Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Jain Dharm Beeji Chopdi
Front matter
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ઉઝરડા
સ્વર્ગવાસી શેઠ નરોતમ નાગજી
જન્મ,
હેન્સર્ગ,
સંવત ૧૯૭૬ ના પપ વર્દી ૧૦
સંવત ૧૯૬૨ ના ભાદરવા વદી ૮
%ଗ अर्पणपत्रिका स्वर्गस्थ श्रावक रत्न शेठ नरोत्तम-- दासः नागजी. SHESSESSE जेनुं हुंकुं जीवन आदरणीय, अने अनुक- रणीय हतुं, अने लघु वयथीज जेतुं मनः अनेक सद्गुणोथी भरपूर हतुं, जेओनी धर्म तरफनी श्रद्धा द्रढ हती, जिनः आगमना जेओ अभ्यासी हता, अने जिन भगवाननी भक्तिमा जेओ घणा प्रेमी हता, पोताना श्रावक बंधुओमा धार्मिक ज्ञाननो प्रचार जोवाने जेओ हमेशां उत्सुक हता, एवा श्री मांगरोळ निवासी स्वर्गवासी श्रावक रत्न शेठ नरोत्तमदास नागजीनेअमो. आ. पुस्तक. सद्भावथीं अर्पण करीए छीए: VESS न h प्रसिद्ध कती. RECESCREEKHOCHCHHRESTHA
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श्रेष्टीवर्य शेठ नरोत्तम नागजी मोतीचंदनी जींदगीनो ढूंक वृत्तांत. आ वीर नरनो जन्म श्रीअम्बापुरी मध्ये संवत १९३६ ना पोष वद १० ने दीवसे थयो हतो. शेठ मो- तीचंद देवचंदना श्रीमान् कुटुंबमां लाड साथे उछरतां बीजना चंद्रनी हे वृद्धि पामतां पामतां तेमने ब्रह्मचर्याव- स्था प्राप्त थइ. तेमना पूज्य पितामह तथा पिताश्रीनी खंत अने देखरेख नीचे गुजराती तेमज अंग्रेजी भापार्नु समयोचित ज्ञान मेळववामां तेओ फत्तेहमंद नीवड्या हता. जैन तत्त्व ज्ञानमां पण तेओ कुशळता धरावता हता. गीत वाजींत्राकदिनुं ज्ञान पण तेओए संपादन करेलु हतुं. आं ब्रह्मचर्यावस्थानो समय पुरो थतां संवत १९५१ ना वैशाख मासमा पोतानी ज्ञातिना रीवाज मुजब पोतानी व्यवहा- रिक आवरु प्रमाणे घणा आडवर तथा धामधुमथी ज्ञा- तिमा उंच कुळमां गणाती कन्या नामे नंदकुंवर साये ते- मनां लग्न करवामां आव्यां हां. एटले पंदर वरसनी उ- म्मरथी तेओए गृहस्थावासमा प्रवेश कर्यो हतो. आ स- मयची तेओना गृहस्थ तरीकेना गुणो व्यक्त जणावा लाग्या हता. धार्मिक दृत्ति पण द्रढ थती जणांती हती. सत्संग पूज्य पूजन इत्यादि मार्गानुसारीना गुणो तेमां
मोटें भागे उपलब्ध थता हता. माध्यस्थादि श्रावकना
एकवीश गुणोए पण तेने विष प्रथमथी. वास करेलो.
होय, एम वाह्य चिन्होपरथी. जणातुं हतुं. गुरु. वंदन,
शास्त्र श्रवण, आवश्यक क्रिया इत्यादि श्राद्ध कृत्योमा मन
होवा साथे जिन. पूजा तरफ. तेमनुं लक्ष विशेष. चोटेलं
जणातुं हतुं.
क्रमें क्रमे ते जिन पूजार्नु स्वरुप. घणा उंचा प्रकारे
समजवा लाग्या हता. दुर्गतिवारक, सुगतिदायक, आपत्ति-
क्षायक, संपत्तिधायक, सौभाग्य, निरोगता, पुण्य, प्रीति,
इत्यादि उत्पादक जिनेश्वरनी पूजाज छे, एम. तेओ शुद्ध
श्रद्धापूर्वक समजता हता, जे. तेमनी पूजा करती. वखतनी
मुखाकृति उपरथी स्पष्टपणे जणाइ. आवतुं हतु,
आवी उंचा प्रकारनी शुद्ध पुष्प, चंदन, धूप दी-
पादि द्रव्यथी द्रव्य पूजा तेओ करता तेथी कायर पुरुषोने
पण दुस्तर संसार सुतर वनाववा अने मोक्ष वधूनेः स्वयं-
वरा वनाववानी इच्छा उत्पन्न करावनारा तेओ जणाता
हता. अष्ट, सप्तविंशति, एकविंशति इत्यादि नाना प्रकारनी
पूजाओमां पण तेओ विशेष कुशल हताः आ प्रकारनी
द्रव्य पूजामां तेओ प्रवीण हता, एटलंज नहि, पण दया-
रुप जळथी स्नान करी, संतोपरुप शुद्ध वस्त्र पहेंरी, वि-
वेकरूप तिलक करी, शुद्ध भावनाथी पावन वनी, भक्ति
अने श्रद्धापी केशर मिश्रित चंदन. लइ, शुद्ध. आत्मस्वरुप
देवनी नवांग भाव पूजा रचवामां पण तेओ पांडित्य धरावता हता, उपरांत भाव पूजाना जुदा जुदा भेदोमां 'पण तेओ पटुत्वने धारण करता हता. 'आवी उच्च प्रकारनी शुद्ध वृत्ति होवा उपरांत व्यवहारनां मुख्य साधनरुप द्रव्यने खेळववामां पण तेओ कुशल हता. पोवाना पितामह तथा पिताश्रीए ग्रहण क- रेला अर्थ शास्त्रना व्यवहारमांज तेओए पण एक न्यायो- पार्जित द्रव्य मेळवनार तरीके शरुआत करी हती, अने धीमे धीमे एक बाहोश अर्थ शास्त्रना अनुभवी तरीके झळकी निकळ्वानां चिन्हो तेओमां जणातां हता. आ रीते धर्मपूर्वक व्यवहार चलावतां लगभग अगीयार वरस थवा आज्या काळ पोतानुं काम कर्या करे छे. दरेक अवस्थानो अंत होय छे. एवा कुदरतना कानुनोने अनु- सरी कर्म परिणामि महाराजाए पोतानी दाहक द्रष्टि आ कोमळ पुष्पाकार नर तरफ फेरवी, अने काळ परिणति राणीनी प्रेरणाथी स्वरसुंदरीओए करेला हावभाव अने कटाक्षथी प्रेमांतकयस्त थयो होय, तेम टुंक मुदतनी व्यथा अनुभवी, अमर स्त्रीओए करेला संकेतने अनुसरीने होय- नी, जाणे, तेम आ युवान नर रत्न पोताना पितामह, मातामह, पिता, माता, भार्या, भगिनी, त्रण पुत्री, एक पुत्र, अने सगांसंबंधी तेमज मित्र मंडळोने शोक सागरमां डुवतां मुकीने सं. १९६२ ना भादरवा वद ७ ने मंगळ- वारनी पण अमंगळ रात्रिना दश वागे अंधकारने समये
८
२५ घरसनी चालवये आ फानी दुनिआनो त्याग करी
चालता यया.
तेमनी पाछळ तेना वडीलोए तेमज तेमनी पाछळ तेनी
धर्म पत्नीए जुदा जुदा शुभ खातामा तेमना नामने अमर
राखवा रु. ९००० जेवडी एक नादर रकम जुदी काढली
छे, जे मरण पाछळ: पोतानी शक्ति अनुसार कर, ते
योग्यज छे.
आवा एक नर रत्नना स्मरण साधनरुप तेनां आ
टुंक जीवन चरित्र शिवाय वीजुं कशुं छेज नहि, तेथी
तेटलाधीज संतोष मानी ते उत्तम आत्मानी शुभ गति थाओ,
एवी निरंतर इच्छा धराविशुं.
प्रस्तावना.
श्री जैन धर्मनी पहेली चोपडी अमारा तरफथी
प्रसिद्ध थइ चुकी छे, तेनुं आ वीजुं पुस्तक
" श्री जैन
धर्मनी बीजी चोपडी" छे. पहेली चोपड़ीनी प्रस्तावनामां
आ वांचनमाला प्रसिद्ध करवानो अमारो हेतु स्पष्टपणे
वतान्यो छे, तेथी अत्र ते संबंधी पुनः विवेचन कर,
ए काळक्षेपन करवा जे, छे, एम समजी ते करता नथी.
आ जैन धर्मनी वीजी चोपडी सुद्धा श्री जैन धर्म
वांचनमालानां अमारा तरफथी कुल ६ पुस्तको प्रसिद्ध
थयां छे. प्रथमनां चार पुस्तको “ श्री जैन धर्म प्रवेश
पोथी " ए नामनां छे, अने पछीनां वे श्री जैन धर्मनी
पहेली चोपडी अने वीजी चोपडी, ए मळी कुल ६ पुस्तको
अमारी जैन यांचनमाळामां प्रसिद्ध थयां छे.
आधुनिक शालाओमा विशेष करीने व्यावहारिक विपयोतुं
शिक्षण आपवामां आवे छे, पण धार्मिक शिक्षणनी योजना
जोवामां आवती नथी. वीजा व्यावहारिक शिक्षणने मु-
कावले धर्म शिक्षणनी केटली अगत्यता छ, ए विचार
करीए तो सर्वथा एमज कहेवू पडे छे के, दरेक शाळा-
ओमां धर्माशक्षण अवश्य अपाबुज जोइए. आपणा जैन
'धमेना शिक्षणने माटे जुदा जुदा स्थळोमां शाळाओ स्था-
पित थइ छे, अने थती जाय छे, ए एक हर्पनी वात
छ. आपणा धर्मशिक्षण प्रत्येनी आ जागृति अभिनंदनीय
छे, पण मात्र जागृति थइ एटला उपरथीज हर्ष पामी
चेसी रहेवानुं नथी, पण तेने संपूर्णपणे पार पाडवाने माटे
प्रयत्न धवानी जरुर छे, अने एम थाय, तोज खरेखरो
अर्थ सिद्ध थाय छे. ए कहे सत्य छ के, आपणो
धार्मिक शिक्षण संबंधी हेतु पार पाडवाने माटे साधनोनी
जरुर छे, अने ते साधनोमां आवा प्रकारनी धार्मिक वि-
पयनी वांचनमाळाओनो समावेश थाय छे.
जैन धर्मना शिक्षणने माटे वांचनमालानी अगत्य
सर्व कोइ स्वीकारे छ, पण अद्यापि सुधी एवा प्रकारांनी
वांचनमाळानों पुस्तको थोडांज वहार पड्यां छे, जे खामी
पुरी पाडवाने माटे अमोए आ वांचनमालानां पुस्तको
प्रसिद्ध की छे, अने अमे इच्छीए छीए के, ते जैन
विद्यार्थीओने सर्व रीते उपयोगी थाय, अने धार्मिक ज्ञान
लेवाने तेओने मुगमता थाय, एवी अमारी धारणा छे.
प्राचीन आचार्य मुनि महाराजोए आपणा धर्मना जे
अ - महान ग्रंथों रच्या छ, तेनी पासे तो आ पुस्तको लेश मात्र पण नथी, तोपण ते महात्माओनां वचनोनेज अवलंबी चालुः जमानाने अनुकुळ थाय, एवां पुस्तकोनी अमोए रचना करी छ, अने आ पुस्तक वांची श्रावक वर्ग ध- मनो बोध मेळववा शक्तिमान थशे, अने प्राचीन ग्रंथो वांचवा तेमनी अभिरुची वधशे, तो अमे अमारो. श्रम सफळ थयो गणीशुं. अमने कहेवाने हर्ष थाय छ के, आ वांचनमालानां प्रसिद्ध थएलां पुस्तको जैन शाळाओमां घणे ठेकाणे च- लाववां शरु थयां छे, अने विद्यार्थीओने ते द्वारा धार्मिक वोध सुगमताथी थइ शके छे, एवं अनुभवमां आवेलं. छे. आ प्रमाणे घणे स्थळे शाळाओमां आ पुस्तको उपयोगी थइ पडवाथी तेमांना केटलांक पुस्तकोनी पुनः आवृत्ति काढवानी जरुर पडी छे. आ प्रमाणे आ वांचनमाला' आपणी शाळाओमा उपयोगी थवाथी अमोने ते प्रसिद्ध कराववा संबंधी उत्साह वध्यो छे, अने अमो आशा सखीए छीए के, आ वांचनमाळानां वाकीनां पुस्तको पण जेम वने तेम जलदी तैयार करी, सद्गुणी श्रावको पासे अमे रजु करीशुं. श्री जैन आगमना द्रव्यानुयोग, चरण करणानुयोग, कथानुयोग, अने गणितानुयोग, ए चार योगर्नु मूळ तत्वरुप. ज्ञान मेळ्यवाने विद्यार्थीओने सुगम पडे, अने. ते.
ज्ञान मेळचवानी तेमने जिज्ञासा उत्पन्न थाय, अने सरळताथी तेओ वोध मेळवी शके, ए पांचनमालानो मुख्य उद्देश छ. श्री जैन आगम जे चार योगथी विरा- जीत छ, तेनु क्रमसर बाल थाय, एवा पाटो आ पुस्त- कोमा दाखल करेला छे. सर्व स्थळे विद्यार्थीओनी शक्ति उपर विचार करीने तेमने दरेक विपयना रहस्य समजाय, तेवी रीते सरल भापामां पाठो लखेला छे. दरेक पाठमां शाळाओमां भणता अभ्यासीओने एक दिवसना अभ्यास जेटलो चिपय समाचलो छ, अने ज्या ज्यां विषयनो सं- बंध पाछळना पुस्तको. जोडे छे, त्यां आ पुस्तकमां पण तेनुं बोई पुनरावर्तन करी, विद्यार्थीओने पाछळना पाठो स्मरणमा राखवाने सहाय मळे तेम करेल छे. आ पुस्तकना चार खंड करेला छे. पहेला खंडमां सम्यक्त्वनुं स्वरुप स्पष्टपणे समजाव्यु छे, अने तेज सं- बंधमा अतिचार, श्रद्धा, लिंग, दश प्रकारना विनय, त्रण शुद्धि, पांच दूषण, आठ प्रभावक, पांच भूपण, पांच लक्षण, छ यतना, छ आगार, छ भावना, समकितना ६७ वोल, पञ्चखाण ए वगेरे पाठो गोठवेला छे. वीजा खंडमां श्रावकना सामान्य आचार, अने नीतिना पाटो आपेला छे. एटले सदाचार, विधि अने निषेध कार्य, भोजन विधि वगेरे संबंधी पाटो आपला छ. वीजा खंडमां नव तत्वना बोधक पाटो आपेला छ, ५ ए खंडमां कुल ५२ पाठो छे. तेमां नव तत्वनो संपूर्ण सार समाबेलो छ. चोथा “खंडमां कथानुयोगना पाठो आपेला छे, तेमां श्री अजितनाथ, सगर चक्रवर्ति वगेरेनां चरित्रो आपवामां आवेला छे. चारे खंडमां कुल मळीने ८५ पाठो आवेला छे. आ पुस्तकनी पहेलांनां पुस्तकोमा आवेला कोइ कोइ पाटो वधारे विस्तारथी आ पुस्तकमा आपेला छे. . शिक्षक अने शिष्य चनेने सुगम पडे, माटे प्रत्येक पाउने छेडे सारांश प्रश्नो आपला छे. जो विद्यार्थीओ ते प्रश्नोना उत्तर यथार्थ आपी शके, तो पुस्तक मांहेनो सघळो विषय तेमना हृदयमां द्रढ थाय एवी योजना छे. वळी शिक्षक वर्गने विद्यार्थीओना पाठ तैयार छे के नहीं, ते वारतनी परीक्षा करवाने ए प्रश्नो घणा उपयोगी छे. पाठ रचवामां : विद्यार्थीओथी केटलो विषय ग्रहण करी शकाशे, ते उपर खास लक्ष आप्यु छ, अने जे विषयो मोटा छे, तेना भागो पाडी बेत्रण के तेथी वधारे पाठो लखेला छे. आ पुस्तक तैयार करवामां ते शुद्ध अने सरल थाय, तेने नाटे अमोए खास ध्यान आपलं छे. विद्वान मुनि महाराजो अने श्रावक गृहस्थो पासे शोधावी दोप रहित थाय, तेने माटे प्रयत्न करेलो छे, छतां पण धर्म- तत्वनो विषय घणो गंभीर छे, एथी आ पुस्तकमां जे , an काइ दोष रही गया होय, ते संबंधी अमो पूज्य मुनि महाराजो अने विद्वान श्रावक वर्ग पासे क्षमा मागीए. छीए, तथा तेमने विनति करीए छीए के, आ पुस्तकमां कोइ स्थळे कंइ दोप तेमना जोवामां आवे, तो ते अमारी उपर लखी मोकळवा कृपा करवी, जेथी अमो तेमनो उप- कार मानीशू, अने वीजी आवृत्ति कढाववाने प्रसंगे ते मुधारीशुं. आ वांचनमालाना प्रथम प्रसिद्ध थयेला पुस्तको अमोए विद्वान मुनिराजो तथा मुज्ञ श्रावकवर्ग तरफ तेमना अभिप्राय अर्थे मोकलेलां, के जेथी तेमां रहेला दोष वि- गेरेनुं वीजी आवृत्ति प्रसंगे संशोधन याय. तेओए कृपा करी अमारा पुस्तकोर्नु अवलोकन करी पोताना अभिप्रायो मोकल्या छ, जे आ पुस्तकना पछवाडेना भागमां अमोए आपेला छे. आ प्रमाणे आ पुस्तकने माटे पण विद्वान मुनिराजो तथा श्रावक गृहस्थो पोतानो अभिप्राय लखी अमोने ते संबंधी मुचना आपवा कृपा करशे, एवी आशा राखीए छीए. आ पुस्तक रचवामां अमोने पूज्य मुनि महाराज श्री चारित्रविजयजीए घणी अमूल्य सहाय आपेली छे. उक्त मुनि महाराज श्री अमारा वर्गना कार्यने वखतोवखत सहाय आपवानी कृपा करे छे; जेथी तेमनो अमो आ. प्रसंगे उपकार मानीए छीए.
७
आ पुस्तक प्रसिद्ध करवामां मांगरोळवाळा शेठ
नागजी मोतीचंदे पोताना स्व० पुत्ररत्न नरोत्तमदास, के
जेमतुं जीवनचरित्र आ पुस्तक साथे अमोए प्रसिद्ध कयु
छे, तेमना स्मरणार्थे रु. ३००) नी सहाय आपेली छे,
नेथी आ पुस्तक प्रसिद्ध कराववाने अमो शक्तिवान थया
छीए. अमो उक्त श्रावकरत्न शेठ नागजीभाइनो आ प्रसंगे
आभार मानीए छीए, अने अन्य श्रावक गृहस्थोने उक्त
शेठनो दाखलो लइ अमारा पुस्तक प्रसिद्धीना खाताने
सहाय आपवाने माटे विज्ञप्ति करीए छीए.
प्रसिद्ध कर्ता.
अनुक्रमणिका. खंड १ लो. पार्नु १ ३ ६ पाठ . .१ लो सम्यक्त्व भाग १ लो पाठ २ जो सम्यक्त्व भाग २ जो पाठ ३ जो श्रद्धा अथवा सदहणा पाठ ४ थो त्रण लिंग ५ मो दश प्रकारना विनय पाठ ६ ठो त्रण शुद्धि पाठ ७ मो पांच दूषण पाठ ८ मो आठ प्रभावक पाठ ९ मो पांच भूपण पाठ १० मो पांच लक्षण पाठ ११ मो छ यतना पाठ १२ मो छ आगार पाठ १३ मो छ भावना पाठ १४ मो छ स्थान पाठ १५ मो समकितना ६७ वोल विष कविता पाठ १६ मो पञ्चखाण भाग १ लो पाठ १७ मो पञ्चखाण भाग २ जो पाठ १८ मो पञ्चखाण भाग ३ जो १० १५ १७ १८ २० २१ २४ २६ ३१ ३३ ३५ ४१ ४३ पार्नु पाठ १९ मो पच्चखाण भाग ४ थो पाठ २० मो पञ्चखाण करवातुं फल ४९ . , खंड २ जो. पाठ २१ मो सदाचार भाग १ लो पाठ २२ 'मो सदाचार भाग २ जो पाठ २३ मो न करवानां काम पाठ २४ मो करवा योग्य काम पाठ २५ मो भोजन विधि भाग १ लो पाठ २६ मो भोजन विधि भाग २ जो ५३ ५५ ५८ ६० ६५ . खंड ३ जो. पाठ २७ मो जीव पाठ २८ मो पर्याप्ति पाठ २९ मो जीवना चौद भेद पाठ ३० मो जीवना चौद भेद विषे कविता पाठ ३१ मो अजीव तत्व पाठ ३२ मो अस्तिकाय पाठ ३३ मो अरुपी अजीचना दश भेद पाट ३४ मो रुपी अजीवना चार भेद ६८ ७१ ७३ ७५ ७६ ७९ ८० १० पार्नु. पाठ ३५ मो काळ ८२ पाठ ३६ मो छ द्रव्य ८४ पाठ ३७ मो पुण्यतत्त्व पाठ ३८ मो पुण्य वांधवा विष कविता ९० पाठ ३९ मो पुण्य भोगववाना ४२ प्रकार भा. १ लो ९१ पाठ ४० मो पुण्य भोगववाना ४२ प्रकार भा. २ जो ९४ पाठ ४१ मो पुण्य भोगववाना ४२ प्रकार भा. ३ जो ९७ पाठ ४२ मो पापतत्त्व ९९ पाठ ४३ मो पाप भोगववाना प्रकार भा. १ लो १०१ पाठ ४४ मो पाप भोगववाना प्रकार भा. २ जो १०५ पाठ ४५ मो पाप भोगववाना प्रकार भा. ३ जो १०८ पाठ ४६ मो पाप भोगववाना प्रकार भा. ४ थो ११३ पाट ४७ मो पापतत्त्व विपे कविता ११६ पाठ ४८ मो आश्रवतत्त्व ११७ पाट ४९ मो पांच इंद्रिय अने चार कपाय ११९ पाट ५० मो आठ मदनो त्याग करवा विषे कविता १२२ पाठ ५१ मो पांच अव्रत भाग १ लो १२४ पाठ ५२ मो पांच अत्रत भाग २ जो १२७ पाठ ५३ मो पांच अत्रत भाग ३ जो १३० पाट ५४ मो त्रण योग अने पचीश क्रिया भा.१ लो १३२ पाट ५५ मो त्रण योग अने पचीश क्रिया भा.२ जो १३७ पाट ५६ मो आश्रव तत्त्व विपे कविता १३९ ૧૧ १४ हिर 23678 पाठ ५७ मो संवरतत्त्व पाठ ५८ मो संवरना सत्तावन भेद पाठ ५९ मो संवरना सत्तावन भेद (दश प्रकारनो यतिधर्म) पाठ ६० मो ब्रह्मचर्य ( नव गुप्ति) १४७ पाठ ६१ मो संवरना सत्तावन भेद बार भावना १५१ पाठ ६२ मो बार भावना विषे कविता १५६ पाठ ६३ मो संवरना सत्तावन भेद १५८ (बावीश परिषह) पाठ ६४ मो वावीश परिसह विपे कविता १६२ पाठ ६५ मो संवरना सत्तावन भेद [ पांच प्रका- रनुं चारित्र] १६६ पाठ ६६ मो निर्जरा तत्त्व १७० पाठ ६७ मो तप १७२ पाठ ६८ मो तप विषे कविता १७५ पाठ ६९ मो वंध तत्त्व १७६ पाठ ७० मो बंध हेतु १७९ पाठ ७१ मो ( बंध उत्तर हेतुना सत्तावन भेद ) १८३ मिथ्यात्व पाठ ७२ मो बंध हेतुना सत्तावन भेद अ- विराति कपाय १८५
१२
पार्नु
पाठ ७३ मो बंध हेतुना सत्तावन भेद (योग)
भाग १ लो,
१८७
पाठ ७४ मो योग भाग २ जो
१९०
पाठ ७५ मो बंध तत्त्व विषे कविता
१९३
पाठ ७६ मो मोक्ष तत्त्व भाग १. लो
१९४
पाठ ७७ मो मोक्ष तत्त्व भाग २ जो
पाठ ७८ मो सिद्धना पंदर भेद
२०४
खंड ४ थो.
पाठ ७९ मो अजितनाथ भाग १ लो
पाठ ८० मो अजितनाथ. भाग २ जो.
पाठ ८१ मो अजितनाथ चरित्र विपे कविता
पाठ ८२ मो सगर चक्रवर्ति भाग १ लो
पाठ ८३ मो सगर चक्रवर्ति भाग २ जो
पाठ ८४ मो सगर चक्रवर्ति भाग ३ जो
पाठ ८५ मो सगर चक्रवर्ति भाग ४ थो
२०८
२१७
२२२
२२४
-
२२९
२३३
२३९
श्री जैन धर्म बीजी चोपडी. खंड १ लो. पाठ १.लो. सम्यक्त्व भाग १ लो. सम्यक्त्व ए आत्मानो शुभ परिणामरुप गुण छे. ते स- स्यक्त्व एवी वस्तु छ के, जे. छझस्थ विगेरेने प्रत्यक्ष थइ शके तेम नथी. सम्यक्त्व आत्मानो शुभ परिणाम छे. सम्यक्त्वंनो प्रभाव अलौकिक छ, जैन धर्मनी वधी महत्ता स- म्यक्त्वने आश्रीने रहेली छ, जैन तत्त्वज्ञान संपादन कर- वानो उत्तम अधिकार सम्यक्त्वथी प्राप्त थाय छे. जो हृदयमां. सम्यक्त्व होय तो ते जैन धर्मना रहस्यने जाणी शके छ. कुदेव, कुगुरु अने कुधर्मनो परित्याग करी शुद्ध देव, शुद्ध गुरु अने शुद्ध धर्मनी आस्था राखवी, ते सम्यक्त्वनुं मूळ स्वरुप छे. ते सम्यक्त्व ओळखवाने माटे सम्यक्त्वना जुदाजुदा सडसठ प्रकार छे. ते जैन संपदायमा 'समकितना सडसठ बोल' एवा नामथी ओळखाय छे. सम्यक्त्वनुं चीजें प्राकृत नाम समकित छे, अने प्राये करीने जैन मामां " , ते नामथी ते 'बधारे प्रख्यात छे. समकितना सडसठ वोलनी गणना आ प्रमाणे थाय छे. सद्दहणाना चार भेद छे, लिंगना त्रण भेद छ, विनयना दश भेद छ, शुद्धिना त्रण प्रकार छे, दूपणना पांच प्रकार छ, प्रभावक आठ कहेवाय छे, भूषण पांच छ, लक्षणना पांच भेद छ, छ प्रकारे यवना कहेवाय छे, छ आगार कहेवाय छे, छ भावना अने छ स्थान कहेवाय छे. आवी रीते समकि- तना आश्रयी कुल मळीने सडसठ बोल थाय छे. दरेक श्रावकनां संताने आ सडसठ वोल वरावर समजीने याद करवा जोइए. सारांश प्रश्नो. १ सम्यक्त्व ए शुं छे ? २ सम्यक्त्व प्रत्यक्ष थइ शके तेवी वस्तु छ के केम ? ३ सम्यक्त्वथी शो लाम थाय छे ? - ४ हृदयमा सम्यक्त्व होवाथी शुं थाय छ ? ५ सम्यक्त्वनुं सूळ स्वरुप | छे ? ६ सम्यक्त्वना केटला प्रकार छ ? अने ते जैन संप्रदायमां केवा नामथी ओळ- खाय छ ? ७ सम्यक्त्वनुं वीजें नाम शुं छे ? ८ सम्य- क्त्वना वधा बोल गणावो. ९ स्थान अने आगार केटला छे ? १० भूपण अने लक्षण केटलां छे ? ११ विनय, लिंग अने दुपणना केटला प्रकार छ ? १२ शुद्धि अने
3
प्रभावक केटला छ ? १३ सदहणा अने यतनाना केटला
प्रकार छे ?
शिक्षके नीचेना शन्दोनी समजूती आपवी.
शुभ परिणाम, 'छमस्थ, अलौकिक, महत्ता, रहस्य,
अधिकार, आस्था, सद्दहणा, लिंग, शुद्धि, दूषण, प्रभावक,
यतना, आगार, भावना, स्थान.
पाठ २
जो.
सम्यक्त्व भाग २ जो.
शुद्ध देव, गुरु, अने धर्म-ए त्रण तत्व उपर जे
निश्चल परिणामरुप श्रद्धा ते सम्यक्त्व कहेवांय छे. कदि
कोइ जीवने उपरनां त्रण तत्त्वनो बरावर वोध न होय,
पण जो ते जीव कदि पक्षपात छोडी दइने मनमां एवं
धारे के, “जिनेश्वर भगवाने जे अर्थ कह्या छे, ते वधा
निःशंकपणे सत्य छे." आवी तेनी तत्त्व उपरनी जे
श्रद्धा, ते पण सम्यग् दर्शन कहेवाय छे, तेनाधी जे विपरीत
ते मिथ्यात्व कहेवाय छे. बळी मिथ्यात्वनो त्याग करवो,
ते पण सम्यक्त्व कहेवाय छे.
४ देव, गुरु, अने धर्मना स्वरुपने जाणीने निश्चय करवो, ते पण सम्यक्त्व कहेवाय छे. चार अनंतानुबंधी कपाय, सम्य- क्त्व मोह, मिश्र मोह, अने मिथ्यात्व मोह-आ सात प्रकृतिनो जे जीव उपशम करे, तथा क्षयोपशम करे, ते जीवने उपशम अने क्षयोपशम सम्यक्त्व थायं छ. ए सम्यक्त्व प्रत्यक्ष ज्ञाननो विषय नथी. “ आ जीवने स- म्यक्त्व छे, " एवं केवळी जागी शके छे. जे जीवने सम्यक्त्व प्रगट थायं छे, ते जीवने नरक तथा तिर्यंच आ बन्ने गतिना आयुष्यनो वंध थतो नथी. ए सम्यक्त्वना पांच अतिचार छ. १ शंका अति- चार, २ आकांक्षा अतिचार, ३ वितिगिच्छा अतिचार, ४ मिथ्या दृष्टि प्रशंसा अतिचार, अने ५ मिथ्या द्रष्टि परिचय अतिचार-आवां तेनां नाम छ. जिन वचनमा शंका करवी नहि. जो शंका करवामां आवे तो, शंका नामे पहेलो अतिचार छे. वीजा मतवाकाओनां अज्ञान कष्ट देखी, कोइ पाखंडीना विद्या मंत्रना चमत्कार देखी, तेमज पूर्व जन्मनां अज्ञान कप्पथी फळ पामेला अन्य मतवालाओने मुखी, तेमज धनवान् देखी, पोताना मनमां ते मतनी प्रशंसा करे, अने तेने अंगीकार करवानी आकांक्षा राखे, ते आकांक्षा नामे वीजो अतिचार लागे छे. तेथी बीजा मतनी आकांक्षा न करवी. पोताना पूर्व जन्मनां करेलां पापना उदयथी दुःख ५ भोगवतो जीव एवो विचार करे के, “ हुँ धर्म करूं छु, तेनुं फळ मने शुं मळशे ? अथवा मळशे के नहीं ? क्ली जेओ धर्म करता नथी, तेओ सुखी छ, अने हुं धर्म करुं छु, तथापि दुःखी थाउं छु. " आ प्रमाणे विचारवं, ते वितिगिच्छा नामे त्रीजो अतिचार छ, तथा जैन साधुनां मलिन शरीर तथा मलिन वस्त्र देखीने म- नमां दुगंछा करे के, “ आ साधु गंदा छे. आवा मलि- न साधु शी रीते संसारने तरी शके ? " आको विचार करवाशी पण वितिगिच्छा नामे त्रीजो अतिचार लागे छे, माटे उपर प्रमाणे दुगंछा न करवी. जिन प्रणित आज्ञाथी जे बाहेर छे, ते मिथ्या द्रष्टि छे. कारण के तेओ सर्वज्ञनां वचनोने मानता नथी, अने असर्वज्ञनां वचनोने सत्य माने छे. आवा जिनाज्ञा- नी बाहेर अज्ञान कष्ट करनारा मिथ्यात्वीओनी प्रशंसा करवी, तेओनां तप, व्रत, अने पर्वोत्सवनां वखाण करवां, ते मिथ्या द्रष्टि प्रशंसा नामे चोथो अतिचार छ, तेथी सम्यक्त्ववाळा भविजनोए मिथ्या द्रष्टिनी प्रशंसा न करवी. मिथ्या द्रष्टिनी साथे . वहुज मेळाप राखे, खानपान करे, अने वास करे, ते मिथ्या द्रष्टि परिचय नामे पां- चमो अतिचार छ, एवा अनेक प्रकारे सहवास करवाथी मिथ्या द्रष्टिनी वासना लागी जाय छे, अने तेम करतां छेवटे धर्मभ्रष्ट थइ जवाय छे.
सारांश प्रश्नो.
१ सम्यक्त्व एटले शुं ? २ सात प्रकृति का कइ ?
३ आ जीवने सम्यक्त्व छे, एवं कोण जाणी शके ?
४ सम्यक्त्वना पांच अतिचार गणावो. ५ पांच अतिचा-
रनी समजुती आपो.
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
श्रद्धा, सम्यक्त्व, अनंतानुवंधी कपाय, उपशम, क्षयो-
पशम, आकांक्षा, वितिगिच्छा, पर्वोत्सव, धर्मभ्रष्ट.
पाठ ३ जो.
श्रद्धा अथवा सद्दहणा.
आस्तिकपणानी जे बुद्धि ते श्रद्धा अथवा सद्दणा
कहेवाय छे. ते सद्दहणानों संबंध समकितनी साथे रहेलो
छ. ते सद्दहणाना चार प्रकार छे. जीव विगेरे नव
तत्वनो अभ्यास करवो, ते संबंधी सारो विचार करवो,
ते श्रद्धानो पहेलो प्रकार छे, जीव विगेरे नव तत्वो श्री
जिन भगवते कहेला छे, अने तेमां जे जे कहेवामां आव्यु
छे, ते वरावर छे. तेमज तेनी अंदर जे जे कहेलं छे,
७ ते सत्य छे. आ प्रमाणे विचार करी ते नवतत्वचें ज्ञान यथार्थ मेळववं, ते श्रद्धानो पहेलो प्रकार छे. गुरुसेवा ए श्रद्धानो बीजो प्रकार छ. साधु मुनि- राजनी शुद्ध बुद्धिथी सेवा करवी, तेमनुं निर्मळ चारित्र जोइ उत्तम प्रकारे तेमनी भक्ति करवी, ए श्रद्धाना वीजा प्रकारमा आवे छे. जे समकितथी भ्रष्ट होय, तेमनो संग करवो नहि, ए श्रद्धानो त्रीजो प्रकार छे. पासथ्था, कु- शीलिआ अने वेषविडंबक, एवा लोको धर्मथी भ्रष्ट होय छ. जेओ धर्मीपणाना डोळघालु होय, तेमज खोटा आ- डंबरथी धर्मनो विपरीत वोध आपनारा होय, ते पासथ्था कहेवाय छे. जेमनामां शीलगुण न होय, ते कुशीलिआ कहेवाय छे, अने खोटो वेष धरी वीजाने ठगनारा होय, ते वेषविडंबक एवा नामथी ओळ्खाय छे, ते पासथ्था, कुशी- लिआ अने वेषविडंवक ए वधा समकितथी भ्रष्ट होय छे, तेवाओनो संग करवो नहीं, ते सद्दहणाना त्रीजा भेदमा आवे छे. मिथ्यात्वीनो संग न करवो, ते श्रद्धानो चोथो प्रकार छ. मिथ्यात्वी एटले अन्य दर्शनी-जे वीजा दर्शन- (मत )ने माननारा होय, तेवाओनो संग न करवो. कारण के तेवाओनो संग करवाथी समकितनो नाश , •. थाय छे. आ चार श्रद्धाना प्रकार छे. जे भव्य मनुष्यने
समकित उपर श्रद्धा होय, ते जीव विगेरे नव तत्वनो अभ्यास
करे छे, अने सर्वदा तेनोज विचार करे छे. समकितनी
श्रद्धावाळो मनुष्य साधु-मुनिराजनी सेवा करे छे. पासथ्था,
कुशीलिआ अने वेप विडंबक एवा समकितथी भ्रष्ट थये-
लानो तेमज मिथ्यात्वीनो संग करता नथी, ए समकितनी
श्रद्धानो प्रभाव छे.
सारांश प्रश्नो.
१ श्रद्धा अथवा सद्हणा एटले शुं ? २ सदहणानां
केटला प्रकार छ ? ३ जीव विगेरे नव तत्वनो अभ्यास
अने तेनो विचार करवो, ते श्रद्धानो क्यो प्रकार छ ?
४ पासथ्या, कुशीलिआ विगेरेनो संग करवो नहीं, ते
श्रद्धानो क्यो प्रकार ? ५ साधु मुनिराजनी सेवा करवी,
ते क्यो प्रकार छ ? ६ मिथ्यात्वीनो संग न करवो, ते
क्यो प्रकार छ ? ७ खोटा वेपंधारी वीजाऔने ठानारा
होय, ते केवा कहेवाय छ १ ८ पासथ्या अने कुशीलिआ
एटले शुं ? ते समजावो.
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
भ्रष्ट, पासथ्या, कुशीलिया, वेपविडंबक, आडंबर,
विपरीत, मिथ्यात्वी, अन्य दर्शनी, दर्शन, भव्य मनुष्य.
पाठ ४ थो. ऋण लिंग. जनामां संमकित होय, तेवा माणसने ओळखावनारा जे चिन्ह ते लिंग कहेवाय छे. ते समकितनां लिंग त्रण प्रकारे छे. सिद्धांत एटले श्री वीतराग प्रभुनी वाणी, तेने सांभळवानी अति अभिलाषा थाय, ते समाकितर्नु पहेलु लिंग छे. कहेवानो आशय एवो छ के, जे मनु- ष्यने सिद्धांत सांभळवानी अभिलाषा थती होय, ते चिन्ह उपरथी एम समजवू के, तेनामां समकित छे. चारित्र धर्म एटले व्रत पचखाण करवानी जेने अति अभिलाषा थाय, ते समकितनुं वीजुं लिंग छे. जे मनुष्य व्रत पञ्चखाण करवानी अति अभिलाषा राखतो होय, तो समजवू के, ते मनुष्यमां समकित छे. देव, गुरु विगेरे उत्तम पुरुषोनी वैयावच करवामां सावधान रहे, ते समकितनुं त्रीजुं लिंग छे. जे माणस देव, गुरु विगेरे उत्तम पुरुषोनी वैयावच करवामां साव- धान रहेतो होय, तो तेनामां समकित छ, एम स- मजबुं. उपर कहेलां त्रण लिंगो ते समकितने ओळखवानां खरेखरां चिन्हो छे. जो हृदयमा समकित होय, तो मा- णसने सिद्धांत सांभळवानी अभिलाषा थाय छे. व्रत . . २ १० पञ्चखाण करवानी इच्छा थाय छे, अने तेनाथी देव, गुरु विगेरे उत्तम पुरुषोनी वैयावच करवामां - सावधान रहेवाय छे. संक्षेपमां एटटुंज समजवान के, सिद्धांत श्रव- णाभिलाष, चारित्र धर्याभिलाष, अने देव, गुरु सेवा ए त्रण सम्यक्त्वनां लिंगो छ. सारांश प्रश्नो. १ लिंग एटले शुं १२ व्रत-पञ्चस्त्राण करवानी अभिलाषा ते समकितनु क्यु लिंग छ ? ३ वीतरागनी वाणी सांभळवानी इच्छा ते क्युं लिंग छ ? ४ चारित्र धर्म एटले शुं ? अने ते क्यु लिंग ? ते कहो. ५ त्रण लिंगोनां संक्षेपथी नाम आपो. . शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. चिन्ह, लिंग, वीतराग, वैयावच्च, सावधान. पाठ ५ मो. दश प्रकारना विनय. सम्यक् ज्ञान अने दर्शन विगेरे सघळा गुणोतुं मूळ विनय छ. जेनाथी आठ प्रकारनां कर्मने वि एटले वि- । ૧૧ शेषे, नय एटले दूर करी शकाय, ते विनय कहेवाय छे. अथवा जे संसारनो लय करे, ते विनय कहेवाय छे. सेवा, भक्ति, बहु मान करवा, अंदरनो प्रेम वताववो, गुण गावा, अने अवगुण छोडवा, ए वां विनयनां लक्षण छ. ते विनय दश प्रकारे थाय छे. १ अरिहंत देवनो विनय, २ सिद्ध भगवान्नो विनय, ३ जिन प्रतिमानो बिनय, ४ श्रुत धर्मनो विनय, ५ चारित्र ध- मनो विनय, ६ सर्व साधुनो विनय, ७ आचार्यनो विनय, ८ उपाध्यायनो विनय, ९ चतुर्विध संघनो वि- नय, अने १० सम्यग् दर्शननो विनय-एम. तेना दश प्रकार पडे छे. देवनी चोराशी प्रकारनी, अने गुरुनी तेत्रीश प्रकारनी आशातना टाळवी-ए पण विनयमां गणाय छे. विनयना बीजी रीते पांच प्रकार पण थइ शके छ. १ दर्शन विनयं, २ ज्ञान विनय, ३ चारित्र विनय, ४ तप विनय, अने ५ औपचारिक विनय-एवां तेनां नाम छे. दर्शनमां कहेला धर्मास्तिकायादि पदार्थ उपर श्रद्धा करवी, ते पहेलो दर्शन विनय कहेवाय छे. ते पदार्थनुं ज्ञान मेळववं, ते वीजो ज्ञान विनय कहेवाय छ. क्रिया करवी, ते बीजो चारित्र विनय गणाय छे, अने सम्यक् रीते तपस्या करवी, ते चोथो तप विनय कहेवाय छे. पांचमा औपचारिक विनयना वे भेद छे. १ प्रतिरुप विनय अने २ अनाशातना विनय. तेमां
१
૧૨
,
प्रतिरुप विनयना ऋण प्रकार छे. १ कायिक प्रतिरुप
विनय, २ वाचिक प्रतिरुप विनय, अने ३ मानसिक
प्रतिरुप विनय.
तेमां पहेला कायिक प्रतिरुप विनयना आठ प्रकार
छे. १ अभ्युत्थान, २ अंजलिवंध, ३ आसन प्रदान,
४ अभिग्रह, ५ कृति कर्म, ६ शुश्रूषा, ७ अनुगमन, अने
८ संसाधन-एवां तेमनां नाम छे. गुणवान् जननी
तरफ उठी सामा जवू, ते अभ्युत्थान, तेनी सामे हाथ
जोडी उभा रहेg, ते अंजलिबंध, तेमने आसन आप, ते
आसन प्रदान, तेमनी चीज-वस्तु लइ, ठेकाणे राखवी,
ते अभिग्रह, तेमने चंदन करवं, ते कृति कर्म, तेमनी
आज्ञा सांभळ्या तैयार रहे, शुश्रूषा, तेमनी पाछळ
जवू, ते अनुगमन, अने तेमनी पगचंपी करवी, ते
संसाधन कहेवाय छे. आ प्रमाणे कायिक विनयना
आठ प्रकार थाय छे.
वाचिक प्रतिरुप विनयना चार प्रकार छे. १ हित,
२ मित, २ अपरूप, अने ४ अनुपाति-एवां तेनां नाम
छ. हित एटले हितकारी बोलवू, मित एटले खप पूरतुं
बोलवू, अपरुष एटले मधुर बोलवू, अने अनुपाति एटले
अनुसरन बोलवू. आवी रीते वाचिक प्रतिरुप विनयना
चार मंद है.
मानसिक प्रतिरुप विनयना वे भेद छ. १ अकुशल
ते
૧૩
मनोनिरोध, अने २ कुशळमन ऊदीरणा-आवां तेनां नाम
छ. अकुशळ मननो निरोध करदो, एटले कोइनुं झुंडूं
चितवq नहि, ते अकुशल मनोनिरोध कहेवाय छ, अने
सर्वनुं भलं चिंतवं, ते कुशळमन ऊदीरणा कहेवाय छे.
आ प्रतिरुप विनय वीजानी अनुवृत्ति करवारूप छे, एटले
बीजाने अनुसरीने ते विनय थइ शके छ, तेथी केवलज्ञा-
नी प्रतिरुप विनय करता नथी, तेओ अप्रतिरुप विनय
करे छ..
औपचारिक विनयनो वीजो भेद जे अनाशातना
विनय छे, तेना वावन.प्रकार थाय छे. तीर्थकर, सिद्ध,
कुल, गण, संघ, क्रिया, धर्म, ज्ञान, ज्ञानी, आचार्य,
स्थविर, उपाध्याय अने गणी ए तेर पदनी आशातना
करवाथी दूर रहेवू, ते तेर पदनी भक्ति करवी, ते तेर
पदनुं बहु मान करवू, अने ते तेर पदनी प्रशंसा करवी,
ए चार प्रकारे तेर पद गणतां वावन प्रकार थाय छे.
आबो विनय गुण सर्वथी उत्तम छे. विनयथी ज्ञान
प्राप्त थाय छे, ज्ञानथी दर्शन प्राप्त थाय छे, दर्शनथी
चारित्र माप्त थाय छे, अने चारित्रथी मोक्ष प्राप्त थाय छे,
एथी सर्व गुणोतुं सूळ विनयज छे.
. १४ ते. सारांश प्रश्नो. १ विनय ए शब्दनो अर्थ शो थाय ? २ विनयना कयां लक्षणो छ ? ३ विनयना मूळ केटला भेद छे ? तेनां नाम गणावो. ४ देवनी अने गुरुनी केटली केटली आशातना कहेवाय छ ? · अने ते आशातना टाळवी, शेमां गणाय छ ? ५ विनयना वीजा केटला प्रकार थइ शके छ ? ते गणावो. ६ तपविनय अने दर्शनविनय शुं छ ? ते समजावो. ७. पदार्थनुं ज्ञान मेळवQ, अने क्रिया करवी, ते कया विनय कहेवाय छ ? ८ औपचारिक विनयना केटला भेद छ ? ९ प्रतिरुप विनयना केटला भेद छ ? तेनां नाम आपो. १० कायिक प्रतिरुप बिन- यना केटला भेद थाय ? ते गणावो. ११ संसाधन; अ- भ्युत्थान अने अनुगमन, ए केवा विनयमां आवे छे, अने, तेनो शो अर्थ थाय छे ? ते समजावो. १२ गुणवान् जननी सामे हाथ जोडी. उभा रहेg, ते केवो विनय ? १३ मोटा जननी आज्ञा सांभळचा तैयार रहेवं, वे केवो विनय ? १४ मोटाओने आसन आप, ते केवो विनय ? १५ अभिग्रह अने. कृतिकर्म विनयमां शुं करवानुं छे ? १६ वाचिक प्रतिरुप विनयना केटला प्रकार छे ? १७ हित. तथा अनुपाति ए केवां वचन कहेवाय ? १८ खप पूरत वोलवू, अने मधुर बोलg, ते केवा विनयमां गणाय छ ? १९ मानसिक प्रतिरुप विनयना केटला भेद छ ? २० अकुशल मनोनिरोप अने कुशळमन उद्दीरणा एटले ૧૫ शुं? ते समजावो. २१ अनाशातना विनयना केटला भेद छ ? २२ तेर पद कयां ? ते गणावो. २३ तेर पदने केवी रीते गणतां वाचन प्रकार थाय छे ? २४ सर्व गु- णोनुं मूळ विनय छे, ते केवी रीते ? ते समजावो. शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. लय, बहुमान, श्रुतधर्म, चतुर्विध संघ, द्रव्य, हित, मित, अपरुष, अनुपाति, निरोध, उद्दीरणा, अनुवृत्ति, स्थविर, गणी. पाठ ६ ठो. त्रण शुद्धि. सम्यक्त्व मेळववामां त्रण प्रकारनी शुद्धिनी जरुर छे. ते शुद्धि ते सम्यक्त्वनी शुद्धि कहेवाय छे./ ए शुद्धिना त्रण प्रकार छे. १ मनःशुद्धि, २ वचनशुद्धि अने ३ ,काय- शुद्धि, एवां तेनां नाम छे. " आ संसारमा श्री वीतरागनो कहेलो धर्मज सार छे. वीजु कांइ सार नथी. " आ प्रमाणे मनमां भावयु, ते मनःशुद्धि कहेवाय छे. " जिन धर्मनुं आराधन करचाथी कल्याण न होय, " तो वीजा कोनाथी होय ? कल्याण तो श्री वीतरागना धर्म- थीज छे, वीजाथी नथी. " आ प्रमाणे वचनथी कहे. ते वचनशुद्धि कहेवाय छे. कदि कोई आवीने मारो, छेदो, भेदो अने अ- नेक प्रकारनी पीडा उपजावो, पण वीतराग विना वीजा- नी आगळ कायाथी मस्तक न नसाव, एवी द्रढ़ता, ए. कायशुद्धि कहेवाय छे. आ त्रणे प्रकारनी शुद्धि, ते खरेखरी समकितनी शुद्धि गणाय छे. सारांश प्रश्नो. १ शुद्धि एटले शुं ? २ शुद्धिना केटला प्रकार छ ? ३ जिन धर्मर्नु आराधन करवाथीज कल्याणं थाय छे, बीजाथी यतुं नथी-आवां वचन केवी शुद्धिमा गणाय छ ? ४ मनःशुद्धि अने कायशुद्धि विपे समजावो. शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. सार, छेदो, भेदो, द्रढता.
१७
पाठ ७ मो.
पांच दूषण.
सम्यक्त्वना पांच अतिचार, ते तेनां पांच दूषण
कहेवाय छे. तेमनां १ शंका, २ कांक्षा, ३ विचिकित्सा,
४ प्रशंसा अने ५ संस्तव-एवां नाम छे. वीतरागे कहेला
वचनमा जे संशय करतो, ते शंका नामे पहेलं दूषण
छे. जिनमत विना बीजा मतनी वांछा करवी, ते कांक्षा
नामे वीजें दूषण छ. " धर्मनुं फळ मळशे के नहीं ? "
एम संदेह करवो, ते विचिकित्सा नामे त्रीजुं दूषण छे.
कुलिंगी एवा पाखंडी लोकोनी प्रशंसा करवी, ते प्रशंसा
नामे चोथु दूषण छे, अने उपर बतावला पाखंडी लोकोनो
परिचय करवो, ते संस्तव नामे पांचमुं दूषण छे.
समकितना आराधक एवा पुरुषे ए पांच दूषणनो
सर्वथा त्याग करवो जोइए.
सारांश प्रश्नो.
१ सम्यक्त्वना अतिचार अने दूषणमां तफावत छे
के नहीं ? २ सम्यक्त्वनां दूपण केटलां छे ? ते दरेकनां
नाम आपी गणावो. ३ संस्तव अने प्रशंसा एटले भुं ?
ते समजावो. ४ वीतरागनां कहेलां वचनमा संशय करवो,
,
3
१८
अने वीजा मतनी वांछना करवी, ते कयां दूपण कहेवाय ?
५ धर्मनुं फळ मळशे के नहीं ? एवो संदेह करवो, ते
कयु दृपण कहेवाय ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपची.
कुलिंगी, संस्तव, आराधक.
पाठ ८ मो.
आठ प्रभावक.
