Sanmati Library, Jaipur

Granthtrayee

Shastri, Lalaram · 2009/11

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Front matter

प्रकाशक -
पन्नालाल बाकलीवाल,
! महामंत्री-मारतीयजैनसिद्धांतप्रकाशिनी संस्था,
८ महद्रवोस लेन, श्यामवाजार-फलफत्ता।
श्रीलाल जैन काव्यतीर्थ,
जैनसिद्धांतप्रकाशक पवित्र मेस
८ महेंद्रवोस लेन, श्यामबाजार-मालकाता।
,

संस्थाके छपे भाषाटीका सहित
उत्तमोचम जैन शास्त्र।
परीक्षामुख
। संस्कृतप्रवेशिनी दोनों भाग... १
संस्कृतप्रवेधिनी-द्वितीय भाग 5 हरिवंशपुराणं वडे-नयीसरलवनिका
तत्वज्ञानतरंगिणी ej आत्मप्रबोध"ig
सुभाषितरंलसन्दोह खुलेपत्र "..: जिल्दका :: ::
सुनहरी जिल्दका. '.. २ योगसार[अध्यात्मतरंगिणी] ११
'परमाध्यात्मरंगिणी-संस्कृत आर मकरध्वज पराजय-हिंदी में काम
भाषाटीका सहित [थोबी प्रतियां आर जिनदेवका युद्ध
रही है] Pay कची जि० = पक्की जि० को mp
-आराधनासार सजिल्द
१) जिनदत्तचरित्रभाषावचनिका
तत्त्वार्थसार १९... भापाटीका , जिल्दका
19
सहित -
४) गोम्मटसारजी-जीवकांडपूर्ण, खुलपत्र
गोम्मटारची-कर्मकांडपूर्ण अनुमान १४०० पृष्ठ
२६०० पृष्ठ भाषा संदृष्टि सहित २४) पात्रकेशरीस्तोत्र भाषाटीका सहित ।।
lly
दूसरोंके छपाये हुये थे।
शाकटीयन धातुपाठ ।
लघीयत्रयादि संमहः ।
विधवा, विवाह संदन
संस्कृत ग्रंथों के लिये वडा सूचीपत्र मंगाकर देखिये ।
अन्यत्रयी,
४
.

Reesese
कीर्तिवान।
:
भोरण (अहमदाबाद ) निवासी स्वर्गीय
श्रीमान् शैठ मोतीचंद्र साकलचंद्रजीकी धर्म पत्नी
ज़डाव बाईने पांचसौ रुपये ज्ञानावरणीय कर्मके
क्षयोपशमार्थ शास्त्रोद्धार करनेके लिये दिये थे
उसी द्रव्यसे इन अश्रुतपूर्व तीनों ग्रंथोंका हिन्दी
अनुवाद मूल सहित प्रगट किया गया है।
यद्यपि इससमय उक्त दानशीला वाई अपनी : मनुष्य
पर्याय नहीं है तो भी उसके नाम और अनुकरणीय
दानको ये अन्य कीर्तित करते ही रहेंगे।
:: इन ग्रन्थोंकी न्योछावर संस्थाके नियमानुसार ला-
'गत मात्र रक्खी गई है । पूरी रकम उठ आनेपर फिर
'अन्य किसी ग्रन्थका जीणोद्धार होगा इस तरह एकबार
दिये गये दानसे सैकड़ों वर्ष पर्यंत जैनशाखोंका प्रचार होता
रहेगा अतः इस परिपाटीसे लाभ उठानेकी इच्छा रखने !
बाले भाइयोंको अपनी २:शक्ति अनुसार किसी भी एक
जैन शास्त्रले उद्धार करनेके लिये सहायता देनी चाहिये ।
.

+ प्रस्तावना। जैन साहित्य कितना विशाल है | जैनधर्मके मक विद्वानाने, "कितनो कृतियोंको निर्माण किया हैं। इस बातका पता लगाना अत्यन्त कठिन है । आज जिन जिन कृतियोंके दर्शनका सौमाग्य मिलता जा रहा है उन्हें देखकर जैन साहित्यको प्रशंसा बिना किये नहीं रहा जाता। यह बात इस समय बडे महत्वको है कि ऐसो ऐसो अनुपम कृतियों के प्रकाशनका साधन प्राप्त है नहीं तो आउफलके आलस्य परिपूर्ण व्यक्कियोकी ओर देखनेसे इन कृतियों का पता भी नहीं चलता। ये जहां थों यहीं रह कर कोडोंके पेरें में पहुंचती। सर्वसाधारण इनका रसास्वादन भी नहीं कर सकते। अब मोद मालूम कितनी अनुपम कृतियां भंडारोंमें सह रही होगी और उनले कोडोंके उदर पुष्ट होरहे होंगे । यदि बहुत जल्दो उनके प्रकाशनका प्रबंध न हुआ तो निश्चय है वे कृतियां पृथियो ऑदि भूतोंमें मिल जायगो-उनका नाम तक सुननेमें न आयेगा। पाठक आपके फरकमलोंमें जो अनुपम कृति विराजमान हैवह तोलमन्थरत्नोंका समुदाय है । तोनों अन्य रत्नोंमें पहिलेका नाम तत्वानुशासन दूसरेका वैराग्यमणिमाला तीसरेका नाम टोपदेश है। इन दोनों प्रत्यलोंकामाणिकचंद्र दि.जे.अन्यमाला तेरहवे गुच्छक तत्वानुशासनादिसंग्रहमें उद्धार हो चुका है परंतुसंस्कृत (२) प्रकाशित हुए है। सर्व साधारण उनसे लाभ उठा नहीं सकते इस लिये इन तीनों प्रत्याका मूलके साथ यह भाषानुवाद प्रकाशित किया गया है- ग्रंथ कर्ताओंका संक्षिप्त परिचय ! १ तत्वानुशासन । इस प्रथके कर्ता आचार्य नागसेन है। अंथके अन्तमें वे अपने दोक्षा-गुरुक्षा नाम विजयदेव और विद्या- गुरुओं का नाम वीरचंद्रदेव, शुभचंद्रदेव तथा महेंद्रदेव बतलाते हैं। अपने संघ या गण गच्छादिके विषयमें उनका मौन है। अपने समयका वे उल्लेख नहीं करते हैं । परंतु ऐसा मालूम होता है कि वे विक्रमको १३ वीं शताब्दीले पहले हुए हैं। क्योंकि पण्डितवर माशावर 'इटोपदेशटोका में-जो इसी संग्रहमें प्रकाशित की गई है- इस प्रन्थके अनेक श्लोक उक्त च' रूपमें उद्धृत करते हैं । उदाह- पके लिये इस संग्रहके पृष्ट २७ में शुरूपदेशमासाद्य आदि दो श्लोकोंको देखिए । तत्त्वानुशासनके १९६ और १६७ नम्बरके श्लोक है। और पं० आयोधरजीने-जैसा कि आगेषतलाया गया। है-विक्रम संवत् २२८५ के पहले इष्टोपदेशको ठोका लिखी है। मतः तत्वानुशासनके का इससे भी पहले हुए है। नागसेनके अन्य किसी अन्यसे हम-परिचित नहीं।

२ इटोपदेश ! इस छोटेसे पर महत्वपूर्ण प्रन्यके कर्ता आ-. अयं देवनन्दी या पूज्यपाद हैं। श्रीयुक्त पं० काशीनाथ बापूजी पाठकबी०ए० ने एक कनड़ी अन्य के माधारसे प्रगट किया है किगंगवंशीय दुविनीत नामका राजा पूज्यपाकका शिष्य था और इस गजानं वि०सं५३५ से ५७० तक राज्य किया है। इसके सिवाय देवसेनसूरीने अपने 'दर्शनसार' नामक प्राकृतप्रन्थमें-जो वि० सं०६0 में रखा गया है-लिखा है कि पूज्यपादके शिष्य वजनन्दिने वि० सं० ५९६ में द्राविडसंघको स्थापना को यो। इन दोनों प्रमाणोंसे मालूम होता है कि देवनन्दि प्राचार्य विक्रम की उही शताब्दीमें हा गये हैं। उनके बनाये हुए सर्वार्थसिद्धि टीका, नद्रव्याकरण और समाधितंत्र ये तीन अन्य प्रसिद्ध हैं। इटोपदेशको टोकाके कर्ता पण्डितवर बायाधर हैं । उन्होंने अनगार-धर्मामृतको भव्यकुमुदचंद्रिका टीका वि० सं १३०० में समात की थी, और यही शायद उनका अन्तिम प्रन्य था। अतः, वे विक्रमकी तेरहवीं शताब्दीके विद्वान हैं उनके बनाये हुए वोसों बन्ध है और उनमें से बहुतसे उपलब्ध भी हैं। वे अपने 'जिनयात्र कल्प' नामक प्रन्यमें जो विसं १२८५ में बनकर समाप्त हुआ है -अपने उससमय तक बनाये हुए जिन जिन प्रन्थोंका उल्लेख करते हैं, उनमें इष्टोपदेश टोकाको भी नाम है। इससे मालूम , ।

(४) होता है कि यह टोका १२८५ से पहले बनी है। यह टोका उन्हों- ने सागरचंद्र मुनिके शिष्य विनयचंद्रको प्रेरणासे बनाई थो, ऐसा टोकोके अन्तिम श्लोकोंसे मालूम होता है। १० वैराज्ञ-मणिमाला । यह श्रुतसागरसूरिक शिष्य श्री- चंद्रको रची हुई है। श्रुतसागर विद्यानन्दिमट्टारकके शिष्य थे। उनका समय विक्रमको १६वीं शताब्दो है श्रीचन्दका बनाया हुआ और कोई अन्य देखने में नहीं आया इन महत्व पूर्ण ग्रन्थों के अनुवादमें बहुतसो जगह ध्रुटियां पह गई होंगो विज्ञ पाठकोंसे यह सविनय निवेदन है कि वे उन्हें परि- मार्जित बनेका काट उठाकर पढे पढावे मोर हमें क्षमा प्रदान करें - - ॐ श्रीवीतरागाय नमः। सनातनजेनग्रंथमाला। श्रीमनागसेनमुनिविर िKATCHIETY तत्त्वानुशासन। (भाषानुवाद सहित) सिद्धस्वार्थानशेषार्थस्वरूपस्योपदेशकान् । परापरगुरून्नत्वा वक्ष्ये तत्त्वानुशासनं॥१॥ जिन्होंने अपने शुद्ध प्रात्साको सिद्ध कर लिया है और समस्त पदार्थों के स्वरूपका उपदेश दिया है ऐसे प्रा- चीन अर्वाचीन समस्त गुरुओंको नमस्कार कर में (श्रीम- भागसेगमुनि) समानुशासन नामके ग्रंथको कहता हूं ॥ १ ॥ अस्ति वास्तवसर्वज्ञः सर्वगीर्वाणबंदितः। घातिकर्मक्षयोद्भूतस्पष्टानंतचतुष्टयः ॥ २॥ धाविया कोके नष्ट होनेसे जिन्हें अनंत चतुष्टय स्पष्ट मापानुवाद सहित। रीतिसे प्रगट होगये हैं और जो समस्त इंद्रादि देवों द्वारा बंधनीय है ऐसा कोई न कोई वास्तविक सर्वज्ञ इस संसारमें अवश्य है ॥२॥ तापत्रयोपततेभ्यो भव्येभ्यः शिवशर्मणे। तत्त्वं हेयमुपादेयमिति द्वेधाभ्यधादसौ॥३॥ उन्हीं सर्वज्ञ देवने तीनों तरहके संतापोंसे तपाये हुए भन्य जीवोंको मोक्षरूप कल्याण प्राप्त करनेके लिये दो प्र- कारके तत्त्वोंका उपदेश दिया है एक हेय अर्थात् छोडने योग्य और दूसरा उपादेय अर्थात् ग्रहण करने योग्य ॥३॥ बंधो निबंधनं चास्य हेयमित्युपदार्शतं । हेयं स्याद् दुःखसुखयोर्यस्माद्वीजमिदं वयं ॥४॥ उन्होंने पंच और धके कारणोंको इस जीयकैलिये हेय तत्व अर्थात् छोडने योग्य बतलाया है इसका कारण यह है कि ये दोनों ही तत्त्व (बंध और बंधके कारण) सुख (सुख सरीखा लगने वाले इंद्रिय सुख ) दुःखके कारण हैं और इसीलिये हेय गिने जाते हैं ॥ ४ ॥ 'मोक्षस्तत्कारणं चैतदुपादेयमुदाहृतं । उपादेयं सुखं यस्मावस्मादाविभविष्यति ॥ ५ ॥ इसीप्रकार मोक्ष और मोक्षके कारणोंको उपादेय तत्त्व बवलाया है इसका कारण यह है कि मोक्ष और मोक्षक तत्त्वानुशासन। कारणोंसे वास्तविक सुखं प्रगट होता है इसलिये वे दोनों ही उपादेय तस्त्र माने जाते हैं ॥५॥ तत्र बंधः स हेतुभ्यो यः संश्लेषः परस्परं । जीवकर्मप्रदेशानां स प्रसिद्धश्चतुर्विधः ॥ ६ ॥ अपने निश्चित कारणों के द्वारा जो जीव और कोके प्रदेश परस्पर मिल जाते हैं उसको बन्ध कहते हैं वह बन्ध चार मकारसे प्रसिद्ध है ( प्रति स्थिति अनुभाग और प्रदेश ) ॥६॥ बंधस्य कार्यः संसारः सर्वदुःखप्रदोऽगिनां । द्रव्यक्षेत्रादिभेदेन स चानेकविधः स्मृतः॥७॥ इसी, बन्धका कार्य यह संसार है जो कि जीवोंको सब तरहके दुख देनेवाला है। यही संसार द्रव्य क्षेत्र प्रादि के (द्रव्य क्षेत्र काल मव भाव) के भेदसे अनेक तरहका का जाता है॥७॥ स्युमिथ्यादर्शनज्ञानचारित्राणि समासतः। बंधस्य हेतवोऽन्यस्तु त्रयाणामेव विस्तरः ॥८॥ मिथ्या दर्शन मिथ्या ज्ञान और मिथ्या चारित्र ये ही चीन संक्षेपसे बन्ध के कारण हैं वाकी और सव ( बन्धके अन्य कारण ). इन्हीं तीनों के भेद प्रभेद समझने चाहिये !! अन्यथावस्थितेष्वर्थेष्वन्यथैव रुचिर्नृणां ।

भाषानुवाद सहित। दृष्टिमोहोदयान्मोहो मिथ्यार्दशनमुच्यते ॥ ९ ॥ जो पदार्थ किसीभी हालतमें मौजूद हैं उनमें दर्शन मोहनीय काके उदयसे मनुष्यों का विश्वास वा उनकी श्रद्धा रुचि भिन्न रीतिसे होजाय अर्थात् वे कुछका कुछ विश्वास- करलें तो उनके उस मिथ्या विश्वासको मोह वा मिथ्या द- न कहते हैं ॥९॥ ज्ञानावृत्युदयादर्थेष्वन्यथाधिगमो भ्रमः। अज्ञानं संशयश्चेति मिथ्याज्ञानमिह त्रिधा ॥१०॥ ज्ञानावरण कर्मके उदयसे पदार्थोंमें मिथ्याज्ञान होनेको मिथ्याज्ञान कहते हैं वह मिथ्याज्ञान भ्रम ( अनध्यवसाय) प्रज्ञान (विपरीत ज्ञान) और संशयके भेदसे तीन प्रकारका कहा जाता है ।। १०॥ वृत्तिमोहोदयाजन्तोः कषायवशवर्तिनः । योगप्रवृत्तिरशुभा मिथ्याचारित्रमूचिरे ॥११॥ चारित्र मोहनीय कर्मके उदयसे जो इस जीवके कपायों के वश होकर योगोंकी (मन बचन कायकी ) अशुभ मव- चि होती है उसको मिथ्या चारित्र कहते हैं ॥ ११॥ । बंधहेतुषु सर्वेषु मोहश्च प्राक् प्रकीर्तितः। मिथ्याज्ञानं तु तस्यैव सचिवत्वमशिनियत् ॥१२॥ -- तत्वानुशासन। | .. ममाहंकारनामानौ सेनान्यौ तौ च तत्सुतौ । यदायत्तः सुदुर्भेदो मोहव्यूहः प्रवर्तते ॥१३॥ : बन्धक जितने कारण हैं उनमें सबसे पहले मोह या मिथ्या दर्शन ही कहा गया है। मिथ्याज्ञान तो केवल मंत्री- अनेका काम करता है अर्थात् मिथ्याज्ञान मिथ्या दर्शनका सहायक हैं । ममत्व और अहंकार ये दोनों उस पिध्यादर्शन के पुत्र हैं और ये ही दोनों सेनापति हैं इन्हींकी अधीनता में यह मोहव्यूह ( मिथ्या दर्शनकी सेनाकी व्यूह रचना) अत्यन्त दुर्शीद (जिसको कोई भी न भेद सके) हो रहा है । शश्वदनात्मीयेषु स्वतनुप्रमुखेषु कर्मजनितेषु । आत्मीयाभिनिवेशो ममकारो मम यथा देहः १३ अपने शरीर आदि (पुत्र स्त्री धन धान्यादि ) जो पदार्थ कर्मक उदयसे प्राप्त हुए हैं और जो आत्मासे सदा भिन्न रहते हैं उनमें अपनापन मान लेना ममकार वा ममत्व कह लाता है जैसे यह शरीर मेरा है ऐसी बुद्धिको ममत्व कहते हैं ॥ १४॥ ये कर्मकृता भावा: परमार्थनयेन चात्मनो भिन्नाः । तत्रात्माभिनिवेशोऽहंकारोऽहं यथा नृपतिः १५ इसी प्रकार जो आत्माके विभाव परिणाम कर्माके उदय से प्राप्त हुए हैं और निश्चयनयसे आत्मासे भिन्न हैं उनमें

भाषानुवाद सहित।
।
अपनापन मान लेना अहंकार कहलाता है जैसे मैंराना है ।।
मिथ्याज्ञानान्वितान्मोहान्ममाहंकारसंभवः ।
इमकाभ्यां तु जीवस्य रागो द्वेषस्तु जायते ॥१६॥
मिंध्याज्ञान के साथ २ होनेवाले मिथ्यादर्शनसे ममकार
और अहंकार उत्पन्न होते हैं तथा ममकार और अहंकारसे
इस जीवके राग द्वेष पैदा होते हैं ॥ १६ ॥
तान्या पुनः कषायाः स्युनोंकषायाश्च तन्मयाः।
तेभ्यो योगाः प्रवर्तन्ते ततःप्राणिवधादयः ॥१७॥
तेभ्यः कर्माणि बध्यन्ते ततः सुगातदुर्गती ।
तत्र कायाःप्रजायन्ते सहजानीन्द्रियाणि च ||१||
राग तथा देपसे कषाय प्रगट होते हैं और नोकषाय भी
कपायरूप ही होते हैं अर्थात् कपायोंसे ही प्रगट होते हैं। उन
कषाय और नोकषायोंसे ही योगोंकी प्रवृत्ति होती है, और
योगोंकी मचि होनेसे जीवहिंसा झूठ चोरी आदि महापार
उत्पन्न होते हैं। इन पापोंसे कर्मोका बन्धहोता है उन बंधे
हुए कर्मोके उदयसे सुगति तथा दुर्गति प्राप्त होती है उनसु-
गति तथा दुर्गति दोनोंमें शरीर उत्पन्न होते हैं और उन श-
शेरोंके साथ२ इन्द्रियां प्रगट होती हैं ॥१७-१८ ॥
तदर्थानिन्द्रियैगृह्णन् मुह्यति दृष्टि रज्यते ।
ततोबंधो भ्रमत्येवं मोहव्यूहगतः पुमान् ॥ १९ ॥

७
तत्त्वानुशासन।
जन स्पर्शन रसना आदि इंद्रियों के द्वारा उनके वि-
षय स्पर्श रस आदिको ग्रहण करता हुआ यह जीव मोहित
होता है द्वेष करता है और राग करता है तथा मोहित होने
और राग द्वेष करनेसे इस जीवके फिर काँका बंध होता
है। इसप्रकार मोहके व्यूहमें (मोहकी सेनाकी रचनामें)
भास हुआ यह नीष सदा परिभ्रमण किया करता है ॥१९॥
तस्मादेतस्य मोहस्य मिथ्याज्ञानस्य च द्विषः ।
ममाहंकारयोश्वात्मन्विनाशाय कुरूद्यमं॥२०॥
इसलिये हे प्रात्मन् ! ये मिथ्यादर्शन और मिथ्याज्ञान
दोनों ही तेरे शत्रु हैं अतएव इन दोनोंको नाश करनेके
लिये तथा मप्रकार और अहंकारको नाश करनेकेलिये
तू उद्यम कर ॥२०॥
बंधहेतुषु मुख्यषु नश्यत्सु क्रमशस्तव ।
शेषोऽपिरागद्वेषादिबंधहेतुर्विनश्यति ॥२१॥
मिथ्यादर्शन मिथ्याज्ञान तथा ममकार और अहंकार
बंधके मुख्य कारण हैं यदि ये नष्ट हो जायगे तो अनुक्रमसे
बाकी बचे हुए राग द्वेष आदि बंधके कारण भी अवश्य
नष्ट हो जायंगे ॥ २१॥
ततस्त्वं बंधहेतूनांसमस्तानां विनाशतः।
बंधप्रणाशान्मुक्तः सन्नभ्रमिष्यसि संसृतौ ॥२२॥

भाषानुवाद सहित । उन सब बंधके कारणों के नष्ट होनेसे बंध भी नष्ट हो जायगा, बंधक नष्ट होनेसे तु मुक्त हो जायगा और मुक्त होनेपर फिर तुझे इस संसारमें परिभ्रमण नहीं क- रना पडेगा ॥ २२॥ बंधहेतुविनाशस्तु मोक्षहेतुपरिग्रहाद । परस्परविरुद्धत्वाच्छीतोष्णस्पर्शवत्तयोः ॥ २३ ॥ अथवा मोक्षके कारणोंको स्वीकार करनेसे (पालन व धारण करनेसे ) बंधके कारणों का नाश अवश्य होता है क्योंकि मोक्षके कारण और बंधके कारण दोनों ही शीत स्पर्श और उम्ण स्पर्शके समान परस्पर विरुद्ध हैं ॥२३॥ स्यात्सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रितयात्मकः। मुक्तिहेतुर्जिनोपज्ञं निर्जरासंवरक्रियाः ॥ २४ ॥ सम्पदर्शन सम्यग्नान और सम्यक् चारित्र इन तीनों की एकता ही मोक्षका कारण है। इनके सिवाय निर्जरा और संवररूप क्रियाएं भी श्रीजिनेंद्रदेवने मोक्षके कारणरूप वतलाई हैं ॥ २४॥ जीवादयो नवाप्यों ये यथा जिनभाषिताः। तेतथैवेतिया श्रद्धासा सम्यग्दर्शनं स्मृतं ॥ २५ जीवादिक नौ पदार्य श्रीजिनेंद्रदेवने जिसप्रकार कहे हैं उनकी उसीमकार श्रद्धा करना सम्यग्दर्शन कहलाता है ।।

तत्वानुशासन। प्रमाणनयनिक्षेपैरों याथात्म्येन निश्चयः। जीवादिषु पदार्थेषु सम्यग्ज्ञानं तदिष्यते ॥२६॥ प्रमाण नय और निक्षेपोंके द्वारा जीवादिक पदार्थोंमें यथार्थ रीतिसे निश्चय करना सम्पज्ञान कहलाता है # २६ चेतसा वचसा तन्वा कृतानुमतकारितैः। पापक्रियाणां यस्त्यागः सच्चारित्रमुप॑ति तद् २७ मनसे बचनसे शरीरसे क्या कृत कारित अनुमोदनासे जो पापरूप क्रियाओं का त्याग करदेना है वह उत्तम चारित्र कहलाता है ।। २७॥ मोक्षहेतुः पुन<धा निश्चयव्यवहारतः। तत्रायःसाध्यरूप: स्याद् द्वितीयस्तस्य साधनं २८ निश्चय और व्यहारके मेदसे मोक्षके कारण दोम- फारके हैं उनमें से पहिला अर्थात निश्चयकारण साध्यरूम है और दूसरा व्यवहारकारण साधना है अर्थात् व्यवहा- से निश्चय सिद्ध किया जाता है ।। २८ ।। . अभिन्नकर्तृकर्मादिविषयो निश्चयो नयः । व्यवहारनयो भिन्नकर्तृकर्मादिगोचरः ॥ २९ ॥ जिसमें कर्ता कर्म प्रादि विषय सब अभिन्न हों वह निश्चयनय वा निश्चय योनमार्ग गिना जाता है और बिस- भाषानुवाद सहित । में कर्ता कर्म आदि सब भिन्न हों वह व्यहार नय वा व्यव- हार मोक्षमार्ग कहलाता है ॥ २९ ॥ धर्मादिश्रद्धानं सम्यक्त्वं ज्ञानमधिगमस्तेषां । चरणं च तपसि चेष्टा व्यवहारान्मुक्तिहेतुरयं ३० धर्म तच भादिका यथार्थ श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन- उन धर्म वा तत्त्वोंका जानना सम्यग्ज्ञान है और तपश्च- रणमें अपनी चेष्टा करना अर्थात् अपनेमें अपने आत्माको लगाना सम्यक्चारित्र है इन तीनोंकी एकता ही व्यवहार नयसे मोक्षमार्ग कहलाता है ॥ ३० ॥ निश्चयनयेन भणितस्त्रिभिरेभिर्यः समाहितो भिक्षुः नोपादत्ते किंचिन्न चमुञ्चति मोक्षहेतुरसौ ॥३१॥ जो साधु इन ऊपर लिखे हुये सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र सहित होकर न कुछ ग्रहण करता है और न कुछ छोडता है, भावार्थ-आत्मामें तल्लीन हो जा- वा है वह निश्चय नयसे मोक्षमार्ग गिना जाता है ।।३।। योमध्यस्थः पश्यतिजानात्यात्मानमात्मनात्मन्यात्मा गवगमचरणरूपरसनिश्चयान्मुक्तिहेतुरिति जिनोक्ति श्रीजिनेंद्रदेवने उपदेश किया है कि जो सम्यग्दर्शन ज्ञानचरित्ररूप मध्यस्थ वात्मा अपने ही प्रात्माके द्वारा अपने ही प्रात्मामें अपने ही आत्माको जानता है और .

तत्वानुशासन। देखता है यह निश्चय नयसे मोक्षमार्ग गिना जाता है ॥३२॥ सचमुक्तिहेतुरिद्धो ध्याने यस्मादवाप्यते द्विविधोऽपि तस्मादभ्यसन्तु ध्यानं सुधियः सदाप्यपास्यालस्यं ॥ इसप्रकार ऊपर कहा हुआ दोनों प्रकारका पूज्य मो- समार्ग नियमसे ध्यानमें ही प्राप्त होता है इसलिये बुद्धिमान लोगोंको पालस छोडकर सदा ध्यानका ही अभ्यास करना चाहिये ॥३३॥ आ रौद्रं च दुर्ध्यानं वर्जनीयमिदं सदा। धर्म शुक्लंच सद्ध्यानमुपादेयं मुमुक्षुभिः ॥ ३४॥ ध्यानके चार भेद हैं भात, रौद्र, धर्म्य और शुक्छ। इन- मेसे आध्यान और रौद्रध्यान ये दोनों दुनि (पापके- कारण) हैं इसलिये इनका सदा त्याग करना चाहिये तथा धHध्यान और शुक्लध्यान ये दोनों ही उत्तम ज्यान हैं इसलिये मोक्षकी इच्छा करनेवालोंको इनका अभ्यास सदा करते रहना चाहिये ॥ ३४॥ वजूसंहननोपेताः पूर्वश्रुतसमन्विताः। दध्युःशुक्लमिहाताताः श्रेण्योरारोहणक्षमाः॥३५॥ जिनके शरीरका संहनन वजषम नाराव था, जो ग्यारह अंग और.चौदह पूर्व श्रुतज्ञानको धारण करनेवाले थे तथा जो उपशमश्रेणी और क्षपकश्रेणी के चढ़नेके योग्य भाषानुवाद सहित। थे ऐसे चतुर्यकालमें होनेवाले कितने ही लोगोंने शुक्लध्यान धारण किया था ।। ३५॥ ताइक्सामय्यभावे तु ध्यातुं शुक्लमिहाक्षमान् । ऐदंयुगीनानुद्दिश्य धर्मध्यानं प्रचक्ष्महे ।। ३६ ॥ परंतु इससमय शुक्लध्यानके योग्य सामग्रीका अभाव होनेसे इस समय उत्पन्न होनेवाले जो लोग शुक्लध्यान धारण कर नहीं सकते उनके लिये अब धर्मध्यानका स्वरूप कहता हूं ॥३६॥ ध्याताध्यानंफलंध्येयं यस्य यत्रयदा यथा । इत्येतदत्र बोद्धव्यं ध्यातुकामेन योगिना ॥३७॥ जो योगी ध्यान करना चाहता है उसे ध्याता (ध्यान करनेवाला ) ध्यान, ध्यानका फल, ध्येय अर्थात् ध्यान करने योग्य पदार्थ तथा जिसका ध्यान करना चाहिये जिसजगह करना चाहिये, जिससमपमें करना चाहिये, और जिस रीतिसे करना चाहिये इन सब बातोंका विचार करना उचित है ॥ ३७॥ गुप्तेन्द्रियमनाध्याताध्येयं वस्तु यथास्थितं । एकाग्रचिंतनध्यानं निर्जरासंवरौ फलं ॥ ३८ ॥ जिसकी इंद्रियां और मन वशमें रहते हैं वह ध्याना अर्थात् ध्यान करने वाला कहा जाता है जो पदार्य अपनी १३ तत्त्वानुशासन। . अवस्थामें मौजूद है वह ध्येय अर्थात ध्यान करने योग्य गिना भाता है। एकाग्र चितवन करना अर्थात अन्य सब पदाथों के चितवनको छोड़कर किसी एकही पदार्थका चितवन क- रना ध्यान कहलाता है और कौकी निर्जरा होना तथा संवर होना उसका फल माना जाता है ।। ३८ ॥ देशः कालश्च सोऽन्वेष्य सा चावस्थानुगम्य तां। यदा यत्र यथा ध्यानमपवित्रं प्रसिद्धयति॥३९॥ इसी प्रकार देश और कालको देखकर वह अवस्था भी देखनी चाहिये कि जिससे जिस जगह ध्यान किया जाय जिस समय में ध्यान किया जाय और जिस रीतिसे ध्यान किया जाय उसमें किसी प्रकारका विघ्न न आधे अर्थात वह ध्यान निर्विघ्न रीविसे सिद्ध हो ।॥ ३९ ॥ इति संक्षपतो ग्राह्यमष्टांग योगसाधनं । विवरीतुमदः किंचिदुच्यमानं निशम्यतां ॥ ४ ॥ इस प्रकार संक्षेपसे यह योग साधन आठ प्रकार से ग्रहण करना चाहिये । भाव में इसी आठ प्रकारके ध्यानकर विशेष वर्णन लिखता हूं उसे चित्त लगाकर सुनो।। ४० ॥ तत्रासन्नीभवेन्मुक्तिः किंचिदासाद्य कारणं। विरक्तः कामभोगेभ्यस्त्यक्तसर्वपरिग्रहः ॥ ११ ॥ अभ्येत्य सम्यगाचार्य दीक्षा जैनेश्वरीं श्रितः ।

भाषानुवाद सहित। तप:संयमसम्पन्नः प्रमादरहिताशयः ॥ १२॥ सम्यग्निणींतजीवादिध्येयवस्तुव्यवस्थितिः । आतरौद्रपरित्यागालब्धचित्तप्रसत्तिकः ॥३॥ मुक्तलोकहयापेक्षः षोढाशेषपरीषहः । अनुष्ठितक्रियायोगो ध्यानयोगे कृतोद्यमः ॥al महासत्त्वः परित्यक्तदुर्लेश्याशुभभावनः । इतीदृग्लक्षणो ध्याता धर्मध्यानस्य सम्मतः १५ उन सबमेंसे ध्यानाका स्वरूप इस प्रकार है-मुक्त होना जिसके समीप पाचुका है अर्थात् जो योडे ही कालमें मुक्त होने वाला है, जो कुछ भी कारण पाकर काम भोगों से विरक्त हो गया है जिसने समस्त परिमोंका त्याग कर दिया है , उत्तम आचार्यके समीप जाकर निसने श्रीजैन- दीक्षा धारण कर ली है जो तप और संयमको अच्छी तरह पालन करता है, जिसका हृदय प्रमादों से सर्वथा रहित है जिसने ध्यान करने योग्य जीवादिक पदार्थों की अवस्था का अच्छी तरह निर्णय करलिया है, बात ध्यान और रौद्र ध्यानके त्याग करनेसे जिसका चिच सदा निर्मल रहता है जिसने इसलोक और परलोक दोनों लोकों की अपेक्षाका स्थाग कर दिया है जो समस्त परिषहोंको सहन कर चुका है जिसने समस्त क्रियायोगोंका अनुष्ठान कर लिया है जो तत्त्वानुशासन। ध्यान धारण करनेके लिये सदा उद्यम करता रहता है जो महाशक्तिशाली है और जिसने अशुभ लेश्याओं और अ- शुभ भावनाओं का सर्वथा त्याग कर दिया है। इस प्रकारके सम्पूर्ण लक्षण जिसमें विद्यमान हैं वह धर्मध्यानके ध्यान करने योग्य ध्याना माना जाताहै ॥ ४१-४५॥ अप्रमत्तः प्रमत्तश्च सदृष्टिर्देशसंयतः। धर्मध्यानस्य चत्वारस्तत्त्वार्थे स्वामिनः स्मृताः वाचार्यसूत्रमें अप्रमत्त सातवें गुणस्थान वाला प्रमत्त छठे गुणस्यानवाला अविरत सम्पादृष्टि चौथे गुण स्थानया- ला और देशसंयमी पांचवे गुणस्यानवाला इस प्रकार धर्म ध्यानके चार स्वामी माने हैं अर्यात ये चारो तरहके जीव धर्मध्यान धारण कर सकते हैं ॥ ४६ ॥ मुख्योपचारभेदेन धर्मध्यानमिह द्विधा। अप्रमत्तेषु तन्मुख्यमितरेष्वौपचारिकं ॥ १७ ॥ मुख्य और उपचारके भेदसे धHध्यान दो प्रकारका है उनमेंसे अप्रमच गुणस्थानमें मुख्य होता है और बाकी तीन गुणस्थानोंमें औपचारिक होता है ॥ १७ ॥ द्रव्यक्षेत्रादिसामग्री ध्यानोत्पत्तौ यतस्त्रिधा। ध्यातारस्त्रिाविधास्तस्मात्तषां ध्यानान्यपि त्रिधा ध्यान धारण करनेके लिये द्रव्य क्षेत्र आदिकी.सा- १३ भाषानुवाद सहित । . गग्री वीनप्रकारकी है उत्तम मध्यम जपन्य इसलिये अर्थात् सामग्रीके मेदसे ध्यान करनेवाले भी तीन प्रकारके हैं और उनके ध्यान भी तीन प्रकारके हैं ॥४८॥ सामगीतः प्रकृष्टाया ध्यातरि ध्यानमुत्तमं । स्याजघन्यं जघन्याया मध्यमायास्तु मध्यम ४९ यदि ध्यान करनेवालेको उत्कृष्ट सामग्री मिल जाय वो उसका ध्यान भी उत्तम कहा जाता है यदि उसे ज- चन्य सामग्री मिले तो उसका ध्यान जघन्य कहलाता है और यदि सामग्री मध्यम मिले तो उसका वह ध्यान मी मध्यम गिना जाता है।॥ ४६॥ श्रुतेन विकलेनापि ध्याता स्यान्मनसा स्थिरः । प्रबुद्धधीरधश्वेण्योधर्मध्यानस्य सुश्रुतः ॥ ५० ॥ श्रेणी प्रारोहणके नीचे नीचे तक यदि विकसित बु. दिवाला ध्यान करने योग्य पुरुष पूर्ण श्रुतज्ञानी न हो यो- डेसे श्रुतज्ञानका जानकार हो तो भी वह मनको स्थिर कर सकता है और धर्मध्यानको धारण कर सक- सा है। ५० ॥ सदृष्टिज्ञानवृत्तानि धर्म धर्मेश्वरा विदुः। तस्माघदनपेतं हि धन्यं तझ्यानमभ्यधुः ॥५१॥ घर्पक ईश्वर गणधरादि देव सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान १० तखानुशासन। और सम्यक् चारित्रको धर्म कहते हैं इसलिये जो उस र. नत्रयरूप धर्मसेपन हो उसे ही वे प्राचार्यगण पर्यध्यान कहते हैं ।। ५१॥ आत्मनः परिणामो यो मोहक्षोभविवर्जितः। स च धर्मोनपेतं यत्तस्मात्तद्धय॑मित्यपि ।। ५२|| अथवा मोह और क्षोभसे रहित जो प्रात्माका परिणाम है वह भी धर्म कहलाता है और उस धर्मसे उत्पन्न हुआ जो ध्यान है वह घHध्यान कहलाता है ॥ २ ॥ शून्यीभवदिदं विश्वं स्वरूपेण धृतं यतः । तस्माद्वस्तुस्वरूपं हिप्राहुर्धर्म महर्षयः ॥ ५३ ॥ शून्यताको प्राप्त हुआ यह संसार स्वरूपसे ही धारण किया जा रहा है, भावार्य-पदार्थोंके स्वरूपसे ही वह वि- व वा संसार कहलाता है विना पदार्थोके स्वरूपके वह कमी विश्व वा संसार नही कहला सकता क्योंकि विना पदार्योंकि स्वरूपके वह अलोकाकाशके समान शून्य कहला- बगा इसलिये महर्षि लोग वस्तुके स्वरूपको ही धर्म क- इते हैं ॥५३॥ ततोऽनपेतं यज्ज्ञातं तद्धम्य ध्यानमिष्यते । धों हि वस्तुयाथात्म्यमित्याऽप्यभिधानतः ।। उस वस्तुके स्वरूपसे जो उत्पन्न हो अथवा उसके १८ भापानुवाद सहित। द्वारा जो जाना जाय वह धर्मघ्यान कहलाता है। तथा अषिप्रणीत आर्ष ग्रंथोंमें वस्तुके यथार्थ स्वरूपको ही धर्म कहा है ॥ ५४॥ यस्तूत्तमक्षमादिः स्यादो दशतया परः । ततोऽनपेतं ययानं तहा धर्पमितीरितं ॥५५॥ अथवा उत्तम क्षमा श्रादि जो दश मकारका धर्म मा- नागया है उससे उत्पन्न हुआ जो ध्यान है वह धHध्यान कहलाता है ॥ ५५॥ एकाग्रचिंतारोधो यः परिस्पदेन वर्जितः। तयानं निर्जराहेतुःसंवरस्य च कारणं ॥५६॥ जो ध्यान एकाग्रचिंताके निरोध रूप है अर्थात् कि- सी एक पदार्थके चितवनके द्वारा अन्य पदार्थोंके चितवमके निरोध करने रूप है और मन वचन कायके द्वारा होनेवाले परिस्पंदनसे (आत्माके प्रदेशोंके इलन चलनसे ) रहित है वही ध्यान निर्जराका कारण और संवरका हेतु गिना जाता है ।। ५६ ॥ एकं प्रधानमित्याहुरग्रमालंबनं मुखं। चिंता स्मृति निरोधंतु तस्यास्तत्रैववर्तनं ॥५७॥ एक, प्रधान, अग्र आलंबन और मुख ये सब पर्यायवा- 'चक शब्द है तथा चिंता, स्मृति, निरोध, और उसका उसी १६ तत्वानुशासन। में तल्लीन रहना ये भी सव पर्याय वाचक शब्द हैं ॥५५॥ द्रव्यपर्याययोमध्ये प्राधान्येन यदर्पित। तत्र चिंतानिरोधो यस्तयानंबभणुर्जिनाः ५८ द्रव्य और पर्यायमेंसे निसको प्रधानता दी हो उसीमें चिताका निरोध करना अर्थात् अन्य सब चिताओंको छो- इकर उसीका चितवन करना, ध्यान कहलाता है ऐसा श्री जिनेंद्रदेवने कहा है ॥ ५८॥ एकाग्रग्रहणं चात्र वैयग्यूबिनिवृत्तये। व्यग्रं ह्यज्ञानमेव स्ययानमेकाप्रमुच्यते ॥५९॥ यहां पर अर्थात् ध्यानके लक्षणमें एकाग्रताका ग्रहण, व्यग्रता वा चंचलताके दूर करने केलिये किया गया है । अन्य चिंताओंको छोडकर एक पदार्थका चितवन करना ही व्यग्रताका अभाव होना है। क्योंकि व्यग्रता ज्ञान है और एकाग्रताको ध्यान कहते हैं ॥ ५ ॥ प्रत्याहृत्य यदा चिंतां नानालंबनवर्तिनीं। एकालंबन एवैनां निरुणाई विशुद्धधीः ॥ ६॥ तदास्य योगिनो योगश्चितकागनिरोधनं । प्रसंख्यानं समाधिः स्याद्ध्यानं स्वेष्टफलप्रदं ६१ निससमय विशुद्ध बुद्धिवाला योगी किसी एक मुख्य पदार्थका अवलंबनकर अनेक पदार्थोके अवलंबन में रहने- मापानुवाद सहित। २० वाली चिताको दरकर केवल उसी चिंताको ( जिस एक मुख्य पदार्थको अवलंबनकर चितवन कर रहा है ) रोकता है अर्थात् उसी एक पदार्थक चितवनको स्थिर रखता है उ- ससमय उस योगीका वह चितवन योग कहलाता है उसीको चिताकी एकाग्रता का निरोध करते हैं उसीको प्रसंख्यान कहते हैं उसीको समाथि कहते हैं और बद्दी आत्माको इष्ट फल देनेवाला ध्यान कहलाता है । ६०-६१ ॥ अथवांगति जानातीत्यगमात्मा निरुक्तितः। तत्त्वेषु चागूगण्यत्वादसावमिति स्मृतः ॥६२ ।। अथवा अंगतीति अग्नं भयाद जो जाने वह अग्र कह- लाता है इस निरुक्तिसे प्रात्माकाही नाम अन पडता है क्योंकि आत्मामें ही जाननेकी शक्ति है । इसके सिवाय सब तत्वोंमें मी आत्मा ही अग्रगण्य वा मुख्य माना जाता है इसलिये भी आत्माको ही अन कहते हैं ।। ६२ ।। द्रव्यार्थिकनयादेकः केवलो वा तयोदितः । अंतःकरणवृत्तिस्तु चिंतारोधो नियंत्रणा ॥६३ ॥ अभावो वा निरोधः स्वत्स च चिंतांतरव्ययः । एकचितात्मको यद्वा स्वसंविचितयोडिझतः॥ द्रव्यार्थिक नयसे यह आत्मा एक ही है अथवा केवल जानी वा केवली होनेसे यह आत्मा केवल वा एक गिना २१ तत्त्वानुवासना . आता है अंत:करणकी वृत्तिको नियंत्रित करना अर्याद उसे वशम रखना चिंतारोप कहलाता है । अथवा अभावको नि: रोध कहते हैं और अन्य चिंताओंका नाश होना ही वह अ. भाव वा निरोध कहलाता है। अथवा अन्य चिंताओंसे र. हित जो एक चितात्मक एक चिवारूप अपने प्रात्माका ज्ञान वह भी एक अग्र ग्रात्मा कहलाता है ॥ ६३-६४ ।। तत्रात्मन्यसहायेयच्चितायाः स्यान्निरोधनं । तयानंतदभावो वास्वसंवित्तिमयश्वसः॥६५॥ उस असहायरूप एक आत्मामें जो चिताका निरोध किया जाता है अर्थात् सब चिंताओंको छोडकर अन्तःकर- यकी प्रवृत्ति उसी में नियंत्रित वा तल्लीन हो जाती है उसको ध्यान कहते हैं वही प्रभाव वा निरोध अर्थात अन्य चिंता ओंका अभाव वा नाश कहलाता है तथा उसीको निजज्ञा- नभय अपने ज्ञानमें तल्लीन हुआ आत्मा कहते हैं ॥६५॥ श्रुतज्ञानमुदासीनं यथार्थमतिनिश्चल। स्वर्गापवर्गफलदं ध्यानमांतर्मुहूर्ततः ॥ ६६ ॥ यह श्रुतज्ञानरूप, उदासीन, यथार्थ, अत्यंत निश्चल और स्वर्गमोक्षादि फल देनेवाला ध्यान अंतर्मुहूर्त तक रहता है। ध्यायते येन तयानयोध्यायति स एव वा । यत्र वाध्यायते यहाध्यातिर्वा ध्यानमिष्यते ६७ " २२ भाषानुवाद सहित। ध्यान है, जिसके द्वारा ध्यान किया जाय वह भी ध्यान जो ध्यान वा चितवन किया जाता है वह भी ध्यान है, जि- समें ध्यान वा चितवन किया जाय वह भी ध्यान है और ध्यान करने वा चितवन करनेमात्रको भी ध्यान कहते हैं । श्रुतज्ञानेन मनसा यतो ध्यायन्ति योगिनः । ततः स्थिरं मनो ध्यानं श्रुतज्ञानं च तात्विक॥६॥ योगी लोग श्रुतज्ञानरूप मनके द्वाराही ध्यान करते है इसलिये श्रुतज्ञानरूप जो स्थिर मन है वही वास्तविक ध्यान कहलाता है । ६८॥ ज्ञानादातरादात्मा तस्माज्ज्ञानं न चान्यतः । एक पूर्वापरीभूतं ज्ञानमात्मेति कीर्तितं ॥६९ ॥ ज्ञानसे भिन्न आत्मा नहीं है और आत्मासे भिन्न ज्ञान नहीं है पूर्वापरीभूत एक ज्ञान ही आत्मा कहलाता है॥६६॥ ध्येयार्थालंबनं ध्यानं ध्यातुर्यस्मान्न भिद्यते। द्रव्याथिकनयात्तस्मात्यातैव ध्यानमुच्यते ॥७० ध्यान करने योग्य जो ध्येय पदार्थ हैं उनका अवलंबन करना चितवन करना ध्यान कहलाता है । तथा वह ध्यान द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षासे ध्यान करनेवाले ध्यातासे कभी भिन्न नहीं होता है इस कारण से ध्यानाको ही ध्यान कह देते हैं । ७.

