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श्रीः
* चाणक्यनीतिदर्पण
* प्रथमोऽध्याय
* श्रीगणेशाय नमः
प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् ॥
नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्येराजनीतिसमुच्चयम्॥१॥
टीका-तीनों लोकोंके पालन करनेवाले सर्वशक्ति.
मान् विष्णुको शिरसे प्रणाम करके अनेक शास्त्रों
मैसे निकालकर राजनीति समुच्चय नामक ग्रंथको
कहताहूं ॥ १ ॥
अधीर अथाशास्त्रनरोजानातिसत्तमः ॥
धनीयदेशविख्यातकार्याकार्यशुभाशुभम् ॥२॥
टीका-जो इसको विधिवत् पढकर धर्मशास्त्रमें
प्रसिद्ध शुभकार्य और अशुभकार्यको जानता है वह
अति उत्तम गिना जाता है ॥ २ ॥
तदहंसंप्रवक्ष्यामिलोकानांहितकाम्यया ॥
यस्यविज्ञानमात्रेणसर्वज्ञत्वंप्रपद्यते ॥३॥
चाणक्यनीतिदर्पणे।
-
टीका-मैं लोगोंके हितकी वांछासे उस्को कहूंगा
जिसके ज्ञानमानसे सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है ॥३॥
मूर्खशिष्योपदेशेनदुष्टस्त्रीभरणेनच ॥
दुःखितःसंप्रयोगणपंडितोप्यवसीदति ॥ ४ ॥
टीका-निर्बुद्धिशिष्यको पढानेस, दुष्टस्त्रीके पोषन
से और दुःखियोंकेसाथ व्यवहार करनेसे पंडितभी
दुःख पाता है ॥ ४॥
दुष्टाभार्याशठमित्रंभृत्यश्चोत्तरदायकः ॥
ससपेंचगृहेवासोमृत्युरवनसंशयः ॥५॥
टीका-दुष्टस्त्री, मूर्खमित्र, उत्तरदेनेवाला दास, और
साँपवाले घरमें वास, ये मृत्युस्वरूपही हैं. इस में
संशय नहीं ॥ ५ ॥
आपदर्थेधनरक्षेद्दागब्रक्षेद्धनैरपि ॥
आत्मानंसतनंरक्षदारैरपिधनैरपि ॥ ६ ॥
टीका-आपारी निवारण करनेके लिये धनको
बचाना चाहिये, धनसेभी स्त्रीकी रक्षा करनी चाहिये
सबकालमें स्त्री और धनौसभी अपनी रक्षाकरनी
उचित है ॥६॥
आपदर्थेधनंरक्षच्छीमतश्चकिमापदः ।
कदाचिचलितालक्ष्मीःसंचितोपिविनश्यति॥७॥
अध्यायः १ ॥
टीका-बिपत्तिनिवारणकलिये धनकी रक्षाकरनी
उचित है क्यों कि श्रीमानोंकोभी आपत्ति आती है.
हाँ कदाचित देवयोग और चंचलहोने से संचित लक्ष्मी
भी नष्ट होजाती है ॥ ७ ॥
यस्मिन्देशेनसंमानोनवृत्तिर्नचबांधवः ।।
नचविद्यागमोप्यस्तिवासंतत्रनकारयेत् ॥८॥
टीका-जिस देश में न आदर, न जीविका, न बन्धु,
न विद्याका लाभ है वहां वास नहीं करना चाहिये॥८॥
धनिकःश्रोत्रियोराजानदीवैद्यस्तुपंचमः॥
पंचयत्रनविद्यतेनतत्रदिवसंवसेत् ॥९॥
टीका-धनिक, वेदकाज्ञाता-ब्राह्मण, राजा, नदी,
और पांचवां वैद्य ये पांच जहां विद्यमान नर नहीं
हैं तहां एकदिनभी वास नहीं करना चाहिये ॥९॥
लोकयात्राभयंलज्जादाक्षिण्यंत्यागशीलता॥
पंचयत्रनविद्यतेनकुर्यात्तत्रसंगतिम् ॥१०॥
टीका-जीविका, भय, लज्जा, कुशलता, देनेकी
प्रकृति, जहां ये पांच नहीं वहांके लोगोंकेसाथ संगति
न करनी चाहिये ॥ १० ॥
जानीयात्प्रेषणेभृत्यान्बान्धवान्व्यसनागम।।
मित्रंचापत्तिकालतुभार्यांचविभवक्षये॥११॥
४
चाणक्यनीतिदर्पणे।
टीका-काममें लगानेपर सेवकों को, दुःख आनेपर
वान्धवों की, विपत्तिकालमें मित्रकी और विभव के
नाश होनेपर स्त्रीकी परिक्षा होजाती है ॥ ११॥
आतुरेव्यसनेप्राप्तेदुर्मिक्षेशत्रुसंकटे ॥
राजद्वारेश्मशानेचयस्तिष्टतिसबांधवः ॥१२॥
टीका-आतुरहोनेपर.दुःख प्राप्त होनेपर,कालपड़ने
पर बेरियोंसे संकट आनेपर राजाके समीप और
स्मशानपर जो साथ रहता है वही बन्धु है ॥ १२॥
योध्रुवाणिपरित्यज्य अध्रुवंपरिसेवते ॥
ध्रुवाणितस्यनश्यन्तिअध्रुवनष्टमेवहि॥१३॥
टीका-जो निश्चित वस्तुओंको छोड़कर अनिश्चितकी
सेवा करता है उसकी निश्चित वस्तुओंका नाश हो
जाता है अनिश्चित तो नष्टही है ॥ १३ ॥
वरयेत्कुलजांप्राज्ञोविरूपामपिकन्यकाम्॥
रूपशीलांननीचस्यविवाहासदृशेकुले ॥१४॥
टीका-बुद्धिमान् उत्तम कुल की कन्या कुरूपाभी
हो उसे बरै नीचकुलकी सुन्दरी हो तोभी उसको
नहीं. इसकारण कि विवाह तुल्य कुलमें विहित
है ॥ १४॥
नखिनांचनदीनांचशूगिणांशस्त्रपाणिनाम् ॥
विश्वासोनैवकर्तव्यःस्त्रीपुराजकुलेषुच॥१५॥
अध्याय: २
टीका-नदियोंका, शस्त्रधारियों का, नखवाले और
सिंगवाले जन्तुओंका, स्त्रियोंमें और राजकुल पर
विश्वास नहीं करना चाहिये ॥ १५ ॥
विषादप्यमृतंग्राह्यममेध्यादपिकांचनम् ॥
नीचादप्युत्तमांविद्यास्त्रीरत्नंदुष्कुलादपि।१६।
टीका-विषमॆसभी अमृतको, अशुद्ध पदार्थों से भी
सोनेको, नीचसभी उत्तम विद्याको, और दुष्ट कुलसे
भी स्त्रीरत्नको लेना योग्य है ॥ १६ ॥
स्त्रीणांद्विगुणअहारोलज्जाचापिचतुर्गुणा ।।
साहसंषड्गुणंचैवकामश्चाष्टगुणःस्मृतः ॥१७॥
टीका-पुरुषसे स्त्रियोंका अहार दूना लज्जा
चौगुनी साहस छगुना, और काम आठगुना अधिक
होता है ॥ १७ ॥
इति प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥
अथद्वितियोऽध्यायः २
अनृतंसाहसंमायामूर्खत्वमतिलोभिता ।।
अशौचत्वंनिर्दयत्वंस्त्रीणांदोषाःस्वभावजाः।
टीका-असत्य, बिनाबिचार किसी काममें झटपट
लगजाना, छल, मूर्खता, लोभ, अपवित्रता और
निर्दयता ये स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं ॥१॥
चाणक्यनीतिदर्पणे। भोज्यभोजनशक्तिश्चरतिशक्तिर्वराङ्गना ।। विभवोदानशक्तिश्चनाल्पस्थतपसःफलम् ।। टीका-भोजनके योग्य पदार्थ और भोजनकी शक्ति, सुन्दर स्त्री, और रतिकी शक्ति, ऐश्वर्य और दानशक्ति इनका होना थोडे तपका फल नहीं है ॥ २ ॥ यस्यपुत्रोवशीभूतोमार्याच अनुगामिनी ॥ विभवेयश्चसंतुष्टस्तस्यस्वर्गइहैवहि ॥ ३ ॥ टीका--जिसका पुत्र वशमें रहता है और स्त्री इच्छाके अनुसार चलती है और जो विभव में संतोष रखता है उसको स्वर्ग यहांही है ॥ ३ ॥ तेपुत्रायेपितुर्भक्ताःसपितायस्तुपोषकः ॥ तन्मित्रंयत्रविश्वासःसाभार्यायत्रनितिः॥४॥ टीका-बही पुत्र है, जो पिता का भक्त है. वही पिता है,जो पालन करता है,वही मित्र है, जिसपर विश्वास है, वही स्त्री है, जिससे सुख प्राप्त होता है ।। ४ । परोक्षकार्यहंतारंप्रत्यक्षेप्रियवादिनम् ।। वर्जयेत्तादृशंमित्रंविषकुंभपयोमुखम् ॥ ५ ॥ टीका-आंखके ओट होने पर काम बिगाडे, सन्मुख होनेपर मीठी मीठी बात बनाकर कहे,ऐसे मित्रको मुंहुडेपर दुधसे और सब विषसे भरे अंडे के समान अध्यायः २। बोडदेना चाहिये ॥ ५ ॥ नविश्वसेत्कुमित्रेचमित्रेचापिनविश्वसेत् ।। कदाचित्कुपितोमित्रोसर्वंगुह्यंप्रकाशयेत् ॥६॥ टीका--कुमित्रपर विश्वासतो किसी प्रकारसे नहीं करना चाहिये और सुमित्रपरभी विश्वास न रक्खे इसका कारण कि, कदाचित् मित्र रुष्ट होयतो सब गुप्त बातों को प्रसिद्ध करदे ॥ ६ ॥ मनसाचिंतितंकार्यवाचानैवप्रकाशयेत् ॥ मंत्रणरक्षयेद्ढंकार्यचापिनियोजयेत् ॥ ७ ॥ टीका--मनसे सोचे हुये कामका प्रकाश वचनसे न करे, किंतु मंत्रसे उसकी रक्षा करे और गुप्तही उसकार्य को काममें भी लावै ॥ ७ ॥ कष्टंचखलुमूर्खत्वंकष्टंचखलुयौवनम् ॥ कष्टात्कष्टतरचैवपरगेहनिवासिनम् ॥ ८॥ टीका--मूर्खता दुःख देती है, और युवापनभी दुःख देता है, परंतु दुसरे के गृहका वास तो बहुतही दुःख दायक होता है ॥ ८ ॥ शैलेशैलेनमाणिक्यमौक्तिकनगजेगजे ॥ साधवानहिसर्वत्रचंदनंनवनेवने ॥९॥ टीका-सब पर्वतोपर माणिक्य नहीं होता और मोती चाणक्यनीतिदर्पणे। सब हाथियों में नहीं मिलता, साधुलोग सबस्थानोमें नहीं मिलते. और सब बनमें चंदन नहीं होता। पुत्राश्चविविधैःशीलैंनियोज्याःसततंबुधैः ॥ नीतिज्ञाःशीलसंपन्नाभवंतिकुलपूजिताः॥१०॥ टीका-बुद्धिमान् लोग लड़कोंको नाना भांतिकी सुशीलतामें लगावे; इसकारण कि, नीतिके जानने वाले यदि शीलवान् होय तो कुलमें पूजित होतेहैं।॥१०॥ मातारिपुःपिताशत्रुर्वालोया यांनपाठ्यते ॥ सभामध्येनशोभतहसमध्येबकोयथा॥११॥ टीका-वह माता शत्रु और पिता बैरीहै जिसने अपने बालक को न पढाया.इस कारण कि सभाके बीच वे ऐसे शोभते, जैसे हंसोंके बीच बकुला ॥ ११ ॥ लालनाबहवोदोषास्ताडनावहवोगुणाः ।। तस्मात्पुत्रंचशिष्यंचताडयेन्नतुलालयेत्॥१२॥ टीका-दुलारनेसे बहुत दोष होते हैं. और दंड देनेसे बहुत गुण. इस हेतु पुत्र और शिष्यको दण्ड देना उचित है लालना नहीं ॥ १२ ॥ श्लोकेनवातद.नत क्षिरेणच। अवंध्यंदिवसंकुर्याहानाध्ययनकर्मभिः॥१३॥ M
अध्यायः २
टीका-श्लोक वा श्लोकके अधिको अथवा अधिसे
अधिको प्रतिदिन पढना उचित है. इस कारण कि
दान, अध्यन आदि कर्मसे दिनको सार्थक करना
चाहिये ॥ १३ ॥
कांतावियोगःस्वजनापमानोरणस्यशेषः
:कुन-
पस्यसेवा॥दरिद्रभावोविषमासंभाचविनाग्नि-
मेतेप्रदहन्तिकायम् ॥१४॥
टीका-स्त्रीका विरह, अपने जनोसें अनादर, युद्ध'
करके बचा शत्र, कुत्सित राजाकी सेवा, दरिद्रता और
अविवेकियोंकी सभा. ये बिना आगही शरीरको
जलाते हैं १४॥
नदीतीरचयेवृक्षाःपरगेहेषुकामिनि ॥
मंत्रिहीनाश्चराजानःशीघ्रनश्यंत्यसंशयम्॥१५॥
टीका-नदीके तीरके वृक्ष, दूसरे के गृहमें जानेवाली
स्त्री, मंत्रीरहित राजा, निश्चय है कि शीमही नष्ट हो
जाते हैं ॥ १५॥
बलंविद्याचविप्राणांराज्ञांसैन्यंबलंतथा ॥
बलंबित्तंचवैश्यानांशूद्राणांचकनिष्ठिका॥१६॥
टीका-ब्राह्मणोंका बल विद्या है, वैसेही राजाका
बल सेना, वैश्योंका बल धन और शूद्रोंका बल
सेवा ॥ १६ ॥
चाणक्यनीतिदपणे। निर्धनंपुरुषवेश्याप्रजाभग्नंनृपंत्यजेत् ॥ खगावीतफलवृक्षंभुक्ताचअभ्यागतागृहम्॥१॥ टीका-वैश्या निर्धन परुषको, प्रजा शक्तिहीन राजाको, पक्षी फलरहित वृक्ष को, और अभ्यागत भोजन करके घरको छोड़ देते हैं ॥ १७ ॥ गृहत्वादक्षिणांविप्रास्त्यजन्तियजमानकं ॥ प्राप्त विद्यागुसंशिष्यादग्धारण्यंमृगास्तथा॥१८॥ टीका-ब्राह्मण दक्षिणा लेकर यजमानको त्याग देते हैं, शिष्य विद्या प्राप्त होजानेपर गुरुको, वैसेही जलेहुये बनको मृग छोड़देते हैं ॥ १८ ॥ दुराचारीदुरादृष्टिर्दुरावासीचदुर्जनः ।। यन्मैत्रीक्रियतेसासतुशीघ्रंविनश्यति॥१९॥ टीका-जिसका आचरण बुराहै, जिसकी दृष्टी पापमें रहती है, बुरेस्थानमें बसनेवाला और दुर्जन इन परुषोंकी मैत्री जिसके साथ की जाती है वह नर शीघ्रही नष्ट होजाता है ॥ १९॥ समानेशोभतेप्रीतीराज्ञिसेवाचशोभते ॥ वाणिज्यव्यवहारेषुस्त्रीदिव्याशोभतेगृह॥२०॥ टीका-समानजनमें प्रीति शोभती है, और सेवा राजाकी शोभती है, व्यवहारोंमें बनियाई, और
अध्यायः ३ ॥
११
घरमें दिव्य सुंदर स्त्री शोभती है ॥ २० ॥
इति द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥
अथ तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
कस्यदोषःकुलेनास्तिव्याधिनाकेनपीडिताः॥
व्यसनंकेननप्राप्तकस्यसौख्यंनिरन्तरम्॥१॥
टीका-किसके कुल में दोष नहीं है, व्याधीने किसे
पीडित न किया, किसको दुःख न मिला, किसको
सदा सुखही रहा ॥ १ ॥
आचारःकुलमाख्यातिदेशमाख्यातिभाषणम्॥
संत्रमःस्नेहमाख्यातिवपुराख्यातिभोजनम्॥२॥
टीका-आचार.कुलको बतलाता है, बोली देशको
जनाती है, आदर प्रीतिका प्रकाश करता है, शरीर
भोजनको जताता है ॥ १ ॥
सुकुलेयोजयेत्कन्यापुत्रविद्यासुयोजयेत् ॥
व्यसनेयोजयेच्छत्रुमिष्टंधर्मेणयोजयेत् ॥ ३ ॥
टीका-कन्याको श्रेष्ठ कुलवालेको देना चाहिये,
पुत्रको विद्या में लगाना चाहिये शत्रुको दुःख पहुँचाना
उचित है और मित्रको धर्मका उपदेश करना
चाहिये ॥३॥
१२ चाणक्यनीतिदर्पणे। दुर्जनस्यचसर्पस्यवरंसोनदुर्जनः ।। सोदशतिकालेतुदुर्जनस्तुपदेपदे ॥ ४ ॥ टीका-दुर्जन और सर्प इनमें सांप अच्छा दुर्जन नहीं इस कारण कि सांप काल आनेपर काटता है दुर्जन पदपदमें ॥ ४ ॥ एतदर्थंकुलीनानांनृपाःकुर्वतिसंग्रहम् ॥ आदिमध्यावसानेषुनत्यजन्तिचतेनृपम् ॥५॥ टीका-राजालोग कुलीनोंका संग्रह इस निमित्त करते हैं कि, वे आदि अर्थात् उन्नति, मध्य अर्थात साधारण और अंत अर्थात् विपत्तिमें राजाको नहीं छोड़ते ॥ ५॥ प्रलयेभिन्नमर्यादाभवन्तिकिलसागराः॥ सागराभेदमिच्छन्तिमलयेऽपिनसाधवः॥६॥ टीका-समुद्र प्रलयके समयमें अपनी मर्यादको छोड़ देते हैं और सागर भेदकी इच्छाभी रखते हैं .' परन्तु साधुलोग प्रलय होनेपरंभी अपनी मर्यादाको नहीं छोड़ते ॥ ६॥ मूर्खस्तुपरिहर्तवम प्रत्यक्षोद्विपदःपशुः ।। भिद्यतेवाक्यशल्येनअदृशंकंटकंयथा ॥७॥ टीका-मूर्खको दूर करना उचित है, इस कारण
।
अध्याय: ३॥
१
१३
कि, देखनेमें वह मनुष्य है; परन्तु यथार्थ देखेतो दो
पांवकर पशु है और वाक्यरूप कांटेको बेधता है
जैसे अन्धे को कांटा ॥ ७ ॥
रूपयौवनसम्पन्नाविशालकुलसम्भवाः ॥
विद्याहीनानशोभन्तेनिर्गंधाइवकिंशुकाः॥८॥
टीका-सुंदरता, तरुणता और बडे कुलमें जन्म
इनके रहतेभी विद्याहीन पुरुष बिनागन्ध पलाशढाक
के फूल के समान नहीं शोभते ॥ ८ ॥
कोकिलानांस्वरोरूपस्त्रीणांरूपंपतिब्रतम् ॥.
विद्यारूपंकुरूपाणांक्षमारूपंतपस्विनाम् ॥९॥
टीका-कोकिलोकी शोभा स्वर है, स्त्रियों की शोभा
पातिव्रत, कुरूपोंकी शोभा विद्या है, तपस्वियोंकी
शोभा क्षमा है ॥ ९ ॥
त्यजेदेकंकुलस्याथेग्रामस्यार्थे कुलत्यजेत् ॥
ग्रामंजनपदस्यार्थयात्मार्थपृथिवीत्यजेता१०॥
टीका-कुलके निमित्त एकको छोडदेना चाहिये,
ग्राम के हेतु कुलका त्याग उचित है, देशके अर्थ
ग्रामका और अपने अर्थ पृथिवीका अर्थात् सबका
त्यागही उचित है ॥१०॥
उद्योगेनास्तिदारियंजपतोनास्तिपातकम् ॥
मौनेनकलहोनास्तिनास्तिजागारितेभयम्॥११॥
११
चाणक्यनीतिदर्पणे । .
