The Asiatic Society, Kolkata
Fatehpur-parichay
Front matter
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फतहपुर-परिचय
-
"दिनमणि
नर-रत्नोंकी जीवन-गाथा,
पूर्वज प्रमुखोंके कीर्ति-गान ;
अनुसंधानों से लिखे हुए,
कर देते हमको साभिमान ।
--'दिनमणि'
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. फतहपुर-परिचय
ASIATIC SO
साहित्य सुमनमालाका द्वितीय पुष्प
( फतहपुर-शेखावाटी का इतिहास )
शिलालेखों, ताम्रपत्रों और अनेक ऐतिहासिक प्रन्थों
के आधार पर तैयार किया हुआ फतहपुर का
करीब ५०० वर्ष का अबतक का,
सर्वाङ्गपूर्ण प्रामाणिक इतिहास
लेखक और प्रकाशक
श्रीगोपाले 'दिनमावि
LIERAR
प्रस्तावना-लेखक:
डा० श्रीभूपेन्द्रनाथ दत्त, एम० ए० पी-एच० डा.
( All rights reserved )
प्रथमावृत्ति
सन् १९४५ ई०
[ मूल्ब-५)
- प्रकाशक- श्रीगोपाल 'दिनमणि' दिनमणि कुटीर फतहपुर-शेखावाटी (जयपुर) सर्वाधिकार सुरक्षित संवत् २००२ रुलियाराम गुप्ता दी बंगाल प्रिंटिंग वर्क्स, सीनागोग स्ट्रीट, १. 4355
FATEHPUR-PARICHAY
(History of Fatehpur-Shekhawati)
About five hundred years' up-to-date
History of Fatehpur written with
the help of researches & studies
of years by the author.
Author & Publisher
Srigopal "Dinmani"
Preface-writer
Dr. Sri Bhupendranath Dutta, M. A. PH. D.
(All rights reserved)
1st. Edition ]
1945
( Price : Rs. 5/-
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फतहपर-परिचय लेखक- - दिनमारिण श्रीगोपाल 'दिनमणि
समर्पण
-
मैं पढ़ता था, असमयमें तब पूज्य पितामह मेरे,
हुए दिवंगत, किये बिना निज निश्चित सुकृत घनेरे ।
मुझे देखने के इच्छुक वे, 'लेखक' निज जीवन में-
रहे सदा ही, प्रबल कामना थी उनके यह मन में।
सफल हुई वह कान्त कामना उनकी, जब न रहे वे;
होते तो आनन्द-गन्ध ले पुष्पित हो जाते थे।
अतः
अपने उन्हीं
परम पूजनीय, पुण्यश्लोक, दिवंगत पितामह
सेठ श्री ताराचन्दजी जैन
सरावगी ( हरनन्दजीका)
की
स्वर्गस्थ आत्माकी तुष्टि के अर्थ,
उन्हीं की
पुण्य-स्मृति में,
राजस्थानी इतिहास के प्रेमियों को,
यह 'फतहपुर-परिचय' ग्रन्थ
सादर सप्रेम समर्पित
'दिनमणि'
-
प्राक्कथन संसारमें उन्नत्यमिलापी जनोंके लिए, इतिहास भी उन्नतिके साधनों में से एक साधन है। आजकल जितनी भी जातियोंने उन्नति- मेरुकी शिखा पर पहुंचनेकी अभिलाषासे परि कर-बद्ध होकर पैरको आगे बढ़ाया है, उन सबने इतिहासकी ही सहायता ली है। जितने भी देश अवनति-गतसे निकल कर अद्यावधि बाहर हुए हैं, सबको अपने पूर्व पुरुषोंका, प्राचान गौरव-गाथाका और अर्वाचीन इतिहास का पहले अध्ययन करके उसकी अनुभूति करनी पड़ी है। जबतक उनको अपनेपनका भान नहीं था और न इतिहासको ही जानते थे, तबतक वे जानते न थे कि उन्नति किस चिड़ियाका नाम है और कैसे की जाती है ; क्योंकि उस समय वे अज्ञानान्ध थे और अन्धे की तरह जैसा किसाके मुखसे सुनते वैसा ही मान लेते । कालान्तरमें समयने पलटा खाया, तब वे अपने इतिहाससे शनैः २ परिचित होने लगे। ज्यों ही इतिहाससे परिचित हुए, उन्हें अपनी उन्नतिकी सूही ; उन्नति-मार्गके लिए खोज होने लगी, तब कहीं उन्नतिका मार्ग मिला। मार्ग मिलने पर उसका अनुगमन किया गया, तब उन्नति तक पहुंच पाये। इस तरह अपने अप्रकट अतीत इतिहासकी अवगति- द्वारा प्रेरित होकर उन्होंने उन्नति-लाम लिया।
........ ( २ ) उन्नतिका जितना श्रेय इतिहासको है उतना किसी दूसरे विषय के प्रन्थों को नहीं हो सकता ; क्योंकि इतिहास ही ऐसी वस्तु है जिसके द्वारा हम अपनी अतीत गौरवान्वित स्थितिका, जिसको हमने अपनी आँखोंसे नहीं देखा है, अध्ययन कर सकते हैं । हमारे यहाँ इतिहासकी इतनी कमी है कि उसकी पूर्ति होना असम्भव-सा है, क्योंकि एक लम्बे अरसेसे इसका अभाव चला आरहा है। इसके अभावका एक कारण लोगों की अरुचि भी है, जो कि शनै: २ कतिपय इतिहासानुरागियोंके अनवरत उद्योगसे दूर होती जा रही है। वर्तमान समयसे कुछ समय पहले इतिहासका जितना अभाव था, उतना अब नहीं है। अब लोगों में इतिहासके प्रति प्रेम हो चला है, जिसका प्रदर्शन वे लोग यदा-कदा ग्रन्थ प्रणयन-द्वारा करते है। शिलालेखों और ताम्रपत्रोंकी भी बहुत खोज हो चुकी है और कई ग्रन्थ भी इस विषयके रचे जा चुके हैं। जिन २ जातियों और देशांने अपने पूर्व के इतिहालों का अध्ययन किया और उन्हें समझा है, वे उन्नतिक लिए अग्रसर हो चुके हैं। देखिए, जब वे इतिहासको न जानते थे, तब तो वे किंकर्तव्य-विमूढ थे और ज्यों ही उन्होंने इतिहासको जाना त्यों ही उनके मानसमें जादूका-सा असर होगया, जिसके फल-स्वरूप वे उन्नति-प्राप्तिके लिए उत्कण्ठित होगये। इससे इतिहासकी हमारे लिए अतीवावश्यकता है।
( ३ ) इसी आवश्यकताले प्रेरित होकर मैंने भी अपनी रुचिके अनुरूप, शेखावाटीके बड़े और प्राचीन शहर फतहपुरके सम्बन्धमें कुछ लिखने का विचार किया तथा अपने विचारोंको लेकर मैं, फतहपुरके इति- हासकी सामग्री बटोरनेके लिए प्रयत्नशील हुआ। मैंने प्रारम्भमें राजपूताना और शेखावाटीके सम्बन्धमें प्रकाशित कतिपय लेख और एक-दो छोटी पुस्तिकाएँ तथा “शिक्षा-दर्पण' नामक एक पुराने ढंग की पुस्तक-जिसमें फतहपुरके सम्बन्धमें एक छोटा, किन्तु अप्रा- माणिक लेख था-पढ़ी। इन लेखों और पुस्तकोंके पढ़नेसे मेरी फतहपुरके इतिहासके सम्बन्धकी जानकारी ज्यों-की-त्यों रही, लेकिन इस सम्बन्धमें मेरी उत्कण्ठा बढ़ गयी। अपनी रुचिको मैंने अपने पूज्य पिताजीके सामने प्रगट किया; क्योंकि वे इतिहास विषयके प्रेमी एवं अच्छे ज्ञाता हैं। उन्होंने मुझे इस विषयकी एकत्रित अपने पासकी सामग्री दिखायी ; इस सामग्रीमें उनकी २ नोट बुक्स थीं, जिनमें इतिहास तथा अन्यान्य विषयोंक नोट्स थे तथा थे यत्र तत्र से अविकल उद्धरित फतहपुरके कतिपय शिलालेख भी। इन शिलालेखोंसे मुझे प्रेरणा मिली कि मैं फतहपुर के सभी शिलालेखोंका संकलन करूं तो मुझे मेरे इतिहास-लेखनके कार्य में बहुत-कुछ सहायता प्राप्त हो सकती है। मैंने अपने एक-दो साथियोंको लेकर फतहपुरके सभी ऐतिहासिक प्राचीन स्थान एवं दर्शनीय नूसन स्थान देख डाले; इसी समय फतह- पुरके शिलालेखों और ताम्रपत्रोंका संकलन कर, मैं यह “फतहपुर- परिचय" पुस्तक लिखनेमेंप्रवृत्त हुआ।
( ४ ) मेरे इस लेखन-कार्य में मुझे शिलालेखों और ताम्रपत्रोंकी महा- यता तथा और-और निजी खोजके अतिरिक्त मेरे पिताजीके पासको सामग्रीसे-जिसके विषय में ऊपर लिख चुका हूँ-बहुत अधिक सहायता मिली ; तथा फतहपुरकी दरगाहके वत्त मान पीर गुलाम सरवरजी, डा० पं० रामजीवनजी त्रिपाठी और पं० भगवानदेवजी ढण्डसे भी कुछ सामग्री प्राप्त हुई। श्री० देवीदत्तजी धाभाईने समय- समय पर मुझे इस सम्बन्धमें अपने उपयोगी परामर्शसे अनुग्रहीत किया और श्री० गुलजारीलालजी पाण्डेयने उदू और फारभीमें लिखी हुई इस सम्बन्धकी पुस्तकें और शिलालेख पढ़नेमें अपना अमूल्य समय देकर सहायता पहुंचायी। श्री० मोहनलालजी बियाणो और पं० देवकीनन्दनजी खेड़वाल शिलालेखादि संग्रह करनेमें मेरे साथ रहे । डा. हरिसिंहजी विन्द्राने फतहपुर शहरका नकशा तैयार करवा कर श्री० गणपतिजी कमलियाने अपना कैमरा देकर तथा श्री० माँगीलालजी धाभाई (फोटोग्राफर ) ने इतिहासमें दिये गये अधिकांश चित्र खींचकर इतिहासके निर्माणमें मेरा हाथ बँटाया। इन लोगोंका अत्यन्त आभारी हूं। और २ जिन महानुभावोंने, मेरे इतिहास-निर्माण-कार्य में, महा- यता प्रदान की है, उनके नाम हैं-बा० बासुदेवजी गोयनका, बाबू बजरंगलालजी लोहिया, श्री० श्रीलालजी साँवलका, पं० भालचन्द्रजी शर्मा, श्रीमती कृष्णादेवीजी जैन, कु० साँवतसिंहजी शेखावत ( गिरदावल-फतहपुर ), श्री० यूसुफखाँजी ( तहसीलदार-रींगस ), पं० वसन्तकुमारजी शर्मा, पं० लालचन्दजी शर्मा, श्री० मन्नालाल जी कायस्थ, मौलवी मुकारबखाँजी, स्वामी गणपत्यानन्दजी, श्री० बाल- कृष्णजी पोहार, श्री० दयारामजी देवड़ा, श्री० दौलतरामजी बजाज, पं० विश्वनाथजी सारस्वत, पं० बजरंगलालजी सारस्वत, पं० शिवनारायणजी शर्मा, बा० सुदर्शनदासजा अग्रवाल और स्व० श्री. काशीप्रसादजी खेमका । इनका भी मैं उपकार मानता इसके अलावा मुझे पुस्तक-प्रणयनमें निम्नाङ्कित प्रन्थों और पत्र- पत्रिकाओंसे समुचित साहाय्य प्राप्त हुआ है-राजस्थान का इतिहास (कर्नल जेम्स टाड ), राजपूतानाका इतिहास ( गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ), राजपूतानाका इतिहास ( जगदीशसिंह गहलोत ), सीकर की इतिहास, खेतड़ीका इतिहास, मदुम शुमारीकी रिपोर्ट प्र. द्वि० भाग, महाभारत, भारत के प्राचीन राजवंश, भारतीय चरिताम्बुधि, आइन-ए-अकबरी, विल्स रिपोर्ट, विल्स रिपोर्ट का उत्तर, इण्डियन एण्टीक्वेरी, लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इण्डिया, विश्व कोश, बाकयात कौम कायमखानी, कायमरासा, फकरु तवारीख, शिखर वंशोत्पत्ति पीढ़ी वार्तिक, मारवाड़का इतिहास, बीकानेरका इतिहास, सुन्दर प्रन्थावली, सुन्दर विलास, पंचेन्द्रिय चरित्र, बादशाह नामा, यवन राज वंशावली, शजरतुल मुसलमीन, मुसलमानी राज्यका इतिहास, सम्राट अकबर, जहाँगीर नामा, राजपूतानाका भूगोल, शेखावाटीका भूगोल, शिक्षा- दर्पण, आश्चर्य सप्तदशी, कविता कौमुदी, भारतीय आत्मत्याग, तीर्थाटन प्रदीपिका, ऐतिहासिक कहानियाँ, दादूपंथियोंका हस्तलिखित " साहित्य, नागरी प्रचारिणी पत्रिका, दैनिक हिन्दुस्तान (दिल्ली), वीकली अमृतबाजार पत्रिका (कलकत्ता), जयपुर गजट (जयपुर) और प्राचीन पंचांग।" उपर्युक्त प्रन्थोंके लेखकों और पत्र-पत्रिकाओंके सम्पादकोंके प्रति भी मैं कृतज्ञता-ज्ञापन करता हुआ फूले नहीं समाता हूं। भारतके सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ, विविध भाषाविज्ञ और नरतत्त्व शास्त्रके अद्वितीय विद्वान् डा० श्री भूपेन्द्रनाथ दत्त, एम० ए० पी-एच० डी० का भी मैं हृदयसे आभार मानता हूं जिन्होंने इस पुस्तककी प्रस्तावना लिखकर मेरे उत्साहको और इस पुस्तकके महत्त्व को बढ़ाया है। पर्याप्त परिश्रम तथा यथेष्ट समयकी समाप्तिके बाद, यह पुस्तक प्रणयनका कार्य सम्यकतया सम्पन्न हुआ है । पुस्तकमें, (१) फतहपुर के भूगोलके सम्बन्धमें, (२) शेखावाटीकी भूमिका शासन और प्राचीन फतहपुर, (३) फतहपुरके कायमखानी शासक, (४) फतहपुर के शेखावत शासक, (५) फतहपुर के नररत्न और (६) फतहपुरके दर्शनीय प्राचीन स्थान, धर्मायतन और संस्थाएँ नामोंसे ६खण्ड हैं। छठे खण्डमें, नयी खोली गयी संस्थाओंके विवरण (विशेष उल्लेखा योग्य न होनेके कारण) संक्षेपमें पाद टिप्पणियोंमें लिखे गये हैं। सभी खण्डोंमें लिखी गयीं सभी बातें और उनमें यत्र-तत्र आये सन्-संवत् प्रामाणिक हों इसका अधिक ध्यान रखा गया है ; विक्रमी संवत् और ईस्वी सन् दोनोंका प्रयोग किया गया है, पर विक्रमी
( ७ )
...
...
.
संवत को प्रधानता दी गयी है। सारी प्राप्त सामग्री, अन्वेषणानन्तर
प्रामाणिक आधारोंसे निर्णीत होनेके बाद लिखी गयी है। फिर भी मैं
सर्वज्ञ नहीं हूँ; निर्णय करनेमें, सम्भव है, मैं भी भूल सकता हूँ।
भूलमें या अविवेकसे हुई कोई ऐतिहासिक त्रुटि, यदि इस पुस्तकमें
मिले तो पाठक मुझे संशोधनके प्रयोजनसे सूचित करनेकी कृपा करें;
यह त्रुटि यथासम्भव अगले संस्करणमें सुधार दी जायेगी।
साहित्य-सदन कार्यालय,
फतहपुर
७ जून, १६४४ ई०
श्रोगांपाल 'दिनमणि'
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फतहपर-परिचय प्रस्तावना-लेखक- डा० भूपेन्द्रनाथ दत्त, एम० ए०, पी-एच डी० INTRODUCTION. Mr. Srigopal "Dinmani”, the author of the book "Fatehpur-Parichaya”, has gleaned his historical materials pertaining the State of Fatehpur-Sekhawati from various epigraphic and historical records. It is commendable on the part of the young poet which the author is, as is borne by his nom-de-plume, to collect all authentic materials regarding his birth-place and put them in chronological order for perusal of the public. It is imperative for every civilised man in this world to know about the history of his country. In order to understand the present and to dream abont the future, one must know the past of his people. It is generally said that the ancient Indians did not write their histories. But this saying is not accepted today. They have left enough materials dealing with historical matters with the help of which we can gather facts about the past history of India. It is up to us to glean the kern from the husks ( 9 ) and recover the true historical news from the texts testifying the civilization of the past of this country. History is a science, and scientific tests mugt be applied to find out the truth in the records dealing with the history of a country. In that way, we arrive at indisputable facts regarding history. Long ago, when Rajputana came in political contact with the British East India Company, Colonel James Todd was sent to deal with the political situation arising out of this new relation. As a result of his stay there, he collected the annals of each state of Rajputana and wrote the ever-memorable book "Annals of Rajsthan". His records were based on bardio legends and Sagas. Hence it took a highly romantic colour. Moreover, he being under the influence of the scanty ethnological news of his time regarding the Hindu Society and the old tribes, his interpretation in the matter of origin of the ruling tribes living in Rajputana became colourful speculations. The epigraphic and anthropological investigations are gradually weaning away Indian history from this position, though it is not yet free from the speculative romanticism of some of the occidental writers!
( 10 ) It is true, that the subsequent researches of Pandit Gourishankar Hirachand Ojha and others have taken away the romantic halo created by Todd in the name of Rajputana, yet in the place of the Sagas we are getting true historical news by and bye. The young writer of this book belongs to the newer generation of research workers who are trying piece-meal to find out the true history of the province. And we commend his efforts, but it must be said here that he could have availed himself regarding the facts about the so-called meeting of Maharaua Pratap Singh and Raja Man Singh at Kamalmir, the battle of Huldighat from "Akbarnamah", the researches of Professors Jadunath Sarkar and Kanungo who have dis-established the colourful Sagas created by Todd in these matters. The second mistake is made here by following Todd, is the story about the origin of Mababat Khan. He was a Pathan whose tomb lies in Peshawar. The important historical fact that the author has brought out is that the first rulers of Fatehpur, the Kayemkhani family were originally like the Khan Fatehs, of Chauhan Rajput tribe.
( 11 ) Besides giving the chronology of the Kayemkhani and subsequent Sekhawat-Rajput rulers, the author has given so far possible the accounts of the important personages of the State who arose in the period following its foundation. Besides the author gives other informations regarding the various institutions that are to be found here. Taking all these together, it has become a handy guide-book for the outsiders. It is to be hoped that the young writer will also collect facts about the socio-economic condition of the people during the period of several centuries that have seen the presence of this State and base these as a part of his data for the second edition of his history-book. 3, Gour Moban Mukerjee St. CALCUTTA. 1, June, 1945. Bhupendra Nath Dutta. A. M. (Brown)., Dr. Phil (Hamburg).
प्रस्तावना "फतहपुर-परिचय" ग्रन्थके लेखक श्री० श्रीगोपाल "दिनमणि" ने फतहपुर-शेखावाटी स्टेट-सम्बन्धी अपनी ऐतिहासिक सामग्री, विविध शिलालेखों और इतिहासोंके रिकार्डो से एकत्रित की है। अपनी जन्मभूमिके सम्बन्धकी तमाम ऐतिहासिक प्रामाणिक सामग्रीके संकलन करने और उन्हें सर्वसाधारणके अनुशीलनके लिए क्रमशः तारीख और संवत् सहित सजानेका, युवक कवि (लेखक)-जैसा कि उनके उपनामसे जाना जाता है-का कार्य प्रशंसनीय है। इस दुनियामें अपने देशका इतिहास जानना, प्रत्येक सभ्य व्यक्ति के लिए आवश्यक है। वर्तमानको समझने और भविष्यके सम्बन्ध में स्वप्न देखनेके प्रयोजनसे व्यक्तिको समाजका भूतकाल जानना होगा। साधारणतया यह कहा जाता है कि प्राचीन भारतवासियोंने अपने इतिहास नहीं लिखे ; लेकिन आज यह कथन मान्य नहीं है। उन्होंने इतिहासके सम्बन्धकी पर्याप्त सामग्री छोड़ी है, जिनकी सहा- यतासे हम भारतके भूतकालके इतिहासके सम्बन्धमें वास्तविक बातें संग्रह कर सकते हैं। छिलकोंमेंसे गूदा एकत्रित करना अथवा इस देशके भूतकालकी सभ्यताके प्रमाणभूत मूल प्रन्थोंसे ऐतिहासिक सत्यको उपलब्ध करना हमारा कर्तव्य है।
( १३ ) इतिहास एक विज्ञान है, और एक देशके इतिहासके सम्बन्धके रिकार्डोंमेंसे सत्य खोज निकालनेके लिए वैज्ञानिक शोध करनी होगी। इस प्रकार हम इतिहास-सम्बन्धी निर्विवाद तथ्यों तक पहुंचते हैं। बहुत दिन पहले जब राजपूताना, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनीके राज- नैतिक संपर्क में आया, कर्नल जेम्स टाड इस नये संपर्कसे पैदा हुई राजनैतिक स्थितिका अध्ययन करनेके लिए भेजा गया। अपने वहाँ (राजपूतानेमें) ठहरनेके फलस्वरूप उसने राजपूतानेकी प्रत्येक स्टेटका इतिहास एकत्रित किया और वह चिरस्मरणीय प्रन्थ "राजस्थान का इतिहास" लिखा। चारण-भाटोंकी पुरानी कथाओं और गीतोंके आधार से उसके रिकार्ड निर्मित थे ; इसीसे इतिहास रोमान्सके गहरे रंगमें रंग गया। इसके अतिरिक्त हिन्दू समाज और प्राचीन जातियों से सम्बन्धित अपने समयके संकुचित, मानव-भिन्नत्य-विज्ञानसे उसके प्रभावित होनेके कारण, राजपूतानेकी शासक जातियोंके सम्बन्धकी उसकी व्याख्या रंगीन कल्पनाएँ बनकर आयीं। शिलालेख-सम्बन्धी और नरतत्त्व-विज्ञान-सम्बन्धी अनुसन्धान क्रमशः भारत के इतिहासको इस स्थितिसे दूर कर रहे हैं, किन्तु अभीतक यह पश्चिमके कतिपय लेखकोंके काल्पनिक रोमान्ससे रहित नहीं हुआ है। यह सत्य है कि पं० गौरीशंकर हीराचन्द ओझा और दूसरे- दूसरे लेखकोंकी, बादमें होनेवाली खोजोंने राजपूतानेके नाममें बनाये हुए टाडके रोमांटिक कथनोंको दूर कर दिया है। चारण-भाटोंके गीतोंके स्थानमें अब हमें वास्तविक ऐतिहासिक बातें मिलती जा रही हैं।
( १४ ) इस प्रन्थके युवक लेखक, नयी पीढ़ीके रिसर्च-करनेवालोंमेंसे हैं, जो प्रान्तीय सत्य इतिहास खोजने में प्रयत्नशील हैं। मैं उनके प्रयास की प्रशंसा करता हूं; लेकिन यहाँ कहना चाहिए कि वे यदि, महा- राणा प्रतापसिंह और राजा मानसिंहकी कमलमीरमें हुई तथाकथित मुलाकात, "अकबर नामे की हलदीघाटीकी लड़ाई और सर यदुनाथ सरकार तथा प्रो० कानूनगो-जिन्होंने इस सम्बन्धमें टाडके बनाये हुए रंगीन चित्रोंको अप्रामाणिक सिद्ध किया है-के अनुसंधानों, के बारे के तथ्योंसे लाभ उठाते तो अधिक अच्छा होता । दूसरी भूल जो यहां की गयी है वह, टाडका अनुसरण करके लिखी गयी, महावतखाँकी उत्पत्तिके बारेकी कहानी है। वह पठान था, जिसका मकबरा पेशावर में है। महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य जो कि लेखाकने प्रस्तुत किया है वह है फतहपुरके प्रारम्भिक शासकोंके बारेमें, कि कायमखानी परिवारकी उत्पत्ति चौहान राजपूत वंशसे थी ; जैसे, फतहलाँ इत्यादि की। कायमखानियों और उनके पश्चात् होनेवाले शेखावत राजपूत शासकोंका तारीख और संवत् सहित इतिहास प्रस्तुत करनेके साथ- साथ लेखाकने स्टेटके विशिष्ट व्यक्तियोंका, जो कि फतहपुरके माबाद होनेके बादसे अबतकके समयमें हुए उपयुक्त विवरण दिया है। इसके अतिरिक्त लेखकने वहांकी अनेक संस्थाओंके सम्बन्धमें भी उल्लेख किया है। हैं , ( १५ ) इन सब विषयोंको लेकर, यह बाहरके लोगोंके लिए एक पथ- प्रदर्शक प्रन्थ होगया है। यह उम्मेद की जाती है कि ये युवा लेखक, स्टेटके कई शताब्दियोंके समयमें हुए लोगोंकी सामाजिक और आर्थिक स्थितिके बारेके तथ्योंका भी संकलन करेंगे और इनको अपने जाने हुए तथ्योंके बतौर अपने इतिहास प्रन्थके दूसरे संस्करण के लिए रख छोड़ेंगे। ३, गौर मोहन मुखर्जी स्ट्रीट, कलकत्ता। १जन, १६४५ -भूपेन्द्रनाथ दत्त (एम० ए०, पी-एच. डी०) विषय-सूची पहला खण्ड ( भूगोल के सम्बन्ध में ) विषय १ .... .... २ .... २ .... .... .... सीमा विस्तार प्राकृतिक विवरण पहाड़ नदी अलवाय वर्षा पैदावार आबादी पेशा कारीगरी .... .... w ... ८ ८ भाषा ( २ ) । .... .... १० .... विषय शिक्षा दर्शनीय स्थान रेल और मोटर सिका राजधानी .... ... .... ११ दूसरा खण्ड .... .... (शेखावाटी की भूमिका शासन और प्राचीन फतहपुर ) शेखावाटीकी भूमि और उसका शासन प्राचीन फतहपुर तीसरा खण्ड ( कायमखानी शासक) चौहानों से कायमखानी खानखाना नवाब कायमखों नवाब ताजखाँ (१) नवाब फतहखाँ नवाब जलालखा नवाब दौलतखाँ (१) नवाब नाहरला नवाब फदनखाँ १८ .... २१ ... २२ ... २६ .... २७ २८ ३० ....
( ३ ) विषय पृष्ठ .... .... .... ४८ .... ... नवाब ताजखाँ (२) नवाब अलिफखाँ ३३ नवाब दौलतखाँ (२) ४५ नवाब सरदारखाँ (१) नवाब दीनदारखाँ ४६ नवाब सरदारखाँ (२) नवाब कामयाबखाँ उपसंहार परिशिष्ट १ (क) नवाबोंकी हैसियत ५६ (ख) नवाबोंका राज्य-विस्तार परिशिष्ट २ (क) फतहपुरके कायमखानी नवाबोंके समसामयिक बादशाह ५६ (ख) फतहपुरके कायमखानी नवाबोंका वंश .... .... चौथा खण्ड ( शेखावत शासक) शेखावत राजपूत ५८ .... .... राव शेखाजी राव शिवसिंहजी ६० ६१. ...
( ४ ) विषय ६८ .... ७०. ७२ राव समर्थसिंहजी राव नाहरसिंहजी राव चाँदसिंहजी राव देवीसिंही रावराजा लक्ष्मणसिंहजी रावराजा रामप्रतापसिंहजी रावराजा भैरवसिंहजी रावराजा माधवसिंहजी रावराजा कल्याणसिंहजी ७४ ८६ .... .... ६३ .... ... १०२ परिशिष्ट ३ .... १३० १३० १३० (क) फतहपुरके शेखावत शासकोंके समसामयिक जयपुर-नरेश और बादशाह (ब) फतहपुरके शेखावत शासकोंका वंश (ग) शेखावतोंका वृहद्वशक्ष पाँचवाँ खण्ड (नर-रत्र) सेठ तुहिनमाजी बोगिराज संत गंगानाथनी १३१ १३३ ( ५ ) पृष्ठ १३५ ... १३७ १३८ ... १४१ १४२. १५१ १५७ ... ... विषय कविवर नवाब अलिफखाँ कविवर नियामतखाँ कायमखानी कविवर संत प्रागदासजी कविवर संत संतदासजी महाकवि संत सुन्दरदासजी कविवर संत भीखजनजी जैनाचार्य मट्टारक ललितकीर्तिजी संत बुधगिरिजी संत परमानन्दजी यतिवर हरजीमल्लजी कविवर सेठ रामदयालजी नेवटिया पण्डित जीवणरामजी स्वामी परशुरामजी स्वामी चम्पानाथजी स्वामी अमृतनाथजी सेठ सुखानन्दजी सरावगी मौनी कुशलरामजी वाबू बासुदेवजी गोयनका बाबू बजरङ्गलालजी लोहिया बाबू कन्हैयालालजी चितलागिया बाबू गंगाप्रसादजी भोतीका १५६ १६० १६२ १६४ १६७ .... १७२ .... .... .... .... १८४.
छठाखण्ड ( दर्शनीय प्राचीन स्थान, धर्मायतन और संस्थाएँ) विषय पृष्ठ दर्शनीय प्राचीन स्थान फतहपुर का किला ... ... १८६ १६२ .... १६४ .... नवाबी बावड़ी नवाब मलिफखाँका मकबरा धर्मायतन दिगम्बर जैन मन्दिर लक्ष्मीनाथ-मन्दिर पीरजीको दरगाह रामगोपालजी गनेड़ीवालाकी छतरी १६५ १६८ .... २०० .... ... २०२ .... .." २०४ .... संस्थाएँ सरस्वती पुस्तकालय लक्ष्मीनाथ विद्यालय गुरुमुखराय जैन नेवटिया कन्या पाठशाला शेखावाटी संस्कृत विद्यालय चमड़िया हाई स्कूल इस्लामिया मदा २११ २१३ २१४ ... २१५ .... २१८ .... .... २१६ ...
( . ) विषय २२० .... २२१ .... २२४ .... २२६ २२८ .... श्रीकृष्ण पाठशाला राजपूताना अनाथालय शिवनारायण जैन आयुर्वेदिक औषधालय ज्वालाप्रसाद भरतिया इस्पताल पिंजरापोल कबूतरखाना जाप्रत जन मण्डल साहित्य-सदन परिशिष्ट ४ डाकखाना और तारघर फतहपुरके बाहर छोड़ी हुई बीहड़ (१) नवाब की बीहड़ (२) कसेरों की बीहड़ २३१ २३२ २३५ .... २३७ २३८ २३८ २३६ २३६ .... मन्त्रालय
चित्र-सूची
चित्र
पृष्ठ
प्रारम्भमें
"
विवरणके आसपास
लेखक
प्रस्तावना लेखक
शेखावाटी का नकशा
फतहपुर का नकशा
फतहपुर के कुछ भाग का विहंगम दृश्य
फतहपुर के टीबों का दृश्य
नवाब दौलतखाँ (२)
राव शेखाजी
वर्तमान जयपुर-नरेश
क्तमान सीकर-नरेश
महाकवि सन्त सुन्दरदासजी
स्वामी अमृतनाथजी
स्व० सेठ सुखानन्दजी सरावगी
बाबू बासुदेवजी गोयनका
बाबू बजरंगलालजी लोहिया
"
"
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फतहपुर का किला
( 8 )
विषय
पृष्ठ
विवरणके आसपास
"
"
नवाबी बावड़ी
नवाब अलिफखों का मकबरा
दिगम्बर जैन मन्दिर
लक्ष्मीनाथ-मन्दिर
रामगोपालजी की छतरी
सरस्वती पुस्तकालय
चमडिया हाई स्कूल
भरतिया हस्पताल
इतिहासों में अंकित हैं गौरव के मधुमय गान;
इनमें ही तो संचित है इतिहासज्ञों का ज्ञान ।
स्मृतियाँ, अतीत की लेकर निर्माण हुए इतिहास;
स्मृतियों से झाँका करता भावी का विमल विकास ।
--'दिनमणि'
मनमोमरंमंडला ४० शखावाटी फतहपुर-परिचय लो हा X का पिलानी असमीमर प मरजगढ़ चिडावा क्सिाऊ टाई दगड रामगढ़ पंच नत्र सुस्ताना राममौसर मुझन साई मिहाना. रजननट मएडावा शिवनाथपुर बाव फतेहपुर खेतडी बडगांक . •चूड़ी मुकन्दगद इन्टलोद नवलगढ़ लक्ष्मण गद सडी तालडापर गुदा सुजानगढ़ किण्डोली पाटोदा मुनाचगदः .... नेठवा. रुलाजी मौकर शामपुरला ५ पलमाना माना •१. मौस रोमाधोपुर जो य पु र रोगाम
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फतहपुर-परिचय..- फतहपुरका नकाशा Sealed"=1hule अमृताजी भा/भाम मौना दौलताबाद जाब al IM - जानेवाली सड़क उगविणार सेशन रेलवे स्टेशन हालला मकबरा लक्ष्मीनाथ- मंदिर हरनंरजीको जैनमंदिर मोरी पावडी० पा सरस्वती पुस्तकालय पित रेलवे लाइन पीरजीकर आहे. तालाब वा ब की धर्मशाला पाना hoda m. तालाब (डा. हरिसिंहजी विन्द्रा के सौजन्य से प्राप्त )
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फतहपुर-परिचय
पहला खण्ड
नाम
-RA
फतहपुरकी भूगोल के सम्बन्धमें
फतहपुर, राजपूताना प्रान्तान्तर्गत जयपुर। राज्य के सबसे
बड़ शेखावाटी': जिलेका बहुत पुराना और बड़ा शहर है। यह
नवाबी जमानेका बसा हुआ है, नवाब फतहखाँने
इसे बसाया था, इससे फतहपुर नाम प्रसिद्ध हुआ।
* राजपूताना, रेतोला और पहाड़ी प्रान्त है।
मारवाड़,
मेवाड़,
हाड़ोती, ढूढार, जादीवाटी, मेवात, मेरवाड़ा और मालानी प्रभृति इसके
मुख्य २ भाग हैं। अर्वली पर्वतकी शृङ्खला इसे दो प्राकृतिक भागों में
विभाजित कर देती है, जो कि पश्चिमी विभाग और पूर्वी विभाग हैं।
+ जयपुर महाराजा सवाई जयसिंहजीने विक्रम संवत् १७८५ में
बसाया और अपने नामसे इसका जयपुर नाम प्रसिद्ध किया।
शेखावटी, राजपूतानाके अन्तर्गत जयपुर राज्यका एक बड़ा जिला
है। इसकी अवस्थिति ४२०० वर्गमील भूमिपर है। बहुभाग रेतीला है।
बारह शहर शेखावाटी में हैं, जिनमें आठ सुख्य हैं।
.
फतहपुरके उत्तरमें रामगढ़, पूर्व में मंडावा, दक्षिणमें लक्ष्मणगढ़
सात २ कोम की दूरी पर स्थित हैं ; और पश्चिम
सीमा
में पास ही बीकानेर की सीमा है।
उत्तरमें स्वामी अमृतनाथजीके आश्रम से लगाकर, दक्षिणमें
स्थित रामगोपालजी की छतरी तक करीब एक मील और
विस्तार पूर्वमें बूबना के कुएँ से लेकर पश्चिममें राजपूताना
अनाथालय तक करीब डेढ़ मील फतहपुर का
विस्तार है।
फतहपुरकी भूमि रेतीली और बालुकामय है। जहांतहां बालुका
के टीले ( टीबे) ही टीले, जिन्हें स्थानीय रेतीले पहाड़ कह ई
प्राकृतिक
बुरा मालूम न होगा, दृष्टिगोचर होते हैं। कहीं २
जङ्गल ( रोही ) भी हैं, जिनमें झाड़ी, जांट, बबूल,
विवरण
खैर, ककड़ा, कैर और कीकर के वृक्षोंका ही बाहुल्य
होता है। शहरके दक्षिणकी ओर नवाब जलालखाँ की छोड़ी हुई एक
बीहड़ भी है, उसमें भी उपयुंल्लिखित वृक्षोंका ही अवस्थान है।
शहरमें जगह जगह हरित पत्र-परिवृत जाल, पीपल, बड़ और नीम,
प्रकृतिकी शोभामें वृद्धि करते हुए, उसे मनोरम बना देते हैं : एवम्,
साया भी प्रदान करते हैं, जन-समूहके विश्रामार्थ । बढ़ और
पीपल तो, सड़क, मन्दिर और धर्मायतनों में ही पाये जाने हैं ;
पर नीम और जाल प्रायः सभी जगह लगे हैं, यहां तक कि कई
लोगोंने अपने घरों में मो नीम खड़े कर रक्खे हैं।
फतहपुर-परिचय
फतहपुर
के
कुछ भागका विहंगम दृश्य
फतहपुर के टीबों का दृश्य
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वसन्त ऋतुमें जब प्रायः सब वृक्षोंके पत्ते झड़ कर नये पत्ते और कोपल निकलती हैं, तब ये अपनी मनोमोहक सुवाससे चतुर्दिक सुवासित कर देते हैं। उन दिनों वृक्षोंका नूतन वेश-भूषा से परिवेष्टित होना, एक अपूर्व प्राकृतिक नौन्दर्य को सृष्टि करता है। फतहपुर में झील, झरना, नदी और पहाड़ न होनस प्राकृतिक सौन्दर्य की कमी बताई जाती है । परन्तु मैं उसे नहीं मानता। प्राकृतिक सौन्दर्य की भी कई किसमें हैं। पृथक २ स्थानों का प्राकृतिक सौन्दर्य मा, अपनी विशेषताओं को लिये हुए पृथक् २ ही होता है। सूर्योदय के समय बालुका-निर्मित शैल-राशिन स्पर्शित शीतल वायु शरीर में स्फूर्तिका संचार करते हुए प्रकृतिकी महत्ता दिखलाता है ; और चिड़ियोंका कलरव गान तो उस समय कलकंठवाली कोकिलांक सुमधुर स्वर से बढ़कर मालुम होता है। उस समय प्रकृति के हाथों द्वारा निर्मित सुन्दर बालुकामय पहाड़ामें मना तो बड़ाही आनन्द देता है। आनन्दका अनुभव तो प्रकृति मदिर्य के अनुभवीको ही होता है ; अथवा हर रोज उन नीले पहाड़ामें उपस्थिति देनेवाले को। छोटे बड़े टीवोंका चढ़ना और उतरना कम आनन्दद नहीं। मूक प्रकृतिका सुन्दर दृश्य तो यहीं देखने को मिलता है। मुझे इन टीबोंसे स्वाभाविक प्रेम हो गया है। प्रतिदिन मवरे
में
पहाड़
( ४ )
इन बालुकामय
टोलोंमें जाकर चक्कर लगाता और प्रकृति-सौंदय
का निरीक्षण किया करता हूं।
ऊपर कह आये हैं कि फतहपुरमें बलुकामय टीले ही हैं जो रेतीले
पहाड़ कहे जा सकते हैं ; इनके सिवा यहां कोई पहाड़ नहीं है।
यहांसे दक्षिण, पहाड़ोंमें उल्लेखनीय पहाड़ अर्वली पर्वन
है। इसकी बड़ी चोटी ३४५० फीट ऊंची है. जा
रघुनाथपुरमें है। कई छोटी २ पहाड़ियाँ भी पासमें ही हैं । खेतड़ीके
यासमें भी पहाड़ हैं।
यहांसे पासही ७ कोसकी दूरीपर दक्षिणाय लक्ष्मणगढ़की डूगरी
नामक एक पहाड़ी है, जिसे पहले "बड़" गांवकी पहाड़ी कहते थे। इस
पर सीकर * नरेश रावराजा लक्ष्मणसिंहनाने संवत् १८६२ में एक
किला बनवाकर उसके नीचे अपने नामसे लक्ष्मणगढ़ बसाया।
फतहपुरमें कोई नदी भी नहीं है। बरसातमें नाले, नदी बहने
लगते हैं बरसाती नदी यहांकी रेतीली सड़कों में बहकर थोड़ी देर
बाद वहीं सूख जाती है। काटली नदी शेखावाटी प्रान्त
नदी
में है, जो खण्डेलेके पहाड़ोंसे निकलती है, साठ मील
उत्तरमें जाकर बीकानेर के टीमों में
सूख
जाती है।
* सोकर, शेखावाटीका मुख्य भाग है। इसका राज्य-विस्तार उत्तर
दक्षिण ३२ कोस और पूर्व पश्चिम २८ कोस है। सात परगनें हैं, जिनमें
मुख्य सीकर, फतहपुर, रामगढ़ और लक्ष्मणगढ़ ४ शहर हैं। राज्यके
अधिकारमें गांव और कसवे सब मिलकर ४३० होते हैं। सीकर शहरके
चारों ओर चहार दीवारी बनी है। वर्तमान में यह फतहपुरकी राजधानी है।
m
( ५ ) .. फतहपुरको जलवायु स्वास्थ्यके लिये बड़ी लामप्रद है। यहां का पानी कुएँ गहरे होनेकी वजहसे अच्छा है ; क्योंकि पानी जितना हो गहरा होगा, उतनाही अच्छा होगा। यहांकी हवा जलवायु भी शरीरके लिये अच्छा फायदा पहुंचाती है। गर्मीके दिनों में यहां गर्मीका आधिक्य होता है और जाड़ेमें सरदीका। गर्माके दिनों में, गर्मी ११५ डिग्री तक बढ़ जाया करती है ; और दिन भर गर्म हवा (लू) चला करती है। जाड़े में, नीचे ३८ डिग्री तक हो जाती है ; और इतनी सरदी पड़ती है कि किसी २ कुर की खेल भी जम जाती है। वर्षा, फतहपुरमें प्रायः कम हुआ करती है। पन्द्रह या सोलह इञ्च नक वर्षा होती है। सिंचाईके साधन नहीं हैं, कारण कुएँ अत्यन्त गहरे हैं। पासकी बीहड़में तीन ३ पक्के जोहड़े भी हैं, वर्मा जो गर्मी में सूख जाते हैं। सिंचाईका काम वर्षा परही निर्भर है। किसी सालमें वर्षा न हो तो दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ जाता है। पानी यहांपर बहुत गहरा है, इससे कुए बनानेमें बड़ा खर्च पड़ता है। स्थानीय धनियों ने जगह २ पर कुएं बनवा दिये हैं ; पर वे उपयुक्त स्थानों पर न बनने के कारण उतने काममें नहीं आते, जितने आने चाहिए। कहीं तो एकही स्थान पर ३-४ कूए बनवा दिये जाते हैं ; और, कहीं बिलकुल नहीं। कुए उपयुक्त स्थान ढूंढकर बनवाये जायँ, तो विशेष आवश्य कता की पूर्ति हो सकती है। ..
फतहपुरमें सालभर में एकही फसल होती है। प्रायः गुवाँर, बाजरा, मोठ, मूग और चौंला ही यहांकी उपज है। खेतीके लिए जमीन बैल और ऊंटोंसे जोती जाती है । मूली, सौगरी पैदावर गाजर, गन, मतीरी, तोरई, कांदा, लहसुन, तरिया, टमाटर, धनियाँ, पुदीना, पालक, मेथी और नन्हा शाक इत्यादि तरकारियां यहांके कुओंकी बाड़ियों में बहुत होती हैं। गर्मीक दिनामें कैर, मांगर और फोग बहुत आते हैं। बाहर गांववाले, जो आसपासके गांवों में रहनेवाले हैं, शहरमें आकर ये चीज बेच जाते हैं। चौमासेमें मनीरा (तरबूज), और ककड़ी बहुतायतसे आती हैं जो कि बाहर गांववाले अपने खेतों में से लाकर यहां बेच देते हैं। उन दिनों मतीरा-ककड़ीका यह बाजार. बावड़ी दरवाजा नामक यहांके छोटे बाजारमें, सबेरे ४ बजेसे लेकर १० बजे तक लगता है। उन दिनों यहां ककड़ी, मतीरा लेनेके लिए शहरके लोगोंके ठट्टके ठट्ट आ उपस्थित होते हैं; और बाहरसे गांववाले अपने २ खेतोंके मतीरे और ककड़ी लेकर उमड़ आते हैं। इन दिनों रोज सबेरे यह एक मेला-सा लग जाता है; चारों तरफ देखने और खानेमें सुमधुर ककड़ी और मतीरोंसे सजी हुई खारियां ही दृष्टिगोचर होती हैं । शेखावाटीके मतीरे अच्छे गिने जाते हैं। सुनते हैं, संवत् १६६६ में नवाब अलिफखांके राजत्व-कालमें, सम्राट जहांगीरने शेखावाटीके मतीरोंकी प्रशंसा सुनकर, फतहपुरसे एक मतीरा अपने दरवारमें मंगाया था, जो कि वजनमें ३३।। सेरका हुआ था। . ,
मनुष्य-गणनाके
करीब १०००
बरसातमें यहांकी भूमि घाससे आवृत होकर हरित-वसना
हो जाती है। इन दिनों गाय, भैंस, बकरी वगैरह इन्हीं स्थानों में
चरकर अपनी उदर-पूर्ति करके मालिककी सेवामें दूध देनेके लिए आ
जाती हैं; और उन्हें दूध देकर अपनी स्वामि-भक्ति और परोपकार
का परिचय देती हैं।
फतहपुरमें, सन् १६४१ की
अनुसार
करीब तेईस
सहन २३००० मनुष्योंकी आवादी है। जिनमें करीब १५००० तो
हिन्दू हैं, जो हिन्दू धर्मके अनुयायी
आबादी
जैन ( अग्रवाल, खण्डेलवाल और ओसवाल) हैं, जो
भगवान ऋषमदेव द्वारा प्रचारित जैन धर्मके सिद्धान्तोंको माननेवाले
हैं; करीब ७००० के मुसलमान हैं, जो मुहम्मद पैगम्बरके धर्मोपदेशों
पर चलनेवाले हैं।
फतहपुरीय अधिकतर लोग (जाट, माली, गूजर वगैरह) खेती
करनेवाले हैं। वे लोग भेड़, बकरी, गाय, भैंस, ऊँट वगैरह
भी पालते हैं और उनमे अपनी जीविकोपार्जन का काम
पेशा
लेते हैं। उनमेंसे बहुत से मेहनत मजदूरी और नौकरी
करके भी अपना पेट भरते हैं। व्यापार करनेवाले महाजन लोग
यहांसे विदेश जाकर विविध प्रकारका व्यापार किया करते हैं। उनमें
से कई नौकरी और दलाली भी करते हैं; और कई पूंजीपतियोंकी
चापलूसी करके ही किसी तरह अपने उदर-गह्वरकी पूर्ति करके
जिन्दगीके दिन पूरे करते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो कि केवल
यजमान- वृत्ति पर ही अवलम्बित रहते हैं। ऐसे लोग ब्राह्मण बोले
( ८ ) जाते हैं। इनके सिवा अन्य जातियां अपना जातीय पेशा करती हैं, जैसे धोबी, तेली, खाती, कुम्हार, नाई, लुहार और सुनार इत्यादि । फतहपुरके पासके बाहर गांवों में ऊन बहुत होती है। गांवके लोग इसका कम्बल और कामला बनाकर लाते हैं और बेच जाते हैं। यहांके बंधेजदार ओढ़ने भी अच्छे रंगे कारीगरी जाते हैं। भाषा फतहपुरस्थ लोगोंकी भाषा राजस्थानी है। ये लोग इमीमें अपना हिसाब-किताव रखते हैं। राजस्थानी भाषाके अक्षर बिना मात्राके होते हैं । जो मुड़िया या सराफी बोले जाते हैं। ये अक्षर लिखने में गोल होते हैं। अक्षराक मात्रा-विहीन होनेसे इस भाषाकी लिखावटको विना अभ्यासवाला नहीं पढ़ सकता। राजस्थानी बोली बोलने में बड़ी मीठी और सुन्दर मालूम होती लोगों का ध्यान दिन-प्रतिदिन शिक्षाकी उन्नतिकी ओर बढ़ता जाता है। जो लोग पहले शिक्षाको उपेक्षाकी दृष्टिसे देखते थे, वे ही आज यहां शिक्षाके लिए अपना प्रेम-प्रदर्शन कर रहे हैं, जिसके फलस्वरूप आज कई पाठशालाएँ फतहपुरमें विद्यमान हैं। पहले लोग अपने बालकोंको ब्राह्मण गुरुओंके पास भेज देते थे, स्वयं जिनके लिए काला अक्षर भैंस बराबर था। वे लोग उनको पट्टी-पहाड़ा और मुड़िया अक्षर सिखाकर अपने कर्तव्यकी इतिश्री कर देते थे। इस तरह लड़के संसारके ज्ञानाम्बुधिकी एक भी बूंद पान न कर सकते थे। शिक्षा ( 8 ) प्रारम्भमें संवत् १६५१ में मास्टर श्यामलालजी यहां आये और बड़े बाजारमें एक चोबारा किराये पर लेकर उसमें privilteschool स्थापित की, जिसमें उन्होंने लड़कोंसे II) आठ आना महीना लेकर महाजनी. हिन्दी और अंग्रेजी पढ़ाना शुरू किया । थोड़े दिन उक्त चौबारे में पढ़ाया ; बादमें टीकूरामजी केजड़ीवालके नोहरेमें पढ़ाते रहे । तदनन्तर हुकमीचन्दजी चौधरीने अपने नोहरेमें एक पाठशाला खुलवाई. जिसमें अयोध्याप्रमाद नामक एक ब्राह्मण मास्टर अध्यापन करते थे। संवत् १९५६ में स्थानीय कुछ उत्साही सज्जनों (गंगाप्रसादजी भोतीका, पूर्ण मलजी सरावगी मेरे पूज्य पिता", रामपालजी सरीफ ) ने मिलकर सेठ हरनन्दगयजीके कुए के पास एक सरावगीकी हवेलीमें आर्य पाठशाला खोली जो लगभग १० वर्ष तक जीवित रही होगी। पहले तो जिन लोगोंने आर्यपाठशाला खोलनेका उत्साह दिखलाया था, वे ही पढ़ाते रहे; बादमें रामनारायण नामके एक मास्टरको पढ़ानेके लिए रख लिया । शिक्षाकी तरफ लोगों का ध्यान बढ़ता गया यहां तक कि कुछ समय बाद स्थानीय सेटाने स्कूलें स्थापित करके अपनी उदारताका परिचय दिया। स्थापित स्कूलोंमेंसे सिर्फ नेवटिया स्कूल अर्थ की कमीके कारण बन्द हो गयी। दो पुस्तकालयोंका भी उद्घाटन किया गया, एक तो सरस्वती पुस्तकालय, जो वासुदेवजी गोयनका और बजरंगलालजी लोहियाके सदुद्योगका सुफल है। दूसरा दिगम्बर जैन पुस्तकालय, जिसका जन्म सज्जनत्रय (श्रीनिवासजी सरावगी, पूर्णमलजी सरावगी “मेर पूज्य पिता", ठाकरसीदासजी सरावगी ) ( १० ) के हाथोंसे हुआ; परन्तु स्थानीय कुछ अपढ़ जनोंको यह काम न रुचा। वे लोग इसे आर्यसमाजियों की संस्था बतलाते थे, और हाथ धोकर इसके पीछे पड़े हुए थे जिसके फलस्वरूप उक्त संस्थाका सदाके लिए अन्त होगया। वर्तमान में यहाँ ४ अंग्रेजी स्कूल। (२ अपर प्राइमरी, १ मिडिल और १ मैट्रिक), १ संस्कृत विद्यालय, २ कन्या-पाठशालाएँ, १ हरिजन पाठशाला, १ खातियोंकी पाठशाला, १ मुसलमानोंका मदमा, और ४ पुस्तकालय हैं । फतहपुरका किला, नवावी बावड़ी, अलिफखां नवाबका मकबरा, दर्शनीय रोमगोपालजी गनेडीवालाकी छतरी और सरस्वती पुस्तकालय इत्यादि फतहपुरकी दर्शनीय इमारते हैं। संवत् १६६६ तक फतहपुरमें रेलवे स्टेशन न थी। तक यहांसे आस पासके गांवों में मोटर तथा लारियां ही आया जाया रेल और करती थीं। अब चैत्र कृष्णा १४ संवत् १६६६ (६ अप्रैल मोटर १६४०) से जयपुर स्टेट रेलवेकी ओरसे मीकरसे लक्ष्मण- गढ़ होती हुई फतहपुर तक रेलवे लाइन खोल दी गयी है, तबसे फतहपुरमें रेलवे स्टेशन हो गयी है। रामगढ़को रेलवेकी मोटर लारी जाती-आती है। फतहपुरके नवाबोंका कोई अलग सिक्का नहीं था, इससे यहाँ उस समय बादशाही सिक्के का ही प्रचलन रहा । शेखावतोंके शासन-कालमें सीकरमें टकसाल खुली और सीकरका सिक्का रुपया जारी हुआ, जिसमें भी मुगल बादशाहका ही उस समय नाम लिखा रहता था। यह सिक्का संवत् १६७८ (सन् १९२१) तक उपयोगमें आता रहा। इसके बादसे यहाँ ब्रिटिश गवर्नमेण्टके सिक्के का प्रचलन चला आता है। जिन दिनों फतहपुरमें नवाबी राज्य था, उन दिनों राजधानी होनेका गौरव भी इसे ही प्राप्त था । उस समय इसका राज्य- विस्तार बहुत दूर तक फैला था, ऐसा सुना जाता है; राजधानी परन्तु कहां तक था ऐसा अवगतिमें नहीं आया । संवत् १७८८ से मीकर, फतहपुरकी राजधानी है। राव शिवसिंह जीके समयसे ही यह सीकरके अन्तर्गत है। वर्तमानमें रावराजा- कल्याणसिंहजी सीकरके शासक हैं।
दूसरा रचण्ड mur- शेखावटीकी भूमि और उसका शासन शेखावाटी, राजपूताना प्रान्तके जयपुर राज्यका एक बड़ा जिला है, जिसके अन्तर्गत मीकर, फतहपुर , लक्ष्मणगढ़, रामगढ़, झुंझुनू, नवलगढ़, उदयपुर, ग्वेन ही, विसाऊ, चिड़ावा, मँडावा और सूरजगढ़ आदि १२ शहा हैं। इस जिलेका शासन वत्त मानमें सूर्यवंशी क्षत्रियों की कछवाहा शाखाके शेखावत राजपूतों * के हाथ में है। इन्हींके पूर्वज शेखाजी : के नामसे इस जिलेका नाम भी शेखावटी प्रसिद्ध हुआ ! इससे पहले, जब कायमखानी नवाबोंका शासन था, शेखावाटीकी यह भूमि, फतहपुरवाटी ओर झुंझुनूवाटीके नामसे प्रसिद्ध थी। शेखावाटीका विस्तार ४२०० वर्गमील भूमि पर है। बहुभाग रेतीला है, जहाँ बालुकामय रेतीले पहाड़ोंका बाहुल्य है । इस बालुकामय रेतीली भूमिके सम्बन्धमें भारतवर्षके ख्यातनामा विवध भाषा-विज्ञ, ऐतिहासिक एवं पुरातत्ववेत्ता पं० गौरीशंकर ! * शेखावत राजपूतों के सम्बन्धमें इसी पुस्तकके चौथे खण्डमें पढ़िये । + शेखाजीके विषयमें भी चौथे खण्डमें देखिये।
( १३ ) हीराचन्द ओझा ने अपने प्रन्थ 'राजपूतानाका इतिहास' में लिखा है-“राजपूतानेमें जहाँ अब रेगिस्थान है वहाँ पहले समुद्र लहराता था, परन्तु भूकम्प आदि प्राकृतिक कारणोंसे उस भूमिके ऊँची हो जानेपर समुद्रका जल दक्षिणमें हटकर रेतेका पुजंमात्र रह गया जिसको पहले मरकान्तार भी कहते थे। अब भी वहाँ सीप, शङ्ख, कौड़ी आदिका परिवर्तित पाषागरूप (Possils) में मिलना इस कल्पनाको पुष्ट करता है।" इसीसे मिलता-जुलता, इसी विषयका दूसरा उद्धरण, श्री. जमदीशसिंहजी गहलोत लिखित राजपूतानेके इतिहासका है, जो इस प्रकार है-"जो प्रदेश इस समय राजपूताना कहलाता है, वह रामायण कालके पूर्व समुद्र जलसे ढका हुआ था। भूगर्भ वेत्ता मी इस बातसे सहमत है; हैं ; क्योंकि अब तक यहांपर सीप, आदि सामुद्रिक पदार्थ मिलते हैं।" उपयु लिखित उद्धरणों से यह अनुमान होता है कि समस्त राजपूताना की भूमि, जो अब मरु भूमि है, पहले विशाल वारिधिकी अशेष जल-राशिसे आवृत थी। समयके परिवर्तन के साथ प्राकृतिक कारणोंसे समुद्रका मरुभूमिमें परिवर्तित हो जाना, आश्चर्य की बात नहीं है, बहुत-कुछ सम्भव है। इस मरुभूमिके अंतर्गत हमारा शेखावाटी जिला भी आ जाता है। शखावाटी, महाभारतके समयमें महाराजा-विराटके विराट वैभव- पूर्ण मामाज्यके अन्तर्गत रहा है। इसके बादका इसका करीब २५०० ढाई हजार वर्ष का इतिहास, वि० संवत् से २६४ वर्ष पूर्व शङ्ख, कौड़ी - ( १४ ) (ईसवीपूर्व ३२१) तकका, नहीं मिलता है, जो संभवतः नष्ट हो चुका है। वि० संवत् २६४ वर्ष पूर्वका काल मौर्यवंशियोंके शासनका प्रारम्भ काल है। इस वंशमें सम्राट चन्द्रगुप्त और अशोक प्रसिद्ध शासक हुए। तत्पश्चात् यहाँ क्रमशः गुप, हूण, गुर्जर, वैश्य, मौर्य (शाखा), चौहान और जोरवंशके शासकोंका अधिकार रहा । सोलहवीं शताब्दीके प्रारम्भमें कायमखानियोंने जोरवंशी राज- पूतोंसे शेखावाटीका अधिकार छीन कर, अपनी सलतनत कायम कर ली। संवत् १७८७ तक इनका यहाँ अधिकार रहा। इसके बादसे अब तक शेखावत राजपूतोंका आधिपत्य शेखावाटी पर चला आ m-pm-- प्राचीन फतहपुर फतहपुरके प्रथम नवाब फतहखाने (संवत् १५०८ में) फतहपुर के आवाद करनेके अनन्तर, उसको चहारदीवारीसे सुरक्षित किया था। जबतक शहरकी आवादी परिमित रही तब तक उस चहारदीवारीकी मीमा पूर्ववत् बनी रही; पश्चात् कालान्तरमें जनसंख्या एवं गृह- संख्याकी वृद्धि होनेसे वह स्थान-स्थानसे भंग हो गयी। चहारदीवारीसे घिरे हुए तत्तामयिक फतहपुरकी चारों दिशाओं में ४ मुख्य दरवाजे थे, जिनमें से उगणिया दरवाजा अब तक मौजूद है। इनके अतिरिक्त, संभव है, और-और भी छोटे दरवाजे उस समय रहे होंगे।
( १५ ) उस समयकी बनी हुई इमारतोंमें से फतहपुरका विशाल दुर्ग, जैन-मन्दिर, गंगानाथ नीका मन्दिर और बोहगुणका कुआँ आज तक विद्यमान हैं। फतहपुरके तृतीय नवाब दौलतखाँ (१) के समयमें बना हुआ लक्ष्मीनाथका मन्दिर मातवें नवात्र अलिफखाँके वक्तकी बनी बावड़ी, तथा सुन्दरदासजीका मट, और उन्हीं के पुत्र आठवें नवाब दौलतखाँ (२) द्वारा उनके शव पर निमा पत मकबरा इत्यादि इमारतें भी अब नक स्थित हैं। * उपरिलिखित 'बावड़ी" का स्थान दुनियाके सत्रह आश्चर्यामसे है। नवाबी जमाने में इनके चारों ओर एक वृहदाकार वाटिका थी; शायद उसीमें प्रवेश करनेका हो द्वार था वही बावड़ी दरवाजा कह- जो खंडहरक कप अभी कुछ दिन पहले तक मौजूद था। इस सम्बन्धमें यह सविस्तार लिखना अनावश्यक है। नवाबी जमाने की मां हुई ऊपर उल्लेख की गयी इमारताके अतिरिक्त उस समय किन कुएँ भी फतहपुरमें मौजूद हैं। लाया, * इन प्राचीन इमारतीक मागतार विवरण, आगे इसी पुस्तकके छठे खण्डमें यथास्थान दिया गया सिर्फ चोहगुणके कुए के विषय में तीसरे खण्डमें (नवाब फलदायांक विवरणके अन्तर्गत) और गगानाथजीके मन्दिर और सुन्दरदासजीके मटके विषय में पांचवें खण्डमें (क्रमशः योगिराज संत गगानाथजी और कविवर संत भीखजनजीके विवरण के अन्तर्गत) पढ़िये । सुन्दरदासजीक मठका उल्लेख दादनाक यान" के नामसे किया गया है।
( १६ ) रघुनाथपुराका कुआँ, नूयाँका कुआँ, कसाइयों का कुआँ, जादूका कुआँ, सरावगियोंका कुआँ, चौहानका कुआँ, राठौड़का कुआँ, बड़ा कुआँ, शायाँ मुहम्मदका कुआँ, शेखका कुआँ, उगणिया कुआँ ठठेरों का कुआँ धोबियोंका कआँ और महासिंहका कुआँ । * * इन प्राचीन कुओंमेंसे कइयों के विषयमें संक्षिप्त उन्लेख, इसी पुस्तककी पाद-टिप्पणियोंमें यत्र-तत्र प्रसंगवश किया गया
तीसरा खण्ड
-
चौहानोंसे कायमखानी
कायमखानी आतिका प्रवर्तक हिसारका नबाव कायममां था।
नवाब कायमखांका जन्म तो राजपूत चौहान * मातिमें हुआ था,
परन्तु बादमें वह मुसलमान बना लिया गया ।
हिसारके फौजदार सैयद नासिरने जब संबत् १४४० में ददरेरा
पर, बादशाह फीरोजशाह तुगलककी अनुशा पाकर आक्रमण करके
उसपर विजय प्राप्त की, तब ददरेरा-निवासियोंने भागना शुरू किया।
उस समय ददरेरामें सैयद नासिरको एक लड़का हाथ लगा, वह इसे
हिसार ले आया और मुसलमान धर्म में दीक्षित करके उसे मुसलमान
बना लिया।
.
