Sanmati Library, Jaipur
Gommatsar (jeevkand)
Front matter
Printed by Ramohandra Yogu Shedge, ab tho Nirnaya sagar Presen
23 Kolbhat Lane, Bombay.
Published by Sha Rovashankar Jagajeevan Javeri, Hon. Vyavasthapak
Shree Paramasbruta-Prabharak Manda), Javori Bazar,
Kharakuya, No. 2. BOMBAY.
ए ओं नमः प्रस्तावना। - इस ग्रंथके रचयिता श्री नेमिचंद्र सिद्धातचक्रवर्ती है। आपके पवित्र जन्मसे यह भारत भूमि किस समय अलंकृत हुई यह ठीक २ नहीं कहा जासकता, तथापि इतिहासान्वेषी विक्रमकी ग्यारहमी शताब्दीके प्रारम्भमं या उसके कुछ पूर्व ही बहुधा आपने अपने भवभंजक उपदेशसे भव्योको कृतार्थ किया था यह सिद्ध करते हैं। इस सिद्धिर्म जो प्रमाण दिये जाते हैं उनमसे कुछ का हम यहापर सक्षेपमे उल्लेख करते है। वृहाव्यसग्रहकी भूमिकामे पं. जवाहरलालजी शास्त्रीने आपका शक संवत् ६०० (वि. स. ७३५) निश्चित किया है। क्योंकि श्रीनेमिचंद्र खामी तथा श्रीचामुण्डराय दोनोंही समकालीन थे। और श्री चा. मुण्डरायके विषयम 'बाहुबलिचरित'मे लिखा है कि 'कल्क्यब्दे पटूशताख्ये विनुतविभवसंवत्सरे मासि चैत्रे पंचम्यां शुक्लपक्षे विनमणिदिवसे कुम्भलने सुयोगे । सौभाग्ये मस्तनानि प्रकटितभगणे सुप्रशस्तां चकार श्रीमच्चामुण्डराजो वेल्गुलनगरे गोमटेशप्रतिष्ठाम् ॥ ५५ ॥ अर्थात् शक स. ६०० मे चैत्र शुक्ला ५ रविवारके दिन श्रीचामुण्डरायने श्रीगोमटखामीको प्रतिष्ठा की परतु यदि दूसरे प्रमाणोंसे इस कथन की तुलना की जाय तो इसमें बाधा आकर उपस्थित होती है । क्योकि वाहुबलिचरितमें ही यह बात लिखी हुई है कि 'देशीयगणके प्रधानभूत श्री अजितसेन मुनिको नमस्कार करके श्रीचामुण्डराय,ने श्रीवाहुबलीकी प्रतिमाके विषय, वृत्तान्त कहा, यथा--- 'पश्चात्सोजितसेनपण्डितमुनि देशीगणाप्रेसरम् स्वस्याधिप्यसुखाब्धिवर्धनशशिश्रीनन्दिसंघाधिपम् । श्रीमद्भासुरसिंहनदिमुनिपाङ्गयाम्भोजरोलम्बकम् चानम्य प्रवदत्सुपौदनपुरीश्रीदोबैलेवृत्तकम् ॥" श्रीमन्नेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवर्तीने भी गोमसारमें श्री अजितसेनका सरण किया है । और उनको श्री. चामुण्डरायका गुरु वतलाया है । यथाः- 'जिम्हिगुणा विस्संता गणहरदेवादि इडिपत्ताणं । सो अजियसेणणाहो जस्स गुरु जयउ सो राओ ॥" १ यहापर करकी शब्दसे जो शकका ग्रहण प. जवाहरलालजी शास्त्रीने किया है वह किस तरह किया यह हमारी समझमें नहीं आया।