्रकृतियोंका बंधसे विछुड़ना होता है । और सातवें अप्रमत्त- गुणस्थानमें एक देवायुप्रकृतिकी व्युच्छित्ति होती है ॥ ९८ ॥ आगे आठवें अपूर्वकरणगुणस्थानके सात भागोंमेंसे पहले, छठे, सातवें भागमेही बंधकी व्युच्छित्तिकी संख्या दिखाते हैं- मरणूणम्हि णियट्टीपढमे णिद्दा तहेव पयला य । छठे भागे तित्थं णिमिणं सग्गमणपंचिंदी ॥ ९९ ॥ तेजदुहारदुसमचउसुरवण्णगुरुगचउक्कतसणवयं चरमे हस्सं च रदीभयं जुगुच्छा यवंधवोच्छिण्णा ॥१०॥जुम्म । मरणोने निवृत्तिप्रथमे निद्रा तथैव प्रचला च । षष्ठे भागे तीर्थ निर्माणं सद्गमनपश्चन्द्रियम् ।। ९९ ।। तेजोनिकाहारद्विसमचतुरस्रसुरवर्णागुरुकचतुष्कत्रसनवकम् । चरमे हास्यं च रतिः भयं जुगुप्सा च बन्धव्युच्छिन्ना ॥ १०० ।। युग्मम् । अर्थ-निवृत्ति अर्थात् आठवें अपूर्वकरणके मरणअवस्थारहित प्रथमभागमें निद्रा और प्रचला इन दो प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति होती है । और छठे भागके अंतसमयमें तीर्थ- करप्रकृति, निर्माण, प्रशस्तविहायोगति, पंचेंद्रीजाति, तैजस १ कार्माण २ ये दो, आहा- रकशरीर १ आहारक आंगोपांग २, समचतुरस्रसंस्थान, देवगति १ देवगत्यानुपूर्वी २ बैक्रियिकशरीर ३ वैक्रियिक आंगोपांग ४ ये चार, वर्णादि चार, अगुरुलघु १ उपघात २ परघात ३ उच्छ्रास ४ ये चार और त्रसौदि नौ' इन तीस प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति होती है। और अंतके सातवें भागमें हास्य, रति, और जुगुप्सा ये चार प्रकृतियां बंधसे बिछुड़ती हैं ।। ९९ ॥ १० ॥ अब नवमें तथा दसवें गुणस्थानके अंतसमयमें बंधव्युच्छित्तिकी संख्या कहते हैं- पुरिसं चदुसंजलणं कमेण अणियट्टिपंचभागेसु । पढमं विग्धं दसणचउजसउच्चं च सुहुमंते ॥ १०१॥ पुरुषः चतुस्संज्वलनः क्रमेण अनिवृत्तिपञ्चभागेषु । प्रथमं विघ्नः दर्शनचतुर्यशउच्चं च सूक्ष्मान्ते ॥ १०१।। १ जो श्रेणी चढ़नेके सन्मुख नहीं हुआ ऐसे स्वस्थान अप्रमत्तके अतसमयमे व्युच्छित्ति होती है, दूसरे सातिशय अप्रमत्तके बंधही नहीं होता तो न्युच्छित्तिभी नहीं । २ कर्मों के पाठक्रमसे गिन लेना इसीतरह दूसरी जगहभी गिनती करलेना ॥ ३ इस गाथामें "अन्ते" ऐसा शब्द कहा है वह अतमे रक्खे हुए दीपककी तरह समझना ॥ जैसे-अंतिमस्थानमें रक्खा हुआ दीपक भीतरकी जगहमेभी प्रकाश करता वैसे "मन्ते" शब्दभी सब व्युच्छित्तियोंको अतसमयमें होना जाहिर करता है । , भय गोम्मटसारः। ४५ अर्थ-नववें अनिवृत्तिकरण गुणस्थानके पांच भागोंमें क्रमसे पहले भागमें पुरुषवे- दकी व्युच्छित्ति, वाकीके चार भागोंमें सज्वलन क्रोधादिचार कषायोंकी व्युच्छित्ति जानना । और दसवें सूक्ष्मसापराय ( कपाय लोभकषायवाले ) गुणस्थानके अंतसमयमें पहला ज्ञानावरण अर्थात् मतिज्ञानावरणादि पांच, अंतरायके भेद पाच, चक्षुदर्शनावरणादि चार, यशस्कीर्ति, और उच्च गोत्र इसप्रकार १६ प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति होती है ॥ १०१ ।। अब तेरवे गुणस्थानके अंतमें बंधव्युच्छिन्न प्रकृतिको दिखाते है।- उवसंतखीणमोहे जोगिम्हि य समयियटिदी सादं । णायचो पयडीणं बंधस्संतो अणंतो य ॥ १०२॥ उपशान्तक्षीणमोहे योगिनि च समयिकस्थितिः सातम् । नातव्यः प्रकृतीनां वन्धस्यान्त अनन्तश्च ।। १०२॥ अर्थ-उपगांतमोह नामके ग्यारवे गुणस्थानमें, बारवें क्षीणमोह गुणस्थानमें और तेरवें सयोगकेवली गुणस्थानमें एक समयकी स्थितिवाला एक सातावेदनीय प्रकृतिका ही बंध होता है, इसकारण तेरवें गुणस्थानके अंतसमयमें सातावेदनीय प्रकृतिकी ही व्युच्छिति होती है । 'और चौढमे बंधका कारण योगका अभाव होनेसे बंधभी नही तथा व्युच्छि- चिभी नहीं होती' इसप्रकार प्रकृतियों के बंधका अन्त अर्थात् न्युच्छित्ति जानना । तथा बंधका अनंत अर्थात् बंध और "च" शब्दसे अवधभी जानना ॥ १०२ ॥ आगे बंध और अवधका स्वरूप दो गाथाओंसे कहते हुए बंधकी संख्या कहते है। सत्तरसेकग्गसयं चउसत्तत्तरि सगति तेवठ्ठी बंधा णवट्टवण्णा दुवीस सत्तारसेकोघे ॥ १०३ ॥ सप्तदशैकाप्रशतं चतुः-सप्तसप्ततिः सप्तपष्टिः त्रिपष्टिः । वन्धा नवाटपश्चाशत् द्वाविशतिः सप्तदश एकौघे ॥ १०३॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदिक गुणस्थानों में क्रमसे एकसौ सत्रह, एकसौ एक, ७४, ७०, ६७, ६३, ५९, ५८, २२, १७, १, १, १, इसप्रकार प्रकृतियोंका बंध तेरह गुणस्थानतक होता है, चौदवेंमें बंध नही होता । यहाँपर ऐसा समझना कि बंधयोग्य प्रकृतिया पहले १२० कही है उनमें "सम्मेव तित्थ" इस ९२ ३ गाथाके अनुसार मिथ्या- दृष्टिमें तीन प्रकृतियोंका बंध न होनेसे १२०-३=११७ बाकी रही । द्वितीयादि गुण- स्थानोंमें भी व्युच्छित्तिप्रकृतियोंको घटानेसे बंधकी संख्या इस गाथाके अनुसार निकल आती है ॥ १०३ ॥ १ जैसे पहले गुणस्थानकी व्युच्छित्ति प्रकृतिया १६ हैं और ३ प्रकृतियां अबंध है तो १६+३=१९ प्रकृतिया दूसरे गुणस्थानमें अवधरूप हुई, अर्थात् १९ का धंध नहीं होता है, इसीतरह और गुणस्थानों में भी लगालेना। .
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अब अवधप्रकृतियोंको गुणस्थानों में क्रमसे दिखाते हैं;- तिय उणवीसं छत्तियतालं तेवण्ण सत्तवण्णं च । इगिदुगसट्टी विरहिय सय तियउणवीससहिय वीससयं ॥१०॥ त्रयमेकोनविशतिः पत्रिकचत्वारिंशत् त्रिपञ्चाशत् सप्तपञ्चाशश्च । एकद्वाषष्टिः द्विरहितं शतं त्र्येकोनविशतिसहितं विंशतिशतम् ॥ १०४ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदिक चौदह गुणस्थानोंमें क्रमसे तीन, १९, ४६, ४३, ५३, ५७, ६१, ६२, दोरहित सौ अर्थात् ९८, तीनसहित सौ अर्थात् १०३, ११९ तीन जगह, और १२० प्रकृतियोंका अवंध है अर्थात् इन ऊपर लिखित प्रकृतियोंका बंध नही होता अर्थात् पहले-गुणस्थानमें तीर्थकर १ आहारक शरीर २ आहारक आंगोपाग ३ इन तीनका बंध पहले ९२ वें गाथामें कहे हुए नियमसे नहीं होता, और द्वितीयादि गुणस्थानोंमें व्युच्छित्ति प्रकृतियोंको पहली अबंध प्रकृतियोंमें जोड़नेसे ऊपर लिखी हुई संख्या निकल आती है ॥ १०४ ॥ आगे चौदह मार्गणाओंमें पहले कहे गये बंधन्युच्छित्ति, बंध, अबंध इन तीनोंका वर्णन करते हुए पहले नरकगतिमें तीन गाथाओंसे तीनोको कहते है- ओघे वा आदेसे णारयमिच्छम्हि चारि वोच्छिण्णा । उवरिम वारस सुरचउ सुराउ आहारयमवंधा ॥ १०५ ।। ओघे इव आदेशे नारकमिथ्यात्वे चतस्रो व्युच्छिन्नाः । उपरितना द्वादश सुरचतुष्कं सुरायुराहारकमबन्धाः ।। १०५ ॥ अर्थ-मार्गणाओंमें व्युच्छित्ति वगैरः तीन अवस्था गुणस्थानके समान जानना । परन्तु विशेष यह है कि नरकगतिमें मिथ्यात्वगुणस्थानके अन्तमें मिथ्यात्वादि चार प्रकृति- योंकी ही व्युच्छित्ति होती है । और सोलहमेंसे आदिकी चार प्रकृतियो के विना एकेन्द्री आदि बारहे, देवगति १ देवगत्यानुपूर्वी २ वैक्रियिकशरीर ३ वैक्रियिक आङ्गोपांग ४ ये चार, देवायु, आहारकशरीर १ आहारक आगोपाग २, ये सव उन्नीस प्रकृतियां अबंध है, अर्थात् नरकगतिके मिथ्यात्वगुणस्थानमें १९ प्रकृतियोंका बंध नहीं होता, इसकारण बंधयोग्य १२० प्रकृतियोंमेंसे वाकी वची १०१ प्रकृतियोंका बंध होता है ॥ १०५ ॥ अब नरकगतिमें धर्मादिनरकोंकी अपेक्षा कुछ भेद दिखाते है- घम्मे तित्थं बंधदि वंसामेघाण पुण्णगो चेव । छछोति य मणुवाऊ चरिमे मिच्छेच तिरियाऊ ॥ १०६ ॥ १ मार्गणाभोंके नाम तथा खरुप इसके पूर्वार्व जीवकाण्डमेंसे समझलेना । २ प्रकृतियोंकी संख्याका क्रम पहले लिखागया है उसके अनुसार १२ प्रकृतियां गिन लेना, ऐसेही सर्व जगह पहले लिखा हुआ क्रम याद रखना चाहिये।
४७ गोम्मटसारः। धर्मे तीर्थ बनाति वंशामेघयोः पूर्णकश्चैव । पष्ठ इति च मानवायुः चरमे मिथ्यात्वे एव तिर्यगायुः ॥ १०६॥ अर्थ-धर्मा नामके पहले नरककी पृथिवीमें पर्याप्त और अपर्याप्त दोनों अवस्थाओंमें तीर्थकर प्रकृतिका बंध होता है। और वंशानाम दूसरे तथा मेघानाम तीसरे नरकमें पर्याप्त- जीव ही तीर्थकर प्रकृतिको बांधता है । मघवीनाम छठे नरकतकही मनुष्यायुका बंध होता है। और अंतके माधवी नाम सातवें नरकमें मिथ्यात्वगुणस्थानमेंही तिर्यच आयुका बंध होता है ॥ १०६॥ मिस्साविरदे उच्चं मणुवदुर्ग सत्तमे हवे बंधो। मिच्छा सासणसम्मा मणुवदुगुचं ण बंधति ॥ १०७ ॥ मिश्राविरते उच्च मनुण्यद्वयं सप्तमे भवेत् बन्धः । मिथ्यात्विनः सासादनसम्यक्त्वा मनुष्यद्विकोचं न बध्नन्ति ॥ १०७ ॥ अर्थ-सातवें नरकमें मिश्रगुणस्थान और अविरतनामके चौथे गुणस्थानमें ही उच्चगोत्र, मनुष्यगति १ मनुष्यगत्यानुपूर्वी २, इनतीन प्रकृतियोंका बंध है । और मिथ्यात्वगुणस्था- नवाले तथा सासादनसम्यक्त्वी दूसरे गुणस्थानवाले जीव उच्च और मनुष्यद्विक जो तीन प्रकृतियां ऊपर भी कह आये है इन तीनोंको नही बांधते ॥ १०७ ॥ अब तिर्यचगतिमें न्युच्छित्ति वगैरः कहते है- तिरिये ओधो तित्थाहारूणो अविरदे छिदी चउरो। उवरिमछण्डं च छिदी सासणसम्मे हवे णियमा ॥ १०८ ॥ तिरश्चि ओघः तीर्थाहारोन अविरते छितिः चत्वारः । उपरिमपण्णां च छितिः सासादनसम्यत्तवे भवेनियमात् ॥ १०८॥ अर्थ-तिर्यंचगतिमें व्युच्छित्ति वगैरः गुणस्थानोंकी तरह समझना । परंतु इतनी विशे- पता है कि तीर्थकर और आहारक शरीर १ आहारक आंगोपांग २, इनतीनोंका बंध नही होता इसकारण बंध योग्य ११७ प्रकृतियां है । और चौथे अविरतगुणस्थानमें अप्र- त्याख्यान क्रोधादि ४ की व्युच्छिति है, तथा दूसरे सासादनसम्यत्त्वगुणस्थानमें चारसे आगेकी वज्रर्षभनाराच आदि ६ प्रकृतियां जो दसमेंसे वची है उनकी व्युच्छित्ति निय- मसे होती है ॥ १०८ ॥ सामण्णतिरियपंचिंदियपुण्णगजोणिणीसु एमेव । सुरणिरयाउ अपुण्णे वेगुब्वियछक्कमवि णत्थि ॥ १०९॥ सामान्यतिर्यकपञ्चेन्द्रियपूर्णकयोनिनीपु एवमेव । सुरनिरयायुरपूर्णे वैगूर्विकषदमपि नास्ति ॥ १०९ ॥ अर्थ-पांचतरहके तियेचोंमें सबभेदोंका समुदायरूप सामान्यतिर्यंच, पंचेंद्रीतिर्यच, -
४८
रायचन्द्रजैनशाम्पमालायाम् ।
पर्याप्ततियेच, स्त्रीवेदरूप तिर्यच, इन चार तरहके तिर्यचोंमें ऊपर लिखित रीतिसे व्युच्छि-
त्ति आदिक समझना । तथा पांचवें लन्धिअपर्याप्तक तिर्यंचमें देवायु, नरकायु, और
देवगति १ देवगत्यानुपूर्वी २ नरकगति ३ नरकगत्यानुपूर्वी ४ वक्रियिकगरीर ५ वैक्रियि-
क आंगोपांग ६ ये वैक्रियिकपटु, इसप्रकार आठ प्रकृतियोंका अबंध है अर्थात् बंध नहीं
होता ।। १०९॥
आगे मनुप्यगतिमें व्युच्छित्ति आदिफको दिखाते है:-
तिरियेव णरे णवरि हु तित्थाहारं च अस्थि एमेव ।
सामण्णपुण्णमणुसिणिणेर अपुण्णे अपुण्णव ॥ ११ ॥
तिर्यगिव नरे नवरि हि तीर्थाहारं चास्ति एवमेव ।
सामान्यपूर्णमनुष्यिणीनरे अपूर्णे अपूर्ण इव ॥ ११० ।।
अर्थ मनुप्यगतिमें व्युच्छित्ति वगैरः की रचना तिथंचगतिकी तरह जानना । विशेष-
ता इतनी है कि तीर्थंकर, आहारकट्टिक इन तीनकामी बंध होता है, इसकारण बंध योग्य
१२० प्रकृतियां हैं । और सामान्य (सब मेदोंका सनुदायरूप ) मनुष्य, पर्याप्तमनुप्य,
स्त्रीवेदरूपमनुप्यिणी मनुप्य इनतीनोंकी व्युच्छिति आदिकी रचना मनुप्यगतिकीसी है।
तथा लब्ध्यपर्याप्तकी रचना तियेचलभ्यपर्याप्तकी तरह समझना ॥ ११० ॥
अब देवगतिमें व्युच्छिति वगैरः को कहते हैं-
णिरयेव होदि देवे आईसाणोत्ति सत्त याम छिदी।
सोलस चेव अवंधा भवणतिए णत्थि तित्ययरं ॥ १११ ॥
निरय इव भवति देवे आईशान इति सप्न वाम छित्तिः ।
पोडश चैव अवन्धाः भवनत्रये नास्ति तीर्थकरम् ॥ १११ ।।
अर्थ-देवगतिमें व्युच्छित्ति आदिक नरागतिक समान जानना, परंतु इतना विशेष
है कि मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें दूसरे ईशानस्वर्गतक पहलेगुणस्थानकी १६ प्रकृतियॉमसे
मिथ्यात्व आदि सात प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति होती है । और बाकी बची हुई सूक्ष्मादि नौ
तथा देवगति १ देवगत्यानुपूर्वी २ वैक्रियिक शरीर ३ वैक्रियिक आंगोपांग ? ये सुरच-
तुष्क, देवायु, आहारक गरीर, और आहारक आंगोपांग, ये सात सब ९+७ मिलाकर
१६ प्रकृतियां अबंधरूप हैं अर्थात् इन सोलहका बंध नहीं होता, इसकारण बंध योग्य
१०१ प्रकृतियां है । तथा भवनत्रिकदेवोंमें (भवनवासीदेव १व्यंतर २ ज्योतिषीदेवोंमें ३)
तीर्थकर प्रकृति नहीं है अर्थात् तीर्थकर प्रकृतिका बंध नहीं होता ॥ १११ ॥
कप्पित्थीसु ण तित्थं सदरसहस्सारगोत्ति तिरियदुर्ग ।
तिरियाऊ उज्जोबो अत्थि तदो णत्यि सदरचऊ ॥ ११२ ॥
कल्पनीषु न तीर्थ गवारसहस्रारक इति तिर्यन्द्विकम् ।
तिर्यगायुरुद्योतः अस्ति ततः नास्ति चतारचतुष्कम् ॥ ११२॥
।
११३१
गोम्मटसारः।
४९
अर्थ-कल्पवासिनी लियोंमें तीर्थकर प्रकृतिका बंध नहीं होता । और तिर्यंचगति १
तिर्यंचगल्यानुपूर्वी २ ये दो, तिर्यंचायु, तथा उद्योत ये चार प्रकृतियोंका बंध ग्यारवें, बारवें
शता, सहस्रार नामके स्वर्गतकही होता है । इसके अर्थात् सहस्रारके ऊपर आनतादि
खगों में रहनेवालोंके इन चार प्रकृतियोंका बंध नहीं होता । इन चार प्रकृतियोंका दूसरा
नाम 'शतारचतुक' भी है क्योंकि शतार युगलतक ही इनका बंध होता है ॥११२ ॥
अब इन्द्रियमार्गणामें बंधन्युच्छित्ति आदिकको कहते हैं-
पुण्णिदरं विगिविगले तत्थुप्पण्णो हु सासणो देहे।
पज्जतिं णवि पावदि इदि णरतिरियाउगंणत्थि ॥११३॥
पूर्णेतरमिवैकविकले तत्रोत्पन्नो हि सासाद्नो देहे ।
पर्याप्ति नापि प्राप्नोति इति नरतिर्यगायुष्कं नास्ति ॥ ११३ ॥
अर्थ-एकेंद्रिय तथा विकलंत्रय अर्थात् दो इंद्री, ते इंद्री, चौ इंद्रीमें लब्धिअपर्या-
सक अवस्थाकी तरह बंध योग्य १०९ प्रकृतियां समझना; क्योंकि तीर्थकर, आहारकद्वय,
देवायु, नरकायु, और वैक्रियिक पटू, इसतरह ग्यारह प्रकृतियोंका बंध नहीं होता । और
एकेन्द्रिय तथा विकलत्रयमें उत्पन्न हुआ जीव सासादन गुणस्थानमें देह (शरीर)
पर्याप्तिको नही पूरा करसकता है, क्योंकि सासादनका काल थोडा और निर्वृति अपर्याप्त
अवस्थाका काल वहुत है । इसकारण इस गुणस्थानमें मनुष्यायु तथा तिर्यंचायुका भी
बंध नहीं होता है। ११३ ॥
अब पंचेन्द्रियों तथा पृथ्वीकाय वगैरः पांच भेदोमें दिखाते है:-
पंचेंदियेसु ओघं एयक्खे वा वणप्फदीयते।
मणुवदुर्ग मणुवाऊ उच्चं ण हि तेउवाउम्हि ॥ ११४ ॥
पञ्चेन्द्रियेपु ओघः एकाक्ष इव वनस्पत्यन्ते ।
मनुष्यद्वयं मनुष्यायुरुचं न हि तेजोवायौ ॥ ११४ ॥
अर्थ-पंचेंद्री जीवोंके व्युच्छित्ति आदिक गुणवानकी तरह समझना, कुछ विशेषता
नहीं है। और कायमार्गणामें पृथ्वीकायादि वनस्पतिकायपर्यंतमें एकेन्द्रियकी तरह ब्युच्छि-
त्ति आदिक जानना । विशेष यह है कि तेजकाय तथा वायुकायमें मनुष्यगति १ मनु-
प्यगत्यानुपूर्वी २, मनुष्यायु और उच्चगोत्र इन चार प्रकृतियोंका भी बंध नहीं होता है।
गुणस्थान एक मिथ्यादृष्टि ही है ॥ ११४ ॥
आगे एक गुणस्थान होनेके कारणको तथा योगमार्गणामें व्युच्छित्ति आदिको
कहते है।
ण हि सासणो अपुण्णे साहारणसुहुमगे य तेउदुगे।
ओघ तस मणवयणे ओराले मणुवगइभंगो ॥११५॥
५० रायचन्द्र जैनशास्लमालायाम्। न हि सासादन अपूर्णे साधारणसूक्ष्मके घ तेजोहये । ओघः त्रसे मनोवचने औराले मनुष्यगतिभगः ॥ ११५ ॥ अर्थ-लब्धि अपर्याप्तक अवस्थामें, साधारण शरीरसहित जीवोंमें, सब सूक्ष्मकायदा- लोंमें, और तेजोकाय १ वायुकायवालोंके २ सासादननामा दूसरा गुणस्थान नहीं होता। इसका कारण कालका थोड़ा होना पहले कहचुके है, इसलिये तेजकाय तथा वायुकाय- वालोंके एक मिथ्यादृष्टि ही गुणस्थान कहा है । और त्रसकायकी रचना गुणस्थानोंकी तरह समझनी । योगमार्गणामें मनोयोग तथा वचनयोगकी रचना गुणस्थानोंकी तरह जाननी और औदारिक काययोगमें मनुप्यगतिकी तरह रचना जानना ।। ११५ ॥ ओराले वा मिस्से ण हि सुरणिरयाउहारणिरयदुर्ग । मिच्छद्गे देवचओ तित्थं ण हि अविरदे अस्थि ॥११६॥ ओराल इव मिश्रे न हि सुरनिरयायुराहारनिरयद्वयम् । मिथ्यात्वद्वये देवचतुष्कं तीर्थ न हि अविरते अति ॥ ११६ ॥ अर्थ-औदारिकमिश्रकाययोगमें औदारिककाययोगवत् रचना जानना । विशेष बात यह है कि देवायु, नरकायु, आहारकशरीर १ आहारक मांगोपांग २, नरकगति १ नरकगत्यानुपूर्वी २, इन छह प्रकृतियोंका बंध नहीं होता अर्थात् ११४ का बंध होता है। उसमें भी मिथ्यात्व तथा सासादन इन दो गुणस्थानोंमें देवचतुष्क और तीर्थकर इन ५ प्रकृतियोंका बंध नहीं होता । अविरतनामा चौथे गुणस्थानमें तो इनका अवश्य बंध होता है ॥ ११६ ॥ पण्णारसमुनतीसं मिच्छदुगे अविरदे छिदी चउरो। उवरिमपणसट्टीवि य एक सादं सजोगिम्हि ॥ ११७ ॥ पञ्चदशैकोनत्रिशत् मिथ्यात्वद्विके अविरते छित्तयः चतस्रः । उपरिमपञ्चषष्टिरपि च एकं सात सयोगिनि ॥ ११७॥ अर्थ-औदारिकमिश्रकाययोगमें मिथ्यात्व और सासादन इन दो गुणस्थानोंमें १५ तथा २९ प्रकृतियोंकी वंध व्युच्छित्ति क्रमसे जानना । और चौथे अविरत गुणस्थानमें ऊपरकी चार तथा ६५ दूसरी सब ६९ प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति होती है। तथा तेरवें सयोगीकेवलीके एक सातवेदनीयकी ही व्युच्छित्ति जानना ॥ ११७ ॥ देवे वा वेगुज्वे मिस्से णरतिरियआउगं णत्थि । छट्टगुणं वाहारे तम्मिस्से णत्थि देवाऊ ॥ ११८ ।। देव इव वैगूर्वे मिश्रे नरतिर्यगायुष्कं नास्ति । षष्ठगुणमिवाहारे तन्मिश्रे नास्ति देवायुः ॥११८ ॥ अर्थ-वैक्रियिक काययोगमें देवगतिके समान जानना । और वैक्रियिकमिश्रकाय- गोम्मटसारः। ५१ योगमें सौधर्म-ऐशान संबंधी अपर्याप्त देवोंके समान कही है। परंतु इस मिश्रमें मनुष्यायु और तिर्यंचायुका बंध नहीं होता । और आहारक काययोगमें छठे गुणस्थानकी रचनाके समान जानना । लेकिन आहारकमिश्रयोगमें देवायुका बंध नहीं होता है ॥ ११८ ॥ कम्मे उरालमिस्सं वा णाउदुगंपि णव छिदी अयदे । वेदादाहारोति य सगुणठ्ठाणाणमोघं तु ॥ ११९ ॥ कर्मणि औरालिकमिश्नं वा नायुकिमपि नव छित्तिरयते । वेदादाहार इति च स्वगुणस्थानानामोघस्तु ।। ११९ ।। अर्थ-कार्माणकाययोगीकी रचना औदारिकमिश्रकी तरह जानना । परंतु विग्रहगतिमें आयुका बंध न होनेसे मनुष्यायु तथा तिर्यचायु इन दोनोंका भी बंध नहीं है। चौथे असंयत गुणस्थानमें नौ प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति होती है । और वेदमार्गणासे लेकर आहार मार्गणातक अपने २ गुणस्थानोंमें साधारण कथन है वैसा जानना ॥ ११९ ॥ अब सम्यक्त्वमार्गणा तथा लेश्यामार्गणाकी रचनामेंसे शुभ लेश्याओंमें और आहारमार्ग- णामें कुछ विशेषता दो गाथाओंसे दिखाते है:- णवरि य सचुवसम्मे परसुरआऊणि णत्थि णियमेण । मिच्छस्संतिम णवयं वारं ण हि तेउपम्मेसु ॥ १२० ॥ सुक्के सदरचउकं वामंतिमवारसं च ण व अस्थि । कम्मेव अणाहारे बंधस्संतो अणंतो य ॥ १२१ ॥ जुम्मं । नवरि च सर्वोपशमे नरसुरायुषी नास्ति नियमेन । मिथ्यात्वस्यान्तिमं नवकं द्वादश न हि तेजःपद्मयोः ॥ १२० ॥ शुक्लायां शतारचतुष्कं वामान्तिमद्वादश च न वा अस्ति । कर्म इव अनाहारे बन्धस्यान्त अनन्तश्च ॥ १२१ ॥ युग्मम् ॥ अर्थ-विशेषता यह है कि सम्यक्त्वमार्गणामें सब ही अर्थात् दोनों ही उपशमसम्य- तवी जीवोंके मनुष्यायु और देवायुका बंध नही है यह निश्चयकर जानना । और लेश्या- मार्गणा तेजोलेश्यावालेके मिथ्यात्व गुणस्थानकी अंतकी नौ तथा पद्मलेश्यावालेके मि- थ्यात्वगुणस्थानकी अंतकी बारह प्रकृतियोंका बंध नियमसे नही होता । शुक्ललेश्यावालेके शतारचतुष्क " तिर्यंचगति वगैरः जो ११२ में कह चुके हैं " और वाम अर्थात् मिथ्यादृष्टि गुणस्थानकी बारह, सब मिलकर १६ प्रकृतियोका बंध नही होता है। और आहारमार्गणामें अनाहारक अवस्था में कार्माण योगकीसी बंधन्युच्छित्ति आदिक तीनकी रचना समझ लेना ॥ इसप्रकार बंधकी व्युच्छित्ति, बंध और " च" शब्दसे अबंध इन तीनोंका खरूप जानना ।। १२० ॥ १२१ ॥ १ बंधन्युच्छित्ति आदि तीनोंका खुलासा बंधादिके नकशामें लिखाजायगा यहांपर अन्यके बढ़जानेके भयसे नहीं लिखा। , १ ५२ रायचन्द्रजैनशासमालायाम्। आगे मूलप्रकृतियोंके सादि वगैरः बंधके भेदोंको विशेषपनेसे कहते हैं;- सादि अणादी धुव अद्धवो य बंधो दु कम्मछक्कस्स। तदियो सादियसेसो अणादिधुवसेसगो आऊ ॥ १२२ ।। सादिरनादिः ध्रुव अध्रुवश्च बंधस्तु कर्मपट्टस्य । तृतीयः सादिकशेप अनादिध्रुवशेषक आयुः ॥ १२२ ॥ अर्थ-छह कर्मोंका प्रकृतिबंध सादि १ अनादि २ ध्रुव ३ अध्रुव ४ रूप चारों प्रकारका होता है। परंतु तीसरे वेदनीय कर्मका सादिबंधसे बाकी जो तीन बंध उन तीनखरूपही बंध होता है सादि बंध नहीं होता । और आयुकर्मका अनादि, ध्रुव बंधके सिवाय अर्थात् सादि और अध्रुव दो प्रकारकाही बंध होता है ॥ १२२ ॥ आगे इन बंधोंका स्वरूप कहते है। सादी अबंधवंधे सेढिअणारूढगे अणादी हु। अभवसिद्धम्हि धुवो भवसिद्धे अद्धवो बंधो ॥ १२३ ।। सादिः अवन्धवन्धे श्रेण्यनारोहके अनादिहि । अभव्यसिद्धे ध्रुवो भवसिद्धे अध्रुवो वन्धः ॥ १२३ ॥ अर्थ-जिसकर्मके बंधका अभाव होकर फिर वही कर्म बंधै उसे सादिवंध कहते हैं। जैसे किसी जीवके दसवें गुणस्थानतक ज्ञानावरणकी पांच प्रकृतियोंका बंध था, जब वह जीव ग्यारवेंमें गया तब बंधका अभाव हुआ, पीछे ग्यारवें गुणस्थानसे पड़कर फिर दसवेंमें आया तब ज्ञानावरणादि पांच प्रकृतियोंका पुनः बंध हुआ, ऐसा बंध सादि कह- लाता है। और जो गुणस्थानोंकी श्रेणीपर ऊपरको नही चढा अर्थात् बंधका अभाव नही हुआ वह अनादिबंध है। जैसे ज्ञानावरणका बंध दसवेंतक है सो दसवें गुणस्थानवाला ग्यारवेंमें जबतक प्राप्त नहीं हुआ वहांपर अनादि बंध है, क्योंकि अनादिकालसे बंध चला आता है । जिस बंधका आदि तथा अंत न हो वह ध्रुवबंध है-यह बंध अभव्यजीवके होता है । जिस बंधका अंत आजावै उसे अध्रुवबंध कहते है । यह अध्रुवबंध भव्यजी- वोंके होता है ॥ १२३ ॥ आगे उत्तर प्रकृतियों में इन चार बंधोंकी विशेषता दिखाते है- घादितिमिच्छकसाया भयतेजगुरुदुगणिमिणवण्णचओ। सत्तेत्तालधुवाणं चदुधा सेसाणयं तु दुधा ॥ १२४ ॥ घातित्रिमिथ्यात्वकपाया भयतेजोऽगुरुद्विकनिर्माणवर्णचतुष्कम् । सप्तचत्वारिशद्धवाणां चतुर्धा शेषाणां तु द्विधा ।। १२४ ।। अर्थ-मोहनीयके विना तोन घातियाकर्मोंकी १९ प्रकृतियां, मिथ्यात्व, १६ कषाय, भयका जोड़ा अर्थात् भय १ जुगुप्सा २, तैजस १ कार्माण २, अगुरुलघु १ उपधात, . - r - .
गोम्मटसारः। , ५३ निर्माण, वर्णादि चार ये ४७ प्रकृतियां ध्रुव है । इनका चारों प्रकार बंध होता है । ( जब तक इनके बंधकी व्युच्छित्ति ( विछुडना) न हो तबतक इन प्रकृतियोंका समय २ प्रति- बंध निरंतर होता है इसकारण इनको ध्रुव कहते है ) और इनके बिना जो वाकी वची वेदनीयकी २ मोहनीयकी ७ आयुकी ४ और नामकर्मकी गति आदिक ५८ गोत्र कर्मकी २ ये ७३ प्रकृतियां अध्रुव है । इनके सादि और अध्रुव दोही बंध होते है। इनका किसी समय बंध होता है, किसी समय किसीका बंध नही भी होता ॥ १२४ ॥ आगे इन प्रकृतियोंके अप्रतिपक्षी १ सप्रतिपक्षी २ ( विरोधी ) ये दो भेद कहते है। सेसे तित्थाहारं परघादचउक्क सव्वआऊणि । अप्पडिवक्खा सेसा सप्पडिवक्खा हु वासट्टी॥ १२५ ॥ शेपासु तीर्थाहारं परघातचतुष्कं सर्वायूंषि । अप्रतिपक्षा शेपाः सप्रतिपक्षा हि द्वाषष्टिः ॥ १२५ ॥ अर्थ-पहले कहीहुई ४७ ध्रुवप्रकृतियोंसे वॉकी वची हुई ७३ प्रकृतियोंमेंसे तीर्थकर, आहारकशरीरद्वय अर्थात् आहारकशरीर आहारक आंगोपांग, परघात आदि चार और सब ( चारों ) आयु, ये ग्यारह प्रकृतियां अप्रतिपक्षी है अर्थात् इनकी कोई प्रकृति विरोधी नहीं है । जिस समयमें इनका बंध होता है उस समय अपना २ बंध होता है । यदि न होवै तो नही हो । जैसे तीर्थकर प्रकृतिका बध जिस समय होना चाहे उससमय तीर्थंकर प्रकृ- तिका बंध होता है न होना चाहे तब नही होता । इस प्रकृतीकी कोई विरोधी नही जोकि रोक लेवै । और ७३ मेंसे ११ घट जानेसे वाकी रही ६२ प्रकृतियां है उनमें आपसमें विरोधीपना होनेसे वे सप्रतिपक्षी कही जाती है । जैसे कि सातावेदनीय, असातावेद- नीय ये दोनों आपसमे प्रतिपक्षी है सो जिससमय साताका बंध होता है उससमय असा- ताका नही होता । इसीतरह रति अरति आदि परस्पर विरोधी प्रकृतियोमें भी सप्रतिपक्षी- पना समझ लेना ॥ १२५ ॥ आगे अध्रुव प्रकृतियोंका पहले सादि तथा अध्रुव ये दो प्रकारका ही बंध कहा उसका कारण युक्तिपूर्वक कहते है। अवरो भिण्णमुहुत्तो तित्थाहाराण सव्वआऊणं । समओ छावहीणं बंधो तम्हा दुधा सेसा ॥ १२६ ॥ अवरो भिन्नमुहूर्तः तीर्थाहाराणां सर्वायुषाम् । समयः षट्पष्टीनां बन्धः तस्मात् द्विधा शेषाः ॥ १२६ ।। अर्थ-तीर्थकर, आहारकद्वय, नरकादि चार आयु इन सातोंके निरंतर बंध होनेका जघन्यकाल अंतर्मुहूर्त है । और शेष छ्यासठि प्रकृतियोंके निरंतर बध होनेका काल एक ५४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । समय (क्षण ) है अर्थात् जिसका किसीएक समयमें बंध हुआ फिर दूसरे समयमै उस प्रकृतिका बंध होवै नहीं भी होवै। इसकारण ध्रुवसे वाकी रहीं १३ अध्रुव प्रकृतियोंके सादि बंध तथा अध्रुव बंध दोही भेद कहेगये हैं यह सिद्ध हुआ ॥ १२६ ॥ इसप्रकार प्रकृति- बंध समाप्त हुआ ॥ आगे स्थितिबंधको कहते हुए आचार्य प्रथम ही मूलप्रकृतियोंकी उत्कृष्टस्थिति कहते है- तीसं कोडाकोडी तिघादितदियेसु वीस णामदुगे । सत्तरि मोहे सुद्धं उवही आउस्स तेतीसं ॥१२७ ।। त्रिंशत् कोटीकोट्यः त्रिधातितृतीयेपु विंशतिर्नामद्वये । सप्ततिर्मोहे शुद्ध उदधिः आयुपः त्रयस्त्रिंशत् ।। १२७ ।। अर्थ-तीन घातियाओंकी अर्थात् ज्ञानावरण १ दर्शनावरण २ अंतरायकी और तीसरे वेदनीयकर्मकी बंध होनेकी उत्कृष्ट स्थिति तीस कोड़ाकोड़ी सागरके प्रमाण है। नाम और गोत्र इन दोनोंका समय वीस कोडाकोड़ी सागर है । मोहनीयकर्मकी बंधरूप रहनेकी स्थिति (कालकी मर्यादा) सत्तरि कोड़ाकोड़ी सागर है । और आयुकर्मकी स्थिति तेतीस सागर ही की जानना अर्थात् अधिकसे अधिक ऊपर लिखे हुए कालतक कर्म आत्मासे बंधरूप रहते है। फिर अपना फल देकर पुराने खिरजाते है नवीन पंधरूप ही रहते हैं ॥१२७॥ अब उत्तरप्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिको ६ गाथाओंसे दिखाते हैं; दुक्खतिघादीणोघं सादिच्छीमणुदुगे तदद्धं तु । सत्तरि दंसणमोहे चरित्तमोहे य चत्तालं ॥ १२८ ।। संठाणसंहदीणं चरिमस्सोघं दुहीणमादित्ति । अट्ठरसकोडकोडी वियलाणं सुहुमतिण्हं च ॥ १२९ ॥ अरदीसोगे संढे तिरिक्खभयणिरयतेजुरालदुगे। वेगुव्वादावदुगे णीचे तसवण्णअगुरुति चउक्के ॥ १३०॥ इगिपंचेंदियथावरणिमिणासग्गमणअथिरछक्काणं । वीस कोडाकोडीसागर णामाणमुक्करसं ॥ १३१ ॥ हस्सरदिउच्चपुरिसे थिरछके सत्थगमणदेवदुगे। तस्सद्धमंतकोडाकोडी आहारतित्थयरे ॥ १३२ ॥ सुरणिरयाऊणोघं णरतिरियाऊण तिण्णि पल्लाणि । उकस्सद्विदिवंधो सण्णीपज्जत्तगे जोगे ॥ १३३ ॥ कुलयं । - - J -. गोम्मटसारः। दुःखत्रिघातिनामोघः सातस्त्रीमनुष्यद्विके तदर्ध तु । सप्ततिः दर्शनमोहे चारित्रमोहे च चत्वारिंशत् ॥ १२८॥ संस्थानसंहतीनां चरमस्योघः द्विहीनमादीति । अष्टादशकोटीकोटिः विकलानां सूक्ष्मत्रयाणां च ॥ १२९ ।। अरतिशोके षण्ढे तिर्यग्भयनिरयतेजउरालद्वये । वैगूर्विकातपद्विके त्रसवर्णागुर्विति चतुष्के ॥ १३० ॥ एकपञ्चेन्द्रियस्थावरनिर्माणासद्गमनास्थिरषदानाम् । विशं कोटीकोटिसागरः नामानामुत्कृष्टम् ॥ १३१ ।। हास्यरत्युच्चपुरुषे स्थिरषद्धे शस्तगमनदेवद्विके । तस्यार्धमन्तःकोटीकोटिः आहारतीर्थकरे ॥ १३२ ॥ सुरनिरयायुषोरोघः नरतिर्यगायुषोः त्रीणि पल्यानि । उत्कृष्टस्थितिवन्धः संज्ञिपर्याप्तके योग्ये ॥ १३३ ॥ कुलकम् । अर्थ-उत्तरप्रकृतियोंमेंसे दुक्ख अर्थात् असाता वेदनीय १ और ज्ञानावरण २ दर्श- नावरण २ अन्तराय ३ ये तीनघातियाकर्मोंकी १९ प्रकृतियां, सब मिलकर २० प्रकृति- योंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ओघ अर्थात् सामान्यमूलप्रकृतिकी तरह तीस कोडाकोड़ीसागर प्रमाण है । सातावेदनीय, स्त्रीवेद, मनुष्यगति १ मनुष्यगत्यानुपूर्वी २ ये दो, इस तरह चार प्रकृतियोंका तो उससे आधा अर्थात् पंद्रहकोड़ाकोड़ी सागर है । दर्शनमोहनीयरूप जो एक मिथ्यात्व उसका सत्तर कोड़ाकोड़ीसागरप्रमाण है। और चारित्रमोहनीयरूप सोलह कषायोंका चालीस कोड़ाकोड़ी सागर है ।। १२८ ॥ और ६ संस्थान तथा संहन- नमें चरम अर्थात् अन्तका हुंडसंस्थान और सुपाटिकासंहनन इन दोनोंका मूलप्रकृतिकी तरह वीस कोड़ाकोड़ी सागर है । और वाकीके ४ संस्थान तथा ४ संहननोंमें दो दो सागर कम पहले पहलेतक करना, अर्थात् वामनसंस्थान और कीलितसंहननका १८, कुनसंस्थान और अर्धनाराचसंहननका १६ सातिसंस्थान और नाराचसंहननका १४ न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान और वज्रनाराचसंहननका १२ समचतुरस्रसंस्थान और वज्रर्षभ- नाराचसंहननका १० कोडाकोडीसागर प्रमाण है । विकलेन्द्री अर्थात् दोइंद्री तेइंद्री चौइंद्री, और सूक्ष्मादि तीन इस तरह ६ प्रकृतियोंका अठारह कोडाकोडी सागर प्रमाण स्थितिवन्ध है ॥ १२९ ॥ अरति, शोक, नपुंसकवेद, तियेच-भय-नरक-तैजस-औदारिक इन पांचका जोड़ा अर्थात् तिर्यचगति १ तिर्यंचगत्यानुपूर्वी २ इत्यादि, वैक्रियिक-आतप इन दोका जोड़ा, नीचगोत्र, त्रस-वर्ण-अगुरुलधु इन तीनोंकी चौकड़ी अर्थात् त्रस १ बादर २ पर्याप्त ३ प्रत्येक ४ इत्यादि, ॥ १३० ॥ एकेन्द्री, पंचेंद्री, स्थावर, निर्माण, असद्गमन अर्थात् अप्रशस्तविहायोगति, और अस्थिरादि छह इसतरह ४१ नामप्रकृति- योंका वीसकोड़ाकोड़ीसागर उत्कृष्टस्थितिबंध है ॥ १३१ ॥ हास्य, रति, उच्चगोत्र, पुरुष- . ' . . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । घेद, स्थिरआदिक छह, शस्त गमन अर्थात् प्रशस्तविहायोगति, देवद्विक अर्थात् देवगति, १ देवगत्यानुपूर्वी २ इन तेरह प्रकृतियोंका उससे आधा अर्थात् दस कोड़ाकोडी सागर प्रमाण है। आहारकशरीर, आहारक आंगोपांग और तीर्थकरप्रकृति इनतीनोंका अंतको. डाकोडी अर्थात् कोड़िसे ऊपर और कोड़ाकोड़िसे नीचे इतने सागरप्रमाण उत्कृष्ट स्थिति- बंध है ॥ १३२ ॥ देवायु और नरकायु इन दोनोंका मूलप्रकृतिकी तरह ३३ सागर प्रमाण है, और मनुप्यायु तथा तिर्यचायु इन दोनोंका तीनपल्य प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिबंधकहा है। यह उत्कृष्टस्थितिबंध सैनी पंचेद्री पर्याप्तके होता है उसमें भी योग्य जीवके होता है हरएकके नही होता ॥ १३३ ॥ आगे तीन आयुके सिवाय शुभ-अशुभप्रकृतियोंकी उत्कृष्टस्थितिके कारण संक्लेश परिणामही है ऐसा कहते है- सहिदीणमुक्कस्सओ दु उक्कस्ससंकिलेसेण । विवरीदेण जहण्णो आउगतियवजियाणं तु ॥ १३४ ॥ सर्वस्थितीनामुत्कृष्टकस्तु उत्कृष्टसंक्लेशेन । विपरीतेन जघन्य आयुष्कत्रयवर्जितानां तु ॥ १३४ ।। अर्थ-तीन आयु अर्थात् तिर्यंच-मनुष्य-देवायुके विना अन्य सब ११७ प्रकृतियोंका उत्कृष्टस्थितिबंध यथासंभव उत्कृष्ट संक्लेश ( कपायसहित ) परिणामोंसे होता है । और जघन्यस्थितिबंध विपरीतपरिणामोंसे अर्थात् संक्लेशसे उलटे उत्कृष्टविशुद्धपरिणामोंसे होता है। तीन आयुप्रकृतियोंका इससे विपरीत अर्थात् उत्कृष्ट विशुद्धपरिणामोंसे उत्कृष्टखिति- चंध होता है तथा जघन्यस्थितिबंध उत्कृष्ट संक्लेशपरिणामोंसे होता है ॥ १३४ ॥ । - आगे उत्कृष्टस्थितिबंधके करनेवाले (खामीको ) को कहते है:- सव्वुक्कस्सठिदीणं मिच्छाइट्टी दुवंधगो भणिदो। आहारं तित्थयरं देवाउं वा विमोत्तूणं ॥ १३५ ॥ सर्वोत्कृष्टस्थितीनां मिथ्यादृष्टिस्तु बन्धको भणितः । आहारं तीर्थकरं देवायुषं वा विमुच्य ।। १३५ ।। अर्थ-आहारकद्विक, तीर्थकर और देवायु इन चार प्रकृतियोंके सिवाय वाकी ११६ प्रकृतियोंकी उत्कृष्टस्थितियोंको मिथ्यादृष्टि जीवही बांधनेवाला होता है। इस कथनसे यह बात सिद्ध हुई कि इन आहारकादि चार प्रकृतियोंके उत्कृष्टस्थितिका बंध सम्यग्दृष्टिके ही होता है ॥ १३५॥ - . १: तीन कषायरूप उत्कृष्टसक्लेशपरिणामोंवाला ही अधिक स्थिति के योग्य कहागया है ।
गोम्मटसारः । - - अब उन चारप्रकृतियोंके बंधखामियोंमें भी विशेषपना दिखाते है:- देवाउगं पमत्तो आहारयमप्पमत्तविरदो दु। तित्थयरं च मणुस्सो अविरदसम्मो समजेइ ॥ १३६ ॥ देवायुषं प्रमत्त आहारकमप्रमत्तविरतस्तु । तीर्थकरं च मनुष्य अविरतसम्यक् समर्जयति ।। १३६ ॥ अर्थ-देवायुकी उत्कृष्टस्थितिको छठे प्रमत्तगुणस्थानवाला बांधता है। आहारकको अर्थात् आहारकशरीर १ आहारक आंगोपांग २ इन दोनोंकी उत्कृष्ट स्थितिको सातवें अप्रमत्तगुणस्थानवाला बांधता है । और उत्कृष्टस्थितिवाली तीर्थकरप्रकृतिको चौथेगुणस्था- नवाला असंयमीसम्यग्दृष्टि मनुष्य ही उपार्जन करता है अर्थात् बांधता है ॥ १३६ ॥ आगे ११६ प्रकृतियोंके वांधनेवाले " जो १३५ वी गाथामें कहेथे" मिथ्यादृष्टियोंके भी भेद दो गाथाओंसे कहते है। णरतिरिया सेसाउं गुवियछक्कवियलसुहुमतियं । सुरणिरया ओरालियतिरियदुगुज्जोवसंपत्तं ॥ १३७ ॥ देवा पुण एइंदियआदावं थावरं च सेसाणं । उक्कस्ससंकिलिट्ठा चद्गदिया ईसिमज्झिमया ॥१३८॥ जुम्म । नरतियञ्चः शेपायुषं वैगूर्विकपदविकलसूक्ष्मत्रयम् । सुरनिरया औदारिकतिर्यग्द्वयोद्योतासंप्राप्तम् ॥ १३७ ।। देवा 'पुनरेकेन्द्रियातपं स्थावरं च शेषाणाम् । उत्कृष्टसंक्लिष्टा चतुर्गतिका ईषन्मध्यमकाः ॥ १३८ ॥ युग्मम् । अर्थ-देवायुसे शेष नरकादि तीन आयु, वैक्रियिकषटू ( नरकगति आदि ६), दो इंद्री आदि तीन विकलेंद्री, सूक्षादि तीन इस तरह १५ प्रकृतियोंका उत्कृष्टस्थितिबंध मनुष्य और तिर्यंच मिथ्याइष्टि करते है। और औदारिकशरीरद्वय (औदारिकशरीर १ औदारिक आंगोपांग २), तिर्यंचगति १ तिर्यचर्गत्यानुपूर्वी २ ये दो, उद्योत और असंप्राप्तसृपाटिकासंहनन इन प्रकृतियोंको उत्कृष्टस्थितिसहित देव और नारकी मिथ्यादृष्टि जीव बाधते है ॥ १३७ ॥ 'एकेंद्री, आतप, और स्थावर इन तीनप्रकृतियोंका उत्कृष्टस्थि- तिबंध मिथ्यादृष्टि देव करते है । और बाकी बची ९२ प्रकृतियोंको उत्कृष्ट संक्लेश परिणामवाले तथा ईषन्मध्यमसंक्लेश परिणामवाले चारोंगतियोंके जीव बांधते हैं॥१३८॥ १. सातवें गुणस्थानके चढ़नेको सन्मुख हुआ प्रमत्तगुणस्थानवाला । २. छठे गुणस्थानमें उतरनेको सन्मुख हुआ ऐसा अप्रमत्तवाला । ३. नरकमें जानेकेलिये सन्मुख हुआ अर्थात् नरकमें जानेवाला ऐसा अविरतसम्यग्दृष्टि । ४ कषायरूप परिणाम तीव्र, मंद, मध्यमके भेदसे असख्याते हैं, उनमेंसे तीघ्र कषायरूप परिणामोंको उत्कृष्टसम्लेश'कहते हैं, मंद (थोड़ी ) कषाय अवस्थारूप परिणामोंको ईषत्सक्लेश और न बहुत न थोड़ी ऐसी मध्यमकषायअवस्थारूप परिणामोंको मध्यमसालेशपरिणाम कहते हैं। .
, - ५८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आगे मूलप्रकृतियोंका जघन्य स्थितिबंध कहते है। वारस य वेयणीये णामागोदे य अट्ट य मुहुत्ता। भिण्णमुहुत्तं तु ठिदी जहण्णयं सेसपंचण्हं ॥ १३९ ॥ द्वादश च वेदनीये नामगोत्रे च अष्ट च मुहूर्ताः। भिन्नमुहूर्तस्तु स्थितिः जघन्या शेपपञ्चानाम् ॥ १३९ ।। अर्थ-वेदनीयकर्मकी जघन्यस्थिति १२ मुहूर्त है और नाम तथा गोत्रकर्म इनदो- नोंकी आठ मुहूर्त है, तथा बाकीवचे पांचकर्मोंकी जघन्य स्थिति अंतर्मुहूर्त है ॥ १३९ ॥ अब उत्तरप्रकृतियोंका जघन्यस्थितिबंध चार गाथाओंसे कहते है। लोहस्स सुहुमसत्तरसाणं ओघं दुगेकदलमासं । कोहतिये पुरिसस्स य अट्ट य वस्सा जहण्णठिदी ॥१४॥ लोभस्य सूक्ष्मसप्तदशानामोघः द्विकैकदलमासः । क्रोधत्रये पुरुषस्य च अष्ट च वर्षाणि जघन्यस्थितिः ।। १४० ॥ अर्थ-लोभप्रकृति और दसवें सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानमें बंधहोनेवाली १७ प्रकृतियोंका जघन्यस्थितिबंध मूलप्रकृतियोंकी तरह समझना अर्थात् इन प्रकृतियोंमेंसे यशस्कीर्ति और उच्चगोत्रका आठ आठ मुहूर्त, सातावेदनीयका १२ मुहूर्त: पांच ज्ञानावरण, चार दर्शना. वरण, पांच अंतराय इन १४ का और लोभप्रकृतिका एक २ अंतर्मुहूर्त जानना । क्रोधा- दितीनका अर्थात् क्रोध, मान, मायाका दो महीने-एक महीना तथा दलमास (पंद्रहदिन) क्रमसे जघन्यस्थितिबंध है, और पुरुषवेदकी आठवर्षप्रमाण जघन्यस्थिति है ॥ १४०॥ तित्थाहाराणंतोकोडाकोडी जहण्णठिदिवंधो। खवगे सगसगवंधच्छेदणकाले हवे णियमा ॥ १४१ ॥ तीर्थाहाराणामन्तःकोटीकोटिः जघन्यस्थितिबन्धः । क्षपके स्वकस्वकबन्धच्छेदनकाले भवेत् नियमात् ॥ १४१ ।। अर्थ-तीर्थकर और आहारकका जोड़ा इन ३ प्रकृतियोंका जघन्यस्थितिबंध अंतः कोड़ाकोड़ीसागर प्रमाण है । क्षपकश्रेणीवालेके यह जो जघन्यस्थितिबंध है वह अपनी २ बंधव्युच्छित्तिके समयमें नियमसे होता है ॥ १४१॥ भिण्णमुहुत्तो णरतिरियाऊणं वासदससहस्साणि । सुरणिरयआउगाणं जहण्णओ होदि ठिदिबंधो ॥ १४२ ॥ मिन्नमुहूर्तः नरतिर्यगायुषोः वर्षदशसहस्राणि । सुरनिरयायुषोः जघन्यकः भवति स्थितिबन्धः ॥ १४२॥ . - + r 4 5 गोम्मटसारः। ५९ अर्थ-मनुष्यायु और तिर्यचआयुका जघन्यस्थितिबंध अंतर्मुहूर्त है। देवायु और नरकायुका दशहजार वर्ष प्रमाण जघन्यस्थितिबंध होता है ॥ १४२ ॥ सेसाणं पजत्तो बादरएइंदियो विसुद्धो य । वंधदि सबजहण्णं सगसगउक्कस्सपडिभागे ॥ १४३ ॥ शेषाणां पर्याप्तो वादरैकेन्द्रियो विशुद्धश्च । वनाति सर्वजघन्यं स्वकस्वकोत्कृष्टप्रतिभागे ॥ १४३॥ अर्थ-पहले कही हुई २९ प्रकृतियोंसे बाकी बची ९१ प्रकृतियां उनमेंभी वैक्रियिकष और मिथ्यात्व इन सातप्रकृतियोंके विना ८४ प्रकृतियोंकी सब जघन्यस्थितियोंको बादर- पर्याप्त यथायोग्यविशुद्धपरिणामोंको धारणकरनेवाला एकेद्री जीव ही अपनी २ स्थितिके प्रतिभागमें अर्थात् गणितके अनुसार त्रैराशिकविधिसे भागकरके जो जो प्रमाण होवै उस प्रमाण बांधता है ।। १४३ ॥ आगे उसी जघन्यस्थितिकी विधिको दिखाते हैं,- एयं पणकदि पण्णं सयं सहस्सं च मिच्छवरबंधो। इगिविगलाणं अवरं पल्लासंखूणसंखूणं ॥ १४४ ॥ एकं पञ्चकृतिः पञ्चाशत् शतं सहस्रं च मिथ्यात्ववरबंधः । एकविकलानामवरः पल्यासंख्योनसंख्योनम् ।। १४४ ॥ अर्थ-एकेंद्री और विकल चार अर्थात् दोइन्द्री, ते इंद्री, चौइंद्री, असंज्ञीपंचेंद्री जीव मिथ्यात्वकर्मकी उत्कृष्टस्थितिका बंध एक सागर, २५ सागर, ५० सागर, १०० सागर, प्रमाण कमसे करते है । और जघन्यस्थितिको एकेद्री जीव अपनी उत्कृष्टस्थिति- मेंसे पल्यके असंख्यातवें भाग हीन ( कम ) जो प्रमाण रहै उतनी बांधता है। और दोइन्द्री आदि विकल चार अपनी २ स्थितिमेंसे पल्यके संख्यातवें भाग हीनकर जो प्रमाण आवै उतनी बांधते हैं ॥ १४४ ॥ आगे संज्ञीपंचेद्रीकी उत्कृष्टस्थितिकी अपेक्षासे एकेंद्रियजीवोंके उत्कृष्ट वा जघन्यस्थि- तिबंधका प्रमाण त्रैराशिकगणितसे निकालकर कहते है- जदि सत्तरिस्स एत्तियमेत्तं किं होदि तीसियादीणं । इदि संपाते सेसा-णं इगिविगलेसु उभयठिदी ॥ १४५ ॥ यदि सप्ततेः एतावन्मानं किं भवति त्रिंशदादीनाम् । इति संपाते शेषाणामेकविकलेभयस्थितिः ॥ १४५ ॥ अर्थ-जो सत्तरि कोड़ाकोड़ीसागरकी उत्कृष्टस्थितिवाला मिथ्यात्वकर्म एकेद्रीजीवके ६० रायचन्द्र जैनशासंमालायाम् | एकसागरप्रमाण बँधै तो तीसआदिककोड़ाकोड़ी सागरकीस्थितिवाले वाकीके कर्म एकेंद्री जीवके कितने प्रमाण बंधसकता है, इसप्रकार संपात (त्रैराशिक ) विधिसे एकेन्द्रीजीवकी उत्कृष्टस्थिति अर्थात् एकसागरके सातभागमेंसे तीनभाग प्रमाण हुई । इसीतरह दोइन्द्री आदि विकलजीवोंकेभी संज्ञी पंचेंद्रीकी उत्कृष्टस्थितिके हिसाबसे कर्मोंकी उत्कृष्टस्थिति निकालना । और जघन्यस्थितिसे जघन्यस्थिति एकेंद्रियादि असंज्ञीपंचेद्री तक त्रैराशिकसे निकाललेना । इस तरह दोनों ( उत्कृष्ट जघन्य ) स्थितियां त्रैराशिकसे निकाल- लेना ॥ १४५॥ अब जघन्यस्थितिमें कुछ विशेषता दिखाते हैं;- सण्णि असण्णिचउक्के एगे अंतोमुहुत्तमावाहा। जेडे संखेजगुणा आवलिसंखं असंखभागहियं ॥ १४६ ॥ संज्ञिनि असंज्ञिचतुष्क एके अन्तर्मुहूर्त आवाधा । ज्येष्ठे संख्येयगुणा आवलिसंख्यमसंख्यभागाधिकम् ॥ १४६ ।। अर्थ-सैनीजीव, असंज्ञीकी चौकड़ी अर्थात् असंज्ञिपंचेन्द्री १ चौइंद्री २ तेइंद्री ३ दोइंद्री ४, और एकेंद्रीजीवकी प्रकृतियोंकी जघन्य आवाधा ( जिसको आगे १५५३में कहेगे) अंतर्मुहूर्त प्रमाण है । यद्यपि आपसमें संख्यातगुणी २ कमती है तो भी अंतर्मुहूर्तमें सब गिनती आजाती है, क्योंकि अंतर्मुहूर्तके बहुतभेद हैं। इसकारण सामान्यसे अंतर्मुहूर्तही काल कहा । और ज्येष्ठ अर्थात् उत्कृष्ट आवाधा सेंनीजीवमें तो अपनी जघन्यसे संख्यात- गुणी जानना । असंज्ञिचतुष्कमें अपनी जघन्यसे आवलिके संख्यातवें भाग अधिक तथा एकेन्द्रियमें अपनी जघन्य आवाधाके कालसे आवलीके असंख्यातवें भाग अधिक समझना ॥ १४६॥ इसप्रकार सब मनमें रखकर जघन्यस्थितिबंधको सिद्धकरनेकेलिये गणितका सूत्र कहते है। जेहावाहोवट्टियजेठं आवाहकंडयं तेण । आवाहवियप्पहदेणेगूणेणूणजेट्टमवरठिदी ॥ १४७ ।। ज्येष्ठावाघोद्वार्तितज्येष्ठमाबाधाकाण्डकं तेन । आबाधाविकल्पहतेन एकोनेन ऊनजेष्ठमवरस्थितिः ।। १४७ ।। अर्थ-एकेंद्रियादि जीवोंकी उत्कृष्ट आवाधासे भाजित . (भाग की गई ) जो अपने २ कर्मोंकी उत्कृष्टस्थिति उसके प्रमाण ( माप) कालको आवाधाकाण्डक कहते -
गोम्मटसारः।
६१.
हैं अर्थात् उतने २ स्थितिके भेदोंमें एकसरीखा आवाधाका प्रमाण जानना । उस अपने
२ आवाधाकाण्डकके प्रमाणसे अपने २ आवाधाके भेदोंको गुणनेसे जो प्रमाण हो उसमें
एक २ घटाकर जितना प्रमाण आवै उतना कम जो अपनी २ उत्कृष्टस्थिति है वह अपनी
२ जघन्यस्थिति जानना । जैसे एकेंद्री जीवके मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट आवाधाका प्रमाण
आवलिके असंख्यातवें भागकर अधिक अंतर्मुहूर्त है उसका भाग मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट-
स्थिति १ सागरमें दिया जो लब्ध आया वह आबाधाकाण्डक नामका प्रमाण है।
इस आवाधाकांडकसे पूर्वकथित एकेंद्रीके आवाधाके भेदोंकर गुणाकार करनेसे जो प्रमाण
हो उसमेंसे एक कम करै उतने प्रमाणको मिथ्यात्वकी उत्कृष्टस्थिति १ सागरमें घटानेसे
जो प्रमाण बचै वह मिथ्यात्वकी जघन्यस्थितिका प्रमाण जानना । इसीप्रकार दो इंद्री
आदिमें भी गणित समझलेना । विस्तार भयसे अधिक नहीं लिखा है ॥ १४७ ॥
अब जीवोंके चौदह भेदोंमें जघन्य और उत्कृष्टस्थितिबंध को जुदा २ करके दिख-
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लाते है।
-
.
-
.
बासूप-वासूअ-वरहिदीओ सूवाअ-सूवाप-जहण्णकालो।
वीवीवरो वीविजहण्णकालो सेसाणमेवं वयणीयमेदं ॥१८॥
वासूप-वासूअ-वरस्थितिः सूवाअ-सूवाप-जघन्यकालः ।
वीवीवरः बीविजघन्यकालः शेषाणामेवं वक्तव्यमेतत् ॥ १४८ ॥
अर्थ-बासूप अर्थात् बादर-सूक्ष्मपर्याप्त और वासूअ अर्थात् बादर-सूक्ष्मअपर्याप्त
येदोनों मिलकर चार तरहके जीवोंके कर्मोंकी उत्कृष्टस्थिति तथा सूक्ष्म-बादरअपर्याप्त
और सूक्ष्म-बादरपर्याप्त जीवोंके कोंकी जघन्यस्थिति, बीवीवरः अर्थात् दोइंद्रीपर्याप्त
और दोइंद्री अपर्याप्त इनदोनोंकी उत्कृष्टकर्मस्थिति तथा दोइंद्री अपर्याप्त और दोइंद्री-
पर्याप्त इनदोनोंका जघन्यकाल इसप्रकार दोइन्द्रीकी स्थितिके, चार भेद होते है। इसीतरह
तेइंद्रीसेलेकर संज्ञीपंचेन्द्रीतक स्थितिके चार २ भेद जानना । सब मिलकर ८+४+४+
४+४+४=२८ भेद चौदहतरहके जीवोंकी अपेक्षा स्थितिके हुए ॥ १४८॥
ऐसा सब कथन मनमें धारणकर स्थितिकी शलाका ( हिस्सा ) ओंको जाननेकेलिये
गाथासूत्र कहते है:-
मज्झे थोवसलागा हेट्टा उवरिं च संखगुणिदकमा।
सबजुदी संखगुणा हेटुवरि संखगुणमसण्णित्ति ॥ १४९ ॥
मध्ये स्तोकशलाका अधस्तनमुपरि च संख्यगुणितक्रमा ।
सर्वयुतिः संख्यगुणा अधस्तनोपरि संख्यगुणा असंज्ञीति ॥ १४९ ॥
- ६२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-जीवोंकी २४ तरहको स्थितिके भेदोंकी संख्याखरूप जो शलाका हैं वे मध्यभागमें थोड़ी है अर्थात् मध्यभेदोंकी संख्या थोड़ी है । और नीचे भाग तथा ऊपर- भागके भेदोंकी संख्या पहलेसे संख्यातगुणी क्रमसे जानना । तथा सबका जोद अर्थात् सब मिलकर संख्यातगुणी भेदोंकी संख्या है। इस तरह नीचे भागसे लेकर ऊपरभाग तक असंज्ञी पंचेन्द्रीजीवोंतक ही संख्यातगुणी शलाका जाननी अर्थात् एकेन्द्रीसे लेकर असंज्ञी- पंचेन्द्री तक स्थितिके भेद संख्याते है ॥ १४९ ॥ अब संज्ञीजीवोंकी स्थितिके चार भेदोंमें कुछ विशेषता दिखाते हैं,- सण्णिस्स हु हेट्ठादो ठिदिठाणं संखगुणिदमुवरुवरि । ठिदिआयामोवि तहा सगठिदिठाणं व आवाहा ॥ १५० ।। संज्ञिनः हि अधस्तनात् स्थितिस्थानं संख्यगुणितमुपर्युपरि । स्थित्यायामोपि तथा स्वकस्थितिस्थानं व आवाधा ॥ १५० ॥ अर्थ-संज्ञी ( मनसहित ) पंचेन्द्रीके चार भेदोंमें नीचे से लेकर अर्थात् संज्ञीपर्याप्तके जघन्यस्थितिबंधसे ऊपर २ चौथे भेदतक स्थितिके स्थान ( भेदोंका प्रमाण ) संख्यातगुणे क्रमसे जानने । और स्थितीका कालभी संख्यातगुणा है तथा स्थितिके स्थानप्रमाण आबाधाकाल होता है ऐसा समझना ॥ १५० ॥ आगे जघन्यस्थितिबंधके खामी ( करनेवाले ) को कहते हैं- सत्तरसपंचतित्थाहाराणं सुहुमवादरापुवो। छवेगुवमसण्णी जहण्णमाऊण सण्णी वा ॥ १५१ ॥ सप्तदशपश्चतीर्थाहाराणां सूक्ष्मबादरापूर्वः । षडैगूर्वमसंज्ञी जघन्यमायुषा संज्ञी वा ॥ १५१ ॥ अर्थ-ज्ञानावरणादि १७ प्रकृतियोंकी जघन्यस्थितिको दसवें सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्था, नवाला बांधता है । पुरुषवेदादिक पांचकी जघन्यस्थिति बादर अर्थात् नवमें गुणस्थान- वाला, तीर्थंकरप्रकृति तथा आहारकद्वय इन तीनकी जघन्यस्थितिको आठवें अपूर्वकरण- गुणस्थानवाला, और वैक्रियिकषटू जो देवगति आदि छह हैं उनकी जघन्यस्थितिको असनीपंचेंद्रीजीव तथा आयुकर्मकी जघन्यस्थितिको संज्ञी अथवा असंज्ञी दोनों ही बांधते हैं ॥ १५१॥ आगे जघन्यादिस्थितिके भेदोंमें जो साद्यादिभेद संभव होसकते हैं उनको कहते हैं- अजहण्णहिदिवंधो चउविहो सत्तमूलपयडीणं । सेसतिये दुवियप्पो आयुचउक्केवि दुवियप्पो ॥ १५२ ॥ अजघन्यस्थितिबन्धः चतुर्विधः सप्तमूलप्रकृतीनाम् ।' शेषत्रये द्विविकल्प आयुश्चतुष्केपि द्विविकल्पः ॥ १५२॥ - गोम्मटसारः। ६३ अर्थ-आयुके विना सात मूलप्रकृतियोंका अजघन्यस्थितिबंध सादि आदिकके भेदसे चार तरहका है । और वाकीके उत्कृष्ट वगैरः तीनबंधोंके सादि, अध्रुव ये दोही भेद हैं। तथा आयुकर्मके उत्कृष्टादिक चार भेदोंमें भी स्थितिबंध सादि, अध्रुव ये दोप्रकारका है ॥ १५२ ॥ अब उत्तरप्रकृतियोंमें विशेषता दिखाते हैं;- संजलणसुहुमचोदस-घादीणं चदुविधो दु अजहण्णो। सेसतिया पुण दुविहा सेसाणं चदुविधावि दुधा ॥ १५३ ॥ संज्वलनसूक्ष्मचतुर्दशघातिनां चतुर्विधस्तु अजघन्यः । शेषत्रयः पुनः दुविधाः शेषाणां चतुर्विधापि द्विधा ॥ १५३॥ अर्थ-संज्वलनकषायकी चौकड़ी, दसवें सूक्ष्मसांपरायकी मतिज्ञानावरणादि घातिया- कर्मोंकी १४ प्रकृतियां, इन १८ प्रकृतियोंका अजघन्यस्थितिबंध सादिआदिकके भेदसे चारप्रकार है, और बाकीके जघन्यादितीनभेदोंके सादि, अध्रुव ये दोही भेद हैं। शेष प्रकृतियोंके जघन्यादिक चार भेदोंके भी सादि, अध्रुव दो भेद है ॥ १५३ ॥ सव्वाओ ठिदीओ सुहासुहाणंपि होंति असुहाओ। माणुसतिरिक्खदेवाउगं च मोत्तूण सेसाणं ॥ १५४ ॥ सर्वास्तु स्थितयः शुभाशुभानामपि भवन्ति अशुभाः । मनुष्यतिर्यग्देवायुष्क च मुक्त्वा शेषाणाम् ॥ १५४ ॥ अर्थ-मनुष्य, तिर्यंच, देवायुके सिवाय बाकी सब शुभ तथा अशुभ प्रकृतियोंकी स्थितियाँ अशुभरूप ही है, क्योंकि संसारका कारण है । इसीलिये इन प्रकृतियोंको बहुतकषायी जीव ही उत्कृष्टस्थितिसे बांधता है ॥ १५४ ॥ पहले जो आवाधा कही थी उसका अब लक्षण कहते है। कम्मसरूवेणागयदव्यं ण य एदि उदयरूवेण । रूवेणुदीरणस्स व आवाहा जाव ताव हवे ॥ १५५ ॥ कर्मस्वरूपेणागतद्रव्यं न च एति उदयरूपेण । रूपेणोदीरणाया वा आबाधा यावत्तावद्भवेत् ॥ १५५ ॥ अर्थ-कार्मणशरीरनामा नामकर्मके उदयसे योगद्वारा आत्मामें कर्मखरूपसे परिणमता हुआ जो पुद्गलद्रव्य वह जबतक उदयखरूप ( फल देने खरूप) अथवा उदीरणा (विना समयके कर्मका पाक होना) खरूप न हो तब तक उस कालको आबाधा कहते है ॥ १५५॥ . दु & । ६४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अब उस आवाधाको उदयकी अपेक्षा मूलप्रकृतियोंमें बतलाते हैं;- उदयं पडि सत्तण्हं आबाहा कोडकोडि उवहीणं । वाससयं तप्पडिभागेण य सेसहिदीणं च ॥ १५६ ॥ उदयं प्रति सप्तानामाबाधा कोटीकोटिः उदधीनाम् । वर्षशतं तत्प्रतिभागेन च शेषस्थितीनां च ॥ १५६ ।। अर्थ-आयुकर्मके सिवाय सात कर्मोकी आवाधा उदयकी अपेक्षा एक कोड़ाकोड़ी- सागर प्रमाण स्थितीकी सौवर्ष प्रमाण जानना, और बाकी स्थितियोंकी उसके अनुसार त्रैराशिकविधिसे भाग देते हुए जो प्रमाण आवै उतनी जानना ॥ १५६ ॥ आगे अंतःकोड़ाकोडीसागर प्रमाण स्थितीकी आवाधा कहते हैं- अंतोकोडाकोडिद्विदिस्स अंतोमुहुत्तमावाहा । संखेजगुणविहीणं सव्वजहण्णष्टिदिस्स हवे ॥ १५७ ॥ अन्तःकोटीकोटिस्थितेः अन्तर्मुहूर्त आबाधा । संख्यातगुणविहीनः सर्वजघन्यस्थितेः भवेत् ॥ १५७ ॥ अर्थ-अंतः कोड़ाकोड़ी सागर स्थितीकी अन्तर्मुहूर्त आबाधा है, और सब जघन्य- स्थितियोंकी उससे संख्यातगुणी कम ( संख्यातवें भाग ) आबाधा होती है ॥ १५७ ।। अब शेष ( वचे) आयुकर्मकी आबाधा कहते है- पुवाणं कोडितिभा-गादासंखेप अद्ध वोत्ति हवे । आउस्स य आवाहा ण डिदिपडिभागमाउस्स ॥ १५८ ॥ पूर्वाणां कोटित्रिभागादासंक्षेपाद्धा वा इति भवेत् । आयुषश्च आबाधा न स्थितिप्रतिभाग आयुषः ॥ १५८ ।। अर्थ-आयुकर्मको आवाधा कोड़पूर्वका तीसरा भागसे लेकर असंक्षेपाद्धा प्रमाण अर्थात् जिससे थोड़ा काल कोई न हो ऐसे आवलीके असंख्यातवें भाग प्रमाण है । कुछ स्थितिके अनुसार भाग कीहुई नहीं है, अर्थात् जैसे अन्य कर्मोमें स्थितिके अनुसार भाग करनेसे आबाधाका प्रमाण होता है, इसतरह इस आयुकर्ममें नहीं है ।। १५८ ॥ आगे उदीरणाकी अपेक्षा आवाधा कहते है- आवलियं आवाहा उदीरणमासिज सत्तकम्माणं । परभवियआउगस्स य उदीरणा णत्थि णियमेण ॥ १५९ ॥ आवलिकमावाधा उदीरणामाश्रित्य सप्तकर्मणाम् । परभवीयायुष्कस्य च उदीरणा नास्ति नियमेन ॥ १५९ ॥ अर्थ-सात कर्मोंकी आवाधा उदीरणाकी अपेक्षासे एक आवली मात्र है, और परभ- वकी आयु 'जो बाघलीनी है उसकी उदीरणा निश्चय कर नहीं होती। अर्थात् वर्तमान आयुकी उदीरणा तो हो सकती है परंतु आगामी आयुकी नहीं होती ॥ १५९ ॥ .