* चौहान, एक राजपूत जाति है। तंवरोंके बाद चौहानोंका ही शासन
दिल्ली पर रहा। मारवाड़ में भी कई जगह इनका राज्य था। मुसलमान
बादशाहोंके जमाने में बहुत से चौहान, मुसलमान बना लिये गये, जिनमें
कायमखानी और खानजादे मुख्य हैं।
+ ददरेरा, राजगढ़ (शेखावाटी) परगनेमें ( राजगढ़ से ८ कोस
पश्चिम ) बोकानेर से १.. कोस पूर्वमें और फतहपुर, झुंझुन् से दक्षिण में
है।
। यहाँ चौहानोंका ही राज्य था।
4355
२
( १८ )
यही लड़का कायमखां नामसे प्रसिद्ध हुआ। यह ददरेराके
चौहान सरदार मोटेराका लड़का था, नाम इसका कामसी
(कर्मसिंह) था। मैयद नासिरने इसे मुसलमान बनाकर “करमसी"
नाममें परिवर्तन करके इसका नाम "कायमखां' ऐसा प्रसिद्ध
किया।
कायमखानी
दिलीपति बादशाह फीरोजशाह तुगलकने संयद नासिरके मरने
पर कायमखांकी योग्यता और वीरता पर मुग्ध होकर उसे हिसारका
नवाब बना दिया था। उसीके वंशधर कायमखानी कहलाते हैं।
बादमें कायमखांके ही दो भाई-और मुसलमान बनाये गये, जो
"जेनुद्दीन" और "जबरुद्दीन" कहलाये। जनुद्दीन क वंशन “जेनदान"
और जबरुद्दीन के “अबवान" कहलाने लगे। बर्तमानमें इन दोनोंक
वंशधरीको भी
कहा जाता है।
खानखाना नवाब कायमखाँ
(हिसारका शासक)
(संवत् १४४१ से १४७५ तक, तदनुसार सन् १३८४ से १४१८ तक)
ददरेराके राजा मोटेराव चौहानका लड़का, संवत् १४४० में
हिसारके फौजदार सैयद नासिर द्वारा मुसलमान बनाया जाकर
कायमखां नामसे प्रसिद्ध किया गया। सैयद नासिरने ददरेरासे
लाकर उसे अपने ही पास रक्खा और लड़के की तरह भरण पोषण
किया था।
( १६ ) गया। फीरोजशाह तुगलकने सैयद नासिरके मरनेके बाद संवत् १४४१ में कायमखाको हिसारका नवाब बनाया, क्योंकि वह पहले से ही उसके गुणों पर मुग्ध था। नवाब हो जानेपर कायमख का प्रताप दिन- प्रतिदिन बढ़ता गया, यहां तक कि बादशाही दरवारमें भी दबदबा हो प्रायः सभी उससे आशंका मानने लगे। नवाब कायमखांको खानखानाकी उपाधि भी प्राप्त थी। उसने ७ स्त्रियाँ विवाही थीं, जिनसे ताजखां, मुहम्मदखां, अखतियारखां (अक्खनखां), अहमदखां; कुतुबखां (कद्दनखां) और मोहनखा इत्यादि क्रमशः ६ लड़के पैदा हुए। बादशाह फीरोजशाह तुगलकका देहावसान संवत् १४९५ में हो जानेके बाद दिल्लीकी बादशाहत अस्थिरावस्था में ही रही। २६ वर्षमें ७ बादशाह दिल्लीके हो गये । फीरोजशाहके बाद ८वां बादशाह सैयद खिजरखा था। कायमखांके प्रताप-सूर्य की प्रखर किरणोंके लापको वह सहन न कर उसका पराक्रम देखकर वह दंग रह गया और उससे मय- भीत होकर संवत् १४७५ में दिल्लीके किले पर से उसे यमुना नदीमें ढकेल दिया, बूडने पर उसका प्राणान्त होगया। नवाब कायमखांके लड़के अहमदखांको तो, उसके (पिताके) साथ ही यमुनामें ढकेल दिया गया। ताजखां और मुहम्मदखांको हिसार से निकाल दिया गया। दो वर्ष बाद जब खिजरखां मर चुका, तब वे हिसारमें आकर राज्य करने लगे। ताजखां और फतहखांके क्रमशः वहां २६ और ५ वर्ष राज्य करनेके बाद वे लोग (मुहम्मदखां नवाज सका।
( २० ) और फतहखाँ) हिसार छोड़कर चले आये और मरुभूमि * में आकर दो नवीन शहर, जिनके निमित्त तैयारियां पहलेसे ही की जा रही थी, आबाद किये, जो झुझुनू और फतहपुर थे। इनकी संतानने फतह- पुर और झुंझुनूमें संवत् १७८७ तक नवाबी की। बादमें शेखावत राजपूतों द्वारा ये दोनों शहर. फतहपुर और झुंझुनूके अन्तिम नवाबों (कामयाबखां और रुहेलखाँ) से ले लिये गये, सबसे वे फतहपुर और झुंझनूसे हाथ धो बैठे। कायमखाँके वंशम-कायमखानी अब विशेषतः मारवाड़, शेखावाटी, हांसी, हिसार, नारनोल और दक्खिन हैदराबाद में बसते हैं। * शुष्क देश, अर्थात् रेगिस्थान से भरी भूमि को मरभूमि कहते हैं। "राजपूतानेमें जहां अब रेगिस्थान है वहां पहले समुद्र लहराता था, परन्तु भूकम्प आदि प्राकृतिक कारणोंसे उस भूमिके ऊँची हो जाने पर समुद्र का जल दक्षिणमें हटकर रेते का पुज मात्र रह गया जिसको पहले मरकान्तार भी कहते थे। अब भी वहां सीप, शंख, कौड़ी आदिका परिवर्तित पाषाणरूप. (Fossils) में मिलना इस कल्पना को पुष्ट करता है।" ----राजपूताना का इतिहास (पहला भाग)
नवाब ताजखाँ (१)
( हिसारका शासक)
(मंवत् १४७७ से १५०३ तक, तदनुसार सन् १४२० से १४४६ तक)
संवत् १४७५ में नवाब कायमखाँ के मरनेपर खिजरखाँ ने
ताजखाँ और मुहम्मदखाँको हिसारसे निकलवा दिया। वे आकर
जेसलमेर और नागौरमें रहने लगे। जब संवत् १४७७ में
खिजरखाँ मर गया, तब वे फिर हिसार लौट आये और शासन
करने लगे।
बड़ा लड़का होनेके कारण ताजखाँको पिताके तख्तका अधिकार
प्राप्त हुआ। मुहम्मदखाँ शासन-कार्यक्री व्यवस्था करता रहा ।
हिसारका राज्य करते हुए दोनों भाइयों ने हिसारके इधर
उधर कई लड़ाइयाँ लड़ीं, जिनसे उनके राज्यका बढ़नेकी बजाय
हास ही हुआ।
इधर जब ताजखाँ हिसारका नवाब हुआ तो उधर मुबारकशाह
खिजरखाँके बाद दिल्लीके तख्त पर बैठा, परन्तु नवाब ताजखों और
उसके भाई मुहम्मदखाँ ने दिल्लीपति की आधीनता में रहना स्वीकार
न किया।
दिल्ली के बादशाह मुबारकशाह ने ताजखाँ और मुहम्मदखाँके
आधीन न होनेसे उनपर अपनी दृष्टिको कड़ी बनाये रखा, परन्तु
दोनों ही प्रबल शक्तिशाली थे, उन्होंने उसकी कुछ परवाह न की,
इससे मुबारकशाहके साथ उनका मन-मुटाव हो गया।
-
( २२ )
1' ........
-
संवत् १४६० में जब दिल्ली में भयङ्कर उपद्रव मचा, उसमें
ताजलाँ और मुहम्मदखाँ ने मुबारकशाहके मन्त्रियोंसे मिलकर उसे
मरवा डाला। उन मन्त्रियोंमें से एक मन्त्री और ताजखाँ भी
आहत हुए परन्तु उचित उपचार से कुछ ही समयमें ताजखाँ
स्वस्थ हो गया।
तदनन्तर १३ वर्ष-और
स्वतन्त्रतापूर्वक राज्य करके नवाब
ताजखाँ संवत् १५०३ में मर गया।
१--नवाब फतहखाँ
(संवत् १५०३ से १५३१ तक, तदनुसार सन् १४३६ से १४७४ तक
हिसार में-
संवत् १५०३ से १५०८ तक
संवत् १५०८ से १५३१ तक
सन् १४४६ से १४५१ तक
सन् १४५१ से १४७४ तक
जब नवाब ताजखाँका देहान्त संवत् १५०३ में हो गया, तब
फतहखाँ हिसारकी गद्दी पर आसीन हुआ। उसने भी अपने पिता
की तरह हिसारके पास कई लड़ाइयाँ लड़कर अपने राज्यको कमजोर
बना लिया।
फतहखाँ बुद्धिमान होते हुए साथमें बहादुर भी था। उसने
हिसारके आसपास अपनी राज्यवृद्धिके लिये जो लड़ाइयाँ लड़ीं, उनमें
भी कुछ कम वीरतासे काम न लिया, बल्कि पूर्ण वीरता प्रदर्शित
की। यह प्रारब्धका ही फेर था जो वह, उन लड़ाइयोंमें सफलीभूत
न हुआ और अपनी राज्यवृद्धि करनेमें असमर्थ रहा।
फतहपुर में-
( २३ ) ......... मांगी। राज्यका वृद्धिगत होनेकी बजाय क्षीणताको प्राप्त होना, फतहखाँ को सहन न हो सका। वह खिन्न मन रहने लगा, यहाँ तक कि उसको अपना जीवन भी भाररूप हो गया था। दुखित चित्त होकर उसने अपने मुसाहिब और मित्रवर्गको बलवाया। उनके सामने अपनी दुखितावस्थाके रोने रोये एवं समयोपयोगी सलाह उन लोगोंने विचारपूर्वक यह सलाह दी कि कोई नया शहर आबाद किया जाय, जिसमें कि आपके जीवनकी घड़ियाँ सुख- पूर्वक करें। उनकी सलाह मानकर मुहम्मदखों * और फतहखाँ दोनोंने ही दो नवीन शहर बसानेकी ठान ली। फतहखाँने "रिणा" नामके गांव (जो फतहपुरसे दक्खिनमें ३ कोसके फासले पर स्थित है) में रहकर संवत् १५०६ । में किला बनवाना आरम्भ किया, जो करीब २ वर्षमें बनकर तैयार हुआ अपने पिताकी बातको ध्यानमें रखते हुए नवाब फतहखाँने भी दिल्ली के बादशाहके अधीन रहना अस्वीकार किया। वह स्वाधीनता- होगा। * मुहम्मदखांने जूझा नामके जाट से सलाह करके उसकी ढ़ानी को शहर का रूप दिया। शहर का नाम जुझा के ही नाम से जूझनू (बाद में मंझुनू बन गया ) रक्खा। :- + इस विषयमें एक पुराने दोहे का निम्नांकित अर्द्ध भाग मिलता है "पंदरह सौ छः साल शुभ बस्यो फतहपुर शहर"
( २४ )
पूर्वक राज्य करता रहा। उसके समयमें दिल्लीका बादशाह भला-
बहीन सैयद हुआ, जिसको उसने उपेक्षाकी दृष्टिसे देखा ।
सैयद बादशाहोंकी बादशाहत शुरूसे अन्त तक कमजोर ही
रही। पीढ़ी दर पीढ़ी कमजोरी बढती गई। उनकी कमजोर
बादशाहत पर बहलोल लोदीको दृष्टि पड़ी। उसने संवत् १५०७
में अलाउद्दीन सैयदसे दिल्ली छीनकर उसपर अपना अधिकार स्थापित
कर लिया। राजे और नवाब जो दिल्लीका स्वामित्व न मानकर
स्वतन्त्रतापूर्वक रहने लगे थे, उन्हें अपने अधीन करनेकी कोशिशें
होने लगी। उस समय वह, हिसारको किस प्रकार छोड़ सकता
था ? हिसार पर भी चढ़ आया और मुहम्मदखों और फतहखाँको
निकाल बाहर किया।
मुहम्मदखाँ और फतहखाँ हिसार छोड़कर चले आये।
फतहखाँ अपने किले ( जो पहले से ही बनाया जा रहा था) में
आ गया। जिस समय वह आया, उस समय किला प्रायः तैयार
हो चुका था।
संवत् १५०८ चैत सुदी ५ को नवाब फतहखाँ ने किले में प्रवेश
किया और शहरको आबाद करके अपने नामसे "फतहपुर'' नाम
रक्खा। इस तरह वह फतहपुरका राज्य करने लगा।
जब नवाब फतहखाँ फतहपुरका राज्य कर रहा था, तब बादशाह
बहलोल लोदीने जैतूर ( पंजाब ) पर चढ़ाई की। नवाब फतहगाँ
ने इसको बादशाहके राजी करनेका एक अच्छा अवसर समझा।
( २५ )
की गई। वह
वह फतहपुरसे एक बड़ी सेना लेकर जैतूर जा पहुंचा और वहाँ
पर बड़ी वीरतासे लड़कर बादशाहको संतुष्ट कर दिया।
जिस समय नवाब फतहखाँ जैतूरकी लड़ाईमें गया हुआ था,
उस समय उसकी अनुपस्थितिमें कांधल (जोधा "जोधपुर बमाने
वाला" का माई ) ने फतहपुर पर चढ़ाई की। बोहगुण ( नवाब
की सेनाका एक सेनापति ) ने कांधलका सामना किया। फतहपुर
से ८ कोस दक्षिण अलखपुरामें भयङ्कर लड़ाई हुई। बोहगुण बड़ी
वीरतासे लड़ा, निदान लड़ते लड़ते उसका शिर कटकर भूमिपर
गिर पड़ा। . इस तरह बोहगुण मारा गया। उसकी लाश फतहपुर
लायी गयी और किलेकी पश्चिमकी बुर्जके नीचे एक जांटके पेड़के
नीचे
दफन वह जांटका पेड़ और का आज तक वहां
मौजूद हैं। पासमें एक कुआँ भी है, जिसको लोग योहगुणका कुआँ
कहते हैं। एक का अलखपुरामें भी बनी, जिसमें बोहगुण का
शिर दफनाया गया था, वह भी आज तक बनी हुई है।
नवाब फतहखाँ, जब लड़ाईसे लौटकर आया तो उसने अलसपुरा
की लड़ाई की सारी बातें सुनीं। सुनकर बड़ा खुश हुआ, माथमें
दुःखी भी। नाबके खुश होनेका कारण तो बोहगुणकी वीरता
और दुःखी होनेका कारण, उसका मारा जाना था।
नवाब फतहखाँने बड़ी योग्यतापूर्वक २३ वर्ष तक फतहपुर
का शासन किया। वह बड़ा वीर और साहसी था। रात, दिन
राज्यकी वृद्धि करनेमें लगा रहता था। संवत् १५३१ तक राज्य
करके मृत्युको प्राप्त हुआ।
२--नवाब जलाल खाँ (संवत् १५३१ से १५४६ तक, तदनुसार सन् १४७४ से १४८९ तक) नवाब फतहखाँ की मृत्यु होनेपर संवत् १५३१ में उसके पुत्र जलालखाँको फतहपुरकी गद्दीका अधिकार प्राप्त हुआ। गद्दीपर बैठतेही उसने अपने नामसे "जलालसर” गांव, फतहपुर से दक्षिणमें ३ कोस की दूरी पर बसाया। नवाब जलालखाँ राजनीति अच्छी जानता था और अपने पिताकी तरह युद्ध विद्यामें भी निपुण था । अपने राजत्वमें नवा। जलालखाँ ने किलेमें महल और मकान भी बनवाये। शहरके दक्षिणकी ओर एक बीहड़ पशुओंके चरनेके लिए १२ कोसके घेरे में छोड़ी, जो पशु पक्षियांके लिए एक आराम का स्थान है। वह बीहड़ आज भी नवाबके दयालु हृदयका स्मरण करा देती है। पशु-पक्षी अपनी सुधासे उपमित ध्वनिमें सबेरा होते ही बीहड़ स्थित वृक्ष-लताओंपर नवाब जलालखाँके गुणगान किया करते हैं ; और गाय, भैंस, बकरी आदि पशु अपनी उदरपूर्ति करके "डाय डाय" धनिमें नवाबको आशीर्वाद देते हुए आनन्दके गीत गाया करते हैं। इससे पता चलता है कि जलालखाँ अमरकीर्ति है। नवाब जलालखाँके ४ औरतें थीं, जिनसे अहमदखाँ, नूरखाँ, फरीदखाँ, दौलतखाँ, निजामखाँ, बहारखाँ दाउदखाँ, एमनखाँ, लाडखों और दरियाखाँ आदि १० लड़के हुए।
( २७ )
संवत् १५४६ तक राज्य करके नवाब जलालखा परलोक
बासी हुआ।
३-नवाब दौतलखाँ (१)
(संवत् १५४६ से १५७० तक, तदनुसार सन् १४८९ से १५१३ तक)
नवाब जलालखाँ के वाद उसका
चौथा
लड़का दौलतखाँ, संवत्
१५४६ में गद्दीपर बैठा। उसने फतहपुरके उत्तरकी ओर अपने
नामसे "दौलताबाद" नामका एक गांव बसाया, जो बादमें फतहपुर
में मम्मिलित होनेके कारण, वर्तमानमें उसीका एक मुहल्ला
(quarter ) है।
नवाब दौलतखाँ को लोग दरदौलतखाँ भी कहा करते थे।
वह इतना बहादुर था कि उसको जीतना किसीके लिये सहज न
था, साथ में बुद्धिमान भी था, जिससे वह पहलेही उत्तम रीतिसे
सोच लेता था। दानी और भक्त भी था। फकीरी करामातोंमें
वह बहुत अधिक विश्वास रखता था, इससे करामात दिखानेका
बहाना करनेवाले फकीर बराबर उसके दरवारमें आया जाया
करते थे।
नवाब दौलतखाँने निम्न लिखित ३ सिद्धान्त बना रक्खे थे :-
(१) ईश्वरसे हरवक्त डरना चाहिए। (२) समदृष्टि होकर न्यायके
आसनपर बैठना चाहिए। (३) जीवन क्षणभंगुर है, ऐसा ध्यान
में रखना चाहिए।
नवाब दौलतखाँ ने संवत् १५६६ में बीकानेरके राव लूणकरणजी
को बीकानेरकी सीमापर स्थित अपने १२० गाँव इस शर्त पर दे दिये
-
( २८ )
कि वे उनपर झुंझुनूवाले नवाबोंकी ओरसे आक्रमण नहीं करेंगे;
क्योंकि झुंझुनू और फतहपुर के नवायोंमें उस समय पारस्परिक
विद्रोह हो गया था।
नवाब दौलतखाँके ३ लड़के हुए, जिनके नाम नाहरखाँ,
जोबनखाँ और वाजीदखाँ थे। नवाष प्रभाका बड़ा हितैषी था।
नियामतखाँ (नवाब
अलिफखाँका पुत्र था) ने भी उसकी प्रशंसा
लिखी है।
मरनेपर नवाब दौलखाँकी कब्र किलेके नीचे दक्षिणमें बनवायी
गयी, जो आजतक है। हिन्दू और मुसलमान दोनों जाति
के लोग इसे पूजते हैं। पासमें २ का और भी हैं।
संवत् १५७० तक नवाब दौलतखाँने न्याय-तस्परतापूर्वक
राज्य करके शरीरोत्सर्ग किया।
४-नवाब नाहरखाँ
(संवत् १५७० से १६०२ तक, तदनुसार सन् १५१३ से १५४५ तक)
संवत् १५७० में नवाब दौलतखाँका लड़ाका नाहरखा राज्या-
सन पर बैठा। वह अच्छा वीर और लड़का हुआ। अपने
समीपवासी वीर राठौड़ों पर उसने कई चढ़ाइयाँ की और विजय
पायी। आसपासके अन्य राजपूतोंको भी उसने जीता और
जनसे अपना स्वामित्व स्वीकार कराया।
( २६ ) नवाब नाहरखाँने फतहपुरके उत्तर और दक्षिणमें ४-४ कोसकी दूरीपर एक-एक (२) गांव आबाद किये जिन्हें अपने नामको अमर करनेकेलिए "नाहरसरा" के नामसे प्रसिद्ध किया। नवाबके ३ लड़के हुए, जिनके नाम फदनखाँ, दिलावरखाँ और बहादुरग्याँ थे। प्रजा-हितैषी होनेके कारण नवाव नाहरखाँको प्रजा बहुत मानती थी। नवाबको हरवक्त ध्यान बना रहता था कि प्रजाको किसी प्रकारसे कष्ट न हो। नवाब नाहरबाँके समयमें दिल्लीकी बादशाहतकी अवस्था अस्थिर बनी रही; कभी कोई बादशाह होता और कभी कोई । कभी पठान तो कभी मुगल। इस प्रकार दिल्लीकी सलतनत इस समय डोलन-हिंडोराकी तरह अस्थायी थी। जिस समय नवाब नाहरखाँ गहोस्थ हुआ था, उस समय दिल्ली के बादशाह सिकन्दर लोदीके राजत्व कालके २५ वर्ष बीत चुके थे। नवाबके गद्दी पानेके ४ वर्ष बाद सिकन्दर लोदी मरा, उसके मरने पर २८ वर्ष में दिल्लीके ४ बादशाह हुए। इस तरह नाहरखांके राजत्व-कालके अन्त तक, ५ बादशाह * संवत् १६०२ तक हुए। फतहपुर जो नवाब फतहखाँके समयसे दिल्लीके बादशाहोंके मातहत था, वह, नवाब नाहरखाँके समयमें ही मातहतीसे मुक्त हुआ * बादशाह सिकन्दर लोदी, इब्राहीम लोदी, बाबर, हुमायूँ और शेरशाह सूर।
( ३० )
था। नाहरखाँके गद्दी पर बैठनेके ३० वर्ष बाद संवत् १६०० में
फतहपुरका राज्य स्वाधीन हुआ।
मातहतीसे मुक्त होने के २ वर्ष बाद तक नवाब नाहरखाँ राज्य
करता रहा। पश्चात् संवत् १६०२ में उसका देहान्त हो गया।
५-नवाब फदनखाँ
(संवत् १६०२ से १६०९ तक, तदनुसार सन् १५४५ से १५५२ तक)
नवाब नाहरखाँकी
मृत्यु हो जानेपर संवत् १६०२ में फदनखाँ
ने नवाबी आसन ग्रहण किया। वह अपने पिताकी तरह वीर होते
हुए साथमें हँस-मुखा भी था। गम्भीरता तो उसके पास फटकने
तक न पाती थी। वीरता और गम्भीरता दोनों ही सखी प्रायः
साथमें रहा करती हैं, पान्तु नवाबमें यह बात न देखी जाती थी।
उसकी वीरता प्रशंमा योग्य थी। गाना सुननेका वह बड़ा प्रेमी था
और साथमें संगीतज्ञ भी था।
अपने जीवनमें नवाब फदनखाँने कई लड़ाइयाँ, छापोली, टोंक
और चिड़ावाके अधिपतियोंसे की और विजय पायी। बीदावतोंको
भी हराया और कई भूमियों पर विजय प्राप्त की।
जिस समय नवाब फड़नखाँका शासन था, उस समय दिल्लीकी
गही पर सलीमशाह सूर अधिष्ठित था, परन्तु उससे फतहपुरके
नवाबका, उस समय किसी तरहका सम्बन्ध न था; कारण नवाब
नाहरखाँके समयमें फतहपुर मातहतोसे मुक्त
चुका था, तबसे
स्वोधन शासन ही चला आता था।
हो
नवाब फदनखाँने अपने नामसे गांव “फदनपुरा" बसाया, जो
फतहपुरसे उत्तर, ३ कोसकी दूरी पर है। नवाबके ३ लड़के हुए, जो
नाजखाँ, फीरोजखाँ और दरियारखाँ नामसे ख्यात थे।
सात ही वर्ष राज्य करके नवाब फदनखाँ, संवत् १६०६ में
परलोक सिधार गया।
६--नवाव ताजखा (२)
(नवत् १६०१ से १६२७ तक, तदनुसार सन् १५५२ से १५७० तक)
नवाब फटनखाँके देहान्त होने पर संवत् १६०६ में, उसका
पुत्र नाजखाँ राज्यासनामीन हुआ। वह इतना सुन्दर था कि लोग
उसकी फोटो मंगाकर, उसकी सुन्दरताको ध्यानसे देखा करते थे।
नवाब ताजखाँ अपनी बहादुरीके लिए प्रसिद्ध था। उसने
अलवर और रिवाड़ी पर २ चढ़ाइयाँ की और विजय पायी।
नवाब नाहरखाँके समयसे फतहपुर ११ वर्ण स्वाधीन रहने के बाद
फिर दिल्लीकी बादशाहतके मातहत हो गया। जब संवत् १६११ में
हुमायूँ , सिकन्दरशाह सूरको हराकर फिर दिल्लीका बादशाह हुआ,
'उस समय फतहपुरमें नवाब ताजखाँ का शासन था, उसने मातहती
मंजूर की।
फतहपुरसे पूर्व में नवाब ताजखाँने “ताजसर (तायसर)" नामक
गाँव बसाया, जो शहरसे करीब ३ कोस पर होगा। नवाबके ८
लड़के हुए, जिनमें सबसे बड़ा मुहम्मदखाँ * था। वह
* मुहम्मदखां, नवाब ताजखाँका बड़ा बेटा था। उसने कारखान और
बराट देशपर चढ़ाई करके विजय पायी। उसका देहान्त नवाब ताजखाँके
जीते-जी ही हो गया।
वह नवाबकी
( ३२ )
जीवितावस्थामें ही मर गया था, जिससे नवाथ बड़ा 'दुखित हृदय
हो गया और उसके लड़के अलिफखाँको अपने पास रखने लगा।
नवाब ताजखाँ प्रायः दिल्ली दरवारमें आया-जाया करता था।
अलिफवाँ भो अपने पितामहके साथ जाता था। सम्राट अकबरक
दरवारमें वह अपने बाबाके साथ कई दफे गया।
अपने बड़े लड़केको असामयिक मृत्युके कारण राज्य मार न
रुचनेसे अपने जीते-जी ही नवाब ताजखाँने समाट अकबरसे
स्वीकृति लेकर संवत् १६२७ में अलिफलाँको नवाबीके सिंहासन
पर आरूढ़ कर दिया । ।
* नवाबोंके यहाँ यह रस्म थी कि यदि बड़ा लड़का उनके जीवनमें ही
मर जाता और उसके पुत्र मौजूद होता तो, नवाबका दूसरा लड़का गद्दीका.
अधिकारी नहीं हो सकता था। यदि बड़ा लड़का निःसन्तान ही मर जाता,
तब छोटा लड़का गद्दी पाता।
इसी रस्मके अनुसार नवाब ताजखाँके बहुतसे और लड़के होनेपर भी,
उसके पौते अलिफखाँको तख्त मिला।
७-नवाब अलिफखा " (संवत् १६२७ से १६८३ तक, तदनुसार सन् १५७० से १६२६ तक) अपने पितामह नवाव ताजखाँक जीते-जी ही संवत् १६२७ में अलिफखाँको माज्यका अधिकार मिल गया। उसका पिता मुह- म्मदखाँ उसकी बाल्यावस्थामें ही मर गया था, इससे अलिफखाँको राज्यका अधिकार मिला। उसने अपने नामसे अलिफसर गाँव बसाया, जो फतहपुरस दक्खिन-पूर्व में ५ कोसकी दूरी पर बेसवा गाँवक पास स्थित है। * नवाब अलिफखाँ फतहपुरके नवाबामें सबसे श्रेष्ठ, प्रख्यात- नामा और बहादुर हुआ। वह भाषाका कवि भी था। साहित्यमें विशेषकर कवितामे उसकी प्रबल रुचि थी। मुगल सम्राट अकबरके दरवार में नवाब अलिफखाँ अपनी बाल्यावस्थासे ही अपने बाबा नवाब ताजखाँके साथ ही जाने लगा नवाब ताजखाँके मरनेके बाद ( अपने राजत्वमें ) मुगलोंके दरवारमें वह पूर्ववत् ही जाता रहा । उसने अपना सम्पूर्ण जीवन मगलोंकी ओरसे लड़ाइयाँ करते ही विनाया। बहुतसे देशों और राजाओं पर उसने सम्राट अकबर और जहाँगीरके राजत्व-कालमें उनसे आदेशित होकर चढ़ाइयाँ की और उन्हें जीत लिया। ---जहांगीरनामा, पृष्ठ २ * यह गांव भूतोंके बहमसे उजाइ हो गया था. संवत् १६०९ में-सेवा जाटने इसका पुनरुद्धार किया । ३
.
फतहपुर-परिचय
बादशाह जहाँगीरके सेनापतियोंमेंसे एक सेनापति नवाब अलिफ
खाँ भी था। वह २ हजारी और १५०० घोड़ोंका मनसबदार था * |
अपने बड़े लड़के दौलतखाँको भी वह शाही दरवारमें ले जाया करता
था। उसके दौलतखाँ, नियामतखाँ । जरीफखाँ, फकखाँ, शरीफखाँ
आदि ५ लड़के थे, सबसे बड़ा उक्त दौलतखाँ ही था।
नवाब अलिफखाँने हलदी घाटीके प्रसिद्ध युद्ध में सम्राट अकबरकी
ओरसे जाकर अपनी वीरताका परिचय दिया था।
उस युद्धका
सकारण विवरण नीचे उल्लिखित किया जाता है ।
सम्राट अकबरसे आदेशित होकर शोलापुर (दक्षिण) विजयार्थ
गये हुए राजा मानसिंह, जब शोलापुर-विजय करके लौटे आते थे तो
रास्तेमें उन्हें महाराणा प्रतापसे मिलनेकी सूझी। वह महाराणासे
मिलनेके लिए कमलमीर :: पहुंचे। महाराणाने अतिथ्योचित स्वागत
करके उन्हें सम्मानित किया।
राजा मानसिंह जत्र महाराणाके यहां भोजन करनेके लिए बैठे,
तब महाराणा प्रताप उनके साथ भोजन करनेको तैयार न हुए, इससे
राजा मानसिंहके क्रोधका वारापार न रहा। वे तत्काल दिल्लीकी
ओर प्रस्थित हुए।
दिल्ली पहुंचकर राजा मानसिंहने सम्राट अकबरसे महाराणाके
पास जानेका वृतान्त आद्यन्त कह सुनाया। सुनकर सम्राट अत्यन्त
कुपित हुआ। युद्धके लिए तैयारियां होने लगीं।
** अलिफखाँ कायमखानी
२ हजारी १५००
+ कायमरासा नामक पुस्तकका प्रणेता ।
* कमलभीर उदयपुरसे उत्तरमें, हलदी घाटीके पास है।
-
( ३५ ) [तीसरा खण्ड सुप- - उधर स्वदेश और स्वजाति पर प्राणोत्सर्ग करनेके लिए द्धत हिन्दू-कुल-रवि महाराणा प्रताप भी लड़ाईकी तैयारीमें लगे। इस तरह दोनों ओरसे लड़ाईकी पूर्ण तैयारी हो जानेपर दोनोंकी सेनाएँ हलदी घाटी * के मैदानमें आ डटीं। संवत् १६३२ में यह लड़ाई हलदी घाटीके मैदानमें लड़ी गयी। सम्राट अकबरकी सेनाके प्रधान सेनापति राजा मानसिंह थे। सेनापति कुमार सलीम था। सलीमको युद्धकी बातें समझानेके लिए मुहब्बतखाँ + था। आसफखाँ, नवाब अलिफखाँ, और राना शक्तिसिंह भी उस सेनामें सम्मिलित थे। दोनों तरफके योधाओंमें भयङ्कर युद्ध हुआ। पश्चात् महाराणाके पराजित होने पर कमलमीर और गोगन्दके किले उनसे छीन लिये गये। महाराणा जंगलकी ओर चले गये। नवाब अलिफखाँने इस लड़ाई में बड़ी वीरता दिखलायी, जिससे लड़ाई विजय करके आने पर उसको सम्राट द्वारा उचित सम्मान प्राप्त हुआ। सम्राट अकबरके दरबारमें बराबर जाते-आते रहनेसे नवाब अलिफखाँकी बातों पर भी सम्राट ध्यान देने लगा था। झुंझुनूका नवाब शमशखाँ, जिससे सम्राटने झुझुनूकी नवाबी छीन ली थी, वह * हलदी घाटी एक पार्वत्य-पथ है, जो कमलमोरके पास ही दक्षिणमें है। "Huldighat is the Thermopyloe of Mewar; the field Deweir her marathon" -rod.. * मुहब्बतखा सगरका लड़का, जो मुसलमान हो गया था।
फतहपुर-परिचय] नवाब आलफखाके पास आया और दुखित होकरके बोला कि मुझे सम्राट अकबरके पास ले जाकर मेरी सिफारिश यदि तुम्हारे जैसे अकबर के दरवारमें उपस्थित होनेवाले के द्वारा की जाय, तब कहीं राज्य मिल सकता है। ये बातें सुनकर नवाब अलिफखाको तरस आया, उसने उसको सम्राटके पास ले जानेका बचन दे दिया। अपने बचनानुसार नवाब अलिफवाँ, शमशखाँको लेकर बाद- शाहके दरवारमें गया और उसके अपराध बादशाहसे क्षमा कराके उसने झुंझुनूका राज्य फिरसे दिलवा दिया। जब काबुलका शासनकर्ता मिजां मुहम्मद हकीम * संत् १६४१ में मर या, तब उसके मन्त्रियोंने मध्य एशियाके तत्कालीन शासक अब्दुल्लाकी सहायतासे अपना स्वतन्त्र राज्य आरोपण करना चाहा। उस समय सम्राट अकबरने राजा मानसिंह, राजा जगतसिंह । और नवाब अलिफबाँको सेना देकर काबुल पर भेजा। उन्होंने वहाँसे महज ही में विजय प्राप्त कर ली। राजा जगतसिंह काबुल राज्यकी सम्भाल करनेके लिए वहीं रहे। राजा मानसिंह और नवाब अलिफखाँ, मिर्जा मुहम्मद हकीमके दोनों बेटोंको लेकर दिल्ली चले आये। * सम्राट अकबरका भाई +राजा मानसिंहका पुत्र
( ३७ )
[ तीसरा खण्ड
संवत् १६६२ में सम्राट अकबरके देहावसान होनेके बाद
जहाँगीर दिल्लीके सिंहासन पर आसीन हुआ।
नवाब अलिफखाँ
सम्राट जहाँगीरके दरवारमें भी पूर्ववत् जाता रहा।
सम्राट जहाँगीरने गद्दीपर बैठतेही संवत् १६६२ में उदयपुरक
राणा अमरसिंह * पर एक सेना शाहजादा परवेजके साथ भेजी,
जिसमें २०००० घुड़सवार
भेजे
। परवेजको
युद्र
सम्बन्धी मंत्रणा
देनेके लिए आसफखाँको भेजा। अब्दुलरज्जाक मामूरी और
मुख्तारवेग मी उचित सलाह देने में प्रवीण समझे जाने पर शाहजादा
के साथमें भेजे गये। इनके अलावा राजा जगन्नाथ राजा
माधवसिंह शेखावत रायसल दरवारी, नवाब अलिफखाँ, शेरखाँ-
पठान, शेख अब्दुर्रहमान, राजा महासिंह, वजीर जमील, वीर
कारखाँ, और राय मनोहर प्रभृति सामन्त इस लड़ाईमें गये थे।
युद्धके अन्तमें समाटकी सेनाने विजय पायी, जिसके फल-स्वरूप
संवत् १६६३ में राणा थाने मंडल की ओर भागकर चला गया।
शाही सेनाने उसका पीछा न छोड़ा। आखिर राणा अमरसिंहको
अधीनता स्वीकार करनी पड़ी।
* महाराणा प्रतापका पुत्र
राजा भारमलका पुत्र
: राजा मानसिंहका भतीजा
• अजमेरसे ३० कोस पर स्थित है। .
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फतहपुर-परिचय]
( ३८ )
संवत् १६६५ में महावतखाँके सेनापतित्वमें एक सेना *
राणा अमरसिंह पर सम्राट द्वारा फिर भेजी गयी। महावतखाँके
साथ नवाब अलिफखाँ, जफरला, शुजाअतखाँ, राजा वरसिंह
देव, किशनसिंह और मुअज्जुलमुल्क बख्शी आदि भेजे
गये। युद्धमें बादशाहकी सेनाने विजय पायी।
रामापर विजय पानेपर संवत् १६६६ में नवाब अलिफखाँ
वगैरह शाहजादा परवेजके सेनापतित्वमें दक्खिन पर भेजे गये।
सेनामें ५००० घुड़सवार और १००० अहदी भेजे। इस लड़ाईमें
गिरिधरराय और वादिसुरराय भी गये थे। घमसान लड़ाईके
बाद सम्राटकी सेना विजयी हुई। नवाब अलिफखाँने इस लड़ाईमें
बड़ी वीरता दिखलायी, जिसके पुरस्कार स्वरूप नवाबको “हरनर" +
और
उदयपुर मिले।
परगना
* सेनामें-घुड़सवार १२०००
अहदी ५००
पैदल बंदूकची २०००
तो
हाथी ६०
रुपये २००००००
-जहांगीरनामा, पृष्ठ १०८
+नाहरखां अफगानकी अधीनतामें था।
* शेखावाटीमें स्थित है।
जब ( ३६ ) [तीसरा खण्ड भिवानीके राजपूत और जाटोंपर संवत् १६६६ में नवाब अलिफखाँ ने चढ़ाईकी और उन्हें पराजित करके लूट लिया। लूट में प्राप्त धन, बादशाहको दे दिया। राजा दलपतसिंहसे शासनाधिकार छीनकर सूरसिंहको बीकानेर का शासक बनाने का अधिक श्रेय नवाब अलिफखाँको था। राजा दलपतसिंह * ने बादशाही आज्ञाके प्राप्त किये बिनाही संवत् १६७० में बीकानेर आकर अपने माई सूरसिंह । की सम्पूर्ण जागीर अपने अधीन करली, तब सूरसिंहकी अधीनताम एक फलोदी ही रहा। आरम्भमें तो बीकानेरमें ही सूरसिंह अपनी जागीर पानेकी कोशिशें करने लगा। बादमें वहां कुछ कार्य-सिद्धिके चिन्ह न देखा पड़नेके कारण वह सम्राटके पास दिल्ली पहुंचा और अपने भाई दलपतसिंह द्वारा अपनी सम्पूर्ण जागीर छीनी जानेकी कथा वहां कह सुनायी। दिल्लीपति पहलेसे ही दलपतसिंह पर रुष्ठ था, क्योंकि वह वगैर शाही इजाजतके दिल्ली-दरवारसे आ गया था। सूरसिंहकी व्यथा-भरी बातोंने सम्राटको दलपतसिंह पर और भी क्रोधित बना दिया। क्रोधावेशमें आकर उसने तुरन्त ५०००० आदमियोंकी सेना नवाब जियाउद्दीनके साथ देकर बीकानेर पर भेजी। यह लड़ाई द्रोणपुरमें हुई। दोनों तरफके योधा धराशायी होगये। * बीकानेरके राजा रायसिंहका लड़का । + दलपतसिंहका भाई और रायसिंहका लड़का ।
फतहपुर-परिचय] ( ४० ) अन्तमें मुसलमानोंकी पराजय होनेपर वे लोग लड़ाईके मैदानसे माग गये। जियाउद्दीन भी अपना प्राण लेकर पलायित हुआ। जियाउद्दीन मागता हुआ दिल्ली पहुंचा। तब बादशाहने नवाब अलिफखाँ और अमीरुल उमराको योग्य जानकर बीकानेर पर भेजा और दलपतसिंहको पकड़ लानेकी आज्ञा दी। सूरसिंहने भागती हुई सेना में से कुछ सेनाको फिर इकट्ठी की और दलपतसिंह का सामना करनेपर उशत हुआ। मम्राटके भेजे हुए नवाब अलिफखाँ और अमीरुलउपरा भी सूरसिंहसे आ मिले । दलपतसिंह एक बड़ी राठौर सेना सहित मैदानमें आ पहुंचा। लड़ाईको शुरू हुए कुछ ही समय हुआ था कि चूरूके ठाकुरने दलपतसिंहको पकड़ लिया। दलपतसिंह पकड़ा जानेपर सम्राटके पास भेज दिया गया । उसने उसे अजमेरके किलेमें कैद करवा दिया। सूरसिंहको सिरोपाव और राजाकी उपाधि दी और बीकानेरका पूर्णाधिकार प्रदान कर दिया। इस लड़ाई में अमीरुलउमरा और नवाब अलिफखाँ ने अच्छी वीरता दिखलायो। संवत् १६७२ में बादशाहने नवाब अलिफखाँको एक सेना देकर मेवाड़के राणा पर फिर भेजा। नवाब वहांसे विजय प्राप्त करके दिल्ली चला आया। संवत १६७२ में मुरतिजाखाँ * के साथ एक सेना कांगड़ा । पर भेजी गयी। उसमें राजा बासुका बेटा सूरजसिंह और नवाब * पंजाबका सूबेदार , कांगड़ाका किला एक सुदृढ़ किला है, जो कि लाहौरके उत्तरमें पहाड़ों 3 ( ४१ ) [ तीसरा खण्ड अलिफखाँ भी गये थे । मुरतिजाखाँ लड़ाई करते हुए विजय होने पहले ही संवत् १६७३ के जेष्ठ मासके शुक्लपक्ष में मारा गया,तब सेना वापिम दिल्ली लौट आयो परन्तु सम्राटको यह न रुचा उसने फिर वही सेना राजा वासुके बेटे सूरजसिंहके सेनापत्विमें कांगड़ भेजी। सोना बोचहीमें भंग हो जानेसे कांगड़ाका किला जीतनेमें बिलम्ब हो गया, इससे किला न जीता गया। उमी माल फिर तीसरी बार इनमादुदौलाके कहनेपर बादशाहने कांगदा जीतनेको एक सेना राजा मानसिंहके सेनापतित्वमें भेजी। नवाब अलिफखाँ उसमें भी गया था। राजा मानसिंह सेना लिये कांगड़ेकी ओर लाहौर होते हुए. जा रहे थे। उन्होंने वहां सुना कि संग्राम * ने बादशाही-राज्यका कुछ हिस्सा दबा लिया है, तब उन्होंने संग्रामको जा घेरा और लड़ाई शुरू करदी। संग्राम इतना शक्तिशाली न था कि राजा मान * पंजाबके पहाड़ी राजाओंमेंसे एक राजा । में स्थित है। यह एक पुराना दुर्ग है। इसके ७ दर्वाजे हैं और २३ बुज हैं। किलेके अन्दरका घेरा एक कोस १५ डोरी है। पाव कोस २ डोरी लम्बाई और चौड़ाई १५ से २२ डोरीके बीचमें हैं। किलेकी ऊँचाई ११४ गज है। २ कुंड किलेमें बने हुए हैं, जो २-२ डोरी लम्बे और ११-१॥ डोरी चौड़े हैं। पहले कांगड़ेमें कटोच राजाओंका शासन था, उन दिनों इसे नगरकोट कहते थे। यहां दुर्गाका एक विख्यात मन्दिर है, जिसे यहां भवन कहते हैं भारतमें यह मन्दिर पहले सबसे अधिक धन-सम्पन्न देवस्थान समझा जाता .
