Sanmati Library, Jaipur
Shrividyamanvinshatitirthankarpooja
Front matter
Printer-Shreelal Jain.
Jain Sidhant Prakashak Press
9. Bishwakosh Lane, Bagh Bazar,
CALCUTTA
publisher Nemichand Vaholastal
230 Upper circular Rond Calcnttn.
प्रकाशकके दो शब्द। विदित हो कि जयपुर निवासी श्रीयुत पडित इवलालजी शास्त्रीने हमको इस पूजाके वावत लिखा कि स्वर्गीय फविवर पं० थानसिंहजी अजमेरा टोकनिवासी हालमें एक बडे अच्छे कवि हो गये हैं, उन्होंने बीस विहर मान तीर्थकरोंकी पूजा सिद्धक्षेत्रपूजा वगेरह बहुत ही उत्तम कबिता की है । आप यदि प्रकाशित करें तो जेनीभाइयोंको बटालाभ होगा। इसीपकार जयपुर निवासी श्रीयुत रामचंद्रनीसिंदूकाने भी हमको इसके प्रका. पित कर देने का बहुत आग्रह किया और लिखा कि कविवरके सुपुत्रसे हमने पानेकी आमा ले ली, है, दो प्रति हस्तलिखित भेजी तथा एकप्रति शुद्धकी हुई प्रेसकापी इंद्रलालजी शास्त्रीने संपादन करके भेजी । हमने इस पूजाविधानका मायोपात पाठ किया तो हमको बहुत ही आनंद हुवा इसकी कविता अर्थगंभीरता पदलालित्य कविवर वृन्दावनजी व मनरंगलालजी आदिसे भी बढिगा लगा और कथन भी अनेक प्रकारके छंद और राग रागनियों में भक्तिरसपूर्ण अनेक विषयोंकी विक्षिा देनेवाला पाया तब हमने सर्वसाधारणके हितार्थ इसको पकाशित किया है। इस पूजाविधानमें अनेक शब्द अप्रसिद्ध हैं जिनपर टिप्पणी करनेकी जरूरत थी परंतु दशलक्षणपर्वसे पहिले ही मुद्रित होकर सपके हाथमें पहुचा देनेकी आवश्यक्ता और शीघ्रता होनेसे टिप्पणी नहिं करसके यह त्रुटि दूसरी आवृत्तिमें दूर की जायगी। मिती मारव। यदि १ सोमबार जैनीभाइयोंका हितपी दास वीरनिर्माण संवत् २४४३ ॥ नेमिचद वाकलीवाल।
'पूजावोंकी सूची। ५ १.३ १११ १२१ १३० १४० २८ १ अष्टोत्तरशत-1मावलीन्तुति २ समुचय-वीपतीर्थंकरपूजा ३ सीमंधरजिनपूमा ४ युगमंधाजिनपूजा ५ वाहुजिनपूजा ६ सुवाजिनपूमा ७ संजातक जिन पूजा . स्वयंप्रभुजिन पूजा ६ ऋषभानन जि-पूजा १० अनंवीयजिनपूना ११ मूरप्रभुनिनपूजा १२ विशाल कीर्तिजिन पूजा पृष्ठ १ १३ वज्रधर जिनपूजा १४ चंद्राननजिनपूजा १३ १५ चंद्रवाहुजिनपूना २१ १६ भुजंगमजिनपूजा १७ ईश्वरनिनपूजा ३६ १८ नेपिप्रभुजिनपूना १९ वीरसेनजिगपूजा ५२ २० महाभद्रजिनपूजा ६१ २१ देवयशजिनपूना ६७ २२ अजितवीर्यजिन पूजा ७६ २३ ग्रंथकर्ता परिचय ८३ इति सूची . १४८ ४४ १५८ १७४ १८७ ॐ श्रीवीतरागाय नमः। स्वर्गीय कविवर थानमलजी अजमेरा विराचित। विदेहक्षेत्रस्थ- SRH कम होम्याला. संगी मोतीलाल मास्टर विंशतिविद्यमानतीर्थकरपूजा REAL टोहा। सकल सुखाकर सकल पर, सकल संकलजगनैन । सीमंधर आदिक सकलै, वीस ईश सुखदैन ॥१॥ विहरत अवनि विदेह जहँ, मुनिजन होत विदेहँ । मैं स्वदेह पावन करन, नमूं नमू धरि नेह ॥२॥ १ शरीरसहित २ सर ३ पृथ्वी ४ शरीररहित । ना १ पूजा वि.ती PRESS SASARAL-SCIENCE छंद चंडी। (१६ मात्रा) जय जगीश वागीश नमामी, आदि ईश शिव ईश नमामी। परम ज्योति परमेश नमामी, सेवत शतक सुरेश नमामी ॥३॥ ब्रह्मा विष्णु महेश नमामी, ज्ञानदिनेश गनेश नमामी । वीतराग सर्वज्ञ नमामी, करुणावंत कृतज्ञ नमामी ॥४॥ सृष्टि इष्ट उत्कृष्ट नमामी, गुनगरिष्ठे वच मिष्ट नमामी। निराकार साकार नमामी, निर्विकार भवपार नमामी॥५॥ निर आमय निकलंक नमामी, जय निरभय चिदअंक नमामी। ज्ञानगम्य अतिरम्यै नमामी, स्वयं निकल निर्मोह नमामी॥६॥ विघ्नहारि त्रिपुरारि नमामी, गुन अपार जितमार नमामी। निर्विकल्प निर्द्वद नमामी, जय नाशनभवकंद नमामी ॥७॥ PRESS REE १ सौ २ गुणोंमें अत्यन्त वठे ३ बहुत मनोहर ।
वि ती पूना अक्षांतीत यतीश नमामी, वीतशोक जितभीत नमामी। शाश्वत सुखित सुवेशनमामी, अघहन वृषेचक्रेश नमामी॥८॥ अव्यावाध अछेद नमामी, जय निर्मल निर्वेद नमामी। स्वयंबुद्ध अविरुद्ध नमामी, सदा शुद्ध जितक्रोध नमामी ॥९॥ सुख अनंत भरपूर नमामी, जयो जगतदुखचूर नमामी। असम-शक्ति अव्यक्त नमामी, मुक्ति-रमनि-संसक्त नमामी।१०। रहित-आदि-मध्यांत नमामी, भव-दवाग्नि उपशांत नमामी । हरन अविद्या-वांत नमामी, अनेकांन एकांत नमामी ॥११॥ जितविस्मय निश्चित नमामी, सूक्ष्म अमन निःसंग नमामी। सदाप्रकाश विव्यक्त नमामी, धीश्वर केवलव्यक्त नमामी। १२॥ श्रीधर श्रीविमलाभ नमामी, चतुरानन वरभाग नमामी। ३ १ अतीन्द्रिग ३ धर्मचको स्वामी।
विती पूजा कृष्ण-पुंडरीकाक्ष नमामी, विश्वभर पुरुदेव नमामी ॥१३॥- जगतजीव हितहेत नमामी, कमलासन वृषकेत नमामी। ज्ञानईश ध्यानेश नमामी,जोगईश भोगेश नमामी ॥ १० ॥ धाम तीन जगशीस नमामी, अचलपानचतुईश नमामी। जय अनंत भगवंत नमामी, सुख अनुपम विलसंत नमामी॥१५॥ जगदाधार अपार नमामी, तत्त्व-भेद-विस्तार नमामी। अशरन शरन सुसंत नमामी, जगमहंत अरहंत नमामी ॥१६॥ अनुपमरूप अरूप नमामी, तत्त्वभूप चिद्रूप नमामी। इम शुचिनाम अनंत तिहारे, तन मन पावन होत उचारे ॥१५॥ इति अष्टोत्तरशत १०८ नामानि पठित्वा जिनप्रतिमागे पुष्पांजलिं क्षिपेत् । . - 20 वि.ती पूजा अथ समुच्चय विंशतिजिनपूजा। दोहा । दायक यश जय सुमति सुग, सुख दुतिरूप अपार । घायक विधि घायकनिके, लायक जग उद्धार ॥१॥ सीमंधर आदिक सकल, वियद बाहु मित छैन । आह्वानन त्रिविधा करूं, इत तिष्ठहु सुख दैनं ॥२॥ मों ही श्री सीमंधरादिभजितवीर्यार्यतविदेहक्षेत्रस्थितवर्तमानविंशतिजिनंद्राः ! अत्र अवतरत अवतरत । संवौषट् । ओं ह्रीं श्री सीमंघरायजितवीर्यपर्यन विदेहक्षेत्रस्थितवर्तमानविंशतिजिनेंद्राः ! अत्र तिष्ठत तिष्ठत | 3:31 ओं ही श्री सीमंधरायजितवीर्यपर्यंतविदेहक्षेत्रस्थितवर्तमानविंशतिजिनेंद्राः ! अब मम सन्निहिताः भवत भवत । वपट ।
अथ अष्टका मचिराए। पूजा थिनी शीतल सलिल अमल तृटहारक, लेय सुधासम भुंगभरं । ज़िनपति चरन अग्र त्रय धारा, धरूं तापत्रय नाशकरं । जय कमलासन सुंदरशासन, भासन नभद्वय बोधवरं । श्रीधर श्री सीमधर आदिक, यजूं वीस जिन श्रेयकरं ॥१॥ गों श्री श्री सीमंधरादिकविदेहक्षेत्रस्थवर्तमानविंशतिजिनेन्द्रेभ्यो जलं निर्वपामीति साहा॥ मलय पटीर घसित वरकुंकुम, शीतलगंध सुरंग भरयो। सारसवरन चरन तव धारत, आकुल दाह अपार हरयो। जय कमलासन सुंदरशासन, भासन नभद्रय बोधवरं । श्रीधर श्री सीमंधर आदिक, यजू वीसजिन श्रेयकरं ॥२॥ ओं श्री श्री सीपंधरादिकविदेहक्षेत्रस्थवर्तपारशितिनिद्रेभ्यो चंदनं नि० स्वाहा ॥२॥ जीरक श्याम सुगंधित तंदुल, श्वेतवरन वर अनियारे । लहि अक्षत अक्षयपद पावन, धरूं पुंज दंग मन हारे । वो विती पूजा जय कमलासन सुंदरशासन, भासन नभद्वय बोधवरं । श्रीधर श्री सीमधर आदिक, यजूं वीस जिन श्रेयकरं ॥३॥ ओं ही श्री सीमंधरादिकविदेहक्षेत्रस्थवर्तमानविंशतिजिनद्रेभ्यो अक्षतान् नि० स्वाहा ॥३॥ केतकि कंज गुलाब जुही वर, सुमन सुवासित मनहारी। धारत चरन लहें समतासर, नशे मदनसर दुखकारी ॥ जय कमलासन सुंदरशासन भासन नभद्वय बोधवरं । श्रीधर श्री सीमंधर आदिक, यजूं वीसजिन श्रेयकरं ॥४॥ ओं ही श्री सीमंघरादिकविदेहक्षेत्रस्थवर्तमानविंशतिजिनेंद्रेभ्यो पुष्पम् नि० स्वाहा ॥४॥ विजन विविध छहों रस पूरित, सद्य सुसुंदर बलकारी। श्रीपति चरन चढाऊ चरु वर, निजबल दायक क्षुतहारी॥ जय कमलासन सुंदरशासन, भासन नभद्रय बोधवरं । श्रीधर श्री सामंधर आदिक, यजूं वीस जिन श्रेयकरं ॥५॥ भों ही श्री सीमेधरादिकविदेहक्षेत्रस्थवर्तमानविंशतिजिनेंद्रेभ्यो नैवेद्यं नि स्वाहा ॥५॥ ७ FRE उन Lanega पूजा विती TEASPRILS प्रजलित ज्योति कपूर मनोहर, अथवा पूरित स्नेह वरं। करत आरती हरि भव आरति, निजगुन जोति प्रकाशकरं ।। जय कमलासन सुंदरशासन, भासन नभदय बोधवरं । श्रीधर श्री सीमंधर आदिक, यजू वीस जिन श्रेयकरं ॥६॥ ओं ही श्री सीमंधरादिकविदेहक्षेत्रस्थविंशतिजिनेन्द्रेभ्यो दीपं नि० स्वाहा ॥ ६ ॥ चूरित अगर पटीरादिक वर, गंध हुताशन संग धरूं। खेऊ धूप जगेशचरन ढिग, चाहत हूं विधि नाश करूं ॥ जय कमलासन सुंदरशासन, भासन नभदय बोधवरं । श्रीधर श्री सीमंधर आदिक, यजूं वीस जिन श्रेयकरं ॥७॥ ओं ही श्री सीमंधरादिकविदेहक्षेत्रस्थवर्तमानविंशतिनिनेंद्रेभ्यो धूपं नि० स्वाहा ॥७॥ फल दाडिम एला पिकवल्लभ, खारिक आदिक मिष्ट भले। लेकर चरन चढावत जिनके, पावत हैं फल मोक्ष रले ॥ १ कविबल्लम पाठ भी है। पिकबालभ-आम और कविवल्लभ-केला होता है।
विती
पूजा
जय कमलासन सुंदरशासन, भासन नभद्वय बोधवरं ।।
श्रीधर श्री सीमंधर आदिक, यजूं वीसजिन श्रेषकरं ॥८॥
ओं ह्रीं श्री सीमधरादिकविदेहक्षेत्रस्थवर्तमानविंशतिजिनेंद्रेभ्यो फलं नि० साहा ॥ ८ ॥
जल चंदन अक्षत मनसिजशर, चरु दीपक वर धूप फलं ।
भवगदनाशन श्रीपतिके पद, वारत हूं करि अर्घभलं ॥
जय कमलासन सुंदरशासन, भासन नभद्वय बोधवरं ।
श्रीधर श्री सीमंधर आदिक, यजूं वीस जिन श्रेषकरं ॥९॥
ओं ह्रीं श्री सीमंधरादिकविदेहक्षेत्रस्थवर्तमानविंशतिजिनेंद्रेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥
जयमाला।
दाहा।
दीप अर्द्ध द्वय मेरु पन, मेरु मेरु प्रति व्यार ।
विहरत विभव अनंतयुत, अवनि विदेह मझार ॥१॥
50 चंडी छंद । (मात्रा १६) विती । सीमंधर सुखसीम सुहाये, युगमंधर युग वृष प्रकटाये । बाहु बाहुबल मोह विदाग्यो, जिन सुबाहु मनमथमद मारयो ॥२॥ संजातक निज जाति पिछानी, स्वयंप्रभू प्रभुता निज ठानी। ऋषभानन ऋषिधर्म प्रकाशन, वीर्य अनंत कर्मरिपु नाशन ॥३॥ सूरप्रभू निजभा परिपूरन, प्रभु विशाल त्रिकशल्य विचूरन । देव वज्रधर भ्रमगिरि भंजन, चंद्रानन जगजन मनरंजन ॥४॥ चंद्रबाहु भवताप निवारी, ईश भुजंगम-धुनि-मनि धारी। ईश्वर शिवगवरी दुख भंजन, नेमिप्रभू वृषनेमि निरंजन ॥५॥ वीरसेन विधि-अरि-जय वीरं, महाभद्र नाशक भव-पीरं । देव देव यशको यश गावै, अजितवीर्य शिवरमनि सुहावै ॥६॥ ये अनादि विधि बंधनमाही, लब्धियोग निज निधि लखि पाई। सम्यक बलकार अरि चकचूरन, क्रमतें भये परम दुति पूरन ॥७॥ eS पूजा वि.ती/ ११ अंतरीक आसन पर सोहै, परम विभूति प्रकाशित जो है। चौसठि चमर छत्रत्रय राजै, कोटि.दिवाकर दुति लखि लाजै॥८॥ जय दुंदुभि धुनि होत सुहानी, दिव्यधनि जग-जन दुखहानी । तरु अशोक जनशोक नशावै, भामंडल भव सात दिखावै ॥९॥ हर्षित सुमन सुमन वरसावै, सुमन अंगना सुगुन सु गावै। नव-रस-पूरन चतुरंग भीनी, लत भक्तिवश तान नवीनी ॥ १०॥ बजत तार तननननन नननन, घुघरू धमक झुनननन झुननन । धीधी धृकटचकट द्रम द्रम द्रम, धनत मुरज पुरु ताल तरलसम ॥१२॥ ता थेई थेई घेई चरन चलावै, कटिकर मोरि भाव दरसावै । मानथंभ मानीमद खंडन, जिन-प्रतिमा-युत पापविहंडन ॥१२॥ शालचतुक गोपुर-युत सोहै, सजल खातिका जनमन मोहै। दिजंगन कोक मयूर मरालं, शुक-कलरव रव होत रसालं ॥ १३ ॥ १२ RECH १ पक्षी। मामाक-नकवा। FR वि ती पूजा १२ पूरित सुमन सुमनकी बारी, बन-बंगला गिरवर छविधारी। तूप ध्वजा गन पंक्ति विराजै, तोरन नवनिधि द्वार सु छाजै ॥१४॥ इत्यादिक रचना बहुतेरी, द्वादश सभा लसत चहुं फेरी। गनधर कहत पार नहिं पावै, "थान" निहारतही बनि आवै ।।१५|| श्रीप्रभुके इच्छा न लगारं, भविजन भाग्य उदय सु विहारं । ये रचना में प्रकट लखाऊं, या हित हरषि हरषि गुन गाऊं ॥१६॥ छंद घत्ता। यह जिन गुनसारं करत उचारं, हरत विकारं अघमारं। जय यश दातारं बुधि-विस्तार, करत अपारं सुखसारं ॥ १७॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थ वर्तमानविंशतितीर्थकरेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अडिल्ल छंद। जो भविजन जिन विश यजै शुभ भाव । करै सुगुनगनगान भक्ति धरि चावलूँ ॥ -- ૧૨ वि.ती पूजा १३ लहै सकल संपति अर वरमति विस्तरै । सुर नर पद वर पाय मुक्ति रमनी वरै ॥ १॥ इति आशीर्वादः। इति समुच्चयविंशतिविद्यमामजिनपूजा समाप्ता ॥ १ ॥ , अथ विदेहक्षेत्रस्थितजिनप्रत्येकपूजा तत्रादौ- श्रीसीमंधरजिनपूजा। *21-15-"tex-nya दोहा। 2- FOR-E- करि निजध्यान प्रचंडवल, जये कर्म अरि चंड। चिदगुन ज्योति अखंडमें, गिले गगन द्वय खंड ॥१॥ सो सीमंधर देव वर, दीनबंधु खामेव । करि करुणा मुझ दीनपे, तिष्ठ तिष्ठ इत देव ॥२॥ १३ বুঝা वि ती ४ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्यवर्तमानसीमंघरपरमदेव ! अत्र अवतर अवतर । संनौषट् । ओं ही विदेहक्षेत्रस्थवर्तमानसीमंधरपरमदेव ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः। ओं ही विदेहक्षेत्रस्थवर्तपानसीमंधरपरमदेव ! अत्र मम सनिहिती भव भव । वषट् । अथ अष्टक। लीलावती छंद। पय कमलसुवासित तृष्णानाशित, हिमगिरि समसित तापहरा । भरकरि वर झारी भ्रमतप-हारी, धारतहूं त्रय धार धरा॥ जय जय सीमंधर यजत पुरंदर, धर्मधराधर धरनीशं । अघगनकर चूरन हे सुख पूरन, गुनपूरन शिवतरुनीशं ॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थसीमंधरजिनेंद्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ कसमीर सुरंगी घसि हरिसंगी, परिमल अंगी तापहरी। प्रभुचरन चढावत सुख सरसावत, जावत भव आताप टरी॥ १४ १ समस्त । R पूजा वि.ती RECHER -%ERGAR १५ % जय जय सीमंधर यजत पुरंदर, धर्मधराधर धरनीशं । अघगन कर चूरन हे सुखपूरन, गुनपूरन शिवतरुनीशं ॥३॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थसीमंधरजिनदाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥ २ ॥ तंदुल शुभ सुंदर श्वेत सुमनहर, पावन दधिसुतदुतिहारी। हे जिन करुणान्वित अक्षयपदहित, यजूंचरन तव भरिथारी॥ जय जय सीमंधर यजत पुरंदर, धर्मधराधर धरनीशं । अघगन कर चूरन हे सुखपूरन, गुनपूरन शिवतरुनीशं ॥३॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थवर्नमानसीमंधरजिनेंद्राय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ सुमन सु मनहर विविधवरनपर, कुंद गुलाब जु आदि वरं। लहिकर जिनपदवर पूजत सुखभर, संवरअरिसर नाश करं ॥ जय जय सीमंधर यजतपुरंदर, धर्मधराधर धरनीशं । अघगन कर चूरन हे सुखपूरन, गुनपूरन शिवतरुनीशं ॥५॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थसीमंधरजिनेंद्राय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ RECER १५ लन वि.ती पूजा . मोदक बलकारन क्षुधानिवारन, हगमनहारन मिष्ट बने । निजगुणबलधारन ले सुखसारन, पूजूं जिनपद इष्ट घने ।। जय जय सीमंधर यजत पुरंदर, धर्मधराधर धरनीशं। अधगन करि चूरन हे सुखपूरन, गुनपूरन शिवतरुनीशं ॥५॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थसीमंधरजिनेंद्राय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ तमपटल विनाशन ज्योतिप्रकाशन, दीपक दिव्य उजास करूं। भ्रपतिमिरविनाशन प्रभु जगपावन, पांवन ऊपरि वार धरूं। जय जय सीमंधर यजत पुरंदर, धर्मधराधर धरनीशं । अघगन करि चूरन हे सुखपूरन, गुनपूरन शिवतरुनीशं॥६॥ ओं ही विदेवक्षेत्रस्थसीमंधरजिनेंद्राय दीपं निर्वामीति साहा ॥ ६ ॥ लहि चंदन वावन चूरन पावन, अगरादिक करि संग भले। खेऊ जिनपदतर ये निजमनधरि, निजगुनहर वसुकर्म जले ॥ जय जय सीमंधर यजत पुरंदर, धर्मधराधर धरनाशं । I पूजा वित्ती १७ अघगन करि चूरन हे सुखपूरन, गुनपूरन शिवतरुनीशं॥७॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थसीमंधरजिनेंद्राय धूप निर्वगामीति स्वाहा ॥७॥ फल प्रासुक सुंदर मिष्ट मनोहर, खारिक लौंग विदाम भले । जिन चरन चढाऊ हर्ष बढाऊं. चाखनकू फल सुगुन रले ॥ जय जय सीमंधर यजत पुरंदर, धर्मधराधर धरनीशं । अघगन करि चूरन हे सुखपूरन, गुनपूरन शिवतरुनीशं ॥८॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यसीमंघरजिनेंद्राय फलं निर्मपामीति स्वाहा ॥८॥ जल हरि अक्षत अरु सुभग सुमन चरु, दीप धूप फल पुंज सजूं । मन आनंद अति धरि अर्घ सु लेकरि, श्रीपतिजूके चरन जजूं॥ जय जय सीमंधर यजत पुरंदर, धर्मधराधर धरनीशं । अघगन करि चूरन हे सुखपूरन, गुनपूरन शिवतरुनीशं ॥९॥ भों ही विदेहक्षेवस्थसीमंधरजिनेंद्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥९॥ 56 ESSORG १७ वि.ती पूजा अथ जयमाला। दोहा। शिव शिवमय शिवकर शिवंद, शिवदायक शिवईश। शिव सेवत शिवमिलन हित, सीमंधर जगदीश ॥१॥ छंद चंडी वा रूपचौपाई। जय जगपति वरगुन वरदायक, केवलसदन मदन मदघायक । पर्म धर्म धर भ्रमपुर वाशन, शासनसिद्ध अचल अचलासन ॥२॥ चखट अघट रस घट घट व्यापक, अनहत आहत सुगुनप्रकाशक । धरत ध्यान दुरगति दुख वारन, जगजल” जगजंतु उधारन ॥३॥ अशरनशरन मरन-भव-भंतन, पंकजवरनचरन मनरंजन । निजसम करत जु मनतुव धारत, ज्यों पावकसँग ईंधन जारत ॥४॥ नृप श्रीहंसतनुज वर आनन, लच्छन वृषभ लप्सत अघभानन । ALNESCRIGIRLS १८ १ कल्याणदायक । २ मुक्तिदायक।
पून -%ER.C वि.ता पुंडरपुर पुर है मन भावन, सो तुम जनमयोग भयो पावन ॥५॥ लियो जनम जगजन दुखनाशन, शिर अमरेश धरत तुव शासन। होत विरक्त देव ऋषि आवन, भयो परम वैराग्य दिढावन ॥६॥ शिवका दिव्य कहार पुरंदर, हो सवार जिन धर्म धुरंधर । संग सकल तजि व्रत धरिपावन, लगे ध्यान मारग शिव जावन ॥७॥ करि वटमार घातियाचूरन, शक्ति अनंत सजी परिपूरन । पूरव जनम भाव वर भावत, ता फल ये अतिशय दरसावत ॥८॥ बिन इच्छा विहार सुखकारन, भव्यनकू भवपार उतारन । यदपि देव तुम दृष्टि अगोचर, तदपि प्रतीति धरत हम निजउर ॥९॥ जानत हूं तुम हो जगजानन, मैं किम दुःख कहूं चतुरानन । दीन बंधु दुख दीन मिटावन, चहिये अपनो विरद निवाहन ॥१०॥ १९ H - विती पूजा २० छन्द हरिगीता। वर वरन भवतपहरन आनन्द भरन दृगमन भावने। युत सुरसपूरति गंध शुभ भविवृन्द अलि ललचावने ॥ सर्वज्ञ आगम विटपके शुचि सुमन वरन रसाल ये । धरि सुमति गुन सह 'थान' उर जगभालकी जयमाल ये ॥११॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थ श्री सीमंधरजिनेंद्राप महाअर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ अडिल्ल छन्द। सीमंधर जिन पूजि कर जो थुति भली दहै सकल अघवृन्द लहै मनकी रली ॥ निर आकुल झै हरै मोह महद्वंदकू टारै भ्रम आताप लखै चितचंदकू ॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीसीमंधरजिनपूजा ॥ २॥ 4 %% २० विन्ती HE पूजा २१ अथ श्रीयुग्मंधरजिनपूजा। स्थापना-दोहा। लसै परमदुतिवंत छवि, लखि लाजै रवि मैन । विगतमोह, मोहित करत, सुर नर मुनिमन नैन ॥१॥ मैं जु दीन तुम दीनपति, यह वानिक स्वयमेव । तिष्ठ तिष्ठ मम हित अबे, भो युगमंधर देव ॥२॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थवर्तमानश्रीयुग्मंघरजिनेंद्र ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । ओंझी विदेहक्षेत्रस्थवर्तमानश्रीयुग्गंधरजिनेंद्र अन तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः । भो । विदेहक्षेत्रस्थवर्तमानयुग्मंधरजिनेंद्र अब मम सनिहितो भव भव । वषट् । अथ अष्टका शुभोदर छंद। शेल सुरोदन निर्गत नीरसमं शुभ पावन । हीरसमं सितशीतल ले तृट ताप नशावन । २१ पूजा वि.नी Siz M र मोह महामल मोचन… त्रयधार धरूं धर । भो युग्मंधर देव धरो शिवथान कृपा कर ॥१॥ ओं की विदेहक्षेत्रस्थयुग्मंधरजिनेंद्राय जल निर्मपामीति स्वहा । ले वर रंगभरी शुचि केसर चन्दन बावन । मेलि घसूं जल संग मिला कदलीसुत पावन ॥ पूजत हूं पदकंज तुही अघताप सबै हर। भो युग्मंधर देव धरो शिवथान कृपाकर ॥२॥ ओं विदेहक्षेत्रस्ययुग्मंधरजिनेंद्राय चंदनं निर्वामीति स्वाहा ॥२॥ श्वेत सुधाकरकी करसे वरगंध अनीयुत । ओघ अखडित अक्षतके शुचि है जल क्षालित ॥ ले वसुमी क्षिति पावनकुं पद पुंज करूं वर। भो युग्मंधर देव धरो शिवथान कृपा कर ॥ ३॥ मोंधी विदेहक्षेत्राणयुग्मंघरजिनेंद्राय अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ २२ ट ba वि.नी/ ૨૨ है गंध भली मंडरात अलीगन है जिनपै जुरि । सो समरायुध म्हेकत है शुचि रंग महा भरि ॥ या हित तोहि चहोढतहूं न परै फिर वा कर । भो युग्मंधर देव धरो शिवथान कृपा कर ॥४॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थयुग्मंघरजिनेंद्राय पुष्पं निर्वधामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ भोगन योग महीपनके रसपूरित हैं षट । चंद्रकला वर घेवर आदि बनाय धरै झट् ॥ सो तुव पाय चढावतहूं करिके क्षुतको उर। भो युगमंधर देव धरो शिवथान कृपा कर ॥५॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थयुगमंघरजिनेंद्राय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ सुंदर दीपक जोति लसै तमवृन्द निवारन । वारत हूं तुमपै करधारि कुज्ञान विदारन ॥ आतमज्ञान अनूप प्रकाश करो हमरे उर।
