Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Hindi Shubhashit
Front matter
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अधिक लाभ उठा सकते हैं। कोई यह न जाने कि मैं किसी
मतलब से प्रशंसा कर रहा है, पण्डित जी से साधारण
दूरकी मित्रता के सिवा मेरा और कोई सम्बन्ध नहीं है,
मैंने जो कुछ लिपा है वह केवल सच्चे मनसे न्यायधर्म
का पालन किया है, परमात्मा उन को इस लामदायक
पुस्तक प्रकाशन का यश दे, और सर्व देश में इस पुस्तक
का प्रचार करे-
॥ दोहा छन्द ॥
रत्न द्वीप, निधि, चन्द्रमा,
सम्वत वीच नवीन ।
'अफसूं' श्री 'चेताव' ने,
पुस्तक मुद्रित कीन ॥
"१६७९"
"संख्या सुचक मन्त्र विम्वाक्षरानुसार
हिन्दी सुभापितीष्ट ये, छपी वढे नितमान ।
प्यारी पुस्तक डालगुणि,अफ सम्बत जान॥
"१९७६
"
नम्र
अफतूं
( काशी निवासी)
॥ ॐ कवये नम ॥
हिन्दी सुभाषित
*->For*
पण्डित राम रकमा मल राम कान
द्वारा सम्पादित
अ+उ+म्, महिमा
ओमुन्चारण होतही, टिके न विन विपाट ।
स्यार भागते हैं यथा, सुनि केहरिको नाद ॥
अगुवा अवगुण
सबसे आगे होयके, कयह न करिये यात ।
सुधरे-काज, समाज फल, विगरे गारी खात ॥
अच्छोमे बुराई का लेश
लघु कलक भी म्बरमे, समझ पडे ततकाल ।
दूरहि ते चुगली करत, ज्यो दर्पण मे याल ।
1
अज्ञानकुत अनादर
भले बुरे सो एकसो, मूढन की परनीत ।
गुजा मम तोलत कनक, तुला पलाकी रीति
गुण जाने बिन गुणिन को, होत नही सत्कार
गज मुक्ता तजि मिल्नी, धारत गुजा हार
अरे हस या नगरम जैयो आप विचार
कागनसो जिन प्रीति करि, कोकिलई बिडार
अजानी जानन नही, गुणिजनको सत्कार
जिमि गुलाय गुडहर सुमन, भेदन जान गंधार
साई घोडे अछत ही, गधहन पायो राज
कौआ लीजे हाथ मे, दूर कीजिये वाज
दूर कीजिये याज, राज पुनि ऐसो आयो
सिंह कीजिये ट स्यार गज राज बढायो
कहि गिरधर कविराय जहाँ यह बूझ बधाई
तही नकोजे भोर साम उठि चलिये माई
राम कवि राजा प्रजा जागे गुण गान लागे,
सबके समाई लहैं सार निज घरकी।
चकवादि' पक्षीके विरहके विनाश कारी,
कमल कुटुम्यको हुलासकी
खवरकी ।
मुदिन जहान होत उदित भए त जाके,
-
(३)
प्रकाश व्यधा हरे चगचरको ।
पड़े न दिसाई जी पै तुझको उलूक
तेरी आरसकी म्बुटाई या खुटाई दिनकर की।
मेहुंड बरको लगावे जो जनन करि,
काटत चमेली चम्पा चदन जुहिनको।
हिमा करि हस और कोग्लिा कलापिनकी,
आदर समेत पाल वायम मलिनो।
गर्ष गजराजको ममान भान होत जहा,
एकमे क्पर औ क्पास लगे जिनको ।
हमे कमलापर न देश दिग्गलाद वह,
दरसे हमारे है प्रणाम कोटि तिनको ।।
अज्ञानानन्द
तजी, मूढ
दोष-कोप गुन बन गये, हुई हियेकी चन्द
उल्लू खण्डर उजाइको, ममझत स्वर्गानन्द
जो विपया सन्तन
ताहि लपटात
ज्यो नर डारत वमन कर इवान स्वादमा सात
रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पशु सर साये स्वादमी, गुर गुलियाये साय
करि फुलेलको श्राचमन, मीठो पहतासराहि
चुप कररे गन्धी चतुर, इन दिग्यानत काहि
अज्ञानी परोपकारकी सार नहीं जानता
बुद्वि होन जानत नहीं, परहिन कारक गैनि
निज मुग्नही न करत है, जिम बालक-फर मीनि
म
अति निन्दा
अति परिचय त हात है, अरुचि अनादर भार
मलियागिरिकी भीलनी, चन्दन देति जराय
अति सम्पति दिन पायकै, अति मत करिये कोय
दुर्योधन अति मान लें, भयौ निधन कुल योय
अतिही सरल न हृजिये, देसिलेहु बन राम
सीधे सीधे काटिये, याको तरु बच जाय
सबको रसमें रासिये, अन्त लीजिये नाहि
विप निकस्यो अति मथनते, रत्नाकर हमाहिं
चोरा चोरी प्रीतिके, कीन्हें' यढत हुलाम
अति साये उपजै अमचि, थोरी बात मिठाम
अति कवह नहिं कीजिये, किये पाव दुस मोय
सुधा सुरस भोजन विमल,अति साये विष होय
चौपाई
सुन प्रभु बहुत अवना कोये, उपज कोप ज्ञानिहुके होये
अति सघर्पण कर जो कोई, अनल प्रकट चदनते होई
,
'
,
अनन्य प्रेम
जिन नननमे पी बमे, आन से क्यो आन
अबाबील घर करत है, सूनो देसि मकान
प्रीतम छवि नैनन बसी,पर छबि कहा समाय
भरी सराय रहीम लग्नि,आप पथिक फिरजाय
सरवरके संग एकसे, याढत प्रीत न धीम
प मरालको मानसर, एक और रहीम
अन्याय इंड
अवगुण करता औरही, देत औरको मार
जो पहुंचे नहिं रुद्र पै, जारत विरहिन मार
और करै अपराध कुइ, और पाव फल मोग
अति विचित्र भगवन्त गति, को जग जाने जोग
अनुचित संतोष
छात्र, छत्र-धर जो कही, कर बैठे मन्तोष
बढ़े नहीं दिन दिन घटे, विद्याधनका कोष
अप्रिय सत्य
हितहूकी कहिये न तिहि, जो नर होय अवोध
ज्यो नकटेको पारसी, होन दिखाये क्रोध
ठोप भरी न उचारिये, यदपि यथारथ यात
कहै अन्धको अधिरी, मान चुरी मनरात
-
कछु कहि नीच न छेडिये, भलौ न वाको सग
पाथर डारे कीचमे उछरि विगारे अग
रिम उपजावक मत्य को, कहिये नही उमाहि
दहत रहत जिय अन्धको,कहत अन्ध जो ताहि
अप्रिय
मा ताकं अवगुण कहै, जो जिहि चाहै नाहिं
तपत,कलकी,विपभरयो,बिरहिनशशिहि कहाहि
जाको जह स्वारथ सधे, सोही ताहि सुहात
चोर न प्यारी चादनी , जैसी कारी रात
अपना ढोप कोई नहीं देखता
सव देस 4 आपनो, दोप न देखें कोय
कर उजरी दीप प, नरे अँधेरो होय
अपने दोप न देग्निहै, पर निन्दा विस्तारि
ज्यो कुलटा कुलजानको, है अपावन नागि
अपना वही है जो सदा साथ रहै
सोई अपनो आपनो, रहे निरन्तर माध
होत पगयो आपनो, शस्त्र पगये हाथ
नेगी दूर न होन है यह जानो तहकीक
मिटत न ज्यो क्योही किये, जो हाथनकी लीक
अपना तबतक ही रहे, रहे पीठ असवार
ननु घोडा ले चोरको, पहुचन कोम हजार
--
|-
दीप बार ले आजत, रिना l
रघुपति सीता परि हर्ग, Prata
अपने हितको वात सबको भनी लंगनी,
भले लग सको कही, कोक निरयन
पिय आगमके कागवच, विहिनगंगान
जो जाके हितकी है, मो तारी अमियम
पिय आगम माग्यो भलो वायम
पिर
कोर कहै हितरी कहै, ई नाहीत
सबै उडारत कागरो, पनि
कहो मूढ की यानको, परिये जो freix
सौह दिवाये औरके, पर
अपनी कीरति कान मुनाहोन न श्रीमान
नाग मत्रके सुनतही, विशE
अपव्ययका अन्दर
काल अँधेगे रातमे, था.
अपवाट मग
लोकनके अपवाद की, "
अभयन्ना
जो चाहै मोई करे,
सयके देसत नगन हरि
२
'
--
V
(८)
डरे न करह दुष्ट सो. जाहि प्रेमको बान
'भोर' न छोडे केतकी, तीये कटक जान
अभ्यास महिमा
करत करत अभ्यासके, जड मति हात सुजान
रसरी आवत जात ते. सिल पर परत निमान
जन्मत ही पावै नहीं, भली बुरी कुउ बात
यूझत बूझन पाइये, ज्यों ज्यो समझत जात
एक एक अक्षर पदे, जाने ग्रन्थ विचार
पैड पंड ह चलत जो, पहुचत कोस हजार
कठिन कला हू आय है करत करन अभ्यास
नट जो चाले बरत पर साधे वरम छ माम
कन कन जोरे मन जुरे, काटे निवरे सोय
बृद बूद ज्यो घट भर्र, टपकत बीते तोय
यन्न और अभ्याम कर, मुशकिल हो आसान
अभ्यासी मरते नही, कर मारक-विप पान
शशि सकोच साहस मलिल, मान सनेह रहीम
बढत बदत बढजात है, घटत घटत घट सीम
यह रहीम निज मगले, जन्मत जगत न कोय
बर. प्रीति, अभ्याम, यश, होत होत ही होय
बढत बढत मम्पति सलिल, मन सगेज यदिजाय -
घटन पटत पुनि ना घटे,वरु समूल कुम्हलाय
-
"
२
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बनन काज अभ्यास ते, शन शन ही सोय
बद श्रद घट भरत है, कन क्न मन भर होय
पार्न फल अभ्यामते, बिन अभ्यास न पाय
चल न्योटी पहुंची उदधि, न चले गम्ड न जाय
फरत महा अभ्याम जो निश्चयही फल पाय
गिरि गिरि न्योटी भीति त, अन्त शिमर चढजाय
दुर पाये बिनह कहू, गुण पावत है कोय
महे च बन्धन सुमन, तब गुग्ण मयुत होय
चिया गुम्मी भक्ति त, के कीने अभ्यास
भील द्रौणके यिन कहे, सोख्यो वान ग्लिास
निद्या याद किये विना, विमरत इहि उरमान
विगर जात बिन सपर ते, ढोली फेसो पान
अभिलापा पूरी होनेपर दशा
मन भावनके मिलनको, मुसको नाहिन छोर
बोल उठे नचि नचि उठे, मोर सुनत घनघोर
विरहानल व्याकुल भए, पाया प्रीतम गेह
जैसे आवत भाग ते, आग लगेपर मेह
मनभावनके मिलन ते, त्यो मन हो न हुलास ?
मिल मनेह गुण करत है, चारो ओर प्रकास
-
"
निज मन भावनके मिले, का को जियन खिलाय
दिनकर दर्श निहार के, खिलत कमल हर्षाय
मलिन देह वेई वमन, मलिन विरह के रूप
पिय भागम और वढी, आनन प्रोप
अनूप
अलस निन्दा
साथी मिले जु आलसी, ठनै कर्म सो वैर
एक पाँव सो जात तब, चलत न दूजो पैर ।
असत्य निन्दा
मिथ्या भापी साच ह, कहै न माने कोय
भाण्ड पुकार पीर बंश, मिस सममै जग लोय
अन्तर अँगुरी चारको, साँच भूठमें होय
सब माने देसी कही, सुनी न माने कोय
कवह झूठी वात को, जो करिहै पछपात
झूठे सग झूठो परत, फिर पाछ पछतात
जग परतीत बढाइये, रहिये साचे होय
झूठे नरकी साचि ह, साखि न माने कोय
घनाक्षरी
भानु छुप जात अन्धकार के समूह आगे,
छुपत एशानु अति तृणके गिराय ते
विद्या छुप जात है अविद्याके समाज विच,
शील उप जान है अशोलके दबाये हैं।
.
1
.
(१)
समवर्ण धातु सग मुवर्ण रजत छुप,
छुपत सुगन्ध दुर्गन्ध नियगयते ।
अन्तम असत्यको विनाश होत “गमकवि"
सत्य प्रगटात
शुम कालहुवे पाय,
अवस्था परिवर्तन
सुख बीते दुख होत है, दुस बीते
सुर
होत
दिवसगये ज्यो निशउदित निशगति दिवस उटगेत
एक दशा नियहै नहीं, नहिं पछतावह कोय
रविहकी इक दिवसम, तीन अवस्था होय
घटत बढत सम्पति सुमति, गति अरहटकी जोय
रौती घटका मरत है, भरी सुरीती होय
जो पावै अतिउच्च पद, ताको पतन निदान
ज्यों तप तप मध्यान लो, अस्त होत है मान
होत बुरे हू ते भलो, काहू ममय प्रकास
अधिक मास ते ज्या मिटयो, पाडव फिर बनवास
सरस निरस नर होत है, समय पाय सब कोय
दिनमें परम प्रकाश रवि, चन्द मन्द द्युति होय
धनी होत निर्धन वहुरि, निर्धन तें धनवान
बडी होति निशि शीन ऋतु, ज्यो प्रोपम दिनमान
तब लगि महिये विरह्दुस, जय लगि आव सुवार
दुःख गये तब सुक्स है, जानै सव मसार
गई
वीत बहार
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जिन दिन देखिये
कुसुमा मु
अय अलि रही गुलाबम, अपत कटीली डार
दहि आशा अटक्यो रहै, अलि गुलाबके मूल
अइहै बहुर बसत मृतु, इन डारन वे फूल
मरत प्यास पिजरा परथो, मुत्रा दिननक फेर
आदर दै दै बोलयतु. बायस वलिकी येर
कुण्डलिया
साई अवसरके पड़े, कोन सहै दुख द्वन्द
जाय विकाने डोम घर चे राजा हरिचन्द
वे राजा हरिचन्द, करें मरघट रखवारी
धरे तपस्वी वेप फिर, अर्जुन यलधारी
तपै रसोई भीम महाबलि परघर माई
को न करें घट काम, परै अवमरके साई
छप्पय
कबो द्वार प्रतिहार, कबौ दर दर फिरत नर
कबौं देत धन कोटि, कयौ करतर करत कर
कयौ नृपति मुख चहत, कहत कर रहत वचन बम
को दाम लघु दास, करत उपहास जिभ्य रस
कछु जान न सम्पत्ति गरजिये, विपत न ये उर धारिये
हिय हार न मानत सत पुरप, 'नरहरि हरिहि सँभारिये।
।
।
कुण्डलिया
नर वर नयन उघार अय देख गौर करि तौर
आज दिवस है और कछु, काल दिवस है और
काल दिवसहै और, दौर इमि चले रैन दिन
कमी रक हो राव, कमी हो राव राज विन
कभी मगलाचार, कभी रोवत विलाप कर
कभी मोद अरु धूम , कमी हो विकल दुखित नर
यह अचल न चल दल सम सदा, दुस सुस माने अज्ञ जन
कह 'राम' वीर सुइ धीर नर, रस रहत सुधार पन
घनाक्षरी
पात झर जात द्रुम धुति ते विहीन होत,
आवत बसत दल फूल अधिकाई है।
ग्रीष्मकी गरमी अपनात पच भूतन
को,
पावसके मेघ आ अनत भर लाई है।
केला कटजात डटजात फल पावन ते,
तावन ते सोना गहि लेन सुघराई है।
रामकवि काहेको विनाश मन मूढ़ होत,
होयेगा हुलास दुस दारुण विताई है।
हरि गीत
ससारमे किसका समय है एक्सा रहता सदा
है निशि दिवा सी घूमती सर्वत्र विपदा सपना
2
(१४)
जो आज एक अनाथ है नरनाथ कल होता वही
जो अाज उत्सव मग्न है कल शोक्से रोता वही
उन्नत रहा होगा कभी जो हो रहा अवनत अभी
जो होरहा अवनत अभी उन्नत रहा होगा कभी
हँसते प्रथम जो पद्म है तम पक्मे फंसते वही।
मुरझे पडे रहते कुसुम जो अन्तमें हंसते वही
उन्नति तथा अनति प्रकृतिका नियम एक असण्ड है
चढता प्रथम जो व्योममे गिरता वही मार्तण्ड है
अतापत्र अवनति ही हमारी कहरही उन्नति कला.
उत्थान ही जिमका नही उसका पतन हो क्या भला
उत्थानके पीछे पतन सभव सदा है सर्वथा
प्रौढत्वके पीछे म्बय वृद्धत्व होता है यथा
हों। किन्तु अवनति भी हमारी हे समुन्नति सी बढी
जैसी बढी थी पूर्णिमा वैमी अमावस्या बढी
है नेचरलका नियम यह चलना हमेशा चाल पर
इसही तिये रहता नहीं है कोई यकसा हाल पर
नीचे पडेको है उठाता प्रेम पुचकार कर
ऊचे चढेको हे गिराता मार थप्पड गाल पर
गीतिका
क्ल जिम देसा या बैठा शहनशाही तरत पर
आज वो बेग्ल पडा रोता उमीने सरत पर
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(१५)
अब जिसे तुम हो हिकारतकी नजर से देग्मत
देशलेना कल उसीको नाज करते वातपर
सवया
रैमन साहसी माहस राग्न सुसाहससे सब जैर फिरेंगे
त्योपदमाकर या सुसम दु स त्या दुसमेसुसमेर फिरंगे
चमेहि बन बजारत श्याम सुनाम हमारेहि टेर फिरेंगे
एक दिना नहि एक दिना कयह फिर वे दिन फेर फिरंगे
छप्पय
व उठते भी हैं अवश्य ही, जो गिरते हैं
दुर्दिन के ही वाद, सुदिन मरके फिरते हैं
दे दारुण दुस, वही नर फिर सुख पावे
अवनतिके उपरान्त, घडी उन्नतिकी आने
रवि रात बीतने पर प्रगट, होते प्रात समयमे
बस यही सोचकर आपभी, धीरज रसिये हदयम
होना प्रथम वसन्त, ग्रीष्म ऋतु फिर आती है
चले पसीना अग, श्राग सी लग जाती है
पने फल या फल, विना जल जलजाते हैं
पशु पक्षी भी घोर धाममे धराते हैं
फिर शीघ्र देखते देखते, हरीभरी होती मही
आजाती वर्षा ऋतु भली मुस देनी तत्काल हो।
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(१६)
कवियोंका सर्वस्व, स्वर्ग की शोमा भारी
शिवके भी सिर चढा, और आकाश बिहारी
अमृत सहोदर चन्द्र, कला जब घटने लगती
तब होता है क्षीण, और श्री लटने लगती
वह फिन्तु शीघ्र ही पूर्ण हो,होता है फिर-अभ्युदय
है ठीक नियम यह प्रकृतिका, परिवर्तन हो हर समय
इतने बड़े अनन्त तेजकी, राशि दिवाकर
तपते तीनो लोक बीच पूजित हो धर घर
किन्तु समय पर राहु उन्हें प्रस लेता जाकर
कुछ कर सकते नही हजारों यद्यपि हैं कर
वह पहले होता अस्त या ग्रस्त समस्त प्रभा रहित
फिर होते मुक्त प्रकाशसे युक्त पूर्वमे अभ्युदित
जीव मरण के बाद जन्म पाता है देखो
कृष्ण पक्षके बाद, शुक्ल आता है देसी
चलती है हेमन्त हवा, जब जोर दिसाती
तब होता पतझाड, न पत्ती रहने पाती
फिर वही वृक्ष होते हरे, नव पल्लव शोभित सभी
वस इसी तरह होगे सुनी, उन्नति युतहमभी कभी
सवैया
कवह तो घटा धनघोर उठै, कबहू नहिं नेम्हु चादर है
कवह जग मे सनमान वडो, कबहू घर मामन आदर है
.
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(१७)
कवह नन शाल दुशाल घने , कबहू सिरपै नहिं चादरहे
मन राम भजो जिय सोच नजी, यह कादिरकी गति नादर?
आत्मश्लाघा
श्रापहि कहा वसानिये, भले बुरे को जोग
ॐ घन की बात को, कहैं वटाऊ तोग
आत्म प्रशसासे मिलत, नेकहु मान न मोद
निज कर कुच मीड बधू, लहत न मदन विनोद
यहक बडाई आपनी, कत राचत मति भूल
विन मधु मधुकरके हिये, गडे न गुडहर फूल
कहत निपुणई गुण विना, रहिमन निपुन हजूर
मानो टेरत बिटप चदि, मो समान को
निज मुरव निज कीरति कथा, परनत श्रोछे लोय
जिमि साली घट करत रब, मौन सपूरण होय
झूठे ह हे मूढ नर, निज कोरति करि गान
स्यो गुणि जन की नजर में , नर ते बनत हवान
आयु परिमाण
धर्म कर्म कर जान के, जीरन को अति अल्प
विद्या, धन, सचन चिपय , आयु मान शत क्ल्प
आश्रय प्रशंसा
पडित बनिता पर लता, शोभित आश्रय पाय.
है मानिक बहु मोल को, हेम जटित छवि छाय
.
(१८)
बिन आश्रय सोभित नही, पडित, लतिका, नार
मणि माणिक वहु मूल्य है, वे भी हेमाधार
घनाक्षरी
चतुर गवैया होय चेद को पढ़या होय
समर लडैया होय रण भूमि चौडी में
जानत समैया होय मौर कवि त्योही चाहे
बात को जनैया होय नैनकी कनौडी मे
नीति पै चलैया होय पर उपकार आदि,
कुशल करैया काज हाथकी हथौडीमे
गुनन को शीला होय तोऊ न वसीला विन,
कोऊ हो पुढया भैया तेहि तीन कौडीमें
इनसे बचो
पाप मूल जग लोभ है, व्याधि मूल मद पान
दुस मूल अज्ञान है, तीनो त्याग सुजान
पर - मेवा सब सुस हरत, परनारी धन प्रान
कीर्ति हनत पर अन्न नित, विप्र द्वेप कल्याण,
ईश्वरको सबकी चिन्ता है
प्रभुको चिन्ता सवनकी, आपुन करिये नाहि
जन्म अगाऊ भरत है, दूध मात थन माहि.
एक एकके नामको, रचि रासै जगदीस
जैसे भरिये पेट को, सयको निहुरै मीम
T
।
(१६)
जिहि जेतो निहचे तितौ, देत देव पहुचाय
सकर खोरे को मिले, जैसे सकर पाय
यथा योग सब मिलत है, जो निधि लिख्यो अकूर
सल गुर भोग गँवारनी, रानी पाय कपूर
अमर बेल बिन मूलकी, प्रति पालत है ताहि
रहिमन ऐसे प्रभुहि तज, सोजत फिरिये काहि
काम कछु आव नही, मोल न कोऊ लेड
बाज टूटे वाजको, साहिय चारा देड
रहिमन कोऊ काकरे, ज्वारी चोर लवार
जो पति रासन हार है, मासन चारसन हार
अजगर कर न चाकरी, पक्षी रैन काम
दास मलूका यों कह, सबके दाता राम
सवैया
दात न थे तब दूध दियो, जब दात टिये वो अनाजहि देई
जीत्र बसै अलमे थलम, तिनकी सुधि ले सो तेरीहु लेई
जानको देत अजानको देत, जहानको देत सोताहूको मेंई
क्यो अय सोच करे मन मूरस, स च करे पछु अाज न देई
दोहा
प्रलय करन बरसन लगे, जुरि जलधर इक माथ
सुरपति गर्व हरो हरपि, गिरिधर गिरि घर हाथ
म
(२०)
उदयम महिमा
.