टीका-उपाय करनेपर दरिद्रता नहीं रहती, जपने
वालेको पाप नहीं रहता, मौन होनेसे कलह नहीं.
होता औ जागनेवालेक निकट भय नहीं आता॥१९॥
अतिरूपेणवैसीताआतिगणरावणः ।।
अतिदानाद्वर्विद्धोगतिसर्वत्रवर्जयेत॥१२॥
टीका-अतिसुंदरता के कारण सीता हरी गई, आति
गर्वसे रावण मारा गया, बहुत दान देकर पलिको
बंधना पडा; इस हेतु अतिको सब स्थल में छोड
देना चाहिये ॥ १२ ॥
कोहिभारःसमर्थानांकिंदुरव्यवसायिनाम् ।।
कोविदेशःसुविद्यानांकःप्रियःप्रियवादिनाम्१३
टीका-समर्थको कौन वस्तु भारी है, काम में तत्पर
रहने वाले को क्या दूर है सुन्दर विद्यावालोको कौन
विदश है, प्रियवादियोंको अप्रिय कौन है ।। १३ ॥
एकेनापिसुवृक्षणपुष्पितेनसुगन्धिना ॥
वासितंतद्व सर्वसुपुत्रेणकुलंयथा ॥ १४ ॥
टीका--एकभी अच्छे वृक्षसे जिसमें सुन्दर फूल
और गन्ध है ऐसे सब बन सुवासित होजाता है,
जैसे सुपुत्रसे कुल ॥ १४ ॥
एकेनशुष्कवृक्षणदह्यमानेनवहिन्ना ॥
दह्यतेतद्वनसवकुपुत्रेणकुलंयथा ॥ १५॥
१९ अध्यायः ३.. टीका-आगसे जलतेहुये एकही सूखे वृक्षसे वह सब वन ऐसे जलजाता है जैसे कुपुत्रसे कुल ॥१५॥ एकेनापिसुपुत्रेणविद्यायुक्तनसाधुना॥ आल्हादितंकुलंसर्वयथाचंदेणशर्वरी ॥१६॥ टीका-विद्यायुक्त भला एकभी भुपुत्रसे सब कुल ऐसे आनांदत होजाता है. जैसे चंद्रमासे रात्रि॥१६॥ किंजार्बहुभिःपुत्रैःशोकसंतापकारकैः॥ वरमेकःकुलालंबीयत्र विश्राम्यतेकुलम्॥१७॥ टीका-शोक संताप करनेवाले उत्पन्न बहुपुत्रोंसे क्या ? कुलको सहारा देनेवाला एक ही पुत्र श्रेष्ठ है. जिसमें कुल विश्राम पाता है॥ १७ ॥ लालयेत्पञ्चबर्षाणिदशवर्षाणिताडयेत् ॥ प्राप्तेतुषोडशेवर्षेषुत्रेमित्रत्वमाचरेत् ॥ १८ ॥ टीका-पुत्रको पांच बरसतक दुलारे, उपरांत दश वर्ष पर्यंत ताडन करें. सोलवे वर्ष की प्राप्ति होने पर पुत्रमें मित्रसमान आचरण करे ॥ १८ ॥ उपसर्गेऽन्यचक्रेचदुर्भिक्षेचभयावहे ॥ असाधुजनसंपर्केयःपलातिसजीवति ॥१९॥ टीका-उपद्रव उठनेपर, शत्रुके आक्रमण करने पर, भयानक अकाल पड़ने पर और खलजनके संग होने चाणक्यनातिदपण। पर जो भागता है वह जीवता रहता है ॥ १९ ॥ धर्मार्थकाममोक्षेषुयस्यकोऽपिनविद्यते । जन्मजन्मनिमत्पेषुमरणंतस्यकेवलम् ॥२०॥ टीका-धर्म, अर्थ काम और मोक्ष इनमेंसे जिसको कोईभी न भया उसको मनुष्योंमें जन्म होनेका फल केवल मरणाही हुआ ॥ २० ॥ मूर्खायानपूज्यंतेधान्यंयत्रसुसंचितम् ॥ दाम्पत्यकलहोनास्तितत्रश्रीःस्वयमागताा२श टीका-जहां मूर्ख नहीं पूजे जाते, जहां अन्न संचित रहता है और जहां स्त्रीपरुषमें कलह नहीं होता वहां आपही लक्ष्मी बिराजमान रहती है ॥ २१ ॥ ॥ इति तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः ४ आयुःकर्मचवित्तंचविद्यानिधनमेवच ॥ पंचैतानिहिसृज्यन्तेगर्भस्थस्यैवदेहिनः ॥१॥ टीका-यह निश्चय है कि, आयुीय, कर्म, धन, विद्या और मरण ये पांचों जब जीव गर्भहीमें रहता है तबही लिखदिये जाते हैं ॥१॥ साधुझ्यस्तेनिवर्तन्तेपुत्रामित्राणिबांधवाः॥ येचतैःसहगंतारस्तधर्मात्सुकृतंकुलम् ॥२॥ .
अध्याय:४॥
१.
ये
जनोंसे निवृत
टीका-पुत्र, मित्र, बन्धु साधु
होजाते हैं और जो उनका संग करते हैं उनके पुण्य
से उनका कुल सुकृती होजाता है ॥ २ ॥
दर्शनध्यानसंस्पर्शर्मत्सीकूर्मीचपक्षिणी ॥
शिशुपालयतेनित्यंतथासज्जनसंगतिः॥३॥
टीका-मछली कछुई और पक्षी ये दर्शन ध्यान
और स्पर्शसे जैसे बच्चोंको सर्वदा पालती हैं वैसेही
सज्जनोंकी संगति ॥ ३॥
यावत्स्वस्थोह्ययंदेहोयावन्मृत्युश्चदूरतः ॥
तावदात्महितंकुर्यात्प्राणांतेकिंकरिष्यति॥४॥
टीका-जबलों देह निरोग है और तषलग मृत्यु
दूर है तत्पर्यंत अपना हित पुण्यादि करना उचित
है. प्राणके अंत होजानेपर कोई क्या करेगा ॥४॥
कामधेनुगुणाविद्याह्यकालेफलदायिनी ॥
प्रवासेमातृसदृशीविद्यागुप्तधनस्मृतम्॥५॥
टीका-विद्या में कामधेनु के समान गुण है इसकारण
कि अकालमेंभी फल देती है. विदेशमें माताके समान
है विद्याको गुप्त धन कहते हैं ॥ ५ ॥
एकोऽपिगुणवान्पुत्रोनिर्गुणैश्चशतैर्वरः ॥
एकश्चंद्रस्तमोहंतिनचताराःसहस्रशः ॥ ६॥
१८
चाणक्यनीतिदर्पणे।
टीका-एकभी गुणी पुत्र श्रेष्ट है सो सैकड़ों गुण-
रहितोंसे क्या ? एकही चन्द्र अन्धकारको नष्ट कर
देता है, सहस तारे नहीं ॥ ६ ॥
मूर्खश्चिरायुर्जातोऽपितस्माज्जातमृतोवरः ।।
मृतः सचाल्पदुःखाययावज्जीवंजडोदहेत्॥७॥
टीका-मुख जातक चिरजीवीभी हो उसंस उत्पन्न
होतेही जो मरगया वह श्रेष्ट है. इस कारण कि मरा
थोडेही दुःखका कारण होता है जड़ जवलों जीता है
तबलों दाहता रहता है । ७ ॥
कुग्रामवासः कुलहीनसेवाकुभोजनक्रोधमुखी
चभार्या ॥ पुत्रश्चमूोविधवाचकन्याविनाग्नि
नाषट् प्रदहतिकायम् ॥ ८॥
टीका-कुग्राममें घास, नीच कुलकी सेवा, कुभोजन,
कलही स्त्री, मूर्ख पुत्र, विधवा कन्या ये छः बिना
आगही शरीर को जलाते हैं ॥ ८॥
किंतयाक्रियतेधेन्वागनदोग्ध्रीनगुर्विणी ॥
कोऽर्थःपुत्रेणजातेनयोनविद्वान्नभक्तिमान।।
टीका-उसगायसे क्या लाभ है जो न दूध देवे
न गाभिन होवे, और ऐसे पुत्र हुएसे क्या लाभ
जो न विद्वान् भया न भक्तिमान् ॥ ६ ॥
अध्यायः ४ ।
२९
संसारतापदग्धानात्रयोविश्रांतिहेतवः ॥
अपत्यंचकलत्रंचसतांसंगतिरेवच ॥१०॥
टीका-संसारके तापसे जलतेहुये पुरुषों के विश्रामके
हेतु तीन हैं,लडका, स्त्री और सज्जनोंकी संगति ॥१०॥
सकृजल्पन्तिराजानःसकृजल्पंतिपंडिताः॥
सकृत्कन्या:प्रदीयन्तेत्रीण्येतानिसकृत्सकृत् ११
टीका-राजालोग एकहीबार आज्ञा देते हैं, पंडित
लोग एकहीबार बोलते हैं, कन्याका दान एकहीबार
होता है ये तीनों बात एकबारही होती हैं ॥ ११ ॥
एकोकिनांतपोद्वाश्यांपठनंगायनंत्रिभिः ।
चतुर्भिगमनक्षेत्रपंचभिर्बहुभीरणम् ॥ १२ ॥
टीका-अकेलेमें तप, दोसे पढना, तीनसे गाना,
चारसे पन्थमें चलना, पांचसे खती और बहुतों से
युद्ध भलीभांतिसे बनते हैं ॥ १२
साभार्यायाशुचिर्दक्षासाभार्यायापतिब्रता ।
साभार्यापतिप्रीतासाभार्यासत्यवादिनी॥१३॥
टीका-वही भार्या है,जो पवित्र और चतुर वही भार्या
है; जो पतिव्रता है. वही भार्या है; जिसपर पतीकी.
प्रीति है. वही भार्या है;जो सत्य बोलती है अर्थात्
दान मान पोषण पालनके योग्य है.॥ १३ ॥
२० . चाणक्यनीतिदर्पणे। अपुत्रस्यगृहंशून्यदिशःशून्यास्त्ववाधवः । मूर्खस्पहृदयंशून्यंसर्वशून्योदरिद्रता ॥ १४ ॥ टीका-निपुत्रीका घर सूना है, बन्धुरहित दिशा शून्य है. मूर्खका हृदय शुन्य है और सर्वशून्य दारिद्रता है ॥ १४ ॥ अनायासेविषशास्त्रमजीर्णेभोजनंविषम् ।। दरिद्रस्यविषंगोष्ठीवृद्धस्यतरुणीविषम् ॥१५॥ टीका-बिनाभ्याससे शास्त्र विष होजाता है, बिना पचे भोजन विष होजाता है, दारिद्र को गोष्ठी विष और वृद्धको युवती विष जानपडती है ॥ १५ ॥ त्यजेदमदयाहीनविद्याहीनंगुरुत्यजेत् ॥ त्यजेत्क्रोधमुखीभार्यांनिस्नेहान्बांधवात्यजेत१६ टीका- दयारहित धर्मको छोडदेना चाहिये, विद्या विहीन गुरुका त्याग उचित है, जिसके मुंहसे क्रोध प्रगट होता होय ऐसी भार्याको अलग करना चाहिये और बिनाप्रीति बांधनोंका त्याग विहित है ॥ १६ ॥ अन्दाजरामनुष्याणांवाजिनांबन्धनंजरा ॥ अमैथुनजरास्त्रीणांवस्त्राणामातपोजरा ॥१॥ टीमा-मनुष्योंको बुढापनपथ है, घोडोंको बांधरखना वृद्धता है, स्त्रियोंको अमैथुन बुढापा है अध्यायः ६ । २१ और वस्त्रोंको घाम वृद्धता है ॥ १७ ॥ कःकाल:कानिमित्राणिकोदेशःकौव्ययागमौ कस्याहकाचमेशक्तिरितिचिंत्यंमुहुर्मुहुः॥१८॥ टीका-किसकालमें क्या करना चाहिये, मित्र कौन है, देश कौन है, लाभव्यय क्या है, किसका मैं हूं, मुझमें क्या शक्ति है ये सब बार बार बिचारना योग्य है ॥ १८॥ अग्निर्देवोद्विजातीनांमुनीनांहृदिदैवतम् ॥ प्रतिमास्वल्पबुद्धीनांसर्वत्रसमदर्शिनां ॥ १९॥ टीका-ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, उनका देवता आग्नि है. मुनियों के हृदयमें देवत्ता रहता है, अल्पबुद्धियों के मूर्ति और समदर्शियोंको सबस्थानमें देवता है॥१६॥ इति चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥ -:+: अथ पंचमोऽध्यायः ५ पतिरेवगुरुःस्त्रीणांसर्वस्याश्यागतोगुरुः ॥ गुरुरग्निर्द्विजातीनांवर्णानांब्राह्मणागुरुः ॥१॥ टीका-स्त्री का गुरु पतिही है, अभ्यागत सबका मुरु है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, इनका गुरु अग्नि है
२२
चाणक्यनीतिदर्पणे।
और चारों वर्गों में गुरु ब्राह्मण है ॥ १॥
यथाचतुर्भिःकनकंपरोक्ष्यतेनिघर्षणच्छेदनता
पताडनैः। तथाचतुर्भिःपुरुषःपरीक्ष्यतेत्यागेन
शीलेनगुणेनकर्मणा ॥२॥
टीका-घिसना, काटना, तपाना, पीटना इनचार
प्रकारों से जैसे सोनेकी परीक्षा कीजाती है, वैसेही
दान, शील, गुण और आचार इनचारों प्रकारसे
पुरुषकी भी परीक्षा कीजाती है ॥ २ ॥
तावद्भयेषुभेतव्यंयावद्भयमनागतम् ॥
आगतंतुमयंदृष्ट्वाग्रहर्तव्यमशंकया ॥३॥
टीका-तबतकही भयोंसे डरना चाहिये जबतक
भय नहीं आया, और आयेहुये भयको देखकर प्रहार
करना उचित है ॥ ३॥
एकोदरसमुद्भूताएकनक्षत्रजातकाः।
नभवंतिसमाःशीलैर्यथावदरिकंटकाः ॥४॥
टीका-एकही गर्भसे उत्पन्न और एकही नक्षत्र
जायमान शीलमें समान नहीं होते जैसे बैर और
उसके कांटे ॥४॥
नि:स्पृहोनाधिकारीस्यान्नाकामामंडनप्रियः॥
नाविदग्धःप्रियंब्रूयात्स्पष्टवक्तानवंचकः॥५॥
श्रध्यायः ५ ॥
२३
टीका-जिसको किसी विषयकी वांछा न होगी वह
किसी विषयका अधिकार नहीं होगा, जो कामी न
होगा वह शरीर की शोभा करनेवाली वस्तुओंमें प्रीति
नहीं रक्खेगा; जो चतुर न होगा वह प्रिय नहीं बोल
सकेगा और स्पष्ट कहनेवाला छली नहीं होगा ॥५॥
मूर्खाणांपंडिताद्वेष्याअधनानांमहाधनाः ॥
दुर्भगाणांचसुभगाःकुलटानांकुलांगनाः॥६॥
टीका--मुर्ख पंडितोंसे,दरिद्री धनियोंसे,व्यभिचारिणी
कुलस्त्रियोंसे,और विधवा सुहागिनियों से बुरा.मानती
Famic
आलस्योपहताविद्यापरहस्तेगतंधनम् ।।
अल्पबीजंइतक्षेत्रंहतंसैन्यमनायकम् ॥ ७॥
टीका-आलस्यसे विद्या नष्ट होजाती है, दूसरेके
हाथमें जानेसे धन निरर्थक होजाता है, बीजकी
न्यूनतासे खेत हत होजाता है, सेनापतिके बिना
सेना नष्ट होजाती हैं ॥ ७ ॥
अभ्यासाद्धार्यतेविद्याकुलंशीलेनधार्यते ॥
गुणेनज्ञायतेत्वार्यःकोपोनेत्रेणगम्यते ॥८॥
टीका-अभ्याससे विद्या, सुशीलतासे कुल, गुमसे
भला मनुष्य और नेत्रसे कोप ज्ञात होता है ॥८॥
२४ चाणक्यनीतिदर्पणे। बित्तेनरक्ष्यतेधर्मोविद्यायोगेनरक्ष्यते ।। मृदुनारक्ष्यतेभूपःसस्त्रियारक्ष्यतेगृहम्॥९॥ टीका-धनसे धर्मकी रक्षा होती है, यम नियम आदि योग से ज्ञान रक्षित रेता है, मृदुतासे राजाकी रक्षा होती है, मली स्त्रीसे घरकी रक्षा होती है ।। ९ ।। अन्यथावेदपाण्डित्यंशास्त्रमाचारमन्यथा ।। अन्यथाथद्वदनशांतलोका:क्लिश्यन्तिचान्यथा टीका-वेदकी पांडित्यको व्यर्थ प्रकाश करनेवाला, शास्त्र और उसके आचारके विषयमें व्यर्थ विवाद करनेवाला, शांत पुरुषोंको अन्यथा कहनेवाला, ये लोग व्यर्थही केश उठाते हैं ॥ १० ॥ दारिदयनाशनंदानंगीलंदुर्गतिनाशनं । अज्ञाननाशिनीप्रज्ञाभावनाभयनाशिनी॥११॥ टीका-दान दरिद्रताका नाश करता है सुशीलता दुर्गतिका, बुद्धि अज्ञान भक्ति भयका नाश करती है, ॥ ११ ॥ नास्तिकामसमोव्याधि स्तिमोहसमोरिपुः।। नास्तिकोपसमोवह्निर्नास्तिज्ञानात्परंसुखम्१२ टीका-कामके समान दूसरी व्याधि नहींहै, अज्ञान : के समान दूसरा वैरी नहीं है, क्रोधके तुल्य दूसरी अध्यायः । २५ आग नहीं है, ज्ञानसे परे सुख नहीं है ॥ १२॥ जन्ममृत्युहियात्येकोभुनक्त्येकःशुभाशुभम् ॥ नरकेषुपतत्येकएकोयातिपराङ्गतिम्॥१३॥ टीका-यह निश्चय है कि एकही पुरुष जन्ममरण पाता है सुखदुःख एकही भोगता है एकही नरकोंमें पड़ता है और एकही मोक्ष पाला है, अर्थात् इन कामों में कोई किसीकी सहायता नहीं करसक्ता ॥१३॥ तृणंब्रह्मविदःस्वर्गंतणंसूरस्पजीवितं ॥ जिताक्षस्यतणनारीनिस्टहस्यतृणंजगत्॥१४॥ टीका-ब्रह्मज्ञानीको स्वर्ग तृण है, शूरकों जीवन तृणहै, जिसने इन्द्रियोंको वश किया उसे स्त्री तृणके तुल्य जानपड़ती है, निस्पृहको जगत् तृणहै ॥ १४ ॥ विद्यामित्रप्रवासेषुभार्यामिगृहेषु च ॥ व्याधितस्यौषधंमित्रधर्मोमित्रंमृतस्य च॥१५॥ टीका-विदेशी विद्या मित्र होती है, गृहमें भार्या मित्र है, रोगीका मित्र औषध है और मरे का मित्र धर्म है ॥ १५ ॥ वृथाष्टिःसमुदेषुटथातृप्तेषुभोजनम् ॥ स्थादानंधनाढ्येषुटथादीपोदिवापि च॥१६॥ टीका-समुद्रोंमें वर्षा वृथा है, और भोजनसे तृप्तको
२६
चाणक्यनीतिदपणे।
भोजन निरर्थक है, धनीको धन देना व्यर्थ है और
दिनमें दीप व्यर्थ है, ॥ १६ ॥