गोम्मटसारः। ६५ अब कर्मोके निषेकका खरूप कहते है। आवाहूणियकम्मट्ठिदी णिसेगो दु सत्तकम्माणं । आउस्स णिसेगो पुण सगहिदी होदि णियमेण ॥ १६ ॥ आवाधोनितकर्मस्थितिः निषेकस्तु सप्तकर्मणाम् । आयुपः निषेकः पुनः स्वकस्थितिः भवति नियमेन ॥ १६० ॥ अर्थ-अपनी २ काँकी स्थितीमें आवाधाका काल घटानेसे जो काल शेष रहै उसके समयोंके प्रमाण सात कर्मों के निषेक ( समय २ में जो कर्म खिरै उनके समूहरूप निषेक) जानना । और आयुकर्मका निपेक अपनी २ स्थिति है ऐसा नियमसे समझना ॥ १६० ॥ अब निषेकका क्रम दिखाते हैं;- आवाहं वोलाविय पढमणिसेगम्मि देय बहुगं तु । तत्तो विसेसहीणं विदियस्सादिमणिसेओत्ति ॥ १६१ ॥ आवाधां वा अपलाप्य प्रथमनिषेके देयं बहुकं तु । ततो विशेपहीनं द्वितीयस्यादिमनिपेक इति ॥ १६१॥ अर्थ-आवाधा कालको छोड़कर जो अनंतर ( उसके बाद ) का समय है वहां पहली गुणहानिके प्रथम निषेकमे बहुत द्रव्य देना अर्थात् बहुत कर्मपरमाणू फल देकर खिरजाते है (दूर हो जाते है)। और दूसरे निषेकसे लेकर दूसरी गुणहानिके प्रथमनिषेकपर्यंत विशेषकर अर्थात् चयकर हीन (कम) कर्मपरमाणू फल देकर दूर होजाते है ॥ १६१॥ विदिये विदियणिसेगे हाणी पुग्विलहाणिअद्धं तु । एवं गुणहाणि पडि हाणी अद्धद्धयं होदि ॥ १६२ ॥ द्वितीये द्वितीयनिपेके हानिः पूर्वहान्यर्धे तु । एवं गुणहानि प्रति हानिः अर्धा भवति ॥ १६२ ।। अर्थ-द्वितीय गुण हानिके दूसरे निषेकमें पहली गुणहानिके चयसे आधाचय तीसरी गुणहानिके पहले निषेकतक घटाना इसप्रकार तीसरीसे लेकर सब छह गुणहानियोंतक आधा आधा चय कम कर्मपरमाणुद्रव्य समझना ॥ १६२ ॥ इस कथनको आगे विस्तारसे कहेंगे परंतु नाममात्र यहांपरभी दिखादेते है-जैसे कर्मकी परमाणु ६३००, आवाधाके विना स्थितिका प्रमाण ४८ समय, एक एक गुण- हानि ८ समय प्रमाण, सव स्थिति ४८ समयकी ६ नानागुणहानि, दो गुणहानिका आयाम (काल) १६, अन्योन्याभ्यस्तराशि ६४ सब इतनी संज्ञा मनमें धारण कर लेना, इन सब गुणहानियोंमेंसे प्रथम गुणहानिमें परमाणू ३२०० खिरते है। द्वितीया- दिक गुणहानिमें आधे २ खिरते है, इत्यादि कथन विस्तारभयसे अधिक नहीं लिखा है। इसप्रकार स्थितिबंधका प्रकरण समाप्त हुआ।
६६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आगे अनुभागबन्धको तेईस गाथाओंसे कहते है- सुहपयडीण विसोही तिन्वो असुहाण संकिलेसेण । विवरीदेण जहण्णो अणुभागो सव्वपयडीणं ॥ १६३ ॥ शुभप्रकृतीनां विशुद्ध्या तीव्र अशुभानां संक्लेशेन । विपरीतेन जघन्य अनुभागः सर्वप्रकृतीनाम् ।। १६३ ।। अर्थ-सातावेदनीयादिक शुभ (पुण्य ) प्रकृतियोंका अनुभागबंध विशुद्धपरिणामोंसे उत्कृष्ट होता है । असातावेदनीय आदि अशुभ प्रकृतियोंका अनुभागबंध क्लेशरूप परि- णामोंसे उत्कृष्ट होता है । और विपरीतसे (इसऊपर कहे गयेसे उलटा करनेपर ) जघन्य अनुभाग बंध होता है अर्थात् शुभप्रकृतियोंका सक्लेश (तीन कपायरूप) परिणामोंसे और अशुभप्रकृतियोंका विशुद्ध (मंद कपायरूप) परिणामोंकर जघन्य अनुभागबंध होता है इसप्रकार सब प्रकृतियोंका अनुभागवंध जानना ॥ १६३ ॥ आगे तीन अनुभागबन्धके खामीको दिखाते है। वादालं तु पसत्था चिसोहिगुणमुक्कडस्स तिचाओ। वासीदि अप्पसत्था मिच्छुक्कडसंकिलिहस्स ॥ १६४ ॥ द्वाचत्वारिंशत्तु प्रशस्ता विशुद्धिगुणोत्कटस्य तीव्राः । व्यशीतिः अप्रशस्ता मिथ्योत्कटसंक्लिष्टस्य ॥ १६४ ॥ अर्थ-पहले कहीगई ४२ पुण्य प्रकृतियां है उनका उत्कृष्ट अनुभागवंध विशुद्धप- नारूप गुणकी उत्कृष्टतावाले जीवके होता है। और असातादिक ८२ अशुभप्रकृतियां मिथ्यादृष्टि, उत्कृष्ट क्लेशरूप परिणामवाले जीवके तीव्र ( उत्कृष्ट ) अनुभाग लेकर बंधती है ॥ १६४ ॥ आदाओ उज्जोओ मणुवतिरिक्खाउगं पसत्थासु । मिच्छस्य होंति तिव्वा सम्माइडिस्स सेसाओ ॥ १६५ ॥ आतप उद्योत मानवतिर्यगायुष्कं प्रशस्तासु । मिथ्यस्य भवन्ति तीत्राः सम्यग्दृष्टः शेषाः ॥ १६५ ॥ अर्थ-उन ४२ प्रशस्तप्रकृतियोंमेंसे आतप, उद्योत, मनुष्यायु और तिर्यचायु इन चारका उत्कृष्ट अनुभागबंध विशुद्धमिथ्यादृष्टिके होता है । और शेष ३८ प्रकृतियोंका विशुद्धसम्यग्दृष्टिके तीव्र अनुभागबंध होता है ॥ १६५ ॥ मणुऔरालदुवजं विसुद्धसुरणिरयअविरदे तिव्वा । देवाउ अप्पमत्ते खवगे अवसेसवत्तीसा ॥ १६६ ॥ मनुष्यौदारिकद्विवजं विशुद्धसुरनिरयाविरते तीव्राः । देवायुरप्रमत्ते क्षपके अवशेषद्वात्रिंशत् ॥ १६६ ॥ . ') गोम्मटसारः। 6 . अर्थ-सम्यग्दृष्टिकी ३८ प्रकृतियोंमेंसे मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, औदारिकशरीर तथा उसके आंगोपांग, वज्रवृषभनाराचसंहनन इन पांचोंका तीव्र अनुभागबंध अनंतानुबंधी कपायके विसंयोजन करनेमें ( अप्रत्याख्यानादिरूप परिणमावनेमें) तीन करण करता हुआ अनिवृत्तिकरणके अन्तसमयमें विशुद्ध देव वा नारकी असंयतसम्यग्दृष्टि करता है। और देवायुको अप्रमत्तगुणस्थानवाला तीव्र अनुभागसहित बांधता है। बाकी ३२ प्रकृतियोंका तीन अनुभागबंध क्षपकश्रेणीवाले जीवके होता है ॥ १६६ ॥ उवधादहीणतीसे अपुवकरणस्स उच्चजससादे । संमेलिदे हवंति हु खवगस्सऽवसेसवत्तीसा ॥१६७ ॥ उपघातहीनत्रिशत् अपूर्वकरणस्य उच्चयशःसातम् । संमेलिते भवन्ति हि क्षपकस्यावशेषद्वात्रिंशत् ॥ १६७ ॥ अर्थ-अपूर्वकरणके छटे भागमें ३० व्युच्छित्ति प्रकृतियों में से एक उपघात प्रकृतिको छोड़ वाकी २९ प्रकृतिया और उच्च गोत्र, यशस्कीर्ति, सातवेदनीय ये तीन प्रकृतियां, इसप्रकार शेष सब ३२ प्रकृतियां क्षपकश्रेणीवालेके पूर्व कही थीं वे जानना ॥ १६७ ॥ मिच्छस्संतिमणवयं णरतिरियाऊणि वामणरतिरिये । एइंदियआदावं थावरणामं च सुरमिच्छे ॥ १६८॥ मिथ्यात्वस्यान्तिमनवकं नरतिर्यगायुषी वामनरतिरश्चि । एकेन्द्रियमाताप स्थावरनाम च सुरमिथ्ये ।। १६८ ।। अर्थ-मिथ्यात्वगुणस्थानकी व्युच्छित्ति प्रकृतियोंमेंसे अंतकी सूक्ष्मादि नव प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभागबंध संक्लेश परिणामवाले मिथ्यादृष्टि मनुष्य वा तिर्यच करते है, और मनुष्यायु, तिर्यंचायुको विशुद्ध (मंदकषाय ) परिणामवाले मनुष्य वा तिर्यच उत्कृष्ट अनु- भागको बांधते है । तथा मिथ्यादृष्टि देव सक्लेशपरिणामोंसे एकेन्द्री और स्थावर प्रकृतिका उत्कृष्ट अनुभाग बांधता है, और विशुद्धपरिणामोंसे अपनी आयुके छह महीने बाकी रहनेपर आताप प्रकृतिका तीव्र अनुभागबंध करता है ॥ १६८ ॥ उजोवो तमतमगे सुरणारयमिच्छगे असंपत्तं । तिरियदुगं सेसा पुण चदुगदिमिच्छे किलि? य ॥ १६९ ॥ उद्योतः तमस्तमके सुरनारकमिथ्यके असंप्राप्तम् । तिर्यद्विकं शेषाः पुनः चतुर्गतिमिथ्ये क्लिष्टे च ॥ १६९ ।। अर्थ-सातवें तमस्तमक नामा नरकमें उपशमसम्यक्त्वके सन्मुख हुआ विशुद्ध मिथ्या- दृष्टि नारकीजीव उद्योत प्रकृतिका और देव, नारकी मिथ्यादृष्टि जीव असंप्राप्तसृपाटिका संहनन, तिर्गच गति, तिर्यचगत्यानुपूर्वी इन तीनोंका उत्कृष्ट अनुभाग बाधते है । और
६८
रायचन्द्रजैनशास्तमालायाम् ।
बाकी रही ६८ प्रकृतियोंको चारोंगतिके संक्लेश परिणामवाले मिथ्यादृष्टि जीव उत्कृष्ट
अनुभागसहित बांधते है ॥ १६९ ॥
अब जघन्य अनुभागवन्धके खामियोंको कहते हैं;-
वण्णचउक्कमसत्थं उवधादो खवगधादि पणवीसं।
तीसाणमवरवंधो सगसगवोच्छेदठाणम्हि ॥ १७॥
वर्णचतुष्कमशस्तमुपघातः क्ष्पकघाति पञ्चविंशतिः ।
त्रिंशतामवरवन्धः स्वकस्वकव्युच्छेदस्थाने ॥ १७० ॥
अर्थ-अशुभ वर्णादि चार, उपघात और क्षय होनेवाली घातियाकर्मोकी पच्चीस अर्थात्
ज्ञानावरण ५ अंतराय ५ दर्शनावरण ४ निद्रा, प्रचला, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा,
पुरुषवेद, संज्वलन ४ इन सब ३० प्रकृतियोंका अपनी अपनी बंधन्युच्छितिके ठिकाने-
पर जघन्य अनुभागबंध होता है ॥ १७० ॥
अणथीणतिय मिच्छं मिच्छे अयदे हु विदियकोधादी।
देसे तदियकसाया संजमगुणपच्छिदे सोलं ॥ १७१ ॥
अन-स्थानत्रयं मिथ्यात्वं मिथ्ये अयते हि द्वितीयक्रोधादयः ।
देशे तृतीयकषायाः संयमगुणप्रस्थिते षोडश ।। १७१ ॥
अर्थ-अनंतानुबंधी कषाय ४ स्त्यानगृयादिक ३ मिथ्यात्व ये आठ, मिथ्यादृष्टिमें
और दूसरी अप्रत्याख्यानकषाय ४ असंयतमें, तीसरी प्रत्याख्यानकषाय ४ देशसंयत
(पांचवे) गुणस्थानमें; इसप्रकार १६ प्रकृतियोको इन गुणस्थानोमें जो संयमगुणके धारनेको
सन्मुख हुआ है ऐसा विशुद्ध परिणामवाला जीव जघन्य अनुभागसहित बांधता है ॥१७१॥
आहारमप्पमत्ते पमत्तसुद्धे य अरदिसोगाणं ।
णरतिरिये सुहुमतियं वियलं वेगुव्वछक्काओ ॥ १७२ ॥
आहारमप्रमत्त प्रमत्तशुद्धे च अरतिशोकयोः ।
नरतिरश्चि सूक्ष्मत्रयं विकलं वैगूर्वषटूम् ।। १७२ ।।
अर्थ-आहारकशरीर और आहारक आंगोपांग ये दो प्रकृतियां शुभ होनेसे प्रमत्त
गुणस्थानके सन्मुख हुए संक्लेशपरिणामवाले अप्रमत्तगुणस्थानवालेके तथा अरति, शोक ये
दो प्रकृतियां अशुभ होनेसे अप्रमत्तगुणस्थानके सन्मुख हुआ ऐसे विशुद्ध प्रमत्तगुणस्था-
नवर्ती जीवके जघन्य अनुभागसहित बंधती है । और सूक्ष्मादि तीन, विकल तीन,
देषगति आदि वैक्रियिक छहका समूह ये सोलह प्रकृतियां मनुष्य अथवा तिर्यचके जघन्य
अनुभागसहित बंधती है ॥ १७२ ।।
सुरणिरये उज्जोवोरालदुर्ग तमतमम्हि तिरियदुगं ।
णीचं च तिगदिमज्झिमपरिणामे थावरेयक्वं ॥ १७३ ॥
गोम्मटसारः। ६९ सुरनिरये उद्योतीरालद्विकं तमस्तमसि तिर्यग्द्विकम् । नीचं च निगतिमध्यमपरिणामे स्थावरैकाक्षम् ॥१७३ ।। अर्थ-उद्योत, औदारिक दो-ये तीन देव नारकीके, सातवें तमस्तमकनरफमें तिर्य- ग्गतिका जोड़ा, नीचगोत्र ये तीन और स्थावर, एकेन्द्री ये दो प्रकृतियां नारकीके विना तीनगतिवाले मध्यमपरिणामी जीवोंके जघन्य अनुभागसहित बंधती है ॥ १७३ ।। सोहम्मोत्ति य तावं तित्थयरं अविरदे मणुस्सम्हि । चदुगदिवामकिलिटे पण्णरस दुवे विसोहीये ॥ १७४ ॥ सौधर्म इति च आतपं तीर्थकरमविरते मनुष्ये । चतुर्गतिवामक्लिष्टे पञ्चदश द्वे विशुद्धे ॥ १७४ ॥ अर्थ-भवनत्रिकसे लेकर सौधर्मद्विक तक अर्थात् सौधर्म ऐशाननामक पहले दूसरे खर्गके संक्लेशपरिणामी देवोंके आतपप्रकृति, तथा नरक जानेको संमुख हुए अविरतगुणस्था- नवर्ती मनुष्यके तीर्थंकर प्रकृति, चारों गतिके संक्लेशपरिणामी मिथ्यादृष्टि जीवोंके १५ प्रकृतियां, और चारों गतिके विशुद्ध परिणामी जीवोंके दो प्रकृतियां, जघन्य अनुभाग- सहित बंधती है ॥ १७४॥ अब उन १५ तथा दो प्रकृतियोंके नाम कहते हैं;- परघाददुगं तेजदु तसवण्णचउक्क णिमिणपंचिंदी। अगुरुलहुं च किलिडे इत्थिणउंसं विसोहीये ॥ १७५ ॥ परघातद्विकं तेजद्वि त्रसवर्णचतुष्कं निर्माणपञ्चेन्द्रियम् । अगुरुलघु च क्लिष्टे स्त्रीनपुंसकं विशुद्धे ॥ १७५ ॥ अर्थ-परघात, उश्वास ये दो, तैजसद्विक, त्रसादि चार, शुभ वर्णादिचार, निर्माण, पंचेंद्री और अगुरुलघु ये १५ प्रकृतियां संक्लेशपरिणामी जीवकी तथा स्त्रीवेद, नपुंसकवेद ये दो विशुद्धपरिणामी जीवकी जानना ॥ १७५ ॥ सम्मो वा मिच्छो वा अट्ट अपरियत्तमज्झिमो य जदि । परियत्तमाणमज्झिममिच्छाइट्ठी दु तेवीसं ॥ १७६ ॥ सम्यग्वा मिथ्यो वा अष्ट अपरिवर्तमध्यमश्च यदि । परिवर्तमानमध्यममिथ्यादृष्टिस्तु त्रयोविंशतिः ॥ १७६ अर्थ-आगेकी गाथामें ३१ प्रकृति कहेंगे उनमें से पहली आठ प्रकृतियोंको अपरि- वर्तमान मध्यमपरिणामवाला सम्यग्दृष्टि अथवा मिथ्यादृष्टि जीव जघन्य अनुभाग सहित , १ जो समय बढ़ते ही जावै अथवा घटते ही जावै ऐसे परिणाम अपरिवर्तमान कहे जाते हैं। जो कि उलटे ( पीछे ) नहीं आते, उनमें मध्यम परिणामोंको अपरिवर्तमानमध्यम कहते हैं।
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रायचन्द्रजैनशास्रमालायाम् ।
बांधता है। और शेष (वांकी) २३ प्रकृतियोंको परिवर्तमानमध्यमपरिणामी मिथ्या-
दृष्टि जीवही जघन्य अनुभागसहित बांधता है ॥ १७६ ॥
अब उन ३१ प्रकृतियोंको गिनाते है:-
थिरसुहजससाददुगं उभये मिच्छेव उच्चसंठाणं ।
संहदिगमणं णरसुरसुभगादेजाण जुम्मं च ॥ १७७ ॥
स्थिरशुभयशस्सातद्विकमुभयस्मिन् मिथ्ये एव उचसंस्थानम् ।
संहतिगमनं नरसुरसुभगादेयानां युग्मं च ॥ १७७ ।।
अर्थ-स्थिर, शुभ, यशस्कीर्ति, सातावेदनीय इन चारोंका जोड़ा अर्थात् स्थिर १
अस्थिरादि आठ प्रकृतियां सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि इन दोनोके जघन्य अनुभाग (कर्मोका
रस) सहित बंधती है, और उच्च गोत्र, ६ संस्थान, ६ संहनन, विहायोगतिका
जोड़ा, मनुष्यगति-देवगति-सुभग-आदेय इन चारोंका जोड़ा सब मिलकर २३ प्रकृतियोंका
जघन्य अनुभागबंध मिथ्यादृष्टिके ही होता है ॥ १७७ ।।
आगे मूलप्रकृतियोंके उत्कृष्ट आदि अनुभागके सादि आदिक भेद कहते है:-
घादीणं अजहण्णोऽणुकस्सो वेयणीयणामाणं ।
अजहण्णमणुक्कस्सो गोदे चदुधा दुधा सेसा ॥ १७८ ॥
घातिनामजघन्योऽनुत्कृष्टो वेदनीयनान्नोः ।
अजघन्य अनुत्कृष्टो गोत्रे चतुर्धा द्विधा गेषाः ॥ १७८ ॥
अर्थ-चारों घातियाकर्मोंका अजघन्य अनुभागबंध, वेदनीय और नामकर्मका अनुत्कृष्ट
अनुभागबंध, और गोत्रकर्मका अजघन्य तथा अनुत्कृष्ट अनुभागवध, इन सबके सादि
आदिक चार २ भेद है। और बाकीके चारों घातिया कमौके अजघन्यकेविना तीन भेद,
वेदनीयके तथा नामके अनुत्कृष्टकेसिवाय तीन भेद, गोत्रकर्मके अजघन्य तथा अनुत्कृष्टविना
दो भेद इन सबके सादि और अध्रुव दोही भेद है ॥ १७८ ॥
अव प्रशस्तादि ध्रुवप्रकृतियोंके जघन्यादि संभव भेदोंके सादि आदिक भेद कहते है-
सत्थाणं धुपियाणमणुक्कस्समसत्थगाण धुवियाणं ।
अजहण्णं च य चदुधा सेसा सेसाणयं च दुधा ॥ १७९ ॥
शस्तानां ध्रुवाणामनुत्कृष्ट अशस्तकानां ध्रुवाणाम् ।
अजघन्यश्च च चतुर्धा शेपाः शेषाणां च द्वेधा ॥ १७९ ॥
अर्थ-ध्रुवप्रकृनियोंमें तैजस आदि आठ शुभप्रकृतियोके अनुत्कृष्ट अनुभागवंधके,
मतिज्ञानावरणादि अशुभध्रुवप्रकृतियोंके अजघन्य अनुभागबंधके सादि आदिक चारों भेद है।
बाकी ध्रुवप्रकृतियोके जघन्यादि तीन भेद तथा ७३ अध्रुवप्रकृतियोंके जघन्यादि चारों भेद
इन सबके सादि और अध्रुव ये दोही भेद है ॥ १७९ ॥
- गोम्मटसारः। ७१ आगे अनुभागबंधका लक्षण प्रथम घातियाकर्मों में दिखाते हैं- सत्ती य लदादारूअट्टीसेलोवमाहु घादीणं । दारुअणंतिमभागोत्ति देसघादी तदो सव्वं ॥ १८॥ शक्तिश्च लतादारुअस्थिशैलोपमा आहुः धातिनाम् । दार्वनन्तिमभाग इति देशघाति ततः सर्वम् ॥ १८० ॥ अर्थ-घातियाकर्मोकी फल देनेकी शक्ति (स्पर्द्धक ) लता (वेलि) काठ, हड्डी और पत्थरके समान समझना अर्थात् क्रमसे अधिक २ कठोरपना समझना । तथा दारुभागका अनंतवां भागतक शक्तिरूप स्पर्द्धक देशघाती है । और शेष बहुभागसे लेकर शैलभाग तक स्पर्द्धक सर्वघाती है, अर्थात् इनके उदय होनेपर आत्माके गुण प्रगट नही होते ॥१८॥ अव मिथ्यात्वप्रकृतिम विशेषता दिखाते है।- देसोत्ति हवे सम्मं तत्तो दारूअणंतिमे मिस्सं । सेसा अणतभागा अद्विसिलाफडया मिच्छे ॥ १८१ ॥ देश इति भवेत् सम्यक्त्व ततः दार्वनन्तिमे मिश्रम् । शेपा अनन्तभागा अस्थिशिलास्पर्द्धका मिथ्यात्वे ॥ १८१ ॥ अर्थ-मिथ्यात्वप्रकृतिके लताभागसे दारु भागके अनंतवें भागतक देशघाति स्पर्द्धक सम्यक्त्वप्रकृतिके है, तथा दारुभागके अनंत वहुभागके अनंतमें भागप्रमाण जुदीजाति- केही सर्वघातियास्पर्द्धक मिश्र प्रकृतिके जानना । और शेष अनंत बहुभाग तथा अस्थि- भाग, शैलभागरूप स्पर्द्धक मिथ्यात्वप्रकृतिके जानना ॥ १८१ ।। आवरणदेसघादंतरायसंजलणपुरिससत्तरसं । चदुविधभावपरिणदा तिविधा भावा हु सेसाणं ॥ १८२ ॥ आवरणदेशघात्यन्तरायसंज्वलनपुरुषसप्तदश । चतुर्विधभावपरिणताः त्रिविधा भावा हि शेषाणाम् ।। १८२ ॥ अर्थ-आवरणोमें देशघातिकी ७ प्रकृतियां, अतराय ५, संज्वलन ४, पुरुषवेद ये १७ प्रकृतियां शैल आदिक चारोंतरहके भावरूप परिणमन करती है । और बाकी सव प्रकृतियोंके शैल आदि तीन तरहके परिणमन होते है केवल लतारूप परिणमन नही होता ॥ १८२॥ आगे शेष अघातिया कर्मोकी प्रकृतियोंको कहते हैं,- अवसेसा पयडीओ अधादिया धादियाण पडिभागा। ता एव पुण्णपावा सेसा पावा मुणेयव्या ॥ १८३ ॥ - :
७२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अवशेपाः प्रकृतयः अघातिका घातिकानां प्रतिभागाः। ता एव पुण्यपापाः शेषाः पापा मन्तव्याः ॥ १८३ ।। अर्थ-शेष अघातियां कर्मोंकी प्रकृतियां घातियाकर्मोकी तरह प्रतिभागसहित जाननी अर्थात् तीन भावरूप परिणमती है, और वेही पुण्यरूप तथा पापरूप होती हैं तथा बाकी- बची घातियाकर्मोकी सब प्रकृतियां पापरूप ही है ॥ १८३ ॥ अब प्रशस्त तथा अप्रशस्तरूप अघातिया कर्मोंकी शक्ति (स्पर्द्धक ) है उनको दूसरे नामसे कहते है- गुडखंडसकरामियसरिसा सत्था हुणिवकंजीरा । विसहालाहलसरिसाऽसत्था हु अघादिपडिभागा ॥ १८४ ॥ गुडखण्डशर्करामृतसदृशाः शस्ता हि निम्बकालीराः। विषहालाहलसदृशा अशस्ता हि अघातिप्रतिभागाः ॥ १८४ ।। अर्थ-अघातियाकर्मों में प्रशस्तप्रकृतियोंके शक्तिभेद गुड, खांड, मिश्री और अमृतके समान जानने । और अप्रशस्त प्रकृतियोंके नीच, कांजीर, विप, हालाहलके समान शक्तिभेद (स्पर्द्धक ) जानना अर्थात् दोनों ही सांसारिक सुख-दुःखके कारण समझना ॥ १८ ॥ इसप्रकार अनुभागबंधका खरूप कहा ।। अब प्रदेशबंधको ३३ गाथाओंमें कहते है:- एयक्त्तोगाढं सव्वपदेसहि कम्मणो जोग्गं । बंधदि सगहेदूहि य अणादियं सादियं उभयं ॥ १८५ ।। एकक्षेत्रावगाढं सर्वप्रदेशैः कर्मणो योग्यम् । बध्नाति स्वकहेतुभिश्च अनादिकं सादिकमुभयम् ॥ १८५॥ अर्थ-जघन्य अवगाहनारूप एक क्षेत्रमें स्थित और कर्मरूप परिणमनेके योग्य अनादि अथवा सादि अथवा दोनों स्वरूप जो पुद्गलद्रव्य है उसको यह जीव अपने सब प्रदेशोंसे मिथ्यात्वादिकके निमित्तसे बांधता है, अर्थात् कर्मरूपपुद्गलोंको आत्माके प्रदेशोंके साथ संबंध होना प्रदेशबंध है। यहांपर सूक्ष्मनिगोदजीवकी धनांगुलके असंख्यातवें भाग अवगाहना ( जगह ) को एक क्षेत्र जानना ॥ १८५ ॥ एयसरीरोगाहियमेयक्खेत्तं अणेयखेत्तं तु । अवसेसलोयखेत्तं खेत्तणुसारिट्ठियं रूवी ॥ १८६ ॥ एकशरीरावगाहितमेकक्षेत्रमनेकक्षेत्रं तु । अवशेषलोकक्षेत्रं क्षेत्रानुसारिस्थित रूपि ॥ १८६ ।। अर्थ-एक शरीरसे रुकी हुई जगहको एक क्षेत्र कहते है, और बाकी सब लोकके क्षेत्रको अनेक क्षेत्र कहते है । तथा अपने २ क्षेत्रके अनुसार ठहरे हुए पुदलद्रव्यका L - गोम्मटसार। प्रमाण त्रैराशिकसे समझलेना । यहाँपर जघन्यशरीरही एक शरीर लेना क्योंकि निगोद- शरीरवाले जीव बहुत हैं। इसकारण मुख्यतासे घनांगुलके असंख्यातवें भाग एक क्षेत्र हुआ॥ १८६॥ एयाणेयक्खेत्तट्टियरूविअणंतिम हवे जोग्गं । अवसेसं तु अजोग्गं सादि अणादी हवे तत्थ ॥ १८७ ।। एकानेकक्षेत्रस्थितरूप्यनन्तिमं भवेत् योग्यम् । अवशेष तु अयोग्यं सादि अनादि भवेत् तत्र ॥ १८७ ॥ अर्थ-एक तथा अनेक क्षेत्रोंमें ठहरा हुआ जो पुद्गलद्रव्य उसके अनंतवें भाग पुद्गल- परमाणुओंका समूह कर्मरूप होने योग्य है, और वाकी अनंत बहुभाग प्रमाण कर्मरूप होनेके अयोग्य है । इसप्रकार एक क्षेत्रस्थित योग्य १ एक क्षेत्रस्थित अयोग्य २ अनेक क्षेत्रस्थित योग्य ३ अनेक क्षेत्रस्थित अयोग्य ४ ये चार भेद हुए । इन चारोंमें भी एक एकके सादि तथा अनादि भेद जानना ॥ १८७ ।। अब सादिआदिके प्रमाणको कहते है,- जेट्टै समयपवद्धे अतीदकाले हदेण सव्वेण । जीवेण हदे सव्वं सादी होदित्ति णिद्दिढ ॥ १८८ ॥ ज्येष्ठे समयप्रवद्धे अतीतकालेन हतेन सर्वेण । जीवेन हते सर्व सादि भवतीति निर्दिष्टम् ॥ १८८ ।। अर्थ-उत्कृष्ट योगोंके परिणमनसे उपार्जन ( पैदा) किया जो उत्कृष्ट समय प्रबद्धका प्रमाण उसको अतीत कालके समयोंसे गुणाकरै। फिर जो प्रमाण आवै उसे सब जीवराशिसे गुणा करनेपर सब जीवोंके सादि द्रव्यका प्रमाण होता है ॥ १८८ ॥ आगे पूर्व कहेगये भेदोंमें सादिद्रव्यका प्रमाण कहते है, सगसगखेत्तगयस्स य अणंतिम जोग्गदवगयसादी। सेसं अजोग्गसंगयसादी होदित्ति णिहिटं ॥ १८९ ॥ स्वकस्वकक्षेत्रगतस्य च अनन्तिमं योग्यद्रव्यगतसादि । शेषमयोग्यसंगतसादि भवतीति निर्दिष्टम् ॥ १८९ ॥ अर्थ-अपने २ एक तथा अनेक क्षेत्रमें रहनेवाले पुद्गल द्रव्यके अनंतवें भाग योग्य सादि द्रव्य है, और इससे बाकी अनंत बहुभाग अयोग्यसादि द्रव्य है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है ॥ १८९॥ अव अनादि द्रव्यका प्रमाण कहते है। - - १० ७४ , रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । 'सगसगसादिविहीणे जोग्गाजोग्गे य होदि णियमेण । जोग्गाजोग्गाणं पुण अणादिदवाण परिमाणं ॥ १९० ॥ खकस्वकसादिविहीने योग्यायोग्ये च भवति नियमेन । योग्यायोग्यानां पुनः अनादिद्रव्याणां परिमाणम् ।। १९० ।। अर्थ-एक क्षेत्रमें स्थित योग्य, अयोग्य द्रव्य तथा अनेक क्षेत्रमें मौजूद योग्य वा अयोग्य द्रव्यका जो परिमाण है उसमें अपना २ सादि द्रव्यका प्रमाण घटानेसे जो वचे वह क्रमसे एक क्षेत्र स्थित योग्य अनादि द्रव्यका, एक क्षेत्रस्थित अयोग्य अनादि द्रव्यका, अनेकक्षेत्रस्थित योग्य अनादि द्रव्यका, अनेक क्षेत्रस्थित अयोग्य अनादि द्रव्यका परिमाण जानना॥ भावार्थ:-यह जीव मिथ्यात्वादिकके निमित्तसे समय समय प्रति कर्मरूप परिणमने योग्य समयप्रवद्ध प्रमाण परमाणुओंको ग्रहणकर कर्मरूप परिणमाता है, वहां किसी समय तो पहले ग्रहण किये जो सादि द्रव्यरूप परिमाणू है उनकाही ग्रहण करता है, किसी समयमें अभीतक ग्रहण करने में नहीं आये ऐसे अनादि द्रव्यरूप परमाणुओंको ग्रहण करता है ॥ १९० ॥ आगे समयप्रबद्धका प्रमाण कहते हैं- सयलरसरूवगंधेहिं परिणदं चरमचदुहिं फासेहिं । सिद्धादोऽभव्वादोऽणंतिमभागं गुणं दवं ॥ १९१ ॥ सकलरसरूपगन्धैः परिणतं चरमचतुर्भिः स्पशैः । सिद्धादभव्यादनन्तिमभागं गुणं द्रव्यम् ॥ १९१ ॥ समयप्रवद्ध सब पांच प्रकार रस, पांच प्रकार वर्ण, दो प्रकार गंध तथा शीतादि चार अंतके स्पर्श इन गुणोंकर सहित परिणमता हुआ, सिद्धराशिके अनंतवें भाग अथवा अभव्य राशिसे अनंतगुणा कर्मरूप पुद्गलद्रव्य जानना ॥ १९१ ।। वह समय प्रबद्ध एक समयमें ग्रहण किया हुवा आठ मूलप्रकृतिरूप परिणमता है उस जगह एक एक मूलप्रकृतिका वटवारा जिसतरह होता है उस तरह कहते है। आउगभागो थोवो णामागोदे समो तदो अहियो। घादितियेवि य ततो मोहे तत्तो तदो तदिये ॥ १९२ ।। आयुष्कभागः स्तोकः नामगोत्रे समः ततः अधिकः । घातित्रयेपि च ततः मोहे ततः ततः तृतीये ॥ १९२ ।। अर्थ-सब मूल प्रकृतियोंमें आयुकर्मका हिस्सा थोड़ा है, नाम और गोत्रकर्मका हिस्सा आपसमें समान है तौभी आयुकर्मके वॉटसे अधिक है, अन्तराय-दर्शनावरण- अर्थ-वह - गोम्मटसारः। ज्ञानावरण इन तीनघातिया काका भाग आपसमें समान है तौभी नामगोत्रके भागसे अधिक है । इससे अधिक मोहनीय कर्मका भाग, है तथा मोहनीयसेभी अधिक वेदनीय कर्मका भाग है । जहां जितने कर्मोंका बंध हो वहां उतनेही कर्मोंका वांट करलेना ॥ १९२॥ आगे वेदनीयकर्मका अधिक भाग होनेमें कारण बतलाते हैं। सुहदुक्खणिमित्तादो बहुणिज्जरगोत्ति वेयणीयस्स । सधेहितो वहुगं दवं होदित्ति णिहिटुं ॥ १९३ ॥ सुखदुःखनिमित्तात् वहुनिर्जरक इति वेदनीयस्य । सर्वेभ्यः वहुकं द्रव्यं भवतीति निर्दिष्टम् ॥ १९३ ॥ अर्थ-वेदनीयकर्म सुखदुःखका कारण है इसीलिये इसकी निर्जरा बहुत होती है। इसवास्ते सब कर्मोंसे बहुत द्रव्य इस वेदनीयका जिनेन्द्र भगवानने कहा है ॥ १९३ ॥ आगे अन्यकर्मोंका द्रव्यविभाग स्थितिके अनुसार दिखाते है- सेसाणं पयडीणं ठिदिपडिभागेण होदि दवं तु । आवलिअसंखभागो पडिभागो होदि णियमेण ॥ १९४ ॥ शेपाणां प्रकृतीनां स्थितिप्रतिभागेन भवति द्रव्यं तु । आवल्यसंख्यभागः प्रतिभागो भवति नियमेन ॥ १९४॥ अर्थ-वेदनीयके सिवाय वाकी सब मूलप्रकृतियोंके द्रव्यका स्थितिके अनुसार वटवारा होता है । जिसकी स्थिति अधिक है उसका अधिक द्रव्य हिस्सा होता है । कमको कम तथा ससानस्थितिवालेको समान जानना । इनके वांट करनेमें प्रतिभागहार आवलिके असंख्यातवें भाग प्रमाण नियमसे समझना ॥ १९४ ॥ अव विभाग ( हिस्सा ) होनेका क्रम दिखाते है। बहुभागे समभागो अट्टण्हं होदि एकभागम्हि। उत्तकमो तत्थवि बहुभागो बहुगस्स देओ दु ॥ १९५ ॥ बहुभागे समभागः अष्टानां भवति एकभागे । उक्तक्रमः तत्रापि बहुभागो बहुकस्य देयस्तु ॥ १९५ ॥ अर्थ-इन आठ प्रकृतियोंको प्रतिभाग करके बहुभाग तो समान भाग करके देना, और बचेहुए एक भागमें पहले कहेहुए क्रमसे आवलीके असंख्यातवें भागका भाग देते जाना। जो बहुत द्रव्यहो उसको बहुभाग देना ऐसा अंततक प्रतिभाग ( भागमेंसे भाग) करते जाना ॥ १९५॥ अब उत्तर प्रकृतियोंमें वटवारा (हिस्सा) होनेका क्रम दिखाते है; - ७६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । उत्तरपयडीसु पुणो मोहावरणा हवंति हीणकमा । अहियकमा पुण णामाविग्धा य ण भंजणं सेसे ॥ १९६ ॥ उत्तरप्रकृतिपु पुनः मोहावरणा भवन्ति हीनक्रमाः । अधिकक्रमाः पुनः नामविनाश्च न भवनं शेपे ।। १९६ ।। अर्थ-उत्तर प्रकृतियोंमें तो मोहनीय, ज्ञानावरण, दर्शनावरणके भेदोंमें क्रमसे हीन २ द्रव्य है, और नामकर्म-अंतराय कर्मके भेदोंमें क्रमसे अधिक २ है, तथा वाकी बचे वेदनीय-गोत्र-आयुकर्म इन तीनोंके भेदोंमें वटवारा नहीं होता क्योंकि इनकी एक एकही प्रकृति एक कालमें बंधती हैं । जैसे वेदनीयमें साताका बंध होवै या असाताका बंध होवै परंतु दोनोका एक साथ बंध नहीं होता । इसकारण मूलप्रकृतिके इन्यके प्रमाण इन तीनोंमें द्रव्य जानना ॥ १९६ ॥ आगे घातिया कर्मोमें सर्वघाती तथा देशघातीका वटवारा कहते है:- सवावरणं दवं अणंतभागो दु मूलपयडीणं । सेसा अणंतभागा देसावरणं हवे दवं ॥ १९७ ॥ सर्वावरणं द्रव्यमनन्तभागस्तु मूलप्रकृतीनाम् । शेषा अनन्तभागा देशावरणं भवेत् द्रव्यम् ॥ १९७ ॥ अर्थ-ज्ञानावरण दर्शनावरण मोहनीय इन तीन मूल प्रकृतियोंके अपने २ द्रव्यमें यथायोग्य अनंतका भाग देनेसे एक भाग सर्वघातीका द्रव्य होता है । और बाकी अनंत बहुभागप्रमाण द्रव्य देशघाती प्रकृतियोंका कहा है ॥ १९७ ॥ अव सर्वघाती द्रव्यके प्रमाण निकालनेकेलिये प्रतिभागहारका प्रमाण कहते हैं- देसावरणण्णोण्णभत्थं तु अणंतसंखमेत्तं सवावरणधणटुं पडिभागो होदि घादीणं ॥ १९८ ।। देशावरणान्योन्याभ्यस्तं तु अनन्तसंख्यामानं खलु । सर्वावरणधनार्थ प्रतिभागो भवति घातिनाम् ॥ १९८ ।। अर्थ-चार ज्ञानावरणादि देशघाती प्रकृतियोंकी अन्योन्याभ्यस्तराशिभी अनंतसंख्या प्रमाण है । वह राशि सर्वघाती प्रकृतियोंके द्रव्य प्रमाण लानेकेलिये घातिया कर्मोंका प्रतिभाग जानना ॥ १९८ ॥ आगे सर्वघाती, देशघाती द्रव्यका विशेष विभाग ( हिस्सा) दिखाते हैं; सव्वावरणं दव्वं विभंजणिजं तु उभयपयडीसु । देसावरणं दवं देसावरणेसु णेविदरे ॥ १९९ ॥ 4 ५ ७७. , गोम्मटसारः। सर्वावरणं द्रव्यं विभजनीयं तु उभयप्रकृतिपु । देशावरणं द्रव्यं देशावरणेपु नैवेतरस्मिन् ॥ १९९ ।। अर्थ-सर्वघाती द्रव्यका सर्वघाती देशघाती दोनों प्रकृतियोंमें विभाग करदेना । देशघाती द्रव्यका विभाग देशघाती में देना। केवल ज्ञानावरणादि सर्वघातीया प्रकृतियोंमें नहीं देना ॥ १९९ ॥ आगे उत्तर प्रकृतियों में विभाग दिखाते है- बहुभागे समभागो बंधाणं होदि एकभागम्हि । उत्तकमो तत्थवि वहुभागो वहुगस्स देओ दु॥२०० ।। बहुभागे समभागो वन्धानां भवति एकभागे। उक्तक्रमः तत्रापि बहुभागः बहुकस्य देयस्तु ॥ २०० ॥ अर्थ-जिनका एक समयही बंध हो उन प्रकृतियोंमें अपने २ पिंड द्रव्यको आव- लीका असंख्यातवें भागका भाग देनेसे बहुभागका तो बरावर बांटकर अपनी उत्तर प्रकृतियोंमें समान द्रव्य देना । और शेष एक भागमें पूर्व कहे क्रमसे भाग करके बहुभाग बहुत द्रव्यवालेको देना ॥ २०० ।। यही बात दिखाते है- घादितियाणं सगसगसव्वावरणीयसवदव्वं तु । उत्तकमेण य देयं विवरीयं णामविग्घाणं ॥ २०१॥ घातित्रयाणां स्वकस्वकसर्वावरणीयसर्वद्रव्यं तु । उक्तक्रमेण च देयं विपरीतं नामविघ्नानाम् ।। २०१ ।। अर्थ-ज्ञानावरण-दर्शनावरण-मोहनीय इन घातिया कर्मोंका अपना २ सर्वघाती द्रव्य प्रकृतियों के क्रमसे घटता घटता देना । और नाम तथा अंतराय इनकी प्रकृतियोंका द्रव्य विपरीत अर्थात् वदता वढता अंतसे लेकर आदि प्रकृति पर्यन्त देना ॥ २०१॥ आगे मोहनीयकर्ममें विशेषता दिखाते है- मोहे मिच्छतादीसत्तरसहं तु दिजदे हीणं । संजलणाणं भागेव होदि पणणोकसायाणं ॥ २०२॥ मोहे मिथ्यात्वादिसप्तदशानां तु दीयते हीनम् । संज्वलनानां भाग इव भवति पञ्च नोकषायाणाम् ॥ २०२।। अर्थ-मोहनीय कर्ममें मिथ्यात्वादिक सत्रह प्रकृतियोंको क्रमसे हीन (कम ) २ द्रव्य देना, और पांच नोकषायका भाग संज्वलन कषायके भागके समान जानना ॥२०२॥ - ७८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । यहां पांच नोकषायका युगपत् ( एक कालमें ) बंध होता है इस कारण नोकपाय पाचही लिये गये हैं। अब इनके विभाग होनेके क्रमको दिखाते हैं;- संजलणभागवहुभागई अकसायसंगयं दव्यं । इगिभागसहियवहुभागद्धं संजलणपतिवद्धं ॥२०३ ।। संज्वलनभागवहुभागार्द्धमकपायसंगतं द्रव्यम् । एकभागसहितबहुभागार्द्ध संज्वलनप्रतिवद्धम् ॥ २०३ ।। अर्थ-संज्वलन कषायका हिस्सा जो बहुभाग उसका आधा नोकषायका द्रव्य जानना। और एक भाग सहित आधा बहुभाग संज्वलन कपायका देशघाती संबंधी द्रव्य है ॥२०॥ आगे नोकषायरूप प्रकृतियोंमें विशेषता दिखाते है- तण्णोकसायभागो सवंधपणणोकसायपयडीसु । हीणकमो होदि तहा देसे देसावरणदव्वं ॥२०४ ॥ तन्नोकपायभागः सवन्धपञ्चनोकपायप्रकृतिषु । हीनक्रमो भवति तथा देशे देशावरणद्रव्यम् ।। २०४ ॥ अर्थ-वह नोकषायके हिस्सामें आया हुआ द्रव्य एकसाथ बंधनेवाली पांच नोकपाय प्रकृतियोंमें क्रमसे हीन २ देना। और देशघाती संज्वलनकपायका देशघाती संबंधी द्रव्य है वह युगपत् ( एक कालमें ) जितनी प्रकृति धंधै उनको हीनक्रमसे देना ॥२०॥ आगे नोकषायका बंध निरंतर ( हमेशा ) होय तो कितने कालतक होता है यह कहते हैं;- पुंबंधऽद्धा अंतोमुहुत्त इथिम्हि हस्सजुगले य । अरदिदुगे संखगुणा णपुंसकऽद्धा विसेसहिया ॥ २०५ ॥ पुंबन्धाद्धा अन्तर्मुहूर्तः त्रियां हास्ययुगले च । अरतिद्वये संख्यगुणा नपुंसकाद्धा विशेषाधिकः ।। २०५ अर्थ-पुरुषवेदके निरंतर बंध होनेका काल अंतर्मुहूर्त है । यह अंतर्मुहूर्त सबसे छोटा समझना । स्त्रीवेदका उससे संख्यात गुणा, हास्य और रतिका काल उससे भी संख्यात गुणा, अरति और शोकका उससे संख्यात गुणा अन्तर्मुहूर्त है और नपुंसक- वेदका काल उससे भी कुछ अधिक जानना ॥ २०५॥ आगे अन्तरायकी पांच प्रकृतियोंमें तथा नामके बंधस्थानोंमें कहते है। , पणविग्घे विवरीयं सर्वधपिडिदरणामठाणेवि । पिंडं दवं च पुणो सबंधसगपिंडपयडीसु ॥ २०६ ॥ . N है गोम्मटसारः। .७९ ‘पञ्चविघ्ने विपरीतं सबन्धपिण्डेतरनामस्थानेपि । पिण्डं द्रव्यं च पुनः सबन्धस्वकपिण्डप्रकृतिपु ॥२०६ ।। अर्थ-दानान्तराय आदिक पांच प्रकृतियोंमें उलटाक्रम अर्थात् अंतसे लेकर आदितक क्रम जानना । और नामकर्मके स्थानोंमे जो एकही काल बंधको प्राप्त होनेवाली गत्यादि पिंडप्रकृति और अगुरुलधुआदि अपिंडरूप प्रकृतियोंमें भी उलटा क्रम जानना । इसप्रकार प्रदेश जो परमाणु है उनके बंधका विधान कहा ॥ २०६ ॥ अब उत्कृष्टादि प्रदेशबंधके सादिआदि भेद मूलप्रकृतियोंमें कहते हैं- छण्हंपि अणुकस्सो पदेसवंधो दु चदुवियप्पो दु । सेसतिये दुवियप्पो मोहाऊणं च दुवियप्पो ॥ २०७॥ पण्णामपि अनुत्कृष्टः प्रदेशबन्धस्तु चतुर्विकल्पस्तु । शेपत्रये द्विविकल्पः मोहायुषोश्च द्विविकल्पः ॥ २०७ ॥ अर्थ-ज्ञानावरणादि छह कर्मोंका अनुत्कृष्ट प्रदेशबंध सादि आदिक भेदसे चार तरहका है, बाकी उत्कृष्टादि तीन बंध सादि अध्रुवके भेदसे दो तरहके है । और मोहनीय तथा आयुकर्मके उत्कृष्टादि चारों भेद भी सादिआदि दो तरहके है ।। २०७ ॥ आगे उत्तरप्रकृतियोंमें भेद दिखाते हैं;- तीसण्हमणुक्कस्सो उत्तरपयडीसु चउविहो बंधो । सेसतिये दुवियप्पो सेसचउक्केवि दुवियप्पो ॥ २०८॥ त्रिंशतामनुत्कृष्टः उत्तरप्रकृतिषु चतुर्विधो बन्धः । शेषत्रये द्विविकल्पः शेषचतुष्केपि द्विविकल्पः ॥ २०८ ॥ अर्थ-उत्तर प्रकृतियोंमें तीस प्रकृतियोंका अनुत्कृष्टबध सादिआदिकसे चार प्रकार है। शेष उत्कृष्टादि तीनके सादि अध्रुव ये दोही भेद है । और शेषवची ९० प्रकृतियोंका उत्कृष्टादि चार तरहका बंधभी सादिआदिक भेदसे दो तरहका है ॥ २०८॥ अब उन तीस प्रकृतियोंको गिनाते है- णाणंतरायदसयं दसणछक्कं च मोहचोदसयं । तीसहमणुकस्सो पदेसवंधो चदुवियप्पो ॥२०९ ॥ ज्ञानान्तरायदशकं दर्शनषटुं च मोहचतुर्दशकम् । त्रिंशतामनुत्कृष्टः प्रदेशवन्धः चतुर्विकल्पः ॥ २०९ ॥ अर्थ-ज्ञानावरण और अंतरायकी १०, दर्शनावरणकी ६ मोहनीयकी अप्रत्याख्यादि १४ ये सब मिलकर ३० प्रकृतियोंका अनुत्कृष्ट प्रदेशबंध चार प्रकार है ॥ २०९ ॥ आगे उत्कृष्ट प्रदेशबन्ध होनेकी सामग्री दिखाते है- ।
० , रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । उक्कडजोगो सण्णी पजत्तो पयडिवंधमप्पदरो। कुणदि पदेसुक्कस्सं जहण्णये जाण विवरीयं ॥ २१ ॥ उत्कृष्टयोगः संज्ञी पर्याप्तः प्रकृतिवन्धाल्पतरः । करोति प्रदेशोत्कृष्टं जघन्यके जानीहि विपरीतम् ।। २१० ॥ अर्थ-जो जीव उत्कृष्ट योगोंकर सहित, संज्ञी, पर्याप्त और थोड़ी प्रकृतियोंका बंध करनेवाला होता है, वही जीव उत्कृष्ट प्रदेशबंधको करता है । तथा जघन्य प्रदेश बंघमें इससे उलटा जानना ॥ २१० ॥ आगे मूलप्रकृतियोंके उत्कृष्टबंधका खामीपना गुणस्थानोंमें कहते हैं- आउकस्स पदेसं छकं मोहस्स णव दु ठाणाणि । सेसाण तणुकसाओ बंधदि उक्कस्सजोगेण ॥ २११ ॥ आयुष्कस्य प्रदेशं पढें मोहस्य नव तु स्थानानि । शेषाणां तनुकपायो बध्नाति उत्कृष्टयोगेन ।। २११॥ अर्थ-आयुकर्मका उत्कृष्ट प्रदेशबंध छः गुणस्थानोंको उलंघ सातवें गुणस्थानमें रहनेवाला करता है। मोहनीयका उत्कृष्ट प्रदेशबंध नवमें गुणस्थानवर्ती करता है । और शेष बचे ज्ञानावरणादि छह कर्मोंका उत्कृष्ट प्रदेशबंध सूक्ष्मसांपराय ( कषाय ) गुणस्थानवाला उत्कृष्ट योगोंका धारण करनेवाला जीव करता है । यहां सब जगह उत्कृष्ट योगद्वारा बंध जानना ॥२११॥ अब उत्तर प्रकृतियोंमें दिखाते है:- सत्तर सुहुमसरागे पंचऽणियदिम्हि देसगे तदियं । अयदे विदियकसायं होदि हु उक्कस्सदव्यं तु ॥ २१२ ॥ छण्णोकसायणिद्दापयलातित्थं च सम्मगो य जदी। सम्मो वामो तेरं णरसुरआऊ असादं तु ॥ २१३ ॥ देवचउक्कं वजं समचउरं सत्थगमणसुभगतियं । आहारमप्पमत्तो सेसपदेसुक्कडो मिच्छो ॥ २१४ ॥ विसेसयं । सप्तदश सूक्ष्मसरागे पञ्चानिवृत्तौ देशके तृतीयम् । अयते द्वितीयकपायं भवति हि उत्कृष्टद्रव्यं तु ।। २१२॥ षट्नोकषायनिद्राप्रचलातीर्थ च सम्यक् च यदि । सम्यग्वामः त्रयोदश नरसुरायुरसातं तु ॥ २१३ ॥ देवचतुष्कं वनं समचतुरस्र शस्तगमनसुभगत्रयम् । आहारमप्रमत्तः शेषप्रदेशोत्कटो मिथ्यः ॥ २१४ । विशेषकम् । - 3. - . गोम्मटसारः। ८१ अर्थ-मतिज्ञानावरणादि ५ दर्शनावरण ४ अंतराय ५ यशस्कीर्ति, ऊंचा गोत्र और सातावेदनीय इन सत्रह प्रकृतियोंका सूक्ष्मसापराय गुणस्थानमें उत्कृष्ट प्रदेशबंध होता है। नवमें गुणस्थानमें पुरुषवेदादि पांचका, तीसरी प्रत्याख्यानकी चौकड़ीका देशविरत नामा पांचवें गुणस्थानमें, दुसरी अप्रत्याख्यान चार कषायोंका चौथे असयत गुणस्थानमें उत्कृष्ट प्रदेशबंध होता है ॥ २१२ ॥ और छः नोकषाय, निद्रा, प्रचला और तीर्थकर इन नौका उत्कृष्ट प्रदेशबंध सम्यग्दृष्टि करता है । तथा मनुष्यायु, देवायु, असाता वेदनीय, देवगति आदि देवचतुष्क, बज्रर्षभनाराच संहनन, समचतुरस्र संस्थान, प्रशस्तविहायोगति,सुभगादि तीन, इन तेरह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबंध सम्यग्दृष्टि अथवा मिथ्यादृष्टि दोनोंही करते हैं। और आहारकद्विकका उत्कृष्ट प्रदेशबंध अप्रमत्त गुणस्थानवाला करता है। इन चौवनके विना अवशेष ६६ प्रकृतियोंका उत्कृष्ट प्रदेशबंध मिथ्यादृष्टि जीव उत्कृष्ट योगोंसे करता है ॥ २१३ ॥ २१४ ॥ आगे जघन्य प्रदेशबंधका खामीपना मूलप्रकृतियोंमें कहते हैं;- सुहमणिगोदअपजत्तयस्स पढमे जहण्णये जोगे। सत्तण्हं तु जहणं आउगवंधेवि आउस्स ॥ २१५॥ सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तकस्य प्रथमे जघन्यके योगे। सप्तानां तु जघन्यमायुष्कवन्धेपि आयुषः ॥ २१५ ॥ अर्थ-सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तकजीवके अपने पर्यायके पहलेसमयमें जघन्य योगोंसे सात मूलप्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशबंध होता है । उसी जीवके आयुका बंध होनेपर आयुका भी जघन्य प्रदेशबंध होता है ॥ २१५ ॥ अब उत्तर प्रकृतियों में दिखाते है, घोडणजोगोऽसण्णी णिरयदुसुरणिरयआउगजहण्णं । अपमत्तो आहारं अयदो तित्थं च देवचऊ ॥ २१६ ॥ घोटमानयोगः असंज्ञी निरयद्विसुरनिरयायुष्कजघन्यम् । अप्रमत्तः आहारमयतः तीर्थ च देवचतुः ॥ २१६ ॥ अर्थ-घोटमान योगोंका धारी असैनी जीव नरकद्वय, देवायु तथा नरकायुका जघन्य प्रदेशबंध करता है । और आहारकद्वयका अप्रमत्त गुणस्थानवर्ती तथा चौथे असंयत गुण- स्थानवाला तीर्थकर प्रकृति और देवचतुष्क इसतरह पांच प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशबंध करता है ॥ २१६ ॥ १. जिन योगस्थानोंकी वृद्धि भी हो, हानि भी हो अथवा जैसेके तैसे भी रहै उन योगस्थानोंको घोट- मानयोग कहते है, इनका दूसरा नाम परिणामयोगस्थान भी है। ११ रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् । आगे ११ प्रकृतियोंसे बचीहुई प्रकृतियोंमें विशेपपना कहते है- चरिमअपुण्णभवत्यो तिविग्गहे पढमविग्गहम्मि ठिओ। सुहमणिगोदो बंधदि सेसाणं अवरवंधं तु ॥ २१७ ॥ चरमापूर्णभवस्थः त्रिविग्रहे प्रथमविग्रहे स्थितः । सूक्ष्मनिगोदो बध्नाति पाणामवरवन्धं तु ॥ २१७ ॥ अर्थ-छहहजार बारह अपर्याप्त (क्षुद्र) भवोमेंसे अंतके भवमें स्थित (मौजूद), विग्रह- गतिके तीनमोड़ाओंमेंसे पहली वक्रगतिमें ठहरा हुआ जो सूक्ष्मनिगोदिया जीव है वह पहली ११ से शेषरही १०९ प्रकृतियोंका जघन्य प्रदेशबंध करता है ॥ २१७ ॥ आगे प्रकृति और प्रदेशबंधके कारण जो योगस्थान है उनका स्वरूप, संख्या तथा खामियोंको ४२ गाथाओंसे कहते हैं,- जोगट्टाणा तिविहा उववादेयंतवाड्डिपरिणामा । भेदा एकेकंपि चोड्सभेदा पुणो तिविहा ॥ २१८ ॥ योगस्थानानि त्रिविधानि उपपादैकान्तवृद्धिपरिणामानि । भेदात् एकैकमपि चतुर्दशभेदाः पुनः त्रिविधाः ।। २१८ ।। अर्थ-उपपाद योगस्थान १ एकांतवृद्धि योगस्थान २ परिणाम योगस्थान ३ इन तीन भेदोंसें योगस्थान तीन प्रकार है । और एक २ भेदके भी १४ जीव समासकी अपेक्षा चौदह भेद है । तथा उन भेदोंके भी सामान्य, जघन्य और उत्कृष्टकी अपेक्षा तीन भेद हैं; उनमेंसे सामान्यकी अपेक्षा १४ भेद, सामान्य और जघन्यकी अपेक्षा २८ भेद, तथा सामान्य-जघन्य और उत्कृष्ट की अपेक्षा ४२ भेद होते है ॥ २१८ ॥ अब उपपाद योगस्थानका स्वरूप कहते है:- उववादजोगठाणा भवादिसमयटियस्स अवरवरा । विग्गहइजुगइगमणे जीवसमासे मुणेयया ॥ २१९ ।। उपपादयोगस्थानानि भवादिसमयस्थितस्यावरवराणि । विग्रह गतिगमने जीवसमासे मन्तव्यानि ॥ २१९॥ अर्थ-पर्याय धारण करनेके पहले समयमें तिष्ठते हुए जीवके उपपाद योगस्थान होते है, क्योंकि “ उपपद्यते" जीवकर पहले समयमें जो प्राप्त हो " इति उपपादः वह उपपाद है-ऐसा व्याकरणसे शब्दार्थ होता है । उनमेंसे जघन्य उपपाद स्थान उस जीवके होते हैं जोकि वक्रगतिकर ( वीचमें मुड़कर ) नवीन पर्यायको प्राप्त होवै, और जो जीव ऋजुगतिकर अर्थात् सीधा जावै ( वीचमें नहीं मु. ) ऐसी गतिकर नवीन पर्याय धारण करै उसके उत्कृष्ट उपपाद योगस्थान है। ये सब उपपाद योगस्थान चौदह जीवसमासों (भेदों) में जानलेना ।। २१९ ॥ F गोम्मटसारः। ८३ आगे परिणामयोगस्थानका खरूप दिखलाते है, परिणामजोगठाणा सरीरपज्जत्तगादु चरिमोत्ति । लद्धिअपजत्ताणं चरिमतिभागम्हि बोधव्वा ॥ २२० ॥ परिणामयोगस्थानानि शरीरपर्याप्तकात् चरम इति । लब्ध्यपर्याप्तकानां चरमत्रिभागे बोद्धव्यानि ॥ २२० ।। अर्थ-शरीरपर्याप्तिके पूर्ण होने के समयसे लेकर आयुके अंततक परिणामयोगस्था- न कहे जाते है । और जिसकी शरीर पर्याप्ति पूर्ण नही हुई ऐसे लब्ध्यपर्याप्तक जीवके अपनी आयु (श्वासके अठारवें भाग प्रमाण)के अतके त्रिभागके प्रथम समयसे लेकर अंतके समय तक स्थितिके सब भेदोंमें उत्कृष्ट और जघन्य दोनों प्रकारके परिणाम योग- स्थान जानना ॥ २२० । सगपजत्तीपुण्णे उपरि सव्वत्थ जोगमुक्कस्सं । सव्वत्थ होदि अवरं लद्धिअपुण्णस्स जेटुंपि ॥२२१ ॥ खकपर्याप्तिपूर्णे उपरि सर्वत्र योगोत्कृष्टम् । सर्वत्र भवत्यवरं लब्ध्यपर्याप्तस्य ज्येष्ठमपि ॥ २२१ ॥ अर्थ-अपनी २ शरीर पर्याप्तिके पूर्ण होनेपर उससमयसे लेकर सब अपनी २ आ- युके समयतक परिणामयोगस्थान उत्कृष्ट भी है, और जघन्य भी संभवते हैं। और लब्ध्य- पर्याप्तकके अपनी स्थितीके सब भेदोंमें भी दोनों परिणामयोगस्थान है । सो ये सब परि- णामयोगस्थान घोटमानयोग समझने क्योंकि ये घटते भी है, बढ़ते भी है और जैसेके तैसे भी रहते हैं ॥ २२१ ॥ आगे एकान्तानुवृद्धि योगस्थानका खरूप कहते है। एयंतवड्डिठाणा उभयहाणाणमंतरे होति । अवरवरठाणाओ सगकालादिम्हि अंतम्हि ॥ २२२ ॥ एकान्तवृद्धिस्थानानि उभयस्थानानामन्तरे भवन्ति । अवरवरस्थानानि स्वककालादौ अन्ते ॥ २२२ ॥ अर्थ-एकान्तानुवृद्धि योगस्थान, उपपाद आदि दोनों स्थानोंके बीचमें अर्थात् पर्या- यधारण करनेके दूसरे समयसे लेकर एक समय कम शरीर पर्याप्तिके अंतर्मुहूर्त के अंत- समयतक होते है। उनमें जघन्यस्थान तो अपने कालके पहले समयमें और उत्कृष्ट- स्थान अंतके समयमें होता है । इसीलिये एकान्त अर्थात् नियमकर अपने समयोंमें सम- य समय प्रति असंख्यात गुणी अविभाग प्रतिच्छेदोंकी वृद्धि जिसमें हो वह एकान्तानु- वृद्धिस्थान ऐसा नाम कहा गया है ॥ २२२ ॥ अब योगस्थानोंके अवयव ( अंग ) कहते है।
४
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अविभागपडिच्छेदो वग्गो पुण वग्गणा य फड्यगं।
गुणहाणीवि य जाणे ठाणं पडि होदि णियमेण ॥ २२३ ॥
अविभागप्रतिच्छेदो वर्गः पुनः वर्गणा च स्पर्धकम् ।
गुणहानिरपि च जानीहि स्थानं प्रति भवति नियमेन ॥ २२३ ।।
अर्थ-सब योगस्थान जगत् श्रेणीके असंख्यातवें भाग प्रमाण है। उनमें एक २
स्थानके प्रति अविभाग प्रतिच्छेद १ वर्ग २ वर्गणा ३ स्पर्धक ४ गुणहानि ५ ये पांच
भेद होते है, ऐसा नियमसे जानना ।। २२३ ।।
आगे इनका खरूप कहते हैं-
पल्लासंखेजदिमा गुणहाणिसला हवंति इगिठाणे ।
गुणहाणिफड्ढयाओ असंखभागं तु सेढीये ।। २२४ ॥
पल्यासंख्येयिमा गुणहानिशला भवन्ति एकस्थाने ।
गुणहानिस्पर्धकानि असंख्यभागं तु श्रेण्याः ॥ २२४ ।।
अर्थ-एक योगस्थानमें गुणहानिकी शलाका ( संख्या ) ये पल्यके असंख्यातवें भाग
प्रमाण है, यह नाना गुणहानिका प्रमाण है । और एक गुणहानिमें स्पर्द्धक जगत्श्रेणीके
असंख्यातवें भाग प्रमाण है ॥ २२४ ॥
फहयगे एकेके वग्गणसंखा हु तत्तियालावा ।
एकेकवग्गणाए असंखपदरा हु वग्गाओ ॥ २२५ ॥
स्पर्धके एकैके वर्गणासंख्या हि तावदालापा ।
एकैकवर्गणायामसंख्यप्रतरा हि वर्गाः ।। २२५ ॥
अर्थ-एक २ स्पर्धकमें वर्गणाओंकी संख्या उतनीही अर्थात् जगच्छ्रेणीके असंख्या-
तवें भाग प्रमाण है । और एक २ वर्गणामें असंख्यात जगत्प्रतरप्रमाण वर्ग हैं ॥२२५॥
एकेके पुण वग्गे असंखलोगा हवंति अविभागा।
अविभागस्स पमाणं जहण्णउड्डी पदेसाणं ॥ २२६ ॥
एकैके पुनः वर्गे असंख्यलोका भवन्ति अविभागाः।
अविभागस्य प्रमाणं जघन्यवृद्धिः प्रदेशानाम् ।। २२६ ॥
अर्थ-फिर एक २ वर्गमें असंख्यातलोक प्रमाण अविभाग प्रतिच्छेद होते हैं। और
अविभाग प्रतिच्छेदका प्रमाण प्रदेशों में जघन्य वृद्धिखरूप जानना ॥ भावार्थ-जिसका
दूसरा भाग न हो ऐसे शक्तिके अंशको अविभागप्रतिच्छेद कहते है । सो यहांपर
उलटे क्रमसे कहा है इसकारण सीधा क्रम " अविभागप्रतिच्छेदका समूह वर्ग, वर्गका
समूह वर्गणा, वर्गणाका समूह स्पर्द्धक, स्पर्धकका समूह गुणहानि, गुणहानिका समूह
स्थान" ऐसा जानना ॥२२६॥
गोम्मटसारः।
आगे एक योगस्थानमें सब स्पर्द्धकादिकोंका प्रमाण कहते है-
इगिठाणफड्ढयाओ वग्गणसंखा पदेसगुणहाणी ।
सेढिअसंखेजदिमा असंखलोगा हु अविभागा ॥ २२७ ॥
एकस्थानस्पर्धकानि वर्गणासंख्या प्रदेशगुणहानिः ।
श्रेण्यसंख्यातिमा असंख्यलोका हि अविभागाः ॥ २२७ ॥
अर्थ-एक योगस्थानमें सब स्पर्धक, सब वर्गणाओंकी संख्या और असंख्यात प्रदेशों-
में गुणहानिका आयाम ( काल ) इनका प्रमाण सामान्यपनेसे जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें
भाग मात्र है । क्योंकि असंख्यातके बहुत भेद है, इसलिये इन सबका प्रमाण पूर्वोक्त ही
होता है । और एक योगस्थानमें असंख्यातलोक प्रमाण अविभागप्रतिच्छेद है ।। २२७ ।।
सव्वे जीवपदेसे दिवडगुणहाणिभाजिदे पढमा।
उवरिं उत्तरहीणं गुणहाणिं पडि तदद्धकर्म ॥ २२८ ।।
सर्वस्मिन् जीवप्रदेशे व्यर्धगुणहानिभाजिते प्रथमा ।
उपरि उत्तरहीनं गुणहानि प्रति तदर्द्धक्रमः ॥ २२८ ॥
अर्थ-सब लोक प्रमाण ( असंख्यात ) जीवके प्रदेशोंको डेढगुणहानिका भाग देने-
पर पहली गुणहानीकी पहली वर्गणा होती है । इसके बाद एक एक चय घटानेसे
द्वितीयादि वर्गणाओंका प्रमाण होता है । और गुणहानि गुणहानि प्रति आधा २ प्रमाण
क्रम जानना ॥ २२८ ॥
फड्डयसंखाहि गुणं जहण्णवग्गं तु तत्थ तत्थादी।
विदियादिवग्गणाणं वग्गा अविभागअहियकमा ॥ २२९ ॥
स्पर्धकसंख्याभिः गुणो जघन्यवर्गस्तु तत्र तत्रादिः ।
द्वितीयादिवर्गणानां वर्गा अविभागाधिकक्रमाः ॥ २२९ ॥
अर्थ-जघन्य वर्गको अपने २ स्पर्धककी संख्यासे गुणाकरनेपर उस २ गुणहानिकी
पहली वर्गणाका प्रमाण होता है। और दूसरी आदि वर्गणा क्रमसे वर्गमें एक एक अवि-
भाग प्रतिच्छेद वदानेपर होती है ।। २२९ ।।
इसका अधिक कथन विस्तार भयसे नही लिखा । इसप्रकार जघन्य योगस्थानका
कथन जानना ॥
अंगुलअसंखभागप्पमाणमत्तऽवरफड्डयावही ।
अंतरछकं मुच्चा अवरहाणादु उकस्सं ॥ २३०॥
अकुलासंख्यभागप्रमाणमात्रावरस्पर्धकवृद्धिः ।
अन्तरषदं मुक्त्वा अवरस्थानादुत्कृष्टम् ॥ २३०॥
८६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। अर्थ जघन्यस्थानसे लेकर उत्कृष्ट स्थान पर्यंत छह अंतरस्थानोंको छोड़कर सूच्यं- गुलके असंख्यातवें भाग प्रमाण जघन्य स्पर्धकोकी वृद्धि क्रमसे जानना अर्थात् एकस्थानसे दूसरे योग स्थानमें पूर्वोक्त प्रमाण स्पर्धक वढती होते है । इसप्रकार तीसरे आदि सानोंमें भी ऐसा ही क्रम जानना ॥ २३० ॥ ऐसा होनेपर जो कुछ हुआ उसे कहते है- सरिसायामेणुवरि सेढिअसंखेजभागठाणाणि । चडिदेकेकमपुवं फड्डयमिह जायदे चयदो।। २३१ ॥ सहशायामेनोपरि श्रेण्यसंख्येयभागस्थानानि चटितैकैकमपूर्व स्पर्द्धकमिह जायते चयतः ।। २३१ ।। अर्थ-सबसे जघन्य योगस्थानका समान आयामके ऊपर पहले कहे हुए प्रमाण स्थान २ प्रति वृद्धिरूप चय करते करते समानतामें एक अपूर्वस्पर्द्धक होता है। वहांपर त्रैराशि- क गणितसे जगच्छ्रेणीके असंख्यातवे भाग प्रमाण स्थान अधिक २ होनेपर द्वितीयादि अपूर्वस्पर्द्धक होते हैं । इसप्रकार एक गुणहानिमें जितना स्पर्द्धकोंका प्रमाण कहा गयाथा उतनेही अपूर्वस्पर्द्धक होनेपर जघन्ययोगस्थान दूना होता है । इसतरह दूने २ क्रमसे चलते २ अंतमें संज्ञी पंचेद्रिय पर्याप्त जीवका सबसे उत्कृष्ट योगस्थान उत्पन्न होता है। अर्थात् संज्ञी पंचेंद्रीजीवके कर्मोके ग्रहणकरनेकी शक्ति अधिक प्रगट होती है ॥ २३१॥ आगे जो कथन करेंगे उसकी प्रतिज्ञा आचार्य करते है:- एदेसि ठाणाणं जीवसमासाण अवरवरविसयं । चउरासीदिपदेहि अप्पाबहुगं परूवेमो ॥ २३२ ॥ एतेषां स्थानानां जीवसमासानामवरवरविषयं । चतुरशीतिपदैः अल्पवहुकं प्ररूपयामः ॥ २३२ ।। अर्थ-ये जो योगस्थान कहे है उनमें चौदह जीव समासोंके जघन्य और उत्कृष्टकी अपेक्षा तथा उपपादादिक तीन प्रकारके योगोंकी अपेक्षा चौरासीस्थानोसे अब थोड़ा बहुतपनेका कथन करते है ॥ २३२ ॥ अब उसीको दिखाते है, सुहुमगलद्धिजहण्णं तणिवत्तीजहण्णयं तत्तो। लद्धिअपुण्णुक्कस्सं चादरलद्धिस्स अवरमदो ॥ २३३ ॥ सूक्ष्मकलब्धिजघन्यं तन्निवृत्तिजघन्यकं ततः। लब्ध्यपूर्णोत्कृष्टं बादरलध्धेरवरमतः ॥ २३३ ॥ अर्थ-सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवका जघन्यउपपादस्थान सबसे थोड़ा है । उससे सूक्ष्मनिगोदिया निवृत्त्यपर्याप्तक जीवका जघन्यउपपादस्थान पल्यके असंख्यातवें भाग गुणा --
गोम्मटसारः।
है। उससे अधिक सूक्ष्मलब्ध्यपर्याप्तका उत्कृष्ट उपपादयोगस्थान और उससे अधिक
बादरलब्ध्यपर्याप्तका जघन्य उपपाद योगस्थान जानना ॥ २३३ ॥
णिवत्तिसुहुमजेडं वादरणिवत्तियस्स अवरं तु ।
वादरलद्धिस्स वरं वीइंदियलद्धिगजहण्णं ॥ २३४ ॥
निर्वृत्तिसूक्ष्मज्येष्ठं वादरनिर्वृत्तिकस्यावरं तु ।
वादरलब्धेः वरं द्वीन्द्रियलब्धिकजघन्यम् ॥ २३४ ॥
अर्थ-फिर उससे अधिक सूक्ष्म निर्वृत्त्यपर्याप्तकजीवका उत्कृष्ट उपपादयोगस्थान है ।
उससे अधिक बादरनिर्वृत्त्यपर्याप्तकका जघन्ययोगस्थान है, उससे बादरलब्ध्यपर्याप्तकका उत्कृष्ट
योगस्थान अधिक है, उससे अधिक दो इंद्री लब्ध्यपर्याप्तकका जघन्ययोगस्थान है ॥२३४॥
वादरणियत्तिवरं णिवत्तिविइंदियस्स अवरमदो।
एवं वितिवितितिचतिच चउविमणोहोदि चउविमणो॥२३५॥
वादरनिर्वृत्तिवरं निर्वृत्तिद्वीन्द्रियस्यावरमतः ।
एवं द्वित्रिद्वित्रित्रिचत्रिच चतु'विमनो भवति चतुःविमनः ॥ २३५ ।।
अर्थ-इसके बाद उससे भी अधिक बादर एकेंद्रीनिर्वृत्यपर्याप्तकका उत्कृष्ट योगस्थान
है, उससे अधिक दोइंद्री निवृत्त्यपर्याप्तकका जघन्ययोगस्थान जानना । और इसी तरह
: दो इन्द्री लब्धिअपर्याप्तका उत्कृष्ट तथा तेइंद्री लब्ध्यपर्याप्तकका जघन्य उपपादस्थान, दो
इंद्री निवृत्त्यपर्याप्तका उत्कृष्ट, ते इन्द्री निर्वृत्त्यपर्याप्तका जघन्य, ते इंद्री लब्धिअपर्याप्तक-
का उत्कृष्ट, चौ इन्द्री लब्धि अपर्याप्तकका जघन्य, निवृत्त्यपर्याप्तक तेइंद्रीका उत्कृष्ट,
निर्वृत्तिअपर्याप्तक चौइन्द्रीका जघन्य, लब्धि अपर्याप्तक चौइंद्रीका उत्कृष्ट, लब्ध्यपर्याप्तक
असंज्ञी ( मनरहित ) पंचेन्द्रीका जघन्य, निर्वृत्ति अपर्याप्तक चौइंद्रीका उत्कृष्ट और निर्वृ-
त्यपर्यासक मनरहित ( असंज्ञी ) पंचेन्द्रीका जघन्य उपपाद योगस्थान क्रमसे अधिक २
जानना ॥ २३५॥
तह य असण्णीसण्णी असण्णिसण्णिस्स सण्णिउववादं ।
सुहुमेइंदियलद्धिगअवर एयंतवहिस्स ॥ २३६ ॥
तथा च असंज्ञीसंज्ञी असंज्ञीसंज्ञिनः संझ्युपपादम् ।
सूक्ष्मैकेन्द्रियलब्धिकावरं एकान्तवृद्धेः ॥ २३६ ॥
अर्थ-और इसीप्रकार उससे अधिक असंज्ञीलब्ध्यपर्याप्तकका उत्कृष्टस्थान, और संज्ञी-
लध्यपर्याप्तकका जघन्यस्थान, उससे अधिक असंज्ञी निर्वृत्त्यपर्याप्तकका उत्कृष्ट और-संज्ञी-
निर्वृत्त्यपर्याप्तकका जघन्यस्थान, उससे संज्ञी पंचेंद्री लब्ध्यपर्याप्तकका उत्कृष्ट उपपादयोग-
स्थान पल्यके असंख्यातवेंमाग गुणा है । और उससे अधिकगुणा सूक्ष्म एकेन्द्री लब्ध्यपर्या-
सकका जघन्य एकांतानुवृद्धियोगस्थान जानना ॥ २३६ ॥
रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् । सण्णिस्सुववादवरं णिव्वत्तिगदस्स सुहुमजीवस्स । एयंतवडिअवरं लद्धिदरे थूलथूले य ॥ २३७ ।। संज्ञिन उपपादवरं निर्वृत्तिगतस्य सूक्ष्मजीवस्य । एकान्तवृद्ध्यवरं लब्धीतरस्मिन् स्थूलस्थूले च ॥ २३७ ॥ अर्थ-उससे अधिक संज्ञीपंचेंद्री निर्वृत्त्यपर्याप्तकका उत्कृष्ट उपपादयोगस्थान, उससे अधिक सूक्ष्म एकेंद्री निवृत्त्यपर्याप्तकका जघन्य एकांतानुवृद्धि योगस्थान है, उससे अधिक यादर एकेंद्री लब्धि अपर्याप्तका और बादर ( स्थूल ) एकेन्द्री निर्वृत्त्यपर्याप्तकका जघन्य एकांतानुवृद्धि योगस्थान क्रमसे पल्यके असंख्यातवें भागकर गुणा है ॥ २३७ ।। तह सुहुमसुहुमजेडं तो वादरवादरे वरं होदि। अंतरमवरं लद्धिगसुहुमिदरवरंपि परिणामे ॥ २३८ ॥ तथा सूक्ष्मसूक्ष्मज्येष्ठं ततो बादरवादरे वरं भवति । अन्तरमवरं लब्धिकसूक्ष्मेतरवरमपि परिणामे ॥ २३८ ।। अर्थ-इसीप्रकार उससे सूक्ष्म एकेंद्रीलब्ध्यपर्याप्तक और सूक्ष्म एकेन्द्री निवृत्त्यपर्याप्तक इन दोनोंके उत्कृष्ट योगस्थान क्रमसे अधिक हैं। उससे अधिक बादर एकेद्री लन्ध्यपर्याप्तक और बादर एकेंद्री निर्वृत्ति अपर्याप्तक इन दोनोंके उत्कृष्ट एकांतानुवृद्धि योगस्थान हैं। उसके वाद अंतरं अर्थात् बादर एकेंद्री निर्वृत्त्यपर्याप्तकका उत्कृष्ट एकान्तानुवृद्धियोगस्थान और सूक्ष्म एकेन्द्री लब्ध्यपर्याप्तकका जघन्य परिणामयोगस्थान इन दोनोंके बीचमै जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण स्थान पहला अंतर है । इस अंतरके स्थानोंका कोई खामी नही है अर्थात् ये स्थान किसी जीवके नहीं होते इसकारण यह अंतर पड़ा। इन स्थानोंको उलंघकर ( छोड़कर ) सूक्ष्म एकेंद्री और बादर एकेंद्री लब्ध्यपर्याप्तक इन दो- नोंके जघन्य और उत्कृष्ट परिणामयोगस्थान क्रमसे पल्यके असंख्यातवें भागकर गुणे जानने ॥२३८॥ अंतरसुवरीवि पुणो तप्पुण्णाणं च उवरि अंतरियं । एयंतवहिठाणा तसपणलद्धिस्स अवरवरा ॥ २३९ ॥ अन्तरमुपर्यपि पुनः तत्पूर्णानां च उपर्यन्तरितम् । एकान्तवृद्धिस्थानानि सपञ्चलब्धेरवरवराः ॥ २३९ ॥ अर्थ-इसके ऊपर दूसरा अंतर है अर्थात् बादर एकेंद्री लब्ध्यपर्याप्तके उत्कृष्ट परि- णामयोगस्थानके आगे जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण योगस्थान खामीरहित हैं। इनको छोड़कर सूक्ष्म एकेंद्री और बादर एकेंद्री पर्याप्तकोंके जघन्य और उत्कृष्ट परिणाम- योगस्थान क्रमसे पल्यके असंख्यातवें भागसे गुणे हैं। फिर इस बादर एकेंद्री पर्याप्तके - गोम्मटसारः। , उत्कृष्ट योगस्थानके आगे तीसरा अंतर है । उसको छोड़कर पांच त्रसोंके अर्थात् दो इंद्री लब्धि अपर्याप्तकआदि पांचके जघन्य और उत्कृष्ट एकांतानुवृद्धि योगस्थान क्रमसे पल्यके असंख्यातवें भागसे गुणे है ॥ २३९ ॥ लद्धीणिवत्तीणं परिणामयंतवाहिठाणाओ। परिणामट्ठाणाओ अंतरअंतरिय उवरुवरिं ॥ २४ ॥ लब्धिनिर्वृत्तीनां परिणामैकान्तवृद्धिस्थानानि । परिणामस्थानानि अन्तरान्तरितान्युपर्युपरि ।। २४०।। अर्थ-इसके आगे चौथा अंतर है। इसकेबाद लब्धि अपर्याप्तक और निर्वृत्ति अपर्याप्तक पाच त्रसजीवोंके परिणामयोगस्थान, एकांतानुवृद्धियोगस्थान और परिणामयोगस्थान तथा इनके ऊपर बीच २ में अंतर सहित स्थान है । ये तीनों स्थान उत्कृष्ट और जघन्यपने लिये- हुए पहली रीतिसे क्रमपूर्वक जानने । इसतरह ८४ स्थान (ठिकाने ) योगोंके कहे है । सारांश यह है कि इनस्थानोंमें अविभाग प्रतिच्छेद एकके वाद दूसरेमें आगे आगे पल्यके असंख्यातवें भाग गुणे है । ऐसा क्रम जानना ॥ २४० ॥ आगे इस कहेहुए गुणाकारको ग्रंथकर्ता स्वयं कहते है। एदेसि ठाणाओ पल्लासंखेजभागगुणिदकमा । हेहिमगुणहाणिसला अण्णोण्णब्भत्थमेत्तं तु ॥ २४१ ॥ एतेषां स्थानानि पल्यासंख्येयभागगुणितक्रमाणि । अधस्तनगुणहानिशला अन्योन्याभ्यस्तमात्रं तु ॥ २४१ ॥ अर्थ ये ८४ स्थान क्रमसे पल्यके असंख्यातवें भागकर गुणाकार किये गये है। और जघन्य तथा उत्कृष्ट योगस्थानोंके बीचकी जो अधस्तन गुणहानि नामकी शलाका बीचके भेद ) हैं वे असंख्यातरूप कम पल्यकी वर्गशलाका प्रमाण है। इसी संख्याको अन्योन्याभ्यस्तराशिकी "गुणाकार शलाका" कहते है ॥ २४१ ॥ आगे इन उपपादादि तीनों स्थानोंका जघन्य और 'उत्कृष्टकी अपेक्षा निरंतर ( एक- स्थानरूप ) प्रवर्तनेका काल कहते है। अवरकस्सेण हवे उववादेयंतवहिठाणाणं । एकसमयं हवे पुण इदरेसिं जाव अट्ठोत्ति ॥ २४२ ॥ अवरोत्कृष्टेन भवेत् उपपादैकान्तवृद्धिस्थानानाम् । एकसमयो भवेत् पुनः इतरेषां यावदष्ट इति ॥ २४२ ॥ अर्थ-उपपाद योगस्थान और एकांतानुवृद्धियोगस्थानोंके प्रवर्तनेका काल जघन्य और उत्कृष्ट एकसमय ही है, क्योंकि उपपादस्थान जन्मके प्रथम समयमें ही होता है, 1 १२ ९० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । और एकांतानुवृद्धिस्थान समय २ वृद्धिरूप अन्य अन्य (जुदा २) ही होता है। और इन दोनोंसे भिन्न जो परिणाम योगस्थान है उनके निरंतर प्रवर्तनका काल दो समयसे लेकर आठ समय तक है ॥ २४२ ॥ अट्ठसमयस्स थोवा उभयदिसासुवि असंखसंगुणिदा । चउसमयोत्ति तहेव य उवरि तिदुसमयजोग्गाओ ।। २४३ ॥ अष्टसमयस्य स्तोका उभयदिशयोरपि असंख्यसंगुणिताः । चतुःसमय इति तथैव च उपरि त्रिद्विसमययोगाः ।। २४३ ॥ अर्थ-आठ समय निरंतर प्रवर्तनेवाले योगस्थान थोड़े है। और सातको आदि लेकर चार समयतक प्रवर्तनेवाले ऊपर-नीचे दोनों जगहमें असंख्यातगुणे स्थान है। इसी तरह तीन समय और दो समयतक प्रवर्तनेवाले योगस्थान ऊपर ही (एक जगह) जानने। इनकी जौके आकार रचना है ।। २४३ ।। मज्झे जीवा बहुगा उभयत्थ विसेसहीणकमजुत्ता। हेछिमगुणहाणिसलादुवरि सलागा विसेसऽहिया ॥ २४४ ॥ मध्ये जीवा बहुका उभयत्र विशेषहीनक्रमयुक्ताः । अधस्तनगुणहानिशलाया उपरि शलाका विशेषाधिकाः ॥ २४४ ॥ अर्थ-पर्याप्त त्रसजीवोंके प्रमाणरूप जौकी रचनामें मध्यभागमें जीव बहुत हैं और ऊपर नीचे दोनों तरफ क्रमसे विशेषकर हीन २ होते है। परंतु नीचेकी गुणहानि शलाकासे ऊपरकी गुणहानि शलाका कुछ अधिक है ।। २४४॥ यही कहते हैं- दवतियं हेटुबरिमदलवारा दुगुणमुभयमण्णोण्णं ॥ जीवजवे चोइससयवावीसं होदि बत्तीसं ॥ २४५ ॥ चत्तारि तिण्णि कमसो पण अड अटुं तदो य वत्तीसं । किंचूणतिगुणहाणिविभजिद दवे दु जवमझ॥२४६॥ जुम्म। द्रव्यत्रयमधउपरिमदलवारा द्विगुणमुभयमन्योन्यम् । जीवयवे चतुर्दशशतद्वाविंशतिः भवति द्वात्रिंशत् ।। २४५ ॥ चत्वारि त्रीणि क्रमशः पञ्च अष्ट अष्ट ततश्च द्वात्रिंशत् । किञ्चिदूनत्रिगुणहानिविभाजिते द्रव्ये तु यवमध्यम् ॥ २४६ ॥ युग्मम् । अर्थ-जौके आकार जीवोंकी संख्याकी रचनामें अंकोंकी कल्पनासे द्रव्यादि तीन अर्थात् द्रव्यंकाप्रमाण, स्थितिका तथा गुणहानिआयाम ( काल ) का प्रमाण क्रमसे १४- २२, ३२ तथा ' ४ है। और नीचे तथा ऊपरकी नाना गुणहानिका प्रमाण ३' तथा ५ . -
गोम्मटसारः।
समझना, सब मिलकर द्विगुण अर्थात् दोगुणहानिकाप्रमाण ८ हुआ। तथा नानागुणहा-
निप्रमाण दूवे (दो दोके अंक ) लिखकर आपसमें गुणाकरनेसे उभय अर्थात् नीचे
ऊपरकी दोनों अन्योन्याभ्यस्तराशियोंका प्रमाण ८ तथा ३२ होता है । और कुछ
कम तिगुनी गुणहानि (१२) का भाग द्रव्यमें देनेसे यवाकारके मध्यकी जीवसंख्या
जानना ॥ २४५। २४६॥
अब यथार्थ संख्याको दिखाते है:-
पुण्णतसजोगठाणं छेदाऽसंखस्सऽसंखबहुभागे।
दलमिगिभागं च दलं दबदुगं उभयदलवारा ॥ २४७ ॥
पूर्णत्रसयोगस्थानं छेदासंख्यस्यासंख्यबहुभागे।
दलमेकभागं च दलं द्रव्यद्विकमुभयदलवाराः ॥ २४७ ॥
अर्थ-द्रव्यद्विक अर्थात् द्रव्य और स्थितिका प्रमाण कमसे पर्याप्तत्रसजीवके प्रमाण
तथा पर्याप्तत्रससंबंधी परिणामयोगस्थानोंके प्रमाण जानना । और पल्यके अर्द्धच्छेदोंके
असंख्यातवें भाग प्रमाण नानागुणहानियोंमें असंख्यातका भागदेनेसे असंख्यातबहुभागका
जो प्रमाण हो उसका आधा तो नीचेकी गुणहानिका और बाकीका आधा तथा असंख्या-
तका एक भाग मिलकर ऊपरकी नानागुणहानिका प्रमाण इस तरह दोनों नानागुणहानि-
योका प्रमाण समझना ॥ २४७ ॥
णाणागुणहाणिसला छेदासंखेजभागमेत्ताओ।
गुणहाणीणद्धाणं सव्वत्थवि होदि सरिसं तु ॥ २४८ ॥
नानागुणहानिशलाः छेदासंख्येयभागमात्राः ।
गुणहानीनामद्धानां सर्वत्रापि भवति सदृशं तु ॥ २४८ ।।
अर्थ-सब नानागुणहानियोंकी संख्या पल्यके अर्द्धच्छेदोंके असंख्यातवें भाग मात्र
है । और गुणहानिके अद्धा अर्थात् कालका प्रमाण सब जगह समान है ॥ २४८ ॥
गुणहानिआयामका दूना दोगुणहानिका प्रमाण है।
अण्णोण्णगुणिदरासी पल्लासंखेजभागमे तु ।
हेडिमरासीदो पुण उवरिल्लमसंखसंगुणिदं ॥ २४९ ॥
अन्योन्यगुणितराशिः पल्यासंख्येयभागमानं तु ।
अधस्तनराशितः पुनः उपरिममसंख्यातसंगुणितम् ॥ २४९ ॥
अर्थ अन्योन्याभ्यस्तराशि पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है । उसमेंभी नीचेकी
राशिसे ऊपरकी राशि असंख्यातगुणी है ॥ २४९ ॥
९२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । - आगे उन परिणाम योगस्थानोंके धारक जीव कितना २ प्रदेश बंध करते हैं। इसके उत्तरमें आचार्यमहाराज समयप्रबद्धकी वृद्धिका प्रमाण त्रैराशिकसे कहते हैं- इगिठाणफडयाओ समयपवद्धं च जोगवट्ठी य । समयपवद्धचयर्टी एदे हु पमाणफलइच्छा ॥ २५० ॥ एकस्थानस्पर्द्धकानि समयप्रबद्धं च योगवृद्धिश्च । समयप्रबद्धचयार्थमेते हि प्रमाणफलेच्छाः ।। २५० अर्थ-दोइन्द्रीपर्याप्तका पहला जघन्यपरिणामयोगस्थानका स्पर्द्धक, समयप्रबद्ध और योगोंकी वृद्धि ये तीनों समयप्रबद्धके वढनेका प्रमाण लानेकेलिये क्रमसे त्रैराशिक संबंधी प्रमाणराशि, फलराशि और इच्छाराशि होते है ॥ २५० ॥ आगे इसी कथनका खुलासा पांचगाथाओंसे करते हैं;- बीइंदियपजत्तजहण्णाणादु सण्णिपुण्णस्स । उक्कस्सहाणोत्ति य जोगहाणा कमे उड्डा ॥ २५१ ॥ द्वीन्द्रियपर्याप्तजधन्यस्थानात् संज्ञिपूर्णस्य । उत्कृष्टस्थानमिति च योगस्थानानि क्रमेण वृद्धानि ।। २५१ ॥ अर्थ-दो इन्द्वीपर्याप्तके जघन्यपरिणामयोगस्थानसे लेकर संज्ञीपर्याप्तके उत्कृष्ट परि- णामयोगस्थानतक परिणामयोगस्थान क्रमसे एक २ स्थानमें समानवृद्धि प्रमाणकर वढ़ते हुए जानने ॥ २५१ ॥ इस तरह बढ़नेपर जो हुआ उसे कहते हैं; सेढियसंखेजदिमा तस्स जहण्णस्स फट्ठया होति । अंगुलअसंखभागा ठाणं पडि फड्ढया उड्डा ॥ २५२ ॥ श्रेण्यसंख्येयिमानि तस्य जघन्यस्य स्पर्धकानि भवन्ति । ' अङ्गुलासंख्यभागानि स्थानं प्रति स्पर्द्धकानि वृद्धानि ॥ २५२ ॥ अर्थ-दोइन्द्रियपर्याप्तके जघन्यपरिणामयोगस्थानोंके स्पर्द्धक जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण होते है, और इसके बाद हर एक स्थानके प्रति सूच्यंगुलके असंख्यातवें भाग प्रमाण जघन्यस्पर्द्धक बढते हैं ऐसा जानना ॥ २५२ ॥ धुववडीवहृतो दुगुणं दुगुणं कमेण जायंते । चरिमे पल्लच्छेदाऽसंखेजदिमो गुणो होदि ॥ २५३ ॥ ध्रुववृद्धिवर्धमानानि द्विगुणं द्विगुणं क्रमेण जायन्ते । चरमे पल्यच्छेदासंख्येयिमों गुणो भवति ॥२५३॥ - . .
गोम्मटसारः। अर्थ-इस तरह स्थान २ प्रति ध्रुव अर्थात् एकसी वृद्धिकर वढ़ते हुए जघन्य योगस्थान दूने २ क्रमसे होते है, इसप्रकार दूने २ होते हुए अंतके संज्ञीपर्याप्तजीवके उत्कृष्ट परिणामयोगस्थानमें पल्यके अर्द्धच्छेदके असंख्यातवें भागप्रमाण गुणाकार होता है अर्थात् असंख्यातवें भाग गुणे है ॥ २५३ ॥ अब उनके भेदोंको गिनाते हैं। आदी अंते सुद्धे वहिहिदे रूवसंजुदे ठाणा। सेढिअसंखेजदिमा जोगट्ठाणा णिरंतरगा ॥ २५४ ॥ आदौ अन्ते शुद्ध वृद्धिहिते रूपसंयुते स्थानानि । श्रेण्यसंख्येयिमानि योगस्थानानि निरन्तरकानि ।। २५४ ॥ अर्थ-आदि जघन्यस्थानको और अन्त उत्कृष्ट स्थानको आपसमें घटानेपर जो प्रमाण हो उसको वृद्धिसे भाजितकर तथा एक स्थान मिलाके जो प्रमाण हो उतने सब अंतररहित योगस्थान जानने । सो ये स्थान जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें भाग प्रमाण है ॥ २५४ ॥ अंतरगा तदसंखेजदिमा सेढी असंखभागा हु। सांतरणिरंतराणिवि सव्वाणिवि जोगठाणाणि ॥ २५५ ॥ अन्तरगाणि तदसंख्येयिमानि श्रेण्यसंख्येयभागानि हि । सान्तरनिरन्तराण्यपि सर्वाण्यपि योगस्थानानि ।। २५५ अर्थ-अन्तरवाले योगस्थान उन निरंतरयोगस्थानोंके असंख्यातवें भाग प्रमाण होते हैं। ये भी जगच्छ्रेणीके छोटे असंख्यातवें भाग प्रमाण है । और सांतर तथा निरंतर मिश्ररूप योगस्थान अंतरगतयोगस्थानके असंख्यातवें भाग प्रमाण है तौभी वे जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें भाग प्रमाण ही है । इस तरह सभी योगस्थान यथायोग्य असंख्यातवें भाग प्रमाण कहे है ॥ २५५ ॥ अब इन योगस्थानोंमें आदि-अंतस्थान कहते है- सुहुमणिगोदअपजत्तयस्स पढमे जहण्णओ जोगो॥ पजत्तसण्णिपंचिंदियस्स उक्कस्सओ होदि ॥ २५६ ॥ सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तकस्य प्रथमे जघन्यको योगः। पर्याप्तसज्ञिपञ्चेन्द्रियस्योत्कृष्टको भवति ॥ २५६ ।। अर्थ-इन सब योगस्थानोंमें सूक्ष्मनिगोदियालब्ध्यपर्याप्तके अनके छोटे भवके पहले- समयमें जघन्य उपपादयोगस्थान, होता है वह आदि जानना । और सैनी पंचेंद्री पर्याप्त- जीवके उत्कृष्ट परिणामयोगस्थान है वह अंतस्थान होता है ऐसा जानना ॥ २५६ ॥ 1 -- . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आगे कहहुए चार प्रकारके बंधोंके कारण दिखाते हैं। जोगा पयडिपदेसा ठिदिअणुभागा कसायदो होति । अपरिणदुच्छिण्णेसु य बंधट्टिदिकारणं णस्थि ॥ २५७ ॥ योगात्प्रकृतिप्रदेशौ स्थित्यनुभागी कपायतो भवतः । अपरिणतोच्छिन्नेपु च बन्धः स्थितिकारणं नास्ति ।। २५७ ॥ अर्थ-प्रकृति और प्रदेशबंध ये दोनोंही, योगोंके निमित्तसे होते है । स्थिति और अनुभागबंध कषायके निमित्तसे होते है । जिसके जघन्य एक समय तथा उत्कृष्ट अंतर्मु- हूर्तकालप्रमाण कषायस्थान अपरिणत अर्थात् उदयरूप नहीं ऐसे उपशांतकपाय तथा कषायस्थान जिसके क्षीण होगये हैं ऐसे क्षीणकषाय और सयोगकेवलीके तत्काल (एक समयका ) बंध स्थितिबंधका कारण नही है च" से अयोगकेवलीके चारोंबंधके कारण योग और कषाय ये दोनोंही नही है ॥ २५७ ॥ आगे योगस्थान, प्रकृतिसंग्रह, स्थितिभेद और स्थितिबंधाध्यवसायस्थान, अनुभाग- बन्धाध्यवसायस्थान और कर्मोंके प्रदेशोंका अल्पबहुतपना तीनगाथाओंसे दिखाते है:- सेढिअसंखेजदिमा जोगट्टाणाणि होति सव्वाणि । तेहिं असंखेजगुणो पयडीणं संगहो सवो ॥ २५८ ।। श्रेण्यसंख्येयिमानि योगस्थानानि भवन्ति सर्वाणि । तैरसंख्येयगुणः प्रकृतीनां संग्रहः सर्वः ॥ २५८ ॥ अर्थ-सब निरंतर वा सांतर वा दोंनोंही योगस्थान जगच्छ्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण हैं। और उनसे असंख्यातलोकगुणा सब मतिज्ञानावरणादि प्रकृतियोंका समुदाय है ॥ २५८ ॥ तेहिं असंखेजगुणा ठिदिअवसेसा हवंति पयडीणं । ठिदिबंधज्झवसाणट्ठाणा तत्तो असंखगुणा ॥ २५९ ॥ तैरसंख्येयगुणा स्थित्यवशेषा भवन्ति प्रकृतीनाम् । स्थितिबन्धाध्यवसायस्थानानि तत असंख्यगुणानि ॥ २५९ ।। अर्थ-उन प्रकृतिसंग्रहोंसे प्रकृतियोंकी स्थितिके भेद असंख्यातगुणे है । उन स्थितिके भेदोंसे असंख्यातगुणे स्थितिबंधाध्यवसायस्थान जानना । जिन परिणामोंसे स्थितिबंध हो उन परिणामोंको स्थितिबंधाध्यवसाय कहते है ॥ २५९ ॥ अणुभागाणं बंधज्झवसाणमसंखलोगगुणिदमदो। एत्तों अणंतगुणिदा कम्मपदेसा मुणेयव्वा ॥२६॥ अनुभागानां बन्धाध्यवसायमसंख्यलोकगुणितमतः । एतस्मादनन्तगुणिताः कर्मप्रदेशा मन्तव्याः ॥२६० ।। - - - - गोम्मटसारः। अर्थ-इन स्थितिबंधाध्यवसायस्थानोंसे असंख्यातलोकगुणे अनुभागबंधाध्यवसाय ( परिणाम ) स्थान है । इनसे अनन्तगुणे कर्मोंके परमाणु जानने ॥ इसका विस्तार बड़ी टीकासे समझलेना ॥ २६० ॥ ऐसे प्रदेशवन्धसमाप्त हुआ। इति बंधाधिकारः। आगे कर्मोंके उदयका कथन आरंभ करते है:- आहारं तु पमत्ते तित्थं केवलिणि मिस्सयं मिस्से । सम्मं वेदगसम्मे मिच्छदुगयदेव आणुदओ ॥ २६१ ॥ आहारं तु प्रमत्ते तीर्थ केवलिनि मिश्रक मिश्रे । सम्यक् वेदकसम्ये मिथ्यद्विकायते एव आनूदयः ।। २६१ ॥ अर्थ-आहारक शरीर व उसके आगोपांग इन दोनों कर्मोंका उदय छठे प्रमत्त गुणस्थान में ही होता है । तीर्थकर प्रकृतिका उदय सयोगी तथा अयोगीकेवलीके है । मिश्रदर्शनमोहनीयका उदय तीसरे मिश्रगुणस्थानमें, सम्यक्त्वप्रकृतिका उदय क्षयोपशमस- म्यग्दृष्टिके चार गुणस्थानों में होता है। और आनुपूर्वीकर्मका उदय मिथ्यात्व, सासादन ये दो तथा चौथा असंयतगुणस्थान इन तीनोंमेंही होता है ॥ २६१ ॥ अव फिरभी आनुपूर्वीकर्मके उदयमें विशेषता दिखाते है,- णिरयं सासणसम्मो ण गच्छदित्ति य ण तस्स णिरयाणू । मिच्छादिसु सेसुदओ सगसगचरिमोत्ति णायन्वो ॥ २६२ ॥ निरयं सासादनसम्यो न गच्छतीति च न तस्य निरयानुः । मिथ्यादिपु शेषोदयः खकस्वकचरम इति ज्ञातव्यः ॥ २६२ ।। अर्थ-सासादनसम्यग्दृष्टि नामके दूसरे गुणस्थानवाला नरकगतिको नही जाता है, इसकारण उसके नरकगत्यानुपूर्वीकर्मका उदय नही है। और वाकीवची सब प्रकृतियोंका उदय मिथ्यात्वादि गुणस्थानोंमें अपने २ उदयस्थानके अंतसमयतक जानना ॥ २६२ ॥ आगे गुणस्थानोंमें उदयव्युच्छित्ति, यतिवृषभाचार्यके पक्षको लेकर क्रमसे कहते हैं;- दस चउरिगि सत्तरसं अट्ठ य तह पंच चेव चउरो य । छ छक्कएकदुगदुग चोइस उगुतीस तेरसुदयविधिः ॥ २६३ ॥ दश चतुरेकं सप्तदश अष्ट च तथा पञ्च चैव चतस्रश्च । षट् षट्दैकद्विकद्विकं चतुर्दशैकोनत्रिंशत् त्रयोदशोदयविधिः ।। २६३ ।। अर्थ-अभेदविवक्षासे मिथ्यादृष्टि आदि चौदह गुणस्थानोंमें प्रकृतियोंकी उदयविधि अर्थात् उदयव्युच्छित्ति ( कहे हुए गुणस्थानसे ऊपर उदय न होना) १०, ४, १, १७, ८, ५, ४, ६, ६, १, २, २ और १४, २९, १३ इसप्रकार क्रमसे जानना ॥ २६३ ॥ अब भूतबलिआचार्यके उपदेशकी परंपरासे दूसरी पक्ष लेकर व्युच्छित्ति कहते है- -- . - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । पण णवइगि सत्तरसं अड पंच च चउर छक्क छञ्चेव । इगिद्ग सोलस तीसं वारस उदये अजोगंता ॥ २६४ ॥ पञ्च नवैकं सप्तदशाष्ट पञ्च च चतस्रः पदं पट् चैव । एकद्विकं षोडश त्रिंशत् द्वादश उदये अयोगान्ताः ॥ २६४ ।। अर्थ-सब प्रकृतियोंके उदयकी व्युच्छित्ति गुणस्थानोंमें क्रमसे ५, ९, १, १७, ८, ५, ४, ६, ६,१, २, १६, ३०, और १२, अयोगकेवली तक जानना ॥ २६४ ॥ आगे इन्ही प्रकृतियोंको आठ गाथाओंसे दिखाते है:- मिच्छे मिच्छादावं सुहुमतियं सासणे अणेइंदी। थावरवियलं मिस्से मिस्सं च य उदयवोच्छिण्णा ॥ २६५॥ मिथ्ये मिथ्यातपं सूक्ष्मत्रयं सासादने अनैकेन्द्रियम् । स्थावरविकलं मिश्रे मिश्रं च च उदयव्युच्छिन्नाः ।। २६५ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें मिथ्यात्व, आतप, सूक्ष्मादि तीन, इन पांच प्रकृति- योंकी उदयव्युच्छित्ति होती है । दूसरे सासादनगुणस्थानमें अन अर्थात् अनन्तानुबंधीकी चार, एकेन्द्रिय, स्थावर, दोइन्द्रीआदि विकल तीन ये ९ प्रकृतियां उदयसे व्युच्छिन्न (विछुड़ती) है। तीसरे मिश्रगुणस्थानमें एक सम्यग्मिथ्यात्वकी ही उदयव्युच्छित्ति होती है, ऐसा जानना ।। २६५॥ अयदे विदियकसाया वेगुम्वियछक्क णिरयदेवाऊ । मणुयतिरियाणुपुच्ची दुब्भगणादेज अजसयं ॥ २६६ ॥ अयतें द्वितीयकषाया वैगूर्विकषटुं निरयदेवायुः । मनुजतिर्यगानुपूर्ये दुर्भगानादेयमयशस्कम् ।। २६६ ।। अर्थ-चौथे असंयतगुणस्थानमें दूसरी अप्रत्याख्यानावरणकषायकी चौकड़ी, चैक्रियि- कशरीरादि छह, नरकायु, देवआयु, मनुष्यगतिआनुपूर्वी, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, दुर्भग, अना- देय और अयशस्कीर्ति, इस प्रकार १७ प्रकृतियोंकी उदयव्युच्छित्ति होती है ।। २६६ ॥ देसे तदियकसाया तिरियाउज्जोवणीचतिरियगदी। छठे आहारदुर्ग थीणतियं उदयवोच्छिण्णा ॥ २६७ ॥ देशे तृतीयकषाया तिर्यगायुरुद्योतनीचतिर्यग्गतिः । षष्ठे आहारद्विकं स्यानत्रयमुदयव्युच्छिन्नाः ॥ २६७ ।। अर्थ-पांचवें देशसंयतगुणस्थानमें तीसरी प्रत्याख्यानावरणकषायके चार भेद, तिर्यच आयु, उद्योत, नीचगोत्र, तिर्यचगति इन आठ प्रकृतियोंकी उदयव्युच्छिति होती है। छठे गुणस्थानमें आहारशरीरादि दो, स्त्यानगृद्धिनिद्रादि तीन, ये पांच प्रकृतियां उदयसे व्युच्छिन्न होती है ॥ २६७ ॥ - म गोम्मटसारः। ९७ अपमत्ते सम्मत्तं अंतिमतियसंहदी यऽपुवम्हि । छच्चेव णोकसाया अणियट्टीभागभागेसु ॥ २६८ ॥ अप्रमत्ते सम्यक्त्वमन्तिमत्रयसंहतिश्चापूर्वे । पदैव नोकषाया अनिवृत्तिभागभागयोः ॥ २६८ ॥ अर्थ-सातवें अप्रमत्त गुणस्थानमें सम्यक्त्वप्रकृति, अंतके अर्धनाराचआदि तीन संहनन इसतरह चार प्रकृतियां उदयव्युच्छिन्न होती है । आठवें अपूर्वकरणगुणस्थानमें हास्य आदि ६ नोकषाय उदयव्युच्छिन्न होती है । नवमें अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें सवेद- भाग और वेद ( पुरुषादि तीन ) रहितभाग इन दोनोंमेंसे ॥ २६८ ॥ वेदतिय कोहमाणं मायासंजलणमेव सुहुमंते । सुहुमो लोहो संते वजंणारायणारायं ॥ २६९ ॥ वेदत्रयं क्रोधमानं मायासंज्वलनमेव सूक्ष्मान्ते । सूक्ष्मो लोभः शान्ते वज्रनाराचनाराचम् ।। २६९ ।। अर्थ-सवेदभागमें पुरुषवेदादि तीनवेद तथा अवेदभागमें संज्वलन क्रोध, मान और माया ये तीन, इसतरह दोनों भागोंकी मिलकर ६ प्रकृतियां उदयसे व्युच्छिन्न होती है। बावरलोभ भी वहींपर उदयन्युच्छिन्न जानना । और सूक्ष्मसांपरायनामके दशवें गुण- स्थानके अंतसमयमें सूक्ष्म संज्वलनलोभकी उदयव्युच्छित्ति होती है । ग्यारवें उपशान्तमो- हगुणस्थानमे वज्रनाराच और नाराचसंहनन इन दोनोंकी उदयव्युच्छित्ति होती है ॥२६९॥ खीणकसायदुचरिमे णिहा पयला य उदयवोच्छिण्णा । णाणंतरायदसयं दंसणचत्तारि चरिमम्हि ॥ २७० ॥ क्षीणकषायद्विचरमे निद्रा प्रचला च उदयव्युच्छिन्नाः । ज्ञानान्तरायदशकं दर्शनचत्वारि चरमे ॥ २७० ॥ अर्थ-बारवें क्षीणकषायके अन्तके पासके दूसरे समयमें निद्रा और प्रचला इन दो प्रकृतियोंकी तथा अन्तके समयमें ज्ञानावरण ५ और अंतराय ५ इस तरह १० तथा चक्षुर्दर्शनादि चार दर्शनकी, इसप्रकार १४ प्रकृतियोंकी-सब २+१४ मिलकर १६ प्रकृतियोंकी उदयसे व्युच्छित्ति होती है ।। २७० ॥ तदियेकवजणिमिणं थिरसुहसरगदिउरालतेजदुगं । संठाणं वण्णागुरुचउक्क पत्तेय जोगिम्हि ॥ २७१ ॥ वृतीयकवअनिर्माणं स्थिरशुभस्वरगतिऔरालतेजोद्विकम् । संस्थानं वर्णागुरुचतुष्कं प्रत्येकं योगिनि ॥ २७१ ॥ १३
।
९८
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अर्थ-तेरवें सयोगकेवली गुणस्थानमें तीसरे वेदनीयकर्मके साता असाता दो भेदोमसे
कोईएक, वज्रर्षभनाराचसंहनन, निर्माण, स्थिर-शुभ-स्वर-विहायोगति-औदारिक और तैजस इन ,
सबका जोड़ा (स्थिर अस्थिर इत्यादि), समचतुरस्रसंस्थान आदि ६ संस्थान, वर्णादि चार,
अगुरुलधुआदि चार और प्रत्येक शरीर-सब मिलकर ३० प्रकृतियोकी उदयव्युच्छिति
होती है ।। २७१ ॥
तदियेकं मणुवगदी पंचिंदियसुभगतसतिगादे ।
जसतित्थं मणुवाऊ उच्चं च अजोगिचरिमम्हि ॥ २७२ ॥
तृतीयैकं मानवगतिः पञ्चेन्द्रियसुभगत्रसत्रिकादेयम् ।
यशस्तीर्थ मानवायुरुचं चायोगिचरमे ।। २७२ ।।
अर्थ-चौदवें अयोगकेवली गुणस्थानके अंतसमयमें तीसरे वेदनीयकर्मकी कोई एक
प्रकृति, मनुष्यगति, पंचेंद्रियजाति, सुभग, त्रसादि तीन, आदेय, यास्कीर्ति, तीर्थकर
प्रकृति, मनुष्यायु, ऊंचगोत्र-इसप्रकार १२ प्रकृतियां उदयसे व्युच्छिन्न होती है ॥२७२॥
आगे "अन्यगुणस्थानों में जैसे साता तथा असाताके उदयसे इन्द्रियजन्य मुख तथा दुःख
है वैसे केवली भगवानके भी होना चाहिये ? इसका उत्तर" आचार्यमहाराज कहते है-
गट्ठा य रायदोसा इंदियणाणं च केवलिम्हि जदो।
तेण दु सादासादजसुहदुक्खं णत्थि इंदियजं ॥ २७३ ॥
नष्टौ च रागद्वेषौ इन्द्रियज्ञानं च केवलिनि यतः ।
तेन
तु सातासातजसुखदुःखं नास्ति इन्द्रियजम ॥ २७३ ॥
अर्थ-जिसकारण केवली भगवानके घातियाकर्मके नाश होनेसे मोहनीयके भेद जो
राग तथा द्वेष वे क्षय होगये, और ज्ञानावरणके क्षय होनेसे ज्ञानावरणके क्षयोपशमसे जन्य
इंद्रियज्ञानभी क्षय होगया, इसकारण साता तथा असाताजन्य इन्द्रियविषयक सुख-दुःख
लेशमात्रभी नही है । क्योंकि सातादि वेदनीयकर्म मोहनीयकर्मकी सहायतासे सुख दुःख
देता हुआ जीवके गुणको घातता था 'ये बात पहलेभी कहआये हैं। फिर उस सहायकके
अभाव होनेसे जली जेवड़ीवत् कुछ अपना कार्य नही करसकता ॥ २७३ ॥
अब वेदनीयकर्म केवलीके इंद्रियजन्य सुखदुःखका कारण नहीं है, इसी बातको सिद्ध कर-
नेफेलिये युक्ति कहते है-
समयडिदिगो बंधो सादस्सुदयप्पिगो जदो तस्स ।
तेण असादस्सुदओ सादसरूवेण परिणमदि ॥ २७४ ॥
समयस्थितिको बन्धः सातस्योदयात्मको यतः तस्य ।
तेनासातस्योदयः सातस्वरूपेण परिणमति ॥ २७४ ॥
गोम्मटसारः।
९९
the
अर्थ-जिसकारण केवली भगवानके एक सातावेदनीयका बंध एकसमयकी स्थिति-
वाला होता है इसकारण उदयखरूप ही है, तिसकारण असाताका उदयभी साताखरूपसे
ही परिणमता है । क्योंकि असातावेदनीय सहायरहित होनेसे तथा बहुत हीन होनेसे
मिष्ट जलमें खारेजलकी एक बूंदकी तरह अपना कुछ कार्य नही करसक्ता ॥ २७४ ॥
एदेण कारणेण टु सादस्सेव दुणिरंतरो उदओ।
तेणासादणिमित्ता परीसहा जिणवरे णत्थि ॥ २७५ ॥
एतेन कारणेन तु सातस्यैव तु निरन्तर उदयः ।
तेनासातनिमित्ताः परीषहा जिनवरे नास्ति ।। २७५ ॥
अर्थ-इस पूर्वगाथाकथित कारणसेही हमेशा सातावेदनीयका उदय रहता
इसीकारण असाताके निमित्तसे क्षुधा आदिक ११ परीषह है वे, जिनवरदेवके कार्यरूप नहीं
हैं ॥ २७५ ॥
अब गुणस्थानों में क्रमसे उदयरूप हुई प्रकृतियोंकी संख्या दिखाते है,
सत्तरसेकारखचदुसहियसयं सगिगिसीदि छदुसदरी।
छावट्टि सहि णवसगवण्णास दुदालवारुदया ॥ २७६ ॥
सप्तदशैकादशशून्यचतुःसहितशतं सप्तकाशीतिः षद्विसप्ततिः ।
षट्पष्टिः षष्टिः नवसप्तपञ्चाशत् द्विचत्वारिंशद्वादशोदयाः ॥ २७६ ॥
अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि चौदह गुणस्थानों में क्रमसे ११७,१११,१००,१०१, ८७,
८१, ७६, ७२, ६६, ६०, ५९, ५७, ४२, १२ प्रकृतियां उदय होती है ॥२७६ ॥
अब अनुदयरूप प्रकृतियोंको कहते है-
पंचेक्कारसवावीसहारसपंचतीस इगिछादालं ।
पण्णं छप्पण्णं वितिपणसहि असीदि दुगुणपणवण्णं ॥२७७॥
पञ्चैकादशद्वाविंशत्यष्टादशपञ्चत्रिंशदेकषटुत्वारिंशत् ।
पञ्चाशत् षट्पञ्चाशत् द्वित्रिपञ्चषष्टिरशीतिः द्विगुणपञ्चपञ्चाशत् ॥२७७॥
अर्थ -उन मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानोंमें क्रमसे ५, ११, २२, १८, ३५, ४१,
४६, ५०, ५६, ६२, ६३, ६५,८०,११० प्रकृतियां अनुदयरूप हैं अर्थात् इनका उदय
नहीं होता ॥ २७७॥
आगे उदय प्रकृतियोंकी उदीरणामें कुछ विशेषता कहते हैं-
उदयस्सुदीरणस्स य सामित्तादो ण विजदि विसेसो।
मोत्तूण तिण्णिठाणं पमत्त जोगी अजोगी य ॥ २७८ ॥
- - - १०० रायचन्द्रजैनगास्त्रमालायाम् । उदयस्योदीरणायाश्च स्वामित्वात् न विद्यते विशेपः । मुक्त्वा त्रयस्थानं प्रमत्तं योग्ययोगि च ॥ २७८ ॥ अर्थ-उदय और उदीरणाके खामीपनेसे कुछ विशेषता नहीं है। परंतु प्रमत्तनामा छठा गुणस्थान, तेरवां योगी, चौदवा अयोगी इन तीनों गुणस्थानों को छोड़देना, अर्थात् इन तीन गुणस्थानों में ही विशेषता है और सब जगह समानपना है ।। २७८ ॥ अब उसी विशेषताको दो गाथाओंसे दिखाते हैं; तीसं वारस उदयुच्छेदं केवलिणमेकदं किच्चा। सादमसादं च तहिं मणुवाउगमवणिदं किच्चा ॥ २७९ ॥ त्रिंशत् द्वादश उदयोच्छेदं केवलिनोरेकत्र कृत्वा । सातमसादं च तत्र मानवायुप्कमपनीतं कृत्वा ।। २७९ ॥ अर्थ-सयोगी और अयोगी केवलीकी ३० और १२ उदयव्युच्छित्ति प्रकृतियोंको मिलाके उन ४२ में साता १ असाता २ और मनुप्यायु ३ इन तीन प्रकृतियोंको घटाना चाहिये ॥ २७९॥ अवणिदतिष्पयडीणं पमत्तविरदे उदीरणा होदि । णस्थित्ति अजोगिजिणे उदीरणा उदयपयडीणं ॥ २८० ॥ अपनीतत्रिप्रकृतीनां प्रमत्तविरते उदीरणा भवति । नास्तीति अयोगिजिने उदीरणा उदयप्रकृतीनाम् ॥ २८०॥ अर्थ-घटाई हुई साता आदि तीन प्रकृतियोंकी उदीरणा प्रमत्तविरत नामा छठे गुण- स्थानमें ही होती है। वाकी ३९ प्रकृतियोंकी उदीरणा सयोगकेवलीके होती है। वहां ही व्युच्छित्ति होती है। और अयोगकेवलीके तो उदीरणा होती ही नहीं है, यही विशेषता है ॥२८॥ अब उदीरणाकी व्युच्छित्ति गुणस्थानों में क्रमसे कहते हैं- पण णय इगि सत्तरसं अट्ट य चदुर छक्क छच्चेव । इगि दुग सोलुगदालं उदीरणा होति जोगंता ॥२८१॥ पञ्च नवैकं सप्तदश अष्टाष्ट च चत्वारि षटुं षद् चैव । एक द्विकं षोडशैकोनचत्वारिंशत् उदीरणा भवन्ति योग्यन्ताः ।। २८१ ॥ अर्थ-मिथ्या दृष्टिसे लेकर सयोगकेवलीपर्यंत क्रमसे ५, ९, १, १७, ८,८,४, ६, ६, १,२,१६, ३९, प्रकृतियोंकी उदीरणाव्युच्छित्ति होती है ।। २८१ ॥ J १. संक्लेशपरिणामोंसे ही इन तीनोंकी उदीरणा होती है इसकारण अप्रमत्तादिके इन तीनोंकी उदीरणा का होना असभव है। .