सम्यक्त्वना आठ प्रभावक छे. जे पुरुप सम्यक्त्वना
प्रभावने वधारे, ते प्रभावक कहेवाय छ. जे जिनमतनां
अने ‘परमतनां शास्त्रोनो जाणनार होय, ते पहेलो प्रभावक
छे. जे धर्मनो उपदेश आपनार होय, ते बीजो प्रभावक
छे. जे न्यायथी वाद करी वादीओनो पराभव करे, ते
त्रीजो प्रभावक छे. जे निमित्त-शुकन तथा ज्योतिष
शास्त्रने जाणनार होय, ते चोथो प्रभावक छ. जे क्षमावंत
निर्लोभी अने तपस्वी होय, ते पांचमो प्रभावक छे. जे
विद्या मंत्रनो जाणनार होय, ते छटो प्रभावक छे. जे
सिद्धसंपन्न होय, एटले आकाशगामनी विद्याए युक्त होय,
ते सातमो प्रभावक छे. जे कवि होय, एटले कविताना
- गुणथी वर्णन करनारो होय, ते आठमो. प्रभावक छे.. आ आठ गुणथी मोटा मोटा राजाओने प्रसन्न करी जैनी बनावे, ते प्रभावक जाणवा. आ आठ प्रभावक जिनमतने दीपावनारा छ. हमेशा एवा प्रभावक थवानो उद्यम करवो, के जेथी जिनमतने दीपावनार थइ शकाय, अथवा तेमना समकितवाला गुण जोइने एवा प्रभावक पुरुषोनी सेवा करवी. सारांश प्रश्नो. १. प्रभावक केटला छे ? २ प्रभाषक कोने कहेवाय ? ३ जे आकाशगामनी विद्याए युक्त होय, ते केटलामो प्रभावक कहेवाय ? ४ कवि होय ते केटलामो प्रभावक ? ५ जिनमत अने परमतनां शास्त्रोने. जाणनार केटलामो प्रभावक ? ६. बीजो प्रभावक कयो ? ७ जे. न्यायधी वाद करे, ते केटलामो प्रभावक ? ८ धर्मनो उपदेश आ- पनार केटलामो प्रभावकः १. ९ क्षमावंत, निर्लोभी अने तपस्वी होय, ते केटलामो प्रभावक ? १० ज्योतिः शास्त्रने जाणनारों केटलामो प्रभावक ? ११ सिद्धसंपन एटले शुं. ? १२ शुं, करें तो. प्रभावक कहेवाय ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. प्रभावक, परमत, निमित्त, ज्योतिषशास्त्र, सिद्धसंपन्न, आकाशगामीनी. पाठ ९ मो. पांच भूषण, समकितनां पांच भूपण कहेलां छे. भूपण धारण करवाथी जेम शोभा प्राप्त थाय छे, तेम आ पांच भूषण धारण करवाथी समकित शोभे छे. २ कुशलता, २ प्र- भावना, ३ तीर्थ सेवा, ४ द्रढता, अने ५ वैयावृत्य-ए पांच भूषणनां नाम छे. जिन धर्मने विषे कुशलता राख- वी, ते पहेलं भूपण छ. जिन शासननी प्रभावना करवी, एटले जिन शासनने दीपावयु, अथवा वृद्धि थाय तेम करवू, ते वीजु भूषण छ. तीर्थ सेवा एंटले गीतार्थ मु- निराज अने तीर्थनी सेवा करवी, ते त्रीजुं भूपण छे. द्रढता एटले जिन धर्मने विष स्थिरता राखबी, ते चौथु भूपण छे. वयात्य एटले देवगुरु तथा सिद्धांतनो विनय करवो-यावच करवी-ते पांच, भूषण छे. समफितनां आ पांच भूपणो समकितने दीपावनारा छ. तेना विना समकित जरा पण शोभत नथी, तेथी देरेक श्रावके ते पांच भूषण संपादन करवां जोइए. सारांश प्रश्नो. १ भूषण एटले शुं ? २ ते सूपण केटल छ ? तेनां नाम आपो. ३ देवगुरु तथा सिद्धांतनो विनय के वैयावच्य करवी, ते क्युं भूषण ? ४ तीर्थ सेवा अने कुशळता ए वे भूषण विषे समजावोः ५ जिन धर्मने विषे द्रढता राखवी, ते क्यु भूषण छे ? ६ प्रभावना एटले शुं ? ते समजावो. शिक्षके नीचना शब्दोनी समजूती आपवी. प्रभावना, कुशलता, गीतार्थ, द्रढता, स्थिरता. पाठ १० मो. पांच लक्षण. समकित छ, समकितनां शुं लक्षण छ ? अने " आ जीवमा एम शी रीते जणाय ? ए प्रत्येक श्राव-
૨૨
के जाणवू जोइए. ते जाणवानेः माटे समकितनां पांच
लक्षणो कहेलां छे. ए पांच. लक्षणोथी. समकितनु खरेखलं
स्वरुप जणाइ आवे छे. ए. पांच लक्षणोनां. १. उपशम,
२ संवेग, ३ निर्वेद, ४ अनुकंपा,, अने ५ आस्तिक्य.
एवा नाम छे. क्रोध, मान, माया,. अने लोभ-ए. चार
कपायनो त्याग, ते. उपशम नामे समकितनुं पहेलं. लक्षण
छ. जे जीवमां अनंतानुबंधी क्रोध, मान, माया, अने लोभनो
उपशम देखाय, एटले. अपराध करनार उपरः पण. जेने
क्रोध विगेरे तीव्र कपाय. उत्पन्न न थाय; जो कदि उ--
त्पन्न थाय, तो तेने निष्फळ करी दे, एवी. शमता जेना-
मां जोवामां आवे, ते. जीवमा समकित छ, एम. जाणवं.
जेना ह्रदयमां मोसनाः सुखनी अभिलापा. सखवाने, लीधे
संसार उपर वैराग्य थाय, ते संवेग नामे समकितनुं
वीजें लक्षण छे.. जे जीवने. तेवोः वैराग्य उत्पन्न थतो
मालम पडे, ते जीवमा सम्यक्त्व छ, एम. जाणवू. संसा-
रना दुःखथी कंटाळो पामी उदास रहे, ते निर्वेद नामे
समकितनुं त्रीशुं लक्षण. छे.. जे. जीव. संसारनां सुख उपर
द्वेप करे, कुटुंब विगेरेनी परतंत्रताना दुःखरुप गृहस्थावा-
समां रहतां, पण मोक्षनी अभिलापा करे, ते निर्वेद लक्षणवाळा
जीवमां सम्यक्त्व छ एम जाणवू. वीजा जीवने दुःखथी
निवारण करवानी इच्छा, अर्थात् सर्व जीव उपर दया.
भाव राखे, ते अनुकंपा नामे समकितनुं चोधु लक्षण छे.
जेना हृदयमां दुःखी जीवने देखी अनुकंपा उत्पन्न थाय;
२३ दुःखी जीवनां दुःख दूर करवानी इच्छा थाय, तेमज वीजा जीवने दुःखी जोइ, पोताना मनमां दुःखी थाय, अने पोतानी शक्ति प्रमाणे दुःखी जीवना दुःखने दूर करे, तेवां अनुकंपानां लक्षणथी समजवू के, ते जीवमा समकित छे. " श्री वीतराग प्रभुए कां, ते सत्य छ, तेमां कंइ पण जुटुं नथी. " आवी द्रढ आस्था राखवी, ते आस्तिक्य नामे समकितनुं पांचमुं लक्षण छे. जे जीवां एवी द्रढ आस्ता जोवामां आवे, ते जीवमा सम्यक्त्व छे, एम जाणवू. ए प्रमाणे उपशम, संवेग, निर्वेद, अनुकंपा, अने आस्तिक्य-ए पांच लक्षण उपरथी जीवमा रहेलं सम्य- क्त्व ओळखाय छे. सारांश प्रश्नो. १ समकितनां लक्षणो शुं छे, अने ते केटलां छ ? तेनां नाम गणावो. २ श्री वीतरागनां वचन उपर दृढ आस्था राखवी, ते समकितनुं क्युं लक्षण ? ३ उपशम एटले शुं ? ते समजावो. ४ वीजा जीवने दुःखथी निवा- रण करवानी इच्छा, ए क्युं लक्षण ? ५ संवेग एटले शुं ? ते विषे समजावो. ३ संसारनां दुःखथी · कंटाळी उदास रहेवं, ते क्युं लक्षण ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजुती अपी. उपशम, संवेग, निर्वद, आस्तिक्य, अनंतानुबंधी, निष्फळ, अनुकंपा, शक्ति. 1 पाठ ११ मो. छ यतना. समकितने शुद्ध रीते रावा यत्न करचो, ते सम- कितनी यतना कहेवाय छे. जो वरावर यतना करवामां आवी होय, तो समलित नाश पामतुं नथी. ए यतनाना छ प्रकार छ. १ परतीथिकादि चंदन, २ परतीथिकादि नमस्करण, ३ परतीथिकादि आलापन, ४ परतीथिकादि संलापन, ५ परतीर्थिकादि अशनादि दान अने ६ पर- तीथिकादि गंध पुप्पादि प्रेपण-आवां तेनां छ प्रकार नाम छ. वीजा मतवाळाओने, तेमना देवने अने तमणे ग्रहण करेली प्रतिमाने वंदन करवू नहीं, एटले तेमनी आगळ ये हाथ जोडवा नहीं, ते परतीथिकादि वंदन नामे पहेली यतना छे. वीजा मतवाळाने नमस्कार करवो नहीं, एटले तेमनी आगळ माथु नमावयुं नहीं, ते परतीर्थि- कादि नमस्करण नागे चीनी यतना छ, वीजा मतवा.
૨૫ . कानी साथे प्रथम बोलवू नहीं, ते परतीधिकादि आ- लापन नामे त्रीजी यतना छे. तेमनी साथे वारंवार बोलवू नहि, ते परतीर्थिकादि संलापन नामे चोथी यतना छे. तेमने धर्म बुद्धिए खावा पीवानुं आप नहि, ते परतीर्थिकादि अशनादिदान नामे पांचमी यतना छे. तेमने माटे गंध तथा पुष्प मोकलवां नहि, ते पर- तीर्थिकादि गंध पुष्प प्रेषण नाये छठी यतना छे. आ छ प्रकारनी यतना राखबाथी समकित द्रढ थाय छे, अने तेना गुणमां वधारो थाय छे. बे हाथ जोडीने नमवू, ते वंदन, अने माथु नमावयु, ते नमस्कार कहेवाय छे. प्रथम वोलवू, ते आलापन, अने वारंवार वोलवू, ते संलापन कहेवाय छे. सारांश प्रश्नो. १ समकितनी यतना एटले शुं ? २ यतनाथी शो लाभ थाय छ ? ३ यतना केटला प्रकारनी छ ? तेना बधा भेदनां नाम आपो. ४ परतीथिकादि गंध पुष्प मे. पण-एटले शुं ? अने ते केटलामी यतना छे ? ५ वी- जा मतवाळाओने, तेमना देवने, अने तेमणे ग्रहण करेली प्रतिमाने वंदन कर नहि, ए कइ यतना ? ६ परतीर्थि- कादि अशनादि दान-ए केटलामी यतना, अने तेनो अर्थ शुं ? ७ वीजा मतवालाने नमस्कार करवो नहीं, ४ -- २६. ते कइ यतना ? ८ परतीथिकादि संलापन ए यतनानो अर्थ शुं ? ९ वीजा मतवाळानी साथे प्रथम चोलवू नहि, ते कइ यतना? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. यतना, परतीथिकादि, वंदन, नमस्करण, आलापन, संलापन, अशनादि दान, गंध पुष्पादि, प्रेषण, धर्म बु- + द्धि, द्रढ. पाठ १२ मो. छ आगार. कोइ मुश्केलीने लइने श्रावकने कांइ पण अनुचित काम करवु पडे, ते वखते जे कांइ पण न चालतां छुट राखवी, ते आगार कहेवाय छे. तेने संस्कृतमा आकार ( अपवाद ) कहे छे. ज्यारे गृहस्थने सम्यक्त्व आपवामां आवे छे, त्यारे गुरु तेने आगार वतावे छे, ते आगारना छ प्रकार याय छे. ते वखते गुरु तेने जणावे छ के, जो छ कारणोमां तमारे कांइ अनुचित काम करवू पडे, तो आ छ आगार राखी शकाय, जेथी करीने तमाएं सम्य- नव कलंकित धो नहीं ર૭ . राजाना कहेवाथी कर, पडे, ते राजाभियोग नामे पहेलो आगार छे. कदि राजा जोरावरीथी अनुचित काम करावे, तेथी. सम्यक्त्वमां. दूषण लागे नहीं. गण एटले ज्ञातिनो समूह अथवा पंच, तेमना क- हेवाथी करवं, ते गणाभियोग नामे वीजो आगार छे. ज्ञाति के पंच अनुचित काम करवानी फरज पाडे, तेवे प्रसंगे जो ते काम कर पड़े, तो. तेथी करीने सम्यक्त्व- मां दूषण लागतुं नथी.. बळ एटले सैन्य अगर कोइ वळवान् चोर के म्ले- च्छ, तेमनी जोरावरीथी करवू, ते बलाशियोग नामे त्रीजो आगार छे. कोइ' चोर के म्लेच्छना ताबामां आवी पडतां, तेओनी जोरावरीथी काम करवू पडे, तो तेथी सम्यक्त्वमा दूषण लागतुं नथी. देव एटले क्षेत्रपाळ, व्यंतर विगेरे कोइ दुष्ट देवता शरीरमा प्रवेश करी, अनुचित काम करावे, ते देवाभि- योग नामे चोथो आगार छे.. दुष्ट देवता के व्यंतर श- रीरमा प्रवेश करी, अनुचित काम करावे, तथा कोइ दे- वता मरणांत दुःख आपे, तेथी मनमां धैर्य न रहे, अने तेने लइने विरुद्ध काम कर, पडे, तो सम्यक्त्वमा अति- चारनो. भंग थतो. नथी. गुरु एटले मातापिता अथवा धर्माचार्य के जिन प्रतिमा, तेमने लइने अनुचित काम करवू पडे, ते. गुरु , ૨૮ निग्रह नामे पांचमो आगार छे. माता पिताना आग्रहथी काइ अनुचित काम करवू पडे, तथा धर्माचार्यने कोइ दुष्ट संकट आपतो होय, तथा जिन प्रतिमानुं खंडन कर- तो होय, के जिन मंदिर तोडतो होय, तेओनी रक्षाने माटे जो काइ अनुचित काम करवू पडे, तो सम्यक्त्वमा दूपण लागतुं नथी. वृत्ति एटले आजीविका तेने माटे का विरुद्ध काम फरवु पडे, ते कांतारवृत्ति नामे छठो आगार छे. दुकाळ विगेरे आपत्ति आवी पडे, त्यारे आजीविकाने. माटे मि- थ्या द्रष्टिने अनुसारे चालवू पडे, अथवा कांइ विरुद्ध आचरण कर, पडे, तेथी करीने काइ दूषण लागतुं नथी. आ छ वस्तुना आगारने छ छींडी पण कहे छे. पोतानी मरजी न- छतां वीजाओना कहेवाथी लाचारीवडे आ छ आगार सेववाथी सम्यक्त्वने कांइ पण दूपण ला- गतुं नथी. आ छ आगार शिवाय वीजा चार आगार पण जुदा गणेला छे, कोइ व्रतना पचखाण लेती वखते ते- ओनो उच्चार करवामां आवे छ, ते नीचे प्रमाणे छ- कोइ विरुद्ध कार्य अजाणपणे उपयोग आप्या विना यह जाय, ते पहेलो आगार छे. तेने माटे ॥ अनत्यणा पोगेणं " एवो उच्चार थाय छे.
1 कोई विरुद्ध काम अकस्मात् थइ जाय, मनमां जा- णतां छतां योगनी चपळताथी अथवा निरंतरना अभ्यास- थी थइ जाय, तो ते बीजो आगार छे. तेने माटे सहस्सागारेणं " एवो उच्चार थाय छे. जे काम करवाथी सम्यक्त्वमां दूषण लागे छे, पण तेमा घणोज मोटो लाभ रह्यो होय, अथवा कोइ मोटानी आज्ञाथी खास करवू पडे तेम होय, तो ते त्रीजो आगार छे. तेने माटे ॥ महत्तरागारेणं एवो उच्चार थाय छे. जे काम सर्व समाधि व्यत्ययथी एटले मोटा सन्निपात विगेरे रोगोने प्रसंगे वावरा बनी जवाथी, तथा वृद्धावस्था- मां स्मृतिनो भंग थवाथी, तथा सर्प विगेरेना डंशने लीधे असमाधि थइ जवाने प्रसंगे करवू पडे, ते चोथो आगार छे. तेने माटे सव्व समाहिवत्तिआगारेणं" एवो उच्चार थायं छे. आ चार आगारथी व्रतनो तथा सम्यक्त्वनो भंग थतो नथी. तेवे प्रसंगे कदाग्रह राखी, आर्त ध्यानमा प्राणनो त्याग करवो, ते योग नथी. " गमे ते थाय, पण जे नियम लेवामां आव्यु, ते कदापि तोडवू नहि. एवो अति आग्रह राखवो न जोइए. कारण के जो पहेले- थी आगार राख्या होय, तो पछी व्रतनो भंग धतो नथी. ។
।
30
सारांश प्रश्नो.
१ आगार एटले शुं ? ते समजावो. २ आगास्ने
संस्कृतमां शुं कहे छ ? ३ आगारना मुख्य केटला. प्रकार
छ ? ४ छ आगारनां नाम आपो. ५ आजीविकाने माटे.
विरुद्ध काम करवू पडे, ते कयो आगार कहेवाय. ?
६ गुरुनिग्रह आगार केवी रीते लागे ? ते कहो.. ७ रा-
जाना कहेवाथी विरुद्ध करवू पडे, ने कयो आगार ?
८ गणाभियोग आगार एटले ? ते समजावो. ९ देव
के व्यतरना आवेशथी अनुचित काम करवू पडे, ते कयो
आगार ? १० वलाभियोग आगार विषे समजावो.
११ छ आगारने वीजा कया नामथी ओळखावे छ'
१२ छ आगार शिवाय वीजा आगार छ के नहिं ?. जो छे
तो ते केटला छे ? १३ मोटा रोगोने प्रसंगे वावरा थइ
जवाथी जे आगार लागे, ते केटलामो आगार, अने तेने
माटे शो उच्चार छ ? १४
अनत्थणा भोगेणं"
ए उच्चार केवा आगारने माटे छे ? १५ जे काम विरुद्ध
होय, पण तेमां घणो मोटो लाभ रह्यो होय, ते केटलामो
आगार ? अने तेने माटे केवो उच्चार छ ? १६ ॥
सह..
स्सागारेणं " ए उच्चार केवा आगारने माटे छे ?
१७ उपरना छ आगार अने आ चार आगारथी शेनो
भंग न धाय ? १८ आगार राखवाधी. शो. लाभ याय छे.?
अ.
शिक्षके नीचेंना शब्दोनी समजूती आपवी.
अनुचित, कलंकित, गण, म्लेच्छ, क्षेत्रपाळ, व्यंतर,
मरणात, आजीविका, आपत्ति, छींडी, उच्चार, उपयोग,
समाधि, व्यत्यय, स्मृति, असमाधि, कदाग्रह, आर्त ध्यान.
पाठ १३ मो.
छ भावना.
ते
समकितने छ वस्तु साथे सरखावचानी भावना करवी,
ते भावना कहेवाय छे. झाडर्नु मूळ, पेसवानुं द्वार, महे-
लनो मूळ पायो, तत्वनो निधि (भंडार ), जीवितनो
आधार अने रसर्नु पात्र, एवी छ उपमा चारित्रनी साथे
आपीने ते भावना भाववामां आवे छे. " समकित चा-
रित्र धर्मरुपी झाडर्नु मूळ
छ " -आ प्रमाणे भाव,
पहेली भावना छे.
" समकित चारित्र धर्मरुपी नगरमां पेसवानुं द्वार
2. " आ प्रमाणे भावबुं, ते चीजी भावना छे.
" समकित चारित्र धर्मरुपी महेलनो मूळ पायो छे. "
आ प्रमाणे भाववं, ते त्रीजी भावना छे.
" समकित ज्ञान, चारित्र विगेरे गुणरुप तत्वनो
32 निधि-भंडार छ. " आवी रीते भावळ, ते चोथी भा- वना छे. " समकित चारित्ररूपी जीवितनो आधार छ. प्रमाणे भाव, ते पांचमी भावना छे. " समकित श्रुत चारित्ररुपी रसनुं पात्र छे. प्रमाणे भाववू, ते छठी भावना छे. आ समकितनी छ भावना, समकितनी वृद्धि कर- नारी छे; तेथी समकितधारी श्रावके हमेशां ते भावना भाववी जोइए. सम- सारांश प्रश्नो. १ भावना एटले शुं ? २ भावनाना केटला प्रकार छ ? ३ ते छ भावनाओने कइ कइ वस्तुनी साथे सर- खावी छ, ते वस्तुओनां नाम आपो. ४ समकितने रसना पात्रनुं रुपक आप्युं छे, ते कइ भावना छ ? ५ कित चारित्र धर्मरुपी झाडर्नु मूळ छे. " ए केटलामी भावना ? ६ समकितने जीवितनो आधार कहेल छ, ते कई भावना ? ७ बीजी भावनामां समकितने शेनुं रुपक आ- पेलं छे ? ८ " समकित ज्ञान चारित्र विगेरे गुणरुप तत्वनो निधि छ," ए केटलामी भावना ? ९ श्रीजी काई भावना के ? १० आ समकितनी भावना भाववाथी शो लाभ छ ?
૩૩ शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. मूळ, द्वार, निधि, जीवित, समकितधारी. पाठ १४ मो. छ स्थान. समकितमा छ स्थान गणाय छे. ए छ स्थान जी- वने उद्देशीने कहेलां छे. ए छ स्थानो आस्तापूर्वक मान- वाथी समकित गुणने वधारे छे. " जीव छ, " एम जे मानवु, ते पहेलं स्थान छ. जीव कहो वा आत्मा कहो, ए बने एकज वस्तुनां नाम छे. ते जीवनुं मुख्य लक्षण चैतन्य छे. " जीव नित्य छ, एम जे मानवं, ते वीजुं स्थान छे. जीवनो अत्यंत अभाव थतो नी, वेथी तेने नित्य कह्यो छे. " जीव कोनो की छे, " एम जे मानवू, ते त्रीजुं स्थान छे. जीव सारां अने नठारी कर्मोनो कर्ता छे. मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, अने योगथी मलिन थइने ते वेदनीयादि कोनो कर्त्ता छे. " जीव कोनो भोगवनार छे, " एवी रीते जे પ ३४ मानवु, ते चोथु स्थान छे. जीव करेलां कर्मोनां सुख दुःख विगेरे फळनो भोक्ता छ. " जीवने मोक्ष छे, " एम जे मानवं, ते पांच स्थान छे. सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान, अने सम्यक् चा- रित्र-ए त्रण रत्नथी उत्कृष्ट पुरुषार्थ करी, कर्मना वधा अंशने दूर करनारा जीवनो मोक्ष थाय छे. " जीवने मोक्षनो उपाय छ, एटले जीवने कर्म. रहित थवानो उपाय छे, एम मानवु, ते छटुं स्थान छे. ते उपाय सम्यग् ज्ञान, दर्शन, अने चारित्र छे. सारांश प्रश्नो. १ स्थान केटलां छे ? २ स्थान कोने उद्देशीने कहेला छ ? ३ जीवने मोक्षनो उपाय छे एम मानवं, ते केटलामुं स्थान ? ४ मोक्षनो उपाय शुं ? ५ 'जीव छ' एम मानवं, ते केटलामुं स्थान ? ६ जीव अने आत्मा केवी वस्तु छे ? ७ जीवनुं मुख्य लक्षण शुं छे ? ८ " जीवनो मोक्ष छे एम मानवं, ते केटलामुं स्थान ? ९ मोक्ष केवा जीवने थाय छ ? १० त्रण रत्नो कयां ? जीव नित्य छ " एम मानवू, ते कयुं स्थान छे ? १२ जीव नित्य शा माटे छे ? १३ ॥ जीव क- मोनो भोगवनार छे" एम मानवू, ते केटलामुं स्थान ३५ छ ? १४ जीव कयां फळनो भोक्ता छ ? १५ “ जीव कर्मोनो कता छ " एम मानवं, ते केटलामुं स्थान छ ? १६ जीव केवां कर्मोनो कर्त्ता छ ? १७ जीव शेनाथी मलिन थइने वेदनीयादि कर्मोनो कर्त्ता छ ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. स्थान; उद्देशीने, आस्तापूर्वक, चैतन्य, अत्यंत अ- भाव, अविरति, योग, वेदनीआदि, भोक्ता; पुरुषार्थ, अंश. पाठ १५ मो. समकितना सडसठ बोल विषे. कविता. सवैया एकत्रीशा. भणे विचारे जे नव तत्वो करे भक्तिथी मुनिवर सेव, पासथ्थादि भ्रष्ट तणी राखे नहीं संग कर्यानी टेवा दूर रहे मिथ्या दृष्टिथी ए भेदो श्रद्धाना चार, ते समकित गुणधारी श्रावक समजी ल्यो समकितनो सार. १
૩૬
मन इच्छा सिद्धात श्रवणनी व्रत चारित्र तणो अभिलाप,
देव गुरु आदि उत्तमनी चैयावच्च करवानी आश;
ए त्रण छे समकितनां लिंगो धारण करवा धरता प्यार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजी ल्यो समकितनो सार. २
श्री अरिहंत सिद्ध जिन प्रतिमा चारित्रागम ने अनगार,
उपाध्याय आचार्य चतुर्विध संघ अने दर्शन सुखकार;
ए दशनो शुभ विनय करे ने ए दश राखे विनय प्रकार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजी ल्यो समकितनो सार. ३
मननी वचनंतणी कायानी ए त्रण शुद्धि राखे आप,
शंका नहि राखे जिनवचने परमत वांछा न करे आप
धर्मतणा फळमां नव राखे ह्रदय विषे संदेह लगार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजी ल्यो समकितनो सार. ४
जे पाखंडी धर्म कुलिंगी लोको फरता जगविख्यात,
करे कदि न प्रशंसा तेनी मुखथी प्रेम धरी साक्षात;
नव राखे परिचय ए जननो ए पांचे दूपण दुःखकार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजी ल्यो समकितनो सार. ५
ज्ञाता जिनमत परमतनो छ धर्म तणो उपदेशक आप,
न्याय थकी बदनारो चादी घरे शुक्रन ज्योतिपनी छाप,
तपसी मांत्रिक विद्यासिद्धि आट प्रभावक ए मुखकार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजी ल्यो समकितनो सार.. ६
जिनमतमा जे धरे कुशलता शासन प्रभावना करनार,
गीतारय तीरखनी सेवा धर्म विषे दृढता धरनार;
39
,
देव गुरु श्रुत विनय वधारे ए पांचे भूषण भवहार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजी ल्यो समकितनो सार. : ७
कपाय टाळे उपशम गुणथी शिवसुख इच्छे धरी संवेग,
उदास रहे भवथी निर्वेद अनुकंपा धरवानो वेग
जिनवचने आस्ता दृढताथी पांचे समकित लक्षण सार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजी ल्यो समकितनो सार. ८
जे परतीर्थी देव अने परतीर्थीनी प्रतिमा कहेवाय,
वांदे नहि करजोडी तेने नहीं मस्तकथी नमन कराय:
तेनी साथे प्रथम न बोले वारंवार वदे न लगार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजी ल्यो समकितनो सार. ९
धर्मबुद्धिए परतीर्थिकने खानपान नव आपे लेश,
गंध पुष्प तेने नव अ राखी धर्म तणो उद्देश;
ए यतना छे समकितनी छो राखो नित्ये समकित धार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजी ल्यो समकितनो सार. १०
राजा ज्ञाति पंच अने वळवंत देवनो जे अभियोग,
आजीविकाने गुरु निग्रहथी विपरित करवानो संयोग
होय अनिच्छा लाचारीथी करतां ए छे छो आगार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजील्यो समकितनो सार. ११
समकित छे चारित्र वृक्षतुं मूळ मनोहर जे सुखकार,
समकित छे चारित्र नगरमा प्रवेश करवातुं शुभ द्वार;
समकित छे चारित्र महेलनो दृढ पायो धरतो विस्तार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजील्यो समकितनो सार. .१२
૩૮
जीव वस्तु छे जीव नित्य छ जीव कर्मनो छ करनार,
जीव कर्मनो भोगवनारो मोक्ष जीवने छे सुखकार;
मोक्ष तणो छ उपाय तेने ए छ स्थान तणोज प्रकार,
ते समकित गुणधारी श्रावक समजी ल्यो समकितनो सार. १३
दोहा.
सडसठ पूरा बोल ए, समकितना निरधार,
कंठ करे जे प्रेमथी, ते पामे भवपार.
शिक्षके नीचना शब्दोनी समजुती आपवी.
पासथ्थादि, श्रद्धा, श्रवण, अभिलाप, चारित्रागम,
परमत वांछा, गीतारथ ( गीतार्थ ), तीरथ. ( तीर्थ ),
भवहार, उद्देश, समकितधार, अभियोग, गुरु. निग्रह,
विपरीत ( काम ).
पाठ १६ मो.
पच्चखाण भाग १ लो.
पञ्चखाण ए प्राकृत भाषानो शब्द छे. तेने संस्कृत
भापामां प्रत्याख्यान कहे छे. प्रत्याख्यान ए शब्दमा
त्रण पद रहेलां छे. पहेलं पद प्रति, वीजुं पद आ,
अने
उ८
. .
त्रीजुं पद आख्यान-ए त्रण पदं मळीने प्रत्याख्यान
शब्द थयेलो छे. प्रति एटले तरफ, आ एटले मर्या-
दा-हद, अने आख्यान एटले कहे, एवा तेना जुदा
जुदा अर्थ थाय छे. ते वधानो भावार्थ । एवो छ के,
अविरतिपणा तरफ आगारनी मर्यादा करी कहे, ते
प्रत्याख्यान अथवा पच्चखाण कहेवाय छे. ते पञ्चरखाणना
मूळ गुणरुप अने उत्तर गुणरुप एवा वे भेद छ. मुनिने
पंचमहाव्रत लेवां, ते मूळ गुणर्नु पञ्चखाण छे, अने शुद्ध
आहार लेवा विगेरे जे करवू, ते उत्तर गुणर्नु पञ्चखाण
छे. श्रावकने पांच अणुव्रतनां जे पञ्चखाण, ते मूळ गुणनुं
'पञ्चखाण छ, अने शिक्षाबत विगेरेनां जे पच्चखाण, ते
उत्तर गुणर्नु पञ्चखाण छे. पच्चखाण हमेशां साधारण
रीते अविरतिनुं विरोधी छे, अने अविरति दूर करवानोज
तेनो हेतु अथवा उद्देश छे.
ते पञ्चखाणखें उपयोगीपणुं हमेशां उत्तर गुणरुपे
रहेल छे. ते उत्तर गुण पचखाणना दश भेद पडे छे. ते
दश प्रकारनां नाम आ प्रमाणे. छे-
१ अनागत पञ्चखाण, २ अतिक्रांत पञ्चखाण, ३
कोटी सहित पञ्चखाण, ४ नियमित पञ्चखाण, ५ अनागार
पच्चखाण, ६ सागार पच्चखाण, ७ निरवशेष पच्चखाण,
८ परिमाणकृत पच्चखाण, ९ सांकेतिक पच्चखाण, अने
४८
ते
.१० अद्धा पच्चखाण. आ दशे
प्रकारनां पचखाण,
एत्तर गुणनां पच्चखाण कहेवाय छे.
सारांश प्रश्नो.
१ पच्चखाण ए केवो शब्द छ ? २ पच्चखाणने
संस्कृतमां शुं कहे छ ? ३ प्रत्याख्यान ए शब्दमां केटली
पद छ ? ४ प्रति, आ,, अने आख्यान ए त्रणे पदनो
जुदो जुदो अर्थ कहो. ५ प्रत्याख्यान अथवा
पच्चखाणनो भावार्थ शो ? ६ पच्चखाणना केटला भेद
छ ? ७ पच्चखाणने मूळ तथा उत्तर गुणरुपे मुनि तथा
श्रावकमां घटावो. ८ मुनि तथा श्रावकने मूळ गुणर्नु
पच्चखाण करे ? ९ मुनि तथा श्रावकने उत्तर गुणर्नु
पच्चखाण करे ? १० पच्चखाणनो हेतु अथवा उद्देश
शो छ ?
उत्तर गुण पच्चखाणना केटला
भेद छ ? १२ उत्तर गुण पच्चखाणना दश भेदनां नाम
यापो.
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
प्राकृत, संस्कृत, मर्यादा, अविरति, आगार, मूळ
गुण, उत्तर गुण, शिक्षाबत. उद्देश.
४१
पाठ १७ मो.
पचखाण आग २ जो.
पर्युषण विगरे पर्व आव्यानी अगाउथी गुरुनी पासे
पच्चखाण लइने जे तप करवामां आवे, ते पहेलं अनागत
पच्चखाण कहेवाय छे. पर्युषण विगेरे पर्व बीती गया
पछी तेज कामना हेतुथी पाछळथी आठम विगेरेना तपने
माटे जे पच्चखाण ले, ते वीजें अतिक्रांत पच्चखाण
कहेवाय छे. सवारे उपवास प्रमुख व्रत करीने वळी वीजे
दिवसे सवारे तेज उपवास विगेरेनु पच्चखाण करे, एम
छछ विगेरेनी कोटि मेळवे, एटले एक पञ्चखाण पूरा थयानी
वखते वीजा पच्चखाणनी संधि मेळवे, ते त्रीजु कोटिसहित
पञ्चखाण कहेवाय छे. एकाशणा विगेरेना पञ्चखाण पार्या
पहेलां आंबिल विगेरे करवां, एटले एकनो छेडो अने
वीजानी शरुआत, ते पण कोटि सहित पञ्चखाण थायछे.
पोते तंदुरस्त अथवा रोगी होय, पण ते एg चिंतये के
मारे अमुक दिवसे छठ के अट्टम विगेरे तप करचु, पछी
गमे तेवू कारण उपजे, तोपण ते निर्धारेला दिवसे ते
तप अवश्य करे, पण छोडे नहीं, ते नियंत्रित पचखाण
कहेवाय छे. आ पञ्चखाण जे काळे वज्ररुपम नाराच
संहननवाला तथा चौदपूर्वी, दशपूर्वी अने जिनकल्पी हता,
ते काळे हतं; हाल तेनो विच्छेद थइ गयो छे.
६
४२ जे पञ्चखाणमा आगार न होय, ते पांच, अनागार पच्चखाण कहेवाय छे. आ पच्चखाण पण पूर्व काळेज हतुं, हाल तेनो उच्छेद थइ गयो छे. जे पच्चखाणमा आगार होय, ते छटुं सागार पच्चखाण कहेवाय छे. जेमा अशन विगेरे चार प्रकारना आहार अने अनाहार वस्तु सर्वनु पच्चखाण करवामां आवे, तथा चउविहार विगरे तथा अनशन करवामां आवे, ते सातमु निरवशेष पच्च- खाण कहेवाय छेजेमा दातिनी संख्या, कोळीयानी संख्या अने घरनी संख्या करे, एटले भिक्षा विगेरेमां दाति, कोळीया अने घरनुं परिमाण करे ते अथवा मग, अडद विगेरे वस्तुओनी भिक्षानो जैमा त्याग करवामां आवे, ते आठमुं परिमाणकृत पच्चखाण कहेवाय छे. सारांश प्रश्नो. १ अनागत पच्चखाण कोने कहेवाय १ २ पर्युषण पर्व चीती गया पछी तेज कामना हेतुथी पाछळ्थी आठम विगेरे तपने माटे जे पच्चखाण ले, ते कयु पच्चखाण कहेवाय छ १ ३ कोटि सहित पच्चखाण कोने कहेवाय ? ४ कोटि एटले शुं ? ५ मारे अमुक दिवसे अमुक तप कv, एवो नियम धारी ते कदि पण छोटे नहीं, ते कयु पच्चखाण कवाय छे ? ६ अनागार पच्चखाण कोने कहेवाय ? ७ जे पच्चखाणमा आगार होय, ते केवु प- च्चखाण कहेवाय ? ८ निरवशेष पच्चखाण कोने कहे- वाय ? ९ जेमा दाति, कोळीया अने घरनी संख्या कर- नामां आवे, ते कयुं पच्चखाण कहेवाय ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. पर्युषण पर्व, कोटि, वज्ररुषभ नाराच संहनन, चौद- पूर्वी, दशपूर्वी, जिनकल्पी, उच्छेद, आगार, अशन, अनाहार वस्तु, चरविहार, अनशन, दाति, परिमाण. पाठ १८ मो. पचखाण भाग ३ जो. ( नवमा सांकेतिक पचखाणना आठ भेद.) काइपण संकेत एटले चिन्ह करीने पञ्चखाण लेवू, ते नवमुं सांकेतिक पच्चखाण कहेवाय छे. आ पच्चखाण घणुंकरीने गृहस्थने होय छे. कोइ श्रावक पोरसी वि- गेरेना पच्चखाण करीने वहार कोइ कामे गयो होय, अथवा घरमा वेठो होय, अने पोरसीनो वखत पूरो थइ गयो होय, परंतु भोजननी सामग्री तैयार यइ न होय, ते रखते एवो विचार करे के, आटलो वखत मारो ए.
च्चखाण वगरनो रहेशे, ते वखते ते एवो संकेत-चिन्ह
करे के, “ ज्यां सुधी हुँ मूठ वाळी नवकार न गणुं,
त्यां सुधी मारे पच्चखाण छ; ते सांकेतिक पच्चखाणनी
पहेलो भेद छे. वळी मुद्रिका धारी राखवा सुधीनो नियम
ते वीजो भेद छे. गांठ बांधी राखवा सुधीनुं पच्चखाण
धारे ते बीजो भेद छे, ज्यां सुधी घरमां होय, त्यां सुधी
धारे, ते चोथो भेद छे.
ज्यां सुधी शरीरना परसेवानां टीपां नीकळे, त्यां
मुधी धारे ते पांचमो भेद छ. ज्यां सुधी श्वास लेवाय,
त्यां सुधी धारे ते छटो भेद छे. ज्यां सुधी पात्र विगेरेने
पाणीनां टीपां मूकाय, अथवा हाथ विगेरे सूकाय, त्यां
मुधी धारे, ते सातमो भेद छे. ज्यां सुधी दीवानी
ज्योति रहे, त्यां सुधी धारे, ते आटयो भेद छे.
आ प्रमाणे सांकेतिक पच्चखाणना आठ भेद कहेला
छे. कदि पोरसी विगैरे पच्चखाण न करे, अने केवळ
अभिग्रहज करे तो गांठ विगेरे न छोडे, त्यां सुधी तेने
पच्चखाण थाय. तेथी या सांकेतिक पच्चखाण जेग बीजा
पच्चखाणोनी वचमां थाय छे, तेम अभिग्रहने विपे पण
थइ शके छ. साधुने पण जो कोइ स्थानके ज्यां सुधी
गुरु विगैरे न आव्या होय, त्यां मुधी अथवा सागारिक
विगरे कांइ कारण होय, लारे पण आ अभिग्रह संकेत
पच्चखाण थाय छ.
,
४५
सारांश प्रश्नो.
१ सांकेतिक पच्चखाण कोने कहेवाय ? २ संकेत
एटले शु? ३ आ पच्चखाण कोनाथी करी शकाय छे ?
४ आ पच्चखाणना केटला भेद छ ? ५ पहेला भेदमां
शुं आवे छे ? ६ मुद्रिका पहेरी राखवा सुधीनुं पच्चखाण
धारे, ते केटलामो भेद छ ? ७ सांकेतिक पच्चखाणनो
बीजो भेद कयो ? ८ घरमां होय, त्यां सुधी धारे ते
केटलामो भेद छ ? ९ सांकेतिक पच्चखाणनो पांचमो
भैद कयो छ ? १० ज्यां सुधी श्वास लेवाय, त्यां सुधी
धारे ते कयो भेद छे ? ११ सांकेतिक पच्चखाणनो सा-
तमो भेद कयो छ ? १२ दीवानी ज्योति रहे, त्यां सुधी
धारे ते कयो भेद गणाय छ ? १३ सांकेतिक पच्चखाण
अभिग्रहने विषे थइ शके के नहीं ? १४ आ पच्चखाण
साधुने पण क्यारे थाथ के ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
संकेत, पोरसी, सामग्री, ज्योति, अभिग्रह, मुद्रिका.
पाठ १९ मो. पञ्चखाण भाग ४ थो. ( दशमा अद्धा पच्चखाणना दश भेद.) जेमां बे घडी तथा पोरसी विगेरेना काळना प्रमा- गयी पञ्चखाण लेवामां आवे, ते दशमुं अदा पञ्चखाण अथवा काल पच्चखाण कहेवाय छे. ते अद्धा पचखाणना दश भेद छे. १ नोकारसी, २ पोरिसी, साइपोरसी, ३ पुरिमट्ट, ४ एकाशण, ५ एकलठाणुं, ६ आंबिल, ७ अ- भक्तार्थ, ८ चरिम, ९ अभिग्रह, अने १० विगइ, एवा तेनां नाम छे. जे नवकार कहीने पारवामां आवे, अने जेनुं वे घडीनुं प्रमाण छे, ते पहेलं नोकारसी पञ्चखाण कहेवाय छे. एक पोहोर दिवस सुधीनुं जे पच्चखाण ते बीजु पोरसी पञ्चखाण कहेवाय छे. साहपोरसी एटले दोढ पोहोरनु पञ्चखाण पण तेमां आवी जाय छे. वे पोहोरनुं पञ्चखाण ते श्रीजु पुरिमट्ट पच्चखाण कहेवाय छे. पुरिमट्टनुं बीजुं संस्कृत नाम पुरिमार्द्ध एवं छे. एकात्रणे वेसीने एकज वार खावानुं नियम ते चोथु एकास' पञ्चखाण कहेवाय छे. एकज वार अने एक अंगज हाले तेवी रीते खावं, ते पांच, एकलठाणुं पञ्चखाण कहेवाय छ. आ पञ्चखाणमां पाणी पण एकज वार पीवाय छे. , एकाम, एक्लटागा, आमंश्लि, उपवासमां पाणी उन पानाम के.
४७
जेमा विगय तथा निवीआता खवाय नहीं, अने लुटुं
रधेिलं अनाज पाणीमा धोइने खावू, ते आयंबिल नामे
छटुं पच्चखाण कहेवाय छे. जे उपवासर्नु पच्चखाण ते
अभक्तार्थ नामे सातमु पचखाण कहेवाय छे, अभक्तार्थ
पच्चखाणर्नु मागधीमां नाम अपभत्तढे एवं छे. दिवस
चरिम अथवा भव चरिम विगेरेनुं जे पच्चखाण ते आठमुं
पच्चखाण कवाय छे.
" ज्यारे अमुक कार्य कराय, त्यारेज अमुक वस्तु
खावी, " एवो नियम धारीने जे पच्चखाण लेवू, ते
नवमुं अभिग्रह पच्चखाण कहेवाय छे. विगइ एटले विकार
करे तेवी दुध, दही, घी, गोळ, तेल, विगेरे वस्तुओ
खावानुं जे पच्चखाण करे, ते दशमुं विगइ पच्चखाण
कहेवाय छे. आ दशे पच्चखाणोमा काळनी मुख्यता छ,
माटे ते अद्धा पच्चखाण कहेवाय छे.
आ वधामां नोकारसी कर्या पछी आंगळ पोरसी
विगेरे पच्चखाण थइ शके, ते विना न यह शके. जो
कदि नोकारसी कर्या विना पोरसी विगैरे करे, तो ते
काळ संकेतरुप जाणवो. तेने माटे वृद्ध लोकोना संपदा-
यमा एम पण कहे छे के, जे नोकारसी पच्चखाण छ,
ते रातना चउविहार विगेरेना पच्चस्लाणचें शिक्षा-
रुप छे.
४८ सारांश प्रश्नो. १ अद्धा पच्चखाण कोने कवाय ? २ अद्धा प- च्चखाण वीजु नाम शुं छ ? ३ अद्धा पच्चखाणना केटला भेद छे ते कहो, अने तेनां नाम आपो. ४ नोका- रसी पच्चखाण कोने कहेवाय ? ५ एक पोहोर सुधीना पच्चखाणने शुं कहे छे ? ६ साठ्ठपोरसी पच्चखाण शेमा गणाय छ ? ७ पुरिमट्ठ पच्चखाण एटले शुं ? ८ पुरिम- हनु संस्कृत नाम शुं छे ? ९ एकासणानुं पच्चखाण केटलामु कहेवाय छे ? १० एकलठाणुं पच्चखाण एटले शुं ? ११ आयंबिल पच्चखाण एटले शुं ? १२ अभक्ता- थै पच्चखाणनो अर्थ शो, अने तेनुं बीजुं नाम शुं छे ? १३ आटमुं पच्चखाण कयुं कहेवाय छ १४ अमुक कार्य कराय, त्यारेज अमुक वस्तु खावी, ए पच्चखाणचें नाम शुं ? १५ विगइ पच्चखाण एटले शुं ? १६ आ दशे पच्चखाणोमां मुख्यता कोनी छ ? १७ नोकारसी पच्च- खाणने माटे वृद्ध लोकोनो शो संप्रदाय छ ? ܝܟ शिक्षके नीचेना शब्दोनी लमजूती आपवी. एकाशगुं, अंग, दिवस चरिम, भव चरिम, अभिग्रह, विकार, भंग, संकेतरुप, संप्रदाय, शिक्षारुप, विगइ. -
पाठ २० मो.
पञ्चखाण करवानुं फळ.
पच्चखाण करवाथी श्रावकने सारं फळ मळे छे.
कोइ पण काम आपणाथी स्वाभाविक रीते सारं थइ जाय,
पण जो ते पच्चखाणनो नियम लइने करवामां आव्यु
होय, तो तेनुं फळ मळे छ, अने नहीं तो ते नकामुं
थइ जाय छे. दाखला तरीके नोकारसीनुं पच्चखाण न
कयु होय, तोपण आपणे अमुक वखत पछी स्वाभाविक
रीते काइ पण आहारपाणी वापरीए छीए, पण जो
नोकारसीनु पच्चखाण लइ, तेने नवकारथी पारीने ते
वापरीए तो आपणने सारं फळ मळे छे, माटे दरेक
श्रावके पच्चखाण लेबानो उत्तम नियम राखवो जोइए.
पच्चखाण लेचाथी आलोक अने परलोक चन्नेनं
फळ मळे छे. आ लोकतुं पण धम्मिलकुमारे मेळव्युं हतुं,
जेनी कथा धस्मिलना रासमां प्रख्यात छे, अने परलोकनुं
फळ दामनक नामे एक वेपारीने मळ्यु हतुं. दामनक
नामे एक वेपारी राजगृह नगरमां थयो हतो. ज्यारे ते
आठ वनो हतो, त्यारे मरकीना रोगथी तेनुं वधुं कुटुंब
नाश- पामी गडे हतुं. पछी दामनक एकलो दुःखी थइ
एक सागरदत्त नामना वेपारीने घेर रह्यो हतो. एक बखते
काइ वे साधु सागरदत्त वेपारीने घेर भिक्षाने माटे आवी
७
चड्या; त्यां दामनकने जोइ तेमांथी एक साधु बोल्या के, आ छोकरो आ घरनो धणी थशे. आ वात गुप्तरीते सागर- दत्ते सांभळी, तेथी तेने दामनक उपर इर्ष्या उत्पन्न थइ, थने तेने छपीरीते मारी नाखवा चांडालने जणाव्यु. वनमां एकांते चांडाल मारवा लई गयो, पण तेने दया आववाथी तेनी टचली आंगळी . कापी लइ सागरदत्तने एंधाणी तरीके आपी, अने दामनकने छोडी मूक्यो. दामनक भय पामीने त्यांथी नाशी छुटयो. फरतो फरतो ते सागरदत्तना वसावेला गोकुळ गाममां आवी चड्यो. गोकूळपतिए ते वाळकने स्वरुपवान् जोइ पोताना पुत्र तरीके राख्यो. अनुक्रमे वाळक युवान थयो, त्यारे सा- गरदत्त शेट त्यां आव्यो; तेणे दामनकने ओळखी लीधो. पछी तेने कोई कार्यनुं वहानुं करी एक पत्र लखी पोताना पुत्रनी पासे. मोकल्यो, अने तेमां तेने विप आपवाने लख्यु. पत्र लइने दामनक चाल्यो, त्यां रस्तामां वाडीनी अंदर कोई कामदेवठे मंदिर आव्यु, तेमां तेणे विश्राम लीधो, अने ते त्यां सड़ गयो; त्यां सागरदत्तनी विपा नामनी दीकरी ते मंदिरमां घर मेळववाने कामदेवनी पूजा करवा आवी. आ मुंदर कुमारने मूतेलो जोइ तेनी उपर मोह पामी गइ. तेनी पासे पत्र इतो ते वांच्यो, तेमां पोताना पिताना अक्षर ओळख्या. तेणीए पिनाना लेखमां भूल जाणी, विपने ठकाणे काजळनो कानो वधारी विषा कयु. पछी ने न्यांधी चाली गह, अने: थोडी. चार पछी दामनक .
48 जागी उठयो. ते त्यांथी सागरदत्तने घेर आव्यो. सागरदत्तना पुत्रे ते पत्र वांची, तेनी. साथे पोतानी बहेन. विषाने पर- णावी. सागरदत्तना पुत्र साथे दामनकनी प्रीति थइ, ते वात जाणी सागरदत्त घणोज नाखुश थइ गयो. पंछी कुळमातार्नु पूजन करवा माटे दामनकने मोकल्यो, अने त्यां लेने ठार मारवाने चांडाल राख्या. कुळमातार्नु पूजन करवानो वखत नठारो हतो, तेवी वेलाए नवा परणेलाने मातार्नु पूजन करवा मोकलवो, ते योग्य न लागवाथी सागरदत्तनो पुत्र तेनीवती पूजन करवाने गयो, त्यां अ-- गाउथी संकेत करी राखेला चांडालोए तेने मारी नाख्यो. आ वात सांभळी सागरदत्तनी छाती शोकथी फाटी गइ, अने ते मरण पामी गयोः पछी सागरदत्तना घरनो स्वामी दामनकः थयो. दामनकर्नु आवु पुण्य पञ्चखाणना नियमथी थयु हतुं. दामनक पूर्व भवे कुलकर हतो, तेणे, जिनदास ना- मना कोइ श्रावकनी संगती साधु पासे जइ मच्छर्नु मांस न खावानु पच्चखाण लीधुं हतुं. एक बखते दुकाळ 'पडवाथी लोको मांसाहारी थया, एटले लोको ते कुलकरने बळात्कारे उपाडी माछला पकडवाने पाणीना धरा पासे लाव्या. त्रण दिवस सुधी वळात्कारे ते काम कराव्यु, सेवामा एक माछलानी पांख तुटेली जोइ तेणे अनशन लीधुं. पछी ते मृत्यु पामीने आ दामनक थइने अवतयों इतो.
પર सारांश प्रश्नो. ? १ पच्चखाण करवाथी शो लाभ छे ? २ दरेक श्रावके केवो नियम राखंवो जोइए ? ३ पच्चखाण लेवाथी आ लोकचं फळ कोने मळ्युं हतुं ? ४ पच्चखाण लेवाथी परलोक फळ कोने मळ्युं हतुं ? ५ दामनक कोण हतो ? ६ ते दुःखी थइने कया नगरमां कोने घेर रह्यो हतो ? ७ सागरदत्ते तेने माटे | कयु हतुं ? अने ते शामाटे कर्यु हतुं ? ८ दामनकने विपानी साथे कोणे परणाव्यो हतो, अने केवी रीते परण्यो हतो? ९ विपाए सागरदत्तना पत्रमा केवा शब्दनो शो फेर को हतो? १० दामनकने सागरदत्ते शेर्नु पूजन करवा मोकल्यो हतो ? ११ दामन- कने बदले कोण पूजन करवा गयुं हतुं ? १२ सागरदत्तनुं छेवटे शाथी मृत्यु थयुं हतुं ? १३ दामनक पूर्व भत्रे कोण हतो, अने तेणे शुं पुण्य कर्यु हतुं ? ते हकीकत समजावो. १४ दामनक सागरदत्तना घरनो स्वामी कया पुण्यथी थयो तो?
૫૩
खंड २ जो.
पाठ २१ मो.
सदाचार भाग १ लो.
शिक्षक-छोकराओ ! आजे तमने सदाचार विषे
शीखववानुं छे, माटे तेमां ध्यान आपजो.
छोकराओ-साहेब ! अमे बराबर ध्यान आपीशुं,
आप कृपा करीने सदाचार विषे समजावो.
