Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Shukraneeti
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प्रस्तावना। सर्व सज्जन विद्यानुरागी धार्मिक महाशय इस वातको भली भाँति जानते हैं कि "धर्माधार हि जीवितम्' आयुष्य धर्मकेही आधार पर है. हमारे पूर्वज ऋषि, महर्षि, देवर्षि निर्व्याज धर्माचरणसे कैसे प्रतापी, दीर्घायु और पूज्य होगये हैं। वे तपोवन अपने वंशजोंके कल्याणके लिये उत्तम २ उपदेश कर गये हैं कि जिनके विधिपूर्वक पालन करनेसे सदा मनुष्य इस लोकमें विविध सुख और परलोकमें स्वर्गादिनिवासमे अनन्त लाभ उठा सकते हैं । अर्थात् उनके निर्दिष्ट आचार, व्यवहार और प्रायश्चित्तांके सेवन करनेसे ही मनुष्य उन्नति साधन कर सकते हैं और कभी उनके ऋणसे उऋण नहीं हो सकते । मन्वादिमहर्षियोंने उपदेश किया है कि राजाके विना क्षणमात्र भी इस मसारका व्यवहार नहीं चल सकता । चोर डाकू आदि दुर्वृत्त लोग प्रजाके धन, धर्म और जीवन में महाकष्ट उत्पन्न कर देते हैं। इससे "राजानं प्रयमं विन्देत्तत्तो भायाँ ततो धनम् । राजन्यसति लोकेऽस्मिन्कुतो भार्या कुतो धनम् अनुसार दुष्टनिग्रह पूर्वक सजनोंके सुखके निमित्त धार्मिक राजाका होना अत्यावश्यक है । यह राजा किस प्रकार प्रभाओंका संरक्षण कर और नानाजाति विविध धर्मवाली मजाके पालनमें किन २ नियमोंकी आवश्यकता है .इत्याद कितने ही व्यवहार इस नीतिमें महात्मा शुक्राचार्यने लिखे हैं कि जिनका विद्वान् शिरसे आदर करते हैं । बहुत लोगोंकी कल्पना है कि तोप, बन्दूक इत्यादि अस्त्र तथा सेनिकोंकी परिचालन- शिक्षा ( कवायद ) आद जैसी आजकल पाश्चात्यद्वीपनिवासियों ( अगरेजों) ने उन्नत की है पाहल समयमें ऐसी नहीं थी । पर यह निर्मुल कल्पना है । इसी शुक्रनीति, इनका वर्णन बहुत उत्तमताके साथ किया गया है । वह इस बातकी साक्षी देता है कि पहिले जोर उन्नति इन सबकी भारतर्वपमें हो गया है वह अन्यत्र कहीं नहीं पायी जाती। इस ग्रन्यमें मुख्य कर तो राजनीति ही वर्णन की गयी है, पर प्रासाङ्गेक धर्मतत्त्व तथा व्यवहारपाटव भी इतना है कि एक इसी ग्रन्यसे मनुष्य सब व्यवहारोंमें निपुण हो सकता है। इन्द्र के सामने कामने अपने बलकी प्रशसामें कहा है कि "अध्यापितस्योशनसापि नीति प्रयुक्तरागप्रणिधिदिपस्ते । कस्यार्थधाविह पीडयाम सिन्धोस्तटावोध इव प्रवृद्धः' अर्थात् 'शुक्राचार्यने भी जिसको नीति पढ़ाई हो ऐसा मनुष्य यदि आपका । शत्रु हो तो अनायाससे उनके धर्म और अर्थकी हानि कर सकता हूं' इससे भी स्पष्ट होता है कि नीतिशास्त्रमें सबको शिरमौर यही “शुक्रनीति" है । 1 .
(४) हमारे कितने ही अनुग्राहक ग्राहकोंने इस नीतिशास्त्रके भाषानुवाद सहित प्रकाश होने की इच्छा प्रकाश की थी, इससे हमने पण्डितवर्य महामहोपाध्याय लॉखयामनिवासी श्रीमिहिरचन्द्रजी द्वारा इसकी भापाटीका कर शुद्धतापूर्वक इसे मुद्रित कराया याथोड़े ही समयमें प्रथम संस्करणको सब पुस्तकें बिक गयो । तदनन्तर सुपरिमार्जित द्वितीय संस्करणकी सब प्रतियां हाथो हाथ विकगयीं । अव इसका तृतीय संस्करण हुआ है। इस बार और भी उत्तमता पर ध्यान देकर यथाशक्ति पुस्तकको शुद्धि, छपाई, सफाई इत्यादि की गयी है । आशा है कि विद्यानुगगी इसक अध्ययनसे लाभ उठायेगे, जिससे हमारा परिश्रम सफल हो। निवेदक- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम् प्रेस-वम्बई.
भाषाटीकासहित शुक्रनीति- अनुक्रमणिका। .. पृष्ठ. श्लो०/विषय. पृष्ठ. श्लो or १ १ १ ... ... १ १ १ ... ... ... ... ... विषय. अध्याय १. सर्व राष्ट्र परस्पर भेद पानको अ. राजकृत्य कथन. नीति ही कारण है २ १९ मंगलाचरण पूर्वजन्मके तपसे ही राजाको सर्व दैत्यप्रश्नानंतर शुक्रोक्ति सामर्थ्यप्राप्ति २ ब्रह्माक्त कोटि नीतिशालका सार कालका भेदकारण २ २१ राजा कालका कारण ३ २२ शुक्रनीति ३ राजदंडभयसे स्वस्वधर्मप्रवृत्ति ३ २३ संक्षिप्त नीतिशास्त्रका प्रयोजन ४ स्वधर्म ही सर्वसुखसाधन ३ २४ अन्यशास्त्र एक २ कार्यकारी प्रजाको स्वधर्ममें तत्पर करने- नातिशाख सर्वोपकारी नाविशास्त्रका फल वाले राजाके देवता भी किंकर होते हैं नीतिशास्त्राभ्यासकी आवश्यकता... नीतिशाषसे कुशलत्वप्राप्ति... युद्धिसे अर्थवृद्धि विविधतपकथन ३ २९ व्यवहारमें व्याकरणादिकोंका सात्विक राजाका लक्षण ३ ३१ अनुपयोग तामसका लक्षण सर्वलोकव्यवहार नीतिके विना राजसका लक्षण ३ ३३ नहीं होता है ३४ सर्वकल्याणकारक नीतिशास्त्र २ १२ सत्त्वगुणमहो मनको धारणा करै ४ ३५ तहां नृपको अत्यावश्यक २ १२ मनुष्यजन्मप्राप्तिका कारण नीतिहीनोंको शत्रु उत्पन्न होते हैं २ १३ कर्म ही सबका कारण ४ ३७ प्रजापालन और दुष्टनिग्रह यह गुणकर्मासे ब्राह्मणादिक होते हैं... ४ ३८ राजाका धर्म २ १४ ब्रह्माजीसे सबकी उत्पत्ति ३९ अनीतिसे राजाको भयप्राप्ति १५ त्राझणका लक्षण ४० अनीतिमान् और स्वतंत्र स्वामीक क्षत्रियका लक्षण ४१ सेवामा निषेध २ १६ वैश्यका लक्षण ४ ४२ जहां नीति और बल तहां लक्ष्मी १ १७/शूदका लक्षण निना आज्ञाके हितकारक प्रजा म्लेच्छका लक्षण हो ऐसी नीति राजाने धारण पूर्वकर्मके ही अनुसार बुद्धि और करनी फल प्राप्त होता है. १ ७ २ ११ अधर्मका लक्षण ... ... २ ४ द शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका। श्लोक पृष्ट. श्लो० विषय. ... ... ५ ... ... ... ६ राजाके गुण ... ६ विषय. पृष्ठ. बुद्विमान् पौरुपको और असमर्थ राजाओंका आठ प्रकारका वृत्त ११ २३ वैको मानते हैं ४८ अघम राजाका लक्षण ११ २६ कर्म दो प्रकारका है ४९ विनाशोन्मुस राजाका ल. पूर्वकर्मको आवश्यकता ५२ राजाने दूतद्वारा स्ववृत्तका कोई पौरुष ही मानते हैं ५३ श्रवण करना २१ २९ पुरुषार्थसे दैव भी अन्यथा होता है ५ ५४ लोकापवाद बलवत्तर देव.तीन प्रकारका .... ५५ यौवनादिक ६ छ: चंचल है १२ ३८ प्रतिकूल देवका उदाहरण ५६ राजाके दुर्गुण ११२ ३९ अनुकूल देवका उदाहरण ५ ५७ राजाको विपत्तिकारण १२ ४१ दैवप्रतिकूलतामें सत्कर्म भी राजाको दुःख और सुखका साधन १२ ४२ अनिष्ट होता है ६ ५८ गुरुका सवन १३ सत्कर्माचरण ही नष्ट है ५९ पटित राजाका लक्षण १३ ४८ राज्यके सात अंग ६ ६१ आन्वीक्षिक्यादिचतुर्दश विद्या ६ ६४ चतुर्दश विद्याओंका विषय १३ अनीतिमान् राजासे अनर्थ ६५ त्रयीका लक्षण धर्मावर्भसे इष्टानिष्ट फल ६ ६८ वार्तालक्षण - १३ इससे धर्मसे ही द्रव्यसंचय ६ ६९ दंडनीतिशब्दका अर्थ १४ ५६ इंद्रादिकोंका अंश राजा ७२ अहिंसा परम धर्म है १५ धर्माधर्म और सज्जनसंगति करे १४ ७३ दुर्जनसंगतिको त्याग कर १४ ६२ राजाके सात गुणोंका वर्णन ७४ कठोर भाषण न करे नृपको क्षमारी आवश्यकता देवतांश राजाका लक्षण ८५ दयादिक वशीकरण है राक्षसांश राजाका लक्षण ८६ मित्रादिकोंको वश करनेका राजाको विनयकी आवश्यकता साधन ९१ राजाने मनको वश करना ९ ९७ राजाको असाधारण गुणकी सब विषय अनर्थहेतु हैं ९१०१ आवश्यकता शब्दादि पांच विपयाँका उदाह० ९ २ पृथ्वी सर धनोंको ग्यानी है।... १५ मृतादिकोंकी निंदा और स्तुति ८सर्वदा घनका संचय करना। २५ राजाने परस्त्रीकी अभिलाषा नहीं सामंतादिकोका लक्षण करना १३ अनुसामंतादिकांका लक्षण १६ गृहकार्यमें घी सहाय है २४ प्रामादिशंका टअण मदिरापानसरीपरािमवि १५ झामे कोगादिकाका लक्षण १६ वा और पापा फट २१ गुंटादिकांशा प्रमाण सदसत्कर्म का प्रवर्तक राजा है ... 15 ८२/मृदु भाषण करे ... ८ ... १५ ८५ . ... ८ ९ ९ 0.
शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका । अष्ट. लो. ... ... ... १९ ... न बनाये mmm परिसाका प्रमाण ... विषय. पृष्ठ, श्लोक. विषय. प्राजापत्य और मनुमानको राजाज्ञावर्णन ९३ व्यवस्था १८ ८ अपनी आज्ञाको लिसकर चौरा- भागके विना भूमिको न छोडे... १८ १० हाम रखना २५ २१२ देवतादिकोंके निमित्त पृथ्वीको राजाने पथिकोंका रक्षण हरप्रय- १८ त्नसे करना १४ राजधानीस्थानवर्णन १८ १२ राजाके द्रव्यके ६छः विभाग... २६ राजगृहनिर्माणप्रकार ... १८ १८ राजा शूरत्वादिकोंका त्याग न इतर गृहादिकोंके सामने द्वार- करे. २६ १८ निषेध ३२ शुरादिकोंका लक्षण १९ इतर गवाक्षके सामने गवाक्ष विपयुक्त अन्नकी परीक्षा २६ २५ २० ३४ अन्नका निषेध २७ २७ प्राकारका प्रमाण राजा मन्त्रियों सहित कोई निवे- २० दनको सुनै २७ २९ युद्धसामयी आदि रहित दुर्गका निषेध विहार वगीचामें करे २७ २९ प्रातःकाल और सन्ध्यासमय कवा- राजसभाका प्रमाण और वर्णन २० ४२ मन्त्री भादिकोंके लिये सभा यद करावै और करै २७ ३० .... ४९ सेनानिवेशस्थान मृगयामें गुण और दोप, २७ ३२ २१ धनी आदिकोंके गृहोंका क्रम:.. गूढ चारियोंसे प्रजाआदिकोका अभि- धर्मशाला वर्णन ५६ २७ ३३ .... बाजारमें सजातियोंकी पृथक् - २ म्लेच्छ राजाक लक्षण राजा गूढचारीको पहचाने २७ २१ राजमार्गादिकाका प्रमाण राज्याधिकारीिनिर्णय २८ ४१ मार्गवर्गन राज्यविभागका निषेध २८ ४५ २२ धर्मशालाको व्यवस्था अन्याधिकारिनिर्णय २८ २२ ६९ मन्त्रियोंके संग एकान्तका समय २८ २३ ७४ राजाका रात्रिके पश्चिममागमें राजासनादिकोंका स्थान निर्णय २८ कृत्य ७५/मद्रासनपर राजाका वर्तन राजाका दिनका कृत्य २३ ७८ मृत्यका विद्या और कलाओंका २३ ८२ कार्यस्थानरक्षणप्रकार २३ ८६ राजयानपर नीचको न बैठावै... चौकीदारोंसे राजा गृहवृत्त सुने २४ ८९ प्रतिवर्प स्वयं प्रामादिकको देखे ७३ राजा रानिमें चार २ घडी सदा अनेक प्रजाद्वेषी अधिकारीको विचरै २४ ९१ त्याग दे राजाका प्रजाशासनप्रकार २४ ९२ भोगयोग्य स्त्रीके लक्षण ३० ... प्राय सुनै दुकान वनावै पथिकोंकी व्यवस्था ... रात्रिके पूर्वभागमें कृत्य अभ्यास करावं 28 ... ...
शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका । पृष्ट. लो० ... आश्रय करै ८० ... ... युवराजका वन ... प्रथमाध्याय। ३५ ४६ विपय. पृष्ठ. श्लो० विपय. राजा दो प्रहर निद्रा करै ३१ ७९ दुष्टदायादको सिंह आदिसे मरवा दे ३४ ૨૮ भापतिमें किल्ला, पर्वत इनका दत्त आदिको अपन पुत्र तुल्य न ३१ मान ३४ ३१ उसी समय चोरीसे राज्यग्रहण करै ३१ ८१ औरस पुत्रके अभावमें दौहित्र ३४ ३२ परसी और कुलीन कन्याको दौहित्राभाव दत्तक पुत्र ३४ ३३ दूपित न करें ३१ ८४ प्रयत्न विफल देसकर तप र पिताकी आज्ञा ही पुत्रको भूपण है ३४ ३८ स्वर्गम गमन करे ३१ ३८५ सम्पूर्ण भ्राताओंमें अपनी अधि- इति नीतिशाम्न स्वरूपलाभादि कयन कता न दिसावे .. ३४ ४० पित्राझोल्लंघनका दुष्ट फल ३५ पिता प्रसन्न हो ऐसेही आचरण करे ३५ ४३ चुगलको महान् दण्ड करै अध्याय २. पित्रादिकोंको नमस्कार करै युवराजादिकत्यकथन । इस प्रकार आचरणशील राजपु- एकाका राजाको राज्य दुष्कर त्रको फल ३५ ५१ होता है ३१ १अब मन्त्री आदिकोंके संक्षेपसे व्यवहार मन्त्रियोंके बिना न करे ३१ कार्य और लक्षण कहते हैं ... ३५ ५२ समासदादिकोंके मतमें स्थित रहे ३ केवल जाति और कुलकोहा न देस ३६ ५४ स्वतन्त्रता अनर्यकारी है ३२ ४ विवाह और भोजनमें कुल जाति- राजाको सहायताकी अवश्यकता ३२ विवेक ३२ ८ श्रेष्ठ भृत्यका लक्षण... निन्द्य सहायकसे अनिष्टफल ૨૨ १० निन्द्यभृत्यका लक्षण.... -वराजादिक राजाके अंग है ३२ १२ दश प्रकृतियोंका नाम ३७ ६९ विराज्यके अधिकारी ३२ १४ आठ प्रकृवियोंका नाम ३७ ७२ न्य राजपुत्रोंका यत्नसे रक्षण करै ३३ १७ पुरोहितादिकोंका आधिकार अण न करनेसे अनर्थ २० पुरोहितादिकों का लक्षण अपने पुत्रोंको नीतिशास्त्रादिकोंमें ३३ २२ प्रधानका कृत्य ३८ अविनीत युवराजसे भय ३३ २५ साचव कृत्य ९४ दुष्ट भी राजपुनका त्याग न करें ३३ २६ मन्त्रिमार्य २९ ९५ व्यसनी राजपुरका वशोपाय ३३ २७ प्राट्टिवाक कृत्य ... २ ३ सहायक गुण ... ... ७७ प्रतिानाधका कार्य ... ... ८७ कुशल करे ... ... ३९ ९८ शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका । पृष्ट. श्लो० पृष्ठ. श्लोक .. ... ... ४४ ४५ ६३ ४५ ६५ ४५ ६७ ४५ ६८ ... 1 ७० ... ७२ ४५ ७४ ... ... ... ७८ ... विषय. विषय. पडित कृत्य ३९ ९९ संभाराधिपतिलक्षण... सुमन्त्रकार्य ६९ १०१ पुजारीका लक्षण मायकत्य ४० ३]दानाध्यक्षलक्षण राजा अन्योन्यके स्थानपर अन्यो- सभासदलक्षण न्यकी योजना कर ४० ७सत्राधिपलक्षण अधिकारकी व्यरस्था ४० ९/परीक्षकलक्षण अधिकारयोग्यको अधिकार देना ४० ११ साहसाधिपलक्षण उसके अभावमें अन्ययोजना ४१ १४ प्रामाधिपतिलक्षण अन्यक्रमोंके सचिवकी योजना... ४१ १७ लेखकलक्षण दंडाधिपति आदि ६छः को प्रतिहारलक्षण योजना २० शौकिकलक्षण राजा तपस्वी आदिका रक्षण तपोनिष्ठलक्षण ४१ २२ दानशीललक्षण योजना करनेहारा दुर्लभ है ४१ २६ श्रुतज्ञलक्षण गजाधिपतिका लक्षण ४२ २७ पौराणिकलक्षण आधोरणलक्षण ४२ २८ शास्त्रज्ञलक्षण अश्वाधिपविलक्षण ४२ २९ ज्योतिपीका लक्षण. सारथिलक्षण ४२ ३१ मांत्रिफलक्षण सवारका लक्षण ४२ अश्वशिक्षकलक्षण ४२ ३४ तांत्रिकलक्षण 'अश्वसेवकलक्षण ४२ ३६ अंतःपुरयोग्यपुरुषलक्षण सेनाधिप और सैनिकों का लक्षण ४२ ३७/परिचारकलक्षण पचिपालु आदिकोका अधिकार ४३ ४० गायकाधिपलक्षण शतानीकादिकोंका लक्षण ४२ वेश्यालक्षण सबको अपने २ चिह्नोंसे चिह्नित वेश्याभृत्योका लक्षण करै... ४७ वैनालिकलक्षण तित्तिरादिकपोपोंकी योजना... ४३ ४९ शिल्पज्ञोका लक्षण और नाम कोशाध्यक्षलाग ४४ ५० सत्य और परोपकार श्रेष्ठ है वखाधिपका लग... ५३ संपूर्ण पापोंसे असत्य प्रबल है विवानाधधिपविलक्षण ४४ ५४ समृत्यलंग धान्यपविलक्षण ४४ ५५ कचहरीमें भाज्ञाके विना अन्य. पाकनायकलक्षण ४४ को आनेका प्रतिबंध आरामाधिपतिलग ४४ ५७ चौकोदारका क य ... गृहाद्यधिपविलक्षण ४४ ५७ राजा विष्णुतुल्य है.... ... ... ... ८० ... ३२ वेधलक्षण ... ... ८१ ८२ ४६ ८३ ८४ ४६ ८५ ८८ ९० ४७ ९२ ९३ ९३ ४८ २०४ ४८ ... ... .. ... 동 ४८ ... १० .
२० शुक्रनीतिविपयानुक्रमणिका पृष्ठ. सो० न करे .. ५० ... ५३ ... विषय, विषय. पृष्ट. लोक, मृत्यका राजसमीप अवस्थान- आता तत्पर रहै. ५२ ५२ प्रकार ४८ १२ महत्कार्य प्रागों को भी दग्ध संरक स्वाभीपक्षकी पुष्टि कर ४९ १४ करद राजाज्ञासे विवादियों के मतको अन्यथा धनहरण स्वनाशक है... ५२ ५५ युक्तिसे बोले १५ राजादिकोंकी योग्यता राजाको स्वकार्य निवेदनप्रकार ४९ १७ राजपत्नी आदिकोंका अपमान राजाके समीप उंचे स्वरसे हंसी वगैरहका निषेध हितकारी सेवकका कृत्य नृपाहूत त्वरित गमन कर १९ २१ राजा किसी मिपसे प्रजाको अदच राजद्रव्यका निषेध दुःखित न करै द्रव्यलामसे अन्यकार्यको नष्ट २६ विद्वान् अपने २ कार्यमें नियुक्त उत्कोचग्रहणनिषेध २७ अन्याधिकारकी इच्छा न करै... ५० २८ राज्यरक्षणप्रकार ६३ स्वामीफे गुणकार्य और मन्त्रका अधार्मिक राजाका लक्षण ६४ प्रकाशन करे ५० ३० राष्ट्रविनाशक राजाका त्याग... ५३ ६५ राजाको मिन न मानै ३१ अखधारियोंका अवस्थान नियम ५३ ६६ स्त्री आदिकाका सहवासनिषेध ५० ३२ सभामें पुरोहिवादिकोंका तारतम्य ५३ संपन्न होकर भी राजवेप न करै ५० ३३) राजा पुरोहितादिकाका कमसे राजदत्त भूपादिफको सदा धरै ५० पुरोगमनादिक सत्कार कौ... आपकालमें स्वामीको न स्यामै ५० राजाका त्रिविध वर्तन अन्नदाताका इष्टचिंतन करे ५३ ७३ अयज्ञ सेवनस अप्रधानमी प्रधा- भृत्यादिके संग परिहामादि कर- नेसे अनर्थ नदोवा है ७५ ५१ ३९/ सहसा कार्यको न कर भृत्य राजलेसके निना ५१ राजनियको अनिष्टींचता न करै ५१ ४२ करे ८१ सदाचारी राजा और अधिकारी लिस विना आज्ञा दे और कार्य इनकी लक्ष्मी स्थिर होती है ५१ ४४ कर व दोनो चोर हैं ८२ प्रच्छन्न वारसेवका लक्षण ४५.राजादिकोंका लेखका तारतम्य ४७/लेसकी आवश्यकता, ८८ प्रच्छन तस्करीका सक्षम ४८ लेसके दो भेद ८९ मन्त्री वालक भी राजपुत्रका अर- जयपत्रलग- मान न करे ५१ ४९जाज्ञापालझण- राजपुत्रका दुगवार राजाम न प्रज्ञापनपत्रलझण.... दिसाव ९२ ५०शाधनपालमण ९३ ३७ ३८ ५४ .. चोरराजाका लक्षण ... .. ..
शुक्रनीतिविपयानुक्रमणिका । ११ पृष्ट. श्लो ... ... ५९ ४५ ... ... " ... विपय. विषय. पष्ठ. श्लो. प्रसादपत्रलक्षण .. ९४मानादिकोंसे आयादिकोंके अनेक भोगपत्र लक्षण - ५५ ९५) भेद ४२ भागलेख्यलक्षण ... ५५ ९६मानादिकोंका लक्षण दानपत्रलअण - ५५ ९७व्यवहारार्थ चांदी आदिको क्रयणलेख्यलक्षण ... ९८ मुद्रित करै संवित्पलक्षण ५५ ९९ द्रव्य और धनका लक्षण मणलेख्यलक्षण ५५ ३०१ मूल्यका न्यूनाधिक्यकारण ५९ ४९ शुद्धिपनलक्षण २/पत्रलेसनप्रकार ५९ ५१ सामायकपत्रलक्षण ... ३ सम लेसपर राजमुद्रा संमतिपत्र । ४ परमें आयव्ययलेखनका स्थान- क्षेमपत्रलक्षण । विचार - भापापत्रलक्षण ५६ ९ व्यापकव्याप्यलक्षण आयधनलझण, ५६ १२ स्थानटिप्पणदिक भेद ६१ ६९ व्ययधनलक्षण १३ शपायव्ययस्थलायव्ययज्ञान - संचितधनलक्षण ५६ १३ ६१ ७२ तिथ्यदिकभी अवश्य लिसनी... ७४ व्यय दो प्रकारका संचित तीन प्रकारका १४ गुंजादिकोंका लक्षण निश्चितान्यस्वामिक संचित प्रस्थपादलक्षण ६१ ७९ निविध है। १५/संख्याका प्रमाण औपनिध्यादिकोंका लक्षण संख्या अनन्त है। ६२ ८१ स्वस्वत्वनिश्चित द्विविध एकादि पदार्थ संख्याओका नाम , ६२ ८२ साहजिकलक्षण १९ कालमान ६२ ८२ अधिकधनलक्षण ५७ २१ चांद्रादिकोकी व्यवस्था ६२ ८४ पार्थिन आयलझण २३ भति तीन प्रकारकी। ६२ ८५ व्ययके दो प्रकार ५७ २६ कार्यमानादिकोंका लक्षण ६२ ८६ निधि और उपनिधिका लक्षण .. ५८ २८मध्यमादि मृतिका लक्षण ६२ विनिमय और अधमर्णका ल. .५८ २९ पोपणयोग्य भृति नियत करै.. ६२ ऋण दो प्रकारका हीन भृति देनेसे अनर्थ .. ६२ ९३ ऐहिकपारलौकिकोंका ल. प्रतिदानलक्षण । शूद्रादिकाको अग्नाच्छादनमान ३२ भृति पारितीपकलक्षण ... ३३ उपभोग्यलक्षण ३४ मृत्यके तीन भद भाग्यलक्षण ३५/भृत्यको छुट्टी देनेका नियम :.. आयव्ययलेसनप्रकार ३९ रोगके समय भूतिदानप्रकार ... ६३ ९९ ७७ ... .. . ५७ १८ ... ... ५८ शुक्रनीतिविषयानुक्रमाणका । पृष्ठ श्लो० विपय. पृष्ट. श्लोक ... विषय. यार २ रोगग्रस्तके जगह प्रतिनिधि ६३ ४०१ /एक क्षण भी स्त्रियोंको स्वातंत्र्य सेवा विनाही भृतिदान ६३ न दे १९ कटुभाषी भृत्यका भृतिदानप्रकार । ६४ ७ यत्नसे स्त्रियों की रक्षा करै ६७ २२ राजाका भृत्यके संग वर्तन ८ चैत्यादिकोंका अतिक्रमणनिषेध ६७ २३ भृत्यको कार्यमुद्रासे अंकित करे.. ६४ १५)नदीतरणादिनिषेध ६७ २४ अपना विशिष्ट चिह्न किसीकोभी बहुत दिनतक खट्टे पदार्थ न खाय ६७ २६ न दे ६४ १७ रात्रिके समय वृक्षपर न रहै ६७ २७ दश प्रतियोंका जातिनियम.. ६५ २८ चत्वरादिकको दिनमें भी न सैव ६७ २८ शहपुरोहिवादिकोंका निषेध ... १९)सूर्यको निरन्तर न देखै ६७ २९ भागपाही और साहसाधिपति सन्ध्याके समय भोजनादिकोंका क्षत्रिय ६५ १९ निषेध प्रामाधिपादिकांक विषे जातिनियम '६५ २० व्यवहारमें लोकही आचार्य है... ६८ ३१ सेनापति शूरही नियुक्त करना... २२ राजादि सद्धर्ममें दूषण न लगावै ६८ ३२ राजाको त्यागने योग्य दुष्ट गुण ६५ २३ आग्रहपूर्वक भाषण न:करै ६८ ३३ इति युवराजादित्यकथननामक किंचित् भी पापका स्मरण न करै ६८ ३५ द्वितीयाऽध्याय । सामको यत्नस प्रहण करे ६८ ३७ श्रुत्यादिकविहित कर्मको कर अध्याय ३. राजा अधर्मनिरत मित्रादिकोंका- साधारणनीतिशासकथन. भी त्याग करें ६८ मयोंकी सुसक अर्थ प्रवृति है १. भावतातियोंका टअण धर्मके विना मुस नहीं होता २/खी भादिकी एक क्षण भी उपे- मसधारण विहिताचरण स्थन ३ धान कर ४१ निपिसापरणकयन ६जहां विरुद्ध राजादिक हो वहां महाविधि पाप एक दिन भी न यस ६८ १२ दरिद्री वादियोंका रक्षण कर ८जहां अविवेकी राजादिक हों यहां समयपर हित और मिव वपन फंह, १० धनादिकको इच्छा न कर ६९ ४४ सुमोको अपने अपमान आदिको मानादिफ पार्टनादिय न करती ६६ १२ ६९ ૪૬ पारापनपीटतपुरुषका यर्वन १३ राजादिफॉकी सारधानपर्नस दहियोगी दशपर... १४ मेया फर १९ दहियाँधोयान पर अनर्थ ६६ १५ मात्रादिक मंग विरोधादिक न फर ६९ पाका पर्श भी अगरफ६ ६६ १६/श्री आदि मग वियाद न फर ६५ ५१ दिया गम्योपनासार १८ भांटाोजनादिफन कर ४ प्रगटन पर चारको क्या यात है ... ६७ ५२ ...
शुक्रनीतिविपयानुक्रमणिका। १३ पृष्ट. श्लोक पृष्ठ. लो ... ... ७० ... ... ... ... .. विषय, अन्यधर्मका सेवन न करे त्याज्य छः दोष विनापूछे किसीसे न कहै अनुभवके मिना स्वाभिप्रायको न दिसावै दंपती आदिकी साक्षि न दे किसीके मर्मको पर्श न करे अश्लील कीर्तनादिकोंका निषेध .. अपने बनाये हेतुसे किसीको कुंठित न करै शनुसेभी गुण ग्रहण करने प्रारब्धसे धनी और निर्धन होताहै दीर्घदर्शीका लक्षण प्रत्युत्पन्नमतिलक्षण . आलसी मनुष्यका लक्षण साहसी मनुष्यका लक्षण चिरकारी मनुष्यका लक्षण कदापि सहसा कर्मको न करें... मिनकी प्राप्ति के लिये यत्न करै... विश्वस्तका भी अत्यंत विश्वास न १ ... ७० घर न बसा २ ... ... ४ ७० ... विषय. ६९ ५३ विद्यादिकोंका फल ५४ सुविद्यादकको नीचसे भी ग्रहण ५९ करै ७२ ९३. नष्टवस्तुकी उपेक्षा करे ७२ ९४ परद्रव्यहरणादिका निषेध ७२ ९५ प्राणनाशादिकोंमें अमृत बोले ७३ ९७ स्त्रीपुरुप आदिमें भेद न करे ९८ ६२ वार्ता करते हुए पुरुषोंके यांचमें नजाय ७३ पुत्रवाला सपुत्र कन्याको घर न बसावै ७३ ६५/सधन और सभर्तृक भगिनीको ७३ आग्नि आदिको अल्प समझके अपमान न करे ७३ ऋणादिकोंके शेपकी रक्षा न करै ७३ याचकादिकोंके संग वर्वन ७३ ७१ ७१ दाता आदिकी कीतिहीको सुनै ७३ ६ समयपर परिमित भोजन करै... ७३ ७१ ७४ विहारादिकको एकांवमें करै ७१ ७६मधुरादिक पडूस अन्नको प्रीतिसे ७३ ए ७७ विहार स्वत्रीके साथ करै दीनादिकोंका उपहास न करै ... ११ कार्यसाधकका कृत्य ५१ ७८ ७४ १२ किसीको अनिष्ट न कहै १३, राजादिकाका आज्ञाभंगनिषेध, ७४ ८२ असत्यकार्यकारीगुरुको भी बोध ८३ करै .. कार्यबोधक छोटेका भी उलंघन ७२ ८५ ७४ ७२ ८६ वरुणीको स्वतंत्र छोड़कर कहीं न जाय ७२ ८८ साध्वी मार्यादिकोंका यत्नसे ७२ ८९ ७४ ... ८ मक्षण करै ... प्रामाणिकादिकोंका विश्वास सदैव ७४ ... उग्रदंड और कटुवचनका निषेध कटुवचन और मृदुभाषणका फल विद्यादिकोंसे प्रमत्त न हो विद्यामत्तको अनर्थ फल शौर्यमचको अनर्थ फल श्रीमत्तपुरुपकी स्थिति अभिजनमतकी स्थिति बलमत्तवन मानमचधर्वन , १५ पालन करें १४ शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका । पृष्ट. श्ला० पृष्ट सोग ५९ ... ... ... ६१ ६२ ... ७७ ... ... ... ६८ ६९ ७० पिपर. विषय, जीतेदी मृनतुन्य है ७४ २१। गुरु आदिक भाग प्रौढपाद न आयुरादिक नव गुम कर २४ पठ देशादनादिफको करें उत्तम पुरुपका लझण देशाटनादिकसे लाभ २७ सोलहवर्षसे ऊपर पुत्रको संवार्य अन्नपचनका निषेध ३४ तादन न करे गुरु मादिकाको मार्ग डाडदे दौदिन आदिक पुनाधिक हैं शम्टादिकास दूर चलनेका स्वामीरा रक्षण नियम नीके संग एकशय्यानिषेध मुंगी जादिता विश्वास न कर यर और भित्रको परीक्षा गगनादिकका निषेध ७६ ३८ विवाहमें पुलादिकोंकी अपेक्षा... ७८ पटॉफी मागरे विना साथ न 'कन्याका टनग ४० विद्या और धनका संपय कर ७८ निदित भी कर्म अटको भूषण घनार्जनमा उपयोग दोवाद ... ७६ ४१ विद्या धनसे श्रेष्ठ प्रेटर गुपन ४२ अपाय धन संपादन करे, गारको मामी पनानी छ। धनका प्रभाव ४३ लंगरमी आवश्यकता आरम्पर फार्य पदिले पर रेगोविना व्ययहारनिरेप। ७६ ४४ मित्रा ७६ ४५ लय पिनाम्याज भी धन ६. मपंचया अश्य सिर जगारी पर फरने उपाय ७६ ४७ पन देनेमनिषा सा करने पराय दुर्जन विषय भादारादिलों में समा माग पद पदि मनुष्प मोवेगावम पनि भादिया नाग दिन- आनंदामोदेगेगा पारी ५. 'पिना गदार भीर प्री: पुको मम्मा पार पान पनमा दिमाग पर "टापारि ५२ विमान पर अनर्थ বিযেন " ५३ यानी माविमाग ५३ जोनना होगी भी न ८. Tagrat ५६ना मागभीर विना नाम inter गमन पाई। ५. गमाविक गुपinमान catati gी कर ifrar दिन भी . म ८१ ะะะะ .. ... ... ८४ ८६ ... ८० ८९ ... " ८० . ८० ३ ." - .. ... ... 1" ...
शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका । --- पृष्ठ. श्लोक. पृष्ठ. श्लोक ... ... ८१ ... ८ . ४२ ८४ ४३ ४४ इच्छा न करे विपय. विषय. दान और धर्म अतिशीघ्रतासे करै ८० वाल्यादिक अवस्थामें मात्रादि. दानधर्मके विना परलोकमें सहा- कोंका नाश यह महापापका यक नहीं १ ८३ अनिष्टप्राप्तिकारण दानसे शत्रुभी मित्र होता है ३२ नररूपधारी पशुका लक्षण पारलोक्यादिदानका लक्षण ८३ ३४ ८१ २ सलका लक्षण आराध्यदेवको अत्यन्त माने ८३ ३६ आशापद्धको जगत् भी पर्याप्त दानके विना घशीकर वस्तु नहीं ८१ नहीं है ३७ दानका फल धूत पुरुषका कर्म ३९ विचार कर स्नेह वा द्वेपको करे ८१ प्रीतिकारक पुत्रका लक्षण ८४ सब अतिको वजे दे.. ८१ १० प्रतिदा स्त्रीका लक्षण ८४ अति क्रौर्यादिकोंसे अनिष्ट फल ८१ १२ प्रीतिदा और दुःसदा माताका मध्यम प्रकारका आचरण करे... .८२ १४ लक्षण देवादिकोका स्वामी होनेकी प्रीतिकृत्पिताका लक्षण ८२ १५/भित्रका लक्षण ८४ ४५ इनके भजनादिककी इच्छा करै ८२ १६दारिद्यका कारण तरुणी आदिको पराधीन न करे ८२ १७दुःसके कारण अल्प कारणसे बडे अथको न त्रियोंकी यथेष्ट कामना न करै त्यागे ८२ १८ वह सुसमागी नहीं होता. ८४ अधिक सर्चके भय सत्कीर्तिको स्त्री वश होनेका उपाय न त्यागे ८२ १९ मधुरभोगी आदिक निर्जनत्वा- दूसरा उदास हो ऐसे वचनको दिककी इच्छा करत हैं ८५ विनोदमें भी न केहे कठोर वचनस मित्र भी शनु सगुणाधिक श्रेष्ठ है ८२ २२ ब्राह्मण अपने कर्मसे सबसे स्वबलाधिक शत्रुको कांधेपर भी अधिक होता है ले चले स्वधर्मस्थ ब्राह्मणको देसकर मनुष्यको सौजन्य भूषण है अधादिकोंमें वेगादिक भूषण है ८२ २५ क्षत्रियादिक डरते हैं इनके विपरीत दुर्भूपण है ८३ जिसम धर्महानि न हो वही २८ एकही नायक होय तो शोभा है ८३ २९ वृत्ति श्रेष्ठ है हिंखकी उपेक्षा न करें २९ सबसे कृषिवृत्ति उत्तम है पैशुन्यादिक दोष गुणियों के भी याच्या अधमतर वृत्ति है गुणोंका छादन करते हैं ८३ ३० क्वचित् सेवा भी उत्चम कृत्ति है ८४ ४८ . ८२ २० मूर्व मनुष्यका कृत्य होता है ८२ २४ ... + १६ शुक्रनीतिषिषयानुक्रमणिका । पृष्ठ. लोग ८८ ... ... ८८ ९९ २ ... ... ४ ... ५ ८ विषय, पृष्ट. श्लोक. विषय आध्ययवादिकोंसे महाधनी नहीं सबसे अधिकका लक्षण ८८ ९४ ८८ ९. होता ८६ ६६ साधु लक्षण राजसेवाके विना विपुल धन नहीं खलकर्म ८८ ९८ ९८ होता ८६ ६७ कलहकारक क्रीडा न करे विनोदमें भी शाप न दे राजसेवा अति कठिन है। मित्रकी गोप्य वस्तुका वैरी दूरस्थ भी समीप है होनेपर भी प्रकाश न करै... ८८ ३०० पहिले निर्धनत्व होना ८६ ७२ बलवानके विपरीतको न कहे . ८८ पहिले पागमन सुखदायी है ८६ ७३ पराये घरमें जाकर तत्स्त्रीको न मृदापयत्वसे अनपत्यत्व श्रेष्ठ ८६ ७४ देखे ८८. अल्पज्ञतासे मूर्सता अच्छी ८६ ७५/अन्य अपराधी बालकको पहिले सुरसकारी पीछे दुःसकारी ८६ शिक्षा न दे ८९ कुमन्त्री आदिकोंसे राजादिकोंका अन्य विवादको ग्रहण कर कि- नाश होता है ... ८६ सीके संग विवाद न करे ८९ इस्त्यादिक संसर्ग गुणधारक है... पारवत्र्यसे परे दुःख और स्वत. न्त्रतासे परे सुरा नहीं ८९ जयादि त्रितय आधिकारस १० मिलता है प्रत्यक्षादि धार प्रमाणोंसे व्यवहार- गृहस्थियोंको दश सुसदायक... ज्ञान होता है ८१ ८९ १३ अन्तःपुरमें नियुक्त करने इति तृतीयाध्याय । योग्य .... काल नियमसे फार्थीफो करे ८३ अध्याय ४. भर्य धर्म, आदिम आत्मा आदि.. मिश्नप्रकरणकपक. को नियुक्त करे ८४ मित्र और शत्रु पार प्रकारफे ८९ अपत्यरहित भार्या आदिफ छः ८९ ३ परदेशमें मुपदायी होते हैं ८७ ८९ राजा भी हमार्गमें अरटे यान |कत्रिम और सहज ऐसे दो मित्र गमनन करे... और शत्रु है १० शीघ्र जरा करनेवाले सहज मित्रका लाग ८९ प्रिय होने का उपाय सहज शशा रक्षण १४ परम्परशशुका रक्षण अप्रिय होनेका कारण ९२/जाराका रक्षण स्तुगिय देवा भी वशम होते शवदासीन मित्रों का लक्षण है ८८ ९३ मित्र और शत्रुओंके संग रानाफा सगजोधा रपयं विपारे ८८ ९४| आपरण ९१ २० ८० ... ८७ ... ८७ ... ... मिग्रमा लक्षण वरीका लक्षण ८७ 29899 ८८ १७ ... ...
शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका । १७ पृष्ठ. ... ... लो ९४ ९४ ६४ ६४ ६५ ९४ ६७ . ... ९४ ६९ ... ९५ ... ९५ ८२ ... ... विपय. 'पृष्ट. श्लो० विपय. सामादिकोंका विचार स्वयु- सूचकसे देश नष्ट होता है क्तियोंसे करे ९१ २३ उत्तम राजाका.लक्षण मित्रता होनेका कारण ९१ २४ राजा पहिले आत्माको नम्र फरे मित्रके विषय सामादिप्रकार ५१ २५ अपराधके चार भेद उदासीन भी शनु होता है ९१ २७ चार अपराधकी परीक्षा शत्रुके लिये सामादिप्रकार - ९१ २८ केवल दंडके योग्य पुरुपका सामादिकोंका क्रम ९२ ३४ शत्रुभेदसे सामादिकोंकी व्यवस्था ९२ ३५ अवरोधके योग्य पुरुषका ल२... 'मित्र के लिये साम दान ही सरोध और नीचकर्मके योग्य ९२ ३६ पुरु० ... रिपुपीडिवोंका साम और दानसे शास्त्रोक्तदडयोग्यपुरुपलक्षण संग्रह करे ९२ ३७ स्वप्रजाओंका साम और यावज्जीव बंधनयोग्यलक्षण मार्गसंस्करणयोग्यपुरुषका ल०... दानसे ही पालन करे ९२ ३८ विपरीत करनेसे राज्यनाश धनगर्नसे अपराध करनेवालेको होता है ९२ ३९ दंडका लक्षण ९२ ४० बंधन और ताड़नयोग्यका दंडका प्रभाव ९२ ४३ लक्षण राजा सदैव धर्सरक्षाके लिये तनुरज्जु सुवेणु वाडनयोग्य दंडधारी हो .... ९३ लझग दंड ही संपूर्णधाका उत्तम देहकी पीठपर.. मारे शरण है ९३ ४८ नीच कर्म करनेवालेको दंड दुर्जनोंकी हिंसा अहिंसा होती है ९३ ४९ वधकी शिक्षा कदापि न करे .. दुड देनेसे राजाको इटानिष्ट- असहायकको दंड न दे फलकथनका कारण ९३ ५० प्रजा क्षुब्ध होनेका कारण . कलियुगमें आधा दंड कहा है। ९३ ५४ देशपार करने योग्यका लक्षण युगप्रवर्तक राजा है... ९३ ५५ मार्गसंरक्षणयोग्योंका लक्षण धष्ठि प्रजा होने का कारण ... ९३ ५७ राजा संसर्गदूषितको दंड देकर पापी राजाके राज्यमें समयपर सन्मार्गकी शिक्षा द मेघदृष्टि नहीं होती ९३ ५८/राजादिकोंको बिगाड करने वालेको शीनही नष्ट कर दे निषेध ९४ ५९/गणदुष्टता हो तब उपाय राजा काम क्रोध और लोमको प्रजा अधर्मशील राजाको सदैव ९४ ६२ भय दे ... ९५ ८५ ९६ ९६ ९१ ९३ ५ ... ... ९७ ... बैण और शोधी राजाका ७ ९७ ८ त्याग दे ... ९७ ९ शुक्रनीतिविषयानुकमाणका पष्ट. उलो विषय.. १. श्लो १०० ४२ ... चय करे १०० ... ... विपय. अधर्मशील राजा और प्रजा तत्काल नष्ट हो जाते हैं मात्रादिकका त्याग करें तो निगटबद्ध न करे उचमादिक साहस दंडका उत्रण पण.आदिकों का लक्षण फोगका लक्षण कोरासंग्रहका उत्तम प्रयोजन अन्यायोपार्जित कोशसे दुष्टफल पात्रका लक्षण अपायका धन अवश्य हरण करे २०० ४७ १०० ... संग्रहयोग्य धान्य आदिको परीक्षा औषधी आद सब वस्तुका से. ९८ सगृहीत धनकी यत्नस रक्षा ९८ १२, ९८ १३ स्वकार्य में सदा जागृत रहे ९८ १६ संचयको रक्षा नहीं करसकता १८' उससे परे मूर्ख नहीं ९८ २० मूर्खका लक्षण ९८ २२ यथार्थ जाननेके लिये स्वयं यत्न करे ९८ २१ राजा परीक्षकोंसे और स्वयं रत्नको परीक्षा करे ९८ २२ वन आदि नव महारत्न नवरत्नांक वर्ण और नवग्रह . २३ संपूर्ण रत्नोंमें वन रत्न श्रेष्ठ है श्रेष्ट रत्नका झग .१०१ ५१ १०१ ५२ १०१ ५४ १०१ ६१ १०१ ६३ ... ९९ २४ असन् रत्नका लमग ... अधर्मशील राजा धन सब प्रकारमहरले शमुझे आधीन राग्य होनेका पारण सीधंदेवारसे कदापि फोश दिन करे सापत्ति में अधिक धन प्रहण करे आपत्तिरहित हो जाय वर मूद पहित दे प्रयटसे मनिष्ट फल फोरसंप्रद करने का प्रमाण प्रजामाणका फल गतिक माना फारण गीतिनिरनामे कोशादि- फा पानको राण भोप आदिपनारा प्रताप सियासी मर पापपररा प्रमाण पद्मराग औरवस धारण करने ९९ : २५ फा निषेध याहुत दिन धारण किये मोती और मंगा हीन होजाते है दोपवर्जित रत्नका उमण ९५ २८ मोर आधेर और फम दोनेका ९० २९ १०२ ६८ १०२ ७० मातिषी उत्पति २३मिायाक रंग और मेद ५५. चिम मोवांग उत्पा ५९ ३६मासीकी परीक्षा ... ... ... नांका नुन्यमान বয়া মাথা १. ४. गुरुमं प्रमाण ... ... १०३ शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका । पृष्ठ. श्लो० पृष्ठ. श्लोक न धारे ... ... मोतियोंकी मूल्यकल्पना ... ... । गौआदिका उत्तम मूल्य ८ विपय. विषय. काले और रक्त जिंदुबाले रनको कारु आदिसे लेनका प्रकार... १०७ ३२ १०३ ८८ भूमिभागादिकको उसी समय लें.-१०७ ३४ माणिक्यादिकोंका मूल्यविचार १०३ ८९ किशानको मागपत्र लिख दे। १०७ ३५ गोमेद सन्मानके योग्य नहीं ग्रामधनीके प्रतिभू ग्रहण कर ले । ३६ होता १०३ ९१ मयन्त गुणवालोंका मोल मानसे कचित् करलेनेका निषेध .... १०७ नहीं होता १०४ ९३ व्यापारी आदिसे ३२ वां भाग ल २०७ ३९ १०४ ९३ हाटवाले आदिस भूमिका कर ले १०७ ४० मोता भेद और लक्षण १०४ ९७ राष्ट्र दो प्रकारका है १०७ ४२ सुवर्णादि सात धातु १०४ ९९ पृथ्वीम राजासे अन्य देवता उनका तरतमभाव १०४ २०० नहीं है १०७ ४४ सुवर्णादिकोंके गुण १०४ १ राजा दशक पुण्य और पापको धातुके मूल्यका प्रमाण १०४ भोगता है अधिक मूल्यके गौका लक्षण २०८ ४७ १०५ वकरी आदिके मोलका प्रमाण नरकका लक्षण २०८ ४७ १०५. सर्वधर्मरक्षणसे देशरक्षा होती है १०८ ५१ हाथी आदिका उत्तम मूल्य १०५ ११ मुख्य जाति चार प्रकारको है १०८ ५२ उत्तम अश्व आदिका लक्षण संकरस जाति अनंत है १०८ ५३ १२, जरायुज आदि चार प्राणियोंकी समयके अनुसार सयको मोल- जाति हैं १०८ ५४ कल्पना करले १५ द्विजोक कर्म १०८ शुल्कका लक्षण... १०५ १७ नाह्मणके कर्म वस्तुओंको शुल्क एकवार ही क्षत्रिय और वैश्यक कर्म १०८ ५८ ग्रहण करे /... १०५ १८मूद आदिके कर्म १०८ ५९ शुल्कका परिमाण, १०६ १९ किशानसे भाग लेनेका प्रमाण १०६ २२ ब्राह्मणादिके लिये फपिभेद १०९ ६० उत्तम कृषिकृत्यका लक्षण १०६ २४ ब्राह्मणके विना अन्यको मिक्षा बडागादिकोसे संपन्न भूमिके निहित है १०९ ६१ राजभागका तारतम्य ... १०६ २५/द्विजाति साग वेदको पढे रजतादियुक भूमिके लिये रा- गुरुका लक्षण- १०९ जमागनियम .. २८ मुख्य विद्या ३२ और कला ६४ हैं १०९ ६४ तृण काष्ठादिके बेचनेवालासे २० विद्या और कलाओंका लक्षण वां भाग कर ले ३० वेद और उपवेदक नाम १०९ ६७ अजा आदिके गृद्धिसे अठां वेटेकछ अग १०९ ६८ भागले. १०६ ३१ मामासादि विद्याओं के नाम ६५ ... और मूल्य ... १०८ - ... ... ... ...
शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका । पृष्ठ. श्लोक पष्ट. श्लोक ५ ... .. ... ११२ १२ ११३ १७ ११३ २० २१३ २२ ... ... विषय. मंत्र और ब्राह्मण दोनों मिलके वेद कहा है मंत्र और ब्राह्मणका लक्षण ऋग्भागका लक्षण यजुर्वेदका लक्षण सामका लक्षण अथर्ववेदका लाग आयुर्वेदका लक्षण ... धनुर्वेदलक्षग गांधर्ववेदलक्षण अथर्ववेदलक्षण शिक्षालक्षण कल्पलक्षण व्याकरणला निरुक्तलक्षण ज्योतिपलक्षण छंदका लक्षण मीमांसालक्षण तर्कलभग सांख्यलक्षण वेदांतलक्षण योगलक्षण इतिहासलक्षण पुराणलक्षण स्मृतिलक्षण नास्विकमवलक्षण अर्थशास्त्रलक्षण कामशावलक्षण शिल्पशास्खलक्षण अलंकारशास्त्ररक्षण काव्यटक्षग ११५ ४४ ११५ ११ ५९ विपय, देशादियमलक्षण ११२ १०९ ७१ गांधर्ववेदोक्त ७ कलाका १०९ ७२ २२. ८ लझण १०९ ७३ आयुर्वेदोक्त १० दश कलाओका ११० ७४/ लक्षण ११० ७५ धनुर्वेदोक्त ५ कलालक्षण ११० ७६पृथक्चार कला ११० ७७ तडागकरणादिकला ११० ७८|चार आश्रम ११४ ३९ ११० ७९ चार आश्रमामे कृत्य १२० ८०खी और शूद देवपूजा न करै... ११५ ४४ ११० ८१ पतिसे पृथक् स्त्रियों को धर्म ११० ८२] नहीं है ११० ८३ स्त्रीके नित्यकृत्य ११० ८४ साध्वी की पैशुन्यादिको त्याग दे ११६ ११० ८५ इस प्रकार पतिकी सेवा करने ११० से पसिलोकमें जाती है ११० ८७ स्त्रोफे नैमित्तिक कृन्य ११६ ६१ १११ ८८ तहारजस्वलाखीके नियम १२६ ६१ १११ रजस्वला शुद्धि २१६ ६३ ११२ ९० पति के समान नाथ और सुस ९१ नहीं है ११६ ६६ ९२ अन शूद्रधर्म कहते हैं ११७ ६९ ९३|संकरजातिके नियम ११७ ९४ राजा स्वर्णकारादिकोंको सदा ९५ कार्यम नियुक्त करे ९६ मदिरागृह गांवसे पृथक् करे... ११७ ७९ ९७ मदिरापान दिनमें कभी न १११ ९८ करावं ११८ १११ ९९ वृक्षारोपण और पोपणके नियम ११८ १११ ३०० ग्राम्यवृक्ष के नाम और लक्षण ११८ ८२ ११२ २ आरण्यवृक्षके नाम और लक्षण ११८ ११२ २ देशमें विपुल जल हो ऐसा ११२ ३, कर ११९ १४ ... १११ १११ १११ १११ १११ १११ १११ ७८ ८० ८० दशभापाक्षण अवसरोक्तिलक्षण ... देयावनमवलक्षण ..
शुक्रनीतिविपयानुक्रमणिका । पृष्ठ. श्लोक पृष्ठ. श्लो ... प्रकार है .. ... ... ७८ विषय. विषय. बतुप्पथमे विष्णु मादिका स.. ब्रह्मा के मुखाकी व्यवस्था १२४ ६२ दिर बनवावे ११९ ९६ हयग्रीवादिकोको आकृति १२४ ६२ नेरु आदि मन्दिरके सोलह अनिष्टकारक प्रतिमा १२४ ६६ ११९ ९७ सौख्यदायक प्रतिमा १२४ ६७ नम आदिका लक्षण ११९ ४०० सात्त्विकप्रतिमालक्षण १२४ ६७ मंदिरादिकोके नाम ११९ विष्णु प्रतिमाके चौवीस भेद १२४ उत्तन्मंडपका प्रमाण ११९ लक्षगोंके अभावमें भी दोप साविकी आदि तीन प्रकारको रहित प्रतिमा... १२४ ७२ प्रतिमा ... २१९ ४|प्रमाणदोपरहित प्रतिमा १२४ ७३ सात्त्विकी आदि प्रतिमाके युगभेदसे वर्णमेदकथन ... १२५ ७४ लक्षण ११९ ५/वर्णभेदसे सात्त्विक्यादिकथन १२१ अंगुलादिकोंका प्रमाण १२० ९ युगभदसे सौवर्णादिप्रतिमा- प्रतिमाकी उंचाईका प्रमाण ... १२० विभाग १२५ ७६ अवयोंका प्रमाण २२० १३ अनुक्तप्रतिमास्थापननिषेध १२५ रम्य प्रतिमाका लक्षण १२१ २५ भक्तिमान् पूजकके तपोवलसे अवयवोंके आकृतिका वर्णन १२१ २७ प्रतिमादोष नष्ट होजाते हैं १२५ अवयवों के अन्तरका प्रमाण १२२ ३४ वाहन स्थापन विचार १२५ ८१ अवयवोंके परिधिका प्रमाण.. १२२ ३७ वाहन लक्षण १२५ प्रतिमाके दृष्टिका प्रमाण १२३ ४८ गजाननको मूर्तिका लक्षण १२६ प्रतिमाके आसनका प्रमाण १२३ ४९ अवयवाका प्रमाण १२६ द्वारप्रमाण ५० नियोंके अवयवाका प्रमाण १२७ ५०० देवालयके उचाईका प्रमाण १२३ ५०सके मुखका प्रमाण १२७ मखिलका प्रमाण १२३ ५२ वालकके अवयवोका प्रमाण १२७ ३ प्रासादकी आकृति १२३ ५४ शरीरको पूर्णता होनेका वर्ष- चारों दिशाओं में मण्डप और प्रमाण १२७ ६ धर्मशाला बनावे १२३ ५४|सप्ततालप्रमाण मनुष्यक अवयवों- मन्दिरके स्तम्भोंका प्रमाण ... १२३ ५४ का प्रमाण १२७ स्तम्भोंका निषेध ... १२३ ५४ अष्टतालके अवयवोका प्रमाण १२७ विस्तार विचार १२३ ५५/दशतालके अवयवोंका प्रमाण १२७ १२ १२३ ५७ शिल्पी मूर्तियोको वृद्धसदृश प्रतिमाके रूप आयुधका विचार १२३ ५८ कलना कमी न करै १२८ १९ १२३ ५९ राजा ऐसे देवतानोंका स्थापन मुख अनेक हों वहां व्यवस्था १२४ करके प्रतिवर्ष उनका उत्सव अनेक भुजाओंकी व्यवस्था परे... १२८ २० ८० ... ... ८७ ... ... १२३ २ ... ... ८ वाहन विचार आयुधस्थान विचार ...
शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका । पृष्ठ..श्लो ... ... ... ... ... . ... विषय. पृष्ठ. श्लो०/विषय. पूर्वपक्षको शुद्ध किये विना जो वालका दंड दे १३७ ३४ उत्तर दिवाते हों उनको अधि. राजाभी सदा अपनी बुद्धिसे कारसे निवृत्त करे १३५ ११ एक नियोगी कर दे १३७ ३४ नियोगी लोमसे अन्यथा करै पूर्वपक्ष पूरा हो ले तब वादीको तो दंडयोग्य होता है १३७ ३५ १३५ १३३ (भ्रातादिकका नियोगी न करे राजाज्ञा न हो तबतक प्रत्यर्थीको विवादको लगाकर दोनों मर- १३६ १५ आसेष चार प्रकारका है गये तो पुत्र विवाद कर १३७ ३७ १३६ १६ जिसपर अपराधका शंका हो वा मनुष्यमारणादि अपराधोंमें प्रति- निधिको नदे १३७ ३८ जो अपराधी हो उसको ही साक्षीका कृत्य १३८ ४२ राजा बुलावे असमर्थादि अपराधियोंको न प्रतिभूका लक्षण १३८ ४४ विवादियोंको रोककर वादकी बुलाव १३६ २१ प्रवृत्तिको राजा करै १३८ ४५ होनपक्षादि त्रियोंकोभी न बुलावे १३६ २२ पक्षका लक्षण १३८ ४७ निवष्टकाम आदिकोंका आसेघ- भापाके दोष १३८ ४८. निषेध १३६ २३ समर्थ हों उनको यानमें पक्षाभासको वर्जदे १३८ ४९ बुलवावे अप्रसिद्धलक्षण १३८ ५० निरावाध और निष्प्रयोजनका जब अर्थीप्रत्यर्थी अन्यकार्यमें लक्षण १३८ ५० व्याकुल हों तब प्रतिनिधि- असाध्य और विरुद्धका ल. १३९ ५२ को करले १३७ ३०/निरर्थक वा निप्प्रयोजनका ल. १३९ ५४ मप्रगल्भ आदिके उत्तरपक्षको उत्तरलेखनविचार :: १३९ ५६ बंधु आदि कहै .. पूर्वपक्ष ठोक २ करदें तो विवा- दंडयोग्य प्रतिवादीका लक्षण १३९ ६१ दको प्रवृत्त कर... १३७ ३२ चार प्रकारका उत्तर ... १३९ ६३ जिस किसीसे कार्य कराले वह सत्यादिकांक लक्षण १३९ ६४ उमाका किया समझना १३७ ३२ मध्योत्तर चार प्रकारका १४०६६ नियोगित पुरुपको सोलहवां प्रत्यवस्कंदनलक्षण १४०६७ भाग भृति दे .... १३७ ३३ प्राइन्यायलक्षण अन्यथा भृतिका ग्रहण करने- प्रादन्याय वीन प्रकारका १४०६९ ... ... ... १३७ ३१ संदिग्धोत्तरका लक्षण १३९ ५९ ... ...
२४ शुक्रनीतिविपयानुक्रमणिका ! पष्ट. श्लो. ... १४४ २६ ... १४५ २८ विषय, व्यवहारके चार पाद... प्रथम न्याय वा विवादका निर्णय करने योग्य एक विवादमें दो वादियोंको क्रिया नहीं होती... भूत और भव्य दो प्रकार तत्व और छलका लक्षण साधनके भेद विवादा अपन २ साधन प्रत्यक्ष दिसावें जो दोष गुम हों उनको सभा- सद प्रकट करें ... स्टसाक्षी और साक्ष्यलोपीको १४५. २९ ... १४५ ३२ १४५ ३३ ... ... ३४ दूना दंड दे पृष्ठ. श्लोपिय. १४० ७२ लेप और साक्षी न मिले तो भोगसही विचार करे १४० ७५ कुशल और कुटिल बनावट लेस करलेते हैं १४१ ७७ केवल साक्षियोस ही कार्यसिद्धि १४१ ७९ नहीं हो सकती १४१ ७९ केवल भोगासे कार्यसिद्धि १४१ ८१ नहीं हो सकती अन्यथा शंका करनेसे अनवस्था १४१ ८४ होती है प्रामाणिक भोगका लक्षण २४१ ८५ केवल भोगका बतावे वह चोर जानना १४१ ८७ केवल आगमभी प्रबल नहीं १४२८९ होता १४२ ९० साठ वषतक भोग हा ता उसको १४२ ९१ कोई नहीं छीन सकता १४२ ९२ आधि आदिक कवल भोगस १४२ ९६| नष्ट नहीं होता .१४२ ९८ उपेक्षादिकारणसे सामी उस १४२ ९९ फलको प्राप्त नहीं होगा १४३ ४ अब दिव्य कहते हैं १४३ ५त्रिविध साधनके अमावमें तीन प्रकारको विधि १४३ ९युक्तिका लक्षण १४३ १० कार्य साधक हेतुओंका लमय धन ग्रहण करने योग्य प्रति- १४३ ११ युक्ति मी असमर्थ होय वहां १४४ दिव्य १४४ १५ दफर कर्मके लिये दिव्य १४५ ३५ . १४५ ३८ ... १४५ ३९ लिसित दो प्रकारका तहां लौफिक सात प्रकारका राजशासन तीन प्रकारका साधनक्षमलेख्य लक्षण साधनायोग्यलेरयका लक्षण . अच्छे लेससे फल साक्षांके लक्षण और भेद खियोकी साक्षी स्त्री करनी पालादिक साक्षियोग्य नहीं है राजा साझिकयनमें कालक्षेप मकरे... प्रत्यक्ष साक्षीको कहावे. इंडप और नाच साक्षीफा ... १४६ ४० २४६ . ... १४६ ४२ १४६ ४४ १४६ वादीका लक्षण... एफ २ से साक्षीका कथन १४६ ४६ पाशी रेनेका प्रकार १४६ १४६ शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका। २५ 14 विषय, ... ... ... ... ... c ... ... पृष्ट. श्लो० विपय. पृष्ट. श्लोक दियको न मान वह धर्म- माठ तरहका निर्णय १४९ ८१ तस्कर है १४६ ४९ सबके अभावमें निश्चय करजे- दिव्यको स्वीकार करनेवाले. को राजा प्रमाण है १४९ को उत्तम फल १४६ ५१ राजा धर्मशाखके अविरोधसे दिव्यनिर्णयम पदार्थ नीतिशास्त्रको विचार १४९ ८५ आमिादेव्यका प्रकार विवाद होने का कारण १४९ ८६ गर दिव्यका प्रकार अधर्ममें प्रवृत्तहुए राजाकी सभा- घटदिव्यका प्रकार १४७ सद उपेक्षा न करे : १४९ जलदिव्या प्रकार धिग्दंड और वाग्दंड ये दोनों १४७ धर्माधर्म दिव्या प्रकार सभासदाक अधीन होते हैं १४९ ९० १४७ ५८ तंडुलदिव्य अर्थ दंड और वध राजाधीन शपथदिव्य होते है १४७ ५९ १५० ९१ अपराधतारतम्यस दिव्यतार- दुवारा कार्यका आरम्भ करनेका तम्य कारण १५० ९१ १४७ ६० दिव्यका निषेध पीनभव विधिका लक्षण १५० १४७ ६३ ९३ शिरके विना दिव्यके अधिकारी जयांका लक्षण १५० तप्तमाप दिव्यके अधिकारी जयाँको जयपत्रको देनका १४८ वादी दिव्यका स्वीकार करे तो प्रकार ... २५० ९६ फिर साधन न पूछे प्रजाको अनुकूल करनेवाले '१४८ भापा पत्रिका होय तो दिव्यसे १५० ९८ शोधन कर जीवतेहुए माता पिताके वृद्ध- लौकिकसाधन न होय वहां भी पुत्र स्वतन्त्र नहीं होता १५० ९९ दिव्यको दे १४८ ७१/उन दोनों पिता श्रेष्ठ है १५० ८०० सासी भेदनको प्राप्त हो जाय पिताके अभावमें माता फिर तब शपथोंसे निर्णय कर... १४८ भाइ श्रेष्ठ होता है १५०८०१ विवाहादिकों में साक्षी ही निर्णय पिताको सम्पूर्ण पत्नियों में मावाके साधन होते हैं १४८ १५० १ द्वार मार्गका करना इत्यादिको स्वतन्त्रास्वतन्त्रमा निर्णय १५० भोगनाही प्रमाण है १४१ ७८ स्वामित्वका निणय १५१ मानुपी और दैविकी क्रियाओं- दिमाग विचार ... २५१ ११ की व्यवस्था १४९ ७९ अंशलारीका क्रम निर्णय १५१ ३१ ... ९५. राजाके गुण ... - ... ... ७७ समान वर्ताव करै ... ५ २६ शुक्रनीतिविपयानुक्रमणिका। पृष्ठ. लोक १५४ ४७ ... ... ४९ ... १५४ ५३ ... .. शिल्पीका लग ५७ ... ... ... विषय. पृष्ठ श्ला विषय. सादायक धनमें खी स्वतन्त्र धातुओंमें कपट करे तो दूना होती है १५१ १४ दण्ड... सौदायिकपनका लक्षग १५ अव दुर्गप्रकरण कहते हैं १५४ अविभाज्यवनका लक्षग १५१ १६ परिण और पारिख दुर्गका लक्षण १५४ जलादिकोंसे धनका रक्षण करने. पारिघदुर्ग और वनदुर्गका लक्षण १५४ ५१ वाला दशवां भागको प्राप्त धन्वदुर्ग और जलदुर्गका लक्षण होता है १५२ १७ सहायदुर्गका लक्षण १५४ ५४ १५२ १९ ऐरिणादिदुर्गका तारतम्य १५४ ५४ शिलियोंका धनविभाग १५२ २० सेना दुर्गसे महान् लाभ १५५ नकादिकोंका धनविभाग १५२ २१ आपत्कालमें अन्य दु!का आ. चोरधनविभाग १५२ २२ श्रय उत्तम है २५५ ५८ व्यापारी आदिकोंका घनविभाग . १५२ २६ अत्यन्त श्रेष्ठ दुर्गका लक्षण १५५ ६० सामान्यादि नववस्तुभाको आ- सहायपुष्ट दुर्गस विजय निश्चयसे पत्समयमें भी न दे १५२ २६ होता है ६२ उत्तम साहस दंडयोग्यका लक्षग १५२ २८ अब सातवें सैन्यप्रकरणको अस्वामिक धनको चौरास लन. कहते हैं १५५ २९ सेनाका लक्षण और भेद १५५ ६४ त्यागयोग्य ऋत्विज और स्वगमा और अन्यगमा सेना याज्यका लक्षण १५३ राजा बत्तीसवा या सोलहवां २५५ ६५ स्नगमसेनाका दूसरी लग लाभ पण्यम नियत करे। १५५ ६६ १५३ ३१ सेनाका प्रभाव १५५ ६७ १५३ ३२ मूलसे दूना व्याज लेलिया हो १५६ ६८ दो प्रकारका सेनावल तो उत्तमणको मूलकोही दिलवावे?५३ ३३ स्वीय और मन सेनाबलका लिसिव नट हो जाय ता ... १५३ १५६ ७२ खोटी वानुको बेचनेवालेको दण्ड १५३ ३७ दुल्सनास्का लक्षण २५६ शिल्पियोंके मृतिका विचार १५३ ३८ शारीरादि वल के वहानके उपाय सरकारको मृतिमा विचार ४३ आयुर्यलका लक्षण ८२ वालेको दंड ३० कालझण व्यापारी धन की व्यवस्था,.. घल छः प्रकारका १५६ ७१ मौलादिकों का लक्षण ... ७४ ७७ शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका। २७ पृष्टाला ... ... ... ... ... . ... विषय. विषय. पष्ट. श्लोक सेनामें पदाति आदिकोकी उत्तम और मध्यम घोडोंके संख्याका नियम २५७ ८३ आवताका विचार १६० सेनामें लेसकादिकोकी सूर्यसंज्ञक अश्वकालक्षण और फल १६० संख्याका नियम १५७ ८८ त्रिकूट अश्वका लक्षण और फल १६० २० प्रतिमासमें सर्च करनेका अन्य अश्वोंका लक्षण १६० २१ प्रमाण १५७ ८९ शर्व नामादि अश्वोका लक्षण ३१ राजाके रथका वर्णन १५८ ९२/ और फल १६१ २४ अनिष्ट और शुभदायक हाथीका अनिष्टकारक अधोंका लक्षण १५८ ४ आवताका शुभाशुभत्व कथन १६१ हाथोके चार प्रकार "१५८ ९६ आवतोंका नाम और फल १६२ ४२ भद्रगका लक्षण १५८ ९७/पञ्चकल्याणादि अश्वाका मन्द्र गजका लक्षण १५८ ९७ लक्षण १६२. ४५ मृगगजका लक्षण १५८ ९९ पूज्य श्यामकर्णका लक्षण १६२ ४६ मिश्रगजका लक्षण १५८ ९०० जयभगलका लक्षण १६२ ४७ गजमानमें अंगुलादिकाका निदित घोडेका लक्षण १६२ ४८ प्रमाण १५८ १/घोडेके श्रेष्ठ गतिका लक्षण १६२ ५२ भद्रादि गजोंके शरीरका मान १५८ निदित दलभजी घोडोंका सब हाथियों में श्रेष्ठ हाथीका लक्षण ५३ लक्षण १५९ ४) आवर्त आदिसे दूषित भी पूजो उत्तमोत्तम घोडाका लक्षण योग्य असका लक्षण उत्तम और मध्यम घोडाका घाडेक कृशत्वादि दोष उत्पन्न लक्षण १५९ ६ हानका कारण १६३ नीच घोडोका लक्षण १५९ सुशिक्षकका लक्षण १६३ घोडोके अवयवोंकी कल्पना ... १५९ ७ सुशिक्षकका कृत्य १६३ घोडोंके ऊंचाई और लम्बाईका अन्यथा ताडन करनेसे आनिष्ट દરે प्रमाण १५९ ८ उत्तम और हीन घोड़की गतिका अश्वाका दूमरा लक्षण १५९ प्रमाण भैराघोडी और घोडाके देहमें सूर्यसज्ञक अश्वका लक्षण और बाई और दाहिनी तरफ गतिको बढानेका समय १६४ ६८ क्रमसे फलदायक होते हैं १५९ १३ वर्षाऋतुम और विषम भूमिमे शुभ आवर्तका लक्षण १५९ १५/ घोडेको न चलावे ६९ ... १६३ .. १५९ ... ... ... ...
२८ शुक्रनातिविषयानुक्रमाणिका । पृष्ट. श्लोक पृष्ट. श्लोक रक पदार्थ oc w ... ७ ... ८ ... ७५ १६० १२ विषय. विपय. वचम गतिसे घोटेको फल १६४ ७० वैलक आयुकी दातास परीक्षा १६६ १००० थके हुए बोडेको धीरे चलाव १६४ ७०ऊंटके आयुकी परीक्षा ३ घोडे भक्षणके लिये हितका. अंकुशका लक्षण १६४ ७१ घोडेके सीतका वर्णन १६६ जो गात्र घोडेका घाव आदित वल और ऊटको वशम करने- गिर जाय उस जगह मांसको का प्रकार १६७ भर द २६४ ७२ चोटा मार्गसे चलकर आया हो मलशुद्धिके लिय दंताली. १६७ उसको लवण और गुड दे बैल आदिकोंके निवासका सु- १६ पसीना शांत होजाय तब उ. रक्षित स्थल १६७ सकेलगामको उतार ले वोझलेचलेनवालेका तारतम्य १६७ १० १६४ ७४ गानोको मलफर फेरे राजा छोट भी शनुपर अल्प मदिरा और नंगली मांसका साधनसे गमन न केर २१ रस सब रोगोंको हरता है.. युद्धसे भिन्न कार्याम अशिक्षि- १६४ मसूर और मूंग घोडेके लिये तादिकोको नियुक्त कर । निदित है संग्रामम अधिक साधनको प्लुत आदि छः गति लाग.. १६५ आवश्यक १६७ १३ धारादि गतिके लग ८२सन्नद्ध सेनाका माहात्म्य १६७ १५ बैल मुखका प्रमाण ८५ मील सेनाको प्रशंसा १६७ पूजने योग्य सप्तताल चैलका सेनामा अवश्य भेद होनेका १६५ कारण १३८ श्रेष्ट उटका लक्षण ८८ सनारा भेद हानस अनिष्टफल १८ मनुष्य और हाथियोंके आयुका राजा मनुसेनाका भद अवश्य प्रमाण १६५ ८८ १६८ मनुष्यके वान्द और मन्यन शनुओंको साधनेरा प्रकार १६८ २० म्याराप्रमाण गनुओंके जीतनेका भदस झापीको म यमावस्था १६५ ९० अन्य उपाय नहीं है ....१६८ २१ घोडाआदिक भायुका प्रमाण १६५. १ शमी त्यागी हुई सेनाको पोटाआदिकी अरथाओंका योजना २३ प्रमाण १६५ ९ मित्रकी मेनाकी योजना २४ पोटक मायु दानामे परीक्षा १६६ ९२ अन्न आरमनका लझण ९८ १६८ २४ ... ... ... तित देका स्थान और भद ...
शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका । २९ पृष्ठ. श्लोक पृष्ठ. शोर ... ... ... विषय. विषय. मांत्रिक अत्रके अभावमें विग्रहको करनेयोग्य पुरुषका नालिक अन... १६८ २६ लक्षण १७३ नालिक दोप्रकारका है १६८ २८ लदाई होनेका कारण १७३ लघुनालिक(वंदूक) का लक्षण यानके पांच भेद... १६८ २८ १७३ बृहनालिक (तोप) का लक्षण १६९ ३१ विगृह्ययानादिकोंका लक्षण १७३ ८६ रास्तोंमें सेनाको चलानेकी अग्निचूर्ण (दारु) बनानेका व्यवस्था, मकरादिव्यूहों प्रकार १६९ ३४ नाम १७४ ९३ गोला बनानेका प्रकार १६९ ३० और उन्होंकी स्थलयोजना १७४ ९६ नालिककी व्यवस्था सेनाव्यूह और मकरादि व्यूहोंके दारु बनानेके दूसरे अनेक लक्षण प्रकार ... १६९ ३९ आसनका लक्षण १७६ १७ तोपके गोलेको निसाने पर सन्धायासनका लक्षण १७६ १९ फेकनेकी रीति १६९ ४२ आश्रयका लक्षण १७६ २७ बाणका रक्षण ४५ वैधीभावसे वर्तन करने योग्य गदा आदिकोका लक्षण पुरुपका और द्वैधीभावका सङ्गादिकाका लक्षण १७० लक्षण १७६ २३ घकादिकोंका लक्षण १७० ४९ राजा भेद और आश्रय इन दोनोंके विना युद्ध न करै... १७६ २९, कवचका लक्षण १७० ५० युद्धकी इच्छा करने योग्य अवश्य युद्ध करनेका कारण... १७७ ३१ राजाका लक्षण १७० युद्ध में पराङ्मुस होनेवालेकी युद्धका सामान्य लक्षण निन्दा ३४ युद्धके भेद और उनके लक्षण १७० ५३) ग्राह्मणभी आपत्कालमें युद्ध युद्धके लिये कालका विचार... करे १७१ ५६ युद्धक लिये देशका विचार १७१ ६० क्षत्रियका महान् अवर्म . युद्धके लिये सेनाका विचार १७१ ६३ युद्धभे पगइमुसन होनेका और मन्त्र सधि आदि छःगुण १७१ मारनेका उत्तम फल सन्धि आदिकाका सामान्य लक्षण १७२ ६६ शार्यकी प्रशंसा सन्धिको करनेयोग्य पुरुषका प्राणियोंके भन्नका विचार १७८ कथन १७२ ७० सूर्यमण्डलको भेदन करनेवाले उपहाररूपसधि सबसे श्रेष्ठ है १७२ ७२) ... ... १७० ... १७८ ४६ ... ... दो पुरुष ...
शुक्रनीतिविषयानुक्रमणिका । पृष्ट. सो. . ... समान ६ ... ... ... १८१ ९२ ... ... ... १८१ ९० ... ... ... पृष्ट. शो' विषय. मानग भी भानायी गुदक शकी मेनाको भेद करनेका प्रसार १८१ मातठाई मारनमें कोई भी अपने राज्यके अन्यन्त समीप दार नहीं होता.. राज्यको दूसरे राजाको न যার গুষ্টি মান নষ্ট परदे १७९ ५६ शत्रुओं को जोतनेपर शकी सम मध्यम और अधम युद्ध. प्रनाको प्रसन्न कर कामग मन्त्र के विचारमें दूसरे मात्रियों- धनयुद्धमा समग फो नियुष की भनयुद्धका साग मन्त्री आदिकाका कृत्य पायुद्धका समग २७९ ६२ बुलं. ममय मेनारगना... मागमे यादर समीपम सौन- १७९ पाको टिकाये गुर होनेराम माम निवासी श्रीमानकों मनास उपटप कालनेदन न होने १८२ ९८ मानो पालामाली भूषिता मानमार लिये था पाजार १८० मनाये गुलमें भर दी I मनाएर ग्यानरमाय १८२ ९ पर ३२ भादो दिन मनियोगमा- पुन मानामादिरीजना का शिक्षा १८२१२.. गुभ Maratोरो मार. मामा प्रारदिन नि १८० ६/ भागात पास निपम नही है . ८. भ. मटमें न मान भार मुल ८.पांति पदन Hrk etu भरी Air९ १८३ intru भनिना anart १८॥ rituी. Tryilपाग. Here गरिसर नित Tertant INTER 17 WAVE fit ... । ... ... ...
M शुकनाातावषयानुक्रमाणेका । पृष्ट श्लो विषय. पृष्ठ. श्लोक ... ... १८४ २१ पुष्टिदायक है ... ... ... विषय. शत्रुके भृन्याका भृतिका विचार १५ युद्धमे नियुक्त करने योग्य सेना- जिसका राज्य हरा हो उसके का कथन पुत्रादिकोफी व्यवस्था १८३ १७दानमानरहितभी भृत्य अपने शत्रुसंचितवनकी व्यवस्था १८३ १८ राजाको छाडे १८६ सदाचारिशत्रुका पालन कर ... १८४ २० राजाका द्रव्य मेधादकके समान पहरेदारोको व्यवस्था १८६ ५३ राजा पूज्य होनेका कारण १८४ २८ शत्रुका राज्य हरण करनेका चिरस्थायी राजाका लक्षण १८४ २९ उपाय ... १८६ ५४ शीत ही पदभ्रष्ट होनेवाला राज्यको वृक्षको साम्यता १८७ राजाको अवश्य पालन करने राजाका लक्षण... १८४ ३० नातिभ्रष्ट राजाकोभी अन्य राजा योग्य नियम . ... उद्धार करनेको समर्थ होता है. १८५ ३३ राज्यको प्राप्त होनेपर राज- पुत्रको राज्य देनेका समय १८७ ६४ तेजोहीन राजासे बलवान् राजा पुत्रका आचरण का छटा आ भृत्य तेजस्वी राजपुत्रके .सा पहिले मात्र- होता योंका आचरण १८७ ६७ राजाका मुख्य वल १८५ ३५ अनीतिसे वर्ताव करें तो आनष्ट होनराज्य राजाका आचरण १८५ ३६ राजान्दरिद्रा हानका कारण १८ ३७ नगीन जनकी व्यवस्था १८८ धर्मका रक्षण करनेवाला नीच राजा मायावीजनोका अंतर बड राजाभी श्रेष्ठ होता है ... यत्नसे जानले १८८ २ धर्म और अधर्मकी प्रवृत्ति मायाक पैदा करनेवाले १८८ ७३ राजाही कारण होता है १८२ १८८७४ मनु आदिके मानेही अथ शुका- या विना अत्यन्त धन १८५ ४१ नहीं मिलता है १८८ इस नीतिसारम २२०० बाईस सपूर्णपाप आश्रय भेदसे से श्लोक कहे हैं १८५ ४२ धर्मरूपसे स्थित नीतिसारका चिन्तन करनेका अत्यन्त दानादिकाका निषेध ૧૮૮ હે फल १८५ ४२ अर्थके लिये अवश्य यत्न करे शुक्रनीतिके समान दूसरी नीति अर्थसे संपुरुषार्थ सिद्ध ४३ १८९ ८४ अब नीविशेषको कहते हैं १८६ ४६ शौर्यादेिक शस्त्रास्त्रादिकों के शत्रुको नष्ट करने का प्रयत्न १८६ ४८ विना दुम्मामी होते हैं... १८९ ... ४० धूर्नका वर्णन चार्थने माने हैं 1८८ ८० १८९ ८३ नहीं है होते है ...
शुक्नीतिविपयानुक्रमणिका । पृष्ट, लोग ... ... १९२ २२ न घसे २९२ २४ विश्य. पृट.लोर विषय. निके समान दूसरा सहाय उपदेशः विना सबझा ज्ञान नहीं है। १८९ ८६ नहीं होता १९१ S महान वरका कारण १८९ ८६ कार्य करने का विचार १९१ ११ मित्रता होनेका कारण १८५ ८७ दशप्रामी आदिकोंका वर्ताव... १९१ १६ भाप-समयमें राजामा वीर १८९ ८७ उत्चमादि गृह भूमिका प्रमाण आपत्तिम भृतिक विना मी नृपकार्यके विना सैनिक ग्राममें स्वाभिकार्य को करनेकी साल मयांदा... २२/राना सैनिकको शार्य बढानेवाले प्रशंसाके योग्य मत्य और स्वा. धर्मको नित्य श्रवण करवा १९२ २३ मीका वन १८९ ९४/शयिवृद्धिकारक अन्य उपाय एकचित्तवारभार १९० ९६ राजा सत्याचार पनिक और श्रोधमकी फूटनीतिका वर्णन किसानका चिपचिम उद्धार करे१९२ २५ फेवल अपनी रक्षासी गुफिको परदेशियोंसे व्ययके अनुसार विपार फरनेवाटकी निंदा १९० १९२ २८ दीप्रती युष्टि १९० १३०० धनिकों के घनको घटे यनसे বলা হয় । १५० १३०० १९२ २९ ३मल धनी अपेक्षा चांगुनी २९. वृद्धिल टी छोय को पनाको तमादिमगारेटा १९० पुड भी धन नदे। २९२ ३. " मागले ~ रक्षा करे मटा यन १५. घर प्रकार पाभन्य ... इति विषयानुक्रमणिका समाता।
॥ श्रीः॥ शुक्रनीतिः। (भाषाटीकासहिता) अध्याय १ ला. चमन मापन प्रणम्यजगदाधारंसर्गस्थित्यंतकारणम् ॥ सर्वोपजीवकंलोकस्थितिकृन्नीतिशास्त्रकम् । संपूज्यभार्गवःपृष्टोवंदितपूजितःस्तुतः ॥१॥ धर्मार्थकाममूलंहिस्मृतमोक्षमदं यतः ॥ ६ ॥ पूर्ववैययान्यायनीतिसारमुवाचतान् । जिससे धर्म, अर्थ, काम, इनका शतलक्षश्लोकमितंनीतिशास्त्रमथोक्तवान् ॥२॥ कारण और मोक्षका दाता कहा है इससे नीतिशास्त्र सम्पूर्ण जगत्का उपकार और रचने और पारने और नाशके कारण मर्यादा पालक है ॥५॥ जिगतके आधार ( आश्रय ) भगवानको नमस्कार करिके पूर्वदेवताओने सत्कार- अतःसदानतिशास्त्रमभ्यसेद्यलतोनृपः । पूर्वक नमस्कार और पूजा और स्तुति की यद्विज्ञानान्नृपाद्याश्चशत्रुजिल्लोकरंजकाः॥६॥ जिनकी ऐसे शुक्राचार्य न्यायके अनुसार इससे राजा नीतिशास्त्रका यत्नसे प्रश्न किया वे शुक्राचार्य देवताओं के प्रति अभ्यास करै जिसके ज्ञानसे राजा और मंत्री नीतिका सार कहते भये शुक कहते है आदि शत्रुओके जेता और जगदके प्रिय होते एक कोटी नीतिशाब ब्रह्माने वर्णन ॥ ६॥ किया ॥ १॥ २॥ सुनीतिकुशलानित्यप्रभवतिचभूमिपाः । स्वयंभूर्भगवॉल्लोकाहिताथसंग्रहेणवै । शब्दार्थानानविज्ञान विनाव्याकरणाद्भवेत् । तरसारंतुवसिष्ठाद्यैरस्माभिवृदिहेतवे ॥ ३ ॥ राजा इस शास्त्रके ज्ञानसे सुन्दर नीतिमें जगतके कल्याणके अर्थ संक्षेपसे उसका कुशल होते हैं शब्द और अर्थका ज्ञान विना सार वशिष्ठ आदि हम सपूर्ण ऋपियोंने व्याकरण क्या नही होता ॥ ७ ॥ बहनेके अर्थ वर्णन किया ॥३॥ प्राकृतानांपदार्थानांन्यायतविनानाम् । अल्पायुर्भूभृताधर्थसक्षिप्ततर्कविस्तृतम् । विधिक्रियाव्यवस्थानांनकिमीमांसयाविना।८॥ प्रियकदेशबोधीनिशाखाण्यन्यानिसंतिहि॥४॥ प्राकृत अर्थात् जगदके पदायोका ज्ञान तर्कोस किया है विस्तार जिसका ऐसा न्याय और वर्कके विना मार कर्मकांडको व्यवस्थाका ज्ञान मीमांसाके विना क्या नीतिशास्त्र पल्प है अवस्या जिनकी ऐसे नहीं होता ॥८॥ राजा के लिये वसिष्ठ आदिकोंने संक्षेपसे किया इवर जो शास्त्र सो एक कार्य दिहावधिनश्वरत्ववेदांतनविनाहिकिम् । वोधक दे ॥४॥ स्वस्वाभिमतमोधीनिशस्त्राण्येतानिसंतिहि।९।। and [ अध्याय- शुक्रनीति । (२) शरीर आदि जगत् नाशवान है यह राजाका अन्याय महान् छिद्र( दोप) है ज्ञान घेदातके विना क्या नही हो सकता और भयदायक, शत्रुओंका बढानेवाला और अपने २ वाछित एक २ वस्तुके योधक वे सेनाकी हानि करनेवाला होता है॥ १५॥ पूर्वोक्त सपूर्ण शास्त्र है ॥९॥ नातित्यस्त्वावर्ततेयास्वतंत्रः सहिदुःखभाक् । तत्तन्मतानुगैःसवावृतानिजनःसदा । स्वतंत्रप्रभुसेवातुह्यसिधागवलेहनम् ॥१६॥ बुद्धिकौशलमेतद्वितःकिस्याद्यवहारिणाम्।१०। नीतिका परित्याग करके जो राजा स्वतत्र तित२ मतके अनुयायी सपूर्ण जनोंने वर्ताव करता है वह दुखका भागी होता सदैव रचे है परन्तु वे संपूर्ण शास्त्र है और स्वतंत्र राजाका सेवा तलवारको बुद्धि की चतुराईरूप है इससे व्यवहारियों का धाराके चाटनेके तुल्य है ॥ १६ कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता॥१०॥ स्वाराध्योनीतिमानराजादुराराध्यस्त्वनीतिमान सर्वलोकव्यवहारास्थिति त्याविनानाहि । यत्रनीतिबलेवोभेतनश्रीस्तर्वतोमुखी ॥१७॥ ययाश नै विनादेहस्थितिर्नस्यादिदेहिनाम्। ११॥ सम्पूर्ण लोकके व्यवहारको स्थिति नीतिमान् राजा सुखस आराधना करनेके नीतिकै विना इस प्रकार नही हो सकती योग्य है, और अनीतिमान् राजा दुःखसे जष देहधारियोंके देहकी स्थिति भोजनके आराधना करने के योग्य है जिस राजाके विना असभव ॥११॥ नीति और पल दोनों है उसको चारों ओरसे सर्वाभीष्टकानीतिशास्त्रस्यात्सर्वसंमतम् । लक्ष्मी प्राप्त होती है ॥ १७ ॥ अत्यावश्यनृपस्यापिसतर्वेषाप्रभुर्यतः ॥१२॥ अमेरितहितकरंस'राष्ट्रभवेद्यया ॥ सबके वाछितका कारक नीतिशास्त्र तथानातिस्तुसंधायानृपेणात्माहतायवै ॥१८॥ सम्पूर्ण मनुष्योंको समत है और राजाको जिस प्रकार पिना माज्ञाके हितकारी भी अत्यन्त अवश्य युक्त है क्यों कि यह सम्पूर्ण देश हो इस प्रकार अपने कल्याण के सम्पूर्णका सम्मत है ॥ १२॥ अथ राजा नीतिको धारण करें ॥१८॥ शनवोनीतिहीनानाययाऽपथ्याशिनागदाः। भिन्न राष्ट्रसभिन्नभिन्नोऽमात्यादिकोगणः। सचिञ्चकालेनभवतिनभवंतिच ॥१३॥ अकौशल्पनृपस्यैतदनीयस्यसंवदा॥१९॥ जिस प्रकार अपथ्य भोजन करपाले जित राजाके देश, सेना, मन्त्री आदिकमि मनुष्योंके रोग इसी प्रकार नीतिसे होन राजाओंके शत्रु कोई शीघ्र, और कोई काला परस्पर भेद है यह सर्वकाल नीति होन तरम होते है फिर वे नीतिहीनोंका तिरस्कार राजाओंकी अकुशलता है ॥ १९ ॥ करते है॥ १३॥ तपसातेजआदत्तशास्त्रोपाताचरंजकः । नृपस्यपरमोधर्मः प्रजानापरिपालनम् । नृप स्वप्राक्तनाद्वत्तेतपसाचमहीमिमाम्।।२०॥ दुष्टनिग्रहणानित्यननीत्याविनायुभे ॥१॥ तपसे राजा तेजधारी और शास्त्रका प्रजाआंका पालन और दुष्टका नाश ज्ञाता और रक्षाका कर्ता सयका प्रिय हो ये दो राजाओं के परमधर्म है ये दोनों ता है और राजा अपने पूर्वजन्मके तपसे इस नीति विना नहीं हो सकते ॥१४॥ पृथ्वीकी पालना करता है ॥२०॥ अनीतिवमछिद्रराज्ञोनित्यंभयावहम् ॥ वृष्टिशीतोष्णनक्षनगतिरूपस्वभावतः । शासवर्धनप्रोक्तंनलहासकरमहत् ॥ १५॥ इष्टानिष्टाधिकन्यनाचारःकालस्तुभिद्यते २१॥
भाषाटीकासहित । ६॥२१॥ . चपी, शीत, उग, नक्षयोंकी गति बुद्ध्याक्लेनशौर्यगततोनीत्यानुपालयन् । आदिक स्वभावले इट, अनिष्ट, अधिक और न्यून आचरणसे कालका भेद होता है अर्थात बुद्धि, चल, शूरवीरता और नीतिसे संपूर्ण प्रजाः सर्वाः प्रतिदिनमच्छिद्रोदंडवृक्सदार एक ही काल अनेकप्रकारका प्रतीत होता प्रजाका पालन करता हुआ राजा भच्छिद्र ( दोषरहित ) होकर दटको सदा धारण आचारप्रेरकोराजाह्मतत्कालस्यकारणम् । करै ॥२७॥ यदिकाल प्रमाणहिकस्माद्धर्मोस्तिकर्वषु २२॥ नित्यबुद्धिमतोप्यर्थःस्वल्पकोपिविवर्धते । आचाणका प्रेरक राजा है इससे कालका तिर्यश्चपिवशंयांतिशैर्यनीतिबलैर्धनैः ।। कारण है, जो केवल काल हीप्रमाण हो तो देहधारियोंमें धर्म कहांसे हो, अर्थात् बुद्धिमान् राजाका अत्यंत अल्प भी राजाकै विना कालसे भी धर्मको प्रवृत्ति नहीं अथे नित्य बुद्धिको प्राप्त होता है सर्प हो सकती ॥२२॥ आदि भी शरता बल,नीति धनसे यश हो जाते हैं ।। २८ ॥ राजदंडभयाल्लोकः स्वस्वधर्मपरोभवेत् । सात्त्विकंतामसँचैवराजसत्रिविधंतपः। योहिस्वधर्मनिरतःसतेजस्वीभवदिह ॥२३॥ राजदंडके भयसे जगत् अपने धर्ममें यादृक्तपतियोत्यर्थतादृम्भवतिसानृपः॥२९॥ तत्पर होता है और जो अपने में स्थित सत्वगुणो, रजोगुणी, तमोगुणी, तीन प्रका- है वही इस लोकमें तेजधारी होता है ॥२३॥ रका तप होता है, जो राजा सात्विकगुणी होकर ताता है वह वैसा ही होता है ॥ २९ ॥ विनास्वधर्मान्नसुखस्वधमाहिपरंतपः । योहिस्वधर्मनिरतःप्रजानांपरिपालकः । तपः स्वर्मरूपयर्धितयेनवैसदा ॥२४॥ यष्टाचसर्वज्ञानांनेताशत्रुगणस्यच ॥ ३०॥ अपने धर्मके बिना मुख नदी दान डःक्षमीशरोनिःस्पृहििपयवापि । होता और अपना धर्म ही परम तर है जिससे विरक्त सात्त्विक सोहियोंतेमोक्षमान्वियात्३१ तप म्वधर्मरूप है इससे वह स्वधर्मकी सदा वृद्धि करता है ॥ २४॥ जो राजा धर्मनिष्ठ होकर देवास्तुकरास्तस्यकिंपुनर्मनुजाभुवि । पालक होता है, और सपूर्ण यज्ञीको करता है शत्रुओंका जता है भीर दानी है और क्षमावान् सुदण्डधर्मनिरतःप्रजाःकुर्यान्महाभयेः ॥२५॥ है, शूरवीर है निलोभी है, विषयों धर्मज्ञ मनुष्यके देवताभी सेवक होते विरक्त है, वह सात्विक राजा अंतषमयमें हे पृथिवीपर मनुष्य तो क्यों न होंगे मोक्षको प्राप्त होता है ॥३०॥ ३१ ॥ धर्ममें स्थित राजा उत्तम और भयानक दंडसिविपरीतस्यामसःस्यात्सतिनरकभाजनः । प्रजाओंको धर्म, वत्सर करे ॥२५॥ नृपःस्वधर्मनिरतोभूत्वा तेजाक्षयोन्यया । निघणश्चमदोन्मत्तोहिंसकः सत्यपर्जितः ३२॥ अभिषिक्तोनाभीपत्तोपत्वतुयदाप्नुयात्र६॥ पूर्वोक्त लक्षणोंसे विपरीत है लक्षण जिसमें राजाको अभिषेक ( पिता भादिके उपदे हिसाप्रिय, सत्यहीन, अन्तमें वह नरकगामी ऐसा राजा तामली भोर निंदयी, मदोन्मत्त, शद्वारा शाम्पोक्त विधि) अथवा स्वयं जव होता है ॥ ३२ ॥ गजपदवीको प्राप्त हो तब राजा धर्मम तत्पर रहे जो धर्ममें स्थित नहीं उसकेका राजसोदांभिकोलोभौविषयीवकाशाठः । क्षप (नाश) होता है ॥२६॥ मनसान्यश्चवचसाकर्मणाकलहपियः ।। ३२ प्रजाका . 1
शुक्रनीति।
सिचाय-
नीचप्रियः स्वतंत्रश्चनीतिहनिम्छलांतरः । ब्राह्मण हो सकते हैं, अयाद नही, वर्ण औ
पिता ब्रह्मवेजकी प्राप्ति नहीं होसकती।
सतिर्यक्त्वस्यावरवंभावतातनृपाथमः३४॥
जानकापासनाभिदेवतागधनेरतः।
दभी, लोभी, विषयी वंचकी शठ, मनसा
अन्य (मनमें कपटी ) वाणी और कमसे शांतोदांतोदयालुश्चब्राह्मणश्चगुणःकृतः ३९
कलहकारी, नीवाम प्रेमी, स्वतंत्र नीविहीन, ज्ञान, कर्म, देवता आदिकी उपासना
मनसे छली पेसा गजाओं में अधम राजा रजो देवताके आराधनमें तत्पर, और शांत, दार
गुणी होता है, वह अन्तम तिरसी अपवा स्था- और दयालु, ऐसा जो मनुष्य वहीं गुणोर्स
वरयोनिको प्राप्त होता है ॥३३॥ ३५॥
माझण होता है ॥४०॥
देवांशान्सात्विकोभुक्तराक्षसाशास्तुतामतः। लोकसंरक्षणेदारशरोदांतः पराक्रमी ।
राजसोमानवांशांस्तुसत्त्वेधार्थमनोयत ३६॥ दुष्टनिग्रहशीलोयः सवैक्षत्रियउन्यते ॥ ४१ ॥
सत्वगुणो देवांशोको, तमोगुणी राक्ष- लोक्की रक्षा करने में चतुर श्रवीर दांत
सांशोंको, रजोगुणी मनुष्यांशीको भोगताहै,इ- और पराक्रमी, दुष्टोको दंडका दाता ऐसा
ससे सत्वगुणहीम मनकी धारणा करे ॥ ३५॥ जो मनुष्य उस क्षत्रिय कहते है ।। ४१ ॥
सत्वस्यतमसःसाम्यान्मानुजन्मजायते । ऋयविक्रयकुशलायनित्यपपयनीविनः ।
यद्यदाश्रयतमय॑स्तत्तुल्योदिष्टतोभवेत् ॥
पशुरक्षाकृपिकरास्तवैश्याः कीर्तिताभुवि ४२॥
सत्वगुणी, और तमोगुणीकी साम्यतासे लेने देनमें चतुर, व्यवहार है जीवन
मनुष्यजन्म होता है, तिस २ गुणका, आश्रय जिनका और पशुओको रक्षा और खेतीके
करता है अपने प्रारब्धके अनुसार तिखक करनेहारे जीव वे पृथ्वीमें वैर करने
ही तुल्प होता है ॥ ३६॥
है ॥४२॥
कर्मक्कारणचात्रमुगातटुर्तिप्रति । दिजसेवार्चनरताःराः शांताजितन्द्रियाः।
कर्मवप्राक्तनमपिक्षणक्किोस्तिचाक्रियः ३७ सौरकाटतणवहास्तेनीचा शूद्रसंशकाः ॥४॥
इस जगत्में मुगति और दुर्गविके प्रति ब्राह्मणकी सेवा और पूजनमें तत्पर
कर्म हो कारण है पूर्ववर्मकोही प्रारब्ध शूर, धीर, शांत और जितेन्द्रिय, हर काष्ठ
कहते हैं क्या कोई जीव क्षणमात्र भी कर्म-मोर तृण इनको ले जानेदारेजो नीच जीव
रदित रद्द ठरतो हे अति नही रह सक वे शूद्र कहाते हैं॥४३॥
त्यत्तस्वधर्माचरणानिवृणाः परपीडकाः ।
नजात्याब्राह्मणश्चात्रक्षात्रियोउयएवन ।
चंडाश्चार्हसकार्नित्यम्लेच्छास्ताविवेकिन:४४॥
नशूद्रोनचम्लन्छोभेदितागुणकमभिः ३८
त्याग दिपाहे अपने धर्मकामाचरण जिन्होंन
इस जगदमें जन्मसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ऐसे नियी परको पीडादेनहारे चंद और नित्य
शुद्र म्लेच्छ नही होवे ६ चिन्नु गुण और हिंसक जो भविवेकी मनुष्य म्लेच्छ हा॥
कर्मके भेदसे होते हैं ॥२८॥
प्राकर्मफलभांगाहावादःसंजायतेनृणाम् ।
ब्रह्मणस्नुसमुत्पन्नाः सवतिकिलुब्राह्मणाः ।
नवनवेलिजनकाद्राह्मतेजः प्रपद्यते ॥३९॥
पापकर्मणिपुष्यवार्तुशक्तोनचान्यया॥ ४॥
पूर्ण, जीव मासे उत्पन्न होनसे या पापकर्म अपदा पुण्यो जव होती हे सर्व
पूर्ववर्मक फल भोगने योग्य मनुष्यको बुद्धि
ता॥३७॥
१] भाषाटीकासहित । बुद्धिके अनुसार कर्म कर सकता है अन्यथा पूर्वकर्मके अनुसार होती है अन्यथा नहीं हो नहीं ॥४५॥ सकती ॥५१॥ बुद्धिरुत्पद्यतेतादृग्यादृक्कर्मफलोदयः ॥ यजायतेल्पक्रिययानृणांवापिमहत्फलम् ।। सहायास्तादशाएवयादृशीभवितव्यता ॥४६॥ तदपिप्राक्तनादेवकेचित्मागिहकर्मजम् ॥५२॥ जैसे कर्मके फदका उदय होता है वैसी ही जो मनुष्यको अल्प कर्मले महान् फळ बुद्धि उत्पन्न होती है, और जैसी भवितव्यता होता है वह भी पूर्वकर्मस ही होता है क्योंकि (होनी) होतीहै वैसेही सहायक होते हैं ॥ १६ ॥ इस जन्मकै कर्मसे पूर्व किंचित् भी नहीं हो पाकर्मवशतः सर्वभवत्येवेतिनिश्चितम् । सकता। ५२॥ तदोपदेशाव्यर्थाःस्युःकार्याकार्यप्रबोधका:४७॥ वदतीहंवक्रिययाजायतेपौरुपनृणाम् । जो यह निश्चय है कि पूर्वकर्मके अधीन ही सम्नेहवर्तिदीपस्यरक्षावातात्प्रयलतः ॥५३॥ संपूर्ण होता है तो कार्य के जतानेहारे उपदेश कोई मतवादी कहते हैं कि इस जन्मकै दी उपर्य हो जायेंगे ॥४७॥ कमसे मनुप्योका पुरुषार्थ होता है जैसे धीमतचिद्यचरितामन्यतेपौरुपमहत् । तेलबत्ती सहित दीपककी रक्षा पवनसे और अशक्तापीरुपंकतुकीवादेवमुपासते ॥४८॥ यत्नसे करते हैं ॥ ५३॥ अवश्यंभाविभावानांप्रतीकारोनचेद्याद । बुद्धिमान और माननीयचरित्र मनुष्य पुरु पार्थको बड़ा मानतेहै और जो नपुंसक पुरुषार्थ दुष्टानांक्षपणंश्रेयोपावद्धिवलोदयम्॥५४॥ करनेको असमर्थ है वे देव ( प्रारब्ध ) की अवश्य होनेवाली वस्तुका जो प्रतिकार न उपासना करते हैं ॥४८॥ होता तो अपने युद्धि और बलके अनुसार देवपुरुपकारेचखलुसर्वप्रतिष्ठितम् । दुष्टोके नाशसे कुशल कैसे होती अर्थात पूर्वजन्मकृतमजिततीहधाकृतम् ॥४९॥ पुरुषार्थसे भावी भी अन्यथा हो सकतीहै॥५ प्रारब्ध और पुरुषार्थ ही निश्चयस सम्पूर्ण प्रतिकूलानुकूलाभ्यांफलाभ्यांचनृपोप्यतः । जगत् विद्यमान है पूर्वजन्मका की प्रारब्ध ईपन्मध्याधिकान्यांचत्रिधादेवेविींचतेयत्५५|| और इस जन्मका कम पुरुषाय होनेसे एक ही इनसे राजा भी अपने प्रतिकूल, मनु- कर्मसे दो प्रकारका होता है। ४९॥ फूल और अल्प, मध्यम, उत्तम फलोसे तीन प्रकारके देवका विचार करें ॥ ५५ ॥ । बलयमतिकारिस्यादुर्बलस्यसदेवहि । सबलावलयोनिफलमाप्त्यान्ययानहि ॥५०॥ | रावणस्यचभीष्मादेवनभंगचगोरहे। प्रातिकूल्यंतुविज्ञातमकेस्माद्वानरानरात्५६॥ दुवैढका प्रतिकार करनेवाला उपकारी रावणक वनका भंग एक वानर ( हनुमान) बलवान् कर्म सर्वदा होता है और प्रबल और से हुआ और भीष्मका गोगृहमें एक नर दुबलके ज्ञान फळमाप्तिसे हैं अन्यया नही (अजुन ) भंग भया इससे कर्मको प्रतिकू- होते ॥ ५० ॥ खता भी ज्ञाता होती है ।। ५६ ।। फलोपलब्धिः प्रत्यक्षहेतुना नवदृश्यते । प्राकमहतुकामानुनान्ययतिनिश्चयः॥५१॥ अनुकूलयादवेनियाल्पासुफलाभवेत्५७॥ कालानुकूल्यविस्पष्टराघवस्यार्जुनस्यच । फदकी प्राप्तिका हेतु कोई प्रत्यक्ष नही रामचन्द्र और अर्जुनकी दीखता क्योंकि यह निश्चय है कि फटकी प्राप्ति सम्बन्धी अनुकन्दता स्पष्टतर है क्योकि जब काल शुक्रनीति । [अध्याय- हुए।५८॥ दव अनुयट होता है तब स्वल्स क्रिया भी भूतिके देनेवाले अंगोकै गुण कमसे सफल होती है ।। ५७॥ कहते है जिन गुणोंते संयुक्त मनुष्य वृद्धिको प्राप्त होते है॥ ३॥ महतीसस्क्रियानिष्टफलास्यात्प्रतिकूलके । राजास्यजगतोहतद्धयवृद्धाभिसंमतः । बलिदाननसंवद्रोहरिश्चंद्रस्तथैवच ॥ ५८ ॥ मारवधको प्रतिकूलतामें महान् भी नयनानंदजनकः शशांकइवतोयः ।।६।। सत्कर्म अनिष्ट फलदायक होता है बलि। इस जगतकी पृद्धिका हेतु और राजा हरिश्चट दानसभी बंधनको प्राप्त है और वृद्धोंका मान्य है नेत्रोको इस प्रकार आनंद देता है जैसे चन्द्रमा समुद्रको ॥ ६ ॥ भवतीष्टसत्क्रिययानिष्टंतद्विपरीतया ॥ यदिनस्यान्नरपीतः सम्यहनेताततः प्रजाः। अकर्णधाराजलधौविप्लवतद्दनीरिख ।। ६५॥ शास्त्रतः सदसन्नावात्यरत्त्वाऽसत्सरसमा- चरेत् ॥ ५९॥ जो उत्तम नीतिमान् राजा न हो तो मजा इस प्रकार नष्ट हो जाय जैसे मला सत्कर्मसे इष्ट और असत्कर्म अनिष्ट के विना समुद्रमे नाव ॥ ६५॥ होता है इससे शानद्वारा सत् और नतिष्ठतिस्वस्ववविनापालेनवेमजाः । असत्या ज्ञान और असत्या परित्याग करके सद (श्रेष्ट ) कर्मकाही आचरण करै ।। ५९॥ ग्रजयातुीवनास्वामीपृथिव्यांनैवशोभते ६६ ॥ कालस्यकारणराजासदससकर्मणस्त्वतः । पाल्पक विना प्रजा अपने २ धर्मम नहीं टिकती और पृथिरीपर मजाके विमा स्वमार्योधनदंडाभ्यां स्वयस्थापयेत्प्रजा:६०॥ स्वामी भी शोभाको मात नही होता ॥ ६॥ फालका कारण राजा है सत् और अस्व न्यायप्रवृत्तोनृपतिरात्मानमयचप्रजाः । कके प्रभावसे अपनी फरता और उसे त्रिवर्गणोपसंपत्तीनहतिध्रुवमन्यया ॥ ६७ ॥ अपने २ पर्मम कर ।। ६० ॥ न्यापमें प्रवृत्त राजा अपनी और प्रजाको स्वाम्यमात्यसुहकारागष्ट्रदुर्गवलानिच । धर्म अयं याममें धारणा करता और अन्यथा पूर्वोक्ताको नट करता है ॥ ६७ ॥ सप्तांगमुच्यतराज्यतप्रमूर्धानृपः स्मृतः६१॥ धर्मादपवनोराजाविधायबुभुजेभुवम । राजा. मन्त्री, मित्र, कोस, देश, दुर्ग, किटाउना ये सात भंग राज्य तिन सातो' अधानेवनडुपः प्रतिपदेरमातलम् ॥ ६८ ॥ मराना प्रधान ॥६॥ धर्मसे पयन राजा पृप्यीको जीतकरभोगत दृगमात्यामुहहोतंमुसंकागारमनः । भया और गजा नाप मधर्मस पाता हस्तापादाटुगंगष्ट्रागम्यांगानिस्मृतानिदि६२॥ चनानटस्वधर्मेणपृदिस्नुधर्मतः । माम हुमा॥ ८॥ मन्त्री, नत्र, त्रि, पर्ण, योग मुणः तस्माटमपुरस्कृत्ययतेतार्यायपार्यिरः ६९॥ ग्रेना, मन. गं हाय, देश पाद, ये राग्यो। भंग ॥on पना यन मधमंसे नष्ट (भा, और गन अंगानांकमसोपस्यगुणान्मृतिप्रदानगटा। पृथु मम गृद्धिको मातहमा तिम गन यगंणग्नसायनामितीमनिदि ॥६३॥ कर॥ • ॥ गमरो प्रगान रमपर गचर न - मजाका स्थापन राजा - भापाटीकामहित । योहिधर्मपगेराजादेवांशोन्यश्चरक्षसाम् । कोशानांरक्षणेदक्षःस्गानिधीनांधनाधिपः । अंशमूताधमलोपामजापीडाकरोभवेत् ॥७० ॥ चंद्राशनविनासरशैनाभातिभूपतिः ॥७६॥ जो राजा धर्ममें तत्पर हैं वह देवताओके धनकी रक्षा करने में चतुर और कोशमें अंश हैं और इतर राजा राक्षसोंके अंश कुवेरके समान सर्वगुणी भी राजा चंद्र- है गक्षसोंका अंश धर्मका लोपकत्ती प्रजाका मांश ( प्रकाश ) के विना शोभित नही पीडा करनेदारा होता है॥७॥ होता ॥७६॥ इंद्रानिलयमार्काणामग्रेश्चवरुणस्यच । पितामातागुरुताबंधुश्रवणोयमः। चन्द्रवित्तेशयोश्चापिमात्रानिहत्यशाश्वतीः॥ नित्यसप्तगुणरेषांयुक्तोराजानचान्यया ॥७७॥ जंगमस्थावराणांचहीशः स्वतपसाभवेत् । पिता, माता, गुरु, भ्राता, बंधु, कुवेर, यम भागभागक्षणेदक्षोययेंद्रोनृपतिस्तथा ७२॥ | इनके सात गुणोसे युक्त ही राजा होता है इंद्र, पवन, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चंद्र, अन्यथा नही होता ॥ ८ ॥ कुर इनके स्वभाविक अंशोसे और अपने गुणसाधनसंदक्षः स्वप्रजायाःपिता यथा । वपके प्रतापसे जंगम और स्थावरोंका स्वामी, क्षमयित्र्यपराधानांमातापुष्टिविधायिनी ७८॥ राजा होता है राजा अपने अंश (कर)का भोगनेहारा रक्षा करनेमें चतुर इस प्रकार पिताके समान अपनी प्रजाके गुणोकी होता है जैसा स्वर्गका रक्षक इंद्र ॥७॥ ॥ सिद्धिमें तत्पर रहै और प्रजाके अपराधोको चायुगंधस्यसदसत्कर्मणःप्रेरकोनृपः। क्षमा करिके पुष्टि इस प्रकार करे जैसे माता पुरके अपराधोको क्षमा करिके पुष्टि धर्मप्रवर्तकोऽधर्मनाशकस्तमसोरविः॥७३॥ करती है ।।७८॥ पवन सुगंधका जैसे प्रेरक है तैसे सत्र हितोपदेष्टाशिप्यस्यसुविद्याध्यापकोगुरुः । और असत् कर्मका प्रेरक राजा होता है। धर्मका प्रवर्तक और अधर्मका नाशक राजा स्वभागोद्धारकृद्भातायथाशास्वपितुर्धनात् ।। इस प्रकार होता है जैसे अंधकारका नाशक जिस प्रकार गुरु शिष्यको उत्तम विद्या- सूर्य होता है॥७३॥ ध्ययन कराता है और उसके हितोंको दुष्कर्मदंडकोराजायमः स्यादंडकृद्यमः । उपदेश भी कराता है जिस प्रकार भ्राताके अग्निश्शुचिस्तथाराजारक्षार्थसर्वभागभुक् । धनमसे शाखके अनुसार अपने भागको ग्रहण करता है इस प्रकार राजा भी पितोपदेश- दुष्टकर्मके दंडका दाता होनेसे यमरापूर्वक शास्त्र के अनुसार ही कर ( दंड ) जके समान दंडका कारक होता है राजा कग्रहण करें।७।। अनिके समान शुद्ध होता है और रक्षाके अयं अपने भाग ( कर ) को भोगता आत्मस्त्रीधनगुद्याणांगोधावंधुस्तुमित्रवत् । धनदस्तुकुवेर स्याद्यमः स्याचमुदंडकृत् ८०॥ पुष्यत्पपाररी सर्ववरुणः स्वधनैर्नृपः। . वन्यु जिस प्रकार मित्रके समान अपने करश्चंद्रोहादयतिराजास्वगुणकभिः॥७५ ॥ यी धन गोष्प वस्तु इनकी रक्षा करता जलोसे सबका पोपक राजा जलरूप है इसी प्रकार राजा भी करे और प्रजाको और अपने धनो पुष्ट करनेसे वरुणरूप विपत्तिमें धनके देनेसे कुबेर और अपराधके चंद्रमाकी किरणों के समान अपने गुण और अनुसार दंड देनेसे यमरूप राजा होता कर्मास सयको प्रसन्न रखता है।।७५ ॥ है ।। ८०॥
(८)
शुक्रनाति ।
[ अध्याय-
प्रवृद्धिमतिसंराज्ञिनिवसतिगुणाअमी। सहायोंके लिये कार्यको उनके आचरणों
एतेसप्तगुणाराज्ञानहातव्याः कदाचन ॥८॥
से राजा मानता है और संतोष करता है और
देवके अनुसार प्रसन्न होता है अन्यथा
श्रेष्ठ बुद्धिमान् उत्तम राजामें ये पूर्वोक्त सा-नही ।। ८७॥
तो गुण वसते हैं इससे राजा इन सातो गुणो- अवश्यमेवभोक्तव्यकृतकर्मफलंनरैः ॥
का कदाचित् भी परित्याग न करे ॥८॥
क्षमतेयोपराध सशक्तः स दमनेक्षमी ।
प्रतिकारैर्विनानैवप्रतिकारकृतेसति ॥ ८८ ॥
क्षमयातुविनाभूपानभात्यखिलसद्गुणैः ८२।।
किये हुए कर्मोका फल मनुष्यको अवश्य
ही भोगना पडताह प्रतिकारके विना प्रतिकार
जो अपराधोकी क्षमा कर वह राजा क्षमा (निवृत्तिका उपाय) किये पीछे भी अवश्य
वान् है और जो दमन दंड देनेमे समर्थ है वह भोगने योग्य है ।। ८८ ॥
शक्त है क्षमाकै विना राजा सम्पूर्ण भी उत्तम
गुणोखे शोभित नही होता है ।। ८२ ॥ तथाभोगायभवतिचिकित्सितगदायथा ।
स्वान्दुर्गुणान्परित्यज्यद्यतिवादस्तितिक्षते । उपदिष्टेनिष्टहेतीतत्तत्कयतेतकः ।। ८९ ॥
दाननिश्चमत्कारैः स्वजारंजकः सदा ॥
जिस प्रकाररोगीकी चिकित्सा होगी उसी
अपने निन्दित गुणोंका परित्याग फारके प्रकारके भोगोंकी प्राप्ति होगी जो अनिष्ट
निन्दाका सहन करे दान मान सत्कारस अप- फलके हेतुका उपदेश करता है उसके करने
नी प्रजाको सदा प्रसन्न रक्खे ॥ ८३ ॥ कोई भी यत्न नहीं करता ।। ८९ ॥
दांतः शूरश्चशस्त्रास्त्र कुशोरिनिषूदनः। रज्यसत्फलस्वतिदुष्फलेनहिकस्यचित् ।
अस्वतंत्रश्चमेधावीज्ञानविज्ञानसंयुतः ॥८४ ॥ सदसद्रोधकान्येवहष्ट्रवाशास्त्राणिचाचरेत् ९०
दमनशील शूरवीर शस्त्र और अस्त्र में कुशल
शत्रुओंका नाशक शास्त्र के अनुसार आचरण कर्ममें लगताहै और अनिष्ट है फल जिसः
मनुष्यका मनउत्तम है फल जिसका ऐसे
करनेहारा बुद्धिमान् ज्ञान और विज्ञान संयुक्त उसमें किसीका भी मन नहीं लगता है
राजासदा रहै ।। ८४ ॥
इससे सत् और असत्कै बोधक शास्त्रोंको
नीचहीनोदीर्घदशीवृद्धसेवामुनीतियुक् । देखकर ही राजा आचरण करै ।। ९०।।
गुणिजुष्टस्तुयोराजासत्रयोदेवतांशकः ८५॥ नयस्यविनामूलंपिनयः शास्त्रनिश्चयात् ।
नीचोंसे रहित दोपदी वृद्धोंका सेवक विनयस्येद्रियजयस्तयुक्त शास्त्रमृच्छति ॥९१
उत्तम नीतिमान् गुणियोसे युक्त ऐसाजो राजा
नीतिका कारण विनय है विनय शास्त्रके
बद देवताओका अंश ८५॥
निश्चयते होता है विनयका हेतु इन्द्रियोंका
विपगितस्तुरक्षोंशः सबैनरफगोजनः ॥
जय है इन्द्रियोंकि जयसे ही शास्त्रकी प्राप्ति
नृपांगमदृशोनियंत त्सहायगणः किल।। ८६॥ होती है । ९१ ॥
पोक्त गुणोसे विपरीत है गृण जिसमें वह आत्मानंप्रयमराजाविनयेनोपपादयेत् ।
राजा राक्षसोका अंश है और जिस अशका ततःपुत्रांस्ततोमात्यांस्ततोभृत्यांस्ततःप्रजाः
राजा होता है उसके सहायकोंका समूह भी
उसी भराफा होता है॥८६॥
इससे राजा मयम अपने आत्मा के निरन्तर
तकृतमन्यंतगजामंतुष्पतिचमोदते ।
विनपयुक्त कर फिर पुत्रों को फिर अमात्योंको
किर सयौको फिर प्रजाको दिनय युक्त
पामाचरणानत्यनान्ययानियतबलात्।।८७ करें ॥ ॥
२.] भोपाटीकासहित। परोपदेशकुशलः केवलोनभवेन्नृपः । एकस्यैवाहियोशक्तोमनसः सन्निवहणे । मजाविकारहीनःस्पात्सगुणोपिनृपःकचित् ९३ महीसागरपर्यंतांसकथावजेष्यति ॥ ९९ ॥ दूसरेके उपदेशोंमें ही केवल राजा जो राजा एक मनके वश करने में असमर्थ कुशल न रहै किन्तु आप भी विनयशीद्ध रहै है वह राजा सागरपर्यंत पृथ्वीको किस क्योंकि विन्दयहीन सगुण भी राजा प्रजाके प्रकार जीतेगा ।। ९९ ॥ अधिकारस कदाचित् हीन होजाताहै ॥९॥ क्रिपावसानविरसैविपयैरपहारिभिः । नतुनृपाहिनिस्वा दुर्गुणाद्यपितुप्रजा। गच्छत्याक्षिप्तहदयः करीवनृपतिहम् ॥ ययानविद्राणासर्वदातुतयाग्रजा ॥९॥ नाशमान और अन्तमें विरस विष- दुर्गुण भी प्रजा राजासे होन सर्वदा इस योसे भाक्षिप्त (घशीभूत ) मन जिसका ऐसा प्रकार नहीं होती जैसे इन्द्रको स्त्री कभी राजा हस्तीके समान बंधनको प्राप्त होता विधवा नही होती है ॥१४॥ है॥ १००॥ भ्रष्टश्री स्वामिताराज्ञोनृपएवनमंत्रिणः । शब्दः स्पर्शश्वरूपंचरसोगंधश्वपंचमः । तथाविनीतदायादोदांताः पुत्रायोपिच ९५ एककस्त्वलमेतेपांविनाशमतिपत्तये ॥ १॥ जैस राजाको भ्रटश्रीका कारण राजा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, इनमेसे ही है मंत्री नही तिसी प्रकार जिस राजाके एक भी विषय विनाश करनेको समय पुत्र आदि अविनीत होते हैं वही राजा भ्रष्टश्री है ॥ १ ॥१.१ अर्थात् राज्यसे हीन हो जाता है ॥ ९ ॥ शुचिर्दीकुराहारोविदूरभ्रमणक्षमः । सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः । लुब्धकोद्गीतमोहेनमृगोमृगयतेवधम् ॥२॥ विनीतात्माहिनपतिर्भूयतीश्रियमश्नुते॥१६॥ और कुशाओके अफुरोंका भक्षक, जिस राजाम प्रजाका अनुराग होता है और अत्यन्त दूर देश भ्रमणशील मृग और जो मजाके पालनमें तत्पर है और लुब्धकके गीतसे मोहित होकर बधको प्राप्त विनीत है वह राजा अत्यन्त श्रीको भोगता होता है अर्थात् एक अषण इद्रियकेही वश होकर मृत्युको प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥ प्रकीर्णविषयारण्यधावंतविममाथिनम् । गिरीशिखराकारोलीलयोन्मूलितदुमः । ज्ञानांकुशेनकुर्वीतवमिंद्रियदतिनम् ॥९७ ॥ करिणीस्पर्शसंमोहाबंधनंयातिवारणः ३ ॥ राजा गहन विषयरूपी वनमें मदसे पर्वतको शिखरके समान है आकार दौडते हुए इन्द्रियरूपी हस्तीको ज्ञानरूपी जिसका और लीलासे उसाडे हैं वृक्ष जिसने अंकुश घशमं करें ॥ ७ ॥ ऐसा दम्ती हस्तिनीभोगके समोसंयधनको विपयामिपलोभेनमन मेश्यतींद्रियम् । प्राप्त होता है अर्थात् लिंगइन्द्रियही वशीभूत तनिरुंधेत्प्रयत्नेनजितेतस्मिनितेन्द्रियः ॥९८ होकर बंधनको भोगता है ॥३॥ विषयरूप मांसके लोभस इन्द्रियोंको स्निग्यदीपशिखालोकविलोलितविलोचनः । मन प्रेरता है तिसके प्रयत्नो मनको मृत्युमुश्छतिसंमोहात्यतंगः सहसापतन्४ ॥ रोके क्योंकि मन जोठनले राजा जितेन्द्रिय स्निग्ध (रमणीय) दीपककी शिखाके होता है ॥२८॥ दिसनेसे चंचल हैं नेत्र जिसके रेसा पतंग (१०) शुक्रनीते। [ अध्याय- HERE दीपशिखापर गिरता हुमा मृत्युको प्राप्त होता का दर्शन तौ क्यो नही विकारको करेगा है अर्थात् नेत्र इन्द्रिय ही इसके वधका हेतु अर्थात् अवश्य करैगा ॥ १० ॥ हो जाता है॥४॥ रहःमचारकुशलामूदुगद्गदभापिणी। अगाधसलिलमनोदूरोऽपिवसतोबसन् । कंननाविशीकुर्यान्नसंरक्तांतलोचना ॥ ११ ॥ मोनस्तुसामिपलोहमास्वादयतिमृत्यवे ५॥ अगाधजलमें डूबा हुआ और दूर बसता गद्गद बोलनेमे तत्पर लाल है नवोंका समीप एकान्त कार्यमै कुशल और कोमल हुआ भी मीन अपनी मृत्युके अथ मांस जिसका ऐसी स्त्री किस मनुष्यको वशमें न सहित लोदेको ग्रहण करता है अर्थात् एक करेंगी अपितु सवकोही वश कर सकती है ११ जिहा इन्द्रियसेही मर जाता है ॥५॥ उत्कर्तितुंसमर्थोपिगंतुंचवसपक्षकः । मुनेरपिमनोवश्यसरागकुरुतेगना । द्विरेफोगंधलोभनकमलेयातिवंधनम् ॥ ६॥ जितेंद्रियस्यकावा किंपुनश्चाजितात्मनाम्।। कमलके कतरनेमें समर्थ और अपने जितेंद्रिय मुनिके मनकोभी वशीभूत और पंखोंसे गमन करने में संपन्न भी भ्रमर गंधक सराग (विषयाभिलाषी) स्त्री कहती है, अजि- लोभस कमलके विषे वैध जाता है अर्थात तात्माओके मनको तो वशीभूत क्यों नहीं करेगी ॥ १२॥ प्राण इंद्रियसे मरणको प्राप्त होता है॥६ एकैकशोविनिम्नन्तिविपयाविपसन्निभाः । व्यायच्छतश्चवः स्त्रीपुनाशंगताअमी। किंपुनः पंचमिलिताः नकथनाशयतिहि ७ ॥ इंद्रदंडक्यनहुपरावणाद्याः सदाह्यतः १३ ॥ विपके तुल्य विषय एक २ भी परस्त्रियोंकी इच्छा करनेहारे ये राजा इतते हैं तो पांचों मिलकर नाश क्यों नहीं नाशको प्राप्त हुए, इन्द्र, दंडक्य, नहुष और करेंगे अर्थात् अवश्य करेंगे ॥७॥ रावण आदि ॥ १३॥ द्यतत्रीमद्यमेवेतत्रितयंचवनर्यकृत् । अतस्परनरस्यैवस्वीसुखायभवेत्सदा ।। अयुक्तंयुक्तियुक्तंविधनपुत्रमतिपदम् ॥८॥ साहारियनगृह्यकृत्येतांविनान्यानविद्यते ॥ अयोग्य द्यूत, खी, मदिरा, अत्यंत जो मनुष्य स्वीके विपे तत्पर (अधीन). अनयंके कर्ता है, यदि युक्त अर्थात् इनका नही उसीको स्त्री सुखदायक होती है क्योंकि सेवन योग्यतापूर्वक होय तो कम धन, पुत्र, गृहके कार्यमें उसके विा और कोई भी मति इनके दायक होते है ॥ ८॥ सहायक नहीं है॥१४॥ नलधर्मप्रभृतयः सुद्यतेनविनाशिताः । अतिमद्यदिपिवतोघुदिलोपाभवेत्किल । सकापटबंधनायालयूतभवतितद्विदाम् ९॥ प्रतिभांबुद्धिवैशययचित्तविनिश्चयम् ॥१५॥ नल और पुधिष्ठिर आदि राजाभीको शूतने तनोतिमात्रयापतिमद्यप्रन्यावनाशकृत् । नष्ट कर दिया, यूतके जाननेवालोको कपट कामक्रोधीमद्यतमोनियोक्तव्याययाचितम् १६ सहित पूत धनके देने में समर्थ है ॥९॥ स्त्रीणांनाम पिगंगादिविफगेत्येवमानसम् । अायत मदिरा पीनेवाले मनुप्यकी बुद्धिका लोप होता है, और परिमित पिईहुई मदिरा पुिनदर्शनंतासांपिलासोल्लासितववाम् २०॥ द्धिकी स्फुरणा और श्रेष्टता, धीरता, चित्तो आनन्दया दाता नियाका नाम भी मनको निश्चय इनको विस्तार करतीहै, अधिक मदिरा विकारी करता और विदासपरिक टलास विनाश करती है और मदिरासे भी कामा (शोभा) को प्राप्त हुई दाटी जिनकी उनकोध होता निको यथोचित रोके १५ १६॥
१.]