RECGe वि.ती पूजा । २४ PREDICALSALEGISTRARE भो युगमंधर देव धरो शिवथान कृपा कर ॥६॥ भोंडी निदेहक्षेत्रस्थयुगमधरजिनेंद्राय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।। ६॥ चूरन ले अगरादिक चारु सुगंध महायुत । जारनकू विधिबंध करें हम पावक संयुक्त ॥ जानि सुखाकर तोहि कह्यो शरनों अब आकर । भो युगमंधर देव धरो शिवथान कृपा कर ॥७॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थयुगमंधरजिनेंद्राय धूपं निषेपामीति स्वाहा ॥७॥ दाडिम श्रीफल अंब रसान्वित निंबुक पावन । खारिक चोचक मिष्ट सुगंधभरा मनभावन ॥ मोक्ष महाफल लैन धरे तुमरे पद ल्याकर। भो युगमंधर देव धरो शिवथान कृपा कर ॥८॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थयुग्मंघरजिनेंद्रीय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ८ ॥ नीर सुचंदन चारु लिए वर अक्षत पावन । २४ 24 ES वि.ती पूजा २५ पुष्प सुव्यंजन दीप धरूं वर धूप हुताशन ।। ले फल पुंज अनूप करूं शुचि अर्घ सुखाभर । भो युगमंधर देव धरो शिवथान कृपाकर ॥९॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थयुग्मंधरजिनेंद्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥९॥ अथ जयमाला। दोहा। FRE करै विविध लीला ललित, सुगुनगेह निज भोग। शिवश्यामा संगम भए, गये विरूप वियोग ॥१॥ सुंदरी छद। मैं अनादि रच्यो पररूपमैं, नहि लख्यो निज आतम भूप में । सुन दयाल सहे दुख मैं महा, सब प्रतच्छ दुरै तुमसे कहा ॥२॥ अब कछू वरलब्धि बसायकै, अवनदार गिरा तुव आयकै । उरप्रवेश कियो सुखदायिनी, सकलविभ्रम मोह विथा हनी ॥३॥ R २५ पूजा सहित सो अविधेय विधानतें, मिलत है संबंध कथानतें। वि.ती निज प्रयोजन इष्ट सु तासमै, लसत साधन शक्य सुजासमें ॥४॥ २६ सर्व ज्ञायक भाषित पावनी, है अनादि कृपा सरसावनी। विगतलोकविरुद्धनतें भली, निजप्रतीति स्वयं अनुभौ रली ॥५॥ अलख है जिन ! तू मम नैनतें, लखि तथापि लियो तुव वैनतें। सुनि सुतत्त्व गिनी सरवज्ञता, विगतदूषणते सुविरागता ॥६॥ सुखदवैन प्रतच्छ प्रकाश है, त्रिविध लच्छन आप्त सुवास है। दम दया तप ये सुखदाय है, सब मती इम कहत सुनाय है ॥७॥ जित नहीं यह मूर सुखी नहीं, घर तजो परिपूर सुखी वही । अतुल लच्छि लहै किम तो विना, नरकदायक लच्छि लहै धना ॥८॥ युति विभूति विज्ञान विशेषता, बलअनंत सुशक्ति अशेषता। असमरूप उदार समंकर, अपरदेव नहीं तुमत परं ॥९॥ करन तात सुवृच्छ अनंद हो, सुभग मात सुतारा-नंद हो । २६ वि.ती पूजा लसत है गज लच्छन सोहनो, सुभगरूप त्रिलोकविमोहनो॥१०॥ यह कृपा युगमंधर कीजिए, दरश मोहि प्रतच्छ जु दीजिए। तुम कहावत दीनदयाल हो, करि यही हमरी प्रतिपाल हो।।११ घत्ता छंद। जय जय जगसारं विगतविकारं सुखित अपारं जितमारं। इनि अघ जंजारं सुनहु पुकारं युगमंधर भवभयहारं ॥ १२॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्ययुग्मंधाजिनेंद्राय जयमाला निर्वपामीति स्वाहा ॥ भडिल्ल छंद। युगमंघर• यजत सजत सुखसार है। तजत संग दुर्बुद्धि सु सुमति अपार है । सुरतिय लोचन भ्रमर कंज मुख तासको। होत भवन परिपूर अमल यश जासको ॥१॥ इति पुष्पांजलिं क्षिपेत् । इत्याशीर्वादः । इति युग्मंघरजिनपूजा ॥ ३ ॥ G
पूजा
वि.ती
२८
अथ श्रीबाहुजिनपूजा।
अडिल्ल छंद।
बाहु सुभट जुगभेद बाहुबल बंडतें।
सजि समभाव सनाह ध्यान असिचंडते॥
किये कमरिपु खंड सुतप रनखेतमैं ।
थापत हूं तुहि देव यजनके हेत में।
ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्यश्रीवाकुजिनेंद्र अत्र अवतर अनतर । संवौषट् ।
गों | विदेहवोत्रस्थश्रीवाहुजिनेंद्र मन्त्र तिष्ठ तिष्ठ । 3. ठः ।
ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवाहुजिनेंद्र अत्र मम सन्निहितो भव भव । वपट् ।
अथ अष्टका
(कंच राग होली जंगली तथा काफी)
जल सुंदर शुचि श्वेत मनू सुरभोग लस है।
सो भरि ग बढात तृषागद मूल नसे है ॥
RRES
२८
Fe
पूजा वि.ती २६ शुद्ध वचन मन अंग हदैवर भक्ति सजै है। सोही चतुर नर सार जिन श्रीवाहु यजै है ॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवाहुजिनेंद्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा । जो तज परसि समीर लगे तरुवृंद वस है। सो श्रीखंड चढात महा अघताप नसै है। धरै सुरभि शरीर फेरि शिवथान लसै है। सो ही चतुर नर सार जिन श्रीवाहु यजै है ॥२॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीवाहुजिनद्राय चन्दनं निर्वामीति स्वाहा ॥ २ ॥ शुचि तंदुल अति खेत मनूं शशिजोति लसै हैं किधौं गुलिकगन मंजु लखे हग मन हुलसै हैं। अक्षत औघ चढात लहै अक्षतपद ये हैं। सोही चतुर नर सार जिनश्रीवाहु यजै हैं ॥३॥ ओं की विदेहक्षेत्रस्यश्रीबाहुजिनेंद्राय असतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ 6RS PAR २६ चिनी पूजा ३० जिसबल मार प्रचंड मार सुर नर उर दें। सो वर गंध प्रसून भव्य निज करमें लेहैं। श्रीप्रभु चरन चढात मनोहर पीर नसे हैं। सो ही चतुर नर सार जिन श्रीवाहु यजै हैं ॥४॥ ओं की विवेक्षत्रस्थश्रीपाइजिनेंद्राग पुष्पं निर्वपामीति साहा ॥४॥ स्नेह सुरभि रसपूर सुव्यंजन सुंदर जे हैं। फीनी धेवर आदि थाल भरि भवि कर लेहें। श्रीपति चरन चढात रोग क्षुत मूर नसें हैं। सो ही चतुर नर मार जिन श्रीबाहु यजै हैं ॥५॥ ओं दही विवेहक्षेत्रस्थश्रीवाइजिनद्राय नैवेद्यं निपामीति स्वाहा ॥५॥ नाशन तमवज मूर दीप घृतपूर लसैहैं। अथवा ज्योति कपूर महादुतिकू सरसे हैं । वारत छविपर भव्य लखै निज आतम जेहैं। SPECTESTRUCT-SER Rॐॐ RE पूजा वि.ती ३१ सो ही चतुर नर सार जिन श्रीबाहु यजै हैं ॥६॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्राथश्रीवाहुजिनेंद्राय दीपं निर्वपामीति साहा ॥६॥ ले श्री खंड कपूर भूरि बर गंध सजे हैं। गंधथकी मंडरात श्याम अलिपंक्ति सजे हैं। खेये पावकसंग नाशि विधि सुगुन भजे हैं सो ही चतुर नर सार जिनश्रीवाहु यजै हैं ॥ ७ ॥ नों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीयाहुजिनेंद्राय धूपं निमामीति स्वाहा ॥ ७॥ लांगल कनुक गवाक्ष आम्र निंबुक सरसै हैं । नारंगी वररंग दाखभाफल लेहैं ।। श्रधिर चरन चढात मोक्षफल पावत वे हैं। सो ही चतुर नर सार जिनश्रीबाहु यजै हैं ॥८॥ ओं दी विदेहक्षेत्रस्थश्रीवाहुजिनेंद्राय फलं निपामीति स्वाहा ॥८॥ जल गंधाक्षत फूल चारु वर-दीप सजे हैं। SEASRAE ANS वि.ती * पूजा ३२ धूप फलौष मिलाय भाव निज शुद्ध भजै हैं॥ अर्घ चढावत भव्य सार निजनिधि गहि लेहैं। सो ही चतुर नर सार जिन श्रीबाहु यजै हैं ॥९॥ ओं ह्रीं विदेडक्षेत्रस्थ श्रीबाहुजिनेंद्राप अर्ध निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ अथ जयमाला। SORRECRE दोहा। HI PRER अनुभव सुमन सुयोगते, उपजी सरस हिलोल। किये दूरि परमल सकल, सरसत सुगुन किलोल ॥१॥ दीपकला छंद। जय बाहुजिनेश्वर जगतराय, सुग्रीव पिता विजया सुमाय । राजै मृगलच्छन शोभमान, शुचि जन्म सुप्तीमा नगर थान ॥२॥ श्रमसलिलरहित कालिमल सुनाहि, वर रुधिर छीररंग अंगमांहि । सम चतुर लसै संस्थान सार, शुचि प्रथम सार सहनन सुधार ॥३॥ ३२ जितमाररूप राज अपार, तन गंधजई सब गंधसार । विती । सब शुभ लच्छन मंडित सुजान, बल अतुल अंग घारत महान ॥४॥ हितमित वर वचन सुधासमान, ये दश अतिशय धारत महान । फुनि तपबल केवलज्ञान होत, तब दश अतिशय अदभुत उद्योत ॥५॥ चहुंधा शत शत योजन सुभिक्ष, नभगमन जु वध नहिं जीव अक्ष । उपसर्गरहित वर्जित अहार, दरशै चहुंधा आनन सुचार ॥६॥ विद्या अशेष ईश्वर जिनंद, विन छांह फटिक दुति तन अमंद। नहिं पलक पतन नैनन-मझार, नख केश बढे नांही लगार ॥७ चौदह सुरकृत राजें अनूप, तिन संयुत सोहै जगतभूप । भाषा सु अर्धमागधि अनूप, सब जीव मित्रता भावरूप ॥८॥ पट ऋतुफल फूल फलै सदीव, दरपन सम अवनि लसै अतीव । सब जीर परम आनंदरूप, योजन भुवि सुर मजें अनूप ॥ ९॥ ३३ वि.ती पूजा सुर मेघ करै जलगंधवृष्टि, पदतर सरदृग-भुजकंज सृष्टि । . भुवि मंडल सोहै शशि सरूप, निरमल नभ अरु दश दिश अनूप ॥ सुर चतुर-निकाय सु जप भनंत, वर धर्मचक्र आर्गे चलंत । वसु मंगलद्रव्य लसे अनूप, इन अतिशययुत जिनराज भूप ॥११॥ वसु प्रातिहार्य उपमा न जास; जहँ तरु अशोक सब शोकनाश । मनहर्षित सुर वरसात फूल, दिगध्वनि भव दुख हरन मूल ॥१२॥ चामर मनु सुरसरिता तरंग, सिंहामन है मनु मेरुश्रृंग। भामंडल भव दरसात सात, रिपु मोह विजय दुंदुभि जितात ॥१३॥ अनुपम त्रय छत्र जु लसै शोश, ऐसी रभुतायुत जगत ईश । सुख दरश ज्ञान वीरज अनंत, इस षट चालिस गुनधर महंत ॥१४॥ तुम धन्य देव अरहंत सार. निर आयुध निरभय निरविकार । जुत विभव परम वर्जित सु संग लखि नग्न अंग लाजै अनंग॥१५॥ CRI ११ सुवर्ण कमल।
पूजा वि.नी तुम धारत हो करुना अपार, सुन देव अवै मेरी पुकार। मम कष्ट हरो सब भेद जान, तुम सेव सदा जासु थान" ॥१६॥ पत्ता छंद। शिव ! शिव शिवकर वारिधि भवतरि, अघटित सुख परिपूरगरं । मन वच तन ध्याऊं गुनगन गाऊ, बाइजिन अघ औष हरं ॥ १७ ॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवा जिनद्राय जयमाला निवपामीति स्वाहा ।। १७ ॥ प्रडिल। ले पावन वसु द्रव्य पाणियुग धारिक। यजै बाहुजिन भव्य गुणौध उचारिक ॥ ते निजगुन परिपूर होत भ्रम मानिके। कर्मशत्रु दल हरे शक्ति निज ठानिक। इत्याशीर्वादः। इति श्रीचाहाजनपूजा समाता ॥ ४ ॥ - Links वि.ती पूजा ३६ अथ श्रीसबाहुजिनपूजा। अडिल्ल छंद। समवसरन जिस भवन भवन भूषन लसै। परमौदारिक देह देखि जन दुख नसै । सो श्रीदेव सुबाहु दया उर ल्यायकैं। तिष्ठ तिष्ठ जिनराज निकट मम आयकै ॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसुबाहुपरमदेव ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । ओं ही विदेहक्षेत्राथश्रीसुबाहुपरपदेव ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः। ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसुवाहुपरमदेव ! अत्र मम सन्निहितो भव भव । वपद् । अथ अष्टका मनमोहन छद । चाल नंदीश्वरपूजाकीसी। शुचि वारिधि क्षीरसमान, नीर सुपावन है । मन संतनसो अविकार, सुख सरसावन है ॥ SALSORE R980-% SSSS स २६
पूजा
चि.ती
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धरिहूं धरिपे त्रयधार, त्रय तप नाशनकुं।
यजिहूं जिनदेव सुबाहु, निजगुन भासन• ॥१॥
ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसुबाहुजिनेंद्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥
वर कुंकुम पूरित रंग, सजल पटीर घसे।
वह पूरित गंध गहीर, तीक्षण ताप नसैं ।।
घरिहूं तुम पायन ईश, भवतप नाशनकुं।
यजिहूं जिनदेव सुबाहु,
निजगुन भासन• ॥ २॥
मों ही विदेहक्षेत्रस्थसुश्रीमाहजिनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥ २ ॥
शुचि तंदुल ओघ अखंड, सुंदर अनियारे ।
युति धारत इंदु समान, नैननको प्यारे ।
करिहूं वर अक्षत पुंज, अरि वसु त्रासनकू।
यजिहं जिनदेव सुबाहु, निजगुन भासनकू ॥ ३ ॥
औ ही विदेहक्षेत्रस्यमीसुत्राजिनंद्राय अक्षतान् निर्वपामीति वादा ॥३॥
-- वि.ती पूजा ३८ शुभ सायकर्मयने गुलाब, पंकज पावन है। वर जाति जुद्दी वकुलादि, सुमन सुहावन है ॥ धरिहूं पद अग्र जु ल्याय, मनशर नासनकू । यजिहूं जिनदेव सुबाहु, निजगुन भासनकू ॥४॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसुवाहुजिनेंद्राय पुष्प निर्वपामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ पकवान सु सुंदर सार, घेवर आदि घने । षट हू रसपूर सुगंध, मनहर सद्य बने। सो नेवज देहुं चढाय, सुबल प्रकाशनकू । यजिहुं जिनदेव सुबाहु, निजगुन भासनकू ॥ ५॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसुबाहुजिनेंद्राय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ तमहारन ज्योति अनूप, पूरित स्नेह लसै । वह उज्ज्वल जिन तन मध्य, वारत इम दरसै ।। न RES CRE पूजा विती सो मानो विधि अवशेष, हेरत नासनकू । यजिहूं जिनदेव सुबाहु, निजगुन भासनकू ।। ६ ॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसुवाहुजिनेंद्राय दीपं निर्वामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ अगरादिक चूरन चारु, करि कर धारत हैं वर गंध हुताशन संग, हम इम जारत हैं। दुखदायक दुर्जन जानि, वसु अरि नासनकू । यजिहूं जिनदेव सुबाहु, निजगुन भासन• ॥ ७ ॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसुबाहुजिनेंद्राय धूप निर्वपामीति म्वाहा ॥ ७ ॥ फल खारिक दाख विदाम, एला आदि धने। अरु केला दाडिम आम, श्रीफल स्वाद मने ॥ लहि धारूं तुम पद भेट, दुर्गति नाशनकुं। यजिहूं जिनदेव सुबाहु, निजगुन भासनकू ॥८॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसुवाहुजिनेंद्राय फलं निर्वामीति स्वाहा ॥ ८ ॥ FREE + वि ती J XRALA पूजा ४० जल चंदन तंदुल फूल, चरु वर दीप लसैं । वर धूप फलौष मिलाय, कहियत अर्घ इसँ॥ तुव भेट करूं उमगाय, अघगन नाशनकुं। यजिहूं जिनदेव सुबाहु, निजगुन भासनकू ॥९॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसुबाहुजिनेंद्रीय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ अथ जयमाला। दोहा। अजयजयी अजयी सु अज, भव अज भय-हरतार । रहितकर्मरज कुजदलन, जय सुबाहु वलधार ॥१॥ . चंद। जय जिनदेव सुवाहुवरं, केवलभानुप्रभानिकरं। है निसढिल्ल नरेश पिता, मात सुनंदा शोभयुता ॥२॥ १० पूजा वि.ती ४१ पावन जन्मपुरी अवधी, है भव ज्ञान त्रियुक्त सुधी। चिह्न लसै कपिको धजमें, इंद्र नमें पदपंकज में ॥३॥ वैन सुधामम है सुथरे, सो गनईस प्रकाश करे । मोह महाभ्रम नाशन है, तत्त्व सु सात प्रकाशन है ॥ ४ ॥ जीव भन्यो उपयोगमई, और अजीव जु है जडई। आस्रव हैं परप्रीतिहिसें, सो रसदायक बंधबसें ॥५॥ संवर आस्रव रोक लसें, दे रस कम द्विभाँति नसें। सो यह निर्जरभाव लसें, है सुखदाजुत संवरसें ॥ ६॥ मोक्ष सुबंधन मोक्ष करें, ये शिवदाय प्रतीत धरैं। क्षेत्र त्रिलोक अनादि लसैं, कारक धारक नाहिं इसें ॥ ७॥ ना हरता कोउ है जु इस, ते ध्रुव औ उपजै विनमै । ये सत लच्छन मंडित हैं, भाखत यो शत पंडित हैं ॥८॥ ५१ वि.ती पूजा ४२ जीव भन्यो उपयोग जुई, पुद्गल है गुन च्यारमई। गंध स्पर्श रु वर्ण धरै, औ रसरूप मिले विछरै ॥ १॥ गौन सहायक धर्म गिनें, स्थान सहाय अधर्म भने। दे अवकाश अकाश सही, जो वरतावन काल कही ॥१०॥ क्षेत्र रु काल जु भावनकी, होत सहाय जसी जिनकी। ता समही सब रूप लसैं, सो सब देव तुम्हें दरसैं ॥११॥ देखि इन्हें निजरूप गहें, सो तवही सुखसिंधु लड़ें। है परप्रीति नहीं उरमें, नाहिं तहां सुख है धुरमें ॥ १२ ॥ तो शरना इह हेत गही, हो हमळू सरधा जु यही। मो मन तो पदकंज धरो, भो जगपाल निहाल करो ॥ १३ ॥ ये रसना मुखमें जु रहै, तौलग तो गुनगान चहै। प्रीति इंटै परतें हमरी, चित्त वसे छवि या तुमरी ॥ १४ ॥ RA ४२ स वि.ती पूजा मन--SIS SA%ES औगुनकून हिये धरिये, दीन निहारि दया करिये। "थान" गही शरना तुमरी, व्याधि हरो जिनजी हमरी ॥१५॥ निशपालिका छंद। रूप निज भालि कर भालि अति तीक्षनी। ध्यान धनु साधि करि सैन्य विधिकी हनी॥ देव बरबाहु पदकंज जन जो यजें। ठोकि भुजदंड आरिमोह जयमों सजें ॥१६॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीसुबाहुजिनेंद्राय जयमाला निर्वपापीति स्वाहा । अडिल्ल इंद। चरन सरोज सुबाहु तने जन जो यज । तजें अविद्याभाव स्वानुभवको भनें । पुत्र पात्र धन धान्य सौख्य इह भव लहें। परभव वरपद भोगि मुक्तिपदवी गहें ॥१॥ इति आशीर्यादः । इति धासुमा जिनपूजा समाप्ता ॥ ५ ॥ RSARA ४३ MORE अथ श्रीसंजातकजिनपूजा। वि.ती पूजा ४४ छप्पय छंद। द्रव्य क्षेत्र यम, भाव, भावनिजजाति भिन्न चिर। चिरसंगी पर सकल, सकल निज भिन्न चतुक कर ॥ कर विचार शुभ येह, येह भवतिथि असार लखि । लखि अनूप चितरूप, रूप रस गंध वरण अखि ॥ अखिलै सुभिन्न अवलोकि निज, निजस्वभाव थिरभाव गिन । करिके जु महर मोपरि इतै, तिष्ठ तिष्ठ संजात जिन ॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थितश्रीसंजातकजिनेंद्र ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । भों ही विदेहक्षेत्र स्थितथीसंजातकजिनेंद्र ! अन तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः। ओं ही विदेहक्षेत्रस्थितश्रीसंजातकजिनेंद्र ! अब मम सन्निहितो भव भव । वषट् । र पूजा वि ती REC% अथ अष्टक। वंद मनहंस। जल खेत गंगतरंगिनीसम ल्यायके। भरि भंग पारि चढात हूं उमगायक। दुतिवंत शेखर नम्र होत सुरेशके। वह पाय पावन पूजिहूं जगतेशके ॥१॥ नों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसंजातकजिनेन्द्रेभ्यो जलं निवपामीति स्वाहा ॥१॥ सुरवल्लभी वररंगपूरित पावनी। घसि नीर चंदनसंग ताप नशावनी॥ दुतिवंत शेखर नम्र होत सुरेशके । वह पाय पावन पूजि हूं जगतेशके ॥२॥ ओही विदेह नेयस्पश्रीसंजानकजिनद्रेभ्यः चंदनं निर्वामीति वाहा ॥ २ ॥ ACS SAX ४५ Kan --- पूजा वि.नी १७ Prock-565ck दुतिवंत शेखर नम्र होत सुरेशके । वह पाय पावन पूजिहूं जगतेशके ॥५॥ भों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसंजातकजिनेंद्रेभ्यो नैवेद्यं निर्वयामीति स्वाहा ॥ ५ ॥ शुचि दीप सुंदर धारिकै हात ही। जिन आरती करते नशै अघवातही ।। दुतिंवत शेखर नम्र होत सुरेशके । वह पाय पावन पूजिहूं जगतेशके ॥६॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसंजातकजिनेन्द्रेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ देश गंध चंदन आदि उत्तम हाथही। करि अग्निसंगमजारि कर्म अनादिही ।। दुतिवंत शेखर नम्र होत सुरेशके। वह पाय पावन पूजिहूं जगतेशके ॥७॥ ओं ही विदेहक्षत्रस्थश्रीसंजातकजिनेंद्रेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा । ४७ SEARCH पूजा वि.नी PISCE acc दुतिवंत शेखर नम्र होत सुरेशके। वह पाय पावन पूजिहूं जगतेशके ॥५॥ नों ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीसंजातकजिनेंद्रेभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ५ ॥ शुचि दीप सुंदर धारिकै हर्षात ही। जिन आरती करते नशै अधबातही ॥ दुर्तिवत शेखर नम्र होत सुरेशके। वह पाय पावन पूजिहूं जगतेशके ॥६॥ ओही रिदेहक्षेत्रस्थश्रीसं नातकजिनेन्द्रेभ्यो दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ दश गंध चंदन आदि उत्तम हाथही। करि अग्निसंगमजारि कर्म अनादिही ॥ दुतिवंत शेखर नम्र होत सुरेशके। वह पाय पावन पूजिहूं जगतेशके ॥७॥ ओं । विदेत्रिस्थश्रीसंनातकनिनेंद्रेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा । RSSIS %ESCRICK विनी KIRTER पूजा ४८ ' फल पक चूतक चारु दाख अनार ही। वर वीजपूरक लौंग खारिक चार ही ॥ दुतिवंत शेखर नम्र होत सुरेशके। वह पाय पावन पूजिहूं जगतेशके ॥८॥ भों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसंजातकजिनेंद्राय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ८॥ जल गंध तंदुल पुष्प नेवज दीपही। वर धूप ले फल औघ अर्घ अनूपही ॥ दुर्तिवंत शेखर नम्र होत सुरेशके । वह पाय पावन पूजिहूं जगतेशके ॥९॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसंजातकनिंद्राय अर्थ निवपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ अथ जयमाला। EOSSSC ८ छप्पय छन्द जितदुराश दिगवास आश शिववास जास उर। ४८. ल --- पूजा वि ती चिदविलाप्त सुविकास अमिनगुनराशि ज्ञानपर ॥ वरविभूतिपरकास दास सुरपति सब सेवें। धरत ध्यान तपराशि नाशि भ्रम निजगुन बे३ ॥ बल अतुल राशि अरित्रास करि, असमशक्ति संजातधर । करुना प्रकाशि निजदासपै सुख विकाशि अघ नाशकरि ॥१॥ ४३ दीपला छंद। संजातक सुनि मेरी पुकार, विधिवश में दुख भुगते अपार । वर भाग्य उदय तुम वचनद्वार, यह जानि परी हमळू अवार ॥२॥ विधि बंधनकारन पंच एव, तिनमें मिथ्यात जु पंचमेव । सो प्रथम नाम एकांत जास, जिम वल नहिं पूरन वस्तु भात ॥३॥ विपरीत नाम दूजो विरूप, दरसात औरस और रूप । तीजो सु विनयनामा कुभाव, जिसबल श्रद्धा चंचल लखाव ॥ ४॥ 9-%256 वि.ती पूजा ५० संशय चतुर्थ जानो अहेत, सो सत्यप्रतीति न होन देत । पंचम अज्ञान विशेष जानि, जिसबल न सकें निजगुन पिछानि॥५॥ फुनि अविरत विरत स्वभावहीन, परमाद अक्षरश स्नेहलीन । कसि है जु कषाय सु करत क्षोभ, यह क्रोध मान माया रु लोभ ॥६॥ उपहास्य अरति रति शोक जानि, भय जुगुप्सा रु त्रय वेद मानि। चल तन मन वचन सुयोग तीन, ये बंधनकारन लिए चीन ॥७॥ सो बंध चतुर्विध है सुजान, पहले प्रकृती सु सुभाव मान। थितिबंध करै थितिको विथार, अनुभाग तृतिय रस देनहार ॥८॥ आतमप्रदेश परचय सुजानि, सो बंध प्रदेश चतुर्थ मानि । करि भूलि बसें वसु भांति येह, परिवर्तन काल किये अछेह ॥९॥ दुख भुगते सो कहि सकत नाहि, सब झलकि रहे तुव ज्ञानमांहि । वर मात देवसेना विख्यात, नृप देवसेन पितु विमल गात॥१०॥ 4. kark%20k ५० पूजा पि.ती अलकापुर पावन जन्म थान, युत सूर्य चिन्ह राजत निशान । वर धर्मचक्र धारत जगीश, तुम गुन नहि बरन सकें फनीश ॥ ११ ॥ तुम दीनदयाल कहात देव, यातें हम शरन गही स्वमेव । विधिबंधयोग्य दुरभाव हानि, करि क्षायिक भाव कृपानिधान ॥१२॥ यह जाचतहूं कर जोरि देव, भव भव पाऊं तुव चरनसेव । तुव वचन सुधारसपान सार, ये थान" चहै भव भव-मझार ॥१३॥ घत्ता छन्द। जय चिदवर वरछवि मोहअचलपवि, चारितधरधरधरनिघरं । संभ्रमतपहर अवि तन-दुतिजितरवि, संजातक जिन श्रेयकरं ॥१४॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थर्वापानश्रीसं जातकजिनदार जयमाला निपामीति स्वाहा ॥ अहिलछंद। ५१ संजातक जिन सेव करत कर जोरिक। जानत भवि निजजाति नेह परमोरिक। R - वि.ती पूजा प्रकट होत सुख अघट सुघटमें ता घरी। पूजें मनकी आश वास द्वै निजपुरी ॥१॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीसंजातकजिनपूजा समाप्ता ॥ ६ ॥ ५२ अथ स्वयंप्रभुजिन पूजा। तोटक छन्द। चिदरूप अनादि स्वयं निज ही, लखि लब्धि वसैं प्रभुता सुगही । इम सत्य स्वयंप्रभु दासप्रतें, करिकै करूना अब तिष्ठ इत॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थवर्तमानश्रीस्वयंप्रभुजिनेंद्र ! अब अवतर अवतर । संवौषट् । ओं ही विदेहक्षेत्रस्थवर्तमानश्रीस्वयंप्रभुजिनेंद्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठ: । ओं ही विदेहक्षेत्रस्थवर्तमानश्रीस्वयंप्रभुजिनेंद्र ! अत्र मम सनिहितो भव भव । वषट् । R ५२ पूजा विती/ ASACH ५३ अथ अष्टका त्रिभंगी छन्द जल प्रासुक सुंदर गंध महा भर शीतलताकरि तृटहारी। त्रय ताप विनाशन दुःखप्रणाशन धार धरूं धरि भरि झारी॥ हम यजें कृपालं भवभयटालं अरिउरशालं सुकुमालं। मम इनि अघजालं हे जगपालं करहु निहालं वरभालं ॥१॥ भों ही विदेहक्षेत्रश्शश्रीवपंप्रभुजिनेंद्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ केसर शुभरंगी परिभलचंगी घसि हरिसंगी तापहरी। प्रभु चरन चढावत सुखसरसावत देह सु पावत गंध भरी ॥ हम यजें कृपालं भवभयटालं अरि उरशालं सुकुमालं । मम हनि अघजालं हे जगपालं करहु निहालं वरभालं ॥२॥ भोंगी विदेहक्षेत्राम्पचीस्वयंपभुजिनंद्राय चदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥ ५३ EKASE যুগ निती ५४, मुक्तासम सुदंर गंध भरा वर सखर अखंडित थाल भरें। पद अक्षय पावें कुगति नसावें जो भवि अक्षत पुंज करें । हम यजें कृपालं भवभयटालं अरिउरशालं सुकुमालं। मम हनि अधजालं हे जगपालं करहु निहालं वरमालं ॥३॥ ओ निदेवोत्रस्मश्रीस्वयंममणिनंद्राग अक्षतान निर्मापामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ सेवति सुंदर कंद जुही वर कंज गुलाब जु मनहारी। शुभ जाति चमेली राय जु बेली सुमन सुहावन भरि थारी॥ हम यजें कृपालं भवभयटालं अरिउरशालं सुकुमालं। मम इनि अघजालं हे जगपालं करहु निहालं वरभालं ॥४॥ ओंजी विवेवसेनस्थश्रीनागजिनेवाग पूर्ण निर्मामीति साहा ॥ ४ ॥ घेवर रस भीने पाक नवीने हे रंग भीने बलकारी। क्षुत रोगनिवारन निजबलधारन चरन चढाऊं भरि थारी॥ ५५ पूजा वि.नी 25 हम यजें कृपालं भवभयटालं अरिउरशालं सुकुमालं। मम हनि अघजालं हे जगपालं करहु निहालं वरभालं ॥५॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीस्वयंभुजिनेंद्राय नैवेद्यं निर्वपामीति साहा ॥ ५॥ शुचि वर्तिकपूरी कै घृतपूरी तमगनचूरी जोतिभरी। भरिकै भरि थारी करत उतारी सुगुन उजारी होत खरी॥ हम य कृपालं भवभयटालं अरिउरशालं सुकुमालं। मम हनि अघजालं हे जगपालं करहु निहालं वरभालं ॥६॥ आं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीस्वयंप्रभुजिनेंद्राय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ शुचि अगर सुचंदन कदलीनदंन अलिगनरंजन चूर्णवरं । वसुविध अरिनाशन दुःखप्रनाशन लेय हुताशन संग धरं ॥ हम यजें कृपालं भवभयटालं अरिउरशालं सुकुमालं। मम हनि अघजालं हे जगपालं करहु निहालं वरभालं ॥७॥ SAF% ५५ पूजा वि.ती xxxki ५६ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीस्वयंपभुजिनेंद्राय धूप निर्वपामीति साहा ॥ ७ ॥ फल शुचि नारंगी कनक सुरंगी सुंदर पुंगी अंबवरं । मिष्ट सु वर केला खारिक एला श्रीफल पिस्ता जायफलं ॥ हम य. कृपालं भवभयटालं अरिउरशालं सुकुमालं । मम हनि अघजालं हे जगपालं करहु निहालं वरभालं ॥८॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्यश्रीस्वयंप्रभुजिनेंद्रीय फलं निर्वामीति साहा ॥ ८॥ जल चंदन अक्षत सुमन सुगंधित नेवज सुदंर स्वादवरं । दुति दीप सुधूपं फल जु अनूपं ले शुचिरूपं अर्धकरं ॥ हम यजें कृपालं भवभयटालं अरिउरशालं सुकुमालं । मम इनि अघजालं हे जगपालं निहालं वरभालं ॥९॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीस्वयंमभुजिनेंद्रीय अर्थ निर्वपामीति स्वाहा ॥९॥ करहु ५६ स अथ जयमाला। वि.ती पूजा दोहा। जन्मथान विजया पुरी, जयो मंगलानंद । सुहृदमित्र नृप तात जसु, लसै चिन्ह भज चंद ॥१॥ जास गिरा पावन गदा, हरन मोह दुरयोध । पावन पावन उर धरूं, पावन पावन वोध ॥२॥ सुन्दरी वंद। वसुघरापति देव स्वयंप्रभू, अरज दासतनी सुनिये विभू । मम सु भूलि बसे बहु कर्म ये, चिरलगे भव कष्ट महा दिये ॥३॥ करन मत्सरके परभावतें, बहुरि विघ्न भरे दुरभावतें। करत साधनको उपधात सो, दरश ज्ञान प्रभाव नसात सो॥४॥ दुरत ज्ञान सु पेच प्रकार है, दरश आतमको न निहार है। --- वि.ती पूजा दिविध वेदनि कर्म तृतीय है, रस शुभाशुभ देत स्वकीय है ॥५॥ प्रथम सो सुखदायक मानिये, बँधत सो इह भांति प्रमानिये । सकलजीव व्रतीजनकी दया, बहुरि दान चतुर्विधको दिया ॥६॥ धरत संयम राग लिये सु जो, करत योगनकी चलता न जो।. असद होत जु दुःख विशेषतै, रुदन पान रु शोक कुवेषतें ॥७॥ करत हैं वध जो दुरभावतें, अरु क परिदेवन चावतें । स्वपरकै परतें परनाम ये, परत बंध महा दुखधाम ये ॥८॥ भनत रूप विरूप सुदेवको, निगम संघ रु धर्म सुभेवको। दरश मोह जु बंध महान ये, परत आतमशक्ति दुरान ये ॥ ९ ॥ वश कषाय उदै परिणाम जो, करत चारित मोह जु तीन जो । दरश चारित द्वैविध मोह ये, करत हैं निजशक्ति विछोह ये ॥१०॥ बहु परिग्रह आरंभ जासके, नरक आयु बंधै जिय तासके। ५4
पूजी
वि.नी
कुटिल वा तिर्यंच गती सुदा, अलप आरंभ मानव जन्मदा ॥ ११ ॥
सहित राग असंजम संजमं, फुनि अकाम जु निर्जरतापमं ।
तप अज्ञान रु सम्यक हेतु हैं, सुभग देवगती यह देतु हैं ॥१२॥
हम चतुर्विध आयु सुकर्म है, कुटिल योग विवाद सुधर्म है।
अशुभ नाम कुबंध सु लेत हैं, उलटि जो इनतें शुभको वहैं ॥१३॥
तुरत बंध करै शुभनाम ते, द्विविध नाम भने मतिधाम ते ।
करत जो परकी विकथा कुधी, बहुरि आतमशंस करै सुधी ॥१४॥
पर तने गुनकू जु दुरात हैं, कुल जु नीच वहै नर पात हैं।
करत जो इनते विपरीतता, धरत है कुल उच्च पुनीतता ॥१५॥
कर्म गोत्र सु द्वैविध यों कहें, करत विघ्न अलाभ महालहें ।
यह कुभाव टरें उरतें जवे, सुखित होय रहै शिवमें तवै ॥१६॥
विरद दीनदयाल सँभारिये, दुखिन देख दया उर धारिये।
तिमिरमोह महा उरतें इरो, निजस्वरूप प्रकाशि सुखी करो ॥ १७ ॥
वि.ती पूजा ६० > >>> % वंद तरंगिक । विध अनोकुहकी जरकी निरमूलता। सुभग आतमके गुनकी अति थूलता॥ विधनकी हरनी करनी दुखसाल है। जिन स्वयंप्रभुकी जयदा जयमाल है ॥ १८ ॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीस्वयंप्रभुजिनेंद्राय जयमाला निर्वामीति स्वाहा ॥ अडिल्ल छंद। स्वयंप्रभू जिनदेव सेव जो जन भजै । थिर करि मन वचकाय अनाकुलता सजै ॥ करै वास उर जास रूप जगभूपको। उदय होत है प्रकट भानु निजरूपको ॥१॥ इत्याशीर्वादः । पुष्पांजलिं क्षिपेत् । इति श्रीस्वयंप्रमुजिनपूना समाप्ता ॥ ७ ॥ - ६० मत अथ श्रीऋषभाननजिनपूजा। पूजा वि.ती PRESARIES छप्पय छंद। शुभगकीर्तिनृप तात वीरसेना सुमातवर । जन्मथान अतिरम्य सुसीमा नगर सुखाकर ॥ सिंह चिह्न ध्वज जास उदित व्रत अंशु भुवन थल । कर निजऋद्धिप्रकाश तिमिरअघपटल सकल दल ॥ जय ऋषभानन जिन भानवर, भव्यकोकगनशोकहर। थापू सु तोहि पद यजनहित, तिष्ठ तिष्ठ वरबोधकर ॥१॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीऋषमाननजिनेंद्र अत्र अवनर अवतर। संवौषट् । ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीऋषभाननजिनेंद्र अन तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः । ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीऋषमाननजिनेंद्र अत्र मम सनिहितो भर भव । वपद् । ६१ tex
पूजी
GRESS
मोदक छंद।
विती नीर महा अति शीतल लेकरि, प्राशुक सुंदर श्रृंगविषै भरि ।
मोह महादव अग्नि बुझावन, हे जिन ! पूजत हूं तुव पावन ॥ १॥
ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीऋषभाननजिनेंद्राय जलं निपामीति स्वाहा ॥१॥
गंध भरा शुचि चंदन बावन, केसर मेलि घसूं मन भावन ।
ताप त्रिवेद महातपनाशन, पूजत हूं तुमको वरशासन ॥१॥
ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीऋषपाननजिनेंद्राय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥
तंदुल औध अखंडित उज्ज्वर, मंडिनगंध हिमाम मनोहर ।
पावन मैं पद अक्षय कारन, पूजतहूं तुमको भयवारन ॥३॥
ओं ही विदेहक्षेत्राथश्र ऋषमाननजिनेंद्राय अक्षतान् निर्वामीति स्वाहा ॥ ३ ॥
कंज कदंव जुही करना वर, केतकि गंध सुगंध महा भर।
ले समरायुध पीर नशावन, पूजतहूं तुमको जगपाचन ॥४॥
ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीऋषभाननजिनेंद्राय पुष्पं निवपामीति स्वाहा ॥४॥
15 पूजा वि.ती घेवर बावन चंद्रकला वर, पापर खजक पाक बनाकर । रोग छुधा जरतें जु निवारन, पूजत हूं तुमको जगतारन ॥ ५ ॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीऋपभाननजिनेंद्राय नैवेद्य निवपामीति स्वाहा ॥५॥ दीपक जोति प्रकाश महाकर, वाति कपूर सुभाजनमें धर । लोक अलोक स्वरूप निहारन, पूजतहूं तुमको शिवकारन ।। ६ । ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीऋषभाननजिनेंद्राय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ ले अगरादिक चूरन वा वर, गुंज करै भ्रमरावलि जापर । कर्म महारिपु अष्ट प्रजारन, खेवतहूं गुन अष्ट जु धारन ॥ ७॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीऋपभाननजिनेंद्राप धूपं निर्धपामीति स्वाहा ॥ ७ ॥ सुंदर आम अनार सदाफल, खारिक दाख विदाम क्षुधादल मोक्ष महातरुके फल पाक्न, तोहि यजूं शिववाम रिझावन ॥ ८॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीभाननजिनेंद्राय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥८॥ kakAESAR HERE , 95% RECE%A5% पूजा ६४ RASALE नीर सु चंदन अक्षत केसर, नेवज दीप रु धूप सु लेकर । वि.ती है ले फलसंयुत अर्घ अनूपम, तोहि यजूं जिन कर्मविथादम ॥९॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीपभाननजिनेंद्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ अथ जयमाला। दोहा। तालु ओष्ठके स्पर्श विन, धुनि धनसम अबदात । प्रकटत भ्रमतमहरनकू, तरुण किरण मनु प्रात ॥१॥ पद्धरी छंद। जय ऋषभानन सुनि जगतभूप, मैं एकभावमय निजस्वरूप । चिरते परपरणति संग पाय, परिवर्तन भाव धरे अघाय ॥२॥ निज पर मिल मूल सुभाव पांच, पहिचाने मुनि तुव वचन सांच । पहलो उपशम जानों सु एव, सो सम्यकचारित युगलभेव ॥ ३॥ ६४
पूजा
दूजो क्षायिक सो नवप्रकार, है ज्ञान दरश अरु दान सार ।
विद लाभ भोग उपभोग जान, वरवीर्य सुसम्यक चरण मान ॥४॥
ये प्रकट लसें तुममें सदेव, है मिश्र अष्टदशरूप एव ।
मति श्रुतावधिज्ञान रु कुज्ञान, मनपर्यय फुनि त्रय दरश जान ॥५॥
सो चक्षु अचक्षु रु अवधि एव, फुनि लब्धि पंचविध है स्वमेव ।
शुचि दान लाभ भोगोपभोग, युत वीरज पंच भये सयोग ॥६॥
सम्यक अरु चारित युगल जान, संयमासंयमसु एकमान ।
इम सब मिल वसुदश भाव येह, क्षय उपशम बल प्रकटै सुजेह ॥७॥
उदईक एकविंशति प्रकार, बरने जगपतिजू तुम निहार।
गति नारक पशु नर सुरसु व्यार, तम मान कुटिल लालच असार ॥
तिय पुरुष नपुंसक वेद तीन, मिथ्यादर्श रु अज्ञान चीन ।
फुनि असिद्धत्व वामें पिछान, लेश्या षट कृष्ण रु नील जान ॥९॥
पूजा वि.ती --- ISRO-96--15 कापोत पीत अरु पद्म एव, फुनि शुक्ल छठी जानो सुभेव । फुनि पारणामिकसु भाव तीन, जीवत भव्यत्व अभव्यलीन ॥ १०॥ इनमें उदयिक भावनि प्रचार, परिवर्चन पंच किये अपार । भुगते मैं कष्ट अनादि देव, तिनको तुम पार लयो स्वमेव ॥११॥ इनतें उबारि लखि दीन मोहि, यह अरज करत है "थान" तोहि । पर परणतितें मनको हटाय, निजरूप हमें दीजे दिखाय ॥ १२॥ लीलाकर छंद। धारे जगाधीशके वैनकू जो हिए माहि । छारें सरूपी तने पारणामी उदै ताहि ॥ वारें चतू द्रव्यके पारिणामी भली भाति । सोही लहै सौख्य जोही गहै आपनी जाति ॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीऋपभाननजिनेंद्राय जयमाला निर्वामीति स्वाहा । ६ ६६
वि.ती
अडिल्ल छद।
ऋषभानन जगजान यजत नर जो सही।
टरे सकल दुख बंद वरै अनुभवमही॥
मुक्ति महीरुह मंजु तहां लहलात है।
अनुपम सौख्य अनंत सुरस फल पात है।
इत्याशीर्वादः ।
इति श्रीनापभाननजिनेद्रपूजा समाप्ता ॥ ८ ॥
C554-55
अथ श्रीअनंतवीर्यजिनपूजा।
स्थापना-वोहा।
गहि निज सरल सुभाव सर, साधि ध्यानको दंड।
हर अनंत बल मोदको, जय जय वीर्य अखंड ॥१॥