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । oc और भी- अन्नजसेणगुणगणसमूहसंधारि अजियसेणगुरु । भुवणगुरु जस्स गुरु सो राओ गोम्मटो जयउ ।।" अर्थात वह श्री चामुण्डराय जयवंत्ता रहो कि जिमके गुरु अजितसेन नाम दियास गणधर देवा. दिकोंके गुण पाये जाते है । आचार्य श्री आर्यसेनके अनेक गुणोंके नमूहको धारण करनेवाले तथा तीन लोकके गुरु अजितसेन गुरु जिसके गुरु हैं वह गोम्मट राजा जयवंता रहो। इससे यह बात मालम होती है कि जिन अजितसेन खामीका उदेख बाहुबली चरितमे और गोमा. सारमें किया गया है वे एक ही है । परतु ये अजितसेन कब हुए इस यातका कुछ पता श्रवणवेलगोलाक एक शिलालेखसे मिलता है। उसमें अजितसेनके विपयमें लिखा है कि:- गुणाः कुंदस्पन्दोइमरसमरा वागमृतवाः, प्वप्रायः प्रेयाप्रसरसरसा कीतिरिव सा । नखेन्दुयोना पचयचकोरप्रणयिनी, न कासां श्लाघानां पदमजितसेनो ब्रतिपतिः ॥ यह शिलालेख करीव ग्यारहमी भदीका खुदा हुआ है । इससे मालम होता है कि श्री अजिनसेन खामी ग्यारहमी शदीके पूर्व हुए है, और उसी समय श्री चामुण्डराय भी हुए हैं। परंतु पं. नाथूरामजी प्रेमी द्वारा लिखित 'चंद्रप्रभचरितकी भूमिका मे श्री चामुण्टरायके परिचयमें लिखा है कि कनडी भापाक प्रसिद्ध कवि रत्नने शक सम्वत् ९१५ मे 'पुराणतिलक' नामक ग्रंथकी रचना की है और उसने आपको रक्कस गंगराजका आश्रित बतलाया है । चामुण्डरायकी भी अपनेपर विशेष कृपा रहनेका वह जिकर करता है। इससे मालम होता है कि शक सं. ९१५ या विक्रम स. १०५० के लगभग ही श्री चामुण्डराय और श्री अजितसेन खामी हुए गोमसारकी श्री चामुण्डरायकृत एक कर्नाटक वृत्ति श्रीनेमिचंद्र सि. चक्रवाके समक्ष ही वन बुकी थी। उसीके अनुसार श्री केशववर्णीकृत संस्कृत टीका भी है उसकी आदिम लिखा हुआ है कि 'श्रीमदप्रतिहतप्रभावस्थाद्वादशासनगुहाभ्यंतरनिवासिप्रवादिसिंधुरसिंहायमान-सि- हनंदिनन्दितगंगवंशललाम-राजसर्वशाधनेकगुणनामधेयभागधेय-श्रीमद्राजमल्लदेवमही वल्लममहामात्यपदविराजमान-रणरजमल्लासहायपराक्रम-गुणरत्नभूपण-सम्यक्त्वरत- निलयादिविविधगुणनामसमासादितकीर्तिकांत-श्रीमच्चामुंडरायप्रश्नावतीर्णैकचत्वारिं- शत्पदनामसत्वप्ररूपणद्वारेणाशेषविनेयजननिकुरंवसंवोधनार्थ श्रीमन्नेमिचंद्रसैद्धान्तिक चक्रवर्ती समस्तसैद्धान्तिकजनप्रख्यातविशदयशाः विशालमतिरसौ भगवान गोमहसारपंचसंग्रहप्रपंचमारचयस्तदादौ निर्विवतः शाखपरिसमाप्तिनिमित्तं ... देवताविशेष नमस्करोति । - राचमल्ल और रक्कस गंगराज ये दोनों ही भाई थे। उपर्युक गोमहसारकी पत्तियोंसे स्पष्ट है कि राच- मल चामुण्डराय तथा श्री नेमिचद्रसिद्धातचक्रवर्ती तीनोही समकालीन है। राचमल्लका समय विक्रमकी ग्यारहमी शदी निश्चित की जाती, है अत एव यह खयं सिद्ध है कि यही समय चामुण्डराय तथा श्री नेमि- चंद्र सिद्धातचक्रवर्तीका भी होना चाहिये।
