Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Samyik Pratikraman Shutra
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खुले मुह और दीपक के सामने नहीं पढना चाहिये। ॥जिनाय नमः ॥ सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र (विधि सहित) संग्रह कत्ती कुम्भट विजयमल जैन (जोधपुर निवासी) . प्रकाशक- सिरहमलजी लालचदजी पीपा नियासी (मारवाद) गुलेदगढ़ गुण्य ज्ञानति प्रथमावृति } ऊ प्रति ५०० वि० सात १t ६० सन १९९४
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tour स्वर्गवामी मेठ मिरेमलजी मुथा पीपाड़ निवासी 1 1
।
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मस्ताना
31
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प्रिय पन्धुनो ! देखो जैन धर्म की कैसी अच्छी रीतियें
है भार ज्ञानियों ने कैसे कैसे सहज रस्ते पापसे बचने के लिये
बताये है ऐसा विचार कर मनुष्यमात्र को चौदह नियम, पारद
जत और सामायिक प्रतिक्रमण अवश्य धारन करना चाहिये
क्योंकि इनके करने से पाप न्यून होजाता है।
प्रिय भाइयों ! ऐसा योग पूर्ण पुण्य से मिलता है। मनुष्य
जन्म, आर्य क्षेत्र, उत्तम कुल जैन धर्म यह सब पाया है वो
भागने सो करलो, वारवार ऐसा योग मिलना कठिन है।
मापका:-
सिरेमल लालचंद मूथा.
पीपाड़ निवासी (मारवाड़)
गुलैदरह
॥ श्री जिनायनमः ॥
सूचना।
यह पुस्तक यत्न से रखें
-
जयणां से जांच।
काना, मात्रा, अनुस्वार, हुस्न, दीर्घ अशुद्ध दूदी
लिख्यो हुयो, विद्वान कृपाकर सुधार लेवे प्रसिद्धकर्ता के
नम्र विनती है।
है
पुस्तक के कई पृष्ठों के नीचे छोटे टाइप में सूचना
पाठकगण उनका उपयोग करें। पुस्तक में यदि कोई
अशुद्धि रहगई होने तो पाठक गण शुद्ध कर पढेंगे और
सूचित करेंगे, जिससे आगामी सस्करण में ठीक
नायेंगी। विजयमलजी जैन को धन्यवाद है जिन्होंने इस
का संग्रह किया है।
।
आपका
सिरेमल लालचद
पीपाड़ निवासी (मारवा
गुले
अनुक्रमणिका। विषय .. १ . १ नवकार मत्र तिक्युचोका पाठ इरियावहिया का पाठ तस्स उत्तरी का पाठ लोगस्स का पाठ सामायिक लेने का पाठ नमोत्धुण का पाठ सामायिक पारने का पाठ सामायिक पढ्या पछे ऐमा पाट कहना सामायिक लेने की विधी ५ ६ .. GG " पारने ८ ० ० इच्छामिण भते का पाठ इच्छामि ठामि का पाठी नागमे तिविहे का पाठ दसण श्री समफित् का पाठ वारे व और उनके अतिचार सलेसण की पाटी तस्स धमस्स की पाटी तस्स सव्यस्स की पाटी चत्तारी मगल का पाठ १२ १२ २० २० । प . . ... (ख) अठोर पापस्थानक का पाठ खमासण की पाटी पच,पदा की. वदना मनत चौगीसी स्तवन आयरिय उवज्झाए का पाठ भावकों से क्षमत क्षमावणा करने का पाठ चौरासी.लाख जीवयोनि का पाठ सर्व जीवराशि क्षमाने का पाठ समुच्चय पचक्खाण का पाठ प्रतिक्रमण करने की विधि चौवीसी स्तवन २४ तीर्थंकरों के नाम २० विहरमान के नाम ११ गणधरों के नाम १६ सती के नाम चौदह नियम . श्रीपूज्य पचक समन्त्र प्रातःस्मरणीय प्राकृत स्वोत्रम् रीष्ठनेमीनाथ भगवान का हालरीया श्री गौतम स्वामी का स्तवन श्री शांतिनाथजी का स्तवन चन्दा प्रभुजी का स्तवन लघु साधु वन्दना पूज्य श्री रतनचन्दजी महाराज रा गुणा री ढाल... मुनि भी चन्दनमलजी महाराज का स्तवन ... ४७ ४८ ४४ ( ग ) ५२ ... ५४ . ५६ .. - ६२ पंचम पूज्य शोभाचन्दजी का स्तवन मुनिगुण स्तवन उपदेशक स्तवन पूज्य श्री शोभाचंदजी महाराज का स्तवन श्री नेमिनायजी स्तवन श्री पार्श्वनाथजी का स्तवन रतनजडीत को पालणो भी जत्रु स्वामीजी का स्तवन श्री शातिनाथजी रो जाप श्री शांतिनाथ स्वामीजीनो छद श्री पारसनाथ स्वामीजीरो स्तवन भी चन्दा प्रभूजीनो स्तवन श्री गोतम स्वामीजीनो चंद श्री चिन्तामाण पार्श्वनाथनो स्तवन छद श्री आदिनाथजी कवित छंद पंच परमेष्टीनो श्री पार्श्वनाथजीनो स्तवन श्री हरकचदजी महाराज का गुण भी गौतम स्वामीनो स्तवन श्री चनणमलजी महाराजना गुण ... भी सीतलनाथजीनो स्तवन श्री महावीर स्वामीनो स्तवन भी पारवनाथजीनो स्तवन ... ६७ ६८ .. ६४ ७२ ७३ ...
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७७
७७
( स्तवन उपदेशी)
स्तवन उपदेशी राग बिहाग
श्री नेमनाथजीनो स्तवन
स्तवन उपदेशी
स्तनन लावणी
स्तवन श्री नेमीनाथजीनो
स्तवन उपदेशी
स्तवन उपदेशी
पूज्य श्री सोमाचन्दजी महाराज का गुण
स्तवन श्री माहावीर स्वामीनो
(अथ चौवीसी लिख्यते)
स्तवन उपदेशी
स्तवन प्रभु गुण
लिख्यते
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...
* श्रीवीवरागाय नमः . श्री सामायिक-प्रतिक्रमण सूत्र अथ श्री नवकार मंत्र प्रारम्भ । णमो अरिहताणं । णमो सिद्धाणं । णमो प्रायरियाणं । एमो उवझायण । णमो लोए सब साहणं । एसो पच णमो- कारो । सम्य पावप्पणा सणो । मगलाण च सन्वेसि । पढमः हवा मगल ।। इति । तिक्खुत्तो का पाठ। तिक्खुचो (तीनवार), भायाहिण (पे हाथ जोड़ी ने जीमणा कानसू डावा कानाई), पपाहिण (प्रदक्षिणा करीने ), पदामि (नमस्कार करता हू), नमसामि ( मस्तक नमायने नमस्कार करता हू), सकारेमि (सत्कार देता हू), सम्माणेमि (सन्मान देता है), कल्याणं ( कल्याणकारी), मगल (मगलकारी), देवय (धर्म देव समान), चेइय (छ कायका जीवने सुख- दायक), पञ्जासामि (मन वचन काया करी ने सेवा करता ह), मत्थएण पदामि (मस्तक करी नमस्कार करता हू) इति । है . इरियावहियाए का पाठ। इच्छाकारेण ( तुम्हारी इच्छापूर्वक ), सदिसह ( आशा कर तो) भगमन इरियावहिय ( चालते मार्ग में जीव ने भारिया होय ), पडिकमामि ( निर्गतु छू ) पछे गुरु कहे-पडिकमह (पापटालो-पछे शिष्य कहे ) इच्छ (प्रमाण है ), इच्छामि ( इच्छा करता हू ) पडिकमिउ (पाप कर्म से निवृत होने के लिये) इरिया ( मार्ग में ) वहियाए ( जाता) विराहणाए (दुःख दिया होय ) गमणागमणे ( जाता माता ) पाणकमणे (प्राणी ने पैर से चाप्या होय ) वीयकमणे (वीज ने चाप्या होय ) हरियकमणे ( वनस्पति वगैरे न चापी होय ) उसा ('ओस ) उसिंग (कीडी नगरा) पणग (फुलण) दग (पानी ) मट्ठी ( सचित्र मही) मकड़ा ( मकड़ी) सताणा (जाला') सकमणे ( दावा हो । जे में (जो मेरे ) जीवा (जीवों का निराहिया (नाश हुआ हो) एगिंदिया ( एक- न्द्रिय जीव । बेडदिया (बेहद्रिय जी ) तेडदिया (तीन इन्द्रिय जीन ) चउरिदिया (चार इन्द्रिय जीव ) पंचिदिया (पांच इद्रिय जीव ) अभिहया ( सामने आते मारा ) पत्तिया । धूड़ आच्छादन हो गई हो ) लसिया ( जमीन पर मसला हो) सघाइया ( सामल किया होय ) सघट्टिया ( सामल हुवे हो ) परियाविया ( परिताप उपजाया होय । किलामिया । खेद पहुचाया हो) उद्दविया ( बास पहुंचाया हो ) ठाणा उठाण ( एक स्थान से दूसरे स्थान पर ) सक्कामिया ( सक्रमण किया हो ) जीवियाउ (जीवसे । ववरोविया । मुक्त किया हा )तस्स 1 तस्स उत्तरी का पाठ । तस्स उरारी करणेण (उसका फिर शुद्धि करने के लिए) पायच्छित करणेण (पापों को दूर करने के लिए) पिसोही क- रणेण (पुनः आरमा को पिशुद्ध करने के लिए। विसल्ली कर- येण (शल्यों को दर करने के लिए ) पावाण कम्माण (पाप कर्मों के) निग्यायणठाप नाश करने के लिए) ठामि (एक स्थान पर रहकर) काउमग्ग (कार्योत्सर्ग करता है। अन्नाथ (इतना और) उमस्मिरण (ऊचे श्वास आने पर) निस्सिएण (नीचे श्वास होने पर ) खासिएण (खासी के होने पर ) छीपर्ण (चीक थाने पर) जमाइएण (जमाई आने पर) उडूहुएण (डकार पाने पर) पायनिसग्गेण (अधो वायु के निकलने से) भमलिए । चमर अनि पर) पित्त मुच्छाए (मुच्छा पाने पर) सुहुमेहिं (सूक्ष्म) रोल अगसचालेहिं (थग के सचालन होने पर ) सुहमेहिं खेल सचालेहिं (खसार के आने पर) सुहमेहि दिहिमचालेहिं (श्राख टमकारने पर । एवमाइ पहि (इत्यादि) भागारहिं (मरा कई श्रागारों से) अभग्गो ( मग न होगा) थपिराहियो (पिरावित न होगा) हुज्ज (हो) में ( मेरा) काउसग्गो (कार्योत्सर्ग) जाव (जस्तक अरिहताण भगवंताण (भगत को नमोकारेण (नमस्कार करके ) नपारेमि (मे न पालु) ताव (तमतक) काय (काया को) ठाणण (एक स्थान में , मोणिण (मौन में झाणेण (ध्यान में ) अध्याण (अपनी काया को) वोमिरामि ( छोडता । इत्ति ( ४ ) लोगस्स का पाठ। लोगस्स (लोग में) उज्जोयगरे ( उद्योतकरनेवाले) धम्मतित्थयरे । धर्म तीर्थक करनेवाले ) जिणे ( राग द्वेपं को जीतनेनाले ) अरिहते ( श्री अरिहत को ) कित्तइस्स ( कीर्ति करता हु । चउवीसपि ( चौवीस तीर्थकर ) केवली ( केवल- ज्ञान के धारक ) उसम (श्री ऋषभदेवजी को) मजियच (और अजितनाथजी को) वंदे ( वदना करता हु ) संभव ( सभानायजी को) मभिणदंण (अभिनन्दनजी को) च (और ) सुनइच ( श्री सुमतिनाथजी को) पउमप्पह ( पद्म- प्रभुजी को ) सुपास जिणच (जिनवर और ) चदप्पह (चन्द्र प्रभुजी को ) वदे । चदना करता हु) सुविहिं च (सुविधिनाथ जीको और ) पुष्फदत्त (और पुष्पदतजीको ) सीयल (शीत- लनाथजी को) सिज्जस (श्रेयांसनाथजी को) वासपुज्जच (वासपूज्यजी को और ) विमल ( विमलनाथजी को ) मणत च (अनन्तनाथजी को और ) जिण (रागद्वेपके जीतनेवाले) धम्म (धर्मनाथजी को ) सति च (शातिनाथजी को और ) वंदामि ( वंदना करता हू) कुथु (कुथुनाथजीको) अरच (श्ररनाथजी को) मल्लिं (मल्लिनाथजी को) वदे मुणिसुन्वय (मुनिसुवृतजी को) नमिजिणंच ( नेमनाथजी रागद्वेप को जीतने वाले को और ) वदामि रिट्टनेमि (अरिष्टनेमी को) पास पार्श्वनाथजी को) तह ( तथा ) वद्धमाण च ( महावीर को) एव ( इस प्रकार से ' मए ( मैने ) अभित्थुवा (स्तुति की है) विहुय (जिन्होंने दर करी है ) रयमला ( कर्मोकी रज तथा मल ) पहाण (क्षय कियाहै ) जरमरणा (जरा और मरणकर) चउरींसपी ( एहवा चौवीसादि ) जिणवरा ( जिनवर ) तित्थ परा (सब तीर्थकर देव ) मे ( मेरेपर ) पमीयतु ( प्रसन्न हो) वित्तिय (कीर्ति के योग्य ) चदिय ( वदनायोग्य । महिया (पूज्य है ) जे (जो) ए ( यह) लोगस्स (लोग में) उत्तमा (उत्तम ) सिद्धा (सिद्धहै ) प्रारूग्ग ( रोगरहित ) वाहीला (सम्यक्त्व का लाभ ) समाहि ( समाधि ) वर (जो श्रेष्ठ है) मुत्तम ( उत्तम) दितु (दो) चदेसु ( चाद स ) निम्मलयरा (भविक निर्मल है ) आईचेसु ( सूर्य से ) अहिय (अधिक ) पयासयरा (प्रकाश करनेवाले ) सागरवर (सागर में श्रेष्ट ) गमीरा (गभीर है ) सिद्धा (सिद्ध ) मिद्धिं (मुक्ति । मम (मुरको) दिसत (दो) ॥ इति ।। सामायिक लेने का पाठ । करेमि ( मै करता हू) मते (हे पूज्य !) सामाइयं ( सा- माथिक)सावज (सापद्य रूप) जोग ( योग का ) पञ्चसामि (प्रत्याख्यान करता हू) जाप ( जातक) नियम (नियम है) पज्जुवासामि ( सेनन करता हू ) दुविह (दो करण से) तिषि- हेण (वीन योग से ) न करेमि (मैं करू नहीं । नकारयमि (मैं कराऊ नहीं) मणमा( मनसे ) वयसा(वचन से) कायसा ( काया से ) तस्स (यह सावध रूप पाप का ) मते (हे पूज्य) एडिकमामि (मैं प्रायश्चित्त करता ह) निंदामि (आत्म-निंदा करता हू) गरिहामि (गुरु की साक्षी से करता हूँ। अप्पाण (अपनी प्रास्मा को) बासिरामि ( पास से अलग करता हूति - - । नमोत्थुएं का पाठ । नमोत्युणं ( नमस्कार हो ) अरिहताण (भी अरिहंतों को) भगवताण ( भगवों को ) श्राइगराण ( धर्म की प्रादि करने चालों को । तित्वंयराण । तीर्थ के करने वाले ) सयम-धाण (स्वयमेन बाध हुआ है । पुरिसुत्तमाण ( पुरुषों में उत्तम ) पुरिसमीहाण (सिंह समान ) पुरिमरपुडरीयाण (पुरुषों में पुंडरीक कमल समान ) पुरिस्वर ( पुरुपों में श्रेष्ठ) गधहत्याण (गध हस्ती समान ) लोगचमाण ( लोग में उत्तम ) लांग- नाहाण ( लोग के नाथ । लोगहियाण ( लोग के हितैपी) लोगाईवाण ( लोग में दीपक समान ) लोगपज्जोयगराण ( लोग में परम उद्योत करने वाले ) अभयदयाण ( अभय दान करने वाले ) चक्खुदयाण (ज्ञानरूपी नेनों के देने वाले) मग्गदयाण ( मोच के बताने वाले ) सरदयाण (सरण को देने वाले ) जीवदयाण ( सयम रूपी जीवन के दाता ) घोहि- दयाण (ोध बीज को देने वाले ) धम्मदयाण (धर्म के देने वाले ) धम्मदेमियाण (धर्म का उपदेश करने वाले ) धम्म- नायगाण ( धर्म के नायक-नेता) धम्मभारहीणं (धर्म रूपी रथ के सारथी ) चम्मर (धर्म में श्रेष्ठ ) चाउरत ( चारगति के अन्त करने वाले) चक्काट्टीण । चक्रपती समान ) दीवोत्ताण । 'संसार रूपी समुद्र में द्वीप समान ) सरणगडपइठाण (शर- णागतों की वत्मलता करने वाले ) अप्पडिहय (किमी से नाश नहीं होय ) वरनाण ( प्रधान ज्ञान । दसणधराण (दर्शन केधरने पाल । वियछउमाण (चलीगई है छास्थावस्था जिनकी) जिणाण ( जिन्हों ने राग द्वेप को जीता है ) जापयाण ( दूसरों ( - { ७ ) को राग द्वेप के जीतने का उपदेश करते है ) तिन्नाण (श्राप तिरे है ) तारयाण । औरों को तारने वाले ) चुद्धाण बोहयाण (श्राप तत्व जाना दूसरों को बोध देनेवाले । मुत्ताण मोय- गाण ( श्राप कर्मों से छूटे और दूसरों को छुड़ाने वाले । सम्म गुण (मर्वज्ञ है । सवर्वादारसिण (सर्वदर्शी है ) सिव · कल्याण रूप ) मयल (थचल । मरुय (रोगरहित ) मणत ( अनत जानादि करी) मख्खय (क्षयरहित ) मव्यावाह ( दु खादि रहित ) मयुणरारित्ति (जिसका फिर जन्म नहीं है ऐसी जो सिद्ध गति है ) सिद्धगई ( मोक्ष है ) नामधेय । नाम भी यही है ) ठाण ( स्थानक को ) सपाताण ( जो मोक्ष को प्राप्त हुए हैं ) नमोजिणाण । नमस्कार को जिनेश्वर को) जियभयाण (सातमय जीत दिये हैं । ॥ इति ॥ ॥सामायिक पारने का पाठ ।। नसमा सामायिक व्रत के रे विप जे कोई भतिचार लागो होय तो पालोउ । मन, वचन, काया रा जो पाहु वे ध्यान प्रवाया होय, सामायिक में मभालना नहीं कीधी हाय, श्रण पुगी पाडी होय, तस्स मिच्छामि दुकह ॥ दस मनरा दस वचन रा, पारे कायरा, बत्तास दोपा मायलो कोई दोष लागा होय तो तस्स मिच्छामि दुबड ।। सामायिक में स्वीकथा, भक्तकथा, देश कथा, राजकथा, ए चार कथा मायली कोइ कथा कीधी होय तो तम्स मिच्छामि दुगाड़ । || सामायिक पाडया पछे ऐसा पाठ करना । सामायिक समकाएण, फासिय, पालिय सोहिय, वारिय, - .
कित्तियं, पाराइयं, आणाए, अणु पालिय, न भवई तस्स
मिच्छामि दुकह ॥
अध सामायिक लेने की विधि।
सामायिक कर्ता को चाहिए कि पहले भूमि पूजे । फिर
प्रासन विद्या. मुखपत्रिका मुख पर बांध प्रथम सचित्त को दूर
कर शुद्ध कपड़े धारण कर, दोनों हाथ जोड़, श्री गुरुदेव की
धाज्ञा मांग 'हरियानहीं" की पारी "जीवियायों ववरोगिया तस्स
मिच्छामि दुकद"पूर्ण पाठ बोले । फिर "तस्सुत्तरी"की पार्टी कहने
काउस्मग्ग करना,काउस्सग्ग में " इरियावहियाए " का सम्पूर्ण
पाठ मन ही मनमें कहना, फिर "नमो अरिहताणं" मनमें कहकर
काउस्मग पाडना, फिर लोगस्स" की पाटी कहना । फिर
"करेमिभते" की पाटी "जावनियम" तक कहीने पागल
मुहूर्त घालना हुवे जितना घालना, फिर पज्जुवासामि से
अप्पाण चोसिरामि " तक पाठ करना । पीछे डावा घुटने
को ऊचा कर, दोनों हाथ जोड "नमोत्थुण" का पाठ दो चार
उच्चारण करे । पीछे भामन पर बैठकर " नमोकार, तथा
चोलचाल
गुणना पढना ॥ इति ॥
सामायिक पारने की विधि।
सामायिक पारते समय " इरियावही" की पाटी और
तस्तउत्तरी" की पाटी कह काउस्सग करना । काउसग्ग
में "लोगस्स" की पाटी मनमें कहना "नमो अरिहताण " कह
कर काउसग्ग पारना । फिर " जोगस्त " प्रगट कहना । दोय
नम्रत्युण पूर्ववद कहना। फिर " नवमा सामायिक की पार्टी
और “ न भवा तस्स मिच्छामि दुका" तक कहना | भतमें
तीन नमोकार कह कर उठना ॥ इति ।।
इति सामायिक सूत्र समाप्तम् ।
(१०)
प्रतिक्रमण
f
सूचम् ।
"
है
इच्छामिणं भंते का पाठ।
इच्छामिणं (मैं इच्छा करता हू) भते (हे भगवन् ) तुम्भीर
(तुमारी ) अमणुनाय समाये (आज्ञा मागने ) देवसी (दिव.