शिक्षक-छोकराओ ! आचार एंटले आचरण,
जे सारं आचरण ते सदाचार कहेवाय छे. सदाचार रा-
खवाथी धर्म सारी रीते जळवाय छे. जेनामां सदाचार
होतो नथी, ते माणस धर्मने साधी शकतो नथी. धर्म
साधवानी योग्यता शुचि एटले पवित्र रहेवाथी प्राप्त थाय
छे. जेनामां अशुचि होय, तेनामां धर्म साधवानी योग्यता
आवती नथी. शुचि-पवित्र रहेवानी रीत सदाचारथी
मेळवाय छे. ज्यारे कायानी शुद्धि थइ, एटले हृदय निर्मळ
थवाथी मन वचननी शुद्धि थइ जाय छे; माटे दरेक
श्रावके सदाचार पाळ्वो जोइए. सदाचारने माटे एक
विद्वान् लखे छे के, अनाचार राखवाथी मलिनता आवे
૫૪ छे, अने अति आचार राखवाथी मूर्खता देखाय छे, माटे विचार अने आचार बनेना योगने सदाचार कहेछे. आ शरीर हमेशां अशुचिथी भरेलुं छे, तेथी तेनी द्रव्यथी शुद्धि करवानी जरुर छे. लघुनीति तथा वडी- नीतिए जइ आव्या पछी राख तथा 'जळधी हाथ पग घोवा जोइए, झाडे जवानां वस्त्र जुदां राखवां जोइए. ब- नतां सुधी तो जंगल जइ आव्या पछी न्हाई जोइए, ते छतां कदि तेम न वने, तो हाथ पग बरावर साफ करी, कोगळा करी, मोडं धोई, वधी जातनी अशुचि टाळची जोइए. छोकराओ-साहेब ! हवे अमे सदाचारने माटे. समन्या. हजु पण कांइ ते विपे वीजुं समजावो. सारांश प्रश्नो. १ आचार एटले शुं ? २ सदाचार एटले शुं ? ३ सदाचार राखवाथी शुं थाय १४ क्यो माणस धर्मने साधी शकतो नथी ? ५ धर्म साधवानी योग्यता क्यार प्राप्त थाय छ ? ६ केवा माणसमां धर्म साधवानी योग्य- ता आवती नयी ? ७ सदाचारथी केवी रीत मेळ्याय छ ? ८. सदाचारने माटे एक विद्वान् शुं लखे छे ? ९ द्र- ध्ययी शृद्धि करवानी कोने जरुर छ ? १० राख तथा
પપ
पाणीथी हाथ पग क्यारे धोवा जाइए ? ११ जंगल
जइ आव्या पछी शुं कर, जोइए ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
आचरण, शुचि, अशुचि, निर्मळ, मलिनता, मूर्खता,
लघु नीति, डी नीति.
4.
पाठ २२ मो.
सदाचार भाग २ जो.
शिक्षक-छोकराओ ! तमे सदाचारने माटे थोडं
तो समज्या हशो, हवे ते विषे वधारे समजावू, ते ध्या-
नमा राखजो.
सदाचारनो वीजो शब्द आचार छ, तेना त्रण
भाग पडे छे. मननो आचार, वचननो आचार, अने
कायानो आचार. हमेशा मन चोख्खं राखवू, ए मननो
आचार कहेवाय छे. मननो आचार राखबाथी मन चोख्खं
रहे छ, अने ज्यारे मन चोख्खं रहे, तो पछी तेमां नठारा
विचारो आवता नथी..
छोकराओ-साहेब ! तमे का के, मन चोख्खं
राखg, त्यारे मन चोखं न रहे, ए केवी रीते बनतुं
૫૬ हशे ? वळी मन शेनाथी मेलं थाय ? ते वधु अमने सारी रीते समजावो. शिक्षक-छोकराओ ! खोटुं ध्यान करवाथी, मनमां कपट राखवाथी, अने खराव विचार लाववाथी मन मेलं थइ जाय छे. ज्यारे मन मेलं थयुं, एटले मननो आचार नाश पामे छे, तेथी करीने माणस अनेक जा- तनां नठारां काम करे छे, माटे हमेश मनन चोख्खं राखg. मनने चोख्खं राख, ए मननो आचार पाळ्यो कहे- वाय छे. छोकराओ ! वीजो वचननो आचार छे. सारां वचनो बोलवां, सत्य बोलवू, सत्पुरुपनां वखाण करवां, वोलवामां नम्रता तथा विनय राखवो, ए-वचननो आचार कहेवाय छे. वचननो आचार राखवाथी सारां वचनो बोलाय छे, अने सारां वचनो बोलवाथी सारां काम करी शकाय छे. जेओ वचननो आचार राखता नथी, तेओ नठारां वचन वाले छे. तेमना मुखमांथी भुंडां वचनो अने वीजानी निंदानां वचनो नीकळे छे, तेवां माणसो वचनना आचार विनाना नीच गणाय छे. बेकराओ ! बीजो कायानो आचार छे. मन अने वचननो आचार ए भावधी, अने कायानो आचार द्र- व्यथी छ. शरीरनी अशुचि दूर करवी, शरीर उपर मेल राखचो नहीं, शरीर उपर पहखानां लुगडां साफ राखवां, ५७ मोटुं, हाथ, पग, बराबर संभाळीने धोवां. आंख, कान, अने नाकना मेल दूर करी, तेने साफ राखवां, ए वो कायानो आचार कहेवाय छे. कायानो आचार राखवाथी बळी आलोकमां पण केटलाएक फायदा थाय छे. शरीर साफ राखनारने चामडीना के रुधिरना रोगो थता नथी, तेथी धणे भागे शरीरनी तंदुरस्ती सारी रहे छे, माटे दरेक श्रावकना छोकराए कायानो आचार साचववानी जरुर ,. छोकराओ-साहेब ! हवे अमे सदाचारमा बराबर समजी गया. आपनी आ शीखामण प्रमाणे अमे हमेशा चालीशु, अने आपनो आभार मानीशुं. सारांश प्रश्नो. १ सदाचारनो वीजो शब्द शो छ ? २ आचारना केटला भाग पडे छे ? तेनां नाम आपो. ३ मननो आ- चार एटले शुं ? ४ मन शाथी मेलं थाय छ ? ५ वच- ननो आचार एटले शुं ? ६ वचननो आचार न होय, तो केवां वचनो नीकळे छे ? ७ कायानो आचार एटले शुं ? ८ भावथी अने द्रव्यथी कया कया आचार छ ? ९ कायानो आचार राखवाथी आ लोकमां शा शा फा- यदा थाय छ ? ८
પદ
पाठ २३ मो.
न करवाना काम.
धर्मदास नामनो एक धर्मी श्रावक चंपानगरीमा रहेतो
इता, तेने विनय अने विवेक नामे वे पुत्रो हता. धर्मदास
पोताना चे पुत्रोने जुदा जुदा विषय शीखवतो हतो. जे
करवा योग्य काम होय, ते विनयने शीखवतो, अने जे
करवा पोग्य काम नथी, ते 'विवेकने शीखवतो हतो.
विवेक हमेशां सवारे उठीने न करवानां कामनो 'पाठ करी
जतो, अने ते पछी बीजां काम करतो इतो. दरेक श्रा-
बकना दीकराए ते विवेकनी जेम न करवानां कामने याद
राखवां जोड़ए, ते आ नीचे प्रमाणे छे:-
१ मिथ्यात्वीनी करणी करवी नहि.
गाय विगेरे पाणीओने लाकडी विगेरेथी घणाज
मारवां नहि, अने मजबुत रीते वांधवां नहि.
३ कोइपण जीवनी हिंसा करवी नहि.
४ माकड, जु विगेरेने तडकामां फैकी देवी नहि.
५ अळगण पाणी वापर नंहि.
६ अनाज, इंधणां, शाक, पत्र, तांबूल, फल बिगेरे
शोध्या विना वापरवां नहि.
७ मोपारी, खारक, आळी, फळी विगेरे पूरीरीने
भाग्या विना पोहापां नाखवां नहि
८ जीववाळी भूमि उपर नहा नहि, तथा तेवी
भूमि उपर मल मूत्र करवां नहि.
९ जयणा राख्या विना हालचं चालवु नहि.
१० जीववाला दाणा विगेरे दळवा, भरटवा तथा
रांधवा नहि.
११ धर्मनां काम अनादरथी करवा नहि.
१२ देव, गुरु अने साधर्मिओनी. निंदा तथा द्वेषा
करवो नहि..
१३ देरासरनुं द्रव्य खावु नहि.
१४. देव, गुरु अने धर्मनी निंदाः करनारनी संगता
करवी नहि.
१५ धर्मी जीवोनी मश्करी करवी नहि.
१६ अति. कपायवाळां काम करवां नहि,
१७ पंदर कर्मादानना आचरण करवा नहि.
१८ पापवाळी नोकरी करवी नहि.
आ अढार न करवानां काम हुं करीध नहीं, को-
इनी पासे करावीश नहीं, अने करता होयः तेमने भनु-
मोदीश नहीं..
हमेशां आ प्रमाणे याद करवायी. विवेकः एक. सारो
उत्तम श्रावक थयो हतो,. अने. तेनुं विवेक एy नाम
नमतमा सार्थक भयं रदं
सारांश प्रश्नो.
१ धर्मदास केवो श्रावक हतो ? २ तेने केटला
दीकरा हता ? ३ विनय अने विवेकने ते शा शा विषय
शीखवतो हतो ? ४ विवेक हमेशा शुं याद करतो हतो?
५ न करवानां काम केटलां गणाव्यां छ ? ६ ते न
करवानां काम याद करवाधी विवेकने शो लाभ थयो
इतो ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
करणी, इंधणां, तांबूल, मळ, पंदर कर्मादान.
पाठ २४ मो.
करवा योग्य काम.
धर्मदासे विनयने करवा योग्य काम गणावी, तेने
हम याद राखवाने का इतुं. तेमां मुख्य रीते पांच
प्रकारना विन्द्धनो त्याग करवाने सूचव्युं इतुं.
१ देश विरुद्ध, २ काळ विरुद्ध, ३ राज विरुद्ध,
४ लोक विरुद्ध ५ अने धर्म विरुद्ध, ए पांच प्रकार विरुद्ध
न होय,
काम हमेशां करवा योग्य छ; एम विनयना
११
मनयां ठसावी दीधुं हतुं. तेथी विनय हमेशां संवारे तेने
याद करतो हतो.
१ जे देशमा जे काम न करवा योग्य होय, ते
देश विरुद्ध गणाय छे.
२ जे काळे जे काम न करवा योग्य होय, ते काळ
विरुद्ध गणाय छे.
३ जे माणसो राजानी विरुद्ध होय, तेमनी साथे
मळवू, अथवा जे राजाए मना करेलु होय, ते
करवू, ते राज विरुद्ध गणाय छे.
४ जे काय लोकमां नठारूं कहेवातुं होय, अथवा
जे कामने लोको धिक्कारता होय, तेवू काम करवू
ते लोक विरुद्ध कहेवाय छे.
५ जे काम धर्मनी विरुद्ध होय, ते धर्म विरुद्ध
कहेवाय छ
आ पांचे प्रकारना विरुद्ध वगरनुं जे काम होय, ते
करवा योग्य काम गणाय छे तेवां करवा योग्य
कामने विनय हमेशा
याद करतो, अने ते प्रमाणे
वर्ततो हतो. तेम वर्तवाथी विनय ज्यारे लायक
उम्मरनो थयो, त्यारे ते एक उत्तम प्रकारनो श्रावक
बन्यो हतो.
१२
साराश प्रश्नो.
१ विरुद्ध केटला प्रकारना छ ? ते गणाचो. २ देश
विरुद्ध अने काळ विरुद्ध एटले शुं ? ३ राज विरुद्ध,
लोक विरुद्ध, अने धर्म विरुद्ध एटले शुं ? ४ करवा
योग्य काम के गणाय ? ५ करवा योग्य काम करवायी
विनय केवो थयो हतो ?
शिक्षके नीचेना शन्दोनी समजूती आपवी.
विरुद्ध, काने, उत्तम प्रकारनो.
पाठ २५ मो.
भोजन विधि भाग १ लो.
प्रावकना आधारमा भोजन विधि पण आवे छे.
विधि प्रमाणे भोजन करवायी आलोकमा घणा लाभ
थाय ठे, अने भोजननो आचार साचववायी धर्मनो
लाम पण मळवी काय छे. श्रावके हमेशां वरखतसर
भोजन करवू. वनतां मुधी भोजननो वखत उल्लंघन करवा
रेवो नहीं. भोजन करवानी जग्या ज्या एकांत बने
जानि रा देने ठेकाण रावी. भोजन वखने मुनिने दान
Gur
,
आपत्रानो भावना भाववी, अंने योग होय तो दान देवू,
तेमज माता, पिता, भाइ, बहेन, पुत्र, स्त्री, सेवक,
ग्लान-दुःखी, अने बांधलां गाय विगेरे जानवरोनी
संभाळ पहेला लेवी जोइए. प्रथम मातापिताने भोजन
करावयू, ते पछी सरखा आसन उपर बेसी, पंचपरमेष्टीतुं
स्मरण करी, देव गुरुन नाम लइ, पञ्चखाण पारी, सर्व
नियमोने संभारी शांतिथी भोजन करवू.
जे 'पांतानी तबीयतने माफक आवे सेवा पदार्थों
जमवा. खावा कोई चीज उपर अति लोलुपता राखची
नहीं. जे वस्तु अभक्ष्य एटले पापवाळी होय ते खावी
नहीं. खावामा मिताहार करवो, वधारे पडतुं जम, नहीं.
पधारे पडतुं जमवाथी अजीर्ण, उलटी, प्राडो विगेरे थाय
छे. जे माणस मिताहार करे छे, ते चळवान् थाय छे,
अने जे वधारे पडतुं जमे, ते रोगी याय छे. जो आखी
जींदगी निरोगी रहे होय, तो नीचेनी पांच बाबत
हमेशां ध्यानमा राखवी.
१ मुख लागे त्यारे हितकारी योडो खोराक
लेवो.
२ डावी बाजु नीचे राखी सु.
३ थोडो घणो चालवानो अभ्यास राखतो.
४ ज्यारे हाजत थाय, त्यारे तरत दिशा मात्रा
करवां
५ विषय भोग घणोज ओछो करतो.
:.. आ पांच बाबत ध्यानमा राखी, ते प्रमाणे नियमधी वर्तवामा आवे, तो आखी जींदगी निरोगी रहेवाय छे. सारांश प्रश्नो. १ विधि प्रमाणे भोजन करवाथी शो लाभ थाय छे १ २ भोजननो आचार साचववाथी शुं थाय छ ? ३ भोजन क्यारे कर ? ४ भोजन करती वखते | भावना भाववी ? ५ भोजन करती वखते कोनी कोनी संभाळ लेवी जाइए ? ६ भोजन करवानी जग्या केवे ठेकाणे राखवी ? ७ पहेलो कोने भोजन करायवू ? ८ पछी शुं शुं करीने भोजन करवू ? ९ भोजनमां केवा पदार्थो जमवा ? १० केवी वस्तु खावी नहीं ? ११ ब- धारे पडतुं जमवाथी शुं थाय छ ? १२ जे मिताहार करे छ, तेने शुं थाय छे ? १३ आखी जींदगी निरोगी रदेवामां पांच वावत ध्यानमा राखदानी छे, ते कइ पांच वावत ? १४ ए पांच वावत ध्यानमा राखवाथी | याय छ ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. उल्लंघन, ग्लान, लोलुपता, अभक्ष्य, अजीर्ण, मि- ताहार, भावना.
૬૫ पाठ २६ मो. भोजन विधि भाग २ जो. श्रावके भोजन विधिमां पचीश बावतोनो त्याग करवानो छ. १ अति सवारे, अति संध्याकाळे, अने रात्रे भोजन करवू नहीं. २ सडेलं अने वासी अन्न खावू नहीं. ३ हालता चालतां खावू नहीं. ४ जमणा पग उ- पर हाथ राखी खावू नहीं. ५ खावाना पदार्थ हाथमा राखी खावू नहीं. ६ खुल्ला आकाशमां, तडकामां, अने अंधारामां वेसी खावू नहीं. ७ झाड नीचे वेसी खावू नहीं. ८ तर्जनी ( अंगुठानी पासेनी ) आंगळी उंची राखी खावू नहीं. ९ हाथ, पग, मुख विगेरे धोया बिना खावू नहीं. १० नग्न थइने के मेला वस्त्र पहेरीने खावू नहीं. ११ थाळी पकडया विना खावू नहीं. १२ फक्त एक धोतीयुं पहेरी खावा बेसबुं नहीं. १३ भीनां वस्त्र पहेरी खावू नहीं. १४ भीनुं वस्त्र माथे लपेटी खावू नहीं. १५ ज्यारे अपवित्र होइए, त्यारे खावू नहीं. १६ अति लंपट थइ एटले अकरांतीया थइ खावू नहीं. १७ उपान पहेरी निःकेवळ भूमिपर देसी खावू नहीं. १८ विदिशा तथा दक्षिण दिशा तरफ मुख राखी खाई नहीं. १९ चंडाल के धर्मभ्रष्टनी देखतां खावू नहीं. २० फुटेला तथा मलिन भाजनमां खावू नहीं. २१ हत्या करनार तथा रजस्वला स्त्रीए स्पर्श करेली वस्तु खावी नहीं. २२ गाय, ८
श्वान तथा पंखीए सुंघेली, अजाणी अने फरीथी उनी
करेली वस्तु खावी नहीं. २३ वचवचाट शब्द करतां
खावू नहीं. २४ उघाडी पडी रहेली वस्तु खावी नहीं,
अने २५ मुख- फाडतां बुरुं लागे, एम मुख करी खाएँ
नहीं.
आ. पचवीश नियमोने वरावर ध्यानमा राखी श्रावके
हमेशां भोजन करवू. अति खारु, अति खाटुं, अति ती,
अति ठंडं अने अति मीठु खावू नहीं. अति गरम खावाथी
रस नाश पामे छे, अति खाटुं खावाथी इंद्रियोनी शक्ति
कम थइ जाय छे, अति खारु खावाथी नेत्र बगडी जाय
छे, अति चीक' खावाथी नासिकानी शक्ति मंद थइ
जाय छे, माटे दरेक पदार्थ साधारण रीते खाचा. तेमां
थोडा थोडा वधा रस होवा जोइए. ती तथा कडQ
खावाथी कफ दूर थइ जाय छे, कपायलं अने मीटुं
खावाथी पित्त नाश पामे छ, घी विगेरे चीकणा पदार्थों
खावाथी वायु दूर थइ जाय छे.
जमती बखते साथी पहलां मीठं अने चीकणुं भोजन
करवू, जे तीखं भोजन होय ते वचमां करवू, अने कडवू
भोजन पाछळ्थी करवू. जम्या पहेला पाणी पीयूँ न
जोइए. जम्या पहेला पाणी पीदाथी अग्नि मंद थइ जाय
ल, भोजननी वचमां पीवाथी घणो गुण थाय छे,
वनां पीधा शिवाय भोजनने अंते पीवाथी ते झेर
गमान याय के. जम्या पली हाथ धोवा, ते पाणीथी
अने
६७ भींजाएला हाथ, गळं, कपोळ, तथा आंख उपर लगा- डवा नहीं. एटुं मुकवू नहीं, जोइए. ते प्रमाणमांज लेवु. जम्या पछी शरीरचं मर्दन, दिशागमन, बोजो. उठाववाचें काम, वेसी रहेQ अने स्नान, एटलां काम करवां नहीं. कोइ विशेष पुण्यनुं काम शरु करतां अने. आठम, चौदश विगेरे पर्वने दिवसे भोजन करवू न. जोइए. एची तपश्या आलोक अने परलोकमां हितकारी छ, तथा गुणकारी छे, भोजन को पछी नवकार मंत्र गणी उठ.. आ विधि प्रमाणे भोजन करनारो श्रावक सदाचारने सेवनार तथा स्वधर्म प्रमाणे वर्तनार गणाय छे. .. साराश प्रलो.. १ भोजन विधिमां केटली वायतोनो त्याग करवानो छ १२ ते पचवीश बावत टुंकामां गणावो. ३ रस, ई- द्रियोनी शक्तिनो नाश, नेत्रनुं वगडी जवू, नासिकानी शक्तिनी मंदता केवा केवा पदार्थो खावाधी थाय छ ? ४ कफ, पीत्त, अने वायु केवो पदार्थ खावाधी नाश पामे छ ? ५ जमती वखते पहेलं, वच्चे, पाछळ्थी फेQ के जमवू ? ६ जमती वखते पाणी पीयूँ क्यारे सारु, अने क्यारे नठारं ? ७ जम्या पछी भीजाएला हाथ क्यां क्यां न लगाडवा जोइए ? ८ जम्या पछी शुं शं न करवु जोइए ? ९ कये कये दिवसे भोजन न कर जोइए ? १० तपस्या करवाथी शो लाभ थाय छे ? ११ भोजन कर्या पछी शुं भणीने उठवू ? १२ विधि प्रमाण भोजन करनारो श्रावक केवो गणाय छ ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. तर्जनी, लंपट, उपान, निकेवळ, विदिशा, धर्म- भ्रष्ट, रजस्वला, रस, कफ, पीत्त, अग्नि मंद, दिशागमन. खंड ३ जो. पाठ २७ मो. जीव. जैन शास्त्रमा नब तत्त्वो मानेलां छे, तेमाचं जीव एक तत्व छे. जे प्राणने धारण करे, अने जनामां चै- तन्य होय, ते जीव कहेवाय छे. ते जीवनी उपाधि भेदे करी छ जातिओ के. पहेली जातिमां जीव चेतना लक्षणथी एक प्रकारनो छ. बीजी जातिमां बस अने स्थावर प्रवा तेना चे भेद पडे छ. जेनामां चालवानी शक्ति होय, अने जे भय देखीने त्रास पामे. ते अस जीव, अने जे दाली चाली. शके नहीं, अने स्थिरज रहे, ते स्थावर जीव कहेवाय छे. त्रीजी जातिमां तेना त्रण भेद पडे छे. स्त्रीवेद, पुरुषवेद, अने नपुंसक वेद अर्थात् स्त्री जातिना, पुरुष जातिना, अने नपुंसक जातिना जीव होय छे ते. चोथी जातिमां देवता, मनुष्य, नारकी अने तिर्यंच एम चार जातना जीव थाय छे. पांचमी जातिमां एकेंद्रिय, बेइंद्रिय, तेरेंद्रिय, चौरेंद्रिय, अने पंचेंद्रिय एम पांच भेद पडे छे, अने छठी जातिमा छकाय जीव थाय छे. पृथ्वीकाय, अपकाय, ते- उकाय, वायुकाय वनस्पतिकाय अने त्रसकाय. आ प्रमाणे जीवनी छ जातिओ थाय छे. तेमां पांचमी जातिमां जे एकेंद्रिय [ एक इंद्रिवाळा ] जीव कहेल छ, तेना सूक्ष्म अने बादर एवा वे भेद पडे छे. सूक्ष्म एकेंद्रिय जीव निरतिशयी सूक्ष्म नाम कर्मना उदयवाळा होवाथी ते घणा झीणामां झीणा होय छे. ते आ वधा चौद राज्य- लोकमां व्यापीने रहेला छे, ते पर्वत विगेरेने भेदीने जाय आवे छे, ते कोइथी भेदाता नथी, अने अग्निथी वळता नधी. माणसोनां चर्मचक्षुधीर जोवामां आवता नथी, अने माणस के कोइ वीजाना उपयोगमा आवता नथी. वादर एकेंद्रिय जीव दृश्य सातिशय नाम कर्मना उदयवाळा होवाथी माणसोथी जोइ शकाय छे, एक नि- १ १ एक जातनुं कर्म छे, जे कर्म उदय आवे, त्यारे प्राणी सीणामां झो' रुप मेळवी सके छे. २ चामडानी आंखो. ३ एक जातनुं कर्म छ. जे उदय आवतां प्राणी दृश्य-जोर शकाय ते रुप मेळवे हे.
यमित ठेकाणे ते रही शके छे, कोइथी भेदी शकाय के, अग्निथी वाळी शकाय छे, अने ते सर्वना उपयोगमा आवे छे. सारांश प्रश्नो. १ जैन शास्त्रमा केटलां तत्त्व छ ? २ जीव कोने कहेवाय ? ३ जीवनी वधी मळीने केटली जाति ? ४ पहेली, त्रीजी अने पांचमी जाति का ? ते जणावो. ५ त्रस जीव एटले शुं ? ६ स्थावर एटले शुं १ ७ छ- काय कया कहेवाय ? ८ सूक्ष्म अने यादर एटले शुं ? ९ निरतिशया सूक्ष्म अने सातिशय दृश्य ए शु छ ? ते समजावो. . शिक्षके नीचेना शन्दोनी समजूती आपवी. प्राण, चैतन्य, स्त्रीवेद, पुरुप वेद, नपुंसक वेद, नारकी, तिर्यंच, एकेंद्रिय, वेरिद्रिय, तेरिंद्रिय, चौरिंद्रिय, पंचेंद्रिय, पृथ्वीकाय, अप्काय, तेउकाय, वायुकाय, वन- स्पतिकाय, त्रसकाय, चौद राज्यलोक, चर्म चक्षु, उपाधि भेद, निरतिशय, सातिशय.
७२ पाठ २८ मो. पर्याप्ति. जीवना शरीरनो बंध पुद्गळोथी बने छ. ए पुद्- गळोना वधाराथी जे कांइ पुद्गळना परिणामने करनारी कोइ जातनी शक्ति थाय, ते पर्याप्ति कहेवाय छे. ते पर्याप्तिनो ओछो वधतो संबंध जीवनी साथे होय छे. ते पर्याप्तिने आधारेज जीवन जीवनर रहे छे. पर्याप्तिनो टुंको अर्थ आहारादि३ पुद्गळोनो मेळाप एवो पण थइ शके. ए पर्याप्तिना छ भेद छे. १ आहार पर्याप्ति, २ शरीर पर्याप्ति, ३ इंद्रिय पर्याप्ति, ४ श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति, ५ भाषा पर्याप्ति अने ६ मनः पर्याप्ति- १ आहार पर्याप्ति दरेक जीव वीजा जीवनी उ- त्पत्ति वखते जे शक्तिवडे आहार ले, अने ते आहारने पछी रसपणे परिणमाववानी जे शक्ति ते. २ शरीर पर्याप्ति आहारना रसरुप थएला परिणा- मने रस, रुधिर, मांस, घरवी ( मेद ), अस्थि४, मज्जा५ अने वीर्य, ए सात धातुरुपे परिणमावी शरीर बांधवानी जे शक्ति ते. - १ एक रुपने योजे रुपे यह जतु, ते ' परिणाम फहेवाय छे. २ जी. ववं. : साद ते. ४ हाडकां. ५ एक जातनी धातु छे.
७२ १ ३ इंद्रिय पर्याप्ति सात धातुपणे परिणमावेला ते रसने जेने जेटली इंद्रियो जोइए, तेटली इंद्रियपणे परिण- माववानी जे शक्ति ते. ४ श्वासोच्छवास पर्याति उपरनी त्रण पर्याप्ति बांधीने पछी श्वासोच्छवासने योग्य एवी वर्गणाना दलिक ( दळिया ) लइ, तेमने श्वासोच्छ्वासपणे परिणमावीने अवलंवी मुकवानी जे शक्ति ते. ५ भाषा पर्याप्ति भापाने योग्य एवां पुद्गळ लइ, तेने भापापणे परिणमावीने अवलंबी मुकवानी जे शक्ति ते. ६ मनः पर्याप्ति मनोवर्गणा योग्य पुद्गळ लइ, तेने मनपणे परिणमावीने अवलंबी मुकवानी जे शक्ति ते. आ छ पर्याप्तिश्रो जीवमां होय छे. तेमाथी जे जीवने जेटली पर्याप्ति कही छे, तेटली पूरी कर्या पछी मरण पामे, ते पर्याप्ता जीव कहेवाय छे, अने जेने जेटली कही छे, तेटली पूरी कर्या विना मरण पामे, ते अपर्याप्ता जीव कहेवाय छे. ते छ पर्याप्तिओमा आहार पर्याप्ति, शरीर पर्याप्ति, अने इंद्रिय पर्याप्ति आ पहेली त्रण पर्याप्तिओ पूरी को विना कोइ जीव मरतो नथी. -----..- ५ प्रदा फरी मुरवानी,
3
सारांश प्रश्नो..
१ पर्याप्ति एटले शुं ? २ तेनो टुंको अर्थ | थइ
शके ? ३ पर्याप्तिना केटला भेद छ ? ४ परिणाम शब्दनो
अर्थ शो ? ५ सात धातु क्या ? ६ वर्गणा एटले शुं ?
७ दलिया एटले शुं ? ८ अवलंबी मुकवानी एटले शुं ?
९ पर्याप्ता अने अपर्याप्ता जीव कया कहेवाय ? १० कइ
कइ पर्याप्ति पूरी कर्या विना जीव मरतो. नथी ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
परिणाम, पुद्गळ, पर्याप्ति, जीवन, आहार, उत्पत्ति,
मज्जा, अस्थि, वर्गणा, दलिक, अवलंबी, मनोवर्गणा.
पाठ २९ मो.
जीवना चौद भेद.
जीवनी छ जातिमां पांचमी जातिनी अंदर पंचेंद्रिय
जीव कहेल छ, तेने चामडी, जीभ, नाक, आंख अने
कान-ए पांच इंद्रियो होय छे. ए पंचेंद्रिय जीवना
संज्ञी अने असंज्ञी एवा वे भेद थाय छे. जेनामां मननी
संज्ञा (भान ) होय ते संज्ञी, अने जेनामां मननी संज्ञा
१०
- न होय, ते असंज्ञी कहेवाय छे. एक इंद्रियवाळाना वे भेद, वेरिद्रिय, तेरिंद्रिय अने चौरिंद्रियना एक एक भेद अने पंचेंद्रियना वे भेद-ए वधा मनी नीचे प्रमाणे सात भेद थाय छे. १ मूक्ष्म एकेंद्रिय. २ वादर एकेंद्रिय. ३ वेरिद्रिय. ४ तेरिद्रिय. ५ चौरिद्रिय. ६ संनी पंचेंद्रिय. ७ असंझी पंचेंद्रिय. उपरना सात भेदना जीवो-१ पर्याप्ता अने २ अ- पर्याप्ता, एचा वे प्रकारे छे, एटले वधा मळीने जीवना चौद भेद यया, ते नीचे प्रमाणे- १ सूक्ष्म एकेंद्रिय पर्याप्ता. २ सूक्ष्म एकेंद्रिय अपर्याप्ता. ३ वादर एकेंद्रिय पर्याप्ता. ४ बादर एकेंद्रिय अपर्याप्ता. ५ वेरिद्रिय पर्याप्ता. ६ वेरिद्रिय अपर्या. ७ तेरिंट्रिय पर्यामा. ८ तेरिंद्रिय अपर्याप्ता. ९ चारिद्रिय पर्याप्ता. १० चौरिद्रय अपर्याप्ता. ११ संझी पंचेंद्रिय पर्याशा. १२ संजी पंचेंद्रिय अपर्याप्ता. १३ असंही पंचेंद्रिय पर्याप्ता. १४ असंज्ञी पंचेंद्रिय अपर्याप्ता.
७५ सारांश प्रश्नो. १ पांच इंद्रियोनां नाम कहो. २ संज्ञी अने असंझी ए शुं ? ते समजावो. ३ जीवना सात भेद क्या? ते गणावो. ४ क्या जीवना एक एक भेद थाय छ ? अन्हे क्या जीवना वे वे भेद थाय ? ते जणावो. शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. संशा, संज्ञी, असंही, पर्याप्ता, अपर्याप्ता. पाठ ३० मो. जीना चौद भेद विषे कविता. चोपाइ. जीवतणी छो जाति बने, एकेंद्रिय पांचमीमा गणे. ।। १ ।। सूक्ष्म ने पादर तेना भेद, द्वि त्रिर चौ इंद्रिय एक भेद. . ॥ २ ॥ ९ पांचमी आतिमां. २ द्वि-द्वीइंद्रि (बेरिदिय ), त्रि-प्रोदिय (सेरिदिय), मी-मौरिद्रिय, तेमना एक एक भेद से.
७६ ॥ ३ ॥ पंचेंद्रिय वेथी भेदाय; संझी असंज्ञी ते कहेवाय. ते साथे पर्याप्ता थाय, अपर्याप्ता तेम गणाय. जीवतणा चौद भेद मनाय, जिनवाणीमां ते वंचाय. ॥ ५ ॥ पाठ ३१ मो. अजीव तत्त्व. पहेला जीव तत्त्वनी विरुद्धनुं जे तत्व ते चीजें अजीय तत्व कहेवाय छे. जीव तत्त्व बरावर समजवाथी अजीव तत्त्व सहेली रीते जाणी शशाय छे. ते अजीवना अरुपी अजीब जने रुपी अजीव, एवा मुख्य वे भेद पडे छे. जेर्नु रुप देखवामां न आये, ते अरुपी कडेवाय छे, अने जेनुं प देखवागां आये, ते रुपी कहेदाय छे. अल्पी अजीवना दश भेद अने रुपी अजीवना चार भेद मळी अजीदना चाँद भेद थाय छे. आ चौद भेदवाळं अजीव तत्व दरेक आस्तिक माणसे जाग, जोइए. ए तत्त्व जा- पाथी जगन्ना घणा पदार्थो जाणवामां आवे छे. जे वस्तु चेतन विनानी जडम्प छ, ते अजीव गणाय छे, Re-team-rrrce saathonent +
७७
अने तेवी वस्तुना ज्ञानथी जीव अने अजीव तत्त्वतुं स्फुट
ज्ञान सारी रीते थइ शके छे.
सारांश प्रश्नो.
१ अजीव तत्त्व एटले शु? २ अजीव तत्त्वना मुख्य
केटला भेद छ ? ३ रुपी अने अरुपी एटले शुं? ४ रुपी
अजीवना केटला भेद छ ? ५ अरुपी अजीवना केटला
भेद छ ? ६ अरुपी अने रुपी अजीवना वधा मळीने
केटला भेद थाय छे ? ७ अजीव शुं कहेवाय ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
अरुपी, रुपी, आस्तिक, चेतन, जड.
.
,
'पाठ ३२ मो.
अस्तिकाय.
अस्ति एटले प्रदेश तेनो काय एटले समूह,
अस्तिकाय कहेवाय छे, एटले प्रदेशना समूहने अस्तिकाय
कहे छे. चलन ( हालदा चालवामां ) मदद करवाना
स्वभाव गुणवाळो जे प्रदेशनो समूह, ते धर्मास्तिकाय
ते
७८ कहेवाय छे. जे स्थिर राखवामां मदद करवानो स्वभाव- वाळो होय, ते अधर्मास्तिकाय कहेवाय छे. एक ज- ग्याची पीजी जग्यामां जतां जे अवकाश आपे, ते आकाशास्तिकाय कहेवाय छे; एटले चलनमां मदद करवानो स्वभाववानो प्रदेश समूह ते धर्मास्तिकाय, स्थिर राखवामां मदद करवानो स्वभाववाळो प्रदेश समूह ते अधर्मास्तिकाय, अने एक जग्याधी बीजी जग्यामा जतां अवकाश आपनारो प्रदेशनो समूह, ते आकाशास्ति- काय एम समजवू. आ त्रणे प्रकारना अस्तिकायना स्कंध, देश अने प्रदेश एवा अण त्रण भेद पडे छे. जे आखो पदार्थ होय, ते स्कंध कहेवाय छे. तेवा स्कंधनी साथे संबंध- वाळो जे केटलोएक भाग, ते देश कहेवाय छ, अने अनो भाग करवाची बीजो भाग पडी शके नदि, ते प्रदेश फदेवाय छे. सारांश प्रश्नो. १ अस्तिकाय ए शब्दनो अर्थ करो. २ अस्ति एटले |, अने काय एटले Y ? ३ धर्मास्तिकाय एटले | १ ४ अधर्मास्तिकाय एटले Y? ५ आकाशास्तिकाय एटले ? ६ धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, अने आका- शास्तिकायना केटला भेद छे ? ७ स्कंध, देश अने प्रदेश एटले ? ते समजावो.
७e. शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. अस्तिकाय, चलन, स्वभाव, अवकाश, स्कंध, देश, प्रदेश १ . पाठ ३३ मो. अरुपी अजीवना दश भेद. अरुपी अजीवना दश भेद छे. धर्मास्तिकायना प्रण, अधर्मास्तिकायना त्रण, आकाशास्तिकायना अण, अने काळनो एक, एम मळीने अरुपी अजीवना दश भेद थाय छे. धर्मास्तिकायना स्कंध, देश, अने प्रदेशथी अण भेद थाय छे. अधर्मास्तिकायना स्कंध, देश, अने प्रदेशथी त्रण भेद थाय छ, अने आकाशास्तिकायना पण स्कंध, देश, अने प्रदेशथी त्रण भेद थाय छ, अने का- छनो भेद एकज छ, तेने काळ अथवा अद्धा कहे छे. एकंदर तेना दश भेद नीचे प्रमाणे थाय छ- १ धर्मास्तिकाय स्कंध. २ धर्मास्तिकाय देश. ३ धर्मास्तिकाय प्रदेश ४ अधर्मास्तिकाय स्कंध. ५ अधर्मास्तिकाय देश. ६ अधर्मास्तिकाय प्रदेश. ७ आकाशास्तिकाय स्कंध ८ आकाशास्तिकाय देश. ९ आकाशास्तिकाय प्रदेश. १० काळ-अद्धा.
सारांश प्रश्नो. १ अरुपी अजीवना केटला भेद थाय ? २ आका- शास्तिकायना त्रण भेद गणावो. ३ अधर्मास्तिकायना त्रण भेद क्या ? ते कहो. ४ अद्धा एटले | ? ५ एकं- दर अरुपी अजीवना दश भेद कहो. शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. काळ, अद्धा. . पाठ ३४ मो. रुपी अजीवना चार भेद. आगळ कहेवामां आव्यु छ के, जे रुपवाळा अ- जीव होय, ते रुपी अजीव पुद्गळास्तिकाय कहेवाय छे. ते रुपी अजीवना चार भेद छे. १ पुद्गळ स्कंध, २ देश, ३ प्रदेश, अने ४ परमाणु, एवां नेगनां नाम छे. स्कंध, देश, अने प्रदेशनुं स्वरुप आगळ जाणदामां आव्युं छे. इवे पुद्गळ अने परमाणुर्नु स्वरुप जाणवं जोड़ए. जनो पूरण गलन एटले पूरावानो तथा गळचानो स्वभाव होय, ते पुद्गल कहेवाय छे. ए पुगळना कंध, देश, प्रदेश अने परमाणु एवा चार भेद थाय छे. स्कं. घथी भिन्न धयेलानो जे निर्विभाज्य भाग एटले जनो ,
भाग पडी शके नहि एवो भाग, ते परमाणु कहेवाय छे.
ए परमाणु पुगळ्नो एक भेद पण याय छे. पुद्गळा-
स्तिकाय पी होवादी तेमां वर्ग, गंध, रस, स्पर्श, अने
शब्दं रहेला छे, ते बळी सचित्त, अचित्त, अने मिश्र गमे
तेवो शब्द, अंधकार, प्रकाश, चंद्रनी ज्योति, छाया,
पूर्यनो लडको विगेरे गुणो तेनामां रहेला छे. ते चौद
राजलोकमा व्यापक छ, अने संख्यात, असंख्यात अने
अनंत मंदेशी छे. धर्मास्तिकाय अने अधर्मास्तिकाय ते
वनेमां वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, शब्द अने रुप नथी,
तेथी ते अरुपी कवाय छे. ते असंख्यातं प्रदेशी अने
चौद रज्जुप्रमाण लोकमां (चौद रांजलोकमां) व्यापक
छ. आकाशास्तिकाय पण लोकालोक व्यापक, अनंत
प्रदेशी अने वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, शब्द अने रुपथी रहित
छे, तेथी ते पण अरुपी कहेवाय छे.
सारांश प्रश्नो.
१ रुपी अजीवना केटला भेद छ ? तेनां नाम आपो.
२ पुद्गळ एटले शुं ? तेनुं स्वरूप बतावो. ३ पुद्गळना
केटला भेद छ ? ते गणावो. ४ परमाणु एटले शुं ? ते
कहो. ५ पुद्गळास्तिकायरुपी शी रीते छ ? ते विवेचन
करी वतावो. ६ पुद्गळास्तिकायमा शुं शुं होय छे ? ते
कहो. ७ धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय अने आकाशास्ति-
कायमा शो तफावत छ ? ते विवेचन करी समजावो. ८ चंद्रनी ज्योति अने सूर्यनो तडको विगेरे गुण कोनामां रहेला छ। शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. पुद्गगळ, परमाणु, पूरण गलन, निर्विभाज्य भाग, संचित, अचित, मिश्र, चंदनी ज्योति, चौद रज्जुपमाण, व्यापक, संख्यात, असंख्यात, अनंत प्रदेशी, असंख्यात प्रदेशी, चौद राजलोक. पाठ ३५ मो. काळ. काळ ए अरुपी अजीवनो दामो भेद छे, ते सूर्यनी गति अने क्रियाना परिणाम उपरथी जाणी शकाय छे. अति सूक्ष्म काळने समय कहे छे, तेवा असंख्यात सम- यने एक आवलिका कंह छ, एटले निगोदना जीवाने एक वासोच्छासमां सत्तर वार मरण मुधी अने अहारमा मानी उत्पत्ति चाय, दे तयतुं आयुष्य सो ने छप्पन आलिका कवाय छे. चसो छप्पन आवलिनो निगोदना
जीवनो एक क्षुल्लक भव जे साडासचर क्षुल्लक अव जेटलो
काळ ते श्वासोच्छ्वासरुपः प्राण छे, तेयाः सात प्राणनो एक
स्तोक कहेवाय छे. तेवा सात स्तोफनो एक लव कवाय
छे, अने तेवा सत्तोतेर लवनो एक मुहूर्त गणाय छे. ते
मुहूर्त्तनुं प्रमाण वे घडीनुं छे; तेवा त्रीश शुहर्तनो अहोरात्र
थाय छे. तेवा पंदर अहोरात्रनो एक पक्ष (पखवाडीयु)
थाय छ, घे पखवाडीयानो एक मास थाय छ, वार मासर्नु
एक वर्ष थाय छे, असंख्याता वर्पोथी एक पल्योपम थाय छे,
दश कोडाकोडी पल्योपयनो एक सागरोपम थाय छ, दश
कोडाकोडी. सागरोपमे एक उत्सर्पिणी थाय छे, तेटलाज,
प्रमाणे, एक अवसर्पिणी थाय छे..
सारांश प्रश्नो.
१ काळ. शी रीते 'जाणी शकाय ? २ समय कोंने
कहे छ ? ३ केटला समयनी आवलिका कहवाय छे ?
४ निगोदना जीवोनुं आयुष्य केटली आवलिकार्नु छ ?
५ श्वासोच्छवासरुप एवा केटला. प्राणनो एक स्तोक कहे-
वाय छे. १६ केटला स्तोकनो लव कहेंबाय छे ? ७ मुहूर्त्तनुं
प्रमाण केवी. रीते छे. ? ८ केटला मुहर्तनो अहोरात्र थाय
छ १ ९ पक्ष, मास अने वर्ष केवी रीते थाय ? ते कहो.
१
रात ने दिवस,
८४ १० उत्सर्पिणी अने अवसर्पिणी काळना प्रमाणमां शो सफावल छ ? Rommon- शिक्षके नीना शब्दोनी समजूती आपवी. सूर्यनी गति, क्रियानुं परिणाम, अति सूक्ष्म, निगोद, क्षुल्लक भव, दासोच्छवासरूप पाण, स्तोक, लव, अहोरात्र, पक्ष, कुवानुं दृष्टांत, पल्पोपम. पाठ ३६ मो. छ द्रव्य. जैन शासनमा छ द्रव्य गणाय छे. एक जीव अने यजीवनां पांच द्रव्य मळीने छ द्रव्य थाय छे. जीव द्रव्य विपे आगळ कहेवामां आव्युं छे, अने अजीवना चौद भेद पण जणान्या छे. हवे अजीवना पांच द्रव्यगो विशेष वोध यवाने तेनुं विवेचन करवानी जरुर छे. धर्मास्तिकाय अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय अने काळ, ए पांच अजीव द्रव्य कवाय छे. जेय माछलांने संचार फरवार्नु अपेक्षा कारण पाणी, एटले मारलं पाणीने लइने संचार करी शक के. लेयन सा कने गतिरपे परिणमता पटले जीव तथा पुगळने संचार ૮૫ करवामां जे अपेक्षा कारण, ते पहेलुं धर्मास्तिकाय द्रव्य कहेवाय छ, अर्थात् धर्मास्तिकायने लइने जीव तथा पुद्ग- लनो संचार थइ शके छे. पीजु अधर्मास्तिकाय द्रव्य छ, 'तेर्नु स्वरुप वधी रीले धर्मास्तिकायने मळतुं छे, पण ए द्रव्य जीव तथा पुद्- गळने स्थिरता राखवामां सहाय करे छे. जेम कोइ मुसा- फर रस्ते चालतां थाकी जाय, त्यारे विश्राम लेवा कोई झाड विगेरेनी छायामा जइ से छे, अही स्थिति तो पोतेज करे छे, परंतु आश्रय विना स्थिति थइ शकती नथी, तेथी तेने वृक्षनी छाया ए अपेक्षा कारण छे. तेवी रीते जीव तथा पुद्गळ गति करतो स्थिति करवाने प्रसंगे स्थिति तो पोतेज करे छे, तेने वृक्षनी छाया जेवु स्थिति करवानुं जे अपेक्षा कारण, तेज अध- बोस्तिकाय द्रव्य कहेवाय छे. त्रीजु आकाशास्तिकाय द्रव्य छे. तेनुं वीजुं स्वरुप धर्यास्तिकायना जेवुज छ. आ द्रव्य, जीव अने पुद्गळने रहेवामां अवकाश आपे छे, ते द्रव्य लोकालोक व्यापी छे. धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, अने आकाशास्तिकाय आ त्रणे एकबीजामां मळी गयेला छे. ज्यां मुधी आ ऋण द्रव्यो छे, त्यां सुधी लोक छे, अने ज्यां केवळ आकाशास्तिकाय छे, अने चीजें कांइ नथी, ते अ- लोक छे. .
८६ . चोधुं पुद्गळास्तिकाय द्रव्य छे. आ पुद्गळवें वी- नाम परमाणु पण कहेवाय छे. घडो, वन, निगेरे पदार्थो परमाणुओना समूहथी बनेला छे, अने तेथी तेओ तेना कार्य छे. तेओने पण पुद्गळज कहे छ. एक पर- माणुमा एक वर्ण, एक रस, एक गंध, अने वे स्पर्श रहेला छ. तेनु बनेलं कार्य ए तेनुं लिंग छे. परमाणुमा वळी एवी खुबी छे के, एक वर्णथी बीजो वर्ण, रसथी बीजो रस, गंधथी बीजो गंध, अने स्पर्शथी बीजो स्पर्श थइ जाय छे. परमाणु द्रव्य-वस्तुरूपे अनादि तथा अनंत छ, अने पर्यायरुपे आदि तथा अंत सहित छे. परमाणुओना जे कार्य छे, तेओमा कोइ प्रवाहथी अनादि अनंत छे, अने कोइ आदि तथा अंत सहित छे. आ जगतमा जेटला. जडरूप देखाय छे, ते वघां परमाणुनां कार्य छे. जे पुद्- गळ द्रव्य समुच्चयरुपे एकटुं थाय, तो ते द्रव्यमां, काळो, लीलो, रातो, पीलो, अने धोळो-ए पांच वर्ण छे. तीखो, कडवो, कपायेलो, खाटो, अने मीटो-आ पांच रस छे. मुगंध, अने दुर्गंध आ वे गंध छे. खरखरो, मुंबाळो, हळ वो, भारे, टाहो, उनो, चीकणो, अने लुखो-ए आठ पर्श छे. ते पुद्गळोमां एकत्रीजाना मेळापधी जातजातना. वर्ण विगरे बड़ जाय थे, ते पुद्गलोमां अनंत शक्तिओ तथा अनंत स्वभाव छे. द्रव्य, क्षेत्र, काळ अने भाव-इ- त्यादि निमित्तोना मळवायी ते पुदगलोनां विचित्र प. परिणाम धाय .
पाचगुं.. काळ द्रव्य छ, तेनुं स्वरुप आगळ कहेवामां याव्युं छे. सारांश मो. १ जैन शासनमा केटलां द्रव्य गणाय छ ? २ छ द्रव्य कयां ? ते गणावो. ३ पद अजीव द्रव्यना नाम आपो. ४ धर्मास्तिकाय द्रव्यमां शेनो दाखलो छ ? ते कहो, ५ धर्मास्तिकाय द्रव्यनो शो स्वभाव छ ? ६ धर्मा- स्तिकायने लइ जीव तथा पुद्गळ शुं करी शके छ ? ७ अ- धर्मास्तिकायचं स्वरुप | छे ? ८ अधर्मास्तिकाय जीव तथा पुद्गलने केवी सहाय करे छ ? ९ अधर्मा- स्तिकायनो दाखलो आपी समजावो. १० आकाशास्ति- काय द्रव्य जीव तथा पुद्गळने शुं करे छे ? ११ ते द्रव्य के, छे ? तेवं विशेष विवेचन करो. १२ आलोक क्यां सुधी छे, अने अलोकमां क्यु द्रव्य छ ? १३ पुद- गळास्तिकायतुं वीजुं नाम शुं छे ? १४ परमाणुओनां कार्य क्या पदार्थो कहेवाय छ ? १५ एक परमाणुमां वर्ण, रस, गंध, अने स्पर्श केला छे ? ते कहो. १७ प- रमागुमा वीजी शी खुबी छ ? ते जणावो. १८ परमाणु अनादि तथा अनंत क्यारे छ, अने आदि तथा अंत सहित क्यारे छ ? ते समजावो. १९ परमाणुओना कार्य अनादि तथा अनंत क्यारे होय छे, अने आदि तथा
t
अंत सहित क्यारे होय छ ? २० पुदंगळ द्रव्यमा वर्ण,
रस, गंध अने स्पर्श केटला केटला छे ? ते गणावो.
२१ पुदगलोमां शक्तियो केटली छे, अने स्वभाव केटला
छ ? २२ द्रव्य, क्षेत्र, काळ केटला छे, अने भाव वि-
मेरे निमित्तो मळवाथी पुद्गळोमां शुं थाय छ १ २३ पां.
चमुं द्रव्य क्युं ? ते कहो.
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
विवेचन, अपेक्षा कारण, संचार, स्थिरता, अवका.
श, लोकालोक, लोक, अलोक, परमाणु, कार्य, द्रव्य,
अनादि, अनंत, पर्याय, प्रवाह, समुच्चय, अनंत स्वभाव,
निमित्त, विचित्र परिणाम.
पाठ ३७ मो.
३ पुण्य तत्व.
पुण्य तत्व ए त्रीचं तत्वं छे. जेनाथी पोते शुभ
प्रकतिरडे करेला कर्म जीवोने मुख थापे छे, ते पुण्य
मद्देवाय छे. या पुण्य उपार्जन करवानां नव कारण छे.
१ पात्रने अननुं दान आपवाथी, २ ताने पाणी पा-
चायी, ३ नागाने ओडवा वस्र आपवायी, ४ घर विना-
८८ नाने, ५ रहेवा स्थान. आपयाथी, ६. सुवा बेसवाने आ- सन आपवाथी, ७ गुणी जनने देखी मनमां संतोष तथा इर्ष मानवाथी, ८ गुणी जननी वचनवडे प्रशंसा करवाथी, अने कायाथी सेवा करवाथी अने ९ गुणीजनने नमस्कार करवाथी, आ नव प्रकारनां कारणथी प्राणी पुण्य उपा- र्जन करे छे. अहीं पात्रने दान आपवामां वे प्रकार एक पात्रदान, अने वीजें अनुकंपादान. जे पात्रने दान आपवामां आवे, ते पात्रदान कहेवाय छे. तेवू दान पुण्य तथा मोक्ष बनेनुं कारण थाय छे, अने कोइ पण दीन दुःखी प्राणी होय, तेने अनुकंपाथी आपे, ते अनु- कंपादान कहेवाय छे. आ अनुकंपादान अवश्य एकला पुण्यवंधनुं हेतु थाय छे. , सारांश प्रश्नो. १ पुण्य तत्व ए केटलामुं तत्व छ ? २ पुण्य ए- टले शुं ? ३ पुण्य उपार्जन करवानां केटलां कारण छे ? ४ दानना केटला प्रकार छ ? ५ पात्रदान अने अनुकंपादान बनेमा शो तफावत छ ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. शुभ प्रकृति, उपार्जन, गुणीजन, प्रशंसा, पात्र, अनुकंपा. १२
८८
अंत सहित क्यारे होय छ ? २० पुदगळ द्रव्यमा वर्ण,
रस, गंध अने स्पर्श केटला केटला छे ? ते गणाचो.
