Bharatiya Jnanpith Delhi

Utpaadadi Sidhiviviran Vadmala Asprasaditivaadh Vijayprabhsurisyaadhaya Sweeti Granth Chthustay

Sri Yashoovijay · 2006/03/27

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प्रत्यप्रकाशकसमान्यांक ॥ ४९-५-५१-५२॥ ॥ श्रीगई नमः । सर्वत्रस्वतंत्र-शासनसम्राट्-रिवाचक्रवर्ति-जगद्गुरु-तपागच्छाधिपति-प्रौढप्रमावशालि-तीर्थराजनीकदम्मगिरिप्रसाति: प्रमूततीर्थोबारक-शासनप्रमावक-महारकाचार्य महाराजाधिराजश्रीविजयनेमिसूरीपरसद्गुरुभ्यो नमो नमः । २१३मा उत्पादादिसिद्धिविवरणं चादमाला-अस्पृशद्गतिवादः ८९श्वे. विजयप्रमसूरिस्वाध्यायश्चेति ग्रन्थचतुष्टयी ॥ स. ९ न्यायविशारद-न्यायाचार्य-निजप्रतिमाप्राग्भारप्रोनोधितातीतपूर्वश्रुतकेवलिमगवद-कूर्चालसरस्वती-पूर्वधरनिकटकालवर्ति- चतुबत्वारिंशदुत्तरचतुर्दशशतबन्यप्रासादस्त्रधारमगवत्-श्रीहरिभद्रसूरिपुलवलघुवान्धवप्रभृतिविशदविरुदावली- विभूषित-महामहोपाध्यायत्रीयशोविजयगणिप्रणीता ॥ सायं राजनगर( अहम्मदावाद व श्रीजैनग्रन्थप्रकाशकसभायाः कार्यवाहकष्ठि-ईश्वरवासमूलचन्द्रेण भावनगरस्थे प्रसिद्ध महोदयमुद्रणालये तदधिपतिष्ठि-गुलाबचंद्र लल्लुभाईद्वारा मुद्रयित्वा प्रकाशिता ॥ वीर निर्वाण सं० २४४० ] वैशासक ३ अक्षयतृतीया [ विक्रम सं. २००० मूल्यं साकप्यकम् ROOOOK Oceaeo2c00000 EXECRECE -

प्रास्ताविक
निवेदनम्॥
.
॥ उत्पादादिसिद्धिविवरण-वादमाला-अस्पृशदूगतिवादादि अंगे प्रास्ताविक निवेदनम् ।।
सौजन्याम्बुधि सद्विवेकसंपन्न भव्यविवन्दना करकमलमां प्राप्त थता मा प्रस्तुत पुस्तकमां आवेला प्रन्योना विरचयिता
न्यायविशारद-न्यायाचार्य-महामहोपाध्याय श्रीमान यशोविजयजीगणि महाराज के ते स्पष्ट दीवा जेतुं छे.तेमोश्रीना वचनोनुं माहा-
स्म्य विगेरे जिज्ञासावाळामोए सटिप्पण धर्मपरीक्षावृत्ति, वाचकप्रन्थसंग्रह, अनेकान्तव्यवस्था अपरनाम जैन तर्कप्रन्ध विगेरे ग्रन्थोनी
प्रस्तावनाओ अबलोकवी । तेभोश्रीना अलभ्यप्राय भष्टसहनी तात्पर्यविवरण-तत्वार्थ प्रथमाध्यायटीका-न्यायालोक-संडनखंड-
खार-सस्वविवेकास्यटीकासमेत परधान्तविशदीकरण-निशाभक्तदोषविचार-श्रीपार्श्वनाथस्तोत्रादि स्तोत्रो-अनेकान्तब्यवस्था अ-
परनाम जैनतर्क विगेरे द्रव्यानुयोगना गहनविचाररूप न्यायना गंभीर विषयवाळा ग्रन्थो के जेनी एकएक ज प्रतियो लभ्य
हती. छपावती वखते प्रयास कर्या छतां पण बीजी प्रतिओ मळी शकी नथी. तेवा ग्रन्थो जेम बहार पडया के तेवीज रीते तेज
कोटिना के जेना नामदर्शन-श्रवण मात्रथी ज आपणे संतोष मानता तेवा अद्वितीय मा ग्रन्थो पण आजे बहार पडे है.
१ प्रथम "उत्पादादिसिद्धिद्वात्रिंशिका विवरण प्रन्य"-जेनी मूळ बत्रीश कारिका तथा ते उपर लगभग पांचेक हजार श्लोक-
प्रमाण स्वोपक्षवृत्ति छे, तेना प्रणेता कलिकालसर्व भगवान् “श्रीहेमचन्द्रसूरीश्वरजी"ना गुरुमाई आचार्य "श्री प्रद्युम्नसरिपुंगव"ना
शिष्य आचार्य "श्रीचन्द्रसेनसूरिप्रवर" छे. आ मूळ बत्रीश कारिकाओ पैकी प्रथमनी छ कारिकाओमां समुदित उत्पादादि त्रय के
जेना उपर त्रिकालाबाध्य श्रीजैनदर्शननी पदार्थसत्तानो आधार छे. "श्रीतीर्थकर भगवंतो" तीर्थस्थापनानी शरुआतमां ज बीजबुद्धि
मादि लब्धिनिधान गणघरपदा मुनिमोने "उपजेह वा, विगमेह वा, धुवेह वा" ए त्रण पदोकप सकलार्थ समूहमय सकल द्वादशां-
गीतुं मूल मालकापदत्रयी आपे छे. तेना आलम्बनथी सूत्ररूप द्वादशांगी “श्री गणधरभगवंतो" गूंथे छे. आज हेतुथी ते बादशांगी.
अर्थथी श्री तीर्थकरोने भात्मागम, श्री गणधरोने अनन्तरागम अने श्री गणघरनी शिष्य-प्रशिष्यादि परंपराने परंपरागम रूप छे भने
॥१॥

. सूत्रथी गणघरोने आत्मागम, गणधरशिष्योने अनन्तरागम, बाकी शिष्यादि परंपराने परंपरागमस्वरूप छ. पूर्वधर "श्री उमास्वा- तिवाचके" पण "उत्पादब्ययनोव्ययुकं सत्" इत्यादि संग्रहसूत्रो रच्या के.ते सूत्रो गंभीर भाववाळा होवाथी "भगवान् उपाध्याय- जीए" संपूर्ण तत्त्वार्थ टीका उपरांत "उत्पादव्ययधौव्ययुक्तं सत् ॥ तद्भावाध्ययं नित्यं ॥ अर्पितानर्पितसि."। (तस्वार्थ अध्याय ५, सूत्र २९-३०-३१) पत्रण सूत्रो उपर त्रिसूझ्यालोक रच्यो हतो. कालनी दुर्घटनाए हाल सुधी ते प्रन्थ रष्टिगोचर अमोने थयो नयी. उत्पादादित्रयीनो योग ए पदार्थसत्ता साथे व्यास के तेनो विचार कर्यो छे. न्याय -वैशेषिक-वेदान्त-बौद्ध-मीमांसकादि दर्शनोए करेला सवलक्षणनुं बाधितपणुं विस्तारथी स्वोपक्ष टीकामा बताब्युं छे. भवान्तर अनेक विचारो दर्शान्या के. सात-आठ-नव ५ प्रण कारिकाओमां केवळ उत्पावाधिकार, दशथी सत्तर सुधीनी आठ कारिकाओमा केवळन्ययाधिकार अने महारथी चोडीश सुधीनी सात कारिकाओमां केवळ प्रौव्याधिकार-ए रीते पृथक् पृथक् ते तेना स्वरूपोनी विस्तारथी परीक्षा करी छे. पचीशथी बत्रीश सुधीनी आठ कारिकाओमा प्रकीर्ण अनेक विचारो बताववापूर्वक छेवटमा “सर्वसिद्धि "- विषय लंबाणथी बर्यो छे. ए रीते अनेक संगृहीत विचारोनो अधिकार छ. छेवटमा टीकानी पूर्णाहुतिमा प्रभावक मुख्य पूर्वघर " श्री मल्लुवादिजी भगवंतकृत " " विधिनियममावृत्ति-व्यतिरिक्तत्वादनकवचोवत् ॥ जैनादन्यच्छासन-मनुतं भवतीति वैधयम् ॥१॥" ए संवादकारिका मूकी अन्तिममाले प्रन्यसमाप्ति करी छे. मा सटीक ग्रन्थ रतलामनी ऋषभदेवजी केशरी- मलजी संस्था तरफथी बहार पटेल के भने ते सुलम छे. आ द्वात्रिंशिका गंमीर भावगमित जाणी उपाध्यायजी भगवते ते उपर स्वतंत्र विस्तृत विवरण लल्युं छे. काळनी विषमतायोगे ते विवरण पुस्तकनी लिखित मूळ प्रतिमा प्रथम पत्र, नवमुं पत्र तथा पाळनो संपूर्ण भाग उपलब्ध थयो नथी. मा अनुपम विवरणना उपलभ्यमान विवरण मागमा सस्वर्नु वास्तविक लक्षण. तेनुं त्रिकालाबाधितपणु तथा अनन्त तीर्थंकर प्रतिपादितपणुं तीर्थकरोपदिष्टत्वना प्रस्तावथी मीमांसकोए मानेल बेवना अपौरुषेयत्ववाद खंडनकरता प्रसंगानुमसंगची अनेकौडयुक्तिमोथी पौरुषेयत्ययावतुं समर्थन सर्वजगदितागमनुंज प्रामाण्य सिबके.

पतापवापूर्वक कर्बु के. प्रसंगथी सर्वसिदिनो प्रारंम, अवान्तर "भट्टाचार्यना मतर्नु" मंडन, सर्वसिदिमा विरोध करता मीमां-
सकोनी शंकामोनुं समाधान करी मासोकागमनुं अप्रामाण्य होवाथी सर्वसिशिवायर्नु समर्थन, भवान्तर नैयापिकोक योगि-
बानमां सर्व विषयकपर्नु बटन, प्रसंगयी बौखमतना जननी शरुभात, सर्व पदार्यन केवलज्ञानगम्यत्व मानवामां मपाता सर्व-
वस्तुपरिसमाप्तिकप मापत्तिदोषनो उबार करी उत्पादावित्रययोमित्वं सस्वम् ' ए लक्षणनी सिद्धि-नैयायिक-वैशेषिक-चौडादि
दर्शनोप मानेला सत्वना लक्षणोनुं बाधितपणुं सिद्ध करी तेनु संडन कर्यु छे. अवान्तर भनेकवादियोए मापेल दोनो परिहार
कों. बिस्तारथी बौखोप मानेल सरचना शक्तिलक्षणर्नु तथा उपलब्धि प ज सत्ता के ए बौख विशेषना मानेल लसणर्नु संडन,
भवान्तर बौखना अर्यलंडन प्रश्नो, अवयविनिरास विचार, बौद्धामिमत "धर्मोत्तरना न्यायविन्दुनो" विचार विगेरे बतावी खंडन
करता कथंचित् परमाण्वात्मक अने परमाणुजन्यस्थौल्य तत्वनुं समर्थन, बौखमतनिरास प्रसंगमा अविलक्षण संयोगवाला
अणुमोज पटके' इत्यादि विचारो माननार नव्यनास्तिक मतनुं संडन, वळी तेज अवयविविचारमा अवान्तर कर्मर्नु अव्याप्य-
पुतिपणुं नयी तेम माननार प्राचीन नैयायिक मत, कर्मनुं मन्यायवृत्तिपणुं छे तेम माननार नन्यनैयायिक मतनुं तेमज अवयवि
विचारमां भावृतपदार्थना परिमाणमा रहेल वैज्ञात्य ग्रहण यतुं नथी तेम माननार मत खंडन, वळी तेज प्रसंगमा "मधुरामाथना"
मतनुं मंडन, उत्पादम्ययोग्य सिवाय वस्तुत्व घटी शकतुं नयी ते समर्थन करवापूर्वक उत्पादादि प्रणतुं निर्वचन करता ते
अणे मम्मोन्य संबलित रहेवाप' सिद्ध करवापूर्वक ते प्रणेना परवादिछत लक्षणोनुं मंडन करी स्वामिमत लक्षणोनुं स्थापन कर्य
छे,ते अनी परस्पर ब्याति होवाथी मविरोधमाव सिख ते महि सहन करता बौखविशेष "मर्चटना"मत खंडन करवासाचे
संबंधमां प्राचीनोना तथा पोताना विचारोनुं प्रदर्शन करीते प्रणेमा सामानाधिकरण्यमा अनेकान्तवाद स्थापन करता वादीप आपेल
दोषोनो उदार, तेसंबंधमां "समन्तमद्रकत बातमीमासा"नी साक्षी मापीछे. "पशुपालीयमतथी" अपातो अवस्थादोनो परिहार
पकान्तवादीमोष मानेक उत्पादादि बंडन, स्वाभिमत उत्पावधर्मर्नु स्वरूपनिरूपण भने तेना समर्थन साये परिणामवाद समर्थन
॥२॥

करता मा विवरण अन्य महींची अपूर्ण रहेछ. उपर दिग्दर्शन मात्र बतावेल विषयोवाळा विवरणनो मा"शेषारूप" उपबम्बमान माग पण सादय विद्वर्गमां घणोज सम्मान्य मादरणीय भने उपादेय के नेम समजी दूंकाणमा कहीए तो उपाध्यायजी भगवंतk एक वाक्य पण सम्मान्य के ते भक्तिथी अपूर्णावस्थ पण ते अन्य जिज्ञासुमोने अनुसन्धानमा क्षति न मावे ते मातर प्रारंभ माग तथा मध्यभाग योजित करी बहार पाडवामां भावे छे. आ चुटित भागनी पूर्ति माटे योजना करवामां उपाध्यावजी भगवंतना माशय विरुख लमाणु होय तो ते संबंधी मिथ्या दुष्कृत मापीए छोए. मा अपूर्ण विवरणमा मावता विषयनी सूचना प्रतिपत्र प्रतिपृष्ठे उपान्त्य भागमा प्रकट करेली छे. सातमी कारिकानी टीकाथी मा विवरण अपूर्ण केले. २ द्वितीय प्रन्थ "वादमाला" '-मा प्रन्थनी पण स्वहस्ताक्षरीय एकज भूळपति मळता विद्वत्समाज तेनो लाम लई शके भने मावो मजोड प्रन्थ पण विच्छेद न जाय ते हेतुथी आजे प्रकाशित थाय छे. मा प्रन्थमां पण आवतो विषयविचार प्रतिपत्र प्रतिपृष्ठे सूत्ववामां आव्यो छे. आ अन्यमा पोते सात वादो जणाव्या के जेमा सर्व प्रथम “चित्ररूप विवेचक वाद"लस्यो छे. शह- आतमा मंगलाचरण करी चित्ररूप नहि स्वीकार करनार मन्यनैयायिकोनो पूर्वपक्ष अवान्तर चित्ररूप स्वीकारनार बादीओए करेली शंकामोना समाधानपुरःसर लंबाणथी बताव्यो छ, प्राचीन नैयायिको के जेओ चित्ररूप माननार के तेयोना विधारथी नव्यपक्ष विचारनु संडन, स्वतंत्र विचारकोनो ते संबंधमां विचार, प्राचीनोना विचारथी चित्ररूप परिष्कारमा अव्याप्यवृत्तिरूप मानमार पक्ष बंडन, चित्ररूप पक्षमां कारणतामेवर्नु देखार, अवान्तर अनेकजातीय विद्यरूप मानवावाळा उच्छखलो विगे- रेना विचारो, चित्ररूप मानवामां गौरवदोष आपनार वादीगोनुं खंडन, व्याप्यवृत्तिनीलादि मानवाथी चित्ररूप मंडन करनारा. मोनुं निरसन, रूपनी ओम रसगन्धमा चित्रपणानी भापति भावी शकती नथी ते समर्थन, चित्ररूप नहि मानता अवयवगत- रूप-स्पोंज, अवयविमा नीरूपत्व-नि:स्पर्शव छेते मान्यताबाळा वादीमोनुं खंडन, मा सर्व परस्पर विवादाभ्यासित विचारो पतापी प्रत्यकारमहाशये पोतानो परिशीलित मार्ग बतायो के. भवान्तर चाक्षुषप्रत्यक्षमा रूपनी कारणता नयी पण शकि- प्रास्ताविक निवेदनम् ॥ मस्थली हेतुताछे ते प्रभy संडन करी चित्ररूप वादनी समाप्ति करी छे. या चित्ररूपवादने अन्धकार महाशये 'स्थाहारकल्प- लता' (शासवार्ता समुचयनी टीका) स्तबक छहाना श्लोक ३७ मानी टीकामा घणीज प्रौढयुक्तिओ पुरस्सर चयों छे. अन्यत्र 'सम्मति टीका' विगेरेमां पण तेनी चर्चामो थएली छे. वळी स्याद्वाद कल्पलतामां लले छ के-'विस्तरस्तु स्याद्वादरहस्ये आ उपरथी जणाय छ जे स्यावादरहस्यमां तेनो घणोज विस्तार कर्यो छे-स्याहादरहस्य माटे तो तेमना न्यायालोक-मानार्णव टीका विगेरे अनेक प्रन्योमा भलामण आवे छ. कालयोगे हजु ते प्रन्थ अमोने उपलब्ध थयो नथी. आ प्रमाणे लगभग बीजा वादो पण प्रसंगानुप्रसंगथी अन्यान्य अन्योमा तेओधीए तथा अन्य पूज्यपुरुषोए चर्चा छे. बीजो "लिमोपहितलैङ्गिकमानवाद"-मा पक्षमा माननार वैशेषिक मतथी तेमां आवती विरोध शंकामोनो परिहार, वैशेषि- कोए करेल अनक प्रश्नोना प्रतिविधानो, अन्यकृत उत्तरोनुं खंडन, "गुरुचरण ( न्यायदर्शनना एक शिष्ट पुरुष )नो" भाशय विगेरे अनेक विचारो दर्शावी छेवटे पोते ते वैशेषिक पक्षना खंडननो प्रकार विशद रीते बतावे छ, ए रीतिए आ लिङ्गोपहितलैक्षिक मान पादनु रहस्य पूर्ण करे छे. श्रीजो "द्रव्यनाशहेतुताविचारवाद"-प्राचीन नैयायिको निमित्तथी मित्रकारणनाशथी द्रव्यनाश माने छे. नव्यनैयायिको तेनो विरोध करी एकला असमवायिकारणनाशथी द्रव्यनाश कहे छे. ए सर्व विस्तारथी बताधता अवान्तर स्वतंत्र मतोनुं खंडन कर्यु छे. पळी आ संबंधमां पण नैयायिकोना शिष्ट पुरुष “गुरुचरणनो" आशय व्यक्त कर्यो छे. आ रीतिए आ त्रीजा द्रव्यनाशहतुताविचार वादनी पण समाप्ति करी छ चतुर्थ "सुवर्णतेजसत्वातैजसत्ववाद"-सुवर्ण तैजस द्रव्य छे तेम नैयायिकोनुं मानबुं छे, बीजा तेनो निषेध करे छे. सुवर्ण एक पार्थिव खनिज पदार्थ के. मा संबधमां केटलाएक वादि नैमित्तिक द्रवत्व पृथ्वीथी मिन्न द्रव्यवृत्ति । तेम कहे के स्वारे केटलाएक तेम नथी इत्यादि नाना विप्रतिपत्तिो करे छे. मा संबंधां प्रथम नैयायिकोना पक्षथी सुवर्णमां तैजसत्व- . R सापक अनुमान बतायी हेत्वन्तर्गत अनुच्छिद्यमान द्रवत्वना विरोधमा पार्थिवद्रवत्वनाशमा प्रतिबन्धक संयोगविशेषर्नु अनुमान देलार, द्रवत्वमा उत्कर्षत्व-अपकर्षत्व एबे भिन्न जातिओ नथी तेम सिद्ध करी उत्कर्ष-अपकर्षनुं स्वरूप बतायुके. पुनः नैयायिक विशेषना पक्षथी तैजसत्वसाधनमां नैमित्तिकद्रवत्वनाशमां निमित्तनाश कारण छे इत्यादि मतप्रदर्शन करता नैयायिक- पक्षथी विरोधमां मावती परवादिकृत शंकामोतुं समाधान बतावना पीतरूपथी भिन्नरूपनो प्रतिबन्धक संयोगविशेष प्रदर्शन करी नैयायिकोए तैजसत्व सिद्धि करी परन्तु छेवटे ग्रन्थकारमहाशये नैमित्तिकद्रवत्व प्रत्ये पृथ्वीत्वनी जकारणता के ते सयुक्तिकसिद्ध करी सुवर्णमां पार्थिवत्व पक्षनुं समर्थन कर्यु छे. आ प्रमाणे सुवर्णतैजसत्वातैजसत्ववाद समाप्त कर्यो के. पांचमो“अन्धकारभाववाद""भा(मीमांसकविशेष)तौतातितमतानुयायिओ"मन्धकार भाव छे तेम कहेछ, नैयायिको तेनो निषेध करे छे. मा स्थळे मीमांसकना आशय निरूपण, अवान्तर त्रुटिस्पर्शमा अनुभूतपणुं दोबाथी अग्राह्यत्वसाधन, त्रुटि तथा तेना स्पर्श, ग्राह्यपणुं छे ते मतनुं खंडन, अन्धकारमा नीलपणुं होवाथी पार्थिवत्वापत्तिदोषनु नैयायिकमतथी खंडन, अन्धकारने द्रव्य मानवा जता तेने स्पर्शवाळा अवयवथी जन्यपणुं मानQ पडशे ते आपत्तिदोषनुं खंडन, प्रसंगथी द्रव्यारंमकत्व विचारमा मनथी भिन्न मूर्तत्व अगर सामान्य मूर्तत्व मानीए तो तेमा मनमा आवती दोषप्राप्ति निवारण माटे विजातीय संयोगरूप हेत्वन्तरनो अभाव मानी ते रूपे कारणता मानवी विगेरे अनेक मतमेहोर्नु निरूपण, साथे साथे भूतत्वविचार, द्रव्यारंभकता विषयमा स्व. तंत्र नैयायिकोनो विचार, अन्धकारने अभावरूप माननार नैयायिकमतनुं प्रदर्शन, अवान्तर तेना विरोधि मतविचारो तथा तेनुं बंडन, घुबड आदिना चाक्षुषप्रत्यक्षमा आलोकविशेषनी कारणता माननार पक्ष खंडन, चाक्षुषप्रत्यक्षमा आलोक संयोगनी कारणतानो भसंभव के ते शकानुं समाधान, तमना अभावढं कारणपणुं मानवा करता आलोकत्वरूपे कारणता मानवामां लाघव तेसंबंधमां “वर्षमानोपाध्याय"(न्यायदर्शनना समर्थ प्रन्थ तस्वचिन्तामणिना प्रणेता "गंगेशोपाध्यायना पुत्र" जेओ बच्चे पण मनीषि- मंडलमा समानकोटि विद्वानो गणाय छे. वर्धमानोपाध्याये बिन्तामणि-न्यायकुसुमांजलि-आस्मतस्वविवेक विगेरे उपर विवरणो प्रास्ताविक बिवेदनम्। सल्यांमा मतनुं प्रदर्शन कर्यु. बळी पण न्यायमतथी मधिक द्रव्य मानवामां गौरव विगेरे दोमोबुदेवारई, तेमज "उदयनाचार्य" (न्यायकुसुमांजलि-पौवाधिकार अपरनाम मात्मतत्वविवेक-न्यायवार्तिकतापर्यपरिशुदि विगेरे अनेक अन्योना प्रणेता जेमणे बौदोनो महान् पराजय करी जगजायना दर्शनार्थे आवता मंदिरना द्वार बंध देखी मावेशमा वी अगमायने आक्षेप करता कर्युके-"ऐश्वर्यमदमसोऽसि, मामवहाय दुर्मते ।। उपस्थितेषु बौखेषु, मदीना तव स्थितिः ॥१॥" है दुर्मति ! शुं तुं मारी अवज्ञा करी ऐश्वर्यनी छाकथी मत्त बन्यो ई, ज्यारे बौखोनो विस्तार फेलायो स्यारे जो में तेमने परास्त न कर्या होत तो तने माननारजकोण रहत अर्थात तेवे वसते मारे आधीन अतारी स्थिति हती इत्यादि लखनार प्रसार विद्वान् )ना मते ममाव- पानमा प्रतियोगि बाननी कारणताना नियमे तमना प्रत्यक्षमा मालोक काननी कारणता अवश्य के तेम बताची तमर्नु मालोका- भाव पणुं स्थापित कयु छे. तेनाथी विरुद्ध नव्यनैयायिकोना मतर्नु प्रदर्शन करावी ते पक्षनुं खंडन कर्यु छे. तमनु ममावपणुं मानता निर्विकल्पकत्वापत्ति दोषनो परिहार तेमज अभावपणुं कहेता उत्कर्षन्ध अपकर्षत्व अमावमा न रही शकवाची मन्यतमस भव- तमल विगेरे केम बनी शके ? विगेरे शंकानुं निराकरण, अन्धतमस-अवतमसनुं स्वरूप, तमस्वादि एक अखंड धर्म के तेम स्वतंत्र नैयायिकोर्नु मत प्रदर्शन, भाववृत्तित्व सहित मालोकामावत्व ए तमनुं स्वरूप के तेम नैयायिक विशेषना मते समर्थन, "प्रमाकर" के जेमो मीमांसकना अमिमतगुरु भट्टना शिष्य अमावना स्थानमां जानने ब्याजवी रीते स्थापन करता ते प्रमाकर साधु तरीके प्रसिद्ध छे. बीजापक्ष प्रभाकर एटले सूर्य भने बुद्धबन्धुए सूर्यवाचक शब्द के एटले ए पर्याय शम्बो के. कडेवाय के-"गुरुधियममावस्य, स्थाने स्थानेऽभिषिक्तवान् ॥ प्रसिद्ध एव लोकेऽस्मिन्, बुदबन्धुः प्रमाकरः ॥१॥" प्रसिद्धि के-प्रमाकर पोताना गुरु महतरफबीज 'गुरु' एवा उपनामधी बोलावाया हता, मा बावतमा किंवदन्ती चाके के के-एक दिवस प्रमाकर भट्ट गुरु पासे मणताहता तेवामा अन्यमा एक वाक्य माव्युं "पूर्व तुनोतमधुनापिनोच्यते इति न पुनसकदोषा" मा वामपनो गर्व सम- जावता समय बुदिशालि प्रसारप्रतिमासंपन होवा तां महरितने आ वाक्यमा 'पहेला तो कई नयी बने पचदेवा .

. नयी माडे पुनरुकदोष आवतो नयी' मावो साहजिक उपस्थित मर्य करवा जता बर्थ संगति न लागवायी महमुंहावा लाया. क्वाने बहाने, कोई कहे जंगल अवाने बहाने वारंवार विचार करवा बहार जाय अने आवे. तेम केटलीकवार थता विचक्षण बुद्धि- इंगिताकारकुशल प्रमाकरने तेमनी मुंसवणनी शंका पडी. पुस्तक हाथमा लेताज यथार्च अर्थ उपस्थित थयो. पुस्तकमा 'ना' भने 'मपिना' मा प्रमाणे पदच्छेद करी पुस्तक मूकी दीधैं. महे आवी जोयु. अर्थसंगत ई गयो. 'पहेला तुशब्दयी कटुंडे हाल अपिशब्दवरे कडेवाय छे माटे पुनरुक्क दोष यतो नयी. आरीतिए अर्थसंगति थवायी प्रसन्न थह प्रमाकरने गुरुपवयी बोलाव्या. स्यारथी प्रभाकर उपनाम गुरुशब्दयी प्रसिद्धि पाम्या. अने मह माटे कहेवत चाली के 'महस्य कटयां शरटः प्रविष्टाते प्रमाकरना मतथी. आलोकमानामाव अर्थात् मालोक नथी इत्याकारक मानरूप अतम छे शानामाव ए मानस गोचर होवाथी 'तमा पश्यामि' इत्यादि चाक्षुष प्रतीतिनो अपलाप प्रसंग भावशे मा विगेरे युक्तिथी न्यायमतथी ते पक्षना खंडनपूर्वक मां अपाता गति विगेरे दोषोनो उबार छेवटना उपसंहारमा जैनदर्शनने अविरुद्ध कचित् सर्व पदार्थमा स्वद्रव्यादिस्वस्वरूप भावत्व अने परद्रव्यादि स्वरूपे ममावत्व पण के तेज समर्थन जाणे बतावता न होय तेम प्राचीनोनु मतप्रदर्शन करवासाये अन्धकारमाववाद पूर्ण थाय छे. छो “ वायुस्पार्शनप्रत्यक्षवाद "-आ विचारमा मीमांसकोनो आशय जेम द्रव्यना चाक्षुष प्रत्यक्षमा उमृतरूप कारणले तेम द्रव्यना स्पार्शन प्रत्यक्षमा पण उद्भूतरूप कारण के. ते परवादि प्राचीन नैयायिकोनी शंकानो परिहार करवा साये चाक्षुषर्मा उद्भूतरूप भने स्पार्शनमा उद्भूत स्पर्शनी कारणतार्नु युक्ति साथे समर्थन, अवान्तर मीमांसक मतना प्रसंगा अनुकूल प्रतिकूल अनेक मतनुं प्रदर्शन, नव्य नैयायिक मते वायुस्पार्शनत्व विचार, कारणताविशेषद्वाराए वायुस्पार्शनत्वनुं समर्थन, वायुस्पार्शनत्व नहि माननारनुं मतप्रदर्शन करता तेमां अनेक कार्यकारणभाव संर्वधर्मा लाघष गौरवादि प्रदर्शित कर्य छे. न्यायमतथी वायुमा पार्शनत्वनु उपपादन करतां स्वतंत्र मतनुं मंडन करवा साये मित्रमिद तार्किकोना विचारो बताया साये मा वायुस्पाचनप्रत्यक्षवादमी समाति थाय छे.