स संबंधी) पडिकमण (पाप का निवारण करने के लिए) ठाएमि
(एक स्थान पर बैठता हू) दिवसि, (ग्यान, दसण (दर्शन)
चरित्ताचरित (चारित्र ) तप, अतिचार चिंतपणा (चितवना
करने के लिए ) करेमि काउस्सग्ग (काया की स्थिरता) ॥इति।।
इच्छामि ठामि की पाठी।
इच्छामि ठामि काउसग्गजो में देवसियो (दिवस समधी)
अयारी ( अतिचार ) को ( किया होय ) काइयो (काया
से ) वाइनो (वचन से ) माणसिनो ( मन से ) उस्सत्तो ( सूत्र
विरुद्ध परूपणा की होय ) उम्मग्गो ( जिन मार्ग छोड़ने दुजो
मार्ग पकड्यो होय ) भकप्पो (अयोग्य वस्तु भोगी होय)
अकरणिज्जो (अयोग्य कार्य कियो होय ) दुझायो (भात
रौद्र ध्यान ध्यायो हो ) दुधिचिंतित्री (अशुभ कार्य मन में
याद किया हो) प्राणायारो ( नव अनाचार याचरवा जोग
नहीं) अणिच्छिययो ( इच्छा करना योग्य नहीं) असावग
पावग्गो ( धावक ने उचित नहीं ) नाणे ( ज्ञान ने विपे ) वह
(विमहिज ) दसणे ( सममित ने विपे ) चरिचा चरिते सूए
- 7 (सूत्र सिद्धान्त के चिपे ) सामाइए (समता रूप सामायक ने विषे) विन्ह गुत्तीण) तीन गुप्ति न पाल्या होय) चउन्द क- सायण (चार कपाय ) पंचाह अणुभयाण ( पांच प्रकार का चिरमण) तिन्ह गुणब्धयाण ( तीन प्रकार का गुणवत) चउ- न्ह सिक्खावयाण (चार प्रकार की शिक्षा) पारस विहस्स (चारे प्रकार का प्रत) सावगधम्मस्स (धारक सबधी) जख दिय देश के लिये भग किया होय ) जविराहिय (सन के लिए मग किया होय ) तस्स मिच्छामि दुकड़। थागमे तिविहे का पाठ ॥ भागमे ( मूत्र सिद्धांत) विविहे ( तीन प्रकार का) पनते ( कशा) तजहा ( ते कहे है। सुत्तागम (सूत्र मागम ) भत्था- गमे ( सत्र ना मर्थ । तदुभयागमे ( सूत्र तथा तेदनो मर्थ ) एहवा भी ज्ञान के विपे जे कोई अतिचार लागो होय ते भालोउ, जपाइद्ध ( सत्र भागा पाला भएया होय ) चचामेलिय (उपयोग रहित मण्या होय । हीणक्सर (थोलो अधर भण्यो होय ) प्रवक्पर ( अधिक थत्तर भएयो होय ) पयहीण (पद मोछो भण्यो होय) नियहीणं (विनय रहित भएपो होय) जोगहीण ( मन पचन काया से जोग ठाम, राख्या ) घोसहीण (शुद्ध उचार रहिव भण्या होय) सुदिन्न (शुद्ध ज्ञान,म. विनीत ने दियो होय.) दुटु पडिच्छिय (अविनीत पने ज्ञान लियो होय ) शकाले कयो सज्मामो, फालेन को मज्झामो, भमझाए सज्झाइय समायेन सज्झाय भणता
-
-
--
.
गुणता चितवता ने विचारतां ज्ञान भने ज्ञानवंत की भाशा-
वना कीनी होय तो तस्स मिच्छामि दुक्करं ॥ इति ।
॥दसण श्री समकित का पाठ,
अरिहंतो महदेवो, जावज्जीव सुसाहुणो गुरुणे, जिय
पएणत्त तत्त ए सम्मत्त,मए गहियं एवा श्री समकित के विषे
बे कोई अतिचार लागो होय तो पालोउ, जिन वचन में शका
पाणी होयं, पर दर्शनरी वांछा कीधी होय, फल प्रति संदेह
भाएयो हो, पर पाखंडीरी प्रशसा कीधी होय, पर पाखंडी
से सस्तव परिचय कीधो होय, तो मारा समकित रूप रत्नरे
पिपे मिथ्यात्व रूप रज, मेल, खेह लागी होय तस्समिच्छामि
दुकई इति ॥
वारे व्रत और उनके अतिचार ।
पहिलो अणुव्रत-(साधुना पांच महाव्रतनी अपेक्षा छोटो
प्रत) थूलाओ (मोठा) पाणाइवायाभो (जीव मात्र नी हिंसा)
रमणं (छोड़ता हूँ), सजीव, बेइदिय, तेइदिय, चउरिंदिय,
पचेंदिय, पिन अपराधे जाणी पीछी श्राकुटी सकल्पी हणवारी,
बुद्धि करी ने इण हणावण का पचक्खाय जायज्जीवा दुविह
तिविदेणं न करेमि न कारवेमि मनसा वयसा कायसा । ( एवा
पहला धूल प्राणातिपात (जीवनी हिंसा) विरमण व्रत के
विषे जे कोई अतिचार लागो होवे तो बालोङ, रीस वसे गादा
पण बांध्या होय, गाढा भाव घाल्या होय, चामना छेदा कीधा
होय, अति भार पान्या होय, भात पाणीना विच्छेद कीधा
होय तस्स मिच्छामि दुकट)॥१॥
- - - दूजी अणुव्रत-धुलाओ मौसाचायाओ (झुठ बोलना) विरमण कमालिय (कन्या तथा वर सम्बन्धी झुठ) गोवा. लिय ( गाय, भैस भादि सम्बन्धी मुठ) भोमालिय (पृथ्वी के काम में झुठ) थापणमोसो (कोईनी स्थापण उलगवी) सूक ले कूड़ी साख, इत्यादिक मोट का भूठ बोलण का पच- क्खाण जावज्जीमाए, दुविह तिनिहेण न करेमि न 'कारोमि मनसा पयसा कायसा । ( एवा इजा थूिल मृपावाद विरमण प्रत के विपे जे कोई अतिचार लागा होय ता, आलोउ, सहसा- स्कारे किणी प्रति कडो बाल दीधो हाय, रह छानी वात प्रगट कीधी होय, अपनी स्त्री का मर्म प्रकाश्या होय, मृपा उपदेश दीपा होय, कूड़ा लेस लिख्या होय वस्स मिच्छामि दुकड़) ॥२॥ तीजो अणुव्रत-धूलामो अदिनादाणा (चोरी करना) निरमणं, खातर खिणी, गाठ छोड़ी, ताला पर कूची, वाट पाड़ी पदी वस्तु मोट की धणियां सेती जाणी ने लेवण का पचक्खाण जावज्जीवाए दुविह तिरिहण न करेमि न कारयेमी. मनसा वयसा कायसा । ( एवा तीजा धूल अदत्तादान विरमण प्रत के विष जे कोई अतिचार लागो होय तो भालोउ, चोराई वस्तु सीधी होय, चोर ने साझ दीपो होय, राज्य विरुद्ध कारज कीयो होय. कूड़ा तोल कूड़ा मापा कीघा होय वस्तु में मेल समले सखरी दिसाय नरवरी पापी होप तस्स मिच्छामि दुकड़) ॥३॥ चोथो अणुवत-धूलामो महुणाओ (मैथुन) चिरमण, पोतारी स्त्री उपरांत मैथुन सेवण का पचक्खाण, जावज्जीवाए देवता सबन्धी विह विविहेण न करोमि न कारवेमि मनसा . . -
( १५ )
-
.
वयसा कायसा. मिनख तिर्जच सम्बन्धी इकविह इक विहेण न
करेमि फायसा ( एना चौथा धूल म्बदारा ) (अपनी स्त्री)
सतोप विरमण व्रत के विषे जे कोई थोतचार लागो होय तो
भालोउ इत्तर धोडा काल रासीस, गमन कीधा होय, अपगृही
सुगमन-कीपाहाय, अनग क्रीम कीधी होय, परायान्याव
नातरा जोरियाहोय कामभोगती भमिलापा सेवियाहोय तस्स
मिच्छामि दुक्कड ।। ४ ॥
पांचवो अणुव्रत-धूलाओ परिग्गओ (परिग्रह दीलव)
विरमणं, खत घर की, रूपा सोना को, धनधान्य को, दुपद
चौपद को, घर विखरा को यथा परिमाण कीधा होय ते उपरात
आपको करी परिग्रह राखण का पचरखाण जावज्जीवाए एकविह
तिविहेण न करेमि मनमा वयसा कायसा (एचा पाचवा धूल
परिग्रह विरमण व्रत के विषे जे कोई भतिचार लागो होय तो
भालोउँ, खेत घर को रूपासोना, को धन धान्य को, डुपद चौपद
को घर विखरा को यथा परिमाण कीधा है ते अतिक्रम्यो होय,
तस्स मिच्छामि दुक्कड ) ॥ ५ ॥
छट्टो दिशिविरमण व्रत-ऊची नीची तिरछी दिशा को
यथा परिमाण कीधो , ते उपरात सहच्छायें जाई ने पांच
आश्रद्वार मेरण का पचक्खाण, जापज्जीवाए एकविह विविहेणं
न फरेमि मनमा वयसा कायसा ( एवा छहा दिशिविरमण प्रत
के विपैजे कोई अतिचार लागो होय तो पालोउ, ऊंची नीची
तिरछी दिश को यथा परिमाण कीयो छ ते अतिक्रम्यो होय,
एकदिश घटाई होय, एक दिश वधाई होय, सदेह पड़िया पंथ
भागे धान्यो होय तस्स मिच्छामि दुक्कड ) ॥ ६ ॥
ra सातमी उपभोग परिभोग विरमण व्रत-उन्लपिया- विहं (अग पूछनाथादि विधि ) दतणविहं (दातणविधि । फल । विह (फलीवधि ) सम्भंगणविह (तेल मालिस की विधि) - उपट्टणविह ( उपटन थादि की विधि ) मअणनिह ( स्नान की + विधि) पत्थविहं (वस्रविधि) विलेवण विह (विलेपन विधि ( पुष्फ- । विह पुष्प विधि आमरण विह (आभूषण विधि) धूपविह (धूप की विधि ) पेजपिह (दुध प्रादि पीवा की विधि ) मक्खणविह (भक्षण की विधि ) श्रोदनविह (चारल की विधि ) सूपविह (दाल की विधि ) चिगपविह । विगय की विधि ) सागविह (साग की विधि) माधुरविद्द ( मधुर पदार्थ की विधि ) जीमण विड (जीमवानी विधि) पाणीविह (पानी की विधि) मुख वासविह (सोपारी पान आदि की विधि ) चाहनरिह ( सवारी की विधि) सयणविह (पलग आदि सोने की विधि ) पनिरिह ( पगरखी की विधि ) सचित निह ( सचित की विधि ) द्रव्यनिह (द्रव्य की विधि ) इत्यादिक छाईस पोला की मरजाद कीधी छै ते उपरान्त उपभोग परिभोग भोगण का पचक्खाण जाधज्जीवाए एगविह तिविहेण न करेमि मनसा वयसा कायसा । ( एवा सातवां उपभाग विरमण बरा के विपैजे कोई अतिचार लागो होय तो पालो, पचवखाण उपरान्त सचिन को आहार कीघो होय, सचिच प्रतिवद्ध को आहार कीधी होय, अपक को थाहार कीधो होय, दुपक को आहार कीघो होय, तुच्छ औपधि भक्सण कीधा होय, थोड़ो खाय घणे नाखियो होय वस्म मिच्छामि दुकाई) । इति । -
.
-
( १५ )
वयसा कायसा, मिनख तिर्जच सम्बन्धी इकविह इक विहेण
करेमि फायसा ( एवा चौथा थूल स्वदारा) (अपनी स्त्री
सतोप विरमण नत के पिप जे कोई प्रोतचार लागो होय ।
थालोउ इत्तर धोडा काल रासीसू गमन कीधा होय, अपगृह
ध् गमन-कीपाहाय, भनग क्रीडा कीधी होय, परायाच्या
नातरा जोरिया होय काममोगती प्राभिलाषा सेवियाहोय तह
मिच्छामि दुक्कड ॥ ४ ॥
पांचवो अणुव्रत-धूलाओ परिग्गओ (परिग्रह दौलए
विरमण, खत घर की, रूपा सोना को, धनधान्य को, दुप
चौपद को, घर विखरा को यथा परिमाण कीधा होय ते उपरात
आपको करी परिग्रह राखण कापचक्खाण जावज्जीवाए एकवि
तिविहेण न करेमि मनसा वयसा कायसा (एचा पाचवां धूल
परिग्रह विरमण व्रत के विषे जे कोई भतिचार लागो होय तो
भालोउ, खेत घर को रूपासोना, को धन धायको, हुपद चौपद
को घर विखरा को यथा परिमाण कीधा है ते अतिक्रम्यो होय,
तस्स मिच्छामि दुकर ) ॥ ५ ॥
छट्टो दिशिविरमण व्रत-ऊची नीची तिरछी दिशा को
यथा परिमाण कीधो , ते उपरात सइच्छायें जाई ने पाच
आश्रद्वार सेवण का पचक्याण, जावज्जीवाए एकत्रिह तिविहेण
न फरेमि मनसा वयसा कायसा ( एवा छहा दिशिविरमण व्रत,
के विप जे कोई अतिचार लागो होय तो पालोउ, ऊंची नीची
तिरछी टिश को यथा परिमाण की है ते अतिक्रम्यो होय,
एकदिश घटाई होय, एक दिश वधाई होय, सदेह पडिया पथ
मागे धान्यो होय तस्स मिच्छामि दुकड़ ) ॥ ६ ॥
अपक को आहार फीधी होय, दुपक को आहार कीधो होया तुच्छ औषधि मक्खण कीघा. होय, थोदो खाय घणे नालियो सातमो उपभोग परिभोगविरमण व्रत-उम्लपिया. विह ( अग पूलना आदि विधि ) दतणविह (दातणविधि ) फल विह (फलविधि ) अभंगणविहं (तेल मालिस की विधि) उवट्टणविह ( उबटन आदि की विधि) मजणविह ( स्नान की विधि ) वत्थविहं (वस्त्रविधि) विलेवण विह (विलेपन विधि (पुप्फ- विह पुष्प विधि भाभरण विह (आभूषण विधि) धूपविह (धूप की विधि ) पेजपिह (दुध मादि पीया की विधि ) मक्खणविह (भक्षण की विधि) मोदनविद (चारल की विधि) सूपविह (दाल की विधि ) विगयविह । विगय की विधि ) सागविह (साग की विधि) माधुरविद (.मधुर पदार्थ की विधि ) जीमण विद (जीमवानी विधि) पाणीविह (पानी की विधि) मुख वासविह (सोपारी पान आदि की विधि) बाहन विह ( सवारी की विधि) सयणविह (पलग धादि सोने की विधि ) पनिनिह ( पगरखी की विधि ) सचित विह ( सचिव की विधि) द्रव्यनिह । द्रव्य की विधि ) इत्यादिक छाईस बोला की मरजाद कीधी छै से उपरान्त उपभोग परिभोग भोगण का पचक्याण जायज्जीवाए एगविह तिविहेण न करेमि मनसा वयसा कायसा । ( एवा सातवां उपभोग विरमण व्रत के विजे कोई अतिचार लागो होय तो आलोउ, पचरखाण उपरान्त सचित को आहार कीघो होय, सचित प्रतिबद को आहार कीधी होय, होय तस्म मिच्छामि दुकड ) । इति । , . . ( १६ ) ए भोजन की कद्याहिवे कर्मयकी पनरे कमांदान श्रावक ने जाणवा जोग छै पर बादरवा जोग नहीं, तजहा ते कह छ इंगालकम्म. (भाग का व्यापार लोहकारादि का कम ) घख कम्मे ( वन में घाम दरसतादि काटवा का कर्म) साडी कम्मे (गाडी श्रादि कराय ने बेचणा) माडीकम्मे (ऊट, घोडा, आदि भाडा को व्यापार कांधो होय ) फोडीकम्मे ( खान सु. दाना, कर्पण कराना इत्यादि पृथ्वीका पेंट फोडाना कुप्रामादि कराना, कर्म कीधा होय । दतवाणिज्जें (दांतको व्यापार) लक्खवाणिज्जे ( लाखनो न्यौपार ) रस वाणिज्जे ( घी, तेल रसादि का व्यापार ) केपीणज्जे ( चाल चमड़ादि का व्यो पार ) विस वाणिज्जे (जीव घातक वस्तुनो व्यापार ) जतपिल्लण कम्मे ( कल पाणी दिनो व्योपार) निलच्छण कम्मे (बलदा दिक ने अंकावया, डाम दिराना ) दागदावणया (चन ममुख में'लाय लगाना ) सर दह तलायपरिसासणया ( तालान आदि ने सोखावो) असई जण पोसणया (कुत्तानादि हिंसक जीवने पोष्या होय ) तस्समिच्छामि दुक्कड ।। इति ॥ ७॥ “पाठमोअनर्थदंड विरमण व्रत-चउबिहे (चार प्रकार) पएणते (प्ररूप्यो ) जहा, धृवज्माण चरिय ( खोटा ध्यान- धरना)पमाय चरिय (प्रमाद करना ) हिंसपयाणं (प्राण- हिन्सा ) पावकम्मो वएस (पापकर्म का उपदेश) एवा अनर्थ दएह सेवयंरा पचक्खाण, नावग्जीवाए, दुविह तिविहेण न करमी न कारवमि ‘मनसा वयसा कायसा । ( एवा पाठवा अनर्थदड विरमणवत के विष,जे कोई प्रतिचार लागो होय से ।
,
पज्जुसामि, एगविहं विनिहेण न करेमि मनमा वयसा कायसा
एसी मारी श्रद्धा प्ररूपणा तो छ फरसणा करू तेवारे सिद्ध ।
[एवा दसमा देसावगासि यत के विष जे कोई अतिचार लोगो
होय तो पालोउ. नेमी भूमिका थी वस्तु वारथी भणाई होय
मोकलाई होय, शब्दकरी रूपकरी दल नखिों भापो जगायो
(१७)
थालोउ, कंदर्प की कथा कीधी होप, भड कुचेष्टा कांधी होय,
सुखर पचन बोल्या होय, अधिकरण जोडी मुक्पा होय,
पभोग परिभाग मधिका वधारया होय तस्समिच्छामि दुक्कई ।।
॥ इति ॥ ८॥
नवमासामायिक व्रत-सावज जोग पच्चक्खामि, जाब-
नियम पण्जुमासामी दुविड विविहेण न करेमि न फाराम
मनसा वयसा कायसा एवी मारी श्रद्धा मरूपणा तो छ फरसण
करू तेवारे सिद्ध । ( एवा नवमा मामायिक प्रतके विपे जे कोई
अतिचार लागो होय तो आलोउ, मन वचन कायारा जोग
पाहवे ध्यान प्रवर्वाया होय, सामायिक में सम्भालना नहीं कीधी
होय, अणपूगी पाडी होय तस्स मिच्छामि दुफड ॥ ६ ॥
दसमा देसावगासिक व्रत-दिन प्रति प्रभात थकी
प्रारमी ने पूर्वादिक छः दिश की जेटली भूमिका मोकली राखी
के ते उपरान्त स्वइच्छायें कायायें जई ने पांच माधव द्वार सेवण
का पचक्याण । जाव अहोरत्त दुविद तिविहेण न करेमिन
कारनेमि मनसा वयसा कायसा, ते माहिं द्रव्यादिक नेमकी
मरजादा कीधी छै ते उपरान्त भोगणरा पचक्याण । जाव दिवस
.