नास्तिमेघसमंतोयनास्तिचात्मसमंवलम् ॥
नास्तिचक्षुःसमतेजोनास्तिधान्यसमंपियम्.१७
टीका-मेघके जलके समान दसराः जल नहीं
अपने बल-समान दूसरे का बल नहीं इस-कारण; कि
समय पर काम आताहै. नेत्रके तुल्य दूसरा प्रकाश
करनेवाला नहीं है. और अन्नके शदृश दूसरा
प्रिय
पदार्थ नहीं है ॥ १७ ॥
अधनाधन मिच्छन्तिवाचंचैवचतुष्पदाः ॥
मानवा:स्वर्गमिच्छंतिमोक्षमिच्छतिदेवताः॥१८॥
टीका-धनहीन धन चाहते हैं, और पशु वचन,
मनुष्य स्वर्ग चाहते हैं, और देवता मुक्तिको इच्छा
रखते हैं ॥ १८ ॥
सत्येनधार्यतेपृथ्वीसत्येनतपतेरविः॥
सत्येनवातिवायुश्चसर्वसत्येप्रतिष्ठितम् ॥१९॥
टीका-सत्यसे पृथ्वी स्थिर है, और सत्यहीसे सूर्य
तपते हैं, सत्यहीसे वायु बहती है, सब संत्यहीसे
स्थिर है ॥ १६ ॥
चलालक्ष्मीश्चलाप्राणाश्चलेजीवितमंदिरेः॥
चलाचलेचसंसारेधर्मएकोहिनिश्चलः॥२०॥
अध्यायः
टीका-लक्ष्मी नित्य नहीं है, प्राण, जीवन और
घर ये सब स्थिर नहीं हैं, निश्चय है कि इस चराचर
संसारमें केवल धर्मही निश्चल है ॥ २० ॥
नराणानापितोधूर्तःपक्षिणांचैववायसः ॥
चतुष्पदांशृगालस्तुस्त्रीणांधूर्ताचमालिनी॥२१॥
टीका-पुरषोंमें नापित, और पत्तियों में कौवा बंचक
होता है, पशवों में सियार बैंचक होता है और स्त्रियों
में मालिन धूर्त होती है ॥ २१ ॥
जनिताचोपनेताचयस्तुविद्यांप्रयच्छति ॥
अन्नदाताभयत्रातापंचैतेपितरःस्मृताः॥२२॥
टीका--जन्मानेवाला, यज्ञोपवीत आदि संस्कार
करानेवाला, विद्या देनेवाला है, अन्नदेनेवाला, भय
से बचानेवाला ये पांच पिता गिनेजाते हैं ॥२२॥
राजपत्नीगुरोःपत्नी मित्रपत्नीतथैवच ॥
पत्नीमातास्वमाताचपंचैतामातरःस्मृताः॥२३॥
टीका-राजाकी भार्या, गरुकी स्त्री, वैसही मित्र:
की पत्ती सास और अपनी जननी (माता) इन पांचों
को माता कहते हैं ॥ २३ ॥
इतिपंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
२८
चाणक्यनीतिदर्पणे।
अथ षष्ठमोऽध्यायः६
श्रुत्वाधर्मविजानातिश्रुत्वात्यजतिदुर्मतिम् ।।
श्रुत्वाज्ञानमवामोतिश्रुत्वामोक्षमवाप्नुयात्॥१॥
टीका--मनुष्य शास्त्रको सुन कर धर्मको जानता है
दुर्बुद्धिको छोडता है, ज्ञान पाता है मोक्ष पाता है।
काकापक्षिषुचंडालःपशूनांचैवकुक्कुरः ।
पापोमुनीनांचांडालःसर्वेषांचैवनिंदकः ॥२॥
टीका-पक्षियोंमें कौवा,और पशुवोंमें कृकुर चांडाल
होता है, मुनियों में चांडाल पोप है, और सबमें चांडाल
निन्दक है ॥ २॥
भस्मनाशुद्धयतेकांस्यंताम्रमम्लैनशुद्ध्यति ॥
रजसाशुब्धतेनारीनदीवेगेनशुययति ॥ ३॥
टीका-कासका पात्र राखसे, तांबेका मल खटाईसे,
श्री रजस्वला होनेपर और नदी धाराके वेगसे पवित्र
होती है ॥ ३॥
नमन्संपूज्यतेराजानमन्संपूज्यतेद्विजः॥
धमन्संपूज्यतेयोगीस्त्रीत्रमन्तीविनश्यति॥४॥
टीका-भ्रमण करने वाले राजा, ब्राह्मण, योगी पूजित
होते हैं परंतु स्त्री घूमनेसे भ्रष्ट होजाती है ॥४॥
भाध्यायः ६॥
२९
यस्यार्थास्तस्यमित्राणियस्यास्तस्यबान्धवाः
यस्याःसपुमाल्लोकेयस्यार्थःसचपंडितः॥६॥
टीका-जिसके धन है, उसीका मित्र, और उसीके
बांधव, होते हैं, और वही पुरुष गिना जाता है,
और वही पंडित कहाता है ॥५॥
तादृशीजायतेबुद्धिर्यवसायोपितादृशः ॥
सहायास्तादृशाएवयादृशीभवितव्यता ॥६॥
टीका-वैसेही बुद्धि और वैसाही उपाय होता है
और वैसेही सहायक मिलते हैं जैसा होनहार है ॥ ६॥
काल:पचतिभूतानिकालःसंहरतेप्रजाः ॥
काल:सुप्तेषुजागर्तिकालोहिदुरतिक्रमः॥७॥
टीका-काल सब प्राणियोंको खाजाता है और
कालही सब प्रजाका नाश करता है. सब पदार्थके
लय होजाने पर काल जागता रहता है कालको
कोई नहीं टाल सक्ता ॥ ७ ॥
नपश्यतिचजन्मान्धःकामान्धोनैवपश्यति॥
मदोन्मत्तानपश्यंतिअर्थीदोषंनपश्यति॥८॥
टीका-जन्मका अन्धा नहीं देखता, काम से जो
अन्धा होरहा है उसको सूझता नहीं,मदोन्मत्त किसी
को देखता नहीं और अर्थी दोषको नहीं देखता ॥८॥
चाणक्यनीतिदपणे।
स्वयंकर्मकरोत्यात्मास्वयंतत्फलमश्नुते॥
स्वयंमत्रमतिसंसारेस्वयंतस्माद्विमुच्यते ॥९॥
टीका-जीव आपही कर्म करता है और उसका
फलभी 'आपही भोगता है, आपही संसार में भ्रमता
है और आपही उससे मुक्त भी होता है ।। ६ ॥
राजाराष्ट्रकृतंपापराज्ञःपापंपुरोहितः ॥
भर्ताचस्त्रीकृतपापंशिष्यपापंगुरुस्तथा ॥१०॥
टीका-अपने राज्यमें किये हुवे पापको राजा, और
राजा के पापको पुरोहित भोगता है, स्त्रीकृतपापको
स्वामी भोगता है, वैसेही शिष्यके पापको गुरु ॥ १० ॥
ऋणकर्तापिताशत्रुर्माताचव्यभिचारिणी ॥
भार्यारूपवतीशत्रुःपुत्रशत्रूरपण्डितः॥११॥ .
टीका-ऋण करनेवाला पिता शत्रु है, व्यभिचारिणी
माता और सुन्दरी स्त्री शत्रु है, और मूर्ख पुत्र
वैरी है ॥ ११ ॥
लुब्धमर्थेनगृह्णीयात्स्तब्धमंजलिकर्मणा ॥ .
मूखंछंदानुठंत्त्याचयथार्थत्वेनपंण्डितम्॥१२॥
टीका-लोभीको धनसे, अहंकारीको हाथ जोड़नेसे,
मुर्खको उसके अनुसार वर्तनेसे और पंडितको संचाईसे,
वश करना चाहिये ॥ १२ ॥
अध्यायः । वरनराज्यं नकुराजराज्यं वरंनमिनकुमित्र मित्रं । वरनशिष्योनकुशिष्यशिष्योवरंनदारा नकुदार दाराः॥१३॥ टीका-राज्य नरहना यह अच्छा, परन्तु कुराजाका राज्य होना यह अच्छा नहीं. मित्रका न होना यह अच्छा, परंतु कुमित्रको मित्र करना अच्छा नहीं, शिष्य नहो यह अच्छा परंतु निदित शिष्य कहलावे यह अच्छा नहीं, भार्या न रहे यह अच्छा पर कुभार्या का भार्या होना अच्छा नहीं ॥ १३ ॥ कुराजराज्येनकुतःप्रजासुखं कुमित्रमित्रेणकुतोऽभिनिवतिः॥ कुदारदारैश्चकुतोगृहेरतिः कुशिष्यमाध्यापयत:कुतोयशः ॥१४॥ टींका-दुष्ट' राजाके राज्यमें प्रजाको सुख, और कुमित्र मित्रसें आनन्द, कैसे होसक्ताहै, दुष्ट स्त्रीसे गृह में प्रीति और कुशिष्यको पढ़ानेवाले की कीर्ति, केसे होगी ॥ १४॥ सिंहादेकंबकादेकशिक्षेच्चत्वारिकुक्कुटात्।। वायसातपंचशिक्षेच्चषट्शुनस्त्रीणिगर्दभात।१५। टीका-सिंहसे एक, बकुलेसे एक, कक्कुटसे चार, कौवेसे पांच, कुत्तेसे छः और गदहेसे तीन गुण - चाणक्यनीतिदपणे। सीखना उचित है ॥ १५ ॥ प्रभूतकार्यमल्पंवातन्नरःकर्तुमिच्छति ॥ सारंभेणतत्कार्यसिंहादेकंप्रचक्षते ॥१६॥ टीका-कार्य छोटा हो या बड़ा, जो करणीयहो उसको सब प्रकारके प्रयत्नसे करना उचित है, इस . एकको सिंहसे सिखना कहते हैं ॥ १६ ॥ इंद्रियाणिचसंयम्यवकवत्पण्डितोनमः देशकालबलंज्ञात्वासर्वकार्याणिसाधयेत् ।१७॥ टीका-विद्वान् पुरुषको चाहिये कि, इन्द्रियों का संयम करके देश काल और बलको समझकर बकुलाके समान सब कार्यको साधे ॥ १७ ॥ प्रत्युत्थानंचयुद्धंचसंविभागंचवन्धुषु ।। स्वयमाक्रम्यभोगंचशिक्षेच्चत्वारिकुक्कुटात१८ टीका-उचितसमय में जागना, रणमें उद्यत रहना और बन्धुओंको उनका भाग देना और आए आक- मण करके भोग करें, इनचार बातोंको कुक्कुट से सीखना चाहिये ॥ १८॥ गूढमैथुनंचारित्वम्कालेचालयसंग्रहम् ॥ अप्रमादमविश्वासंपंचशिक्षेच्चवायसात् ॥१९॥ टीका-छिपकर मैथुन करना धैर्य करना समयमें घर
अध्याय: ६
संग्रह करना सावधान रहना और किसीपर विश्वास
न करनाइन पांचोंको कौवेसे सीखना उचित है ॥१९॥
बहाशोस्वल्पसंतुष्टःसुनिदोलघुचेतनः ॥
स्वामिभक्तश्चशूरश्चषडेतेश्चानतोगुणाः ॥२०॥
टीका-बहुत खानेकी शक्ति रहतेभी थोडेहीसे संतुष्ट
होना, गाढ निद्रा रहतेभी झटपट जागना,स्वामिकी
भक्ति और शूरता इन छः गुणोंको कुत्ते से सीखना
चाहिये ॥ २० ॥
सुश्रांतोऽपिवहेगारंशीतोष्णंनचपश्यति ॥
संतुष्टश्चस्तेनित्यंत्रीणिशिक्षेच्चगर्दभात् ॥२१॥
टीका-अत्यंत थकजानेपरभी बोझको ढोते जाना,
शीत और उष्णपर दृष्टि न देना, सदा सन्तुष्ट होकर
विचरना,इन तीन बातोंको गदहेसे सीखना चाहिये।
यएतान्वेिंशतिगुणानाचरिष्यतिमानवः ।।
कार्यावस्थासुसर्वासुअजेयःसभविष्यति॥२२॥
टीका-जो नर इन बीस गुणों को धारण करेगा वह
सदा सब कार्योंमें विजयी होगा ॥ २३ ॥
इति षष्टोध्यायः ॥ ६ ॥
चाणक्यनीतिदर्पसे।
अथ सप्तमोध्यायः ७
अर्थनाशंमनस्तापंगृहिणीचरितानिच ॥ .
नीचवाक्यंचापमानमतिमान्नप्रकाशयेत् ॥११॥
टीका-धनका नाश,मनकाताप,गृहणीकाचरित्र नीच
का वचन और अपमानइनको बुद्धिमान् प्रकाश नकरे।
धनधान्यप्रयोगेषुविद्यासंग्रहणेषुच ।।
आहारव्यवहारेचत्यक्तलजःसुखीभवेत् ॥२॥
टीका-अन्न और धनके व्यापारमें विद्याके संग्रह
करने में, आहार और व्यहारमें जो पुरुष लज्जाको
दूर रक्खेगा वह सुखी होगा ॥२॥
संतोषामृततृप्तानांयत्सुखंशांतिरेवंच ।।
नचतवनलुब्धानामितश्चेतश्चधांवताम् ॥३॥
टीका-संतोषरूपी अमृतसे जो लोग तृप्त होते हैं
उनको जो शांतिसुख होता है वह धनके लोभसे
जो इधर उधर दौडा करते हैं उनको नहीं होता ॥३॥
संतोषस्त्रिषकर्तव्यःस्वदारेभोजनेधने ।
त्रिषुचैवनकर्तव्योऽध्ययनेजपदानयोः॥ ४ ॥
टीका-अपनी स्त्री भोजन और धन इन तीनों में
सन्तोष करना चाहिये, पढना जप और दान इन
तीन सन्तोष कभी नहीं करना चाहिये ॥४॥
अध्याय: ७॥
विप्रयोर्विप्रवयोश्चदंपत्योःस्वामिभृत्ययोः-
अन्तरेणनगंतव्यंहलस्यवृषभस्यच ॥५॥
टीका-दो ब्राह्मण, ब्राह्मण और आग्नि, स्त्री पुरुष,
स्वामी मृत्यहल और बेल इनके मध्य होकर नहीं
जाना चाहिये ॥२॥
पादाभ्यांनस्पृशेदग्निंगुरुंब्राह्मणमेवच ॥
नैवगांनकुमारींचनवृद्धनशिशुंतथा ॥६॥ .
टीका-अग्नि, गुरु और ब्राह्मण, इनको पैरसे कभी
नहीं छूना चाहिये वैसेही गोको कुमारिको, वृद्धको
और बालकको, पैरसे न छूना चाहिये ॥ ६ ॥
शकटंपचहस्तेनदशहस्तेनवाजिनम् ॥
हस्तिहस्तसहस्त्रेणदेशत्यागेनदुर्जनमः ॥७॥
टीका-गाडी को पांच हाथ पर, घोडको दस हाथ
पर, हाथी को हजार हाथ पर, दुर्जनको देश त्याग
करके छोडना चाहिये ॥७॥
हस्तीह्यकुशमात्रेणवाजीहस्तेनताडयते ॥
श्रृंगालगुडहस्तेनखड्गहस्तेनदुर्जनः ॥ ८॥
टीका-हाथी केवल अंकुशसे, घोड़ा हाथसे, सींग
वाले जन्तु लाठीसे और दुर्जन तरवारसंयुक्त हाथ
से दंड पाते हैं ॥८॥
१६ चाणक्यनीतिदर्पणे। तुष्यन्तिभोजनेविप्रामयुगधनगर्जिते ॥ . साधवःपरसम्पत्तौखलाः परविपत्तिषु ॥९॥ टीका-भोजनके समय ब्राह्मण और मेघके गर्जते पर मयुर, दुसरेको सम्पति प्राप्त होनेपर साधू और दुसरेको विपत्ति आनेपर दुर्जन सन्तुष्ट होते हैं॥९॥ अनुलोमेनबलिनप्रतिलोमेनदुर्बलम् ॥ आत्मतुल्यबलंशत्रुविनयेनबलेनवा ॥ १० ॥ टीका-बली वरीको उसके अनुकूल व्यवहार करने से यदि वह दुर्बल हो तो उसे प्रतिकुलतासे वश करै, बल्लमें अपने समान शत्रुको विनयसे अथवा बलसे जीते ॥ १०॥ बाहुवीर्यवलंराज्ञोब्राह्मणोब्रह्मविद्वली ॥ रूपयोवनमाधुर्यस्त्रीणावलमनुत्तमम् ॥११॥ टीका-राजाको बाहुवीर्य बल है और ब्राह्मण ब्रह्मज्ञानी वा वेदपाठी बली होता है और स्त्रियोंको सुन्दरता, तरुणता और मधुरता अति उत्तम बल नात्यन्तंसरलैर्भाव्यंगत्वापश्यवनस्थलीम् ॥ छिद्यतेसरलास्तत्रकुब्जास्तिष्ठतिपादपाः॥१२॥ टीका-अत्यन्त सीधे स्वभावसे नहीं रहना चाहिये.
अध्यायः ७॥ इस कारण कि बनमें जाकर देखो.सीधे वृक्ष काटे जाते हैं और टेढे खड़े रहते हैं ॥ १२ ॥ यत्रोदकंतत्रवसंतिहंसास्त थैवशुष्कंपरिवर्जयंति नहंसतुल्येननरेणभाव्यंपुनस्त्यजंतः पुनराश्र- यन्तेः ॥१३॥ टीका-जहाँ जल रहताहै वहांही हंसा बसते हैं, वैसेही सूखे सरको छोड़ देते हैं. नरको हंसके समान नहीं रहना चाहिये कि, वे बार बार छोड़ देते हैं और बार बार आश्रय लेते हैं ॥ १३ ॥ उपार्जितानांवित्तानांत्यागएवहिरक्षणम् ॥ तडागोदरसंस्थानांपरिस्रवइवांभसाम्॥१४॥ टीका-अर्जित धनोंका व्यय करनाही रक्षा है. जैसे तडागके भीतरके जलका निकालना ॥ १४ ॥ यस्यार्थस्तस्यमित्राणियस्यार्थस्तस्यबांधवः ॥ यस्यार्थःसपुमाल्लोकेयस्यार्थसचजीवति।१५। टीका-जिसको धन रहता है उसीके मित्र होते हैं, जिसके पास अर्थ रहता है उसीके बन्धु होते है, जिसके धन रहता है वही पुरुष गिना जाता है। और जिसके अर्थ है वही जीता है ॥ १५ ॥ स्वर्गस्थितानामिहजीवलोकचत्वारिचिह्नानिव- संतिदेये॥दानप्रसंगोमधुराचवाणीदेवार्चनंबा-
चाणक्यनीतिदर्पणे।
झणतर्पणच ॥१६॥
टीका-संसारमें आनेपर स्वर्गवासियों के शरीरमें चार
चिन्ह रहते हैं. दानका स्वभाव, मीठा बचन, देवता
की पूजा और ब्राह्मणको तृप्त करना अर्थात् जिन
लोगोंमें दान आदि लक्षण रहैं उनको जानना
चाहिये कि वे अपने पुण्यके प्रभावसे स्वर्गवासी
मर्त्यलोकमें अवतार लिये हैं ॥ १६ ॥
अत्यन्तकोपःकटुकाचवाणीदरिद्रताचस्वजन-
घुवै ॥नीचप्रसंगःकुलहीनसेवाचिहानिदेहेन-
रकस्थितानाम् ॥ १७॥
टीका-अत्यंत क्रोध, कटु बचन, दरिद्रता, अपने
जनोंमें बैर, नीचका संग कुलहीनकी सेवा ये चिन्ह
नरकवासियोंके देहोमें रहते हैं ॥ १७ ॥
गम्यतेयदिमृगेन्द्रमंदिरेलायतेकरिकपोलमौ-
क्तिकम् ॥जंबुकालयगतेचप्राप्यतेवत्सपुच्छ-.