हलन चलनकी शक्ति है, तबलो उद्यम ठान
अजगर लू मृगपति वदन, मृग न परत हैं आन
विद्या धन उद्यम निना, कहिये पावत कौन
बिना डुलाये ना मिले, ज्यों पसाकी पौन
श्रमही ते सब मिलत है, विन श्रम मिले न काहि
सीधी उगुली धी जम्यो, क्योहू निकले नाहि
उद्यम बुधि बल से मिले, तब पावत सुस साज
अध कध चढि पगु ज्यो, सवै सुधारत काज
प्रेरकही ते होत है, कारज सिद्वि निदान
चढे धनुप हु ना चले, बिना चलाये बान
विन उद्यम मसलत किये, कारज मिति न ठाय
रोग न जानत औपधी, जान साय तो जाय
गुनी होय श्रम कष्ट करि, लहै राज दरबार
वोध बध मुक्ता सहै, तब उर हार विहार
चले पिपिलका जो सदा, समुद पार है जाय
जो न चले तो गरुड ह पैंड हू चले न पाय
भयो विमुक्त न ज्ञान सो, कर्म हीन नर कोय
विन साये मधु बोधसो, मुस मीठो नहिं होय
मुस में भोजन निकटको, विन उद्योग न जाय
बछरा थन रीचे विना, पियत न दूध अघाय
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(२१)
बिन उद्यम नहिं पाइये, कर्म लिख्या जौन
धिन जलपान न जात है। प्यास गग तट मौन
घनाक्षरी
सामिलमें पौरमें शरीरमे न भेद रार,
हिम्मत कपटको उधारै तो उधर जाय।
ऐसे ठान ठानै तौ विनाह जन्त्र मन्त्र किये,
सापके जहरको उतारै तो उतर जाय।
ठाकुर क्हत कछु कठिन न जानो अय,
हिम्मत कियेते कहो कहा न सुधर जाय ।
चार जने चारह दिशाते चारों कोन गहि,
मेरुको हिलायकै उसारें तो उसर जाय।
जाते हैं समुद्र वध रहते न अद्रि अडे,
अग्नि, जल, वायु आदि हुक्म उठाते हैं।
हुकम उठाते है उमग भरे वीर वीर,
होते धन धान्य
शाह मस्तक नवाते हैं।
मस्तक नगाते हैं जगतके सरल लोग,
गिरधर मूर्ति निज हिय में बिठाते हैं।
हिय में निठाते है त्यो मह्मिा पराक्रम की,
पौरुप दिया ये क्या क्या काम हो न जाते हैं।
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(२२)
उदरपोपण, पेटस्तोत्र सहित
उदर भरनके कारने, पानी परत इलाज
नाच याचे रनभिर राच काज अकाज
दुर भर उदर दरीनके, होत न नन संताप
तो जन जनकी को महत तरजन गरजन ताप
स्री उदर दुइ भरन भय, हर अग्धंगी दार
जोन होयतो क्यों रहे, अवलो तनय कुमार
उदर बग्न नरतें भलो, राहु उदर ते हीन
कबह नाहिन होत है, जन जनको आधीन
भरत पेट नट निरत के उरत न करन उपाय
धरत बरत परयाय अरु, परत वरत लपटाय
दीन धनी आधीन है, मीम नबावत काहि
मान भग की भूमि यह, पेट दिखावत ताहि
रूसे सूर्य उदर को, भरे होत संतुष्ट
राम न लास करोर के, पाये तुष्ट न दुष्ट
एस एकसों लग रहे, अन्नोदक सबन्ध
चोली दामन ज्यो रच्यो, जगत जजीरा बन्ध
रहिमन कहत सु पेट सो क्यो न मयो तू पीठ
रीत अनरीत करत, भरे विगारत दीठ
बडे पेट के भरन में, है रहिमन दुस बाढ.
गजके मव विधि.
-
।
(२३)
नहि रहीम कुछ रूप गुण, नहिं मृगया अनुराग
देशी शान जु रासिये, भ्रमत भूयही लाग
गगन चढे फिर क्यों गिरे, रहिमन वहरी बाज
फेर प्राय वन्धन पर, पेट अधम के काज
पेट स्तोत्र
नमामि पेट नमामि पेट पेट प्ररमाराध्य प्रभी
पाडे पानी पाडे चनते, चौवेजी चपरास पहनते
हेत तुम्हारे शुरू भिरारी, अद्भुत महिमा बडी तुम्हरी
नमामि पेट नमामि पेट पेट०
द्वार पात है वने द्विवेदी, तेल बेचते वठ त्रिवेदी
वने मिश्रजी जमानर है, गानें कैसे
नमामि पेट नमामि पट पेट०
विडी बनाते है साइ जी, बडी वेचती है वाईजी
पाठक येचे धोतोजोडा, जो कुछ आप कर मो थोडा
नमामि पेट नामामि पेट पट०
तज हथियार तराज धारी, क्षत्री बन बैठे पनमारी।
त्याग वेचना जीरा, धनिया बने कान्स्टेबत हैं यनिया।
नमामिपेट नमामि पेट पेट
दुस दाई चपट तव साके, भस्म रमाके जटा बढाके।
कई शुद्र दुव्यसनी पाजी, बन बैठ जग मे बाना जी।
नमामि पेट नमामि पेट पेट
गुण अपार हैं
(२२)
उढरपोपण, पेटस्तोत्र सहित
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उढर भरनके कारने प्रानी करत इलाज
नाच याच ग्नभिरं गचं काज अकाज
दुर भर उदर दरीनके, हात न तन संताप
तो जन जनकी को महत तरजन गरजन ताप
करी उदर टुइ भग्न भय, हर 'अग्धगी दार
जोन होयती क्यों रहे, अवलो तनय कुमार
उदर धरन नरत भलौ, राहु उदर तें हीन
कबहू नाहिन होत है, जन जनको आधोन
मरत पेट नट निरन के, उरत न करत उपाय
धरत बरत परयाय अरु, परत परत लपटाय
दीन धनी प्राधीन है, मीस नवावत काहि
मान भग की भूमि यह, पेट दिसावत ताहि
रूखे सूने उदर को, भरे होत सतुष्ट
राम न लास करोर के, पाये तुष्ट न दुष्ट
एक एकसों लग रहे, अन्नोदक सयन्ध
चोली दामन ज्यो रच्यो, जगत जजीरा बन्ध
रहिमन कहत सु पेट सों, क्यों न भयो तू पीठ
रीतै अनरीत करत, भरे विगारत दीठ
चडे पेट के भरन में, है रहिमन दुस बाढ
गजके मुरब विधि याहिते, दिये दात द्वै काद
।
( २५ )
तोभी होतीहै तव पूजा, कौन समर्थ श्रापसा दृजा
नमामि पेट नमामि पेट पट०
प्रात काल नीर खुलती जव,मनोवृत्ति जागृत होती तब
याद आपकी ही आजाती, शीघ्र दृष्टि हडी पर जाती
नमामि पेट नमामि पेट पंट
जन्मकालम जीवन भर तक, उपाकालमं अर्द्ध रात्रि तक
लकर मनमें विविध वासना, परते मब नित तब उपासना
नमामि पटं नमामि पेट पट
वर न जो निन तब आराधन, महा मूर्य पापी वह दुर्जन
शीघ्र अवज्ञा फल पाताहै,कुछ दिन ही में मर जाता
नमामि पेट नमामि पेट पेट
जगमें तब ऐसी है महिमा, ऐसे हैं प्रताप गुण गरिमा
यड को पीपल कहना पड़ता, सालेको प्रभु कहना पड़ता
नमामि पेट नमामि पंट पेट
कई आप हित ऐसे मरते, चमरी को सलाम नित करते
कई पीटते यश की भेरी,करते नीच द्वार पर फेरी
नमामि पेट नमामि पेट पटल
तुम्ही दुसो से भेट कराते, तुम्ही अनेक चपेट सिताते
-जड लेसिनी कहा तक गाने, जगजीवो की कौन चतारे
यक्ष रक्ष सिद्धादिक किन्नर, सुर तक भी रखते हैं तब डर
नमामि पेट नमामि पट पट
है
3
।
(२४)
पृथ्वीभरके सकल जीव गण, साहिब यासेठमहाजन
लगा रक से महाराज तक,सभी आपके हैं आराधक
नमामि पेट नमामि पेट पेट
सिर पै टोपी तन में कुर्ता, न हो भलेही पग में जूता
आप भरेहैं तब क्या कहना,बहता सदा शान्तिका झरना
नमामि पेट नमामि पेट पेट०
तब चिन्ता निज मनमे धारे, भूक प्यासकी दशा विसारे
प्रति दिन प्रति क्षण हेतु तुम्हारे, फिरते हैं सब मारामारे
नमामि पेट नमामि पेट पेट०
किसिको पर धर्मी बनवाया, किसिको लन्दन तक पहुंचाया
किसिको वाघम्बर पहनाया, सवको तुमने नाच नचाया
नमामि पेटं नमामि पेट पेट०
लिये तुम्हारे लोग झगडते, पैर पकडते नाक रगडते '
एठ छोडते हाथ जोडते, आस फोडते पैर तोडते
नमामि पेट नमामि पेट पेट०
ज्ञान तभीतक ध्यान तभीतक, ईश्वरका गुणगान तमीतक
रहते भरे श्राप, जबतक, साली में है साली वक वक
नमामि पेट नमामि पेट पेट०
स्थिति अनुसार भक्त गण अर्पित, लेह्य चौष्य पेयादिक चर्वित
नित नै वेद्य ग्रहण करते हो, तोभी खाव खांव करते हो
नमामि पेट नमामि पेट पेटक
घरमें कोई भी मरजावे, रोना धोना भी मचजाये
।
धन रहीम जल पाको, लघुजिय पियत अघाय
उदधि बडाई कोन है, जगत पयामो जाय
नम्र विटप सब फल भरे, रहे भूमि तियराय
पर उपकारी पुम्प जिमि, नवहि सु सम्पति पाय
चौपाई
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीडा सम नहि अधमाई
परहित वश जिनके मनमाही, तिन्ह कह जग कछु दुर्लभनाही
दोहा
चनी कृपण ते होत कय, निधन उदारहि गैस
वो न दे सके तनिक धन, ये परहित दे सीस
उपकारकी ढाल
निन्दक हैं जो दुष्ट जन, कर उनपर अहमान
टुकडा आगे डालदे, फिर नहि भोके श्वान
उपाय
पूरे साधन के बिना कारज मधे न बीर
श्रोदी डोरी कृपमो, नक न काढत नीर
जो पहिले कीजै यतन, मो पाछे फल दाय
अागि लग गोद
युना,
मे
प्राग घुमाय
होत न कारज घडन ते विधियत निना उपाय
अजन चलत न नेपह भाप मोमिन माय
।
।
(२९)
मैंने स्तुति की है तब ऐसी की होगी न किसीने जैसी-
बस वरदान यही मैं पाऊ. तेरा दु.स कभी न उठाऊ
नमामि पेट नमामि पट पटक
दोहा
अरे पेट धिक्कार है तो को वार हजार
गुणि जन को निदरत फिरत, फिर फिर द्वार गवार
उदारता
अति उदारता वडन की, कहलो वरनै कोय
चातक याचै तनक जल, वरस वरै धन तोय,
उपकार
उपकारी उपकार जग, सबसो करत प्रकास
ज्यो कटु मधुरे तरु मलय, मलयज करत सवास
जे उदार ते देत हैं, रीमत जिहि तिहि चाल
गाल बजाये हू करे, गौरी कन्त निहाल
जो सब ही को देत है, दाता कहिये सोय
जल धर वर्पत सम विपम, थल न विचारे कोय
मलेखुरे हू सो करत, उपकारी उपकार
तरुवर छाया करत है, नीच न ऊच विचार
वड़े दीनके दुस सुने, लेत दया उर आन
हरि हाथी सों कब हुती, कहु रहीम पहिचान
-
( २७ )
धन रहीम जल पकको, लघुजिय पियत अधाय
उदधि बडाई कोन है, जगत पयामो जाय
नत्र विटप सब फल मरे, रहे भूमि तियराय
पर उपकारी पुरुप जिमि, नवहिं सु सम्पति पाय
चौपाई
पर हित सरिसधर्म नहिं भाई, पर पीडा मम नहिं अधमाई
पर हितवश जिनके मनमाही, तिन्ह कह जग कछु दुर्लमनाही
दोहा
धनी कृपण ते होत कब, निधन उदारहि गैस
वो न दे सके तनिक धन, ये परहित दे सीस
उपकारकी ढाल
निन्दक हैं जो दुष्ट जन, कर उनपर अहमान
टुकडा आगे डालदे, फिर नहिं भौके शान
उपाय
पूरे माधन के बिना,कारज सर्व न बीर
श्रीबी डोरी कूपमा, नक न काढत नीर
जो पहिले कीजै यतन, मो पाछे फल दाय
पागि लगे खोदे झुमा से आग बुभाय
होत न कारज घडन ते विधिवत चिना उपाय
अजन चलत न नेकह..माय मरे यिन माय
-
.
J
२८ )
नाको अरि का कर सके, जाको जतन उपाय
जर न तात रेतसो, जाके पनहे पाय
जोरावर अरि मारिये, बुधि बल कियं उपाय -
काल यवन को कृष्ण ब्यो, पट मुचकन्द उदाय
छल चल धर्म अधर्म करि, अरि साधिये अभीत
भारत में अर्जुन किसन, कहा करी युध रीत
सुस दिसाय दुख दीजिये, सल मो लरिये नाहि
जो गुड दीने ही मरै, क्यो विप दीजे ताहि
झूठे ही करिये जतन, कारज बिगडे नाहि
कपट पुरुप धत खेत पर, देस मिरग भगजाहि
छोटे अरि को माधिये छोटा करि उपचार
मरै न भूसा सिंह पे, मारे ताहि मजार
जोरावर हू को कियो, विधि वश करन इलाज
विपत्त मही अकुस गजहि, जल निधि तरन जहाज
ऊचा पट सार हीन है
उचे पद की लालसा, नारायण दे त्याग
फीको फीको मो लगन, उग्य उपरी भाग
नामवरी जिन की नहीं, होत नवे बदनाम
लक्डी की तलवार पर, कहा किट्ट को काम
बड माया को दोप यह, जब क्यह घट जाय
नौ रहीम' मरिबो भलो. दुग्न सुग्रजिये यताय'
-
-
( २९ )
आणी
उत्तमर्ण के सामने, होत ऋणी धु ति हीन
जिमि दिनकर के सामने, हिम कर कान्ति मलीन
मिले एक हू छाक में, जाहि न पुष्कल अन्न
पर सो ऋणी न होय तो, रहे सदैव प्रसन्न
लेन हार सनमुस भये, देन हार | ति दीन
राह केतुके सामने, ज्यो शशि रवि श्री हीन
ऐक्य
जुदे न जमे राहत है, मिले विरगत सग
काथ पूग चूना पडत, होत लाल मिल रग
यहुतन को न विरोधिये, निवल जान बलवान
मिल भरिम जाहि पिपीलका नागहिं नग के माना
बहुत नियल बल मिल करें, करै जु चाहे सोय
तिनफन की रसरी करी, करी निरन्धन होया
मितने ते सुख मिलत है, निहर्च मान वचन्न
यने रसोई जो मिले, प्राग इधन जल अन्नः
दोऊ चाहे मिलन को, तो मिलाप निर्धार
कबह नाही बाजि है, एक हाथ से तार
दुर्बल ह बलवान हो जो गठ जाय समाज
बोढे तृण मिल गुण अने, बाधत हैं गजराज
"मैं मैं तृन ने क्यिा, आपस में मत भेट
-
-
हम को सदा प्रयोग कर कभी न उपजे सेद
प्रीत रीत सन मे भली, वैर न हित मित गोत
रहिमन याही जनम की, बहुर न सगति होत
एक नहीं कुछ कर सकत, यदपि होय छवि गेह
बिन सनेह गुण हीन है, गुण दिन हीन मनेह
घनाक्षरी
बुन्दन मिलाप ही सो भरिजात वारधीश,
करि को निवन्ध होत तिन के मिलान है।
पड पड पैसा होय जात है खजाना पूर.
वर्ण वर्ण सीने नर होत विदवान है।।
एक एक जररा जुरि गिरि को अकार होत,
मानुप जुरे तो होत दल का विधान है।
राम कवि विविध विचारों से विचार देसा,
एकताइ एकै मुस सम्पत की सान है।
याधे जात वारिधि हिमाल्य को हिलायो जात,
अग्नि जल वायु नित हुकम उठाते हैं।
ऐरावत नाचै निज पीठ पे चढावें शेर,
महा बलकारी सौफनाक सौफ साते हैं ।
सम्भव होजात जिसे भाप असम्भब जग,
सकल पदार्थ विन मागे घर आते है।
राम कवि देसाहै विचार कर बार बार,
एक एकता से सब काम बन जाते हैं।
-
.
( ३१ )
ऐश्वर्य मद
धन बाढे मन बढ गयो, नाहिन मन घट होय
ज्यो जल सग बाढ जलज जल घट घटे न सोय
धन अरु जोबन को गरव कबह करिये नाहि
देसत ही मिट जात है, ज्यो बादर की छाहिं
धन गुण जोवन रूप मद, दुरै न एको सच
प्यो हासी सासी बहुर, रोके रहत न रच
देसत है जग जात है, तउ ममता से मेल
जानत है या जगत में, देसत भूलो सेल
थोडा धन चिन्ता हरै, बहुत कर मति भग
उछरे नीर न कुम्म मे, नद में भरे तरग
रहिमन कबहू घडन को, नहीं गर्व को लेश
भार धरै ससार को, त कहावत शेप
कुण्डलिया
दौलत पाय न कीजिये, सपने में अभिमान
चचल जल दिन चार को, ठान न रहत निदान
ठार न रहत निदान, जियत जग में यश लीजे
मोठे वचन सुनाय, रिनय सवहीमो कोर्ज
कहि गिरधर कवि राय, अरे। ये सब घट तौलत
पाहुन निशदिन चार, रहत मय हो के दौलत
-
( ३२ )
दोहा
कनक कनक तै सो गुनी, मादकता अधिकात
उहि साये बौराय जग, इहि पाये बौरात
अोछे की प्रीति
ओछे नर की प्रीति की दीनी रीति बताय,
जैसे छीलर ताल जल, घटत घटत घट जाय
चिन बूझे ही जानिये,बुध मूरस मन माहि
छलक्त ओछे नीर घट, पूरे छलकत नाहि
बिनसत बार न लागई, ओछे नर की प्रीति
अम्बर डम्बर साझ के, ज्यो बालू की भीति
ओछे नर के पेट मे, रहै न मोटी बात
जैसे सागर को सलिल गागर मे न समात
ओछे नर के चित्तमे, प्रेम न पूरियो जाय
आध सेर के पात्रमे, कैसे सेर ममाय
बचन रचन कापुरूप के, कहे न छिन ठहराय
ज्यो कर पद मुसक्छप के, निकस २ दुर जाय
नमा शक्ति
नर भूषण सब दिन क्षमा, विक्रम अरि घन घेर
ज्यो तिय भूषण लाज है, निलज सुरति की बेर
होत नमा करयाल मो, रिपु को नष्ट घमट
बढे न कहर भूमि में, पावक पुल प्रचंट
गारी पाय असीम दे, कर अनिष्ट को इष्ट
,
.
,
खारी जल बादर गहे, बरसाने करि मिष्ट
दुष्ट जनों के कोप पे, कोप करो मत वीर ।
प्राग न आग बुझा मकै, ताहि बुझावत नीर
नु अगुवा से हानि
पाय क्षुद्र अगुवा घटे, पिछलगुवी को लार
चलत मुई की गैल गहि, सपै सूत का तार
कठिन
दुःख
चौपाई
यद्यपि जग दारुण दुस नाना, सबसे कठिन जाति अपमाना
कपटी
ऊपर दरमै मुमित सी, अन्तर अन मिल पाक
कपर्टी जन की प्रीति है, मीरा की मी फा
देग्यत को सुन्दर तगे, उर में कपट विपाद
इन्द्रायन के फतन मम भीतर कटुक मवाट
मु पर मीठी बान है, मन की रुचि प्रतिकूल
कुम्भ पयो मुस विप भग्यो, ताहि विलोकि न भूल
सन्मुख मुस मीठो वचन, पीठो कारज दूर
दीठो मीत दुराय श्रम, कचन घट विष पर
हृदय कपट वरप धर, वचन कहैं गदि छोल
अबके लोग मयूर ज्यो, क्यो मिलये मन गोत
मित्र मित्र मी प्रीति कर, हृदय आन मुसान
जाके मन बिच प्रेम नहिं, दुरे दुराये जान
सोरठा
तुलसी देस सुवेप, भूले मूढ न चतुर नर
सुन्दर केको पेप, वचन सुधासम अशन अहि
चौपाई
आगे कह मृदु बचन बनाई, पाछे अनहितमन कुटिलाई
जाकर चित अहि गति समभाई, अस कुमित्र पर हरेमलाई
मन मलीन तन सुन्दर कैसे, विपरसभराकनक घटजैसे
घनाक्षरी
मीठी मीठी यात एक पल को न छोड़े साय
बचनो की चातुरी से नेहमे सने रहे।
पैज कर कहत मरेंगे सग तेरे मीत ।
रैन दिन ऐसे बैन इनके घने रहे
लागी जब घात हाथ साफ करि बैठे जाय,
कुज जो थे नैन सोई वाण सों हने रहे।
कलिके कुमीतन की राम कवि देखी रीत,
वातनमें वैरी, मुख अपने घने रहे ।
(३५)
कृपण निन्दा
खाय न सरचे सूम धन, चोर सबै लैजाय
पीछे ज्यो मधु मच्छिका, हाथ मलै पछताय
वह सम्पति किहि कामकी, जो काह पै होय
नित्त कमावै कष्ट सहि, विलसे औरहि कोय
कृपण धनीको जगतमे, दड दियो है राम
मोजन आगे धर मनो, मुसमे दई लगाम
त्यागी कहिये कृपण को, गहत न कोही साथ
लेत न कळु परलोक हित, रमता रीते हाथ
जेती सम्पति कृपणकी, तेती तू मत जोर
बढत जात प्यो ज्यो उरज, त्यो त्यो होत कठोर
घनाक्षरी
देसतके वृन्छनमे दीरघ सुमाय मान,
कोर चल्यो चारिस को प्रेम जिय जग्यो है।
लाल फल देख के जटान मडरान लागे,
देसत बटोई यहुतेरो डगमग्यो है।
गग करि फर फूले भुभा उधिरान लसि,
सबन निराश है के निज घर भग्यो है।
ऐसे फल हीन वृन्छ वसुधा मये यारो,
सेमर विसामी यहुतेरन को ठग्यो है।
(३६)
कहने और करनेमें अन्तर
कहियो कछुकरवो कर, है जगकी विधि दोय
देगन के अरु सान के, और दुरद रर होय
आप कह नाही कर, ताकी है ये हेत
आप जाय नहि, सासुर, औरन को सिप देत
मान करहु जेकर माह, कथनी अकथ अपार
कथै न करकछु श्रावही, करनी कर तब सार
चले न निज उपदेश पर, तासा होय न हेत
बुरे बतावत और को, खुद बैगन सालेत
चौपाई
पर उपदेश कुशल बहुतेरे,
आचरही ते नर न घनेरे
घनाक्षरी
जीवन सुधार होत वन्धन विनश जाय,
जाहुके क्रियेसे मन पावत विश्राम है ।
जैसा कुछ बेट शान देत उपदेश तोहि,
जानत है सत्य मन मानत मदाम है।
वचन बनाय निज चातुरी जनाय नित्य,
रैन दिन ऐसे ही तू करत कलाम है।
चल्यो पैन आपतिम मार्ग पर एक क्षण,
विषयोंका दास अति झूला कवि रामहै ।
१
( ३७ )
औरोको बतावत है भजो भगवानजू का,
भजता है आप पर नित्य काम काम तू।
औगेको सुनाये तज दीजै लोभ मोह आदि,
हुआ पर आप लोभ माहका गुलाम तू ।
बुरी है पराई निन्दा कह कह जनावे है,
निन्गयुत निन्य पर करता कलाम तु।
मानुपीय जन्म है अमोलक, बसान फिर,
सोवत है ताको अरे। झठे कवि राम त् ।
कहनेसे सुनना अच्छा
दूना सुन आधा कहो, सीसो प्रकृति विक
कान दिये दो ईशने, वाणी बकसी एक
कही वात पराई
पावत यहुत तलाश नहि, कर तै हटी यात
आधी मे टूटी गुडी, को जाने कित जात
गूढ यन्त्र जौलो रहे, करै जु मिलि जन दोय
मई छकानी बात जब, जान जात सबकोय
गूढ मन्त्र गरुने विना, कोउ राचि सकेन
कनक पात्र विन और मे धाधिन दृध रहै न
यात वही अपनी समझ. जो नहिं हुई बयान
तोर न अागत हाथ फिर, जो तजि गयो क्मान
८
-
(३८)
कुएटलिया
साई अपने चित्तकी, भूलि न कहिये काय
तब लगि मन गपिये, जब लगि कारज होय
जय लग कारज होय. भूलि काहू नहि कहिये
दुर्जन हमे न कोय, श्राप मियरे हो रहिये
कहि गिरधर कविराय, बात चतुरनके तार्ड
करतूनी कहिदेत, बात कहिये नहिं साई
सया
योधा किसीको कहा कहिये सो विथासुन पूर रहै, अरगाइकै
याते भला मुख मौन धरै, उपचार करें कह औसर पाइकै
ऐसो न कोऊ मिल्यो कनह,जो कहै कछु रच दया उर लाइकै
आवतुहै मुसलो वढिकै फिर पीर रहे, या सरीर समायके
कायर निन्दा
कायर नरको देसि रन, मुर्स फीको दरसाय
काचो रग यो धूपमे, मटक चटक उडिजाय
कायर मन उडिजात है, सुन कर रनकी बात
वात लगे काफूर ज्यो, थिर फिर पल न रहात
कार्य कसौटी
काम परैही जानिये, जो नर जैमो होय.