पूजा वि.ती E ६८ छंद-मूलना। मेघ राजा पिता मंगला मात है चिह्न गजराजको केतु राजै। जन्मके जोगते है महापावनी नग्र अवधी महासौख्य साजै॥ अन अंतवीर्य तू धीर परपीरहा पेखि छवि चारुको मार लाजै । देवदेवेश हे तिष्ठ तिष्ठो इतै थापिहूं तोहि मैं पूजकाजै॥२॥ नों ही विदेहक्षेत्रस्थितश्रीअनंतवीर्यजिनेंद्र ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । भों ही विदेहक्षेत्रस्थितश्रीअनंतवीर्यजिनेंद्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । उ: । ओं ही विदेहक्षेत्रस्थितश्रीअनंतवीर्यजिनेंद्र ! अब मम सन्निहिनो भव भव । वषट् । 'अथ अष्टका छंद चाल राग गणगौरीको में । प्रासुक जल गंगादहके सम शीतल अति अभिराम । हरन दुरास प्यासहित हे जिन ! तोहि यजूं वरनाम ॥ SSNESC R-6k पूजा विनी लुभाये नेना रावरी छवि छविधाम । लुभाए नैना०॥१॥ ओं में विदेहक्षेत्रस्थश्रीअनंतवीर्य जिनेन्द्रेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ केसर चंदन कदली नंदन मेलि घसू आभिराम । भवभयतापनाशहित नुत मैं पूजूं पति शिववाम ॥ लुभाए नैनां रावरी छविपै छविधाम । लुभाये नैनां०॥२॥ ओं ही निदेहक्षेत्रस्यश्रीअनंतवीर्यजिनेंद्रेभ्यः चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥ २ ॥ शाल अखंडित सौरभिमंडित मुक्तासम शुचिधाम । तोहि यजूं अक्षतते हे जिन ! पावन अक्षय ठाम ॥ लुभाये नैनां रावरी छविपै छविधाम । लुभाये नैनां ॥३॥ ओं की निदेहक्षेत्रस्य श्रीमनंतवीर्यजिनद्रेभ्योऽक्षनान् निर्वपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ सुमन गुलाब जुद्दी कुंदादिक गंध लिये अभिराम । अंग अनंगविया हरिवेळू घारूं तुव पद ठाम ।। शाही वि.नी/ ७० लुभाये नैनां रावरी छवि छविधाम । लुभाये नैनां ॥४॥ मों की विदेहक्षेत्रस्थश्रीअनंतवीर्यजिनेंद्रेभ्यः पुष्पं निर्वपापीति स्वाहा ॥ ४ ॥ सुरभि स्नेहपूर पाकादिक नेवज अति अभिराम । लहि पूजू श्रीपति पद तेरे करन छुधा बलखाम ॥ लुभाये नैनां रावरी छविप छविधाम । लुभाये नैनां०॥५॥ मों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअनंतवीर्यजिनेंद्रेभ्यो नैवेचं निर्वामीति स्वासा ॥ ५॥ भाजन कनक कपूर वाति घर तमनाशन दुतिधाम । निजस्वरूपभासन तुव छविपर वारि करूं परनाम ॥ लुभाये नैनां रावरी छवि छविधाम । लुभाये नैन०॥६॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअनंतवीर्यजिनेंद्राय दीपं निर्वामीति साहा ॥ ६ ॥ चूरन अगर तगर अरु चंदन गंध लिये अभिराम । खऊ तुम पद अग्र जगोचम खोवन वसुविध नाम । RECEN - वि.ती पना ७१ लुभाये नैनां रावरी छविपै छविधाम । लुभाये नैनां०॥७॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीअनंतवीर्यजिनेंद्राय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ७ ॥ केला दाडिम आम जंभीरी एला अति अभिराम । भेला करि धरिहूं तुम पायन पावन शिवफल वाम ॥ लुभाये नैनां रावरी छविपै छविधाम । लुभाये नैनां०॥८॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्री अनंतवीर्यजिनेंद्राय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ८ ॥ जल चंदन अक्षत समरायुध नेवज शुचि बलधाम । दीप धूप फल अष्ट द्रव्य लहि अर्घ धरूं अभिराम ॥ लुभाये नैनां रावरी छविपै छविधाम । लुभाये नैनां०॥९॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअनंतवीर्यजिनेंद्राय अर्घ निर्वपानीति स्वाहा ॥९॥ 2- %% ७१ --- पूजा वि.ती RSS15 अथ जयमाला। दोहा। धन्य जगतपति जन्म तुन, मनहु सुमंगल प्रात । खिले भविनजिय जलज जिम, नस्यो अमंगलबात ॥१॥ चौपाई छंद। सुनो अनंतवीर्य जिनदेव, भूलि भाववशतें स्वयमेव । भावकर्म रागादिक भाव, द्रव्यकर्म वसु प्रकृति स्वभाव ॥२॥ देहादिक नोकर्म सु येइ, लगे अनादि संग मम तेह । सागर बंध लिये थिति सोहि, काल अनंत भ्रमायो मोहि ॥३॥ योजन एक बडो गहराय, इतनोही मुखवेध सुभाय । ऐसो कूप कलपना करै, ताळू पुनि ऐसी विध भरै ॥ ४॥ उत्तम भोगभूमि वर खेत, तामधि जो उपजै शुभहेत । ७२ AR AAS पूजा विती भेडसूनुकचअग्र सुलेत, खंड सूक्ष्म तिनके करि लेत ॥५॥ भरि तामें कालै इह भाय, खंड एकशत वर्ष विताय । कूप उदर जब खाली होय, सो व्यवहार पल्य करि जोय।।६।। वर्ष असंख्य कोटिसम थान, तिन रोमनिकी राशिप्रमान। करि कल्पना घात तिह करे, समय समय प्रति एक जु हरै ॥ ७॥ ये उद्धारपत्य मन आनि, दीप उदधि संख्याहित जानि । याके रोम पुंज हैं जित्ते, कोडाकोडि पचीस जु तिते ॥ ८ ॥ वरस एक शतके फुनि जान, समय करै आगम परमान। रोम उधार पल्पकी राशि, करो घात तिन बुद्धि प्रकाश ॥९॥ ते दश कोडाकोडि प्रमान, अद्धा सागर होत महान । थितिप्रमान यातें कर लाय, ये तुम वैन जिताई सोय ॥१०॥ ७३ १ भेडके बच्चेके याला
पूजा
७४
ज्ञान दर्शनावरण द्वि मान, वेदनि अंतराय फुनि जान ।
वित्ती । करे बंध उतकृष्ट जु च्यार, कोडाकोडि तीस दघि सार ॥११॥
सत्तर कोडाकोडि प्रमान, सागरपर मोहनि थिति जान ।
कोडाकोडि वीस दधि होय, नामे गोत्र की परथिति जोय ॥१२॥
है तेतीस उदधिपरमान, आयुकर्मकी थिति पर जान ।
अपर आयु वेदनि विध दोय, थिति द्वादश मुहूर्त अवलोय ॥१॥
नाम गोत्र दोऊं विधि जान, वसु मुहूर्त थिति अल्प प्रमान ।
ज्ञानदर्शनावरणं जु दोय, मोहनि विघ्न आयु फुनि सोय ॥ १४ ॥
थिति अंतरमुहूर्त इक मान, ये तुम भाषित है भगवान ।
भुगती में परिवर्तनरूप, सो सब तुम जानतु जगभूप ॥१५॥
भय भीत शरण तुव गही, इनते वेग छुडावो सही।
दीनदयाल दयानिधि नाम, अब बिलंब करनो किहि काम ॥१६॥
STRA पुजा वि.ती ७५ भ्रमरावली छ। अगतागत तू विगताविधिवंधविथा। असमं वरभूतियुता अनुभोसुरता ॥ धरता वरबैन सुधा शिव ! तू शिवदा। हमकू वरभक्ति मिलो कर श्रेय सदा॥१७॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअनंतवीर्यजिनेन्द्रेभ्यो जयमाला निर्वपामीति स्वाहा ॥ १७ ॥ अडिल्ल वंद। देव अनंतवीर्य पदपंकज पावने । पूजें भव्य उचारि सुगुन मन भावने ॥ तन मन पावन तास होत सब सुख सरै। आकुल दाह विहाय निराकुलता वरै ॥ १८ ॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीअनंतवीयजिनपूजा समाप्ता ॥ ९ ॥ H-1 ७५ MSRLM FEAR विती अथ श्रीसूरप्रभुजिनपूजा। रोला छंद। पूजा ७६ नागराय जसु तात मात भद्रा सुभद्रमन । जनमपुरी विजया विलोकि मोहित है सुरगन ॥ भववारिध मनु सेतु केतु तिमरारि चिन्हधर । सूरप्रभु जिन इतै तिष्ठ कर कृपा दासपर ॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसूरमभुपरमदेव ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । ओं ही विदेडक्षेत्रस्थश्रीसरमभुपरमदेव ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः। ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसूरप्रभुपरमदेव ! अत्र मम सन्निहितो भव भव । वषट् । अथ अष्टक। छद राग सारंग सोरठ। जल सुंदर तृटहर अतिपावन है हिमसम अवदात । भरि श्रृंगार धार घर धारत जनम मरन नशजात ॥ ७६ म पूजा ७७ ८ 2 भव भय पीर हरो म्हारी, तोहि यजूं जी वरवीर । भवभय० ॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्पश्रीमूरमभुजिनेंद्राय जलं निर्वपापीति ग्वाहा । १ ॥ मलय जु मंजु महक ताकी पर षट्पदगन मँडरात । घसि जलयुत तव चरन यजत जिन भवतप ततछिन जात । भवभय पीर हरो म्हारी तोहि यजूंजी वरवीर । भवभय० ॥२॥ मोही विदेहक्षेत्रस्ययीमूरप्रभुजिनेवाग चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥ अक्षत सित शशिगो तिनके सम निरखत मन ललचात । मंजु पुंज तव चरनकंज तर करत अखय पद पात ।। भवभय पीर हरो म्हारी तोहि यजूंजी वरवीर । भवभय० ॥३॥ ओं ही विदेहवस्थवीमप्रभुजिनेंद्राय पक्षनान निर्मपामीति साहा ॥ ३ ॥ कंज कदव गुलाब केतकी मरवा अति महकात । पटपदरंजक चरनकंजतर धरत ममरसर जात ।।
वि.ती ७८ भवभय पीर हरो म्हारी तोहि यजूंजी वरवार । भवभय० ॥४॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीसरप्रभुजिनेंद्राय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ फेनी त्रिकुट इंदरस गूजा घेवर मन ललचात । चरु बलकार चढात चरन तव निजबल प्रबल लहात ॥ भवभय पीर हरो म्हारी, तोहि यजूंजी वरवीर । भवभय० ॥५॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसूरप्रभुजिनेंद्राय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ ललित जोति दीपक तमभंजन धरि भाजन अवदात । करत आरती श्रीपति तेरी केवलदुति दरशात ॥ भवभयपीर हरो म्हारी, तोहि यजूंजी वरवीर। भवभय० ॥६॥ ओं ही विदेहक्षत्रस्थश्रीसूरमभुजिनेंद्राय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ धूप अगर श्रीखंडचूर्ण पर, उमगे अलिगन आत । ऐसो धूप धरत धूपायन, कर्म सो जरिजात ॥ googlegro 36 12
पि.ती
उ
भवभय पीर हरो म्हारी, तोहि यजूंजी वरवीर । भवभय०॥७॥
ओ ही विदेर क्षेवस्थश्रीमूरप्रभुजिनेंद्राय धूपं निकामीति स्वाहा ॥ ७॥
चोचक चारु निवु नारंगी, दाडिम दाख सुहात ।
हग मनहर फल धरि तव पायन, भविजन शिवफल पात ॥
भवभयपीर हरो म्हारी, तोहि यजूंनी वरवीर । भवभयः॥८॥
मोदी विदेहक्षेत्रस्थश्रीमूरप्रभुजिनेंद्राय फलं निपामोति स्वाहा ॥ ८ ॥
जल चंदन अक्षत मनमथसर नेवज नेन सुहात ।
दीप धूप फल अर्घ बनाकर पूजूं जिन हरपात ॥
भवभयपीर हरो म्हारी, तोहि यजूंजी वरवीर । भवभय० ॥९॥
ओं दी विदेडक्षेत्रस्थ भीमरप्रभुजिनेंद्राप अब निर्मपामीति साहा ॥ ६ ॥
पि.ती पूजा ८० अथ जयमाला। दोह।। पूरि परमदुतितॆ रहे, भूरि भरमतम चूर । हनि कुतर्क तारक प्रभा, सूरप्रभू वचसूर ॥१॥ तोटक छन्। तव जोतिसरूप घटै न इटै, ति हिकूमत सर्व सदीव रटै। अकलंक चिदंक समं असम, वृष अंक निशंक स्स्यं विषमं ॥२॥ अकलं अचलं सकलं विमलं, अअलं सअलं सुवचं सुअलं। अतनं अगनं सुमनं दमनं, रमनं वमनं भवदुःखगनं ॥ ३॥ दुखदाघहतार्थधनं सधनं, गरुड दुररागफणीदमनं। अघोषधनं धनही पवनं, दुरआमपिपासहनं सुवनं ॥ ४॥ अघटं विकटं निकटं सुघर्ट, अतटं सुनटं विरदं सुरटं । US ८१ अखयं अभयं अजरं अमरं, सचिरं अचिरं सपरं अपरं ॥५॥ विददं अगदं अगदं सुसद, सुखदं शिनदं शुभदं सुविदं । अभरं सभर सुकरं निकरं, अगतागत तू जितकं समरं ॥ ६ ॥ न क्षुधा न तृपा नहि रागधृतं, नहि द्वेप रु जन्म जरा न मृतं । भय विस्मय रोग रु शोकहतं, नहि स्वाप महादुखदाय रतं ॥७॥ नहि स्वेद रु खेद जु मोह मदं, नहि आरति और सुर्चित इदं । यह दोप महा दश आठ हने, वरवैन दयारसपूर सने ॥८॥ त्रय काल जु भूत रु वर्तन हे, सुभविष्यत भेद कहे तुम हैं। विन गोवर अक्ष पदारण जे, सु जिताय दिये सबकू जिम जे ॥९॥ हरते अनुभी सुख होत महा, नहि लोक विरुद्ध प्रसंग तहां । भ्रममें भवि भूल रहे सुजिन्हें, सुखपंथ जिताय दियो सुतिन्हें ॥१०॥ समये इक जो परतीति धरै, वह जीव अनूपम शक्ति वरे । दर पूजा विती ૮૨ । परिवर्चन काल जु अर्द्ध समै, फिर तो भवकाननमें न भ्रमै ॥११॥ यह दीनदयालपनो तुमरो, सु उचारि सकै मुख क्यूं हमरो। अरजी उर “थान" तनी धरिये, अब दीन निहारि दया करिये ॥१२॥ बत संयमभाव हिये धरिये, समतारस पूरि सुखी करिये। परिपावन ये हम जाचत हैं, तुमसेव सदा अभिलाषत हैं ॥१३॥ देवराज छंद। हटै कुभावकी घटा सुज्ञानभानको प्रकाश होत है। हुवै समग्र सिद्ध काज उग्र पुण्यके समाज सो लहै ॥ दिवेश वेलिके समान अपमान सौख्यदान है यही। करे जिनेशकी सुभक्ति द्वैत्रिदोषतें विमुक्त जो सही ॥१४॥ ओं है विदेहक्षेत्रस्थश्रीवरप्रभुजिनेंद्रायपूर्णा निर्वपामीति स्वाहा ॥ श्रडिल्ल छंद । सूरप्रभु जिन तनी सुखद जयमाल है।
पूजा RECORRE शुभ संचयकरतार अशुभको साल है। घरे ज्योति मनु परम कलानिधिकी कला। कुमुद ज्ञानविकसान तिमिरदुरमतिदला ॥ इत्याशीवादः। इति श्रीसूरमभुजिनेंद्रपजा समाप्ता ॥ ९ ॥ । अथ श्रीविशालकीर्तिजिनपूजा। Fr गजेन्द्रगति पद ( नेसा) हे गिरपुंडर जन्मपुरी सुपुरी सुरराजसमान विख्याता। भूप विजेश पिता सवितादुति देन विजै विजया वर माता॥ पुगिरि यनगरी (M) के समान पूरी lit गमान ग देनेगी।
PRE
वि.ती
८४
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केतु लसै सुरईश्वर चिह्न विलोकत ही उपजै मन साता।
पूजा
देव विशाल विशालदया करि तिष्ठ इतॆ अब हे जगत्रांता॥
ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीविशालकीर्तिजिनेंद्र अत्र अवतर अातर संवौष ।
ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीविशालकीर्तिजिनेंद्र भत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठाठः।
ओं वी विदेहक्षेत्रस्थश्रीविशालकीर्तिजिनेंद्र पत्र मप सन्निहितो भव भव । वषट् ।
अथ अटका
गीता छंद।
जल अमल गंध सरोजजुत लॅटहार भंग भरायकैं।
प्रकटान शीतल सहज निज जिन चरन देहु चढायकैं॥
पदनखर जासँ कलिंद भव्यमलिंदै मोच साल है।
१पनजाम २ इन्द्र ३ यहुत दगा करके ४ हे जगकी रक्षा करनेगाले ५ सच्छ ६ कमल सहित ५याम
हरने पाला ८ मारी ९ चरणकि नरा १० जिराके ११ तराम-सूर्य १२ भव्यरूपी भ्रमरफिलिये १३ आर ! ८४
तथा प्रफुलित करनेको १४ रगीला राया गदर ।
पूजा प्रहरी शुचि सुभगे समरसताले सुगुनविशाल देव विशाल है॥१॥ ओं ही श्रीविशाल कीनिजिनेंद्राय जलं निर्वामीति साहा ॥१॥ कश्मीर सुभग सुरंग संग पटीर नीर घसायके । तपभाव आकुल इरन श्रीपति चरन देहु चढायक ॥ पदनखर जास कलिंद भव्यमलिंद मोच रसाल हैं शुचि सुभग समरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥२॥ मों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीविशार कीर्तिजिनंद्राय नंदन निर्वपामीति स्वाहा ॥२॥ उज्ज्वल अखंडित गंध मंडित श्याम जीर सुहावने। जल क्षाल अक्षत अखयपदहित यजूं जिनपद पावने ॥ पदनखर जास कलिंद भयमलिंद मोच साल है। शुचि सुभग ममरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥ ३ ॥ 1114 सुपर गमगारगोमात पुनोहर मैगु इन। 4- -4 ~ वि.ती ८६ KASARS2324 ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीविशालकीर्तिजिनेंद्राय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥३॥ वरवरन सुभग सुगंध पूरित प्राण हग ललचावने । हम यजत लेय गुलाब आदिक सुमनवृन्द सुहावने ॥ पदनखर जास कलिंद भव्यमलिंद मोच रसाल है । शुचि सुभग समरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥ ४॥ ओं ही विदेहक्षत्रस्थश्रीविशालकीर्तिजिनेंद्राय पुष्पं निवपामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ नैवेद्य षटरसपूर बलकर सद्य सुभग सुहावने । हम यजत जिन लहि चारु चरु सुरभोगसम मन भावने ॥ पदनखर जास कलिंद भव्यमलिंदमोच रसाल है। शुचि सुभग समरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥५॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीविशालकीनिजिनंद्राय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ लसत जगमग जोति ललित उदोत दीप प्रजारिके। XKESH ८६ गिनी हम स्वपदगुन सुप्रकाशहित जिन चरन धरत उतारिके। पदनखर जास कलिंद भव्यमलिंदमोच रसाल है। शुचि सुभग समरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥६॥ श्री ही विदेहक्षेत्रस्थीविशालकीर्तिजिनेंदाय दीपं निपामीति साहा ॥६॥ वर धूप गंध अनेक मिश्रित वातहोत्रविर्षे धरें। मनु यजत जिनवर चरन भविके धूम मिस पातक टर। पदनखर जास कलिंद भव्यमलिंद मोच रसाल है। शुचि शुभग समरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥७॥ जी निवेदोषस्थतीविशालकीर्तिमिनेंद्रेभ्यो पूर्ण निर्मपामीनि पहा ॥ ७ ॥ फल पक मधुरे दाख दाडिम आमखारिक पावने । लहि यजूं भाभय हरनको गुग वान मुनिमन भावने । ० १।।
- वि.ती पूजा ८८ पदनखर जास कलिंद भव्यमलिंद मोच रसाल है। शुचि सुभग समरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥८॥ ' ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीविशालकीर्तिजिनेंद्रीय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ८ ॥ जल गंध अक्षत सुमन सुंदर चारु चरु रसपूरही । धरि दीप धूप फलौघ करि यजि जगतपति सुखपूरही। पदनखर जास कलिंद भव्यमलिंद मोच रसाल है। शुचि सुभग समरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥ १ ॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीविशालकीर्तिजिनेंद्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ अथ जयमाला। ( कवित्त छंद) कीरति विशाल है विशाल वरमाल जास, मोचन कलंक लसै लोचन विशाल है। S SAREEG ८८ स वे.ती ७६ भवभय पीर हरो म्हारी, तोहि यजूंजी वरवीर । भवभय० ॥७॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसूरप्रभुजिनेंद्राय धूपं निर्वामीति स्वाहा ॥ ७॥ चोचक चारु निंबु नारंगी, दाडिम दाख सुहात । दृग मनहर फल धरि तब पायन, भविजन शिवफल पात ॥ भवभयपीर हरो म्हारी, तोहि यजूंनी वरवीर । भवभयः॥८॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीसूरप्रभुजिनेंद्राय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ८॥ . . जल चंदन अक्षत मनमथसर नेवज नैन सुहात । दीप धूप फल अर्घ बनाकर पूजूं जिन हरषात ॥ भवभयपीर हरो म्हारी, तोहि यजूंजी वरवीर । भवभय० ॥९॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीसूरप्रभुजिनेंद्राय अर्ध निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ **kik 98 *25- CAME gir 20 भ्रमवसाय परकू निज जान्यो, निजखरूप अपनो न पिछान्यो। पिता विविध दुःख भवमें जु लहाये, नहि जु जात इकमुखतें गाये ॥५॥ मरकभूमि भयदा अधिकाई, जुत प्रमाद हति जीवन पाई। डंक सहस विछवा मिल मारे, परस पीर इतनी विसतारे ॥५॥ उसन शीत अतिचंड तहां है, गिरत मेरु सम लोह गला है। जनमथान अति ही भयदाई, सकल रोग बहु हैं दुचिताई ॥ ६ ॥ करत मार करुना नहि लाव, कलह रेन दिन तहां सुहावै । निमिषमात्र तिसमें सुख नाही, पचत दुःख दव अग्नि जु माही ॥६॥ तलत तेल मधि पावक जारे, पकर पांव भुविमांहि पारे। हनत हाड उर अंतरजाली, मरम भेद कर होत विहाली ॥८॥ धरि करोत लकरीवत वेर, धारि यंत्रमधि तहां सु पैर । तिलसमान सबही तन खंडे, मरनकाल विन प्रान न छडे ॥९॥ KX.CALEEP-42-AR- २०
पता
ARLS
चिनी
सफल लोक अन जो भख लेवे, तदपि भूख नहि शांति जु देवे ।
सकल सिंधु जलपान जो ठाने, तनक नाहि तिनकी तिस भान ॥१०॥
मिलत नाहि कन अन्न जहां है, जल न दसम सो जुलहा है।
अगनियोग कर ताम्र गलावे, मधु कुपान करके वह पावे ॥११॥
करत नीच पलभक्षन जो है, भखत जोझि तिनके तनकू है।
सघिर राध सवती दुसदेनी, प्रवल क्षारयुत है सुखखनी ॥ १२ ॥
करि जु लोहपुतरीजुत पावे, पर सुभामरतकं लिपटावे ।
नेत्रनितें जु करत कुटिलाई, इरत तास हग करि निठुराई ॥ १३ ॥
वदत वैन परकू दुखदाई, करत तास रसना तिह ठाई।
सकल दुःख समुदाय जहां है, ससनचाल विकराल तहां है।
वन जु भीम शिखरी भादाई, करत घाव अप्तिपत्र तहां ही।
नहिं समान कोऊ दुख तातें, कहन कोन सक कोटमुखातें ॥१५॥
, पूजा वि.ती १२ लहत आयु तहँ सागरमानं, इम दुखौध हम सहे अमानं । पशु कुयोनिमधि जो दुख पाये, प्रकट तोहि कछु नाहि दुराये ॥१६॥ दरश हीन सुरहू दुख पावै, परविभूति लखिकै ललचावै । मुरझि माल जब जात अगारी, मरन जानि उपजे दुखभारी ॥१७॥ चवत देखि वनिता दुख पावै, तनक नाहि वरन्यो वह जावै । मनुष योनि अतिपावन सोऊ, सुखित नाहि तिसहूं मधि कोऊ॥१॥ वय जु बाल परकै वसि जानो, विविधरोग करि संयुत मानों। तरुन भोगवासि यौवनमांही, प्रबल आश वयमध्य तहांही ।। १९ ॥ शुभवियोग दुखयोग लहावै, शिथिल अंग वयवृद्ध कहावै । विन पिछान अपनी मरि जावे, थिर विना न थिरता कहुं पावै ॥ तुम स्वरूप थिर हो थिरगामी, थिर सुथानकरता थिरनामी। थिर स्वभाव हमकू दरसावो, दुखित जानि करुना उर ल्यावो ॥२१॥ ६२ वि.ती पूजा शुभ संचयकरतार अशुभको साल है ।। धरै ज्योति मनु परम कलानिधिकी कला। कुमुद ज्ञानविकसान तिमिरदुरमतिदला ॥ इत्याशीवादः। इति श्रीसूरमभुजिनेंद्रपजा समाप्ता ॥ ९ ॥ * *5-96 अथ श्रीविशालकीर्तिजिनपूजा। गजेन्द्रगति छन्द ( तेईसा) है गिरपुंडर जन्मपुरी सुपुरी सुरराजसमान विख्याता । भूप विजेश पिता सवितादुति दैन विज विजया वर माता॥ ८३ १ पुण्डरगिरि २ नगरी (स्वर्ग) के समान ३ सूर्यकी कातिके समान ४ विजय देनेपाली ।