भापाटीकासहित ।
(११)
कामः प्रजापालनेचकोषःशत्रुनिर्वहणे । करदीकरणराज्ञांरिपूर्णापरिमर्दनम् ।
सेनासंधारणेलोभायोज्याराज्ञाजयायिना ।। भूपेरुपार्जनभूयोराजवृत्तंतुचाटधा ॥२४॥
विषयकी इच्छावाला राजाप्रजाके पालन दुष्टोंको दंड और प्रजाका पालन और
में कामना और शत्रुओके नष्ट करने में क्रोध राजसूय आदि यज्ञोंका करना और न्यायसे
और सेनाको धारणा लोभको क्रमसे नियुक्त कोश सजानेका पढाना और राजाओको क-
कर अन्यत्र नहीं ।। १७॥
रका दाता करना शत्रुओका मर्दन करना और
परस्त्रीसंगमकामोलोमोनान्यधनपुच ।
भूमिका वारंवार सम्पादन करना यह आठप-
कारका राजाओंका वृत्त आचरण है ॥२३॥ २४
स्वप्रजादडनेक्रोधोनवधार्योनृपः कदा १८॥
नवर्धितंवलयस्तुनभूपाः करदीकृताः ।
परस्त्रीके संगममें काम और अन्यके धनमें
लोभ भीर अपनी प्रजाके दंड क्रोधका धारण नमजाः पालिताः सम्यक्तपंढतिलानृपाः
राजा कदापि न करे ॥ १८ ॥
जिन राजाओंने सेनाओंकी वृद्धिन की और
अन्य राजाओका करके दातान किया और
किमुच्येतकुटुंबीतिपरस्त्रीसंगमान्नरः ।
प्रजाओंकी सम्यक् पालना न की वे राजा
। स्वमजादडनाच्छूरोधनिकोन्यधनैश्चाकम् ॥ निष्फल तिलके समान हैं ॥ २५ ॥
परस्त्रीके सनसे कुटुंबी और अपनी प्रजाको प्रजासद्विजेतयस्माद्यत्कर्मपारीनंदति ।
दंड देनेसे शूरवीर और अन्यके धनासे धनिक त्यज्यतनिकर्यस्तुगुणिभिस्तुनृपाधमः ।।
क्या मनुष्य कहा जाता है अपितु कदाचित
भीनही कहाता॥ १९॥
जिस राजाले प्रजा कांपती है और प्रजा
जिष्ठ राजके कायकी निंदा करती है तिस
अक्षितास्नृपतित्राह्मणचातपस्विनम् । राजाको धनी और गुणी त्यागते हैं वह राजा
धीनकंचामदातारेदवानीतत्यजत्ययः ॥२०॥ अधम है ॥ २६ ॥
रक्षाके न करनेहारे राजाको और शतपस्वी नटगायकगणिकामल्लपंढाल्पजातिपु ।
ब्राह्मणको और भदाता धनि कको देवता योतिशक्तोनृपानिंद्यः साहशत्रुमुखेस्थितः ।
इतते हैं और नरकर्म गैरते हैं ॥ २०॥
नद गायक वेश्या नपुंसक और नीचजा-
स्वामित्वंचैवदातृत्वधानकवंतपःफलम् । तियों में जो राजा अत्यन्त मासक्त है वह
एनसः फलमर्थित्वंदास्यत्वंचदाद्रता ॥२१॥ राजा निंद्य है और शत्रुके मुखमें विद्यमान
स्वामिता दातृता धनिकता ये हपका फल
है और याचकता दासता दरिद्रता ये पापका
बुद्धिमतसदाद्वेष्टिमोदतेवचकः सह ।
फल है ॥ २१ ॥
स्वदुर्गुणनवे वेत्तिस्वात्मनाशायसोनृपः २८॥
दृष्ट्याशास्त्राण्यतोत्मानंसनियम्यययोचितम् ।। जो राजा बुद्धिमान् सदा द्वेष कर पंच-
कुर्यान्नृपःस्ववृत्तंतुपरनेहसुखायच ॥ २२॥ फोंसे सदा प्रसन्न और अपने दुर्गणको न जाने
इससे राजा शात्रोंको देश और मनको पद राजा अपने नाशका कारण होता है ।।
रोककर यथोचित अपने भाचरणको इसलोकानापराधीहक्षमतेपदंडोधनहारकः ।
और परलोकके सुखके अथ करे ॥२२॥ स्वदुर्गुणश्रवणतोलोकानांपारपीडकः २९ ।।
दुनिग्रहणंदानप्रजायाःपरिपालनम् । नृपोयदातदालोकः क्षुभ्यतभिद्यतेयतः।
यजनंगजसूयोदः कोशानांन्यायतोर्जनम् ॥ गहचारैः श्रावायत्वास्ववृत्तंदूपयतिके ॥३०॥
शुक्रनीति । [अध्याय- जो राजा अपराधको क्षमा न करे, उत्तम समवतिनभयाद्राजोगुपिदूपणम् । दहको दे, धनको हरे और अपने दुर्गुणोंको स्तुतिमियाहिवदेवाविष्णुमुख्याइतिश्रुतिः३६॥ श्रवण करिके लोगोको राजा जब पीडित करता है तब लोक क्षोभ और भेदको प्राविष्णु आदि देवताभी स्तुतिको प्रिय मानते राजाके अधिक दूषण कोई नही कहता है होता है इसने गुप्त दूतोंके द्वारा अपने वृत्त है यह श्रुति है ।। ३६ ॥ (आचरण) को कौन दूषित करता है यह अरण करावे ॥ २९ ॥३०॥ किंपुनर्मनुजानित्यानंदाजःक्रोधइत्यतः । भूपयंतिकर्भावग्मात्यायाश्चतद्विदः । राजामुभागदंडीस्यात्सुक्षमीरंजकःसदा॥३७॥ मयिकीहकचनप्रीतिः कपामप्रीतिरेवया ॥ मनुष्य दो नित्य स्तुतिप्रिय क्यों न होंगे जिससे क्रोध निन्दास उत्पन्न होता है इस और कौन २ वृत्तके ज्ञाता मन्त्री आदि मेरे से राजा सुभाग (सूक्ष्म ) दंड दाता और वृत्तको प्रशंसा करते हैं और मेरे विष किस २ उत्तम क्षमाशील और प्रजाका रंजक (प्रसन्न की उनम प्रीति और ममोति है॥३१॥ कारक) संदा रहै ॥ ३७॥ ममागुणगुणापिटर्मभुस्पचाखिलम् ।। यावनंजीवितचित्तंछायालक्ष्मीश्चस्वामिता । चौःस्वदुर्गुणतात्वालोकतः सर्वदानृपः ३२॥ चञ्चलानिपडैतानिज्ञात्वाधर्मरतोभवेत् ॥३८॥ सुकीत्यमत्यनेन्नित्यनावमन्येतैवप्रजाः । यौवन, जीवन, वित्त, छाया, लक्ष्मी लोकोनिंदतिराजस्त्वांचारः संश्रावितोपदि ॥ स्वामिता ये है ६ चञ्चल हैं यह जानकर राजा धर्मम तत्पर रहै ।। ३८॥ मेरे गुण और दुगुणांस कौन २ प्रसन्न और अदानेनापमाननछलाचरुटुवाक्यतः । अप्रसन्न है इस मकार सम्पूर्ण गुमव्यवहारप्रवण करके सम्पूण कालम लोकसे अपने दुर्गुणोंको राजःप्रबलदंडेननृपमुंचतिवैप्रजा ॥ ३९ ॥ राजा जानकर अपनी सुकीर्तिके अर्थ प्रजाको कृपणता तिरस्कार, छल, कटुवचन, त्याग (छोडोदे यांत दंड न दे और प्रजाका राजाका प्रबलदंड, इनसे राजाको मजा त्याग अपमान न करे जिस राजाने लोको यह देती है ॥ ३१ ॥ श्रवण किया हो कि हे राजन्.! लोक तेरी विपरीतगुणरोभ सान्वयारज्यतेप्रजा। निंदा करते हैं ॥ ३२॥३३॥ एकस्तनोतिदुप्फीर्तिदुर्गुणःसंघशोनकिम् ॥ कोपंगेतिदागरम्यादामदुर्गुणलोपकः। और पूर्वोक्तगुणोंके विपरीत गुणांस प्रजा मीतासाध्यपिगमणन्यतालोकापवादतः ।। पदा मखन्न रहती है, एक भी दुर्गुण कुकीर्ति १.] भाषाटीकासहित । मामा काम, क्रोध, मोह, लोभ, मान, मद इन सम्बन्धी कर्म उसे जो करता है वह राजा छ ओंको राजा त्यागदे क्योकि इनके त्यागः पण्डित है समयके अनुसार धनलेने और देने गनेसे राजा सुखी होता है॥४२॥ से राजा साधु होता है॥१८॥४९॥ दंडक्योनृपतिःकामाक्रोधाच्चजनमेजयः। जितेंद्रियस्यनृपतेनैतिशास्त्रानुसारिणः। लोभादैलस्तुराजर्षिौहाद्वातापिरासुरः ॥४३॥ भवत्युच्चीलतालक्ष्म्यःकीर्तयश्चनभस्पृशः ५० पौलस्त्योराक्षसोमानान्मदाभाद्भवोनृपः ॥ जितेन्द्रिय और नीतिशास्त्रके अनुसारी प्रयातानिधनद्यतेशत्रुपड्वर्गमाश्रिताः॥४४॥ राजाको लक्ष्मी अधिक और कीर्ति स्वर्गगा- दंडक्य कामसे, जनमेजय,क्रोधसे, ऐल-मिनी होती है ॥ ५० ॥ राजा लोभसे, वातापि असुर मोहसे, रावण आन्वीक्षिकीत्रयीवादिंडनीतिश्चशाश्वती। राक्षस मानसे, दंभले उत्पन्न राजा मदसे ये विद्याश्चतस्त्रएवैता अन्यसेन्नृपतिःसदा॥५१॥ पूर्वोक्त राजा पड्वगं रूप शत्रु के भाश्रय मरणको प्राप्त हुए ॥४३ ॥ ४४ ॥ ब्रह्मविद्या, चेदान्त, वेदत्रयी, (३ चेद) शत्रुपड्वर्गमुत्सृज्यं जामदग्न्याप्रतापवान् ॥ वात्ता, दण्डनीति, ये चारों विद्याओंका राजा सदा अभ्यास कर ॥ ५१ ॥ अंबरीषामहाभागावुभजातीचरंमहीम्॥४५॥ आन्वीक्षिक्यांतर्कशास्त्रवेदांताद्यप्रतिष्ठितम् । और शत्रुओके पड्वर्गको त्यागकर प्रतापीचच्यांधर्मोह्यधर्मश्चकामेऽकामःप्रतिष्ठितः५२।। परशुराम और महाभाग अम्बरीपचिरकालतक पृथ्वीको भोगते भये ॥ १५॥ मान्वीक्षिकीमें न्यायशास्त्र और वेदान्त वधयन्निधर्मासिवितीसद्भिादरात् । आदि है और वेदत्रयीमें धर्म अधर्म कामना और मोक्ष है ।। ५२॥ निगृहीताद्रियग्रामोकुतिगुरुसवनम् ४६ ॥ अर्थानयातुवा यदिंडनीत्यांनयानयो । सजनोंने किपा सेवन जिनका ऐसे धर्म| और अर्थकी वृद्धिक भर्थ इन्द्रियोको वशीभूत वर्णाःसर्वाश्रमाश्चैवविद्यास्वामुप्रतिष्ठिताः५३॥ (जीत ) कर गुरुका सेवन करै ।। ५६॥ भर्थ और अनर्थ वार्ता में न्याय भीर अन्याय शाखायगुरुसंयोगःशास्त्रविनयवृद्धये ॥ दंडनीतिमें वर्ण, भऔर भाश्रम इन सम्पूर्ण विद्याओंमें विद्यमान है॥५३॥ विद्याविनातोनृपतिःसतांभवतिसंमतः ॥४७॥ गुरुका संयोगशास्त्र अर्थ और शास्त्र विनय अंगानिवदाश्चत्वारोमीमांसान्यायविस्तरः । (नम्रता )की वृद्धिकै अर्थ विद्या और विनयस, धर्मशास्त्रपुराणानित्रयोदसर्वमुच्यते ॥५४॥ युक्त राजा सत्पुरुषोको सम्मत होता है ॥४७॥ शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिप, प्रेर्यमाणोप्यसद्वृत्ताकार्य पुप्रवर्तते । छन्द ये वेदके ६ अङ्ग है, और ४ वेद, मीमांसा न्यायका विस्तार,धर्मशास्त्र,पुराण इनसम्पूों- श्रुत्यास्मृत्यालोकतश्चमनसासाधुनिश्चितम्४८ को त्रयी कहते हैं। ५४ ॥ यत्कर्मधर्मसंज्ञतव्यवस्यतिचपंडितः । कुसीदकृषिवाणिज्यंगोरक्षायतियोच्यते । आददानप्रतिदानकलासम्यमहीपतिः ४९॥ संपन्नोवालयासाघुर्नवृत्तेर्भयमृच्छति ॥५५॥ असत् है भाचरण जिनका तिनकी प्रेरणाले भी जो निन्दित कम प्रवृत्त नहीं होता और सूदलेना खेची व्यापार गोरक्षा इन्हें पाती वेद और स्मृति (धर्मशान) भौर लोकसे कहते है वातासे सम्पन्न नो गजा वह भाच- मनके द्वारा साधु निश्चित किया जो धर्म- रणसे भयको माप्त नहीं होगा ।। ५५।।
शुक्रनीति । [अध्याय- . दमोंटइतिख्यातस्तस्माइडोमहीपतिः। ग्रीष्मकालके सूर्यको किरणोंसे सन्तप्त तस्थनीतिर्दानातिनयनानातिरुच्यते ॥१६॥ और कम्पनका हेतु और आश्रय रहित दमको दंड कहते हैं इससे राजा दंडप मश्देशक समान उदंड दुर्जनके समागमको त्याग करै । ६२ ।। हेतिस राजाकी नीतिको दंडनीति कहते और नय (न्याय ) को नीति कहते निःश्वासोद्गीर्णहुतभुगधुमधूम्रीकृताननैः । वरमाशीविपैःसंगंकुन्नित्वेवदुर्जनः ।। ६३ ।। यान्वीक्षियात्मविज्ञानादर्पशोकौव्युदस्य श्वाससे उत्पन्न अग्निकै धूएसे स्पाम है ति ॥ उभौलोकाववामोतित्रय्यांतिष्ठन्य मुस जिनका ऐसे सोका सङ्ग ती उत्तम याविधि ॥ ५७॥ हे परन्तु दुर्जनका खड्न कदापि उत्तम नहीं आन्वीक्षिकी विद्या आत्माकै ज्ञानसे आनन्द और शोकको नष्ट करती है, अयोम टिकता क्रियतेभ्यर्हणीयायसुजनायययांजलिः । हुमा राजा दोनों लोकोको प्राप्त होता ततासाधुतकार्योदुर्जनापहितार्थिना ६॥ है ।। ५७ ॥ जिस प्रकार सुजनके प्रति पूजाके अर्थ, आनृशंस्यपरोधमरसवप्राणभृतांयतः । अञ्जलि की जाती है उससे अच्छी तरह तस्माद्राजानृशंस्येनपालयेत्कृपणंजनम्॥५८॥ दुर्जनकी पूजाके अर्थ, अञ्जली , अपने हितका जिससे सम्पूर्ण जीवोंकाभानुशस्य(अहिंसा) आभिलाषी करै ॥ ६४ ॥ परम धर्म है तिससे राजा अहिंसास दुःखी नित्यमनोपहारिण्यावाचामहादयेजगत् । जनकी रक्षा करे ॥५८॥ उद्वेजयतिभूतानिक्रूखाग्धनदोपिसन् ६५ नाहिस्वमुखमान्विच्छन्पीडयेत्कृपणंजनम् । मनोहरवाणीसे सदा जगतको प्रसन्न रक्खे कृपण पीडयमानःस्वमृत्युनाहंतिपार्थिवम्५९ क्योंकि कुबेरके समान भी कठोरवाणी अपने सुरसको इच्छा करता हुआ राजा पुरुप भूतोंको कंपित करता है ॥ ६५ ॥ कृपण ( दीन) मनुष्यको दुःख न दे क्यो हदिविश्वात्पर्यययासंतप्यतजनः ।। कि पीइयमान कृपण मृत्युसे राजा को पीडितोपिदिमेधावीनतांवाचमुदीरयेत् ६६॥ इतता है॥५९॥ जिड वाणोसे हृदय में तपायमान सुजनःसंगमंकुपोद्धर्मायचसुखायच । समान जन दुःखी हो उस वाणीको पीडिर सेव्यमानस्तुसुजनैर्महानतिविराजते ॥६० हुआभी बुद्धिमान् न कहे ॥६६ ॥ उत्तम जनों के साथ, धर्म और सुखक प्रियमेवाभिघातम्यनित्यसत्सद्विषत्सुवा । अयं स कर, सुजनोंसे सेपित राजा अरयत शिखीवककांमधुरांबाचंतेजनप्रियः ६७॥ महत्वको प्राप्त होता है॥६॥ सुनन और दुजनोंके प्रति नित्य जो प्रिय हिमांशुमालीयतयानयोकुल्लोत्पलंसरः॥ वचन ही कहता है यह मनुप्य मधुरवाणी आनंदयतिवेतांसिययासुजनचेष्टितम् ६१॥ कहनेहारे मपूरके समान सयको प्रिय सुजनको चेष्टा इस प्रकार चित्तको मानन्द होता है॥ ६॥ जाती है जैसे चन्द्रमा नवे पिले हैं यमर मदरक्तस्यहंसस्यकोकिलस्पशिसंडिनः । निमम ऐसे तळापको ॥६॥ योममूर्याशुमनसमुटेजनमनाश्रयम् । हरतिनतयावाचोययावाचोविपश्चिताम्॥६॥ मसे संयुक्त इंस और कोकिल और मास्यामिनोदप्रत्यनेदुर्जनसंगतम् ६२॥ (मपूर इनकी पाणी पसी मनको नदी १. ] भाषाटीकासहित । . हरती जैसी पंडितोकी वाणी मनको हरती द्रव्यसे पूर्ण पृथ्वीको भोगता है और वही है॥ ६॥ राजा भूमिका पति होता है ॥७॥ येप्रियाणिप्रभापतेपियामिछतिसत्कृतम् । पराक्रमोवलंबुद्धिःशौर्यमेवरागुणाः । श्रीमंतोवंद्यचीरतादेवास्तेनरविग्रहाः ६९ ॥ एभिहीनोन्यगुणयुग्महीभुक्सवनोपिच ७९ जो मनुष्य प्रिय बचन बोलते हैं, और प्रियके साकारको इच्छा करते हैं वे श्रीमान है इन गुणो हीन और इतर गुणों से पराक्रम, पल, बुद्धि, शूरता ये गुण उत्तम नमस्कारके योग्य हैं चरित्र जिनके मनुप्यके और शरीर भारी देवताका है ॥ ६९ ॥ युक्त राजा बहुत धनवाला होय तो भी ॥५॥ नहीशंसंवननंत्रिपुलोके विद्यते । महास्वल्पांनैवभुक्तद्रुतराज्याविनश्या । . दयामैत्रीचभूतेपुदानंचमधुराचवार ॥ ७० ॥ महाधनाचनृपतेविभात्यल्पोपिपार्थिवः ।।७।। सब भूतोंपर दया और मित्रता और दान पूर्वोक्त राजा स्वल्प भी मही (भूमि ) और मधुरवाणी ऐखा वशीकरण और कोई को नही भोगता और शीव राज्यसे भ्रष्ट होवा तीनों लोकों में नही है ॥ ७० ॥ हे और महाधनी राजा अल्प ही शोभाको प्राप्त श्रुतिरास्तिक्यपूतात्मापूजयेद्देवतांसदा । होता है ॥७६ ॥ देवतावद्गुरुजनमात्मवच्चसुहज्जनान् ।।७१॥ अव्याहताज्ञस्तेजस्वीएभिरेवमुणैभवेत् । वेदकी आस्तिकता (सत्य बुद्धिसे पवित्र ) राज्ञःसाधारणास्त्वन्येनशक्ताभूप्रसाधने।।७७॥ है आत्मा जिसका ऐसा राजा देवताओंका पूर्वोक्त गुणोसे युक्त राजा अनाहतात सदा पूजन : करे, देवताओंके समान (जिसकी आज्ञाका कोई भीभवलंघन न करे) गुरुजनोंका भौरमात्माके समान मित्रजनोंका और तेजस्वी होताहै और राजाके साधारण पूजन करें॥ ७१॥ गुण पृथ्वीके वश करने में समर्थ नहीं है ॥७॥ प्रणिपातेनहिगुरून्सतोनूचानवोष्टतः । खनिः सर्वधनस्येयंदेवदैत्यविदिनी। कुर्वीताभिमुखान्देवान्भूत्यै सुकृतकर्मणाम् ।७२ म्यर्थेभमिपतयःस्वात्माननाशयत्याप ७८॥ वेदपाठियोंसे खंयुक्त होकर राजा अपनी कोतिक अर्थ प्रणामसे गुरु और सत्पुरुषोंको और देव दैत्योंकी नाशक है क्योंकि भूमिके यह पृथ्वी सम्पूर्ण धनोंकी खानि है और उत्तम कर्मस देवताओंको अपने अभिमुख (अनुकूल) करे ।। ७२ ।। अय भूमिपति (राजा ) अपने आत्माको भी नष्ट कर देते हैं।। ७८ ॥ सदोवनहेरन्मित्रंसद्भावेनचबांधवान् । उपभोगायचधनंजीवितंयेनरक्षितम् । स्वीभृत्योपममानाभ्यांदाक्षिण्येनेतरजनम् ७३ नरक्षितातुभूपेनकि तस्यधनजवितैः ७९॥ श्रेष्ठभाव (प्रीति ) से मित्रको और बंधुओको, प्रेमसे स्त्रीको, मानसे भृत्य जीवितकी रक्षाकारक धन उपभोग (सेवक) को चतुरता इतर जनोको वशम है जित राजाने भूमिको रक्षा नही की करे ॥७३॥ उसके धन और जीवनसे क्या है ॥ ७९ ॥ वल्यान्युदिमाशूरोयोहियुक्तपराक्रमी । नयथेष्टव्ययायालंसंचितंतुवनंभवेत् । वित्तपूर्णीमहीभुक्तसभपोभूपतिर्भवेत् ७४|| सदागमाद्विनाकस्यकुवेरस्यापिनांजसा1८०॥ जो राजा पळवान् और बुद्धिमान और सदा प्राप्तिके विना कुबेरकाभी धन सुख- शूरवीर और युक्त पराक्रमी है यह राजा पूर्वक इच्छाके भनुसार व्यय (खर्च) करनेको शुक्रनादि । [अध्याय- समय नहीं होता और वो किसका संचित धन सामंतादिसमायेतुभृत्याअधिकृताभुवि । समर्थ होगा।॥ ८०॥ तेनसामंतसंज्ञा स्यूराजभागहराः क्रमात् ॥ पूज्यस्त्वभिर्गुणभूपोनभूपाकुलसंभवः । जो भूमिमें अधिकृत भृत्य (नौकर)साम- नकुलपूज्यतेयादृग्वलशौर्यपराक्रमः॥८१॥ तादिक तुल्य हैं और राजाके भागको ग्रहण इन गुणोस ही राजा पूजाके योग्य होता करते हैं ये अनुसामंतकहोते हैं ।। ८८ ॥ है और उत्तम कुलके उत्पन्न होनसे पूज्य नही होता क्योंकि जैसा बलबुद्धि पराक्रमसे सामंतादिपदभ्रष्टास्तत्तुल्यभृतिपोषिताः ॥ पूजित होता है ऐसा कुलसे नहीं होता ।।८१॥ महाराजादिभिस्तेतुहीनसामंतसंज्ञकाः ॥ ८९ लक्षकमितोभागोराजतोयस्यजायते । जो सामंत आदि पदवीस तो महाराजादि वत्सरेवत्सरेनित्यंप्रजानांत्वविपीडनैः ॥८२॥ कोने भ्रष्ट कर दिये हैं परन्तु सामंतोंके समान भृति (नौकरी)को भोगते हैं वे हीनसामंत सामंतःसनृपःप्रोक्तोयावल्क्षत्रयावाध । कहाते हैं ।।८९॥ तवैदशलक्षांतोनृपोमांडलिकास्मृतः ८३ शतयामाधिपायस्तुसोपिसामंतसंज्ञकः॥ तदूर्वतुभवद्राजायावदिशतिरक्षकः। शतनोमचाधिकृतोनुसांमतोनृपेणसः ९० ॥ पंचाशलक्षपर्यंतोमहाराजःप्रकीर्तितः ८४ ॥ जिस राजाके राज्यमें वर्ष वर्षमें विना सामंत कहता है और ग्रामोंपर जो राजाका शतग्रामोंका जो अधिपति वह भी प्रजाकी पीडाके भी एकलक्ष राजाका भाग अधिकारी (नियमित) है यह अनुसामंत सचित होता है उस सामन्त कहते हैं उससे अधिक तीन लक्ष पर्यंत जिसका भाग संचित कहाता है ॥ ९०॥ हो वह राजा मांडलिक कहाता है और दुश अधिकृतोदशग्रामेनायकः सचकीर्तितः ।। १० लक्ष बोस लक्ष पर्यतका भागी राजा और आशापालोयुतग्रामभागभाक्चस्वराडपि । वीरलक्षसे पचासलक्ष पयतका भागी महा- ग्रामि जो अधिकृत वह राज होता है।॥ ८२ ।। ८३ ॥ ८ ॥ नायक कहावा है दश सहस्र ग्रामों के भागोका व्रतस्तुकोटिपर्यंतःस्वराट्सम्राट्ततःपरम् । जो भागी वह आशापाल और स्वराभी दशकोटिमितोयावद्विरादतुतदनंतरम् ८५ ॥ कहाता है ॥ ९१ ॥ पंचाशत्कोटिपर्यंतसार्वभौमस्ततःपरम् ।। भवेत्क्रोशात्मकोग्रामोरूप्यकर्षसहस्त्रकः । सप्तद्वीपाचपृथिवीयस्यवद्याभवेत्सदा ॥८६॥ ग्रामार्धकपल्लिसंज्ञपल्ल्यधैकुंभसंज्ञकम्९२॥ दश लशसे कोटि पर्वतका भागी स्वराष्ट्र और एकोटिस दश कोटि पर्यंतका भागी एफ कोशका जिसका सम्राट् और दशोटिसे पचास कोदि पर्वतका एक हज र रुपयेका गिखमें राजाका भाग हो भागी विराट और जिसके सतीपा पृथ्वी उसे ग्राम कहते हैं और ग्रामका आधापल्ली यम हो यद राजा सार्वभौम होपाहे ॥५॥ और पल्लीका आधा कुंभ होता है ।। ९२॥ खभागमायादास्यावेप्रजानांचपन कृतः । की पंचसहसैकोशाप्रोक्तःप्रजापतेः ॥ ब्रह्मणास्वमिस्पस्तुपाटनादिसर्वदा ।। इस्तै तुःसहसा मनोः कोशस्यविस्तरः९३ गना भागरूप भति (वेतन) के देनसे पांच हजार दायका कोशविधि प्रद्यावा प्रनामीको दासरूप और मजाभोके पालनसे होता है और चार हजारका मनुरा होता स्यामिरूप रानाप्रमाने कियाद ॥ ८॥ दश प्रमाण और भापायीकामहित । (१७) सादिकोटिहस्तैश्चक्षेत्रकोगस्यब्रह्मणः । सवास १२५ हाथका मानव (मनुका) निवर्तन अथवा उन्नीसहजार दोसी १९२०० पंचविंशशतैःप्रोक्तक्षेत्रंतद्विनिवर्तनः ॥१४॥ यवोंका पूर्वोक्त निवर्तन होता है।। १००॥ अढाईकोटि कोशका ब्रह्माका क्षेत्र पञ्चीस से कोशका क्षेत्र विनिवर्तनोंसे मनु'भादिकाने चतुर्विंशशतैरेवांगुलैश्चनिवर्तने । कहा है॥ ९ ॥ प्राजापत्यंतुकथितशतश्चवकरैः सदा ॥ १ ॥ मध्यमामध्यमपदेययच्चतदंगुलम् । चौबीससौ २४०० अंगुलों का अथवा सी१०० यवादरष्टभिस्तयस्थौल्यंतुपंचभिः॥९५॥ करोंका प्रजापतिका निवर्त्तन कहा है ॥ ॥२०॥ मध्यमा बोचकी अंगुली के मध्यम पर्व सपदपट्शतंदंडाउभयोश्चनिवर्तने । अर्थात् मध्यमरेखाओंके वीचके भागके तुल्य निवर्तनान्यपिसदोभयौपंचविंशतिः॥२॥ और भाठ जौ लंचा और पांच जो मोटा उसे सवाछसे ६२५ दढ दोनोंके निवर्तनमें होते अंगुल कहते है ।। ९५॥ है निवर्तनभी दोनों सदा पच्चीस होते हैं ॥२॥ चतुर्विशत्यंगुलैस्तःप्राजापत्यःकर स्मृतः । पंचसप्ततिसाहस्त्ररैगुलै परिवर्तनम् । सश्रेष्ठभूमिमानेतुतदन्यास्त्वधमामताः ९६॥ मानवंपष्टिसाहले माजापत्यंतथांगुलैः॥३॥ चौवीस २४ अंगुलोंका कर प्रजापति पचहत्तर हजार ७५००० अगुलौंका मानव कहाता है वही कर पृथिवी प्रमाणोंमें श्रेष्ठ और साठहजार ६०००० अगुलोंका प्रजापति- है और इतर कर अधम हैं ।। ९६॥ का परिवर्तन होता है ॥३॥ चतुःकरात्मकोदंडोलघुः पंचकरात्मकः । पंचविंशाधिकहस्तरेकत्रिंशच्छतैर्मनोः । तदङ्गुलपंचयवैर्मानवमानमेवतत् ॥ ९७ ॥ परिवर्तनमाख्यातपंचविंशशतैःकरः ॥ ४ ॥ चार हाथका दंड लघु और पांच हाथका सवाइकत्तीश ३१२५ शव इस्तोंका मनुका दंड दीर्घ होता है उस करके अगुल पांच और पञ्चीससे २५००, हस्तीका प्रजापतिका यवके होते हैं क्योंकि ये पूर्वोक्त दंड मनुके परिवर्तन कहा है॥४॥ मानसे हैं ॥९७॥ प्राजापत्यंपादहीनचतुर्लक्षपवैमनोः । वसुषण्मुनिसंख्याकैर्यवेदंडः प्रजापतेः । अशीत्यधिकसाहस्रचतुलक्षयैवःपरम् ५ ॥ यवोदरः पट्शतैस्तुमानवोदडटच्यते ॥ ९८॥ तीनलाख यवोका प्रजापतिका और चार सातसो अडसठ ७६८ यवोंका प्रजाप-लाख अस्तीहजार ४८००० यवोंका मनुका तिका और ६०० छे से यवोंका मनुका दंड निवर्तन होता है ॥५॥ होता है।॥९८ ॥ निवर्तनानिद्वात्रिंशन्मनुमानेनतस्यौ । पंचविंशतिभिर्दडेरुभयोस्तुनिवतनम् । चतुःसहस्त्रहस्तास्युदंडाश्चाष्टशतानिहि ॥ त्रिशच्छतै गुरुर्यवौस्त्रपंचसहस्रकैः ९९ ।। मनुके मानसे बत्तीस निवर्तनोंके चार हजार पच्चीसले २५०० दंडीका दोनोंका निवर्तन हाथ और आठसे दंड होते ॥६॥ होता है अथवा तीस ३००० अंगुलोंका अथवा पचविंशतिभिर्भुजःस्यात्परिवर्तने । तीन सहस्रयों का अथवा पांच सहस्रयवोंका करस्युतसंख्याकै क्षेत्रं तस्यप्रकीर्तितम् ७ ॥ दोनोका दंड क्रमते होता है ॥ ९९॥ पचीसदंडोंकी परिवर्तनकी भुज होती है सपादशाहस्तश्चमानवनिवर्तनम् । दश हजार हायोंका परिवर्तनका क्षेत्र होता उनशिपाचदिशतैश्चयबोदरः ।। १००njan७ ॥ :
(१८)
शुक्रनीति।
अध्याव-
प्राकार
चतुर्भुजःसमंप्रोक्तंकष्टभूपरिवर्तनम् । अर्थचंद्रावर्तुलीवाचतुरखांसुशोभनाम् ।
प्राजापत्येनमानेनभूभागहरणनृपः ॥ ८॥ सप्राकारांसपरिखांग्रामादीनांनिवेशितीम् ॥ ४॥
सदाकुर्याच्चस्थापत्तीमनुमानेननान्यया। अर्धचन्द्रक आकार हा मोर गोल भयवा
लोभात्संकर्पयेयस्तुहीयतेसप्रजोनृपः ॥ ९ ॥
चौकोर हो शोभायमान हो
भूमिका परिवर्तन चतुर्भूनकै सम कहा पुर जिसके मध्य वखते ही ऐसी राजधानी
साहत हो परिखा (खाद ) युक्तहो ग्राम और
है। राजा पृथिवी भागका ग्रहण मजा-राजा वनावै ॥ १४ ॥
पति प्रमाणसे करें और अपना माप-
त्तिके समय मनुके मानले करे भन्पया नही सभामध्यापयापीतडागादिपुतांतदा ।
जो राजा लोभसे प्रजाको संकर्षित अर्थात् चतुर्दिक्षुचतुरांसमार्गारामवीयकाम१५॥
प्रजासे अधिक कर लेता है वह प्रजासहित
और सभा
जिवके मध्य में हो, कूर,
हीनताको प्राप्त होता है ॥ ८॥९॥ वापी (बावडी ) तलाव इन सदा युक्त
नयादचंगुलमपिभूमे स्वनिलनम्। हो और चारों भोर दिशोंमें जिछक बार द्वार
वृत्त्यर्थंकल्पपेद्रापिय बढ़ाहस्तुजीवति ॥१०॥
हा और माग घगोचे गली जिनमें सुंदर
हों॥ १५॥
दो अगुलकी भूमिको भी कर (भाग)
के विना न छो? अथवा अपनी भाजी-दृढमुरालपमउपांयशालाविराजिताम् ।
विकाके अर्थ भागका ग्रहण करे, क्यों. कल्पयित्वावसेत्तनसुगुतःसप्रजोनमः ॥१६ ॥
कि इवनेकर करका ग्रहण करेगा तबतकही घट देवस्थान, मठ, धर्मशाला वनडे
जोगा ॥१०॥
शोभित ऐसी पूक्तिराजधानीको रचकर
गुणीतावदेववाविरजेच्चप्सदेवदि । गम होकर प्रजासहित राजा उसमे बार॥
आरामाय रहायशद यादृष्ट, कुटुबिनम् ॥
राजगृहंसभामध्यंगवाश्वगजशास्टिकम् ।
गुणयान् राजा देवनाकि मंदिर धगीचे के मास्तवापीकूपादिजलयंत्रःमुशोभितम् १७॥
निमित्त और फुटुंवारे मनुष्यको देखकर
सभा जिसके माध्यम हो, गो, मल,
गृहके निमित्त प्रधीको देदे ॥४॥
दग्नी इनकी शाला निमें दो और उतन
यापसी कर आदि जपत्रांस शोभित राजा
नानाक्षरताकाणेपशुपक्षिगणावृते । गृहको पनाये ॥१॥
सुदायान्यवरगाठ सदा १२॥
ततिःस्यात्समभुजंदास गौचमुदसतम्।
आगनगमाननास्तामोशे। गलांविनानकमुनंतयात्राकन 16
मुग्म्य समादेशगजवानीप्रफपयत् ॥ १३ ॥
१.] भापाटीकासहित । (१९/ और उत्तम येत्रोंसे संयुक्त प्राकार ( परकोटा ) धर्माधिकरणंशिल्पशालांकुर्यादुदगृहात् । बनाये ॥१९॥ पंचमांशाधिकोच्छायाभित्तिर्विस्तारतोगृहे २७ सनिकक्षचतुरचतुर्दिक्षुमुशोभनम् । धर्माधिकार ( कचहरी) शिल्पशाला इन्हे दियारात्रीसशस्त्रास्त्रैःप्रतिकक्षासुगोपितम् ॥ गृहसे उत्तरदिशाम बनावे, गृहके भागसे पंचम चतुर्भिःपंचभिःपाईयामिक परिवर्तकः । भाग ऊची भित्ति ( दिवाल ) बनाये ॥२७॥ नानागृहोपकार्यादृसंयुतंकल्पयेत्सदा॥२१॥ कोष्ठविस्तारपष्ठांशस्थूलासाचप्रकीर्तिता । तीन कक्षा ( श्रेणी) से युक्त चारो दिशा- एकभूमेरिदमानमूर्ध्वमू+समंततः २८ ॥ मोसे चार शोभायमान द्वार हो, रात्रि दिन कोष्टके विस्तारसे पष्ठांश (छठा-भाग) शस्त्र और अस्त्रोंसे संपूर्ण कक्षाओं में गुप्त हो ॥ २०॥ चार पांच छै परिवत्तक (चौकीदार स्थूल भित्ति कही है। यह प्रमाण एक भूमि प्रहरर में घूमनेवाले हों जिसमें और नाना (एफ मजले) स्यानका है इसके आगे इसी प्रकारको सामग्रीसहित महाअटारी संयुक्त प्रकार वृद्धि कही है ॥२८॥ गृहको धानावे ॥२२॥ स्तंभश्चभित्तिभिर्वापिपृयकोष्टानिसन्यसेत् । ''वस्त्रादिमार्जनाथचस्तानार्यपजनार्थकम् । त्रिकोष्ठपंचकोष्ठवासप्तकोष्ठगृहस्मृतम् २९ भोजनार्थचपाकार्यपूर्वस्यांकल्पयेद्गृहान् ॥ स्तभ और भित्तियोके पृथक २ कोठे बनावे वखी धोना स्नान, पूजन,भोजनऔर पाकके तीन पांच अपया लात हैं कोठे जिसमें ऐसा अर्य पूर्वदिशाम घर बनावे ॥२२॥ गृह कहा है ॥२९॥ निद्रायंचविहारार्यपानायरोदनार्यकम् । द्वारार्थ मष्टयाभक्तारस्यांशौतुमध्यमी। धान्याद्यवाहार्यदासीदासायमेवच २३ ॥ दाज्ञेयोचतुर्दिक्षुवनपुत्रप्रदौनृणाम् ३० ॥ उत्समायगृहाकुपादाक्षगस्पामनुक्रमात् । द्वारके वास्ते आठ भाग घरके करे और गोमृगोगाजाद्यर्यगृहान्प्रत्यप्रकल्पयेत् २४ द्वारके भाग मध्यम हों चारी दिशाओमेद्वारके शयन, क्रीडाके, पीनेके, रोनेके अनके अर्थ दो दोधन पुत्रके दाता है॥३०॥ घरह (जात) के दासीके दासके और मळम् तत्रैवकल्पयेद्वारनान्ययातुकदाचन । के त्यागके अये दलिगदिशामें गृहबनाये और वातायनपृथकोष्ठकुर्याद्याहक्सुखावहम् ॥३१॥ मो, मृग, ऊट, हस्ती इनके अये पश्चिममें गृह उन्ही मध्यभागांमेद्वार बनावे अन्यथा कदापि बनावे ॥ २३ ॥२५॥ न वनावे सुब कोठों जैसे सुखके दाता हो इस स्थराज्यस्त्रशस्त्रार्यव्यायामायामिकार्यकम् । प्रकार पृयवातायन(झरोखे)ग्नापै ॥३१॥ वस्त्रानुद्रव्यायविद्याभ्यासायमेश्च २५ अन्यगृहद्वाराविंदगृहदारं न चिंतयेत् । उदग्गृहान्प्रतिमुगुप्तान्सुमनोहरान् । वृक्षकोणस्तंभमार्गपीटकूपैश्चधितम्३२ ॥ ययासुसानिवाकुर्यादगृहाण्येतानिनृपः २६ इतर गृहोके द्वार और वृक्ष कोण स्तंभ रथा अन्य अत्र, शख, व्यायाम (कसरत) मार्ग चौतय कूप इनसे बिन्धा अर्थात् दनके आयाम(घूमना), वनद्रव्य विद्याके अभ्यासके सामने गृहका दार न बनाये ॥३२॥ अर्थ उत्तरदिशामे गृहाकी रचना करावे भयवा प्रासादमंडपट्टारेमार्गधोनविद्यते । अपने सुखके अनुसार राजा, पूर्वोक्त गृहोंको यनावे ।। २५ ॥२६॥ गृहपीठचतुर्याशमुद्रायस्पप्रकल्पयेत्॥३३॥ .
विस्तारसे पक्षमभाग टंचाई मष्य कोठारी
(२०)
शुक्रनीति।
[ अध्याय-
मन्दिर और मण्डपके द्वारमै मार्गका वेध नातिसमापिप्राकाराह्यगाधसलिलागुभा ।
नही है गृहपीठके चतुथाशका जिस मण्डपका
युद्धसाधनसंभारैः सुयुद्धकुशलैविना ४० ॥
प्रमाण हो ॥ ३३ ॥
नहीं है अत्यन्त समाप प्राकार जिसके औ
प्रासादानांमंडपानामार्शवापरेजगुः ।
अगाध है जल जिसमें सी परिखा हो औ
परवातायनैर्विद्धनापिकातायंनस्मृतम् ॥३४॥ युद्धको सामग्री और युद्ध करने में कुशल पुरुष
कोई ऋषि प्रासाद और मंडपका अर्द्धभागके के विना दुर्ग श्रेष्ठ नहीं ॥१०॥
प्रमाणसे द्वारको कहते हैं दुसरेकै गवाक्षानश्रयसेदुर्गवासोराज्ञः स्याइंधनाय सः।
(झरोखे ) से बिधा गवाक्ष न हो।। ३४॥
राज्ञाराजसभाकार्या सुगुप्तासुमनोरमा४१॥
विस्ताराधीशमूलोच्चाच्छर्दिः खर्परसंभवा ।
पूर्वोक्त दुर्ग ( किला ) राजाका कल्याण
पतिततुजलंतस्यांसुखंगच्छतिवाप्यधः॥ ३५॥ कारी नही प्रत्युत बन्धनका हेतु है और ग
विस्तारके भागले अद्ध है मृलोञ्चभागसी राजसभा बनावे जो अत्यन्त गुप्त औ
जिसका पेसी खपरीकी छाज बनावै जिसमें मनोहर हो ॥ ४ ॥
गिरा जल सुखसे नीचे गिरे ॥ ३५॥
त्रिकोष्ठःपञ्चकोष्ठसप्तकोष्ठःसुविस्तृता
दानानिम्नादिनस्यात्ताहकोष्टस्यविस्तरः । दक्षिणादक्तथादीर्घामाक्मत्यादिगुणाथना ।
स्वाच्छायस्यार्धमूलोवाप्राकारः सममूलक:३६
जो सभा तीन, पांच, सात कोप्टोखे सुवि
जैसा कोष्ठका विस्तार हो उसस हीन और पूर्व पश्चिम द्विगुण हो ॥ ४२ ॥
स्तृत हो और दक्षिण उत्तर लम्ची अपव
नीचा न हो अथवा अपनी टंचाईसे आधा हो
अपवा सम हो विस्तार जिसका ऐसा प्राकार
त्रिगुणावायथाकाममेकभूमिर्टिभूमिका ।
(परकोटा) हो ॥ ३६॥
विभूमिकावाकर्तव्यासोपकार्याशिरोगहा ।।
तृतीयांशकमूलोवापन्छायाप्रविस्तरः। अथवा अपनी इच्छामनुखार त्रिगुणाई
उच्छ्रितस्तुतयाकार्योदस्युभिर्नविलंध्यते ३७॥
और एक माली अथवा द्विमसली अपर
विमलली हो और जिसके ऊपरका ग
तृतीय भाग हे मूट जिसका ऐसा ऊँचाई सम्पूर्ण युद्ध आदिको सामग्रीसहित हो॥"
माधा विस्तार हो और ऊंचा ऐठा हो नो परितः प्रतिकोष्ठेतृवातायनविराजिता ।
चोरोनलंघाजाप ॥ ॥३७॥
यामिकरक्षितोनित्यनालिकाश्चसंयुतः ।
पार्श्वकोष्ठाद्विगुणोमध्यकोष्टस्यविस्तरः ।।
सुबहुदृढगुल्मश्वसुगवाक्षमणालिकः॥३८॥
चारों ओर प्रति कोष्टमे गयासि विराजमान
चौकीदारो नित्य रदिति नालिकालो विस्तार हो ॥४४॥
हो और पाच कोटेसे माय कोडेका द्विगुण
गुल्म और गयादीको प्रणाली जिसमें सीपञ्चमांशाधिकवींचमध्यकोष्टस्यविस्तरात् ।
पर बनाये ॥३८॥
विस्तोरणसमत्वाचपञ्चमांशाधिकंनुवा ४५॥
स्वदीनप्रतिमाकारोहासमीपमहीवरः।
पौरसाचततः कार्यारवाताद्विगुणविस्तर ॥ दो भयया विस्तारके समान उंची ही सही
परमोटेदीन मति मापार पसाहो जिसके
सभा राजा पनाये ॥५॥
मनीष पर्यंत न दो और पान टिगुणित कोष्टकानांचभूमिवादिर्वातप्रकारयेत् ।
दिनानियाऐसी परिण हो।। ३९॥ द्विमिपाकोटेमध्यमत्वकभामकम् ॥४६॥
भापाटीकासहित । कोठेकी छत पृथ्वीको हो अथवा खपरैल प्रिकृत्यनुप्रकृतयोह्याधिकारिंगणस्ततः । हो पावके कोठे दुमक्षले और मध्यका सनाधिपाःपदातीनांगणः सादिगणस्ततः५३।। प्ट (कमरा) इकमन्जला हो ॥ ४६॥ यस्तंभांतसकोष्ठाचतुर्मार्गागमाशुभा। प्रकृति ('दिवान आदि) अनुप्रकृति (उत्तम सेवक) फिर अधिकारियोंके गण फिर सेनाके लोलपातियत्रैश्चयुतासुस्वरयंत्रकैः ॥४७॥ अधिपति, फिर पदाति (सिपाही , फिर पृथक् २हें स्तम्भ जिनमें ऐसे उत्तम कोष्ठ सवार इस क्रमसे गृह बनावें ॥ ५३ ।। वारो भागों में जिसके दरवाजे हो और फुवारे साश्वश्चतगजश्चापिगजपालगणस्ततः । और चाजो सुशोभित हो ॥१७॥ वृहन्नाल्लिकयंत्राणिततः स्वतुरगीगणः॥५४॥ तप्रेग्कयंत्रैश्यौः कालप्रबोधकैः । सवार, हाथीवान, हस्तीके रक्षकोंका प्रतिष्ठिताचस्वादशैस्तयाचप्रतिरूपकः ॥४८॥ समूह, और बड़े नालियोंका यन्त्र और उसके अनन्तर घोडियोंके समूह ॥ ५४ ।। वायुके प्रेरक और समयके बोधक यन्त्रोस। और उत्तम २ आदर्श (सीसे) और प्रतिरूपततःस्वगोपकगणो ह्यारण्यकगणस्ततः । ( तसवीर ) इनसे शोभित हो ॥४८॥ क्रमादेपांगृहाणिस्युः शोभनानिपुरेसदा ५५॥ एवविधाराजसभामंत्रार्याकार्यदर्शने । इसके अनन्तर गोपालोंके गण फिर चन- तथाविधामात्यलंख्यसभ्याधिकृतशालिका ४९ वासी (भिल्ल) आदिकोंके गण इस प्रमसे शोभायमान इनके घर पुरमें सदा बनाया। गिसी राजसभा कार्यके देखने और मन्त्रके अय हो और ऐसाही मन्धी (सेवक) और सभा- पांयशालाततः कार्यासुगुप्तासुजलाशया । कि अधिकारियोंकी हो ॥ ४९ ।। सजातीयगृहाणाहिसमुदायेनपंक्तितः॥५६॥ कतव्याचपृथक्त्वतास्तदर्थाश्चपृथक्पृथक् । फिर पांयशाला सुगुप्त और जलाशय(कूप) शतहस्तमितांभामत्यक्त्वाराजगृहात्सदा५०॥ आदि सुन्दर है जिसमे ऐसी बनाव और फिर सजातीय गृहक समुदाय ( मुहल्ले) इन राजसभा आदिको पृथकू २ कर इनके पृथक २ यनावे ॥५६ ॥ कार्य भी पृथक २ हो और राजाके घरमै शतहस्त भूमिको छोडकर पूर्वोक्त सभाओंको निवेशनपुरेमामेमागुदमुखमेववा । बनावे ॥५०॥ सजातिपण्यानवहरापणेपण्यवेशनम् ॥५७।। टदग्विशतहस्तांप्राक्सेनासवेशनार्थिकाम् । पुर और ग्राममें पूर्व और उत्तराभिमुख आराद्राजगृहस्यैवप्रजानांनिलयानिच ॥५१॥ स्थान बनावै और आपण (पाजार) में सजा- पूर्व अथवा उत्तर दिशामें दोसौ २०० हाथ तियोंकी पृथकू दुकान बनाये ॥५७ ॥ गृहके अन्तरसे सेनानिवास, और राजा धनिकादिक्रमेणेवरानमार्गस्यपार्श्वयोः । घरके समीप प्रजाके स्थान यन यावे ॥५१॥ एवंहिपत्तनं कुर्यादामंचैवनराधिपः ॥ ५८॥ . मवनश्रेष्ठजात्यानुक्रमतश्चमदात्रुकः। धनिक आदिके क्रमसे राजमार्ग दोनों समंताचचतुदिक्षुविन्यसेञ्चततः परम् ॥२२॥ पार्बोमं पण्य (दुकाने) बनावे इस प्रकार पत्तन धनी और उत्तम जाति इनके क्रमले चारों और ग्रामको गजा बनावे ।। ५८॥ तरफ और चारों दिशाओंमें गृहोंका विन्यास गजमार्गास्तुकर्तव्याश्चतुर्दिक्षुनृपगृहात् । 'करावे ॥५॥ उत्तमोगजमार्गस्तुगिस्तमितोमवेत् ५९॥
(२२) शुक्रनीति। [ अध्याय- राजगृहसे चारों दिशाभीम राजमार्ग राजमार्गमुखानिस्युहाणिसकलान्यपि । (सड़क) बनाये और तीस हायका राज मार्ग गृहपृष्ठदासवीथिमलनिहरणस्थलम।।६६ ॥ उत्तम ॥ ५९॥ राजमार्गमे हैं दरवाजे जिनके ऐसे सम्पूर्ण मध्यमोविंशतिकरोदशपंचकरोधमः । गृह बनाव और गृहके पिछवारे मल आदि पण्यमार्गास्तथाचतेपुरयामादिपुस्थिताः६०॥ दूरकर नेकी गकी बनावै ॥ ६६ ॥ वीस हाथका मध्यम और पन्द्रद हापका पक्तिद्धयगतानांहिंगहानांकारयेतथा । राजमार्ग अधम होता है और पण्यके मार्ग भी ऐसेही पुर और ग्रामादिकोंक होते हैं ॥ ६ ॥ मार्गान्मुधारिधिटितान्पतिवत्सरम्।।६७॥ करत्रयात्मिकापद्यावथि:पंचकरात्मिका । दोनों पक्तियोंम विद्यमान गृहोके मार्ग ऐसे मार्गोदशकर मोक्तोग्रामेपुनगरपुच ॥६१ ॥ प्रतिवर्ष वनावे जो चूना शर्करा ( कंकर)* तीन हाथको पद्या और पांच हायको बीपि दिसे कूटा हो ॥ ६॥ और दश हायका मागे ग्राम और नगरों में अभियुक्तनिरुदेवीकुर्यात्याम्यजनैर्नृपः । कहा है॥ ६ ॥ ग्रामद्रयांतरेचैवपांयशालामकल्पयेत् ॥६८६ प्राक्पश्चादक्षिणोदक्तान्याममध्यात्प्रकल्प- अभियुक्त ( मजूर ) निरुद्ध (कैदी) २ येत् ॥ ग्रामीणोसे मार्गको बनवाये और ग्रामो मार पुरंदृष्ट्वाराजमार्गान्सुवहून्कल्पयेन्नृप ६२॥ में पाठशाला बना॥ ६८॥ पूर्यसे पश्चिम और दक्षिणसे उत्तर ग्रामके नित्यसमार्जितांचैवग्रामपैश्चमुगोपिताम् । मध्यसे राजमार्गआदिको रचे और उन्हें पुरके तत्रागतंतुसंपृच्छेत्पांयशालाधिपैःसदा ॥६९ भनुसार यहुत बनाये।। ६२ ।। ग्रामके अधिपतियोसेपांयशालाको प्रतिदि नपीथिनुचपद्याहिराजधान्यांमकल्पयेत् । संमाजिठ(स्वच्छोरवप और उस पांयशा पद्मयोजनांतरेरण्यगजमार्गतुचोत्तमम् ॥६३॥ आपे पपिक्को उक्तशालामा अधिपति ८ तीन और पांच हायका मार्ग राजधानीम पूछे ॥ ६९ ॥ न बनाये चौबिसकोस बनके अंतरसे राज-प्रयातोसिकुतःकरमाकगन्छसितंबद । मार्ग उत्तम होता है ॥६३ ॥ ससहायोऽमहायोवाकिंदानाकिसाहनः ७० कल्पयन्मध्यममध्येनयोर्मभ्येतयाधमम् । कहांसे आयेहो और किस हेतुसे और दशहस्तात्मनित्यंग्रामग्रामेनियोजयेत् ६४॥ जाते हो और कौन सग है अथवा एकारी। और यनये. मप्प पारोस अंतरम और कौन नुम्हारे पास शख और की मापम और उनमसे भी मायममें मधम मागे तुम्हारे याद(सवारी) पदमाप यताओर मनाये और दश हायका मागं ग्राम ग्राममें कानातिफिजुलनामस्थितिः कुत्रास्तितेचिर हो॥ ६॥ फूर्मपृष्टामार्ग मात्रामाभ्यः सुसेनुका । इतिपृशालरोल्मायगनंतरयमगृह्यच ॥१ सुपीन्मार्गान्पार्थसातानिर्गमायजनस्य५६५ और कौन जाति पुरनाम और कहा मागगरी भूमि परपी पीठ समान और करो.सापाट के समय गिरें ॥ ७॥ पासीहो यह पले और उस शखो प्रा' टनम पुर निगम मी मनानी भीर जर गमनानिमिन दोनों में पाई नि मारधानमनाभस्वास्वामितिशागपेत् । पंगमार्ग बना। 'तरम्यान्गणयन्य नुम्माराहागपवायच18 भापाटीकासहित। 4 संरक्षयद्यार्मिकश्चप्रभातेतान्प्रयाधयेत् । (और पारितोषिकके देनेसे मुहूर्त व्यतीत शखंद्याचगणयेद्दारमुद्धाट्यमोचयेत् ॥७३॥ र अन्न वस्त्र सुत्रण रत्न सेना और देश गौर मावधानतासे सोवे यह शिक्षा दे इनके देखने से एक मुहूर्त व्यतीत करे ॥ ७९॥ और वहाक टिके हुर सम्पूर्ण मनुष्यों को गिन-आयव्ययेर्मुहूर्तानांचतुष्कतु येत्सदा ॥ कर और शालाके दरवाजेको लगाकर चोको स्वस्थचित्तोभोजनेनमुहूर्तससुहन्नृपः ॥ ८०॥ दारोंसे रक्षा करावे और प्रातःकाल जगवादे चार मुहूर्त भार और व्ययमें व्यतीत करे - और शयको दे और दरवाजे खोल कर प्रभात फिर मित्रासदित राजा भोजन फरिके एक छोड दे॥ ७२ ॥ ७ ॥ मुहर्त स्मस्थचित्त रहै ।। ८०॥ कुर्यात्स हायसीमांततेपांग्राम्यजनस्सदा । प्रत्यक्षीकरणाजीणनवीनानांमुहूर्तकम् । प्रकुर्यादिनकृत्यंतुराजधान्यांवसानृपः ॥७॥ ततस्तुप्राइविवाकादिवोधितव्यवहारतः।। ८१॥ और पथिक की सीमातक ग्रामका मनुष्य पुरानी और नई वस्तुओं के देखने में एक रक्षा करें और राजधानीमें बसता हुआ राजा मुहूर्त व्यतीत करें फिर एक मुहून वकी. दिनने करने योग्य काम करें ॥ ७ ॥ लांसे बोधित ( जताये ) व्यवहारले व्य- उत्यायपश्चिमेयाममुहूद्वित्येनवे । तीत करै ।। ८१॥ नियतायश्चात्य र व्ययानियत कति।।७५॥ मुहूर्तद्वितयंचवमृगयाक्रीडनैयेत् । कोशभूतस्यद्रव्यस्य व्ययःकतिगतस्तथा । व्यूहाभ्यासमुहततुमुहतसंध्ययाततः ॥ ८२ ॥ व्यवहार मुद्रितायव्ययशेषकतीविच ७६ ॥ दो मुहूत्ते मृगयाकी क्रीडासे एक मुहूर्त व्यूहाभ्यास ( कायद)से फिर एक मुहर्त्त प्रत्यक्षतोलखतश्चज्ञात्वाचाद्यव्ययःकति । संध्यासे व्यतीत करे ॥ ८ ॥] भविष्यतिचतत्तुल्यद्रव्यंकोशात्तुनिहरेत्।।७७॥ मुहूर्तभोजनेनैवीदमुहूर्तचवार्तया । राविक पश्चिमभागमें दो मुहूर्त (चार घडी) गृढचारः सावितयानिद्रयाष्टमुहूर्तकम् ॥८३॥. रात्रि से उठकर कितना आज का आय (श्राम एक मुहूर्त भोजनसे दो मुहर्त गूढचारी दुनी ) और कितना ऊपय ( खर्च) नियमित पुरुषने सुनाई हुई वात पवहारसे और और कोशमसे कितना व्यय हुआहे और व्य आठमुहूर्त निद्राग्ने व्यतीत करे ॥ ८३ ॥ वहारमें कितना रुपया भाग और फितनाव्य एवंविहरतोराज्ञःसुखमम्यक्प्रनायते । य हुआ प्रत्यक्ष और देखते यह जानकर और अहोरात्रविभन्यवंत्रिशनिस्तुमुहूर्तकः ॥८॥ आज कितना पय हागा यह निश्चय करके उतनाही द्रवप कोशनसे निकाले ॥ ७९ ॥ नयेकालंवृथानेवन मेस्त्रीमद्यसेवनैः । ॥७६ ॥७॥ यत्कालेहयुचितंक तत्कायद्रागशंकितम८५ ॥ पश्चात्तुवेगानेमोक्षस्नानमाहातकंमतम् । इस प्रकारविहार करते राजाको सुख अच्छी तरह होता है इस प्रकार तीस मुहूतने रात्रिदिः संध्यापुराणदानश्चगुहूद्वितयंनयेत् ॥ ७८ ॥का विभाग कालको व्यतीत करे स्त्री पीछेस मटका परित्याग करिके एकमुहूर्तमें और महिरादिस कालको न बितावे ओर जिस स्नान करें और दो मुहको रुध्या पुराण समय जो करनेको उचित हो उसी समय उस श्रवण और दान में बरतीत करे ॥७॥ कार्यको निःशंक होकर शीघ्रही कर ॥८॥५॥ पारितोषिकदाननमुहर्ततुनयनुधीः । कालेवृष्टिःसुपोपायद्यन्यथासुविनाशिनी । धान्यववस्वणरत्नसेनादेशावलेखनैः ॥७९॥ कार्यस्यानानितर्वाणियामिकराभितोनिशम् ८६ (२४) शुक्रनीति । [अध्याय- ममयकी वृद्धि भले प्रकार पुष्टिक अर्थ है दासभृत्येयभायर्यायांपुत्रेशिष्यपिवावाच । और अकालदृष्टि शीत्र विनाशका हेतु है सपूर्ण वाग्दंडपरुपान्नैवकार्यमदेशसंस्थितैः ॥९३ ॥ कार्यस्यानो को चारों ओरसे यामिक (चौकीजो मनुष्य मेरे देशमें रहते है उन्हें दास दारों) से रात्रि दिन रक्षा करें ॥८६॥ भृत्य, भार्या, पुत्र, शिष्य इनके विषय कठोर नयवान्नातिनतिवित्सिद्दशस्त्रादिवरैः । वचनका दड नहीं देना अर्यात् कठोरसचन चतुभि:पंचभिर्वापिपभिर्वागोपयेत्सदा ॥८७॥ नही कहना ॥ ९३ ॥ न्याय, नीति, नति इनका ज्ञाता सिद्ध तुलाशामनमानानांनाणकस्यापिवाकचित् । (जात) है शस्त्रादि जिनमो ऐसे चार, पांच, छ निर्यासानांचवातूनांसनातीनांघृतस्यच ॥९४ यामिनि कार्यम्यानाकी रक्षा करें॥ ८७ ॥ मधुदुग्धवसादीनांपिष्टादीनांचसर्वदा । नपत्यानिनिकानि शृणुयाल्लेखकाधिपः। कूटनवतुकार्यस्यालाचलिखितंजनः ॥१५॥ दिनदिनेयामिकानांप्रकुर्यात्परिवर्तनम् ॥८८॥ तुला, आज्ञा मान, सिका, निर्यात (गोद) कार्यस्थानाम जो दैनिक है उन्हें लेखा-'धातु, सजाति, घृत, मधु, दूध, वसा, पिष्ट धिपांसे सुने और दिन में यामियोका परि (भाटा) इनके लेखकों मनुष्प वलसे मिग्या वर्तन (बदली) कर ॥ ८८ ॥ न करे॥ ९ ॥ ९५॥ गृहपंक्तिमुखेद्वारकर्तव्ययामिकामदा । उत्कोचग्रहणान्नवस्वामिकाविलोभनम् । तस्तद्वृत्तंनुशृणुयारदहस्यभूतिपोषितः ८९॥ दुर्वृत्तकारिणंचोरेजारमपिणद्विषम् ॥ ९६ ॥ गृहॉकी पक्ति मुगपर यामिक (चौकीदार) नरक्षत्वप्रकाशहितयान्यानपकारकान् । सदा द्वार पर उन्ही यामिकमि गृहोद पूनान्तमातृणापितॄणाचवज्यानांविदुपामाप ९७॥ राजा सुने और वे यामिक गृहस्प भूति (गृद म्यक पालन योग्य वेतन) से पुष्ट रहे ॥८॥ उत्कोच (वोट) के ग्रहण की स्वामी निर्गच्छातचग्रामायग्रामंप्रविशतिच । कार्यके नाशका दुराचारी और चोर और जार मोर राजाका अदपी और ढेपीहतर अपकारी तान्ममंशोभ्ययनेनमोचयेटत्सलनकान्॥९०॥ इनरी प्रत्यक्ष रक्षा कोई न करे, माता पिता जो मनुष्य ग्राममें जाय और जो ग्राममें पूज्य और विद्वान् इनका तिरस्कार कोई न प्रविट हा दन्द भरीभाति शोधन भौर चियरै ॥ ९६ ॥१७॥ समिरे छोट दे॥ ९०॥ नावमाननापहामकुयुत्मवृत्तगालिनाम् । मरयातत्तगीगनुपविमृश्यविमोचपेत् । निभेदजनयेयुनूनायोम्वामिभृत्ययोः ॥९८|| चयिवीयिपुयामानिारीपर्यटनंमदा ॥९॥ और सदाचारमे तत्काभी तिरम्भार न और प्रमिद्ध है माचरण और गोल जिनका पर और ग्री, पुरुष, म्यामी, भाय इन भेद टन्द यिनायिनारही डोदद भोर राजिम नगर पट)को कोई उत्पन्न नपर॥१८॥ पटी गरी मदारिची ॥९॥ भ्रानणागुमगन्याणानपुर्यु पितृपुषयोः । नव्यपार्मिग्याग्जानिवृत्त । । वापीकृपागमीमाधर्मशागगुगलपान् ९९ ।। गागनत्वीटगार्यगानित्यमनामुच ॥५२॥ मागनियम गयेयुहीनांगविकगंगवान् । मामि गौर और नारको निवृनिर शतंयमयपानामृगपांगवधारणम ॥१०॥ भयं गली गिगानाधारगतामा मनाम नाता, गुरु, निrय, पिता, पुष नभी दमप्रकार गिरामानी नि...॥ भदोन मोर नारी, गर, पागम, मीमा भापारीकासहित । (२५) - धर्मशाला, देवमदिर और मार्ग, हीनभगवाला वेतन शुल्क (महसूल) भागासूत, अहंकार, पुरुष, इनको कोई पीडा न दे, और द्यूत, वट, छल इनके द्वारा मनसे भी कोई अपने मद्यपान, मृगया. शम्बधारण, इन सबको स्वामीका दोहन करें ॥७॥ राजाके विना न करै ।। ९९ ॥ १०॥ आधर्षणनकुर्वतयस्यकस्यापि सर्वदा । गोगजाधोष्ट्रमहिपीनृणांवस्थावरस्यच । परिमाणोन्मानमानंधार्यराजविमुद्रितम् ॥ ८॥ रजतस्वर्णरत्नानांमादकस्यविपस्यच ॥ १॥ सम्पूर्ण काळमें किसीका भी आधर्षण ऋयंवाविक्रयवापिमद्यसंघानमेवेच २० (दवाकर दु:खित करना) न करे, परिमाण क्रयपत्रंदानपत्रमृणनिर्णयपत्रकम् ॥ २॥ उन्मान (द्रोण ) आदिमान (तोल ) इनको राजाशयाविनानैवजनः कार्यचिकित्सितम् । राजाकी मुद्रायुक्त रक्खै ॥८॥ महापापाभिशपननिधिग्रहणमेवच ॥३0 गुणसाधनसंदक्षाभवंतुनिखिलाजनाः । गौ, हस्ती, ऊट, भेल, मनुष्य, स्थावर चांदी साहसाधिकृतेदयविनिगृह्याततायिनम् ॥९॥ सोना, रत्न, मादकवस्तु, विष इनका लेनदेन गुणोंकी सिद्धि में सम्पूर्ण जन चतुर हों और मदिरा निकासना लेनेका पत्र, देनेका और अपराधीको पकडकर साहसके अधिकारी पत्र,ऋणके निर्णयका पत्र, चिकित्सा (इलाज)/(फौजदारीके हाकिम) को सौंपदे ॥९॥ महापापका अभिशपन अर्थात् महापापका दोष उत्सृष्टावृपभाद्यायैस्तैस्तेधार्याःसुयंत्रिताः । लगाना, निधि( खजाना)का ग्रहण इतने कार्य इतिमच्छासनं श्रुत्वायेऽन्ययावर्तयन्तितान् ॥ राजाकी आज्ञाके विना कोर्टभी मनुष्य न करे ।। १॥२॥३॥ विनेष्यामिचदंडेनमहतापापकारकान् । नवसमाजीनयमनिर्णयजातिपणम् । इतिप्रवोधयेन्नित्यं प्रजाःशासनडिडिमः ११ अस्वामिनाटिकवनसंग्रहमंत्रभेदनम् ॥ ४॥ जिन पुरुषोने वृषभ आदि छोडे है वेही उनको वडे यत्नसे रक्ख, इस मेरी आज्ञाको नये समाजका नियम, निर्णय, जातिका दोप, जिसका कोई स्वामी न हो उस वस्तुका म महान् दण्डसे शिक्षा दूंगा यह नियर्डिन्टिम सुनकर जो अन्यथा वर्तगे, उन पापियोंको ग्रहण, और मंत्र सलाह इनका भेद कोई (ढंढोरा) से राजा प्रबोधित करावै ॥ १०॥११ न करें ॥४॥ लिखित्वाशासनराजाधारयतिचतुष्पथे। नृपदुर्गुणलोपतुनैवकुर्युःकदाचन । स्वमहानिमनृतपरदाराभिमर्शनम् ॥५॥ सदाचोद्यतदंडःस्यादसाधुपुचशत्रुषु ॥ १२ ॥ राजाके दुगणोका लोप कोई पुरुष कदाचित, अपनी आज्ञाको लिगकर राजा चतुष्पय भी न करे, अपने धर्मका त्याग सत्य भाषण (चौराहा ) मे रख दे और असाधु शत्रु इनमें अन्यस्त्रीका संगकोई न करें 1.॥ दण्डको सदा उद्यत रक्खे ॥ १२ ॥ कूटसाक्ष्यफूटलेख्यमप्रकाशपतिग्रहम् । प्रजानांपालनकार्यनीतिपूर्वनृपेणहि । निर्धारितकराधिक्यस्तैयसाहसमेवच ॥ ६॥ मार्गसंरक्षणंफुर्यान्नृपःपायसुखायच १३ ॥ झूठी साशी,झठालेख, मुन प्रतिग्रह निय-- रानाप्रजाका पालन नीति कर और .मित फरसे अधिक कर, चोरी, साहस, इन्हें पथिकोंके सुख के निमित्त मार्गको सदा रक्षा कोई न करे ॥ ६ ॥ कर॥ १३ ॥ मनसापिनकुर्वस्वामिद्राइतयैवय । पाथमपीडकार्ययेहतन्यास्तेप्रयत्नतः । भृत्याशुल्केनभागेनबादर्परलाच्छलात७॥ विभिांगेलंघायैदानमर्धागकनच ॥ ११ ॥ .
(२६) शुक्रनीति [अध्याय- - पधिकांक जो२ पोडाकारक है तिनको, प्राणोंके भयको त्याग और निःशंकहोकर यानसे मारे और तीन भागांसे सेनाको धारण जो युद्ध करै वही शूर है पक्षरातको छोडकर करे और आधेभागडे दानको धारे ॥ १४॥ पालक्कभी उत्तम कथनको ग्रहण कर और अशिनप्रकृतपोव शेनाविकारिणः । धर्मके तत्त्वका निश्चय कर और निशंक हो. अधाशनात्मभोगश्चकोगोशनसरक्ष्यते १५ ॥ है वहीं पंडित है ॥२०॥ २१ ॥ कर राजाके प्रत्यक्ष राजाकभी अपगुमोको जो भाधेभागले प्रकृति ( दिवान आदि) माधे सवक्तागुणतुल्यांस्तानप्रस्तातिकदाचन । भागले अधिकार (दरवार) आवेभागसे भ- पना भोग, चौथैभागसे कोश (खजाना) इस अदययस्यनवास्तिभायापुत्रादिकंधनम् २२॥ मकार भागसि अपने द्रष्यको भुगतावे ॥१॥, वही वक्ता है जो गुणोके तुल्य यथार्थ स्तु. आयस्पपविभागव्ययं कुर्यात्वत्सरे । ति करें और अधिक न करै और भाची पुत्र, धन यादिमें जिसको अदेय न हो बदी राजा सामंतादिपुवाँयनन्यूनस्पकदाचन ॥१६॥ ६ ॥ २२ ॥ इस प्रकार आय (आमदनी) का वर्षभरम आत्मानमपिसंदत्तेपानेदातासरच्यते । व्यय (रा) को यह मामन्त (मन्त्री) आदि अगंक्तिक्षमोयेनकार्यकर्तुवलहितत् ॥ २३॥ का धर्म है न्यूनका नही ।। १६ ।। राज्यस्ययातःकतिर्धनस्पचगुणस्यच । जो सुपात्रको अपने मात्माकोभी दे दे वही दाता है और जिससे नि.शक होकर कार्यको प्राप्तस्परक्षणेन्पम्पहरणेचोधमोपिच॥१७ ॥ करे वही यल है ॥२३॥ राज्य, यश, पीतिधन, गुग, आदि मामाकी किंकराइवयेनान्येनृपाद्याःस पराक्रमः । रक्षामन्यास अर्थात् व्याज भादिसे यढाना भीर हरण भाव इतर राज्य मादिरे छीनतम युद्धानुकृलन्यापारउत्थानतिकीर्तितम् ।। यत्न करे॥१७॥ जिस इतर राजा किपरक समान हो संरक्षणेसंदरणेममयत्नोभवेत्सदा । 'जाय वही पराक्रम है और युद्धरा संपादक जो व्यापार उसे उत्थान रहते ६ ॥४॥ शायररित्यहनदत्यनत्यनेकचित् १८॥ भटीमार रक्षा और दरणमें अच्छे प्रका-विषदोपभयादन्नावमृश्यकपिऊकुटः । रसे परन पर। शूरता,पाटिरप, वक्तृतादावता हमाःस्वलंतिकृजतिभृगानृत्यतिमायुराः ।। इनपोक्दामिन स्यांग ॥ १८॥ विसतिरकुटोमत्तानोंचौवरेचतेकपिः । घरपगरमीनत्यमुन्यानचापिभूमिपः । शोमाभरभ्रः मानिकाचमततया॥२६॥ समितीस्वात्मागास्वाभिकार्यनयवच १९॥ -
भाषाटीकासाहित ।
(२७)
दृष्ट्वसविपंचानंतस्मादोश्यपरीक्षयेत् ।
मृगयामें ये गुण है परन्तु हिंसा दोष
महान है प्रजा और अधिकारी इनका मनोरथ
मुंजीतषसनित्यनादिविरससंकुलम ॥ २७ ॥
और चेष्टा गुप्तचारोंखे सुने ।। ३३ ॥
इस प्रकार विप सहित अन्नको देखकर प्रकृतीनांचशत्रूणांसैनिकानांमतंचयत् ।
पश्चादोजनके योग्यकी परीक्षा करे अर्थात् छै
रसहजिसमें उसे भक्षण करे और दो अथवा
सभ्यानांवांधवानांचस्त्रीणामतःपुरेचयत्॥
तीन रस जिसमें हो उसे भक्षण न करे। २७॥ शृणुयाद्गूढचारेभ्योनिशिचात्यायकसदा।
होनातिरिक्तंनकटुमधुरक्षारसंकुलम् ।
सावधानमनाःसिद्धशस्त्रास्त्रःसंल्लिखेञ्चतत् ॥
आवेदयतियत्कार्यशृणुयान्मतिभिःसह २८॥
प्रजा, शत्रु, सेनाकै मनुष्य और सभासद,
न्यून और अधिक है, कटु, मधुर, खार बन्धु, अन्तःपुर, स्त्री, इनका आचरण नित्य
जिसमें उसे भक्षण न करें, जो कोई मनुष्यका-
पिछली त्रिको विचरनेहारे गूढचारियोसे
यको निवेदन कर उसे मंत्रियों सहित राजा सुने और सावधानताखे शस्त्रअस्त्रको धारण
सुनै ॥२८॥
करिके उसे लिखे ॥ ३४ ॥ ३५॥
आरामादौप्रकृतिभिः स्त्रीभिश्चनटगायकैः । असत्यवादिनंगूढचारनैवैचशास्तियःः ।
विहरेत्सावधानस्तुमागधेरेंद्रजालिकैः॥२९॥
र पोग्लन्छइत्युक्त प्रजाप्राणधनापह ॥
प्रजा, खी, नट, गानेवाले, भाट, इन्द्रजाली
झूठेगुप्तचारीको जो राजा शिक्षा नहीं देना
इनके संग सावधान होकर आराम (बगीचा) वह राजा प्रजाके प्राण और धनका अपहारी
आदिमें विहार करे ॥२९॥
म्टेच्छ है॥३६॥
गजाश्वरथयानंतुमातः सायंसदाभ्यसेत् । वर्णीतपस्वीसंन्यासीनीचसिद्धस्वरूपिणम् ।
व्यूहाभ्यासंसैनिकानांस्वयंशिक्षेच्चशिक्षयेत्३० प्रत्यक्षेणच्छलेनैवगूढचारविंशोधयेत्॥३७॥
(प्रात:काल और सन्ध्यासमय, हरित, ब्रह्मचारी, तपस्वी, सन्यासी, नीच लिगमें
मध, रथ इनके यानका अभ्यास करें और है रूप जिसके ऐसे गूढचारीको प्रत्यक्ष अथवा
सेनाकै मनुर्योको प्यूह ( कवायद ) अभ्याउ
छलसे शोधै अर्थात् पहचाने ।। ३७॥
करावे और आप भी कर ॥ ३० ॥ विनातन्छोधनात्तत्वनजानातिचनाप्यते ।
घ्याघ्रादिभिर्वनचरैर्मयूराद्यैश्चपक्षिभिः । अशोधकनृपान्नैवविभ्यस्यनृतवादने ॥३८॥
क्रीडयेन्मृगयांकृय दुष्टसायानिमालयन् ।। गूढचारीके शोधे दिना राजाको नका
सिंह आदि पनचर और मयूर आदि पक्षी ज्ञान और प्राप्ति नहीं होती और जो राजा
इनके सङ्ग क्रीडा भौर मृगया करें और दुष्ट इनका शोधन नहीं करता उससे गृह बोलने
जीवोंको न करे ।। ३१ ॥
में वे नहीं हारते ॥ ३८।।
शयिप्रवर्धतेनित्यंलक्ष्यसंधानमेवच । प्रकृतिभ्योधिकृतभ्यो गृहचारमुरक्षयेत् ।
अकातरवंशसास्त्रशीघ्रपातनकारिता ॥३२॥ सदैकनायकंराज्यफुर्यानयहुनायकम् ॥३९॥
शूरताकी वृद्धि और लक्ष्य (निशाने )फा प्रकृति और अधिकारी इनसे गृढचारीकी
सन्धान,अकातरता शस्त्रास्त्रका शीघ्र चल्लाना रक्षा करे और राज्यका स्वामी एकदी कर
ये मृगयार होते हैं।। ३३॥
मृगयायांगुणाएतहिंसादोपोमहत्तरः । नानायकंवचिदपिक मी तभूमिः ।
इंगितंचेष्टितंयत्नात्प्रजानामाधिकारिणाम् ॥ राजकूलेतुबहवः पुरुषादिसतिहि ॥ ४० ॥
बहुत नही ॥ ३९॥
(२८) शुक्रनीति। [अध्याय- I .. तेपुज्येष्टोभवेद्राजाशेपास्तकार्यसाधकाः। विंधुओंको चारो ओर नियत करै अथवा चारों गरीयांसोवरासर्वसहायेभ्योभिवृद्धये ॥४१ ।। दिशाओं में देश के अधिपति कर ॥ ४६॥ राजा किसी स्थानकी भी अनायक (स्वा-गोगनाश्वोष्ट्रकोशानामविपत्येनियोजयेत् । मीरहित ) करनेकी चेष्टा न करें यदि राजाकै मातामातृसमायाचसानियोज्यामहासने ॥ कुरमे बहुत पुरुष होय तो उनमें ज्येष्ठ राजा गी, हस्ति, अश्व, उ, कोश ( खजाना) होता है शेष उसके कार्यसाधकहोते है राजाको इनके अधिपति करें माता और माताकै वृद्धिके अर्थ और बन्धु इतर सहाय जो तुल्य है उसे सिंहासन पर नियुक्त अष्ट है।॥ ४०॥४॥ करै ।। ४७ ॥ ज्येष्ठोपिबधिरःकुष्टीमूकाँध:पंढएवयः । सेनाधिकासंयोग्यावाधवा-श्यालकाःसदा । सगज्याभिवेनैवभ्रातातपुत्रएवहि॥४२॥ स्वदोपदर्शकाः कार्यागुरवःसुहृदश्चये ॥४८॥ यदि ज्येष्ठ भ्राताभी बधिर, कुष्टी, मूक अन्ध। सेनाके अधिकारमं वधु और शालों नपुंसक होय तो वह राज्यके योग्य नहीं होता को नियुक पर अपने दोपो दिखानेमें गुरु भ्राता अथवा उसका पुत्र राज्यका अधिकारी अथवा मित्रीको नियुक्त कर ।। ४८ ॥ होता है ॥ १२॥ 'वस्त्रालंकारपात्राणांत्रियोयोज्या सुदशन । स्वकनिष्टोपिज्येष्ठस्यभ्रातुःपुत्रस्तु राज्यभाका स्वयंसनुविमृशेत्पर्यायेणचमुद्रयेत् ॥ ४९ ।। दायादानामफमत्यं राज्ञःश्रेयस्करपरम्॥४३॥ वव, आभूषण, पाव। इनके भली प्रकार अपना रनिष्टज्येष्ठ भ्राता अथवा भ्राताका दिखनमे नियोको नियुक्त कर और संपूर्णको पुत्र राज्यका अधिकारी होता है और दायाद करा ४९॥ आप विचार और राजमुद्रास अक्ति मशभागिनियों की एक मति राज्यके परम कल्याणको करती है॥४३॥ अन्तर्वेश्मनिरात्रावादिवारण्येविशोधिते । पृथग्भावोविनागायराज्यस्यचकुलस्पच । मन्त्रयेन्मात्रीभिःसाभाविकृत्यनुनिर्जने । गृहक भीतर अथवा वनमे दिनके अतःस्वभोगसदृशान्दायादान्कारयेन्नृपः ॥ 'समय एकान्तम मंत्रियोंके मग भाविकार्यको मंशमागियोका जो भाग विचारे ।। ७० ॥ वह राज्य और पुळके विनाशका हेतु है इससे मुहादातृभिःमार्धसभायांपुत्रवांधवः । राजा दिम्सेदारोगे अपने भागः सदृश राजकृत्यंसनपश्चसभ्यायश्चितयेत्सदा ।। पर॥४॥ राज्यविभजनान्योनभूपानांभवत्व ।। मित्र,भ्राता, पुका चन्धु, मेनार अधिर, सभा सद इनके मंग राजाल्पका सदा चिन्तन अन्पीकृविभागनराज्यंगजिवृक्षति ४५॥ ॥२॥ राज्य के विभागसे राजाओगे फ्ल्याण मभायाप्रत्यगर्धस्यमध्यगनासनस्मृतम् । नहीं होता क्योंकि विभागमे गन्पहमालसंस्थापामसंस्थापिंगयु-पार्श्वकोष्ठगाः ।। गायो शत्रु ग्रहण करनेकी इन करता सभाम पश्चिमदिशा मध्य भागम राजाका गपतृोगटानेनस्थापयेत्तान्ममंतनः । भासन रहा है और पास के बटन हार दक्षिण मयमा वामभागमे ॥५॥ चतुरियरादेगाधिपातुर्यारमदानृपः ।। पुत्रापात्राभ्रानाश्रभागिनेया स्वपृष्ठतः । अनुभागगे देकर कनिष्ठ दावामभागानुवाममंम्या क्रमादिम ।। प्रयक ॥४॥ गाना
२.]
भापार्टीकासहित ।
(२९)
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पुत्र, पौत्र, भ्राता, भानजे, ये अपने पृष्ठ ग्रहण करके दो मनुप्य राजाकै दोनो पावों
भागमें बैठे, दौहित्र (पुत्रीपुत्र ) दक्षिणभाग में बैठे ॥ ५९॥
सेवामभागमे क्रमसे बैठे॥५३॥ विशिष्टचिद्युअाज भासनेप्रविशत्सुखम् ।
पितृव्याः स्वकुलश्रेष्ठाः सभ्या: सेनाविपा- सुभपणासुकवच सुवस्त्रोमुकुटान्वितः६०॥
स्तथा ॥
अष्ट चिहवाला राजा अच्छे भूपण और
स्वादक्षिणभागेतुमाक्संस्याः पृथगासनाः ॥ श्रेष्ट कवच और श्रेष्ठ मुकुट इनको धारण
पितृव्य (चाचा ताऊ) अपने कुल श्रेष्ठ करके सुन्दर आसनपर सुखले बैठे ।। ६० ॥
सभासद, सेनाके अधिप ये अपने आगे दक्षिण सिद्धानाननशस्वस्मन्सावधानमनाःसदा ।
भागमें पूर्वदिशाम चैठे ॥५४॥ सर्वस्मादधिकोदाताशूरस्त्वंधार्मिकोह्यसि ॥
मातामहकुलश्रेष्ठामन्त्रिपोवांधवास्तथा ।
सिद्ध है अस्त्र जिसको ऐसा राजा नग्न
श्वशुराश्चैवश्यालाश्चवामाग्रेचाधिकारिण:५४॥ शत्रको ग्रहण करके सदा सावधानमन रहे
मातामदके कुल के श्रेष्ठ, मन्त्री, बन्धु, -और आप सबसे अधिक दावा, शूर और
शुर, पाल ये वामभागमें अग्रभागके अधि धार्मिक हो इस वाणीको न सुने॥ ६१॥
कारी है ॥ ५५॥
इतिवाच शृणुयाच्छावकावंचकारतुये।
वामदक्षिणपार्श्वस्यौजामाताभागनीपतिः ।
रागालाभाद्भयाद्राज्ञः स्युर्मूकाइवमैत्रिणः ।।
स्वसदृशःसमीपवास्वाधीसनगतःसुहृत् ॥
और जो पूर्वोक्त वाणीके सुनानेवाले हैं
वाम और दक्षिण पार्श्वमें जमाई, और भनोई और जो ठग है और जो राजाके मंत्री क्सिी
बैठे और अपने तुल्य मित्र अपने समीपमे वा की प्रीति, राग लोभले मूक हो जाय अर्थात
अपने माधे मासमपर बै॥ ५६ ॥ यथार्थ न्यायमै सम्मति न दें उन्हें राजा अपने
दौहित्रभागिनेयानांस्थानेस्युर्दत्तकादयः ।
अनुमत न जाने ॥ ६॥
भागिनेयाश्चदौहित्राः पुत्रादिस्थानसंश्रिताः ॥ नताननुमतान्विद्यान्नृपतिः स्वार्थसिद्धये ।
दौहिब, भानजे उनके स्थानमे दत्तकादि पृक्पृथक्ष्मततेपालेखयित्वाससाधनम् ॥
पुन बैठे और भालजे और दौहित्र पुत्र आदिधे अपने कार्यको सिद्धि के निमित्त पूर्वोक्तोंको
'स्थानमे ॥ ५७१
अनुमत नहीं समझे किंतु उनका मत युक्तिस-
यथापितातयाचार्य-समश्रेष्ठासनेस्थितः।
हित पृथक् २ लिखकर भाप विचार ॥ ६॥
पार्धयोरग्रतः सबैलेखकामंत्रिपृष्ठगाया विमृशेत्स्वमतेनैवयत्कुर्याद्वसम्मतम् ।
पिताके समान गुरु होता है इससे पिताके गजाश्वरथपश्चादीन्भृत्यान्दासांस्तथैवच ॥
समान श्रेष्ठ मासनपर बैठे और दोनी पाबमें और जो कार्य वह सम्मतभी किया हो उसे
अग्रभाग विषे सम्पूर्ण देखक मन्त्रियों के पीछे भी भपने मतले करै। हस्ती, घोडे, रय, पशु
बिट ॥५८॥
आदि भृत्य और दास ।। ६५ ।।
परिचारगणा सर्वेसर्वेभ्य पृष्ठसंस्थिताः ।
संभाग सैनिका कार्यसमान्ज्ञात्वादिनोदिने ।
स्वर्णदढधरौपायप्रवेशनतिवोधकौ ॥५९॥ संरक्षपेमपत्नेन जीर्णान्सत्यजेत्सुधीः ६५॥
संपूर्ण सेवकोंकि गग सबके पीछे पेटें भौर और सेना के सन्मार इनको मतिदिन यल
सभामें प्रवेश (गाने) के जवाने और गना से रक्षा करके कार्यके योग्य करे और जो
कोतरको प्रणामके गोधक सुवर्णने इंडकोजीन (पुराने) हों उन्हें त्याग दे॥६५॥
शुक्रनीति ! [ अध्याय- अयुतकोशजांवाताहरेकदिनेन । और प्रकृतिणे सहित गमन करे नीवोंके सर्वविद्याकलाभ्यासेशिक्षतिपोपतान्६६ संग कदाचिदपि गमन न करे ।। ७१ ।। दशसहस्र कोशको वातीको एकही दिन मिथ्यासत्यसदाचारींचासाधुःक्रमात्स्मृतः । में जानले और भृत्योंको सम्पूर्ण विद्याओंको साधुभ्योतिस्व मृदुत्वनीचा संदर्शयन्तिहि ॥ कलाओंके अभ्यासमे शिक्षित करे ।। ६६॥ झंठसे नीच, सत्य और श्रेष्ठ आचरणसे समाप्तपिद्य संदृष्ट्वावकार्येतनियोजयते । साधु होता है क्योंकि नोचभी साधुओस विद्याशलोत्तमान्दृष्ट्वावत्सरेपूजयेञ्चतान् ।। कोमल अपने भाचरणको दिखाते हैं ॥ ७॥ ग्रामान्पुराणदेशांश्चस्ववियपरतो ।। उसकी पूरी विद्याको देखकर उने कार्यम नियुक्त की भोर विद्याकी फलामें उत्तम देष- अधिकारिंगणकाचरंजिताकाचकर्षिता.७३ कर उन्हें प्रतिवर्ष पूजे भयात् उनको विद्याके ग्राम पुर देश इनको स्वयं प्रतिवर्ष देख अनुसार उनका सरकार करे॥६७॥ और अधिकारियोंने कौनसी प्रजा प्रखनको विद्याफलानांवृद्धिःस्यात्तयाकुर्यान्नृपःसदा । और कौनसी दुःखी की यहभी देखे ॥७३॥ पृष्ठापमान्फरवेपानातनी तविशारदान् ॥६८॥ प्रजास्तासांतुभूतनव्यवहारविचिंतयेत् । जैसे विद्याकी कला वृद्धिको प्राप्त हो तैसे नभृत्यपक्षपातस्यिात्मजापर्शसमाश्रयेत् ।। राजा उदा को पृष्ठभाग और अग्रभागमें वि- उन प्रजाओंके वीवसे व्यहारफा चिंतन शुमान जो पुरुष वे मति ( प्रणाम) कर और अपने भृत्य (नौकरों ) का पक्षपाती और नीतिमें थतुर और भयानक पधारी नहो किंतु प्रजाका पक्षपाती ही हो ॥७॥ हो॥६॥ प्रजाशतेनसंदिष्टसंत्यजेदधिकारणम् । सिद्धान्मनग्नशस्त्रांश्चभटानारानियोजयेत् । अमात्यमपिसवीक्ष्यसकृदन्यायगामिनम् ॥ पुरेपर्यटयेन्नित्यंगजस्योरंजयन्मनाः ६९॥ एकांतेदंडयेस्पष्टमभ्यासागस्कृतंत्यजेत् । और वे ज्ञात है अस जिह से हों और अन्यायर्तिनांराज्यसर्वस्वंचहरेन्नृपः७६॥ नमारास दो ऐसे मटी (नोकरी) को समोर जो अधिकारी अनेक प्रजाओंका पी है नियुक फर और हस्तीपर चढकर प्रनाको उसको त्याग और मंत्रीको कारबपाप- प्रसन्न करता गजा मापभी अपने नगरमै गामी यो मनीतिकारक देखकर फिर ॥ ६॥ एकतिम दंड दे और प्रगटजो अपना अपराधी । राजपानारूटिन फिराजाधानममोपिय । है उसे त्याग दे अर्थात् उसे दंढ न दे और । गुनासमोनकिरानाफविभिभाव्यतेजसा ॥ भन्यायतियोंके राज्य और सम्वको राना जो राजा न पान ( सवारी) पर भान हरदः ॥ ७ ॥७॥ अपार नीधपोटा हे तो ज्ञानी पुरुष राना जितानांविषयाप्पंधर्माधिकरणमदा । भी शान रे गमान पथा नहीं जानेंगे अपांत भूतियानिनितानांतचारियानुरूपतः ७७॥ याम्प जानेगे ॥७॥ न्टादारांधवगाम्यप्रापितेर्गुणः । नीतानवि राज्यमं धर्मस उदा अधिकार मो और जोतेवागो उन परपणे अनुहार मजीभिपोगदननीचेस्तुरदाचन॥१॥ भृति ( नोकरी दे॥ गग रामा भरने पन्थ भोर मित्र मौर स्थानुरक्तांसुरूपांचमुरास्त्रांप्रियादिनीम् । जो गुगीन मनी पुरताको माम हुह उन सभूपणामुगादाममदासयतभनन् ॥७८१ .. --
भापाटीकासहित ।
(३१)
.
अपने विष अनुरक्त (प्रीतिमती), सुरूप, परस्त्री और कुलीन कन्याके दूषणले परा-
सुवस्त्र, प्रियवादिनी, सुंदर भूपणोंवाली मुख रहै और पुत्र के समान पाले भृत्य भी
और शुद्ध जो हो उस स्त्रीको शव्यापर भजे समयमें शत्रु हो जाते है ।। ८४ ॥
अर्थात् ऐसी स्त्रीके संगही भोग करें ।। ७८ ॥
नदोपास्यात्प्रयत्नस्यभागधेयंस्त्रयहितत् ।
यामद्वयंशयानोहित्वत्यंतसुखमश्नुते ।
दृष्ट्वासुविफलकमतपस्तत्त्वादिवंतनेत् ॥८॥
नसत्यनेच्चस्वस्थानंनीत्याशगगंजयेत् ॥७९ और प्रयत्न करने में राजाको कुछ दोष
जो राजा दो प्रहर शयन करता है वह नहीं क्योंकि प्रयत्नमें राजाका भाग्यही होता
अत्यंत सुसको भोगता है और अपने स्थान- है और कर्मको अच्छीतरह विफल (निफर)
का परित्याग राजा न करे किंतु नीतिसे ही देखकर और तपको करिके स्वर्गमे राजागमन
शत्रुओके गणको जीते ।। ७९ ॥
करै।। ८५ ॥
स्थानभ्रष्टानोविभांतिदता केशानखानृपाः। उसमासतोराज्यकृत्यंमिश्रेधिकछवे ।
मंश्रयोगारदर्गाणिमहापदिनृपामदा 160 अयायःमयमामोत्तोराजकार्यनिरूपकः८६॥
अपने स्थानस भ्रष्ट (पतित) दन्त, केश, इस प्रकार संक्षपस राजकार्य है जिसमें ऐसा
नख, राजा ये शोभाको प्राप्त नही होते और यह राजकाय निरूपक प्रयमाभ्याय हुमा
महान् आपत्तिमें गजा किला पर्वत इनका मागे विस्तारसे कहेंगे ॥ ८६ ॥
आश्रय ले ॥ ८० ॥
तदाश्रयाइस्युवृत्त्यास्वराज्यंनुसमाहरेत् ।
इति प्रथमोऽध्यायः पूर्तिमगा ॥१॥
विवाहदानयज्ञायविनाप्यष्टांशशेपितम् ॥८॥
उनके आश्रयसे चोरीसे अपने राज्यको
अध्याय २.
ग्रहण करे और विवाह, दान, यज्ञ इनके
अयं अशरोपर्क विनाभी सबसे द्रपको
ग्रहण करे।। ८१॥
यद्यम्पल्पतरंकर्मतदप्येतदुष्करम् ।
सर्वतस्तुहरंदस्युरसतामखिलंघनम् ।
नैकत्रसंवमेनित्यविश्वमेनकमति ।। ८२ ॥
पुरुपेणासहायेनकिमुराज्यमहोदयम् ॥ १ ॥
अल्पसे अल्लभी कार्य एक असदाय
सब प्रकार चोरोसे असजनांके धनको मनुष्यसे दुःससे किया जाता है, महोदय
ग्रहण करे और प्रतिदिन एकस्थानमें नबसे
(मतिमहान् ) राज्य तो क्यों नहीं दुकर
और किसीका विश्वास न कर ॥ ८२ ॥
होगा ॥१॥
सदैवसावधानः स्यामाणनाशनचितपेत् । सर्वविद्यामुकुशलोपोचपिसुमंत्रचित् ।
करकीसदोयुक्तोनिघृणोदस्युकर्मसु ॥८३॥ मरिभिस्तुपिनामनकोचिंतयेत्याचित्। २॥
रामा सदासावधान रहै और प्राणों के नाश सर्व विद्यानाम
मच्छीतरह फराट
को चिंता न करे कर (कठोर ) कर्मको फरे, भोर सुमंचका वेत्ता ( जाननेवाला) भी
और सदा उद्यागी रहे, और चौके राजा एकाफी मंबियांके बिना व्यवहारको
कर्मम दया न करे ॥ ८ ॥
कदापि चिंता न करे ॥३॥
विमुख परदारेपुरकन्याप्रदूषणे । सभ्याधिकारिप्रकृतिमभाससुमतेस्थितः।
पुत्रवत्पालितभृत्याःसमयशगुनांगना ८४॥ सर्वदास्यान्नृपःप्राज्ञःस्वमतेनकदाचन ॥३॥
(३२)
शुक्रनीति ।
[ अध्याव-
राजा
सभ्य
विद्धान्
अधिकारी हीयते कुसहायेनस्वधर्माद्राज्यतोनृपः।
प्रकृति सभासद इनके मतम सदा स्थित रहै कुकर्मणाप्रनष्टास्तुादतिजाःकुसहायत ॥१०॥
और अपने मतम कदापि स्थित न रहे ॥३॥
निदित सहायकसे राजा अपने धर्म और
प्रभुःस्वातंत्र्यमापन्नोडनायरकल्पते ।
रायसे हीन हो जाता है क्याकिनिदित कर्म
भिन्नराष्ट्रोभवेत्सद्योभिन्नप्रकृतिरेवच ॥ ४॥ और निदित सहायकसे दैत्यनष्ट होगये॥१०॥
स्वतत्रताको प्राप्त होकर गजा अनर्थ
करता है और उसका गन्य भिन्न हो जाता नष्टादुर्योधनाद्यास्तुनृपा शूरावलाधिका ।
है और प्रकृति भी पृथक हो जाती है ॥ ४॥ निरभिमानोनृपति सुसहायोमवेदतः ॥ ११ ॥
पुरुपेपुस्पेभिन्नश्यतेबुस्विभवम् ।
निदित सहायक आदिसे शूरवीर और
आप्तवाक्यानुभबैरागमैग्नुमानतः ॥ ५॥ बलवान् दुर्योधनादिक भी नष्ट होगये इसस
पुरुष १ मे भिन्न २ बुद्धिका प्रवाप दीखता राजा निरभिमानी और सुखहायकरहे ॥ ११ ॥
है ययार्थ वक्ताआवे वाक्यसे और अनुभवसे
युवराजोमात्यगणोभुजाव:महीभुजः ।
और आगम और अनुमानसे ॥५॥
प्रत्यक्षणेचसादृश्यःसाहसैश्चङलैवल ।
तादेवनयनेकदक्षत यौकमात्स्मृतौ ॥१२॥
वैचित्र्यंध्यवहाराणामौनत्यपुरुलावै ॥६॥
यजाके युवराज और मत्रियोका समूह
नहितत्सकलजातुनरेणकेनशक्यते ।
क्रमसे दक्षिण वाम भुजा नेत्र और कर्ण कहे
अत सहायान्वरयेद्राजागज्यविवृद्धये ॥ ७ ॥
प्रत्यक्षत, सायस और साहस, छळ योजयञ्चितायित्वातौमहानाशायचान्यया ।।
बाहुकणीविहानास्पादिनाताभ्यामतानृप ।
चल इन पूक्ति सपूर्ण साधनासे व्यवहा
रोकी विचित्रता आर गुरुळापवसे उचाई इन युवराज और मत्रियोये विना राजा बाहुन
को एक मनुष्य नही जानसकता इससे राज्य वर्ण, नेत्र इनसे हीन होता है इससे इन दोना-
को वृद्धि के अर्थ सहायोंको अगीकार राजा को विचारकै युक्त कर अन्यथा नियुक्त दिये
अवश्य करे॥६॥७ ।।
हुए ये दोनों महानाश का होते ६ ॥२३॥
कुलगुणशीलवृद्धाञ्छूरा-भक्तान्प्रियवदान् ।
मुद्राविनाखिलराजकृत्यकक्षमसंटा।
हितोपासन्डेशसहान्धर्मरतान्सदा ॥८॥
कल्पपेशुवराजार्यमीरमधर्मपलिजम् ॥१॥
फुट, गुण, शील इनसे धृद्ध, शूर, वीर,
भक्त, प्रियवक्ता, दितके उपदेष्टा देयम सहन
जो मुद्रा विना सपूणे राजकृत्य मग्नेका
शीर, सदा धर्मम रत ऐसे सहायर्याको राजा सदा समय हो ऐसे धर्मपत्नीके औरत पुनको
गुवराज अय कलित करे ॥५॥
रकम ॥८॥
कुमार्गगनपमीपबुद्धयोदतुक्षमाउछुचीन् । स्वनिष्टपितृव्यवानुजवामजसभवम् ।
निर्ममरान्कामोधरोभहीनानिरासान् ९॥ पुत्रपुनीर तदत्तपोवराज्यभिषेचयेत् १५ ॥
जो सदापक कुमार्गगामी राजाको भी अपनी भपन कनिष्ठ पिवम्य (चाचा) अपया कनिष्ठ
इलिस निवृत्त करनेवो समय हो और शुद्धही भाठाये मपया मेष्ठ भ्राता पुनको अपव
और मारो न हो काम, को,लोभ, आलस्य पुत्रीत पुरो अपरा दत्त पुरको पुरान-
पदवीपर नियुक्त कर ॥ १५ ॥
.