गोम्मटसार। अब पहले कही हुई उदीरणा और अनुदीरणारूप प्रकृतियोंकी संख्या दो गाथाओंसे कहते हैं- सत्तरसेक्कारखचदुसहियसयं सगिगिसीदि तियसदरी। णवतिण्णिसहि सगछक्कवण्ण चउवण्णमुगुदालं ॥ २८२ ॥ पंचेकारसवावीसहारस पंचतीस इगिणवदालं । तेवण्णेकुणसट्टी पणछक्कडसष्टि तेसीदी ॥ २८३ । जुम्मं । सप्तदशैकादशखचतुःसहितशतं सप्तकाशीतिः त्रिसप्ततिः । नवत्रिषष्टिः सप्तपकपञ्चाशत् चतुःपञ्चाशत् एकोनचत्वारिंशत् ॥ २८२ ।। पञ्चैकादशद्वाविंशत्यष्टादश पञ्चत्रिंशत् एकनवचत्वारिंशत् । त्रिपञ्चाशदेकोनषष्टिः पञ्चषकाष्टषष्टिः न्यशीतिः ।। २८३ ॥ युग्मम् । अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि तेरह गुणस्थानोंमें क्रमसे ११७, १११, १००, १०४, ८७, ८१, ७३, ६९, ६३, ५७, ५६, ५४, ३९, प्रकृतियां उदीरणारूप है । और ५, ११, २२, १८, ३५, ४१, ४९, ५३, ५९, ६५, ६६, ६८, ८३, अनुदीरणा रूप प्रकृतियां जानना, अर्थात् इनकी उदीरणा नही होती । २८२।२८३॥ इस प्रकार गुणस्थानोंमे उदय-उदीरणाकी त्रिभंगी (तीन भेद ) कही। अब गत्यादिक १४ मार्गणाओंमें उदयत्रिभंगी कहते हुए उदयका क्रम दिखाते हैं; गदियादिसु जोग्गाणं पयडिप्पहुदीणमोघसिद्धाणं। सामित्तं णेदवं कमसो उदयं समासेज ॥ २८४ ॥ गत्यादिपु योग्यानां प्रकृतिप्रभृतीनामोघसिद्धानाम् । स्वामित्वं नेतव्यं क्रमश उदयं समासाद्य ॥ २८४ ॥ अर्थ-गुणस्थानों में सिद्ध किये और योग्य ऐसे प्रकृतिबंधादि चार बंध हैं उनका खामीपना क्रमसे उदयकी अपेक्षाकर प्राप्त करना ॥ २८४ ॥ आगे सबसे पहले परिभाषा (नियम) को पांच गाथाओंसे कहते है- गदिआणुआउउदओ सपदे भूपुण्णवादरे ताओ। उच्चुदओ णरदेवे थीणतिगुदओ णरे तिरिये ॥ २८५ ॥ गत्यान्वायुरुदयः सपदे भूपूर्णबादरे आतपः । उच्चोदयो नरदेवे स्त्यानत्रिकोदयो नरे तिरश्चि ॥ २८५ ॥ अर्थ-विवक्षितपर्यायके पहले समयमें ही विवक्षित (जिसको कहना है ) पर्यायकी गति, उसकी आनुपूर्वी और उसकी आयुका उदय होता है वह समानस्थानमें एक कालमें ही एक जीवके उदय होता है । आतपनाम कर्मका उदय बादर पर्याप्त पृथिवीकायिक
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
जीवके ही होता है । उच्चगोत्रका उदय किसी मनुष्य और देवोंके होता है, और स्त्यान-
गृद्धिआदि तीननिद्रा प्रकृतियोंका उदय मनुष्य और तिर्यचके ही है ।। २८५ ॥
संखाउगणरतिरिए इंदियपजत्तगादु थीणतियं ।
जोग्गमुदेदु वजिय आहारविगुवणुवट्ठगे ॥ २८६ ॥
संख्यायुष्कनरतिरश्चि इन्द्रियपर्याप्तकात् स्त्यानत्रयम् ।
योग्यमुदतुं वर्जयित्वा आहारविगूर्वणोत्थापके ॥ २८६ ।।
अर्थ-संख्यात वर्षकी आयुवाले कर्मभूमिया मनुष्य और तिर्यचके इन्द्रिय पर्याप्तिके
पूर्ण होनेके वाद स्त्यानगृद्धि आदि तीननिद्रा उदय होने योग्य हैं। परंतु उसमें भी
आहारक ऋद्धि और वैक्रियिक ऋद्धिके धारक मनुष्य के इनका उदय नहीं होता इसका-
रण ऋद्धिवाले मनुष्यको छोड़कर सव कर्मभूमियां मनुष्योमें योग्यता समझना ॥ २८६ ॥
अयदापुण्णे ण हि थी संढोवि य घम्मणारयं मुच्चा।
थीसंढयदे कमसो णाणुचऊ चरिमतिण्णाणू ॥ २८७ ॥
अयतापूर्णे न हि स्त्री पण्डोपि च धर्मनारकं मुक्त्वा ।
स्त्रीषण्डायते क्रमशो नानुचत्वारि चरमत्रयानुः ।। २८७ ।।
अर्थ-निवृत्त्यपर्याप्तक असंयत गुणस्थानमें स्त्रीवेदका उदय नही है क्योंकि असंय-
तसम्यग्दृष्टि मरण करके स्त्री नहीं होता । पहले धर्मानामक नारकके सिवाय नपुंसक
वेदकामी उदय नही होता इसीकारणसे स्त्रीवेदवाले असंयतके तथा नपुंसकवेदवाले
असंयतके क्रमसे चारों आनुपूर्वी तथा नरकके बिना अंतकी तीन आनुपूर्वी प्रकृतियोंका
उदय नही होता ॥ २८७ ॥
इगिविगलथावरचऊ तिरिए अपुण्णो णरेवि संघडणं ।
ओरालदु णरतिरिए बेगुव्वदु देवणेरयिए ॥ २८८ ॥
एकविकलस्थावरचत्वारि तिरश्चि अपूर्णा नरेपि संहननम् ।
औरालद्वि नरतिरश्चि वैक्रियिकद्वि देवनैरयिके ।। २८८ ॥
अर्थ-एकेन्द्री, दोइन्द्री आदि विकलत्रय और स्थावर आदि चार प्रकृतियोंका उदय
तिर्यंचके होने योग्य है, अपर्याप्तप्रकृति मनुष्यके भी उदय होने योग्य कही है। वर्ष-
भनाराचादि छह संहनन, औदारिक शरीरनामकर्मका जोड़ा मनुष्य और तिर्यचके उदय
होने योग्य है । तथा वैक्रियिक शरीर व उसके आंगोपांग ये दो प्रकृतियां देव और
नारकियोंके ही उदय होने योग्य कही है ॥ २८८ ।।
तेउतिगूणतिरिक्खेसुजोवो बादरेसु पुण्णेसु ।
सेसाणं पयडीणं ओघ वा होदि उदओ दु ॥ २८९ ॥
गोम्मटसारः। १०३ नजत्रिकोनतिर्यक्षु उद्योनो वादरपु पूर्ण। शपाणां प्रकृतीनामोघवन भवति उदयस्तु ॥ २८९ ।। अर्थ-तेजः कायिक, वायुकायिक और साधारणवनस्पतिकायिक इन तीनोको छोड़कर अन्य चादर पर्याप्तफ तिर्थचोंक उद्योतप्रकृति उदय होती है । और शेष बची प्रकृतियोंका उदय गुणसानक कमसे जानना ।। २८९ ।। इस प्रकार पांच परिभाषासूत्रों से उदयका नियम कहकर चारगतियोमें उदयप्रकृतियोको कहते हुए पहले नरकगतिमें कहते है:- थीणतिथीपुरिसूणा घादी णिरयाउणीचवेयणियं । णामे सगवचिठाणं णिरयाणू णारयेसुदया ॥ २९० ॥ म्त्यानवित्रीपुरुपोना घातिनी निरयायुर्नीचवेदनीयम । नानि खकवचःस्थान निरयानुः नारकेपृदयाः ।। २९० ।। अर्थ-स्त्यानगृद्धि आदिक तीन, स्वीवेद और पुरुपवेद इन पांचके सिवाय धाती- काँकी ४२ प्रकृतियां, नरकायु, नीचगोत्र और साता-असातावेदनी तथा नामकर्ममेंसे नारकियों के अपने भाषापर्याप्तिस्थानमें होनेवाली २९ प्रकृतियां और नरकगत्यानुपूर्वी- ये सब ७६ प्रकृतियां नरकगतिमें उदय होने योग्य है ॥ २९० ।। अब उन्हीं २०. प्रकृतियोंको दिखाते है,- वेगुब्बतेजथिरसुहद्ग दुग्गदिहुंडणिमिणपंचिंदी। णिरयगदि दुभगागुरुतसवण्णचऊ य वचिठाणं ॥ २९१ ॥ बैगूर्वजःस्थिरशुभद्विकं दुर्गतिहुण्डनिर्माणपञ्चेन्द्रियम् । निरयगतिर्दुभंगागुम्बसवर्णचत्वारि च वच स्थानम् ॥ २९१ ।। अर्थ-वैमियिक, तेजस, स्थिर, शुभ इनका जोड़ा, अप्रशस्तविहायोगति, हुंडसस्थान, निर्माण, पंचेंद्री, नरकगति; दुर्भग-अगुरुलघु-त्रस-वर्ण इनकी चौकडी इसप्रकार ये सव उनतीस प्रकृतियां नारकी जीवोंके वचनपर्याप्तिके ठिकाने उदयरूप होती है ।। २९१ ।। आगे धर्मा नामके पहले नरकम उदयव्युच्छित्तिप्रकृतियोको कहते है,- मिच्छमणतं मिस्सं मिच्छादितिए कमा छिदी अयदे । विदियकसाया दुम्भगणादेजदुगाउणिरयचऊ ॥ २९२ ॥ मिथ्यमनन्तं मित्रं मिथ्यात्वादिनये क्रमात् छित्तिरयते । द्वितीयकपाया दुर्भगानादेयद्विकायुनिरयचत्वारि ।। २९२ ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि तीन गुणस्थानों में मिथ्यात्य, अनंतानुबंधी चार, सम्यग्मि- स्यात्व ये क्रमसे उदयसे व्युच्छिन्न है । उसी घर्मा नरकके असयत नामके चौथे गुणस्था- । । । - १०४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । नमें दूसरी अप्रत्याख्यान कषायकी चौकड़ी, दुर्भग-दुःखर ये दो तथा अनादेय-अयम- स्कीर्ति ये दो, नरकायु और नरकगति आदि चार अर्थात् नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिक शरीर तथा वैक्रियिक आंगोपांग ये चार-सब मिलकर १२ प्रकृतियोंकी उदयसे व्युच्छित्ति होती है ।। २९२ ॥ आगे दूसरे आदि नरकोंमें व्युच्छित्ति कहते हैं;- विदियादिसु छसु पुढविसु एवं णवरि य असंजदहाणे । पत्थि णिरयाणुपुव्वी तिस्से मिच्छेव वोछेदो ॥ २९३ ॥ द्वितीयादिपु षट् पृथिवीपु एवं नवरि च असंयतस्थाने । नास्ति निरयानुपूर्वी तस्मान् मिध्ये एव व्युच्छेदः ॥ २९३ ।। अर्थ-दूसरी वंशा आदि छह नरककी पृथिवियोंमें घर्मा नरककी तरह उदयादि समझना । किंतु विशेषता इतनी है कि असंयत गुणस्थानमें नरकगत्यानुपूर्वीका उदय नहीं है। इसकारण मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही मिथ्यात्व प्रकृतिके साथ नरकगत्यानुपूर्वीकी भी उदयव्युच्छित्ति जानना ॥ २९३ ॥ अब तिर्यंचगतिमें कहते है;- तिरिये ओघो सुरणरणिरयाऊउच्च मणुदुहारटुगं । वेगुब्बछक्कतित्थं णत्थि हु एमेव सामण्णे ॥ २९४ ॥ तिरश्चि ओघः सुरनरनिरयायुरुचं मनुद्विआहारद्विकम् । वैगूर्वषट्कतीर्थ नास्ति हि एवमेव सामान्ये ।। २९४ ॥ अर्थ-तिर्यंचगतिमें गुणस्थानकी तरह उदयादि जानना । परंतु उनमें भी देवआयु, मनुष्यायु, नरकायु, उच्चगोत्र, मनुष्यगति आदि २, आहारादि २ और वैक्रियिक शरीर आदि ६ तथा तीर्थकर प्रकृति-ये सब १५ उदय होनेके योग्य नहीं हैं, इसकारण १०७ प्रकृतियां उदय होने योग्य हुई । इसीप्रकार तिर्यचके पांच भेदोंमेंसे सामान्यतिर्यंचोंमें भी जानना ॥ २९४ ॥ आगे पंचेन्द्रीतिर्यच और पर्याप्तकतिर्यंचोंमें उदयादि कहते है- थावरदुगसाहारणताविगिविगलूण ताणि पंचक्खे। इत्थिअपज्जत्तूणा ते पुण्णे उदयपयडीओ ॥ २९५ ॥ स्थावरद्विकसाधारणातपैकविकलोनाः ताः पञ्चाक्षे । ख्यपर्याप्तोनास्ताः पूर्णे उदयप्रकृतयः ॥ २९५॥ अर्थ-उन सामान्यतिर्यचकी प्रकृतियों में स्थावर आदि२, साधारण, आतप, एकेन्द्री, विकलत्रय, इन आठ प्रकृतियोंको घटादेनेसे बाकीवची ९९ प्रकृतियां पंचेन्द्रियति- -- m गोम्मटसारः। १०५ यंचके उदय योग्य है । और इन ९९ प्रकृतियोंमें भी स्त्रीवेद तथा अपर्याप्त ये दो कम करनेसे बची हुई ९७ प्रकृतियां पर्याप्ततिर्यचके उदय योग्य कहीगई है ॥ २९५ ॥ आगे स्त्रीतिर्यच और लब्ध्यपर्याप्ततिर्यचोमें उदयादि कहते है, पुंसंदणित्थिजुदा जोणिणिये अविरदे ण तिरियाणू । पुण्णिदरे थी थीणति परघाददु पुण्णउज्जोवं ॥ २९६ ॥ सरगदिदु जसादे आदीसंठाणसंहदीपणगं । सुभगं सम्मं मिस्सं हीणा तेऽपुण्णसंढजुदा ॥२९७॥ जुम्म । पुंपण्ढोनलीयुता योनिमति अविरते न तिर्यगानुः । पूर्णेतरे स्त्री स्त्यानत्रि परघातद्वि पूर्णोद्योतम् ॥ २९६ ॥ खरगतिद्वि यशआदेयमादिसंस्थानसंहतिपञ्चकम् । सुभगं सम्यक्त्वं मिश्रं हीनाः ता अपूर्णपण्ढयुताः ।। २९७ ।। युग्मम् । अर्थ-योनिमत् अर्थात् तिर्यचिनीके पहली ९७ प्रकृतियोमें पुरुषवेद और नपुंसक- वेदको घटाकर तथा सीवेद मिलानेसे ९६ प्रकृतिया उदययोग्य है, उसमें भी अविरतसम्य- ग्दृष्टी गुणस्थानमें तिर्यचगत्यानुपूर्वाका उदय नही है । और लब्ध्यपर्याप्तक पंचेद्रीतिर्यचके उन ९६ प्रकृतियों में स्त्रीवेद, स्त्यानगृद्धि आदि ३, परघातादि दो, पर्याप्त, उद्योत, खरका जोड़ा, विहायोगतिका युगल, यशस्कीर्ति, आदेय, आदिके समचतुरस्रआदि पांच संस्थान, वज्रर्षभनाराच आदि पाच संहनन, सुभग, सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्व ये २७ कम करके तथा अपर्याप्त और नपुंसक वेद ये दो प्रकृतियां मिलानेसे वची हुई ७१ प्रक- तियां उदय योग्य है ॥ २९६ ॥ २९७ ॥ आगे मनुष्यगतिमें उदयादिको कहते है:- मणुचे ओघो थावरतिरियादावदुगएयवियलिंदी। साहरणिदराउतियं वेगुधियछक्क परिहीणो ॥ २९८ ॥ मानवे ओघः स्थावरतिर्यगातपद्विकैकविकलेन्द्रियम् । साधारणेतरायुखयं वैगूर्विकपदं परिहीनः ॥ २९८ ॥ अर्थ-चार प्रकार मनुष्योंमेंसे सामान्य मनुष्यके, गुणस्थानोंमें कही हुई १२२ प्रकृतियोंमें स्थावर-तिर्यचगति-आतप इन तीनोंका युगल ( जोड़ा), एकेन्द्री, विकलेन्द्री ३, साधारण, मनुष्यायुसे अन्य तीन आयु और वैक्रियिक शरीरादि ६ कम करनेसे उदय योग्य १०२ प्रकृतियां हैं ॥ २९८॥ उनमें गुणस्थानकी अपेक्षासे उदयव्युच्छित्ति दिखाते है,- मिच्छमपुण्णं छेदो अणमिस्सं मिच्छगादितिसु अयदे। विदियकसायणराणू दुब्भगऽणादेजअजसयं ॥ २९९ ॥ - १४ - १०६ रायचन्द्रजैनशासमालायाम् । मिथ्यात्वमपूर्ण छेद अनमिनं मिथ्यकादिनिपु अयते । द्वितीयकपायनरानुः दुर्भगानादेयायशस्कम् ।। २९९ ॥ अर्थ-मिथ्यात्वआदि तीन गुणस्थानों में क्रमसे मिथ्यात्व १ अपर्याप्त २, अनंतानु- बंधी चार, मिश्र दर्शनमोहनीय इनकी तथा असंयत गुणस्थानमें दूसरी अप्रत्याख्यानकी चौकड़ी, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति इन प्रकृतियोंकी उदयसे व्युच्छित्ति होती है ॥ २९९ ॥ देसे तदियकसाया णीचं एमेव मणुससामण्णे । पजत्तेचि य इत्थीवेदाऽपजत्तिपरिहीणो॥ ३०० ॥ देशे तृतीयकषाया नीचमेवमेव मनुष्यसामान्ये । पर्याप्तेपि च स्त्रीवेदापर्याप्तिपरिहीना ॥ ३०॥ अर्थ-पांचवे देशसंयतगुणस्थानमें तीसरी प्रत्याख्यानकषाय चार और नीचगोत्रकी उदयव्युच्छित्ति होती है । इसके ऊपर छठे आदिगुणस्थानोंमें गुणस्थानके क्रमसे उदयव्यु- च्छित्ति जानना ।। इसीप्रकार पर्याप्तमनुज्यमेंभी पहली १०२ मेंसे स्त्रीवेद और अपर्याप्ति ये दोकम करनेसे १०० प्रकृतियां उदय योग्य है ॥ ३००॥ मणुसिणिएत्थीसहिदा तित्थयराहारपुरिससंदूणा। पुण्णिदरेव अपुण्णे सगाणुगदिआउगं णेयं ॥ ३०१॥ मनुष्यिण्यां स्त्रीसहिताः तीर्थकराहारपुरुषपण्ढोनाः । पूर्णेतर इवापूर्ण स्वकानुगत्यायुष्कं ज्ञेयम् ।। ३०१ ।। अर्थ-उन १०० प्रकृतियों में स्त्रीवेद प्रकृति मिलाके और तीर्थकर, आहारकयुगल, पुरुषवेद और नपुंसकवेद ये ५ प्रकृतियां कमकरनेसे ९६ प्रकृतियां मनुष्यिणीके उदय योग्य है । और लब्धिअपर्याप्तक मनुष्यके तिर्यंचलब्ध्यपर्याप्तककी तरह ७१ उदय योग्य समझना। परंतु आनुपूर्वी, गति और आयु-ये तीन प्रकृतियां तिर्यचकी छोड़कर अपनी (मनुष्य संबंधी ) ही जानना-॥ ३०१॥ अब भोगभूमिया मनुष्य और तिर्यंचमें उदयादिको दो गाथाओंसे कहते है- मणुसोपं वा भोगे दुब्भगचउणीचसंढथीणतियं । दुग्गदितित्थमपुण्णं संहदिसंठाणचरिमपणं ॥३०२ ॥ हारदुहीणा एवं तिरिये मणुदुच्चगोदमणुवाउं । अवणिय पक्खिव णीचं तिरियतिरियाउउज्जो ॥३०॥जुम्मं । मनुष्योघ इव भोगे दुर्भगचतुर्नीचषण्डस्त्यानत्रयम् । दुर्गतितीर्थमपूर्ण संहतिसंस्थानचरमपश्च ।। ३०२ ॥ - - ५ गोम्मटसारः। १०७ आहारविहीना एवं तिरश्चि मनुद्विउच्चगोत्रमानवायुः । अपनीय प्रक्षिप्य नीचं तिर्यग्वितिर्यगायुरुद्योतम् ॥ ३०३ ॥ युग्मम् । अर्थ-भोगभूमियां मनुष्योंमें सामान्यमनुष्यकी तरह १०२ प्रकृतियोंमें दुर्भग आदि ४, नीचगोत्र, नपुंसकवेद, स्त्यानगृद्धि आदि तीन, अप्रशस्तविहायोगति, तीर्थकर प्रकृति, अपर्याप्ति; अंतके वज्रनाराच आदि पांच संहनन तथा न्यग्रोधपरिमंडल आदि पांच संस्थान और आहारक शरीर युगल-इन २४ प्रकृतियोंको घटादेनेसे वची हुई ७८ प्रकृतियां उदय योग्य है। और इसीतरह भोगभूमिया तिथेचमें भोगभूमिया मनुष्योंकी तरह ७८ प्रकृतियोंमें मनुष्यगति आदि दो, उच्चगोत्र और मनुष्यायु, इन चार प्रकृतियोंको घटाकर तथा नीच गोत्र, तिर्यग्गति आदि दो, तिर्यंचायु और उद्योत, इन पांचको मिलानेसे ७९ प्रकृतियां उदय योग्य है ॥ ३०२ ॥ ३०३ ॥ अब देवगतिमें उदयादिको दिखाते हैं;- भोगं व सुरे णरचउणराउवजूण सुरचउसुराउं । खिव देवे वित्थी इथिम्मि ण पुरिसवेदो य ॥ ३०४ ॥ भोग इव सुरे नरचतुर्नरायुर्वघोनित्वा सुरचतुःसुरायुः । क्षित्वा देवे नैव स्त्री स्त्रियां न पुरुषवेदश्च ॥ ३०४ ॥ अर्थ-सामान्यपनेसे देवोंमें भोगभूमियामनुप्योंकी तरह ७८ प्रकृतियोंमें मनुष्यंगति- आदि चार, मनुष्यायु, वज्रर्षभनाराच संहनन, इन ६ प्रकृतियोंको घटाकर और देवगति- आदि चार, देवायु, इन पांचको मिलाके शेष रहीं ७७ प्रकृतियां उदय योग्य है। परंतु देवोंमें स्त्रीवेदका उदय और देवांगनाओंमें पुरुषवेदका उदय नहीं है इसकारण केवलदेव तथा देवांगनाओंमें ७६ ही उदय योग्यहैं ॥ ३०४ ॥ अब नव अनुदिशादिमें कुछ विशेषता बतलाते हैं। अविरदठाणं एक अणुदिसादिसु सुरोधमेव हवे । भवणतिकप्पित्थीणं असंजदे णस्थि देवाणू ॥ ३०५ ॥ अविरतस्थानमेकमनुदिशादिपु सुरौघमेव भवेत् । भवनत्रिकल्पस्त्रीणामसंयते नास्ति देवानुः ।। ३०५ ।। अर्थ-नव अनुदिशादि १४ विमानोंमें एक असंयत गुणस्थान ही है । इसकारण देवोंके अविरत गुणस्थानकी तरह उदययोग्य ७० प्रकृतियां जानना । और भवनत्रिक (भवनवासी १ व्यंतर २ ज्योतिषी ३) देव और देवी तथा कल्पवासिनी स्त्रियों के सामान्य देवोंकी तरह ७७ प्रकृतियोंमें स्त्रीवेद अथवा पुरुषवेद विना ७६ ही प्रकृतियां उदय योग्य है। परंतु असंयतगुणस्थानमें देवगत्यानुपूर्वीका उदय नहीं है, क्योंकि सम्यग्दृष्टि मरण कर भवनत्रयादिमें उत्पन्न नहीं होता ।। ३०५ ॥ , - - - - १०८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आगे इंद्रियमार्गणा उदयादिको तीन गाथाओंसे दिखाते हैं:- तिरियअपुण्णं वेगे परघादचउक्कपुण्णसाहरणं । एइंदियजसथीणतिथावरजुगलं च मिलिदव्वं ॥ ३०६ ॥ रिणमंगोवंगतसं संहदिपंचक्खमेवमिह वियले । अवणिय थावरजुगलं साहरणेयक्खमादावं ॥ ३०७ ॥ खिव तसदुग्गदिदुस्सरमंगोवंग सजादिसेवढें। ओघ सयले साहरणिगिविगलादावथावरदुगूणं ॥३०८॥विसेसयं । तिर्यगापूर्णमिवैके परघातचतुष्कपूर्णसाधारणम् । एकेन्द्रिययशःस्त्यानत्रिस्थावरयुगलं मेलितन्यम् ॥ ३०६ ॥ ऋणमङ्गोपाङ्गत्रसं संहतिपञ्चाक्षमेवमिह विकले । अपनीय स्थावरयुगलं साधारणकाक्षमातापम् ॥ ३०७ ॥ क्षिप्त्वा त्रसदुर्गतिदुःस्वरमझोपाझं स्वजातिसृपाटिकम् । ओघः सकले साधारणैकविकलातापस्थावरद्विकोनम् ॥३०८। विशेषकम् । अर्थ-एकेन्द्रियमार्गणामें तिर्यचलब्धिअपर्याप्तककी तरह ७१ प्रकृतियोंमें परघातादि चार, पर्याप्त, साधारण, एकेन्द्री जाति, यशस्कीर्ति, स्त्यानगृद्धि आदि तीन, स्थावर और सूक्ष्म दो-सब ये १३ प्रकृतियां मिलाकर; और अंगोपांग, त्रस, सृपाटिका संहनन, पंचेन्द्री, इन चारको घटाके नो ८० प्रकृतियां है उनका उदय जानना । इसीप्रकार विकलत्रयके एकेन्द्रियके समान ८० में स्थावरका युगल, साधारण, एकेंद्री, आतप इन ५ को घटाकर तथा त्रस, अप्रशस्तविहायोगति, दुःखर, अंगोपांग, अपनी २ जाति, सुपाटिका संहनन, ये छह मिलानेसे उदय योग्य ८१ प्रकृतियां है । सकलेन्द्रीमें गुणस्थानकी १२२ में सा- धारण, एकेन्द्री, विकलत्रय, आतप, स्थावरका जोड़ा, ये ८ प्रकृतियां कमकरके शेष ११४ प्रकृतियां उदय योग्य है ॥ ३०६ ॥ ३०७ ॥ ३०८ ॥ आगे कायमार्गणामें उदयको कहते है। एयं वा पणकाये ण हि साहारणमिणं च आदावं । दुसु तहुगमुजोवं कमेण चरिमम्हि आदावं ॥३०९॥ एकं वा पञ्चकाये न हि साधारणमिदं चातापम् । द्वयोस्तद्विकमुद्योतः क्रमेण चरमे आतपः ॥ ३०९ ॥ अर्थ-पृथिवीकायादि पांचकायोंमें एकेन्द्रीकी रीतिसे ८० प्रकृतियोंमेंसे साधारण, तथा यही साधारण और आतप, घटानेसे पृथिवीकाय तथा अप्कायमें उदय योग्य ७९ और ७८ प्रकृतियां जानना । और तेजःकायिक-वायुकायिक इन दोनोंमें वे साधारण-आतप - , , -- , . . गोम्मटसारः। १०९ दोनों और उद्योत, ये तीन प्रकृतियां घटानेसे ७७ प्रकृतियां उदय योग्य है । तथा इसी क्रमसे अंतके वनस्पति कायमें आतप प्रकृति घटानेपर ७९ प्रकृतियां उदय योग्य हैं।॥३०९॥ अब त्रसकायमें उदयको दिखाते है- ओघ तसे ण थावरदुगसाहरणेयतावमथ ओघं। मणक्यणसत्तगे ण हि ताविगिविगलंच थावराणुचओ॥३१०॥ ओपनसे न स्थावरद्विकसाधारणकातापमथ ओघः। मनोवचनसप्तके न हि आतापैकविकलं च स्थावरानुचतुष्कम् ॥ ३१०॥ अर्थ-त्रसकायवालोंके गुणस्थान सामान्यकी १२२ मेंसे स्थावरादि दो, साधारण, एकेन्द्री, आताप, ये पांच न होनेसे ११७ प्रकृतियां उदय होने योग्य है । इसके बाद मनोयोग ४ वचनयोग ३ मिलकर सब सात योगों में आताप, एकेन्द्री, विकलत्रय, स्थावर आदि ४, आनुपूर्वी ४, ये १३ प्रकृतियां न होनेसे १०९ प्रकृतियां उदय योग्य है॥३१०॥ आगे अनुभय वचनयोग और औदारिक काययोगमें कहते है:- अणुभयवचि वियलजुदा ओघमुराले ण हारदेवाऊ । वेगुव्वछक्कणरतिरियाणू अपज्जत्तणिरयाऊ ॥ ३११ ॥ अनुभयवचसि विकलयुता ओघ औराले नाहारदेवायुः । वैगूर्वषट्कनरतिरियानुः अपर्याप्तनिरयायुः ॥ ३११ ।। अर्थ-अनुभयवचन योगमें १०९ प्रकृतियोंमें विकलत्रय मिलाके ११२ प्रकृतियां उदय होने योग्य हैं । औदारिक योगमें १२२ मेंसे आहारक शरीरका युगल, देवायु, वैक्रियक शरीर आदि ६, मनुष्यगति आनुपूर्वी, तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, अपर्याप्त, नरकायु, ये १३ न होनेसे १०९ प्रकृतियां उदय योग्य है ।। ३११ ॥ अब औदारिक मिश्रयोगमें उदयादि दो गाथाओंसे कहते हैं; तम्मिस्से पुण्णजुदा ण मिस्सथीणतियसरविहायदुर्ग । परघादचओ अयदे णादेजदुदुभगं ण संढिच्छी ॥३१२ ॥ साणे तेर्सि छेदो वामे चत्तारि चोइसा साणे। चउदालं वोछेदो अयदे जोगिम्हि छत्तीसं ॥ ३१३ ॥ जुम्म । तन्मिश्रे पूर्णता न मिश्रस्त्यानत्रयस्वरविहायोद्विकम् । परघातचत्वार्ययतेऽनादेयद्विदुर्भगं न षण्ढस्त्री ॥ ३१२ ॥ साने तेषां छेदो वामे चत्वारि चतुर्दश साने। चतुश्चत्वारिंशत् व्युच्छेद अयते योगिनि षट्त्रिंशत् ॥ ३१३ ॥ युग्मम् । अर्थ-औदारिक मिश्रकाय योगमें पूर्वकी १०९ में पर्याप्त मिलाना । और मिश्रप्र- कृति, स्त्यानगृद्धि आदि ३, दो खर, विहायोगतिका जोड़ा, परघातादि चार, ये १२ , , , + ११० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । प्रकृतियां नहीं है। इसकारण ९८ उदय होनेके योग्य हैं । चौथे असंयतगुणस्थानमें अना- देय दो, दुर्भग, नपुंसकवेद,स्त्रीवेद इनका उदय नहीं है। इसकारण इन प्रकृतियोंकी व्युच्छि- त्ति सासादनगुणस्थानमें ही जाननी । इसके मिथ्यात्व गुणस्थानमें मिथ्यात्व, सूक्ष्मत्रय ये चार व्युच्छिन्न होती हैं । सासादनमें अनंतानुबंधी आदि १४, असंयतमें अप्रत्याख्यानादि १४ तथा सयोग केवलीके ३६ प्रकृतियोंकी उदय व्युच्छित्ति जानना ।। ३१२ ॥ ३१३ ॥ आगे वैक्रियिक काययोगमें उदयादिको दिखाते है- देवोघं वेगुब्वे ण सुराणू पक्खिवेज णिरयाऊ । णिरयगदिहुंडसंदं दुग्गदि दुब्भगचओ णीचं ॥ ३१४ ॥ देवौधः वैगूर्वे न सुरानुः प्रक्षिप्य निरयायुः । निरयगतिहुण्डषण्डं दुर्गतिः दुर्भगचत्वारि नीचम् ।। ३१४ ।। अर्थ-वैक्रियिक काययोगमें देवगतिवत् ७७ में देवायु न होनेसे और नरकायु, नरकगति, हुण्डसंस्थान, नपुंसकवेद, अप्रशस्त विहायोगति, दुर्भगादि चार, नीच गोत्र ये १० मिलानेसे ८६ प्रकृतियां उदय योग्य है ॥ ३१४ ॥ आगे वैक्रियिकमिश्र काययोगमें डेढ गाथासे कहते हैं- वेगुवं वा मिस्से ण मिस्स परघादसरविहायद्गं । साणे ण हुंडसंहँ दुब्भगणादेज अजसयं ॥ ३१५ ॥ णिरयगदिआउणीचं ते खित्तयदेऽवणिज थीवेदं । छगुणं वाहारे ण थीणतियसंढथीवेदं ॥३१६ ॥ जुम्मं । वैगर्व वा मित्रे न मिश्र परघातस्वरविहायोद्विकम् । साने न हुण्डषण्डं दुर्भगानादेयमयशस्कम् ॥ ३१५ ॥ निरयगतिआयुर्नीचं ताः क्षिपायतेऽपनीय स्त्रीवेदम् । षष्ठगुणं वाऽहारे न स्त्यानत्रयषण्वस्त्रीवेदम् ।। ३१६ ॥ युग्मम् । अर्थ-वैक्रियिकमिश्रयोगमें वैक्रियिककी ८६ प्रकृतियोंमें मिश्रमोहनीम, परघात-खर- विहायोगति इनका जोड़ा, ये प्रकृतियां उदयरूप नहीं हैं इसकारण ७९ उदय योग्य जानना । उनमें भी सासादन गुणस्थानमें हुण्डसंस्थान, नपुंसकवेद, दुर्भग अनादेय, अय- शस्कीर्ति, नरकगति, नरकायु, नीचगोत्र-दनका उदय नहीं है। असयतमें उदय है सो असंयतमें इनको समझना। और उस सासादनमें स्त्रीवेद, 'अनंतानुबंधी चार' इन पांचकी व्युच्छित्ति है ।। आहारक काययोगमें, छठे गुणस्थानकी ८१ प्रकृतियोंमेंसे स्त्यान- गृद्धि आदि ३, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, ॥,३१५ ॥ ३१६ ॥ - ३ - - . - गोम्मटसारः। १११ दुग्गदिदुस्सरसंहदि ओरालंदु चरिमपंचसंठाणं । ते तम्मिस्से सुस्सर परघाददुसत्थगदि हीणा ॥३१७॥ दुर्गतिदुःस्वरसंहतिः औरालद्वे चरमपञ्चसंस्थानम् । ताः तन्मिश्रे सुस्वरं परघातद्विशस्तगतिः हीनाः ॥ ३१७ ॥ अर्थ-अप्रशस्तविहायोगति, दुःखर, संस्थान ६, औदारिक शरीर दो, अंतके पांच संस्थान, इन २० प्रकृतियोका उदय नहीं है । और आहारकमिश्र काययोगमें इन ६१ मेंसे सुखर, परघातादि दो, प्रशस्तविहायोगति, इन चारको घटानेसे उदय योग्य ५७ है ऐसा जानना ॥ ३१७॥ आगे कार्माणकाययोगमें उदयादिको दो गाथाओंसे कहते है- ओघ कम्मे सरगदिपत्तेयाहारुरालदुग मिस्सं । उपधादपणविगुन्वदुथीणतिसंठाणसंहदी णत्थि ॥ ३१८ ॥ ओघः कर्मणि स्वरगति प्रत्येकाहारौरालद्विकं मिश्रम् । उपघातपञ्चवैगूर्वद्विस्त्यानत्रिसंस्थानसहतिर्नास्ति ॥ ३१८ ॥ अर्थ-कार्मणकाययोगमें सामान्यगुणस्थानकी १२२ प्रकृतियोंमेंसे खर-विहायोगति- प्रत्येक आहारकशरीर-औदारिकशरीर इन सवका युगल (जोडा ), मिश्र मोहनीय, उप- घातादि पांच, वैक्रियिकका जोड़ा, स्त्यानगृद्धि आदि तीन, संस्थान ६, संहनन ६ ये सब नहीं होनेसे उदय योग्य ८९ प्रकृतियां है ।। ३१८ ॥ साणे थीवेदछिदी णिरयदुणिरयाउगं ण तियदसयं । इगिवणं पणवीसं मिच्छादिसु चउसु वोच्छेदो ॥ ३१९ ॥ साने स्त्रीवेदछित्तिः निरयद्विनिरयायुष्कं न त्रिकदशकम् । एकपञ्चाशत् पञ्चविंशति. मिथ्यादिषु चतुर्पु व्युच्छेदः ॥ ३१९ ।। अर्थ-उसमेंभी सासादन गुणस्थानमें स्त्रीवेदकी व्युच्छित्ति होती है। और नरकग- त्यादि २, नरकायु इन तीनका उदय नहीं होता। तथा मिथ्यात्वादि (मिथ्यात्व १ सासादन २ असंयत ३ सयोग केवली ४) चार गुणस्थानोंमें क्रमसे तीन, दश, ५१, २५, इतनी प्रकृतियोंकी उदय व्युच्छित्ति होती है ॥ ३१९ ॥ अब वेदमार्गणामें उदयादिको कहते है- मूलोघं पुंवेदे थावरचउणिरयजुगलतित्थयरं। इगिविगलं थीसंद तावं णिरयाउगं णत्थि ॥३२०॥ - १. 'सान' शब्दसे सासादन लेना, क्योंकि लोकमे भी इग्लिश भाषा आदिमें 'पी. एल्.' शब्दसे पन्नालाल' का बोध होता है। इसकारण आदि भतके अक्षर, मिलकर पूरे शब्दका ज्ञान होजाता है।
- - ११२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । मूलोधः पुंवेदे स्थावरचतुर्निरययुगलतीर्थकरम् । एकविकलं खीषण्डमातपं निरयायुष्क नास्ति ॥ ३२०॥ अर्थ-पुरुषवेदमें मूलवत् १२२ प्रकृतियोंमेंसे स्थावर आदि चार, नरकगतिद्विक, तीर्थकर प्रकृति, एकेन्द्रिय, विकल तीन, स्त्रीवेद, नपुंसकवेद, आतप प्रकृति, नरकाबु ये १५ नही है। इसकारण उदय योग्य १०७ प्रकृतियां हुई ।। ३२० ।। आगे स्त्रीवेद और नपुंसक वेदमें उदयादि दिखाते हैं। इत्थीवेदेवि तहा हारदुपुरिसूणमित्थिसंजुत्तं । ओघं संढे ण हि सुरहारदुथीपुंसुराउतित्थयरं ॥ ३२१ ॥ खीवेदेपि तथाऽहारद्विपुरुषोनं खीसंयुक्तम् । ओघः षण्ढे न हि सुराहारद्विस्त्रीपुंसुरायुस्तीर्थकरम् ।। ३२१ ।। अर्थ-स्त्रीवेदमें भी उसीप्रकार १०७ प्रकृतियों में आहारक शरीर युगल, पुरुषवेद ये तीन कमकरके तथा स्त्रीवेद मिलाके १०५ प्रकृतियां उदय योग्य हैं। नपुंसकवेदमें सामा- न्यवत् १२२ मेंसे देवगति युगल, आहारकद्विक, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, देवायु और तीर्थ- कर प्रकृति ये ८ सिवाय ११४ प्रकृतियां उदय योग्य है ॥ ३२१ ॥ अब कषायमार्गणामें कहते है- तित्थयरमाणमायालोहचउक्कूणमोघमिह कोहे । अणरहिदे णिगिविगलं तावणकोहाणुथावरचउकं ॥३२२॥ तीर्थकरमानमायालोभचतुष्कोनमोघ इह क्रोधे । अनरहिते नैकविकलमातापानक्रोधानुस्थावरचतुष्कम् ।। ३२२ ।। अर्थ-क्रोध कषायमार्गणामें सामान्य १२२ मेंसे तीर्थकर प्रकृति तथा चार क्रोध विना दूसरी मानमायालोभचतुष्क ( तीन चौकड़ी ) संबंधी १२ कषाय-इन १३ के विना १०९ प्रकृतियां उदय योग्य हैं । तथा अनंतानुबंधी रहित क्रोधमें एकेन्द्री, विकल तीन, आतप, अनंतानुबंधी क्रोध, आनुपूर्वी ४, स्थावर आदि ४ इस प्रकार १४ प्रकृतियोंके सिवाय तथा 'अनंतानुबंधी मानादि ३ और मिथ्यात्व' इन चारको छोड़कर उदय योग्य ९१ प्रकृतियां हैं ॥ ३२२ ॥ एवं माणादितिए मदिसुदअण्णाणगे दु सगुणोघं । वेभंगेवि ण ताविगिविगलिंदी थावराणुचऊ ॥ ३२३॥ एवं मानादित्रये मतिश्रुताज्ञानके तु स्वगुणौधः । वैभङ्गेपि नातापैकविकलेन्द्रियं स्थावरानुचत्वारि ॥ ३२३ ।। अर्थ-इसीप्रकार मानादि तीन कषायोंमें भी अपनेसे अन्य १२ कषाय तथा तीर्थ- कर प्रकृति, इन १३ के न होनेसे १०९ एकसौ नव सबजगह समझना । तथा ज्ञान- - गोम्मटसारः। ११३ मार्गणामेंसे कुमति और कुश्रुतज्ञानमें सामान्य गुणस्थानवत् १२२ मेंसे आहारकादि ५ के सिवाय ११७ प्रकृतिया उदय योग्य है । विभंग (कुअवधि ) ज्ञानमें भी इन ११७ मेंसे आताप, एकेन्द्री, विकलेन्द्री ३, स्थावरादि चार, आनुपूर्वी ४ सब मिलकर १३ प्रकृतिया उदय न होनेके कारण १०४ प्रकृतियां उदय होने योग्य हैं ॥ ३२३ ॥ सण्णाणपंचयादी देसणमग्गणपदोत्ति सगुणोपं । मणपज्जवपरिहारे णवरि ण संढित्थि हारदुगं ॥ ३२४ ॥ समानपचकादि दर्शनमार्गणापदमिति स्वगुणौषः। मनःपर्ययपरिहारे नवरि न षण्डस्त्री आहारद्वयम् ॥ ३२४ ॥ अर्थ-पांच सम्यग्ज्ञानसे लेकर दर्शन मार्गणास्थानपर्यंत अपने २ गुणस्थान सरीखी रचना समझना । लेकिन मनःपर्ययज्ञानको छोड़ देना, परंतु इसमें विशेषता यह है कि नपुंसकवेद, सीवेद और आहारकका जोड़ा ये पांच उदय योग्य नहीं है ॥ ३२४ ॥ अब दूसरी मार्गणाओंमेंभी विशेषता दिखाते है:- चक्खुम्मि ण साहारणताविगिबितिजाइ थावरं सुहुमं । किण्हदुगे सगुणोघं मिच्छे णिरयाणुवोच्छेदो ॥ २२५ ॥ चक्षुपि न साधारणातापैकद्वित्रिजातिः स्थावरं सूक्ष्मम् । कृष्णद्विके स्वगुणोघो मिथ्ये निरयानुन्युच्छेदः ॥ ३२५ ॥ अर्थ-दर्शनमार्गणाके चक्षुर्दर्शनमे १२२ मैसे साधारण, आतप, एकेन्द्री, दो इंद्री, तेइंद्री जाति, स्थावर, सूक्ष्म, तीर्थकर प्रकृति, इन ८ का उदय न होनेके कारण ११४ प्रकृतियां उदय योग्य है । और लेश्यामार्गणामें कृष्ण, नील इन दो लेश्याओंमें अपने गुणस्थानवत् तीर्थकरादि तीन प्रकृतियोंके सिवाय ११९ प्रकृतियां उदय योग्य हैं। लेकिन मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें नरकगत्यानुपूर्वीकीभी व्युच्छित्ति समझना ॥ ३२५ ॥ साणे सुराउसुरगदिदेवतिरिक्खाणुवोछिदी एवं । काओदे अयदगुणे णियरतिरिक्खाणुवोछेदो ॥ ३२६ ॥ साने सुरायुःसुरगतिदेवतिर्यगानुव्युच्छित्तिरेवम् । कापोते अयतगुणे निरयतिर्यगानुव्युच्छेदः ॥ ३२६ ।। अर्थ-इसीकारण सासादन गुणस्थानमें देवायु, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगत्या- नुपूर्वी इन चारकी भी व्युच्छित्ति जाननी । इसीप्रकार ११९ प्रकृतियां कपोत लेश्यामें भी है, परंतु असंयतगुणस्थानमें नरकगतिआनुपूर्वी और तिर्यंचगत्यानुपूर्वी इन दो प्रकृ- तियोंकी व्युच्छित्ति है ।। ३२६ ॥ - --- १५ - -- , - . ११४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आगे तीन शुभलेश्याओंमें कहते है। तेउतिये सगुणोघं णादाविगिविगलथावरचउक्कं । णिरयदुतदाउतिरियाणुगं णराणू ण मिच्छदुगे ॥ ३२७ ॥ तेजस्त्रये स्वगुणौधः नातापैकविकलस्थावरचतुष्कम् । निरयद्वितदायुस्तिर्यगानुकं नरानु न मिथ्यद्विके ॥ ३२७ ॥ अर्थ-तेजोलेश्यादि तीन शुभलेश्याओमें अपने २ गुणस्थानवत् १२२ मेंसे आत- पादि दो, एकेन्द्री, विकलेन्द्री तीन, स्थावर आदि चार, नरकगत्यादि दो, नरकायु, तिर्यचगत्यानुपूर्वी इन १३ का उदय न होनेके कारण १०९ उदय योग्य हैं । उसमें भी मिथ्यादृष्टिआदि दो गुणस्थानोंमें मनुष्यगत्यानुपूर्वीका भी उदय नहीं है ॥ ३२७ ॥ अब भव्यमार्गणा और सम्यक्त्वमार्गणामें कहते हैं:- भविदरुवसमवेदगखइये सगुणोघमुवसमे खयिये । ण हि सम्ममुवसमे पुण णादितियाणू य हारदुर्ग ॥ ३२८ ॥ भव्येतरोपशमवेदकक्षायिके स्वगुणौघ उपशमे क्षायिके । न हि सम्यगुपशमे पुनः नादित्रयानु चाहारद्विकम् ।। ३२८ ॥ अर्थ-भव्य, अभव्य, उपशमसम्यक्त्व, वेदक ( क्षायोपशमिक ) सम्यक्त्व और क्षायिकसम्यक्त्व मार्गणाओंमें अपने २ गुणस्थानके कथनकी तरह जानना, विशेष बात यह है कि उपशम सम्यक्त्व तथा क्षायिक सम्यक्त्वमें सम्यक्त्वमोहनी प्रकृति उदययोग्य नहीं है। तथा उपशम सम्यक्त्वमें आदिकी नरकगत्यानुपूर्वी वगैरः तीन आनुपूर्वी प्रकृतियां और आहारकका जोड़ा ये प्रकृतिया उदय योग्य नहीं है ।। ३२८॥ किस तरहसे ? सो दो क्षेपक गाथाओंसे कहते है- मिस्साहारस्सयया खवगा चडमाणपढमपुवा य । पढमुवसमया तमतमगुणपडिवण्णा य ण मरंति ॥१॥ अणसंजोगे मिच्छे मुहुत्तअंतोत्ति णत्थि मरणं तु । कदकरणिजं जाव दु सबपरहाण अठ्ठपदा ॥२॥ जुम्मं । मिश्राहाराश्रयकाः क्षपकाः चटमानप्रथमापूर्वाश्च । प्रथमोपशमकाः तमस्तमोगुणप्रतिपन्नाश्च न मरन्ति ॥१॥ अनसंयोगे मिथ्ये मुहूर्तान्तरिति नास्ति मरणं तु । कृतकरणीयं यावत्तु सर्वपरस्थानानि अष्टपदानि ॥ २॥ युग्मम् । १ये दो गाथा क्षेपक हैं प्रकरण वश यहा रक्खे गये हैं। . . है - गोम्मटसारः। ११५ अर्थ-निवृत्त्यपर्याप्तक अवस्थाका धारक १ आहारक मिश्रयोगका धारण करनेवाला २ क्षपक श्रेणीवाला ३ उपश्रेणी चढनेमें अपूर्वकरण नामा आठवें गुणस्थानके पहले भाग- वाला ४ और तमस्तमक नामकी सातवीं नरकभूमिमें सम्यक्त्वगुणसहित ५ प्रथमोपशम- सम्यक्त्ववाला ६ इन अवस्थाओंवाले जीव नहीं मरते हैं । और अनन्तानुबंधी कषायको विसंयोजन ( जुदा) करके अन्य कपायरूप परिणमानेवाला जो द्वितीयोपशमसम्यग्दृष्टी ७ वह यदि मिथ्यात्वगुणस्थानको प्राप्त हुआ हो उसके अंतर्मुहूर्ततक मरण नहीं होता और दर्शनमोहके क्षय करनेवाले जीवके ८ जबतक कृतकृत्यपना अर्थात् क्षयोपशमसम्य- ग्दृष्टीपना है तबतक मरण नही होता है । इस प्रकार सब परस्थान आठ हुए । इनमें मरण नहीं है ॥ १॥२॥ खाइयसम्मो देसो णर एव जदो तहिं ण तिरियाऊ । उजोवं तिरियगदी तेसिं अयदम्हि वोच्छेदो ॥ ३२९ ॥ क्षायिकसम्यगू देशो नर एव यतस्तस्मिन् न तिर्यगायुः । उद्योतः तिर्यग्गतिस्तेपामयते व्युच्छेदः ॥ ३२९ ॥ अर्थ-देशसंयत नामा पांचवें गुणस्थानमें रहनेवाला क्षायिक सम्यग्दृष्टी मनुष्य ही होता है, इसकारण उसके तिर्यंचआयु १ उद्योत २ और तिर्यंचगति ३ इन तीनोंका उदय नही है । इसीलिये इन तीनोंकी उदयव्युच्छित्ति असंयतगुणस्थानमें होजाती है ॥३२९॥ सेसाणं सगुणोघं सण्णिस्सवि णत्थि तावसाहरणं । थावरसुहुमिगिविगलं असण्णिणोवि य ण मणुदुचं ॥३३०॥ वेगुवछ पणसंहदिसंठाण सुगमण सुभगआउतियं । आहारे सगुणोघं णवरि ण सव्वाणुपुत्वीओ ॥३३१॥ जुम्म । शेपाणां स्वगुणौधः संज्ञिन अपि नास्ति आतपसाधारणम् । स्थावरसूक्ष्मैकविकलमसंज्ञिनोपि च न मनुद्विउच्चम् ॥ ३३० ।। वैगूर्वषट् पञ्चसंहदिसंस्थानं सुगमनं सुभगायुत्रयम् । आहारे स्वगुणौधः नवरि न सर्वानुपूर्व्यः ॥ ३३१ ॥ युग्मम् । अर्थ-शेष मिथ्यात्व १ सासादन २ मिश्रसम्यक्त्व ३ इन तीनोंमें अपने २ गुणस्था- नकी तरह उदयादि जानना, अर्थात् मिथ्यारुचिमें उदय योग्य ११७ प्रकृतियां है इत्या- दि जानना चाहिये । और संज्ञीमार्गणामें संज्ञीके भी सामान्य १२२ मेंसे आतप, साधारण, स्थावर, सूक्ष्म, एकेन्द्री, विकलेंद्री तीन, तथा पूर्वोक्त तीर्थकर प्रकृति इसप्रकार ९ प्रक- १. केवली तीर्थकरके भावमन नहीं है इसकारण उनको सही नहीं कह सके । और तियेचोंके सिवाय दूसरी जगह असलीपना नहीं होता इससे असज्ञीभी नहीं कहसकते हैं।
। , ११६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । तियां उदय योग्य नहीं हैं । असंज्ञीके मनुष्यगति आदि दो, ऊंच गोत्र, वैक्रियिक शरीरा- दि छह, पहले पांच संहनन, आदिके पांच संस्थान, प्रशस्त विहायोगति, सुभगादि तीन, नरकादि आयु तीन-ये छन्वीस प्रकृतियां उदय योग्य नहीं हैं, इसकारण मिथ्यादृष्टिकी ११७ मेंसे २६ घटानेपर ९१ प्रकृतियां उदय योग्य हैं । और आहारमार्गणा आहारक अवस्थामें सामान्य गुणस्थानवत् उदयादि समझना, परंतु सब (चारों) आनुपूर्वी प्रकृ- तियोंका उदय नहीं होता, इसकारण उदय योग्य ११८ प्रकृतियां हैं ।। ३३० । ३३१ ॥ आगे अनाहारअवस्थामें उदयादि कहते हुए उदयके प्रकारणको समाप्त करते हैं- कम्मे व अणाहारे पयडीणं उदयमेवमादेसे । कहियमिणं वलमाहवचंदचियणेमिचंदेण ॥ ३३२ ॥ कार्मे इवानाहारे प्रकृतीनामुदय एवमादेशे । कथितोऽयं वलमाधवचन्द्रार्चितनेमिचन्द्रेण ॥ ३३२ ॥ अर्थ-अनाहारक अवस्थामें कार्माण काययोगकी तरह ८९ प्रकृतियां उदय योग्य हैं । इसप्रकार मार्गणादिस्थानोंमें ये प्रकृतियोंका उदय बलभद्र और नारायणकर पूजित ऐसे नेमिनाथतीर्थकर देवने अथवा अपनेभाई बलदेव और माधवचन्द्र विद्यदेवकर पूजित ऐसे नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्तीने कहा है, ऐसा जानना ॥ ३३२ ॥ इति उदयप्रकरणम् ॥ आगे प्रकृतियोंके सत्त्वका निरूपण करते हुए पहले गुणस्थानों में सत्त्व कहते हैं- तित्थाहारा जुगवं सर्व तित्थं ण मिच्छगादितिए । तस्सत्तकम्मियाणं तग्गुणठाणं ण संभवदि ॥ ३३३ ॥ तीर्थाहारा युगपत् सर्व तीर्थ न मिथ्यकादित्रये । तत्सत्त्वकर्मकाणां तद्गुणस्थानं न संभवति ॥ ३३३ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि, सासादन, मिश्र इन तीनों गुणस्थानों में क्रमसे तीर्थंकर, आहारक द्वय एककालमें नहीं होते, तथा सब (तीनों) ही किसी कालमें नहीं होते, और तीर्थकर प्रकृति नहीं होती अर्थात् मिथ्यात्वमें नानाजीवोंकी अपेक्षा सब १४८ प्रकृतियोंकी सत्ता है, सासादनमें तीनोंहीके किसी कालमें न होनेसे ११५ की सत्ता है और मिश्रगुणसा- नमें एक तीर्थकर प्रकृतिके न होनेसे १४७ प्रकृतियोंका सत्ता है। क्योंकि इन सत्त्वपरी तियोंवाले जीवोंके वे मिथ्यात्वादि गुणस्थानही संभव नही हैं ॥ ३३३ ॥ चत्तारिवि खेत्ताई आउगबंधेण होइ सम्मत्तं । अणुवदमहत्वदाई ण लहइ देवाउगं मोत्तुं ॥ ३३४ ॥ - - L 1 1 गोम्मटसारः। ११७ चतुर्णामपि क्षेत्राणामायुष्कबन्धेन भवति सम्यक्त्वम् । अणुव्रतमहाव्रतानि न लभते देवायुष्कं मुक्त्वा ॥ ३३४ ॥ अर्थ-चारों ही गतियोंमें किसीकी भी आयुके बंध होनेसे सम्यत्त्व होता है, परंतु देवायुके बंधके सिवाय अन्य तीनगतियोंकी आयुके बन्धवाला अणुव्रत तथा महाव्रत नहीं धारण कर सकता है, क्योंकि वहां व्रतके कारणभूत विशुद्ध परिणाम नही है ॥ ३३४ ॥ णिरयतिरिक्खसुराउगसत्ते ण हि देससयलवदखवगा। अयदचउक्कं तु अणं अणियट्टीकरणचरिमम्हि ॥ ३३५ ॥ जुगवं संजोगिता पुणोवि अणियट्टिकरणबहुभागं । वोलिय कमसो मिच्छं मिस्सं सम्मंखवेदि कमे॥३३६॥ जुम्म। निरयतिर्यक्सुरायुष्कसत्त्वे न हि देशसकलव्रतक्षपकाः । अयतचतुष्कस्तु अनमनिवृत्तिकरणचरमे ॥ ३३५ ॥ युगपत् विसंयोज्य पुनरपि अनिवृत्तिकरणबहुभागम् । व्यतीत्य क्रमशो मिथ्यं मिश्रं सम्यक् क्षपयति क्रमेण ॥ ३३६ ॥ युग्मम् । अर्थ-नरक, तिर्यंच तथा देवायुके सत्त्व होनेपर क्रमसे देशवत, सर्वव्रत (महाव्रत) और क्षपक श्रेणी नहीं होती। और असंयतादि चार गुणस्थानवाले अनंतानुबंधी आदि ७ सात प्रकृतियोंका क्रमसे क्षयकर क्षायिक सम्यग्दृष्टि होते है। उन सातोंमेंसे पहले अनं- तानुबंधीचारका अनिवृत्तिकरणरूप परिणामोंके अंतर्मुहूर्त कालके अंतसमयमें एकही वार विसंयोजन करके अर्थात् अनंतानुबंधीकी चौकड़ीको अप्रत्याख्यानादि बारह कषायरूप परिणमन कराके उसके बाद अनिवृत्तिकरणकालके बहुभागको छोड़के शेषसंख्यात एक भागके पहले समयसे लेकर क्रमसे मिथ्यात्व, मिश्र तथा सम्यक्त्व प्रकृतिका क्षय करते हैं इसप्रकार सातप्रकृतियों के क्षयका क्रम है। इससे सारांश यह निकला कि सम्यक दृष्टि ७ प्रकृतियोंके क्षय करनेवाले तथा उपशमादि करनेवाले होते है । सो तीन गुणस्थानोंका प्रकृतिसत्त्व पूर्वोक्तही समझना । तथा असंयतसे लेकर सातवें गुणस्थानतक उपशम सम्य- ग्दृष्टी तथा क्षयोपशम सम्यग्दृष्टी इन दोनोंके चौथे गुणस्थानमें अनंतानुबंधी आदिकी उप- शमरूप सत्ता होनेसे १४८ प्रकृतियोंका सत्त्व है । पांचवें गुणस्थानमें नरकायु न होनेसे १४७ का, प्रमत्तगुणस्थानमें नरक तथा तिर्यचायु इन दोनोंका सत्त्व न होनेसे १४६ का तथा अप्रमत्तमें भी १४६ ही का सत्त्व है । और क्षायिक सम्यग्दृष्टीके अनंतानुबंधी चार तथा दर्शन मोहनीय ३ इन सात प्रकृतियोके क्षय होनेसे सात सात कम समझना । और अपूर्वकरण गुणस्थानमें दो श्रेणी है उनमेंसे क्षपकश्रेणीमें तो १३८ प्रकृतियोंका सत्त्व है, क्योंकि अनंतानु बंधी आदि ७ प्रकृतियोंका तो पहले ही क्षय कियाथा और . - -- ११८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । नरक, तिर्यंच तथा देवायु इन तीनोंकी सत्ता ही नहीं है । इसप्रकार ७+३=१० प्रकृतियां कम है ॥ ३३५ । ३३६ ॥ अब अनिवृत्तिकरणनामक नवमें गुणस्थानादिकमें क्षययोग्य प्रकृतियोंका क्रम कहते हैं:- सोलछेकिगिछक्कं चदुसेकं बादरे अदो एक्कं । खीणे सोलसऽजोगे वायत्तरि तेरुवर्तते ॥ ३३७ ॥ षोडशाष्टैकैकपटुं चतुर्वेकं वादरे अत एकम् । क्षीणे पोडशायोगे द्वासप्ततित्रयोदश उपरमन्ते ॥ ३३७ ॥ अर्थ-बादर अर्थात् अनिवृत्तिकरणके ९ भागोंमेंसे पांच भागोंमें क्रमसे १६, ८, १, १, ६, प्रकृतियां उपराम करती है अर्थात् क्षय अथवा सन्चासे व्युच्छिन्न होती हैं, तथा चार भागोंमें एक एक ही की सत्तासे व्युच्छित्ति है । इसके बाद सूक्ष्म सांपरायनामा दशवें गुणस्थानमें एकही की व्युच्छित्ति है । ग्यारवेंमें योग्यताही नहीं । बारवें क्षीणक- पायगुणस्थानके अंतसमयमें १६ प्रकृतियोंकी सत्त्वसे व्युच्छित्ति होती है । सयोगीमें किसीभी प्रकृतिकी व्युच्छित्ति नहीं । अयोगकेवली चौदहवें गुणस्थानके अंतके दो समयोंमेंसे पहले समयमें ७२ की तथा दूसरे समयमें १३ प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति होती है ॥ ३३७ ॥ आगे उन १६ आदि प्रकृतियोंको गिनाते है जिनकी कि गुणस्थानोंमें व्युच्छित्ति कही है।- णिरयतिरिक्खदु वियलंथीणतिगुज्जोवतावएइंदी। साहरणसुहुमथावर सोलं मज्झिमकसायढें ॥ ३३८ ॥ संहित्थि छक्कसाया पुरिसो कोहो य माण मायं च । थूले सुहुमे लोहो उदयं वा होदि खीणम्हि ॥३३९॥ जुम्मं । निरयतिर्यग्द्वि विकलस्त्यानत्रिकमुद्योतातपैकेन्द्रियम् । साधारणसूक्ष्मस्थावरं षोडश मध्यमकषायाष्टौ ॥ ३३८ ॥ षण्ढस्त्री षट्कषायाः पुरुषः क्रोधश्च मानं माया च । स्थूले रक्ष्मे लोभ उदयो वा भवति क्षीणे ॥ ३३९ ॥ युग्मम् । । वृतिक .. पहले भागकी नरकगति आदि २, तियेचगति आदि २, आदि तीन, उद्योत, आतप, एकेन्द्री, साधारण, सूक्ष्म, दूसरे भागकी बीचकी अप्रत्याख्यान चार तथा प्रत्याख्यान । तीसरे भागकी नपुंसकवेद, चौथेकी स्त्रीवेद, पांचवेंकी व, आठवें, नवमें भागमें क्रमसे पुरुषवेद, संज्वल- - - - , अर्थ विकलेंद्री तीन, स्त्यानगृद्धि स्थावर-ये १६ प्रकृतियां है चार कषाय मिलकर आठ कर हास्यादि ६ नोकषाय; और छठे, ।
९ , गोम्मटसारः। नक्रोध, मान, तथा माया है । इसप्रकार स्थूल अर्थात् बादरकषाय नवमें गुणस्थानमें ३६ प्रकृतियां व्युच्छिन्न होती है । और सूक्ष्मकपायनामा दशवेंकी लोमसंज्वलन प्रकृति है। तथा क्षीणकपाय नामा वारवेंकी उदयकी तरह ज्ञानावरण ५ दर्शनावरण ४ अंतराय ५ और निद्रा १ प्रचला १ इसप्रकार १६ प्रकृतियां है ॥ ३३८ । ३३९ ॥ अब अयोगीकी व्युच्छिन्नप्रकृतियोंको कहते है:- देहादीफरसंता थिरसुहसरसुरविहायदुग दुभगं । णिमिणाजसऽणादेज पत्तेयापुण्ण अगुरुचऊ ॥ ३४०॥ अणुदयतदियं णीचमजोगिदुचरिमम्मि सत्तवोच्छिण्णा। उदयगवार णराणू तेरस चरिमम्हि वोछिण्णा ॥३४१॥जुम्मं । देहादिस्पर्शान्ताः स्थिरशुभस्वरसुरविहायोद्विकं दुर्भगम् । निर्माणायशअनादेयं प्रत्येकापूर्णमगुरुचत्वारि ॥ ३४०॥ अनुदयतृतीयं नीचमयोगिद्विचरिमे सत्त्वव्युच्छिन्नाः । उदयगद्वादश नरानुः त्रयोदश चरमे व्युच्छिन्नाः ।। ३४१ ॥ युग्मम् । अर्थ-पांच शरीरसे लेकर आठ स्पर्शतक ५०, स्थिर-शुभ-वर-देवगति-विहायो- गति, इनका जोड़ा, दुर्भग, निर्माण, अयशस्कीर्ति, अनादेय, प्रत्येक, अपर्याप्त, अगुरुलघु आदि ४, तीसरे वेदनीयकर्मकी दोनों से अनुदयरूप १, नीचगोत्र-ये ७२ प्रकृतियां अयोगकेवलीके अंतके समीपके दूसरे समयमें सत्त्वसे व्युच्छिन्न होती है । तथा जिनका उदय अयोगी गुणस्थानमें है ऐसी उदयगत १२ प्रकृतियां और एक मनुष्यगत्यानुपूर्वी इसप्रकार १३ प्रकृतियां अयोगीके अंतके समय अपनी सत्तासे छूटती है ॥३४०।३४१॥ अब सत्त्व और असत्त्व प्रकृतियोंकी संख्या गुणस्थानोंमें क्रमसे दिखाते है- णभतिगिणभइगि दोदो दस दससोलहगादिहीणेसु । सत्ता हवंति एवं असहायपरकमुद्दिष्टं ॥ ३४२ ॥ नभरुयेकनभएकं द्वे द्वे दश दशषोडशाष्टकादिहीनेषु । सत्ता भवन्ति एवमसहायपराक्रमोद्दिष्टम् ॥ ३४२ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टिआदि अपूर्वकरण गुणस्थानतक क्रमसे शून्य अर्थात् कोई नहीं, ३, १, शून्य, १, २,२, १० इतनी प्रकृतियोंका असत्त्व जानना अर्थात् ये प्रकृतिया नहीं रहती। और अनिवृत्तिकरणके पहले भागमें १० दूसरेमें १६ तीसरे आदिमागमें ८ प्रकृतियांआदि असत्त्व जाननी । और इन असत्त्वप्रकृतियोंको सब सत्त्वप्रकृतियोंमें घटानेसे अवशेप प्रकृतियां अपने २ गुणस्थानों में सत्त्वप्रकृतियां है। ऐसा सहायतारहित पराक्रमके धारणकरनेवाले श्रीमहावीरखामीने कहा है ॥ ३४२ ॥ - , , ।
1 १२० रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् । आगे उपशम श्रेणीवालेके चारित्रमोहनीयकी शेष २१ प्रकृतियोके उपशम करानेका विधान कहते हैं,- खवणं वा उपसमणे णवरि य संजलणपुरिसमज्झम्हि । मज्झिमदोदो कोहादीया कमसोवसंता हु ॥ ३४३ ॥ क्षपणामिव उपशमने नवरि च संज्वलनपुरुपमध्ये । मध्यमद्वौ द्वौ क्रोधादिको क्रमश उपशान्तौ हि ॥ ३४३ ।। अर्थ-उपशमके विधानमें भी क्षपणा विधानकी तरह क्रम जानना । परंतु विशेष वात यह है कि संज्वलनकषाय और पुरुषवेदके मध्यमें बीचके जो अप्रत्याख्यान तथा प्रत्याख्यान कषाय संबंधी दो दो क्रोधादि है सो पहले उनको क्रमसे उपशमन करता है, पीछे संज्वलन क्रोधादिका उपशम करता है । जैसे पुरुषवेदके बाद अप्रत्याख्यान और प्रत्याख्यान दोनोंके क्रोधका उपशम किया पश्चात् संज्वलनक्रोधका उपशम करता है इत्यादि मानादिमें भी ऐसे ही जानना ॥ ३४३॥ णिरयादिसु पयडिडिदिअणुभागप्रदेसभेदभिण्णस्स। सत्तस्स य सामित्तं णेदवमिदो जहाजोग्गं ॥ ३४४ ॥ निरयादिषु प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशमेदभिन्नस्य । सत्त्वस्य च स्वामित्वं नेतव्यमितो यथायोग्यम् ।। ३४४ ।। अर्थ-इसके बाद नरकगति आदि मार्गणाओंमें भी प्रकृति, स्थिति, अनुभाग, प्रदेश, इन चार भेदोंको लिये हुए जो प्रकृतियोंका सत्त्व है वह यथा योग्य समझना ॥ ३४४ ॥ अब गत्यादि मार्गणाओंमें सत्वको दिखानेके लिये परिभाषा (नियम ) सूत्र कहते है:- तिरिए ण तित्थसत्तं णिरयादिसु तिय चउक्क चउ तिण्णि । आऊणि होंति सत्ता सेसं ओघादु जाणेज्जो ॥ ३४५ ॥ तिरश्चि न तीर्थसत्त्वं निरयादिषु त्रीणि चतुष्कं चत्वारि त्रीणि । आयूंषि भवन्ति सत्ताः शेपमोघात् ज्ञातव्यम् ॥ ३४५ ॥ अर्थ-तिर्यचगतिमें तीर्थंकर प्रकृतिकी सत्ता नहीं होती। और नरक, तियेच, मनुष्य तथा देवगतिमें क्रमसे भुज्यमान नरकायु-बध्यमान तिर्यच और मनुष्यायु इन ३ आयुओंकी, भुज्यमानतिर्यचायु-बध्यमान नरक-तिर्यगू-मनुष्य-देवायु इन ४ की, मुज्यमान मनुष्यायु- बध्यमान नरक-तिर्यंच-मनुष्य-देव आयु इन चारों आयुकर्मोंकी, भुज्यमान देवायु- बध्यमानतिर्यंच और मनुष्यायु-इन ३ आयुकर्मोकी सत्ता रहने योग्य है। और शेष प्रकृतियोंकी सत्ता गुणस्थानकी तरह समझना ॥ ३४५ ॥ - , गोम्मटसारः। १२१ अब उनमें भी नरकादि गतिमें सत्ता दिखाते है। ओघ वा णेरइये ण सुराऊ तित्थमत्थि तदियोति । छट्टित्ति मणुस्साऊ तिरिए ओघं ण तित्थयरं ॥ ३४६ ॥ ओघ इव नैरयिके न सुरायुः तीर्थमस्ति तृतीय इति । पष्ठ इति मनुष्यायुः तिरश्चि ओघो न तीर्थकरम् ॥ ३४६ ॥ अर्थ-नरकगतिमें गुणस्थानवत् सत्ता जानना, परंतु देवायुका सत्व नही है । इसकारण १४७ प्रकृतियां सत्व योग्य है । और तीसरे नरक तक तीर्थकर प्रकृतिका सत्व है तथा मनुष्यायुका सत्व छठी नरकपृथिवीतक है। तिर्यंचगतिमें भी गुणस्थानवत् जानना लेकिन तीर्थंकर प्रकृतिका सत्व नहीं है, इसकारण सत्व योग्य १४७ प्रकृतियां है ॥ ३४६ ॥ एवं पंचतिरिक्खे पुपिणदरे णत्थि णिरयदेवाऊ । ओघं मणुसतियेसुवि अपुण्णगे पुण अपुण्णेव ॥ ३४७ ॥ एवं पञ्चतिरश्चि पूर्णेतरस्मिन् नास्ति निरयदेवायुः । ओघः मनुष्यत्रयेष्वपि अपूर्णके पुनरपूर्णे इव ॥ ३४७ ॥ अर्थ-इसीप्रकार पाच जातिके तिर्यचोंमें भी सामान्यरीतिसे सत्व जानना, परंतु विशेष बात यह है कि लब्ध्यपर्याप्तक तिर्यचमें नरकायु और देवायु-इन दोका भी सत्व नहीं है। और मनुष्यके तीन भेदोंमें भी गुणस्थानवत् सत्व समझना । परंतु लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यमें लव्ध्यपर्याप्तकतिर्यचकी तरह नरकायु देवायु तीर्थकर इन तीन प्रकृतियोंके विना १४५ प्रकृतियां सत्तायोग्य हैं ॥ ३४७ ॥ अब देवगतिमें कहते है- ओघं देवे ण हि णिरयाऊ सारोत्ति होदि तिरियाऊ । भवणतियकप्पवासियइत्थीसु ण तित्थयरसत्तं ॥ ३४८ ॥ ओघः देवे न हि निरयायुः सार इति भवति तिर्यगायुः । भवनत्रयकल्पवासिकस्त्रीषु न तीर्थकरसत्त्वम् ॥ ३४८ ॥ अर्थ-देवगतिमें सामान्यवत् जानना, परंतु नरकायु नही है इसकारण १४७ सत्त्व प्रकृतियां है। और सहस्रार नामा वारवें वर्गतक ही तिर्यंच आयुकी सत्ता है आगे नहीं। भवनत्रिक ( भवनवासी १ व्यंतर २ ज्योतिषी ३) देवोंमें तथा कल्पवासिनीस्त्रियोंमें तीर्थ- कर प्रकृनिका भी सत्त्व नहीं है ॥ ३४८ ॥ आगे इन्द्रियमार्गणा और कायमार्गणामें सत्त्वादि कहते है- ओघं पंचक्खतसे सेसिंदियकायगे अपुण्णं वा । तेउद्गे ण णराऊ सवत्युवेल्लणावि हवे ॥ ३४९ ॥ १६ . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १२२ ओषः पञ्चाक्षत्रसे शेषेन्द्रियकायके अपूर्ण वा । तेजोद्विके न नरायुः सर्वत्रोद्वेल्लनापि भवेत् ।। ३४९ ॥ अर्थ-पंचेन्द्री और त्रसकायमें सामान्य गुणस्थानकी तरह १४८ सत्त्व प्रकृतियां हैं। और शेष एकेन्द्री आदि चार इन्द्रियोंमें तथा पृथिवी आदि स्थावरकायमें लब्ध्यपर्याप्तक- की तरह १४५ प्रकृतियोंकी सत्ता जानना, परंतु तेजःकाय और वायुकायमें मनुप्यायुका सत्त्व नही है इसकारण इन दोनोंमें १४४ की सत्ता समझना । तथा सब जगह अर्थात् इन्द्रिय और कायमार्गणामें प्रकृतियोंकी उद्वेलना भी होती है । जैसे जेवड़ीके वटने में बल दियाथा पीछे उलटा घुमानेसे बल (टेढापन ) निकाल दिया । इसीप्रकार जिसप्रकृति- का बंध किया था पीछे परिणामविशेषसे उसको अन्यप्रकृतिरूप परिणमा के उसका नाश कर- दिया अर्थात् फल उदयमें नहीं आने दिया पहलेही नाश करदिया उसे उद्वेलन कहते हैं ॥ ३४९॥ वे कौनसी उद्वेलन प्रकृतियां है ? उन्हीको दिखाते हैं;- हारदु सम्मं मिस्सं सुरदुग णारयचउक्कमणुकमसो। उच्चागोदं मणुङगमुव्वेल्लिजंति जीवहिं ॥ ३५० ॥ आहारद्वि सम्यक् मिश्र सुरद्विकं नारकचतुष्कमनुक्रमशः। उच्चैर्गोत्रं मनुद्विकमुद्वैल्यन्ते जीवैः ।। ३५० ॥ अर्थ-आहारकद्विक, सम्यक्त्वप्रकृति, मिश्रमोहनी, देवगतिका युगल, नरकगति आदि चार, ऊंच गोत्र, और मनुष्यगतिका जोड़ा-ये १३ प्रकृतियां क्रमसे जीवोंकर उद्वेलन की जाती है ॥ ३५० ॥ आगे कौन जीव किस प्रकृतीकी उद्वेलना करता है। इसका उत्तर आचार्य महाराज कहते है। चदुगदिमिच्छे चउरो इगिविगले छप्पि तिणि तेउदुगे । सिय अत्थि णत्थि सत्तं सपदे उप्पण्णठाणेवि ॥ ३५१ ॥ चतुर्गतिमिथ्ये चतस्रः एकविकले षडपि तिस्रः तेजोद्विके । स्यादस्ति नास्ति सत्त्वं स्वपदे उत्पन्नस्थानेपि ॥ ३५१ ।। अर्थ-चारों गतिवाले मिथ्यादृष्टि जीवोंके चार प्रकृतियां, एकेंद्री तथा दो इंद्री आदि विकलत्रयमें ६ प्रकृतियां, तेजःकाय-वायुकाय इन दोनोंके तीन प्रकृतियां, अपने स्थानमें और उत्पन्न स्थानमें किसी तरह सत्त्वरूप हैं, किसी तरह सत्त्वरूप नहीं भी हैं अर्थात् जो उद्वेलना न हुई हो तब सत्त्व, यदि उद्वेलना हुई हो तो उन प्रकृतियोंकी असत्ता जानना ॥ ३५१ ॥ - - , - - .
गोम्मटसारः। १२३ आगे योगमार्गणामें सत्त्व दिखाते हैं;- पुण्णेकारसजोगे साहारयमिस्सगेवि सगुणोघं । वेग्गुधियमिस्सेवि य णवरिण माणुसतिरिक्खाऊ ॥ ३५२ ॥ पूर्णकादशयोगे साहारकमिभकेपि स्वगुणीधः वैगृविकमिशेपि च नवरि न मानुषतिर्यगायुः ॥ ३५२ ॥ अर्थमनोयोगादि ११ पूर्ण योगोंमें और आहारकमिश्र योगमें अपने २ गुणस्थानोंकी तरह सत्त्व प्रकृतियां जानना, इसीप्रकार वैक्रियिक मिश्र योगमें भी गुणस्थानवत् ही सत्त्व जानना, परंतु विशेष बात यह है कि मनुष्यायु और तिर्यंचायु इनकी सत्ता नहीं है इसफारण १४६ सत्त्व प्रकृतियां हैं ।। ३५२ ॥ अब औदारिकमिश्रयोगमें और कार्माणकाययोगमें सत्त्व कहते है- ओरालमिस्सजोगे ओघ सुरणिरयाउगं णत्थि । तम्मिस्सवामगे ण हि तित्थं कम्मेवि सगुणोघं ॥ ३५३ ॥ औरालमिश्रयोगे ओघः सुरनिरयायुष्कं नास्ति । तन्मिश्रवामके न हि तीर्थ कापि स्वगुणौधः ॥ ३५३ ॥ अर्थ-औदारिकमिश्रयोगमें सामान्य गुणस्थानवत् सत्त्व जानना, परंतु देवायु तथा नरकायु ये दो नहीं हैं इस कारण १४६ का सत्व है । औदारिकमिश्रमिथ्यादृष्टिके तीर्थ- कर प्रकृति नहीं, इसलिये पहले गुणस्थानमें १४५ का सत्त्व है । इसीप्रकार कार्माणकाय- योगमें भी गुणस्थानवत् १४८ प्रकृतियोंका सत्त्व समझना ।। ३५३ ॥ आगे वेदमार्गणाआदिकमें सत्त्व कहते है- वेदादाहारोत्ति य सगुणोघं गवरि संढथीखवगे। किण्हदुगसुहतिलेस्सियवामेवि ण तित्थयरसत्तं ॥ ३५४ ॥ वेदादाहार इति च स्वगुणौघः नवरि पण्डखीक्षपके । कृष्णद्विकशुभत्रिलेश्यिकवामेपि न तीर्थकरसत्त्वम् ॥ ३५४ ॥ अर्थ-वेदमार्गणासे लेकर आहारमार्गणापर्यंत अपने २ गुणस्थानवत् सामान्य सत्त्व जानना । परंतु विशेषता यह है कि नपुंसकवेद और स्त्रीवेदक्षपकश्श्रेणीवालेके तीर्थकर प्रकृतिकी सत्ता नहीं है । इसीप्रकार कृष्णलेश्या तथा नीललेश्या इन दो लेश्यावाले मिथ्या दृष्टिके, और पीतादि तीन शुभलेश्यावाले मिथ्यादृष्टिके भी तीर्थंकर प्रकृतिका सत्व नहीं है ।। ३५४ ॥ अब अमव्यमार्गणामें विशेषता कहते है- अभवसिद्ध णत्थि हु सत्तं तित्थयरसम्ममिस्साणं । आहारचउकस्सवि असण्णिजीवे ण तित्थयरं ॥ ३५५ ॥ . T , - . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १२४ अभव्यसिद्धे नास्ति हि सत्त्वं तीर्थकरसम्यग्मिश्राणाम् । आहारचतुष्कस्यापि असंज्ञिजीवे न तीर्थकरम् ॥ ३५५ ।। अर्थ-अभव्यमार्गणामें अर्थात् अभव्यजीवके तीर्थंकरप्रकृति, सम्यक्त्वप्रकृति और मिश्रमोहनीय तथा आहारक चतुष्क अर्थात् आहारक शरीर १ आहारक आंगोपांग २ आहारक बंधन ३ आहारक संघात ४ इन चारका-इस प्रकार सात प्रकृतियोंका सत्त्व नही है। और असंज्ञी जीवके तीर्थकरप्रकृतिका सत्त्व नहीं है ॥ ३५५॥ आगे अनाहार मार्गणामें सत्त्वकी विशेषता कहते हुए आचार्य महाराज सत्त्वाधिकारको पूर्ण करते है- कम्मेवाणाहारे पयडीणं सत्तमेवमादेसे । कहियमिणं वलमाहवचंदचियणेमिचंदेण ॥ ३५६ ॥ कामें एवानाहारे प्रकृतीनां सत्त्वमेवमादेशे। कथितमिदं बलमाधवचन्द्रार्चितनेमिचन्द्रेण ॥ ३५६ ॥ अर्थ-अनाहार मार्गणामें कार्माण काययोगवत् सत्त्वप्रकृतियोंकी रचना जानना । इसप्रकार मार्गणास्थानों में यह " प्रकृतियोंका सत्त्व " बलदेव-वासुदेवकर पूजित श्रीनेमि- चन्द्र तीर्थकरदेवने अथवा अपने भाई बलदेव तथा माधवचन्द्र ढविद्यदेवकर पूजित नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्तीने कहा है ॥ ३५६ ॥ अब इस बंध उदय सत्त्वाधिकारको पूर्ण करते हुए अन्तिम मङ्गलाचरण करते हैं;- सो मे तिहुवणमहियो सिद्धो बुद्धो णिरंजणो णिचो । दिसटु वरणाणलाई बुहजणपरिपत्थणं परमसुद्धं ॥ ३५७ ॥ स मे त्रिभुवनमहितः सिद्धो बुद्धो निरजनो नित्यः । दिशतु वरज्ञानलाभं बुधजनपरिप्रार्थनं परमशुद्धम् ॥ ३५७ ॥ अर्थ-आचार्य महाराज प्रार्थना करते है कि जो तीनलोककर पूजित, सिद्ध, बुद्ध, कर्मरूपी अंजनकर रहित और नित्य अर्थात् जन्ममरण रहित ऐसे श्रीनेमिचन्द्र तीर्थकर मुझको ज्ञानीजनोंकर प्रार्थना करने योग्य, परमशुद्ध ऐसा उत्कृष्ट ज्ञानका लाभ देवी अर्थात् मुझे उत्कृष्ट ज्ञान होवे ऐसी आचार्य प्रार्थना करते हैं ॥ ३५७ ॥ इति आचार्य श्रीनेमिचन्द्रविरचित गोम्मटसार दूसरा नाम पंचसंग्रहग्रंथमे कर्मकांडमें बंधोदयसत्त्वके कहनेवाला दूसरा अधिकार पूर्ण हुआ ॥२॥ + १ , ।
१२५ गोम्मटसारः। आगे आचार्य महाराज मङ्गलाचरणपूर्वक प्रकृतियोंके भनसहित सत्त्वस्थान कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं:- णमिऊण वड्डमाणं कणयणिहं देवरायपरिपुजं । पयडीण सत्तठाणं ओघे भंगे समं वोच्छं ॥ ३५८ ॥ नत्वा वर्द्धमानं कनकनिभं देवराजपरिपूज्यम् । प्रकृतीनां सत्त्वस्थानमोघे भङ्गेन समं वक्ष्यामि ।। ३५८ ॥ अर्थ-मैं ग्रन्थकर्ता सुवर्णके समान वर्णवाले, इन्द्रकर पूजनीक ऐसे श्रीवर्धमान तीर्थ- कर देवको नमस्कार करके । भङ्गसहित प्रकृतियोंके सत्त्वस्थानको गुणस्थानोंमें कहता हूं ॥३५८॥ एक जीवके एक कालमें जितनी प्रकृतियोंकी सत्ता पावै उनके समूहका नाम स्थान है। और जिस जगह एकसी संख्यारूप प्रकृतियोंमें बदलना हो उसे भङ्ग कहते है। जैसे किसी जीवके १४६ की सत्ता और किसीके १४५ प्रकृतियोंकी सत्ता पावै तो इस जगह पर दो स्थान हुए। परंतु उसी संख्यामें किसी जीवके तो मनुष्यायु तथा देवायु सहित १४५ की सत्ता है। किसीके तिर्यंचायु और नरकायुकी सत्ता सहित १४५ की सत्ता है, यहांपर स्थान तो एक हुआ क्योंकि संख्या एक है। परंतु प्रकृतिके बदलनेसे भङ्ग दो हुए। इसप्रकार सब जगह स्थान और भङ्ग समझलेना ॥ आगे गुणस्थानोंमे स्थान और भड़के कहनेका विधान दिखाते है आउगवंधावंधणभेदमकाऊण वण्णणं पढमं । भेदेण य भंगसमं परूवणं होदि बिदियम्हि ॥ ३५९ ॥ आयुष्कवन्धावन्धनभेदमकृत्वा वर्णनं प्रथमम् । भेदेन च भगसमं प्ररूपणं भवति द्वितीयस्मिन् ॥ ३५९ ॥ अर्थ-इस जगह आयुके बंध अथवा अबंधके भेदको नही करके पहला वर्णन है । तथा दूसरे कथनमें आयुबंधके भेद सहित कथन है ऐसा जानना ॥ ३५९ ॥ अब दोनों पक्षोंमेंसे सामान्य प्रथमपक्षके अनुसार सत्ताका विधान कहते है, सव्वं तिगेग सव्वं चेगं छसु दोण्णि चउसु छद्दस य दुगे। छस्सगदालं दोसु तिसठ्ठी परिहीण पडि सत्तं जाणे ॥३६०॥ सर्व त्रिकैकं सर्व चैकं षट्सु द्वयं चतुर्पु षद् दश च द्विके । षद्सप्तचत्वारिंशत् द्वयोः त्रिषष्टिः परिहीनं प्रति सत्त्वं जानीहि ॥ ३६० ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि चौदह गुणस्थानोंमें क्रमसे पहलेमें सब १४८ का, दूसरेमें तीन कमका, तीसरेमें एक कमका, चौथेमें सबका, पाचवेंमें एक कमका, प्रमत्तादि छह गुणस्थानोंमें दो कमका उसमें भी उपशम श्रेणीकी अपेक्षा अपूर्वकरणादि चारगुणस्थानोंमें छह कमका, क्षपणश्रेणीकी अपेक्षा अपूर्वकरणादि दो गुणस्थानोंमें दश कमका सूक्ष्मसांपराय
१२६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
तथा क्षीणकषाय इनदोमें क्रमसे ४६ और ४७ कमका, सयोग केवली अयोग केवली इन
दो गुणस्थानोंमें ६३ कमका अर्थात् ८५ प्रकृतियोंका सत्त्व जानना। और "च" से अयोग-
केवलीके अंत समयमें १३५ विना १३ प्रकृतियोंका सत्त्व है ।। ३६० ।।
आगे जो प्रकृतियां हीन कीगईथीं उनको कहते है:-
सासणमिस्से देसे संजददुग सामगेसु णत्थी य ।
तित्थाहारं तित्थं णिरयाऊ णिरयतिरियाउअणं ॥३६१ ॥
सासादन मिश्रे देशे संयतद्विके शामकेषु नास्ति च ।
तीर्थाहारं तीर्थ निरयायुः निरयतिर्यगायुरनम् ।। ३६१ ।।
अर्थ-सासादन गुणस्थानमें, मिश्रमें, देशसंयतमें, प्रमत्तसंयतादि दोमें, उपशमश्रेणीवाले
गुणस्थानोंमें, क्रमसे तीर्थकर १ आहारक शरीर २ आहारकांगोपांग३ ये तीन, तीर्थकर
प्रकृति, नरकायु, नरक-तिवैचायु, नरकायु १ तियेचायु २ अनंतानुबंधीकी चौकड़ी ये ६
प्रकृतियां, सत्व प्रकृतियोंमेंसे नहीं है ॥ ३६१ ॥
अब गुणस्थानोंमें आयुके बंध अबंधका भेदसहित विशेष कथन करते हुए पहले स्थान-
संख्याको दो गाथाओंसे कहते है:-
विगुणणव चारि अर्ट मिच्छतिये
अयदचउसु
चालीसं।
तिय उवसमगे संते चउवीसा होंति पत्तेयं ॥ ३६२ ॥
चउछक्कदि चउअटुं चउछक्क य होंति सत्तठाणाणि ।
आउगवंधावंधे अजोगिते तदो भंगा ॥ ३६३ ॥ जुम्मं ।
द्विगुणनव चत्वारि अष्ट मिथ्यत्रये अयतचतुर्पु चत्वारिशत् ।
त्रीणि उपशामके शान्ते चतुर्विंशतिः भवन्ति प्रत्येकम् ॥ ३६२ ।।
चतुःषकृतिः चतुरष्ट चतुःषट्वं च भवन्ति सत्त्वस्थानानि ।
आयुष्कवन्धाबन्धे अयोग्यन्ते ततो भङ्गाः ॥ ३६३ ॥ युग्मम् ।
अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि तीन गुणस्थानपर्यंत दोगुणित नौ अर्थात् १८, ४ सत्त्वस्थान
हैं। तथा असंयतादि चारगुणस्थानोंमें चालीस चालीस स्थान है । अपूर्वकरणादि तीन
उपशमश्रेणीवाले गुणस्थानों में तथा उपशांतकषाय गुणस्थानमें प्रत्येक (हरएक) के चौवीस
२ स्थान हैं । और क्षपणश्रेणीकी अपेक्षा अपूर्वकरणआदि अयोगीपर्यंत ४, छहका वर्ग
अर्थात् ३६, ४, ८, ४, ६ सत्त्वस्थान है । इसप्रकार आयुके बंध वा अबंधकी अपेक्षासे
अयोगीपर्यंत गुणस्थानों में सत्त्वस्थान हैं। इसके आगे स्थानोंके भङ्ग ( भेद.) हैं सो
आगेकी गाथामें कहते है ।। ३६२ ॥ ३६३ ॥
पण्णास वार छक्कदि वीससयं अट्ठदाल दुसु दालं ।
अडचीसा वासही अडचउवीसा य अह चउ अट्ठ॥ ३६४ ॥
गोम्मटसारः। १२७ पञ्चाशत् द्वादश षट्कृतिः विंशशतं अष्टचत्वारिंशत् द्वयोः चत्वारिंशत् । अष्टाविंशतिः द्वापष्टिः अष्टचतुर्विंशतिः च अष्ट चत्वारि अष्ट ॥ ३६४ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टिआदि सातगुणस्थानोंमे तथा उपशमादि दोनों मिली हुई श्रेणियों में तथा उपशांतकषायादि गुणस्थानोंमें अठारहआदि स्थानोंके क्रमसे ५०, १२,३६,१२०, ४८, ४०, ४०, २८, ६२, २८, २४, ८, ४, ४, भंग जानना ॥ ३६४॥ आगे मिथ्यादृष्टि गुणस्थानके १८ स्थानोंमें प्रकृतियोंकी संख्याको आयुके बंध वा अबंधकी अपेक्षासे कहते हैं- दुतिछस्सत्तट्टणवेकरसं सत्तरसमूणवीसमिगिवीसं । हीणा सबे सत्ता मिच्छे बद्धाउगिदरमेगूणं ॥ ३६५ ॥ द्वित्रिषट्सप्ताष्टनवैकादश सप्तदशोनविंशमेकविशम् । हीना सर्वा सत्ता मिथ्ये बद्धायुष्कमितरदेकोनम् ॥ ३६५ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि बद्धायुवालेके सब सत्वप्रकृतियोंमेंसे २, ३,६,७,८, ९, ११,१७, १९, २१, प्रकृतियां कमकरनेसे १० स्थान हुए । तथा अबद्धायुवालेके आठ स्थानतक इनमेंसे भी एक एक कमती करना और दो स्थान पहलेकी तरह समझना । इसप्रकार १० स्थान हुए, सब मिलकर २० स्थान होते है । उनमेंसे नवमां दशवां स्थान दोनोंका समान होनेसे २० मेंसे दो कम किये इसतरह वाकी वचे १८ स्थान ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थानके कहे गये है ॥ ३६५॥ अब उन कम कीहुई प्रकृतियोंको दो गाथाओंसे कहते है- तिरियाउगदेवाउगमण्णदराउगदुगं तहा तित्थं । देवतिरियाउसहिया हारचउक्कं तु छच्चेदे ॥ ३६६ ॥ आउद्गहारतित्थं सम्मं मिस्सं च तह य देवदुर्ग । णारयछकं च तहा णराउउचं च मणुवदुगं ॥३६७॥ जुम्मं । तिर्यगायुष्कदेवायुष्कमन्यतरायुष्कद्विकं तथा तीर्थम् । देवतिर्यगायुस्सहितमाहारचतुष्कं तु षद्वैताः ॥ ३६६ ।। आयुद्विकाहारतीर्थ सम्यं मिनं च तथा च देवद्विकम् । नारकषवं च तथा नरायुरुवं च मानवद्विकम् ।। ३६७ ॥ युग्मम् । अर्थ-मिथ्यादृष्टिके स्थानोंकी कम कीगई प्रकृतियां क्रमसे तिर्यंचायु १ देवायु २, भुज्यमान बध्यमान आयुसे रहित कोईभी दो आयु और तीर्थंकर प्रकृतिये तीन, देवायु तिर्यंचायु और आहारककी चौकड़ी ये छह, कोईभी दो आयु–आहारकचतुष्क-तीर्थकर प्रकृतिये सात, इन सातमें सम्यक्त्वप्रकृतिभी ८, मिश्रप्रकृतिमी ९, देवगतिका जोड़ा ११, नरकगतिआदि छह ( नरकगति १ नरकगत्यानुपूर्वी २ वैक्रियिक शरीर ३ उसके १२८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आंगोपांग ४ उसीका बंधन ५ तथा संघात ६)१७, और नरकायु-उच्चगोत्र ये दोमी १९, तथा देवगति आदि दो और भी मिलाकर २१ ये सब जानना ।। ३६६ ।। ३६७ ॥ इसप्रकार वद्धायुके ये १० स्थान कहे । अबद्धायुवालेके भुज्यमान (जिसको भोग रहा है वह ) आयुकी ही सत्ता है, वध्यमान (बंध कीगई आगामी) आयुकी सत्ता उसके नही है, इसकारण बद्धायुके स्थानोंमें एक एक बध्यमान आयुकर हीन ऐसे अव- द्धायुकेभी दशस्थान जानना । उनमेंसे दोबार एकसे कहेहुए स्थान घटाकर वाकी १८ स्थान मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें समझना । इन १८ स्थानोंके ५० भंगोका विस्तार बड़ी टीकासे समझलेना, विस्तरके भयसे यहांपर नहीं लिखा ॥ अब मिथ्यादृष्टिके कोई कोई स्थानके भंग कहते हुए अवद्धायुके सातवें स्थानके चार भंग दो गाथाओंसे कहते है।--- उबेल्लिददेवढुगे विदियपदे चारि भंगया एवं । सपदे पढमो विदियं सो चेव णरेसु उप्पण्णो ॥ ३६८ ॥ वेगुवअट्टरहिदे पंचिंदियतिरियजादि सुबवण्णे । सुरछब्बंधे तदियो णरेसु तन्नधणे तुरियो ।। ३६९ ॥ जुम्म। उद्वेलितदेवद्विके द्वितीयपदे चत्वारो भगा एवम् । खपदे प्रथमो द्वितीयः स चैव नरेपु उत्पन्नः ॥ ३६८ ॥ वैगूर्वाप्टरहिते पञ्चेन्द्रियतिर्यग्जातियूपपन्ने । सुरपट्टन्धे तृतीयो नरेषु तद्वन्धने तुरीयः ।। ३६९ ॥ युग्मम् । अर्थ-बद्धायुके सातवें स्थानसे दूसरा अबद्धायुका सातवां स्थान है वहां जिसके देव- गतिआदि दो प्रकृतियोंकी उद्वेलना हुई है उसके चार भंग है। वे इसतरहसे हैं-अपने स्थानमें अर्थात् एकेन्द्री वा विकलत्रय जीवके अपनी ही पर्यायमें १३६ प्रकृतिरूपस्थान होना पहलाभंग है, तथा वही जीव मरणकरके मनुष्य उत्पन्न हुआ उस जगह दूसरा भंग है, जिसके बैंक्रियिक शरीरादि आठकी उद्वेलना ( अभाव ) हुई ऐसा वही एकेन्द्री वा विकलत्रय जीव मरणकरके तिथेच पंचेन्द्री जातिमें उत्पन्न हुआ और वहां देवगतिआदि छह प्रकृतियोंका बंध करनेपर १३६ प्रकृतिरूप तीसरा भंग हुआ, वही जीव मरणकरके मनुप्य उत्पन्न हुआ पर देवगतिआदि छह प्रकृतियोंका वंध करता है उस जगह चौथा भंग हुआ। इसप्रकार चार मंग जानना ॥ ३६८ ॥ ३६९ ॥ यहांपर प्रकृतियोंके बदलनेसे भंग तो जुदे २ हुए परंतु संख्या एक होनेसे स्थान एक एक ही हुआ । अब आठवें अबद्धायुस्थानके दो भंग कहते हैं- गारकछकुम्बेल्ले आउगवंधुज्झिदे दुभंगा हु। इगिविगलेसिगिभंगो तम्मि णरे विदियमुप्पण्णे ॥ ३७० ॥ .
, गोम्मटसारः। १२९ नारकपकोद्वैल्ये आयुर्बन्धोज्झिते द्विभगौ हि । एकविकलेवेकभङ्गः तस्मिन्नरे द्वितीयमुत्पन्ने ॥ ३७० ।। अर्थ-आठवें अबद्धायुस्थानमें आयुबंधके बदलनेसे दो भंग होते है। उनमेंसे नरक- गतिआदि प्रकृतियोंकी उद्वेलना करनेवाले एकेन्द्री वा विकलेन्द्री जीवके अपनी ही 'पर्यायमें १३० प्रकृतिरूपस्थान होना पहला भंग है, तथा वही जीव मरणकर मनुष्य उत्पन्न हुआ वहां आयुके बदलनेसे १३० रूपस्थान होना दूसरा भंग है ॥ ३७० ॥ आगे इन अठारह स्थानोंके पुनरुक्त और समभंगके विना जो ५० भंग कहे है उनकी संख्या कहते है। विदिये तुरिये पणगे छठे पंचेव सेसगे एक । विगचउपणछस्सत्तयठाणे चत्तारि अट्टगे दोषिण ॥ ३७१॥ द्वितीये चतुर्थे पञ्चमे षष्ठे पञ्चैव शेषके एकः । द्विकचतुःपञ्चषट्सप्तमस्थाने चत्वारः अष्टमे द्वौ ॥ ३७१ ॥ अर्थ-बद्धायुके दूसरे, चौथे, पांचवें, छठे, स्थानमें ५ पांच ही भंग होते है। और शेष पहले, तीसरे, सातवें, आठवें, नवमे, दशवें स्थानमें एक एक ही भंग है । तथा अबद्धायुके दूसरे, चौथे, पांचवें, छठे, सातवें स्थानमें चार २ भंग और आठवें स्थानमें २ भंग है; और शेष क्चे पहले, तीसरे स्थानमें एक एक भंग है। इसप्रकार मिथ्यादृष्टिमें अठारह सत्त्व स्थानोंके ५० भंग जानना ॥ ३७१ ॥ अब सासादनगुणस्थान तथा मिश्रगुणस्थानमें स्थान और भंगोंकी संख्या चार गाथा- ओंसे कहते है:- सत्ततिगं आसाणे मिस्से तिगसत्तसत्तएयारा । परिहीण सवसत्तं बद्धस्सियरस एगूणं ॥ ३७२ ॥ सप्तत्रिकमासाने मिश्रे त्रिकसप्तसप्तैकादश । परिहीनं सर्वसत्त्वं बद्धस्येतरस्यैकोनम् ॥ ३७२ ॥ अर्थ-सासादन गुणस्थानमें सब प्रकृतियोंके सत्त्वमेंसे सात कम अथवा तीन कम ऐसे दो सत्त्वस्थान है। और मिश्रगुणस्थानमें सव सत्त्वप्रकृतियोंमेंसे तीन कम, सात कम, सात कम, ग्यारह कम ऐसे चार स्थान बद्धायुकी अपेक्षा जानना। और अबद्धायुकी अपेक्षा उनमेसेभी एक एक बध्यमानआयु कम स्थान जानने । इसप्रकार ४ सासादनके और ८ मिश्रके हुए ॥ ३७२ ॥ आगे सासादनकी हीन प्रकृतियोंको कहते है,- तित्थाहारचउकं अण्णदराउगदुगं च सत्तेदे । हारचउकं वज्जिय तिण्णि य केई समुद्दिडं ॥ ३७३ ॥ ५ १७ १३० रायचन्द्रजैनशासमालायाम् । तीर्थाहारचतुष्कमन्यतरायुष्कद्विकं च सप्तैताः । आहारचतुष्कं वर्जयित्वा तिस्रश्च कैश्चित् समुद्दिष्टम् ॥ ३७३ ॥ अर्थ-तीर्थकर प्रकृति, आहारक शरीरकी चौकडी, भुज्यमान-बध्यमान आयुके सिवाय कोईभी दो आयु, ये सात प्रकृतिया हीन कही है । तथा इनमेंसे आहारक शरी- रादि चार प्रकृतियोंको छोड़कर तीनही प्रकृतियां कम हैं ऐसा कोई आचार्य कहते हैं। इसलिये १४१ तथा १४५ प्रकृतिरूप दो स्थान हुए ॥ ३७३ ॥ अब मिश्रगुणस्थानकी हीनप्रकृतियोंको कहते है- तित्थण्णदराउद्गं तिण्णिवि अणसहिय तह य सत्तं च । हारचउक्के सहिया ते चेव य होंति एयारा ॥ ३७४ ॥ तीर्थान्यतरायुर्द्विकं तिन अपि अनसहिताः तथा च सत्त्वं च । आहारचतुष्केण सहितास्ताः चैव च भवन्ति एकादश ।। ३७४ ।। अर्थ-तीर्थकर प्रकृति, भुज्यमान और बध्यमान आयुको छोड़कर कोईभी दो आयु, इस प्रकार तीन प्रकृतियां; तथा ये तीनों और अनंतानुबंधी चार प्रकृतियां इसतरह सात, अथवा वे तीनों तथा आहारकादि चार-इसप्रकार सात, और ये सब मिलकर हुई ११ प्रकृतियां-इसतरहसे मिश्रगुणस्थानके चार स्थान हुए ॥ ३७४ ॥ आगे सासादन और मिश्रके स्थानोंके भंग गिनाते है; साणे पण इगि भंगा वद्धस्सियरस्स चारि दो चेव । मिस्से पणपण भंगा बद्धस्सियरस्स चउ चऊ णेया ॥३७५॥ साने पञ्च एको भङ्गा बद्धस्येतरस्य चत्वारो द्वौ चैव । मिश्रे पञ्चपञ्च भङ्गा बद्धस्येतरस्य चत्वारश्वत्वारो ज्ञेयाः॥ ३७५ ॥ अर्थ-सासादन गुणस्थानमें बद्धायुस्थानोंके पांच और एक, तथा अबद्धायुस्थानोंके ४ और २ भंग है । इसतरह चारस्थानोंके १२ भंग जानना । मिश्रगुणस्थानमें बद्धायु- स्थानके पांच पांच भंग और अबद्धायु स्थानके चार चार भंग है। इसप्रकार आठस्थानोंके ३६ भंग हुए ॥ ३७५॥ आगे असंयत गुणस्थानमें ४० स्थानोंकी सिद्धि और उनस्थानोंके १२० भंग छह गाथाओंसे कहते है,- • दुग छक सत्त अटुं णवरहियं तह य चउपडि किच्चा। णभमिगि चउ पण हीणं वद्धस्सियरस्स एगणं ॥ ३७६ ॥ द्विकं षटुं सप्त अट्ठ नवरहितं तथा च चतुःपतीः कृत्वा । नभमेकं चतुष्कं पञ्च हीनं बद्धस्येतरस्यैकोनम् ॥ ३७६ ।। अर्थ-दो, छह, सात, आठ, नौ प्रकृतियोंकर रहित स्थान बराबर लिखना और इनकी .