२१ पुदगळोमा शक्तिओ केटली छे, अने स्वभाव केटला
छ ? २२ द्रव्य, क्षेत्र, काळ केटला छ, अने भाव वि-
गेरे निमित्तो मळवाथी पुद्गळोमा थाय छे ? २३ पां-
चमुं द्रव्य क्युं ? ते कहो.
शिक्षके नीचेना शन्दोनी समजूती आपवी.
विवेचन, अपेक्षा कारण, संचार, स्थिरता, अवका-
श, लोकालोक, लोक, अलोक, परमाणु, कार्य, द्रव्य,
अनादि, अनंत, पर्याय, प्रवाह, समुच्चय, अनंत स्वभाव,
निमित्त, विचित्रं परिणाम.
.
पाठ ३७ मो.
३ पुण्य तत्व.
पुण्य तत्व ए त्रीजु तत्वं छे. जैनाथी पोते शुभ
प्रकृतिवंडे करेली कर्म जीवोने सुख आपे छे, ते पुण्य
महेवाय छे. आ पुण्य उपार्जन करवानां नव कारण छे.
१ पात्रने अन्ननु दान आपवाथी, २ तर्ध्याने पाणी पा-
चाथी, ३ नागाने ओढवा वन आपचाथी, ४ घर · चिना-
८८ लाने, ५ रहेका स्थान. आपयाथी, ६. सुवा वेसवाने आ- सन आपवाथी, ७ गुणी जनने देखी मनमां संतोप तथा हर्ष मानवाथी, ८ गुणी जननी वचनवडे प्रशंसा करवाथी, अने कायाथी सेवा करवाथी अने ९ गुणीजनने नमस्कार करवाथी, आ नव प्रकारनां कारणथी प्राणी पुण्य उपा- र्जन करे छे. अहीं पात्रने दान आपवामां वे प्रकार छे. एक पात्रदान, अने वीजु अनुकंपादान. जे पात्रने दान आपवामां आवे, ते पात्रदान कहेवाय छे. तेवू दान पुण्य तथा मोक्ष बनेनुं कारण थायं छे, अंने कोइ पण दीन दुःखी प्राणी होय, तेने अनुकंपाथी आपे, ते अनु- कंपादान कहेवाय छे. आ अनुकंपादान अवश्य एकला पुण्यवंधनुं हेतु थाय छे. सारांश प्रश्नो. १ पुण्य तत्व ए केटलामुं तत्व छ ? २ पुण्य ए- टले शुं ? ३ पुण्य उपार्जन करवानां केटलां कारण छे ? ४ दानना केटला प्रकार छ ? ५ पात्रदान अने अनुकंपादान बनेमां शो तफावत छ ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. शुभ प्रकृति, उपार्जन, गुणीजन, प्रशंसा, पात्र, अनुकंपा.
'
पाठ ३८ मो.
पुण्य बांधवा विषे कविता.
चोपाइ.
३
पुण्य बँधनी छ नव रीत,
एथी याये पुण्यमां प्रीत.
मुख्या जनने अन्नना दान,
तरण्या जनने जळनां पान,
रहेवाने आपे छ स्थान,
सुवा माटे शय्या दान.
उघाडाने वस्त्र अपाय,
मनमा सारा संकल्प थाय.
स्तुति करे शुभ वचने नित,
फायाथी सेवे धरी प्रीत.
नमन करे छ पूज्यने आप,
ए नव रीते पुण्यनी छाप.
* अंश
पाठ ३९ मो. १ • -- पुण्य भोगववाना बेंतालीश' प्रकार-भाग १ लो.. उपरना: पाठमा कहेली नव. रीतीथी माणस पुण्य उपार्जन. करे छे, पण ते पुण्यने केवी रीते. भोगवां ? ते. प्रकार जाणवा जोइए.. ते पुण्य भोगववाना. वेंतालीश प्रकार छे. जे: पुण्यना: उदयथी जीन शात... भोगने, ते शातावेदनीय नामे पहेलो प्रकार छे. जेना. उदयवी जीव क्षत्रि आदि उंचा कुळमां उत्पन्न थाय छे, ते उच्च गोत्र नामे बीजों प्रकार छे. जेना. उदयथी जीव मनुष्य : गतिमां उत्पन्न. थाय, ते. मनुष्य गति नामे त्रीजो प्रकार छे, जेम बळद वांको चालतो होय, तेने नाथ घालीने सिद्धो चलाववामां आवे, तेम जीव वक्रगतिए वीजी ग-- तिमा जतो होय, तेने सीद्धो उपजवाने स्थाने जेधी: प- होचाडवामां आवे, ते. आनुपूर्वी कहेवाय छे.. मनु. ज्यनी गति. अने मनुयनी आनुपूर्वीने मनुष्यछिक. कहे छे ए मनुष्यानुपूर्वी नागे. चोथो प्रकार छे. जेना उदयथी देवतांनी. गति. प्रास थाय, ते देवगतिः नामे पांचमो प्रकार छः ते पछी देवानुपूर्वी नामे छटो प्रकार छे.. आ देवगतिः अनेः देवानुपूर्वी ते वनेने सुरदिक कहे. छे. जेना उदयधी पंचेद्रियपणुं प्राप्त थाय, १ ए ताश प्रफर नाम कर्मनी प्रतिना भेद ले.
एर ते पंचेद्रिय जाति नामे सातमो प्रकार छे. जेना उद- यथी औदारिक शरीरने योग्य एवां पुद्गळेोर्नु ग्रहण करीने तथा तेने शरीररुपे परिणमावीने जीव पोताना प्रदेशनी साथे मेळवे, ते औदारिक नामकर्म नामे श्राठमो प्रकार छे. जेना उदयथी वैकिय शरीरने योग्य एवां पुदगोनुं ग्रहण करी तथा तेने शरीरपणे परिणमा- मावीने जीव पोताना प्रदेशनी साथे मेळवे, ते वैक्रिय शरीर नामे नवमो प्रकार छ. आ वैक्रिय शरीरना औपपातिक अने लब्धि प्रत्ययिक एवा वे भेद छ. औपपातिक बैंक्रिय शरीर देवताने तथा नारकीने होय छे, अने लब्धि प्रत्ययिक वैक्रिय . शरीर तिर्यच. तथा लब्धिवंत मनुष्यन होय छे. जेना उदयथी प्राणी चौद पूर्वधारी मुनिराज तीर्थकरनी. ऋद्धि विगेरे जोवाने अर्थे एक हाथ प्रमाण देह धारण करे, ते आहारक शरीर नामे देशमा प्रकार छे. जेना उदयथी. आहारनुं पचावनार अने तेजोलेश्यानो हेतुरुप शरीर धारण करे, ते तेजस् शारीर नामे अगीयारमो प्रकार छे. कर्मनां परमाणु जे आत्माना प्रदेशनी साथे मळ्या छे, ते शरीरज कार्मण शरीर नामे वारमो. प्रकार छे. जेना उदयथी औदारिक अंग उपांग प्राप्त दाय, ते औदारिक - अंगो- पांग नामे तेरमो प्रकार छ, शरीरना. वे हाथ, खभा, एक पीठ, एक माथु, एक उदर भने एक हृदय-ए आठ अंग कहेवाय छे, अने आंगळां विगेरे उपांग कहवाय छे.
तेवीज रीते जेना उदयथी वैक्रिय अंगोपांग प्राप्त थाय, ते चैक्रिय अंगोपांग नामे चौदमो प्रकार के जेना उ- दयथी आहारक अंगोपांग प्राप्त थाय, ते आहारक अंगोपांग नामे पंदरमो प्रकार छे. वाकीना तैजस अने कार्मण शरीरने अंगोपांग नथी. सारांश प्रश्नो. १ पुण्य भोगववाना केटला प्रकार छ ? २ शाता वेदनीय, उच्च गोत्र-ए वे प्रकार समजावो. ३ आनुपूर्वी एटले शुं ? ते दाखलाथी समजावो. ४ मनुष्यद्विक अने सुरद्विक कोनुं नाम ? ते कहो. ५ पंचेंद्रिय जातिनो प्रकार समजावो. ६ औदारिक विगेरे पांच शरीरना प्रकार सम- जावो. ७ वैक्रिय शरीरना केटला भेद थाय ? ८ औप- पातिक वैक्रिय शरीर कोने होय छ ? ९ लब्धि प्रत्ययिक वैक्रिय शरीर कोने होय छ ? १० आहारक शरीरवाळो पाणी शुं जोइ शके ? ११ तेजस् शरीरथी | थइ शके ? १२ कार्मण शरीरथी शुं थइ शके ? १३ अंग केटलां होय ? ते गणावो. १४ उपांग कयां ते कहो. १५ औ- दारिक अंगोपांग, वैक्रिय अंगोपांग अने आहारक अंगो- पांग-ए त्रणे प्रकार समजावो. १६ कया शरीरने अंगो- पांग नथी, ते कहो.
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. शाता, वक्र: गति, आनुपूर्वी, मजुष्यद्विक, सुरद्विक, परिणमावी, प्रदेश, लब्धिवंत, चौद पूर्वधारी, तेजोलेश्या, कर्मनां परमाणु, अंग, उपांग, लूब्धि, प्रत्ययिक, औए- पातिक. पाठ ४०. मो. . पुण्य भोगववाना बेंताळीश प्रकार-भाग २. जो.. वज्र एटले खोली, रुषभ एटले पाटो: अने नाराच एटले वे पासा मर्कट बंध, अर्थात् तेनापर पाटो अने ते उपर खीली; आनुं नाम वज्ररुषभनाराच नामे. संघयणः कहेवाय छे. शरीरमा हाडनो जे मजबूत संचय ते संघयण कहेवाय छे, अने. तेने संस्कृतमा संहनन कहे छे. जेना उद- यथी प्राणी पोताना शरीरमां आ वज्ररुषभनाराच नामतुं पहेलु संहनन प्राप्त करे, एटले तेना शरीरनो बांघो तेवो मजबूत थाय, ते वज्ररुषानाराच नामे सोळमो प्रकार छ. सम एटले सर, चतुरस्त्र एटले चोरस एवं संस्थान एटले आकार ते समचतुरस्र नामे. पहेलं संस्थानः कहेवाय छे. अर्थात पर्यकासन ( पलोंठी ) करी बेसतां चारे वाजुः सरखी आकृति थाय, अने, पोताना आंगळ प्रमाणे एकसो ने आठ अंगुल प्रमाण शरीर थाय, तेवू संस्थान. जेना उदयथी, ५ पाणी तेवा संस्थानने प्राप्त करे, ते समचतुरस्त्र संस्थान नामे सत्तरमो प्रकार छ. जेना उदयची शरीरनो रंग 'सारो एटले धोलो, रातो के पीळो थाय, ते शुभ वर्ण नामे अहारमो प्रकार छे. जेना उदयथी सुगंध थाय, ते 'शुभ गंध नामे ओगणीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी शरीरमां सारो रस प्राप्त थाय. ते शुभ रस नामे वीशमो प्रकार छ. जेना उदयथी शरीरमा सारो स्पर्श प्राप्त थाय, ते शुभ स्पर्श नामे एकवीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी शरीरनुं वजन लोढानी जेम भारे नहीं, तेमज आकडाना रुनी जेम हलकुं पण नहीं, एटले मध्यम रीतर्नु पजन प्राप्त थाय, ते अगुरु लघु नाम कर्म नामे बावीशमो प्रकार छ. जेना उदयची प्राणी गमे तेवा चळवान्ने पण जीत- वाने समर्थ थाय, ते पराघात नाम कर्म नामे वीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी सुखेथी श्वासोच्छ्वास लइ शकाय ते श्वासोच्छ्वास नाम कर्म नामे चोवीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी चंद्रनां विवनी जेम शीतळता उत्पन्न करनार तेजोयुक्त शरीरनी प्राप्ति थाय, ते उद्योत नाम कर्म नामे छवीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी उपभ तथा हंसनी जेम सारी जातनी चालवानी शक्ति प्राप्त थाय, ते शुभख गति नामे सत्यावीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी माणी सुतारनी जेम पोताना अंगना सर्व अवयव योग्य स्थळे गोठ- बवानी शक्ति धरावे, ते निर्माण नाम कर्म नागे अ- व्यावीशमो प्रकार छे.
सारांश प्रश्नो.
१ वज्र, रुषा अने नाराच ए शब्दोना जूदाजूदा
अर्थ करी बतावो. २ संघयण एटले शुं ? अने तेले
संस्कृतमां शुं कहे छे ? ३ सम, चतुरस्त्र अने संस्थान
ए शब्दोना जूदाजूदा अर्थ करो. ४ पर्यकासन एटले शुं ?
५ सम चतुरस्र संस्थानवाळा शरीरनुं प्रमाण केटला आं-
गळ४ थाय ? ६ शुभ वर्ण, शुभ गंध, शुभ रस अने
शुभ स्पर्श, ए चार प्रकार विषे शुं समज्या ? ते स्पष्ट
रीते समजावो. ७ अगुरु लघु नाम की एटले शुं ?
८ जेना उदयथी प्राणी गमे तेवा बळवान्ने पण जीती
शके, ते प्रकारर्नु शु नाम ? ९ श्वासोच्छास नाम कर्मथी
शुं थाय ? १० जेमां प्राणीने चंद्रनां बिंब जेवो शीतल
प्रकाश थाय छे, ते प्रकारचं शुं नाम ? ११ शुभख गति
अने निर्माण नाम कर्मनो अर्थ समजावो.
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
वज्र, रुपभ, नाराच, संघयण, संहनन, मर्कट बंध,
सम, चतुरस्त्र, संस्थान, पर्यकासन, मध्यम रीत, श्वासो-
वास, बिंब, तेजोयुक्त, वृषभ, हंस, अवयव.
पाठ ४१ मो. पुण्य भोगववाना येताळीश प्रकार-भाग ३ जो. जेना उदयथी जीव त्रस विगेरे दश प्रकृतिने प्राप्त करे, ते त्रसदशक नाम कर्म कहेवाय छे, तेमां उस विगेरे दश प्रकार आवे छे. जेना उदयथी प्राणीने बेइंद्रिय विगेरे शरीरनी प्राप्ति थाय, ते अस नाम कर्म नामे ओगणत्रीशमो प्रकार छे. जेना उदयधी जीवने चादर शरीरनी प्राप्ति थाय, ते यादर नाम कर्म नामे त्रीशमो प्रकार छे. जे शरीर देखावामां आवे, ते वादर कहेवाय छे. जेना उदयथी जीव पोतपोतानी पर्याप्ति पूरी करे, ते पर्याप्ति नाम कर्म नामे एकत्रीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी जुदांजुदां शरीर प्राप्त थाय, पण अनंता जीवनी बच्चे एक शरीर पामे नहि, ते प्रत्येक नाम कर्म नामे वत्री- शमो प्रकार छे. जेना उदयथी जीव दांत विगेरे अवय- वोनी द्रढता मेळवे, ते स्थिर नाम कर्म नामे तेत्रीशमो प्रकार छ. जेना उदयधी जीवने शरीरना सर्व अवयव सारा होय, अथवा नाभिनी उपरतुं शरीर सारं होय, ते शुभ नाम कर्म नामे चोत्रीशमो प्रकार छे. जेना उद. यथी माणस सर्वने प्रिय थाय, ते सौभाग्य नाम कर्म नामे पांत्रीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी वाणीमां कोय- लना जेवी मधुरता आवे, ते सुस्वर नाम कर्म नाम छत्रीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी माणसनां वचन लो- - 13 कमो माननीय थाय, ते आदेय नाम कर्म नामे साड- त्रीशमो प्रकार छ. जेना उदयधी लोकमां यश-कीर्ति थाय, ते यशोनाम कर्म नामे आडत्रीशमो प्रकार छ. जेना उदयथी जीवने देवताना आयुष्यनी प्राप्ति थाय, ते सुरायुष्य रुप नामे ओगणचाळीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी मनुष्यना आयुष्यनी प्राप्ति थाय, ते नरायुष्य रुप नामे चाळीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी तिर्यंचना आयुष्यनी प्राप्ति थाय, ते तिर्यंचायुष्य रुप नामे एक- ताळीशमो प्रकार छ, अने जेना उदयथी प्राणीने त्रिभु- वनना पूज्यपणानी प्राप्ति थाय, ते तीर्थकर नाम कर्म नामे वेताळीशमो प्रकार छे. सारांश प्रश्नो. १ संदशक नाम कर्म. एटले शुं ? २ अस विगेरे दश कया ? ते गणावो. ३ वादर एटले के शरीर ? ४ पर्याप्ति नाम कर्म अने प्रत्येक नाम कर्म विषे समजावो. ५ सौभाग्य नाम कर्म, सुस्वर नाम कर्म अने यशोनाम कर्म विषे समजावो. ६ जेना उदयथी मनुष्यना आयुष्यनी माप्ति थाय, जेना उदयथी त्रिभुवनना पूज्यपणानी प्राप्ति थाय, अने जेना उद्यथी माणस सर्वने प्रिय थाय, प्रकार कया ? तेमनां नाम आपा. ते
स्ट
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
दश प्रकृति, बादर, पर्याप्ति, स्थिरता, नाभि, मिय,
मधुरता, माननीय, तिर्यंच, त्रिभुवन, पूज्य.
पाठ ४२ मो.
पाप. तत्व:
जे अशुभः प्रकृतिरुप कर्म जीवोने. दुःख. आपे, ते
पाप कहेवायं छे, अथवा जे: आत्माना आनंद रसने पीवे
एटले भस्म करे, ते पापः कहेवाय छः . ए. पाप. पुण्यथी
विपरीत छे.. ए पापथी नरक: विगेरे नठारां फळ मळे छे,
तेथी ते अशुभ कहेवाय छेपुण्यनी जेम पापनो. संबंध
पण, आत्मानी साथे रहेलो. छ. सुख तथा दुःख जुदांजुदां
अनुभववामां आवे छे; तेथी तेमनां कारणरुप पुण्य तथा
पाप पण स्वतंत्रपणे अंगीकार करवा योग्य छे. एकलं:
पुण्य के एकलु. पाप के. एकलुं पुण्य पाप मिश्र मानवू.
योग्य नथी.
आ पाप अहार प्रकारे बंधाय. छ; अने व्याशी
प्रकारे भोगवायः छ. १ प्राणातिपात-कोइनी हिंसा
करवी, २ मृपावाद-खोटुं वोलवू, ३ अदत्तादान-चोरी
करवी, ४ मैथुन-ब्रह्मचर्य न. राखy, ५ परिग्रह राखवो,
१०० . ६ क्रोध करवो, ७ मान-अभिमान राख, ८ माया-कपट भारतूं, ९ लोभ करवो, १० राग करवो, ११ द्वेष राखवो, १२ कलह-कजीयो करवो, १३ अभ्याख्यान-आळ च- डावं, १४ पैशुन्य-चुगली करवी, १५ रति अरति- पीति अप्रीति करवी, १६ परपरिवाद-बीजानी निंदा करवी, १७ माया मृषावाद-कपटथी खोटुं बोलवू, अने १८ मिथ्यात्व शल्य एटले मिथ्यात्वरुप शल्य राखवू, ए अढार प्रकारे पाप बंधाय छे. सारांश प्रश्नो. १ पाप एटले शुं ? ते समजावो. २ पाप कोने कहेवाय ? ३ पापथी | फळ थाय ? ४ पापनो आत्मा- नी साथे कोनी माफक संबंध छ ५ पुण्य तथा पाप कोना कारण छ ? ६ पाप केटले प्रकारे बंधाय छ ? अने केटले प्रकारे भोगवाय छ ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती . आपबी. अशुभ प्रकृतिरुप, आनंद रस, पुण्य पाप मिश्र, प्राणातिपात, मृषावाद, अदत्तादान, मैथुन, परिग्रह, माया, कलह, अभ्याख्यान, पैशुन्य, रति अरति, परपरिवाद, माया मृपावाद, मिथ्यात्वशल्य.
૧૦૧ पाठ ४३ मो. पाप भोगववाना प्रकार-भाग १ लो. or पापने भोगववाना व्याशी' प्रकार छ. दरेक मा- णीने उपर कहेला अढार प्रकारे वांधेलु पाप भोगव पडे छे. पहेला ज्ञानावरणीयना पांच प्रकार कहे छे. पांच प्रकारना ज्ञानने जे आच्छादन करे, ते ज्ञानावरणीय पाप कर्म कहेवाय छे. जेना उदयथी पांच इंद्रिय था मननी मारफत नियत (निश्चयवाळी ) वस्तुनुं ज्ञान याय छे, एवा मतिज्ञाननुं जेनाथी आच्छादन थाय, ते मति- ज्ञानावरणीय नामे पहेलो प्रकार छ. जेना उदयची शास्त्रने अनुसारे ज्ञान थाय छे, एवा श्रुतज्ञाननुं जेनाथी आच्छादन थाय, ते श्रुतज्ञानावरणीय नामे बीजो मकार छे. जेना उदयथी इंद्रिय विगैरेनी अपेक्षा विना आत्मद्रव्यने--साक्षात्रुपी द्रव्यने जाणवानुं ज्ञान याय छे, एवा अवधि ज्ञाननुं जेनाथी आच्छादन थाय, ते अवधि ज्ञानावरणीय नामे त्रीजो प्रकार छे. जेना उद- यथी संझि पंचेंद्रियना मनोगत भावने जाणवानुं ज्ञान याय छे, एवा मनःपर्यव ज्ञाननुं जेनायी आच्छादन थाय, ते मनापर्यव ज्ञानावरणीय नामे चोथो प्रकार छ. जेना उदययी उपर कहेला चार ज्ञान रहित एकल निरावरण १ आ व्याशी प्रकार कर्मनी प्रकृतिना भेद जाणा, १०२: ज्ञान थाय छे, एवा केवळ ज्ञानवें जेनाथी आच्छादन थाय, ते केवळ ज्ञानावरणीय नामे पांचमो प्रकार छे. जे आई आवे, ते अंतरायः कर्म कहेवाय छे, तेना पण पांच प्रकार छे. पोताना. घरमां देवा योग्य वस्तु छता, तथा दाननुं फळ जाणतां छतां जेना उदयथी कोइने आपी. शकाय: नहीं, ते दानांतराय नामे. छहो प्रकार छ. सारो दातार होय, अने तेना. घरमा आप- वार्नु होय, अने मागनार डाह्यो होय, ते छतां पण जेता उदयथी मागेली वस्तु मळे नहीं, ते लाभांतराय नामे सातमो प्रकार छे. पोते जुवान होय, सारं रुप होय, अने भोगः क- रवा योग्य वस्तुनी प्राप्ति थइ होय, ते छतां पण जेना उदयथी ते भोगवी शकाय नहीं, ते भोगांतराय, अने. उपभोगांतराय नामे आठमो अनेः नवमो प्रकार छ.. पोते जुवान, निरोगी, अने वळवान् छतां पण जेना उ- दयथी पोतानी शक्ति फोरवी शकाय नहीं, ते वीर्यात- राय नामे दशमो प्रकार छे. दर्शनावरणीय कर्मना नव प्रकार छ. तेमां चार प्रकार दर्शनना, अने पांच प्रकार निद्राना छ. जे सा- मान्य उपयोग, ते दर्शन कहेवाय छे, जेथी आँखे करी रुपर्नु सामान्यपणे ग्रहणं थाय छे, एवा चक्षुदर्शननुं जेमां आच्छादन थाय, ते चक्षुर्दर्शनावरणीय नामे अगीया-
१०३
रमो प्रकार छ. चक्षु विना वीजी चार इंद्रियो तथा
मने करी पोतपोताना विषयर्नु सामान्यपणे जेनाथी ग्रहण
थाय छे, तेवा अचक्षुर्दर्शननुं जेना उदययी आच्छादन
थाय, ते अचक्षुदर्शनावरणीय नामे बारमो प्रकार छे.
जेमा सामान्य रीते रुपी द्रव्यर्नु मर्यादाथी ग्रहण थाय
छे, एवा अवधि दर्शननुं जेना उदयथी आच्छादन थाय,
ते अवधि दर्शनावरणीय नामे तेरमो प्रकार छे. जेमां
सामान्य रीते वघी वस्तुओ देखी शकाय छ, एवा
केवळ दर्शननुं जेना उदयथी आच्छाद्न थाय, ते केवळ
दर्शनावरणीय नामे चौदमो प्रकार छे. हवे पांच प्रकार
निद्राना कहे छे. जेना उदयथी निद्रावस्था थइ गया
पछी सुखे जाग्रत अवस्थानी प्राप्ति थाय, ते निद्रारुप
नामे पंदरमो प्रकार छे. जेना उदयथी निद्रावस्था थइ
गया पछी दुखःरुप जाग्रत अवस्थानी प्राप्ति थाय,
निद्रा निद्रारुप नामे सोळमो प्रकार छे. जेना. उदयथी
सतां तथा उठतां निद्रा आव्या करे, ते प्रचलारुप
नामे सत्तरमो प्रकार छे. जेना उदयधी हरतां फरतां पण
निद्रा आवे, ते प्रचला प्रचलारुप नामे अढारमो प्रकार
छे. जेना उदयथी. दिवसे चिंतवेलं काम रात्रे निद्रा
वखते जाग्रतनी पेठे थाय, ते थीणहीरूप नामे ओगणी-
शमो मकार छे. आ थीणद्धीरुप निद्राने संस्कृतमा स्त्या-
नदि कहे छे. ए निद्राना समये प्राणी वामदेवना
ते
१०४ अर्धा बळवाळो थाय छ, अने ते जीव नरकगामी होय छे. सारांश प्रश्नो. १ पाप भोगववाना केटला प्रकार छ ? २ ते केवे प्रकारे वांधेलु पाप भोगवq पडे छ ? ३ ज्ञानाव- रणीय कर्म एटले शु? ४ मतिज्ञानावरणीय, अवधि ज्ञाना- वरणीय, अने मनःपर्यवज्ञानावरणीयना अर्थ ' समजावो. ५ शास्त्रने अनुसारे जे ज्ञान थाय छे, तेनु शुं नाम ? ६ एकलं निरावरण ज्ञान शेमां थाय छे ? ते कहो. ७ अंतरायनो अर्थ शुं ? ८ अंतराय केटला प्रकारना छ ? ९ दानांतराय, उपभोगांतराय, अने वीर्यातराय विष समजावो. १० जना उदयथी मागेली वस्तु मळे नहीं, ते केवो अंतराय ? ११ जुवानवय, रुप, अने भोग्य वस्तु मळी होय, ते छतां भोगवी शकाय नहीं, ते केवो अंत- राय कहेवाय ? १२ दर्शनावरणीय कर्मना केटला प्रकार छ ? १३ निद्राना प्रकार केटला छ ? तेनां नाम आपो. १४. चक्षुर्दर्शनावरणीय, अवधि दर्शनावरणीय, अने अचक्षु- दर्शनावरणीय विषे समजावो. १५. जेमा सामान्य रीते बधी वस्तुओ. देखी शकाय, ते क्यु दर्शन कहेवाय छे ? १६ दर्शन एटले शृं? तेनो अर्थ समजावो. १७ निद्रारुप, अचलारुप, अने निद्रा निद्रारुप विप समजावो. १८ दिवसे ૧૭૫ चितवेलु काम रात्रे निद्रा वखते जाग्रतनी पेठे थाय, तेवी निद्रानुं शुं नाम छे ? १९ थीणद्धी निद्राने संस्कृतमां शुं कहे छ ? २० थीणद्धी निद्रावाला माणसमां केटलं बळ आवे छे ? २१ केवी निद्रावाळो नरकगामी होय छे ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपदी. आच्छादन, नियत, अनुसारे, अपेक्षा, साक्षात् , रुपीद्रव्य, आत्मद्रव्य, निरावरण, अंतराय, फोरची, सा- मान्य, उपयोग, चक्षु, मर्यादाथी, निद्रावस्था, जाग्रत अवस्था, वासुदेव, नरकगामी. पाठ ४४ मो. पाप भोगववाना प्रकार-भाग २ जो. जेना उदयथी प्राणी स्वरुपवान् तथा धनवान् छतां नीच कुळने विपे उत्पन्न थाय, ते नीच गोत्ररुप नामे वीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी प्राणीने दुःखनोज अ- नुभव थाय, ते अशाता वेदनीय नामे एकवीशमो प्रकार छ. जेना उदयथी वीतरागनां वचनथी विपरीत सहहणा थाय, ते मिथ्यात्व मोहनीय नामे वावीशमो प्रकार छे. सहहणाने संस्कृतमां श्रद्धा कहे छे. १४
१०६
हवे स्थावर दशकना दश प्रकार कहेवामां आवे छे.
जे ताहाढ, ताप विगेरेथी पीडाय, तोपण त्यांची खसी
शके नहीं, ते स्थावर कहेवाय छे.. जेना उदयथी एg
स्थावरपणुं प्राप्त थाय, ते स्थावर नाम नामे त्रेवीशमो
प्रकार छे. जेना उदयथी दृष्टिए न देखाय, एवा सर्व
लोकमां व्यापी रहेला मूक्ष्मपणानी प्राप्ति थाय, ते सूक्ष्म
नाम नामे चोवीशमो प्रकार छे. आ सूक्ष्म ते पृथ्वी
विगेरे पांच सूक्ष्म समजवा. जेना उदययी पोताने योग्य
एवी पर्याप्ति पूरी कर्या बिना मरण पामे, ते अपर्याप्त
नाम कर्म नामे पचीशमो प्रकार छ. जेना उदयधी
अनंता जीव बच्चे एक औदारिक शरीरनी प्राप्ति- थाय,
एबी निगोद अवस्था मळे, ते साधारण नाम कर्म नामे
छवीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी शरीरमां दांत विगेरे
अवयवो स्थिर रहे नहीं, ते अस्थिर नाम कर्म नामे
सत्यावीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी नाभिनी नीचेना
अंगनो भाग सारो न होय, एटले पग विगेरेना स्पर्शथी
वीजाने रोप थाय, ते अशुभ नाम कर्म नामे अठ्या-
वीशमो प्रकार छ. जेना उदयथी माणस वधाने अळखा-
मणो लागे, ते दौभाग्य नाम कर्म नामे ओगणत्रीशमो
प्रकार छे. जेना उदयथी कानने अप्रिय लागे, एवो स्वर
नीकळे, ते दुःस्वर नाम कर्भ नामे त्रीशमो प्रकार छे.
जेना उदयथी. लोकोने विपे तेनुं वोलवू कोइ मान्य करे
नहीं, ते अनादेय नाम कर्म एवा नामे एकत्रीशमो प्रकार
छे. जेना उदयथी लोकमां अपकीर्ति थाय, कोइ यश
बोले नहीं, ते अयश नाम कर्म नामे वत्रीशमो प्रकार छे.
आ स्थावर दशक कहेवाय छे. पुण्य तत्वना त्रस दशकथी
आ तदन विपरीत छे.
सारांश प्रश्नो.
.
१ नीच गोत्र अने मिथ्यात्व मोहनीय एटले शुं ?
ते समजावो. २ जेना उदयथी प्राणीने दुःखनोज अनुभव
थाय, ते शुं कहेवाय १३ सद्दहणा एटले शु? अने तेने
संस्कृतमा शुं कहे छे ? ४ स्थावर दशक कया, ते एकंदर
नाम साथे गणावो. ५ स्थावर एटले शुं ? ६ स्थावर
नाम, अपर्याप्त नाम, अस्थिर नाम, दौर्भाग्य नाम, अने
अनादेय नाम, ए विषे समजूती आपो. ७ जेना उदयची
दृष्टिए न देखाय, एवा सूक्ष्मपणानी प्राप्ति थाय, ते कयो
प्रकार १ ८ जेना उदयथी निगोद अवस्था प्राप्त थाय,
ते कयो प्रकार ? ९ जेना उदयथी नाभिनी नीचेना
अंगनो भाग सारो न होय, ते कयो प्रकार ? १० जेना
उदयथी कंठनो स्वर अप्रिय लागे, ते कयो प्रकार ?
११ जेना उदयधी लोकमां अपकीर्ति थाय, ते कयो प्रकार ?
१२ पुण्य तत्वना त्रसदशक अने आ स्थावर दशकनी
बच्चे शो तफावत छ ?
१०८ शिक्षके नीचेना.शब्दोनी समजूती आपवी. स्वरुपवान् , धनवान्, अनुभव, वीतराग, सद्दहणा, श्रद्धा, पर्याप्ति, औदारिक, निगोद अवस्था, रोप, मान्य, अपकीर्ति, विपरीत. पाठ ४५ मो. 1 पाप भोगववाना प्रकार-भाग ३. जो. (नरकत्रिक अने पचवीश कपाय.) नरकनुं आयुष्य, नरकनी गति अने नरकनी अनुपूर्वी ए त्रण नरकत्रिक कहेवाय छे. जेना उदयथी ए त्रणे प्राप्त थाय, ते नरकत्रिक नामे तेत्रीश, चोत्रीश अने पांत्रीशमो प्रकार छे. सामान्यथी सोळ कपाय अने नव नोकपाय एम मळीने पचवीश कषाय कहेवाय छे. अनं- तीनुबंधीना चार भेद, अप्रत्याख्यानीयना चार भेद, प्रत्याख्यानीयना चार भेद, अने संज्वलना चार भेद, एम मळीने सोळ कपायकद्देवाय छे, अने वाकीना नव नोकपाय एम. वधा मळीने पचवीश कपाय कहेवाय छे. जेना उद- अशी अनंत संसार बंधाय, एवा क्रोध, मान, माया अने लोभ, ए चार. जावज्जीव सुधी. कायम रहे छे, तेओ सम्यक्त्वने आववा देता नथी, अने छेवटे जीवने नरकमा पहोंचाहे छे, आ चार अनंतानुबंधीमां क्रोध पर्वतनी १.०५ लींटी जेवो छे, मान पापाणना थांभला जेवो छ, माया चांसना मूळ जेवी छे, अने लोभ कीर्मजना रंग जेवो छे; आ चार अनंतानुवंधीना आ प्रमाणे चार प्रकार थाय छे. अनंतानुबंधी क्रोध ए छत्रीशमो प्रकार छ, अनंतानुबंधी मान साडत्रीशमो प्रकार छ, अनंतानुबंधी माया आ- डन्त्रीशमो प्रकार छे, अने अनंतानुबंधी लोभ ओगण- चाळीशमो प्रकार छे. जेना उदयथी जीव थोडुं पण प्रत्याख्यान पामे नहीं, ए अप्रत्याख्यानीय कपाय कहेवाय छे. अप्रत्याखा- नीय एवा क्रोध, मान, माया, अने लोभ एक वर्ष सुघी कायम रहे छे, तेओ देशविरतिपणाने आववा देता नथी, अने छेवटे तिर्यचनी गतिने आपे छे. ते क्रोध सुकाएला तळावनी रेखा जेवो छे, मान हाडकांना धांभ- ला जेवो छ, माया मेंढाना शांगडा जेवी छे, अने लोभ नगरनी खाळना कादव जेवो छे. आ चार अप्रत्याख्या. नीय कपायना चार प्रकार थाय छे. अप्रत्याख्यानीय क्रोध चालीशमो प्रकार छ, अप्रत्याख्यानीय मान एकतालीशमो प्रकार छ, अप्रत्याख्यानीय माया बेंता- लीशमो प्रकार छे, अने अप्रत्याख्यानीय लोभ तेंताली- शमो प्रकार छे. जेना उदयथी सर्व विरतिरुप प्रत्याख्यानर्नु आच्छा. दन थइ जाय, ते प्रत्याख्यानीय कपाय कहेवाय छे. प्र- त्याख्यानीय एवा क्रोध, मान, माया, अने लोभ ए चार ૧૧૦ . मास सुधी टके छे, सर्व विरतिरूप चारित्रनो तेओ नाश करे छे, अने छेवटे मनुष्य गति अपाये छे. तेओमां क्रोध रेतीनी लींटी जेबो छ, मान काटना थांभला जेवो छे, माया बळदना मूत्रनी रेखा जेवी छे, अने लोभ गाडानी मळीना रंग जेवो छे. आ चार प्रत्याख्यानीय कषायना चार भेद पडे छे, तेमां प्रत्याख्यानीय क्रोध ए चुसाली- शमो प्रकार छे. प्रत्याख्यानीय मान ए पीस्तालीशमो प्रकार छे, प्रत्याख्यानीय ‘माया ए ,तालीशमो प्रकार छे, अने प्रत्याख्यानीय लाभ ए सुडतालीशमो प्रकार छ. जेना उदयथी चारित्र धारण करनारने पण थोडुक तपावे, ते संज्वलन कपाय कहेवाय छे. संज्वलन एवा क्रोध, मान, माया, अने लोभ-ए चार भेद छे. तेओ एक पखवाडीआ सुधी रहे छे, यथाख्यात चारित्रने आ- वरण करे छे, अने देवतानी गतिने आपे छे. ए क्रोध पाणीनी रेखा जेवो छ, मान नेतरना थांभला जेवो छ, माया वांसनी छाल जेवी छे, अने लोभ हळदरना रंग जेवो छ तेओमां संज्वलन क्रोष ए अडतालीशमो प्रकार छ, संज्वलन मान ए ओगणपचाशमो प्रकार छ, संज्वलन माया ए पचाशमो प्रकार छे, अने सं- ज्वलन लोभ ए एकावनमो प्रकार छे. आ प्रमाणे सोळ कषायना सोळ प्रकार थाय छे. जे कषायने सहचारी एटले कपायनां कारण होय, ૧૧૧ ते , ते नोकषाय कहेवाय छे. नेना नव प्रकार याय छ. जेना उदयथी हास्य, रति, अरति, शोक, भय, अने दुगंछा ए छ वानां उत्पन्न थाय, हास्य पदक कहे- वाय छे. हास्य कोई निमित्ते अने निमित्त विना एम वे प्रकारे छे. आ हास्य विगेरे छना नाम उपरथी छ प्रकार थाय छे, एटले वावन, त्रेपन, चोपन, पंचावन, छ- प्पन, अने सत्तावन एटला प्रकार थाय छे. जना उदयथी स्त्री भोगववानी इच्छा थाय, ते पु- रुप वेद कहेवाय छे. आ वेद घासना अग्नि जेवो , ते पुरुषवेद नामे अहावनमो प्रकार छ. जेना उदयथी पुरुप भोगववानी इच्छा थाय, ते स्त्रीवेद् कद्देवाय छे. आ बेदने बकरीनी लीडीओना अग्मिनी उपमा अपाय छ, ते ओगणसाठमो प्रकार छ. जेना उदयथी स्त्री अने पुरुष वंने भोगववानी इच्छा थाय, ते नपुंसकवेद कहेवाय छे. ते शहेर सळगी उठयु होय, ते अग्निना जेवो छ, ते साठमो प्रकार छे. आ प्रमाणे नोकपायना नव भेद कहेवामां आव्या. सारांश प्रश्नो. १' नरकत्रिक ' एटले शुं ? २ वधा मळीने कपाय केटला छे ? ३ नोकपाय केटला होय ? ४ नो- कपाय एटले शुं ? ५ नोकपाय शिवायना कपाय केटला छ ? ६ मुख्य सोल कपाय कया ? ते गणावो. ७ य- ૧૧૨ नंतानुबंधी कपायथी शुं थाय ? ८ अनंतानुबंधी कपाय क्यां सुधी रहे ? ९ तेओथी सम्यक्त्वने शुं थाय ? १० अनंतानुबंधी चारे कषायो कोना जेवा छ ? ते. स- जावो. ११ अनंतानुबंधी चारे कषायो केटलामा प्रकारो छ ? १२ अप्रत्याख्यानीय कषाय एटले शुं ? १३ अप्र- त्याख्यानीय कपाय क्या सुधी रहे छ. ? १४ तेओ होय, लो शर नुकशानी थाय, अने केवी गतिमां लइ जाय ? १५ अप्रत्याख्यानीय कषाय कोना जेवा छे, ते दरेकना जुदा जुदा दाखला आपो. १६ अप्रत्याख्यानीय चारे कषायो कइ संख्याना प्रकारो छ ? १७ प्रत्याख्यानीय कषाय एटले | १ १८ प्रत्याख्यानीय कषाय क्यां सुधी टके छ ? १९ प्रत्याख्यानीय कपाय केवां चारित्रनो नाश करे छे, अने केवी गति अपावे छे ? २० प्रत्याख्यानीय कषाय कोना जेवा छे ? ते दाखला आपी समजावो. २१ ते केटली संख्याना प्रकारो छ ? २२ संज्वलन कषाय एटले शुं ? २३ ते कषाय क्यां सुधी रहे छे ? २४ तेओ केवा चारित्रने आवरण करे छे, अने केवी गति आपे छे ? २५ संज्वलन कषायना वधा दाखला आपो. २६ नोकषाय एटले शुं ? २७ हास्य पदक एटले शुं ? ते छ क्या ? ते गणावो. २८ हास्यना केटला प्रकार छ ? २९ वेद केटला ? ते गणावो, अने तेमनां लक्षणो कहो. ३० पुरुषवेद, स्त्रीवेद, अने नपुंसकवेदने केवा केवा अग्निनी उपमा आपी छे ? ते जणावो.
૧૧૩ शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. नरकत्रिक, नोकषाय, अनंतानुबंधी, किर्मीज, देश विरति सर्व विरति, अप्रत्याख्यानीय, प्रत्याख्यानीय, सं- ज्वलन, यथाख्यात चारित्र, सहचारी, हास्य पटक, निमित्त. पाठ ४६ मो. पाप भोगववाना प्रकार-भाग ४ थो. जेना उदयथी तिर्यंचनी गति प्राप्त थाय, ते तिर्य- च गति नामे एकसठमो प्रकार छ. जेना उदयथी तिर्य- चनी आनुपूर्वी प्राप्त थाय, ते तिथंचानुपूर्वी नामे वासठमो प्रकार छ. जेना उदयथी पृथ्वीकाय विगेरे पांच स्थावर जातिना शरीरनी प्राप्ति थाय, ते एकेंद्रिय जाति नामे वेसटमो प्रकार छे. जेना उदयथी देइंद्री जीवोनी जातिनुं शरीर प्राप्त थाय, ते वेइंद्रिय जाति नामे चोसठमो प्रकार छ. जेना उदयधी जुं, माकड, विगेरे तेरेंद्रिय जीवनी जातिनुं शरीर प्राप्त थाय, ते तेरेंद्रिय जाति नामे पांस- ठमो प्रकार छ. जेना उदयधी चींछी आदिक जीवोनी जातिना शरीरनी प्राप्ति थाय, ते चउरेंद्रिय जाति नामे छासठमो प्रकार छे. जेना उदयची उंट तथा गधेटाना जेवी नठारी गति मळे, ते अशुभ विहायो गति नामे १५
११४.
--
सडसठमो प्रकार छे, जेना उदयथी पोतानां जीभ, दांत
विगैरे अवयवोमां हरस, रसोळी प्रमुख अवयवोथी पोतेज
हणाय, ते उपघात नाम नामे अडसठमो प्रकार छे.
जेना उदयथी अप्रशस्त वर्ण चतुष्क एटले काळो, नीलो,
अशुभ वर्ण, अशुभ गंध, तीखो, कडवो, अशुभ रस अने
भारे, वरसट, शीत, लुखो अशुभ स्पर्श, ए चार प्राप्त
थाय, ते ओगणोतेर, सीतेर, एकोतेर अने बॉतेर, एम
चार प्रकार थाय छे. जेना उद्यथी अप्रथम संघयण
एटले पहेली संघयण विना पांच संघयण प्राप्त थाय, ते
पांच प्रकार थाय छे. जेना वे पासाए मर्कटबंध तथा
उपर पाटो होय, ते रुषक्षनाराच संघयण नामे त्रोंतेरमो
प्रकार छे. जेने वे पासे केवळ मर्कटबंध होय, ते नाराच
संघयण नामे चुंमोतेरमो प्रकार छे. जेने एक पासे केवळ
मर्कटबंध होय, ते अर्धनाराच संघयण नामे पंचोतेरमो
प्रकार छे. ज्यां माहोमांहे हाडकांने एक खोलीनो बंध
होय, ते कीलिका संघयण नामे छोतेरमो प्रकार छे. जेमा
खीली विना केवळ माहोमांहे अडकी अमस्तो रह्यां होय, ते
छेबटुं संघयण नामे सत्योतेरमो प्रकार छे. जेना उदयथी
पहेला शिवाय चीजा पांच संस्थाननी प्राप्ति थाय, ते
अप्रथम संस्थान कहेवाय छे. जेमां बड वृक्षनी माफक
नाभिनी उपर सारां लक्षण होय, अने नाभिनी नीचे
सारां लक्षणो न होय, ते न्यग्रोध परिमंडळ संस्थान .
नामे अठ्योतेरमो प्रकार छे. ज्यां नाभि नीचे अंग
114 सारं अने नाभि उपरतुं अंग नगर होय, ते सादि संस्थान नामे ओगणाएशीमो प्रकार छे. ज्यां पेट विगेरे सारां लक्षणवाळा होय, अने हाथ, पग, माथु अने केड विगेरे प्रमाण वगरनां कुघाटां होय, ते वामन संस्थान नामे एशीमो प्रकार छ. जेमां हाथ, पग, माथु, केड विगेरे प्रमाणवाळां अने पेट विगेरे प्रमाण रहित होय, कुब्ज संस्थान नामे एकाशीमो प्रकार छे. जेमां वधा अवयव अशुभ होय, ते हुंडक संस्थान नामे व्याशीमो प्रकार छे. आ प्रमाणे पाप तत्वना व्याशी प्रकार थाय छे. ते सारांश प्रश्नो. १ तियच गति अने तिर्यंचानुपूर्वी एटले शुं ? २ एक- द्रिय विगेरे केटली जातिओ छे ? ते समजावो. ३ उंट तथा गधेडाना जेवी नठारी गति मळे, ते प्रकारचें नाम शुं ? ४ शरीर अवयवोमां हरस, रसोळी विगेरे अशुभ अवयवो थाय, ते कयो प्रकार ? ५ अप्रशस्त वर्ण चतुष्क एटले शुं ? ते वधा प्रकार विपे समजूती आपो. ६ अम- थम संघयण एटले शुं ? ७ जेना वे पासाए मर्कटबंध तथा उपर पाटो होय, ते केवी संघयण ? तेनुं नाम आपो. ८ नाराच अने अर्धनाराच संघयणमां शो तफावत छ ? ९ छेवटुं संघयण केवी रीते होय ? ते कहो. १० ज्यां माहोमांहे हाडकांने एक खीलीनो बंध होय, ते संघयणर्नु, ૧૧૬ नाम शुं ? ११ अप्रथम संस्थान एटले शुं ? १२ नाभिनी नीचे नठारां लक्षणो होय, अने नाभिनी उपर सारां ल- क्षणो होय, ते केवु संस्थान ? १३ जेमां वधा अवयव अशुभ होय, ते कयु संस्थान ? १४ सादि संस्थान, वामन संस्थान अने कुब्ज संस्थाननां लक्षणो आपो. शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपबी. अप्रशस्त वर्ण चतुष्क, संघयण, मर्कटबंध, कीलिका न्यग्रोध परिमंडळ, वामन, कुब्ज, हुंडक. पाठ ४७ मो. पाप तत्व विषे कविता. मनहर. हिंसा करे जीवतणी मृपावाद बोले वळी, चोरी करे. शीलतणो भंग करे आपथी; परिग्रहतणो करे संग्रह लोलुप बनी, हृदयमा धारे नित्य क्रोधने अमापी; मान राखे मनमांहि मायाथी कपट करे, लोभतणे वश रही. अति ललचाय छ राग अने द्वेष धरी पक्षपात घणो करे, कलहथी कचवाट करतो दुभाय छे. १
૧૧૭
वीजापर आळ नाखी मनमांही मकलाय,
चाडी करी चित्तमांहे अति हरखाय छे
रति अरति धरीने खोटां काम करे घणां,
परतणी निंदा करी पेटमा धराय छे;
माया मृपावाद करी अनीतिने आचरतो,
मिथ्यात्वनुं शल्य धरी धर्मथी धराय छ
अढार प्रकार ए छ पापकेरा बंधतणा,
एथी अंध वनी जीव पापथी भराय छे.
२
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
संग्रह, लोलुप, अमाप, पक्षपात, कलह, शल्य, अंध.
पाठ ४८ मो.
आश्रव तत्व.
जेनाथी जीवने विपे कर्म आवे, ते आश्रव
कहेवाय छे. जेम तळावमां पाणी आवे, तेम जीवरुप
तळावमां जेनाथी कर्मरुप पाणी आवे, ते आश्रव कहे-
वाय छे. आ आश्रव पुण्य तथा पापना वंधनो हेतु
होवाथी वे प्रकारे छे. तेओना अधिक अने न्यूनपणाधी
११८
घणा भेद थइ शके छ. शुभ अशुभ एवां मन, वचन,
अने कायाना व्यापाररुप आश्रवनी सिद्धि पोताना आत्मामां
स्वसंवेदन एटले स्वानुभव विगेरेथी प्रत्यक्ष छ, अने
वीजाओमा मात्र वचन तथा कायाना व्यापारनी सिद्धि
प्रत्यक्षथी छे, अने वाकीनाओनी सिद्धि तेना कार्यथी
उत्पन्न थता अनुमानथी तथा आगमथी जणाय तेदी छे.
जेम तळावमा गरनाळाथी पाणानी आवक आवे
छे, तेम जीवरुप तळावमां कर्मरुप पाणी इंद्रियरुप
पांच गरनाळामांथी आवे छे, एथी करीने मूळ भेदनी
अपेक्षाए प्रथम पांच इंद्रियोज आश्रवनां पांच कारण थाय
छे. वळी मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय, अने योग
ए पांच पुनर्वधक जीवना ज्ञानावरणीय विगेरे कर्मनो
वंध थवामां हेतुरुप छे, तेओने जैन मतमां आश्रव कहे
छे. ते आश्रवना पांच इंद्रिय, चार कपाय, पांच अव्रत,
पचवीश क्रिया, अने त्रण योग-एम वेंतालीश उत्तर भेद
थाय छ. असत् देव, असत् गुरु, अने असत् धर्म-तेने
विष सत् देव, सत् गुरु, अने सत् धर्मनी जे रुची, ते
मिथ्यात्व कहेवाय छे. हिंसा विगेरेथी जे न निवर्तवं,
तेने अविरति कहे छे. मदिरा विगैरेनी जेम असर, ते
प्रमाद कहेवाय छे. क्रोध, मान, माया, अने लोभ ए
कपाय कहेवाय छ, अने मन, वचन, तथा कायानो
व्यापार तेने योग कहे छे.
