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Grahyasutram

Mishra, Chhutan Lal · 2009/09

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पारस्कर कण्डिकासूची -- ग्रंथम कागद द्विमीयकाण्ड (फपिडका) १ पूड़ा कर्म २उपनयन ३ आघायोपदेश समिदाधान (कविहका) १ कुशकसिको. २भावमथ्याधान ३ अघ, मधुपर्क ४ शाम से पूर्व कप ३ विवाह का होम ६ लाजा होम परिक्रमा ८ सप्तपदी ९ गृह्याग्नि सेवन १० नेमित्तिक प्रायश्चित ११ चतुर्थी कर्म १२ यक्षादि कर्म विधि १३ गर्भाधान १४ पुंसवन १५ सीमन्त २६ जातक १७ नामकरण निरक्रमण १८ विदेश क्षेत्राला प्राशन ५ भिक्षा ६मभावन मातक के यम - स्नातक प्रतत्रयों पञ्चमहायज्ञ १० पढ़ना (सपाकम) ११ अनध्यायछुट्टी १२ उत्मन १३ हल जोतना २४ श्रवणा कर्म १५ इन्द्र यज १६ पृषातक १७ सीता या - तीसरे काया की मूभी पुछर पर देखें

ओ३म्
पारस्कर गृह्यसूत्रम्
सभाषाभाष्यम्
IRL
.
समस्तजगदाधारस् जगदीशम्परात्यरम् ।
नत्वा पारस्करभाष्यम् फुर्वे संस्कारसिद्धिदम् ।। १
भुजसप्ताङ्क पन्द्रन्दे मार्गशीर्ष सिते दले।
द्वितीयायां बुधे घस्ने भाष्यारम्भः कृतोमया ॥२॥
.काए १ काहिला १ (कुश करिडका )
अथातो गृह्यस्थालीपाकानां कर्म ॥१॥
परिसमुह्योपलियोल्लिख्योदरियाम्युक्ष्याग्निमुः
पसमाधाय दक्षिणतेाब्रह्मासनमारतीय प्रणीय
परिस्तीर्यार्थबदासादा पवित्रे कृत्वा प्रोक्षणी:
संस्कृत्यार्थवत्प्रेक्ष्यनिरूप्याज्यमधिनित. पर्य:
ग्निकुर्यात् ॥२॥ नुवं प्रतय संमृज्याभ्युक्ष्य पुनः
प्रतप्य निदध्यात् ॥३॥ आज्यमुद्वास्योत्पूयावेक्ष्य
प्रोक्षणीश्य पूर्ववदुपयमनान् कुशानादाय समिः
धोऽभ्याधाय पर्युक्ष्य जुहुयात् !! ४ ॥ एष एव
विधिर्यत्रकचिट्ठोमः ॥ ५ ॥

। ए पारस्कर गृह्यमूत्रभाष्ये भाषार्थ:-(अय) शब्द पूर्वाचार्य मङ्गल पाचक लिखतेथे तथा किसी बात के पूर्ण करने पीछे नई बात के आरम्भार्थ "अध" आता है। (अतः) अय (स्थालीपाकानाम् ) गृहस्थ, में स्थित सुरुषों के लिये स्थालीपाकों की क्रिया कहते हैं। (परिसमुच्य) यज्ञ स्थलको कुशाओं से सकेर कर धूलि आदि दूर करके (उपलिप्य) गोवर सही जलसे लेपन कर (उल्लिख्य) खैर के काष्ठ के बने हुवे खाटे या स्रुवे से रेखा फरे । (उद्धृत्य) रेखाओं से उठी मृत्तिकादि को अनामिका अंगुष्ठ से उठादे । ( अभ्युक्ष्य ) जल छिड़के (अमिम् उप समाधाय) अग्नि को सामने रखकर (दक्षिणतो०) अग्नि से दक्षिण मोर (पूर्वाभिमुख बैठा यजमान ) अपने दाहिने हाथ ब्रह्मा का आसन बिछाये। उसपर वेदविद् ब्राह्मणकोवस्त्र भूषण पहिना कर बैठाये । ( प्रणीय ) प्रणीतामें जल भरे । ( परिस्तीर्य ) चारों ओर कुशा फैलावे (अर्थवत्०) अर्थात् प्रयोजन योग्य सामग्री को यथास्थान करे । (पवित्रे कृत्वा ) दो पवित्री बना कर (प्रोक्षणीः संस्कत्य) प्रोक्षणी को शुद्ध करके (अर्थ- वत्-प्रोक्षय ) प्रयोजनीय सब, यशवस्तुनों पात्रों कुशादि को साफ शुद्ध करके (निरूप्याज्यम्) पृतको देखकर (अधिश्रित्य) आज्यस्थाली को तपावे (पर्यग्निकुर्यात् ) भाज्यस्थाली के चारोंओर अग्निकरे अंर्थात् घुमावे जलती लकड़ी घृतके चारों ओर घुमावे ऐसी रीति । परन्तु हमारीसम्मतिमें उसपात्रको ऐसे घुमावे जो चारों ओरसे अग्निसे तपजावे । बहुत बड़ा घृतपात्र हो तो उसके चारों ओर 'जलती लकड़ी ही रखदे। जिससे घृत बिखरने हार्थ के जलने का भय भी न रहै ॥२॥ (नुवं.प्रतथ्य.) त्रुव को तपाक्षर (संभृज्य ) मांज-साफ़ कर ( अभ्युक्ष्प ) जल से धोकर (पुनः मतप्य ) फिर तपा कर 1 कापड १. कपिडका १ (निदध्यात ) रखदे. ॥३॥ (भाज्यं उदास) घृत को उतारकर (उत्पूय) ठीक निसारे (अवेक्ष्य) देख कर (मोक्षणीश्च) और मोक्षणीपात्रको भी (पूर्ववत्) पहिले सूत्र में कहे अनुसार ही (उप यमनान् कुशान् आदाय) उप यमन कुशाओं को लेकर (समिधीभ्याधाय)समिधाहोमकर जल छिड़ककर होमकरे ॥३॥ (एष. एव०) यही विधि है जहां कहीं होम होता है । भावार्थः-इसे कुशंकरिडकानाम से कर्गटलोग कहते हैं ।। कण्डिका ( पावसथ्याधान के सूत्रः) आवसथ्याधानं दारकाले॥१॥ दायादा काल एकेषाम् ॥ २॥ वैश्यस्य बहुपशी हाद- म्निमाहृत्य ॥३॥ चातुष्याश्यपचनबत्सर्वम् ॥२॥ अरणिप्रदानमेके ॥५॥ पञ्चमहायज्ञा इति श्रुतेः६ अग्न्याधेयदेवताभ्यः स्थालीपांक श्रपयित्वाऽऽ ज्यभागाविष्ट्वाऽऽज्याहुतीजुहोति ॥ ७ ॥ "न्वतो अग्ने, सत्वं नो अग्ने, इमं मे वरुण, तत्त्वा- यामि, ये ते शतं, अयाश्चाग्ने, उदुत्तम्, भवत नः" इत्यष्टौ पुरस्तात् ॥८॥ एवमुपरिष्टात् स्था- लीपाकस्याग्न्याधेयदेवताभ्यो हुत्वा जुहोति। स्विष्टकृते च ॥ १० ॥ "अयास्यग्नेः वषट्कृतम्, यत्कर्मणोऽत्यरीरिचम,देवागातुविदः इति॥१९॥ बहि त्वा प्राश्नाक्ति॥१साततो ब्राह्मण भोजनम्। भाषार्थ-( दारकाले) विवाह के समय ( आब-.

४
पारस्कर गृह्यसूत्र भाव्ये
थानम् ) आवसथ्य अग्नि का स्थापन होता है ॥१॥ ( एके-
पास् दायाद्यकाल) कोई आचार्यों को मत में दायभाग-पै.
कादि धन बांटनेके समय होता है। प्रत्येक गृहस्थी विवाह
समय से ही अलग २ नित्य प्रति होम करें, कोई कहते हैं
घर में एकत्र ही होम होवे परन्तु जब सम्पत्ति का विभाग
करके जुदे २ घर बनावें तयं अपने २ घर में जुदे २ होम
किया करै ॥२॥ बहुत पशु जिस वैश्य के हों ऐसे वैश्य के
घर से अग्नि लाकर ॥३॥* चातुष्प्राश्य पचन ने समान
सब विधि करे ॥ ४॥ कोई आचार्य अरणी देना कहते हैं
[ यजमान को अरणी देवै वह स्त्री पुरुष अग्नि निकालें ] ५
पञ्चमहायज्ञ हैं ऐसी श्रुति है ॥६॥ अग्नि के आधेय देवताओं
के लिये स्थालीपाक पका कर दो भाज्याहुति देकर धृता-
हुति देता है ॥ ७ ॥ "त्वनो अग्ने० ( य० २९ । ३) सत्वन्नो
अग्ने० (२९।४) इमं से वरुण० (२९ ॥१) तत्त्वा यामि०(२१॥२)
थे ते० (कात्या २५ । ११) आयाश्चाग्ने (का० २५ । १०) उदु.
समम् (य०.१२।१२)भवतं नः(य०॥३)यह ८ पहिले पाहुतिदे
॥॥ स्थालीपाक के अग्न्याधेय देवतों की आहुति देकर
फिर उक्त मन्त्रों से ८ आहुति देवे ॥६॥ ौर विष्टकृत।
आहुति भी देवे॥१०॥ अयास्याग्नेः वषट् कृतम्, यत्कर्मणो०
देवागातु विदो० इन मन्त्रों से आहुति दें॥ ११ ॥ वर्हि होम
'करके प्राशन करताहै ॥१२॥ फिर ब्राह्मणोंको भोजनकरावा
* चातुष्माश्य अन्न ऋत्विजों के लिये पकाया जाता
है। कात्या० ४ । १९८-२०४ तक देखो। कर्काचार्य ने लिखा
है कि चातु० पचन नीतकर्म है । अतः सर्वत्र नहीं है यही
जयराम का मत है।

ar काण्ड १ कण्डिका ३ करिडका ३ (अर्धविधि-मधु पकं विधि ) षडा भवन्त्याऽऽचार्यऋविग-वैवाह्यो राजा,प्रियः, स्नातक, इति ॥१॥ प्रतिसंवत्सरा- नई येयुः ॥२॥ यक्ष्यमाणा स्त्वृत्तिजः ॥३॥ आ- सनमाहाह ' साधुभवानास्तामचयिष्यामो भवन्तम्, इति ॥४॥ आहरन्ति विष्टरंपाचं पादार्थमुदकमर्चमाचमनीयंमधुपर्क दधिमधुघृत मपिहितंकास्ये कास्येन ॥५॥ अन्यस्त्रि:त्रिः प्राह विष्टरादीनि ॥६॥ विष्टरं प्रतिगृह्णाति॥४॥ वोऽस्मि समानानामुदातामित्र सूर्यः । इमंत- मभितिष्ठामि यो मा कश्चाभिदासति, इत्येनम. भ्युपविशति ॥८॥ पादयोरन्यं ॥६॥ विष्टर आ- सीनाय सव्यं पादं प्रक्षाल्य दक्षिणं प्रक्षालयति ॥१०॥ ब्राह्मणश्चेदृक्षिणं प्रथमम् ॥ ११ ॥ विराजोदाहोऽसि विराजो दोहमशीय मयिपा- दाय विराजोदाह इति ॥१२॥ अचं प्रतिगृह्णाति 'आपः स्थयण्माभिः सर्वान् कामानवानवानि' इति ॥ १३ ॥ निनयन्नभिमन्त्रयते ' समुद्रं वः प्रहिणोमि स्वां योनिमभिगच्छत । अरिष्टाऽ. स्माकं वीरा मा परासेचि मत्पयः, इति ॥ ११ ॥ आचामति, 'आमागन् यशसा स सृजवर्चसा पारस्थर गृह्यसूत्र भाये तं माकुरुप्रियं प्रजानामधिपतिं पशूनामरिष्टिं सन नाम्,इति ॥ १५ ॥ मित्रस्यत्वेति मधुपर्कप्र. सोक्षते ॥ १६ ॥ देवस्यत्वेति प्रतिगृह्णाति ॥१०॥ सव्येपाणीकृत्वा दक्षिणस्यानामिकया त्रिः प्र. योति. 'नमः श्यावास्यायावशनेयत्त आविद्वं तत्ते निष्कृन्तामि,इति ॥ १८॥ अनामिकांगुष्ठे- नचत्रिर्निरुक्षयति ॥१९॥ तस्य त्रिः प्राश्नाति"य- न्मुधुनो मधव्यं परमर्थ रूपमन्नाद्यं । तेनाहं. मधुना भधव्येन परमेण रूपेणानाद्येनपरमो मधल्योऽवादोऽसानि,इति ॥२०॥ मधुमतीभिर्धा प्रत्युचम् ॥ २१॥ पुत्रायान्तवासिनेवोत्तरत आ- सीनायोच्छिष्टं ददात् ।। २२ ॥ सर्व वा प्राश्नी. यात् ॥ २३ ॥ प्राग्वाऽसंचरेनिनयेत् ॥ २१॥आ- चम्य प्राणान्'संमृशति-वाङ्म आस्ये, नसे: प्राणः अक्षणारचक्षुः,कर्णयोः श्रोत्रम् बाहोर्य- लम्, जोरोजः अरिष्टानि मेऽङ्गानि तनूस्तन्या मे सह' इति ॥ २५ ॥ "प्राधान्तोदकाय शासमादाय गौरिती त्रिः प्राह॥२३॥ प्रत्याह, नाता रुद्राणां दुहिता वसूना, स्वसादित्यानाम मृतस्य नाभिः । अनुबो, चिकितुषे जनाय मागामनागाम दितिं वधिष्ट । ममचामुष्य च पाप्मान ,हनामि,इति यद्या.

फामा १ कहिफा ३ लक्षेत ॥ २७ ॥ अध यद्युत्सृजेत् ' ममचामुष्यः च पाप्मा एतः, ओमुत्सृजत मृणान्यत्तु, पति ग्रूयात् ॥ २८ ॥ नत्वेवामां साः स्यात ॥२॥ अघियतमधिविवाह कुरुतेत्येव घूयात ॥३०॥ यद्यध्यसकतं संवत्सरस्य सोमेन यजेत कृतार्या एवेनं याजयेयु रुताः, इति श्रुतेः ॥ ३१ ॥ भापार्थ-आचार्य १ ऋत्विा २ विवाहवालावर ३ राजा ४ प्रियमित्र ५ स्नातफ ६ यह छः अर्घ के योग्य होते हैं ॥१॥ प्रतिवर्ष पूजने चाहिये ॥ २॥ जय जय यज्ञ करे तब तब ही ऋत्विजों का पूजन फरें ॥ ३ ॥ प्रासन हाथ में लेफर कहता है कि हम आप को पूजेंगे भले प्रकार वैठिये ॥४॥ श्रासन लाते हैं बेठने को, पाद्य-पग धोने को जल, अर्घ, प्राध- मन को जण, श्रीर मधुपर्क को दधि, शहत, घृत ढका हुआ कांसी के पात्र में कांसी ही के पात्र से ढका हुवा ॥ ५ ॥ यजमान के अतिरिक्त कोई अन्यपुरुप विष्टरादि को विष्टरो विष्टरो विष्टरः ऐसे ३।३ धार फहै ॥६॥ विष्टर लेता है ॥७॥ घमोस्मिा इस मन्त्र को पढ़ कर विष्टर पर बैठता है ॥८॥ अन्य आचार्यों का मत है कि पाहों के नीचेही विष्टर रक्खे विष्टर पर बैठे का यांया पग धुलाने के पीछे दक्षिण पग धुलावे ॥ १० ॥ ब्राह्मण हो तो पहिले दक्षिणपग धुलावे ११ विराजो दोहो० ॥ इस मन्त्र से ॥ १२ ॥ " इस मन्त्र से ॥ १२ ॥ " आपस्थ० . इस मन्त्र से अर्घ ॥ १३ ॥ 'समुद्भवः० " इस मन्त्र को पढ़ता हुवा अर्घ के जल को भूमि पर छोड़ता है]॥१४॥ 'आमागन्' इस मन्त्र से आचमन करता है ॥ १५॥ मित्रस्य स्वा० इस मन्त्र से ( मधुपर्फ को ) हाथ में लेता है.॥ १७ ॥ बायें हाथ में लेकर दाहिने हाथ की अनामिका से ." नमः श्यावा० इस मन्त्र से घोलता है ॥ १८ ॥ अनामिका और अंगूठे से तीन बार छींटा देता है ॥ १९ ॥यन्मधुनो। इस मन्त्र से ३ पारस्कर गुहा सूत्र भाज्ये तीन धार मधुपर्क घाटता है ॥ २० ॥ वा “ मधुमती० " इस से ३ प्रति ऋचानों से ३ वार मधुपर्क भक्षण करै ॥२१॥ उत्तर की ओर बैठे पुत्र था शिष्य को मधुपर्क का झूठन-उच्छिष्ट देदे ॥ २२ ॥ या सय ही चाटले ॥ २३ ॥ या पूर्वको मोर गढ़े में बखेर दे॥ २४ ॥ आचमन फर वाड से इत्यादि कह कर अल स्पर्श करता है ॥२५॥ ( उदकाय #शासं आदाय ).जल के लिये प्राज्ञा लेकर (आचम्य ) आचमन करके गीः गौः गौः ऐसा तीनवार कहै । अथवा जलसे प्राधमन किये अर्घ्य से आज्ञा लेकर गौः ३ कहै घर " माता रुद्रा०" इस मन्त्र को पढ़ें। गौ को ब्राह्मण ग्रहण करै वा छोड़ दे :१-२८ ॥ प्रति यज्ञ प्रति विवाहमें गोदान किया जाताहै ऐसा कहै॥३०॥ यद्यपि वर्ष में कई वार सोमयाग करै तौ भी प्रति यज्ञ में ही अर्धादि देवे .क्योंकि अति में बताया है कि अर्घ किये हुवे ही इस यजमानको यज्ञकरावे विना अर्थ पाये न करथे। * शास का अर्थ हरिहरादि भाष्यकार खङ्ग करते है। हमारी समझ में शासं का अर्थ आज्ञा ही ठीक है । अथवा हमारी सम्मतिमें यह २५ से २९ तक ५ सूत्र वाममार्ग के मिलाये हैं क्योंकि मधुपर्क हो चुका, खा भी चुके, मागे गौ की प्रशंसा है कि यह गौ रुद्रों की माता, वसुओं की बेटी आदित्यों की भगिनी अमृत की नाभि है। विचारवान पुरुषों की मैं कहता हूं ( भनागाम् ) निष्पाप ( गाम् ) गौ को ( मा वषिष्टः ) मत मारो। यह भन्न किसी प्रामाणिक प्रत्य या वेद वाक्य नहीं तो भी न मारने की आज्ञा है गी की प्रशंसा है । जव अर्ध्य पूजनीय राजादि ही निषेध करता है फिरभी बहकार्य करना आशाभंय पापभी है ॥