फतहपुर-परिचय] ४२ । सिंहका सामना करे, इससे वह पहाड़ोंमें भाग गया। राजा मानसिंह ने उसका पीछा किया। वह अपने बच निकलनेका रास्ता न देखा कर राजा मानसिंह से भिड़ गया। राजा मानसिंहके एक पत्थरकी ऐसी लगी कि वहीं प्राणान्त हो गया । प्राणान्त होते ही उनकी बची-खुची सेना भाग गयी, इस तरह वे कांगड़ा तक न पहुंच पाये। था। महमूद गजनवीने सन् १००९ में इस मन्दिरको लूटा। सोने चांदी का सामान ७०० मनका; २०० मन सोना, २००० मन चांदी और २० मन रत्न इत्यादि लटकर ले गया। सन् १९०५ में एक भौंचाल हुआ, जिससे भी इस मन्दिरकी बड़ी हानि हुई। इस मन्दिरके पासमें एक गन्धककी खान है, जिसमेंसे रात दिन उत्तप्त ज्वालाकी लपटें निकला करती हैं, जो मूर्ख और अन्ध-विश्वासी लोगोंके लिए दैवी-चमत्कार है। पौराणिकोंकी कपोल- कल्पना है कि शिवकी स्त्री पार्वतीकी छाती इसी स्थान पर गिरी थी, इसीसे यह एक पवित्र स्थान है। यह किला दुर्जय है। दिल्लीके मुसलमान बादशाहोंकी नजर हमेशा कांगड़ा लेने पर रही, फीरोजशाह बादशाह एवं और दूसरे २ दिल्ली के बादशाह इस पर चढ़ाई करते आये, पर इसे न ले सके। सम्राट अकबरने भी इस पर विजय प्राप्त करनेके लिए सेना भेजी थी, परन्तु ऐसा न हो सका । जहांगीरने भी इसे प्राप्त करने में बड़ी कठिनाइयां उठायीं । वह कांगड़े पर ३ बार मेना भेज चुका, पर कुछ सफलता न मिली । आखिर चौथी बार संवत् १६७६ में कांगड़े पर एक सेना उसने भेजी, जिससे कांगड़ा जीतकर अधिकृत कर सम्राट । ,
( ४३ ) [तीसरा खाण्ड
अब कांगड़ा विजय करनेके लिए सम्राटने खुर्रमको नियुक्त
किया। उसने संवत् १६७६ में एक सेना सुन्दर * के साथ कांगड़ा
पर भेजी। सेना ४ महीने तक किलेको धेरे पड़ी रही, जिससे किले
में आने-जानेका रास्ता बन्द हो गया था, इस कारण किलेमें खाद्य
सामनी न पहुँच पायी, जिससे बादशाहकी सेनाके आगे उन लोगोंको
हार माननी पड़ी। मगसिर (अगहन) सुदी २ संवत् १६७७ को
किले पर विजय पायी।
जिस समय कांगड़े पर विजय पायी, उस समय बादशाह लाहौरमें
था। उसके पास कांगड़ा विजयका समाचार भेजा गया। विजय
का समाचार पाकर उसकी खुशीकी सीमा न रही।
अब्दुल अजीजखाँ, कांगड़ेका फौजदार, नवाब अलिफखाँ किले-
दार, शेख फैजुलाह + रखवाली पर नियुक्त किये गये ।
खुर्रमने ३-४ चढ़ाइयाँ दक्खिन पर की थी, उनमें भी नवाब
अलिफखाँ गया था। संवत् १६७८ में सम्राट कांगड़े पहुंचा तब
नवाब अलिफखाँ और शेख फैजुल्लाह उसे स्वागत सहित किलेमें ले
गये। सम्राटने उन दोनोंको हाथी घोड़े देकर उन पर अपनी
* खुर्रमका सेवक
+ मुरतिजाखाँका जमाई
लिया गया।
कांगड़ेकी मीनाकारी और चांदीके गहनोंकी बनावट
मशहूर है।
फतहपुर-परिचय] ( ४४ ) कृपा दिखलायी और स्वयं एक दिन किलेमें रहकर दिल्ली लौट गया। नवाब अलिफवाँ सम्राट द्वारा किसी कार्यवश पटना भेजा गया था; वह वहांसे संवत् १६८० में वापिस लौटा, तब सम्राटने उसे कांगड़े की रक्षाके लिए फिर भेज दिया। संवत् १६८२ में उत्तर पंजाबके पहाड़ोंका फौजदार मर गया, तब सम्राटने नवाब अलिफखाँ को वहांका फौजदार नियुक्त किया । जब नवाब अलिफखा कांगड़में रहता था, तब वहांक पहाड़ियाने संवत् १६८३ में उमसे लड़ाई आरम्भ कर दी। दस दिन तक भव- कर युद्ध हुआ। दोनों तरफके बहुत से योद्धा सदाके लिए सो गये, परन्तु युद्ध अभी तक शांत न हुआ था कि बीचमें ही नवाबके पास एक पत्र आया, जो कि मादिव अलिखा अफगानका था। उसने नवावको ससैन्य अपनी सहायताके लिए लवाया था, पर नवाब कैसे जा सकता था, वह तो स्वयं समरांगणमें था। उसने अपनी सेनाका कुछ हिस्सा सादिब अलिखाँकी सहायतार्थ भेज दिया, तब थोड़ी-सी सेना नवाबके पास बची। थोड़ी सेना देखकर तलवाड़ाके पहाड़ियोंने नवाब पर आक्रमण कर दिया। नवाब बिलकुल दब गया और मारा गया। उसके १३०० सिपाही भी मार डाले गये। नवाब अलिफखाँका शव सन्दूकमें सिया जाकर फतहपुर लाया गया। फतहपुरमें उसे दफनाकर उसके बेटे दौलतखाँने उसकी कब पर एक सुन्दर मकबरा बनवाया, जो कि आज तक फतहपुरमें पूर्वकी ओर मौजूद है।
फतहपुर-परिचय
नवाब दौलतखाँ [२]
राव शेखाजी
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८---नवाव दौलतखाँ (२) संवत् १६८३ से १७१० तक, तदनुसार सन् 1325 से १६५३ तक) नवाब अलिफखाँके मारे जानेके बाद संवत् १६८३ में उसका लड़का दौलतखाँ फतहपुरकी गद्दी पर अधिष्ठित किया गया । भी अपने पूर्वजों की तरह ही वीर था। उसने अपने नामको अमर बनानेके लिए दौलतपुरा” गांव बसाया जो वर्तमानमें बीकानेर जिलेमें है। नवाब दौलतखाँ अपने पिताकी जीवितावस्थामें उसके साथ बाद- शाही दरवारमें जाया करता था, जिससे उसकी वीरता रूपी चिन- गारी उसकी छोटी अवस्था में ही, दरवारमें सुने हुए वीरता-भावो पेत कथानक रूपी पवन द्वारा उत्तेजित हो चको श्री। तीन लड़के नवाब दौलतखाँके हुए, जिन्हें ताहिरखाँ * महरखाँ, और असदखाँ कहा करते थे। बड़ा लड़का ताहिरखाँ था, जो कि गद्दी पानेका अधिकारी था, वह नवाबी जीवितावस्थामें ही मर गया था। नवाब दौलतखाँ ने अपने पिता नवाब अलिफखाँ के राजत्वमें * ताहिरखाँ-नवाब दौलतखाँके तीन लड़कों में सबसे बड़ा था। अपने पिताके साथ, वह बादशाही दरवारमें आता जाता था। उसने अपने नाम में "ताहिरपुरा” गांव बसाया । दो लड़के उसके हुए, जिनके नाम सरदारखा और दीनदारखाँ थे।
फतहपुर-परिचय] ( ४६ ) .. " उससे आदेश पाकर अपने दादा नवाब फतहखाँ द्वारा निर्मापित फतहपुरके किलेका जीर्णोद्धार संवत् १६६२ में करवाया । जीर्णोद्धार के समय ही किलेके चारों ओर खाई भी बनवायी गयी, जो आजतक बनी हुई है। अलिफखाँके राजत्वमें ही संवत् १६७१ में दौलतखाँ की निगाहसे नागोरके शेख महदूद द्वारा “वावड़ी" बनवायी गयी, जो फतहपुरमें आज तक विद्यमान है। सिंहासनासीन होनेके थोड़े समय बाद ही संवत् १६८४ में नवाब दौलतखाँ, सम्राट जहांगीर द्वारा कांगड़ा ( जहां नवाब अलिफखा, सम्राटकी ओरसे किलेदार नियुक्त हुआ था) भेजा गया । कांगड़ेके पहाड़ी लोग अभी तक शान्त न हुए थे। नवाबने वहां जाकर बड़ी वीरतासे काम लिया। पहाड़ियोंको इतना श्रान्त कर दिया कि उनके नाकमें दम आ गया। संवत् १७०१ में बादशाहके दरवारमें सलाबतखाँ और बादशाही ५ सामन्तोंको जानसे मारकर स्वयं भी वहीं मारे जानेवाले अमरसिंह राठौर के अधिकारस्थ नागौर परगनेपर विजय प्राप्त करनेके लिए सम्राट शाहजहाँने संवत् १७०३ में ताहिरखाँ को ही भेजा। ताहिरखा ने नागौर जाकर राठौरोंको घेर लिया, तदनन्तर उन्हें वहांसे मारकर भगा दिया और नागौरको अपने अधिकारमें कर लिया। सम्राट ने उसके नागौर विजयका समाचार सुनकर, उसकी वीरताके पुरस्कार में नागौर उसे ही सौंप दिया। नागौर विजय करके वहां अपना अधिकार स्थापित करनेकी यादगारी में ताहिरखाँ ने नागौरके किलेके पास उत्तर में एक- ( ४७ ) [ तीसरा खण्ड लड़ाईका अन्त भी न होने पाया था कि वि० सं० १६८३ में सम्राट जहांगीरका मृत्यु-समाचार कांगड़ा पहुंचा। समाचार पाकर कांगड़ाके सिपाही और सामन्त दिल्ली आनेको उद्यत हुए, पर नवाब दौलतख्ताँको यह मंजूर न था, इससे वे लोग दिल्ली न आ सके। कांगड़ेके पहाड़ियोंने बादशाहका मरना जानकर नवाब दौलतखाँ पर जोरसे आक्रमण कर दिया। नवाब और उसकी सेनाने मी अपनी वीरता दिखलाने में कसर न रखी । निदान सहस्रों मनुष्योंको यमलोक भेजकर नवाब विजयी मारे गये और जो बाकी बचे वे भाग गये। नवाब विजय करके दिल्ली हुआ। पहाड़ी लोग बहुतसे तो लौट आया। संवत् १७०३ में नवाब दौलतखाँ सम्राट शाहजहां द्वारा ग्वुरा- शान (काबुल) की लड़ाईमें भेजा गया। लड़ाई खतम हो जाने पर नवाब दिल्ली चला आया। तदनन्तर सम्राटने नवाब दौलतखाँको शाहजादा मुराद के साथ बलख बुखाराकी लड़ाईमें जानेका आदेश किया। शाहजादा मुराद मसजिद बनवायी, जो आजतक बनी है। बलख-बुखारेकी लड़ाई जो संवत् १७१० में हुई थी, उसमें भी ताहिरखाँका पिता भेजा गया था। ताहिरखाँ उस समय नागौरमें था। उसने सम्राटको एक पत्र लिखा, जिसमें बलख-बुखाराकी लड़ाई में जानेकी प्रार्थना की गई थी। प्रार्थना स्वीकार हो जानेपर वह बलख-युखारा चला बहां बड़ी वीरता से लड़ा। बादमें वहीं बीमार होकरके मर गया। गया। उसका शव फतहपुर लाकर दफनाया गया।
फतहपुर-परिचय ( ४८ ) उम समय पेशावरमें था, नवाब उससे पेशावरमें जा मिला। इस लड़ाई में नवाबका लड़का ताहिरखाँ भी गया था। लड़ाईका इन्नि- जाम अच्छी तरह किया गया था। अन्दरक मोर्चका प्रबन्ध शाहजाद मुरादने अपने हाथमें लिया और दक्खिनके मोचका प्रबन्ध नवाब दौलतखाँ और रुम्तमखाँको सौंप दिया । लड़ाई लम्बे अरसे तक होती रही। अन्तमें बलख्न-बुखाराके उजबक लोगांको शाहजादा मुरादन बुरी तरह हराकर उन पर विजय पायी। नवाब दौलतखाँका लड़का ताहिरखाँ वहीं बीमार होकर दुनिया से कूच कर गया। ताहिरखाँ का मरना सुनकर, कंधारके पास में लड़ाई करनेमें रत नवाब दौलतखाने संवत् १७१० में लड़ाई में ही प्राण दे दिये। बादशाहने ताहिरखा और नवाबकी मृत्युकी खबर पा कर ताहिरखाके लड़के सरदा खाँको दिल्ली बुलवाकर उमसे सम- वेदना प्रकाशित की और उसे ही फतहपुर का नवाब नियत कर दिया। ह---नवाब सरदारखाँ (१) (संवत् १७१० से १७३७ तक, तदनुसार सन् १६५३ से १६८० तक) नवाब दौलतखां और ताहिरबाँके संवत् १७१० में प्राणान्न हो जानेके बाद, ताहिरखाँ के पुत्र सरदारखाँ को शासनाधिकार मिला। अपने नामसी उसने “सरदारपुरा” गांव आबाद किया। वह स्वशास- नम्थ प्रजाकी और अपने राज्यकी रक्षा करने में हर समय लगा रहता था।
( ४६ ) [ तीसरा खण्ड फदनखाँ नामका एक लड़का नवाब सरदारखाक था, जो असमयमें नवावकी जिन्दगीमें ही मर गया था, इससे नवाब दुःखी रहने लगा। रात-दिन दुःखमें डूबे रहने से उसो राज्य-कार्य अरुचिकर हो गया था, जिससे उसने संवत् १७३७ तक २७ वर्ष ही राज्य करने के बाद गद्दी छोड़ दी और राज्यका अधिकार अपने छोटे भाई दीनदारखाक सुषुद कर दिया । १०---नवाब दीनदारखाँ (मवत् १७३७ से १७६० तक, तदनुसार सन् १६८० से १७०३ तक) संवत् १७३७ में नवाब सरदारखाने, अपने पुत्रकी मृत्युसे दुखित होनेके कारण राज्यासन छोड़कर अपने भाई दीनदारखाँ को गद्दी पर बैठाया। वह पहलेक नवाबोंकी तरह बहादुर और बुद्धि- मान न था; वल्कि शक्तिहीन और मूर्ख था। अपने नाम "दीनदारपुरा" नाम रखाकर नवाब दीनदारखाने एक गांव झुझुनूके रास्तेमें बसाया । नवाब के २ लड़के यदा हुए, जिनके नाम रसीदखा * और मुजफ्फरखा रक्खे गये । कम अकल होनेसे नवाब दीनदारखाँ अधिक दिन तक राज- काज न निभा सका, इससे उसके पौते सरदारखाँने संवत् १७६० में उससे राज्य-भार ग्रहण करके नवाबी अपने हाथमें ले ली। * रसीदखा-नवाब दीनदारखाँका बड़ा बेटा था। उसने अपने नाम से "रसीदपुरा" बसाया। उसके २ लड़के ये-सरदारखाँ और मीरखा। सरदारखाँ उसका बड़ा बेटा था, इससे उसे ही नबाब दीनदारखाँ ने अपनी गद्दीपर बैठाया। ४
mam
.
११ नवाब सरदारखाँ (२)
(संवत् १७६० से १७८६ तक, तदनुसार सन् १७०३ से १७२९ तक)
नवाब दीनदारखाँक राज-काज न सम्माल मकनेके कारण
उसके पौते सरदारखाँको उसके जीते-जी ही संवत् १७६० में गहीं
सौंप दी गयी।
वह भी नवाब दीनदारखाँके समान मूर्ख और
बलहीन था। ऐयाश भी अब्बल दर्जेका था। उसने एक
तेलिनको उसके रूप पर आसक्त होकर, रख लिया था, जिसका
महल अज तक फतहपुरके किलेमें विद्यमान है, जो "तेलिनका महल"
ऐसा कहा जाता है। तेलिन से एक लड़का भी नवाबके हुआ,
जिसका नाम महबूब था।
संवत् १७८२ में नवाब सरदारखाँ ने किसी कारणवश क्रोधावेश
में आकर भोजराजजीके वंशज बरवाके केशरीसिंह और सुखसिंह
को जानसे मरवा दिये थे। यह बात जब भोजराजजीके वंशज
वीरवर शार्दूलसिंहजी ने सुनी, तो वे इतने क्रोधित हुए. कि शिरसे
पैर तक क्रोधाग्निसे तमतमाने लगे। उन्होंने तुरन्त ही राव शिव
सिंहजीको साथमें लेकर १५० सवारों सहित फतहपुर पर
चढ़ाई की।
फतहपुरकी बीहड़में पहुंचकर शार्दूलसिंहजी और राव शिव
सिंहजीने नवाबके ऊंटोके समूहको वहां चरता हुआ पाया, उन्होंने
उस समूहको घेरा। नवाबने अपने सर्वेसर्वा काजीको वहां भेजा।
काजी और शार्दूलसिंहजी वगैरह में लड़ाई छिड़ गयी। अन्तमें
[तीसरा खण्ड काजी और ग्यारह कायमखानी उस स्थान पर मारे गये और बाकी भाग गये। उसी समय से शादूलसिंहजी और राव शिवसिंहजी कायमखानियोंको नीचा दिखाने और उनकी भूमिको उनसे छीन लेनेके लिए प्रयत्नशील हुए। अपने प्रयत्नमें लगे हुए उन्होंने झुंझुनूको संवत् १७८६ में कायमखानियों से छीनकर, उसपर अपना अधिकार कर लिया। बादमें फतहपुर पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहा, इसके लिए वे उचित अवसरकी बाट जोहने लगे। महबूबको अना उत्तराधिकारी बनाना चाहनेके कारण नथाम सरदार खाँसे अन्य कायम ग्वानी सरदार मनमुटाव रखने लगे थे। कायमखानी चाहते थे कि अधिकार महबूबको न मिल कर कामयाब- खाँको मिले ; पर नवाब यह न चाहता था। उसने तो महबूबको ही उत्तराधिकार देना चाहा ; यद्यपि वह कायमखानियोंके कहनेसे कामयाबखाँको दत्तक-पुत्र बना चुका था। कायमखानी नवाबसे बिलकुल असंतुष्ट हो गये। चूड़ी और वेसवाके कायमखानियों ने राव शिवसिंहजी के पास जाकर करवद्ध प्रार्थना की कि “आप फतहपुरका अधिकार कामयाबखाँ को दिलादें, आपकी सेवामें हम २५ गांव भेंट स्वरूप दे देंगे और फतहपुरकी राज्य-व्यवस्था भी आपकी सलाह से की जावेगी।" कायमग्वानियोंकी प्रार्थना सुनकर राव शिवसिंहजी ने काशली के कुंवर रामसिंहको बुलवाया । रामसिंह और प्रार्थी कायमसानियों फतहपुर-परिचय] को साथ लेकर संवत् १७८६ में राव शिवसिंहजी ने फतहपुर पर चड़ाई की। भयङ्कर लड़ाई हुई, दोनों तरफके अनेक वीर आहत हुए और अनेक मारे गये। बाद नवाब ने यह जानकर कि कायमखानियोंने ही शेखावतोंको साथ लेकर चढ़ाई की है, तब वह राव शिवसिंहजीक, चरणों में आ पड़ा। राव शिवसिंहजीने नवाब के लिए नौ हजार रुपया वार्षिक निश्चित किया और कामयावखाँको गद्दी पर बैठा दिया। १२---नवाव कामयाबखाँ ( संवत् १७८६ से १७८७ तक, तदनुसार सन् १७२९ से १७३० तक) नवाब सरदारखाँ, जो महबूबको राज्याधिकार देना चाहता था, उससे राव शिवसिंहजीने राज्यका अधिकार संवत् १८८६ में काम- याबखाँको दिलवा दिया, जो नवाबके छोटे भाई मीरखाँका लड़का था और नवाबके द्वारा दत्तक मी स्वीकृत किया जा चुका था। नवाब कामयाबखाँ अपने से पूर्व के दो नवाबोंकी मांति ही बल बुद्धि से रहित था। वह राज्यकी व्यवस्था पर ध्यान न देकर अपने आरामकी तरफ ही विशेष ध्यान देता था। हिताहितकी बातोंकी उसे पहिचान न थी। राव शिवसिंहजी ने नवाब कामयाबखाँको जब गद्दी दिलवायी थी, तब अपने श्वशुर भावसिंहजी बीदावतको, उन्होंने नवाबका कामदार नियत किया था। नवाब कामयाबखाँ ने गद्दी पान में कामयाब होकर भावसिंहजी और चूड़ी, वेसवाके कायमखानियोंको ( ५३ ) [ तीसरा खाण्ड थोड़े दिनों बादही अपने राज्य फतहपुरसे निकाल बाहर किया । राव शिवसिंहजीने यह बात सुनी। उन्होंने इसे एक अच्छा मौका समझा। तुरन्त शार्दूलसिंहजीको बुलवाया और उनसे मलाह करके चैत्र कृष्णा १३ संवत् १७८७ को फतहपुर पर दो हजार घुड़सवारों की सेना लेकर चढ़ आये । समस्त कायमखानी, झुझुनूके जैसे फतहपुरको अपने हाथ से जाता देख एकत्रित होकर नवाबकी पक्षमें आ डटे। केवल वेमबा के कायमखानी नहीं आये। शेखावतों और कायमखानिया में प्रवल युद्ध हुआ। दोनों तरफ के योद्धा प्रबल विक्रम से लड़े, जिनमें कई घायल हुए और कई मारे गये, जिससे चारों तरफ रुधिरसे लथ-पथ झण्ड और मुण्ड ही नजर आते थे। निदान नवाब सरदारखाँ घायल हो गया * और नाव कामयाबखाँ मैदान छोड़कर भगा + जिसके फल-स्वरूप कायमखा- नियोंकी पराजय हुई। उनसे राज्य छीनकर शेखावतों ने उसपर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। संवत् १७८७ की समाप्तिके रोज से राव शिवसिंहजी फतहपुरके शासक पद पर आरूढ़ हुए। * नवाब सरदारखाँ, अहत दशामें हो हिसार ले जाया गया, जहाँ पर उसका प्राणान्त हो गया। बापट • नवाब कामयावखाँ, भागकर कुचामण ( मारवाड़ ) में चला गया। वहीं अपनी जिन्दगीके दिन पूर्ण होनेपर मृत्युको प्राप्त हुआ। उसकी सन्तान आजतक कुचामण में विद्यमान हैं।
उपसंहार फतहपुर-राज्यके हाथसे चले जानेके बाद कायमखानी हार मानकर चुप न बैठ सके। वे राज्यको फिर हस्तगत करनेके लिए कोशिश कर रहे थे। उन्होंने दिल्ली जाकर दिल्लीके तत्सा- मयिक मुगल बादशाह मुहम्मदशाहके दरवारमें शेखावतोंके विरुद्ध दावा पेश किया, लेकिन शेखावतोंने पहले से ही सवाई जयसिंहजी ( द्वितीय ), जो कि शाही दरबारके मान्य व्यक्ति थे, को फतहपुर पर अधिकार-स्थापनकी कथा कह सुनायी थी, जिससे उनकी इच्छित बात ही शाही रजिस्टरों में दर्ज हो गयी थी, इससे कायमखानियोंके दावे पर ध्यान न दिया गया। फतहपुर पर राव शिवसिंहजीका ही अधिकार रहा। संवत् १८०८ में कायमखानियोंने, समर्थसिंहजी और राव चांदसिंहजीको अनुपस्थिति * में सिन्धी और बिलोचियों की सेना सहित फतहपुर पर चढ़ाई की और उसे हस्तगत कर लिया। चांदसिंहजी ने यह समाचार सुनकर लाडखानियों और अपने मामोंसे सैनिक सहायता लेकर फतहपुरके लिए प्रस्थान किया । सीकरसे बुधसिंहनी ससैन्य आ पहुंचे। फतहपुर पर आक्रमण करके फिर कायमखानियोंके हाथसे वह छीन लिया गया। * समर्थसिंहजी और चांदसिंहजी, जोधपुरके महागजा अभयसिंहजीके पुत्र रामसिंहकी सहायतार्थ गये हुए जयपुरके महाराजा ईश्वरीसिंहजीके साथ नानेके कारण अनुपस्थित थे HAMARINEEMENRBADONWER-
( ५५ ) [तीसरा खण्ड
तदनन्तर फिर संवत् १८३१ में कायमखानियोंने, बादशाह
शाह आलम (द्वितीय) से मदद मांगी। उसने पीरूखाँ बिलोची
और मित्रसेन अहीरको सना देकर शेखावाटी पर भेजा। राव
देवीसिंहजी भी शेखावत-स'ना सहित, जयपुरकी सैन्य सहायता
प्राप्त करके मैदानमें आगये। लड़ाई “मांडण" गांवमें हुई। लड़ाई
होते होते अन्तमें पीरूखाँ धराशायी हुआ और मित्रसेन भाग गया ।
अपने प्रमुखको भगा देखकर सेना भी पलायित हुई, इस तरह
शेखावतोंने विजय पायी।
नत्पश्चात संवत् १८३६ में बादशाह शाहआलम (द्वितीय)
ने पुनः एक सेना कायमखानियोंकी सहायता-स्वरूप शंखावाटी पर
आक्रमण करनेके लिए भेजी। शेखावतोंके पक्षमें जयपुरपति की
भेजी हुई एक सेना और ससैन्य अलवर-नरेश प्रतापसिंहजी
आये। दोनों पक्षोंमें घमासान युद्ध हुआ। अन्तमें शाही सेना
की पराजय हुई और उसका सेनापति निराश होकर दिल्ली
चला गया।
एक सेना फिर कायमखानियोंको सहायतार्थ देकर संवत् १८३७
में बादशाह शाहआलम ( द्वितीय ) ने शेखावाटी पर भेजी। राव
देवीसिंह जी शेखावतोंको एकत्रित कर “खाटू" के मैदान में आ
डटे। युद्ध आरम्भ हो गया। सहस्रों मनुष्य दोनों तरफके मारे
गये; परन्तु किसी पक्षकी विजय नहीं हुई। दोनों तरफके योद्धा
लड़त-लड़ते बहुत
अधिक
थक चुके थे ; निदान बादशाही सेना
दिल्लीको लौट गयी और शेखावत अपने स्थानोंको चले गये।
परिशिष्ट १
(क) नवाबों की हैसियत
फतहपुर पर नवाबों ने संवत् १७८७ तक २७६ वर्ष राज्य
किया। इतने कालमें १२ नवाव गद्दी पर बैठे, जिनमें प्रारम्भ
८ तो शक्तिशाली और सामर्थ्यशाली हुए और बादके ४ कमजोर ।
नवाब आले करवाँ (फतहपुरका वां नवाब) सर्वश्रेष्ठ नवाव हुआ।
इन नवाबों की हैसियत
बहुत
ऊँची थी। दिल्लीके बादशाहोंके
यहाँ भी ये नवाच ही कहलाये। दिल्ली दरबार में नवाब ताजवाँ
(२), नवाब अलिफखाँ और नवाब दौलतखाँ (२) बरावर जाते
रहे ; अपने समसामयिक सम्राटोंकी ओरस इन्होंने अनेक लड़ाइयाँ
बोरतापूर्वक लड़ी और उनके लिए सम्मान पाया।
•
(म्व) नवाबोंका राज्य-विस्तार
आजको शेखावाटी ज्वाबोंके शासन-कालमें फतहपुरवाटी
और झुझुनूबाटी के नामग्ने प्रसिद्ध रही है ; बादमें परम प्रतापी
राव शेखाजीके नामसे इसका नाम शेखावाटी पड़ गया ।
इमका नवाबी शासन-कालका भूमि-विस्तार कितना था, इस
सम्बन्धमें यथेच्छ जानकारी मुझे नहीं हुई; यद्यपि इस बारेमें मैंने
काकी छानबीन भी की ; पर जितना, इतिहालोंमें इस सम्बन्धका
उल्लेख मिलता है, उससे यह तो भली भाँति अनुमान लगाया जा
( ५७ ) [ तीसरा खण्ड सकता है कि फतहपुरवाटी और झुझुनूवाटीकी भूमि दूर तक विस्तृत थी। जोधपुरमें सम्मिलित झाटोदकी पट्टीके ५७ गाँव और बीकानेर में सम्मिलित फतहपुरपट्टीके १२० गाँव * जिनमें रतनगढ़ और भी है. नवाबों के शासन कालमें फतहपुरवाटी के ही अंतर्गत थे। Imatics-.-. SANEMPHADurat ..PDAMubipivaram- * फतहपुरपट्टीके ये गाँव राव लूणकरणजी ने नवाब दौलतखाँ (१) से ले लिये थे। इस बारेमें अधिक जानकारीके लिए इसी पुस्तकके तीसरे खण्डमें "नवाब दौलत खाँ (१)" शीर्षक के अन्तर्गत देखिए ।
चोथा
कराड
शेखावत शासक
शेखावत राजपूत
सूर्यवंशी क्षत्रियोंकी कछवाहा शाखामें से ही शेखावत राजपूतों
का आविर्भाव हुआ है। उनके आदि पुरुष राव शेखाजो, जिनसे
उनकी “शेखावत' नाम से प्रसिद्धि हुई, कछवाहा वंशीय चौदहवें
आमेराधिपति नरसिंहजीके छोटे भाई बालाजीके पौत्र थे।
शेखाजीके पिता मोकलसिंहजी, * बड़ी उम्र होनेतक
निःसतान थे। संतान का अभाव उनको बड़ा खटकता था ; परन्तु
उसके लिए वे कर क्या सकते थे ? आखिर गौ-सेवा कर पुत्र
प्राप्ति करनी चाही।
* मोकलसिंहनी-आमेर राज्यके तेरहवें अधिपति उदयकरणजोक पुत्र
बालाजीके लड़के थे। अपने पिताके बड़े पुत्र न होने के कारण उनके पिता
बालाजीको आमेर की राजगद्दीका अधिकार प्राप्त न हो सका, उनको बरवाड़ा
गांव प्रदान किया गया, जहां से म कलसिंहजी अमरसर आ गये और वहीं
रहने लगे। संवत् १४९३ से १५५४ तक वे अमरसर में राज्य
करते रहे।
( ५६ ) [चौथा खण्ड एक रोज एक फकीर उन्हें जङ्गलमें शिकार खेलते समय मिला। फकीरका नाम शेख बुरहान * था। उसके सामने भी उन्होंने अपने हृदयस्थ संतानाभावके दुःखको, आंखोंमें आँसू निकालकर प्रकट किया। फकीर दया हो गया और कहने लगा-"राजन् ! इस प्रकार दुखित न रहिए, अब आपको अवश्य पुत्र-प्राप्ति होगी।" शेख बुरहानके कथनानुसार थोड़े ही समयमें मोकलसिंहजी को पुत्र-प्राप्ति हुई। पुत्रका नाम उन्होंने शेख बुरहानकी यादगारी में 'शेखा" रख दिया। वही शेखाजी, शेखावतोंके आदि पुरुष हुए और उन्हींके नामसे शेखावत राजपूत जातिका प्रवर्तन हुआ। * शेख बुरहान---एक मुसलमान फकीर था, जो तैमूरला के साथ इस्लामके प्रचारार्थ आया था और यहीं (हिन्दुस्तान में ) रहने लगा। उसका मकबरा टाला धोला गाँव ( अमरसर से ७ कोसकी दूरी पर है) में स्थित है। इस गांव में उसके वंशज आजतक मौजूद हैं।
. राव शेखाजी ( अमरसर के शासक) (संवत् १५५४ मे १६६ तक, तदनुसार सन् १४९७ से १५०९ तक) संवत् १५५४ में अपने पिता मोकलसिंहजी के बाद राव शेखाजी अमरसर में हीस्थ हुए। वे प्रबल प्रतापी राजा थे, वीरता भी उनमें कुछ कम न थी। पांच सौ पन्नी पठानोंके, उनके आश्रयमें रहने के कारण, वे और भी मशक्त बन गये थे। अपनी वीरतासे उन्होंने ३६० गांवोएर स्वत्व प्राप्त कर लिया था। * बारह लड़के राव शेखाजीके हुए, जिनके नाम क्रमशः दुर्गाजी, भरतजी, निलोकजी, रतनजी, अभाजी, अचलजी, पूरणजी, प्रतापजी, कुभात्री. रिडमलजी, भारमलजी और रायमलजी थे। बालाजी ( शेखाजीके दादा ) के राज्य-कालसे एक नियम चला आता था, जिसके अनुसार आमेरपति को एक घोड़े का बच्चा । प्रति वर्ष भेजा जाता था। पहले शायद कोटुम्बिक अनुराग से घोड़ा आमेरको भेजा गया होगा : पर बादमें यही प्रथा, जयपुरकी अधीनता के कर-स्वरूप हो गयी। * ३६० गाँवों पर स्वत्व प्राप्त करनेकी बात टाड साहब ने अपने "राजस्थान में लिखी है। + बलदेवप्रसाद मिश्र द्वारा अनुवादित टाड साहब के राजस्थान" के पृष्ठ ६९८ में लिखा है "घोड़ेका बच्चा कर-स्वरूप में दिया जाना, यह फारस राज्यकी रिवाज थी। दूरके शासनकर्ता इस प्रकारसे घोड़ेके बच्चेको कर में भेजते थे"। • . samay ( ६१ ) चिौथा खण्ड राव शेखाजी इस कर-स्वरूप घोड़े भेजनेकी प्रथाको सहन न कर सके। अत: उन्होंने अपने सममामयिक आमेरके राजा चन्द्रसेनजीको घोड़ा न भेजकर, इस प्रथाको तोड़ दिया। राजा चन्द्रसेनजीका क्रोध उबल पड़ा। उन्होंने छः लड़ाइयाँ राव शेखाजीक साथ की ; परन्तु विजय शेखाजी की ही हुई। अंतिम लड़ाई राजगढ़में लड़ी, जिसमें विजय पाने पर शेखाजी ने उनका आमेर तक पीछा न छोड़ा। आखिर चन्द्रसेनजीने शेखाजी की बात मानकर उनसे सुलह करली । राव शेखाजी की गौड़वाटीके राजपूतों के साथ ग्यारह लड़ाइयाँ हुई, जिनमें वे ही विजयी हुए। अंतिम लड़ाई उन्होंने एक स्त्री की मान-रक्षार्थ की थी, जिसमें विजय प्राप्त करके विजय- लक्ष्मीक साथ ही-अधिक घायल होनेक कारण-वे संवत् १५६६ में सुरपुर सिधार गये। १-राव शिवसिंहजी (संवत १७७८ से १८०५ तक, तदनुसार सन १७२१ से 1७४८ तक) फतहपुर में- (संवत् १७८८ से १८०५ तक, सन् १७३१ से १७४८ तक) राव शेखाजीकी दशवीं पीढ़ी में राव शिवसिंहजी हुए, जिन्होंने अपने पिता दौलतसिंहजी की मृत्यु हो जाने पर संवत १७७८ में सीकरकी गद्दीका अधिकार प्राप्त किया। वे बड़े ही शूरवीर
फतहपुर-परिचय]
( ६२ )
"NNNNURNA
और प्रातापी थे। उनके प्रतापी होनेसे कितने ही तत्सामयिक ठाकुर
उनके प्रति ईर्ष्यान्वित रहने लगे थे।
ईष्यावश ही संवत् १७८१ में काशलीक ठाकुर सरदारसिंहजी
ने उन पर एक लूट का दोषारोपण कर दिया, जिसके फल-स्वरूप
दिलीके मुगल बादशाह मुहम्मदशाह की ओर से जानिसारखाँ ससैन्य
सीकर आ पहुंचा, उसने राव शिवसिंहजीको गिरफ्तार करके दिल्ली
ले जाना चाहा।
शेखावत सेना एकत्रित करके राव शिवसिंहजी ने जानिसारखाँ
का सामना किया और स्वरूपसिंहजी * को आमेर-नरेश सवाई
जयसिंहजी जिनका दिल्लीकी बादशाहीमें उस
समय पूरा
दबदबा था-के पास इसलिए भेजा कि वे किसी तरह इस शाही
सेना से उनका पिण्ड छुड़ा दें।
सावई जयसिंहजीने दिल्ली जाकर बादशाहकी अनुमतिसे,
जानिसारखाँको सोकरसे लौट आनेके लिए लिख दिया। पत्र पाकर
वह मेना सहित लौट गया।
संवत् १७८२ में फतहपुरके नवाब सरदारखाँ द्वारा भोजराजके
वंशवर बरवाके केशरीसिंहजी और सुखसिंहजीका मरवाया जाना,
शेखावतोंके क्रोधानलको भभकानेमें घृतका काम कर गया।
राव शिवसिंहजी का भाई
• सवाई जयसिंहजी--संवत् १७५७ में आमेर की गद्दी पर बैठे।
गद्दीपर बैठनेके २८ वर्ष बाद उन्होंने संवत् १७८५ में अपने नाम से जयपुर
शहर बसाया।
( ६३ ) [ चौथा खण्ड शार्दूलसिंहजी राव शिवसिंहजीके साथमें १५० आदमियोंकी सेना सहित फतहपुर पर चढ़ आये। उन्होंने फतहपुरकी बीहड़में नवाबके उटोंके एक झुडको पकड़ा। नवाबने अपने सर्वेसर्वा एक काजीको सेना देकर उनका सामना करने के लिए भेजा। दोनों तरफ से लड़ाई होने लगी। काजी और ग्यारह कायमखानी मार डाले गये, शेष पलायित हुए। तब ही से शेखावत वीर शिवसिंहजी और शार्दूलसिंहजीने नवाबों की कमजोरीसे लाभ उठाकर झुंझुनू और फतहपुर पर अपना अधिकार-स्थापन करना चाहा। उन्होंने संवत् १७८६ में कायम- खानियोंसे झुंझुनू प्राप्त कर लिया, उस पर शार्दूलसिंहजीका शासन रहा। तत्पश्चात् उनकी दृष्टि फतहपुर पर ही रही, वे इसे पानेके लिए सुअवसरकी इन्तजारीमें थे। फतहपुरकं नवाब सरदारखाँने 'तेलिन' के पुत्र महबद्धको अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहा । समस्त कायमखानियोंने इसका विरोध किया; परन्तु नवाब सरदारखाँ अधिकार सम्पन्न था, वह कब माननेवाला था ? चूड़ी और बेसवाके कायमखानियोंने राव शिवसिंहजोके सम्मुख जाकर, कामयाबखाँ * को राज्याधिकार दिलानेकी प्रार्थना की और * कामयाबखाँ-नवाब सरदारखाँ के भाई मीरखां का पुत्र था, जो कायमखानियों के कहने पर, सरदारखाँ द्वारा दत्तक पुत्र बना लिया गया था। यह फतहपुर का अन्तिम नवाब हुआ, जिसका पूरा विवरण तीसरे खण्ड में पढ़ जाइए।
फतहपुर-परिचय] कहा कि “यदि आपके प्रयत्नसे कामयाबखाँका राज्याधिकार पानेमें कामयाबी हुई तो हमारी ओरसे २५ गांव, आपको भेंट-स्वरूप दिये जायेंगे और फतहपुरक शामनकी व्यवस्था भी आप ही की परामर्शसे होगी।" राव शिवसिंहजीने तुरन्त ही कुवर रामसिंहजी काशलीवालको बुलाया। उनके आजाने पर कायमखानियों सहित, वे सवत् १७८६ में फतहपुर पर चढ़ आये । भयंकर युद्ध हुआ। बहुतसे वीर सदा के लिए सो गये और कितने ही जख्मी हुए। युद्ध-रूपी चपेटिकासे नवाब सरदारखाँका दिमाग ठिकाने आगया। अब उसने समझा कि घरकी फूट कितनी विनाशकारी होती है। कितनी विनाशकारी होती है। वह शिवसिंहजीक पांवों में गिर गया। उन्होंने उसके लिए नौ हजार रुपये वार्षिकका प्रबन्ध कर दिया और कामयावखाँको गद्दी दिला दी। राव शिवसिंहजीने अपने श्वशुर भावसिंहजी बीदावतको नवाब कामयावखााँका कामदार नियत किया था; परन्तु कुछ ही समय बाद भावसिंहजी और चूड़ी-बेसवाके कायमखानी, नवाब द्वारा निकाल दिये गये। राव शिवसिंहजीको जब यह समाचार मिला तो उन्होंने शाल- सिंहजी, गुमानसिंहजी लाडखानी और कुं० रामसिंहजी काशलीवाले के साथ, दो हजार सेना लेकर फतहपुर पर, चैत्र कृष्णा १३ संवत् ५७८७ को धावा ल दिया। नवाब ३५० साढ़े तीन सा घुड़सवार और ११०० ग्यारह सौ पैदल सैनिक लेकर सामने आया। सिवा वेसवेवालोंके, सभी , [[चौथा खण्ड कायमखानी, नवाबकी ओरसे युद्वमें सम्मिलित हुए थे। दोनों तरफ के योद्वाआंने प्रबल पराक्रम से लड़कर अपना-अपना युद्ध-कौशल दिखलाया। अनेक वीर, वीरगतिको प्राप्त हुए और अनेक क्षत- विक्षत होकर तड़फड़ाने लगे। अन्तमें नवाब सरदारखाँ घायल हो गया * और कायमयाबखाँ मैदान छोड़कर भाग गया । इस प्रकार शेखावतों ने विजय प्राप्त की, जिसके फल-स्वरूप, फतहपुर पर गव शिवसिंहजीका अधिकार हो गया। चैत्र शुक्ला १ संवत् १७८८ को फतहपुर की गद्दी पर राव शिवसिंहजी अधिष्ठित हुए । तदनन्तर वे और शार्दूलसिंहजी, आमेरपति सवाई जयसिंहजीके यहां गये और फतहपुर झुंझुनू पर अधिकार-स्थापन की कथा सुनादी । फतहपुर हाथ से निकल जाने पर कायमनानियोंने दिल्ली जाकर शेखावतोंके विरुद्ध अपील की ; पर होना जाना क्या था ? जब कि सवाई जयसिंहजी ने शिवसिंहजी और शार्दूलसिंहजी की इच्छित बात ही शाही रजिस्टरों में दर्ज करा दी थी। तब ही से सवाई जयसिंहजीके प्रभाव से प्रभावित होकर शार्दूलसिंहजी और शिवसिंहजी ने जयपुर की आधीनता स्वीकार करली। * सरदारखां घायल अवस्था में ही अपने सेवकों द्वारा हिसार पहुंचाया गया, वहीं उसका प्राणान्त हुआ। + कामयाबखाँ भागकर कुचामण चला गया। * संवत् १७८८ का प्रारम्भिक दिन ।
फतहपुर-परिचय
सवाई जयसिंहजी जब दिल्ली के सम्राट द्वारा संवत् १७८६ में
मालवाके सूबेदार नियत करके भेजे गये, तब मार्ग में ही मौजाबाद
में राव शिवसिंहजी और शार्दूलसिंहजी उनसे जा मिले। वहीं
डेरा डाल दिया।
उस समय भयङ्का वर्षा हुई। अविश्रान्त वर्षा
के कारण कुछ खाने के लिए न बन सका ; इसलिए सभी परेशान हो
गये। शिवसिंहजी ने खिचड़ा तैयार करवाया। तैयार हो
जाने पर सब ने भोजन कर लिया। सवाई जयसिंहजी
उसी समय से शिवसिंहजीको थाल के ६०० रुपये वार्षिक देने लगे।
वे ६०० रुपये अब तक शिवसिंहजो के वंशजों को मिलते हैं।
वार्षिक कर जो प्रतिवर्ष सीकर से जयपुर राज्य को भेजा जाता है,
उसमें से ही ६००) रुपये काटे जाते हैं।
जब सवाई जयसिंहजी का देहान्त संवत् १८०० में हो गया,
तब ईश्वरीसिंहजी उनकी गद्दी पर बैठे। उनके माई माधवसिंहजी *
को यह बात न रुची, उन्होंने स्वयं गद्दीपर बैठना चाहा , इसलिए
वे संवत् १८०५ में बूदी-नरेश उम्मेदसिंहजी और मल्हारराव
होलकर की मदद से एक बड़ी सेना लेकर जयपुर पर चढ़ आये।
ईश्वरीसिंहजी की तरफ से शिवसिंहजी ससैन्य शत्रुओं का सामना
करने के लिए गये। उन्होंने शत्रु -दल को पराजित करके
मगा दिया।
* माधवसिंहजी-ईश्वरसिंहजी की विमाता के
पुत्र
थे। मेवाइवालोंके
भानजे थे।
( ६७ ) [चौथा गण्ड कछवाहों के साथ बूंदी और कोटाकी जो लड़ाइयाँ हुई उनमें भी राव शिवसिंहजी ने अपनी वीरता का खासा परिचय दिया था। संवत् १८०५ में कछवाहों का जो युद्ध मराठों के साथ हुआ, राव शिवसिंहजी उसमें प्रधान सेनापति बनाये गये थे। उसीमें वे घायल भी हुए। घायल होने पर उनके छोटे बेटे * चांदसिंहजी पिता के पास आ पहुंचे और सेवा-शुश्रूषा में लग गये। जख्मोंका उपचार उचित रूप से होने लगा ; परन्तु घाव भर न पाये थे कि अचानक उनका देहावसान हो गया। मरते समय उन्होंने ईश्वरीसिंह- जीसे कहा कि "चांदसिंह को सीकर का अधिकार सौंप देना।" * पांचबेटे, राव शिवसिहजी की ४ रानियों से हुए, जिनके नाम- समर्थसिंहजी, कीरतसिंहजी, मेदसिंहजी, चांदसिंहजी और बुधसिंहजी थे।
२-राव समर्थसिंहजी ( संवत् १८०५ से १८११ तक, तदनुसार सन् १७४८ से १७५४ तक ) राव शिवसिंहजीका देहावसान होने पर संवत् १८०५ में सीकर में उपस्थित समर्थसिंहजी ने गद्दी पर अपना अधिकार कर लिया। जयपुर में महाराजा ईश्वरीसिंहजी ने चाँदसिंहजी को सीकरके लिए आमिषिक्त किया। बाद में चाँदसिंहजी जयपुर से आ गये । सीकर की गद्दी पर समर्थसिंहजी ही रहे। उनके ३ पुत्र थे, जिनके नाम क्रमशः नाहरसिंहजी, गुमानसिंहजी और बाघसिंहजी थे। राज-काज सम्भालने में राव समर्थसिंहजी पहले से ही चतुर थे ; क्योंकि उनके पिता राव शिवसिंहजी जब जयपुर चले जाते थे, तब उनके पीछे से वे ही राज्य की देख-माल किया करते थे, जिससे उन्हें राज्य व्यवस्था की जानकारी हो गयी थी। राव समर्थसिंहजी की नृशंस प्रकृति होने के कारण राव शिवसिंहजी उनसे असंतुष्ट रहते थे। एक पिता का अपने पुत्र के प्रति जितना प्यार होना चाहिए, उतना शिवसिंहजी का समर्थसिंहजी के प्रति नहीं था। इसका मुख्य कारण यह था कि समर्थसिंहजी ने शिवसिंहजी के ही राज्य काल में अपने २ भाइयों (कीरतसिंहजी और मेदसिंहजी) * को जानसे मारकर । अपनी निर्दयता का परिचय दे दिया था। .. राव समर्थ- * कीरतसिंहजी और मेदसिंहजी दोनों सहोदर भाई थे। सिंहजी की विमाता के पुत्र -- भाई-थे। • समर्थसिंहजी का अपने भाई कीरतसिंहजी और मदसिंहजी से प्रायः अनबनाव ही रहा करता था ; उनको किसी बहाने से, समर्थसिंहजी फतहपुर ले गये थे और वहीं उनको बध कर डाला। अब कीरतसिंहजीके वंशज बठोठ, पाटोदा में और मेदसिंहजीके सरयड़ी और दीपपुरा में हैं। ..
( ६६ )
[चौथा खण्ड
राव समर्थसिंहजी और चाँदसिंहजी संवत् १८०८ में, जब
जयपुर-नरेश महाराजा ईश्वरीसिंहजी के साथ, जोधपुर के
महाराजा अभयसिंह जी के पुत्र रामसिंहजी की सहायता के लिए
गये
हुए
थे, तब उनको अनुपस्थित देखकर कायमखानियों ने सिंधी
और बिलोचियों की सेना सहित फतहपुर पर आक्रमण कर के उसे
फिर हस्तगत किया। यह समाचार जब समर्थसिंहजी के
कर्णगोचर हुआ तो उन्होंने अपने समीपस्थ चांदसिंहजी को शीघ्र
ही फतहपुर के लिए प्रस्थित कर दिया। चांदसिंहजी ने मेड़तियों
और लाड़खानियों को साथ लिया और फतहपुर पहुंच
गये। उधर सीकर से बुधसिंहजी * भी आये थे। उन सब ने
मिलकर कायमखानियों को मार भगाया, इस तरह फतहपुर उनके
हाथ से निकलते-निकलते बचा।
तब से चांदसिंहजी ने यह विचार कर कि कहीं कायमखानी
फिर फतहपुर पर आक्रमण न कर दें, फतहपुर में ही रहना शुरू कर
दिया। यह देखकर ईषालु लोगों ने समर्थसिंहजी को चांदसिंहजी
के विरुद्ध भड़का दिया; तब समर्थसिंहजीने मौका पाकर चांदसिंहजी
को बलाराँ भेज दिया है और स्वयं सीकर का राज्य संवत्
१८११ तक करके स्वर्ग सिधारे ।
* बुधसिंहजी, समर्थसिंहजी के वैमातृक भाई थे।
+ सीकर से उत्तर में १३ कोस की दूरी पर स्थित है।
* बलारों में चांदसिंहजी ने एक दुर्ग संवत् १८०८ में तैयार करवाया
और वहीं रहने लगे।
३-राव नाहरसिंहजी (संवत् १८११ से १८१३ तक, तदनुसार सन् १७५४ से १७५६ तक) संवत् १८११ में राव समर्थसिंहजी के बाद उनके पुत्र राव नाहरसिंहजी गद्दीस्थ हुए। वे राज-काज को अच्छी तरह न सम्भाल सके, इससे सीकर की प्रजा ने चाहा कि किसी तरह चांदसिंहजी शासक बना दिये जायें। जयपुरपति महाराजा माधवसिंहजी भी नाहरसिंहजी की अव्यवस्थित राज-रीतिको अच्छी तरह जान गये थे। उन्होंने, जब चांदसिंह जी जयपुर गये तब उनसे कहा कि “सीकर का राज- काज आप सम्माल लेवें, अन्यथा नाहरसिंहजी से सीकर का कुछ भी भला न हो सकेगा।" चांदसिंहजी ने महाराजा माधवसिंहजी की बात मानली । उन्होंने अपने कु० देवीसिंहजी की "हर्णकी जात"का बहाना बनाया, साथमें ५० सशस्त्र नौजवानोंको जनानी रथों में चढ़ा लिया और सीकर की तरफ चल पड़े। रात्रि के करीब ११ बजे सीकर आ पहुंचे। सीकर का द्वार उस समय बंद हो चुका था, चांदसिंहजी ने उसको खुलवाया। द्वार खुलते ही जनानी रथ भीतर चले गये। ५० सशस्त्र नौजवानों ने उतर कर तुरंत ही सीकर पर चांदसिंहजी का अधिकार घोषित कर दिया।
४-राव चांदसिंहजी (संवत् १८१३ से १८:० तक, तदनुसार सन् १७५६ से १७६३ तक ) राव चांदसिंहजी ने संवत् १८१३ में सीकर की गद्दी का अधिकार, नाहरसिंहजी से छीन लिया और स्वयं गद्दीपर बैठ गये। तत्पश्चात् नाहरसिंह जी की ओर से, ठा० गोपालसिंह उप्रावत* ने हरगोबिन्द नाटाणी : की सहायता से सीकर पर आक्रमण कर दिया। राव चांदसिंहजी सेना लेकर सामना करने के लिए आये ; परन्तु दोनों ओर से आपस में संधि करली गयी। चांदसिंहजी ने बलारों और कई गाँव नाहरसिंहजी को दे दिये। मल्हारराव के सेनापति गंगाधर द्वारा, संवत् १८१६ में जयपुर पर जो आक्रमण किया गया था, उसमें गंगाधर को हार खानी पड़ी। विजय का सेहरा, जयपुरवालोंके ही शिर बांधा गया। अपने सेनापति को पराजित जान, मल्हारराव ने जयपुर पर धावा बोल दिया। उस समय जयपुरकी ओर से जो सेना उनका सामना करने को गयी थी, उसमें राव चांदसिंहजी भी गये थे। विजय, फिर जयपुर की ही हुई। इस लड़ाई में चादसिंहजी ने अच्छी वीरता दिखलायी थी। आधा रींगम ! जो परशुरामजीकों के अधिकार में था उसको भी राव चांदसिंहजी ने-परशुरामजीकों से छीनकर अपने अधिकार में कर लिया। wu- * नाहरसिंहजी के पिता समर्थसिंहजी द्वारा नियत किया हुआ वकील । . जयपुर-नरेश का मन्त्री * पहले आधा रींगस, सीकरवालोंका था और भाषा परशुरामजीकों का।
फतहपुर-परिचय ] 1 ७२ )
बीदावतों के उपद्रव के शमनार्थ राव चांदसिंहजी, जब "गनेडी"
में ही थे, तभी उनका देहान्त संवत् १८२० में हो गया।
"
५---राव देवीसिंहजी
( संवत १८२० से १८५२ तक, तदनुसार सन् १७६३ से १७९५ तक )
संवत् १८२० में राव चांदसिंहजीके बाद, उनके पुत्र देवीसिंहजी
गही के अधिकारी हुए। वे अपनी शूरवीरता और हिम्मत के लिए
प्रसिद्ध थे। अपने समयमें, उन्होंने सीकर-राज्यको विस्तृत ही
नहीं किया; बल्कि सुव्यवस्थित भी किया।
एक किला सीकरसे ३ कोस दक्खिन. लोहार्गलके पहाड़ पर
बनवाया,
जिसका नाम अपने नामको अमर करने के लिए "देवा"
* रक्खा। रघुनाथगढ़ा और रामगढ़. २ शहर भी आबाद किये ।
.