प्रास्ताविक निवेदनम्॥ सातमो "शब्दनित्यत्वानित्यत्ववाद "-मा संबंधमां मीमांसको कहे छे जे 'आ तेज गकारादि शन के जे पहेला में सांमज्यो हतो' इत्यादि प्रत्यमिज्ञान शब्दनी नित्यत्वसिद्धि करे छ 'गकार उत्पन्न थयो, विनष्ट थयो' इत्यादि अनित्यत्वसाधक प्रतीतिमो भात छ. अनित्य मानवामां शब्दमा अनन्तप्रागमाव-प्रध्वंस विगेरे कल्पवामां गौरव छे. अवान्तर प्रत्यमिक्षान भ्रान्तप' कडेनार मतर्नु खंडन, नैयायिकमते शब्दर्नु अनित्यत्व साधन करता गौरव लाघव विचारमा नैयायिक मते लाघवर्नु समर्थन करनार मतनुं खंडन, मीमांसकानुयायिओना विचार प्रदर्शन करी तर्कानुसारिओना मतथी शब्दना जन्यत्वचें साधन करवाथी मापत्तिए जैन दर्शनने अविरुद्ध द्रव्यार्थिकनयथी नित्यत्व भने पर्यायार्थिकनयथी अनित्यत्वनुं स्थापन कर्यु छे. आरीते आ वाद अहीं समाप्त थतां सात वादगर्भित आ "वादमाला" प्रन्य पूर्ण कर्यो छे. वादमालामां ग्रन्थसमाप्तिसूचक वाक्य न होवाथी मागळ वीजा अनेक वादो रच्या हशे अगर रचवा इच्छा हशे तेम जणाय छ पण प्रस्तुत प्रति तो आटलेथीज पूर्ण करी छे. ३त्रीजो प्रन्थ अस्पृशद्गतिवाद" '-आ ग्रन्थ अपूर्ण अवस्थामा एक पत्र मात्र श्री जैन आत्मानन्ध सभा तरफथी बहार पडेल गुरुतस्वविनिश्चय प्रन्यने अन्ते छपायो हतो साहित्यप्रेमी मुनिराज श्री पुण्यविजयजी पासेथी तेनी पूर्ण प्रति मळतां मा प्रन्थ पण एकवावरूप होवाथी वावमालानी साथे साये बहार पाडवामां आव्यो छे. या अस्पृशद्गतिवादनी साक्षि न्यायसंड- खाद्य टीकामा पोते ज आपे छे. आ ग्रन्थमां सकळ कर्मक्षय थये सिद्धिक्षेत्रमा जता जीवनी गति संबंधमा विचारमेवर्नु अनेक सिद्धान्त-प्रन्यो विगेरेना संवादपाठोथी रहस्य तारव्यु छे छेवटे स्याद्वादकल्पलता(शाखवार्तासमुच्चय उपरनी टीका)नी अधिक जिज्ञासा माटे भलामण करे छे. दुर्भाग्यवशे हाल मळी आवती तेनी टीकामा मात्र नीचेनी पंक्तिमोज मळी आवे छे जुभो शालवार्तासमुचय नवमा स्तबकना स सर्वविद् भूत्वा, भवोपमाहिकर्मणः ॥ शानयोगात्क्षयं कृत्वा, मोक्षं प्रामोति शाश्वतम् ॥२१॥" मा लोकनी टीकामां “ततश्चतुर्थशुक्लभेदेन सकलमवविटपिदवानलकल्पेन भवोपप्राहीणि कर्माणि समन्ताद् भस्मसात्कस्यौदारिकतैजसकार्मणानि शरीराणीह त्यक्त्वा प्रदेशान्तराणि चास्पृशनुज्वा श्रेण्यकेन समयेन याति सिद्धि- " क्षेत्र साकारोपयोगोपयुक्तः ॥ आ उपरथी सहज अनुमान थई शके छ के-आ टीकामांथी घणोमाग त्रुटित थयो होय! आ अनुमानने मन्तिम भाग पुष्टि आपे छ ज्यारे उपाध्यायजी भगवान् दरेक स्तबकनी पूर्णतामां स्तबकना सारगर्मित काब्बो तथा स्वगुरुनामादि प्रशस्ति लखे छ भने ते प्रमाणे दशे स्तवकोमा देखाय छ ज्यारे अगीयारमा स्तबकना अन्तिम श्लोकोनी टीका देखाती नयी, तेमज पूर्ववत् अन्तिम स्तबकनी पूर्णतामां कांईपण देखातुं नथी. उपाध्यायजीभगवंतनी श्रीसिद्धसेनदिवाकर, श्री हरि- भद्रपरि मादि पूज्यतम पुरुषो प्रत्ये केटली निष्प्रतिम भक्ति छे ते तेओश्रीना ग्रन्थोमा आवता वचनो उपरथी स्पष्ट देखाय छे छतां ते माटे मा एक ज पच पूरावारूपे बस थशे. " येषां गिरं समुपजीव्य सुसिद्धविद्या-मस्मिन्मुखेन गहनेऽपि पथि प्रवृत्तः॥ ते सूरयो मयि भवन्तु कृतप्रसादाः, श्रीसिद्धसेन-हरिभद्रमुखाः सुखाय ॥१॥ (स्याद्वादकल्पलता स्तबक ११ मानी टीका- मंगल.) ४ चोयो ग्रन्थ “श्री विजयप्रभसूरिस्वाध्याय" आ स्वाध्याय तार्किकयुकिविचारगर्मित गच्छपति श्रीविजयप्रभसूरि महाराजनी स्तुतिरूपे रचेल छे. आ स्वाध्याय मात्र सातपद्यनो लघुग्रन्थ होवा छतां दिनी महत्ताखूचक होवाथी आ साथे दाखल कर्यो छे. जे आ पुस्तकनुं प्रान्त मंगल छे. आ चार प्रन्योनो आ पुस्तकमा समावेश थाय छे. आ ग्रन्थो माटे प्रयास करता पण बीजी प्रतिओ न मळवाथी एक एक ज प्रतिओ उपरथी आ मुद्रणकार्य थयुं छे. बनती काळजीए ग्रन्थोनी शुद्धि माटे उद्यम कर्यो छे छतां बीजा पुस्तकादिनी सामग्री नहि मळवाथी तथा छनस्थजनसुलभ अनुपयोग दोषथी, प्रेसना सीसकाक्षर योजक विगेरेनी भूलथी तेमज प्रायः समाकृति केटलाक वर्णोमां भुफ सुधारता थयेल भ्रान्ति आदि कारणोथी थयेल अपराधनी क्षमाभ्यर्थना लाथे मुश जिज्ञासु भव्यात्माओ ते सुधारी वांचन करी सत्यतस्वपरिज्ञान मेळवी, असार पौगलिकमावोथी विरक्त बनी, शुभसदनुष्ठान आराधनाकरवापूर्वक परमपद प्राप्त करो तेज अभिलाषा पुरःसर निवेदन पूर्ण कराय छे. निषेवयित्री-श्रीश्रमणसहक्षमाभ्यर्थिनी श्रीजैनग्रन्यप्रकाशकसभा-अमदावाद ॥ उत्पादादिसिद्धिविवरण-वादमालाग्रन्थद्वयशुद्धिपत्रकम् ॥ प. प. भशुद्ध २ धौम्ये-र्वस्तु २ अशुद्ध ब्यक्त्यामेद वास्तन्त्र्येण थैमानस्ये व्यहारा दिति,ना दिक्पदक भयोगेन चरले शरीर ब्यक्त्यमेद स्वातन्त्र्येण र्थभानस्ये व्यवहारा दितिना दिक्पदक अयोगेऽप्र चरणे शरीरं न चल. तीतिवत्पाणी शरीरं धवयवी रूपस्य परि १४ | स्यागेनापरि अस्याभेद २ हहेतुचि ध्रौव्यै-वस्तु रूपस्याऽपरि त्यागेन परि अस्या भेद हे हेतुः, चि ४ ૨૨ मितोमी मपरा १२ | सङ्करमिया मिनोमी धूमपरा सहरमिया पच्छेद २४ चयपी १ अन्धानुक्रमः-उत्पादादिसिद्धिविवरण पत्र १ थी १६ ॥ वादमाला १७ थी ३२ ॥ अस्पृशद्गतिवाद ३२ बी ३६ ॥

॥ ओ हो श्री अर्ह सकललब्धिनिभानाय श्रीगौतमत्वामिने नमो नमः ॥ कलिकालसर्वज्ञ-प्रतिबोधिताष्टादशदेशामारिप्रवर्तनाद्यवाप्तपरमार्हतादिविरुदराजर्षिकुमारपालभूपाल-सार्वत्रिकोटीलोकमित- प्रन्थसूत्रणसूत्रधार-श्रीहेमचन्द्रसूरिगुरुभ्रातृ-श्रीप्रद्युमसूरिशिष्यश्रीचन्द्रसेनसूरिसन्हब्धम् ॥ न्यायविशारद-न्यायाचार्य-महोपाध्यायधीयशोविजयगणिप्रणीतविवरणसमलङ्कृतम्- ॥ उत्पादादिसिद्धिनामधेयं (द्वात्रिंशिका) प्रकरणम् ॥ ॥मूलपुस्तके प्रथमपत्रस्य त्रुटितत्वाद् तबुभुत्सुनामर्थानुसन्धानाय योजितोऽयं [ ] एतचिन्हमध्यवर्ती पाठः॥ [ऐन्द्रवृन्दनतं वीरं, नत्वा तत्त्वार्थदर्शिनम् ।। उत्पादाविसिद्धिनाम-प्रन्थव्याख्यां तनोम्यहम् ॥१॥ यद्यपि प्रमाणाधीना प्रमेयव्यवस्थितिरिति प्रमाणनिरूपणपुरस्सरमेव प्रमेयनिरूपणं कर्तव्यं भवति तथापि प्रमाणमपि नावस्तु सत् वस्तुनः प्रमेयस्य साधकं, किन्तु वस्तुभूतमेव प्रमाणं वस्तुभूतस्य प्रमेयस्य साधकमिति वस्तुत्वमेव प्रमाणप्रमेयोमबानुगतं प्रथमं लक्षयितव्यं मवति तत्र 'यत्सत्तद्वस्तु' इति सर्वैरपि वादिमिरविगानेन प्रतीतमिति यदेव सच्चस्य लक्षणं तदेव वस्तुत्वस्येति स्थितौ 'अर्थक्रियाकारित्वं सत्त्वम्' इति सौगताः, 'सचाख्यपरसामान्यं सत्यम्' इति नैयायिकाः, 'पुरुषस्थ चैतन्यरूपत्वं तदन्येषां त्रिगुणात्मकत्वं सत्वम्' इति कापिलाः, 'सत्त्वं त्रिविषं पारमार्षिकं व्यावहारिकं प्रातिमासिकंच' इति वेवान्ति- नब कल्पयन्ति, एवमनेकधा वादिनो विप्रतिपना, परमपदर्शितैकान्तवाचमिमतलक्षणलषितं सच्वं तद्रूपं वस्तुचानेकदाम- .

सविव. रणम् ॥ सिदि- क्षणं तख त्रिकाला- कदर्षितं न सिद्धिपषमवतरतीत्यतोऽनेकान्तवाचमिमतं सवलक्षणमाविर्वमेव तदुपदेदृसर्वज्ञासप्रणतिलक्षणं मालमाह यस्योत्पादब्ययनोव्य-युक्तवस्तूपदेशतः ॥ सिद्धमासस्वभावत्वं, तस्मै सर्वविदे नमः ॥१॥ श्रीमता मगवता पूर्वघरेणोमास्वातिवाचकपुङ्गवेन"उत्पादव्ययधौव्ययुक्तं सत्" इति(अ०५-२९)सूत्रेणोत्पादव्ययत्री- व्ययुक्तत्वं सतो लक्षणमुक्तं ॥ न च तल्लक्षणं तत आरम्यैव व्यवस्थितस्वरूपम्, किन्तु श्रीमद्भिर्मगवद्भिस्तीयकरैस्सकल- वस्तुप्रकाशककेवलज्ञानवद्भिरपि श्रीमतो गणपरान्प्रति 'उप्पजे हवा' 'विगमे इवा' 'धुवे इवा' इति त्रिपद्या इदमेव सच्चलक्षण- ममिहितमित्याह-यस्येति, असाप्तखभावत्वेऽन्वयः, न मुपदेशोऽकर्वकोऽन्यानातकर्टको वा स्वाकर्तुरातत्वं साधयितुमीष्टे इत्यर्थादुपदेशस्य तत्सम्बन्धित्वं लभ्यते, सम्बन्धश्च जन्यजनकभाव एव, ततश्योपदेशस्वरूपत्रिपद्यास्सर्वविदे इत्युचरवचनलग्ध- सर्वज्ञप्रभवत्वोक्त्या तत एव सिद्धप्रमाणभावायां तस्यां न तत्प्रामाण्यप्रसाधनाय प्रमाणान्तरगवेषणा कार्येति दर्शितम् ॥ यस्येति यत्पदसर्वनाम्ना मामान्यतः सकलमतीर्थकरमम्बन्धित्वोक्त्यैकेनैव श्रीमता महावीरेणापश्चिमतीर्थकृता दर्शित- त्रिपद्येव नेदं लक्षणमभिहितं किन्त्वनन्तैरपि नीर्थकररित्वमेवेदममिहितमिति प्रतिपादितं भवति, उत्पादन्ययधोव्याणाम- न्योन्याजहवृत्तीनामेव कथनिवेदसम्पृक्तामेदात्मकाविष्वग्मावलक्षणसम्बन्धेन सल्लक्षणत्वं नैकैकस्य तत्त्वमित्यभिप्रायेणोकं उत्पादव्ययधोव्ययुक्तति-उत्पादादीनां पृथगसाधारणस्वरूपता चेत्थं, वस्तुनो भाव उत्पादः, नाशो व्ययः, ध्रुवा स्थितिषौव्यम्।। तत्र भवनं परिणमनं भावः स वस्तुन उत्पादः, नाशश्च पूर्वपर्यायस्वरूपपरित्यागलक्षणः न तु सर्वथा सत्कल्पना, स एव वस्तु- नो व्ययः, ध्रुवेतिभावप्रधाननिर्देशाद् ध्रौव्यं तच स्थितिः, पूर्वापरपर्यायानुगामिद्रव्यरूपेण यदवस्थानं तदस्तुनो ध्रौव्यमिति। करगीत- त्वं च।। .

त्रिपद्यनुसायेव सत्त्वार्थसूत्रे ' उत्पादव्ययधौव्येतत्रितययुक्तत्वं सत्त्वमुक्तम्, ' तथात्राप्युत्पादव्ययध्रौव्यैतभितययुक्त त्वमेवामिहितमिति ततोऽस्य न मेद इति ।। उक्तत्रितयम्यैव मल्लक्षणत्वे तत्रात्र च युक्तत्वमधिकमिति न शहिदतव्यम्, घट- स्वघटत्ववस्खयोरिवानयोरप्यमेदादितिभावः, योगस्तादात्म्यलक्षणमम्बन्धस्वरूपस्तत्रानच सम्बन्धविषयैव लक्षणतानियामक उक्तोप्यमिप्रेत एवेति, एतभितययोगस्याभिमतत्वादेव द्वितीयपये “ यदुत्पादव्यपध्रौव्य-योगिताम्" इत्युक्तम् ।। कथमन्योन्यविरुद्धस्वभावानामुपादादित्रयाणामेकत्र योग इति शङ्कासमुद्धरणायावच्छेदकमेद एतेषां विरोधमञ्जको व्या- ख्यानतोऽवबोद्धव्यो भवति ॥ अत्र यस्येतिविशेषणसामदेिव सोऽवगम्यते उपदेशलक्षणत्रिपद्यां वाकारोपादानत एवा- 'वच्छेदकमेदेन त्रयाणामेकत्रावस्थानस्य प्रतीते, प्रवाहतोऽनादिस्वरूपाया अपि त्रिपद्यास्तत्तव्यक्तिस्वरूपात्मना तत्तत्सर्वच- प्रभवत्वं सम्भवत्येव, न च व्यक्तितोपि तस्या नित्यत्वं, भाषावर्गणाविशेषप्रमववर्णविशेषानुपूर्वीविशेषलक्षणायास्तस्या नित्य- त्वासम्मवात् , अत एव वेदप्रामाण्योपपत्तये वेदापौरुषेयत्वकल्पना मीमांसकानामपास्ता वेदितव्या, वर्णानां भाषावर्गणा- प्रमवत्वेनानिस्यत्वव्यवस्थितौ तत्ममुदायविशेषलक्षणस्य पदस्य पदसमुदायविशेषलक्षणस्य च वाक्यस्य वाक्यसन्दर्मविशेष- लक्षणस्य वेदस्य च नित्यत्वामम्भवेनापौरुषेयत्वस्यामम्भवात् , प्रतिनियतकण्ठादिस्थानजन्मनां वर्णानां पौरुषेयत्वे तत्सम- दायविशेषलक्षणस्य वेदस्य नित्यत्वं न सम्भावनापथमवतरति, भ्रमप्रमादविप्रलिप्माकरणापाटवाघन्यतमदोषवन्त एव सर्वे पुरुषा इति न पौरुषेयवचसि प्रामाण्यसम्भव इति नित्यनिर्दोषतया वेदस्य प्रामाण्योपपत्तयेऽपौरुषेयत्वाम्युपगम इति कल्पनापि मीमांसकानां दुष्कल्पना एव, पुरुषान्तराणामुक्तान्यतमदोषसम्मवेपि दृष्टेष्टाविसंवादिवचनप्रणेतुर्मगवतस्तवाविषवचन- पदेशन स्पपेन विदवाक्या- नां मीमा- सकामिम- तापौरुषे यत्वस- . .

भी
उत्तादादि-
सिदि-
सविव-
रणम् ॥
लक्षणकार्यत एवाखिलदोपविमुक्तिलक्षणाऽऽतिमत्तया सिद्धस्य वचसि पौरुषेयत्वेऽपि प्रामाण्यसम्मवाद, अविनामावनिमित्तस्य
कस्यचिदमावेषि पुरुषत्वस्योक्तदोषान्यतमवत्वेन व्याप्त्यभ्युपगमे तस्य वेदवत्वाभावेन रध्यापुरुषादौ व्याप्तेः सम्भवेन ततो
जैमिन्यादौ वेदज्ञत्वामावस्यापि सिद्धिः स्यात्,कर्वस्मरणतो वेदस्यापौरुषेयत्वं तु'छन्दांसि जज्ञिरेतस्मात्' इत्येवं कर्वप्रतिपादक-
वेदवचसि जाप्रति वक्तुमशक्यम् वेदाध्ययनत्वेन सर्ववेदाध्ययनस्य गुवध्ययनपूर्वकत्वसाधनतोऽपौरुषेयत्वसाधनमपि न युक्तम्
तथा सति महाभारताबध्ययनत्वेन सर्वमहाभारताबध्ययनस्यापि गुर्वध्ययनपूर्वकत्वतो महाभारतादेरप्यपौरुषेयत्वं प्रसज्येत, एवं
हुंफट वषट् वौषट्' इत्यादिशब्दघटितत्वादिहेतुतोऽप्यप्रयोजकान वेदस्यापौरुषेयत्वसि] द्धि-रित्याहतमतानुयायिनो वय-
मालोचयामः । स एवायं गकार इति प्रत्यभिज्ञावलाद्वर्णानां निस्यत्वमिति तु न युक्तम् । उत्पनो गकारो विनष्टो गकार इत्या-
बाकारकोत्पादविनाशादिरूपवैधर्म्यज्ञानकालोत्पत्तिकायाः प्रत्यभिज्ञायास्तजातीयामेदविषयकत्वात् । न च पूर्वाऽपरकालीन-
व्यक्त्यामेदविषयकप्रत्यभिज्ञाकालोत्पत्तिकाया उत्पादादिप्रतीतेरेव परम्परया वायुसंयोगाद्युत्पादादिविषयत्वमस्त्विति वाच्यम्।
साक्षादेव गकारादावुत्पादादिप्रतीतेः । न च तस्या भ्रमत्वम् , उत्पत्तेः स्वत्वगत्वेनैकोत्पत्तेरन्यत्रारोपायोगात् । न च
श्यामो विनष्टो रक्त उत्पन्न इति ज्ञानकाले स एवायं घट इति प्रत्यभिज्ञावदत्रापि सा स्यादिति वाच्यम्, तत्र रक्तत्वादिवि-
शिष्टाधिकरणसमयध्वंसानधिकरणसमयसम्बन्धादिरूपाया विशिष्टोत्पत्तेः शुव्यक्त्यमेदाविरोधित्वात्, इह तु शुद्धस्यैव
गकारादेरुत्पादादिधीरिति विशेषात् । तत्तत्पर्यायविशिष्टस्यैवोत्पत्तेः शुद्धस्य द्रव्यस्य कुत्रापि नोत्पत्तिरिति तु द्रव्यास्ति-
कमतं घटादावतिप्रसङ्गेन पर्यायात्यन्तातिरिक्तद्रव्ये मानामावेन च निर्लोठनीयम् । किन तारमन्दशुकसारिकाप्रमवादि-
मीमांसका-
मिमतवेदा-
पौरुषेयत्व-
वादल-
ण्डनम्॥
॥२॥

मेदेन ककारादिनानात्वं परेणाप्यम्युपगन्तव्यम्, अन्यथा शुकीयत्वादिमानानुपपत्तेस्तारान्मन्दोऽन्य इत्यायनुपपत्तेव । तत्रापि चामेदप्रत्यभिज्ञादर्शनाचस्या भ्रमत्वमावश्यकम् । न च तारत्वादिकं वायुधर्म एव, तथासति कत्वादेरपि तथात्वा- पत्तौ वर्णैक्यप्रसाद । एतेन 'साक्षादविरोधिन उत्पादादेावकत्वेनागृहीतत्वात्तबुद्धेरविरोधित्वामित्वेऽपि स्वत्वघटित- सखण्डोत्पादनानेऽपि न व्यक्त्यमेदप्रत्ययविरोध' इत्यपास्तमितिदिग् । किं चागमस्यापौरुषेयत्वे वक्तदोषव्याच्या प्रामा- ण्यमिव वक्तगुणन्याच्या प्रामाण्यमपि निवर्ततेत्यनुभयरूपता स्यात् ॥ एतेन 'लोकवेदसाधारणव्युत्पत्तिवलादन्वितामिधानसिद्धौ वेदस्यापौरुषेयतया वक्तृज्ञानानुमानानवकाशात्तत्संसर्गे शब्दस्यैव वास्तन्त्र्येण प्रामाण्यम् , लोके तु,'अयं वक्ता, स्वप्रयुक्तयथार्थज्ञानवान्, भ्रमाद्यजन्यवाक्यार्थज्ञानजन्यवाक्यप्रयोक्तृत्वाद्,' इत्य- नुमानाद्वक्तज्ञानोपसर्जनतयोत्तरकालम् , 'एते पदार्था, मिथःसंसृष्टा, वक्तृयथार्थज्ञानविषयत्वाद्,' इत्यनुमानात् स्वातन्त्र्येण वा वाक्यार्थसिद्धरन्वितामिधानबलायातेऽपि प्रतिपादकत्वेऽनुवादकतामात्रं वाक्यस्य' इति प्राभाकरमतं निरस्तम् । वेदस्थले निर्णी- तशाग्दधीजननसामर्थ्यादाकाक्वादिज्ञानमधीचीनशब्दाल्लोकस्थलेऽपिनागर्थनिश्चयेऽनुमानस्यैवानुवादकत्वात्। लिङ्गस्य शीघ्रो- पस्थितिकत्वेऽपि व्याप्तिस्मृतिविलम्बेनानुमानस्य शब्दापेक्षया विलम्बितत्वात् । न चाप्तोक्तत्वनिश्चयस्य लोकस्थले हेतुत्वात्त- दनुमानत एवार्थसिद्धेलौकिकस्यानुवादकतेति युक्तं । वेदजन्यशाब्दबोधे त्वन्मते व्यभिचारेण शाब्दबोधसामान्ये वेदानुका- रेण पद्य(ख)मान मन्वादिवाक्ये वेदत्वभ्रमवतो गोडमीमांसकस्य तद्वाक्यजबोधे व्यभिचारेण लौकिकवाक्यजन्ये च तस्य हेतु- ताया वक्तुमशक्यत्वात् । न च शाब्दबोधसामान्यविगेधिन्या अनासोक्तत्वशाया न्युदासायासोक्तत्वनिश्चयो लौकिकस्थले सर्वज्ञगदि. तागमस्यैव प्रामाणिक- त्वप्रसझे मीमांसका- भिमतवेदा- पौरुषेयत्व- वादनि रासः॥

लादादि- सिदि तन्त्र, वेदे तु नित्यनिर्दोषतयैव तच्छाब्युदास इत्यपि साम्प्रतं, आसोक्तत्वस्य पूर्व दुर्घहत्वादनातोक्तत्वशाया ग्राससंशयपर्य- वसायिन्या विरोधित्वे मानामावाच, प्रामाण्ये तूभयत्रासोक्तत्वमेव तन्त्रमितिकिम जरतीयाश्रयणेन । किन वेदस्थले नित्य- निर्दोषत्वज्ञानावश्यकत्वेऽनुवादकत्वं दुर्वार, 'अमी वैदिका अर्था, मिथासंसृष्टा, व्यक्तदूषणाशक पदैःस्मारितत्वात्' इत्यनुमा- नात्संसर्गनिर्णयस्य प्रागेव सम्भवादिति गतं वेदप्रामाण्येनेति न किश्चिदेतत् ।। 'सर्वत्रानुमानमुद्रयैव शब्दः प्रमाणम्' इतिवैशे- पिकमतमपि नियुक्तिकत्वेन न श्रद्धेयम् । एते पदार्था, मिथ संसृष्टा एवेति माध्ये पदस्मास्तित्वमात्रस्यानासोक्तपदस्मारिते व्यभिचारात् , आसोक्तत्वविशेषणे चासिद्धेः, प्रकृतवाक्यार्थयथार्थज्ञानवश्वस्याप्तत्वस्य दुर्घहत्वात् । संसर्गयोग्यत्वमात्रे च साध्ये संसर्गवच्चानिश्चयादेकपदार्थेऽपरपदार्थसंसर्गववरूपाया योग्यताया हेतौ निवेशे तघटितहेतोनिश्चये सिद्धसाधनादनि- बये हेत्वनिश्चयात् , पदानां संसर्गप्रमापूर्वकत्वेऽपि माध्येऽनासमे व्यभिचारात्, आसत्तेरपि निवेशे 'अयमेति पुत्रोराज्ञः पुरु- पोऽपसार्यताम्' इत्यत्र राज्ञः पुरुष इति मागे तात्पर्यविषयसंसर्गप्रमापूर्वकत्वाभावेन व्यभिचारात् । अथ तात्पर्यरूपाकाक्षा हेतुप्रविष्टेति न व्यभिचारः । न च कर्मस्वादौ घटादिसंसर्गसिद्धावपि कर्मत्वादौ निरूपितत्वसम्बन्धेन घटादिप्रकारकबोधासिद्धि- रिति वाच्यम् । 'कर्मस्वादिकं, घटादिमत् , घटाकाङ्क्षादिमत्पदस्मारितत्वाद्,' इत्यनुमानस्याऽपि सम्भवात् , शाम्दात्मकविल- क्षणानुमितौ व्युत्पतेरपि तन्त्रत्वाच न घटादिविशेष्यककर्मत्वादिविशेषणिकाया अप्यनुमितेः प्रसङ्गः, एतेन 'प्रत्यवादिना सिद्धावपि विनेच्छा शान्दबोधानुदयः स्यात्,' इत्यपास्तम्, पक्षताया लिजमेदमित्रत्वेन तल्लिकानुमितौ तदहेतुत्वसम्मवादि- तिचेत्, न, नानुमितं न साक्षात्कृतं किन्त्वातमुखाच्छुतमिति सार्वजनीनप्रमितेः शाब्दप्रमितावनुमितित्वामावसिद्धेः ॥ सविव- रणम् ॥ सर्वज्ञगदि- तागमस्यैव प्रामाणि- कत्वासो मीमांस- कामिमतवे- दापौरुषेय- त्ववाद निरासा॥ .

सर्वज्ञगदि- गमस्यैव प्रामाणिक त्वप्रसङ्गे कविचार खंडनं प्र- किशनृणोमि शाब्दयामीत्याद्युल्लेखप्रयोजकत्वादुमयवादिसिद्धायाः शाब्दत्वजातेरावश्यकत्वे सदाश्रयव्यक्तावनुमितित्वक- ल्पनं व्याप्तिस्मृत्यादिकल्पनं च गौरवान्मानाभावाचासिद्धम् । वस्तुतः शान्दत्वस्यानुमितित्वव्याप्यत्वे शान्दयामीत्युल्लेखप्रयो- जकत्वमनुमिनोमीत्यनुव्यवसायप्रतिबन्धकत्वं च कल्पनीयमिति गौरवम् । न च शाम्दे विधेयताविशेषामावादेवानुमिनोमी- स्यनुष्यवसायाभावः, तद्धर्मावच्छिन्नविधेयताकत्वस्य तद्धर्मावच्छिमव्याप्यवचाज्ञानमात्रप्रयोज्यत्वात् , एव शान्दवोधा- व्यवहितपूर्वक्षणः, परामर्शतदभावान्यतरवान् , क्षणत्वाद् इत्याधनुमितेरन्यत्रक्लप्सामावविषयत्वमेव युक्तम् । यत्तु "शाब्दानु- मित्योः पार्थक्ये उभयसामग्रीसमाहारे युगपदुभयोत्पत्तिवारणाय शाम्दत्वाचवच्छिने शान्देतरसामग्रीत्वादिना प्रतिबन्धक- त्वमिति लापवं, शाब्दस्यानुमितित्वे च वहन्यादेरशाम्दानुमितेरपरस्य शाब्दानुमितेचकदोत्पचिवारणाय शान्दानुमिति- त्वाचवच्छिन्ने शान्देतरानुमितिमामग्रीत्वादिना प्रतिबन्धकत्वं कल्पनीयमिति गौरवम् । किश्च वहिव्याप्यसामान्यामावविशि- विशेष्यको पहिचान्दबोधो न म्याद्विशिष्ट पहिच्याप्यवोधासम्भवात् ।। अपि च "घटात् पृथगित्यादौ शाब्दसमानाकारानु- मितिरेकदेशान्वये दुर्घटा, पृथक्त्वं पक्षीकृत्यानुमितौ तद्वतोऽमानापत्रः, तद्वतः पक्षत्वे च तत्रैव पश्चम्यर्थमानापतेः" इति भट्टाचार्यैरुक्तं, तबातिमनोहरम् । अनतिरेकेऽप्यनुमितित्वव्याप्यशाग्दत्वस्यैव प्रतिवध्यप्रतिबन्धकतावच्छेदककोटौ निवेशे- नानुमितित्वप्रवेशप्रयुक्तगौरवामावाद , वहिव्याप्यसामान्यामावविशिष्टविशेष्यकवाहिशाब्दबोधाभावस्य चेष्टत्वात् ,बहेरपि वहि- व्याप्यत्वेन तत्सामान्याभाववति बहेरन्वयस्यायोग्यत्वात् , इष्टत्वे वा व्युत्पत्चिविशेषस्योत्तेजकत्वकल्पनेन दोषाभावात् , घटात् पृथगित्यादावेकदेशानन्वयवादिमत इव पृथक्त्ववतः पक्षत्वे परम्परया तत्र पशम्यर्थमानस्येष्टत्वात् । यदपि 'शान्दानुमित्योर्मेद- पक्रमथ। .

भी उत्पादादि- सिद्धि- प्रकरणम्॥ सविव- रणम् ॥ प्रसासः सर्वक्ष- सिद्धिः तत्र कल्पने शान्दानुमित्यन्यतरत्वकल्पने गौरवमिति,' तक, एकजात्येऽपि शान्दानुमितेर्मेदकल्पने गौरवादिस्यन्यत्र विस्तरः॥ अपि च शाब्दत्वस्यानुमितित्वव्याप्यत्वेऽनुमितित्वमपि मानसत्वव्याप्यमेवास्त्विति गतमनुमानेनापि, विलक्षणानुभवब. लाचानुमानमिव शब्दोऽपि पृथगेव प्रमाणमिति किमतिपल्लवेन, तत्प्रामाण्ये चासोक्तत्वं नियामकमिति युक्तं । यथोक्तोपदे- शेनाप्सत्वपरीक्षणं भगवतः अथ सर्वविद इति कुतः, यथोक्तोपदेशस्यास्मदादिध्वपि सम्भवेन सर्वज्ञत्वाव्याप्यत्वात् । न च स्वातन्त्र्येणोस्तोपदेशस्याव्यभिचारित्वम् । संसारस्यानादित्वेनोक्तोपदेशस्थ स्वातन्त्र्यासिद्धेः । न हि पाणिन्यादेः पूर्व व्या. करणादीनि नान्येन प्रणीतानि तद्वदत्रापि माव्यमिति चेत् । न, प्रामाणिकार्थविषयम्य तत्तकाले स्वतन्त्रोपदेशस्यानाश्रयणे प्रवृ- त्तावनाबासात् , प्रवाहानादितायाः "धणिकाः सर्वसंस्काराः" "भूतपरिणतिमात्रं चैतन्यम्" इत्यादिवचनेष्वपि सम्मवात् ।। तस्मात् स्वतन्त्रोक्तोपदेशस्य सर्वज्ञत्वव्याप्यत्वाम किशिदाधकम् । किन 'आत्मादृष्टादिक, कस्यचित्प्रत्यक्षं, अनुमेयत्वा- मध्वजव', इत्याद्यनुमानादपि सर्वज्ञसिद्धिः । न चानुकूलतर्कामावादप्रयोजकत्वं, निरुपाधिसहचारस्यैवानुकूलतर्कत्वात् । न च प्रत्यक्षत्वस्येन्द्रियजत्वव्याप्यत्वादतीन्द्रियप्रत्यक्षं कथं भगवत इति वाच्यम् । कामादिमावनाजनितसंवेदनस्य स्वसंवेदन- रूपस्य च विशदज्ञानस्येन्द्रियासमुत्थस्याऽपि प्रत्यक्षत्वेनेन्द्रियजन्यतायाः प्रत्यक्षत्वाव्यापकत्वात् । अथातीन्द्रियप्रत्यक्षस्य सर्वार्थविषयत्वमनुपपनम् । तथा हि-देशान्तरे कालान्तरे च यद्पं तदिदानीन्तनचाक्षुषसजातीयप्रत्यक्षप्रारं रूपत्वादिदानी- न्तनरूपवत् ।। तदुक्तं, "यजातीयैः प्रमाणैस्तु, यजातीयार्थदर्शनम् ।। दृष्टं सम्प्रति लोकस्य, तथा कालान्तरेऽप्यभूत् ॥१॥" न च गृधादिमिळमिचारः, तेषामपि स्वार्थानतिक्रमेण प्रवृत्तेः। आहब-" यत्राप्यतिशयो दृष्टः, स स्वार्थानतिलक्ष- च मीमांस- कायुक्त- दोषनिना- रणम् ॥ .