कापट १ करिष्टका ะ -- कण्डिका ४ ( होम से पूर्व कृत ) चत्वारः पाकया हुतोऽहुतः प्रहुतः प्रा- शित इति ॥१॥ पञ्चसु बहिः शालायां विवाहे चूडाकरणे उपनयने केशान्ते सीमन्तोन्नयन इति ॥२॥ उपलिप्तऽउद्धृतावोक्षितेऽग्निमुपसमा- धाय ॥ ३ ॥ निर्मन्थ्यमेके विवाहे ॥ ४ ॥ उद- गयन आपूर्यमाण पक्षे पुण्याहे कुमार्याः पाणिं गृह्णीयात् ॥ ५॥ त्रिषु निघूत्तरादिषु ॥ ६ ॥ स्वाती मृगशिरसि रोहिण्यां वा ॥ ७ ॥ तिलो ण ।। वे राजन्यस्य ॥६॥ एका वैश्यस्य ॥ १० ॥ सर्वेषा शूद्रामप्येके मन्त्रवर्जम् ॥ ११ ॥ अथैनां वासः परिधापयति 'जरांगच्छ परिधत्सव वासो भवा कृष्टीनामभि शस्तिपावा। शतं च जीव शरदः सुवर्चा रयिं च पुत्रा ननुसंव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः, इति ॥ १२॥ अथोत्तरीयम्-'या अकृ- न्तन्नवयन् या अतन्वत याश्च देवीस्तन्तूनमि तो ततन्थ । तास्त्वा देवी र्जरसे संव्ययस्त्रायु: ष्मतीदं परिधत्स्व वास” इति ॥ १३ ॥ अथैनौ समजयति “ समजन्तु विश्वेदेवाः उमापो हृद- ब्राह्मणस्यानुपूर्येण २९ पारस्कर गृह्यसूत्र माध्ये यानिनौ। संमातरिश्वा संधाता समुदेष्ट्री दधातु नौ " इति ॥ १४ ॥ पित्रा प्रत्तामादाय गृहीत्वा निष्कामति " यदैषि मनसा दूरं दिशोऽनुपत्र- भाना वा । हिरण्यपावैकर्णः स त्वा मन्म- नसां करोतु असो " इति ॥१५॥ अथैनी समी- क्षयलि "अघोरचक्षुरपतिघ्न्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः सुवर्चाः । वीरसूर्दैव कामास्योनाशक्षो भव द्विपदे शं चतुष्पदे " । सोमः प्रथमा वि- विदे गन्धर्वो विविद उत्तरः । तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः । लामोऽदद्गन्ध. र्वाय गन्धर्वोऽदददग्नये । रयिं च पुत्रांशादा- दग्निर्मामयो इमाम् । तां पूषन् शिवतमा मेर यस्व सान अरू उशती विहर । यस्यामुशन्तः प्रहराम शेपं यस्याम कामा बहनोनिविष्टइति भाषार्थ-१ हुत,२ महुत,३ प्रहुत ४ प्राशित, यह धार पाक यज हैं। १ विवाह । मुंडन । ३यज्ञोपवीत केशान्य सीम- न्तोन्नयन इन पांच संस्कारों में बाहर की शाला में होते हैं ( अर्थात् दो दो शाला वनावे } ॥२॥ लेपन की उद्धृत की विड़ भूमि में अग्नि को सामने स्थापित कर के ॥३॥ आचार्य विवाह में अग्नि को मंथन कर स्थापित करे यह उत्तरायण में शुलपक्ष में शुभ दिन में कुमारी, ॥ ४ ॥ कन्या का पाणिग्रहण करे ॥५॥ उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, उत्तरा ३ बालरा काण्ड करिखका १९ पांदा, प्रवणं, धनिष्ठा,उराभाद्रपदा,रेवती,अश्विनी इननपात्रो मेंया खाति,मृगशिर,रोहिणी में (विवाह करे) वर्ण क्रमसे वर्ग की की (जी) In दो क्षत्रियकी । १ वैश्य की ॥१०॥ विवाह योग्य है। कोई प्राचार्य शूद्राको चारों वर्णी की खी योग्य बताते हैं, विनाही मन्न पढ़े ॥११७ रांगच्छक इस मन्त्र से अग्नि स्थापन के बाद अब इसे वस्त्र पहिना ताहे ॥ १२ ॥ इस के पीछे “या अकृ० इशमन्त्र से ओढना ( उढावे .) ॥ १३ ॥ तदुपरान्त " समंजन्तु." इस मन्त्र सो इन दोनो वधूवरों को सम्मुख करता है ॥ १४ ॥ पितासे दी हुई कन्या को ले हाथ पकाड़ कर." यदैषि०.'' इस मन्त्र से चलता है अबोरचक्षु० इन मन्त्रोंसे परस्पर देखते हैं ॥१६॥ करिडका ५(विवाह होमः) प्रदक्षिणमग्निंपर्याणीयके ॥१॥ पश्चादग्ने स्तेजनी कटं वा दक्षिणपादेन प्रवृत्योपविशति ॥२॥ अन्वारब्ध आधारावाज्यमागौ महाव्या- हृतयः सर्वप्रायश्चित्तं प्राजापत्यर्थ स्विष्टकृच्छा ॥३॥ एसन्नित्य सर्वत्र ॥४॥ प्राङ महाव्या- हृतिभ्यः स्विष्टकदन्यच्चेदाज्याहुविः ॥ ५॥ सर्व- प्रायश्नित्तं प्राजापत्यान्तर मेतदाबापस्थानं कि- वाहे ॥६॥ राष्ट्रभृत् इच्छज्जयाम्यातनांश्च जानना ॥ ७॥ येन कर्मणेदिति वचनात् ॥ ८॥चित्त च चित्तिश्चाकूतंचाकूतिश्च विज्ञातं च बि- १२ पारस्कर गृह्यसूत्रमाप्ये ज्ञातिश्च मनश्च शकरीश्च दर्शश्च पौर्णमासं च वृहच रथन्तरं च । प्रजापतिर्जयानिन्द्राय वृष्णे प्रायच्छदुनः पृतनाजयेषु । तस्मै विशः समन- मन्त सर्धाः स उग्रः स विहव्यो बभूव स्वाहा, इति ॥ ॥ अग्निभूतानामधिपतिः स माऽ- वतु इन्द्रो इति ॥ ६॥ अग्निभूतानामधि पतिः स माऽवतु । इन्द्रो ज्येष्ठानाम् । यमः पृथिव्या। वायुरन्सरिक्षस्य । सूर्योदिवः । चन्द्रमा नक्षत्रा- णाम् । वृहस्पतिर्ब्रह्मणः । मित्रः सत्यानाम् वरुणोऽपाम् । समुद्रः क्षोत्यानाम् । अनर्थ साम्राज्यानामधिपति तन्माऽवतु । सेोम ओष- धीनां, सविताप्रसवानां । रुद्रः पशूनां । त्वष्टा रूपाणां। विष्णुः पर्वतानां । मरुतो गणानाम- धिपतयस्ते माऽवन्तु । पितरः पितामहाः परे- ऽवरे तसास्ततामहाः इह . मावन्त्वस्मिन ब्रह्म- ज्यस्मिन् क्षत्रऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायाम- स्मिन् कर्मण्यस्यां देवहुत्यार्थ स्वाहा, इति स- वत्रानुपजत्ति ।१०। अग्निरंतु प्रथमा देव- ताना सोल्यै प्रजां मुशतु मृत्युपाशात् । तद- यी राजा वरुणाऽनुमन्यतां यथे यत्रो पौत्र- .

कायड १ कगिडका ५
१३
मघन्न रोदात् , स्वाहा । इमामग्निस्त्रायतां
गार्हपत्यः प्रजामस्यै नयतु दीर्घमायुः । अश.
न्योपस्या जीवतामस्तु माता पौत्रमानन्दमभि-
विवुध्यतामियर्थ स्वाहा । स्वस्तिनो अग्ने दिव
आपृथिव्या विश्वानि धेह्ययथा यजत्र। यदस्यां
महि दिषि जातं प्रशस्तं तदस्मासु द्रविणं धेहि
चित्रस्वाहा। सुगनु पन्यां प्रदिशन एहि
ज्योतिष्मध्ये हजरत्न आयुः । अपैतु मृत्युरमृतं
मआगाद्वैवस्वतो ना अभयं कृणोतु स्वाहा,इति
। ११ । परं मृत्यविति चैके प्राशनान्ते । १२ ।
भाषार्थ-कोई प्राचार्य भग्निपरिक्रमाके पीछे उक्त विधि
फो मानते हैं । १ । अग्नि के पश्चिमभाग में तृणमय प्रा-
सन पूला या बोरिया बुना हुवा विछाकर बैठे ॥२॥ ब्रह्मा
से प्राज्ञा लेकर प्राचार आज्यभाग २२ आहुतिदे। महाव्या-
हतियों से ३। सर्व प्रायश्चित्ताहुति १ प्राजापत्य आहुति १
विष्टकृत भी १ माहुति दे ॥३॥ यह सर्वत्र होमों में नित्य
कर्म है ॥ ४॥ यदि घृत के सिवाय अन्य धरु भी होम को
हो तो महाव्याहृतियों से पूर्व विष्टकत आहुति होती है।
॥५॥ सर्व मायश्चित्त और प्राजापत्य होम के बीच में यह
अवापस्थान विवाह में होता है ॥ ६॥ राष्ट्रभृत
करता हुवा और जय तथा अभ्यातन को जानता हुवा होमे
॥ 9 ॥ येन कर्मयोगले तत्रहोतव्या ऋनोत्येयतेन कर्मणा (ते.
की इच्छा

१४ देश पारस्कर गृह्यसूत्र भाष्ये ३ । ४।६) इस वधन से ( ज्ञात होता है कि ) जिस कर्म की ऋद्धि चाहे उसी मन्त्र से होनं करे ॥ ७ ॥ जय होम के मन्त्र ( सूत्र में चित्तं च० इंस में बलाये हैं स्वाहा शब्द लगा कर होम होता है जो पद्धति में लिखेंगे.)। सूत्र ॥१०॥ ११ से अभ्यातन होम होता है यह भी पद्धति में लिखेंगे। परंमृत्यो अनु० इस मन्त्र से भी प्राहुति देवे। कोई आचार्य कहतेहैं कि संश्रयं प्राशनके पीछे इस मन्त्रंसे आहुतिदेवे॥१९॥ छठी कवितका-(लाजा' होम) कुमार्या भ्राता शमी पलाश मिश्नांल्लाजानं जलिनांजलावावपति ।१। ताजुहोति स० हतेन तिष्ठन्ती 'अर्यमणं देवं कन्या अग्निमय: क्षत । स नो अर्यमा देवः प्रेतो मुञ्चतु मा. पते स्वाहा। इयं नार्युपब्रूते लाजानामपन्तिका,आयु- समानस्तु मे पतिरेधन्तां ज्ञातयो मम स्वाहा । इमांल्लाजानावपाम्यग्नो समृद्धिकरणं तव । मम तुभ्यं च संबननं तदग्निरनुमन्यतामिय स्वाहा, इति.।।अथास्य दक्षिण हस्तं गृह्णा ति सांगुष्ठमू-गृभ्णामि ते : सौभगतवाय हस्तं मया पत्या जरदष्टियथासः । भगो अर्यमा स- विता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुई पत्याय देवाः । अमोहमस्मि सात्वर सा त्वमस्यमा अहं, सा माहमस्मि ऋक्त्वं दौरहं पृथिवी स्वं । ताहि

पारस्कर गलसूत्र
भाष्ये
विवहावह सहरेता दवावहै प्रजां प्रजनयावहै
पुत्रान् बिन्दाबहै बहून् ते सन्तु जरदष्टयः ।
सप्रियो रोचिष्णू सुमनस्यमानौ । पश्येम शरदः
शतं जीवेम शरदःशतगृणुयामशरदः शतमिति३
भाषार्थ-कन्या का भाई जांड के पत्ते मिली धान कीखीलों
को अंजलिसे (कन्या की) अंजलि पर छोड़ता है. ॥ १॥ यह
कन्या खड़ी हुई पतिकी अंजलिके साथ “भर्यमणम्” इत्यादि
मन्त्रों से पाहुति देती है ॥२॥ अब इस के दक्षिण हाथ को
अंगूठे सहित वर पकड़ता है "मौभगाय स्वा०" यह मन्त्र
बोलता है ॥६॥६॥
अथैनामश्मानमारोहयत्यत्तरताउग्नेर्दक्षि-
णपादेन 'आरोहेममश्मानमश्मेष त्वस्थिरा
भव । अभितिष्ठ पृतन्यतोऽवबाधस्व पृतनायत
इति ॥ १॥ अथ गाथां गायसि 'सरस्वति प्रे.
दमव सुभगे वाजिनीवती । यां त्वा विश्वस्य
भृतस्य प्रजायामस्याग्रतः । यस्यां भूतथं सम;
भवदास्यां विश्वमिदं जगत् । तामदा गायां
गास्यामि या वीणामुत्तमं यशः, इति ॥२॥
अथ परिक्रामतः तुभ्यमग्ने पर्यवहन सूर्या वह
तुना सह । पुनः पतिभ्योजायर्यादाग्ने प्रजया
सह." इति ॥ ३॥ एवं द्विरपरं लाजादि ॥४॥

or 0 काण्ड १ कथिहका ६ चतुर्थ शूर्पकुष्ठया सील्लाजानावपत्ति 'भगा- यस्वाहा ' इति ॥ ५॥ त्रिः परिणीतां प्राजा- पत्य हुत्वा ॥ ६॥ ७ ॥ भाषार्थ--अब अग्निसे उत्तरकी ओर दक्षिणपगसे पत्थर पर चढ़ाता है । आरोहेम० इस मन्त्रसे । १ उदुपरान्त सेर- खंति इस मन्त्र से वर गाथा गाता है । अब तुभ्यमग्नेपर्यः इस मन्त्र से परिक्रमा करते हैं ॥३॥ ऐसे ही दोवार फिर लाजादि होम करै ॥ ४ ॥ चौथे छाज की खूट से सब खोल छोड़ता है । भगाय स्वाहा० इस मन्त्रसे तीनवार परिक्रमा करा कर प्राजापत्य होम करके ॥६॥७॥' अथैनामुदीची सप्तपदानि प्रक्रामयति, एकमिषे, वे ऊर्ज,त्रीणि रायस्पोपाय, चत्वारि मायोमवाय, पञ्च पशुभ्यः, षड् ऋतुभ्यः, सखे संप्तपदाभव सामामनुव्रता भव ॥ १॥ विष्णु- स्त्वा नयत्विति सर्वत्रानुषजति ॥ २॥ निष्क्र- मणप्रभृत्युदम्भथं स्कन्धे कृत्वा दक्षिणतोऽग्ने, . वांग्यतः स्थितो भवति ॥ ३॥ उत्तरत एकेषाम् ॥४॥ सत् एनां मूर्धन्यभिषिञ्चति ' आपः शिवाः शिवत्तमाः शान्ताः शान्ततमास्तास्ते - कृण्वन्तु भेषजम् ', इति--॥५॥:आपो हिष्टतिच:ति: मुभिः ॥ ६॥ अथैना सूर्य मुदीक्षयति तच्चक्षुः इति ॥ ७ ॥ अथास्यैः दक्षिणासमधि हृदय कापड १ कहिका २७ मालभते 'मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्त. मनु चित्तं ते अस्तु । प्रम वाचमेकमना जुषस्व प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्त मह्यम्' इति ॥८॥ मथैना मभिमन्त्रयते 'सुमगलीरियं धधरिमासमेत पश्यत । सौभाग्यमस्यै दत्वा याथाऽस्तं विपरे. तन, इति ॥ ६ ॥ तां दृढ़पुरुष उन्मथ्य प्राग्वो- दम्बाऽनुगुप्तागारे * आनुडुहे रोहिते चर्मण्युप. वेशयति ' इह गावो निषीदन्त्विहाश्वा इह पूरुषाः । इहो सहस्रदक्षिणी यज्ञ इह पूषा निषोदतु" इति ।१० ग्रामवचनं च कुर्युः।११ । विवाहश्मशानयोमं प्रविशतादिसि वचनात् ॥ १२ ॥ तस्मात् तयाग्रामः प्रमाणम् इतिश्रुतेः। ॥ १३ ॥ आचार्याय वरं ददाति ॥ १४ ॥ गोब्रा- ह्मणस्य वरः ॥ १५ ॥ ग्रामोराजन्यस्य ॥ १६ ॥ सश्ववैिश्यस्य ॥ १७ ॥ अधिरथथ्शतं दुहिट- मते ॥ १८ ॥ अस्तमिते ध्रुवं दर्शयति 'ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि ध्रुवैधि पोष्ये मयि । मा वादाद बृहस्पतिर्मयापत्या प्रजावती. शंजीन . शरदः शतम् इति ॥.१६ ॥ सां यदि न पश्यते पश्यामीत्येषब्रूयात् ॥ २० ॥ निरासमक्षारलव- ३ । - १८ पारस्कर गृह्यसूत्रमाप्ये । णाशिनी स्यातामधः शयीयाताई संवत्सरं न मिथुनमुपेयासां द्वादशरात्र पडानं निराश्रम- न्ततः ॥ २१॥ ८॥ भाषार्थ-अब इस कन्या को अग्नि से उत्तर की दिशा में सात पग चलाता है। एकमि० इत्यादि ७ मन्त्रोंसे ॥१॥ विष्णुस्त्वां नयतु विष्णु तुझे चलावें, यह सर्वत्र १ सातों वार लगावे ॥२॥ क०४ । १५ के निकलने के समय से पानी का कलश कन्धे पर धरे, अग्नि से दक्षिण की ओर मीनही बैठा रहै ॥ ३॥ कोई प्राचार्य उत्तर में बैठना कहते हैं ngn आपः शिवा इस मन्त्रसे इस कन्या शिरपर छींटा लगाता ॥ ५॥ आपोहिला० इन ३ मन्त्रों से भी ॥६॥ अव इसे सूर्य दिखाता है । तच्चक्षुः० इन नन्त्र से ॥७॥ फिर इस कन्या के दक्षिण कन्धे के नीचे हृदय को (घर) छूता है । ममवते. इत्यादि मन्त्र से ॥ ८॥ फिर इसे सुभग्लोरियस मन्त्र को पढ़ता है । उस कन्या को दूढ़ पुरुप मर्थात कर पूर्व या उत्तर में पर्दैके घरमें लेजावे । (*मानुहुह लाल 'विस्तर पर बैठात्रे) जिस विस्तर पर लालरंग से सुन्दर बैल का चित्र बना हो ऐसे वित्तर पर बेठावे । इहगावो०. यह मन्त्र पढ़े ॥१०॥ ग्राम वचन भी करे अर्थात् ग्राम की रीति नीति भी करै ॥ १९ ॥ विवाह और मृत्यु में ग्राम में प्रवेश करें इस वचन से। स्त्रियों की प्रसतार्थ उन की भी रीति नीति विवाह और रत्यु समय वत्तै ।। १२॥ इन दोनों अवं. * नोट- आलुडुह चर्म का अर्थ पौराणिक पद्धति कार शण की त्वया, टाट का फर्श कहते हैं। . वर उठा काण्ड । कडिका १४ - . सरों में ग्राम का प्रमाण है यह अति अर्थात् जगनुति है।३ आचार्य को घर दक्षिणा देवे ॥ १३ ॥ ब्राह्मण का वर गौ हे ॥ १५ ॥ राजा का कर ग्राम दे ॥ १६ ॥ वैश्य का वर घोड़ा दें ॥ १७ ॥ रथ सहित १०० गी कन्यापक्ष के प्राचार्य को देवे ॥ १८ ॥ मूर्यास्त होने पर 'ध्रुवमसि' हम मन्त्र से ध्रुव को दिखावे ॥१९॥ तीन रात्रि तक नक्षार और नमकरहित भोजन करे ॥ २० ॥ सूनि पर सोवे, २ वर्ष स्त्री संभागन न करे ॥२१॥ १२ रात्रि तक छः रात्रि तरु या ३ रात्रि तक ही संग न करे। नवमी करिडका (साधारण नित्य होम) उपयमनप्रभृत्यौपासनस्य परिचरणम् ॥१॥ अ. स्तमितानुदितयोर्दधनातण्डुलरक्षतैा । अग्नये स्वाहा, प्रजापतये स्वाहेतिसायम् ॥३॥ सूर्याय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहेतिप्रातः ॥४॥ पुमा ७ सौ मित्रावरुणौ पुमा ॐ सा वश्विनावुभौ । पुमानिन्द्रश्च सूर्यश्च पुमा , सं वर्तता मयि पुनः स्वाहेति पूर्वा गर्भकामा ॥ ५॥६॥ भाषार्थ-उपयमन कुशलेकर आरम्भ कर औशासन-गृह्य अग्निपरिचर्या सेवा (कहते हैं) ॥१॥ सूर्यास्त से सूर्योदय तक (इस का समय है) दही, या चावल वा अक्षतों से (फरे) ॥२॥ अ. ग्नये स्वाहा १ मजापते स्वाहा २ सायं काल यखाहा' प्रजापतये स्वाहा यह प्रातः काल ॥ ४॥ यदि गों की इच्छा वाली स्त्री हो तो पुमा, सौ० इस मन्त्र से १ आहुति पहिले स्त्री देवे ॥ ५॥ ९ में ॥३॥ सूर्या- पारस्कर गृह्यसूत्रज्ञाप्ये। दशमी १० करिडका ( प्रायश्चित्त ) राज्ञोऽक्षभेदे नटुविमाक्षे यानविपर्यासेऽन्यस्यां वा व्यापत्तौ तियानोदहने तमेवाग्नि मुणस- माघायाज्यसंस्कृत्यहरति रिति जुहोति नाना मन्त्राभ्याम् ॥१॥ अन्यदानमुपकल्प्य सत्रोपवेश येद्राजानस्त्रिय वा प्रतिक्षत्र इति यज्ञान्तेना. स्वाहार्षमिति चैतया ॥२॥ या दक्षिणा ॥३॥ प्रायश्चित्तिः ॥४॥ ततो ब्राह्मण भोजनम् ॥५॥१०॥ . भाषा:-राजा जव दौरे का आरम्म करे या शत्रु पर चढ़ाई करे उस समय रथ का फोई भाग टूट जाय वा स. धन जोड़ सुल जाय वा रथ लौट जाय या अन्य कोई आ. पत्ति आजाने पर अथवा वर त्रियों को विवाह करे लाता हो तव उसी गृह्याग्नि को राजा की यात्रा में सेनाग्नि को समाधान करके घृतको शुद्ध कर । इहरति० (य०८।१५) इत्यादि २ मन्त्रों से घृताहुति देवे और अनेक मन्त्रों से, भी॥१॥ अन्य सवारी तयार कर के उस में राजा वा वि. वाहिता भार्या को बैठाये। प्रतिक्षत्रे (य०२।१०) यज्ञे तक मन्त्र से आत्वाहर्ष० यजुः १२ । ११ पाठ करे ॥ २॥ धोरी. दो बैल दक्षिणा देवे यह प्रायश्चित्त कर्म है।॥४॥ फिर बा. लाणों को भोजन करावे । ५॥ १० ॥ ११ वी कण्डिका ( चतुर्थी कर्म ) चतुर्थ्यामपररात्रे ऽभ्यन्तरतोऽग्निमुपसमाधा- घ दक्षिणतो ब्रह्माणमुपवेश्योत्तरत. उदपात्रं मन ११। २११ कावड १ फपिडका तिष्टाप्यस्थालीपाक पयित्या ऽऽज्यभागा- विष्टाऽऽज्याहुतीर्जुहोति ॥ अग्ने प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधायामि, याऽस्यै पतिनाम्न्न स्तामस्य- नाशय स्वाहा। बायो प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधा- वामियाऽस्यै प्रजानी तनूस्तामस्य नाशय स्वाहा। सूर्य प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्रा. ह्मणस्त्वा नायकाम उप धावामि या ऽस्यै पशुघ्नी तनूस्तामस्य नाशय स्वाहा। चन्द्र प्राय- : श्रित त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरहि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि या ऽस्यै गृहध्नी तनू- सामस्य नाशय स्वाहा। गन्धर्व प्रायश्चित्ते तवं देवानां प्रायश्चित्तिरिसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपचावामि याऽस्य यशोघ्नी तनू स्तामस्यै नाशय स्वाहेति ।२ । स्थालीपाकस्य जुहोति प्रजातंये स्वाहेति' । ३। हुत्याहुत्वैतासा मा- हुतीनामुदपात्रेस छत्रवान्त्समवनीय तत- एनां मूर्धन्यभिषिञ्चति 'माते पतिघनी प्रजाची पशु .. से २३ पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये धनी गृहन्नी यशोघ्नो निन्दिना तर्जारनी तत एनां करोमि साजीर्य त्वं मया सह, अमा- गिति ॥४॥ अथैना १ स्यालीपाकं प्राशयति 'प्राणैस्ते प्राणान्त्संदधाम्यस्थिभिरस्थीनिमा सर्मा सानि त्वचा स्वच मिति ।। तस्मादेवं विच्छोत्रियस्य दारेण नापहासमिच्छेदुतोवं वित्परो भवति ।। तामुदुह्य यथ प्रवेशनम् ।। यधाकामीवाकाममाविजनिता: सम्भवामेतिव- चनात्ााअधास्यैदक्षिणार्थ समधिहृदयमालभते 'यत्ते सुसीमे हृदयं दिवि चन्द्रमसि नितम् । वेदाहं तन्मां तद्विद्यात् पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतटणुयाम शरदः शतमिति ॥ एव मत ऊर्ध्वम् ॥ १० ॥ ११ ॥ भाषार्थ:-विवाह से ४ थी रात के पिछले भाग में अर्ध रात्रि के पीछे घर के भीतर अग्नि स्थापन करे दक्षिण में ब्रह्मा को आसन दे उत्तर में जल पात्र रख स्थाली पाक बना आज्यागाहुति और आज्याहुति देता है ॥ १॥ अग्नि मायः । सूर्य प्रा० । गन्धर्व इन मन्त्रों से आहुति देता है ॥२॥ प्रजापतये साहा इस मन्त्र से स्थाठी पाक सेहोमकरताहैप्रत्येकमन्त्रकी आहुति केपीछेतुवेके बचे घृत को जलमें छोड़ता जायऔर उस पात्रके जलसे निम्नमन्त्रसे बंध के शिर को अभिषेक करे ॥४॥ . अब इस बधु को प्रागैस्ते १२ । शत्रु होजाता काय १ करिडका २३ मन्न से स्थाली पाफ खुलाता है । (इस मन्त्र से पति पत्नी फा एक ही अब हो जाता है) इस लिये यह जानने वाला मोत्रिय की. स्त्री से हंसी न करे। ऐसा जानते है ॥ ६॥ उस पानी को घर लेजा कर ऋतु ऋतु में सम्भोग फरै ।। ७॥ अथवा जब उस की कामना हो क्यों कि पहिले गर्भ इस कामना से सम्भोग करें ऐसा वचन है ॥ ८० अब इस पत्नी के दक्षिण कन्धे के ऊपर हाथ कर हृदय को स्पर्श करता है "यत्तेसुसीमे" ॥॥ यह मन्त्र पढ़े ऐसे ही इस के बाद भी जब सक्षम हो इसी मंत्र से हृदय छुवे (१० १२ फरिहका (पाक्षिक यज्ञ) पक्षादिपु स्थालीपाकछत्रपयित्वा दर्शपूर्णमास देवताभ्यो हुत्वा जुहोति ब्रह्मणे प्रजापतये वि- श्वेम्योदेवेभ्यो द्यावापृथिवीभ्यामिति ।१।वि- श्वेभ्यो देवेभ्यो बलिहरणं भूतगृह्य भ्य आका- शाय च ।। वैश्वदेवस्याग्नौ जुहोत्यानये स्वाहा, प्रजापतयेस्वाहा, विश्वेभ्योदेवेभ्यः स्वाहा, अ. ग्नये स्विष्टकृते स्वाहेति प्राशनान्ते ।। बाह्यतः खी बलि हरति 'नमःखियै नमः पुछ से ब- यसे वयसे नमः । शुक्लाय कृष्णदन्ताय पापीनी पतये नमः । ये मे प्रजामुपलोभयन्ति ग्रामे व- सन्ता उतवारण्ये । तेभ्यो नमोऽस्त बलिमेभ्ये .