15 अथ श्रीवजूधरजिनपूजा। पूजा वि.ती MESSESAKS छप्पय छंद। करकि क्रूरधुनि पूरराग अहिमूर नशावन । भ्रमपहार चकचूर जोति अनुपम दरशावन ॥ विपतवत्र सर्वज्ञ वीच दुतिवक झुमकत । डरत सृष्टिपरभाव धरनि मिथ्यात्वधरकत ॥ इम वैन वज्रवर शस्त्रधर, जय जय जिनपति वज्रधर । करि कृपा दलतदुख दासके, तिष्ठ तिष्ठ इत देव कर ॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवजधरजिनेंद्र ! अत्र अवतर अवनर । संवोपद् । ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवज्रधरजिनेंद्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठ: । ओं दो विदेहक्षेत्रस्थश्रीवज्रधरजिनेंद्र ! अत्र मम सनिहितो भव भव । वषट् । RX पूजा वि.ती 3685 ८५ RECE शुचि सुभगे समरसताले सुगुनविशाल देव विशाल है ॥१॥ ओं ही श्रीविशाल कीर्तिजिनेंद्राय जलं निर्वामीति स्वाहा ॥१॥ कश्मीर सुभग सुरंग संग पटीर नीर घसायके । तपभाव आकुल इरन श्रीपति चरन देहु चढायकैं। पदनखर जास कलिंद भव्यमलिंद मोच रसाल हैं। शुचि सुभग समरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥२॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीविशालकीर्तिजिनेंद्राय चंदनै निर्वपामीति स्वाहा ॥ २॥ उज्ज्वल अखंडित गंध मंडित श्याम जीर सुहावने । जल क्षाल अक्षत अखयपदहित यजूं जिनपद पावने ॥ पदनखर जास कलिंद भव्यमलिंद मोच रसाल है। शुचि सुभग समरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥ ३ ॥ --- १ पवित्र २ सुन्दर ३ समतारसके ताल ४ अच्छे गुणोंकर सयुक्त ५ चंदन ।
वि.ती पूजा पतिरैन फैन समान दुति अति ऐन जुत मनहारहै । हिन अखय पद पदतर घर पर चाहि क्षुतक्षयकार है । दुर्तिकंज मंजु सुगंध धारपद वज्रधर यजि शुभ सजें। तिन कुलिशधर हरधर प्रभाधर चक्रधरगनधर यजें ॥३॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवज्रधरजिनेंद्राय अक्षतान निर्मपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ तृण द्रुमा सारस सेवती शुचि सोन जाय सुहावने । सो हरन पनसर शान सुमनसंमूह धरि मनभावने ॥ दुति कंज मंजु सुगंध धरि पद वज्रधर याज शुभसजें। तिन कुलिशधर हलधर प्रभाधर चक्रधर गनधर यजें ॥४॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवत्रधरजिनेंद्राय पुष्प निर्वामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ घृत शरकरायुत विविध व्यंजन शुभग सद्य सुहावने । वरनवर क्षुतहर सुगंधित अअधरि मनभावने ।। RREOS ----- पूजा वि.ती ८७ हम स्वपदगुन सुप्रकाशहित जिन चरन धरत उतारिक । पदनखर जास कलिंद भव्यमलिंदमोच रसाल है। शुचि सुभग समरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥६॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीविशालकीर्तिजिनेंद्राय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ वर धूप गंध अनेक मिश्रित वांतहोत्रविर्षे धरैं। मनु यजत जिनवर चरन भविके धूम मिस पातक टरै ।। पदनखर जास कलिंद भव्यमलिंद मोच रसाल है। शुचि शुभग समरसताल सुगुनविशाल देव विशाल है ॥७॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीविशालकीर्तिजिनेंद्रेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।। ७ ॥ फल पक्क मधुरे दाख दाडिम आम्रखारिक पावने । लहि यजूं भवभय हरनको युग चान मुनिमन भावने ॥ -ब-%ER ८७ १ अग्निमें।
वि.ती पूजा RER 45 नों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवज्रधरजिनेंद्राय धूपं निर्मपामीति स्वाहा ॥७॥ सुभग होलिक अंव एला पूररस निंबुक भले । वररंग नारंगी सु आदिक लेयकै फल मन रले ॥ दुतिकंज मंजु सुगंध धरि पद वजूधर यजि शुभ सर्जें। तिन कुलिशधर हरघर प्रभाधर चक्रधर गनधर यजें ॥८॥ ओं की विवेहक्षेत्रस्थश्रीवजयरजिनेंद्राय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥८॥ जलंगंध अक्षत सुमन चरु अरु दीप धूप फलौघही। इम अर्घकरि प्रभु अग्रधरते हरत हैं अघ औषही ।। दुति कंज मंजु सुगंध धरि पद वजूधर यजि शुभ सजें। तिन कुलिशधर हरधर प्रभाधर चक्रधर गनधर यजें ॥ ९॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवत्रधरजिनेंद्राय अर्ध निवेपामीति स्वाहा ॥६॥ ब २८ 5 पूजा -- वि.ती ६६ अथ जयमाला। चंद्रावर्त छंद। वज्रअस्थिनसकील जु सकलं, वज्र जेम तनकी दुति अमलं । शीलवब्र गहि कं गिरिहरता, देव वज्रधर तू जगभरता ॥१॥ मोतीदाम छंद। अतत्त्वप्रतीत जु वजू महान, विदारन• कनवज समान । चये तुम कोमल बैन जगीश, गुहे तिनकू गहिकै गन ईश ॥२॥ क्ह्यो सब जीव अजीवस्वरूप, भने विधि बंधनकू दश रूप । मिले सब जीव रु कर्मसंयोग, वनै तहँ बंध महा दुखयोग ॥३॥ जब रस देत उदै वह जानि, उपायबसैं सु उदीरण मांनि । रहै जबलों वरनो सत तास, बढे थिति सो उतकर्षण भास॥४॥ घटै थिति सो अपकर्षणरूप, हुवै जब संक्रमणं पररूप । HSRLS ६६ ।
चि.ती पूजा १०० 3- उदीरण ता विन है उपसम्म, उदीरण संक्रमणं सु जुगम्म ॥२॥ नहीं जहँ येह निधचि सु तेह, निकांचितमांहि नही चव येह । जहां उतकर्षणको न प्रसंग, कछू अपकर्षणको नहि अंग ॥६॥ उदीरण संक्रमणं जुग नाहि, इन्हीं वसि जीव भ्रमै भवमांहि । सुचिंतन पावक वजू प्रजारि, दशूविधि बंध किये तुम छारि ॥७॥ छई निज जोति सबै जगपूर, भये भविजीवनके दुख चूर । कह्यो दश धर्म सु जातिस्वभाव, मनूं भववारिधको वर नाव ॥८॥ लहें तुम ध्यान किये निरवान, कहा विसमै इसमें भगवान । तपोधन तो गुनमें मन धार, करें जगजंतु सुखी भय टार ॥९॥ पशूगन हू तुव नाम रटात, विवेकविना पदवी सुरपात । लखें तुमरी छविकू भरि नैन, कहैं महिमा तिनकी किम वैन ।॥ १०॥ अहो तुम जन्म भयो इह ठाम, लह्यो सुख नारक हू अघधाम । १०० अगोचर अक्ष निजातमरूप, तुम्हें उर धार लखें मुनिभूप ॥११॥ यि.ती मथें तुम बैन सुकोमलदारु, जगें कर जोरि कृशानु विचारु । जरें धन मोहमहावन भूरि, लसै निजजोति सवें जग पूरि ॥१२॥ जयो तुम वैन करिंदसरूप, करै विदतिन कोल अनूप । अनंतनयातम अंग विशाल, हिताहितवधि सु उन्नतभाल ॥ १३॥ सुग्राहक भाल लसे वरसुंड, फवें सितदंत प्रमान अखंड । कृपाकरनीरत मत्त महान, झरै नयगंडनतें पयदान ॥१॥ रही मॅडि भव्य सिलीमुख भीर, धेरै समतामय गोनस धीर । करे उपदेश सु गर्ज निषाद, उदे शुभ सुंदरघंट निनाद ॥१५॥ अनातमभाव अनोकुहखडि, दई भवसंमृतिवेल विहंडि। महामुदमंगलवू प्रगटात, लखे मुनि भूपनिषू ललवात ॥ १६ ॥ यह वर वानिक सो सुखदैन, सो हमरे उरमें दिनरेन । । १०१ चि.त SOR पूजा १०२ करो करुना करुनाजलसिंधु, सही तुम दीननके वरबंधु ॥ १७॥ तुही पदपंकजको उरवास, रहो जबलों नहि बंधविनास । प्रतीति तुही वचकी वरदेव, रहै नित ही चरणांबुजमेव ॥१०॥ मिलै सतसंगतिही सुखरास, हुवै जबलों शिव "थान" निवास । अहो जिन! जाचत हैं हम तोहि, अजाचकतापद दे अब मोहि ॥१९॥ शिखरिणी छंद। सुसीमाख्यं रम्यं जनमपुर शोभावरयुतं । पिता पूर्ण क्रांतिः पदमरथनामा क्षितिधरं ॥ प्रभारंभाहारी जननि जगत्राता सरस्वती। जयो कंबूकेतू प्रणतभयहा वज्रधर ! त्वम् ॥२०॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीवजू परजिनेंद्राय जयमालाघे निर्वपामीति साहा ॥१॥ अडिल्लछंद। करत वजूधर देव तने गुनगानकू। SCORE १०२ 4-2-% 4-5 पूजा वि.नी 4 ततछिन देत उडाय कुमतिके मानकू ।। करत सुगतिसंबंध बंधविधिकू हरै। अमल अचल सुखपूर मुक्तिपदवी धरै ॥१॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीवज्रधरजिनपूजा समाता ॥ ११॥ १०३ RA अथ चंद्राननजिनपूजा। कुसुमविचित्रा छंद। विधितमछायाविगत विराजै, दुरमतिकोकी उर दुखप्ताजै। जय जिन चंद्रानन जगचंदा, मम हित तिष्ठौ गुनगनवृंदा ॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्राननजिनेंद्र अत्र अवतर अवता । संवौषट् । ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्राननजिनेंद्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ । 3 ।। ओं ही विदेहक्षेत्रस्वश्रीचंद्राननजिनेंद्र अत्र मन सनिहितो भव भव । वषट् । १०३ पूजा विती १०४ RASAROKES 'अथ अष्टक। छंद चाल लावनी। शरन मैं चंद्रानन तोरी, तिमिरअविद्यानिशि निशिनायक हरहु तपत मोरी । शरन मैं चंद्रानन तोरी शरन०॥ हिम सम शीतल विमल सलिल शुचि, भरूं कनक झारी । धरूं धार तब चरनकमलतर, जनम मरनहारी॥ शरन में चंद्रानन तोरी, तिमिरअविद्यानिशि निशिनायक. ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्रानननिनेंद्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ घसि चंदन करपूर नीरसँग, तपत पीर हारी । पूजू परम उछाह भाव धरि, तव पद त्रिपुरारी॥ शरन में चंद्रानन तोरी, तिमिरअविद्यानिशिनिशिनायफर ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्राननजिनद्राय चंदनं निर्वपामीति साहा ॥२॥ १०॥
MAS पूजा वि.नी १०५ अक्षत औघ अखंड श्वेत शुचि, सुंदर भरि थारी । करूं पुंज तव चरन अग्र जिन, पद अक्षयकारी ।। शरन मैं चंद्रानन तोरी, तिमिरअविद्यानिशिनि शिनायक भों ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीचंद्राननजिनेंद्राय अक्षतान् निर्वामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ सुमन मनोहर विविधवरनके, वरसुगंधधारी। हे शिवेश ! तुह चरनन चोदूं, मदनपीरहारी ॥ शरन मैं चंद्रानन तोरी, तिमिरअविद्यानिशि निशिनायक ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्राननजिनेंद्राय पुष्पं निर्वगीति स्वाहा ॥ ४ ॥ नेवज विविध नवल बलकारक, सुंदर मनहारी । धरूं भेट तंब चरन अग्र जिन, रुजक्षुतक्षयकारी। शरन मैं चंद्रानन तोरी, तिमिरअविद्यानिशिनिशिनायक० भों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्राननजिनेंद्राय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ५॥ %AXY १०५ ECE पूजा विती १०६ दीप रतनमय वा घृतपूरित, अतिदुति तमहारी। करूं आरती करिअब मम उर, निजगुन उजियारी।। शरन मैं चंद्रानन तोरी, तिमिरअविद्यानिशिनिशिनायक. ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्राननजिनेंद्राय दीपं निर्वपामीति साहा ॥ ६ ॥ करि कपूर अगरादिक चूरन, परिमल मलहारी। धूप विषमविधिबंध दहनकू, दहन मध्य जारी॥ शरन मैं चंद्रानन तोरी, तिमिरविद्यानिशिनिशिनायक. ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्राननजिनेंद्राय धूपं निर्वामीति स्वाहा ॥ ७॥ रसपूरित रसनामनभावन, फल शुचि सुखकारी। विधिफल विफलकरन भयभंजन, करूं भेट थारी॥ शरन मैं चंद्रानन तोरी, तिमिरअविद्यानिशिनिशिनायक ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्राननजिनेंद्राय फलं निर्वपामीति स्वाहा ।। ८॥ COLLECRETAL--२ १०६ RE- विती पूजा १०७ जल चंदन गंधाक्षत केसर, नेवज बलकारी। दीप धूप फल मेलि अरघ करि, यजूं विधन टारी। शरन मैं चंद्रानन तोरी, तिमिरअविद्यानिशिनिशिनायक ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्राननजिनंद्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।। ६ ॥ अथ जयमाला। दोहा। विमलभाव षोडश कला, पूरित अतिदुतिवंत । वचनसुधासीकरानकर, भविगन अमर करंत ॥१॥ चौपाई १६ मात्रा। भरमभाव वय बाल मिताई, निजरतभास तरुनता छाई। शोभा सरस अंग वसु बाढी, रची प्रीति शिवतियतै गाढी॥२॥ मजन मल परभाव उतारे, केश सघनरुचि रुचिर सँवारे । १०७ वि ती १०८ सम्यकदरश मुकुट सिर छाजै, उद्यम भाल तिलक वर राजै ॥३॥ बंधुर वसन दशू दिश राजै, दश वृषभेश मुद्रिका छाजै । शक्ति विकाश इतर महकावै, द्विविध धर्म कुंडल दरसावै ॥ ४ ॥ नययुग लसत पादुका दोऊ, ध्यान कृपान चंड अरिखोऊ। सुभग शील पटका छवि छाजै, भेदबुद्धि असितनुजा राजै ॥५॥ वरविद्यायुत श्रीमुख सोहै, रचित तमोलराग वृष जो है । वस्तु दिखान सत्यमुख बानी, निज हित चतुर सकल सुखदानी ॥ इम षोडश शृंगार सँवारे, वर विराग केयूर सुधारे। दृढ प्रतीति भुजबंधन राजै, सुमन सुमनमाला उर छाजे ॥७॥ सो वर मुक्तिरमनिका झूला, गुप्तितीन कटिसूत्र सु मूला। चर्या चरनाभरण विराजै, सरलसुभाव छरी कर छाजै॥८॥ तुरी वर विवेक झलकावै, सुमति सेहुरा सब मन भाव । SEk १०८ पूजा मन मतंग अमवार सुराजे, प्रभुता छत्र परम छवि छाजे ॥९॥ चामर द्विविध दयामित सोहे, अतुल तेज त्रिभुवन मन मोहे । अनहद धनि दुंदुभि घरराने. अनुभव वर निशान फइरावै ॥१०॥ प्रत वरात मँगई रंग भीनी, नृत्य करत निति ऋद्धिनवीनी। अतिशयभाव असम दरमावे, विविधभांति भविमन ललचावै॥११॥ इम समाजयुत जगभूषा, राजन हे मुद मंगलरूपा। शिवपामा वर वरगुनधारी, निजवल प्रबल सफल खलहारी ॥१२॥ पद उर धान करत अघहानी, निजविभनिदाता वर दानी। मुगुन रटन कोउ पार न पाये, रटत रटत तुम सम है जावे ॥१३॥ गाहि गाहि गुणमिधु निहारो, गणपति ज्ञान लहहो नहिं पारो। तो कहि. पार कौन कवि गो, निजभव सफल हेत गुन गावे ॥१४॥ करि कृपाल वरा तिहारी, हरहु धीर ! भवगीर हमारी। 102 गिती पूजा १९० "थान" शरन तोरी शिवनाथा, तजि विलंब करिहो शिवसाथा॥१५॥ पमियादा राजै नगरी पावनी, पुंडरीकणी जास। बालमीकि भूपति पिता, सुंदर दयानिवास ॥ सुंदर दयानिवास दयावति माता सोहै। वृषभचिद धवजगाहि देखि सुर नर मन मोहै। जास चरनयुग सेय सौख्य भनिगनकू साजै। सो चन्द्राननदेव ताप भवभंजन राजे ॥१६॥ 'मोदी विक्षेपस्यश्रीजाननजिनेदाप जयगाला निर्मपामीति लाम प्रापि चंद्राननके चरनसरोजनकू यजे । सजै सकलसुख आज दुःखगन सबभजे ॥
वि.ती पूजा रसना पावन भई करत गुनगानकू । मिल्यो परमशिवथान आज मनुं “थान" कू॥१॥ इत्याशीर्वादः । इति श्रीचंद्राननजिनेद्रपूजा समाप्ता ॥ १२ ॥ अथ श्रीचंद्रबाहुजिनपूजा। -- प्रवरललिता छन्द । चकोरं भव्योघं गनसुखदा घांतहारी। अगम्यं राहो त्वं वचरसयुतं मृत्युहर्ता । कमोदं स्वेबोधं विकसितकरं पूर्णक्रांतिः। इतै तिष्ठौ तिष्ठौ जनतमपहा चंद्रबाहु ॥१॥ AREE पूजा वि.ना है ११२ CARROR- ओं ही विदेहक्षेत्रस्थितधीचंद्रवाहुजिनेंद्र ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । ओं ह्रीं विदेहक्षेत्र स्थितश्रीचंद्रबाहुजिनेंद्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । उः ठः। ओं ही विदेहक्षेत्रस्थितश्रीचंद्रबाहुजिनेंद्र ! अब मम सन्निहितो भव भव । वषट् । अथ अष्टक। छंद चाल ठुमरी। मेटो मेरी पीर जिनंदजी, तोरी मैं शरना आयो। टेर॥ प्रासुक नीर पीर तृटभंजन, जनमनरंजन मैं ल्यायो। दैन विषमभवरोग जलांजलि, तव पद पूजन उमगायो॥ मेटो मेरी पीर जिनंदजी, तोरी-मैं शरना आयो॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्रवाहुजिनेंद्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।। १ ।। सुभग पटीर घसि जलके संग, कुंकुम मिश्रित महकायो। व्याधि प्रबल आकुल कुल बारन, चरन चढावत हरषायो॥
वि.ती % . मेटो मेरी पीर जिनंदजी, तोरी मैं शरना आयो ॥२॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्रबाहुजिनेंद्राय चंदनं निवपामीति स्वाहा ।। २ ॥ दुति मृगांक हिम जलज फेन सम, उज्ज्वल अक्षत में ल्यायो । करि पावन वसुमी क्षिति पावन, चरन चढावन हरषायो॥ मेटो मेरी पीर जिनंदजी, तोरी मैं शरना आयो॥३॥ '; 'ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्रबाहुजिनेंद्राय अक्षतान् निर्वपामीति, स्वाहा ॥ ३ ॥ मदन बाण तृण द्रुमा सेवती, वर गुलाव ग मन भायो। झकध्वजकील शील श्रीदायक, तव पद पंकज ढिग ल्यायो । मेटो मेरी पीर जिनंदजी, तोरी मैं शरना आयो॥४॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीचंद्रबाहुजिनेंद्राथ पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ पूपक पाक मनोहर घेवर मोदन-मन मोदक ल्यायो।।.) .:. खोवन क्षुत तरुमूल कुफलदा, तव पदतरि घर हरषायो॥ . ११३ REAKER यिती पूजा, मेटो मेरी पीरजिनंदजी, तोरी मैं शरना आयो॥५॥ भों ही विदेवक्षेत्रस्थश्रीचंद्रबाहुजिनेंद्राय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ दीप कपूर पूरक घृततें, ललितज्योति तमहर ल्यायो। कुमति कुहर हरिये मम उरको, करूं आरती हरपायो॥ मेटो मेरी पीर जिनंदजी, तोरी मैं शरना आयो ॥६॥ ओं की विदेहक्षत्रस्थश्रीचंद्रयाहुनि द्राय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ शुचि चंदन वर कदलीनंदन, अगरादिक चूरन ल्यायो।। धरि पावक वसु कर्म प्रजारन, हरपि हरपि तुव गुन गायो।। मेटो मेरी पीर जिनंदजी, तोरी में शरना आयो ।॥७॥ ओं की विदेहयोत्रस्थश्रीगंद्रवाहजिनेंद्राय धूप निर्यपामीति स्वाहा ॥७॥ करना कैथ जमेरी दाडिम, अंबक आदिक फल ल्यायो। शिवफल पावनकू जगपावन, तोहि जजू में हरपायो । R मेटो मेरी पीर जिनंदजी, तोरी में शरना आयो॥८॥ ओं की विदेहक्षेत्रस्यश्रीचंद्रयाइजिनेंद्राय फलं निर्वामीति साहा ॥८॥ जल चंदन अक्षत अनियारे, कुसुम सुगंधित वरु ल्यायो। दीप धूप फल लेकरि, पावन अर्घ चहार्दू उमगायो । मेटो मेरी पीर जिनंदजी, तोरी में शरना आयो॥९॥ ओं की विदेहक्षेत्रस्यश्रीनंद्रयाहुजिनद्राय अर्ष निर्वपापीति स्वाहा ॥९॥ अथ जयमाला। गोदा हंस मत मन मानसर, भवदुखकंज तुषार । सुखसमुद्रवर्धन विधू, चंद्रबाहु जयकार ॥ १० ॥ सीपगा। यह जगत जलाध ताको न तीर, पट द्रव्य शक्ति सत्ता सुनीर ।
वि.ती पूजी ANSKHE व्यय उत्पति ध्रौव्य तरंग जास, भरपूर भस्यो नहिं आदि तास ॥२॥ शुभ द्वीप बसै सुख रत्नपूर, दुरगति दुख जलचर बसत कूर । बडवानल मोह महाप्रचंड, विधि उदय मौज उछलै अखंड ॥३॥ चढिके परपरणति पोत भूरि, मद मत्सर तम तस्कर करूर । विचरें दुरलालचके निकेत, धन संतनके गुन हतनहेत ॥४॥ इहको नहि थाह कहूं जिनेश, तुम ज्ञानविर्षे झलक अशेष । निजगुन मुकताफल गहनहार, भविजीव रचें ऐसो प्रचार ॥५॥ जिनवचनप्रतीति जिहाज सार, सत गुरु शुभमग दरसानहार । ऐसें करिकै जु कर प्रवेश, या विध फुनि श्रम ठाने सुवेश ॥६॥ वैराग्यदशाभाजन मझार, बैठे दुरमति सब कर उघार। दृढ सांकल सुरति सु जोरि तास, राबै निजथान लगाय जास॥७॥ जग आशा तजिकै है निशंक, जगदीश्वरके ध्या३ चिदंक । :- पूजा विती ऐसे स्वरूपजलमें अपार, खोजें अपने गुन बार बार ॥८॥ दिशि और धरै रंचक न ध्यान, तब पावत हैं अक्षय निधान । जिन सो निज निज सो जिनस्वरूप, कर कैंप्रतीति है जगतभूप ॥९॥ वर भक्ति तिहारीतें जिनंद, प्रकटै सुख नानाविध अमंद । इम मुनिजन मिल निहचै सुकीन, तुम ध्यानविषे नित होत लीन ॥ ते पावत हैं शुचि शक्ति सार, सो सुरपति एमैं ना लगार । तुम धन्य जगोत्तम देवदेव, नित करत पाकशासन सुसेव ॥११॥ वसु द्रव्य वढावत धरि उमंग, फुनि नाचत राचत भक्तिरंग। विरयां समान रचि सब सुठाट, करि तन छिनलघुछिनमें विराट ॥ सजि स्वांग विविध विधिके अनूप, सरमात नवू रस देवभूप । ' वर भूषण भूषित लसत अंग, मनु भूषणांग सुरतरु चलंग ॥ १३ ॥ धुनि भूषण मुख वादित्र भूरि, मिलि एकसनाको सुरहि पूर।