... गोम्मटसार। नेमिचंद्र सिद्धांतचक्रवतीने कई जगह वीरनंदि आचार्यका सरण किया है। यथा- "जस्स य पायपसाएणणंतसंसारजलहिमुत्तिण्णो । वीरिदणंदिवच्छो णमामि तं अभयणंदिगुरुं॥" "णमिऊण अभयणंदि सुदसागरपारगिदणंदिगुरुं वरवीरणंदिणाहं पयडीणं पञ्चयं वोच्छं ।" "णमह गुणरयणभूसणसिद्धतामियमहब्धिभवभावं । वरवीरणंदिचंद णिम्मलगुणमिदणंदिगुरुं ।।" इन्ही वीरनंदिका सरण वादिराज सूरीने भी किया है । यथा चंद्रप्रभाभिसंवद्धा रसपुष्टा मन:प्रियम् । कुमुद्धतीव नो धत्ते भारती वीरनंदिनः ॥ (पार्धनाथकाव्य श्लो. ३०) वादिराज सूरीने पार्श्वनाथ कान्यकी पूर्ति शक स. ९४७ मे की है, यह उसीकी अन्तिम प्रशस्तिके इस पद्यसे मालुम होता है। "शाकाव्दे नगवार्धिरन्ध्रगणने संवत्सरे क्रोधने, मासे कार्तिकनानि बुद्धिमहिते शुद्ध तृतीयादिने । सिहे पाति जयादिके वसुमती जैनी कथेयं मया, निष्पत्ति गमिता सती भवतु वः कल्याणनिष्पत्तये ।।" अर्थात् 'शक सम्बत् ९४७ (क्रोधन सम्वत्सर ) की कार्तिक शुक्ला तृतीयाको पार्श्वनाथ काव्य पूर्ण किया। इस कथनसे यद्यपि यह मालूम होता है कि वीरनंदि आचार्य शक संवत् ९४७ के पहले ही होचुके है। तथापि जव कि वीरनदी आचार्य खयं अभयनंदीको गुरु स्वीकार करते हैं और नेमिचंद्र सिद्धात चक्रवर्ती भी उनको गुरुरूपसे स्मरण करते हैं तब यह अवश्य कहा जा सकता है कि वीरनंदि और नेमि- चंद्र दोनो ही समकालीन है। गोमहसारकी गाथाओका उल्लेख प्रमेयकमलमार्तण्डम भी मिलता है-यथा.- "विग्गहगदिमावण्णा केवलिणो समुहदो अजोगी य । सिद्धा य अणाहारा सेसा आहारिणो जीवा ॥ "( ६६५) श्रीप्रभाचंद्र आचार्यने प्रमेयकमलमार्तण्डकी रचना भोजराजके समयम की है, क्योंकि उसके अतमें यह उल्लेख है कि.- "श्रीभोजदेघराज्ये श्रीमद्धारानिवासिना परापरपरमेष्ठिप्रणामार्जितामलपुण्यनिराक- तनिखिलमलकलंकेन श्रीमत्प्रभाचंद्रपण्डितेन निखिलप्रमाणप्रमेयस्वरूपोद्योतपरीक्षामुख- पदमिदं विवृतमिति ।" धारानगरीके अधिपति भोजराजका समय विक्रमकी ११ वी शदी निश्चित है। इससे यह मालम होता है कि नेमिचंद्रखामी या तो प्रभाचंद्राचार्यके समकालीन हैं या कुछ पहले होचुके हैं। यद्यपि इस प्रमाणसे यह भी मालुम होसकता है कि श्री नेमिचंद्र सिद्धातचक्रवती प्रभाचंद्रा- ६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । चार्यसे कई शदी पूर्व हुए है; परंतु जवकि कवि रन्नने अपनेपर श्रीमान् चामुण्डरायकी कृपा रहनेका. जिक्र किया है तथा पुराणतिलककी रचना शक स. ९१५ में उसने की यह निश्चित है तब इस शंकाको स्थान नहीं रहता । अत एव इतिहासप्रेमी यह निश्चित करते हैं कि श्रीमान् नमिचद्र सिद्धांतचक्रवतीका समय भी लगभग शक स. ९१५ के ही है । परतु यह निश्चय एक प्रकारसे पुराणतिलकके आधारसे ही है अत एव अभी इतना संदेह ही है कि यदि पुराणतिलकके कथनको प्रमाण माना जाय तो बाहुवलीचरितक कथनको प्रमाण क्यो न माना जाय? यदि माना जाय तो किस तरह घटित किया जाय ? इसतरह नमिचंद्र सि. चक्रवर्तीका समय एक तरहसे अभीतक हमको संदिग्ध ही है। इसीलिये समयनिर्णयको हम यहीं विराम देते