पारस्करगृयसूत्रमाप्ये। हरामि स्वस्ति मेऽस्तु प्रजा में ददत्विति ॥४॥शेष मद्भिः प्रप्लाव्य ततो ब्राह्मण भोजमम् ॥५॥ भाषार्थ:--पक्षारम्भ दिन में १ प्रतिपदा को स्थालीपाक पकाकर दर्श पौर्णमास की देव पाहुति करके ब्रह्मणे स्वाहा प्रजापतये० विश्वेभ्योदेवेभ्योः, द्यावापृथिवीभ्याम् स्वाहा, इन मन्त्रों से होम करता है ॥१॥ विश्वेदेवो, गृहभूतो श्रा- काश के लिये भी बलि ( अन्न ) देता है ॥२॥ विश्वेदेव के अन्त में से अग्निमें इन मन्त्रोंसे होम करता है। अग्नये स्वाहा, प्रजापते स्वाहा, विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा, अग्नये- स्विष्टकृते स्वाहा, इति यह आहुति प्राशनान्त में होती हैं ( संस्त्रव प्राशन उस को कहते हैं जो सुवेका घृत जल में छोड़ते जाते हैं) उस घृत को चाटते हैं ॥ ३ ॥ अग्निशाला के बाहर यजमान पनी बलि देती हुई यह मन्त्र पढ़ती है। नमानियनमपु० ॥ ४॥ शेष अन्न को जो हाथ से लगा हो 'जल में छोड़दे फिर ब्रह्मभोज । यह दर्श पौणर्णमास यज्ञ है ॥५॥ कमिडका १३ (गर्भ धारणोपाय ) सा यदि गर्भ न दधीत सिछह्याः श्वेतपुष्प्या उपोष्यपुष्येण मूलमुत्थाप्य चतुर्थेऽहनि स्नातायों निशायामुदपेषं पिष्ट्वा दक्षिणस्यां नासिकाया मासिञ्चति इयमोषधी नायमाणा सरस्वती। अस्या अहं बृहत्याः पुत्रः पितुरिव नाम जग्र: ॥१॥१३॥ भमिति ॥

२५
कारव १ कएिसका १४॥
वह स्त्री यदि गर्भ धारण न करे तो पुष्य मतन्न के दिन
व्रत करके पति सिंही वूटी सुफेद पुष्पवाली जड़ सहित
उखाउ लाये । जब रजस्वला होकर स्नान करे चौथे दिन
की रात्रि में बूटी को पानी में पीसकर नाक के दाहिने नथने
में निचोड़ दे। इयमोपथी० यह भन्न पड़े।
पुंसवन संस्कार १४ वीं कारिउका
अथ पुथं सवनम् । १। पुरास्यन्दत इति मासे
द्वितीये तृतीयेवा ।२। यदहः पुसा नक्षत्रेण
चन्द्रमा यज्येन तदहरूपवास्याप्लव्याहते वाससी
परिधाप्य न्यग्रोधावरोहाउछुङ्गांश्च निशाया मु.
दपेपं पिष्ट्वा पूर्ववदा से छ। 'हिरण्यगर्भाऽदया
सम्भृतः' इत्येताभ्याम् । ३ । कुशकण्टकथं सोमो
शुं चैके । ४ । * कूर्मपित्तं चोपस्थे कृत्वा स
यदि कामयेत घीर्यपान्तस्यादिति विकृत्यैनमभि
मन्त्रयत, सुपर्णोऽसीति प्रारिबष्ण क्रमेभ्यः ।।
अव पुंसवन कर्म कहते हैं ॥ १ ॥ (स्पन्दतपुरा) हिलने
से पहिले दूसरे या तीसरे महीने में || २ ॥ जिस दिन पुरुष
नक्षत्र से युक्त चन्द्रमा हों उस दिन पत्नी को व्रती रस स्नान
फरा शुद्ध वस्त्र धारण करा कर रात्रि में बड़ के वृक्ष की जटा
और कोपलों को रात्रि में जल से पीसकर पहिलेकहे
अनुसार हिरण्य गर्छ । अध सं. इस दो मन्त्रों से दाहिनी
नातिका में निचोड़े ॥ ३ । कोई प्राचार्य वटजटा के साथ
४

पारस्कर मत्स्यसूमतान्थे। कुशा का कांटा और सोमलता ४ वस्तु निचोड़ना कहते हैं ॥ ४ ॥ वह पुरुष पाहै कि मेरा पुत्र बलवान हो तो भार्या के उपस्थ पर * “ कूर्म पित्त रखकर " विकृतिछन्द के सुपर्णोसि यजुः १२॥ ४ इस मन्त्र से गर्भ को स्पर्श करे फिर विनोक्रमो सि० यजुः १२ । ५ यह दो मन्त्र पढ़े ॥ १५ करिडका-आगे सीमन्तोन्नयन है ॥ १ ॥ अथ सीमन्तोनयनम् ।।१। पुळसबनवत् ॥२॥ प्रथमगर्भमासे षष्टेष्टमेवा । ३। तिलमुद्गमित्र * नोट-पुंसवन संस्कार में कूर्मपित्त को पत्रो के उपस्थ पर रखना लिखा है । हरिहरादि चारों भाष्यकारों ने इस का अर्थ पानी की शराई लिखा है। श्री राजाराम जी ने भी यही अधे किया है परन्तु नोट में कछुवे का पित्ता भी लिख दिया है जो किसी कोश से नहीं मिलता। हमारी सम्मति में कयुवे का पित्ता गर्भ होता है जो हानिप्रद होगा इसी लिये सब टीकाकारों ने पानी का पात्र लिख दिया कूर्म कच्छ कच्छप एकार्घ शब्द हैं। अनरकोप में लिखा है। कुणिः कच्छः कांतलको नन्दिवक्षोथराक्षसी । वनौषधिवर्ग श्लोक १२८ द्वितीय कांड टीका-कुणिः (तुणिः) कच्छः कान्तलकः 'नन्दी के वृक्षः पटकं नन्दियक्षस्य मांद रुखी इति ख्यातस्य अयं अश्वत्था कार पन्नः ॥ पीपल के आकार का पत्ता होता है यह पता भी है । २-इस वृक्ष के पत्ते की टिकिया बना कर रखना प्रतीत होता है । सम्भव है कि कच्छ पन के त्यान में कूर्म पित्त पाठ बन गया हो। 2 २७ काण्ड १ करिखका १५॥ छस्थालीपाक, नपयित्वा प्रजापते त्वा पश्चा- दग्गर्भद्रपीठ उपविष्टायां युग्मेन उठालु ग्रप्सेनी. दुम्बरेणनिभिश्चदर्भपिन्जलस्त्रेण्या शलल्या बी- रतरशना पूर्णचात्रेण च सीमन्तमूवं विनयति 'भूर्भुवः स्वरिति । १ । प्रतिमहाव्याहृतिवा ।५। त्रिवृत्तमायनासि 'अयमूर्जावतो वृक्ष जी फलिनी भवेति, । ६ । अथाह वीणा- गाथिनी राजानसंगायतां यो वाप्यन्योषीर- तर इति । ७ । नियुक्तामप्येके गाथा मुपोदाह: रन्ति सोम एव नो राजेमा मानुषी: प्रजाः । अविमुक्तचक्र सीरं रतीरे तुभ्यम्, असौ, इति यां नदी मुपावसिता भवति तस्या नाम गृह्णात्ति ।। रातो ब्राह्मण भोजनम् । ६ । आगे सीमन्तोन्नयन है १ पुंसवन के समान ही है २।६ठे या वें मास में प्रथम गर्भ समय में ही होता है ॥३॥ तिल मूंग मिलाकर स्थाली पाक पकाकर प्रजापति की आहुति करें अमि के पश्चिम में कोमल भासन बिशा कर स्त्री पुरुप दोनों बैलें। ३ कुशा : सेह के कांटे जो जगह सुफेद हों। या लकड़ी की कंघी डारे से बन्धी हुई। दो गूंजर के फलों का गुच्छा हाथ में लेकर ३ महाव्याहृतियों से मांग निकाले ॥४॥ अथवा३ महाव्याहृतियों से ३ वार १ -- २८' पारस्करगृह्यसूत्रमाच्ये । मांग निकाले ॥५॥ गूलर की गुच्छी को शिर में बांधदे अय.. मूर्जावटो० इस मन्त्र से ३ गांठ देवे। ६॥ पति दो वीजा गायकों को राजानं इस गन्त्र के गान को कहै ॥७॥ कोई भाचार्य " सोम एवनो राजेम० " इस मन्त्र को भी वीणा से गवाते हैं। असौ के स्थान में गर्भिणी स्त्री पार्ववत्ति नदी का नाम लेखे ॥८॥ फिर ब्राह्मणों को भोजन करावे । १६ कपिडका (जातकर्म विधिः ) सोष्यन्तीमद्विरभ्युक्षति 'एजतु दशमास्प:' इसि प्राग् 'यस्येते, इति ।१। अथाबरावपतनम' 'अवैतु पृश्नि शेवल/शुने जरास्वत्तके । नैव मासेन पीवरि न कस्मिंश्चनायतमवजरायु पदाताम, इति ।२. जातस्य कुमारस्याच्छिन्नायां नाझ मेधाजननायुषये करोति ।३। अनामि- कया सुवर्णान्तहितया मधु घृते प्राशयति घृतं बा 'भूस्त्वयिं दधामि वस्त्वयि दधामि स्व- स्त्वयिदधामि भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि, इति । १ । अथास्यायुष्यं करोति । ५। नाभ्यां दक्षिणे वा कर्णे जपति 'अगिरायुष्मान्त्स वन- स्पतिभिरायमांस्तेन त्वाऽऽयुषा ऽऽयुष्मन्तं करोमि । सोम आयुध्मान्स ओषधीभिरायुष्मां- स्तेनत्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि। ब्रह्मायुष्मत् काय १ करिडका १६ । तद्राह्मणैरायुधमत् तेन त्वाऽऽयुषाऽऽयुप्मन्तंकरो- मि। देवा आयुष्मन्तस्तेऽमृतेनायुष्मन्तस्तेन- स्वाऽऽयुपाऽऽयमन्तं करोमि । ऋषय आधुण्म- न्तस्तेव्रतैरायुग्मन्तस्तेन त्वाऽऽयुषाऽऽयुपमन्तं क- रोमि। पितर आयुष्मन्तस्ते स्वधाभिरायुग्मन्त- स्तनत्वाऽऽधुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि । यज्ञ आयु. मान्त्स दक्षिणाभिरायुष्मांस्तेनत्वाऽऽयुषाऽऽयु. मन्तं करोमि । समुद्र आयुष्मान्त्सनवन्तीभि- रायुष्मांस्तनस्वाऽऽय पाऽऽय मन्तं करोमि, इति । ६ । त्रिस निस् 'व्यायुषम् ' इति च । ७ । स यदि कामयेत सर्वमाय रियादितिवात्सप्रेण- नमभिमृशेत् । ८ । दिनस्परि इत्येतस्यानुवाक- स्योपत्तमामुचं परिशिनष्टि ।। प्रतिदिशं पञ्च ब्राह्मणानवस्थाप्य ब्रूयाद 'इममन प्राणित' इत्ति । १० । पूर्वी ब्रूयात् 'प्राण ' इति १२॥ त्याना इति दक्षिण, । १२ । 'अपान' इत्य परः । १३ । उदान' इत्युत्तरः ।१४। 'समान' इति पञ्चम उपरिष्टादवेक्षमाणो ब्रूयात् ॥१५॥ स्वयं वा कुर्या- दनपरिक्राममविदामानेषु ॥१६॥. स यस्मिन् देशे

पारस्कर गृह्यसूत्रमाध्ये
जातो भवति तमभिमन्त्रपते 'वेद ते भूमिहृदय
दिवि चन्द्रमसि नितम् । वेदाहं तन्मांतद्विद्याद
पश्येम शरदः शतं जीक्षेस
र शरदः शतर्थ ऋणु-
याम शारदः शतम् इति । १७ । अथैनममि.
शति 'अश्मा भव परशुर्भब हिरण्य मनुतं भव
। आला वै पुत्रनामासि सजीव शरदः शतम्,
इति ।१८॥ अथाऽस्थमातर मलिमन्त्रयते 'इडा-
ऽसि मैत्रावरुणी वीरमजोजनथाः । सा त्वं
वीरवती भव याऽस्मान् वीरबत्तोऽकरत् , इति ।
१९अथास्यै दक्षिण, स्तनं प्रक्षाल्य प्रयच्छति
: इभस्तनम्' इति ।२०'यस्ते स्तनः' इत्युत्त.
रमेताभ्याम् ॥२१॥ उदपात्रशिरस्तों निदधाति
'आपो देवेषु जानथ यथा देवेपु जाग्रथ एव
मस्या,सूतिकाया, सपुत्रिकायां जाग्रथ' इति
२२ । द्वारदेशे सूतिकाऽग्निमुप समाधायोत्थानात्
संधिवेलयोः फलीकरणमित्रान् सर्पपानगावा-
वपत्ति 'भण्डामा उपवीरः शौण्डिनेय उलू-
खलः मलिम्लुचे द्रोणासश्च्यवन नश्यतादित्तः
स्वाहा। आलिखन्ननिमिपः किंवदन्त उपनुतिः

कायह १ करिहका १६॥
३१
हर्यक्षः कुम्भी शत्रुः पात्रपाणि मणिहन्त्रीमुखः
सर्षपारुण श्च्यवनो नश्यता दितः स्वाहा' इति
२३ । यदि कुमार उपद्रवज्जालेन प्रच्छाद्योत्तरी-
येण वा पित्ताऽङ्क आधाय जपति कुर्कुरः सुकूधैर:
कूधैरो बालबन्धनः । चेच्चेच्छनक सृजनमस्ते
अस्तु सीसरोलपेतापव्हर तत्सत्यम् । यत्ते
देवाषरमददुः सत्वं कुमार
मेव वावृणीथाः ।
चेच्चेच्छुन कसृज नमस्ते अस्तु सीसरोलपेतापहर
सत्सत्यं । यन्ते सरमा माता सीसरः पिता
श्यामशबलौ भ्रातरौ चेचे च्छनक सून नमस्ते
अस्तु सीसरो लपेसापहर, इति ।२४। अभिमृशत्ति
न नामयति न रुदति न हृष्यत्ति न ग्लायति यत्रं
वयं वदामोयत्र चाभिमृशामसि' इति । २५ ।
प्रसवासन्न पत्नी को एजतु दशनास्यः यजुः०८स इस मन्त्र से
यस्पैते । २० तक २ मन्त्रों को पढ़कर जलका छींटा देवे।
बालक के भूमि पर आने पर अवैतु पृश्निः यह मन्त्र पढ़े ।।
जन्म के पौधे नाल छेदन करा कर मेधा जनन आयुष्य
बुद्धि प्रद आयुमद क्रिया करे ॥३॥ यथा-सुवर्णयुक्त अना-
सिका उङ्कली से घृत शहत चटाने या केवल घृत इस मन्त्र
से घटावे । भूः त्वयि दधामि । भुवः त्वयिद । स्वः त्वयिद० ४
फिर आयुध्य करता है ॥५॥ नाभि या दक्षिण कान मे अनि
आयुन्नान् । सोम प्रायु० । ब्रह्मा आयु० । देवा । ऋषयः

ध्यान
अपान
पारस्कर गृयसूत्रमाये ।
आ० । पितर० । यश भा० । समुद्र प्रायुः । इन मन्त्रों का
पाठ करता है । ६ ॥ आयुष० यजुः-३।६२ इस मन्त्र से तीन
वार आयुष्य आशीर्वाद करता है ॥ ७ ॥ पिता यदि पुन्न
सर्वायु चाहे तो ( यजु० १२ । १८ से २८ तक मन्त्र ) वात्सम
अनुवाक ८ का पाठ करै ॥ ॥ दिवल्परि-प्रथम० इस मन्त्र
से आरम्भ कर इस अनुवाक, की अन्त को ऋचा छाइदे (शेष
१९ मन्त्र पढ़े) ॥ प्रत्येक दिशा. में ब्राह्मण बैठाने
(१ पूर्व २ दक्षिण ३ पश्चिम ४ उत्तर ५ मध्य ) यजमान इन
से भाशीर्वाद की प्रार्थना करै ॥२०॥ पूर्व का कहे "प्राया" ११
दक्षिण का
१२ । पश्चिम का
उत्तर का “उदान १४ । नध्य का ऊपर को देखकर "समान"
ऐसा कहै ॥१५ब्राह्मण न हों तो चारों ओर घूमता हुवा
स्वयं पिता ही इन उक्त शब्दों को कहै ॥१६॥ जिस भूमि
पर जन्म लिया उस भूभाग को स्पर्श कर पढ़ें " वेदते
इस मन्त्र को पढ़ता है १७ ॥ फिर इस बालक को छूकर
अश्माभव० " इस मन्त्र को पढ़ता है १८ ॥ फिर इस को
बालक की माता को छूकर इहासि. यह मन्त्र पढ़ता है ।
१६ ॥ फिर उस की दक्षिणदूधी को धोकर और "इनस्तन००
य०१७ । ८७ मन्त्र पढ़कर बालक को देवे ॥२०॥ यस्ते स्तनः०
(वहदा०६ । ४ । २७). इस मन्त्र से बायां स्तन धोकर
पिलाने को दे । इन दो मन्त्रों से दोनों स्तन धोकर पिलावे
२१॥ पानी का पान शिरहाने रखता हुवा भापीदेवेषु
यह मन्त्र पढ़े ॥ २२ ॥ सूतिशागृह के द्वार पर सूतिकाग्नि
का स्थापन कर जब तक प्रसूता न उठे. नित्यमति दोनों
.

