Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Vindhya Himalaya

Shivmangal Singh · 2011/03

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विन्ध्य-हिमालय

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विन्ध्य-हिमालय
शिवमंगलसिंह 'सुमन'
FOR
1966
आत्माराम एण्ड संस, दिल्ली-6

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समर्पण
आज मां का स्मृति-दिवस है
'प्रातः ही अस्ताचलगामी
चौदस के चांद ने जीभर आशीपा,
याद आई पुण्य-वेला
उनके प्रयाण की,
मौसी से कह गई
जहाँ रहे, सुखी रहे,
मेरे श्राद्धकर्म में
व्यर्थ न बहाए पैसा
बेटियां हैं व्याहने को।
पढ़ा था कि माता
कुमाता नहीं होती है
पुत्र हो भले कपूत
ऋपियों की प्रार्पवाणी
उत्कर्पित हो उठी।
बोले बंधु 'लाला को तार दिए देता हूँ'
बोली बहुत दूर है,
दौड़ा हुआ आएगा

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संकेत प्रस्तुत संकलन में 1954 से 1960 तक की रचनाएं संग्रहीत हैं । मालव- निवास और नेपाल-प्रवास की संचित स्मृति-राशि । विन्ध्य-हिमालय नामकरण इसी भाव-भूमि का परिचायक है । मालव मे मेरा मन-मयूर विन्ध्या की धनाली हरियाली पर भाव-विभोर, प्रियतम इव प्रार्थना चाटुकारः', शिप्रा की तरंगों- सा स्मर-स्फुरित, पाताल-पानी की झीनी फुहारों के साथ थिरक-थिरक उठने के लिए व्यम हो उठता था। नेपाल में हिमालय का अभ्रभेदी उदात्त संभार देखा तो अवाक रह गया । जीवन में ऐसी विराट् शुभ्रता, स्वर्ग के प्रति धरती का ऐसा उल्लास मैंने कभी नहीं देखा था। पांच वर्ष उसके अभिराम कोड़ में क्रीड़ा करके फिर मालवा लौट आया और धीरे-धीरे पांच वर्ष बीतने को प्राए पर पुतली मे समाई उसकी नैसर्गिक सुपमा में राई-रत्ती भी अन्तर नहीं पड़ा; प्रत्युत प्रत्येक दिनमान के साथ उसकी मधुर स्मृतियाँ रमणीय से रमणीयतर ही होती जा रही है-"क्षणे-क्षणे यन्नवतामुपैति तदेवरूपं रमणी- यतायाः।" विन्ध्य और हिमालय की तुलना की तो दोनों अपनी-अपनी जगह लाव- ण्यमय, प्रभामय । हिमालय कोपीन मेखलाधारी शुभ्रवेपी सन्यासी, उग्रीव हिरण्यगर्भ, जिसके तपोदीप्त शरीर से विगलित स्वर्ण-रजत-आगीपो का अजस्र प्रवाह और विन्ध्य नाना वर्ण-गंधमय छवीला छैल जिसकी सहस्रार्जुनी प्रलंब वाहों के आलिंगन मे सरितामों और निझरों की अदम्य अटखेलियां । एक सात्विक अखण्डता का मानदण्ड और दूसरा राजसिक उन्माद का उन्मथित काल-खण्ड । एक शिव को शिवता का सम्यक् संकल्प और दूसरा अगस्त्य की तपस्या की पावन प्रगति । दोनों का प्रांतरिक उल्लास गंगा और नर्मदा के रूप में सुमुछ्वसित, उत्तर और दक्षिण के सांस्कृतिक-सचरण की समुज्ज्वल अर्चनाएं । पयस्विनी को समर्पित इस संग्रह की मूलभाव भूमि का रहस्य इसी में अंनिहित ।

ग प्रकाशन में अकल्पित विलंब मेरे अक्षम्य प्रमाद का परिचायक । गीता में तामसी प्रकृति का एक लक्षण दीर्घसूत्रीपन भी बताया गया है जो मुझ पर पूरी तरह घटित होता है । सात्त्विक और राजसी वृत्तियों का प्राकलन ऊपर किया ही जा चुका है, अस्तु इस संग्रह में तीनों अपनी-अपनी जगह । विन्ध्यखण्ड की पहली रचना मालव-प्रदेश से मेरे परिचय की प्रथम अभि- व्यक्ति है । वर्षों से अधूरी पड़ी थी, अब पूरी कर दी। प्रत्येक रचना का अपना इतिहास है जो उसी की जुवानी सुनने से आपको अधिक आनन्द पाएगा। 'पौ फटने के पूर्व' को प्रेरणा प्रयाग को एक नवोन्मेपी गोष्ठी से सन् 1954 में मिली थी। उसकी प्रतीति उसी परिवेश मे समीचीन होगी। उस समय तक प्रयोगवाद वयः-सन्धि की अवस्था पार कर चुका था। और नयी कविता की नयी परिणिति की प्रतीक्षा थी। समय के साथ-साथ नयी कविता का नवोन्मेप मुझे पुलकित करने लगा है, उसको ताजी हवा मे फेफड़ों को सुख मिलता है, बिडम्बना वाला का तो अपने छिछलेपन के दलदल में स्वयं ही समाता जा रहा है। हिमालय की ड्योढी मे मेरा प्रवेश बडे ही नाटकीय ढंग से हुआ । संस्कार रूप मे हिमालय के प्रति मेरे मन का सम्मोहन जननान्तर सौहार्द के किसी अव- चेतन में जैसे अबोधपूर्वक इस घड़ी की प्रतीक्षा ही कर रहा था । कालिदास ने सौन्दर्य की झीनी-चादर की अोट वे एक आधी झलक दिखाकर साक्षात्कार की व्यग्रता तो बढ़ा ही दी थी- प्रस्त्युत्तरस्याम दिशिदेवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः। पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः ।। इसे मेरे पर्युत्सुक मन का पुण्य ही कहना चाहिए कि एक दिन अनायास ही नेपाल-प्रवास का संयोग आ जुटा । मैं भाग्यवादी तो नहीं हूँ पर यह सत्य है कि विदेश-विभाग में प्रवेश पाने को न मैंने कभी कल्पना की थी और न मेरे मानस-परिवेश का उससे कोई साम्य ही था, न मैंने कभी ऐसी इच्छा प्रकट की, न कोई आवेदन-पत्र दिया, न किसी से अनुशसा ही कराई । अच्छा- खासा कामायनी के लोल अपागों की खुमारी मे खोया था कि अचानक एक दिन सूचना मिली कि मेरी नियुक्ति विदेश-विभाग में हो गई है और मुझे य नेपाल-स्थित भारतीय राजदूतावास में सांस्कृतिक और सूचना सचिव का काम सौंपा गया है । मैं भौंचक्का-सा रह गया कि बैठे-ठाले यह बला कहाँ से सिर पर आ पड़ी । प्रादेशिक-सचिवालय से पता लगाया तो मालूम पड़ा कि खवर वेपर की नहीं है । प्रारम्भिक वेतन और अन्य भत्ते उस समय की मेरी पाय से दुगुने कुछ अधिक ही थे, पर संयोग की बात कि उसके कुछ दिनों पूर्व ही इदौर में पृथ्वी थिएटर्स का 'एक पैसा' नामक नाटक अभिनीत हो चुका था, जिसमें पैसे के पीछे दौड़ने वाले नायक की बड़ी दुर्गति दिखाई गई थी। मेरी धर्मपत्नी उससे बड़ी प्रभावित थीं, अस्तु आमदनी और ग्रेड की चर्चा होते ही फूट पडती थी कि "दाल-रोटी तो सा ही रहे है, रुपये के पीछे विदेशों में कहाँ मारे-मारे फिरोगे ?" दूसरी ओर नेपाल-स्थित तत्कालीन भारतीय राजदूत भगवानसहाय जी (सप्रति राज्यपाल केरल) तार पर तार दिलवा रहे थे कि शीघ्रातिशीघ्र नेपाल पहुँचूं और अपना कार्यभार सभालू । संभवतः उनकी धारणा रही होगी कि हिंदी का अनाडी कवि प्रथम प्रवेश में ही विदेश-विभाग की तड़क- भडक से चकाचौंध हो जायगा तो विचकेगा नहीं, कम से कम रस्सी तुड़ा के तो नहीं ही भागेगा। नियुक्ति-पत्र मुझे अप्रैल के द्वितीय सप्ताह में मिला था और 2 मई, 1956 को नेपाल के वर्तमान महाराजाधिराज का राज्याभिषेक था जिसमें सम्मिलित होने के लिए विश्व के कोने-कोने से गण्यमान्य राष्ट्रनायक पधारने वाले थे। समारोह के साज-संभार के तो कहने ही क्या ? हिमालय के रजत रंगशीर्ष से उद्भामित काठमांडू उपत्यका इद्रपुरी की मतरगी विभा को भी चुनौती देती प्रतीत होती थी। मेरी तो समस्याएं ही दूसरी थी-पहले तो एम० ए० और बी० ए० को अर्ध-परीक्षित उत्तर पुस्तिकाओं का ढेर सामने लगा हुआ था, दूसरे 14 वर्ष की अध्यापको के पश्चात् विदेश-विभाग के मप- रिचित वरण-कक्ष में प्रवेश करने का उमक्कम किसी भीरू नवोढ़ा के कंपित पग और धडकते वक्ष के आलोड़न मे कम कौतूहलजनक नहीं था। इसी ऊहा- पोह मे लगभग एक माह बीत गया। विदेश-विभाग के अधिकारियों को भी कुछ भल्लाहट हुई, पर मैं करता क्या ? नये अनुभव की अछूती जिज्ञासा किसी निश्चय पर मनोदशा को टिकने ही नहीं देती थी, इसी किंकर्तव्यविमूढता की अवस्था में एक दिन रामायण के नित्य-पाठ में एक ऐसी चौपाई निकल आई कि मेरी सारी दुविधा एक झटके में ही ध्वस्त हो गई और पाठ समाज ट होते ही मैंने प्रयाण का निश्चय घोषित कर दिया और शायद तीसरे ही दिन रवाना भी हो गया। चौपाई भी विशेष असामान्य या गूढार्थी तो नहीं थी पर थी बडी उद्बोधक-.-"संशय विहंग उडावन हारी" । प्रसंग उस समय का है जब पिता की आज्ञा-पालन-स्वरूप राम तापस-वेप में अनुज और सहमियो सहित वन-यात्रा के लिए तत्पर होते हैं । बिलखती माता से विदा लेकर जब वे पिता का आदेश प्राप्त करने पहुँचते है तो विवर्ण, श्रीहीन, शोकातुर दशरथ को देखकर स्तब्ध रह जाते हैं । करुणा-कातर स्वरों मे 'हाय राम ! हाय राम !' पुकार-पुकार कर बार-बार मूछित हो जाते थे और व्यथा-विजड़ित अर्धचेतन अवस्था मे मन ही मन मनाते थे कि इस समय यदि राम मेरी पाशा की अवहेलना कर दें तो बहुत अच्छा हो । यद्यपि पुत्र द्वारा पिता की अवज्ञा रघुकुलरीति के प्रतिकूल होती पर पिता का मोह राम के आँखों से ओझल होने की कल्पना से ही सिहर उठता था । ऐसे धर्म संकट के अवसर पर सत्य-- सघ, कर्तव्यनिष्ठ कर्मयोगी राम पिता से विदा लेते हुए अद्भुत संयम और अविचल सकल्पशील स्वरो में कहते है कि- 'तात किए प्रिय प्रेम प्रमाद । जस जग जाइ होइ अपवादू ॥' हे तात ! अयायाम कर्त्तव्य सामने आ जाने पर यदि कोई प्रियजनो के विछोह के भय से अथवा प्रमाद से उससे विमुख हो जाय तो ऐसे मनुष्य का यश सदा के लिए चला जाता है और उसे कलंक लगता है।" उस असमंजस की अवस्था में तुलसी वावा का यह रामवाण ऐसा चुभा कि घर छोड़ते ही वना । मन में कुछ ऐसी विह्वलता समा गई कि पहली रचना 'आह्वान'- रास्ते मे ही बन गई, पटना पहुँचते-पहुंचते । नेपाल पहुँचने के दूसरे या तीसरे ही दिन 'काठमाडू की पहली साँझ' हिमकण-सी ढल गई, विरही यक्ष की प्रतिध्वनि बनकर । इसके पूर्व मैंने कभी पारिवारिक ममत्व को व्यंजना का विषय नहीं बनाया था, प्रसंगवश मेरी कनिष्ठा पुत्रियो अपर्णा और रोचना के नाम अना- यास ही आ गए हैं । नेपाल में मेरा पहला वर्ष विशेष विह्वलतापूर्ण बीता ।। कुछ तो परिवार से विलग हो जाने के कारण और कुछ प्रदेश की नवीनता के कारण । इस अभाव का भराव बहुत सीमा तक वहाँ के सुरम्य निसर्गः और विरम्य नेपाली बन्धुओं को सरसता ने किया। रही-सही कमी पूरी कर दी परम सहृदय राजदूत भगवानसहाय जी की प्रात्मीयता ने। उनकी सह- धर्मिणी दयावती भाभी के वात्सल्य का लेखा-जोखा शब्दों में नहीं दिया जा सकता । इस संदर्भ में युग के सजग प्रहरी दिनकर ने मुझे ठीक ही लिख भेजा था कि- प्रहह तात लछिमन मड़भागी। राम पदारविंद अनुरागी ।। तुलसी बावा पाड़े में बड़े काम पाते हैं, सदियोसे उन्होने पीढ़ियो के मर्म में मरहम लगाया है । चलते-चलते मैंने अपने असमंजस का ब्यौरा बच्चन जी तक भी पहुँचाया था, क्योकि इस अभियान में परोक्ष रूप से उनका भी हाथ था । धीर,- वीर अग्रज की भांति बड़े ही प्रास्थापूर्ण स्वरों में उन्होंने मेरी पीठ थपथपाते हुए लिखा था-'तुम अवश्य जानो । मुझे पूरा विश्वास है कि तुम अपनी अप्रतिहत प्रास्था से नेपाल और भारत के बीच सांस्कृतिक सेतु वनोगे ।' साथ ही पशु- पतिनाथ के पाशुपत अस्त्र की याद दिलाते हुए तुलसी वाया का यह दोहा भी लिख भेजा था :-- सुनु भ्राता शासामृगहि नहि बल बुद्धि विशाल । प्रभु प्रताप ते गडहिं खाइ परम लघु व्याल । मूल दोहे मे 'माता' के स्थान पर भ्राता लिखकर उन्होंने सम्बोधन भी संभाल लिया और हिन्दी के शाखामृग को शौर्यान्वित भी कर दिया । जो भी हो, सुहृदों का आर्शीवाद मुझे बहुत फला और नेपाल को प्रकृति-पुरष उन्मुक्त स्नेह-सीकरी को अंकोरना मेरे लिए मुश्किल हो गया। इस सम्बन्ध में भगवान से मैं कोई शिकायत नहीं कर सकता, सिवा एक करण घटना के कि इसी बीच मेरी जन्मदात्री बिना मेरे सिर पर हाथ रखे चली गई। कई बार मेघदूत का पण प्रदा करने की इच्छा हुई क्योकि अव अलकापुरी से रामगिरि को संदेश भेजने की बारी थी। नेपाल में मुझे जो मिसा उसका हिसाब-किताव लगाने के लिए एक उग्र चाहिए । राजदूतावास की तड़क-भडक तो धीरे-धीरे भूल जाएगी पर नेपाल के लेसको, कवियों, चित्रकारों, संगीतज्ञों भौर कलाकारो के रंगो-रेसानो-स्वरों- - और छंदों के सरगम को भुलाने के पहले धमनियों में प्रवाहित रक्त की रवानी भी भूलनी पड़ेगी। विश्व के शीर्षस्थ कलाकारों की पांति में गौरवपूर्ण प्रासन के अधिकारी प्रात स्मरणीय लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा के स्नेह-सम्पर्क को मैं अपने नेपाल-प्रवास की वहुमूल्य उपलब्धि मानता हूँ । नित्यप्रति गिरिराज हिमालय के दर्शनो का अलम्य सुयोग तो पार्वती मैया के पुण्य-प्रसाद का ही फल कहा जा सकता है ! ऐसी शुभ्र, उदात्त सौन्दर्य राशि की तो मैंने कल्पना भी नही की थी। कही कोई कालिख या दाग तक नहीं, जिससे प्रांखों मे खराश भी लगे। सुबह से शाम तक गौरीशकर, अन्नपूर्णा, गणेश हिमाल के श्वेतकर्पूरी शिखरों को देखते मैं नही थकता था। कालिदास को भी विधाता ने कैसी अछूती कल्पना-शक्ति दी थी कि उसे 'त्र्यम्बक का अट्टहास' ही कह डाला । मैं नित्य प्रात. विस्तर से उठते ही खिडकी की ओर दौडता था कि पहले गौरी- शंकर और अन्नपूर्णा के सुधाकलशो की आँखों से पी लूं तव दरवाजा खोलू कि मेरा हँसमुख नेपाली भृत्य गरम-गरम चाय से पलकों की नमी सेंक सके । मेरी इसी विस्मय-विमुग्ध दर्शन-लालसा की विह्वल अभिव्यक्ति 'वातायन से हिमालय-दर्शन' नामक रचना में हुई है । एक और छुटपुट रचना है 'चित्रकार के प्रति' जो वस्तुत: भारतीय राजदूत भगवानसहायजी की कला के प्रति मेरी अर्चना है । शायद कम लोगो को मालूम होगा कि वे एक कुशल राजनीतिश और शासक होने के साथ-साथ उच्चकोटि के चित्रकार और शिल्पी भी हैं। अपने नेपाल-प्रवास में उन्होने नेपाल का अप्रतिम नैसर्गिक सौन्दर्य रगों और रेखाओ मे बांध डाला था। उनकी बनाई हुई महापडित राहुल सांकृत्यायन की मूर्ति जो बाद मे एक नेपाली कारीगर द्वारा कांसे मे ढाली गई, किसी दिन राष्ट्रीय संग्रहालय की वहुमूल्य निधि वनेगी। नेपाल से जब उनकी विदाई होने लगी तो कई नेपाली कलाकारो ने मुझ से बडा आग्रह किया कि राजदूत के चित्रों की प्रदर्शनी अवश्य आयोजित की जाए क्योकि राजदूतावास के भीतर तो गिने- चुने लोगो को ही प्रवेश का सौभाग्य मिल सकता था । मैंने राजदूत से बतलाया तो वे किसी भी प्रकार राजी न हुए। मुझे भी एक चाल सूझी और मैंने गुप्त रूप से महाराजाधिराज के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि वे इसका उद्. 'घाटन कर दें तो सव बात सवर जाए । वे राजी हो गए, पर कानोंकान किसी को खबर न लगी। इसमें महाराजाधिराज महेन्द्र की सहृदयता और भगवान सहाय जी के प्रति उनकी अगाध आत्मीयता का भी अंश था। जव मैंने सब तैयारी कर ली और तिथि उद्घाटित की तो सब आश्चर्यचकित रह गए। भगवान सहाय जी मुझ पर झल्लाए तो बहुत पर महाराजाधिराज के सहज सौहार्द से अभिसंचित होकर उपकृत भी हुए । नेपाल के बाहर यह कम लोगों को विदित है कि महाराजाधिराज बड़े ही मार्मिक कवि और विदग्ध कलाकार है । उनकी वाणी में नेपाल राष्ट्र का समस्त आलोड़न और उल्लास अभिव्यजित है । इस प्रदर्शनी को नेपाल मे बड़ी धूम रही। लगभग दस दिनों तक नेपाल- भारत सास्कृतिक केन्द्र में मेला-सा लगा रहा । कलाकारों, वरिष्ठ अधिकारियो, विद्याथियों, व्यापारियों आदि सभी वर्ग के लोगों ने इसे देखा और सराहा। नेपाल और भारत को प्रात्मीयता के सुदृढ़ सूत्रो में गूंथने के लिए इससे सुकुमार रेशमी डोर नहीं हो सकती थी। सबसे बड़ा उल्लास तो लोगों में इस बात का था कि भारत के राजदूत ने नेपाल के सौन्दर्य को जिस अन्तरदृष्टि से परखा है वह जन-जीवन की सबसे बडी थाती है । एक छोटी-सी चतुष्पदी गुरांस के फूल पर भी है । नेपाल में गुरांस का लाल फूल प्रेम का प्रतीक माना जाता है । भद्र शिक्षित समाज से लेकर श्रमिक वर्ग तक उसकी सामान मान्यता है । पहाडों पर लकड़ी काटने जाने वाली गरीब मजदूरिने भी पीठ पर लकडी का बोझा लादकर घाटी के झुरमुट से एक गुरांस का फूल तोड कर जूड़े मे खोंस लेती है । ऐसा ही लोकप्रिय एक प्यार का पंछी भी है-डाँफाचेरी, चकोर सा- चाहभर । नेपाल से मेरे प्रयाण को 'प्यासों को प्रणाम है' शीर्षक रचना में परिलक्षित किया जा सकता है । 'मां गई' शीर्षक अर्चना व्याख्यातीत है । मां के दूध के एक बूंद का भी मोल आज तक कौन सपूत चुका सका है ? इत्यलम् ! अब आप शौक से इसके पृष्ठ पलट सकते हैं। एक प्रतलमूक व्यथासिक्त करुण-गाथा अव्यक्त ही रह गई है, अभी समय उसकी गवाही देने को तैयार नहीं। --शिवमंगलसिंह 'सुमन"

