Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Mokthik Maal

Dinesh Nandani · 2011/01

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हिन्दी-अप-रन्नाकरका ९३ या अन्य
मौक्तिक माल
(गद्य-गीत)
।
गिफा
कुमारी दिनेगनन्दिनी चोरट्या
m
प्रफाशक
हिन्दी-ग्रन्य-रत्नाकर कार्यालय, बम्बई

प्रकादाफ- नाथूराम प्रेमी, हिन्दी-अपरनाकर कार्यान्य, दीरायाग-यन्बाई पहली यार अगस्त, १९३७ मू० १० प्रिंटर- रघुनाथ दिपाजी देसाई, न्यू भारत प्रिंटिंग प्रेस ६ केलेवाडी, गिरगाव बम्बई न० ४ मौक्तिक माल

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भूमिका । गद्य कवीना निकष वदन्ति', श्रुतिकी तरह यह भी अमेल है । टेढ़े- मेरे अटपटाँग भाव पद्यके चमत्कारी पर्दे में भले ही लुके रहें, परन्तु, गद्यके मैदानमें उतरते ही बेतुकी पछाड़ साते हैं। इसीलिए, गद्य गीत सरल नहीं होते और उनकी सृष्टि सब किसीका काम नहीं है । तत्त्व न हुआ तो यह गद्यका चेतक चेतता ही नहीं, उलटे दुलत्ती लगाता है। उसे कस कर जो द्वैत और अद्वैतकी समस्या हल करना चाहते हैं, सारय और मीमासाके कुलाबे मिलाना चाहते हैं, वे सीसौदियोंके प्रतापकी जगह कछवाहोंके मानका ही दम भरते हैं । गद्य-गीत क्या हैं और क्या न होने चाहिएँ, यह वही जानते हैं जो आप तन्मय हैं और गयको तन्मय कर सकते हैं । न वह पर है न निबध, न कहानियों न कथा- काव्य,—यह तो प्रत्यक्ष है । वे पद्यमें पलटे नहीं जा सकते । मदारीकी गोलियाँ नहीं हैं, इधर रख ली या उधर । गीत हैं । सरस्वतीका दिव्य वेग जिस तरह पद्यको अक्षर अक्षर आप ही आप अपने अनुरूप बना लेता है, उसी तरह गद्यको भी उन्मत्त कर देता है, यह सस्कृत साहित्यका सिद्धान्त है। यह मोतियोंकी माला प्रेमके पोंपर इस पारसे उस पारको उपहार है। मोतियोंका क्या कहना ? किं किं न तेन विहित बत मौक्तिकेन ?' यह गद्य सजीव है, सबल है, सुदर है। उसपर आत्माकी छाप है, दिव्यकी दाप है। वह भावोंमें गोते लगा रहा है, तारोंसे भाँति भाँतिके स्वर निकाल रहा है । कहीं हिन्दी-उर्दू गले मिलती हैं, कहीं मुला और पडित प्रेम पढ़ते हैं। उसमें विधना रूप बदलता है, मोहन मोहन ही ठहरते हैं । शैलीमे आँसू है, मुसकान है, आँच है। 'सध्या होते ही में सरोवर- पर जा बैठी, बिना सावनके ही बदरिया झुक आई' यह गद्यकी सुरीली बाँसुरी है । 'मन-मृग काहे डोलत फिरे' यह पद्यकी सरहदपर छापा है । 'चाँदके प्याले में अगूरका आसव' एक ओर, 'पृथ्वीकी अनन्त सुपमा और आहाद ही मदिरा होंगी' दूसरी ओर, 'तरल तारिकाकान्त किरीटेन्दु और तेजोमय तमारि' इधर ' और फिर, मैं हूँढ़े भी न मिलूंगी' उधर- 'यह मौलाहीकी करतूत है।' शब्दोंके लाड़ले कहीं कमरों में सँवारे जाते हैं, कहीं आप ही आँगनमें छगन मगन हैं । छोटे छोटे गीत बढे बड़ोंसे बाजी मार ले गये हैं | राजहस कहीं उदान ले रहे हैं, कहीं छीर ही छान रहे हैं । यहाँ ईरानी वारुणी है तो वहाँ भारतीय पचामृत या गोलोकका गगाजल। ग्रन्थ सफलताके पथपर है । कुमारी दिनेशनन्दिनीजी चोरड्या- घरानेकी एक आनन्दिनी मणि हैं | उनकी आत्माका प्रकाश अनन्त काल तक रहेगा, इसमे सन्देह नहीं । मानवी जीवन कितना गूढ़ है, कठोर है, जटिल है,-विचित्र है,-सयोग और वियोग, जन्म और मृत्यु, ईश्वर और जीव, क्या क्या कला खेलते और खिलाते हैं, यह कुछ जानना हो तो यह ग्रन्थ अपनाना चाहिए । इसमे शान्ति है, सत्य है, सुधा है, यह मेरा निजी अनुभव है। श्रीप्रयागराज शिवाधार पाडेय

05ODOHORoto
EGOROPHO
शनार
doतकन
हिज हाइनेस श्रीसवाई महेन्द्र महाराज
ओड़छा-नरेश
सर वीरसिंहजू देव के० सी०एस०आई०
और
श्रीमती महारानी-साहवाके
कर-कमलोंमें
Gmanadoo
सादर समर्पित

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~ , जैसे ग्रीष्मकी सूखी धरणी वर्पाकी प्रतीक्षामें व्याकुल हो जाती है, मयूर आपाढ़के प्रथम दिवस ही नीलमेघकी प्रतीक्षामें सुन्दर रख कर कर विह्वल हो जाता है, प्रावृट्के आरम्भमें ही पपीहा ' पीऊ कहाँ, पीऊ कहाँ' की रट लगा स्वातिकी अमृत-बूंदोंके लिए निर्निमेप दृष्टिसे आतुर रहता है, चकोरी चॉदपर निछावर होनेके लिये बौरा जाती है, और प्रोपित-पतिका, रातकी उनींदी घड़ियोंमें घड़ी घड़ी चौककर अपने प्रीतमके प्रत्यागमनकी मजुल प्रत्याशासे द्वारकी ओर झॉकती है,- वैसे ही विश्व आज मेरे गीत सुननेके लिये व्यग्र है ! मेरे हृदयके पावन रक्तसे पले गद्य-गीतो माताकी गोद, और वालापनका आशियाना छोड़कर साहित्यके आनदमय अनत गगनमें, अपने स्वर्णिम पख फड़-फड़ा, हुलस हुलस, ऊँचे उड़ो, और अपनी सङ्गीत-लहरीसे अपने प्रेमियोंको मन्त्र- मुग्ध करो! सहृदय ससार तुम्हारा उसी भुवन-मोहिनी मुसक्यानसे स्वागत करे जिसे मैं अपने प्रेमीके अधर-सम्पुटपर देखनेके लिये सदा लालायित रहती हूँ !!

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मैं तो चाकर प्रेमकी,
प्रेम, तू ही विश्वमें महान् सत्य, पूर्ण सौन्दर्य और
चिरन्तन प्रकाश है,
तेरी चरण-पादुकाने ही इस पृथ्वीको पवित्र तीर्थस्थान
बनाया है जिसके रज-कणका तिलक अपने भालपर लगानेके
लिये देवता भी उत्सुक रहते है,
करियोने अनादि कालसे तेरा ही गुणगान किया है, तू
ही कविताका आदि स्रोत है,
शहीदोंने तेरी दीपर जीवन न्यौछावर कर मृत्युको मुक्तिका
राजमार्ग बना दिया है,
चिरजीवन और चिरमृत्युका मधुर मिलन तुझमें ही होता
है,-तू ही मृत्यु और मृत्युञ्जय है,
मृत्यु, तुझमे नवीन जीवन अन्तर्हित है, मैं तेरा स्वागत
करती हूँ,
जीवन,-रहस्यमय जीवन,-वह प्रदेश जहाँ स्वर्ग और
भूतल क्षणभरके लिये मिलते हैं, मैं तेरी ऐश्वर्य-भरी निधिसे
मेरे आराध्यके पदाम्बुजोपर चढ़ानेके लिये यह अनमोल भेट
लाई है।
मैं तो चाकर प्रेमकी!
.
,
एक

मौक्तिक माल २ ऐ बुत, चाहे ठुकरा, चाहे प्यार कर; तेरी परस्तिश मेरा मजहब है, तेरा जिक्र बज्मे शोअरामें करना मेरा शेवा है, तेरा हुस्न मेरे शिवालेका उजियाला है, तू मेरे जीवनमे तूर पर्वतका प्रकाश है, तेरी गुलामीकी सनद मेरे सौभाग्यका अमर पट्टा है; तेरे नक्शे कदमकी जियारतें मेरे काशी और वृन्दावन,- मका और मदीना, हैं, तेरे गुलशनको अपने खूने जिगरसे सीचूं, यही मेरी एक आरजू है और- तेरी स्मृतिमें तमन्नाए वफा लेकर हँसते हँसते मरना ही मेरे जीवनका महान् गौरव-चिह्न है, ऐ बुत, जी चाहे प्यार कर, जी चाहे ठुकरा!

३ तुम सौन्दर्य हो, और मैं तुम्हारी सुनहरी अलकोंसे झड़ने- चाली सुगधित धूरि है जिसे देख पराग लज्जासे पीला पड जाता है! जब केवड़े और गुलाबके निर्मल जलसे स्नान कर, गोपी- चन्दनका तिलक लगा, पूजा-गृहमें श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने आते हो, मैं सरस्वतीका साकार रूप बनकर तुम्हारी स्तुतिमें समा जाती हूँ! पुरातन पुजारियोंका ज्वालामुखी फूट पड़ता है !जब सुरा-सुन्दरीका अधरामृत पान कर राजराजेश्वरकी तरह झूमते हुए इन मणि-मुक्ता-जटित महलोंमें प्रवेश करते हो, तब राज- रानी बनकर तुम्हारे आह्लादित यौवनकी साध बन जाती हूँ !! यौवन-गर्षितायें तिलमिला उठती हैं ! परन्तु, जब तुम प्रियतम बनकर कविकी कल्पनासे परमेश्वर वन जाते हो, तव मैं प्यासे, थकित, कान्तिहीन नयनोंसे चिरभिखारिनकी तरह तुम्हारे उपासकोंसे दर्शनकी दयनीय याचना करती हूँ!!! " तीन

मौक्तिक माल
दुरङ्गी दुनिया व्यगका कठोर ठहाका मारकर किलक
उठती है।
इसीलिये कहती हूँ,-तुम सौन्दर्य हो और मैं केवल
उसकी धूरि !!
४
क्या ससार तेरे त्रैलोक्य-ललामभूत सौन्दर्य और तेरे प्रति
मेरे अगाध अनंत प्रेमकी पवित्र स्मृतिको यों ही विसार देगा?
तू इद्रके नदन-काननमें प्रवाहित होनेवाली मदाकिनीके
हृत्-पटलपर विकसित होनेवाला नील कमल और, मैं उसकी
मलयानिल-ताड़ित तरल छाया और प्रकाशकी भग्न किरण!
चार

भूले पथिक, पियाके घरकी गैल पूछते हो? मनोवृत्तियोंके घने कटकाकीर्ण जगलमें फेंक फूंक कर पॉर रखते हुए अपनेको प्रलोभनोंके नर-रक्त-लोलुप हिंसक पशुओंसे बचाना, प्रेमकी डोगीपर बैठ सात समदर पार मरकत द्वीपमें पहुँचना जहाँ अनिंद्य सुन्दरी रानी मायावती राज्य करती है। तुम उस फरफन्दीके कपट-जालमें न फंसना, नहीं तो वह छलिया तुम्हे अपनी बलखाई जुल्फोंमें मैणकी मक्खी बनाकर कालान्तरतक कैद कर देगी, शीलकी ढाल पहन, सूरमा, सत्यके खड्गसे उसके जादूके किलेको ढाहकर दूर, और दूर, चले जाना, मार्गमें अविद्याकी घोर तिमिराच्छादित दुर्गम घाटी पड़ेगी जिसमे विषय-चिपधरोंका वास है, किन्तु हृदयमें अभय धारण कर ज्ञानका दीपक जला उसे पार करना, फिर, दारुण विरह वेदनाका अगार-बिछा ऊबड़-खाबड़ गगन- चुम्बी पहाड़ विश्वासके वलपर लाँघना । पाँच ,

मौक्तिक माल
तब तुम्हें पियाके अभ्र-शृग महलका गुम्बज कोटि सूर्योकी
प्रभाको लजानेवाला अमल-धवल-अगमके देशमें दिखेगा,
द्वारपर जा तुम अलख जगाना तो प्राण-पियारा स्वय ही
तुम्हारे स्वागतको दौड़ेगा,
और उसके स्पर्श-मानसे तुम्हारी यात्राके सब कष्ट काफूर
हो जायेंगे,
भव-भवकी वाधा मिटेगी !
भूले पथिक, पियाके घरकी गैल पूछते हो ?
६
शाहजादीकी मजारपर, हाय ! अब
पृथ्वी सिर्फ कोमल दूर्वादल और पुष्प चढ़ाती है,
चयार सुगधित द्रव्योकी धूप भेंट करती है,
चाँद और तारे ज्योतिके चिराग जलाते हैं,
और बेचारा आसमान शबनमके आँसू रोता है !
न

७
'दिनेश कौन थी
-ससारके पुराने पड़नेपर कोई पूछ बैठे।
विधनाके विधान ठीक उतरेंगे,
शताब्दियाँ सौम्य सौन्दर्यसे इठलाती हुई आवेगी और
निकल जायेंगी!
एवम् ,
अनत यौवन, मुक्त प्रौढ़ और जीर्ण जरा झेंप कर
चली जायगी,
दिव्य प्रेमकी परिमल-किरण ससारकी छिन्न थातीको
सुनहले रङ्गसे रागमयी करेगी !
तब,
ससारके पुराने पड़नेपर कोई पूछ बैठे-
'दिनेश कौन थी?'
सात

मौक्तिक माल
मैं तुमसे प्यार कैसे करू
मैं फूलों-बिछे मार्गपर गिन-गिनकर तालसे कदम रखने-
वाली ऐश्वर्य-रानी हूँ, और तुम,-मेरे दिव्य प्रेमीकी स्वर्णिम
पादुकाके नीचे पिसकर धूल बन जानेवाले तुच्छ रज-कण !
मैं रत्नाकरकी विशाल शय्यापर सोई हुई उष्ण प्रलयके
सामयिक तूफानको रोकनेवाली महान् शक्ति हूँ, और तुम,-
मेरे कदापि न पिघलनेवाले हिमाचल-स्वरूप उपास्यसे
टकरानेवाले क्षुद्र बुलबुले!!
मला बताओ तो,
मैं तुमसे प्यार कैसे करूँ?