होय तस्स मिच्छामि दुकड ॥ १० ॥
(१८) इग्यारमा पोपध व्रत-अमण (श्राहार) पाणं (पानी) खाइम ( मेवादिक ) साइम ( पान सुपारी यादि) का पच- क्साण, असम (मैथून ) सेवण का पचक्खाण, अमुक मणि सोवन का पचरवाण, माला वग ( गुलाल रग श्रादि ) विले. पण का पचरसाण, सत्थ ( हथियार ) मुसलादिक सावज्ज (सावध ) जोग का पचरसाण, जान अहोरचं पज्जुवासामि, दुविह तिनिहेणं न करेमि न कारयेमि मनसा वयसा कायसा, एवी मारी श्रद्धा प्ररूपणा तो छ फरसणा करू तेवारे सिद्ध ।। एमाइग्यारमा पोषध व्रत के पिप जे कोई अतिचार लागो होयतो श्रालोउ, पोसा में सज्जा सथारोन जोयो होय, मार्ग तरे जोयो होय न पूज्यो होय, माटी तरे पूंज्यो होय, उच्चार, पासवण भूमिका न जोई होय. माठीतर जोई होय, न पूजी होय, माठीतरे पूजी होय, पोसा में निद्रा, विकथा प्रमाद कीधो होय तस्स मिच्छामि दक्कड़ । जायता अवसही आरसही नही किधु होय, श्रावता निसिही निमिही नहीं कीधु होय, इद्र महाराजरी आज्ञा नहीं लीधी, होय, थोड़ी दूर पूज्या होय, घणी दूर परठी होय, परठन तीन चार चीसरे २ नहीं कीधु होय तस्म मिच्छामि दुकड़ ।। ११ ॥ बारमा अतिथीसंविभाग व्रत-साधु निग्रथ ने पासुरपणीक शुद्ध, अमण पाण, खाइम, साइम, वन्थ, पडिग्गह (पात्र) कपल, पायपुन्छणेण (पैर छने का ) पीढ़ (पाट ) फलग । (वाजोट आदि ) मिजा ( पाट, स्थानक, ) सथारो ( तृणा दिक) औपध, भेषज (चुर्णादि ) प्रतिलामतो थको विचरू एवी मारी श्रद्धा प्ररूपणा तो छ फरसणा करू वेवारे सिद्ध ।
다. (१६) [एवा चारमा अतिथि सविभागवत के विपैजे कोई अतिचार लागो होय ता पालोउ, सूजता वरतु सचित्त ऊपर मूकी होय, . सचित्त करी बांकी होय पोतेरी वस्तु पारकी कहीं होय, मह- फार माप दान दीधु होय, थोडो देघणो पोमायो होय, भोजन वेला टालीने निमन्त्रण कीधी होय तस्स मिच्छामि दुक्कर ॥१२॥ . संलखणा की पाटी। . एमा संलसणा के पंजे कोई अतिचार लागो होय तो बालोउ, इहलोगा समप्पउगे ( इस लोग में इच्छा करके मैं राजा होउ ) परलोगा ममप्प उग (परलोग में सुस की इच्छा फरे कि मैं देवता होवु ) जीपिया समप्प उगे ( जीवित की इच्छा ) नरणा समप्प उगे ( मरण की इच्छा करे कि में दुःख से छुटु) काम भोगा ममप्प उगे ( कामभोगनी इच्छा करें) मा मज हुन्ज मरण ते ( ये उपरोक्त विचार मरणान्त तक नहीं होने ) श्रद्धा प्ररूपणा में फरक आयो तो तस्स मिच्छामि दुक्कड़॥ तस्स धम्मस्स की पाटी। तस्स धम्मस्म फेवलिपरास्स (केलि भापित एवा पारक धर्म ने ) अम्युट्टिउमि (सव रीत पालन करने के लिये उठा हू । पाराहणाए (आराधना के लिए ) निर उमि विरा इणाए (विराधना करवा यकी में पिरम्यो । विविहेण
(२०)
।
( तीन विधि करी) पडिक्क तो (प्रतिकांत थका इतना
अतिचार पाप थकी निवयों) वंदामि (मैं नमस्कार करता
हु) जिणे च उन्नीस (चौवीस जिनराज को)।इति ।
-
तस्स सव्वस्स की पाटी।
-
1
तस्स सबस्स (चे सब) देवसियस्स ( दिन समधी)
अइयारस्स (अतिचार ) दुम्मासिय ( खराब माया)
दुञ्चितिय (खोटी चिन्तवना पालोयते (पालोउ) पहिकमामि ।
चत्तारी मंगल का पाठ ।
-
चत्तारी (चार), मगल ), अरिहता मगल, सिद्धा मगल,
साह ( साधु ) मगलं केवलि पनचो ‘धम्मो , मगलं
( केवलि प्ररूप्यो धर्म ते मगल ) चचारि लोगुत्तमा ( चार,
लोगा में उत्तम) अरिहतो लोगुत्तमा सिद्धा लोगुत्तमा, केवलि
पन्नत्तो धम्मो लोगुत्तमा चत्तारि सरण पवज्जामि (ग्रहण
करता हूँ) अरिहन्ते सरण परज्जामि, सिद्धमरण पवग्जामि,
साहुसरण पवज्जामि, केलिपन्नत्त धम्म सरण पवज्जामि ।
अरिहतारो सरणो मिद्धारो सरणो, साघारी सरणो, केलि
प्ररूपित दयाधमरो सरणो। चारसरणां दुर्गति हरणा, भौर
सरणो नहीं कोय । जे भन्यप्राणी आदरे तो अक्षय अमर
पद होय ॥ इति ॥
.
.
(२१)
अठारे पापस्थानक का पाठ।
अठारे पापस्थानक आलोउ, प्राणातिपात, मृपावाद,
अदत्तादान, मैथुन, परिप्रह, क्रोध, मान, माया, लोम, राग,
द्वेष, कलह, अव्याख्यान (बड़ा आल देना) पैशुन्य (चुगली
खाना ) पर परिवाद ( दूसरेका अपगुणवोलना) रति अरती
(हर्प शोक करना ) माया मोसो ( कपट सहित मुठ बोलना)
मिय्यादर्शन शल्य ( सेटिी श्रद्धा तथा सल राखना) ए
अठारे पापस्थानक सेब्या होय सेवता प्रति मला जाण्यो होय
तस्स मिच्छामि दुफड़ ॥ इति ।
॥खमासण की पाटी।।
; इच्छामि ( मैं चाहता हु ) खमासणो ( हे समा श्रमण )
चंदिउ (वादणे कू जाणिज्जाए (शक्तिकरयुक्त ) निसीही
पाए (जीनहिंसा रहित प्रयोजन वाला मेरे शरीर से ) अणु
जाण्ह ( मुझको हुक्म देशो) मे (मुझको) मिउग्गह
(प्रमाणयुक्त क्षेत्र में प्रवेश करने ) निप्सीहि ( दूसराफामछोडके)
श्रहो (नीचे झुक के ) काय ( काया से ) कायसफास (आ
पके पान काया से ) खमाणि ( स्पर्श करता हू ) जोमे (माफ
करना) किलामो (हेमगरत आपको खेद उपजाया होय )
अप्पकिलताण (थोडी ग्लानि ) बहसुमेण ( बहुत समाधि
भार से) मे (हे पूज्य ) दिवसो (दिन ) वइकतो (वीताहै )
जत्तामे (तपनीयम सजम स्वा-याय रूप यात्रा) जवाणज्जच
( २२ )
चि
( इद्रिय और नो इद्रिय से खेदरहित आपका शरीर )
(हे भगवन् ) सामेमि (खमाता हु ) खमासमणो देवमि
पडक्कम । दिन सम्बन्धी अपराध ) आवसिमाए (प्रापश्य
क्रिया ) पडिकमामि ( मै निवर्तता हूं) समासमणाण (स
धुओं की) देवसियाए (दिन में हुई ) अासायणाए (पाशातन
हुई हो) तेतीसन्नयराए ( तेतीस पाशातना में से) जी-
जो कुछ ) मिच्छाए (मिथ्याभाव रूप आशातना) मर
दुक्कडाए ( मन सबन्धी पाप बय दुक्कडाय (वचन संवन्ध
पाप) काय दुक्कडाय। शरीर सम्बन्धी पाप ) कोहाए (क्रोधरू
अशातना मारणाए (मान आशातना) मायाए (माया आशातना
लोहाए (लोभ आशातना) सब्बकालियाए । सब काल सम्म
न्धी) सबमिच्छोययाराए (सन मिथ्या उपचार पाशातनाक
के ) सधधम्माइस्कमणाए ( सब धर्म करणी उल्लापने रूप,
आसायणाए ( आशातना करने से ) जो मे ( जो मेरे जीन ने
अइयारो (अतिचार ) को ( किया होय ) तस्स ( उसका)
खमाममणो पडिक्कमामि ( मै प्रतिक्रमता हूं ) निंदामि ( प्रात्म
से निंदता हु) गरिहामि (गुरु की साक्षी निन्दता हु (अप्पाण
मरी पापी आत्मा को) बोसिरामि ( मै छुडाता हु) इति ॥
॥पंच पढां की वंदना
T
नमो अरिहताण कहता पहिले पद जघन्य २० तार्थकर
जी, उत्कृष्टा १७० तीर्थकर जी, ३४ अतिशय ३५ वाणी करने
-
(२३)
चिरानमान, १००८ लक्षण का धरणहार, १८ दोप रहित, १२
गुण करी सहित, अनता ज्ञान, अनतो दर्शन अनतो सुख,
अनता नल, दिव्य धुनि भामण्डल फटिक सिंहामन, पाशोक
वृक्ष पुष्पष्ठि, देवदुमि छा धरे चामर विज चौमठ इन्द्रारा
पूजनीक महनिदेह क्षेत्र में जेचन्ता पिचरें, जघन्य २ कोड केवली
उत्कृष्ठा कोड केवली. केवलज्ञान, केवल दर्शन करीने विरा-
जमान, सर्पद्रव्यक्षेत्र, कालभाषना जाणनहार, ज्या महापुरुषा
ने मारी वदना मालूम हुई जो तिक्यूत्तरे पाठ सु ।
॥ सवैया ॥
नमु श्री अरिहत, कर्मों को कियो अत,
हुमा सो केवल पथ, करुणा भडारी है।
अतीशचौतीस धार, पैतीस पाणी उच्चार,
समभावे नर नार, पर उपकारी है।
शरीर सुदर श्राकार, सूरज मो झलकार,
गुण है अनत सार, दोप परिहारी है।
कहत है तिलोक रिख, मन, वच, काया करि,
लली लली वारवार, वन्दना हमारी है ।
ऐसे श्री अरिहत भगवन दीनदयाल महराज को अविनय
आशातना कीधी होय, तो (देपी, या, रायसी ) सबधी हाथ
जोड़ी, मान मोड़ी, काया सकोची नारवारसमाता हू. मत्थएण
चदामि । नमस्कार करता हु १००८ वार तिक्सुत्तो के पाठ सु
मन वचन काया करीने, श्राप मांगलिक हो, उत्तम हो, हे स्वामि-
( २४ ) नाथ आपको इण भव, परमव, भव भर सदा काल सरणे हुई जो ॥ इति ।। चीजे पद ममो सिद्धाण कहता सिद्ध भगवान १५ मेदे, १४ प्रकारे सिद सिद्धा८ गुणा करी विराजमान जठे जन्म नहिं, जरानहीं, मरण नहीं, रोग नहीं, शोक नहीं, मोह नहीं, माया नहीं का नहीं, काया नहीं, चाकर नहीं, ठाकुर नहीं, निरजन निरा- कार, जोत में जोत विराजमान, अनतो सुख में मिलरया, ज्या महापुरुषाने मारी वन्दना तिक्खुत्ता के पाठ से हुई जो । ॥ सवैया॥ . . म सकल कर्म टाल, वश कर लियो काल, मुक्ति में रहा माल, आत्मा कु तारी है । देखत सकल भाव, हुआ है जगत राव, सदा ही क्षायिक भाव, भय अधिकारी है। अचन्न अटल रूप, यावे नहीं भव कूप, अनूप सरूप उप, ऐसे रिदधारी है। कहत है तिलोक रिख, बताओ ए वास प्रभु, सदा ही उगते सूर चन्दना हमारी है ॥२॥ ऐसे सिद्ध महाराज आपका भविनय आशातना कीधा होय, तो ( देवसी रायसी सम्बन्धी ) हाथ जोड़ी मान मोडी काया संकोची पारम्बार खमाता ह । मत्थएण वंदामि १००० पार तिक्खुत्तारे पाठ सं मन, वचन, काया करी ने आपको भव भव सदा काल सरणो हुई जो।
तीजे पद नमो पायरियाण कहना आचार्यजी महाराज,
३६ गुणा करी विराजमान ५ प्राचार पाले, ५ इद्रिया जीते,
५ महारत पाले, ४ कपाय टाले, ६ बाड शुद्ध शीलवत पाले
५ सुमति सुमता ३ गुप्ति गुप्ता, अनेक गुणा करी विराजमान,
८ सम्पदा सहित ज्यां महापुरुषोंने मारी पन्दना हुई जो
तिक्खुत्तारे पाठसु।
--
सवैया-
-
गुण है छतीस पुर, धरत धर्म उर,
मारत कर्म कुर, सुमति विचारी है।
शुद्ध सो प्राचारवन्त, सुन्दर है रूप कंत,
भणिया समी सिद्धान्त, वाचणा सु प्यारी है।
अधिक मधुर वैण, कोई नहीं ला केण,
सकल जीवों का मेण, किर्तिमपारी है।
कहत है तिलोस रिस, हितकारी देत सिख,
ऐसे प्राचारज ताकु वन्दना हमारी है ।। ३ ।।
ऐसे प्राचार्यजी महाराज
सरणो हुई जो।
चौथे पद नमो उवज्झायाण कहता सर्व उपाध्यायजी
महाराज २५ गुणा करी ने विराजमान, ११ अग १२ उपांग
आप भणे पाराने भणारे १४ - पूर्वना पाठी, करण सत्तरी,
चरण सत्तरी ना धरणहार, थेवर डिगते प्राणी ने धर्मरे विषय
स्थिर करणहार, गणां सुनना पाठी को जाणनहार, ज्या महा-
पुरुषो ने मारी चन्दना विक्युत्ता के पाठ सु मालूम हई जो।
.
-- ( २६ ) सवैया पढ़त इग्यारे अंग, कर्मा सु करें जग पासड़ी को मान भग, करण हुशियारी है। चनदे पूर्वधार, जाणत अागम सार, भावियन के सुखकार, भम्रता निगरी है। पढ़ाने भविकजन, स्थिरकर देत मन, तपकरी तावे तन, ममता निवारी है। कहत है तिलोख रिख, ज्ञान भानू परतिख, ऐसे उपाध्याय ताकु वन्दना हमारी है। ऐसे उपाध्यायजी महाराज मिथ्यात्व रूप अन्धकारन मेटन हार, समकित रूप ना उद्योत करण हार, धर्म थकि डिगते प्राणी ने स्थिर करणहार, इत्यादिक अनेक गुणा करी निराज- मान ऐसे उपाध्यायजी महाराज मत्थएण वदामि । मे पद नयो लोए सव्यमाहुण कहता सब परकार्य साधन हार पोताना धर्माचार्य ( यहा पर अपने अपने गुरु का नाम लेना ) जी महाराज जघन्य २ हजार क्रौड साधु साधी, उत्कृष्टा ह हजार का साधु साध्वी अढाई द्वीप, पनरे क्षेत्र में जेवन्ता विचरे २७ गुणा करी ने विराजमान, ५ महाव्रतपाले, ५ इन्द्री जीते ४ कपाय टाले भव सच्चे, करण सच्चे, जोग सच्चे, मनसमाधारणिया, वय समाधारणिया, काय समाधारणिया नाण सपन्ने, दसण सपन्ने, चारित्त सपन्ने क्षमायत, वैराग्यवत, पेदनी समा अहिया सणिया, मरणंत कष्ट सहे, पाच -
५२ अनाचार टाले, ५२ दोष टाली ने आहार पानी लेने
४७ दोप टानी ने भोग के, २२ परिसाजीते, १७ मैदे शुद्ध
सजम पाले, १२ भावना माने, १२ भेदे वप फरे, १० यति
धर्म ना धारक, अनेक गुणां करी ने विराजमान, वस्त्रपात्र,
श्राहार स्थानक निर्दोष भोगने, भगत की आज्ञा माहि विचरे
ज्या महापुरुपो ने मारो वदना मालूम हुई जो तिक्ता के
पाठसु।
[सवैया]
पादरी सजम भार, करण करे अपार,
सुमति गुप्तिधार, विकथा निवारी है
जेयणा परे छ, काय साधान गोले वाय,
बूझाइ कपाय लाय, किया भडारी है।
ज्ञान भण पाठों जाम, लेरे भगरत नाम,
धर्म को करे काम ममता को मारी है।
कहत है तिलोख रीख, कर्मों को टाले निस,
ऐसे मुनिराज ताक, दना हमारी है ।
(श्रीगुरुदेवने)
जैसे कपड़ा को थान, दरजी येतत प्राण,
खडग्वड करे जाण, देतसो सुधारी है।
फाटके ज्यू सुत्रधार, हेमक कम सुनार,
माटी के को जो कुमकार, पान कर त्याग है।
धरती के कीरसाय, लोहे के लुहार जाण,
सीलवाट सीला पाण, घाट घड़े भारी है।
।
(२८) केन है तिलोक रीस, सुधारे ज्यु गुरु शीप, गुरु उपकारी, नित लीजे पलिहारी है ॥१॥ गुरु मित्र, गुरु मात, गुरु सगा, गुरु तात, गुरु भूप, गुरु भ्रात, गुरु हितकारी है। गुरु रवि, गुरु चन्द्र, गुरु पति, गुरु इंद्र, गुरु देव दे पाणद, गुरु पद मारी है। गुरु दिठत शान ध्यान, गुरु देत दान मान, गुरु देत मोक्ष धान सदा उपकारी है। केत है तिलोकरीख, मली मलीदानी शिस, पल पल गुरुजी को, चंदणा इमारी है ।।२।। - .
( २६ ) अनंत चोवीसी स्तवन अनंत चोवीसी जे नम्, मिद अनता क्रोड़। केवल ज्ञानी गणधरा, वद् कर जोड़ ॥ १ ॥ दो कोड़ केवल धरा, पिहरमान जिन वीश । सहस्त्र युगल क्रोडी नमू साधु नमू निश दीश ॥ २ ॥ धन सावु धन सामी, धन श्री जैन धर्म । हण समरया सकट कटे, टूटे आठो कर्म ।। ३ ।। अरिहत सिद्ध सिमरू सदा, आचार्य उवझाय । साधु सकल के चरण को, वद् शीश नमाय ॥ ४ ॥ लोभी गुरु तारे नहीं तिरे सो तारणहार । जो तू तिरवो चाहिये, निलोभी गुरु धार । ५॥ सत्य मत छोडो हे नरा, लक्ष्मी चौगुनी होय । दुख सुख रेसा कर्म की, टाले टले न कोय ॥ ६॥ विन्न हरण मगल करण, घन श्री जैन धर्म । इण समरया सकट कटे, टूटे पाठों कर्म ॥ ७॥ पायरिय उवज्झाए का पाठ। पायरिग (आचार्य) उवज्झाए ( उपाध्याय ) साँसे (शिष्य । साहम्मिए ( साधर्मिक ) कुलगणे (कुलसमुदाय) म (सबके ऊपर ) जे (जो) मे (मारेजी) फेह ( कोई ) कसाया (क्रोधादिक कपाय कीधा होय) सम्बे (सर) तिवहेगा .
( ३० ) - (त्रिविध करी ) खामेमि (खमाता हूं ) समस्म समणमंघस्स मगरयो (सन अमण संघ रूप भगत ना जो अपराध किया होय ) अंजलि करिय सीसे ( मस्तकपर दो हाथ जोड़ कर ) सब समानता ( उन सर अपराध प्रत्ये खमाची ने ) समामि समस अयपि ( मै उन सब अपराधोंको समाता हू ) सध्यम जीव रामिस्स ( एकेंद्रियादिक सब जीवनी राशि ) भावो (भारथी ) धम्म ( धर्म । निहिय (निधित करयु । नियचित्तो (निज चित्त) सम्बं समावहताखमामि सबस्स अहमपि ।। इति ।। श्रावकों से क्षमत क्षमावणा करने का पाठ । अढाई द्वीप पन्नरह क्षेत्रमाहे श्रावकजी * जीवका जाण, अजीर का जाप, पुण्य का जाण, पापका जाण, श्रावका जाण, सनरका जाण, निरा का जाण, नव का जाण, मोक्ष का जाण, दान का देने वाला, भावनाका भावने वाला, वड़ा श्रानकजी ने % हाथ जोड़, मानमोड, बार चार समाचू , छोटा ने समुच्चय वारवार समाव छु ।। इति ।। चौरासी लाख जीवयोनि का पाठ । सात लाख पृथ्वीकाय, सात लाख अपकाय, सात लाख तेउ- काय, सात लास वायुकाय, दशलाख प्रत्येक वनस्पति काय चौदह लास साधारण वनस्पतिकाय, दो लास वेन्द्रिय दोलाख तेइन्द्रिय दो लास चरिंद्रिय, चार लाख नारकीय, चारळास देवता, चार लास तिर्यच पंचेंद्रिय चौदह लास मनुष्य की जाति * श्राविकाओं को " श्रावक "शब्दके स्थान में “ श्राविकां" कहना चाहिए। . --
(३१)
पार गति चौवीस दडक, चौरासीलगख जीवयोनि में से कोई
जीव ने जाणता अजाणता मन वचन काया करी ने हएप होय,
इणायो होय इणता प्रत्ये भलो जाएयो होय, तो १८२४१२०
प्रकारे * तस्स मिच्छामि दुक्कई ।। इति ।
सर्व जीवराशि क्षमाने का पाठ ।
खामेमि (खमाता हु ) सन्ये जीना ( मर जीनों को )
सन् जीया खमतु में (सब जीव मेरे अपराध को माफ करो)
मिती मे सन्म भूएयु ( मित्रता है मेरे सब जीवों मे ) वेरमझन
केणइ ( वैर भार मेरे नहीं किसी से )एव मह ( इस तरह में)
आलोइअ (प्रकाश किया) निदिय (निंदाग) गराहय ( गुरु
सन्मुग्ब गईणा करी) दुगीछय (दुगन्या करी) सम्म ( अच्छी-
तरे ) तिमिहेण पडिकतो (निविध पतिक्रमता हुया । वदामि
(नमस्कार करता हु ) जिणे चउब्धीस (जिन चौबीसोंको ॥ इति ।
समुच्चय पच्चक्खाण का पाठ।
गठि महिय, मुष्टि माहिय, नरकारमी, पोरमी, साढा पोरसी
पाप आपनी धारणा प्रमाणे तिविहपि, चउधिहपि, आहार,
श्रमण, पाण,साइम, साइम, अन्नत्थणा, भोगेण, महमागारण,
महत्तरागारेण सयसमाहि.वत्तियागारेण, वोमिरे+वोसिर । इति।।
प्रतिक्रमण सूत्र समास
-
प्रात काल को सदा ही 'राइमि' और मायकालको देवास
तथा पापी चतुर्मासी सवत्सरी, को देवसि पक्पा श्रादि तस्स
मिच्छीम दुकट के पहले ही उसके साथ में कहना ।
+नाप स्वयमेच करे जय योसिरामि २ बोराना।
( ३२ ) प्रतिक्रमण करने की विधि निर्जीव स्थान में शुद्धतापूर्वक एक आमन पर बैठकर तीन वार तिखुत्ते के पाठ से श्री मंदिर सामीजी को या वर्तमान में अपने गुरु महाराज को खड़े हो वदना करके चौबीसत्यव की आज्ञा लेकर चौवीसत्थ करे । फिर तिक्खत्त के पाठ से तीन बार वदना करके ( राइम या दैवसि, देवसिपक्सी, देवमि चतुर्मासी, देवमि संवत्मरी प्रतिक्रमण करने की आज्ञा है, इसप्रकार कह प्रथम 'इन्छामिणं मते, का पाठ कह नमोकार मन्त्र का एकवार उच्चारण करे । तत्पथात् तिम्लते के पाठ से चदना कर 'प्रथम आवश्यक करने की आज्ञा है' ऐसा कह प्रथम आवश्यक करे ।
मन्त्र कहकर-ध्यान पारे । तत्पश्चात प्रथम सामायिक आवश्यक समत" इस माति कहकर तिक्खुत्ते के पाठ से बदनाकर, "दूसरा यावश्यक की आज्ञा है' ऐसे उच्चारण करने के पश्चाद द्वित्तीय श्रावश्यक करे। [द्वितीय श्रावश्यक] द्वितीय आवश्यक में 'लोगम्स' के पाठ का प्रगट पाठ करे। फिर सामायिक चौवीस्थर दो आवश्यक समत्त, ऐसे कहकर तिक्खुत्ते के पाठ से पदना कर तीसरा आवश्यक की आज्ञा है इसप्रकार भाषण करने के पश्चात् तृतीय श्रावश्यक करे। [तृतीय आवश्यक] उत्तीय आवश्यक में दोनों घुटने ऊंचे कर हाथ जोड़ 'इच्छामि खमासमणे के पाठका दोवार पाठ करे । फिर 'सामायिक चौवीसत्यन, वदना, तीन आवश्यक समत्त, ऐसे कंह 'तिक्मुत्त' के पाठ से वदना कर" चौथे आरश्यक की आज्ञा है, इस भांति उच्चारण करने के पश्चात् चतुर्थ श्रावश्यक करे । [चतुर्थ आवश्यक ] 'चतुर्थ श्रावश्यक में वोही १७ पाठ, जिनका प्रथम भार- श्यक के कायोत्सर्ग में चितवन किया था. प्रगट उच्चारण करे। फिर तिक्खुत्ते के पाठ से बदना कर 'श्रावक सूम की आज्ञा है' ऐसा कहकर 'तस्स सबस्स' का पाठ उच्चारण करे । तत्मवाद जीवणा घुटना ऊचाकर हाथ जोड़ "नमोकार मत्र" को एक बार उच्चारण कर निम्नोक्त ३१ पाठों का उच्चारण करें- " 1
( ३४ )
(१) करोमि भते (२)चचारि मगलं (३)इच्छामिठामि
(४) इरियावहियाए, (५) आगमेतिविह. (६) दर्शन
सम्पन्न रन (७-३०) बारह मणुव्रत और उनके बारह स्धूत
(३१) सलेखना।
फिर एम समकितपूर्वक पारहवत सलेखणा सहित ।
एहने विषे जे कोई अतिक्रम, व्यक्तिकम, अतिचार, अनाचार,
जाणता, अजाणता, मन, वचन, काया ये करी सेव्यो होय'
सेवायो होय, सेवता प्रत्ये भणुमोया होय, तो अनंता सिद्ध
केरली नी साखे (राइसि, देवसि, देवसि पक्खी, देवसी चतु-
मौसी, देवसि संवत्सरी सम्बन्धी) वस्स मिच्छामि दुकडं ।
फिर अठारह स्थानकू और' 'इच्छामि ठामि' के पाठ बोले ।
फिर खड़ा होकर 'तस्स धम्मस्स' का पाठ उच्चारण करे।
तत्पश्चात् दानों घुटने ऊचे कर हाथ जोड़ 'इच्छमि खमासमणों'
का पाठ विधियुक्त दो चार पठन करे । फिर दोनो घुटने ऊधे
कर मस्तक को पृथ्वी से लगा दोनों हाथ जोड़ पांच पदों की
.