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अनुक्रमाणाका खण्ड-विन्ध्य 1. विन्ध्या का सोता 3 2. अनुष्ठान 5 3. अवतिका से विदाई के समय 6 4. मन का मोती 8 5. चल-क्षण 10 6. दूज का चांद 7. शरदपूर्णिमा 12 8. पापिन अांख 15 9. जिस दीपक के संग-सहारे 16 10. मैं अकेला और पानी बरसता है 18 11. होली 19 12. रंग-पंचमी 20 13. आसों ग्राम बहुत बौराए 24 14. आ गया बसंत 26 15. अडचन 27 16. प्रिय तुम्हारी तपन तो वरदान 29 17. तुम सिसकती श्वास के उच्छवास हो 30 18. भूलों का प्रायश्चित्त करो 31 19. संध्या का सन्देश 33 20. प्रभात को किरण 34 21. लज्जा रक्खो 36 *22. शबनम 38 '23. ललक की लाचारी 41 42 43 46 54 57 58 63 74 24. उधेडवुन 25. लेसनी की जिम्मेदारी 26. नया मोड़ 27. युग को गायत्री 28. विसरो पपुरियाँ 29. चेतना का मूल 30. पौ फटने के पूर्व 31. स्वागत है नवयुग के प्रभात खण्ड -हिमालय 32. आह्वान 33. तुम्हारी मर्जी 34. जय हो 35. काठमाण्डू की पहली सांझ 36. माध्यम 37. वातायन से हिमालय-दर्शन 38. दुर्गम पथ पर गीतों के झरने से 39. विकल्प 40. दो खंजन 41. सांसें साधे चुप-चुप 42. तुम्हारी याद आती है 43. अन्तराल 44. अनायास 45. चित्रकार के प्रति 46. वौद्ध गया 47. माँ गई 48. प्यासो को प्रणाम 49. गुरांस का फूल 77 78 80 83 87 89 92 95 96 97 98 100 101 102 103 111 116 118 विन्ध्य 7

एक तुम्हारे नाते जीवन-गाथा
सहज अनन्य हो गई,
तुम अंतर में रमे इसी से
मेरो काया धन्य हो गई।

विन्ध्या का सोता
मन किसी यक्ष का संदेशा बन कर गिरि बन पर छाया है,
मालव के मनहर अंचल में कवि भूला है, भरमाया है।
यह माप रहा छाई दिगंत तक हरियाली का अभ्यन्तर,
पातल-पानी-सा फूट पड़ा फिर रुद्ध-क्षुब्ध आतुर-अन्तर ।
उसने देखी विन्ध्या की बांहों में चोरल को बरजोरी,
अंगों-अंगों में पुलक-किलक, सैना-बैनी, चोरा-चोरी ।
विन्ध्या के अन्तस में चोरल की रूप-सुधा छन जाती है,
कल्पना उभरती नूरजहां के कल-कपोत बन जाती है।
नर्मदा अमरकंटक से सुमनों को सौगात सजाती है,
ओंकारेश्वर के बीच सकुचती सहमी-सहमी आती है।
जो धुआंधार में धारा का स्वर्गिक उल्लास लुटाती है,
वह संगमरमरी बांहों में बरबस बंदी बन जाती है ।
मांडू के महलों में जिसको आभा अभिसार सजाती है,
सपनों की रूपमती रेवा की रेखा-सी रह जाती है ।
इतिहास बता सकना मुश्किल बीधे-अनबींधे मर्मों का,
विन्ध्या का वैभव साक्षी अगणित पुण्य-पुलक उत्सों का।
3

4 | विन्ध्य-हिमालय
सोती है विगलित व्यया मूक प्रास्थानों के प्रावरणों में,
विन्ध्या साकार प्रणति अर्पित पावन अगस्त्य के परणों में।
'तमसो मा ज्योतिर्गमय' तपस्या के वितान-सी तनती हैं,
भगवान भास्कर मुग्ध, उच्चता विनय किस तरह बनती है।
निघूम जातवेदस् ज्वलंत शिवरता प्रपिता गौरी से,
उत्तर-दक्षिण को बांध दिया जिसने किरणों की डोरी से।
विन्ध्या की वेदी पर बैठा में एक अग्निचित होता हूँ,
माहुत अगस्त्य के चरणों से फूटा छोटा-सा .सोता हूँ।

अनुष्ठान
मैं शिप्रा-सा ही तरल सरल बहता हूँ,
मैं कालिदास की शेप कथा कहता हूँ।
मुझको न मौत भी भय दिखला सकती है,
मैं महाकाल की नगरी में रहता हूँ।
हिमगिरि के उर का दाह दूर करना है,
मुझको सर, सरिता, नद, निर्भर भरना है ।
मैं बैटू कब तक केवल कलम सम्हाले ,
मुझको इस युग का नमक अदा करना है ।
मेरी श्वासों में मलय-पवन
धमनी-धमनी में गंगा-जमुना धाए ।
जिन उपकरणों से मेरी देह
बनी है,
उनका अणु-अणु धरती को लाज बचाए ।
लहराए,
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अवंतिका से विदाई के समय
(अगस्त 1954)
मैं कुमुद्वती से राम-राम करता हू,
कालीदह के दह को सलाम करता हूँ।
जिसकी रज से उपकृत गीता का गायक,
उस सांदीपनि गरु को प्रणाम करता हूँ।
मैं लोल अपांगों के सपने सेता हूँ,
मैं शिप्रा का जल नयनों में लेता हूं।
कवि कालिदास जिनके गजरों पर रीझे,
मालीपुर की मालिनो, विदा लेता हूँ।
मेरे उर में भी रूप किसी का अटका,
मेरे विराग में अनुरागी सुर लटका ।
भर्तृहरि, तुम्हारी परम्परा का मैं भी,
घर से वन, वन से घर, वर्षों तक भटका।
मेरा सलाम लो पीर मछंदर बाबा,
हर सिज़दे पर निर्मित होता है काबा।
यह अलमस्ती की दुआ तुम्हीं से पाई,
दुनिया में दर-दर अलख जगायो बाबा ।
6

विन्ध्य-हिमालय 17
जिसके गृह-गृह में संस्कृति की निधि बिखरी
जिसके छोने थे इतिहासों के प्रहरी ।
उसके अतीत को वर्तमान करने में
सौ 'सुमन' मिटें पर जिए अवंती-नगरी।
तुम जिसने मुझको प्रणय-पुरस्सर हेरा,
तुम जिसने मेरा पथ बदली बन घेरा,
तुम जो मेरे हित प्राणों तक से खेले,
मैं जनम-जनम को हुअा तुम्हारा चेरा।
जब कभी ग्राम की बगिया बौराएगी,
जब कभी कोयलिया छिप-छिपकर गाएगी,
जब कभी टिकोरों से टकरा जाओगी,
मेरी गदराई याद तुम्हें आएगी ।
पथिकों की गति, मति, अदा जता देता हूँ
वेतस-निकुंज संकेत बता देता हूँ ।
कुछ काम आ पड़े शायद परदेशी से
चलते-चलते मैं पता बता देता हूँ।
जब मधुऋतु की पागल बयार छाएगी,
सूनी रजनी दुलहिन-सी शरमाएगी,
तब सुबह सेज के सुमनों को छू लेना
उनमें तुमको मेरी सुगंध पाएगी।

मन का मोती
मन का मोती मैं तुम्हें दिए देता हूँ
तुम इसे वेधकर अपना हार बना लो।
हर साध तुम्हारे लिए संजोई मैंने
तुम इसे लुटामो या अंतस में साधो,
हर सांस समर्पित तुम्हें किए देता हूँ
तुम इसे विखेरो या अंचल में बाँधो।
मेरी रसना में रसा रसवती होती
कल की क्या चिता, देखेंगे तब की तब,
अंतर की जलन मुझे बतला देती है
मिट्टी को मिलता स्नेह नहीं बेमलतब ।
जाने फिर किस साँचे में ढाला जाऊँ
तुम मुझे जला कर दीपावली मना लो,
का मोती मैं तुम्हें दिए देता हूँ
तुम इसे बेधकर अपना हार बना लो।
यह तो आंखों का दोष कि दर-दर भटका
परदा दोनों के बीच बहुत भीना है,
सुर-असुर जिसे पीने से घबराते हैं,
उसको हंसकर पी जाना ही पीना है
मन
8

विन्ध्य हिमालय|9
"
सबके अंतर के तार बंधे हों जिससे
झकारों की श्रृंगार वही वीणा है ।
अपने हित जीकर कई जनम खोए हैं
तुममें लय होकर जीना हो जीना है।
जाने फिर कर पीड़ा में पाला जाऊं
तुम मुझे तपाकर खोटा-खरा भुना लो,
मन का मोती मैं तुम्हें दिए देता हूँ
तुम मुझे वेधकर अपना हार बना लो।

चल-क्षण
यह कैसा संयोग कि सकुचा सहमा-सा सहवास था?
यह कैसा विनियोग अपरिचित-सा अपनाही श्वास था?
मन की मन में रही कहा जो वह सारा बकवास था,
वर्षों का विश्वास बन गया क्षण भर का उपहास था,
वेणी के बंदों में लिपटा मलयागिरि का वास था,
प्रांखों की पांखों में सिमटा सपनों का मधुमास था,
कैसी बही बयार कि मेरा मन पीपल का पात था,
आज हमारा और तुम्हारा बस इतना ही साथ था।
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दूज का चाँद
यह हंसिए-सा चाँद
धार तो दिखती है,
बिना बेंट के
काट करेगा पर कैसे?
इसकी मार भीतरी
शायद सालेगी,
ऐसी अचकी चोटों से
भगवान बचाए !