तत्वानुशासन। है ध्यातरि ध्यायते ध्येयं यस्मान्निश्चयमाश्रितः। तस्मादिदमपि ध्यानं कर्माधिकरणद्वयं ॥ ७१ ॥ निश्चयनयका प्राश्रय लेनेवाले पुरुषों के द्वारा ध्यान क- रने योग्य जो ध्येय पदार्थ है उसका ध्यान करनेवाले आत्मामें ही ध्यान किया जाता है इसलिये कर्म ( जिस पदार्यका अवलंबन लेकर ध्यान किया जाता है) और अधिकरण (जिस यात्मामें ध्यान किया जाता है) ये दोनों भी ध्यान ही कहलाते हैं ॥ ७१॥ इष्टे ध्येये स्थिरा बुद्धिों स्यात्संतानवर्तिनी । ज्ञानांतरापरामृष्टा सा ध्यातिानमीरिता ७२ ध्यान करने योग्य जो स्थिर पदार्थ है उसमें अन्य ज्ञानका (अन्य पदाथोंके ज्ञानका) स्पर्श न करनेवाली जो संतान रूप स्थिर बुद्धि है अर्थात जो बुद्धि अनेक क्षण तक उसीमें स्थिर रहती है उसीको व्याति वा ध्यान कहते हैं ॥ ७२ ॥ एकं चकाकरण कर्माधिकरण फलं। ध्यानमेवेदमाखिलं निरुक्तं निश्चयानयात् ।। ७३ ॥ यदि निश्चय नयसे देखा जाय तो एक ध्यान ही कर्ता करण कर्म अधिकरण और फल इन रूप पडता है ॥ ७३ ।। स्वात्मानं स्वात्मनि स्वेन ध्यायेत्स्वस्मै स्वतो यतः। षटकारकमयस्तस्मात्यानमात्मैव निश्चयात् (३७४॥ -- माशनुवाद सहित। इसका भी कारण यह है कि निश्चय नयसे यह वाला अपने ही प्रात्माके लिये अपने ही आत्मासे अपने ही आत्माके द्वारा अपने ही अत्मामें अपने ही आत्माका ध्यान करता है इसलिये इन छहों कारक रूप जो श्रात्मा है वही ध्यान कर- लाता है।। ७४॥ संगत्यागः कषायाणां निग्रहो व्रतधारणं । मनोक्षाणां जयश्चेति सामग्री ध्यानजन्मने ॥५॥ परिग्रहोंका त्याग करना, कपायोंका निग्रहकरना, व्रतोंका धारण करना, तथ मन इंद्रियोंका जीतना यह सब ध्यान धारण करनेकी सामग्री है ॥ ७ ॥ इन्द्रियाणां प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च मनः प्रभुः। मन एवं जयेत्तस्माजिते तस्मिन् जितेन्द्रियः ७६ इंद्रियोंकी प्रवृति अथवा निवृत्तिम मन ही स्वामी है सबसे पहिले मनको ही जीतना चाहिये क्योंकि मनके जीव लेनेपर इद्रियोंका विजय अपने आप हो जाता है ।। ७ ॥ ज्ञानवैराग्यरज्जूभ्यां नित्यमुत्पथवर्तिनः । जितचित्तेन शक्यन्ते धर्तुमिन्द्रियवाजिनः ७७ जिसने अपना चित्त जीत लिया है वह पुरुष सदा कुमार्गमें जानेवाले इंद्रियरूपी घोडोंको ज्ञान और वैराग्यरूपी लगायकी दोनों रस्सियोंसे पकड सकता है-वशमें कर सकता है। भावार्य

सत्वानुम्यासन।
मनको वश करनेवाला पुरुष ज्ञान और वैराग्यके द्वाराईद्रियों-
को भी वश कर सकता है । ७७ ॥
येनोपायेन शक्येत सन्नियन्तुं चलं मनः।
स एवोपासनीयोऽत्रन चैव विरमेत्ततः॥७॥
इस ध्यान धारण करने के समय जिस उपायसे यह चंचल
मन नियंत्रित किया जासके उसी उपायकी उपासना करनी
चाहिये और फिर उस उपायसे कभी नहीं हटना चाहिये,
अर्यात् उसी उपायको सदा काममें लाते रहना चाहिये ॥७८
संचिंतयन्ननुप्रक्षाः स्वाध्याये नित्यमुद्यतः।
जयत्येव मनः साधुरिन्द्रयार्थपराङ्मुखः ॥७९॥
जो साधु, रूप रस श्रादि इंद्रियोंके विषयोंसे सदा परा-
न्मुख रहता है। वारह अनुप्रेमाओंक चितवन करता रहता
है और स्वाध्याय करनेमें सदा उद्यमी रहता है वह मनको
अवश्य जीतता है ।। ७६ ॥
स्वाध्यायः परमस्तावज्जप:पंचनमस्कृतेः।
पठनं वा जिनेन्द्रोक्तशास्त्रस्यैकागचेतसा ॥४०॥
पंचनमस्कार मंत्रका जप करना अथवा एका चित्र
होकर श्री जिनद्रदेवके कहे हुए शास्रोंका पठन पाठन कर-
ना परम वाध्याय कहलाता है ॥ ८॥

२६ भाषानुवाद सहित। स्वाध्यायायानमध्यास्तां ध्यानात्स्वाध्यायमामनेद ध्यानस्वाध्यायसंपत्त्या परमात्मा प्रकाशते ॥१॥ ऐसे स्वाध्यायसे ध्यानका अभ्यास होता है तथा ध्या- नसे स्वाध्यायकी वृद्धि होती है और ध्यान तथा स्वाध्याय इन दोनों सम्पदाओंसे परमात्मा प्रकाशित होता है। येत्राहुन हि कालोऽयं ध्यानस्य ध्यायतामिति। तेर्हन्मतानभिज्ञत्वं ख्यापयंत्यात्मनः स्वय।।२।। जो लोग यह कहते हैं कि ध्यानका यह समय (कलि- युग) नहीं है अर्थात् इस कालमें ध्यान नहीं हो सकता इसलिये इस कालमें ध्यान नहीं करना चाहिए वे लोग अ- पने आप ही अपनी अरइत देवके कहे हुए मतकी अजान- कारीको प्रगट करते हैं ।। ८२॥ अन्नदानीं निषेति शुक्लध्यानं जिनोत्तमाः। धर्म्यध्यानं पुनःप्राहुः श्रेणीभ्यां प्राग्विवानां ८३ इस कलिकालमें जिनेंद्रभगवानने शुक्ल ध्यानका नि- वेध किया है कि वह नहीं हो सकता परन्तु क्षपक पशमक श्रेणी चढनेवालोंसे पहिले धर्मध्यान तो कहा ही है। उसका होना तो बतलाया ही है ॥३॥ यत्पुनर्वकायस्य ध्यानमित्यागमे वचः। श्रेण्योध्यान प्रतीत्योक्तं तन्नाधस्तानिषेधकं11८810 .

तस्वानुशासन।
वज्रषभनाराच संहननवालोंके ही ध्यान होता है ऐसा
जो भागममें कहा है वह शुक्लध्यानके प्रति वचन है अर्याद
शुक्लध्यान वज्रषभनाराच संहननवालोंके ही होता है और
वह संहनन इस कलिकालमें होता नहीं है परंतु श्रेणी चढने-
वालोंसे नीचे जो ध्यान होता है वह तो होता ही है उसका
वह वचन निषेधक कैसे हो सकता है ? ।। ८४ ॥
ध्यातारश्चेन्न सन्त्यद्य श्रुतसागरपारगाः।
तत्किमल्पश्रुतैरन्यैर्न ध्यातव्यं स्वशक्तितः ॥८५॥
इस कलिकालमें यदि शास्त्ररूपी समुद्र के पारको पहुंचे
हुये मुनिगण नहीं हैं तो क्या अल्प शास्त्रोंके जाननेवाले लो.
गोंको अपनी अपनी शक्तिके अनुसार ध्यान न करना चा-
हिये ? भावार्थ धHध्यान सबको अपनी शक्त्यनुसार करना
उचित है।। ८५॥
चरितारो न चेत्सन्ति यथाख्यातस्यसंप्रति ।
तत्किमन्ये यथाशक्तिमाचरन्तु तपस्विनः ॥८६॥
यदि इससमय यथाख्यात चारित्रको प्राचरण करने
वाले लोग नहीं है तो क्या अपनी अपनी शक्तिके अनुसार
अन्य तप भी नहीं धारण करना चहिये । भावार्थ-ऊंचे द-
मेका यदि तप नहीं तप सत्ते, ध्यान नहीं कर सक्ते तो
उससे कुछ कम दर्जेका भी उचम तप या ध्यान भी क्या नहीं.
करना चाहिये । ॥६॥

भाषानुवाद सहित ।
सम्यग्गुरूपदेशेन समभ्यस्यन्ननारतं ।
धारणासौष्ठवाड्यानं प्रत्ययानपि पश्यति ॥८७ ॥
गुरुके उपदेशसे अछी तरह वरावर जो मनुष्य ध्यान
का अभ्यास करता है वह निश्चयसे ध्यानके कारण और
ध्यानको प्राप्त हो जाता है ।। ८७ ॥
यथान्यासन शास्त्राणि स्थिराणि स्युर्महान्त्यपि ।
तथाध्यानमपि स्थैर्य लभताभ्यासवर्तिनां11८८॥
जिसमकार अभ्याससे बडे २ शास्त्रोका ज्ञान स्थिर हो
जाता है उसी प्रकार अभ्यास करनेसे ध्यान भी स्थिर हो
जाता है ।। ८॥
यथोक्तलक्षणो ध्याता ध्यातुमुत्सहते यथा ।
तदेव परिकादौ कृत्वा ध्यायतु धरिधीः ॥८९॥
जिसमकार पूर्वमें कहे गये लक्षणवाला ध्याता ध्यान क-
रनेमें उत्साहवान बना रहे उसी प्रकार बुद्धिमान पुरुषको प-
रिकर्म आदिका सहारा ले ध्यान करना चाहिये ॥८९॥
शून्यागारे गुहायां वा दिवा वा यदि वा निशि ।
स्त्रीपशुक्लीवजीवानां क्षुद्राणामप्यगोचरे ॥ ९ ॥
अन्यत्र वा क्वचिद्देशे प्रशस्ते प्रासुके समे।
चेतनाचेतनाशेषध्यानविघ्नविजिते ॥ ९१ ॥

तस्त्रानुशासन । भूतले वा शिलापट्टे सुखासीनः स्थितोऽथवा । सममृज्वायतं गात्रंनिःकंपावयवं दधत् ॥ ९ ॥ नासानन्यस्तनिष्पदलोचनं मंदमुच्छ्वसन् । द्वात्रिंशदोषनिर्मुक्तकायोत्सर्गव्यवस्थितः ॥१३॥ प्रत्याहृत्याक्षलुटाकांस्तदर्थेभ्यः प्रयत्नतः । चितां चाकृष्य सर्वेभ्यो निरुध्य ध्येयवस्तुनि ॥९॥ निरस्तनिद्रो निर्भीतिनिरालस्यो निरंतरं । स्वरूपं पररूपं वा ध्यायदंतर्विशुद्धये ॥ ९५ ॥ किसी सूने मकान में अथवा किसी गुफामें दिनमें अ- थवा रातमें वथा और भी किसी ऐसे स्थानमें जिसमें स्त्री पशु नपुन्सक जीव न जा सकें अथवा और भी कोई जुद्र पाणी न जा सकें, जो स्थान प्रशंसनीय हो, प्रासुक वा निर्जीव हो, जो चेतन अचेतन आदिके द्वारा होनेवाले सर वरहके ध्यानों के विघ्नोंसे रहित हो ऐसा स्थान चाहे पृ- वी हो चाहे शिला हो उस पर ध्यान करनेवाला सुखसे बैठे अथवा सीधा एकसा लम्वाई रूपमें खडा रहे शरीरको इसतरह रक्खे जिसमें शरीरके अवयव हिल न सकें, संद रवि नेत्रोंको नासिकाके अग्र भाग पर धारण करे, धीरे धीरे श्वास ले, बच्चीस दोषोंसे रहित कायोत्सर्ग धारण करे, इंद्रिय रूपी- लुटेरोंको उनके रूप, रस, गन्ध आदि *३० भाषानुवाद सहित। विषयोंसे घडे प्रयत्नसे दूर रक्खे, अन्य सब पदार्थोंसे अ- पना चितवन हटाकर केवल ध्यान करने योग्य किसी एक पदार्थमें अपना चितवन स्थिर रक्खे, वह ध्यान करनेवाला निद्राको दूर करे भयको दूर करे और आलस्यको दूर करे सथा अपने अन्तरात्माको शुद्ध करनेकेलिये सदा अपने आत्या स्वरूपको अथवा अन्य किसी पदार्थके स्वरूपको चितवन करे ॥ ६०-६५॥ 'निश्चयाद् व्यवहाराच ध्यानं दिविधमागमे । स्वरूपालंबनं पूर्व परालंबनमुत्तरं ॥ ९६ ॥ शास्त्रोंमें निश्चय और व्यवहारके भेदसे दो प्रकारका ध्यान बतलाया है उनमेंसे पहिला निश्चय ध्यान तो स्वर- पालवन अर्याद केवल अपने प्रात्माको आलंबन लेकर होता है और दूसरा व्यवहार ध्यान परालंबन अर्थात आत्माके सिवाय अन्य पदार्थों को मालम्बन लेकर होता है ।। ९६ ।। अभिन्नमाद्यमन्यत्तु मिन्नं तत्तावदुच्यते । मिन्ने हि विहितान्यासोऽभिन्नं ध्यायत्यनाकुलः॥ इसी प्रकार पहिला निश्चय ध्यान आत्मासे अभिन्न है और दूसरा भिन्न हैं । अब आगे भिन्न ध्यानको कहते हैं क्योंकि भिन्न ध्यान में अभ्यास करनेसे यह जीव निराकुक होकर अभिन्न ध्यानको कर सकता है ।। ९७ ॥

तत्यानुयसमा
२५
आज्ञापायो विपाकं च संस्थानं भुवनस्य च ।
यथागममविक्षिप्तचेतसा चिंतयेन्सुनिः ॥ ९ ॥
मुनियोंको आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाक विचय
और लोकका संस्थान विचय इन चारों धर्मध्यानको शा-
स्लोंमें लिखी हुई विधिके अनुसार निराकुल चिचसे चिंतन-
न करना चाहिये ।। ९८॥
नाम च स्थापनं द्रव्यं भावश्चेति चतुर्विधं ।
समस्तं व्यस्तमप्येतद्ध्येयमध्यात्मवेदिभिः ॥ ९९ ॥
अध्यात्मको जाननेवाले मुनियोंको समस्त और व्यस्त
अर्थात् सम्पूर्ण पदार्य अथवा अलग अलग पदार्थ नाम
स्थापना द्रव्य भाव चारों प्रकारसे ध्यान करना चाहिये ।
वाच्यस्य वाचकं नाम प्रतिमा स्थापना मता।
गुणपर्ययवद्व्यं भावः स्याद् गुणपर्ययौ ॥ १० ॥
वाच्यका जो चाचक है (जैसे अरहतका वाचक मईन्
ऋषभदेव आदि ) वह नाम कहलाता है उसकी प्रतिमा
स्थापना कहलाती है जो गुण पर्याय सहित हो उसे द्रव्य
कहते हैं और गुड तया पयार्योंको भाव कहते हैं ॥१०० ॥
आदौ मध्येऽवसाने यहाङ्मयं व्याप्य तिष्ठति ।
हदि ज्योतिष्मदुद्गच्छन्नामध्ययं तदहतो ॥१०॥

भाषानुवाद सहित। हृदयमें जो ज्योति स्वरूप अरहंत देवोंका प्रकाशमान नाम है जो कि आदि मध्य और अन्तमें व्याप्त होकर वाह, भयरूप (अक्षर रूप ) रहता है उसको नाम ध्यान कहते हैं ॥१०१॥ हृत्पंकजे चतुःपने ज्योतिष्मति प्रदक्षिणं । असिआउसाक्षराणि ध्येयानि परमेष्ठिनां ॥१०॥ उसकी विधि इस प्रकार है ज्योतिः स्वरूप और चार पत्रोंवाला जो हृदय कमल है उसमें परमेष्ठियोंके वाचक असि ग्राउ सा अक्षरों का प्रदक्षिणा रूपसे ध्यान करना चाहिये ॥ १०२॥ ध्यायेदइउएओ च तहन्मंत्रानुदर्चिषः । मत्यादिज्ञाननामानि मत्यादिज्ञानसिद्धये ॥ इसी प्रकार मवि आदि पांचों ज्ञानोंको सिद्ध करनेके लिये जिनसे उपरकी ओर अग्नि निकल रही है ऐसे मति श्रुत आदि पांचों ज्ञानोंके वाचक अ इ उ ए ओ इन मं- त्रोंका भी ध्यान करना चाहिये ॥ १०३ ।। सप्ताक्षरं महामंत्रं मुखरंध्रेषु सप्तसु। गुरूपदेशतो ध्यायेदिच्छन् दूरश्रवादिकं ॥१०॥ इसी तरह गुरुके उपदेशके अनुसार सुनाई देने भादि दोषों को दूर रखनेकी इच्छा करता हुआ सातो मुख न्धों तत्त्वानुशासन ३३ में (मुखके सातों छिद्रोंमें) "णमो अरहताणं' इन सात । असरोंक महामन्त्रका ध्यान करे ।। १०४॥ हृदयेऽष्टदलं पद्मं वगैः पूरितमष्टभिः। दलेषु कर्णिकायांच नाम्नाधिष्ठितमहतां ॥१०॥ अथवा हृदयमें आठ दलका कमल पनावे उसके पागे दल पाठों वर्गोसे पूर्ण करे तथा कर्णिकामें अरहतका नाम : लिखकर उसका ध्यान करे ॥ १०५ ।। गणभृद्लयोपेतं त्रिःपरीतं च मायया। क्षोणीमंडलमध्यस्थं ध्यायदभ्यीयेच तत् ॥ १० ॥ अथवा जिसके मध्य भागमें लोधीमंडल विराजमान है और जो मायासे तीनवार घिरा हुआ है ऐसे गणभूद बलय यन्त्रका ध्यान करे तथा उसकी पूजा करे ॥ १०६ ।। अकारादिहकारान्ताः मंत्राः परमशक्तयः। स्वमंडलगता ध्येया लोकस्यफलप्रदाः ॥ १०७॥ अथवा दोनों लोकोंमें फल देनेवाले और परम शक्ति- भान ऐसे अपने मंडलमें भाप्त हुए अकारसे इकार तक अ. सरात्मक मंत्रोंका ध्यान करे ॥ १०७ ।। इत्यादीन्मंत्रिणो मंत्रानहन्मंत्रपुरस्सरान् । घ्यायन्ति यदिह स्पष्टं नामध्येयमवैहि तत् ॥ १८॥ ३

३४
भाषानुवाद सहित।
इस प्रकार मंत्रोंका ध्यान करनेवाले योगी पुरुष पर-
इतके पाचक मंत्रोंको आदि ले कर ऊपर लिखे हुए मंत्रों का
ध्यान करते हैं उसे नाम ध्यान कहते हैं ।।१०८॥
जिनेंद्रप्रतिबिंबानि कृत्रिमाण्यकृतानि च ।
यथोक्तान्यागमे तानि तथा ध्यायेदशंकितं ॥१०॥
अथवा सब तरहके सन्देहोंको दूर कर शाखामें कही
हुई कृत्रिम और अकृत्रिम ऐसी भगवान जिनेंद्रदेवकी प्रति-
मानोंका ध्यान करना चाहिये यह स्थापना ध्यान कहलाता.
है॥ १०९॥
यथैकमेकदा द्रव्यमुत्पित्सु स्थास्नु नश्वरं ।
तथैव सर्वदा सर्वमिति तत्त्वं विचिंतयेत् ॥ ११०॥
कोई द्रव्य किसी समय उत्पन्न होनेवाला हो नष्ट होने-
चाला हो और ध्रुवरूप वा स्थिर रहनेवाला हो उसको सदा
उसी रूपसे चितवन करना द्रव्यध्यान कहलाता है ।।११०॥
चेतनोऽचेतनो वार्थो यो यथैव व्यवस्थितः।
तथैव तस्यं यो भावो याथात्म्यं तत्त्वमुच्यते ॥११॥
चेतन वा अचेतन रूप जो पदार्थ जिस तरह व्यवस्थित
है तथा उसका जो भाव है उसको उसी मकार कहना य-
थार्य तत्व कहलाता है उसके ध्यानको भाव ध्यान कहते
हैं॥१११॥

तत्वानुशासन। अनादिनिधने द्रव्ये स्वपर्यायाः प्रतिक्षणं । उन्मज्जन्ति निमज्वन्ति जलकल्लोलवजले ॥१२॥ यह द्रव्य अनादि और अनिधन है अर्थात् न कभी उ. सान हुआ है और न कभी नष्ट होगा जिसमकार पानी में पानीकी लहरें उत्पन्न होती रहती हैं और उसीमें नष्ट होती रहती हैं उसीमकार इस द्रव्यमें भी इसकी पर्यायें प्रत्येक क्षणमें उत्पन्न होती रहती हैं और प्रत्येक क्षणमें नष्ट होती रहती है ।। ११२ ॥ यद्विवृत्तं यथापूर्व यच्च पश्चादिवति । विवर्तते यदन्नाद्य तदेवेदमिदं च तत् ॥ ११३ ॥ एक द्रव्यकी जो पर्याय पहिले विकसित हो चुकी हैं आगे विकसित होनेवाली हैं तथा बाज जो विकसित हो रही हैं वे सब ही द्वन्धकी पर्याय कहलाती हैं, और उनके समूहको ही द्रव्य कहते हैं ॥ ११३॥ सहवृत्ता गुणास्तत्र पर्यायाः कमवर्जिनः । स्यादेतदात्मकं द्रव्यमेते च स्युस्तदात्मकाः ॥११४॥ जो सदा साथ रहें उन्हें गुण कहते हैं और जो अनु- [क्रमसे हों उन्हें पर्याय कहते हैं। इन गुण और पर्याय रूपही द्रव्य कहलाता है तथा गुण पर्याय भी द्रव्य रूप ही कहला- ३६ भापानुवाद सहित। एवंविधमिदं वस्तु स्थित्युत्पत्तिव्ययात्मकं । प्रतिक्षणमनायंत सर्व ध्येयं यथास्थितं ।। ११५ ।।. इसमकार ये सब द्रव्य भतिक्षण उत्पाद व्यय और धौव्य रूप हैं तया अनादि और अनिधन हैं इन सबका जो पयार्य स्वरूप है वह सब ध्यान करने योग्य है।।११।।. अर्थव्यंजनपर्याया मूर्चामा गुणाश्च ये। यत्र द्रव्ये यथावस्थास्तांश्च तत्र तथा स्मरेत् ॥११६॥ इसके सिवाय जो अर्थ पर्याय हैं व्यंजन पर्याय हैं मूर्त अमूर्तरूप गुण हैं तथा वे पर्याय और गुण जिस द्रव्यमें जिस रीविसे मौजूद हैं उन सबको उसी प्रकार चितवन क- रना चाहिये ॥ ११६ ॥ पुरुषः पुद्गलः कालो धर्माधर्मी तथांवरं । षड्विषं द्रव्यमाम्नातं तत्र ध्येयतमः पुमान् ॥११७॥ जीव, पुद्गल, काल, धर्म, अधर्म और प्राकाश ये छह द्रव्य हैं इनमें सबसे उत्तम ध्यान करने योग्य जीव द्रव्य ही है ॥ ११७॥ सति हि ज्ञातरि ज्ञेयं ध्येयतां प्रतिपद्यते । ततो ज्ञानस्वरूपोऽयमात्मा ध्येयतमः स्मृतः ११८ इसका भी कारण यह है कि ज्ञाताके होते हुए ही कोई भी ज्ञेय पदार्य ध्यान करने योग्य हो सका है इसी वत्तानुपासन। लिये शान स्वरूप यह मात्मा ही सबसे उत्तम ध्यान करने योग्य माना गया है ॥ १९८॥ तत्रापि तत्त्वतः पंच ध्यातव्याः परमेष्ठिनः। चत्वारः सकलास्तेषु सिद्धः स्वामीति निष्कलः ॥ उसमें भी वास्तविक रीतिस पांच परमेष्ठी ही ध्यान करने योग्य हैं इन परमेष्ठियोंमें भी चार तो (अरइंच मा. चार्य उपाध्याय साधु ) शरीर सहित हैं और सबके स्वामी सिद्ध शरीररहित हैं ॥ ११९॥ अनंतदर्शनज्ञानसम्यक्त्वादिगुणात्मकं । स्वोपात्तानंतरत्यक्तशरीराकारधारिणः ॥ १० ॥ साकार च निराकारममूर्तमजरामरं । जिनबिंबमिव स्वच्छस्फाटकप्रतिबिंबितं ॥ १११ ॥ लोकायशिखरारूढमुढसुखसंपदं। सिद्धात्मानं निराबाधं ध्यायेन्निद्धुतकल्मषं १२२ जो अनंत दर्शन अनंत ज्ञान और अनंत सभ्यक्त पादि गुणस्वरूप हैं, कर्मोदयसे प्राप्त हुए और कर्माक नष्ट करनेसे छोड़े हुए शरीरके आकारको धारण करनेवाले है इसलिये जो साकार हैं, तया साकार होकर भी निराकार है, अमूर्त हैं जरामरणसे रहित हैं जिनवित्रके समान स्वच्छ स्क- टिककी प्रतिमाके समान हैं, जो लोक अग्रभागपर विरा- भाषानुवाद सहित। Fie जमान हैं सुखरूपी संपदासे भरपूर हैं जो सब तरहकी वाघा- ओंसे रहित हैं और समस्त पापोंको नाश करनेवाले हैं ऐसे सिद्धोंका ध्यान करना चाहिये ॥ १२०-१२२ ।। तथाधमाप्तमाप्तानां देवानामधिदैवतं । प्रक्षीणघातिकर्माणं प्राप्तानंतचतुष्टयं ॥ १२३ ॥ दूरमुत्सृज्य भूभागं नभस्तलमधिष्ठितं । परमौदारिकस्वांगप्रभाभासतभास्करं ।। १२४ ।। चतुस्त्रिंशन्महाश्चयः प्रातिहाथैश्च भूषितं । मुनितिर्यनरस्वर्गिसभाभिः सन्निषेवितं ॥ १२५ ॥ जन्माभिषेकप्रमुखप्राप्तपूजातिशायिनं । केवलज्ञाननिणीतविश्वतत्त्वोपदेशिनं ॥ १२६ ।। प्रभास्वल्लक्षणांकीर्णसम्पूर्णोदप्रविग्रहं । आकाशस्फटिकांतस्थज्वलज्ज्वालानलोज्वलं॥१२७॥ तेजसामुत्तमं तेजो ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमं । परमात्मानमहतं ध्यायन्निश्रेयसाप्तये ॥ १२८ ॥ इसीतरह पंच परमेष्ठियोंमें जो सबसे प्रथम देवोंके. भी देव वा देवाधिदेव हैं जिन्होंने घातिया कोको नष्ट कर दिया है जिन्हें अनंत चतुष्टय प्राप्त होगया है जो पृथ्वीत. लको दुरसे ही परित्याग कर लोकाकाशके ऊपर विराजमान

तत्वानुशासन।
हैं, परमौदारिक रूप अपने शरीरकी प्रभासे जिन्होंने सूर्य
को भी तिरस्कृत कर दिया है जो चौंतीस अतिशय और आगे
प्राविहायोंसे सुशोभित हैं, मुनि तिर्यंच मनुष्प और देवों
के समूह सदा जिनकी सेवा करते रहते हैं जन्माभिषेक
आदि अनेक पूजाके अतिशय निनको प्राप्त हुए हैं, केवल
जानके द्वारा जिन्होंने संसारके समस्त तत्वों के उपदेश देने
वालोंका निर्णय किया है, समस्त लक्षणों से भराहुआ जिन
का परमोचम सम्पूर्ण शरीर प्रकाशमान है, आकाश स्फटि-
कके भीतर जलती हुई ज्वालारूप अग्निके समान जो उज्ज्व-
ब हैं, जिनका तेज तेजस्वियोंमें भी उत्तम है जिनकी ज्यो-
ति ज्योतिबालोंमें भी सबसे उत्तम है और जिनका आत्मा
परमात्मा अवस्थाको प्राप्त होगया है ऐसे अरहंत देवका
ध्यान केवल मोक्ष प्राप्त होने के लिये करना चाहिये॥२३-२०॥
वीतरागोऽप्यय देवो ध्यायमानो मुमुक्षुभिः ।
स्वर्गापवर्गफलदः शक्तिस्तस्य हि तादृशी ॥१२॥
मोक्षकी इच्छा करनेवालोंके द्वारा ध्यान किये गये
भगवान वीतराग अरंहत देव अवश्य ही स्वर्ग और मोक्षरूप
फलको देनेवाले हैं क्योंकि उनमें शक्ति ही इसतरहकी
सम्यग्ज्ञानादिसंपन्नाः प्राप्तसप्तमहर्घयः।
तथोक्तलक्षणा ध्येयाः सूर्युपाध्यायसाधवः ॥१३०॥

भाषानुवाद सहित। ४० इसीतरह जो सम्यग्ज्ञानादि सहित हैं जिन्हें सामें मह- धियां प्राप्त हुई हैं और शास्त्रोंमें फहे हुए गुण और ला- गोसे जो विराजमान हैं ऐसे आचार्य उपध्याय और साधुका ध्यान भी करना चाहिये ॥ १३० ॥ एवं नामादिभेदेन ध्येयमुक्तं चतुर्विधे । अथवा द्रव्यभावाभ्यां द्विधैव तदवास्थितं ॥१३॥ इस प्रकार नाम स्थापना द्रव्य भावके भेदसे ध्यान कर- ने योग्य पदार्थ चार प्रकारका वतलाया अथवा द्रव्य और भावके मेदसे यह दो प्रकारका भी माना जाता है ॥१३॥ द्रव्यध्येय बहिर्वस्तु चेतनाचेतनात्मकं । भावध्येयं पुनध्येयसन्निभध्यानपर्ययः ॥१२॥ चेतनाचेतनात्मक जो वाद्य पदार्थ हैं वे सब द्रव्य ध्येय (द्रव्य ध्यान करने योग्य ) गिने जाते हैं और ध्येयके स- मान ही जो ध्यानका पर्याय है अर्थात् जिसमें ध्येय और ध्यानका कोई अंतर नहीं है वह भाव ध्येय माना जाता है ॥ १३२॥ ध्याने हि विभ्रते स्थैर्य ध्येयरूपं परिस्फुटं। लेखितमिवाभाति ध्येयस्यासन्निधावपि ॥२३३॥ यदि ध्येय पदार्य समीप न हो तो भी ध्यान ध्येय रूप पदार्य व्यक्त रूपसे सिर प्रकाशमान होता है और उस तत्वानुशासना समय वह ध्येय रूप पदार्थ चित्रित के समान निघल जान- • -- धातुपिंडे स्थितश्चैवं ध्येयोऽर्थों ध्यायते यतः। ध्येयपिंडस्थमित्साहुरत एव च केवलं ॥ १३४॥ इस ध्यानमें धातुपिंडमें ठहरा हुआ जो ध्येय पदार्य है उसका ध्यान किया जाता है इसीलिये इस ध्यानको केवल ध्येय पिंडस्य कहते हैं ।।१३४ ॥ यदा ध्यानवलाड्याता शून्यीकृत्य स्वविग्रहं । ध्येयस्वरूपाविष्टत्वात्तादृक् संपद्यते स्वयं ॥ १३५ ।। तदा तथाविधध्यानसवित्तिध्वस्तकल्पनः। स एव परमात्मा स्याद्वैनतेयश्च मन्मथः॥१३६ ।। जिस समय ध्यान करने वाला ध्यानके वलसे अपने शरीरको न कुछ समझ कर ध्येयके स्वरूपमें प्रविष्ट हो जाता है अर्थात स्वयं ध्येयमें मिल जाता है और ध्येय रूप हो जाता उस समय वह उस ध्यान रूपी ज्ञानसे सब कल्पनाओंको नष्ट कर देता है अर्थात् वह निर्विकल्प हो जाता है इसलिये चही ध्याता परमात्मा कहलाता है वही वैनतेय कहा जाता है और वही मन्मथके नामसे पुकारा जाता है ॥१३५-१३६॥ सोऽयं समरसीभावस्तदेकीकरण स्मृतं । एतदेव समाधिः स्याल्लोकहयफलप्रदः।। १३७ ॥

भापानुवाद सहित।
उस ध्याताका ध्येय रूप हो जाना ही समरसीभाव
कहलाता है उसीको एकीकरण करते हैं और वही दोनों
लोकोंमें उत्तम फल देनेवाली समाधि कहलाती है ॥१३७||
किमत्र बहुनोक्तेन ज्ञात्वा श्रद्धाय तत्त्वतः ।
ध्येयं समस्तमप्येतन्माध्यस्थ्यं तत्र विभ्रता ॥१३८॥
घहुत कहनेसे क्या ? ध्यान धारण करनेवालेको यह
थात यथार्थ रीतिसे जानलेना चाहिये और श्रद्धान करलेना
चाहिये कि संसारमें जो कुछ ध्येय है वह सब माध्यस्थ्य
कहलाता है ॥ १३८॥
माध्यस्थ्यं समतोपेक्षा वैराग्य साम्यमस्पृहः ।
वैतृष्ण्यं परमा शांतिरित्येकोऽर्थोऽभिधीयते ।। १३९ ।।
माध्यस्य, समता, उपेक्षा, वैराग्य, साम्य, निस्पृहता,
वितृष्णा और परमशांति ये, सव एकार्यवाचक हैं अर्थात्
इन सबका एकही अर्थ है ॥ १३९॥
संक्षेपेण यदन्त्रोक्तं विस्तारात्परमागमे ।
तत्सर्व ध्यानमेव स्थायातेषु परमेष्ठिषु ॥ १४ ॥
यहां पर जो ध्यानका स्वरूप संक्षेपसे कहा है वह पर-
मागममें बड़े विस्तारसे कहा गया है केवल परमेष्ठियोंका
ध्यान करनेसे वह सब ध्यान हो जाता है ॥ १४० ॥