निमेरित हो उन्हें रखे ॥६॥
२.] भाषाटीकासहित। क्रमादभावेदोर्हस्वनीयवानियोजयेत् । सुनीतिशास्त्रकुशलान्धनुर्वेदविशारदान् । स्वहितायापिमनसानैतान्संकर्पयेत्वचित।१६॥ लेशसहांश्चवाग्दंडपारुष्यानुभवान्सदा २२ क्रमले पूर्वोक्त पुत्र आदिके अभाव में दौहित्र श्रेष्ट नीतिशास्त्रम फुशल धनुपविद्या चतुर या भानजाको नियुक्त करें और अपने हितके क्लेशक सहनेवाले और वाग्दण्ड ( कठोर लिये भी कदाचित् इनको मनसे दुःखी न वचन इनके ज्ञाता भएने पुत्रोको राजा करै२२ करें ।। १६॥ शौर्ययुद्धरतान्सर्वकलावियाविदोजसा । स्वधमीनरताञ्छूरान्भक्तानीतिमतः सदा। सुविनीतान्प्रकुर्वीतामात्यायैर्नृपासुतान् ।। संरक्षयेद्राजपुत्रान्वालानपिसुयत्नतः॥१७॥ वीरता और युद्ध में रत सम्पूर्ण विद्याओकी अपने धर्ममें वापर, शूर, भक्त, नीतिवाले कलाके यथार्थ ज्ञाता और अच्छे विनीत(नम्र) जो राजाओके पालक पुत्र उनको बड़े पानसे अपने पुत्रोको मन्त्रियोंके द्वारा राजा करै२३॥ रक्षा करै।। १७ ॥ मुवस्त्राभूपयित्वालालयित्वामुक्रीडनैः । लोलुभ्यमानास्तेर्थेपुहन्युरेनमरक्षिताः । अर्हयित्वासनायैश्च पालयित्वासुभोजनः।। रक्ष्यमाणायादिच्छिद्रकचित्माप्तुतिते ।। अच्छे स्त्री आदिते भूपित और अच्छी यदि राजा इतर राजपुत्रोंकी यत्नसे रक्षा क्रीडाओसे लाडिला और अच्छे आसन करें तो वे द्रव्यके लोभको प्राप्त और अर-आदिसे सरकार और अच्छे भोजनोंसे पालन क्षित हुए इस राजाको मार देंगे यदि रक्षासे करे ॥ २४ ॥ भी वे छिद्रको प्राप्त हो जाय तो ॥ २८॥ कृत्वातुयौवराज्यान्यिौवराज्योभषेचयेत् । सिंहशावाइवनंतिरक्षितारंदिपद्रुतम् । अविनीतकुमारहिकुलमाशुविनश्यति ॥२५॥ राजपुत्रामदाद्भूतागजाइवनिरंकुशाः । १९ ।। और यौवराज्यके योग्य करिके यौवराज्यक चे राजपुत्र जैसे सिंहका पालक हस्तीको लिये अभिषेक दे दे क्यों कि जिस फलमें इस प्रकाररक्षक राजाको हत देते है निरंकुश राजकुमार अविनीत हैं वह फुल शीघ्र नष्ट गजके समान मदस उन्मत्त राजपुत्र, पिता हो जाता है ॥ २५ ॥ आदिको भी हत देते हैं ॥ १९ ॥ पितरंचापिनिम्नतिभ्रातरवितरंनाकम् । राजपुत्रः सुदुर्वृत्तः परित्यागहिनाहति । मूीवालोपीच्छतिस्मस्वाम्यर्किनुपुनर्युवा२०॥ क्लिश्यमानः सपितरंपरानाश्रित्यहतिहि ॥२६॥ पिता और भ्राताको भी हत देते हैं तो इत दुष्ट भी राजाका पुत्र त्याग करनेके यो- रको क्यों नहीं हतेगे क्यों कि मर्स और ग्य नहीं होता और यह क्लेशको प्राप्त हो बालक भी अपने स्वल्पराग्यकी इच्छा करता अपने पिताको मार देता है ॥२६॥ कर और इतर राजाभोके अधीन होकर है ती युवा क्यों नहीं करेगा ॥ २०॥ स्वात्यंतसन्निकणराजपुत्रांस्तुरक्षयेत् । व्यसनेसनमानंत हेशयेद्यसनाश्रयैः। समृत्यैश्चापितत्स्यतिछात्वासदास्वयम दुष्टंगजमियोवृत्त कुर्वीतपुरसबन्धनम् ॥ २७ और अपने सुपात्र भृत्योसे उसके सांतः जो राजपुत्र व्यसन (बूत आदि) में जिले ) को आप जानकर और अपने बहुत आसक्त हो जाय तो व्यसनके अधिपतियोंसे निकट रखकर राजपुत्रीको रक्षा कर २१ दुःखित कर उघृत (उन्मत्त) दुष्ट गजके
(३४)
गुनीति ।
[अध्याय-
समान सपा सुसले बन्धन को अयोत नृपः प्रजापालनार्यसपनश्चेनचान्यया ।
शाति आदिक उपायसे वश कर ॥२७॥
पोत्पन्नवपुत्रत्वमत्वासदेदार्तितम् ॥३४॥
सुदर्दृत्तास्तुदायादाहंदव्यास्तप्रयत्नतः ।
राजा और धनी केवल प्रजाक पालनार्य
व्यागादिभिःशत्रुभिर्वाटर राष्ट्रविवृद्धये२८॥ है अन्यथा नही परसे उत्पन्न विधे अपना
दुराचारी जो दायाद (दिसेदार ) है उन
पुनभार मानकर उसीको सर्वस्व देता है ३४॥
को बडे यत्न सय सिंह आदि अथवा शकिमाश्चर्यमतोलोकेनददातियजत्याप ।
और छटो भपन गग्यो गृद्धि अर्थ भरवा प्राप्यापियुवराजत्वमाप्नुयाईकातनच ॥३५॥
दे॥२८॥
इससे अधिक क्या आश्चर्य है किन धन
अतोन्ययाविनाशाय मजायाभूपतेचते ।
बोलोकम देता है और न यज्ञ करता है
तोपयेयुपनित्यंदायामा स्वगुणः परै २९ ।। और युवराजपदवीको प्राप्त होकर भी जो
अन्यया प्रमा और राजाको दायाद
विकारको नहीं प्राप्त होता है ॥ ३५॥
नाशक हेतु हात पो कि दायाद अपने
स्वसंपत्तिमनन्नवमातरंपितरंगुरुम् ।
श्रेष्ठ गुणसि राजा निरय प्रसन्न करते भ्रातरंभगिनींवापिद्यन्यान्वाराजवल्लभान् ।
है ॥ २९॥
। अपनी सम्पत्तिके मदसे माता, पिता, गुरु
भ्रष्टाभात्यन्ययातेस्वभागा-जीवितादपि ।
भ्राताभगिनी(बदन) और इतर राजारे घाम
स्वमाषिध्यविहानायधन्योत्पनानरा ख ३०
(मी)आदिका अपमान न करे ॥ ३६॥
अन्यथा वे अपो भागीर जीवनसे हीन
महागनांस्तयाराष्ट्रनावमन्यनपीडयेत् ।
हो जाते है जो नर अपने सपण्ड भिन्न हो प्राप्यापिमहतींवृद्धियतेतपिनुराज्ञया ।। ३७ ॥
और अन्यसे उत्पन है उन्हे ॥ ३०॥
राज्य मदाजनको अपमान ओर पीटा न
मननापिनमंन पादत्ताधा स्वसुताइति ।
दे और अधिक वृद्धि प्राप्त होरर मा पि
तापी आज्ञाम बत॥ ३७॥
तदनममि छतिदृष्ट्वायपनि नरम ॥ ३१॥ पुत्रम्पपितुरातापिपरमभूपर्णस्मृतम् ।
मनसे भी वन आदि अपने पुत्र है ऐसा भागवणहतामातारावस्तुवनं गतः ॥ ३८॥
न मा धनि मनुष्यो हेराकर तिस पितारी आजादो पुत्रया परमभूषण कदा
4 दत्तकमी करते है ॥३३॥
है परशुरामजीन पितारी भागासे माताका
परोपनान्याया पुत्रस्वेभ्योवगेत । हनन किया और रामचन्द्रजी पितारी अज्ञा
अंगादगाभवतिपददहितानणाम ३018 यनशे गये ॥३८॥
भापाटीकासहित। (३५). - संपूर्ण भ्राताओमें अपनी अधिकता नदिखा- प्रकृतीनांचकपटेःस्वातविद्यासदेवहि । वै क्योंकि भाग योग्य वाताभोकै अपमानसे प्रातनत्वामतिदिनपितरंमातरंगुरुम् ४७ ॥ दुर्योधन नए होपया ॥ १०॥ पिनुराज्ञोलंघनेनप्राप्यापिपदमुत्तमम् । सपट कर प्रवृतियोके स्वभावको सदा जाने और पिता माता, गुरु इनको प्रतिदिन तस्माद्भ्रष्टाभवंतहिदासवदाजपुत्रकाः ॥४॥ प्रातःकाल नमस्कार फरक । ४७॥ पिताको आज्ञाके अवलंघनले उत्तम पदको राजानंस्वकृतंयद्यन्निवेद्यानुदिनंततः । प्राप्त होकरभी तिवपदसे इस संसारमें दासके समान राजाके पुत्र भ्रष्ट हो जाते हैं ॥ १ ॥ एवंगृहाविरोधनराजपुत्रोवसेद्गृहे ॥ १८ ॥ ग्यातेश्चययापुत्राविश्वामित्रसुतायथा । तिसके अनंतर राजाको अपना कृत्य प्रति- पतृमेशपास्तिष्टेकायवा-मानसे सदा ।। दिन निवेदन करके इसप्रकार अपने घरके अविरोधसे राजाका पुत्र घरमें बसे ।। १८॥ जैसे ययातिराजाके पुत्र और विश्वामित्र विद्ययाकर्मणाशीले प्रजाःसंरंजयन्मुदा । ऋषिके पुन पिताकी आज्ञाके अवलंघनसे नष्ट हुए तिसते पुत्र देहमनवाणीसे पिता को त्यागीचसत्त्वसपन्नःसर्वान्कुर्याद्वशेस्वके ४९ आज्ञामें तत्पर र ॥ ११ ॥ विद्या, कर्म, शीलले आनन्द होकर प्रजाको तत्कर्मनियनं कुर्यायेनतुष्टोभवेत्पिता । प्रसन्न रखता हुआ त्यागी और सत्त्वगुणी होकर सबको अपने वश कर ॥४९॥ तन्नकुर्यायेनपितामनागपिविषीदति ४३ ॥ उस कार्यको नियम जि पिता, शनैःशनैःप्रवर्धेतशुक्लपक्षमृगांकवत् । प्रसन्न हो और उसको न करें जिससे पिता एवंपत्तोराजपुत्रोराज्यप्राप्याप्यकंटकम् ।। यतकिंचित्भी दुःसित हो॥४३ ॥ शनैः२ शुक्लपक्षके चन्द्रमा समान वृद्धिको यस्मिपितुर्भवेत्पीतिःस्वयंतस्मिन्मियंचरेत् । प्राप्त हो इस प्रकार आचरणशील राजपुत्र यस्मिन्पपिताकुर्यात्स्वस्यापिटेप्यएवसः । निष्कंटक राज्यको प्राप्त होकरभी॥५०॥ जिस पुरुपमें पिताकी प्रीति हो उसमें सहायवान्सहामात्याश्चिरभुक्तवसुंधराम् । अपनी भी प्रीति करे और जिससे पिताका समासतःकार्यमुक्तंयुवराजस्ययादतम्५१ देप हो उसे अपनाभी देय ही जाने ॥४॥ सहाय और मत्रियों सहित युवराज चिर- असंमतीवरुद्भवापितुर्नवसमाचरेत् । कालतक पृथ्वीको भोगता है यह सेक्षपसे युव- चारमचकदोषेणयदिस्यादन्ययापिता ४५ राजका हितकारी कार्य वर्णन किया ॥५१॥ पिताके भलंमत और विरुद्धका भाचरण समासादुच्यतकृत्यममात्यादेश्चलक्षणम् । न कर यदि दूत और सूचक (चुगल ) के मृदुगुरुममाणत्ववर्णशब्दादिभिः समम् ५२ दोपस पिताका विपरीत उद्धि दोनाय ॥१५॥ मन्त्री भादिकोंके कार्य भीर लक्षण संक्ष- प्रकृत्यनुमतंकृत्वातमेकांतेप्रयोधयेत् । पसे वर्णन करते हैं कोमलता गुरुता, प्रमाण- अन्ययासचकान्नित्यंमहहंडेनदंडयेत् ॥४६॥ वर्ण, शब्दादिको सहित ॥ ५२ ॥ । ती मजाके अनमतकरिक उसे एकान्तम परीक्षावयित्वाययास्वर्णपरीक्ष्यते । बोधित कर ( समझाये )यदि पिता न माने कर्मणासहवासेनगुणैःगीलकुललीदाभः ५३ तो सूचककी सहायता लेकर महादसे शि जैस परीक्षकोस तपायकर सुर्वर्गकी प- क्षित कर ॥ ४६॥ रीक्षा कोजातितीप्रकार कमल,सहवा ܝܫ शुक्रनाति । अध्याय- - ससे, गुण, शील और कुलादिकस भृत्यकोभी, अन्याय करते स्वामीको बोधन कर परीक्षा करे ॥ ५३॥ ( समावे) और अन्यायमें स्वयं प्रवृत्त न हो भृत्यपर्मक्षयेन्नित्यविश्वात्यविश्वोचदा । और स्वामीको वाणीमें शंका न करें और नवजातिनचकुलकेवलदक्षयज्ञप ॥ ५४ ॥ स्वामीको न्यूनताभी प्रकाशित न करै ॥६॥ भृत्यको नित्य परीक्षा करे और तभी अदीर्घसूत्रात कार्यासत्कार्यचिरक्रियः । विश्वासक योग्यका विश्वास करें और केवल नतद्गार्यापुत्रमित्रच्छिद्रदीकदाचन।।६१॥ जाति और कुलहीको न दे ॥५४ ॥ कर्मगीलगुणा:पृज्यास्तयाजातिकुलनहि । उत्तम कार्यको शीत करें और असद (बुरे) कार्यको विलंघस कर और स्वामीकी स्त्री पुत्र नजात्यानकुलेनेवश्रेष्ठत्वप्रतिपद्यते ॥ ५५ ॥ मित्र इनके छिद्रको कभी न देरी ।। ६१ ॥ जैसे कर्म, गोल, गुण पूज्य हैं तिस प्रकार साति, फुल, पूज्य नही, केवल जाति और तहबुद्धिस्तदोयपुभार्यापुत्रादिवंधुपु । कुदसताको माप्त नहीं होता ॥ ५५ ॥ नइलायतेस्पर्वर्तननाभ्यसूयतिनिंदति ६२ विवाहेभोजनेनित्यकुलजातिविवेचनम् । स्वामीक सम्बंधी स्रो,पुत्राचन्धु आदिकों में सत्यवान्गुणसंपन्नस्तयाभिजनवान्धनी ५६ स्वामीके समान बुद्धि रखें लाया ( चडाई) विवाह और भोजनमें नित्य कुळ और न करे और न स्पर्धा ( तिरस्कार ) की इच्छा जातिका विवेक करे । सत्यवान, गुणी और करें और उनकी बडाई देखकर दुःखित न कुदम्नी और धनी ॥५६॥ होय और न निन्दा करे ॥६॥ सुकुलश्वसुझालश्चसुकमीचनिरालसः । निच्छत्यन्याधिकारहिनिःस्पृहोमादत्तसदा । ययाकरोत्यात्मकार्यस्वामिकार्यततोधिाम तद्दत्तवस्त्रभूषादिधारकस्तन्पुरोनिशम् ६३ अष्टपुटसे उत्पन्न सुशील उत्तम कर्मका अन्यके अधिकारकी इच्छा न करें निःस्पर कना और निरास होकर जैसा अपना (इच्छारहित ) हुआ छदा प्रसन्न रहे और कार्य करे तिससे अधिक स्वामीका का स्वामी के दिये दुए वस्त्र, भूपण, आदिको चतुर्गुणनयत्नेनकायवाइमानसेनच । स्वामी मागे राविदिन धारण कर ॥ ६ ॥ भृत्याचतुष्टोमृदुवाकार्यशामुचिटः ॥५८॥ भृतितुल्यव्ययीदांतोट्याउःशरएयहि । अपने कार्यको अपेक्षा चतुर्गुण यत्न और वदार्यस्याहसिसूचकोभृतकोवरः ॥ ६ ॥ दे याणी मनप्ठे म्यामोय. कार्यको फरे भृति अपनी भूति ( नोकरी) में समान पर (नोकरी)से संबट र? कोमल्याणी भौर (राच)करे और दांत (चर) दगट कार्यमें चतुर और शुद्ध और द रदै ॥५८॥ गुरवार और ग्वामीके भन्यया कार्यको एका पगेपकरणेदोपकापगढ़मुखः । तमं जो सूमक करे यह भृत्य ग्रेट होताद६५ स्वाम्यागस्कारिणपुत्रपितम्चापिकः ॥ विपरीतगुणमितकोनिद्यउन्यते । परर. फापंम चतुर और पर, भपकारसयभृन्याहीनभृतिकापेइनमर्पिनाः ६५ ।। निगन रमौर मरने गमो मपराधी पुर और पितामादिरा दटा अविनाता जोन इन गुगोले दाग दी या भुत्व यन्यापगामिनिपनीलप:नायकः ॥ निन्दादोर यदाता जोभाप हानभूहिर नाशनाकसिनगनस्मामामाः ॥ ॥५॥ (नोगरहित ) मोर दिर २.] भापाटीकासहित । (३७) शठाश्चकातरालुब्धाःसमक्षप्रियवादिनः । सुमंत्र, पंडित, मंत्री, प्रधान, सचिव, अ. मत्ताव्यसनिनश्चातीउत्कोचेष्टाश्चदेविनः६६॥मात्य, पाइविवाफ, प्रतिनिधि ये प्रकृति और जोश और भीरु लोभी और प्रत्य- हि॥७२॥ क्षमें प्रियवादी हैं व्यसनी ( मदिरापान आदिएताभृतिसमास्त्वष्टौराज्ञःप्रकृतयःसदा । में प्रवृत्त ) और दुःखी हैं उत्कोच (घूस) इंगिताकारतत्त्वज्ञोदूतस्तदनुगःस्मृतः ॥७३॥ देने में इष्ट है और देवी इतमें आसक्त है ॥६६॥ समान है मासिक जिनका ऐसे गूर्वोक्त नास्तिकादांभिकाश्चैवसत्यवाचोभ्यसूयकाः । सुमंत्र आदि प्रकृति कहे हैं जो चेष्टा और येचापमानिताये सदाक्यैर्ममणिभेदिताः ॥ आकृतिक तत्त्वको जाने वह राजाका अनु- जो भृत्य नास्तिक दभी और सत्य वोटने यायी दूत होता है ॥ ७३ ॥ में निंदा प्रकट करते हैं और जो अपमानः पुरोधाःप्रथमश्रेष्ठःसर्वेभ्योराजराणभृत् । को प्राप्त हुए हैं, और जो पुवायोसे मर्ममें विध हैं॥ ६७॥ तदनुस्यात्प्रतिनिधिःप्रधानस्तदनंतरम् ७४ चंडाःसाहसिकार्यमहीनानैतेसुसेवकाः । सबसे श्रेष्ठ और प्रथम और संपूर्ण देशका पालनकत्ती पुरोहित होता है और पुरोहितका संक्षेपतस्तुकयितंसदसमृत्यलक्षणम् ६८ ॥ अनुयायी प्रतिनिधि और प्रतिनिधिके म- चंड ( अतिक्रोधी ) साहसिक ( भावचा नंतर प्रधान होता है ॥ ७ ॥ रसे कार्यकारी ) धर्महीन ऐसे भृत्य अच्छे सचिवस्तुततःप्रोक्तोमंत्रीतदनुचोच्यते । नहीं होते, संक्षेपसे उत्तम और अधम भृत्यो प्राङिवाकस्ततःपोक्त पंडितस्तदनंतरम् ॥७॥ के लक्षण वर्णन किये ॥ १८॥ तिसके नंतर सचिव और तिसके अनंतर समासतःपुरोधादिलक्षणंयत्तदुच्यते । मंत्री और तिरुके अनंतर प्राविवाफ और पुरोधाचप्रातिनिधिःप्रधानसचिवस्तथा ६९ तिसके अनंतर पंडित होता है ॥ ५ ॥ मंत्रीचप्राइविवाकश्चपंडितश्चसुमकः । सुमंत्रस्तुतताख्याताह्यमात्यस्तु ततः परम् । अमात्योदूतइत्येताराज्ञःप्रकृतयोदश ॥ ७० ॥ दूतस्ततःक्रमादेतेपूर्वश्रेष्ठायथागुणाः ७६ ॥ संक्षेप पुरोहित आदिककि जो लक्षण तिसके अनंतर सुमंत्र और तिसके अनंतर होते हैं सो कहते हैं-पुरोहित प्रतिनिधि अमात्य और तिसके अनंतर दूत ये पूर्वोक्त (कायममुकाम ), प्रधानमंत्री, मंत्रीप्रावि कम गुणोके अनुसार श्रेष्ट होते हैं ॥ ७६ ।। वाक (वकील ), पंडित, श्रेष्टमंत्री, अमात्या मंत्रानुष्ठानसंपन्नवैविद्यःकर्मतत्परः ॥ दूत, ये दश राजाकी प्रकृति होती हैं ॥६९ ७०॥ जितद्रियोजितक्रोधोलोभमोहाविवर्जितः ७७ ।। दशमांशाधिका- पूर्वदूतांताक्रमशःस्मृताः अष्टमकृतिभिर्युक्तोनृपःकैश्चिस्मृतासदा मन्त्र और मनुष्टानमें सपन्न (कुशल ), वेद त्रयीके ज्ञाता, कर्ममें तत्पर, जितद्रिय, जित- पूर्वोक्त पुरोहित आदि और दूरतक क्रोध, लोभ और मोह रहित ॥ ७७ ॥ दशांश अधिक मासिक आदि भागी क्रमशः होने कहे हैं और कोई ऋषि आठ प्रक पडंगवित्सांगधनुर्वेदविच्चार्यधर्मवित् । तियाँसे युक्त राजाको वर्णन करते हैं ॥ ७१ ॥ यत्कोपभीत्याराजापिधर्मनीतिरतोभवेत् ।। सुमंत्र पंडितोमंत्रीप्रवानासचिवस्तथा । वेदके व्याकरण आदि छः अगोंका ज्ञाता अमात्यःप्राइविवाकश्चतयाप्रतिनिधिःस्मृतः और धनुर्विद्याफा और धर्मका ज्ञाता हो शुक्रनीति । [ अध्याप- जिसके क्रोधके भवसे राजाभी धर्म ओर मंत्रीतुनांतिकुशल पडिताधर्मतत्त्वावित् । नीतितत्पर हो जाय ॥ ७८ ॥ लोकशास्त्रनयज्ञस्तुमाडिवाकास्मृतःमदा।। नीतिशास्त्रास्त्र यहादिकुशलरतुपुरोहितः। सैवाचार्यःपुरोवायःशापानुप्रयोःक्षम ॥ नीतिमे जो कुल उसे मन्त्री और धर्मवत्व का जो ज्ञाता उसे पडित और लोक और नीति शास्त्र और अस्त्रकै समूहमे कुशलदो शास्त्रको नीतिमा जो ज्ञाता उसे प्राइविवाक वही पुरोहित होता है वही आचार्य होता है क्हते ह ॥ ८४ ॥ और वह पुरोहित ऐसा होना चाहिये जो शाप देशकालपविज्ञाताह्यमात्यइतिकथ्यते । और अनुग्रह ( दयाभाव ) में समर्थ हो ॥७९॥ आयव्ययप्रविज्ञातामुमत्र सचकीर्तितः ।। विनामकृतिसन्मंत्रादाज्यनाशोभवेन्मम । देशकालके ज्ञाताको अमात्य कहते है, आय निरोधनभवेदेवराज्ञस्तेस्यु सुमत्रिणः ॥८०॥ (आमदनी ) व्यय (खर्च ) का जो ज्ञाता प्रजाकी समतिके विना राज्यका नाश उसे सुमन्त्र कहते है ॥ ८५ ॥ होता है और मेरा विरोध होता है इस प्रकार इगिताकारचेष्टज्ञास्मृतिमान्देशकालवित् । के अवसर पर समतिके जो दाता है वे गजा याइगुण्यमंत्रविद्वाग्मीवीतभीर्दूतइष्यते ॥ के सुमन्त्री होते है ॥ ८ ॥ इगित नेवसे इच्छाका प्रकाश आकार और नविभतिनृपोयभ्यस्तैःकिस्याद्राज्यवर्धनम् । चष्टाका ज्ञाता और स्मृतिमान् (धारणाक यथालंकारवस्वाद्यैःस्त्रियोभूष्यास्तथाहिते ॥१॥ (अधिकारी) और देशकाल का ज्ञाता छ है जिन मन्त्रियासे राजा भय नही करता गुण जिसमे ऐसे मत्रका वेत्ता वाग्मी यथार्थ उनसे राज्य की क्या वृद्धि होती है इससे धीरतासे वक्ता और भयरहित इस प्रकारके जिस प्रकार स्त्रियोको वस्त्र, भूषण आदि लक्षण जिसमे हों उसे दूत कहते है ८६ ।। भूषित करते है इसी प्रकार मन्धियाकोभी अहितचापियत्कार्यसद्य कर्तुयोचितम् । राजा भूपित करै ।। ८१ ॥ अकर्तुयाद्धितमपिराज्ञ प्रतिनिधिःसदा ८७ राज्यंग्रजावलंकोश सुनृपत्वंनवार्चेतम् । राजाके अहितकार्य और तत्काल कर्तव्य यन्मंत्रतरिनाशस्तभनिभ किप्रयोजनम् ॥ कार्य और अकर्तव्य कार्य और हितकारी कायको प्रतिनिधि सर्वकालमे जाने ॥ ८ ॥ राज्य, प्रजा, सेना,कोश, (खजाना) राजाके बोधयेत्कारयेत्कुन्निकुर्यानप्रबोधयेत् । उत्तमता, शत्रुनाश जिन भत्रियाकी सम्मतिस पूर्वोक्त राज्य मादि वृद्धिको माप्त नहीं हुए सत्यवायदिवासत्यंकार्यजातवयत्किल ८८ से मन्धियां क्या प्रयोजन है अर्थात कुछ और जो सत्य कार्यका समूह है उसे चोधन भी नही॥ ८२॥ करै अथवा किसीसे करवा दे और जो कार्याकार्यप्रावज्ञातास्मृत प्रतिनिधिस्तुसः । असत्य कार्याका समूह है उसे न तो आप सर्वदशीमधानस्तुसनावित्सचिवस्तयाना८३॥ कर और न किसोको विदित करै ।। ८८ ॥ यार्य और अकार्यका प्रतिज्ञाता जो हो उसे सर्वेषाराजकृत्येपुप्रधानस्तद्विचितयेत् । प्रतिनिधि कहते है रानारे सम्पूर्ण कार्योका गजानाचतयाश्वानारथानापदगामिनाम ॥ जो दया उसे प्रधान कहते है और सेनामा सम्पूर्ण राजकार्योम सत्य और असत्यका जो ज्ञाता उसे सचिव कहते है ॥ ८३ ॥ प्रधान चिन्तन कर और दस्ति, अश्व रया २.] भापाटीकासहित । और पदाति इनकी भी परिक्षा प्रधान ही और पूर्वोक्त देडोंसे क्या उत्तम मध्यम अल्प कर ॥ ८९॥ फळ होगा यह सम्पूर्ण निश्चय और चिंतन मदानांतयोशाणांवृपाणांसद्यएवहि । करके मन्त्री निवेदन करे ।।९५ ॥ वाद्यभापासुसंकेतव्यूहाभ्यसनशालिनाम् ॥९० साक्षिभिालाखेतै गैश्छलभृतेश्चमानुपान् । और दृढ उष्ट्र( ऊंट) और वृप (बेल) वाद्य स्वानुत्पादितसंप्राप्तव्यवहारान्विचिंत्यच ॥ (पाजे) के संकेत और व्यूह कसरतके साक्षियोंने लिख जो भोग उनसे और (अभ्यासियोंके आचरणोंको देखें ॥ ९१ ॥ छलके वलसे किये भोगोसे अपने मनुष्योको प्रास्मत्यग्गामनाराज्यचिद्वशखावधारि ऐस देखें कि आप उत्पन्न करके ये व्यवहारी णाम् । परिचारगणानांहिमध्यमोत्तमक- अर्थात् अनर्थ नहीं ॥ ९६ ॥ मणाम् ९१ ॥ दिन्यसंसाधनान्वापिकपुर्किसाधनपरम् । पूर्व और पश्चिमकै गमनकर्ता और मध्यम युक्तिप्रत्यक्षानुमानोपमानलोकशास्त्रतः ॥ उत्तम ह कर्म जिनका ऐसे जो राज्यके चित दिव्य साधनके योग्यको और किसमें शस्त्र अस्त्र धारी परिचारक (सवक ) उनके कौन साधन है इनको प्रत्यक्ष अनुमान उपमान आचरणको भी देखे ॥ ९१ ॥ लोक और शास्त्र से मन्त्री जाने ॥ ९७ ॥ अस्त्राणामस्त्रपातीनांसद्यस्त्वंतुरगीगणः । वहुसम्मतससिद्धान्विनिश्चित्यसमास्थितः । कार्यक्षमश्चप्राचीनःसाद्यस्कःकतिविद्यते ९२॥ ससभ्यः प्राड्रीववाकस्तु→पसंबोधयेत्सदा ॥ भस्त्र और शखधारी इनकी नवीनता और अनेक सम्मतियोंके सिद्ध कार्योंको सवारोंका समूह कितना कार्यकारी है और सभासदोके सहित प्राविवाफ ( वकील) कितना प्राचीन है और कितना नवीन है सभास्थितहोकर राजाको निवेदन करें।।९८॥ इसकी चिन्ता भी प्रधान ही रक्खै ॥ ९२ ॥ कार्यासमर्थःकत्यस्तिशस्त्रगोलाग्निचूर्णयुक् । वर्तमानाश्चप्राचीनाधर्मा लोकसंश्रिताः । सांग्रामिकश्चकत्यस्तिसंभारस्तान्विचिंत्यय९३ शास्त्रेपुकेसमुदिष्टाविरुध्यतेचकेधुना ।। ९९॥ लोकशास्त्रविरुद्धा केपंडिवस्ताविचित्यच । और कितना कार्यकारी नहीं है और दा नृपसबोधयेत्तैश्चपरत्रेहसुखपदैः।। १०० ॥ और गोलेके संयुक्त शस्त्र कितने हैं और संग्रामके योग्य सम्भार कितना है इतको वर्तमान और प्राचीन धम लोकमें कौनसे चिन्तन करके ॥ ९ ॥ हैं और शास्त्र में कोनसे कहे हैं और अय सचिवश्चापितत्कार्यराज्ञसम्यगानवेदयेत् । कौनसे धर्म शाखके विरुद्ध हैं और ढोक सामदानञ्चभेदश्चदंडस्केपुकदाकथम् ॥२४॥ और शास्त्र दोनोंसे कौनसे धर्म विरुद्ध है पण्डित विचारकर इस लोक और परलोकमें और सचिव भी पूर्वोक्त कार्यको राजाके सुखदायक उन धर्माको राजाके प्रति चोधित प्रति भलीप्रकार निवेदन करे और साम दान करें (बताव) ॥ ९९ ॥ १० ॥ भेद दंड किनको उचित है और किस कालमें देना होगा यह भी मन्त्री राजाको इयञ्चसाचतंद्रव्यंवत्सरेस्मिंस्तृणादिकम् । निवेदन करे ॥९॥ व्यपीभूतमियचैवशेषस्थावरजंगमम् ॥ २ ॥ कर्तव्यःकिंफलंतेभ्योबहुमध्यतथाल्पकम् । इयदस्तीतिवगजेसुमंत्रोविनिवेदयेत् । एतत्संचित्यनिश्चित्यमनीसनिवेदयेत् ॥९५॥ पुराणिचकतिप्रामाअरण्यानिवसतिहि ॥ 이
(४०)
शुक्रनीति।
[अध्याय-
इस वर्ष में इतनावण आदि द्रव्य सञ्चय हुआ प्रधान आदिक लेखसे उनके लेखको अनु-
है और इतना व्यय ( सर्च ) हुआ है और दभियों ( देखनेवालों) से जाने और राजा
इतना शेप (बाको) है और इतना स्थावर पूर्वोक्त प्रधान आदिकोंको बदलता हुआ
(वृक्षादि) और इतना जगम (पशुआदि)है परस्परके कर्ममें नियुक्त करै अर्थात मंत्रा
यद् सम्पूर्ण तुमन्त्र राजाके प्रति निवेदन स्थानपर अमात्य और अमात्यकी पदवीपर
करै, और स्तिने पुर है और कितने ग्राम है मत्री इत्यादि ॥ ७॥
और कितने अरण्य (वन ) है यह अमात्य नकुर्यात्स्याधिकवलान्कदापियधिकारिणः ।
राजाके प्रति निवेदन करें ॥२॥२॥
परस्परंसमवला कार्या:प्रकृतयोदश ॥ ८॥
कोपताकात केनप्रानोभागस्ततःकति ।
अपनेसे प्रवल अधिकारियों को कदाचित
भागशेपंस्थितंतस्मिन्कत्यकृष्टाचभूमिका ॥ न करे पूर्वोक्त दश प्रकृति समवल (एकसे)
किसने कितनी भूमि जोती है और कितना करने ॥ ८॥
भाग उसले मिला और कितना शेष रहा और एकस्मिन्नधिकारेतुपुरुपाणांत्रयसदा ।
बिना जोती भूमि कितनी है यह भी अमात्य ही नियुजीतप्राज्ञतममुख्यमतुतेपुवै ॥ ९ ॥
राजाको निवेदन करै ।। ३ ।।
भागद्रव्यंवत्सरेस्मितुल्कंदडादिकति ।
एक एक अधिकारके तीन २ साक्षियोंकि
निमित्त पुरुष नियुक्त करें और उनमें एक
अकृष्टपन्यकतिचकतिचारण्यसंभवम् ॥ १॥ मत्यन्त बुद्धिमानको नियुच करे ॥९॥
इस वर्ष कितना द्रव्य भागका हुआ और वादकौतुतत्कायहायनेस्तनिवर्तनम् ।
फितना मुलूक (महसूल) और कितना द्रव्य त्रिभिवपिंचभिर्वापिसप्तभिर्दशभिश्चवा ॥१०॥
दटका हुश्रा और घिना जोते कितना अन्न
हुआ और नितना अन्न वन में उत्पन्न हुआ यह
और उसके कार्यके दो द्रष्टा हो और
भी अमात्य निवेदन परे ॥४॥
तीन, पांच, सात अथवा दश वर्ष उनकी
कतिचाकरसंजातंनिविप्राप्तकनीतिच ।
|निवृत्ति करें ॥ २०॥
अस्वामिकातिनातिनाष्टिकंतस्कराहतम् ॥५॥
दृष्ट्वातकार्यकांगल्येतयातपरिखेतयत् ।
नाधिकारीचरदयाद्यस्मैकस्मसदानृपः ११ ॥
आकर (खान) से कितना द्रव्य उत्पन्न
हुभा और निधि सजानमे कितना है और तिनसे कार्य और
अस्वामिक (लावारसी) क्तिना मिला और देखे तेते ही पदयीपर बदले और जिप्त
चोरोसे कितना नष्ट हुआ यह भी अमात्य विसीको चिरफालतक राजा अधिकार
दो निवेदन करे ॥५॥
न दे॥ ११॥
संचितंतुषिनिश्चित्यामात्योराज्ञनिवदयत् । 'अविकाक्षमंदृष्ट्वाधिकोरनियोजयेत् ।
समामाक्षणकृत्यप्रधानदास्यच ॥ ६ ॥ अधिकाग्मदंपत्विाकोनमुद्यात्पुनश्चिरम् ।।
भीर सचित द्रव्यमा निश्चय करिव अधिकारके योग्य देयकर अधिकार,
ममात्य राजाकै प्रति निवेदन करे और पूर्वोक्त नियुक्त करें क्योकि अधिकाररूपी मदको
दश प्रधानोका लक्षण और पुत्र मपम चिरफाहतक पीकर कौन मोदन प्राप्त नहीं
होता ॥१॥
संत्तनादात सांविधात्तदनुदानिभिः । यत कार्यक्षमंदृष्ट्वाकार्यन्येतनियोजयत् ।
परियनृपेचनन्युज्याटयान्यकर्माण ॥ ७॥ तत्कायमचान्यतपदानुगतसलु ॥१३॥
पृशढता जैसी
।
पदा ॥६॥
२.]
भाषाटीकासहित ।
(४१)
इससे कार्यके योग्य देखकर अन्य कार्यम ओके स्थानोका अधिपति और दानाध्यक्ष
तिसे नियुक्त करे और तिसके कार्यपर उसके इनको पृथक् २ नियुक्त करै ॥ १९ ॥
अनुयायी अन्यको नियुक्त करें ॥ १३ ॥ साहसाधिपतिचैवग्रामनेतारमेवच ।
नियोजयेद्वर्तनेतृतदभावतथापरम् । भागहारतृतीयतुलेखकंचचतुर्थकम् ।। २० ॥
तद्गुणोदितत्पुत्रस्त कार्यतनियोजयेत्॥११॥ साहस ( दंड) का अधिपति ग्रामका
उसके अभावमें वर्तन ( लौटने ) में नेता (चौधरी) तीसरा भागका लेनेवाला
अन्यको नियुक्त करै, यदि उन गुणोसे और चौथा लेखक इनको मी नियत कर २०
युक्त उसका पुत्र होय तो उसके कार्यमें उसे शुल्कयाहपंचमंचप्रतिहारतथैवच ।
नियुक्त कर ॥ १४॥
पट्कमेतन्नियोक्तव्यंग्रामेग्राभेपुरेपुरे ।। २१॥
यथायथाश्रेष्ठपदाधिकारीयदाभवेत् । पांचवां शुल्क ( मोल ) का ग्राहक
अनुक्रमेणसंयोज्योचंतेतंप्रकृतिनयेत् ॥१५॥ और छठा प्रतीहार इनपूर्वोक्त छःओंको ग्रामर
जैसा २ अधिकारी हो तैसे २ श्रेष्ठ पदपर पुर २ में नियुक्त करै ॥ २१ ॥
नियुक्त करे इस प्रकार दश प्रकृतियोंको तपस्विनोदानशीला श्रुतिमीतविशारदाः ।
पदवीपर अन्तसमय नियुक्त करे ॥ १५ ॥ पौराणिकाःशास्त्रविदोदेवजामांत्रिकाचये ॥
अधिकारबलंदृष्टायोजयेद्दर्शकान्बहून् । तपस्वी, दाता, श्रुति (वेद ) स्मृतिम
भधिकारिणमेवायोजयेदर्शकविना॥१६ ॥ चतुर पुराणोके ज्ञाता शाखोके ज्ञाता
ज्योतिपी मन्त्रोंके जो ज्ञाता है ॥२२ ।।
अधिकारके बलको देखकर
इष्टाओको नियुक्त करै अथवा दृष्टाके बिना
आयुर्वेदविदःकर्मकांडज्ञास्तांत्रिकाश्चये ।
रक अधिकारीको नियुक्त करे ।। १६ ॥ येचान्येगुणिनःश्रेष्ठाबुद्धिमंतोजितेंद्रियाः ।।
पंचान्येकमसचिवास्तान्सान्विनियोजयेत् ।
वैद्य, कर्मकांडके ज्ञाता तन्त्रके ज्ञाता
और गुणवान् हैं श्रेष्ठ हैं और बुद्धिमान
गजाश्वरथणदातपशूष्ट्रमृगपक्षिणाम् १७ ॥
जितद्रिय हैं ॥२३॥
जो इतर कोंके सचिव हैं उन
सपूर्णीको नियुक्त कर और हस्ती, अश्व, रथ,
तान्सर्वान्पोपयेदभत्यान्दानमानासुपूजितान्
पदाति, पशु, ऊंट, मृग, पक्षिपोंक पृषक २ हीयत्तेचान्यथाराजाह्यकीर्तिचापिविंदति २४॥
अधिपति नियुक्त करें ॥ १७ ॥
तिन तपस्वी आदिकों (नोकरी)
मुवर्णरत्नरजतवस्त्राणामधिपान्पृथक् । से दान सत्कारसे पूजित करके पोषण
वितानाद्यधिपंधान्याधिपंपाकाधिपंतथा १८॥ करें यदि पोषण न कर तो राजहानिको
सुवर्ण, रत्न, चांदी,
अधिपति वितान (तंबू )आदिकोंके अधिपति बहुमाध्यानिकार्याणितषामप्यधिपांस्तथा।
अन्न और पाक ( रसोई) के अधिपति पृथर तत्तत्काउँपुकुशलाज्ञात्वातांस्तुनियोजयेत् २५
२ नियुक्त करे॥ १८॥
जो कार्य बहुतसे मनुष्योंसे हो उनके भी
आरामाधिपतिंचवसीधरोहाधिपपृथक अधिपति नरकार्यो में फुशल जानकर नियुक्त
संभारपदेवतुष्टिपतिदानपतिसदा ॥ १९ ।।
करै।। २५॥
भाराम ( बगीचे ) या अधिपति मंदि-अमंत्रमारनास्तिनास्तिमूलमनौषधम् ।
गेका अधिपति सभारीका अधिपति देवता- अयोग्य पुरुषोनास्तियोजकस्तत्रदुर्लमः ॥
वस्तु, इनके और कुकीतिको प्राप्त हो ॥२॥
(४२) शुक्रति। [ अध्याय- मन्त्रक विना अक्षर नही और औषधिके योद्धाओके सम्मुख शस्त्र और अलोके विना मूल नहीं और अयोग्य पुरुष नही लक्ष्य सन्धानको जो नाश कर और स्थकी परन्तु योजन करनेहारा वा दुर्लभ है ॥२६॥ गति और रथ, भव और अश्वोका मेल और प्रभद्रादिजातिभेदंगनानांचचिकित्सित्तम । रक्षा इनको जाने ।। ३३ ।। शिक्षांव्यायपोपणंचतालजिहानाबैगुणान्। सादिनश्चतथाकार्याःशूराव्यूहविशारदाः । प्रभट आदि हाथियोकी जातियों के भेद वाजिगतिविदापाज्ञाःशस्त्रास्त्रैयुद्धकोविदाः ।। और दाथियकि चिकित्सक, शिक्षा, रोग, पोपण, तालु, जिला, नख, इनके गुण तिनका और सादि ( अखवार भी ) ऐसे करने जो जो ज्ञाता ॥७॥ शर, व्यूह (कायद) मे चतुर, घोडोंकी आरोहणंगतिवेत्तिमयोज्योगजरक्षण। गतिका वेत्ता, विद्वान्, शस्त्र और अवासे युद्धमें कुशल हों ।। ३३॥ तयाविकाधारणस्तुहस्तीहृदयहारकः ॥२८॥ चक्रितगचितवाल्गतकंधारितमाप्लुतम् । चढना, गमन, जो जानै उस मनुष्यको गोंको रक्षा नियुक्त करें और वैसेही तुरंमंदचकुटिलसर्पणपरिवर्तनम् ॥ ३४ ॥ आधोरण (पीलवान्) को नियुक्त कर जो एकादशास्कंदितंचगतीपश्वस्यवेत्तियः । हाथोके हृदयको वश करले ॥ २८॥ ययावलययर्तुचशिक्षयेसचशिक्षकः ॥३५॥ अश्वानांहदयत्तिजातिवर्णभ्रमर्गुणान् । चक्रके समान गति, रेचित गति, मधुरगति गतिशिशांचिकित्सांचमत्त्वसाररुजतया ॥ धौरितगति, प्लुतगति, तुर (शीघ्रगति) जो अहिदपको और जाति वर्ण मन्दगतिइटिल गति, सर्पणगति, परिवर्तन गमनसे गुणोंगा भीर गति, शिक्षा, चिकि- गति, आम्कंदितगति, इन पूक्ति एकादरा त्सा, पल, इदता और रोग इन को जाने ।।२९॥ गतियोंको मो जाने और अन्य बल और हिताहितोपगंचमानंयानंदतावयः । ऋतुर्क अनुसार अथको गिक्षा दे ऐसे मनु- प्पको शिक्षक नियुक्त कर ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ शूरश्चन्वृहवित्माज्ञाकार्योश्वाविपतिश्चमः॥ दित मोर अहित, पोषण, मान, (प्रमाण । वाजसेवासुकुशलपल्याणादिनियोगवित् । यान, (गति ) दस्त, अवस्या इनको जो जाने दृढांगश्चतयाशूसमकार्यावाजिसवकः ॥३६॥ ऐडा शरवीर पक्षका नाता पिदान् अञ्चका घोटीकी सेवाम गटपल्याण (चार- मधिपति नियुक्त करना ।। ३०॥ जामा वगैरद ) की स्थितिका ज्ञाता होत एभिर्गुणेशमयुनाधुर्यान्युग्यांचवेत्तियः । और गर वीर ला नी हो यह घोनाका स्यस्यमारंगमनभ्रमणपरिवर्तनम् ॥ ३१॥ नीतिगमामव्यहादिनतिविद्याविशारदाः । माफ करना ॥ २६ ॥ इन पोकगीन संयुक्त धुएं भयाद धुरये योग्य, पुष मयांत पान यदनको समय, अनालामध्यवयमागदांताहांगकाः ३७॥ सबोका माता भीर रपरी गरता और गमन नो नीतिशाजा भनसमा नम्रता और अमीर परिमनन (टीटाना)नि चतुर होपाठक न हो, यौगनयो भोक्ता, श. नो पार जान mr सारथी नियुक्त गीर हांगदो॥७॥ गरा म्वमिनिम्तानित्यम्बार्मिमतारिपुदिपः । नमारमानामध्यपालनागरः । वापानिपावश्याम्यागकरसम्भाः ।। ग्यपान्यागापांपांगनिपिन ॥ 3 ॥ धिमानताकागजाजपाविना .
२.] भापाटीकासहित । (४३) RECES अपने अपने धर्म नित्य स्थित और सिपाहियोको जो कार्य पता उसे स्वामीके भक्त, शत्रुओके द्वेषी, शुद्र, क्षत्रिय, सेनानी कहते हैं और जो सिपाहियोंकी वैश्य म्लेच्छ, वर्णसङ्कर, इन जातियोंके हो३८ परिवृत्ति (चदली) कर उसे पत्तिप कहते ऐसे सेनाधिप और सैनिक (सेनाके योद्धा) हैं ॥ ४ ॥ जयकी इच्छा करनेवाले राजाको करने सोवधानयामिकानांविजानीयाच्चगुल्मपः । चाहिये । जो सिपाहियोंकी सावधानीको जान उसे पंचानामथवापण्णामधिपः पदगामिनाम् । गुल्मप कहते हैं। योज्यसपत्तिपाल स्यात्रिंगतांगाल्मिकः तिनिका कतिसंत्यतैःकतिप्राप्तंतुवेतनम ४५॥ स्मृतः । शतानांतुशतानीकस्तथानुशाते. प्राचीना केकुत्रगताचतान्वेत्तिसलेखकः । कोवरः ॥ ४० ॥ गजाश्वानांविंशतेश्चाधिपोनायकसंज्ञकः ॥ पांच अथवा छः सिपाहियोका अधिप जो ये सैनिक कितने हैं और कितना वेतन हो ॥ ३९ ॥ उसे पत्तिपाल कहते हैं तोस (नौकरी) मिली ॥४५॥ प्राचीन सैनिक सिपाहियोके अधिपतिको गोल्मिक कहते हैं कितने हैं और वे कहां गये इसको जो जाने शतके अधिपको शतानीक और अनुशतिक उसे देखक कहते हैं । बीस हाथी और बीस उससे उत्तमको कहते हैं ॥ ४०॥ अश्वोका जो अधिपति उसे नायक कहते हैं ॥४६॥ सेनानीलेखकश्चतशतप्रत्यधिपाइने । उक्तसंज्ञानस्वस्वचिद्वैलाछितांश्चनियोजयेत् । साहस्त्रिकस्तुसंयोज्यस्तथाचायुतिकोमहान् ॥ उक्त संज्ञावालोको अपने अपने चिहोसे समानी और लेखक ये सब 'शतके अधि-चिहित करके नियुक्त करें। पति होते है और सहस्रका अधिपति और दश अजाविगोमहिष्येणमृगाणामधिपाश्चये ॥ सहस्रका अधिपति नियुक्त करना ॥ ११ ॥ बकरी, भेड, गौ, भेख, मृग इनके अधि- व्यूहाभ्यासशिक्षयेद्यासायंप्रातस्तुसैनिकान् । पोंको भी इसी प्रकार चिहित करके नियुक्त जानातिसशतानीकामुयोद्धंयुद्धभामिकाम् ॥ करै ॥ १७ ॥ एम्पद ( कवायद) के अभ्यासको जो वृद्धिपुष्टिकुशलास्तद्वात्सल्यानिपीडिताः ! सायंकाल और प्रातःकाल सैनिकोको शिक्षा तथाविधागजोष्ट्रादेर्योज्यास्तत्सेवकाआप ॥ दे और युद्धभूमिमें युद्ध करनेको जो जाने तिनकी वृद्धि और पुष्टिम जो कुशल और उसे शतानीक कहते है ॥४॥ तिनपर दयालु और पीडा रहित हो और तथाविधानुशतिकः शतानीकस्यसाधकः । करने ॥ ८ ॥ तेसेही गज ऊंट आदिक भी सेवक नियुक्त जानन्तियुद्धसम्भारकार्ययोग्यचसैनिकम् ॥ युद्धप्रवृत्तिकुशलास्तित्तिरादेश्चपोपकाः । तेनाही दातानीकका शिक्षक अनुशतिक शुकादेःण्ठकाःसम्यग्छयेनादेःपातबो- होता है, जो युद्धक सम्भारी और कार्य में कुशल सेनाकै सिपाहियोको जान ।। ४३ ॥ धकाः ॥ ४९ ।। तत्तहृदयविज्ञानकुशलाश्चसदाहिते। निदेशयतिकार्याणिमनानीर्यामिकांश्चसः । पुद्धकी प्रवृत्तिमं कुशल और तित्तिर भादि. परिवृत्तियामेकानांकरोतिरावपत्तिपः ॥ के पोषक (पालक) और तोतोंके उत्तम पा.
शुक्रनीति। [अध्याय- उर और शिवरय पात (गिरने ) ये बोधक,पीताचौतरियायज्ञोग्मसंयोगभेदवित् । निपुन ररने ।। ४. ॥ तिस- के हदयरे जा. नने सदा पुराष्ट्र वे दो। कियामुफुगलोद्रव्यगुणविपाकनायकः ।। मानाकृतिमभावर्णजातिमाम्यानमाल्य- मलीन शुद्ध पाकका ज्ञाता रसके संयोग भेदका ज्ञाता ॥ ५६ ॥ क्रिया कुशल ट्रायके रिव ॥ ५० ॥ गुणका वेना जो दो से पाक्नापक करना। मानांस्यणरजतमुद्राणामविपश्चसः । फरपुष्पवृद्धिदतुंगेपणंशोधनंतया ॥१७॥ मान, नाकार, प्रभा, वण और जाति इनमीनाम्यतासे मन्यया वेत्ता हो । ५० पादपानांययामालंकभूमिजलादिना । बद रत्न. मग चांदी मुद्रा इनका मधिर हो । तपनंचवोत्तयागमाधिपतिश्चमः ॥२८॥ दासम्नमधनीयस्तुग्यवहावियाग्दः । कर परको पृदिया कारण रोक धनप्राणोनिकृपणःोशाध्यक्षामएवहि ॥ (दगाना ) और शोधन ॥ ५५ ॥ सांग जितेन्द्रिया धनी, परमारम चतुर, धनम जोना और उनका भपज ( इलाज ) को (रोपण) भूमि जळादिवस पादनुसार नि माग हो, मत्यन्त शरण मेमा योशा-आरामा अधिप होता है, ।। ५८ ॥ पश होता है। देशभटजतिमदास्थलमृत्मपलानरः। मामादपरिग्यांदुर्गमाकारंपतिमांतया । कमियादानमूल्योनामावस्यवसपः ।। पन्त्राणिमनुबंधनवापांकृपतदागरुम ५९ ॥ देन मीर जानितभेद म्पाट मुकम पर से पुपपरो गृह मनानेका मधिर की भौर निपटनामे ॥ ५२ ॥ रंगमा मान भी प्रासाद (मकान गराई किटाप्रापार परयोग बरा साता भोर शानका ना सीमा गी प्रतिमा ( प्रमाग ) पत्र पुट यांधा मदिराना पापी (पाठी)गपतटामइनका ज्ञाता दो नीटांगुस्नेपथ्यनंटपाटे पगिकियान ॥ तयापुफन्निीसुदनगदृर्धगतिमियाम । प्रमाणन मोनोनजनानिनिमः। सुमिपम यामम्परमुग्म्पनुपयाभोत् ।। ना raniनन । फजानानिपगाविपतिःस्मृतः ।
२.] भापाटीकासहित। (४५) वह पुरुष देवताओका सन्तोषकारी होता देषी न हो गुणको ग्राहक हो अच्छी विद्याका हे जो अपने धर्माचरणमें चतुर और देव- ज्ञाता हो वह परीक्षक हो । ताके आराधनमें तत्पर हो ।। ६२ ॥ लोभी न प्रजानष्टानहिभवेत्तथादंडविधायकः ६९॥ हो वह देवपुष्टिका पति ( पुजारी) करना ॥ नातिकरोनातिमृदुःसाहसाधिपतिश्चसः । याचकविमुखनैवकरातनचसंग्रहम् ॥ ६३ ।। (साह ) फौजदारीका अधिपति हो इस दानशीलश्चनिलाभोगुणजश्चनिरालसः ॥ प्रकार दंड दे जिस प्रकार प्रजा नष्ट न होय दयालुदुवाग्दानपात्रविन्नतितत्परः ६४ ॥ ॥ ६९ ॥ और अतिकठोर और अतिकोमल जो नित्यमेभिर्गुणयुक्तोदानाध्यक्षामकीर्तितः। न हो। आधकेभ्यश्चोरेभ्योहाधिकारिगणात्तथा । वह दानाध्यक्ष करना जो याचकको विमुख न करें और संग्रह न करै ।। ६३ ॥ दानशील प्रजासंरक्षणेदोग्रामपोमातृपितृवत् । हो लोभी न हो गुणी हो आलसी न हो दयालु जो ठग और चोर अधिकारियोके समूहरू हो कोमलवचन कहता हो पात्रका ज्ञाता हो मजाकी रक्षा चतुर हो ॥ ७० ॥ और जो नमस्कार, तत्पर हो ॥ ६४ ॥ प्रतिदिन जो माता पिताके समान प्रजाकी रक्षामें चतु- इन गुणोखे युक्त हो वह दानाध्यक्ष कहा है ॥ र हो ऐसा पुरुष ग्रामका अधिपति हो । व्यवहारविद प्राज्ञावृत्तशीलगुणान्विताः । वृक्षान्संपुप्ययत्नेनफलंपुष्पंविचिन्वति ।। विौमित्रेसमायेचधर्मज्ञाःसत्यवादिनः ॥ मालाकारइवात्यतंभागहारस्तयाविधः ॥ निरालसाजितकोधकामलोभाःप्रियंवदाः । ऐसा पुरुष भाग (कर) का ग्राहक हो जो सभ्याःसभासदःकार्यावृद्धाःसर्वाजातिपु॥ माळीके समान वृक्षोको यत्नले पुष्ट करके फल फूलोको बोने अथात् मजाकी अत्यंत ऐसे सभासद हो जो व्यवहारके ज्ञाता रक्षापूर्वक कर ले ॥ ७ ॥ सदाचारशील गुणोसे संयुक्त हो ॥६५ ॥ शत्रु और मित्रमें जो सम हो, धर्मज्ञ और सत्यवादी गणनाकुशलोयस्तुदेशभाषाप्रभेदवित् । हो मालसी न हों क्रोध काम लोभ ये जिन्हो- असंदिग्धमगूढार्थावलिखेत्सवलेखकः ॥ ने जीत लिपे हों और प्रियता हो । ६६ ॥ ऐसे सम्पूर्ण जातियों में वृद्ध और सभामे साधु देशभाषाके भेदका ज्ञाता हो ॥ ७२ ॥ और ऐसा पुरुष लेखकही जो गणनामें कुशलदो सभासद करने ॥ संदेहरहित स्पष्ट जो लिखे ॥ सर्वभूतात्मतुल्योयोनिस्पृहोतिथिपूजकः । शस्त्रास्त्रकुशलोयस्तुदृढांगश्चनिरालसः । दानशीलश्चयोनित्यं सर्वेसत्राधिपःस्मृतः ॥ यथायोग्यसमाहूयात्प्रनम्रामतिहारकः ।। यज्ञका अधिपति ऐसा हो जो सवको अपने ऐसापुरुष प्रतिहार (दत) हो जो शस्त्र अस्त्र मात्मा समान जाने और निलामी और में कुशल हो और दृढांग और आलसी न अभ्यागतोंका पूजक हो ॥ ६७॥ और प्रतिदिन हो॥७३॥ तथा नम्र होकर यथोचित आहान दानशील हो। कर (अमावे) परोपकारनिरतःपरमर्माप्रकाशकः ॥६८॥ ययाविक्रयिणांमूलधननाशीभवेन्नाहि । निर्मत्सरोगुणग्राहीसद्विद्यास्यात्परीक्षकः ॥ तयाशुल्कंतुहरतिशौकिक सउदाहतः||७|| जो परोपकारमें तत्पर हो परमर्म (छिद्र) ऐसा पुरुष शौल्किक (महसून्द्रका अधिप) प्रकाश न करे ॥ ६८ ॥ किसीकी उन्नतिपर दो जी जैसे लेन देनहारोंके मूलधनका नाश भापाटीकासहित । (४७) सेवा नियुक्त करने और वे सेवक देड और इतरके दुर्गुणोको जो सूचित करें ये भांड वेतको धारण करें और उत्तम शिक्षावान् कहाते है और जो अनेक रूपोको धार के हो ॥ ८७॥ नर्तक होते है। आराम और कृत्रिम वन- संधीठोयितान्सप्तस्वरान्स्थानविभागतः। ( बाग) के यनाने हार और किलेके उत्पादयति संवेत्ति संसयोगविभागतः। बनानेहारे ।। ९४॥ महानालिकयंत्रस्थगोल क्ष्यविभेदिनः । अनुरागंसुस्वरंचसतालंचप्रगायति ।। ८९ ॥ सा गानेवालीका अधिपति हो जोवनीकलयुयंत्रानेयचूर्णवाणगोलासिकारिणः ॥९॥ कंठसे उत्पन्न सात स्परोके स्थानको विभाग तोपके गोलसि लक्ष्य (निसाने)फे भेदन (भेट) से जाने ॥ ८८ ॥ स्वरोंको उत्पन्न करें करनेहारे बंदूक, आग्नेय चूर्ण ( बारूद ) और जाने ओर सयोग और विभागले प्रस चाण गोले और असि (तलवार ) इनके करन- नता और उत्तमस्वर और ताल और नत्यस हारे ॥ ९५ ।। जो गाये ॥ ८९॥ अनेकयंत्रशवाम्बधनुस्तूणादिकारकाः । सनृत्यं वागायकानामधिपःसचकीर्तितः । स्वर्णरत्नायलंफारघटकाग्थकारिणः॥ ९६ ।। तथाविधाचपण्यत्रीनिर्लजाभावसंयुता॥९॥ अनेक प्रकारके यंत्र शस्त्र, अख, धनुष, ऐसा पुरुष गायकोका अधिप कहा है और तरकस इनके करनेहारे और स्वर्ण रत्न आदि इसी प्रकारको गणिका (वेश्या) हो जो निन्ज अलंकारोंको गढनेहारे और रथके करने हो और भाव (प्रीति ) युक्त हो ।। ९०॥ हारे ॥ ९६ ॥ श्रृंगाररसतंत्रज्ञासुंदरांगीमनोरमा । पापाणचटकालोहकाराघातविलेपकाः। नवीनोत्तुंगठिनकुचामुस्मितदर्शिनी ॥९॥ कुंभकाराःशौल्लिकाश्चताक्षणोमार्गकारकाः शृङ्गार रसक तन्त्रको जानकार सुन्दर, पत्थरके और लोहे के पनानदारे और धातुके अंगवाली मनोरमा ( मनके हरनेवाली) लेपक (मुलमा कारनेहारे) कुम्हार शुल्म के नवयौवना ऊंचे है कठोर स्तन जिसके और यननिहारे और बढई और सडकके पनाने- हँसमुसी हो ॥ ९१ ।। हारे ॥ ९७ ॥ येचान्येप्ताधकास्तचतयाचित्तविरंजकाः। नापितारजकाश्चैवांशिकामलहारकाः। मुभृत्यास्तेपिसंधार्यानृपेणात्महितायव ॥९२॥ वार्ताहराःसौचिकाश्चराजचितारधारिणः॥९८ जो वेश्याके इतर साधक हैं ये भी तिसी- नाई, धोवी, वशीकै लामहारे मल शोधक प्रकार चित्तकै रंजक हों और उन वाधको दाकवाल, दरजी ये संपूर्ण प्रोक्त राज- भृत्य (नौकर) भी श्रेष्ठ हो ऐसे साधक चिहानके धारण करनेहारे हो ॥ १८ ॥ अपने हित के भय राजाको रखने ॥ ९ ॥ भेगेपटहगोपुन्छशंखोप्यानिनिःस्वनः । वैतालिकाःसुकवयोवेत्रदंडयराश्चये। येव्यूहरचकायानापयानादिकबोधकाः ९९ ।। शिल्पज्ञाचकलारतोयेसदाप्युपकारकाः ९३॥ नगारे, ढोल, रणसीगे, शख, वशी इन भांड ऐसे ही जो सुन्दर कवि हों येत और शब्दोस जो पदको रचनामें तत्पर है और दंडके धारण करने हारे ही कारीगर (कला-जोयान, और अपयान (रूपापद) के शिक्षक धारी) हो भोरजो सदा उपकारी हो ॥ ९॥ है ॥१॥ दुर्गुणान्सूचकाभाणानर्तकाबहुरुपिणः । नाविकाःसनकाव्याधामकेराताभारिकाअपि । आरामकृत्रिमपनकारिणोद्र्गकारिणः ९४ ॥ शवसंमार्जनकगजलयान्यवाहकाः।।२०० -- (१८) शुक्रनीति। [ अवाव- मल्लाह, रानक (पोदनेवाले) शास्रव व्याध! उत्यायपश्चिमेयामेगृहकृत्यंविचित्यच । भीत, भावं ऐजानेवाले गवे मार्जन कृत्वोत्सर्गदेवहिस्मृत्वास्नायादनतरम् 1101 करनेहार और जो जलमे अन्नके पहुँचा- रात्रिक पिछले पहरमं उठकर और गृह नहार ॥२०॥ कार्यकी चिंता करके और शोचको कर इस आपणिनाश्चगणिकापाद्यनायामजीविनः । देवके स्मणांनतर स्नान करै॥७॥ नुवाया माकुनिकाश्चित्रकाराश्चवर्मकाः॥ प्रात कृत्यंतुनिर्वययावत्सार्थमुहूर्तकम् । पाजारवाले, वेश्या, नट, कुरी, शकुनके गत्वास्वकीयशालांवाकार्याकार्यविचित्यच ॥ ज्ञाता, चित्रकारी ओर चमार॥ १॥ तीन घडी दिन चढे पर्यंत अपने मात का गृहसंमार्जका पानधान्यवस्वप्रमार्जकाः । के कृत्यको करके अपनी कार्यशाला (कचह भय्यावितानास्तरणकारकामासमापि। री) म जाकर और कार्य और अकार्य यर झारनेदारे और पात्र, अन्न, वन, चिंता करके ॥८॥ इनो मार्जन करनेहारे गय्या पर विलौना विनातयाविशंतंतुद्वास्थ सम्यानरोधयेत् । करनेहारे और शिक्षा देनेदारे ॥॥ निर्देगकार्यविज्ञाप्यतेनानप्तःप्रमोचयेत् ॥९॥ आमोटा स्वेदमदूपकागस्तांबूलिकास्तया राजाकीआज्ञा बिना जो कार्यशालाम प्रदेर होनाल्पमिणचेतयोज्या कार्यानुरूपतः ।। करे उस राजाका द्वारपाल रोके तदनन्त सुगन्ध द्रव्प, धूपबत्ती, तपोळी, नीचर्म उसके निवेश कार्य (प्रार्थना ) को राजा का इन तिची कार्पकै अनुसार नियुक्त जताकर और राजाकी आज्ञास उसे छोड प्रोक्तंपुण्यनममत्यपरोपकरणतया । दृष्टागतासभामध्येराज्ञदंडधर नमात् । आजायुक्ताबभृतकान्सततवारयन्नृपः ॥४॥ निवेद्यतन्नती पश्चात्तेपास्थानानिसूचयेत् ॥ सत्य और परोपकार मत्यत |ष्ट कहा है। सभार मध्यमे आप मनुप्योयो दण्डधा और राजा अपनी माता पुक्त सेवारो (चौथीदार) कम निवेदन मेरे और ना निरन्तर ॥५॥ होकर पचात् उन स्थानों मुचित छ हिंगागरीपनीपापेभ्यानृतभाषणम् । गरीयस्तग्मेवाभ्यायुक्ताभित्यानपारयेत् ॥ ततोगनगदंगत्वानप्तांगनमन्निधिम । करे ॥३॥ १० २.] भाषाटीकासहित । (४९) 1 इष्टिको करके किसी इतर मनुष्यकी ओर न जभणंगात्रभंगंचपवारफाटेंचवर्जयेत् । देखे ॥ १२ ॥ राजादिष्टतुयास्थानंतत्रतिष्ठन्मुदान्त्रितः॥१९॥ अप्रिदीप्तमिवासीददाजानमुपशिक्षितः । जम्भाई अंगका भंग (आलस्यसे जोडीका आशीविपभिवकुद्धंप्रभुप्राणधनेश्वरम् ॥१३ ॥ चटकाना) ( मटकाना) राजाने जो स्थान तदनन्तर शिक्षाको प्राप्त होकर अपने प्राण बता दिया है वहांही आनन्दसे बैठा रहे १९॥ और धनके ईश्वर प्रभू (राजा) के समीप प्रवीणोचितमेधावीविजयदेभिमानताम् । इस प्रकार कि मानो प्रज्वल अग्निरूप है और क्रोधी सर्पक समान है॥ १३ ॥ आपद्युन्मार्गगमनेकार्यकालात्ययेपुच ॥२०॥ यत्नेनोपचरेन्नित्यंनाहमस्मीतिचिन्तयेत् । प्रवीण (कुशल ) उत्तम बुद्धिमान् पुरुष अभिमानको त्याग देभापत्ति और कुमार्गकी समर्थयश्चतत्पशंसाधुभाषेतभापितम्॥ १४ ॥ प्राप्ति (हलन) और कार्यके नाशमें भी राजा- सेवक बड़े यनले स्वामीकी सेवा करे का हित चाहे ॥ २० ॥ जानों मै हुँ नही और स्वामीकै पक्षको पुष्टि अपृष्टोपिहितान्वेपीब्याकल्याणभाषितम् । करता हुओ कोमल वाणीसे भाषण करें ॥१४॥ प्रियतथ्यंवपथ्यंचवदेद्धमार्थकंवचः ॥ २१ ॥ नियोगेनयाव यादयसपरिनिश्चितम् । राजाके कल्याणकी इच्छा करनेहारा से- खप्रबंधगोष्टीपुविवादेवादिनांमतम् ॥१५॥ यक विना पछे भी कल्याणरूपी हो वचन अच्छा है प्रबन्ध जिनमें ऐसी सभाओमें कहै और वह वचन भी प्रिय साय हितकारी. वादियोंके मतको और राजाकी आज्ञास और धर्म और अर्थक अनुकूल हो ॥२१॥ च्छिी तरह युक्तिसे वोले ॥१५॥ समानवाःयाचापितद्धितंबोधयेत्सदा । वेजानन्नपिनोब्रूयाद्भर्तुःक्षिप्रोत्तरंवचः । कीर्तिमन्यपाणांवावदेनीतिफलंतथा ॥२२॥ उदानुदतवेपास्यान्नृपाहूतस्तुप्रांजलिः १६॥ अपने सहयोगियोंके संग यातांसे राजाके स्वामीके प्रश्नका उत्तर जानता हुआ भी हितको ही बोधन फर और इतर राजाओंकी घ्र न दे और सेवक उद्दण्ड वेपको कदा-कीति और न्यायके फलको भी योधन करी।२२ चत् भी धारण न कर और राजा जव बुलावे व हाथ जोड़कर राड़ा रहे ॥ १६॥ दातात्वंधार्मिकः शूगेनीतिमानसिभूपते । उहांकृतनात श्रुत्वावनांतरितसंमुखः । अनीतिस्तेतुमनसिवर्ततेनकदाचन ।। २३ ।। दाज्ञांधारयित्वादौस्वकर्माणिनिवेदयेत् १७॥ हे राजन् तुम दाता और धर्मके कर्ता और यापके ज्ञाता हो और कदाचिद भी तुम्हारे राजाकी वाणीको प्रणाम करकै सुनकर मनमें अन्याय नही वर्तता है ॥ २३ ॥ और वस्त्रकी ओटमें राजाके सन्मुख होकर र प्रथम राजाकी आज्ञाको लेकर अपने ययेभ्रष्टाअनीत्यातांस्तदरेकीर्तयत्सदा । कार्याको निदन करे ॥ १७ ॥ नृपेभ्योह्यधिकोसीतिसर्वभ्योनविशेषयेत् ॥ नत्वासीतासनप्रद्वस्तरपाश्वसंमुखोज्ञया । अन्याय जो जो राजा नष्ट हो गये हैं उच्चैः प्रहसनकासष्टविनंकुत्स तथा ॥ १८॥ उनको रमाके आगे सदा कीर्तन कर और राजाके समीप आसनपर उद्धत होकर राजासे ऐसे न कहै कि तुम सम्पूर्ण राजाओसे बैठे और सन्मुख आज्ञासे पेठे ऊँचे स्वर अधिक हो ॥ २४॥ हती, भूकना और किसीकी निन्दा न परायदेशकाल.देशकालेचसाधयेत् । कर ॥१८॥ परार्थनाशनंनस्यात्त्याचूयात्सदैवहि ॥ २५ ॥ ४
[ अध्याय-
(५०)
शुक्रनीति ।
देश और काल का ज्ञाता सेवक इतरके प्रयो- खीभिस्तदार्षिभिः पारिभूतगिकृतः ।
जनको सम्पूर्ण देश और कालम सिद्ध करें!
और परके प्रयोजनका नाश जसे न हो इसी एकार्यचर्यासाहित्यसंसर्गेचविवर्जयेत्।। ३२ ॥
प्रकार सदा राजास कहै ॥ २५॥
स्त्री स्त्रियोंके रसिक पापी राजाने जिनको
निकास दिया हो इनके संग यास और सबंध
नकपयेत्यजांकामिपतञ्चनृपः सदा ।
को त्याग दे॥ ३२ ॥
अपिस्थाणुवदासीतशुष्पपरिगतः क्षुधा२६॥ वेषभाषानुकरणनपुर्यात्पृथवीपतेः ।
राजा किसीकार्यके मिपते प्रजाको दुखित संपन्नोपिचमेघावीनस्पर्वतचतद्गुणैः ॥३३॥
न करै चाहे क्षुधात पीडित सूखते हुए वृक्षके विद्वान् मनुष्य संपन्नहोकरभी राजाके वे
समान भी स्थित रहै ।। २६॥
और भाषाका अनुकरण न करे राजाके गुर्ग
नत्ववानर्थसम्पन्नांवृत्तिमीहतपंडितः । की ईत्योभी न करे ॥ ३३ ॥
यत्कार्येपोनियुक्तः स्याद्भूयात्तत्कार्यतत्परः॥ रागापरागोजानीयाद्भर्तुः कुशलकमवित् ।
अनर्थसे युक्त आजीविकाकी पडित चेष्टा इंगिताकारचेष्टाभ्यस्तदभिप्रायतातया ॥३४॥
कभी न करें और जिस कार्यमें जो नियुक्त हो कुशल कर्मका ज्ञातामनुष्य इंगित आका
उसी कार्य में तत्पर रहै ॥२७॥
और चेष्टास राजाकी प्रीति क्रोध और अभि
नान्याधिकारमन्विच्छेन्नाभ्यसूयाच्च केनचित् ।
प्रायको जाने ॥ ३४ ॥
नन्यूनलक्षयेत्कस्यपूरयीतस्वशक्तितः ॥२८॥ तद्दत्तवस्त्रभूपादिविसंधारयेत्सदा ।
अनर्थक कार्यकी इच्छा और निन्दा न करे न्यूनाधिक्यस्वाधिकारकार्यनित्यनिवेदयेत् ३५
औरजो किलोको न्यूनता अपनेको प्रतीत हो राजाके दियहुए वस्र आभूषण आदि चिहरी
जाय तो अपनी शक्ति के अनुसार सम्पूर्ण सदा धारणकरें और अपनी पदवीके न्यूनौर
फरदे ॥ ८॥
अधिक कार्यको प्रतिदिन निवेदन कर ॥३॥
परोपकरणाढत्पन्नस्यान्मिनकरंसदा ।
तदर्थीतत्कृतांवातीशृणुयाद्वापिकर्तियेत् ।
करिष्यामीतितकार्यनकर्याकार्यसम्बनम् ॥
चारसूचकदोषणत्वन्ययायदेन्नृपः ॥३६॥
राजाकै प्रजाजनकी और आज्ञाको को हुई
परके उपकारस इतर मित्रका और कोईक-
नप नही और में तेराकार्य सदा करूगा ऐसा वातो को सुने दूत और सूचके दोष
चहकर कार्यके करनेमविलम्ब न करै ॥ २९ ॥ जो कुछ राजा अन्यथा कहे ॥२६॥
द्वारकुर्यात्तममयशेमाशंदीधैनरक्षयेत् ।
शृणुपान्मानमाश्रित्यतथ्यचन्नानुमोदयत् ।
गुह्यकर्मचमंत्रंचनभर्तुःसंप्रकाशेपत् ॥ ३०॥ आपद्गतंसुभतरिकदापिनपरित्यजेत् ।। ३७
जो समय हो तो पायको शीघ्र करे और तो उसे मौन होकर सुने और सत्यके समान
यहुत दिनका विश्वास न दे और भपने स्वामी उसमें समति न दे और भापति उमर
में गया और मन्त्रमा प्रकाशन करी॥३०॥ श्रेष्ठ स्वामीको कदापि न त्यांग ॥३७॥
विपंचविनाशंयमनसापिनचितयेत् ।
एफवारमप्याशितंयत्यानं द्यादरेणच ।
गजापाममिनास्तिनकामविवरेदिति ॥३१॥ तदिष्टचिंतयेनित्यपालकस्पांजसानकिम् ३८1
मभी किसीके देष भौर नाराको वितान एकपारभी निप्सक भत्रका भादरते भान
गारभार भागना परम मिनई इम रियास किया हो उस पालक इटको चिन्ता सुध
सपाटन विचर..
क्यो न फर अयान अपर करे॥१८॥
२.] भाषाशासहित । 37231 (५१) अप्रधानः प्रधानः स्याकालेचात्यंतसेवनात् । उभीतरस्थिगलक्ष्मीविपुलासंमुखीभवेत् । प्रधानाप्रधानः स्यात्सेवालस्यादिनायतः३९ अन्याधिकारवृत्तंतुनबमाछूतमप्युत ४५ क्योकि समयपर अयत सेवा करनेसे भमाधानभी मनुष्य प्रधान हो जाता है और वहां लक्ष्मी स्थिर और बहुत और सन्मुख सवा करने में आलस्यस प्रधानभी अप्रधान होती है और अन्य अधिकारके वृत्तांतको होजाता है॥ ३९ ॥ सुनकर भी न कहै ॥ ४५ ॥ नित्यनेमेवनस्तोभृत्योराज्ञः प्रियोभवेत् । राजानशृणुयादन्यमुसतस्नुकदाचन । स्वस्वाविकारकार्ययद्राक्कुर्यात्मनायतः४० नवोधयंतिवाहितमहितंवाविकारिणः॥४६ ॥ और राजाभी अन्यकै मुखसे अन्यका नित्यसेवामें जो तत्पर होता है वह भरय राजाका प्रिय होता है क्योकि अ- वृत्तांत न सुने और अधिकारी हित और परे र अधिकारकै कामको प्रसन्नमन होकर अहितका योधन न करे ॥ १६ ॥ शीघ्र करे॥४०॥ प्रच्छन्नवैरिणस्तेतुदास्परूपमुपाश्रिताः । जकर्यामहमाकार्यनीचंराजापनदिशेत् । हिताहितंनभृणोतिराजामंत्रिमुखाच्चयः॥४७॥ तत्कार्यकारकाभावराजाकार्यमदेवहि ४१ व दासरूपको प्राप्त हुए गुप्तवैरी हैं और जो राजा मन्त्रियोके मुखले हित और महि. और कार्यको शीत न करे और राजाभी तको न सुने ॥ १७ ॥ नीच मनुष्यको कार्य करनेको न कहै यदि उस कार्यका करनेवाला न दोष तो राजा सदम्यूराजरूपेणप्रजानांवनहारकः । स्वयं उस कामको करे ॥ ४१ ।। सुपुष्टव्यवहारायेराजपुत्रैश्चमंत्रिणः ॥ ४८ ॥ कालेयदुचितंफर्जुनीचमप्युत्तमोर्हति । वह राजा राजाका रूप धारे प्रजा यस्मिन्प्रीतोभवेद्राजातदनिष्टनचिंतयेत् ४२॥ धनका हरनेहाराचोर है और जो मन्त्री रा- और किसी समयपर उत्तम पुरुषभी नीच जाके पुत्रोंके संग प्रबल व्यवहार करते हैं वही कर्म करनेको योग्य होता है और जिस मनु- मंत्री है ॥४८॥ पंपर राजाको प्रसन्नता है उसके अनिष्टको विरुध्यांतचतःसाकतेनुप्रच्छन्नतस्कराः । चिंता न करे ॥४॥ बालाअपिराजपुनानावमान्यास्तुमंत्रिभिः४९।। नदर्शपत्स्याधिकारगाग्वंतुकदाचन । और जो मत्री राजपुत्रीकै संग विरोध परस्पांनाभ्यसूयुर्नभेदनामधु-कदा ॥ ४३॥ करते है वे यस तस्कर हैं और चालकमी अपने अधिकारके गौरव (वाई) को राजपुत्रोंका अपमान न करना ॥ ४ ॥ कदाचित भी न दिखावे और राजाके वे पुरुष सदासुबहुवचनैःसंबोध्यास्तेप्रयत्नतः । परस्पर निन्दा भोर भेटको न करें ॥ ३ ॥ असदाचरितंतेपांवचिद्राज्ञेनदर्शयेत् ॥ ५० ॥ राज्ञाचाविकृताःसंत स्वस्त्राधिकारगुप्तये । और राजाके पुत्रोको सदा भली प्रकार अधिकारिगणोराजासद्वृत्तीयातिष्टतः॥४४॥ बहुवचन (चया भी राजकुमारा: ) संयो- जो अपने २ अधिकारको रक्षाके लिये धन करे और उनके दुराचार राजाको राजाने निपत किये हों, अधिकारियोंका [दिखावे ॥५॥ समूह और राजा ये दोनों जहाँ सदाचार स्त्रीपुत्रमोहोनलवांस्तयोनिदानश्रेयसे । तत्पर रहते हैं॥१५॥ राजोपश्यत कार्यमाणमंशयितवपत् ॥ ५१ [अध्याय- शुक्रनीते । खो और पुत्रका मोह पलवान् है इसते नावमान्याराजपत्नीकन्याद्यपिचमंत्रिभिः । उनी निंदा क्त्याणकारिणी नही है गजा राजसंबंधिनःपृज्याःसुहदश्चययार्हतः ॥५८ ॥ का भत्पत भावश्यक कार्य करे और जहाँ माणीका सशप हो ॥१॥ राजाकी पत्नी और कमा भादिका मंत्र आनापयाग्रतश्चाकरिष्येतत्तुनिश्चितम् । आदि अपमान न करे, राजा संबंधी भीर मिव इनकाययायोग्य पूजन करना चाहिये ५८ इतिविज्ञाध्यापनमयतेतस्वगाक्तितः ॥१२॥ में भापर आगे स्थित भाशा दीजिय पाहूतस्तुग्गच्छेत्त्यक्त्वाकार्यगतमहत् । और Bष कार्यको निमपसे कम्गा मित्रायापिनवक्तव्यंगजकार्यमुमंत्रितन ॥२॥ गनामी माज्ञास और अपनी शक्ति के मनु- राजाक बुलाने पर भरने ? सकटी पार सार शीत करने में यान करें ॥२॥ सो त्याग कर शीत जाय, भीमपार प्राणानपिसंदयान्महत्कार्यनृपायच । मन्त्रित (निधित) रानाका कार्य मित्रकोनी भृत्पादनपुष्टवयनान्ययातुकदाचन ॥२३॥ न यता ॥ ५९ ॥ पटे कार्यभ राजा और अपने पुम्यक भृतिदिनाराजद्रव्यमदत्तनाभिलापयेत् । निमिन भाय अपने प्राणीकोभी दग्ध करदे और इतरफ निमित्त दग्ध न परे ॥५३॥ राजाज्ञयाविनाने उत्कार्यमाध्यस्थिकांतिम् । भृत्यायनहगासयुक्तयामाणहरोनृपः । भपनी भूति (मासिक) घे. पिना गना युद्धादीमुमह कार्यभृत्यमाणान्हरेन्नृपः ।। दरको बिना दिये एलान कर भर सनासी भासक यिनामापम्प भधिक भूषि यतन (नागरी) मे धनके दरनेहारे सप गोभी इन्हा न करे ॥ ६ ॥ भाप भार पुलिस माणी परनेदार गना पांकि पुट मादिण्टे काम राना ननिहन्याल्पालीभासतपापकस्यचित् । भरपोफ मागदरता ॥४॥ म्पनीपुप्रयनमाणःकामंपन्नृपम ६१ नान्यथाभूतिरूपेणभृत्यांगनयनत् । भौर निम मिमी पारा अन्यवादग्तस्नानुभातस्वनाश ५५ ॥ लोभले न न परेभीर भनी सी भाप मरने में समापन समाग समपपर रागारमा परे ॥ मानामा भाप अपनदो उत्कोननग्रहीयान्नान्ययावयन्नाम् । नागानां ॥५॥ अन्ययाद कभपनित्यपादाम ॥ रामानुगुक्गजस्तृमान्य मापारि गदा ॥ भीर आग ( पित)ी ar रन्पूनामान्यतयां नमनापियोगणः ॥ ॥ न वो भी मप पर गनापी यो का
२.]
भापाटीकासहित।
.
नवीनमरशुरुकादेलोंकउद्धिनतेततः ।
दास और टहलवे अत्यन्त अधम हैं और
नीच कायके कत्ती इनसे भी अधम जानने
गुणनीतियलद्वेषीलभूतोप्यधार्मिकः ॥ ६४॥ योग्य है ॥७॥
नवीन कर (दंड) और शुल्फ (महसूल) पुरोगमनमुत्थानस्वासनेसन्निवेशनम् ।
से लोक दुःखित होते हैं और कुलीनभी कुर्यात्मकुशलपनकमात्मुस्मितदर्शनम् ॥
राजा जो गुणनीति सनाका ढेप करता है
वह अधार्मिक है॥६॥
सन्मुख गमन अभ्युत्थान अपने भासनपर
बेटाना शठ पूछना कर देखना इन्हें
नृपोयदिभवेत्ततु त्यजेद्राष्टविनाशकम् ।
कमले ॥ ७९ ॥
तपदेतस्यकुलगुणयुक्तंपुगोहितः ॥ ६ ॥
राजापुगेहितादीनांत्वन्येपनिदर्शनम् ।
जो राजाती अपने राज्यको नष्ट करता होय
तो पुरोहित उसके स्थानमें गुणयुक्त उसके
अधिकारिगणादीनांसभास्यश्चनिगलस:७२।।
कुलसे उत्पन्नतो॥६॥
राजा पुरोहितादिकास करे ओर इतर जनों
को प्रीतिले देश और सभाम स्थित पुरुष
प्रकृत्यनुमतिकृत्वाल्यापयेद्राज्यगुप्तये ।
आलस्यको छोडकर अधिपति मादिकांसे
साम्बोदरंनृपातिष्ठेदवपातादहिःसदा ॥६६॥ इसीप्रकार आचरण करे ॥७॥
प्रकृतियोकी समतिसे राज्यकी रक्षा
विद्यावरसुशान्चंद्रोनिदावाौद्धिपत्सुच ।
निमित्त स्थापन करें, अलधारी मनुष्य राजा
दृर अनके पातके भयसे बाहर सदेव भजामुचवताव स्यात्रिवियोनृपः७३
टिक॥६६॥
विद्यावाना में शरदसतुके चन्द्रमासमान
सशस्वादशहस्तंतुयथादिष्टनृपमियाः । शरोम प्रोम्मस्तु सुर्यफै समान प्रजाओ
पंचास्तवसयुवमत्रिणोलेरखकाः सदा ॥ ६॥ म दप्तन्त ऋतुफे सूपके समान तीन प्रकार-
शन सदित जो राजा पारे हे वे राजा से राजा रहे ॥ ७ ॥
की आज्ञाक अनुसार दशहाय और मन्त्री व यदिब्राह्मणभिन्नेषु मृत्ववारयेन्नृपः ।
लेखक पांच हायके अन्तरस रहैं ॥ ६७ ॥ 'परिमयतिनाराययाहस्तिपकागजम् ७४
'सनपस्तुविनानैवतशबानोविशेरसभाम् ।
जो राजाम गमे हर जातियों में को.
पुगेहित श्रेष्ठतर श्रेष्टमेनापतिःस्मृतः ६८ ॥ मह रहे तो नीच उसे इस प्रकार तिर-
शप और भख सहित को भी मनुष्य कृत करते हैं जन पोल्यान् हाथी॥ ७ ॥
सनापतियोंके मिना सभामं न जाने, पुरो-'मृत्यायनात या परिहासाश्चीडनम् ।
हिन सवोत्तम है और सेनापति उत्तम कहा अपमानास्पदेतेतुराजानित्यंभयावहन ७५
है।॥ ६८॥
भृत्यादिके संग हती ओर कीतन न करें
समासुहचसबंधीयुत्तमामंत्रिणःरमृताः । और तिरसारकालेके सगहनी ओर कीर्तन
अधिकारिगामध्योऽधमादर्शकलेखको ६९॥ तो भयो वाताह ॥ ७ ॥
मित्र और सम्बन्धी समह( नउत्तमनमध्यम) पृथक्पृधख्यापयतिस्वायीसहनृपायते।
और मन्त्री उत्तम कहे है अधिकारियोका कार्यगुणवत्यात्सर्वेस्वार्थपगयतः ॥७॥
ममूह मध्यम और देवनहारे और लिग्वारी
अपने प्रयोजनकी सिदिके निमित वे
अपमानी पुरुप प्रथा २ विख्यात करते हैं।
यौवमतमीभृत्य परिचाम्गणःसदा ।
और वे अपने कार्य के गुण वक्तः . इसम
परिचागणानन्यनोविज्ञेयोनीचतावका ७०॥ स्वाय तत्पर है।। ७६ ॥
अधम ह ॥ ६९॥
२.] भापाटीकासहित। ब्रह्माने यत्नसे वाणी वर्ण म्बरसे युक्त जो राजा देता है वह तोपपत्र कहाता है कर लेखको और वृत्तांतको भापव्यय ( लेन-और भेटका पत्र भोगपात्र कहाता ॥९५॥ देन । के भेदसे दो प्रकारका लेस रक्खा पुरुषावधिकतत्तुकलावधिकमेक्वा । है ।। ८९॥ विभकायवधात्राद्या स्वरुच्यातुपररपरम् ९६ व्यवहाराक्रियाभेदाधुभयंबहुतांगतम् । और वह पत्र पुरुषकी अवधि पर्यंत अथवा ययोपन्यस्तसाध्यायसंयुक्तंसोत्तरक्रियम् ९०॥ कालको अवधि पर्यन्त होता है और जो व्यवहार के कार्योंके भेदसे वह दोनो प्रकार अपनी अपनी रुचिस विभक्त (जुदेहुप) का लेख पहुत हो जाता है और आज्ञाके अनु-भाता भादि ।। ९६ ॥ कूल कर्तव्य अपसे युक्त और उत्तर क्रिया विभागपत्रंकुर्वीतभागलेख्यंतदुच्यते । (अागे करना ) के सहित ।। ९० ॥ गृहभूम्यादिकंदत्त्वापत्रकुर्यात्मकाशकम् ९७॥ सावधारणकंचैवजयपत्रकमुच्यते । विभागके पत्रको करे उसे भागलेख्य कहते सामंतप्वयभृत्येपुराष्ट्रपालादिकपुयत् ॥९१॥ है, घर और भूमि आदिको देकर प्रकाशके अर्थ पचको करै॥ ९७॥ जिससे निश्चय जीतको माने उसे जयपत्र कहते हैं और जिससे सामंत (पासकैराजा) अनाच्छेद्यमनाहार्यदानलेख्यंतदुच्यते । भृन्य, राष्ट्रपाळ ( जमीदार) मादिको आज्ञा गृहक्षेत्रादिकंक्रत्विातुल्यमूल्यप्रमाणयुक् ॥ दा जाय ॥९२ ॥ और वह पत्र अनाच्छेद्य (मजबूत ) कार्यमादिश्यतेयेनन्दाजापत्रमुन्यते । हो और हरनेके अयोग्य हो उसे दान लेख्य ऋत्विकपुरोहिताचार्यमन्येष्वभ्यर्धितेपुच९२॥ कहते हैं पर और क्षेत्र आदिका क्रयण (खरीद) कर नुल्यमूल्य और प्रमाणसे पूर्वोक्त सामत आदिकोको जिसस कार्यको आज्ञा दीजाय उसे आज्ञापत्र कहते है। ऋत्विक, पुरोहित, भाचार्य और इतर पनंकारयतेयत्तस्यलेख्यंतदुच्यते । पूजितीको ।। ९२॥ जंगमस्थावरवद्वंकृत्वालेख्यंकरातियत् ।। कार्यानवेद्यतयेनपत्रंप्रज्ञापनहितत् ॥ जो पत्र कराया जाता है उसे क्रयण लेख्य कहते है जगम और स्थावरका बद्ध करके जो सर्वेशृणुतकर्तव्यमाज्ञयाममनिश्चितम् ॥१३॥ संख्या की जाती है॥ ९९ ॥ जिससे कार्यका निवेदन कियाजाय उसे ग्रामोदेशश्चपकुर्यात्सत्यलेखपरस्पाम् । प्रज्ञापन पत्र कहते है सपूर्ण मेरो माज्ञासे निश्चित कर्तव्यको सुनो ॥ ९३ ॥ राजाविशोधिधमाधमविपत्रंतदुच्यते ॥१०॥ स्वहस्तकालसंपन्नंशासनपत्रमेवतत् । ग्राम अथवा देश जो परस्पर देख करते देशादिकंयत्यराजालिखितनप्रयच्छति ॥९॥ है राजाके अविरोधसे और धर्मके भर्य जो किया जाता है उसे संवित्पत्र कहते अपने हस्त और कालले संयुक्त वह है ॥३०॥ शिक्षापत्र कदाता है और राजा अपने लेखसे देश भादि जिसको देता है ॥९४ वृद्धयाधनंगृहीत्वात्कृतवाकारितंचयत् । सेगमीयादिभिस्तुष्टः प्रसादलिखितहितत् । ससानिमश्चतत्मोक्तमृणलेरुपमनीपभिः । व्याजपर धनको लेकर किया ओर कराया भोगपत्रंतुकरदकृितंचोपायनीकृतम् ॥९५ ॥ साक्षिक सहित जो लेख उसको बुद्धिमानोंने सेना अथवा शूरवीरतासे प्रसन्न होकर ऋणलेख्य कहा है ॥१॥ युक्त ॥ ९८॥ ॥
देख पर . (५६) शुक्रनीति। [अध्याय- अभिशापेसमुत्तर्णिप्रायश्चित्ते कृतेवुधै । जो पत्र कायका बोधक हो और जिसस दत्तलेख्पसासिमद्यच्छुद्धिपत्रंतदुच्यते ॥३॥ सम्बन्ध भली प्रकार मिलता हो नमस्कार लोक अतिवादको निवृत्ति हुए पो और और आशीर्वाद जिसम हो स्वामी सेवक प्रायश्चितके अनन्तर एडिताने दिसायिक सेवनेयोग्य जिसने प्रतीत हो उसको देमपत्र लेपको शुद्धिस्त्र कहते ह ॥२॥ कहते ह॥ ८॥ मेलयित्वास्ववनाशा-व्याहारायमावका । एभरेषगुणैर्युक्तस्वावपर्कविनायकम् । कुर्वतिलसपपत्तच्चसामायिकर मृतम् ॥ ३ ॥ भाषापातुतज्ज्ञेयमयवावेदनार्थकम् ॥ ९॥ अपने अपने धनक भागको मिला कर इनही गुणांसे युक्त और अपने दुखका क्सिा व्यवहारकी सिद्धिक अर्थ जो बोधक अथवा यतानेका जा पर उस भाषा- करत है उसे सामायिक पन पत्र कहते है ॥९॥ रहने हैं ॥३॥ प्रदर्शितंवृत्तरेग्यसमासालक्षणान्वितम् । सभ्याविकारिनकृतिमभानभिर्नयः कृतः । समासाकथ्यतेचान्यच्छपायव्ययबोधकम्? तत्पनवाद्यमान्यज्ञेयतमतिपत्रकम् ॥ ४ ॥ दिखाया जो वृत्तात रेख्य और सक्षप सभासदाने जा सय जधिकार ओर से जित्तम लक्षण हा और सक्षपसे ही जिसम प्रजाआकान्याय किया है तिलका जो जानने शेप आमदनी श्य ( खयहा) ॥१०॥ ठिक पत्र उसे समतिस्त्र कहते ॥४॥ व्याप्ययापकमदेश्चमूल्यमानादिभिः पृथक् । रवीयवृत्तज्ञाना लिख्यतेयत्परस्परम् । विशिष्टमनिनस्तद्वियर्यिवहुभेदयुक ॥११॥ श्रीमगलपदाद्यवासपूर्वोत्तरपक्षकम् ॥ ५ ॥ अपने घृनातक ज्ञान अब श्री अथवा प्रमाण आदित विशिष्ट (उत्तम ) हो और न्यून और अधिक भेदा तथा तोल और मागरिकपद नसा आदिम हा, परस्पर यथार्थ अनक प्रकार भेदसे जा युक्त रिखाजाय, जिसम पृर और उत्तर टोनो पक्ष हो ॥ १ ॥ वत्सरवत्मरेवापिमासिमासिदिनदिने । असदिग्वमगृहायस्पटासम्पदसदा । अन्य यावर्तस्वात्मपगपत्रादिनामयुक॥६॥ हिरण्यपवान्यादिस्वाधीनचायतज्ञकम् १०॥ और जिसम सदेह नहा और जिस ना अन भाटिने अपने भाधीन यष म र माल. म और दिन पद, असम, अय ये स्पष्ट हो और जिप्तम न या व्यावृत्तिर अर्थ अपने पिता आदिवाखखै।०॥ रक्त ओर आमदनी को भी अपनेही आधीन नाम दो ॥६॥ एकदिनहुवचनयहिंस्तुतिसयुतम् । पगधीनकृतयत्तव्ययमनवनचतत् गमामासतदधीहीमनात्य दिचिहितम् ॥७॥ सधाश्चेत्रप्राचीनाय मचिनसंज्ञकः १३ एकचन, ढिययन चार पदरजनास पराधान किया जो धन जा सकी। ययोचित स्मृतिर सयुत ओर यप, मास, रतनन और मागन नो भाय (आमदनी ] पक्षा दिन नाम, जाति अादित नि उस सरित पद हे ॥१३॥ यपोडियाचीपमुक्तस्तथाविनिमयात्मक । कार्ययोचिनुनपन याटिकम । निश्तिान्पामिकयानिश्चितस्वामिन- सत्यमेसोय यमपनतरामृतम् ॥८1 स्तथा ॥१॥ हा ॥५॥ पिता।
भाषाटीकासहित ।
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व्यय दो प्रकारका है एक तो भुक्त दूसग पारितोप्यंभृतिमाप्तविजितायंधनंचयत् ।
देना, ओर तीन प्रकारका सचित है एक स्वस्वत्वाधिकसंतदन्यत्साहीजकंस्मृतम् २१
जिनके स्वामीका निश्चयहो दूसरा जिनको
स्वामीका निश्चय न हो ॥ १४ ॥
जो पारितोषिकावेतन और जिससे मिले वह
धन अपने धनसे अधिक कहाता है उससे
स्वस्वत्वनिश्चितचतित्रिविसंचितंमतम् ।
इतर धनको साहजिक कहते हैं ॥२१॥
निश्चितान्यस्वामियदनंतुधिविधाहतत् ११॥ पूर्ववत्सरपंचर्वतमानाब्दसंभवम् ।
और तीसरा जो अपने स्वत्वसे निश्चितदो स्वाधीनसंचितवयाधनंसप्रकीर्तितम्।। २२ ।।
और निश्चित अन्यस्वामी जिसका ऐसा धन
तीनप्रकारका है ।।१५।।
पूर्व वर्षका शेष और बत्तमान वर्षका जो
औपनिध्यंयाचितकमौत्तमणिकमक्च ।
द्रय वह अपने २ अधोनका सम्पूर्ण धन दो
विभान्निहितमदियदौपानविकहितत् १६॥
प्रकारका सचित कहा है ॥३२॥
१ औपन्नध्य, योचित नमाण देवाधिकंसाहजिकंपाथवेतरभेदतः ।
जो विश्वाससे मत्पुरुषोने अपने यहां भूमिभागममुद्गतआय.पार्थिव उन्यते ॥२३॥
ग्वदिया हो उसे ओपनिधिक कहते है ।१६॥ दो प्रकारका अधिक मासिक पार्थिव
अवृद्धिकंगृहीतान्यालंकारादिचयाचितम् ।
और इतर भेदसे जो पृथ्वीके भागसे श-
जाको मिले उस आरको पार्थिव कहते हैं२३॥
सवृद्धिकंगृहीतंयणतच्चोत्तर्माणकम् ॥१७॥
मिा सूद लिया जो लकारादि से सदैवकृत्रिम लंददायामपुरै पृथक ।
याधिन कहते है और सूदपर लिया जा ऋण बहुमध्याल्पफलतोभिद्यतेभुविभागतः ॥२४॥
उसे ओत्तमणिक कहते हैं ॥ १७ ॥
मेघ ओर कृर आठिक जलसे देश ग्राम
निध्यादिकंचमागीदौमाप्तमज्ञातस्यामिकम् । और पुरोसे तथा बहुत मध्यम अल्प भागके
साहजिकंचाधिकंचबिंधासस्वत्वनिश्चितम् १८ भेदस बद्द
धन अनेक प्रकारका होता
है।॥ २४ ॥
जो निधि आदि मागम मिन्हें और स्वा-
मोका निश्चय न हो सभारसे प्राप्त और शुल्कदंडाफरकरभाटकोपायनादिभिः ।
वृद्धि. ( व्याज ) इन दो प्रकारका अपना इतरः कीर्तितस्तम्जेरायोलेसविशारदः॥ २५ ॥
धन होता है॥१८॥
शुलक (महसूल ) दण्ट आकर (ग्वान)
उत्पद्यतयोनियतोदिनेमाप्तिचवत्सरे । उपायन (मंट ) आदिले मिला जो भाय
आयःसाहजिकसैरदायाद्यश्चस्ववृत्तितः १९॥ उसे लेसके फुशल मनुष्य इतर कहते
जो नियमस दिन मान ओर वर्षमें उत्पन्न है ॥२५॥
हो वह धनका आय (आमदनी ) साद यन्निमित्तोभदायोन्ययस्तन्नामपूर्वकः ।
जिक और यह धन अपनी वृत्तित उत्पन्न
व्ययश्चैवंसमुद्दिष्टोव्याप्यव्यापफसंयुतः॥२६॥
होनसे भाईका भाग होता है ॥ १९॥
दाय पग्निहोयत्तप्रकृष्टतत्स्वभावजम् ।
निड निमित्तसे माये उसी नामसे खर्च
करें और व्यय भी व्याप्य व्यापाभेदसे
मोल्याविस्यंकुचिगृहतियाजनादिभिः २०दो प्रकारका होता हे अधीन अल और
जो भाग परिग्रहम मिले और उत्तन भी अधिक २६१
हो उसे म्यभान फतेहै और मोदमें
अधिक मिले (नका) पिसे और
वन- पुनरावर्तक त्वयनिवर्तकइतिदिया ।
समि॥20॥
व्ययन्निध्युपनिवितोधिनमतिः ॥२७॥
शुक्रनीति ।
[ अध्याय--
स्य इसमकार दो भेटका है ( १) पुनरा दिया उस परितोपिक रहते है और जो भृत्ति
वर्तक (फिर आजावे) (.) जिसमें अपना रूपसे दिया हो उसे वेतन कहते है ॥३३॥r
बन रहे और निधि उपनिधि विनिमय धान्यंबन्यगृहारामगोगजादिस्थार्थकम् ।
भेदसे तीन प्रकारका है ।। २७ ।।
विद्यागयाधजनार्थधनाप्त्यर्यतथवच ॥३४॥
मुकुसीदाकुतीचावणिकश्यावृतास्मृतः।
जो धन, अन्न, वस्त्र, घर, बाग, हाथी, रथ
निधिभूमीविनिहितोन्यस्मिन्नुपनिधिः स्थितः। इनके निमित्त पन्चे हो और विद्या राज्य
व्याज के निमित दिया भयया विना व्याज और धमकी प्राप्तिके दिये जोर हो ॥३॥
से दिया जो ऋण उसे मापन ( फिरआने व्ययीकृतरक्षणायमुपभोग्यतदुन्यते ।
वाला ) कहत है प्रीय रसव को निधि सुवर्णरत्नरजतनिष्कशालास्तयश्च ॥ ३५ ॥
और तर मनुके पास रपेको उपनिधि
रक्षा करनेमें जो एच हो उसे उपभोग
पहते ॥२८॥
कहते है सोना, रत्न, चांदी और मणिपोंकी
दत्तमूल्यादिसमाप्तामविनिमय कृतः ।
शादा इन्हें पृथक बनाये ॥३५॥
वृद्धवाड्याचयोदत्तामवेस्पादायमाणक:२९ स्थाश्वगोगोष्ट्राजावीनशाला:पृथक्पृका ।
दिये हुप मोलस जो मिरे उसे विनिमय
कहते है भोर व्यान अयश दिन यान जो वायदाबाववस्त्राणाधान्यसंभारयोस्तया॥३६
दिया जाय उसे आघमाणक कहते है ॥२॥
रथ, अश्व, गाय, हाथी, ऊट, बकरी, भेट
इनकी शाला पृथक और पाजे शस्त्र अस्त्र
सवृद्धिकमृणदंसमकुंतीदतुयाचितम् ।
और मनकी और सम्भारसी शाळा पृथक २
स्वत्वीनवर्तकांठेवावहिकःपारलौकिक ३०॥ ॥३६॥
व्यानर, निमिन दिया अपयश उधारा जो मन्त्रीगिल्पनायवैद्यमृगाणांपाकपक्षिणाम् ।
दिया दो प्रकारका अधमणिर होता है
और गौ दो भाई पर वह जो इस
शालाभाग्यनिविष्टास्तुतद्ययाभोग्पश्च्यते ॥
लोरके लिये दो दूसरा जो वह परळीवरे
मन्त्री गिर नाट्य वैद्य मृग और पाक-
दियदी ॥ ३० ॥
के योग्य पक्षी इनची शालाकि भोग
प्रत्तिदानपरितोष्यतिनभाग्यमहिकः ।
जो नियुक्त है उनके निमित्त जो व्यय (2.
चे) हो उसे भोग्य वदते है॥७॥
चतुर्विवस्तयापारलौकिकानन्तभेदभारु ३१॥
जपहोमाचनदानश्चतुर्धापारलौकिकः ।
पदमे देना, परितोपिर, वेतन. भोय.
इस प्रकार हिरे है और पारलौषि-
पुनयांतीनिहत्तश्योगपाय-ययोचती ३८
को भनन्त भः ॥१॥
जर होम पुजन दान, भेदसे चार प्र.
दीपसंयोजनित्यं पुनगानीव्ययः ।
जारका उपप परोपका होता जो शित
मृल्यत्वेनचवदाप्रतिदानस्मृत हैनत् ।। ३२ ॥ विपसे होते है ॥ १८ ॥
भानाय धीर किरन मायदोनों भाय भीर
गौरशेप जो कापाव्यप प्रतिदिन होता आवर्न कोनिवतीचन्ययायानुप्रयाग्दया ।
बने पुनगान करने के आर जो मार कर आपनरुपिहानीनुष्ययायोअपकीरित् ।।३०,
दिपा उ प्रतिदान मदने, ॥३॥
संगानादिगंतुष्टगत्याग्निोषिकम ।
मानामा भारत रानी
तिम्पंगगंदननरत प्रशासनम ॥ ३३ ॥ोमिटट भार भरपपरोल
इसर और भाप या होगा और
Prirना भाति प्रमा दोगरोनगरा ॥३॥
२.]
भापाटीकासहित।
(५९),
ऋयावमणपटनान्यस्यठातेनिवर्तकः । कोटीसे लेकर रत्न पर्यन्तको द्रव्य करते
द्रव्यलिखित्वादद्यानुगृहीत्वाविलिखेत्स्वयम् ॥ है पश, अन्न, वच, ण, आदिको धन कहते
लेन देन कर्ज जो औरको दिया जाय
वह निवर्तक (किर न आनेवाला) होता ह व्यवहारेचाधिकृतस्वीद्यमूल्यतामियात् ।
ट्रव्यको प्रथम लिखकर दे और प्रथम ग्रहण कारणादिसमायोगापदार्थस्तुभवेद्यपि ॥४७॥
करके पीछे लिरी॥ ४०॥
व्यवहारके लिये माना हुआ सोना आदि
हीयतेवर्धतनवमायव्ययविलेखकः ।
मोल हो जाता है और कारणके बल
वही सोना आदि पदार्थ हो जाता है
हेतुपमाणसंबंधकार्यांगव्याप्यव्यापकः ।।
(जैसे भूपण)॥ १७ ॥
न घटै और न पढे ऐसा जमाखच दिखे यनव्ययेनससिद्धरतव्ययस्तस्यमूल्यकम् ।
और उसके कारण प्रमाण संबंधायक अंग
भी न्यून अधिकभावसे लिखे ॥४१॥
मुलभामुलभत्वाचागुणत्वगुणसंश्रयैः ॥४८॥
आयाश्चनहुधाभिन्नाव्यया शेषपृथक्पृथक् ।
जितने व्ययसे मिल रतना व्यय उसका
मानेनसंख्ययाचवोन्मानेनपरिमाणकः ।।
मूल्यहोता है और सुलभ और कठिन और
भले और बुरे भेदोंस ॥१८॥
आय (आमदनी और व्यय( खर्च) वे
दोनो अनेक प्रकार के होते हैं मान, संख्या यथाकामापदार्थानामनवमधिकंभवेत् ।
उन्मान और परिमाणके भेदोले ॥ ४२ ॥ नहीनंमाणयातूनां क्वचिन्मूल्यंप्रकल्पयेत् ॥
क्वचिसंख्याकचिन्मानमुन्मानपरिमाणकम् । अपनी कामनाके अनुसार पदाथांका मोल
समाहार कचिच्चेष्टोव्यवहारायतविदाम् ॥४४॥ हीन वा अधिक होजाता है और मणिधातु इन
कही संख्या और कही मान और कही का मूल्य कभीभी न्यून न करै ॥ १९ ॥
उन्मान और कहा परिमाण और कही चारी मूल्यहानिस्तुचैतेपांराजदष्टयेनजायते ।
व्यवहारके ज्ञाताओके व्यवहारके लिखे दृष्ट दीर्वचतुर्भागभूतपत्रेतिर्यग्गतावालेः ॥५०॥
होते हैं।। ४३ ॥
इनके मूल्यकी न्यूनता राजाको दुष्टताले
अंगुलाद्यस्मृतमानमुन्मानंचतुलास्मृता । होती है बड़े और चारभागके परम तिरछी
परिमाणपात्रमानसंख्यायादिसज्ञिका ॥४३॥ आवली (पेक्ति) हो पेसा पत्र हो ॥ ५० ॥
भंगुलीसे जो मापा जाय उस मान कहते त्र्यंशगाभ्यंतरगताचार्धगापादगापिका ।
हैं वोट से जो तोला जाय
उसे उन्मान कार्याव्यापकव्याप्यानलिखनेपदसंज्ञिका ॥
कहते हैं किसी पात्रसे जो मापाजाय उसे तीन भागमे भीतरकी अथवा आधे भाग
परिमाण कहते हैं और एक दो तीन आदि में अथवा चौथाई भागमें अंगी हो ऐसे
संख्या होती है ॥ ४ ॥
पत्रको छोटे और बड़ेके लिखनेके निमित्त
यत्रयाहाम्यवहारस्तवतादृक्यकल्पयेत् । चताय ॥५१॥
रजतस्वर्णतानादिव्यवहारार्थमुद्रितम् ४९ श्रेिष्ठासंतरगातामुवामतस्त्र्यंशगाप्यनु ।
जहां जैसा व्यवहार हो वहां वैसाही नि-दक्षत्र्यंशगताचानुहागापागाततः ॥१२॥
यत करे, चांडी, सोना, तांबा, इनको व्यवहार
के अर्थ मुद्रित करे ॥४५॥
उनमें भीतरकी श्रेष्ठ है। उसमें बांभोर
की तीनभागकी और दाहिनी ओरकोभी तीन
व्यवहार्यवगाधनांतद्रव्यमीरितम् । भागकी और फिर चौथाई भागको ये सच
सपशुधान्यववादितणांतधनसंज्ञकम् ॥१६॥क्रमसे हो ॥ ५२ ॥
२.]
भापाटीकासहित ।
(६१)
और अवयवोको व्याप्यऔर अवयवीको व्या-पदार्थस्यस्थलानिस्युःपदार्थाश्चस्यलस्यतु ।
पक कहते हैं ॥६६॥
व्याप्यास्तिथ्यादयश्चापियथेष्टासननृणाम् ।।
सजातीनांचलिखनकुर्याच्चसमुदायतः ।
निश्चितान्यस्वामिकाद्याआयायेइतरांतगाः ।
यथामातंतुलिखनमायनसमुदायतः ६७ ॥
सजातीय पदार्थीको समुदाय रूपस विशिष्टसंत्रिकायेवपुनरावर्तकादयः ७४ ॥
लिखे और समुदायमें प्रथम उसे न लिखे जो पदार्थके स्थान होते हैं और स्थानके
प्रथम आया हो ॥६॥
पदार्थ होते हैं और अपनी इच्छा अनुसार
व्यापकश्चपदार्थावायत्रसंतिस्थलानिहि ।
व्याप्य (मासके अंग ) तिथि आदिभी मनु-
व्याप्यमायव्ययंतत्रकुर्यात्कालनसर्वदा ६८॥
प्योंको लिखनी निश्चित है अन्य स्वामी जिस
का ऐथे जो इतरीके आय और पृथक है
व्यापक अथवा पदार्थ जहां स्थळ होता जिनकी ऐसे जो पुनरावर्तक (फिर
वहां आय और व्यय जो है उसे समयकै अतु-लोटने वाले) आदि ॥ ७३ ॥ ७ ॥
सार व्याप्यसे करै।। ६८॥
स्थानटिप्पणिकांचपाततोन्यसंघटिप्पणम् ।
व्ययाश्चपरलोकांताआंतिमव्यापकाश्चत्ते ।
विशिष्टसज्ञितंतत्रध्यापकलेख्यभाषितम् ।।
इच्छयात्ताडितकृत्वादाममाणफलंततः ॥७॥
यह स्थानकी टिप्पण (पत्र) है और प्रमाणभक्तलब्धभवेदिच्छाफलंनृणाम् ।
इससे इतर संघटिप्पण होती है और वहाँ समाततोलख्यमुक्तंसपस्मृतिसाधनम् ७६॥
विशिष्टनामका व्यापक भाषा ( अजी) देख पालोक पर्यंत जो व्यय है वे सब अंतिम
होता है ॥ ६९॥
व्यापक कहाते हैं अपनी इच्छासे प्रथम
आया कतिव्यया कस्यशेपंद्रध्यस्यचास्तिव। इने गिने और फिर प्रमाणका फल लिख
विशिष्टसंज्ञकरेषांसविज्ञानप्रजायते ७० ॥
॥ ७५ ॥७६ ॥
फितना आय (आमदनी ) और कितना गुजामापस्तथाकप:पदार्थ प्रत्यएवाह ।
व्यय ( खर्च ) है और किस आयका कितना यथोत्तरादशगुणापंचमस्थस्यचाढकाः १७७॥
शेप ( बाकी) है इनका पृथा २ नामोसे ज्ञान
होता है ॥ ७० ॥
गुंजा, माला, कर्ष, पदार्थ, प्रस्थ, ये क्रमसे
दश गुणे अधिक होते हैं और एक प्रस्थके.
आदौलेख्यययामासपश्चाचगणितंलिखेत् ।
पांच मादक होते हैं॥७॥
यथाद्रव्यंचस्यानंचाधिकसंज्ञचटिप्पणे ॥ ततश्चाष्टाढक:प्रोक्तोहार्मणस्तेतुविंशतिः ।
प्रथम जैसे आया हो वैसे लिख और
पीछे उसकी संख्या लिख जसा या खारिकास्माद्भिद्यतेतद्देशेदेशेप्रमाणकम् ॥
और जैसा स्थान हो और जसी अधिक
और
भाठ माढकका एक अर्मण कहा?
संज्ञा हो वह सब रिपण(वही) में लिखा और यीस मादकको एक खारी होती है और
शेपायव्ययविज्ञानक्रमाल्लेख्यैःप्रजायते ।
देशके भेद प्रमाणका भेद होता है ॥७॥
स्थलायव्ययविज्ञानव्यापकस्थलतोभवेत् ॥ पंचांगुलावटपात्रंचतुरंगुलविस्तृतम् ।
शेष भाप न्यपका ज्ञान मसे लेखोंसे प्रस्थपादतुतज्ज्ञेयपरिमाणेसदाबुपैः ॥ ७९ ॥ .
होता है स्थान आय व्ययका ज्ञान बड़े स्था-
पांच अंगुल गहरा और चार अंगुल चौड़ा
नसे अर्थात् इस जिलेके इस गांव इतना जो पात्र होता है उसे परिमाणकै विष विद्वान
रुपया बापा ॥५२॥
सदा प्रस्थपाद जाने ॥ ७९ ॥
(६२) शुक्रनीति । [अध्याय- ऊ कश्चयथासनस्तदधस्थाश्वामगाः । वह वोझ तेरेको वहां पहुँचा देना होगा और कमात्स्वदशगुणिताःपराधीता:प्रकीर्तिताः ॥ इतनी भृति दूँगा इस भूतिको भृतिके उपदेश करने वाले कार्यमाना कहते हैं ।। ८६॥ जपरके अंककी जो संख्या हो और उसके नीचे के जो दश गुण हैं वे पराद्ध पर्यंत कहे है वत्सरेवत्सरेवापिमातिमासिदिनेदिने । एतावतीभृतितेहंदास्यामतिचकीलका ।। नकदशक्यतेसंख्यासंज्ञाकालस्यदुर्गमात् । वर्ष २में अथवा महीने २ में इतनी भृति ब्रह्मणीद्वपरातुआयुरुक्तमनीषिभिः॥८१ ॥ तुझे दूँगा इस भूतिको कालिका कहते हैं दुर्गम होनेसे कालकी, संख्याफी सज्ञा नही करसकते और मनोपियों (विद्वानो) ने एतावताकार्यामदकालेनापित्वयाकृतम् । ब्रह्माकी द्विपराद्ध भायु कही है ॥ ८ ॥ भृतिमेतावतीदास्येकार्यकालमिताचसा ॥ एकादशशतचैवसहसंचायुतंकमात् । इतने काल में इतना काम तुझे करना ओर नियुतंप्रयुतकोटिरवुदचानको ॥४२॥ इतनी भृति दूंगा इस भृतिको कालमिता कहते हैं ॥ ८८ ॥ एका दश, सो, हज़ार, दश हजार दक्ष नकुर्याभृतिलोपंतुतथाभृतिविलम्वनम् । दश लक्ष, किराड़, भव, अब्ज, सर्व, ये क्रम- से संख्या जाननी ॥ ८॥ अवश्यपोप्यभरणाभृतिमध्यापकीर्तिता ॥ निखर्वपद्मशखाब्धिमध्यमांतपरार्धकाः । भृतिका लोप ( अभाव) और देने में विलम्म न करे जिप्त भृति भरण पोषण हो उस कालमा त्रिधाज्ञेयंचांदसौरचतावनम् ८३ भृतिको मध्यमा कहते हैं ।। ८१ ॥ निसर्व, पद्म, शख, अब्धि, मध्य, अंना परिपोष्याभूतिः श्रेष्ठातमानाच्छादनार्थिका ।। परार्द्ध भी संस्था जाननी और कालका मान तीन प्रकारका होता है। सूर्पको सक्राति चं- भवेदकस्यभरणंययासाहीनसंज्ञिका॥९॥ इमाका उदय और सावनसे।। ८३॥ अन्न, वस्त्र, भादिसे जिस अतिते सबका पोपण हो वह भृति श्रेष्ठ हाती है और मृतिदानेमदासौरंचदि कौसीदवृद्धिषु । जिसस एककादीपोषण हो उसे हीनभूति कल्पयेत्सावननित्यंदिनभृत्येवघौसदा ॥८४॥ कहते है ॥ २० ॥ भृति (नौकरी) के देने में सूर्यको सक्राति ययायथानुगुणवान्भृतकस्तभृतिस्तथा । मे और रोतो और ब्याज में चंद्रोदपले ओर संयोज्यातुप्रयत्नेननृपेणात्माहतायधै ९१ ॥ भूति (मजूरो) और भयधिर्म समावससे भास लेना ॥ ८ ॥ गुणवाला भृत्य हो सोही उसकी भूति राजा अपने हितके लिये प्रयत्नसे कार्यमानाकालमानाकार्यकालमितिस्त्रिया । नियत कर ॥९१ ॥ भृतिरुक्तानुताज्ञिः सादेयाभापितायया ॥ अवस्यपायरंगस्यभरणमृतकावेत् । कार्य और फादर मानसे और कार्यके तयाभृतिस्तुसंयोज्यायोग्याभृतकाई ।। काम भृति (नौकरी) भृतिके ज्ञाताओने, भृत्पर पोपण करने योग्यका पालन कही है और वह भूति जैसे कही हो वैसेही जिसमकारहोसके. येतादी योग्य भति(नौकरी) देनी ॥८॥ भृत्यके अयं सयुक्त कर ॥९॥ अयंभारस्त्वयातस्याप्यस्त्वतावतीभृतिम् । यिभृत्याहीनभतिकाः शरवस्तेयंकृताः। दास्यामिकापमानागाशीतितावादकैः । परस्पताबकास्तनुद्रिकोशमनाहाः ।। जंस २
भाषाटीकासहित ।
जिन भृत्योंको भृति न्यून है ये अपनेही रोगके समय तीन महीने को भृति एक
चनाये शत्रु है और वे दूसरेके साधक है वर्षके रोगीको दे एक चौथाईकम भृति
मौर छिद्र कोश तथा प्रजाके हरनेवाले होते भृत्यको दे ओर पांच वर्ष के भृत्यको तोरोगकी
है ॥९३॥
अवस्थाम जैसे तैसे न्यून और अधिक भृति
अन्नाच्छादनमात्राहिभृतिः शूद्रादिपुस्मृता । दे ॥ ९९ ॥
तत्पापभाग्यन्यथास्यात्पोषकामांमभोजिषु ९४ पाण्मासिकीतुदीर्तितदूर्धनचकल्पयेत् ।
शूद्र आदिकोको ऐसी भृति दे जिससे नवपक्षार्धमार्तस्यहातव्याल्पापिवैभृतिः ।।
भोजन वस्त्रका निवाहच क्योंकि जोमांतके
और बहुत दिनके अधिक रागीको वर्ष में
अक्षकोंको अधिक भरण पोषण करता है। छ महीनकी भृतिदे और इससे आगे न्यून-
वह उनक हिंसा आदिक पापका भागी होता भृतिकी कल्पना न करें और ८ आठ दिनके
है॥९॥
रोगीकी कुछ भी भृति न काटे॥१०० ।।
यहाह्मणेनापहृतंवनतत्परलोकदम् ।
शश्वत्सदोपितस्यापियाद्या प्रतिनिीवस्वतः।
गुदायदत्तमपियनरकायस्कवेलम् ॥ ९५ ।।
जो ब्राह्मणने धन र भोलि सुमहद्गुणिनस्वार्तभृत्यर्वकल्पयेत्सदा ॥१॥
जो भृत्य पार २ रोगसे ग्रस्त रहै उसकी
वह परलोकका देनेवाला है और जो धन
शूदको अपने हायसे भी दिया हो वह केवल जगह प्रतिनिधि रखले और जो भृत्य अत्यन्त
गुणो हो उसको रोगको अवस्थामे भी उदा
नरकका हो देनेवाला होता है ॥ ९५ ॥
आधी भृति दे॥१॥
मंदोमव्यस्तयाशीघ्रत्रिवियोभृत्यउच्यते ।
सेवांविनानृपः पक्षदद्याभृत्यायवत्सरे ।
समामध्याचश्रेष्ठाचभ्रातस्तेषांक्रमात्स्मृता ॥
चत्वारिशसमानीता. सेवयायनवनृप-॥ २॥
मन्द, मध्यम, शीघ्र तीन प्रकारका भृत्य
होता है और उनको भृति भी सम मध्यम
भृत्यको एक वर्षमे १५ दिनकी भृत्त
श्रेष्ठ भेदसे तीन प्रकारकी होती है ॥ ९६ ॥
सेवाके विना भी राजा दे और जिसने सेवा
भृत्यानांगृहकृत्यार्थदिवायामप्तमुत्सृजेत् ।
करते २ चालीस वर्ष विताये हो उस भृत्यको
निशियामवयंनित्यंदिनभृत्यर्थयामकम् ॥
अपने घरके कार्य करनेके अर्थ एक प्रहर
ततःसवांविनातस्मैभृत्यर्वकल्पयेत्सदा ।
को छुट्टी भृत्योंको दिनमें और तीन प्रहरको यावजीवतुतत्पुत्रेशमेवालेतदर्धकम् ॥ ३ ॥
राविम और जो दिनकाही भृत्य हो उसे आधे तिसके अनन्तर सेवाके विनाहो तितके
प्रहरकी छुट्टीदे।। ९७ ॥
लिये आधी वृत्ति नियत जीनेतक करदे और
तेभ्यः कार्यकाग्योतयुत्सवानिानाः ।
उसके बालकके लिये आधीमले आधी मृति
नियत कर॥३॥
अस्य वश्यंवत्सपिहित्वात्रादिनमदा ॥२७॥
भार्यायांवासुशीलायांकन्पायांवास्वश्रेयसे ।
राजा भृत्योसे काम करावे परन्तु जो दिन
उरसव (दिवाली भादि) के हां उनके विना अष्टमांशपारितोयदद्याभृत्यायपत्सरे॥ ४॥
यदि कार्य आवश्यक होय ती उत्सवम भी
तुरस्त्री और कन्याको अपने कल्याण
काम करावे परन्तु श्राद्धके दिनोको सदा भय भृतिका आठवां भाग दे ओर भृतिका
त्याग दे अपात् काम न ॥ ९८॥ भाठवा भाग परितोषिक भृत्यको दे॥
पाटहीनांभृतित्वातदद्यात्रमौसिकर्तितः । कार्याष्टमांशवादद्यात्कार्यद्रागविकृतम् ।
पंचवमारभृत्येतुन्यूनावस्पययातया ॥९९॥ स्वामिकार्येविनष्टीयस्तरसुनेतद्भतिवहेताना
राजा॥२॥
(६४)
शुननीति ।
[ अध्याय-
भयवा कामका भाडया भाग दे और जो किनी एक भन्योको सुन्दर बनासे और
कामशार और मर्यादाले अधिक किया हो किना एकाको पानासे और किनी एको
औरतोय स्वामी के कार्य म नष्ट हो गया हो को कुशल पूछनेसे और किनी एकाको
तो उसका भूति उसके पुत्रको द॥५॥ अधिकारके देनसे राजा महान रखे ॥१॥
यावहालेन्यथापुनगुणान्दृष्ट्वाभृतिबहेत् ।
वाहनानांप्रदानेनयोग्याभरणदानतः ।
गटशिवाचतुर्थाशंमृत त्यस्यपालयेत् ॥६॥ उत्रातपश्चमरदीपिकानांप्रदानतः ॥ १२ ॥
इतने भत्यका पुत्र बारक हो तिसके' किनी एक भृत्योको बाहनके देनेने और
अनतर पुरके गुगाको देखकर भृति से योग्य भूपगाम देनेसे और छवी छत्तर च.
छटा भाग अया चायाभाग भत्यको भूति वर ओर मलालके देनेसे राजा प्रसन्न रख
का पालता र अर्थात् उसने भागको दता ॥ १२ ॥
क्षमयाप्रणिपातेनमानेनाभिगमनेच ।
दद्यात्तभृत्यापद्धिीसवपरितलतुवा । सकारणचज्ञानेनह्यादरेणशमेनव ॥ १३ ॥
वाक्पारुप्यान्यनभृत्यास्वामीप्रवलदडतः७॥ किनी एक भृत्यारो क्षमासे भौर नमस्कार
दो तीन वषम मासिकका आधा उस से और सत्कारसे और ज्ञानसे और आद-
भृत्यका सेवाके विना दे जा भृत्य कटु रसे और किनीएक भृत्योयो शांतिसे राजा
वचनी हो अथवा सपाको जिसने यथार्थ न प्रसन्न रक्खै ॥ १३ ॥
पिया हो । ॥
प्रेम्गासमीपवासेनस्वाचीसनप्रदानतः ।
भृत्पप्रशिक्षमित्शवत्वपमानतः ।
संपूर्णासनदानेनस्तुत्योपकारको तनात्॥१४॥
भृतिदानेनसंपुष्टामाननरिवर्विताः ॥ ८ ॥
और किनी एक भायोको प्रेमले और अपने
अपमान भय श होजाता है इससे समीप वासके देनेसे और अपने आधे भासन
भत्यका नित्य शिक्षा देता रहे मासिकरें पर बैठानसे और सम्पूर्ण जुदा आउन देने
दन माप पुष्ट होते हैं और मानसे बढ़ते १८ और किती एकाको विय हुए उपकार्य
सावितामृदयाचोयनत्यमत्यधिपहिते । प्रशला प्रसन्न वरौ ॥ १४॥
ययागुणाखभृत्याचप्रजाःसरंजयेन्नृपः ९ यत्कार्यविनियुक्तायका-करकयेचतान् ।
जिन भृत्यायो कोमल वचनों से शात लोहस्ताम्ररीतिभवरजतसंभवः॥१६॥
गमता र स्वामी को नही त्यागते जिस कार्यमें जो मृत्य नियुक्त है उसीका
हैं गुगार अनुसार मरने भूप और प्रजा यसरी मुद्राले उन्हें अस्ति करे और वे मुद्र
को भी प्रकार रक्षा करा परे॥९॥ लोदेवी हो अथवा तावरीयता पीतलका
शाखामद नत काचिपरान्सलदानत अथवा चादीकी हो ॥ १५ ॥
अन्यान्मुच पाहात्यस्तथाके मर यागिरा ॥ सौवर्णरत्ननर्वापिययायोग्यास्वलाउनः ।
विती भयो शराण ( मासिक्स मधि- प्रविज्ञानायरायश्चमुकुटेरपि ॥ १६
उदाते भीर रितीरो पत्र (द्रमादि), सोनेरी अपना रत्नांकी दो और
देने और किसीसे सौस और क्खिोरोदरख ज्ञानरें भय वर मुरद आदि अपने
फोमट पागोस राना प्रसन्न रांग ॥10॥ पयायोग्य चिति भविपकरे ॥१६॥
मुभा नानुवर्गस्तालश्चयनरपि । वायपादनमदेश्वभृत्या पर्यायस्पृयक।
काध माग-नाधिकामदामन. ११॥ स्वविशिष्टचयचिनद्यारकस्यचिन्नृपः॥१७॥
३.]
भाषाटीकासहित ।
पाच (वाजे) और बाहनके भेदसे भृत्यों कथन समयपर स्मरण न करे और
को पृथक २ करें और अपना जो विशिष्ट कहते भी शंका रक्ख क्षोभके समय मर्मको
चिट है उसे राजा किसीको भी न दे ॥१७॥ बीधै ऐसे राजाको भृत्य त्याग दे॥ २४ ॥
दशमोक्ता पुरोधाद्याबाह्मणाःतर्वएक्ते । लक्षणयुवराजादे कृत्यमुक्तंसमासतः २५ ॥
अभावक्षत्रियायोज्यास्तदभावेतयोरुजाः१८॥ युवराज आदिकोका लक्षण और कार्य
जो दश पुरोहित आदि कहेहै वे सब ब्राह्मण संक्षेपसे कहा ॥ २५ ॥
हो.होने चाहिये जो ब्राह्मण न मिले तौं क्षत्रिय
इति शुक्रनीतौयुवराजकयनं नाम
क्षविय नमिले ही वैश्य होने चाहिये ॥ १८॥
नयशदास्तुसंयोज्यागुणवतोपिपायिवैः।
द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
यह शुक्रनीतिमै युवराज है नाम जिसका
भागग्राहीक्षत्रियस्तुसाहसाधिपत्तिश्चसः १९ ॥ ऐसा दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥२॥
और गुणवाले भी शूद्रोंको पुरोहित आदि
पदवियोंपर कदाचित् नियुक्त न कर भाग
करके ग्रहण करनको और साहस (फौज
अध्याय ३.