बिन ताये सोटो गरी गहनो लहै न कोय
सब को सबको करै, राम जुहार सलाम
हितु अनहितु तब जानिये, जादिन अटके काम
न
+
(३५)
काज प. मयही बडा विन कारज सब छोट
पाई हेत भजावते, मपिया मोहर नोट
रहिमन विपना तू मली, जो थोरे दिन होय
हितु अनहितु या जगतमे, जान पर मब कोय
देत दया निपि तनिक दुस, या हित तुहि अनजान
जान जाय या जगतमें, को अपनो को पान
चौपाई
धीरज धर्म मित्र अ नारी, आपतकाल पररिपये चारी
कसे कनक मणि पारम पाये, पुरप परग्रिये समय सुभाये
कुछ नहीं
छपय्य
न कछु क्रिया विन विप्र, न कछु कायर जिय छत्री
नकछु नीति बिन नृपति,न कछु अन्दर बिन मन्त्री
न बहु वाम बिन धामु न छु गा विन गरुआई
न कनु कपटको हेत, न कछ मुग्म आप बडाई
है न कछु दान सन्मान विन, न कछु मुभोजन जामुदिन
जन सुनो मकल नर हरि कहत, न कछु जन्म हरि भक्ति विन
ममि बिन सूनी रैन, ज्ञान बिन हिरदै सूनो
कुल सूनो विन पुत्र, पत्र निन तरवर सूनो
गज सूनो इक दत, ललित बिन सायर मृनी
वित्र मून विन वेद और दल पहुप बिहनो
(४०)
हरिनाम मजन विन सत अरु घटा सून यिन दामिनी
वैताल कहें विक्रम सुनो, पति बिन सूनी कामिनी
कुत्सित कार्पण्य
विद्या दान न देत है, जो पण्डित पन धार
छागी गल थनमे वृथा, तिनके जन्म असार
-
कुपुत्र निन्दा
।
कुल कपूत किहि काम को, जिहिं सुख सोमा नाहि
ज्यो बकरी के कठ थन, ध न जल तिहि माहिं
ज्यों रहीम गति दीपकी, कुल कपूत मति मोय
वारे उजयारे लगे, बढे अधेरी होय
कुल कपूत नहिं जामियो, रहै वाम वरु माय
निकस वासते अग्नि कन, वनको देत जराय
कुल ही नहिं कुल देशका, देत कपूत दुखाय
ज्यों जयचन्द कनौज गति, जानत बुध ममुदाय,
कुण्डलिया
वेटा विगरे वापस, करि तिग्यन का नेहि
लटापटी होने लगी, मोहि जुदा करि देहि
मोहि जुदा करि देहि, परी मा माया मेरी
लैह घर अरु द्वार, क्रू में फजियत तेरी
कहि गिरधर कविराय, सुनो गदहा के लेटा
समय परो है आय, वापसे भगरत बेटा
(४१)
साई ऐमे पुत्र ते याझ रहे वरु नारि
विगरी बेटे याप मे, जाय रहे सुसरारि
जाय रहे सुसरि, नारिके नाम विकाने
कुलको धर्म नशाय,और परिवार नशाने
कहि गिरधरि कविराय, मात झसै वर ठाई
अस कुपुत्र नहिं होय, याझ रहतो वर साई
आलसरत, शोकातुर लपट, कपटी और सदा चल हीन
मानस मलिन सदा निद्रातुर,लोभी और अकारण दीन
ऐसे सुतसे क्या फल होगा, हे चतुरान दे वरदान
कभी कपूत किसीको मत दे, चाहे करदे निस्मन्तान
परसे प्रेम द्रोह अपनेसे, करते नित्य दुष्ट गुण गान
गुरु जनकी निन्दा कर हंसते, अपनेको कहते गुणवान
काला प्रत्तर भैस बरार, पर नोभी रसते अभिमान
क्रोधानलमे जलते रहते, यही कपूतोकी पहचान
कुल वृद्धिसे प्रसन्नता
यो रहीम सुस होत है, अढत देव निज गोत
ज्यो बडरीअरिचया निरस,असियनको सुखहोत
कुलखभाव अमिट है
कुल मारग छोडें न कुउ, होह कितेकी हानि
गज इक माग्न दृसरो, चहत महावत प्रानि
-
.
(४२)
जिन पण्डित विद्या तजहु, धन मूरस अवरेस
कुलजा शील न परहरी, कुलटा भूपित देस
अपनी राह न छाडिये, जो चाहहु कुशलात
वडी प्रबल रेलहु गिरत, और राहमें जात
तुलसी कबहु न त्यागिये, कुल अपने की रीति
लायक ही सो कीजिये, व्याह बैर अरु प्रीति
घनाक्षरी
चातक कुल शोभा नीर पियत न नीचे है,
हस कुल शोभा क्षीर नीर की जुदाई तें।
कज कुल शौभा है दिनेशमे न मोडै मुस,
शोभा है कुमुत कुल चन्द्र की मिताई तैं।
सृर कुल शोभा जैसे रणमे न दीने पीठ,
दाता कुल शोभा जैसे दान अधिकाई ते।
राम कवि भापे तैसे सुजन सुजान सुनो,
कवि कुल शोभा शुभ होत कविताई है।
कुसंगति निन्दा
जिन प्रसग दूषण लगे, तजिये ताको साथ
मदिरा मानत
जगत, दूध कलाली हाथ
सल जनसो कहिये नहीं, गूढ कबहु करि मेल
यो फैले जग मोहि ज्यो, जल पर बुन्दक तेल
v
है
(४३)
दोहा
दुर्जनके ससर्ग तै, सज्जन तहत क्लेश
ज्यों दशमुस अपराध तेंवन्धन लो जलेश
अनघर सुधर समाज मे, आय विगारे रग
जैसे हौज गुताय को, विगरे इवान प्रसग
अनमिल मुमित समाज ते, होत गये उठ चेन
जैसे तिन परि देत दुरस, निकसै निकसै नन
रसिक सभाम निरस नर, होत होत रस हानि
जैसे भैंसा तालपरि, मतिन करत जल आनि
मिल्यो दुष्ट नाहिन भलो, उपजत मिले अहेत
ज्यो काटो गढि देहमें, अटक सटक दुस देत
विगरपो होय फुसग जिहि, कौन सके समझाय
रासन बसाय बसन को, कैम फूल घसाय
दुष्ट निस्ट यमिये नहीं, बस न कीजिये यात
कदली वेर प्रमग ते छिट पटकन पात
करिये बात न तन परश, सल दिग जैय नाहि
कटुक नीम नर जात ही, मुस्व कडुये ह जाति
एक अनीत करे लहें, मगी दुस अति ताहि
भीम कीचर को दियो, मार चिता के माहि
वसिये तहा विचार क जहाँ दुष्ट गनि नाहिं
होनन कई भैवर टा, ज्याचम्पय यन माहि
(४४)
आप अकारज आपनो, करत कुबुधके साथ
पाय कुल्हारी आपने, मारत मूरख हाथ
दुष्ट सग यसिये नही, दुस उपजत इहि भाय
घसत वासकी अमि ते, जरत सबै बनराय
पड कुसगमें पडत है, निर्मल पर भी मार
पावक लोहे से मिलत, पीटत ताहि लुहार
रोकत सग मलीन का, यश सौरभ विस्तार
काली मिरच मिलाय ते, उड न सके धनसार
कुटिलन सग रहीम कहिं, साधू बचते नाहिं
ज्यो नैना सैना करें, उरज उमेठे जाहिं
रहिमन नीचन मग वसि, लगत कलक न काहि
दूध कलगलिन हाथ लरिस, मद समझहि नर ताहि
सगति सुमत न पावई, परे कुमतके धध
राखो मेल कपूर में, हीग न होय सुगध
सगत टोप लगै सबन, कहे जु साचे बैन
कुटिल बक भ्रू मग मे, कुटिल बक गतिर्नन
बहु दुष्टन के कलह मे , भूल न दीजे पाय
याम पासके घिसन ते, सकल विपन जर जाय
चौपाई
खलउ करें मल पाय सुसगू, मिटहि न मलिन सुभाव अभग
उघरहिं अन्त न होय नियाहू कालनेम जिमि रावण राष्ट्र
वर भल वास नरके कर ताता, दुष्ट सग जनि देइ विधाता
को न कुमगति पाय नशाई , रहत न नीच मते चतुराई
घनाक्षरी
तोहे की कुमगति से आग पर मार पड़े
सट्टे की कुसगति मे दृध फट जात है
वास की कुमति मे जल जात लाखों वृक्ष
कांच की कुसगति मे कूप अट जात है
दुष्ट की कुमगति समाज को विनाश करे
कूर की कुसंगति से मूर कट जात है
'राम कवि देखा है विचार करि बार बार
नीच की कुसगति से मान घट जात है
चौपाई
धूम अनल सम्भव मुन भाई , तिहि बुझाव घन पदवी पाई
रज मग परी निरादर रहई , सब कर पद प्रहार नित सहई
मन्त उडाय प्रथम निहि मरई, पुनि नृप नयन फिरीदन्ह परई
गुनमगपति प्रससमप्रमगा,सुधन कहि श्रधमन करमगा
घनाक्षरी
जाइये न नहाँ जहाँ मगति कुसगति है
सायर के संग सर भगि है प भाग है
फूलन के वास यश फलन की वाम होत
कामनी के संग
माम जगि ५ जगि
(४६)
घर वसे घर बसे घर में वैराग्य कहा
माया मोह ममता मे पगि है पै पगि है
काजर की कोठरी में कैसह सयाने पठे
काजर की एक रेस लगि है पै लगि है
कोरा भजन
लगन विना कोरा भजन , देत न हरि को सग
एक पक्ष सो गगन में , उड नहि सकत विहंग,
कौन क्या चाहता है
धन चाहत निसदिन अधम , मध्यम धन अरु मान
उत्तम चाहत मान ही, चाहत कछु न महान
गुणमहिमा
मान होत है गुणहिं तें , गुण बिन मान न होय
शुक सारो रासै मवै , काग न राग्वै काय
श्राडरर तज कीजिये , गुण महिमा चित चाय
क्षीर रहित गौ नहिं विकत , आनिये घट बँधाय
योडे ही गुण ते कह , हो प्रसिद्धि जग माहिं
एकहि र ते गहि करी, करी सहसटस नाहि
ऊचं बैठे ना राहै , गुण पिन बडपन कोय
बैठो देवल शिमर पर, बायस गाड न होय
गुण वागे मपति लहै , लहै न गुण विन कोय
काढ नीर पताल ते जो गुण युत घट होय
.
-
-
(४७)
गुण सनेह युत होत है , नाही की छवि होत
गुण सनेह के दीप की, जैसे ज्योति उद्योत
करै अनादर गुणिन को , ताहि सभा छवि जाय
गज कपोल शोभा मिटन , यो अलि देत उडाय
जैसो जैसो अधिक गुण ,
तैसो होय मिलाय
अहि उर,विप गल,अनल चस, ससि सिर शमुवसाय
जहा रहै गुण वन्त नर , ताकी शोभा होत
जहा धरै दीपक सहा निहर्च कर उदोत
साली तज पूरण पुस्प , जिहि सब आदर देत
रीतो कुवा उतारिये , ऐच भरयो घट लेत
पूजनीय गुण ते पुस्प , वर्ष न पूजित होय
यज्ञ तिलक क्यि कृष्ण को, छोट वडे सय कोय
गुण विन पुजे न लोक मे, वड कुलियो की पाति
कोन भजे वसुदेव को, वासदेव की माति
गुण ते लेत रहीम जन, सलिल कूप ते काढि
कूपहु
ते होत है, मन काह को वाढि
कुण्डलिया
गुण के गाहक सहस नर, विन गुण लहे न कोय
जैसे फागा कोग्लिा, शब्द सुने सय कोय
शट सुने सय कोय, कोक्ति। म सुहावन
दोऊ को इक रंग, काग सब भये अपावन
-
(४८)
कहि गिरधर कविराय, सुनो हे ठाकुर मन
यिन गुन लहै न काय, महस नर गाहक गुन के
घनानग
दीपक विचार सार कताही सनेह डार
गुणते विहीन हीन मन्दर लसात है.
से धनु देस गुण रेस विन कामका न
कोटि शर जोडे एक पद पै न धात है
चग चढ जात है अकाश गुण सयुन हो
राम कवि भाप ये गुण की करामात है
जो पै गुण डारिये ते येते गुण जडता में
मानुप अपार गुण कापै क्यो जात है
जौलौ कोऊ पारसी मो होन नहिं पाई भेट
तबही लो तनिक गर्गव लो शरीरा हैं
पारसी सों मेंट होत मोल बढे लासन को
गुनिन के प्रागर सुवुद्धि के गभीरा है
ठाकर कहत नहिं निन्दो गुणवानन को.
देखने को दीन ये सपूत मूर बीरा है
ईश्वर के अनम ते होत ऐसे मानस जे
मानस सहूर वाले धूर भरे हीरा हैं
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।
.
'
(४६)
गुणहीन को गुण प्यारा नहीं लगता
रम की कथा सुनी न तिहिं, दूर कथा की चाहि
जिन दासै चाखी नही, मिष्ट निवौरी ताहि
जो गुण को नहिं जानई, अवगुण ही गुण ताहि
सूर उदित आसे में दत, रजनि उल्क उमाहि
गुप्त नाश
फाट ग्धो जीवन वसन, पल पल करो विचार
श्वास श्वास पर सिंचत है, याको इक इक तार
चाहने वाले की दृष्टि से देखो
जो जाको प्यारो लगत, सो तिहिं करत वसान
जैसे निप को विपभखी, मानत अमृत समान
जो जिहि भारे सो भतो, गुण को कछु न विचार
तज गज मुक्ता मीलनी, पहरति गुजा हार
जाको जासो मन लग्यो, सो विहि आने दाय
सारा भम्म विप मुड युत, शिव तउ शिवा सुहाय
जो जाही सो रच रह्यो, ताहि ताहि सों काम
जैसे कीडा आक को, कहा करै बसि श्राम
जिय चाहै सोई भलो, जियत भलो ह्यि लागि
प्यासो चाहन नीर को, कहा करे ले आगि
-
5
जे चेतन ते त्यो तज जाको जासी मोह ।
चुयक के पाछे सदा, फिरत अचेतन लोह
जिहि चाहे सोई लहै यो मुख होय शरीर
ज्यो प्यासे जिय को मिले, निर्मल शीतल नीर
मनभावन के मिलन पिन, यो जिय होत उदास
ज्यों चकोर की दिन दिशा, चकवा
चद प्रकास
सब कोऊ चाहत भलो, मित्र मित्र की ओर
ज्यो चरई रवि के उदय, शशि के उदय चकोर
प्रेमी प्रीति न छोडही, होत न पन ते हीन
मरे परे हू उदरमे, ज्या जल चाहत मीन
मीठी कोड वस्तु नहि, मीठी मन की चाह
अमली मिसिरी छोड के, आफू सात सराह
क्त ट ट कर करत हो, चातक को उपचार
भेक कहा तुम जानिहौ, स्वाति बून्द की सार
दीपक दाहक और को, होत रहे तो होय
पै पतग के अग को सुसदायक है मोय
जाकी जाको लगन है, मगन ताहि को पाय
काकी काम सुहावनो, रानी राव सुहाय
"
छलेहुए सबसे डरते हैं
'पिसुन छल्यो नर सुजन मो, करत विसास न चूक
जैसे दाधो दृध को, पीवत छाछहि फक
फेर न हहै कपट सो, जो कीजै व्यापार
जैसे हाडी काठकी, चढे न दुजी यार
खल पचित नर सुजन को, नहिंन निसाम फरेड
उहक्यो उडु प्रति विम्बते मुक्ता हस न लेड
छोटोसे वडोकी शोभा
छोटे नरते रहत है, शोमायुत सिरताज
निर्मल राखे चादनी, जैसे पायन्दाज
निर्धनको अपनाय
मैला दर्पण देखिये, निवरे रास रमाय
नीच सनेही करि रहैं, ऊच मुग्नी दिन रैन
तेत मलत हैं पगन सी, मस्तक पारत चैन
छोटन सो मोहे बडे, कहि रहीम यहि लग्न
सहसन को हय वाधियत, ले धमर्ग की मेन
छोटो ही के मेलमे, मान बडो नर पाय
लका जीती रामने, वानर रीछ महाय
चडे करत हैं काम नड, छोटन को यल पाय
गुर असन ज्यो चलत बह,अति लघु वाल महाव
Valro
वढे धनीकी पायल,
जीवित मृतक हैं
,
चौपाई
कौल, काम वश, कृपण, विमूढा,
अति दरिद्रि, अयशी, अति बूढ़ा।
सदा रोग चश, सतत क्रोधी,
राम विमुस, श्रुति सत बिरोधी।
निजतनु पोपक. निर्दय यानी,
मम चौदह प्रानी।
जीवत शव
जवान वसमें रक्खो
.
छपाय
जीभ जोग पर भोग, जीभ सय रोग चदा
जोम कर उद्योग, जीभ लै फैद करावे
जीम स्वर्ग तंजाय, जीभ सय नर्क दिग्ग'
जीभ मिला राम, जीम सय देह धरान
निज जीम श्रोठ गाम करि' बाट महार तोलिये
यंताल कहें विनम मुना, जीम मेंमार घोलिये।
मुरडतिया
हावा जाग्त भवन हरित काल मा
पनन अनादिग जग्गा ही, पर न भर श्राय
पाय
+
1
-
सूर उदय पृलं बलम
तक
पियक विछरेचिरह बस मन बाट
वहुर"न अकुर आय, जरै दिन न धरी
कोटि यनहू करहु, दुस नहिं जाय निवंगे
राम सु कवि यो कहत, जाय तन मगहि बाबर
अमृत वारि चहि सीच, हिये कर बुमन न दाबा
जानीहुई वातका क्या पृटना
जाने सो चूमैं कहा, श्रादि अन्त निम्तन्त
घर जन्मे पशुके कहो, देसत कोर इन्ट ?
परतछनी के देखिये, वह वरनै कुर ना
कर कफन को पारसी,को मन
जान बूझ अजगुत करै तासो कहा अगर
जागत ही सोवत रहै, तिहिं
कोटा
जान अजान जु हो रहे , तासों गाय
ज्योतिमान रवि को कहो, [***
जिसके सयोगसे सुखहे उस विधायदा
जाहि मिले सुस होत है, ता
धरनि गिरत विचही मि
-
1
वि.
11
-
.
( ५४ )
धनि रहीम गति मीन की, जल बिछरत जिय जाय
जियत कज तजि अनत बसि, कहा मौरको माय
जितो हर्प मिल होत है, बिछरत शोक समान
कमल सिलत जलसं मिलत, बिछरत त्यागत मान
जिससे सुग्व पाया हो उसके दुखमें
साथ देनाचाहिये
विपति परे सुख पाइये, ना ढिग करिय मौन
नेन सहाई बधिर, के, अध सहाई श्रीन
सेवक सोई जानिये, रहे विपितमें सग
तन छाया ज्यो धूपमें रहे साथ इक रंग
सुस दुस सगीजो रहें, सो साचे हितु जान
बाढत जल बादत कमल, घटत तजत है प्रान.
जैसी करनी वैसी भरनी
करे बुराई सुस चहै, कैमे पावै कोय
रोप विरवा आक को, आम कहा ते होय
होय बुराई ते बुरो, ये जानो निरधार
पाड सनावै और को, ताको कूप तयार
यह कहनन जैसी कर, तैसी पाच लोय
औग्न को आगे कर. श्राधी कहियत सोय
( ५५ )
दोहा
को मुम को दुय देत है, देत म झकझोर
उरम सुरमै आप ही, ध्वजा परनके जोर
सब काहको कहत है, मली बुरो ससार
दुर्योधनकी दुष्टता, विक्रम को उपकार
जैसो कारन होत है, तैसो कारज थाप
कर सरधनु प्रानी हनत, कर माला हरि जाप
नारायण दुर्वचन को, कौन सुने हर्पाय
सोटा सिफा जाहि दो, तुरत देत लौटाय
जैसा वीज बरगेरिये, वैसाही फल पाय
काटे सात यबूल मे, फूल सुगन्ध रिझाय
धनादरी
आप हित चाहै परहित को निगई नर,
दापन दुरानै पर दापन दुराइये ।
चाहै जो मलाई भल ठाने मन औरन की,
रासत पराइये।
चाहै मुत बन्धु नारिधार मन औरन के,
मुग्न अभिलास नही, जीवो को सताइये।
राम कवि भापै शिव परम हित है तोर,
विचार चारु हिये मे धगइये।
चाहत
कल्यान ध्यान
सन्तत
1
(५८)
क्षमी मो निगल कहैं दमी सो अदत्ती कहै,
मधुर वचन कहै तामों को दीन है।
दाता को बताने टभी नेह हीन को गुमानी,
तारणा को घटाने तामो कहें भाग हीन है
माधु गुण दें जहा तहाही लगाव दोप,
एमो कछु दुर्जनको हदोई मलीन है।
तत्वज्ञान
गहत तत्व ज्ञानी पुरुप, वात विचारि विचारि
मथन हार तज छारको, मासन लेत निकारि
तत्व हीन बकवाद को, सुनते निपट गँवार
लडको ही में बिकत है, लकडी की तलवार
विन रस की बकवास जो, सजन को न सुहाय
भ्रमर गहत है सरस को, कागज कुसम विहाय
त्याग
हो निर्भय चटमार सो, कस केवल लगोर
कसह नगी लाशको तक्त न कफन खसोट
थोड़े लाभके लिये अति परिश्रम
'बिना प्रयोजन भूलिह,करिये नाही ठाट
जैयो नाहि जा गावको, ताकी पूछ न बाट
क्यो करिये प्रापति अलप, जामें श्रम अति होय
कौन गरज गिरि सोदकै, चूहा का कोय
-
-
]
-
काम करी मत हो जहा, अल्प लाभ वहु हार
पाई योजनके लिये, पाव तेल मत जार,
----
ढान महात्म्य
बिना दिये कछु ना मिले, यह समझो सब कोय
देत शिशिरमे पात तर, सुरभि सु पल्लव होय
सरचत सात न जात धन उत्सर किये अनेक
जात पुण्य पूरन भये, अझ उपजे अविनेक
धन पूरन धनान पै, बिन दीने न लहात
ज्यो बिन बरसै सघन जल,लिया पियो नहिं जात
पुन्य विनेक प्रभाव नै, निहचे लच्छ प्रवास
जौ लौ तेल प्रदीप मैं, नौ लौ होत प्रमास
दाता कर कमलकी, उपमा युगत बयान
मुकुल रूप आगे बढत, तौटत सुमन समान
नाद रीझ तन नेत मृग, नर धन हेत मर्मत
ते रहीम पशुते अधिक, रोझ बहन देत
तब लग है जीवो मलो दीवो पर न धीम
विन दीवो जीयो जगत, हेमहि न रुच रहीम
दाद दीया है मला दिया करो सय कोय
घरमै धरान पाइये, जो करदिया न होय
(६०)
दृढता
जो न होय दृढचित्त को तहां न रहे सटेक
ज्यो काचे घट में सलिल नहिं ठरत दिन एक.
दुःखद है
छपप्य
मरै वैल गरियार, मरे वह अडियल टट्ट,
मरै हठीली नार, मरै वह ससम निखट्ट,
मेवक मरै सुतौन, जौन कछु समय न सुभझे
स्वामी मरै सु कौन, जौन सेवा नहिं बुभझे
जिजमानसूम मरिजाय तो,कहा सुमिर दुखरोइये
कविगद्द कहैं मरिजाय सो,जाहि सुने सुख सोइये
सवैया
पूत कपूत, कुलच्छनिनारि ,लराक परोस, लजायन सारो
वन्धु कुबुद्वि, पुरोहित लम्पट,चाकर चोर, अतीथ धुतारो
साहिब सृम, अराक तुरग, किसान कठोर, दिवान नकारा
ब्रह्म भने सुन शाह अक्बर बारह बाध समुद्र में डारो
दुख से घबराना नहीं चाहिये
क्ट परे हू साधु जन, नेक न होत मलान
ज्यो ज्यों कचन ताइरे, त्यो त्यो निर्मत जान
अधिक दुग्पी लखि आप तै, दीजै दुस विसराय
धर्म सुवन बन दुरा हरसो, मुनि नत विपति बताय
.
"
-
त
(६१)
"
रहिमन निज मन की व्यथा, मनही रासो गोय
सुन इठले हैं लोग सब, बाट न तै है कोय
यों रहीम दुस सुन सहत, बडे लोग सहि साति
उक्त चन्द्र जिहि माति सों, अथवत वाही भाति
दुग्व सहते हैं शाति से, यह मन जान प्रवीन
पत झर भारत पात जो, देत बसत नवीन
दीरय मास न लेय दुस, सुख साई मत भूल
दई दई कत करत है, दई दई सु कबूल
दियो सु सीस चढाय ले, अाठी भाति अहेर
जापै चाहत सुर लियो, ताके दुसहि न फेर
दुर्वचन से हानि
रूसे वचन मिलाप में, कहत होत रस भग
वीन बजत ज्यो तार के, टूटे रहत न रंग
अमृत ऐसे बचन मे, रहिमन रिस की गास
जैसे मिसरी में मिली, निरस वास की फास
बुरे बचन नहि बोलिये, यदपि होय हित हेत
जैसे चन्दन धूम तर, आसन को दुस देत
नीरस वक्ता जी सुनो, बैठ रहो गहि मौन
क्न फोडा घडियात की, ठनक सहेगा कौन
।
( २ )
अति कठोर उपदेश सो, दुपाचारः न जात
क्यो मुस स्वाद सुधार हित, देत नीम के पात
मीरा को मुंह काट के, मलियत, लौन लगाय
रहिमन कड वे मुसन की, चहिये यही सजाय
,
प
दुष्ट निन्दा
।
"
न
1
है सहाय हित ह करै, तऊ दुष्ट दुस देत
जैसे पावक पवन को, होत जलन को हेत
हित हू भलो न नीच को, नाहिन भलो अहेत
चाट अपावन तन करै, काट श्वान दुस देत
महज मँतोप है साधु को, खल दुस देन प्रवीन
मछुवा मारत, जल बसत, कहा बिगारत मीन
कबहु दुष्ट के बदन ते मधुर न निकस बात
जैसे कडवी बेल के, को मीठे फल सात
सल निज दोप न देसई, पर के दोपहि लागि
लखे न पग नर, सब ल पर्वत परती भागि
दया दुष्ट के चित्त मे, कयह उपजति नाहि.