खरचमखण्डनम् ॥१८॥
टीका-यदि, कोई सिंहके गुहामें जा पड़े तो उस
को हाथीके कपोलकी मोती मिलते है. और सियार
के स्थानमें जानेपर बछवकी पंछ और गदहेके चमडे
का टुकडा मिलता है ॥ १८॥
शुनःपुच्छमिवव्यर्थजीवितविद्ययाविना ॥
नगुह्यगोपनेशक्तनचदंशनिवारणे ॥ १९ ॥
आध्यायः ॥
टीका-कुत्ते के पूंछके समान विद्याविना जीना व्यर्थ
है. कुत्तेकी पंछ गोप्यइन्द्रियको ढांप नहीं सकती है
न मछड आदि जीवोंको उडा सकती है ॥ १६ ॥
वाचांशौचंचमनसःशौचमिन्द्रियनिग्रहः ।।
सर्वभूतदयाशौचमेतच्छोचंपरार्थिनाम् ॥२०॥
टीका-बचनकी शुद्धि, मनकी शुद्धि इन्द्रियोंका
संयम सब जीव पर दया और पवित्रता ये परार्थियों
की शुद्धि है ॥ २० ॥
पुष्पेगंधतिलेतैलंकाष्ठेग्निपयोसघृतम् ॥
इक्षौगुडतथादेहेपश्यात्मानं विवेकताः॥२१॥
टीका-फुलमें गन्ध, तिलमें तेल, काष्ठमें आग दूध
में घी, ऊषमें गुड, जैसे वैसेही देहमें आत्माको
विचारसे देखो ॥ २१ ॥
इति सप्तमोऽध्याय ॥ ७॥
अथ अष्टमोऽध्यायः ८॥
अधमाधनमिच्छन्तिधनमानंचमध्यमाः ।।
उत्तमामानमिच्छन्तिमानोहिमहतांधनम्॥२॥
टीका-अधम धनही चाहते है, मध्यम धन और
मान,उत्तम मानही चाहतेहैं इस कारण कि महात्माओं
का धन मान ही है ॥१॥
चाणक्य नीतिदर्पणे।
इक्षुरापः पयोमूलताम्बूलंफलमौषधम् ।।
भक्षयित्वापिकर्तव्याःस्नानदानादिकाःक्रियाः२
टीका-ऊष, जल, दूध, मूल, पान, फल,
और
औषध इन वस्तुओंके भोजन करनेपरभी स्नान दान
आदि क्रिया करनी चाहिये ॥ २ ॥
दीपोभक्षयतेध्वांतंकजलंचप्रसूपते ॥ यदन्नं
भक्ष्यतेनित्यंजायतेतादृशीमजा ॥ ३ ॥
टीका-दीप अन्धकारको खाय जाता है और काजल
को जन्माता है, जैसा अन्न सदा खाता है वैसीही
उसकी सन्तती होती है ॥ ३॥
वित्तं देहिगुणान्वितेषुमतिमन्नान्यत्रदेहिक्वचित
प्राप्तवारिनिधेलंघनमुखेमाधुर्ययुक्तंसदा ॥
जीवानम्थावरजंगमांश्च सकलान्संजीव्यभूमं
डलं। भूयःपश्यतिदेवकोटिगुणितंगच्छंतमम्मो
निधम् ॥ ४॥
टीका-हे मतिमन् गुणियोंको धन दो औरोंको
कभी मत दो समुद्रसे मेघके मुखमें प्राप्त होकर जल
सदा मधुर होजाताहै. पृथ्वीपर चर अचर सब जीवोंको
जिलाकर फिर देखो, वही जल कोटिगुणा होकर
उसी समुद्र में चला जाता है ॥ ४ ॥
चाडालानासहनैश्चसूरिभिस्तत्त्दर्शिभिः ।।
एकोहियवनःप्रोक्तोमनीचोयवनात्परः॥५॥
.
अध्यायः॥
४१
टीका-तत्वदर्शियोंने कहा है कि, सहस्रचांडालोंके
तुल्य एक यवन होता है और यवनसे नीच दूसरा
कोई नहीं है।' ५॥
तैलायंगेचिताधूमेमैथुनेक्षौरकर्मणि ॥ ताव
द्भवतिचांडालोयावत्स्नानसमाचरेत् ॥ ६ ॥
टीका-तेल लगानेपर, चिताके धूम लगनेपर, स्त्री
प्रसंग करनेपर, बाल बनानेपर, तबतक चाण्डाल ही
बना रहता है जबतक स्नान नहीं करता है ॥ ६ ॥
अजीर्णेभेषजंवारिजीर्णेवारिबलप्रदम् ॥
भोजनेचामृतंवारिभोजनांतेविषप्रदम् ॥ ७ ॥
टीका-अपच होनेपर जल औषध है, पचजानेपर
जल बलको देता है, भोजन के समय पानी अमृत
के समान है, और भोजनके अन्तमें विषका फल देता
है ॥७॥
हतंज्ञानंक्रियाहीनंहतश्चाज्ञानतोनरः॥ हनि
नायकंसैन्यस्त्रियोनष्टाह्यभर्तकाः ॥८॥
टीका-क्रियाके बिना ज्ञान व्यर्थ है, अज्ञानसे नर.
मारा जाता है सेनापतिके बिना सेना मारी जाती है
और स्वामी हीन स्त्री नष्ट होजाती है॥ ८॥
तृद्धकालमृताभार्याबंधुहस्तगतंधनम् ॥
भोजनंचपराधीनंतिस्रःपुंसांविडम्बनाः ॥९॥
४२.
चाणक्यनीतिदर्पणे।
टीका-बुढापेमें मरी स्त्री, बन्धुके हाथमें गया धन
और दूसरेके आधीन भोजन येतीन पुरुषोंकी विडम्बना
है अर्थात् दुखःदायक होते हैं ॥ ६ ॥
अग्निहोत्रं विनावेदानचदानंविनाक्रिया ॥
नभावेनविनासिद्धिस्तस्माद्भावोहि कारणम्।१०
टीका-अमिहोत्रके बिना वेदका पढना व्यर्थ होता
है दानके बिना यज्ञादिक क्रिया नहीं बनती, भावके
बिना कोई सिद्धि नहीं होती इसहेतु प्रेमही सबका
कारण है ॥ ॥
काष्ठपाषाणधातनांकृत्वाभावेनसेवनम्॥श्रद्ध
याचतथासिदिस्तस्यविष्णोःप्रसादतः॥११॥
टीका-धातु काष्ठ पाखान भावसहित सेवन करना
श्रद्धासेती भगवत् कृपासे जैसा भावहै तैसाही सिद्ध
होता है ।॥ ११ ॥
नदेवोविद्यतेकाष्ठेनपाषाणेनमृन्मये.॥
भावेहिविद्यतेदेवस्तस्माद्भावोदिकारणम्॥१२॥
टीका-देवता काठमें नहीं है, न पाषाणमें है न
मृतिकाकी मूर्ति में है. निश्चय है कि देवता भावमें
विद्यमान है, इसहेतु भावही सबका कारण है ॥१२॥
शांतितुल्यंतपोनास्तिनसंतोषात्परंसुखम् ॥ .
नतृष्णाया:परोव्याधिर्नचधर्मोदयापरः ॥१३॥
अध्यायः॥ टीका-शांती के समान दूसरा तप नहीं, न संतोष से परे सुख, न तृष्णा से दूसरी व्याधी है, न दयासे आधिक धर्म ॥ १३ ॥ क्रोधोवैवस्वतोगजातृष्णावैतरणीनदी ॥ विद्याकामदुघाधेनुःसंतोषोनन्दनंवनम्॥ १४ ॥ टीका-क्रोध यमराज है और तृष्णा वैतरणीनदी है, विद्या कामधेनु गाय है और सन्तोष इन्द्रकी वाटिका है ॥ १४॥ गुणोभूषयतेरूपंशीलभूषयतेकुलम् ॥ सिद्धिभूषयतेविद्याभोगोभूषयतेधनम् ॥१५॥ टीका-गुण रूपको भूषित करता है, शील कुलको अलंकृत करता है, सिद्धि विद्याको भूषित करती है और भोग धनको भूषित करता है ॥ १५ ॥ निर्गुणस्यहतंरूपंदुःशीलस्यहतकुलम् ॥ अ सिद्धस्यहताविद्याअभागेनहतंधनम् ॥ १६॥ टीका-निर्गुणकी सुंदरता व्यर्थ है, शीलहीनका कुल. निंदित होता है, सिद्धि के विना विद्या व्यर्थ है भोग के. विना धन व्यर्थ है ॥ १६ ॥ शुद्धभूमिगतंतोयशुद्धानारीपतिब्रता ॥ शुचिःक्षेमकरोराजासंतुष्टोब्राह्मणःशुचिः॥१७॥ टीका-भूमिगत जल पवित्र होता है, पतिव्रता स्त्री
१४
चाणक्यनीतिदपणे।
पवित्र होती है कल्याण करनेवाला राजा पवित्र गिना
जाता है, ब्राह्मण संतोषी शुद्ध होता है ॥ १७ ॥
असन्तुष्टाद्विजानष्टाःसंतुष्टाश्चमहीपतिः ॥
सलज्जागणिकानष्टानिलज्जाश्चकुलांगनाः१८
टीका-असंतोषा ब्राह्मण निदित गिनेजाते हैं और
संतोषी राजा, सलज्जा वेश्या और लज्जाहीन कुल
स्त्री निदित गिनि जाती हैं ।। १८ ।।
किंकुलेनविशालेनविद्याहीननदोहनाम् ॥
दुषकुलंचापिविदुषोदेवैरपिसुपूज्यते ॥१९॥
टीका-विद्याहीन बडेकुलमे मनुष्योंको क्या लाभ है?
विद्वान् का नीचभी कुल देवतोसे पूजा जाता है॥१६॥
विद्वानप्रशस्यतेलोकविद्वानसर्वत्रगोरवम् ॥
विद्ययालभतेसर्वविद्यासर्वत्रज्यते ॥ ५० ॥
टीका-संसारमें विद्वान्ही प्रशंसित होता है विद्वान्
ही सब स्थानों में आदर पाता है विद्याहीसे सबमिलता
है विद्याही सब स्थानमें पृजित होती है ॥ २० ॥
रूपयौवनसंपन्नाविशालकुलसंभवाः॥
विद्याहीनानशोभंतनिर्गंधाइवकिंशुकाः ॥२१॥
टीका-सुंदर, तरुणतायुत और बडे कुलमें उत्पन्न
भी विद्याहीन पुरुष ऐसे नहीं शोभते, जसे बिनागंध
पलाश के फुल ॥ २१ ॥
.
अंध्यायः९।
४५
मासभक्ष्याःसुरापानामुर्खाश्चाक्षरवर्जिताः॥
पशुभिःपुरुषाकारे राक्रांतास्तिमेदिनी॥२२॥
टीका-मांस के भक्षण और मदिरापान करनेवाले,
निरक्षर,और मुर्ख इन पुरुषाकार पशुवोंके भारसे पृथिवी
पीडित रहती है ॥ २२ ॥
अन्नहीनोदहेदाष्ट्रमंत्रहीनश्चऋत्विजः ॥
यजमानंदानहीनोनास्तियज्ञसमोरिपुः॥२३॥
' टीका-यज्ञ यदि अन्नहीन हो तो, राज्यको मंत्रहीन
हो तो ऋत्विोंका दानहीन हो तो यजमानको
जलाता है, इस कारण यज्ञके समान कोईभी शत्रु
नहीं है ॥ २३ ॥
इतिवृद्धचाणक्ये अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
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नवमोऽध्यायः ॥९॥
मुक्तिमिच्छसिचेत्तातविषयान्विषवत्त्यज ॥
क्षमार्जवदयाशौचंसत्यंपीयूषवत्पिव ॥१॥
टीका-हेमाई, यदि मुक्ति चाहते हो तो विषयों
को विषके समान छोड दो ! सहनशीलता, सरलता,
दया पवित्रता और सचाईको अमृतकीनाई पिओ ॥१॥
परस्परस्यमर्माणियभाषतेनराधमाः ॥ तएव
विलयांतिवल्मीकोदग्सर्पवत् ॥२॥
४६ चाणक्यनीतिदर्पणे । टीका-जो नराधम परस्पर अंतरात्माके दुःखदायक बचनको भाषण करते हैं वे निश्वयकरिके नष्ट होजाते हैं. जैसे विमीटमें पड़कर सांप ॥ २ ॥ गंधःसुवर्णेफलमिक्षुदंडेनाकारिपुष्पंखलुचंदन स्य ॥ विद्वान्धनीभूपतिर्दीर्घजीवीधातुः पुरा कोऽपिनबुद्धिदोऽभूत् ॥३॥ टीका-सुवर्णमें गन्ध, ऊषमें फल, चंदनमें फुल, विद्वान् धनी और राजा चिरजीवी न किया इससे निश्चय है.कि, विधाताके पहिले कोई बुद्धिदाता न था ॥३॥ सर्वोषधीनाममृताप्रधानासर्वेतुसौख्येष्वशनप्र धानम् ॥ सर्वेदियन्णांनयनंप्रधानसर्वेषुगात्रेषु शिरःप्रधानम् ॥ ४ ॥ टीका-सब औषधियोंमें गुरच गिलोह प्रधान है, सब सुखोंमें भोजन श्रेष्ट है; सब इन्द्रियोंमें आंख उत्तम है; सब अंगोंमें शिर श्रेष्ट है. ॥ ४ ॥ दूतोनसंचरतिखेनचलेच्चवार्तापूर्वनजल्पितमि दनचसंगमोस्ति ॥ व्योम्निस्थितरविशशिग्रह प्रशस्तंजानातियोद्विजवरःसकर्थनविद्वान्।५। टीका-आकाशमै दुत नहीं जासक्ता, न वार्ताकी चर्चा चलसक्ती न पहिलेहीसे किसीने कहरक्खा अंध्यायः ९। है और न किसीसे संगम होसक्ता; ऐसी दशामें आकाशमें स्थित सूर्यचन्द्र के ग्रहणको जो द्विजवर स्पष्ट जानता है वह कैसे विद्वान् नहीं है ॥ ५॥ विद्यार्थीसेवकःपाथःक्षुधा”भयकातरः॥भा डारीप्रतिहारीचसप्तसुप्तानप्रबोधयेत् ॥ ६॥ टीका-विद्यार्थी, सेवक, पथिक भूखसे पीडित, भयसे कातर, भांडारी और द्वारपाल ये सात यदि सोतेहों तौ जगादेना चाहिये ॥६॥ अहिंनृपंचशादूलविटिंचबालकंतथा ॥ परश्वानंचमूर्खचसप्तसुप्तान्नबोधयेत् ॥ ७ ॥ टीका-सांप, राजा, व्याघ, बररे, वैसेही बालक, दूसरेका कुत्ता और मूर्ख ये सात सोते हो तो नहीं जगाना चाहिये ॥७॥ अर्थाधीताश्चयैर्वेदास्तशूदान्नभोजिनः ॥ तेद्विजा किंकरिष्यतिनिर्विषाइवपन्नगाः॥८॥ टीका-जिन्होंने धनके अर्थ वेदको पढा, वैसेही जो शुद्रका अन्न भोजन करतेहैं वे ब्राह्मण विषहीन सर्पके समान क्या करसक्त हैं ॥८॥ यस्मिन्रुष्टेभयंनास्तितुष्टेनैवधनागमः ॥ निग्रहोऽनुग्रहोनास्तिसरुष्टःकिंकरिष्यति।।
चाणक्यनीतिदर्पणे। टीका-जिसके क्रुध होनेपर न भय है,प्रसन्न होनेपर न धनका लाभ, न दंड वा अनुग्रह होसका है वह रुष्ट होकर क्या करेगा ॥१॥ निर्विषेणापिसर्पणकर्तव्यामहतीफणा ॥ विषमस्तुनचाप्यस्तुघटाटोपोभयंकरः ॥१०॥ दीका-विषहीनभी सांपको अपनी फण बढाना चाहिये. इस कारण कि, विष हो वा न हो आडंबर भयजनक होता है ॥ १० ॥ प्रातऍतप्रसंगेनमध्याह्नेस्त्रीप्रसंगतः ॥ रातोचोरप्रसंगेनकालोगच्छतिधीमताम् ।। टीका-प्राप्तःकालमें जआडियोंकी कथासे अर्थात महाभारतले मध्यान्हमें स्त्रीके प्रसंगसे अर्थात् रामायण से, रात्रीमें चोरकी वार्तासे अर्थात् भागवतसे, बुद्धिमानोंका समय बीतता है. ॥ तात्पर्य यह कि, महाभारतके सुननेसे वह निश्चय होजाता है कि, जुआ, कलह और छलका घर है. इसलोक और परलोकमें उपकार करनेवाले कामोंको महाभारतमें लिखीहुई रीबियोंसे करनेपर उन कामोंका पूरा फल होताहै; इस कारण बुद्धिमान् लोग प्रातःकालहीम माहाभारतको सुनते हैं, जिससे दिनभर उसीरीतीसे काम करते जांय, रामायण सुननेसे स्पष्टउदाहरण मिलता है कि, स्त्रीके वश होनेसे अत्यन्त दुःख होता है और परस्त्रीपर दृष्टि देनेसे पुत्र कलत्र जड़ श्राध्यायः १। १९ मूलके साथ पुरुषका नाश होजाता है; इसहेतु मध्यान्हमें अच्छे लोग रामायणको सुनतेहैं प्रायःरात्रि में लोग इन्द्रियों के वश होजाते हैं और इन्द्रियों का यह स्वभाव है कि, मनको अपने अपने विषयों में लगाकर जीवको विषयोंमें लगादेती हैं; इसीहेतुसे इन्द्रियोंको आत्माप्रहारीभी कहते हैं और जोलोग रात को भागवत सुनतेहैं वे कृष्णके चरित्रको स्मरण करके इन्द्रियोंके वश नहीं होते. क्योंकि सोलह हजार अधिकस्त्रियोंके रहतेभीश्रीकृष्णचन्द्र इन्द्रियोंकेवश न हुए और इन्द्रियों के संयमकी रीतिभी जानजातेहैं.११॥ स्वहस्तग्रथितामालास्वहस्तघृष्टचन्दनम् ॥ मुबहस्तलिखितंस्तोत्रंशकस्यापिश्रियंहरेत्।१२। टीका-अपने हाथसे गुथी माला, अपने हाथसे घिसा चंदन, अपने हाथसे लिखा स्तोत्र ये इन्द्रकी लक्ष्मीको भी हरलेते हैं. ॥ १२ ॥ इक्षुदंडास्तिलाःशूद्राःकांताहेमचमेदिनी ॥ चंदनंदधितांबूलंमर्दनंगुणवर्धनम् ॥ १३ ॥ टीका-ऊष, तिल, शूद्र, कांता, सोना, पृथ्वी, चन्दन, दही और पान इनका मर्दैव गुणवईनह॥१३॥ दरिद्रताधीरतयाविराजतेकुवस्वताशुनतयावि राजतेकदन्नताचोष्णतयाविराजते कुरूपता शीलतयाविराजते ॥१४॥ ।
६० चाणक्यनीतिदपणे। : टीका-दरिद्रतांभी धीरतासे शोभती है स्वच्छतासे कुवन सुंदर जानपड़ता है. कुअन्नभी उष्णतासे मीठा लगताहे कुरूपताभी सुशीलता होतो शोभा देतीहै।११ ॥ इति नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ :+:- अथ वृद्धचाणक्यस्योत्तराईम् । दशमोऽध्यायः १० धनहीनोनहीनश्चधनिकःससुनिश्चयः ॥ विद्यारत्नेनहीनोयःसहीनःसर्ववस्तुषु ॥१॥ धनहीन हीन नहीं गिना जाता, निश्चय है कि, वह धनी ही है. विद्यारत्नसे जो हीन है वह सब वस्तुओं में हीन है ॥ १ ॥ दृष्टिपूतंन्यसेत्पादंवस्त्रपूतंपिवेज्जलम् ॥ शास्त्रपूतवदेद्वाक्यमन:पूतंसमाचरेत् ॥ २॥ टीका-दृष्टीसे शोधकर पांव रखना उचित है, वस्त्र से शुद्ध कर जल पीव, शास्त्रसे शुद्धकर वाक्य बोले और मन से सोच कर कार्य करना चाहिये ॥२॥ सुखार्थीचेत्त्यजेद्विद्यांविद्यार्थीचेत्त्यजेत्सुखं ॥ सुखार्थिनःकुतोविद्यासुखंविद्यार्थिनःकुतः॥३॥ टीका- यदि सुख चाहे तो विद्याको छोड़दे, यदि