r
वदना करे।
तत्पश्चात् “अरिहन्तजी, सिद्धजी, प्राचार्याजी, उपाध्यायजी
साधुजी, जे भीमहावीर स्वामीजी की माज्ञा में विहरे छे, तेने सर्वने
म्हारी बदना नमस्कार हुई जो" ऐसे कह सीधे पन बैठ "अनन्त
चौबीसी" वोले।
-
फिर 'पायरिय उवमाएं' का पाठ कह, श्रावकों' (या
भाविकाओं) से क्षमत नमावणा करने का पाठ पढ़ें, बाद में,
।
चौरामी लाख जीवायोनि, का पाठ कह कर 'सर्वजीवराशि' का
पाठ उच्चारण करे।
फिर सामायिक, चौवीसत्वच, वंदना, प्रतिक्रमण, ए चार
भावश्यक सम्मत्त' एमे कह तिक्खुत्ते के पाठ से पदना कर
'पाचरी आवश्यक की आज्ञा है, इसप्रकार भाषणकरके पचम्
भावश्यक करे।
(पंचम श्रावश्यक)
पंचम भावश्यक में (देवसि या राइसि, देवसि, पक्सी
देवसि, चतुर्मासी, देवसि संवत्सरी ) ज्ञानदर्शन चरित्ता चरित
तप अतिचार पायच्छित पिशोधनार्थ करेमिकाउस्सग ऐसा कहे ।
फिर नमोकार मंत्र करेमिभते का पाठ, इच्छामि ठामि
का पाठ और तस्स उत्तरी का पाठ पूर्ण कहकर कायोत्सर्ग करे ।
कायोत्सर्ग ( ध्यान में ) नित्य लोग्गरस के पाठ का
चार वार चिंतन करे। फिर नौकार मत्र बोलकर ध्यानपारे।
बाद में 'लोगरस' का पाठ कहकर इच्छामि खमासमणों का पाठ
दोनों घुटने ऊचे कर हाथजोड़ विधिवत् दो बार उच्चारण करे।
* पूज्यश्री रतनचन्दजी महाराज की समदाय में सदाही
चार लोगस्सका ध्यान करने की प्रणाली है।
फा,सप्रदायों में पती फो ११ चातुर्मासीको १० और सब
स्सरी को ४.लोगस्स'का ध्यान करने की आम्नाय प्रचलित
चिशेष जैसी जिसकी मानाय हो उसी प्रकार फरें।
। ~ - (३६ ), चादमें 'सामायिक' चौवीसत्थव, वंदना प्रतिक्रमण कायोत्सर्ग, पांच आवश्यक समत्तं,, ऐसा कहे तिक्खुते के पाठ से चंदना कर, छठा ( पच्चक्खाण) आवश्यक की भाज्ञा है। इसप्रकार कह छठा आवश्यक इस प्रकार करे । (छठा आवश्यक) छठा आवश्यक में सड़ा हो साधूजी ( साध्वीजी ) महा राज की उपस्थिति में उन से शक्ति अनुसार करे, पचक्खाय करे । तथा उनकी अनुपस्थिति में समुच्चय पच्चक्साण के पाठ से पञ्चक्खाण करे। बिर सामायिक, चौवीसत्थव, वदना, प्रतिक्रमण, कायो- त्सर्ग, पचक्याण. छः आवश्यक समत्त। ऐसे कह एछ। पान श्यक माही जाणता, अजाणता, जे कोई अतिचार दोप लाग्यो होय तथा पाठ उच्चारतां कानों, मात्रा, अनुस्वार, पद अक्षर अधिका हाणो, आगो, पीछो, कहा होस तो तस्समिछामि . - मिथ्यात्वनो पडिकमणो, अबत नो पढिक्कमयो, ममाद- नो पदिकमणो अशुभयोग नो पडिकमणो कपायनो पडिक्कमणो ए पांच पडिक्कमणा माहिलो कोई पडिक्कमणो नहीं कीधो होय तस्स मिच्छामि दुक्कड । गया काल को पडिकमणो वर्तमान काल को सवर तथा सामायिक श्रावता कालका पञ्चखाण, ते माही जे दोष लाग्यो होग तस्स मिन्छामि दुक्कड़ ।
-
इसपकार दोनों हाथ जोड फिर नीचे बैठ हवा घुटना
ऊचा रख, दो नमोत्थुण, देवे । तत्पथात् श्री मदिरस्वामीजी,
धर्माचार्यजी तथा उपस्थित साधू ( साध्वी) जी सरको विधि
युक तिनुते पाठ से बदना करे ।
फिर विद्यमान श्रावकों (श्राविकामों) से चमचमावणा
करे। बाद में चैविासी स्तवन उच्चारण करे ।
-
PRAANALN
SASINADNS BSURDILAB
प्रतिक्रमण विधि सम्पूर्णम्
9999999999999999999
.
-
-
-
- । बादमें: 'सामायिक' चौवीसस्थव, वंदना प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग, पाच आवश्यक समत्तं ,, ऐसा कहे विक्सुते के पाठ से चंदना कर, छठा ( पच्चक्खाण ) आवश्यक की मात्रा है, इसप्रकार कह छठा आवश्यक इस प्रकार करे । (छठा आवश्यक) छठा आवश्यक में खड़ा हो साधूनी ( साध्वीजी ) महा राज की उपस्थिति में उन से शक्ति अनुसार करे, पञ्चक्खाय करे । तथा उनकी अनुपस्थिति में समुच्चय पच्चक्खाय के पाठ से पचखाण करे । जिर सामायिक, चौवीसत्थव, वदना, प्रतिक्रमण, कायो त्सर्ग, पचक्याण. छः आवश्यक समत्त । ऐसे कह ए छः आर श्यक माही जाणता, अजाणता, जे कोई अतिचार दोप लाग्यो होय तथा पाठ उच्चारतों कानों, मात्रा, अनुसार, पद अक्षर. अधिका. हीणो, धागो, पाछो, कदा होस चो तस्समिच्छामि - . • 'मिथ्यात्वमो पडिकमणो, अत्रत नो पढिक्कमणो, ममाद- नो पडिकमणो अशुभयोगनो पडिकमणो कपायनो पडिक्कमणो ए पांच पडिक्कमणा माहिलो कोई पडिक्कमणो नहीं कीधो होय तस्स मिच्छामि दुक्कड ।। गया काल को पडिक्कमणो वर्तमान काल को सवर तथा सामायिक प्रावता कालका पच्चखाण, ते माही जे दोष लाग्यो होय तस्स मिन्छामि दुक्कर ।
" - इसपकार दोनों हाथ जोड फिर नीचे बैठ डांवा घुटना ऊचा रख, दो नमोत्थुण, देवे । तत्पश्चात् श्री मदिरस्वामीजी, धर्माचार्यजी तथा उपस्थित साधू ( साध्वी ) जी सरको विधि युत तिक्खुते पाठ से वदना करे । फिर विद्यमान श्रावकों (श्राविकाओं) से क्षमततमावणा करे। बाद में चौबासी स्तवन उच्चारण करे । - m- प्रतिक्रमण विधि सम्पूर्णम् PMRRRRRRRRESS
चौवीसी स्तवन
भी श्री ऋषम भजित संभव अभिनन्दन, सुमति पर
सुपार्श्व मुनिरजन, चदाप्रभुजिनदेवो । सुविधिनाथ शीतलगुण
गाऊं, श्री श्रेयोस वासु पूज्यजी ने ध्याऊ श्री विमल सुनिर्मल
देवो । भनन्त धर्म श्री शांतिजिनेश्वर, कुथुनाथ अति ही अल
वेसर, वद् श्री महनायो। मलिनाथ मुनिमब्रत स्वामी, श्रीनमि-
नेमपार्श्व भतरयामी, श्री मुक्ति तणां दातारो । चौवीसा भी
वीर जिनेश्वर, पर उपकारी साहिन श्री परमेश्वर, पहुचा है
निर्वाणों । इन चौवीसारा नित्यगुण गावे, दुखदरिद्र तेना
दर पलावे, वर्ने कोई कल्याणी । पुण्ययोगे मानव भव लाधो,
भी चौबीस जिनवरजी भाराघो, तुम लामो लेगोजी तुम लाभा।
ए चौवीस मजो सिरनामी, श्री मोटा प्रभु साहिब भवरमामी,
सकि तण दातारो ।। इति ।।
२४ तीर्थंकरों के नाम ।
(१)श्री ऋषभदेवजी (भपरनाम) श्रीआदिनाथजी.
(२) श्री मजिवनाथजी (३) श्री संभवनाथजी
(४) श्री भमिनन्दनजी (५) श्री सुमतिनाथजी
(६) श्री पमप्रभुजी (७) भी सपाननाथजी
(८) भी चन्द्रप्रभुजी (६) श्री सुविधिनायजी (भपर
नाम) श्री पुष्पदन्तजी
:
(१०) श्री शीतलनाथजी (११) श्री श्रेयांसनाथजी
(१२) श्री वासुपूज्यजी (१३) श्री विमलनाथजी
(१४) श्री अनतनाथजी (१५) भी धर्मनाथजी
(१६)थी शातिनाथजी (१७)श्री कुधनाथजी
(१८) श्री अनाथजी (१६) श्री मलिनाथजी
(२०) श्री मुनिसुव्रतनी (२१) श्री नेमिनाथजी
- (२२) श्री अरिष्टनेमिजी ( २३ ) श्री पार्श्वनाथजी
(२४) श्री महावीर स्वामी ( श्रीवर्तमानजी)
२० विहरमान के नाम
(१) श्री मदिरस्वामी (२) श्री जुगमदिर स्वामी
( ३ ) श्री वाहूजी स्वामी ( ४ ) श्री सुबाहूजी स्वामी
( ५ ) श्री सुजातस्वामी (६ ) श्री स्वयम्भुजी स्वामी
(७) भी पमानन्द स्वामी ( ८ ) भी अनन्तवीर स्वामी
(६) श्री सूरप्रभु स्वामी (१०) श्री वजूधर स्वामी
(११) श्री विशालधर स्वामी (१२) श्री चद्रानन स्वामी
(१३ ) श्री चन्द्रबाहू स्वामी (१४) थी भुजग स्वामी
(१५) श्री ईश्वरस्वामी
(१६} श्री नेमप्रभु स्वामी
(१७) श्री वीरसेन स्वामी
(१८) श्री महाभद्र स्वामी
(१६) श्री देवयश स्वामी
(२०) श्री अजितवीर स्वामी
११ गणधरों के नाम ।
(१) श्री इन्द्रभूतिजी (२) श्री अग्नितिजी
(३) श्री वायुभुतिजी
(४) भी गितभूतिनी'
. । - गाथा-सचित दवं विग्गइ, वाह तयौल पत्य कुसुमेसु । (४०) (१) श्री सुधर्मा स्वामी . (६) श्री मडी पुत्रजी (७.) श्री मोरीपुत्रजी (८) श्री अकपितजी. (8) श्री अचलजी (१०) श्री मेतारजजी (११) श्री प्रभासजी। १६ सती के नाम । (१) श्री ब्राझीजी (२) श्री सुन्दरजी (३) श्री कौशल्याजी (४) श्री सीताजी (५) श्री राजमतीजी (६) श्री कुताजी (७) श्री द्रोपदीजी (८) श्री चंदणाजी (8) श्री मृगावतीजी (१०) श्री चळनाजी (११) श्री प्रभावतीजी (१२) श्री सुभद्राजी (१३) धी दमयाजी (१४) श्री सुलसाजी (१५) श्री शिवाजी (१६) श्री पद्मावतीनी २४ तीर्थकर, २० विहरमान, ११ गणधर, १६ सती को त्रिकाल घदना नमस्कार हो जो, तिरखुतो जाव मत्थरण पदामि। चौदह नियम । । - 7 १ १ 'वाहणं सर्यण विलेण, पर्भ दिसि-3' ॥अर्थ॥ १सचितः-('जिसमें जीव सत्ता/ नमक
(४१)
-
-
२) द्रव्य-जितनी चीज मुह में जावे उतने द्रन्य-जल,
मजन, दांतन, रोटी, दाल, चावल, कढ़ी, साग, मिठाई,
पूरी, घी, पापड, पान, सुपारी, चूरन, मसाला श्रादि ।
३) विगयः-१० है-जिनमें से मधु, माम, माखन, और,
मदिरा ये ४ महाविगय अभक्ष होने से, श्रावक को सदा
के लिये अवश्य त्याग करने चाहिए और श्रावक के खाने
योग्य हैं, घी, तैल. द्ध, दही, गुड़, खाड और पकवान
पूरी प्रादि कढ़ाई में तले जाय वह ।
(४) उपानहः-जूता, यूना, स्लीपर, मोजा आदि (जो पाच
-
में पहने जाय)
,
-
(५) तंयोल:-पान, सुपारी, इलायची, लोंग, पान, काममाला
भादि।
(६) वत्थ:-पान, पगड़ी, टोपी, साफा, अंगरखा, चोगा, कुरता
घोता, पायजामा, दुपट्टा, चदर, अगोछा, रूमाल, आदि
मरदाना और जनाना कपड़ा (जो प्रोदने पहनने में
आवे)
(७) कुसुमेसुः-फूल फूल की चीजे जमे सेहरा, हार, गजरा,
अचर (जो सूधने में माने) आदि ।
(८) वाहन:-(मवारी) गाही, फिटन,हाथी घोड़ा,रघ,पालखी,
डोली, मोटर, साइकल, रेल, ट्राम्य, नाव, जहाज, स्टीमस
बल्न प्रादि यानि वैरता फिरता चलता मौर
उड़ता
"
-
(8) शयन:-कुरसी, पलग, गादी, तकिया, बिछोना, तखत
मेज, सुसाशन आदि ( सोने या बैठने की चीजें ।
(१०) विलेपन:-तेल, केशर, चन्दन, तिलक, सुरमा, काजल
उपटन, वालवनाना, कघा श्रादि (जो चीज शरीर
लगाई जावे)
(११) यंभ (ब्रह्मचर्य):-स्त्री पुरुष को सुई डोरे के न्याय
तथा बाह्य विनोद की सख्या कर लेना चाहिये । श्राव
परस्त्री त्याग और स्वस्त्री से ही संतोष रखे, उसका में
प्रमाण करे, इसीप्रकार स्त्रियों को भी समझ लेना चाहिये
(१२) दिसि (१० दिशा):-इतने कोस 'लम्चा चोद
ऊंचा, नीचा, जाना, आना, चिट्टी, तार इतने कोस मेजन
माल और आदमी, इतने कोस भेजना तथा मगाना ।
(१३) न्हाण (स्नान ):-शरीर से स्नान इतना बा
करना (छोटो स्नान ) हाथ पैर इतनी बार धोना
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(१४) भतेसुः-मशन पान खादिम स्वादिम ये चारों आहार
में से खाने पीन में जितनी चीजे श्रावे ।
(चवदे नियम समासम् )
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- - (४३) श्रीपूज्य पञ्चक समन्त्र प्रातस्मरणीय प्राकृत स्तोत्रम् ॥ सिरोमणि सु पुंगवी, गुण रयण सजुत्तो रयणचदो मुणी ।। जिस सासण उज्जोयर, गच्छनाहो अन्नाय सूवन्न । १॥ आँ हाँ तेलोकास, कुरु कुरु साहा मत सिद्धि होउ ।। पसस्थ भुणि धम्न घरो, तुझ निम्मल पहावत्तो सया ॥२॥ गुण सायरो गभीरो हमीर इय सुनाम धेघराइयो । पियोंगच्छमाहु सयल, कल्लाण रासिय देउ मवीण ।। ३ ।। मुणिो ओं ही हाँ हँ असि, पाउसा साहा मंतो अयामझ मणम्मि चिन्तियं अज्जे ज्जा गुण गरिम गच्छायरियो ॥४॥ पचायार पवीणो, पचा सब पाप मल्ल उद्घो। मगल कजोडिमल मुणी, कप्प तरु- मिन पुरेउ इच्छिय य॥५॥ों ही हूँ नमोअरिहताण, इयजप्पे ऊण जासिद्धी । साएव सुहपुरस्सर, तुझ ज्झाणाओ मज्झहा ज्जा॥६॥नाण दसण मजुचो, तवो गुणुत्तर विणय चदोमुणी। तीय पडिक्ख गुणन्नू, विजिय विसमसर हिक्ख नाणपसरो ॥७॥ मरणबधण विमुक्ट्ठ, चहयोससार पिसम विसयसुहो । ॉ. हाँ हूँ हाँ स्वाहा, सिद्धो सिग्ध ममाण होउ मतो ॥८॥ माम भिगवनेहिं । पूइ अ चलण नलिणो गुण समुदो । चिन्तामणि रयण भूअ, सोभाचदो मुणि समिगणणाहो ॥ ६ ॥ आँ नमो सिद्धाण, मतो भाउ सुहयर सिद्धिउ ।। तुइनामप्प हावत्तो. सयल सतियर य भविजीपाण ॥ १०॥ इय मुणिगण गणिमाला, मगल कुणेउ जपमाणाण | धम्मवर सजमाग" देउममाण मिवमदिर पुज्जा ॥ ११ ॥ नकलकर्ता इति पुज्य पञ्चक समन्नस्तो प्राकृत भाषाकत श्रीदुःखमोचन মামা समाप्तम् (४६ ) ।। श्री शांतिनाथजी को स्तवन ।। M साता चरते जी । श्री शांति नाम से मुझ मन हरसेनी || सातागटेर शांति नाम है कल्प तरु सम, मन वछत फल पावे जी। रोग शोक दालीदर चीता, सब मिट जावे जी ॥ साता॥१॥ मेघ पाणी से जवु वरक्ष का, सब फल तो गल जावे जी। वैसे भापका नाम समरण से, दुःख टल जावे जी । साता. १॥ मन के लिये जैसे मेरुयादीक दूर कभी नहीं मासे जी। आप नाम से रोधी सपदा, आवे पासे जी । साता० ३ ।। सागर क्षीर समुन्दर मीठो, रसायन अमृत मीठो जी। इनसे अधीको मीठों शातिजिन, नाम जो दीठो जी।। साता०५॥ पाप नाम दीवाली दसरो, सुस सपत के दाता जी। आप नाम धन तेरस मारे, गरमें साता जी ।। साता० ५ ॥ शाति नाम से म्हारे मनम, अति आनद जो छावेजी। लक्ष्मीदेवी मारा घर में, दौंडी पाने जी ।। साता० ६ ॥ आप नाम चीतामणी पावे, चीता सब भगजावे जी । कामधेनु म्हारा घरमें दुजे, सब सुस भावे जी ।। साता७ ।। सवत उगणी से साल छीहतर चींचबड गामज पाया जी। कार्तिक मास धन तेरस के दिन, मानद पाया जी ।। साता०८ मोतीलाल मुनी मोहन मुरत, पूज्य श्री सुसकारे जी । आपको बदन करता, बारमवारे जी ।। साता० ॥ इति ।। 1 ( ४७ ) ॥ धन्दाप्रभुजी को स्तवन ।। चंदपुरी नगरी भलीरे महासेण राय उदार, लिखमा राणी 'दीपति ज्यारे कूख लियो अवतार चंदा प्रभू मो मन भावेर दनो देव दायन प्रापरे ॥ चन्द ॥१॥ ससारना सुख भोगनोरे जाण्यो ससार असार मने बेरागे पाणने प्रभु लीधो सजम भार ॥ चन्द ॥२॥ चन्द आनन्द सदा करेरे पातक जावे दूर, चन्द मजे ससार तरे तो जारे कर्म अकूर ॥ चन्द ॥ ३ ॥ सुर नर असुर विद्याधरु रे इन्द्र करे ज्यारी सेव, मोटाराणा राजवी ज्यान नमे असख्याता देव ।। चन्द ॥ ४ ॥ और देव घणा देखियारे, जठे घणां जीवांरी घात कहो जीकां करो कुण चहे ज्यारे लागी चिन्तामणी हाथ । चन्द-५ चन्द सरीसो कोनहीरे में जोयो सर्व ससार, ओर डबोये ससार मेरे, मोने चन्द उतारे पार ।। चन्द ॥ ६ ॥ पाणी अमृत सारखी जाणे खीर समद को नीर वाणी सुन हीया में घरे तो उतरे भाजळ तीर ।। चन्द ॥ ७ ॥ चन्द प्रभु मरणे आवियोरे, हाथ जोड करू अरदास, कृपा करि शिव दीजिये, रतनचन्द तुमारो दास ॥ चन्द।।.। पूज गुमाननन्दजी गुरु मेठिया, पणा पाम्यो हर्ष हुलास, समत भठोर पचासमें, कियो, साहापुर सहर चोमास ॥ चन्द ।। - - ॥ इति ।