हिंसा छोडे सिंह यह, क्यो आवै मन माहिं.
दुष्ट रहै जा ठौर पर, ताको करै विगार
आगि जहा ही रासिये, जार कर तिहि छार
दुष्टन को हित के बचन, सुन उपजत है कोप
सापहि दृध पियाइये, ज्यों केरल विष ओप
।
-
आप न काहू काम के, द्वार पात फल फूल
औरन को रोकत फिरे, रहिमन पेड यबूल
न ये विससिये अति नये, दुर्जन दुसह सुभाव
आदे पर प्रानन हनत,
काटे ला लग पाव
नीच हिये हुलसे रहे, गहे गेंद के पोत
यो ज्यों माथे मारिये, यों या ऊचे होत
पर द्रोही पर दार रत, पर वन पर अपवाद
ते नर पामर पाप मय,
देह धरे मनुजाद
सहज सरल रघुपति यचन, कुमति कुटिल कर जान
चले जोक जिमि वक्र गति, यद्यपि सलिल समान
दुर्जन दर्पण सम सदा, पर देसो हिय गौर
सन्मुस की गति और है, विमुस भये की और
उदासीन अरि मीत हित, सुनत जहि सल रीति
जानु पाणि युग जोर कर, विनती
कर
मप्रीत
काटे पै क्दली फले, कोटि यतन कर सीच
बिनय न मान सगेश सुन, डाटहि पै नर नीच
चौपाई
पर हित हानि लाम जिन केरे, उजरे हर्प विपाद वसेरे
हरि हर यश राकेश राहु से, परा काज भट सहम वाहु से
जो पर दोप लग्यहिं सहसासी, पर हितधृत जिनके मनमाखी
तेज कृशानु रोष महि पेशा, अध अवगुण धन धनिक धनेशा
(६४)
पराकाज लगि तनु परहरहीं,जिमि हिमि उपल कशीदल गरहीं
उदय केतु सम हित मवही के, कुभकर्ण सम सोबत नीके
मैं आपनि दिशि कीन्ह निहोरा,तिन निज ओर न लाउवभोरा
वायस पालें अति अनुरागा,होय निरामिय कबहु कि कागा
कवि कोविद गावहि अस नीती,सल सें कलह नभल नहिं प्रीती
उदासीन न्ति रहिये गुसाई,सल परहरिये श्वान की नाई
अधम जाति में विद्या पाये, भयो यथा अहि दूध
पियाये
जिहिते नीच बडाई पावा, सो प्रथमहि हठ ताहि नशावा
वैर अकारण सब काहू सों, जो करि हित अनहित ताहू सों
खारथ रत परिवार विरोधी, लम्पट कामि लोमि अति क्रोधी
शणइव सल पर यधन करहीं, साल कढाइ विपत सह मरही
पर सम्पदा विनाशनशाही,जिमि कृपिहति हिमि उपल विनाही
सल बिन स्वारथ पर अपकारी, अहि मूपक सम सुन उरगारी
दुष्ट हृदय जग आरति हेतु, यथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु
सरस काव्य रचना रचू, सलजन सुनत हसत
जैसे सिंधुर देस मग, श्वान सुभाव भुसत
नीच चग सम जानिये, सुनि लरिस तुलसीदास
ढील देत महि गिर परत, बँचत चढत अकास
घनाक्षरी
आपने बनाइये को और के बिगारये को,
सावधान है के सीसे द्रोह के हुनर है
-
r
उत्तम
भूल गये करणनिधान श्याम मेरे जान,
जिन को बनायो यह विश्न को वितर है
ठाकुर कहत पगे सबै मोह माया मध्य,
जानत या जीवन को अजर अमर है
हाय । इन लोगन को कौनसो उपाय,
जिन्हे लोक को न डर परलोक को न डर है
तज कर कामना जो करत पराये काम,
पुरुप
ताको कहिके बुलाइये
स्वार्थ परमार्थ जो दोनो ही को चाहत होय,
मध्यम नरो मे तासु गणना कराइये
अपनी ही भलाई जो चाहत हमेश नर,
कवि ताको नाम नीच ही गनाइये
निना ही प्रयोजन जो औरों के विगाडै काम,
सोच पड़ जी को ताको नाम क्या धराइये
दोहा
गुन नज अवगुन देसि हैं, दुर्जन दुसह सुभाय
ज्यों तज मधुरे फल शुतर, कीकर कटक साय
मो समान नहिं जगत में, जहर। क्रो मत मान
तुम मे भी अति विषम है, दुर्जन दुसह जवान
उदधि रहत हर कट बसि, भयो न इतना मान
काल कूट। जितना भयो, यस कर दुष्ट जवान
.
(६६ )
अगर दुष्टता जीव की, शिर तज अपयश लेइ
मन तन पाल कढाइ के, पर तन बन्धन देइ
चौपाई
पर घर चालक लाज न मीरा
वाझ कि जान प्रसव की पीरा
दोहा
सजन गुण लसि दहन है, दुर्जन हृदय नितात
जिमि चोरन की पार मे, सटकत रजनी कात
घनाक्षरी
गग के न गौरी के गिरीश के न गोविन्द के,
गोत के न जोत के न जाये राहगीर के
काहू के न सगी रति रगी मैन भानजी के,
जी के अति सोटे सोटे सेहैं जम वीर के
ग्वाल कवि कहैं देसो नारि को रखसम जाने,
धर्म को पसम जाने पातक शरीर के
नमक हराम बट काम करै ताजे ताजे,
पाजे पाजे बेसहूर गुरु के न पीर के
,
दुष्टपर उपकार अपकार और
अपकार उपकार है
नीचोंमे उपकारका फल उपजे अपकार
दूध पिलाये सर्प को, उगले विप फुकार
खल दुष्टोंके दाहसे, सरे लोक हित फाम
वृश्चिक भस्म कुघावको, तुरत करे आराम
दुष्टोसे सब डरते हैं
योंके नरत होत हैं, बन्दनीक सब लोय
नमत दुतीया चन्दकौं, पूरन चन्द न कोय
बसै बुराई जासु तन, ताही को सन्मान
भले भले कहिं छाडिये, खोटे ग्रह जप दान
चौपाई
टेढ जान शंका सयकाह, वक्र चन्द्रमहि प्रसन राहू।
दृढ़ता महिमा
जो न होय दृढ चित्तको, तहा न रहे सटेक
ज्यों काचे घटमें सलिल, नहिं ठहरत छिन एक
देह दशा
जैसी परे सो सह सके, कहि रहीम यह देह
घरती ही पर परत सय, शीत घाम अरु मेह
।
(६८)
द्यूत
निन्दा
जूआ सेले होत है, सुख सम्पति को नास
राज काम नलसे छुटयो, पाण्डव फिय धनबास
रहिमन नहीं सराहिये, लेन देन की प्रीति
प्रानन घाजी लागही, हार होय के जीत
कुडलिया
जड़ है जुआ कुकर्मकी, दुराचार का यार.
इसमे हारे हार है, जीते भी है हार
जीते भी है हार, जुआ अपमान करावं
धीर धाम धन धान्य, धरणि धी धर्म नशावे
चोरी जारी सून , तीन तापों की जड है
जुआ नाशका मूल, जुआ पापोंकी जड है.
धन महिमा
गुण प्रगटे अवगुण दुरै, जाके कमला साथ
तियमारी परिहरी तड, कृष्ण त्रिलोकी नाय
जो रहीम विधि बड किये, कोतिहि दूपण कादि
चन्द्र दूयरो बरो, तउ नयनत यादि
धन, धन, धन, है अापको, नमस्कार बहुबार
गुणि जनसे अगुणीन को, कर वानते सत्कार
.
नम्रता
जो हो मनम नम्रता, कष्ट न सहे शरीर
तोड सकत नहिं मूलते, कोमल तृणहि समीर
नरको अरु नल नीरकी, एकै गति करि जोय
जेतो नीचो हचले , तेतो ऊचौ होय
नियम गुण
नृप अनीति के होप ते चूकै मन्त्र प्रयोग
करै उपथता पुरुप को, क्यों नहिं उपजै रोग
होय सो होय हिसाय सो, पिन हिसाब नहिं होय
भर्से यदनते अन्न मन, नहीं नाफत कोय
नारायण सय सयमी, जिये सदा सुख भोग
उचिवाहार बिहार सो, नहीं सतावत रोग
ठीक नियममे काम कर, कबहु न पडे ममेल
गहे सुगमता सरलता, ज्यों लाइनपर रेल
निर्धनकी निन्दता
जगमें सम्पति हीन को, सक्ट नेकहु नाहि
ज्यों सुर तर निईन्द हैं, पतझड ऋतुके माहिं
नीचको उच्चपद शोभा नहीं देता
यडे न लोपै लाज कुल, लोपें नीच अधोर
उदधि रहै मरजाट पर, वह उलट न नीर
।
.
।
होत अधिक गुन निवल पै उपजत वैर निदान
मृग मृगमद चमरी चमर,लेत दुष्ट हनिमान
जो रहीम ओछो बढ़े, तो अति ही इतराय
प्यादे से फरजी भयो, टेढो टेढो जाय
नेत्र मनकी बात जानते हैं
नयना देत घताय सब, हिय को हेत अहेत
जैसे निर्मल आरसी, भली बुरी कहि देत
रहिमन अँसुवा नयन दरि, जिय दुस प्रगट करेइ
जाहि निकारो गेहते, कसन भेद कहि देइ
रहिमन मन महाराजके, हग सो नहीं दिवान
जाहि देस रीझे नयन, मन तिहि हाय बिकान
कहत नटत रीमत सिमत, मिलत सिलत लगजात
भरे मौनमे करत हैं, नैनन ही मब बात
कोटि जतन कीजै तऊ, नागरि नेह दुनि
कहेदेत चित चीकनी, नई रुसाई नैन
कहि रहीम इक दीपत, प्रगट सयै दुति होय
तनु सनेह कैसे दुरै, ग दीपक जर दोय
रूपनगर वसि मदन नृप, हग जासूस लगाय
नेहिन मनको भेद उन, लीनो तुगत मगाय
अपनो से को करत है, फहु दुराव जग माहि
हेत अहेत भली धुरी, नैना नैन यताहिं
.
नैनहि सुनत,
+
( ७१ )
प्रेम नगर में लग यया, नोखे प्रगटे आय
दो मन को करि एक मन, भाव देत ठहराय
नन
कहत
नैन
करत निरधार
नैनन ही से चलत है, सब जगको व्यवहार
मनकी बदी विचार करि, लसि अन रीती बात
परके नैन निहार करि, सकुचि नैन नय जात
मैं तो सो कौवा कह्यो, तू जनि इन्हें पत्याय
लगा लगी करि लोनयन, उरमे लाई लाय
भूछे जान न साहे, मन मुस निकस वैन
याही ते मानहु किये, यातनको विधि नैन
सारी डारी नीलकी, ओट अचूक चुकैन
मो मनमृगकर वर गहे, अहै अहेरी नैन
न्यायी राजाकी प्रजा सुखी रहती है
राजाके पल लोक सब, फिरें घिरै सब और
ज्यों बनम हटे चरे, यांधे हयके जोर
नृप प्रताप ते देश में रहे दुष्ट नहि कोय
प्रगटे तेज दिनेशको, तहा तिमिर नहिं होय
नीति निपुण राजानि को, अजगुत नहीं सुहाय
करत तपस्या शूद्र को, ज्यों मारयो रघुराय
रहै प्रजा धन यतन सो, जह थाकी तरवार
सो परा कोउन सके, जहा क्टीली डार
रहिमन राज सराहिये, शशि सम शीतल होय
कहा यापुरो भानु है, तप्यो तरैयन सोय
पछताते है
छष्यय
सठन सनेह जु क, मान बचहै सुलब्धहे
पिय वियोग सुसचहै सॉकर तजै स्वामि कहें
मनि बन्धहि पर रमनि, सेल दुर्जन सग सेलहि
नृपति मित्रकर गनहि, सर्प मुस उगलि मेलहि
चुक हित समै नरहरि निरस, जड आगे विस्तरहि गुन
पछिताहि सुते नर भगति विन, दौलत दलपत पान सुन
पर घर वास निन्दा
पर घर कबहु न जाइये, गये घटत है जोत
रवि मडलमें जात शशि, नीण कला छवि होत
ठौर छुटे ते मीतहू, है अमीत सतरात
रविजल उखरे कमल को, जारत गारत जात
को न जाय पर गेह में, होत प्रतिष्ठा हीन
पैठ भानुके भवनमे, भयो मयक मलीन
कौन बडाई जलदि मिल, गग नाम भी धीम
किहि को प्रभुता नहिं घटी, पर घर गये रहीम
पारत
है
माह मास लहि टेमुश्रा, मीन पर थत भोर
त्यों रहीम जग जानिये, छुटे आपने ठौर
को न छ निज ठौरके, हीन प्रतिष्ठा हाय
निकस दात मुग्नसे भयो हाड अपानन सोय
पर घर जा कहि राम कवि, को न करे घट काम
पाडव सुत सेवक भये, वमि बिराटके धाम
पद भ्रष्ट निन्दा
नाकी सम्मति को सुने जो पद भ्रष्ट प्रधान
अन चालू सिका कहा,
सम्मान
पराधीन निन्दा स्वाधीन प्रशंसा
जो पानी पर वश परयो, सो दुस सहत अपार
जूथ विछोही गज सहै, बन्धन अकुश मार
मन प्रसन्न तन चैन जह, स्वेच्छा चार विहार
मग मृगी मृग सुख सर्व, बन यसि तृन आहार
पराधीनता दुस महा, मुस जग में स्वाधीन
सुग्नी रमत शुक वन विपे, कनक पीजरे दीन
पराधीन नहि कीजिये, काहू को भगवान
जो कीजै मत दीजिये, ताका करिता ज्ञान
चौपाई
कत विधि सिरजि नारि जग माही
पराधीन मुपने
नाही
-
(७६ )
प्रकृति मिलने से मन मिलता है
प्रकृति मिले मन मिला है, अन मिल तें न मिलाय
दूध दही ते जमत है, काजी ते फट जाय
एक वस्तु गुन होत है,
भिन्न प्रकृति के भाय
मेटा एक को पित्त कर, करत एक को वाय
वाफे सीधे को मिलत, नियहै नही निदान
गुन ग्राही तौऊ तजत,
जैसे धान कमान
पडित पडित को मिलत, संशय मिटत न र
मिलें दीप दुहु दुहुन को, होत अधेर निवेर
सुजन सुजन के दरस ते, पावत जिय -सतोष
लहत कच्छ के वत्स ज्यो, सोम दृष्टि ते पोप
कहु रहीम कैसे निमै, वेर केर को सग
वे डोलत रस आपने, उनके फारत अग
धीरज रहे न धीर को, हो यदि मेल कुमेल
पानी दीपकः मे पडे, चिड़ चिडात है तेल
भेद भरे नेतान सो, होत न देश सुधार
कबहु न निकले मधुर सुर, जो नहिं मिले सितार
सरल सरल सों होय हित, नाहि सरल अरु वक
ज्यो सर सूधहि कुटिल धनु, डार दूर निसक
सूरको सूर गुणीको गुणी लवराके दिगै लबरा सुस पाने
लम्पटको नित लम्पट मानत पडितके मन पडित माने
,
*
( ७५ )
पाप परिणाम
वृद्धि न है है पाप तें, वृद्धि धर्म ते धार
सुन्यो न देख्यो सिंह के, मृग का सो परिवार'
पंडित के सामने मूर्ख का.आदर नही होता
मूढ तहा ही मानिये, हा न पण्डित होय
दीपक की रवि के उदय,
चात न पूछे कोय
चतुर सभा मे कूर नर, सोभा पावत नाहि
जैसे यक सोहत नहीं, हम मडली माहि
जहा चतुर नाहिन तहा, मूढन सो व्यवहार
बर पीपर विन हो रहे, ज्यो अरड अधिकार
'उत्तम को अपमान अर, हा नीच को मान
कहा भयो जो हस की, निन्दा काग वसान
तेजस्वी के सामने,
बने दुष्ट जन भूक
जय तक भासत भासकर,
बोलत नहीं उलूक
पडित जन के सामने, मूढ न ठहरन पाहि
सुनत शेर ख स्थार दल, अनत तुरत चल जाहिं
जह गुणि जन तह मूढ नर, काहू को न मुहात
कन सामने काच की, कोउ न पूछत बात
.
-
( ७४ )
।
.
पात्र भेदसे गुण भेद
पलट जात है वस्तु के, गुण भाजन अनुमार
सुधा भयो बिप गहु को, गरल शभु शगार
पात्रता
करत न कयह कुपात्र को, मदुपदेश कल्यान
सुनने में आया नही, जोक लगी पापान
करत न चचल चित सदा, सदुपदेश को मान
सुमन माल कपि कठ में, छिन भर की महमान
दान दोन को दीजिये, मिटे दुरदि की पीर
औषधि ताको चाहिये, . .जाके रोग शरीर
जो गरीय सो हित करें, धन रहीम वे लोग
कहा
कृष्ण मिताई योग
दीन सवन को लखत है, दीनहि लसै न कोय
जो रहीम दीनहि लग्ब, टीन बन्धु सम होय
बहत नदी नद जल उदधि,
कौन बडाई ताय
धन बादर जल होत जा
फल फूलन सुखदाय
खारथ रत समार नर, देत तेत करि भेय
दीन हीन को कौन जग,
दीनबन्धु विन देय
अधिकारी को दीजिये मिर्ट दरद दुस्ख मय
मुता अधानी न्यागि करि, भूसी बहु को देय
सुदामा बापुरो,
,
( ७७ )
कामीको कामी विलोक् सुलो अरु ज्वारीको ज्वारीमिले हरपारे
जाकोहै जैसा सुभाव सदा तिहिके अनुसारहि आनन्द प्राके.
प्रतिष्टाकी रक्षा करो
फिर जोड जुड़ती नहीं, भई प्रतिष्ठा भग
फळे दुधके छीछड़े, यने न पय के अग
जाय भतही माल धन, इज्जत लेहु बचाय
यहुर हाथ नहिं आवही, जो कपूर उड जाय
सम्पति भग्मागवाय कै, हाथ रहत कछु नाहि
ज्यो रहीम शशि रहत है, दिवस अकासहि माहिं
रहिमन पानी रासिये, बिन पानी सब सून
पानी गये न उबर, मोती मानस चून.
मोरठा
रहिमन मोहिं न सुहाय, अमी पियावत मान विन
जो बिप देय बुलाय, प्रेम सहित मरिवो मतो.
कुटलिया
पानी यादो नावमें, घर में बाढो दाम
दोनो हाथ उलीचिये, यही मयानो काम
यही मयानो काम, रामको सुमिरन
पर स्वारथ के हेत, सीम आगे धर दीजे
कहि गिरधर कविराय, बडन की याही बानी
चलिये चाल सुचाल, रासिये अपनो पानी
कीजै
( ७८ )
प्रेम प्रचार
प्रेम निसाहन कठिन है, समुझ कीजिये कोय
भाग भग्वन है सुगम पै, लहर कठिन ही होय
जैसो बन्धन प्रेमको तेसो वन्ध न और
काठहि धे, कमल को, छेद न निकरै भौर
नवल नेह आनन्द उमग , दुरै न मुस चस ओर
तैसो जान्यो जात है, ज्यो सुगधको चोर
प्रेम छकै मनको हटक, रख न सकै कुल लाज
कमल नालके तन्तु मों, को बाँधे गजराज
यात प्रेमकी राखिये, अपने ही मन माहिं
जैसे छाया कूप की, बाहर निकस नाहिं
प्रेम पगन जासों भई, सुख दुस ताके सग
बसत कमल अलि वासवश, सकमल भसतमतग
होत चाह कय होत है, प्रेम सु सन्जन संग
पास दिये बिन पास पर, चढे न गहरो रग
प्रेम नेम के पन्धको, है कछु अद्भुत रूप
पिय हिय लागै लगत ज्यो शरद जौन्ह मी धूप
कबहू प्रीति न जोरिये, जोर तोरिये नाहिं
ज्यों तोरे जोरे बहुर, गाठ परे गुण माहि
अन्तर तनक न रासिये, जहा प्रीति व्यवहार
उर सों उर लागे न तह, जहा रहत है हार
( ७६)
अगम पन्थ है प्रेमका, जह ठकुराई नाहि
गोपिनके पीछे फिर, त्रिभुवन पति यन माहि
ज्यो ज्यों छुटे अयान पन, त्यो त्यो प्रेम प्रकास
जैसे कैरी आमकी, पकरत पकै मिठास
रहिमन रिस महि तजत नहि, बडे प्रीतिकी पौर
मुक्कन मारत आवई, नींद विचारी दौर
रहिमन मन महराजके, हग सो नहीं दिवान
जाय.देस रोझे नयन, मन तिहि हाथ यिकान
गिरते ऊचे रसिक मन, धूडे जहा हजार
वहै सदा पशु नरनको, प्रेम पयोधि पगार
अद्भुत गति है प्रेमकी, वैनन फही न जाय
दरस भूख लागे हगन, भूसहि देत भगाय
अद्भुत गति है प्रेमको, लसो सनेही आय
जुर कह टूटे कह, कह गाठ पड़जाय
देखो करनी कमल की, जलमो कीनो हेत
प्राण तज्यो प्रेम न तज्यो, सूरयो सरहि समेत
मौरा भोगी बन भ्रमै, मोद न माने ताप
सय कुसमन मिल रम करे, कमल Jधाये आप
सुन परमित प्रिय प्रेमकी, चातक चितवत पारि
यन श्राशा सय दुस सहै, अन्त न याचे वारि
-
1
(८०- )
दीपक पीर न जानई, पावक र परत पतग
तनु तो तिहि चाला जरथो, 'चित न भयो रस भग
प्रीत परेवाकी गनो, चाहत चढन. अकास
तह चढतीय जु देखिय, परत छाड उर स्वास
सुमिर सनेह कुरग को, पवन न रान्यो राग
धर न सकत पग पछमनो, सर सन्मुख उर लाग
सब रस को रस प्रेम है, विपई सेले सार
तन मन धन योवन सिस, तऊ न माने हार
सोरठा।
जल पय सरस विकाय, देस प्रीति की रीति मल
विलग होय रस जाय, कपट सटाई परत ही
चौपाई
जलद जन्म भरि सुरत बिमारे,याचत जल पवि पाहन डारे
चातक रटनि घट घटि जाई, बढे प्रेम सब भाति भलाई
कनक हि वान चढे जिमि दाहे, तिमि प्रीतम पर प्रीति निवाहे
जग यश भाजन चातक मीना, नम प्रेम निज निपुण नवीना
मीन पतगहि गुरु करे, जो चाहत किय नह
त्यागन सगम होत ही, परहर अपनी देह
घनाक्षरी
के तो प्रेम पन्थ दिग पद न टिकावे कोऊ
जो पै पाव डार फिर हारे औ निहारे ना
14
1
'गम कवि काहू विधि काहू को न दीजे बैन
मुग्य मे निकारे जो पै ताहि इनकार ना
के तो काह कार्य को न कीजिये आरम कमी
आदि कर दीजे जोपं अत बिन छारै ना
कोई मापं मन रान अमिलासै जाइ
नीज प्रणपाम कवास को विचारै ना
पारम सगहिये क्यों जहा द्वैत भाव रहे,
लोह स्वर्ण के ही निज तुल्यता दुराय है
म्वर्ण गिरि क्योंकर सराहि के योग्य कहो,
'राम' कवि जहा तरु तरु हो रहाय है
सत्य ही सराहिये के योग्य दूध प्रीत जान,
जल अपनाय निज भाव से निकाय है
अथवा है मलैगिरि शोभा मूल जग माहि,
जहाहु को तग तम चन्दन ह जाय है
यदपि क्सिान नर
आगम मनावत है,
म्वागत करत भेक विविध विधान मा
उच म्बर मोर गुग्ण गावत हे चाव कर,
भूम झूम झीगुर सु नाच नहु तान मी
याध के समाज मज माज अति मोद मान,
उड पर जान पाम बकुले मन्मान सो
( ८२ )
'राम' हैं बलाहक के चाहक अनेक पर,
चातक सी चाहना न होगी किसी श्रान सों
पद
प्रीति तो मरनऊ न विचारै।
प्रीति पतग जोति पानक ज्यो, जरत न आप-सॅमारे
प्रीति कुरग नाद स्वर मोहित, वधिक निकट है मार
प्रीति परेवा उडत गगन त, गिरत न आप सँभारै
सावन मास पपीहा बोलत, पिउ पिउ करि जो पुकार
'सूरदास' प्रमु दरशन कारन, ऐसी भॉति उचारै
घनाक्षरी
चाहिये जरूर इनसानियत मानस को,
नौवत बजे पै फेर भेरि वजनो कहा
जाति औ अजाति कहा हिन्दू औ मुसलमान,
जाते कियो नेह फेर ताते भजनो कहा
'ग्वाल' कवि जाके लिये सीस पै बुराई लई,
लाज गमाई कहो फेर लजनो कहा
यातो रग काहू के न गिये सुजन प्यारे,
रेंगे तो रंगेई रहे फेर तजनो कहा
सवैया
एकहि सों चित चाहिये अन्तलों बीच दगाको परै नहिं टाको
मानिक सो चित वेच कै जू अब फेर कहा परखारनो ताको
गज़
( ८३ )
'ठाकुर' काम नही सब कोइक लासन में परवीन है जाको
प्रीति कहा करिवे में लगै करि के फिर प्रोड निवाहनो बाको
घनाक्षरी
गहिवो आकाश पुनि लैबो अथाह थाह,
अति विकराल काल ब्यालहि खिलाइयो
शेल शमशेर धार साहिबो प्रहार यान,
मृगराज लै हथेरिन लराइयो
गिरि ते 'गिरन पय आगि में जरन और
»াহী करवत तन बर्फ लो गराइयो
पीवो विप विषम 'कबूल' कवि नागरजू,
कठिन कठोर एक नेह को निवाहियो
मरैया
अति खोन मृनाल के
तिहि उपर
पान दे श्रावनो है
सुइ चेह ते द्वार सकी न
परतीति को टाको लगावनो है
कवि 'योधा' अनी घनी नेजहु ते
यदि तापै न चित्त डरावनो है
क्राल महा
तरवार की
धारनो है
,
तारह ते
तहा
पन्थ
यह प्रेम को
धार ६
उपर
~
-
( ८४ )
लोक की लाज औ शोक प्रलोक को
बारिये प्रीति क
दोऊ
गाव को गह को देह का नातो
सनेह मे हा तो कर पुनि मोड
'घोधा सुनीति नियाह कर
धर उपर जाके नहीं मिर' होऊ
लोक की भीत डरात जो मौत
तो प्रीति के पैड परे जिन को
दोहा
चित दै भजै चकोर ज्यो, तीजे मजै न भूख
चिनगी चुगै अँगार की, पियै कि चन्द मयूस'
फूट
निन्दा
अरि के सग कुटम्बि लखि, जिय
उपजत
बैंटा लगे कुठार को, तब वन राय विनास
अपनों ही के द्रोह ते, कटते हैं सब कोय
लोहा कटे न काहु ते, जो छैनी नहिं होय
तहा नहीं है भय जहा, अपनी जाति न 'पास
काठ बिना न कुठार कॅहु, तर को करत विनास
है त्रास
.