गोम्मटसारः। . १३१ नीचे नीचे चार पट्टी करनी, उन चार पंक्तियोंमें ( लाइनोंमें ) क्रमसे शून्य, १, ४, और ५ हरएक कोठेमेंसे घटाना । इसप्रकार बद्धायुके २० सत्तास्थान हुए । और इन्हीं वीसस्थानोंमें एक एक स्थानकी प्रकृतियोंमें एक एक औरभी कम करनेसे अबद्धायुके स्थानभी २० हुए । इसप्रकार असंयत गुणस्थानमें ४० सत्त्व स्थान हुए ॥ ३७६ ॥ आगे चारों पंक्तियों में तीर्थकरप्रकृति और आहारकशरीरप्रकृतिकी अपेक्षाही विशेषता है ऐसा कहते है,- तित्थाहारे सहियं तित्थूणं अह य हारचउहीणं । तित्थाहारचउक्केणूणं इति चउपडिहाणं ॥ ३७७ ॥ तीर्थाहारेण सहितं तीर्थोनमथ चाहारचतु_नम् । तीर्थाहारचतुष्केनोनमिति चतुःपतिस्थानम् ।। ३७७ ।। अर्थ-बद्धायु और अबद्धायुकी पहली दोपनियोंके पांच पांच स्थान तीर्थकर और आहारक शरीरचतुष्क सहित है, इसलिये शून्य कम किया अर्थात् जितनी प्रकृतियोंकी योग्यता है उतनी रहती है । दूसरी दोपंक्तियोंमें तीर्थकर प्रकृति न होनेसे एक एक कमती की। तीसरी पंक्तिके पांच पांच स्थान आहारक चतुष्क रहित है इसकारण चार चार प्रकृतियां कम की । चौथी पंक्तिमें तीर्थकर और आहारक चतुष्क ये पांच प्रकृतियां न होनेसे पांच पांच प्रकृति कम कही । इस प्रकार चार पंक्तिरूप स्थान जानना ॥३७७॥ आगे दो छहआदि जो प्रकृतियां घटाईथी उनके नाम कहते है, अण्णदरआउसहिया तिरियाऊ ते च तह य अणसहिया । मिच्छं मिस्सं सम्म कमेण खविदे हवे ठाणा ॥ ३७८ ॥ अन्यतरायुःसहितं तिर्यगायुः ते च तथा च अनसहिते। मिथ्यं मिश्रं सम्यक्त्वं क्रमेण क्षपिते भवेत् स्थानम् ॥ ३७८ ॥ अर्थ-तिर्यचायुसे भिन्न कोईएक आयु और तिर्यचायु ये दोप्रकृतियां, ये दोनों तथा अनंतानुबंधी चार-इसप्रकार ६, मिथ्यात्व सहित ७, मिश्रमोहनीय सहित ८, सम्यक्त्व प्रकृति सहित ९, इन प्रकृतियोंको क्रमसे कम करनेपर स्थान होते है ॥ ३७८ ॥ आगे इन स्थानोंके भंग दो गाथाओंसे कहते है,- आदिमपंचहाणे दुगद्गभंगा हवंति बद्धस्स । इयरस्सवि णादचा तिगतिगइगि तिण्णितिण्णेव ॥ ३७९ ॥ आदिमपञ्चस्थाने द्विकद्विकभनौ भवतः बद्धस्य । इतरस्यापि ज्ञातव्याः त्रिकत्रिकैकं त्रयस्त्रय एव ॥ ३७९ ॥ अर्थ-पहली पंक्तिके बद्धायु संबंधी पांच स्थानोमें दो दो भंग हैं । इससे दूसरे अबद्धायुके पांचस्थानोंमें क्रमसे ३, ३, १, ३, ३, ही भंग जानना ॥ ३७९ ।। *- + . १३२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । विदियस्सवि पणठाणे पण पण तिग तिणि चारि बद्धस्स । इयरस्स होति णेया चउचउइगिचारि चत्तारि ॥ ३८.।। द्वितीयस्यापि पञ्चस्थाने पञ्च पञ्च त्रिकं त्रयः चत्वारः बद्धस्य । इतरस्य भवन्ति जेया चतुश्चतुरेकचत्वारः चत्वारः ।। ३८० ।। अर्थ-दूसरी पंक्तिके भी वद्धायुके पांच स्थानोंमें क्रमसे ५, ५, ३, ३, ४ भंग हैं । तथा दूसरे अबद्धायुके पांच स्थानोंमें क्रमसे ४, ४, १, ४, ४ भंग हैं ॥ ३८० ।। आदिल्लदससु सरिसा भंगेण य तिदियदसयठाणाणि । विदियस्स चउत्थस्स य दसठाणाणि य समा होति ॥३८॥ आधदशसु सदृशा भङ्गेन च तृतीयदशकस्थानानि । द्वितीयस्य चतुर्थस्य च दशस्थानानि च समानि भवन्ति ॥ ३८१ ॥ अर्थ-पहलीपंक्तिके दशस्थानोंके भंगोंके समान तीसरी पंक्तिके दशस्थानोंके भंग होते है । तथा दूसरी पंक्तिके दशस्थानोंके भंगोंके समान चौथी पंक्तिके दशस्थानों के भंग समझना । इसप्रकार सब मिलकर असंयत गुणस्थानमें ४० सत्त्वस्थानोंके १२० भंग हुए ॥ ३८१ ॥ अब देशसंयतादि तीनगुणस्थानों में स्थान और भंग कहते हैं- देसतियेसुवि एवं भंगा एकेक देसगस्स पुणो । पडिरासि विदियतुरियस्सादीविदियम्मि दो भंगा ॥३८२॥ देशत्रयेष्वपि एवं भङ्गा एकैकं देशकस्य पुनः । प्रतिराशि द्वितीयचतुर्थस्यादिद्वितीयस्मिन् द्वौ भङ्गौ ।। ३८२ ।। अर्थ-इसीतरह असंयतगुणस्थानके समान देशविरतादि तीनस्थानोंमेंभी चालीस २ सत्त्वस्थान जानने और सब स्थानोंमें एक एक भंग है परंतु देशसंयत गुणस्थानमें दूसरी दो पंक्ति तथा चौथी दो ( बद्धायु-अबद्धायुरूप ) पंक्तियोंके पहले और दूसरे स्थानमें दो दो भंग जानना ॥ ३८२ ॥ आगे उपशमश्रेणीके चार गुणस्थानोंमें स्थान-भंग कहनेकी इच्छावाले आचार्य पहले अपूर्वकरणमें स्थान-भङ्गोंको कहते है:- दुगछक्कतिण्णिवग्गेणूणापुवस्स चउपडि किच्चा । णभमिगिचउपणहीणं बद्धस्सियरस्स एगूणं ॥ ३८३ ॥ द्विकषत्रिवर्गेनोनानि अपूर्वस्य चतुःप्रतिं कृत्वा । नभैकचतुःपञ्चहीनं वद्धस्थेतरस्यैकोनम् ॥ ३८३ ॥ अर्थ-उपशमश्रेणीके अपूर्व करण गुणस्थानमें दो, छह, तीनकावर्ग अर्थात् नौ प्रकृति गोम्मटसारः १३३ कम जो तीन स्थान है उनकी चार पंक्तियां करके पंक्तिके क्रमसे शून्य, एक, ४, पांच कम करै तो बद्धायुके स्थान होते है। और इतर अर्थात् अबद्धायुके स्थान उनमें से भी एक एक प्रकृति कम करनेपर होते है । इसतरह २४ स्थान हुए ॥ ३८३ ॥ अब कम कीहुई प्रकृयोंके नाम और भंग कहते है। णिरयतिरियाउ दोण्णिवि पढमकसायाणि दंसणतियाणि । हीणा एदे णेया भंगे एकेकगा होंति ॥ ३८४ ॥ निरयतिर्यगायुपी द्वे अपि प्रथमकषाया दर्शनत्रीणि । हीनानि एतानि ज्ञेयानि भगा एकैकका भवन्ति ॥ ३८४ ॥ अर्थ-नरकायु और तिर्यंचायु-ये दो, येभी दोनों और पहली ( अनंतानुबंधी) चार कषाय-ये ६, तथा तीन दर्शन मोहनीय भी सब ९, इसप्रकार इन प्रकृतियोंसे हीन स्थान जानने । और इनके भंग एक एकही होते है ॥ ३८४ ॥ आगे वाकीवचे तीन उपशमक गुणस्थानोंमें और क्षपकश्रेणीके अपूर्वकरण गुणस्थानमें स्थान तथा भंग कहते है- एवं तिसु उवसमगे खवगापुवम्मि दसहि परिहीणं । सव्वं चउपडि किच्चा णभमेकं चारि पण हीणं ॥ ३८५ ॥ एवं त्रिषु उपशमकेषु क्षपकापूर्वे दशभिः परिहीनम् । सर्व चतुःप्रतिकं कृत्वा नभमेकं चत्वारि पञ्च हीनम् ।। ३८५ ॥ अर्थ-इस उपशमकअपूर्व करणकी तरह उपशमक अनिवृत्तिकरणादि तीन गुण- स्थानोंमें सत्त्वस्थान और भंग चौवीस चौवीस जानना । तथा क्षपक अपूर्व करणमें १० प्रकृतियों रहित स्थानकी चारपंक्तियां करके पंक्तिके क्रमसे पहलेकी तरह शून्य, १, ४, ५, प्रकृतियां कम करना चाहिये । इसतरह चार स्थान और चार ही भंग होते हैं॥३८५॥ अब क्षपक अनिवृत्तिकरणमें स्थान और भंग कहते है। एदे सत्तहाणा अणियहिस्सवि पुणोवि खविदेवि । सोलस अटेकेक छक्ककं एकमेक तहा ॥ ३८६ ॥ एतानि सत्त्वस्थानानि अनिवृत्तेरपि पुनरपि क्षपितेपि । षोडशाष्टैकैकं षट्कैकमेकमेकं तथा ॥ ३८६ ॥ अर्थ-ये जो क्षपक अपूर्वकरणमें चार स्थान कहे है वे क्षपक अनिवृत्तिकरणमें भी जानना । और इसीप्रकार १६, ८, १, १, ६, १, १, १, प्रकृति कम करनेसे आठ स्थान अन्य भी होते है। इनकीभी चार पंक्तियां करके पूर्ववत् क्रमसे शून्यादि घटानेपर ३२ मेद होजाते है । इसप्रकार ४+३२ मिलकर अपूर्वकरण क्षपकके स्थान ३६ हुए, ऐसा जानना ।। ३८६ ॥ , , १३४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अब इन स्थानोंके भंग दोगाथाओंसे कहते हैं;- भंगा एकेका पुण णउंसयक्सविदचउसु ठाणेसु । विदियतुरियेसु दो दो भंगा तित्थयरहीणेसु ॥ ३८७ ।। भंगाः एकैकः पुनः नपुंसकक्षपितचतुर्यु स्थानेषु । द्वितीयतुरीययोः द्वौ द्वौ भङ्गौ तीर्थकरहीनयोः ॥ ३८७ ।। अर्थ-इन ३६ स्थानोंमें एक एक भंग है, परंतु जहांपर नपुंसक वेदका क्षय है ऐसे चारों स्थानोंमें और तीर्थकर प्रकृतिकी सत्ता रहित पहली और चौथी पंक्तिके दो स्थानों में दो दो भंग है ॥ ३८७ ॥ यही कहते है- थीपुरिसोदयचडिदे पुच्चं संढ खवेदि थी अस्थि । संढस्सुदये पुन्वं थीखविदं संढमत्थित्ति ॥ ३८८ ।। स्त्रीपुरुषोदयचटिते पूर्व पण्डं क्षपयति स्त्री अस्ति । पण्डस्योदये पूर्व स्त्रीक्षपितं पण्ढमस्तीति ॥ ३८८ ।। अर्थ-जो जीव स्त्रीभाववेद अथवा पुरुषवेदके उदयसहित क्षपकश्रेणी चढते है वे पहले नपुंसकभाववेदका क्षय करते हैं, स्त्रीवेदकी तो सत्ता वहां पर मौजूद रहती है। और नपुंसकवेदके उदयसहित जो क्षपकश्रेणी चढते है वे पहले स्त्रीवेदका तो क्षय करते हैं, उनके पूर्व कहे दो स्थानों में नपुंसक वेदकी सत्ता रहती है । इस प्रकार दो स्थानोंके दो दो भंग है ऐसा होनेपर ३६ स्थानोंके ३८ भंग हुए ॥ ३८८ ॥ आगे क्षपक सूक्ष्मसांपराय और क्षीणकषाय गुणस्थानमें स्थान तथा भंगोंको कहते है:- अणियट्टिचरिमठाणा चत्तारिवि एकहीण सुहुमस्स । ते इगिदोण्णिविहीणं खीणस्सवि होति ठाणाणि ॥३८९॥ अनिवृत्तिचरमस्थानानि चत्वार्यपि एकहीनं सूक्ष्मस्य । तानि एकद्विविहीनं क्षीणस्यापि भवन्ति स्थानानि ॥३८९ ॥ अर्थ-अनिवृत्तिकरण गुणस्थानके अंतके जो चारस्थान कहे थे उनमेंसे हरएकमें संज्वलन माया कषाय कमकरके सूक्ष्मसापरायगुणस्थानके चार स्थान होते हैं । और सूक्ष्मसांपरायके चारों स्थानोंमेंसे प्रत्येकमें एक संज्वलन लोभ प्रकृति घटानेपर क्षीणकषाय गुणस्थानके अंतके दूसरे समयमें चार स्थान होते है। तथा इन्हीं चारों स्थानोंमें निद्रा- प्रचला, ये दो प्रकृतियां कमकरनेसे इसी गुणस्थानके अंतके समयमें चारस्थान होते हैं। इस प्रकार आठ स्थान क्षीणकषायके जानना ॥ ३८९ ॥ ।
गोम्मटसारः। १३५ आगे सयोगी और अयोगी गुणस्थानमें स्थानादि कहते है- ते चोहसपरिहीणा जोगिस्स अजोगिचरिमगेवि पुणो। वावत्तरिमडसहि दुसु दुसु हीणेसु दुगदुगा भंगा ॥ ३९॥ तानि चतुर्दशपरिहीनानि योगिन अयोगिचरमकेपि पुनः । द्वासप्ततिरष्टषष्टिः द्वयोर्द्वयोः हीनयोः द्विकद्विको भङ्गाः ॥ ३९०॥ अर्थ-क्षीणकषायके अंतके चारस्थानोंमें चौदह २ प्रकृतियां कम करनेसे ८५ आदिकके चारस्थान सयोग केवलीके होते है । और अयोग केवलीके अंतके दो समय शेष रहें तबतक चारस्थान है, वे सयोग केवलीके चारस्थानोमेंसे पहले और दूसरे स्थानमें ७२ वहत्तर प्रकृतियां कमकरके तथा तीसरे चौथे स्थानमें ६८ अडसठि घटाके चार स्थान होते है । यहांपर पुनरुक्तपना होनेसे दो स्थानही समझना । और अंतके दो समयोंमें दो दो स्थान है वहांपर दो दो भंग है। इसप्रकार ६ स्थान और उनके ८ भंग अयोगकेवलीके अतसमयतक जानना ॥ ३९० ॥ आगे " दुगछक्कतिण्णिवग्गे " इत्यादि गाथासे पूर्व अनंतानुबंधी सहित आठ स्थान उपशम श्रेणीवालोके कहे थे वे अपनी (श्रीकनकनदि आचार्यकी ) पक्षमें नहीं है इत्यादि विशेषको और उनकी भंग संख्याको चार गाथाओंसे कहते है। णत्थि अणं उवसमगे खवगापुवं खवित्तु अट्ठा य । पच्छा सोलादीणं खवणं इदि केई णिहिटं ॥ ३९१ ॥ नास्ति अनमुपशमके क्षपकापूर्व क्षपयित्वा अष्टौ च । पश्चात् षोडशादीनां क्षपणमिति कैनिर्दिष्टम् ॥ ३९१ ॥ अर्थ-श्रीकनकनंदी आचार्यकी संप्रदाय (पक्ष) में ऐसा कहा है कि उपशमश्रेणीवाले चार गुणस्थानोंमें अनंतानुबंधी चारका सत्त्व नहीं है, इसकारण २४ स्थानोंमेंसे बद्धायु और अबद्धायु दोनोंके आठस्थान कम करनेपर १६ स्थानही है । और क्षपक अपूर्व- करणवाले पहले मध्यकी आठ कषायोको क्षयकरके पीछे १६ आदिक प्रकृतियोंका क्षय करते है ॥ ३९१ ॥ अणियद्विगुणहाणे मायारहिदं च ठाणमिच्छति । ठाणा भंगपमाणा केई एवं परूवेति ॥ ३९२ ॥ अनिवृत्तिगुणस्थाने मायारहितं च स्थानमिच्छन्ति । स्थानानि भङ्गप्रमाणानि केचिदेवं प्ररूपयन्ति ॥ ३९२ ।। अर्थ-कोई आचार्य, अनिवृत्ति करणगुणस्थानमे माया कषाय रहित चारस्थान हैं ऐसा मानते है, तथा कोई स्थानोंको भंगके प्रमाण अर्थात दोनोंकी एकसी सख्या कहते है ।। ३९२ ॥
. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ऐसा होनेपर स्थान और भंगोंकी संख्या कहते हैं- अट्ठारह चउ अट्ट मिच्छतिये उवरि चाल चउठाणे । तिसु उवसमगे संते सोलस सोलस हवे ठाणा ॥ ३९३ ॥ अष्टादश चत्वारि अष्ट मिथ्यत्रये उपरि चत्वारिंशत् चतुःस्थाने । त्रिषु उपशमके शान्ते पोडश पोडश भवंति स्थानानि ॥ ३९३ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि तीन गुणस्थानों में पूर्वोक्त प्रकार १८, ४, ८, स्थान हैं। ऊपरके असंयतादि चार गुणस्थानों में चालीस चालीस स्थान है। तथा उपशमश्रेणीवाले तीन गुणस्थान तथा उपशांतमोह-इन चारमें सोलह सोलह स्थान है ॥ ३९३ ।। अब इनस्थानोंके भंगोंकी संख्या कहते है,- पण्णेकारं छक्कदि वीससयं अट्ठदाल दुसु तालं । वीसडतिण्णं वीसं सोलह य चारि अटेव ॥ ३९४ ॥ पञ्चाशदेकादश षट्दतिः विंशशतमष्टचत्वारिंशत् द्वयोश्चत्वारिंशत् । विशाष्टत्रिंशत् विशं षोडशाष्टं च चत्वार अष्टैव ।। ३९४ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि स्थानोंके क्रमसे पूर्वोक्त प्रकार ५०, ११, ३६, १२०, ४८, ४०, ४०, दोनों श्रेणियोंके मिलकर २०, ३८, २०, १६, ८, ४, ८ भंग जानने ॥ ३९३ ॥ यहांपर अनेकप्रकार गुरुओंके संप्रदायसे कहा है वह सभी श्रद्धान करने योग्य है, क्योंकि प्रत्यक्षकेवली श्रुतकेवली विना निश्चय नही होसक्ता ॥ ३९४ ।। अब सत्त्वस्थानाधिकारको पूर्ण करनेके इच्छुक आचार्य इसके पढ़नेका फल दिखाते हैं;- एवं सत्तहाणं सवित्थरं वणियं मए सम्म । जो पढइ सुणइ भावइ सो पावइ णिचुदि सोक्खं ॥३९५॥ एवं सत्त्वस्थानं सविस्तरं वर्णितं मया सम्यक् । यः पठति शृणोति भावयति स प्रामोति निर्वृतिं सौख्यम् ।। ३९५ ॥ अर्थ--इसप्रकार सत्त्वस्थानका विस्तारसे अच्छीतरह मैंने वर्णन किया है। आचार्य महाराज कहते है कि जो इस कर्मोंके सत्त्वस्थानको पद्वैगा, सुनेगा और चितवन करेगा वह मोक्ष सुखको अवश्य प्राप्त होगा ॥ ३९५ ॥ वरइंदणंदिगुरुणो पासे सोऊण सयलसिद्धतं । सिरिकणयणंदिगुरुणा सत्तठाणं समुद्दिलं ॥ ३९६ ॥ वरेन्द्रनन्दिगुरोः पार्श्वे श्रुत्वा सकलसिद्धान्तम् । श्रीकनकनन्दिगुरुणा सत्त्वस्थानं समुद्दिष्टम् ॥ ३९६ ॥ अर्थ-आचार्योंमें श्रेष्ठ ऐसे श्रीइन्द्रनंदि गुरुके पास समस्त सिद्धान्तको सुनकर श्री कनकनंदि सिद्धान्तचक्रवर्ती गुरुने इसप्रकार सत्त्वस्थान सम्यक्रीतीसे कहा है ॥३९६॥ - r गोम्मटसारः। १३७ अब आचार्य महाराज अपनेको चक्रवर्तीकी समानता दिखाते हुए इस सत्त्वस्थान- कथन अधिकारको समाप्त करते हैं। जह चकेण य चक्की छक्खंडं साहियं अविग्घेण । तह मइचक्केण मया छक्खंडं साहियं सम्मं ॥ ३९७ ॥ यथा चक्रेण च चक्रिणा पट्खण्डं साधितमविघ्नेन । तथा मतिचक्रेण मया पट्खण्डं साधितं सम्यक् ॥ ३९७ ॥ अर्थ-जैसे चक्रवर्तीने भरतक्षेत्रके छह खंडोंको अपने चक्ररत्नसे निर्विप्न पूर्वक साधे अर्थात् अपने वशमें किये है, उसी प्रकार मैने भी बुद्धिरूप चक्रसे जीवस्थान १ क्षुद्रबंध २ बंधखामी ३ वेदनाखंड ४ वर्गणाखंड ५ और महाबंध ६ भेदसे छहखंडरूप सिद्धान्तशास्त्र अच्छीतरह साधे अर्थात् जाने है ॥ ३९७ ॥ इति गोम्मटसार ग्रंथके कर्मकाण्डमें वालावबोधिनी भाषाटीका सहित सत्त्वस्थानभंग प्ररूपणनामा तीसरा अधिकार समाप्त हुआ ॥ ३ ॥ अब त्रिचूलिका अधिकार कहनेकी प्रतिज्ञा करते हुए नमस्कारात्मक मंगल करते है। असहायजिणवरिंदे असहायपरक्कमे महावीरे । पणमिय सिरसा वोच्छं तिचूलियं सुणह एयमणा ॥ ३९८ ॥ असहायजिनवरेन्द्रानसहायपराक्रमान महावीरान् । प्रणम्य शिरसा वक्ष्यामि त्रिचूलिकं शृणुतैकमनसः ॥ ३९८ ॥ अर्थ-इन्द्रियादिकोंकी सहायता रहित है ज्ञानादि शक्तिरूप पराक्रम जिनका ऐसे श्रीमहावीरगुरू और शेष वृषभादितीर्थंकर जिनेन्द्रदेवोंको मस्तक नवाके (नमस्कार करके) मैं नेमिचन्द्राचार्य त्रिचूलिका नाम अधिकारको अर्थात् नव प्रश्न १ पंच भागहार २ दश- करण ३ नामवाले अधिकारको कहूंगा, सो हे भव्यजीवो तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ३९८ ॥ जो कहे हुए अथवा न कहे हुए वा विशेषतासे न कहेहुए अर्थका चितवन करना उसे चूलिका कहते है ॥ अब उन तीन चूलिकाओंमेंसे पहले नवप्रश्न चूलिकाको कहते है- किं बंधो उदयादो पुवं पच्छा समं विणस्सदि सो। सपरोभयोदयो वा णिरंतरो सांतरो उभयो ॥ ३९९ ॥ को बन्ध उदयात्पूर्व पश्चात् समं विनश्यति सः । खपरोभयोदयो वा निरन्तरः सान्तर उभयः ॥ ३९९ ॥ अर्थ-पहले जो प्रकृतियां कहीं है उनमें उदय व्युच्छित्तिके पहले बंधकी व्युच्छित्ति किन प्रकृतियोंकी होती है १ उदयव्युच्छित्तिके पीछे बंधकी व्युच्छित्ति किन प्रकृतियोंकी २ और उदयव्युच्छित्तिके साथ बंधव्युच्छित्ति कोंन प्रकृतिकी ३ होती है । तथा जिनका १८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १३८ अपना उदय होनेपर बंध होवे ऐसी ४ जिनका अन्य प्रकृतिके उदय होनेपर बंध हो ऐसी ५ और जिनका अपने व अन्यप्रकृतियोंके दोनोंके उदय होनेपर बंध हो ऐसी ६ प्रकृतियां कोंन २ है । और जिनका निरंतर बंध हो ऐसी ७ जिनका सांतर अर्थात् कभी हो कभी न हो ऐसा बंध हो ऐसी प्रकृतियां ८ तथा जिनका निरंतर व सांतर दोनों प्रकार बंध हो वे प्रकृतियां ९ कोनसी हैं? इसप्रकार नौ प्रश्न है ॥ ३९९ ॥ आगे उन नौ प्रश्नोंमेंसे पहले तीन प्रश्नोंकी उत्तरभूत प्रकृतियोंको कहते हैं- देवचउक्काहारदुगजसदेवाउगाण सो पच्छा। मिच्छत्तादावाणं णराणुथावरचउक्काणं ॥४०॥ पण्णरकसायभयदुगहस्सदुचउजाइपुरिसवेदाणं । सममेकत्तीसाणं सेसिगिसीदाण पुवं तु ॥४०१ ॥ जुम्मं । देवचतुष्काहारद्विकायशोदेवायुष्कानां स पश्चात् । मिथ्यात्वातापानां नरानुस्थावरचतुष्कानाम् ॥ ४०० ।। पञ्चदशकपायभयद्विकहास्यद्विचतुर्जातिपुरुषवेदानाम् । सममेकत्रिंशतां शेपैकाशीतेः पूर्व तु ॥ ४०१ ॥ युग्मम् । अर्थ-देवगति आदिकी चौकड़ी, आहारक शरीर युगल, अयशस्कीर्ति और देवायु- इन ८ प्रकृतियोंकी उदयकी व्युच्छित्ति ( अभाव होने ) के पीछे बंध व्युच्छित्ति होती है । और मिथ्यात्व, आताप, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, स्थावर आदि चार, संज्वलनलोभके विना १५ कषाय, भय-जुगुप्सा, हास्य-रति २, एकेन्द्री आदि चार जाति, और पुरुषवेद-इन ३१ प्रकृतियोंकी उदयव्युच्छित्ति और बंधव्युच्छित्ति एक कालमें होती है । तथा इनसे शेष ज्ञानावरणादि ८१ प्रकृतियोंकी उदयव्युच्छित्तिके पहले बंधब्युच्छित्ति होती है॥४०॥ ४०१॥ आगे दूसरे तीन प्रश्नोंका समाधान दो गाथाओंसे कहते है- सुरणिरयाऊ तित्थं वेगुध्वियछक्कहारमिदि जेसि । परउदयेण य वधो मिच्छं सुहुमस्स घादीओ ॥ ४०२॥ तेजदुगं चण्णचऊ थिरसुहजुगलगुरुणिमिणधुवउदया। सोदयवंधा सेसा वासीदा उभयवंधाओ ॥४०३ ॥ जुम्म । सुरनिरयायुषी तीर्थ वैगूर्विकष्टाहारमिति यासाम् । परोदयेन च बन्धो मिथ्यं सूक्ष्मस्य घातिन्यः ॥ ४०२ ।। तेजोद्विकं वर्णचत्वारि स्थिरशुभयुगलागुरुनिर्माणध्रुवोदयाः । खोदयवन्धाः शेषाः न्यशीतिरुभयवन्धाः ॥ ४०३ ॥ युग्मम ।
गोम्मटसारः। अर्थ-देवायु, नरकायु, तीर्थंकरप्रकृति, वैक्रियिकका षटू, आहरकशरीरका जोड़ा, इन ११ प्रकृतियोंका परके उदयसे बंध है । और मिथ्यात्व, सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानमें व्युच्छिन्न होनेवाली घातिया कर्मोंकी १४ प्रकृतियां, तैजसका युगल, वर्णादिक चार, स्थिर और शुभका जोड़ा, अगुरुलघु, निर्माण ये ध्रुव ( नित्य ) उदयवाली १२ प्रकृति- यां-सब २७ प्रकृतियोंका अपने उदय होनेपर ही बंध होता है । तथा शेषरही पांच निद्रादि ८२ प्रकृतियां उभयबंधी है अर्थात् इनका उदय होनेपर अथवा न होनेपरभी बंध होता है ॥ ४०२॥ ४०३ ॥ अव तीसरे तीन प्रश्नोंकी प्रकृतियां चार गाथाओंसे कहते है। सत्तेताल धुवावि य तित्थाहाराउगा णिरंतरगा। णिरयदुजाइचउकं संहदिसंठाणपणपणगं ॥ ४०४ ॥ दुग्गमणादावदुर्ग थावरदसगं असादसंढिस्थि । अरदीसोगं चेदे सातरगा होति चोत्तीसा ॥ ४०५ ॥ जुम्मं । सप्तचत्वारिंगत् ध्रुवा अपि च तीर्थाहारायुष्का निरन्तरकाः । निरयद्विजातिचतुष्कं सहतिसंस्थानपञ्चपञ्चकम् ॥ ४०४ ॥ दुर्गमनातापद्विकं स्थावरदशकमसातषण्ढस्त्री। अरतिः शोकं चैताः सान्तरका भवन्ति चतुस्त्रिशत् ॥ ४०५ ॥ युग्मम् । अर्थ-ज्ञानावरणादि पूर्वोक्त ४७ ध्रुव प्रकृतियां, तीर्थकर, आहारका युगल,आयु ४- ये ५४ प्रकृतियां निरंतर बंधवाली है । और नरकगतिका जोड़ा, एकेन्द्री आदि चार जाति, आदिके संहनन और सस्थान विना ५ संहनन और ५ संस्थान, अप्रशस्तविहा- योगति, आताप-उद्योत, स्थावर आदि १०, असातावेदनीय, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, अरति, शोक-ये ३४ प्रकृतियां सांतरबंधी है अर्थात् किसीसमय किसी प्रकृतिका, किसीसमय कोई प्रकृतिका बंध होता है ॥ ४०४।४०५ ॥ सुरणरतिरियोरालियवेगुम्वियदुगपसत्थगदिवजं । परघाददुसमचउरं पंचिदिय तसदसं सादं ॥ ४०६ ॥ हस्सरदिपुरिसगोददु सप्पडिवक्खम्मि सांतरा होति । णढे पुण पडिवक्खे णिरंतरा होंति बत्तीसा ॥४०७॥ जुम्म । सुरनरतिर्यगौरालिकवैगूर्विकद्विकप्रशस्तगतिवत्रम् । परघातद्विसमचतुरस्रं पञ्चेन्द्रियं त्रसदश सातम् ॥ ४०६ ॥ हास्यरतिपुरुषगोत्रद्विकं सप्रतिपक्षे सान्तरा भवन्ति । नष्ट पुनः प्रतिपक्षे निरन्तरा भवन्ति द्वात्रिशत् ॥ ४०७ ॥ युग्मम् ।
१४० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-देवगति-मनुष्यगति-औदारिकशरीर-वैक्रियिकशरीर-इन चारोंका जोड़ा, प्रशस्तविहायोगति, वज्रर्षभनाराचसंहनन, परघात युगल, समचतुरस्रसंस्थान, पंचेन्द्रिय- जाति, त्रस आदि १०, सातावेदनीय, हास्य, रति, पुरुपवेद, गोत्र दो-ये ३२ प्रकृतियां इनके प्रतिपक्षी ( विरोधी) के होते सांतर बंधवाली हैं । और विरोधीप्रकृतियोंके नाश होनेपर निरंतर बंधवाली है अर्थात् उभयबंधी हैं ॥ ४०६।४०७ ॥ इसप्रकार नवप्रश्न नामकी प्रथमचूलिका कही। अब पंचभागहार नामकी द्वितीयचूलिकाको कहते हुए मंगलाचरण करते हैं।- जत्थ वरणेमिचंदो महणेण विणा सुणिस्मलो जादो। सो अभयणंदिणिम्मलसुओवही हरउ पावमलं ॥ ४०८ ॥ यत्र वरनेमिचन्द्रो मथनेन विना सुनिर्मलो जातः । स अभयनन्दिनिर्मलश्रुतोदधिहरतु पापमलम् ।। ४०८ ॥ अर्थ-जिसमे उत्कृष्टनेमिचन्द्र मथनके विना ही अत्यंत निर्मल उत्पन्न हुआ ऐसा श्रीअभयनंदि आचार्यका उपदेशित निर्मलशास्त्ररूपीसमुद्र भव्यजीवोंके पापमलको दूर करो। ऐसा आशीर्वादात्मक मंगल किया है ॥ ४०८ ।। अब पांच भागहारोंको कहते है- उज्वेलणविज्झादो अधापवत्तो गुणो य सम्वो य । संकमदि जेहिं कम्म परिणामवसेण जीवाणं ॥ ४०९ ॥ उद्वेलनविध्यात अधःप्रवृत्तः गुणश्च सर्वश्च । संक्रामति यैः कर्म परिणामवशेन जीवानाम् ॥ ४०९ ।। अर्थ-जिन्होंसे शुभकर्म और अशुभकर्म संसारी जीवोंके अपने परिणामोंके निमित्तसे संक्रमण करै अर्थात् अन्य प्रकृतिरूप परिणमे वे भागहार उद्वेलन, विध्यात, अधःप्रवृत्त, गुणसंक्रम और सर्व संक्रमणके भेदसे पांच प्रकार है ॥ ४०९ ॥ अव संक्रमणका खरूप कहते है। वंधे संकामिजदि णोवंधे णत्थि मूलपयडीणं । दसणचरितमोहे आउचउक्केण संकमणं ॥४१०॥ वन्धे संक्रामति नोवन्धे नास्ति मूलप्रकृतीनाम् । दर्शनचरित्रमोहे आयुश्चतुष्केण संक्रमणम् ।। ४१० ।। अर्थ-जिस प्रकृतिका बंध होता है उसी प्रकृतिमें संक्रमण होता है अर्थात् अन्य प्रकृति तत्वरूप होकर परिणमती है-यह सामान्य विधान है । और जिसका बंध नहीं उसमें संक्रमणभी नहीं होता है । इस कथनका प्रयोजन यह है कि दर्शनमोहनीके विना शेष सब प्रकृतियां बंध होनेपर संक्रमण करती है ऐसा नियम जानना । तथा मूलप्रकृ- ।
गोम्मटसारः। १४१ तियोंके संक्रमण अर्थात् अन्यका अन्यरूप परस्परमें परिणमन नही है, ज्ञानावरण कमी दर्शनावरणरूप नही होती। इससे सारांश यह निकला कि उत्तरप्रकृतियोंमें संक्रमण होता है। परंतु दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीयका तथा चारों आयुओंका परस्पर संक्र- मण नही होता ॥ ४१०॥ सम्म मिच्छं मिस्सं सगुणठ्ठाणम्मि णेव संकमदि । सासणमिस्से णियमा दंसणतियसंकमो णत्थि ॥ ४११ ॥ सम्यं मिथ्यं मिश्रं स्वगुणस्थाने नैव संक्रामति । सासनमिश्रे नियमादर्शनत्रिकसंक्रमो नास्ति ॥ ४११ ॥ अर्थ-सम्यक्त्वमोहनीय, मिथ्यात्वमोहनीय, मिश्रमोहनीय अपने २ असंयतादि गुण- स्थानोंमें संक्रमण नही करती । और सासादन तथा मिश्रगुणस्थानमें नियमसे दर्शनमोह- नीयके त्रिकका संक्रमण नही होता । असंयतादि चारमें होता है ॥ ४११ ॥ मिच्छे सम्मिस्साणं अधापवत्तो मुहुत्तअंतोत्ति । उव्वेलणं तु तत्तो दुचरिमकंडोति णियमेण ॥ ४१२ ॥ मिथ्ये सम्यग्मियोरधःप्रवृत्तः मुहूर्त्तान्तरिति । उद्वेलनं तु ततो द्विचरमकाण्ड इति नियमेन ॥ ४१२ ॥ अर्थ-मिथ्यात्वगुणस्थानको प्राप्त होनेपर सम्यक्त्वमोहनीय और मिश्रमोहनीयका अंतर्मुहूर्ततक अधःप्रवृत्तसंक्रमण होता है। फिर इसके बाद उद्वेलननामा संक्रमण अंतके समीपके कांडकपर्यंत नियमसे वर्तता है । वहांपर अधःप्रवृत्तसंक्रमण फालिरूप रहता है ॥ ४१२ ॥ एक समयमें संक्रमण होनेको फालि कहते है । समयसमूहमें संक्रमण होना कांडक कहा है ॥ उज्वेलणपयडीणं गुणं तु चरिमम्हि कंडये णियमा। चरिमे फालिम्मि पुणो सव्वं च य होदि संकमणं ॥४१३ ॥ उद्वेलनप्रकृतीनां गुणं तु चरमे काण्डके नियमात् । चरमे फालौ पुनः सर्व च भवति संक्रमणम् ॥ ४१३ ॥ अर्थ-उद्वेलन प्रकृतियोंका अंतके कांडकमें नियमसे गुणसंक्रमण होता है। और अंतकी फालिमें सर्वसंक्रमण होता है ऐसा जानना ॥ ४१३ ॥ यहांपर प्रसंगसे पांच संक्रमणोंका खरूप कहते है । जो अधःप्रवृत्ति आदि तीन करणरूप परिणामोंके विनाही कर्मप्रकृतिके परमाणुओंका अन्य प्रकृतिरूप परिणमन होना वह उद्वेलनसंक्रमण है । मंद विशुद्धतावाले जीवके स्थिति, अनुभागके घटानेरूप काडक तथा गुणश्रेणीआदि परिणाम जो पहले होगये उनमें प्रवृत्ति होना विध्यातसंक्र- मण है। बंधरूप हुई प्रकृतियोंका अपने बंधमें संभवती प्रकृतियोंमें परमाणुओंका जो १४२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । संक्रमण होना वह अधःप्रवृत्तसंक्रमण है । समय समयमें श्रेणी (पंक्ति ) रूप असं- ख्यातगुणे २ परमाणु अन्य प्रकृतिरूप होके परिणमें सो गुणसंक्रमण है। और जो अंतके कांडककी अंतकी फालिके सर्वप्रदेशोंमें पीछेही पीछे अन्य प्रकृतिरूप नहीं हुए परमाणुओंका अन्य प्रकृतिरूप होना वह सर्वसंक्रमण है । इसप्रकार पांचोंका खरूप कहा है ।। आगे सर्व संक्रमण प्रकृतियोंमें तिर्यक् ११ है उनको कहते है,- तिरियदुजाइचउकं आदावुज्जोवथावरं सुहुमं । साहारणं च एदे तिरियेयारं मुणेयवा ॥४१४ ॥ तिर्यग्द्विजातिचतुष्कमातापोद्योतस्थावरं सूक्ष्मम् । साधारणं चैताः तिर्यगेकादश मन्तव्याः ।। ४१४ ।। अर्थ-तिर्यंचगति आदि दो, एकेन्द्रियादि जाति ४, आताप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण-ये तिर्यक् ११ प्रकृतियां है अर्थात् इनका उदय तियेचमेंही होता है; इससे "तिर्यगेकादश" ऐसा नाम है ॥ ४१४ ॥ अब उद्वेलन प्रकृतियोंको कहते है;- आहारदुगं सम्मं मिस्सं देवदुगणारयचउकं । उच्चं मणुदुगमेदे तेरस उवेल्लणा पयडी ॥ ४१५ ॥ आहारद्विकं सम्यं मिश्र देवद्विकनारकचतुप्कम् । उच्चं मनुद्विकमेताः त्रयोदश उद्वेलना प्रकृतयः ।। ४१५ ।। अर्थ-आहारकयुगल, सम्यक्त्वमोहनीय, मिश्रमोहनीय, देवगतिका जोड़ा, नरकगतिका चतुष्क, उच्चगोत्र, और मनुष्यगतिका युगल-ये १३ उद्वेलन प्रकृतियां है ।। ४१५॥ बंधे अधापवत्तो विज्झादं सत्तमोत्ति हु अवंधे । एत्तो गुणो अवंधे पयडीणं अप्पसत्थाणं ॥ ४१६ ॥ वन्धे अधःप्रवृत्तो विध्यातः सप्तम इति हि अवन्धे । इतो गुणः अवन्धे प्रकृतीनामप्रशस्तानाम् ॥ ४१६ ॥ अर्थ-प्रकृतियोंके बंध होनेपर अपनी २ बंधव्युच्छित्तिपर्यंत अधःप्रवृत्तसंक्रमण है, परंतु मिथ्यात्वप्रकृतिका पूर्वोक्तरीतिसे नहीं है । और बंधकी न्युच्छित्ति होनेपर असंयत- से लेकर अप्रमत्तपर्यंत विध्यातनामा संक्रमण है । तथा अप्रमत्तसे आगे उपशांत कषायपर्यंत बंधरहित अप्रशस्तप्रकृतियोंके गुणसंक्रमण है । इसतरह अन्य जगहभी जानना ॥ ४१६॥ अब उन सर्वसंक्रमणरूप प्रकृतियोंको कहते है:- तिरियेयारवेल्लणपयडी संजलणलोहसम्ममिस्सूणा । 'मोहा थीणतिगं च य वावण्णे सन्चसंक्रमणं ॥ ४१७ ।।
४ , , गोम्मटसारः। १४३ तिर्यगैकादशोद्वेलनप्रकृतयः संज्वलनलोभसम्यग्मिश्रोनाः ।। मोहाः स्त्यानत्रिकं च द्वापञ्चाशत् सर्वसंक्रमणम् ॥ ४१७ ॥ अर्थ-पूर्वकथित तिर्यक् ११, उद्वेलन १३, संज्वलन लोभ-सम्यक्त्वमोहनीय-मि- श्रमोहनीय इन तीनके बिना मोहनीयकी २५ और स्त्यानगृद्धि आदि ३ प्रकृतियां- इन सब ५२ प्रकृतियोंमें सर्वसंक्रमण होता है ॥ ४१७ ।। आगे प्रकृतियोंके संक्रमणका नियम कहते हैं- उगुदालतीससत्तयवीसे एकेकबारतिचउक्के । इगिचदुद्गतिगतिगचदुपणदुगदुगतिणि संकमणा ॥४१८॥ एकोनचत्वारिंशत्त्रिंशत्सप्तकविशे एकैकद्वादशत्रिचतुष्के । एकचतुर्दिकत्रिकत्रिकचतुःपञ्चद्विकद्विकत्रयः संक्रमणाः ॥ ४१८ ॥ अर्थ-३९ प्रकृतियोंमें, ३० में, ७ में, २० में, १ में, १ में, १२ में, ४ में, में, ४ में क्रमसे १, ४,२,३, ३, ४, ५, २, २, और ३ संक्रमण होते है ॥ ४१८ ॥ आगे उन प्रकृतियोंको तथा उनके संक्रमणोंको क्रमसे सात गाथाओंकर कहते है, सुहुमस्स बंधघादी सादं संजलणलोहपंचिंदी। तेजदुसमवण्णचऊ अगुरुगपरघादउस्सासं ॥ ४१९ ॥ सत्थगदी तसदसयं णिमिणुगुदाले अधापवत्तो दु । थीणतिवारकसाया संढित्थी अरइ सोगो य ॥ ४२० ॥ तिरियेयारं तीसे उव्वेलणहीणचारि संकमणा । णिहा पयला असुहं वण्णचउक्कं च उवधादे ॥ ४२१ ॥ सत्तण्हं गुणसंकममधापवत्तो य दुक्खमसुहगदी। संहदि संठाणदसं णीचापुण्ण थिरछक्कं च ॥ ४२२॥ वीसण्हं विज्झादं अधापवत्तो गुणो य मिच्छत्ते । विज्झादगुणे सव्वं सम्मे विज्झादपरिहीणा ॥४२३॥ कुलयं । सूक्ष्मस्य बंधघातिन्यः सातं संज्वलनलोभपञ्चेन्द्रियम् । तेजोद्विसमवर्णचतुरगुरुकपरघातोच्छ्वासम् ॥ ४१९ ।। शस्तगतिः त्रसदशकं निर्माणमेकोनचत्वारिंशत्सु अधःप्रवृत्तस्तु । स्त्यानत्रिद्वादशकषायाः षण्ढस्त्री अरतिः शोकश्च ॥ ४२० ॥ तिर्यगेकादश त्रिंशत्सु उद्वेलनहीनचत्वारः संक्रमणाः । निद्राप्रचला अशुभं वर्णचतुष्कं च उपघातम् ॥ ४२१ ॥ सप्तानां गुणसंक्रमोऽधःप्रवृत्तश्च दुःखमशुभगतिः । संहतिसंस्थानदश नीचापूर्णमस्थिरपद्धं च ॥ ४२२ ॥ २
१४४
रायचन्द्रजैनशास्रमालायाम् ।
विंशानां विध्यात अधःप्रवृत्तो गुणश्च मिथ्यात्वे ।
विध्यातगुणौ सर्वः सम्यश्चि विध्यातपरिहीनाः ॥ ४२३ ।। कुलकम् ।
अर्थ-सूक्ष्मसापरायकी बंधव्युच्छित्ति होनेवाली घातियाकर्मोंकी १४ प्रकृतियां, साता-
वेदनीय, संज्वलनलोभ, पंचेन्द्रीजाति, तैजसका युगल, समचतुरस्र, वर्णादि ४, अगुरुलघु,
परघात, उच्छास, प्रशस्तविहायोगति, त्रस आदि १० और निर्माण-इन ३९ प्रकृतियों में
अधःप्रवृत्तसंक्रमण है। स्त्यानगृद्धि आदि ३, १२ कषाय, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, अरति, शोक
और तिर्यक्एकादशकी ११-इन तीस प्रकृतियोंमें उद्वेलनसंक्रमणके विना चारसंक्रमण
हैं। निद्रा, प्रचला, अशुभवर्णादि ४ और उपघात-इन सातप्रकृतियोंके गुणसंक्रमण और
अधःप्रवृत्तसंक्रमण-ये दो पाये जाते है । असातावेदनीय, अप्रशस्तविहायोगति, पहले विना पांच
संहनन और पांच संस्थान-ये १०, नीचगोत्र, अपर्याप्त और अस्थिरादि ६, इसप्रकार २०
प्रकृतियोंके विध्यातसंक्रमण-अधःप्रवृत्तसंक्रमण और गुणसंक्रमण ये तीन संक्रमण पाये जाते
है। मिथ्यात्वप्रकृतिमें विध्यात-गुण और सर्वसंक्रमण ये तीन है। तथा सम्यक्त्वमोहनीयमें
विध्यातसंक्रमणके विना चार संक्रमण पाये जाते है ॥ ४१९।४२०१४२११४२२।४२३ ॥
सम्मविहीणुवेल्ले पंचेव य तत्थ होंति संकमणा ।
संजलणतिये पुरिसे अधापवत्तो य सव्वो य ॥ ४२४ ।।
सम्यग्विहीनोद्वैल्ये पञ्चैव च तत्र भवन्ति संक्रमणाः ।
संज्वलनत्रये पुरुषे अधःप्रवृत्तश्च सर्वश्च ॥ ४२४ ॥
अर्थ-सम्यक्त्वमोहनीयके विना १२ उद्वेलन प्रकृतियों में पांचही संक्रमण होते है।
और संज्वलनक्रोधादि तीन तथा पुरुषवेद-~-इन चारोंमें अधःप्रवृत्त और सर्वसंक्रमण ये दो
संक्रमण ही पाये जाते है ॥ ४२४ ॥
ओरालटुगे वजे तित्थे विज्झादधापवत्तो य ।
हस्सरदिभयजुगुच्छे अधापवत्तो गुणो सवो ॥ ४२५ ॥
औरालद्विके वजे तीर्थे विध्यातोऽधःप्रवृत्तश्च ।
हास्यरतिभयजुगुप्सायामधःप्रवृत्तो गुणः सर्वः ॥ ४२५ ॥
अर्थ-औदारिकशरीर द्विक, वज्रर्षभनाराचसंहनन, तीर्थंकर प्रकृति-इन चारोंमें विध्या-
तसंक्रमण और अधःप्रवृत्त ये दो संक्रमण है। तथा हास्य, रति, भय और जुगुप्सा-इन
चार प्रकृतियोंमें अधःप्रवृत्त, गुण और सर्वसंक्रमण ये तीन संक्रमण पाये जाते है।।४२५||
आगे विध्यातसंक्रमणकी प्रकृतियोंको दिखाते है,
सम्मत्तूणुव्वेलणथीणतितीसं च दुक्खवीसं च ।
वज्जोरालदुतित्थं मिच्छं विज्झादसत्तही ॥ ४२६ ॥
गौम्मटसारः। १४५ सम्यत्तवोनोद्वेलनस्त्यानत्रित्रिशञ्च दुःखविशश्च । वञोरालद्वितीर्थ मिथ्यं विध्यातसप्तषष्टिः ॥ ४२६ ॥ अर्थ-सम्यक्त्वमोहनीयके विना उद्वेलनप्रकृतियां १२, स्त्यानगृद्धि तीन आदिक ३०, असातावेदनीयादिक २०, वज्रर्षभनाराचसंहनन, औदारिक युगल, तीर्थकर प्रकृति, मिथ्या- त्वये ६७ प्रकृतियां विध्यातसंक्रमणवाली है ॥ ४२६ ॥ अब अधःप्रवृत्तसंक्रमण और गुणसंक्रमणकी प्रकृतियोंको कहते है,- मिच्छूणिगिवीससयं अधापवत्तस्स होंति पयडीओ। सुहुमस्स बंधधादिप्पहुदी उगुदालुरालदुगतित्थं ॥ ४२७ ॥ वजं पुंसंजलणति ऊणा गुणसंकमस्स पयडीओ। पणहत्तरिसंखाओ पयडीणियमं विजाणाहि ॥ ४२८॥ जुम्म। मिथ्योनेकविंशशतमधःप्रवृत्तस्य भवन्ति प्रकृतयः । सूक्ष्मस्य बंधघातिप्रभृतयः एकोनचत्वारिशदौरालद्विकतीर्थम् ॥ ४२७ ।। वनं पुंसंज्वलनविकमूना गुणसंक्रमस्य प्रकृतयः। पञ्चसप्ततिसंख्या. प्रकृतिनियमं विजानीहि ॥ ४२८ ॥ युग्मम् । अर्थ-मिथ्यात्वप्रकृतिके विना १२१ प्रकृतियां अधःप्रवृत्तसंक्रमणकी होती हैं। और सूक्ष्मसापरायमें बंध होनेवाली घातियाकर्मोंकी चौदह प्रकृतिओंको आदि लेकर ३९ प्रकृतिया, औदारिक दो, तीर्थकर, वज्रर्षभनाराच, पुरुषवेद, सज्वलनक्रोधादि तीन-इन १७ प्रकृ- तियोंको कमकरके शेष वची ७५ प्रकृतियां गुणसंक्रमणकी है । इसप्रकार प्रकृतियोंमें निय- म जानना ॥ ४२७१४२८ ॥ आगे स्थितिबंध और अनुभागबंधके तथा प्रदेशबंधके सक्रमणके गुणस्थानोंकी संख्या कहते है:- ठिदिअणुभागाणं पुण बंधो सुहुमोत्ति होदि णियमेण । बंधपदेसाणं पुण संकमणं सुहुमरागोति ॥ ४२९ ॥ स्थित्यनुभागयोः पुनः बन्धः सूक्ष्म इति भवति नियमेन । बन्धप्रदेशानां पुनः संक्रमणं सूक्ष्मराग इति ॥ ४२९ ॥ अर्थ-स्थिति और अनुभागका बंध नियमसे सूक्ष्मसांपरायगुणस्थान पर्यंत ही है, क्योंकि उक्त बंधका कारण कषाय वही तक है । और बन्धरूप प्रदेशों ( कर्मपरमाणुओं) का संक्रमणभी सूक्ष्मसापराय गुणस्थान तक ही है, क्योंकि "बंधे अधापवत्तो" इस गाथासूत्रके अभिप्रायसे स्थितिबंध पर्यंत ही संक्रमण होना संभव है ॥ ४२९ ॥ आगे पांच भागहारोंका अल्पबहुपना ६ गाथाओंसे कहते है- १९ १४६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । सव्वरसेकं रूवं असंखभागो दु पल्लछेदाणं । गुणसंकमो दु हारो ओकटुक्कट्टणं तत्तो ॥ ४३० ॥ हारं अधापवत्तं तत्तो जोगम्हि जो दु गुणगारो। णाणागुणहाणिसला असंखगुणिदकमा होंति ॥ ४३१ ॥ तत्तो पल्लसलायच्छेदहिया पलछेदणा होति। पल्लस्स पढममूलं गुणहाणीवि य असंखगुणिदकमा ॥४३२॥ अण्णोण्णभत्थं पुण पल्लमसंखेजस्वगुणिदकमा। संखेजरूवगुणिदं कम्मुक्कस्सटिदी होदि ॥ ४३३ ॥ अंगुलअसंखभागं विज्झादुवेल्लणं असंखगुणं । अणुभागस्स य णाणागुणहाणिसला अणंताओ॥ ४३४ ॥ गुणहाणिअणंतगुणं तस्स दिवड्डे णिसेयहारो य । अहियकमाणण्णोण्णभत्थोरासी अणंतगुणो॥४३५॥ कुलयं । सर्वस्यैक रूपमसंख्यभागस्तु पल्यच्छेदानाम् । गुणसंक्रमस्तु हार अपकर्षणोत्कर्पणं ततः ॥ ४३० ।। हार अधःप्रवृत्त ततो योगे यस्तु गुणकारः । नानागुणहानिशला असंख्यगुणितक्रमा भवन्ति ॥ ४३१ ॥ ततः पल्यशलाकच्छेदाधिकाः पल्यच्छेदना भवन्ति । पल्यस्य प्रथममूलं गुणहानिरपि च असंख्यगुणितक्रमा ॥ ४३२ ।। अन्योन्याभ्यस्तं पुनः पल्यमसंख्येयरूपगुणितक्रमम् । संख्येयरूपगुणिता कर्मोत्कृष्टस्थितिर्भवति ॥ ४३३ ।। अङ्गुलासंख्यभागं विध्यातोद्वेलनमसंख्यगुणम् । अनुभागस्य च नानागुणहानिशला अनन्ताः ॥ ४३४ ॥ गुणहान्यनन्तगुणा तस्या व्यर्ध निपेकहारश्च । अधिकक्रमाणामन्योन्याभ्यस्तो राशिरनन्तगुणः ॥ ४३५ ॥ कुलकम् । अर्थ- 'सर्वसंक्रमण' नामा भागहार सबसे थोड़ा है उसका प्रमाण १ रूप कल्पना किया। इससे असंख्यातगुणा पल्यके अर्धच्छेदोंके असंख्यातवें भाग प्रमाण 'गुणसंक्रमण भागहार है । इससे असंख्यातगुणे अपकर्षण और उत्कर्षण भागहार है तौभी ये दोनों जुदे २ पल्यके अर्धच्छेदोंके असंख्यातवें भाग प्रमाणही है, क्योंकि असंख्यातके छोटे बड़ेकी अपेक्षा बहुत भेद है । इससे 'अधःप्रवृत्तसंक्रमण' भागहार असंख्यातगुणा है । इससे असंख्यातगुणा योगोंके कथनमें जो गुणकार कहा है वह जानना । इससे कर्मोंकी १ इन अपकर्षणादिकोंके अस्पवहुत्वका कथन प्रसंगसे यहापर कहागया है।
. है गोम्मटसारः १४७ स्थितिकी नानागुणहानिशलाकाका प्रमाण असंख्यातगुणा है, वह पल्यकी वर्गशलाकाके अर्धच्छेदोको पल्यके अर्धच्छेदोंमे घटाकर जो प्रमाण रहै उतना है। इससे पल्यके अर्ध- च्छेदोका प्रमाण अधिक है, वह पल्यकी वर्गशलाकाके अर्धच्छेदोंके प्रमाण अधिक है। इससे पत्यका प्रथम वर्गमूल असंख्यात गुणा है । इससे कर्मों की स्थितिकी जो एक गुणहानि उसके समयोंका प्रमाण असंख्यात गुणा है । इससे असंख्यातगुणा कर्मोंकी स्थितिकी अन्योन्याभ्यस्तराशिका प्रमाण है । इससे असंख्यातगुणा पल्यका प्रमाण है, क्योंकि उस अन्योन्याभ्यस्तराफिके प्रमाणको पल्यकी वर्गशलाकासे गुणाकार करनेपर पल्य होता है। इससे कर्मोंकी उत्कृष्टस्थितिका प्रमाण सख्यातगुणा है । इससे 'विध्या- तसंक्रमण' नामा भागहार असंख्यातगुणा है, वह सूच्यंगुलके असंख्यातवें भाग प्रमाण । तथा इससे असंख्यातगुणा 'उद्वेलन संक्रमण' भागहार है । इससे कर्मों के अनुभा- गकी नानागुणहानि गलाकाका प्रमाण अनंतगुणा है। इससे उस अनुभागकी एक गुण- हानिके आयामका प्रमाण अनंतगुणा है । इससे उसीकी डेढ़गुणहानिका प्रमाण उसके आधे प्रमाणकर अधिक है, इससे दोगुणहानिका प्रमाण आधा गुणहानिके प्रमाणकर अधिक है इसीको निपेकहार कहते है । इससे उस अनुभागकी अन्योन्याभ्यस्तराशिका प्रमाण अनंतगुणा जानना । ।। ४३०१४३११४३२१४३३१४३४४४३५ ॥ इसप्रकार पंच- भागहारोके अल्पवहुत्वका तथा प्रसंगसे अन्यके अल्पबहुत्वका कथन किया । इसतरह पंचभागहारचूलिका समाप्त हुई । अब दशकरणचूलिकाको १४ गाथाओंसे कहते हुए पहले अपने श्रुतगुरूको नमस्कार करते है- जस्स य पायपसायेणणंतसंसारजलहिमुत्तिण्णो। वीरिंदणंदिवच्छो णमामि तं अभयणंदिगुरुं ॥ ४३६ ॥ यस्य च पादप्रसादेनानन्तसंसारजलधिमुत्तीर्णः । वीरेन्द्रनन्दिवत्सो नमामि तमभयनन्दिगुरुम् ॥ ४३६ ॥ अर्थ-जिस शास्त्रशिक्षादायक गुरुके चरणोंके प्रसादसे अनंत संसारसमुद्रके पारको प्राप्त हुआ वीरेन्द्रनन्दि नामा आचार्यका शिष्य ऐसा जो मै ग्रन्थकर्ता नेमिचद्र हूं सो उस श्रुतगुरू अभयनन्दि आचार्यको नमस्कार करता हू ॥ ४३६ ॥ अव उन करणोंके नाम कहते हैं, वंधुकट्टकरणं संकममोकटुदीरणा सत्तं । उदयुवसामणिधत्ती णिकाचणा होदि पडिपयडी ॥ ४३७ ॥ बंधोत्कर्पणकरणं संक्रममपकर्पणोदीरणा सत्त्वम् । नदयोपशान्तनिधत्तिः निःकाचना भवति प्रतिप्रकृति ॥ ४३७ ।।
१४८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-बंध १ उत्कर्षण २ संक्रमण ३ अपकर्पण ४ उदीरणा ५ सत्त्व ६ उदय ७ उपशान्त ८ निधत्ति ९ निकाचना १० ये दश करण ( अवस्था) हरएक प्रकृतिक होते है ।। ४३७ ॥ आगे इन करणोंका खरूप तीन गाथाओंसे कहते है- कम्माणं संबंधो बंधो उक्कट्टणं हवे वड्डी। संकमणमणत्थगदी हाणी ओकट्टणं णाम ॥ ४३८ ।। कर्मणां संबन्धो बन्ध उत्कर्पणं वृद्धिर्भवेत् । संक्रमणमन्यत्रगतिः हानिरपकर्पणं नाम ॥ ४३८ ॥ अर्थ-कर्मोंका संबंध होना अर्थात् मिथ्यात्वादि परिणामोंसे जो पुद्गलद्रव्यका ज्ञाना- । वरणादिरूप होकर परिणमन करनेसे ज्ञानादिको आवरण करना वह बंध है । जो कोकी स्थिति तथा अनुभागका वढना वह उत्कर्पण है । जो बंधरूप प्रकृतिका दूसरी प्रकृतिरूप परिणम जाना वह संक्रमण है। जो स्थिति तथा अनुभागका कम होजाना वह अपक- पण है ॥ ४३८ ॥ अण्णत्थठियस्सुदये संथुहणमुदीरणा हु अत्थित्तं । सत्तं सकालपत्तं उदओ होदित्ति णिहिटो ॥ ४३९ ॥ अन्यत्र स्थितस्योदये संस्थापनमुदीरणा हि अस्तित्वम् । सत्त्वं स्वकालप्राप्तमुदयो भवतीति निर्दिष्टः ॥ ४३९ ॥ अर्थ-उदयकालके बाहिर स्थित अर्थात् जिसके उदयका अभी समय नहीं आया ऐसा जो कर्मद्रव्य उसको अपकर्षणके बलसे उदयावली कालमें प्राप्त करना (लाना) उसको उदीरणा कहते हैं। जो पुद्गलका कर्मरूप रहना वह सत्त्व है । और जो कर्मका अपनी स्थितिको प्राप्त होना अर्थात् फल देनेका समय प्राप्त होजाना वह उदय है। ऐसा श्रीजिनेन्द्रदेवने कहा है ॥ ४३९ ॥ उदये संकममुदये चउसुवि दादुं कमेण णो सकं । उवसंतं च णित्तिं णिकाचिदं होदि जं कम्मं ॥ ४४०॥ उदये संक्रमोदययोः चतुर्वपि दातुं क्रमेण नो शक्यम् । उपशान्तं च निधत्तिः निकाचितं भवति यत् कर्म ॥ ४४० ।। अर्थ-जो कर्म उदयावली में प्राप्त न किया जाय अर्थात् उदीरणा अवस्थाको प्राप्त न हो सके वह उपशान्त करण है। जो कर्म उदयावलिमेंभी प्राप्त न होसकै और संक्रमण अवस्थाको भी प्राप्त न होसकै उसे निधत्ति करण कहते है। तथा जिस कर्मकी उदीरणा संक्रमण, उत्कर्षण और अपकर्षण ये चारोंही अवस्थायें न होसकै उसे निकाचित करण ( अवस्थावाला) कहते है ॥ ४४०॥ - गोम्मटसारः। A- इसप्रकार दशकरणोंका खरूप कहकर अब प्रकृतियोंमें तथा गुणस्थानोंमें करणोंके संभव होनेका प्रकार दो गाथासूत्रोंसे दिखाते है,- संकमणाकरणूणा णवकरणा होंति सब्वआऊणं । सेसाणं दसकरणा अपुवकरणोति दसकरणा ॥ ४४१॥ संक्रमणकरणोनानि नवकरणानि भवन्ति सर्वायुषाम् । शेषानां दशकरणान्यपूर्वकरण इति दशकरणानि ॥४४१ अर्थ-नरकादि चारों आयुकौके संक्रमणकरणके विना ९ करण होते हैं। और शेषवचीं सब प्रकृतियोंके १० करण होते है । तथा मिथ्यादृष्टिसे लेकर आठवें अपूर्वक- रण गुणस्थानपर्यंत १० करण होते है ॥ ४४१ ॥ आदिमसत्तेव तदो सुहुमकसाओत्ति संकमेण विणा । छच सजोगित्ति तदो सत्तं उदयं अजोगित्ति ॥ ४४२॥ आदिमसप्तैव ततः सूक्ष्मकषाय इति संक्रमेण विना । षट् च सयोगीति ततः सत्त्वमुदय अयोगीति ॥ ४४२ ।। अर्थ-उस अपूर्वकरणगुणस्थानके ऊपर १० वें सूक्ष्मकषायगुणस्थानपर्यंत आदिके ७ ही करण होते हैं । उससे आगे सयोगकेवली तक संक्रमणकरणके विना ६ ही करण होते है । उसके बाद अयोगकेवलीके सत्व और उदय-ये दो ही करण पाये जाते है ॥ ४४२॥ अब ११ वें उपशांतकषायमें कुछ विशेषता कहते है। णवरि विसेसं जाणे संकममवि होदि संतमोहम्मि । मिच्छस्स य मिस्सस्स य सेसाणं णत्थि संकमणं ॥ ४४३ ॥ नवरि विशेषं जानीहि संक्रममपि भवति शान्तमोहे । मिथ्यस्य च मिश्रस्य च शेषाणां नास्ति संक्रमणम् ॥ ४४३ ॥ अर्थ-विशेष बात यह है कि उपशांतकषायगुणस्थानमें मिथ्यात्व और मिश्रमोहनी- यका संक्रमणकरण भी होता है अर्थात् इन दोनोंके कर्मपरमाणू सम्यक्त्वमोहनीयरूप परिणम जाते है । तथा शेष प्रकृतियोंका सक्रमण नहीं होता, ६ ही करण होते हैं ॥४४३॥ बंधुक्कट्टणकरणं सगसगबंधोत्ति होदि णियमेण । संकमणं करणं पुण सगसगजादीण बंधोति ॥ ४४४ ॥ बन्धोत्कर्षणकरणं स्वकस्वकबन्ध इति भवति नियमेन । संक्रमणं करणं पुनः स्वकखकजातीनां बन्ध इति ॥ ४४४ ॥ अर्थ-बंधकरण और उत्कर्षणकरण ये दोनों, प्रकृतिकी अपनी २ बन्धव्युच्छित्तिके १५० रायचन्द्रजैनशासमालायाम् । ठिकाने होते हैं। और प्रकृतियोंकी अपनी २ जातिकी जहां बंधसे व्युच्छिति है वहापर संक्रमण करण होता है ॥ ४४४ ॥ ओकट्टणकरणं पुण अजोगिसत्ताण जोगिचरिमोत्ति । खीणं सुहुमंताणं खयदेसं सावलीयसमयोत्ति ॥ ४४५ ॥ अपकर्षणकरणं पुनरयोगिसत्त्वानां योगिचरम इति । क्षीणं सूक्ष्मान्तानां क्षयदेश सावलिकसमय इति ।। ४४५ ॥ अर्थ-अयोगीकी ८५ सत्त्वप्रकृतियोंका सयोगीके अंतसमयतक अपकर्पण करण होता है । तथा क्षीणकषायगुणस्थानमें सत्त्वसे व्युच्छिन्नहुई १६ तथा सूक्ष्मसापरायमें सत्त्वसे व्युच्छित्तिरूप हुआ जो सूक्ष्मलोभ-इसप्रकार १७ प्रकृतियोंका क्षयदेशपर्यत अपकर्षण करण जानना । उस क्षयदेशका काल यहांपर एक समय अधिक आवलिमात्र है । क्योंकि ये १७ प्रकृतियाँ खमुखोदयी है। सारांश यह है कि प्रकृतियां दो प्रकारकी है-एक खमु- खोदयी दूसरी परमुखोदयी, उनमेंसे जो अपने ही रूप उदयफल देकर नाश हो जायं वे खमुखोदयी है, उनका काल एकसमय अधिक आवलि प्रमाण है वही क्षयदेश (क्षय होनेका ठिकाना ) है। जो प्रकृति अन्यप्रकृतिरूप उदयफल देकर विनष्ट होजाती है वे परमुखोदयी है, उनके अंतकांडककी अंतफालि क्षयदेश है ऐसा जानना ॥ ४४५ ॥ उपसंतोत्ति सुराज मिच्छत्तिय खवगसोलसाणं च खयदेसोत्ति य खवगे अढकसायादिवीसाणं ॥ ४४६ ॥ उपशान्त इति सुरायुः मिथ्यत्रयं क्षपकषोडशानां च । क्षयदेश इति च क्षपके अष्टकषायादिविंशानाम् ॥ ४४६ ।। अर्थ-देवायुका अपकर्षणकरण उपशांतकषाय पर्यंत है। मिथ्यात्वादि तीन और 'णिर यतिरिक्खे" इत्यादि सूत्रसे कथित अनिवृत्तिकरणमें क्षय हुई १६ प्रकृतियां इनके क्षय- देश पर्यंत अर्थात् अन्तकांडकके अंतफालिपर्यंत अपकर्षण करण है, और क्षपक अवस्थामें अनिवृत्तिकरणमें क्षय हुई जो आठकषायको लेकर २० प्रकृतियां है उनका भी अपने २ क्षयदेश पर्यंत अपकर्षण करण है। जिसस्थानमें क्षय हुआहो उसको क्षयदेश कहते है ।।४४६॥ मिच्छतियसोलसाणं उवसमसेढिम्मि संतमोहोत्ति । अटकसायादीणं उवससियट्ठाणगोत्ति हवे ॥ ४४७ ॥ मिथ्यत्रयषोडशानामुपशमश्रेण्यां शान्तमोह इति । अष्टकषायादीनामुपशमिकस्थानक इति भवेत् ॥ ४४७ ॥ अर्थ-उपशमश्रेणीमें उपशान्तकषायगुणस्थान पर्यंत मिथ्यात्वादि तीन दर्शनमोहनीय और नरक द्विकादिक १६ इन प्रकृतियोंका अपकर्षण करण है । तथा आठ कषायादिकोंका अपने २ उपशमकरनेके ठिकाने तक अपकर्षण करण है ॥ ४४७॥ " - - गोम्मटसारः। १५१ पढमकसायाणं च विसंजोजकं वोत्ति अयददेसोत्ति णिरयतिरियाउगाणमुदीरणसत्तोदया सिद्धा ॥ ४४८ ॥ प्रथमकपायाणां च विसंयोजकं वा इति अयतदेश इति निरयतिर्यगायुपोरुदीरणसत्त्वोदयाः सिद्धाः ॥ ४४८ ॥ अर्थ-अनंतानुबंधी चारकषायके असंयतादि चार गुणस्थानोंमें यथासंभव जहां विस- योजन ( अन्यरूप परिणमन ) होवे वहातक ही अपकर्षणकरण है। तथा नरकायुके असयतगुणस्थानतक और तिर्यचायुके देशसंयतगुणस्थान तक उदीरणा, सत्व, उदयकरण- ये तीन करण प्रसिद्ध ही है, क्योंकि पूर्वे इनका कथन होचुका है ॥ ४४८॥ मिच्छरस य मिच्छोत्ति य उदीरणा उवसमाहिमुहियस्स । समयाहियावलित्ति य सुहुमे सुहुमस्स लोहस्स ॥ ४४९ ॥ मिथ्यस्य च मिथ्येति च उदीरणा उपशमाभिमुखस्य । समयाधिकावलीति च सूक्ष्मे सूक्ष्मस्य लोभस्य ॥ ४४९ ॥ अर्थ -उपशमसम्यक्त्वके सन्मुख हुए जीवके मिथ्यात्वगुणस्थानके अंतमें एक समय अधिक आवलि कालतक मिथ्यात्वप्रकृतिका उदीरणाकरण होता है, उतने ही कालतक उसका उदय है । और सूक्ष्मलोभका सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानमें ही उदीरणा करण है, इससे आगे उदय नही है ॥ ४४९ ॥ उदये संकममुदये चउसुवि दाएं कमेण णो सकं । उवसंतं च णिधति णिकाचिदं तं अपुवोत्ति ॥ ४५० ॥ उदये संक्रमोदययोः चतुर्वपि दातुं क्रमेण नो शक्यम् । उपशान्तं च निधत्ति. निकाचितं तत् अपूर्व इति ॥ ४५० ॥ अर्थ-जो कर्म उदयावलीमें प्राप्त नही कियाजावे अर्थात् जिसकी उदीरणा न होसके, जो उदीरणारूपभी न होसके और संक्रमणरूपभी न होसके, तथा उदयावलीमें भी न आसकै संक्रमण भी न होसकै-उत्कर्षण और अपकर्षण भी न होसके अर्थात् ये 'चारों क्रिया नही होसक्ती हों-ऐसे क्रमसे उपशातकरण, निधत्तिकरण और निकाचितकरण-ये तीन करण अपूर्वकरणगुणस्थानतक ही होते है । इसके ऊपर यथासंभव उदयावली आदि प्राप्त होनेकी सामर्थ्यवाले ही कर्मपरमाणू पाये जाते है ॥ ४५० ॥ इति श्री नेमिचन्द्राचार्य विरचित पंचसंग्रह द्वितीयनामवाले गोम्मटसार ग्रन्थके कर्मकांडमें त्रिचूलिका नामका चौथा अधिकार समाप्त हुआ॥४॥ आगे श्रीनेमिचन्द्राचार्य सिद्धान्तचक्रवर्ती अपने इष्ट देवको नमस्कार करते हुए स्थान- समुत्कीर्तन नामक अधिकारके कहनेकी प्रतिज्ञा करते है।
१५२
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
णमिऊण णेमिणाहं सच्चजुहिहिरणमंसियंघिजुगं ।
बंधुदयसत्तजुत्तं ठाणसमुक्तित्तणं वोच्छं ॥ ४५१ ॥
नत्वा नेमिनाथं सत्ययुधिष्ठिरनमस्कृतात्रियुगम् ।
बन्धोदयसत्त्वयुक्तं स्थानसमुत्कीर्तनं वक्ष्ये ।। ४५१ ।।
अर्थ-प्रत्यक्ष बंदनाकरनेवाला जो सत्यरूप 'युधिष्ठिर' नामा पांडव उसकरके नमस्कार
कियेगये हैं चरणकमल जिसके ऐसे श्री नेमिनाथ तीर्थकरको नमस्कार करके मैं नेमिच-
न्द्राचार्य प्रकृतियोंके स्थानसमुत्कीर्तनको कहूंगा ॥ ४५१ ॥ जो एकजीवके एककाल में
जितनी प्रकृतियोंका संभव होसकै उनप्रकृतियोंके समूहका नाम स्थान है। इसीका
व्याख्यान इस अधिकारमें कहाजाइगा ॥
अब पहले मूलप्रकृतियोंके बंध-उदय-उदीरणा-सत्त्वके भेदको लियेहुए स्थानोंके
कथनको गुणस्थानोंमें छह गाथाओंसे कहते है;-
छसु सगविहमट्टविहं कम्मं बंधंति तिसु य सत्तविहं ।
छविहमेकट्ठाणे तिसु एकमवंधगो एको ॥ ४५२ ।।
षट्सु सप्तविधमष्टविधं कर्म बध्नन्ति त्रिपु च सप्तविधम् ।
पविधमेकस्थाने त्रिपु एकमवन्धकमेकम् ॥ ४५२ ॥
अर्थ-मिश्रगुणस्थानके विना अप्रमत्त पर्यंत ६ गुणस्थानों में आयुके विना सातप्रकार
अथवा आयुसहित आठप्रकार कर्मको बांधते है। मिश्र, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण-
इन तीनगुणस्थानों में आयुविना सातप्रकार ही कर्म बंधरूप होते है । एक सूक्ष्मसापराय-
गुणस्थानमें आयु-मोहके विना ६ प्रकार ही कर्मोंका बंध होता है। उपशांतकषायादि
तीन गुणस्थानों में एक वेदनीयकर्मका ही बंध है । और अयोगीगुणस्थान बंधरहित है
अर्थात् उसमें किसी प्रकृतिका भी बंध नही होता ॥ ४५२ ॥
चत्तारि तिणि तिय चउ पयडिठ्ठाणाणि मूलपयडीणं ।
भुजगारप्पदराणि य अवहिदाणिवि कमे होंति ॥ ४५३ ॥
चत्वारि त्रीणि त्रीणि चत्वारि प्रकृतिस्थानानि मूलप्रकृतीनाम् ।
भुजाकाराल्पतराणि च अवस्थितान्यपि क्रमेण भवन्ति ॥ ४५३ ॥
अर्थ-इस पूर्वोक्तरीतिसे मूलप्रकृतियोंके बंधस्थान चार है, उनमेंसे ३, ३, और ४
स्थानके क्रमसे भुजाकार बंध, अल्पतर बंध और अवस्थित बंध ये तीन प्रकारके बंध होते
है । तथा 'च' से चौथा अवक्तव्यबंध भी समझना, यह चौथा बंध मूलप्रकृतियोंमें नहीं
होता ।। १५३ ।। इन चारोंका स्वरूप आगे ४६९ वी गाथामें कहेंगे
अट्ठदओ सुहुमोत्ति य मोहेण विणा हु संतखीणेसु ।
घादिदराण चउक्कस्सुदओ केवलिदुगे णियमा ॥४५४ ॥
गोम्मटसारः। १५३ अष्टोदयः सूक्ष्म इति च मोहेन विना हि शान्तक्षीणयोः । घातीतराणां चतुष्कस्योदयः केवलिद्विके नियमात् ॥ ४५४ ॥ अर्थ- सूक्ष्मसांपरायगुणस्थान तक आठ मूलप्रकृतियोंका उदय है, उपशांतकषाय और क्षीणकषाय इन दो गुणस्थानोंमें मोहनीयके विना सात का उदय है तथा सयोगी और अयोगी इन दोनोंके चार अघातिया कर्मोंका उदय नियमसे जानना ॥ ४५४ ॥ घादीणं छदुमट्टा उदीरगा रागिणो हि मोहस्स । तदियाऊण पमत्ता जोगंता होंति दोहपि ॥ ४५५॥ घातिनां छद्मस्था उदीरका रागिणो हि मोहस्य । तृतीयायुपोः प्रमत्ता योग्यन्ता भवन्ति द्वयोरपि ॥ ४५५ ॥ अर्थ-चार घातिया कर्मोकी उदीरणा क्षीणकषायगुणस्थानतक छमस्थ ज्ञानी करते है, मोहनीयकर्मकी उदीरणा करनेवाले सरागी सूक्ष्मसापरायगुणस्थानतक कहेगये है, वेदनीय और आयुकर्मकी उदीरणा करनेवाले प्रमत्तगुणस्थानतक प्रमादी जीव होते हैं, तथा नाम और गोत्र इन दोनोंकी उदीरणा सयोगीपर्यत जीव करते है ॥ ४५५ ॥ मिस्सूणपमत्तंते आउस्सद्धा हु सुहुमखीणाणं । आवलिसिट्टे कमसो सग पण दो चेवुदीरणा होंति ॥४५६॥ मिश्रोनप्रमत्तान्ते आयुष अद्धा हि सूक्ष्मक्षीणयोः । आवलिशिष्टे क्रमशः सप्त पञ्च द्वे चैवोदीरणा भवन्ति ॥ ४५६ ॥ अर्थ-मिश्रगुणस्थानके विना प्रमत्तगुणस्थानतक पांच गुणस्थानों में आयुकी स्थितिमें आवलिमात्र काल शेष रहनेपर आयु विना सात कर्मोंकी उदीरणा होती है, सूक्ष्मसांपरा- यमें उतना ही काल बाकी रहनेपर आयु-मोहनीय-वेदनीय इन तीनके विना पांच कर्मोंकी उदीरणा होती है। तथा क्षीणकषाय गुणस्थानमें उतना ही काल कम रहनेसे नाम और गोत्र इन दो कर्मोंकी उदीरणा होती है ।। ४५६ ॥ संतोत्ति अह सत्ता खीणे सत्तेव होंति सत्ताणि । जोगिम्मि अजोगिम्मि य चत्तारि हवंति सत्ताणि ॥ ४५७ ।। गान्त इति अष्ट सत्ताः क्षीणे सप्तैव भवन्ति सत्त्वानि । योगिनि अयोगिनि च चत्वारि भवन्ति सत्त्वानि ॥ ४५७ ॥ अर्थ-उपशान्तकषाय गुणस्थानपर्यंत आठों प्रकृतियोकी सत्ता है । क्षीणकषाय गुण- स्थानम मोहनीयके विना सात कर्मोंकी ही सत्ता है, और सयोगकेवली तथा अयोगके- वली इन दोनोंमें चार अघातिया कर्मोहीकी सत्ता है ॥ ४५७ ॥ आगे उत्तरप्रकृतियों के स्थानोका भलेप्रकार कथन करते है:- तिण्णि दस अट्ट ठाणाणि दंसणावरणमोहणामार्ण । एत्थेव य भुजगारा सेसेसेयं हवे ठाणं ॥ ४५८ ॥ २० १५४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । त्रीणि दश अष्ट स्थानानि दर्शनावरणमोहनानाम् । अत्रैव च भुजाकाराः शेपेष्वेकं भवेत् स्थानम् ॥ ४५८ ॥ अर्थ-दर्शनावरण, मोहनीय और नामकर्मके क्रमसे ३, १० और ८ स्थान हैं तथा इन्हींमें भुजाकार बंध भी होते हैं। और शेष ज्ञानावरणादिकोंमें एक २ ही स्थान है ॥ ४५८ ॥ उन शेषमेंसे ज्ञानावरण और अंतरायका तो पांच प्रकृतिका बंधरूप स्थान एक ही है। णव छक्क चदुकं च य विदियावरणस्स बंधठाणाणि । भुजगारप्पदराणि य अवट्ठिदाणिवि य जाणाहि ॥ ४५९ ॥ नव पर्दू चतुष्कं च द्वितीयावरणस्य वन्धस्थानानि । भुजाकाराल्पतराणि च अवस्थितान्यपि च जानीहि ॥ ४५९ ॥ अर्थ-दूसरे दर्शनावरणके ९ प्रकृतिरूप, स्त्यानादि तीनके विना ६ प्रकृतिरूप, और निद्रा-प्रचलाके विना ४ प्रकृतिरूप-इसतरह ३ बंधस्थान है तथा उनके भुजाकार अल्पतर और अवस्थित बंध-ये तीन बंध होते है । 'अपि' शब्दसे अवक्तव्यबंधभी होता है ॥ ४५९ ॥ इसी बातको प्रगट करते हैं;- णव सासणोत्ति वंधो छच्चेव अपुब्वपढमभागोत्ति । चत्तारि होति तत्तो सुहुमकसायस्स चरिमोत्ति ॥ ४६० ।। नव सासन इति बन्धः षदैव अपूर्वप्रथमभाग इति । चतस्रो भवन्ति ततः सूक्ष्मकषायस्य चरम इति ॥ ४६०॥ अर्थ-दर्शनावरणको ९ प्रकृतिरूप-सासादनगुणस्थानपर्यंत वांधता है, इसके ऊपर अपूर्वकरण गुणस्थानके पहले भागतक दर्शनावरणकी ६ प्रकृतियोंकाही बंध होता है, इसके बाद सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानके अंतसमयतक उसीकी ४ प्रकृतियोंका बंध होता है ॥ ४६० ॥ खीणोत्ति चारि उदया पंचसु णिद्दासु दोसु णिदासु । एके उदयं पत्ते खीणदुचरिमोत्ति पंचुदया ॥ ४६१ ॥ क्षीण इति चतस्र उदयाः पञ्चसु निद्रासु द्वयोनिद्रयोः । एकस्यामुयं प्राप्तायां क्षीणद्विचरम इति पञ्चोदयाः ॥ ४६१ ॥ अर्थ-दर्शनावरणकी चक्षुर्दर्शनावरणादि चार प्रकृतियोंका उदयरूपस्थान जाग्रता- वस्थावाले जीवके क्षीणकषायगुणस्थानपर्यंत है, और निद्रावान जीवके प्रमत्तगुणस्थानपर्यंत पांच निद्राओंमेंसे एकका उदय होनेपर पांचप्रकृतिरूप स्थान तथा क्षीणकषायके अंतके
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गोम्मटसारः।
१५५
समीपके समयतक निद्रा और प्रचला-इन दो निद्राओंमेंसे एकका उदय होनेपर दर्शना-
वरणकी पांच प्रकृतिरूप उदयस्थान जानना ॥ ४६१ ॥
मिच्छादुवसंतोत्ति य अणियट्टीखवगपढमभागोत्ति ।
णवसत्ता खीणस्स दुचरिमोति य छच्चदूवरिमे ॥ ४६२ ॥
मिथ्यात्वादुपशान्त इति च अनिवृत्तिक्षपकप्रथमभाग इति ।
नवसत्ता क्षीणस्य द्विचरम इति च षट्तुरुपरिमे ॥ ४६२ ॥
अर्थ-मिथ्यात्वगुणस्थानसे उपशांतकषाय गुणस्थानतक और क्षपक श्रेणीमें अनिव-
तिकरणके पहले भागतक दर्शनावरणकी ९ प्रकृतिरूप सत्त्वस्थान है । इनके ऊपर क्षीण-
कपायगुणस्थानके अंतके पहले समयतक दर्शनावरणकी ६ प्रकृतिरूप तथा उसके बाद
अंतके समयमें ४ प्रकृतिरूप स्थान है ॥ ४६२ ॥
आगे मोहनीयके बंधादिकी अपेक्षा स्थान कहते है-
वावीसमेकवीसं सत्तारस तेरसेव णव पंच ।
चदुतियदुगं च एकं बंधहाणाणि मोहस्स ॥ ४६३ ॥
द्वाविंशतिरेकविंशतिः सप्तदश त्रयोदशैव नव पञ्च ।
चतुत्रिकद्विकं चैक बन्धस्थानानि मोहस्य ॥ ४६३ ॥
अर्थ-मोहनीयकर्मके बंधस्थान २२, २१, १७, १३, ९, ५, ४, ३, २ और १
प्रकृतिरूप जानना चाहिये ॥ ४६३ ॥
अब उन्हीं स्थानोंको गुणस्थानोंकी अपेक्षा दिखाते है-
वावीसमेकवीसं सत्तर सत्तार तेर तिसु णवयं ।
थूले पणचदुतियद्गमेकं मोहस्स ठाणाणि ॥ ४६४ ॥
द्वाविंशतिरेकविंशतिः सप्तदश सप्तदश त्रयोदश त्रिषु नवकम् ।
स्थूले पञ्चचतुष्कत्रिकद्विकमेकं मोहस्य स्थानानि ॥४६४ ॥
अर्थ-उन मोहनीयके बंधस्थानोंमें मिथ्यादृष्टि आदि देशसंयतगुणस्थानतक क्रमसे
२२, २१, १७, १७, १३ बंधस्थान हैं । प्रमत्तआदि तीन गुणस्थानोंमें प्रत्येकमें नौ
नौ स्थान है । स्थूल अर्थात् नवमे गुणस्थानमें ५, ४, ३, २, १ प्रकृतिरूप ५
स्थान है ॥ ४६४ ॥
अब उन स्थानोंमें ध्रुव बंधी ( जिनका निरंतर बंध हो) प्रकृतियोंको कहते है,
उगुवीसं अट्ठारस चोइस चोइस य दस य तिसु छक्कं ।
थूले चदुतिदुगेकं मोहस्स य होति धुवबंधा ॥ ४६५ ॥
एकोनविंशतिरष्टादश चतुर्दश चतुर्दश च दश च त्रिषु षट्कम् ।
स्थूले चतुनिद्विकैकं मोहस्य च भवन्ति ध्रुवबन्धाः ॥ ४६५ ॥
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि अनिवृत्तिकरण नामक गुणस्थानके भागोंतक क्रमसे १९,
१८, १४, १४, १०, प्रमत्तादि तीनमें ६-६-६, नवमेमें ४-३-२-१, इसप्रकार मोह-
नीयकी ध्रुवबंधी प्रकृतियां है ॥ ४६५ ॥
सगसंभवधुववंधे वेदेके दोजुगाणमेके य ।
ठाणो वेदजुगाणं भंगहदे होति तभंगा ॥ ४६६ ॥
स्वकसंभवध्रुववन्धे वेदे एका द्वियुगयोरेका च ।
स्थानं वेदयुगानां भङ्गहते भवन्ति तद्गङ्गाः ॥ ४६६ ॥
अर्थ-पूर्वोक्त ध्रुवप्रकृतियोंमेंसे यथासंभव तीन वेदोंमें एक वेद, हास्यका युगल
और
रतिका जोड़ा-इन दो जोड़ाओंमें एक एक मिलानेसे स्थान होते हैं । तथा वेदके
प्रमाणको युगलके प्रमाणके साथ गुणाकार करनेसे स्थानोंको भंग होते है ।। ४६६ ॥
आगे उन भंगोंकी संख्या कहते है-
छब्बावीसे चदु इगिवीसे दो दो हवंति छटोत्ति ।
एकेकमदो भंगो वंधट्ठाणेसु मोहस्स ॥ ४६७ ॥
षट् द्वाविशतौ चत्वार एकविंशतौ द्वौ द्वौ भवन्ति पष्ठ इति ।
एकैकोतो भङ्गो बन्धस्थानेषु मोहस्य ।। ४६७ ।।
अर्थ-मोहनीयके बन्धस्थानोंमेंसे २२ के ६ भंग, २१ प्रकृतिरूपके ४, और इसके
ऊपर प्रमत्तगुणस्थानतक दो दो, इसके आगे सब स्थानों में एक एक-इसप्रकार स्था-
नोंके भङ्ग है ऐसा जानना ॥ ४६७ ।।
अब उन १० बंधस्थानोंके भुजाकार बंधादिकी संख्या दिखाते है:-
दस वीसं एकारस तेत्तीसं मोहबंधठाणाणि ।
भुजगारप्पदराणि य अवठ्ठिदाणिवि य सामण्णे ॥ ४६८ ॥
दशसु विंशतिरेकादश त्रयस्त्रिंशत् मोहबन्धस्थानानि ।
भुजाकाराल्पतराणि च अवस्थितान्यपि च सामान्ये ॥ ४६८ ।।
अर्थ-पहले कहे हुए मोहनीयके १० बंधस्थानोंमें सामान्यरीतिसे, भुजाकारबंध २०
है, अल्पतर बंध ११ है और अवस्थित बंध ३३ है ॥ ४६८ ॥
आगे इन भुजाकारादिबंधोंका लक्षण कहते हैं-
अप्पं बंधंतो बहुबंधे बहुगादु अप्पबंधेवि ।
उभयस्थ समे बंधे भुजगारादी कमे होंति ॥ ४६९ ॥
अल्पं बनतो बहुबन्धे बहुकादल्पबन्धेपि ।
। उभयत्र समे बन्धे भुजाकारादयः क्रमेण भवन्ति ॥ ४६९ ॥
गोम्मटसारः।
१५७
अर्थ-पहले थोडी प्रकृतियोंका बंध किया हो पीछे बहुत प्रकृतियोंके बांधनेपर, पहले
बहुतका बंध किया था पीछे थोडी प्रकृतियोंके बंध करने पर और पहले पीछे दोनों सम-
योंमें समान (एकसा) बंध होनेपर क्रमसे भुजाकार, अल्पतर, और अवस्थित बंध होते है।
तथा 'च' शब्दसे अवक्तव्यबंध भी होता है ॥ ४६९ ॥
आगे सामान्य अवक्तव्यभंगोंकी संख्या कहते है,
सामण्णअवत्तव्यो ओदरमाणम्मि एक्कयं मरणे ।
एक च होदि एत्थवि दो चेव अवट्टिदा भंगा ॥ ४७० ॥
सामान्यावक्तव्य अवतरमाने एको मरणे ।
एकश्च भवति अत्रापि द्वौ चैव अवस्थितौ भगौ ॥ ४७० ॥
अर्थ-सामान्यपनेसे ( भंगोंकी विवक्षाके विना) अवक्तव्यबंध उपशमश्रेणीसे
उतरनेमें १ है और वहां पर मरण होनेसे एक होता है, इसतरह दो बंध है। और दूसरे
समय आदिमें उसीप्रकार बंध होनेपर अवस्थित बंध भी यहां पर दो ही है ।। ४७० ।।
अब विशेषपनेसे भुजाकारादिबंधोंकी संख्या कहते है-
सत्तावीसहियसयं पणदालं पंचहत्तरिहियसयं ।
भुजगारप्पदराणि य अवट्टिदाणिवि विससेण ॥ ४७१ ॥
सप्तविशाधिकशत पञ्चचत्वारिंशत् पञ्चसप्तत्यधिकशतम् ।
भुजाकाराल्पतराणि च अवस्थितान्यपि विशेषेण ॥ ४७१ ॥
अर्थ-विशेषपनेसे अर्थात् भंगोंकी अपेक्षा १२७ भुजाकार बंध है, अल्पतर बंध ४५
है, और अवक्तव्यबंध १७५ है ॥ ४७१ ॥
अब उन १२७ को दिखाते है,
णम चउवीसं वारस वीसं चउरट्वीस दो दो य ।
थूले पणगादीणं तियतियमिच्छादिभुजगारा ॥ ४७२ ।।
नभश्चतुर्विशं द्वादश विशं चतुरष्टविंशं द्वौ द्वौ च ।
स्थूले पञ्चकादीनां त्रयस्त्रयो मिथ्यादिभुजाकाराः ॥ ४७२ ॥
अर्थ-भंगोंकी विवक्षासे मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानोंमें भुजाकार बंध कमसे शून्य,
२४, १२, २०, २४, २८, २, २, अनिवृत्ति करणमें पांच आदिके तीन तीन-
इसप्रकार १२७ होते है ॥ ४७२ ॥
अब ४५ अल्पतरबंधोंको कहते है-
अप्पदरा पुण तीसं णभ णम छद्दोगिण दोणि णभ एफं।
थूले पणगादीणं एके अंतिमे सुण्णं ॥ ४७३ ॥
- १५८ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । अल्पतराः पुनः त्रिंशत् नभो नभः पट् द्वौ हौ नभ एकः । स्थूले पञ्चकादीनामेकैकः अन्तिमे शून्यम् ॥ ४७३ ।। अर्थ-अल्पतर बंध मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानोंमें ३०, शून्य, शून्य, ६, २, २, शून्य, १ प्रकृतिरूप क्रमसे अपूर्वकरणतक होता है । स्थूल कपायवाले नवमे गुणस्थानमें पांच आदि प्रकृतिरूपका एक एक है, और अंतके पांचवें भागमें शून्य अर्थात् अल्पतर बंध नही होता ॥ ४७३ ॥ इसप्रकार १२७ भुजाकार, ४५ अल्पतर ३ अवक्तव्य बंध जिनको कि आगे कहेंगे-इसतरह सब मिलकर १७५ बंधोंमें जितनी २ प्रकृतियोंका पहले समयमें बंध हो उतनीही प्रकृतियोंका द्वितीयादि समयमें बंध हो वहांपर १७५ भेदरूप "अवस्थितबंध" जानना चाहिये । भेदेण अवत्तवा ओदरमाणम्मि एक्यं मरणे । दो चेव होंति एत्थवि तिण्णेव अवटिदा भंगा ॥४७४ ॥ भेदेन अवक्तव्या अवतरति एकको मरणे । द्वौ चैव भवत अत्रापि त्रय एव अवस्थिता भङ्गाः॥ ४७४ ॥ अर्थ-भंगकी विवक्षाके विशेषसे अवक्तव्यबंध, सूक्ष्मसापरायसे उतरनेमें एक होता है अर्थात् १० वेसे उतरके जब नवमेमें आता है तब संज्वलन लोभका बंध करता है । तथा उसी १० वेंमें मरणकर देव असंयत हुआ तब दो अवक्तव्य बंध होते हैं अर्थात् देव होकर १७ प्रकृतियोंको दोपकारसे बांधता है । इसतरह ३ अवक्तव्य बंध हुए। येही तीन अवस्थितभंगभी है, क्योंकि द्वितीयादि समयमें समान प्रकृतियोंका बंध होता है ॥४७॥ इसप्रकार मोहनीयकर्मके सामान्य विशेष भुजाकारादि वंध कहे है। अब मोहनीयके उदयस्थान कहते है। दस णव अट्ट य सत्त य छप्पण चत्तारि दोणि एकं च । उदयठाणा मोहे णव चैव य होति णियमेण ॥ ४७५॥ दश नवाष्ट च सप्त च षट् पञ्च चत्वारि द्वे एकं च । उदयस्थानानि मोहे नव चैव च भवन्ति नियमेन ॥ ४७५ ॥ अर्थ-मोहनीयके उदयस्थान १०, ९, ८, ७, ६, ५, ४, २, १ प्रकृतिरूप ९ हैं ऐसा नियमसे जानना ॥ ४७५ ॥ मिच्छं मिस्सं सगुणे वेदगसम्मेव होदि सम्मत्तं । एक्का कसायजादी वेददुजुगलाणमेकं च ॥ ४७६ ॥ मिथ्यं मिनं स्वगुणे वेदकसम्ये एव भवति सम्यक्त्वम् । एका कषायजातिः वेदद्वियुगलयोरेकं च ।। ४६७ ॥ - गोम्मटसारः। १५९ अर्थ-मोहनीयकी उदय प्रकृतियोंमेंसे मिथ्यात्व और मिश्रमोहनीयका उदय अपने २ पहले और तीसरे गुणस्थानमें है । तथा सम्यक्त्वमोहनीयका उदय वेदकसम्यक्त्वी- जीवके चौथेसे लेकर चार गुणस्थानतक है । इसप्रकार गुणस्थानों में उदयका नियम दिखा- कर उदयके कूटोंको कहते है। अनंतानुबंधी आदि चार कषायोंमेंसे एक कषायजाति, तीन वेदोंमेंसे एक वेदका उदय, हास्य-शोकका युगल और रति-अरतिका जोड़ा इन दो युगलोंमेंसे एक २ प्रकृतिका उदय पाया जाता है ॥ ४७६ ॥ भयसहियं च जुगुच्छासहियं दोहिंवि जुदं च ठाणाणि । मिच्छादिअपुवंते चत्तारि हवंति णियमेण ॥ ४७७ ॥ भयसहितं च जुगुप्सासहितं द्वाभ्यामपि युतं च स्थानानि । मिथ्याद्यपूर्वान्ते चत्वारि भवन्ति नियमेन ॥ ४७७ ॥ अर्थ-एककालमें एक जीवके भयसहित ही प्रकृतियोंका उदय होनेसे, अथवा केवल जुगुप्सासहित ही उदय होनेसे, अथवा भय-जुगुप्सा दोनोंसहितही उदय होनेसे अथवा 'च' शब्दसे दोनोंही करके रहिन उदय होनेसे कूटके आकार चार २ स्थान मिथ्याह- ष्टिसे लेकर अपूर्वकरण गुणस्थानपर्यंत निश्चयकर होते है, इसकारण यहांपर चार २ कूट कहेगये है ॥ ४७७ ॥ इनकी रचना बड़ी टीकामें विस्तारसे कही है। आगे मिथ्यादृष्टिमें वा असयतादि चार गुणस्थानोंमें विशेष बात कहते है- अणसंजोजिदसम्मे मिच्छं पत्ते ण आवलित्ति अणं । उवसमखइये सम्म ण हि तत्थवि चारि ठाणाणि ॥ ४७८ ॥ अनसंयोजितसाम्ये मिथ्यं प्राप्ते न आवलीति अनम् । उपशमक्षायिके सम्यं न हि तत्रापि चत्वारि स्थानानि ॥ ४७८ ॥ अर्थ-अनंतानुबंधीकषायके विसंयोजन ( अन्यप्रकृतिरूप) करनेवाले क्षायोपशम- सम्यग्दृष्टिके मिथ्यात्वकर्मोदयसे मिथ्यात्वगुणस्थानमें प्राप्त होनेपर आवलिमात्रकालतक अनंतानुबंधीकषायका उदय नहीं होता, क्योंकि विसंयोजन करनेके पीछे आवलिकाल. तक अपकर्षणद्वारा उदयावलीमें लानेकी सामर्थ्य नही है । इस अपेक्षा मिथ्यादृष्टि गुण- स्थानमें अनंतानुबंधीरहित चार कूट औरभी जानने । तथा उपशमसम्यक्त्वमें और क्षायिक- सम्यक्त्वमें सम्यक्त्वमोहनीयका उदय नहीं है वहापरभी उपशम और क्षायिककी अपेक्षा असयतादि चार गुणस्थानोंमें चार चार कूट दूसरे होते है ॥ ४७८ ॥ पुविल्लेसुवि मिलिदे अड चउ चत्वारि चदुसु अटेवे । चत्तारि दोणि एकं ठाणा मिच्छादिसुहुमंते ॥ ४७९ ॥ पूर्येष्वपि मिलितेषु अष्ट चत्वारि चत्वारि चतुर्यु अष्टैव । चत्वारि द्वे एक स्थानानि मिथ्यादिसूक्ष्मान्ते ।। ४७९ ॥
, - १६० रायचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-इन कूटोंमें पहले कहे हुए कूट मिलानेसे मिथ्याष्टिको आदि लेकर सूक्ष्म- सांपरायगुणस्थानपर्यंत क्रमसे ८, ४, ४, असंयतादि चारमें आठ आठ, ४, २, १ कूट जानना चाहिये ॥ ४७९ ॥ आगे इनमें अपुनरुक्तस्थानोंको गुणस्थानोंमें कहते हैं- दसणवणवादि चउतियतिहाण णवट्ठसगसगादि चऊ । ठाणा छादि तियं च य चदुवीसगदा अपुरोत्ति ॥ ४८० ॥ दशनवनवादि चतुस्तिकत्रिस्थानं नवाष्टसप्तमप्तादि चतुष्कम् । स्थानानि षडादि त्रिकं च च चतुर्विशगता अपूर्व इति ॥ ४८० ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि तीन गुणस्थानोंमें क्रमसे दशआदिके चार उदय स्थान, नवके आदिके तीन उदयस्थान, नवके आदिके तीन उदयस्थान हैं । असंयतादि चार गुणस्थानोंमें नव आदिके चार, आठआदिके चार, सातके आदिके चार, सातके आदिके चार उदयस्थान है। तथा अपूर्वकरण गुणस्थानमें छह आदिके तीन स्थान हैं । वे ६, ५, ४ प्रकृतिरूप हैं । इसप्रकार अपूर्वकरणपर्यंत सब स्थान प्रत्येक चौवीस चौवीस भङ्गों- (भेदों ) कर सहित हैं ॥ ४८० ॥ यहांपर किसी २ स्थानकी संख्या एकसी होनेसेभी प्रकृतियोंके बदलनेसे अपुनरुक्तपना है । एक य छक्केयारं एयारेयारसेव णव तिणि । एदे चउवीसगदा चदुवीसेयार दुगठाणे ॥ ४८१ ॥ एकं च षदमेकादश एकादशैकादशैव नव त्रीणि । एतानि चतुर्विशतिगतानि चतुर्विशैकादश द्विकस्थाने ॥ ४८१ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानोंमें मिलकर दस प्रकृतिरूप १ स्थान है, नव प्रकृ- तिरूप ६ स्थान हैं, ८ प्रकृतिरूप ७ प्रकृतिरूप तथा ६ प्रकृतिरूप ११ ग्यारह स्थान है, पांच प्रकृतिरूप ९ स्थान है, चार प्रकृतिरूप ३ स्थान है । ये सव स्थान चौवीस चौवीस भगोकर सहित है, तथा दो प्रकृतिरूप १ स्थानके २४ भंग और एक प्रकृति- रूप एक स्थानके १९ भंग है ॥ ४८१ ॥ आगे इन दो एक प्रकृतिरूप दो स्थानों के भंगोंका विधान कहते है:- उदयहाणं दोण्हं पणवंधे होदि दोण्हमेकस्स । चटुविहबंधटाणे सेसेसेय हवे ठाणं ॥ ४८२ ॥ उदयस्थान द्वयोः पञ्चबन्धे भवति द्वयोरेकस्य । चतुर्विधवन्धस्थाने शेपेष्वेकं भवेत् स्थानम् ।। ४८२ ॥ अर्थ-अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें पांच प्रकृतिके बंधस्वरूप तथा चार प्रकृतिके बंध- खरूप-इसप्रकार दो भागोंमें तीन वेद और चार संज्वलनकषाय-इनमेंसे एकका उदय : . - - गोम्मटसार। १६१ होनेपर दो प्रकृतिरूप एकस्थान पाया जाता है अर्थात् वहांपर चार चौर कषाय एकएक वेदमें होनेसे एक भागके १२ भंग दोनोंके २४ भग होते है । तथा 'कनकनन्दि' आचा- र्यकी पक्षमें जिस जगह ४ प्रकृतियोंका बंध पायाजाता है उसके अंतसमयमें वेदोंके उद- यका अभाव होनेसे शेप कपायादिकोके ४, ३, २, १, १, भंग होते हैं इसप्रकार एक- प्रकृतिरूप बंधस्थानमें ११ ही भंग सिद्ध हुए ॥ ४८२ ॥ अब इसी अर्थक प्रगट करनेकेलिये चार गाथासूत्र कहते है। अणियट्टिकरणपढमा संढित्थीणं च सरिस उदयद्धा। तत्तो मुहत्तते कमसो पुरिसादिउदयद्धा ॥ ४८३ ॥ अनिवृत्तिकरणप्रथमात् पण्डस्त्रियोः च सदृश उदयाद्धा । ततो मुहूर्तान्तः क्रमश पुरुपाद्युदयाद्धा ॥ ४८३ ॥ अर्थ---अनिवृत्तिकरणगुणस्थानके प्रथमभागके पहले समयसे लेकर नपुंसकवेद और स्त्रीवेटका काल समान है परंतु थोडा है। इससे अधिक अधिक अंतर्मुहूर्त क्रमसे पुरुषवेद संज्वलनक्रोधादिका काल जानना ॥ ४८३ ॥ पुरिसोदएण चडिदे वंधुदयाणं च जुगवदुच्छित्ती। सेसोदयेण चडिदे उदयदुचरिमम्हि पुरिसवंधछिदी ॥४८४॥ पुरुपोदयेन चटिते वन्धोदययोश्च युगपदुच्छित्तिः । शेपोटयेन चटिते उदयद्विचरमे पुरुपबन्धच्छित्तिः ॥ ४८४ ।। अर्थ-पुरुषवेढके उदय होनेसे श्रेणी चढनेपर पुरुषवेदकी बंधव्युच्छित्ति और उदय- व्युच्छित्ति एक कालमें होती है । अथवा 'च' शब्दसे बंधकी व्युच्छित्ति उदयके द्विचर- मसमयमें होती है । और शेष स्त्रीवेद तथा नपुंसकवेदके उदयसहित श्रेणी चढनेवाले जीवके पुरुपवेदकी बधव्युच्छित्ति उदयके द्विचरमसमयमें अर्थात् अंतसमयके समीपके सम- यमें होती है ॥ ४८४ ॥ पणवंधगम्मि वारस भंगा दो चेव उदयपयडीओ। दोउदये चदुवंधे बारेव हवंति भंगा हु॥ ४८५॥ पञ्चबन्धके द्वादश भगा द्वे चैव उदयप्रकृती। व्युदये चतुर्वन्धे द्वादशैव भवन्ति भगा हि ॥ ४८५ ॥ अर्थ-जहांपर पांच प्रकृतियोंका बंध है ऐसे अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें कषाय और वेद इन दो प्रकृतियोंका ही उदय है, इसकारण चार कषाय और ३ वेदको गुणाकार करनेसे १२ भंग होते है। इसीप्रकार चार प्रकृतियोंके बंध होनेपरभी दोके उदयरूप स्थानमें १२ ही भंग होते है ।। ४८५ ॥ २१ २ . १६२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । कोहस्स य माणस्स य मायालोहाणियहिभागम्हि । चदुतिदुगेकंभंगा सुहुमे एको हवे भंगो ॥ ४८६ ॥ क्रोधस्य च मानस्य च मायालोभानिवृत्तिभागे। चतुनिद्विकैकभङ्गाः सूक्ष्मे एको भवेत् भगः ॥ ४८६ ।। अर्थ-क्रोध मान माया और लोभके उदयरूप अनिवृत्तिकरण गुणस्थानके चार भागोंमें ४, ३, २, १ बंध हैं उनमें क्रमसे कपाय बदलनेकी अपेक्षाही ४, ३, २, १ भंग हैं। और सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानमें सूक्ष्म लोभके उदयरूपस्थानमें १ ही भंग है । इसप्रकार ११ भंग होते है ॥ ४८६ ॥ आगे सब उदयस्थानोंकी तथा उनकी प्रकृतियोंकी संख्या कहते हैं- बारससयतेसीदीठाणवियप्पेहि मोहिदा जीवा। पणसीदिसदसगेहिं पयडिवियप्पहिं ओघम्मि ॥ ४८७ ॥ द्वादशशतत्र्यशीतिस्थानविकल्पैर्मोहिता जीवाः । पञ्चाशीतिशतसमभिः प्रकृतिविकल्पैरोघे ॥ ४८७ ।। अर्थ-गुणस्थानों में मोहनीयकर्मके सब १२८३ उदयस्थानोंम तथा ८५०७ प्रकृति- भेदोंमें जगतके चराचर जीव मोहित होरहे है ॥ ४८७ ।। अब अपुनरुक्तस्थानोंकी तथा उनकी प्रकृतियोंकी संख्या कहते है- एक य छक्केयारं दससगचटुरेकयं अपुणरुत्ता। एदे चदुवीसगदा वार दुगे पंच एक्कम्मि ॥ ४८८ ॥ एकं च षट्रैकादश दशसप्तचतुरेकमपुनरुक्तानि । एतानि चतुर्विंशगतानि द्वादश द्विके पञ्च एकस्मिन् ॥ ४८८ ।। अर्थ-दशप्रकृतिरूप १ स्थान, नवादि प्रकृतिरूप क्रमसे ६, ११, १०, ७, ४, १ स्थान अपुनरुक्त है । इन ४० स्थानोंके २४ चौवीस भंग ( भेद ) है । दोप्रकृतिरूप स्थानके १२ भंग और एक प्रकृतिरूप स्थानके ५ भंग है ।। ४८८ ॥ णवसयसत्तत्तरिहि ठाणवियप्पेहिं मोहिदा जीवा । इगिदालूणत्तरिसयपयडिवियप्पेहिं णायव्वा ॥४८९ ॥ नवशतसप्तसप्ततिभिः स्थानविकल्पैः मोहिता जीवाः । एकचत्वारिशदेकोनसप्ततिशतप्रकृतिविकल्पैः ज्ञातव्याः ॥ ४८९ ॥ अर्थ-इसप्रकार ९७७ स्थानोंके भेदसे तथा ६९४१ प्रकृतियोंके भेदसे तीनलोकके चराचर जीव मोहित होरहे है । इसीकारण संसारमें भटकते है ऐसा जानना ॥ ४८९ ॥ आगे मोहनीयकर्मके उदयस्थान तथा उनकी प्रकृतियोको गुणस्थानोंमें उपयोगादिकी अपेक्षासे कहते है। - गोम्मटसारः। . १६३ उदयट्टाणं पयडिं सगसगउवजोगजोगआदीहिं। गुणयित्ता मेलविदे पदसंखा पयडिसंखा य ॥ ४९० ॥ उदयस्थान प्रकृति स्वकस्वकोपयोगयोगादिभिः। गुणयित्वा मेलपिते पदसंख्या प्रकृतिसंख्या च ॥ ४९०॥ अर्थ-७९ वें गाथासे कहीहुई उदयस्थानोंकी संख्या और उनस्थानोंकी प्रकृतियोंकी संख्याको अपने २ गुणस्थानोंसे सभवते उपयोग-योग और आदि शब्दसे सयम लेश्या सम्यत्तव इनमें गुणाकार करके फिर सबको जोड़नेसे जो प्रमाण होवै उतनी ही वहांपर मोहकी स्थानसख्या और प्रकृतियोंकी संख्या जानना चाहिये ॥ ४९० ॥ यही दिखाते है,- मिच्छद्गे मिस्सतिये पमत्तसत्ते जिणे य सिद्धे य । पण छस्सत्त दुगं च य उवजोगा होंति दो चेव ॥ ४९१॥ मिथ्यद्विके मिश्रत्रये प्रमत्तसप्तके जिने च सिद्ध च । पञ्च पट् सप्त द्विकं च च उपयोगा भवन्ति द्वौ चैव ॥ ४९१ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदिक दो गुणस्थानोंमें, मिश्रआदिक ३ में, प्रमत्तादि में, सयोगी अयोगीमें, और सिद्ध जीवों में उपयोग क्रमसे ५, ६, ७, २ और दो होते है ॥ ४९१ ॥ इन उपयोगोंसे स्थानसख्याको तथा प्रकृतिसंख्याको गुणाकार करना चाहिये । ऐसा होनेपर उन भेदोंकी सब सख्या कहते है, णवणउदिसगसयाहियसत्तसहस्सप्पमाणमुदयस्स । ठाणवियप्पे जाणसु उवजोगे मोहणीयस्स ॥ ४९२ ॥ नवनवतिसप्तशताधिकसप्तसहस्रप्रमाणमुदयस्य । स्थानविकल्पा जानीहि उपयोगे मोहनीयस्य ॥ ४९२ ॥ अर्थ-इसप्रकार गुणाकार करनेसे उपयोगकी अपेक्षासे मोहनीयके उदय स्थानोंके भेद ७७९९ जानना चाहिये ॥ ४९२ ॥ अब उपयोगकी ही अपेक्षासे प्रकृतिसख्या कहते है, एकावण्णसहस्सं तेसीदिसमण्णियं वियाणाहि । पयडीणं परिमाणं उवजोगे मोहणीयस्स ॥ ४९३ ॥ एकपञ्चाशत्सहस्रं न्यशीतिसमन्वितं विजानीहि । प्रकृतीनां परिमाणं उपयोगे मोहनीयस्य ॥ ४९३ ।। अर्थ-उपयोगके आश्रयसे मोहनीयकी प्रकृतियोंका प्रमाण ५१०८३ जानना चाहिये ।। ४९३ ॥ आगे योगके आश्रय ( अपेक्षा ) से संख्या कहते है।