वित्ती पूजा ११८ सम सुर तिताल त्रय ग्राम धारि, लय ललित तरल तान अपार ॥१४॥ ततता ततता वितता भनंत, थेईता थेईता थेईता चलंत । छुम छुम छुम धुंघरू घमक चंग, द्रुम द्रुम गुम द्रुम बाजत मृदंग ॥१५॥ सननननन सारंगी उचार, तुं तुं तननं तननं सितार । तं तनन तनन मुहचंग चंग, झननननन झुनकै जलतरंग ॥१६॥ टम टम टम टम टंकार पूरि, मंजीर बजै सुरतें सनूरि । करतार झरर झररर झुनंत, समपै सब आवत एकतंत ॥१७॥ छिनमें जुगबाहुनकू पसार, सोहै चल करपल्लव अपार । इक कर कटि धरि करि ग्रीव बक, इक कर शिर धरि नाचै त्रिबंक ॥१०॥ मुकुटाकृति बैकर शीस धार, रतनांगणमें विचरै अपार । झट झट झट अनहद होत पूर, इह झुरमट राजै जिन हजूर ॥ १९ ॥ फिर फिर फिर फिर फिरकी सुखात, पग नूपुर झुननन झुनननात । २ पूजा वि.नी ११६ शिर शेखर रत्नप्रभा सु सार, चक्राकृति लै झलकै अपार ॥२०॥ मकराकृत कुंडल झुलत कान, विजलीसम सोहत चल महान । छिन भूपरि छिन नभमैं लसंत, परसैं शशि उडु अवनी महंत ॥२१॥ छिनमें इक है छिनमें अनेक, दरशात विबुधपति विविध भेक । सुर नर मुनि मनरंजन विधान, ताको कवि कौन करै बखान ॥२२॥ हरि उरसरपूरित भक्ति नीर, तव दरशन मनु परसी समीर । इह लीला ललित तरंगरूप, तन मन पावन कारन अनूप ॥२३॥ मैं मो मन पावन करन हेत, उचरी मुख सुंदर सुख निकेत । अब “थान" यही जाचै जिनंद, तब भक्ति बसो उरमें अमंद ॥२४॥ कुंडलिया छंद। देवानंद पिता सुखद, मात रेणुका जास। लसै पद्म लच्छन धुजा, नगर विनीता तास ॥ + ११६ R पूजा SOM वि.ती १२० u नगर विनीता तास जन्मते ही अतिपावन ।।. भविजनवृंदचकोर लोललोचन ललचावन ।। सदा उदित मुखचंद करूं ताकी नित सेवा । चंद्रबाहु जयवंत सकल देवनके देवा ॥२५॥ ओं ह्रीं विदेडक्षेत्रस्थश्रीचंद्रबाहुजिनेंद्राय जयमाला निर्वामीति स्वाहा ॥ अडिल्ल छंद। जयमाला जयदाय चंद्रबाहू तनी। जो उचरै घर भक्ति छारि मनकी मनी ।। धनी कहा यह बात कष्ट टरि जानकी । जन्म मरन मिटि होत अचलता ज्ञानकी ॥१॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीचंद्रबाहुजिनपूजा समाप्ता ॥ १३ ॥ COL १२० PLEMES वि.ती अथ श्रीभुजंगमजिनपूजा। १२१ -01- CRE-STORE k- छप्पय छंद। ललनमुक्तिगुनराग सुनत अनुराग प्रबल भर । तजि बंबी मिथ्यात तेज लोचन प्रमान कर ।। हरि कंचुकी विभाव लसत तन सुगन प्रभावर। अनेकांत फन प्रबल प्रचुर फुकार ध्वनीधर ॥ जिह्वा अनंत नय भेद लखि दादुर कुमत भजंत डर। जय जिन भुजंगम तिज्ञानधर तिष्ठ तिष्ठ इत देववर ॥१॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्यश्रीभुनंगमपरमदेव ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । ओं हीं विदेहक्षेत्राथश्रीभुजंगमपरमदेव । अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः। ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीभुजंगमपरमदेव ! अब मम सनिहितो भव भव। वपटू । १२१ न पुजा विती १२२ अथ अष्टक। चंद चाल राग परज तथा विहाग। लेय सलिल शीतल शुचि सुन्दर, मिष्ट मनूं मधुरूप । भरि भंगार घार त्रय धारूं, हरि भवदुख जगभूप ॥ में तो जिन ! पद थारा पूजू शिव उरहार अनूप ॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीभुजंगमजिनेन्द्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ घसि पटीर पावन जलके संग, युत केसर वररूप । गंध अनूप बंध भव मोचन, अग्र धरूं सुखकूप । मैं तो जिन ! पद थारा पूजू शिव उरहार अनूप ॥२॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीभुजंगमजिनेंद्राय चंदनं निपामीति स्वाहा ॥ २ ॥ अक्षत औघ अखंड अनीयुत, सुकताप्सम शुचिरूप । पुंज करूं अक्षय क्षिति पावन, तव पदतर जगभूप ॥ RES-------- १२२ SEX पूजा १२३ ॥ में तो जिन ! पदयारा पूजू शिव उर हार अनूप ॥३॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीभुजंगमजिनद्राय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ सोन जुही वकुलादिक सुंदर, सुमन समूह अनूप । पूरित गंध धरूं तवं पदतर, हरि मनमथ दुखकूप ॥ मैं तो जिन ! पदथारा पूजू शिव उर हार अनूप ॥४॥ ओं की विदेहक्षेत्रस्थलीभुजंगमजिनेंद्राय पुष्पं निर्वामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ घेवर पाक विविधरस भीने, नेवज नवल अनूप । शुत परवाह दाइवेकू अब, भेट करूं जगभूप ॥ मैं तो जिन ! पद थारा पूजूं शिव उरहार अनूप ॥५॥ ओं ही विवहक्षेत्रस्थश्रीभुजंगमजिनेंद्राय नैवेद्यं निर्वपामीति साहा ॥ ५॥ ज्वलित कपूर नेह घृत पूरित, दीपक जोति अनूप । आरति हरन आरती तेरी, करूं लखन निजरूप ॥ F-E- ISSISTAK REWA पूजा वि.ती 456 १२४ मैं तो जिन ! पंदै थारा पूजू शिव उरहार अनूप ॥ ६ ॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीभुजंगमजिनेंद्राय दीप निर्वामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ चूरन गंध भरा अगरादिक, अलिगनरंजनरूप । खेऊ वसुविध बंध प्रजारन, तुम पद ढिग जगभूप ॥ मैं तो जिन ! पद थारा पूजू शिव उर हार अनूप ॥ ७॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीभुजंगमग्नेिंद्रेभ्यो धूपं निर्वपापीति -स्वाहा ॥ ७ ॥ वीजपूर बादाम छुहारे, चोचक अंब अनूप । ये फलपुंज परमफल पावन, भेट धरूं जगभूप॥ मैं तो जिन ! पद थारा पूजू शिव उरहार अनूप ॥ ८॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीभुजंगपजिनेंद्राय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ८ ॥ जल चंदन गंधाक्षत सुंदर, सुमनसमूह अनूप । नेवज दीप धूप फल लेकरि, अर्घ धरूं जगभूप ॥ 5kmar १२४ चि.ती मैं तो जिन ! पद थारा पूजू शिव उरहार अनूप ॥९॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीभुजंगमजिनेंद्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ १२५ अथ जयमाला। दोहा। जगत भ्रमन हरि अशनकरि, प्रकटकालके काल । लसत ज्ञानमनितें अमल, जिन भुजंग वरभाल ॥१॥ चाल रेखता छन्द। सुनो अरजी अबै मोरी, हुआ गरजी निहोरूं मैं । टेर ॥ चिदानंद मैं अनादी हूं, नहीं कुछ आदि है मोरी। सिवा अपनी चतुष्टयके, नहीं परवस्तु मेरेमें ॥ सुनो० ॥१॥ असल मालुम न थी मुझको, अबै गुरुयैनतें जानी। किये जडकर्मकू संगी, परी ये भूल मेरेमें । सुनो ॥२॥ HE 19 पूजा वि.ती १२६ लगा इनकी मुहव्वतमें, लुटाया ज्ञानधन मैने । अहो उपकार ऐ साहिब !, किये इनपैं घनेरे मैं । सुनो०॥३॥ विहीनेज्ञान जड ये हैं, नहीं चैतन्यता इनमें। कृतघ्नी होयक मोकू, भ्रमाया गचि च्यारूं मैं | सुनो०॥४॥ अगोचर बैन विन उपमा, सहे दुख नर्क दारुन मैं। जहां पल एक कल नाही, कहा मुखत उचारूं मैं।सुनो०॥५॥ निगोदी मोहि कीना, दुराया ज्ञानकू ऐसा । रहा इक वर्ण व्यंजनके, अनंते भाग मेरेमें । सुनो० ॥६॥ उसास निश्वास इकमांही, किये मैं क्षुद्र भव ऐसे। अठारै बार हे साहिब ! अहोजनम्या मराहूं मैं ॥सुनो०॥७॥ पशू परजाय जो पाई, सहायी को नहीं तामैं । नहीं धन धामसामाको, नहीं वच आस्थ मेरे मैं ।। सुनो० ॥८॥ SH पूजा. वि.ती -SCREE १२७ क्षुधा रुज चंड है जामैं, तृषा अतिही भयंकर है। मिलै तृण अन्न जल मुश्किल, लिखा जब भाग मेरेमें सुनो०॥ कही जाती नहीं मुखतें, हुई जो व्याधि तनमांहीं। सही को कौनविध जाने, सही मनही जु मेरेमैं ॥सुनो॥१०॥ लदा बोझा बडा भारी, दई मारै मरमभेदी। नहीं ताकत मजल दूरी, पडी मुश्किल जु मेरेमैं ॥सुनो० ॥११॥ सही हिम घाम घन बाधा, कही क्यों हूं नहीं जाती। मरा जल ज्वालके मांहीं, सु जाहिर ज्ञान तेरेमें ॥सुनो०॥१२॥ कसाईने गहा करमें, नहीं उरमें दया जाके। करी है त्रास देदेक, जुदाई प्राण मेरे मैं ।। सुनो० ॥१३॥ कभी पैदा हुआ बनमें, बडा डर क्रूरजीवोंका। जहां रहना उसी थलमें, सदा डरतारहा हूं मैं ॥सुनो०॥१५॥ R ARRECE १२७ वि.ती १२८ कभी जलमें जनम पाया, मुझे खाया जबरदस्तों। निबल मुझसे निगह आया, गया वो पेट मेरेमें ।।सुनो०॥१५॥ हुआ पक्षी उडा नभमें, रहा डरता शिकारिनप्ते । सहायी को नहीं हूवा, गिरा जब फंद उसकेमैं ॥ सुनो०॥१६॥ कभी नरजन्म भी पाया, तहां रागादि बहु व्यापे । सही बाधा वियोगादिक, कहूं कबलों घनेरी मैं ॥सुनो०॥७॥ विभव परकी निरख झूरा, लखी जब माल मुरझानी। लहे दुख देव है ऐसे, बसैं मनही जु मेरेमैं ॥ सुनो० ॥१८॥ लही लख योनि चौरासी, अनंती वेर गहि छांडी। भ्रमन तिहुँ लोकमें कीना, भई थिरता न मेरे मैं ॥सुनो॥१९॥ जिते.दुख हैं जगतमाही, बचे कोऊ नहीं मोते.! इन्हीं बसि भूलिक भोगे, खता कुछ नाहि मेरे मैं। सुनो॥२०॥ RS १२४ पूजा विन्ती १२६ 5 तु ही हाकिम गवा तू ही, तु ही लिखिया खुलासे कर। खलासी कीजिये इनतें, रहें फिर नाहि मेरे मैं । सुनो० ॥२१॥ दयासिंधू कहावै तो, दया मो दीन पै कीजै। दिखा निजरूपकी झांकी, चहूं क्या और तुझसे मैं । सुनो। लहूं अनुभूति में मेरी, रहूं निजधाममें सुखसे । चहै ये “थान' भव भवमें, यजूं पदकंज तेरे मैं ॥ सुनो० ॥२३॥ शार्दूलविक्रीडित छन्द । संयुक्तं सुबलं महाबल पिता, नग्री जया जन्मभू, सीमा रूपसुबुद्धि मात महिमा, चिह्नं सुचंद्रान्वितं ॥ संसंतानंदपूर भूरि सुखदं, दूरीकृतं दुर्दुखं, लोकालोकविलोक शोकदलनं देवं भुजंगं नमः॥२४॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीभुजंगपजिनेन्द्रेभ्यो जयमाला निर्वपामीति स्वाहा ॥ २४ ॥ CSS १२३ वि.ती/ पूजा TI १३० मडिल्ल छंद। जिन भुजंग थुति करत दुरित सवही डरै। ध्यान द्वार उर धरत कर्म दादुर डरै ।। 'टरै सकल भवपीर भीर परगुन तनी। होत सिद्ध सब काज ऋद्धि अतुलितं घनी॥१॥ • इत्याशीर्वादः। इति श्रीभुजंगमजिनपूजा समाप्ता ॥ १४॥ **---- SMARRECENTRENESCRISROK अथ श्रीईश्वरजिनपूजा। छप्पय छन्दा सुवृष वृषभ आरूढ झुंड भव झलक रुंड भृग। जटाजूट निजभाव ध्यान पन्नग भूषण लग॥
पूजा वि.ती १३१ 24-ST गिरा गंग उछलंत त्रिगुन तिरशूल तेजकर । विशदज्ञानसंयुक्त विश्वभासक त्रिनयनधर ॥ चवविध सु घाति भस्मी सु तन, भाल चंद्र चिदगुन झलक । शुचि समवसरन कैलासथल, रहे निवास ईश्वर अलख ॥१॥ दोहा। किये घातिविध विष अशन, पिये स्वानुभवभंग । अनहत ध्वनि डमरू डमक, शिव गिरिजा अरधंग ॥२॥ तम अघभर रविकरनिकर, ईश्वर अलख अमेव । करि करुना करुणारणव, तिष्ठ तिष्ठ.इत देव ॥३॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीईश्वरजिनेंद्र भत्र अवतर अनतर । संवौषट् । ओं ही विदहक्षेत्रस्थश्रीईश्वरजिनेंद्र भत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठाठः। ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीईश्वरजिनेंद्र भत्र मम सन्निहितो भव भव । वषट् । ॐ वि.ती R-6 पूजा १३२ अथ अष्टक। रुचिरा छंद। सम सुर भोग मनोज्ञ महाजल, शशिकरसम दुति धारी। प्रासुक परम पीरतृटभंजन, निजमनमज्जन भरि झारी॥ वरमतिवरद विरदभयभंजन, रमन उमा शिव त्रिपुरारी। पावनपतित चरन तव ईश्वर, यजूं भ्रमनभवश्रमहारी॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीईश्वाजिनेंद्राय जलं निवपामीति स्वाहा ॥१॥ युत अहिगन वन भूरुहवासित, त्रासिततप अति है सीरा। घसि युतजलचंदन अलिगन, रंजनंगजन आकुलकुल पीरा ॥ वरमतिवरद, विरदभयभंजन, रमनउमा शिव त्रिपुरारी। पावनपतित चरन तब ईश्वर, यजूं भ्रमनभवश्रमहारी ॥२॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीईश्वरजिनेंद्राय चंदनं निर्वामीवि स्वाहा ॥२॥ X १३२ वि.ती पूजा १३३ सम पयफेन विशद अतिपावन, मुकताफल मनु मनियारे । पूरितगंध घ्राणहगरंजन, भंजन क्षुत अक्षत प्यारे॥ वरमति वरद विरदभयभंजन, रमनउमा शिव त्रिपुरारी। पाचनपतित चरन तव ईश्वर, यजूं भ्रमन भव श्रमहारी॥३॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीईश्वरजितेंद्राय अक्षतान् निर्षपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ सुमनसमूह विविधविधि पावन, वरणविचित्रित गंधभरे । नाशन बाण मनोभव मनहर, सुखकर शीतल भेट घरे॥ वरमति वरद विरद भयभंजन, रमनउमा शिव त्रिपुरारी। पावनपतित चरन तव ईश्वर, यजूं भ्रमनभव श्रमहारी ॥ ४॥ ऑ ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीईश्वरजिनेंद्राय पुष्पं निर्वामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ नव नैवेद्य सुरस रसपूरन, चूरन क्षुत शुचि बलकारी। चंद्रकला वर घेवर वावर, फोणी मोदक भरि थारी ।। ૨૨૨ - वि.ती RE 'पूजा १३४ वरमति वरद विरद भयभंजन, रमनउमा शिव त्रिपुरारी। पावनपतित चरन तव ईशर, यजूं भ्रमनभवश्रमहारी ॥५॥ ओं व विदेहक्षेत्रस्थश्रीईश्वरजिनेंद्राय नैवेद्य निर्वामीति स्वाहा ॥५॥ चिदगुन अमित रोकि इह राजत, मोहमहातमवज भारी। कर तिहिं नाश प्रकाश सुगुनकर, दीप चढाऊं तमहारी॥ वरमति वरद विरद भयभंजन, रमनउमा शिव त्रिपुरारी। पावनपतित चरन तब ईश्वर, यजूं भ्रमनभवश्रमहारी ॥६॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीईश्वरजिनेंद्राय दीपं निर्वामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ अगर पटीरादिक वर चूरन, धूप धनंजय संग धरूं। जारन बंध करा दुरभावन, श्रीपति. पाय प्रनाम करूं। वरमति वरद विरद भयभंजन, रमनउमा शिव त्रिपुरारी । पावनपतित चरन तव ईश्वर, यजूं भ्रमनभवश्रमहारी ॥७॥ १३४ वि.सी पूजा CARRORE ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीईश्वरजिनेंद्राय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ७॥ फल रसपूर विविधविधि पावन नारंगादिक थाल भरूं । शिवफलहेत यजूं भवभंजन, तव पद कंजन भेट धरूं ॥ वरमति वरद विरद भयभंजन, रमनउमा शिव त्रिपुरारी। पावनपतित चरन तव ईश्वर, यजूं भ्रमनभवश्रमहारी॥८॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीईश्वरजिनेंद्राय फलं निर्वामीति स्वाहा ॥८॥ जल गंधाक्षत सुमन मनोहर, नेवज नवल सु थाल भरूं । दीप धूप फलपुंज सुहावन, ले वसुद्रव्य सु अर्घ करूं ॥ वरमतिवरदविरद भयभंजन, रमनउमा शिव त्रिपुरारी॥ पावनपतित चरन तव ईश्वर, यजूं भ्रमनभवश्रमहारी ॥९॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीईश्वरजिनेंद्राय अब निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ १३५ REKHea अथ जयमाला। पूजा विती दोहा। १३६ शंकर शं करि सकलके, हरि विकलपगन भूरि । पूरि पूरि उर सर सुरस, चूरि चूरि दुखचूरि ॥१॥ 86-15A4%25ESAX दीपकला छंद।' , जय ईश्वर देव कृपानिधान, चितकाकशोकदल दिनसमान । भविवृंदकोकनद• कलिंद, शिववधूवदनपंकजमलिंद ॥२॥ सजि ध्यान जुगल भुजबल अखंड, जय मल्ल मोह जीत्यो प्रचंड । तुम जय जय जय जगजलधिसेतु, निरमद कीनो रिपुमकरकेतु ॥३॥ तुम नाममंत्रमहिमा अपार, अघधनवन जारनकू तुषार । ताके प्रभाव विष नशत भूर, नहि डंक सकै विषधर करूर ॥५॥ मृगपति.पद चाटत है सपेमा, मदपूरित कुंजर शिष्य जेम । १३६ वि.ती पूजा १३७ थलसम जल जलसम अगानि होत,दुरजन उर सज्जनपन उदोत॥५॥ नृप कुपित कृपा ठानें अपार, रुजबुंद सकल नाशै असार । इक छिनमें दुख दारिद्र खोत, सब शोक नशै आनंद होत ॥६॥ कहुं डायनि सायनि भूत प्रेत, भय कर न सकै दुरमतिनिकेत । सुत पंडित सुभग सुशील वाम, याचे किंकर वरसुमतिधाम ॥ ७॥ जिहते यश वरनत नाकईश, वृषपीतिभाव वरतें मुनीश । यातें महिमा कछु नाहि जास, जिहतें प्रगटै चिदगुनप्रकाश ॥ ८ ॥ उचरै छिन अंतसमै सुजास, नर पामर पावत नाकवास । वरमाल धेरै उर मुक्तिवाल, सहजानंद सुख उपजै विशाल ॥९॥ दुरंजय विधिवंधन होत दूरि, दुख जनम मरन व्यापै न भूरि । हक जनम अलप सुखके प्रकाश, सुरतरु चिंतामणिसम न जास।१०॥ यह अशमशक्ति महिमा निधान, नहि वरनसकै धरि च्यार ज्ञान । १३७ ना १३८ CAR- ये जगतशिरोमाण मंत्रराज, दुरगतिदुखभंजनको इलाज ॥११॥ वित्त जबलों स्वतंत्र होवे न जीव, ये मंत्र बसो उरमें सदीव । अरजी येही अवधारि देव, भव भव दीजे तव चरन सेव ॥१२॥ गुनगान सुधारसमें किलोल, मनमच्छ करन चाहै अडोल। मति होहु अश्रव्याभाव अंस, निवरो अज्ञान दुरभाववंस ॥१३॥ भव भव सज्जनजनको सुसंग, निजचिंतभाव वरतो अभंग। वर देहु यहे करुनानिधान, कर जोरि जुगल जाचै सु “थान" ॥१४॥ मेरी करनी पर मति निहारि, निज प्रणतपालपनकू विचार । करतें कर गहि लखि दीन मोहि, करनो विलंब छाजै न तोहि । ५ सुरस बंद। नृप गलिसेन तात अरु माता, ज्याला सुजस्त्रमही । नगर सुसीमा जास जनमहित, स्वर्गसमान भई ॥ १३८ SAX पूजा वि.ती १३९ RS- जीते मोह सूर्यलच्छनकी, जयध्वज फहर रही । ता ईश्वरकी जयमाला यह, जयदा होहु सही ॥१६॥ दोहा। जिन ईश्वरकी थुति यही, उचरत शुद्ध सुभाय । प्रकटै सहजानंद सुख, सकल विघ्न टरिजाय ॥१७॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीईश्वरजिनेंद्राय जयमाला निर्वपामीति स्वाहा ॥ १७ ॥ अडिल्ल छंद । जिन ईश्वर पदकंज सरस मन भावने। जो पूजे मनलाय साख्य सरसावने ॥ कामधेनु समता प्रकटै उर जासके। तृष्णा डायन वीर लगै नहि तासकै ॥१॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीईश्वरजिनपूजा समाप्ता ॥ १५ ॥ ANSAREE १३६ R-56 ESH वि.ती पूजा %ER १४० अथ श्रीनमिप्रभुजिनपूजा। अडिल्ल छंद। त्वं निस्पृह निकलंक अंक चिद चारु हो । मंडित अतुल विभूति सुशक्ति अपार हो। मैं आह्वानन करूं स्वाहित चित ल्यायकै । भो करुनाकर नेमि ! तिष्ठ इत आयकै॥१॥ भों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीनेमिप्रभुजिनेंद्र ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीनेमिप्रभुजिनेंद्र ! अन तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः भों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीनेमिप्रभुजिनेंद्र ! अत्र मम सनिहितो भव भव । वषट् । अथ अष्टक। मदनमोहन छंद। सित सुदंर मासुक नीर, हिम तृट दाहहरा। RSS RECRX १४० वि.ती पूजा SHIER-15-AHES १४१ मै जनममरन भय भीरु, धारूंधार घरा॥ वृषस्यंदन-सुदंर नेमि, शिवतिय प्रेम पगे, वर नेम धरै जिन नेमि, यजत कलंक भगे॥१॥ ओं ही विवहक्षेत्रस्थश्रीनेमिप्रभुनिनेंद्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ १॥ वर मलयज म्हैकन मंजु, कुंकुम संग घसैं । सरसत सुख अलि छकि गंध, परसत ताप कस। वृष स्यंदन सुंदर नेमि, शिवतिय प्रेम पगे। वर नेम धरें जिन नेमि, यजत कलंक भगे ॥२॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीनेमिषभुजिनद्राय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ॥ २॥ अक्षतगन मनु कनहीर, सितपयफेनसमं । शुचि मंडितगंध अखंड, रुजक्षयकूरदमं ।। वृषस्यंदन सुंदर नेमि, शिवतियप्रेम पगे। 1 चमकपी रपी गुदर धरा। १५१ SM