(१६ ) ॥ श्री शांतिनाथजी को स्तवन ।। L साता चरते जी। श्री शांति नाम से मुझ मन हरसेजी ।। सातागटेर शांति नाम है कल्प तरु सम, मन वंछत फल पावे जी। रोग शोक दालोदर चीता, सब मिट जावे जी ।। साता० ॥१॥ मेघ पाणी से जघु घरक्ष का, सर फल तो गल जावे जी । वैसे भापका नाम समरण से, दुःख टल जावे जी ।। साता० १॥ मन के लिये जैसे मेरुयादीक दूर कभी नहीं मासे जी। आप नाम से रोधी सपदा, आवे पासे जी ।। साता० ३ ।। सागर क्षीर समुन्दर मीठो, रसायन अमृत मीठो जी। इनसे अधीको मीठों शातिजिन, नाम जो दीठो जी।। साता०५॥ पाप नाम दीवाली दसरो. सुख सपत के दाता जी । आय नाम धन तेरस मारे, गरमें साता जी ।। साता० ५। । शाति नाम से म्हारे मनमें, अति आनद जो छोवेजी। लक्ष्मीदेवी मारा घर में, दौसी थारे जी ॥ साता०६॥ आप नाम चीतामणी पावे, चीता सब भगजावे जी । कामधेनु म्हारा घरमें दुजे, सब सुख मावे जी ॥ साता७ ॥ सवत उगणी से साल छीहतर चींचबड गामज पाया जी। कार्तिक मास धन तेरस के दिन, भानद पाया जी ।। साता०८।। मोतीलाल मुनी मोहन मरत, पूज्य श्री सुसकारे जी। सीस आपको बदन करता, बारमवारे जी ॥ साता०६ ॥ इति ।। . , 4 ॥ बादाप्रभुजी को स्तवन ।। चदपुरी नगरी भलीरे महामेण राय उदार लिखमा राणी दीपति ज्यारे कृरख लियो अवतार चदा मभू मो मन भावर दुजो देव दायन आपरे ॥ चन्द ॥१॥ समारना सुख भोगीरे जाण्यो ससार असार मने रागे प्राणने प्रभु लीधो सजम मार ॥ चन्द ॥२॥ चन्द प्रानन्द सदा करेरे पातक जावे दूर, चन्द मजे ससार तरे तो जावे कर्म अकूर ॥ चन्द ॥३॥ सुर नर असुर विद्याधरू रे इन्द्र करे ज्यारी सेव, मोटाराया राजवी ज्यान नमे असख्याता देव ॥ चन्द ॥ ४ ॥ और देव पणा देखियारे, जठै घणां जीवांरी धाव कहो जीकां करो कुणनहे ज्यारे लागी चिन्तामणी हाथ। चन्द-५ चन्द मरीसो कोनहारे में जोयो सर्व ससार, और डबोये ससार मेरे, मोने चन्द उतारे पार ॥ चन्द ॥ ६ ॥ पाणी अमृत सारखो जाणे खीर समद को नीर वाणी सुन हीया में घरे तो उतरे मत्रजन तार ॥ चन्द ॥ ७ ॥ चन्द प्रभु सरणे पारियोरे, हाथ जोड करू अरदास, कृपा करि शिव दीजिये, रतनचन्द तुमारो दास ॥ चन्द।। पून गुमाननन्दजी गुरु मेठिया, पणा पाम्यो हर्ष इनास, समत मठोर पचासमें, कियो, साहापुर सदर चौमास ॥ चन्द । . . - ६॥ इति ।
। . , . - , । । ॥ श्री शांतिनाथजी को स्तवन । साता परते जी। श्री शांति नाम से मुझ मन हरसजी। साताटेर शाति नाम है कल्प तरु सम, मन वछत फल पाये जी । रोग शोक दालीदर चीता, सब मिट जावे जी ॥ साता ॥१॥ मेघ पाणी से जबु वरक्ष का, सर फल तो गल जाये जी। वैसे भापका नाम समरण से, दुःख टल जावे जी । साता०१॥ मन के लिये जैसे मेरुयादीक दूर कभी नहीं मासे जी।. आप नाम से रीधी सपदा, श्रावे पासे जी । साता० ३ ॥ सागर क्षीर सान्दर मीठो, रसायन अमृत मीठो जी। इनसे अधीको मीठों शातिजिन, नाम जो दीठोजी।। साता०५॥ माप नाम दीवाली दसरो, सुख सपत के दाता जी । आप नाम धन तेरस मारे, गरमें साता जी ।। साता० ५ ॥ शाति नाम से म्हारे मनम, अति आनद जो छोवेजी। लक्ष्मीदेवी मारा घर में, दौंडी आवे जी ॥ साता० ६ ॥ आप नाम चीतामणी पावे, चीता सब भगजावे जी । कामधेनु म्हारा घरमें दुजे, सर सुख भावे जी ।। साता७ ।। सरत उगणी से साल छीहतर चींचबड गामज आया जी। कार्तिक मास धन तेरस के दिन, मानद पाया जी ।। साता०८॥ मोतीलाल मुनी मोहन मुरत, पूज्य श्री सुखकारे जी। सीस आपको बदन करता, चारमवारे जी ॥ साता०६॥ इति ।। - ~ . - कहो जीफों करो कुपनहे ज्यारे लागी चिन्तामणी हाथचन्द ५ (४७) ॥ बन्दाप्रभुजी को स्तवन || वदपुरी नगरी भलीरे महासेण राय उदार, लिखमा राणी दीपति ज्यारे लियो अवतार चदा प्रभू मो मन भावेर दुनो देवदायन पायो । चन्द ।। १ ।। ससारना सुख भोगीरे जाएयो ससार भमार मने वेराग पाणने प्रभु लीधो सजम मार ॥ चन्द ॥ २ ॥ चन्द मानन्द सदा करे पातक जावे दर, चन्द मेरे ससार तरे तो जावे कर्म अकूर ॥ चन्द ॥ ३ ॥ मुर नर असुर विद्याधरु रे इन्द्र करे ज्यारी सेन, मोटाराणा राजी ज्यान नम श्रमख्याता देव ॥ चन्द ॥ ४ ॥ भार देव घणा देखियोरे, जर घणा नीचारी घाव चन्द मरीखो कोनहारे में जोयो सन ससार, और डोरे समार मेरे, मोने चन्द उतारे पार ॥ चन्द ॥ ६ ॥ चाणी अमृत मारखी जाणे खीर समद को नीर. वाणी सुन हीया में घरे तो उतरे भाजक तौर ॥ चन्द ॥७॥ चन्द प्रभु मरणे पारियोरे, हाथ जोड करू अरदास, कृपा करि शिष दीजिये, रतनचन्द तुमारो दास ॥ चन्द।। पूज गुमाननन्दजी गुरु मेठिया, घणो पाम्यो हर्ष हुलास, समत अठोर पचासमें, कियो, साहापुर सहर चौमास ॥ चन्द ॥ . ६॥ इति । ।
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(४८)
। ॥ लघु साधु वंदना ॥
साधूनी ने वदणा नितनित कीजे, मह उते सूर रे । प्राणी,
नीच गांव में ते नहीं जारे, पामे रिदि भरपूर रे प्राणी ।
साधूनीने वदणा नित२ कीजे ॥१॥ म्होटाते पच महाव्रत पाले
छकायरा प्रतिपालेर प्राणी, भ्रमर भिक्षा मुनि सूजती लेवे,
दोष बयालीस टालेरे प्राणी, साधुजी ने वदणा ॥ २ ॥ द्धि
सपद मुनि कारमी जाणी, दीधी ससार ने पूठरे प्राणी, या पु
स्पारी सेवा करता आलु कर्म जावे तूटरे प्राणी, साधुजीने वद.
णा ॥३॥ एक एक मुनिवर रसनारा त्यागी, एक एक ज्ञानरा
भडाररे प्राणी. एक एक मुनिवर व्यावचीया वैरागी ज्यारागुणा
रो नाही पार रे प्राणी, साधुजी ने वंदणा॥ ४ ॥ गुणसतावीस
करीने दोपे, जीत्या परीमा बाईसरे माणी, बावन तो अनाचार
टाले, ज्याने नमावु म्हारो शीपरे पाणो, साधूजीने वदणा ।।५
जाज समान ते सत ऋषिश्वर, भवी जीवे पैठा पायरे प्राणी
पर उपगारी मुनि दाम न मागे, देवे ते मुक्ति पहोचाय रे प्राणी
साधुजी ने बदणा ॥ ६ ए सरणे प्राणी साता पावे, पावे ते
लील विलासरे पाया, जन्म जरा ने मरन मिटाये, फिर नहीं
आवे गर्भवासरे प्राणी, साधुजी ने वंदण। ।। ७॥ एक वचन
जो सद्गुरु केरा राखे जो मनमाहि रे प्राणी, नर्क निगोद में
ते नहीं जावे इम कहे जिनराजरे पाणी, साधुजीने बंदणा ||
उठी उत्तम प्राणी, सुणे साधुरो पखापरे प्राणी.
सेवा करता पाये ते अमर विमाण रे पाणी,
18 | समत पठारे ने वर्ष अठावीसे बूसी गाम
र प्राणी, मुनि श्राशकरणजी इणि परे बोले हु उतम
दास रे प्राणी, साधुनी ने बदणा ॥ १० ॥ इति ॥
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. (४६ ) "श्री. पूज्य श्री रतनचदजी महाराज रागुणांरी ढाल । ॥चौपन चौमासा दोहा--कुल बडजाती श्रावगी, उपना मुनी रतनेस | मवं जीया तारण तीरण चापा देश विदेश ।। १ ।। ।" संजम चवदा वरस का, लीदो जग सुख त्याग । चौमासा चौपन कीया, ते दाखु पर राग ।। २ ।। ॥ ढाल || मोटी हो जग माहे माहणा या देसी।। सायपुरे बड़ादरे भीलोडे हो दोय तान चौमास । कीधा देश मेवाड़ में, बुध नीरमल हो, पडिया गुरु पास ॥ १॥ रतन मुनिसर मोटका, जीन मारग रो कीघो उद्योत । जा पुरपारा प्रसाद थी, मैं पामी हो शुद समकीत जोतारतना।२ मादा मींदर बड़लु रीयां, रायपुर ने हो जेपुर सुब ठामे। एक एक पांचुही नगर में, चोमासे ही लीदो विसराम, रतन ॥३॥ चार चार अजमेर मेरते, किशनगढ़ में हो दोय तीन पीपाड़ ।। दास नगी ने पाली गारे कीया, जोधाणो हो चौमासा यार रतना रया चौपन चत्रमास में, मवीयाने हो तारिया समजाय । पुर पाटन पिचरिया घणा, वसु पावन कीघो मुनीराय रतन ५॥ मुनी मडल नागोर में, चौमासो हो चौपनमो कीध । रीया पीपाड़ पधारिया, तन चेष्टा हो बड मसलीखवीण रतन ६ गढ़ जोधाणे नरस तपे, हिन्दवाणा हो सुरज तखतेस । देश दीवाण पुरमा नीलो, मानीजे हो मुधो लखमेस ।। रतन मुथाजी श्री लीवमर्माचदजी -एक जोधपुर में प्रसिद्ध दीवान होगये हैं, आप सच्चे परम दयालु गुरुमत थे, आपने भी स्थानुरूः घासी जैनधर्म का बात ही उद्योत किया। 1 . -- सण आगमै सतगुरुतणो, मन हरकीया:हो करीये दीदारी अरज करी दरवार में, हुतो जाम हो रीया पीपाड़ || रतन ॥८॥ मुं कारण नरप पृछीयां, कर जोड़ी हो जपे दीवाण!; मुनि रतनेस पधारिया, बडा पडित हो तीन मतना जाण रतन पाल ब्रह्मचारी,मोटा तपस्वी, निरलोभी हो उत्तम गणखांन । धरम भाचारज,म्हारे, जासु दरसन हो, होवे कोड कन्याणारतन१० धरमारथ पक्ष जाण ने, भले जायो हो कीधो भूपाल । सज कर ततक्षीण नीमरीया गुरु बादीया हो निज नेयण नीहाल ११ पड़ा सीससु चरचा करी, गुरु आगल हो चीनचे लखमेसें । पूज्य जोधाणे पवारीये, पीचरणा रोअवसर नहीं लेस ॥ रतन१२ श्रीमुप-कहे जाणीजसी, सुन समजीया हो मन हरस अपार। गुरु वादी घर भावीया लोरा सु हो, मुनि कीधोवीहासा रतन ।। चैत्र कृष्ण पक्ष अष्टमी, जोधाणे * हो दाखल रतनेश । विनयचद रहे पूज्यरा, जीणे सुनी हो लेला उपदेशे ।। रतन ।। . ॥ मुनि श्री चंदनमलजी महाराज का स्तवन । चाल देसी-बलिहारी है सनगुरुजी आपका ज्ञान की जी।। वन्दै चन्द हो चन्दन मुनि को भारसजी, जन्मे पचम पारे भविजन के 'सुभाग्य से जी ।। टेरें ।। जन्म हुआ या गाम मरुधर देश में जी, श्रोगवश पिता पछराज। धरते धर्म ध्याने शुभ साज, करते गरीब जीव के काज वन्द ॥१॥ मोधाणे को जोधपुर कहते हैं जो मारवटि की रोजधानी है। -- ( ५१ ) माना रिदीलाई धी, आपकी जी रखती धर्म विषय में प्यार । पाले शापिका नतमार, मनमें निशदिन विमल विचार ।। चन्द्र शुभ.स्सम देखा.निज मेज में जी, यह समधा अधिक रसाल। नन्मे कुवर अधिक सुकुमाल, चन्दन नाम अमित गुण नाल ।यन्द। वाल वय उग्नीसे बीममें जी, पलमी कृष्ण जेष्ठ का माम । लिये सयन गुरुजी पाम, पाली नाम शहर में खास ॥ वन्दु ॥ विनय भक्ती करी गुरुजी पास में नी, ननगये श्राप शास्त्र भहार । भनिजीवों के बने साधार, निर्मल पाले मुनि आचार ॥ चन्द ५॥ जान अश्च बढ़े तपते गले जी, दिये दुष्ट कर्म को मार । मनमें शुद्ध भावनाधार, बाल ब्रह्मचारी लिहाररावन्द ।।६।। गच्छ-मानस सरोवर रूप है जी, जल है ज्ञान क्रिया निरधार । ममा सन्त तरंग पिचार, जिममें दया कमल सुससार विन्दु ॥७॥ मुनि आचार सुगन्धी के लोभ मे जी, माये माल भ्रमर सुखकार। वती करते मुनि याचार, केई जन लेते प्रत को घार।। वन्दू०८॥ यम-नियम रूप मच्छ धुमते जी, है यह मानसरोपर महान, चन्दन, मुनि हम मम जान, क्रीडा,करते ये गुणवान ।। बन्दू० ६ ॥ जमे तप्त पुरुष अंग उपरे जी, चन्दन लेप परम सुखदाय । शीतल होती उसकी काय, जाते तन मन अति हुलसाय वन्द १०॥ वैसे भक्तजनों के चित में जी, वमते चन्दन मुनी का नाम । मिटते तन मन ताप तमाम, होते सिद्ध सभी मन काम ॥वन्दु ११॥ चन्दन मुनिवर के मुसचद्र को देखके जी, हर्पित होने भनी चकोर। श्रावे दौड़ी आपकी ओर, करते मधुर गुणों का शार विन्दू१२॥ पेठे, सिंहामन पाणी वागरेजी, सुनकर मधुर वचन का शोर । । हमें भविजन रूपी मोर, चिस गाने शनि की मोर यन्।३॥
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तारामध्य शोमे निमंचदा शिष्य वृन्द में 'तिम मनिन्दाजी, मनि आप बालब्रह्मचारी, जिनके गुण की बलिहारी ॥२॥ जल मीन के जैमे आधार, वायु जिमी सब ससारजी । तिमी आप सकल जन धारी, जिनके गुणं की बलीहारी ॥३॥ जिमी माता सुत को पाले, तिमी पापगच्छ सभाले जी। मुनि तन के उग्र बिहारी, जिनके गुण की पलीहारी ॥४॥ आप सदा चिरजीव रहना, भवीजन मन हर्पित करना, यही सब चाहवे नर नारी, जिनके गुणकी पलिहारी ॥शा इति ॥ मुनिगुण स्तवन ॥ प्यारे पूज्य बड़े गुणधारी है, भारतन सम्प्रदाय जारी है गटेस। सोमाचन्दजी महा विद्वान, तसु शिष्य सोभीत है सुजान । मुनि भोजराज ब्रह्मचारी है। प्यारे ॥ १ ॥ अमरवद सूनों के जान, लामचदजी शशि समान । सागर अानाकारी है ॥ प्यारे ॥ २ ॥ लालवद क्षमा के सागर, हसतीमल बहु गुण रतनागर । चोयमल सुसकारी है। प्यारे ॥ ३ ॥ लखमीचदजी का चित्त हुलास, विद्या का करते अभ्यास । हसराज * ये अर्ज गुजारी है। प्यारे ॥ ४ ॥ सम्बत् उगणीसे अस्मी साल कार्तिक माम है पडा रसाल । शुद्धी तेरस को घुयारी है ॥ प्यारे ॥ १ ॥ यह श्रीमान 'स्वर्गीय सेठ सुग्मलवदजी करणवट के पुत्र है भाप कार्यता, स्तवन और छन्द पाहत अच्छे और सुन्दर बनाते हैं भाप की ऊमर इस समय २१ वर्ष की है, "यथा नाम तथा गए भाप स्थानकवासी जैन है और जोधपुर निवासी है।
ज्ञान घोड़े पे कर अमवारी श्री ॥ २ ॥ सुमलो व्याख्यान, चतुर सुजान, दया दान । घट में क्षमा करो अंगीकारी श्री ॥३॥ सीसो तुम ज्ञान, तज अमिमान, क्षमता । है। मुगुरु,सखि करो स्वीकारी मो ॥ ४॥ ॥उपवेशकालावन। -पेतन रखना अब हुशियारी भो ।। टेर ।। मानुप अवचार, पायो सार समर्कित धार प्यार करलो पर उपकारी श्रो॥१॥ कर्मो के सग, करलो जग, होनी सग। .. - . पाई चोर, करते शोर, अतही जोर । तपजप माल को लेत चुराई ओ ॥ ५ ॥ गफलत से जाग, रख राग, ममता त्याग । प्यारे ज्ञान की कर रखपाली श्रो॥६॥ कहे इसराज, सारो काज, धर्म की जहाज । माही पैठ होवो भवपारी श्रो॥ ७॥ इति ॥ ॥ पूज्य श्री शोभाचन्दजी महाराज का स्तवन । राग-समदण जांगला धारी बलिहारी हो। पूज्य शोमात्रदजी जागांता प्रापरी बलिहारी हो । टेर ।। पड़े पुनमन्त, महा गुणवत। उत्तम सन्त थारी कीरती इधक अपारी हो । पूज्य ॥१ , . . पडित विद्वान, गुणरी खान, चतुरै सुर्जान । श्राप करते हों पर उपकारी हो ॥ पूज्य ॥ २ ॥ देवो उपदेश, तजकर द्वेर्प, कमी को पर्श । इस तन को लिया जगाली हो ।। पूज्यं ॥ ३ ॥ सूत्रों के जाण, शुद्धं व्यायानं देवो ज्ञान । सुनकर ममन्न भय नरनारी हो ॥ पूज्यं ॥ ४ ॥ पच महानत पालो दोपण टालो, कुजर गत चालो। इरंजा को देख सभारी होगा पूज्य ॥ ५॥ सज्जन कर सेव, पावो मेंव है गुरु दें। । 'एतों प्रगट हुए अनतारी हो । पूज्य ॥६॥ सोहत जग मान, अवसर जान, विनती मान । श्राप कियों चौमासा सुखकारी हों। पूज्य ॥ ७ ॥ कर हमपर मेहर, आये शहर, ज्ञान की लहरें। थारी लागी है माने अति प्यारी हो । पूज्यं ॥८॥ हसराज यह गावे, सेवा चान, सीस नमावे। दीजो मोय भपदाधि तारी हो । पूज्य ॥ ६ ॥ इति । . . । ॥श्री नेमिनाथजीका स्तवन । मभुजी जीवाला धारी पलिहारी हो (टेर) सेवा की नदे, आनंद कदै, उगतं च । जग में आपहुएं ब्रह्मचारी हो । प्रभु०१॥ यदुपति पका पूरत है डका नहीं कोई शकी, धिन धिन तुम अवतारी हो ॥२॥ h - ए ( ५६ ) मायुधशाला जावे, संख बजाव.। कृष्ण घबराने, प्रावत कर ललकारी हो । प्र०३॥ कृष्ण वाय पसारी, नमायडारी । नेम पसारी लटक गये गिरधारी हो ॥ प्र०४॥ कृष्ण मन सकुचावे. राज यों जावे । भ्रात समझाये परणाश्रो एकनारी हो ।। ३०५ ॥ कृष्ण महल सिधावे, नेम बुलावे । व्यार मनावे, जान, बनाये, हदमारी, हो । प्र०.६ ॥ वनो अति सोचे, मनड़ो मोवे । प्रसन्न चित्त हो, मगल गावे नर नारी हो ॥ प्र०७।। पशु करत पुकारी, करुणा धारी। त्यागी है नारी, चढगये गढ़ गिरनारी हो । प्रा॥ गावे हसराज, अहो जिनराज । सारो काज थाने पन्दू वार हजारी हो । प्र०६॥ इति - " - -- ॥श्री पार्श्वनाथजीका स्तवन । मणमू पार्श्वजिनन्द सुखकारी हो ॥ टेर ।। अश्वमेन राय, मोमा माय, तिन कुख आय । माप प्रगट भये अवतारी हो ॥मण०१॥ चिन्तामणि जान, अविचल भान, मेरु समान । एतो करते हैं उपकारी, हो । ० २ ॥ गगातट जाय कमठ हटाय, नाग बचाय । प्रभुजी किया है सुरअवतारी हो । प्र.३ ।। . -- सोवणी लागे, माताजी दुलराने ।। ६॥ (५७) सजम चित्त लाय, केवल पाय, कर्म खपाय । प्रभूजी पहुता है मोद मजारी हो ॥ प्र.४॥ महो जिनराय, प्रणमु पाय, मन हुलसाय । हंसराज यह भरज गुजारी हो । प्रणः ५ ॥ इति ॥ पालनो। . रतन जड़तरो पालनीयो कोई रेसम सेती पनीयो रे कोई । जग जननी ने जनीयोरे माताजी कुलरावे. नेमजीने रागसुनावरे॥१ कोई सोनारी सांकल लवे कोई पालनीये वधावे । कोई अदवीचे सुपर टोकरे. माताजी हुलरावे ।। २ ।। कोई सिर पर टोपी मेले कोई अधर हात सु झेले । नानदियो बालक सेलेरे माताजी हुलरावे ॥ ३ ॥ मनगमतो चालक सेलेरे माताजी हुलराने. नेमजीनेरागमनावरे कोई खोलामें खिलाने, कोई काजलटीकी देवे । कोई काना में यात केवरे, माताजी हुलरावे ॥ ५ ॥ कोई हाता में डुलरावे, कोई पालीनया पोटावे । कोई कड़ियां ध पिलावेरे, माताजी हुलरावे ॥ ६ ॥ कोई गीरी गांदोडा लारे, काई घेवरिया छटावे । . कोई खाजा लाइ लावेरे माताजी हुलरावे ॥ ७ ॥ कोई चकरी भार लाव, कोई नीरद कली रिझाये। कोई घुघरिया धमकाये, माताजी हुलराये ॥ ८ ॥ कोई चमक नींदसु जागे, कोई रिमझिम करतो भागे। पारी सुरत . । ( ५६ ) आयुधशाला जाये, संख बजावे । कृष्ण घबराने, आवत कर ललकारी हो ।।.प्र.३।। कृष्ण पाय पसारी, नमायडारी। नेम पसारी लटक गये गिरधारी हो । प्र०४॥ कृष्ण मन सकुचाये, राज यों जावे । भ्रात समझाव परणाश्रो एकनारी हो । ०५॥ कृष्ण महल सिधावे, नेम बुलावे । व्याच मनावे, जान,बनाये, इदमारी हो ॥ प्र०६॥ वनो अति सोवे, मनड़ो मोये,, प्रसन्न चित्त होवे, मगल गारे नर नारी हो ॥ प्र०७॥ पशु करत पुकारी, करुणा धारी । त्यागी है नारी, चढगये गढ़ गिरनारी हो । प्रा॥ गाचे हसराज, श्रहो जिनराज । सारो काज थाने पन्दू बार हजारी हो ॥ ३०६ ॥ इति . . " । - r- ॥ श्री पार्श्वनाथजीका स्तवन ।। मणमू पार्श्वजिनन्द सुखकारी हो ॥ देर ।। अश्वमेन राय, मोमा माय, तिन कुख आय । माप प्रगट भये अवतारी हो । प्रण० १॥ , चिन्तामणि जान, अविचल मान, मेरु समान । एतो करते हैं उपकारी, हो । २॥ गगातट जाय कमठ हटाय, नाग-चाय । प्रभूजी किया है-सुरअवतारी हो । म. ३ ॥ --
(५७)
सजम चित्त लाय, केवल पाय, कर्म खपाय ।
प्रभूजी पङता है मोत मजारी हो । प्र.४॥
महो जिनराय, मणमु पाय, मन हुलसाय ।
हंसराज यह भरज गुजारी हो । प्रथम ५ ।।
इति॥
पालनो।
रतन जड़तरो पालनीयो कोई रेसम सेती पनीयो रे कोई ।
जगजननी ने जनीयोरे माताजी दुलरावे नेमजीने रागसुवांपरे॥१
मोई सोनारी साकल लवे कोई पालनीये यधावे ।
कोई अदबीचे झुंबर टांकेरे. माताजी हुलरावे ॥ २ ॥
कोई सिर पर टोपी मेले कोई अघर हात सु झेले ।
नानदियो बालक सेलेरे माताजी हुलरावे ॥ ३ ॥
उनगमतो चालक पेलेरे माताजी हुलरावे. नेमजीनरागसुबावरेट
कोई खोलामें खिलावे, कोई काजलटीकी देवे ।
कोई काना में बात केवरे, माताजी हुलरावे ॥ ५ ॥
कोई हाता में दुलरावे, कोई पालीनया पोटावे ।
कोई कड़ियां ध पिलावरे, माताजी हुलरावे ॥६॥
कोई गीरी गांदोड़ा लावे, काई घपरिया छटाये।
कोई खाजा लाडू लावेरे माताजी हुलरावे ॥ ७ ॥
कोई चकरी भरा लावे, कोई नीरद कली रिझाये।
कोई घुपरिया धमकारे, माताजी हुलरावे ॥८॥
कोई चमक नींदसु जागे, कोई रिमझिम करतो भागे।
पारी सुरव सोवणी लागे, माताजी हुतराने ॥६॥
. (५८) कोई नचद सनाजोगे, कोई रीध पामे पुणजोगे। कोई करणीरा फल जाणेरे, माताजी हुलराने ॥ १० ॥ कोई करणीरा फल पावरे,माताजी हुलरावे नेमजीने,रागसुवावरे११ , " - . . ॥ श्री जंबु स्वामीजी रो स्तवन ।। राजगीरीनो वासीयोजी जवु नाम कुमार ।। यभदत्तजीना टी रोजी, भद्राजारी माय ॥ जंबु कह्यो मान लेरे, जाया मत लेवो सजम भार ॥ १॥ देसी सुधर्मा स्वामी पधारीयाजी, राजगीरी रे माय ॥ कोणीक वंदन चालीयाजी, जवुजी वदन जाय || जबु॥२॥ भगपत वाणी वागरीजी, सर्व जिवा हितकार ।। वाणी सुणी पैरागियाजी, जापयो अथीर ससार । जचु ।। ३ ।। घर आया माता कने जी बोले' वारंवार । अनुमत दीजो मोरा मातजी, में तो लेसु मजमभार । जंबु ॥४॥ ऐ देसी माता मोरी सांभलाय, जननी लेसु सनम भार ।। ऐ आठोई कामनीयारे, जंबु अबछररे ऊनियार ।। परनि ने किम परिहरो, ज्यारे किम निकलसी जमार ।। जबु।।५।। ऐ पाठोई कामणीयारे, जयु तुज चिना पिलखारे थाय ।। रमिया, उमिया, चिना नासरे, पारो बदन कमल कमल पिलखाय ॥ जयु ॥ ६ ॥ मत हिणो कोई मानवी, माता मिथ्या तणो, ।। पररमणी सु राची रया, माता दुर्गत जासी
( ५६ )
पाती पोमी मोटो कियारे, जयु इम किम दो छीटकाय ।।
माता पिता न मेन्या रोवतारे, धारे दया नही दिलमाय जियुमा
ऐ लोठी पाणी पिउए, माता मात ने तात अनेक ।
सगला रे दया पालसुऐ, जरणी पाप समान लेस ।।माता|६||
ज्यु बांधारे लाकडीरे, जयु तुमज प्राण आधार ।।
तुज चिनारे जग सुनोरे जाया, जरनी जितम राख ॥जघु। १०॥
स्तन अदितरो पिंजरोए माता, सुनो तोजाणे के फद ।।
काम भोग ससार ना, माताज्ञानी बताया जुठाफद ।।माता॥११॥
पच महानत पालणारे जजु, पाचो ही मेरू समान ।।
दोप पयालीस टालणारे जचु, लेणो सुजतोपाहार ।। जवु ॥१२॥
पच महाव्रत पालसुए माता, पावुही मेरू समान ।।
दोष नयालीस ठालसुए माता, लेसु सुजतो माहारमाता॥१३॥
सजम मार्ग दोयलोरे जघु, चलनो खाडा की धार ।।
नदी के किनारे रूग्वदोऐ माता,कदियक होय पिनास|माता॥१४॥
चौदा निना केसी चादनी रे, जगु तारा निना केसी रात ॥
वीर मिना केसी बेनड़ी रे, जघु जुरे वारवार ॥ जवु ॥ १५ ॥
दिप चिनारे मदिर सुणोरे, जगु पुत्र बिना परिवार ॥
कथा मिना केमी कामनीरे, जवु जुरे वाराई मास ॥जयु॥१६॥
मात पिता मेला मिल्याए माता, मिलीयो अनती वार ॥
तारण समर्थ को नहीं ए माता पुत्र पातो परिवार माता॥१७॥
मोह मत करो मोरिमाताजिए जरणी मोहो किया वधे कर्म ।।
हालर हुनर काई करोए माता, करोनी जिन जिनो धर्म। माता१८
ऐ पाठोई कामनीयारे जयु सुख विलसो ससार ।
दिन पाछा थकारे जत्रु लिजो सनम भार ॥ माता ॥ १६ ॥
'
,
( ५८ )
कोई समचद सनाजोगे, कोई रीध पामे पुणजोगे।
कोई करणारा फल जाणेरे, माताजी हुलरावे ।। १० ॥
कोई करणीरा फल पावरे,माताजी हुलरावे नेमनीने,रागसुपावरे११
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॥श्री जचु स्वामीजी रो स्तवन ।।
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राजगीरीनो वासीयोजी जयु नाम कुमार ।।
पभदत्तजीना डीकरोजी, भद्राजारी माय ।
जंबु कह्यो मान लेरे, जाया मत लेवो सजम भार ॥ १॥ देसी
सुधर्मा स्वामी पधारीयाजी, राजगीरी रे माय ।।
कोणीक चंदन चालीयाजी, जयुजी वंदन जाय ।। जयु ॥ २ ॥
भगरत वाणी वागरीजी, सर्व जिवा हितकार ॥
वाणी सुणी वैरागियाजी, जाययो अथीर ससार ॥ जवु ॥३॥
घर पाया माता कने जी चोले' वारंवार ।।
अनुमत दीजो मोरा मातजी, में तो लेसु मजमभार ।। जंषु ॥ ४ ॥
ऐ देमी माता मोरी साभलाय, जननी लेसु सजम भार ॥
ऐ आठोई कामनीयारे, जयु मवछररे ऊनियार ।।
परनि ने किम परिहरो, ज्यारे किम निकलसी जमार ।। जवु ।।शा
ऐ पाठोई कामणीयारे, जयु तुज चिना पिलखारे थाय ।।
रमिया, उमिया, चिना नासरे, ज्यारो चदन कमल कमल
निलखाय ।। जयु ॥ ६॥
मत हिणो कोई मानवी, मावा मिथ्या तणो भरपूर ।।
पररमणी सु राची दुर्ग जरूर ॥ माता ॥७॥
. कथा चिना केमी कामनीरे, जघु जुरे चाराई मास ॥जवु॥१६॥ मात पिता मेला मिल्याए माता, मिलीयो अनती वार । मोह मत करो मोरिमाताजिए जरणी मोदो किया बधे कर्म । तारण समर्थ को नही ए माता पुन पातो परिवार माता॥१७॥ हालर हुनर काई करोए माता, करोनी जिन जिनो धमामाता१८ ऐ पाठोई कामनीयारे जवु सुस विल सो ससार ॥ दिन पाला थकारे जबु लिजा सजम मार ॥ माता।। १६॥ ( ५ ) पाली पोमी मोटो कियारे, जयु इम किम दो चीटकाय ॥ माता पिता ने मेल्या रोवतारे, थारे दया नहीं दिलमाय ॥जयु।।८।। ऐ लोठो पाणी पिउए, माता मात ने तात अनेक ।। सगला रे दया पालसुऐ, जरणी आप समान लेस माताHell ज्यु आंधारे लाकरीरे, जवु तुमज प्राण प्राधार ।। तुज चिनारे जग सुनोरे जाया, जरनी जितब रास जिवु। १०॥ रतन जडितरो पिंजरोए माता, सुनो तोजाणे के फद ।। काम भोग ससार ना, माता ज्ञानी बताया जुठाफदमाता॥११॥ पच महानत पालणारे जजु, पाचो ही मेरू समान ।। दोप रयालीस टालणारे जयु, लेणो सुजतो आहार ॥ जघु ॥१२॥ पच महारत पालसुए गाता, पावुही मेरू समान ।। दोप बयालीस ठालसुए माता, लेसु सुनतो माहार॥माता॥१३॥ सजम मार्ग दोयलोरे जचु, चलनो साडा की धार ।। नदी के किनारे रूबड़ोऐ मावा,कदियक होय पिनास|माता॥१४॥ चांदा पिना केसी चादनी रे, जत्रु तारा निना केसी रात ॥ वीर विना केमी पेनड़ी रे, जघु जुरे वारवार ॥ जवु ॥ १५ ॥ दिप निनारे मदिर सुणोरे, जयु पुत्र पिना परिवार । 7
ऐ पाठोई कामणीयाऐ माता समजाई ऐकण रात ॥
जिण जिनो धर्म ओल खियाऐ माता सजम लेसी मोरी साथ
माता॥२०॥
माता पिता ने तारीयारे जंबु तारी छे भाठोई नार ।।
सासु सुसरा ने तारियारे जंबु पाच से प्रभया परवामाता२१॥
पाच से सतापिस जणारे जवु लिनो सजम भार ।।
इग्यारे जणा मुगत गया, ज्यारे परते जेजेकार। जत्रु ॥ २२ ॥
शांतीनाथजीरो जाप। चईता. 1. मारह. याम. || चकमट्टी. महिछीउ । शाती, शांती करेलोए ॥ पत्तोगईमणत्तरं ।। १ ।। ॥ श्रीशांतीनाथ स्वामीनो छंद ।। शातीनाथ को कीजे जाप, कोड़ भवाना काटे पाप शांतीनाथजी म्होटा देव, सुर नरे सार जेहनी सेव ॥ १ ॥ दुख दारिद्र होवे दुर सुस सपति होवे भरपूर ठग फागर जाने भाग, पळती होवे शीतळ नाथ ॥ २ ॥ राज लोकमा कीर्ती घणी, शांती जिनेश्वर माथे धणी ।। जो व्याचे प्रभुजी नुं ध्यान. राजादेचे अधीकु मान ॥ ३ ॥ गह पीड़ा मिटजाय, देखी दुस्मन लागे पाय । सगळो भाग्यो मननो भर्म, पाम्यो सम काट्या कम ॥४॥ सुणी प्रभु मोरी अरदास हुँ सेवक तमे पुरो पास ॥ मुज चिंतीत कारज करो, चिंता प्रारती बीज हरो॥५॥ मेटो म्हारा पाळ जजाळ, प्रभु मुजने तु नयण निहाल । मापनी कीर्ती ठामोठाम, सुधारो प्रभु म्हारा काम ॥६॥ जो नित्य नित्य प्रभुजीने रटे, मोती नगला कटे । चेप लागण दोनु जळ जाय, विपद आपद कट जावे लाय७ शातिनाथना नामथी थाय पाखे तुठ पडळ कठजाय। - - कमलो पीलो जब जब झरे, शाविजिनेश्वर शाता करे। गरमी ध्याधी मिटावे रोग, सयण मित्रनो मले सजोग । दा देवने दीस और, नही चाले दुश्मन को जोर ।।।
. लठारां सब जाने नाश, अर्जन फीटी होवे दास शांतीनाथनी कीती घणी, कृपा करोतुम त्रिभुवन धणी॥१० अरज करु छ जोड़ी हात, आपसु नहीं कोई छानी मात ॥ देसी रह्या छो पाते श्राप, हो प्रभूजी म्हारा पाप ॥११॥ मुज मन चिंतित करिये कान, राखो प्रभुजी म्हारी लाज ।। तुम सम जग माही नहीं कोय, तुम भजवाथी शाता होय १: तुम पासे चले नहीं मरकी रोग, ताव तेजरो नाव तोड ।। मारी मिठाई कीधी प्रभु शात, गुणनो नहीं आने अत १३ तुमने समरे साधु सती, तुमने सपरे जोगी जती ।। काटो सकट राखो मान, अविचळ पद श्रापो स्थान ॥१४॥ सवत अठारे चौरासी जाण, देश माळ्बो अधिक वखाण ॥ शहर जावरो चेतर मास, हू प्रभु तुम चरणाको दास ॥१५॥ रुपिरुधनाथजी कीधो छंद, काटो प्रभूजी म्हारा फंद ॥ हू जोऊ प्रभुजीनी बाट, मुज भारती चिंता सविकाट ।।१६।। . " ॥ श्री पारसनाथ स्वामीजी रो स्ववन ।। - . अहो अहो पारस्वजी मज मलीयारे मारा मनरा मनोरथ फलीया, अहो २ वारऐंठरे ॥१॥ थारी सुरत मोहनगारी रे सहु सगन लागे छे पारी रे, ऐक नागण नाग ऊनारी रे ॥ अहो । अलपेली सुरत प्रभु थारी रे, थारा मुग्वड़ा ऊपर जाऊ वारी रे, "वोने मोये सुर पतारी ॥ अहो ।।२।। धन धन देवादी देवारे, सुरनर करत तुमारी सेवा रे, पापो सपन || अहो.॥३॥ - " 1 (६३ ) तुम नीलवरण सुसदाई रे, तुम सुरव अती मोहनगारी रे, तुम दर्शन हरक अपारी रे ।। अहो ॥ ४ ॥ प्रभु ते विस्माजी जिनरायारे माता भोमा देवीजी ना जायारे, हमने दर्शन देवोनी दयाल || अहो ॥ ६ ॥ जे पारमतणो गुण गासी रे भव भवना पातीक जासी रे, तेनो ममफित नीरमळ थासी रे ॥ महो ।। ७ ॥ हुतो लुली २ लागु छु पायारे मारा ऊरमे थारा गुण गायारे, ईम माणक विजय गुण गाया । अहो ॥ ८ ॥ . -- चिंतामणी पारस्वनाथ, हारे हारे पारस्वनाथ ॥ टेर ।। अरज करू करजोड हारे करजोड़ ॥ भासा तो मारी पुरजोजि पारस्वनाथ ॥ १ ॥ अश्वसेण रायरा कभार हारे २ कवार ।। भोमादेराणी जागियानी पारश्वनाथ ॥ चीता ॥ २ ॥ मोच्चकरायो सुरईन्द्र हारे २ सुरईद्र ।। वीलोकी जस छानीयो पारश्वनाथ ।। चीता ॥ ३ ॥ जलता बचाया नागणी नाग हारे नागणी नाग ।। प्रभुजी उपगारीयाजी पारसनाथ ॥ ४ ॥ हुवा धरणेन्द्र माहाराज हारे २ माहाराज ।। साँसण रूखवालीयाजी पारसनाथ ॥ ५ ॥ जो से प्रभुता ये हारे प्रभुता ये॥ ज्यारी तो सका सुरहरोजी पारश्वनाथ ॥ चीता ॥६॥ पग २ हवे प्रभु जित हारे प्रभु जित ॥ रोग सब हरेठलेजी पारसनाथ ॥ चीता ॥ ८ ॥ + न (६४) धन नहीं मांगु प्रभु माल हरि २ प्रभु माल । संगापुरी में मेलदीजो पारश्वनाथ ।। चीता ॥ ८॥ मांगु सीरपुर कनो राज, हारे प्रभुराज ।। गरम नही पावसाजी पारसनाथ ।। चीता ॥8॥ गुरू हीरालालजी प्रसाद हारे २ प्रसाद ।। चौथमलजी ईम भणजी पारसनाथ ॥ चीता ॥ १० ॥ संमत १६६८ साल हरे अडसठ साल ॥ रामपुर गुण गावीयाजी पारसनाय चीता ॥ ११ ॥ (चांदा प्रभुजीनोतवनः ) श्री चदाप्रभु मो मन भावेरे, दुनो देव दाय न बावरे ।। देर ।। चदपुरी नगरी मली रे माहासये राय ऊदार ।। लीखम्दाराणी दिपती ज्यारी कुख लिया असतारे ।। चंदा ॥१॥ समार ना सुख मोगनोरे जायो ससार असार । मन वैरागे भाणन प्रभु लीधो सजम भार ) चदा ॥ २॥ चद आनद सदा कररे पातीक जावे दुर ।। चद भजे समार तीरे तो जाने कर्म अकूर । चदा ॥३॥ सुरनर असुर विध्या घसरे ईन्द्र करे जारी सेव ।। मोटा राणा राजार ज्याने नमे असख्याता देव ।।चदा।। ४ ॥ अमरदेव गणा देसीया जठे घणा जिगारी धात ॥ कहोजी काकरो कुण लहे ज्यारे लागो चीन्तामणी हाताचदा। वाणी ईम्रत सारसी नाणे खीर समद्र का नीर ॥ वाणी सुथ हीया मे धरतो अतरे भवजल तीर ।। चदा ॥ ६ ॥ -- . चद्र सरीखो नही में जोयो सरव ससार ।। और झुमारे ससार जो माने चद उतारे पार || चदा ।। ७ ।। चद प्रभु सरणो आविया हात जोड करू अरदास ।। किरपा करो सिव दिजीये रतनचंद तुमारो दास ॥चदा ॥८॥ पुज्य गुमानचदजी गुरू भेठीया गणा पाम्यो हरक हुलास ।। समत १८५० मा कयो सायपुर सेहर चोमास ॥ चदा ॥ ६॥ श्री गोतमस्वामीजी नो छंद । चिरजिणेश्वर केरो शिप, गौतमनाम जपो निश दिश ।। जो किये गौतमनु ध्यान, तो घर विलशे नवे निधान ।। १ ।। गौतम नामे गिरिवर चडे, मन पछित हलो मपडे, गौतम नामे नारे रोग, गौतम नामे सर्व सजोग ।।२।। जे वैरी वीरूला पकडा, तस नामे नावे दुकडा । भुत प्रेत नवि मडे प्राण, ते गौतमना करू पसाण ॥ ३ ॥ गौतम नामे निर्मळ काय, गौतम नामे बाधे पाय, गौतम जिनशासन शणगार, गौतम नामे जय जयकार ॥ ४ ॥ साळदाल सु रहा धृन गोळ, मन वछित कापड तपोळ, घरसु धरणी निर्मळ चित, गौतम नामे पुत्र विनीत ॥ ५ ॥ गौतम उग्यो अविचळ भाण, गौतम नाम जपो जग जाण, म्होटा मदिर मेरू समान, गौतम नामे सकळ विहाण ॥ ६ ॥ घर मयगल घोडानी जाडे, वारू पहोंचे वलित काडे, महियण माने म्होटा राय, जो त्रुटे गौतमना पाय ॥ ७ ॥ गौतम प्रणम्या पातकट, उतम नरनी संगत मळे, गौतम नामे निर्मळ ज्ञान, गौतम नामे वाघेवान ॥ ८ ॥ पुन्यवत अव धारो सहु गुरू गौतमना गुण छे बहु, कहे लावण्य समय कर जोड़, गौतम तुटे सपती कोड है। संपूर्ण श्री आदिनाथ प्रसन्न । श्री चिन्तामणि पार्श्वनाथ स्तवन । चित वेग हरो चिन्तामणि पार्थनाथ हमारी टेर ॥ धरणिन्द्र पदमावती हुचो, तेरे सेवक को हिबकारी वि०॥१॥ चिन्तामण पाया सुख प्रगटे इच्छा पूरे सारी, तु आनन्द कन्द भोमा सुत महिमा वदत विहारी || चि० ॥२॥ यो चिन्तामण कमिहन रासे प्रापे ऋद्ध अपारी, तु चेतन चिन्तामण पारप परतक पर उपकारी। चि०॥३॥ वो चिन्तामय जड़ पुद्गल है, तिनही के गुण मारी । तु ठाकुर त्रिभुवन को सामी, पासा पूरवनारी ॥ चि० ॥ ४ ॥ । 15 ॥ छन्द्र आदिनाधनो॥ तुम तिरण तारण भव निवारण मविकमन प्रानन्दन, श्री नामिनदन जगत बदन श्री भादिनाथ निरंजनम् ॥ १॥ तुम आदिनाथ अनाद सेवो, भावकर पूजा करो, कैलास गिरिवर ऋषभ जिनवर चरण कमल हिरदे धरो ॥२॥ ध्यान धूप मान पुष्प अष्ट कर्म हुनासन । क्षमा जाप सतोप सेवा, पूजो देव निरंजनम् ॥ ३॥ तुम अजितनाथ अजित जीते प्रष्ट कर्म महापली, यह विरध मुणकर सरण पायो कृपा कीजे नाथजी ॥४॥ तुम चंद रण दलांछन पद पुरी परमेश्वरो महासयन नंदन जमव पवन भी चदापस जिने 4 ( ६७ ) तुम बाल ब्रह्म विवेक सागर, भविक कमल प्रकासनं । श्री नेमिनाथ महत दिनकर पाप तिमिर विनासन ॥ ६ ॥ जिन तजिय राजल, राज कन्या काम सेन्या वसकरी । चारित्र रथ चढ भये दुलेह सेनक सेव सुन्दर वरी ।। ७॥ तुम तरण तारण सुख कारण इद्र मिलि प्रस्तुति करे, श्री पार्श्वनाथ जिनद के पद सुर असुर-पाये परे ।। ८ ।। तुम कर्म घातामोक्ष दाता दीन जान दया करो, सिद्वारथ नंदन जगत वदन श्री वर्धमान जिनेश्वरो ।। ह॥ सुख देयो दुस मेटों, यह मोरी बात है । मो गरीच की वीनती सुन जो श्री भगवान है ॥ १० ॥ दर्सन कीजे देव को अधम उधारण वासना । सुरगती का सुस भोगो पावो मोक्ष अवासना ॥ ११ ॥ ऐसी महिमा तुम विपे, भौर,धन नहीं कोइए ! जो चद्रमा जोत होवे नहीं तारागण सोहीये ॥१२॥ 1 . ॥ अथ कवित॥ पर्व तयासी लाख कियो जिनराज सुख एक लाग्य रयो जद ऐसी मन भाइ है । भरथ बुलाय समलाय दियो राज सर भाप भये लोचकर पच महावृतधारी है । प्रथम जिनन्द चन्द कहत विनोदीलाल ऐसे सत गुरुजी को वन्दना हमारी है।
( ६८ )
॥ छंद पंच परमेष्टी नो।।
आदौ नेमी जिननोमी संभवं सुविधा तथा धर्म नाथं महा-
देव शाती शाती करं सदा ॥ १॥ अनन्त मुनि सुभ्रतं भक्तया
नमीनाथं जिनोत्तम अजितजीत कद चन्द्र चन्द्र सम प्रमोः ॥२॥
आदि नाथ तथा देव सुपासु विमल जिन मल्लीनाथ गुणो प्राप्त
धनुष पच मितस्यते ।। ३ ॥ अरेह नाथ महावीर सुमति स्वज
गत गुरू । श्रीपद प्रभ नामाना भास पूज्य सुरे स्वर नाथ ॥४॥
सीतल सीतल लोके श्रेयांस श्रेयसे सदा । कुतनाथ चबामेय
श्रीअभीनन्दन जिन ॥ ५ ॥ जिना नाग नाम भीर वष पच
सेष्टी समतन्नपं । यत्रोय राजते अत्र तत्र सेष्य निरन्तर ॥ ६ ॥
इस मन ग्रहो सदा भगत्या यात्रोय पूजते उधो। भूत प्रेत पिशाचारी
भय तत्र न भीयते ॥ ७ ॥ सकल गुण निदानां यत्र मेदामी सु
धारी दय कमल कोसो छ मतग छे रूपा ॥८॥जय तिलक
गुरु श्री सुरीराजस्या सीयो भदति सुखनिदान मोक्ष लक्षी
निवास ||॥
॥ श्री पार्सनाथजी से स्तवन लिख्यते ।
राग भैरवी
श्री पार्श्वनाथसवाई जिनको कमी रहे नहीं काई । टेर ।।
वनमें मगल रनमें रक्षा अग्न होत सितलाई ॥१॥
जहा जहा जाये तहां वहां आदर पानद रग वधाई ॥२॥
कोण करे कोउ द्वेपी जिन वाको पालन वांको थाई ॥३॥
भजन करे सो नव निध पायें विष अमृत होय जाई ॥४॥
4. ॥ श्री हरकचंदजी मराराज का गुण ।। सकल सतमें दीत गुनी नित हित घ्यावे हरक मुनि । उस सेने सुस संपत पाये, श्री हरफ मुनिको ध्यावे ।। टेर।। जो हरक घरी तुम नाम जपो. सकट दुस्मन गाय रयो । पर पुत्रादिक दौलत थावे ।। श्री हर० ॥ १ ॥ भूत प्रेत हारुन श्यारी व्याल और नागन काली। तुम नाम थकी सब मगजाये ॥ भी हर० ॥ २॥ विकट घाट जल पहाड़ विहा मृगराज को गुजार वहाँ । नर तत्र थई सुस ले आवे ॥ श्री हर० ॥३॥ तब नाम नराधिप मान लहे, जी जी मुख पागल लोग कहे। प्रिय चलम सन को मन भावे ॥ दर० ॥ ४ ॥ सुद एकादसी उपवास करो, मन पछित तिनके काज सरो। श्रीर विधन नेडो नहीं मारे । हर० ॥ ५ ॥ जो नित जप तुम जपमाला, तसु कटे असुभ कर्म जाला । कुसल क्षेम कमला लावे ॥ श्री हरख ॥ ६ ॥ श्रीमगन मुनी परसाद थकी शिपरावतरे परतीत पकी, ते किंचित इम कोरीव गारे । श्री हरख मुनीको जो ध्यावे ॥७॥ .
श्रीगौतमस्वामी नो स्तवन ।
'वीर जिनेश्वर प्रण पाय गौतम गुण गाऊ चितलाय ।।
सामल जो साहु नरनार श्री गौतम नमे जै जै कार ।। टेर।।
जम्बू द्वीप बड़ो सुनाम गौवर गाम कयो सुम ठाम ।
वसुभूत ब्राह्मण सुविचार ॥ श्रीगौत.॥१॥
तिन कुलमाय उपन्या आय, पृथ्वी सुदरी वेहनी माय ।
इद्रभूति मगटे कुलधार ॥ श्री गौत० ॥ २ ॥
सकल विद्या पूरण भयायचास वर्ष घरवासे रया ।
लीघो वार समीपे सजम भार ॥ श्री गौत० ॥ ३ ॥
तीस वर्प छदमस्त पर रया पूछा कर कर सांसा.हरया।
चार वर्ष केव किरतार ॥ श्री गौत० ॥४॥
जोत जोत में रया समाय तिणने सुमयों पातक जाय ।
इणमें सांसो नही है लिगार ।। श्री गौत०॥५॥
जो गौतमरो ध्यानज-धरे रोग सोगा पीड़ा नहीं करे ।
भूत प्रेत नहीं आवे लार ॥ थी गौत० ॥ ६ ॥
जो गौतमरो लीजे नाम मन चिंत्या सब सजे काम ।
श्रातम सुख पावे सिरदार ॥ श्री गौत० ॥७॥
गौतम सुमर्या मनकु जीत तिन घर सगलीरूड़ी रीत ।
श्रापद सकल करे परिहार ।। श्री गौत० ॥ ८॥
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श्री चनएमलजी महाराजना गुण ।
मुनि माहाराज थापरा दरसण कर सुख पाया हो महाराजाटेर।।
रियो केरा भासिया पराजजी तात मा,
आपरा माता रिधुवाई हो । मा० ॥ १० ॥
उगणीसो नोका समें भाद्र सुक्ल पच जाण मा०,
थेतो दशमी के दिन जन्मे हो । मा०॥०॥
माता मानद पामियो, निरखी पुत्र दिदार मा०,
वेतो हर्प हर्ष हुलरावे हो मा० ॥ ३॥ च०॥
अनुक्रम में मोटा हुआ माता रासे लाई मा०,
थाने हित घर बहुत पढ़ावे हो मा०, ॥ ४ ॥ च० ॥
उगणीसो बीसा समें जेट कृष्णपक्ष जाण मा० ।
थेतो पचमी के दिन शुभ कारी हो मा० ॥ ५॥ च० ॥
लगुज्य में सयम लियो पाली सहर मजार मा०,
थाने कनीराम गुरु मिलिया हो मा० ॥ ५० ॥ ६ ॥
बुद्धि तीसी आपकी लियो विनय सुग्यान मा०,
थाने सबगुरु घोत सरावे हो मा० ॥ च० ॥७॥
सूत्र चांची चूपसे मिन्न भिन्न करो व्याख्यान मा०,
थारा नरनारी गुण गावे हो मा० ॥ १०॥८॥
अम्रत धारा आपकी सुरत लेह अनेक मा०,
थारी महिमा अपरपारी हो मा०॥च० ॥8॥
चरचा में चोकम गणा अनुमत आवे चाल मा० ॥
बाने हित घर बहु समजावो हो मा० ॥०॥ १० ॥
सेम मुनी सग सोहता हस गुणा गभीर मा,
ए तो मोजराज वेरागी हो मा० ॥ १० ॥ ११ ॥
( ७२ ) मायत विरध विचारने गुनो करो पखमीम मा०, मारी नैया पार उतारो हो मा० ।। च० ॥ १२ ॥ उगणीसे चौसट में पीपाड़ सेसे काल मा०, एतो माहासुद पचम गाया हो मा० ॥ च० ॥ १३ ॥ सरणे आयो आपके दीजो पार उतार मा०, थारा सुजाण एह गुण गाया हो मा०॥ च० ॥ १४ ॥ श्री सीतलनायजीनो स्तवन । श्री शीतल जिन साहनाजी सुन सेवक अरदास । शिपदाता वृधता हरी थे दो शिवपुर वास, जिनेश्वर वंदिये जी पोह उगत सूर जिनेश्वर वदिये जी, पामे परमानद जिनेश्वर वदियेजी दुख टलजावे, दूरक पाप निकदिये जी, पामे सुस भरपूर जिनेश्वर चदियेजी ।।। काम भोगनी लालसा थिरतन धरे मन, पिण तुम भजन प्रताप थी दाजे दुरमत चन ॥ जि० ॥१॥ लोह अड़े पारस जाइजी सोनो न हुवे तेह, लोहनो सुबीगड़पिण पारस पड़े सदेह । जि० ॥ २ ॥ चिंतामण संग्रहाजी नर सुखियो नहीं होय, जद मनमें सका पड़े ओ रतन न दीसे कोय | जि० ॥ ३ ॥ निसदिन सेवा सारताजी सामसरे जे काम, जिणरी इधकाइ किमी पिण होय तार्याको नाम ॥ जिः ॥ ४ ॥ सेवक साहब ने इयांनी काम न सारे कोय चाकर ने सुमेहणी पिण मोटा ने होय ।। जि० ५ ॥
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बालक जो हट ही करे जी तो हारे माई ।।
हूं बालक तुम पागले बोलु छु इण रीत ॥ जि० ॥ ६ ॥
सरत अठारे पचाने जी मेधनीपुर मज ठाम ॥
पूज्य गुमानपदजी प्रमाद से रत्न करे गुणगान || जि० ॥ ७॥
चेतन तु ही तारसी जी तुम परमेश्वर रूप ।।
पिण प्रभुना गुण गावताजी पगटे निज स्वरूप ॥ जि० ॥८॥
॥ श्री महावीर स्वामी नो स्तवन ।
तीरथनाथ मिधारथ सुतका नित नित सुमिरन कीजे ॥
दिन दिन पधे सवाह प्रभुता सकल मनोरथ सीजे ।। टेर ॥
जिण पर कल्पवृक्ष चित्र मेली काम धेनु दुहीजे ॥
काम कुम्भ चिन्तामण पारस पछत भोग लहीजे ।। १ ।।
तिण स अधिक रूप प्रभुजी को जो निचे चित दोन ॥
जिण घर कुमि रहे नहीं कांइ रिद्ध सिद्ध वृद्ध पामोजे ।। २॥,
पुद्गल वस्त सकल इन मवकी मिली यथा लग लीजे॥
प्रभू का नाम मिले मो सपत गर मच श्रोखे कहीजे ॥ ३ ॥
ज्यु पणीयारण को चित कुभ में त्यों प्रभू में चित दीजे ।।
विनयचद मापो शिय सुसनो जो निथल चित दीजे ॥ ४ ॥
( ७४ ) श्री पारम्वनाथजी नो स्तवन । पास प्रभू श्रास पुरो देवो शिवपुर वासजी, त्रास गावास मेटो हु थारो चरणा रो दास ॥ प्रभू मानै एक आपरो आधार ॥ टेर ॥ ऊठत चैठत सोबत जागत यसरयो हृदय मजार ।। १ ।। मात तात और नाथ तुही तु खांवद किरतार ।। सज्जन वलम मित्र तुही तुहीज तारण हार ॥ २ ॥ प्रभू कैयक पर्वत पहाड़ तरवर सरवर नावत गग ।। माने तो तन मन वचन करने एक तुम सुरग ।। ३ ।। हु मतहीन लेलीन जग में पुद्गल ने परपच ।। अवगुण भरियो देस साइन आप माडीखंच ॥ ४ ॥ भवसागर में बहु विध भटक्यो, पुद्गलपुरी अनेक छेदन भेदन बहोत पामी । अब तो सामो देख ॥ ५ ॥ सरणे आता जज कितरी जो साहब सिरदार ।। छोह कंचन होत छिन में पा पारपनाथ ॥ ६ ॥ काए फाड़ी नाग काढ्यो सिमरे वो नकार ।। धरणिन्द्र पद्मावती हुवो शो प्रभु नो उपकार ।। ७ ।। गरिमनवाज वृद्ध निहारो तारीजो माहाराज ॥ सेवक निज सरण श्रायो आपने शन लाज ॥८॥ कमठमन भजन सुखदाता भय भंजन भगवत ॥ विनयचद करजोर वीनवे नीचे नमाचे सीस ॥६॥ - न --
(स्तवन उपदेशी)
हा उमर अंजन ज्यु जारे॥
नर जागे दिन जाय दिन जाणे नर जावे रे ॥ टेर।।
पच इन्द्रियों को अजन भारी दसों दवार गाड़ी सर स्यारी ।।
पाप पुन गाई गादी को वग चलाने रे ॥ १॥ हा उमर ।।
चले रेल ज्यु साम उसामा मिना तार चलने नहीं प्रासा ।।
खबरदार जट होय मुसाफिर गाड़ी पारे ।। २ ।। हॉ०॥
दया धर्म का टिगट बनाया साच झूठ दोय ना आया ।।
सांच को नहिं है पांच झंठ कु परा फुकायारे ॥ ३ ॥ हा० ॥
मास दिवस की वर्षा है चोकी एक वर्ष स्टेशन देखी ।
बीते वर्ष जर कोई स्टेशन जकसन भामेरे ॥ ४ ॥ हॉ०॥
जकसन उपर तुरतज रोके दया धर्म का टिकटज देखे ।।
माया कुटुम्र परवार उठे नही अर्थ न पारे ।। ५ । हा० ॥
अजन उपरे प्रोफिसर भारी साच झूठ की कर निरधारी ।।
देख दया टिकट धुक्त कु तुर्त पहुचापेरे ॥ ६ ॥ हा० ॥
चार गती में भूक्यो भटक्यो मोह माया में ऊबो अटक्यो ।
जारमल के जीव प्रभु का गुण क्यों नहीं गावरे ॥७॥हा॥
(स्तवन उपदेशी)
दम का नही भरोसा रे करले चलने का सामान ।।
लस चौरामी भ्रम के मायो गर्म किया प्रस्थान ॥१॥ दम०॥
उत्तम कुल में जन्म लिया है मुरा में पान पार पान ।
भीर पडिया तेरे कोई न साथी साथी पुन और पाप ॥ दम० ॥२॥
( ७६ ) आसा तृष्णा भूख और निद्रा कुमत रूप निधान ।। दिन दिन चधे पाप का संगत व्यापोक्रोध और मान दम० ॥३॥ भूठा सब ही जगत पसारा नारी विष की खान ।। माया लोम भयो अब अधिकोंच्यापोगर्म अभिमान दम०॥४॥ पांची चार मुसाफिर तेरे इन की खोटी वाण ।। इतना चोर वमे तो अन्दर मोह बड़ा सुलतान ॥ ५॥दम०॥ दो दिन का है गोकुल रामा घर तिरिया खान ।। काल वेरी थारे मिरपर खेले सांधि रयो हे बान॥६॥ दमः॥ भाइ बध सय सगा सम्बन्धी राखे थारो मान ।। अत समें कोई काम न आवे किमो मान गुमान ॥७॥दम०॥ जप तप सील करो सत संगत साधु सुपात्र दान ।। सेगो साधु पच महा व्रतधारी प्रभु मज तज अभिमान ।।८॥ दम० ॥ ॥ श्री नेमनाथजीरो स्तवन ॥ देशी झलारी॥ नेमी सिर वनड़ा ने गिरनारी जाता राखालीजोए । सयां मोरी राखलीजोए सयां ए, मारा नेमी सिर पनड़ा ने गिरनार जाता राखलीजोए । टेर । समन विजयजी का लादला ए माय, स० । हलधर दोनोइ लार पिताजी जाय कहिजोए ॥ १ ॥ सया० ॥ नेमी सिर बनड़ो परयो ए माय, स० । खूब वणी ले रात ऊचा चढ़ जाक लीजोए ॥२॥ सया०॥ नेमी सिर तारण भावीयो ए माय, स. । पसुत्रारी सुपी पुकार पालो स्थ फेर तीनोए ॥ ३ ॥ सयां ॥ -
( ७७ )
होत्या के कांकण डोरडा ए माय, स.।
तोडथा छे नवसर हार दिक्षा बन जाय लीनीए ॥ ४॥ सयां।।
अब हु अनिग्रो छोड़सु ए माय, स० ।
जाय मिल गिरनार कर्म फल तोड़ लेसुए ॥ ५ ॥ सां० ॥
सेवक सुभ चितये ए माय, स. ।
मागु छु शिवपुर वास अर्ज मेरी मान लीजो ए॥६॥सया॥
(स्तवन उपदेशी ) राग विहाग ।।
यह भेद सील का जाने जो हे सतवंती नारी / टेर ॥
पर पुरुषों से बात न करणा. लम्पट जन का साथ न करणा ।
परपर वासा रात न रहणा, काम कथन मत गारी ॥१॥जो.