T
घनाक्षरी
फूट गए होरा की विकानो कनी हाट हाट,
काह घाट मोल काहू वाढ मोल को लयो
टूट गई लका फूट मिली है विभीषण को,
रावण समेत बस आसमान को गयो
कहै कवि 'गग' 'दुरयोधन से छत्र धारी,
तनक में फुट ते गुमान वाको ने गयो
फूटे ते नरद उठ जात वाजी चौसर की,
आपस के पृटे कहो कौन को भलो भयो
दृध फट जाने घट जारे हे अपार रस,
* अग कट जाये तन लहत हगस है
रतन अमोत के फटे त घट जागे झुति,
~-दन्त के कटे त फील फीस अति मास है
नरद फटे ते बाजी हर जात चौसर की,
मंघो के फटे ते होत जत की न आस है
'राम' पनि भाप सिस कान दै विचारो,
मीता आपस के फुटे ते मलाई को विनास है
फूटहिं ने लका को बिनाश कियो राम कर,
-फूटहि ने भारत में मारे मरदाने हैं
फूट ने चौहान को फंसायो फट वैरियो के,
फूटहि ने भाई हाथ भाई मरवाने है
A
( ८६ )
'राम' कवि फूट फटकार के है योग्य सदा,
फुट फल साये मुम पाये कहो काने है
फुटे भाग्य वाले गे रे फूट बोन वाले,
नेक कहिये विचार जो सताने नहिं ताने हैं
कुण्डलिया
साई ये न विरोधिये. छोट बड़े सब माय
ऐसे भारी वृक्ष को, कुल्हरी देत गिराय
कुल्हरी देत गिराय, मार के जमी गिराई
टूक टुक के काट, समुद में देत बहाई
कहि गिरधर' कविराय,फूट जिहि के घर आई
हरिनाकस्यप कस, गये वलि रावण साई.
साई बेटा बाप स, विगरे भयो अकाज
हरनाकस्यप कस को, गयो दुहुन को राज
गयो दुहुन को गज, बाप बेटा में बिगरी
दुशमन दावागीर, हॅमे महि मण्डल नगरी
कहि गिरधर' कविराय, युगन याही चल आई
पिता पुत्र के बैर, नफा क्हु कौने साई,
साई अपने भ्रात को, को न दीजे प्रास
पलाक दृर नहिं कीजिये, सदा राखिये पास
1
सदा गखिये
पाम, वास कबह नहिं दीज
वाम दियो लफेश, ताहि की गति सुनि लीजे
बाहि गिरधर' कविराय, राम मे मिलयो जाई
पाय विमीषण गज, लस्पति वायो साई
जगत मे घर को फट युरी-
घर की फूटहि सों बिनशाई सुवरण लक पुरी
फूटहि मा सर कौरव नाश भारत युद्ध भयो
जाको घाटो या भारत में अग्लो नाहि पुज्यो
फूटहि मो जयचन्द बुलायो यवनन भारत धाम
जाको फल अयलोंभोगनसयभारजहोय गुलाम
फुटहि सों नवनन्द विनाशे गयो मगधको राज
चन्द्रगुपको नाशन चाह्यो श्राप नशे सहसाज
जो जगम धनमान और बलापन रान होय
तो अपने घर में भलेह फूट क्गे जनि सोय
माया
रावण ने कर बन्धु विरोध लग्यो निज सम्पति जान गंवाई
थालि ने न्यर्थ सुकठ को कष्ट दे साई म्वजीवन राजपढ़ाई
मे भी न कभी करिये निज भाइयों से इस हेतु लडाई
'काम हैं आते विपत्तिके काल में गाठमा चन पीठका भाई
~
-
, । ។ ८८ ) बड़े वडाईकी रक्षा करते हैं बडे जिती लघुता करें, तिती बड़ाई पाय काम करें सब जगतके ताते त्रिभुवनराय छिमा वडनको होत है, छोटनको उत्पात का रहीम हरिको घर्टयो, जो भृगु मारी लात पद सतवादी हरिश्चन्द्र से राजा, नीच घर नीर भरे पाच पाडु और कुन्ती द्रोपदि, हाड हिमालय गरे यज्ञ किया बलि लेन इन्द्रासन, मो पाताल धरे मीरा को प्रभु गिरिधर नागर, विपसे अमृत वडोकी बात मानी जातीहै.. जो भाऐं सोई सही , वडे पुरुप मुस आन । है अनग ताको, कहैं, महा रूपकी मान अशुभ करत जो होत शुभ, सज्जन वचन अनूप । श्रवण पिता दिय दशरथहि, शाप भयो घर रूप यही बात सब ही कही, राजा करें सोन्याव ज्यों चौपरके सेलमें पाम पडै सो दाब बडे अनीति करें तऊ, बुरो को नहिं कोय यालि हत्यो अपराध विन ताहि भजै मत्र लोच हार यडेकी जीत है, निवल न मानें तास विमुख होय हरि ज्या क्यिो, कालयवनको नास करे 1 + . 1-
( ८९ )
बडे जु चाहै सो करें, कर न मतो उर धारि
हरि गिरि तारे जलधि पर, करी सिलाते नारि
द्वै ही गति हैं वडन की, कुसम मालती माय
कै सब के सिर पर रहैं के बन माहिं विलास
हित अनहित गुरुजन वचन, लोपत कबहु न धीर
राज काज को छोड के, चले विपन रघुवीर
कहैं यहै श्रुति समृती हु, सबै सयाने लोग
तीन दयावत निकट ही, राजा पातक रोग
बड़ोंके दोपको कोई नही कहता
को कहि सके बडेन सो, लसी बड़ी ये भूल
दीने दई गुलाब की, इन डारन ये फूल
चौपाई
• जो अहि-सेज शयन हरि कर ही,
बुध कछु तिन कहु दोष न धर हीं।
भानु कृशानु सर्व रस साही,
तिन कहँ मन्द कहत कोउ नाही।
शुभ अरु अशुभ सलिल सय बहही, ,
सुर सरि कोउ,न, अपावन कहही।
समरथ कहें नहिं दोप गुसाई,
पावक सुरसरि की नाई।
.
.
रवि
१
।
-
-
( ९० )
वडोंके पास सबकी गुज़र होती है
भले बुरे छोटे बडे, रहे बडन पे आय
मकर असुर सुरगिरि अनल दधिमधि सरलवसाय
गहिये ओट वडेन की, जहा मिटै दुस दन्द
उदधि मरन मैनाक को, कछु कर सक्यो न इन्द
भले बुरे निबहै सब, महत पुरुप के संग
चन्द सर्पजल अगनि विप, वसत शभुके अग
नीति अनीति बंड सहें, रिम भरि देत न गारि
भृगु उरदीनी लात की, कीनी हरि मनु हारि
कुण्डलिया
रहिये लट पट काट दिन, वरु धामै मा सोय
छाँह न वाकी पैठिये जो तक पतरो होय
जो तर पतरी होय, एक दिन धोसा है है
जादिन वहै ययारि, टूट तब जडसे जै है
कहि गिरधर कविराय, छोह मोटे की गहिये
पत्ते सब झडजोंय, तऊ छायामे रहिये
वनत देर लगतीहे बिगडते शीघ्र है
सुधरी बिगर येगही, निगरी फिर सुधरैन
दूध फटै काजी परे, सा फिर दूध बनन
भली करत लागत बिलम, बिलम न'बुरे विचार
भवन बनावत दिन लगे, दाहत लगन न वार
-
1
(११)
बिगरन वारी वस्तु कौं, कहो सुधार कौन
डारे पय औटायर्क, मिसरी मोरे नौन
बिगरी बात बन नही, लास करो किन कोय
रहिमन बिगरे दृध के, मथे न मासन होय
जिहि जोडत तुमको लगी, बहुत देर हे राम!
टूट गई इक बचन तें अब यह प्रीति तमाम
'बलवान महिमा
जोरावर की होतहे , सयके सिर पर राह
हरि रुकमणि हरि लै गयो, देखत रहे सिपाह
सिहनको अभिषेक कय, कीन्हो विप्र समाज
निज भुज बलके तेज तै, भये मृगनके राज
वह छुद्रनके मिलन ते हानि वली की नाहि
जूथ जेथूकनते नही, कहरि कहु नसि जाहिं
वातासे भले बुरेको पहचान
भले बुरे सब एकसे, जर तरु योलव नाहि
जान पड़त हैं काक पिक, ऋतु बमत के माहि.
मधुर वचन से जात मिट, उत्तम जन अभिमान
तनिक शीत जलसे मिटै, जैमे दूध उफान
बात कहन की रीतिम, है अन्तर अधिकाय:
एक यचन से रिस यद, एक पचन ते जाय
11
E
।
+
सभमै अन
.
कह रसीली बात तो, विगडी लंत सुधार
सरस लौनकी दालमे, ज्यो नीबू रस डार
कर बिगडी सुधर बचहि, जैसे बनिक विशप
हींग मिरच जीरो कहैं, 'हग 'मर' 'जर' लिसलेष
समझ
कछुक,
कहिये मीठी बात
बालक के सुन सुन बचन, जैसे श्रवण सुहात
भले भले ही कहत है, पैन कहत हैं दोप
सूरदास कहि अन्ध को, उपजावत है तोप
भले बुरे को जानिये, जान वचनके बन्ध
कहै अन्धको सूर इक, कहै अधको अध
पाय प्रकृति वश कीजिये, करि बुधि बचन विवेक'
लष्ट पुष्ट सो एक को, यष्ट मुष्ट सो एक
करिये सभा सुहावतो, मुस तें वचन प्रकाश
विन समझे ममपालको, बचनन भयो विनाश
परुष बचन तें रोप हित, कोमल वचन समाज
रजक पधारयो कूबरी, रास लई ब्रज राज
हसन
के ढिग बैठ करि, लीजे मौन सहाय
बक,यक, वक मत कीजिये, जाती जानी जाय
विपत कालमें कोई साथ नहीं देता
यदपि आपनो होय तऊ, दुसमें करत न पीर
-ज्यो दुसती अँगुरी निकट, दूसरि ताहि न पीर
.
,
-
दुरदिन परे रहीम कहि. भूलत सव पहिचान
मोच नहीं वित्त हानिको, जो न होय हित हानि
निस्ट न लागत मीत हितु, विपत कालके माहि
होत अधेरो तजत है, संगति अपनी लाहिं
मवेया
चारिध तातहुसे विधिसे सुत सोम सुधा सु,सहोदर दोऊ
रमा रमा -तिमकी भगिनी मधुवा मधु सूदनसे बहिनोऊ
तुच्छ तुपार इतौ परिवार भयो सरमध्य सहाय न कोऊ
सूरव सरोज रहयो जल हीन नही दुसमे किहिकोकोउ होऊ
बुरे लगते है
सम्पति यीते विलसवो, सुसको चाहे कोय
रूख उरकरे फूल फल, कैधौं कैसे होय
पिछलेपन का रति कथा, जल सू कासार
ज्ञान भये समार सुस, बित्त गये परिवार
दुर्जन सगति जगत रति, पर दुस टायक यात
मान विना धन कोटिह, मजनको न सुहात
भक्तका उपालंभ
थोरेई गुण रीमते, बिसराई वह बानि
तुम हू कान्ह मनो मये, श्राज कालके दानि
चको टेरत दीन रत, होत न श्याम सहाय
तुम ह लागी जगत गुरु, जगनायक जगवाय
-
-
(६४)
ज्यों है हत्या होहुगो, हो हरि अपनी चाल
हठ न करो अति कठिन है, मो तरिवो गोपाल
भक्ति उपदेश
जप माला छापा तिलक, सर न एको काम
मन काचे नाचे वृथा, साँचे राचे राम
सो लग या मन मदनमें, हरि प्रावें किहि बाट
निपट विकट जब लो जुटै, म्बुले न पट कपाट
अपने अपने मत लगे, यादि मंचावत शोर
ज्या यों सेवो सवहि को, एक नन्द किशोर
सोरठा
मैं समझो निरधार, यह जग काचो काच
सो
एक रूप अपार, प्रतिविम्बित लसिये जहा
भक्ति महिमा
जो नारायण भक्त है, नारायण मतिमन्द
तो मरस मौ मांति सो, गुण धर दोहा छन्द
रहिमन मनहि लगाय के, देख लेहु किन कोय
नरको वश करियो कहा, नारायण वश होय
जिहि रहीम चिन आपनो, कीनो चतुर चकोर
निशिवासर लागो रहै, कृष्ण चन्द्र की ओर
मतत सम्पति जान के, मयको सब कुछ देइ
दोन बन्धु पिन दीन की, को रहीम सुधिलेइ
समय दशा कुल देस कै, लोग करत सन्मान
रहिमन दीन अनाथ को, तुम बिन का भगवान
धूर धरत नित सीसपर, कह रहीम किहि काज
जिहि रज मुनि-पनी तरी, सो दूढत गज राज
इहि शरनागत राम की, भवसागरकी नाव
रहिमन जगत उधार कर, और न कर उपाक.
जिहि रहिमन तन मन दियो, कियो हिये बिच मौन
तामो दुम सुख कहनको, रही बात अब कोन
घनाक्षरी
पासनि सो बाध के अगाध जल बोर राखे,
तीर नरवारन मो मारि मारि हार हैं।
गिरि ते गिरायदिये डरपे न नेक तन,
भूधर ते मतवारे हाथी तर डारे हैं।
फेरे मिर पारा ले अगिनि माझ जोर पुनि,
पूछ मीड शातन लगाये नाग कारे है।
पूछे ते यतायो खम तहई दिसायो
प्रगट अनुपदास वानि ही से प्यार हैं।
दोहा
कोऊ कोटिक सग्रहो, कोऊ लास हजार
मो सम्पति यदुपति मदा धिपति विदारन हार
या अनुरागी चित्तकी, गति समझ नहि कोय
ज्यो ज्यो बूड श्याम रंग, यो यो उज्जल होय
रूपर
--
+
जो अनेक अवगुण भरी, चाहै याहि बलाय ,
मो पति सम्पति हू बिना, यदुपति रासै जाय
भय स्थानसे वचो
जिहिं दिशि भय तिहि दिशि कबहु, ना जै यै करि चोज
गज तिहि मग पग ना घरे, जहा सिंह को सोज
दुर्दिन परे रहीम कहि, दुरथलं जैयत भाग
ठाढे हूजत घर पर , जय घर लागत भाग
भले बुरे दिनोंका अन्तर
दिवम भले विग न कछु, रहो निचीते सोय
आ चोरी करन को, चोर आवरो होय
प्रापति दिन होय है प्रापति बारम्बार
लाभ होत व्योपार मे, आमत्रण अधिकार
अप्रापति के दिनन मे, सर्च होत अविचार
घर आवत हैं पाहुने, वनज न लाम लगार
भली किये है हे उरी, देसो बिधि निमीनि
भक्ति करी द्विज जमदिगनि, अर्जन करी अनीति
रहिमन चुप ह वैठिये देस दिनन को फेर
-जब नीके दिन आयहै, बनत न लग है देर
सबैया
बन्धु विरोध करे सिगरो मगरोनित होत सुधारस चाटन
मित्र करें करनी रिपुकी धरती धर देखन न्याउ निपातट
राम कहैं विप होत सुधा,घर नारि सती पतिसो चित फाटत
मा विधना प्रतिकूल जवै तब ऊट चढे पर कूकर काटत
भाग्य-फल
जाको प्रापति होय सो, मिलै आपत प्राय
मेवा कोम हजार को, किहि किहि ठौर न पाय
होय बदा सो माग्यमे, आपहि मिलि है आय
चूहा बिल को सोति करि, पडै साप मुन जाय
भाग्य हीन
भाग्य हीन को ना मिल, भली वस्तुका भोग
दास पकै मुरस पाक को, होत काक को रोग
भाग्य हीन को देव हू, देत सु लेत बनेन
दीठ परे जहँ वस्तु तहें, चले मूद के नेन
श्रावत समय विपत्ति को, मिन शत्रु है जाय
दुहत होत यछ बँधन को, यम्भ मात को पाय'
जो पुरपारथ ते कह, सम्पति मिलति रहीम
पट तागि वैराट घर, तपन रमाई भीमः
छप्पय
गजा नर शिर भानु तापत 'दग्धन लाग्यो
विधि वश छाया हेत, ताड तरवर तर भाग्यो
ताहि जात तिहि ठौर, वृक्षत फल इक टूटयो
भयो भयानक शन्द, गिरन गजा शिर फूटयो
9
1
M
"
।
(६८ )
श्री शिव सम्पति कवि भने, सुनो मुख्य यह बात है
विपति सग लगिजात तहँ, माग्य हीन जहँ जातहूँ।
भावी
दूर कहा नियरे कहा, होन हार सो होय
जर सोचे नारेलको, फलमें प्रगटै तोय
राम न जाते हग्नि सग, सीय न रावण साथ
जो रहीम भावी कतहु, होती अपने हाथ.
यह
निहचै करि जानिये, जान हार सो जाय
गजके भुक्त कपित्थ लों, ज्यो गिरि बीच बिलाय
जान हार सो जाय अरु, होन हार है जाय
रावणतें लका गई, बसे यमीपण पाय
तुलसी जम भवितव्यता, तैसी मिले सहाय
आप न आवै ताहि पै, ताहि तहाँ ले जाय
सुनहु भरत भावी प्रगल, विलस को मुनि नाथ
हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ
भरद्वाज सुन जाहि जय, होत विधाता वाम
धूरि मेरु सम जनक यमु, ताहि व्याल सम दाम
चौपाई
कल्परेलि जिमि वहु विधिलाली, सींच सनेह सलिल प्रतिपाली
फूलत फलत भयो विधि बामा, जानि नजाय काह परिणामा
लिग्नत सुधाकर लिसगा राह, विधि गति वाम सदा सय पाहू
,
दोहा
हरि रहीम ऐसी करी, ज्या कमान सर पर
सेंच आपनी ओर को, डार दियो पुनि दूर
पद
करम गति टारे नाहिं टरी (टेक)-
मुनि वसिष्ठ से पण्डित ज्ञानी सोध के लगन धरी
मीता हरन मरन दशरथ को बन मे विपत परी
कहे वह फद कहाँ वह पारधि कहें वह मृग चरी
सीता को हर लेग्यो रावण सुवरन लक जरी
नीच हाथ हरिचन्द्र विकाने बलि पाताल धरी
कोटि गाय नित पुन्न करत नृग गिरगट जौनि परी
पाडव जिनके आप मारथी तिन पर विपत परी
दुर्योधन को गरम मिटायो यदु कुल नास करी
राहु केतु प्रो मानु चन्द्रमा विधि सजोग परी
कहत कबीर सुनो भाई साधो होनी होत खरी.
घनाक्षरी
भावीको यनाव दान अकथ अपार बल,
वलत न चारे हारे भूर बलवान हैं।
नल से नरेश गहि गादी से गिराय दीने,
नारि दमयन्ती कर छोरत अपान हैं।
मांगी बश राम सग कंचन कुरग धाये,
मक्ष इव लीने कर बीच धनु वान है।
( १०० )
राम कवि ऐसे ही युधिष्टर विचार धान,
प्रापद अपार सही हारे धन धान हैं।
.
मतलबी-मित्र
अपनी अपनी गरज सब, योलत करत निहोर
बिन गरजे बोले नहीं, गिरवर हु को मोर .
स्वारथ के सब ही सगे, विन स्वारथ कउ नाहिं
से पछी सरस तरु, निरस भये उड जाहिं
यिन स्वारथ कैसे सहै, कोऊ कड़ने बैन
लात साय पुचकारिये, होय दुधारू धेन
जिहि जासो मतलब नहीं, ताकी ताहि न चाह
ज्यो निस प्रेही द्रव्यके, तृन समान सुर नाह
नर कारज की सिद्धि लो, कर अनेक प्रकार
छुटे रोग शरीर तैं, को बूढ उपचार
चहल पहल अवसर परे, लोक रहत घर घेर
ते फिर दृष्टि न आवहीं, जैसे फसल बटेर
सर सूखे पछी उर्ड, और सरन समाहि
दीन मीन विन पन्छ क, बहु रहीम कह जाहि
कुण्डलिया
साई सब ससार मे, मतलय का व्योहार
जब लग पैसा गाठ में तबलगताको यार
M
( १०१ )
.
तर लग ताको यार यार सगहि सग डोले
पैसा रहा न पास,यार मुसमे नहि बोलें
कहि गिरधर कपिराय, जगत यहि लेसाभाई
करत बेगरजी प्रीत, यार कोई बिरला साई ।
कृतिघन कबहु नमानही कोटि करे जो कोय
सर्वस आगे रासिये, ता न अपना होय
तर न अपनो होय, भले की भली न माने
काम काढ चुपरहै, फेर तिहि नहिं पहचान
कहि गिरधर कविराय,रहत नितही निर्भय मन
मित्र शत्रु सब एक, दाम के लालचि कृतघत
दोहा
अपनी प्रभुता को सौं, योलत झूठ बनाय
वेश्या वरस घटावती, जोगी बरस यढाय.
मित्र लक्षण
मित्र मित्र के काम को देत विभव सरि हेत
जैसे चन्द्र प्रकाश करि, रयि मण्डल ते लेत
मथत मथत माखन रहे, दही मही रिलगाय
रहिमन मोई मीत है, भीर परे ठहराय
जाल परे जल जात पहि,तजि मीनन यो मोह
रहिमन महरी नीर को, तन छाटति छोह
।
कुपथ निवार
कहि रहीम सम्पत्ति सगे, चनत बहुत बहु रीति
विपति कसौटी जो कसे, तेई साचे मौत
चौपाई
निज दुस गिरि सम रज के जाना,
मित्रक दुस रज मेर समाना ।
जिन के अस मति सहज न आई,
त सठ हठ कत करत मिताई ।
सुपन्थ चलाया,
गुण प्रगद अवगुणहि दुरावा ।
विपति काल करि शत गुन नेहा,
श्रुति कहि सन्त मित्र गुण एहा ।
जो न मित्र दुस होहिं दुसारी,
तिन्हे बिलोकत पातक मारी ।
मिथ्याऽभिमान
यश मिथ्या अभिमान को, नेकहु जग मे नाहि
वन बन विग. वुल बुले, ज्यों वर्षा जल माहि
जो मिथ्या धन धाम पर, करता है अमिमान
मनो कूपकी मैड पर, सोबत चादर तान
धन धारा अर सुतन मे, रहत लगाये चित्त ।।
क्यों रहीम सोजत नही, गाढ दिन को मित्त
-
N
( १०३ )
कहु रहीम केतिक रही, केती गई विताय
माया ममता मोह परि, अन्त चलो पछिताय
अरे मरे कितने सरे, घरे चिता निज हाय
गया न तू नहिं साथ तुव, जात नाम रघुनाथ
जगत जनायो जिन सकल, सो हरि जान्यो नाहि
ज्यो आँसन जग देखिये, आँस न देखी जाहिं.
मजन कहयो ताते मज्यो, मजो न एको वार
दूर भजन जाते कहयो, सो त मज्यो गँवार
मूर्ख कृत निन्दा
दोष धरै गुण को पिशुन, इह उर गुनिन बिसारि
जू के भय ते बसन को, देत कहा कोउ डारि ?