शरद पूर्णिमा
बीती बेसुध बरसात शरद शरमाती-सी आई,
होठों में हुलसे कंज आँख में कोई इतराई ।
गोरे अंगों में कसी-फंसी धानी अंगिया निखरी,
आँचल में झूले काँस हँसी में शेफ़ाली बिखरी।
सांसों में खिले कपास, प्यास सागर की दहक उठी,
अंतर में उमड़ा ज्वार, ज्वार की कलँगी लहक उठी।
वाली-वाली पर नाच आँख पहली भाषा बोली,
करतो-सी कुछ संकेत बाजरे की उँगली डोली।
हल-बक्खर पैर पसार भुनाने बैठे हुंडी-सी,
शैशव-सा चना विभोर मटर के मन में घुडी-सी।
पूरव में जागा प्यार, साँझ का सपना टूट गया,
द्यावा-पृथ्वी की प्रीति परस से मधुघट फूट गया।
झीनी-सी रजत फुहार झरी चेतन अवगुंठन में
ढहती तन की दीवार गुलाबी सिहरन-सी मन में।
सुनते हैं ऐसी रात सदा से आती जाती है
सुनते हैं ऐसी रात किसी की बात बताती है।
सुनते हैं ब्रज में आज संवरिया की सुधि पाती है
बैठी कुजों की प्रोट बसुरिया ईमन गाती है।
सुनते हैं ऐसी रात यक्ष का शाप बंटाती है,
राधा की रोती आँख पियाकी पाती पाती है।
12

विध्य-हिमालय 113
सुनते हैं ऐसी रात 'श्याम ने रास रचाया था,
यौवन का मुक्त उभारफ़सल वनकर लहरायाथा।
सुनते हैं ऐसी रात गोपियां भूली-भूली थी,
सुनते हैं ऐसी रात कलो की मसलन फूली थी।
तन पिघला, मनं मतवार, मूर्त क्षण ब्रह्मानंदी था,
सुनते हैं ऐसी रात मधुप कलियों का बंदी था।
तट के प्यासे अभिसार लहर छप-छप दुहराती थी,
कालिंदी की मनुहार कगारों से टकराती थी।
अधरों के संपुट मौन भुजाएं सिमटी-सिमटी थीं,
सुनते हैं ऐसी रात लताएं तरु से लिपटी थीं।
जड़-चेतन लय सुर ताल खुमारी ऐसी छाई थी,
सुनते हैं ऐसी रात सूर ने अांखें पाई थीं।
जैसे बीता रस-रास रसिक की आँखें बंद हुई,
पूनम की पल अनुभूति युगों के मनहर छंद हुई।
भोतर भर गया प्रकाश अंधेरा वाहर सिमट गया,
द्वापर का रस-संचार सूर के सुर में लिपट गया।
अंतर में थी झंकार कि बाहर इकतारा झनका,
पूजा की पहली भेंट कि सरका था मन का मनका।
पूनम की मधु-अनुभूति बन गई थाती कल्याणी,
गोपी-गोपों की प्रीति बन गई जन-जन की वाणी।
सदियों जिसने दुख-दर्द हमारा पल-पल वलाया,
विछुड़े व्रज का शृगार पदों के रस में पलुहाया।
कल जो पाई थी रात बड़ी ही सूनी-सूनी थी,
कल जो सोचो थी बात बड़ी हो ऊनी ऊनी थी।
.

14 | विन्ध्य-हिमालय
कल साँसों का संसार बड़ा ही उखड़ा-उखड़ा था,
कल जमुना तट-अभिसार वड़ा ही उजड़ा-उजड़ा था।
फ़सलें विधवा-सी मूक सितारों का मुंह तकती थीं,
माखन-मिसिरी की बात कहानी-सी कुछ लगती थी।
खाली थे पड़े वखार लटकते छूछे छींके थे,
दो-चारों घर को छोड़ गोपियों के मुंह फोके थे।
गोपों के हृदय उदास पलक कुछ भारी-भारी थी,
विसरा पूनम का प्यार भला कैसी लाचारी थी।
सुनते हैं ब्रज को आज बसाने की फिर से ठहरी,
सुनते हैं लाखों हाथ करेंगे जमुना को गहरी।
गोकुल गोरस हित आज हुआ जन-जन मतवाला है,
धरती हो रही दुधार कन्हैया आने वाला है।
जिसको बंसुरी पर नगर-ग्राम-गलियारे नाचेंगे,
फिर ऐसा होगा रास कि चाँद-सितारे नाचेंगे।
लखकर जिसकी लिखवार न आँखें लेखेंगी कुछ भो,
पूनम का मुखड़ा देख न आँखें देखेंगी कुछ भी।

भातारा हिन्दी सातिक
* भागाबिगिर
.
पापिन आँख
मेरी आंख बड़ी पापिन है।
तुम्हें देखती हैं भूखी-सी
तुम्हें पेखती हैं प्यासी-सी,
अंग-अंग
छूकर अकुलाती
विसुध वासना की दासी-सी।
मलय-वलय
माधुर्य
सूंघ लेने वाली काली नागिन है ।।
लिहाज छोड़
घूरा करती हैं तुमको वातायन से,
मैले
कर देतीं मंगल-घट
पांखों में लिपटे रज-कन से।
मिट्टी की मधु-गंध
अंध बन पी लेने की अभ्यासिन है ।।
मेरे • लोभी-लंपट
को
छवि छाया का मर्म जना दो,
या मेरी कलुपित आँखों को
मुझसे ले लो, सूर बना दो।
ज्योति तुम्हारी जुगो-जुगो कर
पुतली भी तो बड़भागिन है।
मेरी अखि बड़ी पापिन है।
मन
15

जिस दीपक के संग-सहारे
.
जिस दीपक के संग-सहारे तुमको खोजा
प्रथम मिलन में उसे तुम्हीं ने बुझा दिया ।
हम दोनों की गांठ बंधी मंडप के नीचे,
हुई भारती, दिशा-दिशा में दीप जले।
सांसों की शहनाई बजती रही सकुचती,
आँख बचाकर मुस्कानों के फूल खिले ।
जिसकी लौ ने लाज छोड़कर सेज सुझाई
उसे सुहागरात में तुमने बुझा दिया।
बाहर दीप बुझा भीतर भर गई जलन-सी
जिसे बुझाना आज तलक सम्भव न हुआ।
धुआँ-धुआ-सा कमरे में भर गया मगर प्रिय,
अन्धकार में कोई देता रहा दुना।
तुम मानो या नहीं मगर दीपक की वाती,
सिर कटने पर और अधिक जल उठती है।
तुम जानो या नहीं मगर प्राणों की थाती,
मिटते-मिटते और अधिक छल उठती है।
जिस छलकन के लिए तुम्हें युग-युग से खोजा
हाय, उसी को तुमने पथ पर लुटा दिया।
16
म

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मैं अकेला और पानी बरसता है
प्रीति पनिहारिन गई लूटी कहीं है,
गगन की गगरी भरी फूटी कहीं है,
एक हफ्ते से झड़ी टूटी नहीं है,
सगिनी फिर यक्ष को छूटी कहीं है,
फिर किसी अलकापुरी के शून्य नभ में
कामनाओं का अंधेरा सिहरता है।
मोर काम-विभोर गाने लगा गाना,
विधुर झिल्ली ने नया छेड़ा तराना,
निझरों की केलि का भी क्या ठिकाना,
सरि-सरोवर में उमंगों का उठाना,
मुखर हरियाली धरा पर छा गई जो
यह तुम्हारे ही हृदय को सरसता है।
हरहराते पात तन का थरथराना,
रिमझिमाती रात मन का गुनगुनाना,
क्या बनाऊँ मैं भला तुमसे बहाना,
भेद पी की कामना का प्राज जाना,
क्यों युगों से प्यास का उल्लास साधे
भरे भादों में पपीहा तरसता है।
मैं अकेला और पानी बरसता है।
18

होली
'आज सुबह से बदली-बदली बोली है,
लोल कपोलों में अबीर है, रोली है,
हो ली - हो ली कहते तारे भाग गए
अम्बर की आंखों में शोख ठठोली है।
"कितना बाँकापन है बांको चालों में,
बल खा जाती नदी जिस तरह ढालों में,
मैंने तो पथ से पायल की बात कही,
'किसने लाल गुलाल मल दिया गालों में !
मादक लाली की सीमा कजरारी है,
राधा को बांधे रसिया बनवारी है,
रंग-रंग के रंग घरा ने देखे हैं,
लेकिन इस रंग की लीला बलिहारी है।
जिस पर बनमाली ने सुध-बुध वारी है,
वह सुषमा भी तो तेरी लाचारी है,
बांसुरिया को तू जी भर ले कोस मगर
उसी बाँस की तो तेरी पिचकारी है।
19

।
रंग-पंचमी
बड़ी रगीली रंग-पंचमी आई हो,
गली-गली में रस की बदरी छाई हो,
हल्की-हल्की हवा हुलसती प्यास-सी,
होली को चोली में दहक पलाश की,
खिला अशोक उमंगों को हलकोरता,
लाल-लाल गुच्छों से चरण अकोरता,
पतझर के पत्तों में मर-मर प्यार का,
'नगी डालों में रंग नये निखार का.
बहकी-बहकी बातें आज बहार की
होठों में लगती है लपट अनार की,
फ़सलों की पलकों को.पावस खोलता,
गेहूं की बालों में दाना बोलता,
हर दाने का अपना-अपना राज़ है,
'गेहूं का रंग-रूप सृजन का साज है,
'इसीलिए तो होली हँसती आज है,
इसी ठठोली में फागुन की लाज है,
इसकी लाली में खिलता श्रृंगार है,
मलो अबीर, गुलाल तुम्हें अधिकार है,
काला मुख करने वालों से. रार है,
होली तो वस लाली का त्योहार है,
20

विन्ध्य-हिमालय ] 21
-कोई मुख नोला-पीला रह जायगा,
तो फिर पर्व तुम्हारा सब ढह जाएगा,
झरे हुए पत्तों को झोंको आग में,
नई कोंपलें रोपो अपने वाग में,
घर-घर की होली में भूनो बालियाँ,
नई फ़सल की खुशहाली की डालियाँ,
छोला छीलो, चोला बदलो प्यार में,
होला भूनो होली के सत्कार में,
नये तरन्नुम में नाचो दे तालियाँ,
'प्यार लुट रहा दे लो मीठी गालियाँ ।
ढोलक की थापों पर फिर आवाज़ दो,
नये जमाने को सरगम दो, साज़ दो,
मसलो लोल कपोल रात को भोर दो,
चुनर को उफ़नाए रस में वोर दो,
वर्षों की उलझी कबरी को खोल दो,
बिखरे केशों में मावस का मोल दो,
अंगों-अंगों में रस की बरसात हो,
रंगों-रंगों में रंगों की बात हो,
सबकी खातिर हो बिछुड़े मेहमान-सी
राशि-राशि खुशियां उमड़े खलिहान-सी,
मन में भरा हुलासों का हुलसाव हो,
डालों-डालों बौरों का बौराव हो,
वौराए जो नहीं जवानी उसकी क्या ?
गदराए जो नहीं कहानी उसकी क्या ?

22 | विन्ध्य-हिमालय
टपके नही रसाल रसानीजानी क्या ?
दहके नही मशाल प्राग कापानी क्या ?
ठंडी मत होने दो ये चिन्गारियाँ,
लामो लामो सब अपनी पिचकारियाँ,
ऊपा की लाली भर लो पिचकारी में,.
कोयल की गाली भर लो पिचकारी में,
माली की डाली भर लो पिचकारी में,
तितली कीताली भर लो पिचकारी में,.
भ्रमरों की गुन-गुन गानो पिचकारी में,
गन्ने का रस भर लामो पिचकारी में,
महुए का मदभार भरो पिचकारी में,
सावन की बौछार भरो पिचकारी में,
बीन, वाँसुरी, चंग भरो पिचकारी में,.
ढोलक, झांझ, मृदंग भरो पिचकारी में,
इंद्रधनुष के रंग भरो पिचकारी में,.
होली का हुड़दंग भरो पिचकारी में,
मारो-मारो जगह बेजगह मत देखो,
फागुन की फुहार में भादों मत लेखो,
बड़ी निगोड़ी पिचकारी करती दिक है,
तन-मन सब रंग गया रामही मालिक है,.
मइया! मैं तो मरी नजर नीची-नीची,
पिचकारी की मार बड़ी आड़ी-तिरछी,
कैसी वही बयार सुखी, सीली-सीली,.
दइमारे! कर दी अंगिया गीली-गीलो,
.

"वातान' हिदी गासिक
7, बीरार
विन्ध्य-हिमालय ] 23
बौरों के कोनों में नये टिकोरे हैं,
अभी आम के अधर अछूते कोरे हैं,
कान्हा के कानन का कुंज-वितान दो,
वंशी के स्वर में पिछली पहचान दो,
शरमाई साँसों की छलकन गागर में,
आयो छिप जाएं अबीर की चादर में,
होली में सब कूड़ा-करकट जलता है,
नवयुग का शिशु लपटों बीच मचलताहै,
ज्वाल बिना जीवन होता आबाद नही,
दहन बिना प्रह्लादों को प्राह्लाद नहीं,
नई आग ने जीवन की जय बोली है,
नये देश की नई-नई यह होली है,
इसीलिए जर्जरित जलाकर राख करो,
उसी राख में नये फ़सल कीशाख धरो,
भस्म-राशि को खेल-खेल में धूर करो,
नये जमाने के रोधों को चूर करो,
बारूदों के धूम-धड़ाके लाओ मत,
एटम के डामर से अब डरपाम्रो मत,
कुसमय की मत बात सुनायो मंगल में,
हल्का लाल अगस्त्य खिल गयाजंगल में,
चम्पे को भीनी सुगंध का क्या कहना?
मधुपों की नुक्ताचीनी का क्या कहना
प्रायोपाजप्यार करलें फिर प्यारको,
इसी रंग में रंग दें सब संसार को,
अब तक जैसी उसको ऐसी-तैसी हो,
पंचों को है राय. पञ्चमी ऐसी हो।
?