अध्यायः १० ।
6५५०
५१
विद्या चाहे तो सुख का त्याग कर सखार्थीको विया
कैसे होगी भौर विद्यार्थीको मुख कैसे होगा ॥३
कवयःकिनपश्यतिकिंनकुतियोषितः
मद्यपाःकिंनजल्पंतिकिंनखादतिवायसाः॥४॥
टीका कवि क्या नहीं देखते, स्त्री क्या नहीं कर
सक्ती, मद्यपी क्या नहीं बकते और कौवे क्या नहीं
खाते ॥ ४॥
रंकंकरोतिराजानंराजानरंकमेवच ।।
धनि निर्धनचैवनिर्धनंधनिविधिः ॥५॥
टीका-निश्चय है कि विधि रंकको राजा, राजा
को रंक धनीको निधन और निर्धनको धनी कर
देता है ॥ ५ ॥
लुब्धानायाचकःशत्रुर्मूर्खाणाबोधकोरिपुः ॥
जारस्त्रीणांपतिःशत्रुश्चोराणांचंद्रमारिपुः॥६॥
टीका--लोभियोंको याचक और मुखौंको समझाने
वाला और पुंश्चलीस्त्रियोंकोपति और चोरोंको चन्द्रमा
'शत्रु है. ॥६॥
येषांनविद्यानतपो नदाननचापिशीलनगुणीन
धर्मः॥तेमृत्युलोकेभुविभारभूतामनष्यरूपेण
मृगाश्चरन्ति ॥ ७॥
चाणक्यनीतिदर्पणे। टीका-जिन लोगों में न विद्या है, न तप है, न दान न शील है न गुण है और न धर्म है वे संसार में पृथ्वीपर भार रूप होकर मनुष्यरूपसे मृग वत फिर रहे हैं । ७॥ अंतःसारविहीनानामुपदेशोनजायते ॥ मलयाचलसंसर्गान्नवेणुश्चंदनायते ॥ ८॥ टीका--गंभीरता विहीन पुरुषों को शिक्षा देना सार्थक नहीं होता, मलयाचलके संगमे बांस चन्दन नहीं होजाता ॥८॥ यस्यनास्तिस्वयंप्रज्ञाशास्त्रंतस्यकरोतिकिं ॥ लोचनान्यांविहीनस्यदर्पणंकिंकरिष्यति॥९॥ टोका--जिसकी स्वाभाविक बुद्धि नहीं है उसको . शास्त्र क्या कर सकता है आंखोसे हीनको दर्पण क्या करेगा. ॥ ६ ॥ दुर्जनंसज्जनकर्तुमुपायोनहिभूतले ॥ अपानंशतधाधौतनश्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत् ॥१०॥ टीका-दुर्जनको सज्जन करनेके लिये पृथ्वीतलमें कोई उपाय नहीं है. मलका त्याग करनेवाली इन्द्रिय सौबारभी धोई जाय तोभी श्रेष्ठ इन्द्रिय न होगी.॥ १०॥ आप्तद्वेषाद्भवेनमृत्युःपरद्वेषादनक्षयः । राजद्वेषाद्भवेन्नाशोब्रह्मद्वेषात्कुलक्षयः ॥११॥ - अध्यायः १०॥ ५६ -- टीका--बडोके द्वेषसे मृत्युहोती है शत्रुसे विरोध करने से धनका तय है, राजाके द्वेष से नाश और ब्राह्मणके द्वेषसे कुल का क्षय होता है ॥ ११ ॥ वरवनेव्याघ्रगजेंद्रसेवितेद्रुमालयेपत्रफलाबुसे- वनम् ॥ तृणेषुशय्याशतजीर्णवल्कलंनबंधु मध्येधनहीनजीवनम् ॥ १२ ॥ टीका--बनमें बाघ और बड़े २ हाथियोंसे सेवित वृक्ष के नीचेके पत्ते फल खाना, वा जल का पीना, घास पर सोना, सो टुकड़ेके बकलोको पहिनना ये श्रेष्ठ हैं; पर बंधुओंके मध्य में धनहीन का जीना श्रेष्ठ नहीं है. ॥ १२ ॥ विप्रोवृक्षस्तस्यमूलंचसंध्यावेदाः शाखाधर्मक र्माणिपत्रम्॥ तस्मान्मूलंयत्नतोरक्षणीयंछिन्ने मूलेनैवशाखानपत्रम् ॥ १३ ॥ टीका-- ब्राह्मण वृक्ष है, उसकी जड़ संध्या है, वेद शाखा है, और धर्म कर्म पत्ते हैं, इसकारण प्रयत्नकर के जड़की रक्षा करनी चाहिये, जड़ कटजानेपर न शाखा रहेगी और न पत्ते ॥ १३ ॥ माताचकमलादेवीपितादेवोजनार्दनः । बांधवाविष्णुभक्ताश्चस्वदेशोभुवनत्रयम्।१।। टीका जिसकी लक्ष्मी माता है और विष्णु भगवान् चाणक्यनीतिदपणे। पिता हैं और विष्णुके भक्त बांधव हैं उसको तीनों लोक स्वदेशहीहैं ॥ १ ॥ एकवृक्षसमारूढानानावर्णाविहंगमाः॥ प्रभातेदिक्षुदशसुयांतिकापरिवेदना ॥१५॥ टीका- नाना प्रकारके पखेरू एकवृक्षपर बैठते हैं प्रभात समय दश दिशा में होजाते हैं उसमें क्या सोच है ॥ १५ ॥ बुद्धिर्यस्यबलंतस्यनिर्बुद्धेश्चकुतोबलम् ॥ वनेसिंहोमदोन्मत्तोजंबुकेननिपातितः ॥१६॥ टीका--जिसकोबुद्धि है उसीको बल है निर्बुद्धिको बल कहांसे होगा देखो बनमें मदसे उन्मत सिंह सियारसे मारागया ॥ १६ ॥ काचिंताममजीवने यदिहरिविश्वंभरोगीयते। नोचेदर्भकजीवनायजननीस्तन्यं कथंनिःस- रेत् ॥ इत्यालोचमुहुर्मुहुर्यदुपतेलक्ष्मीपतेकेव लम् । त्वत्पादांबुजसेवनेनसंततंकालोमया नीयते ॥ १७ ॥ टीका--मेरे जीवनेमें क्या चिंता है यदि हरि विश्वका पालनेवाला कहलाता है, ऐसा न होतो बच्चे के जीने के हेतु माताके स्तनमें दूध कैसे बनाते ? इस
अध्यायः १०
५५
को बार २ विचार करके हेयदुपति ! हेलक्ष्मी पति !!
सदा केवल आपके चरणकमल के सेवासे मैं समयको
बिताताहूं ॥ १७ ॥
गीर्वाणवाणीषुविशिष्टबुद्धिस्तथापिभाषांतरलो
लुपोहम् ॥ यथासुधायाममृतेचसेवितेस्वर्गांग
नानामधरासवेरुचिः॥१८॥
टीका-यद्यपि संस्कृतही भाषामें विशेष ज्ञान है
तथापि दूसरी भाषाकामी. मैं लोभी हूं जैसे अमृतके
रहतेभी देवताओंकी इच्छा स्वर्गकी स्त्रियों के ओष्ट
के आसवमें रहती है ॥ १८॥
अन्नादशगुणंपिष्टंपिष्टादशगुणंपयः ।।
पयसोऽष्टगुणंमांसमांसाद्दशगुणंघृतम् ॥१९॥
टीका-चावलसे दशगुणा
पिसान (चूनमें) गुण है.
पिसानसे दशगुणा दूधर्मे, दृधसे अठगुणा मांसमें,
मांससे दशगुणा घी में ॥ १६ ॥
शाकेनरोगावर्धतेपयसावर्धतेतनुः ।।
घृतेनवर्धतेवीर्यमांसान्मांसंप्रवर्धते ॥ २० ॥
टीका-सागसे रोग, दुधसे शरीर, घीसे वीर्य, और
मांससे मांस, बढता है ॥ २० ॥
इति वृद्धचाणक्ये दशमोऽध्याय ॥ १० ॥
चाणक्यनीतिदपणे। अथैकादशोऽध्यायः ११ दातृत्वप्रियवक्तृत्वंधीरत्वमुचितज्ञता ।। अपयासेननजन्यन्तेचत्वारःसहजागुणाःश टीका-उदारता, प्रिय बोलना, धरिता और उचित का ज्ञान ये अभ्याससे नहीं मिलते, ये चारों स्वभाविक गुण हैं ॥१॥ आत्मवर्गपरित्यज्यपरवर्गसमाश्रयेत् ।। स्वयमेवलयंयातियथाराज्यजन्यधर्मतः॥२॥ 'टीका-जो अपनी मण्डलीको छोड परके वर्ग का. आश्रय लेता है वह आपही लयको प्राप्त होजाता है जैसे राजाके राज्य अधर्मसे ॥ २ ॥ हस्तीस्थूलतनुःसचांकुशवश:किंहस्तिमात्रोंऽ कुशोदीपेप्रज्वलितेप्रणश्यतितमः किंदीपमात्रं तमः ॥ वजेणापिहताःपतन्तिगिरयःकिंवज मात्रन्नगाः तेजोयस्यविराजतेसवलवानस्थू लेषुकःप्रत्ययः ॥ ३॥ टीका-हाथीका स्थूल शरीर है वहभी अंकुशके वश रहता है, तो क्या हस्तीके समान अंकुश है? दीपक जलनेपर अंधकार आपही नष्ट होजाता है, तो क्या सपके तुल्य तम है? विकलाके मारे पर्वत गिरजा .
.
अध्यायः ११॥
है तो क्या बिजली पर्वतके समान है? जिसमें तेज
विराजमान रहता है वह बलवान् गिनाजाता है.
मोटेंका कौन विश्वास है. ॥ ३ ॥
कलौदशसहस्राणिहरिस्त्यजतिमेदिनीम् ॥
तदईजाह्नवीतोयंतदईग्रामदेवताः ॥ ४ ॥
टीका-कलियुगमें दशसहस्रवर्षकै बीतनेपर विष्णु
पृथ्वीको छोडदेते हैं. उसके आधेपर गंगाजी जलको,
तिसके आधेके बीतने पर ग्रामदेवता ग्रामको ॥४॥
गृहासक्तस्यनोविद्या नोदयामांसभोजनः ।
दव्यलुब्धस्यनोसत्यं स्त्रैणस्यनपवित्रता ॥५॥
टीका-गृहमें आसक्त पुरुषों को विद्या,मांसके आहारी
को दया, द्रव्यलोभीको सत्यता,और व्यभिचारी को
पवित्रता, नहीं होती है ॥ ५॥
नदुर्जनः साधुदशामुपैतिवहुप्रकारैरपिशिक्ष्य
माणः॥ ग्रामूलसिक्तःपयसाघृतेनननिंबतक्षा
मधुरत्वमेति ॥ ६॥
टीका-निश्चय है कि, 'दुर्जन अनेक प्रकारसे
सिखलायासी जाय, पर उसमें साधूता नहीं आती
दूध और घीसे पालोपर्यंत नींबका वृक्ष सींचा जाय
पर उसमें मधुरता नहीं आती ॥ ६ ॥
६८ चाणक्यनीतिदपणे।
अन्तर्गतमलोदुष्टस्तीर्थस्नानशतैरपि ॥
नशुब्यतितथाभांडंसुरायादाहितंचयत्॥७॥
टीका-जिसके हृदय में पाप है वही दुष्ट है; वह
तीर्थमें सौवार स्नानसेमी शुद्ध नहीं होता, जैसे
मदिराका पात्र जलायाभी जाय तौभी शुद्ध नहीं
होता. ॥ ७॥
नवेत्तियोयस्यगुणप्रकर्षसतंसदानिन्दतिनात्र
चित्रम्॥यथाकिरातीकरिकुंभलब्धांमुक्तांपरि
त्यज्यविभर्तिगुंजाम् ॥ ८॥
टीका-जो जिसके गुणकी प्रकर्षता नहीं जानता वह
निरंतर उसकी निंदा करता है, जैसे भिल्लिनी हाथीके
मस्तककै मोतीको छोड़ धुंधुचीको पहिनती है ॥ ८ ॥
येतुसंवत्सरंपूर्णनित्यमौनेनभुंजते ॥
युगकोटिसहसँतैपूज्यंतेस्वर्गविष्टपे ॥ ९ ॥
टीका-जों वर्षभर नित्य चुपचाप भोजन करता है
वह सहस्रकोटि युगलों स्वर्गलोकमें पूजा जाता है।।
कामक्रोधौतथालोभस्वादुशंगारकौतुके ।
अतिनिद्रातिसेवेचविद्यार्थीह्यष्टवर्जयेत्॥१०॥ ।
टीका-काम, क्रोध, लोभ, मीठी वस्तु, शृंगार,खेल
अति निद्रा और अतिसेवा इन आठोंको विद्यार्थी
छोडदेवे ॥ १० ॥
अध्यायः ११॥
अकृष्टफलमूलानिवनवासरतिः सदा ॥
कुरुतेऽहरहः श्रादमृषिर्विप्रःसउच्यते ॥११॥
टीका-बिना जोती भूमिसे. उत्पन्न फल वा मूलको
खाकर सदा बनवास करता हो और प्रतिदिन श्राद्ध
को ऐसा ब्राह्मण ऋषि कहलाता है ॥ ११ ॥
एकाहारेणसंतुष्टःषट्कर्मनिरतःसदा ॥
ऋतुकालाभिगामीचसविप्रोद्विजउच्यते॥१२॥
टीका-एकसमयके भोजनसे संतुष्ट रहकर पढना
पढाना, यज्ञ करना कराना,दान देना और लेना इन
छःकौमें सदा रत हो और ऋतुकाल में स्त्रीका संग
कर तो ऐसे ब्राह्मण को द्विज कहते हैं. ॥ १२ ॥
लौकिकेकर्मणिरतापशनापरिपालकः ॥
वाणिज्यकृषिकर्मायःसविनोवश्यउच्यते १३
टीका-संसारिक कर्ममें रत हो और पशुओंका पालन,
बनियाई और खेती करनेवाला हो वह विप्र वैश्य
कहलाता है ॥ १३ ॥
लाक्षादितैलनीलीनाकोसुंभमधुसर्पिषा ।
विक्रेतामद्यमांसानांसविप्रःशूदउच्यते॥१४॥
टीका-लाख आदि पदार्थ, तेल नीली कुसूम, मधु
धी, मद्य, और मांस जो इनका वेचनेवाला वह ब्राह्मण
शूद्र कहाजाता है ॥ १४ ॥
,
चाणक्यनीतिदर्पणे।
परकार्यविहंताचदाभिकःस्वार्थसाधकः॥
छलीद्वेषीमृदुःक्रूरोविप्रोमार्जारउच्यते ॥१५॥
टीका-दूसरे के कामका बिगाडनेवाला,दम्भी,अपने
ही अर्थका साधनेवाला, छली, द्वेषी, उपर मृदु और
अन्तःकरणमें क्रूरहो, तो वह ब्राह्मण बिलार कहा-
जाता है ॥ १५॥
वापीकूपतडागानामारामसुरवेश्मनाम् ॥
उच्छेदनेनिराशंकःसविप्रोम्लेच्छउच्यते॥१६॥
टीका-बावड़ी, कुंआ, तलाव, बाटिका, देवालय,
इसके उच्छेद करने में जो निडर हो वह ब्राह्मण
म्लेच्छ कहाजाता है ॥ १६ ॥
देवद्रव्यंगुरुद्रव्यपरदाराभिमर्शनम् ॥
निर्वाहःसर्वभूतेषुविप्रश्चांडालउच्यते ॥१७॥
टीका-देवताका द्रव्य और गुरूका द्रव्य जो हरता
है और परस्त्रीसे संग करता है और सब प्राणियों में
निर्वाह करलेता है वह विप्र चांडाल कहलाता है॥१७॥
देयंभोज्यधनंधनंसुकृतिभिनोसंचयस्तस्यवै ।
श्रीकर्णस्ववलेश्चविक्कमपतेरद्यापिकीर्तिःस्थि
ता॥ अस्माकंमधुदानभोगरहितंनष्टंचिरात्सं
चितं । निर्वाणादितिनैजपादयुगलंघर्षत्यहोम
क्षिकाः ॥ १८॥
अध्यायः १२॥ ६१. टीका-सुकृतियोंको चाहिये कि, भोगयोग धनको और द्रव्यको देवें कभी न संच.कर्ण,बलि,विक्रमादित्य इनराजाओं की कीर्ति इस समयपर्यन्त वर्तमान है,दान भोगसे रहित बहुत दिनसे संचित हमारे लोगोंका मधु नष्ट होगया. निश्चय है कि, मधु मखियां मधुके नाश होने के कारण दोनों पाओंको घिसा करती हैं॥१८॥ ॥ इति वृद्धचाणक्ये एकादशोऽध्याय ॥ अथ द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥ सानंदंसदनं सुतास्तुसुधियःकांताप्रियालापि- नी। इच्छापूर्तिधनंस्वयोषितिरतिःस्वाज्ञापराः सेवकाः॥आतिथ्यशिवपूजनप्रतिदिनंमिष्टान्न पानगृहे । साधोःसंगमुपासतेचसततंधन्यो गृहस्थाश्रमः॥१॥ टीका-यदि आनंदयुक्त घर मिले और लडके पंडित हों स्त्री मधुरभाषिणी हो, इच्छाके अनुसार धन हो अपनाही स्त्री में रति हो, आज्ञापालक सेवक मिले, अतिथिकी सेवा और शिवकी पूजा हो प्रतिदिन गृह में मीठा अन्न और जल मिले सर्वदा साधूके सँग की उपासना, यह गृहस्थाश्रमही धन्य है ॥ १ ॥ मार्तेषुविप्रेषुदयान्वितश्चयच्छ्रयास्वल्पमुपैति ६२ चाणक्यनीतिदर्पणे। दानम् ॥ अनंतपारंसमुपैतिराजन्यहीयतेतन्न लभेविजेश्यः ॥२॥ टीका-जो दयावान् पुरुष आर्त ब्राह्मणों को श्रद्धासे थोड़ाभी दान देताहै उस पुरुषको अनन्त होकर वह मिलता है. जो दियाजाता है वह ब्राह्मणोंसे नहीं मिलता है ॥ २॥ दाक्षिण्यंस्वजनेदयापरजने शाठ्यं सदादुर्जने, प्रीतिः साधुजनेस्मयः खलजनेविद्वजनेचार्ज- वम् ॥ सौर्यशत्रुजने क्षमागुरुजनेनारीजने धूर्तता, इत्येपुरुषाः कलासुकुशलास्तेष्वेव लोकस्थितिः ॥३॥ टीका-अपनेजनमें दक्षता, दूसरे जनमें दया दुर्जन में सदा दुष्टता, साधुजनमें प्रीति, खलमें अभिमान, विद्वानोंमें सरलता, शत्रुजनमें शूरता, बड़ेलोगोंके विषयमें क्षमा, स्त्रीसे कामपडनेपर धूर्तता, इस प्रकार से जो लोग कलामें कुशल होते हैं उन्हींमें लोगकी मर्यादा रहती है ॥ ३॥ हस्तौदानविवर्जितोश्रुतिपुटौसारस्वतद्रोहिणौ नेत्रेसाधुविलोकननरहितपादौनतीर्थगतौ ॥ अन्यायार्जितवित्तपूर्णमुदरवर्गेण गंशिगे.रेरे जम्बुकमुंचमुचसहसानीचंसुनियंवपुः ॥४॥ ... .