जो बडेन को लघु कहैं, नहिं रहीम घटि जाहिं
गिरधर मुरली धर कहे, कछु दुस मानत नाहि,
शशि की शीतल चादनी, सुन्दर सयहि सुहाय
लगे चोर चित में लटी, घटि रहीम मन आय
शीत हरत तम हरत नित, भुवन भरत नहिं चूक
रहिमन तिहि रवि को कहा, जो घटि लसै
उलूक
शीतलता ऽरु सुगन्ध की, महिमा घटी न मूर
पीनस वारे जो तज्यो, सोरा जानि कपूर
मूरस के अपवाद त गुणी न होत मलान
ज्यों मौकत है श्वान पै, धरैन गज कछु ध्यान
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,
-
( १८४ )
सर्वया
पीनस वारो प्रवीन मिले, तो कहाली सुगन्धि सुगन्ध सुघावे
कायर कोप चढे रन मे तो कहा लगि चारण चाव चढावै
जैसे गुणी को मिले निगुणी तो पुपीकहैं क्योकरताहि रिझाने
जो पै नपु सक नाह मिलतो कहा लगि नारि गार बनावै
मोह ज्ञान अन्तर
मोह महातम रहत है, जो लौ जान न होत
कहा महातम रहत है , आदित भये उदोत
मोह प्रवल ससार मे, सय को उपजै आय
पालै पोपै सग वचन, दै है कहा कमाय
भये ज्ञान अज्ञान नहि, है अज्ञान न ज्ञान
मानु उपो तो तम नहीं, है तम उपो न भान
यथा योग्य.
यथा योग्य की ठौर बिन, नर छवि पार्व नाहि
जैस रत्न कथीर मे, काच कनक के माहि
अपनी अपनी ठौर पर, सय को लागै दाव
जल में गाडी नाव पर, थल गाडी पर नाव
इक गुन तें सोमा लहैं, इक अवगुन अवरोह
शोभ उरोजन पीनता, त्यो कटि कृशता सोह
जा लायक जिहि होय सो, ताही ठौर मनोग
चन्देरी पति क्यो धरै रुक्मणि श्री हरि जोग
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-
। १०५ )
मान मरोवर ही मिलें , हमन मुक्ता जोग
सफरिन भरे रहीम सर, बक बालक नहिं योग
थेन यहा नागर बडे जिन श्रादर तो श्राब
फुल्यो अन फूल्यो भयो, गवई गाव गुताब
परले संघ मगह के, रहे सर्व गहि मौन
गधी गन्ध गुलाब को, गँवई गाहक कौन
यथा योग्य यिन को लहै, कहहु राम सम्मान
-मूढ हसत हैं हहर के, सुन सुरागी तान
याचक निन्दा
सवत लघु है मागिवो, यामें फेर न सार
बलि पे याचत ही भयो, वामन तन करतार
तृन अर तूल दुहन ते, हरुवी याचक आहि
जानत है कछु मागि है, पवन उडावत नाहि
इक विन माग हो लहै, मागे एक लेह न
घन जल मर मरिता भरे, चातक चोंच मरन
माता सन पय पान को, समझ भीक की चाल
दातन उँगली धरत है, पछतावत बाल
क्यह न सम्पति भी की, चिर स्थायनी होत
इत भारत उत्त जात है, यथा कला निधि जोव
मागे घटे रहीम पर, स्तिो क्गे यदि काम
तीन पंग वसुधा परी तक श्रावन नाम
-
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( १०६ )
रहिमन वे नर मर चुके, जो कहु मांगन जाहि
उनसे पहिले वे मरे, जिन मुख निकसत "नाहिं"
रहिमन याचकता गहे. बडे छोट हो जात
नारायण ह को भयो, बावन आँगुर गात
ये रहीम घर घर फिरें, मांग मधूकरि खाहिं
चारो यारी छोडदो, ये रहीम अब नाहिं
घर घर डोलत दीन है, जन जन याचत जाय
दिये लोम चशमा चसन, लघु पुनि घडो लखाय
याचक नर के वदनते, हटत तेजको जोत
जलद जलधिसे जल गहत, श्याम वर्ण ज्यों होत
सवैया
हे करतार ! हा तोसो कह कयह जनि दीजिये काहुको टोटो
और लिसो जनि काहुके भाग्यमे मालके काजे महीपन मोटो
तू हु तो जानत है अपने जिय मागोते कछु और न मोटो
जो गयो मागन तू वलि द्वार तो याहीते वगयो धावनछोटो
"मुझे दीजिये कुछ" यो कहि जब याचक कर फैलाता है
तमी शरीर कापने लगता उसका स्वर घट जाता
उसी समय उसके शरीरसे ये पांचो हट जाते हैं
ज्ञान तेज वल और मान यश अधम प्राण रह जाते हैं
( १८७)
-
घनाक्षरी
चातुर, चालाक वाक वक्ता हो विशुद्ध सूर,
भूर बलवान गान गायक रिमात है।
पण्डित अग्बड गुण वारिध सुमडित हो,
चन्द्रमा समान रूप योवन दिसात है।
कविता सुलीन छन्द बन्धत विहीन दोष,
समता न जक्त माम जाकर लसात है।
कहत सु राम जे तो गमता गार सबे,
"दीजिये" कहे ते एक पल में दुरात है।
योग्यताकाही मान है
दाहा
भयो बडापन के विना, को उच्चासन जोग
बैठौ काग मुडेर पर, गरड न माने लोग
कुण्डलिया
बड़े न हजै गुनन बिन, विरद वडाई पाय
कहत धतूरे सो कनक, गहनो गढो न जाय
गहनो गढो न जाय, धतुरे सो किहि भाँती
पुष्कर जलसी कहत, सुरभि नहीं गध सुहाती
चन्द कपूर न कान्ति, जाति उडि यां दिन दूजै
सु करि नामते कहा, गुनन विन वडे न हूज
.
-
( १०८ )
लक्ष्मी चञ्चल है
साची सम्पति और की, और भोगिर्न आय
कन सग्रह चोटीन को, ज्यो तीतर चुग जाय
धन अरु गेंद जु खेलको, दाऊ एक सुभाय
करम आवत छिनकम, छिनमें करते जाय
कमला थिर न रहीम कहि, यह जानत सब कोय
पुरुप पुरातनकी वधू, क्यो त चचला होय
कमला थिर न रहीम कहि, लसत अधम जे कोय
प्रभुकी सो अपनी कहै, क्योन फजीहत होय
नारी काहू रक की , अपनी कहे न कोय
हरि नारी अपनी कह, क्यो न फजीयत होय
लोभ निन्दा
निज परछाई नौर मे, देखत लपको श्वान
मुस हू की रोटी वही, भौंकत रह्यौ अजान
नाशवान ससारमे, अधिक मोह मत मान
जो गठरी हलकी रही, मजिल है आसन
टरे न दुर्जन लालची, करो लास अपमान
मरखी फिर फिर आत है तजे न जब लग प्रान
,
लोभभी वही अच्छाहे जो आशा पूरी करे
लालच भी ऐसो मलो, जासों पूरै आस
चाटे हूँ कहु ओसके, मिटत काहुकी प्यास ?
देश ठिकाना मागिये, मागे मिले जु होय
मुनि घर मीतर कागही, दूढे लहत न कोय
अपने लालचके लिये, दुखहू श्रावै दाय
कान विधाये साय गुरु, पहरै वीर बँधाय
वाचाल निन्दा, मौन महिमा
वसवादी को नीच पद, मौनी को सत्कार
नूपर पायन पडत है, चढत कुचन पर हार
पायल पाय लगी रहै. लगे अमोलक लाल
मोडरह की भासि है, वदी भामिनि भाल
बहुत न यकिये कीजिये कारज अवसर पाय
मौन गहे क दाव पर, मछली लेत उठाय
-
विचार-प्रशंसा
बुरे लगत हितके वचन, हिये विचारो आप
कडवी भेषज बिन पिये, मिटै न तनको ताप
करिये सुसको होत दुस, यह कहु कौन सयान
वा सोने को जारिये, जासों दे कानटू
10
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-
।
-
भले बुरे जह एकसे, तहा न वसिये जाय
ज्यो अन्यायपुर में विके, सर गुर एकैभाय
निष्फल श्रोता मृढ पै, वक्ता वचन विलास
हाव भाव ज्यो तीय के, पति श्री वेके पास,
न करि राम रेंग देस सम, गुण बिन समझे यात
गात धात गौ दृधतै, सैहुड के ते घात
बिन कुल गुन जाने बिना, मान न कर मनुहार
ठगत फिरत सब जगतको, भेप भक्तको धार
मूरसको पोथो दर्द, बोचन को गुण गाथ
जैमे निर्मल आरमी, दई अन्धके हाथ।
हरि रस परिहरि विषय रस, मग्रह करत अजान
जैसे कोऊ करत है, छोड सुधा विप पान .
जासो निबहै जीवका, करिये सो अभ्यास
वेश्या पाल शील तो, कैसे पूरै आस
जाको जैसो उचित तिहिं, करिये सोइ विचार
गीदड कैसे ल्याय है, गज मुक्ता गज मार
कहिये यात प्रमान की, जासी सुधरै काज
फीको थोरे तोनते, श्रधिको साये नाज
चतुर कृर इक्मे गर्न, जाफे नहीं विनेक
जैसे अबुध गॅवार को, पाच काच है एक
अपनो समय विचार के, अरि जीतिये अचूक
"
।
,
+
4
N
M
( १११ )
दिवस काग घूकहि हर्न, कागहि निशि ज्यो धूफ
छल बल समय विचारक, अरि निये अनगाम
कियो अकेले द्रोण सुत, निसि पाइब कुल नाम
सुन्दर यान न छोडिये, जो लो होय न और
पिछलौ पाव उठाइये, देख धरन को ठौर
फिर पीछे पछताइये, सोन वरै मति सूध
बदन जीभ हिय जरत है, पीवत तातो दुध
इगत ते आकार ते, जान जात जो भेट
तासो बात दुरै नहीं, यो दाईसे पेंट
सुनिये सब होकी कही, करिये स्वहित विचार
मन लोक राजी रहें, सो कोजे उपचार
देसा ठेसी करत मब, नाहिन तत्व विचार
या को यह अनुमान है, भेड चाल ससार
तिहि प्रमाण चलिवो भलो, जो सय दिन ठहराय
उमड चल जल पारतें, जो रहीम बढ़ जाय
रहिमन देस बडन को, त न दीजे टार
जहा काम भाव मुई कहा कर नलार
फल विचार कारज करो, गेन व्यर्थ भमेल
तिल सम यालू पेलिये, नाहिन निकमत तेल
पीछे कारंज फीजिये, पहिले पहुँच विचार
फैम पावत उन फल, वामन थाह परमार
"
1
जो करिये सो कीजिये, पहले कर निर्धार :-
पानी पी घर पूछिये, नाहिन भलो विचार
पीछे कारज कीजिये, पहिले यतन विचार
बडे कहत हैं वाधिये पानी पहिले पार
ठीक किये विन और की, वात साच मत थाप
होत अधेरी रैन में, परी जेवरी साप
कुण्डलिया
विना विचारे जो करे, सो पाछे पछताय
काम विगारे आपनो, जग में होत हँसाय
जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पावे
सान पान सन्मान, राग रँग मनहि न मावै
कहि गिरधर कविराय, दुस कुछ टरत न टारे
खटकत है जिय माहि, करे जो विना विचारे
चौपाई
सहसा करि पाछे पचताहीं, कहत वेद बुध ते बुध नाहीं
विदया दान महात्म्य
निस दिन विद्या दान तें, होत न विद्या दूर
खिंचत रहत जल प ते, तऊ रहत भर पर
M
-
( ११३ )
विया नीच से भी लो
उत्तम विद्या लीजिये, यदपि नीच पै होय
परयो अपानन ठौर पर, कचन तजत न कोय"
विढया विहोन निन्दा
विद्या विन न विराजई, यदपि सरूप कुलीन
ज्यो सोभा पावे नही, टेसू वास विहीन
होत बहुत धन होत तऊ, गुण युत भये उदोत
नेह भरथो दीपक तऊ,गुण बिन जोति न होत
कहा भयो जो धन भयो, आदर गुण तें होय
कोटि दीप धारी धनुप, गुण विन गहत न कोय
नहीं रूप कुछ रूप है, विद्या रूप निधान
अधिक पूजियत रूप ते, बिना रूप विद्वान
विपरीत
जिय पिय चाहै तुम करो, घन चन्दन उपचार
श्रौषधि क्छ,
प्रेम पगत परजी न स्यों, अव बरजत ये काज
रोम रोम विष रम गयो, नाहिन यनत इलाज
रोप मिटै कैसे कहत, रिस उपजावन यात
इंधन डार आग मे, पैमे आग बुझात
निपट अमिलती यातो, कैसे करि है कोय
वसन नील के माट में, कयह लाल न होय
रोग यह
कैमे होत करार
।
-
विरह-दशा
विरही जनकं चित्त की, नाहिं रहत बुधि योध
थिर चर का बूझन फिरे, राघव सीता सोध
विरह रूप धन नम भयो, अवधि आश उद्योत
ज्यो रहीम भादो निशा, चमकि जात खद्योत
विरही जन व्याकुल रहै, भूलि जात सुस चैन
चकवा चस्त्री बिछड व्यो, तडपत है सब रन
घनानरी
सृष्टि जात यान पान भूषन यसन भौन
छटि जात वित्त देश प्रेम की पगन में
तात मात दारा पति पुत्र ससा बन्धु छुटे,
तन मन प्रान टूटै नैन की सगन में
रसिक बिहारी नेम धर्म परलोक लोक,
इटिजात मोद वह चित्त की ठगन में
ये ते सब इटि जात रचह न लागै बार
विरह न इटै नेक नेह की लगन में
सवैया
विरही समझायह धीर हिये न धरै न धरै न धरै न धरै
जग लोगहिसो रसिकेश कह न डरै न डरे न डरैन डरै
-
-
-
.
( ११५ )
निज प्रीतम के बिन एक घरी न भर न भर न भर न भर
विधि काहुहि प्रीय विछोह कवो न करेन करै न कर न करें
फल है तिहि के शतर्मनको जिहि के जियमाहि सदाक्ल है
कल है नहि जाहि क्लेशनते न लगै कहु ताहि करू भल है
मल है रसिकेश सदा अति सा हठ के दृढ प्रेमहि जो न लहै.
न लहै निज मीत वियोग कयौ जग जीवन को सुयही फल है.
विरोध
रहे न कबहू दोय मल, एक सदन के माहि
एक भ्यान में = छुरी, जैसि समावै नाहि ।
विश्वास-महिमा
सिद्ध होत मन कामना, तुलमी प्रेम प्रतीति
तिरिया अपने कारने, लिख पूजत है भीति
वैर है
छप्पथ
वैर धनी निर्धनी, र कायर अर सूरहि
धृत मधु मासी नैर, वैर निम्मूहि स्पूरहि
मूसे सर्पहि वैर, वै पावक अर पानी
जरा जोयना वैर, वर मूरस अरु ज्ञानी
वड़ वर चोर जिम चन्द सनु, विरहनि वैर बसतसा
नरहरी सुकच्चि करित किय, मगन वर श्रदत्त सो
-
( ११६ )-
शत्रुसे मित्रता न करो
वेर भाव जहँ भूल हू, मिलत न करिये कोय
मूसे और बिलार में, कबहु प्रीति न होय
निह कारन विपति को, किये प्रीति अरि सग
मृगको मुस मृगराजके, होत कबहु तन भग
कुण्डलिया
जाकी धन धरती हरी, ताहि न लीजे सग
जो चाहे लेतो वनै, तो करिडार निपग
तो करिडार निपग, भूल परतीति न कीजै
सौ सौ सौहैं साय, चित्त में एक न दीने
कहि गिरधर कविराय, सटक नहि जै है ताकी
अरि समान पर हरिय, हरी वन धरतीजाकी
चौपाई
यदपि मित्र प्रभु पित गुरु गेहा, जाइय बिन बोले न सदेहा
यदपि विरोधमान जहँ कोई, तहाँ गये क्ल्याण न होई
शत्रुसे सचेत रहो
अरि छोटो गनिये नही, जात होय विगार
तृण समूह को तनिक मे, जारत तनक अगार
छोटे अरि पर चढहु सजि, सुमट शस्त्र तन बान
लीजै ससा असेट पर, नाहरको सामान
-
।
( ११७ )
कहु रसमे बहु रोसमे, अरि सों जिन पतिप्राय
जैसो सीतल तपत जल, डारत आग बुझाय
हीन जान न विरोधिये, हो अति तन दुसदाय
रजह ठोकर मारिये, चढे सीस पर आय
कागजको सो पूतरा, सहिजाहिमे घुल जाय
रहिमन यह अचरज ललो, सोकसीचत वाय
रिपु तेजमो अकेल अति, लघु कर गनिये न साहु
अजहु देत दुस रवि शशिहि, शिर अवशेपत राहु
शिक्षा अधिकारीको देनी चाहिये
गुर सिखावे ज्ञान गुण, शिष्य सुनुध जो होय
लिसै सरधरी भीत पर, चित्र चितेरो कोय
सुबुध बीच पर दुहुन को, हरत कला रस पूर
करत देहरी दीप ज्यों, घर श्रागन तम दूर
बुद्धि विना विद्या कहो, कहा सिसावै कोय
प्रथम गावही नाहिं तो, मीम कहा ते होय
सुबुध अवुध की सेव को, यह मरूप जिय थाप
घलम रोपित कमल ज्यो, बधिर कर्ण व्यो जाप
कहा कर आगम निगम, जो मूरस समझन
दोप न दर्पण को क्छ, अन्य यदन देखन
शास्त्र सुने निपफल सफ्ल, जो नहिं होय विक
स्वाद न जानत पर्छली, धाग्रत पाक अनेक
"
,
-
,
7
( १९८ )
निष्फल है मति मन्द को, यो उपदेश पनि
व्यों अन्धे के सामने, महा मनोहर चित्र
अधिकारी को सौस दे, अनधिकारि को छोड़
यजर हो तो जोतु ले, कल्ड को मत तोड
सीख दीजिये पात्र को, न्याग कुपात्र कुठाम
जन्मत बीज मुग्नेनम, ऊपरमे नहिं जाम
शिक्षा कबहु न दीजिये, यथा योग्य विन राम
लालटेन की रोशनी, अन्धे के किस काम
शिक्षा दिये सुपात्र को, होत बडो उपकार
मुनि प्रेरे-वाल्मीक से, सुख पावत ससार
सजन महिमा
अहित किये ह हित करे, मजन परम सधीर
सोचे ह शीतल करे, जैसे नौर समीर
"उर ही तैं उत्तम प्रकृति, सज्जन परम दयाल
कौन मिसावत है कहो, राजहम को चाल
जे उत्तमते अधम सो, धरत न रिम मन माहिं
धन गरजे हरि हकर, स्यार बोल मुन नाहि
'चडे सहज ही बात से, रीझ देत चकसीस
तुलसीदल से विष्ण ज्यों, पाक धतूरे ईस
सहज रसीले होय सो, पर अहित पर हेत
जैसे पीड़ित कीजिये, तक ईस्व रस देत
।
-
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M
(९)
उत्तम पर कारज कर, अपनो काज बिसार
पूर अन्न जहान को, ता पति भिक्षाधार
सन्त कष्ट सहि पापही, सुसि रासे जु समीप
आप जर तउ और को, करै उजेरो दीप
बुरी करै पैर जे भले, भली कर हित धार
जैसे दधि बाध्यो तऊ, कपि दल दियो उबार
बड़े विपन ह में करे भल बिरानं काम
किय विराट पतिकी विजय, अर्जुन कर सग्राम
बडे बड़ई काम कर, आपु सराहत नाहि
जय जस उत्तरको दियो, पथ विराटक माहिं
जिन पूछे ही कहत हे, सजन हित के चैन
भले बुरेको कहत है, या तमचर गतरेन
विना कहे ह सत पुम्प, परकी पूरे आस
कौन कहत है सूर को, घर घर करत प्रकास्
जो घर आने शत्रु हू, सुमन देत सुग्व चाहि
ज्यो कार्ट तरु मूल कर, छाह करत वह ताहि.