.४१ तस्वानुशासन। व्यवहारनयादेवं ध्यानमुक्तं पराश्रयं । निश्चयादधुना स्वात्मालंबनं तन्निरूप्यते ॥ १११॥ इसमकार व्यवहार नयसे होनेवाले परावलंबन ध्यानका स्वरूप कहा। अव आगे निश्चय नयसे होने वाले स्वात्मा- वलंबन ध्यानका स्वरूप कहते हैं ।। १४१ ॥ ब्रुवताध्यानशब्दार्थ यद्रहस्यमवादिशत् । तथापि स्पष्टमाख्यातुं पुनरण्यभिधीयते ॥ १४ ॥ ध्यान शब्दका अर्थ कहते समय ही जो कुछ उसका रहस्य था वह सब कह दिया गया या तथापि उसे स्पष्ट प्र. गट करनेके लिये फिरसे कहते हैं । १४२ ॥ दिघासुः स्वं परं ज्ञात्वा श्रद्धाय च यथास्थिति। विहायान्यदनार्थत्वाद स्वमेवावेतु पश्यतु ॥ १४३॥ ध्यानकी इच्छा करनेवालेको चाहिये कि वह पहले अपने आत्मा तथा प्रात्माके सिवाय अन्य समस्त पदार्थोंका स्वरूप जाने और उनकी जैसी अवस्था है बैसाही उनका श्रदान करे । तदनंतर अनर्थक होनेसे प्रात्माके सिवाय भा. न्य सबका परित्याग फरदे और केवल अपने ही आत्माको जाने तथा केवल उसे ही देखे ॥ १३ ॥ पूर्व श्रुतेन संस्कारस्वात्मन्यारोपयेत्ततः। तत्रैकाग्रं समासाद्य न किंचिदपि चिंतयेत् || १४|| भाषानुवाद सहित। उस स्वात्मालम्बन ध्यान करने वालेको चाहिये वह सबसे पहिले अपने भात्मामें श्रुतमानका संस्कार करे और फिर अपने ही आत्मामें एकाय होकर अन्य किसी पदार्य का चितवन न करे ॥ १४४ ॥ यस्तु नालंबते श्रौती भावनां कल्पनाभयात् । सोऽवश्यं मुह्यति स्वस्मिन्वाहिश्चितां बिभर्ति च १४५ जो योगी कल्पनाके डरसे (निर्विकल्प ध्यान न हो सकेगा इस डरसे) श्रुत ज्ञानकी भावनाका भालंबन नहीं करता वह अवश्य ही अपने प्रात्मामें मोहित हो जाता है तथा अनेक वाह्या चिंताओंको भी वह धारण करता है ।। तस्मान्मोहप्रहाणाय बहिश्चितानिवृत्तये। खात्मानं भावयेत्पूर्वमैकाग्र्यस्य च सिद्धये ॥ १४६ ।। इसलिये मोहको नाश करनेके लिये तथा वाह्य ( आ- स्माके सिवाय अन्य पदार्थोंकी ) चिताओंको दूर करनेके लिये और एकाग्रकी सिद्धि करनेकेलिये सबसे पहिले अपने आत्माका संस्कार करना चाहिये ॥ १४६ ॥ तथा हि चेतनोऽसंख्यप्रदेशो मूर्तिवर्जितः। शुद्धात्मा सिद्धरूपोऽस्मि ज्ञानदर्शनलक्षणः ॥१४७॥ उसीको दिखलाते हैं- मैं चैतन्य हूं, असंख्यात म- देशोंवाला हूँ और मूर्विरहित हूं, मेरा आत्मा शुद्ध है।

तत्वानुशासन। सिद्ध स्वरूप है और ज्ञानमय है ।। १४७ ।। नान्योऽस्मि नाहमस्त्यन्यो नान्यस्याहं न मे परः । अन्यस्त्वन्योऽहमेवाहमन्योन्यस्याहमेव मे ॥१४॥ मैं अन्य सरम (देह स्वरूप अथवा प्रात्मेतर स्वरू- 4) नहीं है और न अन्य ही पम स्वरूप है न मैं अन्यका ई न मेरा अन्य है, अन्य २ ही है और मैं, मैं ही हूं अन्यो- न्य रूपसे मैं अपना ही (मात्मा का) हूं ( दूसरे कार नहीं) ॥१४॥ अन्यच्छरीरमन्योऽहं चिदहं तदचेतनं। अनेकमेतदेकोऽहं क्षयीदमहमक्षयः ॥ ११ ॥ शरीर अन्य है मैं अन्य हूं, मैं चैतन्य स्वरूप है शरीर मह है, शरीर भनेक रूप है मैं अकेला हूँ, शरीरनाश होने बाला है और मैं कभी नाश होने वाला नहीं हूं ॥ १४९।। अचेतन भवे नाहं नाहमप्यस्त्यचेतनं ।। ज्ञानात्माहं न मे कश्चिन्चाहमन्यस्य कस्यचित् १५० यद्यपि संसारमें परिभ्रमण करनेसे मैं अचेतन सरीखा दिखता हूं परन्तु वास्तव में मैं अचेतन नहीं है बल्कि शान स्वरूप इस संसारमें न तो मेरा कोई है और न मैं अन्य किसीका हूं ॥ १५० ॥ योऽत्र स्वस्वामिसम्बन्धी ममाभूदपुषा सह ।

भाषानुवाद सहित । यश्चैकत्वभ्रमस्सोऽपि परस्मान स्वरूपतः ॥ १५॥ इस संसारमें शरीरके साथ जो कुछ मेरा स्वस्वामी सम्बन्ध है ( शरीर मेरा है और मैं उसका स्वामी है) और दोनोंके (शरीर और आत्माके ) एक होनेका कारण है वह सब दूसरेके सम्बन्धसे (कौके संबन्धसे) है वास्त- विक रीतिसे नहीं है ।। १५१ ॥ जीवादिद्रव्ययाथात्म्यज्ञातात्मकमिहात्मना । पश्यन्नात्मन्यथात्मानमुदासीनोऽस्मि वस्तुषु १५२ यह मेरा आत्मा अपनेही प्रात्माके द्वारा अपनेही आ. सामें जीवादि सब द्रव्योंके यथार्थ स्वरूपको. जाननेवाला है इसमकारके अपने प्रात्माको देखकर मुझे स्वयं अन्य समस्त पदार्थोंसे उदासीन रहना पडता है ।। १५२ ।। सद्व्यमस्मि चिदहं ज्ञाता द्रष्टा सदाप्युदासीनः । स्वोपात्तदेहमात्रस्ततः पृथग्गगनवदमूर्तः ॥ १५३ ।। मैं सव्य हूं अर्थात् सब पदोंमें उत्तम पदार्थ (जीव) रूप हूं मैं चैतन्य रूप है और फिर भी सदा उदासीन रहने पाला हूं , मेरा प्रात्मा ही मेरा शरीर है अर्थात् में आत्मा मात्र हं शरीरसे सर्वथा मिला है और आकाशके समान अ.. सूर्व हूं ॥ १५३ ॥ सन्नेवाई सदाप्यस्मि स्वरूपादिचतुष्टयात् ।

तत्त्वानुशासन। असन्नेवास्म चासंतं पररूपाद्यपेक्षया ॥१५४ ॥ स्वरूपादि चतुष्पसे (स्वद्रव्य क्षेत्र काल पावसे) मैं सदा अस्तिन्त्र रूप हूँ और परचतुष्टयसे ( पर द्रव्य क्षेत्र काल भावसे मैं सदा नास्तिव रूप हूं ।। १५४ ॥ यन्न चेतयते किंचिन्नाचेतयत किंचन । यञ्चेतयिष्यते नैव तच्छरीरादि नास्यह॥१५५।। जो शरीर आदि जड पदार्थ न तो कमी चैतन्य स्वरूप है न कमी पहिले चैतन्य खरूपये और न कभी आगे चैतन्य स्वरूप होगें ऐसे शरीरादि जडस्वरूप में नहीं हूं। बदचेतत्तथा पूर्व चेतिष्यति यदन्यया । चेतनीयं यदंत्राद्य तच्चिद्रव्यं समस्म्यह॥१५॥ जो पहिले मी इसी रूपसे चैतन्य रसरून या आगे भी रूपान्तरसे चैतन्य स्वरूप रहेगा और आज भी बो चैतन्य स्वरूप है ऐसे चैतन्यस्वरूप चिद्व्यमय में हूं. ॥ १५६ ॥ स्वयामिष्टं न च द्विष्टं किन्तूपेक्ष्यामिदं जगत् । नोहमेष्टा न च द्रेप्टा किन्तु स्वयमुपेक्षिता ।। यह संसार स्वयं न तो इन्ट (मला करनेवाला) है और न द्विष्ट (बुरा करनेवाला वा अनिष्ट) है किंतु उपे. क्ष्य अर्याद इष्ट अनिष्टसे रहित उदासीन रूप है इसलिये मैं भी न तो किसीसे राग करता हूं और न किसीसे द्वेष

४.
भाषानुवाद सहित।
करता है किंतु मैं स्वयं उपेक्षा करनेवाला उदासीन रूप
मतः कायादयो भिन्नास्तेभ्योऽहमपि तत्त्वतः ।
नाऽहमेषां किमप्यस्मि ममाप्येते न किचन १५८.
शरीरादिक मुझसे बिल्कुल भिन्न हैं और वास्तविक
रीतिसे मैं भी उनसे विल्कुल भिन्न हूँ मैं इनका कोई नहीं
और ये मेरे कोई नहीं हैं ॥ १५ ॥
एवं सम्यग्विनिश्चित्य स्वात्मानं भिन्नमन्यतः।
विधाय तन्मयं भाव न किंचिदपि चिंतये॥१७
इसप्रकार अच्छीतरह निश्चयकर और अन्य सर पदा-
योसे अपने प्रात्माको भिन्न मानकर मैं अपने भावोंको
श्रात्ममय ही बना लेता है आत्माके सिवाय में अन्य किसी.
का चितवन नहीं करता ॥ १५९ ॥
चिताभावो न जैनानां तुच्छो मिथ्याशामिव ।
दग्बोधसाम्यरूपस्य यत्स्वसंवेदनं हिसः॥१६॥
चिताका प्रभाव होना ( आत्मामें लीन होनेसे अन्य
चिंताओंका अभाव होना, एकाग्र होना) जैनियोंमें मिथ्या-
अष्टियों के समान तुच्छ नहीं माना गया है क्योंकि वह
चिवाका अभाव (आत्मामें तल्लीन होना ) सम्यग्दर्शन
सम्पग्मान और समत्तारूप अपने आत्माका स्वसंवेदनरूप
पढवा है ॥१६॥

तस्वानुशासन। । वेद्यत्वं वेदकत्वं च यत्स्वस्य स्वेन योगिनः । तत्स्वसंवेदनं प्राहुरात्मनोऽनुभवं दृशं ॥ १६१ ॥ योगियोंको जो अपने आप अपने आत्माका वेधत्व (जानने योग्य ) और वेदकत्व ( ज्ञातापना) जान पडता अर्थात् आत्मा ही ज्ञाता है और आत्मा ही क्षेप है ऐसा जो ज्ञान होता है उसको स्वसंवेदन कहते हैं अथवा सम्यग्दर्श- नरूप जो भात्माका अनुभव है उसको भी स्वसंवेदन कह- ते हैं।॥ १६१ ॥ स्वपरज्ञप्तिरूपत्वान्न तस्य कारणान्तरं । ततश्चितां परित्यज्य स्वसंवित्त्यैव वेद्यतां ॥ १६२ ।। वह स्वसंवेदन स्वपरवप्तिरूप है अर्थात् प्रात्मा आत्मे- तर पदार्योंके ज्ञानस्वरूप है इसलिये उसके लिये अन्य किसी कारणकी आवश्यकता नहीं है अर्थात् वह स्वसंवेदन स्वयं प्राप्त हो जाता है इसलिये सब चिंताओंको छोडकर स्वसंवेदनके द्वारा ही आत्माका अनुभव करना चाहिये १६२ दृग्बोधसाम्यरूपत्वाजानन् पश्यन्नुदासिता । चित्सामान्यविशेषात्मा स्वात्मनैवानुभूयतां ॥१६३॥ यह मात्मा सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और समतास्वरूप है इसलिये उसमें सव पदार्योंको देखते और जानते हुए भी जो उदासीनपना है वह सामान्य और विशेष चैतन्य भाषानुवाद सहित। स्वरूप है आत्माको उसे अपने ही आत्माके द्वारा अनुभव क- रना चाहिये ॥ १६३ ॥ कर्मजेभ्यः समस्तेभ्यो भावेभ्यो भिन्नमन्वहं । ज्ञस्वभावमुदासीनं पश्येदात्मानमात्मना ॥ १६४ ॥ यह श्रात्मा कर्मोके उदयसे उत्पन्न हुए सवतरहके राग देष शादि भावोंसे भिन्न है तथा शस्त्रमाव (ज्ञानस्वमाव- वाला ) और उदासीन है ऐसे अपने आत्माको अपने ही आत्माके द्वारा देखना चाहिये ॥१६४ ॥ यन्मिथ्याभिनिवेशेन मिथ्याज्ञानेन चोज्झितं । तन्माध्यस्थ्यं निजं रूपं स्वस्मिन्संवेद्यतां स्वयं॥१६॥ जो अपने आत्माका स्वरूप मिथ्याश्रद्धान (मिध्याद- शन ) और मिथ्या ज्ञानसे रहित है उसे माध्यस्थ्य कहते हैं वह माल्याका माध्यस्थ्यस्वभाव अपने ही आत्मामें अपने आप संवेदन करना चाहिये अर्थात् अपने आप उसका अ. नुभव करना चाहिये ॥ १६५॥ न हीन्द्रियधिया दृश्यं रूपादिरहितत्वतः। वितास्तन्न पश्यति ते ह्यविस्पष्टतर्कणाः ॥१६६ ॥ "यह उदासीन और मध्यस्वरूप भात्मा रूपादि गुणों से रहित है इसलिये वह इंद्रियज्ञानियोंको (जिन्हें इंद्रियोंसे • ज्ञान उत्पन्न होता है ऐसे छगस्योंको) कभी दिखाई नहीं तत्त्वानुशासन। थड सकता " इसप्रकारके वितर्क करनेवालेको वह वास्त- बमें दिखाई नहीं पड़ता है क्योंकि उनका वह वितर्क स्पष्ट वा ठीक नहीं है ॥ १६६ ॥ उभयस्मिन्निरुद्धे तु स्याद्विस्पष्टमींद्रियं । स्वसंवेद्यं हि तद्रूपं स्वसंवित्त्यैव दृश्यतां ॥१६७ ॥ जिससमय यह आत्मा माध्यस्थ्य और उदासीनतासे भरपूर रहता है उससमय वह प्रीद्रिय होकर भी स्पष्ट प्रत्यक्ष होता है इसलिये उससमय उसका स्वरूप स्वसंवेद्य (अपने आप जानने योग्य ) होता है अतएव संविचिसे ही उसे देखना चाहिये ।। १६७ ॥ वपुषोऽप्रतिभासंऽपि स्वातंत्र्येण चकासते। चेतना ज्ञानरूपेय स्वयं दृश्यत एव हि ॥ १६८॥ यद्यपि उससमय शरीरका प्रतिभास वा ज्ञान नहीं होता है तथापि ज्ञानस्वरूप यह चेतना स्वतंत्ररूपसे महाशित हो- ती ही है इसलिये वह अपने आप दिखाई पड़ती है ।। १६८ समाधिस्थेन यद्यात्मा बोधात्मा नानुभूयते । तदा न तस्य तद्ध्यानं मूर्छावान्मोह एव सः ॥१६९॥ पदि ध्यानमें लगा हुआ योगी अपने ज्ञानस्वरूप आत्माका अनुभव नहीं कर सकता तो समझना चाहिये कि उसका वह ध्यान वास्तविक ध्यान नहीं है वास्तवमें वह વર भाषानुवाद सहित। योगी मूछासहित (परिग्रहोंमें आसक्त) मोही ही है ॥१६९।। तदेवानुभवंश्वायमेकाग्यू परमृच्छति। तथात्माधीनमानंदमेति वाचामगोचरं ॥ १७ ॥ उस ज्ञानस्वरूप प्रात्माका अनुभव करता हुमा यह योगी सबसे उत्तर एकाग्रताको माप्त होता है और उस एकायतामें श्रात्माके आधीन रहनेवाले उस परमानंदको माप्त होता है जो कि वत्रनसे कहा भी नहीं जा सकता। यथा निवातदेशस्थः प्रदीपो न प्रकंपते । त्या स्वरूपनिष्ठोऽयं योगी नैकाग्रन्थमुज्झति।।१७।। जिसप्रकार वायुरहित प्रदेशमें रक्खा हुआ दीपक के- पायमान नहीं होता ( सदा निश्चल ही रहता है ) उसी- प्रकार अपने प्रात्माके स्वरूपमें तल्लीन हुआ योगी एकाग्र- बाको कभी नहीं छोडता ॥ १७१ ॥ तदा च परमैकाग्रयादहिरर्थेषु सत्स्वपि । अन्यन्न किंचनाभाति स्वमेवात्मनि पश्यतः ॥१७२।। उससमय परम एकाग्रता धारण करनेसे वह योगी थापन भात्मामें केवल अपने आत्माको ही देखता है और इसीलिये चाह्य पदार्थों के रहते हुए भी उसे आत्माके सि- वाय अन्य कुछ दिखाई नहीं पड़ता ॥ १७२ ।। अत एवान्यशून्योऽपि नात्मा शून्या स्वरूपतः ।

तत्वानुशासन। शून्याशून्यस्वभावोऽयमात्मनैवोपलभ्यते॥१७३|| इसलिये अन्य पदार्थोसे शून्य होकर भी यह प्रात्मा अपने स्वरूपसे शून्य नहीं हो सकता अतएव शून्पाशून्पस्ट- भाववाला यह आत्मा अपने ही आत्माके द्वारा प्रास होता है ॥ १७३ ॥ ततश्च यजगुर्मुक्त्यै नैरात्म्याद्वैतदर्शनं । तदेतदेव यत्सम्यगन्यापोढात्मदर्शनं ॥१७४॥ इसलिये जो बहुतसे लोग नैरात्म्याद्वैतदर्शनको ही मुक्ति का उपाय बतलाते हैं वह अन्य समस्त पदार्थोंका भभावरूप जो प्रात्मदर्शन है वही नैरास्याद्वैतदर्शन कहलाता है क्योंकि प्रत्येक पदार्थ अन्य सब पदार्थोका अभावरूप होता है स्वा- स्मा भी अन्य सब पदार्योका अभावरूप है इसलिये स्वात्मा की नराम्यावदर्शन (अन्यात्मा के अभावरूप अर्यात के बल स्वात्माद्वैतरूपदर्शन ) कहलाता है ॥ १७४ ।। परस्परपरावृत्ताः सर्वे भावाः कथंचन । नैरात्म्यं जगतो यहन्नैर्जगत्यं तथात्मनः ।।१७।। प्रकारांतरसे संसारके समस्त पदार्थ परस्पर परावृतरूप हैं अर्थात् संसारका प्रत्येक पदार्य अपनेसे भिन्न अन्य समस्त पदार्योका प्रभाव रूप है इसलिये संसार नैरास्य है तथा संसार और आत्मा भी मिन्न २ हैं इसलिये प्रात्मा नै गत्य है-संसारसे भिन्न है।

भापानुवाद सहित। ५० अन्यात्माभावो नैरास्यं स्वात्मसत्तात्मकश्च सः । स्वात्मदर्शनमेवातः सम्यग्नैरास्यदर्शनं ॥ १६॥ अन्य आत्माओंका-पदार्थों का प्रभाव ही नैरात्म्य. कहलाता है और यह स्वात्मसत्तात्मक ही (अपने आत्माकी सत्तारूप ) पडता है। इसलिये सम्पग्रामपदर्शन स्वात्म- दर्शन ही पड़ता है भावार्थ-अपने आत्माका दर्शन ही उत्तम नैरारम्यदर्शन है ॥ १७६ ॥ आत्मानमन्यसंपृक्तं पश्यन् द्वैतं प्रपश्यति । पश्यन् विभक्तमन्येभ्यः पश्यत्यात्मानमवयं ॥ अन्य कर्माके संबंधसे संबंधित आत्माको देखता हुआ यह जीव द्वैतपना देखता है परंतु जब यही जीव इस आ- स्माको कमौके संबंधसे रहित वा भिन्न देखता है तो यहीं आत्मा उसे अद्वैत दिखाई देता है ॥ १७७ ।। पश्यन्नात्मानमैकान्यात्क्षपयत्यजितान्मलान् । निरस्ताहममीभावः संवृणोत्यप्यनागतान् ॥ १८ ॥ अहंकार और ममकार आदि भावोंको नष्टकर जिस समय यह आत्मा एकायता से आत्माको देखता है उसस- भय वह अनेक इकड़े किये हुए पापोंको नाश करता है तथा अागामी मानेवाले कर्माका संवर भी वह करता है ।। १७८८ AranAmava- तत्त्वानुशासन। ५५ # यथा यथा समाध्याता लप्स्यते स्वात्मनि स्थिति। । समाधिप्रत्ययाश्वास्य स्फुटिष्यन्ति तथा तथा ॥ सम्यक ध्यान करनेवाला यह भात्मा ज्यों ज्यों अपने । आत्मामें स्थिर होता जाता है त्यों त्यों उसकी समाधि वा निश्चल ध्यानका कारण भी स्पष्ट प्रगट होता जाता है ।। १७९ ॥ एतद् द्वयोरपि ध्येयं ध्यानयोर्धय॑शुक्लयोः। विशुद्धिस्वामिभेदात्तु तयोर्भेदोऽवधार्यतां ॥ १८ ॥ धर्म्य और शुक्ल इन दोनों ध्यानोंमें यह एक स्वात्मद- र्शन ही ध्येय पडता है जो धर्य ध्यान और शुक्लध्यानमें भेद है वह विशुद्धि और स्वामीके भेदसे निश्चय करना चाहिये। भावार्थ-विशुद्धि और स्वामीके भेदसे उनमें भेद हैं परंतु ध्येय दोनोंका एक ही है ॥ १८० ॥ इदं हि दुःशकं ध्यातुं सूक्ष्मज्ञानावलंबनात् । बोध्यमानमपि प्राज्ञैर्न च द्रागवलक्ष्यते ॥१८॥ . परंतु इस स्वात्मदर्शनके लिये सूक्ष्मज्ञानका पालंयन लेना पड़ता है इसलिये इसका ध्यान करना अत्यंत कठिन साध्य है क्योंकि विद्वान् लोग इसको बहुत समझा तो भी वह स्वात्मदर्शन शीघ्र दिखाई नहीं पड़ता ॥ ११ ॥ तस्मालक्ष्यं च शक्यं च दृष्टादृष्टफलं च यत् ।

५६ भाषानुवाद सहित। स्थूलं वितर्कमालंख्य तदम्यस्यंतु धीधनाः ॥१८२॥ इसलिये जो लक्ष्य (ध्येय जिसका ध्यान करना चा- हिये ) शक्य हो जिसका फल दृष्ट अदृष्ट दोनों रूपमें हो ऐसे किसी स्थूल वितर्कणाका आलंबन कर बुद्धिमान लो- गोंको ध्यानका अभ्यास करना चाहिये ॥ १८२ ।। आकारं मरुतापूर्य कुंभित्वा रेफवह्निना । दग्वा स्ववपुषा कर्म स्वतो भस्म विरेच्य च ॥ सबसे पहिले पूरक वायुके द्वारा प्रात्माके प्राकारकी कल्पना करना चाहिये फिर रेफ रूपी अग्निसे स्थिर रहना चाहिये तया अपने शरीरके द्वारा कर्माको जलाना चाहिये और फिर अपने आप उसकी भस्मका विरेचन करना चाहिये ॥ १८३॥ हमंत्रो नभसि ध्येयः क्षरन्नमृतमात्मनि । तेनाऽन्यचदिनिर्माय पीयूषमयमुवलं ॥ १८४ ॥ फिर आकाशमें 'हमंत्रका ध्यान करना चाहिये तथा कल्पना करना चाहिये कि उस ध्यान किए हुए मंत्रसे श्रात्मामें अमृत गिर रहा है उस भरते हुए अमृतसे अमृत- मथ और उज्वल ऐसे दूसरे शरीरका निर्माण करना चाहिये ॥ १८४॥ तत्रादौ पिंडसिद्धयर्थ निर्मलीकरणाय च ।

तरवानुशासन। १७ मारुती तैजसीमार्थी विध्याघारणां कमात् ॥ उस दूसरे अमृतमय शरीरका निर्माण करते समय स- वसे पहिले पिंड सिद्धिके लिये अर्याद शरीरका निर्माण होनेके लिये तथा उसे निर्मल करनेके लिये अनुक्ररसे मा- रुती तैनसी और पार्थिवी धारणाका प्रांरभ करना चाहिये।। ततः पंचनमस्कारैः पंचपिंडाक्षरान्वितैः । पंचस्थानषु विन्यस्तैविधाय सकलां क्रियाम् ॥ तदनंतर पांचों स्थानों में धारण किये गये पांचो पिडा- तररूप पंच नमस्कार मंत्रसे समस्त क्रियाएं पूर्ण करना चा- हिये ॥ १८ ॥ पश्चादात्मानमहतं ध्यायेन्निर्दिष्टलक्षणं । सिद्ध वा ध्वस्तकर्माणममूर्च ज्ञानभास्वरं ॥ १८७॥ इसके बाद जो अरहंत परमेष्ठीका लक्षण बताया गया है उसके समान अपने आत्माको अरहंत पानकर उसका ध्यान करना चाहिये । अपवा जिनके समस्त कर्म नष्ट हो. गये हैं जो अपूर्व हैं और पूर्णप्रत्यक्षज्ञानसे देदीप्यमान हैं ऐसे अपने मात्माको सिद्ध मान कर उसका ध्यान करना चाहिये ।। १८७॥ नन्वनहतमात्मानमहतं ध्यायतां सतां । अतमिस्तद्रहो भ्रान्तिर्भवतां भवतीति चेत् ॥

भाषानुवाद सहित। कदाचित् यहां पर कोई यह शंका करे कि अपना आत्मा अरहंत नहीं है यदि आप सजन लोग उसे ही अ- रहंत मानकर ध्यान करेंगे तो आपका वह ध्यान जिसमें जो पदार्थ नहीं है उसमें उसीके ग्रहण करनेरूप भ्रम कह- लावेगा। भावार्थ-जो प्रात्मा अाहत नहीं हैं उसीमें अरहंतकी कल्पनाकर ध्यान करना भ्रम कहलायेगा क्योंकि वास्तवमें.. वह अरहंत नहीं है ।॥ १८॥ तन्न चाद्यं यतोऽस्माभिर्भावार्हन्नयमाप्तः। स चाहयाननिष्ठात्मा ततस्तत्रैव तद्रहः ॥१८९॥ परिणमते येनात्मा भावेन स तेन तन्मयो भवति । अहयानाविष्टो भावार्हन् स्यात्स्वयं तस्मात् ।। परंतु वास्तव में यह शंका टीक नहीं है क्योंकि हम, लोगोंने उसके आत्माको कल्पना किया हुआ भाव भरहंत माना है इसका भी कारण यह है कि उसका प्रात्मा . रइतके ध्यान करनेमें तल्लीन है इसलिये अरहत्तम ही उसके आत्माका ग्रहण किया जाता है । इसका भी खुलासा यह कि यह आत्मा जिसमावसे परिणत होता है उसी भावसे वह तन्मय ( उसमावमय ) कहलाता है इसलिये जो आत्मा अरईतके ध्यान करनेमें तल्लीन हो रहा है उससमय वह भ- पने आप भाव अरहंत हो जाता है ।। १८९-१६० ।। येन भावेन यद्रूपं ध्यायत्यात्मानमात्मवित ।

तत्त्वानुशासन। तेन तन्मयतां याति सोपाधिः स्फटिको यथा ॥ जिसप्रकार स्फटिकके पीछे जिस रंगकी उपाधि लगा दी जाती है (जिस रंगका पुष्प अथवा कोई भी चीज उ- सके पीछे रखदी जाती है) वह स्फटिक उसी रंगका दिखलाई पडता है उसीप्रकार आत्माकै स्वरूपको जानने वाला योगी अपना प्रात्मा चाहे जिस अवस्थामें हो उसका जिस भावसे ध्यान करता है उसमावसे वह तन्मय (उसभा- बमय ) हो जाता है। भावार्थ-जब वह योगी अरइतके भावसे अपने प्रात्साका ध्यान करेगा तो उसका वह भारमा अरहंत रूप ही दिखलाई पडेगा ।। १६१ ॥ अथवा भाविनो भूताः स्वपर्यायास्तदात्मकाः । आसते द्रव्यरूपेण सर्वद्रव्येषु सर्वदा ॥ १९ ॥ अथवा यह नियम है कि द्रव्य निक्षेपसे प्रत्येक पदा- के अपने अपने अतीतकालमें वीते हुए भूत पर्याय और. आगामी कालमें होने वाले भावी पर्याय सदा तदात्मक ही प्रतिभासित होते हैं यह ऐसा प्रतिभास समस्त द्रव्योंमें हो- ता है । भावार्थ इसी नियम के अनुसार इस यात्माका भागे होने वाला अरहतका पर्याय द्रव्यनिक्षेपसे वर्तमानकालीन आत्मामें परहंत रूपसे ही प्रतिभासित होगा ॥ १२ ॥ ततोऽयमहत्पर्यायो भावी द्रव्यात्मना सदा । भव्येष्वास्ते सतश्चास्य ध्याने को नाम विभ्रमः॥

भाषानुवाद सहित । भव्य जीवों में आगामी कालमें होनेवाला यह अरहंतका पर्याय द्रव्यनिक्षेपसे सदा ही बना रहता है इसलिये इस सज्जन आत्माको ध्यान करनेमें विभ्रम किसपकार हो स- कता है ? भावार्थ-कमी नहीं होसकता ॥ १९३ ॥ किं च भ्रांतं यदीदं स्याचदा नातः फलोदयः। नहि मिथ्याजलाज्जातु विच्छित्तिर्जायते तृषः॥ प्रादुर्भवंति चामुष्मात्फलानि ध्यानवर्तिनां । धारणावशतः शांतनूररूपाण्यनेकधा ॥ १९५ ॥ भषवा यदि यह ही मान लिया जाय कि उस ध्यान करनेवालेको ऐसा भ्रम हो जाता है अर्थात् अरहंतके ध्यान करनेमें तल्लीन हुए अपने आत्माको अरहंत मानना भ्रांति है मिथ्या है तो उस अवस्थामें उस ध्यानसे उसे यथेष्ट फलकी प्राप्ति भी नहीं होनी चाहिये क्योंकि मूठ मूठके जलसे कभी प्यास नहीं घुझा करती है परंतु जैसी जैसी धारणा होती है उसीके अनुसार ध्यान करनेवाले योगियोंके इस पानसे शांत और कूर आदि अनेक तरहके फळ प्रगट होते हैं अतः अहैत मानना मिथ्या नहीं है ॥ १९४-१६५ ॥ -गुरूपदेशमासाद्य घ्यायमानः समाहितैः । अनंतशक्तिरात्मायं मुक्तिं भुक्तिं च यच्छति ॥ गुरुके उपदेशको ग्रहण कर शांत चित्तसे ध्यान करने- .

तत्त्वानुशासन वाला यह अनंत शक्तिवाला श्रात्मा मुक्ति और भुक्ति दो. नोंको प्राप्त होता है ॥ १९६॥ ध्यातोऽर्हत्सिद्धरूपेण चरमाङ्गस्य मुक्तये। तड्यानोपाचपुण्यस्य स एवान्यस्य मुक्तये ॥१९७।- अरहंत और सिद्ध के स्वरूपको ध्यान करनेवाला यदि चरमशरीरी है तो उसका वह ध्यान मोक्षका कारण होता है। यदि वह चरमशरीरी नहीं है तो उस ध्यानसे वह पु. स्यकी प्राप्ति करता है और उस पुण्यसे वह भुक्ति वा भोगोंको प्राप्त करता है ।। १९७ ॥ ज्ञानं श्रीरायुरारोग्यं तुष्टिपुष्टिर्वपुधृतिः। यत्प्रशस्तमिहान्यच्च तचद्धयातुः प्रजायते ॥१९॥ ज्ञान, लक्ष्मी, आयु, आरोग्य, तुष्टि, पुष्टि, वा, धृति तया संसारमें जो कुछ प्रशंसनीय गिना जाता है वह सब ध्यान करनेवालेको प्राप्त होता है ।। १९८ ।। तल्यानाविष्टमालोक्य प्रकंपन्ते महामहाः। नश्यति भूतशाकिन्यः क्रूराः शाम्यति च क्षणात्।। जो योगी अरहंत और सिद्धोंके ध्यान करनेमें तल्लीन है उसको देखकर महाग्रह भी कंपित हो जाते हैं, भूत शा- किनी आदि सब नष्ट हो जाती हैं और बडे बडे कर भी क्षणभरमें शांत हो जाते हैं ।। १९९ ॥

१२
भापानुवाद सहित।
यो यत्कर्मप्रभुर्देवस्तद्ध्यानाविष्टमात्मनः।
ध्याता तदात्मको भूत्वा साधयत्यात्मवांछितं ॥
पार्श्वनाथोमवन्मंत्री सफलीकृतविग्रहः ।
महामुद्रां महामंत्रं महामंडलमाश्रितः ॥२०१॥
जिस कर्मक करनेमें जो समर्थ देवता है उसका ध्यान
करनेसे यह ध्यान करनेवाला पुरुष उसी कार्यको सिद्ध
कर लेता है जैसे कि-महामुद्रा ( ध्यानके श्रासन ) महामंत्र
(भसि था उ सा) और महामंडलका प्राश्रयकर मंत्री मरु-
श्रुति अपने शरीरको सफलकर पार्थनाय स्वामी होगया ।
तैजसीप्रभृतीर्बिभ्रद् धारणाश्च यथोचितं ।
निग्रहादीनुग्राणां ग्रहाणां कुरुते द्रुतं ॥ २० ॥
यथायोग्य तैजसी आदि धारणाको धारण करनेवाला
योगी उदर (कूर ) ग्रहोंका भी बहुत शीघू निग्रह आदि
करलेता है ।। २०२॥
स्वयमाखंडलो भूत्वा महामंडलमध्यगः।
'किरीटकुंडली वज्री पीतमूषाम्बरादिकः ।। २०३ ॥
महामंडळके मध्यमें विराजमान वह योगी स्वयं इंद्रकी
अल्पना करता है तथा किरीट कुंडलको धारण करनेवाला
वनशस्त्र लिये हुए वह (१) की कल्पना करता है ॥२०॥

तत्वानुशासन।
६६
कुंभकीस्तंभमुद्राद्यास्तंभन मंत्रमुच्चरन् ।
स्तंभकार्याणि सर्वाणि करोत्येकानमानसः ॥२०॥
एकान चिचको धारण करनेवाग नो योगी कुंभक
वायुको धारण कर स्वंभमुद्राके द्वारा स्वमन करनेवाले
मंत्रोंका रचारण करता है वह संसारके समस्त स्तंभनरूप
कार्योंको कर डालता है ।। २०४॥
स स्वयं गरुडीमय वेडं क्षपयति क्षणात् ।
कंदर्पश्च स्वयं भूत्वा जगन्नयति वश्यतां ।। २०५ ।।
वह योगी स्वयं गरुड होकर क्षणभरमें ही विपक्ष
नाश कर डालता है और स्वयं कामदेव होकर समस्त सं-
सारको वश कर लेता है ।। २०५॥
एवं वैश्वानरो भूयं ज्वलज्ञ्चालाशताकुलः।
शीतज्वरं हरत्याशु व्याप्य ज्वालाभिरातुरं ।। २०६ ॥
इसीप्रकार वह योगी जिसमें सैकडोभालाएं जलरही
हैं ऐसी अग्निया रूप धारण कर अपनी मालाओंके द्वारा
रोगीका स्पर्श करता है और बहुत शीघ्र उसके शीतजरको
हरण करलेता है ।। २०६॥
स्वयं सुधामयो भूत्वा वर्षन्नमृतमातुरे।
अथैतमात्मसात्कृत्य दाहज्वरमपास्यति ॥ २० ॥

भांपानुवाद सहित । इसीवरह वह योगी स्वयं अमृतमय होकर रोगीके - रीरपर अमृतकी वर्षा करता है और उस रोगीको अमृतमय करके उसका सव दाहज्वर दूर कर देता है । २०७ ।। क्षीरोदधिमयो भूत्वा प्लावयन्नखिलं जगत् । शांतिक पौष्टिकं योगी विदधाति शरीरिणाम् ॥ अथवा क्षीरसागरमय होकर वह समस्त जगतको वहा देता है अथवा दुवो देता है और वही योगी जीवोंके समस्त शांतिक और पौष्टिक फर्मोको कर डालता है ।। २०८ ॥ किमत्र बहुनोक्तेन यद्यत् कर्म चिकीर्पति । तद्देवतामयो भूत्वा तत्तन्निवर्तयत्ययम् ।। २०९ ॥ अथवा बहुत अधिक कहनेसे क्या लाभ है वह योगी जिस जिस कर्मको करना चाहता है उसी कर्मका देवता रूप होकर वह उस कामको कर डालता है ।। २०९ ॥ शांते कर्मणि शांतात्मा क्रूरे क्रूरोभवन्नयं । शांतऋराणि कर्माणि साधयत्येव साधकः ॥ २१०॥ शांत कौमें वह शांत हो जाता है और कर कर्मोन वह क्रूर हो जाता है इसप्रकार सिद्ध करनेवाला वह योगी. शांत और क्रूर दोनों प्रकारके कर्मोको सिद्ध करलेता है ॥२१॥ आकषर्ण वशीकारः स्तम्भनं मोहनं द्रुतिः ।

तत्वानुशासन, निर्विषीकरणं शांतिविद्वेषोच्चाटनिग्रहाः ॥२१॥ 'एवमादीनि कार्याणि दृश्यन्ते ध्यानवर्तिनां । ततः समरसीभावसफलत्वान्न विभ्रमः ॥ २१२ ।। अाकर्षण, चशीकार, स्तंभन, मोहन, बुति, निर्विषीक- रण, शांति, विद्वेष, उपाटन, निग्रह आदि बहुत- तरहके कार्य ध्यानियोंके देखे जाते हैं अत: समरसीभाव सफल हो जानेसे अर्थात् समरसीमावके पूर्ण प्रगट हो जानेसे उस योगीको किसी प्रकारका विभ्रम नहीं होता ॥२११-२१२।। यत्पुनः पूरणं कुंभो रेचनं दहनं प्लवः । सकलीकरणं मुद्रामंत्रमंडलधारणाः ॥ २१३ ॥ कम्माधिष्ठातृदेवानां संस्थान लिंगमासनं । प्रमाणं वाहनं वीर्य जातिमिद्युतिर्दिशा ॥९१४ ॥ भुजवक्त्रनेत्रसंख्या भावः क्रूरस्तथेतरः। वर्णस्पर्शस्वरोऽवस्था वस्त्रं भूषणमायुधं ।। २१५ ।। एवमादि यदन्यच्च शांतकराय कर्मणे मंत्रवादादिषु प्रोक्तं तद्ध्यानस्य परिच्छदः ॥ २१६॥ जो पुरण, कुंभ, रेचन, दहन, पान, सकलीकरण, भद्रा, मंत्र, मंडल, धारण तया प्रत्येक कर्मके अधिष्ठाता जो देवता है उनके संस्थान, चिन्ह अासन, प्रमाण, वाहन, दी .