आस आम वहुत वौराए
मधु-माधव को डाल-डाल पर
काम-विशिख से छूटे,
कोयल के अरमान श्राम के
रोम-रोम से फूटे,
मधुऋतुपति के राजमुकुट पर
कलँगी से लहराए ।
नये टिकोरों की छलना में
छैल छबीले भटके,
पुञ्ज-पुञ्ज अभिलापात्रों के
गुच्छे-गुच्छ लटके,
होड़ लगी है सबसे पहले
कौन सीप
कनक-कसैली गन्ध गमकती
बन-बन,
वीथी-बीथी,
किसकी मटको छलक उठी है
किसकी
रीती-रीती ?
मदन महोत्सव में कितना मधु,
गदराए ?
मुग्ध
रसाल
लुटाए ?
24

विन्ध्य-हिमालय 1 25
बड़ी वावरी ऋतु आई है
जो देखे बौराए,
तपे मृगसिरा तब अंतस का
सीझे, मधुराए,
अल्हड़ चैत, कोयलिया चौरी
कौन किसे समझाए ?
फूला-फला रसाल झेलता
लू-लपटें अंग-अंग में,
बोराने का मौसम लाता
दाह-जलन संग-संग में
जले
वैसाख,
पथिक कापथ रसमय हो जाए।
आसों पाम बहुत बौराए ।
जेठ,

या गया वसन्त
आ गया बसन्त बह
चला समीर मद-शिथिल
मधुर, मधुर, मधुर।
फिर पलाश डाल-डाल लाल लौ जली,
आम्र की उमंग अंग-अंग में पली,
पात-पात झूम चूमता कली-कली,
गंध-अंध
गुनगुना उठा
मधुप मचल-मचल
किधर, किधर, किधर!
वेकली विकास की किसे खली न रे,
निखर-निखर विखर उठे वौर बावरे,
अमलताश की हुलाश ज्वाल-सी जरे,
मंद-मंद मधु मलय बहा कि पिक पुकारती फिरी विकल
विधुर, विधुर, विधुर।
कर्ण कणिकार, कवरि कुरबकों भरी
कुंद-इंदु मल्लिका विसुध विहँस पड़ी
पुलकिता प्रियंगु, चल अशोक मञ्जरी,
चम्पई सुवास स्वर्ण-अंगना अनंग परस से उठी पुलक
सिहर, सिहर, सिहर।
लहकता गुराँस ललक लास से भरा,
लुब्ध मुग्ध क्षुब्ध वावरी वसुंधरा,
छलकता पराग-चपक जव भरा-भरा,
राग-रंजिता सुरति-सलज्जिता सखी से छेड़छाड़ तो छयल
न कर, न कर, न कर।
पा गया बसन्त बह चला समीर मन्द-शिथिल
मधुर, मधुर, मधुर।

अड़चन
तुम तो उधर पीठ कर बैठी
मैं किसको
देखू ?
ये थोड़े-से क्षण जीवन के
सकुचे सिहरे
यह यश का अभिशाप कि
सबकी मुझ पर नजरें हैं,.
क्या
लुटना है
पाप
मुग्ध-मन के संवरणों पर?
गाज गिरे
गौरव के
गर्वीले आवरणों पर,
यह तो इक संयोग कि
पथ चलते तुम दीख पड़ी,.
सूनी आंखों में काजर की
रेखा-सी
उभरी
आँखें हो तो है मनरंजन
खंजन वनती हैं,.
पाँखे ही तो हैं, शोभी की
लौ
तनती है,
27

?
28 विम्य-हिमालय
इसीलिए चन्दा को कनखी पर
न्यौछावर
लुका-छिपी किरनों की बादल में
कर तक लेख
गो
चुप-चुप लाचार
विवशता पर सिर घुनता हूँ,
साँसों के उभार की आहट
तो
सुन सकता
केले के पते पर नागिन
जव लहराती
पास तुम्हारी धड़कन को
अड़चन प्रा जाती है,
भीतर मन की गाँठ शिथिल-सी
जब सुलझी होगी,
वाहर घरवस बिखर-बिखर
कवरी उलझी होगी,
सुलझाने-सुलझाने में
जो सिमटी जाती हैं,
बिखर बिखर लुट जाने में
जो लिपटो जाती हैं,
ऐसी उलझो-सुलझी
पहेलियों पर पागल मैं-
माते-मनुहारों की छवियाँ
किस पथ पर रेखू ?

प्रिय, तुम्हारी तपन तो वरदान है
व्यर्थ बरसों दर-बदर मारा फिरा,
व्यर्थ आशा से लगाया आसरा,
एक उलझन से सुलझने के लिए
जाल के जंजाल में फंसना पड़ा।
रात की काली लटों में लिपट कर
एक दीपक मुस्करा कर कह गया-
अमा में ही ज्योति का संधान है।
प्रिय, तुम्हारी तपन तो वरदान है।
प्यास मादक श्वास बन छलती रही,
एक बेचैनी विवश पलती रही,
शब्दहीन पुकार-सी सिहरन भरी
लो किसी के रूप की जलती रही।
खिलखिलाते तारकों. से रूठकर
एक जलता नखत टूट बिखर गया-
चांद तो भूला हुमां मेहमान है।
प्रिय, तुम्हारी तपन तो वरदान है ।
.
19

-तुम सिसकती श्वास के उच्छ्वास हो तुम न मिलते तो विरह का सुख न पाता जान में, तुम न खिलते तो मधुप-सा कर न पाता गान मैं, तुम ललकते प्राण की मधुप्यास हो, इतना बहुत है। तुम हसे तो रुदन को उत्सर्ग का संवल मिला, तुम छिपे तो खोज को भीखोजने काबल मिला, • तुम संजोई पास के विश्वास हो, इतना बहुत है। देख तुमको मुस्कराई चांदनी नव-पोडसी, एक आंसू सिंधु से करने লা था होड़-सी, मूक मिट्टी में समर्पण- चाव उमड़ा चौगुना, मैं तुम्हारी अर्चना में प्रारती की • तुम जलन की ज्योति के इतिहासाहो, इतना बहुत है। लो बना, 30

मूलों का प्रायश्चित्त करो
भूलों का प्रायश्चित्त करो मेरे मन
शूलों में फूलों का सौन्दर्य संवारो।
जीवन की पगडण्डी टेढ़ी-मेढ़ी है
पग-पग पर फिसलन से गिरने का डर है,
खूखार भेड़िए रथ को राहें रोके
कान्तारों में फुफकार भरे गह्वर हैं ।
पप की दूरी को काट-छाँटना मुश्किल,
रथ के घोड़ों को चाहिए दाना-पानी,
यों ही पड़ाव में डेरा करते-करते
हो जाए न जीवन-गाथा नयी पुरानी।
इसलिए छोड़ विधाम कमान सम्हालो
सूरज-चन्दा से गति की होड़ लगानो,
पथ में जब चीखें स्यार, दहाड़े बब्बर,
तब ऊर्ध्व कण्ठ से निर्भय गाना गायो।
31

32 | विन्ध्य हिमालय
मन की वेफिक्री सबसे बड़ी नियामत,
मन की कदराई सबसे बड़ी कयामत,
बालू से काढ़ो तेल, वियावानों में
वस्ती के दीपों का जाज्वल्य उभारो।
दुर्दमन तपन से तन के पीले पत्ते
झरने दो जिससे विखरे मन की क्यारी,
अंतसलिला से सीचो उर का ऊसर
फूले फैले उत्सर्गों को फुलवारी ।
मंजिल तो जानें किसने देखी-जानी
जीने का एक बहाना ही मिल जाए,
जिस पौधे को जीवन-भर पाला-पोसा
अंतिम साँसों के साथ-साथ खिल जाए.'
जीवन फल-सा पक जाय, दूसरे - खाएं:
रिस-रिस कर रस का मादक सार लुटायो,
जो वीज मिल गया था मिट्टी में गल कर .
उसकी मिट्टी को फिर से बीज बनायो।
विश्वास विश्व का सबसे उज्जवल जोहर,.
1. पौरुप" धरती की सबसे बड़ी धरोहर,
मनु के दीपक का स्नेह न चुकने पाए
जड़ रजकन का चेतन सौकर्य उभारो,
भूलों का प्रायश्चित्त करो मेरे मन
शूलों में फूलों का सौन्दर्य संवारो।

सन्ध्या का संदेश
संध्या की लाली मुझको पी लेने दो,
जोवन का यह क्षण जीभर जी लन दो।
यह सूरज का सार प्यार जी भर चक्खो,
आँखों के अधरों पर उंगली मत रक्खो।
अभी अँधेरे को कुछ ज्योति बाँटनी है,
इसके बल पर सारी रात काटनी है।
भर लो इसका राग पिया की पाती में,
-भर लो इसकी याग दिया की वाती में।
भर लो इसका मद तारों की आँखों में,
'छोटो कुछ छोटे जुगनू को पॉखों में।
भर लो शीतल ज्वाला शशि के अंचल में,
“परछाई भर लो सरिता के कल-कल में।
वीणा के तारों में राग विहाग भरो,
मंडप के नीचे सपनों की मांग भरो ।
तम के सागर में सम नौका खेना है,
संध्या का संदेश ऊपा को देना है।
33

प्रभात की किरण
मैं आँखें मलता था अलसाया-सा,
बोती के सपनों में भरमाया-सा,.
कुछ अनहोनी-सी साज हो गयी रे,
मुझको प्रभात की किरन छू गयी रे।
जब तक सोचूं क्या हुआ एक छिन में,.
वह एक अनी-सी पैठ गयी मन में,
बाहर अम्बर आतुर अभिलापा-सा,
भीतर कुछ कटने लगा कुहासा-सा,.
अनजान कल्पना ने अंगड़ाई ली,
चिड़ियों की पहली चहक सुनाई दी,.
झंकार ढली मीठी शहनाई-सी,.
सुकुमार उंगलियों से सहलाई-सो,
अन्तर में ढलता लावा-सा दुर्धर
कछ लगा सालने अन्दर ही अन्दर
अब जन्म-जन्म को नींद खो गयी रे,-
मुझको प्रभात की किरन छू गयी रे ।।
34

विध्य-हिमालय | 35
पहले भी तो प्रभात आता ही था,
जग में स्वणिम प्रकाश लाता ही था,
अम्बर अवनी पर राग लुटाता था,
ऊपर-ऊपर मुझको भी भाता था,
यह किरन निगोड़ी कहाँ छिपी थीपर,
जो लुटा गई मुझ पर सपनों के स्वर,
रोने-धोने की कोई बात नहीं,
अब तो मरना भी अपने हाथ नहीं,
अब अन्धकार के चिर-दुराव से क्या?
अब हार-जीत के मोल-भाव से क्या?
अन्तर में कोई ज्वार भर गया रे,
मैं बिना नाव के सिन्धु तर गया रे ।
मन-मोती की सौगात लुट गयी रे,
मझको प्रभात की किरन छू गयी रे।

लज्जा रक्खो
तुमने इतना मान दिया है तो लज्जा रक्खो।
नश्वर सांसों में अनन्त उत्सगों की समिधा
अन्तर में निर्धूम अग्निमय लपटों को वेदी,
अलसाई आँखों में भर दी सपनों की थाती,
नौसिखिया हाथों में तुमने बांसुरिया दे दी।
तपी-तपाई सीझी-साझी रसवारी माती
वृन्दावन के विमल वंश के भीटे से काटी,
सोरह सहस गोपिकानों की पीर लिए उर में,
जाने किस जादू से मुखरित हुई मूक माटी।
मतवाली मीरा-सी घीरा गरल सुधा करती
छैल छबीले किसी छली के अली अंश-सी है,
इसके रंधों में राधा की परम विरह भापा
नयी नवेली लगती लेकिन उसी वंश की है
इसे वजाऊँ तो बजता है तार-तार तन का
रक्तशिरामों में नागिन-सी लहरें मार रही,
इसकी डसन न मौका देती पानो मांग सर्व
फूंक-फूंक में मौत सौत-सी रूप संवार रही।
36

विन्ध्य-हिमालय | 37
जिसका जहर जिन्दगी देता उसकी बलिहारी
जीने-मरने को क्या इतना संबल कुछ कम है ?
नाव उम्र की झोले खाती जिन हल्कोरों पर
प्रांखों के खारे पानी में उनका संभ्रम है।
तुमने जो कुछ दिया उसे किस अंचल में बांधू
जीवन तो स्वर पर न्यौछावर होने का प्रादी,
बाहर-भीतर रास हो रहा शरद पूर्णिमा का
ज्योतिर्मय वरदान दे गया अम्बर आह्लादी।
अब बिखरूं तो शून्य हमारा भय संशय किसका
एक तुम्हीं में लय होने की साध रही वाकी,
मेरे स्वर पर सबका दावा धन्य हो गया मैं
मन वृन्दावन केलिकुंज की पुतली में झांकी।
अब घनश्याम घिरोजीभरकर जीवन भरोभरो
चीर-हरण हो गया हृदय का इतना और करो
मेरे अधरों पर द्वापर की स्वर-सज्जा रक्खो
तुमने इतना मान दिया है तो लज्जा रक्खो ।

शवनम
रात आई कि याद साथ लिए आती है
बात की बात में वरबाद हुई बाती है।
स्नेह के तार पै दीपक को जलन निर्भर है
प्यास को प्यास पिए जाती है ।
जिन्दगी जीत है, विश्वास है, तय्यारी है,
मौत विश्राम है, संघर्ष की लाचारी है।
यों तो कंधों को हिमालय का बोझ भी हल्का
प्यार का भार बहुत भारी है।
प्यास है, ओस को बूंदें ही पिए लेता।"
रात है, देख के तारों को जिए लेता हूँ।
तुम नहीं दे सके मिट्टी को भरोसा लेकिन
मैं तुम्हें चांद की मुस्कान दिए देता हूँ।
आज पाए न तुम चलने के समय आयोगे
फूल की कद्र न 'की घूल पे इतरायोगे ?
गीत ये तुमको सुनाने को नहीं लिखे हैं
इनको शायद कभी सूने में गुनगुनासोगे।
38

विन्ध्य हिमालय | 39
होठ कॅप-कॅप गए पर शब्द नहीं कढ़ पाए
मांगने को हुए पर हाथ नहीं बढ़ पाए ।
दिल धड़कतारहा भौहों पै शिकन तक न पड़ी
चाह के चित्र थे पुतली पं नहीं चढ़ पाए ।
आँख दी देखने को फिर तो था निवाह नहीं
आपको देखा तो कोई किया गुनाह नहीं।
-हर लहर के जुबान हो तो आप भी जानें
आँख के पानी की दुनिया में कोई थाह नहीं।
मानता हूँ न मनाने से आप पाएंगे
-मैं कहूँ बात मगर आप न सुन पाएँगे
आपको पाने से ज्यादा मुझे खोने का खयाल
आप पाए तो दौरे-दर्द चले जाएंगे
जिन्दगी हर जगह विखरी सकेल लो साथी
आज अरमानों से खुलकरके खेल लो साथी।
बूंदें दो प्यार को मिल जाँय जो भूले-भटके
हज़ार बूंदें हलाहल की झेल लो साथी।
‘आँख हिलती है तो सब आसमान हिलता है
प्यार खिलता है तो साराजहान खिलता है।
-खोज को खोज के खोजा यही मैंने अब तक
-खुद कोखोकरही खुदी का मकान मिलता है।

40 | विन्ध्य हिमालय चाँद तुमने चाँदनी की राग रस वनकर चुप्रा एक धब्बे से मगर मुखड़ा तुम्हारा हत हुअा। कालिमा अपने कपोलों की मुझे दे दोसुभग आँख की पुतली तुम्हें सौ साल तक देगी दुना। अभ्र की आंखें छलकती मौन जब सन का ही सवका देता पौन तब। होठ पी-पी लिए पपिहा मिटा प्यास का इंसाफ़ लेगा कौन पर अब ? आँख अनकहनी अनकहनी कहानी कह गई. सांस सूनापन सिसक कर सह गई। वात जीवन भर तुम्हारी की मगर बात इतनी, बात आधी रह गई। कुछ पहले-पहले आज न दुनिया छलो गई- फूलों के मुख पर सदा धूल हो मली गई। वाहें फैलाकर पुलिनों ने सरितासे मांगा आलिंगन प्रिय, आज नही, कल-कल कहती वह चली गई। नैन का नोर नमन था बहा-बहा न बहा पीर का तीर शमन था सहा-सहा न सहा । राह के रोर हमी थे रहे-रहे न रहे,. दर्द के दौर तुम्हीं थे दहे-दहे न दहे ।।

ललक की लाचारी
प्यास थी
आई किसी की याद तो आती चली गई
छाई घटा नयन में तो छाती चली गई।
दो बूंद से अधिक न पपीहे की
पानी भरी पुकार जलाती चली गई।
सीपी पड़ी समुद्र में प्यासी बनी रही
अंतर की आग आव ढलाती चली गई।
बाहर किसी ने बात न पूछो बहार में
भीतर किसी की टेर बुलाती चली गई।
बौराए बाग ने न हूक कूक की बूझी
छिप-छिप के लजीली पिकी गाती चली गई।
जलने की ललक लेके पतंगा पड़ा रहा
आया जो स्नेह दीप में बाती चली गई।