प्रीति छुटे हू सुजनके, मनतं हेत छुटेन
कमरा नालको तोरिये, तथापि सूत टुटेन
सजन के प्रय बचनने, मन सन्ताप मिटाय
जैमे चन्दन नारत, ताप ज्यु तनका जाय
-
( १२० )
निश दिन सटकत तनक तृण, पडे जु आसन माहि
तिनमे सजन रासिये, सो छिन खटकत नाहिं
सुजन वचन दुर्जुन वचन, अन्तर बहुत लसाय
वे सबको नीके लगे, वे काहू न सुहाय
तुला सुईकी तुल्यता, रीति सुजन की दीठि
गरुवे दिशि नै जात हैं; हरुको दै पीठि
जह तह सुजन मिलें नही, गुण गावे जग माहि
ज्योति भरे पानिप भरे, प्रति गज मुक्ता नाहि
बहु धन बीते तनिक धन, सचै सुजन करैन
मनन हानि उपज तहा, कन कन कवह भरैन
शील काम कुल युत चतुर, पुरुष परिक्षा जान
ताडन छेदन कस तपन, इनते कनक पठान
रस पीने विनही रसिक, रस उपजावत मन्त
बिन बरसै मरमें कर, जैसे विटप वसन्त
जहा सुजन तहें प्रीति है, प्रीति तहा सुस ठौर
जहा पुष्प तहॅ यास है, वास जहा तहे भौर
सुजन करत उपकार को, वित माफिक जग माहि
गहरे गहरी छाह तरू, विरले विरली छाहि
सज्जन मो रस पोसिये, यो त्यों यढत हुलास
जेतो मीठो वस्तु मे, तेतो अधिक मिठास
1
।-
,
( १२१ )
विपत पडे हू देत हैं, सत पुरुषन के काम
राज विभीपण को दिया, वैसी विरया राम
सुजन यचावत कष्ट तै, रहैं निरन्तर साथ
नयन सहाई ज्यो पलक, देह सहायक हाथ
सब के सुरम कर होत हैं, सत्पुरुपन के अग
हरि चन्दन सों सुख लहैं, भृग भुजग निहग
यो रहीम गति बडन की, ज्यो तुरङ्क व्यवहार
दाग दिसावत 'आप तन, सही होत असनार
तरुवर फल नहिं सात हैं, मग्वर पियत न नीर
कहि रहीम पर काज हित, सन्तन धरे शरीर
आप करे. उपकार अति, प्रति उपकार न चाह
ह्यिगे कोमल सन्त सम, सुहृद सोइ नर नाह
मन से जग को भत चहे, हिय छल रहे न नेक
सो सजन ससार मे, जाको निमत निक
पशु पक्षी है जान है, अपनी अपनी पीर
तब सुजान जानौ तुम्हे, जय जानैं पर पीर
चटक न छाटत घटत हू, सजन नेह गंभीर
फीको परै न घर घट, रँग्यो चोल रँग चीर
चन्दौ सन्त समानचित, हित अनहितनहिं कोय
अजलि गतशुभसुमनज्यों, सम सुगन्ध कर ढोय
भले भलाई पै 'लहै, लहैं निचाई नीच
सुधा सराही अमरता, गरल सराही मीच
-
जो सहि दुख देइ ( १२२ ) चौपाई साधु चरित शुभ सरिस कपासू, निरस विशद गुण मय फल जासू पर छिद्र दुरावा वन्दनीय जिहि जग यश पावा मगल मय सन्त समाजू, जा जग जगम तीरथ राजू अफय अलौकिक तीरथ राऊ, सद्य फल प्रगट प्रभाऊ चन्दौ असज्जन चरणा, दुख प्रद उमय बीच कछु बरणा विछरत प्राण लेही, मिलत एक दारुण उपजहि एक सग जल माही जलज जौक जिम गुण बिलगाही सुधा सुरा सम साधु असाधू, जनक जग सुधा सुधाकर सुरसरि गरल अनल कलिमल सरि व्याधू गुण अगुण जानत जो जिहि भान नीक तिहि सोई दुस देही जलधि अगाधू साधू, । सब कोई, आई. करत जो ( १२३ ) चौपाई जग-बहु नर मर सरि सम भाई, ज निज वाढ वढहि जल पाई, सजन सुकृत सिधु मम कोई देख विधु वाढहि देन। देशतरु सरस स्वभाऊ, सन्मुस विमुस न साहुहि काऊ उमा मन्त की यहे बडाई, करे भलाई सन्त अमन्तन की अस करनी, जिम कुठार चन्दन आचरनी काटिये मलय परसु सुन भाई, निज गुण देइ मुगध बसाई पर उपकार वचन मन काया, सत सहज म्यभान राया भूरज तरु मम सत कृपाला, पर हित सह नित विपत विशाला हटय सनतत सुसफारी, विश्व निदत जिमि इन्दु तमारी मत सहहिं दुस पर हित लागी, पर हेत ग्रमत प्रमागी
( १२४ )
-
पर
सत विटप सरिता गिरि धरनी,
पर हित हेत इन्हन की करनी
हदय नवनीत
समाना,
कहा
कविन पै कहै न जाना
निज परिताप दह नग्नीता,
दुस द्रवहि सुसत पुनीता
दोहा
हित करियत यहि भातिसो, मिलयत हैं वहि भांति
छीर नीर ते पूछले, हित करवे की बात
मालिनी
दिनकर कमलों को स्वच्छ देता सुहास
शशि कुमुद गणों को रम्य देता विलास
जलद वरस ते हैं भूमिमें अम्बु धाग
सुजन विन कहे ही साधते कार्य मारा
विकल अति क्षुधासे देसके पुत्र प्यारा
जननि हृदय से है छूटती दुग्ध धारा
लस कर कुदशा त्यों दीन दु सो जनोकी
सहज प्रगट होती है दया सज्जनोंकी
लहर रहित होता है पयोधि प्रशान्त
सुहृदय रहते त्यों धीर गम्भीर शान्त
दुख मुस भय चिंता श्रादिसे हो अलिप्त
स्थिर मति रहते हैं साधु ही आत्म तृप
-
( १२५ )
सन नद नदियो का नीर धारा प्रवाही
यह पर मिलता है सिन्धु में सर्वदा ही
तदपि न तजता हे प्रात्म मर्याद मिधू
सु निपुल सुस में भी गर्न लाते न साधू
यदि मर सरिता ग्रीष्म में शुक हो भी
वह उदवि रहेगा पूर्ण ही मित्र तो भी
धन सुग्न प्रभुता का सर्वथा हो अभान
पर सम रहता है सन्जनो का स्वभाव
सपैया
सन्त करै नहि वैर कह सबके हित मे वरते अतिही
ता तन को जब दाहत को वह तापि देत सुग्वामित ही
जैसे कुठार क्टै तर चन्दन गध तिनै भुस दे ग्त ही
हेतु इही सर्वातम हेरत ता पद क्ज नमो नितही
दोहा
तन दाहन छेदन गिमन सहे कनक छवि पाय
यो दुर्जन के वचन सह, सज्जन सन्त कहाय
क्ष्ट दिये पर साधु जन, तऊँ न पर उपकार
चन्दन को फ़कत तऊ, देत
सुगध अपार
सन्त कृपा रवि उदय ते, मिट तिमर अज्ञान
हृदय सरोवर विमल है, कृले हित बुध ज्ञान
,
--
( १२६ )
सजन ख वचनों की रक्षा करते हैं
गर
सज्जन अगीकृत क्यिो, ताको लेहि नियाह
छई कलकी कुटिल शशि, तउ शिव तजत न ताह
यडे भार लै निरवहैं, तजत न सेद विचार
शेप धरा परि धर धरै, अवलों देत न डार
बडे वचन पलटे नही, कहि निरवा, धीर
कियो विभीपन लंक पति, पाय विजय रघुवीर
कहे बचन पलटें नही, जे सत पुरुप सधीर
कहत सब हरिचन्द्र नृप, भरयो नीच घर नीर
वचन तजै नहिं सत पुरुप, तजै प्राण वरु देश
प्राण पुत्र दुहे पर हरे, वचन हेत अवधेश
घनाक्षरी
सूर्य और चॉदहु की ज्योति टर जाय भले,
सज्जन का वैन पन
कयौ टर है।
धन और सम्पति के नाश का न ख्याल लेश,
उपकार हेतसर्व परिहर है ।
सत्य पक्ष पाति निज सत्य ही को सत्य जान,
राम कवि अन्त लगि ताहि अनुसर है ।
सामने है कौन ? और होगा परिणाम कैसा
वोर न विचार कबो ताह पर क्र है ।।
पर
-
है
-
( १२७ )
सोच रूप सागर मे सने रघुराई कहैं,
लक यह ट्रेन को तो लगे कुछ घात है।
कौन या विभीपण यो राग्ने रोक रावण ने,
जीन जाल मछर्ग सौ परयो पछतात हे ।
लक्ष्मण पाबे मै हूँ मरण परण लीनो,
जस राम बुरे न्योत दृवी बुधि जात
जीन को न लालच पचन को विशेप उर,
जीत गये बचन बचै तो बडी बात है।
कुण्डलिया
पुत्र प्राण सब ते बडे, चारो युग परमान
ते गजा दो तजे, वचन न टीने जात
वचन न दीन जान, बडन की यहै वडाई
वचन हे सो काय, और सर्वस किन जाई
कहि गिरधर कविराय, भये नृप दशरय ऐसे
प्राण पुत्र परहरे, वचन परहरे न तैमे
सख प्रशसा
सत्य वचन मुग्न जो कहत, ताको चाह सगह
गाहक आनत दूर तै, सुन इक मढी साह
अरि हू वूमे मत्र को, कहिये माच मुनाय
ज्यो मीपम पाटवन को, दीनो मरम बताय
कहिये जासों जो हित, मली बुरी बजाय
चोर कर चोरी तऊ, साच कहै घर आय
।
"
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( १२८ )
चलिये पैंडे साच के, साई साच सुहाय
साचो जरै न आग तै,झूठो ही जर जाय
आच न लागे साच को, यामें ना कुछ भूल
सोना पावक मे पडे, घटत तोल नहिं मूल
कार्य सिद्ध हो सत्य सों, रहो निकट या दूर
सीधे सरसो धनुर्धर, वेधत लक्ष्य जरूर
का ब्राह्मण का डोम भर, का जैनी कृस्तान
सत्य वात पर जो रहे, सोई जगत महान
न्याय चलत विगरै कष्ट, तौ न करो अफसोस
धार परत जो राज पथ, तौ न देत कोउ दो
सत पथ चलते दुस मिले, तऊ न आनत हान
हरिश्चन्द्र की गाथ को, जानत सफल जहान
सत् सङ्गति महिमा
रहे समीप बडेन के, होत बडो हित मेल
सव ही जानत वढत है वृक्ष वरावर वेल
गरुता लघुता पुरुप की, आश्रय वशते हाय
करी वृन्दमे विंध्य सो, दर्पण मे लघु सोय
एक मलो सबको मलो, देसो सवद विवेक
जैसे सत हरिचन्द्र के, उधरे जीव अनेक
होय शुद्ध मिटि कलुषता, मत सगतिको पाय
जैसे पारमको परस, लोह कनक ह जाय
1
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,
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( १२६ )
उत्तम जनके सगर्म, सहज होत सुस भास
नृपति लगावै इतर जी, लेत समा मय वास
जाके सग अवगुण दुर, करिये तिहि पहिचान
जैसे माने दूध मव, सुरा अहीरी पान
जैसी संगति तैसिये, इज्जत मिलि है श्राय
सिर पर मखमरा सेहरो, पनही मखमल पाय
होत सुसगति सहज सुस, दुस कु मगके थान
गवी और लुहार की, देखो वैठ दुकान
मुधरै विगरि कुसगते, सत मगतिको पाय
वामहि सीकर हीग की, जीरा सग मिटि जाय
उत्तम जन सो मिलत ही, अनगुण ह गुण होय
घन मग सारो उनधि मिल, बरसै मीठो तोय
दुसदाई सोई देत मुग्य, सुसदाई सँग जात
घट जल भीजे चीर को, लागि ल्य सियरात
सदा सुथान प्रधान है, वल न प्रधान घतान
नाग डरावत गरुर को, हर उर हार प्रभार
नीचहु उत्तम सग मिलि, उत्तमही ह जाय
गग सग जल हालू, गगोदक के भाय
बुरो त लागत भलो, मतो ठौर पर लोन
तिय नयना नीको लगे, गाजर अनपि मलीन
।
चढे रज पवन होय जलद तजै सहज ( १३० ) चौपाई सठ सुधरहिं सत. सगति पाई, पारस परम कुधातु सुहाई। गगन प्रसगा, कीचइ मिलाइ नीच जल सगा । सोइ जल अनल अनिल सघाता, जग जीवन दाता । धूमऊ करनाई, अगर प्रसग सुगध बसाई। सोइ भरोस मोर मन आवा, किहि न सु सग वडापन पाना। कर्म नाश जल सुर सरि परई, तिहि को कहो मीस नहिं धरई । उलदा नाम जपत जग जाना, बालमीक भय समाना। विन सत सग विवेक न होई, राम कृपा विन सुलभ न सोई । निधि वश मुजन कुसगति पर ही, फरिणमणि सम निजि गुण अनुसरही। मणि माणिक मुक्ता छपि जैसी, अहि गिरि गज शिर सोह न तैसी। ब्रह्म
( १३१ )
नृप
किरीट तरुणी तनु पाई,
लहहि सुयश शोभा अधिकाई ।
दोहा
ग्रह भेषज जल पवन पटु, पाय कुयोग सुयोग
होहिं कु वस्तु सुवस्तु जग, लसहि सु लक्षण तोग
हरिगीत
मगल करनि तिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथकी
गति पूर कविता मरितकी ज्यो परम पावन पाय की
प्रभु सुयश मगति भरिणत भति होयहि सुजन मनभाननी
मन भूति अग मशानकी सुमिरत मुहारन पारनी
घनानरी
मलय की स गति मे चन्दन ह जात यन,
पारस लगे में लोह मीना होय जात है
नल के सहारे नीर चढत अकास पर,
फल मग पात एक भान में निकात है।
महा गुणगान नारायण की मुस गति से,
मन्द मति राम कपि सुकवि कहात है।
स गति सुधार देत दुष्ट यो कुरुम्मियों को,
स गति ही फुटी तकदीर को बनात
,
.
( १३४ )
अन्धेर
1
पडे हैं बन्धन में गजराज, मुक्त फिरता है सान समाज
कुढगा है कोकिल का साज, धरां कूकर के सिर पर ताज
इसे हम कहे दिनो का फेर, या कहें दुनिया का अन्धे
कूप का निर्मल शीतल नीर, महा सारी है उदधि गैंभीर
ईश के भक्त अशक्त अधीर, दुष्ट राक्षस होते हैं वीर
घरो में अजा बनों मे शेर
देखिये दुनिया का अन्धेर
नहीं घटतो तारो की आब, नही थिर माहताब की ताब
कुशलसे किंशुक सिने जनाब,कठिन काटोमे सिंचे गुलाब
रन क्म पत्थर के है ढेर.
देखिये है कैसा अन्धेर -
पर्वतोम
सोनेकी सान,
राज पूताना रेगिस्तान
शख का सूखा सम्मान, किया सीपी को मुक्ता दान
विधाताकी' सुवुद्विका फेर,
हो रहा है विचित्र अन्धेर
कहा वह कमतकहा वह कोच, न समझा उच्च न समझानीच
-लगाया है कलक शशि बीच, ले गया वह मनोनता सोच
इम अन्धरकी रोशन व्याख्या देखिये “पद्य-परीक्षा" पृष्ट-५७
मिलनेकापता-तान प्रिटिङ्ग वर्क्स चाह रहट देहली
---
है
ऐसे मक
६
दिया है गरल सुधा में गेर
विधाता यह कैसा अन्धेर
महा गुण कारी कडवी नीम, बताते डाक्टर वेद्य हकीम
भरे मीठेमे दोष असीम, विके दो गिन्नी सेर अफीम
और गुड दोही आने सेर
“कौन यह कहे नही अन्धर
महाज्ञानी थे अष्टावक्र, और पर-सन्तापी है शक
चलाता है निधि ऐसा चक्र, किया करता
लगे..अन्धे के हाथ बटेर
लोग चकित देख अन्धेर
सपाया किये जान मजदूर, पेट भरना पर उनका दूर
उडाते माल धनिक भर पर, मलाई लट्ट 'मोती चूर
सुधरनेमें है जग के घर
अमी है बहुत घडा अन्धेर
अन्न दाता हैं धीर किसान, मिपाही दिसलाते हैं शान
डराते उन्हें तमाचा तान, तुम्हें क्या सूझी हे भगवान
श्रावले सट्टे मोठे वेर
किया है क्यो ऐमा अन्धर .
फिलीपाइनके हिंसफ लोग, जिन्हें था कल तक पशुता रोग
भोगते हैं स्वराज्य सुख मोग, पड़ा आकर ऐमा सयोग
वश सोय ( १३६ ) रहा है भारत पर मुस हेर वडा अन्धेर बडा अन्धेर- सबल में तेज होता है सवल न पुष्ट शरीर को, सबल तेज युत होय हृष्ट पुष्ट गज दुष्ट ज्यों, अकुस के विना तेजके पुरुष की, अवश अवज्ञा होय ागि बुझै ज्यों रास की आन छुवे सब कोय मंत्र परम लघु जासु वश, विधि हरि हर सुरं सर्व महा मत्त गजराज कहूँ, वश करि अकुश सर्व "चौपाई। क कुमज यह सिंतु अपारा, सोख्यो सुयश सकल ससार रवि मण्डल देसत लघु लागा,उदय तासु त्रिभुवन तम मागा सवल से बैर करना बुरा है कैसे निबहै नियल जन, कर सरलन को गैर जैसे यसि सागर विपे, करत मगर सों पैर सबै सहायक सवल के, निबल न कोउ सहाय पवन जगावत आगको, दीपहि देत बुझाय कछु बसाय नहिं सबल सो, कर निवल पै जोर चले न अचल उग्मार तक, डारत पवन झकोर एक बुरा सबको बुरो, होत सबल के कोप आँगुन अर्जुन के भयो मब क्षत्रिन को लोप
-
( १३७ )
हरत व ह नियल अरि, दुर्वल ही के प्रान
याप सिंह को छोड़ के, देत छाग यति दान
छोड सबत को निनरा की, कबहु न गहिये प्रोट
जैसे टटी डारमा, तग रिलर चोट
तिन के कागज होत हैं, जिनके बडे सहाय
कृष्ण पच्छ पाडव नयी, कौरव गये रिलाय
साधका निवलको निनत पुगतन पाठ
डार जार निहाय दे, अनित अनल जल काठ
जोर न पडुचे निपल को, जो पै मरल सहाय
भोडर की फानूस को, दीप न वान बुझाय
नियल मनरा के पक्ष ते, सबननमा अनसान
हनत हिमायन की गती, ऐराकी से लात
प्रीति विरोध समान सन, करिय नीति अम आह
जो मृगपति वध मंडकहि मलो कहत को ताह
सत्रलपक्षसे निवन जन,
से
अहि हर उर वसि अमय मन,गरुड दिसा पास
कुण्डलिया
साई वैर न कीजिये, गुरु पण्डिप कवि यार
बेटा वनिता पँवरिया, यज्ञ कारावन हार
यज्ञ करावन हार, राज मत्री जो होई
विप्र परोसी वैद्य, श्राप को तपैः रसोई
मबल शत्रु
मारस
।
U
"
.
( १४० )
प्राण तृपातुर के रहें, थोरे हू जल पान
पीछे जल भर सहस घट, डारे मिलत न प्रान
समय समझ के कीजिये, काज चहै अभिराम
सैंधव मागयो जीमते, घोडा को किहि काम
देवो अवसर को भलो, जामो सुधरै काम
खेती सूसे वरसिवो, घन को कौने काम
बनती देख बनाइये, परन न दीजे सोट
जैसी चले बयार तब, तैसी दीजे ओट
सुसदाई पै देत दुस, सो सब दिन को फेर
शशि शीतल सयोग मे, तपत विरह की बेर
विधि के विरचे सुजन हु, दुरजन मम व जान
दीपहि गये पवन ते, अचल वहै बुझात
विष ह ने सरसी लगै, रम मे रिस की भास
जैमी पित्त ज्वरीन की, कडवी लागत दास
कह अवगुण सो होत गुण, कहुँ गुण अवगुण होत
कुच कठोर त्यो हैं मले, कोमल बुरे उदोत
जैसी हो भवितव्यता, तैसी चुद्धि प्रकाश
सीता हरिने,ते भयो, रावण कुल को नाश
निह, भावीको कहै, प्रती कार जो होय
तो नल से हरिचन्द्र से, विपति न भरते कोय
,
( १४१')
कष्ट सहाय न चल सके, होनहार के पास
भीष्म युधिष्टर से भयो, कौरव कुल का नाश
कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर
समय पाय तरुवर फरै, केतिक सींचो नीर
होत सिद्व जैसे समय, तैसी ही अविलास
कौडी विन जात न लियो, करी तियो दे लास
न कछु तऊ माकी तलव, ताही की मनुहारि
तिलक समय नृप लेत हैं, तृण हू हाथ पसारि
गुणी तऊ अवसर विना, आदर करे न कोय
हियते हार उत्तारिये, शयन समय जब होय
कारज ताही को सरे, फर जो समय निहारि
. कबहुँ न हारे सेल में, सेले दाव विचारि
'जो हाजिर अवमान पर, सोई शस्त्र प्रमान
दामहि ते वलदेव ज्यों, के
अवसर वीते यन्त्र को, परिवो नहिं अमिराम
जैसे पानी वह गयो, सेतुवन्धु कहि काम
आप आदर ना करे, पीछेलत मनाय
घर आप पूजे न अहि बाबी पूजन जाय
अपने अपने समय पर सबको आदर होय
भोजन पारो भृय में, तिस मे प्यागे तोय
हरे सूत
प्रान
।
1
-
( १४२ )
"यारी अन प्यारी लगे, समय पाय सव यात
धूप सुहावे शीत में, सो प्रीपम न सुहात
वय ममान रुचि होत है, रुचि समान मन मोद
बालक खेल सुहाव ही, योवन विष विनोद
सुनत श्रवण पिय के वचन, हिय विकसै हित आगि
ज्यो कदम्ब वर्पा समय, फलत बूढन लागि
निरस बात सोई सरसः जहा होय हिय हेत
गारी ह प्यारी लगै, ज्यों ज्यों समधिन देत
अरुण सिरोरुह कर चरण, हग सजन मुस चन्द
समय आय सुन्दरि शरद, काहिन करत अनन्द
समय समय सुन्दर-सबे, रूप कुरूप न कोय |
-मन की रुचि जेती.जिते, तितै तिती रुचि होय
चौपाई
तृषित वारि विन-जो तनु त्यागा, मुये करेका सुधा तडागा
का यर्पा जब कृपी सुखानी, समय चूक पुनि का पछतानी
कुण्डलिया।
माई समय न चूकिये, यथा शक्ति सन्मान
को जाने को आइ है, तेरे पौरि प्रमान
तेरे पौरि प्रमान, समय असमय तक आवे
ताको तू मन गोल, अक भर हृदय लगावै
F
.
॥
-
( १४३ )
कहि गिरधर कविराय, सये प्रामें मधि आइ
शीतल जल फल फूल, समय जिन चूको साई
यीती ताहि निसार दे, आगे फी सुधि लेइ
जो यनिआने सहज मे, ताही में चित देइ
ताही मे चित देइ, यात जोई वन आने
दुर्जद हँसे न कोय : चित्त मे सता न साने
कहि गिरधर कविराय, यहै कर मन परतीती
आगे को सुप समझ होड बीती सो बीती
राजा के दरबार में, जैये समया पाय
साई तहा न येठिये, जहँ कोउदेइ ,
जहँ कोउ देइ उठाइ, वोल अन वाले रहिये
हैंमिये नही हहाय, बात पूछे ते कहिये
कहि गिरधर कविराय, ममय मे कोजे काजा
अति आतुर नहिं होय, बहुर अनहे राजा
छप्पय
समय मंघ वरसत समय सिर होय सबै फ्ल
तरणाई हो समय, समय ही जान देह बल
समय सुजन हू मिले, समय पण्डित ह चूकै
समय प्रीति चित घटै, समय सरसर हू सूके
कोऊद्वारजु थासमयसिर, समय पाय गिरिवरहि गिर
गोनिद अटल कनिनन्द कहि जो कीजै सो समय सिर
उठाय
-
१
( १४४ )
चौपाई
सकुचे तात कहत इक याता, अधं तजहि बुध सर्वस जाता
सहाय प्रशंसा
अयल हु के अवलम्ब त, पूर्ण होत है प्राश
पाय सहारा सत का, मोम हु करत प्रकाश
सहोदर भ्राताओंका स्वभावभी भिन्न होताहे
एक उदर, वाही समय, उपजत इक से होय
जैसे काटे घेर के, वाके सीधे दोय
यदपि महोदर होय तउ, प्रकृति और की ओर
विप मारे ज्यावै सुघा, उपजै एकहि ठौर
मारे इक रक्षा करे, एकहि कुल के दोय
ज्यों कृपाण अरु कवच ये, एक लोह के होय
होय भले का सुत बुरो, भलो बुरे को होय
दीपक ते काजल प्रगट, कमल कीच ने सोय
चौपाई
उपजहि मग जल माही,
जलज जोक जिमि गुण बिलगाहीं।
सुधा सुरा सम साधु अमाधू,
जनक एक जग जलधि अगाधू ।
एक
(१४५)
घनाक्षरी
एक बीज एक मूल एक डार एक स्थान,
एक सान पान फूल' शूल के लसानिय ।
एक सुसदाई अरि मीत को विनेक तज,
तन मन 'ताको परमार्थ होत जानिये।
कठिन कठोर एक महाँ दुस दायक है,
अग चुभ दुसरो के पीड अधिकानिये।
राम कवि अपने सुकर्म ते वडाई होत,
कुली बडाई कहो' कैसे कर मानिये।
सर्व"मान्य सिद्धान्त
मागत गौरव नाश हो, प्रसवत यौवन तोप
रहत न पिनय प्रणाम लसि,मत पुरसनका कोप
सम सतोप न और सुस, तप नहि क्षमा समान
ब्रह्म ज्ञान सम ज्ञान नहि, धर्म न न्या समान
सामर्थ्य-सीमा
अपनी पहुच विचार के, परतय करिये दौर
ततो पार पसारिये, जेती तानी सॉर
अन मिलती जोई करत, ताहीको उपहास
जैसे योगी योगम, करत मोगकी आस
पैन नीच यह याम
घन मेटत पना सरित, गिरिवर प्रीप्म ताप
बड़े बडनके दुस हरत,
,
।
(३४६)
होय बडेरु न हूजिये, कठिन मलिन मुस रग
मर्दन बधन छत सहत, कुच इन गुनन प्रसग
कोऊ विन देसे सुने, कैसे कहे विचार
कूप-भेक जाने कहा, सागरको विस्तार ,
जा समझ जा यातको, सो तिहि कहे विचार
रोग न जाने ज्योतिपी, वैद्य ग्रहनको चार
जो लायक जा यातको, तासों तसी होय
सजन सो न बुरी करें, दुर्जन मली न कोय
बड़े बडनके जात हैं, बड़े हरै दुख दन्द
कुह भवन मे जाय कै, चन्द भये जग वन्द ।
प्रापति तैसी होत सो, जिहि जैसा लामाय
भाजन मित सर सरित ते, जल भरि भरि लैजाय
उत्तम जनको होड़ कर, नीच न होत ग्साल
कौवा कैसे चल सके, राज इसकी चाल
क्यो कीजै ऐसो यतन, जाते काज न होय
पर्वत पै सोटे कुँवा, कैसे निकसै तोय
है है बड़े बड़ेन सों, होय न छोटे काज
गहै विटप जुफतीन को, गहिं न सके गजराज
होय पहुँच जाकी जिती, तेतो करत प्रकाश
ररि सम कैसे कर सके, दीपक तम को नाश
विपति वडेई सहि मकै, इतर विपति से दूर
तारे न्यारे रहत हैं, गहै राहु शशि सूर,
(१४७)
+
पन अपनो
जाय दरिद करि जनन को, सये गज समाज
मिह तृपित जय हात है, हाथ चढे गज राज
वीर परामम ना करे, नासो डरत न काय
पालक हका चित्र को, बाघ सिलोना होय
वीर पगरम ते करें, भूमण्डल को राज
जोरावर यातें करत, वन अपनो मृगराज
नियह सोई कीजिये, अनुमान
कैमे होत गरीय पै, राजा को सो दान
जो धनमन्त मो देत कछु, देय कहा धन हीन
कहा
निचोरे नम जन, न्हान सरोवर कीन
छोटे मन में आय है, कैसे मोटी बात
छेरी के मुह में दियो, ज्यों पेठा न समात
मान धनी नर नीच पं, याचे नाही जाय
कबहुँ न मागे स्यार पै, वरु भूको मृगराय
छोटे नर सो घडन को, कवह बुरी न होय
फूस आग नहिं कर सकत, तपत उदधिको तोय
जिहि जेतो अनुमान तिहि, तेतो रिजक मिलाय
कन कोडी कर टुकर, मन मर हाथी साय
यथा शक्ति ही देसके, ओं कछु जाफ पास
ब्राह्मण क्न चार दिया, श्री पति धन श्रावास
निर्धन ते कय होत है, धनवानन की रीस
कह कागज के फूल को, कौन चढावत साम
उचन के कर्त्तव्य को, करत न नीच गुलाम
पग-उगली कब करत है, गठ खोलन को काम
कैसे छोटे नरन ते, सरत बडन के काम
मढो दमामो जात है, कहिं चूहेके चाम
चले जाहु या को करत, हाथिन को व्योपार
नहिं जानत इहि पुर बसै, धोबी और कुम्हार
'सावधान रहो
जीवन रक्षा के लिये, मन को रख हुशयार
चोर चुरावत तब न जब, जागत चौकीदार
नीचे बन कर रहत हैं, पहुचे साधु उदार
ज्यों मजिल पर जाय कर, प्यादा बने सवार
जो रहीम मन हाथ है, मनसा कहु किन जाहि
जल में जो छाया परी, काया भीजति नाहि
रह कह गुण ते अधिक, उपजत कष्ट शरीर
मधुरी यानी बोल के, पडत पोज़रे कीर
सीधी चाल .
रहिमन सीधी चाल सो, प्यादा हात वजीर .