कागद १ कतिका १७ ॥ समय वहां पंष्ठामाः इन २ मन्त्रों से सरसों फलीकरण: मिलाकर होम करता है ॥ ३ ॥ यदिबालक रोगी हो तो पिता गोदी में बैठाकर जाली वा दुपट्टे से ढक कर " कुर्कुरः० इस' मन्त्र को जपे ॥ २४ ॥ फिर " स्वमामयति" इस मन्त्र से स्पर्श करे ॥ २५ ॥१६ १७ करिष्ठका दशम्यामुस्थाप्य ब्राह्मणान् भोजयित्वा पिता नाम करोति। १ । यक्षरं चतुरक्षरं वा घोषपदादान्तरन्तस्थं दीर्घाभिनिष्ठानं कृतं कुर्यान तद्विसम् । २। अयजाक्षर माकारांन्त सिंग तद्वितम् । ३ । शर्म ब्राह्मणस्य धर्मक्षत्रियस्य मोट-" फणीकरण मिश्रान्सर्षपान् श्रमौ० यहां फलीकरण फा अर्थ 'फर्क,गदाधर, हरिहर, जयराम के संस्कृत भाष्यों और राजाराम जी के भाष्य में भी तंडल कण-चावल की फिनकी में सरसों मिला कर ही होम लिखा है परन्तु हम को फलीकरण का अर्थ चावल कण कहीं फ़ोष में या व्युत्पत्ति द्वारा ठीक प्रतीत नहीं हुवा। तब कोष देखे ऐसे कात हुवा कि फली नाम अमरकोष के वनौषधिधर्म कांड २ के श्लोक ५५ में प्रियंगुलता का है। कृष्णता कुवेराक्षी- " श्यामा तु महिला हृया। लता गोवन्दिनी गंगा-प्रियंगुः फलिनी फली ॥ ५५ ॥ विष्वक्सेना गंधफली कारम्भा प्रियकश्चसा । श्यामा से प्रियङ्गुतक १२ नाम प्रियंगुके हैं। . तदनुसार ही श्री ५ - १८ कण्डिका ३४ पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये। गुप्तेसि वैश्यस्य ।। चतुर्थे मासिनिष्क्रमणिका।। सूर्य मुदीक्षयति ' तच्चक्षुः' इति । ६ । १७ ॥ दश दिन प्रसूता को उठाकर ब्रह्मभोज कराकर पिता नाम धरै नाम २ या ४ प्रकार का हों घोष * अक्षर आदि में हो, मध्य में अन्तस्थ हो, अन्त में दीर्घ बा विसर्ग हो कृत प्रत्ययान्तहो।तद्वितान्त न हो ॥२॥ विषमाक्षर आकारन्त तद्धितान्त कन्या का नाम हो ॥ ३ ॥ शर्मा ब्राह्मण, वर्मा क्षत्रिय, गुप्त वैश्य के (नामान्तमहो) ॥ चौथे मास निष्क, भण होता है ॥ ५॥ तच्चक्षुः० यजुः ३६ । २४ "मन्त्रसूर्य को दिखाता है॥६॥१७ प्रोष्येत्त्य गृहानुपतिष्ठते पूर्ववत् । १। पुत्रं दृष्ट्वा जपसि-अङ्गादङ्गात् सम्भसि हृदयादधि जायसे । आत्मा वै पुत्रनामासि स जीव शरदः शतमिलि । २ । अथाऽस्यमूनिमवजिघ्रति 'प्र- जापतेष्वा हिङ्कारेणावजिघ्रामि सहस्रायुषाऽसी- जीव शरदः शतम, इसि ।३। गवां त्वा हिङ्का- रेणेति चेतिदक्षिणेऽस्य कर्णे जपति ' अस्मे प्रयन्धि मघवन्नृजीषिन्निन्द्र गयो विश्ववारस्य भूरेः । अस्मे सशरदो जीवसे धा अस्मे वीरां * घोषाक्षर-गघङ। जस जाड ढ ण, द ध न, बम म 'यरल व अन्तस्य कारह १ कण्डिका १८१८॥ उछश्वत इन्द्र शिप्रिन्, इति । इन्द्र श्रेष्ठानि द्रविणानि धेहि चित्ति दक्षस्य सुभगत्वमस्मे । पोषछ रयीणामरिष्टिं सनूनास्वाक्ष्मानं वाचः सुदिनत्व महाम्, इति सव्ये । ५ । स्त्रिवैतु मूनिमेवावजिघ्रति तूष्णीम् । ६ ॥१८ विदेशसेघरमाताहैरपूर्ववत्वासकरताहैपुत्रकोदेखकरजयता है " अङ्गा दा० यह मन्त्र शतपथ ॥२॥ फिर इस पुत्र के शिर को सूंघता है " प्रजापते. " कन्त्र से ॥३॥ गवांस्वा यह मन्त्र पुत्र के दक्षिण कान में जपता है। । इन्द्रम् श्रेष्ठा यह मन्त्र बांये कान में ( जपे ) ॥५॥ कन्याओं के शिर को ही. चुपके सूंघले ॥ ६ ॥१८॥ १९वीं कण्डिका. षष्टे मासेऽनप्राशनम् । १ । स्थालीपाक श्रपयित्वाऽऽज्यभागा विष्वाऽऽज्याहुती जुहोति देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मंद्रेषमूर्ज दुहाना- धेनुर्वाग- स्मानुप सुष्टु तैतुस्वाहा, इति । २। 'पाजो नो अदा' इति च द्वितीयाम । ३ । स्यालीपाकस्य जुहोति 'प्राणेनानामशीय सवाहा, अपानेन गन्धानशीय सवाहा, चक्षुषारूपाण्यशीय स्वाहा, श्रोत्रेण यशोऽशीय स्वाहा, इति । १ . प्राश- M Ame पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये । नान्ते सर्वान् रसान्त्सर्वमन्नमेकत उद्धृत्यानं प्राशयेत् । ५ । तूष्णी ॐ हन्तेति वा 'हन्तकारं मनुष्या' इति श्रुतेः । ६ । भारद्वाज्या माथ्सेन बाक्प्रसारकामस्य । ७ । कपिजलमधिसेनामा.. द्यकामस्य । ८ । मरस्यैर्जबनकामस्य ।। कृक- पाया ओयुष्कामस्य । १० । आट्या ब्रह्मवर्च- सकामस्य । ११ । सर्वैः सर्वकामस्य ।१२। अन्न- पर्यायवा ततो ब्राह्मणभोजनमनपर्यायवा सतो ब्राह्मणभोजनम् । १३ । १९॥ छठे मास में "अन्नप्राशन" अन्नघटाना होता है ॥ १ ॥ स्थालीपाक पकाकर भाज्य भागाहुति देकर " देवी वा० . इस मन्त्र से माहुति दे ॥ २॥ वाजो नो अघ इस मन्त्र से दूसरी ॥ ३ ॥ स्थालीपाफ से होम करता है "माणेमानम्, अशीय स्वाहा । अपानेन गंधं० । चक्षुषा रूपा० । श्रोत्रण यशोग्शीय स्वाहा इन मन्त्रों से आहुति देवे । ४ । संस्त्रय प्राशन के पीछे सब रसों को सब अनों को एकत्र करे और. बालक को घटावे ॥ ५ ॥ चुप होकर चटाधे वा " हन्त " कह कर । क्योंकि "हत कारम् मनु याः" यह श्रुति है ॥६॥ । १० । १९ । १२ सूत्र प्रक्षिप्त प्रतीत होते हैं । क्योंकि सबरसो को सब अन्नों को घटा चुकने के पीछे मांस घटाने में क्या रस नमक आदि नहीं हैं ? अशा परोसकर ब्राह्मण को भोजन करावे ॥१३॥ प्रथम काय समाप्त ३० कागा कतिका १६ अथद्वितीय कांडे प्रथमाकंडिका सांवत्सरिफस्य चूडाकरणम् । १ । तृतीये वाऽप्रतिहते । २ । पोडशवर्षस्य केशान्तः । ३। यथामंगलं वा सर्वपाम् । ४ । ब्राह्मणान् भोज- यित्वा माता कुमारमादायालाव्याहते वाससी परिधाप्याङ्क आधाय पश्चादग्नेरुपविशति।। अन्वारब्ध आज्याहुतीहूत्वा प्राशनान्ते शीता. स्वप्सूष्णा आसिञ्चति 'उष्णेन वाय उदकेनेह्य. दिते केकान् वप ' इति । ६ । केपश्मशिवति च केशान्ते । ७ । अपात्र नवनीतपिण्डं घृतपिण्डं दधनो पा प्रास्यति । । तस आदाय दक्षिणं गोदानमुन्दति सवित्रा प्रसूता देव्या आप उन्दन्तु ते तनुं दीर्घाय त्वाय वर्चसे इसि । ।नेण्या शलल्या विनीय त्रीणि कुशतरुणान्यन्तर्दधाति ओषध ' इति । १० । 'शिवोनाम' इति लोह: क्षुर मादाय निवर्तयामि' इति प्रवपति 'येना. धपत्मविता क्षरेण सोमस्यराज्ञा वरुणस्य विद्वान तेन ब्रह्माणो पतेदमस्यायष्यं जरदष्टिर्य चाऽसद्ध, इति । ११ । सक्रेशानि प्रच्छिदशानु डहे गोमय पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये पिण्डे प्रास्यत्युत्तरताध्रियमयाणे १२॥ एवं द्विर- परं तूष्णीम् । १३ । इमरयोश्चान्दनादि । १४ । छायपश्चात् 'त्र्यायुषम् ' इति । १५ । अधी- तरतः 'येन भूरिश्चरादिवं ज्योक च पश्यामि सूर्यम् । तेन ते वपामि ब्रह्मणा जीवातवे जीवनाय सुश्लोक्यायस्वस्तये' इति ॥ ६ ॥ त्रिः क्षुरेण शिरः प्रदक्षिणं परिहरति ॥ १७ ॥ संमुखं केशान्ते ।१८। यत्क्षुरेण मज्जयता सुपे. शसा वप्ता वपति केशान् छिन्धि शिरोमाऽस्यायुः प्रमोषीः । १६ । मुखमिति च केशान्ते । २० । साभिरद्विः शिरं समुदा नापिताय क्षुरं प्रय- च्छति 'अक्षण्वन परिव' इति । २१ । यथा मङ्गलं केशशेषकरणम् ॥२२॥ अनुगुप्तमेत सकेशं गोमयपिण्डं निधाय गोष्ठे पलवल उदकान्ते वाऽऽचार्याय बरं ददाति । २३। गांकेशान्ते ॥२४॥ संवात्सरं ब्रह्मचर्यमवपनं च केशान्ते द्वादशरात्र षडानं त्रिरात्रमन्ततः । २५ ॥ १ ॥ घूधकरण १ वर्ष के वालक का होता है ९॥ या तीसरे वर्ष की समाप्ति से पूर्व । २ । १६ वर्ष के बालक का केशान्त होता है अथवा फुला चारानुसार जिस वर्ष में होता हो या - कारह २ फरिहका १॥ जब अनुकूल हो तब ही सब केश कन्तनकरावें ॥४॥ ब्राह्मण जिमाकर माता बालक को लेकर स्नान करा नवीन दो वन पहिनाकर गोद में ले अमि के पश्चिम भाग में बैठे ॥॥ पित्ता ब्रह्मा से अन्वारब्धकन्धा छूकर भाज्याहुति से प्राशन पर्य- न्त सब कर्म करै । उपणेनवा० इस मन्त्र से ठंडे जल में गरम जल मिलावे केशान्त संस्कार में केशश्मनु कहै ॥ ७ ॥ फिर पानी में मक्खन वा घृत वा दही डाले ॥८॥ उस जल घुल्लुभर कर दहिनी कनपटी पर बालों को सवित्रा प्रसूतेन, इस मन्त्र से गीला करै ॥३ सेह के कांटे ३ कुशा लेकर बालों को "ओषधे त्रायस्वर यजुः०४ । १ यस मन्त्र से बाल ढांचे ॥१०॥ शिवोनामासिव्य०३ । ६३ इस पद से लोहे का उस्तरा लेकर " निवर्तयाम्यायु ३ । ६३ इस मन्म से केशकाटने प्रारम्भ करै। येनावपस० मन्त्र को पढ़ता हुवा काटे । १९ । कुश सहित केश फाटकर अनुहुइवष के गोवर पिंडको उत्तर में धरकर उस में बालों को रखलाजाय ॥२॥ इसी प्रकार और दो धार धुप के से काटे ॥१३॥ अन्य दोनों शोर के बालों को भिगोनादि कार्य ती मन्त्र पूर्वक फरै ॥ १४ ॥ तत्पश्चात् व्यायुषं० “इस मन्त्र को पढ़े ॥ १५ ॥ येनभूरिः० इस यजुः ३ । ३६ से बांये भाग के बाल कोटे ॥१६॥ तीन वार शिरके चारों ओर प्रदक्षिणक्रम उस्तरा से घुमावे १७ केशान्त संस्कार में मुंख के दाढ़ी भूक भी मूड ॥ १८ ॥ यत्पुरेण यह मन्त्र मुंहन का है ॥ १६ ॥ मुख के बाल के शान्त में जब मूंडे ॥२०॥ पूर्वोक्त प्रकार शीतल और उष्णो दकों से शिर को भिगो कर नाई को उस्तरा देता है अद्युत् खून न निकले ऐसा महो” इस मन्त्र से ॥ २९ ॥ यथा पारस्कर मसूत्र भाब्ये योग्य कुलदेशाधारानुसार केश फटाघे ॥ २२ ॥ शिखा कधी छदती है। सब केशों को बीन कर गोवर सहित लपेट कर गौशाला पोखर या भदी में गाढ़ देवे प्राचार्य को भेट दे। ॥ २३ ॥ केशान्त संस्कार मैं गोदाम दे । १४ ॥ चूड़ा फर्म संस्कार के पीछे १ वर्ष तक बाल न मुहावे ब्रह्मचर्य वस् रहै । और केशान्त के पीछे १२ वा ६ वा। रानि तक बीर न करावे ॥२५॥ इति द्वितीय काय हे मथमा कण्डिका । करिडका २ (उपनयन) अष्टवर्षे ब्राह्मणमुपनयेद् गर्माष्टमेषा ।।। एकादशवर्षराजन्यम् । २ । द्वादशवर्षे वैश्यम् ३। यथामङ्गलं वा सर्वेषाम् ।। ब्राह्मणान् भोज. येत् तं च पर्यप्तशिरसमलङ्तमानयन्ति ।। पश्चादग्नेरवस्थाप्य " ब्रह्मचर्यमागाम् " इति वाचयति "ब्रह्मचार्यसानि" इति च ६ अथैनं वासः परिधापयति “ येनेन्द्राय बृहस्पतिर्वासः पर्यदधादमृतम् । तेन त्वा पनिदधास्यायुषे दीर्घाय त्वाय बलाय वर्चसे " इति । मेखला वनीते "इयं दुरुक्तं परिबाधमाना वर्ण पवित्रं पुनती म आगात् । प्राणापानाभ्यां घल'माद- धाना वसा देवी सुभगा मेखलेयम्, इति । .

काह कायडकी। ४१ "युधा सुवासाः परिषीत आगात् सं उत्रेयान् भवति जायमानः । तं धीरासः कवयं उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः ” इति वा ।। तूष्णी यो । १०१ ( यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापते. यत् सहज पुरस्तात् । आयुष्यमग्रयं प्रतिमुच्चं शुभ्र यज्ञोपवीतं. बलमस्तु तेज । यज्ञोप- बीत मसिं यज्ञस्यत्वा यज्ञोपवीतेनोपन- ह्यामि" इति । अथाजिनं प्रयच्छति "मि- प्रस्य चक्षुर्धरुणंबलीयस्तेजो यशास्त्र स्थविर समिद्धम् । अनाहनस्य वसनं जरिष्णः परीदं वाज्यजिनं दोहम इसि दण्ड प्रयच्छत्ति ।१९ ॥ तं प्रतिगृह्णाति "यो मे दण्डः परापतवैहाय- सोऽधि भूभ्याम् । तमहं पुनरादद आयुषेब्रह्मणे ब्रह्मवर्चमाय" इति । १शदीक्षावदेके 'दीर्घसत्र मुपैति, इति वचनान् । १३ । अथाऽस्याद्विाज- लिनाऽजलि पूरयत्ति मापोहिष्ठा' इति लिसृभिः । १४ । अथैनथं सूर्यमुदीक्षयति तच्चक्षुः' इति । १५ । अथास्य दक्षिणार्थ समधि हृदयमालभते ममवते ते हृदयं दधामि ममचित्तमनचित्तं ४२ पारस्कर गृह्यसूत्र माध्ये ते , अस्तु । मम वाचमेकमना जुषस्व सहस्प- तिष्ट्वा नियुनक्तुमह्यम्, इति । १६ । अथाऽस्य दक्षिण,हस्तं गृहीरवाह 'कोनामाऽसि, इति ११७ असो 'अहं भोः३, इति प्राह १८॥ अथैन माह 'कस्य ब्रह्मचार्यसि, इति ।१९। 'भवतः इत्युच्यमाने : इन्द्रस्य ब्रह्माचार्यस्यग्निराचार्य स्तबासी, इति ।२०। अथैनं भूतेभ्यः परिददाति प्रजापतये त्वा परिददामि देवाय रखा सवित्रे. परिददाम्यस्य स्त्वौषधीभ्यः परिददामि द्यावा पृथिवीभ्यां स्वा परिददामि विश्वेभ्यस्त्वा वेदे- म्यः परिददामि सर्वपस्त्वा भूतेभ्यः परिददा- म्यनिष्टय, इति । २१ । करिडका २ माठ वर्ष के ब्राह्मण का यज्ञोपवीत करावे या गर्भ से आठवें वर्ष में ॥१॥१९ वर्ष के क्षत्रिय को।२ ॥ ९२ वर्ष के वैश्य को ।३ । या जैसा कुलाचार हो वैसा सब का ।४। ब्राह्मणों को भोजन करावे और बालक का शिर मुंडा कर मंडप में लावे ॥५॥ अग्नि के पश्चिम भाग में बैठा र्यमा गाम् ऐसा और "ब्रह्मचर्यसानि बचवावे, कहावे ॥६॥ "येनेन्द्रायः" इस मन्त्र से बालक को वस्त्र पहिनावे ॥७॥ "यंदुरुक्तं मन्त्र से मेखला तगड़ी बांधे ॥८॥ अथवा "युवा- कर अच.

काराकक्षिका।। ४३ सुवासा०" इस मन्त्र से ॥ ॥ या चुप के ही बांधे ॥ १० ॥ (यज्ञोपवीतम् इस मन्त्र से यज्ञोपवीत पहिनावे) फिर सुग- चर्म देता यह मन्त्र पढे " मित्रस्य चक्षुः० दंड देता है ॥ ११॥ उस दंड को लेता हुवा यह मन्त्र पढ़े "योमेदंड: ॥ १२ ॥ कोई प्राचार्य दीक्षा के समान दंड को "दीर्घभत्र- को प्राप्त होता है कह कर दंड को देते हैं । १३ । फिर इस ब्रह्मचारी की अञ्जली को प्राचार्य अपनी अजली से भरती है। मापोहिया इन ३ तीन मन्त्रों से ॥ ॥४॥ तवः इस मन्त्र से पुनः इस को सूर्य दिखाता है ॥१५॥ फिर इस का दक्षिण हदय छूता है । “ममनते इस नन्त्र से १६. फिर इस का दसिण हाथ पकड़ कर प्राचार्य कहै को नामासि 11 शिष्य अपना नाम लेकर अहंभोः ३ ऐसे है ।१८। फिर इससे फहै “कस्यब्रह्मचार्यसि ऐसे १९ भवतः ऐसे शिष्य कहै । ऐसा कहने पर "इन्द्रस्य ब्रह्म, यह मंत्र पढ़े । २० । फिर इसे पोषण करता है । " मजापतये इस मन्त्र से ॥ २१॥ कपिएका प्रदक्षिणमग्निंपरीत्योपविशति । १ । अ. न्वारब्ध आज्याहुतीहु त्वा प्राशनातेऽथैन म छशास्ति 'ब्रह्मचार्यस्यपोऽशान कर्म कुरुमा- दिवा सुषुप्थावाचंयच्छसमिधमाधेह्यपीऽशान, इति । २ । अथा मै सावित्रीमन्वाहोत्तरतोऽग्नेः .

.४४
पारस्कर गृह्यसूत्रताये।
प्रत्यक मुखायोपविष्टायापमन्नाय समीक्षमाणाय
समीक्षिताय । ३ । दक्षिणतस्तिष्ठन आसीनाय
वैक ।। पच्छोऽर्द्धर्चशः सर्वाञ्च तृतीयेन सहान:
वर्तयन् ।। सवत्सरे पाण्मास्ये चतुर्विशत्यहे:
द्वादशाहे षडय हे वा।६। सास्त्वेष गायत्री
ब्राह्मणायानुब्रूयात् 'आग्नयो वै ब्राह्मणः'
इति श्रुतेः । ७ । त्रिष्टुभराजन्यस्य ।।
जगतीं वैश्यस्य । ६ सर्वपां वा गायत्रीम् ।
ब्रह्मचारी अग्नि की परिक्रमा कर के बैठता है ॥१॥
ब्रह्मा से छूकर आचार्य होम कर प्राशन कराकर
उपदेश देवे कि तू ब्रह्मचारी है । आचमन कर सन्ध्यादि
नित्य कर्म कर । दिन में मत सो । वाणी को सम्भाल !
अग्निहोत्र कर । भोजन से पूर्व आचमन कर । ऐसे ॥२॥ फिर
इस के लिये गायत्री देवे । अग्नि से उत्तर में पूर्वाभिमुख
आचार्य के पास बैठा आचार्य को देखता ही आचार्य ब्रह्मा-
चारी को देखता हो।३। अग्नि से दक्षिण में स्थित वी
बैठे को उपदेश करे कोई ऐसा मानते हैं । ४ । प्रथम वार
गायत्री का एक पाद । दूसरी बार दोपाद । तीसरी बार.
समस्त गायत्री को साथ २ बुलवावे ॥५॥ यज्ञोपवीत से १ वर्ष
६ मास, २४ दिन १२६ वा इदिन पीछे उपदेश करे ॥६॥ जल्दी
ही उसी दिन गायत्री ब्राह्मण को पढ़ावे क्यों कि "ब्राह्मण-
अग्नि प्रधान है, ऐमी श्रुति है ॥ ॥ त्रिष्टुप् क्षत्रिय कारा
जगती वैश्य का या सब का गायत्रीही (मन्त्र है) ॥१०॥