* संवत् १८४१ में देवगढ़ का किला बनवाया गया ।
+ संवत् १८४८ में खोह ले लेने के बाद, खोह की पहाड़ी पर, राव
देवीसिंहजो ने रघुनाथगढ़ बसाया ।
ई. राव देवीसिंहजीने संवत् १८४८ में "नासा" गांवको शहर का रूप
देकर उसका नाम रामगढ़ रक्खा। चूरू
के पौद्दार, जिनकी ठाकुरोंसे, किसी
बात के कारण से अड़ गयी थी, वे रामगढ़ में आ बसे थे। देवी सिंहजी ने
उनको सम्मान के साथ रामगढ़ में स्थान दिया, जिससे "रामगढ़-सेठान"
कहलाया।
[चौथा खण्ड राव देवीसिंहजी गुणियोंके आश्रयदाता थे। उनके आश्रयमें हो, राजस्थान के सुप्रसिद्ध कवि कृपारामजी बारहठ * और कवि कवीन्द्र रहा करते थे। कृपारामजी बारहठ द्वारा रचित राजियाके सोरठे -जिनको राजस्थानमें आवाल-वृद्ध जानते हैं-नीति और सुधार- प्रियतासे लबालब भरे हैं, जिससे पता लगता है कि कृपारामजी बार- हठ एक विद्वान् और सुधारक मनोवृत्तिके आदमी थे। ऐसे सद्भाव- सम्पन्न कविका राव देवीसिंहजीके आश्रयमें रहना, उनके सद्विचारक होनेका द्योतक है। Ant * कृपारामजी बारहठ, राजस्थान के एक अमर कवि होगये हैं; यद्यपि उनका पार्थिव शरीर आज विद्यमान नहीं है, तथापि वे सुकवि होने के नाते आज भी अमर हैं। उनके शिक्षा, सुधार और नीतिसे परिपूर्ण सोरटे, आज भी विद्वानों के हृदयमें उनकी स्मृति को सजग कर देते हैं। राव देवीसिंहजी के आश्रय में वे सम्मान सहित रहा करते थे। राज-काज भी अधिकतर उनको ही सलाह से होता था। एक गांव भी रावजी की ओर से उनको मिला था, जो चरणोंकी ढाणी कहलाता है। राजिया उनके नौकरका नाम था, जिसको अमर करने के लिए, उन्होंने स्वरचित हराएक सोरठेके अन्त में राजियाका नाम लगा दिया है। वे रावराजा लक्ष्मणसिंहजीके वयस्क होने तक सीकर में रहे। राजियाके नीतिपूर्ण सोरठे, जिन्हें पढ़नेकी उत्कण्ठा हो वे, मेरी बनायो हुई "राजिया-काव्य" देखें और ललित सोरठोंका रसास्वादन करें ।
फतहपुर-परिचय] ( ७४ ) राव देवीसिंहजीको सिंहासनस्थ हुए थोड़ा ही समय हुआ था कि जयपुरपति महाराजा माधवसिंहजी पर संवत् १८२४ में भरतपुरके जवाहरसिंह जाट ने चढ़ाई कर दी। इस लड़ाईमें रावजीकी ओरसे उनके चचा (काका) बुधसिंहजी गये थे उन्होंने अच्छी वीरता प्रद- शित की। आखिर गहरी चोट ला जानेसे वहीं स्वर्ग सिधारे । जयपुरपतिने तबसे सीकरको वार्षिक करमें ४०००) रुपयेकी छूट करदी। संवत् १८३१ में बादशाह आलीगोहर शाह आलमने कायम- खानियोंकी मदद करनेके लिए, पीरूखाँ बिलोची और मित्रसेन अहीर की प्रमुखतामें एक सेना फतहपुर पर भेजी। देवीसिंहजी, अन्य शेखावतों समेत, जयपुरसे सैनिक सहायता पाकर “मांडण" * रण- क्षेत्रमें आगये। लड़ाई होने लगी। अन्तमें पीरूखाँ मारा गया और मित्रसेन मैदान छोड़कर भाग गया । परशुरामजीकोने संवत् १८३२ में सीकरकी ओरसे नियत, रींगसके ताल्लुकदारको रींगससे निकाल कर, वहां अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। राव देवीसिंहजीने वहां जाकर रींगसको वापिस अपने अधिकारमें किया। संवत् १८३६ में नजफकुलोखाँके सेनापतित्वमें दिल्लीक बादशाहने १६००० आदमियों की एक सेना शेखावाटी पर भेजी। शेखावतोंने । * एक गांवका नाम है। १८३१ में कायमखानी और शेखावतोंमें जो युद्ध हुआ, उसके लिए यह रणक्षेत्र बना था।
( ७५ ) [चौथा खाण्ड उसका सामना किया। जयपुरके महाराजा प्रतापसिंहजीकी भेजी हुई एक सेना और स्वयं अलवरेश्वर प्रतापसिंहजी ससैन्य शेखावतों की सहायतार्थ आये। इस लड़ाई में नजफकुलीखाँ पराजित होकर दिल्ली लौट गया। संवत् १८३७ में फिर ५२००० आदमियों की एक बड़ी सेना, दिलीके बादशाहकी ओरसे शेखावाटी पर आयी। सेनापति मुरतिजा खाँ भड़ेच * था, उसको राव देवीसिंहजीने लिख भेजा कि-"यदि अपनी खैरियत चाहते हो तो पत्र पढ़ते ही चले जाओ, यह शेखा- वतोंकी भूमि है।" उत्तरमें भड़ेचने लिखा कि-"मैं अमीर नहीं हूं, मैं एक सैनिक हूं। मुझे अपने सैनिकत्वका अभिमान है । जानते नहीं है मेरा नाम मुरति जाखाँ है। मेरा तोपखाना जब गोला उगलने लगेगा, तब तुम्हारी अनधिकार चेष्टासे तुम्हारे अधिकारमें आये हुए, झुंझुनू, फतहपुर पुनः कायमखानियोंको मिल जायेंगे। भड़ेच सेना सहित आगे बढ़ आया, उसने माधवपुर, थोई और रींगस लूट लिये। यह देखकर राव देवीसिंहजीने शार्दूलसिंहजीके पौत सुजानसिंहजी, दांताके बख्तावरसिंहजी और कूहड़के गुमानसिंह जीको बुलवाया। उनके आ जाने पर देवीसिंह जी रणभूमि “खाटू" की ओर बढ़े। जयपुरपतिने भी देललसिंह खंगरोत और भूरसिंह नाथावतको एक सेना देकर शेखावतोंकी सहायतार्थ भेजा . * पठान जातिका मुसलमान था, भड़ेच उसका आस्पद था ।
फतहपुर-परिचय] ( ७६ ) मङ्गलदासजी भी जयपुरपतिके आदेशसे, अपनी युद्ध-कौशलमें निपुण साधु सेना सहित आये। घमासान लड़ाई छिड़ गयो। तलवार, माले और बी स्वतन्त्रतासे चलाये जाने लगे। दोनों ओर के अनेक वीर, वीर गतिको प्राप्त हुए और अनेक क्षत-विक्षत होकर भूमि-शय्या पर खून से लथपथावस्था में ही कराहनेके स्वरमें मा रण-चण्डीकी उपासनामें लग गये। राव देवीसिंहजी लड़ाईके अन्त तक लड़ते रहे। सूरजमलजी और देवकरणजी धाभाईने अच्छी वीरता दिखायी, जिससे रावजीने उनको उचित सम्मान दिया। एक हजार नागा साधु तथा और- और अनेक वीर लड़ाई में मारे गये। वीरता दिखाते हुए जिन्होंने प्राण त्याग किये, उनमेंसे कूहड़के बख्तावरसिंहजी, दूजोदके सलहदी सिंहजी, बलाराँके हनूनसिंहजी, मिसरीखाँ कायमखानी, अर्जुन और उम्मेद कायस्थ, स्वरूपा बडुआ, हमीरा नाई और हुकुमसिंहजी लाड़खानीके नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। विजय न तो शाही सेनाकी हुई और न शेखावतोंकी ही ।* दोनों ओर के योद्धा लड़ाई करते-करते परिश्रान्त हो गये, इससे * हिन्दू तुरकाण जुट घणी धर धपायीं। दोनों की हारजीत जाणमें न आयी ।। शेखावत जाति भी न आयी खेत कानी । मुरतिजाखान भी हियामें हार मानी ॥
( ७७ ) [चौथा खण्ड शेखावत तो अपने-अपने स्थान पर चले गये और भड़ेच वापिस दिल्ली लौट गया। राव देवीसिंहजीने संवत् १८४४ में काशलीके ५ गांवोंको दबा लिया और बठोठके ठाकुर पद्मसिंहजीके सुपुद करके उनसे कहा कि 'इन गांवों की सम्भाल आप रखें।" थोड़े ही दिन बाद काशलीके ठाकुर पूर्णमलजीने पद्मसिंहजीको मार डाला। इस समाचारसे राव देवीसिंहनी के हृदयमें दुःख और क्रोध पनप आये. उन्होंने काशलीको पूर्णमलजीसे छीन लेनेका विचार कर लिया। युद्रकी तैयारी करनेमें इधर तो राव देवीसिंहजी लगे हुए थे और उधर पूर्णमलजी। अलबरेश्वर प्रतापसिंहजीसे पूर्ण मलजीने सहायता मांगी। अलवरेश्वरने लिख भेजा कि “मैं लोहार्गलमें आऊंगा, तब तुम्हारा समझौता करवा दूंगा।" तदुपरान्त अलवरेश्वर लोहार्गल आये। उन्होंने राव देवीसिंहजी और पूर्ण मलजीको बुलवा भेजा। रावजी आगये परन्तु पूर्ण मलजी नहीं आये। उनके इस घमण्डको देखकर अलवरेश्वर बोल उठे कि 'पूर्ण मलजीका घमण्ड चूर होनेके काबिल ही है।" राव देवीसिंह जीके हृदयमें प्रतिहिंसाकी अग्नि प्रज्वलित हो रही थी, वे कब माननेवाले थे। उन्होंने तुरन्त ही काशली पर चढ़ाई की और पूर्णमलजीको पराजित करके काशलीसे निकाल दिया। काशली तथा चौरासी गांव रावजीके अधिकारमें आगये । - फतहपुर-परिचय] ( ७८ ) संवत् १८४५ में शार्दूलसिंहजीकोंने सीकर राज्यकी सीमाके अन्तर्गत वरी गाँवकी बीहड़ काटकर नवलगढ़का विस्तार बढ़ाना चाहा। इस बात को लेकर शार्दूलसिंहजीकों और शिवसिंहजीकों में पारस्परिक विरोध पैदा हो गया। जब बीहड़ कटने लगी, तब राव देवीसिंहजीके एक आश्रित कविने उन्हें सावधान करते हुए कहा-- नीलो घोड़ो जीन बनाती, चढ़कर आयो तेरीको । बैठ्यो "देवा" के देखे है, बीड़ कटै है बेरी को ।। राव देवीसिंहजी सेना इकट्ठी कर शीघ्र ही शार्दूलसिंहजीकों पर चढ़ दौड़े। कई दिनों तक लड़ाई हुई। निदान आपसमें सन्धि -- होगयी। . राव देवीसिंहजीने संवत् १८४५ में बलारा, भोजासर, मगलूणा और हर्ष के पहाड़के इर्द-गिर्द के गांव और संवत् १८४८ में खोह, पीपराली इत्यादि गांव सीकरमें सम्मिलित कर लिये । सीकरकी ओरसे जयपुरको प्रतिवर्ष दिये जानेवाले कर का विरोध, राव देवीसिंहजीने संवत् १८४६ में किया, परन्तु वे सफल- मनोरथ नहीं हुए, फरतः सीकरकी ओर से जयपुरको राज्य-कर दिये जानेका कार्य पूर्ववत् जारी रहा। तदनन्तर संवत् १८५२ में ३२ वर्ष राज्य करके वे मृत्युको प्राप्त ६-रावराजा लक्ष्मणसिंहजी (संवत् १८५२ से १८९० तक, तदनुसार सन् १७९५ से १८३३ तक) राव देवीसिंहजी की मृत्यु के बाद संवत् १८५२ में लक्ष्मणसिंह जी को शासनाधिकार पाते देखकर, राव देवीसिंहजी के द्वारा त्रास- प्राप्त, उनके विपक्षीदल ( खण्डेलेवालों, बलाराँवालों और भोज- राजजीकोंकी सम्मिलित शक्ति ) ने यह प्रसिद्ध कर दिया कि लक्ष्मण- सिंहजी, राव देवीसिंहजी के वास्तविक पुत्र नहीं हैं, दत्तक हैं इसलिए वे गद्दी के अधिकार से वंचित रखे जावें। एस बातको लेकर शेखावतों में उस समय एक बड़ा उत्पात खड़ा हो गया था। राव देवीसिंह जीके परम विश्वसनीय कृपारामनी बारहठ और सूरजमलजी धाभाई ने किसी भी विपक्षी की परवा न करते हुए, लक्ष्मणसिंहजी को राज्यासनारूढ कर दिया। जिम समय वे गद्दी पर बैठाये गये उस समय उनकी आयु केवल ८ वर्ष की ही थी * उनकी माता कान्हलोतजी मन्त्रियोंकी मन्त्रणा के सहयोग से राज-काज की सम्भाल करने लगीं। रावराजा । लक्ष्मणसिंहजी के गद्दी नशीन होने का समाचार पाते ही विपक्षी जन, जयपुर से एक सेना, नन्दराम हलदिया 4 के * संवत् १८४४ में कान्हलोतजीके गर्भसे लक्ष्मणसिंहजीका जन्म हुआ था। + संवत् १८७१ में जयपुरपति महाराजा जगतसिंहजी-द्वारा रावराजाकी उपाधि लक्ष्मणसिंहजीको मिली थी। * जयपुरके तत्कालीन मन्त्री दौलतराम हलदियाका भाई ।
टाल फतहपुर-परिचय ( ८० ) सेनापतित्व में सीकर पर चढ़ा लाये ; परन्तु उनकी दाल न गल सकी ; क्योंकि नंदराम के भाई दौलतराम हलदिया का राव देवीसिंहजी के साथ पहलेका मैत्री सम्बन्ध था, उस सम्बन्धको कृपारामजी बारहठ और सूरजमलजी धाभाई ने नन्दराम के सामने प्रकट किया। नन्दराम ने कह दिया कि “आप मेरी ओर से किसी अनिष्ट की आशका न करें, यापि मैं जयपुर की अनुज्ञा को नहीं सकता। आपको मेरी इज्जत बचाने के लिए केवल दिखावटी युद्ध करना पड़ेगा, जिससे किसी को यह पता न लग जाय कि मैं सीकर से मिला हुआ हूं।" नन्दरामकी इच्छानुसार कई दिनों तक युद्ध जारी रहा। आखिर उसने जयपुरपतिको लिख दिया कि सीकर से लड़नेमें धन और समय व्यर्थ नष्ट होते हैं, और स्वयं ३ लाख रुपये --दो लाख दण्डके और एक लाख रिश्वतके -लेकर जयपुर चला गया। संवत् १८५४ में ठा० पूर्ण मलजी (जिनसे राव देवीसिंहजीने काशली छीन ली थी ) ने बीदावत, लाड़खानी और मेडनियोंकी सहा- यता पाकर सीकर पर चढ़ाई की, उसमें सीकरकी ही विजय रही। बलागाँवाले संवत् १८५६ में पंजाबसे जार्ज फ्रांसिस * को चढ़ा कर लाये। उन्होंने फतहपुर पर धावा बोल दिया। सीकरसे उनका सामना करनेके लिए सूरजमलजी धाभाई ससैन्य आये। मेदसिंहजी PARIRAN 0- * जार्ज फ्रांसिस हाँसी (पंजाब) का तत्सामयिक शासक था, यह शेखा- वाटी में “जहाज साहब" कहलाता था।
( ८१ ) [चौथा खण्ड परशुरामजीकाको जयपुर सैनिक सहायता पानेको भेजा गया था, वे भी जयपुरकी सेना सहित युद्धस्थल पर आ पहुंचे। लड़ाईका उपक्रम होगया। रण-चण्डीको सन्तुष्ट करनेके लिए योद्धा लोग वीर तालसे नृत्य करने लगे। आखिर जार्ज फ्रांसिसकी सेना लड़ते-लड़ते थक गयी, जिससे वे हार मानकर फतहपुरसे चले गये। शाहपुरा, बठोठ और नेछवा संवत् १८५७ में रावराजा लक्ष्मण- सिंहजीके बाहुबलके प्रतापसे उन्हींके अधिकारमें आगये । उस समय स्वार्थी लाइखानियों की कृपासे रावराजा लक्ष्मण- सिंहजीकी माता कान्हलोतजी, उनसे रुष्ट होकर रामगढ़ चली गयी थीं और वहीं रहने लगीं। राघराजाजीको यह बात कब अच्छी लग सकती थी ? उन्होंने रामगढ़ जाकर स्वमातासे भेंट की। होने पर माता और पुत्र दोनोंका स्वाभाविक प्रेम उमड़ आया । कान्हलोतजीने अब समझा कि किस प्रकार स्वार्थियोंने मुझे, उलटी- सीधी बातें बनाकर लक्ष्मणसिंहके विरुद्ध कर दिया । रावराजा लक्ष्मणसिंहजीने उन लाड़खानियोंको दण्डित किया, तभी से वे, रावराजाजीके विरोधी हो गये थे। खाचस्यावासके ठाकुर शिवदानसिंहजीने अपनी बुद्धिमानीसे उनके इस विरोधका अन्त किया। सीकर राज्यके अन्तर्गत शाहपुरा पर संवत् १८६० में जोधपुर- राज्यकी एक सेना चढ़ आयी, उसका सामना शाहपुराके दुर्गरक्षक दूजोदके ठा० मुहब्बतसिंहजीने किया। वे, और उनके १५० साथी लड़ाईमें मारे गये। बात ६ फतहपुर-परिचय] ( ८२ ) जोधपुरकी सेना शाहपुराके किलेमें घुसने लगी। यह देखकर शाहपुराके एक सेवकने बारुदकी बुर्ज में आग लगा दो, जिससे जोध- पुरकी सेनाके १५५५ आदमी जलकर मर गये। सीकरसे रावराजा लक्ष्मणसिंहजी आये, जिन्होंने जोधपुरकी सेनाको मार भगाया । संवत् १८६३ में धौंकलसिंहको * जोधपुरका राज्यासन दिलाने के लिए उत्सुक पोकरनके ठाकुर सवाईसिंहजीक अनुरोधसे जयपुरपति महाराजा जगतसिंहजीने जोधपुर पर आक्रमण किया था, + उसमें दशहजार शेखावत भी जयपुरकी सेनामें सम्मिलित थे, जिनका नेतृत्व रावराजा लक्ष्मणसिंहजी, खेतड़ीके राजा अभयसिंहजी और विसाऊके ठाकुर श्यामसिंहजीने किया। लक्ष्मणगढ़ : बसानेके बाद संवत् १८६४ में बीकानेरके राजा जोधपुरके महाराजा भीमसिंहजीके बाद महाराजा मानसिंहजी जोधपुर के सिंहासन पर बैठे, उनसे पोकरनके ठाकुर सवाईसिंह जीका पारस्परिक द्वष था, जो धौंकलसिंहको महाराजा भीमसिंहजी का पुत्र बतलाकर, उसे राज्य दिलाना चाहते थे। + जयपुरके महाराजा जगतसिंहजीको जोधपुरके महाराजा मानसिंहजीसे मेवाड़की कृष्णाकुमारीके सम्बन्ध भयंका शत्रु ता होगयी थी, उसी से प्रेरित होकर महाराजा जगतसिनीने पोकरनके ठाकुा सवाईसिंह जी के प्रस्तावको मानकर जोधपुर पर चढ़ाई की थी। सीकरसे ९ कोस उत्तरमें "बेड़" नाम का एक गांव था, उसमें एक छोटी पहाड़ी भी थी, जिस पर रावराजा लक्ष्मणसिंहजीने लक्ष्मणगढ़का किला संवत् १८६२ में बनवाया और उसी किलेके नोचे संवत् १८६४ में लक्ष्मणगढ़ आबाद किया गया।
( ८३ ) [ चौथा खण्ड सूरतसिंहजीको ओर से बीदावतोंको एक सेना लक्ष्मणगढ़ पर आयो। लक्ष्मणगढ़को उन्होंने लूटना चाहा, इसी बातको ध्यानमें रखकर उन्होंने मालकी कतारके ऊंट घेर लिये। बखतमल दरोगा सीकरसे सेना लेकर लक्ष्मणगढ़ पहुंचा, उसने समस्त बीदावतोंको मार भगाया। रावराजा लक्ष्मणसिंहजीने संवत् १८६६ में २००००० रुपये दो पठानों ( मन्नाखाँ और महावतखाँ ) को देने किये और उनकी सहा- यता पाकर, खण्डेले पर अधिकार पाने की इच्छासे आक्रमण कर दिया। खण्डेलापति अभयसिंहजी और प्रतापसिंहजीकी अधिकार. रक्षार्थ, हनुमन्तसिंहजीने खण्डेलेको बचानेको प्राण-प्रणसे चेष्टा की। उन्होंने महावतावाँ पठानको रावराजा लक्ष्मणसिंहजीसे विरुद्ध करना चाहा। ५०००० रुपये महावतखाँको दिये और कह दिया कि खण्डेलाके विरुद्ध न लड़े। महावतखाँ रुपये हजम कर गया और खाडेलेवालों को धोखा देकर रावराजा लक्ष्मणसिंहजी से जा मिला। यह देखकर हनुमन्तसिंहजी स्वयं एक बड़ी सेना लेकर आये। उन्होंने वीरतापूर्वक ३।। महीने तक युद्ध किया। एकाएक छातीमें एक गोली के लग जाने से उनके प्राणान्त वहीं हो गये ! इस तरह रावराजा लक्ष्मणसिंहजी की विजय हुई और संवत् १८७० में खण्डेला उनके अधिकार में आ गया।
फतहपुर-परिचय] ( ८४ ) संवत् १८७१ में अमीरखाँ-महाराष्ट्र सेनापति आया, उसने ६००००० रुपये जयपुर से नजराने के मांगे। शिवनारायण मिश्र 'उस समय जयपुर के प्रधान मंत्री थे, उन्होंने रावराजा लक्ष्मणसिंह जी के पास सीकर लिख भेजा कि "आपने बिना जयपुरपतिकी अनुमतिके ही खण्डेले पर अधिकार-स्थापन किया है, तिस पर भी अभीतक आपने खण्डेले की शासन-सनद नहीं पायी। यदि आप खण्डेले की सनद चाहते हैं तो आपके लिए यह उपयुक्त होगा कि आप अमीरखाँ को ह००००० रुपये --५००००० अपने पास से और ४००००० शार्दूलसिंहजीकों से लेकर- देवें, आपको खण्डेले की शासन सनद मिल जायगी। रावराजा लक्ष्मणसिंहजी ने ६००००० रुपये एकत्रित करके अमीरखाँ को दे दिये और जयपुरपति से खण्डेलेकी शासन सनद अपने नाम करवाली। तत्पश्चात् जब वे जयपुर गये तब जयपुर द्वारा नियत ५७००० रुपये खण्डेला का राजस्व अप्रिम दे आये; उस समय ही जयपुरपति ने उन्हें रावराना की पदवी से विभूषित किया था। अपनी खोयो हुई सम्पत्तिको पुनः प्राप्त करने के लिए खण्डेले- वाले, जयपुर के ब्राह्मण मत्री (जो शिवनारायणजी मिश्र के बाद में हुआ ) से मिले। ब्राह्मण मंत्री, रावराजा लक्ष्मणसिंहजीसे - उनके जयपुर रहने और वहां अपना कुछ दबदवा प्राप्त कर लेने से-शङ्कित हो द्वेष रखने लगा था। उसने तुरन्त ही एक सेना लेकर खण्डे- लेवालोंके साथ खण्डेले पर चढ़ाई करदी।
[चौथा खण्ड - ( ८५ ) रावराजा लक्ष्मणसिंहजी ने जमशेदखाँ पठान के पास बहुत-सा धन भेजकर उससे खण्डेला-रक्षा का मनोभाव प्रकट किया। जमशेदखाँ सेना सहित ब्राह्मण मंत्री के डेरे पर पहुंचा और उसे डर दिखाकर उसके पासका सारा सामान छीन, उसे जयपुर भगा दिया। मंत्री ने जयपुर पहुंच कर रावराजाजी को पकड़ना चाहा ; परन्तु वहां से रावराजाजी पहले ही नो-दो-ग्यारह हो गये थे। संवत् १८८१ में खण्डेला---धोकर, बराल गावोंको छोड़कर- जयपुर की राजमाता भटियानीजी के कहने से खण्डेलेवालों को वापिस लौटा दिया गया। जयपुर की सहायता पाकर संवत् १८८४ में रावराजा लक्ष्मणसिंह जी ने झुझुनू पर हमला किया। तत्पश्चात् खेतड़ी पर करना चाहा ; परन्तु उनके हितचिन्तकों ने ऐसा न होने देकर शेखावत शक्ति को छिन्न भिन्न होने से बचा लिया। अपने पिता राव देवीसिंहजी की तरह ही रावराजा लक्ष्मणसिंह- जीने सीकर-राज्यका विस्तार खूब बढ़ाया। वे १५०० गांवोंके स्वामी हो गये थे, जिनसे ८००००० रुपये वार्षिक आय उनको होती रही। लक्ष्मणगढ़ तथा और कई गांव रावराजाजी ने दुर्गबन्द किये । ८ बंदूकधारी दल बनाये, जिनका नाम 'अलीगोल दल” रक्खा गया। १००० शिक्षित घुड़सवारोंकी सेना भी उनके पास थी। घुड़सवार भूवृत्तिवाले और ५०० वेतन पानेवाले थे। संवत् १८६० में ३८ वर्ष राज्य करके रावराजा लक्ष्मणसिंहजी ४६ वर्ष की अवस्था में स्वर्गस्थ हुए।
m- राव राजा रामप्रतापसिंहजी ( संवत् १८९० से १९०७ तक, तदनुसार सन् १८३३ से १८५० तक) रावना लक्ष्मणसिंहजी के देहावसान होने पर संवत् १८६० में उनके पुत्र रावराजा रामप्रतापसिंहजी, जिनकी अवस्था केवल पांच ही वर्ष की थी, * राज्यासनारूढ़ हुए। उनकी माता राठोड़जी राजकाज देखने लगीं। राज्यकी व्यवस्था पूर्ववत ही रही, उसमें राठोड़जी ने कोई त्रुटि न होने दो ; पर खवासवाल--मुकुन्दजी, हुकुमजी, चिमनजी-और रामबख्शजी ( पालितपुत्र ), उस समय जोर पकड़ गये थे ; उन्होंने इस अवसर को अपना स्वार्थ सिद्धि के लिए उपयुक्त समझा ; अतः फतहपुर रामगढ़ और लक्ष्मणगढ़ पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। श्री राठोड़जी ने खवासवालों और रामबख्शजीको-उनकी आजीविका के लिए-सिंगरावट और नेछवा ५० गांवों सहित देदिये, जिनसे करीब एक लाख रुपये की वार्षिक आय थी। फतहपुर, रामगढ़ और लक्ष्मणगढ़ वापिस लौटा लिये। इसके कुछ दिन बाद ही रामगढ़ पर, शेखावाटी के प्रसिद्ध वीर .. . * रावराजा लक्ष्मणसिंहजी की धर्मपत्नी राठोड़जी के गर्भ से संवत् १८८५ में रावराजा रामप्रतापसिंहजी का जन्म हुआ था।
( ८७ ८७ ) [चौथा खण्ड डूगजी और जवाहरजी * ने चढ़ाई कर दी, वे रामगढ़ को लूटना चाहते थे। रामगढ़ के सेठ गुरुसहायमलजी पौद्दार + ने उनको २०००० रुपये देकर रामगढ़ से बिदा किया, जिससे रामगढ़ लूट- खसोट से बच गया। श्री राठोड़जी ने उक्त सेठजी के इस दूर- दर्शिता-पूर्ण कार्यकी बड़ी प्रशंसा की। इस प्रकार पोद्दार-परिवार की सीकर-राज्य में और भी प्रतिष्ठा बढ़ गयी। * टुंगजी और जवाहरजीराव शिवसिंहजी के पुत्र कीरतसिंहजी के वंशज थे। शेखावाटी के प्रसिद्ध वीर होने के कारण उनका नाम शेखावाटीका बच्चा-बच्चा जानता है । वे शेखावाटी की वीर-प्रसविनी भूमिके वीर डाकू थे। अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार दे निर्धन मनुष्य और स्त्री-जाति को लूटना पाप समझते थे। वे तो केवल धनियों को ही लूटते थे। शेखावाटी भरमें उनका बड़ा प्रभाव था। लोग-खासकर धनवान्----उनके नाम से थर थर कांपने लग जाते थे। .. एक समय एक डाके के अपराध में डूंगजी, पकड़कर आगरे में कैद कर लिये गये थे ; उनको, जवाहरजी तथा अन्यान्य वीर जेलका दरवाजा तोड़ कर निकाल ले गये ; जाते समय रास्ते में वे लोग नसीराबाद के सरकारी खजाने पर चढ़ दौड़े और ५२०००) रुपये लेकर वहां से चम्पत हो गये, जिसके अपराध में उनको नजरबंद रहना पड़ा, बाद में उक्त सरकारी खजानेकी क्षति-पूर्ति सीकर-राज्य को करनी पड़ी। + रामगढ़ के प्रसिद्ध पौद्दार-परिवार के नामी सेठ थे। आजकल इनके यहां "ताराचन्द घनश्यामदास" के नाम से व्यापार होता है।
फतहपुर-परिचय] ( ८८ ) संवत् १८९१ में कर्नल लाकेट * द्वारा लिखी शेखावाटी के भ्रमण की रिपोर्ट पर, ब्रिटिश सेना का एक भाग--जिसमें तो और घुड़सवार मी थे-नसीराबाद से शेखावाटी में आया, जिसका काम था लुटेरों और उपद्रवियों से जनता के धन-मालकी रक्षा करना और शांति-स्थापन करना। शेखावाटी स्थित कई लूट-खसोट करनेवाले ठाकुरों के किले उसी समय, इस सेना द्वारा तोड़े गये थे। सीकरके रघुनाथगढ़ और देवगढ़ भी सीकरवालों को खाली करने पड़े थे, जो कुछ समय बाद उनको वापिस मिल गये । यह सेना "शेखावाटी ब्रिगेड" नामसे यहीं रहने लगी। मेजर फारेस्टर । इसके अधिनायक नियुक्त हुए। उन्होंने यहीं के लुटेरों और डाकुओंको वेतन देकर सेना में रक्खा, इस तरह अच्छा संगठन बना लिया। सेना के प्रतिवर्षके व्यय में ७३५००) रुपये लगने * कर्नल लाकेट-ब्रिटिश गवर्नमेंट द्वारा आदेशित होकर संवत् १८८८ में राजपूताना के प्रथम ए० जी० जी० बनकर आये थे। उन्होंने संवत् १८८९ में डाकू और लुटेरों की जांचके लिए शेखावाटीका एक दौरा किया। दौरा करनेके बाद उन्होंने एक रिपोर्ट लिखी, जिसके फलस्वरूप उपर्युलिखित ब्रिटिश सेना का ब्रिगेड शेखावाटी में आया। + मेजर फारेस्टर-एक सैनिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति थे। कुछ समय पिंडारियों के साथ भी रहे । बादमें "शेखावाटी ब्रिगेड' के मुखिया बनकर आये थे।
( 48 )
[चौथा खण्ड
लगे। २२०००)
,
,
बीकानेर-राज्यसे और ५१५००) शेखावाटी के
सामन्तों से लिये जाने लगे ।*
संवत् १८६३ में "शेखावाटी ब्रिगेड' जयपुर के अधिकार में
आ गया। मेजर फारेस्टर ही उसके प्रधान पद पर रहे। तदनन्तर
यही ब्रिगेड संवत् १६०० में घटाकर पैदल सिपाहियों का एक
रेजिमेंट बना दिया गया, जिसका व्यय ब्रिटिश गवर्नमेंट देने लगी।
रावराजा रामप्रतापसिंहजी संवत् १८६३ में केवल ८ हो वर्षके
हो पाये थे। उस समय उनकी बाल्यावस्था देख, स्वार्थी लोग
राज्य में नित नये बखेड़े खड़े कर देते थे। बिना किसी उत्पात के
स्वार्थियों को कब चैन पड़ सकती थी ! राज्य उपद्रवोंका केन्द्र
बन गया था, जिससे प्रजाके सुखकी तो कौन कहे, नींद और भूख
तक उड़ गयी थीं।
समसिंहजी के वंशधर श्यामसिंहजी
ने इमी साल जयपुर
कोर्ट में सीकर पर १२० गांवों + की नालिश कर दी, जिसके
फलस्वरूप उन्हें ११ गांव सीकर से मिल गये ।
भैरवसिंहजी की माता मेडतनीजी ने भी जयपुर दरवार में
* शेखावाटी की गरीब प्रजा को ही उपर्युक्त रकम कर-रूप में अपने
सामन्तों को देनी पड़ती थी।
+ समर्थसिंहजीकों के गांव जो राव देवीसिंहजी द्वारा छीने जाकर
अधिकृत कर लिये गये थे।
: रावराजा रामप्रतापसिंहजीके वैमातृक भाई, जो उनके पश्चात् सीकर
की गद्दीपर बैठ चुके हैं।
, फतहपुर-परिचय (१०) अपने पुत्र के लिए आधे राज्य का दावा कर दिया। उनके दावेकी यथाविधि जांच हो जाने के बाद, कुड़ली और सीमालला गांवों सहित उन्हें ५००० रुपये वार्षिक आमदनी की जागीर, सीकर से दिलादी गयी। श्री राठोड़जी का हृदय, इस तरह के उत्पाता से सीकर-राज्यकी उत्तरोत्तर क्षति देखकर, दहल उठा। वे किसी प्रबल शक्ति के सहयोग की अपेक्षा करने लगी। उन्होंने जयपुरके पी० ए० पोलिटिकल एजेण्ट ) को अपनी कष्ट-कथा लिख भेजी। पी० ए० ने पुरोहित रामनाथजी * को कामदार के पद के लिए नियुक्त करके भेज दिया ; परन्तु पुरोहितजी सीकर अधिक दिन न टिक सके; कारण उनकी नीतिसे गवराजाजी सहमत नहीं थे। रावराजाजी चाहते थे कि वे एक बार अपनी प्रजाकी वास्तविक स्थिति देखकर, उसके सुख-दुःखका अनुमान लगावें। इसीसे उन्होंने संवत् १८६८ में अपने राज्य भर का पर्यटन किया। कर्नल सदरलैण्ड से भी मिले, तभी से उनकी सदरलैण्ड से मैत्री हो गयी थी। संवत् १६०३ में रावराजा रामप्रतापसिंहजी सदरलैण्ड से मिलने अलवर गये, तब उन्होंने अपने खवामवाल भाई तथा रामबख्शजी * खेतड़ी राज्य के कामदार थे। उनका खेतड़ी में काफी दबदबा था। उनकी हवेली, जिसमें आजकल खेतड़ी का जेलखाना है, पुरोहितजी की हवेली के ही नाम से विख्यात है।
......... (६१ ) [चौथा खण्ड द्वारा उपभोग की जानेवाली सम्पत्ति के सम्बन्ध में जिक्र करते हुए कहा कि "हमारी जिस सम्पत्तिका ये लोग उपभोग कर रहे हैं, वह हमें वापिस मिल जानी चाहिए।" कर्नल सदरलैण्ड ने जयपुर जाकर रावराजा रामप्रतापसिंहजी के प्रस्ताव को जयपुर रिजेंसी के सामने पेश किया, जिसे रिजेंसी ने मंजूर कर लिया और एक सेना रावराजाजी की सहायतार्थ जयपुर से भेजी। रावराजाजी जयपुरकी सैन्य-सहायता प्राप्त करके खवामवालोंके किले सिंगरावट पर चढ़ दौड़े। उधरसे डूगजी, जवाहरजी और भूपालसिंहजीकी मदद पाकर, खवासवाल और रामबख्शजीने उनका सामना किया। तब क्या था ! दोनों ओरके वीर परस्पर भिड़ गये। कई दिनों तक लड़ाई होती रहीं। आखिर सिंगरावटका किला ले लिया गया। खवासवाल और रामबख्शानी आकर राव- राजाजी के पैरों पड़ गये, जिससे रावराजाजीने दयाई होकर '. ८००) रुपये वार्षिक आमदनीकी जागीर खवासवालोंको दी तथा १२५०) रुपये वार्षिक आय की रामबख्शजी को। तिसपर भी वे लोग शान्तिपूर्वक नहीं रहे। रावराजा रामप्रतापसिंहजी एक सुयोग्य सञ्चरित्र शासक थे। राजनीति अच्छी जानते थे, जिसके लिए उनकी अच्छे-अच्छे राज- नीतिज्ञ भी प्रशंसा किया करते थे। एकबार कर्नल सदरलैण्डने भी उनकी राजनीतिज्ञताकी तारीफ की थी।
फतहपुर-परिचय ( २ ) धर्मशास्त्रोंके अध्ययनके लिए रावराजा रामप्रतापसिंहजीने "सिद्धान्त-कौमुदी" पढ़ी थी ।* "सिद्धान्त-कौमुदी पढ़कर उन्होंने मनोयोगपूर्वक स्मृतियों का अध्ययन किया एवं स्मृति वचनों पर सश्रद्धा चले भी। उदाहरण लीजिये,-लक्ष्मणगढ़के परम वैष्णव पूर्णमलजी प्रेमसुखदाम गनेडीवाला--जो स्वयं चकांकी वैष्णव थे ने गवराजाजीसे भी चक्रांकित हो जानेका अनुरोध किया। राव- राजाजीने चक्रांकित होना, स्मृति वचनोंके प्रतिकूल समझ-इनकार कर दिया। स्मृति वचनों पर रावराजाजीकी इतनी आस्था थी कि अपने गुरु पं० श्रीरामजी-जिनसे कौमुदी सीखी थी--का भी, दक्षिणाके लोभसे चक्रांकित हो जानेके कारण, उन्होंने सीकरके गढ़में प्रवेश निषेध कर दिया था। रावराजा रामप्रतापसिंहजो निरामिष भोजी थे। उन्होंने जीवन में कभी मांस-भक्षण और मद्य-पान नहीं किया। एक क्षत्रिय होते हुए निरामिष भोजी होना, उनके ऊंचे चरित्रका द्योतक है। संवत् १९०७ में रावराजा रामप्रतापसिंहजी रोगाक्रांत होगये । उनकी अवस्था दिन पर दिन खराब होती गयी। आखिर जब उनको बचनेकी उम्मेद न रही, तब भैरवसिंहजीको दत्तक रूपमें ले लेनेका विचार किया। उन्होंने भैरवसिंहजीको बुला भेजा; लेकिन रींगसके पं० श्रीरामजीने रावराजा रामप्रतापसिंहजी को सिद्धान्त. कौमुदी पढ़ायी थी।
[ चौथा खण्ड (६३ ) श्रीराठोड़जीके डरसे वे आ न सके और रावराजाजी, बिना किमीको दत्तक स्वीकार किये, मृत्युको प्राप्त होगये । इस तरह रावराजाजी २२ वर्षकी छोटी अवस्थामें ही केवल १७ वर्ष राज्य करके स्वर्ग सिधारे । * ८-रावराजा भैरवसिंहजी ( सवत् १९०८ से १९२२ तक, तदनुसार सन् १८५१ से १८६५ तक ) रावराजा रामप्रतापसिंहजीके मरनेके बाद, उनकी जेष्ठा रानी रानावतजीने भैरवसिंहजीको दत्तक स्वीकार करके, उन्हें शासना- धिकार देना चाहा; परन्तु उनकी सास श्रीराठोड़जीने उन्हें ऐसा करने से रोका और कहा कि भटियानीजी (स्वर्गीय रावराजाजीकी कनिष्ठा रानी) गर्भवती हैं, सम्भव है उनके गर्भसे कोई लड़का पैदा हो जाय।" उपयुक्त वार्ताको लेकर श्री० राठोड़जी और रानावतजीमें एक प्रकारकी कलह पैदा हो गयी। घरकी कलह बुरी होती है, उसके भावी परिणामके सम्बन्धमें श्री० राठोड़जीका सौतिया डाहसे जला- भुना हृदय न विचार मका; इसीसे उन्होंने अपनी सहपनी (सौत) * रावराजा रामप्रजापसिंहजी की, रानावतजी और भटियानीजी, दो रानियां थीं। + भैरवसिहजी को माता मेड़तनीजी और श्री. राठोड़जी दोनों ही रावराजा लक्ष्मसिंहजीकी पत्नी एवं परस्पर सहपत्नी ( सौत ) थीं। BANNAHAKAar फतहपुर-परिचय ] के पुत्र भैरवसिंहजीके दत्तक रूपमें लिये जानेका विरोध किया, और अन्त तक करती रहीं। भैरवसिंहजीको सीकरकी गृह-कलहका पता लग गया था, उन्होंने अवसरकी उपयुक्तताको हाथसे जाने देना उचित नहीं समझा। तुरन्त ही जयपुर जाकर सीकर पर अपने स्वत्वका दावा कर दिया । इसी तरह एक साल निकल गया। आखिर भैरवसिंहजीका सीकर- राज्य पर स्वत्व, न्यायसम्मत सिद्ध होगया। जयपुरसे भैरवसिंहजीका अधिकार घोषित कर दिया गया; तब भैरवसिंहजी संवत् १६०८ में सीकरके सिंहासन पर विराजे । प्रारम्ममें कुछ छोटे आदमियों के संसर्गके कारण, उनकी अपकीर्ति जयपुर भरमें सीकरकी बदनामी फैल गयी थी। जयपुरकी ओर से करोलीके एजेण्ट केप्टेन हार्ड कासल, शेखावाटीकी व्यवस्था करने के लिए आये और सीकर में ठहर कर उन्होंने व्यवस्था की । रावराजा भैरवसिंहजी भी इधर कुछ सावचेत हुए। उन्होंने सीकरकी सुव्यवस्थाका काम अपने हाथमें लिया; क्योंकि उनका विश्वास अपने कतिपय विश्वासपात्र सेवकोंसे भी उनकी स्वार्थ- परता देखकर-बिलकुल उठ गया था। संवत् १६०६ में रावराजा भैरवसिंहजीने अपना एक दरबार किया, उसमें उन्होंने अपने समस्त अभिजनों को आमंत्रित किया। आमंत्रण पाकर प्रायः सभी कुटुम्बीजन सीकर पहुंचे। उनमें से मुकुन्दजी, हुकुमनो, चिमनजी ( खवालवाल बन्धु ), भूपालसिंहजी, (६५) [चौथा खण्ड जवाहरजी और जवान जीके नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। मुकुन्दजी, प्रधान मन्त्रीके पद पर नियुक्त किये गये । रावराजा रामप्रतापसिंहजीसे त्रास पाकर जिन लोगोंने सीकर छोड़ दिया था, वे लोग भी भैरवसिंहजीके राजत्वमें फिर सीकर में आकर रहने लगे। संवत् १६१४ में गदर--जो सन् ५७ के, गदर के नामसे प्रसिद्ध है--छिड़ गया, जिसमें भारतीय सैनिक, ब्रिटिश गवर्नमेंटके विद्रोही हो उठे थे। उस समय ब्रिटिश गवर्नमेंटने गजपूनोंसे सहायता चाही। राजपूताना प्रान्तान्तर्गत विविध ठिकानांके अधिपतियोंसे भी सहायता मांगी गयी थी। उस सिपाही-विद्रोहमें जयपुरकी ओर से एक सेना, ब्रिटिश गवर्नमेंटकी 'सहायतार्थ भेजी गयी, * उसीके साथमें सीकर के रावराजा भैरवसिंहजीने भी अपनी एक घुड़सवार सेना भेजी, जिसके लिए उनको सधन्यवाद ५०००) की खिलअन । प्राप्त हुई। रावराजा भैरवसिंहजी सरल प्रकृति के मनुष्य थे। सरलता उनमें आवश्यकतासे अधिक थी। जोरावरसिंहजी लाड़खानीने रावराजाजीकी सरलतासे लाभ उठानेका एक उपाय मोचा। उन्होंने संवत् १६१८ में एक बनावटी लड़का बनाकर, उसे स्वर्गीय रावराजा जी ( रामप्रतापसिंहजी ) का पुत्र सिद्ध करना चाहा। जयपुरकी mint * जयपुर को इस सहायताके लिए कोट-कासिम का परगना मिला था। + खिलअत -- बादशाह-वारा दी गयी पोशाक को कहते हैं।
[ फतहपुर-परिचय कोर्ट में उसका मुकद्दमा दायर किया गया, लेकिन मुकद्दमा झूठा और निराधार साबित होनेसे खारिज हो गया। रावराजा भैरवसिंहजी बड़े लोभी थे। वे रुपये संचित करना जानते थे, खर्च करना नहीं। हर साल अपनी प्रजाके लोगोंसे, वे बिना किसी कारण के ही, धन संग्रह करते थे और अपना खजना भरते रहते थे। इसीसे जब वे मरे, सीकरका खजाना भरा-पूरा था। संवत् १६२१ में गवराजा भैरवसिंहजीकी तंदुरुस्ती बिगड़ गयी। वे प्रायः बीमार ही रहने लगे। निःसन्तान होनेसे उन्हें अपने उत्तराधिकारी रूपमें किसीको दत्तक लेनेका विचार हुआ। तब उन्होंने अपने निकटस्थ कुटुम्बी स्व. ठाकुर बिड़दसिंहजी के वर्षीय पुत्र माधवसिंहजीको दत्तक स्वीकार कर लिया और स्वयं संवत् १६२२ में स्वर्गस्थ हुए। * राव शिवसिंहजी के तृतीय पुत्र मेदसिंहजी के वंशधर ।
8--रावराजा माधवसिंहजी बहादुर (संवत् १९२३ से १९७९ तक, तदनुसार सन् १८६६ से १९२२ तक) संवत् १९२३ के पादार्पणके साथ, चैत्र शुक्ला ७ को रावराजा भैरवसिंहजीके बाद, उनके दत्तक पुत्र रावराजा माधवसिंहजीको सीकरकी गद्दीका अधिकार मिला। रावराजाजी उस समय केवल छ ही वर्षके थे, पर थे चपल । उनकी बाल्यसुलभ चपलता देखकर लोग अवाक् रह गये और लगे उनकी प्रशंसा करने । वास्तवमें उस समय सभीको अनुपम आनन्दोपलब्धि थी। मुकुन्दजी, उस समय सीकरके शासन-व्यवस्थापक थे, जो बड़ी ही योग्यतासे राज-कार्यका संचालन किया करते थे। इतनी छोटी अवस्थामें रावराजा माधवसिंहजीके सिंहासनासीन होनेसे शेखावाटीके डाकू और लुटेरोंके मनको नवीन उत्साहकी प्राप्ति हुई। उन्होंने सीकर रियासतमें उपद्रव मचाना शुरू किया ; लेकिन मुकुन्दनीने उनका दमन अति शीघ्र ही कर दिया, जिससे उनको शांत होना पड़ा। संवत् १९२५ में अनावृष्टि अकाल पड़ा। उस समय भी मुकुन्द- जीने सीकर-राज्यकी ओर से अकाल पीड़ित जनोंकी सहायता करके राज्यका यश परिवृद्ध किया। संवत् १६२८ में रावराजा माधवसिंहजी लार्ड मेयोके दरवारमें सम्मिलित होनेके लिए जयपुर गये। उस समय लार्ड मेयोने खिल- अत देकर उनको सम्मानित किया था।
.........., फतहपुर-परिचय] (६८ ) मुकुन्दजी-जो अब तक निःस्वार्थ होकर सीकरका राज-काज चलाते थे-के हृदयमें संवत् १९३० में स्वार्थका पौधा पनप आया । वे अपने लिए सीकर-राज्यसे १०००) रुपये मासिक चाहने लगे, जिसके विषयमें उन्होंने जयपुरसे भी लिखा-पढ़ी की और जयपुरके तत्कालीन पोलिटिकल एजेण्टसे इस सम्बन्धमें कहलाना चाहा। यही उपाय अपनी अभीष्ट-सिद्धिके लिए उन्हें उचित जान पड़ा। तदनन्तर बिना किसी की इजाजतके ही वे सीकरके राज-कोषसे १०००) रुपये, प्रतिमास उठाने लगे। अपनी जागीरके गांवोंको भी उन्होंने बड़े गांवोंसे बदल लिया। मुकुन्दजीकी इस प्रकार की स्वार्थ- भरी नीति देखकर रावराजा माधवसिंहजीने उनको प्रधानामात्यके पदसे च्युत कर, उस पद पर दूसरे किसी सुयोग्य व्यक्तिको नियुक्त कर देना चाहा। रावराजा माधवसिंहजीकी अपने प्रति अप्रसन्नता देखकर मुकुन्द- जीने इस्तीफा पेश किया, जिसे रावराजाजीने बिना किसी आनाकानी के स्वीकार कर लिया। इलाहीबख्शजी (खाँजी ) * उक्त पद पर नियुक्त किये गये। महारानी विक्टोरियाकी राजराजेश्वरी उपाधिके ग्रहणोपलक्षमें संवत् १६३३ में जब लार्ड लिटन द्वारा दिलीमें दरवार किया गया, * फतहपुर-निवासी झंझुनू निजामतके एक वकील, जो बाद में राव- राजा माधवसिंहजीको कृपाके अधिकारी होनेसे प्रधानामात्यके पदपर नियुक्त किये गये।
, (६ ) [ चौथा खाण्ड उस अवसर पर रावराजा माधवसिंहजी, जयपुरेश सवाई रामसिंहजी के साथमें दिल्ली जाकर, दरवारमें समुपस्थित हुए। तभीसे राव- राजाजी पर जयपुरपतिका स्नेह कुछ अधिक होगया था। उन्होंने रावराजाजीको पंचरंग झंडा और शिरोपाव देकर सम्मानित किया। इलाहीबख्शजी जो कुछ समय-पूर्व, मुकुन्दजीके बाद, रावराजाजी के प्रधानामात्यके पद पर नियुक्त किये गये थे, वे संवत् १६३६ में अपने त्रुटिपूर्ण शासन-विधानके कारण रावराजा माधवसिंहजी-द्वारा पदच्युत कर दिये गये और कारावासमें डाल दिये गये। राय परमानन्दजीने रावराजाजीकी अनुज्ञा पाकर उक्त पदको सुशोभित किया। चिमनजी उनके सहायक बने । कुछ समय बाद, जब मुकुन्दजीका देहान्त होगया, तब उनके पुत्र पन्नासिंह * ने सीकरमें उपद्रव करना शुरू कर दिया। रावराजा माधवसिंहजीने उस पर कुरकी भेज दी और मुकुन्दजीके बदले हुए गांवों को अपने अधिकारमें कर लिया। प्रार्थना करने पर पन्नासिंह को उसके पिताकी पूर्वकी जागीरके गांव दे दिये गये। जयपुर-राज्यकी ओर से, संवत् १६३६ में न एक आदेश-पत्र निकाला गया, जिसमें जयपुरकी फौजदारी और दीवानी अदालतें सीकर और खेतड़ीमें स्थापित करनेकी बात लिखी थी। इससे सीकर और खेतड़ीके फौजदारी और दीवानी अधिकार लोप होते * मुकुन्दजीका पुत्र, जो बादमें हुकुमजी के दत्तक आ गया था। 'महाराजा सवाई माधवसिंहजी के राजत्व में।
फतहपुर-परिचय ] ( १०० ) थे। रावराजा माधवसिंहजी और खेतड़ीके तत्सामयिक राजा अजीतसिंहजीने अन्यान्य शेखावतोंके साथ, इसका विरोध किया, जिससे सीकर और खेतड़ीके दीवानी और फौजदारी स्वत्व पूर्ववत् रावराजा माधवसिंहजी संवत् १६४३ में जयपुर-नरेशके जुबिली महोत्सव पर जयपुर पधारे, उस समय उनको ‘बहादुर' की उपाधि जयपुरपतिकी ओर से दी गयी । संवत् १६५६ में जब भीषण अकाल पड़ा, तब रावराजा माधव- सिंहजीने अकाल-पीड़ित लोगोंकी सहायतार्थ मकान बनवाने शुरू कर दिये। उस समय कोई भी दीन-हीन वहाँ काम करके मजदूरी प्राप्त कर, अपने उदरकी पूर्ति कर सकता था। रावराजा माधवसिंहजीने सीकर में एक हस्पताल बनवाया तथा अन्यान्य कई नूतन भवन भी निर्माण करवाये, जिनको विद्युच्छटाके आलोकसे आलोकित किया गया। इस तरह सीकरकी शोभा पहले से द्विगुणित होगयी। संवत् १६५८ में रावराजा माधवसिंहजीने कलकत्ते की यात्रा * की। उस समय उनको भगवानदासजी बागलाके हस्पताल-भवनमें अवस्थान मिला और सेठ ताराचन्दजी घनश्यामदासके यहां उनका अभिनन्दन हुआ। इस यात्रामें वे करीब १ महीने कलकत्ता ठहरे थे। * रावराजा माधवसिंहजीने ४ बार कलकत्ते की यात्रा की थी, जिनमें से उपर्युल्लिखित दूसरी है।
[चौथा खण्ड ( १०१ ) तत्पश्चात् रावराजा माधवसिंहजी जयपुरेश महाराजा सवाई माधवसिंहजीके साथ, संवत् १६५६ में सम्राट सप्तम एडवर्ड के राज्याभिषेकोत्सव पर इङ्गलैंड पधारे । संवा १९६६ में रावराजा माधवसिंहजी फतहपुर आये और फतहपुर पिंजरापोल नामक संस्थाके भवनका शिलारोपण किया। रावराजा माधवसिंह जी प्रजावत्सल, उदार और दयाप्रेमी नरेश थे। उन्होंने अपने राज्य के सुप्रसिद्ध दानवीर प्रातःस्मरणीय स्व० सेठ सुखानन्दजी सरावगी * के अनुरोधसे फतहपुर, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़ और सीकर में प्रत्येक मासकी शुक्ला १४ को तथा दश- लक्षणी पर्व + के दिनों में पशु-बध और मांस बिक्री न करनेकी आज्ञा जारी कर अपनी दयालुताका परिचय दिया। तत्पश्चात् फतहपुर, रामगढ़ और लक्ष्मणगढ़के दशहरेका पशु-बलिदान मी रावराजाजीने उपर्युक्त सेठजीके कहनेसे सदाके लिए बन्द करके अपने नामको चिरस्मरणीय बना लिया। पिछठे महायुद्धके अवसर पर रावराजा माधवसिंह नीने ब्रिटिश गवर्नमेंटकी, करीब ४ लाख रुपये वारलोनमें देकर सहायता को । ब्रिटिश गवर्नमेंटने रावराजाजीको सन् १९२२ ई० (संवत् १६७४) के जनवरी मासमें नूतन वर्षारम्भके उपलक्षमें “के० सी० आई० ई.' की उपाधिसे विभूषित किया। * सेठजी के विषयमें अन्यत्र, इसी पुस्तक के पंचम खण्डमें पढ़िये । + दशलक्षणी पर्व-जैनियोंका एक पर्व, जो भाद्रपद की शुका पंचमो से शुका चतुर्दशी तक रहता है।
फतहपुर-परिचय] ( १०२. ) इसके थोड़े दिन बाद ही रावराजाजी रोग-शय्या-शायी होगये। उनको अपने बचनेकी आशा न रही। उन्होंने अपने बड़े भाई विलापसिंहजीके लड़के कल्याणसिंहजीको अपना दत्तक बना लिया। तत्पश्चात् आषाढ़ शुक्ला ४ संवत् १६७६ को उनका स्वर्गवास होगया। --- १०- रावराजा कल्याणसिंहजी बहादुर (संवत् १९७९ से, तदनुसार सन् १९२२ से ) रावराजा माधवसिंहजीका उत्तरकृत्य सम्पन्न हो जानेके बाद, संवत् १६७६ के आषाढ़ मासकी शुक्ला १५ को रावराजा कल्याणसिंह- जी सीकरकी गद्दो पर अधिष्ठित हुए। सीकरकी प्रजाने उसी रोज संध्या समय इनका हर्षपूर्वक अभिनन्दन-समारोह मनाया, जिसमें इनको एक अभिनन्दन-पत्र भी दिया गया। रावराजा कल्याणसिंहजीका भव्यभाल और चमकता हुआ मुख देखकर प्रजा-जन फूले नहीं समाते थे। उस समय सब यही कहते थे कि कल्याणसिंहजी द्वारा सीकर-राज्य अवश्य कल्याणको प्राप्त होगा। रावराजाजीकी स्वभाव-सुलभ विनम्रता, धर्म-प्रियता और दयालुता देखते हुए, लोगोंका इस प्रकार सुन्दर भविष्यकी कल्पना करना अनुचित नहीं था।
फतहपुर-परिचय ...
वर्तमान जयपर-नरेश
वर्तमान सीकर-नरेश
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( १०३ )
[चौथा खण्ड
अपनी दयालुताका परिचय तो, रावराजा कल्याणसिंहजीने
गद्दी पर बैठनेके थोड़े समय बाद ही संवत् १६८२ की माघ कृष्णा
१३ को, फतहपुर-निवासी प्रातः स्मरणीय दानवीर, सीकर-राज्यमें
अहिंसा परमोधर्मः की पवित्र पताका फहरा देनेवाले स्व० सेठ
सुखानन्दजीके कहनेसे, अगतों * पर किये जानेवाले पशुबध और
मांस-विक्रय जैसे घृणित कार्य सदाके लिए बन्द करके, दिया ।
नवाब जलालखाँ द्वारा पशुओंके चरनेके लिए छोड़ी गयी बीहड़में
बिना राज्यको सनदके शिकार न करने की इजाजत भी रावराजाजीने
दी तथा स्व० रावराजा माधवसिंहजी द्वारा, फतहपुर, रामगढ़ और
लक्ष्मणगढ़में जारी की हुई दशहरेके पशु-बलिदानकी निषेधाज्ञामें
रावराजाजीने सीकरका नाम और जोड़कर सीकरसे भी इस
* अगते ( जिन पर पशुबध और मांस बिक्री निषेध हैं)
(१) रावराजा भैरबसिंहजी की दाग तिथि
(प्रत्येक मासकी शुक्ला १०)
(२) रावराजा माधवसिंहजीकी दाग तिथि
प्रत्येक मासकी शुक्रा ४)
(३) धार्मिक अगते ([क] प्रत्येक मासकी कृष्णा ११ और १५)
([ख] प्रत्येक मासकी शुक्ला ११ और १५)
([ग] प्रत्येक मासकी शुक्ला १४ और ८)
(घ] दशलक्षणी पर्व-भादवा सुदी ५से १४ तक)
([6] प्रत्येक रविवार और मंगलवार)
फतहपुर परिचय] ( १०४ ) कलंकिनी रूढ़िको सदाके लिए निर्वासित कर अपनी महानता दिखलायी। राज्यमें किये गये उपर्युक्त सुधारोंके प्रतिकूल आचरण करने पर रावराजाजीने २०० ) रुपया जुर्माना और छै मासका कारावास दण्ड नियत किया। सीकरकी शासन व्यवस्था भी जो पहले पुराने ढरेसे परि- चालित की जाती थी--रावराजा कल्याणसिंहजी द्वारा अतिशय परिवर्तनको प्राप्त होकर, चमक उठी। ७ विभाग, इन्होंने अपने शासन कार्यों के चलानेके लिए बनाये, जिनका विवरण निम्नाङ्कित है। १. “पुलिस विभाग" जो पहले फौजदारी विभागके अन्तर्गत था, वह अब फौजदारी अदालतोंसे बिलकुल पृथक् कर दिया गया और एक अलग विभाग “पुलिस डिपार्टमेण्ट" नामसे बनाया गया, जिसका संचालन सीकरके पुलिस-सुपरिण्टेण्डेण्ट करते हैं । २. लगान पहले ठेके * से वसूल किया जाता था, वह अब "रिवेन्यू डिपार्टमेण्ट' द्वारा नियुक्त किये हुए तहसीलदारोंकी मात- हतीमें लटारों - द्वारा वसूल किया जाने लगा। * ठेका-किसानोंसे लगान वसूल करने के लिए, ३-३ वर्ष का ठेका दिया जाता था। तीन वर्ष के बाद ठेका दूसरे आदमी को दे दिया जाता था। अधिक लगान वसूल करके देनेवाले हो प्रायः ठेका पानेके अधिकारी होते थे। ऐसी अवस्था में बेचारे किसानों की शामत आ जाती थी। यह ठेका रिवेन्यू डिपार्टमेंट द्वारा सदाके लिए बंद कर दिया गया । ग. लटारे लगान वसूल करने के लिए रखे हुए राज्यके नीकर ।
( १०५ ) [ चौथा खण्ड ३. न्याय-इन्साफके लिए जो विभाग खोला गया, उसको "जुडीशियल डिपार्टमेण्ट" कहते हैं। इस विभागके लिए एक सुयोग्य जुडीशियल आफिसर तथा एक जुडीशियल सेक्रेटरी नियुक्त किये गये । दोवानी और फौजदारी मुकदमोके इब्तिदायी (प्रारम्भिक) अधिकार तथा अपीलांटके अधिकार जुडोशियल आफिसरको मिले । इसके अतिरिक्त फौजदारको भी दीवानी और फौजदारी मामलों में इब्तिदायी अधिकार प्राप्त हुए। ४. “फाइनेन्स डिपार्टमेण्ट' राज्यके खजानेके नामसे, पहले एक महाजनकी देखरेखमें चलता था, उसको उक्त नाम देकर एक अका- उण्टेण्टके अधीन कर दिया गया । शिक्षाकी उन्नतिके लिए "एजुकेशन डिपार्टमेण्ट" खोला गया। पहले २४०० रुपये वार्षिक शिक्षाके लिए बर्च किये जाते थे, वे अब बढ़ाकर ६०००) वार्षिक कर दिये गये। सीकर मिडिल स्कूल हाई स्कूल बना दी गयी एवं छात्रोंके रहने के लिए एक बोर्डिन हाउस भी बना। इसके अलावा सीकर राज्यमें कई पाठशालाओंको सहायता दी जाने लगी तथा कई पाठशालाए राज्यके गांवों में खोली गयीं, जिनको भी राज्यकी ओर से सहायता मिलती है। शिक्षा- सम्बन्धी सब कार्य एक उच्च शिक्षा प्राप्त सुयोग्य आफिसरके निरीक्षण में होते हैं। ६. सीकरके राजकीय हस्पतालका काम एक असिसटेंट सर्जन चलाते थे । अव "मेडीकल डिपार्टमेण्ट” ने एक एम्० बी० बी० एस० फतहपुर-परिचय] ( १०६ ) मेडीकल आफिसरको बुलाकर उक्त संस्थाके लिए नियुक्त कर दिया है, जो सीकरके सभी चिकित्सालयोंकी देख-भाल करते हैं । ७. जगात वसूल करनेके महकमेमें भी कई सुधार हुए। उसे “कस्टम डिपार्टमेण्ट' नाम देकर उस विभागके सब पुराने कार्य- कत्ताओंको निकाल दिया गया और नये-नये अधिकारियोंकी नियुक्ति की गयी। उपर्युक्त सुधार करनेके बाद रावराजा कल्याणसिंहजीका ध्यान, राजपूतोंमें प्रचलित कन्या-बधकी ओर गया। इन्होंने उस गर्हणीय प्रथाके समूल उत्पाटनार्थ प्रत्येक धनहीन राजपूतको उसकी कन्याके विवाह के लिए १००) रुपये राज्यसे देनेका नियम बनाया। रावराजा- जीकी इस अनुपम उदारताके कारण न जाने कितनी अबोध निरपराध बालिकाएं कालके गालसे बचीं। तत्पश्चात् अपने राज्यमें और-और सुधार करनेके लिए लाला- यित रावराजा कल्याणसिंहजीने एक सुयोग्य राजनीतिज्ञ आफिसरका नियुक्त किया जाना उचित समझा। ए० जी० जी० राजपूतानासे इस सम्बन्धमें परामर्श करनेके बाद, इन्होंने, बदायू (यू० पी०) की जजेज कोर्ट के मुन्सरिम खानसाहिब ख्वाजा अजीजुर्रहमानको संवत् १९८१ में अपना सीनियर आफिसर बनाया। तीन वर्षके लिए खानसाहिब नियुक्त किये गये ; परन्तु बीचमें ही संवत् १९८२ के आषाढ़ मासमें--- मासमें--जब उनकी नियुक्तिको दश महीने ही हो पाये थे-उनका देहान्त होगया। खानसाहिबके समय तक सीकर राज्यमें जो सुधार होने थे, .. ( १०७ ) [चौथा खण्ड हो चुके ; पश्चात् ऐमा कोई सुधार नहीं हुआ, जिसका उल्लेख किया जाय। खानसाहिबके बाद रावराजा कल्याणसिंहजीने कई सीनियर आफिसर रक्खे और निकाल दिये। संवत् १९८२ से १६६१ तकके ६ वर्षके अल्प कालमें ही ७ सीनियर आफिसर नियुक्त किये गये, जिनमेंसे अन्तिम केप्टेन ए० डब्ल्यू० टी० वेब हैं, जो संवत् १६६१ में सीनियर आफिसर पदके अधिकारी हुए। उप लिखित ह वर्षकी अवधिमें ही सीकर राज्यको कई उपद्रवों का सामना करना पड़ा। समय-समय पर शासन-व्यवस्था सम्बन्धी त्रुटियोंके कारण नये-नये उपद्रव खड़े हो जाते थे। 'फतहपुर और रामगढ़के हिन्दू-मुसलमानोंके झगड़े' * और 'जाट-आन्दोलन' + प्रभृति कई उत्पात हुए। इन उत्पातोंके कारण सीकरको कम क्षति नहीं उठानी पड़ी है। * (क) संवत् १९८५ में मुहर्रम के अवसर पर फतहपुर में हिन्दू- मुसलमानोंका झगड़ा हुआ। (ख) संवत् १९८९ में बिसाऊ दरवाजे के बाहर बनी हुई मुसलमानों की एक मसजिद के निकट में स्थित पीपल के पेड़ के प्रश्न को लेकर रामगढ़ में हिन्दू-मुसलमानोंका पारस्परिक संघर्ष हुआ + अधिकार मदसे मतवाले राज्य-कर्मचारियों द्वारा की गयी ज्यादतियों के कारण संवत् १९९० में जाट-जातिमें एक नवीन जोश उत्पन्न हो गया था, वही आगे चलकर संवत् १९९१ में एक आन्दोलन का रूप बन गया।
फतहपुर-परिचय ( १०८ ) नये-नये सीनियर आफिसरोंकी नियुक्ति और निष्कासनको ही इन उपद्रवोंका श्रेय है। न वे जल्दी-जल्दी आते और न बरखास्त किये जाते तो सीकरको, ये दिन, जो आज देखने पड़ रहे हैं, नहीं देखने पड़ते। पर किया क्या जाय, जब सीकरके शासन-विधानको अव्यवस्थित बनानेके लिए विधिका विधान ही ऐसा था । सुनते हैं, सीनियर आफिसरके रहते हुए भी रावराजा कल्याण- सिंहजी, वालाबख्शजी कायस्थकी सलाहसे राजकाज चलाते थे। यह बात कहां तक सत्य है, मैं नहीं कह सकता। किसी सीनियर आफि- सरने रावराजानीके विरुद्ध, बालाबख्शजीकी सलाहसे परिचालित सीकरकी शासन-व्यवस्था हस्तक्षेप चाहते हुए, जयपुर शिकायत भेजी, जिसके फलस्वरूप बालाबख्शजी निर्वासित कर दिये गये और सीकर ठिकानेको कोर्ट ऑफ वार्डस् के अधीन कर देनेकी धमकी रावराजाजीको दी गयी। तत्पश्चात् उपयुक्त ७ सीनियर आफिसरोंमेंसे अंतिम केप्टेन ए० डब्ल्यू० टी० वेब संवत् १६६१ में सीकरके मीनियर आफिसर पदके लिए नियोजित किये गये। द्वितीय बैसाख शुक्ला १० बृहस्पति- वारके रोज केप्टेन वेबकी उक्त पद पर तीन वर्ष के लिए नियुक्ति सीनियर आफिसर होनेके १५ दिन बाद ही केप्टेन वेबने रावराजी कल्याणसिंहजीको एक प्रार्थना-पत्र, एग्जीक्यूटिव और जुडीशियल अधिकारोंकी प्राप्ति के लिए, लिखा। रावराजाजीने उक्त प्रार्थना-पत्रको स्वीकार करते हुए उनको याचित अधिकार देकर संतुष्ट ( १०६ ) [चौथा खण्ड कर दिया। पूर्वके किसी भी सीनियर आफिसरको ये अधिकार प्राप्त नहीं हुए थे। इसके अतिरिक्त केप्टेन वेबको तत्सामयिक जाट आन्दोलनसे उत्पन्न अशांतिको मिटा देनेके लिए, तत्सम्बन्धी सम्पूर्ण अधिकार प्रदान कर दिये गये। केप्टेन वेबने अधिकार प्राप्त कर जाट-जाति के असंतोषको मिटा कर शांति-स्थापन करनेकी पूर्ण चेष्टा की। रावराजा कल्याणसिंहजी द्वारा केप्टेन वेबकी उपयुक्त अधिकार- प्राप्ति, रावराजाजी और उनके सीकर-राज्यके लिए हितकर ही सिद्ध हुई। तत्पश्चात् रावराजाजीने फतहपुरके एक धनी सेठको, कस्टम ड्यू टीज, कोर्ट फीस और फुटकर खर्च माफ कर सम्मानित किया, जिसकी चर्चा जयपुर तक पहुंची। जयपुर. नरेशने, किसी धनी-मानीका इस प्रकार कोर्ट-फीससे मुक्त किया जाना अनुचित और गैरकानूनी बतलाया। उसी समयसे जयपुर-गवर्नमेंटने राव- राजाजीसे सीकर ठिकानेका शासनाधिकार छीन लेनेका विचार कर लिया। कैप्टेन वेबकी भी रावराजाजीके विरुद्ध अपने कार्य में हस्त- क्षेप करनेकी शिकायत जयपुर पहुंची। जिस पर जयपुर-स्टेट-कौंसिलसे वाइस प्रेसीडेण्टके हस्ताक्षर सहित १२ अप्रैल सन् १६३७ ई० ५ संवत् १६६४ ) को एक आर्डर निकला, जो संक्षिप्तमें निम्नाङ्कित है :- १. “सीकाके शासन-सुधारमें सहयोग देनेके लिए सीकरके राव- राजाजीको तैयार करनेका, विगत कुछ वर्षोंका प्रयत्न निष्फल रहा, फतहपुर-परिचय] ( ११० ) इस प्रकार सीकर ठिकानेकी शांतिको खतरेमें डालते हुए, रावराजा- जीने अपने आपको शासनके लिए अयोग्य साबित कर दिया है; इसलिए जयपुराधिपतिने यह निर्णय किया है कि १२ अप्रैल सन् १६३७ ई० (संवत् १६६४) से लेकर १० वर्ष तकके लिए रावराजाजी के तमाम अधिकार, जो सीकरके शासन-विभागों पर हैं, जयपुर- राज्य द्वारा नियुक्त किये गये सीनियर आफिसरको सौंप दिये जायँ ।" २. 'भविष्यमें सीकर ठिकानेका सुशासन कुमार हरदयालसिंहके उचित रीतिसे पालन-पोषण और शिक्षण पर निर्भर करता है। इस सम्बन्धमें रावराजाजीको सीनियर आफिसरकी परामर्शका अनु- मरण करना होगा।” ३. “सीकर ठिकानेकी वार्षिक आमदनीमेंसे रावराजाजीको हर साल १०००००) एक लाख रुपये बारह महीनोंकी बारह किस्तों द्वारा दिये जायेंगे। इसके अतिरिक्त कुमार हरदयालसिंहकी शिक्षा के लिए एक पृथक 'प्रांट', सीनियर आफिसर देंगे।" * * जयपुर गवर्नमेंट द्वारा संवत् १६६४ में केप्टेन वेबकी कार्यावधि ---जो समाप्त होनेको ही थी-बढ़ा दी गयी । वे ही पुनः सीनियर आफिसरके पद पर अवस्थित रहे । उनको उपयुक्त अधिकारोंके अतिरिक्त शासनके और भी अधिकार प्राप्त हुए, जो मई सन् १९३७ ई० (संवत् १६६४ ) को निकली हुई, प्राइम मिनिस्टर (जयपुर) ( १११ ) [चौथा खण्ड के हस्ताक्षर सहित एक विज्ञप्तिमें प्रगट हो चुके हैं। पाठकोंकी जानकारीके लिए वे नीचे उद्धृत किये जाते हैं * १ "किसानोंको खेतीके लिए दश साल तक जमीन मंदे पर देना।" २ “किसानोंको एक हफ्ते तक लगानके लिए रोक रखना।" ३ "शहरों या कसवोंमें मकानों के लिए जमीन बेचना ।" ४ 'बजट । के अलावा ३०००) रुपये तक एक मुश्त खर्च करना।" ५ “३०) रुपये माहवार पाठशालाओंको मदद करना । ।" ६ ६०० वर्ग गज जमीन धार्मिक कामोंके लिए देना।" ७ “१५० ) रुपयेके नीचे की तनख्वाहवाले कर्मचारियों को रखना या निकालना।" X x X X संवत् १६६४के माघ मासमें केप्टेन वेबसे रावराजा कल्याणसिंह- * ये अधिकार, यहां "दैनिक हिन्दुस्तान” के एक अङ्क से उद्धृत किये गये हैं। - जयपुर के प्राइम मिनिस्टर द्वारा तैयार किया हुआ सेकर का वार्षिक बजदा फतहपुर-परिचय] ( ११२ ) .. जीने कुमार हरदयालसिंह * के, जयपुरेश महाराजा मानसिंहजी . के साथ इंग्लैंड जानेकी बात सुनी । इस सम्बन्धमें उन्होंने फाल्गुण में ही जयपुर महाराजासे भेंट की। महाराजाने उनसे कहा कि कुमार उनके साथ इंग्लैंड जा रहा है ; इसलिए उन्हें चिन्तित नहीं होना चाहिए। इस बात से रावराजाजीको संतोष नहीं हुआ। वे पुनः चैत्र शुक्ला ५ संवत् १६६५ को महाराजा से मिले और कुमारको इङ्गलैण्ड न ले जानेकी प्रार्थना की। महाराजाने कुमारके इङ्गलैण्ड ले जाने के विषय पर रावराजाजी की उदासीनताका कारण जानना चाहा । उन्होंने रावराजाजी से पूछा कि “कुमारको मेरे साथ इङ्गलैण्ड भेजने में आपको क्या आपत्ति है ?' गवराजाजीने महाराजाके प्रश्नका उत्तर देते हुए कहा कि "कुमार की अवस्था अभी छोटी ही है। उसे मैं, उसके विवाहके पहले इङ्गलैण्ड भेजना नहीं चाहता ; क्योंकि मैं, राजा साहब ध्रांगधा, जिनकी लड़की से कुमारकी शादी होनेवाली है, से संवत् १६८० में यह तय कर चुका हूं कि मैं कुमारको शादी से पहले इङ्गलैण्ड नहीं भेजूंगा।" ana- * रावराजा कल्याणसिंहजी के सुपुत्र, सीकर ठिकाने के युवराज । '' जयपुर के वर्तमान नरेश। स्व० जयपुराधीश महाराजा माधवसिंहजी ने संवत् १९७८ में इनको दतक स्वीकार किया। उनके निधनके बाद ये संवत १९७९ में मानसिंह नाम धारण कर जयपुर के राज्यासन पर बैठे।
.