मेरे साकी,
घड़ियोंपर घड़ियाँ बीती जा रही हैं, और मैं निर्निमेष
नेत्रोसे द्वारकी ओर देखती रहती हूँ।
दीवालपर छाया-चित्र बनते और बिगड़ते जाते है, और
कूचेमें पथिकोंकी पद-ध्वनियाँ सुनाई पड़ती है।
हृदयकी धड़कनकी भॉति आशा और निराशा मेरे
अतस्तलमें अपने पख फड़फड़ाती है,
देख तो,
इतने मनुष्य घर लौट रहे हैं, और
केवल तेरा ही अब तक पता नहीं !!

मौक्तिक माल
तेरे प्रेमकी अन्तर्जालाने मुझे जला जला कर राख कर
दिया जिसे वायु इधर-उधर उड़ाती है,
तेरे लावण्यकी तेज तलमारने चमक चमक कर मेरे दिलके
सौ सौ टुकड़े कर दिये, जिन्हें तेरे बाज़ और शिकरे बड़े
चावसे चुगते हैं,
किन्तु, मेरी अजर आत्माका प्रकाश तुझमें ऐसा समा गया
जैसे फूलमें सुगन्धि, अथवा,
वीणाके तारोंमें लय !
रात्रिके सूने मन्दिरमे तारक प्रकाश और कोमल पुष्प मेरे
अथाह प्रेमको पावन करें!

पछी, तू कौन देशसे आयो ?
मै अगमका राजहस हूँ,
इस बालुका-मय प्रदेशमे उड़ते उड़ते मेरे पख झुलस
गये हैं,
गम-कण चुग नयन-नीर पीते पीते मेरा पीन कलेवर
क्षीण हो गया है,
चकित मुग्धे, तुमने तो इस छोरहीन मरुभूमिका सब
रस खजूरकी तरह अपने हृदयमें ही सचित कर रखा है,
मेरे आतिथ्य और अभ्यर्थनाके लिये दो बूंद न दोगी? मै
अघा जाऊंगा,
आजका रैन-बसेरा तुम्हारे ही मन-मानसमें करने दो,
भोर होते ही पश्चिमकी राह लूंगा जो रात और दिनके
परे है,
और जहाँ प्रेम-घन उमड़-घुमड़कर अखण्ड आनदकी
वर्षा करते हैं!
पछी, तू कौन देशसे आयो ?
ग्यारह

मौक्तिक माल
१२
.
मैने वेद-वेदान्त, पोथी-पुराण, श्रुति और शास्त्र छान
डाले, प्रवृत्ति और निवृत्ति, कर्मकाण्ड और सन्यास, कुफ
और इस्लामके भिन्न भिन्न मार्गीका अवलम्बन कर
मतमतान्तरके प्रदेशोंका भी जर्रा जरी शोध लिया, स्वर्ग और
नरक, भूतल और तलातलके रहस्योद्घाटनमें घण्टों गुजार
दिये, साधु और सूफियों, पीर और पैगम्बरोंकी सङ्गतिमें
ईश्वरवाद और अनीश्वरवादकी चर्चा चला दिन और रात एक
कर दिये, फिर भी,
उस महबूबका कुछ भी पता न पा सकी !
भूख और प्यास, राग और द्वेप, काम और क्रोधसे
छटपटाते हुए ससारको जब मैं मिथ्या समझ, मनुष्यको
केवल खाकका पुतला मान, हताश हो जाती हूँ तो सहसा
मेरी आत्मा बाल उठती है,
क्या मानवी ऑखें ईश्वरके अतुल तेजको सह सकती है ?
क्या मानवी बुद्धि उसकी अनत प्रेरणायें समझनेकी क्षमता
रख सकती है ? क्या तेरा सीमित मस्तिष्क उसकी अनत
महिमाको जान सकनेका दावा कर सकता है जिसका भेद

-
शेष ओर शारदाने अनादिकालसे गुण-गान करते रहनेपर भी
न पाया?
पगली, प्रेम और विश्वासका पथ पकड़, तू सीधी उसके
सिंहासन तक पहुँच जायेगी।
मैंने वेद-वेदान्त, पोथी-पुराण, श्रुति और शास्त्र छान
डोले तो भी मैं उस महबूवका कुछ भी पता न पा सकी !
.
१३
अविश्वासके ऑचलमे ऊँधते हुए विश्व,
भला तेरे पैर पखारने मैं क्यों आई?
मुग्ध चुम्बनसे उद्वेलित! तेरे जालसे निकलकर मैंने
अनजानमें विराट् बननेका प्रयत्न किया है !
विश्वपति, यदि मेरे बिना उसे अनाथ होनेका डर है,
तो तेरी ऋचा इतनी जटिल क्यों ?

मौक्तिक माल जब राग-द्वेपभरे जीवनसे मन उचट जाय, सौन्दर्य और सुरासे ऊबकर मृत्युकी बाट देखें, प्रकाश और पुप्प अधकारमें विलीन हो जायें,- और जीव अनत कालरात्रिके अज्ञात, परन्तु, रहस्य- भरे द्वीपोंका अन्वेपण करनेके लिये प्रस्थान करे, तब, तुम्हारी रूप-माधुरी मेरे मृत्यु-उनींदे नयनोमे समा जाय, तुम्हारे चिरतन प्रेमका मगल-प्रदीप मेरी महायात्राका बीहड पथ आलोकित करे, और उसकी सुनहली स्मृतियाँ मेरा पाथेय बनें ! १५ नंदजूके द्वारपर खड़े रहकर वृपभानु-ललीने यह प्रार्थना की, "ओ निद्रित ससारके सरक्षक दिक्पालो, उस मवुर शय्याकी रक्षा करना, जिसपर सोकर मेरा मुग्ध प्रेमी मेरे स्वप्न देखता है।"

१६ः
शाहजहोंने अपनी प्रियतमा मुमताजको चिरस्मरणीय
बनानेके लिये ताजका निर्माण किया,
प्रेमके इतिहासमें अमर होनेके लिये लैला-मजनू एक
हो, गये,
हजादी शीरीका प्रणय-पात्र बननेके लिये फरहाद
मर मिटा,
प्रेमको भक्तिका अचल रूप देनेके लिये राजरानी मीरा
दर-दरकी दिव्य भिखारिन वनी, दीराना मन्सूर प्रेमी बननेके
लिये, अनलहकका राग अलाप, हँसते-गाते शूलीपर
चढ़ गया,
पुराने अफसानोंको नया करनेके लिये मैंने तुमसे प्यार
किया, और,
उल्फतके अगारेपर आई हुई राखको मैंने अपने प्रणयकी
कसे उड़ाकर उसे फिरसे जगमगा दिया !
,
पन्द्रह

मौक्तिक माल
यामिनीके कोमल अधकारमें तुम मेरे प्रसूतिका-गृहमें
प्रवेश कर मेरे भालपर क्या लिख गई, विधना ?
तुम विश्व-नियताकी रचना-प्रणालीसे अनभिज्ञ थीं, और
तुमने मेरे भाग्य-पटलपर ही प्रथम कलम चलाना सीखा था,
विश्व-सूत्रधारकी निर्भीक आलोचनासे घबड़ाकर तुम उठ
वैठी, और तुम्हारे महावर-लगे पदाम्बुजोने सियाही उलट दी,
सुलेख मिट गये, -अब मैं विश्व-पतिके श्वेत वक्षःस्थलका
वह सियाह वब्बा हूँ जिसकी ओर ससार घृणाकी अगुलीसे
संकेत करता है !
मेरे भाग्य-पटलपर क्या लिख गई री विधना ?

१८ जगके अभिशापसे जब प्रलय-प्रसून झड़ जायें, वसंतके आनेपर भी कोयल न कूजे, नायकके पुप्प-शरोंसे उल्कारानीकी तरल मूर्छा न टूटे, और समयकी परिवर्तनशील गति स्थिर हो जाय तव, मेरे साकी, सम्भव है, तुझसे कोई पूछ बैठे, वे कौन थे?" ठीक उसी समय तुझे थरथरानेके लिये कठोर आकाश- वाणी होगी, परन्तु, तू अपने प्रति मेरे अखण्ड स्नेह तथा चिर-विश्वासको स्मृतिमे रख, अपने आपको सुराके स्निग्ध ऑचलमें छिपा, इतना तो कह देना,- वह प्रेमको पीड़ाके जर्जर जीवनमें छिपाकर पालनेवाली सरल पुजारिन थी और वे उसी स्नेह-पूजित शिशुका सहार करनेवाले, चतुर सहार-कर्ता !!" सनह

मौक्तिक माल
१९
शान्तोद्यानमें सुनहली धूप पत्तोंकी छायासे ऑखमिचौनी
खेल रही है,
देखते देखते शीतल मद सुगधित पवनने मार्गमे गुलाबकी
पंखुड़ियाँ विखेर दी,
अब चद्र-शुभ्र तितलियाँ निखरे आकाशमें हृदयोल्लास
भरकर उड़ रही हैं,
और मेरे प्रीति-सुधा-स्निग्ध हृदयमें प्रेमके प्रवाल-रक्त
अधरोंपर मॅडरानेवाली मद मुस्कानका मधुर स्वप्न रह-रहकर
झूम रहा है।

२०
-
यात्रा कर घर लौटनेपर भी मेरे पैरोंको उस समयतक
विश्राति नहीं मिलेगी जब तक मै उसी ड्योढ़ी तक नहीं
पहुँचूंगी जहाँसे मै तुझसे विदा ले, बिछोहको रोम-रोममें रमा,
आई है!
सुरभित सुमनोद्यानमें, यौननकी प्रथम सध्याको, हँसते
हुए अधकारमें गन्धर्वराज मुझे वीणा बजानेकी शक्ति देंगे
और तू--
उस सुनहली गोधूलिके झीमते हुए धुंधले प्रकाशमें, वह
चिरपरिचित सङ्गीत सुनकर, चौक पड़ेगा!
तब,-पागल ।
दीपक हाथमें ले, सङ्गमरमरके श्वेत द्वारपर, मेरे स्वागतको
और मै
उस ऐंचभरे प्रत्यागमनकी प्रशसामें कुछ गाकर तुझे
मतनाला बना दूंगी।
-
दौड़ेगा तू,
उन्नीस

मौक्तिक माल २१ सिरजनहारके अदृश्य हाथोंमें ब्रह्माण्ड, मालाके मणियोंकी नाईं, फिरते हैं, पाखण्डी पण्डितो और दीनके दीवाने मुल्लाओ, आँख उठाकर जरा देखो, सोचो और गौर करो ! क्या तुम मत- मतान्तरके झगड़ों और मजहबके पुराने फितनोंको एक बार ही सदाके लिये नहीं दफना सकते ? खुदपरस्तीको खुदा-परस्तीका रन दे क्यो अपने अन्धे अनुयायियोंको इस मुहब्बतके शिवालेको ढाहनेके लिये उत्तेजित करते हो? ईमान वेचकर अपनी पाक रूहको शैतानके हाथों सोप अगर तुम कुबेरका खजाना भी पा गये तो वह कयामतके दिन क्या काम आयेगा। अल्लाह इस कुफ और मुसलमानी दोनोपर बरबस हंसता है, और आंसू बहाता है। उसके क्रोधसे अपनेको बचाना । या रब, इन मूर्ख पर मक्कार गुनहगारोंपर रहम कर। सिरजनहारके अदृश्य हाथोंमें ब्रह्माण्ड, मालाके मणियोकी नाई, फिरते हैं। ,

२२
रजनीके अवसान-कालमें, जब प्रभातकी धूमिल रेखाये
खिंच आती है, मेरी तन्द्रा टूटती है, और,
मैं किसी सुदूर अतीतकी भूली हुई स्मृतिमें बेगानी हो
जाती हूँ, हृदयके मूक भाव ऑखोंमे प्रतिबिम्बित होते हैं,
और उन्हें पढ़कर मेरा प्रीतम कुछ खिन्न-सा हो जाता है,
विचार-धाराके इस प्रवाहको वह थाम नहीं सकता कि
भला, उसके पार्श्वमें रहकर मै कौन-सी अलभ्य वस्तु-विशेषकी
वाछा कर सकती हूँ ? मेरे आत्मसमर्पणमें उसे सहसा सदेह
होता है, किन्तु, उसके विश्वासको दृढ बनानेको मैं कहती हूँ,
तू तो उस प्रेम-मूर्तिकी छाया मात्र है।
वह सुनकर सन्न हो जाता है।
रजनीके अवसान-कालमें किसी अतीतकी भूली हुई स्मृति में
बेगानी हो जाती हूँ!
१
.
इक्कीस

मौक्तिक माल
२३
सुपमाभरी सध्यामें, जब मै दिन-भरकी क्लान्त वेदनाको
विश्राति देनेकी आतुरतासे उडनेवाले गगन विहारियोंको अपने
नोड़ोंकी ओर उडते देखती हूँ, तब न मालूम क्यों मृत्युका
काला रुदन गगनकी गरिमामे छाकर मुझे बेबस बना देता है।
निर्मम रात्रिके अचल अधकारमे जब मै अपने सुख-स्वप्नोंको
सजीव करनेके लिये कर-पल्लवमें खिंची विधनाकी टेढ़ी-मेढी
रेखाये मिटानेकी चेष्टा करती है तब सहसा न मालूम कहाँसे
तमचुर बोलकर मुझे प्रात कालका आभास करा देता है !
२४
प्रेमी, तेरे चरणोंपर मैने क्या नहीं चढ़ाया ?
पुलकित प्रार्थना और प्रशसाका कोमल आनंद,
यौवनोन्मादित दिनोंका विकसित माधुरी-मञ्जु कविता-पुष्प,
रहस्यमयी आशा, आकाक्षा, और स्मृतिक सुनहले स्वप्न,--
मृत शोकातुर वर्षांकी विभावरी मनोवेदना, उच्छ्वास ओर
आँसू, शोक और भय,-
प्रेमी, तेरे चरणोंपर मैने क्या नहीं चढ़ाया
--
2