फरजी मीर न हो सके, टेटे की तासीर
सुखकर
एक विरानोई भलो, जिहि सुस होत मरीर
जैसे बन की औषधी, हरत रोग की पौर
r
1
।
(१४९)
-
-
सेयो छोटो ही भतो, जासी गरज सराय
कीजै कहा पयोधि को, जासी प्यास न जाय
बड़ी बडाई नीच की, दीजै अपने काम
सर ह को चोलत पथिक, कहत निनायक नाम
प्यासे दुपहर जेठ के, थके सय जल सोधि
मरु धर पाय मतीर हू, मारू कहत पयोधि
विषम विपादित की तृपा, जिये मतीरन सोधि
अमित अपार अगाध जला,
मारो
मूड
पयाधि
अति अगाध अति ज्थरो, नदी कूप सर वाय
सो, ताको सागर जहा, जाकी प्यास बुझाय
सुजन दुर्जन स्वभाव अन्तर
इक समीप वसि अहित कर, इक हित कर वसि दर
हस विनाश कमत दल, अमल प्रकाश सर
शिव सम्पति फल करत है, मुहट जनन के हेत
दूरहि सूरज उदित ज्यों,
कमलन को सुख
काज निगारत और को, इक निज काज सुधारि
कियो मनिन मिल राज नृप, सुरयहि नियों निकारि
काज विगारत आपनो एक और के काज
वलिहि निवारत नैन की, हानि मही ऋविराज
परधन लेत दिनाय इक, इस धन देत हमत
शिशिर परत पत मार तरु, गहिरे परत अमन
(५०)
.
सुपुत्र प्रशंसा
गाहक सन सपूत के, सारै काज सपूत
सय को ढम्पन होत है, जैसे बन को सुत
आप कष्ट महि और से, सोभा करत सपूत
'चरखी, पोजन,'चरसिवा, जग दम्पन यो सूत
यहुत भये किहिं काम के, भारनिगाहक एक
शेप धरै धर सीस पर, मेंडक भसी अनेक
एकहि भले सुपुत्र तें, सब कुल भलो कहात
सरस सुवासित विरच ते, ज्यो वन सफल बसात
पिता मक्त सुत होय तो, पितु को चलत सुमाय'
राम राज सब छोड़ के, धन वासी भये जाय
श्रवण करीयों कीजिये, मात पिता की सेव
काधे कावर लै फिरयो, पूज्यो जैमें देन
सुत सपूत की कीर्ति लसि पिता अधिक सुख पाय
ज्यो राकाशशि छवि लसत,
उदधि हपर्याय
इक सपूत जन्म्यो मलो, बहु कपूत नहि 'राम'
इक शशि निश तम हग्तु है,नसत समूह निकाम
यपि होत पितु मात को, मब सुत पर सम नेह ।
लसि सपूत ठण्डक लहै, जरै कुसुत लसि देह
कुलहि प्रकाशै एक सुत, नहि अनेक सुत निन्द
चन्द एक निश तम हरै नहि उडगन के
वृन्द
बढत
-
(१५.)
-
।
उसका
चन्दन चन्द उशोर हिमोपल,
हिम रजनी भी और कपूर
ये सय मिल कर भी न करेंगे,
मानव हृदय ताप को दूर
पर मपूत जिस कुल में होगा,
समय आपही आप
पलट जायगा यश फैलेगा,
मिट जायेगा सय सन्ताप
विमल चित्त हो दानशील हो,
मूर चीर हो सरल विचार
वचन हो प्रेम युक्त हो,
परे सभी से सम व्यवहार
ज्ञानी सहृदय हो उपकारी,
और गुणी हो अपना धर्म
कभी न छोडे, देश भक्त हो,
ये सर सत्पुनो के कर्म
दोहा
कुल सपूत जान्यो पर, तसि शुभ लक्षण गात
होनहार बिरवान के, होत चौकने पात
बचपन ही में करत है, चतुराई की बात
होनहार बिरवान के होत चीकन पात
सत्य
.
.
.
माने काच गँवार तर, पार्च काच नहि होय
भेष बनावै सूर को, कायर सूर न होय
गाल उढाये सिंह की, स्यार मिह नहि होय
कैसे ह छुटती नहीं, जा मे पड़ी कुय न
काग न कोकिल हो सके, जो विधि सिखवै पान
देवन हो से देय प्रमु, कहा सुरेश नरेश
कीनी मीत धनेश तर, पहरै चरम महेश
मले यचन मुसानीच के, नाहिन होत प्रकाश
हींग लसुन में ना मिले, घन कस्तूरी बास
नीच कुसगति के मिले, करत नीच मो प्यार
सर को गग न्हवाइये, तऊ न छोड़त छार
सजनता न मिले क्थेि, जतन किये दिन कोय
ज्यों कर फाड़ निहारिये, लोचन बडो न होय
एकत ह रह, सुजन सल, तजत न अपनो अग
मणि विष-हर, विष-कर सरप, सदा रहत इक सग
भली चुरी जो आदर, कौन सकै निग्वारि
शीव विमल पावर पग्न,चलत नीच गति व्यारि
'करै न कवह साहसी, दीन हीन सो काज
भूख सहै पर घास को, नही मसै मृगराज
सहज 'शील गुण सुजैन के, मन व होत न भग
रतनदीप की ज्या शिया, बुझत न यात प्रमग
4
-
.
.
"
(१५)
नाहि करत उपफार , काज सिद्धि बलवान
मुनि रन बसियो सग मृग,किय अगम्त दधि पान
कहा भयो जो नौच को, देत बडाई कोय
कहत विनायक नाम प, सर न विनायक होय
दुष्ट न छोडत दुष्टता, बडी ठौर हू पाय
जैसे तजत न झ्यामता, विप शिव-कठ बसाय
सल सजन सूचीन के, भाग दुइ सम माय
निगुन प्रकाश छिद्र को, सगुन सु ढापत जाय
दुर्जन गहत न सुजनता, जतन करो किन कोय
जो पंजौ को रोपिये, कवह शालि न होय
दान मान सन्मान यश, अपनी अपनी पान
छोटे छोटी गति कहो, मोटे मोटी मान
लास दुष्ट घेरे रहे, साधु न हो मति हीन
होत न अहि ससर्ग ते, चन्दन में विष लीन
जा रहीम उत्तम प्रकृति, क्या कर सक्त कुसग
चन्दन विप व्यापत नही, लिपटे रहत भुजग
रहिमन लास मली करो, अगुनी अगुन न जाय
राग सुनत पय पियत ह, साप सहज घर पाय
काट यत्न कोऊ करो, पर न प्रकृति हि योच
नल पल जल ऊचो चडे, अन्त नीच का नीच
ओछे यटे न हो सके, तगि सतरोहे यन
-
-
।
दोरघ होहिं न नेकहू, फार निहारे नैन
गुनो गुनी स्व कोउ कहत, निगुनी गुनी न होत
सुन्यो कहू तरु अके ते, अर्क समान'उदोत
कुण्डलिया
सवै हँसत कर तार दे, नागरता के नाव
गयो गर्व गुन को सबै, यसे गँवारन गाव
वसे गँवारन गाव, गुन न गौरव को पायो
जो कुछ यश तिहि सँचो, सोइ तहे आय गेंवायो
भूठो लागन लग्यो, मले काजन हू कल्मस
सुकवि गुनन गति सुनत,गँवारे गाहक सबै हँस
सोरठा
फले फले न येत, यदपि सुधा- वहिं जलद
मूरय हृदय न चेत, जो गुरु मिले विरचि सम
दोहा
वरु
विविध विधि, अशन अमित पय पाग
लागहि माग न काग के, त्याग न आपन राग
दुष्ट न छाडे दुष्टता, सजन तजे न हेत
काजर तजे ने श्यामता, 'मोती तजेन श्वेत
भावरि अन माँवरि मरो, करो कोटि बकवाद
अपनी अपनी माँति को, छुटे न महज मवाद
संगति सुमति न पावही, पडे कुमति के धध
रासो मेत कपूर मे, हींग न होय सुगध
r
मान करो
(१५७)
,
होय मले चाकरन ते, भलो धनी को काम
व्यो अगढ हनुमान ते, सीता पाई राम
जाही ते कछु पाइये, करिये ताकी आस
रीते सरवर पर गये, कैम बुमत पियास
तिनसो विमुग्मन हजिय, जो उपकार समेत
मोर ताल जल पान करि, जैसे पीठ न देत
जो कीजै हित याग जनि, निज नेही की आर
सर जल पीनत मोर तर, जात न आनन मोर
रहिमन दानि दरिद्र हो, तर याचरे जोग
ज्यो सरितन सूसे परे, कुँवाँ खनावत लोग
ताही को करिये जतन, रहिये जिहि आधार
को काटै वा डार को, धैठ जाही टार
मत्री गुर अरु वंद्य जो, प्रिय वोले भय पाश
राज धर्म तन तीन कर, होय वेग ही नाश
जैसो थानक सेइये, तैसा पूरे काम
सिह गुफा मुक्ता मिले, स्यार खुरी खुर चाम
]
करें कृपा अस 'रामकवि
गिरा, गजानन' दोय
हिंदी की हितकारिणी
"हिंदि-सुभाषित" होय
इत्याम्
(३५६)
करिना की कल, काफियोंका कोश, तुकान्तका राजाना
पत्र-पथ-प्रदर्शक :
नारायणपमाद बतार" प्रणात
,
-
प्रास-पुंज
.
4
याद श्रापको समाचारपत्रोम अपनी कविता छपवानेका,
उन्मयों पर नज्म पटनेका, उद तरहपर गजल लिबनेका, हिन्दी
समस्या पतिका, नाटक लिसनेसा शौक है, तो "मास-पुज" अवय
भषिय । रोशा दिमाग गाइरो और प्रकाश-प्रिय कमियोको इस
चौमुग चिरागसे चार लाभ होंगे।
-प्राम, कापिया, तुक, तुगान्त क्या वस्नु है । वैसे यनता है?
शुद्ध अशुद्ध की पहचान क्या है ? उदुका तरीका, हिन्दीको रीनि स्या
है। इन प्रभोका सरल उत्तर मिलेगा।
• हजार । ई००० से अधिक काफियाका को इस तरह
दिया है कि जो प्राम चाहिये पौरन मिल सके।
3-गम्दका लिङ्ग अर्थात मुनदर मुयन्नमाधान गन्दये सायही
मारनम हो जाता है।
५-पिङ्गला प्रसिद्ध प्रसिद्ध ५. अधिा प्रदान नियम,
म्वरप और उदाहरण महित लिये है।
पकी, सन्दर जिलन सहित मूल्य डाक व्यय ।।
मिदनका पता
येताय विटिग चर्म,
चाह रहट दोहली
(६०) * सतसई संजीवन भाष्य . सुप्रसिद्ध साहित्य-मर्मज्ञ विवेचक-कला-निधि श्री प० पद्म- मिह जी शर्मा रचित विहारी सतसईकी भूमिकाने हिन्दी- ससाग्में युगान्तर उपस्थित कर दिया है। सच पूछिये तो महाकवि विहारीकी अनूठी लोकोत्तरानन्दवायिनी और हृदय हारिणी कविताके सम्बन्धमें सहृदय-समाजकी उत्तरोत्तर रुचि बढाना साहित्याचार्य प० पद्मसिंह शर्मा के कलमका ही करिशमा है। 'विहारी-सतसई की भूमिका दसकर मूल पुस्तकका भाष्य पढने के लिये पाठकोके हृदय-सागरम किस प्रकार लालसाको लहर उठती रहती है इसे उनका दिल ही जानता है। हर्पकी बात है कि काव्यामृत पिपासुओकी परि- तृप्तिके लिये प० पद्मसिंह शर्मा कृन “सतसई सजीवनभाष्य" का प्रथम भाग शीघ्रही प्रकाशित होने वाला है। इसमें सत- सईके १२५ दोहोंका जिस पाण्डित्यसे भाप्य किया गया है वह एक बार पढनेसे ही विदित होगा । कविवर विहारीलालने सतमई, के जरामे दोहेम कैसी करामात भरी है इमका ठीक ठीक ज्ञान इस भाष्यका प्रध्ययन करने ही में हो सकेगा। मागरको गागरमें भर कर कविवर विहारीलालने तो कमाल क्यिा ही है परन्तु इस कमालया जमाल दिग्वानेमे शर्माजीने . ( १६१ ) .. भी अपनी प्रशस्त प्रतिमा शक्तिका पूरा परिचय दिया है हम इस भाप्यको विशेष प्रशसा न करते हुए पाठकोमे उम पढ़नेरा अनुरोध करते हैं। इस बार मतसईको भूमिका (जो पहिले प्रकाशित E चुकी है ) और भाष्य दोनो एक जिल्लम एकनित कर दि गये हैं, परन्तु जिन माहकोंफे पाम तुलनात्मक भूमिका मौज है उनको केरल भाष्य भी दिया जा सकेगा। पुस्तककी छपई, समाई, कागज और जिन्ट मय उत्तम है मिलनेका पता ताय प्रिंटिंग वर्स, चाह रहट नेहली। नारायण शतक नीतिक नवीन १०० दोहे कार्ड साइज ६४ पृष्ठ। आधे दोहे म नीतिका पदेश, आधेम उस- रचना रची सरस या फीकी निज मुप नाहिं प्रशसा नीकी के टिकट भेजनेसे मिलेगा। का प्रान्त है। मिलनेका पता जाह-रहट दिल्ली साय प्रिंटिंग वर्क्स
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विवेचक-कलानिधि
श्री प० पद्यसिंह जी शम्मांक
लेखोंका संग्रह
पुस्तकाकार छप रहा है। इसमें उन सब महन्य-पूर्ण
शिक्षाप्रद और मनोरक्षा लेपोका समावेश है जो
समय २ पर परोपकारी, भारतोदय, भारत-मित्र, प्रतिभा
मौरभ, श्री शारदा आदि पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते
रहे हैं। जिन्हे पुस्तकाकार देखने को सहृदय समाज
बहुत दिनोंसे समुत्सुक था। कई ऐसे लेप भी इस सग्रह में
सम्मिलित कर दिये गये हैं जो आज तक कहीं प्रकाशित
नही हुए । इसमे अनेक अनूठी समालोचना भी है,
जो "सतसई संहार" से कम रोचक नहीं है।
"सतसई संहार" शोर सुप्रसिद्ध समालोचना भी
इससंग्रह में समावेशित करदी गयी है।
सबसे पूर्व समालोचनामक लेखों का संग्रह प्रकाशित
किया जा रहा है । इसके बाद शीवही अन्य पुकारके लेर
छापे जायगे। छपाई, सफाई और कागजकी उत्तमता
ओर पूरा ध्यान दिया जा रहा है। प पद्मसिह जी शानि
लेपोंकी लोकप्रियता से आणा की जाती है कि यह संग्रह
प्रेस से निकलते ही घडा घड विकने लगेगा। सम्भव है
देरसे मंगाने वालों को दूसरे संस्करणकी 'प्रतीक्षा करनी
पंडे इस लिए ग्राहक महाशयों को अभी से अपने नाम
रजिटर में लिपवाने चाहिये। जो सजन पहिले ही अपने
नाम ग्राहक सूची में लिखावेंगे धो डाक व्ययसे मुक्त कर
दिये जाएंगे
पता-येताय प्रिाटग बस
चाहरहट देहली
।
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IF (TET)
पद्य-परीक्षा
लेसर-नारायणप्रसाद वितान
-
भारतरे मशहर मशहर कवियोंकी करिताओपर पिङ्गल
शास्त्रानुसार वेलाग समालोचना करके गुण दोष लिये हैं
थयोध्यामिहजी उपाध्याय, रामचरितजी उपाध्याय, श्रीधर
पाठक मैथिलीशरणगुप्त, नाथूराम शंकर शर्मा, महावीरप्र.
सादजी द्विवेदी, मिश्ररन्धु, लाला भगवानदीन दीन, त्रिशल,
प० रूपनारायण पाण्डेय इत्यादि कवियोंने जिन जिन छन्दों
का व्यवहार किया है, उन हिन्दी छन्दोंके नियम, उद
बहरोंने कायदे भी समालोचनाके साथ लिये गये हैं
यह अपने ढङ्गकी निगली पुस्तक छपनर बिलकुल
तइयार है। मूल्य जिन्द सहित )
मिलनसा पना
बेताब प्रिण्टिङ्गवस
1
चाह रहट देहली
। उर्दू सुभाषित। आजकल हिन्दी कविता और लेपों में उर्दू शेरों के उद्धरण का रिवाज उत्तरोत्तर बढ़ रहा है, पढने वाले भी उर्दू की चाट का पूब मजा लेते हैं। ऐसी रचि रखनेवालों के लिये ही यह मसाला तइयार किया गया है। जिस नरद "सुभापित रतभाण्डागारम्" में प्रत्येक विषयके श्लोक मिल जाते हैं, जिस प्रकार इस हिन्दी सुभापित' में हिन्दी के पद्य हर एक विषय पर मिलजाते हैं, इसी तरह 'उर्दू-सुभापित' मे भी हर मजमून के अशआर आवश्यक- नानुसार मिलेगे। स्वतंत्र पुस्तक लिखने वाले, अनुवाद करने वाले, नाटक कार, उपन्यास लेखक, व्याख्यान दाता उपदेशक, कथा वाचने वाले, समाचार पत्रों के सम्माद- दाता इस पुस्तक से बहुत लाभ उठा सकते हैं। वाणी तथा रेख में इस सक्ति संग्रह के एक दो पद्य डाल दीजिये, मुँका मजा बदल जायगा और सब स्वादिष्ट होजायगा। उर्दू कवियों के चुने हुए उर्दू शेर तो है ही, परन्तु -विषयशीर्षक" और लिपि हिन्दी है। भाषा ज्योंकी त्यों उर्दू है, हा कठिन शेरो का हिन्दी अनुवाद साथ दे दिया। मिलनेका पता- येताय प्रिंटिङ्ग वर्क्स . चाह रहट देहली
--
पिंगल
सार
यदि पृष्ठ कम है कि बुरे तो ग्लास कुछ भी न गोलिये
मेगं गृदडी का न दसिय मगर इसमें लाल टटोलिय ।
प्रियवर । यह कोई पुस्तक नहीं है किन्त पुस्तका-
कार एक पाठावलीके पर एकत्रित किये हुए हैं। १९२०
ई० में हम एक मासिक पिङ्गल पाठावली निकालते थे,
जिसका मृत्य केवल आशीर्वाद था, यहा तक कि छपाई
और डाक व्ययार्थ तक भी कुछ नहीं लिया जाता था।
पूरे १ वर्पतक यह सिलसिला जारी रहकर वन्द हो
गया। उन्हीं पाठों में कुछ पृष्ठ और छपवाकर सम्मिलित
कर दिये हैं। उर्दू अरूजको भी दिन्दी साचे में ढाल कर
साथही लगा दिया है। अब यह अपने अङ्गमें पूरी पुस्तक
हो गयी है। छन्द कोई नया नही, वही प्राचीन आचार्यों के
लिये, प्राचीन ग्रन्थों से लिये हुए हैं किन्तु वर्णन शैली
नवीन है, क्यों कि प्रवासी विद्यार्थियोंको घर बैठे डाक
द्वारा पढाना अभीष्ट था इस लिये जहा तक सरल और
सुगम हो सका, किया गया है।
यह पुस्तक उपन्यासोंकी तरह एक रुपये के ४०० पेज
खरीदने वाले भाग्वाही ग्राहकों के काम की नहीं है क्पो
कि इसकी पृष्ठ संख्या (२०४३० का १६ वा साइजमें)
केवल १६ है। मून्य साधारण जिल्द सहित
मिलने का पता-
वेताब प्रिण्टिङ्ग वर्क्स
चाह रहट देहली
1
उर्दू सुभाषित। आजकल हिन्दी कविता और लेखों में उर्दू शेरों के उद्धरण का रिवाज उत्तरोत्तर बढ़ रहा है, पढने वाले भी उर्दू की चाट का पूब मजा लेते हैं । ऐसी रचि रसनेवालों के लिये ही यह मसाला तइयार किया गया है। जिस तरह "सुभाषित रत्नभाण्डागारम्" में प्रत्येक विषयके श्लोक मिल जाते हैं, जिस प्रकार इम हिन्दी सुभाषित' में हिन्दी के पद्य हर एक विषय पर मिलजाते है, इसी तरह 'उर्दू-सुमापित" मे भी हर मजमून के अशआर आवश्यक- नानुसार मिलेगे। स्वतंत्र पुस्तक लिसने वाले, अनुवाद करने वाले, नाटक कार, उपन्यास लेखेक, व्याख्यान दाता उपदेशक, कथा याचने वाले, समाचार पत्रों के सम्वाद दाता इस पुस्तक से बहुत लाभ उठा सकते हैं। वाणी तथा रेस में इस सूक्ति-संग्रह के एक दो पद्य डाल दीजिये, का मजा बदल जायगा और सव स्वादिष्ट होजायगा। उर्दू कवियों के चुने हुए उर्दू शेर तो हैं ही, परन्तु विषयशीर्षक" और लिपि हिन्दी है। भाषा ज्योंकी त्यों उर्दू है, हा कठिन शेरो का हिन्दी अनुवाद साथ दे दियाहै । मिलनेका पता- 'येताय प्रिटिश वर्क्स चाह रहट देहली
पिंगल सार
यदि पृष्ठ कम हैं कि है बुर तो ग्लासे कुछ भी न बोलिये
मेग गदडी को न देसि। मगर इसमें लाल टटोलिये !
प्रियवर। यह कोई पुस्तक नहीं है किन्तु पुस्तका-
कार. एक पाठावलीके पत्र एकत्रित किये हुए हैं। १९२०
ई० में हम एक मासिक पिङ्गल पाठावली निकालते थे,
जिसका मृत्य केवल आशीर्वाद था, यहा तक कि छपाई
और डाक व्ययार्थ तक भी कुछ नहीं लिया जाता था।
पूरे १ वर्षतक यह सिलसिला जारी रहकर घन्द हो
गया। उन्हीं पाठों में कुछ पृष्ठ और छपनाकर सम्मिलित
कर दिये हैं। उर्दू अरूजको भी दिन्दी साचे में ढाल फर
साथही लगा दिया है। अब यह अपने अगमें पूरी पुस्तक
हो गयी है। छन्द कोई नया नहीं, वही प्राचीन आचार्यों के
लिसे, प्राचीन ग्रन्थों से लिये हुए हैं किन्तु वर्णन शैली
नवीन है, क्यों कि प्रवासी विद्यार्थियोको घर बैठे डाक
द्वारा पहाना अभीष्ट था इस लिये जहा तक सरल और
सुगम हो सका, किया गया है।
यह पुरतक उपन्यासोंकी तरह एक रुपये के ४०० पेज
गरीदने वाले भारवाही ग्राहकों से काम की नहीं है क्यों
फि इसकी पृष्ठ संख्या (२0x30 फा १६ घाँ साइजमें)
केरल ६ है। मूल्य साधारण जिन्द सहित
मिरनका पता----
बेताब प्रिण्टिङ्ग वर्स
चाह राहट देहली
- अपूर्व ( १६६) हिन्दी में अनूठी अन्युपयोगी अपने विषयकी पहिली उपादेय मचित्र पुग्तक . "मनुष्यका भोजन., इसमें खान पान सम्बन्धी प्राय सभी विषयो का 'डाक्टरी, यूनानी और आयुर्वेदीय मतसे अ-यन्त मनोरञ्जक एवं सरल भाषामें विशद और विस्तृत वर्णन है। हिन्दी में इसके जोडकी अन्य पुस्तक आज नक नहीं छपी । केरल कहनेको बात नहीं है प्रमाण लीजिए १---- श्रीमती काशी - नागरी प्रचारिणी सभाने अपने विषयकी सर्वोत्तम पुस्तक होने के कारण इस पर पदक दि- या है। २- महामति प्रोफेसर गोपालम्बम्प जी भार्गव एम एस सी सम्पादक 'विज्ञान' श्री युक्त डाक्टर त्रिलोकीनाथजी वर्मा बी एस सी, एम वी ची पम, असिस्टेन्ट सर्जन, विर्य श्री १० लक्ष्मीधर जी वाजपेयी भूतपूर्व स- पादक "चित्रमय जगत" आदि . कई धुरन्धर विद्वानोंने इसका संशोधन किया है। t , . .
1
किये हैं।
विज्ञान' जैसे प्रतिष्टिन पत्र में इसके लेखों ने स्थान
प्राप्त किया है।
४--'दैनिक आज' जैसे गौरवशाली पत्रने गिना निवेदन
किये ही इनके लेप उडत
...- अनेक प्रसिद्ध २ विद्वानों ने मुक्त कण्ठसे इसकी
प्रशंसा और छपाने के लिये आग्रह किया है।
जो पुम्नक इतने विद्वानों द्वाग सशोषित और प्रशसित
हो क्या वह आपको पसन्द न आएगी?
शोध चुकने वाला है- जल्दी कीजिए मूल्य
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महात्मा गान्धी लिसित
संसारमें हल चल मचा देने वाली
अपृवे पुस्तक
स्वराज्यकी
कुञ्जी,
दिशा कागज, मनोहर चित्र, छपाई सफाई अत्युत्तम
फिरभी मूल्य फेवर।
भूलोकका अमृत ।-) हिन्द्रजातिका हास-)
पता-चेनाव प्रिंटिंग चर्स
चाह रहट देहली
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