( १५३ )
[ चौथा खण्ड
महाराजाने कहा- 'तीन महीने बाद जब मैं वापिस लौटूंगा
तब आप अपने कुमारका विवाह-कार्य सानन्द सम्पन्न कर सकते
। तीन महीने कोई ज्यादा नहीं हैं।"
रावराजाजी तो, तीन मास क्या, तीन दिनके लिए भी अपने
प्यारे पुत्रको अपने से विलग देखना नहीं चाहते थे।
महाराजा की कही हुई उपयुक्त बातें कब मंजूर हो सकती थीं।
उनको “परदेश कलेश नरेशन को" यह सूक्ति स्मरण हो आयी।
परदेशमें जिन कष्टोंका सामना करना पड़ता है, उनका स्पष्ट चित्र
उनकी आँखोंमें खिंच गया। वे एक प्रकार से सहम-से गये।
उन्होंने महाराजाके सामने अनावश्यक चुप्पी साधली। महाराजाको
इच्छाके प्रतिकूल उनसे जवाब न दिया गया।
महाराजा ने कुमारको अजमेर से बुलाकर जयपुरके रामनिवास
बागमें अपने पास रख लिया और उसे इङ्गलैण्ड ले जाना चाहा ;
परन्तु बादमें उन्होंने उसके माता-पिताकी अनुमतिके बिना उसे
इङ्गालैण्ड ले जाना उचित न समझा। उसको कुछ समयके लिए
जोधपुर भेज दिया गया।
जोधपुरसे, महाराजाके आदेशानुसार कुमारको काश्मीर
भेजा गया और कहा गया कि जब तक महाराना इङ्गलैण्ड जाकर
वापिस न आ जायँ, उसको वहीं रहना चाहिए।
कुमारके काश्मीर भेजे जानेकी खबर पाकर रावरानीने अनशन
प्रारम्भ कर दिया, जिसका समाचार चारों ओर फैलते देर न लगी।
सीकरके तथा निकटस्थ गांवोंके हजारों मनुष्य आ-आकर इकडे
८
फतहपुर-परिचय]
( ११४ )
0.....।
होने लगे। सभीने रावरानीसे अनशन छोड़ देनेका अनुरोध
किया।
रावरानीने लोगोंके अनुरोधकी ओर ध्यान न देते हुए अपना
अनशन जारी रक्खा। इस तरह रावरानीकी बुभुक्षानलकी ज्वालाके
साथ-साथ, सीकर-जयपुर-संघर्षकी अग्नि भी अत्यन्त प्रज्वलित
हो गयी।
चैत्र शुक्ला ६ संवत् १६६५ को केप्टेन वेबने जयपुर लिख
भेजा कि “सीकरकी परिस्थिति भयावह हो गयी है, शांति खतरे में
है। ३००० राजपूत और कायमखानी सीकरके गढ़में एकत्रित हैं।"
इस पर जयपुरकी ओरसे सशस्त्र पुलिस सीकर आ पहुंची। सीकर
के चारों ओर पुलिसने घेरा डाल दिया। बात-की-बातमें सीकर
उत्तेजना और आतंकका केन्द्र बन गया ।
जयपुरके प्राइम मिनिस्टरका एक तार, चैत्र शुक्ला १४ को,
रावराजाजीको प्राप्त हुआ,
जिसमें चैत्र शुक्का १५
को
महाराजाके सामने रावराजाजी की उपस्थितिकी अपेक्षा की थी।
रावराजाजीने तारके उत्तरमें रावरानीके अनशनके कारण अस्वस्थ
होनेकी बात लिखते हुए महाराजाके सामने उपस्थित हो सकनेकी
असमर्थता दिखलायी। जिसके उत्तरमें रावराजाजीको फिर एक
तार जयपुरका मिला, जिसमें अनशनके बहानेको अस्वीकार्य और
उनकी उपस्थिति आवश्यक बतलायी। पर रावर
पर रावरानी स्वस्थ न
हो पायी थीं, इससे रावराजाजी जयपुर नहीं जा सके और न
जयपुरसे आये हुए तारका ही जवाब उन्होंने दिया ।
रामबाग-पैलेसमें
. 3B ( १२५ ) [चौथा खण्ड जयपुरके प्राइम मिनिस्टर ने चैत्र शुक्ला १५ के दिनके २ बजे तक रावराजाजीके उत्तरकी प्रतीक्षा की ; परन्तु उनका कुछ भी उत्तर नहीं मिला, तब उन्होंने मि० एफ० एस० यंग-इंस्पेक्टर-जनरल- पुलिस, (जयपुर) और केप्टेन वेबको रावराजाजीके जयपुर लिवा लानेके लिए सीकर भेजा। बैसाख कृष्णा २ को रावराजाजीने मि० एफ० एस० यंग और केप्टेन वेब से देवीपुराकी कोठीमें भेंट की। वहां उनसे जयपुर चलनेके लिए कहा गया ; लेकिन वे अपने साथके राजपूतोंके अनुरोधसे जयपुर न जाकर सीकर ही लौट आये। मि० एफ० एम० यंग और केप्टेन वेबका रावराजाजीके साथ इस प्रकार सम्मिलन, लोगोंकी दृष्टिमें रावराजाजीकी गिरफ्तारीका षड्यंत्र था। रावराजाजीके, सीकरके गढ़में प्रविष्ट हो जानेके बाद सीकरके दरवाजे बन्द कर दिये गये और हड़ताल बोल दी गयी। फतहपुर, रामगढ़ और लक्ष्मणगढ़में भी हड़तालका अनुकरण किया गया । सीकरकी हड़तालका समाचार पाकर रेजिडेण्ट साहब (जयपुर) ने रावराजाजीको जयपुर बुलवाया ; परन्तु रावराजाजी प्रजाके प्रतिरोधके कारण जा न सके। इससे रेजिडेण्ट साहब स्वयम्, सीकरकी परिस्थितिका अध्ययन करनेके लिए, प्राइम मिनिस्टर साहबको साथ लेकर बैसाख कृष्णा ६ को सीकर आ पहुंचे। उनसे मिलनेके लिए. रावराजाजी अपने महलसे बिदा ही हुए थे कि मार्गमें सीकर-निवासियों ने उनको रोक लिया और समझा- बुझाकर वापिस सीकर ले आये। आये। इस तरह प्राइम मिनिस्टर लौट जाना पड़ा। फतहपुर-परिचय] ( ११६ ) और रेजिडेण्ट साहबको बिना रावराजाजीसे मुलाकात किये ही जयपुर बैसाख कृष्णा १३ को महाराजा और प्राइम मिनिस्टर ने 'सीकरमें किस तरह शांति स्थापित की जाय' इस विषयपर आनरेबल मि० ए० सी० लोथियन-ए० जी० जी० राजपूतानासे विचार- विनिमय किया, जिसमें लोथियन साहबको शांति-स्थापनार्थ सीकर भेजना निश्चित रहा। बैसाख कृष्णा १४ को लोथियन साहब सीकर आ पहुंचे। रावराजाजी ने उनसे मुलाकात की। बातचीतके सिलसिलेमें लोथियन साहबने रावराजाजीसे सीकरकी हड़ताल खोल देने एवम् अपने साथ अजमेर चलनेका अनुरोध किया। लोथियन साहबके अनुरोधको मानकर रावराजाजीने सीकर एवं फतहपुर, रामगढ़ और लक्ष्मणगढ़की हड़ताले खुलवा दी और स्वयं उनके साथ अजमेर चले गये। पश्चात् उन्हीके कहने पर बैसाख शुक्ला १ को वे जयपुर आये और महाराजासे क्षमा-याचना की। महाराजाने उन्हें क्षमा न देकर, जयपुर राज्यसे बाहर चले जानेकी आज्ञा दी और कहा कि जब तक दूसरी आज्ञा न निकल जाय वे जयपुरसे बाहर ही रहें । इस आज्ञाको सुनकर रावराजानी चिन्तित- से होकर अजमेर चले गये। रावराजाजीके इस प्रकार अपमानित होनेके समाचारसे सीकरकी प्रजाने उबाल खाया और शहरमें पुनः हड़ताल घोषित कर दी।
( ११७ ) [चौथा खण्ड जयपुर-राज्यकी ओर से बैसाख शुक्ला ६ को एक आर्डर जारी किया गया, जिसमें रावराजाजीका दिमाग खराब बतलाते हुए उनको शासन करने में अकुशल बतलाया। जयपुर-राज्यकी, रावराजाजीके छिद्रान्वेषणकी, इस प्रकारकी नीति, सीकरकी प्रजा ( जो रावराजाजीसे सहानुभूति रखती थी) को अच्छी न लगी, वह उबल पड़ी। चारों ओर भयङ्कर युद्ध और रक्तपातके आसार दिखायी देने लगे। इस तरह उपद्रव शांत होनेकी बजाय बढ़ता ही गया। सीकरमें आम हड़तालके कारण खतरे की घंटो तो पहले ही बज चुकी थी। अब स्थिति और भी भयंकर होनेसे जनताको खतरेका अंत, बिना युद्धके होता दिखाई नहीं दिया। जनता जहां-तहांसे उमड़ पड़ी, जिससे सीकर शहर एक युद्ध-स्थलमें परिणत हो गया। सीकरके बाहर जयपुरकी सेना आ गयी और डेरा डाल कर रहने लगी। सीकरका यह आन्दोलन दिन-प्रति-दिन जोर पकड़ता गया। रावराजाजीके जो अधिकार, संवत् १६६४ में जयपुर-राज्य-द्वारा छीने गये थे, उनकी मांग करने लगा; यद्यपि आन्दोलनोत्पत्तिके कारण और ही थे, पर वे कारण बिना अपनी कार्य-सिद्धिके ही केवल साधन मात्र (जिससे कार्य की सिद्धि हो ) ही उत्पन्न करके, रावराजाजीके अधिकारों की मांगके आवरणसे आच्छादित होगये। बड़े आश्चर्य की बात तो यह थी कि दो पुराने राजवंशोंका फतहपुर परिचय ( ११८ ) ........... DA......" परम्परागत प्राचीन सम्बन्ध-सूत्र बात-की-बातमें ढीला पड़ गया। एक ही वंशकी दो शाखाएं परस्पर कुल्हाड़ियाँ बनकर एक-दूसरीको काटनेके लिए कटिबद्ध होगयीं। सीकर और जयपुरका पारस्परिक मनोमालिन्य अपरिवर्तित ही रहा। जेष्ठ कृष्णा ११ को जयपुर-राज्यकी ओर से एक कमीशन प्रस्तुत उपद्रवके शमनार्थ नियुक्त किया गया, जिसका अध्यक्ष इंडियन पोलिटिकल सर्विसका एक कर्मचारी बना। सीकरवालोंने कमीशनको अस्वीकार करते हुए उसका विरोध किया; इससे कमीशन कार्य प्रारम्म न कर सका। अपनी हरएक बातका विरोध होते देख जयपुरके अधिकारयोंसे चुप न रहा गया, उन्होंने जेष्ठ शुक्ला ४ को सीकरकी जनता पर लाठीचार्ज करवाके ही दम लिया। सीकरकी पब्लिक कमेटी * के प्रचार के कारण यह समाचार हिन्दुस्तान भर में फैल गया, जिससे * सीकर की विकट परिस्थितिके समय गठित को हुई सीकर ठिकानेकी प्रतिनिधि सभा। सीकरके प्रमुख नागरिकों और राज्यकर्मचारियोंको लेकर ही इस सभाका गठन हुआ था। इसीके तत्वावधानमें सीकरके पक्षमें आन्दोलन का परिचालन किया गया। उस समय सभाका कर्तव्य था कि प्रजाके लिए उत्तरदायी शासनकी मांग करती, लेकिन उसने ऐसा न करके एक सुवर्णावसर हाथ से खो दिया। प्रजाके हितको दृष्टि से, इस सभा-द्वारा कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं हुआ और न होने की आशा ही थी ; क्योंकि. यह तो बङ्गालकी प्रजापार्टी के समान ही एक संगठन मात्र था । - N... ...... ( ११६ ) [चौथा खण्ड जगह-जगह, इस सम्बन्धमें सभाएं हुई, जिनमें जयपुरके रुखको निन्दास्पद बतलाया गया । ए० जी० जी० राजपूतानाने . आषाढ़ कृष्णा ११ तकका समय रावराजाजीको सीकर में शांति-स्थापनके लिए दिया । ए० जी० जी० के आदेशानुसार उपयुक्त समय तक रावराजाजी सीकरकी हड़ताल खुलाकर शांति-स्थापनके लिए सन्नद्ध होगये। उन्होंने एक आदेश- पत्र अपनी ओर से निकाला, जिसमें स्वाधिकार-प्राप्तिकी लड़ाई स्वयं लड़नेकी बात कहकर, प्रजाको हड़ताल खोल देनेका आदेश दिया; परन्तु प्रजाने न तो हड़ताल खोलनेका उद्योग किया और न रावराजा- जीकी अधिकार-प्राप्तिके बिना शांति-स्थापन करनेका ही। तदनन्तर ब्रिटिश गवर्नमेण्टका एक नोटिस रावराजाजीको मिला, जिसमें लिखा था कि "बिना रक्तपातके १५ दिनमें शांति स्थापित कर दी जाय, नहीं तो सर्वोच्च सत्ता हस्तक्षेप करनेके लिए वाध्य होगी।" प्रजाने शांति-स्थापन की, रावगजाजीकी कोशिशको सफल न होने दिया और न सीकर जयपुरका समझौता -जिसके लिए आबूमें कार्यवाही हो रही थी-ही होने पाया। आषाढ़ शुक्ला ४ के दिन पुनः जयपुरकी पुलिस सीकर आ पहुंची। सीकरकी सभी सड़कों पर पुलिसका पहरा बैठ गया। जयपुर-दण्ड-विधानकी १३८ धारा, जो भारतीय-दण्ड-विधानकी १४४ होती है, सीकरवालों पर लगा दी गयी तथा सीकर आनेवाले मुसाफिरोंकी तलाशी ली जाने लगी ।
फतहपुर-परिचय] ( १२० ) जयपुर-पुलिसने आषाढ़ शुक्ला ७ को आवश्यकता पड़ने पर सीकर शहर में दो बार गोली चलायीं एवं १४ आदमियों को पकड़ लिया। लुहारिया-का-बास मुहल्लेके कोई ५०० व्यक्तियोंने उस रोज जयपुर-लांसर्सके एक घुड़सवारं पर, कुछ सशस्त्र व्यक्तियोंको सीकरमें प्रवेश न करने देनेके कारण, आक्रमण कर दिया, जिसका समाचार जयपुर पहुंचने पर जयपुरसे रिजर्वड् आर्मड् पुलिस फोर्स की तीन लारियाँ सीकर आयीं। कर्नल डाँड और मि० यंग भी आये। उन्होंने आक्रमणकारियोंको भगा दिया। ७ आदमी बन्दूक और तलवार सहित पकड़े गये। नाली-का-बासके पास मि० यंग और कर्नल डाँडको लक्ष्य करके, उनकी मोटरों पर पत्थर फेंके गये तथा गोलियां चलायी गयीं। तत्पश्चात् लाला-के-बासकी ओर एकत्रित भीडमेंसे गोलियाँ आयीं, जिनसे जयपुर-पुलिसका एक कान्स्टेबल आहत होकर गिड़ पड़ा। मि० यंगने भी फायर करनेका हुक्म अपने कांस्टेबलोंको दे दिया, जिसके फलस्वरूप सीकरके २ आदमी मारे गये। कर्नल डाँडने सिपाहियोंसे भरी हुई ३ लारियों को साथ लेकर शहरका गश्त लगाया। चाँदपोल दरवाजेकी ओर होकर जब वे आ रहे थे तो शहरके बाहरसे आती हुई एक लारी उनको मिली, जिसमें सशस्त्र जवान मरे हुए थे। उन लोगोंने कर्नल डाँडकी लारियों पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दी। कर्नल डाँडने भी गोलियोंका जवाब गोलियोंसे दिया तथा ७ आदमी पकड़ लिये।
( १२१ ) [चौथा खण्ड उसी रोज पब्लिक कमेटीके ७ सदस्योंका एक डेपूटेशन, जो आबू गया हुआ था, सीकर वापिस आया और पकड़ लिया गया एवं स्टेशन पर भी, बाहरसे आनेवाले सशस्त्र राजपूतोंसे जयपुर-पुलिस- द्वारा शस्त्र मांगे जानेके कारण, गोलीकाण्ड घटित होगया। दोनों तरफसे गोलियाँ चलीं, जिनसे मरने और घायल होनेवालोंकी संख्या का ठीक पता नहीं लगा। ६० के करीब राजपूत पकड़ लिये गये। आषाढ़ शुक्ला ८ को सीकरवाले उत्तेजित हो उठे, उन्होंने जयपुर- पुलिसका ३ बार सामना किया। दोनों ओर से गोलियाँ छोड़ी गी, जिनसे १६ मरे और ३७ घायल हुए। मरे हुए आदमियोंमेंसे १४ और आहतोंमेंसे ३० सीकरके व्यक्ति थे। शेष जयपुरके थे। उसी रोज जयपुर गवर्नमेण्ट द्वारा नियोजित करके भेजा हुआ गिलन जांच कमीशन सीकर आया और ३ दिन रहकर आषाढ़ शुक्ला १२ को वापिस जयपुर लौट गया। स्थिति बहुत ही भयङ्कर होगयी। रक्तपात अनिवार्य-सा होगया। चारों ओर रणेच्छुक राजपूत और पुलिसके सिपाही ही दृष्टिगोचर होने लगे। सीकरके रहनेवाले लोग बड़े भयभीत होगये। कतिपय लोगोंने तो मयके मारे शहर भी छोड़ दिया और आस-पासके गांवों में आकर बस गये। सीकरकी ओरसे राजपूत और कायमखानी बड़ी संख्यामें लड़ने के लिए डटे हुए थे। आस-पासके गांवोंमें भी राजपूतोंका जमघट, भावी आपत्तिका सामना करनेके लिए, कुछ कम न था। जाटोंको फतहपुर-परिचय] ( १२२ ) मी आन्दोलनमें शरीक होनेको फुसलाया गया, लेकिन वे खूड़ी और कूदनके हत्याकाण्डोंके बादसे सीकरसे असंतुष्ट थे। न तो उनका असंतोष मिटाया गया और न वे आन्दोलनमें शरीक ही हुए। उधर जयपुरकी पुलिस भी अपनी सैन्य-व्यवस्थामें लगी हुई थी। उसने सीकरके चारों ओर सिपाहियोंका पहिरा बैठा दिया; इस तरह सारा सीकर पुलिससे घिर गया। मशीनगनें भी लगवादी गयीं, जिससे सीकर फौजी छावनी सा बन गया। नागा-पलटनको भी युद्धमें भाग लेनेके लिए, जयपुर की ओर से राजी करनेका प्रयत्न किया गया।* ऐसी परिस्थितिसे भावी अनिष्टकी आशंका करके लोगोंने सेठ जमनालालजी बजाज, घनश्यामदासजी बिड़ला तथा नवलगढ़, डुंडलोद, मुकुन्दगढ़, मिनाय और मंडावाके ठाकुरोंको तारसे 'सीकर- जयपुर-समझौता' करवानेके लिए आमंत्रित किया । * नागाओंकी सेनाके प्रत्येक व्यक्तिको मिलनेवाले २) रुपये मासिक भत्ते को-जो बीचम साहबके प्रधान-मंत्रित्वके समयसे बंद है-फिर से जारी करने की बात, नागाओं से कहकर, जयपुर की ओर से युद्ध में भाग लेनेके लिए उनसे कहा गया। वर्धाके स्वर्गीय सेठ बच्छराजजीके सुपुत्र एवं आल इंडिया काँग्रेसके अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नताओंमेसे एक थे। भारतका बच्चा-बच्चा आपके नाम से परिचित है; इसलिए आपके विशेष परिचय देनेकी आवश्यकता नहीं है।
( १२३ ) [चौथा खण्ड तार पाकर सेठ जमनालालजी बजाज आषाढ़ शुक्ला १४ को जयपुर पधारे। प्रारम्भमें आपने जयपुरके प्रधान मंत्रीसे बातचीत की ; तत्पश्चात् मि० यंग तथा मिनाय, मंडावा, डुडलोद और नवलगढ़के ठाकुरोंसे। रावरानीने अपनी ओर से सेठ जमनालालजी बजाजको लिखकर भेज दिया कि “मैं आपको एवं भिनाय, मंडावा, डुडलोद और नवल- गढ़के ठाकुरोको अपनी ओर से जयपुरके साथ सन्धि करनेका अधिकार देती हूं।" . श्रावण कृष्णा ८ को सेठ जमनालालजी बजाजने महाराजासे- उनके इङ्गालैण्डसे आगमनके बाद-भेंट की। आध घण्टे तक सीकर के सम्बन्धमें उनकी महाराजासे बातचीत हुई। उस बातचीतको उन्होंने सीकर पब्लिक कमेटी के सदस्योंके सामने विचारार्थ रक्खा, जिन्होंने परस्पर विचार-विनिमय करने के बाद सेठजीके सत्परामर्श को मान लिया और बिना किसी शर्त के ही जयपुरको आत्म-समर्पण कर दिया। दफ्तर और अदालतोंकी कुंजीयाँ मि० यंगको सौंप दी गयीं। इस प्रकार सीकरकी भावी आपत्तिका अन्त हुआ। भीषण नरसंहारका दुर्दान्त नाटक होते-होते बच गया। रक्त-पिपासाकुल रण-चण्डिका की पिपासा शांत न हो सकी, उसकी आशा निराशामें परिणत होगयी। फिर क्या था, वह निराश हो युद्ध क्षेत्रसे लौट गयी और लड़नेके लिए आये हुए उसके उपासक ( योद्धा ) भी अपनी उपासनामें असफल हो अपने-अपने घर लौट आये।
....... ............ फतहपुर -परिचय] ( १२४ ) श्रावण कृष्णा १० को सीकरकी हड़ताल और १३ को अदालतें और दफ्तर खोल दिये गये। सेठ जमनालालजी बजाजके प्रयत्न और महाराजाके इङ्गालैण्डसे आगमनको ही, इस युद्धकी प्रज्वलित अग्नि बुझानेका श्रेय दिया जा सकता है। यदि महाराजा उपस्थित होते ---इङ्गलैण्ड न जाते--तो मैं समझता हूं, स्थिति इतनी विक्ट न हुई होती। हड़ताल खुल जानेके बाद, सेठ जमनालालजी बजाजके आग्रहसे महाराजा, सीकर पधारे। सीकरमें उनका यथेष्ट स्वागत हुआ। समस्त सीकर-निवासी और लड़नेके लिए उद्यत आस-पास के गांवोंसे आये हुए राजपूत, अपने विद्रोह-भावको भुलाकर महाराजाके सामने शांत चित्तसे आ खड़े हुए। इस पर महाराजाने बड़ी प्रसन्नता प्रकट की, तत्पश्चात् जयपुरके लिए प्रस्थान कर दिया। इस उपद्रवमें सीकरके ६४ आदमी पकड़े गये। जयपुरके २ और सीकरके १६ आदमी मारे गये तथा १० और ५० क्रमशः घायल हुए। इस तरहके काण्डोंका होना तो तभी बन्द हो सकता है, जबकि स्वायत्त शासन ( प्रजातंत्र-राज्य) की स्थापना की जाय । जब तक प्रजातंत्रीय राज्य-विधानसे शासन-कार्य संचालित न किये जायेंगे तब तक जयपुर सीकर ही में क्या, प्रायः और-और भी देशी राज्य ऐसे काण्डोंसे अछूते न रह सकेंगे। सेठ जमनालालजी बजाज और तत्कालीन राष्ट्रपति सुभाषचन्द्र बोसने भी अपने वक्तव्योंमें इस सम्बन्धमें कहा है, वह नीचे अंकित किया गया है :- --
( १२५ )
[चौथा खण्ड
सेठजी कहते हैं--"मैंने इस (सीकरके) मामले में पड़कर समझौता
करवाया और वहांके प्रजावर्गको यह बात समझायी कि इस लड़ाई में
जनताका कोई स्वार्थ नहीं है और न यह उपयुक्त अवसर ही है।
उसकी लड़ाई तो प्रजातंत्रीय अधिकारों के लिए अहिंसा और सत्यके
बल पर समय आने पर संगठित रूपसे चलायी जायगी।"
सीकरके सम्बन्धमें की गयी कलकत्त की एक सार्वजनिक सभा
का सभापतित्व करते हुए सुभाषचन्द्र बोसने कहा--"रियासतोंमें
हम उत्तरदायी शासन चाहते हैं, क्योंकि ब्रिटिश भारत और रियासते
कोई अलग चीज नहीं हैं। सवाल तो सारे हिन्दुस्तान की
आजादीका है।"
X
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बात,
सीकरका उपद्रव तो शांत हो ही गया, अब रही रावराजाजीके
अधिकारोंकी जिसका विषय जयपुर राज्य द्वारा नियुक्त किये
गये गिलन कमीशनके विचाराधीन रक्खा गया।
रावराजाजीकी ओर से गिलन कमीशनके सामने प्रस्तुत किया
जानेवाला वक्तव्य कोई २७ पन्नों और २०००० शब्दोंमें, रावराजा.
जीके वकील वैरिस्टर पी० एल० चूड़कर * द्वारा तैयार करवाया
* रावराजाजी के कानूनी सलाहकार, जो बादमें राजकोट (काठियावाड़)
जाकर वहां के उत्तरदायित्वपूर्ण शासनके लिए किये जानेवाले सत्याग्रहमें भाग
लेनेके कारण पकड़े गये थे।
न कि फतहपुर-परिषय ] ( १२६ ) गया, जिसको, रावराजाजीका आदेश पाकर, चूड़करने ही गिलन कमीशनके कर्नल गिलनके सामने, जोधपुर जाकर पेश किया। वक्तव्यमें रावराजाजी ने महाराजा द्वारा गिलन कमीशनकी नियुक्तिको, उनकी अनधिकार चेष्टा बतलायी तथा सीकरको स्वतंत्र बतलाया और कहाकि “सीकरको सार्वभौम सत्ताके सामने अपील करनेका अधिकार प्राप्त है। जयपुरको दिया जानेवाला नजराना सीकर अपनी इच्छा से देता है, दबाव से। इस नजरानेके बदलेमें बाहरसे आक्रमण होनेपर जयपुरसे वह मदद लेता है।" जयपुरकी ओर से पेश किये गये वक्तव्यमें सीकरको जयपुरका एक हिस्सा बतलाया गया और कहा गया कि कुशासनके समय जयपुरको सीकरके मामलेमें हस्तक्षेप करनेका अधिकार है । दोनों ओर के वक्तव्यों पर गिलन कमीशन विचार करने लगा। मामलेकी पेशियाँ पड़ने लगीं। शायद दो ही पेशी पड़ने पायी होंगी कि रावराजाजी ने आश्विन शुक्ला १३ को अपने वकील चूड़करसे महाराजा को लिखवा भेजा कि वे ( रावराजाजी) स्वयं महाराजाके सामने उपस्थित होकर माफी मांगना चाहते हैं। महाराजा ने इसे मंजूर करते हुए रावराजाजी से मिलनेकी इच्छा प्रकट की। दूसरे ही दिन आश्विन शुक्ला १४ को रावराजाजी प्रार्थना-पत्रके साथ महाराजा के सामने उपस्थित हुए। उन्होंने महाराजा पर कमीशनके सामने लगाये गये अपने समस्त अभियोग, वापिस लेते [चौथा खण्ड ( १२७ ) हुए जयपुर द्वारा नियुक्त सीनियर आफिसरको शासनके सब अधिकार देना स्वीकार कर लिया। तदनन्तर रावराजाजी अजमेर लौट गये। उनकी क्षमा- याचनाके कारण गिलन कमीशन ने अकस्मात् अपना कार्य बन्द कर दिया। . जयपुर गजटका एक अतिरिक्त अंक निकालकर महाराजाने रावराजाजीकी क्षमा-याचना पर विचार करते हुए, १० दिसम्बर १६३८ (पौष कृष्णा ३ ) को नये आर्डर जारी किये, जिनके अनुसार सीकरके शासनमें रावराजाजीका कुछ भी अधिकार नहीं रहा। आर्डर निम्नाङ्कित हैं। "रावराजाजी द्वारा ८ अक्त बर १९३८ को मांगी गयी माफी, महाराजा जयपुर द्वारा स्वीकृत होनेके कारण जयपुर गवर्नमेण्टने सीकर-जांच-कमीशनको भंग कर दिया है।" "रावराजाजीकी माफी और कमीशनकी जांचके नतीजे पर सावधानतया विचार करनेके बाद, महाराजाने पहलेके सब आर्डरों को रद्द कर दिया है और सीकर ठिकानेके शासनके विषयमें नये आर्डर जारी किये हैं।" "इन आर्डरोंके अनुसार रावराजाजीको सीकर ठिकाने के शासनके सम्बन्धमें कोई अधिकार नहीं रहेगा। ठिकानेका शासन- कार्य महाराजा द्वारा नियुक्त एक सीनियर आफिसर चलायेगा।"
फतहपुर-परिचय ] ( १२८ ) "रावराजाजी कुछ शर्तों पर जयपुर आने और वहां रहनेके लिए आज्ञापित हैं, लेकिन सीकर आनेकी आज्ञा उनको नहीं दी जाती .. उपरि लिखित आर्डरोंके प्रतिबन्ध से रावराजाजी सीकरमें तो प्रवेश कर नहीं सकते थे, अतः वे अजमेर से दिल्लीको चले गये, जहाँपर करीब ४ वर्ष तक उन्होंने अपने “सीकर-हाउस" बिल्डिंग में, अपना यह निर्वासन-काल शान्तिके साथ ईश्वर-भजन करते हुए बिताया। उनकी अनुपस्थिति में सीकर-राज्यके शासन-कार्य की व्यवस्था और उसका संचालन, जयपुरके हुक्मके अनुसार जयपुरेश द्वारा नियुक्त सिर्फ सीनियर आफिसर ही करते रहे। सीनियर आफिसरके पद पर पहले तो केप्टेन वेब थे ही, वे सीकर एजीटेशन की समाप्तिके कुछ समय पूर्व ही त्यागपत्र देकर, सीकरके कार्यसे पृथक् होकर चले गये। उनके चले जानेके बाद ईश्वरनारायण किचलू सीनियर आफिसर बनकर आये, वे अधिक समय नहीं-कुछ ही मास-रहकर चले गये, तब से सरदार संतोषसिंहजीकी नियुक्ति इस पद के लिए हुई। सरदार साहब अब तक इसी पद पर आरूढ़ रहकर सीकरका शासन-कार्य योग्यतापूर्वक संचालन करते आ रहे हैं।
-- ( १२६ ) [चौथा खण्ड .... सरदार साहबके ही अनवरत यत्नका फल है कि रावराजाजी अब हमारे बीच में पुनः उपस्थित होकर साधिकार गद्दीस्थ हो गये हैं। * सीकर-प्रवेशका प्रतिबन्ध, जयपुर सरकार द्वारा दूर किये जाने पर, संवत् १६६६ की भाद्रपद कृष्णा ८ को रावराजाजी दिल्ली से सीकर पधारे और करीब १ वर्ष पश्चात् आश्विन शुक्ला २ संवत् २००० (१ अक्तूबर १९४३ ई०) को उन्हें गहीके अधिकार जयपुरेश- द्वारा जयपुर-गजटके एक अंकमें निम्न लिखित आर्डर निकालकर पुनः प्रदान किये गये। 'हिज हाईनेस महाराजा बहादुर ( जयपुर ) ने यह आज्ञा देनेके लिए प्रसन्नता प्रगट की है कि सीकरके रावराजा कल्याणसिंहजीके अधिकार १ अक्तूबर १९४३ से फिरसे दे दिये जायेंगे।" १ अक्तूबरके रोज रावराजाजीकी अधिकार-प्राप्तिकी खुशी- सीकर-राज्यकी प्रजा ने, दिनमें घरोंकी सजाईकर और रात्रिमें दीपावली जलाकर प्रगट की। फतहपुर, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, सीकर, नेछवा, सिंगरावट, रींगस, रघुनाथगढ़ और देवगढ़ में सलामी की ११-११ तोपें चलीं। सीनियर आफिसर साहब ने राज्यका सारा कार्यभार रावराजाजीको सौंप दिया। रावराजाजी ने कार्यभार सँभालनेके पश्चात् राज्यके सभी महकमोंका निरीक्षण किया। उसके बादसे वे राज्य-कार्य संचालन में लग गये। -
फतहपुर-परिचय] ( १३० )
अब सीकरका शासन-कार्य पुनः रावराजाजीकी देखरेख में
सीनियर आफिसर सरदार संतोषसिंहजीकी सलाह से संचालित
होने लग गया है, इसे देखकर प्रजाजन प्रमुदित हैं और उन्हें आशा
है कि सीकर-नरेश उनके हितको दृष्टिमें रखकर अपने राज्य-कार्य
का योग्यतासे संचालन करते रहेंगे।
पांचका खण्ड सेठ तुहिनमल्लजी ( नवाब फतहखाँ के समय में ) सेठ तुहिनमल्लजी, फतहपुरके आबाद करनेवाले नवाब फतहखाँके प्रधान मुसाहिब थे। उन्हीं के साथमें ये हिसारसे फतहपुर सकुटुम्ब आये और यहीं बस गये। नवाबका सेठजीके साथ पूर्ण अनुराग था; हरएक काम करनेसे पहले वे सेठजीसे सलाह कर लेते थे। बिना इनकी सलाहके उनसे कुछ भी न बन पड़ता था। सुना जाता है, फतहपुर शहर बसाने में भी सेठजीका पूर्ण हाथ था। सेठजीका नवाबके साथ इतना घनिष्ट सम्बन्ध होने पर भी, सेठजी बिलकुल निरभिमानी थे। संसारमें ऐसे विरले ही मनुष्य होते हैं, जिनको प्रभुता पाने पर भी अभिमान न होता हो। "प्रभुता पाइ काहि मद नाही" वाली उक्तिके ये प्रतिकूल उदाहरण थे सेठजी अग्रवाल जातीय श्रावक थे। हेमचन्द्रजी इनके पिताका नाम था। इनके अतिरिक्त ३ और लड़के भी इनके पिताके थे, जिनके - फतहपुर-परिषय] ( १३२ ) नाम क्रमश: टीलणदास, रूपचन्द और पद्मराज थे। पहले ये चौधरी कहलाते रहे। जैन धर्मानुयायी होनेके कारण इनके वंशका अल बादमें श्रावक (जैन) होगया। सेठजीके अपने परिवारके अतिरिक्त इनके और २ भाइयोंके परिवार तथा सेठजीके पिता हेमराजजी भी उस समय फतहपुर आकर यहीं बस गये थे। वर्तमानमें फतहपुर या आसपासके गांवोंके जितने अग्रवाल जैन हैं, इन्हीं सब भाइयोंके वंशज हैं। दिगम्बर जैन आम्नायकी २ प्रतिमाएं * भी, सेठजीके साथमें, जब ये हिसारसे आये थे, थीं। एक प्रतिमा चौबीस महाराज । की और दूसरी चन्द्रप्रभु (जैनियोंके अष्टम तीर्थकर) की थीं। ईश्वरीदास जी मोजक इन प्रतिमाओंको लेकर आये थे। इन्हीं प्रतिमाओंके * आज तक ये दोनों प्रतिमाएं ऊपरके दिगम्बर जैन मन्दिरमें विद्यमान हैं। + चौबीस महाराजकी प्रतिमा :-~~-मूलसंघी आचार्य पद्मनन्दि देव द्वारा माघ सुदी ११ संवत् १०६९ को प्रतिष्ठित सप्त धातुकी १५४९॥ इंची प्रतिमा। ': चन्द्रप्रभुकी प्रतिमा : बैसाख सुदी ९ संवत् १११३ को प्रतिष्ठित काले पाषाणकी ६x४॥ इंची प्रतिमा । ईश्वरीदासजी शाकद्वीपीय ब्राह्मण थे। आज भी इनके वंशजोंके बहुतसे घर फतहपुरमें मौजूद हैं, जो भोजक कहलाते हैं और भोजकोंके मुहल्ले नामक बासमें आवास करते हैं। इनलोगोंका जैनियोंके साथ उसी समयसे प्रेम सम्बन्ध चला आता है। जैन-मन्दिरके सेवक होनेके कारण इनको जैन-सेवक भी कहते हैं ।
( १३३ ) [पाँचवाँ खण्ड संस्थापनार्थ संवत् १५०८ में सेठजीने फतहपुर-जैन-मन्दिर बनवाया। * नवाब फतहखाँके मुसाहिब पद पर काम करते हुए ही सेठजी दीर्घायु प्राप्त कर परलोक सिधारे । न. योगिराज संत गंगानाथजी ( नवाब फतहखाँके समय में) नवाब फतहखाँके द्वारा बनाये जानेवाले फतहपुरके वृहत् किले की अवस्थितिके पूर्व, जब किलेका स्थान, एक निर्जन स्थान मात्र था, उस समय योगिराज संत गंगानाथजी इसी स्थान पर धूनी तापा करते थे। इनकी धूनी कबसे बनी हुई थी, यह तो कोई नहीं बतला सकता, पर जब ये संवत् १५०६ में धूनी ताप रहे थे, उस समय खानखाना नवाब कायमखाँके पौत्र नवाब फतहखाँ (हिसारके तत्का- लीन नवाब ) ने इस स्थान पर रिणाऊ गांव ( फतहपुरसे दक्खिन ३ कोस पर है) में रह कर अपना किला बनाना प्रारम्भ किया। नवाबकी ओर से संत गंगानाथजीको अपनी धूनी उठाने के लिए कह दिया गया, लेकिन ये यहांसे नहीं हटे। तब इनको बतलाया गया कि बिना इनके इस स्थानसे हटे किला बांका (टेढा ) हो जानेकी * फतहपुर जैन-मन्दिरके सम्बन्धमें छठे खण्डमें पढ़िए । + इनके मृत्यु संवत् का ठीक-ठीक पता नहीं लगता फतहपुर-परिचय ] ( १३४ ) सम्भावना है। तिस पर भी इन्होंने यहांसे हटना मंजूर नहीं किया और कहा कि "किला तो बांका ही अच्छा होता है।" संत गंगानाथजीके न हटने की बात जब नवाबने सुनी तो उन्होंने बलपूर्वक साधुको उक्त स्थानसे हटा देनेकी आज्ञा अपने सिपाहियों को दे दी। आज्ञा पाकर सिपाहियोंने इन्हें जबरदस्तीसे उठा दिया। इन्होंने अपनी धूनीकी प्रज्वलित अग्नि झोलीमें डाल ली और इस स्थानसे पूर्व की ओर चलते बने । जलती हुई अग्निको झोलीमें ले जाते देख कर लोग हैरान-से रह गये। नवाबने भी यह बात जान कर अपनी दी हुई आज्ञाके लिए पश्चाताप किया और शीघ्र ही स्वयम् घोड़े पर सवार हो वे इनके पीछे चल पड़े। संत गंगानाथजी थोड़ी ही दूर-जहां आजकल उणिया दरवाजाके पूर्वकी ओर पासमें ही गायोंके चरनेके लिए चरागाह बना हुआ है-जा पाये थे कि नवाब इनतक जा पहुंचे। उन्होंने इनसे विनम्रतापूर्वक वापिस लौट चलनेका अनुरोध किया; लेकिन ये वापिस न लौट कर वहीं एक जाँटके पेड़ * के नीचे बैठ गये। तदनन्तर नवाबने इनके नाम पर कुछ जमीन निकाल दी, जिसका ताम्रपत्र लिखकर इनको दे दिया गया तथा एक ताम्रपत्र और भी दिया, जिसे साथ ले जाकर किसी भी ब्रह्मपूरीमें एक साधु भोजन पा सकता है। * यह पेड़ आज तक विद्यमान है।
( १३५ ) पाँचवाँ-खण्ड संत गंगानाथजीने उसी स्थानके समीप, तपस्या करते हुए कुछ समय बाद जीवित समाधि ली। नवाबने इनपर एक मंदिर बनवा दिया, जो अभी तक मौजूद है। * इनके पश्चात् इनके शिष्योंमें सेवानाथजी और सारनाथजी यशस्वी संत हुए। कविवर नवाब अलिफखाँ ( संवत् १६२७ से १६८३ तक, तदनुसार सन् १५७० से १६२६ तक ) कविवर नवाब अलिफखाँ फतहपुरके ७वें नवाव थे। इनके विषय में इस पुस्तकके तृतीय भागमें सविस्तार लिखा जा चुका है ; फिर भी यहाँ पर थोड़ेमें इनके सम्बन्धमें लिख देना आवश्यक होगा। संवत् १५०८ से १७८७ तक कायमखानी नवाबोंका शासन, फतहपुर पर रहा। नवाब अलिफखाँ यहांके नवाबोंमें सर्वश्रेष्ठ हुए, जिन्होंने ५६ वर्ष तक फतहपुरका शासन किया। सम्राट अकबर और जहाँगोरकी ओर से कई लड़ाइयोंमें भेजे जाने और वहां पर वीरतापूर्वक लड़कर विजय पानेके कारण, इनको समय-समय पर उचित सम्मान प्राप्त हुआ। अपनी वीरता और बुद्धिमत्ताके लिए तो नवाब अलिफखाँ प्रख्यात-कीर्ति थे ही, साथमें साहित्यानुरागी विद्वान भी थे। * आजकल यह मन्दिर चरस और गांजा पीनेवालोंका अड्डा बना हुआ है।
फतहपुर-परिचय ] ( १३६ ) साहित्यमें इनकी रुचि, 'काव्य' विषयमें विशेष थी। स्वयम् भी ये एक अच्छे कवि थे। कवितामें अपना नाम "जान" रखते थे। इनके बनाये हुए ४ ग्रन्थ आज भी उपलब्ध होते हैं, जो अभी तक अप्रकाशित हैं। जयपुरके, पुरोहित पं० हरिनारायणजी बी० ए० के गृह-पुस्तकालयमें ये चारों प्रन्थ-रत्न मौजूद हैं। प्रन्थोंके नाम क्रमशः रत्नावली, सतवन्ती सत, मदन विनोद और कवि-बलम हैं। अपने समयके फतहपुरस्थ महाकवि संत सुन्दरदासजीसे भी नवाब अलिफखाँने काव्य-प्रेमी होनेके कारण, गहरा प्रणय-सम्बन्ध स्थापित कर लिया था। कई बार तो ये स्वयम् संत सुन्दरदासजी के मठमें जाकर उनसे साहित्य-सम्बन्धी ऊहापोह किया करते थे तथा कई बार उनको सादर अपनी राज्य-समामें बुलवाते और साहित्य- चर्चाका आनन्द लेते संत सुन्दरदासजीका संसर्ग-लाभ नवाब अलिफखाँको थोड़े काल -~-करीब एक साल तक ही प्राप्त हुआ होगा ; क्योंकि जब वे (सुन्दरदासजी ) संवत् १६८२ में काशीसे विद्या प्राप्त कर फतहपुर पधारे थे, उस समय नवाब, सम्राट जहाँगीर-द्वारा कांगड़के किलेके फौजदार घोषित किये गये थे। फौजदारीके पद पर आरूढ़ होनेकी वजहसे इनको उक्त किलेकी सार-सम्भालके लिए बार २ कांगड़े जाना पड़ता था। संवत् १६८३ में जब ये कांगड़ेमें ही थे तो कांगड़े के पहाड़ियोंने इनपर आक्रमण कर दिया और १०-११ दिनके युद्धके अनन्तर इनका शरीरान्त वहीं हुआ। बादमें इनका शव फतहपुर लाया जाकर दफनाया गया।
कविवर नियामतखाँ कायमखानी ( नवाब अलिफखाँके समय में) कविवर नियामतखाँ, नवाब अलिफखाँके दूसरे लड़के थे। ये योग्य पिताके योग्य पुत्र थे। विद्वान होनेके कारण इनका अपने जीवन-कालमें काफी मान रहा है और आज भी मुसलमान इतिहास- कारोंमें इनका नाम आदरके साथ लिया जाता है, यह बात विद्वानों से छिपी नहीं है। किन-किन प्रन्योंकी रचना नियामतखाँने की, यह बात तो अभी तक नहीं जानी गयी है । लेकिन “कायमरासा" * नामका एक ऐतिहासिक प्रन्थ इनका संवत् १६६१ का बनाया हुआ पाया जाता है, जो अप्रकाशित ही रह जानेके कारण वर्तमानमें अप्राप्य है। केवल यही एक प्रन्थ इनको अमर बनाये रखनेके लिए काफी है। इसके अलावा इनका विशेष विवरण नहीं मिलता। * कायमरासा-दोहों और सवैयोंमें लिखा हुआ इतिहास-प्रन्थ, जिसके आधार पर "शजरतुल मुसलमीन" और "तवारीख खानजहानी" बनी -- कविवर संत प्रागदासजी (संवत् १६६३ से १६८८ तक, तदनुसार सन् १६०६ से १६३१ तक) माहेश्वरी वैश्य जातिके बियाणी गोत्रमें कविवर संत प्रागदासजी ने जन्म लिया था। इनका जन्म स्थान किरडोली नामका गांव था, जो सीकर राज्यमें स्थित है। अनुमानतः इनका जन्म संवत् १६००में हुआ होगा, इनके जन्म संवत् का ठीक २ पता नहीं लगता। संवत् १६३४ में महात्मा दादूजी महात्मा दादूभी * जब लाड़खान न होते हुए * महात्मा दादूजी, जिन्हें दादूदयालजी भी कहते हैं, संवत् १६०१ में अहमदाबाद (गुजरात) में पैदा हुए। ये दादूपंथके प्रवर्तक महात्मा थे। दादूपंथियोंके कथानुसार ये भी महात्मा कबीरजीकी तरह लोदीराम नागर ब्राह्मण-जिनके कोई पुत्र नहीं था को सावरमती नदीमें एक बहती सन्दूकसे प्राप्त हुए थे। युवावस्था प्राप्त होने तक ये घरमें रहे ; परन्तु इनके अन्तरमें बैराग्यका अंकुर पहलेसे विद्यमान था, जिससे ये शादीके थोड़े समय बाद ही घरसे निकल पड़े और अपने सिद्धान्तोका प्रचार घम२ कर करने लगे। ढूंढार, मारवाड़, गुजरात और पंजाव प्रभृति विभिन्न प्रान्तोंमें महात्मा दादूजीने अपने सिद्धान्तोंका खुब प्रचार किया, जिसके फलस्वरूप उपयुक्त प्रान्तोंमें जगह-जगह इनके अनुयायी होगये। बहुत-से अनुयायियोंने तो इनसे संन्यास ले लिया ; यहां तक कि सैकड़ों शिष्य इनके होगये, जिनमेंसे ५२ प्रधान शिष्य थे, जो ५२ स्थानोंके ५२ दादूमठोंके संचालक हुए। तत्सामयिक सम्राट अकबर भी इनके सिद्धान्तोंका कायल था। महात्मा दादूजी गुजराती, मराठी, फारसी, मारवाड़ी और हिन्दी आदि बहुतसी भाषाएँ जानते थे तथा हिन्दीके बहुत अच्छे कवि भी थे। इनकी रची हुई 'दादूवाणी" दादूपंथियोंका आराध्य ग्रन्थ समझा जाता है । संवत् १६५९ में महात्मा दादूजी भ्रमण करते २ नारायणा गांवमें पहुंचे और वहीं पासकी भरानेको पहाड़ियों में संवत् १६६० में इनका देहान्त हुआ, जहां प्रति वर्ष फाल्गुन मासमें ९ दिन तक दादूपंथियोंका मेला भरता है। + एक गांव .