अध्यायः १२॥ ६३ टीका-हाथ दान रहित है, कान वेदशात्रके विरोधी हैं, नेत्रोंने साधुका दर्शन नहीं किया, पांवने तीर्थगमन नहीं किया, अन्यायसे अर्जित धनसे उदर भरा है और गर्वसे शिर ऊंचा होरहा है. रे रेशियार ऐसे नीच निंद्य शरीरको शीघ्र छोड ॥४॥ येशांश्रीमद्यशोदासुतपदकमले नास्तिभक्ति नराणां, येषांमाभीरकन्याप्रियगुणकथनेनानु रक्तारसंज्ञा ॥ येशांश्रीकृष्णलीलाललितरस कथासादरॊनैवकों, धिक्तान् धिक्तान धिगतान्कथयतिसततंकीर्तनस्थोमृदंगः॥५॥ टीका-श्रीयशोदासुतके पदकमलमें जिनलोगोंकी भक्ति नहीं रहती, जिन लोगोंकी जीभ ‘अहीरकी कन्याओंके प्रियके अर्थात् श्रीकृष्णके गुणगानमें प्रीति नहीं रखती, और श्रीकृष्णजीकी लीलाकी ललित- कथाका आदर जिनके कान नहीं करते उनलोगोंको धिक् है ऐसा कीर्तनका मृदंग सदा कहता है ॥ ५॥ पत्रनैवयदाकरीरविटपेदोषोवसंतस्यर्किनोलू , कोप्यवलोकतेयदिदिवासूर्यस्यकिदूषणं । वर्षानैवपत्तंतुचातकमुखेमेघस्यकिदूषणं,यत्पूर्व विधिनाललाटलिखितंतन्मार्जितुंकःक्षमः।६। टीका-यदि करीलके वृक्षमें पत्ते नहीं होते तो बसंत
६४
चाणक्यनीतिदपणे।
का क्या दोष है? यदि उलूक दिनमें नहीं देखता
तो सूर्यका क्या दोष है ? वर्षा चातकके मुखमें नहीं
पडती इसमें मेघका क्या अपराध है? पहिलेही ब्रह्मा
ने जो कुछ ललाटमें लिख रक्खा है उसे मिटानेको
कौन समर्थ है? ॥६॥
सत्संगाद्भवतिहिसाधुताखलानां साधूनांनहि-
खलसंगतःखलात्वम्॥आमोदकुसुमभवंमृदेव
धत्तेमृद्धनहिकुसुमानिधारयन्ति ॥ ७ ॥
टीका-निश्चय है कि, भच्छके संगसे दुर्जनों में
साधुता आजाती है परन्तु साधुओंमें दुष्टोंकी संगति
से असाधुता नहीं आती फूलके गंधको मही लेलेती
है पर मट्टीके गंधको फूल कभी नहीं धारण करते॥७॥
साधूनांदर्शनंपुण्यंतीर्थभूताहिसाधवः ॥
कालेनफलतेतीर्थसद्यः साधुसमागमः ॥८॥
टीका-साधुओंका दर्शनहीं पुण्य है इसकारण कि,
साधु तीर्थरूप है. समयसे तीर्थ फल देता है, साधुओं
का संग शीघ्रही काम करदेता है ॥ ८॥
विप्रास्मिन्नगरे महान्कथयकस्तालदुमाण
गणः । कोदातारजकोददातिवसनंप्रातही-
त्वानिशि ॥ कोदक्षःपरविर्तदारहरणेसर्वोपि
दक्षोजनःकस्माज्जीवसिहसखेविषकृमिन्याये
नजीवाम्यहम् ॥९॥
अध्यायः १२॥ ६५ टीका-हेविप्र! इस नगरमें कौन बड़ा है ? ताडके पेडोंका समुदाय, दाता कौन है ? धोबी प्रातःकाल वस्त्रलेता है रात्रिमें देदेता है, चतुर कौन है? दूसरे के धन और स्त्रीके हरणमें सबही कुशल हैं,तो ऐसे नगरमें आप कैसे जीते हो?हेमित्राविषका कीडा विषही में जीता है वैसेही मैंभी जीताई ॥ ९ ॥ नविप्रपादोदककर्दमानिनवेदशास्त्रध्वनिगर्जि तानि॥ स्वाहास्वधाकारविवर्जितानिश्मशान तुल्यानिगृहाणितानि ॥१०॥ टीका-जिनघरोंमें ब्राह्मण के पावोंके जलसे कीचड़ न भया हो और न वेदशास्त्रके शब्दकी गर्जना, और जो गृह स्वाहा स्वधासे रहित हो उनको स्मशानके समान समझना चाहिये ॥ १० ॥ सत्यंमातापिताज्ञानं धर्मोत्रातादयासखा ॥ शांति पत्नीक्षमापुत्रःषडेतेममबांधवाः॥१२॥ टीका-सत्य मेरी माता है, और ज्ञान पिता, धर्म मेरा भाई है, औ, दया मित्र, शांती मेरी स्त्री है, और क्षमा पुत्र, येही छः मेरे बन्धु हैं ॥ किसी संसारी पुरुषने ज्ञानीको देखकर चकितहो पूछा कि, संसार में माता, पिता, भाई, मित्र, स्त्री, पुत्र, ये जितनाही अच्छेसे अच्छे हों उतनाही संसार से आनंद होता है तुझको परम आनंदमें पप देखताहूं तो तुझकोभी ३ ६६ चाणक्यनीतिदर्पणे। कहीं न कहीं कोई न कोई उनमेंसे होगा; ज्ञानीने समझा कि, जिस दंशाको देखकर यह चकित है वह दशा क्या सांसारिक कुटुम्बोंसे होसक्ती हैं. इस कारण जिनसे मुझे परम आनंद होता है उन्हीको इससे कहूं कदाचित् यहभी इनको स्वीकार करे ॥ ११ ॥ अनित्यानिशरीराणिविभवोनमशाश्वतः ॥ नित्यंसन्निहितोमृत्युःकर्तव्योधर्मसंग्रहः॥१२॥ टीका-शरीर अनित्य है, विभवभी सदा नहीं रहता मृत्यु सदा निकटही रहती है; इसकारण धर्मका संग्रह करना चाहिये ॥ १२ ॥ निमंत्रणोत्सवाविप्रागावोनवतृणोत्सवाः ॥ पत्युत्साहयुताभार्याअहंकृष्णरणोत्सवः॥१३॥ टीका-निमंत्रण ब्राह्मणोंका उत्सव है, और नवीन घास गय्योंका उत्सव है, पतिके उत्साहस स्त्रियोंको उत्साह होताहै, हेकृष्ण! मुझको रणही उत्सवहै॥१३॥ मातृवत्परदारांश्चपरद्रव्याणिलोष्टवत् ॥ आत्मवत्सर्वभूतानियःपश्यतिसपश्यति॥१४॥ टीका-दूसरेकी स्त्रीको माताके समान, दुसरेके द्रव्यको पत्थर केकर समान, और अपने समान सब प्राणियोंको जो देखता है वही देखता है ॥ १४ ॥ धर्मतत्परतामुखमधुरतादानेसमुत्साहता। ...
अध्यायः १२॥ ६७ मित्रेवंचकतागुरौविनयाताचित्तेऽतिगंभीरता। आचारेशुचितागुणेरसिकताशास्त्रेषुविज्ञातृता। रूपेसुंदरताशिवेभजनतात्वय्यस्तिभोराघव १५ टीका-धर्ममें तत्परता,मुखमें मधुरता,दानमेंउत्साहता मित्रके विषय में निशच्छलता, गुरूसे नमता,अंतःकरण में गंभीरता, आचारमें पवितत्रा गुणमें रसिकता, शास्त्रों में विशेष ज्ञान, रूपमें सुन्दरता और शिवकी भक्ति, हेराघव ! ये आपही में हैं ॥ १५ ॥ काष्ठंकल्पतरुःसुमेरुरचलश्चिंतामणिः प्रस्थरः सूर्यस्तीव्रकरः शशीक्षयकरःक्षारोहिवारांनि- धिः कामोनष्टतनुबलिदितिसुतोनित्यंपशुः कामगौ:नैतांस्तेतुलयामिभोरघुपतेकस्योपमा दीयते ॥ १६॥ टीका--कल्पवृक्ष काठ है, सुमेरु अचल है, चिंतामणि पत्थर है, सूर्यको किरण अत्यंत ऊष्ण है चन्द्रमाकी किरण क्षीण हो जाती है समुद्र खारा है कामकेशरीर नहीं है बल्ली देत्य है कामधेनु सदा पशुही है इस कारण आप के साथ इनकी तुलना नहीं देसक्ते हेरघुपति ? फिर आपको किसकी उपमा दीजाय ॥१६॥ विद्यामित्रप्रवासेवभार्यामित्रंगृहेषुच ।। व्याधिस्थस्यौषधमित्रंधर्मोमित्रंमृतस्यचा१७॥
१८
चाणक्यनीतिदर्पणे।
टीका-प्रवास. में विद्या हित करती है, घरमें स्त्री
मित्र है, रोगग्रस्थ पुरुषका हित ओषधि होती है,
और धर्म मरेका उपकार करता है ॥ १७ ॥
विनयं राजपुत्रेयःपंडितेश्यःसुभाषितम् ॥
अनृतंद्यूतकारेश्यःस्त्रीपयःशिक्षेतकतवम्॥१८॥
टीका-सुशीलता राजाके लडकों से, प्रियवचन
पंडितोसे असत्य जुआडियोंसे और छल स्त्रियोंसे
सीखना चाहिये ॥ १८॥
अनालोक्यव्ययंक अनाथःकलहप्रियः ।।
आतुरःसर्वक्षेत्रेषुनरःशीघ्रंविनश्यति ॥१९॥
टीका-बिनाबिचारे व्ययकरनेवाला, सहायक के
न रहने परभी कलहमें प्रीति रखनेवाला और सब
जातिकी स्त्रियोंमें भोग केलिये व्याकुल होनेवाला
पुरुष शीघही नष्ट को प्राप्त होता है ॥ १६ ॥
नाहारंचिंतयेत्याज्ञोधर्ममेकेहिचिंतयेत् ॥
आहारोहिमनुष्याणांजन्मनासहजायते॥२०॥
टीका-पंडितको आहारकी चिंता नहीं करनीचाहिये
एक धर्मको निश्चयसे शोचना चाहिये, इस हेतु कि,
आहार मनुष्योंको जन्मके साथही उत्पन्न होता है।२०
धनधान्यप्रयोगेषुविधासंग्रहणेतथा ॥
आहारव्यवहारेचत्यक्तलजःसुखीभवेत्॥२१॥
{ अध्यायः १३॥ ६९ टीका-धनधान्यके व्यवहार करनेमें, वैसेही विद्या के पढने पढानेमें,आहार और राजाकी सभामें किसी के साथ विवाद करनेमें जो लज्जाको छोडे रहेगा वह सुखी होगा ॥ २१ ॥ जलबिंदुनिपातेनक्रमशःपूर्यतेघटः ॥ महेतुःसर्वविद्यानाधर्मस्यचधनस्यच ॥ २२ ॥ टीका-क्रम क्रम से जलके एक एक बूंदके गिरने से घडा भरजाता है. यही सब विद्या धर्म और धनकाभी कारण है ॥ २१ ॥ वयसःपरिणामेऽपियःखल:खलएवसः ॥ संपक्कमपिमाधुर्यंनोपयातीदवारुणम् ॥ २३ ॥ टीका-वयक परिणामपरमी जो खल रहता है सो खलही बना रहता है अत्यन्त पकीभी कडुवी लोकी मीठी नहीं होती ॥ २३ ॥ इतिवृद्धचाणक्ये द्वादशोऽध्यायः -:0+:- अथ त्रयोदशोऽध्यायः १३ मुहूर्तमपिजीवेच्चनरःशुक्लेनकर्मणा ॥ नकल्पमपिकष्टेनलोकद्वयविरोधिना ॥१॥ टीका-उत्तम कर्मसे मनुष्योंको मुहर्तभरका जीना - से चाणक्यनीतिदर्पणे। भी श्रेष्ठ है दोनोंलोगोंके विरोधी दुष्टकर्मसे कल्फ्भर काभी जीना उत्तम नहीं है ॥ १ ॥ गतेशोकोनकर्तव्योभविष्यनैवचिंतयेत् ॥ वर्तमानेनकालेनप्रवर्तन्तेविचक्षणाः॥२॥ टीका गईवस्तुका शोक और भावीकी चिंता नहीं करनी चाहिये,कुशल लोग वर्तमान कालके अनुरोध प्रवृत होते हैं ॥ २॥ स्वभावेनहितुष्यंतिदेवाःसत्पुरुषाःपिता ॥ ज्ञातयःस्नानपानास्यांवास्पदानेनपंडिताः॥३॥ टीका-निश्चय हैकि, देवता सत्पुरुष, और पिता ये प्रकृतिसे संतुष्ट होते हैं पर बन्धु स्नान और पानसे और पण्डित प्रियवचनसे संतुष्ट होतेहैं ॥ ३ ॥ आयुःकर्मचवित्तंचविद्यानिधनमेवच ॥ पंचेतानिचसृज्यंतेगर्भस्थस्यैवदेहिनः ॥४॥ टीका-आयुर्दाय, कर्म, विद्या धन और मरण पांच जब जीव गर्भ रहता है उसीसमय सिरजे जाते हैं ॥४॥ अहोवतविचित्राणिचरितानिमहात्मनाम् ॥ लक्ष्मीतृणायमन्यन्तेतद्धारेणनमंतिच ॥ ५॥ टोका-आश्चर्य है, कि, महात्माओंके विचित्र ये
अध्यायः १३॥
७१
चरित्र हैं लक्ष्मीको तृणसमान मानते हैं यदि मिल
जाती है तो उसके भारसे नम्र होजाते हैं ॥४॥
यस्यस्नेहोभयंतस्यस्नेहोदुःखस्यभाजनं ॥
स्नेहमूलानिदुखानितानित्यक्त्वावसेत्सुखम्६
टीका-जिसको किसी प्रीति रहती है उसीको भय
होता है स्नेहही दुःखका भाजन है और सब दुःखका
कारण स्नेहही है इसकारण उसे छोड़कर सुखी
होना उचित है ॥ ६॥
अनागतविधाताचप्रत्युत्पन्नमतिस्तथा ॥
द्वावेतौसुखमेधेतेयद्भविष्योविनश्यति ॥ ७ ॥
टीका-आनेवाले दुःखके पहिलेसे उपाय करने
वाला और जिसकी बुद्धिमें विपत्ति आजानेपर
शीघही उपायभी आजाता है ये दोनों सुखसे बढ़ते
है और जो शोचता है कि, भाग्यवशसे जो होने-
वाला है सो अवश्य होगा वह विनष्ट होजाता है॥७॥
राज्ञिधर्मिणिधर्मिष्टाःपापेपापा:समेसमाः ॥
राजानमनुवर्तन्तेयथाराजातथाप्रजाः ॥ ८॥
टीका-यदिधर्मात्मा राजा होतो प्रनाभी धर्मिष्ट
होती है यदि पापी हो तो पापी होती है सब प्रजा
राजाके अनुसार चलती हैं. जैसा राजा वैसी प्रजाभी
होती है ॥ ८॥
७१ चाणक्यनीविदर्पयो। जीवन्तंमृतन्मन्येदेहिनधर्मवाजतम् ।। मृतोधर्मेणसंयुक्तोदीर्घजीवीनसंशयः ॥९॥ · टीका-धर्मरहित जीतेको मृतकके समान समझता हूं निश्चय है कि, धर्मयुत मराभी पुरुष चिरंजिवीही है। धर्मार्थकाममोक्षाणांयस्यकोऽपिनविद्यते ।। अजागलस्तनस्येवतस्यजन्मनिरर्थकमा१०॥ टीका-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन्होंमें से जिसको एकभी नहीं रहता, बकरीके गलके स्थनके समान उसका जन्म निरर्थक है ॥ १० ॥ दह्यमानः सुतीवेणनीचाः परयशोऽग्निना। आशक्तास्तत्पदंगन्तुंततोनिंदांप्रकुर्वते ॥११॥ टीका-दुर्जन दूसरेकी कीर्तिरूप दुःसह अग्निसे जल- कर उसके पदों नहीं पाते इसलिये उस्की निन्दा करने लगते हैं ॥११॥ बन्धायविषयासंगोमुत्त्यैनिर्विषयमनः॥ मनएवमनुष्याणांकारणंवन्धमोक्षयोः॥१२॥ टीका-विषयमें आशक्त मन बन्धका हेतु है विषय से रहित मुक्तिका,मनुष्योंके बन्ध और मोक्षका कारण मनही है ॥ १२ ॥ .
श्रध्यायः १३॥
देहाभिमानेगलितेज्ञानेनपरमात्मनः॥
यत्रयत्रमनोयातितत्रतत्रसमाधयः ॥ १३ ॥
टीका-परमात्माके ज्ञानसे देहके अभिमानके नाश
होजाने पर जहां जहां मन जाता है वहां वहां समाधि
ही है ॥ १३॥
ईप्सितंमनसः सर्वंकस्यसंपद्यतेमुखम् ॥.
देवायत्तंयतःसर्वतस्मात्सन्तोषमाश्रयेत्॥१४॥
टीका- मनका अभिलाषित सब सुख किसको मिलता
है, जिसकारण सब देवके वश है इससे संतोष पर
भरोसा करना उचित है ॥ १४ ॥
यथाधेनुसहस्रेषुवत्सोगच्छतिमातरम् ।।
तथायच्चकृतंकर्मकर्तारमनुगच्छति॥१५॥
टीका-जैसे सहस्रों धेनुके रहते बछरा माताहीके
निकट जाता है; वैसेही जो कुछ कर्म कियाजाता
सो कर्ताहीको मिलता है ॥ १५ ॥
अनवस्थितकार्यस्यनजनेनवनेसुखम् ॥
जनोदहतिसंसर्गावनंसङ्गविवजनात्॥१६॥
टीका-- जिसके कार्यकी स्थिरता नहीं रहती वहन
जनमें और न बनमें सुख पाता है. जन उस्को संसर्ग
से जराता है और वन संगके त्यागसे जरातहि.॥ १६ ॥
.