भाषानुवाद सहित। ६६ र्य, जाति, नामकाति, दिशा, भुनाओं की संख्या, मुखोप संख्या, नेत्रोंकी संख्या, कर तथा शांत भाव, वर्ण, सर्व स्वर, अमस्या, वन, आभूषण और आयुध आदि तयां इनके सिवाय जो कुछ शांत और क्रूर कोक लिये आवश्यक है वह सब मैत्रवाद आदि शाखामें कहा है वह सब व्यानकी साध्या कहलाती है ।। २१३-२१६ ॥ यदात्रिकं फलं किंचित्कलमामुत्रिकं च यत् । एतस्य द्वितयस्यापि ध्यानमेवाप्रकारणं ।। २१७ ॥ इस जीका इस लोक तथा परलोकमें जो कुछ फल मिलता है उन दोनों प्रकार के फलोंका मुख्यकारण एक ध्यान ही समझना चाहिये ॥ २१७ ॥ ध्यानस्य च पुनर्मुल्यो हेतुरेतच्चतुष्टयम्। गुरूपदेशः श्रद्धानं सदान्यासः स्थिरं मनः ॥२१.८11 तया ध्यानक ये चार मुख्य कारण हैं गुरुका उपदेश अहए करना, श्रद्धान रखना, व्यानका सदा अभ्यास र सना और मनको स्थिर रखना ॥ २१॥ अत्रैव मानहं कार्ययानफलमैहिक! इदं हि ध्यानमाहात्म्यख्यापनाय प्रदर्शितं ॥२१९॥ जो ध्यानका फल इस लोक संबंधी बदलाया गया है यह केवळ ध्यानक माहास्य को प्रगट करने के लिये ही दिख - तखानुशासना लाया गया है परन्तु उस लौकिक फलको प्राप्त करनेकेलिये ध्यान करना उचित नहीं ॥ २१९॥ यदयानं रौद्रमान वा यदैहिकफलार्थिनां । तस्मादेतत्परित्यज्य धन्य शुक्लमुपास्यतां ॥२२०॥ क्योंकि इसलोक संबंधी फलोंकी इच्छा करनेवालों के नो ध्यान होता है वह बात और रौद्र ही होता है इसलिये दोनों ध्यानाका परित्यागकर धर्य ध्यान और शुक्ल ध्यान की ही उपासना करना चाहिये ।। २२० ।। तत्त्वज्ञानमुद्रासीनमपूर्वकरणादिषु। शुभाशुभमलापायाविशुद्ध शुक्लमभ्यः॥२२॥ अपूर्वकरण आदि गुणस्थानों में तत्रज्ञान स्वरूप भ- र्थात् शुद्ध भात्मस्वरूप, नया उदासीन स्वरूप और शुभ अशुभ मलोंके दूर हो जानेसे विशुद्ध स्वरूप ऐसे शुल्ल घ्यान को धारण करना चाहिये ।। २२१॥ शुचिगुणयोगाच्छुक्लं कषायरजसः क्षयादुपशमाहा। माणिक्यशिखाबदिदं सुनिर्मल निःप्रकप च ॥ २२२ ॥ पायपीरनके क्षय होनेसे अथवा उपशम होनेसे वात्माका शुद्ध स्वरूप गुण मगट होता है और उसकेमगद होने से ध्यान शुक्र ध्यान कहलाता है। वह शुक्ल ध्यान पालिक्यकी शि- खाके समान सुनिर्मल और निष्पकंप होता है ।। २२२ ।।

६८ भाषानुवाद सहित। रखमयमुपादाय त्यक्त्वा बंधनिबंधनं । ध्यानमभ्यस्थतां नित्यं यदि योगिन्मुमुक्षसे ।।२२३॥ हे योगी ! यदि तू मुक्ति चाहता है तो रत्नत्रयको घा- रण कर और बंधके कारण जो मिथ्यात्व अविरत प्रमाद, कपाय योग आदि हैं उनको दूरकर सदा ध्यानका अभ्यास कर ।। २२३॥ ध्यानाभ्यासप्रकर्षेण तुद्यन्मोहस्य योगिनः। चरमागस्य मुक्तिः स्याचदा अन्यस्य च क्रमाव । जो योगी ध्यानका सर्वोत्तम अभ्यास करता है उसका मोहनीय कर्म नष्ट हो जाता है और यदि वह योगी चरमश-- रोरी हुआ तो उसे मोक्ष प्राप्त होता है तथा यदि वह चरम- शरीरी नहीं हुआ तो उसे अनुक्रमसे मोक्ष प्राप्त होता है ।। तथा धचरमांगस्य ध्यानमभ्यस्यतः सदा । निर्जरा संवरश्च स्यात्सकलाशुभकर्मणां ॥ २२५ ।। जो योगी चरमशरीरी नहीं है तथा ध्यानका सदा अभ्यास करता है उसके समस्त अशुभ कर्मोकी निर्जरा तथा संवर होता रहता है ॥ २२५ ॥ आस्रवति च पुण्यानि प्रचुराणि प्रतिक्षणं । महर्भिवत्येष त्रिदशः कल्पवासिषु ।। २२६ ॥

तत्वानुसासन तथा उसके प्रत्येक क्षणमें बहुतसे पुण्य कर्मोका भा- अब होता रहता है जिनके कि उदयसे वह कल्पवासी दे- बॉमें अनेक बडी वडी ऋद्धियोंको धारण करनेवाला देव होता है ।। २२६ ॥ तत्र सर्वोन्द्रयामोदि मनसः प्रीणनं परं । सुखामृतं पिबच्चास्ते सुचिरं सुरसेवितः ॥२२७ ॥ वहाँपर समस्त इंद्रियोंको प्रसन्न करनेवाले, और मन अत्यंत तुष्ट करनेवाले सुखरूपी अमृतको पान करवा हुना रहता है और अनेक देवता लोग बहुत दिनतक उसकी सेका भरते रहते हैं ।। २२७ ॥ ततोऽवतीर्य मर्येपि चक्रवादिसंपदः । चिरं मुक्त्वा स्वयं मुस्वा दीक्षा देगेवरी श्रितः ॥ वहांसे अवतीर्ण होकर मनुष्य लोकमें आवा है और बहुत दिनतक चक्रवर्ती आदिकी संपदाओंका उपभोग कर- वा है या उन्हें स्वयं छोडकर दिगंवरी दीक्षा धारण करता है।। २२८॥ बकायः स हि ध्यात्वा शुक्लध्यानं चतुर्विधे । विधूयाष्टापि काणि श्रयते मोक्षमक्षयं ॥ २२९॥ पटपमनाराच संहननको धारण करनेवाला वह चारों प्रकारके शुक्ल ध्यानको धारण करता है और आगे कर्माको ७० भाषानुवाद सहित। नष्टकर अविनाशी मोक्षपदको प्राप्त होता है ।। २२९ ।। आत्यंतिकः स्वहेतोर्यों विश्लेषो जीवकर्मणोः । स मोक्षः फलमेतस्य ज्ञानाचाः क्षायिका गुणाः ॥ जीव और फौका जो अपने ही आत्मस्वरूप कारणों से अत्यंत विश्लेप हो जाना है अर्थात् आत्मासे कर्मोका विल्कुल अलग हो जाना है उसे मोक्ष कहते हैं और क्षायिक शान आदि गुणोंका प्रगट हो जाना उस मोतका फल होता है ॥ २३० ॥ कर्मबंधनविध्वंसादूर्ध्वव्रज्यास्वभावतः । क्षणेनैकेन मुक्तात्मा जगच्चूडामृच्छति ॥ २३१॥ एक नो फाँका बघन हो जाने से और मरे आत्माका अर्ध्व भयन स्वभाव होनेसे वह मुक्त आत्मा एक ही साथ ( समयमें ) जनतके अग्रभागपर जा विराजमान होता है। पुसः संहारविस्तारौ संसारे कर्मनिर्मिती । मुक्तौ तु तस्य तौ न स्तः क्षयात्तहेतुकर्मणां ॥२२॥ संसारमें जीवों के प्रदेशोंका जो संकोच विस्तार होता है वह कर्मीक उदयसे होता है इसलिये मुक्त होनेपर वह संकोच. विस्तार नहीं हो सकता क्योंकि संकोच बिस्तारके कारण जो कर्म है में नष्ट हो जाते हैं ।। २३२ ॥ ततः सोऽनंतरत्यक्तस्वशरीरप्रमाणतः |

तत्वानुशासन।
किंचिदूनस्तदाकारस्तत्रास्ते स्वगुणात्मकः ।। २३३॥
इसलिये यह मुक्त जीव अपने छोडे हुए शरीरके प्रमा-
बसे कुछ कम आकारमें रहता है क्या मुक्त होते समय जो
शरीरका प्रकार है उसी आकारका रहता है और अपने
आत्माके गुणोंसे भरपूर रहता है ॥ २३३ ।।
स्वरूपावस्थितिः पुंसस्तदा प्रक्षीणकमणः ।
नाभावो नाप्यचैतन्यं न चैतन्यमनर्थकं ॥२३४॥
कर्मक्षय होनेके बाद इस पुरुषकी अवस्था स्वाभाविक
रहती है इसलिये मुक्त अवस्थामें न तो जीवका अभाव कह
सकते हैं न अचेतन कह सकते हैं और न चेतनकी व्यर्यता
कह सकते हैं ।। २३४॥
स्वरूप सर्वजीवानां स्वपरस्य प्रकाशनं ।
भानुमंडलवतेषां परस्मादप्रकाशनं ।। २३५ ॥
सूर्यमंडल के समान समस्त जीवोंका स्वरूप स्वपरको
(अपने आत्माको तया प्रात्मेतर समस्त पदार्थोंको ) मका-
श करना है जिसमकार सूर्य अन्य किसीसे प्रकाशित नहीं
होता उसीपकार जीव भी अन्य किसीसे प्रकाशित नहीं
हो सकता ॥ २३५॥
तिष्ठत्येव स्वरूपेण क्षीणे कमणि पौरुषः।
यथा माणि; स्वहेतुभ्यः क्षीणे सांसर्गिके मले॥२३६॥

१२ भाषानुवाद सहित। : जिसमकार सांसर्गिक मलके दूर होनेपर पहिए अपने हेतुत्रोंसे ठहरता है उसीमकार कर्मोके नाश होनेपर या प्रात्मा भी अपने स्वभावसे ही ठहरता है ।। २३६ ॥ न मुह्यति नसंशेते न स्वार्थानध्यवस्यति । नरल्यते न च द्वेष्टि किंतु स्वस्थ प्रतिक्षणं ॥ उससमय यह मुक्तात्मा न तो मोहित होता है न सोता न अपने स्वार्थोंकी श्रोर झुकता है और न राग करता हैन द्वेष करता है किंतु वह प्रत्येक क्षणमें स्वस्थ ही रहता है।। २३७ ॥ निकालाविषयं ज्ञेयमात्मानं च यथास्थितं । जानन् पश्यंश्च निःशेषमुदास्ते स तदा प्रभुः ।। उससमय वह प्रभु आत्मा भूत भविष्यत वर्तमान तीनों काल संबंधी समस्त ज्ञेय पदार्थोको तया अपने स्वरूपमें उहरे हुए अपने आत्माको देखता और जानता हुआ उदा- सीन रूपसे रहता है ।। २३८॥ अनंतज्ञानहग्वीर्यवतृष्ण्यमयमव्ययं । मुखं चानुभवत्येष तत्रातीद्रियमच्युतः ॥ २३९ ॥ कमी न नाश होनेवाला यह मुक्तात्मा मुक्तावस्थामें अतींद्रिय, अनंतज्ञानमय, अनंतदर्शनमय, अनंतवीर्यमय, तृष्णा रहित और नाम रहित ऐसे अनंत सुखका अनुभव करता है।

. "तत्वानुशासन ननु चाक्षेस्तद(नामनुभोक्तुः सुखं भवेत् । अतीन्द्रियेषु मुक्तेषु मोक्षं तत्कीदृशं सुखं ॥२४॥ कदाचित् कोई यहापर यह शंका करे किइस संसारमें जो इंद्रियों के द्वारा पढार्थीका अनुभव करता है उसीको सुख मिल सकता है जो जीव मुक्त होगया है वह अद्रिय है इसलिये मोक्षमें सुखकी प्राति किसकार हो सकती है। ॥ २४०॥ इति चेन्मन्यसे मोहावन्न श्रेयो मतं यतः। 'नाधापि वत्स स्वंवेसि स्वरूपं सुखदुःखयोः ॥२४२॥ उसके लिये प्राचार्य कहते हैं कि-तू मोहनीय कर्मके : उदयसे ऐसा मानता है इसलिये तेरा यह मन वा यह शंका डीक नहीं है क्योंकि हे परस ! अभी तक तू सुखदुःखका स्वरूप ही नहीं जानता है ।। २४१ ॥ आत्मायत्तं निराबाधमतींद्रियमनश्वरं । पातिकर्मक्षयोद्भूतं यत्चन्मोक्षसुखं विदुः ।। २०२॥ जो केवल आत्माके आधीन है, जिसमें कोई किसीत- रहकी वाघा नहीं है जो अतींद्रिय है कभी नाश होनेवाला 'नहीं है और जो पातिया कौके नाश होनेसे प्रगट हुमा है ऐसा मोक्ष सुख ही वास्तवमें सुख कहलाता है ॥ २४२ ॥ यत्तु सांसारिकं सौख्यं रागात्मकमशाश्वतं ।

भाषानुपाद सहित। स्वपरद्रव्यसंभूतं तृष्णासंतापकारणं ।। २४३ ।। मोहदोहमदकोषमायालोभनिबंधनं । दुःखकारणबंधस्य हेतुत्वाहुखमेव तत् ॥ २४४ ॥ तथा जो सांसारिक सुख रागद्वेष रूप है, क्षण क्षणमें नष्ट होनेवाला है, आत्मा और अन्य पुद्गकादि टू- व्योंसे प्रगट होता है, जो तृष्णा और संतापका कारण है और मोह द्रोह, मद क्रोध माया लोभ आदि विकारोंका का- रण है वह सब दुख देने वाले कर्म बंधका कारण है इस- लिये वह सुख नहीं किंतु दुःख ही कहलाता है ।।२४३-२४४॥ तन्मोहस्यैव माहात्म्यं विषयेभ्योऽपि यत् सुखं । यत्पटोलमपि स्वादु श्लेष्मणस्तहिभितं ॥ २४५ ॥ इम जीवको जो विषयों से भी सुख प्रतीत होता है वह केवल मोहनीय कर्मका ही माहाल्य है, क्योंकि पटोल भी जो स्वादिष्ट जान पडता है वह केवळ श्लेष्माके कारण ही जान पडता है (वास्तव में पटोल स्वादिष्ट नहीं है ) इसी प्रकार वास्तव में विषयो भी स नहीं है ।। २४५ ॥ यदन्न चक्रिणां सौख्यं यच्च स्वर्गे दिवौकसां । कलयापि न तत्तुल्यं सुखस्य परमात्मनां ॥ २४६॥ इस संसारमें भो चत्रवर्तियोंको सुख मिलता है और स्वर्गमें नो देवोंको सुख मिलता है वह परमामाओंके (नु तत्वानुशासन क श्रात्माओंके ) सुखकी एक कलाके समान मी नहीं हो सकता ।। २४६॥ अत एवोत्तमो मोक्षः पुरुषार्थेषु पठ्यते । स च स्याहादिनामेव नान्येषामात्मविहिपां ॥२७॥ इसीलिये चारों पुरुषायोंमें एक मोक्ष ही सबसे उत्तम पुरुषार्थ माना जाता है और वह भी स्याद्वादको माननेवाले नैनियोंके ही यहां है । आत्मासे द्वेष रखनेवाले (आत्माका वास्तविक स्वरूप न माननेवाले) अन्य मतियोंके यहां नहीं ॥ २४७॥ यहा बंधश्च मोक्षश्च तद्धेतू च चतुष्टयं । नास्त्येवैकांतरक्तानां तद्व्यापकमनिच्छतां ॥२४८ अयवा बंध और मोक्ष तया इन दोनोंके कारण, ये चारों ही. एकांतवादियोंके नहीं हैं क्योंकि वे इन चारीको व्यापक नहीं मानते हैं ॥ २४८॥ भनेकांतात्मकत्वेन व्याप्तावत्र क्रमाक्रमौ । ताभ्यामक्रिया व्याप्ता तयास्तित्वं चतुष्टये ॥२४९ ॥ क्रम और अक्रम अर्थात् अस्तित्व नास्तित्व और बकम्प अवतन्य ये दोनों अनेकांत रूपसे ही व्याप्त है तथा क्रम भकम इन दोनोंसे ही इस संसार में अर्थ क्रिया व्याप्त है और पर्थ मापानुषाद सहित। क्रिपासे ही बंघ मोक्ष तया इन दोनोंके हेतु इन चारोंका अस्तित्व रहता है ।। २४९ ॥ मूलव्याप्तुनिवृत्तौ तु क्रमाक्रमनिवृत्तितः । क्रियाकारकयोभ्रंशान्न स्यादेतच्चतुष्टयं ॥ २५० ॥ इसलिये इन सबका मूल व्यापक अनेकांत है अनेकांत न माननेसे क्रम अक्रम भी नहीं बन सकते क्या क्रम अक्र- मके न होनेसे क्रियाकारकका नाश होता है और क्रिया- कारकका नाश होनेसे बंध मोक्ष तथा इन दोनोंके हेतु इन चारोंका अस्तित्व नहीं होसकता ।। २५० ॥ ततोव्याप्त्या समस्तस्य प्रसिद्धश्च प्रमाणतः। चतुष्टयसदिच्छहिरनेकांतोऽवगम्यतां ॥ २५१ ॥ इसलिये जो मोक्ष बंध और इन दोनोंके हेतुओंको चाहते हैं उन्हें जो व्याप्त है और जिसका प्रमाणसे मानना प्रसिद्ध है ऐसा अनेकांत अवश्य मानना चाहिये ॥ २५ ॥ सारश्चतुष्टयेप्यस्मिन्मोक्षः सयानपूर्वकः । इति मत्वा मया किंचिद् ध्यानमेव प्रपंचित॥२२॥ पंच मोक्ष और दोनों के कारणों में एक मोक्ष ही प्रधान तथा सार है और उस मोक्षकी प्राप्ति श्रेष्ठ ध्यान पूर्वक ही ोती है यही समझफर मैने (श्रीमन्नागसेन मुनिने ) कुछ. ध्यानका ही विस्तार लिखा है ।। २५२ ।।

तखानुशासन। यमप्यत्यंतगंभारमभुमिादृशामिदम् । प्रावर्जिषि तथाप्यत्र ध्यानभक्तिप्रचोदितः ॥ २५ ॥ यद्यपि ध्यानमा बस अत्यंत गंभीर है और हमारे ऐसे पुरुषों के कहनेक सर्वथा अयोग्य है तथापि ध्यानकी भक्तिस प्रेरित होकर ही मुझे इसमें प्रवृत्त होना पड़ा है ।। अदन्न स्खलितं किंचिच्छामस्थ्यादर्थशब्दयोः। तन्मे भक्तिपूधानस्य क्षमतां श्रुतदेवता ॥ २५४ ॥ मैं केवल भावका ही प्रधान मानता है इसलिये प्र. त्यानी होने के कारण जो इछ मन्द और अर्यकी भूल होगई हो नो श्रुनदेवना मुझे झपः करे ।। २५४ ॥ वस्तुयायात्म्यविज्ञानश्रद्धानध्यानसंपदः । भवंतु भव्यसत्त्वानां स्वस्वरूपोपलब्धये ।। २५५ ॥ पदार्थीका यथार्थ बार, ययार्य श्रद्धान और घ्यान रूपी संपदाएं भव्य बीवोंको अश्न शुद्ध आमाके स्वरूपकी प्राप्ति होने के लिये हों ।। २५५ ॥

प्रशस्ति ।
4.1
श्रीवीरचंद्रशुभदेवमहेंद्रदेवाः
शास्त्राय यस्य गुरुवो विजयामरश्च ।
दीक्षागुरुः पुनरजायत पुण्यमूर्तिः
श्रीनागसेनमुनिरुद्धचरित्रकीर्तिः ॥२५६ ॥
जिसके श्रीवीरचंद्रदेव, शुभचंद्रदेव और महेंद्रदेव शाख
पढानेवाले विद्यागुरु हुए थे तथा पुण्यमूर्ति विजयदेव
दीक्षागुरु हुए थे तया जिनके चारित्रकी कीर्चि चारों ओर
फैल रही थी ऐसे एक नागसेन नामक मुनि हुए थे ।।
तेन पद्धधिषणेन गुरूपदेश-
मासाद्य सिद्धिसुखसंपदुपायभूतं ।
तत्त्वानुशासनमिदं जगतो हिताय
श्रीनागसेनविदुषा व्यरचि स्फुटार्थ ॥
उन्हीं अत्यंत विद्वान और बहुत ही बढी हुई चुद्धिवाले
नागसेन सुनिने गुरुके उपदेशको स्वीकारकर संसारका
हित करने के लिये जिसका अर्थ अत्यंत सरल है और जो
मोक्षसुखरूमी संपदाका कारण है ऐसा यह तत्त्वानुशासन
नामका ग्रंथ बनाया ॥२७॥

दखानुशासन Gar जिनेंद्राः सद्ध्यानज्वलनहुतघातिप्रकृतयः प्रसिद्धाः सिद्धाश्च पहततमसः सिद्धिनिलयाः। सदाचार्या वयाः सकलसदुपाध्यायमुनयः पुनंतु स्वांतं नास्त्रिजगदधिकाः पंच गुरुवः॥ २५८ ॥ श्रेष्ठ ध्यानरूपी अग्निमें घातिया कर्मोकी सब प्रकृति- योंका होम करनेवाले श्रीजिन्द्रदेव, समस्त कर्मरूपी अंध- कार को नाश करनेवाले तथा सिद्धशिलापर विराजमान ऐसे प्रसिद्ध सिद्धभगवान, श्रेष्ठ आचार्य, सब उपाध्याय और सब साधु ये तीनों लोकोंमें सर्वोचम पांचों परमेठी मेरे में- तःकरणको पवित्र करो ॥ २५८ ॥ देहज्योतिषि यस्य मजति जगत् दुग्धांबुराशाविव ज्ञानज्योतिषि च स्फुटत्यतितरामोंभूर्भुवस्वस्त्रयीं । शब्दज्योतिषि यस्य दर्पण इव स्वाथाश्वकासत्यमी स श्रीमानमरार्चितो जिनपतिज्योतिस्त्रयायास्तु नः॥ इति श्रीमन्नागसेनमुनिविरचितः तत्वानुशासनासद्धान्तः समाः । क्षीरसागरके समान जिनके शरीरकी निर्मल कांतिम यह समस्त जगत स्नान करता है, जिनके मानके मकाशम ओंभूर्भुवः स्वा ये तीनों अत्यंत प्रकाशमान होते हैं और दर्पयके समान जिनके शब्दरूप प्रकाशमें (दिम्पध्वनिमें) ये सब जीव तया जीवेतर सब पदार्य प्रकाशित होते हैं तया 4. . . भाषानुवाद सहित। बोअंतरंग बहिरंग लक्ष्मीको धारण करते हैं और समस्त इंद्रादि देव मिनकी पूजा करते हैं ऐसे भागवान श्रीनिनेंद्र- देव हम लोगोंको शरीरकी यात (परमौदारिक शरीर ) ज्ञानकी ज्योति ( केवल ज्ञान ) और शब्दकी ज्योति (दि.. व्य ध्वनि ) इन तीनोंके देनेवाले हों ।। २५९ ।। -- इति श्रीतत्त्वानुशासन

श्री वीतरागाय नमः।
सनातन जैन ग्रंथमाला।
२०
अथ श्रीचंद्रकविकृता
वैराग्यमणिमाला।
( मापानुवाद सहित )
चिंतय परमात्मानं देवं योगिसमूहैः कृतपदसेवं ।
संसारार्णववरजलयानं केवलवोधसुधारसपानं ॥१॥
हे भव्य जीव तु परमात्माका चिंतन कर । इस सं-
सार में परमात्मा ही सर्वोत्कृत्ट देव हैं, संसार के समस्त
योगियों के समूह उन्ही के चरण कमलों की सेवा करते हैं
और वे ही इस संसाररूपी महासागरसे पार करने वाले उ-
बम जहाज हैं वे परमात्मा केवल ज्ञानके द्वारा असुतके स.
पान पान किये जाते हैं अर्थात् उन परमात्मा का साक्षात्
अनुभव केवलानके द्वारा होता है ॥१॥

२
भाषानुवाद सहित।
जीव जहीहि धनादिकतृष्णा
मुंच ममत्वं लेश्यां कृष्णां ।
घर चारित्रं पालय शीलं
सिद्धिवधूक्रीडावरलीलं ॥२॥
हे जीव तू धनादिक की तृष्णा छोड, ममत्वका त्याग
र और कृष्ण लेश्याको दूर हटा । इन सबका त्याग
कर सम्यक् चारित्रको धारण कर और शीलका पालन कर
क्योंकि इस संसारमें चारित्र और शील ही मोक्षरूपी
का मनोरंजन करने के लिये उचम लीला है। भावार्य-मोक्ष
रूपी स्त्री चारित्र और शीलको पालन करनेवालेको स्वयं
घरण कर लेती है ॥२॥
अध्रुवमिदमाकलय शरीरं
जननीजनकधनादि सदारं।
वांछां कुरुषे जीव नितांत
किं न हि पश्यसि मूढ कृतांतं ॥३॥
हे जीव ! तू इस शरीरको अनित्य अथवा अवश्य नाश
होनेवाला समझ तथा इसके साथ साथ माता पिता स्त्री और
धन आदको भी नष्ट होनेवाला समझ । हे जीव ! तू
इनके बने रहने की अत्यन्त इच्छा करना है परन्तु हे मूढ !
या तु यमराजको नहीं देखता ॥३॥

पैराग्यमणिमाला। ३ बाल्ये वयसि कोडासक्त- स्तारुण्ये सति रमणीरक्तः। वृद्धत्वेऽपि धनाशाकष्ट- स्त्वं भवसीह नितांतं दुष्टः॥४॥ है नीच तू बालक अवम्यामें तो खेल कूदमें लगा रहा, तरुण अवस्थामें सीमें आसक्त रहा और वृद्ध अवस्यामें (बुढापेमें) धन पानेकी आशा लगाये रहनेका मारी कष्ट मोगता रहा । इसमकार तू जन्मसे मरणत अत्यन्त दुष्टता ही, धारण किये रहा ॥४॥ का ते आशा यौवनविषये अध्रुवजलबुबुदसमकाये। मृत्वा यास्यसि निरयनिवास तदपि न जहसि धनाशापाशं ॥५॥ अरे तू इस यौवन अवस्थाकै बने रहनेमें क्या माशा लगा रहा है? देख यह शरीर जलके बुदबुदाके समान भनित्य है। मरकर तुझे नरकका निवास भोगना पडेगा परन्तु सेद है कि तब भी तू इस धनकी आशारूपी जालकात्याग नहीं करता ॥५॥ भ्रातमें वचनं कुरु सारं

भाषानुवाद सहित।
चेत्त्वं वांछसि संसृतिपारं।
मोहं त्यक्त्वा काम क्रोध
सज, भज त्वं संयमवरबोधं ॥६॥
हे भाई! यदि तू इस संसारसे पार होना चाहता है तो
मेरे वचनों हीकोसार मान । सक्से पहिले तुमोहका त्याग कर
और फिर काम क्रोधको छोडकर संयम और सम्परज्ञानको
धारण कर ॥६॥
का ते कांता कस्तव तनयः
संसारोऽपि च दुःखमयो यः।
पूर्वभवे त्वं कीडग्भूतः
पापास्लवकर्मभिरभिभूतः॥७॥
अरे कुछ विचार तो कर कि इस संसारमें कौन तो
तेरी ली है और कौन वेरा पुत्र है। यह संसार दुःख मय है।
पहिले भवमें जब तू अनेक पापोंका आस्रव करनेवाले कोसे
खूब जकडा हुआ था तब कैसा था ॥७॥
शरणमशरणं भावय सतत-
मर्थमनर्थ चिंतय नियतं।
नश्वरकायपराक्रमावचे
वांछां कुरुषे तस्य हि चित्ते॥८॥

वैराग्यमणिमाला जीव ! संसारमें जितने शरण है उन सबको तु सदा अशरण समझ क्या जितने पर्य वा पदार्य है उन सबको सदा अनर्थ करनेवाले चितवन कर । यह पराक्रम दिखाने वाला तेरा शरीर नश्वर वा अवश्य नाश होने वाला है क्या अपने हृदय में उसीकी इच्छा करता है । ॥८॥ एको नरके याति वराक: स्वर्गे गच्छति शुभसविवेकः। राजाप्येकः स्याञ्च धनेशः एकः स्यादविवेको दासः ॥९॥ यह क्षुद्रमाणी अकेला ही तो नरकमें जाता है और विवेक सहित शुभ परिणामोंके साथ साथ अकेला ही स्वर्गमें जाता । यह राजा मी अकेला ही होता है घनी भी अकेला ही होता है और विवेकरहित दास भी अकेला ही होता है ॥९॥ एको रोगी शोकी एको दुःखविहीनो दुःखी एकः। व्यवहारी च दरिद्री एक एकाकी भ्रमतीह वराकः ॥१०॥ रोगी मी अकेला ही होता है शोक भी अकेले को ही होता है सुखी भी अकेला ही रहता है और दुःख भी अकेला

६
भाषानुवाद सहित।
हीभोगवा है । इसीवरह व्यवहार चलानेवाला भी अकेला ही
होता है और दरिद्री भी अकेला ही होता है इसप्रकार यहनीच
प्राणी ईससंसारमें प्रकला ही परिभ्रमण करता है ॥ १० ॥
अथिरं परिजनपुत्रकलत्रं
सर्व मिलितं दुःखामत्रं ।
चेतसि चिंतय नियतं भ्रातः!
का तेजननी कस्तव तातः॥११॥
पुत्र स्त्री और कुटुंबी जन सव अनित्य है और सब
मिलकर दुःख देने वाले हैं इस संसार में कौन किसकी मा-
वा है और कौन किसका पिता है? हे भाई तू अपने चिचमें
सदा यही चितवन करता रह ॥ ११
भ्रातर्भूतगृहीतोऽसि त्वं
दारनिमित्तं हिंससि सत्वं ।
तेनाऽधेन च यास्यसि नरक
तत्र सहिष्यसि घोरातकं ॥१२॥
भाई । क्या तू भूतोंने पकड रक्खा है जो केवल स्त्री
केलिये जीवोंकी हिंसा करता है देख तुझे इसी पापके
कारण नरकमें जाना पड़ेगा और वहां पर घोर दुःख सहन
करने पड़ेंगे ॥ १२॥

वैराग्यमणिमाला। a विषयपिशाचासंगं मुंच क्रोधकषायौ मूलाल्लुंच। कंदर्पप्रभुमानं कुंच वं लुपेन्द्रियचौरान पंच ॥ १३॥ है प्राणी तू विषय रूपी पिशाचों की प्रासक्ति को छोड, क्रोध और कपायोंको जडमूलसे नाशकर, काम और मान को खंड खंड कर डाल तया इंद्रिय रूपी पांचो चौरोंको वश कर॥ १३ ॥ कुत्सितकुथितशरीरकुटीरं स्तननाभी मांसादिविकार। रेतःशोणितपूयापूर्ण जघनच्छिद्रं त्यज रे! तूर्णं ॥ १४ ॥ यह शरीररूपी झोपडी अत्यंत कुत्सित और कथित है 'खियोंके स्तन और नामि मांसादिकके विकार है और जवन- छिद्र अर्यात् योनि, वीर्य रुधिर और पीव घृणित पदार्योंसे परिपूर्ण है इसलिये हे मूर्ख ! बहुत ही शीघ्र तू इनका त्याग २॥१४॥ संसारान्धौ कालमनंत त्वं वसितोऽसि वराक! नितांत।

भाषानुवाद सहित। अद्याऽपि त्वं विषयाऽऽसक्तः भव तेषु त्वं मूढ ! विरक्तः ॥ १५ ॥ नीच तूने इस संसाररूपी समुद्रमें अनन्त काळतक खूब निवास किया है और आजतक विषयोंमें आसक रहा है। हे मूर्ख भव तो तू उनसे विरक्त हो ॥ १५ ॥ दुर्गतिदुःखसमूहैर्भग्न- स्तेषां पृष्टे पुनरपि लग्नः। विकलो मत्तो भूताविष्टः पापाचरणे जंतो ! दुष्टः॥१६॥ हे जीव तु दुर्गतियोंके अनेक दुःखसे जर्जरित किया गया है तथापि तु फिर भी उन्हींके पीछे लगा रहता है। हे क्षुद्र ! पारूप भाचरण करनेमें तु सदा तल्लीन रहता है इसीलिये तु दुष्ट इंद्रिय ज्ञानसे रहित, मदोन्मच और भूतोंके द्वारा पकडा हुआ अर्थात् पागल गिना जाता है ॥ १६ ॥ सप्तधातुमयपुद्गलपिंडाकृमिकुलकलितामयफणिखंड: "तदपि हि मूर्ध्नि पतति यमदंडः ॥१७॥ १ देहोऽयं तव निदिनकुंडः ऐसा पाठ हो सकता है । तब यह शरीर सात धातुओंका बना हुआँ पुद्गलका पिंड कीगाओंका घर है और निंदनीय है परंतु तो भी यमराजका दंड इस पर पड़ता ही है। यह अर्थ होगा। .

वैराग्यमणिमाला। मा कुरु यौवनधनगृहगर्व तव कालस्तु हरिष्यति सर्व। इंद्रजालमिदमफलं हित्वा मोक्षपदं च गवेषय मत्वा ॥१८॥ हे पाणी द यौवन धन और घर आदिका अभिमान मतकर क्योंकि यह काल तेरे इस यौवन धन प्रादि सबको हरण कर लेगा यह धन यौवन प्रादि सब इंद्रजालके समान निफळ है यही समझकर हे जीव तु इनका त्यागकर और मोक्ष पयकी गवेपणा वा तलाशी कर ॥ १८ ॥ नीलोत्पलदलगतजलचपलं इंद्रचापविद्युत्समतरलं। किं न वेसि संसारमसारं भ्रांत्या जानासि त्वं सारं ।। १९ ॥ हे पाणी यह संसार नील कमलके पचेपर पडेहुए जलके समान चंचल है तथा इन्द्रधनुष अथवा विजलीके समान क्षण- मंगुर (शीघही नाश होनेवाला) है । हे जीव क्या तू इस ऐसे असार संसारको नहीं जानता ? अथवा इसमें होनेवाले परिभ्रमणके द्वारा ही तू इसे सारभूत समझना है ।। १६ ।। शोकवियोगभयैः संभरितं संसारारण्यं त्यज दुरित।

१० भापानुवाद सहित । कस्त्वां हस्ते दृढमिव धृत्वा बोधिष्यति कारुण्यं कृत्वा ॥२०॥ हे माणी देख यह संसाररूपी वन अनेक तरहके शोक वियोग और भयोंसे भराहुआ है तथा अत्यन्त पापमय है। इसलिये तू इसे छोड । बहुत कहांतक कहा जाय तुझे हायसे वही मजबूती से पकडकर तया बढी भारी करुणा कर कौन समझायेगा ? भावार्य-समझाना प्राचार्योका कर्तव्य है जब त अत्यन्त समझानेपर भी संसारको नहीं छोडता तब फिर तुझे मजबूती से पराडकर मी तो कौन समझायेगा और इस तरह समझानेसे भी तो क्या लाभ होगा ॥२०॥ मुंच परिग्रहवृन्दमशेष चारित्रं पालय सविशेष । कामक्रोधनिपीलनयंत्र ध्यानं कुरु रे जीव ! पवित्रं ॥२१॥ हे जीव ! अब तू इन समस्त परिग्रहोंके समूहोंका त्याग कर विशेष चारित्रका पालन कर और कामक्रोधको पेलकर नष्ट कर देनेवाले यंत्रके समान पवित्र ध्यानको धारण कर ॥ मुचं विनोदं कामोत्पन्न पश्य शिवं वं शुभसंपन्न।

वैराग्यमणिमाला। ११ यास्यसि मोक्ष प्राप्स्यसि सौख्यं कृत्वा शुक्लं ध्यानं सख्यं ॥ २२॥ हे जीव तू कामदेव से उत्पन्न हुए विनोदों (क्रीडा- ओंका) का त्यागकर और शुभ संपत्तियोंसे भरेहुए मोक्षप- यको देख । इस संसारमें तेरा वास्तविक मित्र शुक्लध्यान है यदि तू उसे धारण करेगा तो तुझे मोक्षपद प्राप्त होगा और वहांफ्र तुझे अनंत सुख मिलेगा ।। २२ ।। आशावसनवसानो भूत्वा कामोपाधिकषायान् हित्वा । गिरिकंदरगहनेषु स्थित्वा कुरु सद्ध्यानं ब्रह्म विदित्वा ॥ २३॥ और तू आशा आदि अंतरंग परिग्रहोंका और ववादि बहिरंग परिग्रहों का त्यागकर तथा कर्मोंकी उपाधिसे उत्पन्न होनेवाले कपायोंको छोडकर पर्वतोंकी अंधेरी गुफाओंमें बैठ- कर और परमब्रह्म परमात्माका स्वरूप जानकर उत्तम ध्यान धारणकर ॥२३॥ यमनियमासनयोगाभ्यासान् प्राणायामप्रत्याहारान् । धारणध्येयसमाधीन धारय १२ मा पानुवाद सहित। संसाराब्धेीवं तारय ॥२४॥ हे जीव तू यम, नियम,यासन और अनेक तरहके यो- गाभ्यासों को धारण कर, प्राणायाम प्रत्याहारोंको घारण- कर तथा धारण ध्येय और समाधियोंको धारणकर , इन सव- को धारण कर संसाररूपी महासागरसे तू अपने जीवको पार लगा अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर ॥ २४ ॥ अर्हसिद्धमुनीश्वरसाक्ष चारित्रं यदुपाचं दक्षं। तत्त्वं पालय यावज्जीवं संसारार्णवतारणनावं ॥ २५॥ अरहंत सिद्ध और मुनिराजोंकी साक्षी पूर्वक जो तुनें सर्वोत्तम चारित्र धारण किया है उसको तू जीवन पर्यंत पा- जन कर क्योंकि संसाररूपी महासागरसे पार करनेके लिये यही एक नाव है। भावार्थ-सम्यकचारित्रको पालन किये बिना तू कभी मोक्ष प्राप्त नही करसकता ॥ २५ ॥ सावधिवस्तुपरित्यजनं यत् रक्षय शुद्धमना:शुद्धं तद औदास्यं शाम्यं संपालय आशादासीसंगंवारय २६ तुने मर्यादापूर्वक जो पदार्योंका त्याग किया है उस शुद्ध त्यागकी शुद्ध मनसे रक्षाकर तथा रागद्वेषरक्षित उदासी- १३ वैराग्यमणिमाला। नता और शांतपरिणामरूप त्रमताका पालनकर और आता- रूसी दासीका साथ बेड ॥ २६ ॥ पर्यकादिविधेरभ्यासं यत्नतया कुरु योगाऽभ्यास । दुर्धरमोहमहासितसर्प कीलय बोधय मर्दय दर्प २७ हे जीव! तू पथक आसन आदि विधिपूर्वकपडे प्रयत्नसे योगाभ्यासका अभ्यासकर । दुर्घर मोहरूपी बडेमारी काले सपको वशकर और अभिमानको चूर चूर करडाल इसम- कार तू अपने आत्माका ज्ञान सम्पादनकर अथवा मोक्षपा- में चलनेकेलिये आत्माको सावधान कर ॥ २७ ॥ पूरककुंभकरेचकपवनैः संसाधनदाहनदहनः । कृत्वा निर्मलकार्य पूर्व त्वं यदि वांछसि मोक्षमपूर्व २८ हे जीव यदि तू अपूर्व मोक्ष पद प्राप्त करनेकी इच्छा करता है तो संसाररूपी ईधनको जलानेके लिये अग्निके समान पूरक कुंभ और रेचक पवनों के द्वारा सबसे पहिले अपने शरीरको निपल कर ॥२८॥ प्राणविनिर्गतपवनसमूह रुधित्वा स्फोटय कलिनिवह दशमद्वारि विलीनं कुरु वलभसे केवलबोधमनंत २९ घाणसे निकले हुए पवन समूहको रोक कर पापोंके समूहको नास कर और फिर इस पान समूहको दशमद्वार १४ भाषानुवाद सहित । में लेजाकर विलीन कर इस प्रकार करनेसे तुझे पान मात होगा ॥२९॥ हृदयादानीय च नाभिं प्रति वायुतदनुच,तं पूरयति योगाभ्यासचतुरयोगोंद्राः पूरकलक्षणमाहुरतंद्राः॥ प्रमादरहित और योगाभ्यास करनेमें चतुर ऐसे मुनि- राज वायुको हृदय स्थानसे लेकर नाभितक पूरण करनेको पूरक कहते हैं ॥३०॥ नाभिसरोजे पवनं रुध्वा स्थिरतरमत्र नितांतं बध्वा पूर्णकुंभवन्निर्भररूपंकथयति योगी कुंभकरूपं ३१ उस पूरक पवनको नामि कमलमें स्थिररूपसे रोककर जिसमकार पूर्ण कुंभ भरते हैं उसीप्रकार अच्छीतरह भरनेको योगी लोग कुंभक पवन कहते हैं ॥ ३१ ॥ निस्सारयति शनस्तंकोष्ठात् पवनं यो योगीश्वरवचनात रेचकवातं योगी कथयति यो जीवान् माक्षं प्रापयति ॥ योगीश्वरोंके वचनानुसार उसवायुको उस कोटेसे धीरे धीरे बाहर निकालनेको योगी लोग रेचक पवन कहते हैं। यह रेचक पवन जीवोंको मोक्ष प्राप्त कराने वाली है। भावार्थ- इसप्रकार प्राणायामपूर्वक ध्यानाभ्यास करना परंपरासे मोक्षका कारण है ॥ ३२॥ नासामध्ये नगरचतुष्टयमस्ति नितांतमूढ! विचारय बैराग्यमणिमाला। तत्रोत्पत्तेर्वातचतुर्णा संचरणांच कलय संपूर्णा ३३ हे मृढ ! इस नासिकाके मध्यभागमें चार नगर हैं ऐसा तू खूब अच्छी तरह चितवन कर। उन्हीं चारो नगरोंसे पृथ्वी- मंडल अपमण्डल तेजोमण्डल और वायुमण्डल इन चारो पवनों की उत्पत्ति होी है। इन चारों पवनोंके संचरणोंको (गम नागमनको) अच्छी तरह समझ ॥ ३३ ॥ चक्षुर्दिषये श्रवसि ललाटे नाभौ तालुनि हत्कजनिकटे तत्रैकस्मिन् देशे चेतः सद्ध्यानी धरतीत्यतिशांत ३४ उत्तम ध्यान करनेवाला ध्याता अपने हृदय को अत्यंत शांतता पूर्वक नेत्रोंमें धारण करता है , कानोमें धारण क- रताहै ललाट पर धारण करता है नाभिमें धारण करता है,तालुमें धारण करता है अथवा हृदयरूपी कमलके निकट धारण करता है। इन उपर लिखे स्थानोंमसे किसी एक स्थानमें धारण करता है ॥ ३४ ॥ योजनलक्षामितं कमलं संचित्यं जावूनदविमलं। कोशदेशमंदिरगिरिसहितं क्षीरसमुद्रसरोवरसहितं सबसे पहिले एक लाख योजन लंबा चौडा गोल - बूद्वीपके समान एक निर्मल कमलका चितवन करना चाहिये कमलपी घुही स्थान पर मंदराचल (मेरु ) पर्वतका चित- - वन करना चाहिये और वह कमल क्षीर सागररूपी सरोव- में हैं ऐसा विचार करना चाहिये।