1.16 सारांश प्रश्नो. १ आश्रव एटले शुं ? २ आश्रवने दाखलो आपी समजावो. ३ आश्रवना मूळ केटला प्रकार छ ? ४ आ- श्रवनी सिद्धि तेना भेदमां केवी रीते थाय छ ? ५ मूळ भेदनी अपेक्षाए आश्रवनां कारण केटलां छे, अने ते क्यां ? ६ ज्ञानावरणीय कर्मनो बंध थवामां शो हेतु छ ? ७ ते हेतुने शुं कहे छ ? ८ आश्रवना वेतालीश उत्तर भेद केवी रीते थाय ? ते गणावो. ९ मिथ्यात्व, अवि- रति, प्रमाद, कपाय, अने योग-ए पांचनां लक्षणो शुं ? ते समजावो. शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. व्यापार, स्वसंवेदन, स्वानुभव, प्रत्यक्ष, अनुमान, मूळ भेद, अपेक्षाए, ज्ञानावरणीय, उत्तर भेद. पाठ ४९ मो. पांच इंद्रिय अने चार कपाय. आ शरीरमां पांच इंद्रियो होय छे. इंद्रियोना जुदा जुदा विषयो होय छे. जेनाथी स्पर्शनुं ज्ञान थाय, ते स्पर्शनेंद्रिय कहेवाय छे, जेनाथी खाटो, खारो, मीठो ૧૨૦ विगेरे रसनो स्वाद लेवाय, तेने रसनेंद्रिय कहे छ, जे- नाथी सारी अने नठारी गंध लइ शकाय, तेने घ्राणोद्रिय कहे छे, जेनाथी दरेक दृश्य वस्तु देखी शकाय, तेने चक्षुइंद्रिय कहे छे, अने जेनाथी शब्द संभळाय, तेने श्रोत्रंद्रिय कहे छे. आ पांच इंद्रियो द्रव्यरुपे चामडी, जीभ, नासिका, आंख, अने कान एवा नामथी ओ- ळखाय छे. ते इवे चार कपायनां लक्षण कहेवामां आवे छे. जेनाथी प्राणी सचेतन के अचेतन वस्तु उपर कोइ निमित्ते अथवा निमित्त विना गुस्सो करे, ते क्रोध नामे पहेलो कषाय छे. मृदुता-कोमळतानो जे अभाव ते मान नामे वीजो कषाय कहेवाय छे. ते मानना मद् अने मान एवा प्र- कार छ. प्राप्त थयेली वस्तुओथी जे अहंकार थाय, मद कहेवाय छे, अने वस्तु प्राप्त थइ न होय, ते छतां जे अहंकार थाय, ते मान कहेवाय छे. १ जातिमद, २ कुळमद, ३ वळमद, ४ रुपमद, ५ ज्ञानमद, ६ लाभ- मद, ७ तपमद, अने ८ जैश्वर्यमद-एम मदना आठ प्र- हुं सारा मोसाळनो भाणेज छु, तानी माताना पक्षनो एटले मोशाळनो मद करे, ते पहेलो जातिमद् कहेवाय छे. “ मारा पितार्नु कुळ उचुं छे, " एम पोताना पिताना पक्षनु अभिमान करे, अने वीजा- ओनी ते बावतमां निंदा करे, ते वीजो कुळमद कहे- वाय छे. पोताना चळy अभिमान करे, अने वीजाना कार छ । .. एम पो-
૧૨
बळनी निंदा करे, ते त्रीजो बळमद कडेवाय छे. पो-
ताना रुपनो गर्व करें, अने बीजाना रुपनी निंदा करे,
ते चोथो रुपमद कहेवाय छे. पोताने महाज्ञानी माने,
अने बीजाने तुच्छ बुद्धि माने, ते पांचमो ज्ञानमद्
कहेवाय छे.
मारा जेवो कोइ तपस्वी नथी, " एम
तपनो गर्व राखे, ते छहो तपमद कहेवाय छे. पोताने
मोटो भाग्यवान् माने, अने बीजाने निर्भागी माने, तेने
सातमो लाभमद कहे छे. पोताना अश्वर्य, एटले पो-
तानी ठकुराइनु अभिमान करे, अने वीजाने तृण समान
गणे, ते आठमो अश्वर्यमद कहेवाय छे. आवी रीते
मानना पण प्रकार थइ शके छे.
जीव बीजाने ठगवा वास्ते जे जे विचारो करे, ते
माया नामे त्रीजो कपाय छे. जेनाथी अधिक वस्तु प्राप्त
करवानी जीवने लालच थाय, ते लोभ नामे चोयो
कषाय छे.
आ प्रमाणे पांच इंद्रियो. अने चार कपाय ए नव
भेद आश्रवना थाय छे.
सारांश प्रश्नो
१ इंद्रियो केटली होय ? २ पांचे इंद्रियोनां नाम
आपो, अने तेनां लक्षण आपो. ३ कपाय केटला ले ?
૧૨
४ क्रोधनुं लक्षण शुं ? मानना केटला भेद छ ?
६ मान अने मदमां शो फेर छे ? ७ मद केटला प्रका-
रनो छ ? ८ आठे मदनां नाम आपो. ९ मान. केटला
प्रकारनो छ ? १० जीव बीजाने ठगवा वास्ते जे
विचारो करे छे, ते कपायर्नु शुं नाम छ ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
विषय, स्पर्श, द्रव्यरुपे, सचेतन, अचेतन, निमित्त
मृदुता, कोमळता, अभाव, महाज्ञानी, तुच्छबुद्धि, तपस्वी,
तृण समान.
पाठ ५० मो.
आठ मदनो- त्याग करवा विषे कविता.
भुजंगी छंद.
भला सौ भवी अंतरे वात लेजो,
नहीं मद करी जीवने बंध देजो
नहीं माना पक्षथी मान पामो,
नहीं कुळमदे गर्वथी नित्य जामो.
१२३.
२
३
नहीं बळतणु मान रे चित्त धारो,
थशो निर्वळा सद्यः ए वात. धारो.
कदि रुप पामो रुडां. कर्मयोगे,
धो नैं गिरि गर्वना भाग्य भोगे.
कदि ज्ञानधारी वनो पूर्ण सारा,
न रहेशो मदे ज्ञानना प्रेम प्यारा
वन्या जो कदि भाग्यना लाभवाळा,
तदा छोडजो गर्वना सर्व चाळा.
तपस्या करुं सर्वथी हुंज सारी,
करे अन्य ते सर्वदा छ नगरी
'. तपस्या तणो गर्व एवो न धारो,
नथी मार्ग ते धर्मनो सर्व. सारो.
अभागी गणो अन्यने नैं. ह्रदेथी,
वनों दुर्गुणी. लाभना ते. मदेथी;
यदि चित्त अश्चर्यनो गर्व राखो,
तदा कर्मनां दुष्फळो सद्य चाखो.
गण्या मदतणा आ वधा आठ भेदो,
करी दूर ते कर्मने. नित्य छेदो
करे चित्तथीं जे सदा ए विचारो,
यशे नै कदी गर्वने धारनारो.
६
૧૨૪ शिक्षके नीचेना शन्दोनी समजूती आपवी. भवी, अंतरे, मातृना, निळा, गिरि, भाग्यभोगे, अन्य, हृदेथी, दुर्गुणी, अश्वर्य, दुष्फळो. पाठ ५१ मो. पांच अग्रत-भाग १ लो. आश्रय तत्वना वेतालीश प्रकारमा पांच अव्रत आवे छे. पांच व्रतथी जे विपरीत, ते पांच अव्रत कहेवाय छे. कोइ पण जीवना दश प्राणोनो वध करवो, ते जीव- हिंसा नामे पहेलं अव्रत कहेवाय छे. मृपावाद-जुहूं वोलवू, ते वीजं अव्रत छे. अदत्तादान-वीजानी वस्तु चोरी लेवी, ते त्रीजु अत्रत छे. ब्रह्मचर्यनो त्याग एटले पैथुनर्नु सेवचु, ते मैथुन नामे चोथु अत्रत कहेवाय छे. नवविध परिग्रहनो संचय करवो, ते पांचU परिग्रह अवत कहेवाय छे. पहेला जीवंहिंसा अव्रतना चार भांगा छे. १ द्रव्यथी हिंसा, भावी नहीं, २ द्रव्यथी हिंसा नहीं, पण भावी हिंसा, ३ द्रव्यथी अने भावथी हिंसा, अने ४ द्रव्यथी अने भावथी हिंसा नहीं.
૧૨૫ साधुने समाचारी, प्रविलेखना करता, मार्गमा विहार करतां, नदी प्रमुख उतरतां, नावमां बेसी नदी ओळंगता, नदीमा तणाइ जतां एवां साध्वी विगेरेने बहार काढतां, वरषाद वरसतां, थंडील जतां, वरसादमां ग्लान साधु- ओनी मात्राने परठवतां, गुरुना शरीरने व्याधीने प्रसंगे, तथा थाक लागवाथी पगचंपी करता जे हिंसा थाय, ते द्रव्याहिंसा कहेवाय छे तथा श्रावकोने जिन मंदिर ब- नावतां, जिन पूजा करतां, साधर्मि वात्सल्य, तीर्थ यात्रा, रथ यात्रा, अहाइ महोत्सव, प्रतिष्टा, अने अंजनशलाका करतां, अने गुरुनी सन्मुख सामैयुं करी जतां, इत्यादि कर्तव्य करता जे हिंसा थाय छे, ते सर्व द्रव्यहिंसा छे परंतु भावहिंसा नथी. कारण के आ हिंसा प्रसंगे साधु तथा श्रावकनां परिणाम घांज सारां होय छ, माठा अध्यवसाय नथी, अने उपयोगयी प्रवर्तन छे, तेथी ते द्रव्यहिंसा छे. आवी हिंसामा पाप अल्प अने निर्जरा घणी होय छे. वीजा भांगामां द्रव्यथी हिंसा न होय, पण भाषथी होय; जेमके जे पुरुष उपरथी शांत देखातो होय, पण तेना अंतःकरणना अध्यवसाय घणा मलीन अने हिंसामय होय छे, ते पोतानां इदयमा अनेक प्रकारे जीवहिंसा करवानां कामनो संकल्प विकल्प. कर्या करे छे. जो के ते हिंसा करतो नयी, तेथी द्रव्यथी हिंसा नथी, परंतु तेना अध्यवसाय हिंसामय होवाथी ते भावथी हिंसा से, ૧૨૬ आवी भावहिंसा करनारने अनंतकाळ सुधी आ संसारमई भ्रमण कर पडे है. त्रीजा भांगामां द्रव्यथी अने भावथी बनेथी हिंसा रहेली छ. इंद्रियोना विषयोमां, तेमज कषायमां अति लुब्ध थइ जीवहिंसा करे, कसाइ वने, शिकार करवा. जाय, विश्वासघात विगेरे जीव जाय तेवां काम करे, अने तेनाथी लाभ थता जोइ मनमा आनंद माने, ते द्रव्य अने भावथी-बनेथी हिंसा छ, आवी हिंसाथी संसारमा भ्रमण अने दुर्गति प्राप्त थाय छे. चोथा भांगामां द्रव्यथी अने भावथी-नेथी हिंसा. होती. नथी. आ भागो शून्य छ, आवा भांगावाळो कोइ. पण जीव. संसारमा होतो नथी. , . सारांश प्रश्नो. १ पांच अव्रत शेमा आवे छ ? २ अव्रत एटले शु? ३ जीवहिंसा एटले शुं ? ४ मैथुन एटले शुं ? ते सय- जावो. ५ पहेला अव्रत जीवहिंसाना केटला भांगा छ ? ६ पहेला भांगामा साधु अने श्रावकने द्रव्यहिंसा केवी रीते थाय ? ते समजावो, अने दाखला आपों. ७ द्रव्य- हिंसामा पाप केटलं लागे ? अने निर्जरा थाय के नहीं। ८ भावइिंसानो दाखलो आपो. ९ भावहिंसा कर्याथीं के. फळ थाय ? १० द्रव्यथी अने भावथी हिंसा केवी
૧૨૭
कहेवाय ? अने तेवी हिंसाथी शुं फळ थाय ? ११ चौथो
भांगो केचो छ ? चोथा भांगावाळो कोइ जीव होय
के नहीं ?
.
शिक्षके नीचेना शन्दोनी समजूती . आपवी.
वध, मैथुन, समाचारी, प्रतिलेखना, विहार, नाव,
थंडील, ग्लान, मात्रा, परठवता, साधर्मिवात्सल्य, तीर्थयात्रा,
स्थयात्रा, अहाइमहोत्सव, प्रतिष्ठा, अंजनशलाका, कर्तव्य,
अध्यवसाय, उपयोग, प्रवर्तन, अल्प, निर्जरा, शांत,
अलीन, हिंसामय, संकल्प विकल्प, अति लुब्ध, शून्य.
.
-
पाठ ५२ मो.
पांच अव्रत भाग २ जो.
वीजा अवत मृषावादना पण उपर प्रमाणे चार
भांगा थइ शके छे. कोइ साधु रस्तामा चाल्या जता होय,
तेमनी आगल जंगलनी गायो तथा हरण विगेरेनुं टोलं
प्रसार थइ चाल्यु गर्यु होय, ते वखते ते टोळानी शोध
करतो कोई शीकारी शस्त्र लइ चाल्यो आवे, ते शीकारी
पेला जीवोनो शीकार करवा वास्ते साधुने पुछे के, तमे
अहाँथी कोइ जानवरोने जतां जोयां छे ? साधु तेनो
૧૨૮ उत्तर नहीं आपां मौन रहे, एटले ते शीकारी जगाव गेळववा सारु साधु उपर हुमलो करे, अने मारे सारे साधु कहे के, में ते जानवरोना टोळांने जतां जोया नथी. जो के साधुनुं आ बोलवू द्रव्ये जुळु छे, परंतु भावे जुटुं नथी; जे इंद्रियोना भोगने वास्ते तेमज लोभ विगेरे कषायने लीधे जुटुं बोले, ते भावथी जुहूं कहेवाय छे. अहीं तो साधुनुं जुटुं बोलQ निरपराधी माणीओनी दया वास्ते ययेल छे, तेथी पास्तविक रीते ते मृषावाद नथी. आ अवतः मृपावादहूँ पहेलं भांगुं छे. कोइ मनुष्य मुखथी तो काइ बोलतो नथी, पण वीजाने ठगवा वास्ते मनमा अनेक जातना जुठा विकल्प करे, या द्रव्यथी मृषावाद नथी परंतु भावथी मृषावाद छ. आ वीजा अव्रत मृषावादनुं पीजु भांगु छे. कोइ माणस मुखथी असत्य वचन बोले छ, अने अंतःकरणमां पण छळ कपट करवाना मलीन अध्य- वसाय छे, आ द्रव्यथी अने भावथी मृषावाद छे. आ अव्रत मृषावादनुं त्रीजु भागु छे. चोथु भागु पूर्वनी जेम शून्य छ. पूर्वनी जेम अदत्तादान एटले चोरी करवाना त्रीजा अव्रतना पण चार भांगा थाय छे. कोइ स्त्री शीलवती होय, तेना शीळनो भंग करवाने कोइ दुष्ट राजा तेने पकटीने पोताना कवजामा राखे. आ खवर कोइ धार्मिक पुरुषना जाणवामां आवतां ते स्त्रीनां शीळनुं रक्षण करवा वास्ते ते धर्मी पुरुप हामत करी, ते स्त्रीने राजाना कवजामाथी राज्य बाहेर लइ ....
૨૨૯ :: जाय. तो व्यवहारथी ते पुरुषे राजानी आज्ञा भंगरुप चोरी अथवा स्त्रीनी चोरी करी छे, परंतु वास्तविक रीते चोरी नथी. कोइ पुरुष पोताना घरमां द्रव्य राखी घरनां द्वार बंध करी परदेश गयेक छ, पछवाडे गाममा चोरनो उपद्रव थयो. ते परदेश गयेला माणसन द्रव्य चोराइ जशे, एम तेना कोइ हितेच्छु पुरुषने लांगवाथी रात्रिने समये ते परदेश गयेला पुरुषना घरनां द्वार खोली, तेन सघल्लं द्रव्य ले, अने ज्यारे ते पाछो परदेशथी घेर आवे, त्यारे तेने पाळु आपवानी दुद्धिथी ते पोताना घरमा राखे आ दृष्टांतमां बीजानुं द्रव्य तेनी रजा शिवाय तेना कवजामाथी लइ लेवाथी ते द्रव्यथी चोरी थाय छे, परंतु तेना हृदयमा बदद्यातनो अभाव होवाथी भावथी चोरी यती नथी. आ त्रीजा अवतनो पहेलो भांगो छे. कोइ पुरुष चोरी करतो नथी, परंतु चोरी करवाना अध्यवसाय तेना मनमां थया करे छ, ते द्रव्यथी चोरी नहीं, पण भावथी चोरी छे. जे श्री वीतराग सर्वज्ञ प- रमात्मानी आज्ञाना भंग करनारा छे, तेओने भावचोर कहेला छे. कोइ पुरुष चोरी करे, अने चोरी करवानो अध्यवसाय पण राखे, ते द्रव्यथी अने भावथी चोरी छे. चोथों भांगो पूर्वनी जेम शून्य शून्य छे. . १७ ૧૩૦ सारांश प्रश्नो १ बीजा अव्रत मृषावादना केटला भांगा छे ? २ पहेला भांगानुं दृष्टांत आपो. ३ बीजा अने त्रीजा भांगा विपे दाखला साथे समजावो. ४ श्रीजा अव्रत चोरीना केटला भांगा छे १ ५ चौरीना पहेला भांगा उपर जे जे दृष्टांत होय ते कहो. ६ कोइ पुरुष परदेश गयेला वीजा माणसनु धन चोराइ न जाय, तेवा हितविचारथी लइने पोताना घरमा राखे, ते कयो मांगो कद्देवाय ? ७ भावचोर कोने कहेवाय ? शिक्षके नीचेना शन्दोनी समजूती आपवी. मौन, वास्तविक, विकल्प, अध्यवसाय, शीलवती, भंग, उपद्रव, हितेच्छु, अभाव, वीतराग, सर्वज्ञ, परमात्मा. . पाठ ५३ मो. पांच अव्रतं-भाग ३ जो. चोथा अव्रत अब्रह्मचर्य (मैथुन ) ना पण उपरनी जम चार भांगा थाय छे. कोइ साध्वी जळमां डुवती होय, तेने देखी कोइ साधु तेने बाहेर काढवाने वास्ते पकडे, तेमन कोइ गृहस्थ, पडी जती कोई स्त्रीने तेना रक्ष-
૧૩૧.
णने माटे पकडे, तेवा प्रसंगोमां पकडq ते स्पर्शवढे द्रव्यथी
मैथुन छे, परंतु भावथी नथी; ते पहेलो भांगो छे. बीजा
भांगामां कोई पुरुष स्त्रीने भोगवतो नथी, परंतु तेना
मनमा खी सेवन करवानी अभिलाषा बहुज रह्या करे छे,
ते द्रव्यथी मैथुन नहीं, परंतु भावथी मैथुन छे. त्रीजा
भांगामां स्त्रीनी साथे जे इच्छापूर्वक मैथुन करचु, ते
द्रव्यथी अने भावथी मैथुन छे. चोथो भांगो पूर्वनी जेम
शून्य छे.
पांचमा अव्रत परिग्रहना पण चार भांगा छे. का-
योत्सर्गे रहेला कोइ मुनिना गळामा कोइ माणस हार
विगेरे आभूषणो पहेरांवी जाय, ते जोइने वीजा अजाण्या
माणसो तेमने परिग्रहवाळा धारे, पण मुनिने ते पदार्थ
उपर परिग्रहनी बुद्धि नथी, तेवा प्रसंगमा द्रव्यथी परिग्रही
कहेवाय, ते भावथी परिग्रही नथी, ते पहेलो भांगो छे.
कोइ पुरुष पासे एक कोडी पण नथी, परंतु तेने द्रव्य
मेळववानी बहुज अभिलापा रह्या करे, ते भावी परिग्रही
छे, द्रव्यथी नहीं. त्रीजा भांगामां धन पण पासे होय,
तेना उपर मूर्छा होय, अने धन मेळववानी अभिलाषा
पण रह्या करे, ते द्रव्यथी अने भावथी परिग्रही छे.
चोथो भांगो शून्य छे.
૧૩૨
सारांश प्रश्नो.
.
:
१ चोथा अव्रतना केटला भांगा छ ? २ पहेला
मांगानो दाखलो समजावो. ३ बीजा अने त्रीजा भांगाने
दाखला साथे समजावो. ४ पांचमा अव्रतना केटला भांगा
छ ? ५. तेना पहेला तथा बीजा भांगाने दाखला साथे
समजावो.
शिक्षके नीचेना शन्दोनी समजूती आपवी.
अब्रह्मचर्य, इच्छापूर्वक, कायोत्सर्ग, आभूषण.
पाठ ५४ मा
अण योग: अने पचवीश क्रिया-भाग १ लो.
आश्रव तत्वना ऋण योगथी वीजा त्रण प्रकार थाय
छ. शुभ अशुभनी अंदर. मनने : जोडवू, ते पहेलो मनो-
योग कहेवाय छे. शुभ अशुभनी अंदर, वचनने, जोडवू,
ते वीजो वचनयोग कहेवाय छे, अने शुभ अशुभनी
अंदर कायाने जोडवी, ते त्रीजो काययोग कद्देवाय छे.
आश्रय तत्वना वीजा पचवीश प्रकार पचवीश क्रि-
याओथी धाय छे. कायाने जयणा विना प्रववितां जे
लागे, ते कायिकी नामे पहेली क्रिया कहेवाय छे. आ
૧૩૩ कायिका क्रिया वे प्रकारनी छे. अनुपरता कायिकी क्रिया अने अनुपयुक्त कायिकी क्रिया. अति दुष्टं एवा मिथ्या- द्रष्टि जीव मन वचननी अपेक्षा विना वीजा जीवने पीडा थाय, तेवो कायानो उद्यम करे, ते पहेलो प्रकार छ, अने जे प्रमादी संयमी उपयोग विना अनेक कर्तव्यरुपे काया- नो व्यापार करे, ते बीजो प्रकार छे. कसाइ विगेरे शस्त्रंथी. वीजा जीवोनो घात करी, पोताना आत्माने नरक गतिमां जवानो अधिकारी करे, ते आधिकरणिकी नामे वीजी क्रिया छ, अथवा अधि- करण एटले घरना उपकरणोथी जे जीवनो नाश करे, ते पण आधिकरणिकी क्रिया कहेवाय छे. आ आधि- करणिकी क्रियाना वे प्रकार छे. एक संयोजना, अने बीजी निवर्तना. झेर, फांसी, धनुष्य, यंत्र, तलवार विगेरे जीवहिंसा करवानां शस्त्राने जीवोने मारवा वास्ते संयोजन करे, एटले जोडीने एकठा करे, जेम धनुष्यनी साथे तीर जोडे, ए विगेरे बधा संयोजना आधिकर- णिकी क्रियामां आवे छे. तलवार, तोमर, शक्ति, तोप, अने बंधुक, विगेरेने नवां सरस वनावां, ए निवर्त्तना आधिकरणिकी क्रियामां आवे छे. जीव एटले प्राणी, अने अजीव एटले सुंटो, कांटो, पथ्थर, विगेरे-ते वनेनी उपर द्वेष करें, ते प्रादेषिकी नामे त्रीजी क्रिया छ. पोताना हाथेथी तेमज वीजाने हाथे जीवोने मार मारी परिताप उपजाववो, ते परितापनिकी नामे चोथी क्रिया ૧૩૪ छे. ते क्रियाना वे भेद छे. स्त्री, पुत्र विगेरेना वियोगी दुःखी थइ जे पोताने हाथे छाती तेमज मस्तक कूटवू, ते स्वपरितापना नामे पहेलो भेद छ, अने पुत्र तथा शि- प्यने मार मारवो, ते परपरितापना नामे बीजो भेद छे. जे पोताना तथा बीजाना जीवने हणवो हणाववो, ते प्राणातिपातिकी नामे पांचमी क्रिया छे. पोताने हाथे पोतानो घात करवो, जेमके कुवामां पडी मरवू, प- र्वत उपरथी गरी पडवू, अग्निमां झंपलावयु, अने झेर खावं, ए वधी आत्मघातनी क्रिया ते पहेलो भेद छ, अने कषायने वश थइने वीजा एकेंद्रिय प्रमुख जीवनो घात करवो, ते वीजो भेद छे, जेथी पृथ्वीकाय विगेरे छकायना जीवोनो उपघात. थाय, तेवा खेती प्रमुख का- यनो आरंभ करवो, ते आरंभिकी नामे छठी क्रिया छ. धन, धान्य विगरे नव प्रकारना परिग्रह मेळवतां तथा तेनी उपर मोह करतां जे क्रिया लागे, ते पारिग्रहिकी नामे सातमी क्रिया छे. माया-कपटथी वीज़ाने ठगवं, ते माया प्रत्ययिकी नामे आठमी क्रिया छ, जिन वचन- पर श्रद्धा न राखतां, विपरीत प्ररुपणा करवाथी जे क्रिया लागे, ते मिथ्या दर्शन प्रत्ययिकी नामे नवमी क्रिया छ. अविरतिए करी पच्चखाण लीधा विना सर्व खावा पीवानी वस्तुनो जेमां न्याग नहि, एवा जे असं- यती रहेवां क्रिया, लागे, ते अप्रत्याख्यानिकी नामे दशमी क्रिया छे. घोडा विगेरे जीव तथा रथ प्रमुख अ.
૧૩૫ जीवोने जोवा वास्ते जवू, ते द्रष्टिकी नामे अगीयारमी क्रिया छे. रागने वश थइने जे पुरुष, स्त्री, गाय, बळद, अने वस्त्र विगेरे जीप अजीव मुकुमार वस्तुने स्पर्श कर- वाथी जे क्रिया लागे, ते स्पृष्टिकी अथवा पृच्छिकी नामे बारमी क्रिया छे. बीजाने घेर हाथी, घोडा, वस्त्र, विगेरे उमदा वस्तु जोइ, 'ए वस्तु एनी पासे केम होय, ' एवं चिंतववाथी जे क्रिया लागे, ते प्रातित्यकी नामे तेरमी क्रिया छे. जीव एटले पोताना घोडा विगेरेने जोवा आ- वेला लोकोने प्रशंसा करतां जोइने जे हर्ष लाववो ते, अने अजीव एटले घर, आभूषण, वस्त्र, विगेरे जोवा आवेला लोकोने प्रशंसा करतां जोइने हर्ष लाववो ते, अथवा दूध, दही, घी, अने तेलनां पात्र उघाडां मुकवाथी तेमां जे त्रस जीव आवी पडे, तेनी हिंसाथी जे क्रिया लागे, ते सामंतोपनिपातिकी नामे चौदमी क्रिया छे. जीव एटले मनुष्य विगेरे तथा अजीव एटले पथरा वि- गेरेने फेंकवा, ते नैशस्त्रिकी नामे पंदरमी क्रिया छ, अथवा वीजाओए उपदेश करेलां पापमा जे घणो काळ प्रवर्ते, अने ते पापनी भावथी अनुमोदना करे, ते पण नैशस्त्रिकी नामे पंदरमी क्रिया कहेवाय छे. पोताना हाथयी जे पापनी क्रिया करे, ते स्वहस्तिकी नामे सोळमी क्रिया छे.
૧૩૬ सारांश प्रश्नो. १ योग केटला ? २ मनोयोग, वचनयोग, अने काययोगनों लक्षणो कहो. ३ आश्रय तत्वना प्रकारोमां जे क्रियाओ गणेली छे, ते केटली छ ? ४ कायिकी क्रिया एटले शुं ? ५ कायिकी क्रियाना केटला भेद छे ? ६ अनुपयुक्त कायिकी क्रियानो अर्थ समजावो. ७ आ- धिकरणिकी क्रियानो अर्थ शो ? ते समजावो. ८ संयो- जना अने निवर्त्तना विष समजूती आपो. ९ जीव तथा अजीव उपर द्वेष करे, ते कइ क्रिया कहेवाय ? १० स्व- परितापना अने परपरितापना ए कइ क्रियाना भेद छ ? ११ प्राणातिपातिकी क्रियाना केटला भेद छ ? १२ जेमा पृथ्वीकाय विगेरे छकायना जीवोनो उपघात थाय, अने तेथी जे क्रिया लागें, ते क्रियानुं शुं नाम ? १३ परि- ग्रहिकी अने अप्रत्याख्यानिकी क्रियानो अर्थ शुं ? १४ वीजाने कपटथी ठगवं, ए क्रियानुं नाम शुं ? १५. जिन वचनपर श्रद्धा न राखतां विपरीत प्ररुपणा करवाथी कइ क्रिया लागे ? १६ जीव अजीव सुकुमार वस्तुने स्पर्श करवाथी कइ क्रिया लागे ? १७ द्रष्टिकी अने प्रातित्यकी क्रियानो अर्थ Y ? १८ पोताना हाथथी जे पापनी क्रिया करे, ते क्रियानु नाम शुं ? १९ जीव अजीब वस्तुने फेंकवाथी कइ क्रिया लागे ?
૧૩૭ शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. शुभ, अशुभ, जयणा, मिथ्याद्रष्टि, अपेक्षा, प्रमादी संयमी, कर्तव्य रुपे, व्यापार, उपकरणो, यंत्र, संयोजन, तोमर, शक्ति, द्वेष, परिताप, आत्मघातनी, विपरीत प्र- रुपणा, सुकुमार.. . पाठ ५५ मो. त्रण योग अने पचवीश क्रिया--भाग २ जो. श्री अरिहंत भगवाननी आज्ञा उल्लंघन करी, पो- तानी बुद्धिथी जीवाजीव विगेरे पदार्थ प्ररुपणा करवाथी जे क्रिया लागे, ते आज्ञापनिकी नामे सत्तरमी क्रिया छ. बीजानां अछतां माठां आचरणने प्रकाश करी, तेनी पूजानो नाश करवो, तेथी उत्पन्न थयेली जे क्रिया लागे ते, अथवा काइ सचित के अचित वस्तु विगेरे विदार- वाथी जे क्रिया लागे, ते वैदाराणिकी नामे अढारमी क्रिया छे. आभोय एटले उपभोग, तेथी जे विपरीत होय, ते अनाभोग कहेवाय छे. तेनाथी जे क्रिया लागे, अथवा देख्या विना तेमज मार्जन कर्या विना भीत के जमीन विगेरे उपर शरीर नाखवाथी जे क्रिया लागे, ते अना- भोगिकी नामे ओगणीशमी क्रिया छे. परमेश्वरे कहेल १८ १७८ जे करवा योग्य विधिओ, तेमांनी कोइ पोताने तथा कोइ परने हितकारी छे, तेवी विधिओमा प्रमादने लइ अनादर करवो, ते अनवकांक्षाप्रत्यायकी नामे वीशमी क्रिया छे. प्रयोग एटले मन, वचन, अने कायानो व्यापार, दोडवू, चालवु, विगैरे कायानो व्यापार, हिंसाकारी कठोर तथा जुटुं वोलवारुप वचननो व्यापार, अने बीजानी इर्षा वथा अभिमान विगेरे मननो व्यापार, ए त्रण व्यापार करवाथी जे क्रिया लागे, ते प्रायोगिकी नामे एकवी- शमी क्रिया छ, जेणे करीने विषयतुं ग्रहण थाय, ते समुदान एटले इंद्रिय कहेवाय छे. तेनो देशथी अने स- वैथी उपघात करवो. जेमके आदेश आपीने नीभाडा वि- गेरे हिंसानां काम करावा, ते समुदान नामे बावी- शमी क्रिया छे. माया-कपट तेमज लोभथी जे क्रिया करवामां आवे, ते प्रेमप्रत्ययिकी नामे त्रेवीशमी क्रिया छे. क्रोध तथा माने करीने जे थाय, ते देषप्रत्ययिकी नामे चोवीशमी क्रिया छे. चालवाथी जे क्रिया लागे, ते इपिथिकी नामे पचवीशमी क्रिया छे.. आ पचवीश क्रियाओगां केटलीएक क्रियाओ आपसमा सरखी जणाय छे, तोपण ते सूक्ष्म रीते सरखी नथी, एम समजवू. सारांश प्रश्नो. १ आभोग एटले , अने अनाभोग एटले | ?
२ अनाभोगयी जे क्रिया लागे, ते क्रियान शुं नाम छे ? ३ आज्ञापनिकी अने पैदारणिकी क्रिया एटले शुं ? ते समजावो. ४ कपट अने लोभथी. जे क्रिया करवामां आवे, ते क्रियानुं शुं नाम ? ५ परमेश्वरे कहेल विधिओ- मां प्रमादथी अनादर करवो, ते कइ क्रियाओ कहेवाय ? ६ प्रयोगिकी अने ससुदान क्रिया विषे बरावर सम- जावो. ७ द्वेषप्रत्ययिकी अने इयोपथिकी क्रियानो अर्थ शुं ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. उल्लंघन, प्ररुपणा, अछतां, चिदारवं, उपयोग, मा- जन, विधि, हितकारी, अनादर, व्यापार, समुदान, उपघात. पाठ ५६ मो. आश्रव तस्व विषे कविता. दोहरा. जेथी आवे कर्मजळ, जीव सरावराय, ते आश्चर्नु सर्वशी, लक्षण श्रेष्ट गणाय.
१४० . तेना वेय प्रकार छ, अशुभ अने शुभ नाम, मनवच काया योगथी, जाणोते अभिराम. इंद्रिय पांच कपायनी, संख्या छ वळी चार, अव्रत पांचे जाणवां, पण योग छ सार क्रियातणी पंचवीश छे, संख्या आगम सार, बेतालीश भेदो कह्या, ए आश्रव आधार. 20 ५ शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. कर्मजळ, जीव सरोवर, वच, अभिराम, आग- म सार. पाठ ५७ मो. संवर तत्व. नव तत्वोमां आ संवर तत्व छटुं तत्व छे. सं- वरनो अर्थ रोक थाय छे. उपर कहेला आश्रव तत्वथी जीवनी अंदर वनार नवां कर्मोने जे रोकी शके, ते संवर कहेवाय छे. ते संवरना एकंदर सत्तावन भेद थाय छे. पांच समिति, प्रण गुप्ति, दश प्रकारनो यति धर्म, वार मावना, वावीश परीपह, अने पांच प्रकारना चारित्र, ए मळीने सत्तावन भेद. थाय छे.
१४२
ते संवरना द्रव्य अने भाव एवा वे भेद पडे छे.
जे नवां कर्मन रोकाववं, ते द्रव्यसंवर कहेवाय छे.
समिति विगेरेथी जे शुद्ध · उपयोगरुप द्रव्यपणुं परिणामने
पामे, अने तेथी करीने आत्माना परिणाम भाव कर्मना
रोधक थाय, एटले रोकनार थाय, ते भावसंवर
कहेवाय छे.
,
सारांश प्रश्नो.
१ संवर तत्व केटलामुं तत्व छ ? २ सवर शब्दनो
अर्थ शो ? ३ संवर तत्वना भेद केटला छ ? ४ संवरना
एकंदर भेद गणावो. ५ द्रव्यसंवर अने भावसंवर शु?
ते समजावो. ६ भावसंवरमां आत्मानां परिणाम केवा
थाय ?
:
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
समिति, गुप्ति, यतिधर्म, भावना, परीपह, चारित्र,
शुद्ध उपयोग, परिणाम, भावकर्म, रोधक.
१४२
पाठ ५८ मो.
संवर तत्वना सतावन भेद.
पांच समिति अने प्रण गुप्ति.
शाखने अनुसार शुभजे चेष्टा करवी, ते.. समिति
कहेवाय छे, ते समितिना पांच भेद छे. इयर्या समिति,
भाषा समिति, एषणा समिति, आदाननिक्षेपणा समिति,
अने पारिष्टापनिका समिति-एवा तेनां जुदा जुदा नाम
छे, जवा आववाने विषे जयणापूर्वक उपयोग राखयो,
ते इयों समिति कहेवाय छे. पवित्र जैन मुनि घणी
संभाळयी चाले छे, अस तथा स्थावर जीवोने अभयदान
आपवाने वेओ हमेशा इयर्या समिति राखे छे, इर्या
समितिया पचनारा मुनि जीवोनी तया पोतानी रक्षाने
माटे पगना अंगुठायी चार हाथ प्रमाण भूमिने आगळ
देखीने चाले छे. आ प्रमाणे इर्या समिति राख्या छता
कदि कोइ. जीव मरी जाय, तोपण बहुज शुभ.. उपयोग
राखनारा साधुने हिंसानो बंध थतो नयी. वचन बोलवामा
में सारी रीते उपयोग राखयो, ते वीजी भाषा समिति
कहेवाय छे. भाषा समितिने साचवनार पुरुष पाप सहित
अने कठोर भाषा बोले नहीं. " तुं धूर्त छ, तुं कामी
छे, अने तुं राक्षस छे. आवा नठारा शब्दो, वेना
मुखायी नीकलता नयी, बीजाने मुखदायक, अल्प, घणा
"
१४७
-
अगेजनने साधनार, अने संदेह विनानां वचनो जे
बोलवामां आवे, ते भाषा समिति छे. वेताळीश प्रकारना
दूषणोथी रहित, एवा आझर विगेरेने ग्रहण करवा, ते
श्रीजी एषणा समिति छे. एषणानो अर्थ इच्छा थाय
छे. एषणा समितिवाळो पुरुष निर्दोष अने शुद्ध आहारनी
गवेषणा करे छे. वेसतां, उठता, अने कोइ चीज लेतां
के मुकतां पुंजवानो उपयोग राखवो, ते चौथी आदान
निक्षेपणा समिति कहेवाय छे.
विष्टा, मूत्र, धुंक, बडखा, शरीरनो मेल, वस्त्र, अन
अने पाणी जे शरीरने उपयोगना न होय, वे सर्व जीव
विनानी भूमिमां परठवे, तेवा उपयोगने पांचमी
पारिष्टापनिका समिति कहे छे.
मन, वचन, अने कायाना योगने गोपववा, वे गुप्ति
कद्देवाय छे, ते मनोगुप्ति, वचनगुप्ति, अने कायगुप्ति,
एवा त्रण प्रकारनी छे. जे मनने गोपबद्यु, तें पहेली
मनोगुप्ति छे, जे वचनने गोपववं, से पीजी बचनगुप्ति
छे, अने जे कायाने गोपववी, ते त्रीजी कायगुप्ति छे.
उपर कहेल पांच समिति अने त्रण गुप्ति, ए आठ
बोल चारित्रनो निर्वाह करवाने माटे माता समान छे,
तेथी तेने शास्त्रमा अष्टप्रवचनमाता एवा नामथी
कहेवाय छे.
-१४४
सारांश प्रश्नो.
१ समिति एटले. शु? २ समितिना केटला भेद
छ १ ३ विष्टा, मूत्र, विगैरेने जीत्र विनानी भूमिमां
परठवां, ते समितिनुं शुं नाम ? ४ जवा आववाने विष
जयणापूर्वक उपयोग राखवो, ते कइ समिति ? ५ एपणा
समिति अने भाषा समिति एटले शुं ? ६ कोइ चीज
लेतां के मूकतां पुंजवानो उपयोग राखवो, ते कइ
समिति ? ७ गुप्ति एटले शुं ? ८ गुप्तिनां केटला भेद
के १.९ प्रवचननी माता कोण कहेवाय छे ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूति आपवी.
चेष्टा, जयणा, पाप सहित, कठोर, धूर्त, मुखदायक,
अल्प, प्रयोजन, एपणा, गवेशणा, विष्टा, -परठवे,
समिति, गुप्ति.
पाठ ५९ मो.
संवर तत्वना सतावन भेद.
दश प्रकारनो यति धर्म.
संवर तत्वना सतावन भेदमां दश प्रकारनो यति
१४५ धर्म आवे छे. यतिधर्म अथवा मुनिर्धमना दश प्रकार छ. कदि पोतामां सामर्थ्य होय, अथवा न होय, तोपण वी. जानां दुर्वचन सहन करवां, तेनां जे परिणाम राखवां, ते पहेलो क्षमाधम छे. नत्र थइ अभिमाननो त्याग करवो, ते वीजो मार्दवर्म छे. मन, वचन अने कायानी कुटिलतानो त्याग करवो, एटले निष्कपटपणे रहेवं, ते त्रीजो आजैन धर्म छे. बाहेर अने अंदरथी तृष्णा के लोभनो त्याग, ते चोथो मुक्तिधर्म छे. रस विगेरे धातु अथवा आठ प्रकारनां कर्म, जेनाथी भस्म थाय, ते अनशन विगेरे तप, ते पांचमो तपोधर्म छ. तप धर्मथी इच्छानो निरोध थाय छे. आश्रवने त्याग करवानी जे वृत्ति, ते छठो संयमधर्म छे. प्राणातिपात विगेरे पांच- मांथी विराम पाम, पांच इंद्रियोनो निग्रह करवो, चार रूपायने जीतवा, अने त्रण दंडनी निवृत्ति, ए सत्तर भेदे संयमधर्म कहेवाय छे. सत्य बोलवू, एटले मृपावादना त्याग करवो, ते सातमो सत्यधर्म कहेबाय छे. सं- यम वृत्तिमा कलंकनो अभाव, ते आठमो शौचधर्न कहेवाय छे. आ शौचर्मने चीजी रीते पण वर्णवेलो छे. वैतालीश दोपथी रहित भात पाणा विगरे आहार लेबो; ते द्रव्यथी शौच कहेवाय छे, अने आत्माना जे शुद्ध अध्यवसाय एटले कपाय विगेरेयी रहित एवां शुद्ध परिणामनी वृद्धि, ते भाव शौच कहेवाय छ; अथवा मन, वचन, अने काया शुद्ध राख़वां, संयमन विष निरनिचा- 12 ૧૪૬ रपणे वर्तवु, तथा जीव अदत्त, स्वामि अदत्त, गुरु अ- दत्त, अने तीर्थकर अदत्त, ए चार प्रकारनी चोरीनो स्याग करवो, ते पण शौच कहेवाय छे. सर्व जातना परिग्रहनो त्याग करचो, एटले सर्व उपत्यी मूर्छा उतारवी, ते नवगो अकिंचनधर्म कहेवाय छे. नव प्रकारचें औदारिक, अने नव प्रकार क्रिय संबंधी मैथुननो त्याग करवो, तेने दशमो ब्रह्मचर्यधर्म कहे छे. आ दश यति- धर्मना गुणने जे धारण करे, ते खरेखरो यति कहे- वाय छे. सारांश प्रश्नो. १ यति धर्म केटला प्रकारनो छे, अने ते दश भेद कया तत्वना छ ? २ क्षमाधर्म अने मुक्तिधर्म विषे समजावो. ३ जेमां नम्र थइ अभिमाननो त्याग करवामां आवे, निष्कपटपणे वर्त्तवामां आवे, ते यतिधर्मनां नाम शुं ? ४ तपोधर्म अने शौचर्धमनां लक्षण कहो. ५ तपो धर्मधी शुं थाय छे ? ६ आश्रवने त्याग करवानी वृत्ति करवी, ते क्यो यतिधर्म ? ७ मृपावादनो त्याग करवो, ते धर्म क्यो ? ८ संयम धर्म केटला प्रकारनो छ ? ते प्रकार कहो. ९ अकिंचनधर्मनो अर्थ समजावो.१० शौच- चर्ममां शौच एटले शुं ? ते समजाचो. ११ शौचना के- टला भेद छ ? १२ द्रव्य शौच अने भाव शौच एटले १४७ शुं ? ते समजावो. १३ औदारिक अने वैक्रिय संबंधी मैथुन केटला प्रकारर्नु छ ? ते कहो. १४ खरेवरो यति कोण कहेवाय ? . शिक्षके नीचना शन्दोनी समजूती आपवी. सामर्थ्य, दुर्वचन, परिणाम, नम्र, कुटिलता, रस विगेरे धातु, निरोध, निग्रह, त्रण दंड, कलंक, अध्य- वसाय, वृद्धि, निरतिचारपणे, जीव अदत्त, स्वामि अदच, गुरु अदत्त, तीर्थंकर अदत्त, मूर्छा, औदारिक, वैक्रिय. ६० मो. पाठ ब्रह्मचर्य-नव गुप्ति. अथवा नव वाड. १ वस्ति, २ कथा, ३ आसन, ४ इंद्रिय, ५ कु- व्यांतर, ६ पूर्व क्रिडातुं स्मरण, ७ प्रणीत भोजन, ८ अतिमात्राहार, अने ९ विभूपण. आनव ब्रह्मचर्यनी गुप्ति कहेवाय छे. दरेक मुनिए आ नव गुप्ति सहित ब्रह्मचर्य राखवं जोइए, जे ए नव गुप्तिथी शीळ पाळे, ते खरेखर १४८ , साधु कवाय छे. ज्यां दैवी अने मानुषी ए वे प्रकारनी स्त्री प्रत्यक्ष के मूर्तिरुपे रहेती न होय, ज्यां पशु एटले तिर्यचणी, गाय, कुतरी, पाडी, घोडी, बकरी के घेटी विगेरे रहेती न होय, अने ज्यां नपुंसक रहेता न होय, तेवी वस्तीमां साधुए रहे, जोइए. जे वस्तीमां स्त्री, पशु, अने नपुंसक रहे, ते स्त्रीपशु पंडकवाली वस्ती कहेवाय छे. नपुंशकनुं वीजु नाम पंडक छे. जो ते त्रणेनी ब- स्तीमां साधु रहे, तो तेओनी काम बिकारनी चेष्टा दे- खबाथी ब्रह्मचारी साधुना मनमां विकार उत्पन्न थवाथी ब्रह्मचर्यने वाधा थाय छे. आ. ब्रह्मचर्यनी वस्ति नामे .. पहेली गुप्ति ( वाड ) छे. एकली स्त्रीने उदेशीने कथा कहेवी, तथा स्त्रीओ- नीज कथा कहेवी, ए साधुने योग्य नथी. कारण के ए कथा राग उत्पन्न करवानो हेतु छे. ब्रह्मचर्यवाळा साधुए स्त्रीना देश, जाति, कुळ, वेष, भापा, गति, विलास, हावभाव, चेष्टा, हसबुं, लीला, कटाक्ष, स्नेह, रति अने कलह के श्रृंगारनी कथा साधुए करवी न जोइए, जो तेवी कथा करे, तो मुनिनुं मन विकार पामे छे. आ कथा ब्रह्मचर्यनी. बीजी गुप्ति (वाड ) छे. स्त्रीओनी साथे एक आसनपर मुनिए वेसवू नहीं, तथा जे . आसन उपरथी स्त्री . उठी होय, ते आसन अथवा स्थानमां वे घडी मुधी साधूए वेसवू नहीं; ~
૧૪૯
कारण के, त्यां वेसवाथी स्त्रीचं स्मरण थाय छे, तेमज
स्त्रीना वेसवाथी शय्या, अथवा आसन मलीन थवार्थी
स्त्रीना स्पर्शवाळा आसन विगेरेथी विकार उत्पन्न थाय
छे. आ आसन नामे त्रीजी गुप्ति कहेवाय छे.
स्त्रीओनां अंग, उपांग ने नेत्र फाडीने जुबे नहीं,
कदि दृष्टि पडी जाय, तो " वाह ! केवी सुंदर छ ? "
एवं चितवन करे नहीं. आ इंद्रिय नामे चोथी गुप्ति
कहेवाय छे.
ज्यां दीवाल, तट्टी, के कनातने अंतरे स्त्री पुरुष
मैथुन सेवन करता होय, तेमज तेओना अवाज संभळाता
होय, त्यां ब्रह्मचारी साधुए रहेवू नहीं. आ कुटयंतर
नामे पांचमी गुप्ति छे.
पूर्व गृहस्थ अवस्थामा स्त्रीनी साथे जे विषय भोग
क्रीडा करी होय, तेनुं स्मरण साधुए करवू नहीं. जो
स्मरण करे, तो विषय सेववानी इच्छा थाय. आ पूर्व
क्रीडा नामे छठी गुप्ति छे.
अति चीकाशवाळा, मीठा, दुध, दहीं विगेरे धातु
पुष्ट करनार पदार्थोनो निरंतर आहार करवो नहीं. जो
तेवो आहार करे, तो वीर्यनी दृद्धि थवाधी विकार
उत्पन्न थाय छे, अने तेथी वखते विपयनी इच्छा थाय
छे, आ प्रणीत नामे सातमी गुप्ति छे.
ઉ૫e
कदि लुखी भिक्षा होय, तोपण साधुर प्रमाणथी
अधिक खावी नहीं; कारण के, हद उपरांत खावाथी
पंण विकार उत्पन्न थाय, अने शरीरने ज्ञाडा विगेरेनी
पीडा थइ पडे छे. भा अतिमात्राहार नामे आठमी
गुप्ति छे.
स्नान, विलेपन अने धूप करी शरीरने सुंदर करवू,
नख समारवा, दांत साफ करवा, केशमा तेल नाखवू,
कपाळे तिलक करवू, आंखमां काजळ सारवू, मुकोमळ
करवा वास्ते हाथ, पग विगेरे शरीरना अवयवने. तेल
अथवा सावुथी मसळवां-आ प्रमाणे शरीरनो शणगार
न करे, आ विभूषणादि नामे नवमी गुप्ति छे.
आ नव प्रकारनी गुप्ति ते ब्रह्मचर्यनी रक्षा माटे
छे, तेथी साधु सिवाय वीजा ब्रह्मचारीए पण आ नव वाढ
साचववी जोइए.
सारांश प्रश्नो.
१ ब्रह्मचर्यनी केटली गुप्ति छ ? २ गुप्ति एटले
शुं ? ३ नव गुप्तिनां नाम आपो. ४ वस्ती नामनी गुप्तियां
स्वीना केटला प्रकार लेवा ? ५ स्त्री, पशु, अने पंडक
ए | ? ते समजावो. ६ स्त्रीओनी साथे एक आसनपर
वेस, ते कइ गुप्ति ? ७ कथा नामनी गुप्ति विणे.
૬૫
समजावो. ८ केवी दीवाल तट्टी के कनात होय, त्यां
साधुए न रहे. ९ इंद्रिय अने क्रीडा ए वे गुप्ति विपे
समजावो. १० धातुपुष्ट करनार पदार्थोनो आहार करवो
नहीं, ते गुप्तिहुँ नाम शुं ? ११ शरीरने शणगारवू नहीं,
ए गुप्तिनुं नाम शुं ? १२ अनिमात्राहार भने पूर्वक्रीडा
ए वे गुप्ति विष समजावो. १३ आ नव वाड कोनी
रक्षा माटे छ ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपची.
कुटयांतर, प्रणीत, अतिमात्राहार, मानुपी, नियंचणी,
पंडक, नपुंसक, ब्रह्मचारी, उद्देशीने, विलास, हावभाव,
चेष्टा, लीला, कटाक्ष, रति, कलह, श्रृंगार, शय्या, अंग,
उपांग, धातुपुष्ट, निरंतर, वीर्य, विलेपन.
पाठ ६१ भो.
( संवर तत्वना सतावन भेद.)
चार भावना.
वार भावनाना चार प्रकार छे, अने ते संवर तत्वना
सतावन भेदमां गणाय छे. १ अनित्य भावना, २ अशरण
ઉપર
भावना, ३ संसार भावना, ४ एकत्व भावना, ५ अन्यत्व
भावना, ६ अशुचि भावना, ७ आश्रद भावना, ८ संवर
भावना, ९ निर्जरा भावना, १० लोक स्वभाव भावना,
११ बोधि दुर्लभ भावना, अने १२ धर्म भावना--आधार
भावनाओ कहेवाय छे. लक्ष्मी, यौवन, कुटुंब, परिवार
तथा आयुष्यने दर्भना अग्र भाग उपर रहेला जळनां
टीपांनी जेम अनित्य के अस्थिर भाववा, ते पहेली
अनित्य भावना कवाय छे. आ संसारमा जन्म,
जरा अने मरणना भयथी वचाववाने एक धर्म शिवाय
बीजु कोइ शरण नथी. आ प्रमाणे जे भाववं, ते वीजी
अशरण भावना छे. जे माता ते स्त्री थाय, स्त्री ते माता
थाय, पिता ते पुत्र थाय पुत्र ते पिता थाय, इत्यादि
संसारनी विचित्रतानो आ जीवे अनुभव कर्यो छे. आ
प्रमाणे जे भाववं, ते त्रीजी संसार भावना छे. . आ
जीव संसारमा एकलो आव्यो छे, ने एकलो जशे, एबुं
धार, ते चोथी एकत्व भावना छे. आत्मा ज्ञान
स्वरुप छे, अने शरीर जड छ, माटे तेओ एक वीजाथी
जुदा छे, आत्मा शरीर नथी, अने शरीर आत्मा नथी,
आत्माथी शरीर, धन तथा सगांवहालां विगेरे अन्य-जुदा
छे, आवी रीते भावंचु, ते पांचमी अन्यत्व भावना छे.