२५
मेरे सुनसान यौवनकी अशान्त घड़ियोंमें यदि तुम्हे पा जाऊँ
तो कोटि कल्पोंतक सूर्यको आँचलकी आड़में कर प्रकाशको
बाँध रक्खू,
बिछुड़नकी निपम वेदनाको भूल जानेकी चेतना आने तक
जगतको सुपुप्तिका स्वप्न दिखाऊँ,
निरतर जीवनका भक्ष्य लेनेवाली भूखी मृयुको हृदयका
उष्ण रक्त पिलाकर विस्मृतिके पर्देमें आश्वासन हूँ,
जीवनमें एक बार तुम्हें पा जाऊँ तो रचयिताकी उल्टी
रस्मोंको बदल कर स्वय ऋचा बन जाऊँ !
२६
मुझपर फलोकी वर्षा न करो, देव,
मैं तो तुम्हारी अनत दयाका भार वहन करते करते
झुक गई हूँ,
मुझे वैभवका दान न दो, दिव्य,
मैं तो तुम्हारी यौवन-परछाईंका ओज देखकर ही इठला गई हूँ,
मुझे अमर होनेका वरदान न दो, वरदाता,
जीवन देख कर ही जीनेसे अघा गई हूँ!
तेईस
मैं तो तुम्हारा

मौक्तिक माल
२७
सन्ध्या होते ही में सरोवरपर जा बैठी,
बिना सावनके ही बदरिया झुक आई,
और वर्षा प्रारम्भ हुई। बड़ी बड़ी बूंदें आकाश-मोतियोंकी
तरह उछलती, नृत्य करती, और पानीमें मिल जाती । मै
देखती रही, और मल्लार गा-गाकर रागिनीको लहरोंमे
रमाती रही।
सुहावनी सध्या धीरे धीरे नीरव रजनीमें बदल गई। युवती
अधरीने शय्या बिछाई, मेघने अलके बिखेरकर शयन किया,-
मेरे पीछे दामिनी छिप छिप कर उसे निरखने लगी और
अकेला पाकर मीठी मुसकानसे उसे रिझाने लगी।
समय पाकर उसने सकेत किया,
वह गई,
उसने प्रथम चुम्बनके साथ आलिङ्गन भी किया, ऐसे
अभिसारको निहार कर मैं हँस पड़ी।
उसने सुना, वह झेंपी, मुसकराई, और फिर मुझीपर
इट पड़ी।
चौबीस

२८
,
विदेशके लम्बे प्रवासको समाप्त कर जब तुम घर लौटो,
तो इस कुटियाको पावन करना न भूलना, जहाँके जलते
हुए चिरागको गुल कर, रक्तके तिलकपर मोतियोंका शृगार
सजा, चेतनाहीन यौनमें प्रणयके प्रथम चुम्बनका उन्माद
चढा, विदा हुए थे।
तुम्हारे गमनमें उत्साहके आकुल पर लगे थे, और मेरे
हृदयमें वेदनाका अथक यार उठ रहा था। मैं न पूछ सकी,
तुम कहाँ चले और फिर कब लौटोगे ?
,
पर,
तबका प्रदीप बुझा पड़ा है, और मैंने उसे अपने आप
प्रज्वलित करनेकी कल्पना तक नहीं की है !
प्रवाससे जब घर लौटो तो इस कुटियाको पालन करना
न भूलना!
पच्चीस

मौक्तिक माल
२९
मुझे ठुकरानेवाले, तेरा जीवन प्रकाश-पूर्ण हो, सदैव
तू सानद सुरभित प्रभातका अभिवादन कर, परन्तु,
भाग्यका घूमता हुआ ताण्डवकारी राजदण्ड किसे छोड़ता
है? कालके कुटिल चङ्गुलमे फँसकर कहीं तू अपनी उभरती हुई
विभूतियोंसे बिलम जाये,-वचित हो जाये, तब सम्भव है,
भूले भोगी,-
सम्मान हॅसी, और जीवन भार प्रतीत हो, मित्र शत्रुकी
गरज पालें, और हृदय-हीन ससारके लोलुप श्वान तेरी
आत्माके वीतराग-पटपर कालिख पोते,---उसे घेरकर घोर
घृणाका भयकर चीत्कार करे,-तब हॉ, तब सम्भवत
मेरे प्रेमी, तुझे यह सूझे,-
'उस पार मेरा एक स्नेही है, निर्वासित हृदय है !'
मैं नितान्त अकेला ही क्यों न होऊँ,-मेरी सात्वना और
सराहनाके लिये भले ही कोई क्यो न हो, परन्तु,
ससार-सागरके उस पार मेरी डोंगीकी रखवाली करता
हुआ एक अभिन्न है,
जिसका मुझमें अखण्ड विश्वास है,
वह मेरी अनत यात्रामे अततक अवश्य साथ देगा !
छब्बीस
.

३०
अलमकी फौजने मेरा गुलशन उजाड़ दिया !
कहाँ गये वे मधुप जो इठला इठला कर मेरे चमनकी
कलियोंका रसास्वादन करते थे ?
कहाँ अतर्हित हुए वे बुलवुल जिन्हें यह उल्फतका उद्यान
था सदा मुवारक, और जहाँ गूंजता था रात और दिन
प्रेमका राग उनकी जवाँसे ?
कहाँ बसती हैं अब वे सूरते जो इस बोस्तॉमे झूम-झूम
कर चॉदके प्यालेमें अगूरका आसव पी पी कर वेसुध हो
जातीं थीं?
ऐ मेरी बिगड़ीको बनानेवाले,
अगर मैंने मौसमे बहारमें, अपने शबाबमें, तुम्हें अपनी
प्रेम-वाटिकामें, सघन वृक्षोंकी शीतल छायामें, तुम्हारे जीवनकी
अलसायी दोपहरीमें, सोने दिया, और पत्र-फल-फल और अर्यसे
तुम्हारा आदर-सत्कार किया, तो, वल्लाह, क्या हुआ,-
कोई स्मृतिके योग्य सेना तो थी नहीं ?
मेरी जुस्तजूमें अपनेको बर्बाद न करो,
मेरे पास अन सिना खारोंके बचा ही क्या है !
अलमकी फौजने मेरा गुलशन उजाइ दिया !
सत्ताइस
-
.
in
511

मौक्तिक माल
३१
.
सॉझकी भरी बेलामें जब सूर्य, गिरि-शिखरोपर द्रवित
प्रकाशकी निरिणी बहा, अपना किरण-जाल समेट, क्षितिजके
ऑचलमें रैन-बसेरा ले,
कमल अपनी कोमल सुगधभरी पखुड़ियोंको बंद कर प्रशात
सरोवरकी मञ्जु जल-राशिपर दिन-भरकी क्लातिसे व्याकुल
हो धीरेसे दुलक जाय,
नृत्य-कला-विशारद मयूर भी सूर्यास्तके सात रङ्गोको
अपनी पूँछमें गूंथ किसी सघन वृक्षकी ऊँची डालीपर गहरी
विनातिकी खोजमें ऊँघने लगे, तब,
प्रीतम, तुम भी अपने वैभवका अत कर मेरे सुगधि-सिंचित
केग-कलापमें आ रात व्यतीत करना,
मेरे वक्ष स्थलमें आहिस्तेसे आ छुप जाना, वहाँ तुम्हारे
झुलसे गात और जीर्ण आत्माको उपाके स्वर्ण-युग तक
अनिर्वचनीय शान्ति प्राप्त होगी।
अहाईस

३२
.
भूलन हेतु पढ़ो,'-किसी प्राचीन कालके पण्डितका
कथन है,
निर्दयी विधाताकी क्रूर कुटिल चाले, दिव्य देवताओंकी
मुग्ध मानवोंके प्रति अगाव घृणा,भूल जाओ ।
काल शीघ्र इस कहानीका अंत कर देगा। रुधिरके ठढे
पड़नेके पूर्व माधवीकी प्याली भरो, अलसाये हुए सौन्दर्यके
मधुर चुम्बनसे, रक्त-कनेर-से कोमल अधरोंसे, नागिन-सी
लटोंसे, भूलकी शराब तैयार करो !
किन्तु,
तू मेरी प्याली भरेगा, मेरे साकी, पृथ्वीको अनत सुपमा
और आह्वाद ही मदिरा होगी। सत्य और शाति, प्रेम और
पवित्र आनदके दिव्य छूटमें भर भर जाम पीऊँगी!
मुझे क्या भूलना है---
तुझे देखते ही मैं अपनेको भूल जाती हूँ!
"
उन्तीस

मौक्तिक माल ३३ अखिलके विश्वासशून्य पटलपर मुझे सुलाकर न मालूम तुम कहाँ जाओगे। सङ्ग-तराशकी मेहनतपर रहम खाकर समयके पूर्व ही दिवाकर डूब जायेगा, मृणालिनी मधुकरको अपने हृदय-कोशमे कैद कर प्रणयके सुखद स्वप्न देखेगी, मूंदे नेत्र खोल उलूक धूम मचावेंगे, निशिगधा खिलकर मेरे विस्मृत आनासमें स्मृतिकी विष-बूंदें छीट देगी, मानव आकृतिमें तुम्हें खोजती खोजती स्वय खो जाऊँगी, और सब होगे, केवल तुम ही न होगे । हाय ! अखिल- विश्वके विश्वास-शून्य पटलपर मुझे सुलाकर न मालूम तुम कहाँ जाओगे! . .- , तीस

मुझे कहाँ चल्नेका सकेत करते हो, अज्ञात ' सर्वत्र
अभेद्य अन्धकार है,
मेघ-सघन आकाशमें एक-आध तारा गोरेनारीबॉके बुझते हुए
चिराग-सा टिमटिमा रहा है, और मार्ग है मेरा अपरिचित ।
तुमने तो असमयमें ही कूचका डका बजा दिया, अरे,
मिलनकी मधुर घड़ियोंमें यह कठोर नाद कैसा ?
क्रूर, न हॅसो, इस सुहावने समयमें मुझे तुम्हारा यह
विद्रूप हास्य नहीं भाता ।
हाय । अभी तो कुशल-क्षेम भी न पूछ पाई थी कि तुम
काल-दूतकी तरह आ उपस्थित हुए। यौवनकी सुपमा समाप्त
होनेतक मैं तुम्हारे संकेतकी अवहेलना करूँगी।
मुझे चलनेके लिये वाध्य न करो, अज्ञात, मैं तुम्हारे पैरों
पड़ती हूँ।
इकतीस

मौक्तिक माल ३७ पके आमकी तरह मृत्युकी गोदमें टपकूँगी ! शैशवके सहज स्नेहकी अमिट स्मृतियॉ, अचेतन मुग्वाका अथक प्रेम और उसकी श्रुति-मधुर सुनहली कहानी, रूपगर्वित यौवनका स्वमिल परिमल और असीम विरह-वेदना, प्रौढ़का जीवन-मन्थनसे निकला हर्ष और विपाद, विफ और अमृत, और, जराका ज्ञान,-नहीं नही अभिशाप, जीवन-तरुके इन प्रसूनोंको अपनी झोलीमें भर पके आमकी तरह मृत्युकी गोदमें टपकुँगी! ३८ मेरे प्राण तुम्हारे बिना कैसे जीवित है ? बिना ही सनेहके तारे जलते हैं, बिना ही काष्ठके निरतर चिन्ता सुलगती है, धधकती चिताये बिना ही नीर शीतल हो जाती है, स्थूल साधनोंके बिना भी सुन्दर सृजन होता है, सकेत- कर्ताके अज्ञात होनेपर भी मृत्युका कार्यक्रम नियमित होता है, ऐसे ही तुम्हारे बिना भी मेरे प्राण जीवित हैं। चौतीस

३९
मुझे मृत्युसे भय लगता है क्योंकि मेरा जीवन-घट पापोंसे
भरा है,
मै प्रायश्चित्तसे दूर भागती हूँ क्योंकि मुझे स्वर्ग-सुख
भोगनेकी वाछा नहीं,
मुझे उसे अपना कहनेमे भी सकोच होता है क्योंकि मेरे
प्रणयमें स्वप्रेरणाओंका आधिक्य है,
मैं उसके निकट जानेसे घबराती है क्योंकि उसके
सहवासकी सुख-कल्पना-मानसे सिहर उठती है!
,
हमारी सङ्गीत-लहरी कोकिलको मुग्ध नहीं करती, किन्तु
उसकी कूजन सुन हम क्यों झूम उठते हैं ?
हमारा वस्त्राभरणालकृत सौन्दर्य बसतमें प्रकम्पन उत्पन्न
नहीं करता, फिर भी हम उसके आगमन-मात्रसे क्यों बेसुध
हो जाते है ?
मृत्यु जीवनकी अपहेलना और उपहास करती है, तो भी,
न मालूम, क्यों पल-पलपर वह निगोड़ा अचरजभरी उत्कठासे
उसकी ओर खिंचता जाता है।
पैतीस
,

मौक्तिक माल
स्मशानके नीरव हृदयपर बैठकर बुलबुलने गाया,
'कुमुदिनी निस्तब्ध रजनीकी भ्रमर-काली पलकोंमें सुरमा
सार रही थी,
'चॉद ज्योतिके ऑचलमें छिपा तारिकाओंसे गगन-मण्डलमें
क्रीडा कर रहा था,
'मैं पुप्पोंका चूंघट निकाल संकेत-स्थलपर अभिसारके
लिये चली,
चार ऑखें होते ही मै झेप कर ठिठक गई,
'उभरते हुए प्रेमोद्गारोंका उलहना देनेके पूर्व ही सुरभित
श्वासमें श्वास मिलाकर उन्होंने पूछा, क्या चाहती हो ?
'मैंने रोमाञ्चित हृदयको थाम कर कहा--मृत्यु ।
'अधरसे अधर मिले,
। मैं अचेत हुई, और मेरे प्राण-पखेरू उड़ गये । वह
सुखद स्वप्न इस बुलबुलके जन्ममें भी मेरी स्मृति पटलपर
ज्योंका त्यो अकित है !'
छत्तीस

४२
मन-मृग काहे डोलत फिरे ?
तृष्णाकी तप्त मरुस्थलीपर मध्याह्नका सूर्य चमक रहा था,
तृपा-क्लान्त मृग सुन्दर क्षितिजके उस पार शीतल जलके
स्रोतपर हाँफता, चौकड़ी भरता, अपनी प्यास बुझाने चला
जा रहा था,
एक मृग-शावक-नयनीने आकाशको मेध-शीतल करनेके
लिये सारङ्ग छेड़ी,
नादका प्रेमी, भोला जीन, रागके प्रवाहमें बहता बहता
उस युवतीके निकट पहुँच गया, परन्तु, पथ-भ्रष्ट हो वह उस
विशुद्ध जल-स्रोतसे भटक गया जो उसे ज्ञानामृत पिलाकर
अनत शाति देता।
मन-मृग काहे डोलत फिरे ?