१६४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । तिसु तेरं दस मिस्से णव सत्तसु छट्टयम्मि एकारा। जोगिम्मि सत्त जोगा अजोगिठाणं हवे सुण्णं ॥ ४९४ ॥ त्रिषु त्रयोदश दश मिश्रे नव सप्तसु पष्ठे एकादश । योगिनि सप्त योगा अयोगिस्थानं भवेत् शून्यम् ॥ ४९४ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि-सासादन-असंयत इन तीन गुणस्थानोंमें १३ योग हैं, मिश्रगुण- स्थानमें १०, देशसंयत-अप्रमत्तादि सात गुणस्थानोमें ९ है, छठे प्रमत्तगुणस्थानमें ११ योग है, सयोगकेवलीके ७ योग है और अयोगी गुणस्थानमें शून्य है अर्थात् कोई योग नहीं है ॥ ४९४ ॥ अब मिश्रयोगसहित तथा केवल पर्याप्तयोगयुक्त गुणस्थानोंमें विशेषपना दिखाते हैं;- मिच्छे सासण अयदे पमत्तविरदे अपुण्णजोगगदं । पुण्णगदं च य सेसे पुण्णगदे मेलिदं होदि ॥ ४९५ ॥ मिथ्ये सासने अयते प्रमत्तविरते अपूर्णयोगगतम् । पूर्णगतं च च शेषे पूर्णगते मिलितं भवति ॥ ४९५ ॥ अर्थ-मिथ्यात्व-सासादन=असंयत और प्रमत्तविरत इन चारगुणस्थानों में अपर्याप्तयो- गको प्राप्त तथा पर्याप्तयोगको प्राप्त इन दोनोंको मिलाकर स्थानप्रमाण और प्रकृतियोंका प्रमाण होता है । तथा शेष गुणस्थानोंमें केवल पर्याप्तयोगहीको प्राप्त स्थानप्रमाण और प्रकृतिप्रमाण होता है ॥ ४९५ ॥ आगे जुदे स्थापन किये योगोंमें विशेषता दो गाथाओंसे कहते है:- सासणअयदपमत्ते वेगुब्बियमिस्स तं च कम्मयियं । ओरालमिस्स हारे अडसोलडवग्ग अट्टवीससयं ॥ ४९६ ॥ सासनायतप्रमत्ते वैगूविकमिश्रं तच्च कार्मणम् । औरालमिश्रमाहारे अष्टषोडशाष्टवर्ग अष्टविशशतम् ।। ४९६ ।। अर्थ-सासादनगुणस्थानके वैक्रियिकमिश्रयोगमें आठका वर्ग अर्थात् ६४ स्थान हैं । असंयतगुणस्थानके वैक्रियिकमिश्रयोग और कार्माणयोगमें सोलहके वर्गप्रमाण अर्थात् २५६ स्थान है, तथा इसके औदारिकमिश्रयोगमें ६४ स्थान है । और प्रमत्तगुणस्थानके आहा- रक-आहारकमिश्रयोगमें १२८ स्थान है ॥ ४९६ ॥ आगे कम कियेहुए वेदोंको ग्रंथकर्ता आपही निषेध करते है- णत्थि णउंसयवेदो इत्थीवेदो णउंसइत्थिदुगे । पुव्वुत्तपुण्णजोगगचदुसुट्ठाणेसु जाणेजो ॥ ४९७ ॥ नास्ति नपुंसकवेदः स्त्रीवेदो नपुंसकत्रीद्विकम् । पूर्वोक्तापूर्णयोगगचतुर्पु स्थानेषु ज्ञातव्यम् ॥ ४९७ ।। १ यह गाथा जीवकाडमें भी आगई है। - 1 - गोम्मटसारः। १६५ अर्थ-पहले कहे हुए अपर्याप्तयोगको प्राप्त चारस्थानों में क्रमसे नपुंसकवेद नहीं, स्त्रीवेद नहीं, और दोमें नपुंसकवेद तथा स्त्रीवेद ये दोनों नहीं है ऐसा जानना चाहिये ॥४९७॥ अब योगकी अपेक्षा सब स्थानोका जोड कहते है- तेवण्णणवसयाहियबारसहस्सप्पमाणमुदयस्स । ठाणवियप्पे जाणसु जोगं पडि मोहणीयस्स ॥ ४९८ ॥ त्रिपञ्चाशन्नवशताधिकद्वादशसहस्रप्रमाणमुदयस्य । स्थानविकल्पान् जानीहि योग प्रति मोहनीयस्य ॥ ४९८ ॥ अर्थ-इसप्रकार मोहनीयकर्मके उदयस्थानोंके भेद योगकी अपेक्षासे १२९५३ जानना चाहिये ॥ ४९८ ॥ आगे प्रकृतियोके भेदोकी सख्या कहते है,- विदिये विगिपणगयदे खदुणवएकं खअट्टचउरो य । छ? चउसुण्णसगं पयडिवियप्पा अपुण्णम्हि ॥ ४९९ ॥ द्वितीये येकपञ्चकमयते खद्विनवैक खाष्टचत्वारश्च पष्टे चतुःशन्यसप्त प्रकृतिविकल्पा अपूर्णे ।। ४९९ ॥ अर्थ-सासादनगुणस्थानके वैक्रियिकमिश्रयोगमें दो एक पांच अर्थात् ५१२, अस- तके वैक्रियिकमिश्र और कार्माणमें शून्य दो नव एक अर्थात् १९२०, 'च' शब्दसे असं- यतके औदारिकमिश्रयोगमें शून्य आठ चार अर्थात् ४८० और छठे प्रमत्तगुणस्थानके आहारक युगलमें चार शून्य सात अकरूप १०४ प्रकृतियोंके भेद अपर्याप्त अवस्थामें होते है ।। ४९९ ॥ इनको जोड़कर पहले भेदोमें मिलाना ।। अब सब भेदोंकी मिलकर जो सख्या हुई उसे कहते है,- पणदालछस्सयाहियअट्ठासीदीसहस्समुदयस्स । पयडीणं परिसंखा जोगं पडि मोहणीयरस ॥ ५००॥ पञ्चचत्वारिंशत्षट्शताधिकाष्टाशीतिसहस्रमुदयस्य । प्रकृतीनां परिसख्या योग प्रति मोहनीयस्य ।। ५००॥ अर्थ-इसतरह सब भेदोंको मिलानेसे मोहनीयकर्मकी प्रकृतियोंकी संख्या योगकी अपेक्षा ८८६४५ है ऐसा जानना ॥ ५०० ॥ आगे संयमके आश्रयसे स्थानादि कहते है, तेरससयाणि सत्तरिसत्तेव य मेलिदे हवंतित्ति । ठाणवियप्पे जाणसु संजमलंवेण मोहस्स ॥ ५.१॥ त्रयोदशशतानि सप्ततिसप्तैव च मिलिते भवन्तीति । स्थानविकल्पा जानीहि संयमालम्बेन मोहस्य ।। ५०१ ।।
। रायचन्द्रनशाम्रमालायाम् । अर्थ-संयमकी अपेक्षासे मोहनीयके स्थानभेद १३७७ होते है ऐसा जानना चाहिये ॥ ५०१ ॥ अब उदयप्रकृतिभेदोंको कहते है,- तेवण्णतिसदसहियं सत्तसहस्सप्पमाणमुदयस्स । पयडिवियप्पे जाणसु संजमलंवेण मोहस्स ॥ ५०२ ।। त्रिपञ्चाशत्त्रिशतसहितं सप्तसहस्रप्रमाणमुदयस्य । प्रकृतिविकल्पान् जानीहि संयमालम्बेन मोहस्य ॥ ५०२।। अर्थ संयमहीकी अपेक्षासे मोहनीयके प्रकृति भेद ७३५३ मात्र होते है ऐसा जानना चाहिये ॥५०२॥ आगे गुणस्थानोंमें संभवती लेश्याओंको कहते है:- मिच्छचउक्के छकं देसतिये तिण्णि होंति सुहलेस्सा। जोगित्ति सुक्कलेस्सा अजोगिठाणं अलेस्सं तु ॥ ५०३ ॥ मिथ्यचतुष्के षटु देशत्रये तिस्रो भवन्ति शुभलेश्याः । योगी इति शुक्लेश्या अयोगिस्थानमलेग्यं तु ।। ५०३ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदिक चार गुणस्थानोंमें ६ लेश्या है, देशसंयतादि तीन गुणस्था- नोंमें ३ शुभलेश्या है, उसके बाद सयोगकेवलीपर्यंत शुक्ललेश्या है और अयोगकेवली गुणस्थान लेश्यारहित है ॥ ५०३ ॥ अब कही हुई इन लेश्याओंके आश्रयसे मोहके स्थान और प्रकृतियोंकी संख्याको दो गाथासूत्रोंसे कहते है:- पंचसहस्सा वेसयसत्ताणउदी हवंति उदयस्स । ठाणवियप्पे जाणसु लेस्सं पडि मोहणीयस्स ॥ ५०४ ॥ पञ्चसहस्राणि द्विशतसप्तनवतिः भवन्ति उदयस्य । स्थानविकल्पा जानीहि लेश्यां प्रति मोहनीयस्य ॥५०४ ॥ अर्थ-लेश्याके सबंधसे मोहनीयके स्थानोंके भेद ५२९७ होते हैं ऐसा हे शिष्य तू समझ ॥ ५०४ ॥ अट्टत्तीससहस्सा वेण्णिसया होंति सत्ततीसा य । पयडीणं परिमाणं लेस्सं पडि मोहणीयस्स ॥ ५०५॥ अष्टत्रिशत्सहस्राणि द्विशतानि भवन्ति सप्तत्रिंशच । प्रकृतीनां परिमाणं लेश्यां प्रति मोहनीयस्य ॥ ५०५ ॥ अर्थ-लेश्याहीकी अपेक्षा मोहनीयकी प्रकृतियोंका परिमाण ३८२३७ होता है ऐसा जानना चाहिये ॥ ५०५॥ . - गोम्मटसारः। १६७ आगे सम्यक्त्वके आश्रयसे स्थानादिककी सख्या कहते है, अत्तरीहिं सहिया तेरसयसया हवंति उदयस्स । ठाणवियप्पे जाणसु सम्मत्तगुणेण मोहस्स ॥ ५०६ ॥ अष्टसप्ततिभिः सहितानि त्रयोदशकशतानि भवन्ति उदयस्य । स्थानविकल्पा जानीहि सम्यक्त्वगुणेन मोहस्य ॥ ५०६ ।। अर्थ-सम्यक्त्वगुणकर सहित मोहनीयक उदयस्थानोके भेद १३७८ होते है ऐसा तुम जानो ॥ ५०६ ॥ अट्टेव सहस्साई छबीसा तह य होंति णादव्वा । पयडीणं परिमाणं सम्मत्तगुणेण मोहस्स ॥ ५०७ ॥ अप्रैव सहस्राणि पविशतिस्तथा च भवन्ति ज्ञातव्या' । प्रकृतीनां परिमाणं सम्यक्त्वगुणेन मोहस्य ॥ ५०७ ॥ अर्थ-तथा सम्यक्त्वगुणसहित मोहनीयकी प्रकृतियोंका प्रमाण ८०२६ जानने योग्य है ॥ ५०७ ॥ आगे मोहनीयक सत्त्वप्रकरणको ११ गाथासूत्रोसे कहते है,- अट्ट य सत्त य छक्क य चतुतिदुगेगाधिगाणि वीसाणि । तेरस वारेयारं पणादि एगूणयं सत्तं ॥ ५०८ ॥ अष्ट च सप्त च पद्धं च चतुनिद्विकैकमधिकानि विंशतिः । त्रयोदशद्वादशैकादश पञ्चादि एकोनकं सत्त्वम् ॥ ५०८ ।। अर्थ-मोहनीयकर्मके सत्त्वस्थान आठ आदि अधिक वीस अर्थात् २८, २७, २६, २४, २३, २२, २१, तथा १३, १२, ११, ५, और एक एक कम अर्थात् ४, ३, २, १ संख्या रूप १५ है ॥ ५०८ ॥ आगे इन १५ स्थानोंका गुणस्थानों में सभव होनेका प्रकार दिखाते है, तिण्णेगे एगेगं दो मिस्से चदुसु पण णियट्टीए । तिण्णि य थूलेकारं सुहुमे चत्तारि तिण्णि उवसंते ॥५०९॥ त्रीण्यकस्मिन्नेकस्मिन्ने द्वे मिश्रे चतुर्यु पञ्च निवृत्तौ । त्रीणि च स्थूले एकादश सूक्ष्मे चत्वारि त्रीण्युपशान्ते ॥ ५०९ ॥ अर्थ-पहले मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें १५ मेंसे तीन स्थान है, सासादनमे १, मिश्रगुणस्थानमें दो, असंयतादिचारगुणस्थानोमें पाच पांच, निवृत्ति अर्थात् अपूर्वकरण गुणस्थानमें ३, स्थूलकषाय अर्थात् नववे गुणस्थानमे ११, सूक्ष्मसापरायमै ४, उपशातक- पायनामा ११ वे गुणस्थानमें ३ सत्त्वस्थान है ॥ ५०९ ॥ . - १६८ रायचन्द्रजनशानमालायाम् । , अब उन्हीको कहते हैं:- पढमतियं च य पढमं पढम चउपीसयं च मिस्सम्हि । पढम चउवीसचऊ अविरददेसे पमत्तिदरे ॥ ५१० ॥ प्रथमत्रयं च च प्रथमं प्रथम चतुर्विशकं च मिश्रे । प्रथमं चतुर्विशचतुष्कं अविरतदेशे प्रमत्तेतरे ।। ५१० ।। अर्थ-उन १५ स्थानों से आदिके तीन स्थान मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें है, सासाद- नमें पहला २८ प्रकृतिरूप ही सत्वस्थान है, मिश्रगुणस्थानमे पहला और २४ प्रकृतिरूप ये दो स्थान है, अविरत-देशविरत और प्रमत्त-अप्रमत्त इन चारगुणस्थानों में पहला तथा २४ प्रकृतिरूपआदि चार स्थान इस तरह पांच पांच सत्त्वस्थान है ॥ ५१० ॥ अडचउरेक्कावीसं उवसमसेढिम्हि खरगसेढिम्हि । एकावीसं सत्ता अट्टकसायाणियहित्ति ॥ ५११॥ अष्टचतुरेकविंशतिः उपशमश्रेण्या झपक श्रेण्याम् । एकविंशतिः सत्ता अष्टकपायानिवृत्तिरिति ॥ ५११ ।। अर्थ-उपशमश्रेणीमें अपूर्वकरणादि चारगुणस्थानो) २८, २४,२१ प्रकृतिरूप तीन तीन स्थान है, तथा क्षपकश्रेणी में आठवें और अष्टकपायवाले अनिवृत्तिकरणके भागमें २१ प्रकृतिरूप एक एक स्थान है ॥ ५११ ॥ तेरस वारेयारं तेरस वारं च तेरसं कमसो। पुरिसित्थिसंढवेदोदयेण गदपणगवंधम्हि ॥ ५१२ ॥ त्रयोदश द्वादशैकादश त्रयोदश द्वादश च त्रयोदश क्रमशः । पुरुषस्त्रीषण्ढवेदोदयेन गतपञ्चकवन्धे ॥ ५१२ ।। अर्थ-उसके बाद पुरुषवेद १ चार संज्वलनकषाय इसप्रकार ५ प्रकृतियों के बंधवाले अनिवृत्तिकरण गुणस्थानके भागमें जो पुरुषवेदके उदयसहित श्रेणी चहै उसके १३, १२, ११ प्रकृतिरूप तीन स्थान होते है । स्त्रीवेदके उदयसहित श्रेणी चढ़नेवालेके १३ प्रकृ- तिरूप स्थान है और नपुंसकवेदके क्षय होनेपर १२ प्रकृतिरूप स्थान है। तथा जो जीव नपुंसकवेदके उदयसे श्रेणी चढे उसके १३ प्रकृतिरूप स्थान है, क्योंकि उसके नपुंसकवेद और स्त्रीवेद इन दोनोंके क्षयहोनेका प्रारंभ एककाल ही होता है ।। ५१२ ।। पुरिसोदयेण चडिदे अंतिमखंडंतिमोत्ति पुरिसुदओ। तप्पणिधिम्मिदराणं अवगदवेदोदयं होदि ॥ ५१३ ॥ पुरुषोदयेन चटिते अन्तिमखण्डान्तिम इति पुरुषोदयः । तत्प्रणिधौ इतरयोरपगतवेदोदयो भवति ।। ५१३ ।। अर्थ-पुरुषवेदके उदयसहित क्षपक श्रेणी चढनेवालेके अंतके खंडके अंतसमयपर्यंत अर्थात् पुरुषवेदके उदयकी स्थितीके पहले समयमै नपुंसकवेद क्षपणाखंड-स्त्रीवेद क्षपण- 1 गोम्मटसारः। १६९ खंड-पुरुषवेदक्षपणाखंडोंमें अंतके खंड ( भाग ) के अतसमयतक हमेशा पुरुषवेदका उदय और बंध पायाजाता है । तथा उसी पुरुषवेदक्षपणाके अंत खंडके समीप अन्यवेद अर्थात् नपुंसक-स्त्रीवेद इन दोंनोंके उदयका अभाव होता है ॥ ५१३ ॥ ऐसा होनेपर जो सिद्धान्त हुआ उसे कहते है- तठाणे एकारस सत्ता तिण्होदयेण चडिदाणं । सत्तण्हं समग छिदी पुरिसे छण्हं च णवगमस्थिति ॥५१४॥ तत्स्थाने एकादश सत्ताः त्रिकोदयेन चटितानाम् । सप्तानां समकं छितिः पुरुषे षण्णां च नवकमस्तीति ॥ ५१४ ।। अर्थ-उन पूर्वोक्त दोनों स्थानोंमें सात नोकषाय और ४ संज्वलन इसतरह ११ प्रकृतिरूप सत्त्वस्थान है, तीनवेदोंमेंसे किसी वेदके उदयसहित श्रेणीचढनेवालेके ७ नोक- पायकी व्युच्छित्ति एककालमें ही होती है, परंतु विशेष यह है कि पुरुषवेदके उदय सहित श्रेणी चढनेवालेके पुरुषवेदके नूतनसमयप्रबद्ध पाये जाते है इसलिये उसके ६ नोकषाय- की सत्वव्युच्छित्ति है ॥ ५१४ ॥ अब पूर्वोक्त अर्थको ही कहके अनिवृत्तिकरणमें सत्त्वस्थानोंकी विशेषता कहते हैं; इदि चदुवंधक्खवगे तेरस बारस एगार चउसत्ता । तिदुइगिबंधे तिदुइगि णवगुच्छिट्ठाणमविवक्खा ॥ ५१५ ॥ इति चतुर्बन्धक्षपके त्रयोदश द्वादशैकादश चतुःसत्ता । त्रिद्विकैकबन्धे त्रिद्विकैकं नवकोच्छिष्टयोरविवक्षा ॥ ५१५ ॥ अर्थ-इस पूर्वोक्त प्रकार क्षपकश्रेणी चढनेवालेके चार प्रकृतियोंके बंधवाले अनिवृत्ति- करणके भागमें १३, १२, ११, और ४ प्रकृतिरूप सत्त्व है । तथा ३, २, १ प्रकृतिके बंध होनेवाले भागोंमें ३, २, १ प्रकृतिरूप सत्त्व स्थान पायाजाता है । यहां नूतनसमय- प्रबद्ध और उच्छिष्टावलि ( उदयसे बचे हुए प्रथम स्थितीके निषेक ) की विवक्षा ग्रहण नहीं की ॥ ५१५॥ आगे मोहनीयके बंधस्थानोंमें सत्त्वस्थानोंकी संख्या जो पाई जाती है उसे दो गाथा- ऑसे कहते है- तिण्णेव दु बावीसे इगिवीसे अठवीस कम्मंसा । सत्तरतरेणवबंधगेसु पंचेव ठाणाणि ॥ ५१६ ॥ पंचविधचदुविधेसु य छ सत्त सेसेसु जाण चत्तारि । उच्छिद्यावलिणवर्क अविवेक्खिय सत्तठाणाणि॥५१७॥जुम्मम्। त्रय एव तु द्वाविंशतौ एकविशतौ अष्टविंशतिः कर्माशाः । सप्तदशत्रयोदशनवबन्धकेषु पञ्चैव स्थानानि ॥ ५१६ ।। - १७० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । पञ्चविधचतुर्विधेपु च पट् सप्त शेषेपु जानीहि चत्वारि । उच्छिष्टावलिनवकमविवेक्ष्य सत्त्वस्थानानि ।। ५१७ ।। युग्मम् । अर्थ-मोहनीयके २२ प्रकृतिरूपधस्थानमें कर्माश अर्थात् सत्त्वस्थान २८-२७-२६ प्रकृतिरूप ३ है।२१ प्रकृतिरूपबंधस्थानमें २८ प्रकृतिरूप सत्त्वस्थान है। १७-१३-९ के बंध- स्थानों में २८ प्रकृतिरूप आदि पांच पांच सच्चस्थान है, पांचके बंधस्थानमें आदिके ६ सत्वस्थान है, चारके बंधस्थानमें७ सत्त्वस्थान है, तथा शेष तीन-दो-एकके बंधस्थानमें चार चार सत्त्व- स्थान हैं। ये सत्त्वस्थान उच्छिष्टावली और नूतनबंधरूप समयप्रबद्धकी अपेक्षा नहीं करके ही कहेगये है।५१६ । ५१७ ॥ इसप्रकार बंधस्थानके होनेपर सत्त्वस्थान पाये जाते है । दसणवपण्णरसाई बंधोदयसत्तपयडिठाणाणि । भणिदाणि मोहणिजे एत्तो णामं परं वोच्छं ॥ ५१८ ॥ दशनवपञ्चदश बन्धोदयसत्त्वप्रकृतिस्थानानि । भणितानि मोहनीये इतो नाम परं वक्ष्यामि ॥ ५१८ ॥ अर्थ-इसप्रकार मोहनीयके १० बन्धस्थान, ९ उदयस्थान और १५ सत्त्वस्थान कहे । इससे आगे अब नामकर्मके बंधादिके स्थान कहेगे ।। ५१८ ॥ उसमें पहले नामकर्मस्थानोंके आधारभूत ४१ जीवपदोंको दो गाथाओंसे कहते है- णिरया पुण्णा पण्हं वादरसुहुमा तहेव पत्तेया। वियलाऽसण्णी सपणी मणुवा पुण्णा अपुषणा य ॥ ५१९ ॥ सामण्णतित्थकेवलि उहयसमुग्धादगा य आहारा । देवाविय पजत्ता इदि जीवपदा हु इगिदाला ॥५२०॥ जुम्मम् । निरयाः पूर्णाः पञ्च बादरसूक्ष्माः तथैव प्रत्येकाः । विकला असंज्ञिनः संज्ञिनो मनुष्याः पूर्णा अपूर्णाश्च ।। ५१९ ॥ सामान्यतीर्थकेवलिन उभयसमुद्धातगाश्च आहाराः । देवा अपि च पर्याप्ता इति जीवपदा हि एकचत्वारिंशत् ।। ५२० ।। युग्मम्। अर्थ-नारकी सब पर्याप्त है इस कारण १ भेद, पृथिवीकाय १ जलकाय २ तेज- काय ३ वायुकाय ४ साधारणवनस्पतीकाय ५ ये पांच वादर और सूक्ष्म है। इससे १० भेद हुए, इसीतरह प्रत्येकवनस्पतिकाय, दो इंद्री आदि ३ विकलत्रय, असंज्ञी पंगेन्द्री, सज्ञी पंचेद्री, मनुष्य ये १७ पर्याप्त तथा अपर्याप्त है इसप्रकार ३४ भेद हुए । तथा सामान्यकेवली, तीर्थकरकेवली, और दोनों ही समुद्धातकरनेवाले, आहारकशरीरवाले, और देव-ये ६ पर्याप्त ही होते है। इसतरह १+३४+६=सब ४१ भेद जीवोंके है। इस- कारण इनको जीवपद अर्थात् जीवस्थान कहते है। और ये नाम कर्मके बंधस्थानों के निमित्तसे होते हैं, इसलिये इनको कर्मपद भी कहते है ॥ ५१९.५२०॥ यहां पर कर्मके निमि- तसे ३६ ही स्थान होते है इसकारण कर्मपद ३६ ही हैं। - - गोम्मटसारः। तेवीसं पणवीसं छब्बीसं अट्ठवीसमुगतीसं । तीसेक्कतीसमेवं एक्को बंधो दुसेढिम्हि ॥ ५२१ ॥ त्रयोविंशतिः पञ्चविंशतिः षड्विंशतिरष्टविंशमेकोनत्रिंशत् । त्रिंशदेकत्रिंशदेवमेको बन्धो द्विश्रेण्याम् ॥ ५२१ ।। अर्थ-नामकर्मके बंधस्थान २३, २५, २६, २८, २९, ३०, ३१ प्रकृतिरूप सात तो अपूर्वकरणके छठे भागतक यथासंभव पाये जाते है, और १ प्रकृतिरूप आठवां बंधस्थान दोनों श्रेणियोंमें बंधता है ॥ ५२१ ॥ आगे वे बंधस्थान किस कर्मपदसहित बंधते है यह बात दो गाथाओंसे कहते हैं- ठाणमपुण्णेण जुदं पुण्णेण य उवरि पुण्णगेणेव । तावदुगाणण्णदरेणण्णदरेणमरणिरयाणं ॥ ५२२ ॥ णिरयेण विणा तिण्हं एक्कदरेणेवमेव सुरगइणा । बंधति विणा गइणा जीवा तज्जोगपरिणामा॥५२३॥जुम्म। स्थानमपूर्णेन युतं पूर्णेन चोपरि पूर्णकेनैव । आतापद्विकयोरन्यतरेणान्यतरेणामरनिरययोः ॥ ५२२ ।। निरयन विना त्रयाणामेकतरेणैवमेव सुरगतिना। बध्नन्ति विना गतिना जीवा तद्योग्यपरिणामाः ॥ ५२३ ॥युग्मम् । अर्थ-ऊपर कहे हुए आठस्थानों में क्रमसे पहला २३ प्रकृतिरूप स्थान अपर्याप्त प्रकृति- सहित बंधता है, दूसरा स्थान पर्याप्तप्रकृति सहित 'च' शब्दसे अपर्याप्तसहित भी बंधता है। इससे आगे पर्याप्तप्रकृतिसहित ही बंधते है । उनमें भी २६ प्रकृतिरूपस्थान आतप- उद्योत इन दोनोंमेंसे कोई एक प्रकृतिसहित बंधता है, २८ प्रकृतिरूपस्थान देवगति और नरकगति इन दोनोंमेंसे कोईएक गति सहित बंधता है, २९ प्रकृतिरूप और ३० प्रकृतिरूप ये दो स्थान नरक गतिके विना तिर्यच आदि ३ गतियोंमेंसे कोईएक गति सहित बंधते हैं, ३१ प्रकृतिरूपस्थान देवगतिके साथ बंधता है और एक प्रकृतिरूप स्थान किसी गति कर्मके साथ नही बंधता । इसप्रकार इन स्थानोंके योग्य परिणामोंवाले जीव इन स्था- नोंको बांधते है ॥ ५२२ । ५२३ ॥ पूर्वोक्त आताप और उद्योत ये दो प्रकृतियां प्रशस्त (पुण्यरूप ) है वे किस पदके साथ बंधती है यह कहते है- भूवादरपजत्तेणादावं बंधजोग्गमुज्जोवं । तेउतिगूणतिरिक्खपसत्थाणं एयदरगेण ॥ ५२४ ॥ भूबादरपर्याप्तेनातापो बन्धयोग्य उद्योतः । तेजत्रिकोनतिर्यप्रशस्तानामेकतमेन ।। ५२४ ॥
-- रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-पृथिवीकायबादरपर्याप्त सहित ही आतप प्रकृति बंधयोग्य है, और उद्योत प्रकृति तेजःकायादि तीन के विना शेष तिर्यचसंबंधी पुण्यप्रकृतियोंमेंसे किसी एक प्रकृतिके साथ बंधयोग्य कही है ॥ ५२४ ॥ णरगइणामरगइणा तित्थं देवेण हारमुभयं च । संजदवंधट्टाणं इदराहि गईहि णस्थित्ति ॥ ५२५ ॥ नरगतिनामरगतिना तीर्थ देवेनाहारमुभयं च । संयतबन्धस्थानमितराभिर्गतिभिः नास्तीति ।। ५२५ ।। अर्थ-तीर्थकरप्रकृतिको देव और नारक असंयत तो मनुष्यगति सहित बांधते है, और असंयतादि चारगुणस्थानवाले मनुष्य देवगतिसहित वांधते है । तथा आहारकयुगल और तीर्थकर आहारक दोनोंको देवगतिसहित ही वांधते है, क्योंकि संयतके योग्य बंध- स्थान देवगतिके विना अन्यगतियों सहित बंधता ही नही है ।। ५२५ ॥ आगे २३ आदि स्थानोंमें प्रकृतियोंके जाननेकेलिये पाठका क्रम तीनगाथाओंसे कहते है- णामस्स णवधुवाणि य सरूणतसजुम्मगाणमेक्कदरं । गइजाइदेहसंठाणाणूणेकं च सामण्णा ॥ ५२६ ॥ तसबंधेण हि संहदिअंगोवंगाणमेक्कदरगं तु । तप्पुण्णेण य सरगमणाणं पुण एगदरगं तु ॥ ५२७ ॥ पुण्णेण समं सव्वेणुस्सासो णियमदो दु परघादो। जोगट्टाणे तावं उजो तित्थमाहारं ॥ ५२८ ॥ विसेसयं । नानो नव ध्रुवाश्च स्वरोनत्रसयुग्मकानामेकतमकं तु । गतिजातिदेहसंस्थानानूनामेका च सामान्याः ॥ ५२६ ॥ त्रसवन्धे हि संहत्याङ्गोपाङ्गानामेकतरकं तु । तत्पूर्णेन च खरगमनानां पुनः एकतरकं तु ॥ ५२७ ॥ पूर्णेन समं सर्वेणोच्छ्वासो नियमतस्तु परघातः । योगस्थाने आतप उद्योत तीर्थमाहारम् ।। ५२८ ॥ विशेषकम् । अर्थ-नामकर्मकी तैजस आदि ९ ध्रुवबंधी प्रकृतियां, खरके विना त्रसादि नौ युगल इनमेंसे एक एक इस प्रकार ९, गति ४ जाति ५ शरीर ३ संस्थान ६ आनुपूर्वी ४ इनमेंसे एक एक इसप्रकार ५ सब मिलकर २३ प्रकृतियां सामान्य बंधरूप है । त्रसप्रकृतिके साथ ही ६ संहनन ३ अंगोपांगोंमें किसी एकका बंध होता है। सपर्याप्त प्रकृति सहित खरयुगल तथा विहायोगति युगलमेंसे एक एकका बंध होता है। पर्याप्त प्रकृति सहित जो सब त्रस स्थावर हैं उनके साथ उच्छास और परघात नियमसे बंध योग्य हैं। तथा आताप, उद्योत, । *
गोम्मटसारः।
१७३
तीर्थकर, आहारकयुगल-ये प्रकृतियां पहले कहे हुए योग्य नामपदोंमें बंध योग्य हैं
॥ ५२६ । ६२७ । ५२८॥
तित्थेणाहारदुर्ग एकसराहेण बंधमेदीदि ।
पक्खित्ते ठाणाणं पयडीणं होदि परिसंखा ॥ ५२९ ॥
तीर्थेनाहारद्विकमेकसराहेण बन्धमेतीति ।
प्रक्षिप्ते स्थानानां प्रकृतीनां भवति परिसंख्या ॥ ५२९ ॥
अर्थ-तीर्थकर प्रकृति सहित आहारकयुगल एक काल ही बंधको प्राप्त होता है,
इसकारण पूर्वोक्त २३ के बंधमें यथासंभव प्रकृतियोंके मिलानेसे स्थानों और प्रकृतियोंकी
संख्या होजाती है ॥ ५२९ ॥
इसी बातको दो गाथाओंसे कहते है।-
एयक्खअपजत्तं इगिपजत्त बितिचपणरापजत्तं ।
एइंदियपज्जत् सुरणिरयगईहिं संजुत्तं ॥ ५३० ॥
पजत्तगबितिचप मणुसदेवगदिसंजुदाणि दोण्णि पुणो।
सुरगइजुदमगइजुदं बंधट्टाणाणि णामस्स ॥ ५३१ ॥ जुम्म ।
एकाक्षापर्याप्तमेकपर्याप्तं द्वित्रिचपनरापर्याप्तम् ।
एकेन्द्रियपर्याप्तं सुरनिरयगतिभ्यां संयुक्तम् ॥ ५३०॥
पर्याप्तकद्वित्रिच मानुषदेवगतिसंयुते द्वे पुनः ।
सुरगतियुतमगतियुतं बन्धस्थानानि नाम्नः ॥ ५३१ ॥ युग्मम् ।
अर्थ-एकेद्री अपर्याप्त सहित २३ का १ स्थान है, एकेन्द्री पर्याप्त-दोइन्द्री-तेइन्द्री
चौहन्द्री-पंचेन्द्री तथा मनुष्य अपर्याप्त सहित २५ के ६ स्थान हैं, एकेन्द्री पर्याप्त आतप
तथा एकेन्द्री पर्याप्त उद्योत सहित २६ के २ स्थान है, देवगति तथा नरकगति सहित
२८ के २ स्थान हैं, दो इन्द्री-तेइन्द्री-चौइंद्री-पंचेंद्री पर्याप्त और मनुष्यगति तथा
देवगति पर्याप्त इन दोनोंकर सहित दो स्थान-इसप्रकार २९ के ६ स्थान है, दो इन्द्री
पर्याप्त उद्योतादि सहित ६ स्थान ३० के है, देवगति सहित १ स्थान ३१ का है, और
यशस्कीर्तिप्रकृति सहित १ स्थान १ का है । इसप्रकार नामकर्मके बंधस्थानोंका कथन
जानना ॥ ५३० । ५३१॥
आगे इन बंधस्थानोंके भंग कहते हैं।
संठाणे संहडणे विहायजुम्मे य चरिमछजुम्मे ।
अविरुद्धकदरादो बंधट्ठाणेसु भंगा हु ॥ ५३२ ॥
संस्थाने संहनने विहायोयुग्मे च चरमषड्युग्मे ।
अविरुद्ध एकतमात् बन्धस्थानेषु भगा हि ॥ ५३२ ॥
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अर्थ-६ संस्थान, ६ संहनन, विहायोगतिका जोड़ा और अंतके स्थिरआदि ६ युगल
इनमें अविरुद्ध एक एकका ग्रहण करनेसे और आपसमें गुणाकार करनेपर बंधस्थानों में
४६०८ भङ्ग होते है ऐसा नियमसे जानना ॥ ५३२ ।।
तत्थासत्थो णारयसव्वापुण्णण होदि वंधो दु
एक्कदराभावादो तत्थेक्को चेव भंगो दु ॥ ५३३ ॥
तत्राशस्तो नारकसर्वापूर्णेन भवति बन्धस्तु ।
एकतमाभावात् तत्रैकश्चैव भङ्गस्तु ।। ५३३ ॥
अर्थ-उन प्रशस्त तथा अप्रशस्तबंधरूप प्रकृतियोंमें नरकगति सहित तथा सस्थावर
युक्त सब अपर्याप्त सहित दुर्भगादि अप्रशस्तप्रकृतियोंका ही बंध होता है, क्योंकि इनमें
बंधयोग्य प्रकृतियोंकी प्रतिपक्षी प्रकृतियोंका बंध नहीं होता। इसलिये उनस्थानोंमें अप्रशस्त
एक एक प्रकृतिका ही बंध होनेसे एक एक ही भंग है ॥ ५३३ ॥
तत्थासत्थं एदि हु साहारणथूलसबसुडमाणं ।
पजत्तेण य थिरसुहजुम्मेक्कदरं तु चदुभंगा ॥ ५३४ ॥
तत्राशस्ता एति हि साधारणस्थूलसर्वसूक्ष्मानाम् ।
पर्याप्तेन च स्थिरशुभयुग्मैकतरं तु चतुर्भगाः ॥ ५३४ ।।
अर्थ-उन एकेन्द्रियके ग्यारहभेदोंमें साधारणवनस्पति और बादरपर्याप्त तथा सूक्ष्मप-
प्ति सहित २५ के बंधस्थानमें एक एक अप्रशस्त प्रकृति ही बंधको प्राप्त होती है । विशे-
षता यह है कि स्थिर-शुभके युगलोंमेंसे किसी एकका बंध होनेसे २५ के ५ स्थानों में
चार चार भंग होते है ॥ ५३४ ॥
पुढ़वीआऊतेऊवाऊपत्तेयवियलसण्णीणं ।
सत्येण असत्थं थिरसुहजसजुम्मट्टभंगा हु ॥ ५३५ ॥
पृथिव्यप्तेजोवायुप्रत्येकविकलासंज्ञिनाम् ।
शस्तेनाशस्तं स्थिरशुभयशोयुग्ममष्टभङ्गा हि ॥ ५३५ ॥
अर्थ-पृथिवीकाय-जलकाय-तेजकाय-वायुकाय-प्रत्येक वनस्पति-द्विइन्द्रियादि विकल
३-असंज्ञी पंचेन्द्री इनके अविरोधी त्रस बादरादिसे हुए जो २५ प्रकृतिरूपआदि स्थान
हैं उनमें त्रस बादर आदि प्रशस्त प्रकृतियोंके साथ यथासंभव दुर्भगादि अप्रशस्त प्रकृति-
योंका बंध होता है, इसकारण स्थिर-शुभ-यशस्कीर्ति इन तीन युगलोंकी अपेक्षा आठ २ भंग-
होते हैं ।। ५३५॥
आगे शेष तिर्यच पंचेंद्री पर्याप्तसहित कर्मपदोंमें और मनुष्यकर्मपदमें २९ तथा ३०
के स्थानोंमें भंग कहनेकेलिये गुणस्थानों में विभाग करते हैं;-
सण्णिस्स मणुस्सस्स य ओघेकदरं तु मिच्छभंगा हु।
छादालसयं अट्ठय बिदिये बत्तीससयभंगा ॥ ५३६ ॥
गोम्मटसारः। १७५ संज्ञिनो मनुष्यस्य च ओधैकतरं तु मिथ्यभना हि । पट्चत्वारिंशच्छतमष्ट च द्वितीये द्वात्रिशच्छतभङ्गाः ॥ ५३६ ॥ अर्थ-तिर्यचगतिपर्याप्तसहित सैनीका २९ का स्थान और उद्योतसहित ३० के स्थानमें, तथा मनुष्यगति पर्याप्तसहित २९ के स्थानमें सामान्य छह संस्थानादि प्रकृतियोंमेंसे एक एकका क्रमसे बंध होनेसे मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें ४६०८ भंग होते है । और दूसरे गुणस्थानमें ३२०० भंग होते हैं ॥ ५३६ ॥ मिस्साविरदमणुस्सठाणे मिच्छादिदेयजुदठाणे । सत्यं तु पमत्तंते थिरसुहजसजुम्मगठभंगा हु ॥ ५३७ ॥ मिश्राविरतमनुष्यस्थाने मिथ्यादिदेवयुतस्थाने । शस्तं तु प्रमत्तान्ते स्थिरशुभयशोयुग्मकाष्टभङ्गा हि ॥ ५३७ ॥ अर्थ-मिश्र और अविरतगुणस्थानवाले मनुष्यगति सहित स्थानमें, मिथ्यात्वादि गुण. स्थानवाले देवगतिसहित स्थानमें तथा प्रमत्तगुणस्थानपर्यंत जीवोंके प्रशस्तप्रकृतिका बंध अप्रशस्त प्रकृतिके साथ होता है, इससे स्थिर-शुभ-यशस्कीर्ति इन तीनयुगलोंकी अपेक्षा आठ आठ भंग कहे है ॥ ५३७ ॥ आगे एक पर्यायको छोडना तथा दूसरी पर्यायमें उत्पन्न होना यथासंभव दिखाते हैं, रयियाणं गमणं सण्णीपजत्तकम्मतिरियणरे । चरिमचऊतित्थूणे तेरिच्छे चेव सत्तमिया ॥ ५३८ ॥ नैरयिकानां गमनं संज्ञिपर्याप्तकर्मतिर्यग्नरे । चरमचतुष्कतीर्थोने तिरश्चि चैव सप्तमिकाः ॥ ५३८ ॥ अर्थ-धर्मादि तीन पृथिवीवाले नारकी जीवोंकी मरणकर उत्पत्ति गर्भजपर्याप्तसैनी पंचेन्द्री कर्मभूमिया तिर्यंच अथवा मनुष्यपर्यायमें होती है । अन्तके चार नरकोंवाले जीव तीर्थंकरादिके सिवाय पूर्वोक्त तिर्यच अथवा मनुष्यपर्यायमें उत्पन्न होते है । परंतु इतनी विशेषता है कि सातवें नरकवाले पूर्वोक्त तिर्यच पर्यायमें ही उत्पन्न होते है ॥ ५३८ ॥ तत्थतणविरदसम्मो मिस्सी मणुवदुगमुच्चयं णियमा। बंधदि गुणपडिवण्णा मरंति मिच्छेव तत्थ भवा ॥५३९ ॥ तत्रतनोऽविरतसम्यक् मिश्रो मानवद्विकमुच्चकं नियमात् । बध्नाति गुणप्रतिपन्ना मरन्ति मिध्ये एव तत्र भवाः ॥ ५३९ ॥ अर्थ-उस सातवी पृथिवीमें उत्पन्न हुआ असंयतसम्यग्दृष्टि और मिश्रगुणस्थानवर्ती अपने २ गुणस्थानोमें मनुष्यगति युगल तथा ऊंच गोत्र इनको नियमसे बांधता है। तथा वहां पर उत्पन्न हुए, सासादन-मिश्र-असंयत गुणस्थानवाले जिससमय मरण करें उस समय मिथ्यात्वगुणस्थानको प्राप्त होकर ही मरण करते है ॥ ५३९ ॥ - - १७६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । तेउदुगं तेरिच्छे सेसेगअपुण्णवियलगा य तहा। तित्थूणणरेवि तहाऽसण्णी घम्मे य देवदुगे ॥ ५४० ॥ तेजोद्विकं तिरश्चि शेषकापूर्णविकलकाश्च तथा । तीर्थोननरपि तथा असंज्ञी धर्मे च देवद्विके ।। ५४० अर्थ-तिर्यंच गतिमें तेजकायिक-वायुकायिक ये दोनों मरणकरके तिर्यंच गतिमें ही उत्पन्न होते हैं। शेष एकेन्द्री अर्थात् पृथिवीकाय-जलकाय और वनस्पतिकाय ये बादर सूक्ष्म पर्याप्त अपर्याप्त इन सब अवस्थाओंवाले इसीप्रकार दो इन्द्री आदि विकलत्रय-ये सब जीव तियेच गतिमें उत्पन्न होते हैं, और तीर्थकरादि त्रेसठ शलाका ( पदवी धारक) पुरुषों के विना शेष मनुष्यपर्यायमें भी उत्पन्न होते हैं । असंज्ञीपंचेन्द्री मरण करके पूर्वोक्त तिर्यंच-मनुष्यगतिमें तथा धर्मानामवाले पहले नरकमें और देवयुगलमें अर्थात् भवनवासी- व्यंतरदेवोंमें उत्पन्न होता है ।। ५४० ।। सण्णीवि तहा सेसे णिरये भोगेवि अचुदंतेवि । मणुवा जंति चउग्गदिपरियंतं सिद्धिठाणं च ॥ ५४१ ॥ संज्ञी अपि तथा शेषे निरये भोगेपि अच्युतान्तेपि । मानवा यान्ति चतुर्गतिपर्यन्तं सिद्धिस्थानं च ॥ ५४१ ॥ अर्थ-इसीप्रकार संज्ञी पंचेंद्री तिर्यच भी शेष अर्थात् असंज्ञी पंचेन्द्रीकी तरह पूर्वोक्त गतियोंमें, सब नारकी पर्यायोंमें, सब भोगभूमियापर्यायोंमें और अच्युतखर्गपर्यंत सब देवोंमें उत्पन्न होता है । और मनुष्य मरण करके चारों ही गतियोंमें तथा सिद्धिस्थान ( मोक्ष ) में प्राप्त होते है ॥ ५४१॥ आहारगा दु देवे देवाणं सण्णिकम्मतिरियणरे । पत्तेयपुढविआऊवादरपजत्तगे गमणं ॥ ५४२ ॥ भवणतियाणं एवं तित्थूणणरेसु चेव उप्पत्ती । ईसाणताणेगे सदरदुगंताण सण्णीसु ॥ ५४३ ॥ जुम्मं । आहारकास्तु देवे देवानां संज्ञिकर्मतिर्यग्नरे । प्रत्येकपृथिव्यव्बादरपर्याप्तके गमनम् ॥ ५४२॥ भवनत्रिकानामेवं तीर्थोननरेषु चैवोत्पत्तिः । ईशानान्तयोरेकस्मिन् शतारद्विकान्तानां संशिषु ॥ ५४३ ।। युग्मम् । अर्थ-आहारकशरीरसहित प्रमत्तगुणस्थानवाले मरण करके कल्पवासी देवोंमें उत्पन्न होते है । सब देवोंकी उत्पत्ति सामान्यसे संज्ञी पंचेन्द्री कर्मभूमिया तियेच तथा मनुष्यप- यायमें, और प्रत्येक वनस्पतिकाय-पृथिवीकाय-जलकायवादरपर्याप्तजीवों में होती है। विशेष - गोम्मटसारः। १७७ यह है कि भवनवासी आदि ३ प्रकारके देवोंकी उत्पत्ति तीर्थंकरादिकोंमें नहीं होती, अन्य मनुष्यों में ही होती है । ईशानखर्गपर्यंत देवोंकी उत्पत्ति पूर्वोक्त मनुष्य तिर्यचोंमें तथा एके- न्द्रिय पर्यायमें होती है । और शतार-सहस्रार पर्यन्त खाँवाले देवोंकी उत्पत्ति भी पूर्वोक्त मनुण्य तिर्यंचोंमें संज्ञीपंचेद्रीमें होती है ॥ ५४२ ॥ ५४३ ॥ इसप्रकार चारोंगतिके जीवोंकी संक्षेपसे मरण और उत्पत्ति कही है। आगे नामकर्मके वधस्थानोंको चौदह मार्गणाओंमें आठ गाथाओंसे कहते हैं- णामस्स बंधठाणा णिरयादिसु णवयवीस तीसमदो। आदिमछकं सर्व पणछण्णववीस तीसं च ॥ ५४४ ॥ नाम्नः बन्धस्थानानि निरयादिपु नवकविशं त्रिंशदतः । आदिमपदं सर्व पञ्चपट्नवविंशं त्रिशञ्च ॥ ५४४ ॥ अर्थ-नामकर्मके बंधस्थान नरकादिगतिमें क्रमसे २९-३० के दो, इसके बाद आदिके ६, सवस्थान, तथा ३५-३६-२९-३० खरूप ४ स्थान जानना चाहिये ॥ ५४४ ॥ इसप्रकार गतिमार्गणामें बंधस्थान कहे है । आगे इंद्रियादि मार्गणाओंमें बंधस्थानोंको कहते है- पंचक्खतसे सबं अडवीसूणादिछक्कयं सेसे । चउमणवयणोराले सड देवं वा विगुवटुगे ॥ ५४५ ॥ पञ्चाक्षत्रसे सर्वमष्टविशोनादिषट्वं शेषे । चतुर्मनोवचनौराले सर्व देवं वा वैगूर्वद्विके ॥ ५४५ ॥ अर्थ-पंचेन्द्रीमें, त्रसकायमें तो सब बंधस्थान है। और शेष एकेन्द्रियादिचार इन्द्रियोंमें तथा पृथिवीकायादि पांच स्थावरोंमें अट्ठाईसवें स्थानके सिवाय आदिके ६ स्थान है अर्थात् ५ स्थान है। चार मनोयोग, चार वचनयोग तथा औदारिककाययोगमें सब बंध- स्थान है। और वैक्रयिककाययोग-वैक्रयिकमिश्रयोग इन दोनोंमें देवगतिकी तरह ४. स्थान होते है ॥ ५४५॥ अडवीसदु हारदुगे सेसदुजोगेसु छवमादिलं । वेदकसाये सव्वं पढमिलं छक्कमण्णाणे ॥ ५४६ ।। अष्टविंशद्विकमाहारद्विके शेपद्वियोगयोः षट्मादिमम् । वेदकपाये सर्व प्राथमिकं षट्मज्ञाने ।। ५४६ ।। अर्थ-आहारक-आहारकमिश्रयोगमें २८ तथा २९ के दो स्थान है। शेष कार्माण और औदारिकमिश्र इन दो योगोंमें आदिके ६ स्थान है । पुरुषादि तीन वेद तथा अनंता- नुबंधीआदि कषायोंमें सब बंधस्थान है । और ज्ञान मार्गणामेंसे तीन कुज्ञानोंमें आदिके ६ स्थान हैं ॥ ५४६॥ २३ । रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । सण्णाणे चरिमपणं केवलजहखादसंजमे सुण्णं । सुदमिव संजमतिदए परिहारे णत्वि चरिमपदं ॥ ५४७ ॥ सदूजाने चरमपञ्च केवलयथाख्यातसंयमे शून्यम् । श्रुतमिव संयमत्रितये परिहारे नास्ति चरमपदम् ॥ ५४७ ।। अर्थ-मतिज्ञानादि चार सम्यग्ज्ञानों में अंतके ५ स्थान है, केवलज्ञान और यथाख्या- तसंयममें शून्य अर्थात् बन्धस्थानका अभाव है । सामायिक आदि तीन संयमोंमें श्रुतज्ञा- नकी तरह ५ स्थान है । परिहारविशुद्धि संयममें अंतका स्थान नही है बाकी ४ स्थान है ।। ५४७ ॥ अंतिमठाणं सुहुमे देसाविरदीसु हारकम्मं वा। चक्खूजुगले सर्व सगसगणाणं व ओहिदुगे ॥ ५४८ ॥ अन्तिमस्थानं सूक्ष्मे देशाविरत्योः आहारकर्म वा। चक्षुर्युगले सर्व स्वकस्खकज्ञानं वा अवधिद्विके ।। ५४८ ॥ अर्थ--सूक्ष्मसापरायसंयममें अंतका एक ही स्थान है । देशसंयममें आहारककी तरह २८ और २९ के दो स्थान है । असंयतमें कार्माणयोगवत् आदिके ६ स्थान हैं । चक्षुद- र्शन और अचक्षुदर्शन इन दोनोंमें सब स्थान है । अवधिदर्शन-केवलदर्शन इन दोनोंमें अपने २ ज्ञानकी तरह बंधस्थान समझलेना ॥ ५४८ ॥ कम्मं वा किण्हतिये पणुवीसाछक्कमट्टवीसचऊ । कमसो तेऊजुगले सुक्काए ओहिणाणं वा ॥ ५४९ ॥ कर्म वा कृष्णत्रये पञ्चविंशतिषट्कमष्टाविशचतुष्कम् । क्रमशः तेजोयुगले शुक्खायामवधिज्ञानं वा ।। ५४९ ॥ अर्थ-कृष्णआदि तीन लेश्याओंमें कार्मणयोगकी तरह आदिके ६ बंधस्थान है । तेजोलेश्या और पद्मलेश्या इन दोनोमें क्रमसे २५ आदि ६ स्थान, तथा २८ आदि चार स्थान है । शुक्ललेश्यामें अवधिज्ञानकी तरह अंतके पांच स्थान है ।। ५४९ ॥ भवे सबमभवे किण्हं वा उवसमम्मि खइए य । सुक्कं वा पम्मं वा वेदगसम्मत्तठाणाणि ॥ ५५०॥ भव्ये सर्वमभव्ये कृष्णा वा उपशमे क्षायिके च । शुक्लं वा पद्मं वा वेदकसम्यक्त्वस्थानानि ।। ५५०॥ अर्थ-भव्यमार्गणामें सब बंधस्थान है। अभव्यमें कृष्णलेश्याकी तरह आदिके ६ स्थान है । सम्यत्त्वमार्गणामेंसे उपशमसम्यक्त्वमें तथा क्षायिकसम्यक्त्वमें शुक्ललेश्यावत् ५ स्थान है । तथा वेदक (क्षायोपशमिक ) सम्यक्त्वमें पद्मलेश्यावत् २८ को आदिलेकर ४ बंधस्थान है ॥ ५५० ॥ J .
गोम्मटसारः।
१७९
अडवीसतिय दु साणे मिस्से मिच्छे दु किण्हलेस्सं वा।
सण्णीआहारिदरे सर्व तेवीसछकं तु ॥ ५५१ ॥
अष्टविंशत्रयं तु साने मिश्रे मिध्ये तु कृष्णलेश्या वा ।
संज्ञिआहारेतरयोः सर्व त्रयोविंशषवं तु ॥ ५५१ ।।
अर्थ-सासादनसम्यक्त्वमें २८ को आदिलेकर ३ स्थान है। मिश्रसम्यक्त्व तथा
मिथ्यात्वमें कृष्णलेश्यावत् आदिके ६ स्थान है । संज्ञीमार्गणामें और आहार मार्गणामें सब
बंधस्थान हैं । और असंज्ञी-अनाहारमार्गणामें २३ को आदिलेकर ६ बंधस्थान है ॥५५१॥
आगे नामके बंधस्थानों में पुनरुक्त ( बार बार कहेगये) भंगोंको कहते हैं;
णिरयादिजुदट्ठाणे भंगेणप्पप्पणम्मि ठाणम्मि ।
ठविणमिच्छभंगे सासणभंगा हु अत्थित्ति ॥ ५५२ ॥
अविरदभंगे मिस्सयदेसपमत्ताण सबभंगा हु।
अस्थित्ति ते दुअवणिय मिच्छाविरदापमादेसु ॥५५३॥जुम्म।
निरयादियुतस्थाने भङ्गेनामालनि स्थाने ।
स्थापयित्वा मिथ्यभने सासनभङ्गा हि अस्तीति ॥ ५५२ ॥
अविरतभङ्गे मिश्रकदेशप्रमत्तानां सर्वभङ्गा हि ।
अस्तीति तांस्तु अपनीय मिथ्याविरताप्रमादेषु ॥ ५५३ ॥ युग्मम् ।
अर्थ-नरकादि गतिसहित स्थानोंको अपने २ भंगोंके साथ अपने २ गुणस्थानोंमें
स्थापन करनेसे मिथ्यादृष्टिके बंधस्थानोंके भङ्गोंमें सासादनके भंग गर्मित हो जाते है।
असयतके मंगोंमें मिश्र-देशविरत-प्रमत्तके सब बंधस्थानोंके भंग आजाते है, इसकारण
सासादनके भङ्गोंको तथा मिश्र-देशसंयत-प्रमत्तके भंगोंको घटानेसे मिथ्यादृष्टि-असंयत-
अप्रमत्तगुणस्थानोंमें परस्पर बंधस्थानोंके भग होते है, ऐसा निश्चयसे समझना चाहिये
॥ ५५२।५५३ ॥
भुजगारा अप्पदरा अवट्ठिदावि य सभंगसंजुत्ता।
सबपरहाणेण य णेदव्वा ठाणबंधम्मि ॥ ५५४ ॥
भुजाकारा अल्पतरा अवस्थिता अपि च स्वभङ्गसंयुक्ताः ।
सर्वपरस्थानेन च नेतव्याः स्थानबन्धे ॥ ५५४ ॥
अर्थ-पूर्वोक्त जो भुजाकार १ अल्पतर २ अवस्थित ३ 'च'से अवक्तव्य ४ बंध है
वे अपने २ भंगोंकरसहित नामकर्मके बंधस्थानोंमें स्वस्थान-परस्थान दोनों अथवा सब-
परस्थानोंके साथ प्राप्त करना ॥ ५५४ ॥
अब उन खस्थानादिकोंका लक्षण कहते है।
अप्पपरोभयठाणे बंधहाणाण जो दु बंधस्स ।
सट्ठाण परहाणं सव्वपरहाणमिदि सण्णा ॥ ५५५ ॥
, १८० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आसपरोभयस्थानानि बन्धस्थानाना यत्तु बन्धस्य । खस्थानं परस्थानं सर्वपरस्थानमिति संज्ञा ॥ ५५५ ॥ अर्थ-इच्छित अपनास्थान, अन्यगुणस्थान, अन्यगति-अन्यगुणस्थानखरूप उभयस्था- न-इन तीनोंमें मिथ्यादृष्टि-असंयत-अप्रमत्तके बन्धस्थानसंबंधी जो भुजाकारादि बंध है उनके क्रमसे खस्थान, परस्थान, सर्वपरस्थान ऐसे तीन नाम है ।। ५५५ ।। चदुरेकदुपण पंच य छत्तिगठाणाणि अप्पमत्ता । तिसु उयसमगे संते ति यतियतिय दोण्णि गच्छंति ॥५५६॥ चतुरेकद्विपञ्च पञ्च च षट्तिकस्थानानि अप्रमत्तान्ताः । त्रिषु उपशामके शान्ते इति च त्रिकत्रिकं द्वे गच्छन्ति ।। ५५६ ॥ अर्थ--अप्रमत्तपर्यंत गुणस्थानवाले जीव मिथ्यादृष्टि आदिक अपने २ गुणस्थानोंको छोड़के क्रमसे ४, १, २, ५, ५, ६, ३ गुणस्थानोंको प्राप्त होते हैं । अपूर्वकरणादि तीन उपशम श्रेणीवाले तीन तीन गुणस्थानोंको तथा उपशांत कषायवाले दो गुणस्थानोंको प्राप्त होते हैं ॥ ५५६ ॥ आगे उन्ही गुणस्थानोंको कहते हैं;- सासणपमत्तवजं अपमत्तंतं समलियइ मिच्छो । मिच्छत्तं बिदियगुणो मिस्सो पढमं चउत्थं च ॥ ५५७ ॥ अविरदसम्मो देसो पमत्तपरिहीणमप्पमत्तंतं । छटाणाणि पमत्तो छगुणं अप्पमत्तो दु ॥ ५५८ ॥ जुम्मं । सासनप्रमत्तवर्ण्यमप्रमत्तान्तं समाश्रयति मिथ्यः । मिथ्यात्वं द्वितीयगुणो मिशः प्रथमं चतुर्थ च ॥ ५५७ ।। अविरतसम्यो देशः प्रमत्तपरिहीनमप्रमत्तान्तम् । षटूस्थानानि प्रमत्तः षष्ठगुणमप्रमत्तस्तु ॥ ५५८ ॥ युग्मम् । अर्थ-मिथ्यादृष्टि गुणस्थानवाला सासादन और प्रमत्तगुणस्थानको छोड़कर अप्रमत्तपर्यंत चार गुणस्थानोंको प्राप्त होता है । दूसरे गुणस्थानवाला मिथ्यात्वको तथा मिश्रगुणस्थान- वाला पहले-चौथे दो गुणस्थानोंको प्राप्त होता है। अविरतसम्यग्दृष्टि तथा देशसंयत ये दोनों प्रमत्तगुणस्थानके सिवाय अप्रमत्त गुणस्थानतक जाते है । प्रमत्तगुणस्थानवाला अप्रम- त्तगुणस्थानपर्यंत ६ गुणस्थानोंमें जाता है । और अप्रमत्तगुणस्थानवाला छठे गुणस्थानको प्राप्त होता है ॥ ५५७१५५८ ॥ उवसामगा दु सेटिं आरोहंति य पडंति य कमेण । उवसामगेसु मरिदो देवतमत्तं समलियई ॥ ५५९ ॥ । . - - - - गोम्मटसारः। १८१ उपशामकास्तु श्रेणिमारोहयन्ति च पतन्ति च क्रमेण । उपशामकेषु मृतो देवतमत्व समाश्रयति ॥ ५५९ ।। अर्थ-अपूर्वकरणादि उपशमश्रेणीवाले उपशमश्रेणीको क्रमसे चढते भी है और उतरते भी है । तथा उपशमश्रेणीमें मरे हुए जीव महान् ऋद्धिवाले देव होते है ॥ ५५९ ।। आगे उपशमश्रेणीमें मरण किसजगह होता है यह दिखाते है। "मिस्सा आहारस्स य खवगा चडमाणपढमपुव्वा य । पढमुवसम्मा तमतमगुणपडिवण्णा य ण मरंति ॥ ५६० ॥ अणसंजोजिदमिच्छे मुहुत्तअंतं तु णत्थि मरणं तु । किदकरणिजं जाव दु सव्वपरहाण अहपदा ॥ ५६१॥" अब बद्धायु कृतकृत्यके प्रति पूर्वोक्त तीनस्थानोंमें सर्वपरस्थानोंके अर्थवान् पद कहते है- देवेसु देवमणुवे सुरणरतिरिये चउग्गईसुपि । कदकरणिज्जुप्पत्ती कमसो अंतोमुहुत्तेण ॥ ५६२ ।। देवेषु देवमनुष्ये सुरनरतिरश्चि चतुर्गतिष्वपि । कृतकरणीयोत्पत्तिः क्रमश अन्तर्मुहूर्तेन ॥ ५६२ ।। अर्थ-कृतकृत्यवेदकसम्यक्दृष्टिपनेका काल अंतमुहूर्त है उसीमें चार भाग करके क्रमसे मरणको प्राप्त हुआ जीव देवोंमें, देव-मनुष्योंमें, देव-मनुष्यतिर्यचोंमें तथा चारों- गतियों में उत्पन्न होता है ॥ ५६२ ।। आगे नामकर्म के बंधस्थानोंके भेद कहते है,- तिविहो दु ठाणबंधो भुजगारप्पदरवट्टिदो पढमो। अप्पं बंधतो बहुबंधे विदियो दु विवरीयो ॥ ५६३ ॥ तदियो सणामसिद्धो सचे अविरुद्धठाणबंधभवा । ताणुप्पत्ति कमसो भंगेण समं तु वोच्छामि ॥५६४॥ जुम्म। त्रिविधस्तु स्थानबन्धो भुजाकाराल्पतरावस्थितः प्रथमः । अल्पं बनन् बहुबन्धे द्वितीयस्तु विपरीतः ॥ ५६३ ।। तृतीयः स्वनामसिद्धः सर्वे अविरुद्धस्थानबन्धभवाः । तेषामुत्पत्तिं क्रमशो भङ्गेन समं तु वक्ष्यामि । ५६४ ।। युग्मम् । अर्थ-नामकर्मके बंधस्थान तीन प्रकारके है-भुजाकार १ अल्पतर २ अवस्थित ३ । इनमेंसे पहला "भुजाकार बंध" पूर्व थोडी प्रकृति बाधता था पीछे बहुत बाधे उस जगह १ ये दो गाथा ११४ के पृष्ठमें क्षेपकरूपसे लिखेगयेथे उसी जगह इनका अर्थ लिखा गया है सो देखलेना।
-- - १८२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । होता है । दूसरा इससे उलटा है अर्थात् पहले वहुत बांधता था अब थोड़ी बांधे वहां "अल्पतर बंध" होता है। "तीसरा अवस्थित बंध" तो अपने नामसे ही प्रसिद्ध है अर्थात् जितनी प्रकृतियां पहले वैधैं उतनी ही पीछेके समयमें बधैं वहां होता है। ये सब भुजाकारादिबंध अविरुद्धबंधस्थानोंसे उत्पन्न होते है, इसकारण मैं अन्थकर्ता उनकी उत्पत्तिको क्रमसे भंगोंसहित कहता हूं ॥ ५६३१५६४ ॥ अब उसीको दिखाते हैं- भूवादरतेवीसं बंधतो सव्वमेव पणुवीसं । बंधदि मिच्छाइट्टी एवं सेसाणमाणेजो ॥ ५६५ ।। भूवादरत्रयोविशं बनन् सर्वमेव पञ्चविशतिः । बध्नाति मिथ्याष्टिः एवं शेषाणामानेयः ॥ ५६५ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि गुणस्थानवाला बादर पृथिवीकाय २३ के स्थानको बांधता हुआ २५ को आदिलेकर सब स्थानोंको वांधता है । इसीप्रकार त्रैराशिक गणितसे शेष बंधस्थानों में भी बंध भेद समझलेना ॥ ५६५॥ तेवीसहाणादो मिच्छत्तीसोत्ति बंधगो मिच्छो। णवरि हु अट्ठावीस पंचिंदियपुण्णगो चेव ॥ ५६६ ॥ त्रयोविंशतिस्थानात् मिथ्यात्वत्रिंशदिति बन्धको मिथ्यः । नवरि हि अष्टाविशं पञ्चेन्द्रियपूर्णकश्चैव ॥ ५६६ ॥ अर्थ-२३ के स्थानसे लेकर मिथ्यात्वमें बंधयोग्य ३० के स्थान पर्यंत स्थानों के भुजाकारोंको मिथ्यादृष्टि जीव बांधनेवाला कहा है । विशेषता यह है कि जो पंचेन्द्रिय पर्याप्त मिथ्यादृष्टि हो वही २८ के स्थानको बांधता है ।। ५६६ ॥ आगे भोगभूमियाके बन्धस्थान कहते हैं- भोगे सुरढवीसं सम्मो मिच्छो य मिच्छगअपुण्णे । तिरिउगतीसं तीसं णरउगुतीसं च बंधदि हु॥ ५६७ ॥ भोगे सुराष्टविंशं सम्यो मिथ्यश्च मिथ्यकापूर्णे । तिर्यगेकोनत्रिंशत् त्रिंशत् नरैकोनत्रिंशत् च बध्नाति हि ॥५६७ ।। अर्थ-भोगभूमिमें पर्याप्तपंचेन्द्री सम्यग्दृष्टि वा मिथ्यादृष्टि, 'च' शब्दसे निवृत्त्यपर्याप्त सम्यग्दृष्टि जीव देवगतिसहित २८ के स्थानको बांधते है। निर्वृत्त्यपर्याप्तकमिथ्यादृष्टि जीव तिर्यंचगतिसहित २९ के बा ३० के स्थानको बांधते हैं, और मनुष्यगतिसहित २९ के स्थानका बंध नियमसे करते हैं ॥ ५६७ ॥ मिच्छस्स ठाणभंगा एयारं सदरि दुगुणसोल णवं । अडदालं वाणउदी सदाण छादाल चत्तधियं ॥ ५६८॥ .
गोम्मटसारः।
१८३
मिथ्यस्य स्थानभङ्गा एकादश सप्ततिः द्विगुणषोडश नव ।
अष्टचत्वारिंशत् द्वानवतिः शतानाम् षट्चत्वारिंशत् चत्वारिंशदधिकम् ॥५६८॥
अर्थ-मिथ्यादृष्टिके स्थानों के भंग (भेद)२३ के ११, २५ के ७०,२६ के ३२,
२८ के ९, २९ के ९२४८, ३० के ४६४० जानने ॥ ५६८ ॥
आगे अल्पतर भंगोंको कहते है।
विवरीयेणप्पदरा होंति हु तेरासिएण भंगा हु।
पुव्वपरठाणाणं भंगा इच्छा फलं कमसो ॥ ५६९ ॥
विपरीतेनाल्पतरा भवन्ति हि त्रैराशिकेन भगा हि ।
पूर्वापरस्थानानां भगा इच्छा फलं क्रमशः ॥ ५६९ ।।
अर्थ-भुजाकार बंधके भंगोंकी त्रैराशिकसे उलटी त्रैराशिक करनेपर अल्पतरके भंग
होते है। उसमें पहले स्थानरूप भंगोंको इच्छा राशि तथा पिछले स्थानोंको फलराशि
करनेपर क्रमसे भेद होते हैं ॥ ५६९ ॥
आगे कहे हुए इन भेदोंको त्रैराशिक विना थोड़े उपायसेजाननेकी विधि दिखाते हैं;
लघुकरणं इच्छंतो एयारादीहिं उवरिमं जोग्गं।
संगुणिदे भुजगारा उवरीदो होंति अप्पदरा ॥ ५७० ॥
लघुकरणमिच्छतः एकादशादिमिरुपरिमं योग्यम् ।
संगुणिते भुजाकारा उपरितो भवन्ति अल्पतराः ।। ५७० ।।
अर्थ-जो थोड़े में जानना चाहना है वह ११ आदि अंकोंसे ऊपरके अंकोंको गुणा
करै तब भुजाकार भंग होते है । और ऊपरके ३० आदिस्थानों के भंगोंसे नीचेके भंगोंका
गुणाकरै तब अल्पतर भंग होते है ।। ५७० ॥
आगे गुणाकरनेसे जितने भंग हुए उन्हींको कहते है,-
भुजगारप्पदराणं भंगसमासो समो हु मिच्छस्स ।
पणतीसं चउणउदी सट्ठी चोदालमंककमे ॥ ५७१ ॥
भुजाकाराल्पतरयोः भगसमासो समो हि मिथ्यस्य ।
पञ्चत्रिंशत् चतुर्नवतिः षष्टिः चतुश्चत्वारिंशदङ्कक्रमेण ॥ ५७१।।
अर्थ-मिथ्यादृष्टि में कहे हुए भुजाकार और अल्पतरकी भंगसंख्या समान है वह पै-
तीस चौरानवै साठ चवालीसके अंकोंके क्रमसे ४४६०९४३५ प्रमाण होती है । इन दो-
नोंकी संख्या मिलानेसे ८९२१८८७० प्रमाण अवस्थित भंगोंकी संख्या कही है ॥५७१॥
अब असंयत गुणस्थानमें भुजाकारादि भंगोंको कहते है।
देवठ्ठवीस णरदेवुगुतीस मणुस्सतीस बंधयदे ।
तिछणवणवद्गभंगा तित्थविहीणा हु पुणरचा ॥ ५७२ ॥
करता है - १८४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । देवाष्टविंशं नरदेवैकोनत्रिंशत् मनुष्यत्रिंशत् वन्धोऽयते । त्रिषट्नवनवद्विकभङ्गाः तीर्थविहीना हि पुनरुक्ताः ॥ ५७२ ।। अर्थ-असंयत गुणस्थानमें देवगतिसहित २८ के स्थानमे, मनुप्यगति सहित तथा देवगति सहित २९ के स्थानमें, मनुष्यगतिसहित तीसके बंध स्थानमें ३६९९२ मुना- कारके भंग होते हैं । और तीर्थकर रहित मनुष्यगतिके पुनरुक्त भंग होते हैं ॥ ५७२ ।। यही दिखाते हैं- देवठ्ठवीसवंधे देबुगुतीसम्मि भंग चउसट्टी। देवुगुतीसे बंधे मणुवत्तीसेवि चउसट्ठी ॥ ५७३ ॥ देवाष्टविशबन्धे देवैकोत्रिंशति भगाः चतुष्पष्टिः । देवैकोनत्रिंशति बन्धे मानवत्रिशत्यपि चतुष्पष्टिः ॥ ५७३ ॥ अर्थ---असंयत गुणस्थानमें देवगतिसहित अट्ठाईसका बंध करके देवगतिसहित तथा तीर्थकरप्रकृतिसहित २९ का बंध करता है तब दोनोंके भंगोंको गुणा करनेसे ६४ भंग होते हैं । और देवगतिसहित २९ का बंधकरके मनुष्यगति सहित ३० का जब बंध तब भी ६४ ही भंग होते है ॥ ५७३ ॥ तित्थयरसत्तणारयमिच्छो णरऊणतीसवंधो जो। सम्मम्मि तीसवंधो तियछक्कडछक्कचउभंगा ॥ ५७४ ।। तीर्थकरसत्वनारकमिथ्यो नरैकोनत्रिशबन्धो यः । सम्यश्चि त्रिंशबन्धः त्रिकषराष्टषट्चतुर्भङ्गाः ॥ ५७४ ।। अर्थ-तीर्थकरके सत्त्वसहित नारकी मिथ्यादृष्टि ४६०८ भंगोंकर मनुष्यगति सहित २९ के स्थानका बंध करता है, उसके बाद शरीरपर्याप्ति पूर्ण करके सम्यक्त्वसहित हुआ तीर्थंकरमनुष्यसहित ३० को बांधता है उसके ३६८६४ भंग होते है । इनमें पूर्व कथित १२८ मिलानेसे ३६९९२ असंयतमें भुजाकार भंग हैं ॥ ५७४ ॥ आगे असंयतमें अल्पतर भंगोंको कहते हैं;- वावत्तरि अप्पदरा देवुगुतीसा दुणिरयअडवीसं । बंधंत मिच्छमंगेणवगयतित्था हु पुणरुत्ता ॥ ५७५ ॥ द्वासप्ततिः अल्पतरा देवैकोनत्रिशत्तु निरयाष्टविंशतिः । वध्नन् मिथ्यभङ्गेनापगततीर्था हि पुनरुक्ताः ॥ ५७५ ।। ' अर्थ-पहले जिसने नरकायुका बंध किया है ऐसा मनुष्य असंयत तीर्थकर और देवसहित २९ का बंध करता हुआ, नरकगतिके संमुख होकर अंतर्मुहूर्त मिथ्यादृष्टि होता हुआ नरकगति सहित २८ का बंध करता है तब ८ भंग होते है। और देव वा नारकी असंयतने तीर्थ मनुष्यसहित ३० के स्थानको बांधा उसके ८ भंग तथा पीछे मरणकर L - , गोम्मटसारः। १८५ तीर्थकरपनेसे माताके गर्भ में उत्पन्न हुआ वहां पर तीर्थ-देव सहित २९ के स्थानका बंध करता है उसके भी ८ भंग होते है । इनको आपसमें गुणा करनेसे ८४८६४ भंग हुए, इनमे पहले ८ मिलानेसे ६४+८=७२ अल्पतर भंग असंयतमें होते है । यहां तीर्थकरसे रहित मनुष्यगतिवाले २९ को वांधके पीछे देवयुत २८ को वाधै उसके ६४ पुनरुक्त भग मिथ्यादृष्टिके भंगोंके साथ कह आये है इससे नहीं कहे ॥ ५७५ ॥ आगे अप्रमत्तादि गुणस्थानोंमें भुजाकार भंगोंको कहते है;- देवजुदेकटाणे णरतीसे अप्पमत्तभुजयारा । पणदालिगिहारुभये भंगा पुणरुत्तगा होंति ॥ ५७६ ॥ . देवयुतकस्थाने नरत्रिशति अप्रमत्तभुजाकाराः । पञ्चचत्वारिंशदेकाहारोभयेषु भङ्गाः पुनरुक्तका भवन्ति ॥ ५७६ ॥ अर्थ-देवगतिसहित एकके स्थानमें और मनुष्यगतियुक्त तीसके स्थानमें अप्रमत्तगु- णस्थानमें ४५ भुजाकार भंग होते है । एक तीर्थकर प्रकृतिसहित, आहारकसहित और दोनों ही सहित इन तीन स्थानोंमें जो भंग है वे पुनरुक्त है ।। ५७६ ॥ अव उन ४५ भुजाकारवंधोंके भंगोंका विधान कहते है- इगि अड अष्टिगि अद्विगिभेदड अट्टड दुणव य वीस तीसेके । अडिगिगि अडिगिगि विहि उणखिगि इगिइगितीस देवचउ कमसो॥५७७॥ एकमष्ट अष्टैकमष्टैकभेदमष्टाष्टाष्ट द्विनव च विंशतिः त्रिशदेकान् । अष्टैकमेकमटैकैकं द्वाभ्यामेकोनखैकैकैकत्रिशत् देवचतुष्कं क्रमशः ॥ ५७७ ॥ अर्थ-नीचेकीपंक्तिके १, ८, ८, १, ८, १, १, १, १, १ भंगोंकर सहित २८, २८, २८, २९, २९, ३०, ३०, ३१, ३१, ३१ प्रकृतिरूप स्थानोंमें ऊपरकी पक्तिके ८, १, १, ८, १, १, १, १, १, मंगोसहित २९, ३०, ३१, ३१, ३१ और देवस- हित चार स्थानोंको क्रससे बांधता है। सो एक २ ऊपरकी पंक्तिके स्थानभंगोंको एक एक नीचेकी पंक्तिके स्थानभंगोंके साथ गुणाकरनेसे सब ४५ मुजाकारभग होते है ॥ ५७७॥ आगे अप्रमत्तके अल्पतरभंगोंको कहते है। इगिविहिगिगि खखतीसे दस णव णवडधियवीसमहविहं । देवचउक्केकके अपमत्तप्पदरछत्तीसा ॥ ५७८ ।। एकविधिकमेकखखत्रिशत् दशनव नवाष्टाधिकविंगमष्टविधम् । देवचतुष्कमेकैकेन अप्रमत्ताल्पतरपत्रिंशत् ।। ५७८ ॥ अर्थ-एक एक भंगसहित एक शून्य शून्य शून्य अधिक तीस प्रकृतिरूप स्थानोंको वांधके आई आठ भंगोंसहित दस नौ नौ आठ अधिक वीस प्रकृतिल्प स्थानोको तथा एक .
. - - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । एक भंगसहित देवगतियुक्त चार स्थानों को बांधता है । इस प्रकार अप्रमत्तगुणस्थानमें ३६ अल्पतर भंग होते है ॥ ५७८ ॥ आगे भुजाकारादि भंगीको एकत्र ( इकडे ) करके कहते हैं:-- सव्वपरहाणेण य अयदपमत्तिदरसन्चभंगा हु। मिच्छरसभंगमज्झे मिलिदे सव्वे हवे भंगा ॥ ५७९ ॥ सर्वपरस्थानेन च अयतप्रमत्तेवरसर्वभगा हि । मिथ्यस्य भङ्गमध्ये मिलिते सर्वे भवन्ति भनाः ।। ५७९ ॥ अर्थ-सर्वपरस्थानोकर तथा 'च' शब्दसे स्वस्थान और परस्थानकर सहित जो असं- यत और अप्रमत्तके सब भुजाकारादि भंग है वे मिथ्यादृष्टिके मंगोंमें मिलाये जानेपर ना- मकर्मके भुजाकारादि भंग नियमसे होते हैं ।। ५७९ ॥ आगे उनभंगोंकी सिद्धिका साधारण उपाय दो गाथाओंसे कहते हैं- भुजगारा अप्पदरा हवंति पुब्बवरठाणसंताणे । पयडिसमोऽसंताणोऽपुणरुत्तेत्ति य समुदिहो ॥ ५८० ।। भुजाकारा अल्पतरा भवन्ति पूर्वापरस्थानसंताने । प्रकृतिसमः असंतानोऽपुनरुक्तेति च समुहिष्टः ।। ५८० ॥ अर्थ-पहलेस्थानको तथा पीछेके स्थानको वहुत प्रकृति तथा थोड़ी प्रकृतियों करके यथा संभव मिलान किया जाय तो क्रमसे मुजाकार और अल्पतर भंग होते है । और प्र- कृतियोंकी समान संख्या होनेपर भी प्रकृतियोंका समुदाय प्रकृतिभेद सहित हो वह अपु- नरुक्त भंग कहा गया है ।। ५८० ॥ भुजगारे अप्पदरेऽवत्तव्ये ठाइदूण समबंधो होदि अवढिदवंधो तभंगा तस्स भंगा हु ॥ ५८१॥ भुजाकारानल्पतरानवक्तव्यान् स्थापयित्वा समवन्धः । भवति अवस्थितबन्धः तद्भङ्गाः तस्य भङ्गा हि ॥ ५८१॥ अर्थ-मुजाकार, अल्पतर और अवक्तव्यभंगोंकोस्थापनकरके जिनजिन भंगोंसहित प्रकृ- तियोंका एक समयमें बंध होकर उन उन प्रकृतियोंका द्वितीयादि समयमें भी समान बंध हो उसे अवस्थित वध कहते है। और उन तीनोंके जितने भंग है उतने ही अवस्थितके भंग होते है ।। ५८१ ॥ आगे उन अवक्तव्यभंगोंको कहते है- पडिय मरियेक्कमेकूणतीस तीसं च बंधगुवसंते । बंधो दु अवत्तव्यो अवढिदो विदियसमयादी॥५८२॥ - .
गोम्मटसारः।
१८५
पतित्वा मृत्वा एकमेकोनत्रिंशत् त्रिंशच बन्धकोपशान्ते ।
बन्धस्तु अवक्तव्य अवस्थितो द्वितीयसमयादिः ॥ ५८२ ।।
अर्थ-उपशांतकषायगुणस्थानसे पड़कर एकके स्थानको बाधै सो एकतो यह अथवा
मरणके देव असंयत होनेपर आठ २ भंगोंसहित मनुष्यगतियुक्त २९ के स्थान को तथा तीर्थ-
कर मनुष्यसहित ३० के स्थानको बाधे इन दोनोंके १६-इसतरह १७ अवक्तव्यभंग
जानना चाहिये । और द्वितीयादिसमयमें भी उन्हीके समान बंध हो वहां पर उतने ही
अवस्थितबंध होते है ॥ ५८२ ॥ इस प्रकार नामकर्मके बंधस्थान कहे है।
आगे नामकर्मके उदयस्थानोंको २२ गाथाओंसे कहते है,-
विग्गहकम्मसरीरे सरीरमिस्से सरीरपजत्ते ।
आणावचिपजत्ते कमेण पंचोदये काला ॥ ५८३ ।।
विग्रहकार्मशरीरे शरीरमिश्रे शरीरपर्याप्ते ।
आनवचःपर्याप्त क्रमेण पञ्च उदये कालाः ॥५८३ ॥
अर्थ-नामकर्मके उदयस्थान विग्रहगति अथवा कार्माण शरीरमें, मिश्र (अपर्याप्त )
शरीरमें, शरीर पर्याप्तमें, आनपर्याप्ति अर्थात् श्वासोच्छ्ास पर्याप्तिमें, वचनपर्याप्तिमें नियत-
काल है अर्थात् जिसकालमें उदय योग्य है उसी कालमें उदय होते है। इसतरह इनके पांच
काल हुए ॥ ५८३ ॥
अब इन कालोंका प्रमाण कहते है-
एक व दो व तिण्णि व समया अंतोमुहत्तयं तिसुवि।
हेटिमकालूणाओ चरिमस्स य उदयकालो दु॥ ५८४ ॥
एको व द्वौ वा त्रयो वा समया अन्तर्मुहूर्त्तकः त्रिष्वपि ।
अधस्तनकालोनः चरमस्य च उदयकालस्तु ॥ ५८४ ।।
अर्थ-उन उदय कालोंका प्रमाण क्रमसे १ समय वा २ समय अथवा ३ समय वि.
ग्रहगतिमें, और शरीरमिश्रादि ३ में अंतर्मुहूर्त २ प्रमाण है, और अंतकी भाषापर्याप्तिमें
पूर्वकथित चारोंका काल घटानेसे शेषभुज्यमान आयुप्रमाण काल जानना ॥ ५८४ ॥
आगे उन पांच कालोंको जीवसमासमें दिखलाते है-
सवापजताणं दोण्णिवि काला चउक्कमेयक्खे ।
पंचवि होंति तसाणं आहारस्सुवरिमचउक्कं ॥ ५८५॥
सर्वापर्याप्तानां द्वावपि कालौ चतुष्कमेकाक्षे।
पञ्चापि भवन्ति त्रसानामाहारस्योपरिमचतुष्कम् ।। ५८५ ॥
अर्थ-सब लब्ध्यपर्याप्तकोंमें पहलेके २ काल, एकेद्रीमें ४ काल, त्रसोंमें ५ काल हैं
और आहारकशरीरमें पहलेके विना आगेके ४ काल है ॥ ५८५ ॥
-
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१८८
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
कम्मोरालियमिस्सं ओरालुस्सासमास इदि कमसो ।
काला हु समुग्धादे उपसंहरमाणगे पंच ॥ ५८६ ॥
कौरालिकमिश्रमौरालोच्छासभाषेति क्रमशः ।
काला हि समुद्धाते उपसंहरमाणके पञ्च ॥ ५८६ ॥
अर्थ-समुद्धातकेवलीके कार्माण १ औदारिकमिश्र२ औदारिकशरीरपर्याप्ति ३ उश्वासनि-
श्वासपर्याप्ति ४ भाषापर्याप्ति काल ५ इस प्रकार पांच काल क्रमसे अपने प्रदेशोंको संकोच
करने ( समेटने ) के समय ही होते है। विस्तार (फैलाने) के समय ३ ही काल है ।। ५८६ ॥
अब यही कहते है:-
ओरालं दंडढुगे कवाडजुगले य तस्स मिस्सं तु ।
पदरे य लोगपूरे कम्मे व य होदि णायव्यो ॥ ५८७ ॥
औरालं दण्डद्विके कपाटयुगले च तस्य मिश्रं तु ।
प्रतरे च लोकपूरे कर्मणि वा च भवति ज्ञातव्यः ।। ५८७ ।।
अर्थ-दंडसमुद्धातके करने वा समेंटनेरूप युगलमें औदारिक शरीर पर्याप्ति काल है,
कपाट समुद्धातके करने और समेटनेरूप युगलमें औदारिकमिश्रशरीर काल है, प्रतरसमुद्धातमें
और लोकपूरणसमुद्धातमें कार्माणकाल है । इसप्रकार प्रदेशोंके विस्तार करनेपर ३ ही काल
है ऐसा जानना चाहिये ॥ ५८७ ॥
आगे नामकर्मके उदयस्थानोंकी उत्पत्तिका क्रम ४ गाथाओंसे कहते है-
णामधुवोदयवारस गइजाईणं च तसतिजुम्माणं ।
सुभगादेजजसाणं जुम्मेकं विग्गहे वाणू ॥ ५८८ ॥
नामध्रुवोदयद्वादश गतिजातीनां च त्रसत्रियुग्मानाम् ।
सुभगोदययशोनां युग्मैकं विग्रहे वानुः ॥ ५८८ ।।
अर्थ-"तेजदुर्गवण्णचऊ" इस गाथासे कही हुई नामकर्मकी १२ ध्रुवप्रकृतियां, ४
गति, ५ जाति, त्रसादि तीनका जोड़ा, सुभग-आदेय-यशस्कीर्ति, इन तीनका जोड़ा-
इनमेंसे एक एक प्रकृतिका और ४ आनुपुर्वी प्रकृतियों में कोई एकका उदय होनेसे २१
प्रकृतिरूपस्थानका उदय विग्रहगतिमें होता है ॥ ५८८ ॥
मिस्सम्मि तिअंगाणं संठाणाणं च एगदरगं तु ।
पत्तेयदुगाणेको उपधादो होदि उदयगदो ॥ ५८९ ॥
मिशे व्यङ्गानां संस्थानानां च एकतरकं तु ।
प्रत्येकद्विकयोरेकः उपघातो भवति उदयगतः ।। ५८९ ।।
अर्थ-उस २१ प्रकृतिरूप उदयस्थानमेंसे आनुपूर्वी घटाके और औदारिकादि तीन
शरीरोंमेसें एक, छह संस्थानोंमेंसे १, प्रत्येक साधारण इन दोनों में से एक, और उपघात-ये
चार मिलानेसे २४ का स्थान होता है यह स्थान मिश्रशरीरके कालमें उदय होता है॥५८९॥
- गोम्मटसारः। १८१ तसमिस्से ताणि पुणो अंगोवंगाणमेगदरगं तु । छण्हं संहडणाणं एगदरो उदयगो होदि ॥ ५९० ॥ परघादमंगपुण्णे आदावदुगं विहायमविरुद्धे । सासवची तप्पुण्णे कमेण तित्थं च केवलिणि ॥५९१॥जुम्म। त्रसमिश्रे तानि पुनः अङ्गोपाङ्गानामेकतरकं तु । पण्णां संहनानामेकतरमुदयकं भवति ॥ ५९० ॥ परघातमङ्गपूणे आतापद्विकं विहायोऽविरुद्धे । श्वासवचसी तत्पूर्णे क्रमेण तीर्थ च केवलिनि ॥ ५९१ ॥ युग्मम् । अर्थ-पहले कही हुई ४ प्रकृतियां, तीन अंगोपागोमेंसे १, छह संहननोंमेंसे १, ये सब ६ प्रकृतियां मिश्रशरीरवाले त्रसजीवके उदययोग्य है । और शरीरपर्याप्तिकालमें पर- घात प्रकृति उदय होती है। आताप-उद्योत ये दोनों तथा विहायोगतिदोनों-ये योग्यत्र- सस्थावरके पर्याप्तिकालमें उदय होती है । उच्छास और खरयुगल-ये अपने २ पर्याप्ति- कालमें उदय होते है। और क्रमसे केवलीमें ही तीर्थकर प्रकृतिका उदय होता है॥५९०५९१॥ आगे एक जीवकी अपेक्षा वा नाना जीवोंकी अपेक्षासे जो नामकर्मके उदय स्थान कहे गये है उन्हींको दिखलाते हैं,- वीसं इगिचउवीसं तत्तो इगितीसओत्ति एयधियं । उदयट्ठाणा एवं णव अट्ठय होंति णामस्स ॥ ५९२ ।। विशमेकचतुर्विशं तत एकत्रिंशदिति एकाधिकम् । उदयस्थानान्येवं नवाष्ट च भवन्ति नान्नः ॥ ५९२ ।। अर्थ-नामकर्मके उदयस्थान, २०, २१, २४ का, इससे एक एक अधिक ३१ के स्थान पर्यंत, ९, ८ का इस प्रकार १२ है ॥ ५९२ ।। अब उनस्थानोंके स्वामियोंको कहते है,- चद्गदिया एइंदी विसेसमणुदेवणिरयएइंदी। इगिवितिचपसामण्णा विसेससुरणारगेइंदी ॥ ५९३ ॥ सामण्णसयलवियलविसेसमणुस्ससुरणारया दोण्हं । सयलवियलसामण्णासजोगपंचक्खवियलया सामी॥५९४ ॥ जुम्म । चतुर्गतिका एकेन्द्रिया विशेषमनुदेवनिरयैकेन्द्रिया । एकद्वित्रिचपसामान्या विशेषसुरनारकैकेन्द्रियाः ॥ ५९३ ।। सामान्यसकलविकलविशेषमनुष्यसुरनारका द्वयोः । सकलविकलसामान्या: सयोगपञ्चाक्षविकलकाः स्वामिनः ।।५९४॥ युग्मम् ।
- - १९० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-२१ के स्थानके चारोंगतिके जीव खामी है, २४ क एकेंद्री, २५ के विशेप- मनुष्य-देव-नारकी-एकेंद्री खामी हैं, २६ के एकद्री-तेहंद्री-चौइंद्री-पंचेंद्री-सामान्य- जीव खामी हैं, २७ के विशेषपुरुष-देव नारकी-एकेंद्री स्वामी हैं, २८ और २९ के स्थानके सामान्यपुरुष-पंचेंद्री-विकलेंद्री-विशेषपुरुप-देव-नारकी खामी है, ३० के पंचेंद्री-विकलेंद्री- सामान्यपुरुष स्वामी हैं, ३१ के सयोगकेवली-पंचेंद्री-दोइंद्रीआदि-विकलेंद्री जीव स्वामी हैं ॥ ५९३१५९४ ॥ ९ और ८ के स्थानके अयोगकेवली स्वामी हैं। एगे इगिवीसपणं इगिछब्बीसवीसतिषिण गरे। सयले वियलेवि तहा इगितीसं चावि वचिठाणे ॥ ५९५ ॥ सुरणिरयविसेसणरे इगिपणसगचीसतिणि समुघादे । मंणुसं वा इगिवीसे वीसं रूवाहियं तित्थं ॥ ५९६ ॥ वीसदु चउवीसचऊ पणछन्वीसादिपंचयं दोसु । उगुतीसतिपणकाले गयजोगे होंति णव अदृ॥५९७॥विसेसयं। एकस्मिन्नेकविंशतिपञ्च एकषड्विंशाष्टविशत्रीणि नरे । सकलेविकलेपि तथा एकत्रिशत् चापि वचःस्थाने ।। ५९५ ।। . सुरनिरयविशेषनरे एकपञ्चसप्तविंशत्रीणि समुद्धाते । मनुष्यं वा एकविंशे विंशं रूपाधिकं तीर्थम् ।। ५९६ ॥ विंशद्विकं चतुर्विशचतुष्कं पञ्चषड़िशादिपञ्चकं द्वयोः । एकोनत्रिंशत्रिकं पञ्चकालेपु गतयोगे भवन्ति नवाष्ट ॥५९७॥ विशेषकम् । अर्थ-पहले कहे हुए पांचकालोंमें यथासंभव क्रमसे एकेन्द्रीके उदय योग्य २१ आदि पांच स्थान है, मनुष्यके उदययोग्य २१-२६ और २८ आदि तीन स्थान, इस तरह ५ स्थान हैं; सकलेन्द्री अर्थात् पंचेंद्री और दोइन्द्रीआदि विकलेंद्रीतिर्यंचोंके उदययोग्य २१ आदि ५ स्थान और भाषापर्याप्तिमें ३१ का स्थान-इसप्रकार ६ स्थान हैं, देव नारकी, आहारक और केवल सहित विशेष मनुष्य इनके २१-२५-२७ आदि ३, इंसप्रकार ५ स्थान उदय योग्य है। समुद्धातकेवलीके मनुष्यकी तरह २१ मेंसे २० का ही स्थान होता है क्योंकि आनुपूर्वी कम हो जाती है । तीर्थकर समुद्धातकेवलीके तीर्थकर प्रकृति बढनेसे २१ का स्थान होता है, इस प्रकार केवलीके २० और २१ के दो स्थान उदय योग्य है; मिश्रशरीरकालमें २४ आदि ४ चार स्थान, शरीर पर्याप्तिकालमें २५ आदि ५ स्थान, आनप्रान (श्वासोच्छ्रास ) पर्याप्तिकालमें २६ आदि पांच स्थान, भाषापर्याप्तिकालमें २९ आदि ३ स्थान उदय योग्य है । और अयोगीकेवलीके ९ और ८ का ये दो स्थान उदय योग्य है ।'५९५/५९६१५९७ ॥
९ गोम्मटसारः। १९१ अब अयोगीगुणस्थानके दो स्थानोंका खरूप कहते है- गयजोगस्स य बारे तदियाउगगोद इदि विहीणेसु । णामस्स य णव उदया अहेव य तित्थहीणेसु ॥५९८ ॥ गतयोगस्य च द्वादश तृतीयायुष्कगोत्रमिति विहीनेषु । नानश्च नव उद्या अष्टैव च तीर्थहीनेषु ॥ ५९८ ॥ अर्थ-अयोगकेवलीकी १२ उदय प्रकृतियोंमेंसे वेदनीय-आयु-गोत्र इनकी ३ प्रकृ- तियां कम करनेपर नाम कर्मकी ९ उदय योग्य है । और जो तीर्थकर प्रकृति नही हो तो ८ ही उदय योग्य है ॥ ५९८ ॥ आगे नामकर्मके उदय स्थानों में भंगोंको कहते हैं; संठाणे संहडणे विहायजुम्मे य चरिमचदुजुम्मे । अविरुद्धकदरादो उदयट्ठाणेसु भंगा हु ॥ ५९९ ॥ संस्थाने संहनने विहायोयुग्मे च चरमचतुर्युग्मे । अविरुद्धकतरस्मात् उदयस्थानेषु भगा हि ॥ ५९९ ॥ अर्थ-६ संस्थानोंमेंसे, ६ सहननोंमेंसे, विहायोगतियुगलमेंसे, और अंतके सुभग आदि ४ युगलोंमेंसे अविरोधी एक एक प्रकृतिका ग्रहण करनेपर नामकर्मके भंग होते है। इन सबको आपसमें गुणाकरनेसे ११५२ भंग हो जाते है ॥ ५९९ ॥ आगे उन भंगोंमेंसे नारक आदि ४१ जीव पदोमें संभव होनेवाले भंगोंको ३ गाथा- औसे कहते हैं- तत्थासत्था णारयसाहारणसुहुमगे अपुण्णे य । सेसेगविगलऽसण्णीजुदठाणे जसजुगे भंगा ॥ ६०० ॥ तत्राशरता नारकसाधारणसूक्ष्मके अपूर्णे च । शेषेकविकलासंज्ञियुतस्थाने यशोयुग्मे भङ्गाः ॥ ६०० ।। अर्थ -उन उदय प्रकृतियों से अप्रशस्त प्रकृतियोंका उदय नारकी-साधारणवनरपती- सब सूक्ष्म-लव्ध्यपर्याप्तक इन सबमें है इस कारण एक एक भग है । शेष एकेन्द्री-विकले- न्द्री-असज्ञीपंचेद्री इनमें पूर्वकथित अप्रशस्तका उदय तो है ही परंतु यशस्कीर्ति-अयश- स्कीर्ति इन दोनोंमेसे किसी एकका उदय होनेसे उदयस्थानोंमें दो दो भंग हो जाते हैं अर्थात् एक यशस्कीर्ति उदयस्थान १ दूसरा अयशस्कीर्ति उदयस्थान २ इस तरह दो भेद होते है । ६००॥ सण्णिम्मि मणुस्सम्मि य ओघेक्कदरं तु केवले वजं । सुभगादेजजसाणि य तित्थजुदे सत्थमेदीदि ॥६०१॥ .
- 1 . १९२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । संज्ञिनि मनुष्ये च ओधैकतरं तु केवले वज्रम् । सुभगादेययशांसि च तीर्थयुते शस्तमेतीति ।। ६०१ ।। अर्थ-संज्ञी पंचेन्द्रीके और मनुष्यके सामान्यकथनवत् एक एकका उदय होनेसे ११५२ भंग होते हैं । केवलज्ञानअवस्थामें वज्रर्षभनाराचसंहनन १ सुभग २ आदेय ३ यशस्कीर्ति ४ इनका उदय होता है । तीर्थकरप्रकृति सहित केवलीके अर्थात् तीर्थकर केवलीके सब प्रशस्त प्रकृतियोंका ही उदय होनेसे उनके उदयस्थानोंमें एक एक ही भंग है ॥ ६०१॥ देवाहारे सत्थं कालवियप्पेसु भंगमाणेजो। वोछिण्णं जाणित्ता गुणपडिवण्णेसु सब्बेसु ।। ६०२ ॥ देवाहारे शस्तं कालविकल्पेषु भङ्ग आनेयः । व्युच्छिन्नं ज्ञात्वा गुणप्रतिपन्नेपु सर्वेपु ॥ ६०२ ॥ अर्थ-चारप्रकारके देवोंमें और आहारकशरीरसहित प्रमत्तम प्रशस्तप्रकृतियोंका ही उदय है, इसकारण उनके सबकालके उदयस्थानों में एक एक ही भंग है । और सासादना- दिगुणस्थानोंको प्राप्त हुए जीवोंमें अथवा विग्रहगतिकार्माणादिकके कालमें व्युच्छिन्न प्रकृ- तियोंको जानकर शेष प्रकृतियोंके भंग यथासंभव समझलेना ॥ ६०२ ॥ वीसादीणं भंगा इगिदालपदेसु संभवा कमसो। एक सही चेव य सत्तावीसं च उगुवीसं ॥ ६०३॥ वीसुत्तरछच्चसया वारस पण्णत्तरीहि संजुत्ता । एक्कारससयसंखा सत्तरससयाहिया सट्टी ॥ ६०४ ॥ ऊणत्तीससयाहियएकावीसा तदोवि एकट्ठी। एक्कारससयसहिया एकेक विसरिसगा भंगा॥६०५॥ विसेसयं । विशादीनां भड़ा एकचत्वारिंशत्पदेपु संभवाः क्रमशः। एकः षष्टिः चैव च सप्तविशं च एकोनविशम् ।। ६०३ ॥ विंशोत्तरपटू च शतानि द्वादश पञ्चसप्ततिभिः संयुक्ताः । एकादशशतसंख्या सप्तदशशताधिकाः पष्टिः ॥ ६०४॥ एकोनत्रिशच्छताधिकैकविंशं ततोपि एकषष्टिः । एकादशशतसहिता एकैकं विसदृशगा भङ्गाः ॥ ६०५ ॥ विशेषकम् । अर्थ-२० के स्थान को आदिलेकर स्थानोंके भंग ४१ जीवपदोंकी अपेक्षा यथासंभव क्रमसे १, ६०,२७, १९, ६२०, १२, ११७५, १७६०, २९२१, ११६१, तीर्थ- समुद्धातकेवलीका १ पुनरुक्तभंग, अयोगकेवलीके तीर्थंकर प्रकृति सहितका १ और तीथै- कर रहितका १ भंग-इसप्रकार ७७५८ भंग होते है ॥ ६०३ । ६०४ । ६०५॥ , गोम्मटसारः। १९३ आगे उन पुनरुक्तभंगोंको कहते है। सामण्णकेवलिस्स समुग्धादगदस्स तस्स वचि भंगा। तित्थस्सवि सगभंगा समेदि तत्थेकमवणिजो ॥ ६०६ ॥ सामान्यकेवलिनः समुद्धातगतस्य तस्य वचसि भङ्गाः। तीर्थस्यापि स्वकभङ्गाः समा इति तत्रैकोपनेयः ॥ ६०६ ॥ अर्थ-भाषापर्याप्तिकालमें सामान्यकेवलीके तथा समुद्धातसहितसामान्यकेवलीके २४ भंग समान है । और तीर्थकर केवली व तीर्थकर समुद्धातकेवलीके ३१ के स्थानमें एक एक भंग है वह समान है इसकारण २५ भंग पुनरुक्त होनेसे ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥ ६०६॥ आगे गुणस्थानोंमें उन भंगोंको कहते है-- णारयसण्णिमणुस्ससुराणं उवरिमगुणाण भंगा जे । पुणरत्ता इदि अवणिय भणिया मिच्छस्स भंगेसु ॥६०७॥ नारकसंज्ञिमनुष्यसुराणामुपरितनगुणानां भङ्गा ये । पुनरुक्ता इति अपनीय भणिता मिथ्यस्य भङ्गेषु ॥ ६०७ ।। अर्थ-नारकी-सज्ञीतिर्यच मनुष्य-देव इनके ऊपरके अर्थात् सासादनादिगुणस्थानोंमें जो भंग है वे मिथ्यादृष्टिके भंगोंके समान होनेसे पुनरुक्त है, इसलिये वे घटाकर केवल मिथ्याष्टिके भंगोंमें कहे गये है॥ ६०७ ॥ अब उन अंगोंका सब जोड़ कहते है:- अडवण्णा सत्तसया सत्तसहस्सा य होंति पिंडेण । उदयहाणे भंगा असहायपरकमुद्दिट्टा ॥ ६०८ ॥ अष्टपञ्चाशत् सप्तशतानि सप्तसहस्राणि च भवन्ति पिण्डेन । उदयस्थाने भङ्गा असहायपराक्रमोदिष्टाः ॥ ६०८ ।। अर्थसहायतारहित पराक्रमवाले श्री महावीर स्वामीने सब मिलाकर ७७५८ भंग उदयस्थानोंमें कहे है ॥ ६०८ ॥ आगे नामकर्मके सत्त्वस्थानका प्रकरण १९ गाथाओसे कहते है, तिदुइगिणउदी णउदी अडचउदोअहियसीदि सीदी य । ऊणासीदद्वत्तरि सत्तत्तरि दस य णव सत्ता ॥ ६०९ ॥ त्रिद्वयेकनवतिः नवतिः अष्टचतुयधिकाशीतिरशीतिश्च । एकोनाशीत्यष्टसप्तती सप्ततिः दश च नव सत्त्वानि ॥ ६०९ ।। अर्थ-९३, ९२, ९१, ९०, ८८, ८४, ८२, ८०, ७९, ७८, ७७, १० और ९ प्रकृतिरूप-नामकर्मके १३ सत्त्व स्थान है॥ ६०९॥ २५ १९४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । + अब उनकी विधि बतलाते हैं;- सव्वं तित्थाहारुभऊणं सुरणिरयणरदुचारिदुगे । उन्वेलिदे हदे चउ तेरे जोगिस्स दसणवयं ॥६१०॥ सर्व तीर्थाहारोभयोनं सुरनिरयनरद्विचतुर्द्विके । उद्वेलिते हते चतुष्कं त्रयोदश योगिनः दशनवकम्॥६१० ॥ अर्थ-नामकर्मकी प्रकृतिरूप सब ९३ का स्थान है, उनमेंसे तीर्थंकर घटानेसे ९२ का स्थान, आहारकयुगल घटानेसे ९१ का, तीनों घटानेसे ९० का स्थान होता है, उस ९० के स्थानमें देवगति १ देवगत्यानुपूर्वी इन दोंनोंकी उद्वेलना होनेसे ८८ का स्थान होता है, इसमें भी नरकगति आदि ४ प्रकृतियोंकी उद्वेलना होनेपर ८४ का स्थान होता है, इसमें भी मनुष्यगति-मनुष्यगत्यानुपूर्वी इन दोनोंकी उद्वेलना होनेसे ८२ का स्थान होता है, तथा ९३ आदि चार (९३-९२-९१-९०) स्थानोंमें अनिवृत्तिकरणमें क्षय होनेवाली १३ प्रकृतियोंके घटानेसे ८०-७९-७८-७७ के स्थान होते है। और अयोगकेवलीके १० का और ९ का स्थान होता है ॥ ६१० ।। आगे उन १० के तथा ९ के स्थानमें प्रकृतियोंको कहते हैं:- गयजोगस्स दु तेरे तदियाउगगोदइदि विहीणेसु । दस णामस्स य सत्ता णव चेव य तित्थहीणेसु॥ ६११॥ गतयोगस्य तु त्रयोदशसु तृतीयायुष्कगोत्रेति विहीनेषु । दश नाम्नश्च सत्ता नव चैव च तीर्थहीनेषु ।। ६११ ॥ अर्थ-अयोगकवलीके १३ प्रकृतियों से वेदनीय-आयु-गोत्र, ये तीन प्रकृतियां कम करनेसे नामकर्मकी १० प्रकृतियोंका सत्त्व है । यदि तीर्थंकर प्रकृति भी घटादी जावे तो ९ प्रकृतियोंका सत्त्वस्थान होता है ।। ६११ ॥ आगे उद्वेलनास्थानोंमें विशेषता कहते हैं;- गुणसंजादप्पयार्ड मिच्छे बंधुदयगंधहीणम्मि । सेसुवेल्लणपयडिं णियमेणुवेल्लिदे जीवो ॥ ६१२ ॥ गुणसंजातप्रकृति मिथ्ये बन्धोदयगन्धहीने । शेषोद्वेलनप्रकृति नियमेनोद्वेल्लयति जीवः ।। ६१२ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टिगुणस्थानमें जिनप्रकृतियोंके बंधकी अथवा उदयकी वासनाभी नही ऐसी सम्यक्त्वगुणसे उत्पन्न हुई सम्यक्त्वमोहनीय-मिश्रमोहनीय-आहारकयुगल, इन चार प्रकृतियोंकी तथा शेष उद्वेलनप्रकृतियोंकी उद्वेलना यह जीव मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें करता है ॥ ६१२॥ अब उसका क्रम कहते है। . 1 गोम्मटसारः। १९५ सत्थत्तादाहारं पुव्वं उब्वेल्लदे तदो सम्म । सम्मामिच्छं तु तदो एगो विगलो य सगलोय ॥ ६१३ ॥ शस्तत्वादाहारं पूर्वमुद्वेल्लयति ततः सम्यक् । सम्यग्मिभ्यं तु तत एको विकलश्च सकलश्च ॥ ६१३ ॥ अर्थ-आहारकयुगल प्रशस्तप्रकृतियां है इसलिये चारों गतिके मिथ्यादृष्टि जीव पहले इन दोनोंकी उद्वेलना करते हैं। पीछे सम्यक्त्वप्रकृतिकी, उसके बाद सम्यग्मिथ्यात्वमोहनी- यकी उद्वेलना करते है । उसके बाद एकेन्द्री-विकलेंद्री और सकलेन्द्रिय जीव शेष देव- द्विकादिकोंकी उद्वेलना करते हैं ॥ ६१३ ॥ आगे उस उद्वेलनाके अवसरका काल कहते है। वेदगजोग्गे काले आहारं उवसमस्स सम्मत्तं । सम्मामिच्छंचेगे वियले बेगुव्वछकं तु ॥ ६१४ ॥ वेदकयोग्ये काले आहारमुपशमस्य सम्यक्त्वम् । सम्यग्मिथ्यं चैकस्मिन् विकले वैगूर्वषटुं तु ॥६१४ ॥ अर्थ-वेदकसम्यक्त्वयोग्यकालमें आहारककी उद्वेलना, उपशमकालमें सम्यक्त्वप्रकृति वा सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिकी उद्वेलना करता है । और एकेन्द्रिय तथा दोइंद्रिय पर्यायमें वैक्रि- यिकपटूकी उद्वेलना करता है ॥ ६१४ ॥ आगे उन दोनों कालोंका लक्षण कहते हैं। उदधिपुधत्तं तु तसे पल्लासंखूणमेगमेयक्खे। जाव य सम्म मिस्सं चेदगजोग्गोय उवसमस्स तदो॥६१५॥ उदधिपृथक्त्वं तु से पल्यासंख्योनमेकमेकाक्षे । यावच्च सम्यं मिश्र वेदकयोग्यश्च उपशमस्य ततः ॥ ६१५ ॥ अर्थ-सम्यक्त्वमोहनीयकी और मिश्रमोहनीयकी स्थितिमेंसे पृथक्त्वसागर काल सके शेष रहै और पल्यके असंख्यातवें भाग कम एक सागर काल एकेन्द्रीके शेष रह जावे वह " वेदकयोग्य काल" है । और उससे भी सत्तारूप स्थिति कम हो तो वह उपशमकाल कहा जाता है ॥ ६१५॥ आगे तेजकाय और वायुकायके उद्वेलन प्रकृतियोंको दिखाते हैं; तेउद्गे मणुवदुर्ग उच्चं उव्वेल्लदे जहण्णिदरं । पल्लासंखेज दिमं उबेल्लणकालपरिमाणं ॥ ६१६ ॥ तेजोद्विके मनुष्यद्विकमुच्चमुद्वेल्यते जघन्येतरत् । पल्यासंख्येयिममुद्वेलनकालपरिमाणम् ॥ ६१६ ॥ अर्थ-तेजकाय और वायुकायके मनुष्यगतियुगल और उच्चगोत्र-इन तीनकी उद्वेलना । - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । होती है । और उस उद्वेलनाके कालका प्रमाण जघन्य अथवा उत्कृष्ट पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण है ॥ ६१६ ॥ अब उसीको कहते हैं;- पल्लासंखेजदिमं ठिदिमुवेल्लदि मुहुत्तअंतेण । संखेजसायरठिदि पल्लासंखेजकालेण ॥ ६१७ ॥ पल्यासंख्येयिमां स्थितिमुद्वेलयति मुहूर्तान्तरेण । संख्येयसागरस्थिति पल्यासंख्येयकालेन ॥ ६१७ ॥ अर्थ-पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण स्थितिकी अंतर्मुहूर्तकालमें उद्वेलना करता है तो संख्यातसागर प्रमाण मनुष्यद्विकादिकी सत्तारूपस्थितिकी उद्वेलना राशिकसे पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण कालमें ही करसकता है ऐसा सिद्ध हुआ ॥ ६१७ ॥ आगे सम्यक्त्वादिककी विराधना (छोड़देना) कितनी बार होती है यह कहते है- सम्मत्तं देसजमं अणसंजोजणविहिं च उक्करसं । पल्लासंखेजदिमं वारं पडिवजदे जीवो ॥ ६१८ ॥ सम्यक्त्वं देशयममनसंयोजनविधिं च उत्कृष्टम् । पल्यासंख्येयं वारं प्रतिपद्यते जीवः ॥ ६१८ ॥ अर्थ-प्रथमोपशमसम्यक्त्व, वेदक (क्षायोपशमिक) सम्यक्त्व, देशसंयम और अनंता- नुबंधीकषायके विसंयोजनकी विधि-इन चारोंको यह जीव उत्कृष्टपने अर्थात् अधिकसे अधिक पल्यके असंख्यातवें भाग समयोंके प्रमाण वार छोड़ २ के ग्रहण करता है । पीछे नियमसे सिद्धपदको ही पाता ॥ ६१८ ॥ चत्तारि वारसुवसमसेटिं समरुहदि खविदकम्मंसो। बत्तीसं वाराई.संजममुवलहिय णिव्वादि ॥६१९॥ चतुरो वारानुपशमश्रेणि समारोहति क्षपितकोशः । द्वात्रिंशद्वारान् संयममुपलभ्य निर्वाति ॥ ६१९ ॥ अर्थ-उपशमश्रेणीपर अधिकसे अधिक चार दफै चढता है पीछे कौके अंशोंको क्षय करता हुआ क्षपकश्रेणी चढ मोक्षको ही जाता है। और सकलसंयमको उत्कृष्टपनेसे ३२ वार ही धारणकरके पीछे मोक्षको प्राप्त होता है। ६१९ ।। आगे चारोंगतियोंकी अपेक्षासे गुणस्थानोंम नामकर्मके सत्त्वस्थानोंकी योजना करते हैं,- तित्थाहाराणुभयं सव्वं तित्थं ण मिच्छगादितिये । तस्सत्तकम्मियाणं तग्गुणठाणं ण संभवई ॥ १ यह गाथा सत्त्वप्रकरणमें आगई है वहापर ही इसका अर्थ है। है - - + .