रस, रुधिर, मांस, हाडकां, वीर्य, अने परु विगेरे
अशुचिथी भरलं आ शरीर छे, तथा पुरुप, अने स्त्रीने
आश्रीने ते शरीरना- नव तथा बार द्वार सदा वह्यां करे
113. , छे; तेथी ते शरीर कोइ दिवस शुचि एटले पवित्र यतुं नथी. आ प्रमाणे भावयु, ते छठी अशुचि भावना छे. पांच इंद्रिय, चार कषाय, पांच अवत, त्रण योग, अने पचवीश क्रिया-एवा भेदथी कर्म बंधाय छे, तेमज दया दान विगेरेथी शुभ कर्म अने विषय कषाय विगेरथी अशुभ कर्म बंधाय छे. आ प्रमाणे जे भाववं, ते सातमी आश्रव भावना छे. जे जे संवर आदरवाथी जे जे आश्रव रोकाय, ते ते संवरने आदरवा, अने आश्रवने रोकवा, ते आठमी संवर भावना छे. जेम संकीर्ण स्थानकना योगथी केरी पाके छे, तेम बार प्रकारना तपे करीने कर्मने पचावयु, एटले पूर्वे करेला कर्मने साडवू, ते रुपी निर्जरा सकाम तथा अकाम, एम वे प्रकारे छे. एवी जे भावना भाववी, ते नवमी निर्जरा भावना छे. आ चौद राजलोक केड उपर वे हाथ दइ, वंने पग पसारीने उभेला पुरुषना. जेवा आकारवाळो छे, ते पद्रव्यरुपे छे. पूर्वना पर्याय नांश पामे, नवा पर्याय उत्पन्न थाय, अने द्रव्यपणे निश्चळ, एम उत्पाद, व्यय तथा ध्रुव स्वरुप छे. जे लोकनुं नीचेन तळीयुं उंधा वाळेला चपणा जेवु, मध्य भाग ज्ञालर जेवो, अने उपरनो भाग मृदंगना जेवो छे. वळी ए लोक शाश्वतो छ. आ प्रमाणे जे भावना करवी, ते दशमी लोक स्वरुप भावना छे. जीवने आ संसा- रमां भमता अनंता पुद्गल परावर्त थइ गया, तेमां अ- नंत वार चक्रवर्ती विगेरेनी समृद्धि मळी, तया यथा . २०
થઈ
प्रकृतिकरणने योगे करी, तथा अकाम निर्जराबडे पुण्यना
प्रयोगथी मनुष्यभव, -- आर्यदेश, निरोगी काया, अने
धर्मना श्रवणनो योग प्राप्त थयो, तोपण सम्यक्त्व पामधुं
अति दुर्लभ छ, एकी जे भावना भारवी, ते अगीयारमी
शोधि दुर्लभ भावना छ. दुःखे तरी शकाय एवा आ
संसार समुद्रमांथी तारखाने वाहाण समान एवो ते श्री
जिन प्रांत क्षमा विगेरे दश प्रकारनो शुद्ध धर्म, तथा
ज्ञान, दर्शन अने चारिन
प्रय रत्नरुप धर्म पामवो
दुर्लभ छ, तथा ते धर्मना साधक अरिहंत विगेरे पण आ
संसारमा पामवा दुर्लभ छे. आ प्रमाणे जे चिंतक्यु, ते
चारमी धर्म भावना कहेवाय छे.
उपर कहेली वार भावना. तथा पांच महाव्रतमा
दरेक व्रतनी पांच पांच एम पचीश, अने मैत्री, प्रमोद,
कारुण्य, अने उपेक्षा---ए वधी वीजी भावनाओने पण
शुद्ध हृदयवढे प्रमाद छोडीने भावची जोइए.
सारांश प्रश्नो.
१'भावना केटली छे ? २ ते भावना कया तत्वमा
गणाय छ १३ वार भावनाओनां नाम आपो. ४ आ
संसारमा जीव एकलो आव्यो छे, अने एकलो जशे एम
धारवं, ते कइ भावना कहेवाय ? ५. दर्भना अग्र भाग
उपर रहेला जळना टीपानी जेम सर्द अनित्य धारवं, ते का भावना कहेवाय ? ६ अशरण भावना अने एकत्दा भावना विषे समजावो. ७ जे जे संवरः . आदरवाथी आश्रय रोकाय, ते ते संवरने आदरवा, अने. आश्रवने रोकवा, ते कइ भावना कहेबाय १८ शरीर अने आ- माने जुदा जुदा यानवा, ते कइ भावना कहेवाय ? ९ अशुचि भावना अने आश्रव भावनातुं स्वरूप कहो. १० बार प्रकारनां तपथी कर्मने पचाक्वां, ए कइ. भावनाः कहेबाय ? ११ आ संसाररुप समुद्रने तारनार दश. प्रका- रनो धर्म तथा ज्ञान, दर्शन, चारित्ररुप त्रण प्रकारनो धर्म के. एम चिंतववं, ते कइ भावना कहेवाय ! १२ लोक स्वरुप भावना, अने बोधि दुर्लभ भावना विप समजावो. १३ आ. बार भावना शिवाय बीजी. कइ भावना भारवी जोइए ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. यौवन, दर्भ, अग्रभाग, अलित्प, अस्थिर, जरा, विचित्रता, ज्ञानस्वरुप,. रुधिर, रस, वीर्य, अशुचि, नद. द्वार, बार द्वार, संकीर्ण स्थानक, निर्जरा, सकाम, अकाम, पद् द्रव्य, पर्याय, निथळ, उत्पाद, व्यय, ध्रुव स्वरुप, चपणा, मृदंग, पुद्गल परावर्त, यथा प्रतिकरण, श्री लिन प्रणीन, साधक, मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, उपेक्षा.
૧૫૬
पाठ ६२ मो.
बार भावना विषे कविता.
भुजंगी छंद.
भली भावना भावजो जे अनित्ये,
र सर्व आ विश्वमां सर्व रीते;
धरो धर्मनुं शरण जे एक सारु,
वीजुं सर्व छे ते विना जे अकालं.
जुवो भवंतणो भेद केवो विचित्र,
विचारो इदे भावथी भव्य मित्र
अहो आ भवे एकला सर्व आव्या,
जवानुं हवे एकला तेह भाव्या.
स्वरुपे जुवो आत्मनुं रुप भारी,
जु, ते शरीरे हदे ल्यो विचारी;
परु मांस ने हाडकां वीर्य आदि,
अशुचि भयं आ वपु गंधमादी.
सदा भावजो आश्रवो कर्म बंधे,
शुभाशुभ विवके करी सर्व संयेः
वळी रोकजो आश्रवो संवरेथी,
घणो लाभ ते भावनाने घरेथी.
४
१.५७
तपस्या करी कर्म सर्वे तपादो,
खरी निर्जरा भावना तेह भावो;
करो वृत पच्चखाण चित्ते विचारी,
वळी पाप आलोयणा टेक धारी.
हदे चौद आ राजलोके विचारो,
वधी आकृति. लोकनी चित्त धारो,
हृदे बोधि छ दुर्लभा एम मानो,
मळ्यो जन्म मानुष्यनो ते प्रमाणो.
पछी धर्मनी भावना नित्य भावो,
क्षमा आदि जे भेद ते नित्य गावो
धरो भावना बार ते. भव्यराज,
थडे जाणजो धर्मनुं सिद्ध काज.
६
७
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूति आपवी.
अनित्ये, भवतणो, विचित्र, भव्य, आत्मनु, भारी,
इदे, आदि, अशुचि, वपु, गंधमादी, कर्मवंधे, राजलाके,
आकृति, चोधि, दुर्लभा, क्षमाआदि, भव्यराज.
१५८
पाठ ६३ मो.
[ संवर तत्वना ससाधन अंद.
वालीश परिषह.
संबर तत्वना सत्तावन भेदनी अंदर बावीश परिषह
पण गणाय छे. सर्व प्रकारे कर्मनी निर्जरा करवाने माटे
जे सहन करवु, ते परिषह कवाय छे, ते परिपहना
वावीश प्रकार छे. मुखथी उत्पन्नः थती वेदनाने सहन
करवी, ते पहेलो क्षुधा परिषद कहेवाय छे. तरस
लागवाथी यती वेदनाने सहन करबी, ते बीजो पीपासा
परिषह छे. टाढधी यती वेदनाने सहन करवी, ते त्रीजो.
शीत परिषह छे. ताप लागवाथी थती आतापना-पी-
डाने सहन करवी, ते चोथो उष्ण परिषह छे. डांस,
मच्छर, जू, मांकड विगेरेना डंसने समभाव सहन करयो,
ते पांचमा दंश परिषह छे. जुना वस्त्र होय तो, तेथी
खेद न पामे, अने नवां वस्त्र होय तो, तेथी हर्ष न
पामे, ते छठो अचेलक परिषह छे. टाढ, तडको विगेरेना
संभवथी जे अरति-अणगमो उत्पन्न थाय, तेने सहन
करवी, ते सावमो अरति परियह छे. स्त्रीओनां अंग,
उपांग तथा हावभावने देखी पोताना मनन स्थिर
राखवू, ते आठमो स्त्री परिषह छे. आळस छोड़ी.
પટ
गामोगाम विहार करवा, अने जे कष्ट सहन करवं, ते
नवमो चर्या परिषह छ. शून्य घर तथा स्मशान विगेरेयां
कायोत्सर्ग विगेरे क्रिया करतां सिंह भमुखनो भय थतां,
जे डरकुं नहीं, ते दशमो निषिधिका परिषह छे.
चढतां, उतरतां, उंची, नीची, शीतळ, उष्ण, कोमळ,
अथवा कठण भूमि उपर आसन के शय्या पामी उद्वेग
घरे नहीं, पण सारी रीते ते दुःख सहन करे,
अगीयारमो शय्या परिषह कहेवाय छे. क्रोधनां वचन
सांभळीने सांखी रहेवां, ते बारमो आक्रोश परिषह
छे. कोइ लपडाक, पाटु, चाबुक, तथा लाकडीनो घा
करे, अथवा वध करे, पण पोते जरा पण रोप न
लावतां सम परिणाम सहन करे, ते तेरमो वध परिषह
छे. पोते राजा के चक्रवर्ति होय, पण संयम लइने निच,
के उंच कुळमां भिक्षा लेवा जतां लज्जा न पामे, ते
चौदमो याचना परिषह छे. कोइ पण चीजनी याचना
करे, अने ते चीज पृहस्थना घरमा होय, ते छता के न
आपे, तोपण उद्वेग न पामे, अनिष्ट चितवे नहीं, वोले नहि
पण ते समता भाद सहन करे, ते पंदरमो अलाभ परिपह
छे. कोइ पण रोग उत्पन्न थतां, तेनी अति वेदना याय,
तोपण आर्च ध्यान करे नहीं, अने ते सारी रोते सहन
करे, ते सोळमो रोग परिपह छे. जमीनपर ढाम
विगेरेनी शच्या उपर जूता, सेना अग्र भाग भोकादायी
मे वेदना थाय, तेने सारी रीते सहन करे, ते सचरमो
10 तृणस्पर्दा परिषह छ, तेने मागधी भाषामां तणफास परिषह पण कहे छे. शरीरे पसीनाना संयोगे मेल थाय, अने तेथी करीने शरीर गंधाय, तोपण स्नाननी इच्छा न करे, अथवा तेथी कंटाळीने एवं न चिंतवे के, “ हूँ क्यारे आमांथी छुटुं ? " आवा कष्टने सहन करवू, ते अढारमो मल परिषह छे. आदर सत्कार मळवाथी उत्कर्ष न आणे, अन न मळवाथी खेद न पामे, ते ओगणीशमो सत्कार परिषह छे. शास्त्रनुं ज्ञान विशेष होवाथी कोइना प्रश्ननो उत्तर तरत आपवानी शक्ति होय, तेथी बहु मान अने पोतानो जय देखी गर्व धरे नहीं, अने तेना अभावे खेद धरे नहीं, ते वीशमो प्रज्ञा परिषह छे. पोतानामां शास्त्र के तत्वनुं ज्ञान न होय, तेथी दिनता धरे नहीं, पण “ मारे ज्ञानावरणीय' कर्मनो उदय छे, ते भोगववाथी अथवा तप आचरवाथी दूर थशे." एवं धारी उद्वेग राखे नहीं, ते एकवीशमो अज्ञान परिषह छे: - उपर कईला अज्ञानने लीधे शास्त्रनी ज्ञीणी वातोमां कादि समजण पडे नहीं, तेथी देव, गुरु, अने धर्मनी उपर अश्रद्धा राखे नहीं, तथा शास्त्रमा इंद्र विगेरे सम्यम् द्रष्टि देवता छ, एम. संभळाय छे, पण ते प्रत्यक्ष नजरे देखाता नथी, माटे ते इशे के नहीं होय, तेवो वहेम न लावे, तथा अन्य मतिओनी समृद्धि के सिद्धिनी उन्न- ति जोइ, तथा तपस्यानां कष्ट देखी मृढ बनी न जाय, ते वावीशमो मुम्यक्त्व परिपह छे.
१६ आ वाविश परिपहोने समभावे सहन करवा, ते संवर छे. सारांश प्रश्नो. १ परिपह क्या तत्वमा गणाय छ, अने ते केटला छ ? २ परिषह एटले शुं १ ३ शून्य घर के स्मशान विगरेमा कायोत्सर्ग विगेरे क्रिया करतां सिंहादिकनो भय थाय, तथापि डर नहीं, ते कयो परिषह ? ४ गामोगाम विहार करवानुं कष्ट वेठे, ते कयो परिपह छे ? ५ क्षुधा परिषद, अने पीपासा परिपह विप समजावो. ६ स्त्रीनां अंगोपांग देखी मनने स्थिर राखg, ते कयो परिपह ? ७ ताढ, तडका विगेरेना संभवथी अणगमो थाय, ते कयो परिपह ? ८ शीत परिपह, अने उप्ण परिपह विषे समजावो, ९ अचेलक परिपह, दंश परिपह, शय्या परि- पह, अने आक्रोश परिपहनां लक्षण कहो. १० आदर के सत्कार मळवाथी उत्कर्ष न आणे, अने ते न मळ- वाथी खेद न पामे, ते कयो परिपह ? ११ याचना प- रिपह, अलाभ परिपह, तृण स्पर्श परिपह विपे समजावो. १२ तणफास परिपह ए कइ भापानो शब्द छ ? १३ व- ध परिपह, निपिधिकी परिपह, प्रज्ञा परिपह, अने सम्य- क्व परिपह विषे समजावो. Rom २१
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
वेदना, आतापना, दंश, अरति, शून्य घर, सम
परिणामे, अनिष्ट,
अनिष्ट, आर्तध्यान, बहुमान, अश्रद्धा,
उन्नति.
पाठ ६४ मो.
यावीश परिषह विषे कविता.
भुजंगी छंद.
क्षुधा' कष्ट चेठे खरी टेक राखी,
भलो संजमे धर्मनो स्वाद चाखी
पिपासा२ तणुं ते सहे कष्ट प्रीते,
अहो धन्य छ साधुने सर्व रीते.
सहे शीतने सर्वदा प्रेम धारी,
करे वांछना वस्वनी नै विहारी33
न इच्छे कदि अग्निनो ताप प्रीते,
अहो धन्य, छ साधुने सर्व रीते.
फरे सूर्यना तापमां मध्य काळे,
फदि ते नहिं चरणमां चर्म५ घाले
२
१ भुख, २ तृपा. ३ विहार करनारा. ४ मध्यान्हकाळे. ५ जो.
टा-उपान.
१
.
४
.
न इच्छे कदि वायु पंखानी रीते,
अहो धन्य छ साधुने सर्व रीते.
नडे मच्छरो मांकडो डांस जंतु',
निवारे न ते जे सहे छे परंतु
न धारे कदि आर्तता? आप चित्ते,
अहो धन्य छ साधुने सर्व रीते.
धरे फाटलां तुटलां वस्त्र. अंगे,
न च्हाहे रुडा ते वधारे उमंगे;
सदा एपणा३ धर्मने आप जीते,
अहो धन्य छ साधुने सर्व रीते.
अभावो बने संयमे वर्तता जो
सहे ते वधुं राखीने प्रेमता जो,
वधुं ते सहे जे नडे सर्व रीते,
अहो धन्य छ साधुने सर्व रीते.
विलोके कदि अंगनां५ अंग सारां,
रहे स्वस्थ चित्ते गणी ते नगरां
न मोहे कदि राग रंगे सुगीते६,
अहो धन्य छ साधुने सर्व रीते.
विहारो करे सर्वदा सर्व गामे,
वनी आलमु ते धकी नै विरामे;
६
७
१ प्राणी. २ आर्तध्यान. ३ इन्छा धर्म. ४ अरति. ५ सी. ६ सा-
रा गोते. ७ विग़म पामे नही.
१६४
.
८
९
१०
वधे नित्य चर्या करे एक रीते,
अहो धन्य छ साधुने सर्व रीते.
करे काउसग्गादि शून्य स्मशाने,
मुणे गर्जना सिंहनी सद्य काने
डगे नहीं कदि तोय मृत्युनी भीते,
अहो धन्य छे. साधुने सर्व रीते.
सहे नित्य शय्यासने कष्ट भारे,
नहीं क्रोधना वाक्ययी खेद धारे,
डगे नहीं कदि मारथी दुःख वीते,
अहो धन्य छ साधुने सर्व रीते.
नहीं याचनाथी इदे आप लाजे,
मळे लाभ नहीं तो.स्त्रचित्ते न दाझे
सहे वेदना रोगनी शांत चित्ते,
अहो धन्य छे . साधुने सर्व रीते.
कदि अंगमां डाम ने घास वागे,
तथापि नहीं खेदथी चित्त जागे;
सहे मेल दुर्गध अंगे सुरीते,
अहो धन्य छे ,साधुने सर्व रीते.
नहीं आदरे हर्पने चित्त धारे,
अनादर धकी खेदने नहीं चधारे
११
१२
१ चर्या परीपह. २ शय्या संथारो अने आसन उपर वेसवाथी. 3 पो-
ताना चित्तमां.
૧૬૫
१३
रहे नित्य मानापमाने सुमीते,
अहो धन्य छे साधुने सर्व रीते.
नहीं पूर्ण प्रज्ञारे थकी गर्व जामे,
नहीं अल्प बुद्धि धरी खेद पामे;
सहे कष्ट अज्ञान४३ तेज रीते,
अहो धन्य छे साधुने सर्व रीते.
अश्रद्धा न राखे धरी व्हेम चित्ते,
न लोभाय जे अन्यना धर्मवित्त४,
परिषद् पुरा धारता ते सुरीते,
अहो धन्य छे साधुने सर्व गैते.
-
१४
१५
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी,
तथा कवितामा वावीश परिपह अनुक्रमे आप्या छे,
ते समजाववा.
क्षुधाकष्ट, पिपासा, शीत, वांच्छना, मध्यकाले, चर्म,
जंतु, आर्तता, एपणा धर्म, ताजो, अंगना, स्वच्छ चित्ते,
मुगीते, विरामे, चर्या, स्मशान, शव्यासने, स्वचित्ते,
मानापमाने, प्रज्ञा, अश्रद्धा.
,
.
१
मान, अपमान.
२ गुद्धि. ३ अमान परिषद. १ मांग
मध्यमां.
૧૬૬
पाठ ६५ मो.
( संवर तत्वना सत्तावन भेद.)
पांच प्रकारचें चारित्र.
संवर तत्वना सत्तावन भेदमा चारित्रना पांच भेदनी
गणना थाय छे. १ सामायिक चारित्र, २ छेदोपस्थापनीय
चारित्र, ३ परिहार विशुद्धि चारित्र, ४ सूक्ष्म संपराय
चारित्र, भने ५ यथाख्यात चारित्र-एवा ते पांच भेदनां
जुदां जुदा नाम छे; ज्यां राग द्वेषना अभावने माटे जq
थाय, अथवा ज्यां ज्ञान, दर्शन अने चारित्रनो लाभ
थाय, ते पहेलं सामायिक चारित्र कहेवाय छे, ते
चारित्रना देशविरति अने सर्वविरति-एवा वे भेद थाय
छे, जेमा सावा योगनो त्याग करवा, अने निरयद्य
योगनुं सेवन करवु, ते देशे करी श्रावकने अने सर्वे
करी साधुने होय छे.
जेमां पूर्व पर्यायनो छेद करवामां आवे, ते वीर्जु
छेदोपस्थापनीय नामे चारित्र छे. आ चारित्र आचार्य
आपेला पंचमहाव्रतरुपे होय छे, ते छेदोपस्थापनीय
चारित्रना सातिचार अने निरतिचार एवा चे भेद
याय छे. जे मूळ गुणने घात करनाराने प्रायश्चित
आपवारुप चारित्र होय, ते सातिचार छेदोपस्थापनीय
१६७
कहेवाय छे, अने नघा दीक्षा लीधेला शिप्यने “ छज्जी-
वणीया अध्ययन भण्या पछी, अथवा वीजा तीर्थन
आश्रयी होय, ते निरतिचार छेदोपस्थापनीय कहेवाय
छे जेम श्री पार्श्वनाथ स्वामीना तीर्थथी श्री वीरस्वामीना
तीर्थ आवी चार महाव्रतरुप धर्मनो त्याग करी पंचमहाव्रतरुप
धर्मने आदरे, ते निरतिचार छेदोपस्थापनीय चारित्र छ.
जेमां विशेष तप करवाथी कर्मनी निर्जरा थाय, ते त्रांगें
परिहार विशुद्धि' चारित्र कहेवाय छे. ते चारित्रना
निर्विश मानसिक अने निविष्टकायिक एवा वे भेद
छे, जे चार जण आ चारित्रना आसेवक होय, अने
ए कल्पमां प्रवर्तता होय, तेनुं जे चारित्र ते निर्विश
मानसिक परिहार विशुद्धि चारित्र कहेवाय छे. चार
जण तेना अनुचारी होय, तेने जे चारित्र होय, ते
निर्विष्टकायिक परिहार विशुद्धि नामे चारित्र कहेवाय
छे, तेमां नवमो एक वांचनाचार्य होय छे. एवी रीते
नव जणना समूहथी आ चारित्र आदरवामां आवे छे.
चोथा चारित्रनुं नाम सूक्ष्म संपराय चारित्र
कहेवाय छे, ते चारित्रमा कपाय सूक्ष्म होय छे, तेथी तेनुं
मुक्ष्म संपराय एवं नाम छे. उपशम श्रेणिए कर्मने शमावतां
अने क्षपक श्रेणिए कर्मने खपावता होय, त्यां नवमे
गुणठाणे लोभना संख्याता खंड करी, तेने उपशम श्रेणी-
वाळो होय, ते उपशमावे, तथा क्षपक श्रेणीवाळो होय
ते खपावे, ते संख्याता खंड मांहेलो जे वारे छल्लो एक खंड रहे,
..
૧૬૮ तेना असंख्यता सूक्ष्म खंड करीने दशमे गुणठाणे उपशमावे, अथवा क्षपक होय, ते खपावे, ते दशमा गुणठाणनुं नाम अने चारित्रनुं नाम पण सूक्ष्म संपराय छे. आ सूक्ष्म संपराय चारित्रना विशुद्ध मानसिक अने संक्लिष्ट मानसिक एवा वे भेद थाय छ जे श्रेणी चढता होय तेने विशुद्ध मानसिक चरित्र होय छे, अने जे उप- शम श्रेणीथी पडता होय, तेने संक्लिष्ट मानसिक चारित्र होय छे. पांचमुं यथाख्यात चारित्र कहेवाय छे, ते चा- रित्रमा सर्व प्रकारे कपायनो अभाव होय छे. तेना छाम- स्थिक अने कैवलिक एवा वे भेद छे. छद्मावस्थामा रहेला उपशामकने अगीयारमे गुण ठाणे, अने क्षपकने वारमे गुणठाणे छानस्थिक चारित्र होय छे. केवळीने तेरमे, अने चौदमे गुणठाणे कैवलिक चारित्र होय छे. ए चारित्र एवं प्रभाविक छ के, तेनाथी सत्वर मोक्षनी प्राप्ति थाय छे. आ पांच प्रकारना चारित्रने धारण करनारा साधु पण पांच प्रकारना थाय छे. चालता. पंचम काळमां प- हेलां वे प्रकारनां चारित्रने धारण करनाराज साधुओ छे, अने पाछळना त्रण प्रकारनां चारित्र विछेद पाम्या छे.
१९८ सारांश प्रश्नो. १ चारित्रना केटला भेद छ ? २ पांच प्रफारनां चारित्रनां नाम आपो. ३ ज्यां ज्ञान, दर्शन, अने चा- रित्रनो लाभ थाय, ते चारित्रनुं शुं नाम ? ४ सामायिक चारित्रना केटला भेद छ ? ५ सावध योगनो त्याग अने निरवद्य योगर्नु सेवन कर, ते शुं कहेवाय, अने श्रावकने तथा साधुने ते केवी रीते होय १ ६ यथाख्यात चारित्र एटले शुं, अने तेना केटला भेद छ ? ते सम- जावो. ७ छाद्मस्थिक अने कैवलिक चारित्र कोना भेद छे, अने ते चारित्र केवी रीते होय ? तेनी बरावर सम- जूती आपो. ८ जेमां सत्वर मोक्षनी प्राप्ति थाय छे, ते कयुं चारित्र ? ९ उपशमिक अने क्षपकने केटलामे गुण- ठाणे कयु चारित्र होय छे ? ते कहो. १० छेदोपस्थाप- नीय चारित्र एटले शुं, अने तेना केटला भेद छ ? ते कहो. ११ नवा दीक्षा लीधेला शिष्यने वीजा तीर्थने आश्रीने जे चारित्र होय, तेवा चारित्रनुं शुं नाम ? १२ निरतिचार छेदोपस्थापनीय चारित्रनो दाखलो आपो. १३ परिहार विशुद्धि चारित्र एटले शुं, अने तेना केटला भेद छ ? ते समजावो. १४ निर्विश मानसिक अने नि- विष्ट कायिक एटले शुं ? १५ जे श्रेणी चडता होय, अने जे उपशम श्रेणीची पडता होय, ते कया चारित्रमा आवे छ ?
.१७० शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपची. प्रबर्चन, देशविरति, सर्व विरति, सावध योग, निरवद्य योग, पूर्व पर्याय, मूळ गुण, प्रायश्चित, छज्जीव- णीया, अध्ययन, आ सेवक, कल्पमा, अनुचारी, उपशम श्रेणी, क्षपक श्रेणी, खपावतां, गुणठाणे, संख्याता खंड, सर्व प्रकारे, छमावस्था, उपशामिक, क्षपक, प्रभाविक. पाठ ६६ भो. ७ निर्जरा तत्व. निर्जरा तत्व ए नव तत्वमा सात, तत्व छ. जे. नाथी जीवनी साथे बंधाएलां कर्मनो देशथी अने सर्वथी क्षय थाय, ते निर्जरा कहेवाय छे. निर्जराना सकाम निर्जरा अने अकाम निर्जरा एवा वे भेद छे. जे साधुओ तथा श्रावको पुद्गलीक मुखनी इच्छा चिना फक्त मुमुक्षु थइ, मोक्षने माटे धर्म करे छे, तेमने सकाम निर्जरा होय छे, अने दीजा अज्ञानी मिथ्यात्वी जीवोने अकाम निर्जरा होय छे. कर्मनो पाक (नाश ) पोतानी मेळे थाय छे, समा उपायथी पण कर्मनो नाश थाय छे. तेनी उपर भावानां फळ ( केरी ) नुं द्रष्टांत अपाय छे. जेम आंवानुं फा सनी डाली उपर रहेलं होय, ते छतां पोतानी मे- १३. लेज पाकी जाय छे, अने कोदरा विगेरे पराळनी अंदर दाखल करवाथी पण पाकी जाय छे, तेवीज रीते कर्म निर्जरा पण चे प्रकारे थाय छे. एकेंद्रिय विगेरे जे जीव छे, तेओने जडपणाने लइ विशेष ज्ञान तो नथी, परंतु. टाढ, लडको, वर्षाद, अग्नि, छेदन, अने बंध विगेरे कष्ट भोगववाथी कर्मनी अकाम निर्जरा कहेवाय छे. आ निर्जरा जे साधनथी थइ शके, तेनुं नाम तपः कहेवाय छे. ते तपना चार प्रकार छे. , सारांश प्रश्नो. १ निर्जरा तत्व ए केटलामुं तत्व छ ? २ निर्जरा एटले शुं ? ३ निर्जराना केटला भेद छे ? ४ सकाम निर्जरा अने अकाम निर्जरा एटले शुं ? ५ अकाम नि- जरा केवा जीवोने थाय छ ? ६ निर्जरा उपर कडे द्रष्टांत छ ? ते समजावो. ७ सकाम निर्जरा विप सम- जावो. ८ तप एटले शुं ? ९ तपना केटला भेद छे. शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. मुमुक्षु, फोदरा, पराळ, पाक, वर्षा, तप.
૧૭
पाठ ६७ मो.
तप.
निर्जरा ए तपथी थाय छे. कर्मनी निर्जरा करवानुं
मुख्य साधन तप छे. ते तपना वार भेद छे. छ. प्रकारे
बाह्य तप, अने छ प्रकारे अभ्यंतर तप-एम मळीने तपना
वार भेद गणाय छे. १ अनशन, २ उणोदरी, ३ वृत्ति
संक्षेप, ४ रस त्याग, ५ काय क्लेश, अने ६ संलीनता
ए छ प्रकारचें वाह्य तप कहेवाय छे. जेमा आहारनो
त्याग एटले उपवास विगेरे करवामां आवे, ते अनशन
नामे पहेलु तप छे. जेमा आहार, वस्त्र, तथा राग द्वेषने
ओछा करवामां आवे, ते उणोदरी नामे वीजुं तप छे.
द्रव्य, क्षेत्र, काळ, अने भावे करी, आजीविकानो संक्षेप
करवो, तथा अभिग्रह करचो, के नियम धारवा, ते वृत्ति
संक्षेप नामे त्रीजु तप छे. विगय विगेरेनो त्याग करवो,
अने आंबील, नीवी प्रमुख करवां ते रस त्याग नामे
चोथु तप छ. लोच, तथा उत्कट आसन
विगेरे
करी कष्ट सहे, ते काय क्लेश नामे पांचमुं तप छे.अंग
तथा उपांग विगेरेनुं संवर-गोपन करवू, ते संलीनता नामे
छद्रं तप है.
आ छ प्रकारनां वाह्य तप कहेवाय छे. ते तपनी
क्रिया बाहेरनी होवाथी नेनुं नाम बाह्य तप छे,
१७३ वीजां छ प्रकारनां आभ्यंतर तप छे. कीधेला अप- राधनी शुद्धि करवी, ते प्रायश्चित नामे पहेलं तप छे. गुणवंतनी भक्ति करवी, तथा आशातना टाळवी, ते विनय नामे वीजें तप छे. आचार्य विगेरेने आहार विगेरे लावी आपवा, तथा तेमनां अंग चांपवां, ते वैयावृत्य नामे त्रीजुं तप छे. भण, भणाव, संदेह दूर करवो, भणेलाने फरी संभार, अर्थ चितववो, अने धर्मोपदेश करवो, ते स्वाध्याय मामे चोथु तप छ. आर्त तथा रौद्रध्यानने निवार, अने धर्मध्यान तथा शुक्ल- ध्यान ध्यावq, ते ध्यान नामे पांच, तप छे. कर्मना क्षय माटे कायोत्सर्ग करवो, ते कायोत्सर्ग नामे छठे तप छे. आ छ प्रकारना आभ्यंतर तप कहेवाय छे, ते तंपनी क्रिया अंदरनी होचाथी तेनुं नाम आभ्यंतर तप छे. आ बने प्रकारना तपना साधनधी प्राणी कर्मनी निर्जरा करी शके छे; आधी करीने ते वार प्रकारनां तप निर्जरा तत्वनी अंदर गणवामां आव्या छे. सारांश प्रश्नो. १ निर्जरा शेनाथी थाय हे २ तपना केटला १७८ भेद छ ? ३ आभ्यंतर अने बाह्य तपना केटला केटला भेद छ ? ४ अनशन अने उणोदरी तपर्नु लक्षण शुं ? ५ लोच, अने उत्कट आसनथी कष्ट सहे, ते कयुं तप कहेवाय ? ६ आंबील तथा नीवी विगेरे करवां ते क्यु तप ? ७ वृत्ति संक्षेप अने संलीनता तप विषे समजावो. ८ वाह्यतप एटले शुं ? ९ प्रायश्चित अने विनय तपमा शु थाय छे ? १० आत तथा रौद्र ध्यानने निवार, अने धर्म तथा शुक्ल ध्यान ध्यावं, ते कयु तप ? ११ स्वाध्याय अने वैयावृत्य तप विषे समजावो. १२ आभ्यंतर तप एटले शुं ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूति आपवी. साधन, वाह्य, आभ्यंतर, द्रव्य, क्षेत्र, काळ, भाव, आजीविका, संक्षेप, अभिग्रह, नियम, विगय, आंबील, नीवी, उत्कट आसन, संवर, गोपन, शुद्धि, आशातना, वैयावृत्य, संदेह, आर्तध्यान, रौद्रध्यान, धर्मध्यान, शुक्ल- ध्यान, क्षय. %3B
૧૭૫
पाठ ६८ मो.
तप षिषे कविता.
२
३
दोहरा.
सर्व कर्मनी निर्जरा, तप करवाथी थाय;
ते तप वार प्रकारचें. साधन श्रेष्ट गणाय.
प्रकार छे छो वाह्यना, आभ्यतरना तेम
शुद्ध हृदे ते सेववा, थाय निर्जरा जेम.
ज्यां उपवास करी रहे, ते अनशन कहेवाय
खानपान ओछां करे, उणोदरीज गणाय.
नियम धरी संक्षेप ज्यां, वृत्तितणो जो थाय;
ए वृत्ति संक्षेपने, नामे तप कहेवाय.
तजीविगय रसनो करे, त्याग महा तप तेह;
उत्कट आसन लोचथी, काय क्लेश तप जेह.
ज्यां गोपन छे अंगठे, ते संलीन गणाय;
एह वाह्य तप जाणवा, षट् भेदे ते थाय.
आभ्यंतर तप ते कहे, जेनो अंदर योग
तेना पण छा भेद छ, आपे निर्जर योग,
कीधेला अपराधनी, शुद्धि करवी जेह
ते मायगिन जाणवू, तेमां नहीं - संदेह.
४
ur
७
.
૧૬ ९ भक्ति जे गुणवंतनी, विनय कहे तप तेह सेवा वैयावृत्य छे, सर्वोत्तम तप जेह. भणq तथा भणावळू, ए स्वाध्याय गणाय; धर्म शुकलनुं ध्यान ते, ध्यानतणुं तप थाय. १० कर्म क्षय उद्देशथी, दिलमा धारी लाग; करे काय उत्सर्गने, जाय कर्मनो डाग. ११ तप आ बार प्रशारर्नु, भविजन सेवे नित्य याय कर्मनी निर्जरा, धर्म तणी ए रीत. १२ शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. शुद्ध हृदे, संक्षेप, वृत्तितणो, विगयरस, उत्कट आ- सन, सलीन, निर्जर योग, कर्मक्षय उद्देशथी, उत्सर्ग, काय, लाग. पाठ ६९ मो. बंध तत्व. नच तत्वोमां बंध तत्वन आठमुं तत्व कहे छे, जेम दुध अने पाणी एकठां थइ मळी जाय, तैम जीवना प्र- देश अने कर्मना पुद्गलो परस्पर मळे, ते बंध कहेवाय १७७ , छे. आ बंध शब्दनो अर्थ बंदीवान् थाय छ जेम केदमा एडेलो केदी स्वतंत्र रही शकतो नथी, तेम आत्मा ज्ञा- नावरणीय, विगेरे कर्मना बंधथी स्वतंत्र रही शकतो नथी ए बंध तत्वना चार भेद छे. प्रकृति बंध, स्थिति वंध, अनुभाग बंध अने प्रदेश बंध, एवां मनां नाम छे. स्वभावपणे जे कर्मठे परिणमयु, ते पहेलो प्रकृति- बंध कहेवाय छे. कर्मना कालना परिमाणनो जे निश्चय, ते बीजो स्थितिबंध छ. तीत्र अने मंद विगेरे रसपणे जे कर्मनुं परिणमवं, ते त्रीजो अनुभागबंध कहेवाय छे, अने कर्म पुद्गलोना प्रदेशना समुदायतुं जे एकटुं थर्बु, ते चोथो प्रदेशबंध कहेवाय छे. आ चारे बंधने स्पष्ट रीते समजवाने माटे एक ला- डवानु द्रष्टांत आपवामां आवे छे. मुंट, पीपर, अने मरीनो बनावेलो एक लाडवो होय, ते जुदा जुदा स्व- भावने धारण करे छे. सुंठ, पीपर, अने मरी ए त्रिकटु कहेवाय छे. जे वस्तु ते त्रिकटुथी बनेली होय, तेनो स्वभाव वायुने हरण करवानो छे, तेवीज रीते शीत द्र- व्यथी बनेली वस्तुनो स्वभाव पित्तने हरण करवानो छे, तथा अरडुसो अने क्षार चिगेरे वस्तुनो स्वभाव क फने हरवानो छे तेज प्रमाणे कर्मनो पण जुदो जुदो स्वभाव छे. कोइ कर्मनो ज्ञानावरण स्वभाव छ, तो कोइनो द- दर्शनावरण स्वभाव छे, आनुं नाम प्रकृतिबंध क- हेवाय हे.
૧૭૮ हवे कोइ लाडवो एक दिवस रही बगडी जाय छे, कोइ वे दिवस, कोइ चार दिवस, कोइ आठ, कोइ दश, कोइ पखवाडीयु, अने कोइ एक मास सुधी रहे छ, अने पछी वगडी जाय छे. तेवीज रीते कोइ कर्मनी स्थिति अंतर्मुहूर्त सुधीनी होय छे. कोइनी प्रहर, दिवस, पखवा. डीयुं, मास, अने छेवटे सीत्तेर कोटाकोटी सागरोपम मुधीनी होय छे. ज्यां मुधीनी स्थिति होय, त्यां सुधी फळ आपीने नाश पामे छे, आनुं नाम स्थीतिबंध क- हेवाय छे. जेम कोइ लाडवानो रस कढवो होय छे, कोइनो मीठो होय छे, अने कोइनो कपाएको होय छे, तेवी रीते कोइ कर्मनो रस ओछु वधतुं मुख आपे छ, अने कोइ कर्मनो रस ओछु वधतुं दुःख आपे छे. आ संसारमा जीवोमा जे जे अवस्था देखाय छ, ते ते अवस्था भेद कर्मना रसथीज देखाय छे. कर्मना रसने अनुभाग पण कहे छे, आनुं नाम रसबंध कहेवाय छे. जेम कोइ लाडवो वजनमा पांच तोलानो होय छे, कोइ पाशेरनो, कोइ अडधा शेरनो, अने कोइ शेरनो होय छे, तेम कोइ कर्मना प्रदेश गणत्रीमां थोडा होय छे, अने कोइना घणा होय छे, आनुं नाम प्रदेशबंध कहेवाय छे.
१७२ सारांश प्रश्नो. १ बंध तत्व ए केटला तत्व छ ? २ बंध एटले शुं ? ते दाखला साथे समजावो. ३ बंध शब्दनो अर्थ शुं छे ? ४ बंध तत्वना केटला भेद छ ? ५ प्रकृतिबंध एटले शुं ? ६ काळनो जमां निश्चय छ, तेने कयो बंध कहे छे ? ७ अनुभागवंधन स्वरुप समजावो. ८ पुद्ग- लोना प्रदेशनो समुदाय ते कयो बंघ ? ९ चार बंध माटे लाडवानो दाखलो समजावो. १० त्रिकटु एटले शुं ? ११ चार बंधने लाडवानो दाखलो आपी जुदी जुदी रीते समजावो. १२ अनुभागबंधनुं वीजुं नाम शुं कहे- वाय छे ? शिक्षके नीचना शब्दोनी समजूती आपवी. प्रदेश, बंदीवान्, परिणम, तीव्र, मंद, रस, शीत द्रव्य, पित्त, क्षार, अंतर्मुहूर्त, प्रहर, कोटाकोटी, सागरोपम, अनुभाग, कर्मना प्रदेश. पाठ ७० मो. बंध हेतु. जेनाथी बंध थाय, ते बंधना हेतु कहेवाय छ, ते
૧૮૦
.
हेतुना वे भाग छे. एक बंधना मूळ हेतु, अने वीजा
बंधना उत्तर हेतु. बंधना मूळ हेतु चार प्रकारना छे,
अने उत्तर हेतु सत्तावन प्रकारना छ. मिथ्यात्व, अविरति,
कपाय, अने योग-ए चार मूळ हेतु छे, तेना उत्तर
भेद सत्तावन थाय छे. मिथ्यात्वना पांच भेद छे,
अदितिना वार भेद छ, कपायना पचीश भेद छ, अने
योगना पंदर भेद छ, एवी रीते बंधा मळीने सत्तावन भेद
थाय छे. आ कर्मना बंधमां वादीओ जुदा जुदा छ विकल्प
करे छ, ते वधा मिथ्या छे. मिथ्या कल्पना करची, ते
विकल्प कहेवाय छे. पहेला विकल्पमां तेओ एची शंका
उठावे छे के, प्रथम जीव निर्गळ हतो; एटले पुण्य
पापना बंधथी रहित हतो. पछी तेने पुण्य पापनो बंध
थयो छे. आ तेनी वात तदन मिथ्या छे. कारण के,
निर्मळ जीव कर्मनो बंध करी शकतो नथी, तेमज कर्म
दिना ते संसारमा पण उत्पन्न थइ शकतो नथी. जो
निर्मळ जीवने कर्मनो वंश थाय, तो पछी मोक्षना जीवने
पण कर्यनो बंध थाय, तो मोक्षनोज अभाव थाय, माटे
ए विकल्प तद्दन मिथ्या छ,
वीजा विकल्पमा वादी एवी बात करे छे के, कर्म
पहेला हतां, अने जीव पछीथी बन्यो छे. आ वात पण
तद्दन मिथ्या छ कारण के, जीव विना कर्म कोणे कर्या
इतां ? कर्ता विना कर्म थइ शकतां नथी.
त्रांजा विकल्पमा कहे छ के, जीव अने कमे एकज
૧૮૧
साथे उत्पन्न थयां छे. आ वात पण संभवती नथी; जे
वस्तु साथे उत्पन्न थाय, ते परस्पर कार्य अने कारण
थइ शके नहीं, अने तेमां एवो विरोध आवशे के, जो
कर्म जीवनां करेला सिद्ध न थया, तो जीव कर्मठे फल
पण भोगवशे नहीं.
चोथा विकल्पमां कहे छ के, जीव तो छ, . पण
जीवने कर्म नथी; आ वात पण मिथ्या छे. जो जीवने कर्म
न होय, तो जीव सुख दुःख केवी रीते भोगवी शके ?
पांचमा विकल्पमा " जीव अने कर्म बने नथी, "
एम कहे छे. आ विकल्प तो तद्दन असत्य छे; कारण
के, " जीव अने कर्म बंने नथी, " एम कहेनारो कोण
छ ? ते जीवछ के बीजो छ ?
छटा विकल्पमां जीव अने कर्म ( माया ) बने
स्वतः अनादि छे, एम कहे छे. आ कहेवामां पण विरोध
आवे छ कारण के जीवनी जेम कर्मनो पण कदापि
नाश न थवो जोइए, अने जैनमां जीव तथा कर्मनो
प्रवाहथी अनादी संबंध छे, पण जुनां कर्म नाश थतां
जाय छ, अने नवां कर्म बंधातां जाय छ, माटे पुद्गल
द्रव्यरुपे कर्म नित्य छ, अनें पर्यायधी अनित्य छ; ज्यारे
जीव अने कर्मनो संबंध तदन नाश पामे छे, त्यारे जीव
मोक्ष पामे छे. आ प्रमाणे छ विकल्प समजवाथी बंध
१८२
तत्वने माटे सारी समजण पडे छ, एथी करीने कर्मना
बंधना जे हेतु छे, ते अवश्य जाणवा जोइए.
सारांश प्रश्नो.
१ बंध हेतु एटले शृं? २ बंधना मूळ हेतु केटला
छ ? ३ बंधना उत्तर हेतु केटला छ ? ४ उत्तर हेतुना
वधा भेद संक्षेपथी गणावो. ५ मिथ्यात्व, अविरति, कषाय,
अने योग-ए चारेना केटला भेद छे ? ते जुदा जुदा
गणावो. ६ विकल्प एटले शुं ? ७ आ निर्मळ जीवने
पुण्य पापनो बंध पछी लाग्यो छे, एम कहेवू ते कयो
विकल्प छ ? ८ त्रीजा विकल्पमा शुं आवे छ ? ९ कर्म
पहेला हता, अने जीव पछीथी बन्यो छे, ए कया
विकल्पमां आवे छ ? १० जीव अने कर्म बंने नथी, ए
कया विकल्पमा आवे छे ? ११ चोथा विकल्पमा शु
आवे छे ? १२ जीव अने कर्म बने अनादि छे, एवी
वात शेमा छे ? १३ जैन | माने छ ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
मूळ हेतु, उत्तर हेतु, मिथ्यात्व, अविरति, कषाय,
योग, मिथ्या, कल्पना, निर्मळ, अनादि.
૧૮૩ पाठ ७१ मो. [ बंधना उत्तर हेतुना सत्तावन भेद. ] मिथ्यात्व. जे धर्मथी विरुद्ध होय, तेने सत्य मानवु, ते मिथ्यात्व कहवाय छे, ते मिथ्यात्वना पांच प्रकार छे. १ आभिग्रहीक मिथ्यात्व, २ अनभिग्रहीक मिथ्यात्व, ३ अभिनिवेश मिथ्यात्व, ४ संशय मिथ्यात्व, अने ५ अनाभोग मिथ्यात्व-एवा नाम छे. जे जीव एम जाणे के, “जे काइ हुँ समज्यो छु ते सत्य छे, वीजानी समज ठीक नथी " आबु धा- रीने सत्य असत्यनी परीक्षा करवानी जे इच्छा थाय नहीं, तेमज ते सत्य असत्यनो निर्णय पण करे नहीं, जे मत पोते ग्रहण करेलो तेज सत्य छे, एम मानी लीधी वात न मुके, ते पहेलं आभिग्रहीक मिथ्यात्व कहेवाय छ. जे जीव एम माने के, सर्व मतो सारा छे, सर्व मतोनी अंदर मोक्ष मळे छे. कोइ पण मतने नठारो क- हेवो न जोइए, वधा धोने नमस्कार करवो, आ वीडं अनभिग्रह मिथ्यात्व छे. जे जीव जाणीने जुहूं वोले, कदि अजाणधी कांइ भुल पडी गइ होय, अने तेने जो कोइ विद्वान् वतावे, तोपण , १८४ , ते ते वातनो कदाग्रह राखे, अभिमानधी पकडेली वातने छोडे नहीं, अने पोताना कपोळ कल्पित मतने नठारी युक्तिओथी सिद्ध करवा मथन करे, तेमज वादमां हारी जाय, तोपण पोतानो मत छोडे नहीं, ते त्रीजु अभिनि- वेश मिथ्यात्व कहेवाय छे. जे जीव श्री जिन भगवंते कहेला तत्वमा शंका करे, जैन तत्वनी गहन वात पोताना समजदामां न आवे, तेथी तेमां वारंवार संशय कयर्या करे, ते चौथु संशय मिथ्यात्व कहेवाय छे. जे जीवने धर्म के अधर्म शी वस्तु छ ? एवो उ- पयोग न होय, ते पांच, अनाभोग मिथ्यात्व क- हेवाय छे. सारांश प्रश्नो. १ मिथ्यात्व एटले शुं ? २ मिथ्यात्वना केटला प्रकार छ ? ३ अनभिग्रह मिथ्यात्व एटले शुं ?. ते समजावो. ४ जेमां जीवने सत्य असत्यनी परीक्षा करवा- नी समजण न होय, अने जे पोते मान्युं होय तेज सत्य छ एम माने, ते केवु मिथ्यात्व ? ५ संशय मिथ्यात्व एटले शुं ? ६ जेमां जीदने पोते करेली भुलनो कदाग्रह याय, अने तेने कपोलकल्पित युक्तिमोथी. सिद्ध करवा मये, 101 ते केवु मिथ्यात्व कहेवाय ? ७ अनाभोग मिथ्यात्वर्नु लक्षणं कहो. शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. निर्णय, कदाग्रह, कपोलकल्पित, युक्ति, · मथन, गहन, उपयोग. पाठ ७२ मो. ( बंध हेतुना सत्तावन भेद.) अविरति अने कषाय. जे हिंसा. थाय तेवा काममांथी विराम न पामवं, से भविरति कहेवाय छे. ते अविरतिना वार भेदः, थाय छे. पांच इंद्रिय, छटुं मन, अने छकाय मळी बार भेद थाय छे. पांच इंद्रियाने पोतपोताना विषयमा प्रवर्ताववी, फोइ पण पापमय वस्तुथी मननो निरोध करवो नहीं, अने छ. जीव निकायनी हिंसामा प्रवृत्ति करवी, ते वधी मळीने चार प्रकारनी भविरति थाय छे. क्रोध, मान, माया, अने लोभ-ए कपाय फहे. चाय छे. ते कगायना पचवीश भेद थाय छ. अनतान-
..१८१
,
बंधी क्रोध, मान, माया, अने लोभ, अप्रत्यारण्यानी कोष,
मान, माया, अने लोय. प्रत्याख्यानी क्रोध, मान, माया,
अने लोभ अने संज्वलन. क्रोध, मान, गाया, अने लो-
म-ए सोळ, तथा १ हास्य, २ रति, ३ अरति, ४ भय,
५ शोक, ६ जुगुप्सा, ७ स्त्री वेद, ८ पुरुष वेद, अने ९
नपुंसक वेद-प. नव नोकपाय- ए. पचवीशं कषायना
भेद कहेवाय छे, तेओ वर्धा संसारनी स्थितिनां मूल
शारण है.
सारांश प्रो.
१ अविरति एटले .१२ अविरतिना केटला भेद
छे १ ३ अविरतिना वार भेद गणावो. ४ कषाय कया ?
ते कहो. ५ कंपायना केटला भेद थाय छे ? ६ कपा-
- यना पचवीश भेद गणावो.
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूति आपवी.
विराम, प्रवर्तावत्री, पापमय वस्तु, निरोध, प्रवृत्ति,
मूळ कारण.
१८७ पाठ ७३ मो. ( ईंध हेतुना सत्तावन भेद..) योग-भाग १ लो. मन, वचन, अने काया-ए योगना प्रण प्रकार छ, ते. योग बंधना हेतुमा गणाय छे. ते प्रण मकारना योगना उत्तर भेद पंदर थाय छे. मनोयोगना. चार भेद, पचनयोगना चार भेद, अने काय योगना सात मेद, एवी रीते सर्व मळीने पंदर भेद थाय छे. सत्य मनोयोग, असत्य मनोयोग, मिथ मनोयोग, अने व्यवहार मनोयोग-ए चार मनोयोगनां नाम । छ, मननुं धीजुं नाम अंतःकरण छ. तेमना द्रव्यमन अने भावमन एवा वे भेद छ. मनोवर्गणानां पुद्गल प्रहण करी वे पुद्गलोने चिंतन धर्मरुपे मनपणे परिणमावे ते द्रव्य मन कहेवाय छे, अने कर्मना क्षय उपशमथी जे पति ज्ञान उत्पन्न धाय, ते नाम भावमन कहेवाय छे. तेवा शानथी आ धो व्यवहार सिद्ध थाय छे, अने व्यवहा- रथी तेम सत्य विगेरेनो व्यपदेश प्राप्त करे छे. वळी उ. पचारथी द्रव्य मन ज्ञाता थाय छे. इंद्रियना आवरण क- मना क्षयोपशमधी जे मनोज्ञान उत्पन्न थाय, तेवढे परि- साप पामेला आत्माने असर करवायाळी मनोर्गणाना .१८८ । संबंधी जे कोई भात्तनुं वीर्य उत्पन्न, पाय, ते पण मन कहेवाय छे. तेवीज रीते वचननी वर्गणा अर्थात् परमाणु- ओनो समृह, तेनाथी परिणतिरुप कोई जातवें सामर्थ्य उत्पन्न थाय, ते वचनयोग जाणवो. मनोयोगना अने व- बनयोगना मळीने आठ प्रकार थाय छे. मनमा सत्य व्यवहारर्नु चितवन करघु, ते सत्य मनोयोग कहेवाय छे. जेमके आ जीवादि पदार्थ द्रव्यरूपे नित्य छे, अने पर्यायरुपे अनित्य छ, एम अनेकतिपणे चिंतव, ते सत्य मनोयोगर्नु खरेखरुं द्रष्टांत छ. तैनाथी विपरीतपणे चिंतववं, एटले जीवादि पदार्थनु स्वरुप सत्य नथी, धर्म नथी, पुण्य नथी, पापः नयी, स्वर्ग नथी, अने नरक नयी, आम चिंतववं, ते असत्य मनोयोग कहेवाय छे. ते सत्य तथा असत्य चितवनने वचनरुपे पोलg, ते सत्य वचनयोग तथा असत्य वचन योग क- देवाय छे. फाइक सत्य अने काइक असत्य चिंतववं, ते मिश्र मनोयोग कद्देवाय छे. जेमके; " आं गाममा आजे दश जन्स्या, तथा दश मुवा. आमां कांक साधुः, अने कांडक जुड़े छ, तेमन गायोना टोळांने देखीने चिंतववं के, आ बधी गायो छ,' पण तेमा वळंद पण होय, आ मिश्र मनोयोग कहेलाय छे, अने ते प्रमाणे वचनधी चोलवं, ते मित्र वचनयोग कहेवाय छे, तथा कोइनी मागणी करवान चिनववं. - 'जेमके ... १हरिचंद्र अहीं - आवे" दामोदर आ वस्तु आप, आम..चिंतववाथी जिन वचन विरोधाय नहीं, तेथी असत्य पण नहीं, अने आराधक पणः नहीं, तेथी सत्य पण नहीं, माटे आ चितववं, ते व्यवहार मनोयोग कहेवाय छे, अने तेज प्रमाणे वोलवं, ते व्यवहार वच- नयोग कहेवाय छे एवी रीते मनोयोग तथा वचनयोगना आठ भेद थाप. छे. सारांश प्रश्नो. १ योगना केटला प्रकार छ ? २ योगना उत्तर भेद केटला थाय. छे ? ते वधा गणावो. ३ मनोयोगना चार भेदना नाम आपो. ४ मननु चीजें नाम शुं ? ५ मनना केटला प्रकार छ ? ६ द्रव्यमन अने भावमननां लक्षण कहो. ७ मन ए शीः वस्तु छ ? ते समजावो. ८ वचनयोग एटले शुं ? ९ मनोयोग अने. वचनयोगना केटला प्रकार छ ? १० सत्य मनोयोग अने , असत्य मनोयोग एटले शृं? ते द्रष्टांत साथे समजावो. ११ सत्य वचनयोग अने असत्य वचनयोग विष समजावो. १२ मिश्र मनोयोग एटले गु? ते दाखला साथे समजावो. १३ मिश्र मनोयोग अने मिश्र वचनयोगमां शो तफावत छ ? १४ व्यवहार मनोयोगनो दाखलो आपो. १ हरिनंद शन्दना भर्थनी जरूर नपी.