मौक्तिक माल चाँदनीमें लवलीन चकोर जब चद्गपर निछावर होनेको आकुल होता है, तब आकाशके यौवनोद्यानमें क्रीडागना तारिकायें न जाने क्यों हँसती है ! जब भौरे भोले सुमनोंको तरसा तरसा कर इठलाते हैं, तब अनतके दीर्घजीवी ज्योति विहार करते हुए भी न मालूम क्यों नि श्वास रखते हैं! जब सूने खेतमें अन्नदाता पसीना सींचते हैं, तब वे माधवीके चूंट पी, साकीके चरण क्यो चूमते और छटपटाते हैं ? जब वो आती और चली जाती है, तब हे सरोवर, तेरे तटपर, धने कुञ्जमें, न जाने क्यों मै दो पक्षियोंकी कल्पना करती हूँ, उन्हें गगन-विहारी पाती हूँ, और, यह जानकर सिहर उठती हूँ कि उनमेंसे एक मुझे देख- कर न जाने क्यों रोता, और दूसरा क्यो हँसता रहता है ! , , अदतीस

४४
पुष्प प्रस्फुटित होकर ही जीवनकी साध मिटाता है,
मुरलिका मदनमोहनके अधर-सकुलके कोमल चुम्बनसे ही
मदभरी हो प्रमुदित होती है,
कविता अपना प्रशसक पाकर ही अमर काव्यका रूप लेती है,
वालक वात्सल्य पाकर मॉकी आकृति भूल जाता है,
प्रेमी पानेपर ही रूप और यौवन अपनी पूर्ण माधुरी
प्राप्त करते हैं,
तुम्हारे हाथसे गिरकर चूर चूर होनेमें ही मेरी माधनी-भरी
जीवन-प्यालीका अखण्ड सौभाग्य है !
४५
श्रोता न हो तो भी गायक अपनी एकान्त तन्मयतामें
उडात आनदका अनुभव करता है,
पूजा स्वीकार करनेवाली प्रतिष्ठित सजीव प्रतिमा न हो तो भी
पुजारिन अपने ध्येय तक कल्पना चढ़ाकर ही तुष्ट हो जाती है,
प्यासेके लिये निर्मल नद हो, तो भी, मृग-मरीचिकाकी
ओर ही लम्बी लम्बी डगें भरनेमें विचित्र आहाद है !
,
उनवालीस

मौक्तिक माल
४६
-
गोरी, रूपसीके प्रकाशमें मोती पिरो ले!
इन चद्रमणि-सी दिव्य ऑखोंपर मत इठला जिनमें
प्रकृतिकी सत्र सुषमा भरी है,
इस धुंघराले काले केश-कलापपर भी न इतरा जो सुगवित
समीरके साथ अठखेली करता है,
तेरे गोरे गुलाबी गालोंपर भी इतना गर्व न कर जिन्हें देख
फारसके गुलाब भी पीसे बदरंग हो जाते है,
न उन अनमोल मोतियोंकी लड़ियोपर ही अभिमान कर
जो हास्यके साथ ही तेरे रक्त-अवर-गुलाबोमे धवल तुपारकी
काति लिये चमकती हैं,
रूपगर्विता, उस चॉदसे मुखड़ेपर भी इतनी न फूल
जिसकी द्युतिसे सब नक्षत्रोंकी ज्योति निस्तेज हो जाती है,
न उस सितम ढाहनेवाली मोहिनीपर ही,-जो सब
हृदयोंको तेरे बन्दी बना देती है,
गोरी, 'चार घड़ीकी चाँदनी, बहुरि अँधेरी रात,'
रूपसीके प्रकाशमें प्रेमका मोती पिरो ले!
,
चालीस

,
यहाँ मेरे सुन्दर दिन कितने शीघ्र पूरे हो जायेंगे, और
फिर मैं पृथ्वीपर कभी ढूँढ़े भी न मिलेगी।
मेरे भटकते भगवान, बताओ तो, मुझे कहाँ ढूँढ़ोगे ?
न कलकल करनेवाली कलिन्दजाके शीतल कूलपर, न वहीं
जहाँ वायु बॉसोंके सुरीले कानोमें अपनी विभावरी कहानी
कहती है, न धनी पहाड़ियोंके देवदारु-सुगधित वनमें, न
वनस्थलीपर जहाँ मधुमय मकरदके लोभी भ्रमर गुजार करते है
और रङ्गीले ग्वाल-बाल वॉसुरी बजा बजा कर अपनी बिखरी
और झूमती गउओंको गोधूलीमें एकत्रित कर घर ले जाते हैं !
मेरे माधव, कहो न मुझे कहाँ खोजोगे ?
मेरी इन बावली बतियोंकी बात सुनोगे क्या ? मैं वचिता हूँ,
जीपनकी लौ मृदुल मृत्तिकाके दीपकमें शीघ्र बुझ जायेगी,
मनोवेदना, प्रेम, लिप्सा और तप्त आँसू मुझे दग्ध कर रहे हैं।
शीघ्र ही उस अधकारसे वह सौरभ-प्रवाह मुझपर बहेगा,--
फिर ये तरल-तारिफा-कान्त किरीटेन्दु और तेजोमय तमारे
भले ही ढूँदें,-परन्तु,
-
मेरे मौला,
यहाँ मेरे सुन्दर दिन कितने शीघ्र पूरे हो जायेंगे और फिर
मैं हूँदै भी न मिलेंगी!
इकतालीस

मौक्तिक माल
४८
मेरा अतिम प्रणाम स्वीकार किये बिना ही तुम एकाकी
कहाँ चल दिये
तुम्हारे मर्माहत करनेवाले सहसा गमनसे मैं विस्मित न
हुई, अप्रतिभ न हुई, विचलित न हुई, क्योंकि मैंने जाना कि
तुम जानेका अभिनय कर कहीं छिपे हो, और मेरे रूठनेकी
आशका-मात्रसे थर्राकर पीछेसे आ, मेरे नयन मूंद, हँस पड़ोगे।
मैंने तुम्हारे इस अनत-गमनको न समझा, यात्री,
तुम तो नेह लगाकर बिना ही विदा लिये चल दिये !
.
४९
मालिन, इन अर्धविकसित बकुल कलियोको मत छेद,
ये तो मधुकरके चुम्बनसे मलिन हो चुकी हैं,
इस कोमल दूबको भी तेरी डलियामें न भर क्यों कि वह
ओसाश्रुओंसे भीगकर विकृत हो गई है,
ये बेल-पत्र भी मेरे देवता स्वीकार न करेंगे क्योंकि इनमें
भी समीरका कम्पन व्याप्त है !
मेरे उपास्यके लिये तो चाहिये अछूता उपहार । मालिन,
इन बकुल कलियोको न वेध !
बयालीस

-
गोपिका, नीर और क्षीरको मिलाकर मुझे धोखा न दे,
क्योंकि, मुझमें हसका विवेक नहीं है!
स्थावर ससारपर प्रात कालकी गो-धूलि छा गई है,
ग्वाल-बाल गायें लेकर यमुना-तटकी वनस्थलीकी ओर गये
हैं, और कदम्बकी छाँहमें ऑख-मिचौनी खेल रहे हैं,
तेरे आँगनमें ग्वालिन प्रभाती गा-गा कर उपले
थाप रही है,
मैं समयको बाँधकर तेरे द्वारे दूध लेने आया हूँ,
नीर और क्षीरको मिलाकर मुझे धोखा न दे, क्योकि
मुझमें हसका विवेक नहीं है!
तेतालीस

मौक्तिक माल
मैं अज्ञात थी!
हृदयमे राग-कलीका अर्ध-आवृत्त मुख विकसित हुआ ही
चाहता था,
यौवन-बसत शरीरोद्यानमे कातिमय लावण्यकी बहार
लाया था,
उन्मनी ऑखें अपना चाचल्य छिपानेमे असमर्थ थीं,
मन-मधुकर जीवन-बाटिकामे पुप्पोकी चाटमें इधर-उधर
मंडराने लगा
रङ्ग-बिरङ्गे सुमनोंकी शोभा दर्शनीय थी।
उपवनका वह यौवन-विहार | कुछ दूर उड़कर मेरी दृष्टि
एक अर्ध शुष्क नीरस नलिनपर पड़ गई, ज्ञात न था कि वह
सौरभ-हीन है,
हृदयका वह मूक दान!
गुलाब छोड़ा, बेला छोड़ा, और कुन्दवनकी ओर देखा
तक नहीं,
उसीके म्लान सौन्दर्यपर मुग्ध हो गई।
वह पागल पिपासा!
चवालीस

-
उसे प्राप्त करनेको हाथ बढ़ाया, सूंघनेका प्रयास किया,
तोड़कर ऑचलमें छिपाना चाहा, आलिङ्गन चाहा, मधुर
चुम्बन चाहा!
परन्तु दुर्दान्त दुर्दैव!
सहसा लाल ऑखें दिखाते हुए मालीने प्रवेश किया,
मैं ठिठककर एक ओर खडी हो गई,
क्रूर हृदयहीनकी कृपासे निराशाके अतिरिक्त कुछ भी न मिला,
सोचा था उसे सावधानीसे रक्यूँगी, और समय आनेपर
मै उसे अपने हृदय-पुष्पके साथ ही मातेश्वरीके चरणोंपर
चढ़ा दूंगी,-
परन्तु, पागलका तिरस्कृत प्यार।
उसीके चिन्तनमें डूब गई, निहल हो गई, बौरा गई,
छोटी-सी कुसम-कलिका तो थी ही !
क्या करती
,
विरह-निदाघने प्रस्फुटित होनेके पहले ही कुचल दी।
मुग्ध प्रेमियोका अतिम ध्येय ! प्रेम-पथपर काँटे बिछे,
महायात्रा प्रारम्भ हुई, पैरोंसे रुधिर बहा, परन्तु,
अज्ञानका पर्दा हटा, मैं रुकी, प्रकाश दिखा,
मैं चौंकी!
अज्ञातके ऐसे प्यारका जय-जय-नाद हो !
पैंतालीस

मौक्तिक माल
५२
अनमोल अनुपम,
क्या तू वह पका, लाल झाई लिये हुए, पीला आम है जो
सबसे ऊँची डालपर लगा हुआ है और जहाँ मुग्ध चयक
इच्छा होनेपर भी नहीं पहुंच सकता ?
फिर भी क्या मै तेरा चयन न करूँगी ? क्या तू वह
कमल कोष है जिसे गोवर्धनके ग्यालेने पैरोंतले रौंद कर
जमीनमें कुचल दिया है ?
फिर भी क्या इन पलकोंके प्रकम्पित पाँवड़ों-द्वारा तुझे मै
न उठाऊँगी
अरे ओ बेवफा,
प्रेमके मर्मको पहचाननेके बाद, प्रेमी मिले या न मिले,
परवाह नहीं पॉख हुमाकी !
छयालीम

मेरी
,
आकाशमें बसनेवाले जालिम,
तेरे जल्लादका खसर मेरे सरपर झूल रहा है, तो भी,
हकीकत तो सुन ले,
जीवन और मरणके विधाता, मुझे अमर गुलामीकी
बेड़ियोंमें जकड़ने, और तेरी अवैध सत्ताको मुझपर आजमानेके
लिये ही तो तूने विश्वकी रचना की है, फिर वता, मै तुझसे
न्यायकी आशा कैसे रक्खू ?
मेरी जबानमें तेरे जुल्मोंकी व्याख्या करनेकी शक्ति नहीं
है, इसलिये तेरे अत्याचारोंको, अब तक, मैं बिना किसी
प्रतिरोधके सहती चली आई हूँ!
ऐ सङ्गदिल, तुझे मैं कैसे दयासे द्रवीभूत करूँ?
देवता, अपने अदृश्य और सुरक्षित वर्गसे मुझपर निरतर
कुलिश बरसा ।
मैं अबला तेरे सिंहासनकी छोरहीन छायामें खडी तेरा
क्या अनिष्ट कर सकती है ? तू ही विधान, तू ही न्यायाधीश,
और तू ही सरको धड़से जुदा करनेवाला जल्लाद है,
फिर, तुझसे इन्साफ पानेकी उम्मीद रखना बौनेका चाँदको
चूमनेके लिए छटपटाना है !
संतालीस
४

मौक्तिक माल प्रेमी, तेरी आँखोंको किसकी उपमा दूं ? ओजसे उभरते हुए अरुणसे देती, किन्तु, तेरी नयन- किरणोंके सामने उस गुलाबी बिम्बकी क्या हस्ती ? प्रेमी, तेरी आँखोंको किसकी उपमा दूं ? जलजसे देती, परन्तु,-कीचड़में होनेवाले राग-हीनोंकी क्या हस्ती १ वे तो उनकी सुनहली रस-बूंदोंसे ही मुखरित हुआ करते हैं। ऋषि-मुनियोंने सुपमा-सुन्दरीके नख-शिखको जान लिया; कोविद-कवियोंने विश्वके हृदयको छितरा दिया, देवताओंने स्वर्गकी सार-हीन धूलिको छान डाला; युगयुगान्तरसे विहंगोंने अमर-स्तोत्र कलरवमें गा डाले-- परन्तु, तेरे नयनोंके लिये मुझे उपमा न मिली ! मैं हार जाती हूँ, और मुस्करा उठती है, शायद इसी भावनामें कहीं तेरे नयनोंकी उपमा छिपी है!! पचाम