मीमांसक- खण्डने आतोका- ऽऽगमस्थ प्रमाणस्व- नात् ॥ दूरवक्ष्मादिष्टौ स्या-त्र रूपे श्रोत्रवृत्तिता ॥१॥ येऽपि सातिशया दृष्टाः, प्रज्ञामेधादिमिनराः ॥ स्तोकस्तोकान्त- रत्वेन, न त्वतीन्द्रियदर्शनात् ॥ २॥ प्राज्ञोऽपि हि नरः सूक्ष्मा-नान् द्रष्टुं वमोऽपि सन् । स्वजातीरनतिक्राम-अतिशेते पराभरान् ॥ ३॥ एकशास्त्रविचारेषु, दृश्यतेऽतिशयो महान् ॥ न तु शास्त्रान्तरज्ञानं, तावन्मात्रेण लभ्यते ॥ ४ ॥ ज्ञात्वा व्याकरणं दूरं, बुद्धिः शब्दापशब्दयोः ॥ प्रकृप्यते न नक्षत्र-तिथिग्रहणनिर्णये ॥५॥ ज्योतिर्विच प्रगल्भोऽपि, चन्द्रार्कबहणा- दिषु ॥ न भवत्यादिशब्दानां, साधुत्वं ज्ञातुमर्हति ॥ ६॥ तथा वेदेतिहासादि-ज्ञानातिशयवानपि ॥ न स्वर्गदेवताऽदृष्ट-प्रत्य- श्रीकरणक्षमः ॥ ७ ॥ दशहस्तान्तरं व्योम्नो, यो नामोत्प्लुत्य गच्छति ॥ न योजनमसौ गन्तुं, शक्तोऽभ्यासशतैरपि ॥८॥ तस्मादतिशयज्ञान-रतिदूरगतैरपि ॥ किश्चिदेवाधिकं ज्ञातुं, शक्यते न त्वतीन्द्रियम् ॥९॥" तस्मादेषाऽनुमानवाधिता प्रतिक्षेति वेत् । न । ज्ञानस्वरूपस्यात्मनः सर्वदा सर्वार्थसभिहितत्वेन विनैवेन्द्रियव्यापार वस्तुपरिच्छेदापतिवारणाय तावदावरणम- वश्यमभ्युपगन्तव्यम्, आवरणतिरस्कृतस्य हि जीवद्रव्यस्य येवेवानुपहतचक्षुरादिप्रदेशेषु तत्क्षयोपशमस्तद्वारेणैव विज्ञा- नप्रवृत्तिः, अस्थगितगवाक्षकल्पानि हीन्द्रियाण्यात्मनो ज्ञानोत्पत्तावुपकरणमात्रमित्यनतिप्रसङ्गात् । सर्वथावरणापगमे च न काचिच्चक्षुराधपेक्षेत्येकदैव सर्वार्थग्रहणस्यानिर्वार्यत्वेन 'यजातीयैः' इत्यायुक्तेः फल्गुणायत्वात् । 'यत्राप्यतिशय' इत्यादिक- मपि कुचोचमिन्द्रियव्यापारनिरपेक्षविज्ञानेऽलमकमेव । तदुक्तम्- " इन्द्रियान्तरविज्ञान, नेन्द्रियान्तरवस्तुनः ।। ग्राहकं चेति यो दोषः, सोऽतीन्द्रियाशः कृतः॥१॥" इति ।। 'येऽपि सातिशया' इत्यादिकमप्यसङ्गतं । कर्मापगमतास्तम्यादुक्ततारतम्यसम्मवेऽपि सर्वथा तदपगमे यावज्वेयविष- प्रसङ्गे सर्व- बतासिदि- स्थापन।

मश्वि- सलादादि- सिदि- रणम् ॥ सर्वज्ञत्व- नैयायि- कामिमत- योगिज्ञान- यताया विज्ञानस्य निबुमशक्यत्वात् , सर्वथा कर्मापगम एव किं प्रमाणमिति चेत्, अनुमानमेव, यत्-समन्तभद्रः- "दोषावरणयोर्हानि-नि:शेषास्त्यतिशायनात् ।। क्वचिद् यथा स्वहेतुम्यो, बहिरन्तर्मलक्षयः॥१॥" इति।। हेतवश्व यथा रत्नवि- शुद्धौ धारमृत्पुटपाकादयस्तथात्मशुद्धौ शानदर्शनचारित्राणीति सर्वमनवयम् ॥ "योगजधर्मप्रत्यासच्या मर्वविषयकं योगिज्ञानम्" इति नैयायिकायुक्तं तु न अद्धेयम् । स्वतन्त्रकारणस्य योगजधर्मस्य परामर्शदेरिव मनसः प्रत्यासत्तित्वे मानामावात् , अन्यथा चक्षुरादावपि सा प्रत्यासत्तिः किं न स्यात्, योगिचाक्षुषादावपि तजन्यतावच्छेदकांशिकालौकिकविषयताया वक्तुं शक्यत्वात् । निदिध्यासनादिजन्यतावच्छेदकतस्वसाक्षात्कारत्वजातेर्मानसत्वव्याप्यत्वकल्पनमेव युक्तमिति चेत्, न, निदि. ध्यासनादेः कर्मान्तरस्येव विहितत्वेन दोषक्षयरूपसत्वशुद्धावेवोपयोगात्तजन्यतावच्छेदकतरचसाक्षात्कारत्वजातेर्मानसावृत्ति- ताया एव युक्तत्वात् , अन्यथैकतरोत्पत्तिकाले तदन्योत्पत्तिवारणाय तत्त्वसाक्षात्कारारूयमानसे तदितरमानसे च हेत्वन्तरा- दिकल्पने महागौरवाद, योगिमानसमात्रे तत्त्वसाक्षात्कारत्वाभ्युपगमे च भोगत्वादिना सार्येण तस्य जातित्वासिद्धेः ॥ किवं घटादिचाक्षुषायनुव्यवसायेऽपि योगिनस्तच्चज्ञानत्वापचिरिति किमपराद्धं चाक्षुषादिस्थलीयेनापि ज्ञानेन ।। तस्मादिन्द्रियातीतं दोषक्षयमात्रमपेक्ष्यात्मजनितत्वेन प्रत्यक्षमेव केवलज्ञानमभ्युपगन्तव्यम् ॥ इन्द्रियजन्यतावच्छे- दकं च साक्षात्कारनिष्ठं वैजात्यमीश्वरज्ञानव्याचं परेणाप्यवश्यमभ्युपगन्तव्यम् । जन्यज्ञानत्वस्य तथात्वे जन्यत्वस्य का- लिकेन घटत्वपटत्वादिवत्वरूपस्य प्रवेशेऽननुगमात् । समवायकालिकोमयसम्बन्धेन ज्ञानत्ववचस्यैव तथात्वे सम्बन्धनिष्ठ- व्यासज्यपत्यवच्छेदकतावच्छेदकताकल्पने गौरवात् , तच्चास्माभिः केवलादिव्यावृत्तं स्वीकर्तव्यमिति न किशिदायकम् । स्य सर्ववि- पयकत्वा- पाकरणम् सौगतम अवेप्सितकतिपयार्थपरिज्ञानेनैवेष्टसिद्धौ किं सर्वज्ञज्ञानस्य कीटसंख्याधनभिमतमर्वविषयतयेति चेत्, न । न हि प्रयोजन- क्षतिमिया मामनी कार्य नार्जयति येन सर्वविषयज्ञानावरणक्षये मर्वविषयज्ञानं त्वदुक्तदिशा नोत्पद्येत । अनुवृत्तिव्यावृत्तिद्वारैकमेव च सर्वात्मकमिति याथात्म्येनैकज्ञत्वेऽवर्जनीयसबिधिकमेव सर्वज्ञत्वमिति कस्तत्र प्रद्वेषः। तथा च पारमर्ष 'जे एग जाणइ से सव्वं जाणईत्ति 'प्रतिनियतविषयतानियामकक्षयोपशमाभावात्सर्वविषयकत्वं केवलज्ञाने प्रामाणिकम् , इत्यपि कश्चित्। न चान- न्तवस्तुविज्ञाने वस्तुपरिसमाप्तिप्रसङ्गः अस्मदादिविकल्पज्ञाने रात्रिन्दिवादीनामनामनन्तरूपतापरिच्छेदेऽपि तदपरिसमातिवद्भग- वतोऽनाबन्तवस्तुपरिच्छेदेऽपि वदपरिसमाप्तेरविरोधात् । रसास्वादप्रसङ्गादिकं त्वकरणाधीनतया न नोद्यमिति सिद्धःसर्वज्ञः॥ अन्यन्यावृत्तिश्च तस्योक्तोपदेशेनैव, “उपदिशनि हि वीतराग एव समुत्पन्नपरमज्ञानः प्रथममेव गणधराणा- मुत्पादादिपदत्रयीं न त्वन्यः कश्चिदिति ॥" एतद्विशेषणद्वारेणैव चोत्पादादीनां वस्तुलक्षणभूतानामिहाभिधेयत्वं, विष- यधुद्धिमोक्षयोः साक्षात्परम्पराप्रयोजनस्वं, विषयविषयिमावस्योपायोपेयमावस्य वा सम्बन्धत्वं, प्रयोजनकामस्याधिकारित्वं च सचितम् । उत्पादव्ययध्रौव्याणि च न प्रत्येकं वस्तुनो लक्षणं, किन्तु समुदायेन । ननु लक्षणं पररूपव्यावर्तनक्षमोऽसाधारणो धर्मः, न चात्र वस्तुव्यतिरिक्तं व्यावर्तनीयमस्तीति कथमेषां लक्षणीयत्वमिति चेत्, न, विकल्पसिद्धस्य परलक्षणलक्षितस्य वस्तुन एवाश्रयणेन परव्यवहारप्रवृत्तेः। अन्यथा 'शक्तिर्हि भावलक्षणम्' इत्यादिकं परेऽपि कथं प्रतिपादयितुमुत्सहेरचित्यमित्याह- यदुत्पादव्ययधोव्य-योगितां न बिभर्ति वै ॥ तादृशं शशाङ्गादि-रूपमेव परं यदि ॥२॥ विनिचितं शशशृङ्गादिना रूप्यते इतिशशशृङ्गाविरूपमसघटितमित्यर्थः । तथा च जीवादिकं वस्तुत्वेन व्यवहर्तव्यं, स्तुविषयत्वे वस्तुपरिस- माझ्यापति- निवारणं उत्पादा- दियोगित्व- स्य सवल- क्षिणत्वव्य- वस्थाप- नम् ॥

भी उत्पादादि- सिद्धि- प्रकरणम्॥ सवि. रणम् ॥ उत्पादध्ययौव्यप्रतियोगित्वाद्, 'यदस्तुत्वेन न व्यवड़ियतेन तदुत्पादव्ययध्रौव्यप्रतियोगि' यथा परलक्षणलक्षितमिति विकल्प- सिद्धं दृष्टान्तमादाय व्यतिरेकिणि तात्पर्यम् । वस्तुतो विकल्पस्याहार्यभ्रमरूपस्य न वस्तुरूपदृष्टान्तसाधकत्वम् । न चाऽवस्तुनि वस्तुधर्मदृष्टान्तत्वसम्भवः । अत एव 'असतो पत्थि णिसेहो' इत्यादि भाष्यग्रन्येनासतो निषेषोऽपि प्रत्युक्तः, वस्तुत्वनियत- प्रतियोगिताया अवस्तुन्यमावाद, शशविषाणं नास्तीत्यादौ तु विषाणे शशीयत्वं नास्ति, शशीयत्वेन वा विषाणं नास्तीत्या- दिरेवार्थ इति नायं पन्थाः। किन्तु प्रकृतलक्षणं नेतरल्यावर्तकं किन्तु विभक्तव्यवहारजनकमितीदमेव वस्तुलक्षणं नापरमित्यत्र तात्पर्यम् । ननु कथमेतत् 'सत्तैव वस्तुलक्षणम्' इति नैयायिकमतस्य जागरूकत्वादितिचेत्, न, सचासामान्यस्य शिरोम णिभट्टाचार्यैरेव निराकृतत्वात् , विद्यमानत्वस्यैव सच्छन्दप्रवृत्तिनिमित्तत्वसम्भवात् , घटः सन्नित्यादिप्रतीतावपि विद्यमा- नत्वस्यैव प्रकारत्वसम्भवाच । अस्तु वा स्वरूपसचमेव तद्विषयः, 'जातिः सती, अभावः सन्' इत्यादिप्रतीताविव समवायेन सत्ताप्रकारकत्वस्य तत्राप्यसिद्धेः ।। "सामान्यं द्विविधं परमपरं च, तत्र परं सत्ता" इति वैशेषिकविभागस्तु नियुक्तिक एवेति। प्रतियोगितया ध्वंसं प्रति तादात्म्येन सवेन हेतुत्वमिति ध्वंमजनकतावच्छेदकतयैव सच्चसिद्धिः। न च प्रागमावध्वंसे व्यभिचा- रा, न च प्रतियोगिरूपस्य तद्ध्वंसस्य भावव्यावृत्तध्वंसत्वरूपकार्यतावच्छेदकानाक्रान्तत्वात् , एवं प्रतियोगिध्वंसरूपस्य च प्र- तियोगितासम्बन्धेन प्रागभावे सच्वेऽपि सविषयातिरिक्तपदार्थस्याव्यवहितपूर्ववर्तिवस्तुन्येवोत्पत्तिनियम इति तत्र तेन सम्ब- न्धेनोत्पत्यभावान व्यभिचारः, भावव्यावृत्वातिरिक्तध्वंसत्वे मानाभावात् , प्रागमावध्वंसस्यातिरिक्तस्याम्युपगमेन प्रति- योगिस्वरूपत्वासिद्धेवेति वाच्यम्, प्रागभावावृत्तिप्रतियोगितायाः कार्यतावच्छेदकत्वाव, प्रागभावे मानामानाद्वा।न चासम- व्यवस्थाप- नप्रसझे नै- यायिकवैशे- पिकामि- मतसच्च- . निरसनम्॥

प्रसने पर- वाद्यापादि. तदोपपसि वायिकारणनाशादेः स्वप्रतियोगिजन्यत्वादिसम्बन्धेनाऽव्यवहितपूर्वकाले प्रतियोगिनिष्ठतया द्रव्यादिनाशकत्वादेवातीताना- गतद्रव्यादौ नाशापत्तिवारणसम्भवात्प्रतियोगिनाशयोः सामान्यकार्यकारणभावे मानामावा, अव्यवहितपूर्वकालेऽतीतानागत- व्यक्त्योरमावेन तत्र तदानीं स्वप्रतियोगिजन्यत्वादिसम्बन्धेनासमवायिकारणनाशायसवादेवानतिप्रसङ्गात् , यदि च जन्य- त्वस्याव्याप्यत्तित्वाभावानायं परिहार इति विभाव्यते, तथाप्यसमवायिकारणनाशादे शकतावच्छेदककोटौ स्वप्रतियो- गिजन्यत्वकालिकविशेषणत्वोमयसम्बन्ध एव दीयताम् , अतिरिक्तकार्यकारणभावकल्पनापेक्षया क्लसकार्यकारणभावे कार- णतावच्छेदकसम्बन्धकोटौ कालिकविशेषणतानिवेशस्यैव लघीयस्त्वादिति वाच्यम् । एवमतीतानागतब्यक्त्यो शवारणाय संस्कारतजन्यस्मृत्योः क्रियातजन्यसंयोगयोः संयोगतजन्यविभागयोगतजन्यकर्मणोविंमागतत्प्रयोज्यसंस्कारयो श्यनाश- कमावेषु जातिनाशवारणाय समवायिनाशसमवेतनाशयो श्यनाशकभावेषु च बहुषु नाशकतावच्छेदकसम्बन्धकोटौ कालि- कविशेषणत्वप्रवेशमपेक्ष्य प्रतियोगिध्वंसयोरतिरिक्तककार्यकारणभावकल्पनाया एव लषीयस्त्वादिति चेत्, न, जन्यत्वजन- कत्वयोर्व्याप्यवृत्चित्वेऽप्यतीतत्वादिदशायां तत्सम्बन्धेनाममवायिकारणनाशादेरव्याप्यवृश्चित्वाभ्युपगमेनैव निर्वाह प्रतियोगि- ध्वंसयोः सामान्यकार्यकारणमावाकल्पनात्, नहि तदानीं सा व्यक्तिः स्वप्रतियोगिजन्यत्वसम्बन्धेनासमवायिकारणनाशव- तीतिप्रतीतिरस्ति, बेन तदव्याप्यवृत्तित्वं दुरुपपादं स्यात् । प्रतियोगितयानाशत्वावच्छि प्रति कालिकसम्बन्धावच्छिमस्वप्रति- योग्यधिकरणत्वसम्बन्धेन सह वृत्तिपदार्थप्रतियोगिकनाशस्य हेतुत्वावश्यकत्वादेव नायं दोषः, अन्यथा तादात्म्येनातीताना- गतव्यक्त्यवच्छेदेनाव्यवहितपूर्वकाले सतः सच्चस्य सुवचत्वेन प्रतियोगिनाशयोरुक्तहेतुहेतुमावेनाप्यनिस्तारादित्यप्याहुः।

श्री उत्पादादि- सिद्धि- प्रकरणम्॥ यत्तु द्रव्यत्वेन सत्वेन कार्यकारणभावात्समवायिकार्यतावच्छेदकतमेच सत्चसिद्धिः। जन्यत्वस्य गुरुत्वेन कालिकेन घटत्वा- दिमत्वमादायाऽविनिगमेन चातयात्वात् । न च सत्त्वस्य नित्यवृत्तित्वेन न कार्यतावच्छेदकत्वं, समवायकालिकोमयसम्ब- न्वेन तथात्वसम्भवात् , जन्यतावच्छेदकतानियामकसम्बन्धेन जन्यतावच्छेदकधर्मवचस्यैव जन्यत्वव्यवहारनियामकत्वेन नि- त्ययोर्द्रव्यगुणयोः सत्तावत्वेन ताशव्यहारामावात् । न चासमवायिकारणस्य विशिष्य हेतुत्वेनानतिप्रसङ्गे किमनेन सामा- न्यकार्यकारणभावेनेति वाच्यम् । एवं सति समवायेन नीलादौ स्वाश्रयसमवेतत्वेन नीलादेहेतुत्वेनावयवगुणादौ नीलाद्यापश्य- वारणात् । न च समवेतत्वं समवायप्रतियोगित्वं, तच्च प्रतियोगिमेदेन भित्रमिति द्रव्यनिष्ठन्तदादायानतिप्रसङ्गः, ममवायि. द्रव्यव्यक्तिमेदादेव तद्भेदात् , प्रतियोगिमेदेन मेदे गौरवात् । न च स्वाश्रयममवेतत्वविशिष्टद्रव्यत्वं सम्बन्धः, विशेषणवि- शेष्यमावे विनिगमनाविरहादनन्तकारणतायां सम्बन्धमध्ये द्रव्यत्वप्रवेशापेक्षया सच्चेन द्रव्यत्वेनैककार्यकारणभावकल्पनस्यैव ज्यायस्त्वात् । न च तथापि तत्कृतक्रियाधीनविभागसंयोगोन्पत्तेः पूर्वोत्तरदेशनियमान्यथानुपपक्या तत्तद्र्व्यव्यक्तित्वेन हेतु- त्वावश्यकतया यावद्विशेषसामग्रीवानावयवगुणादौ नीलाद्यनुत्पादसम्भवे द्रव्यत्वेन सत्त्वेन सामान्यतः कार्यकारणभावे मा- नामाव इति वाच्यम् । तथापि विनश्यदवस्थद्रव्येण स्वनाशोत्पत्तिक्षणे गुणकर्मणोरुत्पत्तिवारणाय कार्यसहवर्तितया सचाव- च्छिन्नं प्रति द्रव्यत्वेन हेतुत्वावश्यकत्वादिति चेत् ?, न, इत्थमपि जन्यसत्त्वसिद्धावप्याकाशादिसाधारणसत्वासिद्धेः। किवं जन्यत्वमखण्डोपाधिरूपमेव किं न सिख्येत् । जात्यपेक्षया नत्कल्पने गौरवस्य सम्बन्धगौरवमूलत्वात्तस्य च समवायस्वरूपस- म्बन्धयोरेक्याविशेषेण निरासात् । अपि च व्यावृत्तत्ववत्कथञ्चिदनुगतत्वं व्यक्तिधर्म एव कल्प्यतां घर्मिकल्पनातो धर्मकल्पनैव मविव- रणम् ।। सवलक्षण प्रसङ्गे परवावापा- दितदोष- परिहारः॥ .

प्रसझे नौ- दोक्तश- क्तिलक्षण- स्यापाकर- णम् ॥ लषीयसी' इति न्यायादिति किं वस्त्वन्तग्मत्तापरिकल्पनया,अनुगतप्रत्ययस्य निमित्तभूतामिःसमानाकारपरिणताभिर्व्यक्तिमि- रेव निर्वाहात्, तत्कर्मतापत्रस्य चातिरिक्तानुगतस्य स्वप्नेऽप्यननुभवात् । किञ्च मामान्यस्थ व्यक्त्यमेदे मामान्यरूपताक्षतिः, मेदे च सम्बन्धानिरूपणं, ममवायस्यैकत्वेनातिप्रमञ्जकत्वात् , ममवायसम्बन्धावच्छिमाधारताया अपि मेदामेदाभ्यां दुनिरूप- त्वात् , कथञ्चिदनुगतव्यक्तिस्वरूपकल्पनाया एव ज्यायस्त्वादिति दिग् । अस्तु तर्हि "शक्तिर्भावलक्षणं," नदाह धर्मकीर्ति:- "शक्तिर्हि भावलक्षणं,मर्वशक्तिविरहोऽभावलक्षणम्" इति ।। शक्तिश्चाथक्रियाकारित्वम् । तच्च क्रमयोगपद्याभ्यां व्याप्तं, क्रम- योगपद्यं च नित्येभ्यो व्यावर्तमानं सचमादाय क्षणिकेश्वेवावतिष्ठते । तथा हि-नित्यं न क्रमेण कार्य कुर्यात् । सकलसा. मोपेतस्यैकक्षण एव समस्तकार्यकरणप्रसङ्गात् , ममर्थस्य सहकार्यपेक्षायोगात् । नापि योगपधेन, प्रथमक्षण एव कृत- कृत्यत्वेन द्वितीयादिक्षणे कर्तव्याभावेन व्योमकुसुमतुल्यताप्रसङ्गादिति । तस्मात् क्षणिकेम्वेवार्थक्रियाकारित्वमिति । " तदेतबानवद्यम् । एकान्तनित्यादिवैकान्तक्षणिकाद्व्यावर्तमानस्यार्थक्रियाकारित्वस्योत्पादव्ययध्रौव्यवत्येव वस्तुन्यवस्थितेः। तथाहि, क्षणिकं वस्तु देशक्रमेण कालक्रमेण वा न कार्य कुर्यादेशान्तरे कालान्तरे वा तस्यैव ध्वंमात्, अन्यथा क्षणिकत्व- धतिः । किन क्रमयोगपचे कार्यान्तरामाहित्यमाहित्यलक्षणे ते च मामग्रीरूपं कारणमाश्रित्य न मम्भवतः, एकस्या द्विती- यकार्यजनकत्वामावादेकमात्रजनकत्वाच्च, ममग्ररूपायाः मामध्या एकमात्रजनकत्वमपि च स्वभावमेदं विना तत्त्वतो न घटते इति न 'शक्तिर्मावलक्षणम् । अर्थक्रियैकत्वेऽपि समत्राणां मेदात् सहकारिकारणमाश्रित्यापि सा न सम्भवति, तत्र स्वस्व. कार्य उपादानमावः परस्परकार्य च सहकारिभाव इत्यभ्युपगमस्य निरंजैकवस्तुवादे विचारासहत्वात् । न च रूपरसादौ .

सविन- भी सादादि- सिदि- प्रसङ्गे रूपादीनामेकस्वभावेन हेतुत्वेऽप्युपादानमेदादेव मेद इत्यपि युक्तम्, एवं मुपादानमात्रादेव कार्यसिद्धी "सहकार्युच्छेदे मन- स्कारो हि विज्ञानस्योपादानकारणं चक्षुषस्तु स्वविषयज्ञानजननयोग्यस्य सहकारिकारणम्" इत्याचर्चटवचनस्यासामञ्जस्यप्रस- जाद, काल्पनिके च कारणानां स्वमात्रमेदे कार्याणामपि तथात्वापत्तिः । एतेन " पटादयोऽनेककार्य कुर्वन्तो दृष्टा नच घर्मिरूपेण मियन्त इत्येकक्रियायामिवानेकक्रियायामपि तद्भावमाविताया एव निवन्धनत्वादविरोध:, अनेककार्यक्रियास्वमा- वेन्यव्यावल्याऽनेकशब्देनामिषानेऽप्यात्ममेदायोगात्, एकस्यानेकक्रियानम्युपगमे च योऽयं रूपरसगन्धस्पर्शविशेषाणां क्वचित्सहमावनियमः प्रमाणपरिदृष्टः स न स्यात्, मिनानिमित्तानां सहभावनियमायोगात् । तदेकपर्मिस्वमावतया तत्र सहभावनियम इति चेत्, न, एकस्यानेकस्वभावताया एव चिन्त्यत्वात् , तस्मादेकसामध्यधीनजन्मनामेव सहभावनियम इति स्वसन्तानक्षणमितरोपादानक्षणं च युगपदुपकुर्वतः कथमेकस्य नानेककार्यता, द्रव्यपर्यायाणां चैकस्वभावतामाचक्षाण एक- स्यानेककार्यतां कथं प्रतिक्षिपेद्" इत्यादि परोक्तमपास्तम् । अनेककार्यकारित्वेन दृष्टानां पटादीनां धर्मिरूपेणाऽमेदेऽपि धर्मरू- पेण मेदाद्वस्तुन उमयरूपत्वाद् गुणप्रधानमावेनैकैकव्यपदेशेऽप्येकानेकस्वभावानिवृत्ते,किशिद्धीन्द्रियादेः स्वोपादानाद्रूपं जातं, किशिच विषयादेरिति कथं नानेकस्वमावता कारणस्य, स्वोपादानादेव कार्यरूपसिद्धौ च शेषकारणवैयर्यम् , अविशि- टादवर्जनीयतचतुसनिधी विशिष्टोत्पतिवादेऽप्ययमेव दोषो वैययं च सुगतदेशनायाः। तस्मादनेकक्रिया तस्य तदा- बभावितापि चित्रस्वभावतामेव समर्थयति । न च भवन्मतेऽपि सहकारिणां चित्रस्वभावत्वे कार्याणामपि तथास्वापतिः, का- रणानामपि परस्परस्वरूपमिश्रणया चित्रत्वादात्मभूतानेकषर्मयोगेन च तेषामिव कार्याणामपि चित्रताया इष्टत्वात्, घटो हि शक्ति लक्षणनि- . मृत्पिण्डान्मृदात्माकुलालण्यापारात्संस्थानात्मा सत्राच चकादिविमक्तात्मेति,प्रधानं चोपादानकारणमेवेत्यपरकारणप्रयुक्ता वि. शेषा मृदमेवावलम्बन्ते सर्वकार्येष्वप्ययमेव न्यायः। एकस्य चात्मातिशयस्यानेककार्यहेतुता चित्रसामर्थ्याच्यासं विनाऽनुपपनै सहे व, अंशेनैकत्रोपयोगे कृत्तान्तब्याकोपात्, सर्वात्मना चोपयोगे कायॆक्यापत्तेः, अन्यव्यावृश्यात्मना चानेकत्वं न कार्यवैचि उपलब्धि ज्यनिर्वाहकं, मिननिमिचानां सहमावनियमोऽपिस्याद्वापनीत्वा नानुपपमा,कथञ्चित्स्वभावमेदे तदेकपर्मिस्वमावतयैकत्र सह- सचेति भावनियमोपपत्तेः, न हि रूपरसादिपरमाणवः पृथक्प्रतिभासन्ते, किन्त्वेकमेव तद्रव्यमनेकरूपानुविद्धमवमासत इति द्रव्यप- र्यायाणां चैकस्वभावतामाचक्षाणाः स्याद्वादनीति न परित्यजन्तीति तदवष्टम्मेन परेण न क्षणिकेऽर्थक्रिया व्यवस्थापयितुं शक्ये. ति नैतद्वस्तुलक्षणम् ॥ "उपलब्धिः सत्ता, सैव वस्तुलक्षणम्" इत्यपि न न्यायानुपाति, यतः केयमुपलब्धिः, किं ज्ञानम् , उत निरास:॥ ज्ञानविषयता, आयर्थावस्तुत्वप्रमङ्गः, न च विज्ञानवादिनः सिद्धसाध्यता, अर्थस्यापि विशददर्शनेनानुभूयमानत्वेन तन्म- तस्यायौक्तिकत्वात् । स्वप्नवदपारमार्थिकत्वादर्थदर्शनं तदसाधकमिति चेत्, न, अपारमार्थिकत्वं बर्थशून्यत्वमितीतरेतरा- श्रयात् , असति चार्थे कथमर्थो नास्तीति ब्रूयात् । परप्रसिखेति चेद, तस्याः प्रमाणत्वेऽयुक्तोऽर्थप्रतिषेधः, अप्रमाणत्वे तु तदाश्रयणमन्याय्यम्, स्वप्नदृष्टान्तेनार्थनिषेधे च ज्ञानमपि कथं न निषेधेत् । ज्ञानरूपत्वावमासस्यार्थनिषेध इति चेत्, न, ज्ञानमात्ररूपताया अनवमासानीला(लेखस चार्थ विनानुपपत्तेः । अनादिवासनानिमित्त्वे च तस्य यथा तस्याः पृथग्- भूताया विज्ञानेनाधिगमस्तथार्थस्यापि किं न स्यात् । एतेन 'नीलाघाकारोशानात्मैव, जडस्य प्रकाशायोगा' इत्यायपास्तम् । जडे ज्ञानविषयताया ज्ञानवानापादकत्वात् , अन्यथा सुगतज्ञानविषयैरशेषज्ञानक्षणैः सुगतज्ञानरूपता प्रतिपओत्येकमेव तदव- उत्पादादि- सचिव- रणम् ॥ . . प्रकरणम्॥ . शिष्येतेति सन्तानान्तरोच्छेदः । यदि चाचिन्त्यशक्त्या सुगतज्ञानत्वाप्रतिपत्तावपि क्षणान्तरादेस्तद्विषयता, तदा तयैवार्थ- स्थापि कथं न ज्ञानविषयता । अथायमर्थः किमवयविरूपः, किंवा परमाणुरूपः । नायः, अवयविनोऽवयवेम्यो मेदामे- दविकल्पानुपपत्तेः, तथाहि, मेदस्तावदनुपलम्भबाधित एव, अवयवेभ्यो व्यतिरिच्यमानमूर्तेरवयविनः स्वप्नेऽप्यनुपलम्भात् । न च समानदेशत्वात् पृथगनुपलम्भः, तत्वेऽपि रूपरसयो तातपयोश्च भेदेनोपलक्षणात् । न च दवीयसि देशेऽवयवाऽप्रति- भासेऽप्यवयविनः प्रतिमामात्तस्यावयवमिन्नत्वं नामातीतिकमिति वाच्यम् । तत्रास्पष्टाकारस्यावस्तुत्वेन तत्प्रतिभासस्य भ्रान्त- त्वात् , अन्यथा निकटस्थस्य सुतरामस्पष्टाकारावमामप्रसङ्गात् । अथावयविनः स्पष्टमस्पष्टं चेत्याकारद्वयमस्ति, तत्र निकटस्थेनाद्यमुपलभ्यते, दूरस्थेन चान्त्यमिति न दोष इति चेत्, न, अस्पष्टाकारस्य योग्यावयविधर्मत्वे निकटस्थस्य नियमत उभयावमासप्रसङ्गात् , अयोग्यत्वे च दूरतोऽप्यनवम(वभास)प्रसङ्गात् , दूरदेशव्यङ्ग्यत्वे च तत्र मानाभावात् , स्फुटत्वा स्फुटत्वयोर्विरोधेनैकत्राकारद्वयायोगाच्च । यदेव दूरेऽस्फुटमद्राक्षं तदेव सनिषो स्फुटमिति स्फुटास्फुटयोरेकत्वप्रतिमानं त्वमिमानमात्रं । तब रेऽवयवेभ्यः पृथगवयविप्रतिमासः । किं च कतिपयावयवप्रतिभासेऽवयवी मातीत्यभ्युपगम्यते, समस्तावयवप्रतिमासे वा, आधे जलमममहाकायस्तम्भादेरुपरितनकतिपयावयवप्रतिमासेऽपि ममस्तावयवव्यापिस्तम्माध- वयविप्रतिभासप्रसनः। द्वितीये च मध्यपरभागवति समस्तावयवप्रतिभासासम्भवेनावयविनोऽप्रतिमामप्रसङ्गभूयोऽवयवन- हणं भूयोऽवयवसमिकर्षो वाऽवयविग्राहक इत्यपि भूयस्त्वानिर्वचनादुर्वचम् । किं चायमवयवेषु वर्तमानः सामस्त्येन वा वर्तेत एकदेशेन वा, आये एकस्मिन्नेवावयवे परिसमासाबनेकवृत्तित्वं न स्यात् , अन्त्ये चावयविनः सांशतापाता, तत्र चांशां- . प्रसङ्गे बौद्धोत्तोप- लब्ध्यात्म- सवलक्षण- खण्डने बौदस्या- खण्डनम श्वेऽवयवि- लण्डनम्॥ .

प्रस नौद्धोत्तोप- लन्ध्यात्म- सत्वखण्ड- विनोमेंदामेदविकल्पासहत्वं, मेदे समवायवृत्यम्युपगमेऽपि स्ववृनौ स्वस्यावच्छेदकत्वानुपपत्तिः। तमावयव्यवयवम्यो मिः। अमेदपक्षे त्ववयवमात्रमवयविमानं वा स्यादिति, नावयविरूपोऽर्थः प्रमाणोपपनः । नापि परमाणुरूपः, तेषामपि दिवडू- सम्बन्धेन षडंशताप्रसङ्गात् , न च विशकलिताः परमाणवः प्रतिभामन्ते । एकघनाकारस्य संवेदनस्यानुभूयमानत्वाद, तब बायोऽयमाकारः, किं तु संवेदनमेव तथा तथा प्रकाशत इति ।। अत्रोच्यते-बाबनीलाघाकारस्य चिद्रूपत्वेऽन्तर्गखतया मान स्थान बहिर्मुखतया । भ्रान्तिवशादव्यतिरिक्तोऽप्ययं व्यतिरिक्ततया प्रकाशत इति चेत्, तर्हि यथानुभूयते तथा न सत्यो यथा च सत्यस्तथा नानुभूयत इति कथं साकारधिषणावादो योगाचारस्य सङ्गतः। 'स्वच्छं संविन्मात्रमत एवं तत्वम्' इति यदि माध्यमिकः प्रतिपद्येत, तदा यद्ययमाकारो न विज्ञाने, नापि बहिस्तदा शशविषाणवनानुभूयेत, इत्युक्ते किमुचरं दद्यात् । अनाद्यविद्यावासनावशादविद्यमानमप्युपदर्शयन्ती भ्रान्तिरियं प्रवर्तत इति चेत् , न, बहिर्मुखावभासशून्यज्ञानान- वमासेन तद्धियो प्रान्तित्वासिद्धेः । तस्मात् स्तम्माद्याकारो बाघस्तावदवश्यमभ्युपगन्तव्यः, तत्र चाऽवयवेभ्यो मेदामेदपक्ष- पणमेकान्तवाद एव सावकाशं, न चैवमभ्युपगमः, अवयवा एव तथापरिणमन्तः कथश्चिचिदेकरूपतामापनाः स्तम्भाधव- यविरूपतया प्रकाशन्त इति हि जैना वर्णयन्ति । न हि येन रूपेण करचरणशिरोग्रीवादयोऽवयवाः करचरणादिप्रतीतौ प्रका- शन्ते, तेनैव पुरुषप्रतीतावपि, तत्साधारणपरिणामस्यैव तथाप्रतीतिहेतुत्वात् , अनतिरेके चावयविनः स्थौल्यमानानुप- पतिः। अथ किमिदं स्थौल्यं । न तावत्परमाण्वात्मकं, पूर्वापरादिदिग्मेदभागित्वात्तस्य, अणूनां च बहनामपि निरंशत्वेन वदनुपपत्तेः, न हि निरंचस्यैकतः परत्वमन्यतचापरत्वं युक्तं । नापि परमाणुजन्यम् , असंयुक्तानां तेषां प्रतिमासस्येव स्थौल्य- बाबा- प्रश्नपति- विधानम्॥ . .

सविव- उसादादि- सिद्धि- रणम् ॥ प्रसले बौद मतखण्ड- ने स्थौरव- स्थाजनकत्वात् , संयुक्तानां चांशाभावेन सर्वात्मना संयोगे पिण्डस्याघुमात्रतापः। तदुक्तम् । “नासंयुक्तैर्न संयुक्त-बिरंशः क्रियते महत् । अयोगे प्रतिमासोऽपि, संयोगेऽप्यणुमात्रकम् ॥१॥" इति । प्रतिभासधर्म एव स्थौल्यमिति चेत्, न, वस्तुत्वे तस्यावयविपक्षोक्तदोषतौल्यात् , अवस्तुत्वे चाभ्रान्तप्रत्यक्षानुपपचे, इच्यते च परेणापि संस्थानापेक्षयाऽम्रान्तत्वं प्रतिमासस्य, "प्रत्यक्ष कल्पनापोढमप्रान्तम्" इति न्यायविन्दु(१-३)सूत्रे वर्णसंस्थानात्मके वस्तुनि 'यन प्राम्यति तदप्रान्तम्' इति धर्मो- तरेणामिधानाद, परमाणूनां च स्वस्वरूपमनाना संस्थानरूपामाव एव । तस्मात्परमाणूनां कथश्चित्साधारणाकारपरिणामा. देव संस्थानात्मकता वस्तुनस्तदेव च स्थौल्यमिति नायं प्रतिमासधर्मः। अत एव च तत्कथञ्चित्परमाण्वात्मकं परमाणुजन्यं च व्यवस्थितम्। न च तेषां पूर्वापरादिभावानुपपत्तिा, एकक्षेत्रप्रदेशावगाढताप्रत्यामश्या तदयोगेऽपि परमाण्वन्तरव्यवधानायो- ग्यक्षेत्रप्रदेशावस्थायिताप्रत्यामक्या तदुपपत्तेः। अत एवोक्तं भगवता भाष्यकृता-'एगपएस खेतं, मतपएसा य से असणचि' । हरिभद्रसूरिणाप्युक्तमनुयोगद्वारवृत्तौ-'न संशतः स्पर्शना नाम काचित् , अपि तु नैरन्तर्यमेव स्पर्शना भूम' इति परमाणुद्रव्यमेकं मप्तप्रदेशस्पर्शमुपपद्यत इति । अत एव संयोगपक्षेऽपि न पिण्डस्याणुमात्रताप्रसङ्गः । यतो नैक प्रदेशावगाढत्वेनैव संयोगो भवति, किन्तु परमाण्वन्तरव्यवधानायोग्यक्षेत्रावस्थायित्वेनापीति, परमाणोः प्रदेशातया नात्ममेदः, धर्मरूपतया पुनर्मियत एव, यतो न येनैव स्वमावेनैकेन सह संयुक्तः स परमाणुस्तेनैव स्वमावेनाऽपरेणापि, किन्तु कथशिदन्येन, ततः कश्चित्परमाण्वात्मकं परमाणुजन्यं च स्थौल्यं सिद्धमिति । एतेन "नित्याः सन्त्वनवःसणुका- दिव्यवस्था संयुक्तापुत्लादिना, लौकिकविषयतया द्रव्यसाक्षात्कारत्वावच्छिनेत्र्यणुकत्वादिषटकसंयोगानां पिशाचस्वादि. माण्वात्मा कत्वपर- मापुजन न्यत्वयो साधनम्॥

प्रसार योगवचार पटकसंयोगमित्रानां वैजात्येन कारणत्वास केवलाणुव्यमुकादेः प्रत्यक्षता, तानसंयोगविशिष्टाचित्वादिकं च गुनादि प्रत्यक्षे तन्त्रमिति केवलाणुमणुकादिगुणाप्रत्यक्षत्वेऽपि न त्र्यणुकादिगुणाप्रत्यवत्वं, न च विजातीयसंयोगस्य द्रव्यत्वस्य जन्यतावच्छेदकत्वे लाघवं द्रव्यसाक्षात्कारत्वस्य तथात्वे तु गौरवमिति वाच्यम्। अनन्तावपवितस्त्रागभावध्वंसादिकल्पने गौरवाजन्यद्रव्यत्वापेक्षया द्रव्यलौकिकसाक्षात्कारत्वस्यैव लघुत्वाच । तन्तूनामेव पटत्वे तन्तुषु पट इत्यादिघीय फलबलेन विलक्षणसंयोगवत्वरूपतन्तुत्वादेविलक्षणसंयोगवश्वरूपपटत्वादिविशिष्टाधारतावच्छेदकत्वस्वीकारामानुपपमा । एक: पट इति प्रतीतिरेकं वनमितिवत्समूहकत्वविषया । महानिति प्रतीतिरपि संयोगविशेषमेवावगाहते, महान धान्यराशिरितिवद् इति नव्यनास्तिकमतमपास्तं परमाणुनामपि संयुक्तासंयुक्तस्वभावेनोत्पादविनाशयोरावश्यकत्वेनैकान्तनित्य- स्वायोगात्कयनिचदात्मकतजन्यस्कन्धस्य सामूहिकविलक्षणैकत्वशालिन आनुमविकत्वाच॥ विलक्षणसंयोगवचावदणुत्व- स्य पटत्वादिरूपत्वे तावच्चस्य विलक्षणयत्वादिरूपस्य प्रतिसन्धानं विना पटत्वादिप्रत्ययायोगात् । विलक्षणसंयो- गत्वमेव पटत्वतन्तुत्वादिकमित्यस्यापि निष्प्रतियोगिकपटत्वादिग्रहस्यानुमविकत्वेन दुर्वचत्वात् । अविविच्यमानं निष- तियोगिकमेव विविच्यमानं सप्रतियोगिकमिति चेत्, अत एव तहि जात्यन्तररूपमववि द्रव्यं स्याद्वावरीत्याऽम्युपग- म्यतां, यथा विलक्षणपरिणतिमन्तस्तन्तब एव पटः, तन्तुसंयोगादुत्पममेकं विलक्षणपटद्रव्यमिति व्यवहारौ सङ्गच्छेते ॥ अत एव सर्वस्य वस्तुनः सामान्यविशेषात्मकत्वात् क्षयोपशमविशेषात् यदोपसर्जनीकृतविशेष प्रधानीकतसामान्यरूपं प्रतीयते तदाऽस्पष्टमामाति, यदा तूपसर्जनीकृतसामान्यं प्रधानीकृतविशेषं तदा स्पष्टम्, इति स्पष्टास्पष्टयोरैक्पषी मिमान- पटत्वादि- रूपत्वमिति नव्यनास्ति- .