शिक्षके नीना शब्दोनी समजूती आपवी. उत्तर भेद, चिंतन धर्म, व्यपदेश, ज्ञाता, आवरण कर्म, मनोवर्गणा, वीर्य, परमाणुओ, सामर्थ्य, द्रव्यरुपे, नित्य, पर्यायरुपे, अनित्य, अनेकांतपणे, विरोधाय, भाराधक पाठ ७४ मो.. योग माग २ जो. मात्माने निवास करवा जे पुद्गल द्रष्यथी बनेल अवलंबन, ते काययोग कईवाय छ; जेम वृद्ध के दुर्बळ माणसने टेकारुप लाकडी होय छे, तेम आत्माने टेकारुप काययोग छे, तेना योगथी जीवने पोताना वीर्यनु परि- णामरुप सामर्थ्य होय छे. जेम अग्निना योगी पर रहेला घडामा रताश थाय छ, तेम कायाना करण संबंधथी आत्माना वीर्यन परिणाम थाय छे. ए कायगोगना सात भेद छ.१ औदारिक काय- योग, २ औदारिक मिश्र काययोग, ३ वैक्रिय काययोग, ४ वैक्रिय मिश्र काययोग, ५ आहारक काययोग, ६ आहारक मिश्र फाययोग, अने ७ कार्मण काययोग- भाषा से साव भेदना नाम. छे.
स पहेला थे औदारिक काययोग अने मौदारिक मिश्र फाययोग पनुष्य अने तिर्यंचमां होय छे. त्रीजो वैक्रिय काययोग, अन चोथो वैक्रिय मिश्र काययोग, ते स्वर्गवासी देवताओमां होय छ, पांचमो आहारक काययोग, अने छठो आहारक मिश्र काययोग ते चौद पूर्वधारी साधुओमां होय छे, सातमो कार्मण काययोग. जीव ज्यारे मृत्यु पामी बीजा भवां जाय छे, त्यारे ते रस्तामा तेनी साथे रहे छे, तेमज ते समुद्घात अवस्थामा फेवलीने होय छे. कदि अहीं कोई शंका करे के, ज्यारे कार्मण काय- योगने गणवामां आव्यो, तो पछी तेजस शरीरने लइने पाठमो तैजस काययोग केम न थाय ? तेना जवाबमा कहेवानुं के, ते तैजस शरीर आहारनुं पाचन करवार्मा समर्थ छ, तेथी तेनो कामर्ण शरीरमा समावेश यह जाय छे, माटे तेने जुदा काययोगमा गण्यु नधी. आ प्रमाणे काययोगना सात भेद याय छे, जे प्रथमना भेदनी साथे मेळचतां पधा मळीने योगना पंदर भेद थया. मिथ्यात्वना पांच, अविरतिना चार, कपायना पचीश, अने योग पंदर-एम एकंदर पंधना हेतुना सत्तावन उचर भेद याय .
૧૯૨
सारांश: प्रश्नो.
१ फाययोग एटले शं? ते समजावो. २ काययोगने
माटे जे जे दाखलाओ होय ते कहो.३ काययोगथी जीवने
के, सामर्थ्य थाय ? ते कहो. ४ काययोगना सात
भेदना नाम आपो. ५ त्रीजों अने चोथो काययोम कोने
होय छे ? ६ पहेलो अन बीजो काययोग कोने होय
ॐ ? ७ जीवन सातमो कार्मिण काययोग क्यारे थाय
छ ? ८ समुद्घात अवस्थामां केवलीने कयो काययोग
होय छे ? ९ चौद पूर्वधारी साधुओने कयो काययोग
होय ? १० स्वर्गवासी देवताओने कयो काययोग छ ?
११ तेजस शरीरने माटे जुदो काययोग केम. नथी ?
१२ तैजस शरीरमां केवी शक्ति छ ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
निवास, अवलंबन, वीर्य, सामर्थ्य, करण संबंध,
चौद पूर्वधारी, समुयात अवस्थामा, तैजस शरीर. पाचन.
૧૮૩
पाठ ७५ मो.
बंध तत्व विष कविता.
भुजंगी छंद.
+
भवे जंतुओ जे थकी कर्म बांध,
कहे बंधन तत्त्व ते कर्म सांधे
जुवो जेम पाणी मळे दूध साथे,
मळे कर्मनां पुद्गलो तेम साथे. १
रहे जेम केदी पराधीन छाप,
रहे जीव ते कर्म आधीन आप;
गण्या मूळ ते बंधना हेतु चार,
वीजा उत्तरे ते सतावंन सार. २
गणे आदि३ मिथ्यात्वना भेद पांच,
सदा ते थकी जीवने थाय आंच
चळी अविरतिना वधा भेद बार,
वघे जे थकी जीवने कर्म भार.
कपायोतणा भेद पूरा पचीश,
पडे भार संसारनो तेथी शीप,५
४
१ आना .साथे. १ वीजा पंचना उत्तर हेतु सतापन हे. ३ प्रथन.
४ दुःख. ५ माये.
२५
गण्या दश' अने पांच जे योग भेद, न याये कदि ते यकी कर्म छेद. ४ घरे क्लेश ते बंधथी जीवराशि, पडे ते थकी जीवने कंठ फांसी सौ ते थकी भव्य प्राणी, सदा संतरे धर्मनी वात आणी. ५ रहो दूर शिक्षके नीचेना शन्दोनी समजूती आपवी. जंतुओ, छाप, उचरे, आदि, आंध, शीष, जीव- राशि, अंतरे. पाठ ७६ मो. मोक्ष तत्व-भाग १ लो. मोक्ष तत्व ए नव तत्त्वोमां छेल्लं तत्व छ. जीवना ज्ञानावरणीय विगेरे सर्व कर्मनो क्षय थवाथी पछी जीवने पोताना शुद्ध स्वरुपमा जे रहे, ते मोक्ष कद्देवाय छे. मोक्ष ए जीवनो धर्म छे, अने जीव धर्गी छे. ते धर्म अने धर्मीनी वच्चे भेद नथी. धर्मी जे सिद्ध थयेलो जीव 7 दश अने पांच एटले पंदर. २ जीयनो समूह.
१६५
सेनी जे प्ररुपणा, ते पण मोक्षनी प्ररुपणा छ, कारण के
जे मोक्ष छ, ते जीव पर्याय सिद्ध थयेला जीवधी जुदो
नथी. जीवना पर्याय सर्वथा. जीवथी भिन्न थइ श.
कता नथी.
ते सिद्धोनुं स्वरुप नव प्रकारे कहेलं छे, तेथी ते मोक्ष
तत्त्वना नव नव भेद गणाय छे, ते भेदनी प्ररुपणा नव द्वारथी
थाय छे. १ सत्पद प्ररुपणाद्वार,२ द्रव्य प्रमाणद्वार, ३
क्षेत्रद्वार, ४. स्पर्शनाद्वार, ५ कालद्वार, ६ अंतार,
७ भागद्वार, ८ भावद्वार, अने ९ अल्प बहुत्वद्वार,
आवां तेनां नाम छे.
मोक्षने विष छतां पदनी जे अरुपणा, ते सत्पद
प्ररूपणा नामे पहेलुं द्वार छे. आ द्वारमा छतां पदनी
प्ररुपणा एवी रीते छे के, मोक्ष ए पद सत्पद छे, एटले
छतुं पद छे; कारण के ते एक पद छे. आ जगतमा
जेटला एक पदवाची पदार्थों छे, ते वधा छतां छे, अने
जे पदार्थ वे. पदवाची एटले वे पदवाळा छे, ते छतां छे,
अने अछता पण छे. जेम घट-[ घडो ] पद [ वस्त्र ]
ए एक पदवाळां पद छतां छे, अने वंध्या पुत्र
[ वांज्ञणीनो पुत्र ]: अश्वश्रृंग ( घोडातुं शीगडं ) आ
वर्धा वे पदनां नाम छे, ते अछतां छे, अने राजपुत्र
( राजानो पुत्र ) केतकी पुप्प (केतकीनुं फुल ) आ
चे पदवाला पदार्थ छत्ती. पण छे, तेथी. वे पदवाळा पदार्थ
.
छता पण छे, अने अछतां पण छे, आ न्याययी मोक्षपद एक पदचाळु छे, तेथी ते छतुं पद छे. ते मोक्षपद अथवा सिद्ध पदने गति विगेरे चौद मार्गणानी साये जोडी देवं. जेमके गति चार प्रकारनी छे. १ नरक गति, २ तिर्यग् गति, ३ मनुष्य गति, ४ देव गति. तेमां मनुष्य गति शिवायनी वाकीनी त्रण गतिओमांधी सिध्ध नथी थता. इंद्रियो पांच छ. १ ए. केंद्रिय, २ द्वींद्रिय, ३ त्रींद्रिय, ४ चतुरिंद्रिय, अने ५ पं- चंद्रिय. आ पंचेंद्रियमांधी सिध्ध थाय छे. बाकीनी चार इंद्रियवाळा मोक्षे नथी जता. छ काय छे. १ पृथ्वीकाय, २ अपकाय, ३ तेउकाय, ४ वायुकाय, ५ वनस्पतिकाय, अने ६ त्रसकाय. आ छ. ए कायमांची त्रसकायमांधी मोक्षे जवाय छे. वाकीनी पांच कायमांयी नयी जवातुं. योग त्रण प्रकारे छ. १ म- नोयोग, २ वचनयोग, अने ३ काययोग. तेमां एकेंद्रिय जीवने केवळ काययोगज छे, अने द्वींद्रिययी ते पंचेंद्रिय मुधीना जीवने काययोग तथा वचनयोग छ, अने संज्ञी पंचेंद्रिय पर्याप्त जीवने त्रणे योग छ. या नणे योग- वाळा मोसे जाय छे, तेथी ओला योगवाळा मोक्षे जता नथी. खोवेद, पुरुषेवद, नपुंसकवेद-आ णे वेदमा सिध्धपणानो अभाव छ. ज्यारे त्रणे वेदनो क्षय करवामा आये, त्यारेज सिध्यपणुं प्राप्त याय छे.
१८७
क्रोध, मान, माया अने लोभ-ए चारे कपाय
पण सिद्धमा होता नथी; कारण के, ज्यारे चारे कपायनो
नाश थाय, त्यारेज सिद्धावस्था मेळवाय छे.
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यवज्ञान, अने
केवळज्ञान-आ पांच प्रकारे ज्ञान छे, अने मतिअज्ञान,
श्रुतअज्ञान, अने विभंग ज्ञान-आ त्रण प्रकारे अज्ञान छे.
तेमां प्रथमना मति, श्रुत, अवधि अने मनःपर्यव-ए चार
ज्ञानमां अने त्रण अज्ञानमां सिद्धपणुं होतुं नथी. एकला
केवळज्ञानमांज सिद्धपणुं पमाय छे.
१ सामायिक, २ छेदोपस्थापनीय, ३ परिहार
विशुद्धि, ४ सूक्ष्मसपराय, अने ५ यथाख्यात-आ पांच
प्रकारनां चारित्र तथा तेनां प्रतिपक्षी देशसंयम तथा
असंयम-ए वधामांथी यथाख्यात चारित्रमाथी मोक्ष
जवाय छे. बाकी चारमाथी जवातुं नथी.
१ चक्षु, २ अचक्षु, ३ अवधि अने ४ केवळ-आ
चार दर्शनोमां पहेला त्रण दर्शनोमांथी सिद्ध थवातुं नथी,
मात्र केवळ दर्शनमांज सिद्धपणुं पमाय छे. १ कृष्ण, २
नील, ३ कापोत, ४ तेज, ५ पद्म, अने ६ शुक्ल-आ
छ लेश्याओमांथी सिद्धपणु पमातुं नधी. अलेशी भावे
सिद्धपणुं पमाय छे.
सारांश प्रश्नो.
१ मोक्षतत्व एटले शुं ? २ मोक्ष कोने कहवाय ?
३ मोक्ष ए कोनो धर्म छ ? ४ धर्म अने धर्मी कोण ?
ते समजावो. ५ मोक्ष कोनो पर्याय छ ? ६ मोक्षतत्त्वना
केटला भेद छ ? ७ ते नव भेद अथवा नव द्वारनां नाम
गणाचो. ८ पहेला सत्पद प्ररुपणा नामना द्वारनो अर्थ
समजावो. ९ सत्पद एटले शुं ? १० केवा पदार्थों छतां
फहवाय छे ? ११ छतां अने अछतां पदार्यो केवा
होय ? १२ एक पदवाळा अने वे पदवाळा. पदार्थोन
नाम आपो. १३ राजपुत्रः अने. केतकी पुष्प, ए केवा
पद कहेवाय ? १४ चार गतिमाथी सिद्ध कइ, गतिमाथी
याय ? १५ पांच इंद्रियोवाळामाथी सिद्ध कइ इंद्रियवान
याय ?.१६ छकायमांथी सिद्ध कइ. कायमा होय ? ते
समजावो. १७ व्रण योगवाळा सिद्ध थाय के नहीं ?
१८ एकेंद्रिय जीवने कयो योग होय ? १९ काययोग
तया वचनयोग केवा जीवने होय छ ? २० त्रणे योग
केवा जीवने होय ? २१ सिद्धां चार कपाय होय के
नहीं ? २२ ज्ञान - अने अज्ञान केटला प्रकारना छ ?
तेनां नाम आपो. २३.पांच ज्ञानमांधी कया ज्ञानमा
सिद्धपणु पमाय छे ? २४ वर्धा चारित्रमा अने देशसंयम
तया असंयममांधी सिद्धपणुं पमाय के नहीं ? अने कया
चारित्रवाळो मोक्षे जाय. १ २५. चार दर्शनोमां कया
१४
दर्शनमाथी सिद्धपणुं “पमाय . १ २६ छ लेश्याओपाथी
सिद्धपणु पमाय के नहीं ? न पमाय तेनु शुं कारण छ ?
.
शिक्षके नीचेना शन्दोनी समजूति आपवी.
धर्म, धर्मी, प्ररुपणा, पर्याय, सत्पद, एक पदवाची
न्यायथी, अवेदी, अकषायी, देशसंयम, असंयम.
पाठ ७७ मो.
मोक्षतत्व भाग २ जो.
माणीनी भव्य अने अभव्य, आवी वे प्रकारनी
अवस्था छे. वने अवस्थामांथी भव्यमा मोक्ष छे, अभव्यमा
नथी. १ क्षायिक, २ क्षयोपशम, ३ उपशम, ४ सास्वादन
अने ५ वेदक-आ पांच सम्यक्त्वना प्रकार छे. तेओना
प्रतिपक्षी मिथ्यात्व अने मिश्र छे. तेओमांधी क्षायिक
सम्यमत्व शिवाय बीजां चार सम्यक्त्वोमांथी सिद्धपणु न.
पमाय, तेमज जे मिथ्यात्व अने मिश्र छे, तेमांथी पण
सिद्धपणुं होतुं नधी. कारण के, क्षायिक शिवायना वीजा
सम्यक्त्वो -क्षयोपशम विगेरे भावमा वर्तनारा छे, अने
क्षायिक सम्यक्त्व तेवू नयी, माटे तेमां सिध्धपणुं पमाय छे,
२००
ते सायिक सम्यक्त्व पण शुद्ध अने अशुद्ध एवा वे
प्रकारचं छे, तेमां जे शुध्ध क्षायिक छे, ते अपाय, तथा
सत् द्रव्य रहित, एवा भवस्थ केवळीओने होय छे, अने
सिद्ध परमात्माने होय छे. सादि [ आदि सहित ] अने
सपर्यवसान ( अंत सहित ) छे जे अशुद्ध क्षायिक छ,
ते अपाय सहचारी एवा श्रेणिक विगैरेनुं समजवू. ते
सादि तथा सपर्यवसित छ, आधी अशुध्ध क्षायिकवाळाने
सिध्धपणुं मळतुं नथी. कारण के, तेने अपाय :सहचारी
छे, अने शुद्ध क्षायिकवाळाने सिद्धपणुं मळे छ कारण
के, सिध्धपणामां क्षायिक सम्यक्त्व विद्यमान छे. अहीं
विशेष समजवान एटलु छ के, अपायनो अर्थ मतिज्ञाननो
अंश थाय छे, अने सत् द्रव्यनो अर्थ शुध्ध सम्यक्त्वनूं
दलियुं थाय छै; ज्यारे ते अपाय अने सत् द्रव्य, बनेनो
अभाव याय छे, त्यारे शुध्ध क्षायिक सम्यक्त्व थाय छे.
संज्ञाना त्रण प्रकार छे. १ हेतुवादोपदेशिनी,
२ दृष्टिवादोपदेशिनी. अने ३ दीर्घकालिकी एवा तेनां नाम
छे. आ त्रण संज्ञाओमां जेने दीर्घकालिकी संज्ञा, ते
संशी कहवाय छे. तेनुंज प्राये करीने व्यवहारमा ग्रहण
. कराय छे; जेने संज्ञा होय, ते संज्ञी कहेवाय छे.
" आ में कयु छे, आ हुं करुं , अने आ हुँ करीश."
आ प्रमाणे त्रिकाल विपयवाळ मनोविज्ञान जे जीवने
होय छे, तेवा जीवन संज्ञी कवाय छ, अने तेनाथी
जे विपरीत होय, ते असंज्ञी फदेवाय छे, तेथी
२०॥ संग्रीमाथी मोक्षे जवाय छे, असंहीमाथी जवातुं नथी. आहार त्रण भकारना छे. १ ओज आहार, २ लोम आहार, अने ३ प्रक्षेप आहार-एवां तेमनां नाम छे. आ अणे मकारना आहारमाथी सिद्धपणुं पमातुं नथी, अणा- हारीपणामा पमाप छ. आ प्रमाणे सत्पद रुपणा नामे पहेलुं द्वार विस्ता- रथी जणावी, हवे वीजा द्वार संक्षेपथी कहेवामां आवे छे. आ सिद्धना जीव गणत्रीमां अनंत छ, एम सिद्धना जीव द्रव्य विषे विचारवू, ते द्रव्य प्रमाण नामे वीजुं द्वार छे. आकाशना एक देशमा सर्व सिदो स्थान छे, ते आकाश देशनुं प्रमाण शुं छे ? धर्मास्तिकाय विगेरे पांच द्रव्य ज्यां सुधी छे, त्या सुधी लोक छे, एचा लो- क आकाशना असंख्यातमा भागमां सिद्ध रहे छे. प्रमाणे सिद्धना अवगाहना क्षेत्र विष विचारवं, ते त्रीजुं क्षेत्रदार छे. जेटला आकाशना भागमां सिद्ध रहे छे, तेनाथी स्पर्शनानो भाग काइक अधिक छे, एटले केटला आकाश प्रदेशने सिद्धना जीव फरशे एम विचारवं, ते चोधुं स्पर्शनाद्वार छे. एक सिद्धने आश्रीने सादि अनंतकाळ अने सर्व सिद्धने आश्रीने अनादि अ- नंतकाल एटले सिध्धनो काल आदि अनंत छ, एम कहे, ते पांचK काळद्वार छे. सिध्धोनी वच्चे अंतर नयी, सर्व सिध्धो माहोमाहे मळीने रहेल छे, तेमन फ- ર૭૨ रोधी संसारमा आववापणु नथी, तेथी"पण भवअंतर नथी एम कहे, ते छठं अंतार छे. सर्व सिध्ध सर्व जीव- राशिने अनंतमे भागे छ एम कहे, अथवा सिध्धना जीव संसारी जीवना केटलामे भागे छ एम विचारवं, ते सातमु भागद्वार छे. क्षायिक विगेरे पांच भावमाथी सिध्धना जीव कया भावे छे 'एम. विचारवं, अथवा सि- ध्धोने क्षायिक पारिणामिक भाव छे, वाकीना भाव नथी एम कहेवं, ते आठमुं भावद्वार छे. नपुंसक सिध्ध सर्वथी थोडा छे, तेथी स्त्री असंख्यातगुणी अने तेथी पुरुष अ- संख्यात गुणासिधं थया छ, आम विचारवं, ते नवमुं अल्प वहुत्वद्वार छे. आ प्रमाणे मोक्ष तत्वनां नव द्वार ए नव भेदे कहेवाय छे, ते. दरेक अभ्यासीए वरावर ध्यान आपीने । समजवानां छे. सारांश प्रभो. १ सिध्धमां भव्य जाय के अभव्य ? २ सम्यक्त्व- ना केटला प्रकार ? ते गणावो. ३ सम्यक्त्वना प्रतिपक्षी कोण छ । ४ पांच सम्यक्त्वोमां क्या सम्यक्त्वमा सि- ध्धपणुं पमाय छ ? ५ मिथ्यात्व अने मिश्रमां सिध्धप- णु पमाय के नहि ? ६ क्षायिक सम्यक्त्वमा सिध्धपणं २०3. होय, तेनु शु कारण ? ७ क्षायिक सम्यक्त्वना केटका भेद छ ? ८ शुध्ध अने अशुध्ध क्षायिक विषे समजावो. ९ भवस्थ केवलीओने केQ क्षायिक होय छे ? १०. थे- णिक विगेरेने केवु क्षायिक हतुं ? ११ सादि अने. सपर्य- वसान एटले शुं. १ १२ अशुध्ध क्षायिकमां सिध्धपणुं कम न होय ? ते समजावो. १३ अपाय अने. सत् द्रव्य- नो अर्थ शु ? १४ शुध्ध क्षायिक सम्यक्त्व क्यारे थाय छ ? १५ संज्ञाना केटला प्रकार छ ? १६ कइ संज्ञाथी संज्ञी कहेवाय ? १७ व्यवहारमा केवा संज्ञीनुं ग्रहण क- राय छ ? १८ केवो जीव संज्ञी कहेवाय छे, अने केवो जीव असंही कहेवाय छे. ? १९ आहार केटला प्रकारना छ ? तेनां नाम आपो. २० त्रणे प्रकारना आहारमाथी सि- ध्धपणुं होय छे के नहि ? २१ द्रव्य प्रमाणद्वारमा शेर्नु चितवन थाय छे ? २२ सिध्धना जीव केटला आकाशः प्रदेशने फरशे, एवो विचार कया द्वारमा छ ? २३ क्षे- त्रद्वारमा शुं विचारवानुं छे ? २४ सिध्धोनी वच्चे अंतर नथी, ए विचार क्या द्वारमा छ ? २५ कालद्वारमा शेनो विचार छ. ? २६ क्षायिक विगेरे पांच भावमाथी सि- ध्धना जीव. कया भावे छे ? ए विचार कया द्वारमा आवे छ ? २७ भागद्वारमा | आवे ? ते. समजावो. २८ अं- तरद्वारमा शेनो विचार करवानो छ ? ते कहो. २९ अलर बहुत्वद्वार विष सारी रीते समजावो. - ૨૦૪ शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूति आपवी. अतीतकाल, प्रतिपक्षी, मिश्र, क्षयोपशम विगेरे भाव, अपाय, सत् द्रव्य रहित, भवस्थ केवली, शुध्ध · स्वभाव- रुप, सम्यग्द्रष्टि, सादि, सपर्यवसान, अपाय सहचारी, मतिज्ञाननो अंश, शुध्ध सम्यक्त्व, हेतुवादोपदेशिनी, द्रष्टि- वादोपदेशिनी, दीर्घकालिकी, त्रिकाळ विषयवालं, मनोवि- ज्ञान, ओज आहार, लोम आहार, प्रक्षेप आहार, अणा- हारी, अवगाहना क्षेत्र, फरशे, अंतर, भाव, क्षायिक पारि- णामिक भाव. पाठ ७८ मो. सिद्धना पंदर भेद. जे जीव मोक्षे जाय, ते सिद्ध कहेवाय छे, ते सिद्धना पंदर भेद थाय छे. १ जिन सिद, २ अजिन सिद्ध, ३ तीर्थ सिद्ध, ४ अतीर्थ सिद्ध, ५ गृहस्थलिंग सिद्ध, ६ अन्यलिंग सिद्ध, ७ स्वलिंग सिद्ध, ८ स्त्रीलिंग मिद्र, ९ पुरुपलिंग सिद्ध, १० नपुंसकलिंग सिद्ध, १२ प्रत्येक युद्ध सिद्ध, १२ स्वयंयुद्ध सिद्ध, १३ युद्ध- बोधित सिद्ध, १४ एक सिद्ध अने १५ अनेक सिर, भागां ते पंदर भेदनां नाम छे.
૨૦૫ तीर्थकर पदवी पामीने जे मोक्षे गयेला, ते जिन- सिद्धा नामे पहेलो भेद छे. सामान्य केवळी थइने जे मोक्षे गया, ते अजिनसिद्धा नामे वीजो भेद छे. तीर्थ- करने केवळज्ञान उपज्या पछी जे मोक्षे गया, ते तीर्थ- सिद्धा नामे त्रीजो भेद छे. तीर्थकरने केवळज्ञान उपज्या पहेला जे मोक्षे गया, ते अतीर्थसिध्या नामे चोथो भेद छे. गृहस्थना वेषमां रहीने मोक्षे गया, ते गृहस्थलिंग सिध्धा नामे पांचमो भेद छ. योगी, संन्यासी अने ता- पस वगेरेना वेषमां रहीने मोक्षे गया, ते अन्यलिंग सिध्धा नामे छठो भेद छे. साधुना वेषे जे मोक्षे गया, ते स्वलिंग सिध्धा नामे सातमो भेद छे. स्त्रीवेद पा. मीने जे मोक्षे गया, ते स्त्रीलिंग सिध्धा नामे आठयो भेद छे. पुरुषवेद पामीने जे मोक्षे यया, ते पुरुषलिंग सिध्धा नामे नवमो भेद छे. नपुंसकवेद पामीने जे मोक्ष गया, ते नपुंसकलिंग सिध्धा नामे दशमो भेद छे. कोइ पदार्यने देखीने प्रतिबोध पामी जे मोक्षे गया, ते प्रत्येक वुध्ध सिध्धा नामे अगीयारमो भेद छे. गुरुना उपदेश विना पोतानी मेळे जातिस्मरण वि- गेरेथी प्रतिबोध पामी जे मोक्षे गया, ते स्वयंवुध्ध सिध्धा नामे बारमो भेद छे, गुरुनो उपदेश सांभळी वैराग्य पापी मोले गया, ते वुध्धयोधित सिध्धा नामे तेरमो भेद १ पानी भयेल, जन्मपी नहीं.
२०६. छे. एक समयने विषे एकज मोक्षे गया, तें: एकसिध्धा नामे चौदमो भेद छे. एक समयमा घणा जीवो मोक्षे गया, ते अनेकसिध्धा नामे पंदरमो. भेद छे. आ प्रमाणे सिद्धना पंदर भेदः थाय छे. ते सिद्धना' पंदर भेद मोक्षतत्वनी अंदर रहेला छे. आ पंदर भेद जाणवाधी मोक्षतत्व समजवामां वधारे. सरळता. पडे. छे. सारांश प्रश्नो. १ सिद्ध कोने कहेवाय ? २ सिद्धना केटला भेद छ ? ते नामथी वघा गणावो. ३ सामान्य केवळी थइनेः मोक्षं गया होय, ते केवा सिद्ध कहेवाय ? ४ जिनसिद्धा कोने कहेवाय ?. ५ तीर्थकरने केवळज्ञान उपज्या पहेला जे माले गया होय, ते केवा सिद्ध कहेवाय. ? ६ तीर्थ- सिद्धा कोने कहेवाय ? ७ योगी, संन्यासी अने तापसना वेपमा रहीने मोक्षे गया होय, ते केवा सिद्ध कहेवाय ? ८ गृहस्थलिंग सिद्धा कोने कवाय ? ९ स्त्रीवेद पामीने मोक्षे गया होय, ते केवा सिद्ध कहेवाय ? १० स्वलिंग सिद्धा कोण कहेवाय ? ११ नपुंसकवेंद पामीने मोक्षे गया. होय, ते केवा सिद्ध फहेवाय ? १२ पुरुपलिंग सिध्ध कोण ? १३ गुरुना उपदेश विना पोतानी मेळे प्रतिबोधः पामी मोक्षे गया होय, ते केवा सिध्ध कहेवाय ? १४ प्रत्येक
२८७
चुध्ध सिध्ध कोने कहेवाय ? १५ एक समयने विष
एकज मोक्षे गया होय, ते केवा सिध्धा कहेवाय ? १६
बुध्धवोधित सिद्धा कोने कहवाय ? १७ अनेक सिध्धा
कोण ? ते कहो.
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
सामान्य केवळी, योगी, संन्यासी, तापस, जाति
स्मरण.
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૨૯૮ खंड ४ थो पाठ ७९ मो. 4 अजितनाथ भाग १ लो. चोवीश तीर्थकरोमां वीजा तीर्थकर अजितनाथ भगवान् कद्देवाय छे. भरत चक्रवर्ती पछी घणा राजाओ थइ गया, पछी इक्ष्वाकु वंशमां तेओ थया हता, तेमने निकाचित तीर्थकर नामकर्म बांध्या पछी बे भव करवा पड्या इता. विमळवाहन अने विजयविमानना देवता ए में भव पछी अजितनायनो त्रीजो भव ययो इतो. महा- विदेह क्षेत्रमा वत्स नामना विजयमां सुसीमा नगरीनी अंदर विमळवाहन राजा ययो इतो, तेणे अरिंदम नामना आचार्यनी देशनायी प्रतिबोध पामी राज्य छोटी दी, हतुं. विमळवाइने पोतानो मुनिधर्म यथार्थ पाळ्यो हतो, पांच समिति, त्रण गुप्ति अने वावीश परीपह सहन करी, तथा बीजां वीश स्थानकोनुं सेवन करी, तेणे तीर्थंकर नाम कर्म उपायुं हतुं. त्यांची काळ करी विजय नामना अनुप्सर विमानमां देवता थइ त्यांथी चवीने तेओ भरत- क्षेत्रमा अवतो इता. इक्ष्वाकु बंगनी राजधानी विनीता नगरी के जेनें
२०
,
वीजुं नाम अयोध्या छे, तेमां अजितनाथनो जन्म थयो
हतो. तेमना पितानु नाम जितशत्रु, अने मातानुं नाम
विजयादेवी हतुं. जितशत्रु राजाने सुमित्र नामे एक
भाइ हतो, तेने युवराज पद आपवामां आव्यु हतुं. ज्यारे
अजितनाथ विजयादेवी माताना गर्भमां आव्या, त्यारे ते-
मनी माताए चौद स्वमा जोयां हता. तेंमनो जन्म माघ
शुदी आठमने दिवसे थयो हतो. तेमना सूतिकागृह अने
जन्म वखतनी बधी जातनी क्रियाओ ऋपभदेव भगवंतनी
पेठे करवामां आवी हती. आज समये जितशत्रु राजाना
भाइ सुमित्रनी वैजयंती नामनी स्त्रीथी एक पुत्रनो जन्म
थयो हतो, तेनु नाम सगर पाडवामां आव्युं हतुं. ते
बने कुमारो साथेज उर्या हता, अने योग्य वये अभ्या-
समां पण साधेज जोडाया हता. ज्यारे अजितनाथ जु-
वान थया, त्यारे तेमनो विवाह सैकडो राजकन्याओनी
साथे थयो हतो. पोताना पिता जितशत्रु राजाना आग्रहथी
प्रभुए ते विवाह स्वीकार्यों हतो. प्रभुनो विवाह को पछी
राजा जितशत्रुए तेमनी पासे दीक्षा लेवानी आज्ञा मागी
हती. अजितनाथे पिताने दीक्षा लेवाने खुशी साथे रजा
आपी, एटले राजा जितशत्रुए मोटा उत्सवधी आजित
स्वामीनो राज्याभिषेक कर्यो हतो.
अजितस्वामी राजा थया पछी तेमणे पोताना पि-
तानो मोटा आडवरची दीक्षा महोत्सव को हतो. राजा
जित्तशत्रुने राज्यनी जेग अखंड व्रतनुं पालन करतां अनु-
૨૧૦ क्रमे केवलज्ञान उत्पन्न थयुं इतुं, अने छेवटे शैलेशीकरण करी, आठ कर्मनो क्षय करी, परमपद संपादन क- र्यु इतुं. पिताना मोक्ष पछी अजितस्वामी विनीता नगरीना स्वतंत्र महाराजा थया इता. तेमणे पोतानी प्रजाने पुत्र- वत् पाळी हती, दंड विगैरे शिक्षाओ कर्या विना पण सारा सारयिवहे घोडानी जेम तेमणे सर्व प्रजाने मार्ग दोरी इती, शांतिरसना सागर ए महाराजाए पोतानी प्रजामा दंड नीति चलावी न इती, एटलज नहीं, पण कोइनी सामे जरा भ्रकुटी पण उंची करी न इती, तथापि सौ- माग्यवान् पुरुषने जेम स्त्री वश थइने रहे, तेम सर्व पृथ्वी तेमने वश थइने रहेली हती. राज्य पाळतां अजित महा- राजाने कुमार वयथा मांडीने वेपन लाख पूर्व मुखे निर्गमन यया हता. एक वखते सभाने विसर्जन करी, एकांत स्थळे वेठेला प्रभुने एवो विचार थयो के, आज मुधीमां मारे भोगफळ कर्म भोगवाइ गयां, हवे मारे मारा पोताना फर्तव्यमा विमुख थइ न रहे जोइए. आ संसारमा प्राणी एकलोन उत्पन्न धाय छे, एकलोज मृत्यु पामे छे, अने गवांतरे मेळवेला कोने एकलोज अनुभवे छे, तेमां तेने कोई पण सदायकारी यतुं नयी, तेथी आ राज्य, धन तथा देह विगरे परिग्रहयी विमुख थइ तेनो सदुपयोग ૨૧૨ करी, आत्म स्वरुपमा रहे, के. जेथी. आ संसार समुद्रनों. पार आवे. आ प्रमाणे ज्यारे अजितस्वामी वैराग्य पाम्या, त्यारे सारस्वत विगरे लोकांतिक देवताओए आवी जणाव्यु के, भगवन् ! आप स्वयंवुद्ध छो, तेथी अमे. आपने वोध आपवाने लायक नथी, तथापि एटलं मात्र यादः आपीए छीए के, “ आप धर्म तीर्थ प्रवर्तावो. " देवताओना आवां वचनथी. तरतज प्रभुनोः वैराग्य वृद्धि पान्यो, अने तेमणेः सगर कुमारने वोलावी, आ. प्रमाणे, कहा- "प्रिय भाइ सगर ! मारी इच्छा आ संसाररुप समुद्रने तरवानी थइ छे, हवे तमें. आ.राज्यने. चलावो." मभुनां आवां वचनी सगर कुमारना नेत्रमा आंसु आवी गयां, अने तेमणे रोतां रोतां कह्यु, पूज्य बंधु ! आ शृं. वोलो छो ? में आपनो. शो अपराध. कर्यों छे, के जेयी. मने जुदो पाडवानी आवी आज्ञा करो छो ? फदि में. अपराध के अभक्ति करी होय, तो ते आपनी अप्रसन्न- ताने माटे न थवी जोइए; कारण के, पूज्य पुरुषो पो- ताना अभक्त के अपराधी शिशुने शिक्षा आपे छे, पण तेने छोडी देता नथी. स्वामी ! हुँ तमारा चरणनी सेवा छोडीश नहीं. ज्यारे तमे राजा धया इता, त्यारे हुँ युव- राज ययो हतो, तेम तमे व्रतधारी यशो, तो हुँ वमारो शिष्य यइश. सगर कुमारना आवां वचन सांभळी प्रभुए ૨૧૨ तेने घणी रीते समजाव्यो, अने छवटे तेने प्रभुनी आज्ञा अंगीकार करवी पडी हती. शुभ दिवसे अजितनाथे सगरनो राज्य उपर अभि- पेक कों, अने पछी वार्षिक दान आपवानो आरंभ को हतो. प्रभु दररोज एक करोड ने आठ लाख सो- नैया आपता हता. एकंदर एक वर्षमा तेमणे अठ्याशी क्रोड ने एशी लाख सोनैया आप्या हता. वार्षिक दानने अंते इंद्रनु आसन कंपायमान थतां. इंद्र पोते सामानिक विगेरे देवताओनी साथे प्रभुनी पासे आव्यो. बीजा. पण सुरेंद्रो अने अमरेंद्रो विनीता नगरीमां आव्या. अनुक्रमे तेमणे प्रभुनो दीक्षा महोत्सव कर्यो. तेना वरघोडामां प्रभु सुप्रभा नामनी पालखीमां वेसी सहस्त्राम्रवन नामना उ- धानमां आव्या हता. माघ शुदी नवमीने दिवसे रोहिणी नक्षत्रमा प्रभुए सप्तपर्ण वृक्ष नीचे रही, पांच मुष्टिए लोच कर्यों इतो. सौधर्म इंद्रे प्रभुना केशने पोताना उत्तरीय वखना छेडामां लइ क्षीर समुद्रमा पधराव्या हता. एवी गीते महाराजा अजितनाथ मोक्ष मार्गमां वाहनरुप एवा. चारित्ररुप स्थ उपर आरुह थया हता, ते वखते तेमने चोथु मनःपर्यव ज्ञान उत्पन्न थयुं हतं. प्रभुनी साये वीजा एक हजार राजाऔए दीक्षा लीधी इती. पछी अच्युत विगेरे इंद्रो स्तुति करीने देवताओना समूहनी साथे नंदी- श्वर द्वीपे महोत्सव करना माटे चाल्या गया हता.
पछी भक्तिथी सुशोभित एवो सगर राजा प्रभुनी
भक्तिपूर्वक स्तुति तथा नमस्कार करी नेत्रमा आंसु पाढतो
हळवे हळवे पोतानी राजधानीमां पाछो आव्यो हतो.
अजित भगवाने दीक्षा लीधा पछी बीजे दिवसे ब्रह्मदत्त
राजाने घेरे क्षीरवडे छ? तपनु पारकर्यु हतुं. प्रभुना
पारणाना प्रभावथी ब्रह्मदत्त राजानां आंगणामां देवताओए
साडावार कोड सोनयानी, उंची जातनां वस्त्रोनी, सुगंधी
जळनी अने पंचरंगी पुष्पोनी दृष्टि करी हती, तथा दुंदु-
भिना नाद साथे " अहोदान, अहोदान "
एम उच्चार
करतां जयनाद को हतो. प्रभु ज्यारे ब्रह्मदत्त राजाना
घरमांथी पारणुं करी वाहेर नीकळ्या एटले तेमना पगलां
उपर ब्रह्मदत्ते एक रत्ननी पीठ करावी हती. वायुनी जेम
स्वतंत्र विहारी भगवान् अजितस्वामी निग्रंथ, निर्मम अने
निस्पृह थइ पोताना संसर्गथी ग्राम अने शहेरोने तीर्थरुप
करता सर्व पृथ्वीमां विचर्या हता.. ए महानुभावे उग्र तप
कर्यु हतुं, विविध प्रकारना उग्र तपथी अने विविध प्रका-
रना अभिग्रहोथी परीषहने सहन करतां प्रभुए वार वर्ष
निर्गमन को इता.
दरेक गाम, दरेक शहेर अने दरेक अरण्यमा फरतां
फरतां प्रभु सहस्राम्रवनमां आव्या, . अने त्यां सप्तच्छेद
वृक्ष नीचे कायोत्सर्गे रद्या हता. त्यां प्रभुनो ध्यानरूप
अनि दीपायमान थवाथी अनिवडे जेम वरफनो लय थइ
जाय, तेम तेमनां घातिकर्मों सर्वथा लय पामी गयां, अने
૧૪ प्रभुने केवळज्ञान उत्पन्न थयुं हतुं. ते समये पौष मासनी शुक्ल एकादशीनो दिवस हतो, चंद्रनी साथे रोहिणी नक्षत्रनो योग थयो हतो. प्रभुने केवळज्ञान थवाथी सौधर्मपति इंद्रनु आसन कंपायमान थयं, एटले अवधि ज्ञानथी ते वात जाणी, ते इंद्र तथा वीजा इंद्रो देवताओने साथे लइ केवळज्ञाननो उत्सव करवाने आव्या हता, अने त्यां प्रभुने. माटे तेमणे समवसरण रच्युं हतुं. अजित प्रभु एम कही समवसरणनी मध्ये आवेला सिंहासन उपर आ- रुढ थया, अने पछी इंद्रोए प्रभुनी स्तुति करी हती. तीर्थाय नमः आ वृत्तांत उद्यानपाळ पासेयी सांभळी सगरराजा हपंथी प्रभुने वांदवा आव्या, अने तेमणे वधामणी आपनार उद्यानपाळने साडावार कोड सोनैयानुं इनाम आप्यु हतुं. सगरे उत्तर द्वारथी समवसरणमा प्रवेश करी प्रभुनी वि- नयथी स्तुति करी इती. ते समये अजितनाथ प्रभुए एवी देशना आपी, के जेमां आज्ञा, अपाय, विपाक अने संस्थानना चितवनरुप चार प्रकारना ध्याननु स्वरुप वि- स्तारयी कही संभळाववामां आव्युं हतुं, अने ते प्रसंगे आ लोक संस्थाननुं स्वरुप पण सविस्तर जणाववामा आव्यु इंद.
૨૨૫ सारांश प्रश्नो. १ अजितनाथ भगवान् केटलामा तीर्थकर छ ? २ अजितनाथ कया वंशमां थया हता ? ३ तेमने केटला भव करवा पडया हता ? तेमणे करेला भवनां नाम शुं ? ५ विमळवाहन कया क्षेत्रमां, कया विजयमा अने कर नगरीमा थया हता? ६ विमळवाहने कोना चोधी राज्यने छोडी दीधुं हतुं ? ७ तेणे तीर्थकर नामकर्म केवी रीते बांध्यु हतुं १ ८ विमळवाहन कया विमानमां देवता थयो हतो ? ९ अजितनाथनो जन्म कइ नगरीमां थयो इतो ? १० तेमना पितार्नु अने मातानुं S नाम हन्तुं ? ११ अजितनाथना पिताना भाइर्नु शु नाम हतुं ? १२ अजितनाथ प्रभुनो जन्म कया मासा, कया पक्षा, कइ तिथिए थयो हतो ? १३ अजितनायना काका सुमि- त्रनी स्त्रीनुं शुं नाम हतुं ? १४ मुमित्रना पुत्रनुं | नाम ? १५ अजितकुमारनो विवाह थयो के नहीं ? १६ अजित- नाथनो विवाह यया पछी तेमना पिता जितशत्रु राजाप शी आज्ञा मागी हती ? १७ राज्य पाळतां अजितनाथने कुमारवयथी मांडीने केटला पूर्व यया हता ? १८ अजित- स्वामीने वैराग्य थयो, त्यारे केवो विचार थयो हतो ? ते संक्षेपमां समजावो. १९ प्रभुने वैराग्य थतां कया देव- ताओ आव्या हता ? अने तेमणे | कयु हतुं ? २० अ. जितनाथे वैराग्य थया पछी पोताना राज्य उपर कोनो ?
२१४
अभिषेक को हतो ? २१ वार्षिक दानमा अजितनाथे
केटला. सोनयानुं दान कर्यु हतुं ? २२ प्रभुनी दीक्षानो
समय :कया मासमां, कया पक्षमा, कइ तिथिमा अने कया
नक्षत्रमा हतो ? २३ प्रभुने चारित्र वखते कयुं ज्ञान उत्पन्न
थडे इतुं १ २४ प्रभुनी साथे केटला राजाओए दीक्षा
लीधी हती ? २५ अजित भगवाने पहेलं पारणु कोने
घेर कर्यु हतुं ? २६ दीक्षा लीधा पछी परीपह सहन
करतां प्रभुए केटलां वर्षों निर्गमन काँ हतां ? २७ प्रभुने
केवळज्ञान क्या थयुं हतुं ? २८ केवळज्ञाननो कयो दिवस
हतो ? २९ अजितप्रभुए समवसरणमां कया विषय उपर
देशना आपी हती ?
..
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी.
इक्ष्वाकु वंश, विजय, तीर्थंकर नामकर्म, विजय वि-
मान, युवराज पद. मृतिका गृह, शैलेशीकरण, दंडनीति,
पूर्व, विसर्जन, भोगफळकर्म, भवांतरे, चिमुख, आत्मस्वरुप,
स्वयंबुद्ध, धर्मतीर्थ, अभक्ति, अप्रसन्नता, वार्षिक दान,
क्षीर, पीठ, स्वतंत्र विहारी, निग्रंथ, निर्मम, निःस्पृह,
अभिग्रह, घातिकर्म, आज्ञा, अपाय, विपाक, संस्थान,
लोक संस्थान.
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२१७ पाठ ८० मो. अजितनाथ-भाग २ जो. . प्रभुनी देशना समाप्त थ्या पछी सिंहसेन नामना तेमना मुख्य गणधरे देशना आपी हती. गणधरनी देशना संपूर्ण थया पछी सर्व देवताओ अने सगर राजा पोत- पोताने स्थाने चाल्या गया हता. भगवान् श्री अजितनाथना तीर्थनो अधिष्टायक महायक्ष नामे एक यक्ष थयो हतो, तेने चार मुख हतां, हाथीनुं वाहन हतुं, अने वर्ण श्याम हतो. तेना आठ हाथमा जमणी तरफ वरद मुद्रा, मुद्गर, अक्षमूत्र, अने पास-ए चार अने डावी वाजु तरफ बीजोरु, अभय मुद्रा, अंकुश, अने शक्ति हता. अजितबला नामे प्रभुनी शा- सन देवी थइ हती. ते सोनेरी रंगनी देवीने चार हाय हता, अने ते लोढाना आसनपर बेठी हती. जमणी तर- फना दे हाथमां वरद मुद्रा अने पाश, अने डाबी तर- फना वे हाथमां बीजोरु, अने अंकुश तेणीए धारण को छे. सगरचक्रीए ज्यारे विनीतानगरीना राज्य उपर पो- ताना पौत्र भगीरथने वेसार्यो हतो, त्यारे अजितनाथ प्रभु पाछा विनीतानगरीना उद्यानमां समोसर्या हता. ते खबर २१८ सांभळी सगर पौत्र भगीरथने साथे लइ प्रभुने चोदवा गयो हतो. सगरे प्रभुने वंदना करी स्तुति करी हती, अने प्रभुनी देशना सांभळी हती. देशनाने अंते तेणे प्र- भुने दीक्षा लेवाने विनति करी, एटले प्रभुए तेने दीक्षा लेवानी आज्ञा आपी हती, जेथी सगर राजाए मोटा उत्सवनी साथे प्रभूनी पासे दीक्षा लीधी इती. केवळज्ञान उत्पन्न ययु, त्यारथी पृथ्वीमा विहार करतां अजीत प्रभुने पंचाणु गणधरो थया हता. तेमना परिवारमा एक लाख मुनि, त्रण लाख ने त्रीश हजार साध्वी, त्रण इजार ने सातसो चौद पूर्वधारी, एक हजार ने साडा- चारसो मनःपर्यव ज्ञानी, नव हजार ने चारसों अवधि ज्ञानी, बाविश हजार केवली, चार हजार ने चारसो वादी, वीस हजार ने चारसो वैक्रिय लब्धिवाळा, वे लाख ने अठाणुं हजार श्रावक, अने पांच लाख ने पीस्तालांश इजार श्राविकाओ हती. दीक्षा कल्याणकथी एक पूर्वांगे एटले चोराशी लाख वर्षे ओछा एवा एक लाख पूर्व जतां पोतानो निर्वाण समय जाणी प्रभू समेतशिखर पर्वते आव्या हता. ज्यारे तेमनुं चोंतेर लाख पूर्व- आ- युप्य पूर्ण थवा आव्युं, एटले तेमणे एक हजार मुनिओ- नी साथे ते पर्वत उपर पादपोपगमन अनशन कर्यु हतुं. ते वखते आसन कंपवाथी इंद्रो प्रभूनो निर्वाण उत्सव करवाने त्यां आच्या इता. ज्यारे एक मास पूर्ण थयो, त्यारे चैत्र शुक्ल पंचमीने दिवसे चंद्र मृगशिर नक्षत्र २१५ . , साथे मळेलों हतो, ते. समये. प्रभु. निर्वाण. पदनेः पा: म्या हता. प्रभुने कौमार अवस्थामा अढार लाख पूर्व थया हता, राज्य स्थितिमां एक पुर्वांगे सहित त्रेपनलाख पूर्व गया। हता, छद्मस्थावस्थामां वार वर्ष प्रसार शयां हता, अने के- वळज्ञानमा पूर्वांगे' तथा वार वर्षे वर्जित एवा लक्ष पूर्व थया हता. एकंदर तेमणे बोतेर लाख. पूर्वतुं आयुष्य भोगव्यु हतुंः पहेला तीर्थंकर ऋषभदेवना निर्वाणथी पचाशः लाख क्रोड सागरोपम जतां अजितनाथ निर्वाणः पदने पाम्या हता. तेमनी साथे वीजा एक हजार मुनिओए पादपोपगम अनशन कर्यु हतुं. तेओ पण. केवळज्ञान प्राप्त करी,. मोक्षः पदने पाम्या हता. सगर चक्रवर्ती पण केवली समुद्घात करीने. क्षणवारमा प्रभुना पदने प्राप्त थया हता. देवताओं प्रभुना मृत शरीरने शणगारी. शिविकामां बेसारी, गोशीपचंदननी चितामां लइ गया हता,. त्यां अग्निकुमारे अग्नि को हतो, अनें वायुकुमारे तेने प्रज्व- लित को हतो. अस्थि विना प्रभुनी वीजी सर्व धातु वळी गइ हती. पछी मेघकुमार देवताए जळ वर्षावी, ते चि- ताने वुझावी हती. प्रभुनी उपरनी जमणी अने डावी तरफनी दाढो शक्र अने. इशान इंद्र लइ गया, अने नीचे- नी बंने दाढो चमर अने चलि इंद्र लइ गया हता, वी- १ पूर्वाग एटले चौरासी लाख वर्ष..