उधेड़बुन
जीवन के जंजालों से जी घबराता है,
औरों से क्या अपने से भी कतराता है।
व्याकुल होता, रोता, गाता, चिल्लाता है
संघर्षों की चिता को चिता बताता है।
मैं सोच रहा यदि पथ में न हो परेशानी
जीवन सीधा सपाट सुथरा-सा सैलानी ।
तो पग आगे बढ़ने को क्यों अकुलाएंगे?
अवरोध नहीं होगा तो किसे ढहाएंगे ?
अंगारे क्सिको शीतलता सुलगाएंगे ?
आँसू किसको मीठी मुस्कान चुराएंगे ?
कैसे सागर का उमड़ा ज्वार जुटाएंगे?
रेगिस्तानों में कैसे रस बरसाएँगे ?
नभ की नीली चुप्पी का मौन मिटाएँगे
चंदा के घर का राज़ किस तरह पाएंगे?
मंगल ग्रह में मंडप कैसे बनवाएंगे
-संध्या के सिर कैसे सिंदूर सजाएँगे?
शबनमी सितारे कैसे ढलवा पाएंगे
अनबींधे मोती कैसे गुहवा लाएँगे?
सीधी बाँहों से कैसे गले लगाएँगे ?
-सीधी राहों से कैसे मंजिल पाएँगे ?
42

लेखनी की जिम्मेदारी
'कहते हैं दुनिया पानी-जानी है
कहते हैं जीवन वहता पानी है।
कहते हैं अनगढ़ रीति जवानी है
कहते हैं असफल प्रीति कहानी है।
कहते हैं पथ को धूल रवानी है
कहते हैं चुभता शूल निशानी है।
कहते हैं बादल अवघड़दानी है
लेकिन प्यासा चातक भी मानी है।
यों तो डाली पर नित्य सुमन खिलता
-मानव जीवन हर बार नहीं मिलता।
जो मिल जाता है सस्ता लगता है
जाने लगता तव मोल उभरता है
जब चला गया तो रोना-गाना क्या ?
चिड़िया चुगने पर फिर पछताना क्या?
इसलिए विखरने के पहले चेतूं
डाली से झरने के पहले चेतूं ।
'चुभती रहती प्रतिपल प्रज्ञा पैनी
मुझको हर क्षण जीने की वेचनी।
43

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विन्ध्य हिमालय 45
ये सब अपने छाया-प्रकाश के धन
गतिपथ पर बनी बैलगाड़ी. इंजन ।
कितनों को इसके लिए पड़ा तपना
साकार हुआ तब सदियों का सपना ।
लेकिन इस युग ने अपनापन खोया
गोदी में प्रात्मज लिए मनुज रोया।
लगते हैं सब स्वार्थों के जाए-से,
ये ज्ञान और विज्ञान पराए-से ।
सत्संग राहु का किया चन्द्र-रवि ने
भस्मासुर को वरदान दिया शिव ने।
हो गया प्रगति का पथ जर्जर धीमा
शापित नागासाकी हीरोशीमा।
दम घोंट रही है युग की लाचारो
इसलिए लेखनी की
जिम्मेदारी,
जो दिखा उसे कहने की ताकत दो
जो लिखा उसे रहने की ताकत दो।
कविता-अविता तो होती रहती है
पत्यर पिघले तब गंगा बहती है।
गंगा है तो ऊसर भो उर्वर है
नंदन वन भी धरती पर निर्भर है,
इसलिए भगीरथ का तप मुझको दो
इसलिए दाशरथि का व्रत मुझको दो।
मैं शिवि-दधीचि का साहस जुटा सकू
में शेपनाग का बोझा उठा सकू।

44 | विन्ध्य-हिमालय
इसलिए धरित्री का कण-कण प्यारा
इसलिए जिंदगी का क्षण-क्षण प्यारा।
चाहे सुपुप्ति हो, जागृति हो, सपना
कुछ भी न पराया यहाँ सभी अपना।
सूरज-चन्दा-तारों की कल छलना
यह धरती अपनी आसमान अपना ।
दूर्वा, द्रुम, बिटपी, लता, गुल्म झांको
सर, सरिता, सागर, निर्भर गति वांकी।
गिरि गह्वर, बीहड़, बियावान जंगल
सब सगे सहोदर सत्य सुघर मंगल ।
खंजन, कपोत, शुक, मोर, लवा, बुलबुल
मनके अनेक हैं तार एक अविकल ।
वेला, जूही, मालती, कदंव, बकुल
सव एक भ्रमर के गुंजन से चंचल ।।
उपवन, वीथी, अमराई, मरु, ऊसर
खलिहान, खेत, दुरौं, कछार, पटपर
हँसिया, कुदाल, खुरपी, गती, रंदा
हल, बैल-गाय, गोरू गोरख-धन्धा।
जिन आविष्कारों पर सभ्यता पली
ये रेल, तार, रेडियो, फोन, विजली ।।
ये वायुयान, जलयान, ब्रेनगन भ्रम
ये टेंक, टारपीडो, अणु-उद्जन बम ।

विध्य हिमालय
ये सब अपने छाया-प्रकाश के धन
गतिपथ पर बनी बैलगाड़ी इंजन ।
'कितनों को इसके लिए पड़ा तपना
साकार हुआ तब सदियों का सपना ।
लेकिन इस युग ने अपनापन खोया
गोदी में आत्मज लिए मनुज रोया।
लगते हैं सब स्वार्थों के जाए-से,
ये ज्ञान और विज्ञान पराए-से ।
सत्संग राहु का किया चन्द्र-रवि ने
भस्मासुर को वरदान दिया शिव ने।
हो गया प्रगति का पथ जर्जर धीमा
शापित नागासाकी हीरोशीमा।
दम घोंट रही है युग की लाचारी
इसलिए लेखनी की
जिम्मेदारी,
जो दिखा उसे कहने की ताकत दो
जो लिखा उसे रहने की ताकत दो ।
कविता-अविता तो होती रहती है
पत्थर पिघले तब गंगा बहती है।
गंगा है तो ऊसर भो उर्वर है
रंदर यस मी परती पर निर्भर है,
इसलिए भगीरथ का तप मुझको दो
इसलिए दाशरथि का व्रत मुझको दो।
मैं शिवि-दधीचि का साहस जुटा सकूँ
मैं शेपनाग का बोझा उठा सकू।

नया मोड़
नया मोड़ इतिहास ले रहा
आगे कदम बढ़ाओ।
अरुणोदय के पुण्य प्रहर में
विस्तर पर मत लेटो,.
अंगड़ाई लेकर उठ बैठो
विखरा स्वर्ण समेटो।।
खड़े खेत में झपकी मत लो
नींद खुमारी त्यागो,
मेड़ न बाँधो, बाड़ न रोपो
रात-रात भर जागो।
एक दशक में सदियों का
सारा अभाव भरना है
नये देश की नयी फ़सल की
रखवाली करना है।
कितनी कुरवानी के बल पर
सबेरा
लाए,
गाफिल हो क्रांति
द्वारतकाकरलौट न जाए।
नया
मत
46

विन्ध्य हिमालय | 47.
जगो पहरुए, नचिकेता की
अग्नि जली लासानी,
प्रतिक्रिया के दस्यु डाल दें
कहीं न उसमें पानी।
सदियों के पाले-पोसे
अरमान नहीं खो जाएँ,
जोते-बोए खेत कहीं
वीरान नहीं हो जाएं।
भेड़-बकरियां, अरने-मैसे
ऊँट उठाए गरदन,
फ़सल हमारी चर जाने को
ताक लगाए हरदम ।
अपने घर में सानी-बूसा
सड़ा करे मनमाना,
इनका काम यही है
औरों की खेती चर जाना।
इसीलिए कहता
विखरी चिन्गारियां बटोरी,.
छोटे-मोटे मतभेदों को
गंगानी में वोरो।
विश्व शांति के अभियानों का
हम तो दम भरते है,.
हूँ

48 J विन्ध्य हिमालय
मोर्चे पर
सैनिक नाहक
वकवास नहीं करते हैं।
सदियों तप-तप कर तुमने
जो जीवन ज्योति निखारी,
नये एशिया पर पाई है
उसकी ज़िम्मेदारी।
शक्ति साधको, अब ग़ाफिल
होने का काम नहीं है,
इस पीढ़ी को पल भर भी
पथ पर विश्राम नहीं है।
कहाँ गए हल-बैल तुम्हारे
ट्रैक्टर औ' बुलडोजर,
तोड़ो खेतों को मेड़ों को
जोतो अवनी-अम्बर।
मरु-थल जोतो, असर जोतो
जोतो बजर
परती।
-सोने-चांदी की फ़सलों से
सारी धरती,
जाति वर्ग को छोटी-मोटी
दीवारों को तोड़ो,
मानवता का फार्म बनेगा
गोड़ो,
मिट्टी गोड़ो।
भर दो

कुड़ फूटो, - वजरी-पीसोर
चट्टानों की तोड़ी,
वीहड़ में जनमार्ग बनायो
सरितानों को मोड़ो।
उठो सिंधु का ज्वार समेटे
चन्दा की लट चूमो,
तारों के संग रास रचानो
तूफानों में झूमो।
बवण्डरों के संग बोरामो
धूमकेतु को धारो,
प्रलयंकरी वाढ वर्षा में
नाव
उबारो।
नयो सृष्टि का सयोजन है
असुरों को ललकारो,
नयी मानवी के अतस की
श्रद्धा-सुधा
सवारो।
उपनिपदों का नया संस्करण
मुद्रित
प्राज करायो,
जगा
सको तो बंधु
मशीनों का अध्यात्म जगायो।
फैक्टरियों की ऊर्ध्व चिमनियों की
प्रात्मा
पहचानो,
मनु की

50 [विन्ध्य-हिमालय
दग्ध भट्टियों की दहकन में
ब्रह्म तेज अनुमानो।
इसी ब्रह्म के तप से पिघलेगी
हिमगिरि की चोटी,
यही ब्रह्म वाँटेगा घर-घर
फिर से माखन-रोटो।
इसी ब्रह्म की बाँसुरिया पर
युग का राग ढलेगा,
जिसकी लय पर उजड़ा ब्रज
फिर दूधो-पूत फलेगा।
जब छलकेगी दूध दही से
ग्वालिनियों की मटकी,
निखारेगा छल
कन्हैया
उलझी गाँठे लट की।
केशों का विन्यास स्नेह बिन
रूखा नहीं रहेगा,
तन की भूख मिटेगी तो
मन भूखा नहीं रहेगा।
चिन्तामों की चंचलता के
झोंके सहम थमेंगे,
वाहर शांति, समृद्धि वसे तो
भीतर
राम रमेगे।

है,
विन्ध्य-हिमालय ! 51
शत्रु नहीं विज्ञान तुम्हारा
संकट का साथी
यह भी ऋपियों के चिन्तन का
रस
परमार्थी है।
यह भौतिकता का नव
आध्यात्मिक स्तर साज रहा है,
हर प्रयोगशाला
ज्योतिर्ब्रह्म विराज रहा है।
सिंधु-गर्भ से इन गोताखोरों ने
बीने
मोती,
मानवता के त्राण हेतु पीढ़ियां
निछावर
होती।
ये घर-घर में खुदवा देंगे
निर्मल मानसरोवर,
मोती का अभाव हंसों को
नहीं खलेगा पलभर।
सतयुग के सत का आवाहन
नांच-पांच में रांचो,
आज नया इन्सान ढल रहा
इस सांचे को जांचो।
हाय, हाय, चिल्लाने से
गति का रथ नहीं रुकेगा,

सीमा छू
52 विन्ध्य-हिमालय
मानवता के पुरुषार्थों का
झंडा नहीं झुकेगा।
तपते-तपते जब तापक्रम
लेता है,
अणु की शक्ति प्रकट होती है
जड़ चेतन होता है।
इस विज्ञान भगीरथ ने
कुछ ऐसा अनुमाना है,
नभ से
नहर
निकाल
दूध की गंगा को लाना है।
इसके पहले खाद डालकर
युग का खेत कमा लो,.
संकल्पों के शिव से
धारा का धारण धरवा लो।
जिस दिन नयी क्रांति
ढालेगी स्वगंगा का पानी,
जाएंगे बड़े-बड़े
अवरोधों के गढ़ मानी।
यज्ञ-अग्नि के तप:धूम से
मघवा को नाराघो,
मानव ममता के स्रोतों के
नये बांध अब बांधो।

विध्य-हिमालय | 53
खाई
खंदक
खाल
पोखरों गड्ढो को भरना है,
ऊँची-नीची धरती का
विघटन समतल करना है।
सामूहिक खेती होगी अब
सामूहिक श्रमदान,
संगच्छध्वं संवदध्वं संवो
मनांसि जानताम्।
गांधी-सागर का जल
नेहरू की नहरों में ढालो,
शांति प्रेम संबोधि वृक्ष
फिर भारत में पनपालो।
इसकी कलमें देश-विदेशों को
भेजी जाएंगी,
प्रियदर्शी अशोक की
गौरव गाथा दुहराएंगी।
नई फ़सल बोने का दिन है
ज्योति वीज विखरानो,
नया मोड़ इतिहास ले रहा
प्रागे कदम बढ़ानो।

युग को गायत्री
हर क्यारी में पदचिह्न तुम्हारे देखे हैं
हर डाली में मुस्कान तुम्हारी पाई है,
हर कोटे में दुख-दर्द किसी का कसका है
हर शबनम ने जीवन की प्यास जगाई है।
हर सरिता की लचकीली लहरें डसती हैं
हर अंकुर की आँखों में कोर समाती है,
हर किसलय में अधरों की प्राभा खिलती है
हर कली हवा में मचल-मचल इठलाती है ।
अम्बर में उगतीं सोने-चांदी की फसलें
ये ज्वार वाजरे की मस्ती लहराती है,
अन्तर में इनका बिम्ब उभरता पाता है,
चांदनी सिन्धु में सौ-सौ ज्वार जगाती है।
मैं कैसे इनकी मोहकता से मुख मोड़
मैं कैसे जीवन के सौ-सौ धंधे छोड़,
दोनों को साथ लिए चलनाक्या संभव है ?
तन का मन का पावन नाता कैसे तोड़ ?
54

विन्ध्य-हिमालय | 55
क्या उम्र ढलेगी तो यह सब ढल जाएगा
सूरज चन्दा का पानी गल जल जाएगा,
जिनके बल पर जीने-मरने का स्वर साधा
उनका आकर्षण सांसों को छल जाएगा।
जिस दिन सपनों के मोल-भाव पर उतरूंगा
जिस दिन संघर्पो पर जाली चढ़ जाएगी,
जिस दिन लाचारी मुझ पर तरस दिखाएगी
उस दिन जीवन से मौत कहीं बढ़ जाएगी।
इन सबसे बढ़ कर भूख बिलखती मिट्टी की
पथ पर पथराई आँखें पास बुलाती हैं,
भगवान भूल में रच कर जिनको भूल गया
जिनकी हड्डी पर धर्म-ध्वजा फहराती है।
इनको भूलूं तो मेरी मिट्टी मिट्टी है
मेरी आँखों का पानी केवल पानी है,
इनको भूलूं तो मेरा जन्म अकारथ है
मेरा जीना मरने की मूक कहानी है।
मैं देख रहा हू तुम इनको फिर भूल चले
बातों-बातों में हमें बहुत वलाते हो,
बेबसी चीखती जब बच्चों की लाशों पर
उसको आजादी की प्रतिध्वनि बतलाते हो ।