चाणक्यनीतिदर्पणे।
यथाखात्वाखनित्रेणभूतलेवारिविन्दति ।।
तथागुरुगतांविद्यांशुश्रूपरधिगच्छति ॥ १७ ॥
टीका-जैसे खननेके साध रसे खनके नर पाताल
के जलको पाता है वैसेही गुरुगत विद्याको सेवक
शिष्य पाता है ॥ १७ ॥
कर्मायत्तंफलंपुंसांबुद्धिःकर्मानुसारिणी।
तथापिसुधियश्चार्या:सुविचायैवकुर्वते ॥१८॥
टीका-यद्यपि फल पुरुष के कर्मके आधीन रहता है
और बुद्धिभी कर्म के अनुसारही चलतीहै तथापि विवेकी
महात्मा लोग विचारहीके काम करते हैं ॥१८॥
सन्तोषस्त्रिषुकर्तव्यःस्वदारेभोजनेधने ॥
त्रिषुचैवनकर्तव्योऽध्ययनेजपदानयोः॥१९॥
टीका-स्त्री, भोजन और धन इन तीनमें सन्तोष
करना उचित है, पढना, तप और दान इन तीनमें
संतोष कभी नहीं करना चाहिये ॥ १६ ॥
एकाक्षरप्रदातारंयोगुरुंनाभिवंदते ॥
श्वानयोनिशतंभुक्त्वाचाण्डालेष्वभिजायते२०
टीका-जो एक अक्षरभी देनेवाले गुरुकी वन्दना
नहीं करता वह कुत्तेकी सौ योनिको भोगकर चांडालों
में जन्मता है ॥ २० ॥
अध्यायः १४॥
युगांतेप्रचलेन्मेरुःकल्पांतेसप्तसागराः ॥
साधवःप्रतिपन्नार्थान्नचलंतिकदाचन ॥२१॥
टीका-युगके अन्त) सुमेरु चलायमान होता है
और कल्पके अंतमें सातौं सागर, परन्तु साधुलोग
स्वीकृत अर्थसे कभी नहीं विचलते ॥ २१ ॥
॥ इति श्रीवृद्धचाणक्ये त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः १४
एथिव्यात्रीणिरत्नानिजलमन्नंसुभाषितम् ॥
मूढैःपाषाणखंडेपुरत्नसंख्याविधीयते ॥ १॥
टीका-पृथ्वीमें जल अन्न और प्रियवंचन ये तीनहीं
रत्न हैं. मूढोंने पाषाण के टुकडोंमें रत्नकी गिनती
की है ॥१॥
आत्मापराधरक्षस्यफलान्येतानिदेहिनाम् ॥
दारिद्यरोगदुःखानिबंधनव्यसनानिच ॥२॥
टीका-जीवोंकों अपने अपराधरूप वृक्ष के दरिद्रता,
रोग, दुःख, बंधन और विपत्ति ये फल होते हैं ॥९॥
पुनर्वित्तंपुनर्मित्रंपुनर्भार्यापुनर्मही ॥
एतत्सर्वंपुनर्लयनशरीरंपुनः पुनः ॥ ३ ॥
चाणक्यनीतिदर्पणे।
टीका-धन, मित्र, स्त्री और पृथ्वी ये फिर मिलते
है, परन्तु मनुष्यशरीर फिर फिर नहीं मिलता॥३॥
बहूनाचैवसत्त्वानासमवायोरिपुंजयः ॥
वर्षाधाराधरोमेघस्तृणैरपिनिवार्यते ॥४॥
टीका-निश्चय है कि बहुतजनोंका समुदाय शत्रुको
जीत लेता है. तृणसमूहभी वृष्टिकी धाराके धरने
वाले मेघका निवारण करता है. ॥ ४ ॥
जलेतैलंखलेगुापात्रेदानंमनागपि ।
प्राज्ञेशास्वंस्वयंयातिविस्तारंवस्तुशक्तितः॥५॥
टीका-जलमें तेल, दुर्जनमें गुप्तवार्ता, सुपात्रमें दान
और बुद्धिमानमें शास्त्र येथोडेभी हो तो भी वस्तुकी
शक्तिसे अपने अपने आपसे, विस्तारको प्राप्त होजाते
धर्माख्यानेश्मशानेचरोगिणायामतिर्भवेत् ॥
सासर्वदेवतिष्ठेच्चेत्कोनमुच्येतबंधनात् ॥६॥
टीका-धर्मविषयक कथाके,श्मशानपर और रोगियों
को जो बुद्धि उत्पन्न होती है वह यदि सदा रहती
तो कौन बन्धनसे मुक्त न होता ॥ ६ ॥
उत्पन्नपश्चात्तापस्यबुद्धिर्भवतियादृशी ॥
तादृशीयदिपूर्वस्यात्कस्यनस्यान्महोदयः॥७॥
ध्या : १४॥
७७
टीका-निदित कर्म करने के पश्चात् पछतानेवाले
पुरुषको जैसी बुद्धि उत्पन्न होती है वैसी बुद्धि यदि
पहिले होती तो किसको बड़ी समृद्धी न होती॥ ७॥
दानेतपसिंशौर्येवाविज्ञानेविनयेनये ॥
विस्मयोनहिकर्तव्योबहुरत्नावसुंधरा ॥ ८ ॥
टीका-दानमें, तपमें शरतामे, विज्ञतामें, सुशीलतामें,
और नीतिमें विस्मय नहीं करना चाहिये इस कारण
कि पृथ्वीमें बहुत रत्न हैं ॥८॥
दूरस्थोऽपिनदूरस्थोयोयस्यमनसिस्थितः ॥
पौयस्यहृदयेनास्तिसमीपस्थोऽपिदूरतः॥९॥
टीका-जो जिसके हृदयमें रहता है वह दूरभी हो
तौभी वह दूर नहीं जो जिसके मनमें नहीं है वह
समीपभी हो तौभी वह दूर है ॥ १॥
यस्माञ्चप्रियमिच्छेत्तुतस्यब्रुयात्सदाप्रियम् ॥
व्याधोमृगवधंगतुंगीतंगायतिसुस्वरम् ॥१०॥
टीका-जिससे प्रियकी वांछा हो उससे सदा प्रिय
बोलना उचित है. व्याध मृगके वधके निमित्त मधुर
स्वरसे गीत गाता है ॥१०॥
अत्यासन्नाविनाशायदूरस्थानफलप्रदाः ॥
सेव्यतामध्यभागेनराजावह्निर्गुरु:स्त्रियः॥११॥
. ७८. चाणक्यनीतिदर्पणे। टीका-अत्यंत निकट रहने पर विनाशके हेतु होते हैं, दूर रहनेसे फल नहीं देते, इसहेतु राजा अग्नि गुरु और स्त्री इनको . मध्यम अवस्थासे सेवना चाहिये ॥११॥ अग्निरापःस्त्रियोमर्खःसोराजकुलानिच ' ॥ नित्यंयत्नेनसेव्यानिसद्यःप्राणहराणिषटा१२। टीका-आग, जल, स्त्री, मूर्ख, सांप और राजाके कुल ये सदा सावधानतासे सेवनेके योग्य हैं ये छः शीन प्राणके हरनेवाले हैं ॥ १२ ॥ सजीवतिगुणायस्ययम्यधर्म:सजीवति ॥ गुणधर्मविहीनस्यजीवितनिष्प्रयोजनम्॥१३॥ टीका-वहीं जीता है जिसके गुण हैं, और वही जीता है जिसका धर्म है, गुण और धर्मसे हीन पुरुषका जीना व्यर्थ है ॥ १३ ॥ यदीच्छसिवशीकतुजगदेकेनकर्मणा ॥ पुरापंचदशास्येश्योगांचरंतीनिवारय॥१४॥ टीका-जो एकही कर्मसे जगतको वश किया चाहते हो तौ पहिले पन्द्रहोंके मुखसे मनको निवारण करो, तात्पर्य यह है कि, आंख, कान, नाक, जीम, स्वचा ये पांचो ज्ञानेन्द्रिय हैं, मुख, हाथ, पांव, लिंग, गुदा, ये पांच, कर्मेन्द्रिय हैं, रूप शब्द रस गन्ध .
७९
अध्यायः १,४।
स्पर्श ये पांच ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं इन पन्द्रहोंसे
मनको निवारण करना उचित है ॥ १४ ॥
प्रस्तावसदृशंवाक्यंप्रभावसशंप्रियम् ॥
आत्मशक्तिसमकोपयोजानातिसपण्डितः।१५
टीका-प्रसंगके.योग्य वाक्य, प्रकृति के सदृश प्रिय
और अपने शक्तिके अनुसार कोपको जो जानता
है वही बुद्धिमान है ॥ १५ ॥
एकएवपदार्थस्तुविधाभवतिवीक्षितः ॥
कुंणपं, कामिनीमांसंयोगिभिः कामिभिः
श्वभिः ॥१६॥
टीका-एकही देहरूप वस्तु तीनप्रकारकी देख
पडती है योगीलोग उसको अतिनिन्दित मृतक
रूपसे, कामीपुरुष कांतारूपसे कुत्ते मांसरूपसे
देखते हैं ॥ १६ ॥
सुसिद्धमौषधंधर्मगृहच्छिदंचमैथुनम् ॥
कुभुक्तंकुश्रुतंचैवमतिमान्नप्रकाशयेत् ॥१७॥
टीका-सिद्ध औषध, धर्म अपने घरका दोष, मैथुन
कुअन्नका भोजन और निंदित बचन इनका प्रकाश
करना बुद्धिमानको उचित नहीं है ॥ १७ ॥
तावन्मानेननीयन्तेकोकिलेश्चैववासराः॥
यावत्सर्वजनानन्ददायिनीवाक्प्रवर्तते॥१८॥
चाणक्यनीतिदर्पणे।
टीका-तवलौं कोकिल मौन साधनसे दिन बिताती
है जबल्लौ सबजनोंको आनन्द देनेवाली वाणीका
प्रारंभ नहीं करती है ॥१८॥
धर्मधनंचधान्यंचगुरोर्वचनमौषधम् ॥
सुगृहीतंचकर्तव्यमन्यथातुनजीवति ।।१९॥
टीका-धर्म, धन, धान्य, गुरूका बचन और औषध
यदि यह सुगृहीत हो तोइनको भली भांतिसे करना
चाहिये जो ऐसा नहीं करता वही नहीं जीता ॥१९॥
त्यजदुर्जनसंसर्गंभजसाधुसमागमम् ॥
कुरुपुण्यमहोरात्रंस्मरनित्यमनित्यतः॥२०॥
टीका-खलका संग छोड, साधूकी संगतिका स्त्री-
कार कर, दिनरात पुण्य क्रिया कर और ईश्वरका
नित्यस्मरण कर इसकारण कि संसार अनित्यहै ॥२०॥
इति चतुर्दशोऽध्याय ॥ १४॥
अथ पंचदशोऽध्यायः।१५।
यस्यचित्तंद्रवीभूतंकृपयासर्वजन्तुषु ॥
तस्यज्ञानेनमोक्षणकिंजटाभस्मलपैनः ॥२॥
टीका-जिसका चित्त सब प्राणियोपर दयासे पिघल
जाता है उसको ज्ञान से, मोनसे, जटासे और
विभूति के लेपनसेक्या है ॥ १॥
८१ 11 अध्यायः १६. एकमेवाक्षग्यस्तुगुरु:शिष्यप्रबोधयेत् ॥ . पृथिव्यानास्तितव्यंयहत्त्वाचानृणोभवेत्॥२॥ टीका--जो गुरु शिष्यको एकभी अक्षरका उपदेश करता है। पृथ्वीमें ऐसा द्रव्य नहीं है जिसको देकर शिष्य उससे उत्तीर्ण होय ॥ १ ॥ खलानांकण्टकानांचद्विविधैवप्रतिक्रिया ॥ उपानन्मुखसंगोवादूरतोवाविसर्जनम् ॥ ३॥ टीका-खल और कांटाइनका दोई प्रकारका उपाय है जुतासे मुखका तोडना वा दुरसे त्याग देना ॥ ३ ॥ कुचैलिनंदन्तमलोपधारिणबहाशिनंनिष्टुरभा षिणंच ॥ सूर्योदयेचास्तमितेशयानंविमुंचति श्रीर्यदिचक्रपाणिः ॥४॥ टीका-मलिन वस्त्रवालको, जो दांतोंके मल को दूर नहीं करता उसको, बहुत भोजन करनेवालेको, कटु भाषीको, सूर्यके उदय और अस्तके समयमें सोने वालेको लक्ष्मी छोड़देती है.चाहे वह विष्णु भी हो॥४॥ त्यजतिमित्राणिधनविहीनंदाराश्चभृत्याचसुह जनाश्च ॥तंचार्थवंतंपुनराश्रयँतेह्यर्थोहिलोके पुरुषस्यबंधुः ॥ ५॥ टीका-मित्र, स्त्री, सेवक, और बन्धु ये धनहीन ८२ . पाणक्यनीतिदपणे। पुरुषको छोडदेते हैं और वही पुरुष यदि धनी होजाता है तो फिर उसीका आश्रय करते हैं माताधनही लोक में बन्धु है ॥५॥ अन्यायोपार्जितंद्रव्यंदशवर्षाणितिष्ठति ।। प्राप्तएकादशेवर्षसमूलंचविनश्यति ॥ ६॥ टीका-अनीतिस अर्जित धन दस वर्षपर्यंत ठहरता है. ग्यारहवें वर्षके प्राप्त होनेपर मूलसहित नष्ट होजाता है ॥ ६॥ अयुक्तस्वामिनोयुक्तंयुक्तंनीचस्यदूषणम्।। अमृतराइवेमृत्युविषशंकरभूषणम् ।।७।। टीका-अयोग्यभी वस्तु समयको योग्य होती है और योग्यभी दुर्जनको दूषण, अमृतने राहुको मृत्यु दिया, विषभी-शंकर को भूषण हुवा ॥७-2. तदोजनंयहिजभुक्तशेषं तत्सौड़दंपतक्रियतेप रस्मिन् ॥साप्राज्ञतायानकरोतिपापं दंभंविना यःक्रियतेसधर्मः ॥८॥ टीका-वही भोजन है जो ब्रामणके -भोजनसे वचा है वही मित्रता है जो दुसरेमें की जाती है वही बुद्धिमानी है जो पाप नहीं करती और जो बिना दभ किया जाता है वही धर्म है।॥॥ - मध्यावर १५ मणिल्ठतिपादायेकाचःशिरसिधार्यते ॥ क्रयविक्रयवेलायाकाचःकाचोमणिर्मणिः॥९॥ टीका-माण पविके आगे लोटती हो, और कांच शिरपरभी रक्खा हो परन्तु कयविक्रय के समयमें कांच कांचही रहता है.. और मणि मणिही है ।। अनंतशास्त्रंबहुलाश्चविद्या अल्पश्चकालोबहु विनताच ॥ यत्सारभूतंतदुपासनीयहंसोयथा क्षीरमिवांमध्यात् ॥१०॥ टीका-शात अनंत है और विद्या बहुत, काल मोटा है, और विन बहुत हैं. इसकारण जो सार है उसको जेलेना उचित हैं। जैसे हंस जलके मध्यसे दूधकों लेलेता हैं ।।१०॥ दुरागतंपथिनांतंव्याचगृहमागतम् ॥ अनर्चयित्वायो क्तेसवैचांडालउच्यते ॥११॥ टींका-दरसे आयेको, पथसे यकको और निरर्थक गृहपर आयको बिनापूछे जो खाता है वह चांडालही गिना जाता है ॥१॥ पठतिचतुरोवेदानधर्मशास्त्राण्यनेकशः॥ मात्मानंनवजानंतिदर्वीपाकरसंयथा ॥१२॥ टीका-चारों वेद और अनेक धर्मशात्र पढ़ते हैं चाणक्यनीतिदपणे। आत्माको नहीं जानतें जैसे करछी पाकके रसको ॥ १२ ॥ धन्याद्विजमयीनांकाविपरीताभवार्णवे.॥ तरंवधोगताःसर्वेउपरिस्था:पतंत्यधः ॥१३॥ टीका-यह ब्राह्मणरूप नाव धन्य है संसाररूप समुद्र में इसकी उलटीही रीति है। उसके नीचे रहनेवाले सब तरते हैं और ऊपर. रहनेवाले नीचे गिरते हैं, अर्थात् ब्राह्मणसे जो नम्र रहता है. वह, तरजाता है और जो नम्र नहीं रहता है वह नरकमें गिरता है।१३। अयममृतनिधानं नायकोऽप्यौषधीनाम् अमृत मयशरीरकांतियुक्तोऽपिचन्द्रः । भवति विगतरश्मिमंडलंप्राप्यभानो:परसदननिविष्टः- कोलघुत्वंनयाति ॥१४॥ टीका--अमृतका घर औषधियोंका अधिपति जिसका शरीर अमृतमय और शोभायुतभी चंद्रमा सूर्यके मंडल में जाकर निस्तेज होता है, दूसरेके घर में पैठकर कौन लघुता नहीं पाता ॥ २४ ॥ अलिरयंनलिनीदलमध्यगःकमलिनीमकरंदम दालसः॥विधिवशोत्परदेशमुपागताकुटजपुष्प रसंबहुमन्यते ॥१५॥ टीका-यह भौंरा जब कमर्लिनीकें पत्तोंके मध्य थां अध्यायः १५ । । ८५ . तब कमलिनीक फलके रससे आलसी बना रहताथा: अब दैववश परदेशमें आकर तोरैयाके फुलको बहुत समुभता है ॥ १५ ॥ पीतः क्रुडेनतातश्चरणतलहतोवल्लभोयेनगेषा दाबाल्पाद्विप्रवयः स्ववदनविवरेधार्यतवैरि- णीमे गेहं मेछदयन्तिप्रतिदिवसमुमाकांत पूजानिमित्तं तस्मात्खिन्नासंदाइंद्विजकुलनि लयनाथयुक्तंत्यजामि ॥१६॥ टीका-जिसने रुष्टहोकर मेरे पिताको पीडाला और जिसने क्रोधक्के मारे पावसे मेरे कन्तको मारा, जो श्रेष्ट बाह्मणः बैठे सदालड़कपनसे लेकर मुखविवरमें मेरी वैरिणीको रखते हैं और प्रतिदिन पार्वतीके पतिकी पूजाके निमित्त मेरे गृहको काटते हैं हैनाथ ! इससे खेद पाकर ब्राह्मणोंक घरको सदा छोड़ें रहती बंधनानिखलुसंतिबहूनिप्रेमरज्जुकृतबन्धन मन्यत् । दारुभेदनिपुणोऽपिषडधिंनिष्क्रियो भवतिपंकजकोशे॥ १७॥ टीका-बंधनतो बहुत हैं; परंतु प्रीतिकी रस्सीका बन्धन ओरही है. काठके छेदने में कुशलभी भौंरा कमलके कोशमें निर्व्यापार होजाता है ॥ १७ ॥ छिन्नोपिचंदनतरुनजहातिगंध वृद्धोऽपिवारण
पाणावर
पतिनजहातिलीलाम् ॥ यंत्रार्पितोमधुरतांना
जहातिचेक्षुः क्षीणों पिनत्यजितशीलगुणान्कु
लीनः ॥१८॥
टीका काटा चन्दनका वृक्ष गन्धको त्याग नहीं
देता बूढाभी गजपति विलासको नहीं छोड़ता: कोल्ड
में पेरीभी ऊसः मधुरता नहीं छोड़ती. दरिद्रभी'
कुलीन सुशीलता आदिगुणों का त्याग नहीं करता
उयाकोऽपिमहीधरोलघुतरोदोश्याँधृतोलीलया।
तेनत्वंदिविभूतलेचविदितोगोवईनोद्धारकः॥
त्वत्रिलोक्यावहामिकुंचपोरग्रेनतण्यते
किंवाकेशवभाषणेनबहुनापुण्यैर्यशीलस्यते१९
टीका-पृथ्वी पर किसी. अत्यंत हलके पर्वतोंको
भनायास से बाहुवोके. उपर, धारणा करने से आप.
स्वर्ग और पृथ्वीतलमें सर्वदागोवईनपारी कहलाते
है. तीनों लोकों के धरने वाले आपको केवलकों
के अग्रभागमें धारण करती हायह कुबभी नहीं
गिनाजाता है हेकेशव बहुत कहने से क्या
पुण्योंसे पा. मिलता है ....
इति पंचदशोऽध्यायः॥ १५ ॥
अप- पोरशोऽध्यायः॥ 'नध्यातंपदमीश्वरस्यविधिवत्संसारबिच्छित्तये स्वर्गद्वारकपाटपाटनपटुर्धर्मोऽपिनोपार्जितः॥ नारीपीनपयोधरोस्युगलं स्वप्रेपिनालिंगितं मातु:केवलमेवयौवनवनच्छेदकुठारावयम् १ टीका-संसार से मुक्त होने के लिये विधिसे ईभरके पदका ध्यान मुझसे न "हुवा स्वर्गद्वारके काटके तोड़ने में समर्थ धर्म काभी अर्जन'नाकिया औरतीके 'दोनों पीनस्तन और जंघाओंको आलिंगन स्वप्नामें भी न किया में माताके युवापन रूप वृक्ष के केवल काटने में कुन्हाडी उत्पन्न हुवा॥५॥ जल्पंतिसाईमन्येनपश्यत्यन्यसविनमाः ॥ 'हृदयेचिंतयंत्यन्यतस्त्रीणामेकतोरतिः ॥२॥ टीका--भाषण दुसरेके साथ करती हैं. दूसरे को बिलाससे देखती है और हृदयमें दुसरेहीकी चिन्ता करती है खियोंकी प्रीति एकमें नहीं रहतीः॥४॥ योमोहान्मन्यतेमुढारक्यमयिकामिनी ॥ सतस्यावशगोमूत्वानृत्येत्क्रीडाशकुंतवत्॥३॥ टीका-जो मर्ख अविवेकसे समझता है कि, यह कामिनी मेरे उपर प्रेम करती है वह उसके वरा होकराजलक-पक्षीक समान-नासा करता है।
८८ चाणक्यनीतिदर्पणे। कोऽर्थान्प्राप्यनगर्वितोविषयिणः कस्यापदो ऽस्तंगताः स्त्रीभिःकस्यनखंडितंभुविमनः को नामराजप्रियः कःकालस्यनगोचरत्वमग मत्कोऽर्थीगतोगौरवं कोवादुर्जनदुर्गुणेषुपतितः क्षामखयातः पथिः॥४॥ टीका-धन पाकर गर्वी कौन न हुवा. किस विषयी की विपत्ती नष्ट हुई. पृथ्वीमें किसके मनको स्त्रियों ने खण्डित न किया.राजाको प्रिय कौन हुवा, काल के वश कौन नहीं हुवा, किस याचक ने गुरुता पाई. दुष्ट की दुष्टतामें पड़कर संसार, के पंथमें कुशलतासे कौन गया ॥४॥ ननिर्मिताकेनः नदृष्टपूर्वा नश्रूयते हेममयी कुरंगी । तथापितृष्णा रघुनंदनस्य विनाश काले विपरीतबुद्धिः ॥ ५॥ टीका-सोने की मृगी,न पहिले किसीने रची, न देखी और न किसीको सुन पड़ती है तौभी: स्घुनंदन की तृष्णा उसपर हुई. विनाशके समय बुद्धि विपरीत होजाती है ॥५॥ गुणरुत्तमायांतिनोच्चैरासनसस्थिताः ॥ प्रसादशिखरस्योऽपिकाक किंगरुडायते। प्राणी गुणों से उत्तमता पाता है ऊंचे आसनपर .