हैं। दूसरी बात यह भी है कि समयकी प्राचीनता या अर्वाचीनतासे प्रमाणता या अप्रमाणताका निर्णय नहीं होता। प्रामाण्य या अप्रामाण्यके निर्णयका हेतु ग्रंथकर्ताका ग्रंथ होता है। इस ग्रंथके रचयिता साधारण विद्वान् व थे। उनके रचित गोमहसार त्रिलोकसार लब्धिमार आदि उपलब्ध ग्रंथ उनकी असाधारण विद्वत्ता और सिद्धातचक्रवर्ती इस पदवीको सार्थक सिद्ध कर रहे है। यद्यपि उपलब्ध ग्रंथोंमें गणितकी प्रचुरता देखकर लोग यह विश्वास कर सकते हैं कि, श्री नेमिचंद्र सि. चक्रवती गणितके ही अप्रतिम पण्डितथे परतु इसमे कोई संदेह नहीं कि वे सर्वविपयम पूर्ण निष्णात थे। ऊपर जो गोमहसार सस्कृत टीकाकी उत्थानिकाका उल्लेख दिया है उसमे यह बात टिसाई गई है कि इस ग्रंथकी रचना श्रीमचामुण्डरायके प्रश्नके अनुसार हुई है। इस विषयमें ऐसा सुननेमे आता है कि एक वार श्री नेमिचंद्र सिद्धातचक्रवर्ती धवलादि महासिद्धात ग्रंथोंमेसे किसी सिद्धांत-ग्रंथका स्वाध्याय कर रहे थे। उसी समय गुरुका दर्शन करनेकेलिये श्री चामुण्डराय भी आये । शिष्यको आता हुआ देश- कर श्रीनेमिचंद्र सि. चक्रवर्तीने खाध्याय करना बंद कर दिया। जव चामुण्डराय गुरुको नमस्कार करके वैठगये तव उनने पूछा कि गुरो ! आपने ऐसा क्यो क्रिया' तव गुरुने कहा कि श्रावकको इन सिद्धात ग्रंथोंके सुननेका अधिकार नहीं है । इसपर चामुण्डरायने कहा कि हमको इन ग्रंथोंका अववोध किस तरह होसकता है ? कृपया कोई ऐसा उपाय निकालिये कि जिससे हम भी इनका महत्वानुभव कर सके। सुनते हैं कि इसीपर श्रीनेमिचंद्र सि. चक्रवर्तीने सिद्धात ग्रंथोका सार लेकर इस गोमहसार ग्रंथकी रचना की है। इस ग्रंथका दूसरा नाम पंचसंग्रह भी है । क्योकि इसमें महाकर्मप्राभूतके सिद्धांतसबंधी जीवस्थान क्षुद्रवंध बंधखामी वेदनाखड वर्गणाखंड इन पाच विषयोंका वर्णन है । मूलग्रंथ प्राकृतम लिखा गया है। यद्यपि मूल लेखक श्रीयुत नेमिचंद्र सि. चक्रवर्ती ही हैं; तथापि कहीं पर कोई २ गाथा माधवचंद्र त्रैविद्य- देवने भी लिखी हैं । यह टीकामें दी हुई गाथाओकी उत्थानिका के देखनेसे मालुम होती हैं । माधवचंद्र विद्यदेव श्री नेमिचंद्र सि चक्रवर्तीके प्रधान शिष्योंमेंसे एक थे। मालुम होता है कि तीन विद्याओंके अधिपति होनेके कारण ही आपको त्रैविद्यदेवका पद मिला होगा। इससे पाठकोको यह भी अदाज करलेना चाहिये कि नेमिचंद्र सि चक्रवर्तीकी विद्वत्ता कितनी असाधारण थी। इस ग्रंथराजके ऊपर अभीतक चार टीका लिखी गई हैं । जिसमें सबसे पहले एक कर्नाटक वृत्ति बनी है। उसके रचयिता ग्रंथकर्ताके अन्यतम शिष्य श्रीचामुण्डराय है । इसी टीकाके आधारपर एक संस्कृत टीका बनी है जिसके निर्माता केशववर्णी है और यह टीका भी इसी नामसे प्रसिद्ध है। दूसरी संस्कृत टीका श्रीमदभयचंद्र सिद्धातचक्रवर्तीकी वनाई हुई है जो कि 'मंदप्रबोधिनी' नामसे प्रख्यात है। उप- युक्त दोनों टीकाओंके आधारसे श्रीमद्विद्वद्वर टोडरमल्लजीने 'सम्यग्ज्ञानचंद्रिका' नामकी हिंदी टीका वनाई है । उक कर्नाटक वृत्तिके सिवाय तीनों टीकाओंके आधारपर यह सक्षिप्त वालबोधिनी टीका लिखी है । 