प्रेमी, सन्ध्या वायु मन्थर गतिसे विचर रहा है, तब
तेरे आगमनमें क्यों विलम्ब हो रहा है ?
दिनकी कड़ी धूपमें तपे हुए तमाल शात और शीतल
अधकारमें कम्पित हो रहे है, और
सीनेतक पहुँचनेवाली बरू भी सन्ध्याके गोधूलि-कणोंमें
अपनी दोपहरकी अतृप्त पिपासा बुझा रही है-
पर मैं,-
केवल मैं ही कभी न बुझनेवाली आगमें जल रही हूँ !
निर्मम निशाने मुझे घोर विडम्बना, और मेरे बिलमाये
प्रेमीने मुझे विरहका धधकता दानानल प्रदान किया,
ओ वरदाता,
मेरी पूजाका यह वरदान भी क्या अमर न होगा ।
इक्यानन

मौक्तिक माल
५८
,
मै तो अपनी करतूतोंसे खुद ही खीज उठी हूँ, न मालूम
तुम उनपर क्यों दीवाने हो ?
इस विराट् जीवनकी जटिल गुत्थियोंको सुलझानेका प्रयास
न करो, पागल, उनींदे यौवनसे जवनिका उठाकर छिद्रान्वेपण
करनेसे तुम्हारी आत्म-तुष्टि न होगी;
प्रौढ़के कल्पना-कलित स्वनिर्मित चित्रोको देखकर तुम
प्रमुदित न हो, मेरे अर्चक, .
वे तो भविष्यको केवल भुलानेके असफल प्रयास हैं ।
मैं तो अपनी काली करतूतोसे खुद ही खीज उठी है,
न मालूम तुम उनपर क्यों दीवाने हो ।
पावन

-
ओ लीनी ललने,
ढाकेकी मलमल, बनारसके रेशमी दुपट्टे, और काश्मीरी
शाल तेरे लिये लाया हूँ जिससे तेरे दीप-शिखा-से सुरम्य
सौन्दर्यकी शोभा अनुपम हो जाय,
वासती वामा,
सुवर्णकी कंधिया, सप्तरङ्गी धागे और रत्नजटित आभूपण
मेरी मञ्जूपामें रक्खे है, देख, कही यह मत समझ जाना कि
तेरा प्रेमी खाली हाथ आया है,
और ओ कुअगलीकी चितचोरटी,
वृन्दावनसे मैं एक ऐसी मुरली लाया हूँ, जिसमें विद्याधरोंने
प्रेम, आकाक्षा और वाछा छिपाई है-
ऐसी महिमामयी मुरलिका तेरे करारबिन्दोंमें मैं
अर्पित करूँगा।
तिरपन

मौक्तिक माल ६० यौवन ! अरे उस दीदार-सा यौवन और हुस्न न कभी किसीका था, न होगा, उस सौन्दर्यको समता वे देव-बालायें भी नहीं कर सकती जो स्वर्गद्वारपर पुण्यात्माओंका पवित्र चुम्बनसे स्वागत करती हैं, उसके आकर्ण-नेत्रोंसे आनन्द, ज्योति और हास्यके फव्वारे छूटकर सबको मुग्ध कर लेते थे और उसके सहीतको सुन- कर आकाशमें विचरण करनेवाले देवदूत भूतलको स्वर्ग समझ भूलसे नीचे उतर आते थे, उस अनुपम सौन्दर्यकी स्मृति मात्रसे आज कितने स्वप्न जाग्रत् होते हैं ! उस दिव्य स्फटिक-निर्मल सरिताके पुलिनपर खड़े रहकर दो चुल्लू पानीसे अपनी अथक प्यास बुझानेका कभी मेरा सौभाग्य था, जहाँ, हाय, आज केवल शुष्क रेणुका ही सुदूर- तक फैली हुई है! यौवन ! अरे वैसा यौनन और हुस्न न कभी किसीका था न होगा। , चौवन

६१
,
'यदि विधाता फेरीनाला बनकर तेरे द्वारपर स्वप्न बेचने
आये तो, सखि, तू क्या लेगी।
'कलिन्दजाको सुदूर फैली हुई रेणुकापर शरत्-पूर्णिमाका
चाँद सुधा बरसावे,
राधिका-रमणके साथ सब ब्रजबाला मिलकर रास रचें,
'वृन्दावनके कुञ्ज और यमुना-पुलिन उस नटवरकी मुरली
और गोपियोंकी ' किंकिणि-चुरि' घनिसे कूजें,
'विकसित मल्लिकाकी सुगधसे पवन महक उठे, और
'मेरे नयन-चकोर नदनंदनकी उस छबिको निर्निमेप
निरखें-
दिलजानी मेरी, बस यही ललित स्वप्न मैं उस निचित्र
बिसातीसे मोल लेकर उस नयनाभिराम घनश्यामकी सलोनी
सूरतके विरहमें दिनरात तड़प तड़प कर अपने प्राण निछावर
करूँगी!
!"

मौक्तिक माल ६२ ६ कालिन्दीके कूलपर मोहन ग्वाल-बाल-सद बाँसुरी बजा रहे थे मुझे अकेली छोड़कर, मै तो रात रूठी थी, पर क्या करती ? अधी-सी होकर पीछे पीछे चली,- कुञ्जमें कल कूज रहा था, मुझे देखते ही वे दौड़ पड़े, और मनाते हुए बोले, " चलो रास रचेंगे। मैं क्यों जाऊँ ? बिन बोले ही अपना घड़ा उठा चल दी ! मोहन न रह सके, आखिर मोहन ही तो ठहरे ! ग्वाल- बालों-सहित चुन-चुनकर ककरियाँ फैंकी- मैं झुंझलाकर बैठ गई। मेरा घड़ा गिर पड़ा, और निर्मल जल दुलक दुलक बहने लगा; मैं चौकी, जल्दीसे औंधे घड़ेको उठा लिया, हा ! केवल चुल्लूभर पानी उसमें शेष था! विशाल विश्वमें वह चुल्ल्भर पानी ही तो प्रेम है ! छप्पन मधुमासमें भौरोंसे ढके हुए गुलाबके रङ्गमें जो ज्ञान, ओज, आनद, माधुर्य छिपा हुआ है, उसके शताशको भी, आजतक कवि-खद्योत तो क्या, कविता-कामिनी-कान्त कालिदास भी नही वर्णन कर सके हैं, वर्षाके वैभवपूर्ण आरम्भमें जो जादू हरी घासमें पचन पैदा कर देता है, वह न तो बैजू बारेकी सितारों और न तानसेनकी सगीत-कलामें ही पाया जा सकता है, बाँसुरीके सुरीले छिद्रोंमें जैसे लय मिली रहती है, और वहाँसे मस्त करनेवाला मधुर गान निकलता है, वैसे ही दो प्रेम-मिले हृदय ही इस रहस्यका आस्वादन कर सकते हैं !

मौक्तिक माल
६४
सजनी, मेरा प्रेमी बल, पौरुप, और सौन्दर्य में वृन्दारकोसा
दिव्य है, उसकी आराधना ही मेरे जीवनकी साधना है,
मेरे हियकी थाती।
आह ! जब हरे-भरे वक्षस्थलमें मेरा हृदय-पक्षी पख
फड़फड़ाता है, तब मैं उसे केवल क्षणके लिये देखने जाती
हूँ, और मेरी शब्दोच्चारणकी शक्तिको लकवा मार जाता है,
जीवनकी साधना एक बार ही समाधिस्थ हो उठती है,
मेरे अङ्ग-प्रत्यङ्गमे एक रहस्यमयी आग धू धू कर सुलग
जाती है,
मेरे विशाल लोचन प्रकाश खो बैठते हैं, और मेरे कानोंमें,
भगवान जाने, वे क्या क्या गुनगुनाते रहते हैं,
मेरे तन-मन-प्राणमें कदलीकी तरह कॅप-कपी होने लगती
है, तथापि,
बीहड जगत्की यात्रा !
अद्भुत साहस कर मुझे उसकी आराधना वैसे ही करनी
पड़ती है, जैसे महोदधिके सौन्दर्य, रहस्य, और अज्ञात द्वीपोंके
आविष्कारके लोभसे उत्साहित होकर मल्लाह मृत्यु-क्रीडित
अहावन

६७
चैती पूर्णिमाकी चारु चद्रिका धरणी-तलपर फैले, उसके पूर्व
ही, साँझकी कुन्दभरी वेलामें, वह व्योम-यानपर बैठ कर, मेरे
द्वारपर तोरण मारने आयेगा,
मै नख-शिख तक शृगार कर किखाव और जरीके बहुमूल्य
वस्त्र पहनूंगी,
और मेरे सीसपर स्वर्ण और मोतियोंका सेहरा सोहेगा,
जिसमें श्वत और रक्त गुलाबकी कलियाँ गुंथी होंगी,
चिर प्रतीक्षासे प्रेम-विह्वल होकर मैं सुमनोंसे सजी हुई
आरती उतार उसका स्वागत करूँगी, वृद्ध पुरोहित गोधूलिमें
लग्न साधेगा,
और मेरा प्रेमी भाँवरें भर, उत्कठासे द्वैतका घूघट मेरे मुखसे
खिसका, मुझे उस अज्ञात लोकको ले जायेगा जहाँसे लौटकर
फिर कोई इस जन्म-मरणकी चक्कीमें पिसने नहीं आता !
वर-वधूका वह चिर-मिलन कितना सुन्दर होगा।
,
६८
तारे एक एक कर बुझ गये, किन्तु रजनीका अवसान न हुआ !
जराके मोहान्ध प्रागणमें प्राण अटके थे, नश्वर
य

मौक्तिक माल
६६
बूढ़े ब्रह्माने मुझे अपनी रसायनशालामें पञ्च महाभूतोंको
मिलाकर निर्माण किया और फिर चाकपर चढा, मेरे भाग्यमे
न माल्म क्या टेढ़ा-मेढ़ा लिख दिया ।
इस मृत्तिकाके क्षणभगुर पात्रमें अनत जीवनकी लौ जला
उस निर्दयन मुझे संसार-समुद्रके वक्षस्थलपर पाप और प्रलो-
भनोंके आँधी और तूफानसे निरन्तर युद्ध करनेके लिये छोड़
दिया ! कहाँ वह पल-पलमे परिवर्तन होनेवाली सुदूर फैली
हुई छोरहीन गम्भीर जलराशि, और कहाँ मै नन्हा-सा दीपक !
किन्तु,
रात्रिके घने अधकारकी निस्तब्धतामे जब मै नक्षत्र-मण्डित
आकाशको निहारता हूँ तो मेरी तुच्छ सकीर्णता नष्ट हो
जाती है, और मैं बन जाता है विराट
तारे कहते हैं कि मैं उनसे बिछुड़ गया है, किन्तु, हूँ
मैं भी उस अखण्ड आनन्द-ज्योतिर्मयका ही अचल प्रकाश !
निभीकतापूर्वक उत्ताल तरङ्गों और वायुके प्रचण्ड थपेड़ोका
सामना करता हुआ, अपने ही चिरन्तन प्रकाशमें मै
चराचरके लक्ष्यकी ओर गतिमान होता हूँ, क्योंकि,--
मेरी यात्राका अन्त, मेरा निर्वाण, तो उस ज्योतिनिरखनकी
अनत लौमें अपनी क्षीण लौ मिलानेसे ही होगा।
N
साठ

६७
चैती पूर्णिमाकी चार चदिका धरणी-सलपर फैले, उसके पूर्व
हो, साँझकी कुन्दभरी वेलामें, वह व्योम-यानपर बैठ कर, मेरे
द्वारपर तोरण मारने आयेगा,
मैं नख-शिख तक शृगार कर किखाव और जरीके बहुमूल्य
वस्त्र पहनूंगी,
और मेरे सीसपर स्वर्ण और मोतियोंका सेहरा सोहेगा,
जिसमें श्वत और रक्त गुलाबकी कलियाँ गुंथी होंगी,
चिर प्रतीक्षासे प्रेम-विह्वल होकर मैं सुमनोंसे सजी हुई
आरती उतार उसका स्वागत करूँगी, वृद्ध पुरोहित गोधूलिमें
लग्न साधेगा,
और मेरा प्रेमी भॉवरें भर, उत्कठासे द्वैतका पूँघट मेरे मुखसे
खिसका, मुझे उस अज्ञात लोकको ले जायेगा जहॉसे लौटकर
फिर कोई इस जन्म-मरणकी चक्कीमें पिसने नहीं आता !
वर-धूका वह चिर-मिलन कितना सुन्दर होगा!
६८
तारे एक एक कर वुझ गये, किन्तु रजनीका अवसान न हुआ !
जराके मोहान्ध प्रागणमें प्राण अटके थे, नश्वर यौनके
एक्सट

मौक्तिक माल
बूढ़े ब्रह्माने मुझे अपनी रसायनशालामें पञ्च महाभूतोंको
मिलाकर निर्माण किया और फिर चाफपर चढ़ा, मेरे भाग्यमें
न मालूम क्या टेढ़ा-मेढ़ा लिख दिया !
इस मृत्तिकाके क्षणभगुर पात्रमे अनत जीवनकी लौ जला
उस निर्दयन मुझे ससार-समुद्रके वक्षस्थलपर पाप और प्रलो-
भनोंके ऑधी और तूफानसे निरन्तर युद्ध करनेके लिये छोड़
दिया ! कहाँ वह पल-पलमें परिवर्तन होनेवाली सुदूर फैली
दुई छोरहीन गम्भीर जलराशि, और कहाँ मै नन्हा-सा दीपक !
किन्तु,
रात्रिके घने अधकारकी निस्तब्धतामें जब मैं नक्षत्र-मण्डित
आकाशको निहारता हूँ तो मेरी तुच्छ सकीर्णता नष्ट हो
जाती है, और मै बन जाता है विराट् !
तारे कहते हैं कि मैं उनसे बिछुड़ गया हूँ, किन्तु, हे
मैं भी उस अखण्ड आनन्द-ज्योतिर्मयका ही अचल प्रकाश !
निर्भीकतापूर्वक उत्ताल तरङ्गों और वायुके प्रचण्ड थपेड़ोंका
सामना करता हुआ, अपने ही चिरन्तन प्रकाशमें मै
चराचरके लक्ष्यकी ओर गतिमान होता हूँ, क्योंकि,-
मेरी यात्राका अन्त, मेरा निर्वाण, तो उस ज्योतिनिरजनकी
अनंत लौमें अपनी क्षीण लौ मिलानेसे ही होगा।
साठ