दारी)की पदवीपर क्षत्रियको नियुक्त करे॥१९
ग्रामपात्राह्मणायोज्याकायस्योलेखकस्तया।
शुल्कयाहीतुवैश्योहिप्रतिहारश्चपादनः ॥२०॥
अथसाधारणनीतिशास्त्रंसपुंचीच्यते ।
ग्रामका अधिपति ब्राह्मण और लेप सुखार्थाःसर्वभूतानामतासर्वाः प्रवृत्तयः ॥१॥
कायस्य नियुक्त करना शुल्क (महसूल) का इसके अनेतर संपूर्णीका साधारण नीति-
अधिपति वेश्य और प्रतिहार (दूत ) शूद शास्त्र कहते हैं। संपूर्ण भूतोकी सब प्रवृत्ति
नियुक्त करना ॥२०॥
सुखके निमित्त होनेवाली माना है ॥१॥
सेनाधिपक्षित्रियस्तुब्राह्मणस्तदभावतः ।
सुखंचनविनाधर्मात्तस्मादमपरोभवेत् ।
नवश्यानचवैद्रकातरश्चकदाचन ॥ २१॥ त्रिवर्गशून्यनारंभभनेत्तंचाविरोधयन् ॥ २॥
सेनाका अधिपति क्षत्रिय और उसके अभा धर्मके विना सुख नहीं होता इससे मनुष्य
व ब्राह्मण और वैश्य और शूद्र और कातर धर्ममै तत्पर रहै इससे जिसमें धर्म अर्थ काम
(कायर) इनको कभी भी नियुक्त न करें॥२१॥ न हो ऐसे कार्यका आरंभ न करें और इनके
सेनापतिःशुरएक्योज्यःसर्वासुजातिषु । अनुरोधसे ही भारंभ करें ॥२॥
ससंकरचतुर्वर्णधर्मोऽयनैवयावनः ॥ २२॥ अनुयायाप्रतिपदसर्वधर्मपुमध्यमः।
संपूर्ण जातियों में सेनापति शूर ही नियुक्त नीचरोमनखश्मश्रनिर्मलाध्यमलायनः ॥३॥
करना यह धर्म संकरसहित चारो वर्णो का सदा संपूर्ण धोके अनुकूल भाचरण करे
है और यवनोका नहीं है ॥ २२॥ और रोम, नख श्मश्रु इनको न रक्खै चरणो.
यस्यवर्णस्ययोराजासवर्णःसुरसमेधते। को निर्मल रवसे मलसे दूर रहै ॥३॥
नोपकृतमन्यतेस्मनतुष्यतिसुसेवनैः ॥२३ ॥ स्नानशी मुसुरभिःसुवेपोनुल्वणोज्ज्वला ।
जिस वर्णका जो राजा होतावह वर्ण सुख पारयेत्सततरत्नसिद्धमंत्रमहौषधी ॥४॥
पाता है म उपकारको मानता है आ. न स्नानने तत्पर रहे सुंदर सुगंधिको धारण
सेवा करनेखे प्रसन्न होता है॥ २३ ॥ करें वेधको धार और उज्ज्वल रहै और निरं-
कथांतरेनस्मरतिशकतेमलपत्यपि । सरल सिद्धमंत्र और उत्तम औपधिपोको
सुधस्तनोतिमाणितनृपंभृतास्यजेत्।।
धारण करे ॥४॥
(६६) शुक्रनीति । [ अध्याय- सातपत्रपदत्राणोविचरेद्युगमात्रदृक् । सुन्दर मुखसे प्रथम पोले सुशील दयावान निशियात्यायकेकायदंडीमोलीसहायवान् ॥५॥ और कोमल रदै सदा एकसुखी और विश्वा सी शकावाला नहीं होता ॥ ११ ॥ छव और पानद सहित विचर और अपने आगे चार हाथ भूमिपर दृष्टि से और नंकचिदात्मनःशत्रुनारमानंकस्याचाद्रपुम् । मावश्यक कार्यकै निमित्त गत्रिम दंड और प्रकाशयेन्नापमाननचनि:स्नेहतांप्रभोः ॥१२॥ मुकुटको धारण करके भृत्यसहित विच॥५॥ दूसरेको अपना शत्रु और अपनेको दूसरे नवेगितोयकार्योस्पानवेगानीरयेद्लात् । का शत्रु प्रकाश न करे और प्रभुका अपमान मक्त्याकल्याणमित्राणिसंवेतेतरदूरगः ॥६॥ और प्रीतिक अभावको भी प्रकाशन करें वेगसे अन्यके कार्यको न करें और वेगसे जसमें न पैर और कल्याण और मित्रोंको जनस्याशयमालक्ष्ययोययापरितुष्यति । भक्तिसे सेवै और इतरों (शत्रुओं) से दूर रहे तंतथैवानुवर्तेतपराराधनपंडितः ॥ १३ ॥ पराई भाराधना ( सेवा ) करने में चतुर हिंसास्तेयान्यथाकामपैशुन्यपरुपानृतम्। मनुष्य इतर मनुपके अभिप्रायको देखकर संभिन्नालापव्यापादमाभिख्यादाविपर्ययम् ७॥ जो जिसप्रकार प्रसन्न हो उसी प्रकार उसने हिंसा, चोरी, दुष्टकम, चुगली, कठोरता, संग वर्ताव करें ॥ १३ ॥ 'मंड, भेद यावचन, द्रोहचिंता,दृष्टिको विष-नपीडयर्दिद्रियाणिनचैतान्यतिलालयेत् । मता इनको त्याग दे॥७॥ इंद्रियाणिप्रमाथीनहतिपसभमनः ॥ १४ पापकर्मेतिदशधाकायवाड्मानसैस्त्यजेत् ।. मनुष्य न तो इंद्रियोंको पीडा दे और अवृत्तिव्याधिशोकानिनुवर्तेतशक्तितः ॥ अधिक इनके संग प्रीति करे क्योंकि मतवा देह वाणी मनसे यह दश प्रकारका पाप इंद्रियां बलात्कारसे मनको हर लेती हैं ॥१५॥ होताहै इसको त्याग देऔर दरिद्री और रोग एणोगजःपतंगश्चमँगोमानस्तुपंचमः । और शोकसे जो दुःखी हैं उनकी अपनी शक्तिके अनुसार पालना करै।। ८ ॥ शब्दस्पर्शरूपरसगंधेरेतहतारखल्लु ॥ १५ ॥ आत्मवत्सततपश्येदपिकीटपिपीलिकम् । मृग हेडीके शब्हसे,हाथी हथिनीके स्पर्शले उपकारमधानःस्यादपकारपरेप्यते ॥ ९॥ पतंग दीपकके रूपसे, भ्रमर फूखके रस कोडे, चीटी इनको सदा अपने ही समान के विषयस मारे जाते हैं ॥ १५ ॥ मौन भन्नको गधिस ये पांचों एक एक इंद्रिय देखें और अपकारके योग्य शत्रुके विषय में भी उपकार ही मुख्य समझे ॥९॥ एपुस्पॉवरस्त्रीणांस्वांतहारीमुनरपि । संपद्धिपत्स्वकमनाहेतावी फलेन तु । अतोऽप्रमत्तःसवेतविषयांस्तुयथोचितान् १६॥ कालेहितमितंबूयादविसंवादिपेशलम् ॥१०॥ इन इंद्रियोके निमित्त उत्तम नियोंका सरी संपदा और विपत्तिम एफरस मन रख मुनिक भी मनको हरता (वश करता )। कार्यके कारणमैं ईपी कर और कामे न करें इससे अप्रमत्त होकर विषयोंको ययोचित और समयपर हित और प्रमित यथार्य सुंदर सवै ॥ १६ ॥ चचन कहे॥१०॥ मात्रास्वस्रादुहितारानात्यतैकांतिकवसेत् । पूर्वाभिभाषीमुमुखःसुशीलम्फरुणामृदुः। ययासंबंधमाहूयादाभाष्याश्चास्यवखियम् ७॥ नकासुरवीनसर्वत्रविस धोनचशंकितः ॥११॥ माता भगिनी, लइकी इनके संग .
भाषा टीकासहित ।
(६७)
एकांतमें न नातेके अनुसार सम्बोधन नाकामेच्छकरालोटवालस्नानभुवापिच ।
करके स्त्रियोंको बुलावे ।। १७ ।।
नदीवरेनवाइभ्यांनाभिंस्कनमाभिवजेत् ॥२४
स्वीयांतुपरकीयांवासुभगेभगिनीतिच ।
फंकर, ढेला, भेट, स्नानकी भूमि इनको
सहवासोन्यपुरुपैःप्रकाशमपिभापणम् ॥१८॥ भी अवलंघन न करें और भुजाओंसे नदी-
अपनी और पराईको सुभगे भगिनी इस को न तैरे और विस्तारको प्राप्त हुई अग्नि
प्रकारसे बोले, दूसरे पुरुषोक संग आत और के सन्मुख न जाय ॥ २४ ॥
सम्भापण न करने दे॥१८॥
संदिग्धनाववृक्षवनारोहेदुष्टयानवत् ।
सातंत्र्यनक्षणमपिावासोन्यगृहेतया । नासिकांनविकृष्णीयान्नाकस्मादिलिखेद्
भपित्राथवाराज्ञापुत्रश्वशुरवांधवैः ॥ १९ ॥ भुषम् ॥ २५ ॥
एक क्षण भी स्त्रियोंको स्वतन्त्रता दे टूटी नाव और वृक्षपर न चढे जैसे
और दूसरेके धरम भर्ना पिता राजा पुत्र दुष्ट सवारीमें, अपनी नाकको न सुजा
श्वशुर भाई बन्धु ये सव स्रोको न बसने और विना प्रयोजन पृथिवीकोन खोदे ॥ २५॥
दें॥१९॥
नसंहताभ्यांपाणिभ्यांकडूयेदात्मनाशिरः।
स्त्रीणानवतुदेयास्याद्गृहकृत्यैर्विनाक्षणः ।
नांगैश्चेष्टतविगुणनाश्नीयाकटुकंचिरम्।।२६॥
चंडंपदंडशीलमकामसुप्रवासिनम् ॥ २०॥ मिल हुए हाथ से अपने शिरको न
घरके कार्यके विना खियोंको एक क्षण भी सुजाव और अपने अंगकी निरर्थक चेष्टान
रहने दे और जो पुरुष अत्यन्त क्रोधी, करें और बहुत दिनतक सटे पदार्थको न
नपुंसक, दण्डकारक, कामरहिन, परदे खाय ॥ २६ ॥
शवासी ॥२०॥
देहवाश्चेत्तसांचेष्टा याक्ट्रमादिनिवर्तयेत् ।
सुदरिंदरोगिणंचान्यखीनिरसदा । नोर्ध्वजानुश्चिरतिष्टेन्नक्तसेवेतनगुमम् ।। २७ ।।
पतिदृष्ट्वाविरक्तास्यान्नारीवान्यसमाश्रयेत्२१॥ श्रम करके अपने देव, वाणी, मन इनकी
भत्यन्त दरिद्री, रोगी, सदा भन्य स्त्री चेष्टाओंको त्यागदे और बहुत देरतक ऊपरको
रत हो उस पतिको देखकरनोविरक्त हो जाय
पैर करके न बैठे और रात्रिक समय वृक्षपरक
भधवा दूसरे पुरुषकै आश्रय हो जाय ॥ २७ ॥
त्यक्त्वैतान्दुर्राणान्यलात्ततोरक्ष्यात्रियोनरः तथाचत्वरचैत्यांतचतुष्पयसुरालयान् ।
खानभूपणमेममृदयाम्भिश्चशक्तितः २२॥ शून्याटवीशून्यगृहश्मशानानिदिवापिन॥२८॥
चैत्य (चबूतरा)शून्य मांगन चौराहा, व मा
वख, अन्न, भूपण, प्रीति और कोमळवा गृहा शून्यवन, शून्यगृह और श्मशाना
गोसे शक्तिके अनुसार यनसे इन दुगुणोंको इनको दिनमें भी न सेव अथान् इनमें न
स्यागकर मनुष्य स्त्रियों की रक्षा करें ।। २२॥ स ॥२८॥
स्वात्यंतसंनिकणत्रियपुत्रंचरक्षयेत् ।
सर्वयोजनादित्यनमारंशिरसावदेत् ।
चैत्यभूपध्वजाशस्तच्छायाभस्मतुपाशुचीन। नक्षेतमतसूक्ष्मंदीतामेध्यामियाणिच।।२९॥
अपनी भत्यन्त समीपता स्त्री और सूर्यको निरंतर न देख शिरपर बोझ है
पुत्रको रक्षा करे और चबूतरा, पूज्य, ध्वजा कर न चले मोर सूक्ष्म पदार्थको भी निरतर
उत्तमोको छाया, भस्म, जो अमंगल है इनका न देखें प्रकाशमान अपवित्र और मामिद
अवलंघन न करे । २३ ॥
इनको भी निरंतर न देखे ॥ २९ ॥
' (६८) शुक्रनीति । { अध्याय- PA संध्यास्वभ्यवहारतीलमाध्ययनाचंतनम् । नक्तदिनानिमेयांतिकथंभूतस्यसंमति । मद्यविक्रायसंघानदानाशनानिनाचरेत् ॥३०॥ दुःसभा भवत्यनित्यंसन्निहितस्मृतिः ३६॥ संध्याके समय भोजन, स्त्री, शयन, पढ अब मेरे रात दिन कैसे चीतते है इससे ना, इतनेकी चिंता न करे और मदिराका दुःपी न हो और नित्य स्मरण रक्ौ ॥ ३६ ॥ चना निकालना पीना और पिलाना इनको समासव्यूहहेत्वादिकृतेच्छार्यविहायच । न। ३०॥ स्तुत्यर्थवादान्सत्यज्यसारसंगृह्मयत्नतः ३७! आचार्य:सर्वचेष्टासुलोकएपहिधीमतः। संक्षेप और विस्तारके कारण दिये अपनी अनुकुर्यात्तमेवातोलौकिकार्यपरीक्षकः ॥३१॥ इच्छाको त्याग दे और बदाईके वृया वयाँको शुदिमान मनुष्यको जगतके लोक ही संपूर्ण भी त्यागकर चारको मनसे ग्रहण करके २७॥ कार्यों में आचार्य है इससे परीक्षा करनेवाला धर्मतत्त्वंहिगहनमतामसेवितंनरः । मनुष्प आचार्यका ही अनुयायी रहे ॥ ३१ ॥ श्रुतिस्मृतिपुगणानांकमकुर्याद्विचक्षणः ।। रानदेशकुलज्ञातिसद्धर्मान्नवदृपयेत् । सत्पुरुषाने सेवन किया जो गहन (गम्भीर शरतोपिलौकिकाचारमनसापिनलंघयत् ३२॥ धर्मका तत्य उसको विचार और श्रुति स्मृति राजा, देश, फुल, जाति इनके उत्तम धर्म में कहे कर्मको ज्ञानवान करें ॥ ३८ ॥ दूपण न लगाये और समर्थ होकर भी लौकिक नगोपयेद्दासयञ्चराजामित्रसुतगुरुम् । भाचरणका भवटपन न करे॥३२॥ 'अधर्मनिरतस्तनमाततायिनमप्युत ॥ ३९ ॥ अयुक्तपत्कृतचोक्तनपलातुनोद्धरेत् । राजा मधर्म करते हुए, चोर, आततायी. दुर्गुणस्पचवकारःप्रत्यक्षविरलाजनाः ॥३३॥ मित्र, पुत्र और गुरुको भी न छिपाये किंतु ग्यसे निकास दे॥ ३९ ॥ जो अपोप फर्मको फिसीने किया हो अग्निदोगरदश्चैवशवोन्मतोधनापहः । भषया फदा हो उसका बलर समाधान न क्षेत्रदारहरश्चतापविद्यादाततापिनः ॥४०॥ करे कि प्रत्यदा दुर्गणके कदनेवाले मनुष्य पिरले होते ॥ १३॥ भग्नि लगानेवाला, विप देनेवादा, शय उन्मत्त, धन चुरानेगाला, संत हरनेवाला मोर लोकतःशावतोज्ञात्वाद्यतस्त्याज्यांत्यजे. म्री हरनेवासा ये छः माततापी होते ६० मधी: । अनपनयसकाशमनसापिनचित-नोपेक्षतखियंगालंरोगदासंपशुधनम् । येत् ॥ ३४॥ विद्याभ्यामंक्षणमपिसरसेवांघुद्धिमाना।। लोक भोर शाग्रसे रमान योग्य कमाको दियाला मनुष्य दनको पकग भी नानकर अधिमान् मनुष्य स्याभोर पाहाम्री, पालक, रोग, दाग, पशु धन भोर पर मान प्रतीति दात भापापी'मनसे भी विधाका सम्पास, मानसेगा ॥१॥ पिन्सान कर॥ ४॥ विरुद्धोपनृपतिनिमः श्रीनियभिषा । मंहगड्यापराधीफिमेकनभस्मम । आचाग्यतयादेशोनतदिवसम्मत् ॥ ४२ ॥ मवानासंस्मन्दार्टदुनापूर्यते धः ॥३॥ जिप दशमं गजा मिटाटी धनी HTTER पनि पक पार मार. in पपा गुण दोगा गर मौकरी महाभरता प्राधिकाग्निनितमदियात् ॥ ४५" मारकर भी पाया मरण न पर न गायत्रीरालयसमधामी । में ना भपmitm नंगाट! मीन यो ।
भाषाटीकासहित । (६९) जिस राजाके राज्यमें नपुंसका स्त्री यालका मातृपितृगुरुस्वामिभ्रातृपुत्रसखिष्यापि । अत्यन्त क्रोधी, मुस, साहसी अधिकारी हो नविरुध्येन्नापफुर्यान्मनसापिक्षणकाचेत् ५०॥ वहां एक दिन भी न वसे ॥ १३ ॥ माता पिता गुरु, स्वामी, भाई, एक और अविवेकीयत्रराजासभ्यायचतुपाक्षिकाः । मित्र इनके संग एक क्षण मात्र भी मनले कभी सन्मार्गोंझितविद्वांसःसाक्षिणोनृतवादिनः ४४ विरोध और इनका तिरस्कार न करै ।। ५० ॥ जहां राजा अविवेकी हो सभासद पक्षपात स्वजनैनविरुद्धयेतनस्पर्धेतवलीयसा । करें पडितजन सन्मार्गी न हो साक्षी (गवाह) नकुर्यात्वीबालवृद्धमूर्खघुचविवादनम् ॥२१॥ झंट बोले वहां भी न स ॥ १४ ॥ स्वजनी (कुटुम्बके मनुष्यो) के साथ दुगरमनांचपावल्यंस्त्रीणांनीचजनस्यच । वलसे विरोध न करे और स्त्री, वालका वृद्ध, परनेच्छेदनमानवसतितबजीवितम् ॥४५॥ मर्ग इनके साथ विवाद न करै ।। ५१ ॥ जहां दुष्ट स्त्री नीच इनकी प्रबलता हो वहां एकास्वादुनमुंजीतएकोन्निविचिन्तयेत् । धनमान वास जीवन इनकी इच्छा न कर एकोनगच्छेदभ्वाननैकःसुप्तेपुजागृयात् ५२॥ अकेला स्वादु भोजन न करे और अकेला मात्तानपालयेद्वाल्येपितासाधुनशिशयेत् । अर्थकी चिन्ता न कर अबैला मार्ग न चले राजायदिहरेडितकातत्रपरिदेवना ॥ ४६॥ और सोतेम अकेला न जागे ५२ ॥ जो बालक अवस्थाम माता पालन न करै नान्यधमहिसेवेतनदुह्याद्वैकदाचन । और पिता भजीप्रकार शिक्षा न दे और राजा हीनकर्मगणै स्त्रीभिनासीतकासनेकचित्५३॥ अपने धनको हर ले तो शोककी इसमे क्या अन्य धर्मको न करें और किसीके संग पत है ॥४६॥ द्रोह न करें और नीच हैं कर्म और गुण सुसेविताःप्रकुप्यतिमित्रस्वजनपार्थिाः । जिसके उनके संग और स्त्रियों के सग एक गृहमग्न्यशनिहतकातत्रपग्देिवना ॥ ४७ ॥ आसन पर कभी न बेटे ॥ ५३॥ यदि भलीप्रकार सेवा करनेसे भी मित्र पडूदोपापुरुपेणेहहातव्याभृतिमिच्छता । घा अपने भाई कन्धु और राजा क्रोध करै, और अपना घर भग्नि वा बिजलोसनको निद्रातंद्राभयंक्रोधआलस्यंदासत्रता ॥४॥ जाय तो वहां शोकसी क्या बात है। ४७ ॥ वडाई चाइनेवाला पुरुष इन छ. दोषोंको आप्तवाक्यमनाहत्यदर्पणाचरितंयदि । त्याग दे किनिद्रा, तन्द्रा, (ददासीनता! भय, क्रोध, आलस्य, दीर्घसूत्रता ॥ ५४॥ फलितविपरीतंतत्कातत्रपरिदेवना ॥ ४८ ॥ प्रभवतिविधातायकार्यस्यैतेनसंगमः। यदि किती साजन वचनको नमान- कर अभिमानसे कोई काम किया होय और उपायज्ञश्चयोगजस्तत्त्वज्ञःप्रतिभानवान् ५५॥ उसका फट विपरीत हो जाय तो वहां क्या क्योंकि ये छहों कार्यके नाश करने में समर्थ शोककी बात है ।। १८॥ है इसमें संशय नहीं है और उपाय युक्ति और सावधानमनानित्यंगजानंदेवतागुरुम् । तरको मनुष्य जाने और सदैव पैनी बुद्धि मितपस्विनमज्ञानदसुसवयेत् ॥ १९ ॥ वाला रहे ॥५८ ! गजा, देवता, गुरु, अग्नि, तपस्वी धर्म स्वधर्मनिरतोनित्यपरस्त्रीषु पराङ्मुखः । और विद्याज्ञानमे जो बड़े ही इनकी सदेव वक्तोहवांश्चित्रकयास्यादकुंठितवाक्सदा ५६॥ सावधान होकर भठी प्रकार सेवा करे ॥४९॥ सदेव अपनेधर्ममें तत्पर रहे पराई नियाका
सिदिम मनुष्यगरी चपलता और सारी
(७०)
शुक्रनीति।
[अन्याय-
त्याग करे और बोलनेमे तत्पर रहै विचित्र अयोग्य और अनर्थक वचन क्सिीके प्रति
क्या है और वाणी कुण्ठी भी नको ॥५६॥ न वह क्यादि सब जगदका जिसमें देर हो
चिरसंशृणुयानित्यजानीयाक्षिप्रमेवच । वह धर्मका काम भी स्वर्ग देनेवाला नहीं
विनायप्रभजेदान्नकामप्रभजेत्वचित् ॥५०॥
होता५६३॥
चिरकाढतक नित्य सुने और शीनामा स्वहेतुभिहन्येतकस्यवाक्यंकदाचन ।
कर जानवर व्यका विभाग और क्वचित प्रविचार्योत्तरदेयंसहसानवंदत्वचित् ।।६४९
इच्छा न होय ती विभाग न करै ।। ५७ ।। अपने बनाये कारणोंसे विसी वचनोको
ज्यविक्रयस्यातिलिप्सांस्वदेन्यदर्शयन्नहि । नष्ट न करे, विचार कर उत्तर दे और शीघ्र
कार्यविनान्यगेहेननाशात पविशेदपि ॥५८ ॥ उत्तर न दे॥ ६४ ।।
देन देनको अधिक इच्छाके लिये अपनी शत्रोरपिमुणाग्राह्यागुरोस्त्याज्यास्तुदुर्गुणाः ।
दीनता न दिखा और कार्य विना ओर उत्कनिनित्यः स्यान्नापकर्षस्तथैवच ६५॥
माशासे दूसरे घरमे प्रवेश न करै ॥८॥ शवरे भी गुण ग्रहण करने और गुरके
अपृष्टानवकथयेहकृत्यतुकंप्रति । भी अवगुण त्यागने योग्य है क्योंकि बाई
बाल्पाक्षपुर्यात्सलापकार्यसाधकम्॥५९॥ और छोटापन सदा नहीं रहते ॥ ६५ ॥
घरका कार्य विना पूछे क्सिास न कह प्राकर्मवगतोनियावनोनिर्धनोभवेत् ।
और दूसरेके सग ऐसी बात बात करे तस्मात्सर्वपुरोकेपुमत्रानवचहापयेत् ॥६६ ॥
जिसे अर्थ बहुत और अक्षर थोटे हा और
पूर्वजन्मरे क्मोस धनवान वा निधन
जिसमे कार्यकी सिद्धि हो ॥ ७० ॥
होता है इससे सपूर्ण होकार संग मित्रताशे
नदर्शयत्स्वाभिमतमनुभूताद्विनासना । म त्यागे ॥६६॥
ज्ञात्वापरमतंसम्यक्तनाज्ञातोत्तरंवदेत्।।६०॥ दीर्यदर्शीसदाचस्यात्प्रत्युत्पन्नमातः कचित् ।
अनुभूनके मिना (अजानेवो ) अपने साहसीसाल्सी,चिरफारभिवेन्नाहि ।। ६७ ॥
अभिप्रायको न दिसाव(न बतावै) और दूसरे-
के मत ( अभिप्राय) को भली प्रकार जानकर रहे और भी तत्काल इद्धि भी रहे और
सदा दीर्घद होनहारको जो पहिचाने)
उत्तर दे ॥६०॥
दंपत्योः क्लहेसाक्ष्यनकुर्यापितृपुरयोः ।
शीन करनेवाला और आलसी और विजन
में कार्य करनेवाला न रहे ।। ६७ ॥
मुगुप्तः कृत्यमरः स्यानत्यजन्सरणागतम् ॥ यामुदुनिष्फटकमज्ञात्वाकर्तृन्यवस्यति ।
स्त्री पुरुष तथा पिता पुरकी साक्षी नदे
और समति (सलाद ) यो छिपाकर करे
नद्रागादाटीर्घदशीस्यात्सचिग्मुखमनुते६८०
और शरण माये हुएका परित्याग न करे॥६॥
वृथा क्मीकामी जानकर जो किर
यथाशक्तिचिकपित्तकुर्यान्मुद्यञ्चनापदि ।
चाहता है और पहिरोही जो गोत्र दीय
क्स्पचिन्नस्पृशन्मममिथ्यावादनम्यचित् ॥ ६ ॥ ६८॥
दर्गी होता है यह चिरकारतर मुरा भागर
करने अभीष्ट कार्यो यथाशनि करे प्रत्युत्पन्नमतिः प्रामाक्रिया यास्यति ।
भापतिकादम माहको प्राप्त न हो; किमीवे
ममंका पग न करे और विसी मिया
सिद्धिसागयिकीतनचापल्याकायगौरवात
भपयादवो न करे ॥६॥
उद्धिको प्राप्त होकर काय समयम।
नारीलकातयकाचित्प्रलापनवारयेत् ।
जो कार्य किया चाहता है उस कात्र
अलग्यस्यादम्यमपिगेट्रिीपतंतुयत् ६३॥ गौरतामे सरार होता है ॥ १ ॥
भाषाटीकासहित ।
(७१)
यततेनैवकालपिक्रियांकर्तुंचसालसः । उसकार्यको निस्सन्देह मित्र कर सकेंगे इस.
नसिद्धिस्तस्यकुत्रापिसनश्यतिचसान्वया७०॥
से मित्रकी प्राप्तिके लिये यत्न करें क्योंकि
भालसी मनुष्य कार्यके समयमें भी मनुष्यीको मित्रकी प्राप्ति बडी श्रेष्ठ है ।। ७६॥
कार्य करनेमें यत्न नही करता उस मनुष्यकी नात्यत्तविश्वसेकंचिद्विश्वस्तमपिसर्वदा ।
कहीं भी सिद्धि नहीं होती और वह वंशव पुत्रवाभ्रातरं भार्याममात्यमधिकारिणम् ।।
हित नष्ट होजाता है ॥ ७० ॥
सदा विश्वासघालेका अत्यन्त विश्वास न
क्रियाफलमविज्ञाययतेतसाहसीचसः ।
करे, पुत्र भाई खी मन्त्री और अधिकारी
दुखभागीभवत्येवक्रियायांतत्फलेनवा ।।७१३ इनका भी विश्वास न करे ॥ ७ ॥
जो मनुष्य कायके फलको विना जानकर धनस्त्रीराज्यलोभोहिपामधिकोयत्तः ।
युल करता है बद साहली शीघ्रकारी है प्रामाणिकंचानुभूतमाप्त सर्वत्रविश्वसेत् ७८
और कार्य और कार्यके फलम वह मनुष्य क्योकि धन स्त्री राज्य इनका लोभ सप-
दुःखका ही भागी होता है ॥७१ ॥
से अधिक है जो प्रामाणिक है जिसको बताय
महत्कालेनाल्पकर्मचिरकारकिशोतच ।
रक्खा हो और जो यथार्थवादी हो उसका
सशोचत्यल्पफलतोदर्घिदशीभवेदतः।।७२ ॥ विश्वास सदैव करें ॥ ७८ ॥
जो अल्पकार्यको बड़े कालमें कर उसे विश्वसित्वात्मवयूढस्तकार्यविमृशेत्स्वयम् ।
चिरकारी कहते है और वह अल्प फलकी तदाक्यंतर्कतोनयविपरीतचिंतयेत् ॥७९ ॥
प्राप्तिसे पोछे शोच करता है इससे मनुप्पको विश्वाससे समान हो गया हो उसके
दीर्घदी होना चाहिये ॥७२॥
सुफलंतुभवत्कर्मकदाचित्सहताकृतम् ।
कार्यको स्वयं विचारे उसके वाक्यको तक-
मासे विपरीत न जाने ॥ ७९ ॥
निष्फलवापिप्रभवेत्कदाचित्सुविचारितम् ७३ चतुःषष्टितमाशंतन्नाशितशमयेय ।
कभी शीघकिया हुआ भी कम अधिक स्वधर्मनीतिबलवास्तेनमैत्रीप्रधारयेत् ८०
फलदायी हो जाताहै और भलीप्रकारसे भी चौसठवा भाग जो सेवक नष्ट कर द उस-
किया हुआ कम कदाचित् निष्फल हो जाता पर क्षमा करें और अपना नीति धर्म बल इन
है॥७३॥
वाला जो पुरुष उसके सग मित्रता करे।।८० ॥
तयापिनैवकुतिप्तहसानकारितत् ।
दानैर्मानैश्चमत्कारैःसुपूज्यान्यूजयेत्सदा ।
कदाचिदीपसनातमकार्यादिष्टसाधनम्७१ ॥ कदापिनोगदंडास्यात्कटुभापणतत्परः ८१ ।
तौभी सहसा ( शीघ्र ) कर्मको न करें
दान मान और सरकारीस पनने योग्योंका
क्योकि वह अनर्थकारी होता है और कदा-सदैव पूजन करें और राजा उग्र दण्डकादाता
चित कुकर्मसे भी इष्टाकोसिद्धि हो जाती है और कवचनका बक्ता कभी न हो ॥ ८ ॥
यदनिष्टंतुसत्कार्यान्नाकार्यपेरकं हितत् ।
भार्यापुत्रोप्युदिजतेकटुवाक्यापदंडतः ।
भृत्योभ्रातापितापुत्रः पत्नीकुयानचैवयत् ॥ पशवोपियांतिदानैश्चमृदुभाषणः ॥८॥
और जिप्त सरकमसे जो अनिष्ट हो जाय
कट्ठवचन और उन दण्डसे स्त्री और पुत्र
यह सत्कर्म उस अनिष्टका प्रेरक नही होता भी उदासीन होते है दान देना और कोमळ.
जिस कायको भृत्य भाई स्त्री न कर सके ७५॥ वचनसे पशु भी वशम हो जाते है ॥ ८॥
विधास्यतिचामेत्राणितत्कार्यमविशक्तिम् । नविद्यपानशौर्येणधनेनाभिजनेनच ।
अतोयतेततत्मात्यमित्रलान्धर्वगनृणाम् ।। नवलेनप्रमतास्याचातिमानीकदाचन ॥८॥
(७२) अध्याय- शुक्रनीति । । विद्या, शूरवीरता, धन, कुल, वल इनसे मदाएतेवलिप्तानांसतामेतेदमाःस्मृताः । कभी प्रमत्त न हो और न अत्यंत मान विद्यायाश्चफलंज्ञानविनयश्चफलंश्रियः ॥ ९०॥ करें ॥८॥ अभिमानियोंके ये मद होते हैं और सत्पुर- नाप्तोपदेशसंवेत्तिविद्यामंतःस्वहेतुभिः । 'पोंके येही दम कहै हैं विद्याका फल ज्ञान और अनर्थमप्यभिप्रेतंमन्यतेपरमार्यवत् ॥ ८४ ॥ विनय है लक्ष्मीका फल-॥ ९० ॥ विद्यास उन्मत्त पुरुष अपने हेतुओंसे यज्ञदानेवलफलंसद्रक्षणमुदाहृतम् । आप्तोके उपदेशको नहीं जानता और अपने नामिताःशत्रवःशौर्यफलंच करदीकृताः ९१॥ वांछित अनर्थकोभी परमार्थके समान मानता है ।।८॥ यज्ञ और दान, बलका फल सजनोंकी । रक्षा कहा है और शूरवीरताका फल यह है कि शौर्यमत्तस्तुसहसायुद्धंकृत्वाजहात्यसून् । शत्रुओंको नवाना और उनसे कर लेना ॥२१॥ व्यहादियुद्धकौशल्यंतिरस्कृत्यवशात्रवान् ८५ शमोदमश्चार्जवंचाभिजनस्यम्लत्विदम् । शूरवीरता उन्मत्त पुरुष शीघ्र ही युद्ध :मानस्यतुफलंचतत्सर्वेस्वसदृशाइति ॥९२।। करके और राजाओके व्यूह (समूह) की कुश और उत्तम कुलका यह फल है कि शांति स्ताले शत्रुओका तिरस्कार करके अपने, इन्द्रियोका दमन और नम्रता करना और प्राणोंको त्याग देता है ।। ८१॥ मान बडाईका फल यह है सबको अपने श्रीमत्तःपुरुपोवेत्तिनदुप्कीर्तिमजोयया । समान समझना ॥ ९॥ स्वमूत्रगंधमत्रेणमुखमासिंचतिस्वकम् ८६ ॥ सुविद्यामंत्रभैपन्यत्रीरत्नंदुष्कुलादाप । लक्ष्मीस उन्मत्त पुरुष अपनी कुकीर्तिको गृहीयारसुप्रयत्ननमानमुत्सृज्यसाधकः ९३॥ नही जानता और वह पुरुष अपने मूत्रको उत्तम विद्या, मत्र, वैद्यविद्या, उत्तमम्री दुर्गधियाले मुखको अपने सूत्रसे ही बकरेके इनको नीच कुलसे भी साधक (कार्यकरने समान सोचता है॥८६॥ वाला) मानको त्यागकर ग्रहण करें। ९३ ।। तयाभिजनमत्तस्तुसर्वानेवारमन्यते । उपेक्षतप्रनष्टयत्प्राप्तयत्तदुपाहरेत् । श्रेष्टानपीतरा-सम्यगकापुरुतमतिम् ।।८७॥ नवालंनस्त्रियंचातिलालयेत्ताडयेनच॥९४॥ तिसी प्रकार अपने कुळसे उन्मत्त संपूर्ण नष्टयस्तुको उपेक्षा करे और प्राप्त इन श्रेष्टॉकाही तिरस्कार करता है और निदित वस्तुको ग्रहण करे, बालक, स्त्री इनका न कामों में मतिको करता है॥८७ ॥ त्यंत लोड करें और न अत्यंत ताडनादे॥९॥ चलमत्तस्तुसहसायुद्धविदधतेमनः । विद्याभ्यामगृहकृत्येतावुभौयोजयेत्रमात् । चलेनवायतेसर्वानश्चादीनपिधन्यया ॥४८॥ पदव्यशुद्रमापनादत्तसंहरदेणु ॥ ९५ ।। बदसे उन्मत्त पुरुप शीघ्रही युद्ध में मन विद्याके अभ्यास और गृहकृत्यमें इन दगाताहै यह पुरुष वसे सबको पोडा देता दोनोंको क्रमस नियुक्त कर । क्षुद्र है भीर भश्व आदिभी वृया ॥८॥ मल्प भी परदयका विनादिये ग्रहणनकर ९५ मानमत्तोमन्यतेस्मतृगवच्चासिलंजगत् । नोचारयेदवंकस्यस्त्रियनवचदूपयेत् । अनहींपिचमभ्यस्त्वत्यमिन मिच्छति ।।८९ नयादन्तसाक्ष्यंकृतंसाक्ष्यनलोपपेत् ॥९॥ मानसे उन्मत्त पुरुष संग जगतको तृणके किसीके पापका उच्चारण न समान मानता है और सरल अयोग्य होनेपर दोपन लगाये और मंडी साक्ष्य (गवाही भी . मानगो इच्छा करतार ॥ ८९॥ दे और सासका लोर न करें ॥२६॥ और कर स्रीको . m ..] भातादीकासहित । (७३) . प्राणात्ययेऽनृतंच्यात्सुमहत्कार्थसाधने । रोग, शत्रु इनको अप समझ कर उप- चार ( इलाज) से अपमान न करे किंतु कन्यादानेतुयधनदस्यसपननरम ९७॥ प्राणके नाशम, बड़े कार्य के साधनम, ऋत्ताके भयसे सर्पकार तेज भयो अनि झूठ बोले और कन्या देनवालको निधन का दु स्वभाव भयसे दुर्जनका, समाके और चौरको धनवाला ॥ ७ ॥ भयस राजाका पुचिका (कन्या ) दुःसके भय जामाताका ॥३॥ गुप्ताजघासयेनेवविज्ञातमापिदर्शयेत् । स्वपूर्वजपिडदत्वावृद्धिभीरपाटपाचरेत् । जायाफ्त्याश्चोपत्रीश्चभ्रात्रोश्चस्वामिभृत्ययोः ऋणशेषरोगशेषशत्रुशेपनरक्षेयत्॥ ४ ॥ ॥९८॥ अपने पुरुषाका पिण्डका दाता हानेसे हिंसा करनेवालेको रक्षित जाने हुएकोभी भानजेका और बढनेकै भयस रोगका, और न बताये जायापत्ति (स्त्री पुरप) माता पिता दो भौतिल शवका संदेय उपचार (सवा ) क्रै भाइ स्वामी भृत्य (नौकर)॥९८॥ और ऋण, रोग, शत्रु, इनके शेषकी रक्षा न भगिन्यामिनयोभदनकुर्याद्रुशिष्ययोः। कर भथात् इनको निमूट कर दे॥४॥ नमध्याहमनेंभापाशालिनो स्थितयोरपि ९९॥ याचकाद्यैः प्रार्थित सन्नतीक्ष्णचोत्तरवदेत् । दो बहन और दो मित्रा गर, शिप्य(चला) तत्कायतुसमर्थश्चेकुर्यादाकारीतच ॥ ५ ॥ इनमें भेद न करे वार्ता करते हुए दो पुरुः और याचर आदि प्रार्थना करे तो उनको पौके और बेठे हुए दो पुरुषाकै बीचमे तोखा उत्तर न और समर्थ हो तो इनके होकर नजाय ॥९७५ कायको करै अथवा करा दे॥५॥ सुहबभ्रातरवधुनुपर्यात्सदात्मवत् । 'दातृणावामिकाणाचशूराणाकीर्तनसदा । गृहागतक्षुद्रमापयहिपूजयेत्सदा ॥ १०० ॥ शृणुयात्तुप्रयत्नेनतन्द्रिनैवरक्षयेत् ॥ ६ ॥ मित्र, भाई, पयुइनकी सदैव अपने समान दाता, धाामा शूरवीर इनकी कीरतो सवा कर और घरआये क्षुद्री भी यथायोग्य सदव पूजा करें ॥ २०० ।। बड यत्नसे सुन और छिद्रको न देखे ॥६॥ तदीयकुशलप्रश्न गस्त्यादानेजलादिभिः । कारहितमिताहारविहारीविधताशन । सपुनस्तुगृहेकन्यासपुत्रावासयेनहि ॥ १॥ अदीनारमाचसुस्वप्न शुचि स्यात्सर्वदानरः । अपना शक्तिके अनुसार जर आदि दोना समयपर हितकारी प्रमित भोजन और से फुशम्पन्न पूछे और पुत्र सहित (सपुत्र ) विहार करे, यता शेपको भदाण फरे, पुत्र सहित कन्याको न बसावे ॥१॥ दीनता न करे सुखसे सावै भोर सर्वदा मभृतकाचभगिनीमनायतेतुपालयेत् । पविर रहे॥७॥ सोग्निर्दुननीराजाजामाताभगिनीमुत ॥ कुर्यद्विहारमाहानिहरिविजनेसदा । भार सहित भगिनीको घर न बसावे व्यवसायीसदाचस्यात्सुखव्यायाममभ्यसेत् ।। भीर अनाथ (असमय) हो तो पाइन विहार (कोडा) भोजन मल मूबरयाग परे। सप, भग्नि, दुजन, राजा नामात,इनको सदैव पका-तम करे, नित्य THI हो और सुखस व्यायाम (कसरत)का अ- रोगाशनीवमान्योप्यल्पइत्युपचारत । क्रोत्तिण्याद्दु'स्वभावारस्वाम पुति अन्नननिद्यासुस्वन्छ'स्वीकुर्यायीतिभोजनम् । पाभयात ॥३॥ आहारप्रवरविद्यापडसमारोत्तरम् ॥ ९ ॥ भानजा॥२॥ (भ्यास करें ।। ८॥
(७४) शुक्रनीति । [ अध्याय- अच्छा मनुष्य अत्रकी निंदा न करें प्रीति जवान स्री अनर्थको मूल होती हैं तो न भोजनको ग्रहण कर और छः रसयाले औरों के साथ क्या है, मदकी पसे प्रमादको उस आहारको उत्तम समझे जिसमें मधुर और सोही संतानसे मोहको प्राप्त न हो ?m अधिक हो ॥ ९॥ साध्वीभार्यापितृपत्नीमातावाला पितास्तुपा। बिहारचैवस्वस्त्रीभिवेश्याभिनकदाचन । अभर्तृकानपत्यायासाध्वीकन्यास्वसापिच २७ नियुद्धकुशलः साव्यायामनतिभिवरम् ।। साधुनी, पिताको घी, माता, बाळक, विवाहित त्रियों के साथ विहार कर पिता और जो अनपत्य और भर्ता हित घेराभोंके साथ कभी न करे, युद्धमें कुशलोके कन्या, स्नुषा (पुत्रकी वह ) स्वक्षा साथ युद्ध और नहि (नमस्कार) करने ( बदन } ॥ १७ ॥ चालक घाय व्यायाम श्रेष्ठ होता है ॥ १०॥ मातुलानीभ्रातृभार्यापिठमावस्वसातया । हित्याप्रावपश्चिमायामानिशिस्वापोवरोमतः।। मातामहोनपत्यश्चगुरुयशुरमातुलाः॥ १८॥ दोनोपंगुवधिरानोपदास्याः कदाचन ११॥ भाई, भावज, माता और पिताको बहन से पहिले बीर पिछले प्रहको छोडकर नाना, संतानरहित गुरु, श्वशुर, मामा १० रात्रिमें सोना म होता है और दीनधेि, बालाःपिताचदाहिनोभाताचभगिनीसुतः । पंगु, पहिरे इनका हास्य कभी न करे ॥ १९॥ एतेषश्यपालनीयाःप्रयत्नेनस्वशाक्तितः ॥१९॥ नाकार्यनुमतिकुर्याद्राक्स्वकर्यप्रसाधयेत् ।। याटक, रक्षक. धेवता, धाता, भानजा ये उद्योगनवलनयबुद्धयाँधयणताहसात् ।।२२।। अपनी शक्ति के अनुसार यससे पालने ॥ १९॥ मकायम मति न कर अपने कार्यको शीघ्र अविभवेपिविभवेपिठ्मानुकुलंमुहत् । सिद्ध करे, उद्योग, पद, बुद्धि, धीरज, साध इनसे ॥१०॥ पन्त्याःकुलंदासदासीभृत्यवर्गावपापयेत्२०॥ पराक्रमेणाचनमानमुत्सृज्यसाधकः । धन न होते और होते भी पिता माताका नानिध्पवढेकस्मिन्नच्छिदंकरपलक्षयेत् १३ इनको पालना करे ॥ २०॥ कुल, मित्र स्त्रीका पुलदास दासी भृत्यवगं कार्यसाधक मानको त्याग कर पराक्रम विकलांगान्प्रजितान्दीनानाथांश्चपालयेत् । औरनम्रतासेपल किसाको अनिष्ट न करें। और किसी रिद्रको न देव ॥ १३ ॥ कुटुंबभरणाययोयत्नवान्नमवेन्नरः ॥ २१ ॥ आज्ञाभंगस्नुमहतांराजाकार्यानवेकचित् । विकलांग (एफ. मग रहिन ), संन्यासी असत्कार्यनियोक्तारं गुरुवापिप्राधयेत् २४ ॥ ना अनाथ, इनको पाटना पर और एडाप पांकी भार गलागी भानामा भग कभी होता उसके ॥ २१ ॥ न कर भवरयापक नियुक्त करनेवाले गुरु तस्यसागुण किनुपिन्द्रपमृतमः । को भी बोपन करा ॥ १५ ॥ नातिकामदपिकविणकार्यमधाम । नकुटुंभृतयेन नामिताभगोपिन ॥२२॥ प्रत्यास्वंतत्रांनमणीयपंगठेन्नर चिन ११ सण गुणांकापा फर यह मनुष्य गाद पोधक पु (सोट) या भी) नीता दोगुमा मराई निमने मारपयो पाटा भरपन न कर पान नीको बोनही और रामाशो नाग नाही ॥ रपीन नाप ॥ १५ ॥ प्राप्तगाभिनेतस्पफिजीस्तिनों। मियाममनयमनामपिरगा। माभिातोरणीनियसुदारिद्रीचारमा२।। विमान्मार्गमरमदमती १६ ॥ गुमहानागानागामनाएंतगडीयाः ।
भाषाटीकासहित । मिले हुए पदार्थको जिलने रक्षा नहीं को एकशास्त्रंक पढ़नेवाला मनुष्य कार्यके उसके जीनेसे क्या है स्त्रियोंके वशीभूत और निर्णयको नहीं जान सकता इससे मनुष्य सदैव ऋणी महान् दरिद्री और याचक अनेक शास्त्रको देखनेवाला हो इसीस महान् ॥ २३ ॥गुणहीन, शत्रुके आधीन ये सब मनुष्य व्यवहार होता है ॥३०॥ जीतेही मृतकके समान है।। २३ ।। बुद्धिमानभ्य सन्नित्यंवद्वशास्त्राग्यतांद्रितः।। आयुपित्तंगृहच्छिद्रमंत्रमैथुनभेषजम् । तदर्थतुगृहीत्वापितदधीनोनजायते ॥ ३१ ॥ दानमानापमानंचनैवैतानिपुगोपयेत् २४ ।। बुद्धिमान् आलस्य छोडकर प्रतिदिवष्ठ अवस्था, धन, घरका छिद्र, मंत्र (सलाह ) शास्त्रोका अभ्यास करें और शास्त्रके अर्थको मथुन, औषध, दान, मान, अपमान इन जानकर भी उसके आधीन मनुष्य नहीं नौवस्तुओको भली कारगुप्त करें ॥ २४ ॥ होता ॥ ३१ ॥ देशाटनंराजसभावेशनशास्वचिंतनम् २५ ॥ वेश्यातथाविधावापिवशीकपुनरंक्षमा । वेश्यानिदर्शनंविद्धन्मत्रीकुर्यादतद्रितः । नेयात्कस्यवंशतद्वत्स्वाधीनंकारयेजगत् ॥३२ अनेक श्चतथाधर्माःपदार्थाःपशवोनराः ॥२६॥ वेश्या तिसप्रकारको मनुष्यको वशकरनको देशो में विचरना राजसभामें जानाशास्त्रका समर्थ होती है इससे आप किसीके वशमें. चिंतन ।। २५ ॥ वैश्याओका परिचय विद्वानो न हो और जगतको अपने वशम कर ॥३२॥ की मित्रता इनको निरालस्य होकर करे और श्रुतिस्मृतिपुराणानामार्थविज्ञानमेवच । भनेक धर्म, पदार्थ, पशु, नर ॥२६॥ सहवासात्पांडतानांबुद्धि पंडाप्रजायते ॥३३॥ देशाटनात्स्वानुभृताः पर्वतादेशरतियः । अति, स्मृति, पुराण, इनके अथका ज्ञान- कीदृशाराजपुरुपान्याव्यान्याय्यंचकीद्दगम् ॥ और पंडा बुद्धि पंडितोंके संग वाससे होती है ॥ ३३ ॥ पर्वत दशौकी रीति ये सब देशाटनसे जाने जाते हैं, राजाके पुरुष कैसे हैं, न्याय, देवपित्रतियिभ्योन्नमदत्त्वानानियाक्वचित् । और अन्याय केटा है ॥ २७ ॥ आत्मायः पचेन्मोहानरकार्यसजीवति३॥ मिथ्याविवादिनः केचकैवैसत्यविवादिनः । देवता, पितर,अतिथि इनको विना अन्न दिये कीदृशीव्यवहारस्यमवृत्तिःशास्त्रलोकतः२८॥ भोजन न करें जो अज्ञानसे अपने लिये पकाता है वह नरकके लिये जोवता है ॥ ३४ ॥ कौन मिथ्यावादी हैं कौन सत्यवादी हैं मार्गगुरुभ्योबालेनेव्याधितायशवायच । शास्त्र और लोककी रीतिले व्यवहारको प्रवृत्ति कती है ॥२८॥ 'राज्ञेथेष्टायनातिनेयानगायसमुत्सृजत् ३५ ॥ सभागमनशीलस्यतविज्ञानप्रजायते । इतने पुरुषों को मार्ग छोडदे अर्थात् समुख आते देखकर हट जाय कि गुरू, यलमान, हंकारीचधर्माधःशास्त्राणांतत्वचिंतनैः२९॥ रोगी, शब, राजा श्रेष्ठ व्रतवाला और जो राजसभा जानेवाले मनुष्यको इन वस्तुयानम चढा हो ॥ ३५!! ओंका ज्ञान होता है, शासके तत्त्वोको चिंतासे शकटासंचहस्तंतुदशहस्तंतुवाजिनः । मनुष्य अहंकारी और धर्म अंधा नही होता ॥ २९॥ 'दूरतःशतहस्तंचतिष्ठेन्नागावृपादश ॥ ३६॥. गाडीसे पांच हाय, घोडेप्स दश हाय, एकशासमधीयानोनपिंद्यात्कार्यनिर्णयम् । हाथीसे सौ हाथ और पैलसे दश हाथ दूर त्यावहागमसंदीव्यवहारोमहानतः ॥ ३०॥ पर टिके ॥ ३६ ॥ 1 [ अध्याय- शुक्रनीति। (७६) श्रृंगिणांनविनविंदष्ट्रिणां दुर्जनस्यच । राजाको मित्र जानकर मन माने कार्य न नदीनांचमतौस्त्रीणांविश्वासनैवकारयेत् ३७॥ कर और मृखको स्वामी बनाने की इच्छा न सोग, नस, डाढवाले जीवोंका, दुर्जन कर तथा महात्माओके दाल बनने की इच्छा नदी समोपका वास और स्त्री इनक कदा. करे ॥ ४ ॥ चित् भी विश्वास न करे ॥ ३७॥ विरोधनंज्ञानलबदुर्विदग्ध त्यचरंजनम् । खादन्नगच्छेदध्वानंनचहास्यनभायणम् । ज्ञानके लेशसे जो दुविदग्ध है उसके संग शोकनकुनिष्टस्यस्वपिनल्पनम् ॥३८॥ विरोध और प्रीति न करें । भोजन करता हुभा मार्गमें न चल, इसी अत्यावश्यमनावश्यक्रमात्कार्यसमाचरेत् । से भाषण न करै, नष्ट हुई वस्तुका शोक प्राक्पश्चाद्राग्विलेबेनप्राप्त कार्यतुवुद्धिमान् ।। नकरै, अपने कृत्यका कथन (प्रशसा) आवश्यक और अनावश्यकको क्रमले करे न कर ॥ ३८॥ अर्थात् आवश्यककार्यको करके अनावश्यकको सशंकितानांसामीप्यत्यजेद्वनीचसेवनम् । कर प्रथम पीछे शीन और विलंबसे सल्लापवशृणुयाद्गुप्त कस्यापिसर्वदा ॥३९॥ प्राप्त हुए कार्यको मनुष्य कर अयाद जो जिसकी तरफसे कुलका हो उसके समीप जिससमय करनेके योग्य हो उसको उसी न रहै, नीच की सेवाको त्याग दे और किसीके समय करें ॥१४॥ सम्भाषगको कदाचित् भी छुपकर न पियाज्ञातेनवैमातृववरूपसुपूजिता ॥ ४५ ॥ सुने ॥ ३९॥ उत्तमैग्ननुज्ञातंकायनेच्छेचतैः सह । धृतागौतमपुत्रेगह्यकायेंचिरकारिता । देवःसाफसुधापानाद्राहोश्छिन्नाशेरोयतः ४०॥ प्रेम्णासमीपवासेनस्तुत्यानत्याचसवया ॥४६॥ पिताकी आज्ञासे माताके मारने रूप कार्यम घडॉकी आज्ञाके विना और उनके साथकी भली प्रकार पूजा ॥१॥ गौतमपुत्रको फुक- इच्छा न करें क्योंकि देवताओके सग अमृत-ममभी चिरकालमे करनेते मिली और प्रेम पान करनेसे राहुका शिर छेदन हो गया समीर वास, स्तुति नमस्कार सेवाले ॥ १६ ॥ महतोसत्कृतमपिभवेत्तद्भपणायवै । कौशल्येनकलाभिश्चकथाभि नतोपिया । विषपानं शिवस्यैवत्वन्यषांमृत्युकारकम् ४१॥ आदरणार्जनशौर्याहानेनविद्यया ॥४७ ॥ निदितभी कर्म बडोंके लिये भूषण होता कुशलता का कयाज्ञान आदर नम्रता और अन्य पुरुषोंको मृत्युका दौता होता शूरता दान और विद्याते ॥ १७ ॥ है॥४१॥ प्रत्युत्यानाभिगमनैरानंदस्मितभाषणैः। तेजस्वीक्षमतेसर्वभोक्तंवदिग्विानयः । उपकौर सागयेनवशीकुर्याजगत्मदा ४८ नसांमुख्पेगुगरयेयंराजाश्रेष्ठस्यकस्यचित् । प्रत्युत्थान (देखकर उडना) सन्मुखगमन तेजपाला मनुष्प संपूर्ण भक्षण करनेको कारणले सदेव जगत्को वशम करै ।। ४८ ॥ आनंद हँसकर भाषण सरकार और अपने- इसमकार समर्थ होता है जैसे पवित्र भाग्नं और गुरुराजा अयवा अन्य किसी ह पुरुपके एतेवश्यकपायादुर्जनेनिष्फलाःस्मृताः । समुप नटिक ॥१२॥ तत्सन्निवियजयाज.गस्तस्तदंडतोजयेत् ४९ गजामिनमितिज्ञात्वानकार्यमानमाप्मतमा परन्तु पे सर वश करनेके उपाय दुनर्व विषय निष्कर कहे है इस दुद्धिमान् मनः समनाम ॥१३॥ दुरके समीपको त्यागसमय होयतो उस से जीते ॥ ४९ ॥ था।॥१०॥ नेछेन्मूर्यस्यम्वामिवटास्पमिन्महा- ३.] भाषाटीकासहित। (७७) उलभूतस्तुत परुपायरेभिरववा। कुर्याद्यथासमीक्ष्यतरसुखस्वप्यारेनरः । श्रुतिस्मृतिपुराणानामभ्यासः सर्वदाहितः ५० राज्ञोनानुकृतिकुर्यानच श्रेष्ठस्यकस्यचित् ।। छलहप जीतने के उपायोंसे अथवा इनहीं इससे इन सब कामोंको यथार्थ देख कर जीते श्रुति स्मृति पुराण इनका अभ्यास सदै कर और मनुष्य चिरकालतक आनंदसे शयन व हितकारी होता है ॥५०॥ कर और राजाका अथवा किसी श्रेष्ट मनुष्यका. सांगानांसोपवेदानांसकलानांनरस्यहि । अनुकरण न करें ॥ ५६ ।। नैकोगच्छेयालव्याघचौरेपुचप्रवाधितुम् । मृगयाक्षास्त्रियःपानंव्यसनानिनृणांसदा ।। अंग और उपवेदी सहित संपूण वेदीका जिघांसतंजिघांसीयाद्गुरुमप्यावतायनम् ।। अभ्याल मनुष्यको हित है और भृगया गूत सर्प सिंह चौर इनकी हिंसाके लिय अकेला स्त्री मदिराका पान ये मनुष्योंके सदेव व्यसन न जाय और मारते हुए माततायी गुरकीभी कहे हैं। ५१ ॥ हिंसा करें ॥ ५७॥ चत्वयिता नसत्यज्ययुक्त्यासयोजयेत्कचित् । कलहेनसहायःस्यात्संरक्षेद्दहुनायकम् । कूटेनव्यवहारंतुवृत्तिलोपनकस्यचित् ॥५२॥ गुरूणांपुरतोराज्ञोनचासीतमहासने ॥ ५८ ॥ लडाईमें सहायता न करें और उसकी इन चारीको त्याग दे परन्तु युक्तिस कचिव रक्षा करें जिसके समीप बहुत सेना हो। गुरू २ इनका योग कवित) किसीके झूठसे व्यव और राजा इनके आगे उच्च आसन पर हार और किसीको जीविकाका लोपू ॥ ५२ ॥ न चैठे ।। ५८ ॥ नकुर्याचिंतयेत्कस्यमनसाप्यहितकचित् । प्रौढपादोनतत्कायहेतुभिर्विकृतिनयेत् । तत्कार्यतुसुखयामाद्भवेत्रीकालिकदृढम् ५३ यत्कर्तव्यनजानातिकृतंजानातिचेवरः ॥१९॥ न करे और मनसे भी किसीके अहि और ऊंचे पैर करके भी न बैठे और तकी चिंता न करें और वही काम करें जिसन उनके कार्यको बिगाडे जो मनुष्य करने से तीनों कादमें दृढ सुख मिले ॥ ५३ ।। योग्य कार्यको न जाने उसको श्वर मनुष्य कैसे जान सकतेहै । ५९ ॥ मृतेस्वर्गजीवविचविद्याकीर्तिदृढांशुभाम् । वक्तिचकर्तव्यंकृतंयश्चोत्तमोनरः । जागर्तिचसींचतायःआधिव्याधिसुपीडितः ॥ नमियाकथितसम्यानुतेनुभवांविना ॥६०॥ मरे पीछे, और जीवते समयमै दृढ तथा जो मनुष्य अपने करने योग्य वा किये उत्तम करको पहियाले जो मनुष्प चिंता कार्यको नहीं कहता वह भादमी उत्तम होता है हित है वा आधिव्याधिस सुपीड़ित है वह अथवा जो स्त्रीके कथनको बिना देखे सत्य जागता है अर्थात् उसको निद्रा नही नहीं मानता वह भी उत्तम है ।। ६०॥ आती॥ ५४॥ अपराधमातृस्नुपाभ्रातपत्नीसपानिजम् । जारश्चोरोवलिदिष्टोविषयीपनलोडपः । पोडशाब्दात्परपुत्रद्वादशाब्दात्परंखियम् ६१॥ कुसहायानृपतिर्भिन्नामात्यस्सुहत्मजः॥५५॥ अथा जो माता पूववधु भातायो श्री सपानी इनके अपराधको न माने वद उत्तम जार चोर बलवान्का री विषयी धनका दोभी जिसका सहायक बुरा हो वा है सोलहवर्षसे ऊपर पुत्रकी और बारह वर्षसे जो राजा बुरा हो जिसके मत्री भिन्न हो वा ऊपरस्त्रीकी॥ ६॥ जितकी प्रजा भिन्न हो अर्थात मानताडयेदुष्टवाक्यै पीडयेन्नस्नुपादिकम् । करन लेवा हो। ५५॥ पुत्राविकाश्चदौहित्राभागिनेयाश्चभ्रातरः ६२६६
शुक्रनीति ।
[ अध्याय
NEPALI
ताटना न करें और पुत्रवधू आदि बांधवाः कुलमिच्छतिमिष्टात्रमितरेजनाः।
कोको दुष्टवचनोले दुःख न दे और भार्यायवरयत्कन्यामसमानर्पिगोत्रजाम्६९।
दौद्दिव भानजे भाई ये सब पुत्रसे अधिक
बांधव कुलकी और इतर बगर
होते हैं। ६२॥
मिष्टानकी इच्छा करते हैं, भार्याका अमिलाप
कन्याधिका पालनयाभ्रातृभार्यास्नुपास्वसा।
मनुष्य ऐसी कन्याको विधा है जो अपने प्रव
आगमाहियततेरक्षणार्थहिसर्वदा ॥ ६॥ वगोत्रकी न हो ॥ ६९ ॥
और भ्राताको नी पुत्रवधू भगिनी इनको भ्रातृमतीसुकुलांचयोनिदोपविवर्जिताम् ।
कन्यासे भी अधिक पालना कर, मेल और क्षिणशः कणशश्वविद्यामर्थचसाध्यत् ॥ ५
रक्षाक लिये खदेव यत्ल कर ॥ ६३ ॥
जितके भ्राता हों अच्छे कुलकी हो भी
कुटंबपोपणेस्वामतिदन्येतस्काराइव ।
योनिका दोप जिसमें न हो ऐसी कन्याव
अनृतंसाहसमोख्यकामाधिस्यस्त्रियांयतः ॥ विवाहै क्षण में विद्या और अल्पर भी धनक
स्वामी वही है जो कुटुम्बका पोषण कर संचय करै ॥ ७० ॥
उससे अन्य चोरोके समान होते हैं, जिससे नत्याज्यौतुक्षणकणौनित्यविधाधनार्थिना ।
त्रियोंको झंठ साहस मूर्खता कामदेवकी अधि- सुभार्यापुत्रामित्रार्थहित्तनित्यंधनार्जनम् ७१
कता होती है ।। ६४॥
विद्या और धनके अभिलाषीको क्षणी
कामाद्विनेकशयनैनवसुप्याखियासह कण (अल्पता) नही त्यागने, श्रेष्ठखी में।
दृष्टाधनंकुलंशीलं पविद्यांबलंक्यः ॥६५॥ पुत्रकै लिये नित्य धनका संचय कर
इससे खोके संग एकशय्या पर कमी अच्छा है॥७१ ।।
नसावेऔर धन, फुल, शील, रूप, विद्या, दानार्थचविनात्वतैः किंधनश्चजनैश्चकिम् ।
बल, अवस्था, इनको देखकर ॥ ६५ ॥ भाविसंरक्षणक्षमंधनंयत्नेनरक्षयेत् ॥ ७२ ।।
कन्यांदद्यादुत्तमचन्मैत्रीकुर्यादयात्मनः। और दानके लियेभी, इनके बिना धा
भार्याथिनयोविद्यारूपिणनिर्धनत्याप ६६॥ योग्य हो उस धनकी पत्नसे रक्षा करें ॥७३ ।
और जनों क्या भविष्यकालमें जो रक्षा
कन्याको दे और अपने उत्तम होय तो
उसफे संग मित्रता फरे और पर
चाजविामिशतवतुनंदामियनेन ।
शो परन्तु विधा और रूपवान् हो ॥ १६ ॥ इतियुद्धयासंचिनुपादनविद्यादिकंसदा ।।७३
नकवलेनरूपेणषयमानपनेनच ।
मेवौ वर्षतक जीनांगा और धन माने
आदौफुलंपरीक्षतततोविद्यांततोवयः॥६७ ॥ देव सञ्चय करे ।। ७३ ॥
भोगागाइस घुद्धिसे धन और विद्या प्रादिक
बेवळ ८५ अवस्था धनसे घरको न देने पंचविंशत्यन्दपूरंतदधैवातदर्षकम् ।
किन्तु प्रथम फुटको परीक्षा करे फिरविद्याकी विद्याधनं श्रेष्ठतरतन्मूलमितरद्धनम् ॥७४ ।।
फिर अवस्थाकी ॥६॥
शालंघनक्योरूपदेशपश्चाविवाहयता
पचीस वपतफ अपया सादे पारद वर्षता
अथवा सया ध्यपंतक पुद्धिक अनुसार nि
पत्यावरयतेरूपमातापित्तपितायतम।।६८॥ धन श्रेष्टतर होता और सरधनीकापही मन
फिर शीट धन भारपा कर इसको कारण है॥७॥
परीक्षा फार पियाद करदे मयारूपकोमाता दानेनवर्पतनियंनभारायननीयते ।
धनलोपिता विणाको पाहते ॥ ६८॥
यास्तिपावतुमवनस्तापसीस्तरोन्यते॥७॥
भापाटीकासहित ।
विद्याधन दानले नित्य बढ़ता है विद्याका व्यवहारियोंको जतानेवाला कोई नहीं
भार नहीं होता और न कोई लेजा सकता और है ॥ ८ ॥
“धनी मनुष्य जबतक धनवान् रहता है तचत्तक नलेखनविनाकुर्यादयवहारंसदाबुधः।
सब सेवा करते हैं ।।७५ ॥
निलभिधनिकराज्ञिविश्वस्तक्षामिणांवरे ।।
निर्धनस्त्यज्यतेभायीपुत्रायः सगुणोप्यतः ।
सुतचितंधनंधायगेहीतालखितंतुवा ।
संस्ताव्यवहारायसारभूतधनस्मृतम् ॥ ७६ ॥
मैत्र्यपाचितंदद्यादकुसीदधनंसदा ८३ ।।
गुणवान्भी निधनको स्त्री पुत्र आदि त्याग
देते हैं परन्तु संसारके व्यवहारोंके लिये धनदी
बुद्धिमान मनुष्य लिखे विना कोई कामन
फरे और निलभिी धनवान्, राजा, विश्वास
सार कहा है॥७६॥
अतोयतेततत्मात्यैनरः सूपायसाहसः ।
योग्य, क्षमाशील, इनके समीप अपने सचिर
धनको रक्ख चाहे वह धन गृहीत वा लिखा
सुविद्ययासुसेवाभिः शौर्यगकृषिभिस्तथा ॥ हो और मित्रता के लिये विना ब्याजभी धनको
इससे मनुष्य उत्तम उपाय वा साहससे भी सदैव दे ॥ ८२ ॥ ८३॥
धनकी प्राप्ति के लिये यत्न कर उत्तम विद्याः तस्मिस्थितंचनबहुहानिकृञ्चतथाविधम् ।
उत्तम सेवा, शूरवीरता और खेतीले ॥ ७ ॥
दृष्ट्राधमर्णवृद्धयादिव्यवहारक्षमसदा ॥८४ा
कोशीदवृद्धयापण्पेनकलाभिश्चप्रतिग्रहः ।
भित्रके पास स्थित हुआ भी लिखित धक
ययाकयाचा पिवृत्त्याधनवान्स्यात्तयाचरेत् ॥ अत्यन्त हानि करनेवाला नहीं होता और
सूदकी वृद्धि, व्यवहार, कला, प्रतिग्रह वा व्याजपरभी व्यवहारके योग्य सदैव देखकर
जित तिस वृत्तिसे ऐसा माचरण करें जिससे ॥८॥
धनवान हो। ७८॥
संबंधसभीतमुंबनदद्याच्चसाक्षिमत् ।
तिष्ठतिसवनद्वारेगुणिनः किंकराइव । गृहीतलिखितयोग्यमानंप्रत्यागमसुख ८५॥
दोपाअपिगुणायतदोषायंतेगुणाआप ॥७९॥ अवधी, प्रतिभू (जामिन) और साक्षी
धनवतोनिर्वनस्यनिद्यतेनि
इनको लिखकर धनको.दे क्योंकि ग्रहण कर-
ययानजानंतिवनसंचितकारीकुत्रवै ॥ ८॥नक समय सुखदाई होता है॥ ८५॥
नेके समय दिखाहुभा जो प्रमाण है सो लौटा-
धनवान मनुष्य के द्वारपर गुणवान् मनुष्य नदद्याद्वृद्धिलोभेननष्टमूलधनंभवेत् ।।
किंफरके समान टिकते हैं और धनवान मनु- आहारेव्यपदारेचस्यकलनः सुरखीभवेत् ॥
प्यके दोष भी गुण, भीर निधनके गुणभी दोष
हो जाते हैं और निधन मनुष्यको सब निंदा
ऐसी जगह व्याजके लोभसे धनको न दे
फरते हैं और जैसे क्षचित धनको कितना इजहां मूलधन भी नष्ट हो जाय क्योंकि आहार
और कहाँ ये न जाने ।।७९ ८० ॥
और व्यवहारमें जो लजाको त्यागता है वही
सुखी होता है ॥८६॥
आत्मास्त्रीपुत्रमित्राणिसलेखंधारयेत्तथा ॥ धनंमत्रीकरंदानेचादानेशचकारकम् ।
नैवास्तिलिखितादन्यस्मारकव्यवहारि-
कृत्वास्वीतेतयौदार्यकार्पण्यंबहिरेखच ।।८७t
णाम् ॥ ८॥
देनेके समय धन मित्रको और लौटाने
मात्मा, नी, पुत्र, मित्र, इन सबको लिख समय शत्रुताको करता है और अपने चित्त में
कर धनको रक्खें अर्थात् नित खसे इनको उदारताको और बाहिर
कृपणतातो
धन प्राप्त होसके क्योकि लिखे विना अन्य करके ॥ ८७ ॥
(८०) शुक्रनीति । [अभ्याव- रचितंनुष्ययंकालेनस्फुर्यान्न चान्पया । परोक्षमे उसने रनवास जाना तथा उसकी स्त्रीको बोलना उसकी न्यूनताको दिखना सुभार्यापुत्रमित्राणिशात्यासंरक्षयद्वन: ८८॥ उतचे प्रतिकूल विवाद इनकोन कर ॥९॥ मनुष्य समयपर उचित व्ययको कर असाहाय्यंचतत्काउँह्यनिष्टोपक्षणंनच । अन्यया न करें और शक्तिरे अनुसार श्रेष्ट स्त्री, पुत्र, मित्र इनको धनस रक्षा करें ॥ ८ ॥ सत्सदिमसीदवनंपञ्चौत्तमणिकम् ॥९५ ॥ उसक काय्यमे सहायताका त्याग उसके नात्मापुनरतोत्मानसमपुनर्भवेत् । अनिटशी उपेक्षा भी न करें और उत्तमर्णका पश्यतिस्मसनविश्वेन्नरोभद्रातानेच ९ ॥ जो धन व्याजपर हो या पिना व्याजपर हो अपना आत्मा फिर नहीं होता और अन्य उसको । ९५ ॥ सब फिर हो सकते हैं इससे आत्माकी सबसे दद्याद्गृहीतमिवनोचोभयोलेशकृयया । रक्षा करें क्योकि यदि मनुष्य जावेगा तो उपहा आनन्दको देखेगा ॥ ८९॥ नासाक्षिमञ्चलिखितमृणपत्रस्यपृष्टत ९६ ॥ सदारप्रौदपुत्रान्द्राक्योविभजेत्पिता । जिस प्रकार ग्रहण क्यिा हो उसी प्रकार उस रीतिले दे जिससे दोनोंको केश न हो सदास्भ्रातस्मादाविभजेयुःपरस्परम् ॥९० ॥ अपने कल्पाणका अभिलाषी पिता स्वीपर विना लिखे धनको न दे ॥ ९६ ।। और विना साक्षी और ऋणपत्र (रका) पीठ और व्यवहार करने योग्य पुनि धनका विभाग शीघ्र करदे अथवा उक्त स्त्री युक्त पुत्र आत्मपितृमातृगुण प्रख्यातश्चोत्तमोत्तमः । परस्पर धनका विभाग रहे ॥९॥ गुणरात्मभवःरख्यातःपैतृकर्मातकःपृयकः ।। एकोदाअपिप्रायोषिनागायान्ययारवटु । अपने वा पिता माताकै गुणा जिसकी कामंगरोच्चापिनीद्वयंमनुजस्यतु ॥ ९१ ॥ जो अपने वा पिताके वा माताके पृधन र कीर्तिमे हे वह नर उत्तमसे भी उत्तम है और क्योंकि विभाग न करनेसे प्राय. सहोदर गुणोस दिण्यात है वह ॥ ९७ ॥ भाई भी नष्ट हो जते है और मनुप्पी दो उत्तमोमध्यमोनीचोधमोमावगुणर्नर । स्त्री एक जगह नही. वस सपती॥९१ ॥ पर्यवसेत्तरहुत्वंपनातुनरद्वयम् । कन्यास्त्रीभगिनीभाग्योनर सोप्पधमाधमः। विभजेयुर्नतत्पुत्रायद्धनंवृद्धिकारणम् ॥१०॥ मावा गुंगा जो प्रसिद्ध हो वह अधम उमसे उत्तम मध्यम नीच होता है और प्रय समान मनुष्य अपना बहुत प्रो भोर कन्या, स्त्री भग्निी इन भाग्यसे जो एक जाद किस प्रकार यख सकते हैं और जीव वह अधम भी मधम होता है।॥ ९८॥ निस धनका म्यान भाता दो उस धनका भृत्वामहावनःसम्परपोप्यागंतुपोपयत् । विभाग पुरन 11, ययमस्थितचापियोपचौरमणिरम् । अदत्त्यायत्किचिदपिननयेडियमंयुध ॥१९॥ महाधनी होकर पाटन करने योग्य पुर यस्य दुत्तमाम त्रायानार्थमितापकम् ।। भादियो भी प्रकार पाना करे और जो धन पानपर हो अपरा जाना दानर दिना प दिनभी पतीत न करें। हो उसयो भी न चोटे और जियो गस्थित मृत्युमुखंचाक्षणमायुर्ममास्तिन । उत्तम मित्रतापी इमार188 धन रेनेगी। दान पर हमारादानवमाययष्टीनुगमाचरेत्॥२०॥ যশোর্শালমাৰাবস্থা। यह मानार पपट दान और धर्म पर बन्नदाननाव पतीपविराटनम् ॥ ९४ ॥'पाका ३०० ॥ IT मन्युये मुगमा भीरम भयरमा भापाटीकासहित। (८१) नताविनामेपरसहायाःतिचेत्तरे । चोरोने हरा हो अथवा परस्त्री 'संगमके दानशीलाश्रयाल्लोकोवर्ततेनराठाश्रयात् ॥१॥ लिये दिया हो उसको.पापदत्त कहते हैं और जिस धनसे देवताकी आराधना करे उसको और यह बुद्धि रखे कि दान और धर्मके विना परलोकमें मेरे कोईसहायक नहीं क्योकि अत्यन्त उत्कृष्ट कहते हैं॥५ जगतका व्यवहार दानशील मनुष्यक भासरस तन्न्यूनानवकुर्याजोपयत्तस्यसेवनम् । चलता है शठके आसरेसे नही ॥ १॥ विनादानार्जवाभ्यांनभुव्यस्तिचक्शीकरम्।।८॥ भवतिमित्रादानेनदिपंतोपिचकिपुनः । उसकी न्यूनता न करे किन्तु सदैव सेवन देवतार्थचयज्ञार्थब्राह्मणार्थंगवार्थकम् ॥ २ ॥ करे दान और नन्नताकै यिना पृथ्वीपर वश और तो क्या शत्रु भी देनेसे मित्र हो जाते हैं करनेवाली कोई वस्तु नही ॥ ८ ॥ और देवता, यज्ञ, ब्राह्मण, गौ इनके लिये ॥२॥ दानक्षीणोविवर्धिष्णुःशशीवकोप्यतःशुभः । यहर्ततत्पारलोक्यसेविदत्ततदुच्यते । विचार्यस्नेहंद्वेपंवाकुर्यात्कृत्वानचान्यथा॥९॥ बंदिमागधमल्लादिनटानर्थचदीयते ॥३॥ जो मनुष्य दानसे क्षीण हो वह कभी न जो दिया हो वह परलोकमें काम आता है कभी बढने योग्य होता है जैसे वक्र भी और उसको संविदत्त कहते हैं और जो चन्द्रमा शुभ होता है और विचार कर स्नेह बदीजन, भाट, मल्ल, नट इनके लिये दिया वा देपको करे, अन्यथा इनको न करे ॥९॥ जाता है॥३॥ नापकुर्यान्नोपकुर्याद्भवतोनर्थकारिणी । पारितोयंयशोथतच्छियादत्तंतदुच्यते । नातिौयनातिशाट्यंधारयत्नातिमार्दवम्१०॥ उपायनीकृतंयत्तुसुहृत्संबंधिबंधुपु ॥ ४॥ कितीका तिरस्कार वा उपकार बिना जो पारितोषिक (इनाम ) यशके लिये विचारे न करे क्योंकि विना विचार किये होता है उसको श्रियादत्त कहते हैं और जो दोनों अनर्थकारी होते हैं, अति करता, अति धनमित्र सम्बन्धी बन्धुओको उपायन (भेट ) शठता, अति मृदुता इनको न करे ॥ १०॥ किया हो॥४॥ नातिवादंनातिकार्यासक्तिमत्याग्रहनच । विवाहादिपुवाचारदत्तंहीदत्तमेवतत् । अतिसर्वनाशहेतुह्यतोत्यंतविवर्जयेत् ॥ ११ ॥ राज्ञेचालनदत्तकार्याकार्यवातिने ॥५॥ .और तिसी प्रकार अत्यन्त वाद अत्यन्त अथवा विवाह आदिमें व्यवहारसे जो दिया क्योंकि सब जगह अति नाशका हेतु होता है कार्यो में आसक्ति अत्यन्त भाग्रह न करें हो उधको हीदत्त कहते हैं और राजा बलवान्, अथवा कार्यके नष्ट करनेवालेको जो दिया इससे अतिको वर्ज दे। १११ हो ॥५॥ उद्वेजतेजनाक्रौर्यात्कार्पण्यादतिनिदति । पापमीत्यायवायच्चतत्तुभीदत्तमुच्यते । मार्दवान्नेवगणयेदपमानौतिवादतः ॥ १२ ॥ इत्तहिनवृद्धययनष्टयतविनाशितम् ॥६॥ क्रूरतासे मनुष्य कंपता है, कृपणताले अ- अथवा पापके भपस जो दिया हो उसको त्यन्त निमाको प्राप्त होता ६, मृदुको कोई भीदत्त कहते हैं और जो धन हिंसा वृद्धिक गिनता नहीं, अत्यन्त बादसे अपमान होता लिये अथा धूत, विनाशित नष्ट होता है ॥१२॥ है।॥ ६॥ अविदानेनदारियतिरस्कारोचिलोभतः । चारहतंपापदंतत्परस्त्रीसंगमार्थकम् । अत्याग्रहान्नरस्येवमौख्यैसंजायतेखलु ॥१३॥ आराधयतियंदेवतमुत्कृष्टतरवदेत् ॥ ७ ॥ भत्यन्त दानसे दरिद्रता, अत्यन्त लोभसे ... 1 यदि पराधीन किये गये देवसे मिट भी सोजन्य ( भाई ) रूप भूपणसे होती (८२) शुक्राति । [अध्याय- तिरस्कार और अत्यन्त आग्रहस मनुप्यको और वीरोके असरचनासे न डरे और न निश्चय मसंता होती है ॥ १३ ॥ उनके सन कोप करे, जिस मित्रको हना अनाचाराधर्महानिरत्याचारस्तुमूर्खता । नही होती वह फट जाता है वा उदासीन हो जाता है।॥२०॥ ह्यधिकोस्मीतिसेवेभ्योह्यधिकज्ञानवानहम् १४ विना भाचार किये धर्मकी हानि भौरभ- वक्तव्यनतयाकिंचिद्विनौदेपिचधीमता । त्यन्त आचारसे मूर्यता होती है, मैं सबसे आजन्मसेवितैर्दानैर्मानैश्चपरितोपितम् ॥२१॥ अधिक है और अधिक ज्ञानवान हूँ ॥ १५ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य विनोदमेभी तेले वचनको धर्मतत्वमिदमितिनवमन्येतबुद्धिमान् । न कहै जिससे दूसरा उदास हो। जिसको नेच्छेत्स्वाम्यंतुदेवेपुगोपुचब्राह्मणेपुच॥१५॥ दान वा मानसे जन्मपर्यंत प्रसन्न रक्खा हो यही धर्मका तत्व है अन्य नही इसको तीक्ष्णवाक्यान्मित्रमपितत्कालंयातिश ताम् । उसको कटु वचन न कहै ॥ २१ ।। बुद्धिमान् मनुष्य कभी न मान और देवता, गौ, ब्राह्मण इनके स्वामी होनेको इच्छा न वक्रोक्तिशल्यमुद्धर्तनशक्यमानसयतः ॥२२॥ कर ।। १५॥ कठोर वचनसे मित्रभी उसी समय शत्रु हो महानर्थकरोतत्समग्रकुलनाशनम् । जाता है क्योंकि कठोर वचनके शल्य(शघ) भजनपूजनंसेवामिच्छेदेतपुर्विदा ।। १६॥ को मनसे कोई नही उसाड़ सकता। ॥२२॥ क्योंकि इनको स्वामिता महान् अनयको वहेदमित्रंस्कंधेनयावत्स्यात्स्वबलाधिकः । और समग्र कुळको नष्ट करती है किन्तु इनके ज्ञात्वानष्टवलंतंतुभिद्यात्घटमिवाश्मनि॥२३॥ भजन, पूजन, वनको संदेव इच्छा कर २६ शव जयतक अपने बदले अधिक हो सब. नज्ञायतेनह्मतेजाकस्मिन्कीहक्मतिष्ठितम् । नक अपने कांधेपर ले चले और जप उसा पराधीननवकुर्यात्तरुणीवनपुस्तकम् ॥१७ ॥ बल नष्ट हो जाय तय इस प्रकार नष्ट करे और किस ब्राह्मणकैसा ब्रह्मतेज है यह जैसे पत्थरपर पटक कर घटको ॥ २३ ॥ *प्रतीत नही हो सकता और तरुण स्त्री, धन नभूपयत्यलंकारोनराज्यनचपौरुपम् । पुस्तक इनको पराधीन न करें।॥ १७ ॥ नविद्यानधनंतादृयादृक्सौजन्यभूपणम२४॥ कृतचेल्लभ्यतेदवाभ्रष्टनष्टाविमदितम् । अलंकार, राज्य, पुरुषार्य, विद्या इनसे ववर्धनत्यजेदल्पहेतुनाल्पंनसाधयेत् ॥१८॥ मनुष्पको यसी शोभा नहीं होती जैसी जायँ तो क्रमस भ्रटा नष्ट, मदन क्पि हुप है।॥४॥ मिटते हैं अल्प पारणसे य गर्यको त्यागे अशेनवोपेपर्यमणीकांतिक्षमानृप । और मल्लकी सिद्धि ।। १८॥ हावभावाचवेश्यायांगायकेमधुरस्वरः ॥ २५ ॥ वर्थव्ययतोधीमानभिमाननकचित् । अश्वका येग, पळका धर्य, मणिकी पतिः वहर्षन्यपभीत्यानुसत्कीतिनत्यजेत्सदा ॥ १९॥ रानाको क्षमा, यग्या दायभाग, गानेयाडेका यदुत धनयेव्यपसे न परे भार बुद्धिमान् मधुर , भपण होते हैं ॥ २५ ॥ मनुष्प अभिमानसे या मधिक राचं भयस दातृत्वयनिशीय निकैबहुदुग्धता । मग यसरीतिको नायागे॥१९॥ मटानामगदुमन्यातुनाकुप्पानता सह । गोपुदमस्तपस्विपुविद्रसुवाबदृकता ॥ १६ ॥ सनतनमुद्यानभिपतेदुर्मनाभात् ॥ २० ॥ पाहा) या शूरता, गोभीका माग दुई धनयानया दावार (देना), सलिए
भाषाटीकासहित ।
(८३)
तपस्वियोंका इंद्रियों में दमन, विद्वानोंका वा-
वाल्य, यौवन, वृद्ध अवस्था महापापका
वदूकता (सभामें बहुत बोलना) भूषण होता फल होता है और धनवानोंको सन्तानका न
है ॥२६॥
होना और निर्धन होकर मूर्खता होनी ॥ ३२ ॥
सभ्येष्वपक्षपातस्तुतथासाक्षिपुसत्यवाक् ।
स्त्राणांपटपतित्वंचनसौख्यायष्टीनर्गमः ।
अनन्यभक्तिभृत्येपुसुहितोक्तिश्चमंत्रिषु २७॥ मूर्ख-पुत्रोऽयवाकन्याचंडीभार्यादरिद्रता ३३॥
सभासदोम पक्षपात न करना, साक्षियों में
स्त्रियोंको नपुंसक पति इनसे सुख और
सत्यवाणी, भृत्यों में स्वामिकी अनन्य भक्ति
इटकी प्राप्ति नही होती मूर्ख पुत्र तथा विधवा
और मंत्रियोंमें राजाके हिसके वचन भूषण कन्या, और चंडी स्त्री, दरिद्रता ॥ ३३ ॥
होते हैं ॥२७॥
नीचसेवाटनं नित्यनैतत्पटूकंसुखायच ।
मौनंमूर्खपुचस्त्रीपुपातिव्रत्गंसुभूपणम् ।
नाध्यापनेनाध्ययनेनदेवेनगुरौदिजे॥३४॥
महादुर्भूपणंचैतद्विपरीतममीपुच ॥ २८॥
नीचकी सेवा नित्य भ्रमणा इन छःसे सुख
नहीं होता, पढाने पढने, देवता, गुरु, ब्राह्मण,
मूर्या में मौन और स्त्रियोमें पातिव्रत्य भू-
पण होते हैं। इन पूर्वोक्त सम्पूर्णों में इनके विप- इनमें और ॥ ३४ ॥
रीत दुष्टभूपण होते हैं अर्थात शोभाको नही नकलासुनसंगीतसेवायांनार्जवेस्त्रियाम् ।
देते ॥२८॥
नशौर्यनचतपसिसाहित्येरमतेमनः ॥ ३५ ॥
भात्येकनायकंनित्यनेवनिर्बहुनायकम् । कला, संगीत, सेवा नम्रता,स्त्री, शूरता तप,
नचीहस्रमुपेक्षतशक्तोहन्याचतत्क्षणे॥२९
साहित्य, (कायोंकी रचना) इनमें जिसका
एक नायक (स्वामी) होय तो शोभाको मन न रमे ॥ ३५॥
प्राप्त होता है नायक-न हो अथवा बहुत नायक यस्यमुक्तःखलाकिंवानररूपपशुश्चसः ।
हो तो शोभा नहीं होती और हिंसा करनेवा- अन्योदयासहिष्णुश्चछिद्रदीविनिंदकः ३६॥
लेकी उपेक्षा न करें समर्थ होय तो उसीसमय
नष्ट करदे ॥२९॥
बह छोडा हुआ खल, नररूपधारी पशु
पैशुन्यवंडताचौर्यमासर्यमतिलोभता ।
होता है और जो अन्यके उदयको न सहे
अथवा छिद्र देखे वा निन्दा करे ।। ३६ ॥.
असत्यकाययातित्वतयालसकताप्यसम् ॥
द्रोहशीलःस्वांतमल प्रसन्नास्याखलःस्मृतः ।
पैशुन्य (चुगली खाना ), चंडता, चोरी
मात्सर्य ( पराये गुणो में दोष देखना ), अति,
एकस्यैवनपयप्तिमस्तियद्रह्मकोशजम्॥३७॥.
लोभ, असत्य, कार्यको नष्ट करना और अत्यः आशावद्धस्योज्ज्ञितस्यतस्याल्पमपिपूर्तीकृत् ।।
न्त मालसी ये सब होना ।। ३०॥ करोत्यकार्यसाशोन्यंबोधयत्यनुमोदते ॥३८॥
गुणिनामपिदोपायगुणानाच्छाद्यजायते ।
वा द्रोहमें मन रक्खे जिसका अन्तःकरण
मातुःप्रियायाःपुत्रस्ययनस्यचविनाशनम्३१। मलीन हो और मुख प्रसन्न हो वह भी खल
गुणियोंके भी गुणोंको ढककर दोपके लिये कहा है और ब्रह्मक सम्पूर्ण कोश ( जगत् )
होते हैं। माता, म्री, पुन और धन कान का सम्पूर्ण धन भाशावान् एक मनुष्यको भी
होना धक्रम ॥३१॥
त्ति नहीं करसकता और आशाहीन मनुष्यकी
वाल्यमध्येचवाक्येमहापापफलंक्रमात् ।
अल्पधनसे भी पूर्ति हो जाती है और आशा-
वान मनुष्य अकार्यको करताहै, उपदेश देता है
श्रीमतामनपत्यत्वमधनानांचमूर्खता ३२॥ और सम्मति देता है ॥ ३७॥ ३८ ॥
शुक्रनीत। [ अध्याय- भवंत्यन्योपदेशाधूर्ताःसाधुसमा सदा । और जो सदैव सहाय करे, कभी प्रतिकूल स्वकार्यार्थ प्रकुर्वतिाकार्याणांशततुते ३९ ॥ और दे वह मित्र होता है।॥ ४५ ॥ न कहे और सत्य हित वचनको कहें, माने धूर्त मनुष्य अन्यके उपदेशार्थ सदैव साधु- भोंके समान होते है और वे अपने प्रयोजनकै नीवस्यतिपरिचयोह्यन्यगेहेसदागतिः । लिये सफडी कुकर्म करते है ॥ ३९ ॥ जातीसंघपातिकूल्यमानहानिदरिद्रता ॥४६॥ पित्रोराज्ञांपालयतिसेवनेचनिरालसः । नीचोंका अत्यन्त परिचय, अन्यके घरमै छायववर्ततेनित्ययततेचागमायवै ॥ ४० ॥ सदैव गमन और जातिके समुदायमें विरोध जो पुत्र माता, पिताकी आज्ञापाले और और मानकी हानि, दरिद्रता । व्याघ्राग्निसर्पहिस्राणांनहिसंवर्पणहितम् । सेवामें मालस्पन करे और छायाके समाननि त्य वते और प्राप्ति के लिये नित्य यत्न करे।।४० सेवितत्वात्तुराज्ञोनेतेमिनारकस्यसतिहि ॥४७॥ कुशलासविद्यासुसपुत्रःप्रीतिकारकः । सिंह, अग्नि, सर्प, घातक इनका सम्बंध हितकारी नही होता, और सेवा करने दुःखदोषिपरीतोयोदुर्गुणीधननाशकः ॥४१॥ राजा कभी मित्र नही होते ॥१७॥ सब विद्याओम कुशल हो वह पुत्र पिताको दौमनस्यंचसुहृदांसुप्रावल्यंरिपो.सदा । प्रसनता कारक होता है और जो पूर्वोक्तसे विपरीत, दुर्गुणी, धनका नाशक हो वह विद्वत्स्वपिचदारियंदाधिावपत्यता ॥४८ ॥ पिताको दुःखदाई होता है ॥ ४ ॥ मित्रोंका दुष्ट मन होता है और शत्रुकी सदैव पत्योनित्यचानुरक्ताकुशलाग्रहकर्मणि । प्रबलता होती है, विद्धानोम दरिद्रता और दरिद्रतासे अधिक सन्तान होती है॥१८॥ पुत्रप्रस:सुशीलायाप्रियापत्युःसुयौवना॥४२॥ जो स्त्री पतिम नित्य अनुरक्त, गृहके धनीगुणीवैद्यनृपजलहीनेसदास्थितिः । कार्यम फुशल, पुत्रवती, सुशीला, श्रेष्ठ दुःखायकन्यकाप्येकापित्रोरपिचयाचनम् ४९ युवती हो वह स्त्री पतिको प्यारी होती धनी, गुणी, वैद्य, गजा, जल इनसे रहित स्थानमें सदेव स्थिति (वास) और एक भी कन्या और माता पिताले भी याचना ये सब पुत्रापराधान्क्षमतेयापुत्रपरिपोषिणी । दुखके लिये होते हैं ।। ४९ ॥ सामाताप्रीतिदानित्यंकुलटान्पातिदु.खदा४३॥ सुरूपासवन स्वामीविद्वानपिवलाधिकः । जो माता पुत्र अपराधोंको सहकर पुत्र-नकामयेद्ययेष्टय स्त्रीणांनवसुसौख्यकृत् ५०॥ की पालना करे वह माता नित्य मातिको जो मनुष्य श्रेष्ठ रूपवान्, धनी, विद्वान देती है और पूर्वक्ति अन्य जो व्यभिचारिणी अधिक बलवान होकर नियोकी यथेष्ट काम- बद दुःरा देनेपाली होती है ।। ४३ ।। विद्यागमार्थपुत्रस्यवृत्त्यर्यपततचयः । नान कर यह सुखका भोगी नही होता।५०॥ योपयेष्टकामयतेवीतस्यवशगाभवेत् । पुसदासाधुगास्तिनीतिकृत्मपितानृणी ४४॥ संधारणालालनाचययायातिवशशिशुः ॥ १॥ नो पिता पुत्रो विद्यालाभके अथका जी जो नीकी यथेष्ट कामना करता है उसके यिका दिपे यान करे और उदेय पुरको यथम स्री हो जाती है जैसे भली प्रकार मच्छी शिक्षा दे यह पिता प्रीति करनेयाटारमने और बाइसे पाटफ यश हो जाता भणी (पुबरी अगसे हटा होता ६ ॥ ॥५१॥ मादाय्यमदापुर्यापतीपनवदेन्यचित् । कार्यतत्सायकादीश्ववद्ययंसुविनिर्गमः । गत्यदितपत्तियानिदत्तगद्धातिमित्रताम् ॥४४॥ वीचैत्यकुरुतेज्ञाननिान्ययालयापकचित्५२॥
३.] भापाटीकासहित । जिस व्ययको भली प्रकार जाने उस का- चडायतविदितेस्वपित्यश्नातिमादकम् । मको साधक आदिके द्वारा करे और ज्ञानी करोतिनिष्फलंकर्ममूखीवास्वष्टनाशनम् ॥ मनुप्य विचार कर कामको करता है और अन्यथा लघु कार्यको कभी नहीं करता ॥५२॥ सोवे,मादक वस्तु भक्षण करे या निष्फळ कर्म मूर्ख मनुष्य प्रचंड हो जाय विवाद करे, नचव्यायाधिककार्यकर्तुमीहेतपंडितः। करे अथवा अपने इष्टका अनिष्ट करे ॥ ५९ ।। लाभाधिस्पयस्क्रियतचेपदाव्यवसायिभिः ५३॥ तमोगुणाधिकक्षाबाह्मसत्त्वगुणाधिकम् । पंडित मनुष्य अधिक व्ययवाला काम न अन्यद्रजाधिकंतेजस्तपुस्तित्त्वाधिकंवरम् ।। कर और व्यवसायी (उद्योगी) मनुष्य थोडे क्षत्रियमें तमोगुण ब्राह्मण, सत्त्व गुण, भी उस कामको करते हैं जिसमे अधिक इनसे अन्योमें रजोगुण अधिक होता है। इन लाभ हो ॥५३॥ तीनोंमें जिसमें सत्त्वगुण अधिक हो वह मूल्यमानंचपण्यानांपाथात्म्यान्मृग्यते सदा । श्रेष्ठ है ॥६॥ तपःस्वीकृपिसेवासोपभोग्येनापिभक्षणे ॥५४॥ सर्वाधिकोब्राह्मणस्तुजायतेहिस्वकर्मणा। ।। और पण्य (बेचने योग्य ) वस्तुओंके मोल तत्तजसोतुतजासिसंतिचक्षत्रियादिषु ॥६१॥ और मानको सदेव ढूँढे, तप और स्त्री भोगने- के लिये और कृषिकी सेवा भक्षणके लिये और क्षत्रिय आदिकों में उसके तेजसे न्यून ब्राह्मण अपने कर्ममे सबसे अधिक होता है होती है ॥ ५४॥ तेज होता है ॥ ६१॥ हितःप्रतिनिधिनित्यंकार्यन्येतंनियोजयेत् । स्वधर्मस्थब्राह्मणहिदृष्ट्वाविभ्यतिचेतरः । निर्जनत्वमधुरभुजारश्चोर सदेच्छति ॥१५॥ क्षत्रियादिर्नान्यथास्वधर्मचातः समाचरेत्६२ प्रतिनिधि सदैव हित होता है उसको अन्य काममें नियुक्त कर, मधुरका भोगी जार चोर अपने धर्मभं टिके हुए ब्राह्मणको देखकर ये सदैव निजन देशको चाहते है ॥ ५५ ॥ क्षत्रिय आदि डरते है अन्यथा नहीं, इससे साहाय्यंतुबलिदिष्टोवेश्याधानकमित्रताम् । ब्राह्मण अपने धर्मका आवरण करे।। ६२ ।। कुनृपश्चठलंनित्यस्वामिद्रव्यंकुसवेकः ॥५६॥ नस्यात्स्वधर्महानिस्तुययावृत्त्याचसावरा । बलवान् का वेरी बहायता और वेश्या धन- सेदशः प्रवरोयत्रकुटुंबभरणंभवेत् ॥ ६३ ।। (चानको मित्रता और खोटा राजा नित्य छल चही जीविका श्रेष्ठ होती है जिसमें अपने और सोटा सेवक स्वामीके द्रव्यकी सदैव धर्मकी हानि न हो, वही देश उत्तम होता है इच्छा करते है ॥५॥ जिसमे कुटुम्बका पालन होय ॥६३॥ तत्त्वज्ञानवान्दभतपोनिदेवजविकः । कृषिस्तुचोत्तमावृत्तिः यासरिन्मातृकामता। योग्येकांतंचकुलानारंवैद्यचव्याधितः ॥५४॥ मध्यमावैश्यवृत्तिश्चशूद्रवृत्तिस्तुचावमा॥६४॥ ज्ञानी मनुष्य तत्त्वको, दभ तपकी, देव. जो नदीके तीरपर का जाय यह खेती 'जीवक अग्निकी, योग एकान्तकी, व्यभिचा उत्तम वृत्ति होती है ओर वैश्यको वृत्ति रिणी जारका रोगी वैद्यकी और ॥ ५७ ॥ मध्यम और शद्रवृत्ति अधम होती है ॥ ६॥ धृतपण्योमहर्षवंदानशीलतुयाचकः । यात्राधमतरावृत्तिर्युत्तमासातपस्विपु ।। रक्षितारंमृगयतेभीतरिछंद्रतुदुर्जनः ॥५८ ॥ कचित्सवोत्तमावृत्तिधर्मशीलनृपस्यच॥६५॥' जिसके माल पडा हो वह महगेकी, याचक दानीकी, भयभीत रक्षा करनेवालेकी, दुर्जन याचनाकी वृत्ति अति अधम होती है छिन्द्रकी इच्छा करता है ।। ५८॥ परन्तु तपस्वियों में वह याचना उत्तम वृत्ति । *- ।
(८६)
[अध्याय-
शुक्रनीते।
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होती है, और कहीं २ धर्मशील राजाको
अनुवाकहतायातुनसासर्वत्रगामिनी ।
सेवाभी उत्तम होती है ॥ ६५ ॥
आदौवरंनिर्धनत्वधनिकत्वमनंतरम् ॥७२॥
अध्वर्यवादिककर्मकृत्वायागृह्यतेभृतिः ।
जो बुद्धि शास्रके ज्ञान हीन है वह सब
साकिमहाधनायैववाणिज्यमलमेवकिम्६६॥ जगह नहीं पहुँचती पहिले निर्धन होना और
अध्वयु आदिके कर्मको करिके जो वेतन पीछेसे धनवान होना अच्छा होता है ॥७॥
ग्रहण किया जाता है क्या उससे बडा धन तयादौपादगमनयानगत्वमनंतरम् ७३ ॥
होता है और क्या वाणिज्यसे (लेन देन ) से सुखायकल्पतेनित्यंदुःखायविपरीतकम् ॥
महाधन होता है अर्थात् नही होता ॥६६॥
तिसी प्रकार पहिले पैरो चलना और पीछे.
राजसेवांचिनाद्रव्यविपुलनवजायते ।
से यान (सवारी) में चलना सदैव सुखदायी
राजसेवातिगहनाबुद्धिमद्भिविना न सा॥६७॥ होता है और इससे विपरीत दुःखदायी होता
राजसेवाके विना विपुल धन नहीं होता है ॥७३॥
और राजसेवा अत्यन्त कठिन होती है बुद्धि-वरहित्वानपत्यत्वंमृतापत्यत्वतः सदा ।
मान मनुष्योंके बिना ६७ ॥
कशक्याचेतरेणाासिबारेवसर्वदा ।
दुष्टयानात्पादगमोह्यौदासीन्यविरोधतः॥७४॥
सन्तानके मरनेसे सन्तानका न होना और
व्यालग्राहीयथाव्यालंमंत्रीमंत्रबलान्नृपम् ६८॥ दुष्टयानसे पर चलना और विरोध करनेसे
राजसेवाको कोई नहीं कर सकता क्योकि उदासीन रहना सदैव अच्छा होता है ।।४।।
राजसेवा सदैव खड्गधाराके समान होती है। वरदेशाच्छादनतश्चर्मणापादगूहनम् ।
सर्पका पकडनेवाला जैसे सर्पको इसीप्रकार ज्ञानलवदौर्विदग्ध्यादज्ञता तु वरामता ७५ ॥
मंत्री मन्त्रके बलसे राजाको॥ ६८ ॥
करोत्यधीनंतुनृपेभयंबुद्धिमतांमहत् ।
और देशके आच्छादनसे चम्मसे परोका
ब्राह्मतेजोबुद्धिमत्सुक्षात्रंराज्ञिप्रतिष्ठितम् ६९ और ज्ञानके लेशस दुर्विदग्ध (अल्पज्ञता)
टकना (जूता पहरना) अच्छा होता है
अधीन कर लेता है और बुद्धिमान् मनुष्यों से मूर्खता अच्छी कही है ॥५॥
को राजाका बड़ा भय होता है, बुद्धिमानों में
ब्रह्मतेज और राजाओंम क्षत्रियोंका तेज परगृहनिवासाद्धचरण्येनिक्सनंवरम् ।
रहता है।। ६९॥
प्रदुष्टभायोगार्हस्थ्याफ्रेक्ष्यवामरणवरम् ।।७६॥
आरादेवसदाचास्तितिष्ठन्दूरेपिबुद्धिमान् ।
अन्यके घरमें निवास वन में रहना
बुद्धिपाशधयित्वासंताडयतिकति ॥ ७० ॥
और दुष्टभार्यावाले गृहस्थसे भिक्षा वा मरण
श्रेष्ठ होता है॥७६॥
दूर टिकाभी बुद्धिमान मनुष्य देव समीप
रहता है बुद्धिको फांसों में बांधकर ताडताश्वमैथुनमगर्भाधान स्वामित्वमेवच ।
है और खींचता है ॥ ४०॥
खलसख्यमयथ्यतुप्राक्सुखंदुःखनिर्गमम७७)
समीपस्थोपिदूरेस्तिद्यप्रत्यक्षसहायवान ।।
स्वा ( कुत्ता ) फा मैथुन ऋण, गर्भाधान,
नानुवाकहतावुद्धियवहारक्षमाभवेत्॥ ७१॥ स्वामी होना, खालको मित्रता, अपथ्य इनमें
जिसको सहायताका प्रत्यक्ष (ज्ञान)न
पहिले सुख और पीछे निकासनेके समय में
होय वह समीपमै टिका भी दूर होता है और दुःख होता है ॥७॥
गाखके ज्ञान से हीन पुद्धि व्यवहार योग्य कुमंत्रिभिर्नृपोरोगीकुवैद्यःकुनृपैःमना ।
कुसंतत्याकुलंचारमाफुयुद्धचाहायतऽनिशम् ।।
नही होती ॥ ७१ ॥
भापाटीकासहित। (८७) 4 कुमंत्रियोंसे राजा कुद्योत रोगी कुरिक्षत गच्छेदनियमेनेवसदैवांतःपुरेनरः । राजाभोंसेप्रजा खोटी सन्तानसे कुल कुबुद्धिस मात्मा सदेव नष्ट होते हैं ॥७॥ भार्यानपत्यासद्यानंभारवाहीसुरक्षकः ८५ हस्त्यश्ववृपवालस्त्रीशुकानांशिक्षकोयया । मनुष्य अपने रनवासमें खदेव विना नियम गमन करे. और जिसके सन्तान न हो तयाभवंतितेनित्यंसंसर्गगुणधारकाः।। ७९ ॥ ऐसी भार्या, भच्छा यान और भारका ले जा- हाथी, अश्व, बैल, पालका स्त्री, शुक,तोता नेवाला अच्छा रक्षक ॥ ८५॥ इनकी शिक्षा देनेवाळे जेस हो वैसेही गुण परदुःखहराविद्यासेक्कश्चनिरालसः । हाथी आदिको में संसर्गसे हो जाते हैं ।। ७९॥ स्याजयोवसरोक्त्यासदसनैःसुप्रसिद्धता । पडतानिमुखायालंप्रवासेतुनृणांसदा ८६ ।। सभायांविद्ययामानस्त्रितयंत्वधिकारतः ॥८०॥सी सेवक ये छः परदेशमें मनुष्यको सदैव परदुःख हरनेवाली विद्या और निगल- समयके अनुसार पचनसे जय,अच्छे वस्त्रो. सुखदायी होते हैं ॥ ८६ ॥ से प्रसिद्धि, विद्यासे सभामें मान ( पडाई) होती है और ये तीनो अधिकार मिलने से मार्गनिरुध्यनस्थेयंसमर्थनापिकहिचित् । होते हैं ॥८॥ सद्यानेनापिगच्छेनहमार्गनृपोपिच ॥८७ ॥ सुभार्यासुष्ठुचापत्यं मुविद्यासुधनंसुहृत् । समर्थ भी मनुष्य मार्गको रोककर कदाचि. सुदासदास्यौसदेह देहासदेश्मसुनृपःसदा ॥ ८१॥ तभी खडा नहो और राजाभीहहमार्ग(बाजार) श्रेष्ठ भार्या अच्छी सन्तान उत्तम विद्या उत्तम में अच्छे यानसे गमन न करे ।। ८७ ॥ धन उत्तम मित्र उत्तम दास और दासी श्रेष्ठ देह ससहायासदाचस्यादध्वगोनान्ययाकचित्। श्रेष्ठ घर और उत्तम राजा ये संदेव ॥ ८१ ॥ समीपसन्मार्गजलोभयग्रामेध्वगोवसेत्।।८८॥ गृहिणांहिसुखायालंदशैतानिनचान्यया । अध्वग ( मार्ग चलनेवाला) संदेव सहा- वृद्धाःसुशीलाविश्वस्ता:सदाचारास्त्रियो यको रक्खे अन्यथा कभी न रहे और ऐसे नराः ॥ ८२ ॥ गांवमें रात्रिको वसे जिसके समीप अच्छा ये दस गृहस्थियोंके पूर्ण सुखके होते हैं और माग और जल दोनों अच्छे हों अन्यथा नहीं । वृद्ध सुशीळ विश्वासके योग्य तथाविधवाविरमेन्नमार्गेविपिनेपिन । सदाचारमें तत्पर स्त्री वा मनुष्य ॥ ८२ ॥ अत्यटनंचानशनमतिमैथुनमेवच ॥ ८९ ॥ शोधावांतःपुरेयोज्यानयुवामित्रमप्युत । और ऐसे ही ग्राम, विश्राम करे और मार्ग कालनियम्य कार्याणिह्याचरेत्नान्ययाकचित्८३ और उनमें विश्राम न करे, अति भ्रमण अति वा नपुंसक इनको रणवासमें नियत करै भोजन अति मेथुन ।। ८९॥ और युवा चाहे मित्रभी हो तथापि नियुक्त अत्यायासश्चर्सवपांद्राग्जराकरणंभवेत् । न करे भीर समयके नियमसे कार्योको करे सर्वविद्यास्वनभ्यासोजराकारीकलासुच॥९॥ अन्यथा कभी न करे ॥८३॥ गवादिष्वात्मवज्ञानमात्मानंचार्थवर्मयोः । भूति परिश्रम ये चारों सब मनुष्योंके शीघ्र जरा करनेवाले होते हैं और संपूर्ण विद्या- नियुंजीतान्नसंसिद्धयेमातरंशिक्षणेगुरुम्८४॥ भों में वा कलाओम अभ्यास न करना 'जरा जो मनुष्प आत्मज्ञानी हो उसको गौ करनेवाला होता है ॥ १० ॥ मादिकोकी सेवा और भात्माको धन और धर्ममें और अन्नके पाकमें माताको और शिक्षा दुर्गुणंतुगुणीकृत्यकीर्तयेत्समियोभवेत् । देनेमें गुरुको नियुक्त करे ॥ ८ ॥ गुणाधियंकीर्तयतियाकिस्यान्नपुनःसखा ९१ .
(८८) शुक्रनीति । [ अध्याय . सकता ॥१३॥ जो मनुष्य दुर्गुणको भी गुणरूपसे वर्णन मन्यतेसर्षपादल्पमहच्चोपकृतखलः ॥ करे वह प्यारा होता है, जो अधिक गुणों तथानक्रीडयेकैश्चित्कलहायभवेद्यया ॥९८ का कीर्तन करता है वह तो मित्र क्यों न घडे भी उपकारको खल मनुष्य सरह होगा ॥९१ ॥ अलर मानता है और उस प्रकारको दुर्गुणवक्तिसत्यनमियोपिसोमियोभवेत् । कितीके संग भी न करे जिससे क गुणहिदुर्गुणीकृत्यवक्तियास्यात्कप्रियः९२॥ हो ॥ ९८ ॥ जो प्यारा होकर भी दुगुणोंको स्पष्ट कहे वह विनोदेऽपिशपेन्नैवतेभायाकुळटास्तिकिम् । शत्रु होता है और जो गुणकोही दुगुण कह- कर वर्णन करें वह प्रिय कैसे हो सकता अपशब्दाश्चनोवाच्यामित्रभावाचकेष्वपि है ॥९२॥ विनोदमें भी ऐसा शाप न दे कि मार्श क्या व्यभिचारिणो है और मिन भा स्तुत्यावर्शयांतिदेवायजप्साकिंपुनर्नराः। किसीको अपशब्द न कह ।।९९ ॥ प्रत्याहुगुणन्निवरक्तुं शक्नोतिकोप्यतः॥९३॥ गोप्यनगोपन्मित्रेतदोप्यनप्रकाशयेत् । स्तुति करने देवता भी सुखसे चशमें हो जाते हैं नर क्यों न होगे इससे वैरीभूतोपिपश्चात्माकथितंवापिसर्वदा ३०० कोई भी मनुष्य दुर्गुणोंको प्रत्यक्ष नहीं कह मित्रस छिपाने योग्य बस्तुको न छि' और मित्रकी गोप्य वस्तुका प्रकाश न. स्वदुर्गणास्वयंचातोविमृशेलोकशास्वतः । तथा पहिले कही हुई अयोग्य बातका होनेपर कभी प्रकाशन करे ।। ३०० ॥ स्वदुर्गुणश्रवणतोयस्तुष्पतिनकुध्यति ॥९४॥ विज्ञातमपियदौष्टयंदर्शयेत्तन्नहिचित् । अपने दुर्गुणोंको लोक व शास्त्रसे स्वयं प्रतिकर्तुयतेतैवगुप्तः कुर्यात्प्रतिक्रियाम् ॥१ विचारे और अपने दुर्गुणों के सुननेसे न प्रसन्न होन क्रोध करे ।। ९४॥ जो दुष्टता जान भी ली हो उसको व स्वोपहासमविज्ञानेयततत्यजतिश्रुते । न दिखावे और प्रतिकार करनेका पत्न जिसने अपनी रक्षा की हो उसका प्रतिव स्वगुणश्रवणानित्यंसमस्तिष्ठतिनाधिका९॥ करे ॥१॥ और अपने अधिक ज्ञान में भी उप-यथार्यमापनयूयाद्रलवद्विपत्तिकम् । हास समझकर यत्न करे और दुगुणोंको सुनकर त्यागे और अपने गुणों को सुनकर सम दृष्ट्त्वदृष्टवस्कुर्याच्छूतमप्यश्रुतंकचित् ॥र रहे अधिक न हो ॥९५॥ बलवान् मनुष्यके यथाये के भी विपरीत दुर्गुणानांखनिरहंगुणाधानकर्यमाय । न कहे देखेको न देखके समान व सुने मस्येवचाज्ञताप्यस्तिमन्यतेसोधिकोखिलात् ॥ न सुनेके समान करे ॥२॥ मैदुगुणोंकी खानहूँ मुझमें गुण कैसे हो स. मूकांधोवधिरःखजोस्वापकालेभवेन्नरः । केत है और मुझमेंदी मूर्खता है इस प्रकार जो अन्यथादुःखमाप्नोतिहयितव्यवहारतः ॥३ 'मानता है चदी सबसे अधिक है 145 ॥ मनुष्य अपनी आपत्तिके समय म ससाधुस्तस्यदेवाहिकलालेशलभंतिन । अन्ध, यधिर, सज्ज हो जाय अन्यथा दुःख सदाल्पमप्युपातमहत्साधुपुजायते॥ ९७ ॥ व्यवहारसे हानिको प्राप्त होता है॥३॥ यदी साधु है जिसकी कलाके लशको भी वदेवृद्धानुकूलंयन्नबालसदृशंकाचित् । देयता मान न हो और साधुभामं अल्प भी परवेश्मगतस्तत्वीवक्षिगनचकारयेत् ॥४ उपकार संदेय महान् होता है ।। ९७ ॥ पृडोके अनुकूल वचनको कहे, वाल . . ४.] भाषाकिासहित । सदृश कभी भी न कह और पराये घर में जाकर नवीन और पुराने व्यवहारोंके जो जानने- उसकी स्त्रीको न देखे ॥१॥ वाले हैं उनको बुद्धिस देणे पोंकि व्यवहार अधनादननुज्ञातानगृहीयानुस्वामिना । क्षण २ में नवीन होता है ॥ ११ ॥ स्वशिलशिशयदन्यशिशुनाप्यपराधिनम् ५॥ वक्तुंनशक्यतेपायः प्रत्यक्षादनुमानतः । और निधन होकर भी स्वामीकी बाजाके उपमानेनतज्ज्ञानभवेदाप्तोपदेशतः ॥ १२ ॥ विना कोई वस्तु ग्रहण न करे अपने पाळकको व्यवहारको प्रत्यक्ष कोई कह नही सकता शिक्षा दे और अन्यके अपराधीही यालकको नकिन्तु प्रत्यक्ष अनुमान, उपमान आप्तो (बडे) करे॥५॥ के उपदेशसे व्यवहारका ज्ञान होता है ॥१२॥ अधर्मनिरतोयस्तुनीतिहनिश्छलांतरः । कथितंतुसमासेनसामान्यनृपराष्ट्रयोः । संकर्षकोतिदंडीतग्रामत्यकान्यतोवसेत् ६॥ नीतिशास्त्रहितायालयाद्वीशष्टनृपस्मृतम्।।१३॥ जो ग्राम अधर्ममें सदैव रत नीतिसे हीन राना और मजाके हितार्थ यह सामान्य मनमें छली लोभी अत्यन्त दण्डवाला हो उस नीतिशास्त्र संक्षेपसे कहा जो राजाके लिये ग्रामको त्यागकर अन्यत्र वसे ॥६॥ उत्तम कहा है ॥ १३॥ ययार्थमपिविज्ञातमुभयोदिनोर्मतम् । तृतीयोऽध्यायः समाप्तः ॥३॥ अनियुक्तोनवैब्रूयादीनशत्रुर्भवेदतः ॥ ७ ॥ दोनों वादी प्रतिवादियोंके यथार्थ जाने हुए भी मतको राजाज्ञाके विना न कहे इससे अध्यायः ४. मनुष्यका शत्रु कोई नहीं होता ॥७॥ गृहीत्वान्यविवादतुविवदेन्नैवकेनचित् । अमिश्रप्रकरणप्रवक्ष्यामिसमासतः । मिलित्वासंवशोराजमंत्रनवतुतयेत् ॥ ८॥ लक्षणंसुहृदादीनांसमासाच्णुताधुना ॥१॥ अब संक्षेपसे मिश्रप्रकरण कहता हूँ (प्रथम) अन्यके विवादको ग्रहण करके किसीक मित्र आदिके लक्षणको संक्षेपसे सुनो ॥१॥ सग विवाद न करे और किसी समुदायमें राजाके मैत्रको तर्कना न फरे॥८॥ मित्र शत्रुश्चनुर्धास्यादुपकारापकारयोः । अज्ञातशाखोनब्रूपाज्ज्योतिपंचमीनर्णयम् । कर्तीकारयिताचानुमंतायश्चसहायकः ॥२॥ नीतिदंडचिकित्सांचप्रायश्चित्तंक्रियाफलम् ॥ करने कराने अनुमति देने सहायता करनेसे मित्र और शत्रु उपकार तथा अपकारके विना शास्त्री जाने ज्योतिष, धर्मनिर्णय चार प्रकारके होते हैं ॥२॥ नीति, दण्ड, चिकित्सा, प्रायश्चित्ता क्रियाका यस्यद्रवतोचत्तंपरदुःखेनसर्वदा । फद इनको न कहे ॥ ९ ॥ पारतंत्र्यात्परंदखनस्वातंत्र्यपरंसुखम् । इष्टाथयततेन्यस्यप्रेरितः सत्करोतियः ॥३॥ पराये दुःखले जिसका चित्त सदेव पियले अमवासीगृहीनित्यं स्वतंत्रः सुखमेधते ॥१०॥ और प्रेरणाके अन्यके इटार्थ यत्न करे. पराधीनसे परे दुःख और स्वतन्त्रता परे वा सरकार जो करे ॥३॥ सुख नहीं होता। जो गृहस्थी अप्रवासी भऔर आत्मस्त्रधिनगुह्यानांशरणसमयेसुहृत् । स्वतन्त्र होता है यह नित्य सुख पाता है॥१०॥ मोक्तोत्तमोपमन्यश्चद्विव्येकपदीमत्रका ॥४॥ नूतनमाक्तनानांचव्यवहारविदांधिया । यह मित्र जीव स्त्री धन गुप्त वसु इनके प्रतिक्षणंचाभिनवोव्यवहारोभवेदतः ॥ १२॥ लिये समयपर शरण ( रक्षक ) और उत्तम व परस्पर होते है और कोई मनुष्य स्वभायस और राजाके चारों दिशाओं में चारों तरफ (दूसरेपर चढनेवाला) है सेना और नीति पुत्रकी वधू, 'सास और सत्पनी, ननंद और का लोभ नही, न राजाका कोई मित्र है, न और राजा और चंद (क्रोधी) और धनवान मूर्यपुत्र, कुवैद्य, रक्षा न करने वाला पिता (९०) शुक्रनाति । [अध्याय- कहा है और अन्य तो एक दो तीन पैर तक पिता, पिताके चाचा,अपनी कन्या, पत्नी औ मित्र होता है ॥४॥ पत्नीका कुल ॥ ११ ॥ अनन्यस्वत्वकामत्वमेकस्मिान्धिपयेव्योः । पितृमात्रात्मभागनीकन्यकासंततिश्चया । चौरलक्षणमेतद्वान्येष्टनाशनकारिता ॥ ५॥ प्रजापालोगुरुश्चैवमित्राणिसहजानिहि ॥१२॥ एक वस्तुके विषय दो मनुष्यकीऐसी बुद्धि पिता माताकी और अपनी भगिनी कन्या हो कि यह भन्यकी नहीं,यह वा अन्यके इष्ट- की संतान, प्रजापालक (राजा) गुरु येस को नष्ट करना वरीका लक्षण होता है ॥ ५॥ सदैव स्वाभाविक मित्र होते हैं ॥१२॥ भ्रातृभावेपितुर्द्रव्यमखिलंममवैभवेत् । विद्याशौर्यचदाक्ष्यंचवलंधेर्यचपंचमम् । नस्यादेतत्यवश्येयममैवस्यात्परस्परम् ॥ ६ ॥ मित्राणिसहजान्याहुर्वतयंतिहितैर्बुधाः ॥१३॥ भाईके विद्यमान होनेपर सम्पूण पिताका विद्या, शूरवीर, चतुराई, चल आर पाच द्रव्य मुझे मिले और मै इसके वशमें न होऊ धीरता येभी स्वाभाविक मित्र कहे हैं क्योरि और ये मेरे वशमें रहे ऐसीपरस्परमतिहो ॥६॥ बुद्धिमान मनुष्य इनतही वर्तते है ॥ १३ ॥ भोक्ष्येखिलमहंचैतद्धिनान्यस्तस्तुवैरिणौ । स्वभावतोभवत्येतहिंस्रोदवृत्तएवच । देष्टिदिष्टउभौशत्रस्तश्चैकतरसंज्ञकौ ॥ ७ ॥ ऋणकारीपिताशजुर्माताखीव्यभिचारिणी । इन सबको मै भोगूगा और अन्य नही वे हिंसक, दुराचारी ये ग्वभावले शत्रु परस्पर वैरी होते हैं जो द्वेष करे और जिसके ऋणका का पिता और व्यभिचारिणी माता संग वैर करे वह दोनों एकस शत्रु होते हैं।७॥ और पत्नी ये सब शत्रु होते हैं ॥१४॥ शूरस्योत्थानशीलस्यबलनीतिमतः सदा । आत्मपितृभ्रातरश्चतत्स्त्रीपुत्राश्चशत्रवः । सर्वमित्रागूढवैरानृपाःकालप्रतीक्षकाः ॥ ८॥ स्नुपाश्चःसपत्नीचननांदायातरस्तस्था। जो राजा सदव शूर है, उत्यानशीळ अपने और पिताके भाई, उनकी स्रो वाला है उसके सब मित्रभी राजा गूढ (छिपे) याता (दुरानी जिठानी ) ये सच परस्पर । समयके देखनेवाले वैरी होते हैं॥८॥ होते है ॥ १५ ॥ भवन्तीतिकिमाश्चर्यराज्यलुब्धानतेहिकिम । नराशीविद्यतेमिराजामिनकस्यवै ॥ ९॥ चंडावारदाताधनिकश्चयः॥ १६ ॥ मूर्खःपुत्रःकुवैद्यश्चारक्षकस्तुपिताप्रभुः । इसमें कुछ माश्चर्य नही क्या उनको राज्य- मजाके शा राजा किसीका मित्र है ॥९॥ होकरके भदाता, ये सब प्राय कृत्रिममित्रंतेभवतश्चपरस्परम् । होते हैं ॥१६॥ कोचत्स्वभावतोमित्रा शत्रव सतिसर्वदा १०॥ आसमंताच्चतुर्दिक्षुसन्निकृष्टाश्चयेनृपाः । प्राय दोनो परस्पर कृत्रिम (मि-ततपरायन्यक्रमादानवलारयः १७ ॥ मिरभी सदेव श होते है ॥ १० ॥ मातामापुलंचवपितातापितरीतथा । भी परले दीनपल शत्रु॥ १७ ॥ पितृपिव्यात्मकन्यापनीताकुलमेच ॥११॥ गदासीनमित्राणिक्रमात्तस्युस्तुपाकृताः 'मातामातापा पुष्ट, पिता, पिता माता अशिमंत्रमुदासीनोनंतरस्तपरस्परम १८ जो राजा होते है और उनसेपरले और उनसे
भापाटीकासदित।
ये सच क्रमसे शत्रु उदासीन मित्र प्राकृत त्वत्सास्तुसखानास्तिमिनेसाममिमस्मृतम् ।
(स्वाभाविक) होते है शङ, मित्र, उदासीन
ममसर्वतवैवास्तिदानमिनेसनावितम् २५॥
और उसके अनन्तर (समीपवर्ती) येभी पर-
म्पर ॥१८॥
मित्रके विषय साम यह कहा है कि तेरी
मशोवातयाज्ञेयाश्चतुर्दिक्षतथारय ।
चरावर कोई मित्र नही जो मेरे पास है यह स.