भाषानुवाद सहित। तस्योपरि सिंहासनमेकं. तत्र स्थित्वा कुरु सद्ध्यानं। १ प्राप्स्यसि जीव ! शिवाऽमृतपानं ॥३६॥ उस कमलके उपर शरद ऋतुके चंद्रमाके समान नि- मैल ऊंचा और मनोज्ञ एक सिंहासनका चितवन करना चा- हिये और उस सिंहासन पर स्वयं अपने आत्माको विराज- मान कर उत्तम ध्यान करना चाहिये। इस प्रकार ध्यान करनेसे हे जीव तू शीघ्र ही मोक्षरुपी अमृतका ध्यान करने लगेगा। तदनंतरमाध्येयं रम्यं नाभीमध्ये कमलं सौम्यं । षोडशपत्रप्रमितं सारं स्वरमालान्वितपनाऽऽधारं ३७ उसके बाद अपनी नाभिके मध्यभागमें एक मनोहर और सौम्य कमलका चितवन करना चाहिये । उस कमल के सोलह दल हों और एक एक दल पर एक एक स्वरके हिसावसे सोलह दलों पर सोलह स्वर लिखे हों। रेफेकलाबिंदुभिरानद्धं तन्मध्ये संस्थाप्यं शुद्ध। १ 'चेतय सिद्धस्वरूपममानं ऐसा पाठ हो सकता है ।

वैराग्यर्माणमाला। ७ शून्यं वर्ण सत्वंतव्यं तेजोमयमाशं संदिव्यं ॥३॥ उस कमलके मध्यभागमें अत्यन्त शुद्ध सब दिशामों को प्रकाशित करनेवाला, अत्यंत दिव्य, और (1) ऐसा रेफ और विंदु सहित शून्य वर्ण अर्थात् इकार ( है ) स्थापन करना चाहिये ॥ ३८॥ तस्मानिर्यान्ती धूमालीपश्चादग्निकणानामाऽऽली संचित्यानुज्वालाश्रेणी भव्यानां भवजलघोणी ३९ उस ई वीजाक्षरके रेफसे घम की पंक्ति निकल रही है उसके बाद अग्निक स्फुलिंगोंका समूह निकल रहा है और उसके बाद भव्य जीवोंको संसाररूपी समुद्रसे पार क- रनेके लिये नावके समान अग्निकी ज्वालाकी पंक्तियां नि- कल रही हैं ऐसा चितवन करना चाहिये । ज्वालानां निकरण ज्वाल्यं कर्मकजाष्टकपत्रंशल्यं । अवतानंहृदयस्थ चित्यं मोक्षं यास्यसि मानय सत्यं ।। उस कमलके नीचे एक हदश्में विराजमान ऐसे आठ दलवाले कमलका चितवन करना चाहिये जिसके आठो द- सोंपर पाठों कर्म रवखे हों और फिर उस ज्वालाकै समूह से वह शल्पके समान आठों फर्मों सहित कपल जल रहा है ऐसा चितवन करना चाहिये । ऐसा चितवन करनेसे तुझे अवश्य ही मोक्ष प्राप्त होगी यहात तू बिलकुल सत्य मान ॥

१९ भाषानुवाद सहित। कोणत्रितयसमन्वितकुंडं वन्हिवीजवर्णैरविसंडम् । दुग्धय मध्ये क्षिप्त्वा पिंडं पश्यसि सिद्धिवधूवरतुडं। - इसके बाद शरीरके बाहर त्रिकोण अग्निकुंटकाचितवन करना चाहिये । वह त्रिकोण कुंड अग्निवीजासर ""से परिपूर्ण हो । उस अग्निकुंडमें शरीरको स्थापनफर जलाना चाहिये अर्थात् ऐसा चितवन करना चाहिये इसमकार चित्र- बन वा ध्यान करनेसे मुक्तिरूपी स्त्रीका सुंदर मुख तुझे दे- खनेको मिलेगा। भावार्थ-त शीघ्र ही मुक्त होगा । यह भा- ग्नेियी धारणाका स्वरूप कहा ॥४१॥ आकाशं संपूर्ण व्याप्य पृथ्वीवलयं सर्व प्राप्य । वातं वातं हृदि संभारय परमानंद चेतसि धारय ॥ १२॥ तदनंतर सम्पूर्ण आकाशमें व्याप्त होनेवाले तया सम्पूर्ण पृथ्विी मंडलमें प्रवेश करतेहुए वायुका चितवन करना चाहिये और फिर उस वायुको अपने हृदयमें धारण करना चाहिये इसमकार अपने हृदयमें परमानंदको धारण करना चाहिये। तेन वातवलयेनोड्डाप्यं भस्मवृंदमनुदिनमास्थाप्यं ।

वैराग्यमानमा द्वादशांतमध्ये सध्यान कुरु सिद्धानां परमं ध्यानं ॥ ३॥ तदनंतर चितवन करना चाहिये कि उसवायुसम्हने उस अलायेहुए शरीरकी भस्मको उहादिया है फिर धीरे धीरे उस वायुको द्वादशांत स्थानों ( ) स्थापन कर शांत करना चाहिये इसमकार सिद्धपरमेष्ठीका परम- ब्यानरूप श्रेष्ठप्रदान करना चाहिये। यह मारुती धारणा है। आकाशे संगर्जितमुदिरं सेन्दचापमासारसुसारं। नौरपूरसंग्लावितसूरं संरोध्यति धनाधननिकरं ।। १४॥ इसके बाद आकाशमें इंद्रधनुष, विजली,बादलोंका गर्जना बादलोंका खूब बरसना,पानीके पूरसे सूर्यका हबजाना या सहजाना आदिका तथा बादलोंके समूहका चितवन करना चाहिये ॥ ४४ ॥ अर्धचंद्रपुटसमसंराध वारणपुरसचित्यमबाधं । अमृतपूरवर्षमशशिसारं तुष्टयोगिवप्पीहकनिकरं ॥ ४५ ॥ .

भाषानुवाद सहित । तदनंतर अर्द्धचंद्राकार निर्माध अमृतमय जलकी वर्षास सारभूत चंद्रमाकै समान वारणपुर (वरुणमंडल.) का चिंत- बन करना चाहिये ॥ ४॥ कांया नापितदशदिग्वलयं दर्शनबोधवीर्यशिवनिलयं । चिन्मयपिंडं वर्जितवलयं स्मर निजजीवं निर्मलकायं ॥ ४६॥ इसके बाद अपनी कांतिसे जिसने दशों दिशाओंके समूहको घोडाला है, जो दर्शन ज्ञान वीर्य और मोक्षरूप कल्याणका स्थान है जो केवल चैतन्य स्वरूप है , गोलाई श्रादि भाकारोंसे रहित है और जिसका शरीर अर्थात् प्रदेशों- का समूह विल्कुल निर्मल है ऐसे अपने आत्माका चितवन- करना चाहिये । यह वारुणी धारणा है ॥ ४६॥ भामण्डलनिर्जितरविकोटि शुक्लध्यानाऽमृतसंपुष्टिं। तर्थिकरपरमोत्तमदेवं स्वात्मानं स्मर कृतसुरसेवं ॥४॥ तदनंतर जिसके प्रभामंडलसे करोडों सूर्यको प्रभा जीती बारही है, जो शुक्ल ध्यानरूपी अमृतसे बहुतही पुष्ट हो रहा और समस्वदेव जिसकी सेवा कर रहे हैं ऐसे देवाधिदेव वीर्य- बेराग्यमणिमाला कर परमदेव मेरा आत्माही है ऐसा चितवन करना चाहिये यह तत्त्वरूपवती धारणा है ॥४७॥ कुंभवातेन च तं संचित्यं ऊर्ध्वरेफसंयुक्तं नित्यं । सकलविंदुनानाहतरूपं स्थापय चिचे छेदितपापं ॥१८॥ तदन्तर समस्त पापोंको नाश करने वाला, सकल विंदु सहित, उर्ध्वरेफसे विराजमान और सदा चितवन करणे योग्य ऐसे अनाहत्त मंत्रके स्वरूपको कुंभवातके द्वारा दयमें स्थापन करना चाहिये ॥ ४८॥ कमलमेकमारोपय चाये आरोग्य स्मर तदलवर्गे। सर्वमंत्रबीजं हृदि नितरां कामक्रोधकषायैर्विरतं ॥ १९॥ . साम्हने एक कालका चितवन करना चाहिये नौ उसके समस्त दलोंपर स्वरोंका चितवन करना चाहिये । काम क्रोध और कषायोंसे रहित होकर समस्त मंत्रोंके बीनको मुदयमें सदा चितवन करते रहना चाहिये ।। ४९ ॥ शरदिदोनिर्गच्छंत संतं. .मंत्रराजमाराघय सततं । "

२२
भाषानुवाद सहित।
: तालुसरोरुहमागच्छंत
मेघाऽमृतधारावर्षतं ॥ ५० ॥
घरद ऋतुके चंद्रमासे निकलतेहुए उस मंत्रराजका सदा
पाराधन करते रहना चाहिये । वह मंत्रराज तालुरूपी कमर
के समीप आया है और मेवरूपी अमृतकी घारा बरसा रहा
है ऐसा चितवन करना चाहिये । इसके बाद ॥ ५० ॥
धूलतयोर्मध्ये चारोप्य
उड्डाप्य प्राणाने स्थाप्यं ।
पुनरुद्धाम्य च हृदये धार्य
नेत्रोत्पलविषये तत्कायें ॥५१॥
उस मंत्रराजको दोनो मोह रूपी लताओंके मध्यभागमें
विराजमान करना चाहिये फिर वहांसे भी उठाकर नासिकाके.
अबभाममें स्थापन करना चाहिये फिर वहांसे उठाकर हृद-
बमें धारण करना चाहिये और फिर उस मंत्रराजको नेत्र
समी फमलोंमें विराजमान करना चाहिये ॥ ५१ ॥
सोमदेवसूरेरुपदेशः
कार्यश्चित्ते शुभसंवेशः।
लंबीजाक्षरमारोप्यांते.
विनिर्मुक्तायै नासांते ॥५२॥

बैगम्यमणिमाला। शुभ षेप बनानेवाला अर्थात् मोक्ष पद प्राप्त कर देने- बाला सोमदेव आचार्यका उपदेश अपने हृदयमें धारण करना चाहिये तदनन्तर विद्वान लोगोंको मोक्ष प्राप्त करनेके लिये नासिकाके अंतिम भागमें लं' बीजासर भारोपण करना चाहिये ॥५२॥ एवमादिमंत्राणां स्मरणं कुरु जीव ! त्वं तेषां शरणं। यत् सामर्थ्याद्विजहसि मरणं संसाराब्धेः कुरुषे तरणं ।। ५३ ।। हे जीव ! तू इसप्रकारके और भी अनेक मंत्रों का स्मरण कर तथा उन्हींको शरण मान क्योंकि उन मन्त्रोंकी सामर्थ्य से वेरा जन्म मरण छूट जायगा और तु संसाररूपी महासा- गरसे पार हो जायगा ॥ ५३ ॥ अविचलचित्तं धारय बंधो! यास्यसि पारं संसृतिसिंघो। त्वं च भविष्यसि केवलवोधो हंसत्वं प्राप्स्यसि शिवसिंधोः ॥५४॥ भाई ! तु स्थिर चित्र होकर उन मंत्रोंको अपने हृदयमें धारण कर, उन मंत्रोंको हृदयमें धारण करनेसेही तूसंसार- रूपी सादसे पार हो जायगा, केवयानी अर्थात् सर्वव हो २४ भाषानुवाद सहित । जायगा और मोक्षरूपी समुद्रमें तू इसके समान रक्षा पदको पहुंच जायगा ॥ ५४॥ शुद्धरूपचिन्मयचितपिंड विज्योतिश्चिच्छत्तयोनीडं। चिद्रगम्यं चित्कौमुदिचंद्र स्मर बोधाधिपति गुणसांद ।। ५५ ॥ हे जीव ! जो अत्यन्त शुद्ध, (चैतन्यरुप ज्योति) और चैतन्यरूप शक्तिका आधार भूत है जो चैतन्य शक्तिके द्वाराही मनोहर है जो चैतन्यरूप चांदनी के लिये चंद्रमा है पूर्णताका अधिपति वा स्वामी है और जो समस्त गुणोंसे भरपूर है ऐसे परम ब्रह्म परमात्माका तू चितवन कर ॥ ५५ ॥ निर्मलचिद्रूपामृतसिंधु शुक्लध्यानांबुजकजबंधुम्। सिद्धिबधूसरसीवरहंसं पश्य शिवं शांतं च निरंशं ॥ १६ ॥ हे जीव । यह मोक्ष निर्मल चैतन्यरूप अमृतका समुद्र है शुक्लध्यान रूपी कमलकेलिये सूर्य है, मुक्तिली रूपी सरोव- रीके लिये उत्तम ईस है, अत्यन्त शांत है और निरंच वा अखंड स्वरूप है ऐसे मोक्षको तु देख ।। ५६ ।।.

वैराग्यमणिमाला। ज्ञानार्णवकल्लोलकलापे क्रीडति योऽजसं शिवरूपे। नवकेवललब्धिभिरापूर्णः सेव्यते मुनिभिर्गतवर्णः ।। ५७ ॥ जो सबतरहके वर्षोंसे रहित है नौ केवल लब्धियोंसे परिपूर्ण है और ज्ञानरूपी महासागरकी लहरोंके समूहरूप मो- सके स्वरूपमें जो सदा क्रीडा करता रहता है उसकी मुनि- -लोग मी सेवा करते रहते हैं ॥५७ ॥ केवलकैरविणीविप्रेशं मुक्तिकामिनीकर्णावतंसं। त्रिभुवनलक्ष्मीभालाविशेष लब्धिसौधरत्नानां कलशं ॥ १८ ॥ शिवहसीसंगमसस्नेह अष्टगुणोपेतं च विदेहं। बोधिसुधारसपानपवित्रं साम्यसमुद्रं त्रिभुवननेत्रं ॥ ५९॥ अनाद्यखंडाचलसद्वेचं योगिवृंदवृंदारकबंधे।

१६ भाषानुवाद सहित। हरिहरब्रह्मादिभिरभिवंद्य केवलकल्याणोत्सवहृद्यं ॥६॥ श्रुतशवलिनीसुरगिरिविधुरै निःश्रेयसलक्ष्मीकरमुकुरं। कर्ममहीधरभेदनभिदुर श्यामश्रीग्रीवालंकारं ॥१॥ व्योमाकारं पुरुषमरूपं निर्वापितसंसृतिसंतापं । वर्जितकामदहनसंपातं त्रिभुवनभव्यजीवहिततातं ॥२॥ इत्यादिकगुणगणसंपूर्ण चिंतय परमात्मानं तूर्णं। अष्टप्रवचनमातुः पितरं पारीकृताजवंजवपारं ॥ ६३॥ चदनंतर हे जीव ! तू शीघ्रताके साथ ऐसे परमात्माका चितवन कर जो कि केवख ज्ञानरूपी कमोदिनियोंके प्रफुल्लित करनेकेलिये चंद्रमा है, मुक्तिरूपी स्त्रीके कानोंके आभूषय है, तीनों लोकोंकी सुशोभित करनेवाली लक्ष्मीके म- स्तककको तिलक स्वरूप हैं, नौ केवल लब्धिरूपी रत्नोंके वैराग्यमणिमा। बनेहुए राजभवनके लिये कलश है, और मोक्षरूपी इंसिनीके साथ समागम करनेके लिये स्नेहरूप है। जोसम्यकत्व यादि आठों गुणोंसे सुशोभित हैं, शरीररहित हैं, रत्नत्रयरूपी अमृत रसके पीनेसे जो अत्यन्त पवित्र हैं, जो समताभावोंके समुद्र और तीनों लोकोंके नेत्र हैं। जिनका सद्वेद्य अर्थात् सुख अनादि है अखंड है और अचल है जो योगियोंके समूह द्वारा बंदनीक है हरिहर ब्रह्मा आदि भी जिन्हें नमस्कार करते हैं, जो केवल ज्ञानके कल्याणोत्सव होनेसे ही मनोहर हैं, जो हा- दशांग वाणी रूपी नदीको प्रगट करने के लिये सुमेरु पर्वत हैं मोक्षरूपी लक्ष्मीको प्रसन्न करनेके लिये हायकी आरसी हैं, कर्मरूपी पर्वतको चूर्ण करनेके लिये वज्र हैं और मोक्षरूपी लक्ष्मीके गलेहार हैं । जो केवल आकाशके आकारस्वरूप हैं, पुरुषाकार हैं, अरूपी हैं जिनके संसारसंबंधी संताप मन नष्ट होगये हैं जो कामग्निके प्रवेशसेभी रहित हैं और जो तीनों लोकके भव्य जीवों का हित करने के लिये पिता के समान हैं। इत्यादि अनेक गुणोंके समूहसे जो परिपूर्ण हैं जो अष्ट भव- चन माताओंको (श्रुतज्ञानको ) प्रगट करनेके लिये पिताके समान हैं और जो संसारके किनारेको भी उल्लंघन काचुके हैं अर्थात् संसारसे सर्वथा पार हो चुके हैं ऐसे परमात्माको त् शीघ्र ही चितवन कर ॥१८-६३॥ निजदेहस्यं स्मर रे मूढ वं नो चेद भ्रमिष्यसि गूढः।

भाषानुवाद सहित। मूर्खाणां मध्ये त्वं रूढः लंच भविष्यस्यग्रे पंढः ॥१४॥ अरे मूर्ख ! तू अपने प्रात्मामें विराजमान परमात्माका 'चितवन कर । यदि तू उस अपने शरीरमें विराजमान पर- मात्माका चितवन न करेगा तो तू इस संसारमें खूबही परि- भ्रमण करेगा मुखोंमें भी तु प्रसिद्ध गिना जायगाऔर आगे चलकर तू नपुंसक अर्थात् कर्नन्पहीन हो जायगा ॥६॥ एकमनेक स्वं संभारय शुद्धमशुद्धं स्वं संतारय। लक्ष्यमलक्ष्यं स्वं संपारय कर्मकलंक त्वं संदारय ।। ६५॥ हे जीव तू अपने प्रात्माको एक और अनेक रूप चितवन कर तथा शुद्ध और अशुद्ध रूप चितवनकर उसे संसारसे पार लगा। तू अपने लक्ष्य तथा अक्षयस्वरूप प्रात्माको प्राप्त कर और कर्मरूप कलंकको विदीर्ण कर ॥ ६ ॥ बद्धमबद्धं रिक्तमरिक्त शून्यमशून्यं व्यक्ताऽव्यक्तं। रुष्टमरुष्टं दुष्टादुष्टं शिष्टमाशष्टं पुष्टा पुष्टं ।। ६६॥

वैराग्यमणिमाला। . अंतमेदज्ञानविचारैः व्यवहारव्यवहारासारैः । वयते देहस्थं पुरुषैर्विषयविरक्तैर्ज्ञानविशेषैः ६० जिनके अंतरंगमें भेदवानका विचार है जो व्यवहार नय और निश्चय नयको अच्छी तरह जानते हैं जो विषयोंसे वि- रक्त है और जो विशेष शानको धारण करनेवाले हैं ऐसे महा पुरुष इस शरीरमें विराजमान आत्गो कोंसे बंधा हुआ, कर्मोंसे रहित , रागद्वेषादि विकारोंसे रहित , तया सहित , मूर्त तथा अमूर्त , व्यक्त तथा अव्यक्त , रागी तया विरक्त, पापी वया पापरहित , सज्जन तथा दुर्जन , और चिदानंदा- मृतसे पुष्ट तया उससे रहिन वर्णन करते हैं ।। ६७ ॥ विरम विरमबाह्यादिपदार्थे रम रम मोक्षपदे च हितार्थे। कुरु कुरु निजकार्य च वितंद्रः भव भव केवलबोधयतीन्द्रः॥ ६८ ॥ हे जीव ! अब तू पुत्र स्त्री धनादक वाद्य पदार्योसे विरक्त हो विरक्त हो। प्रात्माका हित करनेवाले मोक्षम्यानमें क्रीडा कर क्रीडा कर, प्रमाद रहित होकर अपना कार्य (अत्माका कल्याण) जल्दीकर जल्दी कर और केवल झानसे सुशोभित : होकर मुनियों का स्वामी जस्ती हो जल्दी हो ॥ ६॥ मुंच सुंच विषयाऽमिषभोगं लुप लुप निजतृष्णारोग।

भाषानुवाद सहित। रंध रंध मानसमातंग घर घर जीव विमलतरयोगं ॥ ९ ॥ हे जीव ! तू विषयरूपी मांसका भोग छोड छोड, अपने तृष्णारूपी रोगको हटा दूर हटा , मनरूपी हाथीको रोक तया वश कर और अपने प्रत्यंत निर्मल योगको धारण कर जल्द धारण कर ।। ६९॥ चिंतय निजदेहस्वं सिद्ध आलोचय कायस्यं बुद्ध । स्मर पिंडस्थं परमविशुद्धं कल केवलकेलीशिवलब्ध ॥ ७॥ हे जीव ! तू अपने शरीरमें विराजमान सिद्ध भगवानका चितवन कर , शरीरमें विराजमान परम ज्ञानस्वरूप शुद अात्माकी आलोचना कर तथा शरीरमें ही विराजमान परम विशुद्ध स्वरूप चिदानंदका स्मरण कर और केवल ज्ञान रूपी क्रीडाके द्वारा प्राप्त हुए मोक्षस्थानको प्राप्त हो ॥ ७० ॥ वैराग्यमणिमालेयं रचिता सप्ततिप्रमा। ब्रह्मश्रुताब्धिशिष्येण श्रीचंद्रेण मुमुक्षुणा ॥७॥ इसप्रकार मोक्षकी इच्छा रखनेवाले ब्रह्म श्रुत सागरके शिष्य श्रीचंद्रने सत्तर श्लोकोंमें यह वैराग्यमणिमाला बनाई ।। इसप्रकार श्रीचंद्रकी बनाई हुई यह वैराग्यमणिमाला समाध हुई।

श्रीमत्पूज्यपादस्वामिविरचित इष्टोपदेश। हिंदी भाषानुवाद सहित । यस्य स्वयं स्वभावाप्तिरभावे कृत्स्नकर्मणः । तस्मै संज्ञानरूपाय नमोऽस्तु परमात्मने ॥१॥ अर्थ-समस्तकर्मोके अभावसे नष्ट होजानेने जिस स्वस्वरूपकी प्राप्ति होगई है और जो सम्यग्ज्ञानस्वरूप है उस परमात्माके लिये भक्तिपूर्वक नमस्कार है भावार्थ-निर्मल निश्चल जो चैतन्यरूप परिणाम उसका नाम यहां स्वभाव है । इस स्वभावकी प्रकटता ज्ञानावर आदि द्रव्य कर्म और राग द्वेप आदि भावकोके सर्वथा नष्ट हो जानेसे होती है तथा इन्हींके नाशसे आत्मा चमचमाते हुए सम्यग्लान स्वरूप और उत्कृष्ट आत्मा-परमात्मा कहा जाता है इसलिये जिस परमात्माने समस्त कर्मों के अभावसे सस- रूप प्राप्त करलिया है और इसीकारण अभेदनपकी अपेक्षा वह सम्यग्ज्ञान स्वरूप है वह परम अतिशयको मास परमात्मा . २ भाषानुवाद सहित। इमारा कल्याण करे-हमें भी परमात्म-स्वरूप होनेकी बुदि प्रदान करे॥१॥ स्वस्वरूपकी स्वयं प्राप्ति विना दृष्टांतके कैसे ठीक मानी जा सकती है । इस प्रश्नका समाधान करते हैं- योग्योपादानयोगेन दृषदः स्वर्णता मता। अव्यादिस्वादिसंपत्तावात्मनोऽप्यात्मता मता ॥२॥ अर्थ-जिसप्रकार सुवर्णरूप परिणाममें कारण योग्य अपादान कारणके संबंधसे पत्थर सुवर्ण होजाता है -पत्थर रूपसे उसका व्यवहार न होकर सुवर्ण रूपसे व्यवहार होने लगता है उसीप्रकार सुद्न्य सुक्षेत्र सुकाल और सुभाव रूप सामग्री के मात्र हो जानेपर प्रात्माका स्वस्वरूप भी प्रकट हो जाता है। भावार्थ-जो पत्थर सोनारूप परिणतहोजाता है उस पत्पर- को सुवर्ण पाषाण कहते हैं तो जिसप्रकार समर्थ कारणोंकी सहायतासे सुवर्ण पाषाण सोना होजाता है-जिसका पहले पत्थर रूपसे व्यवहार होता था वह साक्षात् सोना हो जाता है उसीप्रकार जो आत्मा कमौके जालमें फंसा रहने के कारण मलिन बना रहता है वही आत्या योग्य द्रव्य योग्य क्षेत्र योग्य काल और योग्य भावस्वरूप असाधारण कारण प्राप्त होजानेपर अपना निर्मल निश्चल चैतन्य स्वरूप प्राप्त कर लेता है, वही आत्मा परमात्मा होजाता है ॥२॥ शंका-अहिंसा सत्य आदि ब्रवोंके पालन करनेपर स्वस्त . इटोपाय। काकी माति होती है यह युक्तियुक्त सिद्धांत है। यदि उस स- खरूपकी प्राप्ति सुद्रन्यादि सामग्रीसे ही हो जायगी तो फिर व्रत आदिका आचरण करना व्यर्थ है क्योंकि स्वस्वरूपकी पातिमें ब्रत श्रादि कारण है यदि ब्रतोंकी गैरमौजूदगीमें भी खस्वरूप प्राप्त हो जायगा तो ब्रत कारण नहीं हो सकते सारार्थ-व्रतोंका आचरण करना व्यर्थ कायको क्लेश देना है। उत्तर- बरं वतैः पदं दैव नातैर्वत नारकं । छायातपस्थयोर्मेंदः प्रतिपालयतोर्महान् ॥ ३ ॥ अर्थ-जिसप्रकार छायामें बैठकर अपने सायीकी राह देखनेवाले पुरुषको छाया, शांति प्रदान करती है और आतप- धूपमें बैठकर अपने साथीकी राह देखनेवालेको कष्ट मिलता है उसीमकार व्रतोंके आचरणसे स्वर्गादिसुखोंके साथ मोक्ष माप्त होती है और अवतोंकी कृपासे पहले नरकदुःख भोगने पढते हैं पीछे मोक्ष मिलती है इसलिये ब्रोंका आचरण करना ठीक ही है और अबती रहना युक्त नहीं । भावार्य- उपर जो यह शंका की गई थी कि जब स्वस्वरूपकी प्राप्तिमें सुद्रव्य सुक्षेत्र आदि सामग्री ही कारण है, प्रत पाचग्ण कारण नहीं, तब प्रत पाचरण करनेकी क्या आवश् यस्ता? उनका पाचरण करना व्यय ही है । उसका समाधान यहां ग्रंयकारने किया है किंत पाचरण करना न्यर्थ नहीं क्योंकि भाषानुवाद सहित। अवती रहनेसे पहले पापका उपार्जन होता है और उसका फल नरक आदिके भयंकर कष्ट भोगने पड़ते हैं, पीछे वडी देरीसे मोक्ष प्राप्त होती है अहिंसादि व्रतोंके पालनेसे नरक मादिक कष्ट नहीं मोगने पडते, स्वर्ग सुखोंके साथ मोक्ष मास हो जाती है इसलिये व्रतोंका पालन करना सार्थक है। वास्त- वमें वो अन्नती मनुष्यकी बुद्धि सर्वदा मिध्या मार्गमें लगी रहती है, उसे हिताहितका विवेक ही नहीं सूझता इसलिये स्वस्वरूप की प्राप्तिमें सुद्रव्य सुक्षेत्र आदि कारण हैं यह ज्ञानही उसे जल्दी नहीं होता किंतु जो मनुष्य व्रती है-व्रताचरण करते हैं उन्हें हिताहितका विवेक रहता है-वे ही यह शीघ्र जान सकते हैं कि सुद्रव्य सुक्षेत्र आदि योग्य सामग्रीकी प्राप्तिसे स्वस्वरूपकी प्राप्ति होती है इसलिये जब यह वात निर्वोप है कि व्रतोंक आचरणसे ही जल्दी स्वस्वरूपकी प्राप्ति है अवतोंसे नहीं तर व्रतोंका पालन कभी निरर्थक नहीं माना जा सकता ॥३॥ शंका-यदि व्रताचरणसे स्वर्ग प्रादि मोक्ष सुखकी शीघ्र प्राप्ति होती है तो जीवोंकी आत्मामें भक्ति न होगी क्योंकि आत्म- भक्तिसे सुद्रव्यादि सामग्रीकी जव प्राप्ति होगी तब पढी देरीसे मोक्ष सुख मिलेगा इसलिये शीघ्र स्वर्ग आदि संसार सुखकी प्राप्तिमें कारण व्रताचरण करना ठीक है, देरीसे मोक्षसुखकी प्राप्ति कारण सुद्रव्य सुक्षेत्र आदि सामग्रीके लिये प्रयन करना ठीक नहीं ? उपर- यत्र भावः शिवं दत्वे द्यौः कियद् दूरवर्तिनी ।

५ छोपदेश। बो नयत्याशु गन्युति कोशाधे किस सीदति ॥४॥ अर्थ-जिसमकार जिस मनुष्यमें यह सामर्थ्य है कि वह किसी भारको खुशी २ दो कोश ले जाता है तब वह उस भारको आधा कोश लेजानेमें तिष नहीं होता-आधा कोश लेजाना कुछ भी चीज न समझकर तत्काल ले जाता है उसी प्रकार जिस भावमें यह सामर्थ्य है कि उससे मो. व सुखकी प्राप्ति हो जाती है तब स्वर्ग सुखकी प्राप्ति क्या चीज है अर्थात् प्रत्यंत कठिन मोक्ष सुखके मिल जानेपर आ. सान स्वर्ग सुख मिल जानेमें कोई अडचन नहीं आसक्ती । भावार्थ-जो पदार्थ महान शक्तिशाली होता है वह सरल और कठिन दोनों कार्य करसकता है और जो योटी शक्ति- पाला होता है वह सरल ही कार्य कर सकता है कठिन नहीं । सुखकी प्राप्तिम सुद्रव्य सुक्षेत्र आदि सामग्री महान भक्ति- वाला कारण है उसलिये उससे सरल कार्य स्वर्ग सुख भी प्राप्त होजाता है और कठिन कार्य मोक्ष सुख भी मिल जाता किंतु अल्पशक्तिशाली व्रताचरणसे केवल स्वर्गसुख ही प्राप्त होगा मोक्ष सुख नहीं इसलिये विद्वान मनुष्योंको कभी आत्म- भक्तिमें आलस नहीं होसकता किंतु वह यह समझकर किं प्रबोंसे नरक आदि दुःखोंके साथ मोसमाप्ति होगी और प्रताचरणसे स्वर्ग प्रादि सुखके साय मोसमाप्ति होगी, प्रताचरणके साय सुदच्यादि सामग्रीकी प्राप्तिकेलिये ही प्रयत्न करता है। प्रात्मभक्ति किंवा प्रामप्यानसे स्वर्ग है मापानुवाद सहित। मुख मा.मोश.सुख दोनोंकी प्राप्ति होती है यह मात अन्या भी कही है यया- गुरूपदेशमासाध.ध्यायमानः समाहितः । अनंतशक्तिरात्मायं मुक्ति भुक्ति च यच्छति ॥ १६॥ बातोऽसिद्धरूपेण चरमोगस्य मुक्तये । तनपानोपासपुण्यस्य स पवान्यस्य भुतये ॥ १९७॥ (तत्वानुशासन) अर्थाद- जो योगी गुरुके उपदेशके अनुसार इस बा- त्माका ध्यान करते हैं उन्हें अनंत शक्तिवाला यह आत्मा मोक्ष सुख वा स्वर्ग सुख प्रदान करता है । चरम शरीरी म- नुष्य जिस समय इस मात्माका अईत वा सिद्धरूपसे ध्यान करता है उस समय उसे मोल सुखकी प्राप्ति होती है और चरम शरीरीसे भिन्न मनुष्य जिस समय अईत वा सिदर- पसे इसका ध्यान करता है उस समय उसे स्वर्ग सुख प्राप्त होते हैं। सार यह है कि व्रत वा ध्यानके माहात्म्यसे जब स. बया विशुद्धता प्राप्त हो जाती है उस समय यह प्रात्मा पर- मात्मा हो जाता है और जब स्वर्ग वा चक्रवर्ती प्रादि सु. सोका कारण पुण्य प्राप्त हो जाता है उस समय यह प्रात्मा स्वर्ग सुख वा चक्रवर्ती के सुखोंका मोगनेवाला हो जाता है। यद्यपि व्रत आचरणका साक्षात् कार्य स्वर्ग आदि सुखोकी शाति है तथापि विना व्रत आचरणके स्वस्वरूपकी प्राति होती नहीं इसलिये मत माचरण कमी व्यर्थ नहीं हो सकता ॥

पटोफो। - जन पाचरण वा भात्मभक्तिसे जब स्वर्ग सुखकी सि- दि होगई तब स्वर्गमें जाने पर क्या क्या फल प्राप्त होते हैं। इस बातका समाधान अन्धकार करते हैं- हषीकजमनातकं दीर्घकालोपलालित। नाके नाकोकसां सौख्यं नाके नाकोकसामिव ।।५।। अर्थ-देवगण स्वर्गमें इंद्रिय जन्य और शत्रु जन्य दुससे रहित, बहुत काल तक भोगनेमें आनेवाले अनन्य तुल्य सु. खका मास्वादन करते हैं। भावार्थ- सुख भात्मिक धर्म है और उसकी प्रकटता स्वभावसेही मोक्ष अवस्थामें होती है क्योंकि वेदनीय कर्म उस आमिक धर्मरूप सुखका विरोधी है और जब तक जीव संसारमें रुलता रहता है तब तक वरावर वेदनीय कर्मका मा- रमाके साथ संबन्ध बना रहता है। कदाचित् स्वर्गके मुखको ही लोग वास्तविक मुख न पान बैठे इसलिये अन्धकारने यहां उसका स्वरूप समझाया है कि स्वर्गका सुख इंद्रियोंसे जाय- मान, वैरियोंसे उत्पन्न हुए दुःखसे रहित, और बहुत काल तक उपयोगमें भानेवाला है इसलिये कुछ अच्छा है किंतु वास्तविक सुख इससे भिन्न है उसकी प्रगटतामें इंद्रियों की बावश्यकता नहीं, न कालकी मर्यादाकी जरूरत है इसलिये वास्तविक सुख अतींद्रिय और सर्वदा कायम रहनेवाला है किसी प्रकारके दुःखका उसके साथ मिश्रण ही नहीं इस.

भाषानुवाद सहित। लिये स्वर्ग प्रादिके सुख हेय और वास्तविक सुख उपादेय है। यहां पर ग्रन्थकारने देवोंका सुख देवोंके ही सुखके समान है इस प्रकारसे उपमालंकारका उपयोग किया है उसका तात्पर्य यह है कि जिसप्रकार रामरावणयोर्यद रामराव: आयोरिव 'अर्थात् रामचंद्र और रावणका युद्ध रामचन्द्र और रावणके युद्ध के समान ही हुआ, अन्य युद्ध कोई बढती और कमती है इसलिये अन्ध युद्धोंसे उसकी तुलना नही हो स. कती उसी प्रकार देवोंके सुखकी तुलना देवोंके ही सुखके साथ हो सकती है अन्य सुखके साथ नहीं क्योंकि अन्य मुख कोई बढती है और कोई कमती है ॥ ५ ॥ यदि कदाचित् कोई मनुष्य हठसे यही स्वीकार करें ठे कि संसारका सुख ही वास्तविक सुख है उसके प्रयो धार्य ग्रंथकार उपदेश देते हैं- वासनामात्रमेवैतत्सुखं दुःखं च देहिनां तथा हथुढेजयंत्येते भोगा रोगा इवापदि॥६॥ अर्थ-यह जो जीवोंका इंद्रियजन्य सुख है वह वासना से उत्पन्न होने के कारण दुःख ही है क्योंकि आपत्ति कालमें जिसमकार रोग चिचमें धवडाइंट उत्पन्न कर देते हैं उसीय- कार भोग भी घवडाइट पैदा करनेवाले हैं। भावार्य-यह पदार्थ मेरा उपकारी है इसलिये इष्ट है और पंह पदार्थ मेरा अनुपकारी है इसलिये अनिष्ट है.इसम: ..