( १३६ ) [पाँचवाँ खण्ड घाटवा * में आये थे तब प्रागदासजी उनके पास पहुंचे और उनसे किरडोली चलनेका अनुरोध किया। प्रागदासजीकी प्रार्थना स्वीकार कर महात्मा दादूनी इनके साथ किरडोली चले आये। ये साधु-सेवी तो थे ही, भक्ति-भावके साथ इन्होंने उनकी बड़ी भारी सेवा की और स्वयम् उनके उपदेश से प्रभावान्वित होकर उनके शिष्य हो गये। धीरे २ इनको गृहस्थाश्रम से मी विराग होने लगा। जल से जिस प्रकार कमल भिन्न होता है, उसी प्रकार ये भी गृह में रहते हुए गृह-कार्यों से उदासीन रहने लगे। थोड़े दिन बाद जब इनकी उदासीनता और प्रबल- हुई तब ये घर छोड़कर साधु-सत्संगके लिए डीडवाना चले गये और वहीं रहने लगे। घर छोड़ने पर भी संत प्रागदासनी का पहनावा वैसा ही बना रहा जैसा गृहस्थावस्थामें था। संवत् १६६३ तक ये डीडवाना में रहे, पश्चात् फतहपुर आ गये। फतहपुर आने के बाद संत प्रागदासजी अपने और २ साथियों के साथ यहीं रहने लगे। ये कवि भी थे, इनकी बनायी हुई वाणीके ६१ दोहे मिलते हैं, जो "प्रागदासजी की साखी' के नामसे चैनसुखदासजी दादूपंथी (डीडवाना) द्वारा प्रकाशित किये जा चुके हैं। * एक गांव -- फतहपुर-परिचय ] ( १४० ) महात्मा दादूजीके प्रधान ५२ शिष्यों में से एक, संत प्रागदासजी थे। इनके १० शिष्य हुए * जिनमें से १ इन्हीं के पुत्र . माधव- दासजी थे, जो इनकी मृत्युके पश्चात् डीडवाना के पट्ट पर बैठे । संवत् १६८८ में, कार्तिक बदी ६ के दिन संत प्रागदासजीका देहान्त फतहपुर में ही हुआ। ये अधिकतर फतहपुर में ही रहे। बीच-बीच में कई जगह भ्रमण भी किया ; लेकिन फतहपुर इनको अधिक प्रिय होने से इनका आवास मरते समय तक फतहपुर ही बना रहा। इनके पश्चात् इनके शिष्य रामदासजी फतहपुरके पट्टके .. मालिक हुए। * रामदासजी, माधवदासजी, केशवदासजी, नारायणदासजी, बोहितदास- जी, धर्मदासजी, हरिरामदासजी, हरिदासजी, प्रमाणदासजी और टीकूदासजी आदि १० शिष्य संत प्रागदासजीके थे। प्रागदासजीके ४ पुत्र थे, जिनमेंसे २ के नाम मिलते हैं-मथुरादास- जी और माधवदासजी। माधवदासजी द्वितीय थे। बड़े मथुरादासजी थे, जिनके वंशोंके कई घर फतहपुरमें वर्तमानमें भी हैं। नवाब सरदारखाँ (१) के समयका 'जादोका कुमा' भी इन्हीं मथुरा- दासजीके सुपुत्र जादोदासजीका बनाया हुभा है।
कविवर संत संतदासजी ( संवत् १६८० से १६९६ तक, तदनुसार सन् १६२३ से १६३९ तक) कविवर संत संतदासजी, चमड़िया उपजातिके अग्रवाल वैश्य थे। इनका जन्म आभानगरी में हुआ था। बड़े ही संत-सेवी थे। जैसा इनका नाम था वैसे ये गुणी भी थे। महात्मा दादूजीके शिष्य होने तक इन्होंने खूब साधु-सेवा की, पश्चात् स्वयम् दादूजी से संन्यास ले लिया और गृह-त्यागी हो गये। महात्मा दादूजीके, संत संतदासजी ५२ प्रधान शिष्यों में से थे। ये बड़े अच्छे कवि हुए हैं। बारह हजार अनुष्टुप् छंदों * में इन्होंने अपनी वाणी रची, इसलिए इन्हें बारह हजारी भी कहते हैं। सुप्रसिद्ध संत भीखजनजी • इन्हींके शिष्यों में से एक थे, जो एक अच्छे कवि हो गये हैं। संवत् १६६६ की माघ बदी ५ को संत संतदासजी ने फतहपुर में ही जीवित समाधि ली। उस समय उस स्थान पर--जहां इन्होंने समाधि ली थी-लोगोंका एक मेला-सा लग गया था। तत्कालीन नवाब दौलतखाँ (२) भी संत संतदासजी के अंतिम दर्शन के लिए उक्त स्थान पर पधारे थे। * अनुष्टुप् छंद-आठ-आठ अक्षरोंके ४ पदोंका छंद विशेष । भीखजनजीके विषयमें आगे इसी खण्डमें पढ़िए ।
महाकवि संत सुन्दरदासजी (संवत्.१६५३ से १७४६ तक, तदनुसार सन् १५९६ से १६८९ तक) - फतहपुर में (संवत् १६८२ से १७४४ तक, तदनुसार सन् १६२५ से १६८७ तक) महात्मा दादूजीके ५२ प्रधान शिष्यों में सबसे छोटे, पर सबसे बुद्धिमान शिष्य महाकवि संत सुन्दरदासजी थे। इनका जन्म यौसा * में | चैत्र शुक्ला ह संवत् १६५३ को बूसर गोत्रीय खण्डेल- वाल वैश्यवंश में हुआ। पिताका नाम परमानन्द और माता- का नाम सती: था। राघवदासजी की भक्तमालमें इनके जन्म के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा है- "दिवसा है नन चोखो, बूसर है साहूकार सुन्दर जनम लियो, ताहि घर आइके।" * द्यौसा-जयपुरसे पूर्व, १६ कोसकी दूरी पर स्थित है। इसका किला पहाड़ी पर बना हुआ है। राजा सोढ़देवजीके पुत्र दूलहरावजीने इसे विजय करके अपनी (आमेरकी) राजधानी बनाया था। चौसामें जिस घरमें महाकवि संत सुन्दरदासजीका जन्म हुआ था, उसके खण्डहर अभी तक मौजूद हैं । * सती-महाकवि संत सुन्दरदासजीकी माता, जो आमेरके सौंकिया गोतके खण्डेलवालौकी बेटी थीं। 4 राघवदासजी, दादूपंथी प्रह्लाददासजी (महात्मा दादृजीके शिष्य बड़े सुन्दरदासजीके शिष्य ) के शिष्य थे, जो नामी ग्रन्थकार हुए। सुन्दरदास जीके समकालीन थे। ये महाकवि संत सुन्दरदासजी स्वामी अमृतनाथजी
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( १४३ ) [पाँचवाँ-खण्ड संवत् १६५६ में जब महात्मा दादूजी दूसरी बार द्यौसा पधारे, तब सुन्दरदासजी अपने माता-पिताके साथ उनके दर्शनार्थ गये और वहीं उनके शिष्य हो गये, यद्यपि इनकी अवस्था उस समय केवल ७ ही वर्षकी थी। महात्मा दादूजी ने उस समय इनके शिरपर हाथ रखकर 'सुन्दर' ऐसा सम्बोधन किया, इसीसे इनका नाम 'सुन्दरदास' प्रसिद्ध हुआ महात्मा दादूजीके शिष्य होनेके बाद संत सुन्दरदासजी उन्हींके साथ रहने लगे और उनके देहान्त होने तक जगजीवनजी * की देखरेख में उनके साथ रहे ; पश्चात् द्यौसा चले गये। द्यौसा में कुछ समय तक रहकर ये संवत् १६६३ में जगजीवनजीके ही साथ काशी विद्याध्ययनार्थ चले गये और वहां संवत् १६८२ तक रहकर साहित्य और व्याकरण पढ़नेके बाद विविध दर्शनोंका अध्ययन इन्होंने किया। तत्पश्चात् फतहपुर, अपने गुरु माई संत प्राग- दासजी-जिनसे इनका अतिशय प्रेम था-के पास आ गये और यहीं रहने लगे। फतहपुरमें आते ही कई शिष्य, संत सुन्दरदासजी के हो गये ; यहां तक कि फतहपुरके तत्कालीन नवाब अलिफखाँ भी-जो कवि थे-इनपर इनकी विलक्षण कवि-प्रतिभा और प्रकाण्ड पाण्डित्य .. * जगजीवनजी-महात्मा दादूजीके ५२ प्रधान शिष्योंमेंसे एक शिष्य थे। ये वैष्णव सम्प्रदायके काशीके पड़े पण्डित थे; बादमें दादूजीके उपदेशों से प्रभावित होकर उनके शिष्य होगये थे।
फतहपुर-परिचय] ( १४४ ) देखकर पूर्ण श्रद्धा रखने लगे थे। उन्होंने इनसे पूरा प्रणय-सम्बन्ध स्थापित कर लिया था। उनके बाद उनके पुत्र-पौत्र (नवा व दौलतखाँ एवम् ताहिरखाँ) भी इनके भक्त बने रहे। संत सुन्दरदासजी बड़े ही प्रतिभाशाली कवि हुए हैं। इनके बनाये छोटे और बड़े सब प्रन्थ ४२ हैं, * जिनमेंसे सुन्दरविलास और ज्ञान-समुद्र अधिक प्रसिद्ध हैं। सभी ग्रन्थ वेदान्त विषय के हैं। वेदान्त जैसे कठिन विषयको इन्होंने माषा-काव्य द्वारा सरल और सुबोध्य बना दिया है। इनकी कविता देखकर काव्य- -मर्मज्ञ यदि इन्हें महाकवि भी कह दें तो, मैं समझता हूँ, कोई अत्युक्ति नहीं होगी। अलंकार, प्रसाद और माधुर्यादि लक्षणों से युक्त, इनकी कविताकी जितनी प्रशंसाकी जाय थोड़ी है। पं० चन्द्रिकाप्रसादजी, संवत् १६५२ के बैंकटेश्वर प्रेसके छपे हुए, अपने द्वारा सम्पादित संत सुन्दरदासजी-लिखित 'पंचेन्द्रिय- चरित्र' नामक ग्रन्थाकी भूमिका में लिखते हैं- "मेरी अल्प बुद्धिमें वे दोनों महात्मा तुलसीदासजी और सुन्दरदासजी बराबरी की पदवी पानेके योग्य हैं।" उपरके कान से संत सुंदरदासजी और संत तुलसीदासजी (रामायणके रचयिता) दोनों एकही कोटिके कवि ठहरते हैं। एक- दो और सम्मतियाँ भी संत सुंदरदासजीके सम्बन्धकी, यहां लिख देना उचित होगा। * इन प्रन्योंकी रचना, संत मुन्दरदासजीने फतहपुरमें रहकर को ।
" ( १४५ ) [पाँचवाँ-खण्ड हिन्दीकी सबसे बड़ी कोश "विश्व कोश" में लिखा है-"संत कवियोंमें सबसे अधिक विद्वान् तथा पंडित कवि सुन्दरदास हुए। सुन्दरदास दादूदयालकी शिष्य परम्परामें थे। इनका अध्ययन विशेष विस्तृत था। इन्होंने काशीमें आकर शिक्षा प्राप्त की थी। सुन्दरदासकी भाषा शुद्ध काव्य-भाषा है और उनकी वाणोमें उनके उपनिषदों आदिसे परिचित होनेका पता चलता है।" 'विश्वकोश' निर्माता पंडितोंने संत सुन्दरदासजीको विस्तृत अध्ययनशील, मंत करियों में सर्वोपरि विद्वान कवि स्वीकार किया है, यह बात तो ऊपरकी सम्मतिसे प्रगट ही है। इसके अतिरिक्त जयपुरके पुरोहित पं० हरिनारायणजी शर्मा बी० ए० नै सुन्दरदास- जीका मध्ययुगके हिन्दी साहित्यक कविया में वां स्थान बतलाया है । ग्रीयसन साहब अपनी लिखित "लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इण्डिया' नामक पुस्तका, 'सबसे अधिक छन्दोंका रचनेवाला' इन्हें ही बतलात हैं। राघवदासजीने तो अपनी भक्तमालमें संत सुन्दरदासजीको दूसरा शंकराचार्य तक कह डाला है। वे लिखते हैं--"शंकराचारज दूसरो दादूके सुन्दर भयो। किसी साधु कविने भी, "दादू दीनदयालके चेले दोय पचास। केई उडुगण केई इन्दु हैं दिनकर सुन्दरदास ।।' इस प्रकार कहा है; और दादूपंथी कविवर चतुरदासजीने सब कवियों का शिरोमणि संत सुन्दरदासजीको ही बतलाया है, देखिए- "तारन में ज्यू चन्द, इन्द देवन में सोहै। नरन माहिं नरपती, सती हरिचंद सजो है ।
फतहपुर-परिचय] ( १४६ ) भक्तन में ध्रुवदास तास सम और सुथोरे । दानिनमें बलि बरनि सुरनि सम सिवरन औरे ॥ जगत भगत विख्यात है, चातुरजन ऐसे कही । सब कवियन सिरताज है, दादू शिष सुन्दर मही।।" उपयुक्त सम्मतियोंसे संत सुन्दरदासजीकी असाधारण प्रतिभा का थोड़ा-बहुत परिचय, पाठकोंको कराया गया है । संत सुन्दरदासजी वर्तमानमें जितने प्रख्यात हैं, उससे कहीं बहुत अधिक प्रख्यात अपने समयमें थे। तत्सामयिक सभी कविगण इनसे परिचित थे, ऐसा पुरोहित पं० हरिनारायणजी द्वारा सम्पादित 'सुन्दर-प्रन्थावली' को पढ़नेसे विदित होता है। महाकवि केशव दासजी, महाकवि तुलसीदासजी और जैनकवि बनारसीदासजी प्रभृतिसे भी इनका परिचय था। ये विविध प्रान्तोंमें घूम-घूमकर तत्स्थानीय कवि और पंडितोंसे मिलते और उनका परिचय प्राप्त करते थे। जहां-जहां गये उन स्थानोंकी भाषा भी इन्होंने सीखी। इसीसे ये हिन्दी और संस्कृत के अतिरिक्त और-और कई भाषाओं पर भी अधिकार रखते थे, जिनमेंसे फारसी, गुजराती, पूर्वी, पंजाबी और मारवाड़ी मुख्य हैं। संस्कृतके मारी पंडित होने पर भी संत सुन्दरदासजीने अपने सभी प्रन्थ हिन्दीमें ही निर्माण किये। सर्वसाधारणके उपकारको दृष्टिमें रखकर ही इन्होंने ऐसा किया होगा, ऐसा प्रतीत होता है। नहीं तो ये देववाणी संस्कृतके साहित्यकी अभिवृद्धि करनेसे न चूकते। .
( १४७ ) [पाँचवाँ खण्ड अपने रचित सभी प्रन्थ संत सुन्दरदासजीने अपने गृहस्थ शिष्य रूपादासजी वैश्यसे संवत् १७४३ तक लिखवा लिये थे। तत्पश्चात् इन्होंने कोई नया पंथ नहीं रचा। इनके रचित नथ यद्यपि २५० ३०० वर्ष प्राचीन हैं, फिर भी इनकी माषा आज-कलकी माषासे बहुत-कुछ मिलती-जुलती है, जिससे इनकी भाषा-विज्ञताका अनुमान सहज ही में हो जाता है। कवि और पण्डित होनेके साथ-साथ संत सुन्दरदासजी तत्त्वज्ञानी मी थे। सामाजिक कुरीतियों और वाह्याडम्बरके ये पक्के दुश्मन थे। सामाजिक कुरीतियोंको लक्ष्य करके ही इन्होंने निम्नाङ्कित कुछ वाक्य अपने दशों दिशाके सवैयोंमें कहे हैं :- पूर्व के विषय में-"ब्राह्मण क्षत्रिय बैसरु सूदर चारहि वर्ण के मच्छ वधारत।" दक्षिणके विषय में-“रांधत प्याज बिगारत नाज न आवत लाज कर सब भच्छन।" फतहपुरके विषय में-"फूहड़ नार फतहपुर की।" इनके अलावा वाह्याडम्बरके सम्बन्धमें भी इनकी उक्तियाँ बड़े मार्केकी कही जाती हैं, वे भी यहां उद्धृत कर देनी आवश्यक होगी। माला जपौं 'न तसवी फेरौं, तीरथ जाऊं न मका हेरौं । न्हाइ धोइ नहिं करूं अचारा, ऊजू तँ पुनि हूवा न्यारा ॥ एकादशी न प्रतहिं विचारौं, रौजा धरौं न बंग पुकारौं । देव पितर नहिं पीर मनाऊं, धरती गड़ौं न देह जलाऊ ।
फतहपुर-परिचय] ( १४८ ) ना मैं कृत्रिम कर्म बखानौं, ना रसूल का कलमा जानौं । ना मैं तीन ताग गलि नाऊँ, ना मैं सुन्नत करि बौराऊ । संत सुन्दरदासजीका कहना था कि क्रियाडम्बरसे ब्रह्मकी प्राप्ति नहीं होती और न हिन्दू या मुसलमान होनेसे ही। एक जगह इन्होंने “हिन्दूकी हद छाड़िके तजी तुरककी राह ।" ऐसा कहा है, जिससे इनकी, हिन्दू-मुसलमान दोनों ही सम्प्रदायोंसे उदासीनता झलकती है। संवत् १७४४ तक संत स्तुन्दरदासजी फतहपुरमें रहे, बादमें देशाटनके लिए निकल गये। घूरत-घूमते ये अपने परम स्नेही रजवजी * के स्थान सागाने । म संवत् १७४६ में पहुंचे और वहीं रजवजीकी मृत्यु हुई जाना स्वयम् भी उनके वियोग-जनित दुःखसे दुखित होकर संवत् १५४६ की कार्तिक सुदी ८ के दिन परलोक सिधारे। इनकी समाधि सांगारी अद्यावधि अद्यमान है। संत सुन्दरदासजीके मरनेके बाद, इनके मुख्य ५ शिष्यों के ५ पट्ट स्थापित हुए, जिनमें फतहपुरका पट्ट ही मुख्य है। इनकी कुछ कविताएं नीचे देखिए- है * रउजवजी-दादूजी के प्रधान ५२ शिष्यों में से एक । + सांगानेर-जयपुरसे दक्षिण तरफ ४ कोसकी दूरी पर * संत सुन्दरदासजीके ५ शिष्य-दयालदासजी, श्यामदासजी, दामोदर- दासजी, निर्मलदासजी और नारायणदासजी। * पांच स्थानोंके ५ पट्ट-फतहपुर, रामगढ़, बिसाऊ, चूरू और मोर । .
( १४६ )
[पाँचवाँ खण्ड
।
धूलि जैसो धन जाके, सूलि सो संसार सुख ।
भूलि जैसो भाग देखे, अंत कैसी यारी है।
पाप जैसी प्रभुताई, स्राप जैसो सनमान ।
बड़ाई बिच्छुन जैसी, नागिनी सी नारी है ।
अग्नि जैसो इन्द्रलोक, विघ्न जैसो विधि-लोक।
कीरति कलंक जैसी, सिद्धि सी ठगारी है ।
बासना न कोई बाकी, ऐमी मति सदा जाकी।
सुन्दर कहत ताहि बंदना हमारी है।
( २ )
आपन देखत है अपनो मुख, दर्पण काट लायो अति श्रूला ।
ज्यूहग देखत ते रहि जात, भयो जबही पुतरी पर फूला ॥
छाय अशान रह्यो अमिअंतर, जानि सकै नहिं आतम मूला।
सुन्दर यूं उपजे मनके मल. ज्ञान बिना निज रूपहिं भूला ॥
( ३ )
पुरुष प्रकृति संयोग, जगत् उपजत है ऐसे।
रवि दर्पण दृष्टान्त, अग्नि उपजत है तैसे ॥
सुई होहिं चैतन्य, यथा चुम्बक के संगा।
यथा पवन संयोग, उदधि में उठहिं तरंगा।
अरु यथा सूर संयोग पुनि, चक्षु रूपको गहत है
यो जड़ चेतन संयोग तें सृष्टि उपजती कहत है ।।
फतहपुर-परिचय]
( १५० )
तें
( ४ )
ब्रह्म तें पुरुष अरु प्रकृति प्रगट भई
प्रकृति ते महत्तत्व पुनि अहंकार है।
अहंकार हूं तें तीन गुण सत रज तम
तम हूं महाभूत
विषय पसार है॥
रज हूं तें इन्द्री दस पृथक पृथक भई
सत्त हूं तें मन आदि-देवता विचार है।
ऐसे अनुक्रम करि शिष्य सू कहत गुरु
सुन्दर सकल यह मिथ्या भ्रम जार है।
( ५ )
तौ सही चतुर तू जान परबीन अति
परै जनि पिंजरे
पाइ उत्तम जनम लाइलै चपल मन
गाइ गोबिन्द गुण जीति जूवा ।।
मापु ही आपु अज्ञान नलिनी बन्ध्यो
बिना प्रभु, विमुख के बेर मूवा ।
दास सुन्दर कहै परम पद तौ लहे
राम-हरि राम-हरि बोल सूषा ।
मोह कूवा।
कविवर संत भीखजनजी (संवत् १६८३ में, तदनुसार सन् १६२६ में ) दाद-शिष्य संत संतदासजीकेजिनके विषयमें पहले लिखा जा चुका है-शिष्य, कविवर संत भीखजनजी थे। ये जातिके आचार्य ब्राह्मण * थे। इनके पिताका नाम देवीमहायजी था, जिनके इनके सिवा और भी २ पुत्र थे। ये ही. अपने पिताके तीनों पुत्रोंमें गुणी होनेके कारण, प्रख्यात-कीर्ति हुए हैं। इनकी रची हुई 'भीखबावनी' नीतिकी छोटी अपितु अमूल्य पुस्तक है। छोटी अवस्थासे ही संत मीखजनजी साधु सेवामें रत रहा करते और जहां-तहां संतोंके आगमनका समाचार पाकर पहुंच जाते थे। भाग्यसे इनका समागम, धूर्त और आडम्बरी साधुओंसे न होकर, तत्कालीन दादूपंथी साधुओंसे हुआ। दादूपंथी साधुओंका उस समय फरापुरमें अच्छा जमघट था, जिनमेंसे संत संतदासजीको इन्होंने अपना गुरु बनाया और संन्यस्त हो गये । संन्यासी होनेके बाद संत भीखजनजी, अपने गुरु तथा अन्य दादूपंथियों के साथ उन्हींके स्थानपर रहकर भजन स्मरण करने लगे। भजन-स्मरणसे अवकाशक समयमें ये अपने गुरु संत संतदासजी से अध्ययन भी करते रहे, जिसके फलस्वरूप ये एक अच्छे कवि और उपरिलिखित 'भीखबावनी इन्होंने रची। * आचार्य ब्राह्मण-महाब्रह्मग भी कहलाते हैं। पहले गौडब्राह्मण थे और ढांचोलिया कहलाते थे, बादमें श्राद्धान्न लेने और खाने से ये पतित गिने जाने लगे एवम् महाब्राह्मण इनका आस्पद हो गया।
फतहपुर-परिचय] ( १५२ ) भीखबावनी' के छन्दोंका रचना-चातुर्य और शब्द-योजना देखकर ही इनकी ज्ञान-गरिमा जानी जा सकती है। ये ही भीखजनजी थे, जिन्होंने लक्ष्मीनाथ-मन्दिर में प्रवेशाधिकार प्राप्तिके लिए सत्याग्रह किया था। कहा जाता है कि पुजारियोंने, जब ये मन्दिर में दर्शनार्थ जा रहे थे तो इनको, महाब्राह्मण होनेकी बजहसे नहीं जाने दिया। इन्होंने पुजारियोंकी इस धींगाधींगीका सक्रिय विरोध किया। स्वयम् ये निराहार रहकर मन्दिरके पीछे बैठ गये, जिसका फल यह हुआ कि इनको मन्दिरमें जानेकी इजाजत पंच महाजनोंसे मिल गयी ! समझमें नहीं आता, सांत भीख जन जी एक दादूपंथी साधु होकर लक्ष्मीनाथजीकी मूर्त्तिके दर्शना क्यों गये थे ? •• पर विचार करने से मालूम होता है कि इन्होंने स्वयम अपने लिए नहीं ; ( बल्कि बुत- परम्त हरिजनों के लिए ऐसा किया था। जो काम आज महात्मा गांधी कर रहे हैं, वही काम संत भीख जननीने आजसे ३०० वर्ष पहले कर दिखाया था। संत भीखजनजीकी उपयुक्त मन्दिर प्रवेशाधिकार प्राप्तिकी कथा, आज तक चली आती है। सभी बड़े-बुड्ढे इस कथाको अच्छी * लक्ष्मीनाथ-मन्दिर के विषयमें इसी पुस्तक के छठे खण्डमें पढ़िए । + दादूपंथी बुत-परस्त नहीं होते हैं। * महात्मा गांधी-वर्तमान के विश्व-विख्यात एक भारतीय महापुरुष, जिनका परिचय देना सूर्य को दीपक दिखाना है।
( १५३ ) [ पाँचवाँ खण्ड तरह जानते हैं। यद्यपि भीखजनजी आज नहीं हैं, फिर भी यह कथा आज इनका स्मरण करा देती है। इनके मृत्यु संवत् का ठीक- ठीक पता नहीं चलना। , जैनाचार्य भट्टारक ललितकीर्तिजी ( रावराजा लक्ष्मणसिंहजो के समय में ) भट्टारक * श्री ललितकीर्तिजी, दिगम्बर जैन सम्प्रदायके आचार्य हुए हैं। इनका पट्ट दिल्लीमें था। ये लोहाचार्य आम्नायके काष्ठ- संघी माथुर गच्छके मट्टारक थे। भट्टारक जगतकीर्तिजीके बाद ये दिल्ली के पट्टके अधिकारी हुए। संवत् १८६१ में ये फतहपुर पधारे । फाहपुरके लोग मट्टारकोंकी असाधारण विद्या-बुद्धिसे पहलेसे ही परिचित थे; क्योंकि उक्त भट्टारकजीके पूर्वके कई भट्टारक समय- समय पर फतहपुर आये और अपने अमूल्य उपदेशोंसे जनताको प्रभावित किया। फतहपुर की जनता--जैन-अजैन मभी-ने भट्टारकजीका आगमन जानकर इनका पूर्ण सम्मान किया और इनके * भट्टारक-नाम दिगम्बर जैन मुनियोंका बिगड़ा हुआ रूप था। ये लंगोट तथा चद्दर धारण करते और राजसी ठाठ रखते थे। संस्कृत के पूर्ण पंडित होते थे। इनके कई जगह पट्ट थे। अब प्रायः सभी पट्ट, सिवा एक-दोके, उठा दिये गये हैं।
फतहपुर-परिचय] ( १५४ ) उपदेश सुने। जैनियोंने इनके उपदेशसे अपने प्राचीन जैन-मन्दिर का जीर्णोद्धार करवा कर उसीके ऊपर एक नया जैन-मन्दिर बनवा दिया। इसके अलावा कतिपय वैष्णव इनके शिष्य होकर जैन- धर्मानुयायी होगये, जिनमेंसे पण्डित जीवणराममी * का नाम विशेष प्रसिद्ध है। भट्टारकजी अपने समयके बड़े ही प्रसिद्ध विद्वान थे। इन्होंने काशीके प्रकाण्ड पंडितोंको शास्त्रार्थ में कई बार पराजित किया। बाल ब्रह्मचारी थे। तंत्रशास्त्रमें अद्वितीय थे। इनके चमत्कारोंकी बहुतसी कहानियाँ आज तक फतहपुरमें बड़े-बुड्ढे लोगोंके मुंहसे सुनी जाती हैं। वे सच्ची हैं या झूठी, मैं नहीं कह सकता। कई प्रन्थ इन्होंने रचे, जिनमें से ३ बहुत प्रसिद्ध हैं, जिनके नाम त्रिलोकसार पूजा । संस्कृत ), सिद्ध चक्र पूजा ( संस्कृत ) और आदिपुराण-टीका हैं। आदिपुराण-टीका ५०००० श्लोकों में, भगवन्मिनसेनाचार्य कृत आदिपुराण पर, लिखी गयी है। केवल इसी एक वृहत् प्रन्थसे इनकी विद्वत्ताका अनुमान लगाया जा सकता है। भट्टारकोंको, उनके प्रखर पाण्डित्य पर विमोहित होकर, दिलीके बादशाह अलाउद्दीन खिलजी और फीरोजशाह तुगलकने ३२ उपाधियाँ दी थीं। इन ३२ उपाधियों की ३२ सनदें इनके पास थीं। जब तक दिछीका पट्ट रहा, तबतक भट्टारक लोग फतहपुर बराबर - * जीवणरामजो के विषयमें इसी खण्डमें आगे देखिए।
( १५५ ) [पाँचवाँ खण्ड माते रहे। मट्टारक ललितकीर्तिजी कई बार फतहपुर आये । इनका एक पंडित शिष्य फतहपुरमें तत्स्थानीय भावकोंको उपदेश देनेके लिए रहने लगा। भट्टारक ललितकीर्तिजीके बाद २ भट्टारक और दिल्ली-पट्ट पर हुए, जिनके नाम क्रमशः राजेन्द्रकीर्तिजी और मुनीन्द्रकीर्तिजी थे । मुनीन्द्रकीर्तिजीके बाद योग्य शिष्यके अभावमें पट्ट उठा दिया गया। * भट्टारकोंकी गद्दी उठ जानेके बाद फतहपुर में भट्टारकोंके पंडित शिष्य-जो भट्टारकोंके समयसे ही रहते आ रहे थे-श्रावकोंको उपदेश देते रहे। पण्डितोंकी एक गद्दीकी बतौर यहां होगयी थी, जो अब तक चलती थी। वर्तमानमें कोई गद्दी भट्टारकोंके पण्डित शिष्योंकी यहां नहीं है। संत बधगिरिजी ( रावराजा लक्ष्मणसिंहजी के समय में) संत बुधगिरीजी, जातिके धामाई गूजर थे। संन्यास लेनेसे पूर्व ये चिड़ावेमें किसी धनीके यहां बहलवानका काम किया करते थे। किसी कारणसे उक्त धनीसे अनबन हो जानेसे इन्होंने उसकी नौकरी छोड़ दी और नूआ आगये। * अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण करनेवाला, सरस्वती के समान पण्डित अप्रवाल जैन ही दिल्ली के भट्टारक पद पर आसीन होनेके योग्य समझा जाता था।
फतहपुर-परिचय] ( १५६ ) - नूंआ आकर संत बधगिरिजीने लक्ष्मणगिरि नामके एक अघोर- पंथी माधुसे संन्यास ग्रहण कर लिया और वहीं उनके पास कुछ समय तक रहकर योगाभ्यास किया। बादमें संवत् १८५० में ये फतहपुर आगये। फतहपुरमें शेखके कुएँ * के पास--जहां आजकल बूबनोंकी हवेलियाँ बनी हुई हैं-ये खड़े रहकर तपस्या करने लगे। बादमें फतहपुरसे दक्षिण टीबोंमें चले गये और वहीं रहने लगे। इनकी तपस्या और योगबलने बहुतसे आदमियों को इनका भक्त बना दिया था। तत्कालीन सीकर-नरेश रावराजा ल प्रणसिंहजी भी इनकी ओर आकर्षित हुए बिना न रहे, वे भी इनके भक्त होगये और जब- जब फतहपुर पधारे इनके दर्शनोंसे अपनेको धन्य समझा। एक बार तो एक गांव, उन्होंने इनके अर्पण कर देना चाहा ; लेकिन इन्होंने उसे लेनेसे साफ इनकार कर दिया। संवत् १८६२ की फाल्गुण बढी १३ को संत बुधगिरिजीने ३५ वर्षकी अल्पावस्थामें ही हिन्दुओंकी परम्परागत प्राचीन परिपाटी के अनुसार -उसी स्थान पर जहां ये रह रहे थे-~जीवित समाधि लेली। इनके समाधि-स्थान पर रावराजा लक्ष्मणसिंहजीने एक * यह कुआं नवाबी जमाने का, शेखमलजी केजड़ीवाल का बनवाया हुआ, बतलाया जाता है
( १५७ )
[ पाँचवाँ खण्ड
मन्दिर बनवा दिया, जो आज तक बना हुआ है।* हर वर्ष फाल्गुण
वदी १३ के दिन इस स्थान पर मेला लगता है।
संत बुधगिरिजीके समाधिस्थ हो जानेके बाद इनके शिष्य
यशवन्तगिरिजीको रावराजा रणसिंहनन 'नय वास' नामका एक
गांव दे दिया, जो फतहपुरी इक्खिनमें है।
संत परमानन्दजी
( रावराजा लक्ष्मणसिंहजी के समय में )
संत परमानन्दजी, संत बुधगिरिजीके समकालीन थे। ये बड़े
ही योगी हुए हैं। इनके यौगिक चमत्कारोंकी बहुतसी कथाएं
फतहपुरमें अब तक सुनी जाती हैं। कहते हैं योग द्वारा इन्होंने
वाक्-सिद्धि भी प्राप्त कर ली थी।
** यह समाधि-मदिर, फतः पुर सहरसे बा..', उसके दक्षिण में स्थित
मात्र जलालादों की बीहड़ में, शहर से करीब १ मीलकी दूरी पर एक बहुत
ऊँचे बाल के टीले पर, बना हुआ है। मंदिर के ऊपर से फतहपुर का
विहङ्गम दृश्य अच्छी तरह दिखाई देता है तथा मंडावा ( फतहपुर से पूर्व में
७ कोस पर ) भी कृष्टिगत होता है। इस मंदिर को हम फतहपुर शहर के
किसी भी ऊँचे मकान से भली प्रकार देख सकते हैं।
फतहपुर-परिचय ] ( १५८ ) अधिक भांग पीनेके कारण, लोग संत परमानन्दजीको 'भंगड़ कहने लग गये थे ; यद्यपि इनका नाम 'परमानन्द' था। इतना ज्यादा दुर्व्यसन इनको भांग पीनेका था कि योगसाधनसे बचा हुआ इनका सारा समय इसीमें बीतता था। एक बार रावराजा लक्ष्मणसिंहजी संवत् १८६० में जब फतहपुर पधारे थे तब वे इनके दर्शनार्थ भी आये। ये उस समय भांग घोट रहे थे। रावराजाजीने चाहा कि वे इनकी भांग घोट देते ; लेकिन इन्होंने उनसे “धुट गयी, मीकर चला जा" इतना-सा वाक्य कहकर ऐसा करनेसे इनकार कर दिया। रावराजाजी उसी रोज सीकर चले गये और वहां जाकर दो दिन बाद स्वर्गस्थ हुए। इस प्रकारकी बहुतसी चामत्कारिक बातें इनकी हैं ; लेकिन उनको यहां, प्रसंगवश लिखी गयी उपयुक्त बातके सिवा, लिखना अनावश्यक जान पड़ता है। संत परमानन्दजीका देहान्त-न मालूम कब-फतहपुरमें ही हुआ। इनकी समाधि पर एक चबूतरा बना हुआ था, जो अभी थोड़े दिन पहले फतहपुरके पूर्व में पं० जीवणरामजी * की छतरीके पाममें किसी नोहरेमें मौजूद था; लेकिन अब नष्ट होगया है। * पं० जीवणरामजी की जीवनी को बातें आगे इसी खण्ड में पढ़ने को यतिवर हरजीमलजी ( रावराजा रामप्रतापसिंहजी के समय में ) यतिवर हरजीमलजी, जैनियों के श्वेताम्बर सम्प्रदायके आचार्य होगये हैं। ये वृहत्खरतर गच्छीय जिनदत्त सूरि आम्नायकी भद्रमरि शाखाके यती थे। बड़े ही विद्वान् और तान्त्रिक थे। इनका प्रभाव इनके समयमें काफी रहा है। अपने समयके सीकर-नरेश रावराजा रामप्रतापसिंहजीको, यती हरजीमलजीने अपना शिष्य बनाया और उन्हींके पास बहुत समय तक ये सीकरमें रहे ; पश्चात् लक्ष्मणगढ़में अपना उपाश्रय बनाकर रहने लगे। फतहपुरमें इनका मन बहुत कम लगता था, इससे इनके गुरुने फतहपुरका उपाश्रय अपने दूसरे शिष्य यती चिमनरामजीको सौंप दिया ।* फतहपुरके उपाश्रयमें ये बराबर आते-जाते रहते थे परन्तु ठहरते बहुत कम थे। जब ये फतहपुर आते तो दि० जैन- मन्दिरमें भी आया करते थे। यती हरजीमलजीके जीवनका अधिक समय लक्ष्मणगढ़में ही बीता और वहीं इनका देहान्त भी हुआ। इनकी समाधि पर वहां एक छतरी बनी हुई है। * यती चिमनरामजी की शिष्य-परम्परामें, फतहपुर के पट्टपर यती विष्णुदयालजी हुए, जिनका देहान्त हाल ही में हुआ है । ये यती भैरवचन्द्र जी के, व्याकरण, ज्योतिष और वैद्यकादि विषयों में पारङ्गत शिष्य थे।
कविवर सेठ रामदयालजी नेवटिया (संवत् १८८२ से १९७५ तक, तदनुसार सन् १८२५ से १९१८ तक ) कविवर सेठ रामदयालजी नेवटिया, मनसारामजी नेवटियाके सुपुत्र थे। इनका जन्म संवत् १८८२ में मँडावामें हुआ, जिसके ४८ दिन पश्चात् इनके पिता अपनी गृहिणी और नवजात शिशु सहित फतहपुर आगये। संवत् १८६६ में जब सेठजीकी अवस्था १४ वर्षकी थी, इनके पिताका देहान्त होगया। उस समय सेठजी सांसारिक अनुभवसे बिलकुल अनभिज्ञ थे। इनकी आर्थिक स्थिलि साधारण थी ; लेकिन छोटी अवस्था और अनभिज्ञताके कारण ये कर क्या सकते थे ? दो भाई और भी इनके थे, पर वे इनसे छोटे थे। संवत् १६०७ में ये अजमेरके सेठ प्रतापमलजी मेहताकी पूनाकी दूकान पर उनके मुनीम होकर गये। अपनी कार्यकुशलतासे इन्होंने सेठ प्रतापमल जीके हृदयको जीत लिया एवम् पूनाके, अपने संसगमें आनेवाले सभी व्यापारियोंसे घनिष्टता स्थापित करली। ये बड़े ही सरल, मिष्टभाषी और मिलन- सार थे, इससे इनके जान-पहचानवालोंकी संख्या पूनामें बहुत अधिक होगयी थी। तत्स्थानीय कई उच्च पदारूढ़ राज्य-कर्मचारी भी इनसे भलो प्रकार परिचित थे। पूनामें रहते हुए सेठ रामदयालजी अपने व्यापार से बचे हुए- अवकाशक-~-समयको अपनी विद्याभिरुचिको तृप्त करनेमें लगाते- उस समय ( १६१ ) [पाँचवाँ खण्ड रहे, जिसका फल यह हुआ कि ये ४-५ भाषाएं जानने लग गये थे, जिनमें से हिन्दी और संस्कृतका इनको अच्छा ज्ञान था और अंग- रेजी, मराठी और गुजराती भी थोड़ी-थोड़ी जानते थे। संवत् १९१४ में सेठजी पूनासे अजमेर. चले आये और थोड़े समय बाद ही फतहपुर आगये और यहीं रहने लगे। इनकी अर्थिक स्थिति अच्छी हो गयी थी। विद्वान्, धार्मिक और धनसम्पन्न होनेसे इनकी प्रतिष्ठा फतहपुरमें दिन-दिन बढ़ती गयी, जो समय पाकर सर्वश्रेष्ठता तक पहुंच गयी। विद्वानों और गुणियोंका सेठजी बड़ा आदर किया करते थे ; क्यों न करते जब स्वयम् ही विद्वान थे। सभी शास्त्रीय विषयों में इनकी जानकारी, थोड़ी या बहुत, अवश्य थी। पुस्तकांका बड़ा हर समय इनके चारों ओर पुस्तकें पड़ी हुई रहती थीं। इनके पुस्तक संग्रहमें हिन्दी और संस्कृतकी नवीन और प्राचीन कई प्रकारकी पुस्तकें थीं, जिनको अव्यवस्थित दशा में दिलसुखरायजी * के पास जाकर आज भी देख सकते हैं । स्वयम् ये अच्छी कविता करते थे। इनका उपनाम 'कृष्णदास' था। तीन अन्य इनके बनाये हुए मिलते हैं जिनके नाम क्रमशः प्रेमांकुर, बलभद्र-विजय और लक्ष्मणामङ्गल हैं । ये तीनों प्रकाशित हो चुके हैं। अपनी अन्तावस्था-संवत् १६७५-त सेठजी पूर्ण स्वस्थ रहे। उस समय तक इनकी आंख और कानकी शक्तियाँ काम प्रेम था। BretuRNIDAMUP- * सेठ रामदयालजीके सुपुत्र। ११ फतहपुर-परिचय] ( १६२ ) करती थीं और दांत भी साबूत थे। हमेशाकी तरह इनका पूजना- राधन और सम्पूर्ण गीता पाठ भी उस समय तक चलता रहा। संवत् १६७५ की आश्विन बदी १५ को ६३ वर्षकी दीर्घायु प्राप्त कर सेठजी स्वर्गस्थ हुए। .. पण्डित जीवणरामजी (संवत् १८८४ से १९२३ तक, तदनुसार सन् १८२७ से १८६६ तक) जैनाचार्य मट्टारक ललितकीर्तिजीके फतहपुरस्थ पंडित-शिष्य रूपचन्दजीके शिष्य पंडित जीवणरामजी हुए। फतहपुरमें इनकी बहुत अच्छी प्रतिष्ठा रही है। ये अपने समयके पीयूषपाणि वैद्य, अद्वितीय ज्योतिषी और निसर्गजात चित्रकार थे तथा' और-और विद्याएं भी इनको हासिल थीं ; जैसे-बढईगिरी, जड़ाई, और सुवर्णकारी। इनका नाम 'जयरामदास' था, पर बादमें लोग इन्हें 'जीवणराम' कहने लग गये थे ; इससे इनकी ख्याति इसी नामसे हुई। ये जाति के ब्राह्मण थे। भट्टारकोंके शिष्य होनेके कारण जैनधर्मही पालते और जैनियोंको जैनधर्मका उपदेश देते थे। जैनमंदिरमें प्रातःकाल पूजा-पाठ भी किया करते थे। तदनन्तर मध्याह्नमें ये लड़कोंको निःशुल्क पढ़ाते थे। अन-अजैन सभी इनके पास पढ़ने आते ; ..
( १६३ )
[पाँचवाँ खण्ड
MAMMONAL
.....