'मंदप्रबोधिनी' हमको पूर्ण नहीं मिलसकी इसलिये जहांतक मिल सकी वहातक तीनों टीकाओंके आधारसे और आगे 'केशववर्णी' तथा 'सम्यग्ज्ञानचंद्रिका के आधारसे ही हमने इसको लिखा है।
गोम्मटसार। ७ इस ग्रंथके दो भाग है-एक जीवकांड दूसरा कर्मकांड । जीवकाण्डमें जीवकी अनेक अशुद्ध अवस्था- ओंका या भावोंका वर्णन है। कर्मकाण्डमें कौंकी अनेक अवस्थाओंका वर्णन है। कर्मकाण्डकी सक्षिप्त हिंदी टीका श्रीयुत पं. मनोहरलालजी शास्त्री द्वारा सम्पादित इसी ग्रंथमालाके द्वारा पहले प्रकाशित हो- चुकी है । जीवकाडकी सक्षिप्त हिंदी टीका अभीतक नहीं हुई थी । अत एव आज विद्वानोंके समक्ष उसीके उपस्थित करनेका मेने साहस किया है। . जिस समय श्रीयुत प्रात सरणीय न्यायवाचस्पति स्याद्वादवारिधि वादिगजकेसरी गुरुवर्य पं गोपाल- दासजीके चरणोमै मैं विद्याध्ययन करता था उसी समय गुरुकी आज्ञानुसार इसके लिखनेका मेंने प्रारम्भ किया था। यद्यपि इसके लिखनेमे प्रमाद या अज्ञानवश मुझसे कितनी ही अशुद्धिया रहगई होंगी, तथापि सजन पाठकोंके गुणमाही खभावपर दृष्टि देनेसे इस विषयमे मुझे अपने उपहासका बिलकुल भय नहीं होता । ग्रंथके पूर्ण करनेमे मैं सर्वथा असमर्थ था तथापि किसीभी तरह जो मैं इसको पूर्ण कर सका ह उमका कारण केवल गुरुप्रसाद है । अत एव इस कृतज्ञताके निदर्शनार्थ गुरुके चरणोका चिरतन चितवन करना ही श्रेय है। प्राचीन टीकाएं समुद्रसमान गम्भीर हैं-सहसा उनका कोई अवगाहन नहीं कर सकता । जो अवगा- हन नहीं कर सकते उनकेलिये कुल्याके समान इस क्षुद्र टीकाका निर्माण किया है। आशा है कि इसके अभ्याससे प्राचीन सिद्धात तितीर्पओंको अवश्य कुछ सरलता होगी। पाठकोसे यह निवेदन है कि यदि इस कृतिम कुछ सार भाग मालुम हो तो उसे मेरे गुरुका समझ हृदयगत करें। और यदि कुछ नि.सा- रता या विपरीतता मालुम पडे तो उसे मेरी कृति समझें, और मेरी अज्ञानतापर क्षमाप्रदान करें यह टीका ख श्रीमान् रायचंद्रजीद्वारा स्थापित 'परमश्रुतप्रभावकमंडल'की तरफसे प्रकाशित की गई है । अत एव उक मंडल तथा उसके ऑनरेरी व्यवस्थापक शा. रेवाशंकर जगजीवनदासजीका साधु- वादन करता है। इस तुच्छ कृतिको पढनेके पूर्व "गच्छत स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादत.। हसति दुर्जनास्तत्र समाद. धति सजना" इस श्लोकके अर्थको दृष्टिपथ करनेके लिये विद्वानोंसे प्रार्थना करनेवाला- ७-७-१९१६ ई. खूबचंद जैन २रा पाजरापोळ-बंबई नं. ४ वेरनी ( एटा) निवासी .