१ इछोपदेश। कारका जो कोई भात्माका संस्कार है वह वासना है। इसी वास- नाके कारण, भोगोंसे उत्पन्न होनेवाले सुखको लोग वास्तविक मुख समझ बैठते हैं यह वही भूल है क्योंकि जिसप्रकार दि. पचिकालमें रोग हो जानेसे आत्माको धवडाहट हो जाती है सीप्रकार इन मोगोंसे भी घबडाहट होजाती है । कहा भी है- रम्य इम्य चंदनं चंद्रपादा वेणुवर्वीणा यौवनस्या युक्त्यः । नैते रम्याः क्षुत्पिपासार्दितानां सर्वारंभास्तंदुलप्रस्थमूला ॥ अर्याद जो मनुष्य भूख और प्याससे दुःखी है उन्हें मनोहर महल, चंदन, चंद्रमाकी किरण, वेणु, वीन वाना और युवती स्त्रियां कुछ भी अच्छे नहीं लगते क्योंकि चावल. मोजूद हैं तो घर चंदन आदि समस्त पदार्थ अच्छे लगते हैं नहीं तो नहीं, और भी कहा है- मातपे धृतिमता सह वध्वा यामिनीविरहिणा विहगेन। सेहिरेन किरणा हिमरश्मेषुःखिते मनसि सर्वमसद्धं ॥ अर्थात् जो पक्षी अपनी प्यारीके साय धूपमें उडता फिरता या तयापि उसे धृपका कष्ट नहीं मालूम पडता या उसी पक्षीका जिससमय अपनी प्राणप्यारीके साथ रातको वियोग होगया तो उसे शीतल मी चंद्रमाकी किरणें अच्छी नहीं लगी इसलिये यह वान सर्वथा युक्त है कि इंद्रियोंसे उत्पन होनेवाला सुख कल्पना या वासना मात्रसे जायमान होनेसे असली नहीं और अतएव मोगोंसे सुखकी आशा दुराशा है, १० भाषानुवाद सहित। जो चीज अभी सुख स्वरूप मालूम होती है वही इछ काल बाद दुख स्वरूप होजाती है किंतु वास्तविक निराकुलतामय सुख ही सुख है वह कभी दुःखलप परिणत नहीं हो सकता इसलिये संसारके सुखको सुख समझना सर्वया भ्रम है॥६॥ यदि सुख और दुःख वासनासे उत्पन्न हैं जो वे मालूम क्यों नहीं होते इस वातका प्रयकार समाधान करते हैं- मोहेन संवृतं ज्ञानं स्वभावं लभते नहि । मतः पुमान् पदार्थानां यथा मदनकोद्वैः॥ ७॥ अर्थ-जिसप्रकार मादक पदार्थोके खानेसे मत्त-पागल हुला पुरुष पदार्योंका स्वरूप नहिं जानता उसीपकार मोह- नीय कर्मके द्वारा आच्छन्न शान भी पदार्थोके वास्तविक स्वरूपको नहिं जान सकता। भावार्थ-मदिरा आदिके पीनेसे जिसमकार मनुष्य का हिताहित विवेक नष्ट होजावा है, पागल होजानेसे कभी श्रीको मा, तो माको स्त्री कहने लगता है उसीप्रकार जिसस. मय शानपर मोहनीय कर्मका पर्दा पड जाता है उससमय दुःख सहप भी संसारका सुख वास्तविक सुख जान पड़ने लगता है-भो भोग अनंत दुःखों के देनेवाले हैं वे सुखके देनेवाले समझे जाते हैं और उससमय मोहनीय आदि कोकी कृपासे मात्मा भी अनेक प्रकारका मालूम पडने लगता है। जैसा कि कहा भी है- टोपदेश मलविद्धमणेय॑विर्यथा नैकप्रकारता। कमेयिवात्मविज्ञप्तिस्तथा नेकप्रकारतः॥१॥ अर्थात्-जिसमकार मलके संबंघसे पणिके अनेक स्वरूप दीख पडते हैं उसीप्रकार कमीक संबंधसे आत्मा अनेक प्रकारका दीख पडता है किंतु जिससमय मणिका सर्व मल नष्ट होजाता है उस समय उसका एक निर्मल स्वरूप दील पटने लगता है उसीप्रकार जिससमय इस आत्मासे समस्त कर्मोका संवध घट जाता है उससमय यह मी अखंड चैतन्य स्वरूप एक ही प्रकारसे मालूम पड़ने लगता है इसलिये मोहनीय कर्मकी कृपासे जो इस प्रात्माको दुखिस्वरूप भी संसारका सुख वास्तविक सुख जंचता है वह इसका पूर्ण प्रज्ञान है ।। वस्तुके वास्तविक स्वभावके न पहिचाननेके कारण क्या होता है । यह बतलाते हैं- वपुहं धनं दाराः पुत्रा मित्राणि शत्रवः । सर्वथान्यस्वभावानि मूढः स्वानि प्रपद्यते ॥८॥ अर्थ-मोहनीय कर्मके जालमें फसकर जिससमय यह आस्मा मूढ होजाता है-फौंन मेरा और कौन पराया है जिस- समप यह ज्ञान नहीं रहता उससमय यह महात्मा शरीर घर झी स्त्र मित्र शत्रु आदि पदार्थ जो सर्वथा अन्य स्वरूप है उनको अपना मान लेवा है । मोहनीयकर्मके जालमें फस मानेपर, इसे यह ज्ञान ही नहीं रहता कि कौन मेरा और

भाषानुवाद सहित ।
कौन पराया है॥८॥
इस बात समझाने के लिये ग्रंथकार दृष्टांत देते हैं-
दिग्देशेभ्यः खगा एत्य संवसंति नगे नगे।
स्वस्वकार्यक्शाघांति देशे दिक्षु प्रगे प्रगे॥ ९ ॥
अर्थ-पक्षिगण पूर्व भादि दिशा और अंग वंग आदि
अनेक देशोंसे आकर वृक्षोंपर निवास करते हैं और माता
काल होते ही अपने अपने कार्यके सम्पादनके लिये इच्छा-
नुसार दिशा और देशोंमें जाते हैं।
भावार्थ-जिसप्रकार पक्षियोंका कोई निश्चित स्थान नहीं,
रात होजानेपर जहां जो वृक्ष देखा उसीपर बसेरा करलेते हैं
और फिर सवेरा होते ही अपने अपने कार्यके करनेकेलिये
इच्छानुसार जहां तहां उड जाते हैं उसीमकार संसारी जीवोंका
भी कोई निश्चित स्थान नहीं, कर्मके जालमें जिकडे रहने के
कारण ये कभी नारकी तो कभी तियेच आदि होते रहते हैं
और अनंत कष्ट भोगते रहते हैं इसलिये आमाका कर्तव्य
यही है कि वह पुत्र आदि परपदायाँको अपना न माने
जिससे कोका बल घट जाय और धीरे धीरे उनका सर्वथा
नाश होजानेपर परिभ्रमणका दुःख मिट जाय ॥ ५॥
और भी अचार्य उपदेश देते हैं-
विराधकः कथं हने जनाय परिकुप्यति ।
व्यंगुलं पातयन् पद्भ्यां स्वयं दंडेन पासते॥१०॥

इहोपदेश। ११ वर्ष-जिसप्रकार कचहा या मिट्टी काटनेवाला पुरुष चंगुल (बांगुरा) को मिट्टी आदि कारनेकेलिये नीचे गिराता है तो उसके साथ स्वयं भी नीचा गिरजाता है-नम भाता है। उसीप्रकार जो मनुष्य दूसरेको मारता है नो स्वयं मी दूसरेसे मारा जाता है फिर न मालूप दूसरेको मारने- घाला मनुष्य निससमय दूसरेसे वदलेमें मारा जाता है तब क्यों उसपर क्रोध करता है? भावार्य-प्रांगुरा नामक यंत्र फावडेके समान छूझ या मिट्टीको काटने के लिये होता है उसमें लगा हुआ काठका संता छोटा होता है इसलिये जिससमय मनुष्य उससे मिट्टी आदि काटता है उससमय वह मिट्टी आदि काटने के लिये ज- मीनमें नीचे गिराया जाता है उसके साथ ही ब्रांगुरा चलाने- पाले मनुष्यको भी नीचें नमजाना पडता है उसीप्रकार जो मनुष्य दुसरेका अपकार करता है बदलेमें दूसरेसे भी स्वयं ही उसका अपकार किया जाता है। कहा भी है- मुखं था यदि वा दुःख येन यच्च कृतं भुवि । अवाप्नोति स तत्तस्मादेष मार्गः सुनिश्चितः ॥५॥ अर्थात् यह विलकुल निश्चित बात है कि जो दुसरेको सुख वा दुःख पहुंचाता है दूसरेसे उसे मी सुख किंवा दुःख भोगना पडता है इसलिये अपकार करनेवाले पुरुषका बद- लेमें अपकार करनेवाले पुरुषपर नाराज होना व्यर्य है। किंतु १४ माषानुवाद सहित। यदि दूसरा कोई अपना अपकार करता है तो यह विचमें शमता रखनी चाहिये कि यह जो मेरा अपकार करता है सो बदलेमें कर रहा है मैने भी पहिले इसका अवश्य अपकार किया होगा ॥१०॥ इष्ट पदार्योंमें राग और अनिष्ट पदार्थोंमें देष करने- वाले मनुष्यको क्या फल मिलता है ? इसवातको ग्रंयकार कहते हैं- रागद्वेषद्वयौदीर्घनेत्राकर्षणकर्मणा अज्ञानात्सुचिरं जीवः संसाराब्धौ भ्रमत्यसौ ॥११॥ अर्थ-निसमकार मंदराचलको दीर्घ नेवाकर्षणके कारण बहुर काल समुद्रमें घूमना पडा था इस प्रकारको किंवदंती है उसी प्रकार यह अज्ञानी जीव भी राग और द्वेषके कारण चिरकाल तक संसार रूपी विशाल समुद्रमें भ्रमण किया करता है । भावार्थ-अन्यमत्रमें यह कथा प्रसिद्ध है कि मंदरा- चल पर्वतको विशाल नेत्रोंके धारण करनेकी इच्छा हुई थी इसलिये वह बहुत काल तक समुद्रमें घूमता रहा था (१) तो जिसप्रकार दीर्घ नेत्रोंके आकर्षणकी इच्छासे मंदरावलको चिरकाल समुद्रमें घूमना पड़ा था उसीप्रकार अज्ञान के कारण जो जीव राग और द्वेषमें मग्न रहते हैं इष्टपदायोंमें प्रेम और बैरियोंमें वैर रखना ही जिनके जीवन का उद्देश है वे बहुत काल- तक संसारमें चलते रहते हैं और अनेक दुःख सहते रहते हैं।

१५ - टोपरेश। 'रागद्वेषयी इहांपर यी पद देनेका यह तात्पर्य है कि कि महापर राग होता है वहांपर देष मी अवश्य होता है राम देषका अविनाभाव संबंध है विना देपके राग रह नहीं सकता। कहा भी है- यवरागः पदं धत्ते द्वेषस्तति निश्चयः रमावेतौ समालय विक्रमत्यधिक मनः ।। अर्थात् यह वात विलकुळ निश्चित है कि जहांवर राग है वहां देष नियमसे रहता है और जहांपर ये दोनों है वहां मनको अत्यंत सोम होता है इसलिये जिन मनुष्योंका यह मामह है कि हम दूसरोंपर प्रेम ही करते हैं देष नहीं यह उनका. भ्रम है क्योंकि यदि प्रेमकी सत्ता प्रात्मामें विद्यमान है वो किसी न किसी पदार्थम द्वेष भी अवश्य रोगा ही तया और जो संसारमें दोष हैं वे सर्व रामदेर मूळकरें यदि आत्मामें राग द्वेषकी सत्ता मोजूद है जो समझना चाहिये कि वे दोर मोजूद हैं ही। कहा भी है- मात्मनि सति परसपा स्थपरविभागात्परिग्रह पी। अनयोः संप्रतिपदा सर्वे दापाय जायते ॥२॥ अर्थात्-जहांपर यह मेरा है यह ख्याल है वहांपर यह अन्य है यह ख्याल जवरन रहता ही है और जहाँपर यह मेरा है एवं यह दूसरा है यह भान है वहांपर नियमसे राग और स विद्यमान रहते हैं वथा जहाँपर राग और देष दोनों मोजूद हैं वहाँपर अन्य सब दोष उत्सम हो ही जाते हैं क्यों ३६ भाषानुवाद सहित। कि अन्य दोषोंकी उत्पनिमें राग और देष प्रधान कारणों समस्त दोप राग और द्वेपसे सटे हुए हैं। क्या इसहपसे यह जीव अपने रागद्वेष रूप परिणामोंसे सदा इस संसारमें घूमता रहता है। कहा भी जो खलु संसारत्यो जीवो तत्तो दु होदि परिणामो । परिणामादो कम्म कम्मादो हवदि गदि सुगदी ॥१॥ गदिमधिगदरस देवो देहादो इंदियाणि आयते । हिंदु विसयग्गहण सत्ता रागो व दोसो वा ॥ २॥ जायदि जीवरसेवं भावो संसारचकपालस्मि। पति जिणवरेहिमणिय अणाणिहणे सणिणेवा ॥३॥ अर्थात् जो जीव संसारमें रुलानेवाला है उसके राम देष आदि परिणामोंकी उत्पत्ति होती रहती है। परियामोंके द्वारा शुम अशुभ कर्माका पात्रव होता रहता है । अशुभ काँक यात्रवसे कुगति और शुभकर्मोंक पासबसे उत्तप्रगति मिलनी है। गवियोंमें जाने के कारण शरीरकी प्राप्ति होती है शरीरकी मालिसे इंद्रियोंकी पाप्ति होती है । इंद्रियोंसे सः स प्रादि विषयोंका ग्रहण होता है | विषयोंके ग्रहणसे यह अच्छा और यह बुरा है इस प्रकारके राम और द्वेष रूप परिणाम होते हैं । रागद्वेष होनेसे संसारमें कलना पडता है इस प्रकार यह जीव अनादिकालसे सदाइस संसारमें घूमता रहता है कमी इसको असली सुख माह . - होगा नहि होता । इसलिये राग, द्वेष सर्वया हेय हैं ॥१९॥ चदि संसारमें रुलने पर भी आनन्द मिले तो फिर स- सारका नाश करना व्यर्थ है इस माक्षेपका मंथकार निराकरण करते हैं- विपद्रवपदावर्ते पदिकेवातिवाहयते। यावत्वावद्भवंत्यन्याः प्रचुरा विपदः पुरः ॥१२॥ मर्थ-संसाररूपी पेरसे चलनेवाले यंत्रमें उस घटीयंत्रके दंरके समान जबतक एक विचि नष्ट होती है तातक 'अन्य बहुतसी विपत्तियां सामने आकर उपस्थित हो जाती हैं-विपत्तियोंका अंत नहीं होता। भावार्थ-जिससे कूएसे जल निकाला जाना है ऐसे पैरसे चलनेवाले यंत्रका नाम पदावर्त है तो उस यंत्रके एक दंडके घडों के खाली होते ही जिसपकार बहुतसे घडे सामने नजर आते हैं उसीप्रकार यह संसार मी एकप्रकारका वटी- यंत्र ही है इसमें एक विपत्ति नष्ट हुई तो दूसरी सैकडों वि- पत्तियां शीघ्र सामने आकर खड़ी होनाती है इसलिये संसार में सदा दुःख ही है आनन्दका लेश नहीं, आनन्द मानना परम अज्ञान है ॥ १२ ॥ संसारमें सभी दुःखी नहीं अनेक संपत्तिशाली मी दीख पटते हैं इसलिये संपत्तिशालियोंको तो सुख मानना ही पडेगा इसका समाधान ग्रंथकार करते हैं- - माषानुवाद सहित। १४ दुरज्यनामुरक्ष्येण नश्वरेण धनादिना। खस्थंमन्यो जनः कोऽपि ज्वरवानिव सर्पिषा ॥१३॥ प्रय-जिसपकार ज्वरसे दुःखित मनुष्य ज्वरकी दाइ मिटाने के लिये थी खाकर अपनेको स्वस्थ मानता है परंतु वास्तवमें वह स्वस्थ नहीं हो सकता, बीके खानेसे उसे और भी दुःख होगा उसीमकार भवानी मनुष्य धन आदिंसे अपनेको सुखी मानता है परंतु वह सुखी नहीं कहा जासकता क्योंकि धन दुरर्थ है उसके कमानेमें अत्यन्त कष्ट होता है । असुं- बक्ष्य है धन होजानेपर वही कठिनतासे उसकी रक्षा होती है और नश्वर है देखते देखते नष्ट होनानेवाला है। भावार्थ-धनका यह स्वरूप बतलायागया है कि- अर्धस्योपार्जने दुःखमर्जितस्य च रक्षणे । आये दुःख व्यये दुःख धिगर्थं दुःखभाजनं ॥ १॥ अर्थात्-धन उपार्जन करो तब भी कष्ट, क्योंकि धन कमाने के लिये जो कार्य न करने लायक है वे भी करने पडते हैं । कदाचित् भाग्यसे धन हाय भी लग जाय तब भी कष्ट, क्योंकि उस धनको हरण करने के लिये चोर भादि अवसर देखा करते हैं इसलिये उसकी रक्षाके लिये रात दिन चौकन्ना रहना पडता है सदा उसके रक्षाकी चिंता ही धनी रहती है। वथा निससमय धनका आना होता है उससमय आय हुई पचास हजारकी और इच्छा हुई दश लाखकी तर .. इटोपदेश। मी कष्ट हुआ कि हाय दशलाख न पाया और किसी कार्यमें बह खर्च होगया तो हाय इतना खर्च होगया यह चिंता रात दिन सताती है इसलिये जब यह बात हेतु सिद्ध है कि धन कभी सुख देनेवाला नही तब धनवानोंको सुखी समझना बिलकुल अज्ञान है ॥ १३ ॥ यदि यह शंका हो कि जब संपत्ति इसप्रकार महाकष्ट देनेवाली है तब लोग उसे छोडते क्यों नही ? रातदिन क्यों उसके चक्रमें घूमा करते हैं, उसका समाधान ग्रंथकार करते हैं- विपत्तिमात्मनो मूढः परेषामिव नेक्षते। दह्यमानमृगाकीर्णवनांतरतरस्थवत् ॥ १४ ॥ अर्थ-अनेक वनचर जीत्रोंसे भरेहुए वनमें आग लग जानेपर वृक्षके ऊपर बैठे हुए मनुष्य के समान यह भज्ञानी जीव दूसरोंके समान अपनी विपतिका जरा भी ख्याल नहीं करता। भावार्थ-बिसप्रकार अनेक जंगली जीवोंसे भरे वनमें भाग लगजानेपर उससे पचनेकेलिये कोई मनुष्य ऊपर इसके चढ़ जाता है और यह समझवा है कि मैं ऊंचा वेग ई, अग्नि मेरा कुछ नहीं कर सकती परन्तु उस मूहको यह नहीं जान पड़ता कि निसमकार ये जंगली जीव भस्म होरहे है उसीपकार थोड़ी देरमें मैं भी भस्म होजाऊंगा, उसीमकार मा अज्ञानी जीव धनादिसे अन्य मनुष्यपर भाई विपचिका ५ - भावानुवाद सहित। जो ख्याल करता है परन्तु अपनेलिये धनादिक उपार्जन करनेमें जरा भी विश्राम नही लेता और संपनते आये. होनेवाली विपत्तिका जरा भी ध्यान नहीं करता इसलिये धन आदिसे आई हुई अन्य मनुष्यकी विपति देखकर पाशा तो धनकी सर्वथा छोड हो देनी चाहिये परन्तु उसको नहीं छोडता यह सवा पूर्ण अशान है ॥ १४ ॥ यदि यह कहा जाय कि इसप्रकार धनसे अनेक विप. गियों के होने पर भी धनी लोग क्यों उन विपचियोंको नहीं देखते ? उसका समाधान ग्रंथकार करते हैं- आयुर्वृद्धिक्षयोत्कर्षहेतुं कालस्य निर्गमें। वांछता धनिनामिष्टं जीवितात्सुतरां धनं ॥१५॥ अर्थ-कालका बीतना नयुके क्षरका करनेवाला और धनकी वृद्धि करनेवाला है अर्थात् जैसा जमा काल बीतता जाता है वैसी ही वैसी आयु कम होती जाती है और योग्य व्या- पार प्रादिसे धनकी उनि होती जाती है लोभी धनी लोग कालका वीतना अच्छा समझते हैं इसलिये यही कहना पड़ेगा कि धनी लोगोंको धन अपने जीवनले भी अधिक प्यारा है। भावार्य-सोम कषायका ऐसा आत्माके ऊपर संस्कार बैंग हुआ है कि उसके वशीभूत हुआ आत्मा अपने जीवनसे भी पारा धन समझता है, देखो ! यद्यपि कालकी गति .

. टोपदेश २१ भायुका क्षय करती है परन्तु धनकी वृद्धि में वह कारण है इसलिये आयुकी कुछमी पर्वाह न कर लोग धन वृद्धिकी प्राशासे कालकै बीननेको भी अच्छा समझते हैं इसलिये धनी लोग जो धनसे उत्पन्न होनेवाली विपत्तियों का विचार नहीं करसकते उसमें लोभ रूपाय ही कारण है ॥१५॥ धनसे ही पात्र दान देव पूजा आदि कार्य होते हैं विना धनके नहीं, इसकारण जप धन पुण्यका कारण है तब वह निध नही होसकना, ग्रंयकार इसका उत्तर देते हैं- त्यागाय श्रेयसे वित्तमविचः संचिनोति यः । स्वशरीरं स पंकेन स्नास्यामीति विलंपति ॥ १६ ॥ अर्थ-जो निधनी मनुष्य पात्रदान प्रादि अपूर्व पुण्य की प्राप्तिकी आशासे सेवा कृषि आदिसे धन उपार्जन करता है वह मनुष्य अपने निर्मल शरीरमें 'नहालूंगा' इस पाशा से कीचड लपेटता है। भावार्य- बहुतसे मनुष्योंका यह ख्याल रहता है चाई कितना भी खराव मार्ग हो उससे धन तो कमा लेना परन्तु उसे दान आदि पुण्य कार्यमें लगा देना चाहिये ऐसा क. रनेसे घनके कमानेमें जो पापासव हुया था उसकी जगह दान आदिमें धन खर्च होजानेसे पुण्याचा हो जायगा । परन्तु यह विचार ठीक नहीं क्योंकि जिस प्रकार किसी ए.

२६ " भाषानुवाद सहित। नुष्यका शरीर निर्मल है परन्तु वह यह कहकर कि 'नहा- लूंगा' उस शरीरमें कीचड लपेट लेता है तो उसका वह कार्य ठीक नहीं माना जाता, वैसा करनेवाला पुरुष असानी माना जाता है । उसीमकार जो मनुष्य यह कहकर कि 'मैं अपने धनको दान आदि उत्तम क्रियाओंमें खर्च करूंगा, झुमार्गीसे धन उपार्जन करता है वह भी अज्ञानी गिना जाता है। ऐसा करनेसे कभी मनुष्यफा इष्ट सिद्ध नहीं सकता । वास्तवमें नो धनका उपार्जन शुद्ध भावोंसे होती नहीं सकता । जैसाकि कहा है- शुबैर्द्धनैविपद्धते सतामपि न संपदः। नहि स्वच्छांबुमिः पूर्णाः कदाचिदपि सिंधयः ॥ १६॥ अर्थात् बिसमकार निर्मल जलसे नदियोंकी भरवारी नहीं होती, गदले ही जलसे होती है उसी प्रकार सज्जनोंकी भी संपत्ति शुद्ध मार्गसे कमाए हुए धनसे नहीं बढती, धन संचयमें निदित मार्गका सहारा लेना ही पड़ता है इसलिये महातक बने शुद्ध भावोंसे ही धनका उपार्जन करना चाहिये और संसारकी दृष्टिमें जो निंदित मार्ग हैं उनसे धन कमा- कर दान आदि शुभ कार्योंमें खर्च करना कभी हितकर , समझना चाहिये ॥ १६ ॥ यदि कदाचित् यह शंका की जाय कि पापजनक हो- नेसे धन निध हैं परन्तु विना घनके भोग उपभोग जरा भी

होपदे।।
नहीं हो सकता इसलिये मोग और उपमोगकी प्राप्तिमें अ..
साधारण कारण होनेसे वह प्रशस्त ही गिना जायगा-निध
नहीं कहा जा सकता, उसका समाधान ग्रन्यकार करते हैं-
आरंभे तापकान्प्राप्तावतृप्तिप्रतिपादकान् ।
भंते सुदुस्त्यजान् कामान् कामं का सेवते सुधीः।
अर्य-भोग जिससमय उत्पन्न होते हैं उससमय अनेक
संताप देते हैं, जब प्राप्त हो जाते हैं तव उनके भोगनेसे तृप्ति
नहीं होती इसलिये सदा चितमें घबडाहट बनी रहती है
तथा अन्तकालमें मोगोंके छोडनेका साइस नहीं होना इसलिये
उससमय भी कट ही देते हैं इसलिये ऐसे अहितकारी भोगों
का विद्वान मनुष्य तो कभी सेवन नहीं करता।
भावार्य-आदि मध्य और अन्त तीनों अवस्याओं-
मेंसे यदि एक भी अवस्थामें मोगसे सुख मिले तब तो भोग
अच्छे भी माने जांय किंतु वहाँ तो सुखका लेश भी नहीं
क्योंकि खेती सेवा आदि अनेक कष्ट प्रदान करनेवाले का-
यौसे अन्न आदि भोग्य पदार्थोका सम्पादन होता है इसलिये
प्रारंभमें ही भोगोंसे देह इंद्रिय और मनको अत्यन्त कष्ट होता
है। यदि कदाचित् भोगोंकी प्राप्ति हो जानेपर सुख माना
'जाय सो भी सपाई क्योंकि भोगोंके प्राप्त होजानेपर मी तृष्णा
भार लेती है-कभी मोगोंसे तृप्ति ही नहीं होती । कहामी है-
मपि संकल्पिता कामा संभवति यथा यथा।
तथा तथा मनुष्याणां कृष्णा विश्वं प्रसर्पति ।

भाषांनुवाद सहित ।
'अर्थात्- भोग जैसे जैसे प्राप्त होते जाते हैं और उ.
नको सुखका कारण माना जाता है वैसे ही वैसे मनुष्यको
तृष्णा भी बढती चली जाती है, प्ति कभी होती ही नही।
कदाचित यह माना जाय कि मोगोंके यथेष्ट भोगनेपर
मनुष्यकी तृष्णा बुझ जायगी, वह तुम हो जायगा सो भी
नहीं क्योंकि अंत कालमें भी वे छोडे नहीं जाते जैसे २
अधिक भोग बढते जाते हैं उतनी ही चतनी कृष्णा भी व.
दती चली जाती है-तृप्ति हो ही नहीं सकती। कहा भी है-
दहनस्तृणाकाठसंघयैरपि तृप्येदुदधिर्नदीशतैः।
न तु कामसुखैः पुमानहो पलवत्ता खलु कापि कर्मणः ।
अर्थात्- कितना भी अग्निमें काठ डाला जाय तो
भी यह तृप्त नहीं होती लेकिन वह सप्त हो जाय, सैकड़ों
नदियोंसे समुद्रकी दृप्ति नहीं होती तौभी शायद उ.
सकी भी वृप्तिहो जाय परन्तु मोंगोंसे मनुष्य कभी राम नहीं
हो सकता । कर्म वहाही बलवान है इसलिये-
तात्वसुखसंक्षेषु भावेश्वशोऽतुरज्यते ।
हितमेवानुरुप्यते प्रपरीस्य परीक्षकाः ।।
अर्थात्- जो मनुष्य मूढ हैं-हित अहितके विवेकसे
शून्य हैं वे ही भोगते समय सुखकारी भान भोगोमें भन्नु-
राग करते हैं-उन्हें अच्छा समझ भोगते हैं किंतु जो मनुष्य
परीक्षा प्रधानी हैं, हर एक वातकी परीक्षा करनेकी शक्ति

- टोपश। रखते हैं वे दुखदायी भोगोंकी ओर न झुककर हिवकारी : मार्गका ही अनुसरण करते हैं। यदि यह कहा जाय कि विद्वान लोग तो विषय भोगते ही देखे गये हैं। उनकी विषयोंसे विरक्ति नहीं देखी जाती इसलिये विद्वान लोग भोगोंको नहीं गोगते यह कहना निर- यक है उसका समाधान यह है कि यद्यपि तत्त्वज्ञानी पुरुष चारित्र मोहनीयकर्मके उदयसे भोगोंके छोडनेमें असमर्थ है तथापि अज्ञानी जिसप्रकार विषयमोगोंको हितकारी मान उनका सेवन करता है वैसा मानी लोग नहीं करते, ये हेय समझकर उनको भोगते हैं। कहा भी है- इदं फलमिय क्रिया करणमेतदेष क्रमो ध्ययोयमनुषंगजं फलमिदं दशेयं मम । अवं मुहदयं छिपन प्रयतिदेशकालाविमा- विति प्रतिवितर्कयन् प्रयतते बुधो नेतरः ॥ ४ ॥ अर्यात-यह फल है, यह क्रिया है, यह करण है, यह उसका क्रम है, यह हानि है, भोंगोंके संबन्धसे यह फल प्राप्त होता है, मेरी यह दशा है, यह मित्र है, यह शत्रु है, यह ऐसा देश और यह ऐसा काल है इसप्रकार परि- पूर्ण विचार बुद्धि विद्वानकी ही होती है, अज्ञानीकी नहीं इसलिये हेयरूपसे विषयोंके भोगनेर जिससमय विद्वानका चारित्रमोहनीवकर्म सर्वथा निर्दक होजाता है, वह तब सर्वथा - भाषानुवाद सहित। विषयोंका त्याग करदेता है अज्ञानी ऐसा नहीं करसकता । वास्तवमें तो जिसको विषय सुख कहते हैं वह विष ही है, कामी है- किमपीदं विषयमयं विषमतिविपमं पुमानयं येन । प्रसभमनुभूयमानो भवे भवे नैव चेतयते ॥५॥ अर्थात्- यह जो विषयमय सुख है वह अत्यंत भयं- कर विष है तथापि संसारमें प्रत्येक जगह इस विपका अनु. भवन करनेवाला और उससे उत्पन्न होनेवाले दुःखको मो- गनेवाला भी यह पुरुष अज्ञानी बना हुआ है। इसलिये जो अपर यह शंका की गई थी कि धन भोग उपभोगका का. रणा है इसलिये प्रशस्य है वह ठीक नहीं क्योंकि भोगउपभोग श्रशुभ कर्म के कारण हैं यदि धनसे मोग उपभोगोंकी उत्पति होती है तो वह धन सर्वथा निंद्य ही है ॥ १७ ॥ धनसे शरीरका उपकार होगा और शरीरसे सुख मि. लेगा इसलिये धन निंध नहीं हो सकता इस वासका अन्य- कार समाधान देते हैं- भवंति प्राप्य यत्संगमशुचीनि शुचीन्यपि । स कायः संततापायस्तदर्थ प्रार्थना वृथा ॥१८॥ अर्थ- जिसके संबंधसे पवित्र भी पदार्थ अपवित्र हो जाते हैं और जो सदा नाश स्वरूप है उस शरीरका पवित्र पदार्थोंसे उपकार करना व्यर्थ है।

स्टोपदेश। भावार्थ-शरीर सरीखा निकृष्ट पदार्य कोई नहीं क्योंकि चाहे अत्यंत सुगंधित भी इन झुलेल मादि पदार्योंसे इसका अपटन किया जाय वे सब इसके संबंधसे दुर्गंधित अपवित्र होजाते हैं तिसपर भी यह शरीर निश्चित नहीं सदा नाश- खरूप है इसलिये जो यह कहा गया था कि धनसे शरीरका उपकार होगा और शरीरसे सुख मिलेगा वह सब व्यय है शरीरसे कमी सुखकी प्राप्ति नहीं तव धन प्रादिसे उसका उपकार करना ठीक नहीं है इसलिये धन कमी प्रशस्य नहीं हो सकता ॥१६॥ यदि यह कहा जाय किधन आदिसे शरीरका उपकार मत हो प्रात्माका उपकार होगा इसलिये धन निंद्य नहीं कहा जा सकता उसका समाधान ग्रंथकार देते हैं- यजीवस्योपकाराय तदेहस्यापकारकं । यहेहस्योपकाराय तज्जीवस्यापकारकं ॥१९॥ अर्थ-जो पदार्थ जीवका उपकारक है यह शरीरका उपकारक नहीं हो सकता-अपकारक ही होगा । तथा जो देहका अपकारक है, वह जीवका अपकारक न होगा-उप- कारक ही होगा। भावार्थ-अनशन अवमोदर्य आदि तपोंसे मस्त पापों का नाश होता है और आत्मा निर्मल होजाता है इसलिये भाषानुवाद सहित। अनशन आदि तप आत्माके तो उपकारी हैं परन्तु शरीरके नहीं क्योंकि उनके करनेसे वह सूख जाता है और ग्लानिका कारण बन जाता है । तथा भोजनादि पदार्थोंसे शरीरको शुष्टि होती है वह सचल और कांतिमान होजाता है इसलिये भोजनादि पदार्थ शरीरके तो उपकारी हैं परंतु प्रात्माके नहीं क्योंकि उनके सेवन करनेसे कर्मोका पासव होता है और उनसे आत्मा मलिन होकर नरक आदि दुर्गवियोंका पात्र बन जाता है, इसलिये यह जो कहा गया था कि ध. नसे शरीरका उपकार मत हो, प्रात्माका उपकार होगा, वह ठीक नहीं । धनसे कभी श्रात्माका उपकार नहीं हो सकता ॥ १६॥ शंका-शरीरमाचं खलु धर्मसाधन' अर्थात् धर्मसिद्धिका मुख्य कारण शरीर है-पिना शरीरके धर्म साधन नहीं हो सकता इसलिये उसका नाश न हो इस रूपसे उपकार क- रना ही चाहिये । यदि यह कहा जाय कि शरीरका नाश न होसके इसरूपसे उपकार हो ही नहीं सकता सो ठीक नहीं क्योंकि ध्यान से सब वात सुकर होजाती है । कहा भी है- पदाधिक फलं किंचित्फलमामुत्रिकं च यत् । एतस्य द्विगुणस्यापि ध्यानमेवाप्रकारणं ॥१॥ अर्थात इसखोक और परलोक संबंधी दोनों प्रकार के फल ध्यानसे भात शेजाते हैं तथा यह भी कहा है 'माणसपा घोपरे। दुलई किंचि' अर्थात् ध्यानकेलिये कोई बात दुर्लभ नहीं सब चीजें प्राप्त होसकती है इसलिये ध्यानसे शरीरका नाश न हो ऐसा उपकार हो सकता है । इस चातका अन्यकार समाधान देते हैं- इतश्चितामणिदिव्य इतः पिण्याकखंडकं । .. ध्यानेन चेदुभ लभ्ये काद्रियंतां विवोकनः॥२०॥ अर्थ- एक ओर तो अमीष्ट पदार्थों को प्रदान करने वाला चिंतामणि रत्न है दूसरी ओर खलका टुकडा है, ध्या- नसे ये दोनो ही बातें प्राप्त होती हैं तोवताइये विवेकी लोग किसका श्रादर करें। किसकी प्राप्तिका यत्न करें? भावार्थ- ध्यानसे दोनों बातें प्राप्त हो जाती हैं यदि उचन ध्यानोंका पाराधन किया जाय तो चिंतामणि रत्नके ममान उत्तम पदार्थ- स्वस्वरूपकी माप्ति यह आत्मा कर लेता है और यदि अशुभ ध्यानोंका भाराधन किया जाय तोखलके टुकडेके समान निरर्थक इस लोक संबंधी सुख प्राप्त होजाता है इसलिये शरीरका नाश न हो इस अमिलापासे ध्यान करना अयुक्क है किंतु स्वस्वख्यकी प्राप्तिक लिये ही ध्यान का आराधन हितकारी है। कहा भी है- तत्यानं रौद्रमात या यदैहिकफलार्थिनां । तस्मादेतत्परित्यज्य धम्य शुक्लमुपास्यतां ॥१॥ मर्थात्- जो लोग पानसे इसलोकसंबंधी फलकी '३० भाषानुवाद सहित। अभिलापा करते हैं वह ध्यान आध्यान और रौद्र ध्यानके भेदसे दो प्रकारका है और जिससे स्वस्वरूपकी प्राप्ति होती है इस ध्यानके धर्य और शुक्ल दो भेद हैं। विद्वान मनुष्यों का कर्तव्य है कि वे इस लोक सबंधी, परिणाममें दुःखदायी फलको देनेवाले आर्त और रौद्र ध्यानोंका सर्वथा त्याग करदें और धर्य एवं शुल्ल ध्यानोंका आराधन करें ॥२०॥ अंथकार आत्माका स्वरूप बतलाते हैं- स्वसंवेदनसुव्यक्तस्तनुमानो निरत्ययः। अत्यंतसौख्यवानात्मा लोकालोकविलोकनः ।। अर्थ-यह आत्मा स्वानुभव प्रत्यक्षका विषय है, शरीरकी वरावर है, अविनाशी है, अत्यंत सुस्वस्वरूप है और लोक अलोकका साक्षात्कार करनेवाला है। भावार्थ- बहुतसे लोगोंका यह ख्याल है कि जो वस्तु किसी न किसी श्याणके गोचर है उसीका गुणानुवाद क- रना उचित है। असिद्ध वस्तुका गुणानुवाद नहीं करना चा- हिये उसके परिहारके लिये ग्रंथकारने विशेषण दिया है कि " स्वसंवेदनसुल्यता ' अर्थात् अमूर्तिक पदार्थ होनेके का- रण और किसी प्रमाणका विषय आत्मा नहीं हैं परन्तु स्व. संवेदन प्रत्यक्षमा विषय है ग्रहं ग्रह ( मैं मैं ) इस रूप जो कोई अंतर्मुखाकार रूपसे ज्ञान होता है उससे आत्माकी सत्ता सिद्ध हो जाती है इसलिये भात्माको असिद्ध कहना इष्टोपदेश। ३९. प्रमाण पापित है। स्वसंवेदन प्रत्यक्षका स्वरूप यह कहा बेपत्वं वेदकरयं च यत्तस्य स्त्रन योगिनः । तत्स्वसंवेदम माहुरात्मनोऽनुभषं शं ॥१॥ अर्यात्- योगीका अपनेडी द्वारा अपनेका ज्ञेयपना और मातापना है उसका नाम स्वसंवेदन है और उसीको अनु- भव प्रत्यक्ष कहते हैं। बहुतसे लोगोंका यह सिद्धांत है कि प्रात्मा व्यापक है अर्थात् जिसमकार श्राकाश सब जगह मौजूद है कहीं पर भी उसका अभाव नहीं कहा जासकता उसी प्रकार आत्मा भी सब जगह मोजूद है उसका भी कहीं पर प्रभाव नहीं कहा जा सकता । तथा बहुत से लोग यह भी मानते हैं कि जिसमकार बडका बीज बहुत छोटा होता है उसीमकार मा. सा भी बहुत छोटा पदार्थ है । उनके सिद्धांत के परिहारके- लिये ग्रंथकारने आरमाके लक्षणमें 'तनुमात्र विशेषगा दिया है उसका तात्पर्य यह है कि मारमा आकाशके समान व्या- पक नहीं, न वडके बीमके समान छोटा है किंतु अपने श- रीरके परिमाण है जैसा जैसा शरीर धारण करता है उसीके अनुसार इसके आत्ममदेश हीनाधिक होनाते हैं। यदि हापीका श्ररीर धारण किया तो उसके शरीरके समान इसके प्रदेश विस्तृत हो जाते हैं और यदि चींवटी का शरीर धारण क- रता है तो उसके समान इस भात्माके प्रदेश संकुचित दो. भाते हैं।

भांशनुवाद सहित। चार्वाक (नास्तिक) लोगोंका सिद्धांत है कि जिसपकार . कोदों मउश्रा आदि पदार्थोके संबंधसे मादक शक्ति पैदा होजाती है और जो मनुष्य उन पदार्थोसे बनी हुई शराको पीता है वह मत्त हो जाता है उसीप्रकार पृथ्वी जल आदि भूतोंका जिससमय एक विलक्षण संयोग होजाता है उसस- मय एक शक्ति उत्पन्न हो जाती है वही शक्ति प्रात्मा है इससे भिन्न कोई आत्मा पदार्थ नहीं इसलिये उस शक्ति- रूप आत्माकी सत्ता गर्भसे लेकर मरण पर्यंत ही है। जैसे ही मरण हुआ वह शक्तिरूप प्रात्मा भी नष्ट होगया उसके सिद्धांतके निरामार्थ निरत्यया । यह विशेषण दिया गया है उसका तात्पर्य यह है कि यद्यपि पर्यायाथिक नयकी अपेक्षा आत्मा प्रति मपय विनाशीक है तथापि द्रव्यार्थिक नयकी प्रापेक्षा वह अविनाशी है, प्रात्मत्वेन कभी उसका नाश नहीं होता इसलिये पृथ्वी जल आदि पदार्थोंके सं- योगसे उत्पन्न शक्तिस्वरूप प्रात्मा नहीं पड सकता। सांख्य और योग, सुख आत्माका धर्म नही मानते जड स्वरूप प्रकृतिका धर्म मानते हैं इसलिये जब तक आ- स्माकी मोक्ष नहीं होती तब तक इसमें प्रकृतिके संबंधसे सु. खका मान होता है और मोक्ष हो जानेपर. सुखकी सत्ता आत्मामें नहीं रहती ऐसा मानते हैं उनकेलिये ग्रंथकारने 'अत्यन्तसौख्यवान् ' यह पद दिया है उसका तात्पर्य है कि सुख, प्रकृति आदि जड पदार्थों का स्वरूप नहीं, आत्मा

३३
छोपदेश
का ही स्वरूप है, यद्यपि कर्पोके जाल में निकडे रहने के का.
रण उसका परिपूर्ण स्वरूप समारावस्थामें प्राट नहीं होता
तथापि वह मोक्षावस्पाने सर्वथा व्यक्त हो जाता है।
'शानशून्यं चैतन्यमाप्रमाला' अर्थात् ज्ञानसे रहिन केवल
चैतन्यस्वरूप आत्मा है ऐसा सांख्यातावलंबियोंका सिद्धा-
नत है । 'धुदधादिगुणोन्मिनः पुमान्' अर्याद वृद्धि सुख
दुखि इच्च आदि नव गुणोंसे रहित पुरुष-आसा है, ऐसा
योग कहते हैं । बौद्धोंका सिद्धान्त है कि आत्मा कोई पदार्य
ही नहीं, नैरास्यवाद ही पदार्थ है। इन सबोंके सिद्धांत के
परिहारकेलिये ग्रंयकारने 'लोकालोकविलोकन:' यह पद
दिया है अर्थात् आत्मा लोक और अलोकका द्रष्टा और ज्ञाता
है इसलिये सांख्यकार जो मानते हैं कि आत्मा ज्ञानशून्य है
वह मिथ्या है क्योंकि यदि ज्ञान आत्माका स्वरूप न हो तो
मात्मा लोक अलोजका ज्ञाता द्रष्टा नहीं हो सकता। योग
जो यह मानते हैं कि ज्ञान प्रात्माका स्वभाव नहीं, वह भी
मिथ्या है क्योंकि आत्माको शानस्वरूप न मानने से वह
लोक अलोकका ज्ञाता और द्रष्टा नहीं बन सकता । तया
चौद्ध जो नैरात्म्यवाद ही पदार्थ बतलाते हैं वह भी उनका
भ्रम है । यदि वैसा स्वीकार कर लिया जायगा तो आत्मा
पदार्थ ही सिद्ध न होगा और प्रान्मपदार्थक अभावमें
लोक और अलोकका दर्शक और ज्ञापक भी कोई सिद्ध नही
हो सकता इसलिये भाला बानस्वरूप आदि है यही सोपरि