वि.ती|
पूजा
१४२
वर नेम धरें जिन नेमि यजत कलंक भगे ॥३॥
भों ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीनेमिप्रभुजिनेंद्राय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥
शुभ सुंदर शुचि सुकुमार, सुमन सुगंध भरे।
लहि केतकि कंज गुलाब, सेवति आदि खरे॥
वृषस्यंदन सुन्दर नेमि, शिवतियप्रेम पगे।
वर नेमि धरें जिन नेमि यजत कलंक भगे ॥४॥
नों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीनेमिपभुजिनेंद्राय पुष्पं निर्वगपीति स्वाहा ॥ ४ ॥
रसयुत रसनाललचान, मोदक मनहारी।
वर घेवर चन्द्रकलादि, व्यंजन भरि थारी॥
वृषस्यंदन सुन्दर नेमि, शिवतियप्रेम पगे।
वर नेम धरे जिन नेमि यजत कलंक भगे ॥५॥
थों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीनेमिप्रभुजिनेंद्राय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ५॥
- वि.ती पूजा SEAS २४३ . तमभंजन दीपक ज्योति, उपमा फबत असें। ये जारत मनु अघपुंज, है मिस धूम नसें ॥ वृषस्यंदन सुदंर नेमि, शिवतियप्रेम पगे। वर नेम धरें जिन नेमि यजत कलंक भगे ॥६॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीनेमिप्रभुजिनेंद्राय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ वर चूरन पूरनगंध, पावक संग धरें। मिस धूम मनूं मन मैल, नभ मग गौन करें। वृषस्यंदन सुन्दर नेमि, शिवतियप्रेम पगे। वर नेम धरे जिन नेमि, यजत कलंक भगे॥७॥ नों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीनेमिप्रभुजिनेंद्राय धूपं निधामीति स्वाहा ॥ ७॥ फल दाडिम दाख विदाम, एला लौंग भले । रसपूरित रम्य रसाल, खारिक स्वाद रले॥ RER SEARCH १९३ H विती| पूजा १४४ * वृषस्यंदन सुन्दर नेमि शिवतियप्रेम पगे। वर नेम'धरें जिन नेमि यजत कलंक भगे॥८॥ भों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीनेमिप्रभुजिनेंद्राय फलं निर्वपापीति स्वाहा ।। ८॥ जल चंदन अक्षत श्वेत, सुमनसमूह रले । चरु दीपक धूप फलौघ, भरि करि थाल भले ॥ वृषस्यंदन सुन्दर नेमि, शिवतियप्रेम पगे। वर नेम धरें जिन नेमि, यजत कलंक भगे॥९॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीनेमिमभुजिनेंद्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥९॥ - %% अथ जयमाला। दोहा । ASS-CITIES जसु वच विमल कृशानुझल, दुरनय वचन पतंग। गिरत विसन निज विजयहित, होत आप ही भंग ॥१॥ १४४ SRIEOS पूजा वि.ती १४५ कृपासदन मदमदनदल, विधि खल वल क्षयकार । नमू नेमिपदकमलयुग, अशरन शरन अधार ॥२॥ तारकवरन छंद। तुम तो प्रभु नेम त्रिलोकधनी हो, तुमरी महिमा नहि जात भनी हो। इकही गुन ज्ञान अमान अनै सो, वरन्यो न जहै जिम इंतिम तैसो॥ षट द्रव्य असंख्य अनंत प्रमाने, नहिं अंत अनादिहित तिथि ठाने । सबही गुण औष अनंत सुधारें, गुण हू पर्याय अनंत विथारें ॥४॥ बहै गत वर्चत आगत जे हैं, झलकें तुमरे निजभाव विषे हैं। तुमरो उर ध्यान सुभान प्रकाश्यो, भ्रमभावविभावरिको तम नाश्यो। विकसी शुभ आस्रव राजिवराजी, उडुवृंद दुरास्रव ज्योति न साजी। चकवी सदबुद्धि हिये हुलसाई, उलवा अविवेक न देत दिखाई ॥ १४१ १० १रापिका - वि.ती १४६ T भवसंसृति बेलि भई कुमलानी, वर भाँति पदारथ पाँति पिछानी । कुनया व्यभिचारनि जेम दुरी है, गति मोहनिशाचरकी न फुरी है। सुसुधारस प्यास प्रचंड बधाई, प्रगटी व्रते भोजनकी सु क्षुधा ही। वट मार महाभट मार पिरानो, तटिनी तृसना जल जात सुखानो । मदभाव महीधरसे अकुलाने, व्यवसाय भए गुनलाभ अमाने । विन बंध प्रतीति भई उर ऐसे, पति के भुजतें नव नागरि जैसे ॥ प्रकट्यो शिवको मग सहज सुभाए, पथिकी चिदराव हिये हुलसाए । चदिहूं कर जोरि जिनेश इहै मैं, वरतो यह ज्योति अखंड हियेमें। तुमरे गुनवारिधमें चित ध्याये, सुमिले तुममें फिरके नहि आये। फुतरी मिसरी जल थामन ध्यावे, लहि थाह कहो किम आनि कहावै ॥ अनुभो गत है तुमरी गति जाने, तवही गति पंचम है विधि भान । इसही हित तो मुनिनायक ध्यावें, पर आश्रित भाव सभी छिटकावें ॥ ७६ , यिती पूजा सुसुधा निज छाक छके अविकारी, विचरे निरशंक भये भयटारी। तुमसो निजकू निजतें नहिं ध्यावे, तबलों शिवथानकळू नहि पावै ।। सुप्रतीति यहै उर “थान" धरी है, तिहत शरना तुमरी पकरी है। शरनागत पालक है पन तेरो, चहिये हरनो अब तो दुख मेरो॥ द्रुमिला छंद। तिहके पदध्यान धनंजयमें धन पाप पतंगन जेम जरें। तसु वानि छके गुरुभेषजसी, विधिबंधनविधि छिनमें निवरें। मद रावनही रघुवंशधणी नित नेमप्रभू तुव जो सुमरै । सु लहै वर दर्शन ज्ञान चरित्र अनुकमा शिवनार वरै ॥१५॥ नों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीनेमिप्रभुजिनद्राय जयमाला निर्वधामीति स्वाहा ।। प्रडिल्ल छंद । नेमप्रभू जसगान उचारत भावसूं। . २ॐES १४७ वि.ती पूजा १५८ पूज करें मनलाय होय शुचि चावसूं ॥ ताके विकलपवृंद बंद सब ही टरै । है निर्विकलपदशा शक्ति अपनी धरै ॥१॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीनेमिजिनपूजा समाप्ता ॥ १६ ॥ KAISERCISHRA .:: अथ श्रीवीरसेनजिनपूजा। स्थापना ।पय छंद। आदि और नहिं जास जोर अद्भुत प्रचंड जसु । इंद्र चंद्र नागेंद्र जीति नहिं सकत बोध तसु ॥ सकल जीव जडरूप ठानि लै रह्यो गुमानी। १४८ १घका ३ वि.ती पूजा १४६ मोह वीर वरशक्ति रंच नहि जात बखानी॥ जिन वीरसेन वर वीर तुम, धीर धारि सिंह नाश कर। है कृपावान निज दास, तिष्ठ तिष्ठ इत देववर ॥ भों ही विदेहक्षेत्रस्थितीवीरसेनजितेंद्र ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । भों ही विदेहक्षेत्रस्थितश्रीवीरसेनजिनेंद्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । उठः। ओं ही विदेहक्षेत्रस्थितश्रीवीरसेनजिनेंद्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव । वषट् । अथ अष्टका त्रिमंगी छंद। सुरसरिसमनीरं हरितृटपीरं, प्रासुकसीरं गंधयुतं । भरि कर वर झारी धार उतारी, भारी भवरुजतापहतं ॥ यतिवर वरनागर सुजसउजागर, समरससागर बोधवरं । विधि अरिहन वीरं जगजनवीरं, जिनवरवीरं पीरहरं ॥१॥ ओं विदेइक्षेत्रस्यश्रीवीरसेनजिनेंद्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ १४६ वि.ती पूजा १५० मलय जुवन आश्रित सुभग सुवासित, त्रासिततपहर अतिसीरा। शुचि कुंकुमरंगी घसि तिह संगी, अरचत पद हर भवपीरा ॥ यतिवर वरनागर सुजसउजागर, समरससागर बोधवरं। विधि अरि इन वीरं जगजनवीरं, जिनवरवीरं पीरहरं ॥२॥ 'ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीवीरसेनजिनेंद्राय चंदनं निर्वामीति स्वाहा ॥ २ ॥ तंदुल अनियारे सित अतिप्यारे, मनु दुतिधारे सीपसुतं । शुचि सलिल पखारे पुंज सुधारे, अग्रतिहारे भावयुतं । यतिवर वरनागर सुजसउजागर, समरससागर बोधवरं । विधि अरि हन वीरं जगजनवीरं, जिनवरवीरं पीरहरं ॥३॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीवीरसेनजिनेंद्राय अक्षतान् निपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ शुचि सुमन चमेली चंपक रेली, श्यामा बेली पुष्पवरं । निशिगंध सुरंग सेवति संगं, हरत अनंगं भेट घरं ॥ १५० 62
पूजा
वि.ती
Sr
यतिवर वरनागर सुजसउजागर, समरससागर बोधबरं ।
विधि अरि हन वीरं जगजनवीरं, जिनवरवीरं पीरहरं ॥४॥
ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीवीरसेनजिनेंद्राय पुष्पं निर्वामीति स्वाहा ॥ ४ ॥
षद रस रस भीने अन्न नवीने, नेवज लीने बलकारी
मैं मन हरषाऊं क्षुत विनशाऊं, चरन चढाऊ भरि थारी॥
यतिवर वरनागर सुजसउजागर, समरससागर बोधवरं।
विधि अरि हन वीरं जगजनवीरं, जिनवरवीरं पीरहरं ॥ ५॥
मों ही विदेडक्षेत्रस्थश्रीवीरसेनजिनेंद्राय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ५ ॥
दीपक तमहारी ज्योतिप्रजारी, भरि वर थारी भेटधरं।
तमभ्रमब्रजभंजन विधिअरिंगंजन, निजगुन सजनसौख्यकरं॥
यतिवर वरनागर सुजसउजागर, समरससागर बोधवरं ।
विधि अरि हन वीरं जगजनवीर, जिनववीरं पीरहरं ॥६॥
पूजा वि.ती १५२ मों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवीरसेनजिनेंद्राय दीप निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६॥ अगरादिक पावन गंध सुहावन, ले धूपायनमाहि धरूं । तुम पदतर धारूं सुजस उचारूं, कलमष टारूं बंध हरूं ॥ यतिवर वरनागर सुजसउजागर, ममरससागर बोधवरं । विधि अरिहन वीरं जगजनवीरं, जिनवरवीरं पीरहरं ॥ ५॥ मों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवीरसेनजिनेंद्राप धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ७ ॥ फल पक सुपावन नैनलुभावन, शिवफलपावन भेट करूं। खारिक मनभावन दाख सुहावन, दाडिम आदिक थालमरूं ॥ यतिवर वरनागर सुजसउजागर, समरससागर बोधवरं। विधि अरि इन वीरं जगजनवीरं, जिनवरवीरं पीरहरं ॥८॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवीरसेनजिनेंद्राय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥८॥ जल गंध सुहावन अक्षत पावन, प्रानलुभावन पुष्प लिये। HAR १५२ पूजा वि.ती चरु दीप रु धूपं फल शुचिरूपं, अर्घ समपूं हर्ष हिये । यतिवर वरनागर सुजसउजागर, समरसमागर बोधवरं । विधि अरि हनवोरं जगजनवीरं, जिनवरवीरं पीरहरं ॥९॥ ओं ही विदेहक्षेत्रम्यमीवीरसेनजिनेंद्राय अर्घ निर्वामीति स्वाहा ॥ ९ ॥ अथ जयमाला। दोहा । विषमचरित रनभूमिमें, अरि विभावगन जीत । वीरसेन निजभाव गढ़, निवसे निपट अभीत ॥१॥ भवभूरुहदाहन दहन, मनमलभंजन वारि । पामर पावन परमपद, तेरो नाम उचारि ॥२॥ अडिल्ल छंद। वीरसेन वरवीर सुगुन रनभूमिमें।
पूजा विती १५४ छके महारस वीर सुरस मद घूमिमें | शिवश्यामा अनुराग प्रबल उरमें धरें। द्वै निशंक ललकार कमरिपुतें लरें ॥ ३ ॥ करन चपलताधारक मनमातंग पैं। भये उमगि असवार कर्मरनरंग ॥ समरसभाव सनाह सुरुचिकुल हॉकिये। साहस शुभकोदंड सरल तायक लिये ॥४॥ भेदज्ञान वरमित्र संग सुखदैन है सहस अठारा शीलभाव वरसेन है। सेनानी निजबोध बडो बलि बंड है। चारित सुभट सधीर अरीगन खंड है॥५॥ चक्रव्यूह मिथ्याल भेदि अरि सेनमें । १५४ पूजा वि.ती पैसे धारि उमंग विजय जस लेनमें ॥ सात सुभट तह चूरि चरन आगे धरें। चढि सप्तम गुनथान तीन अरिछय करें॥६॥ सजि समाधि बल जोरि अनूपम रिस बढे । उपशम अवनि विहाय क्षपक श्रेणी चढे॥ सुभट छतीस प्रचंड नवें थल में हरे। दशमे सूक्षम लोभ नाशि उर रिस भरे॥७॥ सुकलध्यान पद दुतिय चंड असि हाथ ले। द्वादशमें गुणथान सुभट सोलहदले ॥ सकल घातिया प्रकृति तरेसठि चूरिके। अद्भुत शोभा सजी बाल शिव पूरिक ॥८॥ गुन,अनंत परपूरि असम शोभा घनी । SSS- REA% FRE--- . वि ती ज पूजा परमौदारिक देह परमदुर्तितें सनी ॥ परमभक्ति भरि इंद्र द्रव्य वसु शुभ सकें। परम शर्मकरतार चरन तुमरे यजें ॥९॥ रूप सुधारस पान सहस दृगपानते। करत न रंच अघात अचल पलकानतें॥ रसन तालु अस्पर्श अनाहन ध्वनि खिरै । भव ग्रीषम तपहरन मेघ झरसी झरै ॥१०॥ जातिविरोधी जीव तजत सब वैर है। शन योजन चहुं ओर सुभिक्ष तहां रहे ॥ जंतू बध नहि होय विभव जहँ तुम तनी। भई प्रकट इत्यादि दयानिधिता धनी ॥११॥ करत तिहारो ध्यान सकल दुखगन नशै । Y १५६ चि.ती 5-5 । पूंजो तुम पद निज उर बसे मनूं हम शिव बसे ।। तुम सब जाननहार कहा तुमतें कहूं। चहूं और कुछ नहीं सुगुन तेरे गहूं ॥१२॥ मेरे औगुन ओर न नेक निहारिये। दीनबंधु निज नाम तनी पन पारिये ॥ विनऊं तोहि जगेश जोडि जुग पानकुं। भव भव तेरी सेव देव ! दे थान" कुं॥ १३ ॥ संवेया इकतीसा। भूमिपालभूपकुलकंजविकसानभान, भंजनबलीश बलिबंड मोहसैनाके भानचिन्ह केतु भवसिंधु लंघवेकू सेतु, दरप विहंड महामैन दुखदैनाके सुभगपुरंदरकेपुरुसोपुर पुंडर है, रच्योगयो कारन तिहारेजन्मलनाके तप रनवीर धीरधारी देव वीरसेन, दायक अनंद जयो नंद वीरसेनाके। ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीवीरसेनजिनेंद्राप जयमाला निर्वामीति साहा ।। १४ ॥ 36le विती W पूजा १५८ अडिल्लछंद। बीरसेन जिन वीर धीर पर जो यजे। वीररूप निज धारि सु कायरता तजै ॥ ते वसुमी भुवि लसै शत्रु वसु जीतिरौं । विलसै सुख निज धाम मुक्तिकी प्रीतिसे ॥१॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीवीरसेनजिनपूजा समाता ॥ १७ ॥ , Dat । अथ श्रीमहाभद्रजिनपूजा। ASSIST- मसुल छन्द SE देवराज नृपके वर नंदन, उमासूनु सुखदाय। विजया नगर परम पावन तह, लियो जनम शुभ आय ॥ २५० पूजा विती १५६ चन्द्र चिन्ह ध्वजधरन देववर, महाभद्र जिनराय । थापूं तोहि यजन हित हे जिन, तिष्ठ तिष्ठं इत आय ॥१॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्यर्थ महाभद्रपरमदेव ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । ओं ही विदेहक्षेत्राथश्रीमहाभद्रपरमदेव ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः। ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीमहाभद्रपरमदेव ! अत्र मम सन्निहितो भव भव । वषट् । शरन हम महाभद्र तोरी, करमआदिहरकुलिश कृपापर कर सहाय मोरी॥टेक। सलिल मिष्ट शीतल मन भावन जुत सुगंध डोरी। मोचन मलविधिबंध धार त्रय धरूं चरन ओरी॥ शरन हम महाभद्र तोरी, करम अदिहरकुलिश कृपापर कर०॥ ओं ही-विदेहक्षेत्रस्थश्रीमहाभद्रजिनेन्द्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ चंदन बावनके संग पावन, कुंकुम घसि जोरी। SRISSA -- वि.ती पूजा १६० तुम पद युग अरचत शिवनायक, परसत शिवगोरी। शरन हम महाभद्र तोरी, करमआदिहरकुलिश कृपापर० ॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीमहाभद्रजिनेंद्राय चंदनं निर्मपामीति स्वाहा ॥ २॥ अक्षत औघ अखंड अनीयुत, हसत चंद्र ओरी। करत पुंज तव चरनकंज तर, पावत शिवगोरी ।। शरन हम महाभद्र तोरी, करमअद्रिइरकुलिश कृपापर०॥३॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीमहाभद्रजिनेंद्राय अक्षतान् निर्वामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ सुमन सुहावन घाणलुभावन पावन मन डोरी। पावन तुव पावनतर धारत मैंन मनी मोरी॥ शरन हम महाभद्र तोरी, करमअद्रिहरकुलिश कृपापर०॥४॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीमहाभद्रजिनेंद्राय पुष्पं निर्वामीति स्पाहा ॥४॥ नेवज नवल सुहाने घेवर फीनी रसबोरी। -RSSEXX १६० विती पूजा २१२ श्रीपति चरन चढात तिहारे, नाशै क्षुत दौरी ॥ शरन हम महाभद्र तोरी, करमआदिहरकुलिश कृपापर०॥५॥ औं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीमहाभद्रजिनेंद्राय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ॥ ५॥ वाति कपूर पूर दुति सुंदर, तुम सनमुख जोरी। ज्ञानभान परकाशि नाशि तम, भई बुद्धि गोरी॥ शरन हम महाभद्र तोरी, करमअद्रिहरकुलिश कृपापर० ॥६॥ ओ ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीमहाभद्रजिनेंद्राय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ पूरनगंध धूप अगरादिक, पावकसंग जोरी । तुम पद धरत बंधाविधिकारन, जरै करम डोरी॥ शरन हम महाभद्र तोरी, करमअद्रिहरकुलिश कृपापर०॥॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीमहाभद्रजिनेंद्रेभ्यो धूपं निपामीति स्वाहा ॥ ७ ॥ फल रसपूर मधुर अवलोकत, ललनत हग जोरी।
ਕਿਰੀ पूजा ISRCRASIK तुम पद धरत चखत शिवफल वर, बँधै सुरस डोरी॥ शरन हम महाभद्र तोरी, करम अद्रिहरकुलिश कृपा०॥८॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीपहाभद्रजिनेंद्राय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥८॥ जल चंदन अक्षत मदनायुध, चरु अमृत कोरी । दीप धूप फल अरघ भेट तुव, करिके कर जोरी ।। शरन हम महाभद्र तोरी, करमअद्रिहरकुलिश कृपा०॥९॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीमहाभद्रजिनेंद्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ अथ जयमाला। दोहा। परिवर्तन अहि अशनकर, वैनतेय तसु वैन । महाभद्र जिन जयति जग, नमू नमूं सुखदैन ॥१॥ , १६२ मोतीदाम मंद। 56 पूजा १६३ जयो तुम भद्र गुनातमरूप, रची चिदचिंतन केलि अनूप। विता विराग कहें तुमकू कवि केम, रच्यो शिवभामनितें अतिप्रेम ॥ २॥ तजे किम भोग अहो जिनदेव, लिए तुम भोग अनंत अछेव । तज्यो किम लोभ अहो जिनराय, लही निधिज्ञान अनंत लुभाय ॥ तज्यो किम संग अहो जगपाल, घरो समवसृति भूति विशाल । तज्यो किम बांधववर्ग सुदेव, किये जगजंतुन बंधु स्वमेव ॥४॥ तज्यो किम मोह अहो जगपार, कियो सब ज्ञेयविषै विसतार। तजी चलवृचि कहो किंह भाय, रमो तुम लोकअलोकन जाय ॥५॥ तज्यो किम राज कहो जिनदेव, करें जगराज सवें तुम सेव । तज्यो किम द्वेष कहो जगपाल, वसू विधिबंधनके तुम काल ॥ ६॥ सही हम जान लई मनमाहि, घटी तुमरी कछुहू नहि चाहि । तजे सब कारज जानि असार, गहे जितने जु लखे हितकार ॥७॥ %E १६३ वि.ती पूजा १६४ भली तुमरी महिमा दुखनास, दियो अधर्माजनकू दिववास । नुहै मुखसो शशि चाहत कीन, बनात मनू विधि तोरि नवीन ॥८॥ करै तिहँ षोडश भाग सु जोरि, बनें फिर ना तब डारत तोरि। घटा बधि या हित होत सदीच, लख्योथिर नाहिं परेंनिशि पीव ॥१॥ लजे चरनाधर पाणि निहारि, कलै नहि कंज रहै गहि वारि । धनी सुनि लज्जि भयो घनश्याम, प्रभालखि मेरु गह्यो इक ठाम ॥ लखें तव तेज चितें दुचिताय, मनूं यह भान भमें नभ मांय । कहै उपमा तुमको कवि कोय, लौ तुमरी तुम ही मधि सोय ॥ ११ ॥ प्रभू हम दीन पापट टारि, करी थुति ये अपनो हितधारि । क्षमों हमरे सब औगुन देव, कृपाकरि देहु सदा तुमसेव ॥ १२ ॥ गही शरना तुमरी अब देव, भये सब कारज सिद्ध स्वमेव । चहै यह “थान” दुहूं कर जोरि, अनातमभाव हुवै न बहोरि ॥१३॥ १६४ वि.ती पूजा मालिनी छद। इति जिनगुनमाला, पर्म आनंदशाला। सकलविघनटाला, शुद्धरूपा विशाला ॥ करि तन मन शुद्धी, जो स्वरों धारि गावें। विलसि सुख दिवाल, मुक्तिश्री सो लहावै ॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीमहाभद्रजिनेंद्राय जयमाला निर्वामीति स्वाहा ॥ अडिल्ल वंद। महाभद्र गुनभद्र भद्र मनते भने। कर्म अद्रि चकचूरि अचल सुख सो सने ॥ विलसै सुख सुरबाल कमलिनी वागमें। रमें बहुरि चिरकाल वधूशिव लागमें ॥१॥ इत्याशीवादः । इति श्रीमहाभद्रजिनेश्वरपूजा समाप्ता ॥ १८ ॥ RX ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीदेवयशजिनेंद्र अत्र अवतर अवतर । संवर पूजा १६६ अथ श्रीदेवयशजिनपूजा। खरा छेद। देवयशगान तो करत मुदठानिक, धरतमुनिध्यानतें मोक्षपावै खरो। पानधारीनको प्रानरक्षक तुही, ज्ञानधारीनमें ज्ञानधारी वरो॥ भूरि आनंदके कंद सुखवृंद दे, चूरिये दुददल महर मोपै करो। देव देवेश जू थापिहू तोहि मैं, तिष्ठ तिष्ठो इतै कष्ट मेरो हरो ॥१॥ ओं ह्रीं विदेइक्षेत्रस्थश्रीदेवयशजिनेंद्र भत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठा। ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीदेवयशजिनेंद्र अत्र मम सन्निहितो भव भव। वषट् । अथ अष्टक। राग पीलू। तेरी भक्ति बसी मन माही, मैं तो पूजूं पद हरषाई ॥टेर ।