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विषयसूची। पृ. पं. • . .. .. ... पृ ५। विषय. १। १ छठे गुणस्थानका लक्षण १। ५/प्रमादके १५ भेद २॥ १ प्रमादके विषयमें ५ प्रकार सख्या २।१८/प्रस्तारका पहला क्रम प्रस्तारका दूसरा क्रम ३॥ १ प्रस्तारकी अपेक्षा अक्षपरिवर्तन दूसरे प्रस्तारकी अपेक्षा अक्षसंचार ... १४॥२२ १५। ७ १५/१५ १५/२५ १६।११ १६.२५ १७४१० १७॥२४ ૧૮ ૬ १८०२३ . . ३। ५ नष्टकी विधि ... . . विपय मंगलका प्रयोजन मंगल और प्रतिज्ञा बीस अधिकारोके नाम गुणस्थान और मार्गणाकी उत्पत्तिका निमित्त और उनके पर्याय वाचक शब्द गुणस्थान सज्ञाको मोहयोगभवा क्यो कहा इसका उत्तर दो प्ररूपणा और वीस प्ररूपणाकी भिन्न २ अपेक्षा मार्गणाप्ररूपणामें दूसरी प्ररुपणाओका अतर्भाव संज्ञाओंका अंतर्भाव उपयोगका अंतर्भाव गुणस्थानका लक्षण चौदह गुणस्थानोंके नाम चार गुणस्थानोंमें होनेवाले पाच भाव ४ गुणस्थानोके पाच भावोकी अपेक्षा... पाचमे आदि गुणस्थानोमे होनेवाले भाव और उनकी अपेक्षा मिथ्यात्वका लक्षण और भेद मिथ्यात्वके पाच मेदोका दृष्टात प्रकारातरसे मिथ्यालका लक्षण मिथ्यादृष्टिके वाह्य चिन्ह सासादन गुणस्थानका लक्षण सासादनका दृष्टात तीसरे मिश्र गुणस्थानका लक्षण तीसरे गुणस्थानका दृष्टान्त तीसरे गुणस्थानकी कुछ विशेषता वेदक सम्यक्त्वका लक्षण औपशमिक और क्षायिक सम्यक्त्वका लक्षण चतुर्थ गुणस्थानकी कुछ विशेषता पाचमे गुणस्थानका लक्षणे... विरताविरतकी उपपत्ति गो.प्र.२ उद्दिष्टका खरूप ३।१४ प्रथम प्रस्तारकी अपेक्षा नष्ट उद्दिष्टका ४१ १ गूढयंत्र ४।१३ दूसरे प्रस्तारकी अपेक्षा गूढयंत्र सतमगुणस्थानका खरूप ४।२५ सातमे गुणस्थानके दो भेदोका खरूप... अध करणका लक्षण ६. १ अपूर्वकरण गुणस्थान ६।१६ अपूर्वकरण परिणामोंका कार्य नवमे गुणस्थानका खरूप दशमे गुणस्थानका खरूप ... ७२१ ग्यारहमे गुणस्थानका खरूप ८1१४ वारहमा गुणस्थान ... ८१२३ तेरहमा गुणस्थान ९. ५ चौदहमा गुणस्थान ९.१४ गुणस्थानों में होनेवाली गुणश्रेणिनिर्जरा... ९/२५ सिद्धोंका स्वरूप... १०१११ सिद्धोंको दियेहुए विशेषणोंका फल १०३० जीवसमास-अधिकार २ ११.८ १२। १जीवसमासका लक्षण जीवसमासके चौदह भेद ... १२।२२/जीवसमासके ५७ भेद १३॥ १जीवसमासके विषयमे स्थानादि ४ अधि- १४॥ १ कार १४॥ /स्थानाधिकार १९/१० १९२२ २०१३ २०१११ २१ १ २३११५ २५। ३ २५।२३ २७ ८ २०२८ २८६ २८1१४ २९ ४ २९/१६ ३०१२ ३०१२३ ... ३१११७ ३२।