वसमीपतराभृत्याह्यमात्याद्याश्चकीर्तिता १९
व तेरा है और दान जीवितकाभी मित्रके लिये
कहा है ॥२५॥
क्रमसे चारों दिशाओमे उसीमकार मित्रे पमित्रमुगुणान्कर्तियेनेदनाहतत् ।
जानने और अपने अत्यन्त समीपर्क भृत्य और
मिडोनाकरिष्यमैत्रीमेवंविधोसिचेत्॥२६॥
पन्त्री आदि भी शतु कहे है ॥ १९ ॥
गृहयेत्कर्षन्मिनहीनाधिकनलंकमात् ।
और भेदन यह होता है कि मित्रके आगे
नदनीया पीडनीया कपणीयाश्चशाश्व २०॥ के लिये दड यह होता है कि यदि तु ऐसा है
दूसरे मिनके गुणाका कीर्तन करना और मित्र
हीनपल मित्रको बढावे और अधिक बळको तो वेरे संग मित्रता न करूंगा।॥ २६ ॥
वटावे अर्थात् उससे कुछ सहायता ले और योनिसंयोजयेदिष्टमन्यानिष्टमुपेक्षते ।
पओको सदेव भेदन पीडन कर्षण (हिसा)
करें ॥२०॥
उदासीन सनकथंभवेच्छ सुसाधिक ॥२७॥
विनाशनीयास्तेसवसामादिभिरुपक्रमैः ।
जो मनुष्य इष्टका सयोग न करें और अन्यके
अनिकी उपेक्षा करे वह उदासीन भी सन्धी
मेवशययायोग्यैःकुर्यात्स्ववशवर्तिनौ २१॥ (मेल ) करने के समय शत्र क्यो नहीं
साम आदि उपयोसे उन सयका विनाश होता ॥ २७ ॥
करे मित्र और शत्रुको भी यथोचित उपायोसे परस्परमनिष्टनचिन्तनीयत्वया मया ।
अपने वराम करे ॥२२॥
रूपायनययाव्यालोगज सिहोपिसाध्यते ।
सुसहाय्यहिकर्तव्यंशनीसामप्रकार्तितम् २८ ॥
मुझे और तुझे परस्पर अनिष्टकी चिन्ता न
मिष्ठा स्वर्गमायातिवत्रंभिदत्युपायत २२ ॥ करनी चाहिये, किन्तु परस्पर सहायता करनी
जैसे उपायसे सर्प, हाथी, सिंहको भी साध यह शत्रुके लिये खाम कहा है ॥ २८ ॥
देते है और पृथ्वी के घसनेवाले स्वर्गमे उपायले करीप्रमितमिर्वत्समनलारिपुम् ।
माते है औरउपायसेही यनसे बीधते है ॥२२॥
हत्सयधिस्त्रीपुरमजासटपुतेपृथक् ।
तोपत्तद्धिदानस्याद्ययायोग्येपुशरपु ॥ २९॥
सामदानभेददंडाश्चितनीया स्वयुक्तिभि.२३ वर्षभर के लिये प्रबल शत्रुभोको प्रसन्न करदे य.
कर देने वा प्रमित ( दो चार ) ग्रामोसे
। मित्र सम्बन्धी, खी, पुत्र, शत्रु, इन सबमेह यायोग्य शत्रुओके लिये दान होता है२९॥
थर साम, दानाभेदा दण्ड, इनकी चिन्त
"विचार) अपनी युक्तियोसे करे ॥ ३३ ॥
शत्रुसाधकहीनत्वकरणात्मबलाश्रयात् ।
हरकशीलवयोविद्याजातिव्यमनवृत्ततः ।
तद्धीनतोजीवनाचशत्रभेदनमुच्यते ॥ ३० ॥
पाहचर्यान्भवन्मित्रमेभिर्यदिनुसावै २४
शत्रुको साधकसे हीन करना प्रवलका
आश्रय लेना उससे हीन होकर जीना यह
एक सभा, पफ अवस्या,एक विद्या, एक शत्रु लिये भेदन कहा है ॥ ३० ॥
'नाति, एक व्यसन, एक जीविका, एक वास
ददि ये सब नम्रता सहित हो तो इनसे मिला दस्युभि पीडनशत्रो कर्पणंधनधान्यतः ।
होजाती है ॥२४॥
तनिदर्शनादुमनलनीत्याप्रमीपणाम् ॥३१॥
शुक्रनाति ।
शत्रु,
शभने दी है पीटा जिनसे गुणवा- रहती है, इंटरे भयस भाधर्षण (जपा
गतिमामदानाभ्यासर्वदापनमास्थितः३८॥ पिशुनामुकतांयांतिभयांत्याततायिनः४॥
[ अध्याय-
चोरोंसे शनुको पीडा देना और धनधान्यकी अपनी प्रजाओंका भेद और दंडसे पालन
हिंसा करनी उसके छिद्रोंको देखना उग्रंबल न करे किन्तु यत्नमें टिका हुमा राजा साम
नीति भय दिखाना और ॥ ३१ ॥ और दानसे पालन करे ॥ ३८॥
प्राप्तयुद्धानिवतित्वैस्वासनंदंडउच्यते । स्वप्रजादंडभेदैश्चभवेद्राज्यविनाशनम् ।
क्रियाभेदादुपायाहिभियतचयथार्हतः ॥३२॥ हीनाधिकायथानस्युःसदारक्ष्यास्तथाप्रजाः ॥
प्राप्त हुए युद्ध में न हटकर त्रास देना यह अपनी प्रजाके दंड और भेदसे राज्य
शत्रुके लिये दड कहा है और क्रियाकै भेदसे विनाश होता है, इससे राजा प्रजाकी ।
उपायोका भी यथायोग्य भेद हो जाता है ३२ प्रकार रक्षा करे जैसे प्रजा हीन और अधि
सर्वोपायैस्तथाकुर्यान्नीतिज्ञः पृथिवीपतिः । न हो॥ ३९॥
यथास्वाभ्यविकानस्युमित्रोदासीनशत्रवः३३॥ निवृत्तिरसदाचाराइम दंडतश्चतत् ।
नीतिका ज्ञाता राजा तिस प्रकार सम्पूर्ण येनसंदम्यतेनुरुपायोदंडएवसः ॥ ४०॥
उपायोंसे भाचरण करें जैसे मित्र उदासीन
ये तीनों अपनेसे अधिक न हो ॥ ३३॥ स दमन कहते है जिससे प्राणी दमनको प्र
असत् आचरणसे जो निवृत्ति उसको द
सामैवप्रथमं श्रेष्ठंदानंतुतदनंतरम् । हो वह उपाय भी दंड होता है ॥४०॥
सर्वदाभेदनशनोंदेडनमाणसंशये ॥ ३४ ॥ सउपायोनृपाधीन ससर्वेपांप्रभुर्यतः ।
शत्रुके लिये सबसे पहले साम श्रेष्ठ है निर्भत्सनचापमानोनाशनबंधनंतथा ॥ ४१
उसके पीछे दान, भेदन तो सदैव श्रेष्ठ और
प्राणके सशयम ढड कहा है ३४ ॥
ताडनंद्रव्यहरणंपुरानिवासनांकने ।
मनले सामदानेसामभेदीविकेस्मृती । व्यस्तक्षौरमसद्यानमंगच्छेदोवधस्तथा ४२
भेददंडोसमेकार्योदंड पूज्यपहीनके ॥ ३५ ॥
वह उपाय राजाके अधीन है क्योंकि
भवल शबुके लिये साम,दान अधिक लिये सपका प्रभु है निर्भर्सन ( झिडकना) पर
साम, भेद बहे है, सम शत्रु लिये भेद दण्ड
हरना, पुरले निकासना, अक्ति करना,उल'
करने और हीनके लिये दड श्रेष्ठ है ॥ ३५ ॥
क्षीर फराना, असत्यान (गधा आदि)
मित्रेचसामदानेस्तोनकदाभेददंडने ।
चढाना अंगका छेदन और वध ॥११॥
रिपोः प्रजानां सभेदः पीडनंस्वजयायवे३६॥
युद्धमते पायास्युदंडस्यैवप्रभेदकाः ।
मित्रो लिंये साम, दान होते है और जायतेवर्मनिरताःप्रजादंडभयनच ॥ ४३ ॥
इंट की नहीं, शत्रु तथा प्रजाका भेद और करोत्याधर्पणनवतथाचासत्यभाषणम् ।'
पीटा अपनी जयके लिये होते है ॥ ३६॥ कूराश्चमार्दवयांतिदुष्टादौष्टयंत्यजतिच ॥४॥
रिपुमपीडितानांचसानादानेनसंग्रहः । और युद्ध थे संप उपाय दण्डके ही में
गुणवतांचदुष्टानां हितनिर्वासनसदा ॥ ३७॥ यदे है क्योंकि दो भयस मजाधम निस
नाका साम और इस संग्रह पर और असत्य भाषण कोई नही परता और
दृष्टीफा सदेव नियासन निTOR) कोमल हो जाते है और दुष्ट मनुए डा
साको त्याग देते है।। ४३॥४४॥
स्वप्रजानांनभेदननेवदंडे नपाठनम् ।
पापियशयांतिविद्रवंतिचदस्यवः ।
परे ॥२७॥
४.]
भापाटीकासहित ।
पशुभी वशमें होते हैं। चोर भाग जाते हैं क्षमयायत्तु पुण्यस्पात्तत्किंदडनिपातनात् ।
पिशुन (चुगलखोर) मूक होते हैं भावतायी
स्वमजादंडनान्ट्रयाकर्थराज्ञोभविष्यति॥५२॥
(हिंसक)डर जाते हैं।॥४५॥
क्षमासे जो पुण्य होता है वह क्या दण्ड
करदाश्चमवत्मन्येवित्रासयांतिचापरे ।
देनेसे हो सकता है अपनी प्रजाके दण्डसे
अतोदंडधरोनित्यस्यान्नृपोधर्मरक्षणे ॥४६॥ राजाका कल्याण कैसे होगा ॥ ५२ ॥
कोई इंटकै मारे कर देने लगते हैं और तंदडाजायतकीर्तिर्धनपुण्यविनाशनम् ।
कोई वासको प्राप्त हो जाते हैं इससे राजा नृपस्यधर्मपूर्णत्वाइंडाकृतयुगेनहि ।। ५३ ॥
प्रजाके दण्डसे कीर्ति, धन, पुण्पका नाश
गुरोरप्यालिप्तस्पका कार्यमजानतः ।
होता है, और राजा धर्मपूर्ण होनेसे सतयुगमें
उत्पथमतिपन्नस्यकार्यभवतिशासनम् ।।४७॥ दंड नही ।। ५३ ॥
जो गुरु भी अभिमानी हो कार्य, अकार्यको त्रेतायुगेपूर्णदंड पादाधमिजायतः ।
न जाने और कुमार्गमें चले तो राजा उसको
भी शिक्षा दे।। १७॥
द्वापरेचधिधर्मत्वाधिपादंडविधीयते ॥ ५४ ॥
राज्ञांसदंडनीत्याहिसिध्यत्युपक्रमाः।
बेतायुगमें पूर्ण दंड इसलिये था कि प्रजाम
चौथाई अधर्म रहा और द्वापरमें आधा धर्म
दडएवहिधर्माणांशरणपरमंस्मृतम् ॥ १८ ॥ रहनेस त्रिपात ( ३ हिस्से) दण्ड देना कहा
राजाकी दण्डसहित नीतिसे सब उपक्रम है॥ ५४ ॥
(भारम्भ ) सिद्ध होते हैं, और दंड ही सम्पूर्ण प्रजानिस्वाराजदौथ्याइंडातुकलीयुगे।
'धमीका उत्तम शरण कहा ॥४८॥
अहिंसवीसाधुाहंसापशुवाछुतिचोदनात् ।
युगप्रवर्तकाराजाधमाधमप्रशिक्षणात् ॥१५॥
इंडयस्यादंडनान्नित्यमदंड्यस्यचदंडनात् ४९ हो जाती है इसलिये आधा दण्ड कहा है, धर्म
राजाकी दुष्टतासे कलियुगमें मजा निधन
र दुर्जनोंकी हिंसा, चेदकी भाज्ञाके अनुसार और अधर्मको शिक्षासे युगोंको प्रवृत्ति गजासे.
पशु समान अहिंसा होती है, दड देने यो होती है ॥ ५५॥
ग्यको ड न देना, दंड देने अयोग्यको ट्रेड
युगानांनमजानांनदोपःकिंतुनृपस्याहि।
अतिदंडाचगुणिभिस्त्यज्यतेपातकीभवेत् । प्रसन्नोयननृपतिस्तदाचरतिवैजनः ॥५६॥
अल्पदानान्महत्पुण्यदंडमणयनात्फलम् ॥ न युगोंका न प्रजाओका दोष है किन्तु रा-
E: अथवा अत्यन्त दण्ड देना इनसे गुणी लोग जाका दोष है क्योकि मनुष्य वही आचरण
जाको त्याग देते हैं और वह राजा पातकी करता है जिसे राजा प्रसन्न रहै ।। ५६ ॥
ता है, अल्पदानसे बड़ा पुण्य जैसे होता लोभाद्भयाचकितेनशिक्षितनाचरेत्कथम् ।
। तेसे राजाको दंट देनेसे फल मिलता
सुपुण्योयत्रनृपतिर्धर्मिष्ठास्तवाहिप्रजाः ॥५॥
शास्त्रेपूक्तंमुनिवरैः प्रकृत्यर्थभयायच । जो गजाने लोभ वा भयसे शिक्षा की है
उसको मना कसे न करेगी जहां गजा पुण्य-
अश्वमेधादिभिःपुण्यंतरिकस्यास्तोत्रपाठतः॥
शास्रो विषय श्रेष्ठ मुनियोंने प्रवृत्ति और घान होता है वहां प्रजाभी धर्मिष्ठ होती है ५७
भयके लिये जो पुण्य अश्वमेधादि यज्ञका महापापीयत्रराजातवाधर्मपगेजनः ।
कहा है वह पा स्तोत्र पाउसे होता है अर्थात नकालवीपर्जन्यस्तत्रभूनमहाफला ५८ ॥
नही होता ।। ५१॥
जहां राजा महापापी होता है वही मनुष्य
दिना ॥ ९ ॥
॥५०॥
क्या न्याय यह पछे और यह मायने (९१) शुक्रनीति । [ अध्याय- अधर्मम तत्पर हो जाते है, न समय पर मेघ प्रजा । कायिकोवाचिकोमानसिकासास वर्षता है, न भूमिमे बहुत फल होते है ॥ ५८॥गिकस्यता ॥६५॥ जायतराष्ट्रहासश्चशवृद्धिर्धनक्षयः । राजा प्रथम अपनी आत्माका फिर भृत्यों सुराप्यपिवरोराजानलैणोनातिकोपवान् ॥ का फिर प्रजाका नियमन करे और देह देशकी हानि, शत्रुकी वृद्धि, धनका नाशवाणीसे मनसे तथा संगसे ।। ६५ ।। होता है, मदिराका पीनेवाला भी राजा अच्छा चतुर्विधोऽपराध सबुद्ध्यबुद्धिकृतोद्विधा । परन्तु व्यभिचारी अत्यन्त क्रोधी अच्छा पुनर्द्विधाकारितश्चतथाज्ञेयोनुमोदित ॥६६॥ नहो ॥ ५९॥ यह चार प्रकारका अपराध, १ जानवर लोकांचंडस्तापयतिस्त्रैणोवनन्विलुपति । क्यिा ओर २ विना जाने किया दोप्रकारका मद्यप्येकश्चभ्रष्ट स्याद्बुद्धयाचव्यवहारतः ॥ कहाहै फिर वह दोप्रकारका होता है एक क्रोधी राजा लोकोंको दु:ख देता है, व्य कराया और दूसरा अनुमोदन किया ॥ ६६॥ भिचारी वर्गों का नाश करता है, मदिरा पीने सदसकृदभ्यस्तःस्वभावःसचतुर्विधः । वाला तो बुद्धि और व्यवहारसे आपही भ्रष्ट नेत्रवकूत्रविकाराद्यर्भावैर्मानसिकतया ॥ होता है॥६०॥ फिर वह चार प्रकारका होताहे कि एक कामक्रोधौमद्यतमौसर्वमाविकोयतः । धार किया, पारवार किया, अभ्यास किया धनप्राणहरोराजामजायाश्चातिलोभतः ॥६१॥ और स्वभावसे किया, नेव, मुसके विकार काम और क्रोध, ये दोनो बडेभारी मद है आदि भावोंसे मानसिक अपराधको ॥६॥ और सब मद्यासे अधिक है और राजा अत्य क्रिययाकायिकंवीक्ष्यवाचिकंक्रूरशन्दतः । न्त लोभस प्रजाके धन और प्राणायो हरसा सांसर्गिकंसाहर्यीत्यागौरवलाघवम् ॥६८॥ है॥६१॥ ओर देहके अपराधको करनेसे तया वाणी तस्मादेतत्रयस्यस्त्वादंडधारीभवेन्नृपः । के अपराधको कठोर शब्दसे सांसर्गिक भर अंतर्मुदुर्वहिरोभूत्वास्वांदंडयेत्प्रजाम ६१॥ राधको साहचर्य से देखकर लाघव इससे राजा इन तीनोगे छोड कर दण्ड गौरवको जानकर ।। ६८ ॥ धारी हो भीतर कोमल और बाहरसे यूर उत्पन्नोत्पत्स्यमानानांकार्याणांदेडमारहेत् । अपनी प्रजाको दण्ड दे॥६१ ॥ अत्युदंडकल्प स्यात्स्वभावाहितकारिणः । प्रथमंसाहसकुर्वन्नुत्तमोदंडमहति ॥ ६९ ॥ पैदाहुए और पैदाहोनेवाले कार्योकादा राकणेजपैनित्यंहन्यनेचस्वभावत ॥ ६३ ॥ दे जो उत्तम पुरुष पहिलेही साहस करे स्वभावसे जो अपने अहितकारी है उनको उत्तम दण्डके योग्य होता है । ६९ ॥ भतिउन दण्ड है, जो स्वभाव से सूचक (घु न्याय्यकिमितिमपन्तववेयमसस्कृतिम् । गल) टनसे देश नष्ट होता है ॥६॥ अतोनृपासूचितोपिविमृगेकार्यमादरात् । उपहासंयथोक्तंचद्विगुणांनेगुणंततः ॥ ७० ॥ आत्मनश्चमजायाश्चदोपद[तमानुषः॥६४॥ इससे राना सूचना करन परभी पायो तेने किया है,फिर दोगर या तीनवार ययोत भादरसे विचार जो राजा अपना और प्रमाका उपदासको पछे ॥७॥ दोपदेशतादेपद उत्तम होता॥ ६४ ।। मध्यमसाहसंकुर्वन्नुत्तमोदंदमहति । विनिग अतिचारमानमादीभृत्यास्वतः पिग्दंडप्रथमंचाद्यसादसंतदनंतरम ।। ७१। और
भाषाकासहित।
यदि उत्तम पुरुष मध्यम साहस करे तो मध्यमसाहसंकुर्वन्नधमोदंडमर्हति ।
वद दण्डके योग्य होताहे उसको पहिले धि-
पूर्वसाहसमादौतुययोक्तंद्विगुणंततः ॥ ७८॥
कारका दण्ड और पीछे साहसका दण्डनीच जो मध्यम साहस करे तो दंडके
होताहै ॥७१॥
योग्य होता है उसको प्रथम साहसका दंड
ययोक्तंतुतयासम्यग्यथावृद्धिानंतरम् ।
पीछे शास्त्रका दंड होता है ।। ७८॥
उत्तमंसाहसंकुर्वन्नुत्तमोडमर्हति ।। ७२ ॥ उत्तमसाहसंकुर्वन्मध्यमोदंडमर्हति ।
प्रथम भली प्रकार यथोक्त दण्ड और पीछे
मध्यमंसाहसंचादौययोक्तंतदनंतरम् ॥७९॥
से दण्डको वृद्धि होती है।यदिउत्तमपुरुष उत्तम
साहसकरे सो वह दण्डके योग्य होता है॥७॥ यदि मध्यम पुरुष उत्तम साहस करै तो
प्रथमसाहसंचादीमध्यमतदनंतरम् ।
दण्डके योग्य होता है, उसको पहिले मध्यम
साहसका दण्ड पीछे शास्त्रोक्त होता है ।।७९ ॥
यथोक्तंद्विगुणंपश्चादवरोधंततःपरम् ॥ ७३ ॥ द्विगुणंत्रिगुणंपश्चाद्यावनीवंतुबंधनम् ।
उसको पहिले साहसका दंड फिर मध्यम
साहसका फिर शास्त्रोक्तसे दूनादेड फिर प्रथमंसाहसकुर्वन्नधमोदंडमर्हति ॥ ८० ॥
अवरोध (कैद ) होताहै ॥७३ ।।
फिर शास्त्रोक्तसे दूना वा तिगुना दण्ड
बुद्धिपूर्वन्यातेनविनैतदंडकल्पनम् ।
फिर जन्मभर बंधन होता है, यदि अधम मनु-
उत्तमत्वमध्यमत्वनीचत्वंचारकीर्यते ॥७॥
ध्य प्रथम साहस करे तो दण्डके योग्य होता
है॥८॥
जो जानकर मनुष्यको मारे उसको बिना
विचारे दंडकी कल्पना करे, यहांपर उत्तम
ततःसंरोधीनत्यमागैसंस्करणार्थकम् ।
मध्यम नीच दडको कहते हैं.॥७॥
उत्तमंसाहसंकुर्वन्नधमोदंडमर्हति ॥ ८१ ।।
गुणेनैवतुमुख्याहिकुलेनापिधनेनच ।
फिर सरोध और नित्य मार्गका संस्कार
प्रथमंसाहसकुर्वन्मध्यमोदंडमर्हति ।। ७५ ॥
(सडककी सफाई ) अधम मनुष्य उत्तम साह.
सकरै तो वह दंडके योग्य होता है ॥ ८१ ।।
गुण, कुल या धनसे मुख्यता होती है। मध्यमसाहसंचादायथोक्तंद्विगुणंततः ।
मध्यम पुरुष प्रथम साहसको करे तो दंडके
योग्य होता है ।।७।।
यावनीवबंधनंचनीचकमक्केवलम् ८२ ।।
दिग्दंडमदंडंचपूर्णदंडमनुक्रमात् ।
उसको प्रथम मध्यम साहसका दंड पीछे
द्विगुणंत्रिगणपश्चात्संरोधनीचकर्मच।।७६॥
शास्त्रोक्त और फिर शास्त्रोक्त दूना फिर जन्म
भर चधन फिर केवल नीचर्कम कराना कह।
उसको कमसे धिकारका दंड भाधा दूंड है ।। ८२॥
पूर्ग दंड दूना या तिगुना दड होताह और
पीछेले संरोध (कैद) वा नौचकर्म करनेका हरेत्पादंधनात्तस्ययाकुर्याद्धनगर्वतः ।
दंड देना ॥ ७६॥
पूर्वततोमखिलंयावजीवंतुबंधनम् ८३ ।।
मध्यमं साहसंकुर्वन्मध्यमोदडमहीत ।
जो मनुष्य धनके अभिमानसे पहला अप.
अथैयथोक्तंद्विगुणीत्रगुणधनत ७७॥ राध कर सके चौथाई धनको राजा हर ले
मध्यम पुरुष मध्यम साहसको करे तो फिर भाधे धन को फिरसर धनको हरे फिर
दडयोग्य होता है टसको आधा दंड वा
जन्मभर बंधन कर॥ ८३॥
शाखोक्तसे दुगुना तिगुना दंड होता है और सहायगौरवाद्विद्यामदाचवलदर्पतः ।
फिर बंधन (फैद)॥७॥
पापंकरोतियस्तंतुवंधत्ताडयत्सदा ॥ ८४ ॥
शुक्रनीति। [ अध्याय- (९६) जो मनुष्य किसीको सहायताके घमंडसे जो राजा क्षमाशील है उसका दंड ऐसा वा विद्या और बलके मदसे पापकरे उसका (पूर्वोक्त) होता है और जब राजा प्रचण्ड वधनकरे वा सदैव ताडना दे॥ ८ ॥ होकर धनका हरनेवाला और अपराधकी भार्यापुत्रश्चभागनीशिष्योदासःस्नुपाऽनुजः । क्षमा नहीं करता ॥ ९१ ॥ कृतापराधास्ताव्यास्तेतनुरज्जुसुवेणुभिः ८५॥ नृपायेदातदालोकःशुभ्यतेभिद्यतेपरैः । भार्या, पुत्र, बहन, शिष्य, दास, पुत्रवधू, अतःसुमागदंडीस्याक्षमावान्रंजकोनृपः ९२॥ छोटाभाई ये अपराध करें तो छोटी रस्ती तव सम्पूर्ण जगत् चलायमान और दूस- और बांससे ताड़ना दे॥ ८५॥ रोले पीडित होता है इससे राजा सुभाग पृष्ठतस्तुशरीरस्यनोत्तमांगेकथंचन । (थोड़ा) दंड दे और क्षमासे प्रजाको प्रसन्न रक्खे ॥ ९२॥ अतोन्ययातुनहरेच्चोरवडमहति ॥ ८६ ॥ इन्हें भी देहकी पीठपर मारे उत्तम अंगमें मद्यपाकितवस्तेनोजारश्चंडश्चहिंसकः । कभी न मारे इससे अन्यथा जो प्रहार करता त्यक्तवर्णाश्रमाचारोनास्तिकः शठएक्च ॥ है वह चौरके दण्डका भागी होता है ।। ८६ ॥ राजा इतने मनुष्योंको राज्यसे निकाल दे नीचकर्मकरंकुर्याइंधयित्वातुपापिनम् । कि मदिरा पीनेवाला, धूर्त, चोर, जार, कोधी, हिंसक, वर्ण और आश्रमकै भाचरण- मासमात्रंत्रिमासंवापण्मासंवापिवत्सरम् ८७॥ का त्यागी नास्तिक और शठ॥ ९३ ॥ पापी मनुष्यसे बांधकर एक माल तीन मिथ्याभिशापकाकर्णजपार्यदेवदूषको । मास छः मास वा वर्षभर नीचकर्म करावे ८७॥ असत्यवान्यासहारतियाात्तीवघातकः ।। यावनीवतुवाकश्चिन्नकश्चिद्वधर्महति । ननिहन्याञ्चभूतानिवितिजागतिवैश्रुतिः ८८॥ ताओंके दूपक, झटा, न्यास, ( धरोहर) का मिथ्या दुःखदाई, सूचक, सजन और देव- अथवा जीवन पर्यन्त, कोई भी जीव वधके चोर, जीविकाका नष्ट करनेवाला ॥ ९ ॥ योग्य नही होता क्योंकि श्रुतिमें यह लिखा है अन्योदयासहिष्णुश्चात्कोचग्रहणेरतः । कि प्राणियोंकी हत्या न करै ।। ८८॥ अकार्यकर्तामंत्राणांकार्याणांभेदकस्ता ।। तस्मात्सर्वप्रयत्नेनवधदंडत्पन्नृपः । जो दूसरेके प्रतापको न रहे, उत्कोच अवगेधाबंधननेताडनेनचकर्पयेत् ॥ ८९ ॥ (रिशवद ) का ग्रहण करनेवाला, कुफर्मका तिसखे सम्पूर्ण पत्नले वधके दंडको राजारी, मन्त्र और कार्योंका नष्ट करनेवाला।।९५॥ त्यागदेभवरोध, बंधन, ताडनासेही दंड दे८२ अनिष्टवाक्परुपवाग्जलारामप्रवाधकः । लोभानकर्षयेद्राजाधनदंडनप्रजाम् । नक्षत्रसूचीराजदिटूकुमंत्रीकृटकार्यवित् ।। नासहायास्तुपित्राबादंडया:स्युरपराधिनः९० अनिष्ट वा कठोर वचन कहनेवाला जल और बागका हिंसक, नक्षत्रसूची (जो दुकान राजा लोभसे धनका दंड देकर प्रजाको दुःपी न करे अपराध करनेवाले पिता आदि गजाका बैरी, छोटा मन्त्री, कपटी ॥९६ दुकानपर नक्षत्रोंको वतावे ऐसा ज्योतिषी) काँका यदि कोई सहायक नहीं तो दंड न दे ॥९॥ कुवैद्यामंगलाशीचशीलामार्गनिरोधाकः क्षमाशीलस्यवैराज्ञोदंडग्रहणमीदृशम् । कुसाक्ष्युद्धतवपश्चस्वामिद्रोहीव्ययाधिका ।। नापराधंतुक्षमतेप्रचंडोधनहारकः ॥ ९१॥ . रोकनेवाला छोटा साक्षी, जिसका वेष उद्धत खोटा वैद्य, अमंगली, सदा अशुद्ध, मार्गके 44 भापाटीकासाहत। (९७) हो, स्वामीका द्रोही और अधिक व्ययका स्वभावदुष्टानेतान्हिज्ञात्वाराष्ट्रादिवासयेत् । कर्ता।।९७॥ दीपेनिवासितव्यास्तदादुगोदरथेवा ॥४॥ अनिदोगरदोवेश्यासक्तः प्रबलदंडकृत् । इन सम्पूर्ण स्वभावदुष्टोंफो राजा देशले तयापाक्षिकसभ्यश्चवलाल्लिखितग्राहकः ९८॥ निकाल दे या किसी द्वीपमें बांधकर क्लेिमें भनि लगानेवाला, विष देनेवाला, वेश्या- इन सबको बसादे ॥४॥ गामी, प्रवल दण्डका दाता, पक्षपाती, मभा मार्गसंरक्षणेयोज्याकदन्नन्यूनभोजनाः । सद, वलसे लिखाई लेनेवाला ।।९८॥ ततजात्युक्तकर्माणिकारयीतचतैपः ॥१॥ अन्यायकारीकलहशीलायुद्धपराङ्मुखः । खोटा अन्न और अल्प भोजन देकर इनको साक्ष्यलोपीपितृमातृसतीस्त्रीमित्रद्रोहक:९९॥ मार्गको रक्षामें नियुक्त करे और इनसे तिसर अन्याय कर्ता, कलही, युद्ध में पराङ्मुख, जातिकै जो कम हैं वे करावे ॥५॥ साक्षीने जो कुछ कहा हो उसका नाश करने एवंविधानसाधूंश्चसंसर्गेणचदूपितान् । वाला और पिता, माता, सती स्री, मित्र ईनके दंडयित्वाचसन्मार्गेशिक्षयेत्तान्नृपःसदा ॥६॥ संग द्रोहका कर्ता ॥ ९९॥ इस प्रकारके असाधुओं और संसर्गसे असूपकः शसेवीमर्मच्छेदीचवंचकः । दूषितोको दण्ड देकर राजा सन्मार्गको शिक्षा स्वकीयद्विगुप्तवृतिवृपलोग्रामकंटकः १००॥ सदेव दे॥६॥ परापे गुणों में दोपोको इंढेनेवाला, शत्रुका सेवक, ममका छेदक, वंचक, अपनोंका द्वेषा, राजाराष्ट्रस्पविकृतितयामंत्रिगणस्यच । गुप्त (छिपी) जिसकी जीविका हो, शूद्र और इच्छतिशत्रुसंबंधायेतान्हन्याद्धिद्राडूनृपः ७॥ ग्रामका कंटक ॥ १०॥ जो मनुष्य शत्रुओके सम्बंधले राजा देश विनाकुटुंबभरणात्तपोविद्यार्थिनं सदा । और मंत्रियोंके गगीके विगाडोकी इच्छा करे तृणकाष्ठादिहरणशक्तः सन्भैक्ष्यभोजकः ॥ उनको राजा शीघ्रही नष्ट करदे ॥७॥ जो फुटुम्बका भरण पोषण किये बिना तप नेठेच्चयुगपद्मासंगणदौष्ट्येगणस्यच । को वा विद्या सौरो और तृण और काष्ट मा एकैकंधातयेद्राजावत्सोभातियथास्तनम् ॥ दिकै लाने में समर्थ होकर जो भिक्षा मांगकर यदि किसी समुदायको दुष्टता हो तो भोजन करे॥१॥ समुदायकी एकवार हानिको न चाहे किन्तु कन्यापाअपिविक्रेताकुटुंबवृत्तिहासकः। एक २का नाश इस प्रकार करे जैसे वस अधर्मसूचकश्वापिराजनिष्टमुपेशकः ॥ २॥ एक २ स्तनको पीता है ॥ ८॥ जो कन्य को बेचे, कुटुम्बकी जीविकाको अधर्मशीलोनृपतिर्यदातंभीपयेजनः । कमकरे जो भधर्मको सूचना करे और राजा धर्मशीलातिपलवदिपोराश्रयतःसदा ॥ ९॥ अनिष्टकी उपेक्षा करे ।।२॥ जव राजा अधर्मशील दो तय प्रजा उस कुल्टापतिपुत्रौघस्वितंत्रावृद्धानंदिता । को धर्मशील अत्यन्त परवान् शत्रुके आपसे गृहकृत्योझितानित्यंदुष्टाचारप्रियस्तुपा ॥३॥ सदैव दे॥९॥ व्यभिचारिणीका पति तथा पुत्र और यावधर्मशीलास्यासनृपस्तावदेवाहे । स्वतन्त्र तथा वृद्धोंसे निदित खो और जो अन्ययानश्यतेलोकोद्राइनृपोपिविनश्यति । पुत्रकी वधू घरके कृत्यको न करे सदैव दुष्टा- जितने कालतक गजा धर्मशील रहता चरण करे॥३॥ है उतनेही कालतक यह राजा होता है और
[ अध्याय--
शुक्रनीति ।
(९८)
अन्यथा जगत् और राजा दोनो नष्ट हो येनकेनप्रकारेणधनसचिनुयान्नृपः ।
जाते हैं ॥ १०॥
तिनसंरक्षयेद्राष्ट्रवलंयज्ञादिकाःक्रियाः ॥ १७ ॥
मातरपितरंभार्यायःसंत्यज्यविवर्तते ।
राजा जिस किसी प्रकारसे धनका संचय
निगडेवैधयित्वातंयोजयेन्मार्गसंसृतौ ११॥ करे उस धनसे देश सेनाको रक्षा धौर यज्ञ
माता, पिता, भाया, इनको जो त्यागकर आदि कम करे ॥ १७ ॥
वर्त उसको बेड़ियोंसे बांधकर संसारकै वलप्रजारक्षणार्थयज्ञार्थकोशसंग्रहः ।
मागमें लावे ॥ १२ ॥
परत्रेचसुखदोनृपस्पान्यश्चदुःखदः ॥ १८ ॥
तभृत्यवतुसंदद्यात्तेभ्योराजाप्रयत्नतः । सेना प्रजाकी रक्षा और यज्ञ इनके लिये
विद्यारपणसहस्रतुदंड उत्तमसाहसः ॥ १२ ॥ कोशका संग्रह परलोक और इस लोकमें
और उसको आधी भृति उन माता आ- सुखदाई होता है और भन्यकोश दुःखका दावा
दियोंसे राजा प्रयत्नसे दिलाये, एक सहस्रपण कहा है ॥ १८॥
दण्ड उत्तम साहस होता है ॥ १२॥ स्त्रीपुत्रार्यकृतोयश्चसोपभोगायकेवलः ।
दशमाषमिततानंतपणोराजमुदितम् । नरकायैवसज्ञेयोनपरत्रसुखपदः ॥ १९ ॥
वराटिसार्धशतकंमूल्यकापिणश्चतः।। १३ ॥ जो कोश स्त्री और पुरके ही लिये किया
दश मासे तांचा जो राजमुद्रासे अंकित हो वह केवल उपभोगके लिये होता है और
हो उसे पण कहते हैं और १५० वराटि परलोकमें नरकार्य है सुखदाई नहीं ॥ १९ ॥
(कौडी) योंका जो मोल हो उसे कापापण अन्यायेनार्जितोयस्मायेनत्पापभाक्चसः ।
कहते है ॥ १३॥
सुपात्रतोगृहीतंयदत्तवावर्धतेचयत् ॥ २० ॥
तदर्घश्चतदर्धश्चमध्यम प्रथमाक्रमात् । अन्यायस जिसने कोशका संचय किया
प्रथमेसाहसेदंड प्रथमश्चक्रमात्परौ ॥ १४ ॥ वह उसके पापका भागी होता है जो धन
पूर्वोक्तसे आधेको मध्यम और उससे सुपावसे ग्रहण किया हो अथवा दिया हो वह
अधिको प्रयम साहस कहते हैं पहले साहस बढता है ॥२०॥
में प्रथम फिर क्रमसे मध्य और उत्तम दंड स्वागमीसद्ययीपात्रमपात्रंविपरीतकम् ।
होते हैं॥ १४ ॥
अपात्रस्यधनसर्वहरेदाजानदोषभाक २१ ॥
मध्यमेमध्यमोधार्यश्चोत्तमेतृत्तमोनृपैः ।।
जो मनुष्य सुमार्गस संचय और सुमार्गम
सोपाया:कथितामिमित्रोदासीनशत्रवः१५॥ व्यय करता है वह पात्र होता है इससे विप-
और राजा मध्यम साहसमें मध्यम और रीत कुपात्र कुपात्रका संपूर्ण धन हरनेसेयजा
उत्तम साहस, उत्तम दंड दे इस मिश्रप्रक-दोषका भागी नही होता ॥२१॥
रणमें मित्र उदासीन शत्रु और उनके उपाय अधर्मशीलनृपतेःसर्वतः संहरेद्धनम् ।
कहे हैं ॥१५॥
छलागलादस्युवृत्त्यापरराष्ट्राद्धरत्तथा २२ ।।
अथकोशप्रकरणंहवामिद्वितीयकम अधर्मशील राजाके धनको सब प्रकारसे
एकार्थसमुदायोयासकोशःस्यात्पृथक्पृथक् १६ इरले कि छल वल चोरी तथा परके देशले
अब मिश्र प्रकरणमें दूसरा कोशका प्रकरण
कहते हैं, जो एक प्रकारके धनका, समुदाय
त्यक्त्वानीतिबलस्वीयप्रजापीडनताधनम् ।
हो उसे पृथए २ कोश (खजाना ) संचितयेनतत्तस्यस्वराज्यंशत्रुसाद्भवेत् ॥
जिज्ञराजाने नीति और पलको त्यागकर
हरे ॥ २२॥
फहते हैं ॥ १६ ॥
भाषाटीकासहित । अपनी प्रजाको पीदास धनका संचय किया हो बद्धको रक्षासे कोश, और देशकी वृद्धि उस राजाका राज्य शोके आधीन हो दया शनुका क्षय होते हैं ये तीनों और जाता है।॥ २३ ॥ स्वर्ग प्रजाकी रक्षाले होते है ॥३०॥ दंडभूभागशुल्कानामाधिस्याकोशाधनम् । यज्ञाथैद्रव्यमुत्पन्नयज्ञः स्वर्गसुखायुपे । अनापदिनकुतितीर्थदेवकरग्रहात् ॥ २४ ॥ अर्थभावोयलकोशोराष्ट्रवृद्धचैत्रयंत्विदम् ।। राजा दड पृथ्वीका भाग शुक (मह- द्रव्य यज्ञके लिये और यज्ञ स्वर्ग, सुख,भव- सूल ) इनकी अधिक्तासे आपत्कालको स्थाके लिये होते है, शत्रुका अभाव बळ कोश छोडकर खजाना न बढावे उसको तीर्थ और ये तीनों राष्ट्र (देशावृद्धिक लिये होते हैं।। ३१॥ देवसे कर लेकर ॥४॥ तवृधिनीतिनैपुण्यारक्षमाशीलनृपस्यच । यदाशनुविनाशार्थलमाक्षणोद्यतः । जायतेतोयतेतैवयावबुद्धियलोदयम् ३२ ॥ विशिष्टदंडशुल्कादियनंलोकात्तदाहरेत्॥२५॥ क्षमाशील राजाको नीतिनिपुणताते उनकी जब राजा शत्रुकै पिनाशार्थ सेनाकी रक्षा वृद्धि होती है इससे जितनी बुद्धि और बल में उद्यत हो उस समय अधिक दण्ड और का उदयहो तितने कोश वृद्धिका यत्न करे३२ शुल्क आदि द्वारा प्रजासे धनको ग्रहण मालाकारस्यवृत्त्यैवस्वमजारक्षगनच । करे ॥२५॥ धनिभ्योभृति दत्त्वास्थापत्तातैदनहरेत् । शत्रुहिकग्दीकृत्यतद्धनैः कोशवधनम् ॥३३॥ राजास्थापत्समुर्तीर्णस्तत्संदद्यात्संवृद्धिकम् ॥ जो राजा मालीकी वृत्ति और अपनी प्रजा अपनी आरत्तिम राजा सूदपर धनियास की रक्षासे शत्रुओको करदेनेवाले बनाकर धनले और जब आपत्तिसे उत्तीग (रहित ) शोके धनसे कोशको बढावे ॥ ३३ ॥ हो जाय तब सूदसहित दे ॥२६ ॥ करोतिसनृपः श्रेष्ठोमध्यमोवैश्यवृत्तितः । प्रजान्यथाहीयतचेगज्यकोशानृपस्तया । अधमासेक्यादंड तीर्थदेवकरग्रहः ॥ ३४ ॥ हीनाः प्रदडेनमुरथाद्यानृपायतः ।। २७ ॥ घह राजा उत्तम होता है, जो वैश्यवृत्ति करे अन्यथा प्रजा, राज्य, कोश, राजा ये सब वह मध्यम और सेवा करे वा दंड तीर्थ तथा हीन हो जाते हैं, क्योंकि प्रबल ददले सुरथ देवताले कर ले वह अधम होता है ॥ ३४ ॥ आदि राजा हीन हो गरे है ॥२७ ।। प्रजाहीनयनारक्ष्याभृत्यामध्यवनाः सदा । दंभूभागशुल्कैस्तुीवनाकोगाइलस्यच । ययाधिकृमतिमुवोधिकद्रव्यास्तथात्तमाः ।। सरक्षणंभवेत्सम्यग्यावदिशतिवमरम् ।। २८ ॥ जो मजा धनहीन और भृत्य मध्यमधन दण्ड भूमिका कर और कोश इनके विना हो उनकी सदैव रक्षा करे मोर साक्षी जितने बलकी रक्षा जबतक बीस वर्ष तक भली अधिक धनी हों उतनेही उत्तम होते हैं॥३५॥ प्रकार हो ॥२८॥ घनिकाश्चोत्तमघनानहीनानाधिकान्पैः। तथाकोशस्तुसंधार्यः स्वपनारक्षणक्षमः । दादशाब्दप्रग्यद्धनंतन्नीचसंज्ञकम् ।। ३६ !! बलमूलोभवेत्कोगः कोशमूलंपलंस्मृतम्।। जो उत्तम धनवाले हो और न हीन तिस प्रकार अपनी रक्षाफे योग्य फोशकी हा न अधिक हों उसको राजा रक्खे, जिसे रक्षा राजा करे क्योकि कोराका मूल वल्धतसे १२ वर्ष तक निर्वाह होसके वह धन और बलका मूल कोशक्दा है ।।२९ ॥ नीय होता है।॥ ३६॥ वलसंरक्षणाकोशराष्ट्रवृद्धिरक्षियः । पर्याप्तपोडशाब्दानामध्यमंतद्धन॑स्मृतम् । जायतेतत्रयंवर्गः प्रजासंरक्षणेनवै ॥ ३० ॥ निशदब्दप्रपूरयत्कुटुवस्योत्तमंवनम् ।। ३७ ॥
(१००) शुक्नोति । [अध्याय- गौर जिससे १६वपंतक कुटुम्बकी पालना जो वस्तु अधिक हो और चिरकालतक हो वह धन मध्यम कहा है और जिससे ३० रहसके वह महगीभी अच्छी अन्यथा नहीं वर्षतक पालनाहोवह उत्तम धन होता है॥३७॥ और जो वस्तु विषअग्नि, शीत, जीव इनकी क्रमादरायेदास्थापत्तानृपएपुर्व। मारी हो टसेन रक्खे ॥ १३ ॥ और जिस मूलै यवहान्त्यर्वनवृद्ध सवणिजः कचित् ॥ वस्तुका सार बनरहा हो उसेहो खर्चमे लावे और जितनी खर्च हो चुकी हो उसकी तुन्न राजा अपने आपत्तिरे लिये इन धनिक मादिकाम क्रमसे आधे धनकी रक्षा करे जो नवीन ॥ १४ ॥ व्यापारी भाधेमूल धनसे (जमास) सूद ग्रहीयात्सुप्रयत्नेनवत्सरेवलरेनृपः। लिये व्यापार करताहै वह कभी व्यापारी नही औपधीनांचधातूनाशकाष्ठादिकस्यव ।। होता ॥ ८॥ वर्ष में पड़े यौनसे ग्रहण करता है और विक्रीणतिमहाचतुहीनाघेसचंयतिहि । औषधी तृणकाष्टादिवाभी सचय रक्स ॥४॥ व्यवहारे वृतवश्यस्तदनन विनासदा॥३९॥ यनशस्त्रावाग्निचूर्णभांडादेर्वासमांतया । जो द्रव्य व्यवहारमै लग रहा है उसके यद्यच्चमाधकंदव्यंयद्यत्कार्येभवेत्सदा ४६ ॥ विना सदेव महर्गेमे बचते है और मन्देम लेते जो शस्त्र अस्त्र, अग्नि, चूर्ण (दारू) भाण्ड, विस्र, इना भी सचय रक्से और कार्याम अन्यथास्वप्रजातापानृपठहतिसान्वयम् । जो जो द्रल्प साधक हो सदेव ॥ १६॥ धान्यानासंग्रहाकार्योवरमात्रयषिदः ॥४०॥ संग्रहस्तस्यतस्यापितव्यः कामद्विद. । अन्यथा मजाका सन्ताप यशसहित राजा को नष्ट करता है और इतने भन्नका सग्रह। संरक्षयेत्ययलेनगंगृहीतधनादिकम ॥ ४७ ॥ करे जिस ३ वर्ष पूरा पट जाय ॥४०॥ उस की कार्य सिद्विय रिपे सग्रह कर वत्तकालेश्वगष्ट्रायनृपेणात्महितापच । ना और सग्रह क्येि हुए धन भादिनी चिरस्थायीसमृद्धानामधिकोवापिचेष्यते४१॥ प्रयत्नसे रक्षा करे ॥४७॥ . लिख के समय में अपने देश और अपने अर्जनतुमहद्दु संरक्षणेतचतुगुणम् । लिये मनसग्रह रवरी और जो समृद्ध है क्षणंचोपेक्षितयत्तहिनागंद्राक्समाप्नुयात् ।। उनको चिरकालतक रहने योग्य अथवा धनकै सचयम महादुर और उसकी अधिक भाभी च्छा ॥४॥ राम उसमे चोगुना दुप दोता है यदि सुपुष्टंकात्तिमनातिभेष्टशुष्कंनवीनकम् । दणमार भी धनरक्षकी पेत की जादा रसुगवार्णग्नधान्यस वायरक्षेपत्॥ ४२ ॥ गोयही नट होजाता है ॥ ४ ॥ जो दुग्नु पृष्ट चा शान्तिगालीदै यद्द स्पी अर्जास्पायदुःवस्याद्ययानितनागर्ने । और नगीन बच्छी होता है और तो सुगधघीपुरणामपितयानान्येषांतुस्थभवेत् ॥ गर्ग रसवादी६ टनसी देश' पर रक्षा गरे॥४॥ सचर फरनेयारे मनुम्पनी सचित धारे नाम जोरा होता है यद दुपधी, मुममृटीचरस्थायीमहामपिनान्यया । पुत्र और न्यारो से दो वक्ता॥४९॥ विषयादिहिम पानीटनुष्टंनधारयंत् ॥ ४३ ॥ स्वकीयशिथिंगेयास्यात्तिमन्यनभवतिदि। नि शान्तानदिमान-पर्वतारनियोजयेत् । जागर स्वकोथपस्तन्महापागमाः || पीभूतंतुयशाततुत्यंतुन नकम ॥४॥ जो मनुष्य अपने कार्य शिधिर दीवा
४.]
भापाटीकासहित।
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(१०१)
है तो अन्य क्यों न होगे और जो अपने काम लाल वर्णका इन्द्रगोप के समान जिसकी
में जागता है उसके सहायकभी जागते है ५० कान्ति हो ऐसा माणिक्य सूर्यको प्यारालाल
योजानायजितुंसम्यगर्जितनीहरक्षितुम् ।
पीला, सपेद, श्याम कान्तिवाला मोती चन्द्र
नातःपरतरोमूखोवृथातस्यार्जनाश्रमः ॥५१॥
माको प्रिय है ॥ ५७ ॥
जो मनुष्य सञ्चय करना जानता है और
सपीतरक्तरुग्भोममियविद्रुममुत्तमम् ।
सञ्चयको रक्षा भलीप्रकार नहीं करसकता मयूरचासपत्राभापाचिर्बुधहिताहरित् ५८ ॥
उससे परेकोई मूख नही उसका सश्चय करना पीलापन लिये लाळ मूंगा मगलको प्रिय
वृथा है ॥ ५१ ॥
हे मोर वा चासके पंखों के समान वर्ण पाची
एकस्मिन्नधिकारेतुयोद्धावविकारोतिस । युधको हित होती है ॥ ५८ ॥
मूसीजीवद्विभार्यश्चह्यातिविलंभवांस्तया ५२ ॥ स्वर्णच्छवि पुष्कराग पीतवर्णीगुरुप्रियः ।
जो मनुष्य एक कामम दोनोको अधिकार अत्यंतविशेदवघ्तारकाभंककप्रियम् ५९ ॥
देता है जिसके पहिलीके जीवते दूसरी स्त्री स्वर्णकी जिसमें झलक हो ऐसा पीला
हो ओर जिसको अत्यन्त विश्वास हो उससे पुखराज गुरुको प्यारा है और तारों के समान
परे कोई मूस नही ॥५२॥
जिसकी कांतिहो ऐसा वज्र शुकको प्रियह५९
महावनाशोरसतः स्त्रीभिर्निजितएवहि । हितः शनेरिन्द्रनीलोह्यसितोषनमेघरुरू।
तथायः साक्षितांपन्ठेचीरजाराततायिषु ॥ गोमदःप्रियदाहोरीपपीतारुणप्रभः ६० ॥
जो मनुष्य महालोभी हो और जिसको सजल मेघके समान जिसकी काति हो
हाव भावसे स्त्रियोने जीत लिया हो और जो ऐसा कृष्ण इन्द्रनील शनैश्चरको प्रिय है,
मनुष्य चोर, जार, आतयायी, ( हिंसक ) किश्चित पीला लाल कांतिघाला गोमेद राहु
इनको साक्षी पछे वह भी मूरी है ॥ ५३॥ को प्रिय है ॥ ६ ॥
संरक्षवरकृपणवत्कालेदद्याद्विरक्तवत् ।
ओत्त्वक्षमाश्चलत्तंतुवैदूर्यकेतुमीतिकृत् ।
वस्तुयाथात्म्यविज्ञानेस्वयमेवयतेत्सदा ५४ ॥ रत्नश्रेष्ठतरंवननीचंगोमेदविद्रुमम् ॥ ६१ ॥
कृपणके समान धनकी रक्षा करे और सम पिलाय नेनोंके समान जिसकी कांतिहो
यपर विरक्तके समान दे और वस्तुके यथार्थ और जिसमें लकीर हों ऐसा बैर्य केतुको
जानने के लिये संदेव स्वय यत्न करे ॥ ५५ ॥ प्रिय है, रत्नोमे वज्र श्रेष्ठतर है और गोमेद
परीक्षकै स्वयंराजारनादीन्वीक्ष्यरक्षयेत् ।
और भूगा नीच होतेहै ।। ६१॥
वनमुक्तापवालंचगोमेदश्चंद्रनीलकः॥ ५५ ॥
गारुत्मतंचमाणिस्यमौक्तिकश्रेष्ठमेवाहि ।
भोर राजा परीक्षकों (जौहरी से और इन्द्रनीलपुष्करागौवैदूर्यमध्यमस्मृतम् ६२ ।।
स्वयं परीक्षा करके रत्न भादिकी रक्षा करे
गारुत्मत (पाची) माणिक्य और मोती
कि पच, मोती, ममा, गोमेद इन्द्रनीला श्रेष्ठ है। इन्द्रनील पुखराज, चैदूर्य ये मध्यम
वैदूर्यः पुष्फगगश्चपाचिर्माणिक्यमे च ।
वहाते है॥२॥
महारत्नानिवैतानिनवमोक्तानिरिभिः ५६ ॥
रत्नश्रेष्ठोऽल्भश्चमहाद्युतिरहेमीण ।
वैदूर्य, पुखराज,पाची, मानिय सूरियाने अजालगर्भसद्वर्णरेखाविदुविवर्जितम् ॥६३ ॥
ये नी९ महारत्न कहे है ॥५६॥
सर्पकी मणि जो रत्नाम श्रेष्ठ है वह कांति
खे:प्रियंरक्तवर्णमाणिक्यविद्गोपरुक् ।
वाली दुर्लभ होती है जिसके गर्भमे जाल में
हो, उत्तम वर्ण हो जिसमे रेखा और विधा
रक्तपातसितश्यामच्छामुक्तानियावियोः ॥ हाँ ॥ ६३ ॥
शुक्रनीति [ अध्याय- सकोणंसुप्रभात्नं श्रेष्ठरत्नविदोवदुः । गुरु भारी और अल्प होता है उनका मोल शर्कराभंदलाभंचचिपिटवर्तुलहितत् ।। ६४ ॥ कम होता है ॥ ७ ॥ जिसमें कोण अच्छीही और कांतिभीअच्छी शर्कराभहीनमौल्यचिपिरम ध्यास्मृतम् । हो और जो खांदकी भाकृति हो वा कमल दलाभश्रेष्ठमूल्यस्याद्ययाकामात्तुवर्तुलम् ।। दल तुल्य हो चिकना और गोल हो ऐसे खांडके समान जिसकी काति हो यह रत्नोको रत्नके ज्ञाता श्रेष्ट जानते है ॥ ६४ ॥ कम मोलका और चिपटा मध्यन मोठया वर्णाःप्रभाः सिताररुपीत कृष्णास्तुरत्नजाः ।। होता है कमलदलके समान जिसती काति ययावर्णयबाछायरत्नयद्दोपवर्जितम् ॥ ६५ ॥ दो यथोचित गोल हो वह श्रेष्ट मोलका होता रत्नकै रंग सफेद, रक्त, पीला, काला होते है। जिस रत्नकी शास्त्रोत्ता कांति और वर्ण हो नजरांयांतिरत्नानिविद्रुममौक्तिकंपिना । तथा दोपसे जो रहित हो ॥ ६५ ।। गजादौथ्याचरत्नानांमूल्यहीनाविभवेत् ।। श्रीपुष्टिकीतशीर्यायुःकरमन्यदसत्स्मृतम् । विद्यम मंगा और मोती इनके बिना सय पद्मगगस्तुमाणिक्यभंदाको लनदच्छविः ।। रत्न यद्धावस्था (हीनपना) को प्राप्त नहीं होते है और राजाके मृर्सपनासे रत्नाका मौल्य बह रत्न क्षमी.पुष्टि, कीर्ति शरता अवस्था इनको करता है घोर अन्य रन AGE न्यूनाधिक होता है ।। ७२ ॥ कमन्दके समान जिनकी काति हो ऐसा मत्स्याशिसवारावेणुजीमूतमुक्तितः । मराज माणिस्याही एरु भेद है ॥ ६६ ॥ जायतेमौक्तिकतेपुभूत्तियुद्भवस्मृतम् ॥ नधान्यपुत्रकामानारीवजंदाचन । मत्स्य, सर्प, शप. वाराह, यांस, मेघ, कालेनदीनभवतिमौक्तिकीपटुमंधृतम् ६७ ।' शुक्ति (सीप) इनसे मोती पदा होता है, पुत्र की कामना जिसे हो वह नो को परन्तु शुक्तिले अधिक पैदा होता है ॥७३॥ कृष्णमितपतिरक्तद्विचतुःसतकंचुकम कभी भी धारण न २ । यहुरा धारण किये कनिष्ठमध्यमंश्रेष्ठकमान्मत्युगवंविदुः।।७४। मोती और भूगा हीन हो जाते है ॥ ६ ॥ गुरुवान्प्रभयावर्णा द्वस्तारादाश्रयादपि । काडा. सफेद, पीता रक्त जिप्सम दो चार आकृत्याचाधिमूल्यस्यादनयदोपार्जितम सात कंयुक (पदे) ही सा मोती कनिष्ठ मध्यम श्रेष्ठ शुक्तिसे उत्पन्न कहा ॥७॥ गुरु ( भारीपन ) काति, वर्ण, विस्तार तदेवरिभाष्यमवैध्यानीतराणिनु । और भाश्रय आकृति, इनसे रनका अधिक कुर्वतिकृत्रिमंतहामिहलद्वीपमासिनः ७५ ॥ मोटो जाताजी दोपास जित दो ॥६८ नायीलग्यंतग्नविनामांतिकाविमात् । योधनात सिलदीप वासी गृत्रिमभी और यद धोयने योग्य होताद इतर नही पाषाणपिचप्रायइतिग्नीवदेविदुः॥११॥ मोती बनाते हैं।" ॥ मोती और मंगमे अन्य नितने रन तत्संदेहरिनामामाक्तिकंसुपरीक्षयेत् । पर लोहे और पत्यागी बार नही उप्राणस्नेहेजलेनिश्युपितदिन्न ॥७॥ मोती या नापजातानिपटा ३॥ ६९ ।। मूल्याधियायभव तिपदलंबुस्तृितम् । टम संधी नितिरंटिये मातीची परी क्षा भी प्रसार कोण लाग या बनेट मुलपानमान्यस्यानयाचिमट्टणम ॥ मयुक्त जमे गरिम पर जोगायो और पटे होने दिया माहिभितियाप्यतदधिमग । मोद मध और गद्रमभी जोरान श्रेष्ठभियुक्तिवामध्यभनिदिदुः ७० भाषाटीकासाहित । - जो मोती धानो मलनेसे विवर्ण (मला) चिपिटका मूल्य तेहाई कम होता है जो न हो जाय वह अकृषिम (अखल) होता है शर्कराकी कातिवालेसे तोलमें आधा हो जो शुक्तिसे पैदा होता है उसकी कांति श्रेष्ठ उसका मोल उत्तम कहा है ॥८॥ और अन्यको मध्यम कांति होती है ॥ ७७॥ रक्तिकायाश्चदेवजेतदर्धमूल्यमर्हतः । तुलाकल्पितमूल्यंस्पाद्रत्नंगोमेदकविना । तदर्धबहवोहतिमध्याहीनायथागुणः ॥ ८५ ।। सुमाविंशतिभीरक्तीरत्नानांमत्तिकविना७८॥ जो दो र वन एकरतीके हो उनका उससे गोमेद विना सर रत्नाकर तोलसे मोल आधा मोल कहा है और जो गुणांसेजते होता है बीस मलसियांशी रत्ती सय रत्नोको मध्य पा हीन हो वे उससे भी भाधे मोल होती है एक मातीके विना ॥ ७८ ॥ योग्य होते है ।। ८५॥ रक्तित्रयंतुमुक्तायाश्चतुःकृष्णकलभरेत् । उत्तमार्वतदर्थवाहीरकामुणहीनतः । चतुर्विशतिभिस्ताभीरत्नं कस्तुरक्तिभिः॥ शतादृवरक्तिवर्गाद्रगेदिशतिरक्तिकाः॥ मोतीको तीन रत्ती चार कृष्णलाकी होती है, जो हीरे गुणहीन होनेसे उत्तमसे आधे वा और २४ चौबीस रतियाका एक टंक रत्नोका उस आधेले भी आधे हो उनमें सौ १०० रत्ति- होता है ॥७२॥ योसे ऊपर वील२० रत्ती कम समझ ले अर्थी टंकेश्चतुर्भिस्तोलास्यास्वर्णविटमया:सदा । २० का मोल कम करदे ॥ ८६ ॥ एकस्यैवहिवज्रस्यत्वेकरक्तिमितस्यच ॥८०॥ प्रतिशतात्तुवज्रस्यविस्तृतदलस्यच । चार टेकोका एक तोला सोने और मूंगेका तथैवचिपिटस्यापिविस्तृतरयचहासयेत् ।। सदैव होता है, जो बन एक रत्ती भरका जिसका दल विस्तार अच्छा हो चज्रके एक हो।।८०॥ प्रति सौ और विस्तृत चिपिटके भी २० रत्ती सुविस्तृतदलस्यैवमूल्यपंचसुवर्णकम् । कम करदे ॥ ८७॥ शर्कराभस्यपंचाशञ्चत्वारिंशच्चवैकतः । रक्तिकादलविस्ताराच्छेष्ठपंचगुणयदि ।।८१॥ रत्ननधारयेत्कृष्णरक्तविदुयुतंसदा ॥८८॥ जिसके दलका विस्तार भी अच्छा हो उसका मोल पांच सुवर्ण होता है जो रत्तोके चालो जो मोल कम करे और काले और शर्करा (कंकर) के वज्रकी पचास वा दलसे पांच गुना विस्तार हो ।। ८१ ॥ रक्तबिंदुवाले रत्नको कभी न धारे ॥ ८८॥ यथायथाभवेन्न्यूनंहीनमौल्यंतथातथा । गारुत्मकंतूत्तमंचेन्माणिक्यंमूल्यमहतः अत्राष्टक्तिकामापोदशमापैःसुवर्णकः ८२ सुवर्णरक्तिमात्रंचयथारक्तिततोगुरु ॥ ८९ ॥ जितना न्यून हो उसना २ ही कम मोल होता है और यहां ८ रत्तियोका १ मापा गौरमोल योग्य होता है यदि रत्तीमात्र सुवर्णसे जो उत्तम गारमा होय तो माणिस्यके दशमापीका एक सुवर्ण होता है ॥ ८२ ॥ रत्तीमात्र भारी हो ॥ ८ ॥ मूल्यपंचसुवर्णानांराजताशीतिकर्षकम् । राक्तिमात्रःपुष्करागोनीलःस्वार्धमर्हतः । यथागुरुतरंवतन्मूल्यं रक्तिवर्गतः ॥ ८३॥ चलबिर यश्चोत्तममूल्यमर्हति ॥९० ॥ पांच सुवर्णीका मोल चांदोके मस्ती कपंका एक रत्तीका नीला पुखराजका आधासुवर्ण (रुपैया) होता है जितना भारी बन्न हो मोल होता है। जिस वैदूर्यमें तीन सूत्र हों उसका मोलभी रत्तियों समूहसे होता है ८३ वह उत्तम मोलके योग्य होता है ॥९॥ तृयीयांशविहीनंतुचिपिटरयप्रकीर्तितम् । प्रवालंतोलकमिस्वार्धमूल्यमहति । अर्धशर्कराभस्पचोत्तममूल्यमीरितम्।। ८५॥ अत्यल्पमूल्योगाभदोनोन्मानंतुयत हैति ।। "
(१०४)
शुक्रनीति।
[अध्याय-
एक तोला मगेका याधा सुवर्ण मोल यो- स्नेस्वाभाविकादोषासतिधातुपुकृत्रिमाः।
म होता है अति अल्प मोलका गोमेद उन्मान अतोधातून्सपरीक्ष्यतन्मूल्पकल्पयेद्बुधः ९७
(तोलना) के योग्य नहीं होता ॥९॥
संख्यातःस्वल्परत्नानांमूल्यस्याद्धारकाद्विना कृत्रिम होते हैं, इससे बुद्धिमान मनुष्य धातु-
रत्नमें दोष स्वाभाविक और धातुओंमें दोष
अत्यंतरमणीयानांदुर्लभानांचकामतः ॥१२॥ ओकी परीक्षा करके उनके मोलकी काना
छोटे रत्नोंका मोल हीरेको छोड़कर गिन करे ।। ९८ ॥
सोते होता है जो अति रमणीय वा यथार्थम सुवर्णग्नतंतामेवंगसीसंचरंगकम् ।
दुर्लभ है ॥९॥
लोहंचधातवःसप्तोपामन्येतुसंकराः ॥९९ ॥
भवेन्मूल्यनमानेनतयातिगुणशालिनाम ।
सुवर्ण, चांदी, तांचा, वंग,सीसा, रांग लोहा
व्यंधिश्चतुर्दशहतोवर्गामौक्तिकरक्तिजः ९३ ये सात धातु होती है और बाकी तो संकर
तेसेही अत्यन्त गुणवालोंका मोल मानते ( मेलजोल) ॥९९ ॥
नहीं होता और मोतियोंकी रत्तियोंके समूहको यथापूर्वतश्रेष्टस्यात्स्वर्णश्रेष्ठतरंमतम् ।
चौथाई कम करके चौदहगुना करे ।। ९३ ॥1
चतुर्विशीतभिर्भक्तोलब्धान्मूल्यंप्रकल्पयेत् ।
'वंगतानभवंकांस्यपित्तलताम्म्ररंगजम्।।२०० ।।
ये पूर्व २ की श्रेष्ठ होतो है और इनमें सोना
उत्तमंतुसुवर्णार्धमुनमूनंययागुणम् ॥ ९४ ।।
आयन्त श्रेष्ठ होता है वग और तांबस कांसी
फिर चौबीसका भाग दे उसमे जो लब्धतांबा और रांग मिलाकर पीतल होती
हो उससे मोलकी कल्पना करे, उत्तमका मोल है॥२०॥
आधा सुवर्ण और न्पून न्यूनका गुणफै अनु।
सार होता है ।। ९४ ॥
मानसममपिस्वर्णतनुस्यात्पृथुला परे ।
मुक्तायारक्तिवर्गस्यप्रतिरक्ताकलानय ।। एकन्छिन्द्रसमाकृष्टसमखंडेद्वयोर्यदा ॥१॥
कल्पयेत् पंचभागान्हित्रिशद्रिः प्राग्भजेच्च सोना, मानके, समानभी पतला हो सकता
(है और धातु पृथुल(मोटी)रहती है एक छिद्में
तार॥ ९५॥
खीचनेसे जर दोनोंके संड
समान हो
मोतियाकी रत्तियोंके समूहम प्रति रत्ति ९
जाय॥ १॥
फ्ला समझे उनमेसे पांचभागोंमे तिसका
भागदे॥१५॥
घातो सूत्रमानसमंनिर्दस्यभवत्तदा ।
लकलासुसंयोज्यकलापोडगभिर्भजेद यंत्रशस्त्रास्त्रम्पयन्महामूल्यंभवेदयः ॥ २॥
प्रपतहम्पोरमेमसात्पत्याश्याशुभम् ६ रुप मिशा (शुद्ध पातुका सूत मानके
जो टन्ध हो उसे क्लाभमि मिला दे भीर समानहोता और जिस लोहेके यत्र शस्त्र अस्त्र
काभौम खोलदका भाग दे उससे जो लदो चने यह भी बहुत मोलका होता है ॥२॥
उसीसे मोतीका मोल जाने वा गुणकै मनु रजतपाडगगुणभेवत्वर्णस्यमूल्यकम् ।
रक्तंपतितुलंचेन्माक्तिकंचात्तमांसितम ।।
'ताम्ररजतमूल्यस्यात्प्रायोशीतिगुणतया ३॥
अयमंचिपिशर्कगभमन्यत्तमभ्यमम ॥९॥ सोनेका मोल चांदीस सो रह गुना होता है
जो मोती रक्त, पोला, सफेद और गोल होमोल होता है ॥ ३ ॥
और चांदीसे अस्सी गुणा ( भाग) तांबेका
घद उनम और जो करके समान वा चिपटा
हो. यह अधम, और अन्य मध्यम होता ताम्राविकसाईगुणवंगांगात्तयापरे ।
रंगमासद्वित्रिगुणंताम्रालोहेतुपड्गुणम् ४॥
सार॥९६॥
४.] भापाटीकासहित । (१०५) . शरिस डेढगुणा अधिक वग ओर तैसे ही द्विनिचतुःसहवामूल्यंश्रेष्ठंगजाश्चयोः । चगले अन्य धातु होती है, वंग ओर सीता क- मसे दूने तिगुने और तांबसे छ गुना लोहा उष्ट्रस्यमाहिषसममूल्यमुत्तममरितम् ११ ॥ होता है ॥४॥ हाथी और अषका उत्तम मोल दो तीन घा चार सहन पर है और उटका मोल भैसके मूल्यमेतद्विशिष्टंतुयुक्तमामूल्यकल्पनम्। समान उत्तम कहा है ॥ ११ ॥ सुश्रृंगवर्णासुदुघावहुदुम्बासुवासका ॥५॥ योजनानांशतगंताकेनाह श्वउत्तमः । यह विशिष्ट (उत्तम)मोल पहा ओर मो मूल्यंतस्यसुवर्णानांश्रेष्ठपंचशतानिहि।। १२॥ पहली फ्ल्पना तो पहिले कह आये और जिस जो घोडा सो योजन एक दिनमै चलै वह के अच्छे सीग, दहनमें सुशील, बहुत दूध दे, उत्तम होता ह उसका उत्तम मोल पांच शत वछटा अच्छा हो॥५॥ वरुण्यल्पावामहतीमूल्याधिक्याहिगार्भवेत् । विशद्योजनगताउटश्रेष्ठस्तुतस्यवे । (५०० सुवर्ण होता है ॥१२॥ पतिवत्साप्रस्यदुग्धातन्मूल्यराजतंपलम् ॥६॥पलानांतुशतमूल्यराजतंपारकीर्तितम् ॥१३ ।। जवान हो, चाहे वह छोटी हो चाहे बडी तीन योजन चटनेवालाऊट उत्तम होता पर वह गो अधिक मोलकी होती है, जिसका है उसका उतम मोट चादीके सौ पल कहा दूध वत्सने पी लिया हो और प्रस्थभर दूध है ॥ १३ ॥ उस गौका मोल एकपळ चादी होता है॥ ६॥ चतुर्मापमितस्वीनिष्कइत्यभिधीयते । अजायाश्चगवास्यान्मेष्यामूल्यमजाधकम् । पंचरक्तिमितोमाषोगजमौल्येप्रकीर्तितः ।। दृढस्ययुदशीलस्यपलंमेपस्थराजतम् ॥ ७ ॥ चार मासे सोने शो निष्क कहते है हाथी धकरीका मोल गौसे आधा,भेडका बकरीस मोलम पांच रत्तीका मासा कहा है ॥ १४ ॥ माधा घोर जो मोढा दृढ तथा युद्धो योग्य हो रत्नभूतंतुतत्तरस्याद्यद्यदप्रतिमभुवि । उसका मोल एक पल चांदी होता है ॥७॥ यथादेशयथाकालंमूल्यसर्वस्यकल्पयेत् १५ ।। दशवाष्टीपमूलंराजतंवत्तमंगवाम् । जो वस्तु पृथ्वीपर अप्रतिम ( नायाब ) पर्लमष्याअवेश्चापिराजतंमूल्यमुत्तमम ॥८॥ हो वह सब ररनरूप है और देश वा समयके दश वा आठ पल चादी गायका उत्तममूल्य अनुसार सबके मोलकी कल्पना कर ले ॥१५॥ होता है, मेपी ओर भेडका मोल एकपल घा-नमूल्यगुणहीनस्यव्यवहाराक्षमस्यच । दी उत्तम होता है ॥८॥ नचिमध्योत्तमत्वंचसर्वस्मिन्मूल्पकल्पने।। गवांसमसार्धगुणमहिप्यामूल्यमुत्तमम् । जो वस्तु गुणसे हीन वा व्यवहार अयो- मुश्रृंगवर्णनलिनोवाढ-शीघ्रगमस्यच ॥ ९ ॥ग्य हो उत्तका कुछ मोल नही, सब जगह गौमारे समान वा डेढगुना तका मोल मूल्यको कल्पनाम नीच मध्यम उत्तमता है॥१६ सत्तम ह, जिस वैलरे सोग अच्छे हो बलपान चितनीयधुंवोंकाद्वस्तुजातस्यमर्वदा । हो योझ ले जाने समय हो और तेज विक्रेत मनोराजभागःशुल्कमुदाहृतम्॥१७॥ चलता हो ॥९॥ बुद्धिमान् मनुष्य लोक्स वस्तुओके मूल्यवी अष्टतालवृपस्यैवमूल्यंपाष्टपलंस्मृतम् । सदैव चिन्ता कर बेचनेवाले और लेनेपालेस महिपस्योत्तममूल्पंसप्तचाष्टोपलानिच ॥१०॥जो राजभाग लिया जाय उसको शुल्क कहते भाउ ताल ( बिलस्त) ऊचाहो ऐसे चलका है ॥ १७ ॥ मोल ६० साठ पल चाँदी है. और भसका शुल्कदेशाहमार्गाःकर सीमा:प्रकीर्तिताः। नम मोट, सात वा आठ पल चांदी है॥ १०॥ वस्तुजातस्यैकगारंशुकग्राद्यप्रयत्नतः १८ ॥
शुक्रनीति । [ अध्याय- चा पत्थरीसे . शुल्कके देश,हट्टके मार्ग, करकी सीमा कही तडागवापिकाकूपमातृकाद्देवमातृकात् । है और वस्तुओका शुल्क एकचारही ग्रहण देशानदीमातृकात्तुराजानुक्रमत सदा ॥२५॥ करे॥ २८॥ जिन देशोमै तलाव, गवडी, कूप, नदी सचिनवासकृच्छुल्कंराष्ट्रेयाह्यनृपेश्ठलात् । 'बहुत ही उनमस क्रमसे सदैव ॥ २५ ।। हात्रिशांशहरेद्राजाविकेतु केतुरेववा १९ ॥ तृतीयांशचतुर्थाशमशिंतुहरेत्फलम् । और देशमेले वारयार शुल्कको राजा छल पष्ठांशमृषरात्तद्वपापाणादिसमाकुलात् ।। से कभी ग्रहण न करे और राजा तीसग, चौथा आधा छठा भाग राजा चाले वा देनवालसे ३२ बत्तीखयां भाग ग्रहण करे ॥१९ ॥ प्रहण करे जो भूमि ऊपर व्याकुल (युक्त ) हो उससे छठा भाग ग्रहण विशांशवापोटाशशुल्कमूलाविरीयकम् । करे ॥२६॥ नहीनसममूल्याधिशुल्कवितृताहरेत् २० राजभागस्तुरजतशतकमितोवतः । अथवा २० बीसचा वा १६वां भाग लाभमे कर्पकालभ्यतेतस्मैविशांशमुत्सृजेन्नृपः ।। से ग्रहण करे । मूल धनका नाश न करे जिस भूमि १०० कर्ष चांदीके पैदा हो और मोलसे कम वा बरावर बेचनेवाले से उसमे किसान २० वा भाग राजा छोड नते॥२०॥ दे॥७॥ लाभंदृष्ट्वाहरेन्छुल्नेतृतश्चसदानृप । स्वर्णादथचरजतात्तृतीयांशंचतामतः वहुमध्याल्पफलितांभुवंमानमितांप्सना २१ चतुर्थीशंतुषष्ठांशलोहादंगाच्चसीसकात् ॥२८॥ राजा लाभको देसकर गरीदने वालेसे सोने और चांदीसे तीसरा भाग, तावे- शुल्क और अधिक मध्यम अल्पफरको से चौथा लोहा वर्ग सोसे छठा भाग ग्रहण गृतीम प्रमाणसे संदव ॥ २१ ॥ करे ॥२८॥ ज्ञात्वामागमिन:पश्चादागंविकल्पयेत् । रत्नाचैवसागसनिजाद्वययोपतः । होचकर्षकादागययानष्टोभवेन्नमः ॥ २२ ॥ लाभाविक्यंकपकादेर्ययादृष्ट्वाहरेत्फलम् ।। पहि जानकर भागया अभिलाषी राजा रत्न और सार ( लवणादि) इनका पीछेसे भागनी करना करे और किसानसे ऐसा भगदे जिस किसान न बिगडे 100m आधाराचते बचावर ग्रहण कर और क्सिा- नरे अधिक लाभगो देराकर फरले ॥२०॥ मालाकाग्इवयागोमागोनांगारकारवत् । निधावापंचधाकृत्वासप्तधादशवापिपा । बगुमध्याल्पफटतरतारतम्यविमृश्यच ॥२३॥ राना माली समान भागको लेदो तृणकाष्ठादिहरकादिगत्यशहरेत्फलम् ॥३०॥ करनेवा में समान न और पहिले सुन तीन, पाच, सात वा दश-भाग पर फटरी न्यूनाधिपताको मिस फर हेवण काष्ठ आदिर येचने वाली विचारलं ॥१॥ से चीप भाग रहे ॥३०॥ राजभागादिव्ययतीद्विगुणंरभ्यतेयाः । अजानिगोमहिप्यचदितोटांशमाहेत् । कृषिसत्यंत उतन्न्यनंदु सर्वनृगाम ।। महिप्यनाधिगोदुग्वारपोडगांगरेन्नृप | निगेतीम सजाया भाग और पर्च। यारो, भेद, गो, भैस इन दिम आठ ना काही पद श्रेष्ठ और उमस पना भागले और इन मंसे राजा सोरया तुपा पदादोजी ॥१॥ भाग ॥३१॥ मप्पम अहर भाषाटीकासहित । (१०७) .. कारुशिल्पेगणात्पादौनकंकमकारयते । वाधुपिकाचकौसीदावात्रिंशांशहरेन्नृपः । तस्यवृद्ध्यैतडागंवावापिकांकृत्रिमांनदीम ॥ गृहाद्याधारभूशुल्कंकृष्टभूमिरियाहरेत् ३९ कारीगर शिल्पी इनके समूहसे पक्षमें एक ज्यापारी और व्याज लेनेवालेसे ३२ दिन काम कराले और ये बहुत ही तलाव यावावां माग राजा ले जिस भूमिमं घर दी डी, कृत्रिम नदी (नहर) इनको ॥ ३२ ॥ उसका कर ( डयूटी) भूमिके समान ग्रहण कुवैत्यन्यंतद्विधंवाकर्पत्यभिनयांभुवम् । करे ॥ ३९॥ सद्यपदिगुणयावन्नतेभ्योभागमाहरेत् ॥३३॥ तथाचापणिकेभ्यस्तुपण्यभूशुल्कमाहरेत् । बनाते हो या अन्य ऐसाही काम करते मार्गसंस्काररक्षार्थमार्गगेभ्योहरफलम् ।। हो अथवा नई भूमिको सोदते हो तो उनसे और हाटवालोले हाटकी भूमिके करको तबतक कर न ले जबतक उनके खचलेले और मार्ग चलनेवालोसे मार्ग ( सडक) दूना लाभ हो ॥ ३३ ॥ की रक्षाके लिये कर दे।। १० ॥ भूविभागंभृत्तिशुल्कवृद्धिमुत्कोचकंकरम् । सर्वताफलभुम्भूत्वादासवरस्पाजुरक्षणे । सधएवम्तनतुकालविलम्वनैः ॥ ३४॥ इतिकोशमारणंसमासात्कायतकिल ४१ ।। भूमिका भाग, भृतिका शुल्क, व्याज सबसे कर लेकर दाबके समान रक्षा करे उत्कोच (रिसवत ) इनके करको उसीसमय यह कोशका प्रकरण संक्षेपसे कहा ॥४१॥ लविलम्ब न करे ॥३४॥ अथमिशेतृतीयतुराएंवक्ष्येसमासतः । दद्यात्मतिकर्षकायभागपत्रसचिाहतम्। स्थावरंजंगमंधापिराष्ट्रशब्देनगीयते ४२ ॥ नियम्यग्रामभूभागमेकस्मादनिकात् ।। अय मिश्र प्रकरणमें राष्ट्र (देश)को संदे- भी किसानको मोहर लगाकर करका पत्र पसे कहते हैं, स्थावर और जंगम भेदते दो (रसीद ) दे ग्रामकी भूमि करको नियत कर प्रकारका कदा है ॥४२॥ के एक धनी (चौधरी) से ते ॥ ५ ॥ यस्याधीनभवेद्यायत्तद्राह्मतत्यवभवेत् । गृहीत्वातत्प्रतिभुवंधनंप्रातसुमन्तुना । कुस्ताशतगुणाधिकासर्वगुणात्ततः ४३ ॥ विभागोगृहीत्वापिमासिमासितौऋतौ ॥ जितना देश जिसके आधीन हो वह राज्य पोडशद्वादशदशाष्टांततोवाविकारिण। उसीका होताहे और उससे सौगुनी अधिक स्वांशाराष्टांशभागेनमामपन्सन्नियोजयेत् सब गुणवाली कुवेरता होती है ॥ १३ ॥ और उस धनी के प्रतिभू जामिन को पहिले इशताचाधिकतरासानाल्पतपसःफलम् । ग्रहण करले और जिसके पास उसको बरावर सदीव्यतिपृथिव्यांतुनान्योदेवोयतःस्मृतः ।। धनदो उसे प्रतिभू न करे और महीनेरवा ऋतु ईशता (राजहोना ) उसतभी अधिक है २में विभागले ग्रहण करके १६, १२, १०, ८, और वह अल तपका फल नही । वह पृथ्वीम अधिकारीनियतकरे अपने अशमेसेछठे भागस क्रीडा करता है इससे राजासे अन्य पृथ्वीमें ग्रामक अधिपतिको नियुक्त करे ॥ ३६॥ ३४॥ देवता हा ॥४४॥ गवादिदुग्धान फलफुटुंबार्याधरेन्नृपः । तस्थाश्रितोभवेल्लोकस्तद्वदाचरतिप्रना। उपभोगेधान्यवस्वस्तृतोनाहरेत्कलम् ॥३८॥ भुक्तराष्ट्ररुलंसम्यगतोराष्ट्रकृतत्वधम्॥ ४५ ॥ गौ भादिका जो दृध फुटुम्बकेही लायक हो जगत् उसके भाश्रय होता है, प्रजा उसीके उससे और जो उपभोगके लिये अन्न-पत्र ख-समान आचरण करती है देशके फर रीदे उससे राजा फर न ले ॥ ३८॥ (पुण्य) और पापको भोगता है ॥ ४५ ॥ राजा,
४]
भापाटीकासहित ।
(१०९)
सीरभेदःकृषिःभोक्तामन्याद्याह्मणादिपु । ऋग्यजुःसामचायवर्विदाआयुर्धनुःक्रमात् ।
ब्राह्मण पोडशगवंचतुरूनंयथापरः ॥ ६०॥ गांधर्वश्चैवतंत्राणिउपेवदा प्रकीर्तिताः
मनु आदि ऋषियोने ब्राह्मण आदिकोके ऋकू, यजु, साम, अथर्य ये चार वेद है
लिये सीर (हल) के भेदखे खेती कही है कि आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद और तन्त्र के
ब्राह्मण एक हलपर सोलह बैल और अन्य चार उपवेद कहे हैं ।। ६७ ॥
वर्ण चार चार थैद्ध कम बैलोको खौ ॥६॥ शिक्षाव्याकरणकल्पोनिरुक्तंज्योतिपतया ।
द्विगवांत्यजैःसीरंदृष्ट्वाभूमार्दवंतथा । छंदःपडंगानीमानिवेदानांकीतितानिहि।।
ब्राह्मणेनविनान्येषांभिक्षावृत्तिविहिता ॥
व्याकरण, शिक्षा, कल्प, निरुक्त, ज्योतिष,
अन्त्यज दो बैल रक्ख अथवा जैसी भूमि छन्द ये छः वेदोक अंग कहे हैं ॥ ६८ ॥
कोमल हो वही बैलों की संख्या कम रक्खै|
मीमांसातर्कसांख्यानिवेदांतोयोगएवच ।
और ब्राह्मणके विना अन्य वर्गीको भिक्षाको
वृत्ति निदित है॥६॥
इतिहासाःपुगणानिस्मृतयोनास्तिकंमतम् ।।
तपोविशेषविविधैर्वतैश्चविधिचोदितः । मीमांसा, तर्क (न्याय ), सांख्य, वेदान्त,
वेद कृरनोधिगंतव्यःसरहस्यादिजन्मना६२ ।
योग, इतिहास, पुराण, स्मृति, नास्तिकोंकर
मत ॥ ६९॥
तपाके भेदोंसे, शास्त्रोक्त विविध वतीले
रहस्यों सहित सम्पूर्ण वेदोको द्विजाति अर्थशास्त्रकामशास्त्रंतथाशिल्पमलंकृतिः ।
पढे॥ ६२॥
काव्यानिदेशभापावसरोक्तियविनंमतम ।।
योधीतविद्यासकलामसर्वपांगुरुभवेत् । अर्थशास्त्र कामशास्त्र, शिल्पशास्त्र, अलंकार
नचजात्यानधीतोयोगुरुभवितुमर्हति ॥ ६३॥ काव्य, देशभापा, अवसरको उक्ति, यवनोकर
जिसने सम्पूर्ण विद्या पढी हो वह सबका मत ॥ ७० ॥
गुरु होता है जो पढा हुभा न हो वह
देशादिधर्माद्वात्रिंशदेताविद्याभिसंज्ञिताः ।
जातिसे गुरु नही होता ॥ ६३ ॥ मन्त्रब्राह्मणयांदनाममोक्तमृगादिषु ॥७॥
विद्याधनंताश्चफलाःसंख्यातुं वशक्यते बत्तीस देश आदिके धर्म इनका विद्या नाम
विद्यामुख्याश्चद्वाशचतुःपष्टिकलाःस्मृताः (है और ऋर आदिका मन्त्र और ब्राह्मणकर
विद्या और कला अनन्त हैं ये गिननेको भी बेद नाम कहा है ॥ ७१ ।।
शस्य नहीं हैं और मुख्य विद्या बत्तीस ३२ जपहोमार्चनंयस्यदेवताप्रीतिदभवेत् ।
हैं और चौसठ कला मुख्य है,॥ ६४ ॥
उच्चारान्मन्प्रसंशंतद्विनियोगिचब्राह्मणम् ।।
यद्यत्स्याहाचिकंसम्यकर्मविद्याभिसंज्ञकम् ।
जिसके उच्चारणसे जप होम पूजन देवताको
शक्तोमूकोपियत्कर्तुकलासंज्ञतुतत्स्मृतम् ६५
प्रसन्न कर उसको मन्त्र कहते हैं और जिसमें
जो जो कर्म वाणीका विषय है उसका ही विनियोग हो उसे ब्राह्मण कहते हैं ॥७२
नाम विद्या है और जिसको मूक (गूंगा) भी
करसके उसको कला कहते हैं । ६५ ॥
ऋग्रूपायत्रयेमन्त्राःपादशोधशोपिया ।
उक्तसंक्षेपत्तोलक्ष्मविशिष्टंपृथगुच्यते ।
येषाहसिमग्भाग:समाख्यानंचयत्रया ।।
विद्यानांचकलानांचनामानितुपृथक्पृथक् ॥ ऋग्वेदरूप जो मन्त्र है चाहे वे पाद ही चाह
संक्षेपसे यह लक्षग कहा भय पृयक २ आधी ऋचाके हो जिनसे होता करनेका
विशेष लक्षण कहते हैं, विद्या और कलाओंके होता है अथवा जिसमें इतिहास ही वह अपने-
पृथक नाम भी कहते हैं ॥६६॥
दका भाग है॥७३॥
(१२०) शुक्रनीति । [ अध्याय- प्रश्लिष्टपठितामंत्रावृत्तगीतविवर्जिताः । कही हो वे छः अथर्ववेदका उपवेद तन्त्र आध्वपश्यत्रकत्रिगुणंयत्रपाठनम् ॥ ७४ ॥ रूप है। ८०॥ जो मन्त्र भिन्न भिन्न पढे हैं और जिनमें स्वरतःकालतास्थानात्मयलानुपदानतः। वृत्तान्त और गीत न हों और जिसमें अध्य- सवनाद्यैश्चसाशिक्षावर्णानांपाठशिक्षणात् ।। र्युका कर्म हो और जो तिगुना पढा जाय ७॥ जिसमें स्वर, काल, स्थान, प्रयत्न और मन्यवाह्मणयोरेवयजुर्वेदःसउच्यते । अनुप्रदानसे और सवन भादिस वर्गाके पढने टही पस्पशवादेर्यज्ञेतत्सामसंज्ञकम् ॥७५॥ की शिक्षा दो वह शिक्षा होती है । ॥ ८ ॥ वद मन्त्र और ब्राह्मणरूप यजुर्वेद कहा प्रयोगोयत्रयज्ञानामुक्तोब्राह्मणशेषतः । है, जिसमें यज्ञ के बीच शस्त्र आदिका ऊँचे श्रौतकल्पःसविज्ञये स्मार्तकल्पस्तथेतरः८२ ।। स्वरसे माना है उसको सामवेद कहते हैं।७५॥ जिस ब्राह्मण शेषभागते यज्ञीका प्रयोग अथर्वांगिरसोनामयुपास्योपासनात्मकः । ( विधान ) हो, यह श्रीतकल जानना और इतिवेदचतुष्कंतुचिप्समासतः ॥ ७६॥ उससे भिन्न स्मात का होता है ॥८॥ जिसमें उपासना (पूजा) और उपास्य व्याकृतःप्रत्ययाद्यश्चवातु संधिसमासतः । (पूजाके योग्य ) वर्णन हो वह अब और शब्दापशब्दाव्याकरणंएकद्रिवहुलिंगतः ॥ अंगिरा है ये संक्षपसे चारों वेद कहे ॥७६ ॥ जिसमें प्रत्यक्ष भादिधातु सन्धि समासते दित्यापुर्वेत्तिसम्यगाकृत्योपधिहेतुतः । शब्द और अपशब्दका व्याख्यान हो और यस्मिन्ऋग्वेदोपवेदःसचायुर्वेदसंशकः ॥८७॥ एक दो बहुत लिंगके भदसे शब्दोका न हो जिव भाकृति और हेतुसे भली प्रकार वह व्याकरण कहा है ॥ ८३ ।। अवस्थाका ज्ञान हो वह ऋग्वेदका उपवेद शब्दनिर्वचनंयत्रवाक्यार्थकार्थसंग्रहः ॥ आयुर्वेद कहाता है ॥ ७७ ।। निरुक्तंतत्समारपानादेदांगीतसंज्ञकम ८१ युदशस्त्रास्त्रकुशलोरचनाकुशलोभवेत् । जिसमें वाक्यार्थीले एक अर्यका संग्रह यजुर्वेदोपवेदोऽयंधनुर्वेदस्तुयेनसः ॥ ७८ ॥ हो वह श्रीत नामका वेदांग कहा है ॥ ८४ ॥ जिससे युद्ध शस्त्र अस रचना आदिमें नक्षत्रग्रहगमनैःकालोधनविधीयते ॥ ८५ ।। कुशल हो यह यजुर्वेदका उग्वेद धनुर्वेद दोता है॥७८॥ संहितामिश्रहोराभिगणितज्योतिपहितन् । स्वररुदात्तादिधर्मस्तंत्रीकंडोत्थितःसदा । जिसमें नक्षत्रों और नहीकी गतिसे सम- सतालगीनीवज्ञानंगांधवेिदपवसः ॥ ७९॥ यकी विधि हो संहिता भोर होराले गणित हो म्यर और उदात्त मादि स्वरोके धर्मात जो यह ज्योतिष होता है।८५॥ वीणा वा कण्ठ से निकलते हैं और ताल सहित म्यरस्तजनगीते पद्यान्यत्रममाणतः ८६ ।। ६ इनसे जिसमें गानेका ज्ञान हो वद गांधर्व कल्पांतछंदःशास्त्रंउद्वेदानांपादरूपक । येद ॥ ७९ ॥ और जहा मगण, यगण, गण, सगण विविधोपास्यमन्त्राणांपयोगास्तुविभेदतः। तगण, जगण, भगगा नगण, गुरु और के कायनाःसोपमहारास्तधर्मनियमैश्चपद ।। प्रमागसे पद्य (रहोक) पद कराकर थगांचोपवेदस्वन्त्ररूपःसएचदि ।। छन्दःशाख घेदका अंग है॥८६॥ निस भनेक प्रकारको पना मन्त्रीक यत्रव्यवस्थिताचार्थकल्पनाविधिभेदतः ॥ पोग भोर उनकी समाति धर्म नियमों सहित मीमांसावेदवाक्यानासपन्यापथकीर्तितः ।
भापार्टीकासाहित । (१११) जहां अर्थकी फरपना विधिके भेदसे वर्णादिवर्मस्मरणयत्रवेदाविरोधकम्॥ ९४ ।। निश्चितहो वह मीमांसा और वेद वाक्याका कीर्तनंचार्थशास्त्राणांस्मृतिःसाचप्रकीर्तिता। न्याय कहा है ॥ ८७ ॥ और जिसमें वेदके अनुक्ल वर्ण आदिकोकि भावाभावपदार्थान प्रत्यक्षादिप्रमाणतः॥८८॥ धमका स्मरण हो ।। ९४ ॥ ओर अर्थशास्त्रका सविरकोमत्रतर्फकणादादिमतंचयत् । जिसमे कीर्तन हो वहम्मृति कही है। भाव और अभारूप पदार्योका प्रत्यक्ष युक्तिर्वलयिसायत्रसस्वाभाविकंमतम् ।। आदि प्रमाणसे विवेक सहित वर्णन हो वह कस्यापिनेश्वरकनिवेदोनास्तिकंमतम् । कणाद आदिका मत तर्कशास्त्र है॥ ८८ ॥ और जिधर्म युक्ति बलवान् हो और अन्य पुरुयोष्टौप्रकृतयोविकाराःयोडशेतिच ॥८९॥ सब वर्णन स्वाभाविक हो । ९५॥ ईश्वर कि- तत्त्वादिसंख्यावैशिष्टयात्सांख्यामित्यभि सीकाभी कर्ता नही है और न वेद है, वह ना- धीयते । स्तिक मत है ॥ जिसमे पुरुष ( ईश्वर ) आठ प्रकृति और श्रुतिस्मृत्यविरोधेनराजवृत्तंहिशासनम्॥१६॥ सोलह विकार और तत्व आदिकाको संख्या सुयुस्त्यार्थार्जनंयत्रार्थशास्त्रंतदुच्यते । युक्त होनेसे वह सांख्य कदाता है ॥ ८ ॥ श्रुति स्मृतिक अनुक्ल जिम राजाके - ब्रह्मकमद्वितीयस्यान्नानानेहास्तिार्कचन ॥ तान्तकी शिक्षा हो ॥ ९६ ॥ और युक्तिसे धनके मायिकंसर्वमज्ञानाद्भातिवेदांतिनांमतम् । सचयका वर्णन हो वह अर्थशास्त्र कहाता है। ब्रह्म ही एक अद्वितीय है और नाना शशादिभेदतः पुंसामनुकुलादिभेदतः ॥ (माया) कुछ भी नही है सम्पूर्ण भज्ञानले पद्मिन्यादिप्रभेदेनस्त्रीणांस्वीयादिभेदतः ९७॥ मायारूपही भाखता है यह वेदांतियोका तत्कामशास्त्रंसत्त्वादिलक्ष्मयनास्तिचाभयो । मत है।९०॥ जिसमे शश आदिके भेद और अनुकूल चित्तवृत्तिनिरोधस्तुमाणसंयमनादिभिः॥९१॥ आदि भेदसे पुरुषोंके ॥ ९७ ॥ और पधिनी तद्योगशास्त्रीवज्ञपयस्मिन्ध्यानसमाधितः । आदिभेद और स्वीय आदि भेदसे स्त्रियोंक जिसम माणाके सयम भादित चित्तको लक्षण और घरव भादि दोनोंके लक्षगीका वृत्तिका निरोध वा ध्यान समाधिले चित्त वर्णन हो वह कामशास्त्र कहा ॥ ९८॥ वृत्तिका अवरोध हो चह योगशास्त्र कहाता मासादप्रतिमारामगृहवाप्यादिसस्कृतिः । कथितायत्रताछल्पशास्त्रमुरुमहाभिः ९९॥ माग्मृत्तकथनंचैकराजकृत्यमिपादितः ॥१२॥ जिसमे प्रासाद, (मंदिर) प्रतिमा, मारामा यस्मिन्सइतिहासः स्यात्पुरावृत्तः सएवहि ॥ (बगीचा ) घर और वावटी आदिका मनाना राजाप कर्म आदिके मिषसे जिसमें प्राचीन कदाहो वह बडे २ ऋपियोने शिल्पशास्त्र कहा वृत्तांतका कयन हो ॥ ९२ ॥ वह इतिहास है ॥ ९९ ॥ और पुरा वृत्त कहा है ॥ समन्यूनाधिकत्वेनसारूप्यादिप्रभेदतः। सर्गश्चप्रतिसगश्चयशोमन्वंतराणिच ॥ ९३ ॥ अन्योन्यगुणभूषादिवर्ण्यते कृतिश्चमा वंशानुचरितयस्मिन्पुराणताद्धिकार्तितम् । सम, न्यून, अधिक आदिस और सारूप्या जिसमे सर्ग, प्रतिसंग वंश और मन्वंतर आदिक भेदसे जहां परस्परके गुण और भूषा ११ ९३ ।। और वंशोक चरित्रोंका वर्णन हो वह (शोभा) आदिका वर्णन हो वह अलंकारशाह कहाता है। ३००॥ पुराण कदा है।
( ११२) शुम्नत। [अध्याय- सरसालतादृष्टशब्दार्थका यमवतत् । भित्र भिन्न कमांस क्रियाका भेद होता है विलक्षणचमत्कारनीजपद्यादिभेदतः ॥ १॥ नाम जाति कदाती है ॥ ७ ॥ और जिस जिस स्लाका आश्रय हो रखी। जिसमे रसा सहिन सरकार और शौका) हावभावादिसंयुक्तंनर्तनंतुक्तास्मृता । शुद भये हो और पद्य (श्लोक )आदि भदसे रिक्षण चमकारका बीज हो वह काव्य अनेस्वाद्यविकृतौज्ञानतद्वादनेकला ॥ ८॥ क्दाता॥ हार भाव आदि सहित जो नृत्य उसे क्ला कहते है और अनेक प्रकारचे बाजाकै वि लोकसंकेततोर्यानासुग्रहावास्तुदैशिकी । कारका ज्ञान हो वह उसरे,यजानेमे कळा विनागिरगावीयमंतः कार्यपाधिका ॥ होती है॥८॥ जिसमे जगती रीतिसे देशको धाणीका अनेकरूपाविर्भानकृतिज्ञानक्लास्मृता । ज्ञान भली प्रकार हो और कोश और शाखरे सांताक विना कायाको सिद्धि जिसस होवालकारसंधानन्त्रीपुसोश्चकलास्मृता ॥९॥ अनेक रूपोवे आविभय (प्रकटता ) से ययाकालोचतावाग्यावसरोक्तिश्चसास्मृता। जिसम कार्यका ज्ञान दो पद कला कही है ईश्वर कारणंयत्रादृश्यास्तिजगत सदा॥ ३॥ स्री और पुरुषर वस्त्र और भूपणोरे सन्धान समका अनुसार जो वाणी उसे भासरोक्ति (धारण) को भी कहा रहते है ॥९॥ कहते है, जिसमें जगतका कारण ईश्वर संदेवाप्यास्तरणसंयोगेपुष्पादिग्रयनरला। अदृश्य माना हे॥३॥ द्यूताद्यनेनीडाभीरंजनंनुकास्मृता ॥१०॥ श्रुतिस्मृतीविनाधर्माधर्मास्तस्त चयावनम्। शय्या और पिछौनपर पुष्प भादि गुप- श्रुत्पादिभिनयमास्तियत्रतधावनमतम् ॥ ४ ॥ नमो कळा यहते हैं और शुत आदि अनेक मीडामे जो रजन उसे पता कहते है ॥१०॥ श्रुति और स्मृति यिना धर्म अधर्मका अनेकाशनसंधानरतेतनिकलास्मृता । बगेन हो वह पावन (यपनाका शान पारसी) माना है और श्रुति मालिस भिन्न धर्म जिसमें कागतकमेतद्धिगाधममुदाहृतम् ११ ॥ दो पद पवनाका मत है॥४॥ । भनेक भासनास रति (मथुन) सन्धा- कल्पितश्रुतिमूगेवामटेरिधृत सदा । नरें नानोपला पदते दे ये सात फटा देशादिधर्म र ज्ञेयोदेशेोरफुल ॥6॥ गांधी पेदभ रही है ॥११॥ सित होगा श्रुधिर भनुसार दी और मकरदारवादीनामद्यादीनांकृतिः फला। सिम (w) मान रायद्वारलाशती सप्रणम्परा, १२ ॥ दायद देगझिा धम रक्षा और देश' मकरराव भीरमाय मादि मचा भारा और एटम ॥५॥ रको पछापदते है, छिपे हुए शल्प (पा पृयश्यानुपियानोरक्षणमागितम् । निपाटने ज्ञानकोनीर नसाय पारनेरी ॥ १२ ॥ कर्णनानपदनाममचास्तीदोपरम ॥ गि भिनाईपदविधाको रक्षण दानाधिन्मयोगानादगपाचना। माय पिपा, पणाभारत पर नाम नहीं शादिप्रसारोपर नादिति ॥१३॥ पर ॥६॥ हम भीरमधिर रामपोग मा. प्रयायापामिदिभेदस्तुजायते । दिश पचानयो फायदभार राभानि पापा समाश्रिपतन्नाम्नानानिमाय ॥६॥ १ ॥ परम गाने भोर पापनमोपला परते .
१.] भाषाटीकासहित । (११३) पाषाणादितिर्घातोस्तद्भस्मकरणेकला । हैं और अनेक प्रकारके आवन और मुद्राओ यावदिक्षुक्किाराणांकृतिज्ञानंकलास्मृता ।। देवताकी प्रसन्नताको कला कहते हैं ॥ २१ ॥ पत्थर आदि धातुओको बनाना और उन-सारथ्यंचगजाश्चादेतिशिक्षाकलास्मृता । को भस्म करने की कला और सम्पूर्ण इक्षुओंके मूर्तिकाकाष्ठपाषाणधातुभांडादिसाक्रिया ॥ गुह भादि विकारोको जानना कला कही है| गज, अश्व आदिकी गति (चलने) की ॥ १४ ॥ शिक्षा और सारथीके कामको कला कहते हैं धात्वीपधीनांसयोगीकन्याज्ञांनकलास्मृता । मट्टी, काष्ठ, पत्थर, धातु इनके अच्छे २ पान धातुसाकर्यपार्थक्यारणतुकलास्मृता ॥१५॥ बनानेको कला कहते हैं ।। २१ ॥ धातु औषधि इनके संयोगको क्रियाका ज्ञान पृथक्कलाचतुष्कंतुचित्रायालेखनकला। कला है और मिलीहुई धातुओका पृथक् तडागवापीप्रासादसमभूमिक्रियाकला २२ करना-कला कही है॥ १५ ॥ ये चार कला पृथक हैं चित्र आदिके लिखने संयोगापूविज्ञानववादीनांकलास्मृता । को कला कहते हैं और तलाव बावडी प्रासाद क्षारनिष्कासनज्ञानंकलासंज्ञतुतत्स्मृतम् १६॥ इनकी समभुमिका जो करना उसको भी कला कहते हैं ।।२२॥ धातु आदिक अपूर्व संयोगकै ज्ञानको कला याद्यनेकयंत्राणांवाद्यानांतुकृतिःकला । 'और क्षार आदिके निकालनेके ज्ञानको कला कहते हैं॥ १६ ॥ होनमध्यादिसंयोगवर्णाद्यैरञ्जनकला २३. कलादशकमेतद्विद्यायुर्वेदागमेपुच। घटी आदिके अनेक यन्त्र और याजोंके बनानेको कला कहते हैं और भल्प मध्य शस्त्रसंधानविक्षेपपदादिन्यासतःकला ॥१७॥ आदि वर्णी (रंगो) से रंगनेको कला कहवे ये दश फला आयुर्वेद के आगमोमें होती हैं। ॥२३॥ और शस्त्रको लगाना और चरण आदिके न्यासारसनेसे) फेपने को कला कहते हा जलवाय्वग्निसंयोगनिरोधैश्चक्रियाकला । संध्याघाताकृष्टिभर्दमल्लयुद्धकलास्मृता । नौकास्थादियानानांकृतिज्ञानंकलास्मृतार४ कलाभिलक्षितदेशेयन्त्राधस्त्रनिपातनम् १८॥ जलवायु, अग्नि इनके संयोगऔर निरोधको करा रहते हैं और नाव, रथ आदि यानोको सन्धि (मेल) आघात (पटकना) और बनानेकी रीतिको कला कहते हैं ।। २४ ॥ भाकृष्टि (खीचने ) के भेदसे मल्लयुद्धको और सूत्रादिरज्जुकरणविज्ञानंतुकलास्मृता । कलाओंसे जाने हुए देशमें अस्त्रक निपातन (गेरने) को कला कहते हैं ॥ १८॥ अनेकतंतुसंयोगैःपटबंधाकलास्मृता २५ ॥ वाद्यसंकेततोव्यूहरचनादिकलास्मृता । सूत आदिकी रज्जु करनेका जो ज्ञान उसे गजाश्वरयगत्यादियुद्धतंयोजनकला १९ ॥ जो पट (कपडा) का बुनना उतको कला भी क्ला रहते हैं अनेक तन्तुओंके संयोगसे बाजेके संकेतसे व्यूह (सेना) की रचना कहते है ॥ २५ ॥ को कला कहते हैं और गज, अश्व, रथ वधादिज्ञानरत्नानांचकलास्मृता। आदिकी गतिक द्वारा युद्धकै मेळको कला कहते हैं ॥ १९ ॥ स्वर्णादीनांतुयाथात्म्यविज्ञानचकलास्मृता॥ रत्नक बोध, मत् असत्का जो ज्ञान कलापञ्चकमेतद्धिधनुर्वेदागमेस्थितम् । विविधासनमुद्राभिर्देवतातोपर्णकला २० ॥ स्वरूपका जो विज्ञान उसको कला कह बहभी बला और सोने आदि धातुओंके यथार्थ ये पांच कला धनुर्वेदके भागम(प्रन्या)में स्थित है ॥ २६ ॥ ..
शुक्रनीति। [ अध्याय- (११४) - कृात्रेमस्वर्णरत्नादिक्रियाज्ञानकलास्मृता । यांस और तृण आदिक पात्रोका जो ज्ञान स्वर्णाद्यलंकारकृतिःकाललपादिसत्कृति. २७ उसको कला और कांचके पात्र करनेको कृत्रिम (नकली) सुवर्ण रत्न आदिकी कला कहते हैं ॥ ३३ ॥ क्रियाका जो ज्ञान उसको कला और सुवर्ण ससेचनसंहरणंजलानांतुकलास्मृता। आदिक भूषणोंको बनाने और लेप आदिके लोहाभिसारशस्त्रास्त्रकृतिज्ञानकलास्मृता ।। भली प्रकार करने को क्या कहते है ॥२७॥ जलोंके सोचने और निकासनेके ज्ञानको मार्दवादिक्रियाज्ञानंचमणांतुकलास्मृता। कला कहते है, लोहा ओर अभिसारके शन पशुचौगनिहींरक्रियाज्ञानकलास्मृता २८ अनके बनानेका जो ज्ञान उसको कला कहते है ।। ३४॥ चर्म आदिकी कोमलताके ज्ञानको कला कहते है ओर पशु के चर्म और अंगके निहार गजाश्वद्याभोष्ट्राणांपल्याणादिक्रियाकला । (स्वच्छता) करनेके ज्ञानको कला कहते शिशो संरक्षणेज्ञानधारणेकीडनेकले ३५॥ है॥२८॥ हाथी, अश्व, बैल, ऊट इनके पल्याण दुग्धदोहादिविज्ञानेवृतांततुकलास्मृता । आदिके करने जो ज्ञान वह कला और बाल- ककी रक्षाके ज्ञानमे बालक धारण और क्रोडा सीवनंकचुकानीनांविज्ञानहिकलात्मकम् ॥ दूधके दुइने और धोके निकासने आदिव ये दोनो कला है ॥ ३५ ॥ ज्ञानको कला कहते है और कचुक आदिक सुयुक्तताडनज्ञानमपराविजनेकला । सीनेका जो अच्छा ज्ञान उसको भी क्ला नानादेशीयवर्णानांसुसम्यग्लेखनेकला ।। कहते हैं ॥२९॥ अपराधीकी ताडनाके ज्ञानको कला और बाह्वादिभिश्चतरणकलासंशंजलेस्मृतम् । नाना देशके अक्षरो को अच्छी तरह लिन- नेका जो ज्ञान उसकोकला कहते है ॥३६॥ मार्जनंगृहभांडादेर्विज्ञानंतुकलास्मृता ३० जलमें भुना आदिसे तरना उसको भी ताबूलरक्षादिकृतिविज्ञानंतुकलास्मृता । क्ला और परके पार आदिक माजनेका जो आदानमाशुकारित्वप्रतिदानचिरकिया ३७॥ ज्ञान उसको भी कदा कहते हे ॥ ३०॥ पानोंकी रक्षा करनेकी जो विधि उसकोभी वसंमार्जनचवारकर्मकलयुभे । भी कला कहते है, सीखना और शीत करना, तिलमांसादिस्नेहानांकलानिष्कासनकृतिः प्रतिदान (सिसाना) ओर विलम्बस करना ३७ बस्रोका धोना और (भुरकम वेशदन) कलासुद्वौगुणौनयोकलेपरिकीर्तिते । ये दोनों भी कला और तिल मांस आदि चतुःपष्टिकलाद्येता सक्षपेणनिदार्शताः॥३८॥ स्नेह ( तेस.) भादिका जो ज्ञान उसको भी यां यांकलांसमाश्रित्यतांतांकुर्यात्सएवहि । फटाक्दतेद॥३१॥ ये पूक्ति जो कलाओमे दो गुग हैं मीराद्याकर्पणज्ञानवृक्षाद्यारोहणकला । ये भी दो कला कही है,ये पूर्वोक्त चौखट कसा मनोनुकलसेराया:कृतिज्ञानं कलास्मृता। सक्षेपसे दिरा ॥ ३८॥जो जिस २कलाका इल चलानेश ज्ञान और वृक्षपर चढना आश्रय ले टस कोही वद करें। दुनो कला और स्वामीरे मनके अनाल ब्रह्मचारीगृहस्यश्चरानप्रस्थोयति-क्रमात् ।। रोपापा जोशान उस कला कहते हैं ॥३२॥ चत्वाराआश्रमाचतेत्राह्मणस्यसदेवहि । वेणुनृणादिपानाणांकृतिज्ञानकलास्मृता। अन्येषामंत्यहीनाचक्षत्रविट्शूद्रकर्मणाम् ३९ काचपानादिकरणाविज्ञानंतुकास्मृता ३३॥ प्राचारी, गृदम्य, पानमस्य और यदि ४.] भाषाटीकासहित । ५ - ( संन्यासी ) क्रमसे ॥ ३९ ॥ ये चार आ-प्रोक्षणीयानितान्यवेययास्यानप्रकल्पयेत् । श्रम ब्राह्मण सदेव कहे हैं और संन्यास, को छोडकर क्षत्री वैश्य शुद्रांक तीन आश्रम, शोधायित्वातुपात्राणिपूरयित्वातुधारयेत् ॥४७॥ और उनको धोकर महांक तहां रख दे होते हैं ॥ ४०॥ ओर पात्रोंको शुद्धकरके जल भरकर विद्यार्थब्रह्मचारीस्यारसपांपालनेगृही । रसदे ॥ १७ ॥ वानप्रस्यासंदमनसंन्यासीमाक्षसाधने ॥४१॥ महानसस्यपात्राणिबाहे:प्रक्षाल्यसर्वशः । विद्याकिरिये ब्रह्मचर्य और सबकी पाल- नाकै दिये गृहस्थ और इंद्रियोंके दमन करने मृद्भिस्तुशोधयेच्चुल्लीतत्रानिधनंन्यसत्४८॥ के लिये वानप्रस्थ और मोसकी सिदिके लिये महानस ( रसोई) के सव पात्रोको याहेर सन्यास आश्रम है॥४१॥ धोवे और चुल्हीको लीपकर अग्नि और इंधन वर्तयंत्यत्ययादंड्यायावर्णाश्रमजातयः । उसमें रखदे ॥ १८॥ जपस्तपस्तीर्थमेवाप्रवन्या सायनस ॥४२॥ स्मृत्वानियोगपात्राणिरसान्नद्राविणानिच । जो २ वर्ण और आश्रमकी जाति जप, कृतपूर्वाह्नकार्येयंश्वशुरावभिवादयेत् ४९ ॥ प, तीर्थसेवा, संन्यास, मंत्रकी सिद्धि जोडके पात्रोका भीर रस अन्न द्रव्य इनका • अन्यया वतार करती है वे दंड देने योग्य स्मरण और प्रातःकालके कामको करके सास हैं।। ४२ ॥ और श्वशुरको नमस्कार करै ।।१९।। यदिराज्ञोपेक्षितानिदण्डतोशिक्षितानिच । ताभ्यांभत्रीपितृभ्यांचाभ्राहमातुलबांधवः। कुलान्यकुलतांयांतिाफलानिफुलीनताम् ४३ ववालंकारत्नानिप्रदत्तान्येवधारयेत् ॥५०॥ यदि राजा दंड और शिक्षा न दे तो सास ससुर माता पिता भाई मातुल बांधव कुलभी अकुल और अफुलही कुलीन होजाते इन्होंने जो बख वा भूषण दिये हों उनको है॥४२॥ ही धारण कर ॥५०॥ देवपूजानवकुत्स्त्रिीशूद्रस्तुपतिविना । मनोवाकर्मभिःशुद्धापतिदेशानुवर्तिनी । विद्यतेपृथकत्रीणांत्रिवर्गविधिसाधनम्॥४४॥ छायेरानुगतास्वच्छासखीवहितकर्मसु ॥५१॥ । देवताको पूजा स्त्री और शूद्र अपने मन वाणी कर्मसे शुद्ध और पतिकी आज्ञा- पति की आज्ञा विना न करें। पतिसे पृथक कारिणी छायाकै समान अनुकूल सखीक त्रियोंको धर्म अर्थ काम संबधी कोई विधि समान हित कारिणी रहे ॥ ५१ ॥ नदी है।॥ १४॥ दासीवशिष्टकायपुभार्याभर्तुःसदाभवेत् । पत्युःपूर्वसमुत्यायदेहशुद्धिविधायच । ततोऽनसाधनंकृत्वापतयोवीनिवेद्यसा ॥५२॥ उत्याप्यशयनीयानिकृत्वावेश्मविशोधनम्४५॥ स्त्री इष्ट कामों में अपने भताकी दासोके स- स्त्री पतिसे पहिले रटकर देवकी शुद्धि करके शघ्या वस्त्रोंको उठावे और घरको शुद्ध और पतिको निवेदन करके ॥ ५ ॥ मान ही सदा रहै फिर अन्नको सिद्ध करके कर (बुदार ) ॥४॥ मानलपनःप्राप्यसानलंयवसाङ्गणम् । विश्वदेवोदतरन(जनीयांश्चभोजयेत् गोषयेयज्ञपात्राणिनिधान्युष्णेनवारिणा ४६ पिर्तिचतदनुज्ञाताशिष्टमन्नाधमात्मना॥५३॥ मार्जन तथा लोपनेसे अग्निशाला और मां-भुक्त्वानयेदहशेपंसदाऽऽयव्ययचिंतया ।। गनको शुद्ध कर और चिकने यज्ञ पात्रोको वैश्वदेवसे बचे हुए अनोले फुटुंबके मनु- उगजलसे धोरे॥१६॥ प्योको निमावपतिको जिमाकर उसकी 5 - (११६) शुक्रनीति । [अध्याय- आज्ञासे शेष अन्नको खा भोजन करके शेष एवंपरिचरन्तीसापतिपरमदैवतम् । दिनको आय और व्यय (खर्च) की चिंताम यशस्यमिहयात्येवपरत्रैपासलोकताम् ६० ॥ हो विताने ॥५३॥ पुन.सायंपुनम्नातहशुद्धिविधायच । इस प्रकार पर देवतारूप अपने पतिकी जो सेवा करती है वह इसलोकमे यश और मर कृतान्नसाधनासावीसभृत्य भोजयेत्पतिम्५४॥ कर पतिलोकमे जाती है । ६० ॥ फिर सायकाल फिर प्रातः काल घरकी योपितोनित्यकर्मोक्तंनैमित्तिकमयोच्यते । शुद्धि करके और भोजन बनाकर भृत्योसमेत रजोदर्शनादपासर्वमेवपरित्यजेत् ६१ ॥ पतिको जिमाने ॥ ५॥ यह स्त्रीका नित्यकर्म कहा। अब नैमित्तिक नातितास्वयंभुचारहनातिविधायच । कर्म कहते है, रजके दर्शनसे खी सवयो आस्तुत्यसाधुशयनंतत परिचरेत्पतिम् ५५ त्याग दे॥ ६१ ॥ आप अधिक न सापर और घरको नी- सर्वेरलक्षिताशीघ्रंलग्नितातहेवसेत् । तिको करके और भली प्रकारशय्याको पिछा एकावराकृशादीनानानालकावर्जिता ।। कर पतिकी सेवा करे॥ ५५ ॥ मुखपत्यातदध्यास्यस्वंयंतद्गतमानसा । स्वपेर्माचप्रमत्ताक्षपेदेवमहस्त्रयम् ॥ ६२ ॥ अनग्नाचाप्रमत्ताचनिष्कामाविजितौद्रिया५६॥ ऐसे भीवरकै घरमे से जहां कोई न देखें जय पति सोनाप तय आपभी उनके समीप एक चख थारे स्नान क्या भूपणीयो उनमें ही मन लगाकर सो जाय नगो म त्याग दे भूमिमे सोवे, प्रमाद न करे से जप साँव मतवाली नरहेकामदेवको त्याग इंदि- तीन दिन बीतजाय ॥ ६ ॥ योको जीत ॥५६॥ सायीतसानिरानांतेसचैलाभ्युदितस्वी। नोचदेनपरुपननहारुचिमप्रियम् । विलोक्यभवदनंशुद्धाभवातिधर्मतः ६३ ॥ नकेनचिचीववेदेदमलापविवादिनी ५७ ॥ चौथे दिन सूर्योदय होने पर स्नानवर और पति के संग ऊचे स्वरसे पढवा चिल्लाकर पतिक मुखको देखकर शुद्ध होती॥ ६३ ।। फुप्पारा पचन न बोले किसीके सग विवाद कृतशौचापुनःकर्मपूर्ववच्चसमाचरेत् । स्टा न करे और पान यके ॥५॥ द्विजस्त्रीणामधर्म प्रायोऽन्यासामीप्यते ॥ नचास्यत्ययशीलास्यानधर्माविरोधिनी। इसमकार शुद्ध दावर घी पूर्वयत् कर्म प्रमादोन्मादरोपेयावचनान्यतिनियतामु५८॥ माचौ यद धर्म दिशाति नियोका और पतिये धनमैसे पहुत गनर प्रायः भन्योका भी है ॥ ६४॥ और धर्मयो या धनयो न यिगा और प्रमाद, कृषिपण्यादित्यपुभवयुस्ता:प्रसाधिसः । उन्माद रूसना, ईपी इनयो न य निदा सगतिमधुराऽऽलाप स्वायत्तस्तुपतिर्यया ।। नकले। ५८ ॥ और जातिगती व्यापारये कृत्यामचनुर पेशुन्यहिंसाविषयमोहाहंकारदर्पण होती है. उत्तम गाना, मीठा वचन इनसे निख नास्तिक्यमाहसस्तेपदम्भान्साध्वी विवर्ज-प्रकार अपना पति अपने माधीन रहे ॥६॥ येत् ॥ ५९॥ भवेत्तयाऽचोयुर्वमायाभि.कार्यसिमि । शंगटी, हिंसा, मोर, मदमार, ममि नास्तिमईसमोनायोनास्तिमसमं सुखम्।। मान, नास्तिवा, पादत मविचार करना, सिमसार दीमापा भीरमायाषी पंधि- गोरी दंभ इन उसको पानी सी सीमाचरण पाकि पति उमान नाप नहीं और पतिथे रामान गुग नही॥६६४ .