इन्हींके शिष्यों में से एक, आयुर्वेदाचार्य पं० ज्वालादत्तजी शर्मा हुए
हैं, जो बम्बईमें बड़े प्रसिद्ध वैद्य थे और द्वितीय धन्वन्तरि कहलाये।
एक गुटका * पंडितजीका संग्रह किया हुआ फतहपुरके
जैन मंदिर में उसकी (मंदिरकी) अमूल्य सम्पत्तिके रूपमें रक्खा हुआ
है। यह गुटका विविध विषयोंका सुन्दर संग्रह है, इससे इसे
भानुमतीका पिटारा भी कह सकते हैं। इसमें एक लाख श्लोक
बताये जाते हैं।
पंडित जीने अपनी जीवितावस्था में ही संवत् १६२२ में फतहपुर
के पूर्वमें सरावगियोंके कुएं ... के पास अपने नामसे एक नसिया
( छतरी ) का निर्माण कराया, जिसमें
भाद्रपद मासमें जैनियोंके
तीर्थङ्करकी प्रतिमा सोत्सव ले जायी जाती है और वहीं उसकी पूजा
होती है। उसी साल बिसाऊमें भी एक छतरी इन्होंने अपने
नामसे बनवायी।
पंडितजीके २ शिष्य हुए, जिनके नाम पं० खेमचन्द्र और पं०
विष्णुदयाल थे। संवत् १९२३ के आश्विन मासकी कृष्णा १ को
पंडितजीका देहान्त हुआ, इनके शिष्य बिष्णुदयालजी इनके पट्ट
पर बैठे
* गुटका हस्तलिखित छोटे साइज की पुस्तक को कहते हैं।
' सरावगियों का कुआं-यह कुआं नवाब दीनदारखां के समय में
संवत् १७३९ में सकल पंच श्रावकों की ओर से बना था।
स्वामी परशुरामजी
( रावराजा माधवसिंहजीके समय में )
स्वामी परशुरामजी घस्सू गाँव * में रहनेवाले किसी बनियेके
लड़के थे। संन्यासी होनेके बाद ये फतहपुर चले आये और यहीं
सरावगियोंकी छतरी (पं० जीवणरामजीकी नसिया) में रहने
लगे।
स्वामीजी भगमा कपड़े पहनते थे। इनका शरीर गौर वर्णका
था। बड़े ही निरमिमानी, दयालु और ईश्वर-भक्त ये थे। गीता
का इनको बड़ा प्रम था। इनका सारा समय भजन-स्मरण और
गीता-पाठमें ही बीतता था।
स्वामीजीने कभी किसीसे कुछ नहीं मांगा। न मालूम इनका
भोजन-वस्त्रका खर्चा कहांसे चलता था। ऐसी बातोंसे हमें इनके
साधु होने में संदेह नहीं रह जाता। ये पूरे सौ साल
तक जीते रहे।
उच्च कोटिके
* घस्स--लक्ष्मणगढ़ के पास का एक गांव है।
स्वामी चम्पानाथजी ( रावराजा माधवसिंहजी के समय में) स्वामी चम्पानाथजी, फतहपुरके ख्यात नामा स्वामी अमृतनाथ- जी * के गुरु हुए हैं। इन्होंने झुंझुनूके स्वामी चंचलनाथजी के शिष्य स्वामी मोतीनाथजी से दीक्षा ली थी। दीक्षा लेनेके बाद ये शेखावाटी में इधर उधर भ्रमण करते रहे ! फतहपुर भी भ्रमण करते हुए पधारे थे, यहां एनके शिष्य स्वामी अमृतनाथजी पहले से ही अपनी शिष्य मण्डली सहित रहते थे, इससे ये भी यहीं टिक गये। इन्होंने सरावगियोंकी छतरी (पं० जीवणरामजीकी नसिया) को अपना आवास बनाया। तदनन्तर मूगीलालजी * इसी खण्ड में स्वामी अमृतनाथजी" शीर्षक निबन्ध में, स्वामी अमृतनाथजी के विषयमें पढ़िए । 'स्वामी चंचलनाथजी मुंमुन में हुए हैं। इन्होंने संवत् १६०० में अपना आश्रम मुंझनू में बनाया और तीन शिष्य किये, जिनके नाम मोतीनाथ, क्षमानाथ और गणेशनाथ थे। * स्वामी मोतीनाथजी, रीणी (बीकानेर ) के रहनेवाले विद्वान् ब्राह्मण थे। ये स्वामी चंचलनाथजीके शिष्य और स्वामी चम्पानाथजी के गुरु थे। 2 सरावगियोंकी छतरी में स्वामी परशुरामजीके बाद स्वामी चम्पानाथजी . vv फतहपुर-परिचय] ( १६६ ) देवड़ा ने इनके लिए, फतहपुरके पूर्वकी ओर महासिंहजीके कुएं * के पास एक स्थान बनवा दिया, वहीं ये रहने लगे। स्वामीजीका नाम 'चम्पानाथ' इनके रूपको देखते हुए उपयुक्त ही था। इनका रूप गौरा एवम् आकर्षक, मुखमण्डल प्रभावशाली और आंखें बड़ी सुन्दर थीं। ये संयमी और जितेन्द्रिय थे। बड़े ही सच्चे और निरमिमानी साधु ये हुए हैं । स्वामीजीको ही अपना योग्य गुरु समझकर, स्वामी अमृतनाथजी ( उस समयके जसराम जाट ) ने संवत् १९४५ में इनसे संन्यास प्रहण किया था, जिनके अतिरिक्त और २ भी योग्य शिष्य स्वामीजी के हुए, जिनके नाम यहां देना में आवश्यक नहीं समझता हूं । स्वामीजीके गुरु स्वामी मोतीनाथजीके गुरु-भाई स्वामी गणेश- नाथजी ने बिसाऊ में अपना आश्रम बनया था। उनके कोई शिष्य नहीं था, इससे स्वामी चम्पानाथजीको ही वहां (बिसाऊ में) जनके पट्ट पर बैठनेके लिए जाना पड़ा। बिसाऊ में पट्टस्थ होनेके बाद स्वामीजी फतहपुर में नहीं रहे, बिसाऊमें ही रहे। संवत् १९७२ के माघ महीने में इनका देहान्त बिसाऊ में ही हुआ। * महासिंहजी का कुआं-यह कुआं महासिंहजी चौधरीका, नवाब दीनदार खाँ के समय का बनाया हुआ है। संवत् १७५० में यह बना था। + स्वामी गणेशनाथजी-स्वामी चंचलनाथजी के शिष्यों में से एक थे।
स्वामी अमृतनाथजी (संवत् १९०९ से १९७३ तक, तदनुसार सन् १८५२ से १९१६ तक) फतहपुर में- ( संवत् १९५८ से १९७३ तक, तदनुसार सन् १९०१ से १९१६ तक) बऊ गांव * के चेतनजी जाटके सुपुत्र स्वामी अमृतनाथजी हुए। इनका पहलेका नाम 'जसराम' था, पर जब से ये साधु हुए तबसे इनका नाम अमृतनाथ रख दिया गया और इसी नामसे इनकी प्रसिद्धि हुई। स्वामीजीका जन्म, बऊ से बीस कोसकी दूरी पर, पिलानी गांव + में-जहां इनके पिता इनके जन्मके वक्त रह रहे थे--संवत् १६०६ की चैत्र सुदी १ को हुआ। इनके अन्मके | वर्ष बाद इनके पिता पुनः अपने पुराने निवास स्थान बऊ में सपरिकर आ- गये और रहने लगे। अपने पिताकी पांचवीं संतान स्वामीजी थे, तथा और मी ३ संतान इनसे छोटी इनके पिताके थीं सबका विवाह क्रमसे होता -- * बऊ-पिलानी से २० कोसकी दूरी पर एक गांव है। + पिलानीजहपुरवाटी का एक गांव। यही पिलानी प्रसिद्ध बिड़ला- बन्धुओंकी जन्मभूमि है। + स्वामीजी सहित सब ८ भाई-बहिन वे थे। ३ बहिन और ५ भाई थे। ३ बहिन और १ भाई स्वामीजी से बड़े और ३ भाई इनसे छोटे थे।
फतहपुर-परिचय] ( १६८ ) गया। जब स्वामीजीकी बारी आयी तो इन्होंने अनिच्छा दिखला दी और साफ कह दिया कि "मैं तो ब्रह्मचारी रहकर ईश्वर भजन करगा।" इस तरह ये विवाहकी बला से विलग हुए। संवत् १६४५ तक स्वामीजी अविवाहित रहकर घरमें ही रहे, पश्चात् उसी साल इनकी स्नेहमयी माताका देहावसान हो गया, जिसके आधातको ये सहन न कर सके और संसार से विरक्त हो गये। इनको' संसार असार दिखाई देने लगा। फिर क्या था, इन्होंने घर-द्वारसे निकलकर जङ्गलका रास्ता पकड़ लिया। कई दिनोंतक स्वामीजी राजपूतानामें इधर उधर भ्रमण करते रहे। उस समय ये वृक्षोंके पत्र और फूलों पर ही जीवन धारण करते थे। किसी से खानेके लिए कुछ भी नहीं मांगते थे। कोई दे देता तो खा लेते, नहीं तो पत्र-पुष्प ही इनका आहार होता था। भ्रमण करते हुए स्वामीजी रीणी (बीकानेर) पहुंचे, वहां स्वामी मोतीनाथजी अपनी शिष्य-मण्डली सहित रहा करते थे। स्वामी मोतीनाथजीके शिष्यों में से एक स्वामी चम्पानाथजी * थे, उन्हींसे स्वामी अमृतनाथजीने संन्यास-दीक्षा ली। संन्यासी होनेके बाद स्वामीजीको गोस्वामी मुरजनपुरीजी + का साथ हो गया था, उन्हींके साथ ये राजपूतानामें जहां-तहां भ्रमण करते रहे। भ्रमण करते हुए संवत् १६५८ में ये फतहपुर पधारे । . * स्वामी चम्पानाथजी के विषयमें इससे पहले का लेख पदिए। + गोस्वामी मुरजनपुरीजी एक साधु थे .. ( १६६ ) [ पाँचवाँ खण्ड फतहपुरमें घड़वे जोहड़े ( तालाब) * के सामनेके पीपल-वृक्षके गट्टे के पास पृथिवीमें गुफा बनाकर ये रहने लगे; बादमें फतहपुरके उत्तरमें स्थित श्मशान-भूमिमें सेठ जगन्नाथजी सिंघानियाके बनवाये हुए एक तिबारेमें आगये और वहीं रहने लगे। कभी-कभी आसपासके गांवों में भ्रमणार्थ भी ये चले जाया करते थे। संवत् १९६६ में इनका शरीर उदरवृद्धिके कारण बिलकुल बेकार होगया, तबसे ये वहीं उक्त तिबारेके सामने एक बालूके टीले (टीबे ) पर लेट गये और जब तक इनके लिए आश्रम न बना, लेटते रहे। उसी साल फतहपुरके उत्तरमें रामगढ़के रास्तेमें दौलताबादके पास खाकीके टीबेपर इनका आश्रम बन गया, + जिसमें १६६६ की माघ शुक्ला ५ के दिन स्वामीजी लाये गये। इनके भक्तोकी संख्या दिन पर दिन बढ़ने लगी। इनके भक्तोंमें विशेष उल्लेखनीय नाम स्व० रामलालजी फतहचन्दका, स्व० कृष्णदेवजी नेवटिया, स्व० बदरीदासजी खेमका और स्व० डुगरसीदासजी नेवटियाके हैं । उस समय स्वामीजीके दर्शनार्थियोंकी काफी भीड़ आश्रममें लाती रही। रावराजा माधवसिंहजी भी इनकी कीर्ति सुनकर * फतहपुर के दक्षिण में नवाब जलालखों को बीहड़ में यह जोहड़ा स्थित है। + यह आश्रम प्रारम्भ में एक झोंपड़े के रूप में बना, पश्चात् शन: शनैः पक्का बनता गया। संवत् १९७७ में इसका दरवाजा और चहारदीवारी बनी।
फतहपुर-परिचय ] ( १७० ) इनके दर्शनार्थ आश्रममें पधारे थे, उन्होंने एक स्वर्ण मुद्रा स्वामीजी को भेंट की तथा आश्रमके आसपासकी २५ बीघा जमीन आश्रमके अर्पण कर, स्वामीजीके प्रति अपनी भक्ति दिखलायी। उक्त जमीन 'नाथजीकी बनी' कहलाती है। बाहर गांवके रहनेवाले, स्वामीजीके बहुत-से अंधभक्तोंने तो स्वामीजीकी भेंटमें अपने प्यारे पुत्रों तकको चढ़ा दिया, जिनको इन्होंने अपना शिष्य बनाकर आश्रममें रख लिया। यद्यपि स्वामी- जी पढ़े-लिखे नहीं थे, फिर भी इनके उपदेशोंके प्रभावसे अनेक कुमार्गी सुमार्ग-गामी बने। संवत् १९७३ में आश्विन मासकी १५ के दिन ६४ वर्षकी अवस्थामें स्वामीजीने फतहपुर में अपना शरीर छोड़ा। जिस झोपड़ेमें ये रहते थे, उसीमें इनको समाधि दी गयी। बादमें इनकी समाधि पक्की बनादी गयी, जिसमें श्वेत पत्थरके बने हुए चरण- द्वय लगवा दिये गये। आजभी इस समाधि-मंदिरको स्वामीजी के आश्रममें जाकर हम देख सकते हैं। x X x स्वामीजीके शिष्य ज्योतिनाथजीको स्वामीजीके स्वर्गस्थ हो जानेके बाद, इनका उत्तराधिकार मिला। उत्तराधिकार होते समय ठा० चमनसिंहजीने ५१ बीघा उदासरकी अमीन आश्रमको दी, वह जमीन आश्रमके अधीन है।
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फतहपुर-परिचय स्व० सेठ सुखानन्दजी सरावगी सेठ सुखानन्दजी सरावगी ( संवत १९२४ से १९८७ तक, तदनुसार सन् १८६७ से १९३१ तक ) बम्बई और फतहपुरके जन समुदायमें ऐसा कोई आदमी कठिन- तासे मिलेगा जिसने सेठ सुखानन्दजीया नाम न सुना हो। सेठ सुखानन्दजी फतहपुरके अप्रवाल जातीय श्रावक वंशोत्पन्न थे। इनके पिताका नाम गुरुमुखरायजी था, जिनकी सुलक्षिणी गृहदेवी के उदर से सेठजीने इन्दौर में संवत् १६२४ में जन्म धारण किया । सेठजीका बाल्यकाल इन्दौर में ही बीता। इनके पिताकी वहां अफिमक व्यापारकी दूकान थी, इसीसे वे सपरिवार वहां रहा करते थे। सेठजी ने अपने पिताके द्वारा किये जानेवाले व्यापारका, अपनी विशोरावस्थाके समयसे ही, मनोयोगपूर्वक अध्ययन किया, जिसके फलस्वरूप छोटी अवस्था में ही ये उसमें दक्ष हो गये और स्वयम् भी व्यापार करने लगे। सेठजीके वयस्क और व्यापार-कुशल हो जानेपर सेठजीके पिताने अपने व्यापारको विस्तृत करना चाहा। उन्होंने अपनी एक दूकान बम्बईमें खोली और बम्बईको ही अपने व्यापारका प्रधान स्थान बनाया। सेठजी बम्बई भेज दिये गये, जिनकी देखरेख में वहांकी दूकान उचित रीत्या चलती रही। व्यापारमें भी अच्छा लाभ इनके हाथसे हुआ, जिससे कालान्तरमें ये बम्बईके एक असा- धारण व्यापारी गिने जाने लगे।
.......... फतहपुर-परिचय] ( १७२ ) सेठजी जब ३५ वर्षके हुए तब इनके पिताका देहान्त होगया । व्यापारका सारा बोझ इन्हींके कंधों पर आ गिरा, जिसे उचित रोति से इन्होंने सम्भाल लिया और कुशलतापूर्वक व्यापार संचालन करते हुए इन्होंने बम्बईके व्यापारिक क्षेत्रमें अपनी काफी प्रतिष्ठा स्थापित करली। धन और प्रतिष्ठाके साथ-साथ और २ भी कतिपय गुण, जो प्रायः धनियोंमें नहीं हुआ करते हैं, सेठजीमें विद्यमान थे, जिनके कारण वर्तमान में--अपने पार्थिव शरीरकी अविद्यमानता में--भी सेठजी जीवित हैं। करुणा, दया, उदारता, गुणग्राहकता, सहन- शीलता, निरभिमानता, संयम और ब्रह्मचर्य इनके विशेष गुण थे । करुणा और दयाके तो सेठजी अवतार हुए हैं। सुनते हैं बम्बई में हर वर्ष १ तथा १५ लाख रुपये इनकी दूकानसे दलालीके, दलाली- पेशा साधारण स्थितिके लोगोंको देनेमें निकल जाया करते थे। इतनी बड़ी रकमका प्रतिवर्ष दलालीके बहाने, एक बड़े जन समुदायकी आजीविका चलानेके लिए, निकाला जाना कोई साधारण बात नहीं है ; बल्कि एक वृहदाकार कलेजेका काम है। इसी तरहके परहेतुक कार्योंके द्वारा सेठजीका स्थान बम्बईके सराफोंमें सर्वप्रथम होगया था। बम्बई जैसे खर्चीले स्थानसे तंग आकर बहुतसे अभागे धनविहीन जन इनके पास रोते हुए जाया करते और हंसते हुए आते थे। ये गरीबोंके आंसू सहर्ष पूंछ देते और अपना अहोमाग्य इसी में मानते थे।
[पाँचवाँ-खण्ड . सीकर-नरेश रावराजा माधवसिंहजी और कल्याणसिंहजी दोनों के हृदयोंमें सेठजीके लिए बहुत ऊंचा स्थान था, वे इन्हें बड़ी इज्जतकी नजरसे देखते रहे। उनसे भी सेठजीने ऐसे काम लिये, जो इन्हें अमर और इनकी कीर्तिको अनन्तकाल-स्थायी बनाये देते हैं । कार्योका परिचय यहां पाठकोंको करा देना अत्यन्त आवश्यक होगा। रावराजा माधवसिंहजीसे सेठजीने, प्रत्येक मासकी सुदी १४ तथा दशलक्षणी पर्व (जैनियों का एक पर्व, जो भाद्रपद शुक्ला ५ से १४ तक रहता है ) के दिनोंमें फतहपुर, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़ और सीकरमें पशुबध और मांस-बिक्रीके घृणित कार्य न किये जानेकी आज्ञा सदाके लिए जारी करवायी और फतहपुर, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़ के दशहरेकी पशुबलिको भी बन्द करवाया। तत्पश्चात् माघ कृष्णा १३ संवत् १९८२ को, जब रावराजा कल्याणसिंहजी गद्दी पर थे, सेठजीने अगतों * पर सीकर राज्यमें की जानेवाली पशु-हिंसा और मांस-बिक्रीके विरुद्ध राजाज्ञा जारी करवा दी ; सीकरका, दशहरेका पशु-बलिदान रुकवा दिया और नवाब जलालखाँकी छोड़ी हुई शहरके दक्षिण स्थित बीहड़में बिना राज्यकी सनदके शिकार न खेल सकनेका हुक्म जारी करवा दिया। उपयुक्त आज्ञाओंके विरुद्ध आचरण करनेवालेके लिए छ मासकी कड़ी कैदकी सजा और २००) रुपये जुर्माना ठहराया गया। .. * अगतोंके विषयमें, इसी पुस्तक के चौथे खण्डमें "रावराजा कल्याण- सिंहजी बहादुर" शीर्षक निबन्ध के एक फुटनोट में लिखा जा चुका है, उसे पदिए। , फतहपुर-परिचय] ( १७४ ) इन सुधारोंके अतिरिक्त बिसाऊमें होनेवाले दशहरेके वृणित पशुबधका अन्त भी, सेठजीने ही करवाया। एक बार जब बिसाऊ के ठाकुर बम्बई गये, उस समय सेठजीकी धर्मशालामें ही उनका ठहरना हुआ। सेठजीसे बातचीत के सिलसिलेमें उन्होंने यथायोग्य सेवा-कार्य पूछा। सेठजीने बिसाऊके दशहरेको सदाके लिए बन्द कर देनेकी आज्ञा जारी कर देनेकी बात उनसे कही। उन्होंने इनकी बात मानकर दशहरेके पशुबधको बन्द कर दिया। अपनी समाज (जैन समाज ) में भी सेठजीकी पूर्ण प्रतिष्ठा थी। हरएक समाज तथा धर्मसम्बन्धी कामोंमें ये ही अग्रणी हुआ करते थे, और वह काम भी इनकी कार्यकुशलता और तन्मयताके कारण पूरा हो जाता था ; क्यों न होता, जब ये धन, जन और बुद्धि तीनों द्वारा सहायता किया करते थे ! ऊपरकी बातोंसे सेठजीके राज्य-मान्य और समाज-मान्य होने का पता लगता है ; फिर भी अभिमानका इनको स्पर्श तक न हुआ था। ये बड़े ही हंसोड़ प्रकृतिके थे। पासमें बैठनेवालोंसे खूब हँसी-मजाक किया करते और ठहठहाकर हँसा करते थे। कभी- कमी तो ये हँसी देवीकी उपासनामें इतने रत हो जाते कि उसकी तष्ठीनतामें अपने आपको भूल जाते थे। बस यही एक दुगण इनमें बताया जाता है, पर इनके अनेक गुणों के प्रकाशके सामने इनका उक्त दुर्गण अपने ध्वान्तका प्रसार नहीं कर सकता।
( १७५ ) [ पाँचवाँ खण्ड सेठजीका चरित्र अत्यन्त उज्ज्वल था। चरित्रदोषको, ये मान- वताकी एक बड़ी भारी कमी मानते थे। इन्होंने अपने लड़के मोती- लाल * को चरित्र-दोषसे दूषित होनेके कारण ही घरसे निकाल दिया था। संवत् १९६५ में बैसाख सुदी ७ के दिन सेठजीने अपने मृत पिताकी स्मृतिको चिरस्थायी बनानेके लिए फतहपुरमें गुरुमुखराय जैन पाठशाला | की स्थापना की, जो आज तक विद्यमान है। जब संवत् १६६६ में अनावृष्टि अकालके कारण निधनोंको बड़े भारी कष्टका सामना करना पड़ा था, उस समय सेठजीने उनके कष्टों को कम करनेके लिए फतहपुरके बाजारमें बजरेका भाव १६ सेरका बंधवा दिया है और इससे होनेवाली आर्थिक हानि अपने ऊपर लेली। इस कार्य में लगभग २०००० रुपये सेठजीको नुकसानके देने पड़े। * मोतीलाल-सेठ सुखानन्दजी का दत्तक पुत्र था। ३० वर्ष तक निःसन्तान रहने के बाद सेठजी ने इसे दत्तक रूप से ग्रहण किया था। यह अपने समय का शेखावाटी का अद्वितीय शौकीन और अपव्ययी था। गुरुमुखराय जन पाठशाला के सम्बन्ध में इसी पुस्तक के छठे खण्ड में देखिए। * संवत् १९६६ में ५८ तोलोंका सेर फतहपुरमें था, जो संवत् १९८५ तक चलता रहा। यह प्राचीन समयसे चला आ रहा था ।
फतहपुर-परिचय] ( १७६ )
तदनन्तर एक साल दशलक्षणी पर्वके शुभ दिनोंमें वालदे की
२०० गायें किसी मुसलमानके हाथ बेची जाकर बाहर भेजी जाने
वाली थीं, उनको सेठजीने छुड़ा कर १२ महीने तक रक्खा और
उचित रीतिसे उनको
खिलाया-पिलाया।
इस काममें सेठजीके
१५००० रुपये खर्च हुए।
उपयुक्त उपकारोंके अतिरिक्त और २ भी परोपकारके कार्य
सेठजीने किये। बम्बईमें, मंदारगिरि (दक्खिन ) में और ईशरी
स्टेशन पर इन्होंने धर्मशालाओंका निर्माण करवाया,
जिनमें पांच
लाख, पच्चीस
हजार
और बीस हजार रुपये क्रमशः लगे। बम्बईकी
इनकी धर्मशाला बेजोड़ गिनी जाती है। *
बम्बईकी कई सामाजिक और धार्मिक संस्थाए----जिनको सेठजी
मासिक और वार्षिक सहायता दिया करते थ---सेठजी द्वारा प्राप्त
सहायता और प्रोत्साहनको भुला नहीं सकतीं। इन्हीं संस्थाओंने
सेठजीको 'दानवीर' उपाधिसे विभूषित किया था।
* उपर्युक्त धर्मशाला बम्बई के माधवबाग मुहल्ले में है। बड़ी ही
शानदार बनी है। इसमें यात्रियोंके उतरने का अच्छा प्रबन्ध है । एक
यात्री ८ दिन तक, धर्मशाला के मैनेजर से आज्ञा प्राप्त करने के बाद, यहां
टिक सकता है।
दि. जैनियों के लिए रहने का खास इन्तिजाम इसमें है । उनके ठहरने के
लिए पृथक ४ कमरे हमेशा रिजर्वड रहा करते हैं। दरवाजे परका विशाल
कमरा खासकर राजा-महाराजाओं के लिए नियुक्त है, जिसमें प्रायः बम्बई
आनेके समय वे लोग ठहरा करते हैं।
wamixLM.Wailavatam
( १७७ ) [पाँचवाँ खण्ड सेठजी जैसे आदमी दुनियामें बहुत कम हुआ करते हैं ।* खास इन्हींके पिताके, इनके सिवा और कई सन्तान हुई, जिनमें इनकी समता रखनेवाली कोई नहीं थी। ये अपने ढंगके एक ही थे। संवत् १९८७ की फाल्गुण कृष्णा १ को बम्बई में, बिना किसी बीमारी के एकाएक हृदयकी गति बन्द हो जानेसे, सेठजीका देहान्त हुआ। अब इनके रिक्त स्थानका पूर्ण होना असम्भव-सा प्रतीत होता है। मौनी कुशलरामजी ( रावराजा कल्याणसिंहजी के समय में) मौनी कुशलरामजीको फतहपुर तथा उसके आसपासके गांवोंके लोग 'मुनिजी' के नामसे खूब जानते थे। ये जातिके ब्राह्मण थे। इनका जन्म बीकानेर रियासतके किसी गांवमें हुआ। बचपनमें ही इनके पिताका देहान्त होगया था, इससे इनकी माताने ही इनका पालन-पोषण किया। जब ये ७-८ वर्षके हुए तब इनकी माता इन्हें गाय-बकरी चराने तथा खेतकी रखवाली करने भेज दिया करती थीं। इनके बड़े भाई भी इनके साथ जाते, पर ये उनसे अधिक * ईश्वरदासजी पौद्दार (बम्बई ) का व्यक्तित्व कुछ-कुछ सेठ सुखानन्द- जी जैसा था, पर वे असमय ही मृत्युको प्राप्त हो गये, इससे वे कोई ऐसा काम नहीं कर पाये जिसका उल्लेख किया जाय । १२ फतहपुर-परिचय ] ( १८ ) बोलते-चालते नहीं थे ; न मालूम इनको क्या होगया था। ये तो अपनी ही धुनमें मस्त रहते थे। इसी धुनने इनको वैरागी बना दिया। ये घरसे बहिर्गत होकर भजन-स्मरण करनेके लिए तैयार हुए ; परन्तु इनकी माताने इन्हें किसी तरह कह-सुनकर घरमें ही रक्खा और इनकी शादी करदी। शादी होनेके कुछ समय बाद ये एक दिन खेत जानेका बहाना बनाकर घरसे निकल गये और ४ वर्ष तक गायब रहे ; पश्चात् एक दिन स्वमातृ-स्नेहकी याद हो जाने पर, माताके दर्शन करने के लिए ये घर आये ; उस समय माताके अत्यन्त आग्रह करने पर ये घरमें रह गये और गृहस्थ-जीवन बिताने लगे। कुछ समय बाद इनके एक पुत्र पैदा हुआ, जो अपनी माता ( इनकी स्त्री) सहित परलोक-गामी हो गया। इनके वैराग्यकी अग्निको मभकानेमें इस घटनाने ईधनका काम किया। ये घर से निकल पड़े और किसी योग्य गुरुकी खोजमें इधर-उधर घूमने लगे। इनकी भेंट 'बरखण्डीजी' नामके एक साधुसे हुई, जिनको इन्होंने अपना गुरु बनाया। बाद मौनीजी राजपूताने में जहां-तहां घूमते रहे। घूमते हुए ये फतहपुरमें कई बार आया करते और यहीं अपने भक्तोंकी बढ़ी हुई संख्या देखकर अधिक समय तक टिके रहते। मौनीजीके गांववाले * भी मौनीजीके भक्त हो गये थे, वे साधु हो जानेके * जिस गांव में मौनीजी ने जन्मधारण किया था, वहां के बाशिन्दे ।
( १७६ )
पाँचवाँ-खण्ड
इनको भेटमें रुपया-पैसा देने लगे। इन्होंने किसीकी दी हुई भेंटको
अस्वीकार नहीं किया। ये उन रुपयोंको तत्स्थानीय किसी साहू-
कारके पास जमा करवाते रहे, यहांतक कि इनके जमा रुपयोंका
कुलजोड़ ‘साठ हजार' हो गया था। इन्होंने उन रुपयोंको किसी
धार्मिक कार्यमें लगवा दिया होगा, इस सम्बन्धमें ठीक २ पता
नहीं लगा।
मौनीजीका जीवन, वास्तवमें, बत सादा था। ये गृहत्यागी
होनेके बाद से एक कौपीन-मात्र वस्त्र लग्जा निवारणार्थ धारण
करते और अखण्ड ब्रह्मचर्यका पालन करते आरहे थे। इनकी
नासिकाका एक ओरका छिद्र रूई से बन्द रहता था। बोलते ये
कुछ भी नहीं थे। पासमें आने-जानेवालोंके प्रश्नोंके उत्तर पृथिवीपर
अंगुलीसे लिखकर दिया करते थे, जिनको इन्हींके पासमें रहनेवाला
इनका एक ब्रह्मचारी शिष्य * स्पष्ट करता था।
लगभग ३० वर्षतक मौनावलम्बनपूर्वक पवित्र जीवन व्यतीत
करते हुए इन्होंने ७६ वर्षकी अवस्थामें राजगढ़ (बीकानेर ) में
शरीर परित्याग किया। ये फतहपुरमें घड़वे जोहड़ेके पासकी
धर्मशालामें
रहा
करते थे।
* यह ब्रह्मचारी वर्तमान में भी है
बाबू बासुदेवजी गोयनका ( वर्तमान में ) बाबू बासुदेवजी गोयनकाका नाम फतहपुरके वर्तमानके नर-रत्नोंमें विशेष उल्लेख योग्य है। इनका जन्म फतहपुरमें संवत् १६४१ की अश्विन शुक्ला ४ को हुआ। कन्हैयालालजी इनके पिता का नाम था, जिनके इनके सिवा और २ भी संतान थीं, जिनके सम्बन्धमें यहां कुछ भी लिखना अनावश्यक और विषयान्तरकारी १७ वर्षकी अवस्था होने तक गोयनकाजी फतहपुरमें ही रहे, पश्चात् संवत् १६५८ में ये कलकत्ता चले गये और वहां जाकर एक मारवाड़ी फर्म में, जिनके यहां 'वंशीधर भगवानदास' के नामसे व्यापार होता था, नौकरी करली। ये वहां मुनीमकी बतौर नियुक्त किये गये। अपनी योग्यता एवम् कार्यकुशलतासे गोयनकाजीने उक्त फर्मके मालिकोंका मन मोह लिया और उनके कृयाभाजन बन गये। मालिकोंने अपनी फर्मकी एक शाखा 'भगवानदास सूरजमल' नामसे खोली, जिसमें उन्होंने गोयनकाजीको भी पार्टनर (हिस्सेदार ) उस फर्म के मालिक जबतक सम्मिलित रहे तब तक ये उसमें कार्य करते रहे। तदनन्तर अपने बड़े भाई नागरमलजीके साथ ये शेयरमार्केट में काम करने लगे और अब तक वही काम करते आ रहे हैं। बनाया।
बाबू बासुदेवजी गोयनका बाबू बजरंगलालजी लोहिया
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( १८५ ) [पाँचवाँ खण्ड बड़े ही मिलनसार, सरल हृदय, और मिष्टभाषी गोयनकाजी हैं। साथमें सुशिक्षित भी हैं। इनकी सुशिक्षा उपयुक्त गुणों के साथ मिलकर सोनेमें सुगन्धका सा काम करती है । पुस्तकोंका गोयनकाजीको बड़ा प्रेम है, जो आरम्भ से ही है । पुस्तक-प्रेमके कारण इनके पास पुस्तकोंका अच्छा संग्रह हो गया है। अपने इसी संग्रह में से बहुत-सी पुस्तकें प्रदान कर फतहपुरमें संवत् १९६७ की बैसाख शुक्ला ६ को इन्होंने श्री सरस्वती पुस्तकालय * नामक संस्थाकी स्थापना की, जो आज एक अच्छी लाइब्रेरीके रूपमें विद्यमान है। इन्हींकी प्रेरणा से इस लाइब्रेरीका निजी भवन इनके बड़े भाई नागरमलजीकी माता-जिनके वे गोद हैं-ने संवत् १६४२ में बनवाया। उपयुक्त लाइनरीकी व्यवस्था संवत् १९८० तक गोयनकाजीके द्वारा ही होती रही। जब ये कलकत्तामें होते तो इनकी ओर से पुस्तकालयकी व्यवस्था करनेके लिए एक व्यवस्थापक फतहपुरमें नियुक्त रहता और प्रबन्ध करता। इनके व्यवस्थापक पदसे हट जानेके बादसे पुस्तकालयका प्रबन्ध दुःखद-सा बना हुआ चला आता है। कलकत्तामें भी गोयनकाजी कई सार्वजनिक संस्थाओंमें बराबर भाग लेते रहे हैं। ये बड़े उत्साही और अपनी लगनके पक्के हैं। * सरस्वती पुस्तकालय के सम्बन्ध में इसी पुस्तक के छठे खण्ड में पदिए।
फतहपुर-परिचय] ( १८२ ) इसी अपनी सोत्साह लगनके द्वारा इन्होंने फतहपुरमें उक्त पुस्तकालय खोला, जिसके लिए यहांका सुशिक्षित समाज इनका सदा अभारी बना रहेगा। , बाबू बजरङ्गलालजी लोहिया ( वर्तमान में ) बाबू बजरंगलालजी लोहियाका जन्म करीब ५५ वर्ष पहले, रामप्रतापजी लोहियाकी गृहलक्ष्मीके उदरसे फतहपुरमें हुआ। फतहपुरके नर-रत्नों में इनका स्थान महत्त्वका है। ये एक निराले ढङ्गके व्यक्ति हैं। इनके व्यक्तित्वकी अपनी कुछ विशेषता है। त्याग, अनवरत तलीनता, दृढ़ निश्चय और पुस्तक प्रेम आदि २ अनेक गुण इनके व्यक्तित्वके सर्वदाके सहचर हैं, जिनके साहचर्य के बिना इन्हें पल भर भी चैन मिलना असम्भव-सा है। यद्यपि ये उच्च शिक्षा-प्राप्त नहीं हैं, फिर भी एक अच्छे और उच्च शिक्षित व्यक्तिसे इनका अनुभव और विचारों की प्रौढ़ता किसी कदर कम नहीं हैं। इसका एक मात्र कारण इनका प्रगाढ़ पुस्तक- प्रेम है। ये स्वयं कहा करते हैं 'यद्यपि मैं समय-समयपर कई राजा-महाराजा, सेठ-साहूकार, पण्डित और त्यागियों से मिला, तथा उनमें से कुछ के साथ मित्रताके पवित्र पाशमें भी मैं बंध गया, लेकिन ( १८३ ) [पाँचवाँ खण्ड मुझे मेरे जीवनमें पुस्तक जैसा एक भी प्रहर्ष कर अभीष्ट साथी नहीं मिला।' इन्हींके उपर्युक्त शब्दोंसे भली भाँति जाना जा सकता है कि इनमें पुस्तक-प्रेम कितना अधिक है। अपने इसी पुस्तक-प्रेमसे प्रेरित होकर लोहियाजीने श्री सरस्वती पुस्तकालयको जन्म देनेमें बाबू बासुदेवजी गोयनक.का पूर्णरूपेण साथ दिया एवं इसको स्वशक्तिसे अधिक सहायता देकर उन्नत भी आज भी लोहियाजीको खाते-पीते, सोते-बैठते, चलते- फिरते, दिनमें या रात्रिमें इसी पुस्तकालयका ध्यान बना रहता है; इसी पुस्तकालयको परमाभ्युदयके शिखर पर देखनेके स्वप्नमें एकान्त में ये घण्टों ध्यानमग्न-से बैठे रहते हैं और इसीके ध्यानमें ये यत्रतत्र कलकत्ताके बाजारोंमें विचरते हुए पुस्तक-विक्रताओंकी दूकानोंमें जाते-आते देखे जाते हैं। इनकी इस धुनको देखकर कोई भी व्यक्ति यह निःसंकोच कह देगा कि "सरस्वती पुस्तकालयकी उन्नतिके लिए विचरना लोहियाजीके जीवनका मिशन बन चुका है।" फतहपुरको लोहियाजी जैसे व्यक्ति पर गर्व होना चाहिए। बनाया।
बाबू कन्हैयालालजी चितलांगिया ( वर्तमान में) माहेश्वरी जातिके चितलांगिया गोत्रमें बाबू कन्हैयालालजीका जन्म हुआ। इनके पिताका नाम गोपीरामजी था। चितलांगियाजी सुशिक्षित और सुलझे हुए विचारोंके अपने ही ढांचेके एक आदमी हैं। इनकी समानता रखनेवाला इक्का-दुक्का आदमी शेखावाटी प्रांतमें मिल सकेगा, यह कहना कोई अत्युक्ति नहीं है। इनसे मिलनेपर ही इनके निरालेपनका पता लगता हैं। इनके निरालेपनको देखकर तो “तीन लोकसे मथुरा न्यारी' वाली लोकोक्ति स्मरण आजाती है। चितलांगियाजीकी शिक्षा कलकत्तामें हुई। स्कोटिश चर्च कालेजमें ये पढ़ते थे। मैट्रिककी परीक्षा फर्स्ट डिविजनमें इन्होंने पास की। पश्चात् इण्टरमीडियेटमें भी अक्छे नम्बरोंसे पास हुए और अपना अध्ययन आगेके लिए जारी रखा। जब ये थर्ड ईयर में थे तब इनकी परीक्षाके १५ दिन पहले ब्रिटिश गवर्नमेण्टकी ओर से इनपर तथा इनके एक-दो और साथियों पर-क्रांतिकारी होनेके संदेहके कारण-गिरफ्तारीका वारंट जारी किया गया। ये तथा इनके साथी पकड़ लिये गये। इनके साथियोंको गवर्नमेण्ट ने पहलेही छोड़ दिया और ये कैद करलिये- गये। इनको उस समय ३ वर्ष तक कठिन कारावास भोगना पड़ा
( १८५ ) [पाँचवाँ खण्ड
था। तदनन्तर कारावास से छूटनेके बाद भी इनका कई वर्षों तक
बङ्गाल प्रांतमें प्रवेश बन्द रहा।
ये बड़े अध्ययनशील हैं। रात-दिन इनका पढ़ने-लिखनेमें ही
बीतता है। जब देखिए तब ये पुस्तकों और समाचार पत्रों के बीच
में लेटे हुए ही मिलेंगे।
अपनी अनवरत अध्ययनशीलताके कारण ही चितलांगियाजीने
एकबार बङ्गालमें होनेवाली अगरेजी भाषाकी उच्चारण-प्रतियोगिता
में सर्व-प्रथम नम्बर पाया था, जिसे देखकर अच्छे-अच्छे अगरेजीके
पण्डित और ग्रेजुएट भी आश्चर्य-चकित और अवाक् रह
गये थे।
चितलांगियाजीकी प्रत्येक विषयमें थोड़ी बहुत पहुंच अवश्य है ।
खासकर राजनीति, व्यापार और प्राकृत स्वास्थ्य विज्ञानके ये पंडित
हैं। जीवन इनका एक गृहस्थ होने पर भी संतका-सा है। संवत्
१६६४ में एक विश्व-भ्रमणकारी अफरीकन यात्री, जाब राजपूतानामें
भ्रमण करता हुआ आया तब उसका फतहपुर भी आना हुआ ; वह
इनसे मिलकर बड़ा खुश हुआ और कहने लगा कि “मुझे आप जैसे
सज्जन से मिलकर बड़ी खुशी हुई ; मैं नहीं जानता था कि मरुभूमि
में भी इतने श्रेष्ठ विचारोंका कोई व्यक्ति होगा। आपके ऊंचे
विचार और सादी रहन-सहनको दृष्टिगत करके मैं आपको
Plain living & high thinking का मूर्तिमान उदाहरण
मानता हूं।"
-
..
फतहपुर-परिचय]
( १८६ )
यात्रीके कहे हुए उपयुक्त विचारों से चितलांगियाजीके असाधा-
रण व्यक्तित्वका, हमें थोड़ा बहुत आमास मिल जाता है ; पर
समझता हूँ ऐसे व्यक्तित्वको सम्झनेवाले बहुत कम फतहपुरमें
होंगे। हमें ऐसे व्यक्तित्वका सम्मान करना चाहिए।
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: बाबू गङ्गाप्रसादजी भोतीका ( वर्तमान में ) कलकत्ताके मारवाड़ी समाजके गण्यमान्य समाज-सुधारकों में से एक, बाबू गङ्गाप्रसादजी भोतीका भी हैं। इनका जन्म संवत् १६४८ में बदरीदासजी ( मोतीका ) की गृहिणीके उदरसे फतहपुर में हुआ संवत् १६५८ में जब भोतीकाजी केवल १० वर्षके ही थे तब हुकुमीचन्दजी चौधरीने अपने नोहरेमें एक पाठशाला खुलवायी, उस पाठशालामें अयोध्याप्रसादजी शर्मा नामके एक अनुभवी मास्टर अध्यापन-कार्यके लिए रक्खे गये। मोतीकाजी भी उनके पास पठनार्थ आने लगे। भोतीकाजीकी अवस्था यद्यपि छोटी थी, पर बुद्धि अत्यन्त तीव्र थी, जिसके कारण मास्टर अयोध्याप्रसादजी इनकी ओर आकर्षित हुए बिना न रहे। उन्होंने इन्हें होनहार बालक जानकर बड़े प्रेमसे पढ़ाया। पश्चात् वे किसी कारणसे इस्तीफा देकर उक्त पाठशाला से चले गये तब भोतीकाजीने मी पाठशाला छोड़ दी तथा संवत् १६५६ में अपने कुछ साथियोंसे मिलकर आर्यपाठशालाकी स्थापना की, जो करीब १० वर्ष तक चलती रही होगी। संवत् १६६५ में भोतीकाजी कलकत्ता चले गये। वहां जाकर भी इनका अध्ययन जारी रहा। विशुद्धानन्द सरस्वती विद्यालय में इन्होंने अपना नाम लिखवाया और वहीं से मैट्रिक पास करनेके
फतहपुर-परिचय]
( १८८ )
बाद ये कलकत्ताके किसी कालेजमें भरती हो गये। लगातार ६
वर्ष तक अध्ययन करके इन्होंने एम० ए० की डिग्री कालेजसे
प्राप्त की; पश्चात बी० एल० (बेचेलर आफ ला) परीक्षा की तैयारी
में ये लग गये और उसे भी यथासमय पास करली तथा संस्कृतकी
काव्यतीर्थ परीक्षा भी पास की।
मोतीकाजी अङ्गरेजी और संस्कृतके अतिरिक्त हिन्दी, उर्दू
और बङ्गला प्रभृति भाषाएं भी अच्छी तरह जानते हैं।
वर्तमानमें भोतीकाजी कलकत्तामें ही रह रहे हैं। अपने
आजीविकोपार्जनके कार्यके अलावा ये वहां सामाजिक और
राजनैतिक कार्यों में बराबर भाग लेते रहे हैं और आजभी ले
रहे हैं। कलकत्ताके प्रायः सभी समाज-सुधारक इनसे भली प्रकार
परिचित हैं।
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फतहपुर का किला नवाबो बावड़ी
छठा स्वराड
दर्शनीय प्राचीन स्थान,
धर्मायतन और संस्थाएं
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दर्शनीय प्राचीन स्थान
फतहपुरका किला
हिसारके नवाब ताजखाँके सं० १५०३ में देहान्त हो जाने पर,
उनके लड़के फतहखाँ हिसारकी गद्दी पर बैठे। उन्होंने गद्दीस्थ
होनेके बाद कई लड़ाइयाँ अपनी राज्य-वृद्धिके लिए हिसारके आसपास
लड़ी, जिनमें उनको सफलता नहीं मिली। उनका राज्य बढ़नेकी
बजाय घटता ही गया।
ऐसी अवस्थामें नवाब फतहखाँको कब चैन पड़ सकता था।
उन्होंने अपने मुसाहिबों और मित्रोंको एकत्रित करके उनके सत्परा-
मर्शसे अपनी चिन्ताका अन्त करना चाहा। सब लोगोंने नवाबसे
एक नवीन शहर आबाद करनेकी बात कही, जिसे नवाबने बिना
किसी हिचकिचाहटके स्वीकार कर लिया।
फतहपुर-परिचय ( १६० ) नवाब अपने मंत्रिवर्ग सहित राजपूतानामें आये और वहांके रिणाऊ नामके एक छोटेसे गांव ( फतहपुरसे दक्खिन ३ कोसकी दूरी पर है ) में रहकर सं० १५०६ में उन्होंने एक नवीन शहरके लिए नवीन किला बनवाना आरम्भ कर दिया। किला करीब २ वर्ष में बनकर तैयार हुआ होगा ; यही फतहपुरका किला कहलाया। संवत् १५०७ की समाप्तिके कुछ दिन पहले नवाब, दिल्लीका स्वामित्व स्वीकार न करनेके कारण बहलोल लोदी द्वारा हिसारसे निकाले गये । * वे अपने नवीन बनाये जानेवाले किलेमें आगये । उस समय यह किला बन चुका था। नवाबने अपने नामसे 'फतहपुर' नाम देकर किलेके चारों ओर एक शहर आबाद किया। संवत् १५०८ की चैत्र सुदी ५ को नवाबने किले में प्रवेश किया था । यह किला बहुत बड़ा और मजबूत बना हुआ है। आजतक इतना प्राचीन होने पर भी, उसी रूपमें विद्यमान है। किले की दीवार तथा उसके अन्दरके मकान-सिवा कुछ फूट-टूटके पूर्ववत् ही हैं। मरम्मत करवानेसे किला बड़ा शानदार बन सकता है। * संवत् १५०७ में बहलोल लोदी ने अलाउद्दीन सैयद से दिल्ली की बादशाहत छीन ली और स्वयम् बादशाह बन बैठा। उसने दिल्ली के स्वामित्व को स्वीकार न करनेवाले राजाओं और नवाबों पर चढाइयाँ कों। नवाब फतहखां भी दिल्लीका स्वामित्व न माननेवाले शासकोंमें से एक थे। उनकी बारी जब आयी तो उन्हें और उनके चाचा मुहम्मदखाँको हिसार से निकाल दिया गया।
( १६१ ) [छठा खण्ड संवत् १६६२ में नवाब दौलतखाँ (२) ने अपने पिता नवाब अलिफखाँके राज्यकालमें उनसे ही आदेशित होकर इस किलेकी मरम्मत करवायी थी एवम् किलेके चारों ओर खाई भी दिलवायी, जो अबतक बनी हुई है । * किलेमें का 'तेलिनका महल' बहुत प्रसिद्ध है, जो नवाब सरदारखाँ (२ ) द्वारा अपनी विवाहिता तेलिनके लिए बनवाया गया था। संवत् १७८८ से यह किला शेखावत राजपूतोंके अधिकारमें चला आता है। * इस खाई को यहां के लोग 'नहर' कहते हैं। आजकल राज्यकी ओर से कोई प्रबन्ध न रहने से यह खाई लोगोंके टट्टी फिरने के काम आती है। राज्य द्वारा इसका उचित प्रबन्ध किया जाय तो अच्छा है।
नवाबी बावड़ी
फतहपुरकी नवाबी बावड़ी, फतहपुरका एक दर्शनीय प्राचीन स्थान
है। संवत् १६७१ में नवाब अलिफखाँके समयमें उन्हींकी आज्ञासे
उनके लड़के नवाब दौलतखाँ (२) की देखरेखमें नागौरके शेख
महदूदने यह बावड़ी बनवायी थी।
सर्वसाधारणके स्नानादिकी सुविधाको ध्यानमें रखकर ही बावड़ी
का निर्माण कराया गया तथा उसके चारों ओर एक बगीचा मी
लगाया गया,
जो
बड़ा सुन्दर और विस्तृत था। बगीचेमें बालकोंके
पढ़ाये जानेका भी प्रबन्ध था। पेड़ोंकी शाखाओंके नीचे एवम्
सायादार झुरमुटोंमें बैठकर उस समयके बालक मा वीणापाणिकी
उपासना, इस बगीचे आकर किया करते थे। कैसा सुन्दर दृश्य
उस समय इस स्थानका होगा, अकल्पनीय है।
बगीचेके अलावा एक कुआँ भी, जो बावड़ीका कुआँ कहलाता
है और ठीक बावड़ीके ऊपर ही बना है, उसी समय बना। यह कुआँ
अब बावड़ीसे अलग है। *
बावड़ीका मकान बहुत विस्तृत और पेचीदा बना है। इसमें
कोई आदमी छिप जाय तो मुश्किलसे उसका पता लग सकता है।
कहा जाता है कि एक चोर १२ वर्ष तक इस बावड़ीमें छिप कर रहा
था, लेकिन उसका कोई पता नहीं लगा सका था।
* कुए की मरम्मत करवाते समय, मरम्मत करवानेवाले व्यक्ति ने कुएं
को बावड़ी से अलग करवा दिया था।
( १६३ ) [छठा खण्ड कई सुरंगें भी इस बावड़ीमें बतायी जाती हैं, * जिनमेंसे एक सुरंग, फतहपुरके किले में जाती थी, जिसमें होकर नवाबोंकी बेगमें नहाने आती रही होंगी। यह बावड़ी दुनियाके सतरह आश्चर्यों मेंसे एक आश्चर्य के अन्त- गत ली गयी है। चतुर्वेदी द्वारकाप्रसादजी शर्मा द्वारा संग्रहीत "आश्चर्य सप्तदशी" नामकी पुस्तिकामें इसके सम्बन्धमें इस प्रकार लिखा है-"राजपूतानाके अन्तर्गत सीकर राज्य है। उनमें फतहपुर नामका एक गांव है। उस गांवमें भी एक सुरंग है। सुरंग बड़ी लम्बी-चौड़ी है और उसके ऊपर तालाब है। बहुत दिनों तक उस सुरंगको एक डाकूने अपने छिपनेका स्थान बना रखा था। बहुत हूँढ़ने पर भी इसका पता नहीं लग सका था। डाकू रातको उसके बाहर निकलता था और लूटका माल लेकर उसके भीतर छिप रहता था। उस सुरंग में उसके साथी भी रहा करते थे। धीरे २ पुलिसको खबर मिली और वह डाकुओंका गिरोह पकड़ा गया।" बावड़ी जैसे महत्त्वके प्राचीन स्थानका सुरक्षित रक्खा जाना आवश्यक है। ऐसे स्थान जिस राज्यमें होते हैं, उस राज्यको.उनके लिए गौरव अनुभव करना चाहिए । पर यहां तो उलटी लापरवाही उपर्युक्त बावड़ीके लिए है, यह यहां अरक्षितावस्थामें पड़ी हुई है। * वर्तमान में ये सुरंगें बुर गयी हैं। १३
नवाब अलिफखाँका मकबरा
फतहपुरके ७३ शासक नवाब अलिफखाँको संवत् १६८२ में
सम्राट जहाँगीरने कांगड़ेका फौजदार बनाया था। उस समय नवाब
को अधिकतर किलेकी रक्षाके लिए कांगड़ेमें ही रहना पड़ता था।
बीच-बीच में वे कभी थोड़े समयके लिए फतहपुर आजाया करते और
वापिस कांगड़े लौट जाते थे।
संवत् १६८३ में जब नवाब कांगड़े में ही प्रस्तुत थे, उस समय
वहांके पहाड़ियोंने नवाब पर आक्रमण कर दिया। नवाबने उनका
सामना किया। परस्पर भयङ्कर युद्ध छिड़ गया, जो लगातार १०-११
दिन तक होता रहा होगा। अन्तमें नवाब उसमें मारे गये। उनका
शव सन्दूकमें सिया जाकर फतहपुर लाया गया।
नवाबोंके कब्रिस्तान फतहपुरमें पूर्वकी ओर थे, वहीं नवाब अलि-
फखाँका शव भी लाया जाकर दफनाया गया। उनकी कब्र पर उनके
लड़के नवाब दौलतखाँ (२) ने उसी साल एक सुन्दर मकबरा
तैयार करवा दिया, जो आजतक विद्यमान है ।
नवाब अलिफखाँका यह स्मारक (मकबरा) आज अरक्षितावस्था
में पड़ा हुआ है।
* यह कन एक ही पत्थर की बनी हुई है।
नवाब अलिफखाँ का मकबरा दिगम्बर जैन मंदिर
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धर्मायतन दिगम्बर जैन मन्दिर जब फतहपुर संवत् १५०८ में नवाब फतहखाँ द्वारा आबाद किया गया, उस समय नवाबके प्रधान मुसाहिब सेठ तुहिनमल्लजी * भी नवाबके साथ सकुटुम्ब हिसारसे आये थे। उनके साथ दिगम्बर जैन आम्नायकी २ प्रतिमाएं थीं । । एक प्रतिमा चौबीस महाराजकी १५४६॥ इंची, सप्त धातु निर्मित मूलसंघी आचार्य पद्मनन्दिदेव द्वारा संवत् १०६६ की माघ सुदी ११ को प्रतिष्ठित और दूसरी जैनियोंके अष्टम तीर्थकर चन्द्रप्रभुदेवकी ६x४।। इंची, काले पाषाण की बैसाख सुदी ६ संवत् १११३ को प्रतिष्ठित थीं। ईश्वरीदासजी भोजक इन प्रतिमाओंको साथ लेकर आये थे। इन्हीं प्रतिमाओंको लेकर दिगम्बर जैन मन्दिरका शिलान्यास, सेठजीने फाल्गुण सुदी * सेठ तुहिनमलजी के विषय में इस पुस्तक के पांचवे खण्ड में पदिए। | सेठ तुहिनमल्लजी दिगम्बर जैन आम्नाय के अनुयायी थे ; इसीसे दि. जैन भाम्नाय को प्रतिमाएं उनके साथ थीं, जो ऊपर के दि. जैन मंदिर में अब तक हैं। ..
फतहपुर-परिचय] ( १६६ ) २ संवत् १५०८ को मट्टारक श्री जिनचन्द्रदेव * के उपदेशसे किया। मन्दिर तैयार हो जाने पर उक्त प्रतिमाएं सोत्सव मन्दिरमें लायी गयीं और उनकी स्थापना वहां करदी गयी। संवत् १७७० में चौधरी रूपचन्दजी • ने दिल्ली पट्टके अधीश भट्टारक श्री देवेन्द्रकीर्तिकी आज्ञासे उक्त मन्दिरका जीर्णोद्धार करवाया। पश्चात् संवत् १८६१ में भट्टारक श्री ललितकीर्ति : फतहपुर पधारे । उस समय जैन-अजैन सभीने उनका उचित सम्मान किया था। जैनियोंका मन्दिर उस समय पृथिवीमें गड़ गया था। भट्टारकजीने उन्हें ( जैनियोंको ) जैन मन्दिरका जीर्णोद्धार करवाने भट्टारक श्री जिनचन्द्रदेव, दिल्ली पट्ट के भट्टारक थे, जो भट्टारक श्री शुभचन्द्रजी के बाद पट्टाधीश हुए। इनके पट्ट का महात्मा महावीर से ८६ वां नम्बर पड़ता था। ये बड़े विद्वान् थे। दो ग्रन्थ इनके बनाये हुए मिलते हैं, जिनके नाम धर्मसंग्रह श्रावकाचार ( मागधी ) और लघु सिद्धान्तसार हैं। एक ताम्रका बना हुआ अष्टांग सम्यग्दर्शन का यंत्र, इन्हीं के हाथ का मंदिर में है, जो संवत् १५४३ में मगसिर बदी १३ का बना हुआ है। ये भट्टारक संवत् १५०७ से १५७१ तक दिल्ली पट्ट पर रहे। न चौधरी रूपचन्दजी-सेठ तुहिनमलजी की आठवीं पीढ़ी में चौधरी सखमलजी के लड़के हुए। + भट्टारक श्री ललितकीर्तिका परिचय इस पुस्तक के पांचवें खण्ड में पढ़िए।
( १६७ ) [छठा खण्ड की बात, अपने उपदेशमें कही। जैनियोंने उनके उपदेशसे प्रभावित होकर जैनमन्दिरकी मरम्मत करवा दी और उसीके ऊपर एक नया जैनमन्दिर भी निर्माण करवा दिया। ये दोनों मन्दिर अबतक बने हुए हैं। ऊपरका मन्दिर बन जानेसे नीचेके मन्दिरकी सभी प्रतिमाएं उसमें लाकर स्थापित करदी गयीं और वहीं उनका पूजनाराधन होने लगा। नीचेका मन्दिर बन्द कर दिया गया । ऊपरका यह मन्दिर नीचेके मन्दिरसे दुगुना है। पहले यह छोटा ही था, पर बादमें और जगह इसमें सम्मिलित करके इसको बड़ा बना दिया गया। यह मन्दिर संगमरमरका बना हुआ है ; देखने में बड़ा ही सुन्दर है। मन्दिरके अन्दर सुवर्णका काम भी है, जो बहुत ही आकर्षक है। मन्दिरका सभा-मण्डपका तिबारा, मन्दिर देखनेवालोंके लिए, अवश्य दर्शनीय है। बड़ा सुन्दर यह बना है। इसमें का सुवर्णका काम तथा सुवर्ण पर की गयी, कुशल राज-चित्रकारों की चित्रकारी प्रशंसाके योग्य हैं। सुवर्णाक्षरों में लिखित चमकते हुए पीले-पीले श्लोक तो बहुत ही सुन्दर मालूम होते हैं। यह मन्दिर अवश्य दर्शनीय है। X X x बहुत प्राचीन होनेसे उपयुक्त जैन मन्दिरमें एक-दो शिलालेखोंके अलावा बहुतसे प्राचीन साम्रपत्र और यन्त्रलेख हैं, जिनसे इतिहास - ............ फतहपुर-परिचय ] ( १६८ ) और पुरातत्वके अन्वेषणमें अच्छी मदद मिलती है। मैंने स्वयम् "फतहपुर-परिचय" के लिखनेमें इस मन्दिरके ताम्रपत्रों और शिलालेखोंसे सहायता ली है। मन्दिरमें जैन दर्शन-सम्बन्धी सा- हित्यके प्राचीन-हस्तलिखित और नवीन छपे हुए प्रन्थ भी पर्याप्त हैं। लदमीनाथ-मन्दिर अलबरके किसी पठानको हल जोतते समय संवत् १५२६ में एक गड़ी हुई मूर्ति दिखाई दी। उसने उस मूर्तिको निकाल कर अपने पास रख लिया। यही मूर्ति संवत् १५८८ में गौरीदत्तजी भोजक * द्वारा फतहपुर लायी गयी और लक्ष्मीनाथकी मूर्तिके नामसे प्रसिद्ध करदी गयी। मूर्ति लायी जानेके बाद उसी साल ( संवत् १५८८ में) मन्दिर बननेकी तैयारी होने लगी। फतहपुरके झूरियों न ने मन्दिरके लिए अपनी खरीदी हुई जमीन देदी और पत्थर तत्सामयिक नवाब नाहर- खाँ द्वारा दिये गये। मजदूरोंकी मजदूरीके लिए पंचायती करके चिट्ठा कर लिया गया। चिट्ठ में सबसे ऊंची कलम ॥ दो पैसेकी * गौरीदत्तजी भोजक-ईश्वरीदासजी भोजक की चौथी पीढ़ी में हुए। + यूरिया- अग्रवाल बनियों की एक जाति ।
फतहपुर-परिचय
AMRPrat
ISM
hwar
-दर
लक्ष्मीनाथ-मंदिर
रामगोपालजी की छतरी
.
( १६४ ) [छठा खण्ड लिखी गयी थी, जो तत्सामयिक किसी चौधरी ( अग्रवाल) सेठने लिखी थी ।* चिट्ठा हो जाने एवम् भवन-निर्माणके लिए आवश्यक तमाम सामग्री जुट जाने पर मन्दिर बनाया गया। उस समय मन्दिर छोटा ही बना था, पर बादमें संवत् १८०८ में इसको विस्तृत और विशाल बना दिया गया। यह मन्दिर सफेद संगमरमरका बना हुआ, फतहपुरके बड़े बाजार के बीचमें बड़ा शानदार है । देखने योग्य है । मन्दिरमें सुवर्णका काम भी हुआ है। शहरके लोग ( वैष्णव ) दूर-दूरसे इस मन्दिरमें प्रति- दिन दर्शन करने आते हैं। इसी मन्दिरमें प्रविष्ट होनेका अधिकार पानेके लिए सतरहवीं शताब्दिमें कविवर सन्त भीखजनजीने सत्याग्रह किया था। SarshAampuras- * यह समय सम्राट हुमायूँ के राजत्व का था। पैसे की कमी और अनाज की अधिक उपज के कारण उस समय अनाज का भाव बड़ा सस्ता था । एक रुपये का दो मन ( एक मन सवा तेरह सेर पका ) अनाज आता था ; इसी से उस समय मजदूरों की ऊंची से ऊंची मजदूरी सिर्फ । एक दैनिक थी। भीखजनजी के सत्याग्रह के विषय में इसी पुस्तक के पांचवें खण्ड में "कविवर संत भीखजनजी" शीर्षक निबन्ध के अन्तर्गत पढ़िए । पैसा पीरजीकी दरगाह ख्वाजा हाजी नजमुद्दीन चिश्ती ( पीरजी ) * का देहान्त संवत् १६२७ में रावराजा माधवसिंहजीके समयमें झुंझुनू में हुआ। उनका शव फतहपुर लाया जाकर दफनाया गया, जिस पर उसी साल एक सुन्दर मकबरा उनके उत्तराधिकारी पीर हाजी मुहम्मद नासिरुद्दीनने बनवा दिया तथा उस मकबरेके चारों ओर एक विशाल दरगाह भी बना दी, जो आजतक फतहपुरके दक्खिन की ओर नवाब जलालखाँ द्वारा छोड़ी गयी बीहड़में स्थित है। * ख्वाजा हाजी नजमुद्दीन चिश्ती, संवत् १८७४ में झुंझुनू में जन्मे । उनके गुरुका नाम ख्वाजा सुलेमान था। संवत् १८९० में वे फतहपुर आये और नवाब जलालखाँ की छोड़ी हुई बीहड़ में-जहां आजकल उनकी दरगाह बनी हुई है-रहे। जब संवत् १९२७ में ख्वाजा साहब झंझुनू गये हुए थे, वहीं उनका देहान्त हो गया। उनका शव फतहपुर लाया गया और वहीं, उनको उक्त बीहड़ में दफनाने के बाद, उन पर मकबरा तदनन्तर दरगाह बनी। ख्वाजा साहब के बाद दरगाह में पीरोंकी एक गद्दी के बतौर हो गयी इस गद्दी पर अब संवत् १९८५ से पीर गुलाम सरवर बिराज रहे हैं, जो बड़े सज्जन, मिलनसार और शिक्षित हैं। मुझे, इस इतिहास के लिए बहुत-से नोटसू देकर, इन्होंने सहायता पहुंचायी है, जिसके लिए मैं इनका आभार मानता हूं।
( २०१ ) [छठा खण्ड यह दरगाह बहुत सुन्दर एवम् विस्तृताकार बनी हुई है। देखने में एक आलीशान गढ़ ( किले ) से कुछ कम शानदार नहीं है । राव- राजा माधवसिंहजीने इस दरगाहके बनानेके लिए जमीन दी थी; साथमें एक प्राचीन नवाबी जमानेका बना हुआ कुआँ * तथा उसकी बाड़ीके लिए ११ बीघा जमीन भी दी। प्रतिवर्ष इस दरगाहमें उर्स का बड़ा भारी मेला लगता है, उस समय जगह-जगहके लोग ( मुसलमान ) जियारत (तीर्थ-यात्रा) करने यहां आया करते हैं। उन दिनों गायन-वाद्य-विशारदा का एक अच्छा जमघट यहां हो जाता है, जो संगीतज्ञोंक लिए एक अच्छा सुयोग है। रावराजा माधवसिंहजीने इस दरगाहके लिए ह१ बीघा जमीन गांग्यासरकी अर्पण की थी, जो दरगाहके अधीन है। * यह कुआं पीर हाजी मुहम्मद नासिरुद्दीन ने चंदा करके मरम्मत करवाया।
रामगोपालजी गनेडीवालाकी छतरी श्री० रामगोपालजी गनेडीवाला * ने संवत् १६४३ में अपने पिता हीरालालजीके मरने पर एक सुन्दर संगमरमरकी छतरीका निर्माण, शहरके दक्षिणकी ओर पासही, नवाब जलालखाँकी बीहड़में करवाया। यह छतरी बदरीनारायण + के अर्पण की गयी, इससे बदरीनारायणका मन्दिर इसमें बनवा दिया गया, जो बहुत ही आकर्षक बना है। इस मन्दिरमें सुवर्णका काम देखने योग्य है। संवत् १६४३ में कार्तिक सुदी १ को इस छतरीके बनानेका काम प्रारम्भ हुआ था, जो कई वर्षों में समाप्त हुआ होगा ; क्योंकि इतनी सुन्दर और कीमती इमारतका थोड़े समयमें बनाया जाना असम्भव-सा है। यह छतरी करीब २ लाख रुपयेकी लागतसे बनी है। इसका सफेद संगमरमरका बड़ा सुन्दर मकान बना हुआ है, जो दर्शनीय है। मकानके चारों ओर खूब लम्बे-चौड़े दायरेमें एक बगीचा लगा है, जो चहारदीवारीसे घिरा हुआ है। इस बगीचेके चार दरवाजे हैं। दो दरवाजे पूर्वकी ओर हैं तथा एक पश्चिम और एक उत्तर की ओर हैं। पूर्वकी ओरका ऊंचा दरवाजा, जिसमें दो बगलियाँ भी बनी हुई हैं, इस बगीचेका मुख्य द्वार है। इस दरवाजे पर * गनेडीवाला-अग्रवालों की एक जाति । + बदरीनारायण-पौराणिक हिन्दुओंका एक देवता ।
( २०३ ) [छठा खण्ड हर महीने नौबत बजती रहती है। एक घड़ी भी इमी दरवाजेमें लगी है, जिसका समय शहर भर में प्रामाणिक माना जाता है। इसी घड़ीके समयको देखकर प्रतिघंटे घड़ियाल बजायी जाती है, जो सारे शहर में सुनायी देती है। शहरके लोग जिनके पास घड़ी नहीं हैं—आसानीसे समयका ज्ञान, घड़ियालकी आवाज सुनकर कर लेते हैं। समय-सूचक यह घड़ियालकी ध्वनि, उन्हें अपने पास की घड़ीकी कभी नहीं अनुभव होने देती। इस बगीचेका प्रबन्ध एक मुनीम करता है, जो छतरीका मुनीम कहलाता है। छतरीकी सम्पत्तिका एक ट्रस्ट बना हुआ है, जो संवत् १९६३ में बना था। प्रतिवर्ष बदरीनारायणके भोग, उत्सव और नौकरादिकोंकी तनख्वाहके ५६००) पांच हजार छ सौ रुपये यहां खर्च होते हैं। रावराजा माधवसिंहजीने भी इस छतरीके निमित्त संवत् १९५८ में ५०० बीघा बाढ़ प्रदान किया था, जो छतरीके अधीन है।
संस्थाएं सरस्वती पुस्तकालय 8 बाबू बासुदेवजी गोयनका • ने अपने वृहत् पुस्तक-भण्डारसे संवत् १६६७ में फतहपुर में एक पब्लिक लाइनरीकी स्थापना की और सरस्वती पुस्तकालय उसका नाम रक्खा । यह पुस्तकालय आज उन्नत दशाको प्राप्त होकर सर्वसाधारणकी सेवा करता हुआ अवस्थित - संवत् १६६१में गोयनकाजीके विचार-गर्भमें, किसी मासिक पत्र के एक लेखको-जो पुस्तकालयोंकी आवश्यकताके सम्बन्धमें था- पढ़कर उपयुक्त पब्लिक लाइब्रेरीकी स्थापनाकी बात आयी। उन्होंने शीघ्रही कतिपय शिक्षा-प्रेमी सज्जनों से इस सम्बन्धमें परामर्श किया, लेकिन उनको सफलता न मिली। उनका विचार- . * उपयुक्त "सरस्वती पुस्तकालय” के अलावा ३ और पुस्तकालय, "दि. जैन वीर पुस्तकालय", "साहित्य-सदन पुस्तकालय"और "आजाद-भवन पुस्तकालय" नामों से फतहपुर में हालही में खुले हैं। •. बाबू बासुदेवजी गोयनका के सम्बन्ध में इस पुस्तक के पांचवें खण्डमें देखिए।
फतहपुर-परिचय
LA
सरस्वती पुस्तकालय
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- ( २०५ ) [छठा खण्ड गर्भ इस तरह शिक्षा-प्रेमियोंकी सहमतिके बिना परिपक्व न होने पाया, जिससे वे उस समय कोई फल-प्रसव भी नहीं कर सके। गोयनकाजीके उत्साहमें कोई कमी न हुई। वे पुस्तकालयकी आवश्यकताको कब भूल सकते थे ? उन्होंने तत्सम्बन्धी अपनी चेष्टा जारी रक्खी और अपने विचार-गर्भको पुष्ट होनेका अवसर प्रदान किया। स्वयम वे सरस्वती. पुस्तकालयकी अपनी बनायी हुई एकादशवर्षीय रिपोर्ट में अपने पुस्तकालय स्थापनके उत्माहके सम्बन्धमें ''पुस्तकालयकी कल्पना'' शीर्षकके अन्तर्गत लिखते हैं कि “मैंने अपने विचार कई सज्जनोंके सामने रखकर उनका सहयोग चाहा, किन्तु किसी ओर से कुछभी उत्तेजना तथा उत्साह न मिला और न इस विचारको कार्य रूपमें परिणत करनेका शुभ अवमर ही हाथ आया। पर मुझे पूर्ण विश्वास था कि जो कार्य परोपकार की दृष्टिसे सच्चे दिलसे उठाया जाता है उसमें कभी न कभी सफलता अवश्य मिलती है। अस्तु, मैं भग्नोत्साह नहीं हुआ रिपोर्ट के उपयुक्त उद्धरणसे गोयनकाजीके उत्साहका अनुमान लगाया जा सकता है। गोयनकाजी, अपनी लगनके पक्के और उत्साही सज्जन हैं ; यह बात उनकी जीवनीसे भी, जो इसी पुस्तक के पाँचवें खण्डमें लिखी गयी है, साफ प्रगट होती है। सरस्वती पुस्तकालयकी स्थापनाके कुछ समय पहले, फतहपुरमें संस्थापित राजपूताना अनाथालय और लक्ष्मीनाथ विद्यालय + की * राजपूताना अनाथालय और लक्ष्मीनाथ विद्यालय के सम्बन्ध में इसी खण्ड में आगे पढ़ने को मिलेगा।
फतहपुर-परिचय ] ( २०६ ) मम्मिलित प्रबन्धकारिणी समिति ( कलकत्ता ) के सदस्य गोयनका- जी भी चुने गये। सदस्य चुने जानेसे उन्हें श्री० कृष्णदयालजी जालानसे घनिष्टता स्थापित करनेका एक अच्छा अवसर मिल गया। एक दिन बातचीतके सिलसिलेमें उन्होंने फतहपुरमें पुस्तकालयकी आवश्यकताके विषयमें जालानजीसे कहा। जालानजीने उनकी बातका हृदयसे समर्थन किया। फिर क्या था गोयनकाजीका उत्साह दुगुना हो गया। गोयनकाजीके पास पुस्तकालय-स्था- पनार्थ बहुतसी पुस्तकें संग्रह थीं, उनके अलावा और २ पुस्तकें भी उन्होंने संग्रह की। पश्चात् वे कुछ समय बाद फतहपुर आये और अपनी पुस्तकें जालानजीके यहां छोड़ आये । फतहपुर आकर गोयनकाजी ने पुस्तकालय खोलनेके सम्बन्धमें कई सज्जनोंसे सलाह की, जिन्होंने उन्हें इस काममें सहायता देनेका वचन दिया। खासकर श्री० श्रीनिवासजी सरावगी से जो एक सम्पन्न व्यक्ति थे-पुस्तकालय स्थापन के लिए हर प्रकार की महायताका आश्वासन मिला। जिसपर गोयनकाजी ने जालानजी को अपनी संग्रहीत पुस्तकें भेज देनेकी बात, कलकत्ता लिख भेजी। कलकत्तासे जालानजीकी खरीदी हुई कुछ और पुस्तकोंके माथ उक्त संग्रहीत पुस्तकं फतहपुर आ गयीं। पुस्तकें आ जानेपर संवत् १६६७ की बैसाख शुक्ला ६ को गोयनकाजी ने फतहपुरमें सरस्वती पुस्तकालयको जन्म दिया । श्री० पूर्णमल्लजी सिंघानियाकी दूकान पर का चौवारा पुस्तकालयके
( २०७ )
[छठा खण्ड
.