चि.ती पूजा 3 REACHER- धुनी सुरसरी समजल प्रासुक, ले गार भराई। करन नाश परत्राह तृषा त्रय, धारूं धार धराई ॥ तेरी भक्ति बसी मनमाही, में तो पूजूं पद हरपाई। ओं ही विवहक्षेत्रस्थश्रीदेवाशजिनेंद्राय जलं निर्वामीति स्वाहा ॥१॥ शुचि कुंकुम चंदन मलयागिर, धनरस संग घमाई। ताप महाआकुल कुल वारन, तुमरे चरन चढाई॥ तेरी भक्ति वसी मनमाही, मैं तो पूजूं पद हरपाई ॥ २ ॥ मोही विदेरक्षेत्रस्यश्रीदेवयशजिनेदाग चंदन निर्वपामीति साहा ॥२॥ सित हिमाम तंदुल अनियारे, धारि रकेवी माही वसु गुनयुत वसुमी क्षिति पावन, पुंज करूं तुम माही॥ तेरी भक्ति वसी मनमाही, मैं तो पूजू पद हरपाई ॥३॥ ओं ही पिदेवक्षेत्रस्यश्रीदेवयजिनेंद्राय अक्षतान् निर्वपामीति साहा ।। ३ ।। ------ पूजा की ६८ 9456 eSir-55 पूरित गंध सुमन गन ऊपर, अलि अवला मँडराई। करन सुमन पावन हित हे जिन ! भेट धरूं मैं लाई। तेरी भक्ति बसी मनमाही, मैं तो पूजू पद हरषाई ॥४॥ ओं ह्रीं विदेहक्षेत्रस्थश्रीदेवयशजिनेंद्राय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ नेवज मधुर नवल बलकारन, लोयन लेत लुभाई। करन पुष्ट निजरूप ज्ञानबल, भेट धरूं उमगाई। तेरी भक्ति बसी मन माही, मैं तो पूजूं पद हरषाई ॥५॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीदेवयजिनेंद्राय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ दीप कपूर पूरि प्रत शुचिके, सुंदर जोति जगाई। आरति हरन आरती तेरी, करिहूं मन मुददाई ॥ तेरी भक्ति बसी मनमाही, मैं तो पूजू पद हरषाई ॥ ६ ॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीदेवयगजिनेंद्राय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ AR ANSALI १६८
वि.नी
पूजा
अगर तगर कदलीसुत आदिक, चूरि सुधूप बनाई।
श्रीपतिचरनकंज तुमरे ढिग, खेऊं विधिछयदाई ॥
तेरी भक्ति वसी मनमाही, मैं तो पूजूं पद हरपाई ॥ ७॥
ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीदेवयशजिनेंद्राय धूप निर्वपामीति माहा ॥७॥
दाडिम दाख आम नारंगी, ले फलराशि सुहाई।
शिवफल हेत भेट तुमरे पद, ढिग धारूं उमगाई।
तेरी भक्ति वसी मनमाही, मैं तो पूजूं पद हरषाई ॥ ८ ॥
ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीदेवयशजिनेंद्राय फलं निर्वपामीति साहा ॥ ८ ॥
जल चंदन अक्षत पुष्पावलि, नेवज ले वलदाई।
दीप घूप फल वसुविध सुंदर, अर्घ धरूं तुमपांही ॥
तेरी भक्ति बसी मनमाही, मैं तो पूजू पद हरपाई ॥९॥
ओं में विदेहक्षेत्रस्थश्रीदेवयशजिनद्राय अर्थ निर्वपामीति स्वाहा ॥९॥
वि.ती पूजा १७० अथ जयमाला। दोहा। विधिधन विन चिदरविछटा, दमकि रही दुति ऐन। छकित होत छवि निरखिकै, सुर नर मुनि मन नैन ॥१॥ दोधक 'छद। तारक हो तुम ही जगस्वामी, बारक भो दुख अंतरजामी । भौन विकाग दिनेश तुही है, शुभ्र गिरा धरईश तुही है ॥२॥ तू विधि है चतुराननधारी, मदन तू मुर मोह मुरारी। और कषायवि बसि सारे, हो तुम द्वेष दोष दुख टारे ॥३॥ यद्यपि मोह तज्यो तुम स्वामी, ना करता हरता शिवधामी। तद्यपि ध्यान धरै जिन तेरो, सिद्ध फुरै मनवंछित मेरो ॥४॥ यह उरमें दृढता हम धारी, तब पद सेव गही त्रिपुरारी। यह भव कानन भीम गुसाई शैल विभाव तहां दुखदाई ॥५॥ २%-5 S * वि.ती पूजा HD श्रेय सवै करता तुम त्योंही, ना कछु संशय है विधि योंही । आस्रव नीर झर झरने हैं, भूरुह बंधसमूह घने हैं॥६॥ मोह महा मृगराज गलारै, धीर्य तहां जगजंतु निवारै । भील मनोज तहां दुखदानी, लूटन• शुभ सोंज सुहानी ॥७॥ प्रीति जहां जुरि झांसि रही है, द्वेष महाभयदैन अही है। है तृष्णा जल माल डरानी, व्हेल निगोद धरै दुखदानी ॥८॥ वारण मत्त जु मान जहां है, आरण महिष जु क्रोध तहां है। मत्सर रीछ जहां धुरीव, लोभ दरार अथाह दिखावै ॥९॥ कर्म उदे फल द्वैविध तामें, है हितकारक एक न जामें। आरति भाव बुरे वनचारी, पावक वेद कपाय करारी॥१०॥ अक्षविलास पलास विकास, आकुलभाव पिशाच जु भासे । छांह धनी धन है भ्रम जामें, सूझत ज्ञान दिनेश न तामें ॥११॥ RAM. १७१ वि.ती पूजा १७२ भाव असत्य ढिगां भरमायो, मैं चिरते शिवपंथ न पायो। लब्धिबप्साय गुरूमुख गाई, दीपशिखा तुमरी धनि पाई ।१२। चाहत हूं शिवराह गही मैं, जाचत हूं कछ और नहीं मैं । पंथसहायक ध्यान तिहारो, संबल दे निजबोध हमारो ॥१३॥ बाहन शुद्ध क्रिया कर दीजे, संग सधर्मिनको नित कीजे। तो चरचा मगमें नित होवै, भक्ति सराय जहां हम सोवै ।१४) उद्यम द्वै अथवा मगमाही, राह मिलै शुचि सम्पक याही । "थान" लहूं जब लो शिवनीको, ये सब होहु सहाय धनीको ॥ जयो नृपति स्तवभूत सुत, गंगा उर अवतार । स्वस्तिक ध्वज जसु जनमथल, नगर सुसीमा सार ॥१६॥ मेघविस्फूर्जित छंद। तजै शंका कांक्षा निजहितरता भाव संवेग धारें। दोहा। رو १७२ वि.ता ल-15 १७३ सजें आनंदौघ पुलकितवपू शुद्धस्तूती उचारें ॥ लहै सो संवोधं सकलसुखदं कीर्ति भूलोक छावै । वै शक्री चक्री अचल अमलं मुक्तिभूमी लहावै ॥१७॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीदेवयशजिनंद्राय जयपाला निर्वपामीति स्वाहा ॥१७॥ अडिल्ल छंद। जयो देवयश देव देवपति पूजकी। भक्ति महासुख दैन कला शशि दूजकी ।। कर सिन्धु सुख वृद्धि सिद्ध सब दायनी। घायक सकल कलेश कलंक पलायनी॥ इत्यागीर्वादः। इनि लादेश्यशनिनपूना समाप्ता ॥ १६॥ SC १७३ वि.ती पूजा- १७४ अथ श्रीअजितवीर्यपूजा। कवित्त छंद। भास घन चेतनको विशद विकास जास, त्रासन अरीकी जाहि वीरज अमानतें। आसन्न कीन्हो है अचलासन अनूपहीकू, विजय अनंग कियो अंग अमलानतें ॥ वीर मोह आदि जगजीततें अजीत लसें, रंच न अघात शिवश्यामा सुखदानतें। वीर्य अजितेश एम मगन सुखोदधिमें, अंत करि अंतको चिरंजीभाव प्रानतें ॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअजितवीर्यजिनेंद्र ! अत्र अवतर अवतर । संवौषट् । ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअजितवीर्यजिनेंद्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ । ठः ठः। नों ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअजितवीर्यजिनेंद्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव । वषट् । PASSICALSCRE १७७
अथ अष्टका
पूजा
वि.ती
राग वरवा।
हो ज्ञानी तैने जानि लई, मेरे दरदकी मैं कहूं कहाजी, तो गुन में
झलकंत सही ॥ टेर॥
सलिल स्वच्छ प्रासुक तृट भंजन, भरि भुंगार लडूंजी।
पावन पतित पांव तव पूजूं, भवभ्रमनाश चहूंजी ॥
हो ज्ञानी आने जानि लई, मेरे दरदकी मैं कहूं कहाजी, तो गुन
में झलकंत मही॥१॥
भाभी विदेहक्षेवस्यश्रीअजितवीर्यजिनेंद्राय जलं निपामीति स्वाहा ॥१॥
बावन कदलीसुत कुंकुम, जलसंग मेलि घसूंजी।
श्रीपतिचरन चढावत तेरे,आकुलताप कसूजी ॥
हो ज्ञानी तने जानि लई, मेरे दरदकी मैं कहूं कहाजी, तो गुन
में झलकंत सही ॥२॥
वितो पूजा ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअजितवीर्यजिनेंद्राय चंदनं निर्वामीति स्वाहा ॥२॥ अक्षत श्वेत अमल अनियारे, करि शुचि थाल भरूंजी। क्षिति दशमी पावन मनभावन, तव पद पुंज करूंजी ॥ हो ज्ञानी तैंने जानि लई, मेरे दरदकी मैं कहूं कहाजी, तो गुन में झलकत्त सही ॥३॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअजितवीर्यजिनेंद्राय अक्षतान् निर्मपामीति स्वाहा ॥ ३ ॥ सुमन सेवती रैण सुगंधादिक, बहु भेट धरूंजी। उद्दीपन शिवतियको करिके, विजय मनोज करूंजी। हो ज्ञानी तैने जानि लई, मेरे दरदकी मैं कहूं कहाजी, तो गुन में झलकंत सही ॥१॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअजितवीर्यजिनेंद्राय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ फैनी सुखदैनी क्षुतखेनी, चरु बहु भांति धरूंजी। १७६ .
पूजा पिनी १७७ 69 भरि वर थार वारि तव पद, क्षुत परचाहि हरूंजी॥ हो ज्ञानी तैन जानि लई, मेरे दरदकी मैं कहूं कहाजी०॥५॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअजितवीर्यजिनेंद्राय नैवेद्य निर्वामीति स्वाहा ॥५॥ प्रज्वलित ललित गलततमभर वर, दीप उदोत करूंजी। भारतीश ! तुव करत आरती, आरति सकल हरूंजी ।। हो ज्ञानी तैने जानि लई, मेरे दरदकी मैं कहूं कहाजी०॥६॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्थनीअजितवीर्यजिनेंद्राय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ कृष्णागर कर्पूर शिलारस, मलयज चूर करूंजी। दशविध बंधक फंद प्रजारन, दाहकसंग धरूंजी॥ हो ज्ञानी आने जानि लई, मेरे दरदकी मैं कहूं कहाजी०॥७॥ ओ ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअजितवीर्गजिनेंद्राय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ७ ॥ शुभ सहकार अनार नरंगी, निवुक थार भरूंजी। शिव उरोज श्रीफल फलपावन, ये फल भेट धरूंजी॥ 8 १७७ -- विती पूजा १७८ . हो ज्ञानी तैंने जानि लई, मेरे दरदकी मैं कहूं कहाजी ॥८॥ ओं ही विदेहक्षेत्रस्यश्रीअजितवीर्यजिनेंद्रीय फलं निर्मपामीति स्वाहा ॥८॥ जल गंधाक्षत सुमन चरूवर, दीप उदोत करूंजी। धूप दशांग पूररस फल वर, वसुविध अर्घ धरूंजी॥ हो ज्ञानी तैंने जानि लई, मेरे दरदकी मैं कहूं कहाजी ॥१॥ औ ही विदेहक्षेत्रस्थश्रीअजितवीर्यजिनेंद्राय अर्थ निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ अथ जयमाला। दोहा-अजितवीर्य जिनदेव तुव, परनीरज नमि भाल । धरि धीरज जय जस सुखद, भनूं विशद जयमाल ॥१॥ वीपकला छंद। जय अजितवीर्य वीरज अपार, तुमकू मम प्रणमन बार बार। सुख आशा धरि चिरते जिनेश, भवमें हम श्रम ठाने अशेष ॥२॥ सुखजाति निराकुलता न जानि, जडसंग किई निजशक्ति हानि । - R-56.
विती
पुजा
गुरुके मुखतें अब भेद पाय, निजमें तुम रूप रह्यो सु छाय ॥३॥
तुम समवसरन रचना वखान, नहिं वरन सके धरि च्यार ज्ञान ।
निज नर गव पावन करन हेत, मैं बरनूं कछु आनँद उपेत ॥४॥
धनु पांच सहस भुविते उतंग, सोपान सहस विंशति अभंग!
लंबे इक कोशतने सुजानि, इक कर उन्नत आयाम मानि॥५॥
योजन तसु द्वादस व्यास रूप, मणि-नील-शिला ऊपरि अनूप ।
तह प्रथम शाल वर धूलिशाल, पणरत्नरचित युत छवि विशाल ॥६॥
तिइके चवदानित सुजान, चौरी इक कोश गली महान ।
मणि फटिक भीति चहुं दिश अनूप, इह गंधकुटी तक रुचिर रूप ७)
तिन मध्य प्रथम चहुं दिशमझार, चव वापी संयुत छवि अपार ।
जिन विवघरे शुचि मानथंभ, मानी-मन-मद मर्दन उतंग ॥८॥
बहुं ओर अवनि धुर वलयरूप, प्रासादपक्ति तिहमें अनूप ।
फुनि वेदी तज कीने प्रवेश, भाव दुतिय मध्य खाई शुभेश ॥ ९॥
पूजा वि.ती १८० मणिमयतट विकसित कंजबात, सोपान रतनमय मन लुभात । शुक सारिक मोर मराल बुंद द्विज केलि करै नाना अमंद ॥१०॥ इमं धूलीशालथकी सु जानि, खाई तक योजन एक मानि । फुनि बेदी तजि भुव तृतीय सार, सुवलय इक योजन मान धार ॥१९॥ पुष्पनिकी बाड़ी है अनूप, मंडप जु अतान वितानरूप । थल सुंदर शिलतल है अपार,तित देव रमें आनंद धार ॥ १२॥ फुनि स्वर्ण साल सोहै अपार, छविमंडित मणिमय द्वार च्यार। तौरन वंदनमाला विशाल, बँगले मुकताफल माल भाल ॥ १३ ॥ कगुरे कटनी सीढी सुभेष, कंचन मणिमय राजै अशेष । शुक कोक मयूरादिक स्वरूप, मणि चित्र विविध झलकै अनूप ॥१४॥ सुर यक्ष तहां दरवान सार, नवनिधि द्वारै ठाडी अपार । आगें दुहु औरन• महान, गलिएं विचरनकू शोभमान ॥१५॥ तिनमें दय द्वय अतिरुचिररूप, घटधूप नृत्यशाला अनूप । ने १८० बर- पूजा वि.ती २८१ तहं द्रम द्रम द्रम बाजत मृदंग, सुरवाल न. वर ताल संग ॥१६॥ सननन सारंगी सनननात, पग नूपुर अननन झुनननात । ताथेई ताई ताथेई चलंत, फिर फिर फिर फिर फिरकी लहंत । १७ । लचकत कटि कर ग्रीवा सु सार, दरसात नवू रस छवि अपार । तननं तननंतननं सुवीन, गतिपूर बजें स्वर सप्त पीन ॥ १८ ॥ लय ग्राम गमक मूर्छा सुधार, उचरंत तरल तानें अपार । इत्यादिक साजि श्यामाअनूप, जगपति जस वरनत भक्तिरूप । १९ । वन च्यार बहूं कोने मझार, युत वेदी गिरि सर सरित सार। वापी बंगले रजरत्नरूप, क्रीडै सुर नर खग तह अनूप ॥२०॥ चंपक छदसप्त अशोक आम, तरु चेत्य चैत्ययुक्ताभिराम । इक योजन चौथी भुमि येम, अब वरनत हैं आगें सु जेम ॥२१॥ वेदी तजि धजपंकति विशाल, इक योजन पंचम भू रसाल। फुनि रजतकोट पूरव समान, राजें अनुपम रचनानिधान ॥ २२ ॥ २८१ वि.ती पूजा १८२ -ALS दरवान जहां सुरनाग जान, सन्मुख अदभुत राजे महान । फुनि षष्टमि भुवि योजन मझार, वन कल्पवृक्ष शोहै अपार ॥२३॥ तरु सिद्ध चहूं दिश हैं शुभेश, युत सिद्ध बिंब राजें नगेश। मंदार नमेरुक पारिजात, संतानकयुत इम च्यार भांत ॥ २४ ॥ वेदी तजि फुनि योजन सु आध, भुवि सप्तमि राजत हरि विषाद । चहुं दिशमें नव नव तूप शृंग, जिनप्रतिमायुत छविके प्रसंग ॥२५॥ फुनि फटिक कोट शोभा अमान, सबतें अदभुत राजें महान । गोपुर पन्नासम लसत जास, सुर कल्प सुभग दरवान जास ॥२६॥ गलियनकी वेदी युत महान, वेदी तक षोडश भीत जान। तिनपैं खंभन पर फटिक रूप, श्रीमंडप राजत है अनूप ॥ २७॥ मुक्ताफलमाला रत्नघंट, घटधूप आदि रचना महंत । सब थलते अष्टम भू मझार, रचना अदभुत आनन्दकार.॥२८॥ तिनमें चहुं ओर गली जुटार, दश दोय सभा शोभे सुसार । %%------ * ૧૮૨ CHESSES पूजा १८३ PU मुनि कैल्पसुरीअजियो सुजानि, नियज्योनि व्यंतरभुवन मानि ॥ पिती व्यंतर भावन ज्योतिष जु देव, कल्पामर नैर पंशु येम भेव । फुनि भीतर वेदी मध्य जानि, है प्रथम पीठ पन्ना समान ॥ ३०॥ वसु धनुष तुंग द्वयकोश व्यास, वसु पहल द्विगुन छवि गोल जास। ता परि च्यारों दिश यक्ष देव, वृषचक्र धरें शिरपैं स्वमेव ॥३१॥ जिनभक्त तनो तिहं तक प्रवेश, फुनि दुतिय पीठ कलधौत भेश । चव धनुष तुंग ध्वजयुत स्वरूप, तहं मंगल द्रव्य घरे अनूप ॥ ३२॥ फुनि तृतिय पीठ नग जटित सार, चव धनुप तुंग रचना अपार । तिह ऊपर गंधकुटी रसाल, छविपूरति गंध धरे विशाल ॥ ३३ ॥ सुरतरुके पुष्पनिकी अनूप, लूवन हे माल रसालरूप युत पत्र पुरुष किसलय अपार, छवियुत अशोक तरु शोकहार ।३४॥ पदतर वय सिंहनके सु रूप, यह विष्टरसिंह लसै अनूप । स १८३ yar १८४ सब रतनजदित सौहे अपार, सुरधनुसम प्रसारित जोति जार॥३५॥ fry तिहमैं चतुरंगल व्योम टार, पदमासन जिन छवि निर अपार । अनुपम भामंडलको उदोत, लाख कोटिक रवि छवि छीन होत ॥३६॥ भविजनकुंभव दरसात सात, महिमा तिनकी बरनी न जात । धनसम धुनि सब भाषा जतात, भ्रम बैग अंस कहुं ना रहात ॥ ३७ ॥ शिर छत्र तीन शशिकू लजात, प्रभुता तिहुँ लोकनकी जितात । सित चामर गंग तरंग जेग, चवसठि गित सुर ढारे सोम ॥ ३८॥ तुव धुनिवल मनु हरि मदनवान, तुम ढिग डारत सुर मुद महान। सो पुष्पवृष्टि बरनी न जात, शसकेतुपराजयकुँ जितात ॥ ३९ ॥ जगजीवनकू धुनि पूरि इष्ट, सुरताड़ित दुंदुर्मिनाद मिष्ट । रिपु मोह जयो केके निरोष, मनु ताम विजय भापे सुघोष ॥१०॥ कीडा चिदचिंतन अतुल जास, कवि कौन कहै. बुधिवलविकास । MES १८४ वि.ती पूजा १८५ पट द्रव्य अमित शक्ती न अंत, तिहुं कालमयी सत्ता अनंत ॥३॥ पर्याय अनंत लिये जु ताहि, झलकै गुनभाग अनंत मांहि । अनुभव करिकै वरने जु केम, मिसरी चखि मूक भने न जेम ॥४॥ जिय जातिविरोधी वैर छांडि, उर प्रीति धरै आनंद मांडि । तह रोग शोक व्यापै न भूर, दुख सकल नशें आए हजूर ॥४३॥ दुख देष दोपवर्जित विराग, तव राग भए नाशें कुराग। हम अतिशय असम धरै अपार, मंडित निर आकुल सौख्यसार । यह छवि चितवन उपवन मझार, मेरो मन रमन चहै अपार । अरजी अव ये सुनिये कृपाल, दुरभाव अविद्या टाल टाल ॥१५॥ समरस सुख निज उर मंडि मंडि, पर चाइ दाह दुख खंडि खडि । प्रकटो उर परउपकारवानि, निशदिन उचरूं तुम सुगुन गान ॥४६॥ तुम वैन सुधारसपान सार, चाहूं भव भव आनंदकार । १८५ वि. पूजा १८६ तुम भक्त संतजनको सुसंग, मति होहु कुमतिधरको प्रसंग ॥४७॥ परनिंदा परपीडन कुवानि, मति होहु कभी निज सुगुनहानि । १ सदगुरुचरणांबुजसेव सार, दीजे जगपति भव भव मझार ॥ ४ ॥ तुव दरश करूं परतक्ष देव, यह चाहि हिये वरतै सुमेव । पावें जब लों नहि मोक्षथान, तबलों यह देहु दयानिधान ॥१९॥ हम जाचत हैं कर जोरि जोरि, अघबंधन मेरे तोरि तोरि। निजबोधसुधासुखको भंडार, अब 'थान" हिये प्रकटो अपार ॥५०॥ कननि नंद आनंदकर, करो विघ्नगन नाश । पद्मचिह्नध्वज जनम थल, नगरि अयोध्या जास॥५१॥ सुन्दरी छंद। निज स्वरूप दिये दरसावनी, सकल पातिगताप नसावनी। अजितकी जयदा जयमालही, धरत कंठ लहें शिवबालही ॥५२॥ औं ही विदेहक्षेत्रस्थश्री अजितवीर्यजिनेंद्राप जयमाला निर्वामीति स्वाहा ॥ १८६ वि.नी पूना १८७ मडिल ईद। समिधर युगमंधर वाहु सुवाहुजी, संजातक अरु स्वयंप्रभूसुखदायनी ऋपभाननअरुअनंततीर्य मनमोहने, सूरप्रभूरुविशालप्रभूअति सोहने अवर वज्रघर चंद्रानन अति चारु हैं, चंद्रबाहु रु भुजंगम ईश्वर सारहें नेमप्रभू अरु वीरसेनवरनाम ये, महाभद्र अरु देवयशहि अभिराम ये अजितवीर्य इम विंश परम जिनदेव हैं। हरे तिमिर मिथ्यात्व करें सव सेवहैं । इन्हें भक्ति धरि भव्य यजे मन ल्यायकैं। ते नर सुर सुख भोगि वरें शिव जायकै ॥३॥ प्रयकर्ता परिचय-फपित्त । इवराहीम अलीखां नवावको सुराज तहां, काका तिनको जु अबदुल्लाखां विख्यात है। ताकी सहायतें जु कारपरदाज तास, A-RECEM वि.ती पूजा 4-45 धरम अनुराग धरै रहे कुशलात हैं । सार शुचि स्तुति ये रची है पुर टोंक थान, कुल अजमेरा फौजसिंह जाम तात हैं। विधिमुख लोके निधि इंदु साल विक्रममें, वार शशि अश्वनि नौमी अवदात है ॥१॥ दोहा। गृहपति दूनिपति हि के, संघी पन्नालाल । वृषवत्सल तिन पाठ यह, कीनो सोधिरसाल |॥२॥ सकल करन पर्याय निज, अरु परको हित जान। विना बुद्धि थुति करनपैं, मति हसियो मतिमान ॥३॥ ये विनती कर जोरिक, लोज्यो चूक सुधार । करियो भक्ति जिनेशकी, भरियो पुण्य भंडार ॥४॥ इति विदेहक्षेत्रस्थाविंशतिविछम्पनतीर्थकरपूजा समाप्ता ॥ २१ ॥ 16 १८८
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