मविक- रणम् ॥ सलादादि- सिदि- . प्रसने बौद्ध- मतखण्डने अवयवि. विचारे मात्र, किंतु पारमार्थिक्वेव, यदपि 'किं कतिपयावयवप्रतिमाम 'इत्याधुक्तं, तत्रापि यावदवयवामिमुख्येऽवयविप्रतीत्युपप- चिस्तावदवयवामिमुख्यमेव, तत्र नियामकमित्येवोत्तरम् , अन्यत्र नु नाग्रहः । जलमममहाकायस्तम्भादेरुपरितनकतिपयाव- यवावलोकनेऽपि देशतः प्रत्यक्षदेत्येव, स्कन्धप्रत्यक्षे त्वावरणस्यापि प्रतिबन्धकत्वमुपेयं, देशस्कन्धादिविमागस्त्वयमर्ष- स्तम्भोऽयं सर्वः स्तम्भ इत्यादिप्रतीत्यैवाभ्युपेयः, न चार्धत्वमवयवाश्रितमेव, अवयवावयवापेक्षयाप्यवयविनि तदर्शनात, स्कन्धदेवादिविभागाभावे च पाणिचरणायकैकावच्छेदेन शरीरे सकम्पत्वनिष्कम्पत्वयोरुमयावच्छेदेनोभयात्मकत्वस्य स्क- न्धत्वावच्छेदेन चानुमयात्मकत्वस्य सार्वजनीनोऽनुमवः कथमुपपादनीयः । यत्तु "पाणी शरीरं चलतीति प्रत्ययः पाणि- वृत्तिकम्पस्य परम्परासम्बन्धविषयक एव, कम्पजनकाभिषातादेः फलवलेन पाणावेव कल्पनात्पाणिकर्मणैव प्रत्ययाधुत्पत्ता- वतिरिक्तशरीरकर्मकल्पनायां मानाभावात् , अन्यत्र क्लप्सकम्पाभावमम्बन्धमात्रस्य शरीरे कल्पनौचित्यात्, न तु कम्पतद- मावावेकत्र कल्पनीयौ, कर्मणोऽव्याप्यवृत्तिन्वाभावात् , सविषयावृत्तिव्याप्यवृत्तिवृत्तिजातेरव्याप्यवृत्तिवृत्तित्वामावनियमात्, न चोक्तयुक्त्यानादिनिष्ठसंयोगादेरेव वृक्षादौ प्रतीतिसम्भवे संयोगादेरपि व्याप्यवृत्तित्वमेवास्त्विति वाच्यम् । अश्ववच्छे- देन तन्तुद्वयसंयोगादपि पटोत्पत्तेस्तदव्याप्यवृत्तित्वात् , न चांशुसंयोगादंशावेव पटोत्पत्तिः, तन्तुत्वेन पटममवायित्वाद्" इति प्राचीननैयायिकमतम् । तदपमतम् । एवं हि शरीरस्य निष्कम्पत्वे चरणे शरीरं न चलतीति प्रत्ययापत्तिः । न च शरीर- त्वादेरिव पाणे कर्मामावानवच्छेदकत्वान तथाप्रत्ययः, चरणस्यापि तथात्वात् । न च चरणे न चलतीत्यत्र चरणवृत्ति- कम्पामाव एव विषयः, मेदामेदानपेक्षायामनवयवमादायापि तथाधीप्रसङ्गात् । न च परम्परासम्बन्धेन तभिरासः, देशदेशि- कर्मणो ना. व्याप्य त्तित्वमिति प्राचीन नैयायिक- मतस्य खण्डनम्॥ .

नोर्मेदामेदेन साक्षात्सम्बन्धावगाहिताया एवानुमविकत्वात् । एतेन 'पाणिवृत्तिक्रियाया दोषत्वात्पाणी न चलतीति न धी' इत्यपि निरस्तम् । अनन्तावयवक्रियाणां दोषत्वकल्पनापेक्षयावयविक्रियाकल्पने लापवात् । मक्रियावयवस्यावयविनो निष्कि- यत्वे मावयवावच्छेदेनोपलभ्यमानकर्मवत्यपि शरीरे कर्मानुपलम्भप्रमङ्गात् । एवं च कर्मणोऽणुमात्रगतत्वस्य त्रुटिमात्रगत- त्वस्य वापत्तेः । तत्कर्मणैवान्यत्र प्रत्ययोपपत्तेः । यावदवयवकम्पजनकमामग्रीत्वेनावयविकम्पजनकसामग्रीनियतत्वकल्पना- पेक्षया च यावच्चाप्रदेशेनावयवकम्पजनकमामग्रीत्वेन तथात्वकल्पनमेव ज्यायः। हन्त, एवं संयोगजसंयोगवत्कर्मजकर्मोपग- मेऽपसिद्धान्त इति चेत् , सोऽयमेकान्तवादिनां भवतां दोषो, नास्माकमवयवावयविधर्माणां कथञ्चित्तदात्मकत्वतजन्यत्ववा- दिनां । किं च शाखायां वृक्षश्चलति न सर्व इति प्रतीतिरपि स्कन्धदेशादिभेदसाक्षिणी, एनेन 'कर्माव्याप्यवृत्तित्ववादिनवी- नमतमपि' अपास्तं । न मर्व इत्यत्र मर्वावयवावच्छेदेनाभावस्य वक्तुमशक्यत्वात् , मर्वावयवावच्छिन्नत्वविशिष्टतासम्बन्धे- नामावमानाम्युपगमे चावच्छेदकमेदानवगाहनात् । इष्यते च प्रतियोगिमत्वेन भासमाने तदभाववत्ताधियोऽवच्छेदकमेदाव- गाहित्वं । अन्यथा देशावच्छिन्नोऽपि सम्बन्ध एव स्यादिति सम्बन्ध्यनवच्छिन्नतापत्तिः। तस्मादनन्यगत्या शबलवस्त्व. म्युपगमे देशस्कन्धादिविभाग आवश्यक इति दिग् । यदप्युच्यते परैः " जलमग्रस्तम्भावयवी गृह्यत एव, तस्यानावृतत्वात्, यावदवयवसंयोगस्य कुत्राप्यसम्भवात् , भूयोऽवयवावच्छेदेन चक्षुरादिसंयोगस्य च ग्राहकस्य तत्रापि सत्त्वात् , भूयस्त्व- स्य चानेकत्वविधान्तत्वात् , दीर्घत्वमहत्वादिकं त्वावृतत्वान गृह्यते, तत्प्रत्यक्ष प्रति तत्तदावारकसंयोगत्वेन प्रतिबन्धक- स्वात्, न च तदशायामनातस्याप्यन्यस्य ताशदीर्घत्वादिप्रत्यक्षानुपपचिः, विषयतासम्बन्धेन परिमाणसाक्षात्कारत्वा- प्रसङ्गेचौद- मतखण्ड- नेऽवयवि- विचारे काव्या- प्यवृत्चित्व- वादिनव्य- नैयायिक मतस्य खण्डनम् ।।

सविक.
रणम्॥
उत्सादादि-
सिदि-
प्रसनेवार
नेऽवयवि.
विचारे
पछि प्रति स्वाभयसमवेतत्वसम्बन्धेनैव तत्तदावारकसंयोगत्वेन प्रतिबन्धकत्वादिति । तदपि न । आवरणस्थलेऽपि
दीपोंऽयं महानवं स्तम्भ इत्यादिप्रतीतेहर्षित्वादेरप्यनाश्तत्वात् । यदप्युच्यते-"आवरणस्थले दीर्घत्वादिग्रहेऽपि तनिष्ठा-
वान्तरबैजात्याग्रहाचबैजात्यग्रहं प्रत्येवावारकसंयोगस्य विरोधिता करप्यते, अत एव धर्मिग्रहेऽपि धर्माग्रहणं दोषादित्या-
चार्याः । न च निखातानिखातसदृशवंशयोः सभिकर्षदशायां तन्महत्वादिवृत्तिवैलक्षण्यानुभवाचबैजात्यप्रत्यक्षं प्रत्यप्याव-
रकसंयोगानां प्रतिबन्धकत्वासम्भव इति वाच्यम्, ताहालथण्यप्रकारकप्रत्यक्षं प्रत्येव तेषां विरोषित्वात् , विशेष्यत्वं प्रति-
बध्यतावच्छेदकः सम्बन्धः स्वाश्रयसमवेतत्वं च प्रतिवन्धकतावच्छेदक इत्यनतिप्रसङ्ग इति" तदपि न । तथापि निखात-
सनिकर्षातादृशलक्षण्यनिर्विकल्पकापत्तेर्दुर्वारत्वात् । आवरणदशायां स्कन्धत्वाख्यस्तम्मादिकृत्तिवैलक्षण्याग्रहेण तत्प्रत्यक्षं
प्रत्येवाऽवरणसंयोगस्य प्रतिबन्धकत्वौचित्याच । अत एव तदा स्तम्भैकदेशो गृह्यते न सर्वः स्तम्भ इति व्यवहारस, परिमाण
गतवैलक्षण्यं तु द्विहस्तमितेऽर्थावते हस्तत्वरूपं गृह्यत एव, न च तदवयवगतं, सामूहिकविलक्षणत्वात्, देशनहे तद्गतानां
धर्माणां ब्रहो न तु स्कन्धानहे तद्गतानामितित्वस्मदीयेनैव पथा शोभते । एतेन 'अनावृतस्वाश्रयाविषयकपरिमाणगतवैल-
क्षण्यप्रत्यक्षे आवरणसंयोगस्य प्रतिवन्धकत्वं विशेष्यता-स्वाश्रयसमवेतसमवेतत्वे प्रतिवध्यप्रतिवन्धकतावच्छेदको सम्बन्धा-
विति नोक्तनिर्विकल्पकापतिः' इत्यप्यपास्तम् । तथाप्रतिवन्धकत्वकल्पने गौरवात् , इत्थमायावतसत्रिकर्षादनावतस्वाभयविष-
यकलवण्यप्रत्यक्षावारणाच । तत्रावरणसंयोगानवच्छिनचक्षुःसंयोगस्य प्रथकारणत्वकल्पने च महागौरवात् । यदपि मयु-
रानानाभ्यपापि-"अस्तु वा तचद्वैलक्षण्यसाक्षात्कारप्रयोजकतयापि चक्षुरादिसंयोगनिष्ठं वैजात्यान्तरं, तेनानिसात-
स्थले परि
माणगतवै-
जास्वर
बाग्रहम-
मिति
लन्डनम्॥
॥१२॥

. स्थलीयवैजात्यस्य न निर्विकल्पकमपि । एतेन "अनावृतैकपाविच्छेदेनैकस्य पुंसयक्षुरादिसंयोगावस्य दण्डादिनिष्ठहस्तवि- तस्त्यादिपरिमाणस्य तद्तहस्तत्वादिवैजात्यस्य वा न ग्रहस्तस्येव तदानीं पुरुषान्तरस्य तत्पुरुषस्यैव वाऽन्यदा पार्थान्त- रावच्छेदेन चक्षुःसंयोगेऽप्यमहः स्वादावरकसंयोगस्य विरोधिनः मत्त्वात् । न च तत्तत्कालीनतत्तत्पुरुषीयमहत्त्वादिप्रत्यक्ष प्रत्येच तत्तदावरकसंयोगत्वेन कथितप्रत्यासत्या प्रतिबन्धकत्वं, तथा सत्यनावरणकालीनस्य तत्तत्पुरुषीयविलक्षणमहन्वादि- प्रत्यक्षस्यावरणदशायामुत्पत्तिप्रसङ्गात् , नहि तत्राप्यन्यद्विशिष्य कारणं क्लप्तं येन तद्विलम्बादेव तद्विलम्बः स्याद् इत्यादि प्रत्युक्तमिति" । तदपि तुच्छं । एवं सति तत्तदवान्तरवैलक्षण्यग्राहकतावच्छेदिकानामप्यनन्तजातीनां कल्पनापत्तेः, चक्षु- रादिसंयोगनिष्ठवैजात्यान्तरस्यापि कार्यमात्रवृत्तिजातित्वेन कार्यतावच्छेदकतया तदवच्छिन्नजनकत्वाभिमतादावरणसंयोगा- मावादेव वैलक्षण्यचाक्षुषोपपत्तौ तत्कल्पने मानाभावाच । एतेन तत्पुरुषीयद्रव्यचाक्षुपे विलक्षणचक्षुःसंयोगत्वेनैव हेतुत्वम् , आलोकसंयोगावच्छेदकावच्छिनचक्षुःसंयोगत्वेन हेतुत्वेऽनिस्तारात्, यत्रैकस्यैव पटस्याई तमस्य चालोके, तत्र तमोवच्छे देन संयोगेऽपि प्रत्यक्षापत्तेः, आलोकसंयोगावच्छेदकीभूतदीर्घतन्तुव्यच्यवच्छेदेन चक्षुःसंयोगाप्रतिघाताद , इत्थमेव स्वगो- लकादेरग्रहण, परमाण्ववच्छेदेन कपाले चक्षुःसंयोगाद् घटेऽपि तदवच्छिमकपालावच्छेदेन ततस्तदग्रहणं, निरवच्छिन्नस्थ- लावयवनिष्ठावच्छेदकताकचक्षुःसंयोगत्वेन हेतुत्वे तु शर्करायवच्छिमकपालावच्छेदेन चक्षुःसंयोगेऽपि घटाप्रत्यक्षतापतिः । न चैवमुद्भतरूपमहत्वयोः पृथमहेतुत्वापचिः, द्रष्यवृश्यभावचाक्षुषं प्रत्यपि ताशचक्षुःसंयोगवद्विशेषणतायाः प्रत्यासत्ति- त्वेन सत्यालोकसंयोगे वाय्बादौ x x x x x x x x x x x x x x x x x (त्रुटितः पाठः) प्रसने पौ खण्डने, अवयविप- रिमाणगत- वैजात्यस्य चाग्रहण- मिति मत- खण्डने मथुरानाव- मतखण्ड- सदादि- श्रुटितपू- रणे उत्पा- दादित्रिक- मन्तरेणस- पलन्धितो [॥ अस्य मूलादर्शऽत्रैक पत्रं नास्ति तत्र च द्वितीयकारिकाविवरणान्स्यविमागस्य सविवरणवतीयतुर्यपचयोग विशीर्णत्वमित्यर्थानुमन्धानपूर्तिमात्रमत्र स्वोपवाचितः किञ्चियोजितम् ॥] [घटामावादेः प्रत्यक्षापचिवारणायोद्भूतरूपस्य परमाणवादी घटामावादेः प्रत्यधापतिवारणाय महत्त्वस्य च पृथकारण- ताया आवश्यकत्वादिति निरस्तम् ॥ २ ॥ एवश्वोत्पादव्ययधौव्ययोगितामन्तरेण न सचासम्बन्धवक्त्युपलब्ध्यादिरूपेण वस्तुलक्षणमुपपद्यत इत्येतन्मर्व चेतसि निधायाह- न यत् सत्ताभिसम्बन्धा-न शक्तेर्नोपलन्धितः ॥ विनोत्पादव्ययप्रौव्ये-चस्तुत्वमुपपद्यते ॥ ३ ॥ यद् यस्मात्सत्ताभिसम्बन्धात्, शक्तेर्वार्थक्रियां प्रति, उपलब्धेर्वा मकाशात्, उत्पादव्ययत्रौव्यैर्विना वस्तुत्वं नोपपद्यते, तनस्तयोगविकलं यत्तादृशं यदि परं तत्सर्व शशशृङ्गादिरूपमेव भवतीति पूर्वलोकेन सम्बन्धः ॥ ३ ॥ इदानीमुत्पादादिस्वरूपं निरूपयति, तथाहि- उत्पावो वस्तुनो भावो, नाशस्तस्य व्ययो मतः॥ धौव्यमन्वितरूपत्व-मेकं नान्योऽन्यवर्जितम् ॥४॥ उत्पादो वस्तुनो भावः, व्ययो विनाशः, अन्वितरूपत्वं च प्रौव्यं, तदिदमुत्पादादित्रयमन्योन्यरहितं न सम्भवति, तत्र उत्पादो वस्तुनो भाव इत्यनेन यत्कस्यचिन्मतं "कारणसमवायः सत्तासमवायो वायेन तदेव क्रियते प्रत्ययैरिति" तत्प्रतिक्षिप्यते, ममवायसचासमवाययोनित्यत्वेन कार्यनित्यत्वप्रसाद, प्रध्वंसे च तदननुगमाद्विधीकरणाधीनस्वात्मत्वात्का- त्वोपपत्ति- यात्रौव्या- णां निर्व-- यस्वमित्यनेन सत्परिणामानम्युपगमे तदनुपपत्तेरिति वक्ष्यामः, 'प्रतीत्य समुत्पादरूप उत्पाद' इत्यप्यसुन्दरम्, इहैव निराकरि- प्यमाणत्वात् । तस्मादस्तुनो मावस्तवापरिणामापचिलक्षण उत्पादः, यतो वस्तुनो माव इति कर्तरि षष्ठी, वस्त्वेव सत्कार्यरूप- तया भवति, वस्तुसजैव कार्यसत्तारूपता प्रतिपद्यत इत्यर्थः, द्रव्यस्यैव तत्पर्यायरूपतया भावात् , तदनेन पूर्वमवनभूतान्यथा- भूतभवनात्मक एवायमुत्पाद इत्यावेद्यते, एतदुपरिष्टात्प्रमाधयिष्यामः ॥ तथा नाशस्तस्य व्ययो मतः इत्यनेनापि यन्सु- गतमुता व्यावर्णयन्ति यथा “न तस्य किश्चिद्भवति, न भवत्येव केवलम्" इति तदपास्तं, यदि हि किश्चिदपि तस्य न भवति तर्मक्षतमेव तद्वस्तु स्यादिति प्रबन्धेन प्रतिपादयिष्यते । वस्तुनोऽत्यन्तमिनः प्रध्वंसनामाऽभावो विनाश इत्यप्यबुधजनमनो- हरं, यदि नाम मावव्यतिरिक्तमपरमभावनामकं वस्त्वन्तरमुत्पनं तदा भावस्य किमागतं ? येन स न स्यात्, इहापि विस्तरम- मिधास्यामः ॥ वस्तुतस्तु यस्य वस्तुन उत्पादः पूर्वममिहितः तस्यैव पूर्वरूपामवनात्मकोत्तररूपतापरिणामलक्षणो विनाश व्ययः, तपढ़ेदे च तस्येति सङ्गायोगा, वस्त्वेव व्येति पूर्वरूपादपगच्छति रूपान्तरमवलम्बमानेन तेन पूर्वपर्यायात्मना स्वयमेव व्यावर्तनात् । एतेन ये केचिद्विकल्पयन्ति तदपि न, तथाहि, विनाशरूपोऽयं व्ययः किं द्रव्य] विनाशः, उत पर्यायविनाशा, अथवाऽऽवरणयोगः, उताहो विज्ञानानुत्पादकत्वं, नायद्वितीयौ, अनम्युपगमात्, न वतीया, अविचलितरूपस्यावरणायोगात्, न सकिंचित्कार्यावरणं भवति । न तुरीयः । ज्ञानजनकता येन रूपेण तद्पस्य विद्यमानत्वात्सहकारिणामकिञ्चित्करत्वात् । प्रो- व्यमन्वितरूपत्वं पूर्वापरपरिणामसाधारणैकस्वरूपत्वं, न त्वप्रच्युतानुत्पनस्थिरकस्वभावतालक्षणं कूटस्थनित्यत्वम्, अतोऽ- न्योन्यरहितमेतत्रयं कथं भवेदिति, न चेह केनचित्कस्यचितिरोधः, अविनामाविनि रूपे विरोधाभावात् ।।४॥ तदाह- बुटितपूर- घिउत्पादा- दीनां प्रया जामन्यो- न्पसहिता- नामेवात सानं, तेषां वाघन्तरा- जमपाक त्य स्वामि- व्यवस्था- पनर।

उत्पादादी नांना- .. सिदि- अविनामावि यद् येन, न सत्तेन विरुध्यते ।। वृक्षत्वेनेव चूतत्व-मिहाप्येवं व्यवस्थितिः ॥५॥ यद् येन सहाऽविनामावि सामानाधिकरण्येन प्रतीयमानं, तत्तेन सह न विरुध्यते । मामानाधिकरण्यानुभवे सहा- नवस्थाननियमपरस्परपरिहारादिलक्षणविरोधनिरामात्, वृक्षत्वेन सामान्यरूपेण, विशेषरूपं चूतस्वमिव, सामान्यविशेष- रूपतया प्रविमक्तयोरपि वृक्षत्वचूतत्वयोः सामानाधिकरण्यानुमवाद् यथाऽविरोध इत्यर्थः, इहाप्युत्पादादित्रयेऽपि, एवं सामानाधिकरण्यानुभवप्रकारेण, व्यवस्थितिरविरोषसिद्धिः। इत्थं च यदुक्तमर्चटेन "उत्पादव्ययत्रीव्ययुक्तं सदित्ययुक्त । धौव्येणोत्पादव्यययोर्विरोधात् । कथाश्चिदुत्पादव्ययौ कवशिद्रौव्यमिति चेत्, यथोत्पादव्ययो, न तथा प्रौव्यं, यथा च ध्रौव्यं न तथोत्पादव्ययाविति नैकं वस्तु यथोक्तलक्षणं स्यादित्यादि," तदपास्तम् । उत्पादादीनां परस्परानुविद्धत्वेन रूपरसयोरिव विरोधाभावात् । धौम्यं परिणामिवस्त्वात्मकं तदुत्पादव्ययावप्युच्यते, न पुनस्तावत्यन्तव्यतिरिक्ती, तावपि वस्तुन एव परि- गामाविति धौव्यमप्युच्यते, न पुनस्तदत्यन्तव्यतिरिक्तं किञ्चिदिति । अत एव यथोत्पादव्ययौ न तथास्ति धौव्यमित्याद्यपि प्लवते, शरले वस्तुनि थाप्रत्ययार्थस्य प्रकारस्य व्यक्तिस्वरूपेणापि सम्मवात् । यद्यक्तिस्वरूपेण देवदचपिता तव्यक्तिस्व- रूपेण पुत्र इतिवत् । विविक्तव्यवहारच वैवक्षिक एव, यथोक्तधौव्य एवोचररूपप्राधान्यविवक्षयोत्पादस्य पूर्वरूपव्याधुचिप्राधा- न्यविवक्षया व्ययस्य तयोरेवान्वयप्राधान्यविवक्षया ध्रौव्यस्य व्यपदेशात , क्षयोपशमद्वारेणार्थित्वादिवशात्तथा तथा व्यवहार- प्रवृत्तेरिति सम्प्रदायः । वयन्तु ब्रूमा, "वद्रावाव्ययं नित्यम्" इति (तच्चार्थ अ०५-३०) सूत्रानुसारेण व्ययामाव- रूपत्वेऽपि धौव्यस्यावच्छेदक मेदाम विरोधो, ध्रौव्यावच्छेदकं हि द्रव्यत्वम् , उत्पादव्ययावच्छेदको चोचरपूर्वपरिणामत्वे इति, णामविना- मावित्वेना- विरोषस्य व्यवसाप नं, तेषाम- विरोषम सहमानस बौदविशेष- खार्चटस्म मतमपा- कृतम्, सन प्राचांस्वस्य च विचा- रावुपद- भिंती। , बनेकान्ता- नेकान्ते समन्तभद्र संवाद, इज्यते चावच्छेदकमेदेनाविरोधः संयोगतदभावादिस्थले मर्वैरपीति, यथोत्पादण्ययौन तथा धौव्यमित्याचम्युपगमेऽपि न थतिः। यथेत्यस्य यद्धविच्छेदेनेत्यर्थात् । न चैवम्प्रकारेऽनेकान्तमङ्गप्रसङ्गः, प्रकारैकान्तस्य धर्म्यनेकान्तानेकान्तत्वेनेष्टत्वात् । यत्समन्तभद्रः " अनेकान्तेऽप्यनेकान्तः, प्रमाणनयमापनात् ॥ अनेकान्तः प्रमाणात्ते, तदेकान्तोऽपितामयात् ॥१॥" इति । अत एव 'अनेकान्तेऽप्यनेकान्ताभ्युपगमेऽनवस्थापत्तिः' इति पशुपालप्रलपितमपास्तम् ।। तृतीयचतुर्षाबनेकान्तानां प्रथमद्वितीयादिरूपत्वेनानवस्थानिरामात् । अवच्छेदकावच्छेदकादिगवेषणया मतभङ्गीकोटयुत्थानस्य च विषयान्तरसहारा- दिना नयोपयोगविरामेणान्ततस्तत्वार्थवृत्युक्तदिशा शुद्धमाध्यमिकनयपर्यवसानेन वा विरामादिति ॥५॥ नन्वत्यन्तामतो भाव एव उत्पादः, निरन्वयोच्छेद एव विनाशः, अप्रच्युतानुत्पमस्थिरैकरूपतैव ध्रौव्यमित्येव कुतो न करप्यते, किमविनामाव्युत्पादादित्रयं कल्प्यते इति चेत्, उच्यते- नासतः सर्वथा भावो, न नाशः सर्वथा सतः॥ नान्वयोऽपि विनैताभ्यां, प्रमाणे प्रतिभासते ॥६॥ परकल्पितोत्पादादीनां प्रमाणाविषयत्वेन प्रागुक्तमविनामाव्युत्पादादित्रयमनुभवसिद्धमभ्युपगम्यत इति समुदितार्थः॥६॥ उत्पादो वस्तुनो भाव इत्यायुदेशक्रममनुरुध्य प्रत्येकविचारे पूर्वमुत्पादं विचारयति- उत्पादो यदि हष्टत्वा-विष्टःप्रामाणिकैः परैः॥ तदा द्रव्यस्य तद्भाव-परिणामोऽयमिष्यताम् ।।७।। यद्युत्पादो दृष्टत्वादुत्तमोऽयं घट इत्यादिप्रत्यक्षप्रसिद्धत्वात् । परैः प्रामाणिकैः, व्यवहारतः प्रमाणविद्भिः, इष्टः अभ्युपगतः, तदा द्रव्यस्य प्रतिनियतरूपेण परिणामस्वभावोऽयमेष्टव्यः । न हि तद्रूपपरिणामव्यतिरेकेणाकस्मिकं किमपि . स्थायाः पशुपालो- काया: परिहार, एकान्तवा- चभिमता- नामुत्पादा दीनामपा- करणम् खामिमतो- त्पादखल . .