561 विध्य हिमालय
यों खेल करोगे तुम कब तक असहायों से
कब तक अफ़ीम आशा की हमें खिलायोगे,
वरवाद हो गई फ़सल कहीं जोती चोई
क्या बैठ अकेले ही मरघट पर गायोगे ?
विश्वास सर्वहारा का तुमने खोया तो
आसन्न मौत की गहन गोंस गड़ जाएगी,
यदि वांध बांधने के पहले जल सूख गया
धरती की छाती में दरार पड़ जाएगी।
सदियों की कुरबानी यदि यो वेमोल विकी
जमुहाई लेने में खो गया सवेरा यदि,
जनता पूर्णिमा मनाने की जब तक सोचे
घिर गया अमावस का अम्बर में घेरा यदि।
इतिहास न तुमको माफ़ करेगा याद रहे
पीढ़ियाँ तुम्हारी करनी पर पछताएंगी,
पूरब की लाली में कालिख पुत जाएंगी
सदियों में फिर क्या ऐसी घड़ियाँ ग्याएँगी।
इसलिए समय के सैलावों को मत रोको
खुशहाल हवानों में न खिड़कियां बन्द करो,
हर किरण जिन्दगी की आँगनतक आने दो
नव-निर्माणों की लपटों को मत मन्द करो।
इस नए सवेरे की लाली को देखो तो
इसकी अपनी कितनी पहचान पुरानी है,
भू, भुवः, स्वर्ग को एक बनाने पाई जो
युग की गायत्री सव छन्दों की रानी है।

विखरी पँखुरियाँ
जहाँ मुंज की मौज मृणालवती की बनती कारा
सरस्वती ने कण्ठ-प्राभरण था जिस जगह संवारा
जहाँ भोज को खोज रही है गिरा कई सदियों से
सुधामयी धारा नगरी में फिर उमड़े रस धारा ।
x
x
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हमारे बारा में गर प्यार के अंकुर नही फूटे, नहीं फूले,
हमारी शाख
4
मनुहार के पंछी नहीं झूले, नहीं झूले,
पोंछी डबडबाई आंख तारों की तमित्राने
भगर हम किरण की मुस्कान को फिर भी नहीं भूले, नहीं भूले ।
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तुम्हारे तार पं दौड़ा हुआ मैं आज पाया हूं
कि विध्याको हिमालय की दुआ औ' प्यार लाया हूँ
मिलें दिल तो हजारों कोस की दूरी निरर्थक है
किसी की श्वास में निश्वास बन कर मैं समाया हूँ
57

चेतना का मूल
दूर कहीं अन्धड़-सा उठ रहा है दुनिवार।
दिग्वधुएं ध्वांत-भ्रांत
अम्बर को निगल रहा अन्धकार का प्रसार
ग्रह-उपग्रह श्रांत-क्लांत
गड़गड़ा रहा है व्योम
घरघरा रहा है सिन्धु
हरहरा रहा है तम-तोम में विराट वट
प्रान्तर का प्रहरी-सा निर्विकार ।
प्रलय मेघ घटाटोप
फटते मूसलाधार
अन्धकार ज्वार बना
ज्वार बना अन्धकार।
लहरों पै लहर टूट
उठतीं
भूधराकार
पानी भी परशुधार के
प्रहार पर प्रहार।
घररर छा: अररर छा
माटी के वन्धन सव काट रही
धार-धार
जीर्ण-शीर्ण जर्जर कंकाल जाल जड़ उघाड़ तोड़ हाड़,
58

निश्चल,
विन्ध्य हिमालय | 59
स्नेहमयी मां के जिस बन्धन से
बन्धा रहा
आज तलक
छिन्न वही तार-तार,
छाती से चिपकाए रही जो युगावधि से
भूक-मुग्ध
बिछुड़ा उसका दुलार,
फिर भी वह खड़ा रहा ज्यों का त्यों
निर्भय,
निशंक,
धावा और पृथ्वी के निर्जर अजेय तत्त्व
अपरिमेय सत्व-सा विराट अंक ।
कैसा खड़ा? किसके सहारे ?
यह व्यर्थ कथा
सत्य यही
आज भी तना उस वट-पादप का महाकार
जीवन का सहज धर्म उसको रहा संभार।
मेरुदण्ड तान वह खड़ा, अड़ा सहस्रबाहु
धार रोक रेवा की
धंसा दिए अपने सहस्रों भुज धरती में
प्लावन के प्रश्नों के उत्तर-सा साकार,
जल क्रीड़ा उमड़ी उद्दाम वासनास्वरूप
पौरुष का पुरस्कार।
जानता है एक दिन पूरा हो जाएगा

.
60 पिहिमालय
व्यक्तियागं, युगपर्म
फर्म को मुंगसा में कही गुट जाएगी
छिराएगी छाती वसुंधरा की स्फुलिंग-सी
जहाँ-तहाँ दीरप दरार पड़ जाएंगी।
किन्तु आज सोचे कोन, मोचे कोन अथुबिंदु
ताप तप्त, शापग्रस्त, स्वप्न-मंग
उठने लगी तरंग पं तरंग,
लासों फन फैलाए फूकार छोड़ता
असने चला प्रलयाब्धि
क्षुब्ध ऋद्ध।
सोचने का समय नहीं
'गतासून गतासुंश्च नानुशोचन्ति पंडिताः'।
भले हुई क्षीण शक्ति
मन्द श्वास,
किन्तु इस चुनौती को जिसने स्वीकारा
उस साहस की जय हो।
चलता रहा क्रम अटूट
तोड़ता कगारों को
सागर घहराता रहा
मिट्टी के रहे-सहे
तार तड़तड़ाता रहा
लहरों की टक्कर से बड़वानल भभक उठे
पानी बने आग तो प्रदाह से बचाव कहाँ ?

विन्ध्य-हिमालय [ 61
होड़ हुई मिट्टी और पानी में
तत्त्व की तत्त्व से
कारण की कारण से
वट तो है कार्यमान।
किन्तु ज्योंही धुलने लगे
मिट्टी के प्राधार तत्त्व
जड़ें लगी जल के अन्तस में पसरने
अतल-तल-वितल भेद
छेदती रसातल को
हो गई समूल मुक्त।
वट आधारहीन
भधपर लहराने लगा
प्रलय पयोधि पं विमुक्त विजयकेतु-सा।
हारे थके यन्न विफल देख
वरुण कुपित हुए,
लहर-लहर खोल-खोल कुण्डली
उग्रीव हुई
ग्रसने को पासमान,
वस्त सौरमण्डल के रंध-रंध्र प्रवहमान
खौलता लावा अजल।
झल्लाते, हांफते-से बोले वरुण
'देखा, इस अहम् की पिटारी को
जल गई समूल रज्जु ऐंठन किन्तु शेष है।

62 | यिभ्य-हिमालय खोजो क्षीण सांसों की डोर कहाँ भटको है ? जलदूत दौड़ पड़े विद्युतमय परशु खङ्ग चेतना के स्तर पर स्तर तराशते । निष्फल निर्वीर्य हंत लौटे विक्षुब्ध सभी बोले देव ! कमठ को पीठ की शिरामों तक घसी हैं जड़ें नश्वर न्यग्रोध की। वरुण हतप्रभ अशांत झूठ ! झूठ ! जल्पना विमूढ़ गूढ़ फेनिल फुफकार-सी, ऊपर जो दृष्टि गई देखा एक पत्ता सा तिरता मुक्त वृन्तहीन चेतना के शिशु को दुलराता, हलराता हुमा, पैर का अंगूठा मुख में दिए बालक अबोध- पंचतत्त्व के विकार चूस रहा शोध-शोध मृत्यु को अमरता से।

पौ फटने के पूर्व
नयी कविता पढ़ी
तो पढ़ता गया
पढ़ता गया
धूल के सुमेरु पर
चढ़ता गया
चढ़ता गया
एक बार झटके से गिरा तो ऐसा गिरा
कि कमर की कचोट का
स्फोट मुंह से फूट पड़ा....."हिच् ।
बड़ा संतोष हुआ
अब सव लिखेंगे निडर,
लिखने को बहुत है
चल रहा रहँट है
खूब रस चुएगा
मार दूंगा मर्दुए जो छुएगा।
देता है दाता तो छप्पर फाड़कर
बिल्ली के भाग्य से टूट ही गया छींका,
इतने दिनों व्यर्थ क्यों
अटके रहे ताड़ पर !
छिप-छिप कर पीते रहे
63

64 | विन्ध्य हिमालय
मर-मर कर जीते रहे
एक साथ घोल घाल वात कफ पित्त
सर्वाधिकार सुरक्षित ।
अव ग्रामो सामने
खुला बाजार है
यार का मजार है,
बैठे ठाले अच्छा काम मिल गया
देख लो यारों का चाक गरेवा सिल गया ।
फुरसत का काम है
मशक्कत हराम है,
फिर भी कहने को
बहुत शेप रह गया है यार
किस्मत के दिलदार,
कल सई साँझ से ही
पिछवाड़े में बोल उठे थे सियार ।
खुदा ने दिमाग़ दिया
आदम को हव्वा पर लाद दिया।
सखुन तो सूझ है
देखो किसे सूझेगा
जीवन पहेली है
बिरला ही बूझेगा,
धनिक हो या कि श्रमिक
एज़रा पाउंड या ईलियट ।
बड़े-बड़े खर दिमाग़

'पाताचा हिन्दी मासिक
k. सागा निस्क्षिगपानेर
विन्ध्य-हिमालय-65
होने लगे बाग-बाग,
तुम तो वस लोच ही दिखाते रहे
'लखनऊ के देवता से
हाथ मटकाते रहे
'जल रहे हैं दीप जलती है जवानी,
उई री अल्ला
मरे तेरी नानी।
छोड़ो यार
मियां-बीवी की तकरार ।
'कुहरे के परदे में
शयनम पर सूरज की
लिप्सा के रंग कभी देखे हैं ?
-सांझ के कपोलों को
करौंदों की प्रोट में
किसी ने मसला था,
कैसी जल उठी थी. उँगलियां शमा-सी
चिड़ियों को चुप करने में
दाँतों बीच दवी जीभ
कटने से बची थी, याद है ?
तो फिर वहने दो बंधु
हर नया जीवन
झरने-सा झर-झर कर
इसी तरह ढलता है
विरल-विरल, तरल-तरल

661 विध्य हिमालय
पत्थर के हाथी के हौदों पर
झूम-झूम चलता है,
कुंभ फोड़ देता है
मद-सा मचलता है।
रही वात कशिश की
तो मित्र इस युग में
कशिश के हेतु अवकाश हो कहाँ है ?
हर दिल एक प्राइना है
बहुत-से विचित्र चित्र
धुंधले ही पड़े रहे
अंतस ही अंतस में गड़े रहे
संदली या सुप्रापंखी,
केसरी सुकुभी शंखी,
अस्तु अब रहो न दूर
व्यक्ति वैचित्र्य भरे भाव सूर
अन्यथा न जाने कितने
वाल्मीकि, कालिदास, विकटनितम्बा,
जयदेव, सूर, तुलसीदास
दूहों के नीचे ही दवे रह जाएंगे।
हाँ, यदि कभी पैरों में चक्की बांध
हिरन फिर न मारेगा छलांग
वन-बीहड़ डाँग खेतों की मेड़ों पार
कोई तो लालबुझक्कड़
बूझ ही लेगा उसे।

विन्ध्य हिमालय | 67
आज है नई उमग
वात-वात में तरंग
नये भाव, नये छंद
पर तैरते-से बढ़े
ठेस लग गई अजान
प्रकल के अंगूठे में
एक मिनट नौ सेकेंड
बैठकर मलता रहा।
स्मृति-सी जगी-जगी
प्रज्ञा थी ठगी-ठगी
सोत-सी अपाला की रस में थी पगो-पगो,
कैसे कहूँ?
कसम मनभावन के दामन की
बात कुछ नई-नई सबमें लगी।
प्रेरणा अगाध मिली
नये-नये सत्त्व से
गर्व खर्वकारी इस
मौलिक वर्चस्व से,
वर्ना आज तलक कभी
इस तरह प्रप्रयास
प्रानन-फानन में
कविता लिख पाया नहीं।
लिखो बंधु खूब लिखो
गरमी को ऊमस में

68 | पिम्य-हिमालय
भंसों को अब लिसो
हरी हरी दूव लिसो,
खिल कर लिखो, खुल कर लिखो,
वाल्मीकि, कालिदास
तुलसी प्रो' सूरदास
बंध-बँध कर लिखते थे,
कहते थे, हिचकते थे,
शायद उस युग में
बंधने का हो रिवाज़ था।
अन्यथा
कमठ की पीठ में भी
फूट पड़ता कारबैन्किल
डाइविटीज़ लिए फिरते
दर-दर वाराहदेव
कल्पनामय गरुणराज
सांस-सांस खांस-खाँस
थाइसिस में थरतेि
कैसर की कचोट से
तिलमिला उठते फणींद्र
आ गए मगर रवींद्र,
वरस पड़े पुष्कर आवर्तक के
दल पर दल
उभर आई उर्वशी
"पड़े छिलो पदप्रान्ते

विन्ध्य-हिमालय | 69
फना लक्खशत अवनत कर
मंत्र शांत भुजंगेर मतो।'
बंधी वायु मुक्त हुई
सांसों में रहस्य के
किंतु अंतर्भूत हुई,
पी गए, प्रसाद, पंत
निराला सब नीराजन
द्रोणकलश में जो शेष
बस्तीवरी काजल
फंठ में समा गया
महार्घा महादेवी के।
मुक्त तो हुआ अनंग
अंग में समा-सा गया
मुग्ध प्रकृति पर्णा के
खुलकर भी अनखुला ही रह गया
कुमारसंभव,
मंडराता गाता हुमा
मेघदूत उड़ गया
रान्तास्वादो विवृतजघनां
फो विहातुं समर्थः।
इसीलिए बंधु प्राज
तुमसे समर्थ
जन्मे हैं पुण्यदरी
तारणतरी की कोख में।

70 [ यिभ्य-हिमालय
जो कुछ था गोपन, मन रोपन
सब मुक्त करो
वेतस के हाथ भी बढ़ानो मत
सर के अधोवस्त्र को समेटने को।
जो भी चुभे, चुटकी से पकड़ उसे
फांस-सा निकाल लो,
गाँस सा विठाल लो
देह वल्ली ढाल लो।
पीकर पचाकर
संपृक्त न कह पायो
तो भो कोई हर्फ नहीं
टुकड़ों-टुकड़ों में कहो,
हीरे के टुकड़ों का
मोल अधिक होता है,
उसे वेधने की
साधना में सेंध कर
माला गुह डालने की
तुम्हारी नहीं जिम्मेदारी,
जिसे गरज होगी, झख मारेगा
हीरे से हीरे को काटने का
हियाव चाव धारेगा।
तुम तो सहज सिद्ध वनो
ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं
कापालिक अघोरघण्ट

दिय-हिमालय 1 71.
चलोंक्तीली ब्ली
नवन्नव प्रपोनॉम
प्रप्टांग योगों में
साचो सपर्या क्रिया
अनुक्षण श्रीवृद्धि करो
जानते हो?
अवम विपुरारी को
मिपुरसुंदरी से
मिपुर भैरवी कहीं प्यारी थी।
धन्य हुमा यंघु प्रान
मिन्धु के अनवा मोती..
सगोती गोतागोरों की
मंजुलि में भर देव
अरप उदास-नौ मरस्वती
निहाल हुई।
प्रभा पारमिताको
प्ताह के प्रांग देश।
रिन्तु दन्यु में नी
निराम नहीं जीवन में,
मंजुर को सराहा सदा
योरपि की तुलना में,
सपं नहीं प्रलमस्ती
यह तो दयामन्पि है।