भाषानुवाद सहित। सिद्धांत है। जीव पुद्गल धर्भ अधर्म आकाश और काल ये छह पदार्थ जिसमें पाये जावें वह लोक और जिसमें सिवाय आकाशके अन्य कोई द्रव्य न पाई जाय उसका नाम अलोक है।॥२१॥ शंका-आत्मा ममाण सिद्ध है और वह उपास्य भी है तो उसकी उपासनाका क्या उपाय है ? उत्तर--- संयम्य करणग्राममेकाग्रत्वन चेतसः। मात्मानमात्मवान् ध्यायदत्मनैवात्मनि स्थितं ॥२२॥ अर्थ-आत्माको चाहिये कि वह चित्तकी एकाग्रतासे इंद्रियोंको वशकर अपनेही द्वारा अपनेमें अपने स्वरूपका ध्यान करे। भावार्थ-आत्माके ज्ञानमें अन्य किसी कारणकी भाव- श्यकता नहीं पत्ती, अपनेही स्वसंवेदन प्रत्यक्षसे उसका साक्षात्कार होजाता है। कहा भी है। खपरमप्तिपस्वान तस्य करणांतरं। तताधता परित्यज्य स्वसंवित्यैव वेचतां ॥१॥ अर्थात-आत्मा स्वपर प्रकाशक है जिसप्रकार दीपकको अपने स्वरूपके प्रकाशनके लिये अन्य दीपककी प्रावश्यकता नहीं पड़ती उसीपकार आत्माको भी अपने मान करने के लिये अन्ध पदार्थकी पावश्यकता नहीं पडती इसलिये भात्माके धानकेलिये अन्य पदार्थकी चिता न कर अपनेही स्वसंवेदन ३५ दोपदेश। प्रत्यससे उसका मान करना चाहिये और स्वसंवेदन पत्य- क्षसे शान उसी समय होगा जब श्रुतझानके अवलंबनसे द्रन्य वा पर्यायका आश्रय कर विच एकान होगा एवं पिसके एकाग्र होनेसे इंद्रियां वश होजायगी। क्योंकि मनके एकाम न होनेसे इंद्रियां अपने अपने रूप आदि विषयों की ओर झुकेंगी, उससे मन विक्षिप्त होगा इसलिये स्वसंवेदन प्रत्य. क्षसे प्रात्माके अनुभवकेलिये अवसर न मिलेगा। कहा भी है- गहियं तं सुअणाणा पच्छा संवेयणेण भाविजा । जो णटु सुयमयलंयह सो मुज्मद अप्पसम्मा ॥१॥ अर्यात-श्रुतज्ञानके अवलंबनसे भात्माको जानकर पीछे स्वसंवेदन प्रत्यक्षसे उसका अनुभव करना चाहिये । जो पुरुष श्रुतज्ञानका अवलंबन न करेगा वह आत्मस्वभावको जान सकेगा | आत्मस्वरूपके पहिचाननेकी उसमें योग्यता नहिं हो सकती । और भी कहा है- प्रध्याच्य विषयेभ्योऽहं मां मयैव मयि स्थितं । बोधात्मानं प्रपन्नोऽस्मि परमानंदनिर्वृतं ॥३॥ अर्यात्-विषयोंसे विरक्त हो जानेपर परमानंदकी छटासे परिपूर्ण सम्परमानस्वरूप मुझको मैं ही अपनेमें अपने द्वारा प्राप्त हुआ हूं इसलिये जो यह शंका की गई थी कि आगा- की उपासना कैसे होती है। वह पतला दिया गया कि मनकी निषलतासे इंद्रियोंके वश होजानेपर स्वसंवेदन पत्यक्षसे भा- साकी उपासना होती है।॥ २२ ॥ ।

२६
भाषानुवाद सहित।
शंका-विद्वानों की प्रवृत्ति किसी न किसी प्रयोजनसे
होती है तो आत्माकी उपासनासे क्याप्रयोजन सिद्ध होगा?
अज्ञानोपास्तिरज्ञानं ज्ञानं ज्ञानिसमाश्रयः ।
ददाति यत्तु यस्यास्ति सुप्रसिद्धमिदं वचः ॥२३॥
अर्थ-संसारमें यह वात प्रसिद्ध है कि जो चीज जिसके
पास होती है.वही वह दूसरेको दे सकता है इसलिये जो अज्ञा-
नस्वरूप शरीर आदि वा मूर्ख गुरु आदि हैं उनकी उपासना-
से अज्ञानकी प्राप्ति होती है और जो ज्ञानी है उनकी उपा-
सनासे ज्ञानकी प्राप्ति होती है।
मावार्थ-धनीकी सेवासे धन और विद्वानकी सेवासे
विद्याकी प्राप्ति होती है यह बात जर संसारमें प्रसिद्ध है
तव अज्ञान स्वरूप देह श्रादि वा मिथ्याज्ञानस्वरूप गुरु आ-
दिकी उपासनासे अज्ञानकी और ज्ञान स्वरूप प्रात्मासे स-
म्यग्ज्ञानकी प्राप्ति अवश्य होगी। जो पुरुष अपना कल्याण क-
रना चाहते हैं उन्हे जिसमें स्वपर विषेक रूप ज्योति चमचमा
रही है ऐसे परम पावन प्रात्माकी अवश्य उपासना करनी
चाहिये । ज्ञानीकी उपासनासे ज्ञान ही फल प्राप्त होता है यह
यात सर्वथा प्रमाणीक है। यथा-
हानमेव फल माने ननु श्लाघ्यमनश्वर ।
अहो मोहस्य माहात्म्यमन्यदप्यत्र मृग्यते ॥१॥

दोपदेश। अदि मानकी उपासनासे प्रशंसनीय और अविनाशी सम्पवानरूप फलकी प्राप्ति होती है यद्यपि वान प्रालिकेलिये बानीकी उपासना मोहसे होती है-ऐसी उपासनामें मोह करना पड़ता है तथापि इस प्रकारकी विलक्षण ही मोहकी महिमा आदरणीय गिनी जाती है। भावार्थ-धन आदिको उ. पासनामें जो मोह कारण पहना है उस मोहसे मानकी प्रा. स्तिकेलिये मानीकी उपासनामें जो मोह कारण पडता है यह प्रशस्त माना जाता है । अतः अपने कल्याणकेलिये स्वपर विवेक शाली प्रात्माकी अवश्य ही उपासना करनी चाहिये। शंका-जो ज्ञानी निष्पन्नयोगी प्रात्मस्वरूपमें लीन है उसे प्रात्मध्यानसे क्या फल प्राप्त होता है ? उत्तर- परीषहाधविज्ञानादाखवस्य निरोधिनी। जायतेऽध्यात्मयोगेन कर्मणामाशु निर्जरा ॥२४॥ अर्थ-अध्यात्मयोगमें लीन होजानेपर परीपह आदि कष्टों का कुछ भी स्मरण नहीं रहवा इसलिये इस अध्यात्मयो- गीके समस्त कोक आस्रवको निषेध करनेवाली शीघ्र ही नि- बरा हो जाती है। भावार्य-जबतक मनुम्मका विच पात्म स्वरूपके वि- तबनमें लीन नहीं होता वा पदार्योंमें घूमा करता है तब- वक भूख प्यास आदि परीपहोंका से कट बना रहता है भूख और प्यासकी वेदनासे वह अधीर हो उठता है और १८ भाषानुवाद सहित। उससे हमेशा शुभाशुभ कर्मोका संचय होता रहता है किंतु जिससमय वाह्य पदार्थोकी दासनासे रहित हो चित्त अध्या- म अभ्यासमें लीन होजाता है उससमय भुख प्रादिकी इ. छभी वेदना नहिं मालूम पडती, उससमय विलक्षण ही मा- नंदकी छटा हृदयमें छटकने लगती है और उस अध्यात्म- ध्यानसे मौकी निर्जराके साथ स्वस्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है । जैसा कि कहा है- यस्य पुण्यं च पापं च निष्फलं गलति स्वयं। स योगो तस्य निर्वाणं न तस्य पुनराश्रयः ॥ १ ॥ अर्थात् जिस पवित्रात्मा योगीके पुण्य और पाप बिना फल दिये ही खिर जाते हैं उस योगीको स्वस्वरूपकी प्राप्ति हो- जाती है। वह परमात्मा हो जाता है और फिर उसके शुभा. शुभ कर्मोंका पास्रव नहीं होता-उसे संसारमें नहीं घूमना पडता । और भी कहा है- तथा चरमांगस्य ध्यानसम्यस्यता सदा । निर्जरा संघरश्वास्य सकलाशुभकर्मणां ॥२॥ अर्थात् चरमशरीर-वज्रषभनाराच संहननसे अन्य संह- ननको धारण करनेवाला जो जीव ध्यानका अभ्यास कर- ता है। प्रात्मस्वरूपके चितवनमें अपना मन लगाता है उसके समस्त अशुभ फोकी निर्जरा ( एकदेशरूपसे कौका खिर ना) और संबर (आते हुए कौंका रुक जाना) होता है और भी कहा है-

पष्टोपदेश।
३
आरमदेहांतपणानजनिताहादनिवृतः।
तपसा दुकृतं घोरं भुंजानोऽपि न खिचति ॥६॥
अर्याव-मात्मा और शरीरके मेद विज्ञानसे उत्पन्न आ-
दाद सरूप आनंदका जिसने अनुभव करलिया है ऐसा
पुरुष अनेक दुःखोंको भोगता हुआ मी तपसे खिल नहीं
होता-परीपदोंके उपस्थित हो जानेपर उनके भपसे उपका
परित्याग नहीं कर देता, तप करनेमें और भी धीर वीर हो
नाना है । वास्तवमें जिससमय योगी सम्यग्दर्शन और स-
म्यग्ज्ञान पूर्वक आत्माके स्वरूपका चितवन करता है उस प्र-
वस्थामें उसकी आत्माका स्वरूप ध्येय मोर ध्यान अवस्थाके
सिवाय पर द्रव्यसे जरा भी संबंध नहीं रहता। परीपह आदि
परद्रव्यके विकार है इसलिये उसे परीपद आदिको पीडा
जरा भी चंचल नही बनाती, उससमय धीरे धीरे सव कर्म
खिरते चले जाते हैं । चार घातिया कौके सर्वथा नष्ट हो
माने पर उस योगीके तेरहवे गुणस्यानमें केवलज्ञान प्राप्त
हो जाता है और मुक्तात्माके समान अनुपम भानंदका मनु
भव करता हुमा वह अ इ उ ल इन पांच इस अक्षरों-
के उच्चारण करनेमें जितन काल लगता है उतना चौदहवे
गुणस्थानमें रहकर, सर्वदाके लिये वह अविनाशी सुखका
भोक्ता हो जाता है। कहा भी है
सोलेसि संपत्तोणिरुदणिस्सेस आसवो जीयो।
कम्मरयविष्पमुक्खो गयजोगो केवली होदि ॥४॥

भाषानुवाद सहित । अर्थाद-जिससमय यह जीव शील शिरोमणि बन जाता है उससमय इसके समस्त शुभ अशुभ कर्मोंका भानव रुक जावा है और कर्मरूपी रजसे रहित हो यह अयोगकेवली बन जाता है ।। २४ । अब ग्रंथकार ध्यान और ध्येय अब- स्था में प्रात्माके संयोगादिरूप संबंधका प्रभाव क्वलाते हैं। कटस्य कर्ताहमिति संबंधः स्याद्वयोर्द्वयोः । ध्यानं ध्येयं यदात्मैव संबंधः कीदृशस्तदा ॥२५॥ अर्थ-चटाई और चटाईका बनानेवाला दोनों आपसमें भिन्न है इसलिये उन दोनोंका पापसमें संयोग आदि संबंध बन सकता है और उस संबंधके अभावसे वे जुदे जुदे हो जाते हैं किंतु जब ध्यान स्वरूप और ध्येय स्वरूप भात्मा ही है, आत्मासे मिन्न पदार्थ नहीं है तव उनका संयोग प्रादि संबंध जो आपसमें जुदाईका कारण संबंध गिना जाता है बह नहीं बन सकता इसलिये ध्यान और ध्येय अवस्यामें परद्रव्य से प्रात्माका कोई संबंध नहीं। भावार्थ-"ध्यायते येन तद्धयानं, यो ध्यायति स एव वा" जिप्तका ध्यान किया जाता है वह पदार्थ और जो ध्यान करता है वह पदार्थ दोनों ही एक हैं। जिस समय इस प्रात्माका ध्यान अवस्थामें परमात्मा' निजस्वरूप के साथ एकीकरण होजाता है उससमय चिन्मात्र पिडके सिवाय अन्य किसी भी परद्रयका संयोगरूप संबंध नहीं बनता।

- छोपदेश। ४५ किंतु उस अवस्थामें कर्म आदिका जो भी संयोग संबंध रहता है वह नष्ट होजाता है । इसलिये जब यह बात है कि ध्यान और ध्येय अवस्थामें अन्य कोई संयोगादिसंबंध नही बनसकता तब उस अवस्थामें योगीको परीपह आदि पर द्रव्यके विकार, कभी कष्ट नहीं पहुंचा सकते ॥२५॥ शंका-भेद जो होता है वह संयोग पूर्वक होता है चिना संयोगके भेदकी कल्पना नहीं हो सकती । ध्यानसे जब भात्या और कर्मोंकी जुदाई होती है तब किस कारण से वो उनका संयोग होता है और किस कारणसे उनका भेद होता है ? उत्तर- बध्यते मुच्यते जीवः सममो निर्ममः क्रमात् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन निर्ममत्वं विचिंतयेत् ॥ २६ ॥ अर्थ-ममस्व परिणापसे जीवके कर्मबंध होता है और ममत्वके अभावसे मोक्ष होती है इसलिये विद्वानों का कर्तव्य है कि वे जिसतरह बने उसतरह निर्ममत्वकाही चितवन करें। भावार्थ-स्त्री पुत्र धन धान्य प्रादि पदार्थ मेरे हैं और उनका हूं जिस समय मोइसे मृट हो जीवक ऐसे परि- णाम होजाते हैं उससमय इसके अनेक शुभाशुभ मौका बंध होता रहता है । कहा मी ई- न कर्मबहुलं जगन्न चलनात्मक कर्म या न चापि करणानिधान रिदचियो बंधकद ।

भाषानुवाद सहित। यदैत्यमुपयोगभूः समुपयाति रागादिभिः स एव किल केवलं भवति बंधहेतुर्गुणां ॥१॥ अर्थात् जीवके जो शुभाशुभ कर्माका बंध होता है उसमें कार्माण जातिकी वर्गणाओंसे खचाखच भरा हुआ न तो यह लोक कारण है, न चलनस्वरूप कर्म कारण है, न इंद्रियां कारण हैं और नचेतन अचेतन पदार्थाका कारण है किंतु जिससमय इस आत्माका उपयोग राग द्वेष आदि के साथ एकीकरण करलेता है । इष्ट और अनिष्ट पदार्थोंमें जिससमय राग और द्वेषकी सत्ता इसकी आत्मामें स्थान पा लेती है वही निश्चयसे बंधमें कारण है। यह मेरा है, और यह पराया है तथा मैं इसका हूं जिससमय इस प्रकार के राग द्वेष रूप परिणाम हो जाते हैं उससमय सदा शुभ अंशुभ कर्मोंका बंध होता रहता है किंतु जिससमय ये परि- शाम नही होते, स्त्री पुत्र आदि कोई मेरे नहीं और न मैं इनका हूं इसप्रकार निर्ममत्वकी भावना हृदयमें चपचमा निकलती है उस समय शुभ अशुभ काँका बंध नहीं होता। कहा मी है- अकिंचनोऽहमित्यास्थ त्रैलोषयाधिपतिर्भवेः। योगिगम्यं तव प्रोक रहस्यं परमात्मनः ॥१॥ अर्थाद-जिससमय आत्मामें यह अविचलं भाव हो निकलता है कि मैं अकिंचन हं-स्त्री पुत्र आदि जो भी संसारमें पदार्थ दीख पड़ते हैं उनमें मेरा कोई नहीं उससमय . इष्टोपदेश। यह शारमा तीन लोकका अधिपति बन जाता है-परमासा कहा जाता है परंतु इस प्रकारका यह परमात्माका रहस्य- परमारमा बना देनेवाला रहस्य योगियोंक ही गम्य है कि- चन स्वरूप भाव सिवा योगाके अन्य कोई पा नहीं सकता। और भी कहा है- रागी वनाति कमाणि चीतरागी चिमुचति । जीवो जिनपदेशोऽयं संक्षपान्धमोक्षयोः॥३॥ अर्थात्-जो पुरुष रागी है। धन धान्य आदि पदार्य मेरे हैं इस प्रकारसे राग करनेवाला है उसके शुभ अशुभ काँका बंध होता है किंतु जो वीनरागी स्त्री पुत्र आदिको अपना मानना दुःखका कारण सपमवा है उसके कबंध नहीं होता । वह परमात्मा वनजाता है, यह संक्षेपसे वन्य मो- सका व्याख्यान निन्द्रकी आज्ञानुसार है ॥ २६ ॥ शंका-तब इस प्रकारके अनुपम थानन्द प्रदान करने वाले निर्मपत्तके चितवनका क्या उपाय है ? उचर- एकोऽहं निर्ममः शुद्धो ज्ञानी योगींद्रगोचरः । बाहयाः संयोगजा मावा मत्तः सर्वेऽपि सर्वथा ॥२०॥ मर्थ-मैं अकेला हूं, ममत्व रहिन हूं, शुद्र हूं, ज्ञानी ई, और योगियोंके ज्ञानका विषय है । तथा संयोगजन्य- कर्मसे होनेवाले मात्र मुझसे सर्वथा वाइय है, आम मात्र भी मेरे नहीं।

भाषानुवाद सहित । भावार्थ-यपि पर्यायाथिक नयकी अपेक्षा मेरे अनेक भेद होजाते हैं तो भी द्रव्याथिक नयकी अपेक्षा में अकेला हूं, निर्मल हूं, यह मेरा और मैं इसका इसमकारके विका- रसे रहित हूं, शुद्ध द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा द्रव्य और भावकर्मोसे सर्वथा भिन्न होनेके कारण मैं शुद्ध हूं, स्वपर प्रकाशन स्वभावका धारक शानी हूं, तथा केवलीका केवल बान अनन्त पर्यायोंको जानता है अतः स्पष्ट रूपसे उसका विषय और श्रुतकेवलीका ज्ञान भी मुझे शुद्धोपयोग स्वरूप मानता है इसलिये उसका भी विषय होने के कारण में योगी- द्रोंके ज्ञानका विषय हूं किंतु अनादि कालसे कर्मके सबंधसे होनेवाले शरीर भादि पदार्थ कमौके विकार है मेरे शुद्ध चैतन्य स्वरूपसे भिन्न हैं इसलिये मुझसे बाह्य हैं-मेरे नहीं इस प्रकारकी भावना निर्ममत्वकी प्राप्ति होती है ।। २७ ।। शंका-देहादिक संबंधसे आत्माको क्या फल भोगना पढता है । उत्तर- दुःखसंदोहभागित्त्रं संयोगादिह देहिनां । त्यजाम्येनं ततःसर्व मनोवाक्कायकर्मभिः ॥ २८ ॥ अर्थ-जीवोंको कर्मके संबंधसे माप्त शरीरादिसे अनेक कष्ट भोगने पड़ते हैं इसलिये मन वचन कापकी क्रियासे शरीर प्रादिका त्याग ही करना उत्तम है। भावार्थ-आत्मा और शरीर आदिके मेद भावसे सुखकी टोपोग। प्राप्ति होती है और इनके अभेद भानसे-इनको माना मान- नेसे अनेक दुःख भोगने पड़ते हैं इसलिये मन वचन कायकी क्रियासे इनको अपना न मानना ही ठीक है। कहा भी है- स्ववुया यतु गृहोयाकायवाचतसा त्रयं । संसारस्तावदेवेषां भेदाभ्यालेन नितिः ॥ १ ॥ अर्थाद-शरीर वाणी और मनको जब तक अपना माना जाता है अर्थात् इनकी क्रियासे शरीर धन धान्यको अपनाया जाता है तबतक सदा संमारमें घूमना पड़ता है किंतु निससमय प्रात्मामें यह अभ्यास होने लगता है कि शरीर मादि मुझसे भिन्न हैं किसी हालनमें ये मेरे नहीं हो पावे उस समय कर्मोका बंध नहीं होवा, मोतकी माप्ति हो जाती है इसलिये पारीर आदिको कभी अपना न मानना चाहिये । शंका-दहादि स्वरूप पुदल दम्पसे अनादिकालसे आत्माका संबंध है उसीके कारण जन्म मरण आदि होते है और उनसे अनेक प्रकारके श्लेश सहने पड़ते हैं यह दुःख किस भावनाके भावनेसे दूर होगा ? उत्तर- न मे मृत्युः कुतो भीतिन मे व्याधिः कुतो व्यथा। नाहं बालो न वृद्धोऽहं न युवैतानि पुद्गले ॥ २९ ॥ मर्य- मेरा मरण नहीं इसलिये मुझे दर नहीं, मुके व्याधि नहीं हो सकती इसलिये मुझे कोई दुःख भी नहीं, मैं बालक कृद और जवान भी नहीं क्योंकि ये सब विकार

भाषानुवाद सहित।
भावार्थ- मैं चिदानंद चैतन्य स्वरूप है। मान दर्शन
आदि चैतन्य स्वरूप परिणामों का कभी नाश नहीं हो स-
कता इसलिये मेरा कभी मरण नहीं हो सकता अत: सर्प
सिंह आदि मुझे खा जायंगे वा तलवार भादिसे मेरा वध
हो जायगा मुझे कभी इस वातका भय नहीं करना चाहिये
तथा वात पित्त आदिके कुपित होजानेपर ज्वर आदि को
भी व्याधियां हैं मूर्तीक हैं इसलिये वे मूर्तीक पुद्गलस्वरूप
शरीरमें ही हो सकती हैं मेरा प्रात्मा अमूर्त चैतन्य स्वरूप
है उसमें कमी कोई व्याधि नहीं हो सकती इसलिये मुझे
व्याधिजन्य दुःखसे कभी भी दुःखित न होना चाहिये ।
तथा वालक वृद्ध और युवा ये अवस्था भी मूर्तीक पुद्गलमें
होती हैं मेरी आत्माकी इनमें कोई अवस्था नहीं हो सकती
इसलिये इन अवस्थाओं में जो भी दुःख होते हैं मुझे
उनसे दुखी न होना चाहिये किंतु मुझे अपने चिदा.
नंद चैतन्य स्वरूपमें ही मान रहना चाहिये इत्यादि भाव-
नाओंके भानेसे जन्म मरण आदिक दुःख दूर हो जाते हैं ।।
शरीर और आत्मामें अभेद बुद्धि रखनेपर भयादिक
होते हैं । जब इनको अपना अहितकारी समझ इनका स-
था परित्याग कर दिया तब ये मुझे कभी संताप नहीं थे
सकते इस वातका ग्रंथकार उपदेश देते हैं-
भुक्तोज्झिता मुहुमोहान्मया सर्वेऽपि पुद्गलाः ।
उच्छिष्टेष्विव तेष्वद्य मम विज्ञस्य का स्पृहा ॥३०॥

७ इष्टोपरेशा अर्थ- मोहनीय कर्मकै जालमें फसकर अनेकवार - रीर मावि स्वरूप पुगलोंका मैंने भोग किया है और फिर छोड दिया है अब में विचार शील हूं- शरीर भादिक स्व. रूपका भले प्रकार जानकार हूं इसलिये उच्छिष्ट पदायोंक समान अब मेरी इनके मोगनेमें इच्छा नहीं हो सकती । भावार्थ-- जो पुरुष लाह आदि अछूने पदार्थोका खानेवाला है उसकी जिसप्रकार पच्छिष्ट पदार्याक खाने में अभिलाषा नहीं होती वह उच्छिष्ट पदार्थीको घृणाकी पटिसे देखता है उसीप्रकार जिस मनुष्पने शरीर आदि पदार्चाको अनेकवार भोगकर छोड दिया है वह पुरुष वि. चार बुदिके विकसित हो जानेपर उनको उच्छिष्ट मानता है फिर उनके भोगनेमें नहीं लगता ॥ ३० ॥ शंका-शरीर आदि फर्मोंका यंध जीवक कैसे हो जाता है ! उपर- कर्म कर्महितावधि जीवो जीवहितस्पृहः । स्वस्वप्रभावभूयस्त्वे स्वार्थ को वा न बांछति॥३१॥ अर्थ- अपने अपने प्रभाव बलवान होनेपर कर्म तो अपने अंगस्वरूप कर्मका हित करना है और जीव जीवका (अपना ) हित करता है। ठीक भी है अपने अपने स्वार्थको सभी चाहते हैं। भावार्य- यह एक स्वभाविक बात है कि जो बलवान - भाषानुवाद सहित। होता है वही अपनी ओर खींच लेता है अवसर पाकर कभी वो कर्म वलवान हो जाता है और कमी जीव भी बलवान हो जाता है। कहा भी है- कस्यविवलिओ जीवो कत्थवि कमाइ होति पलिया। जीवस्ल य कम्मस्त य पुन्वविरुद्धार पराई ॥१॥ अर्थात् कभी तो जीव बलवान हो जाता है और कमी कर्म बलवान हो जाते हैं इस प्रकार जीव और क- मैके परस्पर विरुद्धता है, इसलिये जिससमय कर्म बलवान हो जाता है उससमय वह कौका उपकार करता है अर्थात जीवके औदयिक आदि भावोंकी उत्पत्तिकर नवीन नवीन कोको उपार्जन कराकर अपने अंगभूत कर्मों का पोषण क- रता है। जैसा कि कहा है- जीवकृतं परिणाम निमित्तमात्रं प्रपद्य पुनरन्ये । स्वयमेव परिणमंतेऽत्र पुद्गलाः कर्मभावेन ॥१॥ परिणममानस्य चिदश्चिदात्मकै स्वयमपि स्वर्भावः । भवति हि निमित्तमा पौगलिकं कर्म तस्यापि ॥२॥ अर्थात्- जीवद्वारा किये गये राग द्वेष आदि परिणा- भोंके निमित्तसे अन्य पुदल स्वयं ही फर्मरूप परिणत हो जाते हैं। उसी प्रकार परिणमनशील जीवके स्वयं होने वाले जो राग द्वेषरूप परिणाम हैं, उनमें शगल कर्म निमित पहजाता है । वषा जिससमय जीव पलवान हो जाता है - ४१ - उस समय वह मी काँके नाम के साथ अनंत सुख स्वरूप मोलकी इच्छा करता है। वह भी अपना दित करनेमें नहीं चुकता । इसलिये यही समझना चाहिये कि कर्मसे आविष्ट जीव ही कर्मोका संचय करता है कर्म रहित नहीं ॥ ३१ ॥ इसी घातको ग्रंथकार और भी स्पष्ट करते है- परोपकृतिमुत्सृज्य स्वोपकारपरो भव । उपकुर्वन् परस्याज्ञो दृश्यमानस्य लोकवत ॥३२॥. हे मात्मन् । तू लोकके समान मूह बनकर . व्यमान शरीर आदि पदार्योका उपकार कर रहा है यह तेरा अज्ञान है। अब तू परके उपकारकी इच्छा न कर अ. पने ही उपकारमें लीन हो। भावार्य-जिसप्रकार मृढ लोक दुसरेको दूसरा न स- मझकर रात दिन उसकी भलाई में लगा रहता है उसकी भलाई करनेमें अपनी कितनी भी हानि क्यों न होवे 3- सकी कुछ भी पर्वाह नहीं करता किंतु निससमय उमको यह ज्ञान हो जाता है कि यह मेरा नहीं, मुमसे भिन्न है उसका उपकार करना छोड देता है और जिमतरह बनवा है उसतरह अपना ही उपकार करता है उसीप्रकार है भा. स्मन् ! मान अवस्था में तेरे समावसे सर्वया विरुद्ध परीर भादि पदायाँके होते हुए भी तू उनके पालन पोपणमें सदा जगा रहा है और सदा उन्हें अपना मानता रहा है अब त भाषानुवाद सहित । नमें अपनी निजत्व बुद्धि छोड दे और अपना हित संपादन कर । इसीमें तेरा कल्याण होगा ॥ ३२ ॥ और भी ग्रन्थकार उपदेश देते हैं- गुरूपदेशादभ्यासात्सवित्तेः स्वपरांतरं । जानाति यः स जानाति मोक्षसास्यं निरंतरं ॥३॥ अर्थ-गुरुके उपदेशसे शास्त्राभ्यास और शास्त्राभ्यास से पदार्थोके वरूपका ज्ञान होता है एवं उससे स्वपरका भेद मालूम पडता है जिसको इस बातका ज्ञान है उसे ही मोक्ष सुखका ज्ञान हाता है। भावार्थ- यह स्व- अपना है और यह दूसरा है इस वातका ज्ञान स्व परके हक्षणोंके जाननेसे होता है। मेरा यह स्वरूप है और दूसरेका यह स्वरूप है जबतक यह ज्ञान नही होता तब तक कमी स्व पररूपका भेद नहीं मालूम पड सकता । तथा इस प्रकारसे स्वरूपका ज्ञान शास्त्राभ्यास से होता है और वैसा शास्त्राभ्यास गुरुके उपदेशसे होता है इसलिये जो पुरुष गुरुके उपदेशसे शास्त्राभ्यास करते हैं और उसकी कृपासे स्व और परके लक्षण पहिचानकर व परका भेद जानते हैं वेही मोक्ष स्वरूपके जाननेके अधिकारी है क्योंकि कर्म रहित भात्याक ध्यानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। कहा भी है- AA- मेवानुमबंधापमेकामयं परमच्छति। तयामाधीनमानंदमेवि पालामगोचरं ॥१॥ अर्थात्-उस कर्मविमुक आत्माकै ध्यानसे परम एका- अताकी माप्ति होती है और वचनके अगोचर जो कोई चात्मा- धीन आनंद है वह भी मात होजाता है इसलिये मोक्ष मा. सिकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको अवश्य स्वपरका विवेक प्राप्त करना चाहिये ॥ ३३ ॥ शंका-मोक्षमार्गका निदॉप रूपसे अनुभव करनेवाला गुरु कौन है ? उत्तर- स्वस्मिन् सदाभिलाषित्वादभीष्टज्ञापकत्वतः । स्वयं हितप्रयोक्तृत्वादात्मैव गुरुरात्मनः ॥३४॥ अर्य-प्रात्माका गुरु वास्तवमें मात्मा ही है क्योंकि वही अपने मुझे 'मोक्ष सुख मिले' इस अमिलापासे मोक्ष सुखकी अभिलाषा करता है। अपने ही मुझे अभीष्ट मो. क्षसुखका दान करना चाहिये' इसरूपसे मोक्ष सुसका वोष करता है और मोक्ष सुख ही परम हितकारी है इस रूपसे . सकी माप्तिमें अपनेको लगाता है। भावार्थ-जोमात्माको हितकारी उपदेश दे और उ- सके प्रभानको दूर करे उसीका नाम गुरु है। यद्यपि ऐसे गुरु मन्य मी म्पति हो सकते हैं परंतु ये कहने पात्रके होते है, ये वैसा करा नहीं सकते। असली गुरु गो आत्मा ही है क्योंकि 'मोक्ष मुझे मास हो जाय' इसमकारकी मन्नस्त अभि- भाषानुवाद सहित । कापा उसी में होती है। उसकी यह शान रहता है किस- सारमें सबसे अभीष्ट पदार्थ मोक्षसुख है और वही इस प्र- कार अपनी भासाकी निंदा कर कि रे दुरात्मा ! तूने प्रा- जतक कमी मोक्षसुखकी मासिके लिये प्रयल नहिं किया सदा विषय भागों में ही मान रहा है। परम हितकारी मोक्ष सुखकी प्रापिमें अपनेको लगाता है। इसलिये सबसे उत्तमक- स्याणकारी गुरुअपने आत्माको ही मानना चाहिये ॥३४॥ शंका-यदि आत्माका गुरु आत्मा ही है अन्य नहीं तव शास्त्रों में जो यह उपदेश है कि आचार्य आदि गुरु हैं उनकी सेवा करनी चाहिये, यह सव व्यर्थ है । उचर- नाज्ञो विज्ञत्वमायाति विज्ञो नाज्ञत्वमृच्छति । निमित्तमात्रमन्यस्तु गतेधर्मास्तिकायवत् ॥ ३५॥ अर्थ-जो पुरुष अज्ञानी है वह परके निमित्से विशेष शानी नहीं हो सकता और जो विशेष ज्ञानी है वह प्रज्ञानी नहीं हो सकता इसलिये जिसप्रकार जीव पुदलोंके गमनमें धर्मास्तिकाय निमित्त कारण है उसी प्रकार अन्य मनुष्यके भानी वा प्रधानी करनेमें गुरु प्रादि निमित्त कारण हैं। भावार्थ-पदार्थमें जो शक्ति होती है वह उसीसे कार्य कर सकता है अन्य पदार्थ तो उसके कार्य करने में निमित्त कारण मात्र पड जाता है। जीव और पुद्गल द्रव्यमें गमन करनेकी स्वयं शक्ति है इसलिये वे जिस समय गमन करते हैं ५३ प्रोपोगा -धर्मदव्य उनके गमनमें सहकारी कारण पट जाता है किंतु यदि उनमें गमन करनेकी शक्ति न हो तो एक नहीं इनार धर्म द्रव्य सरीखे सहकारी कारण पड आँप, कमी बीच और पुद्गल गमन नहीं कर सकते उसीपकार प्रात्माकी भी दवा है। यदि यह आत्मा तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिक अयोग्य समन्यादि स्वरूप अज्ञानी रहना है उससमय एक धर्माचार्या उपदेश क्या हजारों धर्माचार्योके उपदेश क्यों न प्राप्त हो, मी यह तस्वशानी नहीं हो सकता। कहा भी है- स्वाभाविक हि निष्पत्ती क्रियागुणमपेमते। न व्यापाशतेनापि शुकवत्पाट्यते पका ॥१॥ अर्याद-सैकडों प्रयत्न किये जाय तो भी वगला वो. के समान पढ़ नहीं सकता उसीप्रकार यदि स्वामाविक चीज नहीं है तोहजारमयत्न किये जाय तो भी वह पैदा नहीं हो सकती क्योंकि स्वाभाविकचीजकी मौजूदगीमें ही प्रयत्न करनेपर वह प्रगट हो सकती है । जब अबानीमें ज्ञानप्राप्ति- की योग्यता ही नही तब उसे कितना भी उपदेश दिया जाय तत्वज्ञान उसे नहीं माप्त हो सकता तथा वो पुरुष शानवान है तत्वानका पात्र है उसके लिये तानसे रि- गाने के लिये हजारों उपाय क्यों न किये जांय बद वत्वमा- नसे चिग नहीं सकता। कहा भी है- बते पतत्यपि भयगुतविश्वलोके मुकावनि प्रशमिनो न चलति योगात् ।।

भाष याद सहित । बोधप्रदीपहतमोहमहांधकागः सम्यग्दृशः किमुत शेषपरीषहेषु ॥ जो योगीगण सम्यग्ज्ञानरूपी जाज्वल्यमान दीपकसे मोहरूपी प्रवल अधकारका नाश करनेवाले हैं और सम्य- पुष्टि हैं वे शांतस्वभावी योगीगण जिसके भयानक श. ब्दसे पथिकोंने मार्ग छोड दिया है और समस्त लोक भ- यसे यर थर कांपने लगता है ऐसे बनके गिरने पर भी अ. पनी परम पवित्र समाधिसे जराभी चलायमान नहीं होते। इसलिये यह वात निश्चित होचुकी किशानी और प्रशानी धननेकी सामर्थ्य आत्मामें ही है और गुरु आदि तो निमि- च कारण हैं जबर्दस्ती;वे फिसीको ज्ञानी आझानी नहीं बना सकते। हां ! निमित्त कारणके विना भी कार्य नहीं होता इसलिये ज्ञानप्राप्तिमें निमित्त कारण गुरुओंकी शुश्रूषाका परित्याग न कर देना चाहिये । उनकी परमभक्ति रखनी. ही चाहिये ॥ ३५॥ शंका-अभ्यासका उपाय क्या है ? उचर- अभवच्चिंचविक्षेप एकांते तत्वसंस्थितिः । अभ्यस्येदभियोगेन योगी तत्त्व निजात्मनः॥३६॥ अर्थ-जिसके चित्तमें किसीप्रकारका विक्षेप न जिसकी बुद्धि एकांतमें बैठने के कारण हेय और उपादेय स्व- रूप पदार्थोक विचारमें निश्चल हो, ऐसे योगीको चाहिये.