। काकगितका । ४५ कपिडका ४ . . अत्र अमिदाधानम् । १ । पाणिनाऽग्नि परिममूहति 'अग्ने सुश्रवः सुनवसं मा कुरु। यथा स्वमग्ने सुश्रुत्रः सुशुत्रा अस्येवं मासु नवः सौनत्रसं कुरु । यथात्वमग्ने देगनायज्ञ स्य निधिपा अस्येवमहं मनुष्याणां वेदस्य नि- धिपोभूयासम्, इति । २ . प्रदक्षिणमग्निंपर्यु- ध्यात्तिष्ठन्त्ममिधमादधाति ' अग्नये समिध- माहा बृहतेजातवेदसे । यथा त्वमग्ने समिधा समिध्यस एवमहमायुषा मेधया वर्चसा प्रजया पशुमिब्रह्मवर्चसेन समिन्धे जीवपुत्रो ममा- चार्योमेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्ण यशस्वी तेज स्वी ब्रह्मवर्चस्यन्नादो भूयास स्वाहा, इति । ३३ एवं द्वितीयां तथा तृतीयाम् । ४ । एषा त इति वा समुच्चयो यो। ५। पूर्ववत् परिसमूह- नपर्युक्षणे। ६ । पाणी प्रतष्य मुखं विमृष्टे 'त- नूपा अग्नेऽसि तन्वं मे पाह्यायुर्दा अग्नेऽस्या- युमै देहि बौदा अग्नेऽसि घी मे देहि, अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आपूण। ७ । मेधां मे ४६ पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये । देवः सविता मेधां देवी सरस्वती। मेधामश्विना देवावाधत्तां पुष्करखजी, इति ।। यहां समिधा अग्नि में छोड़ता है। ब्रह्मचारीहार्य से अग्नि को ( वे से ) समेटता है । "अग्ने सुश्रुव० * . त्यादि मन्त्रों से १२ ॥ अग्नि के चारों ओर जल छिड़क कर खड़ा होकर समिधा धरता है । 'अग्नये समि०. इस मन्त्र से।३ । ऐसे ही दूसरी तथा तीमरी समिद् भी ( उगावे) । ४ । वा “ एषाते " यजु०३ । १४ ।इस मन्त्र से या एक ही वार तीनों समिधा लगावे ॥५॥ प्रथम कहे अनुसार अग्नि को समेटे और चारों ओर जल छिड़ के ॥६॥ "तनूपामग्ने० ॥७॥ "मेधांदेवः ॥ ८॥ इन दोनों मन्त्रों से दोनों हाथ तपाकर मुख से लगावे ॥ कण्डिका ५ अत्र भिक्षाचर्य चरणम् ।। भवत्पूर्वी ब्रा- लाणी भिक्षेत ।२। भवन्मध्याथराजन्यः ।३। भवदन्त्यां वैश्यः । १ । तिस्रोऽप्रत्याख्यायिन्यः ।। षड् द्वादशाऽपरिमिता वा ६॥ मातरं प्रथ- मामेके । ।आचार्याय भैक्षं निवेदयित्वा वा- ग्यतोऽहःशेष तिष्ठेदित्येके । ।अहि श्रसन्नर- ण्यात् . समिधआहृत्यं तस्मिन्नग्ली पूर्वपदा- धाय वाचं विसृजते । । अधः शारयक्षारल- कास कण्डिका वणाशी स्यात् । १० । दण्डधारणमग्निपरिचरणं गुरुसुश्रूषा भिक्षाचर्या । ११ । मधुमाईममज्ज नोपर्यासन स्त्रीगमनानतादत्तादानानि वर्जयेत् ।१२। मष्टचत्वारिशद वर्षाणि वेद ब्रह्मचर्य चरेत् । १३ । द्वादश द्वादश वा प्रतिवेदम् ॥११॥ यावग्रहणं वा । १५ । वासा , सि शाणक्षौ. माविकानि । १६ । ऐणेयमजिनमुत्तरीयं ब्राह्म- णस्य। १ । रोरवयं राजन्यस्य । १८ । आज गव्यं वा वैश्यस्य । १६ । सर्वेषां गव्यमसति प्रधानत्वात् ॥२॥ मौजी रशना ब्राह्मणस्य ॥२१॥ धना राजन्यस्य । २२ । मौर्व वैश्यस्य । २३ । मुजामावे कुशाश्मन्तकपल्यजानाम् । २४ । पालाशो ब्राह्मणस्य दण्डः । २५ । वैल्वो रा. जन्यस्य । २६ । औदुम्बरो वैश्यस्य । २७ । सर्व वा सर्वेषाम् । २८ । आचार्यणाहूत उ- स्थाय प्रतिशृणुयात् ।२६ । शयानं चेदासीन आसीनं चेत् तिष्ठस्तिष्ठन्तं चेदभिकामवभिका- मन्तं चेदभिधावन् ।३० । स एवं वर्तमानोऽमु- प्राद्य वसत्यमुत्रादा बससीति तस्य स्नातकस्य 'पारस्कर गृह्यसूत्रमाध्ये कीर्तिर्भवति । ३१ । त्रयः स्नातका भवन्ति विदशास्नातको व्रतस्नातको विदावतस्नातक इति । ३२ । समाप्यवेदमसमाप्य व्रतं यः समा वर्तते स विद्यास्नातकः । ३३ । समाप्यवतमस- माप्य वेदं यः समावर्तते स व्रमानातकः ॥३४ । उभय समाप्य यः समावर्तल स विद्यावतस्ना- तक इति ! ३५ । आपोडशाद् वर्षाद् ब्राह्मण- स्यानसीत. काली भवतीति । ३६ । आद्वावि. शाद राजन्यस्य । ३७ । आचतुर्विधशादत्रै श्यस्य । ३८ । अत ऊर्ध्व पतितसावित्रीका भवन्ति । ३ । नैनान पनयेयुनर्नाध्यापयेयुर्नया- जयेयुन चैभिर्व्यहरेयुः । १० । कालातिक्रमे निः यतत्रत् । ४१ । त्रिपुरुषं पसितनावित्रीकाणा मपत्य संस्कारो नाध्यापनं च । १२ । तेषा संस्कारेप्सु त्यस्तासेनेष्वा काममधीयोरन् व्यवः हार्या भवन्तीति वचनात् ॥ १३ ॥ यहाँ शिक्षा के प्राचार का कथन है ॥ १ ॥ भवत शब्द प्रथम बोलकर ब्राह्मण भिक्षा मांगे । २ । भवात् मध्य कह क्षत्रिय 1३ । भवत् अन्त में दीजिये ब्राह्मण । मिता आप दीजिये, क्षत्रिय । भिक्षा दी। कह वैश्य।४ यथा-श्राप भिक्षा कांगड २ कगिटका। ge जिये महाराज । ऐसे वैश्य मांगे । ( पूर्व दिन ) ऐमी तीन त्रियों से मांगे जो नकार न करें । ५। या १९ से मांगे।६। कोई आचार्य प्रथम माता से मांगे ऐसा कहते हैं 191 आचार्य के सामने भिक्षा लाई भेटकर चुपचाप शेषदिन खड़ा रहे। यह किन्ही का मत है। । हरे वृक्षों को न काट कर ( अहिंसासे) समिधा लावे । अग्नि में छोड़े वाणी को बोले मन्त्र पढ़े । ९ । भूमि पर सेवि, क्षार लवण न खावे ॥ १०॥ दपष्ट रक्खे, अग्नि सेवा “गुरुसुश्रूषा"भिक्षाचर्याकरे ॥१९॥ भिक्षा में शहद और मांस नले (अर्यात मांसाहारी जनों के घर से भिक्षा न छे) बहुत स्नान,ऊंचे पर बैठना स्त्रियों का संग मिथ्याभाषण, विना दी हुई वस्तु लेना, यहवर्जित है ।१२ ४८ वर्ष तक वेदपढ़े ब्रह्मचर्य करे १३॥ १।१२ वर्ष एक रवेद पढ़े ॥१४॥ याजवतक पढ़ सके।शवन सया, शिवत्र सण, रेशम या ऊन के हों ऐणेय छाल वालण को।१७। रुरु कीक्षत्रिय को १० अज बागी की वैश्य को ॥१९॥ उक्त छाउ नक्षतौ सव गौली ही रखें क्योंकि गौ प्रधान है ।२०। मूंज की तगड़ी ब्राह्मण को ।२९॥ क्षत्रिय की धनुष के ज्या होरे की ।२। वैश्योंको माले के वचन की ।२३। मूंज न होती कुशा अवश की बनावे ।२४। ढाक का दंड ब्राह्मण का २॥ वेल का क्षत्रिय का ।२६। गूलर का वैश्य का । २७ । या सत्र दंड सब के । २८ । प्राचार्य के बुलाने पर उठकर सुने । ९ । साता हो तो वेठ कर । वैठे हों तो, खड़े होकर। खड़े हों तो कुछ चलकर । धनते हों तो दौड़कर ॥३॥ *इन ब्रह्मचारियों के ओढ़ने के वस्ा पर उक्तचित्र बने हों जिससे ब्रह्मचारी के वस्त्र पर निशान मार्क समझ जावे (संपादक) 90 । - पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये । छात्र ऐसे रहता है यदि स्नातक ऐसे न रहे तो अपयश दोता है । ३१ । तीन प्रकार के स्नातक होते हैं । विद्या एनालक, व्रतस्नातक, विद्या व्रतस्नातक । ३२ । वेद समाप्त करको व्रतसमाप्त न करके वर्त वह यिद्यास्मातक है । ३३ । व्रतसमात कर वेद समाप्त न करके वर्त वाह व्रतस्नातक है ॥३४॥ वेद और व्रत दोनों को समाप्त करे वह विद्यावत स्नातक है ॥३५॥ ब्राह्मण का १६ वर्ष तक अनतीतकाल होता है । ३६ । क्षत्रिय का २२ वर्ष तक 130 वैश्य का २४तक ३८. इस के बाद सावित्री से पतित हो जाते हैं । ३० । न इन्हें यज्ञोपवीत दे न वेद पढ़ावे न यज्ञ करावे न इन से व्यवहार करें । ४० । समय बीतने पर श्रीत सूत्र में नियत किये अनादिष्ट प्रायश्चित्त ॥४॥ जिन के ३ पीढी तक सावित्री पतित हो जावें उन की सन्तान हो म पढ़ावे । ४२ । वह यदि संस्कार चाहे तो व्रात्यस्तोम इष्टि करें तो भले ही पढ़ें व्यवहार योग्य होते हैं ऐसा वचन है ॥ ४३ ॥ कविष्टका ६ (समावर्तन संस्कार ) वेदसमाप्य स्नायात् । १ । ब्रह्मचर्य वा. ऽष्टाचत्वारि शकम् ।२ । द्वादशकेऽप्येके । ३ । गुरुणानुज्ञातः ।। विथिर्विधेयस्तर्क- श्ववेदः । ५ । षडङ्गमेके । ६ । न कल्पमात्रे : ७ । कामन्नु याज्ञिकस्य । ८ । उपसंगृह्य गुरु समिधोऽभ्याधाय परिणितस्योत्तरतः कुशेषु मागग्रेषु पुरस्तात् स्थित्वाऽष्टानामुदकुम्भानाम् ।

। काण्ड २ कपिडका।६। #. ।। ये अप्स्वन्तरमायः प्रविष्टोगोय उपगहियो मयूखोमनोहाऽस्खलो विरुजस्तनद्रपिरिन्द्रिय- हाअतितान्जामि । योरोचनस्तमिहगृहा- मिः इत्येकस्मादपोगृहीत्वा । १० । तेनाभिषि- जुने तेन 'मामाभिषिञ्चामि त्रिय यशसे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसायः इति । ११ । येन श्रियमकृणुतां येनावमृशता/सुराम् । येनाक्ष्यावस्यषिचतां यहां सदश्विना यश इति । १२ । आपोहिष्टा, इति च प्रत्यूचम् । १३ । त्रिभिस्तूष्णीमितरैः । १४ । उदुत्तममितिमेखलामुन्मुच्य दण्डं निधा- य बासेोऽन्यत् परिधागादित्यमुपतिष्टते । १५ । उद्यनभ्राजभूष्णुरिन्द्रो मरुद्विरस्थात् प्रातर्याव- भिरस्थाद् दशमनिरसि दशसनि मा कुर्वाविद- मागमय ॥ उद्यन् भाजभृष्णरिन्द्रो मरुद्विर- स्थाद् दिवायाधभिरस्थाच्छतसनिरसि शससनि मा कुविदन्मागमय । उद्यन भाजभूष्णुरिन्द्रों मरुद्विरस्थात् सापयभिरस्थात् सहखसनिरसिं सहस्त्रसनिं मा कुर्वाधिदन्मा गमय , इति । ! १६ । दधि तिलान्वा प्राश्य जटालोभनखानि सहृत्यौदुम्बरेण दन्तान् घावेत । अन्नादाय :

--- ५२ पारस्कर गृह्यसूत्रताष्ये । 'व्य दध्वंसामोराजायमागमत् । स मे मुखं प्र- मायते यशसा च भगेन च, इति । १७ । उ- रसाद्य पुन: स्नात्वाऽनुलेपनं नासिकयार्म खस्य घोपगृह णीते 'प्राणापानी मे तर्पय, चक्षुमै सर्प- य, श्रोत्रं मे सर्पय , इसि । १८ । 'पितरःशुन्ध- ध्वम्, इति पाण्यो रवनेजनं दक्षिणा निपिच्या- नुलिप्यजपेत् 'सुचक्षा अहमक्षीभ्यां भूयाससु- वर्चा मुखेन । सुश्रुत् कर्णाभ्यां भूयासम्, इति । १९ । अहतं वासो धौतं वाऽमैत्रेणाच्छादयीत 'परिधास्य यशोधास्य दीर्घायुस्वाय जरदष्टि- रस्मि । शतं च जीवामि शरदः पुरुचीरायस्पो- घममि संव्ययिष्य, इति । २० । अथोत्तरीयम् यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेन्द्रा हरुपती यशो भगश्च मा · विदद् यशो मा प्रतिपदा- ताम्' इति । २१ । एक चेत् पूर्वस्योत्तरवर्गण प्रच्छादयीत । २२ । मुमनसः प्रतिगृह्णाति 'या आहरज्जमदगिः श्राद्धाय मेधाय कामायेन्द्रि- यायाताअहंप्रतिगृह्णामियशसाचभगेनचाइति।२३। अथाषबधनीत' यद् यशोऽसरसामिन्द्रश्च कार "कायह २ करिडका ।। विपुलं एथु। तन संग्रधिसाः सुमनस आबध्नामि यशे। मयिः इति । २४ । उष्णीषेण शिरो वेष्ट: यते ' युवा सुवासाः ' इति । २५ । 'अलंकर- णमांस, भूयोऽलंकरणं भूयात् इति कर्णवेष्टको । २६ । वृत्रस्य ' इत्यङ्क्ते अक्षिणी । २७ । रोचिष्णरसि' इत्यात्मानमादर्श प्रेक्षते ।२८। छत्रं प्रतिगृह णाति ब्रहस्पते श्छदिरसि पाप्मनो मा मन्तधहि तेजसोयशसा माऽन्तर्धहि' इति ।२६॥ 'प्रतिष्ठस्थो विश्वतो मा पातम् इत्युपानहौं प्रति मुज्जते । ३० । 'विश्वाभ्यो मानाष्ट्राभ्यस्परिपाहि सर्वतः इति वैणवं दण्डमादत्ते । ३१ । दन्नप्र- क्षालनादीनि नित्यमपि वास श्छत्रापानहश्चा- पूर्वाणि घेन्मन्त्रः ॥ ३२ ॥ वेद समास करके: स्नान करै (इमी लिये स्नातक कहते. हैं)।१। या वर्ष तक पढ़ के ही स्नातक हो ।२। कोई १२ वर्ष के पीछे ही स्नातक बनाते हैं । ३ । गुरु की आज्ञा पाकर ही.।४। विधि विधेय वेद हैं। कोई छः अङ्गों को वेद कहते हैं।६। कल्पमात्र को नहीं। ७॥ जव यज के कर्म कराने वाले की इच्छा होतवही स्नातक हो । ८ । ( विधिः ) प्राचार्य के चरण स्पर्श कर अग्नि में समिधा छोड़कर अग्नि से उत्तर की ओर अग्र भाग, बिछाई कुशों पर: घड़े जल के भरे हुवों से ।। . ।

. । पारस्कर गृह्यसूत्र भाव्य "ये अप० " इस मन्त्र से एक घड़े का जल लेकर । १० । उस से अभिषेक करै । तेनामि० इस मन्त्र १११ फिर येन नियमकृणु० इस से । १२ । फिर आपोहिया इन ३ मन्त्रों से ३।४।५ घड़े से । १३ । शेष 19। इन तीन घड़ो धुप चाप अभिषेक करे । १४ । उदुत्तमम सगड़ी छोड़ दे । दयह को धर कर अन्य वस्त्र पहिन कर सूर्य के सामने खड़ा होता है । १५ । उद्यन वाजि० * इत्यादि मन्त्र पढ़ता है । १६ । दही वा तिल खाकर जटा लोम नखों को कटाकर गूलर को दतौन से दान्त शुद्ध करें । “अनाद्याय ऐसे मन्त्र पड़े ।१७. उवटन मलकर फिर स्नान करें "प्राणा- पानी में उस मन्त्र से मुखनासा पर जन्दन लगावे ॥१८॥ "पितरः शुन्धध्वम् कहकर दक्षिण को मुखकर दोनों हाथों से जल देकर चन्दन लगाता हुवा "शुचना०" ऐसे जप करें। १९ । नवीन वध वा धुले यस धोती “ परिधास्यै. इस मन्त्र से पहिने । २० ।' यशसामा० " इस मन्त्र से दुपट्टा भोढ़े । २१ । यदि १ ही धोती हो तो पहिले मन्त्र से आधी बांधले उत्तर मन्त्र से प्राधी ओढलेवे । २२ । यामाहर एजमदग्निः- इस'मन्त्र से प्राचार्य से पुष्प माला लेवे ॥२३॥ यद्यशो०- इस. मन्त्र में गले में पहिने । २४ । पगड़ी से शिर को लपेटता है “ युवा इस मन्त्र से । २५। "मलं करणमसि इस मन्त्र से कान लपेटे । २६ । वत्रस्य. आंखों में अञ्जन डाले । २७ । " रोधिष्णुरक्षि० "इस मन्त्र से दर्पण देखे । २८ । छत्र लेता है " वृहस्पते. इस मन्त्र से 18 | "प्रतिष्ठेस्था० मन्त्र में जूता पहिने ३० "विश्वाम्यो मन्त्र से वांस का दण्ड लेता है । ३१ । दन्तधावनादि वक्ष हाता जूता जब २ नवीन पहिने तब २ मन्त्र पढ़े ॥ ३२ ॥ . ।

काह२ कागडका। ५५ . कगिडका ( स्नातक के लिये यम )। स्नातस्य यमान् वक्ष्यामः । १। कामा- दित्तरः ॥ २ ॥ नृत्यगीतबादित्राणि न कुर्यात्र च गच्छेत् ॥ ३ ॥ कामं तु 'गीतं गायति वैव गीते वा रमते , इति श्रुतीपरम् । १ । क्षेमे मक्तं ग्रामान्तरं न गच्छेन च धावेत् । ५। उद- पानावेक्षण वृक्षारोहण फल प्रपतन सन्धिसर्पण विकृतस्नान विषमलङ्घन शुष्कवदन सन्ध्या- दित्यप्रेक्षण भैक्षणानि न कुर्यात् 'म ह वै स्नात्वा मितापह वै स्नात्वा भिक्षां जयति इति श्रुतेः । ६ । वर्षत्यप्रावृतो ब्रजेन 'अयं मे वजः पाप्मानमपहनत्' इति । ७ । अप्स्वा- त्मानं नावेक्षेत । ८ । अजातलोनी विपु/सी. थपण्डञ्च नोण्हसेत् । ६ । गर्मिणो विजनन्ये- ति ब्रूयात् । १०। सकुलमिति नकुलम् ॥ ११ ॥ भगालमिति कपालम् ॥ १२ ॥ मणिधनुरितीन्द्र धनः ॥ १३ ॥ गां धयन्ती परस्मै नाचक्षीत १. ॥ १४ ॥ उर्वरायामनन्तर्हितायां भूमावत्सस्ति- ठन्न मूत्र पुरीषे कुर्यात् ॥ १५ ॥ स्वयं विशाणेन काष्ठन प्रमजीत ॥१६॥ विकृतं वासो नाच्छा-: ॥

पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये
दयीत ॥ १७ ॥ द्रढनती वधत्र: स्यात् सर्वत
आत्मनं गोपायेत् सर्वेषां मित्र मिव ॥१८॥ ॥
करिडका
अर्थ-स्नातक के यम कहते हैं। १। इन यमो को अन्य
पुरुष
भी चाहे तो पालन करै ।। नाचना, गाना, बजाना
न स्वयं करै न इन कार्यों में जावे । ३ । “ गीतं गायति० "
"गीत गाता है वा गीत से प्रसन्न होता है। यह श्रुति है इस
से सामवेद गानामात्र चाहै तो दोष नहीं।४।विमा आपत्ति
समय के रात में दूसरे ग्राम में न जावे न दौड़े । ५। कूप
झांकना वृक्षों पर चढ़ना फल झाड़ना नस चटकाना, नग्न
स्नानऊंचे नीचे में कूदना कठोर भाषण, उदय अस्त होते
सूर्य का देखना और भिक्षा मांगना यह कर्म न करें । "नह-
वै० शतपथ १०।३।३।७ भिक्षा वर्जित है।६। वर्षा में
भी छन न लगावे । अयं मैं मन्त्र पढ़ता हुवा । ७। पानी में
मुख न देखे । ८ । जब तक रोमन भाये हों ऐसी वाला
स्त्री और नपंसफ से उपहास हंसी न करें (विवाह न करै .
यह तात्पर्य है । । । । गर्भिणी खी को विजन्या कह कर
बोले
१०
। मौले को
नकुल न कह सकुल कहै ।१११ कपाल
को भगाल । १२ । इन्द्र धनु को मणि धनुष कहै ।१२० बछड़े
को चुंखोती गौ को किसी को न बतावे । १४ । जमे हुवे या
बुये हुवे खेत में या चलते २ या खड़े २ विटा मूत्र न करे। १५ ।
स्वयं गिरी हुई लकड़ी से गुद को पौछे । फिर मट्टो जल मे
। । १६ । बिगड़ा (विकृत) वस्त्र न ओढ़े । १७ । टूढ़
प्रतिज्ञ रक्षक सब का मित्र हो ॥ १८ ॥

५. काय कमिका - करिडका (स्नातक के व्रत) प्रक्षिप्त तिस्रो रानीव्रतं चरेत् । १। * अमाईसा.. श्यमृण्मयपायी । २ । खीशूद्रशवकृष्णशकुनि शुनांचादर्शनमसम्भाषा च तैः । ३। शवशूद्र- सूतकान्नानि.च नादात् । १ । मूत्रपुरीषेष्ठीवनं चातपे न कुर्यात् सूर्याच्चारमानं नान्तर्दधीत।५। सप्त नोदकार्थान् कुर्वीत । ६ । अवज्योत्य रात्री भोजनम् । । सत्यवदनमेव वा । । दीक्षितो- यातपादौनि कुर्यात् प्रवर्यवांश्चेत् ।। कणिका समावर्तन से तीन राततक व्रतकरै । मांस न खावे और मही के पात्र में पानी न पीवे । त्री, शूद्र, शव, काले पक्षी, कुत्ता इनको.न देखें न इन से बोले । ३ । शव शूद्र और सूतक का अन्न न खावे । ४ धूप में मूत्र विष्टा थूकना न करै छत्री यह समस्त कण्डिका ही प्रक्षिप्त प्रतीत होती है। जब के०७ में स्नातक के निमम कह चुके थे तब उसी में यह सूत्र भी. घर देते । मांस का मामउड़द अर्थ भी कर दिया तो क्या मही के पात्र में भोजन क्यों न करें। गर्म जल से स्नानादि सभी क्रिया अंड वरड हैं । यमो के वर्णन में पहले ही' यमान् वक्ष्यामः " ऐसी प्रतिज्ञा है भागे पीछे सभी कण्डिकाओं के प्रारम्भ में प्रतिज्ञा हैं इस कं० में कोई प्रतिज्ञा भी नहीं है ॥