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भापाटीकासहित ।
(११७
विष्यवनसर्वस्वभावशरणांत्रियः ॥
और उत्तरमै वडते हैं, उनकेही आचायाने
उनके हितके लिये उनका शास्त्र रचा है।।७३॥
मितंददातिहिपिताभितंभ्रातामितंसुतः ॥६॥
संपूर्ण धन और सर्वस्वको छोडकर स्त्रीका
व्यवहागययानीतिरुभयोरविवादिनी ।
शूरण भा ही है, पिता, भाई, पुत्र ये संघ कदाचिद्धजिमाहात्म्यक्षेत्रमाहात्म्यतः
मित ( थोडासा ) ही देते हैं ॥ ६७ ॥
कचित् ॥ ७४॥
अमितस्यप्रदातारंभरिकानपूजयेत् । जो नीति व्यवहारके लिये विवाद वाली,
शूद्रोवर्णचतुर्थोपिवर्णवाद्धर्ममहति ६८॥ न हो वह नीति है कदाचित् वीजके मादा-
अमित ( अनतुले ) के देनेवाले भर्ताको त्म्यसे मोर कदाचित् क्षेत्र (स्त्री) के महा.
कौन सी न पूजेगी चौथा वर्ण शुद्र भी वर्ण त्म्यसे ॥ ७४ ॥
होनेसे धर्मके योग्य है ॥ ६८ ॥ नीचोत्तमत्वंभवतिश्रेष्ठत्वक्षेत्रवीजतः।
वेदमंत्रस्वधास्वाहावपट्कारादिभिर्विना । विश्वामित्रश्चवासिष्ठोमातंगोनारदादयः ७५॥
पुराणायुक्तमत्रश्चनमातःकर्मकेवलम् ६९ नीचता और उत्तमता होती है क्षेत्र वा पी.
बेदके मंत्र, स्वधा, स्वाहा, वपद्कार मादि- जसे श्रेष्ठता होती है जैसे विश्वामित्र वसिष्ठ
के विना केनल पुराण आदिके नमोत मंत्रासही मातंग और नारद आदि ।। ७५ ॥
शद्रका कर्म होता है॥ ६९ ॥ स्वस्वजायुक्तधर्मोय पूर्वराचरितःसदा ।
विप्रवद्धिप्रविन्नासुक्षत्रविन्नासुक्षत्रवत् ।। तमाचरेचसाजातिदेड्यास्यादन्यथानृपः॥
प्रजाताःकर्मकुर्युववैश्यविन्नासुपैश्यवत् ७०
अपनी २ जातिके लिये कहाहुआ जो २ धर्म
ब्राह्मणने विवाहीमें पैदा हुए ब्राह्मणके वडोंने सदासे किया हो वह जाति उसको
समान, क्षत्रियने विवाहोम पैदा हुए क्षत्रियक हो कर अन्यथा कर तो राजाने दंड देने
समान, और पैश्यकेही विवाहीमें पैदाहुये वैश्य-योग्य है ।। ७६ ॥
फेही समान कर्माको करै अर्थात् जिस वर्णकी जातिवर्णाश्रमान्सर्वान्पृथक्चिद्वैःसुलक्षयेत् ।
स्त्री हो उस वर्णके कर्म न करे ।। ७०॥ यंत्राणिधातुकाराणांसंरक्षन्निशिसर्वदा ७७
वैश्यासुक्षत्रविप्राभ्यांजातःशूद्रासुशूद्रवत् ।
जाति वर्ण आश्रम इन सबको पृथक् चि:
अधमादुत्तमायांतुजातःशूदाधम स्मृतः ।।
होसे भलीप्रकार चिहपाले कर और धातु
क्षत्रिय और ब्राह्मणसे वैश्या या शूद्रामें यनानेवालोंके यंत्रोंकी रात्रि में सदैव रक्षा करे
पदा हुए माताके समान कमीको करें और ॥ ७ ॥
अधम वर्णसे उत्तमवर्णको स्त्रीम पैदा हुआ तो कारुशिल्पिगणाराष्ट्ररक्षेत्कार्यानुमानतः ।
शूद्रसेभी अधम कहा है॥७१ ॥
अधिकान्कृपिकृत्सेवाभृत्यव नियोजयेत् ।।
सशूदादनुसत्कुर्यान्नाममंत्रणसर्वदा । कारीगर और शिल्पी इनके समूहकी देशमें
ससंकरचतुर्वणी एकत्रैकत्रयावनाः ॥ ७२॥ कार्यकअनुमान रक्षा करे,यटिअधिक होजाय
वह शुद्रके अनुसारही नामवेस कमको तो खेती सेवा भृत्यों में नियुक्त करदे ॥८॥
संदेव कर, संकरजातियों सहित चारों चौराणांपितृभूतास्तेस्वर्णकारादयस्त्वतः ।
एक २ जगह ययन होते हैं ।। ७ ।। गंजागृहपृयग्ग्रामात्तस्मिन्रक्षेतुमद्यपान् ।।
वेदभिन्नप्रमाणास्तेपत्पगुत्तरवासनः। क्यों कि सुनार भादि वे सब चोरोंके कि,
सारूप होते है और मदिरा बनानेके या पीनेक
तदाचार्यश्चतन्छास्त्रनिर्मितंतद्धितार्थकम् ॥
घरको गांवसे पृथक् करें और मदिरा पीने
उनके मन में वेदप्रमाण नहीं हैं वे पश्चिमावालीकी उसमें रक्षा कर ॥ ७९ ॥
(११८) शुक्रनीति । [अध्याय- . नदिवामद्यपानहिराऐकुर्याधिकाचित् । अच्छे पुष्पवाले वृक्ष है इन सबको ग्राम समीपमे लगवावे ॥८६॥ ग्रामग्राम्यान्वनेवन्यान्वृक्षारोपयेन्नृपः॥ और अपने राज्यमे मदिराका पान दिनम येचुकंटकिनोवृक्षाः खदिराद्यास्तथापरे । कभी न करावे ओर गांवमें गावके वृक्षोको और आरण्यकास्तेविज्ञेयास्तेषांतत्रनियोजनम ॥ वनमै वनके वृक्षोको राजा लगवावे ॥८०॥ और जो काटेवाले और खदिर उत्तमान्विशतिकरमध्यमास्तिथिहस्ततः । (वर) आदि अन्य जो वृक्ष है वे वनके सम झने इससे उनको वनमे लगवाये ॥८॥ सामान्यान्दशहस्तश्चकनिष्ठापंचभिाकोः ।। खदिराश्मतशाकाग्निमयस्योनाकसम्युला। बहुत घडे इत्तम • वृक्षोको वीसहाथ, मध्यम वृक्षोंको पद्रह हाथ, सामान्य वृक्षो तमालालकुटजयवार्जुनपलाशकाः ॥ ८८॥ को दश हाथकै ओर छोटे • वृक्षीको पांच खैर, अश्मतका शाक, अग्निमथ(अमल वास) हायके अतर पर लगवावे ॥ ८१ ॥ स्योनाक, वन्बुल, तमाल शाला स्टज, धव, अजाविगोशकृद्धिाजलैमौसश्चपोषयेत् । अर्जुन, ढाक और ।। ८८ ॥ उदुंबराश्वत्यवचिंचाचंदननंभलाः ॥ ८२ ॥ सप्तपर्णशमीतूनदेवदारुविकंकता । और उनको बकरी भेड गौके गोवरखे ओर' नळ योर मासले पुष्ट करावे गलर, पोपट, करमदेंगुढीभूर्जविषमुष्टिकरीरकाः ॥ ८९ ॥ वड, इमली चदन जमल ओर ॥२॥ सप्तपर्ण शमी, छाकर, तून, देवदारु, कदंवाशोकनकुलविल्वासातकपित्थकाः । विकक्त, करमद, इगुदी, भोजपत्र, विषमुष्टि, तिकरीर और ॥ ८९॥ राजादनाम्रपुन्नागतुदकाष्ठानचंपकाः ८३ शल्लकीकाश्मरीपाठातिदुकोनीजसारकः । कदव,अशोक, बगुला पेट, आम्रातक, कैथ, राजादनाम (मालदा आदि) पुन्नाग, तुदका- हरीतकीचभलातःशम्याकोश्चपुष्करः ९०॥ ठ, आम चपा और ॥ ८३॥ शल्लकी, काश्मरी, पाठा, तेदु, विजयसार, नापकोकाम्रसरलदाडिमाक्षोदभि सटा । हुरडे, भिलाये, शम्पाका भाक, पोहकरमूल और ॥ ९०॥ शिशिपाशियदरनिवजंभीरश्रीगिका ८४ ॥ अरिमेदश्चपीत? शाल्मा श्चविभीतक । नीप, कोकान, सरल, अनार, अखरोट नखेलोमहावृक्षाऽपरेयेमधुकादय ॥ ९१ ॥ भिस्पट, शीसम, शिशु, परी, निच, जभीरी, क्षीरिक और ॥ ८॥ अरिमेद, पीतवृक्ष, शाल्मली, विभीतका खरदेवबुरजफल्गुतापिच्छासभा । गरखेड, महावृक्ष और अन्य जो मथुप ( महुआ) आदिहै ।। ९१॥ उद्दालोल्वलीधारीकुमकोमातुटुंगक ८२ प्रतानवन्त्य स्तंपिन्योगुल्मिन्यश्चतयैश्च । सर, देवरजकारगु, तापिर,(तमाल) संभर, कुदार, नदी, सावरा, उमः ग्राम्याग्रामवनवन्यानियोग्यास्तेप्रयत्नतः९॥ मातएग (सुपारी) और ॥ ८५ फैरनेवाली, गुच्छेवाली और गु-मयाली शुचौनाक्लिश्चरंभान्यतत्तलाहमाः। जो हताहै इन समो गाँसे योग्य गावाम सुपुष्पा श्रवयवृक्षाप्रामाभ्यणनियोजयेत् ॥ और वनम बंग ने योग्य धनम प्रयानसहगाये। यहदा, नारिपर, रमा (ला) ये कृपापीपुप्फारिण्यस्तडागा सुगमास्तथा । सप और जो मच्छे पदमारे है अयया कार्याः सातहितिगुणविस्तारपहचानिना.९३ ४. भाषाटीकासहित । .. . कूप, पावडी, पुष्करिणी, तालाय इनको सहसहस्तविस्तारोट्रायःस्यान्मेरुसंज्ञकः । सुगम करें और खोदनेसे दूनी वा तिगुनी ततस्ततोष्टांशहानाअपरेमन्दरादयः॥४००।। इनकी पदधानी (मण घाट आदि) बन- सहस्र हाथका जिसका विस्तार और चा॥९३॥ ऊँचाई हो उसका मेरु नाम है, उससे पाट ययात्थाद्यनेकाश्चराष्ट्रस्याद्विपुलंजलम् । आठ अंशसे जो कम हों वे क्रमस मन्दर नदीनासेतकः कार्याविवंन्धाः सुमनोहराः९४ होते हैं ।। १०० ॥ जैसे जैसे देशमें बहुत जल हो ऐस ऐस मन्दनक्षमालीचधुमाणश्चंद्रशेखरः । अनेक कूप आदि बनावे और नदियोंके माल्यवान्यापारियानोरनशीपाहिधातुमान् ।। पुल और बांध अच्छे मनोहर करावे ॥ ९४ ॥ मन्दर ऋझमाली, मणि,चन्द्रशेखर, माल्य: नौकादिजलयानानिपारगानिनदीपुच । वान्, पारियान, रत्नशीप, धातुमान ॥५०॥ मनातिपूज्योयोदेवस्तद्विद्यायाश्चयोगुरुः ॥ पद्मकोशःपुष्पहासः श्रीकरः स्वस्तिकाभिधः नदियोमें पार जानेके लिये नाव और महापद्म पद्मकूट-पोडशोविजयाभिषः ५०२॥ जलके यान आदि करावे जिस जाति पद्मकोश, पुष्पदास, श्रीकर, स्वस्तिक, पूजने योग्य जो देव हो और उस जातिकी महापन, पार, विजय ये सोलह मेह विद्याका जो गुरु हो ॥ ९५ ।। आदि लक्षण होते है । ५०२ ।। तदालयानितनातिगृहपंक्तिमुखेन्यसेत् । शृंगाटकेयाममध्यविष्णोशिंकरस्यच॥९६॥ स्वाराध्यदेवताध्यानःप्रतिमास्तेपुयोजयेत् ॥ तन्मण्डपश्चतत्तुल्यःपादन्यूनोच्छ्रितःपुरः । उनके स्थान उसी जातिके घरोको पंक्तिके सन्मुख बसावे, चौराहे और गांव मध्यमे इनसे चौथाई कम जिसकी उँचाई हो वह पुर इनका मण्डप भी इनकेही तुल्य होता है, विष्णु, वा शिवका वा ।। ९६ ।। होता है, और अपनी अपनी आराधना गणेशस्यरवेदव्या:प्रासादान्क्रमतोन्यसेत् । के योग्य देवताओंके ध्यानते इनमें प्रतिमा मेर्वादिषोडशविधलक्षणान्सुमनोहरान् ॥९७॥ नियत कर ॥ ३॥ गणेश, सूर्य, देवी इसके मन्दिर क्रमले सात्त्विकीराजसीदेवप्रतिमातामसीत्रिधा । बनवावे मेरु आदि सोलह प्रकारके और वह विष्ण्वादीनांचयायत्रयोग्यापूज्यातुतादृशी ॥ मनोहर और ॥ ९७॥ सात्विकी, राजती, तामसी, यह तीन बर्नुलांश्चतुरमादागाकारान्समंडपान् । प्रकारकी विष्णु आदिको प्रतिमा होती है जो प्राकारगोपुरगणयुतान्दित्रिगुणोच्छ्रितान् । जहां योग्य दो उसकोही वहां पूजे ॥ ४ ॥ गोल, चतुष्कोण, मण्डप सहित, यज्ञोंके योगमुद्रान्वितास्वस्थावराभयकरान्विता । भाकार भौर परकोटा गोपुरक समूहात देवेंद्रादिस्तनुतासात्विकोत्ताप्रकीर्तिता ॥५॥ युक्त दूने वा तिगुने ऊँचे बनवावे ॥ ९८ ॥ जित प्रतिमा, योगमुद्रा हो जो स्वस्थ हो यथोक्तांतःसुप्रतिमानलमूलान्विचित्रितान् ।- जिसके वर और अभय मुद्रायुक्त हाथ हो। रम्यासहस्रशिखरःसपादशतभूमिकः ॥१९॥ जिला और इन्द्र आदि स्तुति कर वह जिनके भीतर शास्त्रोक्त प्रतिमा हो ऐसे प्रतिमा सारिएको वंही है ॥५॥ विचित्र जलक्षे मूल (बडे २ तलाव)जोतिष्ठंतीवाहनस्थावानानाभग्णभूषिता । रमणीक हो, सहस्र जिसके शिखर हो, याशस्त्रात्राभयवरकरासाराजसीस्मृता ॥६॥ सवासौ हाथ जिसकी भूमि हो ॥ ९९ ।। जोप्रतिमा राडी हो वा चाहनपर स्थित (१२०) शुक्रनीति । [अध्याय- ---- हो, नाना भूपोंसे भूषित हो और शस्त्र के रहे हैं नौ तालको मर्तिक प्रमागमें एक मस्र अभय वरदायक जिसके कर हो बह वालका मुख कहा है ।। १३ ।। राजसीकही है॥६॥ चतुरंगुलंललाटस्यादधोनासातथैवच । शस्त्रास्दैत्यत्रीयाउग्ररूपधरासदा । नासिकायश्चहन्वंतचतुरंगलमारितम् ॥१४॥ युद्धाभिनंदिनीसातुतामसीमतिमोच्यते ॥७॥ चार अंगुलका · मस्तक और नाकका जो शव अत्रास देत्योंको हननेवाली और अधोभाग कहा है, नासिकासे नीचे दनु सदैव उग्ररूप धारे हो और युद्ध जिसको प्रिय ( ठोडी) तक चार अंगुल का कहा है ॥ १४ ॥ हो वह प्रतिमा तामसी कही है ॥७॥ चतुरंगुलाभवदीवातालेनदयंपुनः। संक्षेपतस्तुध्यानादिविष्ण्वादीनातयोच्यते । नाभिस्तस्मादयःकार्यातालेनेकनशोभिता१५ प्रमाणप्रतिमानांचतदंगानांसुविस्तरम् ॥८॥ चार अंगुळकी ग्रीवा मोर एक बालका अब संक्षेपले विष्णु मादिकोंका यथाय हृदय कहा है, हदयंक नीचे पक तालकी ध्यान और प्रतिमा तथा उनके अंगीका शोभायमान नाभी करनी ॥ १५॥ विस्तारसे प्रमाण वर्णन करते हैं।॥ ८॥ नाभ्यवश्वभवेन्मे भागेनकैनापुनः । स्वस्त्रमुऐश्चतुर्थाशोचंगुलंपरिकीर्तितम् । द्वितालौह्यायवाचूरूजानुनचितुग्गुले ॥१६॥ तदंगुलैदशभिर्भवेत्तालस्यदीर्घता ॥ ९ ॥ नाभिके नीचे एक भागसे लिंग इंद्रिय अपनी मुष्टिके चौथे भागको अंगुल कहते और दो ताल लपे उरू और चार भगुलके है और पारद भंगुढ़की पक ताल दीर्घता जानु पनवाये ॥ १६ ॥ (पिस्त होती है ॥ ९॥ जऊरूसमेकार्येगुल्फायश्चतुग्गुलम् । चामनीसप्ततालास्यादृष्टवालातुमानुपी । नवतालात्मकमिदमूवमानंधुःस्मृतम् १७॥ नयतालास्मृतादेवीगक्षतीदशतालिका॥१०॥ नीचको जया (पीडि) ऊक समान बामनी सांत ताल की और मानुपी माठ करने, गुल्को नीचेका भाग चार अंगुलका ताटकी, नी वाल की देवी और दश ताटकी करना, नौ ताल ऊंचीमतिका प्रमाण पंटिवाने राक्षापी प्रतिमा कदी है ॥ १० ॥ पह कहा है॥ १७॥ सप्ततालाहाचतावामूर्तीनदिशभेदतः । शिरवावधितुकेशांतत्र्यंगुलंसर्वमानतः। संदेवत्रीसमतालासप्ततालश्चरामनः ॥११॥ दिशानयाचविभजेसप्ताष्टदशतालिकम् १८॥ भयका देशव भेदसे मूदियोकी ऊंचा पशास शिपापर्यंत संपूर्ण भाग तीन सरत अली होतीटी और कामन खदेव मशरक मानसे करना सी रोतिस साल सात वाटके होते ६॥ ११॥ माद दश ताटको मातमभी मगकिमान नरोनारायणोगमोनृसिहोदशताटकः । समझने ॥१८॥ दातालाहलयुगेवेत यांनस्तार्डिका ॥१२॥ चतुस्तालामकीयाहीदांगुल्यताबुदाहनी। नर, नारायण, राम, मिद ये .उप दश स्कंधादिर्पगंतंचविशत्यंगुलमुत्तमम् ॥१९॥ नारी होते हैं, परन्तु मरपपुग दातालय, गुगपर्यंत पार तालको भना की नाम नीताटर और॥१०॥ 18 मोर कसर (ताल) पत्र योस अनागदापातुगमतासाफलीस्मृता । भएर का प्रमाग उनम कदा ॥ १९ ॥ नातारणमाणेतुमुगतालमितस्मृतम् ॥१३ ॥ प्रपोदगांगुलंचापाकलापा:यूपरांताम् । लाराम भाट माटो पटियुग पात का अटाविगत्पगुलस्तुमध्यमावास्मृतः २० मापाटीकासहित । (१२१) * पुक्षिक नीचेस कूपर्यंत तेरह अंगुलका शास्त्रमानेनयोरस्यासरम्योनान्यएवहि । और मध्यमा अंगुलीके असतक अहाईस संगुलका कर कहा है ॥ २० ॥ शास्त्रमानविहीनंयदरम्यंतद्विपश्चिताम् २७ ।। शास्त्रकै मानसे जो रमगीक हो अर्थात सप्तांगुलंकरतलंमध्यापंचांगुलामता । जिसके अंगोंका प्रमाण शास्त्रोक्तहो वह श्रेष्ठ है सार्धत्रयांगुलीगुष्ठस्तर्जनीमूलपूर्वभाकू २१॥ अन्य नहीं जो शास्त्रोक्त मानते हीन है वह सात गुढ़का हाथका तल और पांच विद्वानांकी अपेक्षा रमणीक नहीं ॥२७॥ भगुलका मध्य कहा है, साढे तीन अंगुल- एकेपामेक्तद्गम्यलग्नंयत्रचयस्यहृत् । का अंगूठा तर्जनीके मूलके पूर्वभागसे होता अष्टांगुलंललाटस्यात्तावन्मात्रौधुवौमतौर है।॥ २२ ॥ जिस मनुष्य में जिसका हृदय लग्न पर्वद्वयात्मकान्पासांपणित्रीणित्रीणितु । (आसक्त) होजाय यह बात किसीको ही अधौगुलेनांगुलेनहीनानामाचतर्जनी॥२२॥ प्रतीत होती है, माठ २ अंगुलका मस्तक अंगूठेके दो पव होते हैं अन्य अगुलियोके और दोनों चुकुटी होती हैं ॥ २८ ॥ तीन २ पव होते हैं। अनामिका और अर्धागुलाभुवालेखामध्येधनुरिवायता । राजनी भाधा भंगुल और भंगुल कम होती नेत्रवत्र्यंगुलायामधंगुलेविस्तृतेशुभे ॥२९ ।। है॥ २२॥ भृकुटीकी लेखाके मध्यमें धनुपके समान कनिष्ठिकानामिकातागुलोनाचप्रकीर्तिता । विस्तार दो और आधा अगुळ चौडी हो और चतुर्दशांगुलौपादांगुष्टोद्ध्यंगुलोमतः २३॥ नेत्र तीन अंगुल लंबे तथा दो अंगुल चौटे शुभ कनिष्ठिका अनामिकासे एक अंगुल कम होत हैं ॥२९ ।। होती है चौदह भरलका पाद और दो अंगु- तारकाततृतीयांशानेत्रयोःकृष्मरूपिणी । लका अंगूठा होता है ॥ २३ ॥ चंगुलंतुीमध्पनासामलमांगुलम् ॥३०॥ प्रदेशिनीव्यंगुलातुसा(गुलमयेतराः । नेत्रोके तारे कृष्ण और नेनोंके तीस शिरोज्झितीपाणिपादोगूढगुल्फौप्रकीतितौ ॥ द्विरसके होते हैं भुटयाँका मध्य दो भंगुल प्रदेशिनी (अंगूठेके पासकी अंगुलो) दो और नासिकाका मूलएक अंगुलका होता है। अंगुलकी अन्य अगुलियां डेढ अगुटकी होती नासाप्रविस्तरंतद्ववचंगुलंतद्धिलद्वयम् । शिरके विना हाथ और पैर ऐसे अच्छे शुकमुखाकृति सासरलावाद्विधाशुभा३१ ॥ होते हैं जिनके गुल्फ छिपे है ॥२॥ नासिकाकै अग्रभागका विस्तार और दोनों तद्विजैःप्रस्तुतायेयेमूर्तरवयया:सदा । पिल दो अंगुलके होते हैं तोतेके मुख उमान नहीनानाधिकामानात्तेतज्ञेयाःसुशोभनाः२५॥ जितका आकार अथश सीधी जो हो वह जो शरीरके अवयव हैं वे २ विद्धानीको दो प्रकारको नासिका शुभ होती है ॥ ३१ ॥ प्रशंना योग्य और शोभित तभी होते हैं जब निष्पावसदृशंनासापुट्युग्मंसुशोभनम् । मानसे न्यून न हो न ज्यादे ।। २५ ।। कर्णेचभ्रूसमौज्ञेयौदीर्घातुचतुरंगुलौ ॥३२॥ नस्थूलानकृशावापिससर्वमनोरमाः । निभावके तुल्य जो हो ऐसे नासिका सर्वोर्ग:सर्वरम्योहकाश्चलक्षेप्रजायते ॥२६॥ दोना पुट श्रेष्ठ कदे हैं और श्रुटियोंके समान जो न अधिक स्थूल हो न कृश हो और और दीर्घ (लंचे ) चार भंगुल कान उत्तम सवकारसे उत्तम हो ऐसा लक्षामें कोई ही होते हैं। ॥ होता है जो सबप्रकारले सम्पूर्ण अंगोमें रम- कर्णपालीव्यंगुलास्यात्स्थूलाचा(गुलामता । णीक हो ॥२६॥ नासावंगोधांगुलस्तुश्लक्ष्णायःकिंचिदुन्नतः ।।
• (१२२) शुक्रनीति । [अध्याय- कानोकी पाली ( पिछली त्वचा ) दो अंगुल सात्रितालपरिधिःकट्याश्चव्यंगुलाधिकः । बी और आधा अगुल मोटी कही है और नाफका बाल आधा अगुल मोटा और आगेसे चतुरंगुलउत्सेवौविस्तार स्यात्पडंगुलः ४० ॥ चिकना और कुछ ऊचा हो तो अच्छा है ॥३३ दो अगुल ऊपर साढे तीन ताल परिधि ग्रीवामूलाच्चस्कंधांतमष्टांगुलमुदाहतम् । कटि (कमर) की होती है और चार अंगुल वाइन्तरद्वितालंस्थाचालमात्रस्तनांत्तरम् ॥ उचाई ओर छः अमुलका विस्तार होताहे४०॥ ग्रीवा मूलसे कधतक जो भाग है वह पश्चाद्धागेनितंबस्यस्त्रीणामंगुलतोधिकः । आठ मेगुल होना चाहिये दोनों भुजाओका वादग्रमूलपारीधःपोडशाष्टादशांगुलः ४१ ।। अन्तर (वीच ) दो चारद और स्तनोका अन्तर स्त्रियोंके नितम्बके पश्चात भाग एक अगुल एकवाल होता है॥३॥ अधिक होते है और भुजाओंके अग्र भागकी पोडझांगुलमातुकर्णयोरंत स्मृतम् । परिधि सोलह अगुल और मुह भागकी अठा- कर्णहन्वयांतरंतुसदैवाष्टांगलंमतम् ॥ ३५॥ रद अगुळ होती है ॥ ४ ॥ दोनों कानोंका अन्तर सोरह अगुलका हस्तमूलाग्रपरिधिश्चतुर्दशदशांगुलः । यहा हे और कान और इनु । टोढी) इनका पंचांगुलापादकरतलयोविस्तृतिःस्मृता ४२ ॥ अन्वर सदैव आठ अंगुलका कहा ॥२५॥ हाथी मूलकी परिधि चौदह अंगुल और नासाकतिरतदत्तदपकर्णनेत्रयोः । अग्रभागकी परिधि दश अगुल होती है और मुखंतालीतृतीयांशमोठावधीगुलामतौ॥ ३६॥ हाथ और पादोय तलका विस्तार पाच भंगु- लका होता है।॥४२॥ इसी प्रकार आठ अगुलश अन्तर नाफ और कानोका होता है और इससे आधा ऊरुमूलस्यपरिधिभिशदंगुलात्मकः । अन्तर कान और नेवाका होता है, तालका ऊनविंशत्यंगुल स्यादृर्वग्रपरिविस्मृतः ४३ तीसराभाग मुराया होता है ओर आधा अगु. अरु (एन) के मूलकी परिधि मत्तीस लके ओष्ट होते है॥३६॥ अंगलकी होती है और अप्रभागकी परिधि द्वात्रिंशदंगुल.प्रोक्तःपरिधिर्मस्तकस्यच । उन्नीस अगुरदी होती है॥१३॥ दशांगुलाविरततिस्तुद्वादशागुलदीधता ३७॥ जंबानुलाग्रपरिधि:पोडशद्वादशांगुल' । मस्तक (शिर) की परिधि वत्तीय अगु मध्यमामूलपरिधिविज्ञेयश्चनुरंगुलः ॥ ४४॥ लको कदी है और दश अगुलका विस्तार नघाटमी परिधि सोलद अंगुल और और बारह गुटमी लम्याः कही है ॥ ३७॥ अन भागवी परिधि पारह मगर रही है ग्रीवामूलस्यपििपपिठात्यगुलात्मकः । और मध्यमारे मृरकी परिधि चार गुलकी हन्मूलेपरिथितयश्चतुःपंचागदंगुलः ॥३८॥ होती है ॥ ४५ ॥ गोवा मलरी परिधि बाईस अगुको तर्जन्यनामिकामूल्पर्गिवः सायंगुलः । कही , हदयरे मूरपो परिधेि (फर । कनिष्टिकाया परिविलव्यंगुलपयदि ॥४५॥ चन्दन ५४ अराजकदी है ॥८॥ तर्जनी और अनामिकार मलवी परिधि इनिांगुलचतुस्तालपनिधिहदयस्यचा साडे तीन अंगला चौर निष्टिका आस्तनास्पृष्टदेशांतापृथताद्वादशांगुला ३९ गरी परिधि तीन अंग होती गुट पम एक तार परिधि हदपया स्वमूलपरियापादहीनागे पनिषःस्मृतः । zatiरानाले रेकरपट देगा। स्तपादांगुष्टयोश्चचनु पंचांगरक्रमात ४६।। और अपन मुहको परिति पौधाई गुरपी मोटाईयोती ॥'
भापाटीकासहित । (१९३) -- मग्न भागको परिधि होती है हाथ और पैरके प्रासादकारयच्छत्तयाह्यष्टाम्रपद्मसन्निभम् । अंगूठों की परिधि कमसे चार पांच अंगुलको चतुर्दिन्मंडपंयापिचतुःशालसमंततः ॥५३॥ होती है ॥४६॥ शक्तिके अनुसार अष्टपनके समान मंदिरको पादांगुलीनापरिविस्यंगुल समुदाहतः । बनाये और चारो दिशाओं में मंडम और धर्म- मंडलस्तनयो मे सार्चागुलमथांगुलम्॥४७ । शाला चनाचे ॥ ५३ ॥ पैरकी अंगुलियोंकी परिधि तीन अंगुल सहस्रस्तंभसंयुक्तश्चोत्तमोन्यासमोधमः । होती है, स्तनोका मंडल डेढ अगुल और प्रासादेमंडपेवापिशिखरंयदिकल्प्यते ॥ ५॥ नाभिका मंडल एक अंगुल होता है॥४७॥ सागानांययाशोभिपाट्यपरिकल्पयेत् । जिसमें सहस्र स्तम्भ हो ऐसा मंदिर उत्तम और अन्य मध्यम और अधम होते हैं यदि नोर्ध्वदृष्टिमयोदृष्टिमीलिताक्षीप्रकल्पयेत् ॥ प्रासादवा मंडपमेंशियर बनाया जायतो॥५४।। सम्पूर्ण अंगोका पाटव ( उत्तमता ) शोभाक स्तम्भास्तानकर्तव्याभित्तिस्तत्रसुखपदा। अनुसार बनावे, ओर ऊपर और नीचेको प्राप्तादमध्यविस्तार प्रतिमायाःसमंततः ५५॥ जिसकी दृष्टि हो और जिसके नेत्र मिचे हो वहां स्तम्भ न बना भीतीही वहाँ सुखदा- ऐसी प्रतिमा न चनावै ॥४८॥ यक होती है और मदिरके मध्यका विस्तार नोग्रदृष्टिंतप्रतिमा प्रसन्नाझीविचितयेत् । प्रतिमाके चारों तरफ ॥ ५५॥ प्रतिमायास्तृतीयांशमधीशंतत्सुपीठकम् ॥ पड्गुणोष्टगुणोवापिपुरतोवासुविस्तरः । जिसकी दृष्टि उग्र हो ऐसी भी न बनाये वाहनमूर्तिसदृशंसावाद्विगुणस्मृतम्।।५६ ॥ किन्तु जिसके नेत्र प्रसन्न हो ऐसी बनाव,प्राते छहगुणा वा आठगुणा अथवा प्रतिमा माकै प्रमाणसे साढतीन अंश कम पीठ आगे विस्तारपूर्वक बनाना चाहिये और मूर्तिके (माखन) बनाये ॥४९॥ तुल्य डेढ गुण वा दूना वादन कहा है ॥५६॥ दिगुणंत्रिगुणद्वारप्रतिमायाश्चतुर्गुणम् । यवनोक्तंदेवतायारूपंतचतुर्भुजम् । एकद्वित्रिचतुइस्तपीठदेवालयस्यच ॥५०॥ अभयचबरदद्याद्यतनोतंयदायुधम् ॥ ५७ ।। प्रतिमासे दूना व तिगुना वा चौगुना मंदिर जहां देवताका रूप न कहा हो वहांचतुर्भजी का द्वार बनावे, एक दो तीन वा चार हाथ रूप और जहां आयुध न कहाहो वहां अभय देवायतनका पीठ बनावें ॥५०॥ ओर वर आयुध बना॥ ५७ ।। पीठतस्तुरमुच्छायोभित्तेर्दशकरात्मकः । अधःकरेतू+करेशंखचक्रतयांकुशम् । द्वाराद्विगुणोछायाप्रासादस्योभूमिभाक् पार्शवाडमरुशलंकमलंबालशम्रजम् ५८ ।। हाथके नीचे और ऊपर शंख, चक्र, अंकुशः पीटसे दश हाथ ऊंची भीत बनावै और पाश, डमरू, शूल, कमल, माला ॥५८॥ दारसे द्विगुण ऊंचा मंदिरके ऊपरका भाग लड्डुकंमातुलुंगंवावीणांमालांचपुस्तकम् । वनावे ॥१॥ मुखानांयत्रबाहुल्यंतत्रपतयानिवेशनम् ॥ शिखरचोन्यायसमद्विगुणंत्रिगुणंतुवा । लड्डू, मातुलिंग,वीणा, माला और पुस्तक एकभूमिसमारभ्यसपादशतभूमिकम् ॥५२॥ यनावे जहां मुख वहुत ही वहाँ पंक्तिसे मुख ऊंचाई के समान द्विगुना वा-तिगुना शिखर बनावे ॥ ५९॥ पनावे और एक भूमि (मंजिल से लेकर तस्पृथग्नीवमुकुटंसुमुखस्वक्षिकर्णयुक् । सवासी भूमि तक ॥५२॥ भुजाना यत्रबाहुल्यनतत्रस्कवभेदनम्।।६० शुक्रनीति ! अध्याय- दन भुखायी ग्रीवा और मुफुट पृथक् २ हो गूढसध्यस्यिवमनीसर्वदासौल्यवर्धिनी । चौर जिसमें नेत्र, मुख, कान ये अच्छे हो वही वराभयाजशेखाढयहस्ताविष्णोश्वसात्त्विकी । इच्छा होता और जिसकी भुजा बहुत हों जिस प्रतिमा की सधि, अस्थि, नाही ये पदाधि भेद न करें ॥ ६ ॥ छिपहुए हो वह संवंदा सुखकी वृद्धि करती है फूपवितुसूक्ष्माणिचिपिटानिहढानिच । मौर जित हायमें वर, अभय,शंस हों ऐसी मुजमूलानिकार्याणिपक्षमूलानियया॥६१ ॥ विष्णुकी प्रतिमा सत्वगुणो होती है ॥ ६७ ।। कृपर (केहुनी) के कार सूरुम, चिकने, मृगवाद्याभववरहस्तासोमस्यसाविकी। दृढ भुनाकि मूल इस प्रकारके बनाये जैत वराभयाजलकहस्तेभास्यस्यतात्विको । पंखांक मूल होते हैं ।। ६१ ॥ मृग वाद्य अभय वर जिसके हाय हो ऐसी ब्रह्मणस्तुचतुर्दिक्षुमुखानांविनियोजनम् । शिरजीको प्रतिमा सत्त्वगुगी होती है, और हयग्रीवोवराहश्चनृसिंहश्चगणेवरः ॥ ६२ घर अभय क्मल लड्डू जिसके हायमें हो ऐसी नाके मुस चारों दिशाओमें बनावे हय. गणेशजी की प्रतिमा सत्त्वगुणी होती है ॥६८॥ ग्रीव, वराह, नृसिंह, गणेशजी ॥ २ ॥ पद्ममालाभयवरकरासरवाधिकाग्वः । मुखबिनानराकारानृसिंहश्चनसर्विना । वीणालंगाभयवरकरासत्त्वगुणाश्रियाः ६९ ॥ विष्टंतीस्पविष्टांवास्यासनेवाहनस्थिताम् ६३॥ पद्म माला अभय वर जिसके हाय हो - प्रतिमामिटदेवस्वकारयेटुक्तलक्षणाम् । सी सूर्यप्रतिमा सत्वगुगी होती है, वीणा लुग अभय घर जित हायमें ही ऐसी लक्ष्मीफी द्दीनश्मश्रुनिमेपांचसदापोडशवापिकीम् ६४ प्रनिमा सगुणी होती है ॥ ६९ ॥ इनका आकार मुसके बिना मनुष्य के स- शंखचक्रगदापारायुधेदितः पृथक । मान यनावे नोरनसिंहकी मूर्ति नाके रिना मनुप्पाकारकी पनाये सुंदर भासन और पाह पट्टपटूभेदाश्चमूर्तीनांविषयादीनांभांतिहि ॥ नपेटी अथवा गरी दुई इष्टदेश्की प्रतिमाको शप चक्र गदा पद्म और भायुधांस विष्णु उक्त रीतिमे पनपाव, जिमश्रु और निमिप भादिकांकी मनियोंकि यह भेद दो। न हो और सदा सोरह वर्षको प्रतीत हो हैं ॥ ७० ॥ पसीप्रतिमाको बनाये ॥६३ ॥६५॥ ययोपाविप्रभेदनममयोगविभागतः। दिव्याभरणरवाइयांदिव्यपर्णक्रियांमदा । समस्तव्यस्तार्णादिभेदज्ञानप्रजायते ७१ ॥ हीनांग्योनाधिकांग्पश्चकर्त्तव्यादेवताःकचित् यथोचित उपाधि भेद और संयोग विभा.
४.]
भाषाटीकासहित।
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स्वयमेव पैदा हुए अथवा चन्द्रकांवमणिस प्रतिमायाश्चयेदोपाह्यर्चकस्यतपोबलात् ।
पैदा हुए वाणलिंगमें रत्नसे पैदा हुए अथवा सर्वत्रेश्वरचित्तस्यनाशयांतिक्षणाकिल ८०॥
गंडकीनदीसे पैदा हुओमें प्रमाणका दोष "जो प्रतिमाके दोष हैं वे ईश्वरमें है चित्त
सर्वथा नहीं है ॥ ७३ ॥
जिसका ऐसे पूजा करनेवालेके तपोबलसे
पाषाणधातुजायांतुमानदोषान्विचिंतयेत् । क्षणमात्र ही निश्चय नष्ट हो
नष्ट हो जाते
श्वेतपीतारक्तकृष्णपापाणयुगभेदतः ।। ७४ ॥ हैं ।। ८० ॥
पाषाण और धातुसे पैदाहुई प्रतिमाओंमें देवतायाश्चपुरतोमंडपेवाहनंन्यसेत् ।
प्रमाणके दोषोको चिन्ता करै और युगोंके भेद- द्विबाहुर्गरुडामोक्तःसुचंचुस्वक्षिपक्षयुक् ८१n
से श्वेत पीत रक्त कृष्ण पापाणकै भेदसे ॥७॥
देवताके आगे मंडपमें वाहनोका न्यास
प्रतिमांकल्पयेच्छिल्पीययारुच्यपरैः स्मृता । (स्थापन ) करै दो भुजावाला श्रेष्ठ चंच नेय
श्वतास्मृतासात्त्विकीतुपीतारक्तातुराजसी ॥ पक्षवाला गरुड कहा है ॥ ८१ ॥
प्रतिमाकी कल्पना शिल्पी फरै अन्य पाषा-नराकृतिश्चंचुमुखोमुकुटीकवचांगदी।
गोको यथारुचि करनी कही हे श्वत प्रतिमा- वद्धांजलिननशीपःसेव्यपादाब्जलोचनः ८२॥
सत्वगुणी पीत और रक्त रजोगुणी होती
नरके समान आकार चंचु जिसके मुसमें
तामसीकृष्णवर्णातुयुक्तलक्ष्मयुतायदि ।
हो, मुकुट कवच भंगद धारण किये हो
हाथ जोडे हो नम्रशिर हो सेव्य (देवता) के
सौवीराजतीतानीतिकीवाकृतादिपु॥६॥ चरण कमलसे जिसके नेत्र हो ऐसा गरुड
कृष्णवण प्रतिमा तमोगुणी होती है यदि आदि वाहन हो॥८२ ॥
उक्तलक्षीसे युक्त हो अथवा सतयुग आदि वाहनत्वंगतायेयेदेवतानांचक्षिणः ।
में सुवर्ण चादी तावा पीतर की प्रतिमा कामरूपधरास्ततेतयासिंहवृपादयः ॥८३ ।।
यही है॥७६॥
जो पक्षी देवताओके वाहन हुए हैं वे सब्द
शांकरीतवर्णावाकृष्णवणार्तुवैष्णवी ।
कामरूपधारी अपवा सिंह धूप आदि ॥ ८३
सूर्यशाक्तगणशानांताम्रवर्णास्मृतापिच ।।
स्वनामाकृतयश्चैतेकादिव्याबुधैः सदा ।
शिवजीकी प्रतिमा वित्तवर्ण, विष्णुको
कृष्णवण भऔर सूर्य देवी गणेश इनको ताक सभूपितादेवताग्रमंडपेध्यानतत्पराः था
वणके समान प्रतिमा कही हे॥७७॥
अपने नामकी आकृति दिव्य (सुंदर,
लाहसिसिमयावापिययोद्दिष्टास्मृतावुधैः ॥ मायुधों सहित सदैव करने और ऐसे बनाने जो
चलायोस्थिरा यांप्रासादायुक्तलक्षणम् । ध्यानके विषय तत्पर हो ॥ ४ ॥
भली प्रकार भूपित और देवताके आगे मंडपमें
प्रतिमांस्थापयेन्नान्यांसर्वसौख्यविनाशिनीम् ॥
मार्जाराकृतिक:पीत कृष्णचिह्नोवृहदपुः ।
सेव्यसेवकभावेपुप्रतिमालक्षणस्मृतम् ॥७९ ॥ असटोव्याघ्रइत्युक्तःसिंह सूक्ष्मकटिर्महान् ।।
लोहे वासासको शास्त्रोक्तरीतिसे विद्वानों वळीवके समान जिसका आकार पीला
ने कही ३, चटकी पूजा या स्थिरकी पूजाम
कृष्णचिढ़, बडाशरीर हो और गरदन में बार-
प्रासाद (मंदिर) आदिक उक्त
नहों वह व्याघ्र कहा है और कटि पतली और
णवाली प्रतिमाको स्थापन करे और सब
रुपमहान् हो वह सिंह कहा है॥ ८५॥
सुखीको नष्ट करनेवाली, अन्य प्रतिमाको
स्थापन न करे और सेव्यसेवक भाव भीमात वृहदभूगंडनेत्रस्तुभालरेखोमनोहः ।
माका लक्षण कहा है ॥७८॥ ७९ ॥
सटावान्धूसरोऽकृष्णलांछनश्चमहाबलः॥८॥
शुक्रनीति । [ अध्याय- जिसकी भुकुटी,गंडस्पल ने बड़े हो मस्तक कानोंके मध्यका व्यास दो अंगुल ऊपर एक पर रेसा हो मनोहर हो, केसर युक्त हो, धूसर ताल होता है और इसके मस्तक्की परिधि म हो ओर काला चित न हो, महाबली हो छत्तीस अंगुल होती है ॥ ९ ॥ ऐसा सिह होता है ॥ ८६ ।। नेत्रोपातेचपरिवाशीपतुल्यासदामतः । भेदासटालांछनतोनाकृत्याव्यानसिहयो। सद्यगुलदिताल स्यान्नेत्राधापरिधिको ९३ गजानननराकारवस्तकर्णपृथूदरम् ॥ ८७ ॥ नेत्रोके समोपकी परिधि शिरके तुल्य कही सटा (कसर) विहको छोड स्वरूपमे व्याघ्र है और हाथीके नेवोंके नोचेकी परिधि दो लिहवा कोई भेद नहीं है, गजाननकी मूर्ति अगुल और दो ताल होती है ॥ ९३ ॥ नराकारको हो, जिसके कान ध्वस्त हों पेट कराग्रेपगिविज्ञेयः पुष्करेचदशागुलः । बडा हो ॥ ८७ ॥ व्यंगुलकंदेयतत्परिविधिशदगुलः ॥९४ ॥ वृहत्संक्षिा गहनपानकधांत्रिपाणिनम् । हाथ और पुस्करके अग्रभागकी परिधि वृहच्छंडंभमवामरदमिच्छितवाहनम् ॥८८ ॥ दश अगुल कटकी लंबाई तीन अंगल और बडे मक्षित गहन पुष्ट है स्कंध,चरण, हाथ कटकी परिधि तीस अगुल होती है ।। ९४ ॥ जिसके और यही शुड़, टूटा वाम दात और परिणाहस्तूदरेचचतुस्तालात्मकः सदा । यथेच्छ है वाहन जिसका एसी ॥८८॥ पडंगुलोनियोक्तव्योष्टागुलोवापिशिल्पिभिः।। इपत्कुटिलदंडाग्रवामझुंडमदाक्षिणम् । उदरका विस्तार सदेव चारतालका होता मध्यस्थिवमन गूटं कुर्यात्मानमितंसदा ८९ ॥ है परंतु शिल्पी उसमे छ: अंगुल वा पाठ अगुल और मिला दे ।। ९५ ।। मुछेक कुटिल शुडका अग्र हो, वामभुज दतः पडंगुलोदीर्वस्तन्मूलपरिधिस्तथा । जा पर शुद्ध हो दक्षिण पर नही और संधि अस्यि धमनी ( नाडी) ये सब जिसकी षडंगुलश्चाधगेष्ठःपुष्करंकमलान्वितम्॥१६॥ ढकी हों ऐसी गणेश की मूर्ति सदेव प्रमाणसे छ. अगुलका मोटा दत होता है और उसके वनारे ॥ ८९॥ मूल की परिधि भी लेतीही होती है और सार्धधनुस्तालमित शुंडादंड समस्ततः । नीचका ओष्ठ छ अंगुल हो ओर पुष्कर (शुद्ध) कमल सहित बनानी चाहिये ॥ ९६॥ दशांगुलंमस्तकंचभ्रूगंडश्चतुरंगुलः ॥ ९० ॥ उरुमूलस्यपरिधिःपात्रंशदंगुलोमतः । सपूर्ण गुण्डका दंड साडेचार वाळया होत्रयोविशत्यंगुल स्यादूर्वग्रपरिधिस्तया ॥९७ ।। दश अगुटका मस्तक और चार अगुलका र मटकी परिधि छत्तीस अंगुल मानी कुटियाका गढम्यल हो ॥ ९०॥ है और उसके अग्रभागकी परिधि तेईस नासोत्तगष्टरूपाचशेषगुंडासपुष्करा । अगुलकी होता है ॥ ९७॥ दशांगुलकर्णदेयतदृष्टांगलविस्तृतम् ९१ ॥ जयारलेनुपनियर्विशत्यंगुलसमेतः। नामिका और जाके ओष्ठ र नाशामलको परिधि वीस अंगुलको होती परिधिमिलादरोधकोयंगुलागलः १९८॥ रद पुष्कर सहित दो कानोको लपाई और पाहु मूर और अग्रभागको परिधि दो कुरा अंगर और चौडाई आठ अंगुवा क्रमसे एक अंगुट अधिक बीस गुट होती है ॥२८॥ कर्णनेवांचगनित्यायनेयंचतुरंगुरम् । मानोऽपिरपागधेयापनिशदगुल: ९२ मलमध्यानातानुदासपगुलम् ॥ ९९ ॥ हो ॥९॥ कर्मयारताच्यासोदयंगुलस्तालमांमतः ।
भोपाटीकासहित । (१२७ RROR कान और नेत्रोंका अंतर सदेव चार नित्यप्रवर्धतेवाला पंचान्दापरतोभृशम् । अगुलका होता है और नेत्रोंके मूल मध्य अ-स्याषोडशेदेसर्वांगापूर्णातीविंशतोपुमान् ६ ग्रको भतर क्रमसे दश सात छः अंगुल होता पांच वर्षसे ऊपरको अवस्था में वालयः अत्यन्त वढता है और सोलह वपमें खी और मेवयोःकायतंतज्जगणपस्यविशपतः । बीस वर्ष पुरुष सम्पूर्ण अंगोले पूर्ण हो जाता उत्सेधःपृथुतास्त्रीणांस्तनपंचांगुलामता५०० है ॥ ६ ॥ तिसके ज्ञाताओने गणेशके नेत्रोकी ऊंचाई ततोतिप्रमाणंतुसप्ततालादिकंसदा । विशेषकर पूर्वोक्त कही और खियाकेस्तोंकी कश्चिद्भाल्येपिशोभाढवस्तारुण्येशकेचित् जगई और लंबाई पांच अंगुल मानी ३५००॥ फिर सप्तताल आदि प्रमाणके योग्य हो स्त्रीकटयांपरिधिामोतस्वितालोदयंगुलाधिका जाता है और चाल्य अवस्था और कोई बीणामवंयवान्सर्वान्सप्ततालविभावयेत् ॥१॥ होता है॥७॥ यौवनमें और वृद्ध अवस्थामें शोभासे मुक्त ख्यिोंकी कमरकी परिधि दो अंगुल ऊपर मुखाधस्यंगुलाग्रीवाहृदयंनुनवांगुलम् । तीन ताळको और स्त्रिरोंके संपूर्ण अवयव तथो स्ववस्तिश्चसक्थित्वष्टादशांगुलम् ॥८॥ सात ताल के होते हैं ॥१॥ मुखके नीचे ग्रीवा तीन अंगुल हृदय नव. सप्ततालादिमानेपिमुखस्ववादशांगुलम् । अंगुल होता है तिखी प्रकार उदर पस्ति वालादीनामपिसदादीर्घतातुपृथक्पृथक् ॥२॥ सक्थि अठारह अंगुल होती है ॥ ८॥ “सम सालकै प्रमाणमें भी मुख बारह अंगु व्यंगुलंतुभवेजानुजंबात्वष्टादशांगुला । खका होता है और बाळ (केश) आदिको गुल्फापस्व्यंगुलज्ञेयंसप्ततालस्यसर्वदा ॥ ९ ॥ दीर्घता भी पृथङ्क २ होती है ॥२॥ शिशोस्तुकधराहस्वापृथुशीप्रकीर्तितम् । जानु तीन अंगुल और जंघा अठारह अंगु और गुल्कके नीचेका भाग · तीन अंगुन्द्रका कंठाधोवर्धतेयादृक्तापछीनवर्षते ॥३ सात तालके मनुष्यका सदेव होता है ॥९॥ बालककी ग्रीचा छोटी और शिर वडा होता है और कंठसे नीचे जितना चालकहता वेदांगुलाभवेद्ग्रीवाहृदयंनुदशांगुलम् । उतना शिर नहीं बढता ॥३॥ दशांगुलंबोदरंस्यादस्तिश्चैवदशांगुलः १० कंठायोमुखमाननवृत्तसाचतुर्गुणम् । और चार अगुलकी ग्रीवा दश अंगुटकर द्विगुणःशिश्नपर्यंतोहफाशेपंतुसक्यितः॥४॥ हृदय उदर और यस्ति दश अंगुलकी हो not कण्टके नीचे मुराक प्रमाणसे साढ़े चार- एकविंशांगलं सक्थिजानुस्याञ्चतुरंगुलम् । गुना और नीचेका शेष सस्थिसे लेकर लिंग- पर्यन्त दो गुना बढता है॥४॥ एकविशांगुलाबागुल्फावश्चतुरंगुलम् ।। इक्कीस अंगुल सश्यि चार अंगुल जानू -सपादद्धिगुणीहस्तौदिगुणीवामुखेनहि । इक्कोस अंगुल धा गुल्क (टकने) नीर स्थौल्येनुनियमोनास्तिययाशोभिप्रकल्पयेत् ॥ चार अंगुलका प्रमाण ॥ ११ ॥ भौर मुखले सवा दो गुने वा दुगुने हाय पढ़ते हैं और म्यूटता (मोटाई) में अष्टतालप्रमाणस्यमानमुक्तमिदंसदा । नहीं उसमो शोभाके अनुसार नावे ॥५॥ त्रयोदशांगुरंज्ञेयमुखंचहृदयंतथा ॥ १२ ॥ " क
[अध्याय-
शुक्रनीति ।
(१२८)
आठ वाटके प्रमाण मनुष्यका सटव कहाहै, कही तरुण अवस्था भी बालके सदृश होती
मुस और हृदय तेरह अंगुलफा होता है ।। १२॥ है और शिल्पी वृद्धके सहध मायाकी
उदरचतयावस्तिर्दशतालेपुसर्वदा । कल्पना कभी न करे ॥ १९ ॥
गुल्फावश्चतयात्रीवाजानुपंचांगुलंस्मृतम् ॥ एवंविधान्नृपोराष्ट्रदेवान्संस्थापयेत्सदा ।
उदर और यस्ति दश अगुलकी दश तालके प्रीतसंवत्सरतेपामुत्सवान्सम्यगाचरेत् ॥२०॥
मनुष्यकी होती है गुल्फके नीचेका भाग, राजा ऐसे देवताओका स्थापन अपने
जानु और ग्रीया पांच अंगुलके कहे हैं ॥ १३॥ राज्यमें सदैव कदै, प्रतिवर्ष उन उनके उत्स-
वोको भली प्रकार करे ॥२०॥
- पट्टाविंशत्यंगुलंसस्थितयाजंघाप्रकीर्तिता ।
एकांगुलोमूत्रिमणिर्दशतालेप्रकल्पयेत्॥१४॥
देवालयमानहीनांमूर्तिभनांनधारयेत् ।
छब्बीस अंगुल सस्यि और दश अंगुल जया प्रासादांश्चतयादेवाजीर्णानद्धृत्ययत्नतः ॥
कही है तारके मनुप्पमें मस्तककी मणि चार
प्रमाणसे रहित और दूटी फूटी मूर्तिको
अंगुटकी कही हे ॥ २ ॥
देवालयमें न रहने दे, जीण मन्दिर और
देवताओंका यलले उद्धार करके ॥ २१ ॥
पंचाशदंगुलीवाहूदशवालस्मृतौसदा।
इचंगुलोद्यंगुलीचोनीततोहानप्रमाणके १५॥
देवतांतुपुरस्कृत्यनृत्यादीन्वीक्ष्यसर्वदा।
नमत्तास्वोपभोगार्थीवदध्याद्यत्नत्तोनृपः २२॥
दश तारके मनुप्यकी भुजा पचास
अंगुटकी होती है और उससे अल्प प्रमाणके
देवदर्शन और नृत्यको देखकर प्रसन्नचित्त
राजा अपने उपभोगके लिये यत्न न करे ॥२२॥
मनुप्यकी भुजा दो दो अंगुल कम होती
६॥ १५॥
मजाभिविंधृतायेयेयुत्सवास्तांश्चपालयेत् ।
पाटवनुययाशोभिसर्वमानपुकल्पयेत् ।
प्रजानंदेनसतुष्पेत्तदुःखैर्दुःखिताभवेन्२३॥
नवतालप्रमाणेनह्यनाधिक्यंप्रकल्पयेत्॥ १६॥ तिनको सदेव पाटना करे, प्रजाके आनन्दले
और जिन उत्सवोंको प्रजा करती हो
सय प्रमाण मनुष्योम शोभाके अनुसार और दुःखसे दुःसित हो ॥ २३ ॥
धनुगर्दको कल्पना करे और नौ तारके दुष्टनिग्रहणकुर्याद्यवहारानुदर्शनैः ।
मनुप्यकै न्यूनाधिक्की कल्पना न करे ॥१६॥
दशतालेतुविज्ञेयोपादीपंचदशांगुली।
स्वाज्ञयावर्तितुंशतयाऽधीनाजाताचसामजा।
एकैकांगुलदीनास्तस्ततान्युनप्रमाणके १७॥ वाव नोजा अपने आधीन हो यह अपनी
मौर घ्यवहारीक, देखनसे दुटीको दंट
दश सारके मनुप्यमें चौदह अंगुलफे पैर मना रद्द रुपती ६॥ २४ ॥
जानने और उससे न्यून मनुष्पकै प्रमाण
एफ २ अंगुर पम होते हैं ॥ १७ ॥
स्वेष्टहानिकरःपर्दुष्टःपापप्रचारवान् ।
नपंचांगुलतोदिनानपढंगुलतोधिका ।
इष्टसंपादनन्यायप्रजानांप.त्नांदितत् ॥२५॥
कररयमध्यमानत्ताव्युरुमानपुसहिदे १८॥ जो अपने इष्टको हानि परे पापाचारी हो
छापा मयमा भगुटसे पम भोर
वद होता है इट (बालित)को सम्पति
मंगुदा मधिर विद्धानाने अधिफसे मधिर
करना उचित दो पयोधिसीयो भजाका
मानमें नदी यदी२॥१८॥
पालन करते ॥२५॥
गरिनुपालमहामदेवतरुणपः।
शोरनिटकरणानिहात्तिायुनागनम् ।
मानायल्पपछिल्पीनटसदृशंकचित् ।। | पापाचारनित्तियष्टनिमहणदितत् ॥२६॥
भाषाटीकासहित । शत्रुको अनिष्ट न करने देनेको शत्रुनाशन अधिरात्तंदुरात्मानंवशेकुवैतिशत्रवः । कहते हैं और जिनसे पापाचरणोकी निवृत्ति अस्वालोकनाशायपरानीकभयावहाः३३॥ हो उसे दुष्टनिग्रहण कहते हैं ॥ २६ ॥ उस दुरात्माको शत्रुमन थोडे ही कालमें स्वप्रजाधर्मसंस्थानंसदसमविचारतः । वशकर लत ह नरककी दाता जगतकी नाशक जायतेचार्थसिद्धिर्व्यवहारस्तुयेनसः ॥२७॥ शत्रुसेना को भय देनेवाली ॥ ३३ ॥ साधु असाधुके विचारसे अपनी प्रजाको आयुर्वीजहरीराज्ञामस्तिवाक्येस्वयंकृतिः । धर्ममें स्थापन करे और जिसे अर्थ सिद्ध होय तस्भाच्छास्त्रानुसारेणराजाकार्याणिसाधयेत् ।। उसे व्यवहार कहते हैं ॥२७॥ भवस्थाके वीजको नाशक शक्ति राजा- धर्मशास्त्रानुसारेणक्रोवलोभविवर्जितः । ओंके वाक्यमें स्वयं सिद्ध होती है तिससे सपाडिवाकःसामात्यःसब्राह्मणपुरोहितः२८॥ राजा शास्त्रोंके अनुसार काय्याको सिद्ध क्रोध लोभते रहित और प्राविवाक (व-करे ॥ ३४॥ कोल) मन्त्री ब्राह्मण पुरोहित इन करके सहि-यदानकुर्योन्नृपातःस्वयंकार्यविनिर्णयम् । त राजा धर्मशास्त्र अनुसार ॥२८॥ समाहितमातःपश्येद्वयवहाराननुकमात् । तदातनियुजीतब्राह्मणवेदपारगम् ॥३५॥ जिस समय राजा कार्योंका निर्णय न करे नकै पश्येच्चकार्याणिवादिनो शृणुयाद्वचः२९ उस समय कार्यनिर्णयके लिये ऐसे ब्राह्मणको सावधान मन होकर क्रमले ध्यवहारो नियत करे जो वेदोका पारगामी हो ॥ ३५ ॥ (मुकदम)को देखे और वादियों (मुद्दईमुद्दाळे) दांतकुलीनंमध्यस्थमनुद्वेगकरंस्थिरम् । के कार्योको अकेला न देखे और उनके वचः परमभीरुंधर्मिष्ठमुद्युक्तंक्रोधवर्जितम् ॥३६ ॥ नोको ॥२९॥ और दान्त (जितेन्द्रिय) कुलीन मध्यस्थ रहसिचनृपःप्राज्ञःसभ्याश्चैवकदाचन । (समयुद्धि) अनुदेगकारी ( कोमळवचन) पक्षपाताधिरोपस्यकारणानिपचवै ॥ ३०॥ स्थिरबुद्धि परलोकसे भीरु (टरनेवाला), बुद्धिमान् राजा और सभासद एकांतमें धर्मिष्ठ उद्योगो और क्रोधसे रहित हो ॥३६॥ कदाचित् न सुने पक्षपात करनेके ये पांच यदाविप्रोनविद्वान्स्यात्क्षत्रियंतन्नियोजयेत् । कारण होते हैं कि ॥३०॥ विश्यवाधर्मशास्त्रज्ञशूद्रयलेनवर्जयेत् ॥३७ ॥ गगलोभभयद्धपावादिनोश्चरह श्रुतिः । यदि विद्वान् ब्राह्मण न मिले तो क्षत्री, पोरकार्याणियोराजानकरोतिसुखेस्थितः ३१॥ क्षत्री न मिले तो धर्मशास्त्र के ज्ञाता वैश्यको राग (प्रीति ) लोभ भय वैर और एकांतमें उस पदपर नियत करे शूद्रको तो यनसे वर्ज दे॥३७॥ वादी प्रतिवादीका वचन सुनना जो राजा भुरामें स्थित हुआ पुरवासियों मायोको यद्वर्णजोभवेद्राजायोज्यस्तद्वर्णजःसदा । नही करता ॥३१॥ तद्वर्णएवगुणिनःप्रायशःसंभवतिहि ॥ ३८॥ व्यक्तंसनरकेघोरेपच्यतेनात्रसंशयः । निर्णका राजा हो उसी वर्णक यस्त्वधर्मेणकार्याणिमोहाकुर्यात्नराधिपः३२॥ मनुष्यको नियत करे क्योंकि उसी वर्णमें यह प्रकट है इसमें संशय नही वह पोर प्रायः गुणवान् मनुष्य होते हैं ॥ ३८॥ नरकमें पडता है जो राजा विना जाने अधर्मव्यवहारावदामाज्ञावृत्तशालगुणान्विताः । कायको करता है ॥ ३२ रिवामित्रेसमायेचधर्मज्ञा-सत्यवादिनः।।३९ ॥ ९ (१३०) शुक्रनीति। अध्याय- .. पादारकै ज्ञाता माचारशील और गुणोंसे सैनिकाःसैनिकखग्रामेप्युभयवासिभिः । सयुक्त शा और मित्रमें समान धर्मज्ञ सत्य. अभियुक्ताश्चयेयत्रयनियर्वनियोजयेत्॥१६॥ वादी जो दो ॥३९॥ निरालसाजितकोषकामलोमा:प्रियंवदाः । सनिकों (सनाके योद्धा)के कार्य सैनिको- के संग और ग्रामवासियत काप ग्रान. और राज्ञनियोजितव्यास्तेसभ्यासर्वासुजातिषु ४० बनासियोंके सग बैठकर करे जितपदपर जो निराळखी क्रोध काम लोभ ये जिन्होंने नियुक्तहो उनका निबंध जो राजाने नियत का जीते हो, प्रियवादी हो ऐसे सभासद सब दिया हो ॥ ४६॥ जातिगामसे राजाने नियुक्त करने ॥ ४० ॥ तत्रत्यगुणदोषाणांतएवहिविचारकाः । कोनागाःकारकाशिल्पिफुसीदिश्रोणनतकाः राजातुधार्मिकान्सभ्यान्नियुज्यात्सुपक्षि- लिगिनस्तस्कगायुःस्वेनधर्मेणनिर्णयेत् ॥ तान् ॥१७॥ किसान पारीगर (शिल्पी ) व्यवहारी उसके गुण और दोपक पिचार फरनेवान्ट नतंक संन्यासी चोर ये सब अपने धर्मसे ये ही होते हैं परंतु राजा धार्मिक और भटोप- निगंय करे॥४१॥ कार परीक्षा करनेवाले सभासद निपत अगायोनिर्णयोहान्यस्तवतुफाग्येत् । करे ॥१७॥ आश्रमपुदिनातीनांकायपिटतांमियः।।४२॥ व्यवहारधुरखौद्यसक्ता पुंगवाइय । स्पोकि इनके निर्णयको मन्य नही फरसक्ते लोकवेदज्ञधर्मज्ञाःसप्तपंचत्रयोपिया ॥४८॥ इन्हींपी जातिखें निर्णय कराये जो दि. जाति अपने माश्रमोश कायोमे परस्पर विवाद से ये भीर जो लोक वेद धर्म इनके जो व्ययक्षारके गोता उठाने में से समय परते दो ॥१२॥ नविटयान्नृपोधर्मचिको हितमात्मनः । ज्ञाता हो और सात पाच तीन ही ॥८॥ तपस्विनांतुकार्याणिपविधीवकारयेत्॥१३ ।। यत्रोपविष्टाविमाःस्युःसायनसदृशीसभा । श्रोतारोपणिजस्तकतन्याः सुविचभगाः ।। वह मरने हित पादनेगला राना धर्म गिपत न फी भोर तपम्चियों कापोरी निसभामं ग्रामण पटेवा पद सभापत सीनी येदपाठी प्रागसि कराये ॥४॥ मान होती है और उससभामै म पण्डित माप योगापदांचरनस्वकोपकारणात् । फाप यः सुननेयाले येरप गजान निरत मरने मम्पम्मितानसंपन्न नापीटकरपेत् ॥४॥ अनियुक्तोनियुक्तीपापमोर मन । स्कृष्ट नातिनीयानांगुवाचार्यतास्तिनाम । दिवांगाचमादतियामानामुपनीय ॥ ५० ॥ मापापी और योगियार पापमोधा रानामा निपुनदो या मनिपुन, माता टो गना न मोर भाभा पोट महाशायनो नान् मनपरी उपदेशन पर उनम जानता र गोरो पाnिnn नाति या गोगरे मोर गुरु मापार समारानमोटापानिलयंगगमंजगम । मायानुसायंगnिichini समाधिमापन गेमतिनियिरी ।। पासोमरान नार नही मार मार पार पारि (पान) नमामो पाप परे पनि पोins में मनुपको पासर मा. गरपाभी Ivn गमिटर १५
४.]
भाषाटीकासाहित ।
राजायविदिताःसम्यकूकुलश्रोणिगणादयः। कार्यपृथक्पृथक्स पैराज्ञाश्रेष्टोत्तरः सह ।
साहसस्तेयवानिकुयुः कार्याणितेनृणाम् ।। अर्थिप्रत्यायनौसभ्यर्लेखकप्रेक्षकांश्चयः ५८ ॥
विचार्यश्रेणिभिाकाधकुलपन्नविचारितम् । पृथर २ क्रमसे श्रेष्ठ सभासदोंके संग वेट
गणेश्चश्रेण्यविज्ञातंगणाज्ञातनियुक्तकैः॥५३॥ कर करे और अधिमत्यर्थि (मुद्दई मुद्दाले)
सभासद लेखक और देखने वालोंको
जिन कुलश्रेणी गण आदिको राजा भली जो ॥ ५८ ॥
प्रकार जानता हो वे मनुष्योंके उन कार्योंको धर्मवात्यैरजयतिसभ्यस्तारायिताभयात् ।
करे जिनमें साहस (हित) चोरीका सम्बंध
न हों ॥ ५२ ।। जित कार्यका विचार कुलवा-
नृपोधिकृतसभ्याश्चस्मृतिर्गणकलेखकौ ५९॥
लोकी धुद्धिम न आयाहो उस कार्यको विचा. धर्मके काक्योंसे प्रसन्न करै वह सभास.
रकर श्रेणी करे श्रेणियोंके बिना जाने कार्य- दोंको भयले निवृत्त करता है राजा अधिका.
को गण को गणके बिना जानेको राजाकारी (मंत्री ), सभासद, धर्मशास्त्र, गणक,
अधिकारी पुरुष करे ॥५३ ॥
लेखक ॥ ५९॥
कुलादिभ्योधिकाःसभ्यास्तेभ्योध्यक्षोऽधिकः हेमाग्न्यंबुस्वपुरुषाःसावनांगानिवेदश ।
कृतः सर्वेषामधिकाराजाधर्मावनियोजकः। एतद्दशांगकरणंयस्यामध्यस्य पार्थिवः ॥ ६०॥
कुलसे अधिक सभासद और सभासदोंसे सुवर्ण, अग्नि जल और राजाके पुरुप (सि-
अधिक मधिपति (मन्त्री) और सबसे अधिक पाही) ये दश कार्यसिद्धिके अंग है इस दश
धर्म अधर्मका नियुक्त करनेवाला राजा होता अंगरूपसामग्री सहित राजा जिसमें बैट कर
है॥ ५४॥
उत्तमा धममध्यानांविवादानांविचारणात् । न्याय्यान्याय्यकृतमतिःसासभाध्वरसन्निभा ।
उपर्युपरिबुद्धीनांचरतीश्वखुद्धयः ॥ ५५ ॥ दशानामापचैतेपांकर्मप्रोक्तंपृथक्पृथक॥६१॥ .
उत्तम मध्यम अधम जो विवाद उनके न्याय और अन्यायमें बुद्धिको करता है वह
विचार करनेसे सब बुद्धियोंके ऊपर ईश्वर सभा यज्ञरे तुल्य है और इन दीका कर्मभी
(राजा) की बुद्धि विचरती हैं॥ ५५ ॥ पृथक कहा है ॥ ६१॥
एकशास्त्रमधीयानोन विद्या कार्यानर्णयम् । वक्ताध्यक्षोनृपःशास्तासभ्या कार्यपरक्षिकाः ।
तस्माइबागमःकार्योविवादेषत्तमोनृपैः ।। स्मृतिर्विनिर्णय तेजयंदानंदमंतया ॥ ६२ ।।
एक शास्त्रका पढा हुआ मनुष्य कार्यके अध्यक्षा (मंत्री) पढकर सुनावे राजा शि-
निर्णयको नही जानसकता तिससे राजा विक्षादे, सभासद कार्यकी परीक्षा करें धर्मशास्र
वादोंके निणयार्य ऐसे उत्तम मनुष्यको नियत उसके निर्णयको और जय दान दमको कहता
करे जिसने बहुत शास्त्र पढे हों ॥ ५६ ।।
सनतेमधर्मस्यादेकोबाध्यात्मचिन्तकः । शपयाडहिरण्यानाअंतृपितक्षुब्धयोः।
एकद्वित्रिचतुर्धारव्यवहारानुचिंतनम् ।। ५७ ॥ गणकोगगयेदलिखेन्न्याय्यंचलेखकः ।।
पद और अध्यात्म (ब्रह्म) की चिंता करने शपथ (सौगंध) के लिये मुवर्ण, अग्नि,
वाला एकभी जिक्षको कहे वह धर्म होता है | पावान् और क्रोधोके लिये जल गणक अर्थ
.एक दो तीन बार व्यवहारीका अनुचिंतन (द्रय भादि) को गिने और लेखक न्यायको
लिख ॥ ६३ ॥
,
॥ ५७॥
[ अध्याय- शुक्रनीति । (१३२) शब्दाभिधानतत्त्वज्ञागणनाकुशलौशुची । नके अन्यथा करनेस प्रजा क्षोभको प्राप्त हो नानालिीपत योगजागणकलेखौं । जाती है दक्षिण दशेके द्विज मातुलको कन्या को विवाह देते है ॥७॥ शब्द बोलने तत्वको जाननेवाल, नि सीम कुशल और रद्ध अनेक लिपिक ज्ञात मध्यदेशेकर्मकरा:शिल्पिनश्चगराशिनः । जो हो ऐसे रणक और लेखक राजाको नियत मत्स्यादाश्चनगःसर्वेव्यभिचाररता त्रियः ॥ करने ॥ ६४ ॥ मध्यदेश दिज कर्म (सेवा) करते है धर्मशास्त्रानुमोरणअर्थशास्त्राववचनम् । शिल्पी है और विषको खाते है और सब नर यत्राधिक्रियतेस्थानधर्माधिकरणहिटत् ।। मत्स्योको खाते है, स्त्री व्यभिचारमें रत है जिष्ठम्यान में धर्मशास्त्र अनुसार अर्थशास्र ( व्यवहार )का विवेचन दोनेका अधिकरण उत्तरेमद्यपानार्यःस्पृश्यानृणांरजस्वला । (प्रस्ताव ) हो उस स्थानको धर्माधिकरण खशजाता:प्रगृह्णातिभ्रातभार्यामभकाम्७२॥ कहते है ॥६५॥ उत्तरकी स्त्री मदिरा पीती है, मनुष्य व्यवहारान्दिनुस्तुब्राह्मणःसहपार्थिवः । रजस्वला स्त्रियोको स्पर्श करते है। सश मंत्रहमानिभिश्चवविनतिमविशसभाम ६०॥ देश मनुष्य अपने भ्राताकी विधवा स्त्रीको व्यवहार देखनेका अभिळापी राजा नम्र ग्रहण कर लेते है ॥७॥ होकर ब्राह्मण और मरये ज्ञाता मत्रियो सहित अननकर्मणानतेप्रायश्चित्तदमाईकाः । सभामप्रवेश करें॥ ६६ ॥ धर्मासनमविष्टायकायदर्शनमारभेत् । येपापरंपराप्राप्ताःपूर्वजेरप्यनुष्ठिताः ॥ ७३ ॥ पूर्वोत्तरसमोभूत्वाराजापृच्छद्धिवादिनोः ॥६७॥ और दइके योग्य नहीं है जिनके जो कर्म इस पूर्वोक्त अपने कमसे ये प्रायश्चित्त राजा धमासन ( राजगद्दी ) पर बैठकर परपरासे चले आये हो और पहिले पुरुषोंने कायोंके देखने का प्रारंभ कर और मारभ तया भी क्येि हों ॥७३॥ अतम समान (इक्सा) होकर विवादियोको पूछे ॥ ६७॥ तएवते दुष्येयुराचारानेतरस्यतु । प्रायदेशमाखदपश्चहेतुभिः । न्यायान्पश्येत्तुमच्याटेपूर्वाह्नस्मृतिदर्शनम्॥ जातिजानपदान्धर्माणिधर्मास्यवच ।। उनही कमास वे दूषित नहीं होते और प्रतिदिन देश तया शाम दो हेनुप्रास इतर कोंसे दृपित होतेही है राजा मध्या जाति देश और ग्रेणियवि धायो॥६८॥ के समय न्याप देसे और पूर्वाहम स्मृति समोदयपुरमीश्चस्वधर्मप्रतिपारयेत् । (धर्मशाख)को दस ॥४॥ देशातिरानाचयधर्मा पाक्प्रवर्तिताः ॥ मनुष्यमाग्णस्तयेसाहसेस्तयिकसदा । और परो धमाको देखकर अपने यो नकालनियमस्तरसद्यएवविवेचनम् ॥ ७० ॥ पाटना और देश जाति पुल जो मनुष्य मारना,चोरी, साहस और यावश्यक धर्म पान स्पेि॥६॥ कायमै समयका कोई नियम नहीं है किन्तु तयवतपारनीया:प्रजामसुभ्यतेन्यया । उसी समय विवेचन करें ॥५॥ रातदाक्षिणात्यमातुरम्यमुताहिजे ७० धर्मामनगतं दृष्ट्वाराजानमनिभिः सह । उनको माना टनों प्रकार सक्योकि गटनिवेद्यमानयत्परिरद्वमधर्मतः ॥७६॥ .
भाषाटीकासहित।
(१३३)
.
.
मंत्रियो सहित राजाको धर्मासनपर बैठा उस लेखकको राजा चोरके समान उसी
देखकर जाय और जो निवेदन करना हो समय सावधान होकर दंड दे और सभासद
उसको अधर्मके त्यागपूर्वक ( सत्य २) जो लिखा हो उसके विरुद्र कदाचित् न
कह ।। ७६ ॥
भी कहें॥ ८२ ॥
यथासत्यंचिंतयित्वालिखित्वावासमाहितः । वलाद्गृहतिलिखितंदेडयेत्तांस्तुचौरवत् ।
नत्यावापांजलि महोह्य कार्यनिवेदयेत् ७७॥ माइविधाकोनृपाभावपृच्छेदेवसभागतम्८३॥
सत्यके अनुसार विचार कर, सावधानी जो बदसे लिखकर ग्रहण कर उन सभा.
से लिखकर और नवकर हाय जोडकर सदोंको चोरके समान दंड दे और राजाक
नमस्कार करके अ- (मुद्दई ) अपने कार्य-न होनेपर सभामें आये मनुप्यको प्राइविवाफ
को निवेदन करै ॥ ७॥
पूछे ।। ८३॥
ययाहमनमभ्पर्यत्राह्मणःसहायियः । वादिनापृच्छतिमाइविवाकोविधिनत्यतः ।
सांत्वेनप्रशमय्यादौस्वधर्मप्रतिपादयेत् ।।७८॥ विचाग्यतिसभ्यैर्वाधर्माऽधमाविवक्तिवा ८४॥
इस अझको ब्राह्मगासहित राजा यथा-
वादी विषादीको पूछनेते प्राड और सत्य
योग्य सत्कार करके और प्रथम शांतिके असत्यके विवेक करनेसे विवाफ अथवा
वाक्योंसे समझाकर अपने धर्मको कह ॥७॥ सभासदोंके संग विचार और धर्म अधर्मके
कालेकाथिनं पृच्छेत्मणतंपुरतःस्थितम् ।
विवेकले प्राइविधाक ( वकील ) को कहते
हैं ॥ ८ ॥
किकार्यकाचतेपीडामाभैषी हिमानव ॥७९॥
सभायांयेहितायोग्या-सभ्यास्तेवापिसाधवः ।
नमन किये और आगे सडे हुए कार्या
धोको समयपर पूछे कि तेरा क्या कार्य स्मृत्याचारव्येपेतेनमार्गेणापितः परः८५॥
और तुझे क्या पीडा (दु ख ) है तू कह और जो सभासद सभामे हित और योग्य हो
हे मनुष्य । भय मत कर ॥ ७९ ॥
वि साधु (अच्छे) होते है, धर्मशास्त्र और
केनकस्मिन्कदाकस्मात्पीडितोसिदुरात्मना ।
लोकाचारसे भिन्न जो माग उस रीतिस अन्य
मनुप्य जिसको दुःख दे और ॥ ८५॥
एवंष्टःस्वभावोक्तंतस्यमशृणुयाद्वचः ।८०॥ आवेदयतिचेद्रा व्यवहारपदंहितत् ।।
किस दुरारमाने किस जगह किस समय नोत्पादयेत्स्वयंकार्यराजानाप्यस्यपूरुपः८६ ॥
और किस कारण तुझे दुःख दिया है इस
वद राजाके यहां आकर निवेदन करे वही
भकार पूछकर उस के स्वभाव कहे।
व्यवहार (झगडा) का स्थान होता है और
हुए पचनको भली प्रकार सुने ॥ ८ ॥
राजा वा राजाका कोई मनुष्य स्वयं व्यव-
प्रसिद्धलिपिभाषाभिस्तदुक्तलेखकोलिखेत् । हारको पैदा न करे ।। ८६ ॥
अन्यदुक्तांलिखेदन्यद्योधिप्रत्यर्थिनांवचः८१॥ नरागेणनलोभननकोवेनग्रसेन्नृपः।
प्रसिद्ध लिपि (अक्षर)और भाषामें उस पौरापितानान्नचापिस्वमनीषया ॥८७॥
अर्थीक कहे हुएको लेसक लिख जो (लेखक) राजा भी प्रीति लोभ क्रोधसे व्यवहार न
भार्थप्रत्यर्थिक अन्य कहे वचनको अन्य ग्रसे (छिपावे ) और दूसरोने नहीं प्राप्त हुए
दिस ॥ ८१॥
अथाका अपनी बुद्धिसे न उठावे ॥ ७॥
चौरखत्वासयेद्राजालेखेकंद्रागतंद्रितः । छलानिचापराधांश्चपदानिनृपतेस्तया ।
लिखिततासभ्यानवियूयुः कदाचन॥८॥ स्वयमेवानिग्रहीयान्नृपस्त्वावदेकैर्विना॥८८॥
(१६४)
शुक्रनाति ।
[ अध्याय-
:
छळ अपराध और राजाकी पदवी इनको नृपातिरिक्तवेपश्चवितामविशेत्तुयः ।
तो राजा निवेदन करनेवाली के विना भी यश्चोपदारेणीवशेदवेलायांतयैवच ॥ ९५ ॥
ग्रहण करले ॥ ८॥
राजाके विरुद्ध वेषको धारण करें और
सूचकस्तामकाभ्यांवाश्रुत्वाचैतानि तत्त्वतः ।
धारण करके प्रवेश करें और जो प्रसिद्ध
शास्त्रेणनिदितस्त्वयोनापिराज्ञाप्रचोदितः८९॥ दारसे अन्यद्वारसे श्यया भसमयपर प्रवेश
सूचक (चुगुल) स्तोमक (बहकानेवाला) करे।। ९५ ॥
से इनके यथार्थ तत्वको सुनकर जो अर्थी शय्यासनेपादुकेचशयनासनरोहणे ।
शाखसे निदित और राजाने जिलको कुछ
राजन्यासन्नशयनयस्तिष्ठतिसमीपतः ॥९६॥
कहा न हो ॥ ८ ॥
आवेदपत्तियत्पूर्वस्तोभकासउदाहतः ।
और जो राजाकी शव्यापर सोते समय
[शय्या आसन खडाऊं अपने शय्या पर राजाके
नृपेणविनियुक्तोयापरदोषानुवीक्षणे ॥९० ॥ समीप बैठे ॥९६ ॥
और राजाके प्रति प्रथम ही निवेदन कर राज्ञोविदिष्टसेवीचाप्यदत्तविहितासनः ।
उसे स्वोभक कहते हैं और राजाने जिसको
अन्यवस्वाभरणया:स्वर्णस्यपरिधायकः ९७॥
दूसरोके अपराध देखनेके लिये नियत कर
रक्खा हो ।। ९० ॥
जो राजाके विरोधोसे मिल विना दिये
नृपसंसूचयेज्ज्ञात्वासूचकःसउदाहृतः ।
आसन पर बैठे अन्यके वस्त्र भूपण सुवर्ण
इनको धारण करें ॥ ९७॥
- पायभंगीपराक्षेपामाकारोपरिलंधकः ॥ ९१ ॥ स्वयग्राहेणतांबूलंगृहीत्वाभक्षयेतुयः ।
और जो जानकर राजाको वता देता है।
वह सूचक कहा है, मार्गका भंजक, दूसरेको "और जो पानको विना दिये स्वयं लेकर
अनियुक्तप्रभापीचनृपाक्रोशकएवच ।।९८ ॥
निंदा, परकोटेका लंघन इनको जो करें ॥९१॥ भक्षण कर, राजाकी आज्ञाके विना सम्भाषण
विपानस्यविनाशीचतयाचायतनस्यच ।
कर और राजाकी निन्दा कर ॥१८॥
परिखापूरकश्चैवराजाच्छद्रप्रकाशकः ९२ ॥ एकवस्त्रस्तयाभ्यक्तामुक्तकेशीवगुंठितः ।
जो चौयच्चा और घरको नष्ट कर और विचित्रितांगाग्वीचपरिधानविधूनकः९९॥
खाईको मिहीसे भर दे और जो राजाकै छिद्र
(बुगई)को प्रकाश करे ॥ ९२ ॥
एकवस्त्र धारण किये,उबटना किये, केशीको
गेलकर, चूंगट लगायकर, अंगको बीतकर,
अंतःपुरंवासगृहभांडागारंमहानसम् ।
माला पहनकर और वस्रोको हिलाकर जो
प्रविशत्यनियुक्तीयोभोजनचनिरीक्षते ९३॥ राजाके समीप जाय ॥ ९९ ।।
अंतःपुर ( रनवास) यसका म्यान, पा. शिरमच्छादकश्चैवच्छिद्रान्वेषणतत्परः ।
का घर और भोजन रनानेका स्थान इनमें आसंगीमुक्तकेशश्ववाणकर्णाक्षिदर्शकः ६००
जो विना कहे चले जाय और जो भोजनको शिको ढक लिट्रोको जो जिसका
देख ॥ ९३॥
मन दूसरे काममें लगा हो जिसके केश मुले
विमूत्रश्लेष्मवातानांशेताकामान्पायन हो जो नाक कान नेत्र इनको दिपावे॥ ६०० ॥
पर्वकासनबंधाचाप्यग्रस्थानीवरोधका? ॥दतोल्लेखनकश्चैवकर्णनासाविशोषकः ।
और जो विष्टा मूत्र थूक अधोवायु इनको राजसमीपंचाशन्छलान्येतानिसंतिहि ॥१॥
तानफर राजाके आगे के और पलंगर दांतोके मैदको जो निकाले कान नाक
भास्न गाकर पेठे और राजाके मुख्य मेलको निकासे, ये पूर्वोक्त पचास ५० छळ.
राजाके समीप होते हैं ॥१॥
स्थानका विरोध करे॥२४॥
४.] भापाटीकासहित । (१३५) आज्ञालंघनकारःखीवधोवर्णसंकरः । जो एक आसनपर बैठे, अति अभिमानी, परस्त्रीगमनचौर्यगर्भश्चैवपतिविना ॥ २ ॥ विवादी हो वह दंड देने योग्य है जो विषय अर्थी राजाके भागे माकर कहै उसे भावेदन आज्ञाका अवलंघन करनेवाले स्रोकी हत्या, ( अ ) कहते हैं॥८॥ वर्णीका संकर, पराई स्त्रोका गमन, चोरी, कथितमाडिवाकादासाभापाखिलबोधिनी। पतिके विना गर्भकी स्थिति ॥२॥ सपूर्वपक्षासभ्यादिस्तविमृश्यययार्थतः ॥९॥ वाक्पारुष्यमवाच्यायदंडपारुष्यमेवच । और प्राड्विवाक आदिसे कहै उसे भाषा गर्भस्यपातनंचैवेत्यपराधादशैवतु ॥ ३ ॥ कहते हैं उससे सबको बोध होता है उसी कठोर वाणी निन्दाके अयोग्यको कठोर पूर्वपक्षको सभ्य आदि यथार्थ रीतिसे विचार दंड, 'गर्भका पातन ये दश अपराध होवे कर ॥९॥ आर्थितःपूरयेद्धीनंतत्साक्ष्यमाधिकंत्यजेत् । उत्कृतीसस्यघातीचाप्यामदश्चतयैवच । वादिनश्चिद्वितंसाक्ष्पकृत्वाराजाविमुद्रयेत् १०॥ राज्ञोद्रोहप्रकःचतन्मुद्राभेदकस्तथा ॥४॥ उसमें जो काम हो उसको अर्थी ( मुद्दई) अन्नको जो काटे सस्य (घास) को नष्ट से पूछकर पूर्ण करे और उसकी अधिक कर, अग्नि लगावे, राजाका जो द्रोह करे, साक्षियोंको त्यागदे वादीके हस्ताक्षरसे चि. राजाको मुद्रा (मोहर) को जो नष्ट करै ॥२॥ |न्हित कराकर राजाकी मुद्रासे अंकित करे (मोहर लगा दे) ॥ १०॥ तन्मंत्रस्यप्रभेत्ताचवद्धस्यचविमोचकः । अशोधयित्वापक्षयेयुत्तरंदापयंतितान् । अस्वाभिविक्रयंदानभागंदंडविचिन्वति ॥५॥ रागाल्लोभाद्यावापिस्मृत्यर्येवाधिकारिणः॥ राजाकै मन्त्रको जो नष्ट कर बद्ध (कैदी) विना पूर्वपक्षको शुद्ध किये जो उत्तर को जो छोड़ दे विना स्वामीके जो बेच दे दिवाते है उनको और प्रीति लोभ भयसे जो वा दान करै, दंडके भागको जो ढूढे ॥ ५॥ धर्मशास्त्र के अधिकारी विरुद्ध करें ॥ ११ ॥ पटहायोपणाच्छादिद्रव्यमस्वामिकंचयत् । सभ्यादीन्दंडयित्वातुह्यधिकारान्निवर्तयेत् । राजावलीढद्रव्यंचयञ्चैवागोविनाशनम् ॥६॥ ग्राह्याग्राह्यविवादंतुसुविमृश्यसमाश्रयन् १२॥ ढंडोरेके शब्दको जो छिपावे, विना स्वामी उन सभासद आदिकोको दंड दिवाकर के द्रव्यको और राजाके मिलाने योग्य द्रव्य उनके अधिकारोको छीन ले और ग्रहण करने (कर आदि) को जो ले और जो अपराधोके योग्य और अयोग्य विवादको भली प्रकार अपराधको नष्ट करै।। ॥६॥ विचार कर रामा कर ॥ १२ ॥ द्वाविंशतिपदान्याहुपज्ञेयानिपंडिताः । संजातपूर्वपक्षतुवादिनसनिरोधयेत् । उद्धतःकरवाग्वेपोगर्वितश्चंडएवहि ॥७॥ राजाज्ञयासत्पुरुपैःसत्यवाग्भिमनोहरैः॥१३॥ हे पंडितो ये बाईस २३ पद राजाके जानने जब वादीका पूर्वपक्ष पूरा होले तब उस योग्य हैं और जो उद्धत (उदंड) कठोर वादीको राजाको आज्ञाके अनुसार सज्जन वाणी तथा वेषवाला हो अभिमानी और सत्यवादी मनोहर पुरुष रोक दे ॥ १३ ॥ क्रोधी हो ॥ ७॥ निरालसेंगितज्ञैश्चदृढशस्त्रास्त्रधारिभिः । सहासनश्चातिमानीवादीदडमवाप्नुयात् । वक्तव्यहातिष्ठंतमुकामंतवतद्वचः ॥ १४ ॥ अथिनाकथितराज्ञतदावेदनसंज्ञकम् ॥८॥ और जो आलस्यरहित चेष्टाके ज्ञाता दृढ (१३६) शुक्रनाति । [अध्याय- - वह शस्त्र अनाको जो धारण किये हो, जो वादी अकल्पवालस्थविरविषमस्थक्रियाकुलान् । कहने योग्य अधर्म न टिकै अथवा अपने कहे कार्यातिपातिव्यसनिनृपकार्योत्सवाकुलान् । वचनका अवलंघन करै ॥ १४ ॥ असमर्थ, बालक, वृद्ध, पठिण, काममें आसेधयेद्विवादा यावदाहानदर्शनम् । व्याकुल, कार्यम अत्यंत आसक्त, व्यसनी, प्रत्यर्थिनंतुगपैयैराज्ञयावानृपस्यच ॥१५॥ गजाके कार्य और उत्सवामें व्याकुळ ॥ २१ ॥ उसको सवतक रोक दें जयतक राजाको मत्तोन्मत्तममत्तातभृत्यानाहानपेन्नृपः । आज्ञा न हो और प्रत्ययों (मुद्दाले) को सौगध नहीनपक्षायुवतीकुलेजातांप्रसूतिकाम् २२ और राजाकी आज्ञासे रोके ॥ १५ ॥ मत्त, उन्मत्त, प्रमत्त, रोगी ऐसे भृत्योंसे स्थानासधाकालकृतःप्रवासात्कर्मणस्तया । अपराधियोंको राजा न बुलावे और हीन चतुर्विवास्यादामेवोनासिद्धस्तविलंघयेत् १६ ( दुट) जिसका पक्ष हो उस स्रीको और आसेध स्थान काल, परदेश और कुटीन स्री और प्रसूता स्त्रीकोभी राजा न कर्मस पैदा होनेसे चार प्रकारका होता बुलावे ॥२३॥ है उस आसेधको प्राप्तहुआ मनुष्य आलेधका सर्ववत्तिमांकन्यांनज्ञातिप्रमुवाः खियः । अवलंघन न करें ॥ १६ ॥ यस्विद्रियनिरोधनव्याहारोच्छासनादिभिः । निर्वेष्टुकामारोगायियायसनस्थितः॥२३॥ ब्राझगकी कन्या' और जाति में मुख्य स्त्री आमधयेदनासधैःसदंड्योनत्वतिक्रमी ॥ १७॥ कभी न बुलाये विवाहमें उद्यत (लगा , जो मनुष्य इंद्रियोंके रोकने, वाणी, ऊर्ध्व-रोगसे दुखी, यज्ञका कर्ता, विपत्तिम हा आदि अनासेघरूपांसे आसेध करै वही स्थित ॥ २३ ॥ दड देने योग्य होता है और अवलंघन करने वाला दख्य नहीं होता।॥ १७॥ अभियुक्तस्तयान्येनराजकार्योद्यतस्तया । आसेघकालआसिदआसेधंयोनिवर्तते । गांप्रचारगोपालाःसस्यवापेकपीवला: ॥ सविनयोन्ययाकुर्वन्नासेदादंडभाग्भवेत्॥१८॥ और अन्यके संग जिसका विरोध हो भारोधक समयपर आधको प्राप्तहमा जो जो राजाके काममें लगा हो, जो गोगल गौ- मनुष्य मासेधसे हटता है अन्यया करने पर रहे हो ॥ २४ ॥ माको चुगा रहे हो और जो किसान खत पो घदंड देने योग्य होता हे भासंध करानेवाला दंडका भागी नही होता ॥ १८॥ शिल्पिनश्चापित कालमायुधीयाश्वविप्रदे ।। यस्याभियोगंकुरुतेतत्त्वेनाशफयायवा । अव्याप्तव्यवहारश्चदूतोदानोन्मुखोवती ॥२५॥ तमेवाहानयेद्राजामुद्रयापुरुपेणवा ॥ १९॥ जो शिल्पी हो और जो तरपलिमें दडाम निस मनुष्पपर अपराधी शंका हो या जो आयुध धारण किये हो जो व्यवहारको नका. यथार्थ अपराधी हो उस मनुष्य हो जानता हो, दून, दान देने को जो उद्यत हो और अपने पुरुष अपया मुद्रासे जुटाये ॥१॥ जो उनमें भासत हो॥२५॥ गंगाऽसतातुर्ममर्गादनुभूतकृतस्तथा :-- विषमस्याश्च नामपानचतानाइयेन्नृपः। चोटाभिदर्शनात्तन्वविज्ञास्पतिविचक्षणः २०॥ नदीसंसारकांताग्दु गोपपुवादिषु ॥ २६ ॥ टगि संपन्धरी मयया पारंगार कार्य गो विषय(भयानक) म्यानमें थेठे वादना देनेगे फा होती है भार अपराधियों भागद न परे (न पकडे)न राना इनको मा गमनस पंडितनन तापमो जानन्द) पापं नदीका तिना यन भीर भपानक देखणे. पद्रव भादिम ॥ ६॥ २०॥
भापाटीकासहित। (१२७) Ti- । असिद्धस्तपरासेषमुस्क्रामन्नापराप्नुयात् । यह कार्य उसीका किया समझना यह हट नहीं सकता और जिस मनुप्यको नियत कालंदेशचविज्ञायकार्याणांचबलाबलम् २७॥ कर उसको सोलह भागभृति (नोकरी) जो मनुष्यको पकडे और वह उसके दे ॥३३॥ पकडनेको रोके तो अपराधी नहीं होता कार्य और देशको और कार्योंक चल अचलको अन्ययाभृतिगृहतंदंडयेचनियोगिनम् । जानकर॥२७॥ कार्यानित्योनियोगीचनृपेणस्वमनीपया ३४॥ अकल्पादीनपिशुनान्यानहानयेन्नृपः । जो नियुक्त किया मनुष्य भन्यथा भृतिको ज्ञात्वाभियोगयेपिस्युर्वनेमवाजतादयः २८ ॥ ग्रहण करता है उसको दंड दे और राजाभी असमर्थ और सजन आदिको राजा यान खदाके लिये अपनी बुद्धिसे एक नियुक्त मनु- (सवारी) में बुलवावे और जो वनमें संन्या-प्य करै ॥ ३४ ॥ सी आदि हों अपराध जानकर ॥२८॥ लोभेनत्वन्यथाकुर्वनियोगीदंडमर्हति । तानप्याद्वानयाजागुरुकायेंव्वकोपयन् । योनभ्रातानचपितानपुत्रोननियोगकृत् ।।३५॥ व्यवहारानाभज्ञेनह्यन्यकार्याकुलनेच २९ ॥ यदि नियुक्त मनुष्य लोभसे अन्यथा उनकोभी गुरु (भारी) कामके लिये इस कर तो दंडके योग्य होता है, जो भ्राता, प्रकार बुलावे जप्स वे कुपित नही जो व्यवहा-पिता, पुत्र ये नियोगको न करें और ॥ ३५ ॥ रको न जानतादो अथवा अन्य कार्यम व्याकुल परार्थवादीदंड्य-स्याइयवहारपुवित्रुवन् । हो ॥ २९ ॥ तदधीनकुटुंविन्यस्वैरिण्यागणिकाचयाः३६ प्रथिनार्थिनातज्ज्ञाकार्य:प्रतिनिधिस्तदा । निष्कलायाश्चपतितास्तासामाहानमिष्यते । अप्रगल्भजडोन्मत्तवृद्धस्त्रीवालरोगिणाम् ॥ पराये अर्थको कहे व्यवहारमै विरुद्ध कह- ऐसा प्रत्ययों और अर्थी व्यवहारके ज्ञाता ता हुआ वह दंडके योग्य होता है और प्रतिनिधि (मुखत्यार) को सदैव करलें जो जिन त्रियोंके आधीन कुटुम्य हो और जो प्रगल्भ न हो, जड, उन्मत्त, वृद्ध, खी व्यभिचारिणी और वेश्या हों ॥३६ ॥ जिन- बारका रोगी॥३०॥ के कुल न हो और पतित हो ऐसी स्त्रियोंका पूर्वोत्तरंखदेदनियुक्तोवाथवानरः । कुल्लाना श्रेष्ठ है। पितामातासुहृदधुर्धातासंबंधिनौपिच॥३१॥ प्रवतीयस्वावादतुवादिनौतुमृतीयदि ॥३७ ।। इनके पूर्व और उत्तर पक्षको चन्धु अथवा तपुत्रोविक्देत्तज्ज्ञोह्यन्यथातनिवर्तयेत् । नियुक्त (मुखत्यार) मनुष्य अथवा पिता, यदि विवादको लगाकर दोनो वाठी मरगये माता, मित्र, भ्राता वा सम्बन्धी कह ॥ ३१॥ ही ॥ ३७ ॥ तो व्यवहारका ज्ञाता उसका योदकुर्युरुपस्थानवादतत्रप्रवर्तयेत् । पुत्र विवाद करै यदि पुत्र न करें तो विवा- यः कश्चित्कारयत्किचिन्नियोगायेनकेनचित्॥ दको निवृत्त करदे॥ जो ये उपस्थान (पूर्वपक्ष) ठीक २ कर दे मनुष्यमारणेस्तेयेपरदागाभिमर्शने ॥ ३८॥ तो वहां विवादको प्रवृत्त कर, जो मनुप अभक्ष्यमाणेचैवकन्याहरणदूषणे । जित किसीसे नियुक्त करके अपने किंचित प्रतिनिधिर्नदातव्याकर्तातुविवदेत्स्वयम् । कार्यको कराले ॥ ३२॥ पारुष्यफूटकरणेनृपद्रोहेचसाहसे ॥ ३९ ॥ तत्तैनवकृतज्ञयमानवत्यैदितत्स्मृतम् । मनुप्यके मारना, चोरी, पराई स्त्रीके नियोगितम्यापिभूतिविवादात्षोडशांशिकीम्॥ ॥ ३८ ॥ अभश्य वस्तुके भक्ष- ।
(१३८
अध्याय-
शुक्रनीति।
मा
णमें कन्याके हरने या दोष लगाने में, कठोर स्वपुष्टौराजपुष्टौवास्वभृत्यापुष्टिरक्षकौ ॥
वचन कहने,झूठ करने,राजाके द्रोहऔरसाह- ससाधनौतत्त्वमिच्छु:कूटसाधनशंकया ॥४६॥
समें प्रतिनिधिको न दे किंतु अपराध
करनेवाला स्वयं विवाद करै ॥ ३९ ॥
जो स्वयं पोषण करवा राजा जिसका
आहूतोयत्रनागच्छेद्दपी बंधुबलान्वितः ।
पोषण कर अथवा अपनी भृति ( नोकरी)
से जो पोषण और रक्षा करै इन सबके
अभियोगानुरूपेणतस्यदंडंप्रकल्पयेत् ॥४०॥ साधन सहित तत्वकी इच्छाको राजा कर
जो बंधु और बलले संयुक्त मनुष्य बुलाने क्योकि कोई साधन झूठा न होजाय ॥ ४६॥
पर न जाय तो अपराधके अनुसार उसके प्रतिज्ञादोपनिर्मुक्तंसाध्यसत्कारणान्वितम् ।
दंडकी कल्पना करै ॥१०॥
दूतेनाहानितंप्राप्ताधर्षकमतिवादिनम् ॥ ४१॥
निश्चितलोकसिद्धंचपक्षपक्षविदोविदुः ॥४७॥
प्रतिज्ञाके दोषोंसे रहित अच्छे कारणों
दृष्ट्वाराज्ञातयोश्चित्योयाहप्रतिभूस्त्वतः ।
सहित जो निश्चय किया और लोक
दास्याम्यदत्तमेतेनदर्शयामितवांतिक ॥४२॥ सिद्ध साध्य, पक्षके जाननेवाले उसको पक्ष
दूतके बुलानेसे प्राप्त हुये जो अपराधी कहते है ॥ १७ ॥
और प्रतिवादी उनको ॥ ४१ ॥ देखकर राजा अन्यार्थमर्थहानंचप्रमाणागमवर्जितम् ।
उन दोनोंके यथोचित साक्षीकी चिन्ता लेख्यहीनाधिकंभ्रष्टंभापादोपाउदाहताः ।।
कर जो यह न देगा तो मै दूगा और आपके जो अन्य अर्थवाला हो अथवा अर्थसे
समीप पहुँचा दूंगा ।। ४२ ।।
एनमाधिदापयिष्यास्मात्तनभय क्वचित् ।
हीन ( रहित) हो, प्रमाण और आगमसे
वर्जित हो लिखने योग्य वातसे हीन हो वा
अकृतचकारिप्यामिह्यनेनायंचवृत्तिमान् ४३॥ अधिक हो वा भ्रष्ट हो ये भाषा ( भनी ) के
और
इससे आधि- ( धरोहर ) को दोष कहे हैं ॥४८॥
दिवायूँगा इससे आपको कदाचित् भी भय अप्रसिद्धनिरावाधनिरनिष्प्रयोजनम् ।
न होगा जो इसने नही किया है उसे असाध्यवाविरुद्धवापक्षाभासंविवर्जयेत् ॥४९॥
करादंगा और यह आजीविकावाला है ॥ ४॥
जो प्रसिद्ध न हो निरावाध हो निरर्थक
अस्तीतिनचमिथ्यैतदंगीकुर्यादतंद्रितः।
हो निष्प्रयोजन हो आसाध्य हो वा बिरद्ध
प्रगल्भोवहुविश्वस्तश्चाधीनोविश्रुतोषनी ४४॥
हो ऐसे
पक्षाभास (नामका पक्ष ) को
यह कभी मिथ्या नही बोलेगा इस
वर्ज दे ॥ ४९ ॥
बातदो निरालत होकर स्वीकार कर नकेनचितादृष्टःसोऽप्रसिद्धउदाहृतः ।
जो धनी प्रगल्भ हो जिसका अधिक विश्वास अहमूकेनमंशप्तोवंध्यापुत्रणताडितः ५०॥
हो जो अधीन हो और विख्यात धनवान्
हो ॥४४॥
जो कि सीने सुना न हो न देखाहो उसको
उभयोःप्रतिभूयःसमर्थःकार्यनिर्णये ।
अप्रसिद्ध कहते है, जैसे कि मुझे गंगेने
गाली दी और वंध्याके पुत्रने मुझे माग॥५०॥
विवादिनौमनिरुध्यततोवादप्रवर्तयेत्॥ ४५ ॥ अधीतसु स्वरंगातिस्वेगेहेविहरत्ययम् ।
वादी और प्रतिवादीकै ऐसे साक्षीको धत्तमार्गमुखद्वारममगेहसमीपतः ॥ ५१ ॥
राजा ग्रहण कर जो कार्य निर्णय करनेम
समर्थ हो दोनों वादी प्रतिवादियों को बड़े ऊ स्वरसे पढता है गातादे और अपने
यह मनुष्य मेरे घरके समीप अपने घरमें
रोककर यादी प्रवृत्तिको राजा का दरवाजा भेडकर कोडा करताई ॥५१॥
४.] भापाटीकासहित । (१३९) इतिज्ञेयनिरावाधनिष्प्रयोजनमेवतत् । श्रुतार्थस्योत्तरलेख्यपूर्वावेदकसन्निधौ । सदामदत्तकन्यायांजामाताविहरत्ययम्॥५२॥ पक्षस्यव्यापकंसारमसंदिग्धमनाकुलम् ५८॥ इसको निरायाध जानना और वही निष्प्र. सुने हुए अर्थका उत्तर वादीके सन्मुस योजन होता है, यह मेरा जमाई मेरी लिखना चाहिये जो संपूर्ण पक्षका व्यापक दी हुई कन्या सदैव विहार करता है ॥५२॥ ( पूस) हो और सार, संदेहरहित व्याकु- गर्भवतेनवंध्येयंमृतोयनमभापते । लतासे न दिया हो॥ ५८॥ किमर्थमितितज्ञेयमताध्यंचविरुद्धकम् ५३॥ अव्याख्यागम्पमित्येतन्निदृष्टंप्रतिवादिना । और गर्भ धारण करती है क्योकि मेरो संदिग्धमन्यत्प्रकृतादत्यल्पमतिभरिच ६९ ॥ कन्या वंध्या नहीं है और मेरे संग मरा जो टीकाके विना समझाय और यह बोलता क्यों नहीं इसको असाध्य और प्रतिवादी जिसमें कोई दोष न दे और जो विरुद्ध कहते हैं ॥५३॥ उचित उत्तरसे भिन्न हो अथवा अत्यन्त अल्प महत्तदुःखसुखतोलोकोदुष्यतिनंदात । और अत्यन्त अधिक हो वह संदिग्ध उत्तर कहाता है॥ ५९ ॥ निरर्थमितिवाज्ञेयनिष्प्रयोजनमेववा ॥ ५४॥ पक्षकदेशेव्याप्ययचत्तुनवोत्तरंभवेत् । मेरे दिये दुःखसे जगत् दुःखी और नवाहूतोवदेत्किंचिद्धीनोदंड्यश्चस स्मृतः ६० सुखसे प्रसन्न होताहै इसको निरर्थक वा निष्प्रयोजन जानना ॥ ५४ ॥ जो उत्तर पूर्व पक्षक एकदेशका हो वह उत्तर नहीं होता और प्रतिवादी बुलाने श्रावयित्वातुयत्कार्यत्यजेदन्यवदेदसौ। पर कुछ न कहै वह हीन और दंड देने योग्य अन्यपक्षाश्रयावादीहीनादेडचश्चसस्मृतः।। कहा है ।। ६०॥ जो यह पुरुष एक कार्यको सुना कर पूर्वपक्षेययातुनदद्यादुत्तरंतुयः । त्याग दे और अन्य कार्यको कहने लगे वह प्रत्यर्यादापनीयःस्यात्सामादिभिरुपक्रमः६१॥ वादी अन्यपक्षके आश्रयसे हीन और दंड देने जो प्रतिवादी यथार्थभी पूर्वपक्षका उत्तर योग्य कहा है ॥ ५५ ॥ न दे वह शांति आदि उपायोंसे दंड देने योग्य विनिश्चितेपूर्वपक्षग्राह्याग्राह्यविशोधित । होता है ।। ६१॥ प्रतिज्ञार्थस्थिरीभूतेलेखपेदुत्तरततः ॥५६॥ मोहादायदिवाशाट्याद्यन्नोक्तंपूर्ववादिना । जब पूर्वपक्ष ( अर्जी ) का निश्चय हो उत्तरांतर्गतवातत्प्रश्नैाह्यद्वयोरपि॥६॥ जाय और ग्रहण करनेयोग्य वा अयोग्यका मोह वा शउतासे जो बात पूर्व वादीने न निश्चय होजाय और प्रतिज्ञा कियाहुआ अर्थ कही होतअथवा जो उत्तरमें ही आजाय वहयात स्थिर हो जाय उसके अनंतर उत्तरको पूछकर दोनोंकी ग्रहण करने योग्य है ॥ १२ ॥ लिखे ॥ ५६ ॥ सत्यंमिथ्योत्तरचैवप्रत्यवस्कंदनंतथा । तत्राभियोक्ताप्राक्पृष्टोद्यभियुक्तस्त्वनंतरम्। पूर्वन्यायविधिश्चैवमुत्तरस्याच्चतुर्विधम् ॥६३॥ प्राइविवाकसदस्याद्यैर्दाप्यतेात्तरंततः ५७॥ सत्य, मिथ्या, उत्तर और प्रत्यवस्कन्दन उस समय वादीको प्रथम पूछे और और पूर्वन्यायका विधान इन भेदोंसे उत्त प्रतिवादीको उसके अनंतर और फिरचार प्रकारका होता है । ६३ ।। प्राविधाक और सभासद आदिसे उत्तर अंगीकृतययाथैयद्वायुक्तंप्रतिवादिना । दिवावे ।। ५७ ॥ सत्योत्तरंतुतज्ज्ञेयप्रतिपत्तिश्चसास्मृता ६४
(१४०)
शुक्नीले।
[अध्याय-
जिस वादीके कथनको प्रतिवाटीने यथार्थ लिखितेशोधितेसम्यक्सतिनिदोपउत्तरे !