श्री सादादि- सिदि- स्वाम्युपम तस्योत्पाद- खसमर्थन तत्र परि पामसस रूपमुत्पादस्वभावमनुभवामः । द्रव्यपर्यायान्यतरनिष्ठता तु तस्यान्यतरप्राधान्येन व्यवहर्तव्या । न चैवं घटादिपरिणामास्म- कत्वे उत्पादस्य द्वितीयादिक्षणे उत्पनत्वव्यवहारापतिः, नाशोत्पल्याश्रयत्वेन कालगर्मनष्टत्वव्यवहारवदाधक्षणावच्छिन- सद्भावाश्रयत्वेनैव कालगर्मोत्पादव्यवहारसम्भवादिति दिग् । मत एव कश्चिदुत्पादाभ्युपगम एव हि सुवर्ण कुण्डलत्वे- नोत्पद्यते, मृत्पिण्डो घटत्वेनेत्यादिव्यपदेशः सङ्गच्छते । प्रागनुपलब्धरूपस्योपलम्मश्च कथञ्चिदेव, न तु सर्वथा, मृदादि- रूपेण घटस्य प्रागप्युपलम्मात् । प्रतीत्य समुत्पाद इत्यपि परिणामानम्युपगमे वचनमात्र, किमपि प्रतीत्य कस्यचिदनुत्पा- दात् । ननु परिणामोऽपि वस्तुनः पूर्वरूपस्य परित्यागेनापरित्यागेन वा, आयेऽवस्थानां सायद् वृद्धोऽपि युवेत्युपलभ्येत, द्वितीये केन परिणामः, पूर्वरूपस्य निरुद्धत्वादिति चेत्, न, कथचित्परित्यागस्यैवोपगमात् । तदाहु:-" परिणामो बर्षा- न्तर-गमनं न च सर्वथा व्यवस्थानम् । न च मर्वथा विनाशः, परिणामस्तद्विदामिष्टः ॥ १॥" इति, हन्तैवं वृद्धाधव- स्थायां बालाघवस्थाऽस्ति नास्ति चेति युगपदुपलम्भानुपलम्मप्रसङ्ग इति, द्रव्यतयास्ति पर्यायतया नास्तीति तद्रूपाम्या युगपदुपलम्भानुपलम्मयोरविरोधात् । न x x x x x x x [इतोऽग्रे निखिलमपि विवरणं नास्माकं दृग्गोचरतामायातमिति मूलमात्र प्रकरणं प्रकाश्यते तदर्थजिज्ञासुना स्वोपक्षा वृत्तिः सुलमेति साऽवलोक्या] ॥ इति खण्डितावस्थं उत्पावादिसिद्धिप्रकरणविवरणं समाप्तम् ।। मर्थना॥ X xx x xx X x xxx ॥ उत्पादादिसिद्धि[द्वात्रिंशिका प्रकरणम् ॥ [मूलमात्रम्] बघ्रोब्ब- योगित्व- व्यवस्था पनम् ॥ यस्योत्पादव्ययध्रौव्य-युक्तवस्तूपदेशतः ॥ सिद्धमाप्तस्वभावत्वं, तस्मै सर्वविदे नमः ॥ १ ॥ यदुत्पादध्ययधौम्य-योगितां न विमति वै ॥ ताशं शशमादि-रूपमेव परं यदि ॥२॥ न यत्सत्ताभिसम्बन्धा-भ शक्तोंपलब्धित ॥ विनोत्पादब्ययनोव्यै-4- स्तुत्वमुपपद्यते ॥ ३ ॥ उत्पादो वस्तुनो भावो, नाशस्तस्य व्ययो मतः ॥ भोव्यमन्विनरूपत्व-मकं नान्योन्यवर्जितम् ॥ ४॥ अविनामावि योन, न तत्तेन विरुध्यते ॥ वृक्षत्वेनेव चूतत्व-मिहाप्येवं व्यवस्थितिः ॥ ५ ॥ नासतः सर्वथा भावो, न नाश. सर्वथा सतः । नाम्बयोऽपि विनैताभ्यां, प्रमाणे प्रतिभासते ॥ ६ ॥ उत्पादो यदि दृष्टत्वा-विष्टः प्रामाणिकः परैः ॥ तपप- रिणामोऽयं, तदेष्टव्यस्ततो न किम् ॥ ७॥ यदसत्ता केनापि, क्रियते वियदजवत् ॥ उपादानं न चेह स्यात्, सर्व सर्वत्र वा भवेत् ॥ ८॥ कार्यकारणभावादि-व्यवस्थाप्यत्र दुर्घटा । शक्तीनां नियमोऽप्येष, स्यात्सत्त्वेन विना कथम् ॥१॥ मिनो भाषादमित्रो पा, नाशः किं वा स एव न ? ॥ भेदे वस्तूपलभ्येत, ताइवस्थ्यप्रसङ्गतः ॥ १० ॥ अभेदे भाव एवाय-ममावः केवलोऽथवा ॥ ततः सहावभासेत, भावो यहा कदाऽपि न ॥ ११ ॥ अभावेऽपि च नाशस्य, वक्तुमेतदसाम्प्रतम ॥ न तस्य किश्चिद्भवति, न भवत्येव केवलम् ॥ १२ ॥ विद्युदाद्यपि नात्यन्तं, नाशित्वेन प्रकाशते ॥ अन्धकारापादान-भाषनास्येव सम्म- वात् ॥ १३ ॥ न चैवं तस्य रूपस्य, नाशे पूर्वसमुद्भवः ॥ तदन्यस्यापि तत्राशस्वभावस्य प्रसूतितः ॥ १४ ॥ कर्मतत्फलस- म्बन्ध-बन्धमोक्षाचसहतिः॥ स्फुटैव सर्वथोच्छेने, सन्तानः स्वः परो न वा ॥१५॥ इन्द्रियाधीनजन्मेय-मभेदप्राहिणी मतिः ।। प्रामाण्यं वाधवैकल्या-वश्नुते मेदबुनिषत् ॥ १६ ॥ यदमेदस्य मेदेन, भवनं सोऽयमन्वयः ।। एकान्तेन न नित्यत्वं, प्रमाणानुप- भी उसादादि- सिदि- पत्तितः ॥ १७ ॥ भावा हेयस्वभावाशे-नित्यं नमानसम्भवः ॥ त(म)याशेयस्वभावास्ते, कदा तज्ज्ञानसम्भवः ? ॥ १८ ॥ सह- कारिव्यपेक्षाऽपि, नित्यैकान्ते न युज्यते ॥ नाधेयं नापनेयं वा, रूपं तेस्तस्य किश्चन ॥ १९ ॥ वस्तुतोऽचिन्त्यशक्तित्वादे(त्वमेव चेदिष्यते परैः ॥ द्रव्यरूपस्य पर्याये-रैक्यं ष्टं न किं मतम् ? ॥ २० ॥ न हि द्रव्यातिरेकेण, पर्यायाः सन्ति केचन ॥ द्रव्यमेव ततः सत्यं, भ्रान्तिरन्या तु चित्रवत् ॥ २१ ॥ पर्यायव्यतिरेकेण, द्रव्यं नास्तीह किश्चन ॥ भेद एव ततः सत्यो, भ्रान्तिस्तद्- धोव्यकल्पना ॥ २२ ॥ नाभेदमेव पश्यामो, भेदं नापि च केवलम् ॥ जात्यन्तरं तु पश्याम-स्तेनानेकान्तसाधनम् ।। २३ ॥ सुखदुःखादिसम्बन्धो, युज्यते कथमन्यथा ? ॥ व्यर्थः श्रमस्ततोऽन्येषां, दुस्तर्काकुलचेतसाम् ॥ २४ ॥ ननूत्पादादयो धर्मा, मिक्षाः स्युर्धर्मिणो यदा ॥ नीरूपत्यं तदा तस्य, वाच्यं या लक्षणान्तरम् ॥ २५ ॥ अमेवे युक्तता न स्यात्, अस्यामेदव्यपे- क्षणात् ।। सम्बन्धशब्दो नायं यद्, न येन विना स तु॥२६॥ किं चोत्पादादियोगित्व-मुत्पादादेर्यदेष्यते ।। अनवस्था तवा मृग्य, तेनान्यबस्तुलक्षणम् ॥२७॥ सत्त्वं हि वस्तुनो रूपं, सदिति प्रत्ययो यतः ॥ सत्त्वरूपवियोगेन, नोत्पादादेरपि स्थितिः ॥ २८ ॥ यदुत्पादन्ययौव्य-युक्तं तेभ्यः परं न तत् ॥ किन्त्वभेदांशमाश्रित्य, तेषामेव तथा स्थितिः॥२९॥ मिनशब्दप्रवृत्तिश्च, मेदांश- स्थापि सम्भवात् ॥ निरपेक्षौ न चान्योऽन्य, भेदाभेदाविमौ क्वचित् ॥ ३०॥ वस्तुनस्तन नैरूप्यं, न चान्यदपि दूषणम् ।। सदिति प्रत्ययोऽप्येष, तत एवोपजायते ॥ ३१ ॥ बोधरूपादयोऽप्येत-रूपयामेदवर्तिनः ॥ कथञ्चित्तेन जैनेन्द्र, मुरशं वस्तुलक्षणम् ॥ ३२॥ Desame amvad उत्पादादि-: प्रययोगि- त्वलक्षण- सच्चव्यव- स्थापने मेदैकान्त पूर्व मेदा- मेदानेका.. पनम् ॥ ॥श्री उत्पादादिसिद्धिद्वात्रिंशिकाप्रकरणं समाप्तम् ॥ NSGRRA ॥ॐ अहे सत्तर्कदेशिने श्रीवर्धमानस्वामिने नमः॥ ॥न्यायविशारद-न्यायाचार्य-श्रीयशोविजयवाचकविरचिता वादमाला ॥ चित्रसे विप्रतिष- तया कि ऎकारस्मरणं कुर्व-शेष न्यायविशारदः ॥ वादमालां वितनुते, शिष्याणां हितकांक्षया ॥१॥ तत्र चित्ररूपं विचार्यते । तत्र नीलासमवायिकारणको नीलो नवेति विप्रतिपत्तिः। विधेः पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन, निषे- घस्य च सामानाधिकरण्येनोद्देश्यत्वाम सिद्धसाधनवायी। नीलरूपासमवायिकारणकरूपत्वं पीतरूपासमवायिकारणकात्तिनवा, नीलो नीलान्यरूपासमवायिकारणं नवेत्याद्या वा विप्रतिपत्तयः। अत्रैकदेशिनः (प.२५.३अन्वयः) "नीलासमवाविकारणको नील एव, नीलातिरिक्तस्य तच्चे गौरवात् , तथाहि, चित्रत्वावच्छिदं प्रति न नीलत्वादिना हेतुत्वं, व्यभिचारात , नापि रूप- त्वेन, नीलमात्रारब्धेऽपि तदापत्तेः। अथ नीलेतरपीतेतररूपादेरपि तत्र हेतुत्वाम तदापत्तिः, यत्रैकावयवे नीलोऽपरन च पीत- जनकामिसंयोगस्तत्रावयवे पीतरूपोत्पत्यनन्तरमेवावयविनि चित्रोत्पत्तिस्वीकाराम व्यभिचारः। न च नीलामावादिषट्कस्यैव समवायेन विजातीयचित्रं प्रति स्वाश्रयसमवेतत्वसम्बन्धेन हेतुत्वमस्त्विति वाच्यम्, नीलपीतोमयकपालारब्धे घटे पाकनाशि- तावयवपीतखचित्रेऽवयवे व्याप्यतिनीलोत्पत्रिकाले चित्रोत्पत्यापचेः। न च कार्यसहभावेन नीलामावादीनां तदेतत्वाबायं दोष इति वाच्यम्, नीलपीतश्चेतत्रितयकपालारब्धे पाकेन पीतश्चेतयोः क्रमेण नाशे घेतनाशकालेऽपि तदापचेः । अथाऽस्तु मयुपपन्त जांनन्य नैयायि- काना पूर्वपक्षः॥

करणम्॥ नीलनीलजनकतेजासंयोगान्यतरत्वाच्छिनामाववादिना हेतुत्वमिति चेत्,न, संयोगस्याव्याप्यवृत्चित्वेन प्रतियोगिव्यधिकर- पदमावस्वादिना हेतुतायां गौरवात् । अपि चोक्तसम्बन्धेन नीलामावादीनां चित्रहेतुत्वे वाय्वादावपि तदापचे, उक्त- रूपत्वेनापि तद्धतुताकल्पने गौरवम् । न च जन्यरूपत्वावच्छिदं प्रत्येव रूपत्वेन हेतुत्वान तदापत्तिः, नीलादौ नीलादेहेतु- तावश्यकत्वे तामहेतुतायां मानामावात् । एतेन ' अनवच्छिबविशेषणतया प्रतियोगिवैयधिकरण्याविशेषितोक्कामावहेतुत्व- सम्मवेपि न अतिरिति चेत्, न, पाकमात्रादपि चित्रोपचेः। अथ रूपजन्यतावच्छेदकं विजातीयचित्रत्वम् , अनिसंयोग- जन्यतावच्छेदकं वापरम् । अनिसंयोगजन्यचित्रं प्रत्यवच्छेदकत्वसम्बन्धावच्छिमप्रतियोगिताका नीलजनकाग्निसंयोगादेर- मावा उक्तप्रत्यासत्या हेतवो रूपजनकविजातीयाग्निसंयोगबेति न वाय्वादौ तदापत्तिः, स्वाश्रयसमवेतत्वसम्बन्धावच्छिन- प्रतियोगिताकरूपामावस्यापि तद्धेतुत्वेन नोमयस्मात् तदुत्पत्तिा, न च रूपजचित्रं प्रत्यमिसंयोगामावस्यैव हेतुत्वं किं न स्यात् इति वाच्यम्, नानामिसंयोगाभावानां हेतुत्वकल्पनापेक्षया रूपसामान्याभावस्यैव तत्कल्पनौचित्यादित्याहु, वस्तुतो विजातीयाग्निसंयोगामावस्यैव रूपजचित्रे हेतुत्वसम्भवाम किनिदेवत्, किन्तु विजातीयचित्रे विजातीयतेज:- संयोगस्य, विजातीयचित्रे चोमयोरेव हेतुत्वं, नीलेतररूपत्वादिनैव चित्रहेतुत्वे तु रूपमात्रजातिरिक्ते विजातीयतेजःसंयोग एव हेतुः, फलवलेन वैजात्यकल्पनात् । अग्निसंयोगमात्रजातिरिक्त रूपहेतुताया वक्तुमशक्यत्वाचेति ध्येयम् ।। पाकजचित्रे वा मानाभावः, पाकादवयवे नानारूपोत्पश्यनन्तरमेवावयविनि चित्रस्वीकारे लापवादित्येके । तचिन्त्यम्, चित्रजनकत्वामिमतस्य पाकस्यावयवनीलपीतादिजनकत्वे नीलपीतादिजनकतावच्छेदकजातिसार्यादुमयादिबनकतावच्छेद- चित्ररूप- विचारे चित्ररूपा- नम्युपग- न्तर्वपये चित्ररूपा- म्युपगन्तु रवेत्यादि- ना पूर्व- . . १७॥

विचारे चि- संबलित- कजातस्तत्र नानापाकादीनां वा कल्पने गौरवादित्यपरे । यत्तु 'नीलासमवायिकारणत्वादिनैव चित्रसामान्य प्रति हेतुता' इति तमाऽसमवायिकारणत्वस्यातिगुरुत्वेन कारणतानवच्छेकत्वादिति चेत्, न, चित्रस्थले नीलादिसामग्रीमत्वाचीलाधापत्तिवार- णाय नीलादौ नीलेतररूपादेः प्रतिबन्धकत्वकल्पने गौरवादित्याहुः ॥" तदसत्, अव्याप्यवृत्तिनीलादिकल्प एवं गौरवाद, तथाहि, अवच्छेदकतासम्बन्धेन नीलादिकं प्रति समवायेन नीलेतररूपादीनां प्रतिवन्धकत्वं वाच्यम् । अन्यथा पीतावयवावच्छे- देन नीलोत्पचिप्रसङ्गात् । न च नीलस्य स्वाश्रयावच्छेदेन नीलजनकत्वस्वभावादेव न तदापत्तिरिति वाच्यम् । विनतादृश- प्रतिवध्यप्रतिबन्धकमावं तथास्वामाव्यानिर्वाहात् । ननु समवायेन रूपं जायत एव, पीतावयवावच्छेदेनेत्यत्रापादकामाव इति चेत्, न, समवायस्येवावच्छेदकताया अपि कारणनियम्यत्वौचित्यात् । यत्तु 'अवच्छेदकतया नीलहेतुः अवच्छेदकतया नीला- भाव एव तदापादक इति' तश्चिन्त्यम् । अवच्छेदकतया जन्यरूपत्वाच्छिन्न प्रति तया(अवच्छेदकतया) रूपस्यापि प्रतिवन्ध- कत्वे मानाभावात् , समवायेन रूपहेतोः समवायेन रूपाभावस्याऽभावादेवावच्छेदकतया रूपे उत्पने पुनस्तया तदुत्पत्यस- म्मवाद, कार्यतावच्छेदकीभूततद्धर्माश्रययत्किञ्चिव्यक्तिवृत्तिकार्यतानिरूपितकारणतावच्छेदकावच्छिवं यावत्प्रत्येकं तावत्सव एव कार्योत्पत्तिनियमात् । अत एव नीलपीनोमयकपालनीलावच्छेदिकायामेव नीलकपालिकायामवच्छेदकतया घटनीलोत्पत्तिः सम्गच्छते, सामग्रीसच्चात् , एवञ्च नीलादौ नीलेतररूपादीनां नीलेतररूपादौ वा नीलादीनां प्रतिबन्धकत्वे विनिगमकामावः, मम तु नीलेतररूपादौ नीलादीनां न प्रतिवन्धकत्वं नीलपीतारब्धे नीरूपत्वप्रसङ्गस्यैव बाधकत्वात् । अथ ममापि नीलत्वादि- -जिन पीतेतररूपत्वादिक, गौरवात। न च नीलत्वेन प्रतिवन्धकत्वं न तु नीलेतरत्वेन गौरवादित्येव पूर्वपक्षस्य. तदसदि- त्यादिना प्राचीनाना विविधा- श्रीवाद- विचारेमा माला १६ प्रकरणम्॥ ॥१८॥ २० . किं न स्यात्, अवच्छेदकगौरवस्थाऽदोषत्वात् , अस्तु वाऽच्छेदकतया नीलादौ समवायेन नीलादीनामेव हेतुत्वं, न च नानारूप- वत्कपालारग्वषटनीलस्य तत्कपालावच्छेदेनोत्पतिप्रसङ्गः, केवलनीलत्वादिनैव तद्धेतुत्वात् , समवायेन नीलादौ च स्वसम- वायिसमवेतत्वसम्बन्धेन नीलादीनां हेतुत्वं, न च नीलमात्रारम्धनीलस्यावयवेऽवच्छेदकतयोत्पत्तिप्रसङ्गा, स्वसमवापिसमवे- तद्रव्यसमवापिन्वसम्बन्धेन नीलेतररूपादीनामप्यवच्छेदकतया नीलादौ हेतुत्वात् । केचित्तु 'व्याप्यवृत्तिनीलस्थलेऽव्याप्य- वृत्तित्ववारणाय समवायेन नीलेतररूपविशिष्टनीलत्वेनावच्छेदकतया रूपं प्रति हेतुता' इत्याहुः, तन्मेत्यन्ये, नीलविशिष्टनीलेतर- स्याप्येवं हेतुतापची पृथक्कार्यकारणभावात् । वस्तुतोऽवच्छेदकतया नीलादावुक्तमम्बन्धेन नीलेतररूपविशिष्टनीलत्वादिनैव हेतुत्वं, नच नीलेतरत्वाद्यवच्छि प्रति नीलविशिष्टनीलेतरत्वादिना हेतुत्वे विनिगमकाभावो नीलस्वापेक्षया नीलेतरत्वस्य गुरुत्वात् ।। एतेन 'उक्तसम्बन्धेन नीलेतरादेर्नीलादिकं प्रति हेतुत्वं नीलादीनां नीलेतरादिकं प्रति वेति विनिगमनाविरहाद्वादश- कार्यकारणभावापत्तिरित्यपास्तम् । इत्थं चातिनिष्कर्षादस्माकं द्वादशैव कार्यकारणभावा इति चेत्, चित्ररूपकल्पेऽपि नीले- तररूपादिषट्रस्य चित्रं प्रति हेतुत्वं नीलादौ च नीलेतरादीनां प्रतिबन्धकत्वं तत एत नानारूपवत्कपालारब्धे शुक्लावयवमात्रा. रब्धे च नीलायनुत्पत्तिनिर्वाहादिति तुल्यम् । अव्याप्यवृत्तिनानारूपतत्मागमावप्रध्वंसादिकल्पनागौरवं पुनरपिकमायुष्मतः, यदि च नीलपीतवत्यमिसंयोगाभीलावयचावच्छेदन पाके रक्तोत्पत्तिर्न स्याद्रूपं प्रति रूपस्य प्रतिबन्धकत्वादिति विमृश्य नीलादौ नीलादेविशिष्य प्रतिबन्धकत्वं कल्प्यते, तदापि चित्ररूपकल्प एव लाघवम् । स्वतन्त्रास्तु चित्ररूपं प्रति रूपत्वेनैव हेतुत्वं, नीलमात्राचारधे तु चित्रप्रागभावाभावादेव न तदुत्पत्तिः, अस्तु वा चित्रं प्रति चित्रेवररूपस्य, चित्रेवरं प्रति चित्रस्म मन्तमा कारणो- पदर्शनं न व्यक कतत्पति- धयुक्तरपार करणं स- तन्त्राणां मतस्योप- दर्शन। ॥१८॥ २४ .

कार्यसहमावेन प्रतिबन्धकत्वमित्यतिलाधवमित्याहुः । अथ व्याप्यवृत्तिरूपस्याप्यवच्छेदकस्वीकारादवच्छेदकतया नीलादिकं प्रति समवायेन नीलादेर्हेतुत्वादव्याप्यवृत्तिरूपसिद्धिः । न चैवं घटेऽपि तया नीलाद्यापत्तिः, अवयवनीलत्वेन द्रव्यविशिष्ट- नीलत्वेनैव वा तद्धतत्वात् । न च नीलमात्रपीतमात्रकपालिकाद्धयारधनीलपीतकपाले तदापत्तिः, नीलकपालिकावच्छिमत- दवच्छेदेन तदुत्पत्तेरिष्टत्वात् । अस्तु वा तया नीलादौनीलेतररूपादेरेव विरोधित्वमिति चेत्, न, नीलादौ नीलेतररूपादिप्रति- बन्धकतयैवोपपत्तौ तत्र नीलादिहेतुताया मानाभावेन नानारूपवदवयवारब्धेऽवयविनि चित्ररूपसिद्धेरेव प्रामाणिकत्वात् , व्या- प्यवृत्तेरवच्छेदकाऽयोगादुक्तविनिगमनाविरहाच्चावच्छेदकतया नीलादिकं प्रति समवायेन नीलेतरादेः प्रतिबन्धकत्वापेक्षया समवायेन नीलादिकं प्रति स्वसमवायिसमवेतत्वसम्बन्धेन नीलेतररूपादेः प्रतिबन्धकत्वकल्पनाया एव न्याय्यत्वात् ।। केचिनु 'विजातीयचित्रं प्रति स्वविजातीयत्वस्वसंवलितत्वोमयसम्बन्धेन रूपविशिष्टरूपत्वेनैव हेतुत्वम् ,स्ववैजात्याच 'चि. त्रत्वातिरिक्तं यत् स्ववृत्ति तद्विधर्मसमवायित्वं',स्वसंवलितत्वं च 'स्वसमवायिसमवेतद्रव्यसमवायिवृत्तित्वं',न च स्वत्वाननु- गमः,सम्बन्धमध्ये तत्प्रवेशाद्"इत्याहुयत्तु "नीलपीतोमयाभावपीतरक्तोमयाभावादीनां स्वसमवायिसमवेतत्वसम्बन्धाक्- च्छिमप्रतियोगिताकानां समवायावच्छिमप्रतियोगिताकानां च विजातीयविजातीयपाकोमयामावादीनां यावरवावच्छिनप्रति- योगिताकोऽभाव एकश्चित्रत्वावच्छिन प्रति हेतुरिति" तब,प्रसिद्धान्वयव्यतिरेकग्रहविषयतावच्छेदकरूपेणैव कारणत्वौचित्यान, अन्यथा प्रायशोऽन्यत्राप्यमावविशेषस्यैव हेतुत्वप्रसङ्गात् । परे तु "चित्रत्वावच्छिन्ने रूपत्वेनैव हेतुता नीलपीतोमयारब्धाषि- चित्रत्वाचान्तस्वैलवण्यावच्छिन्ने चनीलत्वेन पीतत्वेन च देतता",एवं त्रितयारम्बे तत्चत्रितयत्वेन,नीलपीतोमयादिमात्रारखेच वादे चित्र- रूपाम्युपग- न्तुप्राचीन- मतपरिष्का- रिअन्याय- वृचिरूपा- भ्युपगन्त- मतस्यस ण्डन,चित्र- रूपपक्ष एक कारणता- मेदोषदर्श कमतो- दर्षना॥

नीलपीतान्यतरादीतररूपत्वेन प्रतिवन्धकत्वाम त्रितयारब्धचित्रवति द्वितयारम्पचित्रप्रसङ्गो, न चैवं गौरवं, प्रामाणिकत्वाद् । वस्तुतः समवायेन द्वितयजचित्रादौ स्वाधिकरणपर्यातहत्तिकत्वसम्बन्धेनैव द्वितयादीनां हेतुत्वं, नातः प्रागुक्तप्रतिबन्ध- कत्वकल्पनागौरवम् ॥उच्शलास्तु "नीलपीतरक्ताधारब्धघटादौ नीलपीतरक्तादेव नीलपीतोमयजपीतरक्तोमयजतत्रितयज- चित्राणामुत्पत्तिः, सर्वेषां सामग्रीसत्त्वात् । न चैकमेव तदस्त्वितिवाच्य, तत्तदवयवद्वयमात्राद्यवच्छेदेनेन्द्रियसत्रिक विलक्षण- विलक्षण-चित्रोपलम्मात् जातेरण्याप्यवृत्तित्वे पुनरस्त्वेकमेव तत् ,किश्चिदवच्छेदेन तत्र नीलत्वपीतत्वरक्तत्वविलक्षणचित्रत्वादि- सम्भवाद" इत्याहुः।। अत्र वदन्ति "नीलविशिष्टपीतादिना नीलपीतोमयादिना वाऽवान्तरचित्रबुद्धिमम्मवानावान्तरचित्र- सिद्धिश्चित्रत्वेन सममवान्तरचित्रत्वसामानाधिकरण्यप्रत्ययस्यापि नीलपीतविशिष्टचित्रत्वसामानाधिकरण्यावगाहित्वावस्तुतो नीलावविशेषितनीलादिमेदाश्रयरूपसमुदायेनाऽनुगतचित्रप्रतीतिमम्मवाच्चित्रत्वमामान्यमप्यसिद्धमेवेति",तचिन्त्यम्। चित्र- त्वजातेरनुमवसिद्धत्वेनापलापायोगाद् अन्यथा नीलादिप्रतीतेरपि भेदविशेषावगाहित्वेन नीलत्वादिकमपि विलीयेत,चित्रत्व- ग्रहे च परम्परयाऽवयवगतनीलेतररूपपीतेतररूपादिमचग्रहो हेतुः, अत एव "त्र्यणुकचित्रं चक्षुषा न गृह्यते" इत्याचार्यः ।। न च नीलेतररूपत्वाचवच्छिमप्रकारताकग्रहो न हेतुर्नीलत्वपीतत्वादिनाऽवयवगतनीलपीतादिग्रहेऽप्यवयविचित्रप्रत्यक्षा- दितिवाच्यम्। विलक्षणचित्रप्रत्यक्ष तेन तेन रूपेण तवद्रहस्यापि हेतुत्वात् । वस्तुतो "नीलेतररूपत्वादिव्याप्यत्वेन नीलेतररूप- त्वपीतत्वाचनुगमाम क्षतिः, त्रसरेणोश्चित्ररूपाग्रहे चतुरणुकचित्रप्रत्यक्षानुपपचे, नीलेतररूपपीतेतररूपादिमदवयवावच्छेदेने- न्द्रियसभिकर्षोऽवयवनीलानुगतनीलत्वादिग्रहविरोधिदोषाभावश्च हेतुः"इति वदन्ति । अवयविनि साधाबीलपीतादिग्रह एव तद्- वादे प्राची- नमतपरि- कारे अ- बान्तराने- कजातीय- चित्राम्युप- गन्तॄणास- व्यूहला- नाम्मतम्. चित्रस्वा- नम्युपग- न्तमतस्य २४ वादेप्राची- नमतपरि कारेचित्र: गौरवोपद- . किमतस्य हहेतुचित्रवति नीलपीतादि-समावेशस्य प्रामाणिकत्वे तत्प्रमाया इतरथापि तद्ममस्य सम्मवादित्ययाहुः। यत्तु "अध्याय- वृत्तिनीलादिकल्पे ताहग्नीलादिप्रत्यक्षे द्रव्यसमवेतप्रत्यक्षत्वावच्छिन्नं प्रत्यव्याप्यचिद्रव्यसमवेतप्रत्यक्षत्वावच्छिमं प्रति वा चक्षुःसंयोगावच्छेदकावच्छिनसमवायसम्बन्धावच्छिमाघारतासभिकर्ष एव निरूपकतया विषयनिष्ठो हेतुः, स च संयोगादि- प्रत्यक्षस्थले क्लस एव, न च नीलकपालिकावच्छेदेन चक्षुःसनिकर्षस्य तत्समवेतनीलपीतोमयकपालावच्छिनत्वनियमात् तदवच्छेदेन सभिकर्षे पीतग्रहापत्तिः, संयोगव्यक्तिर्यदेशव्यापिनी तत्र परम्परया तहेश एवावच्छेदको न तु सम्पूर्णोऽवयव इत्यम्युपगमात्, चित्ररूपकल्पे च चित्रप्रत्यक्षे उक्तकार्यकारणभावकल्पनागौरवमिति " तन, तादृशगौरवस्य फलमुखत्वेना- दोषत्वात् । अपरे तु" तत्र व्याप्यवृत्तीन्येव नीलपीतादीन्युत्पद्यन्ते नीलादिकं प्रति नीलेतरादिप्रतिबन्धकत्वनीलामावादि- कारणत्वकल्पनापेक्षया व्याप्यवृत्तिनीलपीतादिकल्पनाया एवं न्याय्यत्वादित्याहु:, तदपि न, नीलकपालावच्छेदेन चक्षुःस- भिकर्षे पीतादेरुपलम्मापतेः, नीलाद्यवयवावच्छेदेन सनिकर्षस्य नीलादिग्राहकत्वकल्पने च गौरवात् । यत्तु "एतत्कपाला- पच्छिमसंयोगादिप्रत्यक्षानुरोधेनैतत्कपालानवच्छिनचिकत्वे सति यत्तत्रीलान्यं तद्भिनं यदेतदटसमवेतं तस्यैतत्कपाल- विषयकसाक्षात्कारं प्रत्येतत्कपालावच्छेदेनैतषटचक्षुःसभिकर्षस्य हेतुत्वान पीतावयवायवच्छेदेन सभिकर्षे नीलादिचाक्षु. पापत्तिरिति", तन, तथा हेतुतायां महागौरवात् ।। किश्चैवं नीलावयवाद्यवच्छेदेन नीलादिप्रतीतेर्धमत्वापत्तिरपि नीलेतरादे- नीलादिविरोषित्वे कथं तत्र व्याप्यवृत्तिनीलपीतादिकम् , इत्यायूहनीयम् । रसगन्धौ तु व्याप्यवृत्ती एव नानारसापवयवारम्बा- वयविनो नीरसत्वादिकमेव,तत्र नानारसकरुपने गौरवात् । पदरसा हरितकी इतिव्यवहारस्तु तस्याः पडसकार्यकारित्वात् पर- खण्डनं चित्रस्थले व्याप्य चिनीलाब- भ्युपगमम- तस्य खण्ड- नम्,रसम न्धयोन- बाद-१६ माला- ॥२०॥ परवाऽवयवगतपररसवतया वोपपादनीयः। नन्वेवं नीरूपो निःस्पर्शस्तत्रावयवी किं न स्यात्, न पैवमप्रत्यय: स्यात्, द्रव्य- तत्समवेतचाक्षुषस्पार्शनसाधारण्येन चाक्षुषत्वावच्छिनं प्रति स्पार्शनत्वावच्छिदं प्रत्येव च स्वाभयसमवेतचित्वसम्बन्धेन च रूपस्य स्पर्शस्य च हेतुस्वादत एव त्रुटिचाक्षुषाचनुरोधेन परमाणुळ्यणुकयोरपि सिद्धिः" इत्याहुः, तचिन्त्यम् । चित्रकपालि- कास्थले तदसम्भवात् । किश घटाकाशसंयोगाचचाक्षुषत्वानुरोधेन चाक्षुषत्वावच्छिन्नं प्रति स्वाश्रयसमवेतत्वसम्बन्धेन रूपा- भावस्य प्रतिवन्धकत्वं कल्पनीयं व्यासज्यवृत्तिगुणप्रत्यक्षं प्रति यावदाश्रयप्रन्यक्षस्य हेतुत्वेऽप्यन्यासज्यवृत्याकाशादिगुणा- चाक्षुषत्वोपपत्तये रूपवत्त्वस्य द्रव्यसमवेतप्रत्यक्षनियामकप्रत्यासत्तिषटकत्वे गौरवात् , न च स्पर्शशब्दाबन्यतममेदस्य चाक्षु- पहेतुत्वात् स्पर्शादेरिव शब्दादेरपि तच्चतच्वेन चाक्षुषाहेतुत्वादेव वा नाकाशादिगुणचाक्षुषापत्तिरितिवाच्यम् , अखण्डमेदस्या- हेतुत्वात् रूपामावस्य चाक्षुषप्रतिवन्धकत्वे शब्दादीनां तत्व-तत्त्वेन हेतुत्वाकल्पनलाघवाच । न च चाक्षुषामावस्यैवास्तु द्रव्या- न्यसचाक्षुषं प्रति प्रतिवन्धकत्वम् ,आश्रयाचाक्षुषत्वेनैव दयणुकाबचाक्षुषत्वोपपत्ती महत्त्वस्यापि प्रत्यासत्यघटकत्वे लापवादिति वाच्यम् । लौकिकविषषितावच्छिनचाक्षुषामावापेक्षया समवायसम्बन्धावच्छिनरूपाभावस्य लघुत्वात् । किश त्रुटावेव विश्रामे महत्वस्योमयथा प्रत्यासत्यघटकत्वे विनिगमनाविरहादपि रूपामावस्य प्रतिबन्धकत्वम् । इत्थं च तादृशघटस्य नीरूपत्वे तादृशघटवृत्तिसंयोगादिचाक्षुषं न स्यात् , एतेन " उतैकत्वस्यायोग्यव्यावृत्तधर्मविशेषस्यैव वा द्रव्यचाक्षुषकारणत्वेन रूपं विनाऽपि घटादिचाक्षुषत्वोपपादनेन स्वतन्त्राणां तादृशघटस्य नीरूपत्वं" प्रत्याख्यातम्, स्पार्शनं प्रति तु पार्शनामावस्यैव प्रतिबन्धकत्वं,न तुस्पर्शामावस्य त्रुटिसमवेतास्पार्शनानुरोधेन संयुक्तसमवायप्रत्यासचिमध्ये प्रकृष्टमहत्त्वस्य घटकत्वे गौरवाद, २४ वादे चातु पम्प्रतिश- [क्तिमत्वेन कारणत्वं न तुरूपत्वे- नेतिप्रश्न- एवं च ताशघटस्य निःस्पर्शत्वे तु न क्षतिः, इतिमदेकपरिशीलितः पन्थाः॥ अथ चाक्षुषसामान्य प्रत्येव मात्रामावसा- धारणेन शक्तिविशेषण लापवाद्धेतुत्वम् , अन्यथा द्रव्यचाक्षुषे समवायेन गुणादिचाक्षुषे च सम्बन्धसम्बन्धविशेषेण रूपस्य हेतुत्वे वक्तव्ये गौरवादिति किमर्थ नानारूपवदवयवारब्धावयविन्यनन्तरूपादिकल्पनमिति चेत्, न, रूपत्वादिनाऽम्वयव्यतिरेक- महानैव रूपेण रूपस्य विषयस्य च तत्तद्रूपेण चाक्षुषहेतुत्वात् , अन्यथा दण्डचक्रादीनामपि घटं प्रति शक्तिविशेषेणेव हेतु- स्वप्रसङ्गात् । किवं रूपादीनामेव शक्तिविशेषेण हेतुत्वं विषयस्य वेति विनिगमनाविरहः, न च रूपादीनां प्रत्यासत्तिमेदेन कारणतामेदस्तत्प्रत्यासचीनामेव शक्तिविशेषेणानुगताना हेतुस्वप्रसाद, अपि चैवं चाक्षुषसामान्य प्रति प्रयोजको रूपस्यैव सिखतु कथन सम्बन्धविशेषो, न तु शक्तिविशेषः, एवञ्च व्यणुकादिवृत्तिरूपस्यैव सम्बन्धविशेषेण चतुरणुकादिसाक्षात्कार- सम्मवेऽनन्तावयविरूपाकल्पनया लाघवमिति । यदि च ममवायेनैव रूपस्याऽन्वयव्यतिरेकग्रहादिना तेनैव तस्य द्रव्यचाक्षुष- हेतुत्वं तदा सिद्धं नः समीहितम् ॥ इति चित्ररूपविवेचको वादः ॥ प्रथमो वादः समाप्तः ॥१॥ (२)वेशेषिकाणां लिङ्गोपहितलैङ्गिकभानाम्युपगमो नियुक्तिकत्वेन न श्रद्धेयः, न च वहिव्यायधूमवत्पर्वतत्वावच्छिनोहे- श्यताकवहित्वावच्छिन्नविधेयताकानुमितित्वस्य धूमपरामर्शजन्यतावच्छेदकत्वात् तसिद्धिः,शुद्धपर्वतत्वसामानाधिकरण्यमात्रा- वगाहिन्यामनुमिती सामानाधिकरण्यमात्रावगाहिपरामर्शस्य शुद्धपर्वतत्वावच्छिमविशेष्यतानिरूपितविशेषणतासंसर्गावच्छिन- विरोधिप्रकारताशून्यशुद्धपर्वतत्वावच्छिमविशेष्यतानिरूपितधूमप्रकारताशालित्वेन हेतुतायां पर्वतत्वातिरिक्तधर्मानवच्छिमत्व- लक्षणशुद्धपर्वतत्वावच्छिमत्वस्थले वहिव्याप्यधूमवत्पर्वतत्वावतिरिक्तधर्मानवच्छिमत्वनिवेशे गौरवात् , पक्षेऽलौकिकहेत्वाधमा- स्य खण्डन चित्ररूपवा- दसमाक्षिा लिङ्गोपहि- तलैङ्गिक मानवादा स्मानी भी युपगत- लिडोपहि- ॥२१॥ बनियाद् द्वितीयक्षणोत्पबात्विाचंशे लौकिकपराम द्वितीयक्षणेऽनुमित्यनापतेश्च । एतेन “वहिण्याच्यधूमवत्पर्वतो वहिन्या- प्यध्मवान् ,पर्वतो वाहिन्याप्यधूमवान् इति परामर्शयोरेकरूपेणानुमितिहेतुत्वात् तत्सिद्धिः" इत्यपास्तम् । पर्वते हेत्वभावनिश्चय- दशायां लिङ्गोपहितलैङ्गिकानुमित्यनुपपत्तेः, तत्र शुद्धपर्वतत्वावच्छिन्नविशेष्यताकानुमित्यम्युपगमेऽपि तादृशानुमितौ तास- परामर्शस्य. हेतुतायां व्यभिचारो, वहिव्याप्यधूमवत्पर्वतत्वावच्छिभविशेष्यताकपरामर्शस्य वहिव्याप्यधूमविषयतामनन्तर्मा- व्य स्वाव्यवहितोचरपर्वतविशेष्यकवाहिविधेयकानुमितित्वावच्छिन्नं प्रत्येव हेतुत्वे तु शुद्धपर्वतत्वावच्छिमविशेष्यताकपरामर्श- स्याऽपि स्वाव्यवहितोत्तरतादृशानुमितित्वावच्छिनं प्रत्येव हेतुत्वेनास्मत्पक्षप्रवेशात् । अथाव्यवहितोत्तरत्वमनिवेश्य वाहिन्याप्य- धूमवत्पर्वतत्वपर्याप्तविशेष्यतावच्छेदकताकवाहित्वावच्छिनविधेयताकानुमितित्वावच्छिवं प्रति वहिव्याप्यधूमत्वावच्छिन्नप्रका- रतानिरूपकविशेग्यतावच्छेदकतासम्बन्धेन परामर्शस्य हेतुत्वम् , नातः पर्वतत्वपर्याप्तविशेष्यतावच्छेदकताकपरामर्शजन्यानुमिती पर्वते वहिमनुमिनोमीतिवदहिव्यायधूमवत्पर्वते वहिमनुमितोमीत्यनुव्यवसायापत्तिः, तत्र वहिव्याप्यमवत्पर्वतत्वस्य विशेष्य- तावच्छेदकत्वेऽप्युद्देश्यतानवच्छेदकत्वात् , न वा वहिव्याप्यालोकवान् पर्वतो वहिव्याप्यधूमव्याप्यवाति परामर्शदहिव्याप्या- लोकवान् पर्वतो वहिमान् वहिव्याप्यधूमव्याप्यवान् पर्वतो वहिव्याप्यधूमवानित्यनुमितेषूमपरामर्श विनाऽप्युत्पत्ती व्यभिचार, तादृशानुमितेर्वहिल्याप्यधूमप्रकारतानिरूपितपर्वतविशेष्यताकत्वेऽपि वहिन्याप्यधूमवत्पर्वतत्वपर्यासविशेष्यतावच्छेदकताकत्वा- भावात्, नापि वहिव्याप्यधूमवान् पर्वतो घटोति परामर्शजन्यानुमिती घटस्योद्देश्यतापत्तिः,तत्र तत्परामर्शविशेभ्यतायाः सत्त्वेऽपि बहिव्यायधूमप्रकारतानिरूपकविशेष्यताया अमावात्, उदेश्यतावच्छेदकतासम्बन्धेन पर्वतत्वावच्छिचविशेष्यताकानुमिति भानापाक- रणे वैशेपि काणांत कप्रश्न:॥ २४ ॥ २१॥ R लिगोपहि- तलैनिक- मानव्यव- वैशेषिक- प्रति च पर्वतत्वावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपिताऽभावप्रकारतानिरूपितप्रतियोगितासम्बन्धावच्छिमप्रकारतासम्बन्धेन ज्ञानस्य प्रति- बन्धकत्वात्पर्वतो न बहिन्याप्यधूमनानिति बाघकाले न वहिव्याप्यधूमवत्पर्वतत्वपर्यासोदेश्यतावच्छेदकताकानुमित्यापतिः । नच तत्र शुद्धपर्वतत्वावच्छिन्नविशेष्यताकानुमितेराकस्मिकत्वापत्तिः, ताशसिखमावादेरेव तनियामकत्वादिति चेत्, अत्र बदन्ति "लिगोपहितलैङ्गिकमानस्वीकारेऽनन्तसिद्धिप्रतिबन्धकत्वकल्पनागौरवम् , न चान्यथा द्वितीयानुमित्या(त्यनापत्तिा, द्वितीयानुमितिस्थानीयपरामर्शानुब्यवमायकल्पने चातिगौरवादिति," तचिन्त्यम्, फलमुखस्य तस्यादोषत्वात्, पर्वतो बहि- व्याप्यधूमवान्वहिव्यायधूमव्याप्यवान्त्रहिव्याप्यधूमव्याप्यव्याप्यवानित्यादिपरामर्शदनुमितिधारापत्तेः सिद्धिप्रतिवन्धकत्वं विनाऽवारणात् लापवाद्भिनविषयत्वाप्रवेशेनानुमितिसामग्रीत्वेन प्रत्यक्षत्वेन प्रतिवध्यप्रतिबन्धकमावे क्लसे विशेषदर्शनोत्तर- मनुमितिमङ्गीकृत्य व्यवहारविलोपभियाऽग्रे प्रत्यक्षकल्पनात् तदुत्पत्तिकालेऽनुमित्यापत्तिवारणाय तत्कल्पनाया आवश्यकत्वाच। गुरुचरणास्तु "अनुमितित्वपरामर्शत्वाम्यां सामान्यत एव कार्यकारणभावाम धूमलिङ्गकत्वादेः कार्यतावच्छेदकताया घटकतया लिङ्गोपहितलैङ्गिकमानसिद्धिः, परामर्शत्वं च 'मानमत्वव्याप्यो जातिविशेष इति' परामर्श वक्ष्यते, न च घटव्या- प्यवत्तापरामबियनुमित्यापत्तिर्विधेयतावच्छेदकतापर्याप्तिमम्बन्धेनैव तयोः कार्यकारणभावाद्, अत एव न प्रमेयवहित्व. पर्याप्सविधेयतावच्छेदकताकपरामर्शाच्छुदाहित्वपर्याप्सविधेयतावच्छेदकताकानुमित्यापतिः, न वा बहित्वपर्याप्तविधेयतावच्छे- दकत्वं विनापि वाहित्वेऽपर्याप्ततया तदुत्पत्तेर्व्यभिचारः, पर्वतो वहिण्याप्यधूमवानिति परामर्शात्पर्वते महानसीयवाहिकल्पने लापवमित्यादिवानसहकृतान्महानसीयवाहित्वेन वहयनुमितिस्तु नाम्युपेयते, व्यापकतावच्छेदकरूपेणेवानुमित्युपगमात् । नच न्योपदर्शितं प्रतिविधा- नमपाकृत्य गुरुचरणा- नांप्रतिकि- धानमुप- दर्शितम्॥ १२ .