गोम्मटसारः।
१९७
सुरणरसम्मे पढमो सासणहीणेसु होदि वाणउदी।
सुरसम्मे णरणारयसम्मे मिच्छे य इगिणउदी ॥ ६२० ॥
सुरनरसम्ये प्रथमं सासनहीनेषु भवति द्वानवतिः ।
सुरसम्ये नरनारकसम्ये मिथ्ये च एकनवतिः ॥ ६२० ॥
अर्थ-पहला ९३ का सत्त्वस्थान असंयतसम्यग्दृष्टि देवके तथा मनुष्यके होता है,
सासादन रहित चारोंगतिके जीवोंके ९२ का स्थान होता है और ९१ का स्थान देव
सम्यग्दृष्टीके तथा मनुष्य और नारकी सम्यग्दृष्टी अथवा मिथ्यादृष्टिके होता है ॥ ६२०॥
णउदी चदुग्गदिम्मि य तेरसखवगोत्ति तिरियणरमिच्छे ।
अडचउसीदी सत्ता तिरिक्खमिच्छम्मि बासीदी ॥ ६२१ ॥
नवतिः चतुर्गतौ च त्रयोदशक्षपक इति तिर्यमरमिथ्ये ।
अष्टचतुरशीतिः सत्ता तिर्यञ्चमिध्ये तयशीतिः ।। ६२१ ।।
अर्थ-९० का सत्त्वस्थान १३ प्रकृतियोंके क्षयवाले अनिवृत्तिकरण गुणस्थानपर्यंत
चारोंगतियोंके जीवोंके होता है, ८८-८४ के दोनों स्थानोंकी सत्ता मिथ्यादृष्टि तिर्यच और
मनुष्यके है, और ८२ का सत्त्वस्थान तिर्यंचमिथ्यादृष्टिके होताहै ऐसाजानना चाहिये ॥६२१॥
सीदादिचउठाणा तेरसखचगादु अणुवसमगेसु ।
गयजोगस्स दुचरिमं जाव य चरिमम्हि दसणवयं ॥ ६२२ ॥
अशीयादिचतुःस्थानानि त्रयोदशक्षपकादनुपशामकेपु ।
गतयोगस्य द्विचरमं यावच्च चरमे दशनवकम् ॥ ६२२॥
अर्थ-८० को आदिलेकर चार स्थान अर्थात् ८०-७९-७८-७७-के स्थान तेरह-
प्रकृतिके क्षय करनेवाले क्षपक अनिवृत्ति करण गुणस्थानसे लेकर अयोगीके द्विचरमसमय तक
पाये जाते है। और १० का तथा ९ का सत्त्वस्थान अयोगकेवलीके अंतसमयमें होता है ।।१२२॥
आगे ११ जीव पदोंमें उन सत्त्वस्थानोंको कहते हैं;
णिरये वा इगिणउदी णउदी भूआदिसतिरियेसु ।
वाणउदी णउदी अडचउवासीदीय होति सत्ताणि ॥६२३॥
निरये द्वघेकनवतिः नवतिः भ्वादिसर्वतिर्यक्षु ।
द्वानवतिः नवतिः अष्टचतुद्वर्यशीतिश्च भवन्ति सत्त्वानि ॥ ६२३ ।।
अर्थ-नामकर्मके सत्त्वस्थान नारकी जीवोम ९२-९१-९० के इसतरह ३ है । और
पृथिवीकायादि सब तिर्यचोमं ९२-९०-८८-८४-८२ के इसतरह पाच पाच है ॥६२३॥
बासीदिं वजित्ता वारसठाणाणि होति मणुवेसु ।
सीदादिचउहाणा छट्ठाणा केवलिदुगेसु ॥ ६२४ ॥
. १९८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । द्वयशीतिं वर्जयित्वा द्वादशस्थानानि भवन्ति मानवेषु । अशीत्यादिचतुःस्थानानि षट्स्थानानि केवलिद्विकयोः ॥ ६२४ ।। अर्थ-मनुष्योंमें ८२ के स्थानको छोड़कर शेष १२ स्थान होते हैं। परंतु सयोगकेव- लीके ८० को आदिलेकर चार सत्त्वस्थान हैं, अयोगकेवलीके ८० को आदिलेकर ६ स- त्त्वस्थान है ॥ ६२४ ॥ समविसमट्ठाणाणि य कमेण तिथिदरकवलीसु हवे । तिदुणवदी आहारे देवे आदिमचउकं तु ॥ ६२५ ॥ समविपमस्थानानि च क्रमेण तीर्थेतरकेवलिनोः भवेयुः । त्रिद्विनवतिः आहारे देवे आदिमचतुष्कं तु ॥ ६२५ ।। अर्थ केवलीके जो स्थान कहे थे वे समसंख्यावाले तीर्थकर केवलीके और विषम- संख्यावाले स्थान तीर्थकरप्रकृति रहित सामान्यकेवलीके होते है । आहारकमें ९३-९२ , के दो स्थान है । और विमानवासी देवोंमें आदिके ४ सत्त्वस्थान होते हैं ।। ६२५ ॥ वाणउदिणउदिसत्ता भवणतियाणं च भोगभूमीणं । हेडिमपुढविचउक्कभवाणं च य सासणे णउदी ॥ ६२६ ॥ द्वानवतिनवतिसत्ता भवनत्रिकानां च भोगभूमीनाम् । अधस्तनपृथिवीचतुष्कभवानां च च सासने नवतिः ॥ ६२६ ॥ अर्थ-भवनत्रिक देवोंके, भोगभूमियाओंके और नीचेकी अंजनादि चार नरकपृथिवी- योंमें ९२-९० इन दो स्थानोंकी सत्ता है । तथा सासादन गुणस्थानमें सब जीवोंके ९० का ही सत्त्वस्थान है ।। ६२६ ॥ इस प्रकार बंधोदयसत्त्वकी अपेक्षा भंग कहे। आगे प्रकृतियोंके बंधोदयसत्त्वके त्रिसंयोगी भंग कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं;- मूलुत्तरपयडीणं बंधोदयसत्तठाणभंगा हु। भणिदा हु तिसंजोगे एत्तो भंगे परूवेमो ॥ ६२७ मूलोत्तरप्रकृतीनां बन्धोदयसत्त्वस्थानभङ्गा हि । भणिता हि त्रिसंयोगे इतो भङ्गान् प्ररूपयामः ॥ ६२७ ॥ अर्थ-इसप्रकार मूलप्रकृतियोंके और उत्तरप्रकृतियोंके वंधोदयसत्त्वरूप स्थान तथा भंग कहे। इसके बाद अब हम बंध-उदय-सत्ता इनके त्रिसंयोगी भंगोंका निरूपण करते हैं॥६२७|| यही कहते हैं। अट्टविहसत्तछन्वंधगेसु अट्टेव उदयकम्मंसा । एयविहे तिषियप्पो एयवियप्पो अबंधम्मि ॥ ६२८ ।। अष्टविधसप्तषड्वन्धकेषु अष्टैव उदयकीशाः । एकविधे त्रिविकल्प एकविकल्प अबन्धे ।। ६२८ ।। - .. -- गोम्मटसारः। १९९ अर्थ-ज्ञानावरणादि ८ प्रकारके बंधवाले सात प्रकार बंधवाले छह प्रकार बंधवाले जीवोंके उदय और सत्त्व आठ आठ प्रकार ही जानना ।जिसके एक प्रकार मूल प्रकृतिका बंध है उसके उदय ७ प्रकार सत्त्व ८ प्रकार, उदय-सत्त्व दोनों सात सात प्रकार अथवा चार चार प्रकारके होनेसे तीन भेद होते है। जिसके एक प्रकृतिका भी बंध नहीं है उसके उदय और सत्त्व चार २ प्रकारके होनेसे एक ही विकल्प होता है ।। ६२८ ।। आगे इन त्रिसंयोगी भंगोंको गुणस्थानोंमें घटित करते है,- मिस्से अपुवजुगले विदियं अपमत्तओत्ति पढमदुर्ग । सुहुमादिसु तदियादी वंधोदयसत्तभंगेसु ॥ ६२९ ॥ मिने अपूर्वयुगले द्वितीयमप्रमत्त इति प्रथमद्विकम् । सूक्ष्मादिपु तृतीयादिः बन्धोदयसत्त्वभङ्गेषु ॥ ६२९॥ अर्थ उन बंध उदय सत्त्वके भंगोंमेंसे गुणस्थानोंकी अपेक्षा मिश्रगुणस्थान-अपूर्वकर- ण-अनिवृत्तिकरण, इन तीन गुणस्थानोंमें दूसरा भंग है । मिश्रके विना अप्रमत्तगुणस्थान- पर्यंत ६ गुणस्थानों में पहला और दूसरा भंग है । और सूक्ष्मसांपराय आदि अयोगीपर्यंत तीसरा भंग आदि क्रमसे जानना ॥ ६२९ ।। आगे उत्तरप्रकृतियोंमें त्रिसंयोगी भंगोंको कहते है- वंधोदयकम्मंसा णाणावरणतरायिए पंच। बंधोपरमेवि तहा उदयंसा होति पंचेव ॥ ६३०॥ बन्धोदयकर्माशा ज्ञानावरणान्तराययोः पञ्च । बन्धोपरमेपि तथा उदयांशी भवन्ति पञ्चैव ।। ६३०॥ अर्थ-ज्ञानावरण और अंतरायकर्मकी पांच पांच प्रकृतिरूप बंध उदय और सत्त्व सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानपर्यंत है । और बंधके अभाव होनेपर भी इन दोनोंकी उपशांतमोह और क्षीणमोहमें उदय सत्त्वरूप पांच पांच ही प्रकृतियां है ॥ ६३० ॥ बिदियावरणे णवबंधगेसु चदुपंचउदय णवसत्ता । छब्बंधगेसु एवं तह चदुवंधे छडंसा य ॥ ६३१ ॥ उवरदबंधे चदुपंचउदय णव छच्च सत्त चदु जुगलं । तदियं गोदं आउं विभज्ज मोहं परं वोच्छं ॥ ६३२ ॥ जुम्म । द्वितीयावरणे नवबन्धकेषु चतुःपञ्चोदयः नवसत्ता। षट्बन्धकेषु एवं तथा चतुर्बन्धे षडंशाश्च ।। ६३१ ।। उपरतबन्धे चतुःपञ्चोदयः नव षद् च सत्त्वं चतुष्कं युगलम् । तृतीयं गोत्रमायुर्विभज्य मोहं परं वक्ष्ये ॥ ६३२ ।। युग्मम् । १ यहा पर अश नाम सत्त्वका है।
२०० ४ . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-दूसरे दर्शनावरणकी ९ प्रकृतियोंके बंध करनेवालेके उदय ५ का अथवा ४ का और सत्ता ९ की ही होती है । ६ प्रकृतियोंके बंधकके इसीप्रकार उदय और सत्ता जानना । और ४ प्रकृतियोंके बंध करनेवालेके पूर्वोक्तप्रकार तथा ६ का भी सत्त्व पाया जाता है। जिसके बंधका अभाव है उसके उदय तो ४ वा ५ का है और सत्त्व ९ वा ६ का है तथा उदय-सत्त्व दोनोंही चार चारके है । अब वेदनीय गोत्रआयु, इन ती- नोंके भंगोंको विभागकरके उसके बाद मोहनीयके भंगोंको कहूंगा ॥ ६३११६३२ ॥ अब पहले वेदनीयके भंगोंको कहते है- सादासादेक्कदरं वंधुदया होंति संभवट्टाणे । दोसत्तं जोगित्ति य चरिमे उदयागदं सत्तं ॥ ६३३ ॥ छटोत्ति चारि भंगा दो भंगा होति जाव जोगिजिणे । चउभंगाऽजोगिजिणे ठाणं पडि धेयणीयस्स ॥६३४॥ जुम्मं । सातासातैकतरं वन्धोदयौ भवतः संभवस्थाने । द्विसत्त्वं योगीति च चरमे उदयागतं सत्त्वम् ॥ ६३३ ।। षष्ठ इति चत्वारो भगा द्वौ भनौ भवतो यावत् योगिजिनम् । चतुर्भङ्गा अयोगिजिने स्थानं प्रति वेदनीयस्य ।। ६३४ ॥ युग्मम् । अर्थ-साता और असाता इन दोनोंमें एक ही का बंध तथा उदय योग्यस्थानमें होता है और सत्त्व दो दो का ही सयोगीपर्यंत है। अयोगीके जिसका उदय उसीका सत्त्व होता है । इसलिये वेदनीयकर्मके गुणस्थानों प्रति भंग इस प्रकार कहे है कि प्रमत्तगुणस्थान- पर्यंत चार भंग है, सयोगीजिनपर्यंत दो भंग होते है, और अयोगी गुणस्थानमें ४ भंग कहे है ।। ६३३१६३४ ॥ आगे गोत्रकर्मके भंग कहते है:- णीचुचाणेकदरं वंधुदया होति संभवट्ठाणे । दोसत्ताजोगित्ति य चरिमे उच्चं हवे सत्तं ॥६३५॥ नीचोच्चयोरेकतरं बंधोदयौ भवतः संभवस्थाने । द्विसत्त्वमयोगीति च चरमे, उच्चं भवेत् सत्त्वम् ॥६३५ ।। अर्थ-नीचगोत्र और ऊंचगोत्र इन दोनोंमेसे एक ही का बंध तथा उदय यथायोग्य स्थानों में होता है । और सत्त्व तो अयोगीके अंतके दूसरे समयपर्यंत दोनोंका ही पाया जाता है । तथा अयोगीके अंतके समयमें उच्चगोत्रका ही सत्त्व होता है ॥ ६३५ ।। उचुब्वेल्लिदतेऊ वाउम्मि य णीचमेव सत्तं तु । सेसिगिवियले सयले णीचं च दुगं च सत्तं तु ॥ ६३६ ।। .
गोम्मटसारः। २०१ उच्चोद्वेलिततेजसि वायौ च नीचमेव सत्त्वं तु । शेषैकविकल सकले नीचं च द्विकं च सत्त्वं तु ॥ ६३६ ॥ जिसके ऊंचगोत्रकी उद्वेलना हुई ऐसे तेजकायिक और वायुकायिकजीवोंके नीचगोत्रका ही सत्त्व है । और शेष एकेन्द्री-विकलेन्द्री तथा पंचेद्री, इनके नीचगोत्रका अथवा दो- नोंका सत्त्व है ।। ६३६ ॥ यही दिखलाते है, उञ्चब्बेल्लिदतेऊ वाऊ सेसे य वियलसयलेसु । उप्पण्णपढमकाले णीचं एयं हवे सत्तं ॥ ६३७ ॥ उच्चोद्वेलिततेजसि वायौ शेषे च विकलसकलेपु । उत्पन्नप्रथमकाले नीचमेकं भवेत् सत्त्वम् ॥ ६३७ ।। अर्थ-उच्चगोत्रकी उद्वेलना सहित तेजकायिक और वायुकायिक जीवोंके एक नीच- गोत्रका ही सत्त्व है । और इन दोनोंका मरण होकर शेष एकेन्द्री-विकलेंद्री और पंचे- न्द्रीमें उत्पन्न होनेके अंतर्मुहूर्तकाल पहले एक नीचगोत्रका ही सत्त्व है, पीछे उच्चगोत्रको वाधनेसे दोनोंका सत्त्व होता है ॥ ६३७ ॥ मिच्छादिगोदभंगा पण चदु तिसु दोण्णि अहठाणेसु । एकेका जोगिजिणे दो भंगा होति णियमेण ॥ ६३८ ॥ मिथ्यादौ गोत्रभङ्गाः पञ्च चत्वारः त्रिपु द्वौ अष्टस्थानेषु । एकैकः अयोगिजिने द्वौ भनौ भवन्ति नियमेन ॥ ६३८ ॥ अर्थ-गोत्रके भंग नियमसे मिथ्यादृष्टि और सासादन गुणस्थानोंमें क्रमसे ५ और ४ होते है, मिश्रादि तीन गुणस्थानोंमें दो दो भंग है, प्रमचादि आठ गुणस्थानोंमें गोत्रकर्मका एक एक ही भंग है, और अयोगकेवलीके दो भंग होते है ॥ ६३८ ॥ आगे आयुके भग १३ गाथाओंसे कहते है। सुरणिरया णरविरियं छम्मासवसिहगे सगाउस्स । णरतिरिया सघाउं तिभागसेसम्मि उकस्सं ॥ ६३९ ॥ भोगभुमा देवाउं छम्मासवसिट्टगे य वंधति । इगिविगला णरतिरियं तेउदुगा सत्तगा तिरियं ॥६४०॥ जुम्म। सुरनिरया नरतिर्यचं षण्मासावशिष्टके स्वकायुषः । नरतिर्यञ्चः सर्वायूंषि त्रिभागशेषे उत्कृष्टम् ॥ ६३९ ।। भोगभूमा देवायुः षण्मासावशिष्टके च बध्नन्ति । एकविकला नरतिर्यञ्च तेजोद्विको सप्तकाः तिर्यञ्चम् ॥ ६४०॥ युग्मम् । अर्थ-भुज्यमान अपनी आयुके अधिकसे अधिक ६ महीने शेष रहनेपर देव और २६ २०२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । नारकी मनुष्यायु-तिर्यंचायुका बंध करते है। मनुष्य और तिर्यच, अपनी आयुके तीसरे भागके शेष रहनेपर चारों आयुओंको बांधते है । भोगभूमिया जीव अपनी आयुके ६ मा हीने बाकी रहनेपर देवायुका बंध करते हैं । एकेन्द्री और विकलत्रय जीव, मनुप्यायु वा तिर्यंचायुको बांधते हैं, परंतु तेजकायिक-वायुकायिकजीव और सातवीं पृथिवीके नारकी तिर्यंचआयुका ही बंध करते है ॥ ६३९।६४० ॥ इसप्रकार आयुके बंधको कहा । अब आयुके उदयसत्त्वको कहते हैं; सगसगगदीणमाऊं उदेदि बंधे उदिण्णगेण समं । दो सत्ता हु अवंधे एक उदयागदं सत्तं ॥ ६४१॥ स्वकखकगतीनामायुरुदेति बन्धे उदीर्णकेन समम् । द्वे सत्त्वे हि अबन्धे एकमुदयागतं सत्त्वम् ॥ ६४१ ॥ अर्थ-नारकीआदि जीवोंके अपनी अपनी गतिकी एक आयु ही उदय होती है। और परभवकी आयुका भी बंध हो जावे तो उदयरूप आयुसहित दो आयुकी सत्ता है, और जो परभवकी आयुका बंध न हो तो एक ही उदयागत आयुकी सत्ता है। ऐसा नियमसे जानना ॥ ६४१ ॥ एके एक आऊ एकभवे बंधमेदि जोग्गपदे । अडवारं वा तत्थवि तिभागसेसे व सव्वत्थ ॥ ६४२ ॥ एकस्मिन्नेकमायुरेकभवे वन्धमेति योग्यपदे । अष्टवारं वा तत्रापि त्रिभागशेषे एव सर्वत्र ॥ ६४२ ॥ अर्थ-एकजीवके एकभवमें जो एक ही आयु बंधरूप होती है वह योग्यकालमें आठवार बंधती है, वहां पर सब जगह आयुका तीसरा २ भाग शेष रहनेपर ही बंधती है॥६४२॥ इगिवारं वजित्ता वड्डी हाणी अवटिदी होदि । ओवट्टणघादो पुण परिणामवसेण जीवाणं ॥ ६४३ ॥ एकवारं वर्जयित्वा वृद्धिः हानिः अवस्थितिः भवति । अपवर्तनघातः पुनः परिणामवशेन जीवानाम् ।। ६४३ ।। अर्थ-पूर्वकथित आठ अपकर्षणों (त्रिभागों) में पहलीवारके बिना द्वितीयादिवारमें जो पहले आयु वांधी थी उसकी स्थितिकी वृद्धि हानि अथवा अवस्थिति होती है। और आयुके बंध करनेपर जीवोंके परिणामोंके निमित्तसे उदयप्राप्त आयुका अपवर्तनघात (कद- लीघात-घटजाना ) भी हो जाता है । ६४३ ॥ एवमबंधे बंधे उवरदवंधेवि होंति भंगा हु। एकस्सेकम्मि भवे एकाउं पडि तये णियमा ॥ ६४४ ॥ N
my
गोम्मटसारः।
२०३
एवमवन्धे बन्धे उपरतवन्धेपि भवन्ति भगा हि ।
एकस्यैकस्मिन् भवे एकायुः प्रति त्रयो नियमात् ॥ ६४४ ॥
अर्थ-इसप्रकार बंध होनेपर अथवा बन्ध नही होनेपर व आगामी बंध अवस्थामें
एक जीवके एकपर्यायमें एक एक आयुके प्रति तीन तीन भंग नियमसे होते हैं॥६४४॥
एकाउस्स तिभंगा संभवआऊहिं ताडिदे णाणा।
जीवे इगिभवभंगा रूऊणगुणूणमसरित्थे ॥ ६४५ ॥
एकायुषः त्रिभङ्गाः संभवायुभिस्ताडिते नाना।
जीवेषु एकभवभङ्गा रूपोनगुणोनमसहशे ॥ ६४५ ॥
अर्थ-उन एक एक आयुके तीन तीन भंगोंको गतिमें संभव होनेवाली आयुकी संख्या
से गुणाकरनेपर नाना जीवोंकी अपेक्षा एक एक भवके भंग होते है। और अपुनरुक्त भं-
गोंकी अपेक्षा बध्यमान आयुकी संख्यारूप गुणाकारमें एक घटाके जो प्रमाण हो उसे पूर्व-
कथित भंगोंमें घटानेसे अपुनरुक्त भंग होते है ॥ ६४५ ॥
अब गुणस्थानोंमें आयुके अपुनरुक्त भंगोंको दिखाते है-
पण णव णव पण भंगा आउचउक्केसु होति मिच्छम्मि ।
णिरयाउबंधभंगेणूणा ते चेव बिदियगुणे ॥ ६४६ ॥
पञ्च नव नव पञ्च भङ्गा आयुश्चतुष्केषु भवन्ति मिथ्ये ।
निरयायुर्बन्धभङ्गेनोनास्ते चैव द्वितीयगुणे ।। ६४६ ॥
अर्थ वे अपुनरुक्तभंग मिथ्यादृष्टिगुणस्थानमें नरकादिगतिकी चार आयुओंमें क्रमसे
५, ९, ९, ५, जानना चाहिये । और दूसरे गुणस्थानमें नरकायुके बंधरूप भंग विना होते
है अर्थात् वहांपर ५, ८, ८, ५ भंग जानना ॥ ६४६ ॥
सवाउबंधभंगेणूणा मिस्सम्मि अयदसुरणिरये।
णरतिरिये तिरियाऊ तिण्णाउगवंधभंगूणा ॥ ६४७॥
सर्वायुर्वन्धमङ्गेनोना मिश्रे अयतसुरनिरये ।
नरतिरश्चि तिर्यगायुः त्रिकायुष्कबन्धभङ्गोनाः ॥ ६४७ ।।
अर्थ-जोकि पहले आयुबंधकी अपेक्षा भंग कहे गये थे वे सब कमकरनेसे मिश्रगुण-
स्थानमें नरकादि गतियोंमें क्रमसे ३, ५,५,३ भंग होते है, और असयतगुणस्थानमें देव-
नरकगतिमें तो तिर्यचआयुका बंधरूप भंग न होनेसे चार चार भंग है तथा मनुष्य तिर्य-
चगतिमें आयुबंधकी अपेक्षा नरकतिर्यचमनुष्यायुबंधरूप तीन भंग नहोनेसे छह छह भंग है,
क्योंकि इनके बंधका सासादनगुणस्थानमें ही व्युच्छेद (बंधका अभाव) हो जाता है ॥६४७॥
देस गरे तिरिये तियतियभंगा होति छहसत्तमगे।
तियभंगा उवसमगे दो हो खवगेसु एकेको ॥ ६४८ ॥
२०४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । देशे नरे तिरश्चि त्रिकत्रिकभङ्गा भवन्ति षष्ठसप्तमके। त्रयभङ्गा उपशमके द्वौ द्वौ क्षपकेपु एकैकः ॥ ६४८ ॥ अर्थ-देशसंयतगुणस्थानमें तिर्यंच और मनुष्योंमें बंध-अबंध--उपरतबंधकी अपेक्षा तीन तीन भंग होते हैं। छठे सातवें गुणस्थानमें मनुष्यके ही देवायुके बंध आदिकी अपेक्षा तीन तीन भंग होते हैं। उपश्रमश्रेणीमें देवायुका भी बंध न होनेसे देवायुके अबंध-उप- रतबंधकी अपेक्षा दो दो भंग हैं। और क्षपकश्रेणीमें उपरतबंधके भी न होनेसे अबंधकी अपेक्षा एक एक ही भंग है ऐसा जानना चाहिये ।। ६४८ ॥ आगे गुणस्थानों में जो सब गतियों संबंधी आयुके भंग कहे गये है उनका सब जोड़ कहते है:- अडछचीसं सोलस वीसं छत्तिगतिगं च चदुसु दुगं । असरिसभंगा तत्तो अजोगिअंतेसु एकेको ॥ ६४९ ॥ अष्टषदिशतिः षोडश विंशतिः षड् त्रिकत्रिकं च चतुर्पु द्विकम् । असदृशभंगाः तत अयोग्यन्तेषु एकैकः ॥ ६४९ ॥ अर्थ-सब मिलकर अपुनरुक्तभंग मिथ्यादृष्टि आदि ७ गुणस्थानोंमें क्रमसे २८, २६, १६, २०, ६, ३, ३, है । उपशमश्रेणीवाले चार गुणस्थानोंमें दो दो भंग जानना । उसके बाद क्षपकश्रेणीसे लेकर अयोगिगुणस्थानतक एक एक भंग कहा गया है ।। ६४९॥ आगे वेदनीय-गोत्र-आयु इन तीनोंके मिथ्यादृष्टिआदि गुणस्थानोंमे भंगोंकी संख्या कहते है। बादालं पणुवीसं सोलसअहियं सयं च वेयणिये । गोदे आउम्मि हवे मिच्छादिअजोगिणो भंगा ॥ ६५० ॥ द्वाचत्वारिंशत् पञ्चविशतिः षोडशाधिकं शतं च वेदनीये । गोत्रे आयुषि भवेयुः मिथ्याधयोगिनो भङ्गाः ॥ ६५० ॥ अर्थ-पहले जो मिथ्यादृष्टि आदि अयोगीपर्यंत गुणस्थानोंमें भंग कहे थे वे सब मि- लकर वेदनीयके १२, गोत्रके २५ और आयुके ११६ होते है ॥ ६५० ।। आगे पूर्वोक्त वेदनीय-गोत्र-आयु इनके सामान्यरीतिसे मूल भंगोंकी संख्या कहते हैं- वेयणिये अडभंगा गोदे सत्तेव होंति भंगा हु। पण णव णव पण भंगा आउचउक्केसु विसरित्था ॥६५१ ॥ वेदनीये अष्ट भगा गोने सप्तैव भवन्ति भङ्गा हि । पञ्च नव नव पञ्च भङ्गा आयुश्चतुष्केषु विसदृशाः ॥ ६५१॥ अर्थ-अपुनरुक्त मंग वेदनीयके ८, गोत्रके ७ होते हैं तथा चारों आयुओंके क्रमसे ५, ९, ९,५ होते है ॥ ६५१ ॥ - गोम्मटसारः। २०५ आगे मोहनीयके त्रिसंयोगी भंगोंको कहते है:- मोहस्स य बंधोदयसत्तट्ठाणाण सव्वभंगा हु। पत्तेउत्तं व हवे तियसंजोगेवि सव्वत्थ ॥ ६५२ ॥ मोहस्य च बन्धोदयसत्त्वस्थानानां सर्वभगा हि । प्रत्येकोक्तं व भवन्ति त्रिकसंयोगेपि सर्वत्र ॥ ६५२ ।। अर्थ-मोहनीयकर्मके बंध उदय सत्त्वस्थानोंके सब मंग जिसतरह पहले जुदे २ कहे थे उसीतरह बंधादिके संयोगरूप त्रिसंयोगमें भी सब जगह भंग होते है ॥ ६५२ ॥ आगे गुणस्थानोंमें मोहके स्थानोंकी संख्या कहते है।- असु एको बंधो उदया चदु ति दुसु चउसु चत्तारि। तिण्णि य कमसो सत्तं तिण्णेगदु चउसु पणग तियं ॥६५३॥ अणियट्टीवंधतियं पणदुगएक्कारसुहुमउदयंसा। इगि चत्तारि य संते सत्तं तिण्णव मोहस्स ॥ ६५४ ॥ जुम्मं । अष्टसु एको वन्ध उदयाः चत्वारः त्रयः द्वयोः चतुषु चत्वारः । त्रीणि च क्रमशः सत्त्वं त्र्येकद्विकं चतुर्यु पञ्चकं त्रिकम् ।। ६५३ ॥ अनिवृत्तिवन्धत्रिकं पञ्चद्विकैकादश सूक्ष्मोदयांशा. । एकः चत्वारश्च शान्ते सत्त्वं त्रीण्येव मोहस्य ॥ ६५४ ॥ युग्मम् । अर्थ-मोहनीयके पूर्वोक्त बंध उदय सत्त्वस्थानोंमें यथासंभव बंधस्थान मिथ्यादृष्टि आदि ८ गुणस्थानोंमें तो एक एक ही है । उदयस्थान पहले गुणस्थानमें ४, इससे आगे दो गुणस्थानोमें तीन तीन, इसके बाद चारगुणस्थानों में चार चार, एकमें तीन-इसतरह क्रमसे जानना । और सत्त्वस्थान है वे क्रमसे मिथ्यादृष्टि आदि तीन गुणस्थानोंमें तो ३, १,२ जानना, इसके बाद चारगुणस्थानोंमें पांच पांच, इससे आगेके गुणस्थानमें ३ ही है। और अनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें बंध उदय सत्त्वस्थान क्रमसे ५, २, ११ जानने चाहिये । सूक्ष्म- सांपरायमें उदयस्थान और सत्त्वस्थान क्रमसे १ और ४ है। उपशातकषाय नामा ग्यारवें गुणस्थानमें बंध-उदयका अभाव होनेसे सत्त्वस्थान ही ३ पाये जाते है ॥ ६५३।६५४ ।। आगे वे कौन २ से स्थान है उनको दिखाते है, बावीसं दसयचऊ अडचीसतियं च मिच्छबंधादी। इगिवीसं णवयतियं अट्ठावीसे च विदियगुणे ॥ ६५५ ॥ द्वाविंशतिः दशकचतुष्कमष्टाविंशतित्रिकं च मिथ्ये बन्धादि.। एकविंशतिः नवकनिकमष्टाविंशतिश्च द्वितीयगुणे ।। ६५५ ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें बंध उदय सत्त्वस्थान क्रमसे २२ का, १० वें को लेकर
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
चार, २८ वे को लेकर तीन है । और सासादनगुणस्थानमें बंधस्थान २१ वां, उदयस्थान
९ वें से लेकर तीन अर्थात् ९वां ८ वां ७ वां तथा सत्त्वस्थान २८ का जानना चाहिये।।६५५॥
सत्तरसं णवयतियं अडचउवीसं पुणोचि सत्तरसं ।
णवचउ अडचउवीस य तिचीसतियमंसयं चउसु ॥ ६५६ ॥
सप्तदश नवकत्रयमष्टचतुर्विंशं पुनरपि सप्तदश ।
नवचतुष्कमष्टचतुर्विशं च त्रयोविशत्रयमंशकं चतुर्पु ॥ ६५६ ॥
अर्थ-मिश्रगुणस्थानमें बंध उदय सत्त्वस्थान ये तीनों क्रमसे १७ का, ९ को आदि-
लेकर तीन, २८-२४ के दो स्थान हैं। उसके बाद असंयतगुणस्थानमें बंधादि तीन क्रमसे
१७ का, ९ को आदिलेकर चार स्थान, २८-२१ और २३ को आदिलेकर तीन इसतरह
पांच, हैं । इसीतरह ५ सत्त्वस्थान असंयतादि अप्रमत्तगुणस्थानतक चार गुणस्थानोंमें
जानने चाहिये ॥ ६५६॥
तेरढचऊ देसे पमदिदरे णव सगादिचत्तारि ।
तो णवर्ग छादितियं अडचउरिगिवीसयं च वंधतियं ॥ ६५७ ॥
त्रयोदश अष्टचतुष्कं देशे प्रमत्तेतरयोः नव सप्तकादिचत्वारि ।
अतो नवकं षडादित्रयमष्टचतुरेकविशकं च बंधत्रयम् ॥ ६५७ ।।
अर्थ-देशसंयतगुणस्थानमें बंध उदय सत्त्व ये तीनों स्थान क्रमसे १३ का, ८ को
आदिलेकर चार स्थान, तथा पूर्ववत् ५ है । प्रमत्तगुणस्थान और अप्रमत्तगुणस्थान इन दो-
नोंमें बंधादिस्थान क्रमसे ९ का, ७ को लेकर चार, तथा पहलेकी तरह ५ है । इसके बाद
अपूर्वकरणगुणस्थानमें तीनोंस्थान क्रमसे ९ का, ६ को आदिले तीन, २८-२४-२१ का
इसप्रकार है, और क्षपकके २१ का ही स्थान है ॥ ६५७ ॥
पंचादिपंचवंधो णवमगुणे दोण्णि एकमुदयो दु ।
अठ्ठचदुरेकवीसं तेरादीअट्ठयं सत्तं ॥ ६५८ ॥
पञ्चादिपञ्चबन्धो नवमगुणे द्वौ एक उदयस्तु ।
अष्टचतुरेकविंशं त्रयोदशायष्टकं सत्त्वम् ॥ ६५८ ॥
अर्थ-नवमे गुणस्थानमें ५ को आदिलेकर पांच बंधस्थान है । २ का १ का इसप्रकार
दो उदयस्थान है । और २८-२४-२१ का इसतरह तीन सत्त्वस्थान हैं। तथा क्षपकरे-
णीवालेके १३ के को आदिलेकर ८ सत्त्वस्थान है ॥ ६५८ ॥
लोहेकुदओ सुहुमे अडचउरिगिवीसमेक्कयं सत्तं ।
अडचउरिगिवीसंसा संते मोहस्स गुणठाणे ॥ ६५९ ॥
लोभैकोदयः सूक्ष्मे अष्टचतुरेकविशमेकं सत्त्वम् ।
अष्टचतुरेकविंशांशाः शान्ते मोहस्य गुणस्थानेः॥ ६५९ ॥
गोम्मटसारः। २०७ अर्थ-सूक्ष्मसांपरायगुणस्थानमें उदयस्थान एक सूक्ष्मलोभरूप ही है । और सत्त्वस्थान २८-२४-२१ के तीन तथा क्षपकश्रेणीवालेके १ प्रकृतिरूप एक ही है। उपशांतकषाय गुणस्थानमें सत्त्वस्थान ही २८-२४-२१ के तीन हैं। " यहां पर इतना और समझना कि दश गुणस्थानमें बंधस्थानका अभाव होनेसे दोस्थान कहे है, ग्यारवेंमें उदयका भी अभाव होनेसे एक ही स्थान कहा है। इससे आगे मोहका सत्त्व भी नहीं रहता" इसप्रकार मो- हनीयके बंधादि स्थान गुणस्थानोंमें जानना चाहिये ॥ ६५९ ॥ आगे मोहनीयके बंध उदय और सत्त्वस्थानोंके त्रिसंयोगमें विशेषता दिखाते है- बंधपदे उदयंसा उदयट्ठाणेवि बंध सत्तं च । सत्ते बंधुदयपदं इगिअधिकरणे दुगाधेजं ॥ ६६० ॥ वन्धपदे उदयांशा उदयस्थानेपि बन्धः सत्त्वं च । सत्त्वे बन्धोदयपदमेकाधिकरणे द्विकाधेयम् ।। ६६०॥ अर्थ-बन्धस्थानमें उदयस्थान और सत्त्वस्थान ये दो स्थान, उदयस्थानमें बंधस्थान और सत्त्वस्थान, तथा सत्त्वस्थानमें भी बंधस्थान और उदयस्थान होते है । इसप्रकार एक अधिकरणमें दो आधेय रहते है ऐसा समझना चाहिये ॥ ६६० ॥ उनमेंसे पहले बंधस्थानमें उदय सत्त्वस्थानोंको कहते है,- बावीसयादिवंधेसुदयंसा चदुतितिगिचऊपंच । तिसु इगि छद्दो अट्ठ य एकं पंचेच तिहाणे ॥६६१ ।। द्वाविंशकादिवन्धेषूदयांशाः चतुत्रित्रिकैकचतुःपञ्च । त्रिष्वेकः षद् द्वौ अष्ट च एकः पञ्चैव त्रिस्थाने ॥ ६६१ ॥ अर्थ-बाईसके स्थानको आदिलेकर बंधस्थानोंमें क्रमसे उदयस्थान और सत्त्वस्थान २२ के में ४ उदयस्थान और ३ सत्वस्थान है, दूसरे बंधस्थानमें ३ उदयस्थान १ सत्त्व- स्थान है, इससे आगेके तीन स्थानों में उदयस्थान चार चार और सत्वस्थान पांच पांच हैं, इसके बाद एक बंधस्थानमें उदयस्थान १ सत्वस्थान ६ है, उससे आगेके एक बंधस्थानमें उदयस्थान २ सत्त्वस्थान ८ है, उसके बाद तीन बंधस्थानोंमें उदयस्थान १ सत्त्वस्थान पांच पांच हैं" इसप्रकार कहे है ॥ ६६१ ॥ आगे उन्हीं उढयादिस्थानोंको दिखाते हैं।- दसयचऊ पढमतियं णवतियमडवीसयं णवादिचऊ । अडचदुतिदुइगिवीसं अडचदु पुर्व व सत्तं तु ॥ ६६२ ॥ दशकचतुष्कं प्रथमत्रिकं नवत्रिकमष्टाविंशकं नवादिचतुष्कम् । अष्टचतुहिकविंशमष्टचतुष्कं पूर्व व सत्त्वं तु ॥ ६६२ ॥ -- २०८ रायचन्द्रजैनशास्रमालायाम् । अर्थ-उन उदयादिस्थानों से बाईसके बंधस्थानमें १० के स्थानको आदिलेकर चार उदयस्थान है और २८ को आदिलेकर तीन सत्त्वस्थान है। २१ के बंधस्थानमें ९ के स्थानसे लेकर तीन उदयस्थान है और सत्त्वस्थान एक अट्ठाईसका ही है। १७ के बंध- स्थानमें ९ के स्थानसे लेकर ४ उदयस्थान है और सत्त्वस्थान २८-२४-२३-२२-२१: के पांच हैं । १३ के बंधस्थानमें ८ के स्थानसे लेकर ४ उदयस्थान है और सत्त्वस्थान पूर्व कहे हुए ५ है ॥ ६६२ ॥ सगचउ पुवं वंसा दुगमडचउरेक्कवीस तेरतियं । दुगमेकं च य सत्तं पुवं वा अत्थि पणगदुर्ग ॥ ६६३॥ सप्तचतुष्कं पूर्व वांशा द्विकमष्टचतुरेकविशं त्रयोदशत्रयम् । द्विकमेकं च च सत्त्वं पूर्व वा अस्ति पञ्चकद्विकम् ।। ६६३ ॥ अर्थ-९ के बंधस्थानमें ७ को आदिलेकर ४ उदयस्थान है और सत्त्वस्थान पूर्वक- थित ५ है । ५ के बंधस्थानमें २ का ही एक उदयस्थान है और सत्त्वस्थान उपशमकके २८-२४-२१ के तीन तथा क्षपकके १३ से लेकर तीन, इसप्रकार ६ है। ४ के बंधस्थानमें २ और १ प्रकृतिरूप दो उदयस्थान है और सत्त्वस्थान पूर्वोक्त कहे हुए ६ तथा पांच को आदिलेकर २ इसतरह ८ है ।। ६६३ ॥ तिसु एक्वेक उदओ अडचउरिगिवीससत्तसंजुत्तं । चदुतिदयं तिदयदुगं दो एक मोहणीयस्स ॥ ६६४ ॥ त्रिषु एकैक उदय अष्टचतुरेकविंशसत्वसंयुक्तम् । चतुत्रितयं त्रितयद्विकं वे एकं मोहनीयस्य ॥ ६६४ ।। अर्थ-३-२-१ प्रकृतिरूप तीन बंधस्थानोंमें उदयस्थान एक एक प्रकृतिरूप ही हैं और सत्त्वस्थान २८-२४-२१ के तीन स्थानों में तीनके बंध स्थानके ४-३ के स्थानोंको मिलानेसे ५ होते हैं २ के बंधस्थानके २-३ के स्थानोंको पूर्वोक्त तीन स्थानों में मिलानेसे ५ होते हैं, तथा १ के बंधस्थानके सत्त्वस्थान पूर्वोक्त तीन स्थानोंमें २-१ के स्थानको मिलानेसे ५ हो जाते हैं। भावार्थ-जिस जीवके जिस समयमें २२ का बंध है उसके उदय १० का अथवा ९ वा ८ का अथवा ७ का भी पाया जाता है और सत्त्व २८ का २७ का अथवा २६ का भी पाया जाता है इसतरह आगेका कथन भी ऐसा ही समझलेना ।। इसप्रकार मोहनीयके बंध स्थानोंको अधिकरण मानके उदय सत्त्व इन दोनोंके आधेयरूप भंग गुणस्थानोंकी विवक्षासे कहे गये हैं ॥ ६६४ ॥ आगे उदयस्थानको अधिकरण बनाके बंधस्थान-सत्त्वस्थानके आधेयरूप भंगको कहते . + - गोम्मटसारः। - २०९ दसयादिसु बंधंसा इगितिय तियछक्क चारिसत्तं च । पणपण तियपण दुगपण इगितिग दुगछचऊणवयं ॥ ६६५ ॥ दशकादिपु बन्धांशा एकत्रिकं त्रिकपर्टी चतुःसप्त च । पञ्चपञ्च त्रिलपञ्च द्विकपञ्च एकत्रिक द्विकषट् चतुर्नवकम् ।। ६६५ ॥ अर्थ-१० के स्थानको आदि लेकर उदयस्थानोंमें बंधस्थान और सत्त्वस्थान क्रमसे १-३, ३-६, ४-७, ५-५, ३-५, २-५, १-३, २-६, और ४-९ जानने वाहिये ॥ ६६५॥ अव उन्हींको दिखाते है- पढमं पढमतिचउपणसत्तरतिग चदुसु बंधयं कमसो। पढमतिछस्सगमडचउतिदुइगिवीसंसयं दोसु ॥ ६६६ ॥ प्रथमं प्रथमत्रिचतुःपञ्चसप्तदशत्रिकं चतुर्पु बन्धकं क्रमशः । प्रथमत्रिपट्सप्त अष्टचतुनिद्विकैकविशांशकं द्वयोः ॥ ६६६ ॥ अर्थ-पहले उदयस्थानम वंधस्थान पहला ( २२ का ) है, उसके वाद चारस्थानोंमें क्रमसे २२ के को आदि लेकर ३, २२ के को लेकर ४, २२ के को आदि लेकर ५, १७ के स्थानको आदि लेकर तीन बंधस्थान है । और सत्त्वस्थान पहले बंधस्थानमें २८ आदि तीन हैं, दूसरेमे पहले २८ वेंको आदिलेकर ६ है, तीसरेमें २८ वेंको आदि लेकर ७ है, और चौथा तथा पांचवा इन दो उदयस्थानोमें २८-२४-२३-२२-२१ के इसतरह पांच सत्त्वस्थान है ॥ ६६६ ॥ तेरटु पुव्वं वंसा णवमडचउरेकवीससत्तमदो। पणदुगमडचउरकावीसं तेरसतियं सत्तं ॥ ६६७ ॥ त्रयोदशद्विकं पूर्व वांशा नवममष्टचतुरेकविंशसत्त्वमतः । पञ्चद्विकमष्टचतुरेकविशं त्रयोदशत्रिक सत्त्वम् ॥ ६६७ ॥ अर्थ-पाचप्रकृतिके उदयस्थानमें १३ के स्थानको लेकर दो बंधस्थान है और सत्त्वस्थान पहलेकी तरह ५ है, चारके उदयस्थानमें ९ का बंधस्थान है और २८-२४ २१ के तीन सत्त्वस्थान है, उसके बाद २ के उदयस्थानमे ५ के स्थानको लेकर दो बंधस्थान है और २८-२४-२१-१३ के को आदि लेकर तीन, इसतरह ६ सत्त्व- स्थान है ॥ ६६७ ॥ चरिमे चदुतिदुगेकं अट्ठयचदुरेकसंजुदं वीसं । एक्कारादीसव्वं कमेण ते मोहणीयस्स ॥६६८॥ चरमे चतुस्लिद्विकैकमष्टकचतुरेकसंयुतं विंशम् । एकादशादिसर्व क्रमेण तानि मोहनीयस्य ॥ ६६८ ॥ २७ . - - L २१० रायचन्द्रजैनशासमालायाम् । अर्थ-अंतके १ प्रकृतिवाले उदयस्थानमें ४-३-२-१ के चार बंध हैं और २८. २४-२१- और ११ के स्थानसे लेकर सव ६ स्थान, इसप्रकार ९ सत्त्वस्थान है। इसरीतिसे ये सब मोहनीयके स्थान क्रमसे जानने चाहिये ।। ६६८ ॥ आगे सत्त्वको अधिकरण मानके और बंधउदयको आधेयरूप समझकर भंगोंको कहते हैं- सत्तपदे वंधुदया दसणव इगिति दुसु अडड तिपण दुसु । अडसगदुगि दुसु विविगिगि दुगि तिसुइगिसुण्णमेकं च॥६६९॥ सत्त्वपदे बन्धोदया दशनव एकत्रिक द्वयोः अष्टाष्ट त्रिपश्च द्वयोः । अष्टसप्त ध्येकं द्वयोः द्विद्विकमेकैकं दयेकं त्रिपु एकशून्यमेकं च ॥ ६६९ ॥ अर्थ–२८ के स्थानको आदिलेकर सत्त्वस्थानों में जो क्रमसे बंधउदयस्थान कहे हैं वे पहले स्थानमें १०-९, उसके बाद दोस्थानोंमें १-३, उसके आगेके स्थानमें ८-८, उसके बाद दो स्थानों में ३-५, उससे आगेके स्थानमें ८-७, उसके बाद दो स्थानोंमें २-१, उसके आगे २-२, उसके बाद १-१, उसके बाद तीनस्थानोंमें २-१ और एक सत्त्वस्थानमें १ अथवा शून्य-१ स्थान है ।। ६६९ ॥ अब उन्हीं स्थानोंको दिखाते है- सव्वं सयलं पढमं दसतिय दुसु सत्तरादियं सव्वं । णवयप्पहुदीसयलं सत्तरति णवादिपण दुपदे ॥ ६७० ॥ सत्तरसादि अडादीसव्वं पण चारि दोणि दुसु तत्तो। पंचचउक्क दुगेकं चदुरिगि चदुतिणि एकं च ॥ ६७१ ॥ तत्तो तियद्गमेकं दुप्पयडीएकमेकठाणं च । इगिणभबंधो चरिमे एउदओ मोहणीयस्स ॥६७२॥ विसेसयं । सर्व सकलं प्रथमं दशत्रिक द्वयोः सप्तदशादिकं सर्वम् । नवकप्रभृति सकलं सप्तदशत्रिकं नवादिपञ्च द्विपदे ॥ ६७० ॥ सप्तदशादि अष्टादि सर्व पञ्च चत्वारि द्वे द्वयोः ततः । पञ्चचतुष्कं द्विकैकं चतुरेकं चतुस्त्रीणि एकं च ॥ ६७१ ॥ ततः त्रिकद्विकमेकं द्विप्रकृत्येकमेकस्थानं च । एकनभोवन्धो चरमे एकोदयो मोहनीयस्य ॥ ६७२ ।। विशेषकम् । अर्थ-मोहनीयके सत्त्वस्थानोंमेंसे पहले २८ के सत्त्वस्थानमें बंधस्थान और उदय. स्थान क्रमसे २२ को लेकर सब (१०)-१० को आदि लेकर सब (९), उसके बाद २७ और २६ के दोस्थानों में २२ का-१० को लेकर तीन, २४ के सत्त्वस्थानमें १७ को लेकर सब (८)-९ को लेकर सबस्थान, उसके बाद २३ और २२ के दो सत्त्व- । - 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गोम्मटसारः। २११ स्थानोंमें १७ को लेकर तीन-९ को लेकर पांच है । २१ के सत्त्वस्थानमें बंध उदयस्थान १७ को लेकर सब-८ कोआदि लेकर सब, उसके बाद १३ और १२ के दो सत्त्वस्थानों में पांच चार-२ का स्थान, उसके बाद ११ के स्थानमें ५और चारका-२ और १ का,५ के सत्त्व- स्थानमें ४ का-१ का, ४ के सत्त्वस्थानमें ४ और ३ के-१ का है । उसके बाद ३ के सत्त्वस्थानमें बंध उदयस्थान ३ और २ के-१ का, २ के सत्त्वस्थानमें २ और १ के -१ का और १ के सत्त्वस्थानमें बंधस्थान १ का अथवा शून्य तथा उदयस्थान १ का है ॥ ६७० । ६७१ । ६७२ ॥ आगे मोहनीयके बंध उदय और सत्त्वमें दो आधार एक आधेयकर भंग कहते हैं- बंधुदये सत्तपदं बंधंसे णेयमुदयठाणं च । उदयंसे बंधपदं दुट्टाणाधारमेकमाघेजं ॥ ६७३ ॥ पन्धोदये सत्त्वं बन्धांशे ज्ञेयमुदयस्थानं च । उदयांशे बन्धपदं द्विस्थानाधारमेकमाधेयम् ॥ ६७३ ।। अर्थ-बंध उदयके स्थानों में सत्त्वस्थान, बंधसत्त्वस्थानोंमें उदयस्थान और उदय सत्त्वस्थानों में बंधस्थान इसप्रकार दोस्थान आधार तथा एकस्थान आधेयको लेकर तीन- प्रकार भंग जानना चाहिये ॥ ६७३ ॥ अब उनमेंसे पहले प्रकारको ६ गाथाओंसे कहते है- वावीसेण णिरुद्धे दसचउरुदये दसादिठाणतिये । अट्ठावीसति सत्तं सत्तुदये अट्ठवीसेव ॥६७४ ॥ द्वाविशेन निरुद्ध दशचतुष्कोदये दशादिस्थानत्रये । अष्टाविंशत्रिकं सत्त्वं सप्तोदये अष्टविंशमेव ॥ ६७४ ॥ अर्थ-२२ के बंधसहित जीवके १० के स्थानको आदि ले चारउदयस्थानोंमेंसे दशसे लेकर तीनस्थानोंमें तो २८ के को आदिलेकर तीन सत्त्वस्थान है, और ७ के उदयस्था- नमें २८ के स्थानका ही सत्त्व है ॥ ६७४ ॥ इगिवीसेण णिरुद्धे णवयतिये सत्तमट्टवीसेव । सत्तरसे णवचदुरे अडचउतिदुगेकवीसंसा ॥ ६७५ ॥ एकविंशेन निरुद्ध नवकये सत्त्वमष्टविंशमेव । सप्तदशे नवचतुष्के अष्टचतुनिद्विकैकविंशांशाः ॥ ६७५ ॥ अर्थ-२१ के बंधसहित जीवके ९ को आदि लेकर ३ के उदय होनेपर २८ का ही सत्त्वस्थान हैं, और १७ के बंधसहित जीवके ९ आदिलेकर ४ के उदय होनेपर २८. २४-२३-२२-२१ के सत्त्वस्थान है ॥ ६७५ ॥ यहांपर कुछ विशेषता कहते है,- 1 २१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । इगिवीसं ण हि पढमे चरिमे तिदुवीसयं ण तेरणवे। अडचउसगचउरुदये सत्तं सत्तरसयं व हवे ॥ ६७६ ॥ एकविंशं न हि प्रथम चरमे त्रिद्विविंशकं न त्रयोदशनवके । अष्टचतुःसप्तचतुरुदये सत्त्वं सप्तदशकं व भवेत् ॥ ६७६ ॥ अर्थ-पहले (९ के ) का उदय होनेपर २१ का सत्त्व नहीं होता है और ६ के उदय होनेपर २३ तथा २२ का सत्त्व नही होता, और १३ के बंधसहित ८ के स्थान- को आदि लेकर चार उदयस्थानोंके होनेपर अथवा ९ के बंघसहित ७ को आदि लेकर ४ चार उदयस्थानोंके होनेसे सत्त्वस्थान १७ के बंधसहितस्थानमें जैसे कहे हैं उसतरह जानने चाहिये ॥ ६७६ ॥ और भी विशेषता कहते है:- णवरि य अपुव्वणवगे छादितियुदयेवि णत्थि तिदुवीसा । पणवंधे दोउदये अडचउरिगिवीसतेरसादितियं ॥ ६७७ ॥ नवरि च अपूर्वनवके षडादित्रयोदयेपि नास्ति त्रिद्विविंशम् । पञ्चवन्धे द्विकोदये अष्टचतुरेकविंशत्रयोदशादित्रयम् ॥ ६७७ ॥ अर्थ-इतनी विशेषता है कि अपूर्वकरणगुणस्थानमें ९ के बंधसहित ६ के स्थानको आदिलेकर ३ के उदय होनेपर भी २३ और २२ का सत्त्व नही होता है, और पांचके बंधसहित दोके उदय होते समय २८-२४-२१-और १३ को आदि लेकर तीन सत्त्वस्थान है ।। ६७७॥ चदुबंधे दोउदये सत्तं पुव्वं व तेण एकुदये। अडचउरेक्कावीसा एयारतिगं च सत्ताणि ॥ ६७८ ॥ चतुर्वन्धे द्विकोदये सत्त्वं पूर्व व तेन एकोदये। अष्टचतुरेकविंशानि एकादशत्रिकं च सत्त्वानि ॥ ६७८ ॥ अर्थ-४ के बंधसहित दोके उदयहोनेपर पहलेकी तरह (५ के बंधसहित ) कहा हुआ सत्त्व जानना चाहिये, उसी ४ के बंधसहित १ के उदय होनेपर २८-२४-२१' और ११ के को आदिले ३ सत्त्वस्थान जानने योग्य है ॥ ६७८ ॥ तिदुइगिबंधेकुदये चदुतियठाणेण तिदुगठाणेण । दुगिठाणेण य सहिता अडचउरिगिवीसया सत्ता ॥ ६७९ ॥ त्रिद्विकैकबन्धे एकोये चतुस्त्रयस्थानेन त्रिद्विकस्थानेन । द्विकैकस्थानेन च सहितानि अष्टचतुरेकविंशकानि सत्त्वानि ॥ ६७९ ॥ अर्थ-३-२-१ के बंधसहित एकके उदय होनेसे २८-२४-२१ के तीन सत्त्व स्थानों में क्रमसे १ और ३ के दो सत्त्वस्थानमिलानेसे, ३ और २ के दो सत्त्वस्थानमि- . -- गोम्मटसारः। २१३ लानेसे, २ और १ के दो सत्त्वस्थानमिलानेसे सब जगह पांच पांच सत्त्वस्थान होते हैं ॥ ६७९॥ आगे बंध-सत्त्वको आधारकर और उदयको आधेय समझकर ५ गाथाओंसे भंग कहते है। बावीसे अडवीसे दसचउरुदओ अणे ण सगवीसे । छन्वीसे दसयतियं इगिअडवीसे दुणवयतियं ॥ ६८०॥ द्वाविंशतौ अष्टविंशतौ दशचतुष्कोदय अने न सप्तविंशतौ । पद्धिशतौ दशकत्रयमेकाष्टविंशतौ तु नवकत्रयम् ॥ ६८० ॥ अर्थ-२२के बंधसहित चारगतिके मिथ्यादृष्टि जीवोंके २८ का सत्त्व होनेपर १० के को आदि लेकर चार उदयस्थान है, क्योंकि वहां अनंतानुबंधी रहित भी उदयस्था- नोंका संभव है; २७-२६ का सत्त्व होनेपर १० को आदि तीन उदयस्थान होतेहैं, २१ के बंधसहित सासादन गुणस्थानवालोंके २८ का सत्त्व होनेपर ९ को आदि लेकर तीनस्थानोंका उदय होता है ॥ ६८० ॥ सत्तरसे अडचदुवीसे णवयचदुरुदयमिगिवीसे । णो पढमुदओ एवं तिदुवीसे गंतिमस्सुदओ ॥ ६८१ ॥ सप्तदश अष्टचतुर्विशे नवकचतुष्कोदय एकविंशे । नो प्रथमोदय एवं त्रिद्विविंशे नान्तिमस्योदयः ॥ ६८१ ॥ अर्थ-१७ के बंधसहित चारोंगतिके जीवोंके २८-२४ का सत्त्वहोनेसे ९ को आदि लेकर ४ उदयस्थान है, २१ का सत्त्व होनेपर पहला (९ का) उदयस्थान नहीं शेष ८ को आदि लेकर ३ ही उदयस्थान है, इसीप्रकार २३-२२ का सत्त्व स्थान होनेपर अंतका ( ६ का ) स्थान नही है इसलिये यहांपर ९ को आदि लेकर ३ ही उदयस्थान हैं ॥ ६८१ ॥ तेरणवे पुर्वसे अडादिचउ सगचउण्हमुदयाणं । सत्तरसं व वियारो पणगुवसंते सगेसु दो उदया ॥ ६८२ ॥ त्रयोदशनवमे पूर्वीशे अष्टादिचतुष्कं सप्तचतुष्कमुदयानाम् । सप्तदशं व विचारः पञ्चकोपशान्ते स्वकेषु द्वौ उदयौ ॥ ६८२ ।। अर्थ-१३ के बंधसहित तिर्यचमनुष्यदेशसयतके और ९ के बंधसहित प्रमत्त दोनों श्रेणियोंवाले अपूर्वकरणके पूर्ववत् १७ के बंधकी तरह सत्त्व होनेपर क्रमसे ८ केको आदि लेकर ४ उदयस्थान और ७ के को आदि लेकर चार उदयस्थान होते है। इसमें विशेष वातका विचार १७ के बंधकी तरह समझलेना । तथा उपशांतकषाय गुणस्थानमें , - + 1 - २१४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २८ आदिके सत्त्व होनेपर ५ के बंधसहित २ का उदय है और ५-४ के बंधसहितभी २ का उदय है ।। ६८२ ॥ यही कहते हैं- तेणेवं तेरतिये चदुबंधे पुषसत्तगेसु तहा। तेणुवसंतंसेयारतिए एको हवे उदओ ॥ ६८३ ॥ तेनैवं त्रयोदशत्रये चतुर्वन्धे पूर्वसत्त्वकेषु तथा । तेनोपशान्तांशे एकादशत्रये एको भवेत् उदयः ॥ ६८३ ॥ अर्थ-उन ५ के बंधसहित क्षपक अनिवृत्तिकरणमें पूर्ववत् १३ आदिक तीनके सत्त्व होनेपर तथा ४ के बंधसहित २८ के को आदिलेकर ३ का अथवा १३ को आदि लेकर ३ का सत्त्व होनेपर २ का उदय होता है । और ४ के बंधसहित उपशांतकषायमें पूर्वोक्त २८ को आदिलेकर ३ का सत्त्व होनेपर तथा ११ को आदिलेकर तीनका सत्त्व- होनेपर १ का ही उदय है ॥ ६८३ ॥ तिदुइगिबंधे अडचउरिगिवीसे चदुतिएण ति दुगेण । दुगिसत्तेण य सहिदे कमेण एक्को हवे उदओ ६८४ ॥ त्रिद्विकेबन्धे अष्टचतुरेकविंशे चतुत्रिकेण त्रिद्विकेन । द्वथेकसत्त्वेन च सहिते क्रमेण एको भवेत् उदयः ॥ ६८४ ॥ अर्थ-अनिवृत्तिकरणमें ३-२-१ के बंधसहित क्रमसे २८-२४-२१ के सत्त्व होनेपर अथवा ४-३ का सत्त्व होनेसे वा ३-२ का सत्त्व होनेसे वा २-१ सत्त्व होनेसे एक एकका ही उदय होता है ॥ ६८४ ॥ यहां नवक समयप्रबद्धकी विवक्षा और अविवक्षासे दो प्रकारके सत्त्व कहेगये है। आगे उदय-सत्त्व आधार और बंधको आधेयकरके ७ गाथाओंसे कहते है- दसगुदये अडवीसतिसत्ते बावीसबंध णवअहे। अडवीसे वावीसतिचउबंधो सत्तवीसद्गे ॥ ६८५ ॥ बाबीसबंध चदुतिदुवीसंसे सत्तरसयदद्गवंधो । अड्डदये इगिवीसे सत्तरबंधं विसेसं तु ॥ ६८६ ॥ जुम्मं । दशकोदये अष्टविंशत्रिसत्त्वे द्वाविशबन्धः नवाष्टके । अष्टविशतौ द्वाविंशतित्रिचतुर्वन्धः सप्तविंशद्विके ।। ६८५ ॥ द्वाविंशवन्धः चतुखिद्विविशांशे सप्तदशायतद्विकबन्धः । अष्टोदये एकविशे सप्तदशवन्धा विशेषस्तु ।। ६८६ ॥ युग्मम् । . अर्थ-१० के उदयसहित २८ को आदिलेकर ३ का सत्त्व होनेपर २२ का ही बंध होता है, ९ के उदयसहित असंयतपर्यंत वा ८ के उदयसहित देशसंयतगुणस्थानतक 1 -- -
गोम्मटसारः।
२१५
२८ का सत्त्व होनेपर क्रमसे २२ को आदिलेकर ३ और ४ का बंधस्थान है तथा
उन्हींमें २७ का वा २६ का उदय होनेपर २२ का बंध होता है । और पूर्वोक्त उदय-
सहित मिश्रगुणस्थानमें २४ का सत्त्व होनेपर तथा असंयतगुणस्थानमें २४-२३-२१
इन तीन सत्त्वोंके होनेपर १७ का बंध है । देशसंयतगुणस्थानमें ८ के उदयसहित २४
को आदिलेकर तीनसत्त्व होनेपर १३ का बंध है। इतना विशेष है कि २१ के सत्त्व
होनेपर क्षायिक सम्यग्दृष्टि असंयतके १७ का बंध होता है ॥ ६८५/६८६ ॥
सत्त्दये अडवीसे वन्धो वावीसपंचयं तेण ।
चउवीसतिगे अयदतिवंधो इगिवीसगयददुगवंधो ॥ ६८७ ॥
सप्तोदये अष्टविंशे बन्धो द्वाविंशपञ्चकं तेन ।
चतुर्विशत्रिके अयतत्रिबन्ध एकविंशके अयतद्विकबन्धः ॥ ६८७ ।।
अर्थ-७ के उदयसहित २८ का सत्त्वहोनेपर २२ को आदिलेकर ५ बंधस्थान हैं।
पूर्वोक्त उदयसहित २४ को आदि लेकर ३ सत्त्व होनेपर असंयतगुणस्थानमें १७ को
आदि लेकर ३ बंध होते हैं और पूर्वोक्त उदय सहित २१ का सत्त्व होनेपर असंयतयु-
गलमें कथित १७-१३ इन दोका बंध होता है ॥ ६८७ ॥
छप्पणउदये उवसंतसे अयदतिगदेसद्गबंधो।
तेण तिदोवीसंसे देसदुणवबंधयं होदि ॥ ६८८ ॥
पट्पञ्चोदये उपशान्तांगे अयतत्रिकदेशद्विकबन्धः ।
तेन त्रिद्विविंशांशे देशद्विनवबन्धकं भवति ॥ ६८८ ॥
अर्थ-६ और ५ के उदयसहित उपशांतकषायमें कहे हुए तीन सत्त्वस्थान होनेपर
क्रमसे असंयतयुगलकथित १७ को आदिलेकर ३ तथा देशसंयतयुगलकथित १३
को आदि लेकर दो बंध स्थान है । और पूर्वोक्त ६-५ के उदयसहित २३-२२
के सत्त्व होनेपर देशसंयतयुगलकथित १३ का बंधस्थान तथा ९ का बंधस्थान होता
है ॥ ६८८॥
चउरुदयुवसंतसे णवबंधो दोण्णिउदयपुवंसे ।
तेरसतियसत्तेवि य पण चउ ठाणाणि बंधस्स ॥ ६८९ ॥
चतुरुदयोपशान्तांशे नवबन्धो द्विकोदयपूर्वाशे ।
त्रयोदशत्रयसत्त्वेपि च पञ्चचतुःस्थानानि बन्धस्य ॥ ६८९ ।।
अर्थ-४ के उदयसहित उपशांतकषायोक्त २८-२४-२१ के सत्त्व होनेपर ९ का
बंध पाया जाता है । २ के उदयसहित पूर्ववत् ३ सत्त्व होनेपर तथा १३ को आदि
लेकर तीनसत्त्व होनेपर भी ५ का अथवा ४ का बंधस्थान है ॥ ६८९ ॥
. २१६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । एकुदयुवसंतसे बंधो चदुरादिचारि तेणेव । एयारदु चदुवंधो चदुरंसे चदुतियं वंधो ॥ ६९० ॥ एकोदयोपशान्तांशे वन्धः चतुरादिचत्वारः तेनव । एकादशद्विके चतुर्वन्धः चतुरंशे चतुस्त्रिको बन्धः ॥ ६९० ॥ अर्थ-एकके उदयसहित उपशांतकषायोक्त २८-२४-२१ के सत्त्व होनेपर ४ के को आदिलेकर चार बंधस्थान हैं । एकके ही उदय सहित ११-५ ये दो सत्त्व होनेपर ४ का बंधस्थान है । और 8 के सत्त्व होनेपर ४ वा ३ का बंधस्थान है ॥ ६९० ॥ तेण तिये तिदुवंधो दुगसत्ते दोण्णि एक्कयं बंधो। एकंसे इगिवंधो गयणं वा मोहणीयस्स ।।६९१ ॥ तेन त्रये त्रिद्विबन्धो द्विकसत्त्वे द्वौ एको वन्धः । एकांशे एकबन्धो गगनं वा मोहनीयस्य ॥ ६९१ ॥ अर्थ-उसी एकके उदयसहित अनिवृत्तिकरणोक्त ३ का सत्त्व होनेपर ३ का वा २ का बंध होता है । २ का सत्त्व होनेपर २ का वा १ का बंध होता है। और मोह- नीयके १ के स्थानका सत्त्व होनेपर १ हीका बंध स्थान होता है अथवा गगन अर्थात् बंधाभाव होता है ॥ ६९१ ॥ इसप्रकार मोहनीयके त्रिसंयोगी भंग कहे। आगे नामकर्मके बंधादिस्थानों के त्रिसंयोग कहते है- णामस्स य वंधोदयसत्तट्ठाणाण सवभंगा हु। पत्तेउत्तं व हवे तियसंजोगेवि सव्वत्थ ॥६९२ ॥ नाम्नश्च बन्धोदयसत्त्वस्थानानां सर्वभगा हि । प्रत्येकोक्तं व भवेयुः त्रिकसंयोगेपि सर्वत्र ॥ ६९२ ।। अर्थ-नामकर्मके बंध-उदय-सत्त्वस्थानोंके सब भंग ( भेद ) जैसे जुदे २ कथनमें पहले कहे थे उसीतरह त्रिसंयोगमें भी सब जगह भंग होते है ऐसा प्रगट जानना ॥ ६९२ ॥ छण्णवछत्तियसगइगि दुगतिगदुग तिण्णिअट्टचत्तारि । दुगद्गचदु दुगपणचदु चदुरेयचदू पणेयचदू ॥ ६९३ ।। एगेगमट्ट एगेगमट्ट चदुमह केवलिजिणाणं । एगचदुरेगचदुरो दोचदु दोछक्क बंधउदयंसा ॥६९४ ॥ जुम्म। पट्नवषट् त्रिकसप्तकं विकत्रिकद्विकं त्रिकाष्टचत्वारि । द्विकद्विकचतुष्कं द्विकपश्चचतुष्कं चतुरेकचतुष्कं पञ्चैकचतुष्कम् ॥ ६९३॥ एकैकाष्ट एकैकाष्ट चतुरष्ट केवलिजिनानाम् । एकचतुष्कमेकचतुष्क द्विचतुष्कं द्विषटुं बन्धोदयांशाः ॥ ६९४ ।। युग्मम् ।
गोम्मटसारः। २१७ अर्थ-नामकर्मके बंधस्थान-उदयस्थान और सत्त्वस्थान मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानों में कमसे ६-९-६, ३-७-१,२-३-२, ३-८-४, २-२-४, २-५-४, ४-१-४, ५-१-४, १-१-८, १-१-८, इसके बाद वधका अभावहोनेसे १-४,१-४, २-४, और अयोगकेवलीके २-६ है ॥ ६९३।६९४ ॥ णामस्स य बंधोदयसत्ताणि गुणं पडुच उत्ताणि । पत्तेयादो सच्चं भणिदव्वं अत्थजुत्तीए ॥ ६९५ ॥ नाम्नश्च घन्धोदयमत्त्वानि गुणं प्रतीत्य उक्तानि । प्रत्येकात् सर्व भणितव्यमर्थयुक्त्या ।। ६९५ ।। अर्थ-नामकर्मके बंध-उदय-सत्त्वस्थान जो गुणस्थानोंको लेकर कहे गये है उन सबको अर्थकी युक्तिसे जुदे २ कहते है ॥ ६९५ ॥ तेवीसादी बंधा इगिचीसादीणि उदयठाणाणि । चाणउदादी सत्तं बंधा पुण अट्टवीसतियं ॥ ६९६ ॥ इगियीसादीएकत्तीसंता सत्तअट्टवीसूणा । उदया सत्तं णउदी बंधा पुण अहवीसदुर्ग ।। ६९७ ॥ एगुणतीसत्तिदयं उदयं वाणउदिणउदियं सत्तं । अयदे बंधट्टाणं अट्ठावीसत्तियं होदि ॥ ६९८ ।। उदया चउवीसूणा इगिवीसप्पहुदिएकतीसंता। सत्तं पढमचउर्फ अपुचकरणोत्ति णायव्वं ॥ ६९९ ॥ कलावयं। त्रयोविशादयो बन्धा एकविंशादीनि उदयस्थानानि । द्वानवत्यादि सत्त्वं वन्धाः पुनः अष्टविंशत्रयम् ॥ ६९६ ॥ एकविंशाधेकत्रिशदन्ता सप्ताष्टविंशोनाः । उदयाः सत्त्वं नवतिः बन्धाः पुनः अष्टविशद्विकम् ।। ६९७ ।। एकोनत्रिशत्रितयं उदयः द्वानवतिनवतिकं सत्त्वम् । अयते वन्धस्थानमष्टाविंशत्रय भवति ॥ ६९८ ।। उदयाः चतुर्विशोना एकविशप्रभृत्येकत्रिशदन्ताः । सत्त्वं प्रथमचतुष्कमपूर्वकरण इति ज्ञातव्यम् ॥ ६९९ ॥ कलापकम् । अर्थ-गुणस्थानों से मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें २३ को आदि लेकर ६ बंधस्थान है, २१ को आदि लेकर ९ उदयस्थान है, ९२ के स्थानको आदि लेकर ६ सत्वस्थान है। उसके बाद दूसरे गुणस्थानमें बंधस्थान २८ के को आदि लेकर ३ हैं, २७-२८ के स्थान- कर रहित २१ को आदि लेकर ३१ के स्थानपर्यंत ७ उदयस्थान है, सत्त्वस्थान ९० का ही है । उसके बाद तीसरे गुणस्थानमें बंधस्थान २८ को आदि लेकर दो है, २९ को - 1 २१८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आदि लेकर ३ उदयस्थान हैं, ९२-९० के दो सत्त्वस्थान हैं । तथा असंयत गुण- स्थानमें बंधस्थान २८ को आदि लेकर ३ है, उदयस्थान २४ के विना २१ के को आदि लेकर ३१ के स्थानपर्यंत ८ हैं, सत्त्वस्थान ९३ के को आदि लेकर ४ हैं। ये चारोंही सत्त्वस्थान अपूर्वकरण गुणस्थानतक जानने चाहिये । ६९६।६९७६९८१६९९|| अडवीसदुगं बंधो देसे पमदे य तीसद्गमुदओ। पणवीससत्तवीसप्पहुदीचत्तारि ठाणाणि ॥ ७०० ॥ अष्टविशद्विकं बन्धो देशे प्रमत्ते च त्रिशद्विकमुदयः । पञ्चविशसप्तविशप्रभृतिचत्वारि स्थानानि ।। ७०० ॥ अर्थ-देशसंयतगुणस्थानमें २८ को आदि लेकर २ बंधस्थान है, ३० को आदि लेकर २ उदयस्थान हैं, सत्त्वस्थान पूर्ववत् ४ हैं । प्रमत्तमें देशसंयतकी तरह २ बंध. स्थान है, २५ का स्थान तथा २७ के को आदि लेकर ४ स्थान इसतरह ५ उदयस्थान है, सत्त्वस्थान पूर्ववत् ४ हैं ॥ ७०० ॥ अपमत्ते य अपुव्वे अडवीसादीण बंधमुदओ दु । तीसमणियट्टिसुहुमे जसकित्ती एक्कयं बंधो ॥ ७०१॥ उदओ तीसं सत्तं पढमचउक्कं च सीदिचउ संते । खीणे उदओ तीसं पढमचऊ सीदिचउ सत्तं ॥७०२॥जुम्मं । अप्रमत्ते च अपूर्वे अष्टाविशादीनां बन्ध उदयस्तु । त्रिशदनिवृत्तिसूक्ष्मयोः यशस्कीतिरेका वन्धः ।। ७०१॥ उदयः त्रिंशत् सत्त्वं प्रथमचतुष्कं च अशीतिचतुष्कं शान्ते । क्षीणे उदयः त्रिशत् प्रथमचतुष्कमशीतिचतुष्कं सत्त्वम् ।। ७०२।। युग्मम् । अर्थ-अप्रमत्तगुणस्थान और अपूर्वकरण गुणस्थानमें २८ को आदि लेकर ४ तथा ५ बंधस्थान क्रमसे होते है, उदयस्थान ३० का ही है, सत्त्वस्थान पूर्ववत् ४ हैं । अनि- वृत्तिकरण और सूक्ष्मसापरायगुणस्थानमें एक यशस्कीति नामकर्मका ही बंधस्थान,है, उदय- स्थान ३० का ही है, सत्त्वस्थान पहले ( ९३ के ) स्थानको आदि ले ४ और ८० को आदि लेकर ४ इसतरह ८ है। उपशांतकषाय और क्षीणकपाय गुणस्थानमें उदयस्थान ३० का है, सत्त्वस्थान २३ के को आदि लेकर ४ तथा ८० को आदि लेकर ४ क्रमसे जानना चाहिये ॥ ७०१॥ ७०२ ॥ जोगिम्मि अजोगिम्मि य तीसिगितीसं णवठ्ठयं उदओ। सीदादिचऊंछकं कमसो सत्तं समुद्दिलं ॥ ७०३॥ योगिनि अयोगिनि च त्रिशदेकत्रिशत् नवाष्टकमुदयः । अशीत्यादिचतुःषटुं क्रमशः सत्वं समुद्दिष्टम् ।। ७०३ ॥
गोम्मटसारः। २१९ अर्थ-सयोगकेवली और अयोगकेवलीके क्रमसे उदयस्थान ३०-३१ के दो, ९-८ के दो, सत्त्वस्थान ८० के आदि लेकर ४ तथा ६ जानने । 'इन चार गुणस्थानों में नामकर्मके बंधाभावसे दो स्थानही कहे हैं। इसप्रकार गुणस्थानोंमें बंधादि स्थान कहे गये है ॥ ७०३ ॥ आगे चौदह जीव समासोंमें इन स्थानोंको दिखलाते है- पणदोपणगं पणचदुपणगं बंधुदयसत्त पणगं च । पणछक्कपणगछछक्कपणगमट्ठमेयारं ॥ ७०४ ॥ सत्तेव अपजत्ता सामी सुहुमो य वादरो चेव । वियलिंदिया यतिविहा होन्ति असण्णी कमा सण्णी ॥७०५॥ जुम्मम् । पञ्चद्विपञ्चकं पञ्चचतुःपञ्चकं बन्धोदयसत्त्वं पञ्चकं च । पञ्चपटूपञ्चकं पट्पटपञ्चकमष्टाष्टैकादश ॥ ७०४ ॥ सप्तैव अपर्याप्ताः स्वामिनः सूक्ष्मश्च बादरश्चैव । विकलेन्द्रियाश्च त्रिविधा भवन्ति असंज्ञिनः क्रमात् संज्ञिनः॥७०५॥ युग्मम् । अर्थ-उन १४ जीवसमासों ( भेदों) मेंसे क्रमसे अपर्याप्तक ७ जीवसमासोंमें बंध- उदयसत्वस्थान ५-२-२-५ है । सब सूक्ष्म जीवोंके ५-४-५ है । सब बादर एकेंद्री जीवोंके ५-५-५ है। विकलत्रय अर्थात् दो इंद्री तेइंद्री चौइंद्रीके ५-६-५ स्थान है। असंज्ञी पंचेद्रीके ६-६-५ है । और ८-८-११ बंधादिस्थानोंके संज्ञीजीव खामी होते हैं । ७०४१७०५ ॥ आगे उन्हीं स्थानोंको कहते है। बंधा तियपणछण्णववीसत्तीसं अपुण्णगे उदओ। इगिचउवीसं इगिछवीसं थावरतसे कमसो ॥ ७०६ ॥ बाणउदीणउदिचऊ सत्तं एमेव बंधयं अंसा। सुहुमिदरे वियलतिये उदया इगिवीसयादिचउपणयं ॥७०७॥ इगिछक्कडणववीसत्तीसिगितीसं च वियलठाणं वा । बंधतियं सण्णिदरे भेदो बंधदि हु अडवीसं ॥७०८॥ विसेसयं । बन्धाः त्रिकपञ्चषण्णवविंशत्रिंशदपूर्णके उदयः । एकचतुर्विंशं एकषड्विंशं स्थावरत्रसे क्रमशः ।। ७०६॥ द्वानवतिनवतिचतुष्कं सत्त्वं एवमेव बन्धकः अंशाः। सूक्ष्मतरयोः विकलत्रये उदया एकविंशकादिचतुःपञ्चकम् ॥ ७०७ ॥ एकषडाष्टनवविंशत्रिंशदेकत्रिंशञ्च विकलस्थानं वा । बन्धनयं संज्ञीतरस्मिन् भेदो बध्नाति हि अष्टविंशम् ॥ ७०८ ॥ विशेषकम् ।
+ - r . , २२० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-अपर्याप्तक ७ जीवसमासोंमें बंधस्थान २३-२५-२६-२९:३०के पांच हैं, उदयस्थान क्रमसे स्थावर लब्ध्यपर्याप्तकमें २१-२४के दो है और त्रस · लब्ध्यपर्याप्तकके २१-२६ के दो हैं, सत्त्वस्थान ९२ का और ९० को आदि लेकर चार इसतरह ५ हैं। तथा सूक्ष्म-बादर और विकलत्रय इनमें बंधस्थान और सत्त्वस्थान इन अपर्याप्तकोंकी तरह जानना, उदयस्थान सूक्ष्ममें २१ को आदि लेकर ४ और वादरमें ५ जानना, विकल. त्रयमें २१-२६-२७-२८-२९-३०-३१ के छह है । असेंनी पंचेंद्रीमें बंधादि तीनखान विकलत्रयकी तरह समझ लेना, परंतु इतनी विशेषता है कि यह २८ के स्थानको भी बांधता है । इसकारण बंधस्थान ६ होजाते है ।। ७०६७०७१७०८ ॥ सण्णिम्मि सव्ववंधो इगिवीसप्पहुदिएकतीसंता। चउवीसूणा उदओ दसणवपरिहीणसव्वयं सत्तं ॥ ७.९॥ संज्ञिनि सर्ववन्ध एकविंशप्रभृत्येकत्रिंशदन्ताः । चतुर्विशोना उदयो दशनवपरिहीनसर्वकं सत्त्वम् ।। ७०९।। अर्थ-संज्ञीपंचेंद्रीके बंधस्थान सब (८) है, उदयस्थान २४ को विना २१ को आदि लेकर ३१ तक आठ है, और सत्त्वस्थान १०-९ के विना सब ११ हैं ॥७०९॥ इसप्रकार जीवसमासोंमें नामकर्मके बंधादिस्थान कहे है । आगे चौदहमार्गणाओंमें नामके बन्धादि स्थानोंको कहनेवाले पहले गतिमार्गणामें कहते हैं।- दोछक्कटचउकं णिरयादिसु णामवंधठाणाणि। पणणवएगारपणयं तिपंचवारसचउक्कं च ॥७१०॥ द्विषट्राष्टचतुष्कं निरयादिपु नामवन्धस्थानानि । पञ्चनवैकादशपञ्चकं त्रिपञ्चद्वादशचतुष्कं च ॥ ७१०॥ अर्थ-नामकर्मके बंधस्थान नरकआदि चारगतियों में क्रमसे २-६-८-४ है, उद । स्थान ५९-११-५ है, सत्त्वस्थान ३-५-१२-४ कहेगये है ॥ ७१० ॥ अब इंद्रियमार्गणामें कहते है:- एगे चियले सयले पण पण अड पंच छक्केगार पणं । पणतेरं बंधादी सेसादेसेवि इदि णेयं ॥ ७११॥ एके विकले सकले पञ्च पञ्चाष्ट पञ्च पट्रैकादश पञ्च । पञ्चत्रयोदश बन्धादीनि शेषादेशेपि इति ज्ञेयम् ।। ७११ ॥ अर्थ-एकेद्री विकलेंद्री और पंचेद्रीके क्रमसे ५-५-८ बंधस्थान हैं, ५-६-११ उद- यस्थान हैं, ५-५-१३ तत्त्वस्थान है। इसीप्रकार शेष कायादिक मार्गणाओंमें बंधादि स्थान जानने चाहिये ।। ७११॥ - Pr CON , गोम्मटसारः। २२१ आगे उन्ही स्थानोंको दिखाते है:- णिरयादिणामवंधा उगुतीसं तीसमादिमं छकं । सव्वं पणछकुत्तरवीसुगुतीसंदुगं होदि ॥ ७१२ ॥ निरयादिनामबन्धा एकोनत्रिंशत् त्रिंशदादिमं षटम् । सर्व पञ्चषकोत्तरविंशैकोनविंशद्विक भवति ॥ ७१२ ।। अर्थ-नामकर्मके बंधस्थान नरकादि गतियोंमें क्रमसे २९-३० के दो, आदिके (२३ के ) स्थानको आदि लेकर ६, सब आठों, २५-१६-२९-३० के चार है ॥७१२॥ उदया इगिपणसगअडणववीसं एकवीसपहुदिणवं । चउवीसहीणसव्वं इगिपणसगअट्टणववीसं ॥ ७१३ ॥ उदया एकपञ्चसप्ताष्टनवविंशमेकविंशप्रभृतिनव । चतुर्विशहीनं सर्वमेकपञ्चसप्ताष्टनवविंशम् ॥ ७१३ ॥ अर्थ-उदयस्थान नरकगतिमें २१-२५-२७-२८-२९ के पांच है, तिर्यंचगतिमें २१ को आदि लेकर ९ है, मनुष्यगतिमें २४ के स्थानके विना सब हैं, देवगतिमें २१-२५- २७-२८-२९ के पांच है ॥ ७१३ ॥ सत्ता वाणउदितियं वाणउदीणउदिअट्टसीदितियं । बासीदिहीणसव्वं तेणउदिचउक्कयं होदि ॥ ७१४ ॥ सत्ता द्वानवतित्रयं द्वानवतिनवत्यष्टाशीतित्रयम् । द्वयशीतिहीनसवै त्रिनवतिचतुष्कं भवति ॥ ७१४ ॥ अर्थ-सत्त्वस्थान नरकगतिमें ९२ को आदि लेकर ३ हैं, तिर्यचगतिमें ९२-९०- ८८ को आदि लेकर तीन इसतरह ५ है, मनुण्यगतिमें ८२ के विना सब है, देवगतिमें ९३ को आदि लेकर ४ है ।। ७१४ ॥ इगिविगल वंधठाणं अडवीसूणं तिवीसछकं तु। सयलं सयले उदया एगे इगिवीसपंचयं वियले ॥ ७१५ ।। इगिछक्कडणववीसं तीसदु चउवीसहीणसव्वुदया। णउदिचऊ बाणउदी एगे वियले य सव्वयंसयले॥७१६॥ जुम्म। एकविकले बन्धस्थानमष्टविंशोनं त्रयोविंशषदं तु । सकलं सकले उदया एकस्मिन्नेकविंशपञ्चकं विकले ॥ ७१५ ।। एकषदाप्टनववंशं त्रिंशद्विकं चतुर्विशहीन सर्वमुदयाः । नवतिचतुष्कं द्वानवतिः एके विकले च सर्व सकले ॥ ७१६ ॥ युग्मम् । अर्थ-वंधस्थान एकेद्री विकलेंद्रीके २८ के विना २३ को आदि लेकर ६ है, पंचेंद्रीके सब है । और उदयस्थान एकेंद्रीके २१ के को आदि लेकर ५ हैं, विकलेंद्रीके - . . - २२२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २१-२६-२८-२९-३०-३१, के ६ हैं, पंचेंद्रीके २४ के विना सब हैं। तथा सत्त्वस्थान एकेन्द्री और विकलेन्द्रीके ९२ का तथा ९० को आदि लेकर ४ हैं, सकल अर्थात् पंचेंद्रीके सब है ॥ ७१५/७१६ ॥ अब कायमार्गणामें कहते है- पुढवीयादीपंचसु तसे कमा बंधउदयसत्ताणि । एयं वा सयलं वा तेउद्गे णत्थि सगवीसं ॥ ७१७॥ पृथिव्यादिपञ्चसु त्रसे क्रमान् वन्धोदयसत्त्वानि । एकं वा सकलं वा तेजोद्विके नास्ति सप्तविंशम् ।। ७१७ ।। अर्थ-पृथ्वीकायआदि पांच स्थावरों में और त्रसकायमें बंधउदयसत्त्वस्थान एकेन्द्रीवत और पंचेन्द्रीवत् जानना, परंतु इतनी विशेषता है कि तेजःकायिक और वायुकायिक इन दोनोंमें २७ का स्थान नही है क्योंकि उसका उदय इन दोनोंके नहीं होता ॥७१७॥ आगे योगमार्गणामें दिखाते हैं। मणिवचि वंधुदयंसा सव्वं णयवीसतीसइगितीसं । दसणवदुसीदिवजिदसव्वं ओरालतम्मिस्से ॥ ७१८ ॥ सव्वं तिवीसछकं पणुवीसादेक्कतीसपेरंतं । चउछकसत्तवीसं दुसु सव्वं दसयणवहीणं ॥ ७१९ ॥ जुम्मं । मनोवचसोः वन्धोदयांशाः सर्व नवविंशत्रिंशदेकत्रिंशत् । दशनवद्वयशीतिवर्जितसर्वमौरालतन्मिश्रे॥ ७१८ ।। सबै त्रयोविंशषटुं पञ्चविंशादेकत्रिशत्पर्यन्तम् । चतुःषटुसप्तविंशं द्वयोः सर्व दशकनवहीनम् ॥ ७१९ ॥ युग्मम् । अर्थ-मनयोग वचनयोगमें बंधस्थान सब है, उदयस्थान २९-३०-३१ के तीन हैं, सत्त्वस्थान १०--९ और ८२ के विना सब है। औदारिकयोगमें बंधस्थान सब हैं, और औदारिकमिश्रमें २३ के को आदि लेकर ६ है, उदयस्थान औदारिकयोगमें २५ को आदि लेकर ३१ पर्यंत सात हैं और औदारिकमिश्रमें २४-२६-२७ के तीन हैं, सत्त्वस्थान औदारिकयोग तथा औदारिकमिश्रयोग इन दोनोंमें १०-९ के विना सब है ।।७१८१७१९॥ वेगुब्बे तम्मिस्से वंधंसा सुरगदीव उदयो दु । सगवीसतियं पणजुदवीसं आहारतम्मिस्से ॥ ७२० ॥ बंधतियं अडवीसदु वेगुव्वं वा तिणउदिवाणउदी। कम्मे वीसदगुदओ ओरालियमिस्सयं व बंधंसा ॥७२१॥ जुम्मं । वैगू तन्मिश्रे बन्धांशाः सुरगतिरिव उदयस्तु । सप्तविंशत्रयं पञ्चयुतविंशमाहारतन्मिश्रे ।। ७२० ।। - गोम्मटसारः। २२३ वन्धत्रयमष्टविशद्विकं वैगूर्व वा त्रिनवतिद्वानवती । कर्मणि विशद्विकोदय औरालिकमिश्रकं व बन्धांशाः ॥ ७२१ ॥ युग्मम् । अर्थ-वैक्रियिक योग और वैक्रियिकमिश्रयोगमें बंधस्थान तथा सत्त्वस्थान देवगतिके समान जानना, उदयस्थान वैक्रियिकयोगमें २७ को आदि लेकर तीन है वैक्रियिकमिश्रमें २५ का ही है। आहारक तथा आहारकमिश्रयोगमें बंधादि तीन स्थान क्रमसे २८-२९ के दो, वैक्रियिकयोगवत् २७ को आदि लेकर तीन, ९३-९२ के दो हैं। और कार्मा- णयोगमें उदयस्थान २०-२१ के दो है, तथा बंधस्थान-सत्त्वस्थान औदारिकमिश्रयोगके समान जानने चाहिये ।। ७२० ॥ ७२१ ॥ आगे वेदमार्गणा और कषायमार्गणामें बंधादि स्थानोंको कहते है। वेदकसाये सव्वं इगिवीसणवं तिणउदिएकाएं। थीपुरिसे चउवीसं सीदडसदरी ण थीसंढे ॥ ७२२ ॥ वेदकषाये सर्वमेकविशनवं त्रिनवत्येकादश । स्त्रीपुरुषे चतुविशमशीत्यष्टसप्तती न स्त्रीषण्ढे ॥ ७२२ ॥ अर्थ-वेदमार्गणा और कपायमार्गणामें बंधस्थान सब है, उदयस्थान २१ को आदि लेकर ९ है, सत्त्वस्थान ९३ को आदि लेकर ११ है । परंतु इतनी विशेषता है कि स्त्री-पुरुषवेदमें २४ के का उदय नहीं है और स्त्री-नपुंसकवेदमें ८०-७८ के दो सत्त्व- स्थान नहीं है ।। ७२२ ॥ अब ज्ञानादि मार्गणाओं में बंधादिस्थानोंको दिखलाते है,- अण्णाणदुगे बंधो आदीछ णउंसयं व उदयो दु । सत्तं दुणउदिछक विभंगवंधा हु कुमदिं व ॥ ७२३ ॥ उदया उणतीसतियं सत्ता णिरयं व मदिसुदोहीए। अडवीसपंच बंधा उदया पुरिसं व अटेव ॥ ७२४ ॥ पढमचऊ सीदिचऊ सत्तं मणपज्जवम्हि वंधसा। ओहि व तीसमुदयं ण हि बंधो केवले णाणे ॥ ७२५ ॥ उदओ सव्वं चउपणवीसूणं सीदिछक्कयं सत्तं । सुदमिव सामयियदुगे उदओ पणुवीससत्तवीसचऊ ॥७२६॥ कलावयं। अज्ञानद्विके वन्ध आदिषट् नपुंसकं व उदयस्तु । सत्त्वं द्विनवतिषटुं विभगवन्धा हि कुमतिर्व ।। ७२३ ॥ उदया एकोनत्रिंशत्रयं सत्ता निरयं व मतिश्रुतावधिषु । अष्टविंशपञ्चबन्धा उदया पुरुषो व अष्टैव ॥ ७२४॥ .