मानलियाहो उसको सत्योत्तर कहते है और आर्थप्रत्यर्थिनोपिक्रियाकारणामिप्यते ७१॥
वही प्रतिपति कही है ॥ ६४ ॥
श्रुत्वाभाषार्थमन्यस्तुयादितमतिपेयति ।
तब दोनों वादी और प्रतिवादीकी क्रिया
(मुकद्दमा) का करना अच्छा कहा है जब
अर्थतःशब्दतोवापिमिथ्यातज्ज्ञेयमुत्तरम् ।। उत्तर लिखकर ओर शुद्ध होकर निदोष हो
भाषा ( मर्जी) के अथको सुनकर यदि जाय ।। ७१ ॥
उसका कोई अर्थ वा शब्दसे निषेध करै वह पूर्वपक्षःस्मृत पादोद्वितीयश्चेोत्तरात्मकः ।
उत्तर मिथ्या जानना ॥ ६५ ॥
भियतनाभिजानामितदातरमसन्निविः।
क्रियापादस्तृतीयस्तुचतुर्थीनिर्णयाभिवः ।।
अजातश्चास्मितत्कालेइतिमिथ्याचतुर्विधम्६६) पय पाद पूर्वपा दूसरा पाद उत्तरतीसरा
और इन भेदास न्याय चार प्रकारसे होता
यह मिथ्या है, मैं जानता नही, उस समय पाद किया और चौथा पाद निर्णय क्दा
मेवा समाम नहीं था और उस समय मे है।
अंदाही नहीं हुआथा इस प्रकार मिया चार काहिसाध्यमित्युक्तंसाधनंतुक्रियांच्यते ।
प्रकारका है॥६६ ॥
अधिनालिखितोह्यर्थ प्रत्यर्थीयदितंतया ।
अर्थातृतीयपादेतुझियाया प्रतिपादयेत् ७३॥
प्रपद्यकाणयात्मत्यवस्कंठनादितत् ६७ ।। कार्यको साभ्य कहते हैं और क्रियाको वा
वादीने जो अर्थ लिखा हो उसको यदि धन और वादी क्रियारूप तीसरे पादमे साध-
नको कदै ॥७३॥
वादी मानकर कोई कारण कहै उस उत्तरको
प्रत्यवस्पन्दन कहते है ॥ ६७॥ चतुष्पाद्यवहार स्यात्प्रतिपत्युत्तरविना ।
आस्मिन्नर्थेममानेनवाट पूर्वमभृत्तदा । क्रमागतान्विवादास्तुपश्येद्दाकार्यगौरवात् ।।
जितोयमस्तिचेयात्माइन्याय सउदाहतः, और प्रतिपत्ति उत्तरकै विना व्यवहारके
इस विपर्यम मेरा इनके सग पहिले विवाद चार पाद होते है, और सभामे क्रमसे आये
हुमाया उसमें इसरो पराजय कर चुकाहू उस जो विवाद उनको कार्यके गौरवानुसार राजा
उत्तरको माइन्याय कहते है ॥ ६८॥
देखे ॥ ७ ॥
जयपत्रणसभ्यासाक्षिभिर्भाक्याम्यहम् । यस्यवाभ्यधिकापीडाकार्यवाभ्यधिक भवेत् ।
मयाजित पूर्वामिति प्राइन्यायन्त्रिविध स्मृत वर्णानुक्रमोवापिनेयविवादयेत् ॥७॥
वह प्राट्न्याय इन भेदासे तीन प्रकारका जिसको अधिक पीडा हो अथवा जिसका
पदा है कि जय पत्रले वा सभासदोंसे वा कार्य अधिक हो अथवा जो चारों वर्णीम उत्त-
सादियांसे मै भावना (निश्चय) कर सकता हो उसकाही प्रथम न्याय वा विवादका
॥६९ ॥
निर्णय करें।। ७॥
अन्योन्ययोसमझतुवादिनो परमुनरम् । कल्पयित्वोत्तरंसभ्यतिव्यैकस्यभावना ।
नदिगृहतियसम्पादंडयास्तचौरवत्सदा ७०॥ साध्यस्यसाधनाहिनिर्दिष्टायस्यभावना ॥
जीउभाउद दोनां पाती और प्रतिवादीके सभासद उत्तरपी कल्पना करके. यह देख
सुमा ( सामने) पक्ष वा उत्तरको ग्रहण न वि देने योग्य वस्तुमें भावना किसकी है और
करें ये सब चोरके समान दड देने योग्य साय वा साधन लिये जिसकी भावना
दिखी हो ॥ ७६ ॥
भाषाटीकासहित ।
(२४१)
-
विभायमातिज्ञातंतोऽरिवलंलिसितादिना । नकालहरणकार्यराज्ञासाधनदर्शने ।
नचैकस्मिन्विवादेतुक्रियास्यावादिनोईयो ॥ महान्दोषोभवेत्कालाद्धर्मव्यापत्तिलक्षण:८३
यही मनुष्य सपूर्ण प्रतिज्ञा विपका रिएने राजा साधन देखने में विलय न करें क्यो
आदिसे निश्चय करादे और एक विवादमे दो कि समयके विलबसे धर्मका नाशरूप महान्
वादियोकी क्रिया नही होती ॥७॥ दोष होता है ।। ८३ ॥
मिथ्याक्रियापूर्ववादेकारणप्रतिवादिनि ।
अर्थोप्रत्यार्थप्रत्यक्षसाधनानिप्रदर्शयेत् ।
प्राइम्पायकारणोक्तीतुमत्य निर्दिशोक्रियाम अप्रत्यक्षतया वगृहीयात्साधननृपः ।। ८४ ॥
पूर्व वादमे जो प्रतिवादी कारणको कदै वहा वादी अपने साधनों (सबूत) को प्रतिवा
मिप्याक्रिया होती है और प्रथम न्यायकै कार-दीके सामने दिसावे और राजा वादी ओर
णको प्रतिवादी कहै वहां प्रतिवादी ही उसका प्रतिवादीके अप्रत्यक्षा ( पीछे) साधनको
कारण दिखावे ॥ ७८॥
स्वीकारन करे ॥ ८॥
तत्त्वाच्छलानुसारिवाटूतभव्यद्विधास्मृतम् ।
साधनानांचयदोपावक्तव्यास्तेविवादिना ।
तत्त्वंसत्यार्थाभिधायिफूटाद्याभिहितउरम् ७९
गूढास्तुप्रकटाःसभ्य कालगात्रप्रदर्शनात ॥
यथार्थ और छलके अनुसार भूत और भव्य
और प्रतिवादीके साधनामे जो दोप हा
दो प्रकारका कहा है जो सत्य अर्थका अभिधा उनको वादी कहै और जो दोप गुप्त हो
यी हो वह तत्त्व और जो कृटादिभोंको कहै उनको काल और शास्त्र के अनुसार सभासद
वह छल कहा है॥७९॥
प्रगट करें ।। ८५॥
कारणात्पूर्वपक्षोपि उत्तरत्वं प्रपद्यते ।
ततोर्थीलेखयेत्सद्य प्रतिज्ञातार्थसाधनम्।।८।।
अन्ययादूपयन्दंडयः साध्यादिवहीयते ।
विमृश्यसाधनसम्यक्कुर्यात्कार्यविनिर्णयम् ।।
किसी कारणले पूर्वपक्ष भी उत्तर होजाता यदि वादी अन्यथा (ठा) ही दोष दिखा-
है, फिर अर्थो (वादी ) अपने प्रतिज्ञा किये वे तो दडदेने योग्य है और अपने साध्य अर्थ
अर्थक साधनको लिस।। ८०॥
को प्राप्त नहीं होता और राजा साधनको
तत्साधनंतद्विविधमानुपदेविकतथा ।
भळीप्रकार विचार कर कार्यका निणय
विधास्याल्लिखितभुक्ति साक्षिणश्चेतिमा करै ।। ८६॥
नुपम् ॥ ८१॥
कूटसाधनकारीतुदंड्या कार्यानरूपत ।
वह साधन मानुष और देविभेदस दो द्विगुणंकटसाक्षीतुसाक्ष्यलोपतिर्थवच ८७ ॥
प्रकारका हे तिनमें मानुष साधन इन भेदोस झठा साधन करनेवालको कायक अनुसार
तीन प्रकारका होता है कि लिखाहुभा, वा राजा दड दे और झूठे साक्षी और साक्षीरे
भोगाहुआ अथवा जिसमें कोई साक्षीहो ॥१॥ लोप करने वालेको दूना दड दे ॥ ८ ॥
दैवघटादितद्भव्यभूतालाभेनियोजयेत् । अधुनालिरिक्तवनिमययावदनुपूर्वशः ।
युक्तानुमानतोनित्यसामादिभिरुपमैः ८२॥ अनुभूतस्मारकंतुलिखितब्रह्मणाकृतम् ८८ ।।
घट (तोल ) आदि देव होता है उसको अभी लिखे हुयको क्रमसे यथार्थ कहताहूँ
भूत और भव्यक न मिलनेपर युक्ति अनुमान और जो अनुभूत (चीती) का जतानेवाला
और साम आदि उपायोले नियुक्त करै ॥८॥ वह लेख ब्रह्माका क्यिा समझना ॥ ८८ ॥
(१४२) शुक्रनीति । [अध्याय- " राजकीयाफिकंचद्विविधलिखितस्मृतम् । पितरो नाम पितामह और प्रपिताम. चित दके नाम और क्षमाआदिके अन्य स्वहस्तलिखितधान्यहस्तनापिविलेखितम्८९॥ इन सबको पक्ष ( मर्जी ) में क्हकर लेख दो प्रकारका होता है एक राजकीय लिखवावे ॥९५ ॥ और दूसरा लौक्कि वह चाहै अपने हायसे यौतानिनालख्यतेहीनलस्पतदुच्यते। दिसा हो वा अन्यके हायसे लिखा हो। ८९॥ भिन्नक्रमयुक्रमार्थप्रकीर्णानिर्यकम्।९६ ॥ असाक्षिमत्साक्षिमञ्चसिद्धिर्देशस्थितेस्तयोः । जिसमें ये सब न लिखे जाप उसको हीनदेख कहते है और क्रमरहित और भोगदानक्रियावानसंविदासऋणादिभिः ॥९० जिसका क्रम उल्लदा हो वा जिसका और चाहे वह साक्षीले युक्त हो वा अयुक्त हो, अर्थ प्रकीर्ण ( कम ) हो अथवा निरर्थक उसकी सिद्धि देशरीतिक अनुसार होती है। हो॥२६ और भोगन दान क्रिया माधान { धरो- अतीतकाललिखितंनस्यात्तत्माधनक्षमम् । हर ) सक्ति (करार) दास और ऋण आदिभेदसे ॥२०॥ अप्रगल्भेणचवियावलात्कारणयत्कृतम् ॥ सप्तधालौकिकंवैतत्रिविधंराजशासनम । मो समय (मियाद) विताकर लिखा है शासनार्थज्ञापनानिर्णयार्यतृतीयकम् ॥११॥ वह देय साधनके योग्य नहीं होता और जो चौलिक सात प्रकारका और राजाका मप्रगल्भ मनुष्यने अथवा स्त्रीने किया दो बह- शासन तीन प्रकारका है, शिक्षा रिये भी साधनयोग्य नहीं ॥ ९७॥ जताने के लिये और तीसरा निर्णयके सट्रिलेख्य साक्षिभिश्वभोगेर्दिव्यैःप्रमाणताम् । लिये ॥२१॥ व्यवहारेनगेयातिहासुप्राप्तुतेसुसम् ॥९८॥ राजास्वहस्तसंयुक्तस्वमुदाचिहितंतया। गजकीयस्मृतलेख्यंप्रकृतिभिश्चमुद्रितम् ।। और अच्छे देससाक्षी, भोग (वर्तना वा जो राजाने अपने झापसे दिसाहो अयव फरजा) दिव्य इनसे मनुष्य व्यवहारमे प्रमा- जिसपर राजाक प्रकृति (मत्री) आदिन अपनी ताको माप्त होता है और चेष्टाम सुखका राजमुद्रा लगा दी हो भयया ।। ९. भागी होता है॥२८॥ निवश्यकालंवचमामंपतियितथा । स्वतर.कार्यविज्ञानीय सताक्षीमनेकधा । वेलामदेविपर्यस्थानंजात्याकृतिपय ॥९॥ दृष्टार्थश्चश्रुतार्थश्चतश्चैवाताद्विधा १९९॥ जिस्म सयव मनु महीना पक्ष तिधि सम-1 मरनेसे भिन्न सो कार्यका ज्ञाता वद य देश चिपय स्थान जातिभापार और भय साक्षी दाता ६ उस भनेक भेद है एक पद स्था और ॥१३॥ जिसने देशादो और जिसने सुना हो और यह साध्यंप्रमाणंढयंचसंन्यांनामतयात्मनः । साशी दो प्रकारका होता है, क्रिया हो या न दिपाहो ॥१॥ गजारकमगीनामनिवासनाध्यतामच॥९॥ अधिमत्ययितानिन्याउनुभूतनुप्राग्यया । साध्य (दविका द्रव्य मादि) प्रमाण द्रव्य मन्स अपना नाम और रमले राजापा दर्शन श्रवणेयाससाक्षीनुल्गपाग्यादि। नाम निशा और साम्यया नाम और ॥ ९ ॥ घाटी और प्रतिवादी समाजमा नमापितृणानामानिपितामहततीय कम । RER निउने देने सुननेमे जानादरे क्षमादिगानिवान्यानिपीयन हे॥७:०॥ यवसासीहोतापदि दसवी पाणी कमी ७०० ४] भाषाटीकासहित। यस्पनोपहताबुद्धिःस्मृति श्रोत्रंबनित्यशः । सम्बन्धी विद्या और योनेि सम्बन्धी भी सुदर्पणापिकालेनसवैसाक्षित्वमर्हति ॥ १॥ सादी नहीं हो सकते ॥ ७॥ निसको बुद्धि, स्मरण और श्रोत्र पे सदेव श्रेण्यादिपुचवर्गेपुकश्चिञ्चद्देष्येतामियात् । बहुम्काकतक नष्ट नहीं वह मनुष्य साक्षी हो-तस्यतेभ्योनसाक्ष्यस्याष्टिारःसर्वएवते ॥८॥ नेके योग्य होवाहे ॥१॥ जो श्रेणी आदि समूहमें कोई वैरभावको अनुभूतःसत्यवाग्यासकःसाक्षित्वमइति । प्राप्त हो जाय उनसे उसकी खाक्षी नहीं हो उभयानुमतःसाक्षीभवत्येकोपिधर्मवित् ॥२॥ सकती क्योंकि धे सब वैरी होते हैं ॥ ८॥ जिसको सच सच्चा जानते ही वह एकही नकालहरणकार्यराज्ञासाक्षिमभापण । साक्षी होने योग्य होता है वादी और प्रतिवादी अर्थमत्यार्थिसान्निध्यसाध्यापिचसन्निधौ ॥ दोनोंको समतिले एकभी धर्मका जानने वाला साक्षी होसकवा ॥२॥ राजा साक्षीके कथनमें समयको न बिताये ययाजातिययावर्णसर्वेसर्वेपुप्ताक्षिणः । और वादी प्रतिवादीके सामने और साध्य गृहिणोनपाधीना सूरयश्चाप्रवासिनः ॥३॥ अर्थको समीपतामें ॥ ९ ॥ जाति और वर्णके अनुसार सबही सबके सा- प्रत्यक्षवादयेत्साह्यंनपरोसंकयंचन । को होसकतेहैं जो गृहस्थो पराधीन नहीं भोर नांगीकरांतियासापदंडयास्यादिशितोयदि ॥ जो शूरवीर परदेशी न रहते हों वे और ॥३॥ प्रत्यक्ष साक्षीको कहावे परोक्षमें कदा. युवान साक्षिण कार्या:खियाखीपुचकीर्तिताः। चित न कहावे जो साक्षीको अंगीकार न करे साहसेपुचसर्वेपुस्तेयसंग्रहणणेपुच ॥ ४ ॥ वह खाध्यके दंड देने योग्य है ॥१०॥ जो युवा हों वे साक्षी करने और नियोंकी यासाक्षान्नवनिर्दिष्टानाहूतानवदेशितः । साक्षी स्त्री करनी कही हैं, और सपूर्ण साहस यान्मिय्योतितथ्यवादंडयःसोपिनराधमः ।। चोरी और संग्रहगो और ॥ ४ ॥ जिसको साक्षीके लिये न कहा हो न बुलाया वाग्दंडयोश्चपारुष्यनेपरीक्षेतप्ताक्षणः । हो न आज्ञा दी हो वह नीच नर मिथ्या वा वालोज्ञानादसत्यात्वीपापाभ्यासाचकूकृत् सत्य जती साशी दे दंड देने योग्य है ॥ ११ ॥ कठोर वाणी और कठोर दंडम साक्षियोंकी परीक्षा न करे ज्ञानसे बालक और झूठी स्त्री विधेवहूनांवव समेपुगुणिनांवचः। और पापके असे छळफा कता॥५॥ तत्राधिकरणानांचगृहीयावचनंसदा ॥१२॥ विज़्याद्रांवरनहानिर्यातनादारः । जो साक्षी में दो प्रकार हों तो जिस तरफ अभिमानाचलोभाञ्चविजातिश्चशठत्वया॥६॥ बहुतोंका वचन हो उसको सत्य ग्रहण करें बाधु स्नेहसे और शड्डू बरसे बिरुद्ध कद वालोका वचन ग्रहण कर और गुणवालों में यदि दोनों पक्षोंमें साक्षी घरावर हो तो गुण- सकता है तथा अभिमान लोभते विजाति भी जो अधिक गुणघाले हों उनके वचन मोर उभी विरुद्ध सह सकते हैं॥६॥ सदैव ग्रहण करै॥ १२॥ उपजीवनसंकोचामृत्यथैवेशासाक्षिणः । नार्थसंबंधिनोविद्यायोनसंबंपिनोपिन ॥ ७ ॥ पवानियुक्तोपीक्षेतशृणुयाद्वापिकिचन । उपजीयन (नौकरी) के सोचले भृश्य पृष्टस्तत्रापितलूयाद्ययादृष्टंपयाश्रुतम् ॥१३॥ येखर साक्षी नहीं हो सकते और धनके) जहां विना नियुक्त किया भी पुरुप देख
[अध्याय
शुक्रनीति ।
(१४४)
वा कुछ सुने वहां वह भी अपने देखै और तस्मात्सत्यहिवक्तव्यंसर्ववर्णेषुसाक्षिभिः ।
सुनेके अनुसार साक्षीको कह सकता है ॥१३॥ आत्मवह्यात्मनःसाक्षागतिरात्मैवद्यात्मनः.२०
विभिन्नकालेयज्जातंसाक्षिभिश्चांशतःपृथक् ।
तिससे सब वर्गों में साक्षी सत्य कहे अपनी
एकैकंवादयेत्तत्रविधिरेषसनातनः ॥ १४॥ आत्माका साझो आप है अपनी आत्माका गति
और भिन्न २ समयमें साक्षियोंने जहां आत्मा ही है।॥ २०॥
पृथक् २ जाना होय वहां एक २ से साक्षीका मावमस्थास्त्वमात्मानंनृणांसाक्षिणमुत्तमम्।
कथन करावे यह सनातनिक विधि है ॥ १॥ मन्यतेवपापकारीनकश्चित्पश्यतीतिमाम् २१
स्वभावोक्तंवचस्तेपांग्रहीयानबलात्कचित् । मनुष्योके यथार्य साक्षी आत्माका अनादर
उक्तेतुसाक्षिणासाक्ष्येनप्रष्टव्यंपुनःपुनः॥१५॥तु मतकर पाप करनेवाला मनुष्य यह मानता
है कि मुझे कोई नहीं देखता ॥२१॥
उनके स्वभावसे कई हुए वचनको ग्रहण
कर और बलसे कभी न करें जब साक्षी देने तांश्चदेवाःप्रपश्यतितयाह्यंतरपूरुषः ।
वाला अपनी सादीको वहदे तव वारंवार न सुकृतंयत्त्वयाकिचिजन्मांतरशतैःकृतम् २२
पूछ ।॥ १५॥
। उसको देवता और सबका अन्तयामी पर-
मेश्वर देखता है तो जो अनेक जन्ममि तने
आहूयसाक्षिणापृच्छेन्नियम्यशपर्यभृशम् ।
पौराणःसत्यवचनधर्ममाहात्म्यकीर्तनः ॥१६॥
कुछ पुण्य किया है ॥२२॥
तत्सर्वतस्यजानीहियंपराजयसेमृपा ।
साक्षियोको बुलाकर गगा मादिकी सोगंददे
पुराणके सत्य वचन, धर्मका माहात्म्य इनको,
समामेषिचतत्पापंशतजन्मकृतंसदा २३ ।।
कहकर पूछे ॥ १६॥
। वह सब पुण्य उसका जान जिसकी तू
अनृतस्यातदोपैश्चभृशमुत्रासयेच्छनैः ।
झूटी पराजय करता है, उसने जो सौजन्मों में
दोकालेकयंकस्मारिकदृष्टवायुतत्वया॥१७॥ साक्षिणश्रावयेदेवसभायानरहोगतम् ।
पाप किया है उसको तू प्राप्त होगा ।। २३ ।।
झूठ बोटने में अत्यन्त दोषोंसे बारम्बार भय दद्याद्देशानुरूपतुकाल्सावनदर्शने ॥ २४ ॥
दिखावे और शनै:२ इस प्रकार पूछे कि किस
देशमें किस कालमे विस प्रकार किस कारण सुनाव और देशके अनुसार साधन (सबूत)
इठ प्रकार साक्षीको सभामें सबके सन्मुख
से तेने इस विषय में क्या देसा क्ण सुना १७॥
दिखानेके लिये समय दे ॥४॥
लिखितंलखितंयत्तद्वदसत्यंतदेवहि । उपार्विवाससमीक्ष्यैवदेवराजकृतसदा ।
सन्यसाक्ष्यंब्रुवन्साक्षीलोकानामोतिपुष्कलान् । विनष्टेलिाखेतराजासाक्षिभागर्विचारयेत् २५॥
जो लिया हो अथवा दिरायाया दो उसीको और देव राजाको उपाधिको देखकर
सत्पं फदो साक्षीम सच बोलता हुआ सा दिसिव नष्ट हो जाय तो राजा साक्षी और
उत्तम लोकोको प्राप्त होता है॥१८॥
भोग (करना)से विचार करे ॥२५॥
इहचानुचमांकीतिवागेपाब्रह्मपूजिता ।
लेखसाक्षिविनागेतुसद्भागादेवचिंतयेत् ।
सत्यनपूज्यतेसाक्षीधर्मःसत्येनवर्पत १९ ॥
सदोगाभावत साक्षालेसताविमोत्सदा २६॥
देश और सादी दोनों न मिलें तो उत्तम
इस लोकमें उत्तम पौर्ति होती है यह वाणी भांगरे ही विचार करे और भच्छा भोगन
वेदमें भी पनित कही है सत्यमे साक्षी पुनाता चोप तो साक्षी भोर टेससे देव विचार
करे । ०६॥
रायसे धर्म पदता २॥ १९॥
भापाटीकासहित । (१४५) . केवलेनचभौगनलखेनपिचसाक्षिभिः । आगम (लेख) और दीर्घकाल और दूसरे- का छोडा हुआ विच्छेद ( भोगका अभाव) कार्यनचिंतयेद्राजालोकदेशादिधर्मतः २७ ॥ और प्रत्यर्थीकी समीपता इस प्रकार भोगाहु- केवल भोगसेया केवल लेख अथवा साक्षि- मा भोग प्रामाणिक होता है ॥ ३३ ॥ योसे राजा लोक और देशके धर्मानुसार संभोगंकीर्तयेद्यस्तुकेवलनागमंकचित् । कार्यकी चिन्ता करे ॥२७॥ कुशलालेख्पविवानिकुवैतिकुटिला सदा । भोगच्छलापदेशेनविज्ञेयःसतुतस्करः ॥३४॥ तस्मान्नलेख्यतामात्सिद्धिोकांतिकी आगमोपिचलनवभुक्ति स्तोकापियवनो। जो मनुष्य केवळ भोगको बतावे और आग. मता ॥ २८॥ मको न बता दे वह भोगके छलके बहानेसे त. कुशल और कुटिल जो लिखनेवाले स्कर (चोर)जानना यह आगम भी बलवान है वे सदैव बनावटके लेख कर लेते है नहीं होता जहाँ कुछभो भोग न होय ॥ ३४ ॥ तिससे लेखके बळसे सिद्धिका निर्णय नहीं येकचिदशवर्षाणिसन्निधौप्रिक्षतधनी ।। ३५॥ माने ॥ २८॥ स्नेहलोभभयकोवैःकूटसाक्षित्वशंकया । मुज्यमानंपरैरर्थनसतंलन्धुमति । केवल साक्षिभिनवकार्यासष्यतिसर्वदा २९॥ धनवाला मनुष्य जिस किसीको दश वर्ष- स्नेह, लोभ, भय, क्रोध इनसे झूठी साक्षी में पैदा हुये धनको दूसरे भोग रहे हैं उस धन तक अपने समीप यह देखता है कि ॥३५।। इस को शंका होसकती है इससे केनल साक्षियोंसे को वह धनवान नहीं ले सकता ॥ ही कार्यसिद्धि नहीं होती॥ २९ ॥ वर्षाणिविंशतिर्यस्यभूर्भुक्तानुपरैरिह ३६ ।। अस्वामिकस्वामिकंवाभुक्तेयदलदर्पितः । इतिशंकितभोगनकासिध्यतिकेवलैः ३०॥ सतिराज्ञिसमर्थस्यतस्यसहनासध्याति । जिस मनुष्यकी भूमिको २० बीस वर्षतक चलके भभिमानवाला मनुष्य अपनी और भोगाहो राजा विद्यमान और भूमिका पराईको भोग सकता है इस प्रकार केवळ स्वामीभी समर्थ होय उसकी वह भूमि सिद्ध शंकावाले भोगाँसे ही कार्यसिद्धि नहीं नही हो सकती॥ ३६॥ हो सकती ॥ ३० ॥ अनागभंतुयोभुक्तवहन्यब्दशतान्यपि ३७॥ शंकितव्यवहारेपुशंकयेदत्ययानहि । चौरदंडेनतपापंदण्डयेस्पृथिवीपतिः ।। अन्ययाशंकितान्सभ्यान्दंडयेचैखिन्नृपः ।। और आगमके बिना जो बहुतसे सैकड़ों वर्ष जिन व्यवहारों में शंका हो उनमें अन्यथ भी भोगे ॥ ३७॥ उस पापीको राजा चोरके शंका न करै यदि राजाके सभासद अन्यथा शंका करें तो राजा चोरके समान दंडदे॥३१॥ समान दंड दे॥ अन्ययाशंकनानियमनवस्यामजायते । अनागमापियाभुक्तिपिच्छेदोपरमोज्झिता । लोकोविभिद्यतेधाव्यवहारश्चहीयते ३२॥ पष्टिवात्मिकासापहर्तुशल्यानकेनचित् ३८॥ अन्यया शंका करनेसे व्यवहारकी भनक और विना आगमभी निरंतर जो भोगाथा स्था होती है याद निवटेग नहीं होना लोक में आठ वर्पतक होय उसको कोई नही छीन धर्म और व्यवहार दोनों नष्ट होते हैं ॥३॥ मक्ता है। सागमोदीकालश्वविच्छेदोपामाज्झितः। आधिःसीमावालधननिक्षेपोपानीधिःस्त्रियः। प्रत्यार्थसानिधानश्वभुक्तोभोगप्रमाणवत३३ ।। राजस्वश्रोत्रियस्वंचनभोगनप्रणश्यत्ति ।
(१४) शुक्रनीति । [ अध्याय- ॥१८॥ उपेक्षांकुर्वतस्तस्यनुशामतस्वतिटत: ४०॥ सारंवार प्रेरण करनेस भी जोधपने वचन कालेतिपन्नेदोक्ततत्फलंनाप्नुतेवनी । तीन चार पांच बार कहनेते न लोटे तो दक्ष को प्रतिवादीले धन मिल सकता है ॥ ४६॥ भोग सक्षपश्चोतस्तयदिव्यमयोच्यते ४१॥ युक्तिप्वप्यतममुदिव्योनधिमईयेत् । आधि(धरोहर) सी (ग्रामपात) चालकका धन, सोना, खी ॥ और यत्नावःमयुक्तातिदुष्कराय महात्मभिः ।। राजा वेदपाठीका द्रव्यय भोग (वर्तना। जहां युक्ति भी असमर्थ हार (न) वर्धा सेवन नहीं होता यदि यह उपेक्षा करें और दिव्यात मनुष्यका मर्दन को क्यों के देवता पका बैठा रहे ॥ ४० ॥ तो ओंक मर्यादा और महामामाने दुप्फर कर्म के लिरे दिन बीतनेपरमी धनकासामी उनके रुटको प्राप्त कहे ॥४॥ होता सरले भोग वणन किया भय दिन पासवियर्यतहमाद्दिश्यानिकप्पतः । वर्णन करते हैं॥१॥ सतीपाभश्च नीत्यये स्वीकृतान्पत्तगुदपे४०॥ प्रमादाननीयत्रत्रिविसावननचेत् । परारकार्यको शुद्धिक लिग दिनार अयश्चापढ्नुतेवादतियोक्तनिवेवाविषिः ॥ होते हैं और डराने के लिए समायोनेभो आ- त्मशुद्धि के लिये दियोको साकार किया। यदिधनगाले प्रमादसे जहां पर दोन प्र कारका साधन नहोर और वादी अवे (धन) को छिपाया चाहे तो वहां तीन प्रकारको स्वमहत्वाचयोदियनकुर्याज्ञानदर्पतः । विधि कही है ॥४२॥ वसिष्ठायाश्रितनित्यंसनरोधर्मतस्कर.॥ १९ ॥ चोदनामतिकालयक्तिलेशस्तथैवच । जो अपने महत्व और ज्ञानके अभिमानसे तृतीयःशपयामाक्तस्सवसाधयेकमात् ॥४३॥ नमाने वह मनुष्य का वका होता है घतिष्ठमादि ऋषियोक स्वीकार किरदिन्यतो प्रेरणा समस्का पत्यार और युक्तिका लेश ॥ १९ ॥ और तोपरा शरय (सोगद ) इन तीनवे कार्य प्राप्तेदियग्निशोद्राह्मगोज्ञानदुः। की सिद्धि राजा की।४३ ॥ तहन्तियर्धितत्यदेवानसंशयः ॥५०॥ विशिष्टतातायाचशास्त्रशिष्टाविरोधिनी । ज्ञानका दुल बाह्मण दिपको मानि योजनास्तासियेतायुक्तिस्तुनचान्यया ॥ समय निदान कर जो लोगद न करतो देश- जो उत्तम तकना होय शाखोर गिटोका ता उसके पाये धर्मको दरले॥ ५० ॥ निमें विरोध न होर और भने यस्तुस्वमुद्धिमन्विच्छन्दिर्यदद्वतन सिद्धिका योग होय उसे युक्ति कहते हैं भन्न- विशुद्धोलभतेकोतिस्वर्गवैवान्यवान ५॥ को नहीं ॥४॥ जो मनुष्य अपनी शुद्धिको इच्छा करता दानंप्रज्ञापनाभेदातपटमास्याचया । मादको छोर दिपका स्वीकार करता चित्तापनयनचहेतबाहिविभागकाः, १४६॥ होता भाया नही होता ॥ ५ ॥ ६. विशुद्ध हुआ यह कीति और स्कोर देना, समझना, फोहमा और उतर लोभ अग्निविघटस्तोपंधमाधीवतंडुलाः। देना और मनको वा करना ये सप काप- मिदिर नुहोते हैं. शपयाशेवनिर्दिष्टामुनिभिदिन्यनिये ५२ ॥ समीरगंयोधनानोषिप्रावन्यनतदयः । अप्ति, विप, तुस्सा जलन, अपन, पा. वियतुःपचहत्वतापामायतदाप्यते ॥१६॥ मुनिने कई ५३॥ यस मोर सागर पर निमें - भापाटीकासहित । (१४७) पूर्वपूर्वगुरुतरकार्यदृष्ट्वानियोजयेत् । अपने पूज्य पिता आदिक चरणोंका पुत्र लोकमत्ययतामोक्तंसवैदिव्यगुरुस्मृतम् ५३॥ आदिक शिरोंका अथवा धनका स्पर्श करे और शीघही उत्यसे सौगदको ग्रहण कर ॥ ५९ ॥ इनमें पहिला २ अधिक होता है और इन- को कार्यको देखकर नियुक्त कर और जग- दुष्कृतंत्रामुपामधनश्येत्सर्वतुमाकृतम् । की प्रजाति कहा हुआ दिन संपूर्णही गुरु सहस्ररहतेचानिःपादोनेविस्मृतम् ॥६॥ कहा॥५३॥ मुझे आज पार प्राप्त हो और संपूर्ण सत्कर्म ततायोगोरकंधृत्वागच्छेनैवपदकरे । नष्ट हो जय हजारको चोरी पर अग्नि और इससे चौथाई कमपर विपदेना कहा है ॥६० ॥ तप्तांगारेपुवागच्छेत्पद्यांसप्तपदानिहि५४ विभागोनेवट-प्रोक्तोवर्धेचसलिलंतया । तगये हुर लोडेका गोला हायपर रखनेसे धर्माधर्मोतदर्धेचाष्टमांशेचतंडुलाः ॥६१ ।। यदि चिह्न न पडे अथवा जो मनुष्य सात पदतफ तमाये हुए अंगारों पर गमन करी॥५४॥ विभागले कममें घट ( तुला ) भाधम जल और उससे आधेमें धर्म और अधर्म तप्ततैलगतलोहमापहस्तेननिहरेत् । आठवे अशकी चोरीमें चावल ।। ६ ।। सुतप्तलोहपत्रवाजिदयासँल्लिहेदपि ॥ ५५ ॥ पोडशांशचशपयाएवंदिव्यावधिःस्मृतः । तपाये हुए तेलमें डाले हुए माले भर लो-एपसिंख्यानिकृष्टानांमध्यानांद्विगुणास्मृता ।। इको हाथ उठाले श्यवा तपाये हुए लोदेके और सोलह भागमें शपथ (सौगद) इस पत्रको जिहासे चाटले ॥ ५५ ॥ प्रकार दिव्य प्रमाणकी विधि कही है और गरप्रभक्षेपद्धस्तैःकृष्णसर्पसमुद्देत् । कृत्वा निकृष्टीकी यह संख्या है मध्यम दिव्योंको स्वस्यतुलासाम्यहीनाधिक्यांवेशाधयेत् ।। ५६ सम्पा दूनी कही है ॥ ६२॥ चतुर्गुणोत्तमानांचफल्पनीयापरीक्षकः । विषको भक्षण कर ले अथवा हायसे काले सांकको २ ( यदि इन पूर्वोक्तोसे न मरे अथवा शिरोवर्तियेदानस्यात्तदादिश्यनदीयते ॥३३॥ हानि न होय तो जानना कि सच्चा है) अथवा और परीक्षक जन उत्तम दिव्योकी चौगुनी तुळामें अपनी परापरके पदार्थको रसकर दीन सख्पाकी कल्पना करे जब शिरोवति अर्थात.. और अधिकताकी जांच करै ।। ५६ ।। शिरका कांपना न हो तो उस समयमें दिव्य प्रमाणको न दे ॥ ६३ ॥ स्वष्टदवेस्नपनजमयादुदकमुत्तमम् । यावनियमित कालमतावनिमजनम् ॥ अभियोक्ताशिरःस्यानदिव्येपुपरिकीयते । अपने इष्ट देवक स्नानकै उत्तम जलकर अभियुक्तायदातव्यांदव्यंश्रुतिनिदर्शनात् ।। पान कर अथवा नियमित कालतक जलमें अभियोक्ता (अनी देनेवाला ) का शिर टूया रहे ।। ५७॥ भी दिव्यों में गिना है, श्रुतिकी आज्ञास अर्मि- अधर्मधर्ममूर्तीनामदृष्टहरणंतथा । युक्त (मुदायले) को भी दिव्य देना ॥६॥ नकश्चिदाभयोक्ताशंदेव्यपुविनियोजयेत् । : कर्षमात्रांस्तंडुलांश्चचमेचविशंकितः ॥५८॥ इच्छयात्विता कुर्यादित रावतयच्छिरः ॥६५॥ अधर्म और धर्मकी मूतियोंको न देखे न हरे और एक तोलाभर चावल शंशाको त्याग कोई भी न्याय करनेवाला अभियोक्ता कर चाय ले॥५८॥ (मुद्दई ) को दिप प्रमाणों में नियुक्त न पर स्पर्शयेत्पूज्यपादांश्चपुत्रादीनांशिरांसिच । अर्थाद उससे दिव्य न वाये और इतर अपनी इच्छाते दिव्यको फरै और दूसर धनानिससरोद्राक्नुसत्येनापितया ५९॥ शिरको हिलादे ॥६॥ .
(१४८) शुक्नीत । [ अध्याय- पार्थिव शक्तिानांचनिर्दिष्टानाचदस्याभः अरण्यनिर्जनेरानावंतवेदमनिसाइसे । आत्मशुद्धिपराणांचदिव्यदयशिरोविना ॥ स्त्रीणांशालाभियोगेपुसर्यापहवेपुच ७५ ।। जिन मनुष्योंपर राजाओंकी शका हो और निर्जन वनम, रात्रि, गृहके भीतर, साहस जोचोरोंके संग देखे हो और जो अपराधी (हिंसा आदि) नियोके आचरणका अभि- अपनी शुद्धि चाहते हो उन सबको दिव्य योग और सर्वथा झट इनमे ॥७॥ देना परतु शिर चिना ॥६६॥ प्रदुष्टेपुममाणेपुदिव्य कार्यविधिनम् । परदाराभिशापेचागम्यागमनपुच । महापापाभिशप्तेपुनिक्षेपहरणेपुच ।। ७३ ।। महापातकशस्तेचदिव्यमेवचनान्यथा ॥६॥ दिव्ये कार्यपरीक्षेतराजासत्स्वपिसाक्षिषु ॥ पराई दाराव अभिशाप ( गालीदेना) गमन और जहा अन्य प्रमाणाको दुष्टता होगई हो के भयोग्य स्त्रीका गमन, महापातकी, इतने वहा दिव्य प्रमाणात शोधन करै महान् अपराधियोको दिव्य प्रमाण दे अन्यथा नदे६७। पापोंके अभिशाप ( दगाना ) में और चार्याभिशंकायुक्तानांतप्तमापोविधीयते । निक्षेप (धरोहर ) हरनेमें ॥७॥चादे साक्षी- प्राणांतिकविवादेतुविद्यमानेपिसाधने ॥ ६८ ॥ भी विद्यमान होय तो भी राजा दिव्योम ही जो प्राणी चोरीको शकासे युक्त है उनको मुटे सच्चेकी परीक्षा करें। उपाये हुये मासेभर सोनेवा दिव्य कदा है जो प्रथमायत्रभिद्यतेसाक्षिणश्चतथापरे ।। ७४ ॥ विवाद प्राणांतिक (खूनये ) ही उनमें चाहे परेभ्यश्चतयाचान्यतेंवादशपथनयेत् । साधनभी विद्यमान हो ।। ६८॥ जिस बादमे पहिले साक्षी और दुसरे साक्षी दिव्यमालंमतवादीनपृच्छत्तनसावनम् । भेदनको प्राप्त होजायँ ॥७॥ और किती सोपधंसाधनयनतद्वाशेधावियदि ॥ ६९ ॥ प्रकार भन्यभी साक्षी दूट जायें ऐसे चादको राजा शपोंसे निर्णय करें। वहांपर वादी दिष्यप्रमाणको आलयन स्थावरेपुविवादेपुयुगश्रेणीगणेपुच ॥ ७९ ॥ (स्वीकार)करे तो ऐसे स्थल में न्याय पर नेवाला साधनको न पूछे यदि यही साउनमे दत्तादत्तेपुभृत्यानास्वामिनानिर्णयसति । कोई बल प्रतीत होय और वह गजाको विनियादानसंबंधेतीत्वाधनमयच्छति ॥७६॥ सुना दिपा होय तो॥ ६९ ॥ साक्षिभिारिखतेनायभुक्त्याचैतान्प्रसादयेत् । शोषयेत्तचीदव्यनराजाधर्मासनस्थितः। स्थावर िविवादम युगश्रेणी (सहा) यन्नामोर्यल्लेर यतुल्यलेख्ययदाभवेत् ७०॥ गमि ॥७५॥ दिये और न दियमें सेवक धमासनप वेठा हुआ राजा रसको दिम्पलं वचने और दानपे सपधर्म और पदार्थकोसरी- और स्वामी देनये और न देनेचे निर्णय शोधन कर जो भाषा पत्रिका (भी) हिरादर धन न देने में ॥ इन सपमा निर्णय ना नाम और गोत्रके तुल्य होय ॥ ७० ॥ साशियोके एठे अपया भुक्ति ( यतना अगृहीतधनेतनकार्यदिव्यननिर्णय । से करे॥७६॥ मानुषसाधननस्पात्तनदिव्यपदापर्यत् ७९ ॥ विवाहोत्सपातेपुषिवादसमुपस्थिते ७७ ।। और प्रतियादीने धनको ग्रहण न किया साक्षण. सायनंतनादिव्यंनचरेसपम् । ोपतो यहाँपर दिम्य प्रमाण निर्णय कर विवाद टरहर त (जूमा) पदिश्नमें और जदा कोई छोषिक साधन न झोप पद विवाद उपस्थित होप को ७७ ॥ यहाँ सारी पर भी दिपको दे॥७॥ दी निगपरे पन दोते न दिम नया ४.] भापाटीकासहित । (१४९). द्वारमार्गक्रियाभोग्यजलवाहादिपुतया ७८ ॥ विवादमे भी राजा ही प्रमाण है क्योंकि वह भुक्तिरेखतुगुवास्यान्नदिव्यनचसाक्षिणः । प्रभु है जो राजा स्वतत्र होयके अयों (विवाद) द्वार मार्गका करना और जल प्रवाह आ.को सिद्ध करता है वह भी पापी होता है दिवे भोगमे ॥ ७८ ॥ भोगना (वर्तना) ही धर्मशाखाविरोधनद्ययशास्त्रविचारयेत् । भारी प्रमाण है और न दिव्य है न लामो गजामात्यप्रलोभेनव्यवहारस्तुदुप्यति ॥८॥ धर्मशास्त्र अविरोधसे राजा नीति शस्त्र- योकोमानुषाव्यादन्योन्यातुदैविकीम् । को विचार जिस व्यवहारमै राजा और मत्री- मानुषीतरगृह्णीयानतुर्दैवी क्रियानृपः ॥७९॥ को लोभ होता है यह दूषित हो जाता जित विवादम एक मनुष्य मानुषी क्रिया-है८५॥ को कहे और दूसरा दिन्न क्रियाको कह लोकोपिच्यक्तेधर्मात्कृटायेंसमवर्तते । वहार राजा मानुषी क्रियाको ग्रहण कर अतिकामक्रोधलोभैयवहारः प्रवर्तते ८६ ॥ देवीको नहीं ॥ ७॥ और जगभी धर्मसे गिर जाता है और ययनप्राप्तापिक्रियाविद्यतमानुपी ॥ ८०॥ क्पटमें प्रवृत्त होजाता है अत्यन्त काम कोध मानाद्यानतुपूर्णापिदविकविदतांनृणाम् । लोभ इनसेही व्यवहार (विवाद ) प्रवृत्त होता जो किसी एक देशमे भी मानुपी निया है।। ८६ ॥ मिट जाय तो विवाद करते हुए मनुयोम कर्तनयोसाक्षिणश्चमभ्यानराजानमेवच । 'उस मानुपीक्रियाको राजा ग्रहण करें और व्यामोत्यतस्तुतन्मूलंछित्त्वातविमृशन्नयेत् ।। पूरी भी दिव्य क्रियाको ग्रहण न करें। ८० ॥ और वह करनेवाला साक्षी सभाषद राजा प्रमाणहेतुचरितै शपयननृपाज्ञया ॥ ८१॥ इन सबम फेलता है इससे राजा काम क्रोध वादिसप्रतिपत्त्यावानिर्णयोष्टविधास्मृतः । लोभ मोह जो व्यवहार भूल है उनको दूर प्रमाण हेतु आचरण, शपथ (सौगध करके विचारपूर्वक निणय करै ॥ ८ ॥ राजारी वादीकी सप्रतिपत्ति अनर्थचार्थवत्कृत्वादर्शयतिनृपायये । ( सतोप) इस प्रकार पूर्वोक्त निर्णय अविचित्यनृपस्तथ्यमन्यतेतेर्निदर्शित. ९८॥ आट तरहका पहा है ।। ८१ ॥ लेख्यमनविद्येतनभुक्तिनँचसाक्षिणः ।।८२॥ वे और उनके कहे हुयेको राजा विना विचा- जो सभासद राजायोभनयका अर्थ दिखा- नदिव्यावतागोस्तिप्रमाणंतत्रपार्थिवः । रेसत्य मानले ॥ ८८ ॥ जिप्त विवादम न रेख होय, न भुक्ति होय स्वयफरोतितहत्ताभुज्यतोगुणत्वरम् । और न साक्षी होय और न दिव्यका कोई अधर्मतःप्रवृत्तंतनोपोन्सभासःः ।। ८९ ॥ निश्चय होय ऐसे म्यम राजा ही प्रमाण है ॥ ८॥ वा अर्थ तथा अनर्थको राजा सय करे तो निश्चेतुयेनगल्या स्युर्यादा सदिग्वरूपिणः । वे दोनों भाठगुने पारयो भोगते ह, अधर्मम सीमायास्तननृपति प्रमाणंस्थात्प्रभुर्यतः ॥ ॥ ९ ॥ प्रवृत्त हुए. राजावी सभाषद् उपेक्षा न स्वता सावयन्नर्थान्गजापिस्याचफिलिपी उपेन्यमाणा मनपानरम्यान्त्यधोमुखाः। ॥८८॥ विग्टंटस्त्वथवाग्दैट सभ्यायत्तौनुतानुभौ ९० उमोसे संहरूपविवाद निश्चय परनको यदि उपेक्षा पर तो राजा और सभासद शस्य हातहै ॥ ८३ ॥ सीमा भादि सदेह नीवेको मुसक रक नरकमे जाते है धिकार आज्ञा,
शुक्रनीति।
[अध्याय-
(१२०)
फा देढ ओर वाणीका दंड ये दोनो सभावदों दृष्ट्वाराजातुजायनेपदद्यालयपत्रकम् ।
के आधीन होते है ॥९०।,
अन्दयाह्यभियोक्तारनिरुध्यादहुपरसरम् ।।
अर्थदंडवधायुतीराजायत्ताभावपि ।
मिथ्याभियोगसदृशमहयेदभियोगिनम् ।
तीरितंचानुशिष्टंचयोमन्येतविधर्मतः ॥ ९१॥ ऐसे जयपत्रको देखकर राना जीतने-
धनका दइ और वध ये दोनों राजाकै आवालको दे । अन्यथा (पूर्वोक्त न होय तो)
धीन होते हैं जित तीरित( हुस्म) और शि-अभियोक्ता (अरजी देनेवाले)को बहुत वर्षत
क्षाको राजा अधर्मले कीहुई माने ।। ९२ ।। क कैद करें ।। ९७ ॥ और मिथ्या अभियोग
द्विगुणदंडमादायपुनस्तत्कार्यमुद्धरेत् । (अजी) के समान भभियोगी ( मुदायले)
साक्षिसभ्यावसन्नानांदूपणदर्शनंपुनः ॥९२ ॥ का पूजन करें।
सभावदोखे दना दंड लेकर दुबारा उसका कामक्रोधौतुसंयम्ययोर्यान्धमणपश्यति ९८॥
यंका उद्धार (प्रारंभ ) करै यदि साधी सभा-प्रजास्तमनुवर्ततेसमुद्रमिवसिंघवः ।
पद इनमें कोई दूषण पाया जाय तोभी पुन: जीवतोरस्वतंत्र स्याजरयापिसमन्वितः ॥२९॥
उद्धार कर ॥ ९२ ॥
जो राजा कामळोधको रोकफर धर्म-
स्वचर्यावसितानांचोक्तापनि वोविधिः।
पूर्वक अयों ( दावे ) को देखता है ॥ ९॥
अमात्यःप्राविधाकोबायेकुर्युःकार्यमन्यया। उस राजाके भनुरुल प्रजा इस प्रकार होती
जो सभाषद अपने कार्यम भूल जाय तोभी है जैसे समुद्रके नदी 1 माता पिताके
कार्यको विधि पुनः वही है यदि मत्री वा जीते हुए वृद्ध भी पुत्र संत्र नही होता॥२९॥
प्राडियाक (घकोळ ) कार्यको अन्यया करदे तयोरपिपिताश्रेयान्वीजप्राधान्यदर्शनात् ।
तसर्वनृपतिःकुर्यात्तान्तहस्रतुदंडयेत् ।
अभाववाजिनोमर्मातातदभावेतुपूर्वजः ८०० ।।
उन दोनोमभी बीजकी प्राधान्यता देखकर
नहिजातुविनादंडंकश्चिन्मार्गवतिष्ठते ॥९४॥ पिता श्रेष्ठ है, और पिताके अभाव माता
उस सपूर्णकार्यको राजा करें और टन और माताके अभावमें जेठा भाई श्रेष्ठ होवा
दोनोको सदरमुद्रा दंड दे क्योंकि विना दंड है। ८०० ॥
कोई भी मार्गमे नही टिकता ॥ ९४ ॥ स्वातंत्र्यंतुस्मृतज्येष्टज्येष्ठवंगुणवय कृतम् ।
सदर्शितसम्पदापतधृत्पनृपोनयेत् । याःसर्ग:पितृपल्यास्युस्तामुक्ततमातृवत् ।।
प्रतिज्ञाभावनादादिमाइविवाकादिपूजनात९५ जेठे भाईको स्तवता कही ६ और गुग
यदि सभाषदोका कोई दोप दिनाया जाय अवस्थाले ज्येष्टता होती है जो पिताको
हो उस दोपको काटकर राजा या सपूर्ण पानी हैं उन सबमे माग उमान
य कर प्रतिज्ञायी सत्यता भोर माइविवाफ पतीव करे ॥ १॥
(वकील)मादि पूजनसे ॥ ९॥ स्वसमैकेनभागेनसर्वास्ता प्रतिपालयन् ।
जयपनस्यचादानाजयीलोकेनिगयते । अस्वतंत्रता प्रजा सर्वाःस्वंतत्र पृथिवीपतिः ।।
सभ्यादिभिर्विनिर्णितंविधृतंप्रतिदिना९६॥
भीर मरने ममान एकभागले टन उपकी
भौर जपपरक ग्रहण जगजीतने अच्छी पालना र सपंगमजा भया(परा-
याटेको जयो करते है।जो उभारुटीने
धीन) हेभीर राजाम्रतत्र है। ८०१॥
निगप फिपादो मोर प्रतिदिन मान लिया असंतवस्मृत मिष्यआचार्यनुस्वतंत्रता।
सुतस्पमुततागगांवगित्तमनुगानने ॥ ३ ॥
॥ ९३ ॥
मापाटीकासहित । " शिष्य अस्पतंव है और आचार्य स्वतंत्र है उस शास्त्रने जिस धर्मको शिक्षा दी है वही शिक्षा देने के लिये लडके और लडकी स्त्री धर्म म्लेछ आदिपर्वत सदासे होता है क्योंकि पिताक वशमें होती है ॥३॥ पहिले आचार्गाने जगतकी मयादाके लिये विक्रयवदानचवशित्वनसुतेपितुः। कहा है॥१०॥ स्वतंत्राःसर्व एवेतपरतपुनित्यशः ॥ ४॥ समानभागिन कार्या:पुवा स्वस्यदेखियः । चने और वानके लिये लड़का पिताके स्वभागविहराकन्यादौहित्रस्तुतभा ।। चशमें नही होता पराधीनके विषे भी ये सब पिता अपने पुत्र और स्त्रियों को समान भाग स्वतंत्र होते हैं ॥४॥ दे और कन्याको आधाभाग और कन्याओं अनुशिष्टविसगेवारिसर्गेचेश्वगेमतः । से दीहिनको आधा भाग दे ॥ ११ ॥ मणिमुक्तामवालानांसवस्यैवपिताप्रभुः ॥५॥ मृतेधिपेपिपुत्राद्याउक्तमार्गहराःस्मृताः । शिक्षा, दान और अदान में थे स्वतंत्र कहे हैं मात्रेयाच्चतुर्थाशंभगिन्यमातुरर्धकम् १२ ॥ मणि, मोती, मूंगा इन सबका स्वामी पिताक मरेपरभी पुत्र आदि सम भाग (मालिक) पिता होता है॥५॥ लेनेवाले ही कहे हैं माताको चौथा भाग और स्थावरस्यसवस्यनपितानापितामहः ॥ मातास आधा भाग भागिनीको दे॥१२॥ । भार्यापुरश्चदासश्चत्रयएवाधना.स्मृताः ॥६॥ तदर्धभागिनेय यशेपमवहेरसुतः । सम्पूर्ण स्थावर धनका स्वामी न पिता है न पुत्रोनसाधनपत्नीहपुत्रींचतत्सुतः १३ ॥ पितामह है । भार्या, पुत्र, दास ये तीनो अधन भगनासे आधा भानजेकोदे और शेष सब, अर्थात् धनके अस्वामी कहे हैं ॥ ६॥ को पुत्र ग्रहण कर पुत्र न होय तो पत्नी पत्नी यत्तेसमाधिगच्छायिस्यतेतस्यतद्दनम् ॥ न होय तो पुत्री पुत्री न होय तो दौहित्र वर्ततेयस्ययस्ततत्यस्वामीसएवन॥ ७ ॥ धनको ग्रहण करे॥१३॥ जो इनको मिटता है यहभी धन उसीका मातापिताचभ्राताचपूर्वालाभेचतत्सुतः ।। होता है जिसके ये तीनों होते हैं, जो धन सौदायिकंध प्राप्यत्रीणांस्वातंत्र्यमिप्यते ११ जिसके हाथमें बतें उसका स्वामी वही नही माता, पिता, भाई, भाइ न होय तो उसका हो सकता ॥७॥ पुत्र धनको ग्रहण कर जो धन स्त्रियोंको सौ- अन्यस्वमन्यदस्तेपुचौर्यायैःकिन्नदृश्यते । दायिक मिलता है उस धनमें स्त्री स्वतंत्र तत्माच्छास्त्रतएवस्यात्स्वाम्यनानुभवादपि८॥ होती है ॥ १४॥ प्योकि चोरी करनेसे अन्यका धनभी अन्य विक्रयेचैवदोनचयथेष्टंस्थावरेष्वपि । के हाथ दोखता है, तिससे शास्त्रसे ही धनका उढयाकन्ययावापिपत्युःपितृगृहाच्चयत् १५॥ स्वामी होता है अनुभवसे नहीं ॥८॥ चाहे उसे बेचे और दान करें और वह धन अस्यापहृतमेतेननयुक्त वक्तुमन्यया । स्थावर हो या जंगम विवाही हुइ कन्याको पति विदितोर्यागमःशस्खेतथावणः पृथक्पृथक से और पिताके घरसे जो धन मिले ॥ १५ ॥ भन्यथा यह कहना अयोग्य होगा कि मातृपित्रादिभित्तधनंसौदायिकस्मृतम् । इसका धन इसने हरा धनका आगम और पित्रादिधनसंबंधहीनंययदुपार्जितम् ॥१६॥ पृथक वर्णशास्त्र में विदित है॥९॥ शास्तितच्छावधययम्लेच्छानामपितत्सदा । दारिक कहते हैं, जो पुत्र पिताके धनको न अथवा माता पिता, जो दें उस धनको सौ. पूर्वाचार्यस्तुकायतंलोकानांस्थितिहेत १०॥ गाफर धनका संचय करले ॥ १६ ॥ .
शुकनीति । [अध्याय- सयनकाममश्रीयादविभाज्यधनहितत् । तेषांचे प्रस्तानांचग्रहणंसमवाप्नुयात् । जलतस्करराजाग्निव्यसनसमुपस्थिते १७॥ तन्मोक्षार्थचयदत्तवहेयुस्तेसमांशतः ॥२३ ।। वह पुत्र उसधनको अपनी इच्छाके अनुसार उनके उस काम करने में जो कोई पन्धन भोगे और अपने भाइयोंको न बांटे यदि जल को प्राप्त हो जाय उसके छुटाने में जो धन चौर, राजा, अग्नि इनकी विपत्ति पिताके धन दिया हो उसको भी समभागले चाटकर पर पड़े ॥ १७॥ भुगतः ॥२३॥ यस्तुस्वशक्तपासंरक्षेत्तस्यांशोदशमःस्मृतः। प्रयोगकुर्वतयेतुहेमाद्यन्यरसादिना । देमकारादयोयत्रशिल्पसमयकुर्वते ॥ १८॥ समन्यूनाधिकरशैलीभस्तेषांतयाविधः २४ ॥ जो पुत्र अपनी शक्तिसे उस धनकी जो मनुष्य तुवर्ण मादि वा अन्य रस आदि रक्षा करे तो उसको दशवां भाग उसमेंसे से प्रयोग रसोका पनाना करते हैं उन सपको मिलना कहा है जो सुनार आटि मिलकर मान न्यून वा अधिक अशोले उसी प्रकार कारीगरी करते हैं। १८ ॥ लाभ होता है कि ॥ २४ ॥ कार्यानुरूपनिदोलभेरस्तषयाईतः । समोन्यूनोधिकोह्यशोयेनक्षिप्तस्तयैवसः । संस्कर्तातत्कलाभिज्ञःशिल्पीप्रोक्तोमनीपि व्ययंदद्यात्कर्मकुयाल्लाभंगृहीतचैवहि २५ ।। भिः॥ १९ ॥ जिसने समान न्यून वा अधिक जसा अश ये अपने अपने कार्यके अनुसार नोकरीको व्ययको दिया हो वैसाही वह सच कर काम- यथायोग्य माप्त होते हैं, संस्कार करनेवाला को करे और लाभको ग्रहण करे ॥ २५॥ जोकार्यकी फलाको भली प्रकार जानता वणिजानांकर्षकाणामेपरवविधिःस्मृतः । हो उसको बुद्धिमान् शिल्पी कहते हैं ॥ १९ ॥ सामान्ययाचितंन्यासआपिर्दासश्चतद्धनम् १६ हदेवगृहवापिवाटिकोपस्कराणिच । यह विधि व्यापारी और किसानोकी कही संभूयर्वतातेपांप्रामुख्योद्यशमर्हति २०॥ हे सामान्य, पाचित न्यास ( सागमा द्रव्य) महट देवताओंका मंदिर. वाटिका और माधि (धरोहर)दख (दास का धान ) ॥२६॥ उपस्कर, इनको जो मनुप्प मिलकर करते हो अन्वाहितंचनिक्षेपःसर्ववंचान्वयेप्सति । उसमें जो मुख्य हो उसे दो भाग मिटने आपत्स्वपिनदेयानिनववस्तूनिपंडितः ॥२७॥ योग्य ॥२०॥ नर्तकानामेवधर्मःसन्दिग्वउदाहतः । अन्वाहित, निक्षेप और सय धन इन यन्त्र- को पंटित जन मापत्तिय समय में भी मदे ताललोलभतेवोंधगायनास्तुसमाशिनः ॥२१ यदि अपने राम कोई सन्तान होय ॥३७n नाचनेवाफा यह सनातन धर्म सज्जनाने फदा किनाटो जाननेवाटेको चीयाई भाग अदेयपश्चगृह्णातिपश्चादेयप्रयच्छति । और गानेगटीको सम ( यगयर) मिला ताबुर्भाचोग्यच्छास्यौदाप्पांचोत्तमसाहमम्२८ ११॥ जो मनुष्य देने योग्यको ग्रहण करता परराष्ट्रानंयत्स्पाचरितस्वाम्याज्ञयास्तम् । अयया देता है ये दोनों चोरके समान शिक्षा गोषष्टांगमुत्पविभजेरेन्समागरम ॥२२॥ देने योग्य है और राजा उनको उत्तम खाद- परापे राग्यमे जिस धनको अपने स्वामी उपाइंद॥८॥ पीमाता चौर परमारे टसका उठा भाग अस्वामिभ्यरिभ्योविग्रदातिपननुपः । ग्गामाया देकर गेप भागको समान वाटा अव्यनमेकीणातिमदायीखन्नृपः२९॥
भाषाटीकासहित । जिनका कोई स्वामी न होय ऐसे चौरीले विज्ञायमाक्षिभिःसम्यम्पूर्ववदापयेत्तदा । जो धनको लेता है और छिपकर रारीदता है अदत्तयश्चयहातिसुदत्तं पुनरिन्छति ३६ ॥ उसको राजा चोरके समान दंट दे॥२९॥ तो साक्षियोले भदीप्रकार जान कर पूर्वक विग्याज्यमदुरयस्त्पजेदनपकारिणम् । समान राजा दिवादे जो विना दिये को ले ले अदुष्टश्चखिजोयाज्योधिनेयौतावुभावपि॥३०॥ अथया भली प्रकार देने पर भी पुनः इच्छा जो ऋत्वित (यज्ञ करनेवाला) निरपराधो करे ।। ३६ ॥ और अदुष्ट यज्ञ करनेवालेको त्याग दे और दंडनीयायुभावतीधर्मज्ञेनमहीक्षिता । जो यज्ञ करनेवाला भदुष्ट सज्जन ऋत्विजको कूटपण्यस्यविक्रेतासदज्यश्चौरवत्सदा ॥ ३णा त्याग दे उन दोनोकोराजा शिक्षा दे ॥ ३०॥ तो धर्मका ज्ञाता राजा इन दोनोको इंड द्वात्रिंशांशषोडशशिलाभंपण्येनियोजयेत् । दे जो खोटी वस्तुको बेचे उसे राजा चोर तान्ययातद्वययज्ञात्वाप्रदेशाद्यनुरूपतः ३१ ॥ के समान दंड दे।। ३७ ॥ पत्नीसा या सोलहवां साभ दंड ( बाजार) दृष्ट्वाकार्याणिचगुणाञ्छिल्पिनांभृतिमावदत् ।। भे राजा नित्य कर। देश और कालके अनुरूप पंचमांशचतुर्थाशंतृतीयांशंतुकर्पयेत् ३८ ॥ उसके ध्यय (ख)को जानकर अन्यथा न करै ।। ३१॥ कारीगरोके कार्य मोर गुणोंको देखकर वृद्धिहित्वायर्धधनवाणिज्यकारयेत्सदा । भृति (नौकरी) दे पांचवां चौथा वा तीसरा, भाग रुपेका देकर खेती करावे ॥ ३८॥ मूलातुद्विगुणावृद्धिगृहीताचाधमणिकात्३२॥ वृद्धि (नका को छोडकर व्यापारियोपर अर्धवाराजतादाजानाधिकंतुदिनदिने । आधे धनसे सदैव व्यापार कराये यदि उत्तमर्ण विद्रुतनतुहीनस्यात्स्वर्णपलशतंशुचि ३९ ।। (देनेवाला) ने अधमणे (करजलेनेवाले) अथवा आधा देकर करावे अधिक नही यह भूसे दूना व्याज दे लिया हो ॥ ३२ ॥ प्रमाण एक दिनको भृतिका है जो सीपल तदोत्तमणमूलंतुदापयेन्नाधिकंततः । सोना गलानेसे कम न होय घद शुद्ध होवा धनिकाश्चक्रवृद्धयादिमिप्तस्तुप्रजाधनम् ॥ ६॥ ३९ ॥ तो उत्तमणके मुलको हो राजा दिलाचतुःशतांशरजतंतानंन्यूनशतांशकम् । उससे अधिक नही, क्योंकि धनी मनुष्य चक्रवृद्धि (स्दपरसूद) के बहाने प्रजाक वगंचजसंदंसीसहीनस्यात्पोडशांशकम् ४०॥ •धनको ॥३३॥ और चार सौ पल चांदी, सौ पल तांबा सहरतिह्यतस्तभ्योराजासंरक्षपेमजाम् । और चंग जस्त शीसा सोलद पद गलाये जायें समर्थःसनददातिगृहीतंधनिकादनम् ३४ ॥ तो प्रत्येकी एक २ पट कम हो जाता ॥४०॥ हरते हैं, इससे राजा उनसे प्रजाको भलो अयोष्टांशंत्वन्ययातुदंड्याशिल्पीसदानृपः। प्रकार रक्षा करै ।जो समय होकर धनीसे लिये सुवर्णद्विशतांशंतुग्जतंचशतांशकम् ॥ ४॥ हुए धाको न दे ॥ ३४ ॥ लोभ आठ भाग कम होता है इससे राजासंदापयेत्तस्मात्सामदंडविकर्षणैः । अधिक म हो जाय तो राजा शिल्पीको लिखितंतुयदायस्पनष्टतेनप्रबोधितम् ३५ ॥ दड देने योग्य उमझे सुवर्णके दो सौ नोटेमें उससे राजा साम, दंड, भेदसे धनको और चांदीके सौ सोरेमें एकतोला॥११॥ दिलवाय दे और जिसका लिखा हुआ नष्ट हो जाय उसने नष्ट हुए लिसितको राजाको जता हीनंसुवटितेकायसुसंयोगेतुवर्धते । दिया हो ॥ ३५॥ पोडशशित्वन्ययाहिटडयः स्यात्स्वर्णकारकः।
(१५४)
शुक्रनीति।
[अन्यायर,
बम होता है और उनकी कोई वस्तु व्यवहार अनेक उनको कोई नहीं कह
{ गहना ) पकाया जाय तो सोरहवां भाग सस्ता । यह पांचवां राष्ट्र (राज्य) प्रकरण
पढता है इससे अन्यथा दोर तो सुनार दंड संक्षेपसे वर्णन किया ॥ १८ ॥
देने योग्य समझना ॥४॥
अत्रानुत्तागुणादोपास्तेकालोकनाखतः।
संयोगरम्हसावृद्धिहासप्रकल्पयेत् । पठेदुर्गमकरणमवक्ष्यामिसमासतः ॥ ४९ ॥
वर्णस्योतमार्येतुभृतिदिनांगोमता ४॥ इसमे जो गुण वा दोष नहीं पदे वे लोक
सोग जोटीपी पटनायो देखकर वृद्धि और भादसे जानने । अब छठे दुर्म (रिला)
भौर भृतिषी पसना करे, सोने के उत्तम प्रकरणो संक्षेपसे बदता हूँ ॥४९॥
कामों के पनानेको भृति (नौकरी) दोसवा सातकंटकपापाणैर्दुप्पयंदुर्गमेरिणम् ।
भागवही है॥४॥
परितस्तुमासातपरिखदुर्गमेवतत् ॥१०॥
पध्वंशकीमध्यकाइनिकायतदधकी । सान, दाहपत्थर, यतमान और कादर
दकिटके याविलुतेतुतदर्थकी ।। ४४ ॥ भूमि जिसरे समीप होय उठे परिग दुर्ग
मध्यम कामको भृति साटो भागका और कहते है। जिसपे चारों तरफ पड़ी साई उदी
हीन (नुगम) कामीको भृति उसे आधी होय उले पारिस दुर्ग कहते है॥५०॥
रही है और उससे भी आधा ई बनाने की इष्टके.पलमृदित्तिमाकारंपारिवस्तम् ।
और उससे भी भाधी सोने गढानेयी महाकवृक्ष धैर्याप्ततदनदुर्गमम् ॥५१
दी है॥४५॥
ईद, पत्यर, मिट्टी, भीत इनका जिसमें पर-
रत्तमेराजतेन्वतदर्धामध्यमास्मृता।
वोटा दो से पारिध दुर्ग कहते है बढे २
होनेत कटकेतन्यसंप्रकीर्तिता ॥ ४५ ॥ माटाके वृक्षक सनहसेतो व्याप्त हो उठे
चाँदीकै उत्तम कामोंको भृति आधी और वनदुग रहते है ॥ ५२ ।।
मध्यम कामारी चौथाई और ई न लामोको जसाभावस्तुपरिवोधगप्रकीर्तितम् ।
उससे भाधा भौर उससे भी भाधी कडा बना जल्द स्मृवंत-शतमंठा-महाजरम् ५२०
नेमे कही ३॥४५॥
पादमात्रामृतिस्तावेगवजमदेतया।
जिसके चारों तरफ जला अभाव हो
उसे धन्यदुर्ग रहते है और जिसके चारों
लोहेर्यावासमावापिद्विगुणात्रिगुणायवा ॥४६॥ तरफ बड़ा जल हो उसे शास्रके ज्ञाता जळ
तविक यानी झाद चोपाई और तितो रहते है ॥ ५॥
प्रकार संग और जस्तके याों में होती है,
लोहेकी भृति पाधी वा परावर दूनी या
सवारिपृष्टोचघरविविक्तगिन्दुिर्गमम् ।
विगुनी होती है॥४६॥
अभेद्यव्यहविधीरव्याप्ततस-यदुर्गमम् ॥५३॥
घातूनांस्टमारीनुद्विगुणोदंडमहति । जोजलके स्थान में बड़ा जया एकान्तम
लोकप्रचारलापनोमुनिभितिःपुरा ॥४७॥ बनाया जाप टसे गिरिदुर्ग कहते है जिसमें
जो पागा धातुमि कपट कर वह वापर ज्ञाता बहुतले दरवार दो और जो
दूने पंदक योग्य होता है लोपः प्रचारसभेदन अयोग्य हो उतन्यदुर्ग कहते हैं५३॥
उस्म हुआ और मुनियोंने पहिले कदा सदाय?गैतन्झयगनुकूल्यांवरम् ।
प्पाहारोनंबायसवस्तुंनेवारयते ।
पारिवानिरिणश्रेष्ठंपारिचतुततोवनम् ॥ ५४॥
उपराष्ट्रप्रकरणममामाचि तया ॥४८॥ माय कठे है. पारिखदुगडे
नितमें शूरवीरों मनुरुल भुजन रहते
धमा॥७॥
मापाटीकासहित । ऐरिण और ऐरिणले पारिघ और उससे वन धान्यवीरास्त्रपुष्टानिकोशपुष्टानवता दुर्ग श्रेष्ठ होता है ॥५॥ सहायपुष्टयद् गत्तमत्तम् ॥ ६॥ ततोधन्वंजलतस्मादिरिदुर्गततःस्मृतम् । और अन्न, शूरवीर, ख, कोश इनसे भी सहाय सैन्यदुगेंतुसर्वदुर्गप्रसाधिके ॥५५॥ पुष्ट हो और जो दुर्ग सहायकोल पुष्ट हो वह उससे धदुर्ग, धन्य जलदुर्ग और अत्यन्त श्रेष्ठ कहा है ॥ ६ ॥ उसे गिरिदुर्ग श्रेष्ठ कदा है, सहायदुर्ग और सहायपुष्टदुर्गेणविजयोनिश्चयात्मकः । सैन्यदुर्ग ये दोनों को सब दुर्गाके साधन होते यद्यत्सहायपुष्टतुतत्सर्वसफलंभवेत् ॥ ६२ ॥ खहायसे पुष्ट जो दुर्ग उससे विजय ताभ्यांविनान्यदुर्गाणिनिष्फलानिमहीभुजाम्। निश्वपसे होता है और और सहायसे पुष्ट होत श्रेष्टतुसर्वदुर्गेभ्यःसेनादुर्गरमृतंबुधैः ॥५६॥ ३ वह संपूर्ण सफल होता है । ६२ ।। क्योंकि इन दोनोंक दिना अन्य स्पराजा परस्परानुकूल्यतुदुर्गाणांविजयप्रदम् । भोके दुर्ग निष्फल होते हैं और सय दुर्गसे दोगसंक्षे पतःप्रोक्तं सैन्यसप्तममुच्यते ६३ ।। श्रेष्ठतोटितजनोंने सेनादुर्ग कहा है ॥५६॥ दुर्गाको जो परस्पर अनुरूदता है बद्ध तत्साधकानिचान्यानितद्रक्षेन्नृपातःसदा। विजय देनेवाली होती है, यह सोपसे दुर्ग- सेनाद्रीतुयस्यस्यात्तस्यवश्यातुभूरियम् ५७॥ वर्गन किया अब सातवे सैन्य प्रकरणको अन्य सब दुर्ग सेनाके ही साधक होते हैं। कहते हैं ॥ ६३ ॥ इससे राजा सदैव सेनाकी रक्षा करे जिव सेनाशस्त्रास्त्रसंयुक्तामनुष्यादिगणात्मिका । राजाके सेनादुर्ग होता है उसके वशमें ही यह स्वगमान्यगमाचतिद्विधासवपृथकृत्रिधा ॥ भूमि होती है ।। ५७ ॥ शत्रं भरोसे संयुक्त मनुष्योंक समूहको विनातुसैन्यदुर्गणदुर्गमन्यत्तुबंधनम् । सेना कहते हैं। वह स्वगम (पिपादे) और आपत्कालन्यदुर्गाणामाश्रयश्चोत्तमोमतः ॥ अन्पगम (सवार ) भेदसे दो प्रकारकी और सैन्यदुर्ग विना अन्यदुर्ग पन्धन होते हैं और वही पृथक् २ तीन प्रकारको होती ३॥ ६४ मापत्तिके समयमें अन्य दुर्गाका भाश्रय उत्तम दैव्यासुरीमानीचपूर्वपूर्ववलाधिका । कहा है।५८॥ स्वगमायास्यंगत्रीयानगाऽन्यगमास्मृता ।। एकाशतंयोधयतिदुर्गस्योऽस्वधरोयादि । देवी, आसुरी, मानुषी इन तीनों में पहली शतंदशसहस्राणितस्माद्दुर्गसमाश्रयेत् ५९॥ सना यल्लमें अधिक होती है जो सेना अपने जो दुर्गमे टिका हुभा एकभी शखधारी हो/परोसे चले यह स्वगमा और जो याममें च तो वह सौ योधाभोक संग युद्ध कर और सौ वह भन्यगमा कदाती है ॥ ६५ ॥ योधा १० सहस योधाओंके संग युद्ध कर पादास्वगमवान्यद्रयाश्चगजगंविण । इससे राजा दुर्गका माश्रय ले ॥ ५९ ।। सैन्यादिनानवराज्यंनधनपराक्रमः ६६ ॥ शूरस्यसैन्यदुर्गस्थसर्वदुर्गमिवस्थलम् । अथवा पदातियोंकी सेना स्वगम और दूस- युद्धसंभारपुष्टानिराजादुगाणिधारयते ॥६०॥ री रय, अय, हाथीपर चलने तीन प्रकार- और शूरवीर सैन्यदुर्गको तो सम्पूर्ण स्थल की होती है, सेनाके विना न राज्य है न धन (मैदान) भी दुर्गके समान है राजा ऐसे दुगा है और न पराक्रम ॥ ६६ ॥ को धारण कर युद्धके सम्भारो (सामग्री से वलिनोवगशाःसदुर्घलस्यचशत्रवः । पुष्ट (मजबूत) हा ॥ ६॥ भवत्यल्पजनस्यापिनृपस्यतुनकिंपुन:६७ ॥
४.] भाषाटीकासहित। (१५७) दुर्चल यही है और अटी ये दोनों कार्य स्थाजुद्धिगुणराजाबृहन्नालव्यंतथा । सिद्धिको नही कर सकती।। ७८ ॥ पदातिबहुलंसैन्यंमध्याश्चतुगनाल्पम् ८५ समैर्नियुद्धकुशलैर्यायामतिभिस्तथा । रथोले दूने दो बड़े तोपखाने राजा रवले वर्धयेद्वायुद्धार्थभोज्य शारीरकैर्यलम् ७९ जिसम पदाति बहुत हो, घोडे मध्यम और समान जो निरतर युद्धमे फुशल उनके हाथी अल्प हो उसे सैन्य कहते है ॥ ८५॥ परस्पर युद्धसे व्यायाम (कसरत ) और नती तथावृपोष्ट्रसामान्यरक्षेन्नागाधिकंनाहि । (प्रार्थना )से और शरीरके पोषक उत्तम २ खानेके पदार्थोसे बाहयुद्धके लिये सेनाको सवयःसारवेपोच्चशस्त्रास्त्रंतुपृयक्शतम् ॥ तिसी प्रकार बैल और ऊंट जिसमे सामा- बढावे ॥७९॥ न्य हो उस सेनाकी राजा रक्षा करें और मृगयाभिस्तुव्याघ्राणांगखास्त्राभ्यासत सदा।। जिसमें हाथी अधिक हो उसकी नही जवान वर्धयेच्छरसंयोगात्सम्यक्छौर्यनलंनृपः ८०॥ उत्तम वेषधारी, उत्तम २ शस्त्र ओर अस्त्रधारी सिंहीको मृगया, सदैव शस्त्र अत्रक अभ्या ये सब पृथक् २ सो २ रखने ॥८६॥ स और वाणोक संयोग (चालना) से राजा लघुनालिकयुक्तानांपदातीनांशतत्रयम् । भली भाँति शूरवीरोंकी सेनाको वढावै ।। ८०॥ सेनावलंसुभृत्यातुतपोभ्यासैस्तथास्त्रिकम् । अशीत्यश्वानरय वैकंवृहन्नालद्वयंतथा ८७ ॥ बदूकवाले पदाति तीनसौ हो, अस्ती वधयेच्छास्त्रचतुरसंयोगाद्धीवलंसदा ८१॥ घोडे, एक रथ और बडी दो तोप ॥ ८७ ।। अच्छीभृति (नौकरी) से सेनाके चलको और तप अभ्यासले अस्त्रके बलको शास्र उष्ट्रान्दशगजादौतुशकटौपोडशर्पभान् । और चतुरोके सत्संगसे बुद्धिक बलको सदैव तयालेखकपटकंहिमंत्रित्रित्त्यमेवच 1८८3 बढावे ॥८॥ दश ऊंट, दो हाथी, दो गाडे, सोलह वेल सक्रियाभिश्चिरस्थायिनित्यंराज्यंभवद्यथा । और छ लिसारी और तीन मत्री होने स्वगोत्रेतुतथाकुर्यात्तदायुर्वर मुच्यते ८२ ॥ चाहिये ॥ ८८ ॥ अच्छे २ कोसे अपने गोत्रको परपरामें धारयन्नृपतिःसम्यन्वत्सरेलक्षकर्पभाक् । रज्य विरकाळतक जिस प्रकार स्थिर रहै उस संभारदानभोगार्थव सार्थसहस्रकम् ॥ ८९।। प्रकारही राजा भाचरण करै उसको आयुर्वल इन सबको राजा भली प्रकार रक्खै और कहते है ।। ८२॥ एक वर्षमे एक लक्ष रुपैयोंका सचय करे यावगोत्रराज्यमस्तितावदेवसजीवति । सामान दान और भोगके लिये डेढ सहर चतुर्गुणहिपादातमश्वतोधारयेत्सदा ॥८३॥ रुपया प्रतिमासमें रक्ख ॥ ८ ॥ जपतक राजाकै गोत्रमे राज्य रहै तवत- लेखलायेंशतमासिमंत्र्ययेंतुशतनयम् । कही वह राजा जीता है, और सवारोमे त्रिशतदारपुत्रार्थविदर्दथेशद्वयम् ॥ ९० ।। चौगुनी पदातियोकी सेना राजा संदेव खखे ॥ ८३॥ लिखनेके काममें सौ रुपये, मत्रीके पंचमाशास्तुवृपमानष्टांशांश्चक्रमेलकान् । काममे तीन सौ रुपये, स्त्री और पुत्रोंके लिये तीन सौ रुपये, वया पंडिताके लिये दो चतुर्थीशान्गजानुष्टान्गजाश्चिस्थान्सदा ॥ सौ रुपये प्रति मातम खवं करें ॥१०॥ पाचवे अशके बैल और आठवे अशके खञ्चर चौथाई हाथी तथा ऊट और हाथियोसे आधे साधवपदगार्थहिराजाचतुःसहस्रकम् । रथ सदैव रस्ते ॥ ८४॥ गजोष्ट्रवृपनालायव्ययीकुर्याच्चतुःशतम् ।।
[अध्याय-
शुक्रनीति ।
(१५८)
..
ज्वार, घोडे, पदाति इनके लिये चार
मधाभदंतःसवासमांगोवतुलाकृतिः ।
उदस सये ओर हाथी, ऊट, बैल और
तोपचाना इनके लिये चार सौ रुपये प्रति सुमुखोवयवश्रेष्ठोयोभद्रगन सदा ९७ ॥
मासमें राजा खच कर ॥ ९१ ॥
जिसका दांत मधुके समान हो, जो बढ़-
वान् हो, जिसके अंग सम हो, जिसका
शेरकोशेषनंस्थाप्यव्ययीकुर्यानचान्यया ।
आकार गोल हो, सुन्दर मुख हो, अंग अच्छे
लोहमारमयश्चकसुगमोमंचकासनः ।। ९२॥हो ऐसे गजको संदेवसे भद्र कहते
शेप धनतो कोश (खजाना) में स्थापन ॥ ९७ ॥
पार और अन्य किसी वृथा रीतित खर्च न स्थूलकुक्षिःसिंहद्दकचहत्त्वग्गलशुंडकः ।
पर जिस स्थका चक्र लोहसार (उनम लोहा मध्यमावयवादीर्घकायोमंद्रगजःस्मृतः ९८
कहो जिकी गति (चलना) अच्छी कोख स्थूल हो, सिहके समान
हो और जिसमें बैठनेका आसन मंचक (खट्टा हष्टि हो, गला और शुण्ड बढे हो, अंग
के समान हो ॥१२॥
मध्यम हों, लंबी काया हो उस हाथीको मंद्र
रवादोलायितरूढस्तुमध्यमासनसारथिः ।
कहते हैं। ९८॥
शाखालसंधार्युदरइष्टच्छायोमनोरमः ९३ ॥ तनुकदंतकर्णशुंडःस्थूलाक्षएवहि ।
जिसकी दोला ( कमानी) भोंपर सारथी मुहत्स्वाधरमेहस्तुवामनोमृगसंज्ञकः ९९ ॥
के व मध्यम आसन हो और जिस रथके जिलके कंठ, दांत, कान, शुन्ड ये सब
भीतर शस्त्र अन सर भाजांय और जिनकी पतले हो और नेत्र स्थू (बडे ) हो हृदय,
छाया अच्छी हो और जो देखेनम तुंदर ओष्ठ और लिंग ये सब सुन्दर हो और जो
हो॥९३ ॥
वामन ( छोटा ) हो उस हाथीको मृग
एवंविधारथोराज्ञारक्ष्योनित्यंसदश्चकः ॥
कहते हैं ॥ ९९ ॥
नीलतालुनौलजिबोवक्रदतोह्यदंतकः ९४ ॥ एषांलक्ष्मतिमिलितोगजामिश्रइतिस्मृतः ।
ऐसे उत्तम अश्ववाले स्थकी राजा सदैव भिन्नभिन्नप्रमाणंतत्रयाणामपिकीर्तितम् ।।
रक्षा पर और जिसको तालु और जिहा नीली इन सबके चिह्न जिसमें मिले यह गन
हो और दांत टेढे हो ओर जिपके दांत मिका है और तीनोंका प्रमाणभो भित्र २
न हो ॥९४ ॥
कदा है॥९००॥
दीर्घद्वेषीग्मदस्तथापृष्टविधूनकः ।
देशाटननसामंदोभूविशोधनपुच्छकः ॥१५॥
गजमानेचंगुलंस्यादष्टभिस्तुपबोदरैः ।
जिनको घडावैर हो, जिसमें बहुत मद
चतुर्विशत्यंगुलैस्तैःकर मोक्तोमनीषिभिः९०१
हो और जिसकी पीठ करती हो और जिस
हाथीके प्रमाणमें ऐसा अंगुल होता है
ये. पठारहसे कम नख हो जो मंद हों और जिसके बीचम आठ जो आजाय उन चौ.
जिसकी पूछ भूमि पर लटकतो दो॥ ९५॥ वीस अंगुल्लोका बुद्धिमान मनुष्योने फरहाय)
एवंविधोजनेष्टगजोविपरीतःशुभावहः।
कदा हे॥९०१॥
भद्रामंद्र मृगोमिश्रोगजोजात्याचतुर्विधः९६ ॥
सप्तहस्तोन्नतिर्भदेहाष्टइरतमदीर्वता ।
ऐसा जो हाथी यह भनिष्ट होता है और परिणाझेदारउदरस्पभवेत्सदा ॥ २॥
दम विपरीत शुभदापी होता है और भद्र-
भद्रहाधीकी उंचाई सात हायकी उम्पाई
मर, मृग, मिश्र इन चार जातियाँस दायी भाट हापकी भोर उदरका विस्तार देय
चार मकारका दोता३॥९६ ॥
दायका देव दता॥२॥
भापाटीकासहित। . .. प्रमाणमं अमृगोर्हस्तहीनकमादतः । तीसरा अंश अधिक(चौगुगी)लंयाई धोती हे और वह उसके प्रमाणले चौगुगी रुमानी कथितदर्थसाम्यतुमुनिभिर्भरभद्रयोः ३ ॥ और उदरका विस्तार तिगुना मोर तीन बेश- मंद्र भोर मृग नामक हाथियोका प्रमाण ल होता है ॥ ९ ॥ इससे एक हाथ कम होता है और चौडाइमें श्मश्रुहीनमुखाकांतःमगल्भातुंगनासिकः । भद्र और मद्रकी साम्यता ( बरावरी) ही दायाँद्धतग्रीवमुखोहस्वकुक्षिपुरश्चतिः १०॥ मुनियोंने फही हे ॥३॥ जिसके मुखपर मथु (बाल )नहो तुन्दर, वृहद्मगडमाल्स्तुवृतशापगातःसदा । प्रगल्भ हो और जिसकी नासिका ऊची हो। गगःश्रेष्ठस्तु सर्वेशंशुभलक्षगंतयुतः ॥ ४॥ जिसकी ग्रीवा और मुख ऊपरको उचे उट जिसकी भृगगडत्य और मस्तक ये रहते हों और जिसकी कुक्षि छोटी हो और तीनों बड़े हो और शिरफी नतिमी जिसको जितके सुरोका शब्द सुनता हो ।। १० । सदैव अच्छी हो और जो उत्तम २ लक्षणोसे तुरप्रचंडवेगश्चहंसमेवसमस्वनः । युक्त होऐसा हाथो सर हाथियों में श्रेष्ठ कहा ॥४॥ नातिकोनातिनक्सखोमनोरम: ॥११॥ पंचयांगुलेनैववाजिमानंपृयक्स्मृतम् । शीघ्रतरमें जिलका वेग प्रचंड हो,इंस और मेघ के समान जिसका शब्द हो और जोन चत्वारिंशांगुलमुखोवाजीयश्चोत्तमोत्तमः ५॥ अत्यन्त क्रोधी भोर न अत्यन्त कोमळ हो पांच जोकै अगुलले घोडौंका प्रमाण भो ओर जो देवके समान वळवान् हो और पृथकू २ कहा है, चालोस भगुलका जितका सुन्दर हो ॥ ११ ॥ मुथ हो ऐला जो घोडा वह उत्तमसे उत्तम सुकांतिगंधवर्णश्चसद्गुणभ्रमरान्वितः । होता है॥५॥ भ्रमतस्तुद्विधावावामदक्षिणभदतः ॥ १२ ॥ पत्रिंशदंगुलमुखोयुतम परिकीर्तितः । जिसकी कांति गंध वर्ण ये सुन्दर हो गोर दशिदंगुलमुखोमपमा उदाहतः ॥ ६ ॥ उत्तम गुण और भोवरी हों, वाम और दादर छत्तीस अंगुटका जिसका मुख हो वह की तरफ भ्रमणके समय जिसके दो प्रकार उत्तम और बत्तीस अंगुलका जिसका मुख हो भावर्त (भोयरीं) पडें ॥ १९ ॥ वह मध्यम कहा है ॥६॥ पूर्णोऽपूर्ण:पुनधादीपहिस्वस्तयवच । अष्टाविंशत्यगुलोयोमुखेनीचा प्रकीर्तितः । स्त्रीपुंदेहेवामदक्षीययोक्तफलदोक्रमात् १३E और पूर्ण और अपूर्ण और तितीमकारदीये वाजिनांमुखमानेनसीस्यवकल्पना ।। ७ ॥ और हत्व भीवरी हो और घोडी और पोटा जित घोडेका मुख अट्ठाईस अगुलका हो के देहमें चाई और दाहिनी तरफक्रमकरदा- चद नीच कहा है और घोडोंके मुसलेही संपूर्ण यक होते हैं ॥१३॥ अवयवोंको कल्पना होती है कि ॥ ७ ॥ नतथाविपरीतौतुशुभाशुभफलप्रदे। औञ्चनुमुखमाननावगुणंपरिकीर्तितम् । नांचालतिर्षङ्मुखतःफलभेदोभवेत्तयोः॥१४ शिरोमणिसमारभ्यपुच्छमूलांतमेवहि ॥ ८॥ और इसस विपरीत गुभ और अशुभ फन्द्र- मुख के प्रमाणत तिगुनी उचाई कही है और दायक नहीं होते नीचे आर ओर तिर सुन्द- शिरको मणित लकर पूछ के मूठ पर्यंत ॥८॥ से उनके फनका भेद हो जाता है । तृतीयांशाविकपमुखमानाचतुर्गुणम् । शंखचक्रगदापद्मवेदिस्वातिकसन्निभः । परिणाइस्यूदरस्पत्रिगुणस्यगुलाधिकः ॥९॥प्रासादतोरणधनुःसुपूर्णकलशाकृतिः ॥ -- [अध्याय- शुक्रनीति। (१६०) शंख, चक, गदा, पद्म, वेटी, स्वस्तिक एवमेवप्रकारणत्रयोग्रावासमाश्रिताः २१॥ (सतिया ) इनके समान अथवा मदिर,तोरण, समावर्ता:सवाजीशोजायते नृपमंदिरे । धनुप, पूर्णकलश इनके तुल्य जिसका आकार हो ॥ १५॥ इसी प्रकार तीन ग्रीवामें उत्तम आवर्ट स्वस्तिकसमानखड्गश्रीवत्ताभःशुभोभ्रम के मंदिर में ही होता है ॥ १ ॥ होय तो वह घोडोका स्वामी वाजी राजा- स्वस्तिक, माला, मीन, सद्भ श्रीवत्स इन की कांतिक समान जो हो वह भोवरी शुभ है। कपोलस्यौयदावादृश्येतेयस्यवाजिनः ।। नासिकाग्रेलराटेचशखेकंठेचमस्तके ॥ १६॥ यशोवृद्धिकरी मोक्तीराज्यवृद्धिकत्मने। आवाजायतेयपातेपन्यास्तुरगोत्तमाः। जिस घोडेके कपोलों पर दो आवर्ट दो वे दोनों भावतं यश और राज्यको वृद्धि नाखियाके अग्रभागमें ललाटमे शंखम कठ-करने वाले कहे है ॥२२॥ में और मम्तकमे ॥१६॥जिन वाजियोके मा- वर्त (भ्रमर ) हो ये घोडोंमें उनम धन्य है। एकोवायकपोलस्योपस्यावाप्रदृश्यते २३ ॥ हृदिस्कोगलेचैवकटिदेशेतयैवच ॥ १७ ॥ शर्वनामासविख्यात'सइच्छेत्स्वामिनागनम् । नामाकुक्षौचपाचीवमध्यमा संप्रकीर्तिताः। अथवा जिसके कपोळ पर एक्ही भावर्त दोरी उखघोडेका नाम शी विख्यात है और हदयम स्कंधेपर गलेम और कमरमे वह अपने स्वामीका नाश करता है ॥२३॥ ॥१७॥ और नाभि, कुक्षि और पाश्चाका अग्र भाग इनमें जिनके मारत हो ये घोडे मध्यम गडसंस्थायदावर्तीवाजिनोदक्षिणाश्रितः॥ कहे है ॥ संकरोतिमहासौख्यस्वामिनःशिवसंज्ञकः । ललाटेयस्यचावर्तद्वितयस्यसमुद्भवः १८ ॥ तद्वद्वामाश्रितः क्रूरः प्रकरोति धनक्षयम् २५ मस्तकेतृतीयस्यपूर्णहोपमुत्तमः । जिस घोडेके दक्षिण गंडस्थल पर आवत दो जिसके दलाटमें दो भावर्त हो और मस्तकमे ॥ २४ ॥ शिवनामक बद घोढा अपने स्वामी तीसरा भावतं हो और आनंदसे पूर्ण हो को महान् सुरा करता है और जिसके बाप यह घोडा उत्तम होता है॥१८॥ गढस्थलमै आवत हो रनामक यह घोडा पृष्ठंबटगेयदावतोयस्पैक संप्रजायते ॥ १९॥ स्वामीके धनको नाश करता है॥५॥ संकरोत्यश्वमंचातान्स्वामिनःसयसनकः । इंद्रामौताउभौशस्तीनृपराजविवृद्धिदी। निसबी पोटो पासमे एक भावत होकर्णमूलेयदावर्तीस्तनमध्पेतयापरौ ॥ २६ ॥ बद नाममा पोदा अपने मामी यहाँ विजयाख्याउभीतीतुयुद्धकालेयशम्भदौ । योटीक समारोप करता॥१९॥ पारस्पटलाटस्याआवस्तियंगुत्तराः॥२०/तम राजापी गृद्धि देनेवाले होते यदि यदोनों गंटों के भायतं द्रिये समानदोष विफूट:सपरिक्षयोपानिवृद्धिकरः सदा जिसरे कान भोर स्तनकि मापदोमाया और निस एलाटमें तीन माया हो और हीलिप नामरे ये दोनों पोद पुरके उम सामग्री हरफमा मायतं तिरछा दो दरा यशपे दाता होते हैं।॥ २६ ॥ पोहोमिट पते ६ भौर यह भी संदेव संघपाधयदायतोसभोपामरक्षगः २७ ।। गोपद्धि करनेगलादोवा ॥२॥ करातिविर्षियांपनांसामिनासतमुखम् ।
भाषाटोकासहित । (१६१) स्कन्ध और पावों में जो भावत हो उसको) जिसकी गुदा पूंछ और पीठको हड्डीमें पद्म रक्षण कहते हैं यह घोडा अपने स्वामीके आवर्त होय तो कालरूप वह घोडा भयका यहां नाना प्रकारको लक्ष्मी और निरन्तर दाता होता है जिस घोडेकी शतपदी (पंछ) सुख करता है ॥ २७॥ के बाल मध्य दंडसे पावोंकी तरफ जाय ३॥ नासामध्येयदावर्तएकोवायदिवात्रयम् ॥२८॥ अतिदुष्टांगुष्ठामितादीर्घाऽदुष्टायथायथा । चक्रवर्तीसविज्ञेयोवाजीभूपालसंज्ञका। अश्रुपाताहनुगंडहद्गलमोथवस्तिपु ॥ ३५॥ जिसकी नाकम एक वा तीन भावर्त ही उस और वह अंगूठेके समान पतली होय तो घोडेका नाम भूसाल होता है और वह राजा अत्यन्त दुष्ट होती है, और जितनी २ मोटी हो चक्रवर्ती जानना ॥२८॥ उतनी ही उत्तम होती जिसके ठोडीगंडस्थल, कोठेयस्थमहावतएकाश्रेष्ठःप्रजायते ॥ २९ ॥ हृदय, गला, प्रोथ ( पेह ) और चस्तिपर चिंतामणिःसविज्ञेयश्चितितार्थसुखपदः । आंसू गिर ॥ ३५॥ शुक्लारख्यामालकंस्यौआवतीवृद्धिकीर्तिदौ ॥ कार्टिशखजानुमुष्कककुन्नाभिगुदेपुच। जिसके कण्ठसे एक उत्तम आवर्त हो उस दक्षकुक्षौदक्षपादत्वशुभोभ्रमर सदा ॥ ३६ ॥ घोडेको चिन्तामणि कहते हैं वह घोडाचिंतित कमर, शख, गोडे, अटकोश, डोट, नाभि, अर्थ और सुख देनेवाला होता है यदि मस्तक गुदा, दक्षिणकोख, दक्षिणपाद इनमें भ्रमर ओर ग्रीवाम सफेद भावत होय तो वृद्धि होय तो सदैव अशुभ कहा है ॥३६ ॥ और कीर्ति के दाता होते हैं ॥ २९ ॥ ३०॥ गलमध्यपृष्ठमध्यउत्तरोष्ठऽधस्तथा । यस्यावविक्रगतीकुक्ष्यंतेवाजिनीयाद । कर्णनेत्रांतरेवामकुक्षौचैवतुपायोः ॥ ३७॥ सनूनमृत्युमाप्नोतिकुर्याद्वारवामिनाशनम् ॥ गलेमें, पीठ और दोनों ओष्ठ, कान, नेत्र जिस घोडेकी कुक्षिक अन्तमें तिरछे भावत और पाई कोख और दोनो पावों में ॥३७॥ हो वह घोडा या तो निश्चय मर जाय अथवा ऊरूपुचशुभावतॊवाजिनामग्रपादयोः। अपने स्त्रामीका नाश करें ॥ ३१॥ आवतीसांतरौभालेसूर्यचंद्रौशुभप्रदी ॥ ३८॥ जानुसंस्थायावतःप्रवासक्लेशकारकाः । दोनों ऊरु (जघा) मों में और अगले पैरोमें वाजिमंट्रेयदावविजयश्रीविनाशनः ३२॥ जो आवर्त हैं वे शुभ कहे हैं और मस्तकके जिसके घोटुऑपर तीन आवत हों वह बीचमें जो खाली आवर्त हैं वे सूर्यचन्द्र कहाते घोडा प्रवास (परदेश ) में क्लेशकारक होता है और शुभदायक होते हैं ॥ ३८ ॥ है यदि घोडेके लिंगमें भावन होय तो विजय मिलितौतीमध्यफलोह्यतिलनौतुदुष्फलौ । भौर श्रीका नाश करता है ॥ ३२॥ आवर्तत्रितयंभालेशुभंचायतुसांतरम् ॥३९॥ त्रिसस्योयदावतीस्ववर्गस्यप्रणाशनः । जो वे दोनों आवर्त आपसमें कुछ मिले पुच्छमूलयदावर्तीधूमकेतुरनर्थकृत् ॥३३ ॥ होय तो मध्यफल और अत्यन्त मिले जिसको पोठयो हड्डीम आवर्त हो वह धर्म होय तो बुराफल देते हैं, और मस्तकके ऊपर अर्थ कामका नाश करता है, यदि पूंछके तीन भावते फरकसे होय तो शुभ होते हैं ३९॥ मलमें मावर्त हो तो धूमकेतु वह घोडा अनर्थ अशुभंचातिसंलग्नमावर्तद्वितयंतथा । को करता है॥३३॥ त्रिकोणत्रितयंभालआवर्तानांतुदुःखदम् ४०॥ गुह्यपुच्छत्रिकावासकृतांताभयमदः । और अत्यन्त मिले हुये अशुभ होते हैं और मध्यदंडात्पार्श्वगमासैवशतपदीकचैः ॥३४॥ ऐसे ही दो आवर्त समझने और मस्तकमैं .
[ अध्याय-
शुक्रनीति।
--
:
तिकोने तीन आवर्त दुखदायी होते है ॥१०॥ वैडूर्यसन्निभेनेत्रेयस्यस्तोजयमंगलः ।
गलमध्येशुभस्त्वेकःसर्वाशुभनिवारणः। मित्रवर्णस्त्वेकवर्ण पूज्यास्यात्सुन्दरोयदि ।
अधोमुसःशुभःपादेभालेचोर्धमुखोभ्रमः ॥ जिसके नेत्र वैडूर्य मणिके तुल्प हों वह
गलेके मध्य में एक आवर्तसम्पूर्ण अशुभोंका जयमङ्गल होता है और जो घोडा अनेक वर्ण
नाशक होनेसे शुभ होता है और पैरोमे अधो- हो अथवा एकही नण हो और सुन्दर भी होय
सुस और मस्तरमे अवमुख आवत शुभ तो पूजनेयोग्य होता है।॥७॥
होते है ॥११॥
कृष्णपादोहरिनंद्यस्तथाश्वेतैकपादपि ।
नचैवात्यशुभापृष्टमुखशितपदीमता । रूशोधूसरवर्णश्चगर्दभाभोपिनिंदितः ॥४८॥
मेस्याश्चाद्भमरीस्तनीवाजीसचाशुभः ॥ जित घोटेक पैर फाले हो अथवा एक ही
पोछेको मुसवाली पूछ अत्यन्त अशुभ पेरसपेद होय तो वह भी निन्दित होता है
मही रही, जिसके लिड़के पीछे और स्तनोम और जो रूखा गधेके समान धूसर वर्णका
भौरी हो वह घोडा भी अशुभ होता है ॥४२॥ हो वह भी निन्दित होता है ॥४८॥
भ्रमाःकर्णसमीपेतुश्रृंगीचेक-सनिंदितः । कृष्णतालुालणनि कृष्णोष्ठश्वविनिदितः।
ग्रोवोर्ध्वगभ्रमरटकरश्मिःसकतः ॥ सर्वत्र कृष्णवर्णीयापुच्छेश्चेतःसनिदितः ४९॥
जो कानोंके समीप एक सींगवाला भावर्त
जिसके तालु, जिद्दा और मोष्ठ ये
होय तो यह भी निन्दित है । ग्रीवाके ऊपरके व काले हो यहभी अत्यन्त निदित होता है
पाव जो एक रस्सीकी भारी हो और वह और जो सब कृष्णवर्ण और पूंछ में सुफेद हो
एक तरफ होय तो निन्दित होती है ॥४३॥ वहभी निंदित है ॥ ४९ ।।
पादोर्ध्वमुखभ्रमकीलोत्पाटीसनिदितः ।
उच्चैःपदन्यासगतिदिपव्यावगतिश्रयः ।
शुभाशुभौभ्रमौयस्मिन्सयाजीमध्यमःस्मृतः ॥ मयूरहंसतित्तरिपारावतगतिश्चयः ॥ ५० ॥
पैरों में जो ऊर्धमुरा भौंरी है उसको जित घोटेकी गति (चाळ) ऊचे २ पैर
फोलोरपाटी कहते हैं और वह भो निन्दित उठाकर दो अथवा गैडा, सिंदा मोर, 'ईसा
होती है, जिस घोटेंम शुभ धौर अशुभ दोनो तित्तिर और क्यूतर इनके समान जिसकी
मायत हो वह घोडा मध्यम होता है।४४ ॥ गति हो ॥ ५० ॥
मुखपत्सुसित पंचकल्याणोऽश्चासदामतः। मृगोष्टवानरगातःपूज्योवृपगतिपः ।
सएपहृदयेस्कंधेपुच्छेश्वेतोष्टमंगलः ॥ ४५ ॥ अतिभुक्तोतिपीतोऽपिययासादीनपीडयेत्५१।।
जिसका मुस और पैर सफेद हो यह योडा मृगारंट, चन्दर अथवा बैल इनके समान
सदेय पंचरल्याण पहा है, यदि यही हृदय जिसी गति दो घद घोढा पनने योग्य होता
म्गन्ध और पुन्छम मुफेद होय तो मष्ट महर है,जो घोडा अत्यन्त भूपा वा मापन्त प्याठा
होता ॥४५॥
अपने सवारशे पीदान दे॥५१॥
कोश्यामाश्यामकर्णःनर्वतस्त्वेकवर्णभार । श्रष्टागतिस्तुसाझेयासश्रेष्टस्नु गोमवः ।
वनापिर्वताश्वतोमध्यःपूज्य सदैवहि ४६ ॥ सुचेतभालतिरकोपिधोरणांतरणेच ॥ १२ ॥
निर्णयामही भौरसर एफही रंग
दो पद म्यामपंग उसमें भी जो सम्पूर्ण श्वत श्रेष्ट माना जिस पोटी मतपया मुफेर
यह गत उत्तम जाननी जोर पड़ी घोडा
हो या मायम और मृदेय पूनने योग्य होता तिटक दूसरे रंग विधा दो भयाच उठने
पोईमन्य घणमीदो॥५२॥
.
२॥६॥
[४
भाषाटीकासहित ।
(१६३)
सवाजीदलभंजीतुयस्यतस्यातिनिदितः । ओर अतिकठिन न हो उससे ही घोडेकी
ताडना करें ।। ५८॥
सहन्यावर्णजान्दोपास्निग्धवर्णभिवेद्यदि ५३
यह घोटा सेनाको नष्ट करनेवाला होता है ताडयेन्मध्यघातेनस्थानेस्वन्धंसुशिक्षकः ।
और जिसका वह घोडा हो वदभी अत्यन्त हेपितकक्षयहिन्यावस्खलितेपक्षयोस्तथा ५९||
निंदित होता है यदि घोडेका वर्ण स्निग्ध (चिः उत्तम शिक्षा देनेवाला श्रेष्ठघोडेको मध्यम-
क) होय तो वर्णके जितने दोष हैं उन सव. रीतिसे तचित अंगमें ताडना दे,हिंसनेमें कोख
को नष्ट करता है ॥५३ ॥
और गिरने के समय पखोमें ताडना दे॥ ५९॥
बलाधिकश्चसुगतिर्महान्सबोगसुंदरः । भीतकातरेचैवग्रीवामुन्मार्गगामिनि ।
नाति–र सदापूज्योभ्रमाद्यैरपिदृपितः ॥५४॥ कुस्थितवाहमध्येचभ्रांतचित्तेतथोदरे ६० ॥
जिस घोड़ेमें यल अधिक हो और अच्छी डरनेपर कानोमे कुमार्ग चलने पर ग्रीधामें
गति हो और मोटा और सब अंगोमें सुदर हो क्रोध होनेपर भुजाकै मध्यमें, चित्तके भ्रम
जो अत्यन्त क्रोधी नही वह चाहे आवर्त होनेपर पेटमें घोडेको ताडना दे॥६०॥
आदिसे दूपितभी होतोभी सदैव पूजने योग्य
अश्वः संताडयतेप्राज्ञैःनान्यस्थानेपुर्हिचित् ।
है॥५॥
चाजिनामत्यवहनासुदेपाःसंभवंतिहि ।
अथवाहेपितस्कंधस्खलितेजघनांतरम् ६१ ।।
बुद्धिमान् मनुष्य किसी अन्य स्थानमें कभी
कृशोव्याधिपरीतांगोजायतेत्यंतवाहनात्॥५५ भी ताडना नदे अथवा हिंसने पर स्कंधो और
घोडीले जो सवारी न लेना उससे बहुतसे पढने पर जंघाओ मध्यमें ताडना दे॥ ६१ ।।
दोष होते है, जो घोडा दुचला, रोगी, अत्यन्त भीतेवक्षस्थलहन्याद्वक्त्रमुन्मार्गगामिनि ।
जोतनेसे हो जाय ॥ ५५ ॥
श्रवाहितोभवेन्मंदः सर्वकर्मसुनिदितः ।
कुपितेपुच्छसध्यतेभ्रान्तेजानुदयंतथा ।। ६२॥
घोडेके डरजानेपर छातीपर कुमार्ग चलने
अपोपितोभवेक्षीणोरोगीचात्यंतपोषणात् ॥ पर मुखम, कोप होनेपर पूछके समीपमें और
मौर विना जोते मंद हो जाय वह सवभ्रम होनेपर दोनों गोंडोमें ताडना दे ।। ६२ ।।
काममि निदित होता है और जो बिना पोपण नासकृत्ताडयेदश्चमकालेचीवदेशके ।
(खवाये) क्षीण ( थकना) होजाय और
अत्यंत पोपणले रोगी होजाता है ॥५६॥
अकालास्थानवातेनवाजीदोषोस्तनोतिच ६३
वारंवार और कुसमयमै और कोमल देशमें
सुगतिर्दुर्गनिनिल्यशिक्षकस्यगुणागुणः ।
प्रश्वको ताडमानदे क्यों कि कुछनय और
जान्वधश्चलपादःस्यादृजुकाय:स्थिरामनः ॥ विदेशको ताडना देनेपर घोहा दोषीको करता
और जिसकी शिक्षकके गुण और अवगुणसे हे अर्थात् अपने सवारक दावमें नही रहता
सुगति और दुर्गति होजाय और गोंटेके नीचे ॥ ६३ ॥
जिसके पैर दलते हों और काया कोमल तावद्भवतितेदोपायावजीवत्यसौहयः ।
और आसन स्थिर हो। ५७ ॥
दुष्टंदेडेनाभिभवेन्नारोहेदंडवर्जितः ॥ ६४ ॥
तुलाधृतखलीनःस्याकालेदेशेसुशिक्षकः । और दोप तबतक रहते है जब तक यह
मृदुनानातितीक्ष्गेनकशाघातेनताडयेत् ॥५८ घोड़ा जीता है दुष्ट घोडेका दंड तिरस्कार
जो समय और देशकै अनुसार एफसी करें और दंडके विना सवारभी न हो ॥ ६
खलीन (लगाम ) को धारण कर वह अच्छा गच्छेत्योडशमात्राभिरुत्तमोश्वाधेनुःशतम् ।
शिक्षक होता है जो कशा(कोरडा)कोमल हो यथायथा-यनगतिरश्चोहीनस्तयातथा ॥६५॥
[ अध्याय-
शुक्रनीति।
जोघोडासोलह मात्राकि उच्चारण कालम खिलावे चने उदद और मटाये सन घोडेके
सौधनुप चले वह उत्तम होता है इससे जित भक्षणके लिये हित हैं ॥१॥
नी न्यूनगति जितकी हो टतना २ ही वह शुष्कानाद्रीश्चमांसानिसुस्विन्नानिप्रदापयेत् ।
हीन होता है ॥६५॥
यद्यास्वलितंगावंतत्रदशंप्रपातयेत् ॥७२॥
सहस्त्रचापप्रामतमंडलंगतिशिक्षण ।
सूखे और गोले पके हुए मांसीको भी देजो
उत्तवाजिनोमध्यंनीचमधूतदर्धकम् ॥६६॥ गाव घोडेका घाव आदिसे गिर जाप उस
और गतिकी शिक्षा देनेके समय सहस्र जगह मांसको भरदे ॥ ७२ ।।
मंडल धनुपकी गतिका प्रमाण उत्तम घोडेका नावतीरितपल्याणहामार्गसमागतम् ।
है उससे आधी गतिवाला मध्यम और उससे दत्त्वागुडसलवणंवलसंरक्षणायच ॥ ७३ ॥
भी आधी गति जिसकी हो वह थोड़ा नीच
जिस घोडेका पलाण नावसे उतारा हो और
होता है ॥६६॥
मागसे चलकर आया हो उसको लवण और
अल्पंशतधनुःप्रोक्तमत्यल्पंचतदर्धकम् ।
गुड वरकी रक्षाके लिये देकर ॥७३॥
दातयोजनगंतास्यादिनैकेनययायः ॥ ६७ ॥ गतस्वेदस्यशांतस्यसुरूपमुपतिष्टतः ।
सौधनुषको गति अल्प और पचास धनु- मुक्तपृष्ठादिवंधस्यखलीनमवतारयेत् ७४ ॥
पकी गति अत्यल्प होती, जस घोडा एक
दिनमें सौ योजन चलनेवाला होजाय ॥६॥ स्वपमें स्थित हो जाय और उसकी पीठका
जव स्वेद (पसीना)शात हो जाय, अपने
गतिसंवर्धयन्नित्यंतयामंडलविक्रमैः ।
बंधन उतारकर खलीन (हंगाम ) को उतार
सायंप्रातश्चहेमतेशिशिरकुसुमागमे ॥ ६८ ॥ ले ॥ ४ ॥
इस प्रकार नित्य गतिको मंडल और दढावे, मदीयत्वातगात्राणिपांसुमध्यविवर्तयेत् ।
विक्रम (चाळ ) स हेमन्त ( जाडा) ऋतुमें स्नानपानावगाहैश्चततःसम्यस्प्रपोपयेत् ७५।।
सायंकाल भोर प्रातःकाल और शिशिर और
वसंत ऋतु ॥ ६८॥
और अंगीको मलकर ऐसी जगह फेरे जहां
सायंग्रीष्मेतुशरदिनातरश्चंवत्सदा ।
धूली हो फिर स्नान, पान और मल कर भली
प्रकार पुष्ट करै ॥ ७५ ॥
वर्षासुनवहेदोषत्तयाविषमभूमिपु ॥ ६९ ॥ सर्वदोषदरोश्वानांमद्यजांगलयोरसः ।
सायकालको, ग्रीष्म ( गरमी) और शरद शक्त्यासंपादयेत्क्षीरघृतंवावारिसक्तकम् ॥
ऋतु में प्रातःकालके समय घोडेको नित्य
चलावे और वर्षा तथा विपम भूमि कदाचिन्
मदिरा और जगलीमांसका रस घोडकि
भीनचढ़ावे॥ ६९॥
सब रोगोंको हरता है और यथाशक्ति दूध, घी
सुगत्यासिंबलंदायमारोग्यवर्धतरे। .
और जलमिले सत्तओंको खिलावे ॥७६ ॥
भारमार्गपारश्रांतंशनैःशंकामयेद्धयम् ७० ॥ तदाश्वानांकासवासादिकागदाः ॥
अन्नभुक्त्वाजलंपीत्वातत्क्षणाद्वाहितोयः ।
उत्तम गतिसे घोडेकी अग्निवल दृढता और अत्रको सिलाकर और जलको पिलाकर
भारोग्य वढते हैं और भार और मागसे यके उसी क्षण में चलाया हुआ जो घोडा उसके
हुये घोडकोशःचलावे (फेरै) ॥७॥
कास और श्वास भादि भनेक रोग पैदा होते
सेहसंपादयेत्पश्चाच्छक सक्तमिश्रितम् । हैं ॥७॥
हरिमंयाश्चमापाश्चमक्षणार्थमकुष्टकान् ॥७२॥ यवाश्चचणकाःश्रेष्ठामध्यामापामकुष्ठकाः ।
फिर साह और सनुओ में मिटाकर पीको नचिामसूरामुद्गाश्चभोजानायतुवाजिनः॥७॥
४.]
मापार्टीकासहित ।
योडेको जौ और चने श्रेष्ठ, उडद और
परिणाहोवृपमुखादुदरेतुचतुर्गुणः ।
माठा मध्यम होते हैं और मसूर और मूंग
भोजनके लिये निंदित होते हैं । ७८ ॥
सककुत्रिगुणोच्चस्तुसाधित्रिगुणदीर्घता १८५||
बैल के मुख विस्तारसे उदरका चौगुणा वि-
पादेश्चतुर्मिरुप्लुत्यागवत्साप्लुतागतिः ।
स्तार होता और ककुद (डाटा सहित तिगुनी
असंवलितपद्भ्यांतुसुव्यक्तंगमनंतुरम्॥७९॥ उचाई और साढे तीन गुनी लंबाई होती ८५।।
जो घोडा चारों पैरोले मृगके समान कृद सप्ततालोवृपःपूज्योगुणैरेभिर्युतोयदि ।
कर चले वह गति पलुत होती है और पैरोको नस्थायीनचवमंदःसुवोढायंगसुंदरः ८६ ॥
नही मिलाकर जो प्रगट रीतिते चले उस
यदि पूर्वोक्त गुणीसे युक्त होय तो सात ता-
गतिको तुर (वेगवती) कहते हैं ॥ ७९ ॥
लका बैल पूजने योग्य होता है और जो न
धौरीतकंचतज्ज्ञेयंस्थातवाहनेवरम् । स्थायी (खडा रहै) हो और न मंद हो और
प्रसंवलितपभ्यायोमयूरोदृतकंधरः ॥८०॥ जिसके सब भग सुंदर हो ॥ ८६ ॥
जो घोडा रयके ले चलनेमें उत्तम हो उसे नातिर सुपृष्ठश्चकृपभःश्रेष्ठउच्यते ।
धौरीतक कहते हैं जो घोडा मिले हुये परोसे त्रिंशद्योजनगंतावाप्रत्यहंभारवाहकः ८७ !!
कंधरा उठाय ले उसे मयूर कहते हैं । ८०॥ और जो भारको ले चले जो न अत्यन्त क्रूर
दोलायितशरीरार्थकायोगच्छतिवलिगतम् । हो और जिसकी पीठ सुन्दर हो वह बैल श्रेष्ठ
गतयःपड्विधाधागस्कंदितरेचितंप्लुतम् ८१॥ कहा है और प्रतिदिन तीस योजन भारको
जो घोडा आधे शरीरको हिंडोलेके समान
लेकर चलसके ।। ८७॥
उठाकर चले उसकी गतिको वलिगत कहते है।
नवतालश्चसुदृढःतुमुखोष्टःप्रशस्यते ।
और घोडेकी गति छः प्रकारको होतीहै धारा, जिसका प्रमाण हो और मुखसुन्द
शतमायुर्मनुष्याणांगजानांपरमंस्मृतम् ८८
आस्कंदित, रेचित, प्लुत ॥ ८१॥
धौरीतकंवल्गितंचतासांलक्ष्मपृथक्पृथक् ।
र हो ऐसा ऊंट श्रेष्ठ कहा है मनुष्य और हा-
|थियोंको अवस्था सौ वर्षकी परम कही है।।८८
धारागतिःसाविज्ञेयायातिवेगतरामता ।।८२॥ मनुष्यगजयोल्यंयावदिशतिवत्सरम् ।
धौरीतक और बलिगत, उनके लक्षणभी ४ नृणांहिमध्यमंयावत्पष्टिवर्पवयःस्मृतम् ८९ ।।
थरु २ हैं जो अत्यन्त वेगसे हो वह गति धारा
जाननी ॥८॥
मनुष्य और हाथीकी बाल्य अवस्था घीस
पाणितोदातितुदितायस्यांनांतोभवेद्धयः ।
वर्पतक होती है और मनुष्योकी मएम अव-
स्था साठवर्षतक कही है।॥ ८९ ॥
आकुंचिताप्रपादाभ्यामुत्प्लुत्योत्प्लुत्ययागतिः अशीतिवरमायावत्जस्यमध्यमवयः ।
पाणि ( एडी) के लगानेसे मत्यंत प्रेरित चतुस्त्रिंशत्तुवर्षाणामश्वस्यायुःपरंस्मृतम् ।।
किया घोडा अत्यन्त भ्रात होजाता है किंचित असी वर्षतक हाथोकी मध्यम अवस्था हो-
सुकडे हुए अगले पैरोसे कूद २ कर जोती है चौतीस वर्षको अवस्था घोडेकी परम पू.