रणाम प्रतिविध २२ ॥ काले मित्याप २० वहिव्यायधूमवानितिपरामर्शात् पर्वतो न पहिमानितिवाचकालेऽनुमित्यापत्तिः, विषेयतावच्छेदकतासम्बन्वेन पर्वतत्वावच्छिन- विशेष्यताकज्ञानं प्रति पर्वतत्वावच्छिचविशेष्यतानिरूपिताऽभावप्रकारतानिरूपितप्रतियोगित्वसम्बन्धावच्छिमप्रकारतानिरूपि- तावच्छेदकत्वाख्पविषयतासम्बन्धेन ज्ञानस्य प्रतिवन्धकत्वाद" इत्याहुः ॥ अत्रेदमवधेयम् ।। पर्वते वाहिन्याप्यवत्तापरा- माद्वापामावरलेन पर्वतविशेष्यिकेव चत्वरविशेज्यिकाऽप्यनुमितिः स्यादिति तद्वारणाय विशेष्यतावच्छेदकतासम्बन्धेनापि परामर्शस्य पृथकारणता वाच्या, विशेष्यतावच्छेदकतामम्बन्धेन वहिविधेयकानुमिति प्रति च वद्धित्वाविषयतावच्छिन(ता- निरूपिता)ऽवच्छिषत्वविषयतावच्छिन्न (निरूपित)प्रतियोगित्वाविषयतानिरूपिताऽभावविषयतानिरूपितविशेषणतासंसर्गावच्छि- म(संसर्गतानिरूपित)विशेष्यतानिरूपिताऽवच्छेदकत्वाख्यविषयतासम्बन्धेन ज्ञानस्य प्रतिबन्धकत्वं, नातः पर्वतो न वहिमा- निति बाधकाले पर्वतत्वे विशेष्यतावच्छेदकतयाऽनुमित्यापत्तिः, विशेष्यतावच्छेदकतासम्बन्धन पर्वतविशेष्यकज्ञानं प्रति च पर्वतत्वावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपिताऽभावप्रकारतानिरूपितप्रतियोगितासम्बन्धावच्छिमप्रकारतासम्बन्धेन ज्ञानस्य प्रतिबन्ध- कत्वान पर्वतो न नील इति बाधकाले नीलपर्वतत्वपर्याप्त विशेष्यता(वच्छेदकता)कपरामर्थाचाहशानुमित्युत्पत्तिरिति । इवन्तु चिन्त्यम्-यत् पर्वतो वहिव्याप्यधुमवान् भूतलं घटव्याप्यसंयोगविशेषवदिति समूहालम्बनपरामर्शात्पर्वतो घट- वान् भूतलं बहिमदित्यनुमित्यापतिः, नच पर्वतत्वावच्छिनोद्देश्यतानिरूपितघटत्वावच्छिमविधेयताकानुमितित्वं परामर्थका- यतानवच्छेदकमिति न तदवच्छिमापतिः, सिक्षमावादिकार्यतावच्छेदकत्वात् तस्य । अथानुमिताविव परामर्शेऽपि पक्षसाध्य- योरुदेश्यविधेयभावस्य प्रामाणिकत्वे पर्वतत्वाबवच्छिनोद्देश्यतानिरूपितविधेयतावच्छेदकतैवास्तु कार्यकारणतावच्छेदक: स- कार आ दितस्तत्रात २४ चिन्तनीर तिम्॥ २८ २२॥

म्बन्धोऽनन्तलिलावन्तविन हेतुत्वाकल्पनलाधवाच्यवादित्थमपि च लिङ्गोपहितलैङ्गिकमानसाधन निर्मूलमिति चेद, म, क. हित्वाचवच्छिन्नविषेयतानिरूपितोदेश्यतावच्छेदकतासम्बन्धस्य तथास्वे विनिगमनाविरहादेवमप्यनन्तपक्षान्तविन हेतुत्वाक- ल्पनलाघवाप्रच्यवादिति । यत्तु “धूमपरामर्शादीनां विजातीयानुमितावेव हेतुत्वान तत्सिद्धिरिति,"तचिन्त्यम्-धूमपरामर्शज- न्यतावच्छेदकालोकपरामर्शजन्यतावच्छेदकजात्योरुभयपरामर्शजन्यानुमितौ सार्यादुमयपरामर्शजन्यतावच्छेदकजातेरतिरेके चोमयपरामर्शसत्त्वे प्रत्येकपरामर्शजन्यानुमितिप्रसङ्गाचत्र किश्चित्प्रतिवन्धकादिकल्पने च गौरवात् । विजातीयानुमिती विजाती- यपरामर्शस्य हेतुत्वान् पर्वतत्वावच्छिन्नविशेष्यतानिरूपितवाहित्वावच्छिनाविधेयताकानुमित्रौ ताशपरामर्शत्वेन हेतुत्वाद्वान तत्सिद्धिरिति युक्तः पन्थाः। एतेन "विशेष्यतावच्छेदकतासम्बन्धेन वहिव्याप्यधूमविशिष्टे वैशिष्टयज्ञानं प्रत्येव वहिव्याप्य- धूमत्वावच्छिनप्रकारतानिरूपितविशेष्यतानिरूपितप्रकारतामम्बन्धेन निश्चयत्वेन हेतुता, न तु परामर्शानुमित्योः पृथकार्यकार- जमावान चैवं वहिव्याप्यधूमवत्पर्वतो घटवानित्यनुमित्यापत्तिः पक्षतादिजन्यतावच्छेदकपर्वतपक्षकपटानुमितित्वस्य पटव्या- प्यविशिष्टपर्वतविशेष्यकस्वनियतत्वेन सामग्री विना कार्यानुत्पचेन च गृहीतैकसम्बन्धावच्छिमव्याप्तिकस्य धूमादेरन्यसम्प- न्धेन पक्षे निश्चयाद्विशिष्टबुद्धिवदनुमित्यापतिः, तमिवयस्यानुमित्यजनकत्वेन सामान्यसामग्रीत्वामावाद" इति निरस्तम् ।। लिनविषयकत्वे वाधके लिङ्गाविषयकानुमितेस्त्ववापि स्वीकारातत्र च परामर्शानुमित्योः पृथकार्यकारणभावावश्यकत्वा- लिनविषयकानुमितौ मम पृथकारणत्वाकल्पनया लापवमिति चेत्, न, उकरीत्योभयत्रैकरूपेणैव हेतुत्वात् । यत्तु “लिङ्गोपहित- लैहिकमानाभ्युपगमेंऽज्ञतो माथसत्प्रतिपक्षयोरदोषत्वापधिः" इति तस, लिङ्गाविषयकानुमितावेव तयोः प्रतिबन्धकत्वात् , यदपि लिङ्गोपहि- तलैङ्गिक- मानखण्ड- नप्रकारम- पाकृत्य स्व- यं तत्खण्ड- निमार्गमा दितवांस्तेन चलिकोप- हिते लैशि कमानसा- धनप्रकारा- न्तरस्याप्प

लिङ्गोपहि-
॥२३॥
शुद्धपर्वतत्वमामानाधिकरण्येन परामर्शाचथैव सिद्धौ लिङ्गविषयकानुमित्यापत्तिरिति तत्र परस्येष्टापतिस्तस्यास्तत्रापि विरोधि-
स्वे तु लिङ्गविशिष्टपर्वतस्वसामानाधिकरण्येन परामर्शदपि तस्यां सत्यामनुमित्यनापचेः, वस्तुतः शुद्धपर्वतत्वसामानाधिकर-
ज्येन वहिमत्तानिययस्य पर्वतत्वातिरिक्तधर्मानवच्छिन्नविशेष्यताकवहित्वावच्छिन्नविधेयताकानुमितित्वमेव प्रतिवध्यतावच्छे-
दकं न तु पर्वतत्वातिरिक्तं यहिल्याप्यधूमादि तदतिरिक्तधर्मानवच्छिन्नविशेष्यताकवाद्विविधेयाताकानुमितित्वं महागौरवात् ॥
अत्रे विचारणीयं शुद्धपर्वतत्वसामानाधिकरण्येन सिद्धिसत्वे लिङ्गाविषयकानुमित्यभ्युपगमे पर्वतो वहिव्याप्यधूमवान्
इतिपरामर्शघटितसामग्र्याः प्रत्यक्षप्रतिबन्धकत्वे वहिव्याप्यधूमवत्पर्वतो वहिमानितिसिसमावस्य घटकत्वे गौरवम् ॥ किन
पर्वतो न वहिल्याप्यधूमवानितिबाधकाले पर्वतो पहिमानितिसिद्धिसच्चे प्रत्यक्षस्यैवोदयात्रागुक्तपरामर्शपटितसामग्रीप्रति-
बन्धकतायां शुद्धपर्वतत्वसामानाधिकरण्येन सिसमावोऽपि निविश्चते तथाविधवाधासत्त्वेऽप्युक्तसिद्धिसत्वेऽनुमितेरुत्पचेस्त-
दानी मिनविषयकप्रत्यक्षवारणाय ताशसिख्खभावमनिवेश्यापि प्रतिबन्धकतान्तरकल्पनमावश्यकमिति गौरवम् ॥
अस्माकन्तु पर्वतो न पहिल्याप्यधूमवानितिबाधकालीनादपि पर्वतो वहिव्याप्यधूमवानितिपरामर्शात्पर्वतो वहिमा-
नितिसिद्धिसत्वेऽनुमितेरनम्युपगमात्सियमावानिवेशेन प्रतिबन्धकत्वकल्पने लापवमिति, अथ लिङ्गविशिष्टपर्वतत्वसामाना-
घिकरण्येन शुद्धपर्वतत्वसामानाधिकरण्येन च परामर्शघटितसामग्योरेकरूपेणैव प्रतिवन्धत्वामोक्तदोष इतिचेत्, न, लिनान्तर-
विशिष्टपर्वतत्वसामानाधिकरण्येन सिद्धौ सत्यां लिङ्गान्तरविशिष्टपर्वतत्वसामानाधिकरण्येनानुमित्यनुदयापचिवारणाय तत्त-
सिसमावादिषटिततत्तद्रूपेण प्रतिवन्धकत्वावश्यकत्वात् ,इति दिग्॥ यत्तु “यत्र वहिव्याप्वधूमवानितिपरामर्थोऽप्रामाण्यग्रह-
माने प्रति
वध्यप्रति-
बन्धकमा-
वकल्पन-
गौरवप्रस-
पाकरणम्॥
॥२३॥

लिङ्गोपहि- तलैङ्गिक मानेलापर्व प्रस्तस्तदुत्तरं तद्वावधीस्तदुत्तरानुमितिजनकपरामर्शेऽप्रामाण्यज्ञानामाववैशिष्वादाने लिङ्गोपहितलैङ्गिकमानवादिनां मते लापवं तादृशानुमितेर्वाधज्ञानप्रतिवन्धादेवाऽनुदयाद्" इति, तचिन्त्यम् , तथापि ततो लिङ्गानुपहितानुमित्यापचिवारणायाप्रामाण्य- शानामाववैशिष्चदानस्यावश्यकत्वाद् । वस्तुतः सामानाधिकरण्यविशिष्टविशेष्यतासम्बन्धेन ज्ञानाभाव एव परामर्श सामान्यतो निविशते विशेष्यता चाप्रामाण्यप्रकारतानिरूपिता निरवच्छिन्नोभयावृत्तिधर्मावच्छिमा प्राया, अप्रामाण्यप्रकारतानिरूपित. धूमपरामर्शत्वाचवच्छिन्नविशेष्यतासम्बन्धावच्छिनप्रतियोगिताकाचामावाः पृथगेच निवेश्या इति तादृशधर्माणामुभयवृत्तिन्वे- पि न क्षतिः, एवं च सामान्यत एवाप्रामाण्यज्ञानामावस्य निवेशानोक्तस्थले तत्तदप्रामाण्यवानामावनिवेशे गौरववार्ताऽपि, एवश्च तत्तदनुमितित्वस्य तत्तल्लिङ्गविषयकत्वनियमोक्तावपि न क्षतिरिति ॥ इति लिङ्गोपहितलैङ्गिकभानरहस्यवादः ॥२॥ (३) अथ द्रव्यनाशं प्रति हेतुता विचार्यते ॥ तत्र द्रव्यनाशं प्रति निमित्तेतरकारणनाशत्वेन कारणतेति प्रायः, तम, कपालसंयोगादेरपि क्रिश्चित्कार्य प्रति निमित्तत्वात् तत्तद्रव्यनिमित्तेतरत्वदानेऽननुगमाच्च, अथ प्रतियोगितया द्रव्य- नाशवावच्छिन्न प्रति स्वप्रतियोगिजन्यतासम्बन्धेन स्वप्रतियोगिनिमिचेतरकारणप्रतियोगिकत्वसम्बन्धेन स्वविशिष्टताशना- शत्वेन हेतुत्वानाननुगमो, न वा प्रत्यासत्तिमेद इति चेत्, न । निमित्त्वस्य समवायिकारणासमवायिकारणेतरत्वगर्भत्वात् ।। नव्यास्तु "असमवायिकारणनाशादेव सर्वत्र द्रव्यनाशो व्यणुकादिनाशं प्रति परमाणुद्वयसंयोगनाशादीनां विशेषान्वयव्य- तिरेकाम्यां सामान्यत एव द्रव्यनाशत्वावच्छिनं प्रति विजातीयसंयोगनाशत्वेन हेतुत्वकल्पनात् ,असमवायिकारणत्वं च जन्य- द्रव्यजनकतावच्छेकतया सिद्धः संयोगनिष्ठो जातिविशेषः।नच संयोगकर्मजन्यतावच्छेदकजातिम्यामभिषातत्वनोदनत्वाम्बांच पदापा- कृतम्,लि- झोपहित- क्लिकमान- वादसमा- तिः, द्रव्य- नाशकार- विचार: तत्र प्राची १२ लण्डनम् ॥

द्रव्यनाश
श्रीवाद-
माला १६
प्रकरणम्॥
चारेनव्या-
नां मतं,त-
त्रासमवा-
यिकार-
॥२४॥
त्वस्य जी
परापरमावानुपपरेस्तत्र मानामावः, तासामेतद्व्याप्यत्वोपगमात् । न च विनिगमकामावो, द्रव्यजनकतावच्छेदजातेनोंदन-
त्वादिव्याप्यत्वे हि तदाश्रयजन्यद्रव्ये हि जातिविशेषो वाच्यः, सोऽपि विशेषो घटत्वपटत्वादिना सङ्करमिया तथाप्या
स्वीकार्य इत्यनन्तकार्यकारणभावापचेरमिषातत्वादीनां नानात्वे च कर्मादिनिष्ठतजनकतावच्छेदकजातिचतुष्टयमात्रस्यैव
कल्पनाद्" इत्याहुः। यत्तु "कर्मज एव संयोगो द्रव्यहेतुः परमाणौ त्रसरेणी वा संयोगजसंयोगासम्मवस्य विनिगमकत्वाद"
इति, तचिन्स्यम् । तथापि तातेरमिषातत्वादिना सार्यावारणात् , असमवायिकारणत्वमखण्डमेवेति पुनरविचारितं वचः,
असमवायिकारणनाशत्वस्य समवायिकारणासमवायिकारणनाशयोर्जनकतावच्छेदकस्यैव वाऽखण्डत्वौचित्यात् ।।
अत्र स्वतन्त्राः "द्रव्यनाशत्वावच्छिनं प्रति समवायिकारणासमवायिकारणनाशयोरेवैकशक्तिमत्वेन हेतुत्वम् । एका-
वयवनाशोत्पत्तिसमये यत्रावयवान्तरे द्रव्यान्तरसंयोगविभागोत्पत्तिस्तत्र तदधीननानावयविसंयोगादिकल्पनामपेक्ष्यैकस्याः
शक्तः कल्पनाया एव समुचितत्वाद्" इत्याहुः, तच्चिन्त्यम् । उक्तगौरवस्य फलमुखत्वेनादोषत्वात् । अन्यथा नाशत्वावच्छिमं
प्रत्येकशक्तिमत्वेन हेतुत्वप्रसङ्गात् । अपि च प्रसिद्धरूपेण हेतुत्वपरित्यागे सर्वत्रैवान्यतमत्वादिना तत्वप्रसङ्गः॥
गुरुचरणास्तु “विजातीयसंयोगनाशस्य द्रव्यनाशत्वं जन्यतावच्छेदकं मर्तनाशत्वादिकं वेतिविनिगमनाविरहात्स्वा-
श्रयसमवेतत्वकालिकोमयसम्बन्धेन स्वविशिष्टप्रतियोगिकनाशत्वमेव तथेति न जन्यद्रव्यमात्रस्यासमवायिकारणनाशनाश्य-
स्वम् । न चैवं समवायिकारणनाशस्य हेतुत्वान्तरकल्पने गौरवम् , प्रतियोगितया स्वप्रतियोगिसमवेतत्वकालिकोमयसम्बन्धेन
नाशवनाशत्वावच्छिवं प्रति स्वप्रतियोगिसमवेतत्वेन नाशत्वेन हेतुतायाः क्तमत्वात् , तयैव समवाविकारणनाशस्य द्रव्यना-
तित्वव्यव-
स्थापनंत-
प्रतिक्षेषक-
रणं, स्वत-
त्राणाम्म-
तस्यखण्ड-
नं गुरुमतो-
पदर्शनश॥
॥२४॥

द्रव्यनाथ- हेतुताबि- चारसमा- शकत्व निर्वाहाद्" इत्याहुः, तचिन्त्यम् । द्रव्यत्वविशिष्टप्रतियोगितया नाशत्वावच्छिवं प्रत्येव तदेतत्वात् । द्रव्यत्ववि- शिष्टप्रतियोगिताया एव च मूर्त्तत्वविशिष्टत्वाम विनिगमनाविरहः । अथ परमाण्वादिषु पूर्वपूर्वासमवायिकारणनाशसचात् खणुकादेःश्वणिकत्वापत्तिवारणाय तत्तद्रव्यनाशं प्रति तत्तत्संयोगनाशत्वेनैव हेतुत्वात्सामान्यतो हेतुत्वे मानाभाव इति चेत्, न, यत्र विभक्कावयवकपटादिनाशस्थले नासमवायिकारणनाशान्तरं तत्र सामान्यतो हेतुतयैवोपपत्ची विशिष्य हेत्वन्तरा- कल्पनात् । कार्यकारणभावान्तरकल्पनापेक्षया कपालादिनाशोचरं कलशादिनाशे धणविलम्बकल्पनाया एव समुचितत्वात् ॥ वस्तुतस्तु प्रतियोगितया द्रव्यनाशत्वावच्छिवं प्रति स्वप्रतियोगिजन्यतासम्बन्धेनैव विजातीयसंयोगनाशस्य हेतुत्वान स्वणुकादेः क्षणिकत्वापत्तिरितिदिग ॥ इति द्रव्यनाशहेतुताविचारः (वादः)॥ तृतीयो वादः समाप्तः ॥३॥ (४) सुवर्ण तैजसमिति नैयायिका, नेत्यन्ये, 'तत्र सुवर्ण तैजसं न वा' इति विप्रतिपचौ सामानाधिकरण्येन विधिको- टिः, अवच्छेदकावच्छेदेन च निषेधकोटिरिति न बाघसिद्धसामने । केचित्तु "नैमित्तिकद्रवत्वं पृथिव्यतिरिक्तवृत्ति नवा"इत्या- दिविप्रतिपत्तिमाहुः। अत्र नैयायिकाः, तैजसं सुवर्ण, अत्यन्तानलसंयोगे सति अनुच्छिद्यमानद्रवत्वाधिकरणत्वात् , न चां- शतोपाधः, पक्षतावच्छेदकसामानाधिकरण्येनानुमितौ तखाप्रतिवन्धकत्वात् । न च पीतमागे व्यभिचारः, तस्याद्रुतत्वात् । पीतं द्रुतमिति प्रतीतेलमध्यसमषीचोदादेरिक परम्परया द्रवत्वविषयत्वात् , अन्यथा तद्वत्वस्यात्वन्तानलसंयोगेनोच्छेदप्रसनात् । अत्यन्तानलसंयोगस्य पार्थिवद्रवत्वोच्छेदकत्वनियमात् । अचात्यन्तत्वस्यान्यस्य दुर्वचत्वेन विजातीयामिसंयोगस्यैव द्रवत्वो- च्छेदकत्वात् तदमावादेव नोषष्टम्मकद्रवत्वोच्छेद इति चेत्, न, एकचैव क्रियया द्रुतपीततदन्तर्व्यवधूतयोवत्वोच्छेदकविजा- तेजसत्व- विवादा रम्मः,सत्र विप्रतिष- तिः, नैया- विकस वर्णतैजस- त्वानुमा- नम् ॥

सुवर्णता
विचारे.
॥२५॥
तीयसंयोगजनने तत्रैकक्रियाजन्यतावच्छेदाप तत्सत्वाम्बुपगमस्यावश्यकत्वात् । अथ विजातीयद्रवत्वमेव तमाश्यम्, न तु
पार्विवद्वत्वमिति चेत्, न, पृथिवीजन्यतावच्छेदिकाया एव जातेस्तभाश्यतावच्छेदकत्वात् , जात्यन्सरकल्पने गौरवात् ।।
वस्तुतस्तु पार्थिवद्वत्वोच्छेदं प्रति संयोगविशेषत्वेन विरोधिताऽपि, कथमन्यथा न कथ्यमानजलखघृतद्रवत्वोच्छेदः,
इत्यसति विरोधिसम्बन्धे इतिविशेषणावश्यकत्वात् तत्र द्रवत्वसवेऽपि न व्यभिचारः। एवञ्च पीतं द्रुतं इति प्रतीते: साक्षात्स-
म्बन्धेनाऽपि प्रमात्वं समर्थितम् । तत्र विरोधिसम्बन्धसचे किं प्रमाणमिति चेत्, 'द्रवत्वाधिकरणं पीतं द्रवत्वोच्छेदप्रतिवन्धककि-
चित्संयोगवत्, अत्यन्ताभिसंयोगेऽप्यनुच्छिद्यमानद्रवत्वाधारपार्थिवत्वात् , काध्यमानजलमध्यस्थितघृतवद्,' इत्यनुमानमित्य.
वेहि। न चैवं तद्वत्वोच्छेदप्रतिवन्धकसंयोगशालितया जलमेवास्तु तत् , सांसिद्धिकद्रवत्वामावाद,नापि पृथिवी, तद्वत्वोच्छे-
दप्रतिवन्धकस्याऽपि गवेषणीयत्वापत्तेः। अथ मिष एवास्तु तत्प्रतिबन्धकत्वममिभूतरूपानुभूतस्पर्धतेजोऽन्तरकल्पने गौरवाद, न
चापार्थिवद्रवत्वेनैव तत्प्रतिवन्धकत्वाचैवमिति वाच्यम् । एवं सति द्रुतसुवर्णसंयोगेन घृतद्रवत्वोच्छेदानापत्ते,संयोगविशेषेणा-
पार्थिवद्रवस्य तथात्वे तु तस्यैव तचौचित्यात्, किञ्च द्रुतद्रुततरादिप्रतीतेः सुवर्षेऽपकृष्टद्रवत्वनाशे उत्कृष्टद्रवत्वस्वीकारात् द्रव-
त्वानुच्छेदोऽप्यसिद्धः, अपकृष्टोत्कृष्टत्वे च न जाती, येन चरमप्रथमावर्तिन्योतयोरान्तरालिकचित्वेन सार्यमाशयेत, उत्क-
पिकर्षयोर्वा विजातीयामिसंयोगजन्यतावच्छेदकत्वं न विनिगन्तुं शक्येत, किन्तु 'स्वाव्यवहितोत्तरत्वस्वसामानाधिकरण्योमय-
सम्बन्धेन द्रवत्वविशिष्टं द्रवत्वमुत्कृष्टम्' अन्यचापकृष्टमिति । न च विजातीयामिसंयोगनाश्यतावच्छेकत्वेनापकर्षजातिरावश्यकी,
अनपकृष्टस्यापि तमाश्यत्वाद, स्वसामानाधिकरण्यावच्छिन्नस्वाव्यवहितपूर्वपतित्वसम्बन्धन विजातीयामिसंयोगस्य प्रति
वर्णतैजस-
त्वानुमाने
पार्थिवद्रक-
स्वोच्छेद-
तिवन्धकर्स-
योगविशे-
वानुमान
वित्वोत्कर्षा-
पिकर्षयोर्खा-
|तिस्वमपा-
पदर्शनम्॥
॥२५॥

कानमितिक- निमिचना- सिनाश्यत्व मिवेतिमतो. पदर्शन, वर्णस्यपा योगितया विजातीयद्यत्वनाशहेतुत्वाब द्वितीयादिद्रवत्वानां क्षणिकत्वापत्तिः केषितु "निमिचनाशनाश्यत्वमेव नैमित्तिकद्र- वस्वस्येति प्रतियोगितया विजातीयद्रवत्वनाशे स्वप्रतियोगिजन्यतासम्बन्धन विजातीयसंयोगनाश एव हेतु, उत्पत्तिसम्बन्धेन विजातीयामिसंयोगस्य तजनकत्वाचन विनश्यदवस्थाषिसंयोगजन्यस्य तस्य क्षणिकत्वापत्तिः"इत्याहु, तचिन्स्यम् । अथ द्रक- त्वोच्छेदकामिसंयोगस्य द्रवत्वान्तरोत्पत्तिप्रतिबन्धकत्वादाश्रयनाशादेव स्वर्णद्रवत्वनाशः, अत एव तीवानलसंयोगादपकृष्ट- स्वर्णनाशादुत्कृष्टस्वर्णस्यैवोत्पत्तिरिति द्रुतद्रुततरादिप्रतीते नास्वर्णविषयत्वं, न च नानाश्रयाणां नाशकताकल्पने गौरवम् , ख- प्रतियोगिसमवेतत्वस्वाधिकरणत्वोमयसम्बन्धेन नाशवनाशत्वावच्छिवं प्रति नाशत्वेन सामान्यत एव हेतुतायाः क्लसत्वात् , तषाचामिसंयोगित्वे सति तद्धेतुकनाशाप्रतियोगित्वादिति हेत्वर्थ इति चेत् ,न, हैव्यङ्गचीनस्यापि द्रुतद्रुततरादिप्रतीत्या तथात्वेन तथापि व्यभिचाराद, तस्मानानाभयध्वंसोत्पचिकल्पनागौरवात् पार्थिवत्वाविशेषेऽपि स्वर्णतदितरद्रवपार्थिवयोरुत्तरोतद्रवत्व- सामग्रीसमवधानासमवधानाम्यामेव तदुच्छेदानुच्छेदावित्युचितमिति चेत्, अत्रमाउपष्टम्भकपीतेतररूपप्रतिबन्धकसंयोग- शालित्वादेव तस्य तेजस्त्वं विजातीयतेजासंयोगत्वेन शक्तिविशेषवचेजासंयोगत्वेन वा पाकजपीतेतररूपप्रतिवन्धकत्वात् पीतादौ विजातीयामिसंयोगहेतुत्वकल्पनया लापवात् ॥ एतेन "द्रवद्वत्वेन पीतेतररूपविरोधित्वे द्रुतस्वर्णमध्यवर्तिपीतपटरूपपरापल्य- नुपपचिः, उपष्टम्मकाख्यसंयोगेन तथात्वे जलाद्यसाधारण्य, घृतादौ जलादेरनुपष्टम्मकत्वाजतादौ शुक्लादिरूपानुपपचिब, है- जसस्वर्णत्वादिनैव पृथग्विरोषित्वे तु पार्थिवस्वर्णत्वादिनैव तथात्वमुचितम्" इति प्रत्याख्यातम् । यदि तु विजातीयसंयोगत्वेन शक्तिविशेषवत्संयोगत्वेनैव वा तथात्वमस्तु उपष्टम्मकमगनसंयोगस्वैव पीतेतररूपप्रतिवन्धकत्वादिति विमान्यते, विमान्यते वित्वमा प्रतिविषा- ने पीतेतर- रूपप्रतिष- . न्धकसंयो- गेन तत्सा- बनम्।