૨૨૯ जा इंद्रोए प्रभूना दांत लीया, अने देवताओए अस्थि लीधां इता. इंद्रोए पोतपोतानी सुधर्मा सभानी वर्मा माणवक नामना · स्तंभोनी अंदर वज्रमय गोळाकार डावलामां ते प्रभूनी दाढो मुकी, तेनी गंध, पुष्प, अने धूपयी पूजा करवा लाग्या. सारांश प्रश्नो. . १ प्रभुना पहेला गणधरनु शु नाम ? २ अजित- नाथना तिर्थनो अधिष्टायक यक्ष कयो ? अने तेनु स्वरुप केवु छ ? ३ अजित प्रभुनी शासन देवीनुं शृं नाम ? अने तेनुं स्वरुप केवु छ ? ४ सगरे कोने राज्य आपीने दीक्षा लीधी इती ? ५ अजितनाथने गणधरो, मुनिओ, अने साध्वीओनी संख्या केटली थइ इती ? ६ अजितस्वामीने चौद पूर्वधारी, मनःपर्यवज्ञानी, अवधिशानी केवळी, वादी अने बैंक्रिय लब्धिवाळा केटला केटला हता? ७ श्रावको अने श्राविकाओ केटली थइ इती ? ८ दीक्षा फल्याणकथी केटला पूर्व जतां प्रभु समेतशिखर उपर आव्या इता ? ९ अजितनाथ प्रभुएँ केटलं आयुष्य पूर्ण यतां पादपोपगम अनशन कर्यु हतुं ? १० अजित प्रभु कये दिवसे निर्वाण पाम्या हता ? ११ ते वखते कयो मास, कइ तिथि अने कयुं नक्षत्र हतुं ? १२ अजि- तनाथ प्रसने कांमार अवस्थामां, राज्य स्थितिमा, उम.
૨૨૧ स्थावस्थामां अने केवळज्ञानमा केटला केटला पूर्व के वर्ष थयां हतां ? १३ एकंदर तेमणे केटला लाख पूर्वनुं आयुष्य भोगव्युं हतुं ? १४ पहेला तीर्थकरना निर्वाण पछी केटला सागरोपम जतां अजितनाथनुं निर्वाण ययुं हतुं ? १५ म- भुनी साथे केटला मुनिओए पादपोपगम अनशन कयु हतुं ? १६ देवताओए प्रभुनां मृत शरीरने शुं कर्य हतुं ? १७ प्रभुनी चिता उपर देवताओए शुं शुं कर्यु हतुं ? १८ प्रभुनी उपरनी जमणी अने डावी तरफनी दाढो कया कया इंद्रो लइ गया हता ? १९ नीचेनी वे दाढो कया कया इंद्रोए लीधी हती १ २० प्रभूनां दांत अने अस्थि कोण लइ गया इता ? २१ ते दाढो इंद्रोए क्यां राखी इती ? २२ ते दाढोनी पूजा शेनाथी करता इता ? ? शिक्षके नीचेना शन्दोनी समजूती आपवी. अधिष्टायक, वरदमुद्रा, अक्षसूत्र, अभयमुद्रा, अंकुश, पर्षदा, संकेत, अग्रहार, अणुव्रत, धर्म अंगीटी, जिनोक्त, दाहशक्ति, दानशील, पुष्करवर द्वीप, दीक्षा कल्याणक, पूर्वीग, पादपोपगम अनशन, पूर्व, केवळी समुद्घात, मृत शरीर, शिविका, चिता, अस्थि, वज्रमय.
૨૨
पाठ ८१ मो.
अजितनाथ चरित्र विषे कविता.
मनहर छंद.
:
वीजा अरिहंत प्रभु इक्ष्वाकुना वंश मांहि,
प्रगट थया छे क्षेत्र भरतमा भावथी;
विमलवाहन तणा भव मांहि जिन नाम,
कर्म शुभ करी धया देव जे प्रभावधी.
वे भव करीने त्रीने भवे यया जिनवर,
जितशत्रु जनकने विजया छ जननी;
आदि जिन पेरे वधी जनमनी क्रिया वनी,
माघ सुदी अष्टमी ते वनी जिन जननी'.
मुमित्रने घेर वैजयंति तणा उदस्थी.
प्रगट्या कुमार नाम सगर ते दिनमा
बने बंधु साथे रही ज्ञान कळा मेळवीने,
ज्ञानकळा वधी तेमां सारी रीते जिनमो.
सकटो नरेशतणी कन्याओनी साये प्रमु,
विवाहित यइ भोग कर्मने पतावता;
पिता व्रतधारी वन्या अजित नरेश यया,
लाख पूर्व त्रेपन थया राज्य पाळतां
३
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: जिनने उत्पन्न करनारी.
૨૨૩
ur
सगरने राज्य आपी माघ शुदी नवमीए,
रोहणीमां चंद्रयोगे प्रभु व्रत धारता;
ब्रह्मदत्त तणे घेर पार] प्रथम करी,
उग्र तप आचरीने वार वर्ष काढता.
पोष मास तणी शुक्ल एकादशी तणे दिन,
केवळ धारण करी प्रभु थया केवळी;
समवसरण तणा खवर जाणीने ताही,
सगर नरेश आव्या वांदवा अतिवली.
सिंहसेन आदि गणधर थया गुणधर,
महायक्ष नामे थयो यक्ष तीर्थनायक
नामे तो अजितवला शासननी देवी थयां,
सगरने व्रत विषे थया. प्रभु सहायक.
गणधर पंचाणुं ने एक लाख मुनिवर,
त्रण लाख ने हजार त्रीश साध्वीजी छ;
त्रिहजार सातसो ने चौद पूर्वधारी थया,
साडाचारसो२ हजार मनपरयवी छे.
नव हजार ने बळी चारसो अवधि ज्ञानी,
वीश हजार ने चारसो वैक्रिय लब्धिना;
वे लाख ने अठाणुं हजार श्रावको थया छ,
पांच लाख पिस्तालीश हजार छ श्राविका.
७
१०
१ अतिशय चळवान्.
२ एफ हजार ने माटाचारसो मनःपयन सानी भया, ३ चैफिय लावा.
२२४ लाख पूर्व वहाँतेरनुं आयुष्य पूरण करी, चैत्र शुक्ल पंचमीए प्रभू शिव पामीआ, समेतशिखरपर आवीने अजित प्रभू, पादपोपगम अनशनमां विरामि. ११ शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूति आपवी. जनक, जननी, विवाहित, अतिबली, तीर्थनायक, पर्षदा, पादपोपगम, अनशनं. पाठ ८२ मो. सगर चक्रवती-भाग १ लो. सगर चक्रवर्तीनो जन्म विनीतानगरीमां इक्ष्वाकुर्व- शने विपे थयो हतो. तेना पितार्नु नाम सुमित्रविजय अने मातानुं नाम वैजयंती इतुं. तेमना जन्म वखते वैशाख मासनी शुक्ल तेरस अने रोहिणी नक्षत्रनो योग हतो. जगार सगर राजानो जीव वैजयंतीना गर्भमां आव्या, त्यारे माताए झांखां चौद स्वमा जोयां इतां. सगर राजाए कु- मार वयमांज सर्व प्रकारनी विद्याओनो अभ्यास कर्यो हतो. ने साधे संगीतविद्यामां अने शमविद्यामां ते घणां निपुण ૨૨૫ बयां हता. ते शिवाय चीजी केटलीएक कळाओ तेओ "तनाथ पासथी शीख्या हता. ज्यारे सगरचक्री लायक अमरना थया, त्यारे तेमने उत्तम राजकन्याओनी साथै परणाववामां आव्या हता. पछी राजा जितशत्रुए अजि- तनाथने राज्यपदी, सगरने युवराजपदी आपी हती. अजितस्वामीए ज्यारे दीक्षा लीधी, त्यारे प्रभुनी आशा- थी विनीतानगरीना राज्य उपर सगरराजा आव्या हता. दीक्षा लीधा पछी अजितस्वामी एक वार विनीता- नगरीना उद्यानमां समोसर्या, ते वखते देवताओ तथा तेमना इंद्रोनी साथे सगर राजा पण तेमां हाजर थया हता. इंद्रनी पछवाडे वेसीने सगरे प्रभुनी देशना सांभळी हती. प्रभुए देशना आपी, विहार कर्या पछी सगर रा- जाना शस्त्र मंदिरमा सुदर्शन नामे चक्ररत्न उत्पन्न थयु हतुं. ते पछी सगर भावथी शुद्ध थइने चक्रनी पूजा करी, अने खारत्नने धारण करी सारा मुहूर्ते गजरत्न उपर वेसी, दिशाओने तावे करवाने नीकळ्या हता. तेमनी साथे सेनापति दंडरत्नने लइने आगळ चाल्यो हतो. त शिवाय सर्व उपद्रवने हरनार पुरोहितरत्न, दरेक मुकामे खानपान तथा मुकामनी सगवड करी आपनार गृहिरत्न, छावणी विग- रेनी मदद करनार वर्द्धकिरत्न, उपर तथा नीचे रक्षण करनार छत्ररत्न तथा चर्मरत्न, अने अंधकारमा रक्षण करनारा मणि अने कांकणीरत्न सगर चीनी साथ चाल्या हता.
२२३ नामना सगर राजा चक्रनी पछवाडे प्रथम पूर्व दिशा तरफ चाल्या हता. ते दिशामां. तेणे मागध तीर्थनी पासे छावणी नाखी, त्यां गंगा नदीमां स्नान करी, तेणे ते तीर्थना कुमारदेवनी उपर वाण नाख्यु, ते वाण उपर चक्रीना अक्षर वांची मागधपति जातजातनी . उमदी भेटो लइने चक्रीने शरणे आव्यो हतो. तेने सेवकनी जेम त्यां राखी, ते ठेकाणे सगरे अहाइ उत्सव को इतो. त्यांधी चक्रनी पाछळ सगर राजा दक्षिण दिशामां गया, अने मार्गमा आवेला राजाओने तावे करी रथमां वेसी, तेनी धरी सुधी दक्षिण समुद्रना जळमां उतों हतो, त्यां तेणे वरदाम तीर्थना नायक वरदाम कुमारने धारी अष्टम तप कर्यु हतं, अने तेने पहेलानी जेम वाण- थी खबर आपी, एटले ते देव चक्रीनी पासे आव्यो, अने उंची जातनां आभूषणोनी भेटो आपी, सगरचक्रीने तावे थइ गयो हतो. त्यांधी सगर राजा पश्चिम दिशा तरफ आल्या हता. ते दिशामां आवेला द्रविड देशना राजाओने तावे करी, चक्रीए पश्चिमना समुद्रने कांठे छा- वणी नाखी इती. पहेलानी माफक ते दिशाना स्वामी प्रभासदेवने पण वाण मुकी बोलावी, तेनी भेट लइ तावे करी लीयो. ते पछी त्यांची पाछा फरी सगरचक्री चक्रनी पछ्याटे सिंधुना दक्षिण तरफना कांटेथी पूर्व तरफ चाली सिंधुदेवीना मंदिरनी पासे आच्या, अने त्या पोतानी छा- वणी नाखी इती. चक्रीए अष्टम तप करवायी सिंधुदे- २२७ वीनुं आसन कंपी चाल्युं, अने ते देवी एक हजार ने आठ रत्नना घडा तथा बीजी उत्तम भेटो लइ, सगर- चक्रीनी पासे हाजर थइ. सिंधुदेवीने तावे करी, चक्रवर्ती इशान दिशा तरफ कुच करी, वैतादय पर्वतना दक्षिण भागमा आव्या हता. त्यांना नायक वैताढय कुमारने तांबे करी, तमिस्रा नामनी गुफा पासे आव्या इता, त्यां तेणे कृतमाल नामना देवने तावे करी दीधो हतो. पछी पोते त्यां रोकाइने पश्चिम दिशाना सिंधुना निष्कूटने जीतवा पोताना सेनापतिने अरधी सेना लइ मोकल्या हतो. सेनापति चर्मरत्नथी सिंधुने उतरी यवनद्वीपमा आ- व्यो, अने त्यां रहेला जुदीजुदी जोतना म्लेच्छ लो- कोने तेणे शिक्षा करी इती. ते शिवाय फच्छ देशना नायकोने तावे करी, जातजातनी उंची भेटो लइ, सिंधु उतरी ते पाछो चक्रवर्तीनी पासे आग्यो, अने ते वधी भेटो तेणे चक्रवर्तीने अर्पण करी हती. सारांश प्रश्नो. १ सगर चक्रवर्तीनों जन्म कइ नगरीमा अने फया वंशर्मा थयो हतो ? २ सगरचक्रीनो जन्म कया मासमा अने कइ तिथिए धयो हतो ? ३ सगरचत्रीनों माता पि- तानां नाम , हतां ? ४ जितशत्रु राजा सगरने ” यता हता ? ५ जितशत्रु राजाए सगरने केवी पदी आपी ૨૨૮ इती ? ६ सगरराजा विनीतानगरीना राज्य उपर क्यारे आव्या इता ? ७ सगरराजाना शस्त्र मंदिरमां चक्ररत्न क्यारे प्रगट थयु हतुं ? ८ सगरराजा दिशाओने तावे करवाने नीकळ्या, त्यारे तेनी साथे कयां कयां रत्नो हता ? ९ पुरोहितरत्न, गृहिरत्न, बर्द्धकिरत्न, छत्ररत्न, चर्मरत्न, मणिरत्न, अने कांकणीरत्न, चक्रवर्तीनां शा शा काम करे छे ? १० सगरचक्रीए पूर्व, दक्षिण, अर्ने प- श्चिम दिशामां कया कया नायकने तावे कर्या इता ? ११ सिंधुदेवीए चक्रवर्ती सगरने | भेट आपी इती ? १२ सगरराजा तमिस्रा गुफानी पासे क्या थइने अने कोने तावे करीने आव्या इता ? १३ सगरे सेनापतिने मोकली कयो भाग जीत्यो हतो ? १४ सेनापति कइ रीते यवन- दीपमां आव्यो, अने त्यां तेणे कोने जीत्या हता ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. रोहिणी नक्षत्र, संगीत विद्या, शस्त्र विद्या, निपुण, युवराज पट्टी, उद्यान, समोसर्या, विहार, शस्त्र मंदिर, खारत्न, गजरत्न, दंडरत्न, उपद्रव, पुरोहितरत्न, गृहि- रत्न, पर्दफिरत्न, छत्ररत्न, चर्मरत्न, कांकणीरत्न, अष्टम नप, निष्कट, यवनीप. -
૨૨૦
पाठ ८३
मो.
सगर चक्रवर्ती भाग २ जो.
.
सगरे एक वखते तमिस्रा गुफानां दक्षिण द्वारनां
कमाड उघाडवानी सेनापतिने आज्ञा करी, तेथी सेना-
पतिए दंडरत्नथी ते द्वार उघाडी दीर्धा हतां. पछी
सगरे हाथी उपर मणिरत्न मुकी, प्रकाश पाडी, ते
गुफामां प्रवेश को हतो; त्यां वर्द्धकिरत्ननी मददी
निम्नगा अने उम्नगा नामनी वे नदीओ उतरी सगर
राजा गुफानी बाहेर नीकळ्या. ते वखते आपात नामना
भिल्ल लोको चक्रवर्ती उपर हुमलो को हतो, पण
तेओने सगरे क्षणवारमा ताबे करी दीधा हता. ते
आपात जातना भिलोनी उपासनाथी मेघकुमारो चक्री
उपर वरसादनुं तोफान मचाव्यु, तेने चक्रीए चर्मरत्न
अने छत्ररत्नथी दूर करी दीधुं हतुं. छेवटे तेओने पण
हारी जइ चक्रीने शरण आवq पडयुं इतुं, अने पोते
करेला . अपराधनी क्षमा मागी हती. त्यारपछी चक्रीए
सिंधुना पश्चिम निष्कूटने जीतवा सेनापतिने मोकल्यो, अने
पोते त्यांज मुकाम नाखी रह्या.
ते पछी सगरचक्री इशानमा रहेला क्षुद्र हिमालयना
देवने जीतीने रूपभकूट पर्वते गया हता, अने ते पर्वतना
पूर्व भाग उपर
आ अवसर्पिणी काळमां ई सगर नामे
२७ वीजो चक्रवर्ती थयो छ. " एवा अक्षरो तेणे कांकणी रत्नथी लख्या इता. त्यांची उत्तर पूर्वने रस्ते थइ चक्र- वर्ती गंगादेवीनी पासे आच्या हता. तेने साधी लइ दक्षिण दिशा तरफ रहेली खंडप्रपाता नामनी गुफा पासे आवी, त्याना देव नाटयमालने तेणे तावे करी दीधो हतो. पछी चक्रीनी आज्ञाथी सेनापति अरधी सेना लइ गंगाना पूर्व निष्कूटने साधी आन्यो. ते पछी सगरचक्रीए वैता- व्य पर्वतनी वने श्रेणीना विद्याधरोने तावे कर्या, अने तेमनी मोटी भेटो ग्रहण करी हती. पछी. सेनापति पासे खंडप्रपाता गुफा उघडावी सगरचक्रीए तेमां हाथी उपर मणि राखी प्रवेश को हतो, अने तेना दक्षिण तरफना द्वारमाथी पाछा तेओ नकळ्या हता. पछी वहार आवी तेमणे गंगाना पश्चिमना कीनारा उपर छावणी नाखी, अष्टम तप करी नव नीधिओने साधी मेळवी लीधा इता. पछी सगर राजानी आज्ञाथी सेनापतिए गंगादेवीनी पूर्वमा रहेलं वीजुं निष्कूट साधी ली, हतुं. एवी रीते गंगा अने सिंधु नदीनी बने बाजुना चार निष्कूटो अने तेनी. बच्चे रहेला चे खंड मळी आ छ खंडवाळ भरतक्षेत्र सगर- चक्रीए पोताने तावे कर्यु हतुं. ते छ खंड साधतां सगरचक्रीने वत्रीश हजार वर्ष ययां हता. भरतचक्रीना जेवी तेने पण वधी जातनी समृद्धि प्राप्त यइ हती. तेवी समृद्धि मेळवी तो पाछा पोतानी राजधानी विनीतानगरीमा आल्या हता. एक बरखते सगरची. एक तोफानी अने. अवठी २37. शिक्षावाला घोडा उपर बेसी फरवा नीकळ्या हता. ते तोफानी घोडो सगरने लइ आकाशमा उडी एक मोटा जंगलमा दोडी गयो, त्यो सगरराजा घोडानी लगामने मुकी कबजे राखी तेनी उपरथी कुदी पड्या हता. पछी चक्री पगे चाली आगळ गया, त्यां एक मोटुं सरोवर जोवामां आव्युं, मा. न्हाइ, पाणी पी तेने कीनारे आसन कीg, त्यां एक सुंदर स्त्री जोवामां आवी इती. ते स्त्री वैताढय पर्वत उपर आवेला गगनवल्लभ नामना नगरना एक विद्याधर राजा सुलोचननी सुकेशा नामनी पुत्री हती, ने जीतांज सगरराजाने मोह उत्पन्न थयो हतो. वेवामा कोइ सेवके आवी सगरराजाने जणान्युं के आ मुकेशा आजथी तमारी स्त्री छे, तेनी रक्षा करो. रथनूपुर नग- रना राजा पूर्णमेघे परणवाने माटे आ सुकेशानी मागणी करी हती. तेना पिताए पूर्णमेघने सुक्केशाने आपी नहीं, एटले पूर्णमेघेः सुलोचनने मारी नाख्यो, एटले आ स्त्रीनो भाइ सहस्रलोचन तेने लइने अहीं छुपी रीते रह्यो हतो. ते आजे तेने तमारो मेळाप थयो. पछी सहस्रलोचने आवी, ते सुकेशाने सगरराजानी साथे परणाची हती. त्यांथी सगरराजा वैताव्य गिरि उपर आवेला गगनवल्लभ नगरमां आच्या हता, अने सहस्रलोचनने तेना राज्य उपर बेसारी विद्याधरोनो स्वामी को हतो, अने पछी पोते. पाछा विनीतानगरीमां. आव्या हता. ते वखने लोकोए मोटो उत्सव को हतो. ज्यारे सगर चक्रवर्ती
૨૨
महाराणी मुकेशानी साथे राजधानीमां आव्या, एटले दे-
वताओ सगरचक्रीनी पासे आव्या इता. तेमणे चक्रीनी
आज्ञा लइ तेमनो चक्रवर्तीपणानो . अभिषेक को हतो.
अने ते वखते सगरराजा खरेखरा छ खंड पृथ्वीना पति
चक्रवर्ती कहेवाया हता. ए महोत्सव दरेक दुकानोमां,
दरेक मंदिरोमां अने दरेक रस्ताओमा वार वर्ष सुधी
चाल्यो इतो.
सारांश प्रश्नो.
१ तमिस्रा गुहाना कमाड कोणे उघाड्यां हां ?
२ तेमा पेठा पछी चक्री उपर केवा भिलोए हुमलो कर्यो
हतो? ३ मेघकुमारोए चक्री उपर शुं कर्यु हतुं ? अने चक्रीए
तेनाथी शीरीते बचाव को हतो ? ४ सिंधुना पश्चिम
निप्कूटने चक्रीए शी रीते जीत्यु हतुं ? ५ ऋपभकूट पर्वत
उपर चक्रीए केवा अक्षरो लख्या हता ? ६ खंडप्रपाता
गुफामां जइ कोने ताये कर्यो हतो ? ७ गंगाना पूर्व
निप्कूटने सेनापति पासे सधाव्या पछी चक्री क्या आव्या
हता ? अने कोने तावे कर्या हता ? ८ चक्रीए क्यांधी
नीकळीने. कये ठेकाणे अने कयुं तप करीने नव नीधिओ
मेळव्या हता ? ९ आ भरतक्षेत्रना छ खंड केवी गीते
चार ? १० छ खंड भरतने साधतां चक्रीने फेटलां
वप ययां हना ? ११ सगरगना केवा घोडा उपर घेसी
233 जंगलमा आवी चड्या हता ? जंगलमां सरोवरने कोठे शु जोयुं हतुं ? मुकेशा कोण इती ? अने कोनी पुत्री इती ? तथा सुकेशाना पिता सुलोचनने शुं ययु हतुं ? अने तेनो भाइ सहस्रनयन तेने जंगलमां शा भाटे लाव्यो इतो ? १२ सगरचक्री ते मुकेशाने परणी क्या गया इता ? १३ सुकेशाना भाइ सहस्रलोचनने चक्रीए शुं कर्यु हतुं ? चक्रवर्ति महाराणी सुकेशाने लइ विनीता नगरीमां आव्या, ते पछी देवताओए शुं कर्यु हतुं ? अने चक्रवर्तिपणाना अभिषेकनो महोत्सव क्या सुधी चा- ल्यो हतो? ? शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूति आपबी. उपासना, अवसर्पिणीकाल, नवनिधि, समृद्धि, अ- बळी शिक्षावाला, अभिषेक पाठ ८४ मो. सगर चक्रवर्ति-भाग ३ जो. . सगरराजाने वधी मळी चौसठ हजार स्त्रीश्री इती. तेओनाथी साठ हजार पुत्रो थया हता. तेमां साथी मोटी २३४ जन्हुकुमार नामे पुत्र इतो. तेओ मोटी उम्मर विधा तथा शस्त्र कळामां घणा निपुण थया हता. घोडाओन खेलाथा- नी कळामां तेओए सारी नामना मेळवी हती. एक व- खते तेमणे पोताना पिता सगरराजाने जणाव्यु के, पि- ताजी ! तमे घधी दिशाओ जीती लीधी छे, अमारे माटे कांइ पण जीतवान वाकी राख्युं नथी, के जेथी अमे अमारु पराक्रम वतावीए. तेथी जो अमने आज्ञा आपो, तो अमे मरजी प्रमाणे फरीने विहार करवानी इच्छा राखीए छीए. सगरराजाए ते पुत्रोनी मागणी कबुल करी रजा आपी, एटले ते साठ हजार कुमारो स्वेच्छाए पृथ्वी उपर फरवा नीकळ्या. ज्यारे तेओ फरवा नीकळ्या, त्यारे तेमने घणां माटां शुकन थयां हतां, तोपण तेओए भवि- तव्यता उपर आधार राखी, हिंमतथी बाहेर नीकळ्या हता. सगरराजाए तेमनी साथे पोतानी सेना मोकली इती. रस्तामां निशानबाजी विगेरे अनेक जातनां हथीयार ना खेल करता, अने शत्रुओने ताले करता फरता फरता तेओ अष्टापद पर्वतनी पास आवी पहाच्या. ते पर्वतनी मुंदर शोभा जोइ तेओ खुशी थइ गया. पछी पोताना पूर्वज भरत चक्रवत्तिए करावेल सिंहनिषद्या नागना चैत्यमां गया, अने त्यां श्री ऋपभदेव प्रभुनी देह प्रमाणवाली मुंदर प्रतिमा अने भरतना तथा बाहुबलि विंगरे नवाणु भाइ- ओनां पगला तेमना जोवामां आव्यां. सगरना कुमारोए तेपने प्रणाम करी, भाव सहित विधिधी पूजा करी, अने ૨૩૫ भरते आ गिरिने आठ आठ पगधीयां करेलां छ, तेथी आ गिरिनुं नाम अष्टापद पडयुं छे. ए वधी हकीकत पोताना मंत्रिओ पासेथी जाणी लीधी. पछी तेमणे त्यां भरतना जेवू वीजें एक मोटुं चैत्य करावानी धारणा क- री. सर्वे एकठा थइने दंडरत्न हाथमां लइ, चार हजार गाउ सुधी रंडी एक मोटी खाइ खोदवा मांडी. ज्यारे आवी उंडी खाइ खोदवा मांडी, एटले नीचे आवेला ना- ग कुमार देवताना मंदिरो भांगवा लाग्यां. ते मोटो उप- द्रव जोइ, नागलोकोमा भारे त्रास थइ गयो, एटले ना- गकुमारोनो राजा ज्वलनप्रथं वाहेर आव्यो, अने तेणे सगरना कुमारोने समजावी तेम करतां अटकाव्या. त्यारे जन्हुए कयु के, अमारा पूर्वजना आ जुना पर्वतने अचल करवा माटे अमारो प्रयत्न हतो, ते छतां आ दंढरत्ननी मोटी शक्तिथी तमने नुकशानी थइ होय तो क्षमा करो, अमे फरीथी तेम करीशुं नहीं. पछी नागराज शांत थड़ पाछो गयो. पछवाडे ते खाइ पाणीयी पूरवानो विचार करी, तेओ गंगा नदीने त्यां लाव्या, अने तेनायी ते खाइ पूरवा मांडी. जन्हुकुमार गंगा नदी खची त्यां आ- व्यो, तेथी गंगानुं " जान्हवी " ए, नाम पडयु. गंगा- ना जळथी पाछी नागकुमारोने मोटी हरकत थइ, एटले नागराज ज्वलनप्रभ कोपथी बाहेर आव्यो, अने पोतानी झरवाळी द्रष्टियी सगरना साठ हजार कुमारोन वाली भस्म करी दीधा, तेपी सरे तरफ हाहाकार थइ हो. आ ૨૩૬ . बनावथी तेमनी साये आवेला सेनापति, सामंत, राजा अने मंडलेश विगेरे वधा गभराइ गया हता. तेमना म- नमां एवं थइ आव्युं के, आपणे सगरराजाने शीरीते मुख वतावीशुं १ माटे अहिं मरवू सारं छ. आवो विचार क- रता हता, त्यां इंद्र भगवां लुगडां पहेरी ब्राह्मणने रुपे आव्यो. इंद्र तेमने धीरज आपी सगरराजाने समजाववाने रस्तामाथी कोइ अनाथ मुडदु लइ विनिता नगरीमां बा- व्यो हतो. ते जुलम जुलम एम पोकार करतो. सगरराजा- नी पासे आव्यो. राजा सगरे तेने दुःख थवानुं कारण पुछयु, एटले ते ब्राह्मण रुपे वोल्यो, महाराज ! हुँ अवति देशनो रहेवाशी अग्निहोत्री ब्राह्मण छ, आ मरेलो मारो पुत्र छ, हूं बाहेर गाम विद्या भणवा गयो हतो, त्यां पछवाडे मारा पुत्रने सर्प करड्यो, अने ते मरी गयो छे.. अपशु- फन यवाथी कांइ माठा धवानी शंका लावी हुं घेर आ- व्यो, त्यां में पुत्रने मरेलो जोयो, अने मारी स्त्रीने वि. लाप करती जोइ, मने भारे शोक थयो, अने रात्रे तेना अफसोसथी हुँ घरमां बेसी रह्यो. तेवामां मारी उपर दया लावी, पारी कुलदेवीए आवी मने कहा के, पुत्र ! शोक कर नहीं. जेना घरमा कोइ मरी गयुं न होय, तेवा घ. मांधी मंगलिक अग्नि लावी आप तो हूं तारापुत्रने जीवतो फर, पछी तेवू घर शोधयाने ९ घेर घेर फर्यो, पण मन कोइ तेवू घर मळयुं नहीं. पछी आप चक्रवत्तिने घर भागा उं, आपना परमापी अपवा चीजा कोइना २३७ .. घरमाथी मने तेवो अग्नि मंगावी आपो, जेथी मारो पुत्र जीवतो थाय. पछी सगरराजाए तेने समजाव्यो के, अरे भाइ ! तेवू घर कोइनुं पण होय नहीं. दरेक माणंसने माथे काळ फरे छ, माटे तारे पुत्रनो शोक करवो न जोइए. पछी ब्राह्म- णे सगरराजाने जणाव्युं के, राजा ! तमे वीजाने वोध. आपो छो, पण जो तमारे तेवो अनुभव थाय, तो आवो बोध याद राखजो. पछी तेणे कडं के, राजा ! तमारा साठ हजार पुत्रो वळीने भस्म थइ गया छ, अने तमारा सामंत, मंत्रि विगेरे मरवाने तैयार थता हता, तेमने धी- रज आपवानी खातर आ वधौ देखाव करवामां आव्यो छ. राजा सगर ते सांभळी घणो खेद पाम्या हता. तेने ब्राह्मणरुपे थयेला ते इंद्रे राजानो मोह तोडवाने माटे के टलाएक दाखला आप्या हता, जेथी सगरराजानो शोक समाइ गयो हतो. पछी अष्टापद पर्वतनी आसपास रहे- नारा लोकोए आवी फरीयाद करीके खाइने पूरतां वा- हेर उछळेली गंगा नदी अमारा गामडानो नाश करे छे. पछी सगरे पोताना मोटा पुत्र जन्हुना भगीरथ नामना पुत्रने आज्ञा करी इती के, पुत्र ! तुं दंढरत्न लइने त्यां जा, अने तेवडे गंगाने खेची पूर्व समुद्रमा मेळवी दे. पितामहनी आज्ञाथी भगीरथ अष्टापद गिरि पासे आव्यो अने अष्टम तप करी, तेणे नागकुमारोना राजा ज्वलनम- भने असम फरी, तेनी रमा लइ गंगाने दंदरत्नपी
२८
खंचीने पूर्व समुद्रमा मेळेची दीधी हती. त्यारथी गंगानु
नाम भागीरथी पडयुं हतुं.
सारांश प्रश्नो.
१ सगर राजाने बधी मळीने केटली सीओ हती ?
२ सगर राजाना सौधी मोटा दिकरानुं शुं नाम हतुं ?
३ सगर राजानी पासे तेना साठ हजार पुत्रो शी
आज्ञा मागी हती ? ४ तेओ फरता फरता कया पर्वतनी
पासे गया हता ? ५ अष्टापद पर्वत उपर तेमणे शुजोयुं हतुं ?
६ ते. पर्वतर्नु अष्टापद एवं नाम केम पडयु हतुं ?
७ तेमणे दंडरत्नधी केटली उंडी खाइ खोदी हत्ती ?
८ खाइ खोदवाथी कोने नुकशान थयुं हतुं ? ९ गंगा
नदीने त्यां शामाटे लाव्या हता ? १० गंगानुं नाम
जान्हवी शा उपरथी पडयु हतुं ? ११ नागराज ज्वलन.
प्रभे सगरराजाना साठ हजार कुमारोने शामाटे वाळ्या
हता १ १२ साठ हजार कुमारोना वळवाथी सामंत विगेरे
शुं करवाने तैयार थया इता ? १३ तेमने इंद्रे केवा रुपथी
शो बोध को हतो ? १४ इंटे सगरराजानी पासे आवी
शी बात कही हती ? १५ ब्रामणरुपी इंटे केची युक्तिथी
सगरराजाने समजाव्या दता ? १६ सगरराजानी आगळ
आवीने कया लोकोग फरीयाद करी इती ? १७ गंगानें
नाग भगीरथी शापी पदयुं हतं ?
शिक्षके नीचेना शब्दोनी समजूती आपवी. शस्त्रकळा, निपुण, विहार, स्वेच्छा, भवितव्यता, पूर्वज, देह प्रमाणवाळी, उपद्रव, अचळ, सामंत, मंडलेश, अग्निहोत्री, मंगलिक, पितामह, प्रसन्न, १ पाठ ८५ मो. सगरचक्री भाग ४ थो. भगीरथे पोताना बळी गयेला साठ हजार काका- ओनां अस्थिने गंगाना जळमां नाखी पवित्र कर्या हतां. ते रीवाज हजु सुधी लोकोमा चाले छे. ज्यारे भगीरथ त्यांथी पाछो फर्यो, त्यारे रस्तामा एक झाडनी नीचे रहेला केवळी तेना जोवामां आव्या हता. केवळीने नम- स्कार करी भगीरथे पुछ्युं हतुं के, मारा काका एकी साथे केम मृत्यु पाम्या ? तेना उत्तरमा त्रण काळने जा- णनारा केवळी भगवाने कयु के, भगीरथ ! पूर्वे एक मोटो संघ तीर्थयात्रा करवाने नीकळ्यो हतो. ते नजीकनार कोइ गामयां कुंभारना घरनी पासे उतो. संघनी सारे १ १ शत्रंजय महात्म्यमां अजितनाथ प्रभुए सगर चश्वतीने कार के, एन लतेल छे. २ शत्रुजय महात्म्यमा एक लुटार टोटी हतो, तेमां एक कुंभार हतो, दयाविक रुपे लखेल है, २४० घणी समृद्धि जोइ ते गामना लोको तेने लुटवाने आच्या ते तखते भला दिलना कुंभारे तेमने समजावी पाछा वा- ळ्या. आ खवर जाणी राजाए ते चोरना गामने वाळी नाख्यु, तेमाथी ते कुंभार वची गयो. कुंभारने मृत्यु आवतां ते मरीने विराट देशमा मोटो पैसादार वाणीयो थयो, अने पेला वळी गयेला गामना लोको ते विराट देशनी वस्तारुपे अवतर्या. ते कुंभारनो जीव पछी उत्तम थइ अवतर्यो, त्योथी मृत्यु पामी देवता ययो, अने ते पछी तुं भगीरथ थइ अवतर्यो छु, अने पेला गामना लोको संसारमा घणुं भमीने तारा पिता जन्हु अने तारा काकाओ यया हता. ते संघने लुटवाना मोटा पापथी तेओ एकी साथे बळी मुबां छे, अने ते संघने बचाव्यो हतो, माटे तुं वची गयो छ. केवळी पासेयी आचां वचन सांभळी भगीरथने वैराग्य थयो हतो, पण पोताना पिता- महने दुःख न थाय, ते माटे तेणे दीक्षा लीधी न इती.. पछी भगीरथ केवळीने वादी रथमां सीने विनीतानगरीमा आव्यो हतो. पोतानी आज्ञा प्रमाणे काम करी आवेला भगीरथने सगरराजाए सावासी आपी हती. पछी सगर- राजा भगीरथने राज्यगादी उपर बेसारी पोते व्रत लेवाने तैयार यया. ते बखते उद्यानपाळोए अजितप्रभु समोस- योना खबर आप्या हता. ते खवर जाणी सगरचत्री भगीरयने साये लइ प्रभुने समवसरणमां वांदवा गया हता. प्रमुए आपकी देशना सांपळी सगरराजाप मभुनी स्तुति
२४३
करी, अने दीक्षा आपवानी प्रार्थना करी. प्रभुए ते वात
मान्य करी, एटले भगीरथे पोताना पितामहनो नीकळवानो
मोटो वरघोडो चडाव्यो, अने प्रभुनी पासे आवी, तेमने
मुनिनो वेष अपाव्यो. सगरराजाए ज्यारे दीक्षा लीधी.
त्यारे तेनी साथे सामंत अने वीजा मंत्रीओए पण दीक्षा
लीधी हती. पछी प्रभुए देशना आपी सगरराजा विगे-
रेने साथे लइने त्यांथी विहार को हतो, अने भगीरथ
विगेरे राजाओ अने देवताओ पोतपोताने ठेकाणे चाल्या
गया हता.
सगर चक्रवर्ती प्रभुनी साथे रही बार अंग भण्या
हता. तेमणे सारी रीते चारित्रने पाळ्यु हतुं. “ हुँ
चक्रवर्ती अने तीर्थकरनो भाइ छु,” एवो तेमणे कदी
पण गर्व राख्यो न इतो, अने भारे आकरा परीपह सहन
कर्या हता. सगरराजाएं पाछळथी दीक्षा लीधी हती,
पण तपस्या अने भणतरना भारे गुणथी तेओ मोटेरा
मुनिओथी पण अधिक थइ पड्या हता. छेवटे घातिकर्मनो
क्षय थवाधी तेमने केवळज्ञान उत्पन्न थयुं इतुं.
सारांश प्रश्नो.
१ भगीरथे पोताना काकाओनां अस्थि शेमा ना-
रख्यां हतां ? २ भगीरथ गंगा लावी पाछा फर्या, त्यारे
रस्तामा तेमणे कोने जोया हता ? अने तमने पुख्यं
૨૪ हतुं १ ३ भगीरथ अने सगरराजाना साठ हजार पुत्रो पूर्वे कोण हता ? तेओ बधा साथे शामाटे बळी मुआ हता ? ४ भगीरथ शामाटे बची गयो हतो ? ५ केवळी पासे भगीरये केम दीक्षा लीधी न हती ? ६ भगीरयने राज्यगादीए वेसारी सगरराजाए | कर्यु हतुं ? ७ सगर- राजानी साथे कोणे कोणे दीक्षा लीधी इती? ८ सगर- राजा प्रभुनी पासे शुं शीख्या हता ? ९ सगरराजा मोटेग मुनिओची पण अधिक शामाटे थइ पड्या इता? १० छेवटे सगररानाने केबुं ज्ञान उत्पन्न थयुं हेतु ? समाप्त.
जैन धर्म पहेली चोपडी.
जैन धर्म वांचनमाळानी पहेली चोपडींना विद्वान
मुनिराजो अने न्युसपेरवाळाओना अभिप्रायो मां-
हेना थोडा अभिप्रायो अहीं आपेला छे.
शियाजी विजय
ता. १८-८-०६
जैन धर्मना तेम इतरने पण ए धर्मनुं शरुआतर्नु
सारं ज्ञान मळे, एवं प्राचीन सिद्धांतो साथेनुं वांचनमा-
ळानी शैली उपर लखाएल आ उत्तम पुस्तक अमने
पालीताणाना जैन धर्म विद्या प्रसारक वर्ग तरफथी मळ्यु
छ, ने तेनी सुंदर छाप उंचा. कागलोना मोटा कदनां
एकसो साठ पानां तथा पाका कापडी पुंठा छतां छ
आनानी कीमते. एक अमूल्य पुस्तक छे. दरेक जैन घरमां,
तेम वाल्कना हाथमा राखवा जोग छः पर्युसणना तहे-
वारोमा प्रभावना आपी, ज्ञान वस्तु पाळकने भेट अपाय,
तो धणीज योग्यः शरुआतः अने सखावत यशे:
.
२ देशाइपोळ सुरत ता. ७-९-०६ धर्मस्नेही जैन धर्म विद्या प्रसारक वर्गना स्नेक्रेटरी साहेव सु. पालीताणा. आपनी सभा तरफधी प्रगट थयेल " श्री जैन धर्म पहेली चोपडी" पुस्तक मळ्युं छे, तेनी पहोंच उपकार साथे स्वीकारीए छीए. ए पुस्तक आवती वापीक परीक्षा जे एकथी दोढ मासमा थनार छ, ते पछी अत्रेनी श्री रत्न- सागरजी जैन विद्याशालामां चलाववामां आवशे. ए लघु पुस्तक माटे अमारो नम्र अभिप्राय नीचे मुजब छे. आ पुस्तक प्रगट करी आपनी समाए एक खरी खोट पुरी पाडी छे. हालमा स्थळे स्थळे नवी नीकळती जनशालामां चलावचा माटे ए घणु उपयोगी थइ पडशे. धर्मनु स्वरुप धीमे धीमे वाळकोना मनपर ठसाववाने पु- स्थानी संकलना ठीक करी छे. धर्म संबंधी अतिहासीक चारतोनुं धर्मना वोध साथे ज्ञान मळे, एवा कथाना पा- टोनी बहु सारी योजना के. जैन तरीके अवश्य करवा योग्य नित्य करणी जेवी के, " जीन पूजा " विगेरेनी विधिनुं जाणपणुं आ पुस्तकधी सहेजे थाय एम छे. कविनानी रचना सरल, अने बालकोंने सहेलाइथी अर्थ समनाय एवी है. हालमां केटलाक लखनारा जाणी जो पुस्तकनी भाषा संस्कृत शब्दाची भरपुर, अने लांबी 3 वाक्य रचनाथी मुश्केल करी नाखे छे, तेवू आ पुस्तकमां थयेल लथी. वल्के वाळकोने तुरत समजाय, एवी व्यव- हारमा चपराती भापा राखवामां आवी छे. उपर दर्शावेल कारणोथी आ पुस्तकने अमे आवकार आपीए छीए. तेनी साथे तेना लेखकने तेमज प्रगटकर्त्ताने अभिवंदन आपीए छीए. ली. सेवक, CHUNILAL CHHAGANCHAND. ओनररी मेनेजर, श्री रत्नसागरजी जैन विद्याशाळा. मुंबइ समाचार. नवीन पद्धति उपर तैयार करवामां आवेली श्री जैन धर्मनी पहेली चोपडी-पालीताणा खातेना श्री जैन धर्म विद्या प्रसारक वर्ग तरफथी श्री जैन धर्म पहेली चोपडी प्रगट करीने शाळामां शीखता विद्यार्थीओने धार्मिक ज्ञान जाणवा माटे ठीक सगवडता करवामां आवी छ. आ पुस्तकनी योजना एची मुगम रीते करवामां आवी छे के, साधारण भापाज्ञान धरावनारा गुजराती पांचमा धोरण सुधीना जैन विद्यार्थीओ पोताना धर्मनां प्राथमीक तत्वो ४ सहेलाइथी समजीने शीखी शकशे. आ पुस्तकनुं नाम जो के पहेली चोपडी आप्युं छे, तोपण तेमां समावचामा आ- वेली वावतो उपरथी लखी वांची जाणनारा मोटी क्यनां स्त्री पुरुपोने धर्मज्ञाननो सारांश जाणवामां जे मुश्केली पडे छे, ते दुर थशे. आ पुस्तकने त्रण भागमां वहेंची नांख- वामां आव्यु छे, अने पहेला भागमां नवकार मंत्र, पंच- परमेष्टिी, अढार दुषण, शुद्ध देव तथा धर्म, जीन प्रतिमा, पुजा तथा श्रावक दिनकृत्य विगेरे विपयो; वीजा भागमा जीवनां पांच द्वार, संसारी स्थावर जीव, पंचेंद्रिय तिर्यच जीव, पंचेंद्रिय मनुष्य जीच, अने जीवविचार विगेरे विषयो अने त्रीजा भागमां श्री ऋषभदेव, भरत चक्रवर्ती, प्रश्नचंद्र राजपी विगेरे चरित्रो पाठरुपे आपलां छ. आ उपरथी जणाय छ के, आ ग्रंथावळीनो मुख्य हेतु जैन धर्मना माननुं अध्ययन मुगम करवानुं छे. हालनो वखत केळ- वणीनो योग्य छ, भने जैन कोमना प्रत्येक श्रावक तया श्राविकाए पोताना धर्मर्नु झान संपादन कर जोइए, के जेने लगतां साधनो आवी नवा प्रकारनी पद्धति उपर पाठावळीरूपे रचाएलो पुस्तको छे. आवां मुगम साधनो जन पाठशाळाओ सत्कार करणे, एवी आशा आपणे राखी. P...
પ
केळवणी पुस्तक १८ मुं, अंक ११ मो,
संवत १९६२ भादरवो.
श्री जैन धर्मनी पहेली चोपडी-पालीताणाना
जैन धर्म विद्या प्रसारक वर्ग तरफथी प्रसिद्ध थयेली छ.
किम्मत रु. ०-६-० छे, ते पुस्तकना प्रमाणमां घणीज
ओछी छे. लीपी वाळवोध छे, अने भाषा सुगम छे.
वाळकोने अने अन्यने पण जैन धर्म संबंधी कांइ ज्ञान
आपवानी तथा खास करीने नीति धर्म समजाववानी एमां
व्यवस्था उत्तम छे. धर्मना प्रसार माटे वाळकोना हाथमा
सहेलथी आपी शके, अने तेओ सहेलथी समजी शके,
एवां पुस्तकोनी घणी अगत्य छे. जैन धर्मनी शालाओमां
चलाववाने आ पुस्तक उपयोगी थशे, एम लागे छे.
जैनोद्य पुस्तक १ लुं अंक १२ मो आश्विन.
श्री जैन धर्म पहेली चोपडी-आ पुस्तक श्री
जैन धर्म विद्या प्रसारक वर्ग तरफथी तेमनी उच्च श्रे-
णीनी वांचनमाळाना प्रथम पुस्तक तरीके वाळबोध लि-
पिमा यहार पडेल छे. सदरहु पुस्तकनी प्रस्तावनामा लखेल
छे के-“ ग्रंथावळीनो मुख्य उद्देश जैनोना द्रव्यानुयोग,
चरणकरणानुयोग, अने कथानुयोगना ग्रंथो अने जैन
साहित्य वांचवा तरफ अभिरुची उपजाववी ते छे. " आ
an पुस्तक उक्त उद्देश केटलेक अंशे सफळ करी शके तेम छे. कुल ६८ पाठमां त्रण विभागो पाडवामां आव्या छे. पहेला विभागमां आवश्यक संबंधी पाठो छ, वीजामां जीव तत्व संबंधी अने त्रीजामां केटलाक महा पुरुपनां जीवन चरित्रो संबंधी पाटो छे. पुस्तक मूर्तिपूजक जैन वर्गमां खास उपयोगी थइ पढे तेवु छे. केटलीक कविता- ओमां काव्य-मेळ सचवायो नथी, तेमज कविताओमां जेई रहस्य होवू जोइए तेवू नथी. पुस्तकर्नु कद १५० पृष्टर्नु होवा छतां किंमत रु. ०-६-० छ आना छे. श्री जैन धर्म पहेली चोपडी-सदर ग्रंथ प्र- मोदयी स्वीकारतां तत्संबंधी स्वतंत्र अभिमाय-आ जैनी चांचनमालामां शृद्ध देव, गुरु, धर्म, जीन पुजा, जीव विचार, चरित्रो विगेरे उत्तम रीते योग्य भापामां लख- वामां आवेल छे. कविताओ रसीक तेमज बोधक छे. चारित्रविजयजीना प्रयासने धन्यवाद घटे छे. दरेक पाटो जैन धर्म प्रचाकने खास उपयोगी छे. पाठशाळाओमां चलावया योग्य छ. कोन्फरन्स पण आ सीरीज स्वीकार तो बाघ जंधु नदी. दरेक प्रकार प्रसंशनीय छ, वर्गना प्रयास दिनकानी है. दरेक जैन बंधुभान आ सीरीडा जोवा खरीदवाः खास आग्रहपूर्वक भलामण छे. इत्यलम्. शांति. आ वर्गनां कार्योंने श्रीमंतोए सहायभूत थर्बु जरुरनुं छे. निकपराधी मुनि नीतिविजयजीना धर्मलाभ. वी. स. २४३३ मागशर वदी १० सोमवासरे. जैन धर्म पहेली चोपडी-उपरोक्त पुस्तक पण उपरोक्त वर्ग द्वारा प्रसिद्ध थयेलं अमने अभिप्रायाथै म- ळेल छे, जे स्वीकारतां हर्ष थाय छे. वर्गनो प्रयत्न योग्य छे. चालता समयनी खामी आ पुस्तकथी पुराइ छ, विद्वान मुनि महाराजो वि. नी. संमतिथी कार्य केवु थाय छे, तेनो नमुना आ पुस्तक छ. आस्तिक जैन अभ्यासीने धर्मज्ञानना उत्तम साधन रुप छे. जैन शैलिथी विरुद्ध एक वाक्य पण अंदर नथी, जे वावतर्नु मान चारित्रविजयजी महाराजने आभारी छे. वीजा भागो जलदी वहार पाडी, जैन वर्गने आश्रय आ- पवानी उत्तम तक छे. वघारेमा पुस्तक खंतथी छपायेळ जेयी शुद्धि पत्रक · नधी, ए पण वर्गनी चडती दशानुं कारण छे.
जुदा जुदा विद्वानो तरफथी जुदी जुदी हिलचाल साझि माटे थाय, ते करतां मंडळो एकत्र मळी, एकज जैन सारीझ पसार करे तो, ते विशेप उपयोगी थाय, एम मारी धारणा छे. इत्यलम् . शान्ति शान्ति शान्ति. मुनि मणीविजयजीना धर्मलाभ, नीकारा. संवत १९६२ भाद्रपद कृष्ण ४. गुरुवार, बनारसथी ली. कर्परविजयजी तरफथी. तत्र श्री जैन धर्म विद्या प्रसारक वर्ग योग धर्मलाभ पूर्वक विदित याय के, तमारो पत्र तथा जैन धर्म पहेली चोपडी बंने पहोंच्या. तत् पुस्तक संबंधी अमारो अभि- प्राय नीचे मुजय . पुस्तकमा लीधना विपया प्रवेशकने खास व्या- नमां लवा जवा के छनां भापा सहज कटण वापरवामां प्रावी . कविताश्री विपयन बंधवसती अने रसिक बनेली . पाठशालामा अभ्यास दाखल करवाने तन्न- बंधी या चोपटी अनुनुल पटंग. नेयांना विगयो साग वायी यांचनाम्न वह भी लाभ यवा संभव है."
श्री पार्श्वजीन प्रणम्यः पाटण खेतरवाशीपाडा, आशो शुद ४ शनीवार. श्री पाटणथी मुनि मोहनविजयजी तथा चारित्रविज- यजी आदि ठाणाओ जोग. मुा. पालीताणा मध्ये देवगुरु यक्तिकारक प्रभावक सुश्रावक शिवजीभाइ देवशी आदि चर्गना मेम्बरो जोग धर्मलाभ पहोंचे. विशेषमां तमारा. तरफथी श्री जैन धर्म पहेली चोपडी मळी छे, जेमांना दरेक पाठना विपयो एटला उपयोगी छ के, आ चोपडी दरेक पाठशालामां ग्रहण करवामां आवे तो, हालना जमानाना उछरती वयना युवान वाळको घणुं सारं शिक्षण प्राप्त करे, एम हुँ खा- तरीथी. कही शकुं छु. मुंबइनी जैन कोन्फरन्स तरफथी जैन सीरीझ तैयार करवा माटे. जे आर्टीकल प्रगट थयो छे, ते आर्टीकलना संबंधमां कोन्फरन्सना सेक्रेटरीओ जैन सीरीझ तैयार करवामां आवी चोपडीनो समावेश करो, तो ते अति श्रेय गणाशे. आवी प्रथमनी पहेली चोपड़ी माफक धोरणोने अनुसार वीजी चोपडीओ बहार पाइवाने आ वर्ग शक्तिमान थाओ, एम हुँ अंतःकरणथी इच्छं छु. एज. देवदर्शने याद करशो, धर्म साधना विशेष करता रहेशो. मीति सदर. JUNI JOHUS 1. Kietarmasi Pl, P1,011.
१० श्री जैन धर्म विद्या प्रसारक वर्ग, पालीताणा. मुळीथी ली. श्री जैनशाळाना सेक्रेटरी शा. मगन चतुरना जयजीनेंद्र पांचशो. विनति साथे लखवान के, आपना तरफथी चोपडीओ नंग ३ भेट तरीके मोकली, ते पहोंची छे. विशेष लखवायूँ के, आपे जे प्रवेश पोथी भाग १ तथा ३ जो छपावी बहार पाड्यो छे, ते जैन- शाळाओमां घणोज उपयोगी तेमज वाळवर्गमां तुरत ज्ञान संपादन थाय तेवो छे. . लखवा विनति के, अहीं हाल प्लेगना सववधी लगभग मास छधी अत्रेनी जैनशाना बंध छे, तेमन हवे मास्तरनी पुरेपुरी खोटने लीधे बंध छे, तो तमारा तरफ कोई सारो हुशीयार मास्तर होय, तो पगार दर मासे का.८-१० नुधी आपशृं, माटे तपास करी तुरत मोकलाववा बंदोबस्त करशो. आ पत्रनो जवाव तुरत लखवा महेर- वानी करशो. एज अरज. संवत १९६३ना पेला चैत्र शुदी १४ दा. पोताना.
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