- - - रायचन्द्रजैनशास्रमालायाम् । प्रथमचतुष्कमशीतिचतुष्कं सत्त्वं मनःपर्यये बन्धांशाः । अवधिरिव त्रिशदुदयो न हि वन्धः केवले जाने ॥ ७२५ ॥ उद्यः सर्व चतुःपञ्चविशोनमशीतिपटुं सत्त्वम् । श्रुतमिव सामायिकद्विके उदयः पञ्चविंशसप्तविशचतुष्कम् ॥७२६|| कलापकम् । अर्थ-कुमतिज्ञान और कुश्रुतज्ञान इन दोनोंमें बंधस्थान २३ को आदि लेकर ६ हैं, उदयस्थान नपुंसकवेदवत् ९ है, सत्त्वस्थान ९२ को आदि लेकर ६ हैं। विभंग (कु अवधि ) ज्ञानमें बंधस्थान तो कुमतिज्ञानकी तरह है, उदयस्थान २९ को आदि लेकर ३ हैं, सत्त्वस्थान नरकगतिवत् हैं। मतिज्ञान-श्रुतज्ञान और अवधिज्ञानमें बंधस्थान २८ को आदि लेकर ५ हैं, उदयस्थान पुरुषवेदवत् ८ है, सत्त्वस्थान ९३ को आदि लेकर ४ तथा ८० को आदि लेकर ४ इसतरह ८ है । मनःपर्ययज्ञानमें बंधस्थान और सत्त्वस्थान अवधिज्ञानकी तरह है, उदयस्थान ३० का ही है। केवलज्ञानमें बंधस्थानका तो अभाव है और उदयस्थान २४-२५ के विना सव है, सत्त्वस्थान ८० को आदि लेकर ६ है । तथा संयममार्गणामेंसे सामायिक-छेदोपस्थापना इन दो में बंधस्थान और सत्त्वस्थान श्रुत- ज्ञानवत् जानने चाहिये, उदयस्थान २५ का-२७ को आदि लेकर चार इसतरह ५ हैं ॥ ७२३१७२४७२५/७२६ ॥ - 4 परिहारे बंधतियं अडवीसचऊ य तीसमादिचऊ । सुहमे एको बंधो मणं व उदयंसठाणाणि ॥ ७२७ ॥ परिहारे वन्धत्रयमष्टविंशचतुष्कं च त्रिशमादिचतुष्कम् । सूक्ष्मे एको वन्धो मनो व उदयांशस्थानानि ।। ७२७ ।। अर्थ - परिहारविशुद्धिमें बंध-उदय-सत्त्वस्थान क्रमसे २८ को आदि लेकर ४, ३० का, ९३ के को लेकर ४ है । सूक्ष्मसांपरायसंयममें बंध १ का ही है, उदयस्थान और सत्त्वस्थान मनःपर्यायज्ञानवत् जानने चाहिये ॥ ७२७ ।। जहखादे बंधतियं केवलयं वा तिणउदिचउ अस्थि । देसे अडवीसदुगं तीसदु तेणउदिचारि वंधतियं ॥ ७२८ ॥ यथाख्याते बन्धत्रयं केवलं वा त्रिनवतिचतुष्कमस्ति । देशे अष्टविशद्विकं त्रिशद्विकं त्रिनवतिचत्वारि वन्धत्रयम् ॥ ७२८ ।। अर्थ-याख्यातसंयममें बंधादि तीन स्थान केवल ज्ञानवत् है, परंतु इतना विशेष है कि सत्त्व ९३ को आदि लेकर ४ का भी पाया जाता है । देशसयतके बधादि तीन स्थान क्रमसे २८ को आदि लेकर दो, ३० को आदि लेकर दो, ९३ को आदि लेकर ४ है ।। ७२८ ॥
गोम्मटसारः।
२२५
अविरमणे वंधुदया कुमादि व तिणउदिसतयं सत्तं ।
पुरिसंवा चक्खिदरे अस्थि अचक्खुम्मि चउवीसं ॥ ७२९ ।।
अविरमणे वन्धोदयाः कुमति विनवतिसप्तकं सत्त्वम् ।
पुरुपं वा चक्षुरितरयोरस्ति अचक्षुपि चतुर्विंशम् ॥ ७२९ ।।
अर्थ-असंयतके बंधस्थान और उदयस्थान कुमतिज्ञानवत् है, सत्त्वस्थान ९३ को
आदि लेकर ७ है । तथा दर्शनमार्गणा से चक्षुदर्शन और अचक्षुदर्शनमें बंधादिस्थान
पुरुषवेदकी तरह है, परंतु इतना विशेष है कि अवक्षुदर्शनमें २४ के स्थानका भी उदय
होता है ॥ ७२९॥
ओहिदुगे बंधतियं तण्णाणं वा किलिट्टलेसतिये ।
अविरमणं वा सुहजुगलुदओ पुंवेदयं व हवे ॥ ७३० ॥
अडवीसचऊ बंधा पणछव्वीसं च अस्थि तेउस्मि ।
पढमचउकं सत्तं सुक्के ओहिं व वीसयं चुदओ॥७३१॥ जुम्मं ।
अवधिद्विके बन्धत्रयं तज्ज्ञानं वा क्लिष्टलेश्यत्रये ।
अविरमणं वा शुभयुगलोदयः पुंवेदको व भवेत् ॥ ७३० ॥
अष्टविशचतुरो बन्धाः पञ्चपविशं चास्ति तेजसि ।
प्रथमचतुष्कं सत्त्वं शुक्लायामवधिर्व विशकं चोदयः ॥ ७३१ ॥युग्मम् ।
अर्थ-अवधिदर्शन और केवलदर्शनमें बंधादि तीनस्थान अवधिज्ञान और केवल-
ज्ञानवत् जानने चाहिये । तथा लेश्यामार्गणामेंसे कृष्णादि तीन अशुभ लेश्याओंमें बंधादि
तीन स्थान असयतवत् है । तेजोलेश्या और पद्मलेश्यामें उदयस्थान पुरुषवेदकी तरह
है, बंधस्थान पद्मलेश्यामें २८ को लेकर ४ है और तेजोलेश्यामें ये चार तथा २५-२६
के दो इसप्रकार ६ है, सत्त्वस्थान तेजोलेश्या और पद्मलेश्या इन दोनोंमें आदिके ४ है
शुक्ललेश्यामें बंधादि स्थान अवधिज्ञानवत् जानना, परंतु इतना विशेष है कि २० के स्थानका
भी इसमें उदय होता है ॥ ७३०१७३१ ॥
भव्वे सचमभव्वे बंधुदया अविरदव्य सत्तं तु ।
णउदिचउ हारवंधणदुगहीणं सुदमिवुवसमे बंधो ॥ ७३२ ॥
उदया इगिपणवीसं णववीसतियं च पढमचउ सत्तं ।
उवसम इव बंधंसा वेदगसम्मे ण इगिवंधो ॥ ७३३ ॥
उदया मदिं व खइये बंधादी सुदमिवत्थि चरिमदुर्ग ।
उदयंसे वीसं च य साणे अडवीसतियवंधो ॥ ७३४ ॥
२२६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । उदया इगिवीसचऊ णवीसतियं च णउदियं सत्तं । मिस्से अडवीसढुगं णवचीसतियं च बंधुदया ॥ ७३५ ।। वाणउदिणउदिसत्तं मिच्छे कुमदिं व होदि बंधतियं । पुरिसं वा सण्णीये इदरे कुमर्दि व णत्थि इगिणउदी॥७३६।। कुलयं । भव्ये सर्वमभव्ये बन्धोदया अविरत इब सत्त्वं तु । नवतिचतुष्कमाहारवन्धनद्विकहीनं श्रुतमिवोपशमे वन्धः ।। ७३२ ।। उदया एकपञ्चविंशं नवविशत्रयं च प्रथमचतुष्कं सत्त्वम् । उपशम इव वन्धांशा वेदकसम्ये नैकवन्धः ।। ७३३ ॥ उदया मतिर्व क्षायिके बन्धादि श्रुतमिवास्ति चरमद्विकम् । उदयांशे विशं च च साने अष्टविंशत्रिकबन्धः ॥ ७३४ ।। उदया एकविशचत्वारः नवविंगत्रयच नवतिकं सत्वम् । मिश्रे अष्टविशद्विकं नवविगत्रयं च वन्धोदयाः ।। ७३५ ॥ द्वानवतिनवतिसत्त्वं मिथ्य कुमतिर्व भवति बन्धत्रयम् । पुरुषो वा संजिनि इतरस्मिन् कुमतिर्वनास्ति एकनवतिः ॥७३६॥ कुलकम् । अर्थ-भव्यमार्गणामें भव्यके बंध उदय सत्त्वस्थान सब है, और अभव्यके बंध उदय- स्थान असंयमवत् जानना तथा सत्त्वस्थान ९० को आदि लेकर ४ हैं, परंतु इतना विशेष है कि आहारद्विक सहित ३० का बंध नहीं है किंतु उद्योत सहित है । सम्यक्त्वमार्गणामसे उपशमसम्यक्त्वमें बंधस्थान श्रुतज्ञानवत् है, उदयस्थान २१-२५-२९ को आदि लेकर ३ इसतरह ५ है, सत्त्वस्थान ९३ के स्थानको आदि लेकर ४ है । वेदक सम्यक्त्वमें बंधस्थान और सत्त्वस्थान तो उपशमसम्यक्त्वकी तरह है परंतु इतना विशेष है कि एकका बंधस्थान नही है, उदयस्थान मतिज्ञानवत् ८ है । क्षायिकसम्यक्त्वमें बंधादिस्थान श्रुतज्ञा- नवत् ५-८-८ है इतना विशेष है कि उदय सत्त्वमें अंतके दो दो स्थान अन्यभी पाये जाते है तथा उदयमें २० का स्थान भी पाया जाता है । सासादनसम्यक्त्वमें बंधस्थान २८ को लेकर ३ है, उदयस्थान २१ को आदि लेकर ४-२९ को लेकर ३ इसतरह ७ है, और सत्त्वस्थान ९० का ही है । मिश्ररुचिके बंधस्थान २८ को आदि लेकर २ है, उदयस्थान २९ को आदि लेकर ३ है, सत्त्वस्थान ९२-९० के दो है। मिथ्यारुचिके बंधादि तीन स्थान कुमतिज्ञानवत् जानने चाहिये । संज्ञीमार्गणामें संज्ञीके बंधादिस्थान पुरुषवेदकी तरह है । असंज्ञीके कुमतिज्ञानवत् है परंतु इतना विशेष है कि ९१ का सत्त्वस्थान नही है ।। ७३२।७३३१७३४१७३५/७३६ ॥ आहारे वंधुदया संदं वा णवरि णत्थि इगिवीसं । पुरिसं वा कम्मंसा इदरे कम्मं व बंधतियं ॥ ७३७ ।। -- 7 -- ॥ गोम्मटसारः। २२७ आहारे वन्धोदया पण्डो वा नवरि नास्ति एकविंशम् । पुरुपो वा कर्माशा. इतरस्मिन् कर्म व वन्धत्रयम् ॥ ७३७ ॥ अर्थ-आहारमार्गणामें बंध उदयस्थान नपुंसकवेदवत् है, परंतु इतना विशेष है कि २१ का उदयस्थान नही है, सत्त्वस्थान पुरुषवेदवत् है । अनाहारकके बंधादि तीन स्थान कार्माणकाययोगवत् है ।। ७३७ ॥ अस्थि णवह य दुदओ दसणवसत्तं च विजदे एत्थ । इदि वंधुदयप्पहुदीसुदणामे सारमादेसे ॥ ७३८ ॥ अस्ति नवाष्ट च द्वयुदयो दशनवसत्त्वं च विद्यतेऽत्र । इति वन्धोदयप्रभृतिश्रुतनानि सारमादेशे ॥ ७३८ ।। अर्थ-उस अनाहार मार्गणामें इतना विशेष है कि अयोगीके उदयस्थान ९-८ को दो है, सत्त्वस्थान १०-९ के दो है । इसप्रकार मार्गणाओंमें नामकर्मके बंधउदयसत्त्वका निसंयोग प्रगटरीतिसे सारभूत कहागया है ।। ७३८ ।। चारुसुदंसणधरणे कुवलयसंतोसणे समत्येण । माधवचंदेण महावीरेणत्थेण वित्थरिदो ॥ ७३९ ॥ चारुसुदर्शनधरणे कुवलयसन्तोपणे समर्थेन । माधवचन्द्रेण महावीरेनार्थेन विस्तरितः ॥ ७३९ ।। अर्थ-इसप्रकार पूर्वोक्त कथन, उत्कृष्ट सम्यग्दर्शनके धारण करनेमें समर्थ तथा पृथ्वी- मंडलको आनन्द उत्पन्न करनेवाले ऐसे श्रीमाधवचंद्र अर्थात् नेमिनाथ तीर्थकर और महावीर तीर्थकर इन दोनोंने परमार्थसे विस्ताररूप किया है ॥ अथवा माधवचंद्र और वीरनंदि ये दोनो आचार्यों के नाम है ऐसा भी अर्थ निकलता है सो ऐसा अर्थ करने में भी कोई हानि नही है ॥ ७३९ ॥ आगे इस बधादि त्रिसंयोगको एक आधार और दो आधेयकी अपेक्षा कहते हैं; णवपंचोदयसत्ता तेवीसे पण्णुवीस छवीसे । अट्टचदुरट्टवीसे णवसत्तुगुतीसतीसम्मि ॥ ७४०॥ एगेगं इगितीसे एगे एगुदयमसत्ताणि । उवरदवंधे दसदस उदयंसा होति णियमेण ॥७४१॥ जुम्म। नवपञ्चोदयसत्ताः त्रयोविंशे पञ्चविंशे षडिशे । अष्टचतुष्कमष्टाविंशे नवसप्तैकोनत्रिंशत्रिंशतोः ॥ ७४० ॥ एकैकमेकत्रिंशतो एकस्मिन्नेकोदयोऽष्टसत्त्वानि । उपरतवन्धे दश दश उदयांशा भवन्ति नियमेन ॥७४१ ॥ युग्मम् । अर्थ-२३-२५-२६ के बंधस्थानमें उदयस्थान ९ और सत्त्वस्थान ५ हैं । २८ - २२८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । के बंधस्थानमें उदयस्थान ८ और सत्त्वस्थान ४ हैं । २९ और ३० के बंधस्थानमें उदयस्थान ९ और सत्त्वस्थान ७ है । ३१ के बंधस्थानमें उदयस्थान १ और सत्त्वस्थान १ है । १ के बंधस्थानमें उदयस्थान १ और सत्त्वस्थान ८ है । तथा उपरतबंध अर्थात् बंधरहितस्थानमें उदयस्थान और सत्त्वस्थान दस दस नियमसे होते है ।। ७४०१७४१॥ उदयंसहाणाणि य सामित्तादो दु जाणिदद्याणि । वंधुदयं च णिरंभिय सत्तस्स य संभवगदीए ॥१॥ अब उक्तस्थानोंकी सख्या कहते हैं, तियपणछचीसबंधे इगिवीसादेकतीसचरिमुदया । वाणउदी णउदिचऊ सत्तं अडवीसगे उदया ॥ ७४२ ॥ पुर्व व ण चउबीसं वाणउदिचउकसत्तसुगुतीसे । तीसे पुवं बुदया पढमिलं सत्तयं सत्तं ।। ७४३ ॥ जुम्मं । त्रिकपञ्चषड्विंशवन्धे एकविसादेकत्रिशचरमोदयाः । द्वानवतिः नवतिचतुष्कं सत्त्वमष्टविंगके उदयाः ।। ७४२ ।। पूर्व व न चतुर्विश द्वानवतिचतुष्कसत्त्वमेकोनत्रिो। त्रिंशे पूर्व वोदयाः प्रथमाचं समकं सत्त्वम् ।। ७४३ ॥ युग्मम् । अर्थ-२३-२५-२६ के बंधस्थानोमें २१ को आदि लेकर ३१ पर्यत उदयस्थान ९ है, सत्त्वस्थान ९२-९० को आदि लेकर ४ इसप्रकार ५ है। २८ के बंधस्थानमें उदयस्थान पूर्ववत् ९ मेंसे २४ का न होनेसे ८ है, सत्त्वस्थान ९२ को आदि लेकर ४ है । तथा २९-३० के बंधस्थानमें उदयस्थान पूर्ववत् ९ है, सत्त्वस्थान पहले (९३) को आदि लेकर ७ है ।। ७४२।७४३ ॥ इगितीसे तीसुदओ तेणउदी सत्तयं हवे एगे। तीसुदओ पढमचऊ सीदादिचउक्कमवि सत्तं ॥ ७४४ ॥ एकत्रिशे त्रिगोदयः त्रिनवतिः सत्त्वं भवति एकस्मिन् । त्रिंगोदयः प्रथमचतुष्कमशीत्यादिचतुकमपि सत्त्वम् ।। ७४४ ।। अर्थ-३१ के बंधस्थानमें उदयस्थान ३० का है, सत्त्वस्थान ९३ का है। १ के बंघस्थानमें उदयस्थान ३० का है, सत्त्वस्थान ९३ को आदि लेकर ४ और ८० के को आदि लेकर ४ इसतरह ८ है ।। ७४४ ॥ उवरदवंधेसुदया चउपणवीसूण सधयं होदि । सत्तं पढमचउर्फ सीदादीछक्कमवि होदि ॥ ७४५ ॥ १ यह गाथा क्षेपक मालूम होता है। . - , गोमाटसारः। २२९ उपरतबन्धेपूदयाः चतुःपञ्चविगोन सर्व भवति । सत्त्वं प्रथमचतुष्कमगीत्यादिपदमपि भवति ॥ ७४५ ॥ अर्थ-बंधरहितमें उदयस्थान २४-२५ के विना सब ( १०) है, सत्त्वस्थान ९३ को आदि लेकर ४ और ८० को आदि लेकर ६ इसतरह १० है । ७४५ ॥ आगे दूसरा भेद उदयको आधार तथा वध-सत्त्वको आधेय मानकर कहते है- वीसादिसु बंधंसा णभदु छण्णव पणपणं च छसत्तं । छण्णव छड दुसु छड्स अहदसं छकछक्क णभति दुसु ॥७४६॥ विशादिपु बन्धांशा नभद्विकं पण्णव पञ्चपञ्च च षट्सप्त । पण्णव पउष्ट द्वयोः पड्दश अष्टदश पटुपटु नभत्रिकं द्वयोः ॥ ७४६ ॥ अर्थ-२० को आदि लेकर उदयस्थानोंमें बंधस्थान और सत्त्वस्थान क्रमसे अर्थात् २० के उदयस्थानमे शून्य-२, २१ के में ६-९, २४ के मे ५-५, २५ के में ६-७, २६ के मे ३-९, २७-२८ के में ६-८, २९ के में ६-१०, ३० के में ८- १०, ३१ के में ६-६, ९-८ के में शून्य-३ जानने चाहिये ॥ ७४६ ॥ अब उन्हीं सानोको दिखलाते है, वीसुदये वंधो ण हि उणसीदीसत्तसत्तरी सत्तं । इगिवीसे तेवीसप्पहुदीतीसंतया बंधा ॥ ७४७॥ सत्तं तिणउदिपहुदीसीदंता अट्ठसत्तरी य हवे । चउवीसे पढमतियं णचवीसं तीसयं बंधो ॥ ७४८॥ वाणउदी णउदिचऊ सत्तं पणछस्सगढ़णवीसे । बंधा आदिमछक्कं पढमिलं सत्तयं सत्तं ॥ ७४९ ॥ ते णवसगसदरिजुदा आदिमछस्सीदिअहसदरीहिं। णवसत्तसत्तरीहिं सीदिचउक्केहि सहिदाणि ॥७५०॥ कलावयं । विंशोढये वन्धो न हि एकोनाशीतिसप्तसप्तती सत्त्वम् । एकविगे त्रयोविगप्रभृतित्रिंशान्तका बन्धाः ॥ ७४७ ॥ सत्त्वं त्रिनवतिप्रभृत्यशीत्यन्तानि अष्टसप्ततिश्च भवेत् । चतुर्विशे प्रथमत्रयं नवविशं त्रिंशत्क वन्धः ॥ ७४८ ॥ द्वानवति. नवतिचतुष्कं सत्त्वं पञ्चपट्सप्ताष्टनवविशे। वन्धा आदिमपट्ट प्रथमाद्य सप्तकं सत्त्वम् ॥ ७४९ ॥ तानि नवसप्तसप्ततियुतानि आदिमपडशीत्यष्टसप्ततिभिः नवसप्तसप्ततिभिरशीतिचतुष्कैः सहितानि ॥ ७५० ॥ कलापकम्। अर्थ-२० के उदयस्थान में बंध नहीं है, सत्त्वस्थान ७९-५७ के दो है । २१ के - H २३० रायचन्द्रनशास्त्रमालायाम् । उदयस्थानमें बंधस्थान २३ को आदि लेकर ३० के अन्ततक ६ है, सत्त्वस्थान ९३ को आदि लेकर ८० के अंततक हैं और ७८ का भी है । २४ के उदयस्थानमें बंधस्थान आदिके ३ और २९-३० के दो इसतरह ५ है, सत्त्वस्थान ९२ का-९० को आदि लेकर ४ इसप्रकार ५ है । २५-२६-२७-२८-२९ के उदयस्थानमें बंधस्थान २३ को आदि लेकर ६ है, सत्त्वस्थान क्रमसे २५ केमें आदिके ७ हैं-२६ केमें पहले सात तथा ७९ और ७७ के दो इसप्रकार ९ है-२७ केमें आदिके ६ तथा ८० और ७८ के दो इसप्रकार है-२८ केमें आदिके ६ तथा ७९ और ७७ के दो इसतरह ९ हैं-२९ केमें आदिके ६ तथा ८० को आदि लेकर ४ इसतरह १० है।। ७४७/७१८१७४९/७५०॥ तीसे अट्टवि बंधो ऊणत्तीसंच होदि सत्तं तु । इगितीसे तेवीसप्पहुदीतीसंतयं वंधो ॥ ७५१ ॥ सत्तं दुणउदिणउदीतिय सीदडहत्तरी य णवगट्टे । वंधो ण सीदिपहुदीसुसमविसमं सत्तमुद्दिटं ॥७५२॥ जुम्मं । त्रिंशे अष्टापि वन्ध एकोनत्रिशं न भवति सत्त्वं तु । एकत्रिंशे त्रयोविंशप्रभृतित्रिंगान्तको वन्धः ।। ७५१ ॥ सत्त्वं द्विनवतिनवतिनिकमष्टाशीत्यष्टसप्ततिश्च नवकाष्टसु । बन्धो न अशीतिप्रभृतिसुसमविषमं सत्त्वमुद्दिष्टम् ।। ७५२ ।। युग्मम् । अर्थ-३० के उदयस्थानमें बंधस्थान ८, सत्त्वस्थान २९ की तरह १० है । ३१ के उदयस्थानमें बंधस्थान २३ को आदि लेकर ३० के स्थानतक ६ है, सत्वस्थान ९२-९० को आदि लेकर ३-८० और ७८ के इसतरह ६ हैं । ९-८ के उदयस्थानमें बंधस्थान नहीं हैं, सत्त्वस्थान ८० को आदि लेकर ६ स्थानोंमेंसे समरूप ३ तथा विषमसंख्या- रूप ३ यथाक्रमसे जानने चाहिये ।। ७५११७५२ ॥ आगे सत्त्वस्थानको आधारकर तथा बंध-उदयस्थान आधेय मानके ७ गाथाओंसे कहते है- सत्ते वंधुदया चदुसग सगणव चतुसगं च सगणवयं । छण्णव पणणच पणचदु चदुसिगिछकं णभेक सुण्णेगं ॥७५३॥ आदि लेकर ४ इसत्त्वे वन्धोदया चतु:सप्त सप्तनव चतुःसप्त च सप्तनवकम् । शव पञ्चनव पञ्चचतुष्कं चतुर्बेकषटुं नभैकं शून्यमेकम् ।। ७५३ ।। सत्तं में बंधस्थान और उदयस्थान क्रमसे ४-७, ७-९, ४-७,७-९, १ यह गाथा क्षेपक मालूम हसत्त्वस्थानोंमें १-६,शून्य-१,शून्य-१ जानने चाहिये । ७५३।। उवश्व गोम्मटसारः। २३१ अब उन्हीं स्थानोंको स्पष्टरीतिसे बतलाते है:--- तेणउदीए बंधा उगुतीसादीचउक्कमुदओ दु। इगिपणछस्सगअट्ठयणववीसं तीसयं णेयं ॥ ७५४ ॥ त्रिनवत्यां बन्धा एकोनत्रिशादिचतुष्कमुदयस्तु । एकपञ्चषट्सप्ताष्टकनवविशं त्रिशत्को ज्ञेयः ॥ ७५४ ॥ अर्थ-९३ के सत्त्वस्थानमें बंध स्थान २९ के को आदि लेकर ४ है, उदयस्थान २१-२५-२६-२७-२८-२९-३० के है ॥ ७५४ ॥ वाणउदीए बंधा इगितीसूणाणि अट्ठठाणाणि । इगिवीसादीएकत्तीसंता उदयठाणाणि ॥ ७५५ ॥ द्वानवत्यां बन्धा एकत्रिशोनानि अष्टस्थानानि । एकविशाघेकत्रिशान्तानि उदयस्थानानि ।। ७५५ ॥ अर्थ-९२ के सत्त्वस्थान में बंधस्थान ३१ के विना आठ अर्थात् ७ है, उदयस्थान २१ के को आदि लेकर ३१ पर्यंत ९ है ।। ७५५ ॥ इगिणवदीए बंधा अडवीसत्तिदयमेकयं चुदओ। तेणउदि वा णउदीबंधा वाणउदियं व हवे ॥ ७५६ ॥ चरिमदुवीसूणुदयो तिसु दुसु बंधा छतुरियहीणं च । वासीदी वंधुदया पुवं विगिवीसचत्वारि ॥ ७५७ ॥ जुम्म । एकनवत्यां बन्धा अष्टविशत्रितयमेकञ्चोदयः । त्रिनवतिर्वा नवतिवन्धा द्वानवतिर्व भवेत् ॥ ७५६ ॥ चरमद्विविशोनोदयः ततः द्वयोर्वन्धाः षट्तुरीयहीनं च । द्वयशीत्यां बन्धोदयाः पूर्व इवैकविशचत्वारः ॥ ७५७ ॥ युग्मम् । अर्थ-९१ के सत्त्वस्थानमें बंधस्थान २८ को आदि लेकर ३ और १ का इसतरह ४ हैं, उदयस्थान ९३ की तरह ७ है । ९० के सत्वस्थानमें वधस्थान ९२ की तरह ७ है, उद- यस्थान अंतके दो तथा वीसका इन तीनोंके विना ९ है । ८८-८४ के सत्त्वस्थानमे उदयस्थान येही ९ है, परंतु बंधस्थान क्रमसे २३ को आदि लेकर ६ तथा चौथा (२८वां) विना शेष ५ है। ८२ के सत्त्वस्थानमें बंधस्थान पहलेकी तरह अर्थात् ८४ केकी तरह ५ है, उदयस्थान २१ को आदि लेकर ४ है ।। ७५६/७५७ ॥ सीदादिचउसु बंधा जसकित्ती समपदे हवे उदओ इगिसगणवधियवीसं तीसेक्कत्तीसणवगं च ॥ ७५८ ।। वीसं छडणववीसं तीसं चट्टं च विसमठाणुदया। दसणवगे ण हि बंधो कमेण णवअट्टयं उदओ ॥७५९॥ जुम्म।
. २३२ रायचन्द्रजैनशास्रमालायाम् । अशीत्यादिचतुर्पु वन्धो यशस्कीर्तिः समपद भवेदुदयः । एकसप्तनवाधिकविशं त्रिगैकत्रिशनवकं च ।। ७५८ ।। विशः पडष्टनवविश त्रिंगलाष्ट च विपमस्थानोदयाः ! दशनवके न हि वन्धः क्रमेण नवाष्टक उदयः ।। ७५९ ॥ युग्मम् । अर्थ-८० केको आदि लेकर ४ सत्त्वस्थानोंमे बंधस्थान एक यशस्कीर्तिप्रकृति है, उदयस्थान समसंख्यारूप ८०-७८ कमें २१-२७-२९-३०-३१-९ के ६ है, तथा विषमसंख्यारूप ७९-७७ के सत्त्वस्थानोमें २०-२६-२८-२९-३०-८ के ६ उद- यस्थान है । १०-९ के सत्त्वस्थानों में बंधस्थान नही है, उदयसान क्रमसे ९ का और ८ का है ॥ ७५८।७५९ ॥ आगे बंधस्थान-उदयस्थान इन दोनोंको आधार करके आधेयभूत सत्तस्थानोंको ९ गाथाओंसे कहते है,- तेवीसबंधगे इगिवीसणबुदयेसु आदिमचक्के । वाणउदिणउदिअडचउवासीदी सत्तठाणाणि ॥ ७६० ॥ तेणुवरिमपंचुदये ते चेवंसा विवज वासीदि। एवं पणछब्बीसे अडचीसे एकवीसुदये ॥ ७६१ ॥ वाणउदिणउदिसत्तं एवं पणुवीसयादिपंचुदये । पणसगवीसेणउदी विगुवणे अत्थिणाहारे ॥७६२॥ विसेसयं । त्रयोविशवन्धके एकविंशनवोदयेषु आदिमचतुष्के । द्वानवतिनवत्यष्टचतुर्थशीतिः सत्त्वस्थानानि ॥ ७६० ।। तेनोपरिमपञ्चोदये ते चैवांशा विवर्य व्यगीतिम् । एवं पञ्चषड्डिो अष्टविशेन एकविशोदये ।। ७६१ ।। द्वानवतिनवतिसत्त्वमेवं पञ्चविशकादिपञ्चकोदये । पञ्चसप्तविशे नवतिविगूर्वणे अस्ति नाहारे ॥ ७६२ ॥ विशेषकम् । अर्थ-२३ के बंधस्थानमे २१ को आदि लेकर जो ९ उदयस्थान है उनमेंसे आदिके ४ उदयस्थानोंमें सत्त्वस्थान ९२-९०-८८-८४-८२ के पांच है। और उसी २३ के वंधस्थानसहित ऊपरके ५ उदयस्थानोमें सत्त्वस्थान (२ के विना सब (४) ही है। २५-२६ के बंधसहित उदयस्थानोमें पूर्ववत् सत्त्व जानना । २८ के बंधसहित २१ के उदयस्थानमें ९२-९० का सत्त्वस्थान है । इसीप्रकार २८ के वंघसहित २५ को आदि लेकर ५ उदयस्थानोंमें सत्त्वस्थान जानने, परंतु इतना विशेष है कि २५-२७ के उदयमें जो ९० का सत्त्व है वह वैक्रियिककी अपेक्षासे है आहारककी अपेक्षासे नहीं है ॥ ७६० ७६१/७६२ ॥ + २३३ गोम्मटसारः। तेण णमिगितीसुदये वाणउदिचउक्कमेक्कतीसुदये । णवरि ण इगिणउदिपदं णववीसिगिवीसवंधुदये ॥ ७६३ ॥ तेणवदिसत्तसत्तं एवं पणछक्कवीसठाणुदये। चउवीसे बाणउदी णउदिचउक्कं च सत्तपदं ॥७६४ ॥ जुम्म । तेन नभएकत्रिंशोदये द्वानवतिचतुष्कमेकत्रिंशोदये । नवरि न एकनवतिपदं नवविशैकविंशबन्धोदययोः ॥ ७६३ ॥ त्रिनवतिसप्तसत्त्वमेवं पञ्चषद्वाविंशस्थानोदये । चतुर्विशे द्वानवतिः नवतिचतुष्क च सत्त्वपदम् ॥७६४ ॥ युग्मम् । अर्थ-उस २८ के बंधसहित ३०-३१ का उदय होनेपर ९२ को आदि लेकर ४ स्थानोंका सत्त्व है । परंतु इतनी विशेषता है कि ३१ के उदय होनेपर ९१ का सत्त्व नहीं है । २९ के बंधसहित २१ के उदय होनेपर ९३ को आदि लेकर ७ स्थानोंका सत्त्व है, इसीप्रकार पूर्वोक्त बंधसहित २५-२६ के उदय होनेपरभी सत्त्व जानना चाहिये । २९ के बंधसहित २४ का उदय होनेपर ९२ का तथा ९० को आदि लेकर ४ का सत्त्व है ॥ ७६३१७६४ ॥ सगवीसचउकुदये तेणउदीछक्कमेवमिगितीसे। तिगिणउदी ण हि तीसे इगिपणसगअट्टणवयवीसुदये ॥७६५॥ तेणउदिछक्कसत्तं इगिपणवीसेसु अत्थि बासीदी। तेण छचउवीसुदये बाणउदी णउदिचउसत्तं ॥७६६॥ जुम्म । सप्तविंशचतुष्कोदये त्रिनवतिषट्मेवमेकत्रिंशे । त्र्येकनवतिर्न हि त्रिंशे एकपञ्चसप्ताष्टनवकविंशोदये ॥ ७६५ ॥ त्रिनवतिषटुसत्त्वमेकपश्चविंशयोरस्ति द्वयशीतिः । तेन षट्चतुर्विशोदये द्वानवतिः नवतिचतुष्कसत्त्वम् ॥ ७६६ ॥ युग्मम् । अर्थ-२९ के बंधसहित २७ को आदि लेकर ४ स्थानोंके उदय होनेपर ९३ को आदि लेके ६ का सत्त्व है; इसीप्रकार ३१ के उदयमें भी जानना, विशेष यह है कि इस स्थानमें ९३-९१ का सत्त्व नहीं है। ३० के बंधसहित २१-२५-२७-२८-२९ के उदय होनेपर ९३ को आदि लेकर ६ का सत्त्व है, विशेषता यह है कि ८२ के स्थानका सत्त्व २१-२५ के उदय होनेपर ही होता है अन्य जगह नहीं । ३० के बंधसहित २४-२६ के उदय होनेपर ९२ का-९० आदि ४ का इसप्रकार ५ स्थानोंका सत्त्व पाया जाता है ।। ७६५/७६६ ॥ ३० - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २३४ एवं खिगितीसे ण हि वासीदी एकतीसवंधेण । तीसुदये तेणउदी सत्तपदं एकमेव हवे ॥ ७६७ ॥ एवं खैकत्रिंशे न हि यशीतिरेकत्रिशबन्धेन । त्रिशोदये त्रिनवतिः सत्त्वपदमेकमेव भवेत् ॥ ७६७ ।। अर्थ-३० के बंधसहित ३०-३१ के उदय होनेपर सत्त्वस्थान इसीप्रकार २१ के उदयकी तरह जानना चाहिये, इतना विशेष है कि यहांपर ८२ का सत्त्वस्थान नहीं होता। ३१ के बंधसहित ३० का उदय होनेपर सत्त्वस्थान एक ८३ का ही है ॥ ७६७ ॥ इगिवंधाणेण दु तीसट्टाणोदये णिरुंधम्मि । पढमचऊसीदिचऊ सत्तट्टाणाणि णामस्स ॥ ७६८॥ एकवन्धस्थानेन तु त्रिशस्थानोदये निरोधे । प्रथमचतुष्काशीतिचतुष्कं सत्त्वस्थानानि नाम्नः ॥ ७६८ ।। अर्थ-१ के बंधसहित ३० के उदय होनेपर ९३ को आदि लेकर ४ और ८० को आदि लेकर ४ सत्त्वस्थान नामकर्मके कहे गये हैं ।। ७६८ ॥ आगे बंधसत्त्वको आधार करके और उदयस्थानको आधेय मानके ६ गाथाओंसे कहते हैं- तेवीसवंधठाणे दुखणउदडचदुरसीदि सत्तपदे । इगिवीसादिणउदओ वासीदे एकवीसचऊ ॥ ७६९ ।। त्रयोविंशबन्धस्थाने द्विखनवत्यष्टचतुरशीतिसत्त्वपदे। एकविंशादिनवोदयः द्वयशीतौ एकविशचतुष्कम् ॥ ७६९ ॥ अर्थ-२३ के बंधस्थानसहित ९२-९०-८८-८४ के सत्त्वस्थान. होनेपर २१ को आदि लेकर ९ उदयस्थान है, और ८२ का सत्त्व होनेपर २१ को आदि लेकर ४ उदय- स्थान हैं ॥ ७६९॥ एवं पणछब्बीसे अडवीसे वंधगे दुणउदंसे । इगिवीसादिणवुदया चउवीसट्टाणपरिहीणा ॥ ७७० ॥ इगिणउदीए तीसं उदओ णउदीए तिरियसणि वा । अडसीदीए तीसदु णववीसे वंधगे तिणउदीए ॥ ७७१ ॥ इगिवीसादट्टदओ चउचीसूणो दुणउदिणउदितिये । इगिवीसणविगिणउदे णिरयं व छवीसतीसधिया ।। ७७२ ।। वासीदे इगिचउपणछब्बीसा तीसवंधतिगिणउदी। सुरमिव दुणउदिणउदी चउसुदओऊणतीसं वा ॥७७३॥कलावयं । एवं पञ्चषडिशे अष्टविशे वन्धके तु द्वानवत्यंशे । एकविशादिनवोदयाः चतुर्विशस्थानपरिहीनाः ॥७७०।- - - गोम्मटसार। २३५ एकनवत्यां त्रिंश उदयो नवत्यां तिर्यक्संज्ञी वा। अष्टाशीतौ त्रिंशद्विकं नवविशे बन्धके त्रिनवत्याम् ॥ ७७१ ॥ एकविशादष्टोदयः चतुर्विशोनो द्विनवतिनवतित्रये । एकविंशनव एकनवत्यां निरयो व षडिशत्रिंशाधिकाः ॥ ७७२ ॥ द्वयशीत्यामेकचतुःपञ्चपड्रिंशः त्रिंशबन्धे त्र्येकनवतौ । सुर इव द्विनवतिनवतिचतुर्वृदय एकोनत्रिशं वा ॥ ७७३ ॥ कलापकम् । अर्थ-२५-२६ के बंधसहित भी सत्त्वस्थानों में उदयस्थान २३ की तरह जानना । २८ के बंधसहित ९२ के सत्त्व होनेपर २४ के विना २१ को आदि लेकर ९ उदयस्थान है । ९१ का सत्त्व होनेपर ३० का उदयस्थान है, ९० का सत्त्व होनेपर तियेच संज्ञीके कहे हुए २१ आदि उदयस्थान है, ८८ का सत्त्व होनेपर ३०-३१ के उदयस्थान है । २९ के बंधसहित ९३ का सत्त्व होनेपर २४ के विना २१ को आदिलेकर ८ उदयस्थान है, ९२ का-९० को आदिलेकर ३ का सत्त्व होनेपर २१ को आदिले ९ का उदय होता है, ९१ का सत्त्व होनेपर नरकगतिकी तरह २१ को आदिलेकर तथा २६-३० ये दोनों मिलाकर उदयस्थान है । ८२ का सत्त्व होनेपर २१-२४-२५-२६ के उदय- स्थान हैं, तथा ३० के बंधसहित ९३-९१ का सत्त्व होनेपर देवगतिवत् ५ उदयस्थान है, ९२ का-९० को आदिलेकर ४ का सत्त्व होनेपर २९ के बंधसहितके समान उदयस्थान होतेहै ॥ ७७०७७११७७२।७७३ ॥ इगितीसवंधठाणे तेणउदे तीसमेव उदयपदं। इगिवंध तिणउदिचऊ सीदिचउक्केवि तीसुदओ ॥७७४ ॥ एकत्रिशवन्धस्थाने त्रिनवत्यां त्रिंशमेव उदयपदम् । एकबन्धे त्रिनवतिचतुष्के अशीतिचतुष्केपि त्रिंशोदयः ॥ ७७४ ॥ अर्थ-३१ के बंधस्थानसहित ९३ का सत्त्व होनेपर ३० का ही उदयस्थान है। १ के बंधसहित ९३ को आदिलेकर ४ का-८० को आदिलेकर ४ का सत्त्व होनेपर भी ३० का ही उदयस्थान है ॥ ७७४ ॥ आगे उदयस्थान सत्त्वस्थानको आधार तथा बंघस्थानको आधेयमानके १० गाथाओंसे भंग कहते हैं- इगिवीसठाणुदये तिगिणउदे णवयवीसदुगवंधो। तेण दुखणउदिसत्ते आदिमछक हवे बंधो ॥ ७७५ ॥ एवमडसीदितिदए ण हि अडवीसं पुणोवि चउवीसे। दुखणउदडसीदितिए सत्ते पुत्वं व बंधपदं ॥ ७७६ ॥ जुम्म ।
के R रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २३६ एकविंशस्थानोदये त्र्येकनवत्यां नवविंशद्विकवन्धः। तेन द्विखनवतिसत्त्वे आदिमषटुं भवेद्वन्धः ॥ ७७५ ।। एवमष्टाशीतित्रितये न हि अष्टविंशं पुनरपि चतुर्विशे । द्विखनवत्यष्टाशीतित्रये सत्त्वे पूर्व व बन्धपदम् ।। ७७६ ॥ युग्मम् । अर्थ-२१ के उदयसहित ९३-९१ का सत्त्व होनेपर २९-३० के बंधस्थान हैं, ९२-९० का सत्त्व होनेपर आदिके ६ बंधस्थान है, इसीप्रकार ८८ को आदिलेकर ३ का सत्त्व होनेपर उक्त बंधस्थान होते हैं परंतु २८ का बंधस्थान नही होता, २४ उदयसहित ९२-९० का-८८ आदिलेकर ३ का सत्त्व होनेपर पूर्वोक्त ५ ही बंधस्थान है ।। ७७५/७७६॥ पणवीसे तिगिणउदे एगुणतीसंदुगं दुणउदीए । आदिमछक्कं वंधो णउदिचउक्केवि णऽडवीसं ॥ ७७७ ॥ पञ्चविशे ज्येकनवतौ एकोनविंशद्विक द्विनवत्याम् । आदिमषटू बन्धो नवतिचतुष्केपि नाष्टविशम् ।। ७७७ ॥ अर्थ-२५ के उदयसहित ९३-९१ का सत्त्व होनेपर २९-३० के बंधस्थान हैं, ९२ का सत्त्व होनेपर आदिके ६ बंधस्थान है, ९० को आदिलेकर ४ का सत्त्व होनेपर २८ के विना पूर्वोक्त ही बंधस्थान है ॥ ७७७ ॥ छवीसे तिगिणउदे उणतीसं बंध दुगखणउदीए । आदिमछक्कं एवं अडसीदितिए ण अडवीसं ॥ ७७८ ॥ षडिशे ध्येकनवतौ एकोनत्रिंशं बन्धो द्विकखनवत्याम् । आदिमषटुमेवमष्टाशीतित्रये नाष्टविंशम् ।। ७७८ ।। अर्थ-२६ के उदयसहित ९३-९१ का सत्त्व होनेपर २९ का बंधस्थान है, ९२- ९० का सत्त्व होनेपर आदिके ६ स्थान है, इसीप्रकार ८८ को आदिलेकर ३ का सत्त्व होनेपर २८ के विना पूर्वोक्त ६ स्थान अर्थात् पांच बंधस्थान हैं ॥ ७७८ ॥ सगवीसे तिगिणउदे णववीसदुवंधयं दुणउदीए आदिमछण्णउदितिए एवं अडवीसयं णत्थि ॥ ७७९ ॥ सप्तविंशे ज्येकनवतौ नवविंशद्विबंधको द्विनवत्याम् । आदिमषण्णवतिनये एवमष्टविंशकं नास्ति ॥ ७७९ ॥ . अर्थ-२७ के उदयसहित ९३-९१ का सत्त्व होनेपर २९ को आदिलेकर २ बंध- स्थान हैं, ९२ का सत्त्व होनेपर आदिके ६ बंधस्थान है, ९० को आदिलेकर ३ सत्त्वं होनेपर २८ के बिना पूर्वोक्त ६ बंधस्थान है ॥ ७७९ ॥ - + . . 5
गोम्मटसारः।
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२३७
अडचीसे तिगिणउदे उणतीसदु दुजुदणउदिणउदितिये ।
वंधो सगवीसं वा णउदीए अत्थि णडवीसं ॥ ७८०॥
अष्टविशे ध्येकनवत्यामेकोनत्रिशद्विक द्वियुतनवतिनवतित्रये ।
बन्धः सप्तविंशं वा नवतौ अस्ति नाष्टविंशम् ॥ ७८० ॥
अर्थ-२८ के उदयसहित ९३-९१ का सत्त्व होनेपर २९-३० के दोबंधस्थान हैं,
९२ का-९० को आदिलेकर ३ स्थानोंका सत्त्व होनेपर २७ के उदयसहितके समान
बंधस्थान है परंतु विशेष इतना है कि ९० का सत्त्व होनेपर २८ का बंधस्थान नही
है ॥ ७८० ॥
अडवीसमिवुणतीसे तीसे तेणउदिसत्तगे बंधो ।
णववीसेकत्तीसं इगिणउदी अट्ठवीसदुगं ॥ ७८१ ॥
तेण दुणउदे णउदे अडसीदे बंधमादिमंछकं ।
चुलसीदेवि य एवं णवरि ण अडवीसवंधपदं ॥७८२॥ जुम्मं ।
अष्टविंश इवैकोनत्रिशे त्रिशे त्रिनवतिसत्त्वके बन्धः ।
नवविशैकत्रिशमेकनवत्यामष्टविंशद्विकम् ॥ ७८१ ॥
तेन द्विनवतौ नवतौ अष्टाशीतौ बन्ध आदिमषदम् ।
चतुरशीत्यामपि च एवं नवरि न अष्टविशबन्धपदम् ॥ ७८२॥ युग्मम् ।
अर्थ-२९ के उदयसहित ९३ आदिका सत्त्व होनेपर २८ के उदयसहितके समान
बंधस्थान है । ३० के उदयसहित ९३ का सत्त्व होनेपर २९-३० के बंधस्थान है, ९१
का सत्त्व होनेपर २८-२९ के बंधस्थान है। तथा ९२-९०-८८ का सत्त्व होनेपर
आदिके ६ बंधस्थान है, ८४ का सत्त्व होनेपर भी इसीप्रकार ६ बंधस्थान है परंतु इतना
विशेप है कि २८ का बंधस्थान नहीं है ॥ ७८११७८२ ॥
तीसुदयं विगितीसे सजोग्गवाणउदिणउदितियसत्चे।
उवसंतचउकुदये सत्ते बंधस्स ण वियारो ॥ ७८३ ॥
त्रिंशोदयं वैकत्रिंशे वयोग्यद्वानवतिनवतित्रयसत्त्वे ।
उपशान्तचतुष्कोदये सत्त्वे बन्धस्य न विचारः ॥ ७८३॥
अर्थ-३१ के उदयसहित अपने २ योग्य ९२-९० को आदिलेकर ३ स्थानोंका
सत्त्व होनेपर ३० के उदयमें कहे गये बंधस्थान है। तथा उपशांतकषायादि चार गुण-
स्थानोंमें उदय-सत्त्व स्थान होनेपर बंधस्थानका विचार नहीं किया गया है क्योंकि उनमें
बंधका अभाव है ॥ ७८३ ॥
२३८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । णामस्स य बंधादिसु दुतिसंजोगा परूचिदा एवं । सुदवणवसंतगुणगणसायरचंदेण सम्मदिणा ॥ ७८४ ॥ नानश्च बन्धादिपु द्वित्रिसंयोगाः प्ररूपिता एवम् । श्रुतवनवसन्तगुणगणसागरचन्द्रेण सन्मतिना ।। ७८४ ॥ अर्थ-इसप्रकार नामकर्मके बंध-उदय-सत्त्वस्थानोंमें द्विसंयोग और त्रिसंयोगी भंग ( भेद ), जैनसिद्धान्तरूपी वनको प्रफुल्लितकरनेमें वसंतऋतुके समान, गुणोंका समूहरूप- सागरके बढानेकेलिये चंद्रमाके समान ऐसे सम्यज्ञानके धारक श्रीवर्द्धमानखामीने कहे है ॥ ७८४ ॥ इति श्री नेमिचन्द्राचार्यविरचित पंचसंग्रह द्वितीयनामवाले गोम्मटसार ग्रंथके कर्म- कांडमें बंधउदयसत्त्वस्थानसमुत्कीर्तन नामका पांचवां अधिकार समाप्त हुमा ॥५॥ दोहा। आसवभाव अभावते भये स्वभावस्वरूप । नमौं सहज आनंदमय अचलित अमल अनूप ॥ १ ॥ आगे प्रत्ययके अर्थात् कर्म आनेका कारण जो आस्रव है उसके अधिकारको आरंभ करनेवाले आचार्य निर्विघ्नतासे समाप्त होनेकेलिये अपने इष्ट गुरूको नमस्कार करते हुए उसके कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं;- णमिऊण अभयणंदि सुदसायरपारगिंदणंदिगुरुं। वरवीरणंदिणाहं पयडीणं पचयं वोच्छं ॥ ७८५ ॥ नत्वा अभयनन्दि श्रुतसागरपारगेन्द्रनन्दिगुरुम् । वरवीरनन्दिनाथं प्रकृतीनां प्रत्ययं वक्ष्ये ॥ ७८५ ॥ अर्थ-मैं "नेमिचंद्र आचार्य" अभयनन्दि नामा मुनीश्वरको, शास्त्रसमुद्रके पारगामी इन्द्रनन्दि नामा गुरूको तथा उत्कृष्ट वीरनंदि नामा खामीको नमस्कार करके कर्मप्रकृति- योंके प्रत्यय अर्थात् कारण ऐसे आस्रवोंको कहता हूं ॥ ७८५ ॥ अब उन आस्रवोंको भेदसहित दिखलाते हैं:- मिच्छत्तं अविरमणं कसायजोगा य आसवा होति । पण वारस पणुवीसं पण्णरसा होंति तब्भया ॥ ७८६ ॥ मिथ्यालमविरमणं कषाययोगौ च आस्रवा भवन्ति । पञ्च द्वादश पञ्चविंशं पञ्चदश भवन्ति तद्भेदाः ॥ ७८६ ।। अर्थ-मिथ्यात्व १ अविरत २ कषाय ३ योग ४-ये चार मूल आस्रव हैं । तथा इनके भेद क्रमसे ५, १२, २५, १५, होते हैं ॥ भावार्थ-जिन्होंकर कार्माणवर्गणा- 1 ..
गोम्मटसारः।
२३९
रूप पुदलस्कंध कर्मपनेको प्राप्त होवें उनका नाम आश्रव है। वे मिथ्यात्वादि परिणाम
है। उनमेंसे "मिथ्यात्व" एकांत विनयादिके भेदसे पांचप्रकार है, "अविरत" ५ इंद्री
तथा छठा मन इनको वशीभूत नही करनेसे ६ भेद और पृथिवीकायादि ५ स्थावरकाय
तथा १ त्रसकाय इनकी दया न करनेसे ६ भेद इसतरह १२ प्रकारका है, कषायके अनं-
तानुबंधी आदि १६ कषाय तथा हास्यादि ९ नोकषाय इसतरह २५ भेद है, मनोयोगा-
दिके भेदसे १५ प्रकार योग है, इसप्रकार सब ५७ भेद होते है ॥ ७८६ ॥
आगे मूलप्रत्ययोंको गुणस्थानोंमें कहते हैं,-
चदुपचइगो बंधो पढमे अंतरतिगे तिपञ्चइगो ।
मिस्सगविदियं उपरिमदुर्ग च देसेक्वदेसम्मि ॥ ७८७ ॥
चतुःप्रत्ययको बन्धः प्रथमे अनन्तरत्रिके त्रिप्रत्ययकः ।
मिश्रकद्वितीय उपरिमद्विकं च देशैकदेशे ॥ ७८७ ॥
अर्थ-मिथ्यादृष्टिगुणस्थानमें ४ प्रत्ययोंसे बंध होता है, उसके बाद सासादन आदि
तीन गुणस्थानोंमें मिथ्यात्वके विना ३ प्रत्ययोंसे ही बंध है, तथा एकदेश असंयमके
त्यागनेवाले देशसंयतगुणस्थानमें दूसरा अविरतप्रत्यय विरतकर मिला हुआ तथा आगेके
दो प्रत्यय-इसप्रकार ३ प्रत्ययोंसे ही बंध है ॥ ७८७ ।।
उवरिलपंचये पुण दुपचया जोगपचओ तिण्हं ।
सामण्णपञ्चया खलु अढण्हं होंति कम्माणं ॥ ७८८ ॥
उपरिमपञ्चके पुनः द्विप्रत्ययौ योगप्रत्ययः त्रयाणाम् ।
सामान्यप्रत्ययाः खलु अष्टानां भवन्ति कर्मणाम् ॥ ७८८ ॥
अर्थ-इस पांचवें स्थानसे आगेके ५ गुणस्थानों में २ प्रत्ययोंसे बंध है, इससे आगे
३ गुणस्थानोंमें १ योगप्रत्ययसे ही बंध होता है । इसतरह निश्चयकर ८ कर्मोके सामा-
न्यप्रत्यय होते है ।। ७८८ ॥
आगे उत्तरप्रत्ययोंको गुणस्थानों में दिखलाते हैं-
पणवण्णा पण्णासा तिदाल छादाल सत्ततीसा य ।
चदुवीसा बावीसा बावीसमपुत्वकरणोति ॥ ७८९ ॥
थूले सोलसपहुदी एगणं जाव होदि दसठाणं ।
सुहुमादिसु दस णवयंणवयं जोगिम्मि सत्तेव ॥७९० ॥जुम्मं ।
पञ्चपञ्चाशत् पञ्चाशत् त्रिचत्वारिंशत् षट्चत्वारिंशत्सप्तत्रिंशच ।
चतुर्विंशतिः द्वाविंशतिः द्वाविंशमपूर्वकरण इति ॥ ७८९ ॥
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २४० स्थूले षोडशप्रभृतय एकोना यावत् भवति दशस्थानम् । सूक्ष्मादिषु दश नवकं नवकं योगिनि सप्तैव ।। ७९० ।। युग्मम् । अर्थ-मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें आहारकयुगलके न होनेसे ५५ प्रत्यय है, सासादनमें ५ मिथ्यात्व भी नही है इसलिये ५० प्रत्यय है, मिश्रमें ४३ हैं, असंयतमें ४६ हैं, देशसंयतमें ३७ हैं, प्रमत्तमें २४ है, अप्रमत्तमें २२ प्रत्यय हैं, अपूर्वकरणमें भी २२ हैं। अनिवृत्तिकरणमें १६ को आदिलेकर एक एक कम १० भेदतक हैं, सूक्ष्मसापरायमें १० है, उपशांतकषायमें ९ तथा क्षीणकषायमें भी ९ प्रत्यय हैं, और सयोगकेवलीमें ७ प्रत्यय है ॥ ७८९१७९० ॥ अयोगीके प्रत्ययका अभाव है। आगे प्रत्ययोंकी व्युच्छित्ति तथा अनुदयके उपयोगी गाथा केशववीकृत कहते हैं- पण-चदु सुण्णं णवयं पण्णारस दोण्णि सुण्णछक्कं च । एक्ककं दस जाव य एक सुण्णं च चारि सग सुण्णं ॥१॥ दोण्णि य सत्त य चोइसणुदयेवि एयार वीस तेत्तीसं। पणतीस दुसिगिदालं सत्तेतालट्टदाल दुसु पण्णं ॥२॥ जुम्मं । पञ्चचतुष्कं शून्यं नवकं पञ्चदश द्वे शून्यं पदं च । एकैकं दश यावच्च एकं शून्यं च चत्वारि सप्त शून्यम् ॥१॥ द्वौ च सप्त च चतुर्दशानुदयेपि एकादश विंशं त्रयस्त्रिंशत् । पञ्चत्रिंशत् द्वयोरेकचत्वारिंशत्सप्तचत्वारिंशदष्टचत्वारिंशत् द्वयोःपञ्च ॥२॥ युग्मम् । अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानोंमें क्रमसे ५, ४, शून्य, ९, १५, २, शून्य, ६, इसके वाद १० आस्रवोंके रहनेतक १, १, १, शून्य, ४, ७, शून्यरूप आस्रवोंकी व्युच्छित्ति है । तथा गुणस्थानों में जो अनुदय अर्थात् आस्रवका अभाव है वह क्रमसे २, ७, १४, ११, २०, ३३, ३५, ४१, ४७, ४८, ५० का जानना चाहिये ॥१२॥ अब उन व्युच्छित्तियोंको दिखलाते हैं;- मिच्छे पणमिच्छत्तं पढमकसायं तु सासणे मिस्से । सुण्णं अविरदसम्मे विदियकसायं विगुव्वदुग कम्मं ॥३॥ ओरालमिस्स तसवह णवयं देसम्मि अविरदेक्कारा । तदियकसायं पण्णर पमत्तविरदम्मि हारदुगछेदो ॥४॥ सुण्णं पमादरहिदे पुवे छण्णोकसाय चोच्छेदो। अणियट्टिम्मि य कमसो एक्ककं वेदतियकसायतियं ॥५॥ सुहुमे सुहुमो लोहो सुण्णं उवसंतगेसु खीणेसु । अलीयुभयवयणमणचउ जोगिम्मि य सुणह वोच्छामि ॥ ६ ॥ १. ये गाथा केशववर्णीके किये हुए होनेसे क्षेपक हैं। . . .
गोम्मटसारः। २४१ सच्चाणुभयं वयणं मणं च ओरालकायजोगं च । ओरालमिस्स कम्मं उवयारेणेव सम्भाओ॥७॥ कुलयं । मिथ्ये पञ्चमिथ्यात्वं प्रथमकषायस्तु सासादने मिश्रे । शुन्यमविरतसम्ये द्वितीयकषायः वैगूर्वद्विक कर्म ॥३॥ औरालमिश्रं त्रसवधः नवकं देशे अविरता एकादश । तृतीयकपायः पञ्चदश प्रमत्तविरते आहारकद्विकच्छेदः ॥ ४ ॥ शून्यं प्रमादरहिते अपूर्वे षण्णोकषायव्युच्छेदः । अनिवृत्तौ च क्रमश एकैकं वेदत्रयकषायत्रयम् ।। ५॥ सूक्ष्मे सूक्ष्मो लोभः शून्यमुपशान्तकेषु क्षीणेषु । अलीकोभयवचनमनश्चतुष्कं योगिनि च शृणुत वक्ष्यामि ॥ ६ ॥ सत्यानुभयं वचनं मनश्च औरालकाययोगश्च । औरालमिभं कामणमुपचारेणैव सद्भावः ॥ ७॥ कुलकम् । अर्थ-मिथ्यात्वगुणस्थानमें ५ मिथ्यात्वाश्रवोंकी व्युच्छित्ति होती है। सासादनमें प्रथम अनतानुबंधी ४ कषायकी, मिश्रमें शून्य, अविरतमें दूसरी चार कषाय-वैक्रियिकद्विक का- र्माणयोग-औदारिकमिश्रयोग-त्रसहिसा ये ९ आस्रवोंकी, देशसंयतमें ११ अविरत तीसरी प्रत्याख्यानी ४ कषाय इसतरह १५ आस्रवोंकी, प्रमत्तविरतमें आहारकयुगलयोगकी, अप्रमत्तमें शून्य, अपूर्वकरणमें हास्यादि नोकषायकी, अनिवृत्तिकरणमें क्रमसे एक एककर ३ वेद संज्वलन ३ तीनकषायोंकी, सूक्ष्मसांपरायमें सूक्ष्मलोभ की व्युच्छित्ति होती है, उपशांतकषायमें शून्य, क्षीणकषायमें असत्य उभय वचनयोग तथा मनोयोग इसप्रकार ४ की व्युच्छित्ति है । सयोगकेवलीके अब व्युच्छित्ति कहते है सो तुम हे शिष्य सुनो । सत्य अनुभय वचनयोग-मनोयोग, औदारिक-औदारिकमिश्रयोग-कर्माणकाय. योग इसप्रकार ७ योग है सो उपचारसे कहे गये हैं ॥३।४।५।६।७॥ आगे आसवको विशेषतासे कहनेकेलिये अधिकार कहते है। अवरादीणं ठाणं ठाणपयारा पयारकूडा य । कूडच्चारणभंगा पंचविहा होंति इगिसमये ॥ ७९१ ॥ अवरादीनां स्थानं स्थानप्रकाराः प्रकारकूटाश्च । कूटोच्चारणभङ्गाः पञ्चविधा भवन्ति एकसमये ॥ ७९१ ॥ अर्थ जघन्य मध्यम उत्कृष्टस्थान, स्थानोंके प्रकार, कूटप्रकार, कूटोच्चारण, भंग, इसतरह प्रत्ययोंके पाच प्रकार एक समयमें होते है ॥ ७९१ ॥ आगे उन प्रकारोंको क्रमसे ६ गाथाओंकर कहते है, दस अट्ठारस दसयं सत्तर णव सोलसं च दोण्हपि । अह य चोइस पणयं सत्त तिये दुति दुगेगमेगमदो ॥७९२ ॥ - ३१ . . - २४२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । दश अष्टादश दशकं सप्तदश नव पोडश च द्वयोरपि । अष्ट च चतुर्दश पञ्चकं सप्त त्रिके द्वित्रिक द्विकैकमेकमतः ॥ ७९२ ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानों में क्रमसे मिथ्यादृष्टिगुणस्थानमें एक जीवके एकही समय 'आसव' जघन्य तो १०-मध्यम एक एक अधिक-उत्कृष्ट १८ होते है, सासादनमें जघन्य १० उत्कृष्ट १७, मिश्र और अविरत इन दोमें जघन्य ९ उत्कृष्ट १६ देशसंयतमें जघन्य ८ उत्कृष्ट १४ का स्थान, प्रमत्तादि तीनमें जघन्य ५ का उत्कृष्ट ७ का स्थान, अनिवृत्तिकरणमें जघन्य २ का उत्कृष्ट ३ का, सूक्ष्मसापरायमें २ का ही स्थान है, इससे आगे उपशांतकषायादि गुणस्थानोंमें एकका ही स्थान है, अयोगीके शून्य है ॥ ७९२ ॥ एकजीवके एककालमें संभवते प्रत्ययोंके समूहको स्थान कहते है। आगे स्थानोके प्रकार कहते है- एकं च तिणि पंच य हेहुवरीदो दु मज्झिमे छक्कं । मिच्छे ठाणपयारा इगिद्गमिदरेसु तिण्णि देसोत्ति ॥७९३ ॥ एकः च त्रयः पञ्च च अधस्तनोपरितस्तु मध्यमे पदम् । मध्ये स्थानप्रकारा एकद्विक्रमितरेषु त्रयः देश इति ।। ७९३ ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टिमें जो ९ स्थान कहे है उनमें ऊपर नीचेके तीन युगलस्थानोंमें १, ३, ५ प्रकार हैं । मध्यके ३ स्थानोंके छह छह प्रकार है । सासादनादि देशसंयत- पर्यंत ऊपरके संतके २ युगलस्थानोंके क्रमसे १-२ प्रकार है, मध्यस्थानके तीन तीन प्रकार है ॥ ७९३ ॥ आगे इन कहे हुए स्थानप्रकारोंके जाननेके लिये कूटप्रकार कहते है;- भयदुगरहियं पढमं एकदरजुदं दुसहियमिदि तिण्णं । सामण्णा तियकूडा मिच्छा अणहीणतिण्णिवि य ॥ ७९४ ॥ भयद्विकरहितं प्रथममेकतरयुतं द्विसहितमिति त्रयः । सामान्यानि त्रयकूटानि मिथ्या अनहीनत्रीण्यपि च ॥ ७९४ ।। अर्थ-भय-जुगुप्सा इन दोनोंसे रहित पहला कूट, भय जुगुप्सा इन दोनोंमेंसे कोई एकसहित दूसरा कूट, अथवा दोनों सहित तीसरा कूट इसप्रकार ३ कूट तो सामान्य तथा अनंतानुबंधी विसंयोजनकरनेवाले मिथ्यादृष्टिके अनंतानुबंधी कषाय रहित ३ कूट अन्य भी जानने चाहिये ॥ ७९४ ॥ आगे जो स्थानप्रकार कहे गये हैं उनके बोलनेके विधानकेलिये कूटोच्चारणप्रकार ' कहते हैं। . - गोम्मटसारः। २४३ मिच्छत्ताणण्णदरं एकेणक्खेण एककायादी। तत्तो कसायवेददुजुगलाणेकं च जोगाणं ॥ ७९५ ॥ मिथ्यावानामन्यतरमेकेनाक्षेण एककायादि । ततः कपायवेदद्वियुगलानामेकं च योगानाम् ॥ ७९५ ॥ अर्थ-५ मिथ्यात्वोंमेंसे १ भेद ६ इंद्रियोंमेंसे १ भेद कायमेंसे १ काय इसके वाद कपायोंमेंसे १ कषाय वेदोंमेंसे १ वेद हास्यादि दो युगलोंमेंसे १ भेद, 'च'से भय जुगुप्सा- मेंसे १ या दो और योगोंमेंसे १ भेद कहना चाहिये, इसप्रकार कूटोच्चारणका विधान होता है ।। ७९५ ॥ आगे इन भंगोंका प्रमाण लानेकेलिये भंगोंके लानेका प्रकार कहते है। अणरहिदसहिदकूडे वावत्तरिसय सयाण तेणउदी। सट्टी धुवा हु मिच्छे भयदुगसंजोगजा अधुवा ॥ ७९६ ॥ अनरहितसहितकूटे द्वासप्ततिशत शतानां त्रिनवतिः। पष्टिः ध्रुवा हि मिथ्ये भयद्विकसयोगजा अध्रुवाः ॥ ७९६ ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टिगुणस्थानमें मिथ्यादृष्टिके अनंतानुबंधीरहित कूटमें ५ मिथ्यात्व ५ इंद्रिय इत्यादिको आपसमें गुणाकरनेसे ७२००, अनंतानुबंधीसहित कूटके आकार रचना- परस्पर गुणनसे ९३६०, येदोनों ध्रुवगुण्य है और एक एकके प्रति भय जुगुप्साके सं- बंधसे ४ भंग तथा कायहिसाके ६३ भंग इसप्रकार ४ और ६३ अध्रुवगुणकार हैं । इनको परस्पर गुणाकरनेसे सब ४१७३१२० भंग होते है ॥ ७९६ ॥ आगे पूर्वोक्त भंगोंकी संख्या कहते है,- चवीसहारसयं तालं चोइस असीदि सोलसयं । छण्णउदी वारसयं वत्तीसं विसद सोल बिसदं च ॥ ७९७ ॥ सोलस विसदं कमसो धुवगुणगारा अपुवकरणोत्ति । अद्धवगुणिदे भंगा धुवभंगाणं ण भेदादो ॥ ७९८ ॥ जुम्म। चतुर्विशाष्टादशशतं चत्वारिंशश्चतुर्दशाशीतिः षोडशशतम् । पण्णवतिः द्वादशशतं द्वात्रिंशद्विशतं षोडश द्विशतं च ॥ ७९७ ॥ षोडश द्विशतं क्रमशो ध्रुवगुणकारा अपूर्वकरण इति । अध्रुवगुणिते भगा ध्रुवभङ्गानां न भेदात् ॥ ७९८ ॥ युग्मम् । अर्थ-ध्रुवगुण्य' अपूर्वकरणगुणस्थानपर्यंत क्रमसे मिथ्यादृष्टिमें पूर्वोक्त, सासादनमें १८२४ मिश्रमें १४४० असंयतमें १६८० देशसंयतमें १२९६ प्रमत्तमें २३२ अप्रमत्तमें २१६ अपूर्वकरणमें २१६ हैं । इनको अपने २ अध्रुवगुणकारोंके साथ गुणाकरनेसे उस २ जगह भंग होते हैं। इससे आगे भुवभंगोंका भेद नहीं है केवल ध्रुव भंग ही हैं ॥७९७/७९८॥ में - २ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २४४ आगे कायवधमें पूर्वोक्त प्रत्येक द्विसंयोगी आदि भंगोंके साधनेकेलिये दूसरा उपाय बतलाते हैं;- छप्पंचादेयंतं रूवुत्तरभाजिदे कमेण हदे। लद्धं मिच्छचउक्के देसे संजोगगुणगारा ॥ ७९९ ।। षट्पञ्चादेकान्तं रूपोत्तरभाजिते क्रमेण हते । लब्धं मिथ्यचतुष्के देशे संयोगगुणकाराः ॥ ७९९ ।। अर्थ-कायवधके ६ तथा ५ के प्रमाणसे लेकर १ पर्यंत संख्या रखकर क्रमसे गुणा- कार करनेसे तथा एक एक अधिक आगेकी संख्यासे भागदेनेपर जो लव्य हो वह मि- ध्यात्वादि चार गुणस्थानोंमें तथा देशसंयतमें प्रत्येक द्विसंयोगी आदि गुणाकार रूप भंग जानने चाहिये ।। ७९९ ॥ आगे प्रत्ययोंके उदयके कार्यभूत जीवके परिणामोंको ज्ञानावरणादिकर्मबंधका कारणपना दिखलाते है।- पडिणीगमंतराए उवधादो तप्पदोसणिण्हवणे । आवरणदुगं भूयो बंधदि अचासणाएवि ॥ ८०० ॥ प्रत्यनीकमन्तराय उपघातस्तत्प्रदोषनिन्हवने । आवरणद्विकं भूयो वनाति अत्यासादनयापि ।। ८०० ।। अर्थ-प्रत्यनीकसे अर्थात् शास्त्र वा शास्त्रके जाननेवाले पुरुषोंमें अविनयरूप प्रवृत्ति करमेसे, ज्ञानमें विच्छेदकरनेरूप अंतरायसे, मन वचनकर प्रशंसायोग्य ज्ञानमें द्वेष रखनेरूप वा ज्ञानीजीवोंको भूख प्यास आदिमें बाधा करनेरूप उपघातसे, तत्त्वज्ञानमें हर्ष नहीं मा- ननेरूप अथवा मोक्षसाधनभूत तत्त्वज्ञानका उपदेश होना अच्छा नहीं लगनेपर अंतरंग- में द्वेष होनेरूप प्रद्वेषसे, आप जानता भी है परंतु किसी कारणसे "ऐसा नहीं है अथवा मैं नहीं जानता अथवा कोईके उपदेशको तीर्थंकरादिक गुरूका कहना" इत्यादि खरूप नि- हवसे तथा किसीके प्रशंसायोग्य उपदेशकी अनुमोदना (तारीफ़) न करनेरूप वा। अन्य अप्रसंगकी वातको वीचमें प्रारंभकर उसके उपदेशको रोकदेनेरूप आसादनासे स्थिति और अनुभाग बंधकी बाहुल्यताकर ज्ञानावरण तथा दर्शनावरण इन दो कर्मोंको बांधता है ॥८००॥' ये ६ कारण ज्ञानमें हों तो ज्ञानावरणके बंधके कारण और जो दर्शनमें हों तो दर्शनावरण- के बंधके कारण होते हैं ऐसा भी जानना । आगे वेदनीयके बंधके कारण दिखलाते है:- भूदाणुकंपवदजोग जिदो खंतिदाणगुरुभत्तो बंधदि भूयो सादं विवरीयो बंधदे. इदरं ।। ८०१॥ -- - ।
गोम्मटसारः। २४५ भूतानुकम्पव्रतयोगयुखितः क्षान्तिदानगुरुभक्तः । बनाति भूयः सातं विपरीतो बध्नाति इतरत् ॥ ८०१॥ अर्थ-सब प्राणियोंपर दयाकरना, अहिंसादि व्रत और समाधि परिणामरूप योग इनकर सहित हो तथा क्रोधके त्यागरूप क्षमा, आहारादि ४ प्रकारका दान अरहंतादि पांच परमेष्ठी गुरूमें भक्तिकर सहित हो ऐसा जीव बहुधाकरके सातावेदनीयको बांधता है। इससे विपरीत अदया आदिका धारक जीव तीव्रस्थिति अनुभागसहित असाता वेदनीय कर्मका बंध करता है । ८०१ ।। आगे दर्शनमोहनीयके प्रत्यय (आस्रव ) कहते है। अरहंतसिद्धचेदियतवसुदगुरुधम्मसंघपडिणीगो। बंधदि दसणमोह अणंतसंसारिओ जेण ॥ ८०२ ॥ अर्हत्सिद्धचैत्यतपःश्रुतगुरुधर्मसंघप्रत्यनीकः। बनाति दर्शनमोहमनन्तसांसारिको येन ।। ८०२ ।। अर्थ-जो जीव, अरहंत सिद्ध प्रतिमा तपश्चरण निर्दोषशास्त्र निर्मथगुरू वीतरागप्रणी- तधर्म और मुनिआदिका समूहरूप सघ-इनसे प्रतिकूल हो अर्थात् इनके स्वरूपसे विपरीत- का ग्रहण करै वह दर्शनमोहको बांधता है कि जिसके उदयसे वह अनंतसंसारमें भटकता है ।। ८०२॥ अब चारित्रमोहके बंधकारण कहते है- तिव्वकसाओ बहुमोहपरिणदो रागदोससंतत्तो। वंधदि चरित्तमोहं दुविहंपि चरित्तगुणघादी ॥ ८०३ ॥ तीव्रकषायो बहुमोहपरिणतो रागद्वेषसंतप्तः । बध्नाति चारित्रमोहं द्विविधमपि चारित्रगुणघाती॥ ८०३ ॥ अर्थ-जो जीव तीव्र कषाय और हास्यादि नोकषाय सहित हो, बहुत मोहरूप परि- णमता हो, राग और द्वेषमें अत्यंत लीन हो तथा चारित्रगुणके नाशकरनेका जिसका खभाव हो ऐसा जीव कषाय और नोकषाय रूप दो प्रकारके चारित्रमोहनीयकर्मको बांधता है ।।८०३॥ आगे नरकायुके बंधकारण दिखाते है। मिच्छो हु महारंभो णिस्सीलो तिब्बलोहसंजुत्तो। णिरयाउगं णिबंधइ पावमई रुद्दपरिणामी ॥ ८०४ ॥ मिथ्यो हि महारम्भो निःशीलः तीव्रलोभसंयुक्तः । निरयायुष्कं निबध्नाति पापमतिः रुद्रपरिणामी ॥ ८०४ ॥ अर्थ-जो जीव मिथ्यादृष्टि हो, बहुत आरंभी हो, शील रहित हो, तीव्रलोभी हो, रौद्र परिणामी हो, पापकार्य करनेकी बुद्धिसहित हो वह जीव नरकायुको बाधता है ।। ८०१ ॥
- 4 - - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २४६ आगे तिर्यंच आयुके कारण कहते है- उम्मग्गदेसगो मग्गणासगो गूढहियय माइल्लो। सठसीलो य ससल्लो तिरिया बंधदे जीवो ॥ ८०५॥ उन्मार्गदेशको मार्गनाशको गूढहृदयो मायावी । शठशीलश्च सशल्यः तिर्यगायुष्कं वनाति जीवः ।। ८०५ ॥ अर्थ-जो जीव विपरीत मार्गका उपदेश करनेवाला हो भले मार्गका नाशक हो गूढ अर्थात् दूसरेको न मालूम होवे ऐसा हृदयका परिणाम जिसका हो मायांचारी हो मूर्खता सहित जिसका खभाव हो मिथ्या आदि ३ गल्योंकर सहित हो वह जीव तियेच आयुको बांधता है।॥ ८०५ ॥ आगे मनुष्यायुके वंधकारणोंको कहते है। पयडीए तणुकसाओ दाणरदी सीलसंजमविहीणो । मज्झिमगुणहि जुत्तो मणुवाऊ वंधदे जीवो ॥ ८०६ ।। प्रकृत्या तनुकषायो दानरतिः शीलसंयमविहीनः । मध्यमगुणैः युक्तो मानवायुष्कं वध्नाति जीवः ।। ८०६॥ अर्थ-जो जीव खभावसे ही मंद क्रोधादिकषायवाला हो, दानमें प्रीतियुक्त हो, शील संयमकर रहित हो, मध्यमगुणोंकर सहित हो अर्थात् न तो उत्कृष्ट गुण हों न दोष हों, वह जीव मनुष्यायुको बांधता है ॥ ८०६ ॥ अब देवायुके बंधकारणोंको कहते है। अणुवदमहत्वदेहि य वालतवाकामणिजाराए य । देवाउगं णिवंधइ सम्माइट्टी य जो जीवो ॥ ८०७ ॥ अणुव्रतमहाव्रतैश्च वालतपोकामनिर्जरया च । देवायुष्कं निवध्नाति सम्यग्दृष्टिश्च यो जीवः ।। ८०७ ।। अर्थ-जो जीव सम्यग्दृष्टि है वह केवल सम्यक्त्वसे वा साक्षात् अणुव्रत महाव्रतोंसे देवायुको बांधता है तथा जो मिथ्यादृष्टि है वह अज्ञानरूपवाले तपश्चरणसे वा विना इच्छा बंधादिसे हुई अकामनिर्जरासे देवायुको बांधता है ॥ ८०७ ॥ आगे नामकर्मके कारण कहते है- मणवयणकायवको माइल्लो गारवेहिं पतिवद्धो। असुहं बंधदि णामं तप्पडिवक्खेहि सुहणामं ॥ ८०८ ॥ मनोवचनकायवक्रो मायावी गर्वैः प्रतिबद्धः । अशुभं बध्नाति नाम तत्प्रतिपक्षैः शुभनाम ।। ८०८॥ in - गोम्मटसारः। २४७ अर्थ-जो 'जीव' मन वचनकायसे कुटिल हो अर्थात् सरल न हो, कपटकरनेवाला हो, अपनीप्रशंसा चाहनेवाला तथा करनेवाला हो वह नरकगति आदि अशुभ नामकर्मको बांधता है । और पूर्वोक्तसे विपरीत खभाववाला हो अर्थात् सरलयोगवाला निष्कपट प्रशंसा न चाहनेवाला हो वह शुभनामकर्मका बंध करता है ।। ८०८ ॥ आगे गोत्रकर्मके बंधकारणोंको कहते है:- अरहंतादिसु भत्तो सुत्तरुची पढणुमाणगुणपेही। बंधदि उच्चागोदं विवरीओ बंधदे इदरं ॥ ८०९॥ अहंदादिषु भक्तः सूत्ररुचिः पठनानुमननगुणदर्शी । बध्नाति उच्चगोत्रं विपरीतो बनातीतरत् ॥ ८०९ ॥ अर्थ-जो जीव अहंतादि पांच परमेष्ठियोंमें भक्तिवंत हो, वीतरागकथित शास्त्रमें प्रीति रखता हो, पढना विचार करना इत्यादि गुणोंका दर्शक हो वह जीव ऊंच गोत्रका बंध करता है । और पूर्वोक्तसे विपरीत करनेवाला नीचगोत्रको बांधता है ॥ ८०९ ॥ आगे अंतरायकर्मके बंधकारणोंको दिखलाते है- पाणवधादीसु रदो जिणपूजामोक्खमग्गविग्घयरो। अजेइ अंतरायं ण लहइ जं इच्छियं जेण ॥ ८१०॥ प्राणवधादिषु रतो जिनपूजामोक्षमार्गविघ्नकरः । अर्जयति अन्तरायं न लभते यदीप्सितं येन ॥ ८१०॥ अर्थ-जो जीव अपने वा परके प्राणोंकी हिंसा करनेमें लीन हो और जिनेश्वरकी पूजा तथा रत्नत्रयकी प्राप्तिरूप मोक्षमार्गमें विघ्न डालै वह अंतरायकर्मका उपार्जन करता है जिसके उदयसे वांछितवस्तुको नहीं पाता है ॥ ८१० ॥ इति श्री नेमिचन्द्राचार्य विरचित पंचसंग्रह द्वितीयनामवाले गोम्मटसार ग्रंथके कर्मकांडमें प्रत्ययनिरूपण नामका छठा अधिकार समाप्त हुआ ॥६॥ दोहा । करि अभाव भवभाव सब, सहजभावनिज पाय । जय अपुनर्भवभावमय, भये परम शिवराय ॥१॥ आगे भावचूलिका नामा अधिकारके कहनेकी नमस्कारात्मक मङ्गलाचरणपूर्वक प्रतिज्ञा करते हैं- गोम्मटजिणिंदचंदं पणमिय गोम्मटपयत्थसंजुत्तं । गोम्मटसंगहविसयं भावगयं चूलियं वोच्छं ॥ ८११ ॥ गोम्मटजिनेन्द्रचन्द्रं प्रणम्य गोम्मटपदार्थसंयुक्तम् । गोम्मटसंग्रहविषयं भावगतं चूलिकां वक्ष्ये ।। ८११ ।। । -- , P २४८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-मैं नेमिचन्द्र आचार्य, नेमिनाथस्वामीरूप चंद्रमाको नमस्कार करके समीचीन पद और अर्थकर सहित अथवा उत्तम पदार्थोके वर्णन सहित ऐसे गोम्मटसार ग्रंथमें प्राप्त भावोंके अधिकारको कहता हूं ॥ ८११ ।। जेहिंदु लक्खिजंते उसमआदीसु जणिदभावहिं। जीवा ते गुणसण्णा णिहिट्ठा सचदरसीहिं ॥ ८१२ ।। यैस्तु लक्ष्यन्ते उपशमादिपु जनितभावैः । जीवास्ते गुणसंज्ञा निर्दिष्टाः सर्वदर्शिमिः ॥ ८१२ ॥ अर्थ-जिन अपने प्रतिपक्षीकोंके उपशमादिकके होनेपर उत्पन्न हुए ऐसे औपशमि- कादि भावोंकर जीव पहचाने जावें वे भाव'गुण' ऐसी संज्ञारूप सर्व दर्शियोंने कहे हैं ।।८१२॥ अब उन भावोंके नाम भेदसहित कहते है:- उवसम खइओ मिस्सो ओदयियो पारिणामियो भावो। भेदा दुग णय तत्तो दुगुणिगिवीसं तियं कमसो ॥ ८१३ ॥ औपशमिकः क्षायिको मिश्र औदयिकः पारिणामिको भावः । भेदा द्विकं नव ततो द्विगुणमेकविंशतिः त्रयः क्रमशः ।। ८१३ ।। अर्थ-वे भाव औपशमिक १ क्षायिक २ मिश्र ३ औदयिक ४ पारिणामिक ५ इस- तरह पांच प्रकार है और उनके भेद क्रमसे २,९,१८,२१,३ इसतरह जानने चाहिये ८१३ अब इन भावोंकी उत्पत्तिका प्रकार कहते है। कम्मुवसमम्मि उवसमभावो खीणम्मि खइयभावो दु । उदयो जीवस्स गुणो खओवसमिओ हवे भावो ॥ ८१४ ॥ कम्मुदयजकम्मिगुणो ओदयियो तत्थ होदि भावो दु। कारणणिरवेक्खभवो सभावियो होदि परिणामो॥८१५॥ जुम्मं । कर्मोपशमे उपशमभावः क्षीणे क्षायिकभावस्तु । उदयो जीवस्य गुणः क्षायोपशमिको भवेत् भावः ।। ८१४ ॥ कर्मोदयजकर्मिगुण औदयिकस्तत्र भवति भावस्तु । कारणनिरपेक्षभवः खाभाविको भवति परिणामः ॥ ८१५ ॥ युग्मम् । अर्थ-प्रतिपक्षीकर्मके उपशम होनेसे 'औपशमिकभाव' होता है, उन कोंके बिलकुल क्षय होनेसे क्षायिकाव होता है, और उन प्रतिपक्षीकर्मोंका उदय भी हो परंतु जीवका. गुण भी प्रगट,रहे वहां मिश्ररूप क्षायोपशमिकभाव होता है । कर्मके उदयसे उत्पन्न हुआ संसारी जीवका गुण जहां हो वह औदयिक भाव है और उपशमादिकारणके विना खाभा- विक भाव वह परिणामिकभाव है ।। ८१४१८१५ ॥
गोम्मटसारः। २४९. आगे भावोंके भेदरूप उत्तरभावोंको कहते है,- उवसमभावो उवसमसम्मं चरणं च तारिसं खइओ। खाइय णाणं दंसण सम्म चरित्तं च दाणादी ॥ ८१६ ॥ उपशमभाव उपशमसम्यक्त्वं चरणं च तादृशः क्षायिकः। क्षायिक ज्ञानं दर्शनं सम्यक्त्वं चारित्रं च दानादयः ॥ ८१६ ॥ अर्थ-औपशमिक भाव है वह उपशमसम्यक्त्व और उपशमचारित्रके भेदसे २ तरह- का है । उसीप्रकार क्षायिकभाव' क्षायिकज्ञान १ दर्शन २ सम्यक्त्व ३ चारित्र ४ दान ५ लाभ ६ भोग ७ उपभोग ८ वीर्य ९ ऐसे ९ प्रकार है ॥ ८१६ ॥ खाओवसमियभावो चउणाण तिदंसणं तिअण्णाणं । दाणादिपंच वेदगसरागचारित्तदेसजमं ॥ ८१७ ॥ क्षायोपशमिकभावः चतुर्ज्ञानं त्रिदर्शनं व्यज्ञानम् । दानादिपञ्च वेदकसरागचारित्रदेशयमम् ॥ ८१७ ॥ अर्थ-क्षायोपशमिकभाव' मतिज्ञानादि ४ ज्ञान, चक्षुरादि ३ दर्शन, कुमति आदि ३ अज्ञान, दानादि ५, वेदकसम्यक्त्व १ सरागचारित्र १ और देशसंयम-इसतरह १८ भेदों सहित है ॥ ८१७ ॥ ओदयिया पुण भावा गदिलिंगकसाय तह य मिच्छत्तं । लेस्सासिद्धासंजमअण्णाणं होंति इगिवीसं ॥ ८१८ ॥. औदयिकाः पुनः भावा गतिलिङ्गकषायास्तथा च मिथ्यात्वम् । लेश्यासिद्धासंयमाज्ञानं भवन्ति एकविशतिः ॥ ८१८ ॥ अर्थ और 'औदयिकभाव' ४ गति ३ लिंग (वेद) ४ कषाय एक मिथ्यात्व ६ लेश्या १ असिद्धत्व १ चारित्रके अभावरूप असंयम १ अज्ञान-इसरीतिसे २१ प्रकार है।।८१८॥ जीवत्तं भवत्तमभवत्तादी हवंति परिणामा । इदि मूलुत्तरभावा भंगवियप्पे बहू जाणे ॥ ८१९ ॥ जीवत्वं भव्यत्वमभव्यत्वादयो भवन्ति परिणामाः । इति मूलोत्तरभावा भङ्गविकल्पे बहवो जानीहि ॥ ८१९ ॥ अर्थ-जीवत्व १ भव्यत्व १ अभव्यत्व १ ये तीन पारिणामिकभाव है, इनमें किसी कर्मका निमित्त नहीं है ये तो स्वाभाविक होते है । इसतरह मूलभाव ५ उत्तरभाव ५३ हैं यदि इनके भी भेद किये जावें तो बहुत होसक्ते है ऐसा जानना ।। ८१९ ॥ ओघादेसे संभवभावं मूलुत्तरं ठवेदूण । पत्तेये अविरुद्धे परसगजोगेवि भंगा हु॥ ८२० ॥ ३२ -- २५० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ओघादेशे संभवभावं मूलोत्तरं स्थापयित्वा । प्रत्येके अविरुद्ध परस्वकयोगेपि भगा हि ॥ ८२० ।। अर्थ-गुणस्थान और मार्गणाओंमें सभवते मूलभाव और उत्तरभावोंको स्थापन करके प्रमादोंके अक्षसंचार ( भेदोंके बोलनेका ) विधानके समान यहांपर भी प्रत्येक मंग और विरोधरहित परसंयोगी तथा खसंयोगीमें भंग होते हैं ॥ ८२० ॥ आगे मूलभावोंकी संख्या और स्वपरके संयोगरूप संख्याको कहते हैं:- मिच्छतिये तिचउक्के दोसुवि सिद्धेवि मूलभावा हु। तिग पण पणगं चउरो तिग दोणि य संभवा होति ॥२१॥ मिथ्यत्रये त्रिचतुष्के द्वयोरपि सिद्धपि मूलभावा हि । त्रिकं पञ्च पञ्चकं चत्वारः त्रिकं द्वौ च संभवा भवन्ति ।। ८२१ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि तीन गुणस्थानोमें,असंयतादि चार गुणस्थानोंमें, उपशमश्रेणीके १ गुणस्थानोंमें, क्षपकश्रेणीके चारोंमें-इसतरह तीन चौकड़ीमें तथा सयोगी अयोगी इनदोनोंमें और सिद्धजीवमें क्रमसे संभव होनेवाले मूलभाव ३,५,५, ४, ३,२ जानने चाहिये ॥८२१॥ तत्थेव मूलभंगा दसछवीसं कमेण पणतीसं । उगुवीसं दस पणगं ठाणं पडि उत्तरं वोच्छं ॥ ८२२ ।। तत्रैव मूलभङ्गा दश पड़िशं क्रमेण पञ्चत्रिशत् । एकोनविशं दश पञ्चकं स्थानं प्रति उत्तरं वक्ष्यामि ।। ८२२ ॥ अर्थ-उन पूर्वकथित छह भेदोंमें क्रमसे मूलभंग १०, २६, ३५, १९, १०, ५ होते है । इसके बाद गुणस्थानोंके प्रति उत्तरभावोंको कहूंगा॥ ८२२ ॥ उत्तरभावोंके भेद सामान्य पनेसे गुणस्थानोंमें कहते है-मिथ्यादृष्टिमें औदयिकके २१, ३ अज्ञान २ दर्शन ५ लब्धि इसप्रकार क्षायोपगमिकके १०, पारिणामिकके ३ भेद-इस- तरह ३४ भाव है । सासादनमें मिथ्यात्वके औदयिकके २०, क्षायोपशमिकके १०, जी- वत्व-भव्यत्व इसतरह पारिणामिकके २ भेद सब ३२ भेद हैं । मिश्रगुणस्थानमें औदयि- कके २०, मिश्ररूप३ ज्ञान ३ दर्शन ५ लब्धिरूप क्षायोपशमिकके ११ भेद, भव्यत्व-जीवत्व ऐसे पारिणामिकके २ भेद-सब मिलकर ३३ भेद है। असंयत गुणस्थानमें औदयिकके २०, ३ ज्ञान ३ दर्शन ५ लब्धि १ सम्यक्त्व ऐसे क्षायोपशमिकके १२, उपशमसम्यक्त्व १, क्षायिकसम्यक्त्व १, जीवत्व-भव्यत्व ऐसे पारिणामिकभावके २ भेद इसतरह सब ३६ भेद ' है । देशसंयंतमें मनुष्यगति-तिर्यंचगति ४ कषाय ३ लिंग ३ शुभलेश्या १ असिद्धत्व १ अज्ञान ऐसे औदयिकके १४ भेद, ३ ज्ञान ३ दर्शन ५ लब्धि १ सम्यक्त्व १ देशचारित्र ऐसे क्षायोपशमिकके १३, उपशमसम्यक्त्व, क्षायिकसम्यक्त्व, जीवत्व-भव्यत्व ऐसे पारि- णामिककेदो भेद-इसतरह सब ३१ भेद है। इनमें तिर्यंचगति और देशचारित्र कमकरके तथा - .
गोम्मटसारः।
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मनःपर्ययज्ञान-सरागचारित्र ये दो भेद मिलानेसे ३१-३१ प्रमत्त और अप्रमत्तमें होते हैं।
इन भेदोंमें पीतलेश्या-पद्मलेश्या-क्षायोपशमिकसम्यक्त्व-क्षायोपशमिकचारित्र घटाके उपशम
चारित्र-क्षायिक चारित्र मिलानेसे २९-२९ भाव अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणमें है । इन
भेदोंमेंसे लोमके विना ३ कषाय ३ लिंग घटानेसे सूक्ष्मसांपरायमें २३ भाव है। इनमें भी
लोभकषाय १ क्षायिक चारित्र १ कम करनेसे उपशांतकषायमें २१ भेद हैं । इनमें औपश-
मिकके २ दो भेद घटाकर क्षायिकचारित्र मिलानेसे क्षीणकषायमें २० भेद है। मनुष्य-
गति-शुक्ललेश्या-असिद्धत्व ऐसे औदयिकके ३ भेद, क्षायिकके ९ पारिणामिकके जीवत्व-
भव्यत्व ऐसे दो भेद इसतरह सयोगी गुणस्थानमें १४ भाव है । इन भेदोंमेंसे शुक्ललेश्या
घटानेपर अयोगीके १३ भाव है । तथा सम्यक्त्व ज्ञान दर्शन वीर्य ऐसे क्षायिकके ४ भेद
जीवत्व पारिणामिकभाव-इसतरह सिद्धजीवोंके ५ भाव है । इसप्रकार नाना जीवोंकी अपेक्षा
ये ५३ भाव कहे गये है।
अब उत्तरभावोंके भेद दूसरे प्रकारसे कहते है-
उत्तरभंगा दुविहा ठाणगया पदगयात्ति पढमम्मि।
सगजोगेण य भंगाणयणं णस्थित्ति णिदिई ॥ ८२३ ॥
उत्तरभङ्गा द्विविधाः स्थानगताः पदगता इति प्रथमे ।
स्वकयोगेन च भङ्गानयनं नास्तीति निर्दिष्टम् ॥ ८२३ ॥
अर्थ-उत्तरभावोंके भंग दो प्रकार है-स्थानगत और पदगत । पहले स्थानगत मंगमें
खसंयोगीभंग नहीं पाये जाते है क्योंकि एक ही समय एक स्थानमें दूसरा कोई स्थानका
होना संभव नहीं है ऐसा कहा है ॥ ८२३ ॥ एक जीवके एककालमें जितने जितने भाव
पाये जावें उनके समूहका नाम स्थान है उसकी अपेक्षाकर जो भंग करना वे स्थानगत हैं।
तथा एक जीवके एकही काल जो जो भाव पाये जावें उनकी एक जातिका वा जुदे २ का
नाम पद है उसकी अपेक्षा जो भंग करना उनको पदगत कहते हैं।
मिच्छदुगे मिस्सतिये पमत्तसत्ते य मिस्सठाणाणि ।
तिग दुग चउरो एकं ठाणं सबत्थ ओदयियं ॥ ८२४ ॥
मिथ्यद्विके मिश्रनये प्रमत्तसप्तके च मिश्रस्थानानि ।
त्रिक द्विकं चत्वारि एकं स्थानं सर्वत्र औदयिकम् ॥ ८२४ ॥
अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि दो गुणस्थानोंमें, मिश्रादि तीनमें और प्रमत्त आदि सात
गुणस्थानोंमें क्रमसे क्षायोपशमिक भावके स्थान ३, २, ४ जानने । तथा औदयिक भावका
स्थान सब गुणस्थानोंमें एक एक ही है ।। ८२४ ॥
तत्थावरणजभाषा पणछस्सत्तेव दाणपंचेव ।
अयदचउके वेदगसम्म देसम्मि देसजमं ॥ ८२५ ॥
। । २५२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । तत्रावरणजभावा पञ्चपट्सप्पैव दानपञ्चैव । अयतचतुष्के वेदकसम्यं देशे देशयमम् ।। ८२५ ।। अर्थ-उन पूर्वोक्त तीनोंमें ज्ञानावरण दर्शनावरणके निमित्तसे उत्पन्न हुए क्षायोपग- मिक भाव मिथ्यादृष्टि आदि दो गुणस्थानों में ३ अज्ञान २ दर्शन ऐसे ५ है । मिश्रादि तीनमें आदिके ३ ज्ञान ३ दर्शन इसतरह ६ है । प्रमत्तादि सात गुणस्थानोंमें आदिके ४ ज्ञान ३ दर्शन इसरीतिसे ७ हैं । दानादिक पांच भाव मिथ्यादृष्टिसे लेकर बारवें तक है। वेदक सम्यक्त्व असंयतादि ४ गुणस्थानों में है। देशसंयम देशसंयत गुणस्थानमें होता है ।।८२५॥ रागजमं तु पमत्ते इदरे मिच्छादिजेठाणाणि । वेभंगेण विहीणं चक्खुविहीणं च मिच्छदुगे ।। ८२६ ॥ रागयमं तु प्रमत्ते इतरस्मिन् मिथ्यादिजेष्ठस्थानानि । वैभङ्गेन विहीनं चक्षुर्विहीनं च मिथ्यद्विके ॥ ८२६ ।। अर्थ-सरागचारित्र प्रमत्त और अप्रमत्तगुणस्थानमें है, "इसतरह यथा संभव भाव मि- लानेसे मिथ्यादृष्टि आदि क्षीण कपाय पर्यत क्रमसे क्षायोपशमिक भावके उत्कृष्ट स्थान १०, १०, ११, १२, १३, १४, १२, १२, १२, १२, १२ रूप जानने" तथा मि- थ्यादृष्टि आदि दो गुणस्थानोंमें विभंग रहित ९ का स्थान और चक्षुदर्शनसे भी रहित ८ का स्थान और पूर्वोक्त १० का स्थान—इसतरह तीन तीन स्थान है ।। ८२६ ॥ अवधिदुगेण विहीणं मिस्सतिए होदि अण्णठाणं तु । मणणाणेणवधिद्गेणुभयेणूणं तदो अण्णे ॥ ८२७ ॥ अवधिद्विकेन विहीनं मिश्रत्रये भवति अन्यत्स्थानं तु । मनोज्ञानेनावधिद्विकेनोभयेनोनं ततः अन्यानि ॥ ८२७ ।। अर्थ-मिश्रादि तीन गुणस्थानोंमें एक तो अपना अपना उत्कृष्ट स्थान और अवधि ज्ञान अवधिदर्शन इन दोनोंसे रहित मिश्रमें ९ का स्थान, असंयतमें १० का देशसंयतमें ११ का इसतरह दो दो स्थान है। प्रमत्तादि सातमें एक तो अपना अपना स्थान तथा एक मनःपर्ययज्ञान रहित एक अवधिज्ञान अवधिदर्शनरहित, एक स्थान अवधिज्ञान- अवधिदर्शन-मनःपर्ययज्ञानरहित-इसप्रकार प्रमत्त अप्रमत्तमें १३-१२-११ के तीन तीन खान, अपूर्वकरणादि पांचमें ११-१०-९ के तीन तीन स्थान, ऐसे चार चार स्थान जानने चाहिये ॥ ८२७॥ आगे औदयिकके स्थानोंमें भावोंके वदलनेसे जो भंग होते है उनको गुणस्थानोंमें कहते हैं- लिंगकसाया लेस्सा संगुणिदा चदुगदीसु अविरुद्धा । वारस वावत्तरियं तत्तियमेत्तं च अडदालं ॥ ८२८ ॥ r 1 M गोम्मटसार। २५३२ लिङ्गकषाया लेश्याः संगुणिता चतुर्गतिपु अविरुद्धा। द्वादश द्वासप्ततिः तावन्मानं च अष्टचत्वारिंशत् ॥ ८२८ ।। अर्थ-नरकादि चार गतियोंमें विरोधरहित यथासंभव लिंग-कषाय-लेश्याओंको आप- समें गुणाकार करनेपर क्रमसे १२, ७२, ७२, ४८, भंग होते हैं । ८२८ ॥ णवरि विसेसं जाणे सुर मिस्से अविरदे य सुहलेस्सा। चदुवीस तत्थ भंगा असहायपरकमुद्दिट्टा ॥ ८२९ ॥ नवरि विशेष जानीहि सुरे मिश्रे अविरते च शुभलेश्या. । चतुर्विंश तत्र भगा असहायपराक्रमोद्दिष्टाः ॥ ८२९ ।। अर्थ-इतना विशेष जानना चाहिये कि मिश्र और अविरत गुणस्थानमें देवगतिमे ३ शुभलेश्या ही है इसकारण वहांपर २४ ही भंग होते है, ऐसे असहाय पराक्रमवाले श्रीवर्द्धमानस्वामीने कहे है ।। ८२९ ॥ चक्खूण मिच्छसासणसम्मा तेरिच्छगा हवंति सदा। चारिकसायतिलेस्साणभासे तत्व भंगा हु ॥ ८३० ॥ चक्षुरूनं मिथ्यसासनसम्यञ्चः तैरश्चिका भवन्ति सदा । चतुःकपायत्रिलेश्यानामभ्यासे तत्र भगा हि ॥ ८३० ।। अर्थ-चक्षुदर्शन रहित मिथ्यादृष्टि और सासादन सम्यग्दृष्टि हमेशा तिर्यच ही होते है, इसकारण १ नपुंसकवेद ४ चार कषाय और ३ लेश्याओको आपसमें गुणा करनेसे वहांपर १२ भंग नियमसे जानने चाहिये ॥ ८३० ॥ खाइयअविरदसम्मे चउ सोल विहत्तरी य वारं च । तहेसो मणुसेव य छत्तीसा तब्भवा भंगा ॥ ८३१ ।। क्षायिकाविरतसम्ये चत्वारः पोडश द्वासप्ततिश्च द्वादश च । तद्देशो मनुष्य एव च षट्त्रिंशत् तद्भवा भङ्गाः ।। ८३१ ।। अर्थ क्षायिक अविरत सम्यग्दृष्टीके नारकी आदि चार गतियों में क्रमसे ४, १६, ७२, १२ भंग होते है । और क्षायिकसम्यग्दृष्टी देशसंयत मनुष्य ही होता है, वहापर वेद कषाय शुभलेश्याओंको गुणा करनेसे ३६ भंग होते है ।। ८३१ ॥ परिणामो दुट्ठाणो मिच्छे सेसेसु एक्कठाणो दु । सम्मे अण्णं सम्मं चारित्ते णत्थि चारित्तं ॥ ८३२ ॥ परिणामो द्विस्थानो मिथ्ये शेषेषु एकस्थानस्तु । सम्ये अन्यत्सम्यं चारित्रे नास्ति चारित्रम् ॥ ८३२ ।। अर्थ-पारिणामिक भावके मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें दो स्थान है जीवत्व भन्यत्व, जीवत्व अभव्यत्व । शेषद्वितीयादि गुणस्थानोंमें १ स्थान ही है जीवत्व भव्यत्व । तथा सम्यक्त्व ३ -- - - - . . + रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २५४ सहित स्थानमें दूसरा सम्यक्त्व नहीं होता और चारित्रसहित स्थानमें दूसरा चारित्र नहीं होता ॥ ८३२॥ मिच्छद्गयदचउक्के अठ्ठठाणेण खयियठाणेण । जुद परजोगजभंगा पुध आणिय मेलिदवा हु ॥ ८३३ ॥ मिथ्यद्विकायतचतुष्के अष्टस्थानेन क्षायिकस्थानेन । युतं परयोगजभङ्गा पृथगानीय मेलयितव्या हि ॥ ८३३ ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टि आदि दो स्थानोंमें, असंयतादि चार गुणस्थानों में, क्षायोपशमिकके ८ के स्थानमें पूर्वकथित औदयिक भंगोंकर सहित तथा क्षायिक सम्यक्त्वके स्थानमें पूर्वक- थित औदयिक भंगोंकर सहित परसंयोगसे उत्पन्न हुए भंगोंको जुदे २ लेकर अपनी अपनी राशिमें मिलाना चाहिये ॥ ८३३ ॥ अब पूर्वोक्त गुण्योंके गुणाकार और क्षेप प्रगट करते है;- उदयेणक्खे चडिदे गुणगारा एव होंति सव्वत्थ । अवसेसभावठाणेणक्खे संचारिदे खेवा ॥ ८३४ ॥ उदयेनाक्षे चटित गुणकारा एव भवन्ति सर्वत्र । अवशेषभावस्थानेनाक्षे संचारित क्षेपाः॥ ८३४ ।। अर्थ-औदयिक भावके स्थानकर अक्षका (भेदोंका) संचार विधानकर (बदलनेसे) सब जगह जो भंग हों वे भंग गुणकार जानने । और शेष भावोंके स्थानमें अक्षसंचारकर जो भंग हों वे क्षेप जानने ॥ ८३४ ॥ जिसको मिलाया जावे उसे क्षेप कहते हैं। आगे पूर्वोक्त गुण्यादिकोंको दिखलाते है:- दुसु दुसु देसे दोसुवि चउरुत्तर दुसदगसिदिसहिदसदं । वावत्तरि छत्तीसा बारमपुज्वे गुणिजपमा ॥ ८३५ ॥ बारचउतिढुगमेकं थूले तो इगि हवे अजोगित्ति । पुण वार बार सुण्णं चउसद छत्तीस देसोत्ति ॥८३६॥ जुम्मं । द्वयोः द्वयोः देशे द्वयोरपि चतुरुत्तरद्विशतकमशीतिसहितशतम् । द्वासप्ततिः षट्त्रिंशत् द्वादश अपूर्वे गुण्यप्रमा ॥ ८३५ ।। द्वादशचतुनिद्विकैकं स्थूले अतः एको भवेत् अयोगीति । पुनः द्वादश द्वादश शून्यं चतुःशतं षत्रिंशत् देश इति ॥ ८३६ ॥ युग्मम् । अर्थ-औदयिक भावके गुण्यरूप भंग मिथ्यादृष्टि आदिक दो गुणस्थानों में २०४ प्रत्येक है, मिश्रादि दो गुणस्थानोमें १८० हैं, देशसंयतमें ७२ हैं, प्रमत्तादि दो गुणस्था- नोंमें ३६ है, अपूर्वकरणमें १२ है, अनिवृत्तिकरणके भागोंमें क्रमसे १२-४-३-२-१ - गोम्मटसारः। २५५ है, इसके बाद अयोगीपर्यंत एक एक है। फिर मिथ्यादृष्टिआदि देशसंयतपर्यंत क्षायिक सम्यक्त्वीकी अपेक्षा कमसे १२, १२, शून्य, १०४, ३६ है ॥ ८३५/८३६ ॥ वामे दुसु दुसु दुसु तिसु खीणे दोसुवि कमेण गुणगारा । णव छचारस तीसं वीसं वीसं चउकं च ॥८३७॥ वामे द्वयोः द्वयोः द्वयोः त्रिपु क्षीणे द्वयोरपि क्रमेणे गुणकाराः। नव पट् द्वादश त्रिश विशं विशं चतुष्कं च ॥ ८३७ ॥ अर्थ-जिनसे गुणाकिया जावे ऐसे 'गुणकार' क्रमसे मिथ्यादृष्टिमें ९, सासादनादि दो में ६, असंयतादि २ में १२, प्रमत्तादि दो में ३०, अपूर्वकरणादि तीन गुणस्थानोंमें २०, क्षीणकषायमें २०, सयोगी अयोगीमें ४ है ।। ८३७ ॥ पुणरवि देसोत्ति गुणो तिदुणभछछक्कयं पुणो खेवा । पुवपदे अड पंचयमेगारमुगुतीसमुगुवीसं ॥ ८३८ ॥ पुनरपि देश इति गुणः त्रिद्विनभःषदष्टुं पुनः क्षेपाः । पूर्वपदे अष्ट पञ्चकमेकादश एकोनविंशमेकोनविंशम् ॥ ८३८ ॥ अर्थ-फिर उनमेंभी चक्षुदर्शनरहित वा क्षायिकसम्यक्त्वकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि से लेकर देशसंयततक गुणकार ३, २, शून्य, ६, ६ जानना । और 'क्षेप' पूर्वोक्त स्थानमें अर्थात् मिथ्यादृष्टिमें ८, सासादनादि दो गुणस्थानों में ५, असंयतादि दो में ११, प्रमचादि दो में २९ अपूर्वकरणादि तीनमें १९ है ॥ ८३८ ॥ उगुवीस तियं तत्तो तिदुणभछछक्कयं च देसोत्ति । चउसुवसमगेसु गुणा तालं रुऊणया खेवा ॥ ८३९ ॥ एकोनविंशं त्रयः ततः त्रिद्विनभाषट्पदं च देश इति । चतुर्पूपशामकेपु गुणाः चत्वारिंशत् रूपोनाः क्षेपाः ॥ ८३९ ॥ अर्थ-क्षीणकषायमें १९, सयोगी अयोगीमें ३ है, तथा चक्षुदर्शनरहित वा क्षायिक सम्यग्दृष्टीकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टी आदि देशसंयतपर्यंत क्रमसे ३, २, शून्य, ६, ६ क्षेप है। और उपशमश्रेणीके चार गुणस्थानोंमें गुणाकार ४० तथा क्षेप उसमेंसे १ कम अर्थात् ३९ है ॥ ८३९॥ मिच्छादिठाणभंगा अट्ठारसया हवंति तेसीदा। वारसया पणवण्णा सहस्ससहिया हु पणसीदा ॥ ८४०॥ मिथ्यादिस्थानभङ्गा अष्टादशशतं भवन्ति ज्यशीतिः। द्वादशशतं पञ्चपञ्चाशत् सहस्रसहिताहि पञ्चाशीतिः ॥ ८४०॥ अर्थ-पूर्वोक्त गुण्योंको गुणाकारोंसे गुणनेपर और क्षेपोंको मिलानेसे मिथ्यादृष्टि- ३ - E ८ - + r २५६" रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आदि गुणस्थानों में स्थानोंके भंग क्रमसे मिथ्यादृष्टिमें १८८३, सासादनमें १२५५, मिश्र- में १०८५ होते है ॥ ८४० ॥ रूवाहियडवीससया सगणउदा दससया णवेणहिया। एकारसया दोण्हं खवगेसु जहाकम वोच्छं ॥ ८४१ ॥ रूपाधिकाष्टविशशतानि सप्तनवतिः दशशतानि नवेनाधिकाः । एकादशशतानि द्वयोः क्षपकेपु यथाक्रमं वक्ष्यामि ।। ८४१ ॥ अर्थ-असंयतगुणस्थानमें २८०१, देशसंयतमें १०९७, प्रमत्तादि दो गुणस्थानों में ११०९ भंग होते हैं । क्षपकश्रेणीवालोंके यथाक्रम कहूंगा ।। ८४१ ॥ पुव्वंपंचणियट्टीसुहुमे खीणे दहाण छब्बीसा। तत्तियमेत्तो दसअडछच्चदुचदुचदुय एगूणं ॥ ८४२ ॥ अपूर्वपञ्चानिवृत्तिसूक्ष्मे क्षीणे दशानां पदिशतिः । तावन्मात्रा दशाष्टषट्चतुश्चतुश्चतुष्कमेकोनम् ।। ८४२ ॥ अर्थ-अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरणके पांच भाग, सूक्ष्मसापराय, क्षीणकपाय इन आठ क्षपकस्थानोंमें क्रमसे दशगुने छन्वीस १ कम अर्थात् २५९, उतने ही अर्थात् २५९, ९९, ७९, ५९, ३९, ३९, ३९ भंग होते है ॥ ८४२ ॥ उवसामगेसु दुगुणं रूवहियं होदि सत्त जोगिम्हि । सत्तेव अजोगिम्मि य सिद्धे तिण्णेव भंगा हु ॥ ८४३ ॥ उपशामकेपु द्विगुणं रूपाधिकं भवति सप्त योगिनि । सप्तव अयोगिनि च सिद्ध त्रय एव भङ्गा हि ॥ ८४३ ॥ अर्थ-उपशमश्रेणीके चार गुणस्थानों में पूर्वोक्त भंगोंसे दूने और १ अधिक भंग जानने चाहिये । सयोगीमें ७ अयोगीमें भी ७ और सिद्ध भगवानके ३ ही भंग होते है ।।८४३॥ इंसप्रकार स्थानभंग कहे। आगे पदभंगोंको कहते है- दुविहा पुण पदभंगा जादिगपदसवपदभवात्ति हवे। जातिपदखइगमिस्से पिंडेव य होदि सगजोगो ॥ ८४४॥ द्विविधाः पुनः पदभङ्गा जातिगपदसर्वपदभवा इति भवेत् । जातिपदक्षायिकमिश्रे पिण्डे एव च भवति स्वकयोगः ।। ८४४ ॥ अर्थ-पदभंग दो तरहके होते है एक तो जातिपदभंग १ दूसरे सर्व पदभंग २, उनमेंसे जातिपदरूप जो क्षायिक भाव मिश्रभाव इनके पिंडपदखरूप भावोंमें खसंयोगी भी भंग पाये जाते हैं ।। ८४४ ॥ . १ - 1 - 1 - - .