८९ अध्यायः १६ बैठकर नहीं. कोठोंके ऊपर के भागमें बैठा कौवा क्या गरुड़ होजाता है ॥ ६ ॥ गुणाःसर्वअपूज्यंतेनमहत्योऽपिसंपदः । पूर्णेन्दुःकिंतथावंद्योनिष्कलंकोयथाकृशः॥७॥ टोका-सब स्थानों में गुण पूजे जाते हैं बड़ी संपति नहीं, पूर्णिमाका पूर्णभी चंद्रमा क्या वैसा वंदित होता है जैसा बिना कलंकके द्वितीयाका दुर्बलभी ॥७॥ परस्तुतगुणोयस्तुनिर्गुणोपिगुणीभवेत् ॥ इंद्रोऽपिलघुतांयातिस्वयंप्रख्यापितैर्गुणैः ॥८॥ टीका-जिसके गुणोंको दूसरे लोग वर्णन करते हैं वह निर्गुणभी होतो गुणवान् कहा जाता है. इन्द्रभी याद अपने गुणों की आप प्रशंसा करै तो उससे लघुता पाता है। विवेकिनमनुप्राप्ता गुणायांतिमनोज्ञताम् ॥ सुतरांरत्नमाभातिचामीकरनियोजितम्॥९॥ टीका-विवेकीको पाकर गुण सुंदरता पाते हैं जब रत्न सोनमें जड़ा जाताहै तब अत्यंत सुंदर दीख पड़ताहै॥९॥ गुणैःसर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येकोनिराश्रयः ॥ अनय॑मपिमाणिक्यं हेमाश्रयमपेक्षते॥१०॥ टीका-गुणोंसे ईश्वरके संदृशभी निरालंब अकेला
चाणक्यनीतिदर्पणे।
पुरुष दुख पाता है अमोलभी माणिक्य सोनाके
आलंबकी अर्थात् उस में जड़े जाने की अपेक्षा
करता है ॥ १० ॥
अतिक्लेशेनयेअर्था धर्मस्यातिक्रमेणतु ॥
शत्रूणांप्रणिपातेन येअर्थामाभवंतुमे ॥ ११॥
टीका-अत्यंत पीडासे धर्मके त्यागसे और वैरियों
की प्रगतिस जो धन होते हैं सो मुझको नहीं ॥११॥
किंतयाक्रियतेलक्ष्म्या यावधरिवकेवला ।
यातुवेश्येवसामान्या पथिकैरपिभुज्यते।।१२॥
टीका-उस संपत्तिसे लोग क्या कर सक्ते हैं जो
वधू के समान असाधारण है जो वेश्याके समान सर्व
साधारण हो वह पथिकोंके भी भोगमें आसक्ती है॥१२॥
धनेषुजीवितव्येषु स्त्रीषुचाहारकर्मसु ॥
अतृप्ता:प्राणिनःसर्वे यातायास्यंतियांतिचा१३॥
टीका-धनमें जीवन में स्त्रियोंमें और भोजनमें अतृप्त
होकर सब प्राणिगये और जायंगे ॥ १३ ॥
क्षीयंतेसर्वदानानि-यज्ञहोमबलिक्रियाः॥
नक्षीयतेपात्रदानमभयंसर्वदेहिनाम् ॥१४॥
टीका-सब दान, यज्ञ, होम, बलि ये सब नष्ट
होजातेहैं सत्पात्र को दान और सब जीवोंको अभय
दान ये क्षीण नहीं होते ॥ ३४ ॥
११
टीका-तृण
अध्यायः १६ ॥
तृणलघुतृणात्तूलं तूलादपिचयाचकः ॥
वायुनाकिननीतोऽसौ मामयंयाचयिष्यति।१५।
सबसे लघु होता है तृणसे रुई हलकी
होती है रुईसेभी याचक तो उसे वायु क्यों नहीं
उडा ले जाती वह समझती है कि यह मुझसेभी
मांगेगा ॥ १५॥
वरंप्राणपरित्यागो मानभंगेनजीवनात् ॥
प्राणत्यागक्षणदुःखं मानभंगेदिनेदिने ॥१६॥
टीका-मानभंगपूर्वक जीनेसे प्राणका त्याग श्रेष्ठ
है प्राण त्यागके समय क्षणभर दुःख होता है मान
के नाश होनेपर दिन दिन ।। १६ ।।
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वेतुष्यंतिजन्तवः ॥
तस्मात्तदेववक्तव्यं वचनेकिंदरिद्रता॥१७॥
टीका-मधुर बचनके बोलनेसे सब जीव संतुष्ट
होते हैं. इस कारण उसीका बोलना योग्य है बचनमें
दरिद्रता क्या ॥ १७ ॥
संसारकूटबक्षस्य द्वेफलेअमृतोपमे ॥
सुभाषितंचसुस्वादुसंगतिःसुजनेजने ॥१८॥
टीका-संसाररूप कूटवृक्षके दोही फल हैं. रसीला
प्रियबचन और सज्जनके साथ संगति ॥ १८ ॥
चाणक्यनीतिदर्पणे।
बहुजन्मसुचाश्यस्तंदानमध्ययनंतपः ॥
तेनैवान्यासयोगेनदेहमीचाश्यस्यतेपुनः॥१९
टीका-जो जन्म जन्म दान, पढना, तप, इनका
अभ्यास कियाजाता है उस अभ्यासके योगसे देहका
अभ्यास फिर फिर करता है ॥ १९ ॥
पुस्तकेषुचयाविद्या परहस्तेषुयद्धनम् ॥
उत्पन्नेषुचकार्येषु नसाविद्यानतद्धनम् ॥२०॥
टीका-जो विद्या पुस्तकोंही में रहती है और दूसरोंके
हाथों में जो धन रहता है, काम पड़जानेपर न विद्या,
है न वह धन है ।
इतिवृद्धचाणक्ये पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
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अथ सप्तदशोऽध्याय प्रारंभः १७
पुस्तकप्रत्ययाधीतं नाधीतंगुरुसन्निधौ ॥
सभामध्येनशोभंते जारगर्माइवस्त्रियः ॥१॥
टीका-जिनने केवल पुस्तकके प्रतितसे. पढा
गुरूके निकट न पढा वे सभाके बीच व्यभिचारसे
गर्भवाली स्त्रियोंके समान नहीं शोभते ॥ १॥
कृतप्रतिकृतिकुर्याबिंसनेप्रतिहिंसनम् ॥
तत्रदोषोनपततिदुष्टेदुष्टसमाचरेत् ॥ २॥
अध्यायः १७॥
, दुष्टता
टीका-उपकार करनेपर प्रत्युपकार करना चाहिये
और मारनेपर मारना इसमें अपराध नहीं होता इस
कारणकि करनेपर
दुष्टताका आचरण करना
उचित होता है ॥२॥
यद्रंयद्दूराराध्यंयच्चदूरेव्यवस्थितम् ॥
तत्सर्वतपसासाध्यंतपोहिदुरतिक्रमम् ॥३॥
टीका-जो दूरहै जिसकी आराधना नहीं होसक्ती
और जो दूर वर्तमान है वे सब तपसे सिद्ध होसक्ते
हैं इस कारण सबसे प्रबल तप है ॥ ३ ॥
लोभश्चेदगुणेनकिंपिशुनतायद्यस्तिकिंपातकैः
सत्यंचेत्तपसाचकिंशुचिमनोयद्यस्तितीर्थेनकिम्
सौजन्यंयदिकिंगुणैः सुमहिमायद्य स्तिकिं
मंडनैः सद्विद्यायदिकिंधनैरपयशोयद्यस्तिकिं
मृत्युना॥४॥
टीका-यदिलोभ है तो दूसरे दोषसे क्या यदि
चुगली है तो और पापोंसे क्या, यदि मन सत्यता है
तो तपसे क्या यदि मन स्वच्छ है तो तीर्थसे क्या,
यदि सज्जनता है तो दूसरे गुणसे क्या, यदि महिमा
है तो भूषणोंसे क्या, यदि अच्छी विद्या है तो धनसे
क्या, और यदि अपयश है तो मृत्युसे क्या ॥४॥
पितारत्नाकरोयस्यलक्ष्मीर्यस्यसहोदरी ।।
संखोभिक्षाटनंकुर्यान्नदत्तमुपतिष्ठते ॥५॥
चाणक्यनीतिदपणे।
टीका-जिसका पिता रत्नोंकी खान समुद्र है, लक्ष्मी
जिस्की बहिन, ऐसा शंख भीख मांगता है सच है
बिना दिया नहीं मिलता ॥ ५॥
अशक्ततस्तुभवेत्साधुर्बह्मचारीचनिर्धनः ॥
व्याधिष्टोदेवभक्तश्चवृद्धानारीपतिव्रता ॥६॥
टीका-शक्तिहीन साधु होता है, निर्धन ब्रह्मचारि,
रोग्रस्त देवताका भक्त होता है और वृद्ध स्त्री
पतिव्रता होती है ॥ ६॥
नान्नोदकसमंदानं नतिथिर्वादशीसमा ।।
नगायच्या:परोमंत्रो नमातुर्दैवतंपरम् ॥ ७॥
टीका-अन्न जलकेसमान कोई दान नहीं है, न
द्वादसीके समान तिथि. गायत्रीसे. बढ़कर कोई मंत्र
नहीं है न मातासे बढ़कर कोई देवता है ॥ ७ ॥
तक्षकस्यविषंदते मक्षिकायाविषंशिरः ।।
वृश्चिकस्यविषपुच्छ सर्वांगेदुजनोविषम् ॥८॥
ढोका--सांपके दांतमें विष रहता है, मक्खीके सिरमें
विष है, विच्छकी पूंछमें विष है सब अंगोंमें दुर्जन
विषहीं से भरा रहता है ॥ ८ ॥
पत्युराज्ञांविनानारी उपोस्यव्रताचारिणी
आयुष्यांहरतेभर्तुःसानारीनरकंव्रजेत् ॥९॥
अध्यायः १७॥ ९५ . टीका-पतिकी आज्ञा बिना उपवास व्रत करनेवाली स्त्री स्वामीकी आयुको हरती है और वह स्त्री आप नरकमें जाती है ॥ ६ ॥ नदानःशुयतेनारी नोपवासशतैरपि ॥ नतीर्थसेवयातद्वद्भर्तुः पादोदकैर्यथा ॥१०॥ टीका-न दानसे, म सैंकडों उपवासों से, न तीर्थ, के सेवन से स्त्री वैसी शुद्ध होती है, जैसी स्वामी के चरणोदकसे ॥ १० ॥ पादशेषंपीतशेष संध्याशेषतथैवच ॥ श्वानमूत्रसमंतोयं पीत्वाचांदायणंचरेत् ॥१॥ टीका-पांव धोनेसे जो जलं बचता है, और पीनेसे जो जल बचनाता है और सन्ध्या करनेपर जो अवशिष्ट जल है वह कुत्ते के मूत्रके समान है उसको पीकर चांद्रायणका व्रत करना चाहिये ॥५१॥ दानेनपाणिन्तुकंकणेनस्नानेनशुद्धिर्नतुचंद नेन ॥ मानेनतृप्ति तुभोजनेनज्ञानेनमुक्तिन तुमंडनेन ॥१२॥ टीका-दान से हाथ शोभता हे कंकण से नहीं, स्नान से शरीर शुद्ध होता है चन्दनसे नहीं, सन्मान से तृप्ति होती है भोजन से नहीं,ज्ञान से मुक्ति होती है, छापा तिलकादि भूषणसे नहीं ॥ १२ ॥ ॥
९६ चाणक्यनीविदपणे। नापितस्यगृहेक्षौरं पाषाणेगंधलेपनम् ॥ आत्मरूपंजलेपश्यन्शकस्यापिश्रियहरेता१३ टीका-नाईके घरपर बार बनवाने वाले, पत्थर परसे लेकर चन्दन लेपन करनेवाला, अपने रूपको पानीमें देखनेवाला इन्द्रभी हो तो उसकी लक्ष्मीको हरलेते हैं ॥ १२॥ सद्यःप्रज्ञाहरातुंडी सद्यःप्रज्ञाकरीवचा ॥ सद्यःशक्तिहरानारी सद्यःशक्तिकरंपयः॥१॥ टीका-कुंदरू शीमही बुद्धि हरलेता है और बच झटपट बुद्धि देती है. स्त्री तुरंतही शक्ति हरलेती है दूध शीग्रही बल कर देता है ॥ १४ ॥ यदिरामायदिरमायदितनयोविनंथगुणोपेतः॥. तनयेतनयोत्पत्तिःसुरवरनगरेकिमाधिक्यव१५ टीका-यदि कांता है, यदि लक्ष्मी वर्तमान है, यदि पुत्र सुशीलता गुणसे युक्त है, और पुत्र के पुत्रकी उत्पति हुई हो, फिर देवलोकमें इससे अधिक क्या है ? ॥ १५ ॥ परोपकारणंयेषाजागर्तिहृदयेसताम् ॥ नश्यतिविपदस्तेषासंपदास्युःपदेपदे ॥१६॥ टीका-जिम सज्जनोंके हृदयमें परोपकार जागरूक अध्याय: १६ । है उनकी विपत्ति नष्ट होजाती है और पदपदमें संपत्ति होती है ॥ १६ ॥ आहारनिद्राभयमैथुनानि समानिचैतानिनृणा पशूनाम्॥ज्ञानंनराणामधिकोविशेषोज्ञानेन हीनाःपशुभिःसमानाः ॥ १७ ॥ टीका-भोजन निद्रा भय मैथुन ये मनुष्य और पशुओंके समानही हैं मनुष्योंको केवल ज्ञान अधिक विशेष है ज्ञानसे रहित नर पशुके समान है ।।१७।। दानार्थिनोमधुकरायदिकर्णतालैर्दूरीकृताःक- रिवरेणमदान्धबुद्ध्या ॥ तस्यैवगण्डयुगमण्डन हानिरेषा,गा:पुनर्विकचपद्मवनेवसंति॥१८॥ टीका-यदि मदान्ध गजराजने गजमदके अर्थी भौंरों को मदांधतासे कर्णके तालोंसे दूर किया तो यह उसीके दोनों गएडस्थलकी शोभाकी हानि भई.भौरे फिर विकसित कमल बनमें बसते हैं ॥१८॥ तात्पर्य यह है कि, यदि किसी निर्गुण मदांध राजा वा धनीके निकट कोई गुणी जापडे उस समय मदान्धों को गुणीको आदर न करना मानों अपनी लक्ष्मीकी शोभा की हानि करनी है काल निरवधि और पृथ्वी अनंत है गुणीका आदर कहीं न कहीं किसी समय होहीगा. राजावेश्यायमचाग्निस्तस्करोबालयाचको । परदुःखंनजानंतिअष्टमोग्रामकंटकः॥१९॥ , ९८ चाणक्यनीतिदपणे। टीका-राजा, वेश्या, यम, अग्नी,चोर, बालक,याचक और आठवां ग्रामकंटक अर्थात् प्रामनिवासियों को पीडा देकर अपना निर्वाह करनेवाला ये दूसरेके दुःख को नहीं जानते हैं ॥ १६॥ अधःपश्यसिकिंवाले पतितंतवकिंभुवि ॥ रेरेमूर्खनजानासि गतंतारुण्यमौक्तिकम्॥२०॥ टीका-हेबाला ! तू नीचे क्यों देखती है पृथ्वीपर तेरा क्या गिरपडा है तब स्त्रीने कहा अरे मूर्ख तू नहीं जानता कि, मेरा तरुणता रूप मोती चलागया॥२०॥ व्यालाश्रयापिविफलापिसकंटकापिवक्रापि किलभवापिदुरासदापिगन्धेनबन्धुरसिकेत- किसर्वतोःएकोगुणःखलुनिहतिसमस्तदोषान् टीका-हेकेतकी ! यद्यपि तू सांपों का घर है विफल है तुझमें कांटेभी हैं टेढी है कीचड में तेरी उत्ताच और तू दुःख से मिलतीभी है तथापि एक गंध गुणसे सब प्राणियोंकी बन्धु होरही हे निश्चय हे कि, एकभी गुण दोषोंका नाश करदेता हैं ॥ २१ ॥ इतिश्रीवृद्धचाणक्यनीतिदर्पणसप्तदशोऽध्यायः१७ इति श्री चाणक्यनीतिदपर्णभाषाटीका सहितो समाप्ता ॥
विकृयार्थ पुस्तक।
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दुर्गासप्तशती सुन्दर मोटे अक्षरों में खुली पत्र ॥2)
सारस्वत मूल सजिल्द
श्रीमद्भगवद्गीता पदच्छेद पदार्थ सहित १)
सत्यनारायण की कथा भाषा टीका सहित
सत्यनारायण की कथा, दोहा चौपाई में 8-1)
महिम्न मोटे अक्षर
सन्ध्या यजुर्वेदी
शब्द रूपावलि
धातु रूपावलि
सन्ध्या गुटका
देवऋषि तर्पण
श्री तुलसीदासजी कृत रामायण छपरही है
सर्व पूजा
रामस्तव राज
लक्ष्मी स्तोत्र (लक्ष्मीजी महाराजको प्रसन्न
रखना हो तो इसका पाठ अवश्य कीजिये
फिर देखिये कि सदा मंडार भराही रहे ॥
क)
नवग्रह स्तोत्र (इसके पाठ करनेसे ग्रहव्याधि
पलायमान होती है पुस्तक मुल्य भी एक ही
आना है फिर विलम्ब क्यों करते हैं लीजिये
पाठ करके तत्काल फल देख लीजिये
सूर्य पुराण
विकृयार्थ पुस्तकें।
गंगालहरी संस्कृत (कविवर जगन्नाथभकृत
गंगामहाराणीको प्रसन्न करने का एक सहज
उपायह उक्त कवि ने यह स्तुति गाकर यवनी
संसर्ग के पातकसे छुटकारा पाया था तो क्या
आपके पापों का नाश होना कुछ दुष्करहै) )
1).
संध्या सामाजिक ईश्वर प्रार्थना सहित ॥
गोपाल सहसू नाम सादा
अर्जुन गीता
रेशमी पहा
1)
विष्णु सहसू नाम सादा
,, रेशमी पुढा
चाणक्यनीति दर्पण भाषा टीका सजिल्द ।)
श्री भर्तृहरिशतक नीति, शृंगार, वैराग्य, भाषा
टीका सहित सम्पूर्ण अति उत्तम बडे अक्षर में
छपरहा है शीघही तय्यार होगा।
+:-
बाबू दीपचन्द मैनेजर
मुलननिमल अप्रेन्टिंग प्रेस
छानीमच
५५
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