एक आसन पर कबहु न बैठो, पर पुरुषन का साथ न भेटो ।
पिता भ्राता पति तुम भेटो, बनो कुटुम्बी प्यारी ॥ २ ॥ जो.
पर पुरुषां का अंग ना निरखें, अग कीरत सुण मन मे पत हरपे।
अटुल सरन को मन में परखो, तुम भूमी नीगे रस चालरी ॥३॥ भो.
हाट बाट में खड़ीयन रहना, अकेली घर में नहीं सोना ।
जेनी समय वृथा नहीं खोना, लीजे सुजस वधारी ॥४॥ जो.
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स्तवन लावणी।
खपर नही या जुग में पलकी रे, सबर नही या जग में पल की रे।
सुक्रत करणा होय तो करले कुण जाणे कलकी रे॥ टेर।।
या दोस्ती है जंगल वास की काया मडल की।
स्वामो स्वास सुमरले साहर आयु घटे पलकी ॥१॥ सपर०
आसा तृष्णा भूख और निद्रा कुमत रूप निधान ।।
दिन दिन बधे पाप का संगत व्यापोक्रोध भार मानदम०॥
झूठा सव ही जगत पसारा नारी विष की खान ।।
माया लोम भयो अब अधिक व्यापो गर्म अभिमान आदम०॥
पांचो चार मुसाफिर तेरे इन की खोटी चाण ।।
इतना चोर वसे तो अन्दर मोह बड़ा सुलतान ॥ ५॥दम०॥
दो दिन का है गोकुल रामा घर तिरिया खान ।
काल वेग थारे सिरपर खेले साधि रयो हे पान ॥६॥ दम।
भाइ बघ सब सगा सम्बन्धी रासे थारो मान ।।
श्रत समें कोई काम न भाये किमो मान गुमान ॥७॥दम ।
जप तप सील करो सत संगत साधु सुपात्र दान ।।
सेनो साधु पच महाव्रतधारी प्रसमज तज अभिमान ||८वम.
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॥ श्री नेमनाथजीरो स्तवन ।। देशी झलारी॥
नेमी सिर वनड़ा ने गिरनारी जाता राखालीजोए ।
सयां मोरी राखलीजोए सयां ए.
मारा नेमी सिर बनड़ा ने गिरनार जाता राखलीजोए ।। टेर
समन विजयजी कालाडला ए माय, स०।,
हलधर दोनोह लार पिताजी जाय कहिजोए ॥१॥सया० ॥
नेमी सिर बनड़ो परयो ए माप, स० ।
खूब चणी छे बरात ऊचा चढ़ जाक लीजोए ॥२॥सयां०॥
नेमी सिर तोरण भावीयो ए माय, स.।'
पसुगारी सुरपी पुकार पाछो रथ फेर लीनोए ॥३॥ सयां ॥
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खबर नहीं या जुग में पलकीने, राबर नहाया जग में पल की।
( ७७ )
वोच्था के कांकण दोरा ए माय, स० ।
तोडया छे नवसर हार दिक्षा वन जाय लीनीए ॥ ४ ॥ सया।।
अब हु भचिनो छोड़सु ए माय, स० ।
जाय मिलू गिरनार कर्म फल तोर लेसुए ॥ ५ ॥ सयौ ।।
सेवक सुभ चितवे ए माय, स.।
मागु छ शिवपुर वास अर्ज मेरी मान लीजो ए॥६॥ सया॥
(स्तवन उपदेशी) राग बिहाग ।।
यह भेद सील का जाने जो हे सतरती नारी ।। टेर।
पर पुरुषों से बात न करणा. लम्पट जन का साथ न करणा।
परघर वासा रात न रहणा, काम कथन मत गारी ॥१॥ जो.
एक आसन पर कबहु न बैठो, पर पुरुषन का साथ न भेटो ।
पिता भ्राता पति तुम भेटो, पनो कुटुम्बी प्यारी ॥ २ ॥ जो.
पर पुरुषां का अग ना निरखें, अंग कीरत मुगण मन म मन हरपे।
कुटुल सरल को मन में परखो, तुम भुमीनीगे रम चालरी ॥३॥ मो.
हाट चाट में खड़ीयन रहना, अकेली घर में नहीं सोना ।
जेनी समय वृथा नहीं सोना, लाजे सुनस वधारी 10 जी.
स्तवन लायणी।
सुक्रत करणा होय तो करले कृष्ण जाणे कलकी रे ।। टेर
या दोस्ती है लगल वाम की काया मडल की।
स्वामो म्याम मुमरले माइप आयु घटे पनी ।।
७८ )
वारा मडल रखी चन्द्रमा सबही चलने की।
दिवस चार का चमत्कार ज्यों बिजली ननकी ॥२॥ खबर
कूड कपट कर माया जोड़ी कर पातां छलकी ।
पापकी पोटली बाधी सिर पर कैसे होय हलकी ॥३॥ खबर
या जुग है सपना की माया जैसे यूद है जलकी ।
निणसता तो वार न लागे दुनिया जाय सलकी ॥४॥ खबर
मात तात सुत पंधु भाइ सब जग मतलब की ।
काया माया नार हवेली ए थारी कवकी ॥५॥ सबर०
मन भावत तन चञ्चल हस्थी मस्ती है बलकी ।
सतगुरु अकुस घरो सीस पर चल मारग सतकी ॥६॥ खर०
जवलग हमा रहे देह में सुखिया मंगल की।
हमा छोड़ चले जब देही मटिया जगेल की ॥७॥ सवर०
पर उपकार सम नहीं सुक्रत घर समता सुखकी।
पाप नही पर प्राणी पिंडन हर हिंसा दुसकी ॥८॥ सबर०
कोइ गोरा कोई काला पीला नयन निरसन की।
ए देखी मत राची प्राणी रचना पुद्गल की ॥६॥ सबरर
अनुभव जान पातम बुजी कर पाता सत की।
अमर पद अरिहत को ध्याया पदवी अविचलकी ॥१०॥ सपर०
दया धर्म साहब को सुमरण ए बाता सत की ।
राग द्वेष उपजे नहीं जिनको चीनती अखमल की ॥११॥ खबर०
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( ७६ )
॥स्तवन नेमीनाथजी नो।
रंगीला नेमजी माने दरसण दो माहाराज || टेर।।
समद विजय सुत साभलो जी सेना देजी को नन्द ।
दरवतीना राजीया माने दीठा मा छे भानन्द ।।१॥ गीला
जीवदयारे कारणेरे पसुपारी सुणी पुकार ।
गुण अवगुण मुज पालणा स्वामी कहीं छोड़ी निरधार॥२॥रगीला
इस हुती मन म गणीजी भेटण से भरतार ।
ए सुस में किम वीमरूजी मुक्त गया निरधार ॥३॥ रंगीला.
नरमव केरो नेहदोरे भो किम जुटत नेम ।
हु जाणती मन में गणारे निपट निरजन नेम ॥४॥ रगीला
तुमो नेमीश्वर सांपलाजी राजन रे मन रग ।
दे दिक्षा स्वामी हाथ सुजी मुक्त मलो माहाराज ॥५॥ रंगीला.
तिर्थकर पानीस माजी सीलयात सिरदार ।
सती सेवक सु वीणतीजी होइजो वारम्पार ॥६॥ रगीला०
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स्तवन उपदेसी।
योजुग जाल सपनरी माया इमपर क्यों गरमापारे
घटगई ग्राघु रहन नहीं पाये क्या राजा क्या राणारे । टेर
सुदर नार सड़ी मुस अागल रूप देख इनारे.
आतमज्ञान इतो नहीं देस सेवट पास मसाणारे ॥ १ मो० ॥
गादी पेस गर्न अति तोले बोले मगज भराणा
अंतर ग्यान करीने देखो कई गया राम अरु राणारे ॥२०॥
- (८०) कर कर कपट निपट धन मेन्यो संच सच एक दाणोरे. मद छकिया मन में नहीं सोचे सेवट माल विराणोरे ॥३०॥ थोड़ा दिवस कर्म बहु बांध्या कर कर ने कमठाणारे. आतम ग्यान करीने देखो सेवट निपट पयानारे ॥ ४यो । क्षुधित पुरुष सीसतल छाणा जाणे घेवर पेठा भराणारे उडगई नींद खुली दोय अंख्या अत छाणे का छाणारे ॥५मो०॥ सपने राज लिया सर जग का सिर पर छत्र धराणारे. जागे पात्र छत्र की जागा मांग मांग अन खाणारे ॥६॥ रत्नचंदजी जुग देखी यथारथ निज गुण मन ठहराणारे अबख लिख्यो सतगुरु वचने पुद्गल भर्म मिटाणारे।।७मो० ॥ स्तवन उपदेशी। चार पोररो दिन हुवरे लाल चार पोररी रातरे । सुजाण नर दोय घड़ी कर आपणारेलाल ।। परभव सुखियो थायर सुजाण नर कोई चातुर विचारने चेतज्योरे लाल । टेर ॥ साधु कहे साभलोरे लाल पाल जजाल में मत हार रे ॥ सु०॥ अन्प सुखारे कारणे रे लाल परभव दुखियो थायरे ॥१०॥ मात पिता सुत कामनी रे लाल अल्प दिनारो वासरे । सु० ॥ भोला लोग समझे नहीरे लालरे वेत्रियारे पासरे ।। २ सु० ॥ बाड बड़ा राणा राजवी रे लाल पड़ा बड़ा भोपालरे ।। सु० ॥ मुण्डन्या चल गालता रे लाल ज्याने लेगयो कालरे ।सु०॥ केड नर हीडे होडता रे लाल बहु नारी जारे लार रे ।। सु० ॥
मरण कई नहीं जाणावा रेलाल जानेई लेगयों कालरे ॥४॥ प्रव हटवारे हद मिन्यारे लाल मिली मिली गोता खायरे सु० इण भव में चेते नहीं रे लाल परभया दुरिया थायरे ।। सु०५॥ भागा तो नेजा फरहरे रे-लाल पड़े नगारारी घोर रे ॥ सु०॥ ऊयो त यो परमारे लाल-जोरन लागे लिगाररे ।। सु०६॥ फौजा वो पणी अति फुटरी धगया सगले इतिहासरे सु० ॥ परमारथ पोते नहींरे लाल पिचमें लेगयो कालरे ।। सु०७॥ भरत पाहुमल मझवारे लाल लाखों फौजां जारी लारे ॥१०॥ मरण थकी उण डरपिया रे लाल छोड दियो संसाररे ॥१॥ धदो करीने पन.जोडियारे लाल लासा ऊपर करोड़ रे ॥ सु०॥ मरणरी बेला मानवीरे नाल लेसी कदोरो तोरे लाल ॥ सुहै स्तयन श्री पूज्य सोभाचंदजी महाराज का गुण । दर्शन हालोरे हारे २ मारा परम पूज्य पधायीरे ॥ टेर। जेपर नागोर विचरत २ उपकार घणेरो करतारे धन्य भाग घस्तीका लोगो मुगन मनावारे ॥१॥दर्स होय केसरिया भौर कसूचल नर नारी रा वृदोरे. होडा होटी सब मिल, चाल्या धर पानदो रे ॥२॥ दर्स० हाथी घोड़ा रथ पालकी कोई मेना पर चढियारे, सेठ सेनापति भौर सब कोई पांचों पर परिया रे ।। ३ ।। दर्स० चतुरगी सेन्या सज पाया राजा माहाराजा भारीरे, सन्मुख पेठे श्री सांभाचदजी शनि के लली खुली सीसनमारे द.४ , - . - सारी पर्खदा पैठो सामने जिनजीरा गुण गावरे प्रभु मुख वाणी सुण कर प्रति हुलसावरे ॥ ५॥ दर्शन केइ बडभागी होय बैरागी संयम का वृत लीधार के द्वादश वृत श्रादरियारे ॥ दर्शन०६॥ उगणी सो साल सततरे वैशाख कृष्ण सुभकारे तिथ वेरस ने पूज्य प्रभु का गुण गायारे ।। दर्सन. ७|| स्तवन श्री महावीर स्वामीनो । महावीर स्वामी, नैया लगादे मोरी पार हो,, वृधमान स्वामी नैया लगादे मोरी पार ।। देर ।। यो भवजल अथाग भर्यो है, एक आप तोरे आधार ॥ हो मा०॥१॥ कुरुम्म कबीलो, मतलब को गरजी, मिन मुतलब नहीं पूछे सार ।। हो मा० ॥ २ ॥ जो प्राणी जगजाल में फसीयो, वो सावेला जम की मार ॥ हो म० ॥ ३ ॥ - तन धन जोपन वीजु को भल को, जाता नहीं लागे वार । हो मा० ॥ ४ ॥ पास लगी तो पूरण कीजे, जन्म मरण निवार || हो मा० ॥ ५ ॥ इम जाणी ने सरण गहु छु, जिननी है तारण हार | हो मा० ॥६॥ चोथमल की अरज सुनी जो, रानी के चार ॥ हो सा० ॥ ७॥ सम्पूर्ण . । . 4 - , P (श्रथ चौवीसी लिखते ) चतुरविंसजी ने में गास्यां माने जिनजी को हे जी माने प्रमुजी को नाम नीको लागे है माय भाचो लागे है मायटेर।। रिखभ अजित सभव स्वामी, अभीनन्दन हित हुलरास्या ये माय, सुमत पदम सू पासजी चदाप्रभुजी, सू लगन लगास्या हे माय ॥ चतुर० ॥१॥ सुबुद्धि सीतल श्रीयांसजी वास पूज्य, चरण चित लास्या है माय, विमल अनत धर्म ध्यान सू सातीनाथ, गुण गाय सुरु पास्या हे माय ॥ चतुर ॥२॥ कुयु अरिजी मल्लीनाथजी मुनी सो घृत, गुणा जीव रमास्या हे माय । नमोय नेम पार्ष धणी सांसणपत, वृधमान मनास्या हे माय ।। चतुर० ॥३॥ अनत चौवीसी ने नित नमु गणधर, सोहसीस नमास्या हे माय ! चर्तमानजी ने बदस्या, परमेष्टी जाप जपास्प हे माय ॥ चतुर० ॥ ४॥ चार बीस जिनराज ने हित चित, दिल हद घर ध्यास्या हे माय ॥ चतुर० ॥ ५ ॥ .
। - - . (८२) सारी पर्खदा पैठो सामने जिनजीरा गुण गावरे प्रभु मुख वाणी सुण कर भति हुलसावरे ॥५॥ दर्शन केइ पडभागी होय वैरागी सयम का वृत लीधार के द्वादश वृत भादरियारे ॥ दर्शन. ६ ॥ उगणी सो साल सततरे वैशाख कृष्ण सुभकारे तिथ तेरस ने पुज्य प्रभु का गुण गापारे । दर्सन. ७॥ 1 । -- - स्तवन श्री महावीर स्वामीनो। महावीर स्वामी, नैया लगादे मोरी पार हो, वृधमान स्वामी नैया लगादे मोरी पार ।। देर ।। यो भवजल प्रयाग भर्यो है, एक आप तणारे श्राधार ॥ हो मा० ॥१॥ फुरुम्ब कबीलो, मतलब को गरजी, मिन मुतलब नहीं पूछे सार ।। हो मा० ॥ २॥ जो प्राणी जगजाल में फसीयो, चो सावेजा जम की मार ।। हो म०॥३॥ तन धन जोपन चीजु को मल को, जाता नहीं लागे वार | हो मा० ॥ ४ ॥ श्रास लगी तो पूरण कीजे, जन्म मरण निवार || हो मा० ॥ ५ ॥ इम जाणी ने सरण गहुँ छु, जिनजी है तारण हार || हो मा० ॥ ६ ॥ चोथमल की अरज सुनी जो, सलादे रानी के कॅवार । हो मा०॥७॥ सम्पूर्ण , (अर्थ चौबीसी लिखते ) चतुरविंसजी ने मैं गास्पां माने जिनजी को हे जी माने प्रभुजी को नाम नोको लागे है माय माछो लागे है मायदे रिसभ भजित संभव म्यामी, अभीनन्दन हित हुलरास्या ये माय, सुमत पदम र पामजी चदाप्रभुजी, स लगन लगास्या हे माय ॥ चतुर० ॥१॥ सुबुद्धि सीतल श्रीयांसजी चास पूज्य, चरण चित लास्था हे माय, विमल अनत धर्म ध्यान स् सांतीनाथ, गुण गाय सुख पास्या हे माय ॥ चतुर ॥२॥ कुधु भरिजी मल्लीनाथजी मुनी सो घृत, गुणा जीव रमास्था हे माय । नमाय नेम पार्प धणी सांसणपत, वृधमान मनास्या हे माय ॥ चतुर० ॥३॥ अनत चौवीसी ने नित नमु गणधर, सोहु सीस नमास्या हे माय । चर्तमानजी ने बदस्या, परमेष्टी जाप जपास्या है माये ॥ चतुर० ॥ ४॥ चार चीस जिनराज ने हित चित, दिल दृद घर ध्यास्या हे माय ॥ चतुर ॥ ५॥ - । । 7 . 7 -- 1 (४) ॥ स्तवन उपदेसी । । भलाई करलेरे बदा २ इण मृत्यलोक के माय चतुर नर क्यों हो रहा अधा॥ टेर ॥ यो जग है सपने की माया, तड़को होय आवे । राजा रक फकीर बादसाह,,मारग पकड़ जावे ॥ भलाई ॥१॥ थारी तुछ जिंदगानी सुन अभीमानी, सतगुरू की वाणी, पाणी ऊपर हुवे बुदबुदो, फिर पानी को पानी ॥ भलाई ० ॥ २ तन धन जोवन रग पतग सम देखत पिलगाये, जिम बाड़ी में फूल फूलियो छिनमें फमलावे,॥ मलाई ॥३ मात पिता त्रिया सुत बधु इण से मोह ल्यावे, काल प्राण जद गाटी पकड़े पैठो ढलक जाचे मलाई ॥४, पाप पुण्य की खरची लेकर परभव सीधाचे, दुस भुगतणरी विरिया थान कोई न छुड़ावे ।। मलाई: ।।। तिर्थकर चक्रीवल देवा मडलीक राया, } } पासुदेव अवतार अवलिया सबी काल ख़ाया ।।,भलाई ॥६। रावण तीन खड को राजा रामत्रिया लायो । । लिछमण हाथ मरायो रिण में । कवियां मुख गायो । मलाई ॥ ७ ॥ पाठ पोर री साठ,घड़ी में सुक्रत कर लेरे; दोय घडी प्रभृजी रा भजन री हिरदे धर लेरे ॥ मर्लाह ।। ८ राजा कर्ण हुवा दानेश्वर अजु का कीर्ति गायी है। . उगता नामज लेवे सबके मन भावे ॥ मलाई ॥६॥ उगणी से पनरा के वर्षे जोधाणा माही। कानी मोहाग पचमी हिमतराम गाई । मलाई ।। १० ।। . -- ३ 1 (६५) वन प्रभु गुण लिखते। आनन्द अग रंग सु प्रभू के गुण गाइये, जिनेंद्र गुण गाइये प्रभु टेर।। प्रभु के अपार गुण मेरे मन भाइये, उमंग धर गावे जांका पाप कर जाइये ।। मानन्द ।।१।। अनग कु पिडार एकाग्र चित गाइये, फसाय के कसायताने दूर हुनसाइये ।। आनन्द ॥२॥ ऐमी विद्ध भक्त भाव प्रेम सु रचाइये, समता की सहेली सग मोज खुब पाइये । मानन्द ।। ३ ॥ प्रभु को सुजस जग के तू फरकाइये, मागम सुध लेई हम प्रमोदित थाहये ।। भानन्द ॥४॥ प्रभु के समो सरण वादे चल पाइये, देखत दिदार सिर तुरत ही नमाइये ॥ आनन्द ॥ ५ ॥ प्रभु गुण गाते गीत तीर्थ कर बधाइये, देसो दास की नर राय तेसे भाव भ्याइये ॥ भानन्द ॥ ६ ॥ दरस सरस सुख मोकुमी बताइये, सुजाण कीये श्रास प्रभु पूर्ण कराइये ।। भानन्द ।। ७ ।।
सेवक की (सूचना सब भाइयों को देने में आती है) की
जिसको पुस्तक मगाने की जरूरत हो उसने हमारे नीचे लिखे
पते से मगाचे पिना मूल्य भेज देते हैं तथा नीचे लीव उस पुस्तक
की तथा उस पाने की चावना होवे सो विना मूल्य भेजते हैं
मंगाने की कृपा करे ऐमी हमारी नम्र चीननी करके कहना
भोर पुस्तक को जतना से रखें खुला मुस कर न वाचे ।
१-जैन सास्त्रमाला तीन ३ भाई
२-सामायक माहा लाभ का पाना
श्रापका
सिरेमल लालचंद मुथा,
पीपाड़ मारवाड
'गुलेदगढ
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