पारस्कर गद्यसूत्रभाज्ये यूपमें भी न लगावे । । गरम जल से स्नान संन्धादि करे ।६। रात्रि को दीपक जलाकर भोजन करै ।। अथवा सन नियमों के बदले सत्य भाषण ही करैः । ८ । दीक्षित समर्थ हो तो उक्त नियम कर ॥ ॥ कपिडका अथातः पञ्च महायज्ञाः । १ । वैश्वदेवाद- नात् पर्युक्ष्य स्वाहाकारैर्जुहुयाद ब्रह्मणे प्रजा. पतये गृह्याभ्यः । कश्यपायानमतय इति । २। भूतगृह्येभ्यो मणिके त्रीन् पर्जन्यायादयः पृथि- व्यै । ३ । धात्रे विधात्रे च द्वार्ययोः । ४ । प्रति दिशां वायवे दिशां च । ५. मध्ये श्रीन् ब्रह्म- णोऽन्तरिक्षाय सूर्याय । ६ । विश्वेभ्यो देवेभ्यों विश्वेभ्यश्च भूतेभ्यस्तेषामुत्तरतः । ७ । उषसे भूतानां घ. पतये परम् । ८ । पितृभ्यः स्वधाः नम इति दक्षिणतः । पात्रं निर्णिज्योत्तरा परस्यां दिशि निनयेन् 'यक्ष्मैलेत्ते, इति । १० । उधृत्याग्रं ब्राह्मणामांवनेज्य ददात् 'हन्तते, इति । ११ । यथार्ह भिक्ष कानतिथीच सम्भ: जरन् । १२ । बालज्येष्ठा गृह्या यथार्हमश्नीयः । १३ । पश्चात् गृहपतिः पत्नी च । १४ । पूर्वो वा फूल कायड २ कडिका ।। गृहपतिः सरुमादुस्वादिष्टं गृहपतिः पूर्वोऽतिधि- भ्योऽश्नीयाद्, इति त्रुते । १५ । अहरहः स्वाहा कुर्यादनाभावे केनचिदाकाष्ठाद देवेभ्यः पित्तभ्यो भनुष्येभ्य श्नोदपात्रात् । १६ ॥६॥ कायष्ठका अब आगे पञ्चयज्ञ हैं । १ । वैश्वदेव के अन्न से पर्युक्षण कर स्वाहा शब्द लगाकर ब्रह्मणे, प्रजापतये, गयाभ्यः, श्य- पाय, अनुमतये, इन का होम करै ।२। पर्जन्यायनमः, अद्भयो नमः पृथिव्यै नमः ऐसे ३ बलि देवे । ३ धात्रे, विधाने, और हार्ययोः नमः कह बलि दे । ४ । पूर्वादि दिशाओं में दिशाओं को धाय स्वाहा कह कर धलि घरे । ५। मध्यमे बलि ब्रह्मणे खा० । अन्तरिक्षाय स्वाहा सूर्याच खा०।६। उत्तर में विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा० विवेभ्यो भूतेभ्यः । ७॥ उम से भागे उषसे और भूतानाम् पतये स्वाहा नमः ।। पितृभ्यः स्वधानमः ऐसे कह कर दक्षिण में ।।। पात्र को धोकर उत्तर की ओर संघादे “ यक्ष्मैतत्ते यह कहै । १०॥ हन्तते कहकर ब्राहाम के आगे भोजन देवे । १९ । यथायोग्य भिभुकों को अतिथियों को भी देवे ।१२। घर के बालक बड़े- सब यथायोग्य भोजन करें। १३ । फिर गृहपति और उसकी पत्नी भी भोजन करें ।१४। या पहले गृहपति खावे पीछे पत्नी खावे। क्योंकि अतिथि पूर्व जिमाकर पहिले गृहपति खावे यह श्रुत है ।१५॥ नित्य र होम करे। अन्न न होतो किसी समिधा से ही देवों मनुष्यों पितरों को जड के पात्र से प्रसन्न करै १५ ३ . थ ६० 1 ' • पारस्कर गृह्यसूत्र भाष्ये कशिडका १० (अध्ययनारम्भ )। अथासोऽध्यायोपाकर्म । १ । ओषधीनां प्रादुर्भावे प्रवणेन प्रावण्या पौर्णमास्याश्रा- वणस्य पञ्चमी हस्तेन धा । २। आज्यभागा- विष्ट्राऽऽज्याहुतीर्जुहोति । ३ । 'पृथिव्या अग्नये, इन्य वेदे। ४ । अन्तरिक्षाय वायवे, इति यजु- वैदे । ५ । 'दिवे सूर्याय, इति सामवेदे।६। 'विम्यनन्द्रमसे, इत्यथर्ववेदे। । 'ब्रह्मणे छन्दो, भ्यश्न, इप्ति सर्वत्र । प्रजापतये देवेभ्य ऋ- षिभ्यः श्रद्धायै मेधार्य सदस्पतयेऽनुमतये इति च ।। एतदेवनादेशन विसर्गेषु । १५ । सदैसम्पतिम्', इत्यक्षतघानास्त्रिः । सर्वेऽनु- पठेयुः । १२ । हुत्याहुत्यौदुम्बर्यस्तिस्तितः समिध आदधघुरा सपलाशा घृताक्ताः वित्र्या । १६ । ब्रह्मचारिणश्चपूर्वकल्पेन । १४ शत्रो भवन्तु, इत्यक्षतधाना अखादन्तः ,प्रा. श्नीयः । १५ ।, दधिक्रावणे, इति भक्षयेयुः । १६ । स यावन्तं गणमिच्छेत् सावंतस्तिलाना.. कर्षफलके जुहुयात् सावित्र्या: इत्यनुवाकेनवाः । १७ । प्राशनान्ते प्रत्यङ्मुखे. - शुक्र,ज्योतिः कॉ२ करिडका ।१०। भ्य उपविष्टेभ्य ओंकारमुक्त्वा त्रिश्नसावित्रिम- ध्यायादीनु प्रदूयात् । १८ । ऋषिमुखानि बह- चानामारा पर्वाणि छन्दोगानाम्।२०। सूक्तान्य- धर्षणाम् ॥२१॥ सर्वे जपन्ति सहनोऽस्तु सहनो- ऽवतु सहन इंदं वीर्यवदस्तुब्रह्म । इन्द्रस्तद्वेद येन यथा नविद्विषामहे, इति । २२ त्रिरात्रं नाधी. योरन् । २३ । लोमनखानामनिकृन्तनम् । २४ । एके प्रागुत्सात् । २५ । कशिडका १० भब पढ़ने का फर्म कहते है ।। श्रोषधियों के उगने पर अवण नक्षत्र युक्त श्रावणी पूर्णिमा को वा श्रावण की पञ्चमी, हस्त नक्षत्र से युक्तहो ।२। आज्यभागाहुति करके आज्याहुति देना है। ३ । पृधिव्य स्वा०. अग्नये स्वाहा यह ऋग्वेद पाठ | सन्तरिक्षायस्वाहा वायवे स्वाहा यह यजुर्वेद पढ़ने दिवेस्खा सूर्यायवाः यह सामवेद में ६'दग्भ्यःखाचन्द्र मसे स्वाहा ऐसा अथर्व वेद में 17 प्रक्षणे स्वा० और छन्दोभ्याः स्वाहा यह सब वेदों में ।। प्रजापतये । देवेभ्यः । ऋषिभ्य। श्रद्धायै, मेधाये, सदसस्पतये, अनुमतये ( स्वाहा लगाकर ). in ऐसे ही यज्ञोपवीतं और समावर्तनों में करै । १० । सद संस्पति० ( य०३२ । १३ ) मन्त्र से चावलों की खोल से आचार्य ३ आहुति देखे । १९ । मन्त्र सम शिष्य साथ पढ़ें ।२। होम कर करके गूलर की ३.३ मिधा पत्तों सहित " .

६२
पढ़कर लेवें
पारस्कर गृह्यमूत्रभाष्ये।
गीली पृत में भिगो कर गायत्री
आचार्य
के साघ २ लचारी भी होमें । १४ ।
करिडका १९ ( अनध्याय प्रकरण ) ।
वातेऽमावास्याया सर्वानध्यायः १ । नाट्टा.
शनेचोल्काऽवस्फर्जदभूमिश्चलनारन्युत्पातेवृत्तु
सन्धिपुचा कालात् ।। उत्सृष्टेष्मदर्शनेसर्वरूपे
चत्रिरात्रं त्रिसन्ध्यं वा । ३ । भुक्तबाऽऽर्द्रपाणि
रुदा के निशायासन्धिवेलयोरन्तःशवग्रामेऽन्त
दिवाकीत्यै । १ । धावतोऽभिशस्तपतितदर्शना-
श्वार्याभ्युदये पु च तत्कालम् ।। नीहारे वादित्र
शब्द आर्त स्वने ग्रामान्ते श्मशाने श्वंगर्दमोलू क
शृगालसामशब्देषु शिष्टाचरिते च तत्कालमा
गुरौप्रेतेऽपोऽम्यवेयाद, दशरात्रं चोपरमेत् । ७ ।
सतानूनस्चिणि सब्रह्मचारिणिच त्रिरात्रसाएक
रानमसब्रह्मचारिणि ।। अर्द्धषष्ठान् मासानधी
त्योत्सृजेयुः। अर्द्धसप्तमान्या ।१११ अथेमामृचं
जंपन्ति 'उभा कवी युवा यो नो धर्मः परापतत् ।
परिसस्यस्य धर्मणो विसरयानि विसृजामहे,
इति । १२ । त्रिरात्रसहोण्य विपप्रतिष्ठेरन्।१३।।
करिहका ११
अतिवायु चलते दिन और सब अमावसों को छुडी है ।।

कायत २ फायहका । ६३ बाद भोजन * उल्कापात बादल गर्जने पर भूमि कोप अग्नि पड़ोस में लगने पर ऋतु परिवर्तन के दिन १ । १ दिन छुट्टी हो । २। वेद समाप्ति और जब समस्त दिन मेघदर्शन न हो तीन रात या इ सन्ध्या का अनध्याय हो।। भोजन के पीछे यावत् भीगे हाथ रहैं । जल में नौका पर बैठे रात में, सायं प्रातः सन्ध्या के समय, ग्राम में मुर्दा पड़ा हो ॥ या दिया कीर्ति कोई चाराहाल पास हो तब तक वैद न पड़े। छुही है। दौड़ते पाखण्डी, पतित के देखते हुवे। नाश्चर्य देखने के समय (उसी समय तक) वेद न पढ़े । कुहरा, वर्षते वाजा बजते, हा हा कार में, सिवाने पर श्मशान में, कुत्ने गर्थे उल्लू गीदड़ बोलते में, सामवेद के, गाते समय और किसी सम्मान के आने पर उस समयं न पढ़े । ६ । गुरु के मरने में करे और १० दिन तक पठनबन्द करे।७। सोमयाजी ऋत्विज के और ब्रह्मचारी सहाध्यायी के मरने पर ३ दिन । । झ व्रलचारी सहाध्यायी की मृत्यु पर १ दिनअनध्याय करे ।। साढ़े छः मास पढ़कर छुट्टी करें ( वेद की ) २० या ॥ मास । ११। फिर गुरु शिष्य साथ इस ऋचा को आपैं “ उभाकवी०५ । १२ । तीन रात गुरुकुल में छुट्टी मनाकर अलग हो जावे । १३ । कपिठका १२ ( उत्सर्ग कर्म ) पौषस्य रोहिण्यां मध्यमायां वाऽष्टकाया- मध्याय..तुत्सृजेग्न् । १ । उदकान्तं बांश्छन्दासिवेदानुषोन् पुराणाचार्यान् संवत्सर * जिस दिन बहुत श्रद्धा से प्रीति भोजादि हुधा हो उस उस दिन अधिक खाया जाता है ।। पर जल स्नान - गत्वादि दै- पारस्कर गृह्यसूत्रमध्ये. च सावपवं पितनाचार्गान स्वांश्चतर्पयेयुः ॥२॥ सावित्री चतुरन्द्रत्य विरता: स्म इति प्रयः ।। क्षपणं प्रचनं च पूर्वधन् ।। करिडका १२ पौप रोहिणी नक्षत्र में या मावस या अष्टमी को पढ़ना छोड़ दे । १ । जलाशय पर जा के जल से देवतों छन्दों, वेदों, ऋषियों, पुराणाचायौं, गन्धवों ,अन्यआचार्यो संवत्सर को और महीनों को । पितरो-ऋतुओं को अपने आचार्यों को भी वृप्त करें । २। गायत्री चार वार पढ़ कर "विरताः स्म ऐसे फहै। दूसरे आकर पूर्व के समान फिर पड़े तब अनध्याय करे।४। कगिडका १३ ( प्रथम हल योजन ) पुण्याहे लाङ्गलयोजन ज्येष्ठया वेन्द्रदेव- स्यम्। १। इन्द्रं पर्जन्यमश्विनी मरुत उदला. काश्यप, स्थातिकारीसीतानुमतिं दध्ना तगडुले गन्धरक्षतैषिष्ट्वाऽनदु हो.मधुघृते प्राशयेत् । २ । 'सीरायुज्जन्ति, इति योजयेत् ।३। 'शुनसुफाला:, इति कृषेत्फालं बालभेत निवांन्युपदेशाद वपनानुषङ्गाच्च।। अग्रयमभिषिच्याकृष्ठं तदाकृ. घेयः ।।स्थालीपाकस्य पूर्ववद्धदेवता यजेदुभयो- ब्राहियक्योः प्रवपन् मीतायशेषतते ब्राह्म- णभोजनम् ॥

फाड २ कपिका-१३ । १४ ६५ कडिका १३ । पवित्र दिन हल जोते । इन्द्र देवता के ज्येष्ठा नक्षत्र में ।१ । इन्द्र, पर्जन्य, अश्विनी दोनों मरुत् उदल काश्यप, खातिकारी सीता औरअनुमति को दही चावल गुगन्धों और जौ से माहुति देकर अनुह बैल को वृत. मीठा चटाये । सीरा युजन्ति० य०१२ । ६७ मन्त्र पढ़कर हल जोड़े । ३ । शुन- अनुफालाः य० १२॥ ६९ इस से फाली को ठीक करे या जोते । ४ । या अग्नि में माहुति देते समय ही इन मन्त्रों को पढ़े हल जोड़ते जातते समय न पढ़े । ॥ बिना जते खेत में हल जोते और उत्तम बैलको उस दिन पहिले पानी से साफ़ करले । ६ । जब २ धान जो प्रादि बोने हो तभी पूर्व कहें देवों को स्थाली पाक से होम करे । और सीता यज्ञ में भी 19। फिर ब्राह्मण जिमाधे । ८ ॥ १३ ॥ फरिष्ठका १४ (अवपा कर्म) । अथात: शत्रणा कर्म ।। शावण्यां पौ. मास्याम् ।२। स्थालीपाकापयित्वाऽक्षतधा- नाश्चैककपालं पुरोडाशं धानानां भूयसोः पिष्ट्वा- उज्यभागाविष्टाऽऽज्याहुनीजुहोति ।३। अपश्वेन- पदा जहि पूर्वण चापरेण च सप्न चवारुणीरिमा: प्रजा:सर्वाश्चराजबान्धवैःस्वाहाहान श्वेतस्या- ध्याचारेऽहिददर्श कश्शन। श्वेताय वैदाय नमः स्वाहा इति । स्थालोपाकस्य जुहोति विष्णवे, नवणाय,नावण्यै पौर्णमास्यै, वर्षाभ्यश्चेति ।६।

पारस्कर गृह्यसूत्रमध्ये धानावन्तमिति धानानाम्॥धृता तान् सक्तूतून् सम्यो जहोति ।। भाग्य पाण्डपार्थिवाना सर्पाणामधि पतये स्वाहा, श्वेलवायवान्तरिक्षा- पासर्पाणामधिपतयेस्वाहा, इति। सर्वहुत मेक कपालं'ध्रुवाय भौमाय स्वाहा' इति १०॥ प्राशनान्ते सतना- मेकदेश, भूपैन्युप्योपनिष्फम्य बहिः शालायाः स्थगिष्ठलमुप- लिप्योस्कायां ध्रियमाणायां'माग्न्तरागमत'इत्युक्तवा वाग्यतः सोनवनेजयति । १९ । आग्नेय पाण्डुपार्थिवाना, सर्पाणा- मधिपतयेज्वनिक्षव, श्वेत वायवान्तरिक्षाणा सणामधि- पतेयनेमिक्षव, अभिभूः चोर्यदिव्याना सर्माणामधिपतेऽव- नेनिव' इति ।१२। यथाऽवनिक्तं दोवघातसक्तूनुत्सर्पेभ्यो बलिथं हरति । १५ । आग्नेय पाठपार्थिवानार्थ सर्पाणा माधिपते एषते बलिः, श्वेतवानवान्तरिक्षामा सामधि- पत एषते बलिः, अभिभूः सौर्यदिव्याना, सर्पाणामतिपत एषते बलिः' इति । १५ । भवनेच्य पूर्ववत् कडूतैः प्रलिखति । १५ । भाग्नेयपछुपा र्थिवाना साणामधिपते प्रलिखस्व श्वेतवायवान्तरिक्षाणा सणामधिपते प्रलिखस्व, अभिभूः सौर्यदिव्या सणामधिपते पलिखस्व' इति ।१६। अन्ज- भानुलेपन सजश्चाजखानुलिम्पस्व स्त्रजोपिनास्त्र, इति १९७॥ सक्तुशेष स्थण्डिले न्युप्योदपानेणोपनिनीयोपतिष्ठते 'नमोस्तु सभ्यः, इति तिसृभिः । १८ । स यावत् कामयेत 'न सर्पा अभ्युपेयुरिति तावत् सन्ततयोदधारया निवेशनं त्रिः परिषिञ्चनपरीयात् ' अपवत पदा जहीति ' द्वाभ्याम् । १९ । दर्वीशूर्प प्रक्षाल्य प्रतक्ष्य प्रयच्छति । २० द्वारदेश १४ का भाषार्थ काण्ड २ कमिहका १४ १५ मार्जयन्तः 'मापोहिष्ठा, इति तिसृभिः ॥२९॥ अनुगुप्तमेत सक्तुशेष निघाय ततोऽस्तमितेऽस्तमिते ऽग्निं परिचर्य दों पघात : सस्तून् सबैम्पो बलिं हस्सेदाग्रहायण्या: ।२२। त परन्तं नान्तरेण गच्छेयुः । २३ । दाधमनं प्रक्षाल्य निद- धाति ।२४। धानाः प्रानन्त्यस " स्यूताः ॥२५॥ ततो ब्राह्मण भोजनम् । २६ । १४ ॥ कपिडका अब आगे श्रवणा कर्म है । श्रावणी पौर्णिमा में स्थाली पाक पकाकर सत्तूरे जौ की खील कुछ सत्तू जौ के भौर पुरोहाश बनावे, दो आज्य भाग होमे । आज्याहुति देता है।३। अपश्वेतपदा० । ४ । नवैश्वेतस्याः । ५ । इन से आहुति देकर स्थालीपाक से होमे । विष्णवे, श्रवणाय, श्रावणय, पौर्णमास्य, वर्षाभ्यः इत्यादि स्वाहान्त आहुति दे ।६। धानावन्तम् ( य०२० । २९ ) से खीलों को होमे घी मिलाकर सत्तुओं से सपों के लिये होम करै । ८ । अग्नेयः आदि मन्त्रों से आहुति दे। । ध्रुवाय भौमाय स्वाहा कह कर कपाल में बनाये पुरोडाश को समस्त १ आहुति देवे । १०। संश्रय प्राशन कर कुछेक सातू छाज में घर बाहर आकर । शाला के बाहर चौतरी-स्थंडिल को लीप कर जलती उकड़ी धर कर माअन्तरा गमत ऐसे कह चुप हो सो को जल देता है। इत्यादि कस्य प्रक्षिप्त प्रतीत होता है। अतः भाषार्थ नहीं किया। काण्डका १५ ( इन्द्रयज्ञ) प्रौष्ठपझामिन्द्रयज्ञः ॥ १। पायसमैन्द्र) . ।

पारस्कर गृह्यसूत्रभाष्ये शपयित्वा उपूपांच्या पूपैः स्तीत्वाऽऽज्यभागाधि- ष्ट्वाऽऽज्याहुती हातीन्द्रायेन्टाइथा अजायैकपदे- हिर्बुध्न्याय गौण्ठपदाप्यन्नेति ॥२: प्राश नान्ते मरुदयावालहरसिमतादो ममतः, इति श्रुतेः ३। आश्वत्थेपु पलाशेषु 'मरुतो ऽश्वत्थे तस्थुः, इनि वचनात् ।। 'शुक्रज्योत्तिः इनि प्रतिमन्त्रम् १॥ विमुखेन चा मनसा। नामान्येषामेतानि, इति श्रुतेः । ८ । इन्द्र देवीः, इति जपति । ६ । ततो ब्राह्मण भोजनम् । १० ॥१५॥ १५ करिहका भादों की पूर्णिमा को इन्द्रयज्ञ होता है।१। इन्द्र को खीर और पूड़े पकाकर पूरे अग्नि के चारों भोर घरे । माज्यभाग २ आहुति दे। इन्द्राय, इन्द्रस्य, अजाय, एक पदे, अहिर्बुध्न्याय, प्रौष्टपदाभ्यः, स्वाहान्त कह आहुति दे।। प्राशन के पीछे मरतों को बलि देता है । अहुत साने वाले मरुत हैं यह श्रुति है । पीपल के पत्तों पर वलि दे। मस्त (हवा ) पीपल पर रहता है ।४शुझ ज्योति इत्यादि मन्त्रों से आहुति दे।। तथा विमुख से भी । ६ । मन से मन्त्र पढ़कर । ७ । यह मरुत के नाम हैं यह श्रुति है। । "इन्द्र देवी र मन्त्र को ज़पता है या फिर ब्राह्मण भोजन करावे १० काशिडका १६ (पृषासक कर्म) आश्वयुज्यां पृषातकाः । १। पावसमैन्द्र ।