६७
चैती पूर्णिमाकी चारु चद्रिका बरणीतलपर फैले, उसके पूर्व
हो, सॉझकी कुन्दभरी वेलामें, वह व्योम-यानपर बैठ कर, मेरे
द्वारपर तोरण मारने आयेगा,
मै नख-शिख तक शृगार कर किखाब और जरीके बहुमूल्य
बन पहनूंगी,
और मेरे सीसपर स्वर्ण और मोतियोंका सेहरा सोहेगा,
जिसमें श्वेत और रक्त गुलावकी कलियाँ गुंथी होंगी,
चिर प्रतीक्षासे प्रेम-विह्वल होकर मैं सुमनोंसे सजी हुई
आरती उतार उसका स्वागत करूँगी, वृद्ध पुरोहित गोधूलिमें
उग्न साधेगा,
और मेरा प्रेमी भॉवरे भर, उत्कठासे द्वैतका पूँघट मेरे मुखसे
खिसका, मुझे उस अज्ञात लोकको ले जायेगा जहाँस लौटकर
फिर कोई इस जन्म-मरणकी चक्कीमें पिसने नहीं आता !
वर-वधूका वह चिर-मिलन कितना सुन्दर होगा।
-
६८
तारे एक एक कर बुझ गये, किन्तु रजनीका असान न हुआ !
जराके मोहान्ध प्रागणमें प्राण अटके थे, नश्वर यौननके
एक्सट

मौक्तिक माल
कुत्सित अभिनय-चित्र मृत्युके काले अचलपर आकित होकर
मानव-हृदयको भयभीत करते थे,
भुलाये हुए भूतको स्वप्निल ऑखोंमें भविष्यकी स्वर्णिम
रेखायें दिखती थीं,
और कुटियाका निर्वाणोन्मुख प्रदीप टिमटिमा रहा था,
इसीलिये, तारे बुझ गये किन्तु रजनीका अवसान न हुआ!
मैं अलमस्त पीनेवाली हूँ, साकी, मुझे भर भर जाम पिला,
और खूब पिला!
क्या हुआ जो तेरे तरल पानीका मोल चुकानेके लिये
मेरी गाँठमें रजत्के टुकड़े नहीं हैं !
क्या हुआ जो मेरे अस्थि-पञ्जर-मात्र ककालमें तुझे रिझानेके
योग्य सौन्दर्य नहीं है।
क्या हुआ जो मेरे रतनारे निस्तेज नेत्रोमें तुझे अपनी
ओर आकर्पण करनेकी शक्ति नहीं है !
फिर भी मुझमें पीनेकी अटूट चाह है, और प्रेमके मर्मको
पहचानती हूँ।
मैं अलमस्त पीनेवाली है, साकी, मुझे पिला, खूब पिला !
.
बासठ

७०
सुनो तो।
तुम्हारी तालपर तो पशु-पक्षी, सुन्दर पर्वतमालायें, और
सदैन भ्रमण करनेवाले नक्षत्र, मनुष्य और देवता, नाचते हैं,
तुम ही तो सुनसान फेनिल समुद्र और पूर्णेन्दुमें अद्भुत
भार भरते हो,
ओह अमरधन!
यदि तुम मेरे स्नेह-कोमल पर निर्बल हृदयको, जो प्रेमकी
धड़कनसे घुट रहा है, यथेष्ट वल और साचना प्रदान करोगे
.
तो, तारनहार,
उस दिन विधाता अपना कालचक्र घुमाना छोड़कर
क्षण-भरके लिये कह उठेगा,
'देखो, मरणशील मानवने देखते ही देसते प्रेमका अनमोल
अमरत्व प्राम किया !'
देवता, मेरी प्रार्थना म्वीकार न करोगे ।
.
प्रेण्ड

मौक्तिक माल
७१
बनजारे,
पार्थिव विश्वकी विपुल भावनायें जाग उठी हैं, तू क्यों
बेखबर सोता है?
मेरा शाश्वत प्रणय जीवनकी ज्योत्स्नामें घुलकर अमर
हो गया है,
मेरे कवि-हृदयकी विपण्ण विरक्तिसे ऊबकर प्रकृति मदिरासे
भिन्न हो गई है,
तेरी चितवनोंमें समाधिस्थ सङ्गीत-राशिकी ऑखें स्मित
हास्यसे चम-चमा उठी है,
और मै अपना जीर्ण ककाल यौवनमें परिणत कर तेरी
चिरप्रतीक्षा कर रही हूँ।
बनजारे, पार्थिव विश्वकी विपुल भावनायें जाग उठी है,
अब तू क्यों वेखवर सोता है ?

७२
आज रण-विजयी घर लौट रहा है, उसे बधाने जाना
है ! सुभगे, चल तेरी श्याम-वर्ण वेणीको सुगधसे सींचकर
पुष्पोंसे बॉध दूं,
गज-मुक्तासे तेरा शृगार कर दूं,
फिर तेरी आतुर निर्निमेप ऑखोंमें सुरमा सारकर उनकी
शोभा बढ़ा दूं,
और तेरे लोने ललाटपर सुरग-बिन्दु लगा उसे विजयोद्भासित
हर्षसे दमका हूँ !
चाक कुमारी उसे बधाने कोरा कलश लाई है, और
मालिन मकरद पुष्पोंकी माला !
उठ, सखीरी, मोतियोंसे सुवर्ण थाल सजा ले,
इत्रभरी आरतीमें लौनी ली रख दे,
आनदायुसे गगा-जली भर ले, और
पट-पूजाके प्रेमरारे साजको गूंथी हुई वेणी-आउयमें रख ले।
आज रण-विजयी घर लौट रहा है, उसे वधाने जाना है !
पैसठ

मौक्तिक माल ७३ , , प्रभातकी बाल्यावस्थामें, जब मेरी अज्ञात ऑखे शैशवके स्वप्न देख रही थी, तब तुम भव्य भिखारी बन, मन्दार पुष्पोंका साज पहन, मेरी कुटियामे आये, और मुझे क्या दे गये ! --मुरलीवाले, प्रभातकी किगोरावस्थामें जब मेरे आगा-उन्मीलित नेत्र अलभ्य यौवनके स्वप्न देख रहे थे, तब तुम मोर-मुकुट पीताम्बर पहनकर आये, और मेरे मुग्ध हृदयमें क्या भर गये ? - नटवर, प्रभातकी जर्जर यौवनावस्थामे जब मेरे वैशाखी नयन- निर्झर किसी तक सन्देश पहुँचानमें व्यस्त थे,-बेखबर अपनी फकीरीमें मस्त थे, तब तुम मग्न-भग्न-हृदय सन्यासीकी भाँति आये, और मेरा सब-कुछ चुराकर वह कौन-सा चक्र , चला गये? छयासठ

७४
प्रेमी,
कम्पित कदलीसे मैं ज्यादा कम्पिता हूँ।
प्रेमने मुझे सरिताके स्निग्ध जल-सा तरल बना दिया है,
मुरलीमनोहर,
तेरी मुरलीकी पनिका प्रभार मुझपर गिरि-पवन-सा
पड़ता है और,
मेरा पल-पलमें परिवर्तित होनेवाला हृदय सम्पूर्ण ध्यानसे
आकर्षित हो उस सङ्गीत-लहरीको सुनता है,
चिरही,
तेरी वेदना-भरी आह अथवा खोई प्रतिपनि सुन मै वैसे
ही रोमाञ्चित हो जाती हूँ जैसे पूर्णेन्दुमें समुद्रका ज्वार उसे
चूमने छटपटाता है।
बस, अब मुझे सोने दो,
प्रभात होते ही जुदाईकी घड़ी निश्चित मृत्युकी तरह
आवेगी, और हमको सदाके लिये जुदा कर देगी।
सड़स

मौक्तिक माल वसतका अत नहीं हुआ, यौवनके ऑसू न सूखे, पाप-मोचनके लिये सरिताके शुचि नीरकी उपयोगिता ज्योंकी त्यों है, प्रकृति हरी है, सन्ध्यामें शातिका आवास है, और प्रभातमें जीवनको पालनेकी क्षणभगुर विडम्बना,- इन सवसे छूट कर मुझे सो लेने दो, जुदाईकी मृत्यु- निश्चित घड़ी हाथ बाँधे खड़ी है ! " ७६ सजनी, अरेरे !-कल भी हृदय-हार न आये, देख तो, यह मोगरेका हार यों ही सूख रहा है, गुलाबका इत्र और मृग-मद-मिश्रित चन्दन मेरे सूने शयन- कक्षमे व्यर्थ ही अपनी सुरभि फैला रहे हैं,- क्या आज भी मेरा चितचोर न आयेगा ? मेरा जी अन- मना हो रहा है, मेरे अङ्ग-प्रत्यङ्ग फड़क रहे है, और मैं छतपर बैठे कागके उड़नेका आसरा देख रही हूँ। अडसर ७७ घूघटका पट खोल दे, मधुबाले ! मैं इस स्वर्ण-घटमें भरी हुई महँगी वारुणीका मोल करने नहीं आया हूँ, क्योंकि इससे मेरी तृप्ति न होगी, तेरे मयखानेमें झूमते हुए वेसुध पियक्कड़ोंकी रगरलियाँ देखनका भी मेरा मन नहीं होता क्योंकि वह मेरे एकाकी नाटकका दृश्य पूर्ण नहीं करती, तेरी समवयस्का मधुनायिकाओकी मधुर पायल-ध्वनि तथा हाथीदाँतकी चूड़ियोकी खनखनाहट मेरा ध्यान आकर्षित नहीं करती क्यों कि मेरे प्रेमका ध्येय बाह्याडम्बरोंसे परे है, तेरी रङ्गशालामें जमी हुई महफिलका मदभरा राग सुन- कर मुझमें रोमाञ्च नहीं होता, क्योंकि, मैं तो केवल तेरे चन्द्र-मुखकी सुधा पीने आया हूँ, जिसे पीकर पीना सदाके लिये भूल जाऊँगा। घूघटका पट खोल दे, मधुवाले 1 उनहत्तर

मौक्तिक माल,
७८
ओ जल्लाद !
इस रेशमी फाँसीके फदेको मेरी झुकी हुई गर्दनमें जकड़
देनेके पश्चात् मेरी तड़पती हुई लाशपरका लाल कफन उठाकर
उस अदृश्य ईशपुत्रका आह्वान करना, जो विश्व-हितके लिये
शूलीपर चढ़कर भी अपनी सच्चाईका सुबूत देने जी उठा था,
अमावास्याके घने अधकारमें जब वह श्वेत चद्दरसे ढॉपकर
मुझे अपने कधेपर रख दफनाने ले जाये तब उससे कहना,
'उस धूलके गुब्बारपर चिराग जलाकर बैठे और मुझे वह
अतिम कलमा सुना जाय जिसको याद कर मै तेरे मिलनेके
लिये कयामतकी दुआ न करूँ।'
सत्तर

७९
विश्व जब घोर पाप-पकमें लिप्त हो स्वार्थको स्वतत्रताका
नाम दे रक्तकी नदियाँ बहावे, और धर्मकी आड़में अत्याचारका
दारुण अभिनय हो,
तब तुम प्रकाशकी प्रच्छन्न किरण बनकर आना, ओर हमें
पावनताका गुचि पाठ पढा देना,
जब भूतलपर सर्वत्र अशाति फैले, और महामारीके भयकर
प्रकोपसे शेपासन डोल उठे,
तब तुम स्वातीकी नन्ही बूंदें बन कर आना,
और पपीहेकी तरह कभी न शात होनेवाली चिर आशा
उत्पन्न कर जाना,
जब ऊधोके निर्गुण उपदेशसे गोपिकायें ऊब जायें, और
प्रेमको ईश्वरका सगुण रूप न मानकर उसकी उपेक्षा
करें तब
तुम घनश्याम बनकर आना, और एक ही भाव-भगीमें
उस सनातन सत्यका प्रकाश कर जाना !
इकहत्तर

मौक्तिक माल
यौवनकी प्रथम सन्ध्या ही तुम इस आहो-सनी काल
कोठरीमे कैद हो गये, फिर भी, तुम सदा हंस-मुख रहते हो,
यह देखकर मै निश्चेष्ट हो जाती हूँ!
इस कारागृहमें वह कौन-सा सुख है जो तुम्हे मस्त बनाये
शायद तुम स्वतत्रताके सस्कृत जीवनका धूमिल चित्र
बनाते हो और कल्पनाके नयनसे उसे निहार वर्तमानको भूल
जाते हो!
तुम मेरे बन्दी होकर भी कुन्द-से कान्ति भरे हो, और मैं,
राजरानी होकर भी तुम्हारे कृपा-कटाक्षके लिये तिल तिल
मर रही है।
काश । मैं तुम जैसे अजेय बन्दीसे स्वय बंध सकती !
बहत्तर

८१
नौसिखिये,
विन बजी वीणाके इन तारोंको अस्त-व्यस्त न करो,
काल-विटपको फलते देखकर अब तक मैं निस्तब्ध थी,
अनजान थी, और अपने मूछित वैकल्यको इसी वीणामें
रमा प्रणयकी लीलाओंसे थी उदासीन,
तुम्हारे तार-प्रकम्पनमें सधा हुआ लय-लालित्य नहीं है,
इन्हें न छूओ, क्योंकि,
ये तो उसी प्रीतमके कोमल-कर-स्पर्शसे मधुर गुञ्जन
करेंगे जो इन्हें बजा,
मेरे सुप्त प्रणयको जाग्रत कर,
उसका रस लेगा!
नौसिखिये, वीणाके इन तारोंको न छेड़ो।
तेहत्तर

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८५
यदि मै स्वर्ग और भूतलका अधीश्वर होता तो वसतकी
समस्त सुषमा छीनकर उपा और सन्ध्यासे तुम्हारा शृङ्गार करवाता,
रत्नाकरके अनमोल मोतियोंसे तुम्हारी माँग भरता,
चाँद और तारे तुम्हारे केश-व्यालोंमें गूंथ देता, अप्सराओंको
तुम्हारी परिचारिकायें नियुक्त करता जो हाथ बाँधे तुम्हारे
इशारोंपर नाचती,
चराचरका रहस्योद्घाटन कर तुम्हारा मनोरञ्जन करता,
और विश्वका सारा वैभव तुम्हारे चरणोपर चढ़ा अपनेको
धन्य मानता, किन्तु,
मुझ गरीबके पास, मेरे टूटे दिलके दिलरुबाके सिवा है
ही क्या जिसके तारोंको अपने स्वप्निल गीतोंसे प्रकम्पित
कर, मैं तुम्हारी अमर कीर्ति दिग्-दिगन्तरमे गाता फिरता है।
सतहत्तर
1

मौक्तिक माल
८६
मै उस मयूरके नयनोंका तप्त नीर नहीं हूँ जिसे पीकर
मयूरी हुलसी हुलसी फिरती है,
मैं उस हृष्ट-पुष्ट अज-शावकका रक्त नहीं हुँ जिसके सिञ्चनसे
अमर-वल्लरी हरी हो जाती है,
मैं उस प्याली-भरी वारुणीकी प्रथम हिल्लोर नहीं हूँ जो
पीनेवालेको अलमस्त बना देती है,
मैं उस नवोढ़ाकी भ्राति नहीं हूँ जिसे भॉपकर नायक रशि
उठता है,
मै उस प्रियतमका अछूता सौन्दर्य नहीं हूँ जिसे निरखकर
विश्व विमोहित हो जाता है,
मै तो केवल उस भिखारिनका ममत्व-भरा भाव हूँ जिसे
पढकर चराचर अपना रहस्य सुलझा लेता है !