भी
माला-
प्रकरणम्॥
तत्र पृथ्वी-
स्वेनैव हेतु
त्वं व्यव--
स्थापित
तदुपसंहा-
.
॥२६॥
२०
२, तमो-
च नैमित्तिकद्रवत्वत्वावच्छिचं प्रति पृथिवीत्वेनैव हेतुता, विजातीयद्रवत्वत्वावच्छिक प्रति पृथिवीत्वेन विजातीयद्रवत्वत्वाव-
च्छिचं प्रति च तेजस्त्वेन हेतुताद्वयकल्पने गौरवात् , तदास्तु पार्थिवमेव स्वर्णमिति दिग्॥ इति सुवर्णातैजसत्ववादः ॥४॥
(५) अन्धकारो भाव इतितौतातिताः,नेतिनैयायिकादयः,तत्र परेपामयमाशयः, तमो द्रव्य, रूपवत्वात् , घटवत्,
न च हेत्वसिद्धिः, तमो नीलमितिप्रतीतेः सार्वजनीनत्वात् । न चासौ प्रमो, बाधकाभावात् । न चोभूतरूपवत्वमभूतस्पर्श-
व्याप्यं इन्द्रनीलप्रमासहचरितनीलमामस्तु स्मर्यमाणारोपेणैव तत्प्रमायां नीलधीनिर्वाहागौरवादेव न कल्प्यत इति न तत्र
व्यभिचार, कुहमादिपूरितस्फटिकमाण्डे बहिरारोप्यमाणपीताश्रयेऽपि न व्यभिचारः, तत्रापि स्मर्यमाणारोपेणैव पीतधीनिर्वा-
हाइहिप्पीतद्रव्याकल्पनात् , बहिर्गन्धोपलब्धेस्तु वाय्वाकष्टाऽनुभूतरूपभागान्तरेणैवोपपत्तेरिति वाच्यम् । तादृशव्याशौ माना-
मावात् , प्रमायां व्यभिचाराचान चोभूतनीलरूपवत्वमेवोद्भूतस्पर्शव्याप्यम्, न च धूमे न्यमिचारः, तत्राप्युतस्पर्शवत्वात्,
अत एव तत्सम्बन्धाचक्षुषो जलनिपात इति वाच्यम् । चक्षुधूमसंयोगत्वेनैवाश्रुपातजनकत्वाद्मे उद्भूतस्पर्शासिबे, नीलन-
सरेणौ व्यमिचाराच । न च पाटितपटसूक्ष्मावयव इव तत्राप्युद्भूतस्पर्शवत्वानुमानम् । अनुभूतरूपस्योभूतरूपजनकतावा
इवानुभूतस्पर्शस्यापि निमित्तभेदसंसर्गेणोद्भूतस्पर्शजनकतासम्भवात् दृष्टान्तासम्प्रतिपत्ता, अपि च त्रसरेणोरुबूतस्पर्शवश्वे
तत्स्पर्शस्पार्शनप्रसङ्गः। द्रव्यान्यद्रव्यसमवेतस्पार्शनजनकतावच्छेदकीभूतप्रकर्मवन्महत्त्वामावानायं दोष इति चेत्, न, तादृश-
प्रकर्षस्पैकत्वेऽपि कल्पयितुं शक्यत्वेन विनिगमनाविरहात् । अथैकत्वे ताशजातिकल्पने द्रव्यचाक्षुषजनकतावच्छेदकीभूतैकत्व-
निष्ठजात्या सायमेव विनिगमकमिति चेत्, तथापि सा जातिमहले कल्प्यता इयं त्वेकत्वे इत्यत्रैव विनिगमकमन्वेषणीयम्॥
२४
विचारे
तमोभाव-
त्ववादि-
मीमांसका-
शयोप-
वर्णनम्॥
॥ २६॥

तमसिमी- मांसका यवर्णने टिस्पर्शनु- टितत्स्था- नस्य, + . अब द्रल्यान्यसचाचत्वावच्छिचं प्रति स्वामयसमवेतत्वसम्बन्धेन त्वाचामावस्य प्रतिवन्धकत्वात् त्रसरेणोरसानत्वादेव न तनुचिस्पर्शस्पार्शनप्रसङ्ग इति चेत्, न, उद्भूतस्पर्धामावस्य प्रतिबन्धकत्वेन तत्रानुभूतत्वकल्पनस्यैवौचित्यात् । " त्रुटितत्स्सी गृोते इति" केचित्, तभ, विवेकस्यानिर्वचनात् । यत्तु “नीलरूपवये तमसः पृथिवीत्वापत्तिः, नीलवा- वच्छिन्न प्रति पृथिवीत्वेन हेतुत्वाद्" इति, तन, अवयवनीलादिनैवाऽवयविनीलाद्युपपत्तौ पृथिवीत्वेन तत्समवायिकारणत्वामा- वात् , जन्यसन्मात्रसमवायिकारणतावच्छेदकीभूतद्रव्यत्वामावादेव स्वसमवायिसमवेतत्वसम्बन्धेनाऽवयवनीलादिमति रूपादौ नीलामनुपपत्तेः, "नीलविशेष एव पृथिवीतमसोः समवायिकारणत्वं रसविशेष इव पृथिवीजलयोः, अन्यथा रसत्वावच्छिन प्रति जलत्वेन समवायिकारणत्वाद्रसवत्याः पृथिव्या जलत्वापचेः" इत्यन्ये।। यत्तु "एवमनुष्णाशीतस्पर्शत्वावच्छिन्न प्रति पृथिवीत्वेन हेतुत्वाद्वायोः पृथिवीत्वापत्तिः" इति,तम, शीतोष्णेतरस्पर्शत्वरूपस्य तस्य संशयत्ववदर्थसमाजसिद्धत्वेन कार्यतानवच्छेदकत्वात् ।। वस्तुतः पृथिवीतमःसाधारणजातिविशेषेणैव नीलत्वावच्छिवं प्रति समवायिकारणत्वमुचितम् ,अन्यथोक्तरीत्या कार्यकार- गमावद्वयजातिद्वयकल्पनागौरवादिति ध्येयम् । अथ तमसो जन्यद्रव्यत्वे स्पर्शवदवयवारम्यत्वं स्यात् ,स्पर्शवदनन्त्यावयवित्वस्य द्रव्यारम्भकतावच्छेदकत्वादिति चेत्, न, स्पर्शवच्चादेविशेष्यविशेषणभावे विनिगमनाविरहेण तेन रूपेणाहेतुत्वाद, अनन्त्या- वयवित्वस्य द्रव्यसमवायिकारणत्वपर्यवसितत्वाच । वस्तुतश्चक्षुराद्यवयवेष्वनुभूतस्पर्शानभ्युपगमे जातिविशेष एवं द्रव्यारम्भ- कतावच्छेदकत्वेनाम्युपेया, सतु तमोवयवेष्वपि सम्मवीति नानुपपत्तिः, न च द्रव्यानारम्मकत्वान्यथानुपपत्यैव तत्रानुभूतस्प- ङ्गिीकार इति वाच्यम् , अनन्तानुभूतस्पर्शकल्पनामपेक्ष्य लघुभूतैकजातिकल्पनाया एनोचितत्वात् , तादृशजातेरन्त्यावय- ध्वीत्वाप- ते, द्रव्य स्वेचस्स- विदवय- पादनस्कर

प्रसशागत
कत्वविचा
रेममोन्य
मूत्वेन
मूर्चस्वेनवा
तत्वमिति
.
२०
मते भूत
विन्यप्यम्युपगमान बलत्वादिना साइयं, घटत्वादिना पटादेव्यं प्रति प्रतिवन्धकत्वाच नान्त्यावयविनि द्रव्योत्पतिः।
"भूतत्वेनैव द्रव्यारम्भकत्वं न च मनसोऽपि मूर्तत्वाचदारम्मकत्वप्रसङ्गो, मनोऽन्यतत्वेनैव तथात्वाद" इत्येके। "मूर्तत्वेनैव
तथास्वं मनसि द्रव्यानुत्पत्तिस्तु विजातीयसंयोगरूपहेत्वन्तरामावाद"हत्यपरे। यत्तु"द्रव्यारम्मकतावच्छेदकतया पृषिव्यादि-
चतुव भूतत्वाल्यो जातिविशेषः कल्प्यते, स एव च भूतपदशक्यतावच्छेदका, आकाशे भूतस्वव्यवहारस्तु भात इति",
तन, मनसोऽनतिरिक्तत्वनये भूतमूर्तपदयोः पर्यायत्वापचे, वेदादावाकाशादौ प्रयुक्तभूतपदमुख्यत्वाय बहिरिन्द्रियग्रामविशेष-
गुषजातीयगुणवश्वस्य गुरुणोऽपि भूतपदशक्यतावच्छेदकत्वात् , अन्यथा पशुपदादेरपि गोत्वादिविशिष्ट एव शक्यतापचे॥
स्वतन्त्रास्तु"एकत्वनिष्ठ एव द्रव्यारम्मकतावच्छेदकजातिविशेषः कल्प्यते,स चान्त्यावयव्येकत्वव्यतिरिक्त एवेति न तच.
दन्त्यावयवित्वेनानन्तप्रतिवध्यप्रतिबन्धकमावकल्पनागौरवम् । न च तस्य बन्यैकत्वत्वेन समं सार्य, तस्याप्यजन्यैकत्वत्व-
स्प मित्रत्वात्कार्यतावच्छेदकाननुगमस्यादोषत्वाद्" इत्याहुः । अत्र वदन्ति तमसो द्रव्यत्वे आलोकनिरपेक्षचधुर्वायत्वं न
खाद, द्रव्यचाधुत्वावच्छिचं प्रत्यालोकसंयोगत्वेन हेतुत्वात् , न चालोकचाक्षुषे व्यमिचारः, तत्राप्यालोकगगनसंयोगस
सच्चात्, न चैवं बहलतमे तमसि सुवर्णसाक्षात्कारापत्तिः, महद्भूतानमिभूतरूपवदालोकसंयोगत्वेन तद्धेतृत्वात् । न
चैकावच्छेदेनालोकसंयोगवत्यपरावच्छेदेन चक्षुःसंयोगाचाक्षुषापत्तिा, चक्षुःसंयोगावच्छेदकावच्छिनालोकसंयोगस तथात्वा-
त् । न च पेचकादिचाशुषे व्यभिचार, चैत्रीयद्रव्यचाक्षुषत्वावच्छिदं प्रति चैत्रचक्षुःसंबोगावच्छेदकावच्छिमालोकसं-
गोगत्वेन तवात्वात् । न चालनादिसंस्कृतचक्षुषक्षेत्रख चाक्षुषे व्पमिचारः, आलोकस्वाञ्जनादेरपि खाव्यवहितोचर-
२४
त्वविचार:
स्वतन्त्राणां
मतं,यो-
माववादि-
नैयायिक
मतप्रदर्थ-
॥२७॥

चाधुरे मा लोकविशे- चाक्षु प्रति हेतुत्वे व्यभिचाराप्रचारात् । यत्तु "फलबलापेचकादिचाक्षुषहेतुरप्यालोकविशेष एव कल्प्यते" इति, तन, दालोकेनान्येषामपि तमसि चाक्षुषापत्ते१रित्वात् । पेचकादिनयनमोलकसंसृष्टालोकस्य पेचकाचन्यचाशुपं प्रति नाना- प्रतिबन्धकत्वकल्पने च महागौरवादिति ।। अत्रेवं चिन्त्यते ॥ चक्षुःसंयोगावच्छेदकावच्छिनालोकसंयोगस्यालोकसंयोगा- बच्छेदकावच्छिनचक्षुःसंयोगस्य वा चाक्षुषहेतुत्वमिति विनिगमनाविरहः । स्वावच्छेदकावच्छिनचक्षुःसंयोगसम्बन्धेनाऽऽ- लोकसंयोगस्य तथात्वेऽपि स्वावच्छेदकावच्छिमालोकसंयोगसम्बन्धेन चक्षुःसंयोगस्य तथात्वे स एव दोषः । अब द्रव्य- निहलौकिकविषयताद्रव्यसमवेतनिष्ठलौकिकविषयतादिसम्बन्धमेदेन चाक्षुषत्वावच्छिन प्रत्यालोकसंयोगावच्छेदकावच्छिन- चा:संयोगतत्संयुक्तसमवायादे नाहेतुताकल्पने गौरवात्समवायेन लौकिकविषयतादिविशेषवचाक्षुषत्वावच्छिनं प्रत्यालोक- संयोगस्य स्वावच्छेदकावच्छिषसंयोगवचक्षुःसंयुक्तमन प्रतियोगिकविजातीयसंयोगसम्बन्धेन कारणता । चक्षुःसंयोगस्य स्वावच्छेदकावच्छिमालोकसंयोगावच्छेदकावच्छिन्नस्व(त्ववचक्षुःसंयुकमनःप्रतियोगिकविजातीयसंयोगसम्बन्धेन वयात्वे तु स्फुटमेव गौरवमिति चेत्, न । उक्तसम्बन्धेन तमासंयोमामावस्य तथात्वे बाघकाभावात् , आलोकं विना पेचका दिचाक्षुषोदयाद्विषयनिष्ठतयैव चैत्रादिचाक्षुषे तद्धततावश्यकत्वाच । यत्तु “ तमोऽमावत्वेन न हेतुताऽपि त्वालोकत्वेन लाप- वाद" इति, सम, महदुस्तानमिभूतरूपवदालोकत्वापेक्षया महत्तमोऽमावत्वस्य लघुत्वात् । तमसो व्यत्वे प्रौढालोकम- ध्ये सर्वतो पनतरावरणे सति तमो न स्यात् , तेजोऽवयवेन तत्र तमोऽवयवानां प्रागनवस्थानात्सर्वतस्तेजःसहले चान्य- तोऽप्यागमनासम्मवादिति वर्धमानोपाध्यायाः ।। पिथस्य स. ण्डनं, चा. क्षुष प्रत्या लोकसंयो गकारणला संभवाशा बाया:प्र. तिविधानं वर्षमानम- तदर्शनमा १२

श्री
माला-
प्रकरणम्॥
.
॥२८॥
२०
वस्तुतो गन्धसमवायिकारणतावच्छेदिक्यैव नीलसमवायिकारणतावच्छेदात्तमसो नीलरूपवत्वे गन्धवश्वप्रसङ्गः, अपि
चालोकायावेनैव तमोव्यवहारोपपचेर्नानाद्रव्यतत्प्रागभावप्रध्वंसादिकल्पने गौरवम् । अथामावत्वे तमसस्तेजोमानं विना.
तज्ज्ञानं न सात्, अभावज्ञाने प्रतियोगिज्ञानस्य हेतुत्वादिति चेत्, सत्यम् , आलोकं जानतामेव तमःप्रत्यक्षस्वीकारात्,
तवाहुराचार्याः "गिरिदरीविवरवचिनो यदि योगिनो न ते तिमिरावलोकिनः, तिमिरावलोकिनचन्नूनं स्मृतालोका" इति ।
नव्यास्तु "अमावज्ञाने प्रतियोगिज्ञानं न हेतुः,प्रमेयत्वादिनाऽभावग्रहेऽभावत्वमामान्यलक्षणाधीनप्रत्यक्षे च व्यभिचाराद ,
नाऽपि तदभावलौकिकप्रत्यक्षे तज्ज्ञानं हेतु:, घटघटध्वंमादिप्रतियोगिकघटात्यन्ताभावस्थापि समनियतैकत्वपरिमाणाबमावस्य
चैकप्रतियोगिमात्रग्रहेऽपि ग्रहाव , प्रतियोगितावच्छेदकप्रकारकप्रतियोगिनिश्चयत्वेन हेतुता तु विशिष्टवैशिष्वज्ञानत्वावच्छिन
प्रति विशेषणतावच्छेदकप्रकारकनिश्चयत्वेन हेतुतां नातिशेते, अत एव प्रतियोग्यग्रहेऽपि इदन्त्वेन तमःप्रत्यक्षं नानुपपमं । न
चैवं प्रथमममावाभावत्वयोनिर्विकल्पकेऽभाव इत्याकारकप्रत्यक्षापत्तिः, शून्यमिदं दृश्यत इत्यादिप्रत्ययादमावत्वमात्रेण प्रत्य-
वस्येष्टत्वात् ,अस्तु वाऽभावत्वप्रत्यक्षे योग्यधर्मावच्छिबज्ञानत्वेन हेतुत्वम्" इत्याहुः,तच्चिन्त्य,योग्यधर्माणामननुगमात् ,घटत्वा-
बन्यतमत्वेन तदनुगम इति चेद, न, अतिगौरवात् , अपि चैवं केवलामावनिर्विकल्पकापत्तिः, इन्द्रियसम्बद्धविशेषणताया
घटो नास्तीति प्रत्यक्षत्वं कार्यतावच्छेदकमिति चेत्, न, इन्द्रियत्वस्य चक्षुस्त्वगादिमेदमिनत्वेनातिगौरवाद्, घटत्वावच्छि-
मप्रकारत्वान्यप्रकारत्वानिरूपिताऽभावविषयताकप्रत्यक्षत्वावच्छिन्न प्रति घटत्वावच्छिन्मज्ञानत्वेनैव हेतुत्वादमावांशे निर्विक-
ल्पकस्याभाव इत्याकारकप्रत्यक्षस्य च निखिलप्रतियोगिवानकार्यतावच्छेकाक्रान्ततयैव यत्किशित्प्रतियोगिज्ञानेसम्मवाद,
तमसो मैल्ये
दोषोडा-
वनं, तमो-
द्रव्यकल्प-
ने गौरव,
आलोक
बाने सत्वेव
तमःप्रत्य-
क्षमित्यह-
यनाचार्य
मतं, नव्य
मितखण्डन
.
२४
॥२८॥

विचारेन्या- समतोपद- यावत्प्रतियोगिज्ञानस्य चासम्भवादिति । अथ पत्किञ्चित्प्रतियोगिधीसाध्यस्याऽभावांशे यत्किश्चित्प्रतियोगिविशिष्टविषय- स्वाऽभावत्वांशे निर्विकल्पकस्याम्युपगमेऽपि केवलामावत्वनिर्विकल्पकापत्तिरिति चेत्, न, केवलामावत्वनिर्विकल्पकत्वस्य कार्यतानवच्छेदकत्वेन तदवच्छिन्नापत्तेरभावात् । वस्तुतोऽमावत्वमपि भावमेद एवेति शुद्धतनिर्विकल्पकस्य निखिलप्रतियो- गिज्ञानकार्यतावच्छेदकाक्रान्ततयैव नापत्तिरिति । अत एवेदन्त्वेन तमःप्रत्यक्षमप्यनुपपन्ममिति । इदन्तु प्रतिभाति, यदि चक्षुःसम्बविशेषणतायाः प्रतियोगिताऽवच्छेदकसम्बन्धावच्छिन्नप्रकारतानिरूपिताभावविषयताकप्रत्यक्षत्वं ताशाभावस्ववि- शिष्टविषयतासम्बन्धन प्रत्यक्षत्वमेव वा कार्यतावच्छेदक, कोटिप्रतियोगिज्ञानकारणताकल्पनापेक्षया लापवाद, घटादिधि- यश्च लापवात्कृसमेव घटत्वावच्छिनाप्रकारतानिरूपितविषयताकप्रत्यक्षत्वं कार्यतावच्छेदकम्, उक्तसमिकर्षहेतुतयैव शुदा- भावप्रत्यक्षाचापत्रमावादिति, 'नात्रालोकः किन्त्वन्धकार' इति व्यवहारस्तु 'नात्र घटः किन्तु तदमाव' इतिवद्विवरणपरतया समर्थनीया, तमसोऽभावत्वे उत्कर्षापकर्षामावादन्धतमसत्वाऽवतमसत्वादिकं न सादिति चेत्, न, महद्भूतानमिभूतरूप- वद्यावतेजसाममावेऽन्धतमसत्वस्य कतिपयतदमावे चावतमसत्वस्य स्वीकारात् । अस्तु वान्धतमसावतमसत्वादिकमखण्डोपा- घिरेव, अतः कतिपयतदमावो नावतमस, दिवा प्रकृष्टालोकेऽपि तत्सत्वात् । न च छायायामतिव्याशिवारणाय स्वन्यूनस- जयवाहालोकसंघलने सतीतिविशेषणदानावश्यकत्वाचदानी च बाहालोकस्य स्वाधिकसयत्वामातिव्याप्तिरिति वाच्यम् । तदिनातिरिक्तानन्तदिनवृत्तिवासालोकामावानामेवाधिकत्वादित्याधुक्तावपि न पतिः। संयोगसंयुक्तसमवायादिनानासम्बन्धा- वच्छिमप्रतियोगिताकनानालोकामावनिष्ठं तमस्त्वमप्यखण्डमेकमेव, तेन "प्रकृष्टालोकेऽपि रूपादौ संयोगेनालोकामावसचा- त्वनिर्विक- सकापचेर पाकरपंत- मसोऽमाव- स्वेठक- पकर्षामावे- ऽप्यन्धतम- सावतम- सत्वादेल्प- पादनम् ॥

तमोविचारे स्वतन्त्राणां मतं भाव चित्ववि शिष्टालो. माला- ॥२९॥ भान्धकारव्यवहारापतिः, न वा नानालोकामावेष्वनुगततमोव्यवहारानुपपचिः, न वा इदं तम इतिप्रतीतावपि तत्र भावत्वा- मावत्वसंशयानुपपचिः, इदन्त्वावच्छेदेन तमस्त्वग्रहेऽप्यालोकामावत्वामहाद" इति स्वतन्त्राः । “संयोगायन्यतमसम्बन्चा- वच्छिमप्रतियोगिताक आलोकाभाव एक एव, अन्धकारत्वं च मावचित्वविशिष्टालोकाभावत्वम्, तेन नान्धकारेऽन्धकार इति प्रयोगापतिः, न वान्धकारे नान्धकार इति प्रतीतेप्रमत्वम्" इत्यन्ये । प्राभाकरास्तु “आलोकजानामाव एव तमा, अत एवालोकवद्गर्भगृहं प्रविशतस्तमोधीः" इत्याहुः, तत्तुच्छं, एवं सत्यन्धकारवानहमिति प्रतीत्यापचिः, न च सम्बन्धविश्शेषणा. लोकज्ञानामाववत्येव समाप्रतीतिनियमानाय दोष इति वाच्यम् । तथा सत्यालोकज्ञानामाववानहमिति प्रतीतेरपि विलया- पचे। किवं तमसपाक्षुषत्वं न स्यात् , ज्ञानामावस्य मानसत्वाद, तथा च तमः पश्यामीति प्रतीतिः कयापपादनीया। ननु तमसोऽमावत्वे गतेः का गतिरिति चेद्, प्रान्तिरित्यवेहि स्वाभाविकगतेरन्यगत्यनुविधानानुपपचेः। अथात्यन्तामावत्वे तमस उत्पतिविनाशप्रत्पयो प्रमः स्यादिति चेत्, स्यादेव, “आलोकप्रागमावप्रध्वंसात्यन्तामावसमदायरूपस्य तमसः किश्चित्स- सदायिप्रागमावप्रध्वंसावेव समुदायप्रागमावप्रध्वंसप्रतीतिरवगाहते" इति तु प्रायः। एवं नीलरूपवत्वषीरपि तत्र प्रान्तव, दोषस्तु तत्र तमास्वरूपमेव, न चैवं पीतरूपाधारोपप्रसङ्गः, आरोपे हि सति निमित्तानुसरणं न तु निमिचमस्तीत्यारोपः। इत्यन्धकारपदार्थविवेचनम् ॥ पञ्चमो वादः सम्पूर्णः ॥५॥ (१)वायुःस्पार्शन इति मीमांसकाः,तेषामयमाशयः,शीतो वायुतीति वायुमुख्यविशेष्यकस्सार्शनप्रतीतेस्तस्य स्सा- नित्वं निरामापं, न चासो न स्पार्शनी अपि तु मानसीति वाच्यम् । वातं स्पृशामीत्याधनुष्यवसायानुपपत्ते, न चासौ प्रमा, स्तमइति.. मतं, प्रमा करमतस्प पखण्डन गत्यादि प्रतीवेम.. त्वं, प्राचां. मतं वादस- माशिष बायकामावाद, न च द्रव्यचाक्षुषवद्र्व्यस्पार्शनेऽप्युवरूपस्य हेतुत्वात् कारणामाव एव बाधक इति वाच्यम्, प्रमा हि तेजसो रूपमितिनयेऽपि त्रसरेणुस्पार्शनवारणाय द्रव्यस्पार्शनं प्रत्युदस्तस्पर्शस्य हेतुत्वावश्यकत्वे उद्भूतरूपस्य तबाहेतुत्वा- प्रकष्टमहत्वस्य तद्धेतुत्वे तत्प्रकर्षस्य कार्यमात्रवृत्तिजातित्वेन तदवच्छिन प्रति कारणताकल्पने गौरवात्रसरेणावनुद्भूतस्प- खीकारस्यैवौचित्यात् । अथ मानसेतरद्रव्यलौकिकप्रत्यक्षत्वावच्छेदेनैवोद्भूतरूपस्य द्रव्यलौकिकचाधुर्ष प्रति हेतुत्वान वायोः स्थानत्वमिति चेत्, न, आत्मेतरद्रव्यप्रत्यश्चत्वादिकमादाय विनिगमनाविरहा, द्रव्यचाक्षुषत्वापेक्षया गौरवाच, तदवच्छिन्नत्वं प्रत्युद्भूतरूपस्याहेतुत्वात् । अथ मूर्तलौकिकप्रत्यक्षत्वद्रव्यलौकिकचाक्षुषत्वयोः समशरीरतया विनिगमकामा- वादुमयमेवोद्भूतरूपकार्यतावच्छेदकमिति चेत्, न, उक्तानुव्यवसायानुपपत्या मूर्तलौकिकप्रत्यवत्वस्य प्रकृष्टमहत्वस्येवोद्- भूतरूपस्यापि कार्यतानवच्छेदकत्वात् ॥ यत्तु “मूर्तलौकिकप्रत्यक्षत्वं भगवत्प्रत्ययसाधारणं न कार्यतावच्छेदकमिति वाय्वादे सार्शनं निरानाधम्" इति, तम, इन्द्रियादिजन्यतावच्छेदकत्वेन लौकिकत्वस्य जन्यप्रत्यक्षमात्रत्तित्वात् , "पश्यत्यचक्षुरित्या- देलौकिकचाक्षुषसमानाकारज्ञानपरत्वाचाक्षुषादेस्तत्रासम्मवाद्" इति केचित्॥ यदि तु परमाणुद्वित्वादिजनकतावच्छेदककोटि- प्रविष्टा लौकिकी विषयता भगवज्जानमाधारणी, तदाऽस्तु मूर्तनिष्ठलौकिकविषयतासम्बन्धेन जन्यप्रत्यक्षत्वमेवोद्भूतरूपजन्य- तावच्छेदकं, समूहालम्बनगुणादिचाक्षुषे व्यभिचारवारणायोक्तसम्बन्धनिवेशस्यावश्यकत्वात् , जन्यप्रत्यवत्वं चेन्द्रियादिजन्य- वावच्छेदकतया सिद्धा जातिरेवेति न गौरवम् । एतेन "द्रव्यनिष्ठलौकिकविषयतासम्बन्धेन चाक्षुषत्वस्य कार्यतावच्छेदकत्वं सम्भवति, द्रव्यनिष्ठमूर्वनिष्ठलौकिकविषयतयोर्मेदामावेन विनिगमनाविरहानवकाशात, नतु मूर्तनिष्ठलौकिकविषयतासम्बन्धेन बाबुस्सा नवादिमी- मांसका- श्रयदर्शन तत्रचा पितरूपं स्पाईनेची- मतस्पर्क कारणंन- त्वेकरूपंत- स्पोमयसा- धारणस्य तत्कार्यता- विच्छेदकत्व-

श्रीवाद-
माला १६
प्रकरणम्॥
॥३०॥
.
प्रत्यक्षत्वस्य, तस्य कार्याकार्यचित्वात् , जन्यप्रत्यक्षत्वस्य तथात्वे तु जन्यत्वस्व प्रध्वंसप्रतियोमित्वादिरूपस्य निवेशे गौरवं,
जन्यत्वप्रत्यक्षत्वयोर्विशेष्यविशेषणभावे विनिगमनाविरहाच" इत्युक्तावपि न क्षतिरितिकेचित्तु"निविताम्यमिचारकतया द्रव्य.
चाक्षुषत्वमेवोभूतरूपकार्यतावच्छेक, नतु सन्दिग्धव्यभिचारकमूर्तप्रत्यक्षत्वम्" इत्याहुः॥अत्रप्रतिविधीयते॥मूर्तप्रत्यक्षत्व-
मेवोद्भूतरूपकार्यतावच्छेदकं, द्रव्यचाक्षुषत्वस्य तथात्वे गगनादिसार्शनवारणाय द्रव्यस्पार्शनं प्रत्युद्भूतस्पर्शत्वेन हेतुत्वे स्पर्शत्व-
प्रवेशे गौरवात् , अनुभूतत्वाभावकूटस्पर्शत्वयोर्विशेष्यविशेषणभावे विनिगमनाविरहाच्च, मम तु स्पर्शनिष्ठानुद्भुतत्वावच्छिन-
प्रतियोगिताकानुद्भवाभावकूटत्वेनैव हेतुता, गगनादौ रूपामावादेव त्वाचापत्रमावात् । सामान्यसामग्रीमादायैव विशेषसाम-
व्याः कार्यजनकत्वनियमात् । अथापेक्षाबुद्धिमेदेन कूटत्वस्य नानात्वाम तादृशानुभूतामावकूटत्वेन हेतुत्वम् , अपि त्वनुभूत-
त्वामावकूटस्पर्शत्वयोर्व्यासज्यवृत्त्यवच्छेदकतोपगमेनानुभूतत्वाभावकूटवस्पर्शत्वेनैव तथात्वमिति चेत् ,तर्हि मूर्तप्रत्ययत्वाब-
च्छित्रप्रति महत्वोद्भूतरूपस्पर्शवत्वेन हेतुत्वमस्त्विति वायुप्रमादेः प्रत्यक्षत्वकथाप्युच्छिद्यते, स्पर्शरूपादिप्रत्यक्षेणैव तदनुमिति-
स्मृत्यादिसम्भवात् ॥ इदन्तु ध्येयं ॥ यद्यनुद्भूतस्पर्शासत्वे प्रमाया: स्पार्शनवारणाय द्रव्यस्पार्शनत्वावच्छिनं प्रति स्पर्शत्वेनैव
हेतुतावश्यकी, व्यासज्यवृत्यवच्छेदकतानुपगमाच नोक्तरूपेण हेतुतेति विभाव्यते,तदा द्रव्यचाक्षुषत्वावच्छिचं प्रत्येवोद्भूतरूप
स्य हेतुत्वान वाय्वादेरस्पार्शनत्वम्, अस्तु वा द्रव्यचाक्षुषत्वावच्छिन प्रति द्रव्यमानत्वावच्छिदं प्रति च शक्तिविशेषेणैव वि-
षयस्य हेतुत्वं महत्त्वरूपयोर्महचस्पर्शयोध हेतुत्वापेक्षया शक्तिद्वयकल्पनाया एवोचितत्वात् । यत्तु "घटाकाशसंयोगद्वित्वादेः
स्पार्शनवारणाय द्रब्यान्यसवाचत्वावच्छिमं प्रति स्वामयसमवेतत्वसम्बन्धेन लौकिकविषयत्वावच्छिमत्वाचामावस्य प्रति-
वायुस्साई-
नत्वविचा-
रेऽनुकूल-
प्रतिकूलम-
तप्रदर्शनं
तदुपरान्त-
न्यायमतव-
निमत्रापि
कारणस्व-
विशेषोप-
गमेन वायु
स्पार्शनत्व-
स्वीकारः॥
॥३०॥

बन्धकत्वं कल्प्यते व्यासज्यवृत्तिगुणत्वाचत्वावच्छिनं प्रति तथात्वे गुणादित्वाचं प्रति प्रकृष्टमहत्त्ववदुद्भूतस्पर्शवत्सममयस्य पृषकारणत्वकल्पनापचेर्द्रव्यान्यसत्प्रत्यक्षत्वावच्छिनं प्रति चाक्षुषामावस्य तथात्वे च घटप्रमासंयोगादिस्सार्शनापत्ते१षि- वारत्वादिति वायूमादेरस्पार्शनत्वे तत्तिस्पर्शादिस्पार्शनानुपपत्तिः, न च स्पर्खेतरद्रव्यान्यसत्त्वाचत्वं तत्प्रतिवध्यतावच्छेदक, सङ्केतरत्वप्रवेशे गौरवाद्, घटाकाशसंयोगादौ स्पार्शनसामान्यापत्तिवारणाय स्पर्शस्पार्शनं प्रति स्पर्धात्वेन परमाग्वादिस्पार्शन- वारणाय प्रकष्टमहत्त्वत्वेन चातिरिक्तकारणत्वकल्पनाप्रसङ्गादिति," तश्चिन्त्यम् । त्रसरेण्वादिघटितसभिकर्षेण द्रव्यत्वादित्वाच. प्रसनवारणाय द्रव्यान्यद्रव्यसमवेतस्पार्शनत्वावच्छिन्न प्रति त्वक्संयुक्तप्रकृष्टमहत्वोद्भूतस्पर्शवत्समवायत्वेन प्रत्यासत्चित्वा- वश्यकत्वाद् द्रव्यान्यसवाचत्वस्य प्रतिवध्यतावच्छेदकत्वे घटाकाशसंयोगादौ जातिस्पार्शनवारणाय जातिस्पार्शनं प्रति जाति- स्वादिना हेतुत्वकल्पने गौरवाद्, व्यासज्यवृत्तिगुणनिष्ठविषयतया त्वाचत्वावच्छिन्नं प्रत्येवोक्तप्रत्यासत्या त्वाचामावस्य पाव- दाश्रयत्वाचस्य वा हेतुत्वात् । अत एव वायुघटसंयोगद्वित्वादेरस्पार्शनत्वं सङ्गच्छते॥अथ द्रव्यान्यद्रव्यसमवेतस्पार्शनत्वाव. च्छिमं प्रति त्वक्संयुक्तत्वाचवत्समवायत्वेनैव हेतुत्वं महदुद्भूतरूपयोरुभयोः प्रवेशे गौरवात् , तथा च वाय्वादेरस्पार्शनत्वे कथं तत्तिस्पादिस्पार्शनमिति चेत्, न, वाचत्वस्य विशेषणत्वे गुणगुणिनोर्युगपदग्रहणप्रसङ्गा, उपलक्षणत्वे च पाकजस्स- ोत्पत्तिकालेऽपि स्पर्शादिब्रहणप्रसङ्गादेकस्यामेव व्यक्ती कालमेदेनानन्तत्वाचसम्भवेन तत्र ताववाचनिवेशापेक्षया महत्वोत्- भूतस्पर्शयोरुभयोरेव निवेशौचित्यात् ।। स्वतन्त्रास्तु “ द्रव्यस्पार्शनजनकतावच्छेदकैकत्वनिष्ठजाते. सायवारणाय द्रव्य- चापजनकतावच्छेदकैकत्वनिष्ठजातिव्याप्यत्वस्वीकारात्कृतो वाय्वादेः पार्शनं प्रकष्टमहयोद्भूतस्पर्शयोईव्यस्पार्शनं प्रति नविचारे वायुस्साई नानम्युप- गन्सूनैया- यिकमतो- पदर्शनं, कार्यकार- जमाबत- हाधव- . दर्शनम् ॥