गति है ।। ८३ ॥
री होती है ॥ ९॥
आस्कंदिताचसाञयागातिविद्रिस्तुवाजिनाम् । पंचविशतिवहिपरमायुर्वृपोष्टयोः ।
ईपदुत्प्लुत्यगमनमखंडरोचितहितत् ॥ ८४ ॥ वाल्यमश्वपाष्ट्राणांपंचसंवत्सरंमतम् ॥ ९१||
उसको घोडाकी गतिके ज्ञाता आम्कदित बैल और अटकी पूरी अवस्था पच्चीस वर्ष-
कहते है किंचित् कदकर जो असड गति है की होती है और घोडा बैल ऊंट इनकी वाल्य
उसको रेचित कहते हैं ॥ ८ ॥
अवस्था पांच वर्षकी कही है ॥११॥
[ अध्याय- (१६६) शुक्रनीते। मध्ययावत्योडगाव्दंवार्धक्यतुततःपरम् । की मध्यम हो पीट जिसकी लगती होय पीछे दंतानामुद्गमैवर्णरायुज्ञेयंपाश्चयो ॥ ९२ ॥ को हटता होय. उररको पैर उठाता होय सोलह वर्पतक मध्यम आयु और उससे परे और ॥ ९८॥ वृद्ध अवस्था होती है और दांतो निलिने सर्पजिहश्चर्मकांति रुग्श्वोतिानेंदितः । और वर्ण (आकार )से बैल और घोडेकी सच्छिद्रभालतिलकीनिद्यआश्रयकृत्तथा ॥९८ अवस्था जाननी ॥९१ ।। सांप के समान जिहा और रीछवीसी काति अवस्यपदसितादंता प्रथमान्देभवंतिहि । डरपोक होय ऐसा घोडा अत्यत निंदित होता कृष्णलोहितवर्णास्तुद्वितीयेन्देह्यधोगताः ॥ है जिसके मस्तक्के तिलकम छिद्र होय और जो ढोला औरमाश्रय चाहता होय वह घोडा घोडे छ दांत सपेद पहिले वपमे और भी निंदित होता है ॥९९ ॥ दूसरे वर्षम काले और साल वर्णके और नीची तरफ ही होते है॥ ९३ ॥ वृषस्याष्टौसिताईताश्चतुर्थेदेखिला • स्मृताः। तृतीयब्टेतुमदृशाकमात्कृष्णौपडन्दतः। द्वावत्यौपतितोत्पन्नीपंचमेब्टेहितस्पदै १०००। नवमादानमात्पीतीतीसितौदादशाब्दतः ॥ घर के दांत चौथे वर्षमे माठ और सपेद होत और पांचवे वर्षमे पिछले दो टूटकर पैदा तीसरे वर्ष में प्रमले बराबर हो जाते है होते है ।। १००० ॥ और कठे वर्ष में काले हो जाते है और नये वर्ष ले और बारहवे वर्षों सुफेद हो पृष्ठेतूपांत्योभवतःसप्तमेतत्समीपगी। जाते ६॥९॥ अष्टमेपतितोत्पन्नौमध्यमादशनौखलु॥१००१ दहापंचाव्दतस्तौतुकाचाभौक्रमतःस्मृती । और उनके पाउके दो दांत उठे व भोर अष्टादशाव्दतस्तौहिमध्वाभौमवत क्रमाव दोन आठव यर्षभ गिरकर दुपारा उनके भी पासके दो दांत सातवें वर्ष और और पंद्रहवें वपम ये दोनों दांत काचक पैदा होते है ॥ १००१ ॥ समान और भठारहवे वर्ष मधु (शदद) के समान ममस होजाते है॥९५ ॥ कृष्णपीतसितारक्तशंखच्छायोधिकेदिक । वारसाचिकपिशाब्दाचताशाब्दतःसदा। क्रमादब्देचभवतश्चलनंपतनंततः ॥१००२।। छिद्रसंचलनंपातोदवानाचत्रिकोरिके९६ ॥ फाली, पान, सपेदलाल और पराकै समान और दो दो वर्षकै अन्तरसे दातीपी फीति दफास्य घर्षमे शपके समान हो जाते हैं हो जाती है और उसके बाद दांतोंका दिलना भीर चौपीठ पर्पस तीसरे२ वर्षे दांतों और पदना होने लगता है ॥ १० ॥ छेद दिरना और पटना होने लगता है ॥१६॥ उष्ट्रस्योक्तमकारेणवयोज्ञानंतुवामवेत् । प्रोथेसवरयस्तिस्य पूर्णायुर्यस्पराजिनः । ययाययातुहीनास्ताहीनमायुस्तयातया ९७॥ अशी भी भवस्थामा ज्ञान पूर्यात प्रकार मेरकाऽऽकर्षकमुखानुशोगजविनिग्रहे ॥ ३॥ जिम योगी नाक्ये भाग निवली होप होता है, साथीको शिक्षा देनेये लिये ऐए उसको पूर्ण अवस्या होती है भोर जैसी हो जिस मुगतिरा हो भौर जो प्रिपती यम दोष उतनीदी कम होती है. पुम सो ॥३॥ नानुस्यातायोटवाद्योधूतपृष्ठोजलामनः । दास्तिपफैगजरतेन धिनेप मुगमोपदि। गतिमध्यापन पृष्टपातीपश्चादमार्चपात् ।। पलीनस्योधमंडीदीपा गीदादशांगुरी। गौटे जो पाटा महाद्वीप भार होटनि उसमय भी प्रसार घटना पने पीट पे नाम पे जाप गति निरा-पोसानहाया निशादेगटी (मा) 2 ४, भाषाटीकासहित। ऊपर लोखंडके दोनों याजू पारद २ अंगुलके नचाल्पसाधनोगच्छेदपिजेतुमरिलघुम् । होते हैं ॥४॥ तत्पाश्चतिर्गताभ्यांतुसुदृढाभ्यांतयैश्च । महत्तात्यंतसाध्यस्तुवलेनैवसुबुद्धियुक् ॥१॥ थोडे सामानवाला राजा छोटेभी शत्रुके वारकाकपखंडाभ्यारज्ज्वर्थवलयैर्युतौ ॥ ५॥ जीतने के लिये गमन न करे वा बुद्धिमान और वे दोनो ऐसे होयं जिनके पासमे लगे मनुष्य बडी सेनाले शत्रुओके अंतको प्राप्त हुए ओर बडे दृढ हटाने और खीचनेके खंड होता है ॥ ११ ॥ लगे होय भौर रस्सीको डोरभी लगी अशिक्षितमतारचसादयस्कंगलवचतत् । होय ॥५॥ एवंविधखलीननवशीकुर्यात्नुवाजिनम् । युद्धचिनान्यकायेंपुयोजयेन्मतिमान्सदा १२॥ नासिकारज्ज्यातुवृषोभंपिनयेदशम् ।। वृद्धिमान् राजा ऐसी सेनाको युद्धसे भिन्न कायों में नियुक्त कर जो अशिक्षित, असार, ऐते खलोनले घोडेको वशमे करे और साद्याक, (नवीन ) बलवान् होय ॥ १२॥7 नाखिकामें लगी हुई खीवनेकी रस्सीले बैल और ऊटको वशम करें।। ६॥ [विकर्तुयततेऽल्पेपिप्राप्तप्राणात्ययेऽनिशम् ।। तीक्ष्णाप्रकासप्तफालास्यादेपांमलशोधने । नपुनः बिनुबलवानविकारकरणक्षमः ॥१३॥ सुताडनर्विनेयाहिमनुष्यैःपशवः सदा ॥ ७ ॥ छोटाभी शत्रु प्राणोंका नाश होना देखकर और इनकी मदशुद्धिके लिये तीखे अग्र- विरोध करने के लिये जब यत्न करता है तो धाला सात फालोंकी दंताली करना, मनुष्य बलवान मनुष्य विकार करनेको क्यों न समर्थ पशुओको सदैव भली प्रकार ताडनाते होगा ॥१३ ॥ शिक्षादे॥७॥ अपिनहुवलोऽशुगेनस्यातुंक्षमतेरणे । सौनिकास्तुविशेषेणनधनदंडतः । किमल्पसाधनाच्छूरः स्थातुं शक्तोऽरिणा अनूपेतुवृपाश्वानांगजोष्ट्राणांतुजांगले ॥ ८॥ सपम् ॥ १४ ॥ और सेनाकै मनुष्योको तो विशेप कर ताडनासे शिक्षित करै धन दडसे नहीं बैल अशूर (कायर) भी मनुष्य अधिक सेना पर सग्राममें टिकनेको समर्थ नही और और घोडोको जलवाले देशमें हाथी और अदर सामानवाला शूर शत्रुके संग टिकनेको ऊंटोंको जंगलमे ॥८॥ साधारणेपदातीनां निवेशाद्रक्षणभवेत् । समर्थ क्या हो सकता है अर्थात् नहीं हो सकता॥१४॥ शतंशतयोजनांतेसैन्यंगनियोजयत्।॥ ९॥ सुसिद्धाल्पवल.शूरोविजतुक्षमतेरिपुम् । पदाति मनुम्योको साधारण देशमें निवास करनेते रक्षा होती है, राजा अपने राज्यम महान्सुसिद्धवलयुक्छूर किन्नविजेष्यति ९५॥ योजनके अंतरपर तीली सेनाको नियुक्त करे भली प्रकार सनद्ध थोडीभी सनायाला भर्याद छावनी डाले ॥९॥ शूरवीर शत्रुके जीतनेको समर्थ होता है और गजोवृपभाश्ना पाश्रेष्ठाःसंभारवाहने । भलीप्रकार सन्नद्ध सेनाबाला और महान् शूर- सर्वेभ्यशकटा श्रेष्ठावर्षाकालंविनास्मृताः १० वीर शत्रुफी सेनाको क्यों नहीं जीतेगा ॥१५॥ हाथी, पर बैल, घोडे, इनमे पहिला . मौलशिक्षिततारेणगच्छेद्राजारणरिपुम् । बोझ खेचलनम श्रेष्ठ होता है और वर्षाक माणात्ययेपिमौलनस्वामिनं त्यक्तामिच्छति १६ समयको छोड़कर सबसे उत्तम बोझ खेचल मौर(पुस्तैनी नौकर)और सीररी सनाको में शक्ट (गाडी) होते है ॥ १०॥ लेकर राजा रणमे शवपर चढे क्योंकि मौल शुक्रनीत । [अध्याय- (१६८) सेना प्राणोंरे नाश समयमे भी अपनेस्वामीको शवकी त्रागा हुई सेनारे समूहगे अपने त्यागना नहीं चाहती ॥ ६॥ समीपन र याता उसे अपनी सेनाले पृथक याग्दडपरुपेणवभृतिहासेनभीतितः । काममै रगावे अथवा सबसे पहिन्द्रे युद्धमे नित्यंप्रवासायाताभ्यांभेदोवश्यंप्रजायते १७॥ नियुक्त रै॥२३॥ कटु वचन और भृति ( नोकरी)की मैव्यमारास्पृष्टभागेपार्श्वयोवारलन्यसेत् । न्यूनदा करनेट भयस और प्रतिदिन परदेशम अस्यतेक्षिप्यतयत्नुमंत्रयंत्रादिभिश्चतत् २४॥ भेजने और परिश्रमसे सेनाका अवश्य भेद मित्रकी सेनाको अपने समीप पीटरे ( फटना) हो जाता है ॥७॥ भाग अथवा पाच ( आसपास ) भागामे वलंयस्यतुसंभिन्नमनागपिजयाकुतः । रक्खे जो मत्र यत्र अग्नि इन तीनोसे चलाया जाय उसे ॥२४॥ गोस्वल्पापिसेनायाअतो विचितयेत् १८ जिस राजावी योटी ही सेना भिन्न अस्त्रंतदन्यत सबमसिकुतादिकंचयत् । हो गई होय उसवी जय कहा, इससे शहरे अवतुद्धिविधापनालिकमानिस्तथा॥२५ ॥ थोडीभी सेना भेदकी चिंता करें॥ १८ ॥ अस्त्र कहते हैं उससे जो भिन्न तलवार ययाहिशत्रुसेनायाभेटोवश्यंभवत्तथा । भाला आदि उनको शत्र कहते है मस्र कौटिल्येनप्रदानेनद्रास्र्यान्नृपतिःसदा१९॥ दो प्रकार होते है १ नालिक मात्रिक॥२॥ लेखी गरी भेनाका अवश्य भेद होय यदातुमात्रिकनास्तिनारिकंतत्रधारयेत् । तिसप्रकार युटिळाई और द्रव्यर देनेसे राजा सहशस्त्रेणनृपतिविजयायतुसर्वदा ॥२६॥ बीच माचरण करे॥ १९ ॥ जो मात्रिक अखन होय तो नालिक सेवपाऽत्यनपरिनत्याचारिप्रसाधयेत् । अत्रको शस्त्रसहित राजा विजय लिये सदैव मंगरमानदानाभ्यायुहीनरलंतया २०॥ धारण करें ॥ २६॥ अत्यन्त प्रबळ शो से और नतिलघुदीर्घाकारधाराभेदैःशस्त्रास्त्रनामस्म । (नाना)से साधे, प्रयटयो मान और दानस प्रथयंतिनवमिन्नव्यवहागयतद्वितः ॥२७॥ और हीन बटो युद्धमे सिद्धवरें ॥ २० ॥ लघु और पटे हो आकार और धारा- मैन्याजयेत्समनलभेद सर्वावगेनयेत् । भेद गर और असं सग्राम जाननेवाले शत्रुसंगाधनोपायोनान्यासुरलभेदतः॥२॥ नरीन, • भित्र • नाममि विम्तार करते समान या दुरो मित्रता जीते ६ ॥२७॥ और सय प्रकार भारत भी नारिफद्विविधनयंरक्षुद्रविभेदतः । में कर मेनारे भी प्रकार भेटम इतर म तिर्यगृच्छिमूनार पचवितस्तिषम् २८॥ केजीतनका टपाप नही २॥३०॥ तावत्परोनीतिमानस्याधावत्सरान्स्वयम् । म्टे मोर क्षुद्र (छोटेर ) भेदसे नारिक मिनायचभवतिष्टाने परनोयया ॥ दो प्रकारका तिरसा उपरोन्द्रिमार नन्य भक्षम पांच सिम्तका नारदाना साने गजा र पम्यान रहे मनीतिम॥२८॥ सारर रहे भार इतने ही मित्र होता है जमे मूडामोरक्ष्यभेदितिगंदुयुत्सदा । प्रण्ट मधिको पयन ॥७॥ स्याम्पुपचापननाममीपत । पंचायातामिष्ट्रावर्णमत्यर्णम ॥२०॥ मर भोर मन माग जी पंगे दाप प्रयानपानपेमायायुदाय पपेजतत् ३ (निशान) मोजो नि और पिउने गमान ४.] भाषाटीकासहित । हो भेदनेगला जिसम यत्रके दबानेसे अग्नि और रसौत के रसमें मिलाकर पुट दे और रगे और पिसाहुआ चून (दारू ) पडा धूप सुखा ले ॥ ३५ ॥ होय ॥ २९ ॥ पिष्ट्वाशर्करबच्चैतहाग्निचूर्णभवेतखलु । सुकाठोपांगवुनचमध्यांगुलाबलांतरम् । सुवर्चिलपणाभागाःपड़वाचत्वारएक्वा ३६ ।। स्वतिग्निचूर्णसंधात्रीशलाकासयुतंदृढम् ३०॥ यह अग्निचूर्ण पीसकर खांडवे समान हो जिसमें दृढ काठ हो भीतरसे एक अगुल जाता है सोरेके लगके ६छ वा चार भाग पोली हो जिसमें अग्निचूर्ण पडा हो और ले ॥ ३६ ॥ शलाका (जोडेका गज) सेभी युक्त और दृढ नालाखाग्निचूर्णेतुगंधागारौतुपूर्ववत् । होय ॥३०॥ गोलोलोहमयोगर्भगुटिका केवलोपिया ३७ ॥ लघुनालिकमप्यत्तत्प्रचार्यपत्तिमादिभिः । गंधक और कोयले पूर्वके समान तोपके ययाययातुत्वक्सारंययास्थूलविलांतरम् ३१॥ लिये बारूद बनानेकी यह रीति है और हाल- ऐसी लघुनालिफा ( बंदूक ) को पदाति नेका गोळा सब लोहेका हो अथवा जिसके और सवार धारण करे और जितनी २ मोटी भीतर छोटो २ गोली हो ऐसा हो ॥ ७ ॥ त्वचा होय और योचका जितना र विल सीसस्यलघुनालार्थेद्यन्यधातुभयोपिका । जिसका मोटा हो ॥३१॥ लोहसारमयंवापिनालास्त्रंत्वन्यवातुजम ३८॥ यथादीर्घवृहदोलंदूरभेदितथातथा । बन्दूकके लिये सीखेका अथवा अन्यधातुका मूलकीलोद्माल्लक्ष्यसमसंधानभाजियत् ३२॥ गोला होता है और तोपके लिये लोहसारक जितनी लम्बी होय और जितना बडा अथवा अन्यधातुका होता है ॥ ३८॥ गोला आय और दूर निसानकोभी भेदन नित्यसंमार्जनस्वच्छमत्रपतिभिरावृतम् । कर और मूलकी काळ उखाइनेसे जो निशान अंगारस्पैवगंवस्यसुचिलवणस्यच ॥ ३९॥ समान लगे ॥ ३२ ॥ उसको नित्य माजना स्वच्छ रखना और बृहन्नालिकसंज्ञतत्काबुभ्राविवर्जितम् । गोलदानोंसे युक्त रखना चाहिये और वोयले गधक सोरेका नोन ॥९॥ प्रवाह्यशकटाद्यस्तुसुयुक्तविजयमदम् ॥३३॥ एसो बृहन्नालिका (तोप) जो काष्ठ बुन सिलायाहरितालस्यतयासीममलस्यच । (अपरका काठ) से वर्जित हो और भलो हिगुलस्यतथाकांतरजस कपरस्यच ॥ ४० ॥ कार लगानेसे विजयको देनेवाली वह शस्ट मनसिल, हरताल, सीसेका मल, हिंगुल, आदिसे चलाने योग्य होती है ॥३३॥ कांतिसार, लिहा, सपरिया ॥४॥ सुवार्चलवणात्यंतपलानिगंधकात्पलम् । जतोनील्याश्चसरलनिर्यासस्यतथैवच । अंत मविपकार्कस्नुह्याद्यंगारतःपलम् ।।३४॥ समन्यूनापिकरशैरग्निचूर्णान्यनेकशः ॥११॥ जिखमपाच पल सोरेका लवण एकपल लाख वा राल नील-(देवदारु) उरदका गधक और अग्निसे परे हुए आक, स्नुही गदि इन सबके समान वा कम ज्यादे अशीले (सेड ) वा पढ़े इन पलभर पोइ. अनेक प्रकारकी दारू बनती है ॥ ४१ ॥ लेहोय ॥४॥ कल्पपतिचतद्विदयार्श्वदिकाभादिमंतिच । शुद्धासंग्राह्यसंचूर्ण्यसंमोल्यमपुटेद्रः । शिपतिचापिसंयोगाहोललध्येसुनालगम ।। शुद्धाकाणां रसोतस्यशोषयेदातपनेच॥३५॥ और दारू जाननेवाले चांदनी समान इन सबको शुद्ध लेकर पीसल ऑक प्रकाश करनेवाली अनेक प्रकारका दारनामो (१७०) शुक्रनीति। [सध्याव- मना करते हैं और तोपके गोलेको अनि चक्रपडूढस्तपारीधे सुरमांतमुनाभिगुरु । संयोगसे निशाने पर करते है॥५॥ निहस्तंदडनिसिखोलोहरज्जुःसपागमः॥४९ नालासंशोधयेदाटीदद्यात्तवामिचूर्णकम् । छः हायकी जिसको परिधि फर) हो निवेशयेत्तदंडेननालमूलंययाम ।। ४३ ॥ रीके समान जिसका प्रान्त हो और अच्छी पदिले तोपको भली प्रकार शुद्ध करे फिर नाभि (घुगेको जगे) हो पेसा का होता है उसमें दालो दालदे फिर उस दारूको दंड तीन हाथका जिसका दंड हो तीन शिया (गनाते तोपको जड ताले जमा हो और फांसी जिसमें हो ऐसी लोदेको तवःसुगोलकंदद्यात्ततःकणेग्निचूर्णकम् । रजु होती है ॥४॥ कर्णचूर्णामिदानेनगोलेलत्येनिपातयेत ४४॥ गोधूमसमितस्थूलपत्रलाहमयंहदम् । फिर उसके जर गोला रवटे फिर तोप कवचसीशरस्त्राणमूलकायविशेोभनन् ५० ॥ के चानने दारको रखदे फिर कानके दारूमे गेहूँके समान जितके स्मूल पत्ते हो, जो मग्निको लगाकर गोरकोनिखाने पर क सय लोहेका दृद्ध दो भीर शिरका बाप ॥४॥ ( रमा) सहित हो ऊपरको ऊंचा मोर लक्ष्यभेदीययावाणोचनुाविनियोजितः । शोभित हो ऐसा कवच होता है ।।५०॥ भवेत्तयातुसंधायदिदस्तश्चशिलीमुखः ॥४५॥ यविमुपुष्टसभारस्तथापड्रगुणमंत्रचित् । जैसे याण धनुपयापर लगाया हुआ वहस्त्रसंयुतोराजायोधुमिच्छेत्सम्वहि५१ ।। निगानेसोधे, इसप्रकार दो हायके पाणको जिस राजाके भरलीप्रकार पुर सामान धनुपपर रखा १५॥ हो जो पहगुण मंको जानarsite अशावापृथुचुनातुगदाहृदयसमिता । यहां पहुदसे भय भी हाँ यही राजा पुद पर. पट्टीशात्मसमोहस्तबुन्नश्चोभपतामुखः ४६॥ नेकी इच्छा कर ॥५॥ भाट कानकी मोटो छातीको वपर गदा अन्ययादुःसमाप्नोतिस्वगज्याइभ्रश्यतोपर। होती है और पट्टी अपनी परावर दोनों तरफ शत्रुभावमागतयोरुभयो संयतात्मनोः ५२ ।। मुपादा हायमें गयेके लिये होता है॥५६॥ अन्यथा दुसको प्राम होता है और अपने ईपटनमयागविस्तारेचतुरंगलः । गम्यसे भी लाता रहता है तो दोनों शव सुरमांतीनाभिसमोरमुष्टि मुचंद्ररुमा योगभी हो भौर जिनके मनमें परमर भावको मात होगये हो और जिनके मनमें पर टेा एक धारपाला और चार भगुड बढाईक योग ६॥५२॥ पीटा गाभितक ऊंचा पीक समान पेना अखाद्यास्वार्थसिद्धयर्यव्यापागेयुद्धमुच्यते । भौर पद जिसशी मृत दी जदमा समान कांति हो।॥१७॥ मंत्रात दविकयुद्धनालायधस्तयाऽऽमुरम् ।। सदानामधन्दरतंदट्युनगननः । बाने शेजनयी सिद्धिदोनोर दगदरनमितान फालामगंम्युनिकः ४८॥ मन मादिस परम्मर म्यागपुरात मा गरम होता है घार घायलमा भारत भाभिननि जो पुद र मापुर R, ममम योगा जो पुट उंगे देविक समान मुगाटा मोटा RIO (फरमा ) tinाश सायमा भर पदरी ५५ ॥ अभाग माग पेनाल (भा) मायाद्गमुत्यामानवयुद्धमाग्टिम्। पसम्परभिामार्थपनामाभिधरा ॥५४॥ २:१८॥
मापाटीकासहित ।
(१७१)
कर॥५५॥
शत्रुओंची परस्पर भुजाओसे जो युद्ध उसे यस्मिन्देशययाकालसैन्यव्यायामभूमयः ।
मानव कहते है और एकका बहुताके संग परस्यविपरीतश्चस्मृतोदेश सउत्तमः ॥६० ॥
और बहुतोंका बहुतोंके संग ॥ ५४॥
एकत्येकनवाद्वाभ्यांद्वयोतिद्भवेत्खलु ।
जिस दशम समयके अनुसार अपनी सेना
के क्वायरकी अच्छी भूमिहो। ६० ॥ राजुरी
कालंदशंशत्रुनलंदृष्ट्वास्वीयवलंततः ॥ ५९॥ इससे विपरीत हो वह देश लड़ाई के लियेउत्तम
वा एकका एकके उग वा दोका दोके कहा है।
सग जो युद्ध उसे मानव कहते है, काल, आत्मनश्चपरपांचतुल्यव्यायामभूमय ६१ ।।
देश, शत्रुका पल और अपना बळ देख
यत्रमध्यमरदिष्टोदेश शास्त्रविचिंतकै।
उपायान्पगुणमंत्रसभूयायुद्धकामुकः ।
जिस देशमे अपनी और पराई सेनाकी कवा
यदके लिये समान भूमि हो ॥ ६१ वह देश शास्त्र
शरद्धेमंतशिशिरकालोयुद्धेपुचोत्तमः॥५६॥ की चिन्ता करने वालाने मध्यम क्या है।
गुण जिउमे ऐसे मत्रोंके उपायोको
आरातिसैन्यव्यायामसुपर्याप्तमहीतल ॥६२॥
युद्धवी कामनावला मनुष्य संग्रह कर युद्ध
के लिये शरद, हेमन्त, शिशिरया समय उत्तम आत्मनाविपरीतश्चसबैदेशोऽधम स्मृतः ।
होता है ॥५६॥
जिस देशर्म शत्रुको सनाकेलिये कवायदकी
वसंतोमध्यमाञयोधमोग्रीष्मःस्मृतःसदा ।
भूमि पूरी हो ॥ ६ ॥ और अपनी सेनाको
उससे पिपरीत होय उस देशको अधम कहा।
वर्षासुनप्रशसंतियुद्धसामस्मृतंतदा ॥ १७ ॥
वसत मध्यम जानना और ग्रीष्म सदेव स्वसैन्यात्तुतृतीयांशहीनंशजवलंयदि ॥ ६३ 11
अधम कहा है। वर्षाके समय युद्धको कोई भी अशिक्षितमसारंवासाद्यस्कंस्वजयायन ।
प्रशसा नहीं करते क्योंकि उस समय शांति| यदि अपनी सेना तीसरा भाग कम शत्रु.
करना ही कहा है ।। ५७ ॥
की सेना हो।। ६३॥ और अपनी सेना शि-
युद्धसंभारसंपन्नोयदाधिकालोनृपः । क्षित होय सारहीन वा नई दो तो अपना जय
मनोत्साहीसुशकुनोत्पातीकालस्तदाशुभः ॥ न हो सगा
जर तक गना युद्धके सामानसे संपन्न पुत्रवत्पालितयत्नुदानमानविवर्द्धितम् ६४ ॥
हो अधिक बलवान हो मनमें उत्साही हो
और अच्छे शकुन होते हों उस कालको युद्धसंभारसंपन्नंस्वसैन्यं विजयप्रदम् ।
जो सेना पुन समान पालो हो दान ओर
कार्येऽन्यावश्यक प्राप्तकालोनोचेघदाशुभः । मानसे बडाई हो ॥ ६४ ॥ युद्धको सामग्रियोले
विधायहदिविश्वशंगहेचिहमियात्तदा ॥५९ ॥ युक्त हो पेसी सेना विजय देने वाली
नकार नियमस्वरगोखविमविनाशने ।
होती है।
जब अत्यत आवश्यककार्य आन पडे और संधिचवियानमासनंचसमाश्रयम् ६५ ॥
समयभी शुभ न हो तो हदयम परमेश्वरको वैधीभावंचसंविद्यान्मंत्रस्यैतास्तुपगुणान् ।
स्थापना करके और घरमै परमेश्वरके चिह) सधि, विग्रह, यान (चढाई आसन, समा
बनार गमन करे ॥ ५९॥ गौ सी ब्राह्मण श्रय (आधीन होना ) ॥ ६५ ॥ द्वधी भार
इनके विनाश और पूर्वोक्तसारमे समयका (भेद ) इन मत्रके छः गुणोंगे राजा भली
नियम नही है।
प्रकार जाने॥
.
शुभ जानना ॥ ५८॥
(१७२)
शुक्रनीते।
[मध्याय
यामि त्रिपाभिलवान्मित्रतांयातिरिणः६६ उपहाराहतेयस्मा संघिरन्पोन विद्यते ।
साक्रियासधिरित्युक्तावमृशेतांतुयलतः । शत्रोर्वलानुसारेणउपहारप्रकल्पयेत्॥७३॥
जिन कामोर्य करनेसे बलवान्भी देरी मित्र वहाँपर उपहारसे दूसरी संधि नहीं होती
होजाय ॥६६॥ उस क्रिया (कर्म ) को सन्धि विन्तु शत्रुके बलानुसार भेटको दे दे ॥७३ ।।
कहते है उसको यत्नस राजा विचारे ॥
सेवांवापिचस्वीकुर्याद्यात्कन्यांभुवंधनम् ।
विकर्पितःसनाधीनोभवेच्छस्तुयेनैव ।। ६७ स्वसामंतांश्चसंधीयान्मंत्रेणान्यजयायवै ।।
कर्मणाविग्रहस्तंतुचिंतयेन्मंत्रिभिर्नृपः ।
अथवा शत्रकी सेवाका स्वीकार करे व
जिस कामसे भेदन किया हुआ शव अपने कन्या, भूमि, थम इनको शत्रुको दे दूसरेकी
आधीन होजाय ।। ६७ ।। उस विग्रह ( लडाई) जयके लिये अपने सामन्ती (समीपके गजा)
को मवियोकै सग राजा विचारे॥ के संग सन्धि करै ।। ७४ ।।
शत्रुनाशार्थगमनयानस्वाभीष्टसिद्धये ६८ ॥ संधि कार्योप्यनार्येणसंप्राप्योत्सादयेद्धिसः ।
स्वरक्षणंशत्रुनाशोभवेत्स्थानात्तदासनम् ।
अपने अभीष्ट सिद्धिके लिये शत्रु नाशाय!" मनुष्यको कोहुई सन्धि शत्रुको
संवातवान्ययावणुनिविडेकंकैर्वृतः ।।७५॥
मनुष्यसे यान (चढाई )हते है॥६॥अपनी
उखाड देती है, जैसे सघन कांटोंसे रोका
रक्षा शत्रुका नाश ( जिस म्यानले धैठ रहना) हुआ वेणु समूहवाळा होकर ॥ ७५ ॥
होय उसको आसन कहते है ।
गुप्तोपलवान्भूयादुर्वलोपिताश्रय ६९॥ नशक्यतेसमुच्छेत्तुंवेणुःसंवातवांस्तथा ।
वैधीभावःस्वमन्यानांस्थापनंगुल्मगुल्मतः ।
बलिनासहसंधायभयेसावारणयदि।।७६॥
जिनकी रक्षासे दर्बलभी बलवान् होजाय छेदनेको भय नही होता इसी प्रकार
उसे आश्रय कहते हैं । ६९ । गुल्म (मौका) सन्धिवाला राजाभी उखाडनेके अयोग्य होता
पर अपनी सेनाओंशे टिकानेको धोभाव है, यदि राजाको साधारण भय होय तो पल-
कहते है।
वानके संग मिलकर ।। ७६ ।।
बलीयसाभियुक्तस्तुनृपोनान्यप्रतिक्रियः ॥ आत्मानंगोपयेकालेवहामित्रेपुवुद्धिमान ।
आपन्नःसंधिमन्विच्छेत्कुर्वाण कालपालनम् । वलिनासहयोद्धव्यमितिनास्तिानदर्शनम्।।
एफएवोपहारस्तुसंधिोपमतोहिनः ॥ ७१॥
बहुत शत्रुभोंके होनेपर बुद्धिमान् राजा उस
बलवानका वायाहुआ राजा जब अन्य काल में अपने आत्माको रक्षा करें क्यो कि
प्रतीकार न करतो तो ॥ ७० ॥ विपत्तिको यह शास्त्रमें नहीं लिखा कि बलवानके संग
माप्त हुआ और काल्यो वितावा हुआ शटके युद्ध करना ॥ ७ ॥
संग संधि (मेल) की इच्छा करें और दूसरे प्रतिवादीनवनाकदाचिदापसर्पति ।
यो भेट देदेना यह मुख्य सधि हमको भी वलायसिमणमतांकालेविक्रमतामपि७८ ।।
सम्मत है॥७॥
उपहारस्यभेदास्तुसवेन्यमैत्रवर्जिताः ।
यो कि छोटा बादल पवनके सामने कदा
अभियोक्तारलायिस्त्वादलमानानिवर्तते ७२॥ को मानते है और समयपर पराक्रम भी परत
चित भी नहीं चलता जो राजा बलवान् शन
मितालोटकर टपहारके अन्य भी भेद है ॥ ७८ ॥
पानसे होते हैं जहां अभियोक्ता ( चढ़नेवाला) संपदोनविगपतिप्रतीपमिवनिनगाः ।
राब पट्यान् दोनम विना भेट टिये निवृत्त
राजानगडावश्वामसंधितोपहिवद्धिमान८०
नोय ॥५२॥
भापाटीकासहित । (१७३) ARTIYA उनकी सम्पदा इस प्रकार कही नहीं जाती उपेक्षयाचनिपुणैर्यानपंचविधस्मृतम् । जसे ऊँचेपर नदी, बुद्धिमान राजा मेल होने विगृह्ययातिहियदासर्वाञ्छत्रगणान्बलात्८६ पर भी शत्रुका विश्वास न कर ॥ ७९ ॥ उपेक्षासे यह पांच प्रकारका यान (चढाई). अद्रोहसमयंकृत्वावृत्रमिद्रःपुराऽबंधीत् । विद्वानोंने कहा है जब शत्रुओंके गणके ऊपर आपन्नोभ्युदयाकांक्षीपीडयमानःपरेणवा ॥ वलसे लडाई करके गमन करे उसको ।। ८६॥ क्योंकि स्नेहकी प्रतिज्ञा करके भीपूर्वकाल-विगृह्ययानंयानस्तदाचार्यःप्रचक्षते । में इन्द्रने धृत्रासुरको मार दिया था आपत्तिको अरिमित्राणिसर्वाणिस्वमित्रःसर्वतोवलात् ८७ प्राप्त हुभाशनुसे पीडित राजा अपना उदय चाहे ता ।। ८०॥ यानकै जाननेवाले आचार्य विगृह्ययान देशकास्वलोपेतःप्रारभेतचविग्रहम् । कहते हैं अथवा सपूर्ण शत्रुके मित्रोंको अपने सय मित्रोंके संग बलसे ।। ८७ ।।. महीनवलमित्रतुदुर्गस्थ्ट्यंतरागतम् ८१॥ विगृह्यचारिभिर्गविगृह्यगमनंतुवा । देश, काल, बद्ध इनसे जब युक्त हो उस समय लडाईका प्रारम्भ करे जिस शत्रुके बल संधायान्यत्रयानायांपाणिग्राहेणंशत्रुणा ८८ और मित्र हीन हो दगमें टिका हो दो शत्रुओ लडाकर शत्रुपर जो चढना उसको विगृह्य के बीच हो ।। ८१ ॥ गमन कहते हैं अन्यपर चडाई के समय पीछेके अत्यन्तविषयासक्तंप्रजाद्रव्यापहारकम् । शत्रुके साथ सन्धि करके जो गमन ॥ ८८ ॥ भिन्नमंत्रिवलंराजापीडयेत्परिवेष्टयन् ।। ८२॥ संवायगमनंप्रोक्तंत्तजिगीपो:फलााथना । अत्यन्त विषयोमें आसक्त हो प्रजाकै द्रव्य एकोभूप यदैकत्रसामतैःसांपरायिकैः ॥८९॥ का हरता हो मंत्री और सेना जिसे फटी हो उसे जीतनेवाले फलके अभिलाषी राजाका ऐसे शवको चारों तरफ लपेटकर पीडित सन्ध्यागमन कहते हैं जव एक राजा अपने देवा ) कर ॥ ८२ ॥ सामत साथी उन राजाओंक सग ॥ ८९ ।। विग्रहाराचविज्ञयोद्यन्यश्वकलहःस्मृतः । शक्तिशौर्ययुतैयानसंभूयगमनंहितत् । बलीपसात्यल्पबल शूरेणनचविग्रहम्।।८३॥ अन्यत्रास्थितासंगादन्यत्रैवचगच्छति ९०1। इसीको विग्रह पहते हैं इससे अन्य कलह मिलकर गमन करै जो सामर्थ्य और परसे कहा है बलवानके संग अल्प बलवाले शूरवीर युक्त होय उसे संभूय गमन कहते हैं यदि के संग जो लडाई ।। ८३ ॥ मन्यपर चढाईके लिये प्रस्थित राजा संग कुयीञ्चविग्रहपुंमांसवानाशःमजायते । अन्यत्र ही चला जाय ॥९॥ एकाभिनिवशित्वकारणकलहस्यया ॥८४॥ प्रसंगयानंतत्मोक्तयानविद्भिश्चमात्रभिः । कता है उस लडाईमें पुरुषोंका सर्वनाश रियातस्यबालेनःसंप्राप्यविकृतफलम् ९१ ॥ होता है एक वस्तुको अभिटापा करनी इसी- जो यानके ज्ञाता मंत्रीजन उसे प्रसंगयान कोटडाईका कारण कहते हैं ॥ ८ ॥ कहते हैं, जो बलवान् राजा शनुपर गमन करे वही विपरीत फल मिट जाय ॥९॥ टपायांतरनाशेतुततोविग्रहमाचरेत् । विगृह्यसंवायतथासंभूयायमसंगतः ॥ ८५ ॥ उपेक्ष्यतस्मिन्तद्यानमुपेक्षायानमुच्यते । जब दूसरा कोई उपाय न होय तो लडाई दुर्वृत्तेऽप्यकुल नतोयलंदातारज्यते ॥ ९२॥ को कर लडाईके लिपे मिलकर इकट्ठा होकर तो उसकी उपेक्षा ( छोडना) करनेको और प्रसंग ॥ ८॥ उपेक्षापान कहते हैं, जो दुराचारी फुलद्दीन (१७४) शुकनाोते। { अध्याय- दोय ऐसे राजापर बल करना अच्छा होता देशके अनुसार शत्रुकी सेनाके भलीप्रकार भेद (तोड़ने )का यत्न करें और पूर्वोक्त हटंकृत्वास्वीयवलंपारितोष्यप्रदानतः । व्यूहोकी रचनाके ऐसे संकेत (इशारे) जो वाजोंक वजनेस मालूम हो सकें ॥९८॥ नायकापुरतोयायात्मवीरपुरुषावृतः ॥९३ ॥ स्वसनिकविनाकोपिनजानास्तियाविधान् । अपनी सेनाको प्रसन्न और धन आदि देने उनको सन्तोय करके बडे २ वीर पुरुषास नियोजयेञ्चमतिमान्व्यहान्नानविधानसदा९९ युक्त सेनाका नायक (सेनापति) सबसे' और उन संकेतोको अपनी सेनाक मनुष्योंसे भागेचले ॥१३॥ इतर कोई भी न जाने और बुद्धिमान् राजा सदैव अनेक प्रकारके व्यूहाको नियत मध्येकलचंकाशश्चस्वामीफल्गुचयदनम् । कर ॥ ९९ ॥ ध्वजिनींचसोयुक्त संगोपायद्दिवानशम् ९४ अश्वानांच गजानांचपदातीनांपृथपृथक् । सेना. चोचमें स्त्री, कोश स्वामी और उच्चैःसंधाक्यद्वयूहसंकेतान्सैनिकान्नृप११०० सामान्प धन, इनको रख और रात्रि दिन सदेव बड़े यत्नसे अपनी सेनाको रक्षा सधार, हाथीवाना पदाति इनको और कर ॥१४॥ 'सेनाकै इतर मनुष्योंको राजा पूरके 'संकेताको ऊच शब्दसे सुनवा दे॥१००। नद्यद्रिवनढुंगपुयत्र यत्रभयंभवेत् । सेनापतिस्तरतनगडहर्वलैः ॥९५ ॥ वामदक्षिणसंस्थोषामध्यस्थोवारसंस्थितः। धत्वातासनिक कार्यमनशिष्टयथातथा ॥१॥ मटी, पयत, वन, दुग, मादिमें जहां भय दोष पद सेनाकै व्यूह बनाकर सेनापति राजापामा दक्षिण या मध्य वा अग्रभागमें गमन करें ।। ९५॥ स्थित रहे सेनाकै मनुष्य उन संफेतीको सुन- कर यथार्थ रीतिस उत्तासतौर अनुसार यायावयूहेनमहतामकरणपुरोभये । राजाकी शिक्षा अनुसार कामको श्येनेनोभयपक्षणस्च्यावावीरवस्त्रया ॥९६॥ कर ॥1॥ यदि सेना मागे भप होप को बड़े मक संमीलनप्रसरणंपरिभ्रमणमेयच । रफे आकारके पहसे सनापति चल अपया आकुंचनंतयायानप्रपाणपपयानकम् २॥ शिवाकै दोनों पक्षक समान पहले अयया चदीपेनी धार जिलकीरोपी सूचीके पहले संमोहन (मिदना) प्रसरण (चलना) सेनापति गमन करे ॥१६॥ चारोतरफ घूमना माफुचन (तुफदना ) शनेः गमन भरकी रीति गमन भपपान (उन्ट- पथापितुगरपाझपोवासंतिकम । टाचदमा)॥॥ सातामर्वतोभद्रंचकन्यालमयापिरा ॥९७ ॥ पर्यायेणचप्त मुख्यममुल्यानंचटुंठनम् । पति पीये भर हो तो शकटप्पस, पाचाम संस्थानचाष्टदरवचकानोलतुल्पाम् ॥ ३ ॥ (दोनों तरफ) भव हो तो सबम्यूहमे हमने गमन, सन्मुग गमन, गदा होना. चार तरफने भर दो को रायतोभद्रगो लोटना, माठ दर के समान टिकना भयंग पपरा सणसे गनापति गमन करे ॥९॥ गोटा नुय टिकना ॥ ३ ॥ ययादेशकल्पपेशामधुमेनाविभदेकम् । पाचनकिनन्यायमापारपारितान् । सचीतुल्यसमटवदचंद्रगमंतुया । एयमनासापापयिः पतिरेशन? .
४.
भापाटीकासहित ।
(१७२
EDIA
सुईक समान, शकट वा आये चन्द्रक तासंग्चयेकाचव्यूहंदेशयलयथा ।
समान अथवा थोडी २ सनाको पृथक् करना सूक्ष्मग्रीवमध्यपुच्छंस्थूलपक्षतुपंक्तितः ११ ॥
या क्रमसे पंक्तियों में बैठाना ॥४॥
उसी प्रकार देश और चलके अनुसार काँच
शस्त्रासयोर्धारणंचसंधानलक्ष्यभेदनम् ।
व्यूहकीरचानाको सेनापति रच जिसको ग्रीवा
मोक्षणंचतयात्राणांशस्त्राणांपरिघातनम् ॥५॥ सूक्ष्म होय पूछ मध्यम और पक्ष मोटे हो ऐसी
शस्त्र अखफा धारण सधान (धनुपपर वाण/पक्ति बनावै ॥११॥
लगाना) निशानेका भेदन अस्रोका छोटना वृहत्पशंमध्यगलपुच्छेश्येनंमुखेतनु ।
और शस्त्रोंका चलाना ॥५॥
चतुष्पान्मकरोदीर्घस्थूलवक्तद्विरोष्ठकः १२
प्रासंधानंपुनःपातोग्रहोमोक्षःपुनःपुनः ।
जिसके पक्ष बड़े हों गळ और पूंछ मध्यम
स्वगृहनमतविातःशस्त्रास्त्रपदविक्रमैः ॥ ६ ॥ हो मुख सूक्ष्म हो उसे सेनाव्यह कहते हैं जि-
याणोंका शीघ्र लगाना, छोटना, फिर ग्रह-सके चौपायेका आकार हो लम्बा हो स्थूलमुख
ण करना, वारंबार फिर छोडना, शस्त्र, भख हो और दो ओप्ट हों उस व्यूहको मकर कहते
पैरोंके उटावसे अपना गृहन (छिपना) और ॥ १२ ॥
शत्रुको मारना ॥ ६॥
सूचीसूक्ष्ममुखोदीर्घसमदंडांतरनयुक् ।
दाभ्यांविभिश्चतुर्भिर्वा पंक्तितोगमनंततः । 'चक्रव्यूहश्चैकमार्गोह्यष्टधाकुंडलाकृतः १३ ॥
तथानाभवनंचापसग्णंतूपार्जनम् ॥ ७ ॥ जिसका सूक्ष्म मुख हो, समान लम्पा वि.
फिर दो २ तीन २ वा चार २ को पक्ति ब- स्तार हा और बीच खाली हो उसे सूचीन्यू-
नाकर गमन करना और कभी सनास भागे ह कहते हैं जिसका एक मार्ग हो और आठ कु.
होना कभी पीछे कभी पृथर होजाना ७ ॥डली हो उसे चक्रव्यूह कहते है।॥ १३ ॥
अपमृत्यास्त्रसिद्धयर्थमुपसृत्यविमोक्षणे । चतुर्दिश्वष्टपारीधःसर्वतोभद्रसशंकः।
प्राभूत्वामोचयेदत्रंव्यहस्तःसैनिकः सदा ८ आमार्गश्चाटवलयांगोलकःसर्वतोमुखः ।।
अस्रोको सिद्धिक लिय पोछे हटना और जिसकी चारों दिशाओमें भाठ परिधि (फें.
अत्रोके छोड़ने के लिये आगे जाना, व्यहमें टि-र) हों उस व्यूहको सर्वतोभद्र कहते हैं ॥१॥
काहुआ युद्ध करनेपाला सैनिक सदैव अखको शकटाशकटाकारोव्यालोव्यालाकृतिःसदा ।
छोड़े ॥८॥
सैन्यमल्पबृहद्वापिदृष्ट्वामागैरणस्थलम् १५
आसीनःस्याद्विमुक्तास्त्र प्राग्वाचापसरेत्पुनः । जिस सेनाका आकार शकट ( गाडा ) के
पागासीनंतूपमृतोदृष्ट्वास्वास्रविमोचयेत् ॥९॥ समान हो उसे शकट और जिसका सर्पके
अनके छोडेनपर खडा होजाय अथवा फिर समान हो उसे व्पालव्यूह कहते हैं सेनाकी
सेनाके आगे चल्ला जाय और आगे जाकर अप- अरता वा अधिकताको और रणभूमिको
ने
सन्मुख रोड
दुप शनुको देखकर अम्रको देखकर ॥ १५ ॥
छोडे ॥९॥
व्यहव्यूहनव्यहाभ्यांसंकरेणापिकल्पयेत् ।
मकैकोद्विशोवापिसंघशोचोधितोयथा ।
यंत्रास्त्रैःशसेनायाभेदोयेभ्यःप्रजायते १६
क्रौंचानांखगतिहिक्पंक्तितःसंप्रजायते १०॥ सेनाके अनेक,एक वा दोप्पूहोंकी वा संक-
जैसे माकाशमे क्रौञ्च पक्षियोंकी गति एकर (इकट्ठी)की रचनाको करे, जहां यंत्रक
२दो दो वा समूह २ से पंक्तीवेहो होती है अस्नाले शत्रुको सेनाका भेद (पराजय) दी
उसी प्रकार सतसे नाके मनुष्य च ॥१०॥ जाय ॥ १६ ॥
[अध्याय-
शुक्रनीति ।
(१७६)
..
.
स्थलेभ्यस्तपुसतिष्ठेससैन्योह्यासनहितत् ।
नका जो आश्रय लेना अथवा किलेमें बैठरहना
उसीको महात्मा लोग आश्रय कहते हैं ॥२२॥
तृणान्नजलसंभारायेचान्येशत्रुपोपकाः १७ ॥ अनिश्चितोपायकार्य समयानुचरोनृपः ।
ऐसे स्थलोंमें जो सेना सहित राजाका टि-वैधीभावेनवर्तेतकाकाक्षिवदलक्षितम् २३ ॥
कना उसको आसन कहते हैं तृण, अन्न और
जलके संचय और जो शत्रुके पोषण करनेवा का उपाय निश्चित न हो उस सयय काकके
जब राजाको समय के अनुसार अपने का-
हे पदार्थ हैं॥ १७ ॥
नेत्रसमान द्वैधीभावसे वर्ते और किसीको प्र-
सम्यनिरुध्यतान्यत्नात्परितश्विरमासनात् । तीत न हो ॥ २३॥
विच्छिन्नविविधासारप्रक्षीणयवसंघनम॥१८॥ प्रदर्शयदन्यकार्यमन्यमालवयेच्च वा ।
उन सबको चारो तरफसे चिरकालतक आ- सदुपायैश्चसन्मत्रैःकार्यसिद्धिरथोद्यमैः ॥२४॥
सनमें टिका हुआराजा भलीप्रकार रोक और
अन्य कामको दिखावे और अन्यको ग्रहण
शत्रुके भार ढोनेके बीवध ( बहिगी ) इनको करै अच्छे उपाय, अच्छे मन्त्र और उद्यमोंसे
और भुरूई धनको और मार्गको नष्ट कार्यकी सिद्धि ॥ २४ ॥
करदे ॥ १८॥
विगृह्यमाणप्रकृतिकालेनैववशंनयेत् ।
भवेदल्पजनस्यापिकिंपुनर्नृपतहि ।
अरेश्वविजिगीपोचविग्रहेहीयमानयोः॥१९॥
उद्योगेनैवसिध्यतिकार्याणिनमनोरथैः।।२५ ।।
तुच्छ जनकी भी होजाती है राजाकी तो
और शत्रुको प्रजामे जिस समय राजाके संगम्यों न होगी उद्योगसे काय सिद्ध होते हैं
लडाई देखे उस समय शत्रको वशमें करले, मनोरथ करनेसे नही ॥२५॥
जव शत्रु जीतनेवाला ये दोनों लडाईमें हीन
होजायं ॥ १९॥
नहिसुप्तमृ गेंद्रस्यनिपतंतिगजामुखे ।
संघाययदवस्थानसंधायासनमुच्यते ।
अयोभेद्यमुपायेनद्रवतामुपनीयते ॥ २६ ॥
राच्छिद्यमानोवलिनानिरुपायप्रतिक्रियः॥
क्योंकि सोते हुए सिंहके मुखमें हाथी नहीं
उस समय मिलकर जो वैठ रहना, उसे सं-यसे द्रव (पतला) होजाता है ॥२६॥
गिरते जो पदार्थ लोहेले विंधताहे वह भी उपा-
धाया आसन कहते हैं वलवाले शत्रुका उखाडा
हुआ उपाय और प्रतीकार करने में असमर्थ
लोकप्रसिद्धर्मवैतद्वारिवद्वेर्नियामकम् ।
उपायोपगृहीतेनतेनैतत्परिशोप्यते ॥ २७ ॥
कुलोद्भवंसत्यमार्यमाश्रयेतवलोकटम् ।
यह यात जगतमें प्रसिद्ध है कि जलसे अग्नि
विजिगीपोस्तुसाह्यार्थाःसुहृत्संबंधिवांधवाः२१
शान्त होती है यदि उपाय किया जाय तो
अग्निही जल को शोप देती है ॥ २७ ॥
कुलीन, सत्यवादी, सजन और अपनेसे व.
लमें अधिकका आश्रय ले जीतनेवाले राजाक उपायेनपदंमूनिन्यस्यतेमत्तहस्तिनाम्
ही मित्र संगंधी और बांधव सहायक होते उपायेपूत्तमोभेदःपगुणेपुसमाश्रयः २८ ॥
उन्मत्त हाथियोंके मस्तकपर भी उपापसे
मदत्तभृतिकाह्यन्येभूपाअंशप्रकल्पिताः। चरण रक्खा जाता है सब उपायों में उत्तम गुण
संपाश्रयस्तुफयितोदुर्गाणिचमहात्माभः २२॥ भेद है और गुणोंमें उत्तम गुण समाश्रय है.८॥
जिनको राजाने येतन दिपाहो वा और कोई कार्योदौसर्वदातीतुनृपेणविजिगीपुणा।
राना भया नि हैं मिका भाग दिपाहो उताभ्यांविनानैवकुर्याउदंगनाकदाचन २९॥
राजा॥ २० ॥
४.] भाषाटीकासहित । (१७) RRORRENT -- . . इन दोनोको विजयकी इच्छावाला राजा ब्रामण आपत्ति जो क्षत्रियोंके धर्म (युद्ध- सदैव करे इन दोनोके विना युद्धको कदाचि-दि) से वर्तता है ।। ३५ ॥ जगत में उनका ही त् भी न करें ॥२९॥ जीवन श्रेष्ठ है क्योंकि नासणसे ही क्षत्रियोंकी परस्परंपातिकूल्यरिपुसेनपमविणाम् । उत्पत्ति है। भवेद्ययासथाकुर्यात्तापजायाश्चतस्त्रियाः ३०॥ अधर्मक्षत्रियस्यैषयच्छय्यामरणभवेत् ३६ ॥ जिस प्रकार शका सेनापति और मन्त्री विसृजनश्लेष्मपिचानिकृपणंपरिदेवयन् । ये परस्पर प्रतिकूल (विरुद्ध) हो जायें और क्षायिका यह महान् अधर्म है कि शय्यापर शत्रुको मजा तथा स्त्रियों में भी प्रतिकूलता हो पडे पड़े मरन ॥ ३६ ॥ जो क्षत्री अपने 'एस आचरण राजा करे ॥ ३०॥ देह से कफ और पित्तको गेरता और दीन उपायान्पइगुणान्वीक्ष्यशत्रोःस्वस्यापिसर्वदा । वचन कहता हुआ । युद्धमाणात्ययेफुर्यात्सर्वस्वहरणेसति ॥३६॥ अविक्षतेनदेहेनप्रलयंयोधिगच्छति ॥३७॥ शडके और अपने उपाय और ६ गुणोको क्षत्रियोनास्यतत्कर्मप्रशंसंतिपुराविदः । 'सव देखकर भौर सर्वस्वके हरने पर प्राणों के देहमें घाव आये विना जो मर जाता है नारा मानेपर युद्धको करे ॥ ३१ ॥ ॥ ३७॥ पुरावन ऋषि उस क्षत्रीक इस खीविनाभ्युपपत्तीचगोविनाशोपिनाह्मणः । कमकी प्रशंसा नही करते ॥ प्राप्तेयुद्धेवचिन्नैवभवेदपिपराइन्मुखः ॥ ३२॥ नगृहेमरणशस्तक्षत्रियाणांविनाग्णात् ॥३८॥ यदि स्री ब्राह्मण इनको विपत्ति हो गौओंका शौंडीराणामशौंडीरमधर्मकृपणंचयत् । नाश हो ब्राह्मणीका परसर युद्ध हो ऐसे सम- क्योंकि रणके विना क्षत्रियोंका घरमें मर- यमें कभी भी युद्धसे न हटे॥ ३२ ॥ ना अच्छा नही ॥३८॥ और शस्त्र में कुशलोके युद्धमुत्सृज्ययोयातिसदेवैर्हन्यतेभृशम् । मध्यम अकुशलता करती अधर्म और कृपणता भी क्षत्रियोंको अच्छा नहीं। समोत्तमाधमैराजावाहूतःपालयन्मनाः ३३॥ ननिवततसंग्रामाक्षात्रधर्ममनुस्मरन् । रणेपुकदनंकृत्वाज्ञातिभिःपरिवारितः ३९॥ जो राजा युद्धको छोडकर भागता है उस- शस्त्रावैःसुविनिर्भिन्न क्षत्रियोवधमर्हति । को देवता सदैव नष्ट करते है मजाओको रणमे शत्रुओंका कदन ( हिंसा ) करके पालना करते हुए राजाको यदि युद्ध के लिये अपनी जातिके परिवारसहित और शख और उत्तम अधम बुलावे तो ॥ ३३॥ अखोसे भली प्रकार विधा हुआ क्षत्वीमारनेक योग्य होता है ॥ ३९॥ क्षत्रियोंके धर्मका स्मरण करता हुमा राजा संग्रामसे न हटे। आहोमियोन्योन्यजिवांततोमहीक्षितः४०॥ राजानंचापयोद्धारंब्राह्मणंचाप्रवासिनम् ।३४ युध्यमाना परंशत्तयास्वर्गयांत्यपराङ्मुखाः। निगीलतिभूमिरेतौसीविलशयानिव । संग्राममं परस्पर मारते हुए राजा शक्तिके जो राजा होकर युद्ध न करे और ब्राह्मण स्वर्गम माते है॥ १० ॥ अनुसार युद्धको करते और न हटते हुए होकर परदेशमें न जाय ॥ ३४ ॥ इन दोनोंको भर्तुरथैवय झूगेविकमेदाहिनीमुखे ॥ ४१ ॥ भूमि इस प्रकार ग्रस लेती है जैस सांप बिल- में सोने वालो (चूहो) को। भयानावनिवर्तततस्यवोधनंतकः। ब्राह्मणस्पापिचापत्तौक्षत्रधर्मेणवर्तत ॥३५॥ जो शूरवीर अपने स्वामीके लिये सेनाके मुखपर पराक्रम करता है ॥१॥ और भयो प्रशस्त जीवितलोकेशहिब्रह्मसंभवम् । 'हटता नही उसको अनन्त स्वर्ग मिळता है। समान । अध्याय- .. (१७८) शुक्रनीति । आहहनिहतंगरंनशोचेतकदाचन ॥ ४२ ॥ ये दो पुरुष सूर्यमंडलको भेदन करनेवाले निर्मुक्तासर्वपापेभ्यापूतोयातिसलोकताम् । होते हैं कि ॥४८॥ योगसे युक्त सत्या और संग्राममें सन्मुस मरा हुआ शुरवीर ॥ संग्राममें मरे हुए शूरवीरको कदाचित् भी आत्मानंगोपयच्छक्तोवधेनाप्याततायिनः ।। न सोचे ॥ ४२ ॥ क्योंकि सब पापोंसे निवृत्त और पवित्र हुआ वह अच्छे लोकोंम सुविद्योब्राह्मणगुरुयुयुचेश्रुतिदर्शनात् । जाता है। और समर्थ मनुष्य आततायी (शत्रधारी) वराप्तरःसहस्राणिशूरमायोधनेहतम् ॥ ४३ ॥ के मारनेसे अपने आत्माकी रक्षा करै ।। ४९ ॥ स्वरमाणा:प्रधावंतिममभाभवेदिति । क्योंकि वेदकी आज्ञाले विद्यावान और ब्राह्म- न भी द्रोणाचार्यने युद्ध किया । मोर संग्राममें मरे हुए शूरवीरके लये आततायित्वमापन्नोब्राह्मणःशूद्रवस्मृतः ॥ हजारी उत्तमोत्तम अप्सरा ॥४३॥ शीघ्रतासे दोडती है कि यह मेरा भर्ता हो । नाततायिववेदोपोहंतुर्भवतिकश्चन । मुनिभिदीर्वतपसाप्राप्यतयेत्पदमहत् ।। ४४ ॥ ब्राह्मण भी आततायी शूदके समान कहा है ॥ ५० ॥ भाववायीक मारनमें मारनेवालेको युद्धाभिमुखनिहतैःशूरैस्तद्रागवाप्यते । कोई भी दोष नहीं होता। चिरकालतक तर करनेसे मुनिलोग जिस उद्यम्यशस्वमायातंभ्रूणमप्याततायिनम् ॥५१ महानुपदको प्राप्त होते हैं ॥ ४५ ॥ वही पद निहत्यभ्रूणहानस्यादहत्वाभ्रूणहाभवेत् । युद्धमें सन्मुख रहते हुए शूरवीरको शीघ्र मिढ़ता है। जो आततायो शख उठाकर आता हो चाहे एतत्तपश्चपुण्यंचधर्मश्चैवसनातनः ॥ ४५ ॥ वह भ्रूण (बालक) भी हो ॥५१॥ उसको मारकर भ्रूणहत्या नहीं लगती और नमारे चत्वारआश्रमास्तस्ययोयुद्धनपलायते । तो लगती है। धर्म है ॥ ४५ ॥ और उसीके ४ भाश्रम हैं जो जीवन्नेवमृतःसोपिभुक्तराष्ट्रकृतंवयम् । यह दी तप यह ही पुण्प यह ही सनातन अपमर्पतिपोयुद्धाजीवितानिराधमः ॥१२॥ युद्धमे नही हटवा ।। नाहिशायर्यास्परकिंचित्रिपुलोकेपुविद्यते ४६ ॥ हटता है। यह जीवता हुभादो मरा जो मनुष्यों में नीच जीने के लिये युद्धसे शूरःसर्वपालयतिरसर्वप्रतिष्ठितम् । है और सब देशके पापको भोगता है। तीनों लोकमि शूरवीरताही परे और मित्रवास्वामिनंत्यकानिर्गच्छतिरणाचयः ।। कोई उत्तम नहीं है ॥६ग्योर ही सयको सातनकमायातिनीयोनियतेसिलः । पाटना करता है और शूरवीरवेदी सब आश्रय जो मनुष्प मित्र या अपने स्वामोको रपा- चराणामचराअन्नमद इष्ट्रिणामाप ४७॥ो निदा करते हैं और अंत उम गकर रणमसे भागताः॥५३॥ जीते हुए अपापयःपाणिमतामन्नंशूरस्पफातगः ।। यमै नरकको जाता॥ घरी (मनुप्प) के अन्न ग्यापर और मित्रमापतामहायनकरोतियः।।२४ ।। दादाकि मन विना दाटयारे होते देशीतिलभतेसोअमृतानरकमन्यते । हापयाकि मन पिना दापयाले और पीर मोमप अपने मित्रो मापनि देखकर ६.मय फापर होते रिमापुरुषासमूपमंटलभेदिनी १८ ॥ मलापता नहीं करना ॥५॥ घर छ परिपादयोगयुक्तोपोरणेचाभिमुगहनः । रकम नावा है। टोसम भगतिमो मानता है और मरकर ४.] मापाटीकासाहित । (१७९) विनमाच्छरणमाप्तयःसंत्यजतिदुर्मतिः॥५५॥ फुत आदि शस्त्रोके समूहले जो को सयातिनरकेवोरयावदिंद्राश्चतुर्दश । नष्ट करना ॥ ६१ ॥ नाल अस्रोके न होने पर किये हुए युद्धको सदैव शस्त्रयुद्ध कहते हैं। जो दुर्मति मनुष्य विश्वाससे शरण आयेको कर्षणैःसंविमर्माणांप्रतिलोमानुलोमतः ॥ त्यागता है॥ ५५ ॥ वह चौदद इन्द्रोके राज्य तक घोर नरकमें जाता है। बंधनैर्वातनंशत्रोर्युक्त्यातद्वाहयुद्धकम् । सुदुर्वृत्तंपदाशनाशयेयुस्तुबाह्मणाः ५६॥ उलटे पलटे शत्रुको सन्धि में माँ को जो युद्धकृत्वापिशस्त्रास्त्रनतदापापभाजिनः । खीचना ॥ ६२ ॥ और युक्तिसे पांध कर यदि दुराचारी क्षत्रीको ब्राह्मण नष्ट करद शत्रुको मारना उसे बाहुयुद्ध कहते है ॥ ॥ ५६ ॥उस समय शस्त्र और अनासे युद्ध नालास्त्राणिपुरस्कृत्यलघूनिचमहांतिव ।। करके भी ब्राह्मण पापके भागी नहीं होते ॥ तत्पृष्टगांश्चपादातान्गजाश्चान्यायोस्थितान् हीनयदाक्षत्रकुलंनाचौकाप्रपीड्यते ।। ५७॥ कृत्वायुद्धप्रारभेतभिन्नामात्यवहारिणा ॥ ६४ तदापिब्राह्मणायुद्धेनाशयेयुस्तुतान्युवम् । छोटे और बडे नालास्त्रोंको भागे कर ॥६॥ और जय क्षनियोंका कुळ होन (असमर्थ) उनके पीछे पदातियोको और दोनों तरफ हो जाय और नीच जगतको पीडा देते हो आसपासमें हाथी और घोडाको करके ऐसे ॥ ५७ ॥ उस समय में भी युद्ध करके ब्राह्मण शत्रुके संग युद्धका प्रारंभ करै जिसके मंत्री उन नीचोंको अवश्य नष्ट करें। फटगये हो ।। ६४ ॥ उत्तममांत्रिकास्त्रेणनालिकास्त्रेणमध्यमम् ॥ सांख्येनसुप्रपातेनपार्श्वीभ्यामपयानतः । शस्त्रैःकनिष्टयुदंतुबाहयुद्धततोऽधमम् । युद्धानुकूलभूमेस्तुयावल्लाभस्तयाविधम् ६५॥ मंबके अस्रोंसे युद्धको उत्तम और तोपके सांस्य (मोरचा) से और भळी प्रकार अघोंसे युद्धको मध्यम ॥५८॥ और शस्त्रोके प्रपाते ( फरें ). से और पाश्वीकी तरफ युद्धको कनिष्ट और भुजा के युद्धको अधमरा लोटनेसे युद्ध करे, जिस प्रकारको युद्धके मंत्रेरितमहाशक्तिवाणायेःशत्रुनाशनम्।।५९॥ अनुकूल और जितनी भूमि मिळे ॥ ६५ ॥ मांत्रिकास्त्रणतयुद्धसर्वयुद्धोत्तमस्मृतम् । सैन्याधीशेनप्रथमसेनपोयुद्धमीरितम् । मंत्रसे फेंकी हुई महा शक्ति (यनछी ) अमात्यगोपितःपश्चादमात्यैःसहतद्भवेत् ।। और वाणों जो शत्रुका नाश ॥ ५९ ॥ मवर्क उसमें सेनाक आधे २ भागसे दोनों अम्रोस किये हुए उस उद्यमको सब युद्धोम सेनाओंका युद्ध कहा है और पीछेसे मंत्री उत्तम कहते हैं। की सेना वामंत्रियोंके सग युद्ध होता है ॥६६॥ नालाग्निचूर्णसंयोगालोगोलानपातनम् ६०॥ नृपसंगोषितैःपश्चात्वतःमाणात्ययेचतत् । नालेकाखणतयुद्धमहाहासकररिपाः। दीर्घाध्वनिपरिधांक्षुत्पिपासाहितश्रमम् ।। तोपमें दारुके सयोगसे जो लक्ष्य पर फिर राजाके सेवकोंके संग और पीछेले गोटेका गैरना।। ६० ॥ नालिक अखसे माणोंका नाश होता दोखै तो स्वयं राजा- किया हुआ यह युद्ध शनुको पडी हानि कोही युद्ध करना कहा है, मागसे थकित हो अथवा क्षुधा और तृषासे युक्त हो ॥ ६ ॥ कुंतादिशस्त्रसंघातैरिपूणांनाशनंचयत् ।। व्याधिभिक्षमरकै पीडितदस्युविद्रुतम् । शवयुद्धतुतज्ज्ञेयनालाखाभावतःसहा । कपांसजलंस्कंधव्यस्तंबासातुरंतथा ६८ ।। । करता है।
(२८०) शुक्रनीति । [अध्याय- भय व्याधि, अकाळ ओर मरीसे पीडित स्पेनचरथीयोग्य पतिनापत्तिरेखच । हो अपवा चोराकी भगायी हुई हो वा कोच एकनैकश्चगवणशवमवेणवातकम् ७५ ।। और धूलका जल पीती हो जिसके स्कध मत हो और जिसका वासभीतिको एकसएको औरशस्तके सगशख रथ सग रथयो और पदातिके सग पदा- मरान हो॥८॥ को और अनके सग अन्नको मिळावे ॥ ७॥ प्रमुप्तभाजनेव्यप्रमभूमिष्टमसस्थिनम् । नचहन्पास्थलारूढंनक्लीनकृताजलिम् । घोराग्निभयस्विस्तवृष्टिपातसमाहतम् ॥ ६९।। सोती हो अथवा भोजन करती हो, भूमि नमुक्तकेशमासीनंनतवास्मीतिवादिनम् ॥ टिको न हो, विगटी हो, योर अग्निस दुखी स्थळ (मैदान ) में सडे और नपुसक और हो अधिक वृष्टि या पदनले पीडित हो ॥ कृतांजलि ( हाथ जोड़े हुए) को और जिस के वेश सुले हो मोर जो स्वस्थ बैठा हो और एवमादिपुजातेपुव्यसनैश्चनमाकुलम् । जो तेराही में ऐसे कहता हो ॥ ७६ ॥ स्वसैन्याधुरक्षेनुपरसन्यविनाशयेत् ॥ ७० ॥ नमसन्नविसनहिननग्नननिरायुधम् । इत्यादि पूक्ति कारण होनेपर और व्यस मासे युक्त अपनी सेनाकी तो राजा रक्षा करनयुध्यमानपश्यंतयुध्यमानेपरेणच ।। ७७ ।।. और पराई सेनाको नष्ट करे॥७॥ बहुत थकाटुभा कवचहीन नग्म आपुधरहित हो जो युद्ध करते हुए पिसीको देखता हो उपाया पद्गुणान्मत्रंशतो स्वस्यापिचितयेत् । धर्मयुःकृटयुदैन्यादेवरिपुंसदा ।। ७१ ॥ पिबतनच जानमन्यकार्याकुलंचन । अथवा दूसरे सग युद्ध करता हो ७७ ॥ शवके और अपने उपाय और छ गुणोंवाले मन्त्रीको बिता कर (विचार) धर्म अपग जल पीता दो भोजन करता हो नभीतनपरावृत्तंसतांचर्ममनुस्मरन् ७८ ॥ छलक युद्धोख सदेव शतुको मारे ॥७॥ यानेसपादभृत्यानुस्वभृत्यावर्धपन्नृपः । भयवा किसी अन्य कार्यम व्याकुरको भव स्वदेहंगोपपन्यु चर्मणाकवचेनच ।। ७२ ॥ भीत हो युद्धसे जो परामुरा (हटा) होरखने पानो समयमे योद्धाओंको भृति (मीरा शत्रुओयो सत्पुरुष धर्मको स्मरण करता को एक चीयाई बढाये और युद्ध के समयमा राजा कभी न मारे । ७८ ॥ चौ (दाल) और कवचसे अपने देहषीमा वृद्धोबालोनहतोनववीकेवलोनृपः । रदार॥७॥ ययायोग्यासयोग्यनिमन्धोनहीयते ॥ पापयियामसम्परगनिकालायवर्धनम् । द, यार माली भवेला गजाइनरोभी नागनेणयबद्गायरोनिकरियेदरीन् ।। नमारे योग्यसे योग्यपो मिलाकर शमुवे मार सेनाकं पोपी जिसमें शूरवीरता पटेनमें धम नष्ट नही होता ॥७९॥ मेरी मद ( मदिरा पिसापर नालाय धर्मयुटवस्टयनसविनियमाअभी । (तोप से भार रन ( तगर भादिनयुयूटरादर्शनाशनंगदिश ॥ ८ ॥ सनि पर शुभाया मरवारे ॥३॥ तिनमादियानयनरयगोपिच । ये नियम धर्मयुद्धमेदए पुदमरो गजोगजेनपावत्यानुरगणनुगमः ॥ ७॥ नियम नहीं दे पदयान रायोकट मानेवार माला गया सवार भोर पाटपुट समान और युद्ध नदी है । 20 ग्यगारे यो जी भार पोदा मोरामणद्रादिवाकरमेशपुग। टेननियोगाईपानोनमुविस्तया ८१॥ पगोwn
भाषाटीकासहित ।
(१८१)
पहले भी राम कृष्ण इन्द्र आदि देवताओंने विलोभ्यापिपरानीकमप्रमत्तोविनाशयेत् ।
कूट युद्धवादी आदर क्यिा है पाली कालयः तत्सहायबलनेवव्यातनाप्तमपिकचित् ८८ ॥
यन नमुचि ये सब कूटयुद्धसेही मारे है॥८॥ शत्रुको सेनाको विशष लोभ देकर भी
प्रफुल्लवदनेनैवतथाकोमलयागिरा।
सावधान राजा नष्ट करैशबुके सहायककी
शुरधारेणमनसारिपोरिच्छंद्रसुलक्षयेत् ।।८२॥ सेनाको सकटके समयमें कदाचित् भी न
मुंदको प्रफुल्लता और कोमलयानी रेकी मारे ॥ ८८॥
धारा समान मन इनसे शत्रुकै छिटको भली स्वममीपतरराज्यनान्यस्मानाहयेत्कचित् ।
प्रकार देख ॥ ८॥
क्षणंयुद्धायसज्येतक्षणंचापसरेत्पुनः ॥ ८९ ।।
मंचामीनः शतानीकःसेनाकार्यविचितयन् । जो राज्य अपने राज्यकै अत्यन्त समीप हो
सदैवन्यूहसंकेतवाद्यशब्दांतवर्तिनः ॥८३ ॥ उसको दूसरे राजाको कदाचित् न देने दे
मचर बैठा हुआ सेनापवि सेनाकै कार्य क्षण मारमेही युद्धकैलिये तैयार हो जाय और
को विचार व्यूहके सकेतोके जो बाजे उनके फिर एणमानमही युद्धसे हटजाय ॥ ८९ ॥
शब्दों के अनुसार ।। ८३॥
अकस्मानिपतेद्दूराइस्युवत्परितः सदा ।
संचरेयुःसैनिकाश्चराजराष्ट्रहितपिणः । रूप्यहमचकूप्यंचयोयजयतितस्यतत् ॥१०॥
भोदतांशत्रुणादृष्ट्वास्वसेनांयातयेच्चताम् ॥
और अचानक दूरसेही चोरके समान चारो
सैनिक राजा और देशकै हितको चाहते
तरफ सदैव प्रहार कर, चांदी सोना और धन
ये सब जित योधाने जीते हो उसर्वही होते
हुए विचार, शत्रुस भेदन की हुई अपनी सेना है ॥९॥
को देखकर यलसे रक्षा करें ॥ ८॥
दद्यात्कार्यानुरूपंचहष्टोयोधान्पहर्पयन् ।
प्रत्यग्रेकमणिकृतेयोधैर्दद्याद्धनंचतान् ।
विजित्येवरिपूर्नवसमादद्यात्कस्तथा ॥ ९१ ।।
पारितोप्यंशाधिकारकमेतहिनृपःसदा ॥८५॥
प्रसन्न हुमा योधाओकी प्रसन्नताके लिये
सेनाके योद्धाओं में यदि कोई योद्धा क्सिी काम अनुसार वस्तुओको दे इसप्रकार राजा
भारी कामको करें तो उसको धन दे अथवा शबुओंको जीतकर उनसे करका ग्रहण
पारितोषिक वा उत्तम अधिकार क्रमसे सदैव करै ॥ ९१ ॥
दे॥ ८॥
राज्यांशंवासर्वराज्यनंदयीतततः प्रजाः ।
जलानणसंरोकेशवन्सपीडययत्नतः । तूर्यमंगलबोषेणस्वकीयंपुरमाविशेत् ९२ ॥
पुरस्ताद्विपमेदेशेपश्चाद्धन्यातुवेगवान् ८६ ।। वह कर जो राज्यका भाग अथवा सम्पूर्ण
जल अन्न तृण इनवे रोकनेसे यत्न पूर्वक राज्य हो फिर शत्रुकी प्रजाको प्रसन्न करे
शाको दुःखी करके अपने आगे विषमदेश और मगळके पाजे वजाता हुआ अपने पुरमें
में टिके शत्रको पीछेस सेनाका वेग बहाकर प्रवेश करे ।। २ ॥
नष्ट करै॥८६॥
तत्प्रजा पुत्रवत्सर्वाःपालयीतात्मसात्कृताः ॥
कूटस्वर्णमहादान दयित्वाद्विपडलम् । नियोजयेन्मंत्रिगणमपरंमंत्रचितने ॥ ९३ ॥
निन्यविभसमुप्तप्रजागरकृतश्रमम् ८७ ॥
उस शत्रुकी सम्पूर्ण प्रजाको अपने अधीन
झूठे सोनेका महान् दान देदेकर शडकी करके पुरके समान पाटन करे और मन्त्रके
मनाको तोटे और प्रतिदिन विश्वाससे सोती विचारमं दूसरे मन्त्रियोंके समुहको नियुक्त
और जागनेके श्रम मुक्तः ।। ८७॥
करे ॥९॥
(१८२) शुक्रनीति। [ अध्याय- देशकालेचपानेचद्यादिमध्यावसानतः । अनिष्टोपेक्षणंराज्ञःस्वधर्मपरिवर्जनम् । भवेन्मनफलंकागुपायेनकरिवति । ९४ ॥ त्यजतुसैनिकानित्यंसल्लापमपिशापरः१२०१ टेश काट पात्र आदि मध्य अन्त इनमे राजावअनिष्टकी उपेक्षा अपने धर्मका परि- क्सि प्रकार उपाय करनेसे मन्त्रका फल क्या त्याग शत्रुओंके संग सम्भाषण इन सबको से- होगा इसको ॥ ९ ॥ नाके मनुष्य प्रतिदिन त्याग दे।। १२०१ ॥ मंन्याद्यविकृत कार्ययुवराजायबोधयेत् । नृपाज्ञयाविनाग्रामनविशेयुःकदाचन । पश्चादानेतुतःसाकयुवराजानिवेदयेत् ९५ ॥ स्वाधिकारिगणस्यापिद्यपराधदिशतुनः ।। मन्त्री आदि अधिकारी इस कायको राजाकी आज्ञाकै विना पदाचित् ग्राममे न युवराजको कदै फिर मन्नी आदि सहित युव जायें और अपने अधिकारी गणका जो अप- राज राजाके प्रति निवेदन कर ॥९५॥ राध हो उसे न कह॥ १० ॥ राजासशासयदादायुवराजततस्तुसः । मित्रभावेनवर्तध्वंस्वामिकृत्येसदाखिला ।' युवराजोमंत्रिगणाराजाग्रेतेषिकारिण ॥९६॥ सूज्ज्वलानिचरक्षतुशस्त्रास्त्रवसनानिच ॥ राजा प्रथम युगराजको शिक्षा दे फिर युवराज मन्त्री आदि समृदको शिक्षित कर भावस वर्ताव करें। अपने शस्त्र अब और और स्वामीके कार्यमे सम्पूर्ण सदेव मित्र- क्योकि राजाके आगे बेदी अधिकारी होते को उज्वल रक्सें और रक्षा करै ॥ ३ ॥ सदसत्कर्मराजानबोधयोद्धिपुरोहितः । अन्नंजलंपस्यमापात्रंबन्नसाधकम् । ग्रामादहिःसमीपेतुमैनिकान्धारयत्सदा ९७॥ शासनादन्ययाचारान्चिनेप्यामियमालयम्४ ॥ राजावे सत् असत कर्मका पुरोहित बोधन भन्न और जल ये प्रस्थभर और जिसमें करे और ग्रामसे बाहर समीपमही सैनिका बहुत भन्न भाजाय ऐसा पात्र हो जो मेरो वो सदव टिकावे ॥ ९७ ॥ शिक्षाका भग करेगा उसे यमराज स्यानपर ग्राम्यमनिकयोर्नस्यादुत्तमाधमर्णता । पहुँचाउंगा॥४॥ सैनिकार्यतुपण्यानिसैन्येसंधारयेत्पृथक।।९८ भेदयित्वारिपुधनंगृहीत्वादर्शयतुमाम् । ग्राम निवासी और सैनिकोंका वनमण सनिकैरभ्यसैन्नित्यन्यहाद्यनुकृतिनृपः ॥५॥ मधमण व्यवहार (लेन देन) होने दो भेदन किये हुए शाके धनको हम दिखाओ सनिकाल लिये सनामही पृपा बाजार राजा भी सैनिकोंक सग सेना प्यूहीका बनवावे ॥९८॥ प्रतिदिन स-पास करे ॥५॥ नकरवामयसन्यवसांतुकदाचन । तयाध्यनेज्यनेलक्षमस्रपातविभेदयेत् । मेनासहसंमजस्यान्क्षणासंगासपेत्तया॥९९॥ सायंप्रातःसनिकानांकुर्यात्संगणनंनृप. ६ ॥ पर म्यानपर एक वर्ष सेनाको कदाचित तिसी प्रकार अपन (मोरे १)पर मन्त्रा न बसाये जिस प्रकार हजारों सेना पण यो फेंककर एदारोधीधे भौर पवार मौर मेही तयार होजाय ऐसी शिक्षा दे॥९९ ॥ प्रात काटये समय राजा सेनिकषी गिनती संगागंपत्स्यनियमान्सनिकानष्टमदिने । चंदत्वमाततायचंगजकार्यविरंजनम् १२००॥ जात्याकृतिवादशग्रामवासान्विायर मौर भाटन दिन मनिकायो मानेनियमगी काल मृत्याधिदेयंदत्तभृत्यम्य टेरसयेत् ॥ ७ ॥ शिक्षा दता रहे मोध मावती गनारे भत्पपी जाति, मागार, मरिया, देश प्राम मापम गिर॥10.॥ सोयाप्त भौर ममप भूतिया मधि टिपा
भापाटीकासहित ।
(१८३)
हुआ और देने योग्य द्रव्य इन सबको इसी प्रकार जगत्के विश्वासीको बाहिरके
लिखे ॥७॥
कृत्यमें नियुक्त कर यदि इन पूर्वोक्तोंको अन्य-
कतिदत्तहिभृत्येभ्योवेतनेपारितोषिकम् । या नियुक्त करे तो केवल अपयशके लियेही
होते हैं ॥ १३ ॥
तत्प्राप्तिपत्रंगृह्णीयादद्यावेतनपत्रकम् ॥ ८॥
वेतनमें भृत्योंको कितना पारितोषिक दिया शसंबंधिनोयेयेभिन्नामंत्रिगणादयः ।
उसकी प्राप्तिका पत्र ( रसीद ) ले, और वेतन नृपदुर्गुणतोनित्यंहतमानगुणाधिकाः १४ ॥
(नौकरी) का पत्र उसको दे दे ॥८॥ जो २ भृत्य शत्रुके संबंधी हों और जो २
सैनिकाःशिक्षितायेयेतेपुपूर्णामतिःस्मृता ।
मंत्रियोंके भिन्न गण ( फटे) हो राजाके दुष्ट
गुणोले गुणों में अधिक भी उनके मान(जस्कार)
व्यूहाभ्यातनियुक्तायेतेष्वर्धाभृतिमावहेत् ९॥
को हरले ॥१४॥
जो सैनिक शिक्षित है उन २ की भृति स्वकार्यसाधकायेतुसुभृत्यापोषयेचतान् ।
(नौकरी) पूर्ण देनी कही है और जो सैनिक
म्यहके अभ्यासमें नियुक्त हैं उनको उनसे
लोभेनासेवनागिनास्तेष्व(भृतिमाहेत् ॥
आधी भृतिको दे ॥९॥7
जो अच्छे भृत्य अपने कार्यके साधक हो'
असकाश्रितसन्यनाशयेच्छ. योगतः।
उनका पोषण कर जो लोभसे और सेवा कर.
नेस भिन्न (विमुख) हों उनको आधी भृति
नृपस्यासद्गुणरताकेगुणद्वेषिणोनराः ॥१०॥ ६ ॥२५॥
शत्रुके योग (बहकाना )से जो सेना असत शत्रुत्यक्तान्सुगुणिनःसुभृत्यान्पालयेन्नृपः ।
कामको करै उसको नष्ट कर राजाकी बुराई में
कौन तत्पर है और कौन मनुष्य राजाके गुणो- परराष्ट्रहतेदद्याभृतिभिन्नावधितया ॥१६॥
का द्वेष करते हैं।॥ १०॥
जिन अच्छे गुणवालोंको शत्रुने त्याग दिया
हो उनकी अच्छी भूति देकर पालना कर
असद्गुणोदासीना केहन्यात्तान्विमृशन्नृपः । जिस समय पराया देश लिया जाय उससमय
सुखासक्तांस्त्यजेत्यान्गुणिनोपिनृपःसदा ११ भिन्नावधि( भत्ता और भृति उसको दे ॥१६॥
कौन.असद्गुणी है और कौन उदासीन हैं दद्याद/तस्यपुत्रेस्त्रियैपादमितांकिल ।
उन सबको विचार २ कर राजा नष्ट करै, जो हतराज्यस्यपुत्रादौसद्गुणेपादसमितम् ॥
भृत्य सुखमें आसक्त हो ये चाहे गुणवानभी
और उसके पुत्रको आधी और उसकी
हो तथापि राजा उनको सदैव त्याग दे ॥११॥ स्त्रीको चौथाई दे, जिलका राज्य हरा हो
सुत्यसले कत्यिश्वत्तापल्यावसापुरादि अच्छे गुणी उक्के पुत्र अदिको चौथाई
थार्याःसुस्वांतविश्वस्ताधनादिव्ययकर्मणि१२/राज्य दे॥ १७ ॥
भली प्रकार स्वयं जांचे और जगदमें दद्याद्वान्द्राज्यतस्तुद्वात्रिंशांशंप्रकल्पयेत् ।
विश्वास वाले जो भृत्य उनको अन्तःपुर हतराज्यस्यनिचितकोशंभोगार्थमाहेरत्॥१८॥
(रमयास) में नियत करें और भलीप्रकार अथवा उसके राज्यमेंसे बत्तीसवां भाग
स्वयं जिनका विश्वास कर लिया हो उनको और जिस्का राज्य हरा हो उसके सचित
धनके व्यय
(खर्च) करनेमें नियुक्त कोश ( खजाना ) को भोगनेके लिये ले
करें ॥ १॥
आवे ॥१८॥
क्याहिलोकोविश्वस्तोवाहाकृत्येनियुज्यते । कौसदिवातद्धनस्यपूर्वोक्तामकल्पयेत् ।
अन्ययायोजितास्तेतुपरिवादायकेवलम् १३॥ तद्धनंद्विगुणंयावन्नतदूकदाचन ॥ १९ ॥
[अध्याय-
शुक्रनीति ।
(१८४)
-
अथवा उसके धन से आधे धनको व्याज और चारसे कल यामिकको तो कदाचित
पूर्वोत्तसे आधा द्रव्य दे परन्तु इतनेही दे भी नियुक्त न करें, जिसकी रक्षा करनी हो
जपतक उसके धनले दूना व्याज पहुँचे फिर अयवा जो उपदशके योग्य दो टसे यामिकों
उसके पीछे कदाचित् नदे॥ १९ ॥ को पताय दे॥२५॥
स्वमहत्त्वद्योतनार्थहतराज्यामधारयेत् । तत्समक्षसियाद्यामिकोपिचतत्तया ।
माझ्मानदिस वृत्तान्दुर्वृत्तांस्तुप्रपीडयेत् कीलकोष्टेतुस्वर्णादिरशेनियामितावाध ॥२६॥
अपनी बडाईके जतानक लिय जिनका उत्तोके सामने सब हो और यामिक भी
राज्य हराहो उनकीभी पालना करै यदि वे उसे उसी प्रकार करै और जिसमें कोल लगी
मान आदिसे पहिले सदाचारी हो यदि दुरा- हो ऐसे कोठेम नियमले स्वर्ण आदिको रक्षा
बारी होय तो पीटित करें ॥२०॥
करें ॥ २६ ॥
अष्टवादशवावापिकुर्याद्वादशवापिवा ।
स्वांशांतेदर्शयेदन्ययामिकंतुययार्यकम् ।
यामिकाथमहोरात्रंयामिकान्वीक्ष्यनान्यथा ॥क्षणेक्षणेयामिकानांकार्यदृरासुबोधनम् २७॥
भाउ वा दशम भयवा वारह यामिको पहिला यामिक अपने भागके अन्तमें दूसरे
(पहरेदार) देखकर यामिक (पहरा) के लिये यामिकको यथार्थ रीतिले दिखादे, क्षगरम
रातदिन नियत करै ॥२१॥
यामिकोके कार्यको दूरसेही समझा दे ॥ २७
आदीमकल्पितानशान्भजेयुर्यामिकास्तया । सत्कृतानियमानसर्वान्यदासंपालयन्नृपः।
आद्यापुनस्त्वंतिमांशःस्वपूर्वाशंततोपरे ॥२२॥
सदैवनृपतिःपूज्योभवेत्सर्वेपुनान्यया ॥ २८ ॥
नियत होने के समय जितना भाग पहरेके
जब राजा अपने किये हुए सब नियोंकी
लिये नियत हुआ हो उसकी सद यामिक
पालना करता है तभी राजा सब मनुष्यों के
पालना करे, पहिले भागको पहिला उससे
वीची पूजा (घडार्ड) के योग्य होता है
अगले भागको दूसरा और अपनेसे पूर्व
उन्यथा नहीं होता ॥२८॥
भशको वे जो अन्य है॥७॥
यस्यास्तिनियतकर्मनियतःसद्ग्रहोयादि ।
पुनीयोजयेत्तरदायेंत्यंचांतिमततः ।
नियतोऽसद्ग्रहत्यागोनृपत्वंसोश्नुतेचिरम् २९
स्वपूर्वीगंद्वितीयोद्रिद्वितीयादिःक्रमागतम् ।।
जिस राजाका काम नियत है और जिसका
अया फिर (बदली ) अन्त्य ( पिछलागि आग्रहका त्यागभी नियत है वदो राना
माग्रह भी अच्छा ही नियत और असत
को माद्य समपर्म और आद्यको अन्त्य समयमै चिरकालतक राज्यको भोगता है ॥ २९ ॥
दूसरे दिन अपने पूर्व अंशमें द्वितीय आदि
कम नियत कर॥३॥
यस्यानियमितकर्मसाधुत्ववचनंत्वपि ।
चतुर्यस्त्वविकानित्ययामिकान्योजयोंईने ।
सदैवकुटिल:सस्तुस्वपदावाग्विनश्यति॥३०॥
युगपद्योजयेदृष्ट्वावन्वाकार्यगौरवम्।।२४॥ चाहे वचन अच्छे भी हो तो भी वह सदैव
जिस राजाकै कामका नियम नही उसके
एक दिनमें चारसे अधिक यामिकांको कुटिल है और वह अपने पद (राजगदी) से
सदेव नियत कर और कार्यका गौरव (भारी) शोधही पतित (गिरना) होता है ॥ ३० ॥
देकर एफ चारही बहुत यामिकोयो नियत नापियामागजाशक्तामृगेंद्रशासितुंयया ।
चनुम्नान्यामिकांस्तुकदानवनियोजयेत् ।
नयामानणामनृपस्वच्छंद्गामिनम् ३१॥
यद्रव्यमुपेत्यपदादेश्यपामिझायवत्॥२५॥ के लिये समय नहीं होते तिसीप्रका
जसे भिटा मौर दायी सिहको शिक्षा देने
~
परं ॥४॥
४.] भापाटीकासहित । (१८५) MINSaam होता है। मंत्रियोके गण स्वच्छंदचारी राजाको शिक्षा : क्षुधा होनेपर मनोजन और निद्राके आनेपर नदी दे सकते ॥३१॥ भलीप्रकार शपन जेले होय तेही करे इससे निभृताधिकृतास्तेननिःसारवाहितेप्यतः। जो अन्यथा करता है वह शीघ्रही दरिद्री होता है॥ ३७ ॥ इसीप्रकार राजा सदा व्यय गजोनिवध्यतेनैवतूलभारसहस्रकः ॥ ३२॥ (खर्च) को करें अन्यथा न करें। वे मंत्री राजानेही पाले हैं और राजानेही उनको अधिकार दिया है इससे उनमें सब धर्मनीतिविहीनायेदुर्बलाआपिवैनृपाः ३८ ॥ । दृढता ) नहीं होता रईके सहस्रो भारोंसेभी सुधर्मवलयुग्राज्ञादंडयास्तेचौरक्सदा । दायी नहीं बांधा जा सकता ॥ ३२॥ जो दुर्वल राजा धर्म और नीतिसे हीन हैं उतुद्राग्गजः शक्तःपंकलग्नंगंजयली । ॥ ३८ ॥ उन सबको उत्तम बल और धर्मसे नीतिभ्रटनृपत्वन्यनृपडद्धारणक्षमः ॥ ३३ ॥ युक्त राजा देव चोरके समान दंडदे ॥ सर्वधर्मावनानीचनृपोपिश्रेष्ठतामियात् ३९ और बलवान् हाथी पंक (कीच) में फसे हुए दूसरे हाथोको जैसे शीघ्र ही उद्धार कर उत्तमोपिनृपोधर्मनाशनानीचतामियात् । सकता है इसी प्रकार नीतिसे भ्रट (हीन) सबके धर्मकी रक्षा करनेसे नीच गजाभी राजाकोभी अन्य राजा उद्धार करनेको समर्थ श्रेष्ठ होजाता है ॥ ३९ ॥ और उत्तम भी राजा होता है॥३३॥ सबके धर्म नाश करनेसे नीचताको प्राप्त बलवन्नृपभृत्येऽस्पेपिश्रीस्तेजोययाभवेत् । तयानहीननृपतीतन्मंत्रिष्वपिनोतया ॥३४॥ धर्माधर्मप्रवृत्तातुनृपएवहिकारणम् ॥ ४०॥ सहिश्रेष्ठतमोलोकेनृपत्वयःसमाप्नुयात् । बलवान राजाके पीछे भी भृत्यमें जैसे लक्ष्मी और तेज होता है वहा तेजहीन राजा क्योंकि धर्म और अधर्मकी प्रवृत्तिमें राजा में और उसके मन्त्रियों में भी नहीं होता था हो कारण होता है ॥ १० ॥ वही जगदमे अत्य- बहूनामैकमत्यहिनृपतेर्भलवत्तरम् । न्त अष्ट है जो राज्यको प्राप्त होता है। बहसूत्रकृतोरन्जु:सिंहाद्याकर्षणशमः ॥३५॥ मन्याचैराहतोयोर्यस्तदयाभार्गवेणवे॥ ४१ ॥ बहुत मन्त्री आदिकी जो एकमति वही द्वाविंशतिशतश्लोकानीतिसारेप्रकीर्तिताः ॥ राजाका अधिक चर है क्योंचि. बहुतसे जो अर्थ मनु आटिने मानेहें वेही अर्थ शुक्रा- सूतोकी यनाई हुई रन्जु (रस्सी) सिंह आदि चार्यने माने है ॥ ४१ ॥ इस नीति सारमें केभी सोचने में समर्थ होती है॥३५॥ २२०० बाईससोश्लोक कहे हैं। हानगज्योरिपा त्योनसैन्यंधारयेदहु । शुक्रोक्तनीतिसारयाश्चतयेदानेशंनृपः ४२ ॥ कोशवृद्धिमदाकुर्यात्स्वपुत्रायभिवृद्धये ३६॥ व्यवहारधुरंवोढुंसशक्तोनृपतिर्भवेत् । जिसका राज्य छीन गया हो और शत्रुको शुक्रके कहे हुए इस नीतिसारको जो सेवा करता हो ऐसा गजा अधिक सेनाको राजा रात दिन चिन्ता (विचार) फरता है न री ओर राजा अपने पुत्र आदिको वृद्धि ॥४॥ वहीं राजा व्यवहारके भार उठाने में ये लिय कोश (ग्वजाना )की वृद्धि व समय होता है ।। करें ॥३६॥ नफवेमशीनीतिविपुलोकविद्यते ४३ ॥ इधपानियासर्वमशनशप शुभम् । काव्यग्नीतिरन्यातुकुनीतियवहारिणाम् । भवेद्यथातथायर्यादन्यथाशुदस्तिकव ३७ ॥ शुक्रनीतिक समान इतर कोई नीति तीनी दिशानपाव्यपंकुन्निपोनित्यनचान्यया । लोग नही ?॥ ४२ ॥ व्यवहारी मनु-
[अध्याय-
शुक्रनीति ।
(२८६)
प्योंके लिये शुक्रकी नीतिही है और सच सेनाको नियुक्त करै जो शत्रुको सेनाको नष्ट
कुनीति हैं।
कर सके ॥ ५० ॥
नाश्रयीतचयनीतिमंदभाग्यास्तुतेनृपाः ४४॥ नयुज्याद्रिपुराष्ट्रस्यामियास्वपिणानच ।
कातर्याधनलोभादास्युर्वनरकभाजनाः । ननाशयेत्स्वसेनांतुसहसायुद्धकामुकः ५१ ।।
इतिशुक्रनीतौचतुर्थमिश्रप्रकरणं समाप्तम् । शत्रुके देशकी और परस्पर पर करनेवाली
जो राजा इस नीतिका आश्रय नही लेते वे सेनाको नियुक्त न करै युद्धके इच्छावाला राजा
मन्दभागी जानने ४ ॥ और कायर पन और विना विचारे अपनी सेनाको नष्ट न
धनके लोभसे वे नरकगामी होते है । शुक्रनी- करे ॥ ५१ ॥
तिम यह चौथा मिश्र प्रकरण समाप्त हुआट॥ दानमानैर्वियुक्तोपिनभृत्योभूपतित्यजेत् ।
नीतिशेपंखिलेवत्येाखिलेशास्त्रसंमतम् । समयेशनुसान्नैवगन्छेनीववनाशया ॥५२॥
सप्तांगानांतुगज्यस्यहितसर्वजनेपुवै ॥ ४६॥ दान और मानले हीननी भृत्य अपने राजा.
अब मर शास्रोका सम्मत और सम्पूर्ण को न त्यागै जीव और धनकी इच्छासे समय
नीतिका जो रोप है उसको कहता हू । जिस पर शत्रुके आधीन न होवे ।। ५२ ॥
प्रकार सब मनुष्योंका हित हो उसी प्रकार मेघोदकैस्तुयापुष्टिःसाकिन यादिवारितः ।
राज्यके सातो अङ्गाको रक्खे ॥४६॥ प्रजापुष्टिर्नुपद्रव्यस्तयाधिनिनांधनात् ५३॥
शतसंवत्सतिपिकारप्याम्यात्मसाद्रिपुम् । जो पुष्टि मेनके जलोसे होती है यह पुष्टि
इतिसंचित्यमनसारिपोश्छिद्राणिलक्षयेत् ॥
क्या नदी आदि के जलसे होती है मजाकी जो
और मनसे यह विचार कर शत्रुके छिद्राको पुष्टि राजाके द्रव्यास होती है क्या वह पुष्टि
देखे कि १०० सो वर्षके अततक भी शत्रुको अ-धनियोंके धनले होतीहै ? ॥ ५३ ॥
पने आधीन ( वशमें ) करूगा ॥४७॥
दर्शयन्मार्दवनित्यमहावीर्यवलोपिच ।
राष्ट्रभृत्यविशंकीस्यादीनमंत्रबलोरिपुः ।
रिपुराष्ट्रप्रविश्यादौतत्कासापकोभवेत् ५४॥
युक्त्यातयाप्रकुतिसुमंत्रबलयुफस्वयम् ।।
महान् वीर्य और बलवालाभी राजा प्रति-
श्रेष्ठ मन और वळसे युक्त राजा युक्तिप्रवक दिन नम्रता दिखाता हुमा प्रथम शत्रु राज्यमें
ऐसा यान करे कि शको राज्य और भृत्याको प्रविष्ट होकर शत्रुके कार्योका साधक हो
शंका हो और मंत्र तथा सेनाले रहित हो जाय जाय ॥ ५४ ॥
सनातन मूलस्तुतदायमखिलंहरेत् ।
सेवपावावणिग्वृत्यारिपुगष्ट्रविमृश्यच ।
अथतद्विष्टदायादान्सेनपानंशदानतः ॥५५॥
दत्ताभयंसापयानोव्यसनासक्तचतसम् ४९ राज्यको हरले किर शके वैरी और
और जय यह मूल (जड) वध जाय तो उ-
मेया या व्यापारयो गृत्तिस के देशको दायाद (हिस्सेदार) और सेनापति इनको
विचार (प)कर भौर शवको अभपदान वह युछ भाग देने ॥ ५५ ॥
देकर सावधान हुमा राना व्यसनमें लगा है ताज्यस्यागीकुर्यान्मूलमुन्मूलपन्नलात्
चित्त निकाल शो॥ ४९ ॥
मान राधादवसतिष्ठनागंपदारम् ।
तगेःसंक्षीणमूलस्पशासाःगुष्यंतिवेयया५६॥
सेनायुदेनियुनीतप्रत्यीकपिनागिनीम ५०॥ बसे गलको उग जसे जिसका
चगर्म करे जोगरे राम्पकाही हो भौर प.
इस प्रसार दिकार को नष्ट कर जग मल पटगपा हो उठ गृश शापा राप
पिटारको साधर (ग्याध) भौर पुल ऐसी जाती है ॥ ५६ ॥
॥४८॥
५.] भापाटीकासहित । (१८७) . सद्याकेचिचकालनसेनपाद्या पतिविना । जीवता हुआ राजा अपनी स्वामिना पूरी२ राज्यवृक्षस्यनृपतिर्मूलस्कंधाश्चमत्रिणः ५७ अपने पुत्रको कदाचित न दे क्योंकि स्वभावले इसी प्रकार सेनापति आदि संपूर्ण कोई उद्गुणों को भी स्वामिता महान् अनर्थ और शीघ्र और समय पाकर राजाके विना सूख मदको देती है ॥ ६३॥ जाते हैं, राज्यरूपी वृक्षका मूल राजा होता है विष्ण्वाद्यैरापिनोदत्तास्वपुत्रेवाधिकारता । और मन्त्री स्कन्ध (डाळे) होते हैं। ५७ ॥ स्वायुषःस्वल्पशेपेतुसापुत्रेस्वाम्यमादिशेत् ॥ शाखा सेनाविपासनाःपल्लवाःकुसुमानिच । विष्णु आदिकोने भी अपना अधिकार अपने प्रजा फलानिभूभागावीजभूमिःप्रकल्पिता ॥ पुत्रको नहीं दिया किन्तु जब अपनी अवस्था सेनाके अधिप शाखा सेना पत्तेः प्रजा फुल अल्प रहे उस समय सज्जन पुत्रको अपनी और पृथियों के भाग फल, भूमि योज होती स्वामिता दे॥ ६४ ।। है।५८॥ नाराजकंक्षणमपिराधक्षमाःफिल । विश्वस्तान्यनृपस्यापिनाविश्वाससमाप्नुयात् । युवराजादयःस्वाम्यलोभंचापलगौरवात् ६५॥ नैकांतनगृहेतस्यगच्छेदल्पसहायवान् ५९॥ युवराज आदि विना राजाकै क्षणमात्रभी राए। देश के धारण ( पालन)करनेको समर्थ विश्वासकै योग्यभी दूसरे राजाकाविश्वास नहीं होते और स्वामिताका लोभ, चपलता कदाचित् न करें और अल्प सहायक होने गौरव (चडाई )से ॥ ६५ ॥ पर एकांत समयमें शत्रुके घरमें न जाय ॥५९॥ प्राप्योत्तमपदंपुत्रःसुनीत्यापालयन्प्रजाः । स्ववेषरूपसदृशानीनकटरक्षयत्सदा । पूर्वामात्येपुपितृवगौरवसंप्रधारयेत् ॥ ६६ ॥ विशिष्टचिरगुप्तःस्यात्समयेऽज्यादृशोभवेत् ।। पुत्र उत्तम पदको प्राप्त होकर और उत्तम अपने समान वेप और रूपवाः भृत्योंकी नीतिसे प्रजागोका पालन करता हुआ पहिले अपने निकट सदेव रक्षा करे और विशिष्ट (श्रे-माने ॥६६॥ मंत्रियोंका पूर्वक समान गौरव ( बडाई) ४) चिहसे अपनी रक्षा करें और युद्ध आदिके समय अन्य अन्य रूपोको धारण करें ।। ६० ॥ तस्यापिशासनंतैस्तुप्रधार्यपूर्वतोधिकम् । वेश्याभिश्चनटैमधैर्गायकोहयेदरिम् । युक्तंचदन्ययाकार्यनिषध्यकाललंबनैः।।६७॥ और मंत्री आदिभी उसकी आज्ञाको पूर्वसे सुवस्त्राभरण वनकुटुबेनसंयुतः ॥ ६१ ॥भी अधिक माने यदि अन्यथा कर तो काल शत्रुको वेश्या, नट, मदिरा, गानेवाले इनसे विलंब आदिसे निषेध करें ।। ६७ ॥ मोहित कर उत्तम वस्त्र, आभूषण और कुटुंब तदनीत्यानवर्तयुस्तेनसाधनाशया । इनको लेकर युद्धमै कदाचित् मवृत्त नहो॥६॥ विशिष्टचिदित्ताभीतायुद्धगच्छन्नवैवाचित्। वर्ततेयनीत्यारोतेनसाकंपतंत्यरात् ॥ ६८ ॥ राजाकी अनीति में उसके संग मंत्री आदि क्षणंनासावधानःस्याभृत्यस्त्रीपुत्रशत्रुपु६२॥ धन लोभस न त यदि वे अनीतिसे वर्वाव विशिष्ट चिह्न (राजा) को धारण किये करें तो राजाके संग शीग्रही नरकमें जाते. ' और डरता हुआ युद्धमै कदाचित्भी न जाय, है॥ ६८॥ और भृत्य स्रो पुत्र और शत्रु रनमें क्षण मावभी कुलभक्तांश्चयोद्वेष्टिनवीनभजतेजनम् । असावधानी न कर।।६२ ।। जीवन्सन्स्वामितापुत्रेनदेयाप्याखिलाकचिद । "अपने कुलके भक्तो (पालेहुओं) से जो सगच्छेच्छबुसाद्राजाधनमाणपियुज्यति ६९॥ स्वभावसगुणयस्मान्महाऽनयमदावहा ॥६३॥ युवराज वर करता है भोर नवीन जनको [अध्याय- शुक्रनीति । (१८८) सेवता है वह राजा शत्रुके आधीन हो जाता है धृतजन समीर हितको भी अहितके समान और धन और प्राणासे वियुक्त हो जाता और अहितको हितके समान मुखको दर्शा कर अपने कार्यको सिद्ध करते हैं ॥७॥ गुणीतुनीतिनव्योपिपरिपाल्यस्तुपूर्ववत् । वित्रंभयित्वाचात्यर्थमाययाघातयन्तिते । प्राचीन सहकार्यानुभूयानयोजयेत् ७० ॥ यस्यचाभियमान्वच्छेत्तस्यकुर्यात्सदाप्रियम् ।। गुणी नीतिका ज्ञाता नवीन जनको भी और वे मायाले अत्यन्त विश्वास देकर मार पूर्वके समान पालकर प्राचीन मंत्री आदिको देते हैं, जिसके अमियको इच्छा कर उसका के संग देखभालकर कार्यों में नियत सदैव प्रिय करे ।। ७६ ॥ करे ।। ७॥ व्याधोगवधकर्तुगीतंगायतिसुस्वरम् । अतिमृदुस्तुतिनतिसेवादानप्रियोक्तभिः । मायांविनामहाद्रव्यद्रानसंपाद्यतेजनैः।।७७|| मायिकःसेव्यतेयावत्कार्यनित्यंतुसाधुभिः७१ मृगोका वध करता हुआ व्याध उत्तम अत्यन्त कोमल, स्तुति, नमन, सवा, दान स्वरसे गीत गाता है और मायाकै विना मनु- और प्रिय वचन इनसे जबतक मायावी सवा प्योको अत्यन्त धन नहीं मिलता ॥७॥ तबतक उस कार्यको करें जिसे साधुजन विनापरस्वहरणानकश्चित्स्यान्महावनः । कह ॥७॥ माययातुविनातादिनसाध्यस्याद्ययोप्सितम् ।। प्रत्यक्षंशपरोक्षवासत्यवाभिर्नृपोऽपिच । । पराये धनके हरने विना कोई भी महाधनी याथार्थ्यवस्तयोरहिगतरखभुवायथा ७२ ॥ 'नही होता और मायाके विना वह धन अपनी प्रत्यक्ष (सामने) वा परोक्ष (पीछेसे) इच्छाके अनुसार मिटभी नही सरुता ॥ ७८ा. सत्य वाणियोंस उनके इस प्रकार अन्तर: स्वधर्मपरमंमखापरस्वहरणंनृपाः । (फरक) को राजाभी जान ले जले आकाश, परस्परंमहायुद्धंकृत्वाप्राणांस्त्यजंत्यपि॥७९॥ और भूमिका अन्तर होता है ।। ७ ।। पराये धनके हरनेको अपना परम धर्म मायायाजनकाधूर्तजारचोरबहुश्रुताः । मानकर राजा लोग परम्पर महायुद्ध करके प्रवेष्टितोययापूर्वोनतयानुवहुश्रुतः ॥७३॥ प्राणोंको भी त्याग देते हैं ॥ ७९ ॥ माया पैदा करनेवाले, धूर्त, जार चौर राजोयदिनपापस्याइस्यूनामपिनोभवेत् । और यहुश्रुत ( जिसने बहुत बाते सुनी हो) सर्वपापंधर्मपस्थितमाश्रयभेदतः ॥ ८ ॥ ये होते हैं और जसा मायावी प्रतिष्ठित पत! यदि राजाको पाप न होय तो चोरीको भी होता सा बहुश्रुत नही होता ॥७३॥ न होना चाहिये इससे सम्पूण पाप आश्रय - परस्सद्दरणेलोफेजारचौरीनुनिदिती । (यता) के भेदसे धर्मरूपसे स्थित है॥८॥ तावप्रत्यक्षहरतःप्रत्यक्षतएवहि ॥ ७४ ॥ बहुभिर्यस्तुतोधमोनिदितोऽधर्मएक्सः । जगवमें पराये धन हरनेवाले चोर और जिसको बहुत जन स्तुति करें वह धर्म धर्मतत्वंहिगहनंज्ञातुंकेनापिनोचितम् ॥८॥ जार ये दोनों निन्दित रहे हैं परन्तु ये दोनों को निन्दा करें वह अधर्मही है अमरपा (पोल) दरत है धन तो सामनेही धमके गहन (गहरा ) तत्वको कोई भी नही प्रतिधानतपःसन्ययोगोदाधिकाचिद । पूर्ता:मंशापित्यानरमामाययतिने॥७५॥ वायर्यायानस्यातांतटाकामनिरर्थकम् ॥८२।। . जिान सवता॥८॥ धनको दरता ॥७२॥ दिवहिनवजात अदितंदितात्मदा ।
भाषाटीकासहित । (१८९) अत्यन्त दान देना, तप, सत्य बोलना ये आपदंपतरिष्यामोयूययुक्त्यावदिष्यथ । सब इस जगतम दरिद्रता करनेवाले हैं। जिस भवंतोमममित्राणिभवत्सुनास्तिभृत्यता ॥८९ काममें धर्म वा अर्थ (धन) न हो वह निरर्थक (वृथा) है ॥ ८॥ जिस प्रकार भापत्तिले पार हो वह युक्ति आप लोग कहो तुम मेरे मित्र हो और भृत्य. अर्थस्यपुरुषोदामोदासस्थानकस्पचित्त । पना तुममें नही है ।। ८९॥ अतार्थाययतिवसर्वदायलमास्थितः ॥ ८॥ नभवत्सदृशास्त्वन्येसहाया:संतिमेह्यतः । यह पुरुष अर्थका दास है और अर्थ किसी का भी दास नहीं है इससे यत्नम तत्पर तृतीयांशभृताह्यमर्धेवाभोजनार्थकम् ९० ॥ ममुष्य अर्यके लिये अवश्य यत्न करै ।। ८६॥ जिससे तुम्हारे समान अन्य कोई मेरे अर्थाद्धर्मश्चकामश्चमोक्षश्चापिभवेन्नृणाम् । सहायक नहीं हैं अब भोजनके लिये अपनी शस्त्रास्त्राभ्यांविनाशौर्यगाहस्थ्यतुस्त्रियविना ॥ भृति (नोकरी) का तीसरा या. आधा भाग आप लोग ग्रहण करो ॥ ९ ॥ मर्थसे धर्म काम और मोक्ष ये तीनों मनुग्यो को प्राप्त होते हैं शस्त्र और अत्रके विना शूर दास्याम्यापत्समुत्तीर्णःशेषप्रत्युपकारवित् । वीरता, भीर स्त्रीक विना गृहस्थ ।। ८४ ॥ भृतिविनास्वामिकार्यभृत्याकुर्यात्समाष्टकम्।। एकमत्यविनायुद्धकौशल्यंग्राहकविना । इस मापत्तिसे पार होकर शेष भृतिको उप- दुःखायजायतेनित्यंसहायविनाविपत्॥८६॥ कारको जाननेवाला में दूंगा, अपने स्वामी एक मतिके विना युद्ध और ग्राहक करा ९१ ॥ कामको भृतिके विना भी भाठ वर्ष तक भृत्य (करदान ) के विना कुशलता और पदातियों के विना अच्छी सहायता ये सदा दुःखदायी पोडशाब्दंधनीय.स्यादितरोनुरूपतः । ही होते हैं ।। ८५ ॥ निर्धनरन्नवस्त्रंतुनृपाद्राजुनचान्यया॥१२॥ न विद्यतेतुविपदिसुसहायसुहत्समम् । जो भृत्य धववान् हो वह खोलद वर्षतक लघोरप्यपमानस्तुमहावैरायजायते ।। ८६॥ कर और उससे इतर अपने धनके अनुसार और विपत्तिकै समय मित्रके समान दूसरा कर भीर निर्धन भृत्य राजाले अन्न वस्त्रको सहायक नहीं होता, तुच्छ मनुष्यका भी ही ग्रहण करै अन्यथा न करें ।। ९२ ॥ अपमान महान् परके लिये होता है ॥८६॥ यतोमुक्तंसुखंसम्यक्तदुःखैदुःखितोनचेत् । दानमा सत्यशीयमूदुताहिसुहत्करम् । विनिदतिकृतवस्तुस्वाभीभृत्योन्यएव।। ९३ सर्वानापदिरहसिममाहूयलवून्गुरून् ॥ ८७ ॥ जिससे भली प्रकार सुख भोगा हो उसके... दान, मान, सत्य, शूरता, मृदुता, (कोमल दुःसीसे दुःखी न हो तो उसको स्वामी वा पना) मित्रका कार्य इन सपको आपत्तिकै स. अन्य भृत्य यह निन्दा करते है कि यह मय सप रघु गुरु (छोट बटे) को ५८७ ॥ कृतन है ॥ ९३ ।। भ्रातृन्बंधूश्चभृत्यांश्चक्षातन्सिभ्यान्पृथक्पृयक्। सकृत्सुभुक्तंयस्यापितदर्थजीवितंत्यजेत् । ययाईपूज्यविनतस्वाभीष्टंयाचन्नृपः ।। भृत्यासएक्सुलोकोनापत्तास्यामि त्यजेत्९८. और भाई, यन्धुभृत्य, ज्ञादि: सभासद इन जिसका एक बार भी खाया हो उसके सबको यथायोग्य पृथक् पूजा कर नम्रलिये भी जीवित (माण) को त्याग दे वहीं हुआ राजा अपने अभीष्ट्र (मनोरथ) को भृत्य प्रशंसाके योग्य होता है जो आपत्तिके याचना करें॥८॥ समय स्वामीकोन त्यांग ॥ ९४!
[अध्याय ( १९०) शुक्रनीति। हुआ।। ९५॥ स्वामीसएपविज्ञेयोभृत्यायनीविंवत्यजेत् । अन्यथा छल करना बढोंक भी शीलको नष्ट नरामसदृशोराजापृथिव्यांनीतिमानभूत् ॥९५ करता है और वृद्धिमान् मनुष्योंको भी श्रेणी और स्वामी भी वही जानना जो प्रत्यके (बहुत ) होती है एक ही मनुष्य बुद्धिमान, लिये जोवितको त्याग दे, रामचन्द्र के समान नहीं होता ॥ १३०१ ।। कोई भी राजा पृथिवीमें नीतिवाला नही देशेकालेचपुरुषेनीतियुक्तिमनेकधाम् । कल्पयांतचतद्विद्यादृष्ट्वारुद्धांतुमाक्तनाम्॥२॥ सुभृत्यतातुयन्नीत्यावानरैरापिस्वीकृता । उस बुद्धिके ज्ञाता देश और कालके मनुः अपिराष्ट्रविनाशायचोराणामेकचित्तता ॥ ९६ सार अनेक प्रकारको उन नीति और युक्तिमा और उनकी श्रेष्ठ भृत्यता भी नीतिसे वान- को देख कर कल्पना कर लेते है जो पुरानी रोने स्वीकार की जय देशके नष्ट करनेके लिये हैं परन्तु छिपी हैं ॥ १३०२ ॥ चोरीका भी एक चित्त हो जाता है तो ॥९६॥ मत्रौपविपृथग्वेपकालवागर्थसंश्रयात् । शक्ताभवेन्नकिशनाशायनृपभृत्ययोः । छद्मजनयंतीहतविद्याकुशलाजनाः ॥ ३ ॥ नकुटनीतिरभवत्श्रीकृष्णसदृशोनृपः ॥९७॥ छलकी विद्यामें कुशल जन मन्त्र, औषधा क्या स्वामी और भृत्यकी एकता के पृथक् वेष, काल, वाणी अर्थ इनके माश्रयसे नाशार्थ न होगी और फूट (झठी) नीति- छलको पैदा कर देते हैं ॥ ३ ॥ वाला राजा श्रीकृष्णचन्द्र के समान कोई नहीं लोकोऽधिकारीप्रत्यक्षविक्रतिदत्तमेवया । हुआ ॥ ९७॥ वबभांडादिकंकात स्वचितरंकयेच्चिरम् ॥४॥ अर्जुनात्याहितास्वस्यसुभद्राभगिनाउलान् । जगतमें जो जिसका अधिकारी है यह नीतिमतांतुसायुक्तिहिस्वश्रेयसैखिला ९८ अपने येचे और दिये बस पदार्थको भांद आदि अपनी यहिन भी सुभद्रा जिन्होंने छलसे सपके सामने अपने नामके चिद्रांड अंकित अर्जुनको विवाद दी नीतिमान् गजाओंकी कर दे॥४॥ जो युक्ति है यही सप भपने कल्याण के लिये स्तेनकूटनिवृत्पर्यराजज्ञानसमाचरेत् । होती है ॥२८॥ नामसंगोपनयुक्तिचिन्तयेत्सपशोडः । जडांधवालद्रव्याणांदद्यावृद्धिनृपःसदा ॥५॥ चोरीके और छक्के पदार्य जैसे प्रतीत न जारगंगोपनेउद्मसंश्रयातीययोऽपिच ॥९९ ॥ हो उस प्रकार राजाको भी ज्ञात करा दे और जो मनुष्य अपनी रक्षाको पुक्तिको नजट मन्ध याल इनके जो दम्य उनको सदेय विचारे यह जड़ और पशुम्री भी जार वृद्धि ( साज)को राजा दे ॥५॥ मनुष्य के छिपाने में घर परती ॥ १९॥ स्वीपातयाचसामान्यापरकीयातुनीयया । युक्तिउटात्मिकामापस्तयान्यापोजनारिमा विवियोभृतास्तदुत्तमोमध्यमोऽधमः ॥६॥ पद्मचारिमार्तितेनच्छमप्समाचरेद१३०० जैसी भपनी पराई और सामान्य ये तीन मोर युक्ति प्रापः सप सप होती कारणी म्रो होती इसी प्रकार उनममायम मर्ग पुनियोजन (मिराप) पहोती मधमरूप तीन प्रकारका भाप होता ॥६॥ नो मनपर कर उस संग माप भी स्वामिन्येवानुग्क्तोपोभृतास्तूत्तम स्मृतः । एसपी॥१३०॥ अन्ययागीटनागापमहतामपिजापने । मेरपुरभातेदमकरंगवमध्यमः ॥ ७ ॥ जो भार मपन म्यामी मंडी मीतिशादी गद उनम पदारजो उमी मग अनादिमनभिगिनकोयुद्धिमानतः ।।
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भाषाटीकासाहत ।
(१९१)
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कर जो अधिक भृति ( नोकरी ) दे वह प्रवृतिच्छिद्रहतानिकार्यसप्तबुधाजगुः ।
मध्यम होता है॥ ७ ॥
यथाछिद्रभवेत्कायतयवहसमाचरेत् ॥ १४ ॥ .
पुष्टोपिस्वामिनाऽव्यक्तंभजतेन्यसाधमः।
ये सब प्रवृत्तिके छिद्र में हेतु पंडित जनोंने
उपकरोत्यपकृतोत्तमोप्यन्ययाधमः ॥ ८॥ कहे हैं इस जगत कामको उसी प्रकार
जो अपने स्वामीने पुष्टमी किया हो तोभी कर जैत उसम कोई छिद्र न हो ॥ १४ ॥
छिपकर दूसरेकी सेवा कर वह अधम होता अविसंवादिविद्भिःकालेतीतपिचापदि ।
है और जो तिरस्कार करने परी उपकार दशग्रामीशतानीकौपरिचारकसंयुतौ १५ ॥
कर वह उत्तम और अन्य अधम होता है ॥८॥
और सत्यवादी विद्धानोने कळा चोतनेपर
मध्यमःसाम्यमन्विच्छेदपरः स्वार्थतत्परः। आपत्ति के समयमें पूर्वोक्त छिद्रका न होना
नोपदेशविनासम्यक्प्रमाणैज्ञायतेखिलम् ।। कहा है दशग्रामोका स्वामी और सी निको
जो अपनी समानताको चाहे वह मध्यम का सेनापति ये दोनों अपने सेषकों स.
और जो अपने स्वार्थम तर हो वह अधम मेत ॥ १५ ॥
होता है और उपदेशक विमा किती प्रमाणसे अस्वस्थौविचरेयातांग्रामपाद्यपिचाश्वगाः।
भी सबका ज्ञान नही होता ॥ ९ ॥ साहस्रिकाशतग्रामीएकाश्वरथवाहनो १६ ॥
वाल्यवाप्यथतारुण्यं प्रारंभिंतसमाप्तिदम् । अस्वस्थ ( व्याकुल ) हुए और ग्रामक
प्रायोबुद्धिमताज्ञेयंनवार्धक्यंकदाचन ॥१०॥ पति ( चौधरी) और असवार नित्य विचार
घालपन अथवा वृद्धपन ये दोनों प्रारंभ कर सदन मनुष्य और सौ ग्रामोंका स्वामी
किये कामकी समाप्तिके होनेसे बुद्धिमान सहस्रनामपोनित्यंनरश्चद्यश्चयानगः ।।
एक घोडके यान में बैठकर चले ॥१६॥
मनुष्यके जानने योग्य होते हैं और वृद्धता)
कदाचित्भी नही होती॥ १० ॥ आयुतिकोविंशतिभिःसेवकहस्तिनावजेत् १७॥
आरंभंतस्यकुद्धियत्समाप्तिसुखंत्रजेत् । . वहन ग्रामोका स्वामी नरयान (पालकी)
नारंभोवहुकार्याणामकदेवसुखावहः ॥११॥ वा अन्ययानमें बैठकर, और दश सहस्र सेना-
उसी कामका प्रारंभ करे जिसकी सुखले चटकर गमन करे ॥ १७ ॥
ओका स्वामी चीस सेवकों समेत हाथीपर
समाप्ति हो जाय एकवारही बहुतसे कार्मोका
प्रारंभ सुखदायी नही होता ॥ ११ ॥
अयुतग्रामपः सर्वयानैश्चचतुरश्वगः ॥
नारभितसमातितुविनाचान्यसमाचरेत् ।
पंचायुतीसेनपोपिसंचोद्वहुसेवकः ॥ १८ ॥
दश सहस्रनामोका स्वामी चारघोडोंके सर
संपाद्यतेनपूर्वहिनापरलभ्यतेयतः ॥ १२ ॥
यानों में बठकर गमन कर और पचास सहर
प्रारभ किये हुए कार्योकी समाप्तिके विना सेनाओंका स्वामीभी बहुतसे सेवकों सहित
अन्य कामको न करें क्योंकि यदि प्रयमही विच १८॥
काम न हुआ तो दूसरा भी न होगा ॥ १२॥
कृतीतकुरुतेनियंपसमातिप्रजेत्सुखम् ।
ययाधिकाधिपत्यंतुवीक्ष्याधियंप्रकल्पयेत् ।
ईर्ष्यालोमोमदःप्रीतिःकोषोभीतिश्चसाहसम् ॥
कल्पयेचषयाधिक्यवानपुगुणिप्वापे १९॥
जितना अधिक अधिपति ( स्वामी)दो उस
शक्तिके अनुसार प्रारंभ किय कामको नित्य को देखकर ही यान आदिकी अधिकताको
करें जिससे उसकी सुखते समाप्ति हो ईन्यो करे इसी प्रकार धनी और गुणवानाम भी
लोभ, मद, प्रीति, क्रोध, भीति, और धन गुगकी अधिकता देखकर यान आदिको
साहस।। १३॥
अधिफवा करें ॥ १९॥
(१९२) शुक्रनीति । । अन्याय-४. श्रेष्ठोनमानहीनःस्यान्न्यूनोमानाधिकोपिन । दिन व्यवहार न करें, और सेनाके मनुष्यों राष्ट्रनित्यंप्रकुर्वीतश्रेयो नृपतिस्तथा ॥२०॥ को शूरवीरता बढानेवाले धर्मको नित्य श्रवण श्रेष्ठ जन मानले दीन और न्यून ( छोटा) करवावै ॥२५॥ जन अधिक मानवाला न हो यह रीति अपने सुवाचनृत्यगीतानिशौर्यद्धिकराण्यपि । राज्यमें कल्याणका अभिलापी राजा कर २०॥ युद्धक्रियांविनाशौर्ययोजयेन्नान्यकर्मणि २६ हीनमध्योत्तमानांतुग्रामभूमिप्रकल्पयेत् । श्रेष्ठ वाजे, नृत्य, गीत इनकोभी ऐसीकोही कुटुंनिनांग्रहार्यतुपत्तनेपिनृपः सदा ॥ २१॥ सुनावे जिनसे शुरवीरताको वृद्धि हो ओन जो गाममें हीन मध्यम उत्तम हो उनके युद्ध के काम विना शूरवीरको किसी अ लिये ग्राममें कुछ भूमि नियत कर और कुटुं- काममें न लगावे ॥ २६ ॥ वियों के वरके लिय तो राजा सदैव पत्तन सत्याचारास्तुधानकाव्यवहारेहतायदि । (शहर) ऐसी भूमिको नियत कर ॥ २१ ॥ राजासमुद्धरेत्तांस्तुतथान्यांश्चकृषीवलान् ॥२५ द्वात्रिंशत्मामतेईस्तैदीर्वार्धा विस्तृताधमा । जो सत्य माचरण करनेवाले धनवान व्यव उत्तमादिगुणामध्यासार्धमानाययातः २२॥ हारमे विगडगये हो उनका और अन्य वैसेही जो बत्तीस हाथ लंबी और खोलह हाथ किसानोका राजा उद्धार करे अर्थात धन देकर चौडी हो वही टत्तम कही है और उससे उनकी सहायता करें ॥ २७ ॥ प्रमाणकी जो दो यह यथायोग्य मध्यम और येसैन्यवनिकास्तेभ्योययाहीभृतिमावहेत् । अधम होती है॥२७॥ सारदेश्यंचत्रिंशांशमधिकंतद्धनव्ययात् ॥२८ कुटुंबसंस्थितिसमानन्यूनानाधिकापिन । जो सेनाके मनुष्य धनवान हो उनसे पधा ग्रामावहिवसेयुस्तेयेयेत्वविकृतानृपः २३ ।। योग्य भृति ले, जो परदेशी हो उनसे तीसव वह भूमि फुटुंपकी स्पितिक सम (वर) भाग वा अधिक धनके व्यय (राचा ) के अनु हो, न उससे न्पून हो और न कमही, जिन सार ले ॥ २८!! जिनको राजाने अधिकार दिया हो ये धनसंरक्षयेत्तेपांयत्नवा स्वात्मकोशवत् । ग्रामसे याहिर च ॥ २३॥ संहरेदनिकासमिथ्याचाराधनंनृप. ॥१९॥ नृपकाविनाकश्चिन्नमासनिकोविशेत् । और उनकै धनी अपने कोशक धमा तयानपीठयेत्कुत्रकदापियामवामिनः ॥२४॥ पटे यत्न रक्षा करें और जो धनवान् मनुः रानाके फाय पिना कोईभी सनिक ग्राम मिश्याचारी दो राजा उसके सब धन मन ,और तिसी प्रकार किसीभी ग्राम दरले ॥ २९॥ वासीको पीटा (दुपा) नदे॥ २४ ॥ मूलाचतुर्गुणावृदिगृहीताधनिनच । सनिकर्नव्यवहरेनित्यंप्राम्पजनोपिच । अधमणीन्नदातन्यचनिनेनुयनंतदा ॥ ३० श्रावयेत्तनिफनित्यधर्मगायधिर्धनम २५॥ो अपेक्षा चौगुनी गृति (व्यान) टेली । जर धनवान् मनुप्यने अधमणमे मुलधन सौर ग्रामरे जनमी सैनिको मग प्रतितो यधनीको फुटभी धननद॥ १३३० इति शुक्रनीति ममाता ।