८७
अपने प्रेमीके लिये मैने एक मन्दिर और वेदी बनाई,
उसका प्रत्येक पत्थर प्रेममय विचार था। उसकी दीवालोंको
सुसज्जित करनेके लिये मैने स्वर्ग और भूतलपर, दूरदूरतक,
मन्जुल कल्पनाओकी खोज की।
दिव्य कर्म और दीप्त शब्दोंने अखण्ड विश्वास और पूर्ण
प्रेमके साथ मिलकर ही उस मन्दिरका भव्य भवन निर्मित
किया था।
प्रेमका वह मन्दिर,-
हॉ, बड़ी कठिनाईसे वह बना था !
परन्तु--2
उसमें निवास करने कौन आया ? वह मुखड़ा नहीं
जिसको मैंने यावजीवन कल्पना की थी, वे अद्भुत आँखें ही
नहीं जिनकी सुखदा सुधामयी रुचिरतासे मैं जन्मजन्मान्तरसे
खूब परिचित हूँ!
प्रियतमको न देख मै व्याकुल हुई !
'देवता। दया कर दयानिधान !'
एक प्रतिघोप उठा,-ओर निखरे हास्यमें मैंने सुना-
'मैं दया हूँ!
उन्यासी

मौक्तिक माल
८८
तेरे सुकुमार नव हृदय-पौधेके निखरते सुमनको मैंने खिलते
हुए देखा,
मेरा अपलक आकर्पण उत्कठाकी सीमा पार कर चुका था,
वायुके मद मंद झोंकोंसे सुगवका अनुभव हुआ,
-सौन्दर्य निरखनेकी आतुर पिपासा खींचकर निकट ले गई।
अलसाये यौवनने प्रस्फुटित यौवनसे नयन मिलाये,
प्रकृतिने व्यगसे कहा, 'वेणीमें गूंथ लो, पूर्णिमाकी
गुलाबी रजनीमें मोहनको रिझाकर मुरली सुनानेकी याचना
करना।
विवश थी, फिर भी इस हलके व्यगको न सह सकी,
उलझी अलकोंको, घूघट निकाल, आँसुओंसे तर
करने लगी।
कुमुदको बाहु-पाशमें बाँधे कुमुदिनीने प्रवेश किया,
मैंने देखा, और एकाकी प्रियतमकी स्मृतिसे सिहर उठी,
-असहाय अवला, हाय । क्या करती ? फलके वेषको चुराया
और चुपकेसे गोधूलिमें मिल गई !
प्रियतम मुझे खोजने निकले,
.
परन्तु,
मैं स्वय उन्हें खोज रही हूँ !
अस्सी

८९
दिव्य,
क्या हुआ यदि मै तुमपर मन्दार न बरसा सकी ?
पर आज तो तुम्हें इन सूखे बेल-पत्रोंसे ही रीझ उठना
चाहिये, तुममें और मुझमें तो घना अन्तर है,
तुम तो भरी प्यालीको ठुकरानेकी क्षमता रखते हो,
और मैं,-
बूंद बूंद पीनेके लिये तड़प तड़प कर वेगानी फिरती हूँ!
इसीलिये कहती हूँ, क्या हुआ यदि मैने तुम्हारे पथमें
विछे फलोंको बटोरकर काँटे विछाये ?
तुममें और मुझमें तो घना अन्तर है!
इक्यासी

मौक्तिक माल ९० - सदैव तुम मुझे पिलाकर पागलसे झूमते थे, परन्तु,- आज उष कालसे ही ढालते ढालते अवसान कर दिया; सलोनी सुराही रिक्त होनेसे विरक्ताकी भॉति तुम्हारे अध- खुले नयनोको निहार रही है, तुम्हारे शुष्क अधरोंसे वह अधीर अतृप्ता, निराशाका उच्छास बनकर, निकलती है और उस रिक्त सुराहीमें आहकी मदिरा बन समा जाती है, परन्तु, तुम न मालूम कौन-सी खोई हुई मोहिनीको पुन खींच लानेका सतत प्रयत्न कर रहे हो । सफल न होनेपर सिर धुनते हो, फिर, भावहीन भौहोको टेढ़ी कर, मेरी प्यालीमे बची हुई बूंदोंको निर्निमेष नेत्रोंसे देखने लगते हो, तब, कदाचित् , तुम मेरे साकी होना भूल जाते हो, और सहसा अपनी ऑखोंसे मेरा नशा उतार कर वे बूंदें प्रियतमको पिला, उसे बदहोश बना देते हो, धन्य साकी ! तुम पिला-पिलाकर प्रसन्न होते हो, और बिलमाये प्रेमियोंको मधुर-मुग्ध बनाकर प्रणय और प्रेमका दान देते हो; रस-भीने साकी! बयासी ९१ , वह सुन्दर था, सुशील था, और था रसिक, उसके अल्हड़पनमें सरलता थी, और उसके यौनिके उन्मादमें बाल-सुलभ चापल्य, सरयूके स्वच्छ जलसे क्यारियों सींचता, चमनमें चहल- कदमी करता, फूल तोड़ता, सूंघता, मसलता और धूलि- धूसरित कर देता, उसके इस कौतुकसे सुकुमार नवीन पौधे सिहर जाते, वह धीरेसे आता, और चुपकेसे चूम लेता ! मैं उधर देखती,—वह झेंपता, झिझककर और मुसकराकर रह जाता! मैं सरस थी, सलोनी थी, और थी मुग्धा, मेरी प्रकृतिमें सध्याका अलसाया सौन्दर्य था, और गतिमें छिपी हुई मत्तगयद-सी मादकता, मृग-छौना भागता, मैं पकड़ती, वह भयभीत होता, मैं मार्ग रोक लेती, तिरासी

मौक्तिक माल
फिर, मैं बिखरी हुई अधखिली कलियाँ आँचलमे भर लाती,
और सावधानीसे माला पिरोती,
वह देखता, परन्तु तरगिणीके तटपर जाकर ध्यान-मग्न
हो जाता,
मैं आहिस्तासे जाती और चुपकेसे माला पहना देती,
वह ऑखोमे रस भरकर देखता,-मैं झंपती, झुंझला जाती,
और सहमती!
सन्ध्या-सुन्दरीको श्यामाबर अंधकार अपने अकमें ढक लेता,
वह आगे बढ़ता, मैं पीछे पीछे चलती,
अधरा धना हो जाता, स्यार चीखते, मै चीत्कार कर
उसका हाथ पकड़ लेती,
ऑखें मिलती,-एकसे ज्योति निकलती और दूसरेमें
समा जाती,
हम झेंपते, झिझकते और एक हो जाते !!
चौरासी

आज तो मैं प्रेमीसे झगड़ गई,
वीके मिनिमयसे मैने तेरी सेवा की, शुश्रूषा की,--हृदय
दहल उठा,-
हा ! उसका क्या प्रतिकार मिला ?
जीवनके मोलसे की हुई आराधनाका प्रतिकार क्या था
मेरे प्रति तेरी घोर अवहेलना, और भयकर अन्याय !
2
परन्तु,
क्या मैं अपने स्वत्वोंकी आशा छोड़ दू? प्रेमने आँखोंमें
अमी उड़ेलते हुए कहा,
क्या यह कली सराहनाके लिये खिली है ?
क्या सूर्यका प्रकाश तेरी पूजा और प्रार्थनाको, अर्घ्य और
आराधनाको, स्वीकार करनेके लिये महोदवि और वसुधापर
फैलता है।
-मैं कुहुक उठी,-
'मुझे अपने अतस्तलमें स्थान दो, नाथ,
'मुझे वहाँ दिनमणिकी भाँति धुतिमय होने दो, गुलाब-सी
खिरने दो!"
प्रेम ही प्रेमका प्रतिकार है !
पचामी

मौक्तिक माल
९३
.
मरनेके पूर्व मृत्यु भयानह थी, किन्तु अब ?
अब तो वह जीवन-माधवीसे भी अधिक मधुरिमापूर्ण है !
इस नश्वर जगत्से उसने मेरा अस्तित्व मिटा मुझे गुलाबी
वसत-पवन-सा मुक्त और स्वच्छद बना दिया है, जो कोकिलकी
कण्ठ-ध्वनि सुनकर आनकी हरित मञ्जरीमें मधुर प्रकम्पन
उत्पन्न करता है,
उस महान् परिवर्तनने मुझे पञ्चत्वमें मिला, विचार-वैपम्यके
निर्वाध व्यवधानोंसे मेरा पिण्ड छुड़ा, मुझे अधिक पारदर्शी
और प्रत्यक्ष बना दिया है,
क्योंकि, प्रियतमका असाव्य प्रेम अब मेरे लिये सधी
,
हुई पूजा,
और उनकी अभिसन्धि ही मेरे निसर्ग मरणका साफल्य है।
-इसीलिए तो कहती हैं, मृत्यु अब जीवन-माधवीसे भी
अधिक मधुरिमापूर्ण है!
छयासी

यारे,
प्रेमकी पीड़ा मिटाना चाहे तो सो जा, सो जा! दर्दे इश्क
जिन्दगीसे हटाना चाहे तो सो जा, सो जा!
रात्रिके मृदुल अधकारमें समुद्रकी लहरें तेरे चरण सुहलायेगी।
पश्चिमी वायु लोरियॉ गा-गाकर तुझे सुनायेगी, और,-
नक्षत्र तुझे अपना समझ अनत शाति प्रदान करेंगे,
प्यारे,
उस यौवन-मद-मातीके चितवनकी मधुर कसक मिटाना चाहे,
अपने हृदयके गम्भीर घानपर भूलका मरहम लगाना चाहे,
तो सो जा, सो जा!
बिस्मिल,
प्रेमकी तड़प मिटाना चाहे तो मर जा, मर जा !
दर्दे उल्फत जिन्दगीसे हटाना चाहे तो मर जा, मर जा!
नयन मूंदकर गुलाव और कमलके पत्तोंकी कोमल-शय्यापर
चन्दनका लेप लगा सोनेसे तो मरना हजार बार भला,
कनियोंके व्यथाभेर गीत, शहीदोंकी अतस्तलसे निकली
हुई दुआयें, और
सत्तासी
,

मौक्तिक माल मृत प्रेमियोंके सुरभित उच्छ्वास मृत्युके रहस्यमय प्रदेशमें प्रणय-स्वप्न सजीव कर उन्हें चरितार्थ करनेमें तेरे सहायक होंगे! प्यारे, इसकी आगको बुझाना चाहे, उल्फतके घावको पुरवाना चाहे तो मर जा, मर जा! ९५ . तुझे देखनेवाली अखियाँ आनदसे ओत-प्रोत है, और तेरी मृदुल वाणी सुननेवाले कर्ण वन्य हैं, क्योंकि,- ऐ मधुश्याम, तेरे सन्निकट रहकर कोई भी उस असीम, चिरन्तन आनदसे वचित नहीं रह सकता, जिसके घनीभूत आलोकसे विश्व जन्मा है, जिसके आभामय यानपर ससार स्थित है, और जिसकी जाज्वल्य ज्योतिमे वसुधा लीन होती है। परन्तु,-जीवन-प्राण, ससार मुझ अभागिनीके लिये कितना भयावह, और अधकारपूर्ण है ? क्या मेरी वेदनाका कोई प्रतिघोष नहीं ? क्या मेरे लव- लीन लोचन-वारिको झेलनेके लिये कोई अमर अचल नहीं ? अहासी

९६
-
ललिता,
मुझ पतिताकी पर्ण-कुटियामें तो आज मोहन मुरली
बजाने आये,
मै पुलकित हो उठी, मल मल कर पदाम्बुज पखारे, और
उस अमृतके अतिम बूंद तकको पी गई,
काठके कठौतेको चबा न सकी,--यही मेरा दुर्भाग्य था!
चे मुखरित हो उठे-
'क्या लोगी,-मुग्धे "
'कुछ नही ।'
'कहो भी,-मुक्ति चाहिये ? '
.
नहीं।
,
'स्वर्ग-सुख, योग, वा सिद्धि'
मैं उन चरणोंको हृत् पटलपर अकित कर बोल उठी-
उन सबको क्या करूँ? मुझे तो भव-भवमें ये चरण
चाहिये !
.
नवासी