बाळा १६ वायुस्पाई- नत्वोपपा- ॥३१॥ गौरवगाहेतुत्वाद्, एकस्य विजातीयकत्वे हि तत्त्वा( बैरूप्यामावाद, अथ त्रसरेणोबाक्षुषत्वाम्युपगमेन द्रव्यचाक्षुषजनकताव- च्छेदकैकत्वनिष्ठजातेरेव द्रव्यस्पार्शनजनकतावच्छेदकैकत्वनिष्ठजातिव्याप्यत्वं किं न स्यादितिचेत्, तथाप्कस्था एवैकत्व- निष्ठजातेद्रव्यचाक्षुषस्पार्शनोमयजनकतावच्छेदकत्वास वाय्वादेः स्पार्शनत्वम्" इत्याहुः, तम, तादृशी जातिरेकत्वनिष्ठा स्वी- कर्वच्या महत्त्वनिष्ठा वेति विनिगमनाविरहाचटावेव विश्रामे रूपत्वेन द्रव्यचाक्षुष प्रति एकस्या एव हेतुताया अम्युपगमे तजनकतावच्छेदकैकत्वनिष्ठजातौ मानाभावाच ॥ केचित्तु "स्पार्शनजनकतावच्छेदकवैजान्यव्यापकत्रसरेण्वेकत्वसाधारण- जात्यस्य नित्यैकत्वसाधारणत्वे महत्त्वोद्भूतरूपयोः पृथकारणताद्वयकल्पनमावश्यक निखिलतळ्यावृत्त्वे च कार्यमात्र- तिजातितया तदवच्छिनं प्रति कस्यचित्कारणत्वस्यावश्यकतया द्रव्यचाक्षुषं प्रत्येकत्वकारणतामादाय कारणताद्वयकल्पन- मावश्यकं वैजात्यकल्पनं पुनरधिकम्" इत्याहुः॥ इति वायुप्रत्यक्षत्वाप्रत्यक्षत्वविचारः॥॥षष्ठोवाका सम्पूर्णः॥ (७) शब्दो नित्यः सोऽयं गकारः श्रुतपूर्वोऽयं गकार इतिप्रत्यभिज्ञानान्यथानुपपच्या तत्सिद्धे उत्पनो गकारो विनष्टो गकार इत्यादिप्रतीतेर्तीमत्वाद्, अन्यथाऽनन्तचन्दप्रागभावप्रध्वंसादिकल्पने गौरवाद्, एतेन "अनन्तोत्पश्यादिप्रतीतीनां प्रमत्वमपेक्ष्य प्रत्यभिज्ञामात्रस्य तवकल्पने लाघवम्" इत्यपास्तम् । प्रत्यभिज्ञानामप्यानन्त्याच ज्ञानवाहुल्ये विषयवाहु- त्यस्याप्रयोजकत्वात् । अथ तारमन्दादिमेदेन गकारादेर्नानात्वावश्यकत्वात्कथं प्रत्यभिज्ञयैक्यसिदिस्तारत्वादीनां वायुग- तत्वे च कत्वादेरपि तद्वत्वापतिः । कत्वादेस्तगतत्वे शन्दात्तित्वेन भानं भावणं न स्यादिति चेत्, तारत्वादेरपि सहतस्वे तम स्यादिति तुल्यम्, गकारादौ तारत्वादेः परम्परबैच मानमिति चेद, ककारादौ कत्वादेरपि तथैव मानमिति समामम् ॥ खण्डनं, वायुस्सार्थ- नविचारस- मातिाश- ब्दनित्य- स्वानित्य- त्वविचारा- रम्म, तब वचित्यत्व- वादिमीमां- २४ एवं वायुपतित्वे तस्य श्रावणमेव न स्याद्वायुस्सादेरिव सार्शनं वा स्याजातित्वाचं प्रति कत्वादीनां प्रतिबन्धकत्वकल्पनेच गौरवादित्युभयत्र समानमितिचेत्, न, तारमन्दयुकसारिकाचैत्रादिप्रमचमेदेनैव तस्य नानात्वाद्, अत एव 'गकारादेरेकत्वे शुकामवत्वादिलक्षण्यमानं न स्याद'इत्यपास्तम् ॥ यत्तु मीमांसकानां "चैत्रादेःस्वीयमैत्रशुकादिककारादेः प्रत्यक्षे चैत्रा- दिकर्णावच्छिमाविजातीयवायुसंयोगा हेतवो वाच्या" इत्यतिगौरवं, नैयायिकानान्तु “ अवच्छेदकतया चैत्रादिककारादौ विजातीयवायुसंयोगो हेतुस्तत्पुरुषीयनिखिलशन्दप्रत्यक्षे च तत्पुरुषकांवच्छिमसमवाय" इति लाघवमिति, तश्चिन्त्यम्, विजा- तीयवायुसंयोगस्य स्वावच्छेदकश्रोत्रसंयुक्तमनःप्रतियोगिकविजातीयसंयोगसम्बन्धेन निखिलशब्दभावणं प्रति हेतुत्वे मीमां- सकानामेवातिलाषवाद्, एतेन "जन्यत्वपक्षे विजातीयपवनसंयोगस्य कत्वं जन्यतावच्छेदकमिति लापवं व्यङ्गयत्वपक्षे तु कप्रत्यक्षत्वं कश्रावणत्वादिकं वेति गौरवम्" इति निरस्तम्, "उत्तरीत्या सामान्यत एव हेतुत्वे क्लसे प्रत्यक्षत्वाचवच्छिन्न प्रति तदकल्पनात् स्वाश्रयविषयतासम्बन्धेन कत्वस्यैव तजन्यतावच्छेदकत्वसम्मवाच" इति मीमांसकानुयायिनः॥ अत्रवदन्ति उत्पत्तिविनाशरूपवैधय॑ज्ञानकालोत्पत्तिकाया उक्तप्रत्यभिज्ञायास्तजातीयामेदविषयकवाक्यसापकत्वं,न चैवं तखातीयोऽयमिति स्याम तु सोऽयमितीति वाच्यम्। तचिजात्यवच्छिममेदामावख मेदामावत्वेनैव मानाचव्यक्तित्वावच्छिन- मेदामावविषयकप्रत्यभिज्ञायास्तु प्रान्तत्वमेव, अन्यथा तारमन्दादिनानावणेप्वपि ताचप्रत्यभिज्ञादर्शनाचेपामप्यैक्यप्रसङ्गात् । अपि चैवं घटादेरपि व्यायत्वापचिपटसाधनताज्ञानेन दण्डादौ प्रवचिदर्शनातस्य जन्यत्वे तु शब्दसाधनताशानेन पुंसः कण्ठ- वाखाचमिषातादौ प्रतिदर्शनाचस्य जन्यत्वमेवेतिाइति शब्दनित्यत्वानिवस्वविचारः॥७॥श्रीवावमाला सम्पूर्णा। त्वानित्य- त्वविचारे नित्यत्ववा- दिमीमांस- कमतं, त्खण्डना- स्मकं ग्दानित्य- त्वबादिन- यामिका- दिमत, वा- दमालास- भावित

सिदिक्षेत्र
विवाद १६
सिद्धस्या-
ऽस्पृशति-
२०
प्ररूपणम्॥
॥ अथ न्यायविशारद-न्यायाचार्य-महोपाध्याय-श्रीयशोविजयगणिप्रणीतः श्रीअस्पृशद्वातिवादः।
अस्पशगतिमतीत्य शोभते,सिक्यतो न हिम(ग)तिः सुमेधसाम्॥
इत्यखण्डतमपण्डपण्डिता-चारमण्डनमसावुपक्रमः॥१॥
इह हि केचिदतिस्थूलमतयोऽन्तरालप्रदेशस्पर्शनं विना कथमुपरिमागप्रदेशस्पर्शनसम्भव इति बम्नम्यमाणासिद्धि-
गमनसमये स्पृशन्तीमेच गतिमभिमन्यन्ते, स्त्रोक्तां च सिस्मतो गतेरस्पृशचामुमयपार्थप्रदेशास्पर्शनेन समर्थयन्ति, तेषां
कामप्यपूर्वा वैदग्धीमाकलयामः । यत एवमुपरितनोपरितनप्रदेशस्पर्शनस्याधस्तनापस्तनप्रदेशस्पर्शपूर्वकत्वनियमोपगमे सम-
यबाहुल्यापच्या समयान्तरास्पर्शनोक्तिव्याघातः। तनियमानुपगमे चैकहेलयैवाखिलान्तरालिकप्रदेशास्पर्शनेनैव सिविक्षेत्रा-
वगाहनोपपत्चावस्मदमिमताभ्युपगमप्रसङ्गः । न चैकस्मिमपि समयेऽखिलान्तरालिकप्रदेशस्पर्शनं दण्डकरणवदुपपत्स्यत इति
शहनीयम् । तथा सति तदानीं तावतो दण्डस्यैव करणप्रसझाव , "यावत्यैवावगाहनया जीवोऽवगाढस्तावत्यैन बोई गच्छति"
इत्युक्तिव्याघातप्रसङ्गात् । इदमेव हि "उन्जुसेढीपडिवो अफुसमाणगई एगसमयेणं अविग्गहेणं उगता सामारोवउत्तेसिजाइ
चि" प्रज्ञापना(पद सूत्रस्थले "अविग्रहेण विग्रहस्थामावोऽविग्रहस्तेन, एकेन समयेनास्पशन समयान्तरप्रदेशा-
न्तरास्पर्धनेनेत्यर्थः। जुणिच प्रतिपन्नः, एतदुक्तं भवति । यावत्स्वाकाशप्रदेशेषु इहावगाढस्तावत एव प्रदेशान् ऊर्च
ऋजुभेण्यावगाहमानो विवक्षिताच समयादन्यत्समयान्तरमस्पृशन् गत्वा, तथा चोतं आवश्यकचूणों-"बचिए जीवोs-
२४
॥३२॥

. बमाडो तावतियाए जोगाहणाए उज्जुगं गच्छद न वक, वितियं च समयं न फुसति । भाष्यकारोऽप्याह-"रिउसेटिं पति- पो,समयपएसंतरं बफुसमाणोएगसमयेण सिज्मइ,अह सागारोवउत्तोसो"||३०८८॥इत्यादिवृत्तिवचनममृतप्रायमपि नि- पीय समुत्पमस्य प्रमविषस्य परमं मेषजमुत्पश्यामः। तावतामेव हि प्रदेशानामूईमवगाहनयाऽऽन्तरालिकप्रदेशास्पर्शनस्य सष्ट- मुपपत्तेः। न च सिद्धिक्षेत्रावच्छिन्न प्रदेशस्पर्शनेनाऽप्यस्पृशचाव्याघातः, आन्तरालिकप्रदेशास्पर्शनेनैवास्पृशत्वाविवक्षणात् । तदि- दक्तं वाविवेतालेन श्रीमता शान्तिसूरिणा (उत्तरा०२९००)-" अफुसमाणगइत्ति अस्पृश्चतिरिति नायमर्थः यथा सर्वाना(नऽयमा)काशप्रदेशामस्पृशति, अपि तु यावत्सु जीवोऽवगाढस्तावत एव स्पृशति न तु ततोऽतिरिक्तमेकमपि प्रदेश- मिति"अत्र हि स्वाक्गाहातिरिक्तप्रदेशास्पर्शनेनैवास्पृशचापपादितम् । इत्यमेवावश्यकचूर्णी "जथा उज्जुसेढिपत्तो जत्तिए जीवो बबगाडो तावतिआए अवगाहणाए उई उजुगं गच्छा,ण वक,अफसेमाणगती वितिय समयं ण फुसति,अहवा जेसु अवगादो जे अ फुसति उड्डमवि गच्छमाणो तलिए चेव आगामपएसे फुसेमाणो गच्छति" इति ।। अत्र विवक्षामेदाद् व्याख्यानमङ्गद्वयोप- पत्तिः। यथाक्रमं सिद्धिक्षेत्रप्रदेशाऽऽन्तरालिकप्रदेशस्पर्शनाऽस्पर्शनविवक्षणात् । अत्र च प्रदेशापेक्षयाऽस्पृशत्ता प्राचि पक्षे उपसर्ज- नीकृता, उत्तरपक्षे च प्रधानीकतेति विशेषः। न चैवं गौणमुख्यत्वाम्यां व्याख्यानमेदोपपत्तिरदृष्टचरी ॥ नामाइतियं दब-हि- यस्स मावो अपजवणयस्स ॥ भावं चिय सद्दणया, सेमा इच्छंति सबनिक्खेवे॥७५॥ इत्यादिस्थले विशेषावश्यकादौ शत- एवं व्याख्यानमेदस्य दृष्टपूर्वत्वात् । हन्तैवम्-अस्पृशगतिरिति कोऽर्थः?, "स्वावगाहातिरिक्तनमःप्रदेशानस्पृशन् यावत्सु तेषु जीवोऽवगाढस्तावत एव समभेण्या स्पृशमित्यर्थः" इति नूतनवृत्तावपि को दोषः । तावत एव इत्यत्र एवकारेणातिरिक्तव्य- विवाद १६ . सिद्धिक्षेत्र व्रजता सिदस्या- स्पृशति- तत्वप्र- रूपमम् ॥ बच्छेदाद, समश्रेण्या इत्यनेन च सिद्धिक्षेत्रप्रदेशस्पर्शनस्यैव लामादिति चेत् । नहि वयमेतदक्षरकाष्ठस्यैव पराकर्तारः किन्तु बान्तरालिकप्रदेशास्पर्शनाभिप्रायसारस्यैव । अथेहगमिप्राय एवात्र कषदश्वेदिति चेत्, सोऽयमाशयितारं प्रत्येवानुयोग: शोमते, परमन्यत्रापि स्वावगाहम्रान्त्यैवायं सम्भाव्यते, सा चाऽयुक्ता दण्डप्रसङ्गात् अस्पृशताव्याघाताच । पार्थवर्णिप्रदेशा- स्पर्शनेनास्पृशचायां च स्पृशद्तेरप्यस्पृशचापत्तिः। न हि योऽप्यानुपूर्व्या स्पृशन् गच्छति सोऽपि पार्थतोऽपि स्मृतीति सम्भवति, अपि च स्पृष्ट्वा गच्छतः पार्थवर्तिप्रदेशास्पर्शनमसम्भवदुक्तिकमेव । पदिक्प्रदेशसमालिङ्गानेनैव क्षेत्रतः स्पर्शनाया विशेषात् । तथा च बभाषे भाष्यकारः। “एगपएसं खेसचपएसा य से फसणा।" इति ॥ नन्वेवं "यावत्सु जीवोऽवगाड- स्तावत एव स्पृशति न तु ततोऽतिरिक्तमेकमपि प्रदेशम्", इति वादिवेतालोक्तिरसङ्गता स्यात्, स्पर्शनायामवगाहनातः पदिक्प्रदेशाधिकस्यावश्यकत्वादिति 'अजामपनयतः क्रमेलकागम' न्यायापात इति चेत्, सत्यम् , अत्रावगाहनावच्छि- स्पर्धनायामेवातिरिक्तप्रदेशसम्बन्धाभावसमर्थने तात्पर्यात् , यतो "येष्ववगाडो याँश्च स्पृशति ऊर्ध्वमपि गच्छन् तावत एवा- काशप्रदेशान् स्पृशन् गच्छति" इत्यावश्यकचूर्णिकारवचनात् व्यक्तमेवेदं लक्ष्यते । अत्र हि स्वावगाहकस्पृष्टोमयप्रदेशा- वच्छेदेनेव सिध्यतः स्पर्धनं नियम्य अन्यत्र च स्पर्शनसामान्यवाचकपदेनामिघीयमानायामवगाहनावच्छिमस्पर्शनाया- मतिरिक्तप्रदेशसम्बन्धाभावो नियम्यते इति । न चैवमवमाहनावच्छिन्नत्वेनान्तरालप्रदेशान् मास्त्राधी, अन्यथास्पर्शनशा तु दुर्निवारेति वाच्यम् । ऋजुश्रेण्याऽन्तरास्पर्शनस्यावगाहननियतत्वात् । अस्तु वाऽतिरिक्तपदस्य 'अतिरिच्यते व्यवधीयते' इति व्युत्तच्या व्यवाहितत्वमर्थः । न बन्तरालस्पर्शनं विनाऽवगाहनान्यवहित प्रदेश स्त्रष्टुं शक्यत इति, बयमेवार्थोऽसन- इतिरिति । कोऽर्थः “स्वावगाहातिरिक्तनम प्रदेशानस्पृशभचिन्त्यया शक्त्या सिद्धिं गच्छति"इति विशेषावश्यकवृत्तावपि अयमेवाशयो द्रष्टव्यः अपरापरपदस्यापि व्यवहितार्थलाक्षणिकत्वसम्भवात्। चूयाविवचनसमर्थनाय चेयं सूक्ष्मेक्षिका। यदि च बहुश्रुता अपरथापि समर्थयन्ति तदा नास्माकमाग्रहः । न च ग्रन्धकदमिप्रायमविविच्य शून्यतामात्रे- पावसानमपि हितावहमिति विमावनीयं सुधीमिः। “यत्र च सर्वोचं गच्छन् ऋजुश्रेण्या यावत्स्वाकाशप्रदेशेविहावगाड- स्वावतः प्रदेशानूर्वमप्यवगाहमानो विवक्षितममयाचान्यत् समयान्तरमस्पृशन् गच्छति । उक्तं च चूर्णी जत्तिए जीवो- ऽबगाडो इत्यादि" मलयगिरिकृतकर्मग्रन्थटीकायाम् । तथा "साकारोपयोगोपयुक्त ऊवं गच्छन् ऋजुभेण्या यावत्स्वा- काशप्रदेशेष्विहावगाढस्तावत एवं प्रदेशानूर्वमप्यवगाहमानस्तस्मिन्नेव समये लोकान्तमुपैति" इति समयसारवृत्तौ । तथा "कमविमोक्षसमये यावत्स्वाकाशप्रदेशेष्विहावगाढस्तावतः प्रदेशानूलमप्यवगाहमानो विवक्षितसमयाचान्यत्समयान्तरमस्म- शन् गच्छति उक्तंचचूणों इत्यादि" मलयगिरिकृतावश्यकवृत्तौ। "एत्तो (अओ चेव) अफसमाणगईए चेव गमणं उकरि- सविसेसबो इयं" इति पञ्चसूत्रे । अन्यत्राप्येतजातीयस्थलेऽवत्यतत्रत्यावगाहनयोरेव तुल्यत्वेनास्पृशयमुपपादितं वर्तते, तत्र तुन किमपि विवेचनीयमवशिष्यते । अत्रत्यतत्रत्यावगाहनस्पर्शनयोस्तौल्योक्तिय विवक्षामपेक्षत एवेति सूक्ष्ममीक्षणीयम् ।। अन्तरालप्रदेशस्पर्शनन्तु प्रवचनवचनस्य लेशमपि जानता न वक्तुं शक्यमिति रहमवधारणीयम् । तथा चाऽऽचचविरे 'उज्जुसेढीपडिव-इत्याद्यौपपातिकोपाङ्गप्रतीकव्याख्यानावसरे श्रीमदभयदेवसूरयः। ऋजु:-अवक्रा, श्रेणि:-आका- प्रदेशपडि, ताम् ऋजुश्रेणिं प्रतिपन:-आश्रितः। अफसमाणगइत्ति-अस्पृशन्ती सिखन्तरालप्रदेशान् गतिर्यस्य सोऽस्स- विवाद १६ प्रकरणम् ॥ ॥३४॥ सिदिक्षेत्र बजतः सिदस्या- स्पृशक्ति २० रूपणम् ॥ अगति:-अन्तरालप्रदेशस्पर्शने हि नैकेन समयेन सिदिः, इष्यते च तत्रैक एव समयः य एव चायुकादिकर्मणां अयसमयः स एव निर्वाणसमया, अतोऽन्तराले समयान्तरस्यामावादन्तरालप्रदेशानामसंस्पर्शन मिति, सक्षमथायमर्थः केवलिगम्यो मावत इति ॥ एगेणं समयेणं ति । कुत इत्याह । अविग्गहेणं ति-अविग्रहेण वक्ररहितेन, वक्र एव हि समयान्तरं लगति प्रदेशान्तरं च स्पृशतीति । उट्टुं गंता-ऊचं गत्वा सागारोवउत्तेति-ज्ञानोपयोगवान् सिखति-कृतकृत्यतां लमते इति"॥"सोऽस्पृष्टया हि गत्या-ऽनन्तरमेव समये जगच्छिखरम् ॥ अवगाहतेऽन्तरा (तेतरां) ते-न नास्ति ननु भो बजत्कालः ॥१॥ सिसति गत्वा अस्मात् , सिद्धिक्षेत्रेपहाय देहमिह ॥ न अन्तरास्ति सिद्धि-नासिद्धिशास्ति मुक्तस्य ॥२॥ [स्ववचस्यानमिसन्धेः, कुत- कत्यस्य च यथा स्वमावेन ॥ तस्योपयोग इष्टस्तथा गतिः सा स्वमावेन ॥३॥" अ० १० सूत्र. ७] इति तत्त्वार्थ- वृत्तौ ॥ अत्र कश्चिदविपबित् 'क्ष्मथायमर्थः केवलिगम्यो माक्तः' इतिवचनश्रवणादुत्कन्धरीभूय प्रकृतार्थस्य सन्दिसमा- नतामवलम्बमान आचार्यपरम्परया विप्रतिपातयाऽनुपदर्शितमप्यर्थ विप्रतिपनत्वेनोद्भावयन् कृतान्तब्याकोपमाग् मवति। "आयरियपरंपरएण, आगयं जो उ आणुपुबीए ॥ कोवेई छेयवाइ, जमालिनासं स णासिहिइ ॥१॥" इति । अब मुहमावेनैव पृच्छामः,क्ष्मत्वं केवलिगम्यत्वं चात्र कथमुक्तमिति चेत् एकसमयावच्छेदेन प्रभूतान्तरालप्रदेशस्पर्श- नातिक्रमेण स्पृशतिप्रक्रमस्य सांव्यवहारिकप्रत्यक्षेणादृष्टपूर्वत्वात्ान त्वेवंविधवचनमग्याऽज्ञानासत्वमात्रमत्रोद्राव्य मूकत- याऽवस्थानं सनातं " ततो भवोपवाहिकर्मजालंधपयित्वा ऋजुश्रेणि प्रतिपमोऽस्पर्शमान(ऽस्पृशगत्या सिखतीत्यत्र बहुव- कव्यं तत्तु नोच्यते अन्धविस्तरमयादिति गावाः" इति हारिभद्रयामावश्यकवृत्तावस्पार्षस्य बहुवक्तव्यत्वेनोक्तत्वात् ! २४ न चाऽजामात्रायें बहुवचनावसरोऽस्ति,आज्ञाग्राममर्थ पुच्या समर्थयतोऽपसिद्धान्तापातात् । तवाह भगवान् सम्म- तिकार:-"जो हेउवायपक्सम्मि,हेउको आगमे अआगमिओ।सोससमयपण्णवो,सिद्धन्तविराहगो अण्णो॥३-४५" इति। नन्वेवं बहुवक्तव्यत्वेन हेतुवादप्रविष्टस्यार्थस्य केवलिगम्यत्ववचनमपसिद्धान्तदोषग्रस्तं स्यात् इति चेत् न,निरपेक्षाज्ञानासत्वामा- वेनात्र हेतुप्रासात्वाद् ,अत एव 'भव्यो ज्ञानादिमान सिक्सति' इत्यासागम्येऽर्थे हेतुग्रामत्वमविरुद्धम् । तथा च सम्मतिकारः। "भविजो सम्मईसण-नाणचरित्तगुणलदिसंपरोनियमा दुक्खन्तकडो-ति लक्खणं हेउवायस्स॥३-४४॥"अ'तत्वं पुनः के वलिनो विदन्ति' इत्यादिजातीयवचनानामन्यत्र विप्रतिपचिसूचकत्वेनैव दर्शनात्,'सक्ष्मबार्यमर्थ'इत्यादिवचनस्यापि विप्रतिपचि- सूचकत्वमेवास्तु, 'अत्र बहुवक्तव्यम्'-इतिवचनस्यापि बाइविप्रतिपत्तिकत्वव्यञ्जकतयैव समर्थयितुं शक्यत्वाद् इति चेत्, स्वकी- यवचनबदामुग्धजनपन्मध्य एवेदं निगद्यमानं शोभते, न तु पण्डाकण्ड्लवदनपण्डितपर्षदि, यतो बलवदनेकजनसम्मतविरु बनानार्थप्रदर्शनपूर्वकमेव केवलिगम्यत्ववचन विप्रतिपत्तिव्यञ्जकमुपलमामहे, न त्वन्यथाऽपि । अन्यथा 'सुहुमा आलागिजा, चक्खुप्फासं न ते जन्ति'-इत्यादिवचनानामपि विप्रतिपत्तिप्रदर्शकत्वापत्तेरिति किमधिकबालचेष्टितचोदेन ॥ कबिश्वत्यन्त- प्रगल्भस्तावत्यैवावगाहनयाऽपि स्पृशन्तीं गतिमचिन्त्यशक्तिकत्वेन कल्पयति, प्रष्टारं प्रति चाऽचिन्त्यशक्तिकत्वमेव प्रत्युप- दिशति 'हरीतकीमात्रप्रतिकारशाता वैद्य इव यत्र तत्रामयचिकित्सायां हरीतकीमक्षणोपयोगम् ।' स एवं प्रतिबोद्धयः॥ सौम्य! किमेवं गुरूपदेशाद्विपलब्धोऽसि, नहिषयमचिन्त्यशक्तिकत्वेन बाधितमप्यमबाधितवदुपदिशामः, शक्तिसह- प्रेणापि पावितस्य अबाधितवत् कर्तुमशक्यत्वात् , तावत्यैवावगाहनया सकलान्तरस्पर्शनं त्वाल्यग्रेण त्रैलोक्यस्पर्धनववाधित. orgpke s सिदिक्षेत्र H सिदस्या स्वदति- मेष, किशिदन्तरालस्पर्शनमपि समयामेदाद तथैवेति, किन्त्वेकसामयिक्या: सिसतोप्रशद्गतेरितरास्पृश्चद्गविलक्षण्यमेव ॥ तवाहि । बहुसरान्तरालप्रदेशसंयोमन्यापारकप्राप्तिजनकत्वरूपं स्पृचवम् , अल्पतरान्तरालप्रदेशसंयोगव्यापारकमाप्तिजनकत्व- रुपमसावं च मन्दतीव्रक्रिययोरापेक्षिकं प्रसिद्धमेवोपलम्यते मन्दं गच्छति तीवं गच्छति इत्यादिब्यवहाराणां समस्या- सशस्वावलम्बनतयैवोपपत्तेः। एतेन “वेगेन गच्छतीत्यादिव्यवहाराद् वेगास्यस्य गुणान्तरस्य सिदिः" इति वैशेषिका- विमतमपास्तं निरवधिकवेगव्यवहारदर्शनाद वेगस्यास्पृशत्वाख्यतीव्रत्वाऽतिरिक्तत्वे मानाभावात् तस्य गुणान्तरत्वे मान्ध- स्यापि गुणान्तरत्वापचेच मन्दं गच्छतीत्यादिव्यवहारस्यापि जागरूकत्वात् । मान्धं वेगामाव एवेति चेत्, वेग एव मान्या- माव इत्यपि किं न स्यात् । न च पातप्रतिबन्धकत्वाद्वेगसिद्धिम, क्रियाविशेषम्यैव पातहेतुत्वाद्वेगेन पततीत्यादिव्यवहाराद्वेग- विशेषस्य पातानुकूलत्वाचेत्यन्यत्र विस्तान च समिहितदेशसंयोगं विना व्यवहितदेशसंयोगस्यासम्मवादस्पृशगतिविरुदै- वेति शहनीयम्-तचक्रियायास्तत्तदुचरदेशसंयोगहेतुत्वेनाविरोधात्, तदिदमुक्तं दर्शनान्तरीयैरपि "अचिन्त्यो हि तेजसो वेगातिशयो यत् सनिहितदेशविशेष विमुच्यैव व्यवहितदेशे संयुज्यते" इति, इदमेवामिप्रेत्य च स्थानावृत्तिकृतोतं वश- मस्थानके दाविषमजीवपरिणाम विवृण्वता "गतिपरिणामो द्विविधः स्पृश्चद्गतिपरिणाम इतरब, तत्रायो येन प्रयत्नविशेषात् क्षेत्रप्रदेशान् स्पृशन् गच्छतीति, द्वितीयस्तु येनास्पृशमेव तान् गच्छति, न चायं न सम्भाव्यते, गतिमद्रव्याणां प्रयत्नमेदो- पलम्बे, तवाहि, अपहर्म्यतले गगने(तलगत)विमुक्ताऽमपातकालमेद उपलभ्यते, अनवरतगतिप्राचानां वा देशान्तरप्राप्ति- कालमेदयेत्यवः सम्भाव्यतेऽस्मशद्गतिपरिणाम इति"[ प्रज्ञापनात्रयोदशपरिणामपदगताजीवपरिणाममेदेषु " गह- २४ परिणामेणं मंते" इत्यादि, द्विविधो गतिपरिणामः, तबथा, स्पृशद्गतिपरिणामोऽस्पृश्वद्गतिपरिणामय । तत्र वस्त्वन्तरं स्पृशतो यो गतिपरिणामः स स्पृशद्गतिपरिणामा, यथा ठिकरिकाया जलस्योपरि प्रयत्नेन तिर्यप्रक्षिप्तायाः, सा हि तथा प्रक्षिता सती अपान्तराले जलं स्पृशन्ती स्पृशन्ती गच्छति, बालजनप्रसिद्धमेतत् ।। तथाऽस्पृशतो गतिपरिणामोऽस्पृशगतिपरिणामः यस्तु न केनापि सहापान्तराले संस्पर्शनमनुभवति तस्यास्पृशद्गतिपरिणाम इति भावः ।। अन्ये तु व्याचक्षते, "स्मश- गतिपरिणामो नाम येन प्रयत्नविशेषात्क्षेत्रप्रदेशान्स्पृशन् गच्छति ॥ अस्पृशद्गतिपरिणामो येन क्षेत्रप्रदेशानस्पृशमेव गच्छति" इति, तम बुख्खामहे नमसः सर्वव्यापितया तत्प्रदेशसंस्पर्शव्यतिरेकेण गतेरसम्मवात् ।। बहुश्रुतेभ्यो वा परिमावनीयम् ॥" इति तवृत्ती मलयगिरिपादाः ॥ तदेवमापेक्षिकास्पृशगत्यपेक्षया सकलान्तरालप्रदेशास्पर्शनावगुण्ठितायां सिख- तोऽस्पृश्चद्गती वैलक्षण्यं न्यायप्राप्तमेव, तत्र चाचिन्त्यशक्तिकत्वमेव निर्वाहवीजम् । यथा दण्डादिकमवत्यां सर्वधास्पृशद्गती आपेक्षिकस्मशद्गतिवैलवण्ये तदेव निर्वाहवीजमिति । अथापेक्षिकं स्पृशतमस्पृशत्वं च नाचिन्त्यशक्तिकत्वनिर्वायम्-अर्थ- समाजत्वात् एकापेक्षया स्पृशश्वस्येवान्यापेक्षयाऽस्पृशत्त्वस्यापि जन्यतावच्छेदकत्वे विनिगमकामावाच, एवं सर्वथा स्पृशव- मस्पृशत्त्वमपि च तथैव सकलान्तरास्पर्कस्पर्शपूर्वकत्वयोरपि तथात्वादिति चेत्, न, तादृशधर्मस्यापि शक्तिनिर्वायत्वाद् । अन्य- थाऽतिप्रसङ्गाद्-अनन्तशक्तिकवस्त्वम्युपगमे दोषामावात् , प्रत्यक्षादिप्रमाणप्रसिखविरोधाच ॥ इत्यधिकं व्युत्पादितमस्मा- भिः स्याद्वावकल्पलतायाम्।। सुहदनुग्रहमानं पुनरेतल्लिखनप्रयोजनमिति श्रेयः ॥ इति अस्पृशद्गतिवाद: समाप्तः॥

1. महोपाध्याय श्रीयशोविजयगणिप्रणीतः वार्शनिक विचारगर्मितः श्रीविजयममसरिस्वाध्यायः॥ मिस साध्याय , श्रीविजयदेवसूरीशपट्टाम्बरे,जयति विजयमममुरिएर्कः॥ येन वैशिनासिद्धिप्रसङ्गादिना,निजगृहे योगसमवायसर्क: मीविजय॥शानमेकं भवविश्वकरकेवलं,दृष्टयाधातु कर्तरि समाना॥इति जगत्कर्वलोको(वादोचरे सजते,सङ्गता यस्य पी. सावधाना ॥ श्रीविजय० ॥२॥ ये किलाऽपोहचक्ति सुगतसूनवो, जातिशक्ति च मीमांसका ये ॥ सनिरन्ते गिरं ते यदीयां नय-तपूतां प्रसव श्रयन्ते ॥ श्रीविजय० ॥३॥ कारणं प्रकृतिरङ्गीकृता कापिले, कापि नैवाऽऽत्मनः कापि शक्तिः ॥बन्य- मोक्षव्यवस्था तदा दुर्घटे-त्या जागर्ति यत्प्रौढश(ोक्तिः ॥ श्रीविजय० ॥४॥ शाब्दिकाः स्फोटसंसाधने तत्परा, अबसिडी च वेदान्तनिष्ठाः ॥ सम्मतिप्रोक्तसनहरहस्यान्तरे, यस्य वाचा जितास्ते निविष्टाः ॥श्रीविजय० ॥५॥ ध्रौव्यमुत्पतिवि.. ध्वंसकिर्मीरितं, द्रव्यपर्यायपरिणतिविशुद्धम् ॥ विससायोगसहातमेदाहितं, स्वसमयस्थापितं येन बुद्धम् ॥ श्रीविजय ॥६॥ इति मुत: श्रीविजयप्रभो मक्तित-स्तर्कयुक्त्या मया गच्छनेता ॥ श्रीयशोविजयसम्पत्करः कृतधिया-मस्तु विघ्नापहा शत्रुजे(नेता ॥ श्रीविजय० ॥७॥ तर्कयुक्तिगुम्फितः श्रीविजयप्रभसूरिस्वाध्यायः सम्पूर्णः॥ न्यायविशारद-न्यायाचार्य-महामहोपाध्यायधीयशोविजयगणिप्रणीता १ श्रीउत्पादादिसिविद्वात्रिशिकाविवरणं (धुटितावस्थ) २श्रीवादमालाप्रकरणं-३ श्रीअस्पृशद्गतिवादप्रकरण-४ श्रीविजयप्रमरिस्वाध्यायति प्रत्यरत्नचतुष्पयी सम्पूर्णा ॥ --------

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Utpaadadi Sidhiviviran Vadmala Asprasaditivaadh Vijayprabhsurisyaadhaya Sweeti Granth Chthustay

Author
Sri Yashoovijay
Title
Utpaadadi Sidhiviviran Vadmala Asprasaditivaadh Vijayprabhsurisyaadhaya Sweeti Granth Chthustay
File name
Utpaadadi Sidhiviviran Vadmala
Text
OCR done
Citation
1934
Published
2006/03/27
Publisher
Sri Jain Granthsabha Rajnagar Ahemdabad
Language
Sanskrit
Pages
89
Library
Bharatiya Jnanpith Delhi
Classification
Literature
Keywords
jain sahitya
DLI number
292777
Barcode
99999990185978.00
Scanning centre
C-DAC, Noida
Digital publisher
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Utpaadadi Sidhiviviran Vadmala Asprasaditivaadh Vijayprabhsurisyaadhaya Sweeti Granth Chthustay