इष्टोपदेश। कि वह आलस्य और निद्रा आदिके परित्याग पूर्वक अपनी आत्माके स्वरूपका अभ्यास करे। भावार्थ-जातक चित्तमें किसी प्रकारका विक्षेप रहेगा तबतक पाकुलताके कारण कभी आत्माके स्वरूपका प्यान नहीं हो सकता इसलिये सबसे पहिले योगीको अपना चिच शांत रखना चाहिये । चितके विक्षेपका निरोध एकांतवाससे ही हो सकता है इसलिये योगीको जनसामुदायमें नरा कर एकांतमें रहना चाहिये । वषा यह पदार्य त्यागने योग्य है और यह पदार्य ग्रहण करने योग्य है जबतक इसवावका मान न होगा तबतक भी आत्माके स्वरूपका अभ्यास नहीं हो सकता इसलिये स्वपर विवेक रखना भी भात्मस्वरूपके - भ्यासी योगीको परमावश्यक है ।। ३६ ॥ शंका-स्वपर विवेकरूप संविवि योगीके है यह बात कैसे जानी जास- कती है ? उत्तर- यया यथा समायाति संवित्तौ तत्त्वमुत्तम। तथा तथा न रोचंते विषया सुलभा अपि॥३७॥ अर्थ-संविचि-स्वपर पदायोंके मेदविज्ञानसे जैसा जैसा प्रात्मक स्वरूप विकसित होता नाता है वैसे ही से सुलभ भी विषयोंसे प्रीति हटती जाती है। भावार्थ-जबतक मामाको अपने स्वरका धान नहीं होता तबतक वह विषयोंको ही प्यारा मानता है और उनसे १६ भाषानुवाद सहित। जायमान सुखको ही परम सुख मानता है किंतु निससमय आत्माको अपना स्वरूप मालूम पडता चला जाता है उस समर्थ उसको वही परम आनन्द जान पड़ने लगता है और विषय सुख जो परिणाममें दुखहीके देनेवाले हैं उनसे सर्व धाविमुखता हो जाती है । लोकमें भी यह वात प्रसिद्ध है जो कारण प्रचुर सुखका उत्पादक होता है उसीको लोग अपना- ते हैं और जिससे थोडा सुख मिलता है उसको छोड देते' हैं। मुनिगण इस वातको अच्छीतरह जानते हैं कि विषय- भोग अल्पसुखके कारण हैं और प्रात्मस्वरूपका चितवन परम सुखस्वरूप मोक्षका कारण होता है इसलिये वे स्वपर वि- कस्वरूप आत्मस्वरूपके चितवनमें ही लौ लगाते हैं। मु. निगण काममोगोंको कैसा समझते हैं यह अन्यत्र भी कहा है, यथा-- - शमसुखशीलितमनसामशनमपि द्वेषमेति किमु कामा स्थलमपि दहति झषाणां किमंग पुनरंगमंगाराः ॥ १ ॥ अर्थात्- जिसंप्रकार सुखी जमीन भी मछलियोंकेलिये जवं माणनाशक होती है तब अग्निकी तो बात ही क्या है अर्थात अग्निसे जरूर ही मछलियां मर जाती हैं उसीप्रकार जिनका विच समतापी सुखसे परिपूर्ण है ३ मुनिगण जब शरीरकी स्थिति के कारण भोजनका भी प- रित्याग कर देते हैं वव काम भोगोंको वे कैसे अच्छा मान सकते हैं । अर्थात् काम भोगोंको सर्वथा हेय समझ - होपदेश पर योगियोंकी कभी उनमें प्रवृत्ति नहीं होगी । इसलिये यह बात सर्वधा युक्त है कि योगीको अपनी प्रात्माके स्व- सका मान है, इसवातको जतळानेवाली योगीको दिपयोंमें अरुचि ही ई-जिलयोगीकी नितनी विषयोंमें अरुचि होगी यह उतना ही अधिक मासस्वरुपका माता होगा ॥३७॥ बैंसी जैसी विषयोंमें अरुचि बढ़ती जाती है वैसी ही वैसी स्वात्मसंवित्ति-स्वपर विवेक भी चढना चला जाता है, इस वातको ग्रंयकार समझाते हैं- यथा यथा न रोचते विषयाः सुलभा अपि । तथा तथा समायाति संविचौ तत्त्वमुत्तमं ॥ ३८ ॥ अर्थ-जैसी जैसी सुलम मोगोंसे रुचि घटची जाती है वैसे ही वैसे स्वपरसविचिस विशुद मात्सोका स्वरूप उदित होता चला जाता है। भावार्थ-ऊपर कह दिया गया है कि प्रात्माक पिशुद स्वसकी उपलब्धिमें विषयोंकी अरुचि कारण है, विपर्योकी माचिसे ही विशुद्ध सरूपकी प्राप्ति होती है। कहा भी है- विरम फिमपरेणाकार्यकौतूदलेन स्वयमपि निमृतः सन् पश्य पण्मासमे। इंदयसरसि पुंसः पुद्गलादिमधाम्नो ननु निमनुपलब्धिमीति किंचोपलन्धिः ॥३४॥ (समपसार कला) 44 मापानुवाद सहित। - अर्थात्-आत्मन् ! यह जो तु विना कामका व्यर्थ को लाहल मचा रहा है वह तेरा व्यर्थ है उससे तु शीघ्र विरक्त हो। आत्मस्वरूपमें लीन होकर छैमास पर्यंत तू इस चैतन्य स्वरूप प्रात्माको देख । पदलसे भिन्न कातिके घारक इस प्रात्माकी तेरे हृदयसरोवर में प्राप्ति होती है या नहीं। इसलिये जो पुरुष विशुद्ध प्रात्मस्वरूपकी प्राप्तिके अभिलापी हैं उन्हें चाहिये कि वे विषयभोगोंको सर्वथा हेय सममें, कभी भी उनमें रुचि न करें ॥३८॥ शंका- स्वात्मसंविचिके प्रकृष्ट होजानेपर किन किन चिन्होंकी प्रगटता होती है ? उत्तर- निशामयति निश्शेषमिंद्रजालोपमं जगत् । स्पृहयत्यात्मलाभाय गत्वान्यत्रानुतप्यते ॥ ३९ ॥ अर्थ-इस समस्त जगतको वे इन्द्रजालके समान देखते हैं।आत्मस्वरूपकी प्राप्तिकेलिये उनकी इच्छा लहलहा उठती है पौर जिससमय किसी कारणसे आत्मस्वरूपसे मिल किसी पदार्थमें उनकी मचि हो जाती है तो उन्हें अत्यंत संताप होने लगता है। भावार्थ -जबकक आत्माको अपने असली वरूपका शान नहीं होता तबतक वह स्त्री पुत्र आदि समस्त पदार्थों को अपने सुखका कारण मानता है और विषयोंसे जार- मान सुखको ही परम सुख मान बैठता है, आत्माके असली टोपदेश। स्वरूपकी प्राप्तिकेलिये कभी प्रयत्न नहीं करता और न मात्मस्वरूपसे अतिरिक्त विषयभोगों में प्रचिहोजानेसे किसी प्रकारका पश्चाताप करता है परंतु निससमय उसे स्वात्म- संविचि-स्त्र और परका विवेक होजाना है उसममय जगतका समस्त ख्याल इसे इंद्रनालके ख्यालके समान जान पटने लगता है अर्थात् जिसमकार इंद्रजालमें सब झूठी माया होती है उसी मकार स्त्री पुत्र श्रादिकी मायाको वह झूठी अत एव हेय समझने लगता है। उससमप सिशय प्रात्म- स्वरूपकी मासिके और किसी चीजकी प्राक्षिकी इच्छा नहीं होती और पूर्वजन्मके संस्कारसे अथवा अन्य किसी कारण से विषय आदिमें उसकी प्रवृत्ति भी हो जाती है तो उस से उसे वढा ही क्लेश होता है ।।३६ ।। और मीस्वात्मसं- विचिका फल बतलाते हैं- इच्छत्येकांतसंवासं निर्जन जनितादरः । निजकार्यवशास्किंचिदुक्त्वा विस्मरति द्रुतं ॥४॥ अर्थ-स्वात्मसंविचिके जागृत हो जानेपर यह भासा बडे पादरसे किसीप्रकारसे मनुष्यों का संचार न हो ऐसे एकांत स्थानों में रहनेकी इच्छा करने लगता है और विशेष प्रयो- जनसे कुछ बोलनेपर भी शीघ्र ही उसे भूल जाता है। भावार्य-जबतक प्रात्माको यह ज्ञान नहीं होता कि जीने मर- नेवाला और नरक दुःख मोक्ष सुखका मोक्काअकेला मैं ही हूं भाषानुवाद सहित। स्त्री पुत्र प्रादि जन्मके साथी हैं कर्मके नहीं । मेरे ऊपर आई हुई विपत्तिमेसे वे जरा भी भाग नहीं वटा सकतै । तबतक वह स्त्री पुत्र मादिको अपनी रक्षाका कारण मानता है और उनका संग छोडकर एकांत स्थानमें रहने के लिये भय करता है किंतु जिससमय इसे स्वपर विवेक होजाता है, में अकेला ही इं अन्य कोई भी मेरा नहीं, जिससमय यह भावना हृदयमें शेने लगती है उससमय स्त्री पुत्र प्रादिके साथ रहेना इसे दुःखदायी जान पड़ने लगता है। बड़े भानन्दके साथ वह पर्वतकी गुफा श्रादि ऐसे स्थान जहाँपर जरा भी मनुष्यों के संचारकी गम्य नहीं वहां आनन्दपूर्वक रहनकी अभिलाषा करने लगता है। तया भोजन आदिकी पराधीनतासे कुछ समय श्रावकोंको उपदेश देनेके लिये प्रयत्न करता है किंतु प्रात्मस्वरूपमें विशेष लीनता होने के कारण तत्काल उसे भूल जाता है अपने प्रात्मस्वरूपमें ज्योंका त्यों फिर लीन हो जाता है और श्रात्मध्यानसे होनेवाले चमत्कारोंको हासिल कर लेता है । ध्यानका फल अन्यत्र भी इसीप्रकार कहा है- गुरुपदेशमासाद्य समभ्यस्यन्ननारत। धारणासौष्ठवध्यांनप्रत्ययानपि पश्यति ॥ १॥ अर्थात्- गुरुके उपदेशके अनुसार सदा आत्मसरूम का अभ्यास करनेवाला योगी धारणा सौष्ठव भादि ध्यान के प्रत्ययोंको साक्षाव प्रत्यक्ष करने लगता है। सार यह कि योगीकी आत्माकै स्वरूपके चितवनमें जिससमय एका- ६६ - इटोपदेशन अंदा हो जाती है उससमय उसे जगतका कोई पदार्थ पच्छा नही लगता; भात्मिक आनन्दमें ही वह चूर पना रहता है॥४०॥ और भी आत्मध्यानका कार्य बतलाते हैं- ब्रुवन्नपि हि न ब्रूते गच्छन्नीप न गच्छति स्थिरीकृतात्मतत्वस्तु पश्यन्नपि न पश्यति ॥४९. अर्थ-जिस पवित्रामा योगीकी आत्मस्वरूपके चित्त- बनमें स्थिरता होगई है वह बोलता हुआ भी नहीं बोलता. हुआ सरीखा है, जाता हुआ भी नही जाता हुआ सरीखा. है और देखता हुधा भी नहीं देखता हुआ सरीखा है। भावार्थ- विशुद्ध आत्मस्वरूपके चितवनमें जिससमय- योगीका चिच लीन हो जाता है उस समय उसके चिचेकी. प्रवृत्ति उसीमें लीन हो जाती है, अन्य कुछ भी चीज उसे अच्छी नहीं लगती इसलिये उससमय वह श्रावक आदिके उपरोप-प्राग्रहसे उपदेश श्रादि देवा हुआ भी उस कार्यम मुख्यता न होनेके कारण न देता हुआही सा है। कहा - आत्महानात्परं कार्य न बुद्धौ धारपेचिरं । फादर्थक्शाकिंचिहाकायाभ्यासतत्परः ॥ अर्यात-बोलनेका और शरीरले कार्य करनेका अभ्याम पड़ा हुआ है इसलिये योगी, पापक आदिक निमित्त या अन्य किसी प्रयोजनसे पदेश भादिके समय बोलना ॐ भाषानुवाद सहित। वा भोजनादिके लिये जाना भादि प्रवत्ति करता है तथापि स्व- स्वरूपके ज्ञानमें विशेष लीनता होनेपर स्वस्वरूपके अभ्यास रूप कार्यमें ही वह लीन बना रहता है । स्वस्वरूपके अभ्या- ससे अन्य जो भी कार्य हैं वे बहुत कम उसकी बुद्धिमें 3- हरते हैं, हेय समझ उनकी ओर वह लौ नहीं लगाता । तथा मात्मस्वरूपके अभ्यासमें विशेष लीनता होनेके कारण वह भोजनादि केलिये जाता हुआ भी नहीं जाता सरीखा है, और किसी पदार्थको देखता है तथापि उसे नहीं देखता -सरीखा है। सार यह है कि स्वस्वरूपके अभ्याससे योगीको जो भानंद प्राप्त होता है वह अन्य किसी भी कार्यों नहीं इसलिये अन्य कार्योंके करनेकी उसे जरा मी उत्सुकता नहीं रहती। और भी ग्रंथकार कहते हैं- किमिदं कीदृशं कस्य कस्मात्वेत्यविशेषयन् । स्वदेहमपि नावैति योगी योगपरायणः ॥ ४२ ॥ अर्थ-योगमें लीन हुधा योगी अनुभवमें आनेवाला तत्त्व क्या है ? कैसा है ? कौन उसका स्वामी है किससे उ. दित और कहांपर मोजूद है ? इसमकारके भेदभावका कुछ भी ख्याल.न कर अपने शरीरको भी नहीं जानवा । भावार्थ-वस्वरूपके ध्यान करनेवाखे भी योगीकेन- चवक यह भेदविज्ञान बना रहता है कि मैं जिस तत्त्वका - अष्टोपदेश अनुभव कर रहा हूं वह यह है, इसरूप है, उसका यह स्वामी है, इससे वह उदिव हुआ है और यहां पर मोजूद रहता है अबतक उसको अपने शरीरका ज्ञान रहता है किंतु जिसस- मय अंनुभवमें आनेवाला पदार्य क्या है? कैसा है कौन- सका स्वामी, कहांसे उदिव और कहां रहता है इसप्रकार ज्यु. परतक्रियानिचि सरीखी एक प्रकारसे समाधि प्राप्त हो जाती है उससमय योगीको जरा भी अपने शरीरका मान नहीं रहता । कहा भी है-- सदाच परमकाप्रयाद्वहिरयपु सत्स्वपि । अन्यन्न किचिनाभाति स्वयमेवात्मनि पश्यतः॥१॥ अर्याद-जिससमय योगी अपने योगमें लीन होजाता है उससमय परम एकाग्रतासे वह अपने आत्माक ही स्वरूपका अवलोकन करता रहता है इसलिये वाह्य पदार्थोके रहते मी उसे कुछ भी अच्छा नहीं मालूम होता ।। ४२ ॥ शंका- आत्मस्वरूपमें लीन हो जानेपर अन्य कोई पदार्थ अच्छा नहीं मालूम होता यह कैसे ? उत्तर- यो यत्र निवसन्नास्ते स तत्र कुरुते रति। यो यत्र रमते तस्मादन्यत्र न स गच्छति ॥४३॥ प्रये-जो मनुष्य जहां रहता है उसको वहीं प्रीति हो जाती है और वहीं रमण करनेके कारण अन्यत्रं नहीं जाना चाहता। - ६४ भाषानुवाद सहित। 1. भावार्थ- यह बात आपालगोपाल प्रसिद्ध है कि यदि मनुष्य किसी उत्तम शहर वा उत्तम मकानमें रहता है तो उसमें उसका प्रेम हो जाता है, यदि वही किसी छो- टेसे गांवके झोपडैमें रहता है तो उसकी उसी में प्रीति हो जाती है तथा उसीमें क्रीडापूर्वक प्रानंदसे रहनेके कारण वह अपने कैसे भी अच्छे बुरे निवास स्थानको छोडना नहीं वाहता । उसीप्रकार जबतक योगी दूसरे पदार्थों को अपना मानता है और उन्हें अपना हितकारी समझता है तब तक वह उन्हींमें प्रेम करता है और उन्हींको आनंददायी मान, आनंद स्वरूप अपने आत्माके स्वरूपकी ओर लौ नहीं लगाता किंतु जिससमय वाह्य पदार्थोंसे खिचकर यो- गीकी दृष्टि अपने विशुद्ध प्रात्मस्वरूपमें लीन हो जाती है और श्रात्मस्वरूपके चितवनसे जायमान भानंदका उसे अनुः भव होने लगता है,उस समय समस्त वाह्य पदायोंके रहते भी वह उनकी ओर नहीं सुकता स्वस्वरूपके सामने उसे सब फीका लगता है ॥ ४३ ॥ स्वात्मानुभवमें लीन होनेपर जर योगीकी अन्य पदार्थोंमें प्रवृत्ति नहीं होती तब क्या होता है? ग्रंयकार इसवातका समाधान देते हैं- आगच्छंत्तद्विशेषाणामनभिज्ञश्च जायते । अज्ञाततद्विशेषस्तु बद्धयते न विमुच्यते ॥४॥ अर्थ-स्वात्मनिष्ठ योगीकी जब अन्यत्र प्रवृत्ति नहीं .

देवा ६५ होती तो उसे अन्य पदार्यो विशेपोंका मी मान नहीं रहता और जन से विशेषका ज्ञान नहीं होता तब उसके काँका बंध नहीं होता है, काँका नाश ही होता है। भावार्थ-जो मनुष्य जिस पदार्यकै चितवनमें मग्न हो जाता है उसे दूसरे पदार्थक अच्छे बुरे स्वरूपका जरा भी ज्ञान नहीं रहता इसलिये दूसरे पदार्थोसे उसका संबंध नहीं रहता, उनसे उसका संबंध छूट जाता है । योगी भी जिससमय स्वस्वरूपके चितवनमें लीन हो जाता है और 6- सीको अपना मानने लगता है उससमय उसकी मति वाद्य पदार्थोकी ओर नहीं होती और मदृत्ति न होने के का- रण कौन पदार्य अच्छा है, और कौन बुरा है इस रूपसे उनके विशेषोंका धान भी उसे नहीं होता। पदार्थोके विशेष ज्ञानके अभावसे उनमें उसकी ममता भी नहीं होती और ममता न होने के कारण शुभ अशुभ कर्मोका बंधनहीं होता, निजरा ही होती चली जाती है जिससे उसे मोक्ष स्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है।॥४४॥ और भी ग्रंथकार उपदेर परः परस्ततो दुःखमात्मैवात्मा ततः सुखं । अत एव महात्मानस्तन्निमित्तं कृतोद्यमाः ॥१५॥ अर्थ-पर पदार्य पर ही है इसलिये उसको अपना मा- ६६. भाषानुवाद सहित। ननेसे दुख होता है और जो पदार्य अपना है वह अपना ही है उसको अपनाने से सुख मिलता है इसीलिये तीर्थंकर आदि महापुरुषोंने पात्माके लिये ही उद्योग किया है। भावार्थ--खी पुत्र शरीर आदि जो भी संसारमें पदार्थ । है वे जड स्वरूप हैं इसलिये अपने चिदानंद चैतन्य स्वरूपसे भिन्न हैं यदि उनको अपना माना जायगा तो अवश्य दुख होगा क्योंकि वे सदा अपने साथ नहीं रह सकते, जरूर उनका वियोग होता है और वियोगसे अवश्य क्लेश होता है। चिदानंद चैतन्य पदार्थ अपना है कभी वह अपनेसे वियुक्त नहीं हो सकता इसलिये उसे अपना माननेसे परम सुखकी प्राप्ति होती है। तीर्थकर आदि जितने भी महापु- रूष होगये हैं उन्होंने शरीर आदि पदार्थोको दुःखदायी जान उनको अपनानेका उद्योग नहीं किया किंतु चिदानंद चैतन्य स्वरूप जो अपना पदार्थ है उसीके लिये उद्योग किया है। पर पदार्थोंमें अनुराग करनेपर क्या क्या फल प्राप्त होता है । इतवातका निरूपण ग्रंथकार करते हैं- अविद्वान् पुगलद्रव्यं योऽभिनंदति तस्य तत् । न जातु जंतो सामीप्यं चतुर्गतिषु मुंचति ॥ १६ ॥ अर्थ-प्रशानी जीव पुद्गल द्रव्यको अपना मानता है इसलिये वह दल द्न्य चारों गतियोंमें उसका सबंध नही छोटती सायही बनी रहती है। - टोपदेश भावार्य-गरीर आदि पद्दल द्रभ्य सर्वया हेय है और भामस्वरूपसे सर्वथा भिन्न है तथापि जिस पुरुषको इस वातका ज्ञान नहीं कि यह पदार्य हेय है और यह पदार्थ उपादेय है वह शरीर आदिको अपना मानता रहता है। शरीर आदिको अपना माननेसे कर्मोका मानव होता है, उसकी कृपासे चारो गतियों में घूमना पटता है और उन्हीं शरीर प्रादिका संबंध करना पडता है इसलिये पर पदामि कभी अनुराग न करना चाहिये और अपने स्वरुपको ही अपनाना चाहिये ॥४६॥ स्वस्वरूपके अपनानेसे क्या होता है ? ग्रंथकार यह समझाते हैं- आत्मानुष्ठाननिष्ठस्य व्यवहारवहिःस्थितेः। जायते परमानन्दः कश्चिद्योगन योगिनः ॥ १७ ॥ अर्थ-प्रति निवृत्ति रूप व्यवहारसे रहित होकर जिससमय योगी अपने आत्मस्वरूपमें लीन होजाता है उस समय उस योगकी कृपासे उसे परमानन्द स्वरूप मोशकी प्राप्ति होजाती है। भावार्य-स्वस्वरूपमें लीनता होना योग कहलाता है और जबतक बाह्य पदार्यमें ममत्त्व लगा रहता है तबतक स्वस्वरूपमें लीनता नहीं होती इसलिये जो योगी वादा प- दामि किसीमकारका ममत्व न कर स्वरूपमें ही सीन "६८ मायानुवाद सहित। रहता है उसे अनिर्वचनीय मानन्द-मोक्ष सुखकी प्राप्ति 'होती है ॥ १७ ॥ भानन्दका कार्य ग्रंथकार बतलाते हैं- आनन्दो निर्दहत्युद्धं कमेंधनमनारतं । न चासौ खिद्यते योगी वहिर्दखेष्वचेतनः ॥४८॥ अर्थ-वह आनन्द सदा आनेवाले प्रचुर मी कर्मस्पी ईधनको जला डालता है और बाह्य पदार्थोसे जायमान दुःखों का कुछ भी मान न होनेके कारण योगीको उससमय कुछ भी खेद नहीं होता। भावार्थ-कर्म ऐसा क्लबान है कि जयतक प्रात्मापर इसका प्रभाव पड़ा रहता है तब तक उसे स्वस्वरूपका ज्ञान नहीं होने देता, अपने जालमें फसाकर भात्माको चतुर्गति रूप संसारमें घुमाता है और अनेक प्रकारके क्लेश भुगाता है। परंतु किसी कारणसे कर्मोका बल घटजानेपर जिसस. मय आत्मा स्वस्वरूप शुद्ध चैतन्य स्वरूपके चितवनमें लीन होजाता है उससमय काँका बल बरावर घटवा चला जाता है और वे किसी समय जाकर नष्ट होनाते हैं । यही यहां पर चलाया गया है कि योगी जिससमय स्वस्वरूपके चितवनसे उत्पन्न होनेवाले भानन्दको प्राप्त करलेता है उस- 'समय समस्त कर्मरूपी धन जलकर खाक होजाता है और वस्वरूपमें लीन होनाने से बाइय पदार्थोंके अच्छे बुरेका इटोपदेश। मी योगीको मान नहीं होता इसलिये से उनके संबंघसे किसी भी प्रकारका खेद नहीं होता ॥ १८ ॥ और मी कहते हैं- अविद्याभिदुरं ज्योतिः परं ज्ञानमयं महत् । तत्प्रष्टव्यं तदेष्टव्यं तद्रष्टव्यं मुमुक्षुभिः ॥ ४९ ॥ अर्थ-बह आनन्दस्वभाव ज्योति अविद्याको नाश करनेवाली महान उत्कृष्ट और ज्ञानमय है इसलिये मोक्षा- मिलापियोंको उसीके विषय में प्रश्न करना, उसीकी भमि- लापा करना और उसीका अनुभव करना चाहिये। भावार्थ-जिस आनन्दका ऊपर उल्लेख कर भाये है वह भानंद एक प्रकारकी विलक्षण ज्योति है । वह मानस्वरूप है। उसके समान अन्य पदार्य हितकारी नहीं इसलिये वह उत्कृष्ट महान है। आत्मामें उसके नामरयमान रहनेपर अज्ञानरूपी अर्धशर सर्वया नष्ट होजाता है । इसलिये वह आनन्दस्वरूप ज्योति जब इतनी उत्कृष्ट है, तब जो पुरुष 'मोसके उन भानन्द स्वरूप ज्योतिके प्राप्त करनेके अमि- झापी है उन्हें चाहिये कि वे जब किसीवावका गुरू आदिसे प्रश्न करें तो उस ज्योतिक विषयमें करें । पति- -समय उसी ज्योतिकी अभिलापारक्खें और उसी ज्योतिका अनुभव करें-सार यह है कि मोशामिलापियोंको सोद ।

-- भाषानुवाद सहित। उठते बैठते उस ज्योतिहीका मनन ध्यान रखना चाहिये । तत्वसंग्रहके विपयमें ग्रंथकार कहते हैं-- जीवोऽन्यः पुद्गलश्चान्य इत्यसौ तत्त्वसंग्रहः । पदन्यदुच्यते किंचित् सोऽस्तु तस्यैव विस्तरः ॥ अर्थ-जीव; शरीर आदि पुद्गलसे भिन्न हैं और पुद्गल भी जीवते भिन्न है यही तत्वका संग्रह है और इसके प्रति- रिक जो भी दूसरा है-भेद प्रमेदको लिये कथन है वह उसी का विस्वार है। भावार्थ-यदि वास्तवमें देखा जाय तो सन्मानं तच्ची सत् ही तत्त्व है। किंतु सत तबसे हर एक पदार्यकी असलियतका ज्ञान नहीं हो सकता इसलिये उसके भेदस्वरूप चेतन और प्रचेतन इस प्रकारसे दो तत्व स्वीकार किये गये हैं चेतनसे अचेतन सर्वया भिन्न है और चेतन कभी अचेतन नहीं हो सकता चेतनाके ज्ञान दर्शन आदि भेद हैं। ज्ञानके म- विज्ञान प्रादि भेद हैं, दर्शनके चक्षुदर्शन आदि भेद हैं। अजीब के भी पुद्गल आदि भेद हैं। पुद्गलके अणु स्कंध आदि भेद हैं इसलिये वास्तवमें तो समस्त जगत् चेतन और अचेतन के ही अंतर्गत है। ऐसा कोई जगल्में पदार्थ नही जो चेतन और अचेतन दोमें से एक न हो क्या ज्ञानदर्शनादि वा शरीर श्रा- दिक जो भी भेद मभेद हैं वे इसी तत्त्व संग्रहके विस्तार हैं।

७१ इष्टोपदेश। भगवान पूज्यपाद प्राचार्य शास्त्र अध्ययनका साप्ताद परंपरासे होनेवाला फल निरूपण करते हैं- इष्टोपदेशमिति सम्यगधीत्स धीमान् मानापमानसमतां स्वमताद्वितन्य। मुक्ताग्रहो विनिवसन् सजने वने वा मुक्तिश्रियं निरुपमामुपयाति भव्यः ५१ अर्थ-प्राग्रहरहित और ग्राम किंवा निर्मनवन में निवास करनेवाला जो विद्वान भव्य जीव इष्टोपदेश इष्ट उपदेश-वा इष्टोपदेश शास्त्रका मनन परिशीलन करता है और उससे उत्पन्न हुए पात्मज्ञानसे सन्मान और अनादर दोनोंमें स- मता भाव रखता है वह महानुभाव अनुपम मोक्ष लक्ष्मीको प्राप्त कर लेता है। भावार्थ-जो स्वात्मध्यानका उपदेश देनेवाला है - सका नाम इष्टोपदेश है वह इष्ट उपदेश भी लिया जा सकता है और इष्टोपदेशका निरूपण करनेवाला इष्टोपदेश ग्रंय भी लिया जा सकता है । जो विदान भव्य जीव इष्ट उपदेश वा इष्टोपदेश ग्रंयका मले प्रकार अभ्यास करता है उसके अभ्याससे उत्पन्न स्यात्म ज्ञानसे मान और अपमानमें समवाभाव रखता है यदि कोई सन्मान करता है तो उससे मसन्न नहीं होता और अमान करता है वो नाराज नहीं होता । तया प्रामस्वरूप भले भाशानुवाद सहित। प्रकार ज्ञान होजाने पर पदार्थोंमें जो अच्छे बुरेका आग्रह करने लगता है वह भी छोड देता है इसीलिए ग्राम बावनमें निवास करता है उस पुरुष को परमानंदस्वरूप-मोक्ष सुख प्राप्त हो जाता है । यदि अनादि वासनासे परपदार्थोंमें गग देषका अवसर प्राप्त भी हो जाय तो उस समय भी योगीको अपने स्वरूपका ही ध्यान करना चाहिये । कहा भी है- थदा मोहात्प्रजायते रागद्धेपो तपस्विनः। तदेष भावयेत्वस्थमात्मानं साम्यतः क्षणात् ॥१॥ अर्थात् जिस समय पर पदार्थोंमें मोह हो जानेके कारण योगीके राग और द्वेषकी उत्पत्ति हो जाय तो उस समय उसे अपने स्वरूपमें लीन होकर समता पूर्वक अपनी आत्माके स्वरूपका ही चितवन करना चाहिये ॥ इति इष्टोपदेश समाप्त।

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. ३६१६ ... ६४२११ ... तत्त्वानुशासनके श्लोकोंकी आकारादिक्रमसे सूची। पृ.सं.लो.सं. पृ.सं.हो.सं. अकारादिह ३३ १०७ अमिनमा २०६७ मचेतनं भवे ...४५ १२० अभ्येत्य सम्य .. १४ ४२ अत एयोसमो.७५ २५७ अर्थव्यंजन अत पवान्य ५३ १७३ (भा) अत्रेदानी नि २६ ८३ आकर्षण वशी अप्रैवमाग्रह ६६ २१६ आकारं मरता अपवांगति "२. ६२ महापायो वि अथवाभाविनो":५६ १६२ आत्मनः परि "१७५२ अनादिनिधने "३५ १५२ भात्मानमन्य ५४ १७७ अनंतदर्शन "३७ १२० आत्मायत्तं नि .. ७३ २४२ अनंतवान ७२ २३६ मात्यतिका स्व.७०२३० अनेकांतात्म ७७ २४६ आदौ मध्येऽव " ३१ १०१ अन्यच्छरीर '४५ १४६ मार्त रीडूंच अन्यत्र या २८ ११ अस्ति वास्तव मन्यथा वा स्थिते ३ ६ मात्रवति च ६८ २२६ अन्यात्मामावो.५४ १७६ अप्रमत्तः प्रम १५ ४६ इति चेन्मन्यसे " ७३ २४२ समावोवानि ... २०६४ इति संक्षेपतो " १३ ४. अमिनकर्ट ६ २६ इत्यादीन्मंत्रिणो" ३३ १०८ ... ... १ " पृ.सं.संलो पृ.सं.लो. इंदशकं "५ १८२ किमय बहनो.. ४२ १३८ इष्टे ध्येये स्थिरा"२२ ७२ किमश्चदुनो.... ६४ २०६ इंद्रियाण प्र . २४ ७६ किंच नांदय.. ६० १६४ (३) जुभसीस्तनमुद्रा..६३ २०४ उभयसिन्नि ५. १६७ लौरोधिनयो... ६४ २०८ (ए) ग एकाचंचा "१८ ५६ गणमृद्वलयो... २३ १०५ एकानप्रहर्ष. १९ ६६ गुरूपदेशमा... ६० १६६ एकंच का २३ ७३ गुप्तेंद्रियमना.... १२ ३८ च एतवद्धयोरपि... ५११८० चतुस्लिमहा... ३८ १९२९ पदं नासोदि... ४० १३१ चरितारोनचे...२७ ८६ एवं प्रधानमि... १८ ५७ चिंताभावो न... ४८१६० एवमादि यद... १२९६ चेतनोऽनो... ३४ १११ एमादोनि... ६ २१२ चेतता पवता...६ २७ एवं सम्यग्वि एवंविधनिई... ३६ १२५ ज) एवं वैश्वानले... ६३ २०३ जन्मामिपेक... ३८ १८६ जिनंदप्रतिषिवा.. ३४ १० कन्या स... ५० १६४ जिनेन्द्रसिद्धया ७५ कामेघनति... ११३ जीवादयो नबा.८ २५ कर्माधिष्टान... ६५ २१४. जीवादिन्यया. १६५३ ज्ञानवैराग्यर... ५७ १८७ तयानाविष्ट ७ २२ तल चौधय पृ.सं.श्लो.सं. पृ.सं.लो.स अयाहि चैतनो. ४४१४७ २४ 6 तथाहाररमा...६८२१५ शानादर्थातरा... २२ ६६ तदर्यानिद्रि... छानावृत्युद.... १ १० तदा व परमैका.... ५२ १७२ मानं श्रीग.... ६१ १६८ तदा तयाविध्या ४१ १३६ (त) तदास्य योगिनो.....११ १ ततश्च यनगु... ५३ १४४ तदेवानुमवं ५२१७० वत:पंचम.... ततस्त्वं बंध.... ततासोऽनंत.... ७० २३३ सन्मोइस्यैव मा तोऽवतीय... २२८ ततोऽनपेतं य ततोऽयमइत्य... तस्मादेतस्य वतो व्याप्त्या स... ७६ २५१ तस्मान्मोहम ४४१६ तस्वाहानमु.... तत्र सर्व दि.... ६६२२७ ताकतामय १२ ३६ तपासनीम.... तापत्रयोपत तत्र घःहब.... ३ ताम्या पुनः क . सत्रात्मन्यस... २१ ६६ लिष्टत्येव स्वरू १९६६ ३७ ११८ त्रिकालविषय ७२२३८ तबादौ कि.... ५६ १८५ तेजसामुत्तम... २१२८ ३८.१२३ तेन प्रवृधि.. १७. ६३ २२१ तस्मालक्ष्य च . तथापि त.... वयाचमात.

. पृ.सं.लो.सं. पृ.सं.श्लो.सं. ध्यानास्यास तेभ्यः कर्माणि, ६८२२४ ध्याने हि विनते . ४१३३ जसीप्रभृतोधि ६२ २०२ ध्यायते येन त २१ ६७ (द) ध्यायेद {उ ३२१०३ दिधासुःस्वं परं ४३ १४३ ध्येयार्थालंयन २२७० दूरमुत्सृज्य भू ३८ १२४ ग्योधसाम्य ४६ १६३ न देशः कालश्व १३ ३६ नन्यहतमा- ५७१८२ देहज्योतिषिय ७६ २५६ ननु चाक्षत ७३ २४ द्रव्यक्षेत्रादिसा १५ ४८ नमुह्यति न सं"" ७२ २३७ द्रव्यध्येयं व ४० १३२ नहींद्रियधिया" ५० १६६ १६ ५७ नान्योऽस्मिना" ४५ १४८ दाथिकनया ३० ६३ नाम व स्थाप" ३१६९ नालाप्रत्यस्त'. ', धर्मादिश्रदान · १०.३० निश्चयनयेन. १० ३१ धातुपिंडे स्थित ४११३४ निश्चयाव्य" , ३७.६६ ' ध्यातरि ध्याय २३ ७१ ध्याता ध्यानं फ १२ ३७ पश्चादात्मान ध्योतारश्चे २७ ८५ परस्परपण ध्यातोऽहसि ६६ १६७ परिणमते येना ५८ १९० ध्यानस्य व पुन' ६६ २१८ : पश्यन्नात्मान ; द्रव्यपर्याययो - २६३ - M (५) पृ.सं.श्लो.सं. पृ.सं.श्लो.सं. पावनायोऽम ६२२५१ म पुरुषः पुद्गलः ३६ ११७ मत्तः कामादयो ४८१५८ पुंसः ससारबि ७० २३२ ममाइंकारनामाः ५ १३ पूर्व श्रुतेन सं ४३ १४३ महासमा १४.४५ प्रत्याहृत्य यदा १६ ६० माध्यस्थ्यस ४२ १३६ प्रत्याहण्याझ २६ ६४ मिव्याज्ञानाधि अमांस्वल्ल ३८ १२७ मुक्तलोकद्रया प्रमाणनयनिक्षे ६ २६ मुख्योपचार भादुर्भवन्ति चा ६० १६५ मूलव्याप्नुनि ६ २५. प चनकासा २१२५ रवहननो ७४२४४ ४३ १४२ य बंघहेतुपु मु ७ २१ यत सांसारिक ७३ २४३ ४ १२ यत्पुनः पू ६५ २६ बंधहेतु विना बघस्थ कार्य: यथाम्यासेन शा २८.८८ ३ बयोनिबंध यथा निर्वात ५२ ११ २ ४ भ ययायपासमा ५५.१७६ भुनवस्त्रनेत्र ६५.२१५ 'भूतले घा शिला. २६. १२ - ययोजउनमो . २८ ८९ मोक्षहेतुः पु '६६ २२६ मोझलकार १९ ३२ मोहद्रोहम अवता ध्यान बंधहेतुपुस ८ १३ यत्पुनर्वत यवैशमेकदोद्र '३४ ११० यत्र स्खलितं यदव चकिणां ५० १६५ लोकाप्रशिक्ष पृ.सं.श्लो.सं. पृ.सं.श्लो.सं. 'पदचेतत्तथा ४७१५६ ७७ २५४ वपुपोऽप्रति ५१२६८ ८४ २४६ घस्तु याथात्म्यवि ७७२५५ यदात्रिफलं ६६ २१७ घाच्यस्य वाधर्फ ३११०० यदा ध्यानवला ४१ १३५ वीतरागोऽप्प यद्यान रौद्रमा ६७२२० वृश्चिमोहोदया स्वप्यत्यंत ७ २५३ देद्यावं वेदफ० यद्वा पंधश्च मो ७५२४८ व्यवहारनया ४३ १४२ यद्विवृतं यथा ३५ १९३ (ल) यन्मिथ्याभिनि यस्तु नालंयते ४४ १४१ (1) यस्तूत्तमक्षमा शश्वदनात्मो ये कमवा ६४२९० थेन भाविनय शुचिगुणयो ६७ २२२ येऽत्राहुन हि शून्यीभवदिद २५८ यो यत्कर्मप्रभु ६२ २०० श्रीवीरशुभ ७८ २५६ यो मध्यस्थापं १० ३२ २२ ६८ योऽत्र स्वस्वामि ४५ १५१ शु तशानमुदासी २१ ६६ यस्तु याथाल्य २५६ श्रुतेन विफले १६ ५० (र.) (स) रत्नत्रयमुपा शांत कण २६ ४२ शून्यांगोरे गु थेनोपायन श কালন ३१ १०० सच मुक्तिहेतु ( . ४७ १५७ ६३ २०७ सवितयलनु सति हि हात सहद्रव्यमस्ति संष्ट्रिदान सन्नवाहं सदा सताक्षरं महा समाधिस्थेन य सम्यगुरूपदे सम्यमाना सम्यग्नित सस्वयं गरुडो सहयता गुणा सामग्रोतः प्रक सारश्चतुष्टये 'सिद्धस्वाधाव सोयं समरसो संक्षेपेण यः पृ.सं.श्लो.सं. पृ.सं.श्लो.सं. २. संगत्याग: कपा ३६ ११८ साकारंवनि ३७ १२१ ४६ १५३ स्यात्सम्यग्दर्श स्यात्सम्यग्दर्श । १६ ५५ स्वपरक्षति ४६ १५४ स्वयमाखंडलो ६२ २०३ ३२१७४ स्वमिष्टनम ५. १६६ स्वयं सुधाम २८ ८७ स्वरूपावस्थि હ? વાઈ ३६ १३० स्वरूप सर्व ७१ २३५ १४ ४३ स्वात्मानं स्वात्म २३ ७४ ६३२०५ स्वाध्यायाया २५ ६१ ३५ ११४ स्वाध्यायः परम १६ ४६ स्युमिथ्याद ७६ २५२ १ १६ हमंत्रो नमसि (इ) ४१ १३७ हत्पंकजे चतु. ३२ १०२ ३३ १०५ ४२ १४० हृदयेऽट इति तत्वानुशासनके इलोकोंकी अकारादि क्रमसे सूची समाप्त (4) वैराग्यमणिमालाके श्लोकोंकी प्राकारादिक्रमसे सूची। पृ.सं.श्लो.सं. पृ.सं.श्लो.सं. अथिरं परिजन : ६ ११ काते आशा अध्रुव मिदमाक २ ३ का ते कांता ४ अनाद्यखंडाच २५ ६. कात्या स्नपित अर्धचंद्रपुर १६ ४५ कुत्सितकुपि महत्सिद्धमु १२ २५ कुंभवांतेन च २१:४८ अविचलचित्त २३ ५४ केवलकैरविणी २५ ५८ काशे संग १९ ४४ कोणत्रितयस साकाशं संपू (घ) मोथावसन १ २३ प्राणविनिर्गत (इ) (च) इत्यादिक्गुण चितय निजदे ३० ७० वितय परमा एकमनेकस्य (न) को नरके या : ५ ९ जोव जहीहि ८ स्वालानां निकर १७४ एवमादिमंत्रा २३ ५३ (इ) (अ), बत दज्ञान २९ ६७ त) कालमेकमा २५ ४६ तदनंतरमध्ये . २६ ६३ चक्षुर्विषये श्रव एका रोगो झोनार्णवकल्लोल १६ ३७ तस्मानिया तो १७ ३६ मूलठयोध्ये तस्योपरि सिंहा १६ २६ (म) सेन यादवलयेनो १८ ४३ माकुर यौवन (द) मुंब परिरह दुर्गतिदुःख ८ १५ मुंच मुंच विय २६६ मुंब विनोद मासामध्ये नग (य) नामिसरोक्षेप यमनियमास निजदेवस्य स्सर २७ ६४ योजनलक्षण निर्मलचिपा (२) निस्सारयति । १४ ३२ रेफेकलाबिंदु नीलोत्पलदल (4) वालये चयसि पथकादिविधे १३ २७ चिरम विराम २६ ६८ १३ २८ विषयपिशाच चैराजमणि ३० ७१ बदमयचं २८ ६६ व्योमाकार पुरुष २६ ६२ (म) (श) मामलनिजित २० ४७ शरणमरण ( १ ) पूरककुंभकरेव मातम तगृही ६ १२ दिदोगित ३ ६ थियईसोसंग १५ ५६ माठमें पचन .

(१०)
शुद्धरूपचिन्म २४ ५५ सोमदेवसूरे २२ ५९
शोकषियोग ९ ३० संसाराब्धी का
श्रुतशेवलिनो २६ ६१ (इ)
सप्तधातुमय
८. १७ हृदयादानोय च
सावधिवस्तु १२ २६
इति वैराग्यमाणमाला के श्लोकोंकी
अकारादिक्रमसे सूची
समाप्त
इटोपदेशक श्लोकोंकी
आकारादिक्रमसे सूची
ज्ञानोपास्ति
३६ १३ आयुर्व शिक्ष
अमवच्चित्तवि
५४ ३६ आरंभे तापका
२३ १७
अविद्यामिदुरं
(इ)
६६ ४६ इच्छत्येकांतसं
(आ)
इतश्वितामणि ૨૩ ૨e
आगच्छंस्तद्विशे ६४ ४४
इष्टोपदेशमि
आत्मानुष्ठाननि ६७ १७
(ए)
आनंदो निदहत्यु ६८ ४८ 'एकोहं निर्ममः
४३ २७
अविद्वान पुल

परोपतिमुर करस्यता म ५२ २६ कर्म कर्महिता किमिदं को ग गुरुपदेशाद न जोवोऽन्यापुद्ग ४७ ३१ अध्यने मुच्यते ६२ ४२. दन्नपि हिन भवंति प्राप्य य ५० ३३ मुक्कोस्मिताम म ७० ५. गोहेनवृतं १० त य त्यागाय श्रेयसे यया यथान ५७ ३८ २५ ३७ २७ २६ ४ ४४ २८ १८ १३ द दिग्देशेभ्यः दुःखसंदोहया दुरज्य नासुरक्षे न न मे मृत्युः फु नाझो विज्ञत्व निशामयति नि यथा यया समा यस्तोवस्योप यत्र भोकः शिव यस्य स्वयं स्वमा योम्योपादान यो या निवस ₹ रादे पात्यो २ २ ६३ ४३ ५८ ३६ पुहं धनं प परस्परस्ततो অধিৰি वरं चतः पदं ६६ १५ पासनामात्रमे ३७ २० विपतिमात्मनो

विपदभवपदा
१७ १८ स्यसंवेदनसुव्य
१२ १. स्यस्मिन् सदा
३० २१
विराधकः कथ
संयम्य करण
hor
३४ २२ हपोकामना
इति इष्टोपदेशके श्लोकोकी
थाकारादि क्रमसे सूची
समाप्त

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Granthtrayee

Author
Shastri, Lalaram
Title
Granthtrayee
File name
Granthtrayee
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2009/11
Publisher
Calcutta, Jain Siddhantprakashak Press
Language
Sanskrit
Pages
206
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Granth sangrrah
DLI number
344223
Barcode
99999990234101.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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