मौक्तिक माल
९७
-
दुपहरीकी अलसायी घड़ियोंमें, निस्तेज लेटी हुई जब मैं
कालान्तरमें उत्पन्न होनेवाले कपि-कोपिदकी अलक्ष्य
कल्पनातक स्वप्न-यानमें बैठकर पहुँच जाती हैं, तब मेरे
सहज उत्सर्गमें सहसा दारुण विलोड़न होती है।
मेरा शब्द-विन्यास ही उसका विश्व आलोकित करेगा, और
कालके अनत कूचे वह मेरी स्मृतिमें सिर धुन-चुनकर
बौरा जायेगा,
साकी, सुरा और मै न होंगे, किन्तु, मेरा अधक निर्द्वन्द
प्रेम मेरे सँपारे शब्दों में चित्रित होगा!
जनक-पुलवारीमे सीतारामके प्रथम दर्शनकी प्रेम-लीला
लोप हो गई,
द्वापरकी अयोध्याका अस्तित्व न रहा,
रावणकी स्वर्ण-लका भस्मीभूत हुई,
किन्तु, तुलसीके अमर वाग्विलासमें वे ज्योंकी त्यो आज
भी सजीव हैं!
भविष्यके गर्भमें छिपे हुए कविरत्न, तू मेरी स्मृतिमें
,
विकल हो,
नब्बै

उसके पूर्व ही मैं तेरा स्वागत करती हूँ, सादर अभि-
वादन करती है,
स्वर्ण युगके भावी निर्माता, मेरे अनत प्रणाम स्वीकार कर
मेरी शब्द-ज्योति ही तेरे अधे विश्वको आलोकित करेगी।
९८
आशा-अमर धन ।
गम्भीर विश्व-सागरमे गोते लगाकर अनमोल मोती
निकालनेके लिये मैने तेरे ही आसरे कमर कसी !
आकाशमे झूमते तारे मेरे सूने हृदयके स्मृति-स्तम्भ हैं,
वे रेंग-भीने बादल, मेरे आँसुओंके अथाह निधि बन,
तेरे तापोंको शात करने, तेरे ही द्वारपर बरसने, आ रहे है,
साकी,
भग्न हृदयका उपहार, भला,
कैसा हो?
मृत्युकी मोहमयी रागिनीसे प्रकम्पित हो मेरा कफन उड
कर तुझे सुहलाये,
देवता,
उस काली घड़ीमें भी मुझे तेरा ध्यान रहे, कि उस पार,
कोई मेरे लिये खड़ा है !
आशा-अमर धन !
इक्यानवे

मौक्तिक माल
९९
परदेसी,
इस अनत गमनके लिये ही तुम्हारा आगमन हुआ था,
दीर्घकाल तक विचार करते रहनेपर भी मैं इस महा
प्रयाणके समय, द्वारकी देहली तक भी तुम्हारा साथ न दे सकी,
पथ सकार्ण और दुर्गम था!
मेरे प्राण तुम्हारे रोम-रोममें रम रहे थे, और मैने उस
महीन जालको काटनेका कभी प्रयत्न भी न किया,
क्यों कि, मैंने समझा, जीवन अनत है, पाप एक अज्ञात भय,
और रौरवकी भीपण यत्रणा केवल कपोल-कल्पित सत्य है !
परदेसी, इस अनत गमनके लिये ही तुम्हारा आगमन
-
हुआ था।
बयानवै

ईदका चाँद उगते ही मस्जिदकी मीनारसे रोजेकी अजान
देनेवाले मुल्ला,
जब तेरी बॉगको सुनकर आस्मानसे अल्लाह उतर आये
तब इतना तो कह देना,
'सुबहके स्फूर्तिदायक समयसे लगाकर मध्याह्नकी भूली हुई
घड़ियों तक वह यौवनमे डूबी हुई आसपका अक्षत पात्र लिये
अचल खड़ी रहेगी,
और मानव-हृदयके पावन प्रेमकी अधिष्ठात्री हो जायगी,
'किन्तु, सन्ध्याकी मृत्युभरी वेलामें क्लान्त होकर जीर्ण हो
जाय, विपत्तिके मेघ उसे चारों तरफसे घेरकर गम्भीर गर्जना
करे, विहग अपने नीडोंमें उड़ चलें, कृषि-बालाके अम-बिन्दु
सूख जायें, दिन-भरके परेशान पथिक विनातिकी खोजमें भटकने
लगे, तब,-
'अपना हृदय-नीड़
'उसके लिये सुरक्षित रखना, जहाँ वह रात आरामसे बसर
कर सके।
अधे पक्षी भी सध्याफे अंधकारमें तो बेखटके अपने अपने
घोंसलोंमें ही सीधे प्रवेश करते हैं,---बूदे मुल्ला!!
तिरान

मौक्तिक माल मेरे जीवन-विटपसे वर्ष-प्रसून एक एक कर झड़ रहे हैं, शीघ्र ही वह तो नीरस, गुप्फ, कटीला डण्ठल रह जायगा, जिसे जरामें मृत्युका बर्फीला तूफान खूब झकझोरेगा, वसतमे जब कोयलकी कूज सुन हरियाली धूलके अव- गुण्ठनसे झाँकेगी, और सूखे तरुओंकी डालियाँ कोमल किसलय और नवल सुमनोसे खिल उठेगी, तब,- क्या मेरे जीवन-विटपमें भी वसत फिरसे नवयौवनकी वहार न लायेगा? चौरान

१०२
.
विश्व-जीवनकी सामूहिक विषमता देखकर, मैं अपना जीवन
क्यों नष्ट करूँ
कहाँ मानवी दुर्बलतायें, और कहाँ मेरा ईश्वरत्व ?
मेरे प्रकाशसे ही सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र चमकते हैं,
मेरी प्रेरणासे ही पवन चलता है, और मेरी तालपर ही
नटराज जीवन और मृत्युका भीपण ताण्डव रचते हैं,
मेरे क्रोधसे ही प्रकृति रौद्ररूप धारण कर प्रलय मचा देती है,
और, फिर मेरे ही सकेतपर नवीन सृष्टिका सृजन होता है,
मैं ही कनियोंकी कल्पना, और अखिल विश्वका सौन्दर्य है।
विश्व-जीवनकी सामूहिक विपमता देखकर मैं अपना जीवन
क्यों नष्ट करूं?

मौक्तिक माल
१०३
सनम,
जी चाहे तो मेरी यादमें टुक रो लेना,
मृत्यु जब मेरी जीवन-माधवीकी स्वर्णिम प्यालीको रिक्तकर
मुझे मिट्टीमें मिला दे, तब तुम भूलकर भी मेरी खाकपर श्वेत
सङ्गमरमरका दूसरा ताज न वनवाना,
मृत्तिकाके उस मृदुल ढेरपर तुम सुदूर शिराजके गुलाब,
जिनके सलज यौवनसे मस्त हो हाफिजने सैकड़ों गजले कह
डाली, और सलोने सरोके मञ्जुल वृक्ष लगा नवीन स्वर्गाद्यानकी
रचना न करना जिसमें स्थान-स्थानपर निर्मल जलकी नहरें
बहें और फव्वारे छूट-छूटकर फलकको छ्यें,
जी चाहे तो मेरी यादमें दो आँसू बहा देना!
नीले आसमानके नीचे, जिसमें आकाश-गङ्गा बहती है,
जहाँ नक्षत्र क्षणिक रजत प्रकाश छोड़कर लोप हो जाते है,
और बादल पल-पलमे नया अभिनय करते हैं,-
मेरे धवल-तुपार-वक्षपर तो शवनम-गीली हरी घास ही
बस होगी,
कोकिलकी कूजसे मैं न चौकूँगी,
छयानवे

न वासती मलयानिलके स्पर्शसे प्रकम्पित होऊँगी, न ऊपाका आलोक, न सन्ध्याका सौन्दर्य, मेरी तुरबतके धूमिल प्रकाशको उज्ज्वल बना सकेंगे, परन्तु, अगर मैं तुम्हारे प्रेमकी स्मृतिको बिसार दूं तो हश्र हो जाय, और कयामतको घडी नजदीक खिंच आय, मैं तुम्हारे पार्श्वमें न होऊँगी, किन्तु विश्वका विमुग्धकारी सौन्दर्य तुम्हें लुभायेगा, और तुम फिरसे रूप और सुराके भक्त बन जाओगे, ऋतुयें तुम्हारा दिल बहलायेंगी, चन्द्रिका और बॉसुरीकी रागिनी तुम्हें भोग-विलासकी ओर आकर्षित करेगी,- पर, मेरी मृत्युसे भग्न तुम्हारे हृदयमें जीवन फिरसे प्रथम- प्रणयके सुरभित आनदोच्छ्वासकी अनत माधुरी तो कदापि न भर सकेगा! सनम, साँझके झुटपुटे समयमें जी चाहे तो मेरी मजारपर बैठकर टुक रो लेना।

मौक्तिक माल
१०४
,
.
,
भटियारिन,
मेरे बिछोहमें आँसू मत बहा, मत बहा,
विधनाको मनमानी करने दे, मेरी प्रतीक्षामे पलक न
बिछा, न बिछा,
मै तो अब इस मार्गसे न लौटूंगा, तेरे हृदयके कपाट
मूंद ले, आफ़ताब डूब रहा है,
पवन पतझड़के पीले पत्तोंमें मरमर-ध्वनि कर रहा है, और
यम और यमी इस प्रशात घडीमें भूतलपर विचर रहे हैं !
मेरी चिन्तामे मत घुल, मत घुल, मैं तो अब इस सरायमें
फिर कभी विश्राति न लेगा,
जुदाईके गम-ऊँड़े उच्छ्वास न छोड़, न छोड़, और न
विरह-व्यथामें रो-रोकर दिशाओंको व्याकुल कर,
आकाशमे रङ्गीले बादल कबड्डी खेल रहे हैं, और समुद्रमें
ज्वार उमड़ रहा है,-
तेरे हृदयके किवाड़ बन्द कर ले,
आफ़ताब डूब रहा है।
अहानवै

१०५ उसकी पार्थिव-अस्थियोंपर पोस्तके लाल फूल बरसाओ, और उसके कफनपर श्वेत ! समुद्र उसके विरहमें करुण क्रन्दन कर रहा है, हया उसके वियोगमें उच्छ्वास छोड़ रही है, और बुलबुल मरसिया गा-गाकर सुननेवालेके दिलको ठेस पहुंचा रही है, सुख दु.ख उसने देख लिये- उसके कफनपर श्वेत फूल बरसाओ, और उसके मृत- पिण्डपर लाल पोस्त ! किसी सूने शात स्थलमें, उसके क्लान्त शरीरको, मिट्टीकी कोमल शय्यापर धीरेसे उसके अर्ध-खुले नयनोंको आहिस्तासे मूंद दो, शून्य गगनकी शाति उसे मिले, वह तो प्रकाश और अधकार, शोक और आनदके परे पहुंच गई, न अब उसे शुहरतकी जुस्तजू है, न वदनामीका भय, निन्यानवे १

मौक्तिक माल
बेहतर है यही कि सब्जेके घूघटमें वह अपना सौन्दर्य
छिपा ले,-
क्यों कि, उसके लम्बे खामोशपर लिखी है मेरे जुल्मकी
दानवी कहानी,
या इलाही ! उसकी खाकनशीनीपर अमृत बरसा !
ऐ कब तक साथ देनेवालो।
उसके कफनपर श्वेत फूल बरसाओ और उसके पार्थिव
शवपर गुले लाला और लाल पोस्त !
१०६
दीवाने मन !
निद्रित विस्मृतिके उच्छ्वासोको एक ही उपहासमे उगल
दे,-
फिर गूढ़ रहस्यमयी उमगका अतुल धनी बन,-
तेरा पागलपन अमर होगा !
-
सौ

१०७
मेरे गद्य-गीतोंके राजहसो,
खूनी वर्फका तूफान इस भयकर शीतमें मेरे मानसरोवरको
क्षुब्ध करे,
उसके पूर्व ही यहाँसे उड़ चलो! उस सुदूर नील गगनमें
विचरना जहाँ न कोई वनस्थली है, और न कल्पनाका विशाल
नदन-कानन,
उड़ते उड़ते अपनी यात्रा में उन ऊँचे गिरि-शिखरोका
अलौकिक सौन्दर्य निरखना न भूलना जहाँ सदैव चॉदी बिछी
रहती है, और,-
जिनके आलिङ्गन-मात्रसे चन्द्रिका अपने पूर्ण यौननको
प्राप्त करती है !
मार्गमे तुम्हें उन विहगम-बालाओंकी सङ्गीत-लहरी सुनाई
पड़ेगी, जो अपने प्रेमियोंसे चोचें मिलाकर स्वर्गीय राग
अलापती हैं, और जिसको सुननेके लिये चराचर लालायित
,
रहता है,
तुम उस स्वर्णिम द्वीपमें जाकर ही विश्राम लेना जहाँ
सदैव वसत निराजता है,
एक्सौ एक

मौक्तिक माल और जिसका अधिपति मेरी स्वप्न-कल्पनाका स्वामी भी है, और जिसका दिव्य-प्रेम मेरे रोम-रोममें बस रहा है, उससे कहना कि प्रेमके चिरन्तन ध्येयको जो शुचि समर्पण है, खूब समझनेवाली तुम्हारी सरल पुजारिन तुम्हारे विरहमे रात- दिन तड़प तड़प कर किसी तरह काल-क्षेप कर रही है, उसकी शीघ्र सुधि ले, विजय-चर-माल पहनाओ! और अपने प्रेम-राज्यकी रानी बनाओ। जाओ,---तुम्हारा प्रवास सुखद हो, तुम्हारी लम्बी यात्रा शुभ हो, और कालरूपी बाज तुमसे कनी काटे- -यही मेरा आशीर्वाद है, यही मेरी मंगल कामना है ! समाप्त

Mokthik Maal

Author
Dinesh Nandani
Title
Mokthik Maal
File name
Mokthik Maal
Text
OCR done
Citation
1937
Published
2011/01
Publisher
Hindi Granth Ratnakar Bombay
Language
Sanskrit
Pages
109
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546566
Barcode
4990010025028.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
AhBHDJumkPe
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