गोम्मटसारः। २५७ अयदुवसमगचउक्के एक दो उवसमस्स जादिपदो। खइगपदं तत्थेकं खवगे जिणसिद्धगेसु दु पण चदू ॥ ८४५॥ अयतौपशमिकचतुष्के एक द्वे उपशमस्य जातिपदम् । क्षायिकपदं तत्रैकं आपके जिनसिद्धकेषु द्वे पञ्च चत्वारि ॥ ८४५ ॥ अर्थ-औपशमिक भावके जातिपद असंयतादि चार गुणस्थानोंमें सम्यक्त्वरूप एक ही है, उपशमश्रेणीके चार गुणस्थानोंमें सम्यक्त्व और चारित्र इसतरह दो जातिपद है । क्षा- यिकभावके जातिपद असंयतादि चारमें क्षायिकसम्यक्त्वरूप एक ही है, क्षपकश्रेणीके चार गुणस्थानों में सम्यक्त्व चारित्र ऐसे दो जातिपद है, सयोगी अयोगी केवलीके सम्यक्त्व ज्ञान २ दर्शन ३ चारित्र : लब्धि ५-इसतरह ५ जातिपद है, सिद्धोंमें चारित्रके विना ४ जातिपद होते है ॥ ८४५॥ मिच्छतिये मिस्सपदा तिणि य अयदम्मि होंति चत्तारि । देसतिये पंचपदा ततो खीणोति तिण्णिपदा ॥ ८४६ ॥ मिथ्यत्रये मिश्रपदानि त्रीणि च अयते भवन्ति चत्वारि । देशत्रये पञ्चपदानि ततः क्षीण इति त्रिपदानि ।। ८४६ ॥ अर्थ-मिश्रभावके जातिपद मिथ्यादृष्टिआदि तीन गुणस्थानोंमें तीन तीन है, असं- यत गुणस्थानमें चारित्रके विना ४ है, देशसंयतादि तीनगुणस्थानोंमें ५ पद है, उसके बाद क्षीणकषायपर्यंत ज्ञान १ दर्शन २ लब्धि ३ इसतरह तीन पद है ॥ ८४६ ॥ मिच्छे अट्ठदयपदा ते तिसु सत्तेव तो सवेदोत्ति । छस्सुहुमोत्ति य पणगं खीणोत्ति जिणेसु चदुतिदुगं ॥ ८४७॥ मिथ्ये अष्टोदयपदानि तानि त्रिपु सप्तैवात सवेद इति । षट् सूक्ष्म इति च पञ्चकं क्षीण इति जिनेषु चतुनिद्विकम् ॥ ८४७ ॥ अर्थ-औदयिकभावके जातिपद मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें ८, सासादनादि तीनगुणस्था- नोंमें मिथ्यात्वके विना ७, इसके बाद अनिवृत्तिकरण गुणस्थानके सवेदभागपर्यंत असयम- के विना ६, इससे आगे सूक्ष्मसांपरायपर्यंत वेद विना ५, इसके बाद क्षीणकषायपर्यंत कषायके विना ४, सयोगीके अज्ञान विना ३, अयोगीमें लेश्या विना गति और असिद्ध ये दो हैं ॥ ८४७॥ मिच्छे परिणामपदा दोण्णि य सेसेसु होदि एकं तु । जातिपदं पडि वोच्छं मिच्छादिसु भंगपिंडं तु ॥ ८४८ ॥ मिथ्ये परिणामपदे द्वे च शेषेषु भवति एकं तु। जातिपदं प्रति वक्ष्यामि मिथ्यादिषु भङ्गपिण्ड तु ॥ ८४८ ॥ .
. २५८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-पारिणामिकभावके जातिपद मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें जीवत्व भव्यत्व वा जीवत्व अभव्यत्व ऐसे दो है। शेष गुणस्थानोंमें भव्यत्व-जीवत्वरूप एक ही है। तथा मिथ्यादृष्टि आदि गुणस्थानोंमें अब जातिपदकी अपेक्षा भंगोंका समुदाय कहता हूं ॥ ८४८ ।। आगे गुण्यादिकोंकी संख्या कहते हैं;- अट्ठ गुणिज्जा वामे तिसु सग छच्चउसु छक्क पणगं च । थूले सुहुमे पणगं दुसु चउतियद्गमदो सुण्णं ॥ ८४९॥ अष्ट गुण्यानि वामे त्रिपु सप्त षट् चतुर्पु षटुं पञ्चकं च । स्थूले सूक्ष्मे पञ्चकं द्वयोः चतुत्रिकद्विकमतः शून्यम् ॥ ८४९ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें गुण्य ८ सासादनादि तीनमें ७ देशसंयतादि ३ और क्षपकश्रेणी-उपशमश्रेणीका अपूर्वकरण इसतरह चार गुणस्थानोंमें ६, अनिवृत्तिकरणमें ६ वा ५ सूक्ष्मसापरायमें ५ उपशांतकषायादि दोमें ४ सयोगीमें ३ अयोगीमें २ गुण्य इसके बाद सिद्ध भगवानके शून्य जानने चाहिये ॥ ८४९ ॥ वारछवीसं तिसु तिसु बत्तीसयं च चउवीसं । तो तालं चउवीसं गुणगारा वार वार णभं ॥ ८५० ।। द्वादशाष्टषड्विशं त्रिषु त्रिषु द्वात्रिंशत्कं च चतुर्विंशम् । अतः चत्वारिंशत् चतुर्विशं गुणकारा द्वादश द्वादश नभः ।। ८५० ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टिमें गुणकार १२ सासादनमें ८ मिश्रौ ८ असंयतमें २६ देशसंयतादि तीनमें ३२ क्षपक अपूर्वकरणादि तीनमें २४ उपशम अपूर्वकरणादि चारमें ४० क्षीणकषायमें २४ सयोगीमें १२ अयोगीमें १२ गुणकार हैं इसके बाद सिद्ध भगवानके शून्य अर्थात् कोई गुणकार नहीं है ॥ ८५०॥ वामे चउदस दुसु दस अडवीसं तिसु हवंति चोत्तीसं । तिसु छच्चीस दुदालं खेवा छब्बीस वार वार णवं ॥ ८५१ ॥ वामे चतुर्दश द्वयोः दश अष्टविशं त्रिपु भवन्ति चतुत्रिशत् । त्रिषु षडिशं द्विचत्वारिंशत् क्षेपाः षदिशं द्वादश द्वादश नव ॥ ८५१ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें क्षेपसंख्यारूप पद १४, सासादनादि दोमें १०, असं- यतमें २८ देशसंयतादि तीनमें ३४, क्षपक अपूर्वकरणादि तीनमें २६, उपशमक अपूर्व- करणादि चारमें १२ क्षीणकषायमें २६ सयोगीके १२ अयोगीके १२ क्षेपपद हैं और सिद्धके ९ जानने चाहिये ।। ८५१ ।। अव गुण्यको गुणाकारके साथ गुणाकरनेसे तथा क्षेपोंके मिलानेसे भंगोंकी संख्या दिखलाते हैं:- .
. गोम्मटसारः। २५९ एकारं दसगुणियं दुसु छावट्ठी दसाहियं बिसयं । तिसु छव्वीसं बिसयं वेदुवसामोत्ति दुसय वासीदी ॥८५२॥ वादालं बेण्णिसया तत्तो सुहुमोत्ति दुसय दोसहियं । उवसंतम्मि य भंगाखवगेसु जहाकम वोच्छं ॥ ८५३॥जुम्मं । एकादश दशगुणितं द्वयोः षट्षष्टिः दशाधिकं द्विशतम् । त्रिषु षड़िशं द्विशतं वेदोपशम इति द्विशतं व्यशीतिः ॥ ८५२ ।। द्वाचत्वारिंशहिशतं ततः सूक्ष्म इति द्विशतं द्विसहितम् । उपशान्ते च भगाः क्षपकेषु यथाक्रमं वक्ष्यामि ॥ ८५३ ॥ युग्मम् । अर्थ-मिथ्यादृष्टिमें ११० भंग है, सासादनादि दोगुणस्थानों में ६६ भंग है, असं- यतमें २१०, देशसंयतादि तीनमें २२६, उपशमक अपूर्वकरणादि अनिवृत्तिकरणके सवे- दभागतक २८२ भंग है । इससे आगे उपशमक वेदरहित अनिवृत्तिकरण सूक्ष्मसांपरायतक २४२ है, उपशांतकषायमें २०२ भंग है। अब क्षपकमें यथाक्रमसे कहता हूं। ८५२।८५३ ॥ सत्तरसं दसगुणिदं येदित्ति सयाहियं तु छादालं। सुहुमोत्ति खीणमोहे वावीससयं हवे भंगा ॥ ८५४ ॥ अडदालं छत्तीसं जिणेसु सिद्धेसु होति णव भंगा। एत्तो सवपदं पडि मिच्छादिसुसुणह वोच्छामि ॥८५५॥जुम्म। सप्तदश दशगुणितं वेद इति शताधिक तु षट्चत्वारिंशत् । सूक्ष्म इति क्षीणमोह द्वाविंशशतं भवेयुः भङ्गाः ।। ८५४ ॥ अष्टचत्वारिंशत् षट्त्रिंशत् जिनेषु सिद्धेपु भवन्ति नव भङ्गाः। एतस्मात्सर्वपदं प्रति मिथ्यादिपु शृणुत वक्ष्यामि ॥ ८५५ ॥ युग्मम् । अर्थ-अपूर्वकरणसे सवेद अनिवृत्तिकरणतक १७०, वेदरहित अनिवृत्तिकरणसे सूक्ष्म- सांपरायतक १४६, क्षीणकषायमें १२२ भंग होते है । सयोगीके ४८ अयोगीके ३६ और सिद्धोंके ९ भंग होते है । इससे आगे अब मै सर्वपदोंकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि आदिमें भंग कहता हूं सो हे भव्यो! तुम सुनो। ८५४१८५५॥ सर्वपद दो प्रकार है पिंडपद १ प्रत्येकपद २॥ अब उन दो भेदोंमेंसे पिंडपदोंको दिखलाते है,- भबिदराणण्णदरं गदीण लिंगाण कोहपहुदीणं । इगिसमये लेस्साणं सम्मत्ताणं च णियमेण ॥ ८५६ ॥ भव्येतरयोन्यतरत् गतीनां लिङ्गानां क्रोधप्रभृतीनाम् । एकसमये लेश्यानां सम्यक्त्वानां च नियमेन ॥ ८५६ ।। अर्थ-एकसमयमें एकजीवके भन्यत्व अभव्यत्व इन दोनोंमेंसे एकही नियमसे होता है । गति-लिंग-क्रोधादिकषाय-लेश्या-सम्यक्त्व इनमें भी अपने अपनेभेदों से एक - २६० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । एक ही संभव होता है इसकारण ये पिंडपद हैं ।। ८५६ ॥ एक कालमें एक जीवके भाव- समूहमेंसे एक एक ही पाया जावे उन भावोंको पिंडपद कहते हैं। पत्तेयपदा मिच्छे पण्णरसा पंच चेव उवजोगा। दाणादी ओदयिये चत्तारि य जीवभावो य ।। ८५७ ॥ प्रत्येकपदानि मिथ्ये पञ्चदश पञ्च चैव उपयोगाः । दानादयः औदयिके चत्वारि च जीवभावश्च ।। ८५७ ।। अर्थ-एक समयमें जो पाये जावें ऐसे प्रत्येकपद, मिथ्यादृष्टि में ५ उपयोग, दानादि- क पांच क्षयोपशमलब्धियां और औदयिक भावोंके मिथ्यात्वादि ४ और १ जीवत्वरूप पारिणामिकभाव-इसतरह १५ है ॥ ८५७ ॥ पिंडपदा पंचेव य भविदरदुगं गदी य लिंगं च । कोहादी लेस्सावि य इदि वीसपदा हु उडेण ॥ ८५८ ।। पिण्डपदानि पञ्चैव च भव्येतरद्विकं गतिश्च लिङ्गं च । क्रोधादयः लेश्या अपि च इति विंशपदानि हि वृद्ध्या ॥ ८५८ ॥ अर्थ-उन १५ प्रत्येक पदोंके ऊपर पिंडपद मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें ५ है उनके 'भव्य अभव्यका युगल, गति, लिंग, क्रोधादिकपाय और लेश्या' ऐसे नाम हैं । सब मि- लकर १५+५-२० पद होते है सो इनको ऊपर ऊपर स्थापन करना चाहिये ॥ ८५८ ॥ पत्तेयाणं उपरि भविदरदुगस्स होदि गदि लिंगे। कोहादिलेस्ससम्मत्ताणं रयणा तिरिच्छेण ॥ ८५९ ॥ प्रत्येकानामुपरि भव्येतरद्विकस्य भवति गतिलिङ्गयोः । क्रोधादिलेश्यासम्यक्त्वानां रचना तिरश्वा ।। ८५९ ॥ अर्थ-प्रत्येकपदोंके ऊपर जो स्थापना किये गये भव्य अभव्यत्व युगल, गति, लिंग, क्रोधादि ४ कषाय, लेश्या और सम्यक्त्व है उनकी रचना तिरछी (वरावर) करनी चाहिये ॥ ८५९ ॥ एक्कादि दुगुणकमा एककं रुधिऊण हेम्मि । पदसंजोगे भंगा गच्छं पडि होंति उवरुवार ॥ ८६० ॥ एकादि द्विगुणक्रमादेकैकं पदसंयोगे भगा गच्छं प्रति भवन्ति उपर्युपरि ।। ८६० ॥ अर्थ-एकसे लेकर दूने दूने क्रमसे एक एक पदका आश्रयकरके नीचेके पदोंके सं- योगसे जोनसा पद होवे उसके प्रमाण प्रति ऊपर ऊपरके भंग होते हैं ।। ८६० ॥ आगे अंगोंके योग ( मिलाने के लिये गाथासूत्र कहते है- रुवा अधस्तने। .
गोम्मटसारः। २६१ इपदे रुऊणे दुगसंवग्गम्मि होदि इट्टधणं । असरित्थाणंतधणं दुगुणेगूणे सगीयसव्वधणं ॥ ८६१ ॥ इष्टपदे रूपोने द्विकसंवर्गे भवति इष्टधनम् । असदृशानामन्तधनं द्विगुणे एकोने स्वकीयसर्वधनम् ॥ ८६१ ॥ अर्थ-विवक्षितपदमें एक कम करनेसे जो शेष रहें उतने दो दोके अंक लिखकर वर्ग करनेसे (आपसमें गुणाकरनेसे) विवक्षितपदमें भंगोंका प्रमाणरूप इष्टधन होता है यही प्रत्येकपदका अंतधन है । उस इष्टधनको दूना करके उसमें १ घटानेसे जो प्रमाण हो उतना प्रथमपदसे लेकर विवक्षित पदतक सब पदोंके भंगोंका जोडरूप सर्वधन है ॥ ८६१ ॥ आगे इसीकथनको गाथाओंसे दिखलाते है- तेरिच्छा हु सरित्था अविरददेसाण खयियसम्मत्तं । मोत्तूण संभवं पडि खयिगस्सवि आणए भंगे ॥ ८६२ ॥ तिर्यश्चि हि सहशानि अविरतदेशयोः क्षायिकसम्यक्त्वम् । मुक्त्वा संभवं प्रति क्षायिकस्यापि आनयेत् भङ्गान् ॥ ८६२ ॥ अर्थ-पिंडपदरूप भावोंकी तिर्यक् (वरोवर ) रचनाकर और असंयत तथा देशसंयत गुणस्थानमें क्षायिकसम्यक्त्वको छोडकर अन्यभावोंमें गुणस्थानोंका आश्रयकर यथासंभव भंग जानने चाहिये । इसीप्रकार क्षायिकसम्यक्त्वके भी यथासमव जुदे २ भंग समझने चाहिये ॥ ८६२ ॥ उद्दतिरिच्छपदाणं दव्वसमासेण होदि सव्वधणं । सव्वपदाणं भंगे मिच्छादिगुणेसु णियमेण ॥ ८६३ ॥ ऊर्ध्वतिर्यक्पदानां द्रव्यसमासेन भवति सर्वधनम् । सर्वपदानां भंगे मिथ्यादिगुणेषु नियमेन ।। ८६३ ।। अर्थ-मिथ्यादृष्टिआदि गुणस्थानों में प्रत्येकपद और पिंडपदके भंगरूप धनको मि- लानेसे उस उस गुणस्थानके सर्वपदोंका मंगरूप सर्वधन नियमसे होता है ॥ ८६३ ॥ मिच्छादीणं दुति दुसु अपुवअणियट्टिखवगसमगेसु । सुहुमुवसमगे संते सेसे पत्तेयपदसंखा ॥ ८६४ ॥ पण्णर सोलद्वारस वीसुगुवीसं च वीसमुगुवीसं । इगिवीस वीसचउदसतेरसपणगं जहाकमसो ॥८६५॥ जुम्मं । मिथ्यादीनां द्वित्रिषु द्वयोः अपूर्वानिवृत्तिक्षपकोपशमकेषु । सूक्ष्मोपशमके शान्ते शेषे प्रत्येकपदसंख्या ॥ ८६४ ॥ पञ्चदश षोडशाष्टादश विशैकोनविंशं च विंशमेकोनविशम् । एकविंशं विंशचतुर्दशत्रयोदशपञ्चकं यथाक्रमशः ॥ ८६५ ।। युग्मम् ।
२६२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-वे 'प्रत्येकपद' मिथ्यादृष्टि आदि दो गुणस्थानोंमें १५, मिश्रादि तीन गुणस्सा- नोंमें १६, प्रमत्तादि दो गुणस्थानोंमें १८, क्षपक उपशम दोनों श्रेणियोंके अपूर्व और अ- निवृत्तिकरण गुणस्थानमें २०-१९, उपशमक सूक्ष्मसापरायमें २०, उपशांतकपायमें १९, शेष क्षपकसूक्ष्मसांपरायमें २१, क्षीणकषायमें २०, सयोगीमें १४, अयोगीमें १३ सिद्ध । ५ क्रमसे जानने चाहिये ॥ ८६४८६५॥ मिच्छाइटिप्पहुदि खीणकसाओत्ति सवपदभंगा। पण्णाठिं च सहस्सा पंचसया होति छत्तीसा ।। ८६६ ॥ मिथ्यादृष्टिप्रभृति क्षीणकपाय इति सर्वपदभगाः । पञ्चषष्टिः च सहस्राणि पञ्चशतानि भवन्ति पत्रिंगत् ।। ८६६ ।। . अर्थ-मिथ्यादृष्टि से लेकर क्षीणकषायगुणस्थानतक ६५५३६ सर्वपद भंग गुण्यरूप होते है ॥ ८६६॥ तग्गुणगारा कमसो पणणउदेयत्तरीसयाण दलं । ऊणटारसयाणं दलं तु सत्तहियसोलसयं ॥ ८६७ ।। तद्गुणकाराः क्रमशः पञ्च नवत्येकसप्ततिशतानां दलम् । एकोनमष्टादशशतानां दुलं तु सप्ताधिकपोडशशतम् ॥ ८६७ ।। अर्थ -उस गुण्यके गुणकार क्रमसे मिथ्यादृष्टिआदि गुणस्थानोंमे ७१९५ के आधे प्रमाण एक कम १८०० के आधे प्रमाण, १६०७ है ।। ८६७ ॥ तेवतरि सयाई सत्तावठी य अविरदे सम्मे । सोलस चेव सयाई चउसट्टी खयियसम्मस्स ॥ ८६८ ॥ त्रिसप्ततिशतानि सप्तषष्टिश्च अविरते सम्ये। षोडश चैव शतानि चतुःषष्टिः क्षायिकसम्यस्य ।। ८६८ ॥ अर्थ-असंयतसम्यग्दृष्टीके ७३६७ गुणकार है, उसमें क्षायिकसम्यग्दृष्टीके १६६१ हैं ॥ ८६८ ॥ उणत्तीससयाई एकाणउदी य देसविरदम्मि । छावत्तरि पंचसया खइयणरे णत्थि तिरियम्मि ॥ ८६९ ॥ एकोनत्रिंशच्छतानि एकनवतिश्च देशविरते । षट्सप्ततिः पञ्चशतानि क्षायिकनरे नास्ति तिरश्चि ।। ८६९ ॥ अर्थ-देशसंयतगुणस्थानमें २९९१ गुणकार है, उसमेंभी क्षायिकसम्यग्दृष्टी मनुष्यके ५७६ हैं तिर्यचके नहीं है ।। ८६९ ।। इगिदालं च सयाई चउदालं च य पमत्त इदरे य। पुव्वुवसमगे वेदाणियहिभागे सहस्सम₹णं ॥ ८७० ॥ 1 •in - ܚܝ गोम्मटसारः। २६३ एकचत्वारिंशच शतानि चतुश्चत्वारिशच च प्रमत्ते इतरस्मिश्च । अपूर्वोपशमके वेदानिवृत्तिभागे सहस्रमष्टोनम् ॥ ८७० ॥ अर्थ-प्रमत्त और अप्रमत्तगुणस्थानमें ११४४ गुणकार है, उपशमश्रेणीके अपूर्वकरण तथा सवेद अनिवृत्तिकरणमें ८ कम एक हजार अर्थात् ९९२ है ॥ ८७० ॥ अडसट्टी एकसयं कसायभागम्मि सुहुमगे संते । अडदालं चउवीसं खबगेसु जहाकम वोच्छं ॥ ८७१ ॥ अष्टपष्टिः एकशतं कपायभागे सूक्ष्मके शान्ते । अष्टचत्वारिंशत् चतुर्विशं क्षपकेषु यथाक्रमं वक्ष्यामि ॥ ८७१ ।। अर्थ-कषायसहित और वेदरहित अनिवृत्तिकरणके भागमें १६८ गुणकार हैं, सूक्ष्म- सांपरायमें ४८ हैं, उपशांतकषायमें २४ है । अब क्षपकश्रेणीमें यथाक्रमसे कहता हूं ॥८७१॥ अडदालं चारिसयापुब्वे अणियद्विवेदभागे य । सीदी कसायभागे तत्तो बत्तीस सोलं तु ॥ ८७२॥ अष्टचत्वारिंशत् चतुःशतान्यपूर्वे अनिवृत्तिवेदभागे च । अशीतिः कषायभागे ततो द्वात्रिंगत् षोडश तु ॥ ८७२ ॥ अर्थ-अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणके वेदभागमें ४१८ गुणकार है, कषायसहित वेदरहित अनिवृत्तिकरणके भागमें ८० है, उससे आगे सूक्ष्मसापरायमें ३२ और क्षीण- कपायमें १६ है ॥ ८७२॥ जोगिम्मि अजोग्गिम्मि य वेसदछप्पण्णयाण गुणगारा । चउसट्टी बत्तीसा गुणगुणिदेकूणया सब्बे ॥ ८७३ ॥ योगिनि अयोगिनि च द्विशतषट्पञ्चाशतां गुणकाराः । चतुःषष्टिः द्वात्रिंशत् गुण्यगुणिते एकोनकाः सर्वे ।। ८७३ ।। अर्थ-सयोगी और अयोगीके २५६ गुण्य है, तथा गुणकार क्रमसे ६४-३२ हैं। इसतरह गुण्यको गुणकारों के साथ गुणाकरके जो प्रमाण हो उसमें १ कम करनेसे सर्वपद- भंगोंका प्रमाण होता है ।। ८७३ ॥ सिद्धेसु सुद्धभंगा एकत्तीसा हवंति णियमेण । सच्चपदं पडि भंगा असहायपरकमुहिट्ठा ॥ ८७४ ॥ सिद्धेषु शुद्धभङ्गा एकत्रिंशत् भवन्ति नियमेन । सर्वपदं प्रति भङ्गा असहायपराक्रमोद्दिष्टाः ॥ ८७४ ।। अर्थ-सिद्धोंमें गुण्य गुणकारके भेदरहित शुद्ध ३१ सर्वपदभंग नियमसे होते हैं । इसप्रकार, सहायरहित पराक्रमवाले श्रीमहावीरस्वामीने सर्वपदोके मंग कहे है ।। १७४ ॥ .
- रायचन्द्रजैनशासमालायाम् । २६४ आदेसेवि य एवं संभवभावहिं ठाणभंगाणि । पदभंगाणि य कमसो अव्यामोहेण आणेजो ॥ ८७५ ॥ आदेशेपि च एवं संभवभावैः स्थानभङ्गा। पदभङ्गाश्च क्रमशः अव्यामोहेन आनेवाः ॥ ८७५ ॥ अर्थ-इसीप्रकार यथासंभव भावोंकर मार्गणास्थानमें भी स्थानभंग और पदमंग क्रमसे सावधान होके जानने चाहिये ।। ८७५ ॥ आगे जिनमें सर्वथा एकनयका ग्रहण पाया जावे ऐसे जो एकांतमत हैं उनके भेदोंको कहते है:- असिदिसदं किरियाणं अक्किरियाणं च आहु चुलसीदी। सत्तट्टण्णाणीण वेणयियाणं तु बत्तीसं ॥ ८७६ ॥ अशीतिशतं क्रियानामक्रियाणां चाहुः चतुरशीतिः । सप्तषष्टिरज्ञानिनां वैनयिकानां तु द्वात्रिंशत् ।। ८७६ ॥ अर्थ-क्रियावादियोंके १८०, अक्रियावादियोंके ८४, अज्ञानवादियोंके ६७ और वै- नयिकवादियोंके ३२ भेद है॥ ८७६ ॥ अब उनमें से क्रियावादियोंके मूलभंग कहते हैं;- अस्थि सदो परदोवि य णिचाणिञ्चत्तणेण य णवत्था । कालीसरप्पणियदिसहावेहि य ते हि भंगा हु ॥ ८७७ ॥ अस्ति स्वतः परतोपि च नित्यानित्यत्वेन च नवार्थाः । कालेश्वरात्मनियतिस्वभावैश्च ते हि भगा हि ॥ ८७७ ।। अर्थ-~-पहले 'अस्ति' ऐसा पद लिखना उसके ऊपर 'आपसे' 'परसे' 'नित्यपनेसे' 'अनित्यपनेसे' ऐसे ४ पद लिखने, उनके ऊपर जीवादि ९ पदार्थ लिखने, उनके ऊपर 'काल' 'ईश्वर' 'आत्मा' 'नियति' 'खभाव' इसतरह ५ पद लिखने-इसप्रकार १४४४९४५ का गुणा करनेसे १८० भंग होते है॥ ८७७ ॥ अत्थि सदो परदोवि य णिचाणिच्चत्तणेण य णवत्था । एसिं अत्था सुगमा कालादीणं तु वोच्छामि ॥ ८७८ ॥ अस्ति स्वतः परतोपि च नित्यानित्यत्वेन च नवार्थाः । एषामर्थाः सुगमाः कालादीनां तु वक्ष्यामि ॥ ८७८ ।। अर्थ-अस्ति अपनेसे-परसे-नित्यपनेकर-अनित्यपनेकर-नवपदार्थ-इन १४ का अर्थ तो सुगम ( सीधा ) है । और कालवादादिकोंका अर्थ क्रमसे कहता हूं ॥ ८७८ ॥ कालो सव्वं जणयदि कालो सव्वं विणस्सदे भूदं । जागत्ति हि सुतेसुवि ण सकदे वंचिदं कालो ॥ ८७९ ॥ - - , गोम्मटसारः। २६५ कालः सर्व जनयति कालः सर्व विनाशयति भूतम् । जागर्ति हि सुप्तेष्वपि न शक्यते वश्चितुं कालः ॥ ८७९ ॥ अर्थ-काल ही सबको उत्पन्न करता है और काल ही सबका नाश करता है, सोते हुए प्राणियोंमें काल ही जागता है ऐसे कालके ठगनेको कोंन समर्थ हो सक्ता है। इसप्रकार कालसे ही सवको मानना यह कालवादका अर्थ है ॥ ८७९ ॥ अण्णाणी हु अणीसो अप्पा तस्स य सुहं च दुक्खं च । सग्गं णिरयं गमणं सव्वं ईसरकयं होदि ॥ ८८० ॥ अज्ञानी हि अनीश आत्मा तस्य च सुखं च दुःखं च । वर्ग निरयं गमनं सर्वमीश्वरकृतं भवति ॥ ८८०॥ अर्थ-आत्मा ज्ञानरहित है, अनाथ है अर्थात् कुछभी नहीं करसकता, उस आत्माके सुख-दुःख, खर्ग तथा नरकमें गमन वगैरः सब ईश्वरकर कियाहुआ होता है-ऐसे ईश्वरकर किया सब कार्य मानना ईश्वरवादका अर्थ है ॥ ८८० ॥ एक्को चेव महप्पा पुरिसो देवो य सव्ववावी य । सव्वंगणिगूढोवि य सचेयणो णिग्गुणो परमो ।। ८८१ ॥ एकश्चैव महात्मा पुरुषो देवश्च सर्वव्यापी च । सर्वाङ्गनिगूढोपि च सचेतनो निर्गुणः परमः ॥ ८८१ ॥ अर्थ-संसारमें एक ही महात्मा है, वही पुरुष है, वही देव है और सबमें व्यापक है, सागपनेसे अगम्य (छुपा हुआ) है, चेतना सहित है, निर्गुण है और उत्कृष्ट है । ऐसे आत्मासे ही सबको मानना आत्मवादका अर्थ है ॥ ८८१ ॥ जत्तु जदा जेण जहा जस्स य णियमेण होदि तत्तु तदा । तेण तहा तस्स हवे इदि वादो णियदिवादो दु ।। ८८२ ।। यत्तु यदा येन यथा यस्य च नियमेन भवति तत्तु तदा । तेन तथा तस्य भवेदिति वादो नियतिवादस्तु ॥८८२॥ अर्थ-जो जिससमय जिससे जैसे जिसके नियमसे होता है वह उससमय उससे तैसे उसके ही होता है-ऐसा नियमसे ही सब वस्तुको मानना उसे नियतिवाद कहते हैं ॥ ८८२ ॥ को करइ कंटयाणं तिक्खत्तं मियविहंगमादीणं । विविहत्तं तु सहाओ इदि सव्वंपि यं सहाओत्ति ॥ ८८३॥ कः करोति कण्टकानां तीक्ष्णवं मृगविहङ्गमादीनाम् । विविधत्वं तु खभावः इति सर्वमपि च स्वभाव इति ॥ ८८३ ॥- 1. .
. २६६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-कांटेको आदि लेकर जो तीक्ष्ण (चुभनेवाली) वस्तु हैं उनके तीक्ष्णपना कौन करता है और मृग तथा पक्षीआदिकोंके अनेकतरहपना जो पाया जाता है उसे कोंन करता है ऐसा प्रश्न होनेपर यही उत्तर है कि सबमें खभाव ही है-ऐसे सवको कारणके विना खभावसे ही मानना स्वभाववादका अर्थ है ॥ ८८३ ॥ इसप्रकार कालादिकर एकांत लेनेसे क्रियावाद होता है । आगे अक्रियावादके भंग कहते है। णस्थि सदो परदोवि य सत्तपयत्था य पुण्णपाऊणा। कालादियादिभंगा सत्तरि चटुपंतिसंजादा ॥ ८८४ ॥ नास्ति स्वतः परतोपि च सप्तपदार्थाश्च पुण्यपापोनाः । कालादिकादिभङ्गाः सप्ततिः चतुःपतिसंजाताः ।। ८८४ ।। अर्थ-पहले 'नास्ति' पद लिखना उसके ऊपर 'आपसे' 'परसे' ये दो पद लिखने चाहिये, उनके ऊपर पुण्य-पापके विना सात पदार्थ लिखने, उनके ऊपर कालको आदि- लेकर ५ पद लिखने चाहिये, इस प्रकार चार पंक्तियोंको गुणा करनेसे १४२४७४५-७० भंग होते है ।। ८८४ ॥ णत्थि य सत्तपदत्था णियदीदो कालदो तिपंतिभवा। चोदस इदि णत्थित्ते अकिरियाणं च चुलसीदी ।। ८८५ ॥ नास्ति च सप्तपदार्था नियतितः कालतः त्रिपतिभवाः । चतुर्दश इति नास्तित्वे अक्रियाणां च चतुरशीतिः ॥ ८८५ ।। अर्थ-पहले 'नास्ति' पद लिखना, उसके ऊपर सात पदार्थ लिखने, उनके ऊपर 'नियति' 'काल' ऐसे दो पद लिखने-इसप्रकार तीन पंक्तियोंके गुणाकरनेसे १४७४२ १४भेद नास्तिपनेमें हुए । पहलेके ७० और १४ ये सब मिलकर ८४ अक्रिया- वादियोंके भेद होते हैं ।। ८८५ ॥ आगे अज्ञानवादके भेद कहते हैं- को जाणइ णवभावे सत्तमसत्तं दयं अवचमिदि। अवयणजुद सत्वतयं इदि भंगा होंति तेसट्ठी ॥ ८८६ ॥ को जानाति नवभावेषु सत्त्वमसत्त्वं द्वयमवाच्यमिति । अवचनयुतं सप्ततयमिति भङ्गा भवन्ति त्रिषष्टिः ॥ ८८६ ।। अर्थ-जीवादिक नव पदार्थोंमें एक एकका सप्त भंगसे, न जानना जैसे कि 'जीव' अस्तिखरूप है ऐसा कौन जानता है तथा नास्ति अथवा दोनों वा अवक्तव्य वा तीन भंग अवक्तव्यसे मिली हुई इसतरह ७ भंगोंसे कोंन जीवको जानता है । इसप्रकार ९ मावोंको ७ नयोंसे गुणा करनेपर ६३ भंग होते हैं ॥ ८८६ ॥... - गोम्मटसारः। २६७ को जाणइ सत्तचऊ भावं सुद्धं खु दोणिपंतिभवा । चत्तारि होति एवं अण्णाणीणं तु सत्तट्टी।। ८८७॥ फो जानानि सरवचतुष्कं भाव शुद्ध सलु द्विपतिभवाः । चत्वारो भयन्ति एवमज्ञानिनां तु सप्तपष्टिः ॥ ८८७ ॥ अर्थ-पहले 'शुद्धपदार्थ ऐसा लिखना उसके ऊपर अस्तिआदि चार लिखने, इन दोनों पंक्तियोंगे उपस ४ चार मग होते हैं। जैसे-शुद्धपदार्थ अस्ति आदिरूप है ऐसे फौन जानता है । इसतरह ४ तो ये और पूर्वोक्त ६३ सब मिलकर अज्ञान वादके ६७ भेद होते हैं ।। ८८७ ॥ भाग नयिकवादके मूलभंग कहते है- मणवयणकायदाणगविणवो सुरणिवइणाणिजदिवुहे। वाले मादपिदम्मि च कायचो चेदि अट्टचऊ ॥ ८८८ ॥ मनोवचनकायदानविनयः सुरनृपतिज्ञानियतिवृद्धे । पाले मातृपित्रोच कर्तव्यः चेति अष्टचतुष्कम् ॥ ८८८ ॥ अर्थ-देव राजा ज्ञानी यति वुहा बालक माता पिता इन आठोंका मन वचन काय और दान-इन चारों विनयकग्ना । इसप्रकार वैनयिकवाद ८ गुणित ४ अर्थात् ३२ होते है ॥ ८८८ ॥ ये विनयवादी गुण अगुणकी परीक्षा किये विना विनयसे ही सिद्धि मानते हैं। सच्छंददिट्टीहिं वियप्पियाणि तेसटिजुत्ताणि सयाणि तिण्णि। पाखंडिणं वाउलकारणाणि अण्णाणिचित्ताणिहरंति ताणि॥८८९॥ खच्छन्दष्टिभिः विकल्पितानि त्रिषष्टियुक्तानि शतानि त्रीणि । पारण्डिनां व्याकुलकारणानि अज्ञानिचित्तानि हरन्ति तानि ॥ ८८९ ॥ अर्थ-स्वच्छंद अर्थात् अपने मनमाना है श्रद्धान जिनका ऐसे पुरुषोंने ३६३ भेद कल्पना किये है, जो कि वे पाखंडी जीवोंको व्याकुलता उत्पन्न करनेवाले और अज्ञानी जीवोंके चित्तको हरनेवाले हैं ॥ ८८९ ॥ आगे अन्य भी एकातवाद कहते है- आलसहो णिरुच्छाहो फलं किंचिं ण भुजदे। यणक्खीरादिपाणं वा पउरुसेण विणा ण हि ॥८९० ॥ आलस्यान्यो निरुत्साहः फलं किञ्चिन्न भुते । स्तनक्षीरादिपानं वा पौरुषेण विना न हि ।। ८९०॥ अर्थ-जो आलसकर सहित हो तथा उद्यम करनेमें उत्साह रहित हो वह कुछभी फल नहीं भोगता । जैसे-स्तनोंका दूध पीना विना पुरुषार्थके कभी नहीं वनसकता। इसी- प्रकार पुरुषार्थ से ही सब कार्यकी सिद्धि होती है-ऐसा पुरुषवाद है ॥ ८९० ॥ - २६८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । दइवमेव परं मण्णे धिप्पउरुसमणत्थयं । एसो सालसमुत्तुंगो कण्णो हण्णइ संगरे ॥ ८९१ ॥ दैवमेव परं मन्ये धिक् पौरुपमनर्थकम् । एष सालसमुत्तुङ्गः कर्णो हन्यते संगरे ॥ ८९१ ॥ अर्थ-मै केवल देव ( भाग्य ) को ही उत्तम मानता हूं निरर्थक पुरुषार्थको धिक्कार हो, देखो कि किल्लाके समान ऊंचा जो वह कर्णनामा राजा युद्धमें मारागया-ऐसा दैववाद है, इसीसे सर्वसिद्धि मानी है ।। ८९१ ॥ संजोगमेवेति वदंति तण्णा णेवेकचकेण रहो पयादि। अंधो यपंगू य वणं पविठ्ठा ते संपजुत्ता णयरं पविठ्ठा ॥८९२।। संयोगमेवेति वदन्ति तज्ज्ञा नैवैकचक्रेण रथः प्रयाति । अन्धश्च पङ्गुश्च वनं प्रविष्टौ तौ संप्रयुक्तौ नगरं प्रविष्टौ ।। ८९२ ।। अर्थ-यथार्थज्ञानी संयोगसे ही कार्यसिद्धि मानते है क्योंकि जैसे एक पहियेसे रथ नहीं चलसकता तथा एक अंधा दूसरा पांगला ये दोनों वनमें प्रविष्ट थे सो किसी समय आग लगजानेसे ये दोनों मिलकर अर्थात् अंधेके ऊपर पांगला चढकर अपने नगरमें पहुंचगये । इसप्रकार संयोगवाद है ॥ ८९२ ॥ सइउठ्ठिया पसिद्धी दुवारा मेलिदेहिंवि सुरेहि। मज्झिमपंडवखित्ता माला पंचसुवि खित्तेव ॥ ८९३ ॥ सकृदुत्थिता प्रसिद्धिः दुर्वारा मिलितैरपि सुरैः। मध्यमपाण्डवक्षिप्ता माला पञ्चस्खपि क्षिप्तेव ॥ ८९३ ।। अर्थ-एक ही वार उठी हुई "द्रौपदीकर अर्जुनपांडवके ही गलेमें डाली हुई माला पांचों पांडवोंके पहनाई है" ऐसी लोकप्रसिद्धि देवोंसे भी मिलकर दूर नही होसकती अन्यकी तो वात क्या है । इसप्रकार लोकवादी लोकप्रवृत्तिको ही सर्वख मानते हैं ॥ ८९३ ॥ अब आचार्य महाराज इन मतोंका विवाद मेंटनेके लिये सारांश कहते हैं- जावदिया वयणवहा तावदिया चेव होंति णयवादा । जावदिया णयवादा तावदिया चेव होंति परसमया ॥ ८९४ ॥ यावन्तो वचनपथाः तावन्तश्चैव भवन्ति नयवादाः । यावन्तो नयवादास्तावन्तश्चैव भवन्ति परसमयाः ॥ ८९४ ॥ अर्थ-बहुतकहनेसे क्या । सारांश इतना है कि जितने वचन बोलनेके मार्ग हैं उतने ही. नयवाद हैं और जितने नयवाद है उतने ही परसमय हैं ॥ भावार्थ- जो कुछ वचन बोलाजाता है वह किसी अपेक्षाको लिये हुए ही होता है उसजगह जो अपेक्षा है गोम्मटसारः। २६९ वही नय है और विना अपेक्षाके बोलना अथवा एक ही अपेक्षासे अनन्तधर्मवाली वस्तुको सिद्धकरना यही परमतोंमें मिथ्यापना है ॥ ८९४ ॥ आगे परमती जो मिथ्यामती कहे है उनके वचन किसतरह मिथ्या है उसका कारण दिखलाते है।- परसमयाणं वयणं मिच्छं खलु होइ सबहा वयणा । जेणाणं पुण वयणं सम्म खु कहंचिवयणादो ॥ ८९५ ॥ परसमयानां वचन मिथ्या खलु भवति सर्वथा वचनात् । जैनानां पुनः वचनं सम्यक्खलु कथंचिद्वचनात् ।। ८९५ ॥ अर्थ-परमतोंके वचन 'सर्वथा' कहनेसे नियमसे असत्य होते है और जैनमतके वचन 'कथंचित्' (किसी एक प्रकारसे ) बोलनेसे सत्य है । भावार्थ-जैनमत स्याद्वादरूप है वह अनन्तधर्मस्वरूप वस्तुको कथंचित् वचनसे कहता है इससे सत्य है क्योंकि एकवचनसे वस्तुका एक धर्मही कहा जाता है। यदि सर्वथा कहै कि यही वस्तुका खरूप है तो वाकीके धर्मोके अभावका प्रसग होनेसे वह भी झूठा कहलावै । अन्यवादी वस्तुके एक धर्मको लेकर यही है ऐसा सर्वथा वचनसे वस्तुका स्वरूप कहते है सो पूर्वोक्त हेतुसे झूठे है । इसप्रकार अन्यमतोंका विवाद एक स्याद्वादसे ही मिटसकता है ऐसा सारांश समझना चाहिये ॥८९५॥ इति श्री नेमिचन्द्राचार्य विरचित पंचसंग्रह द्वितीयनामवाले गोम्मटसार ग्रंथके कर्मकांडमें भावचूलिका नामका सातवां अधिकार समाप्त हुआ ॥ ७ ॥ - दोहा। करि निजकारजकरणकरि, कर्मसमूह खिपाइ । भये शुद्धपरमातमा, नमो नमों शिवराय ॥१॥ आगे त्रिकरणचूलिकाको कहनेकी इच्छावाले आचार्य चामुंडरायको गुरूकेलिये नम- स्कार करनेका उपदेश करते है। णमह गुणरयणभूसण सिद्धतामियमहद्धिभवभावं । वरवीरणदिचंदं णिम्मलगुणमिदणंदिगुरुं ॥ ८९६ ॥ नमत गुणरत्नभूषण सिद्धान्तामृतमहाब्धिभवभावम् । वरवीरनन्दिचन्द्र निर्मलगुणमिन्द्रनन्दिगुरुम् ॥ ८९६ ॥ अर्थ हे गुणरूपीरलके आभूषण चामुंडराय ! तुम सिद्धान्तशास्त्ररूपी अमृतमय महा- समुद्रमें उत्पन्न हुए ऐसे उत्कृष्ट वीरनंदि नामा आचार्यरूपी चंद्रमाको नमस्कार करो, तथा निर्मलगुणोंवाले इंद्रनंदि नामा गुरूको नमस्कार करो ॥ ८९६ ॥ पहले जीवकांडमें प्रसग पाके गुणस्थानाधिकारमें तीन करणोंका स्वरूप कहा था। .
२७० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अब आचार्य यहांपर जुदा अधिकार करके तीन करणोंका स्वरूप कहते हैं; इगिवीसमोहखवणुवसमणणिमित्ताणि तिकरणाणि तहिं। पढमं अधापवत्तं करणं तु करेदि अपमत्तो ॥ ८९७ ।। एकविंशतिमोहक्षपणोपशमननिमित्तानि त्रिकरणानि तस्मिन् । प्रथममधःप्रवृत्तं करणं तु करोति अप्रमत्तः ॥ ८९७ ॥ अर्थ-अनंतानुबंधी कषायकी चौकड़ीके विना शेष २१ चारित्रमोहनीयकी प्रकृतियोंके क्षयकरनेके लिये अथवा उपशमकरनेके निमित्त अधःप्रवृत्तादि तीन करण कहे गये हैं। उनमेंसे पहले अधःप्रवृत्तकरणको सातिशय अप्रमत्तगुणस्थानवाला प्रारंभ करता है ।।८९७॥ करण नाम परिणामका है। आगे अधःप्रवृत्तकरणका शब्दार्थसे सिद्ध लक्षण कहते हैं; जम्हा उवरिमभावा हेडिमभावहिं सरिसगा होति । तम्हा पढमं करणं अधापवत्तोत्ति णिहिटुं॥ ८९८ ॥ यस्मादुपरितनभावा अधस्तनभावैः सदृशका भवन्ति । तस्मात् प्रथमं करणमधःप्रवृत्तमिति निर्दिष्टम् ॥ ८९८ ॥ अर्थ-जिसकारण इस पहले करणमें ऊपरके समयके परिणाम नीचे के समयसंबंधी भावोंके समान होते है इसकारण पहले करणका नाम अधःप्रवृत्त ऐसा अन्वर्थ (अर्थके अनुसार ) कहा गया है ॥ ८९८ ॥ अंतोमुहुत्तमेत्तो तत्कालो होदि तत्थ परिणामा । लोगाणमसंखपमा उवरुवरि सरिसवडिगया ॥ ८९९ ॥ अन्तर्मुहूर्तमात्रः तत्कालो भवति तत्र परिणामाः । लोकानासंख्यप्रमा उपर्युपरि सदृशवृद्धिगताः॥ ८९९ ॥ अर्थ-उस अधःप्रवृत्तकरणका काल अन्तर्मुहूर्त है । उसकालमें संभवते विशुद्धता (मन्दता) रूप कषायोंके परिणाम असंख्यात लोकप्रमाण है। और वे परिणाम पहले समयसे लेकर आगे २ के समयोंमें समान वृद्धि (चय) कर बढ़ते हुए हैं ।। ८९९ ।। आगे अंकोंकी सहनानी (संकेत )से कथन दिखलाते है:- वावत्तरितिसहस्सा सोलस चउ चारि एक्कयं चेव । धणअद्धाणविसेसे तियसंखा होइ संखेजे ॥ ९०० ॥ द्वासप्ततित्रिसहस्राणि षोडश चतुष्कं चत्वारि एकं चैव धनाध्वानविशेषाः त्रयसंख्या भवति संख्येये ॥ ९००॥ १ ये गाथा जीवकांडमें भी आये हैं वहा इनका खुलासा समझलेना ।,, । - - - , गोम्मटसारः। २७१ अर्थ-अधःकरणके परिणामोंकी संख्याके साधनेकेलिये सर्वधन ३०७२, ऊर्ध्वगच्छ १६ तिर्यग्गच्छ ४ ऊर्ध्वविशेष ४ तिर्यक् विशेष १ और चयके सिद्ध करनेके लिये स- ख्यातकी सहनानी ३ का अंक समझना ॥ ९०० ॥ आदिधणादो सव्वं पचयधणं संखभागपरिमाणं । करणे अधापवत्ते होदित्ति जिणेहिं णिहिटुं॥९०१ ॥ आदिधनात्सर्व प्रचयधनं संख्यभागपरिमाणम् । करणे अधःप्रवृत्ते भवतीति जिनैनिर्दिष्टम् ॥ ९०१ ॥ अर्थ-अधःप्रवृत्तकरणमें सर्व प्रचय धन आदिधनसे सख्यातवें भाग प्रमाण है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है ॥ ९०१॥ प्रचयधनको उत्तरधन भी कहते है । उभयधणे संमिलिदे पदकदिगुणसंखरूवहदपचयं । सव्वधणं तं तम्हा पदकदिसंखेण भाजिदे पचयं ॥ ९०२॥ उभयधने संमिलिते पदकृतिगुणसंख्यरूपहतप्रचयः । सर्वधनं तत्तस्मात् पदकृतिसंख्येन भाजिते प्रचयम् ।। ९०२ ।। अर्थ-आदिधन और उत्तरधन दोनोंको मिलानेसे सर्वधन होता है और उसका प्रमाण गच्छके वर्गको सख्यातसे गुणाकरे फिर चयसे गुणाकरे जो संख्या आवे उतना है । इसी- कारणसे गच्छका वर्ग और सख्यात इन दोनोंका भाग सर्वधनमें देनेसे चयका प्रमाण 7 होता है ॥९०२॥ - चयधणहीणं दवं पदभजिदे होदि आदिपरिमाणं । आदिम्मि चये उड्डे पडिसमयधणं तु भावाणं ॥ ९०३ ॥ चयधनहीनं द्रव्यं पदभक्ते भवति आदिपरिमाणम् । आदौ चये वृद्ध प्रतिसमयधनं तु भावानाम् ॥ ९०३ ॥ अर्थ-सर्वधनमें से चयधन कमकरके जो प्रमाण हो उसमें गच्छका भाग देनेसे पहले समयसंबंधी विशुद्ध भावोंका प्रमाण होता है और उन प्रथमसमयके परिणामोंमें एक एक चय बढा देनेसे हरएक समयके भावोंका प्रमाण होता है ॥ ९०३ ॥ पचयधणस्साणयणे पचयं पभवं तु पचयमेव हवे। रूऊणपदं तु पदं सब्वत्थवि होदि णियमेण ॥९०४ ॥ प्रचयधनस्यानयने प्रचयः प्रभवस्तु प्रचय एव भवेत् । रूपोनपदं तु पदं सर्वत्रापि भवति नियमेन ।। ९०४ ॥ अर्थ-प्रचयधन के लाने के लिये सब जगह उत्तर और आदि ये दोनों प्रचयके प्रमाण होते है; और यहां गच्छका प्रमाण विवक्षितगच्छके प्रमाणसे १ कम नियमसे होता है, क्योंकि पहले स्थानमें चयका अभाव है ।। ९०४ ॥ m २७२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । आगे अनुकृष्टिके प्रथमखंडका प्रमाण कहते हैं- पडिसमयधणेवि पदं पचयं पभवं च होइ तेरिच्छे । अणुकट्टिपदं सचद्धाणस्स य संखभागो हु ॥ ९०५ ॥ प्रतिसमयधनेपि पदं प्रचयः प्रभवश्च भवति तिरश्चि । अनुकृष्टिपदं सर्वाध्वानस्य च संख्यभागो हि ॥ ९०५ ॥ अर्थ-हरएकसमयका धन लानेकेलिये अनुकृष्टिके गच्छ-चय-आदि सवकी रचना तिर्यग् (तिरछी) होती है और अनुकृष्टिका गच्छ ऊर्ध्वगच्छके संख्यातवें भाग प्रमाण निश्चयकर होता है । ९०५॥ नीचे और ऊपरके समयोंमें समानता होनेको अनुकृष्टि कहते है। अणुकट्टिपदेण हदे पचये पचयो दु होइ तेरिच्छे । पचयधणूणं दव्यं सगपदभजिदं हवे आदी ॥९०६ ॥ अनुकृष्टिपदेन हते प्रचये प्रचयस्तु भवति तिरश्चि । प्रचयधनोनं द्रव्यं स्वकपदभाजितं भवेदादि ।। ९०६ ।। अर्थ-अनुकृष्टिके गच्छका भाग ऊर्ध्वचयमें देनेसे जो प्रमाण हो वह अनुकृष्टिका चय होता है और प्रथमसमयसंबंधी अनुकृष्टिके सर्वधनमें चयधन कम करके जो प्रमाण आवे उसमें अपने अपने गच्छका भाग देनेसे अनुकृष्टिके प्रथमखंडका प्रमाण होता है ।।९०६॥ आदिम्मि कमे वहृदि अणुकट्टिस्स य चयं तु तेरिच्छे । इदि उड्डतिरियरयणा अधापयत्तम्मि करणम्मि ॥ ९०७ ॥ आदौ क्रमेण वर्धते अनुकृष्टेः च चयस्तु तिरश्चि । इति ऊर्ध्वतिर्यररचना अधःप्रवृत्ते करणे ॥ ९०७ ॥ अर्थ-उस प्रथमखंडसे तिर्यग्रूप क्रमसे अनुकृष्टिका एक एक चय वढता जाता है तब द्वितीयादि खंडोंका प्रमाण होता है । इसप्रकार ऊर्ध्वरूप और तिर्यगुरूप दोनों ही रचना अधःप्रवृत्तकरणमें जाननी चाहिये ॥ ९०७ ॥ अंतोमुहुत्तकालं गमिऊण अधापवत्तकरणं तु । पडिसमयं सुज्झता अपुवकरणं समल्लियइ ॥९०८॥ अन्तर्मुहूर्तकालं गमयित्वा अधःप्रवृत्तकरणं तु । प्रतिसमयं शुद्ध्यन्नपूर्वकरणं समानयति ॥ ९०८॥ अर्थ-वह सातिशय अप्रमत्तसंयमी समय समय अनन्तगुणी परिणामोंकी विशुद्धतासे व- ढता हुआ अंतमुहूर्तकालतक अधःप्रवृत्तकरणको समाप्त करके अपूर्वकरणको प्राप्त होता है।९०८॥ आगे अपूर्वकरणमें अंकोंकी सहनानी दिखलाते हैं; छण्णउदिचउसहस्सा अट्ट य सोलस धणं तदद्धाणं । परिणामविसेसोवि य च संखापुचकरणसंदिट्ठी ॥ ९०९ ॥'
- गोम्मटसारः। २७३ पण्णवतिचतुःसहस्री अष्टौ च षोडश धनं तध्वानः । परिणामविशेषोपि च चत्वारि संख्यातान्यपूर्वकरणसंदृष्टिः॥ ९०९॥ अर्थ-अपूर्वकरणमें अंकोंकी सहनानी "सर्वधन ४०९६, गच्छ ८ परिणामविशेष १६ और संख्यातका प्रमाण ४" इसप्रकार है ॥ ९०९ ॥ अंतोमुहुत्तमेत्ते पडिसमयमसंखलोगपरिणामा। कमउहापुवगुणे अणुकट्टी गत्थि णियमेण ॥ ९१० ॥ अन्तर्मुहुर्तमाने प्रतिसमयमसंख्यलोकपरिणामाः। क्रमवृद्धाः अपूर्वगुणे अनुकृष्टिनास्ति नियमेन ॥ ९१० ॥ अर्थ-अपूर्वकरणका काल अंतर्मुहर्तमात्र है उसमें हरएकसमयमें समानचय (वृद्धि) से बढते हुए असंख्यात लोकप्रमाण परिणाम पाये जाते है। लेकिन यहां अनुकृष्टि नि- यमसे नहीं होती क्योंकि परिणामोंमें अपूर्वता होनेसे समानता नहीं पायी जाती ॥९१०॥ मागे तीसरे अनिवृत्तिकरणका स्वरूप कहते है- एकम्हि कालसमये संठाणादीहिं जह णिवति । ण णिवदति तहवि य परिणामोहिं मिहो जे हु ॥ ९११ ॥ होति अणियट्टिणो ते पडिसमयं जस्सिमेकपरिणामो। विमलयरझाणहुदवहसिहाहि णिहकम्मवणा ॥९१२॥ जुम्म। एकस्मिन् कालसमये संस्थानादिभिर्यथा निवर्तन्ते । न निवर्तन्ते तथापि च परिणामैमिथो ये हि ॥ ९११ ।। भवन्ति अनिवर्तिनस्ते प्रतिसमयं येषामेकपरिणामः । विमलतरध्यानहुतवहशिखाभिर्निर्दग्धकर्मवनाः ॥ ९१२ ॥ युग्मम् । अर्थ-जो जीव अनिवृत्तिकरणकालके विवक्षित एकसमयमें शरीरके आकार वगैरःसे भेदरूप हो जाते हैं तौभी परिणामोंसे अधःकरणादिकी तरह भेदरूप नहीं होते । और उस करणमें जिनके समय समय प्रति एकखरूप एक ही परिणाम होता है वे जीव, अतिशयनिर्मल ध्यानरूपी अमिसे जलाये है कर्मरूपी वन जिन्होंने ऐसे होते हुए अनिवृत्तकरण परिणामके धारक होते हैं ॥ ९११ ॥ ९१२ ॥ इस अनिवृत्तिकरणका कालभी अंतर्मुहूर्तमात्र है। इति श्री नेमिचन्द्राचार्यविरचित पंचसंग्रह द्वितीयनामवाले गोम्मटसार ग्रंथके कर्म- कांडमें त्रिकरणचूलिका नामा आठवां अधिकार समाप्त हुआ ॥८॥ .
२७४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । दोहा। करि विनष्ट सब कर्मकी, स्थितिरचना सद्भाव । परमेष्टी परमातमा, भये भो शिवराय ॥१॥ आगे आचार्यमहाराज सिद्धोंको नमस्कार करते हुए कर्मस्थितिकी रचनाका सद्भाव कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं:- सिद्धे विसुद्धणिलये पण?कम्मे विणट्ठसंसारे । पणमिय सिरसा वोच्छं कम्मटिदिरयणसम्भावं ॥ ९१३ ।। सिद्धान् विशुद्धनिलयान् प्रणष्टकर्मणः विनष्टसंसारान् । प्रणम्य शिरसा वक्ष्यामि कर्मस्थितिरचनासद्भावम् ॥ ९१३ ।। अर्थ-अत्यंत नष्ट हुऐ है घाति अघाति कर्म जिनके, विशेषतासे नष्ट किया है चतु- तिम्रमणरूप संसार जिन्होंने इसीकारण निर्मल आत्मप्रदेशोंमें है स्थान निनका ऐसे सिद्ध- परमेष्टियोंको मै मस्तक नवाके नमस्कार कर कर्मोंकी स्थितिकी रचनाका सत्तारूप कथन कहता हूं ॥ ९१३ ॥ पहले बंधउदयसत्त्व अधिकारमें यह कथन कहागया है यहांपर भी गाथाओंसे कहते हैं। कम्मसरूवेणागयदव्वं ण य एदि उदयरूवेण । रूवेणुदीरणस्स य आवाहा जाव ताव हवे ॥ ९१४ ॥ उदयं पडि सत्तण्हं आवाहा कोडिकोडि उवहीणं । वाससयं तप्पडिभागेण य सेसहिदीणं च ॥ ९१५ ॥ अंतोकोडाकोडीठिदिस्स अंतोमुहुत्तमावाहा । संखेजगुणविहीणं सव्वजहण्णहिदिस्स हवे ॥ ९१६ ॥ पुव्वाणं कोडितिभागादासंखेवअद्धओत्ति हवे । आउस्स य आवाहा णद्विदिपडिभागमाउस्स ॥ ९१७ ॥ आवलियं आवाहा उदीरणमासिज्ज सत्तकम्माणं । परभवियआउगस्स य उदीरणा णस्थि णियमेण ॥ ९१८ ॥ आवाहूणियकम्मद्विदीणिसेगो दु सत्तकम्माणं । आउस्स णिसेगो पुण सगढ़िदी होदि णियमेण ॥ ९१९ ॥ आवाहं वोलाविय पढमणिसेगम्मि देय बहुगं तु । तत्तो विसेसहीणं विदियस्सादिमणिसेओत्ति ॥ ९२०॥ १. इन ८ गाथासूत्रोंका अर्थवगैरः दूसरे अधिकारमें ६३-६४-६५ वे पृष्ठमें लिखा है इससे यहां मूल- मान ही रक्खे गये हैं। . -- .
गोम्मटसारः। २७५ विदिये विदियणिसेगे हाणी पुग्विल्लहाणिअद्धं तु । एवं गुणहाणि पडि हाणी अद्धद्धयं होदि ॥ ९२१ ॥ दवं ठिदिगुणहाणीणद्धाणं दलसला णिसेयछिदी। अण्णोण्णगुणसलावि य जाणेजो सबठिदिरयणे ॥ ९२२ ॥ द्रव्यं स्थितिः गुणहानीनामध्वानं दलशला निषेकच्छितिः । अन्योन्यगुणशला अपि च ज्ञातव्यं सर्वस्थितिरचनायाम् ॥ ९२२ ॥ अर्थ-सब कर्मोंकी स्थितिकी रचनामें द्रव्य १ स्थिति आयाम २ गुणहान्यायाम ३ नानागुणहानि ४ निषेकहार अर्थात् दोगुणहानि ५ अन्योन्याभ्यस्वराशि ६ ये छह राशियां जानना चाहिये ॥ ९२२ ॥ तेवहि च सयाई अडदाला अट्ठ छक्क सोलसयं । चउसटिं च विजाणे दवादीणं च संदिट्ठी ॥ ९२३ ॥ त्रिषष्टिश्च शतानि अष्टचत्वारिंशदष्ट षदं षोडशकम् । चतुःषष्टिं च विजानीहि द्रव्यादीनां च संदृष्टिः ॥ ९२३ ॥ अर्थ-उन द्रव्यादिकोंकी अंकोंकी सहनानी क्रमसे द्रव्य ६३००, स्थिति १८, गुण- हान्यायाम ८, नानागुणहानि ६, दोगुणहानि १६, अन्योन्याभ्यस्तराशि ६४ जानना चाहिये ॥ ९२३ ॥ . अब अर्थसंदृष्टिसे व्यादिका प्रमाण कहते है- दवं समयपबद्धं उत्तपमाणं तु होदि तस्सेव । जीव सहत्यणकालो ठिदिअद्धा संखपल्लमिदा ॥ ९२४ ॥ द्रव्यं समयप्रबद्धं उक्तप्रमाणं तु भवति तस्यैव । जीवेन सह स्थानकालः स्थित्यद्धा संख्यपल्यमिताः ॥ ९२४ ॥ अर्थ-द्रव्य तो पहले प्रदेशबंधाधिकारमें कहे हुए समयप्रबद्धके प्रमाण है, और उस समयप्रबद्धका जीवके साथ स्थित रहनेका काल 'स्थितिआयाम' है, वह स्थिति संख्या- तपल्यप्रमाण है ॥ ९२४ ॥ मिच्छे वग्गसलायप्पहुदिं पल्लस्स पढममूलोत्ति । वग्गहदी चरिमो तच्छिदिसंकलिदं चउत्थो य ॥९२५ ॥ मिथ्ये वर्गशलाकप्रभृति पल्यस्य प्रथममूलमिति । वर्गहतिः चरमः तच्छितिसंकलितं चतुर्थश्च ॥ ९२५ ।। अर्थ-मिथ्यात्वनामा कर्ममें पल्यकी वर्गशलाकाको आदि लेकर पल्यके प्रथम मूल- पर्यंत उन वर्गोंको आपसमें गुणकार करनेसे चरमराशि अर्थात् अन्योन्याभ्यस्तराशिका .
- ५ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २७६ प्रमाण होता है और उनको संकलित अर्थात् जोड़नेसे चौथी राशि अर्थात् नानागुणहा- निका प्रमाण होता है ॥ ९२५ ॥ वग्गसलायेणवहिदपलं अण्णोण्णगुणिदरासी हु। णाणागुणहाणिसला वग्गसलच्छेदणूणपल्लछिदी ॥ ९२६ ॥ वर्गशलाकयावहितपल्यमन्योन्यगुणितराशिहि । नानागुणहानिशला वर्गशलच्छेदन्यूनपल्यछितिः ।। ९२६ ।। अर्थ-इसप्रकार पत्यकी वर्गशलाकाका भाग पल्यमें देनेसे अन्योन्याभ्यस्तराशिका प्रमाण होता है और पल्यकी वर्गशलाकाके अर्धच्छेदोंको पत्यके अर्धच्छेदोंमें घटानेसे जो आवे उतनी नानागुणहानिराशि जाननी चाहिये ॥ ९२६ ॥ आगे गुणहान्यायामका प्रमाण कहते हैं। सबसलायाणं जदि पयदणिसेये लहेज एकस्स । कि होदित्ति णिसेये सलाहिदे होदि गुणहाणी ।। ९२७ ।। सर्वशलाकानां यदि प्रकृतनिषेके लभ्यते एकस्य । किं भवतीति निषेके शलाहिते भवति गुणहानिः ।। ९२७ ॥ अर्थ-सब नानागुणहानिशलाकाओंके यदि पूर्वोक्त स्थितिके सब निषेक होते है तो १ गुणहानिशलाकाके कितने होने चाहिये इसप्रकार त्रैराशिक गणितसे निपेकोंमें शलाकाओं- का भागदेनेसे जो प्रमाण हो वह गुणहान्यायामका प्रमाण होता है ॥ ९२७ ॥ आगे दोगुणहानिका प्रमाण और उसके माननेका प्रयोजन दिखलाते हैं:- दोगुणहाणिपमाणं णिसेयहारो दु होइ तेण हिदे । इटे पढमणिसेये विसेसमागच्छदे तत्थ ॥ ९२८ ॥ द्विगुणहानिप्रमाणं निषेकहारस्तु भवति तेन हिते। इष्टे प्रथमनिषेके विशेष आगच्छति तत्र ॥ ९२८ ।। अर्थ-दूना गुणहानिका प्रमाण 'निषेकहार' होता है उस निषेकहारका भाग विवक्षित गुणहानिके पहले निषेकमें देनेसे उसगुणहानिमें विशेष (चय) का प्रमाण निकल आता हैं ॥ ९२८॥ इसतरह द्रव्यादिकोंका प्रमाण बतलाकर अन्य कार्य कहते हैं। रूऊणण्णोण्णभत्थवहिददव्वं च चरिमगुणदव्वं । होदि तदो दुगुणकमो आदिमगुणहाणिदचोति ॥ ९२९ ॥ रूपोनान्योन्याभ्यस्तावहितद्रव्यं च चरमगुणद्रव्यम् । भवति ततो द्विगुणक्रममादिमगुणहानिद्रव्यमिति ॥ ९२९ ।। - - - 1
गोम्मटसारः।
२७७
अर्थ-१ कम अन्योन्याभ्यस्तराशिका भाग सब द्रव्यमें देनेसे अंतगुणहानिका द्रव्य
होता है और इससे दूना दूना पहलीगुणहानिके द्रव्यतक द्रव्य जानना चाहिये ॥९२९॥
अब द्रव्यजाननेसे क्या करना यह बतलाते है।
रूऊणद्धाणद्धेणूणेण णिसेयभागहारेण ।
हदगुणहाणिविभजिदे सगसगदव्वे विसेसा हु॥९३०॥
रूपोनाध्वानार्धेनोनेन निषेकभागहारेण ।
हतगुणहानिविभाजिते स्वकस्वकद्रव्ये विशेषा हि ॥ ९३०॥
अर्थ-एक कम गुणहान्यायामके प्रमाणको आधाकरके निषेक भागहारमें घटानेसे जो
प्रमाण आवे उससे विवक्षित गुणहानिआयाम को गुणनेसे जो प्रमाण हो उसका भाग
अपने २ द्रव्यमें देवे तो विशेष वा चयका प्रमाण होता है ॥ ९३० ।।
पचयस्स य संकलणं सगसगगुणहाणिदव्वमज्झम्हि ।
अवणिय गुणहाणिहिदे आदिपमाणं तु सव्वत्थ ॥ ९३१ ॥
प्रचयस्य च संकलनं स्वकस्वकगुणहानिद्रव्यमध्ये ।
अपनीय गुणहानिहिते आदिप्रमाणं तु सर्वत्र ॥ ९३१ ॥
अर्थ-सब चयधनको अपने अपने गुणहानिके सब द्रव्यमें से घटाके जो प्रमाण हो
उसमें गुणहानिआयामका भागदेनेसे जो सख्या आवै वह आदिधनका अर्थात् अन्तके
निषेकका प्रमाण सब जगह होता है ।। ९३१ ।।
सवासि पयडीणं णिसेयहारो य एयगुणहाणी।
सरिसा हवंति णाणागुणहाणिसलाउ वोच्छामि ॥ ९३२ ॥
सर्वासां प्रकृतीनां निषेकहारश्च एकगुणहानिः ।
सदृशे भवतः नानागुणहानिशला वक्ष्यामि ॥ ९३२ ॥
अर्थ-सब मूल उत्तर प्रकृतियोंका निषेकहार और एकगुणहान्यायाम ये दोनों तो एकसे
ही होते हैं और नानागुणहानिशलाका समान नहीं है इसकारण उनको कहता हूं ॥९३२॥
मिच्छत्तस्स य उत्ता उवरीदो तिण्णि तिण्णि संमिलिदा।
अट्टगुणेणूणकमा सत्तसु रइदा तिरिच्छेण ॥ ९३३ ॥
मिथ्यात्वस्य च उक्ता उपरितः त्रयः त्रयः संमिलिताः ।
अष्टगुणेनोनक्रमाः सप्तसु रचिता तिरश्वा ॥ ९३३ ॥
अर्थ-जो मिथ्यात्वके पल्य वर्गशलाकाके अर्धच्छेद आदि कहे गये हैं वे स्थापन करके
ऊपरसे पल्यके प्रथममूलसे लेकर तीन तीन वर्गस्थानोंके अर्धच्छेद मिलानेसे आठ आठ
गुणे कम अनुक्रमसे होते है और वे मिलाये हुए सातस्थानोंमें तिरछी रचनारूप होते
है ॥ ९३३ ॥
। २७८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । तत्थंतिमच्छिदिस्स य अट्टमभागो सलायछेदा हु। आदिमरासिपमाणं दसकोडाकोडिपडिवद्धे ॥९३४ ।। तत्रान्तिमच्छितेश्चाष्टमभागः शलाकच्छेदा हि। आदिमराशिप्रमाणं दशकोटीकोटिप्रतिवद्धे ।। ९३४ ॥ अर्थ-उन सातपंक्तियोंमेंसे पहली पंक्तिके अर्धच्छेदोंके आठवें भागप्रमाण शलाकाके अर्धच्छेद होते है और उतना ही दस कोड़ाकोड़ी सागर संबंधी अन्योन्याभ्यस्तराशिका प्रमाण होता है ॥ ९३४॥ आगे वीसकोड़ाकोड़ी सागरआदि स्थितीकी नानागुणहानि और अन्योन्याभ्यस्तराशिको कहते है- इगिपंतिगदं पुध पुध अप्पिटेण य हदे हवे णियमा । अप्पिदृस्स य पंती णाणागुणहाणिपडिवद्धा ॥ ९३५ ।। एकपङ्किगतं पृथक् पृथगात्मेप्टेन च हते भवेन्नियमात् । आत्मेष्टस्य च पङ्कयो नानागुणहानिप्रतिबद्धाः ॥ ९३५ ।। अर्थ-शेष छह पंक्तियोंमेंसे एक एक पंक्तिमें जुदे २ अपने इष्टका भाग देनेसे निय- मकर अपनी २ इष्टराशि जो वीस कोडाकोडी सागरादि है उसकी नानागुणहानिशलाकाकी पंक्तियां होती हैं ॥ ९३५॥ अप्पिट्ठपंतिचरिमो जेत्तियमेत्ताण वग्गमूलाणं । छिदिणिवहोत्ति णिहाणिय सेसं च य मेलिदे इट्टा ॥९३६ ॥ आत्मेष्टपतिचरमः यावन्मात्राणां वर्गमूलानाम् । छितिनिवह इति निर्धाय शेषं च च मेलिते इष्टा ।। ९३६ ।। अर्थ-अपनी २ इष्टपंक्तियोंमें जितने अंतस्थान हों उतने वर्गमूलोंके अर्घच्छेदोंका समूहरूप ऐसा निश्चयकर और सबको मिलानेसे अपने २ विवक्षितकी नानागुणहानि होती है ॥ ९३६ ॥ आगे अन्योन्याभ्यस्तराशिको कहते है। इट्ठसलायपमाणे दुगसंवग्गे कदे दुइहस्स। पयडिस्स य अण्णोण्णभत्थपमाणं हवे णियमा ॥ ९३७ ॥ इष्टशलाकाप्रमाणे द्विकसंवर्गे कृते तु इष्टस्य । प्रकृतेश्च अन्योन्याभ्यस्तप्रमाणं भवेनियमात् ॥ ९३७ ॥ अर्थ-अपनी नानागुणहानिशलाकाके प्रमाण दोके अंक लिखकर आपसमें गुणनेसे नियमकर अपनी इष्ट प्रकृतिकी अन्योन्याभ्यस्तराशिका प्रमाण होता है । ९३७ ॥ - गोम्मटसारः। २७९ आगे वह प्रमाण कितना किस कर्मका होता है यह कहते हैं- आवरणवेदणीये विग्घे पल्लस्स विदियतदियपदं । णामागोदे विदियं संखातीदं हवंतित्ति ॥ ९३८ ॥ आवरणवेदनीये विघ्ने पल्यस्य द्वितीयतृतीयपदम् । नामगोत्रे द्वितीयं संख्यातीतं भवन्तीति ॥ ९३८ ॥ अर्थ-ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अंतराय इन चार कर्मोंमें अन्योन्याभ्य- स्तराशिका प्रमाण, पल्यके द्वितीयवर्गमूलके साथ असंख्यात तीसरे मूलको गुणनेसे जो होवे वह है । और नाम तथा गोत्रकर्मके असंख्यातगुणे पल्यके द्वितीयवर्गमूलप्रमाण अन्योन्या- भ्यस्तराशिका प्रमाण है ॥ ९३८ ॥ आउस्स य संखेजा तप्पडिभागा हवंति णियमेण । इदि अत्थपदं जाणिय इट्टठिदिस्साणए मदिमं ।। ९३९ ॥ आयुपश्च संख्येयाः तत्प्रतिभागा भवन्ति नियमेन । इति अर्थपदं ज्ञात्वा इष्टस्थितेरानयेत् मतिमान् ॥ ९३९ ।। अर्थ-आयुकर्ममें संख्याते प्रतिभाग नियमसे होते है इसप्रकार बुद्धिमान् मनुष्य वि- वक्षित स्थानोंको जानकर विवक्षित स्थितिकी नानागुणहानिशलाकाआदिको लावै ॥ ९३९ ॥ यही कहते है- उक्कस्सटिदिवंधे सयलावाहा हु सव्वठिदिरयणा । तकाले दीसदि तो धोधो बंधहिदीणं च ॥ ९४० ॥ उत्कृष्टस्थितिवन्धे सकलावाधा हि सर्वस्थितिरचना। तत्काले दृश्यते अतः अधोऽधो बन्धस्थितीनां च ॥ ९४०॥ अर्थ-विवक्षितप्रकृतिके उत्कृष्ट स्थितिबंध होनेपर उसीकालमें ही उत्कृष्ट स्थितिकी आवाधा और सब स्थितिकी रचना देखी जाती है। इसकारण उस स्थितिके अंतके निषेकसे नीचे २ प्रथमनिषेकपर्यंत स्थितिबंधरूप स्थितियोंकी एक एक समय हीनता देखनी चाहिये ॥ ९४०॥ आगे अधिकता किसतरह देखनी इस बातको कहते है। आवाधाणं विदियो तदियो कमसो हि चरमसमयो दु। पढमो विदियो तिदियो कमसो चरिमो णिसेओदु ॥९४२॥ आवाधानां द्वितीयः तृतीयः क्रमशो हि चरमसमयस्तु । प्रथमो द्वितीयः तृतीयः क्रमशः चरमो निषेकस्तु ॥ ९४१॥ अर्थ---उस बंध होने के बाद आबाधाकालका दूसरा समय तीसरा समय इसतरह क्रमसे एक एक बढ़ता हुआ आवाधाकालका अंतसमय होता है उसके बाद पहले समयमें प्रथम २८० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । निषेक दूसरेमें दूसरा तीसरे समयमें तीसरा निषेक इसतरह एक एक बढ़ता हुआ क्रमसे अंतसमयमें अंतका निषेक होता है ॥ ९४१ ।। आगे समयप्रबद्धके प्रमाण द्रव्य वर्तमान एकसमयमें बंधता भी है और उदयरूप भी होता है ऐसा दिखलाते है:- समयपवद्धपमाणं होदि तिरिच्छेण वट्टमाणम्मि । पडिसमयं वंधुदओ एक्को समयप्पवद्धो दु ॥ ९४२ ।। समयप्रवद्धप्रमाणं भवति तिरश्चा वर्तमाने। प्रतिसमयं वन्धोदय एकः समयप्रवद्धस्तु ।। ९४२ ।। अर्थ-त्रिकोणरचनामें समयप्रबद्धका प्रमाण विवक्षित वर्तमान समयमें तिर्यकरूप अर्थात् वरावर रचनारूप हरएक समयमें एक समयप्रवद्ध बघता है और एक समयप्रवद्ध ही उदयरूप होता है ॥ ९४२ ॥ आगे सत्त्व भी एकसमयप्रवद्धमात्र होगा इस आशंकाको दूर करनेके लिये कहते हैं- सत्त्रं समयपवद्धं दिवडगुणहाणिताडियं ऊणं । तियकोणसरूवढिदव्वे मिलिदे हवे णियमा ॥ ९४३ ॥ सत्त्वं समयप्रवद्धं व्यर्घगुणहानिताडितमूनम् । त्रिककोणखरूपस्थितद्रव्ये मिलिते भवेनियमात् ॥ ९४३ ।। अर्थ-सत्त्वद्रव्य, कुछकम डेढ गुणहानिकर गुणा हुआ समयप्रवद्ध प्रमाण है । वह त्रिकोणरचनाके सब द्रव्यका जोड़ देनेसे नियमसे इतना ही होता है ॥ ९४३ ॥ आगे इस सत्तारूप त्रिकोण यंत्रके जोड़ देनेकी विधि कहते है- उपरिमगुणहाणीणं धणमंतिमहीणपढमदलमत्तं । पढमे समयपवद्धं ऊणकमेणटिया तिरिया ॥ ९४४ ॥ उपरितनगुणहानीनां धनमन्तिमहीनप्रथमदलमात्रम् । प्रथमे समयप्रवद्धमूनक्रमेण स्थितं तिरश्वा ॥ ९४४ ॥ अर्थ-त्रिकोण रचनामें विवक्षित वर्तमानसमयमें प्रथमगुणहानिके प्रथम निषेकमें तो तिर्य- गूरूप अर्थात् वराबर लिखे निषेकोंका समुदाय संपूर्ण समयप्रबद्ध प्रमाण होता है, और उसके बाद द्वितीय निषेकसे लेकर अंतकी गुणहानिक अंतनिषेकपर्यंत क्रमसे चय कम होती हुई द्वितीयादि गुणहानियोंके जोड़से लेकर अंतकी गुणहानिके जोड़को अपनी २ पहली गुणहा- निके जोड़मेंसे घटाके जो प्रमाण हो उसका आधार होता है। और प्रथमगुणहानिका जोड़ गुणहानिके प्रमाणकर समयप्रबद्धको गुणनेसे जो प्रमाण हो उतना होता है ।। ९४४ ॥ - गोम्मटसारः। दु २८१ आगे स्थितीके भेदोंको कहते हैं- अंतोकोडाकोडिद्विदित्ति सव्वे णिरंतरट्ठाणा । उकस्सट्टाणादो सण्णिस्स य होंति णियमेण ॥ ९४५ ॥ अन्तःकोटीकोटिस्थितिरिति सर्वाणि निरन्तरस्थानानि । उत्कृष्ट स्थानात् संज्ञिनश्च भवन्ति नियमेन ॥ ९४५ ॥ अर्थ-आयुके विना सात कर्मोके उत्कृष्टस्थितिसे लेकर अंतःकोडाकोडीसागरप्रमाण जघन्यस्थितिपर्यंत एक एक समय कमका क्रम लिये हुए जो निरंतर स्थितिके भेद है ने संख्यातपल्यप्रमाण नियमसे सज्ञी पंचेन्द्री जीवोंके होते है ॥ ९४५ ॥ आगे सांतरस्थितिके भेद कहते है:- संखेजसहस्साणिवि सेढीरूढम्मि सांतरा होति । सगसगअवरोत्ति हवे उकसादो सेसाणं ॥ ९४६॥ संख्येयसहस्राण्यपि श्रेणीरुढे सान्तरा भवन्ति । स्वकखकावर इति भवेदुत्कृष्टात्तु शेषाणाम् ।। ९४६ ।। अर्थ-सम्यक्त्व देशसंयम सकलसयम उपशमक वा क्षपकश्रेणीके संमुख हुए ऐसे क्रमकरके मिथ्यादृष्टि असयत देशसंयत अप्रमत्त अपूर्वकरणादि तीन गुणस्थानवर्ती उपश- मश्रेणी क्षपकश्रेणी चढनेवाले जो जीव है उनके सांतर अर्थात् एक एक समय कमके नि- यमकर रहित स्थितीके भेद संख्यात हजार है । और शेष जीव समासोंमें (भेदोंमें, अपनी २ उत्कृष्ट स्थितीसे लेकर अपनी २ जघन्य स्थिति पर्यंत एक एक समय कम लिये- हुए निरंतर स्थितीके ही भेद होते है ॥ ९४६ ॥ आगे स्थितीके भेदोंके कारणरूप कषायाध्यवसाय (स्थितिबंधाध्यवसाय ) स्थान मूल- प्रकृतियोंके कहते है,- आउछिदिवंधज्झवसाणहाणा असंखलोगमिदा । णामागोदे सरिसं आवरणदु तदियविग्धे य ॥ ९४७ ।। आयुःस्थितिबन्धावसायस्थानानि असंख्यलोकमितानि । नामगोने सदृशमावरणद्विके तृतीयविघ्ने च ॥ ९४७ ।। अर्थ-आयुके स्थितिबंधाध्यवसायस्थान' सबसे कम होनेपर भी यथायोग्य असंख्यात- लोकप्रमाण है। उनसे पल्यके असख्यातवें भाग गुणे नाम-गोत्र इन दोनोंके परस्पर समान जानने । और उनसे भी पल्यके असंख्यातवें भाग गुणे ज्ञानावरण दर्शनावरण वेदनीय अंतराय-इन चारोंके परस्पर समान जानने चाहिये ॥ ९४७ ॥ सव्वुवरि मोहणीये असंखगुणिदकमा हु गुणगारो। पल्लासंखेजदिमो पयडिसमाहारमासेज ॥ ९४८ ॥ . 7 २८२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । सर्वोपरि मोहनीये असंख्यगुणितक्रमाणि हि गुणकारः । पल्यासंख्येयिमः प्रकृतिसमाहारमासाद्य ॥ ९४८॥ अर्थ-सबसे अधिक मोहनीयकर्मके स्थितिबंधाध्यावसायस्थान उनसे पल्यके असंख्यातवें भाग गुणे हैं। ऐसा प्रकृतियोंके स्थितिभेदोंकी अपेक्षा क्रमसे असंख्यात गुणे स्थितिबंधाध्य- वसाय जानने चाहिये । यहांपर गुणकारका प्रमाण पत्यका असंख्यातवां भाग जानना ॥९४८॥ आगे जघन्यादिक स्थितिकी अपेक्षा स्थितिबंधाध्यवसायस्थानोंका प्रमाण कहते हैं; अवरद्विदिवंधज्झवसाणट्टाणा असंखलोगमिदा । अहियकमा उक्कस्सद्विदिपरिणामोत्ति णियमेण ॥ ९४९ ॥ अवरस्थितिबन्धाध्यवसायस्थानानि असंख्यलोकमितानि । अधिकक्रमाणि उत्कृष्टस्थितिपरिणाम इति नियमेन ॥ ९४९ अर्थ-सब जघन्यस्थितिबंधके कारण जो अध्यवसायस्थान ( परिणामोंके स्थान ) है वे असंख्यातलोक प्रमाण है उससे आगे उत्कृष्टस्थितिपर्यंत एक एक चय क्रमसे अधिक नियमकर जानने चाहिये ॥ ९४९ ॥ अहियागमणणिमित्तं गुणहाणी होदि भागहारो दु । दुगुणं दुगुणं वड्डी गुणहाणि पडि कमेण हवे ॥ ९५० ॥ अधिकागमननिमित्तं गुणहानिः भवति भागहारस्तु द्विगुणा द्विगुणा वृद्धिः गुणहानि प्रति क्रमण भवेत् ॥ ९५० ।। अर्थ-विवक्षित गुणहानिमें अधिक (चय ) का प्रमाण लानेकेलिये अंतके निषेकको दोका भागहार दिया जाता है उससे आगे हरएक गुणहानिके प्रति क्रमसे दूना २ चयका (वृद्धिका ) प्रमाण होता है ऐसा जानना ॥ ९५० ॥ ठिदिगुणहाणिपमोणं अज्झवसाणम्मि होदि गुणहाणी । णाणागुणहाणिसला असंखभागो ठिदिस्स हवे ॥ ९५१॥ स्थितिगुणहानिप्रमाणमध्यवसाने भवति गुणहानिः । नानागुणहानिशला असंख्यभागः स्थितेर्भवेत् ।। ९५१ ॥ अर्थ-पहले बंधकथनके अवसर पर जैसा कर्मस्थितिकी रचनामें गुणहानिका प्रमाण कहा है वैसा यहां कषायाध्यवसायस्थानोमें भी गुणहानिका प्रमाण जानना और जो नानागु- णहानियोंका प्रमाण उस जगह कहा है उसके असंख्यातवें भाग प्रमाण यहां कषायाध्यवसा- यस्थानों में नानागुणहानिका प्रमाण होता है ॥ ९५१ ॥ १. यहाँपर “ण च सव्वमूलपयडीणं" इत्यादि प्रस्तुत सिद्धातवाक्य, कहे गये हैं।
गोम्मटसारः।
-
२८३
आगे जघन्यचयका महत्त्व दिखलाते हैं;-
लोगाणमसंखपमा जहण्णउहिम्मि तम्हि छट्ठाणा।
ठिदिवंधज्झवसाणटाणाणं होंति सत्तण्हं ॥ ९५२ ॥
लोकानामसंख्यप्रमाणि जघन्यवृद्धौ तस्मिन् षट्स्थानानि ।
स्थितिवन्धाध्यवसायस्थानानां भवन्ति सप्तानाम् ॥ ९५२ ॥
अर्थ-आयुके विना शेष सात मूलप्रकृतियोंके स्थितिबंधाध्यवसायस्थानोंका प्रमाण
जघन्य वृद्धि में अविभागप्रतिच्छेदोंकी अपेक्षा असंख्यातलोकप्रमाण अनंतभागवृद्धि आदिक
छहस्थानपतित वृद्धिरूप पाया जाता है ॥ ९५२ ॥
आगे आयुकर्मके स्थितिबंधाध्यवसायस्थानोंमें विशेषता दिखलाते है-
आउस्स जहण्णछिदिवंधणजोग्गा असंखलोगमिदा।
आवलिअसंखभागेणुवरुवरि होति गुणिदकमा ॥ ९५३ ॥
आयुषः जघन्यस्थितिवन्धनयोग्यानि असंख्यलोकमितानि ।
आवल्यसंख्यभागेनोपर्युपरि भवन्ति गुणितक्रमाणि ॥ ९५३ ॥
अर्थ-आयुकर्मकी सब जघन्यस्थितिबंधके योग्य अध्यवसायस्थान असंख्यातलोकप्रमाण
हैं । उससे आगे २ उत्कृष्टस्थितिपर्यन्त क्रमसे आवलीके असंख्यातवें भागकर गुणे हुए
स्थान जानने चाहिये ।। ९५३ ॥
आगे किसी जीवके जितने अध्यवसायस्थानोंसे नीचेकी स्थिति बंधती है किसी दूसरेके
भी उतने ही स्थानोंसे ऊपरकी स्थिति बंधती है इसप्रकार ऊपर नीचे समानता समश अनु-
कृष्टिविधान कहते है-
पल्लासंखेजदिमा अणुकही तत्तियाणि खंडाणि ।
अधियकमाणि तिरिच्छे चरिमं खंडं च अहियं तु ॥ ९५४॥
पल्यासंख्येयिमा अनुकृष्टिः तावन्ति खण्डानि ।
अधिकक्रमाणि तिरश्चि चरम खण्डं च अधिकं तु ॥ ९५४ ॥
अर्थ-स्थितिबंधाध्यवसायस्थानोंकी अनुकृष्टिरचनामें पल्यके असख्यातवें भाग अनु-
कृष्टिपदोंका प्रमाण है और उतने ही अनुकृष्टिके खंड होते है । वे खंड तिर्यक् ( बराबरी)
रचना किये गये क्रमसे अनुकृष्टिके चयकर अधिक २ है तौभी अतका खंड कुछ विशेषसे
अधिक ही है दूना तिगुना नही होता ॥ ९५४ ॥
अब उस विशेषके प्रमाणको बतलाते है-
२
लोगाणमसंखमिदा अहियपमाणा हवंति पचेयं
समुदायेणवि तचिय ण हि अणुकिहिम्मि गुणहाणी ॥९५५॥
- २८४ रायचन्द्रजैनशासमालायाम् । लोकानामसंख्यमितानि अधिकप्रमाणानि भवन्ति प्रत्येकम् । समुदायेनापि तावत् न हि अनुकृष्टौ गुणहानिः ॥ ९५५ ।। अर्थ-हर एक गुणहानिके प्रति अनुकृष्टिचयका प्रमाण सामान्यसे असंख्यातलोकमात्र है और सब चयसमूहको मिलानेसे भी असंख्यातलोकप्रमाण ही है। और अनुकृष्टिके गच्छोंमें गुणहानिकी रचना नही है ॥ ९५५ ।। पढमं पढम खंडं अण्णोणं पेक्खिऊण विसरित्थं । हेछिल्लुकस्सादोऽणंतगुणादुवरिमजहण्णं ॥ ९५६ ॥ प्रथमं प्रथम खण्डमन्योन्यं प्रेक्ष्य विसशम् । अधस्तनोत्कृष्टादनन्तगुणादुपरितनजघन्यम् ॥ ९५६ ।। अर्थ-इसप्रकार अनुकृष्टिरचनामें प्रथमादि गुणहानियोंमें पहले पहले खंड भी परस्पर अपेक्षाकर विसदृश ( असमान ) है क्योंकि अपने नीचेके प्रथमखंडके उत्कृष्टस्थानसे ऊपरले प्रथमखंडके जघन्य स्थान अनंतगुणे हैं ।। ९५६ ।। विदियं विदियं खंडं अण्णोण्णं पेक्खिऊण विसरित्थं । हेडिल्लुक्कस्सादोणंतगुणादुवरिमजहण्णं ॥ ९५७ ॥ द्वितीयं द्वितीयं खण्डमन्योन्यं प्रेक्ष्य विसदृशम् । अधस्तनोत्कृष्टादनन्तगुणादुपरिमजघन्यम् ॥ ९५७ ॥ अर्थ-गुणहानियोंमें प्रथमादि निषेकोंका दूसरा २ खंड परस्पर देखनेसे असमान है क्योंकि नीचले दूसरे खंडके उत्कृष्टस्थानसे ऊपरले दूसरे खंडके जघन्यस्थान अनंतगुणे है ॥ ९५७ ॥ ऐसे ही तीसरे तीसरे इत्यादि खंडोंकी असमानता जानलेना, इसप्रकार एक कम अनुकृष्टिप्रमाण खंडोंकी असमानता होती है। उसमें क्या होता है यह कहते हैं- चरिमं चरिमं खंडं अण्णोण्णं पेक्खिऊण विसरित्थं । हेडिल्लुक्कस्सादोणतगुणादुवरिमजहणं ॥ ९५८ ॥ चरमं चरमं खण्डमन्योन्यं प्रेक्ष्य विसदृशम् । अधस्तनोत्कृष्टादनन्तगुणादुपरिमजघन्यम् ॥ ९५८ ।। अर्थ-गुणहानिके प्रथमादिनिषकोंका अंतअंतका खंड अंतके निषकोंके अंतके खंड पर्यंत निरंतर एक एक चय अधिक होनेसे परस्परमें असमान है। और शक्तिसे नीचले अंतखंडके उत्कृष्टस्थानसे ऊपरले अंतखंडके जघन्यस्थान अनंतगुणे हैं ॥९५८ ।। उसमें कारण कहते हैं:- हेहिमखंडुक्कस्सं उर्वकं होदि उवरिमजहणं । अट्ठकं होदि तदोणंतगुणं उवरिमजहण्णं ॥ ९५९ ॥ 1 २ हैं ॥९६० ॥ है उसके बाद उस उत्कृष्टखंडसे ऊपरके स्थितिखंड है उनसे लेकर अपने २ उत्कृष्टखंड पर्यंत रचनाकरके क्रमसे असंख्यातगुणे है ॥ ९६१ । ९६२ ॥ यस्थानोंमें जघन्यस्थितिसंबंधी अनुभागाध्यवसायस्थानोंको कहते है,- गोम्मटसारः। २८५ अधस्तनखण्डोत्कृष्टमुर्वको भवति उपरिमजघन्यम् । अष्टाङ्को भवति ततोऽनन्तगुणमुपरिमजघन्यम् ॥ ९५९ ।। अर्थ-जिसकारण तिर्यगरूप रचनामें ऊपर लिखे हुए खंडोंके अपने २ नीचे लिखे खंडोंका उत्कृष्ट अध्यवसायस्थान पूर्वस्थानसे अनंत भागवृद्धिको लियेहुए है उसकारणसे नीचले खंडके उत्कृष्ट से ऊपरले खंडका जघन्यस्थान अनंतगुणा कहा है ॥ ९५९ ॥ अवरुक्कस्सठिदीणं जहण्णमुक्कस्सयं च णिवग्गं । सेसा सब्चे खंडा सरिसा खलु होति उड्डेण ॥ ९६०॥ अवरोत्कृष्टस्थितीनां जघन्यमुत्कृष्टक च निर्वर्गम् । शेपाः सर्वे खण्डाः सहशा खलु भवन्ति वृद्ध्या ॥ ९६०॥ अर्थ-जघन्यस्थितिका कारणरूप जो प्रथमनिषेकका जघन्य पहलाखंड और उत्कृष्ट- स्थितिका कारण जो अंतके निपेकका उत्कृष्ट अंतका खंड-ये दोनों तो निर्वर्ग है अर्थात् किसी खंडसे सर्वथा समान नहीं है । और शेष सब खंड ऊर्ध्वरचनासे अन्यखडोंके समान अटण्हपि य एवं आउजहण्णटिदिस्स वरखंड । जावय तावय खंडा अणुकट्टिपदे विसेसहिया ॥ ९६१ ॥ तत्तो उपरिमखंडा सगसगउक्स्सगोत्ति सेसाणं । सब्बे ठिदियणखंडाऽसंखेजगुणक्कमा तिरिये ॥९६२॥ जुम्म। अष्टानामपि च एवमायुर्जघन्यस्थितेः वरखण्डम् । यावत् तावत् खण्डा अनुकृष्टिपदे विशेषाधिकाः ॥ ९६१ ।। तत: उपरिमखण्डाः स्वकस्खकोत्कृष्टक इति शेषाणाम् । सर्वे स्थितितनखण्डा असंख्येयगुणक्रमाः तिरश्चि ।। ९६२ ॥ युग्मम् । अर्थ-आठों ही कर्मोंका रचनाविशेष समान है परंतु विशेषता यह है कि आयुकर्मके खंड अनुकृष्टिगच्छमें जघन्यस्थितिक खडसे उत्कृष्ट खंडपर्यंत ही विशेषतासे अधिक है। तथा अवशेष स्थितियोंके अपने २ जघन्यखंडसे अपने २ उत्कृष्टखंडपर्यत सब बराबर आगे अनुमागबंधाध्यवसायस्थानोंको कहते हुए उसमें जघन्यस्थितिसंबंधी अध्यवसा- रसबंधज्झवसाणठ्ठाणाणि असंखलोगमेवाणि। अवरद्विदिस्स अवरद्विदिपरिणामम्हि थोवाणि ॥ ९६३ ॥ १. "उर्वक" आदिक सझायें जीवकाडमे कही गई हैं।
२८६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
रसवन्धाध्यवसायस्थानानि असंख्यलोकमात्राणि ।
अवरस्थितरवरस्थितिपरिणामे लोकानि ।। ९६३ ॥
अर्थ-अनुभागबंधाध्यवसायस्थान असंख्यातलोकप्रमाण है तो भी जघन्यस्थितिसंबंधी
जघन्यस्थितिबंधयोग्य परिणामोंकी अपेक्षा थोड़े है ॥ ९६३ ॥
तत्तो कमेण वदि पडिभागेण य असंखलोगेण ।
अवरहिदिस्स जेदृष्टिदिपरिणामोत्ति णियमेण ॥ ९६४ ॥
ततः क्रमेण वर्द्धते प्रतिभागेन च असंख्यलोकेन ।
अवरस्थितः ज्येष्ठस्थितिपरिणाम इति नियमेन ॥ ९६४ ॥
अर्थ-उसके बाद क्रमसे जघन्यस्थितिके जघन्यपरिणामसंबंधी प्रथमनिषकरूप अनुमा-
गाध्यवसायस्थानसे लेकर उत्कृष्टस्थितिके उत्कृष्ट परिणामसंबंधी अनुभागाध्यवसायस्थानतक
असंख्यातलोकरूप प्रतिभागहारकर वढते २ अनुभागाध्यवसायस्थान नियमसे जानने
चाहिये ॥ ९६४ ॥
इति श्रीनेमिचन्द्राचार्यविरचित पंचसंग्रह द्वितीयनामवाले गोम्मटसारग्रंथके कर्म-
कांड में कर्मस्थितिरचनासद्भाव नामा नवमां अधिकार समाप्त हुथा ॥९॥
ग्रन्थकर्ताकी प्रशस्ति ।
आगे मूलग्रंथकर्ता श्रीनेमिचन्द्राचार्य अपनी ग्रंथ करनेकी प्रतिज्ञा पूर्ण करके अपने
समाचार कहते है-
गोम्मटसंगहसुत्तं गोम्मटदेवेण गोम्मटं रइयं ।
कम्माण णिज्जरहें तचटवधारणटुं च ॥ ९६५ ॥
गोम्मटसंग्रहसूत्रं गोम्मटदेवेन गोम्मटं रचितम् ।
कर्मणां निर्जरार्थ तत्त्वावधारणार्थ च ॥ ९६५ ।।
अर्थ-जो यह गोम्मटसारग्रंथका संग्रहरूप सूत्र है वह श्रीवर्द्धमान नामा तीर्थकरदेवने
नयप्रमाणके गोचर कहा है और वह ज्ञानावरणादिकर्मोकी निर्जराकेलिये तथा तत्त्वोंके
खरूपका निश्चय होनेकेलिये जानना चाहिये ॥ ९६५ ॥ इसप्रकार अपनी स्वच्छंदताका
अभाव दिखलाया है।
जम्हि गुणा विस्संता गणहरदेवादिइढिपत्ताणं ।
सो अजियसेणणाहो जस्स गुरू जयउ सो राओ ॥ ९६६ ॥
यस्मिन् गुणा विश्रान्ता गणघरदेवादिऋद्धिप्राप्तानाम् ।
सः अजितसेननाथो यस्य गुरुर्जयतु स रायः ॥ ९६६ ॥
गोम्मटसारः।
२८७
अर्थ-जिसमें बुधादिऋद्धिप्राप्त गणधरदेवादि मुनियोंके गुण विश्राम पाके ठहरे हुए
हैं अर्थात् गणधरादिकोंके समान जिसमें गुण है ऐसा अजितसेन नामा मुनिनाथ जिसका
व्रत (दीक्षा ) देनेवाला गुरू है वह चामुंडराय सर्वोत्कृष्टपनेसे जय पावौ ॥ ९६६ ॥
सिद्धंतुदयतडग्गयणिम्मलवरणेमिचंदकरकलिया।
गुणरयणभूसणंबुहिमइवेला भरउ भुवणयलं ॥ ९६७ ॥
सिद्धान्तोदयतटोद्तनिर्मलवरनेमिचन्द्रकरकलिता ।
गुणरत्नभूपणाम्बुधिमतिवेला भरतु भुवनतलम् ॥ ९६७ ॥
अर्थ-सिद्धांतरूपी उदयाचलपर ज्ञानादिकर उदयमान हुए निर्मल और उत्कृष्ट श्रीने-
मिनाथतीर्थंकररूपी चन्द्रमाकी अथवा नेमिचंद्राचार्यरूपी चंद्रमाकी वचनरूपीकिरणोंसे बंधी-
हुई गुणरूपीरनोंकर शोभित ऐसे चामुंडरायरूप समुद्रकी बुद्धिरूपी वेला इस पृथ्वी
तलको पूरित करौ अथवा समस्तजगत्मे अतिशयकर विस्तार पाओ ॥ ९६७ ॥
गोम्मटसंगहसुत्तं गोम्मटसिहरुवरि गोम्मटजिणो य ।
गोम्मटरायविणिम्मियदक्षिणकुक्कडजिणो जयउ ॥ ९६८ ॥
गोम्मटसंग्रहसूत्रं गोम्मटशिखरोपरि गोम्मटजिनश्च ।
गोम्मटरायविनिर्मितदक्षिणकुक्कटजिनो जयतु ॥ ९६८ ॥
अर्थ-गोम्मटसारसंग्रहरूपसूत्र, गोम्मटशिखरके ऊपर चामुंडरायराजाकर वनवाये
जिनमंदिरमें विराजमान एक हाथप्रमाण इंद्रनीलमणिमय नेमिनाथनामा तीर्थकरदेवका
प्रतिबिंब तथा उसी चामुडरायकर निर्मापित लोकमें रूढिकर प्रसिद्ध दक्षिणकुक्कटनामा जि-
नका प्रतिबिंब जयवंत प्रवर्तो॥ ९६८ ॥
जेण विणिम्मियपडिमावयणं सवसिद्धिदेवेहि।
सव्वपरमोहिजोगिहिं दिट्ट सो गोम्मटो जयउ ॥ ९६९ ॥
येन विनिर्मितप्रतिमावदनं सर्वार्थसिद्धिदेवैः ।
सर्वपरमावधियोगिभिः दृष्टं स गोम्मटो जयतु ॥ ९६९ ॥
अर्थ-जिस रायकर वनवाया गया जो जिनप्रतिमाका मुख वह सर्वार्थसिद्धिके
देवोंने तथा सर्वावधि-परमावधिज्ञानके धारक योगीश्वरोंने देखा है वह 'चामुंडराय'
सर्वोत्कृष्टपनेसे वत्तौ ॥ ९६९ ॥
वजयणं जिणभवणं इंसिपभारं सुवण्णकलसं तु ।
तिहुवणपडिमाणिक जेण कयं जयउ सो राओ ॥ ९७० ॥
वज्रतलं जिनभवनमीषत्प्रभारं सुवर्णकलश तु ।
त्रिभुवनप्रतिमानमेकं येन कृतं जयतु स रायः ॥ ९७० ॥
२८८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-जिसका, अवनितल ( पीठबंध ) वज्रसरीखा है, जिसका ईपत्याग्भार नाम है, जिसके ऊपर सुवर्णमयी कला है तथा तीन लोकमें उपमा देने योग्य ऐसा अद्वितीय जिनमंदिर जिसने बनवाया ऐसा चामुंडराय जयवंत वर्ती ॥ ९७० ॥ जेणुभियर्थमुवरिमजक्खतिरीटग्गकिरणजलधोया। सिद्धाण सुद्धपाया सो राओ गोम्मटो जयड ॥ ९७१ ॥ येनोद्भितस्तम्भोपरिमवक्षतिरीटाग्रकिरणजलधौती । सिद्धानां शुद्धपादौ स रायो गोम्मटो जयतु ।। ९७१ ।। अर्थ-जिसने चैत्यालयमें खड़े किये हुए खंभोंके ऊपर स्थित जो यक्षके आकार हैं उनके मुकुटके आगेके भागकी किरणोंरूप जलसे सिद्धपरमेष्टियोंके आत्मप्रदेशोंके आकार- रूप शुद्ध चरण धोये है ऐसा चामुंडराय जयको पाओ ॥ भावार्थ-चैत्यालवमें स्तंभ बहुत ऊंचा बना हुआ है उसके ऊपर यक्षकी मृति है उसके मुकुटमें प्रकाशवन्त रन लगे हुए है ॥ ९७१ ॥ अब अतिम आशीर्वाद देते हुए अपने समाचारोंको पूर्ण करते है। गोम्मटसुत्तल्लिहणे गोम्मटरायेण जा कया देसी । सो राओ चिरं कालं णामेण य वीरमत्तंडी ॥ ९७२ ॥ गोम्मटसूत्रलेखने गोम्मटरायेन या कृता देशी। स रायः चिरं कालं नाना च वीरमार्तण्डी ।। ९७२ ।। अर्थ-गोम्मटसारग्रंथके गाथासूत्र लिखनेके समय गोम्मटरायने जो देशीभाषा अर्थात् कर्णाटक वृत्ति वनाई है वह वीरमार्तण्ड नामसे प्रसिद्ध चामुंडराय बहुत कालतक जयवंत प्रवर्ती ॥ ९७२ ॥ इसप्रकार श्रीनेमिचन्द्राचार्यने इस ग्रंथके होनेमें अपने समाचार कहे सो यही ग्रंथप्रशस्ति समाप्त हुई । इति संक्षिप्त भापाटीका सहित कर्मकाण्ड समाप्त हुआ। Amm समाप्तोऽयं ग्रन्थः। Mahilomromitram - - ܚ