72| वित्थ्य हिमालय
युग के पालोड़न की।
रूढ़ियों के बीज का हत वक्ष
यों ही चिरता है।
मैं हूँ आश्वस्त प्रस्तु
समय की धमनियों में
गरम-गरम लोहू देख,
समाचार-सूचक-सी
चिन्तातुर भौंहों पर
उभरी हुई क्षितिज रेख।
तुमने जो किया
वह भी युग की एक मांग है,
अस्तव्यस्त संसृति को
समेटने की लाग है।
मैं हूँ इसलिए प्रसन्न
मानता स्वयं कोघन्य
लहरों की उच्छृखंल
चुनौती स्वीकारता
पवन-पुत्र की छलांग
सांसों में धारता।
हर्ष यही
तुमने नये यन्त्रों से
नयी भूमि तोड़ी है
घिसी-पिटी लीकों का
बासी मोह छोड़कर

विषय-हिमालय [73-
बंजरों औ' घाटियों की
छाती प्राज फोड़ी है।
मैं हूँ विश्वस्त
कल बनेगा प्रशस्त पथ
संयम यदि टूटा नहीं
पूतना के पय का
विष्कुंभ यदि फूटा नहीं।
अस्तु साधुवाद लो
इस साहस संयोजन पर
इतना ही कहना है
यह कलजुग का अन्तिम चरण
वरण यदि चाहते हो करना
कृतयुग का करण
गरल पियो
जियो।

स्वागत हे नवयुग के प्रभात
आश्वस्त धरणि, श्राकुल अधीर
विश्वास तरणि तम-तोम चीर
भर गया विश्व मानस में
ज्योतिर्मय जीवन मधु मुक्त-वात ।
महमहा उठे कलि अलि माली
चहचहा उठी
डाली डाली,
खुल गए सृष्टि के चक्षु,
भिक्षु से कोक, कोकनद फुल्ल गात ।
कल शिथिल पड़ी थी रात विवश
अव राग रंजिता रही विहँस
सविता के स्वागत में फूटें
फिर सामगान
स्वर प्रपात।
74

हिमालय

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अाह्वान
आज कहाँ से बाला जोगी
अलस सवेरे पाया,
मोठी नींद सो रहा था
बरबस झकझोर जगाया।
और कहा- पाराम छोड़ दो
सुख-सुविधा का धाम छोड़ दो
चलो हिमालय के अंचल में
झरनों के संग गाग्रो.।
गौरीशंकर के चरणों में
अपना अहम लुटामो,
कुछ दिन ऊंचाई भी परखो
परसो पारस
पत्थर,
मैदानों के वासी निरखो
शिखरों का अभ्यन्तर ।
सेवा को धूनी में शायद
कलुप-खोट जल जाए,
पशुपतिनाथ प्रसन्न पाशुपत
अस्त्र तुम्हें मिल जाए।
77

तुम्हारी मज़ों
तुमने कहा सफर करो
पथ भरो भरो,
अपनी थकान
श्रमविन्दु से हरो,
स्टेशन पर स्टेशन
पड़ाव पर पड़ाव
बीच-बीच नगर निगम
ग्राम ठांव-ठाँव
खेतों में अरहर जों
चना सन कपास
इंजन की गर्मी में
चक्कों की सांस
रुकता हूं तो धूल-धूल
फूलता है दम,
चल पड़ता लगती हवा
ज्यादा या कम
परिचय हैं नये-नये
नया-नया प्यार
धरती की छाती में
,
कितना गुवार,
78

विन्ध्य हिमालय 179
उड़ते हुए कोयलों से
डरना भी क्या?
आँखों में किरकिरी
उभरना भी क्या?
दूर-दूर पास-पास
पास दूर-दूर
देह-गेह नाते सब
होते चूर-चूर,
ईंट-ईट जोड़-जोड़
रहना भी क्या ?
चाल-चाल ढाल रही
कहना ही क्या?
दुनिया पुरानी हो
मैं नया-नया
मर्जी तुम्हारी है
मेरा तो क्या?

जय हो
जय हो उसकी
जिसने मुझको दो पैर दिए ।
अपनों से बढ़ कर
जिसने मुझको गैर दिए,
मैं आज घूमता घाटी में
कितने उतार, कितने चढ़ाव
हर मंजिल के अपने पड़ाव,
हर कदम
-नये नज्जारों से परिचय करता,
हर ठोकर में
'भीतर कुछ छलक-छलक पड़ता।
अटकी आशा, भटकी उसास
उस क्षण तो लगती वुरो
बाद में लगता है
समतल राहों में चलने से
क्या पाऊँगा?
जो कुछ पाया है
इन्हीं ठोकरों के बूते
जो कुछ सीखा है
'फटी विवाई का वल है
80

विध्य-हिमायल 81
जो पीर पराई की
गर्मी से स्नेहिल है,
क्या बतलाऊं मेरे साथी
जंगली पेड़ फल-फूलों की
मुस्कान मुझे क्या दे जाती?
झरबेरिया की झाड़ी
क्यों लिपट-लिपट जाती?
टेढ़ी-मेढ़ी पगडण्डी
मेरे नंगे पैरों का धन है।
सरितानों के कल कल को
मोड़ लचीली है,
जिसने शैशव में सहलाया
वाहों उछाल कर किलकाया
ये नटखट
चट्टानों की सखी सहेली हैं
फेनों में फूली हंसी
नहीं रोके रुकती
मैदानों का बहाव तो कुछ-कुछ नकली है,
सोधी सड़कें तो शहरों में ही होती है ।
यों तो जीवन में
सब कुछ सहना पड़ता है
नदियां नहरों में बँध कर
याद संजोती है,
खेतों को शायद

82 | विन्ध्य-हिमालय
उनकी तड़पन मिल जाए
मासूम घरा की छाती
दरक नहीं पाए
इसलिए वन्धनों को
उनने कब दुत्कारा?
पर मुक्त प्रवाहों का सरगम
प्यारा-प्यारा
गाते-गाते
मिटने की साध नहीं जाती।

काठमाण्डू की पहली साँझ
न जाने बात क्या है
साँझ होते ही
तुम्हारी याद आती है
लजीली लालिमा के पार
सपनों की तरी सी तैर जाती है।
न जाने साम्य क्या है
इस ढलीली साँझ में, तुम
में
कि इसकी आंख के कोए
बिना गाय, बिना रोए
हजारों पंछियों का प्यार
छितराई हुई
किरनों की छाया में समेटे है,
सुबक कर रह गया कोई
छिपाए मुख
चंदेरी के सितारेदार आँचल में,
यहीं से सुन रहा हूँ मैं
तुम्हारे प्रतीक्षातुर स्वर
यही से देखता हूँ मैं
कि तुम बैठी हुई
खिड़की की सीढ़ी पर
83

84/ विन्ध्य हिमालय
लगाए कान बैठी हो
कि साइकल की सहज सरसर
वता दे, लौट आया आज
कालिज की पढ़ाई कर,
खिले मुस्कान की कोंपल
कि मुखरित हो उठे मरमर,
उतरने भी ना पाऊँ मैं
तुम्हारा हुक्म है कुछ देर
अप्पी और रोचन को घुमाऊँ मैं,
मगर तुम तो गई भीतर
उठा कर चिक
बहुत-सा काम करना है
सतत संघर्ष के दामन के
बिखरे तार भरना है,
अभी माताहूँ, पाता हूँ
तुम्हारे अनकहे अनुरोध को
स्वीकार करना है।
सड़ी हो चाय का प्याला लिए
जैसे किसी भटके मुसाफ़िर की
उसासों का हवाला हो
टहर जाग्रो पका हूं
एक मोढ़ा डाल दो
प्रांगन में, प्रांगन में
यहीं पर बैठ कर माराम से

विन्ध्य-हिमालय | 85
कुछ बूंद ढालूंगा,
तुम्हारी चाय
उफ किन पत्तियों की
स्निग्ध हरियाली समोए है
निरी बेजान प्याली में
घुली हैं साँझ की किरने
तुम्हारी आँख का प्रतिविम्ब
जिसमें उभरता माता
हजारों मील की दूरी
उसी से नाप मैं पाता,
कहाँ हो मालवा में तुम
कहाँ मैं काठमाण्डू में
खुली है सामने खिड़की
हिमालय की विरल थेणी
तरल-सी आँख में उलझी,
पहाड़ी ढाल पर
धुंधली सफेदी उड़ रही आतुर
पहाड़ों के हृदय में भी
उठा करता धुआँ अहरह
अचल का चल अतल
दह दह बड़ी ज्वाला समेटे है,
कि जिसको तरलता का तार
सदियों से नहीं टूटा,
इसी हिममय हृदय का

861 विध्य हिमालय
एक सोता ढल रहा मुझ में
शिखर की मूक विखरन सा ।
पलक अव देखती अपलक
नही दिखती कहीं चोटी,
समूचा शैल
धरती को हथेली पर
उबलती चाय का प्याला
कि जिससे भाफ उड़ती है
घुमड़ती प्राह अन्तर की
तुम्हारी, छ रही मेरे
सिसकते सिक्त होठों को।

यौवन का बुखार
माध्यम
चाहा था तुम्हें कभी
प्रांखों के माध्यम से
मन अनुगामी था।
कहते थे समझदार
यह
वर्षा की बहिया है
आई है उतर जाएगी,
मेरु की उमग
झरनों सी भर जाएगी।
यह भी है एक सत्य
परम्परा का अपत्य,
जीवन की हर धड़कन
अनुभव की आंच में
सिका-तपा करती है,
सूखने लगी सिवार
मानस के अन्तस से
शत शतदल फूट रहे
लहरों के अंचल में
शुक्ति-मुक्ति लूट रहे,
केशर-सर छूट रहे,
87

88/ विन्ध्य-हिमालय
मधुप मधु रहा संवार
कूल-मूल नाभि-नाल
छिन्न-भिन्न तमस जाल ।
किंतु वात बदल गई
वदला मैं, बदला जग
चाहने लगा हूं आज
मन के माध्यम से तुम्हें
ऑखें अनुगामी हैं।

वातायन से हिमालय-दर्शन
वड़ा सौभाग्य है मेरा
कि प्रातः नित्य खिड़की से
तुम्हारा रूप पीता हूँ,
अलौकिक लोक के उन्मान का
क्षण एक जीता हूँ।
तुम्हारे श्वेत, निर्मल, शुभ्र
कर्पूरी कपोलों पर
फिसलती आँख की पुतली,
किसी की स्निग्ध सुधि की राशि सम
तुम जम गए कैसे?
क्षितिज के छोर की उमड़ी हँसी
कब से समेटी है ?
अलौकिक कौन-सा अपरूप है
जिसको छिपाने को
बनाया मुग्ध अवगुंठन
कि जिसकी प्रोट ऋत औ' सत्य
रह रह झिलमिलाता है
सहस्रों पारदर्शी समस्तरों के पार
'तपसो अध्यजायत' कौध जाता है।
युगों से योगियों के
89

90) विन्ध्य-हिमालय
सार्थवाहों के समुन्नत पग
भटकते फिर रहे अहरह
उसी उपलब्धि के पीछे
जिमे तुमने सँजोया
शुभ्र शिवता के तुपारों से
गगन की शून्य अभिलापा
टिकी जिसके कँगूरों पर।
निपट पाश्चर्य
वैठी पार्श्व में रत पार्वती
कुछ भी नहीं कहती
कि केवल देखती रहती
युगों से सहज पुंजीभूत
साधक की अचल मुद्रा।
प्रतीक्षा की तितीक्षा में
उमस कर फूट पड़ती है
कहीं गंगा, कहीं जमुना
तरंगित कामनाओं की
सहेली सी अलकनंदा।
हमारे पूर्वजों को
क्या मिला तुमसे
नहीं मालूम,
न उत्तनी साधना मुझ
में
न उतना आत्मचिंतन ही
मगर मैं

विन्ध्य हिमालय191
नवस्फटिक की स्निग्ध सिहरन में
चमकते ऊवं कलशों को
निहारा नित्य करता हूँ
यही माशा लिए मन में
कि शायद तुम कभी बोलो
हमारी अर्चनातोलो।

-
तार
दुर्गम पथ पर गीतों के मरने से
दुर्गम पथ पर गीतों के झरने से
सारी थकान हैरान हो गई है।
समतल पथ पर चलने वाले राही
अव प्रागे विलकुल खड़ी चढ़ाई है,
गिरिवर के गर्वोन्नत मस्तक से ही
मनु के चरणों को मिली बड़ाई है,
उच्छ्वसित प्रतीक्षा पथ के दीपों से
ऊपा-सन्ध्या के
मिलाना है
मुस्कान मिल गई जो चलते चलते
उससे पत्थर पे फूल खिलाना है,
प्रस्थान समय अखिों के भरने से
मीठी पीड़ा महमान हो गई है।
दुर्गम पथ पर गीतों के झरने से
सारी थकान हैरान हो गई है।
मंजिल खुद घूमेगी पीछे पीछे
गति-मति को ही पाय बनाना है,
अगले अर्जन के साथ-साथ साथी!
पिछले प्रमाद का व्याज चुकाना है
92

विन्ध्य-हिमालय | 93
ये युगों-युगों से जमी हुई परतें
साँसों को गरमी से पिघलाना है,
हिम की ठिठुरन से जड़ीभूत जग में
चेतनता के नव स्रोत बहाना है।
गुक्या? दिक् की कल्पित दूरी भी
मनुपुत्रों को आसान हो गई है,
दुर्गम पथ पर गीतों के झरने से
सारी थकान हैरान हो गई है।
भव
अब मंगल ग्रह में मंगल कलश धरो
चंदा को चूनर सजने वाली है,
ध्रुव में मण्डप बनने को बारी है
शुक में शहनाई बजने वाली है।
सप्तर्षि सगुन पढ़ने को आतुर हैं
द्यावा-पृथ्वी की आज सगाई है,
गुरु की प्राज्ञा से समधी सुरपति ने
इसपुटनिक को पालकी मंगाई है।
रसमयी रसा फिर दिव की दयिता वन
नव-मुग्धा सी नादान हो गई है,
दुर्गम पथ पर गीतों के झरने से
सारी थकान हैरान हो गई है।

प्रय
दिव्य-हिमालय
बांध बंधेगे ब्रह्मसरोवर में
स्वगंगा से भी नहरें छूटेंगी,
पुप्पार पायत्तंक जल विद्युत गृह से
रेगिस्तानों में फसलें फूटेंगी।
गयारियां कट रही हैं नंदन वन में
प्रय अमरलोक का गोपुर खुलना है,
सोलहों फलायों से सौन्दर्य राजे
अब इंद्रपुरी धरती की तुलना है ।
कल्पना सलोनी कवियों को विभु को
भूमा का मधुमय दान हो गई है,
दुर्गम पथ पर गीतों के झरने से
सारी थकान हैरान हो गई है।

विकल्प
जो लिखा उसे मत पढ़ना तुम
जो पढ़ा उसे मत लिखना तुम,
यह बूझ-बुझव्वल नहीं वंधु
जो कह डाला वह सचमुच ही हल्का था
पल का था।
यों तो इस साँझ सवेरे में
शाश्वत हो ही क्या सकता है
लेकिन पीकर जो पचा लिया
सवको देकर जो बचा लिया
उसने ही जीना सिखलाया
कुछ काम पाया।
95