- ६ काण्ड २ कण्डिका । १६ । १७ नपयित्वा दधिमधुघृत्तमिश्र - जुहे।तान्द्राये न्द्राण्या अश्विभ्यामाश्वयज्यै पौर्णमास्यै शग्दे चेति । २ । प्राशनान्ते दधिएषात मज्जना जुहोति ' जनं मे पूर्यता पूर्ण मे माव्यगात् स्वाहा इति। ३। दधिमाधुतमिश्रममात्या अवेक्षन्त' आयाविन्द्रः , इन्यनुवाकेन । १ । माभिर्वत्सान्सर्थ सुज्यता रात्रिमाग्रहायणी च। ५। तता ब्राह्मणभोजनम् । ६॥ १६॥ १६ कपिडका अाश्विन की पूर्णिमा को पृषातक यज्ञ है । १ । इन्द्र को खीर पकाकर दही शहद धी मिलाकर होमता है इन्द्राय इन्द्राण्यै, अश्विभ्यां, पाश्वयुज्य, पौर्णिमात्यै और शरदे, स्वाहा का होमे ।। प्राशनान्त में पृषाकत को दोनों हाथों से होमे। अनं मे इस मन्त्र से । ३ । दही मधु घृत खीर में मिलाकर मित्रजन देखें । “प्रायात्विन्द्रः" (य०२७ । २७) इस अनुवाफ से होम करै । ४ । उस असौज की रात में माताओं (गौओं) से बछड़े मिलाये। फिर ब्रह्मभोज करे। कण्डिका १७ ( सीतायज्ञ ) अथ सीतायज्ञः । १ । ब्रीहियवानां यत्र यंत्र रजेत तन्मयर्थस्थालीपाक नपयेत्। २। कामादीजानोऽन्यत्रापि : ब्रीहियक्योरेवान्यतर स्थालीपाक, नापयेत् । ३। न पूर्वघोदित- ।

पारस्फर गृह्यन्त्र माध्ये
स्वात् सन्देहः । १ । असम्भवाद्विनिवृत्तिः ।।
क्षेत्रस्यपुरस्तादुत्तरता वा शुचौ देशे कृष्ट फ-
खानुपरोधेन । ६ । ग्रामे वोभयसम्प्रयोगादवि-
रोधात् । ! यत्र नपयिष्यनुपलिप्त उद्धृतावो
क्षितेऽग्निमुपसमाधाय सन्मित्रीदर्भः स्ती
ज्यभागा विष्ठाऽज्याहुतीजुहोति । ८ । पृथियी
धीः प्रदिशो दिशो यस्मै शुभिरावृताः । तमि
हेन्द्र मुपहये शिवानः सन्तु हेतय: स्वाहा ॥
यन्मेकिञ्चिदुपेप्सितमस्मिन् कर्मणि वृत्रहन् ।
तन्मे सर्व समृध्यतां जीवत: शरदः शत,
स्वाहा। सम्पत्तिभूति मिर्वष्टि ज्येष्ठय श्रेष्ठ
ॐ श्रीः प्रजामिहारतु स्वाहा । यस्या ऽभावे
वैविक लौकिकानां भूतियति कर्मणाम् । इन्द्र
पत्नीमुपव्हये सीतार्थ सा मे त्वनपायिनी
भूयात् कर्मणि कर्मणि स्वाहा। अश्वायतीगोमती
सूतावती बिभर्ति या प्राणभृतो अतन्द्रिता ।
खलामालिनी मुर्वरामस्मिन् कर्मण्युपव्हये ध्रुवा
वा मे त्वन यायिनी भूयात् स्वाहेति । ।
स्थालीपाकस्य जुहोति सीतायै जयायै शमायै
भृत्या इति । १० । मन्त्रवत् प्रदान केषाम् ॥११॥

कागडकरिडका । 191 स्वाहाकारप्रदाना इति श्रुतेवि निवृत्तिः । १२ । स्तरणशेष कुशेषु सीतागे।प्तृभ्योबलि परति पुरस्ताद ये त आसते सुधन्वानो निषङ्गिणः । ते त्वा पुरस्ताद गोपायन्त्वप्रमत्ता अनपायिनो नम एषां करोम्यहं बलिमेभ्यो हरामीममिति । १३ । अथ दक्षिणानिमिषा वर्मिण आसते तेत्वा दक्षिणते। गोपायन्त्वप्रमत्ता अनपायिनो लम एषां करोम्यहं बलिमेभ्यो हरामीममिति । १४ । अथ पश्चात् आभुवः प्रभुवो भूतिभूमिः पाणिः शुनङ् कुरिः । ते तवा पश्चाद् गोपा- यन्त्धप्रमत्ता अनपायिनो नम एषांकरोम्यहं बलिमेभ्यो हरामीममिति।१॥ अथेत्तिरता भीमा वायुसमा जवे ते त्वोतरत: क्षेत्रे खले गृहेऽध्वनि गोपायन्त्यप्रमत्ता अनपायिनो नम एषां करो म्यहं बलिभेभ्यो हरामीममिति । १६ । प्रकृता- दन्यस्मादाज्यशेषेण च पूर्ववबलिकर्म । १७ ॥ स्त्रियश्चापयरक्षाचरिसत्वात् ।१८। स स्थिते कर्मणि ब्राह्मणान् भोजयेत् ब्राह्मणान् भोज- येत् । १६ ॥१७॥ इति द्वितीयकाण्डम् समाप्तम् ।।

स . पारस्कर गृह्मपूत्रभाष्ये। कारिका १७ अब मीता यज्ञ है। १। धान या जब जिस का करें उमी का ( स्थानीपाक) मनोई में शात नलावे । २। भले हो चाहे योगों में जी जी या धान मिली एक का भात बनावे । ३ । पहिले कहाँ कहा नहीं पर लिये सन्देह है 19 अलम्भव होने से संदेश नहीं। ५ । खेत के पूर्व या पवार भाग में साहाँ शुद्ध हल से जुते हुवे खेत को हानि क हो।६। या ग्राम के सड़े पर जहां खेत और ग्राम मिले होते हैं वहां करें कोई विरोध न होने से । ७। जहां भात पकाना है वहां गोबर महो में लीपकर ऊँची वेदी बना जड़ से छिड़के अग्नि स्थापन कर धान पाक में धान के तुषों वा पयाल, पाक जौ का हों तो जौ के पयाल कुशा वेदी के सल ओर बिछावे। भाज्यभागाहुति पाहुति देता है ८॥ पषिवी यौ० इत्यादि ५ मन्त्र जो मूल के शिडका में जमा हैं इनसे ५ घृत्त को आहुतिदे।। स्यालीपाक की आहुति आगे लिखे अनुसारदे । सीतायै स्वाहा, प्रजायै स्वाहा, शमायै स्वाहा, भूत्यै स्वाहा, ।१०। कोई आचार्य कहते हैं स्वाहा भी न लगाये। ११ । स्वाहा शब्द से आहुति होती है यह श्रुति है इसलिये सूत्र की निवृत्ति है । १२ । अग्नि के पास बिछी कुशों पर सीता रक्षकों को बलि देते हैं।"पुरस्तात" इस मन्त्र पूर्व दिशामें । १३ । फिरदक्षिण में “निमिषावर्य०" इस मन्त्रसे । १४ । फिरपश्चिम में "आभुव प्रभुवो०॥ १५ फिर उत्तर में "भीमावायुसमा० इस मन्त्र से । १६ । प्रश्न-धान था जो छोड़ अन्य सुगंधित मिष्ट और घृत से पूर्ववस पलिकर्म १९॥ खियां भी वलिकर्म यज्ञकरें ऐसा प्राचारहै । १८ाकर्म समामिपर ब्राह्मणों को लोजन करावे। ब्राह्मणों को भाजन करावे १ दोवार उबारण अन्य की समाप्तिका चिन्ह है। . - .

३ . कांगड कनिका । ७३ तीसहा काराडकण्डिका १ मनाहिताग्नेर्नवप्राशनम् ॥ १। नवौं स्थालीपाक अप- यित्वाऽऽज्यभागाविष्टवाऽऽस्वाहुती जुहोति 'शतायुधाय शत यीयर्याय शतोतये अभिमातिषाहे । शतं यो नःशरदोऽजीजा- निन्द्रो नेषदति दुरितानि विश्वा खाहा । ये चधारः पथयो देवयाना अन्तरा द्यावापृथिवी वियन्ति । तेषां येन्यानि- मजीतिमावहात तस्मै नो देवाः परिघनेह सर्व स्वाहा, इत्ति । २ । स्थालीपाकस्याग्रयदेवताभ्यो हुन्वा जुहोति खिष्ट. कतेच स्विष्टमग्ने अभि तत् पृणीहि विश्वांश्च देवः पृतना भभिष्यक् सुगन्न पन्यां प्रदिशन्न एहि ज्योतिष्मद्धेच्छा - रक आयुःखाहा, इति । ३ । अथ प्राश्नाति-'अग्निः प्रथमः मानातु सहि वेद यथा हविः । शिवा अस्मभ्यमोषधीः कृणोतु विश्वचर्षणिः । भद्रातः सेयः समनेष्ट देवास्त्वयाऽवलेन समशी महिल्या । स लो भयोभूः पित्तवाविशस्त्र शं तोकाप तनुवे स्योमः, इति । ४ । अन्नवतीयया वा ५॥ अथ यावाना भेतमुत्यं मधुना संयुतं यचं सरस्वत्या अधिवनाय चर्कषुः । इन्द्र आसोत् सीरपतिः शतमतुः शीनाशा शासन् मरुतः सदानवः, अति । ६ । ततो ब्राह्मण भोजनम् । ७ ॥१॥ करिइंका २ ( आग्रहायणी कर्म) मार्गशीया पीर्णमास्यामाग्रहायणीकर्म पाकनपयित्वा प्रवणावदाज्याहुती हुत्वाऽपरा जुहोति-यां जमा प्रतिनन्दन्ति रानी धेनुमिवायतीम् । संवत्सरस्य यापनी सा नो अस्तु सुमङ्गली स्वाहा । संवत्सरस्य प्रतिमा या सा रात्रिनुमानहे। प्रशा सुबोया कृत्वा दीर्घमायुर्यभाये स्वाहा । संवत्सराप परिवत्सरायेदावत्सरायेद्वरसराय बत्स- १० १. स्थाली- ४, पारस्कर रायसन्नसाव्य राय कृणुता हशमतेषां वय सुमतौ यजियानांज्योगजीता भल्लाल्यान स्वाहा ग्रीमो हेमन्त उतनो बसन्तःशिवा वर्षा अभया शरन्नः । वैशातूनाथ शत शारदानां निवास एषा मभये वैसेम स्वाहेति । २। स्थानीयाकस्य जुहोति सामाय : मृगशिरसे, मार्गशीध्य पौर्णमास्य हेमन्तीय चेति । प्रा. शनाते सक्तुशेष भूपैन्युच्योपनिष्क्रमणप्रभृत्यामार्जनात्।। मार्जनान्त उत्खष्टो बलिरित्याह । ५. पश्चादग्ने त्रस्तरमा स्तीयोहत च. यास आपलता शहतवाजता प्रत्यवरोहन्ति दक्षिणतः स्वामी जायोत्तरा यथाकनिष्ठमुसरतः । । दक्षि- शंतो नमाणमुपवेश्योत्तरत उदपात्र शमीशाखासीतालोष्ठी श्मनो निधायाग्निमीक्षमाणो अपति-अयमग्निवीरतमोऽयं भगवत्तमः सहनवासम । सुवीर्योऽया श्रेष्ठ्य दधातुःनों, इति 1.७ पश्चादनेः प्रामालिं करोति ।। दैवी नावर्मिति तिसृभिः स्तरमारोएन्ति ।। ब्रह्माणमामन्त्रयते मन प्रत्यरोहाभ, इति । अरमान ज्ञाताः प्रध्यवरोहन्ति 'आ युकोसियेशी बलसम्माद्य प्रजाम्, इति । १९ । उपेता जपन्ति सुहेमन्तः सुवसन्तःसुग्रीडम प्रतिधीयता नः शिवा नो वर्षों संन्तु शरदः सन्तुः नः शिवाः, इति । १२ । स्योना पाधवीनो भव इति दक्षिणपशिवः माकं शिरसः संविशन्ति । तपो त्तिरित उदायुषाः स्वायुषीत्यर्जन्यस्य वृठ्या पृथिव्याः सप्तधामभिः, इति । १४ । एवं द्विरपरं ब्रह्मानुज्ञाताः। १५. अधः शयार"श्चतुरों मासान् ययेष्ठं वा । ९६ ॥२॥ करिडका ३ । अष्टंका कर्म ).. मध्यमानहायरयाल्तिस्त्रोऽष्टकाः ॥ ॥ ऐन्द्री वैश्वदेवी माजापत्या पित्येति ॥२॥अपूपमा सशाकैर्य यासंख्यम् ॥३॥ मयमाष्टका पक्षाष्टभ्याम् ४ थालीपाक अपयित्वान्य- .

७५ mernamanenashe MEName - कांगपालिका-३। भागाaaranाहती जगति गि गत्तन्य मारपनिनिका निमगार्ग योनियामाम स्तन्ते कदमः मजा. मतपेचन्द परियन्ति मानतीः II || ज्योशिस्ती प्रतिमोरात्री देवी नूस्य नागि । विपश्यन्ति प्रशयो शायमाना सानाम्पा मातरम्या नपरये स्वाहा ॥ एकाएका THE REAST शान महिमानमिन्द्रय । तेन दस्यून Uru देवा ताशानभयऽयधी मिः स्वाहा ॥ मा. नु नगुन मामफर्म गम्यवारयति । भूयाममस्य चमनी यशायमगत्या सयामसि मा प्रयुक्त स्वाहा ॥ अभूममम मुगती यावेदा भारतिधागविद्धि गापम् ॥ भूगामगरस्य सुमती यशापगन्या पो प्रन्यानतिमा प्रयुक्त स्यारा परमपदोहा गां पहमासी भूतमोग्नुपञ्च पशुद्धि परीगासा: ममानमुरिघिलोकमे स्यामा धातस्य गर्भः प्रथमा न्यूषिप्यपामेका मदिमा मिति । मृर्यस्पेशा धाति निकला धर्मम्पका सचिोकांनियन्तु म्याहा ।। या मधमाशीत साधेशरमवद्यमे ॥ मानः पय- स्थली पुतीतरामुशरा सगा स्वाहा ॥ शुभकापभामभमा पीविपागाह विजया शयली: अमियोतुः । समानमर्थ स्यपश्यमाना यिमता रामार उपधागाः स्वाहा । कानूगां पनी प्रपमेयमानान्हा नेत्री जनित्री प्रजानाम् । एका राती बायोपोन्युज्छस्यागीय व जरयसि मनन्य स्वाहेति । ५१ स्थाठीपाकस्य गुहामि "शान्ता एधित्री शिमन्तरित गन्दो धौरभयं कृणोत् । यो दिशः प्रदिश आदिशो गोऽहो राने कण दीर्घमायशास्वाहा । भाभी मरीचीः परिपातु सातो पाता नमुन्द्री अपहन्तु पापम् । भूतं भविष्यदत्तद् वि. 'खमस्तुमे प्रक्षाभिगुप्तः सुरक्षितःस्या स्वाहा । विश्वमादित्या "m पारम्बार गृह्यसूत्रनाये। यसयश्च देवा. संता गोताले मरुतश्चसन्तु । प्रजाभगतं. दीपमाः प्रजापहिर्गपि पर येष्टी दवात ना.स्वाहेति ।। मटफायै स्वाहेति ।। मध्यसा गया तस्यै घमां जशोति 'व: वां जालवेदः पितृभ्यः, इति । । इवोऽन्घटकाराम वात पावरुक्षिसध्याच्या परिदते पियक्षपितृयसबार १० श्रीपश्ची पत्तेचलं घार्थ मुरया तर्पणेन वाचनानुलेपन सजशप । ११ । साधार्यायान्याशिभ्यश्चानपत्येभ्य बच्छन् १२ । नादया वर्षे च तुरीया शाफाएका । १३ ॥४॥ हरिष्ठफा ४ ( शाछाकर्म:) अथातः शालाशन । १ । पुण्याहे. शालां कारयेत् ।। तस्या अबटमभिजुहोति अध्युताय भौमाय स्वाहा' इति स्तम्भमुच्छ्यति इमामु: च्यामि भुवनस्य नाभि प्रसार प्रतरणी घसू- नाम्। इहैव ध्रुवा निमिनोमि शाला क्षेमे तिष्ठतु घृतमुक्षमाणा । अचानतो. गोमती सूनताय त्युच्छयव महते सौभगाय आल्या शिशुराक- न्दस्यां गानो धेनवो बाश्यमानाः। माया कुमार स्तरुण आवरले. जगदैः सह । अरवा परि लुतः कुम्भ आदनः कलशैरुप । क्षेमस्य पत्नी बहती. सुत्राला रयिं ना धेहि सुभगे सुवीर्यम् । अलावद गोमदूर्जस्त्रत् पर्णा वनस्पतेरिष। अ. भिन्नः पूर्यता रयिरिदमनायो धसान इत्ति * इस कएिडका के पाठ संस्कारविधि में मो. कुछेक हैं। -- कापड ३ कगिहका ।।। 988 गोपायेताम् , इति । ११ । पश्चिम सन्धावभि मृशति 'अन्नं च त्वा ब्राह्मणश्च पश्चिमे सन्धौ गोपायेताम्, इति । १२ । उत्तरे सन्धावभिमृ- शति 'जर्क घ वा सूत्रता चोत्तरे सन्धौ गो- पायेतरम्, इति । १३ । निष्क्रम्य दिश उपतिष्ठतें 'केता च मा सुकेता च पुरस्ताद गोपायेतामि- त्यनिकेताऽऽदित्यः सुकेता तौ प्रपझे ताभ्यां नमोऽस्तु तौ मा पुरस्ताद गोपायेतामिति ।१४ । अथ दक्षिणतो गोपायमानं च मा (रक्षमाणा) चदक्षिणतागोपायतामिति अबैगोपायमान) रात्री रक्षमाणा ते प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तु ते मां दक्षिणतो गोपायेतामिति । १५ । अथ पश्चात् दीदिविश्च मा जागृत्रिश्च पश्चाद् गोपायेतामि- त्यवं वेदीदिविःप्राणो जागृविस्ती प्रपोता. भ्यां नेमोऽस्तु तो मा पश्चाद् गोपायेतामिति ।१६। अयोत्तरतोऽस्त्रालश्च माऽनवाणश्चोत्तरतोगी. पाये तामिति चन्द्रमावा अस्वप्नो त्यहवैगोपाय मानरात्रीरक्षमाणाते प्रपद्ये ताभ्यां नमोऽस्तुते मादक्षिणतो गोपायेतांबायुरन वदाणस्ता प्रप- - 'पारस्कर मृत्यसूत्रमाणे चताभ्यां नमोस्तु तौमात्तरतो गोपायतामिति निष्ठिनां प्रपदाते धर्मस्थूणा राजत्रोस्तूप महोरात्रे द्वारफलके, इन्द्रस्य गृहा वसुमन्त्री वरूधिनस्तानई प्रपझे सह प्रजया पशुभिः सह चन्मे किचवस्त्युपहूमः ..सर्व गणः सुखाय साधु संवृतः सांत्वाशालेऽरिष्टवीरागृहानः सन्तुसवेशः इति । १८॥ सतो. ब्राह्मणभोजनम् ॥ १८ ॥ कगिहफा. ५ ( मणिकावधान ) अथातो मणिफावधानम् । १६ उत्तरपूर्वस्यां दिशियूप चवट सात्वा कुंशानास्ती योशतारिष्टकांश्चान्यानि पाभि- मगला निच तस्मिन् मिनोति महिक 'समुद्रोगसिः इति ।। अप प्रासिञ्चति-'आपो रेवतीः क्षयथाहि वस्वः क्रतुंच अट्रं विस्थामृतंचरायश्वस्थस्य पत्यस्य पत्नी सरस्वती तद् गणते बयोधाद्' इति । ३ । आपोहिष्ठति घतिसुभिः । । ततो ब्राह्मणभोजमस् । ५। ॥५॥ ६ करिडका अथातः शीर्षरोगभेषजम् ।। पाणी प्रक्षाल्य ध्रुवौ विभाष्टि- 'या " श्रोत्राभ्यांगोदानः छुबु कादधि । यक्ष्म शी: र्षय राटाद् विवामीमम् । इतिः।२। अहंचेद् 'अव- भेक विरुपाक्ष श्वेतपक्षो महायशाः। प्रथा चित्रपक्ष शिरो मास्यामिताशीः इति । ३ । क्षेभ्यो वेव भवति । ४ । करिडका उतूल परिमेहः १५ जास्वपतोवविषाणे स्वमूत्रमा सिच्या काम करिका। ८१ पसलवित्रिः परिषिञ्चन् परीयात् 'परित्या निरहं परि मातुः परि स्वः । परिपित्रोश्च मात्रीश्च सख्येभ्यो विसृजाम्यहम्। उतूल परिमोढोलि परिमोढवगमिष्यसि इति ।। स यदि चाम्याद् दावाग्निमुपसमाधाय घृताहानि कुशेषड्धानि जुहुयात् 'परित्या छलनो हल निवृत्तेन वीरुधः सम्पाशेनछित्वा मह्यं मुखाग्थान्यमानयेदिति' ।३। झम्यो ह्येव भवति ॥४॥॥७॥ ( करिडका ८) शूलगवः ।। स्वर्ग्यः पशव्यः पुग्यो धन्यो यशस्य आयुष्यः ।२। भोपासनमरयय हत्वा वितान” साधयित्वा राष्ट्र पशुमालभेत । ३ । सापडम् । । । गौर्वाशब्दात् । ५। धपा अपयित्वा स्थालीपाकमवदानानि च रुद्राय वामन्तरिक्षाय स्थालीपामिशाण्यवदानानि जुहोति 'अग्नये रुद्राय शर्वाय पशुपतय उपायाशनये भवाय महादेवायेशानायेति च । ६। वनस्पतिः । 9 । विष्टकदन्ते ।। दिव्याधारणम् । । । व्या. घारणान्सेपत्नीःसंयाजयन्तीन्द्राण्यै रुद्रायै शर्वाण्यै भवान्या अग्निगृहपतिमिति।१०। लोहितंपलाशेषुकर्थेषु रुद्राय सेनाम्यो बलिं हरति 'यास्ते रुद्र पुरस्तात् सेनास्ताभ्य एष बलिस्ता. स्पस्ते नमः । यास्ते रुद्र दक्षिणतःसेनास्ताभ्य एष बलिस्तास्य स्ते नमः। यास्ते रुद्र पश्चात् सेनास्ताभ्य एष बलिस्ताभ्यस्ते नमः । यास्ते रुद्रोसरतः सेनास्तस्यि एष बलिस्ताम्यरते नमः । यास्ते रुद्रोरिष्ठात से नास्ताभ्य एष बलिस्तास्यरते नमः । यास्ते रुद्राधस्तात सेनास्ताम्य एष यग्निस्ता- भ्यस्ते नमः । इति । १९ । जनध्यं लोहितलिप्त मग्नो प्रात्य- त्यधीवा निखनन्ति । ११ । अनुवातं पशुमवस्थाप्य सद्रूप. तिठसे प्रथनोत्तमाभ्यां वाऽनुवाकाभ्याम् । १३। नैतस्य यशो- ११ पारस्कर गृह्यसूत्रभाध्ये नाम : हरति । १४ । एतेनैव गोयनो व्याख्यातः ।।१५। पायसेनानर्थलुप्तः ॥१६॥ तस्य तुल्यवया गौर्दक्षिणा ॥ २७ ॥८॥ करिडका अंथ. वषोत्सर्गः । । गोयजेन व्याख्यातः । ३ । काति- क्या पौर्णमास्या रेवल्मां बाश्वयु जस्य । ३ । मध्ये गवा सुसमितुमग्निं करवाज्य संस्कृत्य इतरतिः, इति पद जुहोति प्रतिमन्त्रम् ।४। पूषा गा अन्वेतु नः पूषा रक्षतुभवतः पूषा वाज सनोतु नः स्वाहा, इति पौष्णस्य जुहोति ।। रुद्रान जपित्व कवण द्विवर्ण. वा यो वा यूथं छादयति य वा यूथं छादयेद रोहितो वैव स्यास सर्वाङ्क रुपेतो जीववत्तायाः पस्विन्याः पुत्री यूथे घ, रूपवत्तमः स्यात् समलंकृत्य यूथे मुख्याश्चत्तनोवत्सतर्यस्ताश्चालंकृत्य "एतं युवानं पतिं धो ददामि तेन क्रीडन्तीश्वरथा निये । मानः सास जनुषा.सु. भंगा रायस्पोषेण समिधा मदेम इत्येतयैवोत्सोरन् । नाभ्यस्थ अभिमन्यते मयोभूः, इत्यनुवाकशेषेण १ . सर्वासां पयसि पायस अपयित्वा ब्राह्मणान् भोजयेत् । ६ । पशुम- ध्येके कुर्वन्ति । । तस्य शूलगवेन करपोव्याल्पातः। १० ॥ . करिडका १० भयोदकर्म ११ मद्विवर्षे प्रेते मातापित्रोराशौचम् ॥२॥ शौचमेवेतरेषाम् । ३ । एकरात्रं विरात्रंवा! ४ शरीरमदग्ध्वा निखनन्ति । ५। अन्तः सूतके घेदोत्थानादाशीय सूतकवतः । ६. मात्रोदककर्म । ७ । द्विवर्षप्रति प्रेतमाश्मशानात सर्व अनुगच्छेयुः । ८ । यमगाथा गायन्तो यमसूक्त घ अपन्त इत्येके । ययुपेतो सूमियोपशादिसमानमाहिताग्नेरोदकास्तक्ष्य गमनात् । । शालाग्निनादहन्त्येनमाहितश्चेत् ॥ १२ ॥ तूष्णी. ग्रामाणिनेतरम् । १२ । संयुक्त मैथुनं मोदक यांचे स्न ... कारह ३ करिष्ठका । १० उदकं करिष्यामहे, इति ।२३। 'कुरुध्वं मा चैवं पुनः इत्य- शतवर्ष प्रेते । १४ । 'कुरुध्यम , इत्येवेतरस्मिन् । १५ । सबै जातयोऽपोभ्यधयन्त्यासप्तमात पुरुषाद् दशमाद्वा । १६ । स. मानग्रामवासे यावत्सम्बन्धमनुस्मरेयुः ।१७ । एकवस्त्रा प्रा- चीनांवीतिनः । १८ । सत्यस्यानामिकयापनोद्य 'अपनःशो- शुपदघम्, इति । १९ । दक्षिणामुखा निमन्जन्ति । २० । प्रेता योटक सकृत प्रसिचन्त्यचलिना 'असावेतत्ते उदकार, इति । २१ । उत्तीर्णाजकुचीदेशे शाध्यलवत्युपविष्टान्त नैतानपद. देयुः । २२ । श्रनवेक्षमाणा ग्राममायान्ति रीतिभूताः कनि- पूर्वाः । २३ । निवेशनद्वारे पिघुमन्दपत्राणि विदश्याचम्यो दकमग्निं, गोमयं, गौरसर्षयांतलसालभ्याश्माममाक्रम्य प्र- विश्वन्ति । २१ । त्रिरात्रं ब्रह्मचारिफोग्यः शायिनो न किञ्चन कर्म कुर्युर्मप्रकुर्वीरन् ।२१ क्रीत्वा लब्ध्वा वा दिवैवान्नानी- युरमा सम् । २६ । मेताय पिण्डं दत्वावनेजमदानप्रत्यय- नेजनेषु नाम ग्राहम् ॥२॥ मृण्मघेता रात्री क्षीरोदके वि- हायसि निदध्युः ' प्रेतात्र स्नाहि , इति । २८ । त्रिरात्र शाधमाशोधम् । ६६ । दशरात्रमित्येके । ३० ।न स्वाध्यायम- धीयीरन् । ३१॥ नित्यानि निवतैरन् वैतानवर्जम् । ३२ । शा- लाग्नौ धैके । ३३ । अन्य एतानि कुर्युः ।३४ । प्रेतस्पर्शिनो ग्रानं न प्रविशेषरानक्षत्रदर्शनाए । ५ । रात्री चेदादित्यस्य i६ । प्रवेशनादिसमाममितरैः । ३ । पक्षं द्वौधाशौचम् । ३८ । प्राचार्य चैवम् । ३९ । मातामहयोश्च । ४० । स्त्रीणां चामत्तानाम् । ४१ मत्तानामितरे कुरिन् । ४ । ताश्च ते.. षाम् ४३ प्रोपितश्चेत मेयाष्ट्रवणप्राति कृतोदकाः कालशेष भासीरम् । ४४ । अतीतश्चेदेकरानं निरानं वा ।। अथ- पास्कर गृहसूत्रभाध्ये कामोदकान्यतिलकामवशुर मनिसन्धन्धि मातुलभागिनेयानाम् 1:४६ . प्रत्तानांध...: 25 एकादश्याप्रयुग्मान प्रालयान भोजयित्वा मा. सवस् । प्रेतायोद्दिश्य गामप्येके शामित ge | पिराडकरण प्रथमा पितृणां प्रेतः स्यात् पुत्रवाश्चेत् । ५०. । निवर्तत चतुर्थः । ५१ । संवत्सरं पृथगेके । ५२ । न्यायस्तु न धत्तुथैः पिएष भवतीतिश्रुतेः ५३ । अहरहरममस्मै बाल- गायोदकुम्भ चं दद्यात् ॥५॥ पिराडमध्येके निपूणन्ति ।।९० करिष्ठका १९ पशुश्वेदाप्लाध्यागासग्रेणग्नीन् परीत्य पलाशंशाखां निहन्ति । १। परिव्ययणोपाकरणनियोजनप्रोक्षणान्याता कुर्याद्यच्चान्पत् । २ । परिपशध्ये हुत्या तूष्णीमपराः पञ्च ।।। वपोटुर चारिधारयेद् देवतांचादिशेत् । ४. उपाकरणनि- योजनमोणे स्यालोपाको पेयम् । पाहुवावदाना न्यवंद्यत्ति । ६ । सर्वाणि त्रीणि पंञ्च वा।। स्थालीपाकमि- पारयवंदानानि जुहोति । ८ । पश्वगंदक्षिणा ।। यद्देवते तद्देवतं यजेत तस्मै चभागं कुर्यातं च ब्रूयाद् इममनुप्रापय इति । २१ । मद्यन्तरे नावं कारयेनवा । १९ ॥ ११ ॥ करिएका १२ (अवकीपिप्रायश्चित्त). अथातोश्वकीर्णिप्रायश्चितम् । १ । अमावास्यायां चतु प्पथे गर्दभपशुमालभेत । २।नितिं पाकयझेन यजेत ३ अप्लसदानहोमः । ४ । भूमौ पशुपुरोडाशपणम् । ५। तां- कृर्षि परिदधीत ।६. ऊध्र्वबालाभित्येके , 1 संवत्सरं भिक्षा- चर्य घरेत् स्वकर्म परिकीर्तयन्।। अथापरमाज्याती जुहोति " कानावकोोस्स्यवकांगास्मि काम कामाय स्वाहा । कामामिदुग्धोऽस्म्यभिदुग्धोऽस्मि काम कामाय स्वाहा .. * दुग्धास्मि इत्यपिपाठः, . ।