लिए किरायेपर लिखाया गया और एक ब्राह्मणको वैतनिक पुस्तका-
ध्यक्ष नियुक्त किया गया।
यह पुस्तकालय करीब एक साल तक उपर्युक्त स्थानमें रहा
होगा, पश्चात् लक्ष्मीनाथके मन्दिरकी एक दूकानमें यह लाया
गया, जहां इसकी कुछ उन्नति भी हुई। पुस्तकाध्यक्ष भी एक दूसरे
सुयोग्य व्यक्ति बनाये गये। उन्हीं दिनों पहले-पहल पुस्तकालयके
८-१० सदस्य बने और पुस्तकों की संख्या वृद्धि हुई। पुस्तकालय
के व्यवस्थापक गोयनकाजीकी ओर से नियुक्त, उस समय
फतहपुरस्थ व्यवस्थापक पं० रामनरेशजी त्रिपाठी * रहे हैं. जिन्होंने
पुस्तकालयको उन्नत बनानेमें बड़ी मदद पहुंचायी थी।
दिन पर दिन पुस्तकालय उन्नति करता गया। पुस्तकोंका
संग्रह बढ़ता गया। इससे एक सुविस्तृत स्थान की आवश्यकता
पुस्तकालयके लिए प्रतीत हुई ; तब पुस्तकालय, लक्ष्मीनाथके मन्दिर
के नये विभागके ऊपरवाले हालमें लाया गया, जहां कार्तिक शुक्ला ४
संवत् १६६३ तक यह अवस्थित
कार्तिक सुदी ५ के रोज यह पुस्तकालय अपने नव-निर्मित
..
रहा।
* पं. रामनरेशजी त्रिपाठी लक्ष्मीनाथ विद्यालय के तत्कालीन एक
अध्यापक । वर्तमान में इनकी गिनती हिन्दी के सुकवियों में है। ये अब
सुलतानपुर ( पू० पी० ) में रहते हैं।
फतहपुर-परिचय] ( २०८ ) स्वकीय विशाल भवनमें लाया गया, * जहां यह समुचित रूप- से जनताको लाभान्वित करता हुआ शोभायमान है। इस पुस्तकालयमें अबतक करीब १३००० तेरह सहस्र पुस्तकों का संग्रह हो चुका है। अगरेजी, हिन्दी, संस्कृत और उर्दू सभी माषाओंकी पुस्तकें इसमें हैं : अधिकांश पुस्तकें हिन्दी और संस्कृत की हैं। अप्राप्य पुस्तकेंभी पर्याप्त हैं, जिन्हें बाबू बजरङ्गलालजी लोहियाने अपने सतत् परिश्रमसे समय-समय पर एकत्रित करके पुस्तकालयकी सम्पत्ति-वृद्धि की है। इन अप्राप्य पुस्तकोंको देखकर इस पुस्तकालयको कोई रत्नागार कह दें तो अत्युक्ति नहीं हो सकती। यह पुस्तकालय स्कालरोंके लिए रेफोन्स-लाइब्रेरीका काम दे सकता है। * यह विशाल भवन फतहपुरके किले के पास किले की खाई के किनारे बना हुआ है। श्री. नागरमल्लजी गोयनका की माताने इसे करीब १८०००) रुपये लगाकर तैयार करवाया। इसके लिए सीकर-राज्यने स्वल्प मूल्य लेकर जमीन प्रदान की तथा अपनी २ दुकानों को जमीन श्री० मटरूमलजी खेमका ने दी। संवत् १९९२ में यह भवन, श्री. भीमराजजी दूगड़ की देखरेख में, बनकर तैयार हुआ, जिसमें संवत् १९९३ की उपर्युक्त शुभ तिथि के दिन पुस्तकालय लाया गया। बड़ा ही सुन्दर, दर्शनीय भवन यह बना है।
( २०६ ) [छठा खण्ड अपने जन्मके समयसे संवत् १९८० तक गोयनकाजीके व्यव- स्थापकत्वमें यह पुस्तकालय अपना कार्य सुचारु रूपसे करता रहा। अपनी अनुपस्थितिमें वे (गोयनकाजी ) फतहपुरस्थ किसी व्यक्ति को अपनी ओर से इसकी व्यवस्थाके लिए नियुक्त कर देते, जो इसका प्रबन्ध करता रहता। उनके व्यवस्थापक पदसे पृथक हो जानेके समयसे शेखावाटी शिक्षा-मण्डलके हाथमें इसका प्रबन्ध-कार्य गया, जो ठीक २ रहा। इसके बादसे अबतकका इसका प्रबन्ध, जन साधारण-विशेषकर शिक्षितवर्ग-की दृष्टिसे उत्तम नहीं कहा जासकता ; अतः वर्तमान प्रबन्धमें सुधार वांछनीय है , क्योंकि समुचित प्रबन्ध ही किसी संस्थाको समुन्नत और सार्थक बनानेमें समर्थ हो सकता है। पुस्तकालयकी वर्तमान नियमावली भी सम्यक नहीं है। पुस्तकालयकी उपयोगिता बढ़ानेकी दृष्टिसे ऐसी नियमावलीका निर्माण होना आवश्यक है, जिससे गरीब और अमीर दोनों ही पुस्तकालय से समानरूप से लाभ उठा सकें और दोनों ही पुस्तकालयके कार्यों में सहयोग देकर इसकी अभिवृद्धि कर सके ; तब यह पुस्तकालय बहुत अधिक उन्नति कर सकता है। इस पुस्तकालयके साथ वाचनालय भी है, जिसमें हिन्दी और अगरेजीके खास २ समी पत्र-पत्रिकाएं आती हैं। करीब ६५ पत्र (दैनिक, साप्ताहिक और मासिक) इस समय आते हैं। जन- साधारणमें इस समय पुस्तकालय के प्रति रुचि दिन पर दिन बढ़ती जाती है। दैनिक उपस्थिति इस समय १०० के करीब होती है। १४ .
फतहपुर-परिचय] ( २१० ) यह पुस्तकालय वत्त मानमें पं० वसंतकुमारजी शर्मा * की अध्यक्षता में अच्छी प्रकार चल रहा है। इसे वर्तमान समुन्नत स्थितिमें पहुंचाने का श्रेय गोयनकाजी और लोहियाजी के अतिरिक्त पं० रामनरेशजी त्रिपाठी, श्री० केशवदेवजी नेवटिया, श्री राम- कुमारजी नेवटिया, श्री० मटरूमलजी खेमका, डा. रामजीवनजी त्रिपाठी, श्री० देवीदत्तजी धाभाई, श्री. भीमराजजी दूगड़ को भी प्राप्त है। फतहपुरकी सुशिक्षित जनता इनके इस महत कार्य के लिए इनकी चिर ऋणी रहेगी। आशा है, भविष्यमें फतहपुरके ही नहीं बल्कि सारे शेखावाटीके लोग, इस सुन्दर पुस्तकालयको हर प्रकार से सहायता प्रदान करते हुए इसके कार्य-संचालनमें हाथ बंटाते रहेंगे। * पं० वसन्तकुमारजी शर्मा, करीब २० वर्षसे योग्यतापूर्वक इस पुस्त- कालयमें पुस्तकाध्यक्षका काम कर रहे हैं ; बड़े सज्जन और कार्य-पटु हैं । इनका कार्य पूर्ण संतोषप्रद है। • बाबू बजरंगलालजी लोहिया, फतहपुरके रहनेवाले एक पुस्तकालय- प्रेमी सज्जन हैं ; वर्तमानमें कलकत्तामें रह रहे हैं। इनके द्वारा आजतक उक्त सरस्वती पुस्तकालयको समय-समय पर अच्छी सहायता प्राप्त होती आरही है, जिससे यह वर्तमान उन्नत अवस्था प्राप्त कर सका है। इनके सम्बन्धकी पूरी जानकारीके लिए इसी पुस्तकके पांचवें खण्डमें पढ़िए ।
लक्ष्मीनाथ विद्यालय लक्ष्मीनाथ विद्यालयकी स्थापना, फतहपुरके पंच-महाजनोंने शुभ मिती पौष कृष्णा १२ संवत् १९६४ को की। प्रारम्भमें यह विद्यालय रामकृष्णदासजी सरावगीकी धर्मशालामें खोला गया, जहां करीब २ वर्ष तक यह रहा होगा। पश्चात फतहपुरके बड़े बाजारके समीप पब्लिकके चन्देसे बना हुआ शफाखानेका मकान, संवत् १९६६ में रावराजा माधवसिंहजी द्वारा इसके लिए दे दिया गया। मकानकी प्राप्तिके अनन्तर उक्त विद्यालय, मकानमें लाया गया ; जहां अबतक यह जनतामें शिक्षा प्रचार करता हुआ मौजूद है। यह विद्यालय फतहपुरमें उस समय खोला गया था, जब यहां शिक्षाका अभाव-सा ही था। इससे पहले आर्यपाठशाला, हुकुमीचंदजी चौधरीकी पाठशाला और मास्टर श्यामलालजीकी प्राइवेट पाठशाला आदि २ कतिपय शिक्षण-संस्थाए खुली और थोड़े-थोड़े समय तक रहकर बंद हो गयीं। इन पाठशालाओंसे पहले यहां कोई पाठशाला न थी, सिर्फ गुरुओंकी चटशालाएं थीं, जिनमें यहांके नौनिहाल बच्चोंकी शिक्षा, पट्टी-पहाड़ा और मारवाड़ी अक्षरों की जानकारी तक ही सीमित रहती थी। लक्ष्मीनाथ विद्यालयके खुल जानसे यह सीमा टूट गयी और शिक्षाकमका विकास हुआ। प्रारम्भमें इस विद्यालयमें संस्कृत शास्त्री और अगरेजी मिडिल तक की पढ़ाईका प्रबन्ध हुआ, जो क्रमशः संवत् १९७३ और १९७५ फतहपुर-परिचय] ( २१२ ) तक रहा। तत्पश्चात् कई वर्षों तक ६ कक्षा तक पढ़ाई होती रही, वह भी धनामावके कारणसे बादमें ५ वीं कक्षा तक करदी गयी। संवत् १९६० में विद्यालयकी प्रबन्धकारिणी समिति ने फिर ६ क्लास तक की पढ़ाईका इन्तिजाम किया, जो आज तक चला आता है। विद्यालयका प्रबन्ध, कलकत्ता स्थित, विद्यालयकी प्रबन्धकारिणी समितिकी ओर से नियुक्त स्थानीय व्यवस्थापककी देखरेखमें, विद्यालयके प्रधानाध्यापक द्वारा किया जाता है । इस विद्यालयमें २ पुस्तकालय हैं ; एक पुस्तकालय अध्यापकों के लिए और दूसरा छात्रोंके लिए है। जिनमें ५६४ और ५५२ पुस्तकें क्रमशः हैं। जयपुर शिक्षा विभागके पाठ्यक्रमके अनुसार ६ कक्षाकी पढ़ाईके अलावा गोरखपुरकी रामायणादिकी परीक्षाओंकी तैयारी भी इस विद्यालयमें करवायी जाती है और हरसाल यहांके लड़के इन परीक्षाओं में बैठते भी हैं। लड़कोंके लिए खेलका भी प्रबन्ध है। इस विद्यालयका संचालन इसके स्थायी कोष ( २५००० रुपये) के व्याज तथा ऊपरकी (विवाह-शादी एवम् लागकी) प्रतिवर्षकी आमदनीसे होता रहता है। संवत् १९८८ से, सीकर-रियासतसे भी ३०) रुपया मासिक, सहायता-स्वरूप इस विद्यालयको प्राप्त हो रहे हैं। वर्तमानमें यह विद्यालय मास्टर रुद्रदत्तनी शर्माके प्रधानाध्याप- कत्वमें अच्छी तरह चल रहा है।
जैन स्कूल" . गुरुमुखराय जैन स्कूल सेठ गुरुमुखरायजीके स्वर्गस्थ हो जानेके बाद उनके सुपुत्र सेठ सुखानन्दजीने उनकी यादगारीमें एक पाठशाला बनवायी, जिसका मकान शहर ( फतहपुर ) के बीचमें बावड़ी दरवाजेके समीप ही उसके उत्तर-पश्चिममें स्थित कायस्थोंके कुएं के पास बना हुआ है। संवत् १६६५ की बैसाख सुदी ७ के रोज इस पाठशालाकी स्थापना हुई थी। यही पाठशाला "गुरुमुखराय " के नाम से प्रसिद्ध है। पाठशालाके स्थापित हो जानेके बाद, इसके परिचालनके लिए एक अलग स्थायी सम्पत्ति, सेठ सुखानन्दजी ने निकालनी चाही ; उन्होंने इस सम्बन्धमें अपनी मा तथा छोटे भाई ( निहालचन्दजी) से परामर्श किया। तत् पश्चात् एक मकान बम्बईमें पाठशालाके निमित्त निकाल दिया गया, जिसका एक दूस्ट बना दिया गया। इसी मकानके किराये की आमदनीसे पाठशाला अबतक सुचारु रूपसे चलती आरही है। इस पाठशालामें जयपुर शिक्षा विभागके पाठ्यक्रमके अनुसार ६ कक्षा तककी पढ़ाई होती है। जैनियोंके लड़कोंके लिए जैनधर्म पढ़ानेकी विशेष व्यस्था है। मास्टर लक्ष्मीचन्दजी गुप्त इसके प्रधानाध्यापक हैं, जिनकी अध्यापन-कार्य-कुशलता और देखरेख में पाठशाला अच्छी तरह चल रही है। - नेवटिया कन्या पाठशाला नेवटिया कन्या पाठशालाकी स्थापना फतहपुरमें संवत् १९७२ में हुई। इससे पहले बालिकाओं की शिक्षाका कोई साधन यहां नहीं था। क्यों होता ! जब बालिकाओंका पढ़ाना-लिखाना यहां पाप में शुमार होता था। पश्चात् समयके परिवर्तनके साथ २ स्थानीय लोगोंके मनमें भी आशातीत परिवर्तन हुआ, जिसके फलस्वरूप यहांके नेवटियोंने उपयुक्त पाठशालाकी स्थापना की। इस पाठशालामें लड़कियों को पढ़ना-लिखना एवम् कपड़े बुनना सिखाया जाता है। यहां से पढ़कर निकली हुई लड़कियाँ साधारणतया साक्षर और व्यवहार-कुशल हो जाती हैं वर्तमानमें इस पाठशालाका संचालन, दो-तीन व्यक्तियोंसे प्राप्त सहायता द्वारा होता है, नेवटिया-परिवार द्वारा नहीं। प्रबन्ध, इसका असंतोषप्रद है। इस प्रकार धन और व्यवस्थाके अभावमें यह संस्था अपना अस्तित्व अधिक समय तक नहीं रख सकेगी। नेवटिया-परिवारको इस ओर ध्यान देना चाहिए तथा इस संस्थाको अनन्त काल-स्थायी बनानेका कोई उपाय ढूंढ निकालना चाहिए। * उपर्युक्त नेवटिया कन्या-पाठशालाके अलावा एक कन्या-पाठशाला अभी कुछ दिन पहले बोहितरामजी केडियाकी ओर से और खोली गयी है।
विद्यालय शेखावाटी संस्कृत शेखावाटीमें, संस्कृत शिक्षाके प्रचारार्थ-राय बहादुर रामप्रताप- जी चमड़ियाने फतहपुरमें मार्गशीर्ष कृष्णा १० संवत् १६७६ को, "शेखावाटी संस्कृत विद्यालय"की स्थापना की थी। प्रारम्भमें इसको महाविद्यालय ( कालेज ) का रूप दिया गया, उस समय संस्कृतके नामी नामी पण्डित यहां पढ़ाते रहे हैं, जिनके नामोल्लेखकी, मैं समझता हूँ, यहां कोई आवश्यकता नहीं है। महाविद्यालयके रूपमें करीब १२-१३ वर्ष तक यह रहा होगा। पश्चात् इसका खर्च घटाया गया और महाविद्यालयसे विद्यालय बना दिया गया, तबसे यह उसी रूपमें चलता आरहा है। जब यह महाविद्यालय था, इसमें गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज (बनारस ) की प्रथमा और मध्यमाके परीक्षा केन्द्र भी करीब १० वर्ष तक रह चुके हैं । लेकिन अब नहीं हैं। वर्तमानमें प्रथमा, मध्यमा और शास्त्री कक्षाके छात्र इस विद्या- लयमें शिक्षा पारहे हैं। प्रबन्ध, गोरखराम रामप्रताप टूस्ट (कलकत्ता) के आधीन फतहपुरस्थ प्रबन्धकारिणी कमेटी द्वारा होता है।
फतहपुर-परिचय] ( २१६ ) पं० नागेन्द्रजी शास्त्री* पिछले दिनों इसके प्रधानाध्यक्ष (प्रिंसीपल ) रहे हैं, जो बड़ी योग्यतापूर्वक अध्यापन-कार्य करते हुए इसे उन्नत * पं० नागेन्द्रजी शास्त्रीके विषयमें यहां कुछ विस्तारसे लिखना आवश्यक हो जाता है। ये शेखावाटी संस्कृत विद्यालयके प्रिंसीपल दो बार रह चुके हैं और दरभंगा जिले के रहनेवाले मैथिल ब्राह्मण हैं। इनके पिताका नाम पं० योगधरजी मिश्र था, जो काशीमें अपने समयके एक सुप्रतिष्ठित विद्वान् गिने जाते रहे हैं। उन्हींको सुलक्षिणी गृहलक्ष्मोके उदरसे पं० नागेन्द्रजीका जन्म संवत् १९४९ में हुआ था। पं० नागेन्द्रजी जब ७ वर्षके ही हो पाये थे तो इनके पिताने इनको अमरकोषके शब्दों पर ही अक्षर ज्ञान कराया। अक्षर ज्ञान हो जानेके उपरांत उन्होंने इनको अमरकोषके तीनों खण्ड अच्छी तरहसे याद करवा दिये। पंडितजी तीव्र बुद्धि तो थे ही, इससे एक वर्षके अल्पकालमें ही इन्होंने सम्पूर्ण अमरकोष समाप्त कर डाली। तदनन्तर इनका व्याकरणका अध्ययन प्रारम्भ १६ वर्षको अवस्था प्राप्त होने तक वह भी पूरा होगया । व्याकरण खत्म हो जाने के बाद पण्डितजीको, उनके पिताने महाराजा दरभंगाके "रामेश्वरलता संस्कृत विद्यालय में पठनार्थ भेजा। पंडितजीने वहां से साहित्य, व्याकरण, सांख्य, न्याय और धर्मशास्त्रकी मध्यमा परीक्षा अच्छे नम्बरों में पास की। तदनन्तर "गवर्नमेण्ट संस्कृत कालेज," मुजफ्फरपुरमें ये भेजे गये, जहांसे अनेक वर्षों के कठिन परिश्रमके बाद इन्होंने ससम्मान साहित्य-व्याकरणाचार्यको उपाधि प्राप्त की। साहित्याचार्यमें ये यूनिवर्सिटी भरमें (संवत् १९६४ में) सर्वप्रथम हुए, जिससे इनको उस समय गवर्नमेण्टसे १००) रुपया पुरस्कार-स्वरूप भी प्राप्त हुआ था। हुआ।
( २१७ ) [छठा खण्ड बना सके। आजकल भी इसका कार्य संतोषप्रद ढङ्गसे चल मुजफ्फरपुरसे पण्डितजी अपना अध्ययन समाप्त करके काशी आगये, जहां विविध दर्शनोंका अध्ययन इन्होंने कई विद्वानोंसे किया। काशीके तत्सा- मयिक प्रसिद्ध विद्वान् पण्डित तात्या शास्त्रीसे भी ये वहां पढ़े । संवत् १९६८ में "बेली संस्कृत पाठशाला, रायबरेली में पण्डितजी प्रधानाध्यापकके पदपर नियुक्त किये गये। तत्पश्चात् धौलपुर-राज्यके संस्कृत विद्यालय, स्याद्वाद विद्यालय ( काशी) प्रभृति कई स्थानों पर इन्होंने योग्यता के साथ अध्यापन कार्य किया। बादमें ये उक्त "शेखावाटी संस्कृत विद्यालय", फतहपुरमें प्रिंसीपल होकर आये। निरन्तर ६ वर्षके अध्यापन कार्यके बाद ये यहांसे-वेतन कम किये जानेकी वजहसे इस्तीफा देकर चले गये। पुनः संवत् १९९४ में ये उक्त विद्यालयको प्रबन्धकारिणी कमेटी द्वारा विद्यालयमें काम करनेके लिए फतहपुर बुलाये गये और कुछ वर्ष काम करनेके बाद पुनः वेतनकी कमोके कारण इस्तीफा देकर विद्यालयसे अलग हुए। पंडितजी बड़े ही योग्य, मिलनसार, मिष्टभाषी और अत्यन्त सरल प्रकृतिस्थ हैं। इनको जितनी प्रशंसा की जाय थोड़ी है। इतने बड़े विद्वान् होने पर भी इनका अभिमानसे तो, मालूम होता है, परिचय भी न होने पाया है, यह कम आश्चर्यको बात नहीं है। जब कि "रामचरित मानस" जैसे विश्वमान्य ग्रन्थमें भी "प्रभुता पाइ काहि मद नाही" कहा है।
चमड़िया हाई स्कूल ® "शेखावाटी संस्कृत विद्यालय के संस्थापक उपयक्त राय बहादुर चमड़ियाजीने ही "चमडिया स्कूल" की स्थापना संवत् १६८५में की। उन्होंने इसे मिडिल स्कूलके रूप में खोला, जिसमें पिछले दिनोंतक जयपुर शिक्षा विभागके पाठ्यक्रमके अनुसार मिडिल ( ८ कक्षा) तक की पढ़ाई होती रही है, अब श्रावण कृष्णा ७ संवत् १९६८ से यह हाई स्कूल बन गया है। . इसके अलावा यहां गोरखपुरकी गीता-रामायणादिकी परीक्षाओंके लिए भी लड़के प्रतिवर्ष तैयार किये जाते हैं। स्कूलके गरीब छात्रों को मदद पहुंचानेके लिए एक पुअर फण्ड ( Poor fund ) स्थापित है, जिससे अबतक कुछ छात्रोंको छात्र- वृत्तिके रूपमें आर्थिक सहायता दी जा चुकी है। उपर्युक्त गोरखराम रामप्रताप ट्रस्ट ( कलकत्ता ) के अधीन फतहपुर की प्रबन्धकारिणी कमेटीकी देखरेख में, यह स्कूल भी सुचारु रूपसे चलता आरहा है। * उपर्युक्त चमड़िया हाई स्कूल तथा अन्यान्य स्कूलोके अतिरिक्त एक और स्कूल "ठिकाना मिडिल स्कूल" के नामसे अभी कुछ दिन पहले, सीकर ठिकाने की तरफसे खोला गया है। • हाई स्कूलके लिए गोरखराम रामप्रताप ट्रस्ट (कलकत्ता) की इजाजत से स्थानीय प्रबन्धकारिणी कमेटीने एक विशाल भवन बनवा दिया है, जो चमड़ियाजीकी ही कोठीके सामने है। इस भवनमें लाइब्रेरी रूम बहुत सुन्दर है। समूची गीताके श्लोक संगमरमरके पत्थरों पर लिखे हुए रूमकी दीवारों पर सुशोभित हैं और रूमको आकर्षक बनाते हैं। केवल इस रूमके बनवाने में लगभग २५०००) रुपये व्यय हुए बताये जाते हैं।
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चमड़िया हाई स्कूल
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इस्लामिया मदर्सा हाजी वजीर धोबीने सन् १३३७ हिजरी ( संवत् १९७७ ) में "इस्लामिया मदर्सा" का मकान बनवाना प्रारम्भ किया था, जिसके तैयार हो जाने पर एक मुसलमान अध्यापक बुलाया गया और मदर्सा खोल दिया गया। कुछ समय पश्चात् समयके परिवर्तनके माथ, हाजीजीकी आर्थिक स्थितिने भी पलटा खाया, वह पहले जैसी न रही ; इस कारण हाजीजीकी ओर से मदर्सेका खर्चा पहलेसे कम कर दिया गया। उस समयसे अबतक १५) पन्द्रह रुपये माहवारका केवल एक अध्यापक इस मदर्सेमें अध्यापन-कार्य कर रहा है। शिक्षा, व्यावहारिक हिसाब और मजहबी किताबों की दी जाती है। इसके अतिरिक्त हिन्दी, उर्दू और अरबी भाषाएं भी पढ़ाई जाती हैं। उर्दू में चौथी कक्षा तककी पढ़ाई यहां होती है और अरबीमें कुरान- शरीफ * पूरा करा दिया जाता है। इस समय इस मदर्सके संचालनके लिए सीकर-राज्यसे ५) पांच रुपये मासिक सहायता स्वरूप प्राप्त होते हैं, बाकी रुपये हाजीजी अपने पाससे खर्च करते हुए इस मदर्सेका किसी तरह संचालन कर रहे हैं। * कुरान शरीफ-मुसलमानों का प्रसिद्ध और मान्य धार्मिक प्रन्थ ।
श्रीकृष्ण पाठशाला "श्रीकृष्ण पाठशाला' फतहपुरमें दक्षिणकी ओर शहरसे बाहर सालासरके रास्तेमें विद्यमान है। इसकी स्थापना चैत्र शुक्ला ११ संवत् १९८६ को हरिजनोंको साक्षर बनानेके प्रयोजनसे श्री० भीम- राजजी दूगड़ने की थी। सीकर राज्यने इसके लिए कच्चे पट्ट की एक जमीन दी, जिसपर कुछ परोपकारी सज्जनों द्वारा पाठशालाका एक कच्चा मकान बनवा दिया गया। पाठशाला वर्तमानमें इसी मकानमें स्थित है। इस पाठशालामें माली, जाट, खाती, खटीक, नायक, मोची, चमार और मुसलमान छात्र शिक्षा पा रहे हैं। पढ़ाई “लोअर- प्राइमरी'' तक की होती है। थोड़ा २ व्यावहारिक ज्ञान भी लड़कों को करा दिया जाता है। इस पाठशालाका संचालन पंचायतीके चन्दे से होता है। वर्तमानमें मास्टर रावतसिंहजीके प्रधानाध्यापकत्वमें यह सुचारु रूपसे चल रही है। . * उपर्युक्त "श्रीकृष्ण पाठशाला तथा अन्यान्य पाठशालाओंके अलावा खातियोंकी एक पाठशाला "जांगिड़ ब्राह्मण पाठशाला" के नामसे, अभी हाल ही में, फतहपुरके दौलताबाद मुहल्लेमें और खोली गयी है।
राजपूताना अनाथालय "राजपूताना-अनाथालय की स्थापना श्री० कृष्णदयालजी जालान के उद्योग से संवत् १९६३ की माघ कृष्णा ३ के रोज हुई। प्रारम्भ में यह शीतला देवीके मन्दिर * में खुला। हरचन्दरायजी चोटिया इसके मैनेजर पद पर नियुक्त किये गये, जिनकी देखरेखमें इस संस्थाने पर्याप्त उन्नति की। चोटियाजीके चले जानेके पश्चात् ठा० गौरीशङ्करसिंहजी इसके मैनेजर होकर आये, जो कुछ ही दिन यहां रहे होंगे, उसके बादसे पं० लालचन्दजी शर्मा के व्यवस्था- में संस्था उत्तरोत्तर उन्नति करती आरही है। अनाथालय को वर्तमान उन्नतावस्थाका अधिकतर श्रेय इन्हीं को है। अनाथालयका मकान शहरसे बाहर पश्चिमकी ओर विद्यमान है। मकानके लिए उनमल्लजी हजारीमल्लजी लोहिया से १००४५० हाथ जमीन प्राप्त हुई थी, इस पर कुछ उदार सज्जनों द्वारा मकान तैयार करवा दिया गया, जिसमें अनाथालय स्थित है। यह मकान पकत्व * शीतलादेवीका मन्दिर-उगणिया दरवाजासे पूर्वकी ओर समीप ही स्थित है। पं० लालचन्दजी शर्मा-राजपूताना अनाथालयके वर्तमान व्यवस्थापक हैं। ये इसीके निकले हुए सुयोग्य एवं सुपठित व्यक्ति हैं। लगभग १३ वर्षसे ये इस संस्थाको उन्नत बनानेके लिए प्राण-प्रणसे प्रयत्नशील है।
- . ने फतहपुर-परिचय] ( २२२ ) अनाथालयके छात्रों द्वारा लगायी गयी सामनेकी सुन्दर बाटिकाके साथ बहुत ही मनोमुग्धकारी प्रतीत होता है । अनाथालयके इस मकानसे लगती ही १००४२५ हाथ एक और जमीन, हजारोमजी लोहियाकी धर्मपत्नी ने अनाथालयको, अभी थोड़े समय पूर्व ही प्रदान की है, जिसपर शिल्पशालाके लिए श्रीमती १२०० रुपये व्यय करके एक मकान निर्माण करवा दिया है। शिल्पशाला में अनाथालयके छात्र विविध शिल्पोंकी शिक्षा प्राप्त करते हैं, जिनमें-- टेलरिंग, वीविंग, इम्ब्राइडरी और गान-वाद्य मुख्य विषय हैं। अनाथालयके छात्रोंको व्यावहारिक ज्ञान तथा लिखने पढ़नेकी शिक्षा भी दी जाती है, जिसके लिए वे अनाथालयके बाहर-बाजार के समीप स्थित लक्ष्मीनाथ विद्यालय * में भेजे जाते हैं। छात्रों की ज्ञान-वृद्धि के लिए अनाथालयके अन्दर छात्र-सभा और एक छोटा-सा पुस्तकालय भी हैं। छात्र-सभाका अधिवेशन हर रविवार को मैनेजरके निरीक्षणमें होता है तथा पुस्तकालय इसीसे सम्बद्ध है, जिसमें विविध विषयोंकी करीब १००० पुस्तकें हैं। अनाथालयका प्रबन्ध, कलकत्ता-स्थित प्रबन्धकारिणी द्वारा नियुक्त फतहपुरस्थ व्यवस्थापकके अधीन है, जिनकी देखरेख में इसका संचालन होता है। * लक्ष्मीनाथ विद्यालयके सम्बन्धमें पुस्तकके इसी खण्डमें पीछे देखिए।
( २२३ ) [छठा खण्ड ८०) इस समय अनाथालयका स्थायी कोष करीब २५०००) रुपयेका है, जिसके व्याजकी आमदनी १०० रुपये प्रतिमास है। ऊपरकी आमदनी (विवाह तथा लाग की ) २५) रुपये मासिक है। इनके अतिरिक्त रुपये मासिक सीकर-राज्यसे प्राप्त होते हैं। इसका मासिक व्यय करीब ४५०) रुपये हैं, जो इसकी आमदनीको देखते हुए, बहुत अधिक है। अनाथालयके अन्तर्गत पूर्वोक्त शिल्पशालाके लिए पृथक् कोष- संग्रह किया जा रहा है, जिसके लिए फिलहाल राधाकृष्णजी चमड़िया से १५००० रुपये और श्रीमती कृष्णादेवीजी सिंघानिया से ११००) रुपये प्राप्त हुए हैं। इस अनाथालय से कई सुयोग्य छात्र निकलकर गार्हस्थ्य जीवन में प्रवेश कर चुके हैं, जिनमें पं० रुद्रदत्तजी शर्मा, पं० हनुमत्प्रमाइजी और पं० लालचन्दजीके नाम उल्लेखनीय हैं। वर्तमानमें ४१ छात्र इस संस्थामें हैं।
शिवनारायण जैन आयुर्वेदिक औषधालय ® शिवनारायण कन्हैयालाल फर्म (कलकत्ता) के मालिकोंने अपनी जन्मभूमि फतहपुर में संवत् १६७८ में एक धर्मार्थ आयुर्वेदिक औषधालयकी स्थापना की। इस औषधालयका नाम 'शिवनारायण जैन आयुर्वेदिक औषधालय" रहा। पं० बैजनाथजी त्रिवेदी लक्ष्मणगढ़-निवासी वैद्य होकर आये, जिन्होंने औषधालयकी अच्छी उन्नति की। औषधि प्राप्त करनेके लिए आनेवाले रोगियोंकी संख्या, यद्यपि प्रारम्भमें बहुत कम थी ; पर बादमें धीरे-धीरे त्रिवेदी- जीके मिष्ट भाषण और कार्यपटुता से वह अत्यधिक हो गयी। लगभग १० वर्ष तक त्रिवेदीजी ने औषधालयमें कार्य किया। पश्चात् और-और वैध आपके स्थान पर आये, लेकिन उनमें से कोई अधिक समय तक इस जगह पर न टिक सका ; सम्भव है, इसी कारणसे औषधालयको उन्नत बनानेके लिए वे कोई खास कार्य, जिसका उल्लेख किया जाय, न कर सके हों। संवत् १६६३ पं० कन्हैयालालजी आयुर्वेदाचार्य (लब्ध प्रतिष्ठ स्वामी लक्ष्मीरामजी के शिष्य ) इसी स्थान पर कार्य करने लगे, जो अब तक बड़ी योग्यतापूर्वक औषधालयका कार्य संचालन करते आ रहे हैं । % B * उपर्युक्त शिवनारायण जैन आयुर्वेदिक औषधालयके अतिरिक्त गोस्वामी, चमड़िया, केडिया और बाबूनाके औषधालय भी फतहपुरमें हैं ।
( २२५ ) [छठा खण्ड यह औषधालय शहरके मध्यमें मुरारकोंके कुएँ के पास एक प्राचीन-सी जगहमें स्थित है। इसके मकान के लिए, सुनते हैं, एक जमीन इसी कुएँ के निकट खरीदी जा चुकी है, जिसपर किसी भी समय इसके लिए मकान तैयार करवाया जा सकता है। यह औषधालय, दिनमें २ बार-प्रातःकाल और सायंकाल- खुलता है, तब रोगियोंको यथोचित औषधियाँ वितरण की जाती हैं। काष्ठादिक चूर्ण, गुटिका और क्वाथादिके अतिरिक्त घृत, तैल, अवलेह, आसव, अरिष्ट, रस एवं धातु-औषधियाँ भी दी जाती हैं। शहरके समीपके बाहर गाँवोंके लोग भी प्रायः औषधियाँ ले जाया करते हैं, जिनको दूरीके हिसाबसे कई दिनों तककी औषधियाँ दे दी जाती हैं। इस तरह यह औषधालय जनताका हित-साधन करता हुआ सुचारु रूपसे चल रहा है। ---- . ज्वालाप्रसाद भरतिया हस्पताल 8 ज्वालाप्रसादजी भरतिया द्वारा संवत् १६६४ की पौष कृष्णा ३० को, यह हस्पताल स्थापित किया गया। सुनने में आया है कि भरतियाजी ने १२ लाख रुपये औषधि-दानके लिए अपनी सम्पत्ति में से पृथक् किये, जिनमें से करीब २ लाख रुपये तो हस्पतालके भवन-निर्माण कार्यमें लग गये और शेष १० लाख रुपये कोषमें स्थित हैं, जिनके व्याजसे इस हस्पतालका संचालन होता रहता है। हस्पतालका भवन, फतहपुरके दौलताबाद मुहल्ले के कुछ दक्षिणमें, पास ही-जहाँ पहले हड़खम्भा था—बना हुआ है । भवनका निर्माण, कलकत्ताके प्रसिद्ध "विशुद्धानन्द मारवाड़ी हस्पताल" के नकशेके अधार पर हुआ है। हस्पतालमें ऐलोपैथिक चिकित्सा-प्रणाली से रोगियोंकी चिकित्सा की जाती है । चिकित्साके लिए २ डाक्टर और १ लेडी डाक्टर हैं। एक आयुर्वेदिक विभाग भी इसके अधीनमें है, जिसमें आयुर्वेदका * उपर्युक्त ज्वालाप्रसाद भरतिया हस्पतालके अतिरिक्त "ईश्वरदास पौद्दार डिस्पेन्सरी" और "फतहपुर हस्पताल" २ और ऐलोपैथिक चिकित्सा- लय यहाँ हैं, जिनमेंसे दूसरा सरकारी हस्पताल है और हाल ही में खुला है । • दौलताबादके सम्बन्धमें इसी पुस्तकके तीसरे खण्डमें "नवाब दौलतखो" (१) शीर्षक निबन्धमें पढ़िए ।
( २२७ )
[छठा खण्ड
एक विशेषज्ञ वैद्य चिकित्सार्थ रहता है। हस्पतालका सारा मासिक
व्यय करीब
२५०००
रुपये बताया जाता है।
हस्पतालमें रोगियोंके रहनेके लिए वार्ड बने हुए हैं, जिनमें सब
८० रोगी रह सकते हैं। प्रतिवर्ष हजारों रोगी इस हस्पतालसे
फायदा उठाते हैं।
-
पिंजरापोल गङ्गारामजी देवड़ाके सुपुत्रोंने संवत् १९३७में, प्रारम्भमें पिंजरा- पोल स्थापित की थी, जो कुछ ही वर्ष चलकर बन्द होगयी, जिसका मकान अभी तक फतहपुरमें स्थित है। तत्पश्चात् संवत् १९६६ में अकाल-पीड़ित गौओंके सहायतार्थ फतहपुर और कलकत्तामें चन्दा एकत्रित किया गया ।* उसी समय गौओंके कष्ट निवारणार्थ एक सुव्यवस्थित संस्थाकी अवस्थितिकी आवश्यकता प्रतीत हुई, जिसके फलस्वरूप इस पिंजरापोलकी स्थापना की गयी, जो आज तक सुचारु रूपसे चलती हुई विद्यमान है। इस पिंजरापोलका स्थान, फतहपुरके पूर्व में चाँदके टीजे न. C. be Dusamme * फतहपुर और कलकत्तामें किये गये उपर्युक्त चन्देमें क्रमशः १२०००) और ३६.००) रुपये एकत्रित हुए। इन एकत्रित रुपयोंसे गौओंके लिए फतहपुरके चारों तरफ ग्वार और पूलोंका प्रबन्ध किया गया, जिसमें करीब ३६०००) रुपये खर्च हुए होंगे। शेष रुपये पिंजरापोलके कोषमें दे दिये गये। • चाँदका टोबा-फतहपुरका स्वनामख्यात बालुका-निर्मित टोबा है। यह टोबा फतहपुरके पूर्वमें, जहाँ आजकल पिंजरापोलका स्थान है, विद्यमान मह पहले बहुत ऊंचा था; लेकिन अब उतना ऊंचा नहीं रहा । - ( २२६ ) [छठा खण्ड के पास, बना हुआ है। स्थानके लिए २००४२०० हाथ जमीन, सीकर-नरेश रावराजा श्री० माधवसिंहजी ने प्रदान की थी, जिसपर मनसारामजी रामदयालजी नेवटियाने २१०००) रुपये व्यय करके स्थान बनवा दिया और पासका, गौओंके पानी पीने के लिए, बना हुआ कुआँ, उनमल्लजी हजारीमल्लजी लोहिया द्वारा बनवाया गया । इस पिंजरापोलकी एक शाखा लाछासर (बीकानेर ) में खोली गयी, जहाँ पिंजरापोल की ही गौएँ रक्खी जाती हैं। पिंजरापोलका संचालन, कलकत्ता-स्थित प्रबन्धकारिणी-द्वारा नियुक्त स्थानीय व्यवस्थापकके प्रबन्धसे होता रहता है । पिंजरापोलकी सम्पत्तिका एक ट्रस्ट बना हुआ है। मूलधन करीब १ लाख रुपये का है। प्रतिवर्षका व्यय २००००) रुपयेके - इसके नामके सम्बन्धमें बहुत-सी किंवदन्तियां सुनने में आती हैं। जिनमें से २ यहाँ भी लिखी जा रही हैं। (१) फतहपुर तथा इसके पासके बाहर गांवोंके लड़के प्रायः इस टोबे पर जाकर "चांदमारी" नामका खेल खेला करते थे, जिससे इसका नाम “चाँदका टीबा" पड़ गया। (२) टौवा, अधिक ऊँचा होनेके कारण चाँदसे स्पर्श करता प्रतीत होता था, इसीसे इसे 'चांदका टोबा" कहने लगे फतहपुर-परिचय] ( २३० ) लगभग है, जो व्याज तथा ऊपरकी (लाग की)* आमदनी से किसी प्रकार चलता रहता है। पिंजरापोलकी आमदनीके लिए फतहपुर और कलकत्तामें कुछ लागे लगायी गयीं, जो निम्नाङ्कित है फतहपुरकी लाग- १ घृत पर, ॥2) प्रति मन । २ ब्रह्मपूरी (एकपांतकी) पर, २१) रुपये। ३ ब्रह्मपूरी (तीन पाँतकी) पर, १०१) रुपये। ४ चेजे पर, ॥) सैकड़ा। ५ दूकानदारोंके यहाँ पिंजरापोलका डिब्बा रक्खा गया। कलकत्ताको लाग- १ फतहपुर-सालेकी ब्रह्मपूरी पर, ५१) रुपये। २ सिर्फ फतहपुरको ब्रह्मपूरी पर, १५) रुपये । ३ लड़केके विवाह पर, २) रुपये। ४ खुले निमन्त्रण पर, ५ दक्षिणा । ५ फतहपुर-निवासी गद्दीवालोंके यहाँ पिंजरापोलका डिब्बा रक्खा गया।
कबूतरखाना
कबूतरखानेका मकान आजसे करीब ३५ वर्ष पहले पब्लिकके
चन्देसे बनाया गया था। प्रारम्भमें इसमें ६ मन मोठ * प्रतिदिन
कबूतरोंके लिए पड़ते रहे, अब २॥ मन पड़ते हैं। अनाजके लिए
रकम चन्देसे इकट्ठी की जाती है । धर्मप्राण जनताको उदारताके बलसे
यह कबूतरखाना आज तक सुचारु रूपसे चलता आरहा है और
आशा है, भविष्यमें भी इसी प्रकार चलता रहेगा।
* मोठ-राजपूतानाकी भूमिमें पैदा होनेवाला एक प्रकारका अनाज ।
जाग्रत जन मण्डल फतहपुरके उत्साही नवयुवकोंने सन् १९४० में एक नूतन संस्था * को जन्म दिया। यह संस्था राजनैतिक प्रगतिशील विचारोंको लेकर आयी। जयपुर-राज्य प्रजामण्डल + की एक शाखा फतहपुर में पहलेसे विद्यमान थी ही, तिसपर भी इस दूसरी राजनैतिक संस्था का प्रादुर्भाव, किसी खास उद्देश्यको लेकर या किसी महत्कार्यके सिद्ध्यर्थ, हुआ था। जयपुर-राज्य प्रजामण्डलकी दुलमुल और ठंडी नीतिसे जिन नवयुवकोंको संतोष नहीं था उन्होंने ही इस संस्थाको जन्म देने में अप्रणी होकर कार्य किया था। इस संस्थाका नाम "जाप्रत जन मण्डल" रक्खा गया। संवत् १६४० का मार्च मास था। एक दिन तहसील प्रजा- मण्डल ( फतहपुर ) के आफिसमें, नवयुवकोंने एक मीटिंग उपयुक्त संस्थाके स्थापनार्थ बुलबायी। मैं उस समय कलकत्तासे फतहपुर आया हुआ था; मुझे भी उस मीटिंगमें शरीक होनेका आमंत्रण मिला। मैं भी गया। मीटिंगकी कार्यवाही प्रारम्भ हुई; सर्वसम्मतिसे सभा- * इस नूतन संस्थासे पहले फतहपुरमें सर्वहितकारिणी सभा, आर्यसमाज और सेवा समिति इत्यादि संस्थाएं अपने २ समयमें काफी काम कर चुकी हैं। + जयपुर-राज्य प्रजामण्डल-जयपुर महाराजकी छत्र-छायामें काम करनेवाली जयपुर राजनैतिक संस्था। फतहपुरमें इसकी शाखा "फतहपुर तहसील प्रजामण्डल" के नामसे काम कर रही है। प्रान्तीय एक ( २३३ ) [छठा खण्ड पतित्वका पद मुझे सौंपा गया, जिसके मैं योग्य नहीं था। तद- नन्तर संस्थाकी कार्यसमितिका चुनाव होगया। चुनाव हो जाने पर दिन-प्रतिदिन संस्था सुचारु रूपसे नवयुवकोंकी स्फूर्तिके साथ काम करती हुई आगे बढ़ती गयी। प्रति रविवारको संस्थाकी साप्ताहिक बैठक होती रही, जिसमें फतहपुरके अधिकाधिक नवयुवक भाग लेते रहे। आगे चलकर संस्थाने अपना कार्य-क्षेत्र बढ़ाना चाहा । उसने क्रमशः साहित्य विभाग, प्रकाशन विभाग, प्रचार विभाग, सेवा विभाग, ग्रामोद्योग विभाग और राजनैतिक विभाग इत्यादि ६ विभाग संस्थाके अन्तर्गत खोले। प्रायः सभी विभागोंने अपना-अपना कार्य अच्छी प्रकार किया। साहित्य विभागके अन्तर्गत संस्थाका एक सुन्दर पुस्तकालय बन गया तथा प्रकाशन विभागकी ओर से "जागृति-मन्देश" * नामका एक हस्तलिखित साप्ताहिक पत्र निकाला गया, जिसको संस्थाके सदस्योंकी इच्छा न रहने पर भी, किसी खास कारणवश असमयमें ही बन्द करना पड़ा। . * जागृति-सन्देश-'जाप्रत जन मण्डल की ओर से निकलनेवाला समाज- वादी विचारोंका, हस्तलिखित साप्ताहिक पत्र था। इसका स्टैण्डर्ड अपने समसामयिक पत्रों में अच्छा गिना गया । कई पत्रोंमें इसकी सुन्दर समालोचना हुई। ।
फतहपुर-परिचय] ( २३४ ) इस संस्थाको जयपुर-राज्य सन्देहकी दृष्टिसे देखने लगा था; साथमें जयपुर-राज्य प्रजामण्डल भी इसके अस्तित्वको अपने मार्गमें बाधक समझ कर, छिपे २ इसकी जड़ काटनेमें लगा था। उसके एक प्रतिष्ठित सदस्यने एक बार फतहपुरकी एक बड़ी मीटिंगमें इस संस्थाके खिलाफ भयंकर विप आला, जिसका उन्हें उसी समय मुँहतोड़ जवाब भी मिल गया। इस तरह यह संस्था कठिन विघ्न- बाधाओंको कुचलती हुई करीब १॥ वर्ष तक कार्य करती रही ; पश्चात् जयपुर-राज्यकी ओर से इसको गैरकानूनी ठहराकर इसकी गति बन्द कर दी गयी ; तबसे इसका कार्य स्थगित है। वर्तमानमें फतहपुरमें जितने उत्साही नवयुवक और कार्यकत्तांगण दृष्टिगोचर होते हैं, उनमेंसे अधिकांशको तैयार करनेका श्रेय इसी संस्थाको है। ...
-- साहित्य-सदन शेखावाटीमें साहित्यिक संस्थाका पहले अभाव ही था। उसे अभावकी पूर्तिके लिए सन् १६४२ के अक्तूबर मासकी ता० २५ को फतहपुरके साहित्यिक लोगोंकी बैठक हुई, जिसमें फतहपुरस्थ साहित्यिकों को लेकर एक संस्थाका निर्माण किया गया। संस्थाका नाम “साहित्य सदन" सर्व सम्मतिसे स्वीकृत हुआ और संस्थाकी नियमावलीके निर्माणके लिए एक अस्थायी उपसमिति ५ आदमियोंकी बनायी गयी, जिसने नियमावली तैयार की। कुछ संशोधनोंके अनन्तर नियमावली सभा द्वारा मंजूर हुई। इस नियमावली के अनुसार संस्थाको कार्यसमितिका निर्वाचन हर माल संस्थाके है सभ्योंको लेकर होता है। संस्थाकी सारी देखरेख इसका व्यव- स्थापक करता है। लोगोंमें साहित्यके प्रति रुचि उत्पन्न करनेके लिए साहित्यिक समारोह और कवि-सम्मेलनादि करना तथा राजस्थानके प्राचीन साहित्यका अन्वेषण और प्रकाशन कर उसे जनसाधारणके सामने लाना, इस संस्थाके खास कार्य हैं। संस्थाकी मीटिंग प्रति मास एक बार हुआ करती है । फतहपुरके प्रायः सभी साहित्यिक संस्थामें भाग लेते हैं। समय-समय पर मासिक अधिवेशनोंमें शरीक होनेके लिए आसपासके गाँवोंसे भी साहित्या- नुरागी लोग आ जाया करते हैं।
... फतहपुर-परिचय] ( २३६ ) इस तरह यह संस्था अपना कार्य करती आ रही है। जयपुर- राज्यने इसे उपयोगी संस्था समझकर अपने पब्लिक सोसाइटीज ऐक्टके अनुसार रजिस्टर्ड भी कर दिया है। यद्यपि इसे स्थापित हुए बहुत कम समय हुआ है, तो भी इसने लोगोंमें अच्छी साहित्यिक अभिरुचि पैदा करदी है। शेखावाटीमें अपनी तरहकी यह एक ही संस्था है। पूर्ण विश्वास है यह संस्था, कार्य करती रही तो, भविष्य में शेखावाटीका गौरव बढ़ायेगी।
परिशिष्ट डाकखाना और तारघर संवत् १६२३ में फतहपुर में सर्वप्रथम अङ्गरेजी डाकखाना खोला गया और एक किराये के मकान में रक्खा गया, जहाँ यह एक लम्बे अरसे तक रहा। तत्पश्चात् इसके लिए एक सरकारी मकान बन गया। संवत् १६५० में फतहपुर-निवासियोंको तार घरकी आवश्यकता प्रतीत हुई, उन्होंने इस सम्बन्धमें भारत सरकारके "इण्डियन पोस्ट एण्ड टेलीग्राफ डिपार्टमेण्ट" के अधिकारियोंसे लिखा-पढ़ी की, जिसका फल यह हुआ कि संवत् १६५१ में यहाँ तारघर भी खुल गया। अब यहाँ डाकखाना और तारघर दोनों सम्मिलित-रूपमें हैं और उपरिलिखित सरकारी मकानमें विद्यमान हैं।
फतहपुरके बाहर छोड़ी हुई बीहड़ * -- (१) नयाबकी बीहड़ फतहपुरके द्वितीय शासक नवाब जलालखाँ * द्वारा उनके राजत्वमें फतहपुरके दक्षिणमें, यह बीहड़ १२ कोसके घेरेमें, पशुओंके चरने और पक्षियों के विश्राम करनेके लिए छोड़ी गयी। अद्यावधि यह विद्यमान है और नवाबका दीर्घ स्मारक बनी हुई है। खेद है, अब इस बीहड़का विस्तार पहले जितना न रहकर बहुत- कुछ कम होगया है, जिसका एक-मात्र कारण-राज्यका, इसकी ओर ध्यान न दिया जाना है। पता चला है कि जब यह बीहड़ छोड़ी गयी थी, उस समय बावड़ी-दरवाजाके निकटसे इसका प्रारम्भ था; पर बादमें धीरे-धीरे यह बिकती गयी ; यहाँ तक कि अब बीहड़के बीचमें भी कतिपय लोगों की खरीदी हुई पट्टाशुदा जमीन हैं। सीकर-राज्यको इस बीहड़की यथाशक्य रक्षा करनी चाहिए। w * नवाब जलालखाँके विषय में इसी पुस्तकके तीसरे खण्ड में देखिए ।
(२) कसेरोंकी बोहड़
जयदयालजी कसेराने अपनी माताकी आज्ञासे फतहपुरके
बाहर पूर्व की ओर पास ही, ११०० बीघा जमीन गौओंके चरनेके
लिए छुड़वायी ; यही जमीन “कसेरोंकी बीहड़' कहलानी है।
इस बीहड़में फतहपुर-पिंजरापोलकी गौओंको चराया जाता
है, जिसमे पिंजरापोलको एक प्रकारसे अच्छी महायता मिल
जाती है।
यंत्रालय
फतहपुरके दौलताबाद मुहल्ले में स्थित, राहबहादुर रामप्रतापजी
चमड़ियाको कोठीकी चहारदीवारीके भीतर, कोठीके भवन के साथ
ही, यह यंत्रालय बनाया गया, जो जयपुरमें महाराजा सवाई
जयसिंहजी द्वारा बनाये गये यंत्रालयके एक यंत्र की नकल
इसमें एक धूप घड़ी बनी हुई है, जिससे समय जाना जाता है ।
यह यंत्रालय करीब १५०००) रुपये व्यय करके बना है ; लेकिन
यहाँ इस विषयका कोई जानकार न होने से इसका उचित उपयोग
नहीं होता है।
है
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शुद्धि-पत्र पृष्ठ पंक्ति ३ १ अशुद्ध फतहपुर की भूगोल सुख्य प्रकृति-सौंदय दुर्मिक्ष सरीफ १ फतहपुर के भूगोल मुख्य प्रकृति-सौंदर्य दुर्मिक्ष सर्राफ है १० १५ नवात्र संबत. बर्तमान १८ ११ नवाब संवत् वर्तमान मुहम्मदलाँ निम्नांकित १६ भुहम्मदखााँ मिम्नांकित २३ १६ १५ लड़ाका २८ १६ लड़का लड़ाका महावतखाँ शमसखाँ लड़का मुहब्बतखाँ शमशखाँ ८ ३५ १८ १४ ४६ १५ रशीदखाँ रसीदखाँ जार्ज फ्रांसिस कंजीयाँ जार्ज टामस १२३ १५ कंजियाँ
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असाधारण अग्रिम ग्राहक
इस पुस्तकके "असाधारण अग्रिम-प्राहक" * बनकर, निम्नांकित
सज्जनोंने अपना इतिहास-प्रेम प्रगट किया है-
4. श्रीयुत् सोहनलालजी दूगड़, फतहपुर
श्रीलालजी साँवलका, फतहपुर
डा० पं० रामजीवनजी त्रिपाठी, फतहपुर
यूसुफखाँजी तहसीलदार, रींगस
सीतारामजी केडिया, फतहपुर
नथमलजी केडिया, फतहपुर
चम्पालालजी पोद्दार, फतहपुर
गणपतिगयजी रामजीवननी देवड़ा, फतहपुर
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* पांच या पांचसे अधिक प्रतियोंके लिए ग्राहक बननेवाले सज्जन, असा-
धारण ग्राहक माने गये हैं। अग्रिम बने हुए असाधारण ग्राहकोंके नाम यहाँ
छापे गये हैं, बादमें बननेवालोंके नाम अगले संस्करणमें छपेंगे।
+पांचसे अधिक प्रतियाँ लेनेवाले असाधारण ग्राहक ।
* पांच प्रतियां लेनेवाले असाधारण ग्राहक ।
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