दो खंजन
फुदका करते हैं सुबह-शाम
मेरे प्रांगन में दो खंजन ।
इनको किन छंदों में बांधूं?
इनको किन सपनों में बांधू ?
अपनी चंचलता से मुखरित
चपला की आंखों के अंजन।
छिन मेघाली के बालों में
छिन इन्द्रकमल की डालों में
विबित प्रतिबिंबित हिम सौधों के
झिलमिल झिलमिल वातायन ।
बरसात शरद वेमानी है
यह देश बड़ा सैलानी है
वारहों महीने यहाँ खनकते हैं
मधुऋतु के कर-कंगन।
96

साँसें साधे चुप-चुप
सांसें साधे चुप-चुप कबसे जगते हो?
वाहों के बंधन में कैसे लगते हो?
जी करतातुमको लिए लिए जग घूमूं
सौ बार तुम्हारी पुलकित पलकें चूमूं
सौ वार समेट् असीमता अंकों में
सौ वार बिखरती अलकों में झुक झूम
बलिहारी, वाँकी अदा तुम्हारी साजन
मदहोशी में भी मचल मचल उठते हो।
दो कूलों में सरिता का ज्वार जुटा है
गागर में सागर जैसे उमड़ उठा है
किस बड़वानल की इगित पर अनजाने
मिट्टी-पानी का यह संजोग जुटा है।
उमड़न बंदी पर अंतर को घुमड़न से
लहरों-लहरों में सिहर-सिहर लुटते हो।
किसने साधी धरती से स्वर्ग नसेनी
हर नये मृजन की ऐसी ही वेचैनी
अपनी विशेषता विधना ही पहचानें
बन गई अमरताचेरीमाज सुनयनी!
संसार पुराना हो पर मेरे प्रियतम
तुम जनम-जनम में नये-नये लगते हो
साँसें साधे चुप-चुप कवसे जगते हो?
97

हैं
बैठ
-540
तुम्हारी याद आती है
कभी जब काम से थक कर
अकेला
जाता
तुम्हारी याद
पाती है ।
तरसता हूं मिले फुरसत
तुम्हारे गीत गाऊँ मैं
कभी झगड़ो, कभी रूठो
ठठोली कर मनाऊँ में,
मगर तुम भागती फिरती
जमाने के जुलूसों से
महल से, महफ़िलों से
कहतहों से, गुलफ़रोशों से।
सदा इस ताक में रहती
अकेला कब मिले आऊँ
थके मांदे मुसाफिर को
खिभाऊ और चौकाऊँ
वाद वैठा हूँ
खुदी से बेतरह उलझा
पुरानी यादगारों को लटों को
फिर रहा
बहुत दिन
सुलझा।
98

विन्ध्य-हिमालय 199
गईं तुम
अचानक श्रा
गो हजारों कोस की दूरी,
अभावों की अतल खाई
लगी कुछ कुछ भरी-पूरी,
लगा जैसे किसी ने
दहकता माथा दबाया हो
तुम्हारा सावनी झूला
बहारों ने झुलाया हो ।
क्षितिज की कोर पर छाने लगे
फिर बादलों के
दल
चली पुरवा कि पलकों में
किसी का छू गया आंचल
बजी सांकल किसी मेहमान के
भाने की
पाहट-सी
खुली पलकें तो होठों पर
महज इक
गुनगुनाहट थी,
कहीं भी हो मुझे एहसास
इतना हो रहा इस दम
जवानी में जली जो
आज भी रह रह
सुलग उठती वो वाती है
कभी जब काम से थक कर
अकेला बैठ जाता हूँ
तुम्हारी याद आती है।

अन्तराल
अकेलापन अच्छा लगता है
पर लोग रहने नहीं देते
घेर कर रिक्तता और बढ़ा देते हैं,
लगता है भाग जाऊँ कहीं
किंतु मुझे
नफ़रत है भागने से
जो कुछ भी पाया सहज
महज स्वीकारा है,
इसीलिए अभी तक
कुछ भी न कर पाया
किंचित भर पाया नही
शून्य अंतराल को।
100

अनायास
आज पया सोचकर
तुमने मुझे प्यार दिया।
पिछले तीन दिनों में
मिले काई वार हम
सिले भी, रोते भी,
फिर क्या विशेष बात
विधि पा बिटम्बन या
चौबीस घड़ियों में
ऐसे भी जाते क्षण
जय कुष्ठ माना नहीं रहना
मपया पराया सब प्रपना हो जाता है।
101

चित्रकार के प्रति
इस तपोभूमि में तुमने जो पाराधा है
अपने सपनों को बड़ी साध
साधा है
ये चित्र नहीं आशीप हिमालय की विखरी
जो रगों रेखानों में तुमने बांधा है।
तुम साधक निष्ठावान निरीह नियोगी हो
कल के संयोगी बनते आज वियोगी हो
गोरख-मछींद्र की भूमि तुम्हें पहचान गई
तुम अलख जगाने वाले कोई जोगी हो।
ये लहरें तो बहने को हैं वह जाएंगी
अनबोली एक कहानी कहती जाएंगी
जो चित्र बनाए तुमने जन-जन के मन में
रंग घुल जाएं पर रेखाएँ रह जाएंगी।
102

वौद्ध-गया
आज वौद्ध गया देखा
शीतल वोधि वृक्ष भी
विरल हो गया है जो
घना रहा होगा कभी
फिर सघन होने की संभावना से स्पंदित,
छाया छू गई है मुझे
ढाई सहस्राब्दि पूर्व
तप्त-दीप्त किरणों की,
पावन हो गया है मन
तन जैसे गंगा स्नान कर पाया हो ।
धन्य अश्वत्थ जो
प्राश्वस्त करता रहा
पीढ़ियां मानवता की,
सुनते हैं यहाँ तपे थे तुम कभी
दग्ध कर डाले थे पर-अपर सारे सूत्र
दावा का दाह भी मलय वना डाला था
शरद की चांदनी भी
सहमी-सी खड़ी रही
वसुंधरा साक्षी है।
103

104 1 विध्य-हिमालय
कैसी संवेदना समाई
दग्ध मानस मे
दुस की प्रतीति माह
केसी विराट् वनी,
करुणा के भगीरथ !
क्षणभंगुरता क्षणदा सी
कैसे छू गई थी
तुम्हारे द्रवित मानस को ?
उस दिन से जन-जन का दुख
बना अपना दुख
मृग-पशु-पक्षी-पतंग
श्रात्मीय सहचर से।
उस दिन से सो न सके
जगना भी दंशनमय
मृत्यु का रहस्य
सुलझाने को प्रातुर
जीवन से जूझकर।
सीमा थी सहने की
रहने की सीख देने वाला
रह पाए शान्त, संतोषी
आनन्दी यदि,
तो फिर कौन पिघले ?

विम्य-हिमालय ! 105
गंगा बन सीचे कोन
मस्थल की प्यास को?
सोचता हूँ
कैसी रही होगी संवेदना वह ?
जिसने पकवान कर डाले सब फीके
और राजभोग
क्षुद्र, हेय, मिट्टी को ढेरी से,
कामिनी के कलित कपोल
उन्नत उरोज,
हिरनी के प्रायत नयनों के
अराल तार
नहीं भेद पाए मर्म
शर्म से ब्रह्मानद का सहोदर
सिसकता रहा
रुठे हुए बालक सा।
हाय रे पराई पीर जानने के जिज्ञासु !
कैसे थे कठोर तुम
धोखे में छोड़ गए सोती
सखी प्यारी को।
जिसका न कोई अवलंब था
तुम्हारे सिवा।
एक की पीर की उपेक्षा

1061 विन्ध्य हिमालय
या समष्टि की?
सुनते है पागल से
तपने लगे प्रहनिशि
तप भी तुम्हारा तप देख
थरथराया था,
सांच-पाँच झेलने में
दिनकर भी दृप्त-सा,
बचपन को बात मुझे
सहसा याद आ गई
जाम्बु वृक्ष तले
एकासन में समासीन
आगत की गाथा रही
पाए गए अंशुमाली
बेला ढल गई विरक्त
छाया पर हटी नही,
हे सुजात,
खीर उस सुजाता की
सम्यक् समर्पणमय
शाश्वत मातृत्व की
महान् निधि दे गई,
हाय रे विरागी
गृहत्यागी, वीतरागी वोर,

विध्य-हिमालय | 107
अनजाने
पुरुप से नारी तुम्हें कर गई,
ममतामयी जिसने
सहस्राब्दियों से पिलाया दूध
कोटि-कोटि त्रस्त ग्रस्त
दीन-हीन शिशुओं को,
काश तुम जान पाते
उस समय भी मस्तक पर
तना था झीना वितान
भाग्यहीना विधुरा
यशोधरा के आंचल का ।
सम्यक संबोधि पूत
दिव्य ज्योति
करुणा की पहली मुस्कान में
थी प्रतिविवित
दूधिया दंतुलिया मूक राहुल की
कुछ तो थी अंतर में
विह्वलता अनजानी
जिसने धुमाया तुम्हें
ग्राम नगर जनपद बन
गर-डगर द्वार-द्वार
भातं की गुहार पर।

1081 विध्य-हिमालय
कैसे यह मान लें
कि जिसके सवेदन में
सृष्टि की व्यथा कथा
रात-दिन जगती थी,
अपनी को भुलाकर
पराई सुना करती थी,
विचलित हो उठता जो
कण-कण की सिहरन से
अणु-अणु का भेद जिसे
क्षण-क्षण था भेद रहा
जिसके सिंधु मानस में
इंदु ज्वार भरता था
तारों की टिम-टिम
पुतलियों में प्रतिबिंबित,
उसके उनीदे शून्य पहरों मे
विद्युत-सी
कोधी न होगी कभी
याद पिया प्यारी की।
कुश की साथरी में
सोते या अधजगे
करवट की आहट में
गोरी बांह छूती न होगो

विम्य-हिमालय | 109
पाच कल्पना के?
हाय, वे अजान वाहु
भरने को आतुर
न हो उठते होगे कभी
भूले हुए
मादक-आलिंगन के चाप को।
मांसल विशाल वक्ष
धड़कता न होगा सहलाने को
केशों की घनता से घिरे
चंद्र-प्रानन को,
कभी-कभी सोचता हूँ
कोन तपा पंचाग्नि
तुम या यशोधरा?
आग वह किस की थी
जिसने इस जीवन की
नोंद तुम से छीन ली,
राग वह किसका था
जिसने अपनाया कन-कन को
बहुजन हिताय ।
चिर-विरही संमृति के
तुमने जिस वियोग का
संयोग दिया जग को

1101 विन्ध्य हिमालय
विह्वल बहुजनसुखाय।
चार प्रार्य सत्य जो
सुझाए आठ मागों से
उन सबके अंतस में
ज्वाला थी किसकी?
कौन थी माध्यमिका
प्रज्ञा पारमिता वह,
मनोकाश प्रांतर में
प्रतिबिंबित तारा सी।

माँगयां
आज मुझे प्यार करे,
कोई नहीं, कोई नहीं।
अब मैं दे सकता हूँ,
प्रांशिक सहानुभूति
जग के मनाथों को।
सात साल बाद
पारसाल कातिक में
दो दिन को गया था गाँव
कोने में बैठी थी
भूतिमती ममता
काया की छाया-सी।
प्रांखों में मनायास
धूमिल-सा तिरा था कुछ
सिक्त हो गया था शीष
अस्फुट माशीपों से,
इतने दिनों कहाँ रहा
खोज-सबर क्यों ली नहीं,
शिकवा तक सुनने को
तरस गया,
111

112| विन्ध्य-हिमालय
परस की
स्निग्ध-स्निग्ध सिहरन हो शेप है।
दो दिन ही रहा पास
श्वास-श्वास उच्छ्वास
चलने के दिन कतकी थी
बोलीं 'गंगा नहा ग्रामो प्राज'
आज के ही दिन
तुम्हें ले गए थे मुझसे छीन
प्रातःस्मरणीय पिता
दूध छुड़ा कर मेरा
शहर में पढ़ाने को
पांचवीं में लगे थे तुम।
कहने को एक बार
मां के आदेश का
मैं ने भी पालन किया
लौटा चढी दुपहरिया
चंदिका माई वाले
बक्सर के घाट से।
खा पीकर विस्तर जब
बांधने को उद्यत हुआ
बार-बार कहने लगीं

1133 विन्ध्य हिमालय
लाला न जाणो आज
किंतु हंत मानी नहीं
मनुहार पयस्विनी की
विवश विसुध
एक-माध बार और
कह कर चुप हो रहीं।
रार अधिक की नहीं
उसका तो केवल मुझे ही
अधिकार था,
चलते समय बोली
आगए अच्छा हुआ
तुम्हें आज देख लिया
शायद दुबारा फिर
देख भी न पाऊँ तुम्हें,
घाव में सलाई सो
घुमा दी किसी ने अजान
बोला क्यों ?
ऐसा क्यों कहती हो?
बोली कुछ बात नहीं
आँखों से दिखने लगा है कम
शायद दुबारा पा पाने तक
रही-सही ज्योति भी

114 | विन्ध्य-हिमालय
जैसे आई चली जाय।
छुए चरण, चला, मुड़ा
काम कुछ जरूरी था
जैसा सरकारी नौकरी में
हुमा करता है।
कई बार आती रही याद
वही बात, एक वात
बीच काम काज के
कोशिश की भूल जाय
भरसक तो भुला भी दिया।
शूल आज कसका है,
मुझे याद आता नहीं
कभी को हो कोई सेवा
जीवन जन्मदात्री की
कप्ट ही देता रहा
भूला हुआ अपने में,
अस्तु मैं अपनी
मां का भी सगा नही
मुझसे कभी कोई करे
पाशा नहीं प्यार की।
माज होश आया है
जव सब वेकार है

विन्ध्य-हिमालय | 115
पर मिला
मां गयीं
कैसी थीं ? कैसे बताऊँ पाज
पाशीपों प्राशीपों पाशीपोंमयी।

प्यासों को प्रणाम है
बहुत दिनों वाद
जमी वर्फ आज पिघलतो है
रिसने लगा है मन
छाती पहाड़ की
दरके या सिसके,
जी कर रहा है
आज वहूं सिर्फ बहूँ
नादी वनूं या न बनूं
टकराऊ चट्टानों थूगों से
शतधा सहस्रधा।
संगम का सुख ?
अन्त में उदासी छोड़ जाता है,
सदियों
कोरी वकवास है।
मेरे अस्तित्व के सीकर
बिखर जाय
सत्ता तो
यत्र तत्र
पत्र पत्र
116

विध्य-हिमालय ] 117
जीवन को जिलाने में
खुद को पिलाने में
'गिरि के गुरुत्व को
साभार राम राम है
•प्यासों को प्रणाम है।

गुरांस का फूल
तुम खूब मिल गए पथ के बीच बसेरे में
जीवन का आधा मोड़ घूमते धेरे में
कुछ कहता पर शायद चलने का समय हुआ
लामो गुरांस का फूल लगाएं जूड़े में ।
फूले गुरांस झूम रहे झाड़-झाड़ में
फागुन फला कि आग लगी है पहाड़ में !
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118

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Vindhya Himalaya

Author
Shivmangal Singh
Title
Vindhya Himalaya
File name
Vindhya Himalaya
Text
OCR done
Citation
1966
Published
2011/03
Publisher
Aatma Ram & Sons Dehli
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551463
Barcode
4990010032201.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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Ahf36dDMstj
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