फायड ३ कसिष्ठका १३ १४ प्रति ।। अथोपतिष्ठते “ सम्मासिञ्चन्तु मरुतः समिन्द्रः संघहस्पतिः । सं माऽयनग्निः सिञ्चन्तु प्रजया च धनेन-प" इति । १० । एतदेव प्रायश्चित्तम् । ६१ ॥१॥ (कवितका १३) अथातः समा प्रवेशनम् । ११ सभालभ्येति 'सभातिरसि । वादिर्नामासि विपि मासि तस्यै ते नमः इति ।२ । प्रथ प्रविशति 'सभा च मा समितिश्चोभे प्रजापतेर्दुहितरौ सचे- तसौ। योमानविद्यादुपमा सतिष्ठेत् स घेतनो भवतु श सथे जने, इति । ३ । पर्षदमेत्य जपेत् 'अभिभूरहमागर्म चिराइंप्रतिवाच्यः । अस्याः पर्षद ईशानः सहसा सुदुष्टरो जनः , इति । ४ । स यदिमन्येत 'क्रुद्वोयम्' इति, तममिम- प्रयते 'या त एपा रराट्या तनमन्योः क्रोधस्य नाशनी । तां देवा ब्रह्मचारिणो विनयन्तु सुमेधसः ।धीरहं पथिवीचाहं तोते को नयामसि गर्भमश्वतर्यसहासी, इति । ५ । अथ पदिमन्येत दुग्धोऽयमिति तमभिमन्त्रयते 'तान्ते वाचमास्य मादत्ते हृदय आदधे । यत्र यत्र निहिता वाक् तां ततस्तत् भाददे । यदहं ब्रवीमि तत्सत्यमधरोमत्तोद्यस्व, इति ।। एतदेव वशीकरणम् । ॥१३॥ कपिष्ठका १४ अथातो रथारोहणम् । १। युंक्तति रथं सम्प्रेष्य युक्त इति प्रोक्त साविरहित्येत्य चक्रे अभिमुशति । २। 'रथन्तर- मसि' इति दक्षिणम् । ३ । 'शुदसि, इत्युत्तरम् । ४ । 'वा- मदेव्यमसि, इति-कूवरीम् ।। हस्तेनोपस्थमभिमशति 'भनौ न्यङ्कावभितो रथं यो ध्वान्तं वाताग्रमनुसच्चरन्तौ । दूरेहेति ििन्द्रयावान् पतत्रिस्ते नोऽग्नयः पप्रयः पारयातु, इति ।।

पारस्कर गहलमूत्रमाध्य. 'समीमाणिधराय, इति दक्षिण ,धुय्यं प्राजतिः । अप्राप्य देवता :प्रज्यवरोहेत् सम्प्रति ब्रामणान मध्ये गा अभिनय पितृन् । ८ । न स्त्रीब्रह्मचारिणी सारथी स्याताम् । तंमतीयाय जपेद् इह रतिरिहरमध्वम्,। ९॥ एक नास्त्विह रतिः इति च १९. . सं. यदि दुर्बलो रथः स्यात् तमा स्थाय जपेद् 'अयं वामाश्विना रथो मा दुर्ग: मास्तषिद् इति । १२। स यदि धम्यात् स्तम्भमुपस्पश्याभूमि वा जपेद एष वामश्विना रथो मा दुर्ग मा स्तरोरिषद् इति ।१३ सस्य न काधनातिन रिष्टिर्भवति । २४ । यारयावाम वि- मुच्य रथं यवनोदके दापयेद् एष उ हावाहनस्यानपाठक, इति श्रुतेः । १५ ॥ १४ ॥ कण्डिका.१५ अथातो हस्त्यारोहणम् । १ । एत्य हस्तिनममिति 'हस्तियशसमेसि हस्तिवर्चसमसि, इति ।। अथारोहति 'इन्द्रस्य त्वा बज शामितिष्ठामि स्वस्ति मा सम्पारय, इति ३। एतेनैवाश्वारोहणे व्याख्यासम् । ४ । उष्ट्रमारोक्ष्यामि मनयते 'त्वाष्ट्रोऽमित्वदृ देवत्यः स्वस्ति मा सम्पारय, इति । रासभमारोक्ष्यन्नभिभात्रयते 'शूद्रोऽसि शूद्रजन्मारनेयो चै द्विरेताः स्वस्ति मा सम्पराय, इति ।६। पन्धानमभि सन्नयंते ममोरुद्राय पथिषदें स्वस्ति मा सम्पारय, इति ॥ ७॥ चतुष्पथममिमन्त्रयते 'नमोरुद्राय चतुष्पयसदे स्वस्ति मा सम्पारय, इति । ८ । नदीमुत्तरिष्यन्नभिमन्यते नमोरुः गायाप्सुषदे.स्वस्ति मा सम्पारय, इति । नावसरोक्ष्या- भिमस्त्रयते सुनावम्, इति ।.। उत्तरिष्यमाभिमन्त्रयते सुनामाणम् , इति । १९ वनमभिमन्यते नमो कद्राय . ES काण्ड । करिडका । १५ । वासदे खस्तिमा सम्पारय, इति । १२ । गिरीमभिमन्यते 'नमोरुद्राय गिरिषदे खस्ति मा सम्पारय, इति । ३ । श्मशान मभिमन्त्रयते 'नमो रुद्राय पितषदे खस्ति मा - पारय, इति ।१४। गोष्ठमभिमन्त्रयते 'नमो सदाय शारिप- बहसदे स्वस्ति मा सम्पारय. इसि । १५ । यत्र घा न्यत्रापि 'ममी रुद्राय, इत्येव ध्यात् ' रुद्रो होवेद * सर्वम् , इति झुत्तेः । १६ । सिधाग्वधूताभिमन्त्रयते ' सिसि न वजोऽसि नमस्ते अस्तु मानाहि सीः, इति ।१७। स्तनयित्नुमभिम- स्त्रयते 'शिवा नो वर्षाः सन्तु शिवा मःसन्तु हेतयः । शिवा नस्ताः सन्तु यास्तव सुगसि वृत्रहन्, इति । १८ । शिवा वाश्यमाना मभिमन्त्रयते 'शिवो नाम, इति । १० । शकुनि- पाश्यमानममिमन्त्रयते । हिरण्यपर्ण शकुने देवानां प्रहितं गम । यमदत नमस्ते स्तु किन्तवा काकारिणोब्रवीद्, इति 16 । लक्षण्यं वृत मभिमन्त्रयते 'मा स्वाशनिर्मा परशुर्मा वाती मा राजप्रेषितो दण्डः। प्राङ्करास्ते प्ररोहन्तु निवातेवा. अभिवर्षत् । अग्निण्टे मूलं माहि" सीत् स्वस्ति ते ऽस्तु वन- स्पते स्वस्ति मे ऽस्तु बनस्पते, इति । २९ । सयदि किञ्चि- सभेत सत्पतिगृहातु 'द्यौस्त्वा ददातु पृथिवी त्वा प्रतिग- भातु' इति सास्य न ददतः क्षीयते भूयसीच प्रतिगृहीता भवति । २२ । प्रथयद्योदनं लभेत्त तत् प्रतिगृह्म 'धौस्त्वा, इति तस्य द्विःप्राश्नाति 'ब्रह्मास्वापारनातु ब्रह्मात्वा मा. स्नातु, इति । २३ । अथ यदि मन्थं लोत, तत्मतिगृह्य धौ- स्वा, इति तस्यत्रिः प्राश्नाति ब्रह्मा त्वामानातु ब्रह्मा त्वा प्राश्नातु ब्रह्मात्या पिबतु, इति । २४ ॥ १५ ॥ * . नोट-काशीके छये पुस्तक में करिहका १५ सेही १६ भी मिलादी । यहीं समाप्त कर दिया है। और क० १५ के २२ ही सूत्र हैं है'.

परिस्कर गध मृत्रभाज्ये फयिका १६ अथातोऽधीत्याधीत्यानिराफरणं ' प्रतीक मे विपतसं जिवना मे मधु यद्वयः ।काभ्यां भूरि शुश्रुधे गा स्य हार्यों श्रुतं मयि । प्रमाणः प्रवचनमति ब्रह्मणः प्रतिष्ठानमसि अल- कोशोसि बनिरसि शान्तिरस्यनिराकरणमसि ब्रह्मको मे विशवाचा त्वा पिदधामि वाचा स्वापिदधामि स्वरकरण- कराम्चौर गदन्न्योष्टयग्रहणधारणोच्चारणशतिर्मयि भवतु ।' भाप्यायन्तु मेग्लानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रं यशोबलम् । यन्मे श्रुतमधीतं तन्मे मनसि तिष्ठतु तन्मे मनसि तिष्ठतु ।११ ॥१६॥ इति पारस्कर गृह्यसूत्रं समाप्तम् । परिशिष्टकरिका अथातो वापीकूपलडागारामदेवतायतनपुष्करिण्याः प्रतिष्ठा- पनं व्याख्यास्यामः ॥ तत्रोदगयनआपूर्यमाणपक्षे पुण्याहे तिथिवारकरणे नक्षत्रेच गुणान्वितेतन वारुणं यवमयं धरु अपयित्वाज्यभागाविष्वाज्यहुति हाति “त्वममग्नेसत्वको भग्मइनमे वरुण तत्वायामि,येते शतमयाश्चाग्नउदुत्तनमुरु हिाराजा वरुणस्योत्तम्भनमग्नेरनीमिति दशर्च. हुत्वा।। स्थालीपाकस्य जुहोत्यग्नये स्वाहा सामाय स्वाहा वरुणाय स्वाहा यज्ञाय स्वाहानाय स्वाहा भीमाय स्वाहा शतकतवे स्वाहा व्युष्टधै स्वाहा स्वर्गाय स्वाहेति यथोक्त स्विष्टकत् प्राशनाते जलघराणि जिम्वालंकृन्य ३. गांतारयित्वाचार्याय वरं दत्वाकर्णवेष्टको वासा सिधेनुदक्षिणा ।। ततो ब्रालश सेोजनम् ॥.५ ॥ इति शम - (६) . पारस्करभाषाभाष्य पृ० ८ में मधु पर्क में पशुबंध पर और पृ० २६ पुंसधन में कूर्म पित्त पर पृष्ठ और ३३ के नोट देखने योग्य हैं। पृ.३६ पर अन्नप्राशन में सूत्र से१२ तक प्रक्षिप्त प्रतीत होते हैं । कारण वहीं लिख दिया है । काण्ड ३ समस्त ही हमने बारीक टाइप से छापा है । उस में प्रक्षिप्तांग बहुत अधिक प्रतीत हुवाहै जैसा नीचे की सूचीसे पता लगेगा। काण्ड ३ वृपोत्सर्ग al १नव प्राशन २ प्राग्रहायणी कर्म ३ अष्ट का कर्म ४ शाला कर्म ५.मशिकायपान ६.शिर रोग का इलाज sant कर शूल गव १० उदक कर्म ११ पशुकल्प १२ अवकीर्ण १३ समा प्रवेश १४ रच पर बैठना २५.हायो पर इना १६ पढ़ा हुवा न भूलना १वापी कूप प्रतिष्ठा परिबिर

.."
१-प्राचीन ग्रंथों में अन्समें पाठ दोवार पड़ने फा मयार या
सो पारस्कर सून में दूसरे कामच के अन्त में कथिका १७ मैं!
प्रालणान् भोजयेत, बालशान् भोज घेत ऐसे दोवार है, ऐसा
पूर्व कारह वो अन्त में नहीं है इमसे भी कर ममाप्ति नहीं
किन्तु ग्रंथ समाप्ति सीही प्रतीत होती
२-पूर्वग्नंधों में २ भाग या ४ भागहुबा करतेथे ३ भाग बहुत
कम होते थे।
३-इ. समय में दही कागहों के कर्मकार का प्रचार हो
जाय तो बहुत लाभ है तीसरे का भापामाष्यं पाने से गौरव
की हानि होती है वृद्धि नहीं ।
४-उस का पाषानुवाद भी हम ने इसी लिये नहीं किया
कि मांस से यज्ञ या "प्रसुवध हमारे पौराणिक पड़ोसी
भी लिवर्जित कहकर, उसे करना. ध नहों मागते हैं. तो
कलियुगी भाषा में उख- भाग का अर्थ हो क्या करने की
आवश्यकता है।
-इमने मूल इस लिये शामा दिया है कि मूल बना
तो नजाने कोई बात इस से भी उत्तम निकल आवे
लिये उसे बारीक टाइप में पाया है, ग्रन्थ से अगर नहीं
किया है।
६-मनों फामर्थ अधिकतर संस्कार चन्द्रिका में भी रूपधुकर
सक्षप सेलिंखा मंत्रार्थभी समझा नहीं जाता है विस्तार से
लिखने योग्य समय नहीं है, मेरे संस्करण में यत्न पारगड
कि अंधकाराष्ट्रिऋगनेकांटकर समकाअर्थवहींकरोल बाज

Grahyasutram

Author
Mishra, Chhutan Lal
Title
Grahyasutram
File name
Grahyasutram
Text
OCR done
Citation
1916
Published
2009/09
Publisher
Swami Yantralaya
Language
Sanskrit
Pages
89
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345484
Barcode
99999990233824.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Copyright permitted
VMLT id
APNJ31h4yZv
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