११ ३२/१९ .. ३२।२९ ३३३१० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १० प पृ. पं. ५७६ . ५७०२१ ५८ १ ५८०१० का नियम ५८१७ ५९) ७ ५९/२१ ६०११ ६२।३ ६२।१८ ઉદાર विषय विषय. योनिअधिकार ३५।२७ संज्ञाओके स्वामी तीन प्रकारका जन्म ३६४१५ मार्गणा-महाधिकार जन्मका योनिके साथ सम्बन्ध ३७१ ४ मंगलाचरण और मार्गणाविकारले वर्ण- गुणयोनिकी संख्या ૨૨૪ नकी प्रतिज्ञा गतिकी अपेक्षा जन्म ३८।१२ मार्गणाका निरुक्तिपूर्वक लक्षण गतिकी अपेक्षा वेदोका नियम ३९। चौदह मार्गणाओके नाम अवगाहनाअधिकार .. ३९।१९ अंतरमार्गणाओके भेद और उनके काल- अवगाहनाओके स्वामी और उनकी न्यू- नाधिकताका गुणाकार. ४१। अंतरमार्गणा विशेप चतु स्थानपतित वृद्धि और अवगाहनाके गतिमार्गणा अ-६ मध्यके भेद ४३११४ गति शब्दकी निरुक्ति और उसके भेद वायुकायकी अवगाहना ४५११३ नारकादि ४ गतियोका मिन्न २ स्वरुप तैजस्कायादिकी अवगाहनाओंके गुणाका. सिद्धगतिका स्वरूप रकी उत्पत्तिका क्रम ४६॥२३ गतिमार्गणाम जीवसंख्या अवगाहनाके विषयमे मत्स्यरचना ४७३ कुलअधिकार इन्द्रियमार्गणा अ-७ ४७११६ इन्द्रियका निरुक्तिसिद्ध अर्थ पर्याप्ति-अधिकार ३ इन्द्रियके द्रव्य भावरूप दो भेद और दृष्टातद्वारा पर्याप्त अपर्याप्तका स्वरूप.. ४८॥२२ उनका स्वरूप पर्याप्तिके छह भेद और उनके स्वामी... ४९. ५ इन्द्रियकी अपेक्षा जीवाके भेद पर्याप्तिका काल ५० १ इन्द्रियवृद्धिका क्रम अपर्याप्तकका स्वरूप ५०१२६ इन्द्रियोंका विषयक्षेत्र अपर्याप्तकके उत्कृष्ट भव ५१॥ ९ इन्द्रियोंका आकार केवलियोंकी अपर्याप्तताकी शंकाका परि- इन्द्रियगत आत्मप्रदेशोंका अवगहन- हार ५२।१० प्रमाण गुणस्थानोंकी अपेक्षा पर्याप्त अपर्याप्त अतीन्द्रियज्ञानियोका स्वरूप अवस्था ५२।२८ एकेन्द्रियादि जीवोंकी संख्या सासादन और सम्यक्त्वके अभावका कायमार्गणाअ-८ नियम ५३।१० प्राण-अधिकार ४ कायका लक्षण और भेद... पृथ्वी आदि ४ स्थावरोंकी उत्पत्तिका प्राणका लक्षण ५३३२१ कारण प्राणके भेद ५४. ५ शरीरके भेद और लक्षण ... प्राणों की उत्पत्तिकी सामग्री ५४११२ शरीरका प्रमाण... प्राणोंके स्वामी. ५४२७ वनस्पतिका स्वरूप और भेद एकेन्द्रियादि जीवोंके प्राणोका नियम ५५६ त्रसोंका स्वरुप भेद क्षेत्र आदि संज्ञा-अधिकार ५ वनपतिके समान दूसरे जीवोमें प्रतिष्ठित संज्ञाका स्वरूप और भेद ५५।२४ अप्रतिष्ठित भेद क्रमसे आहारादि संहाका स्वरूप ५६॥ ४ स्थावर और त्रस जीवोका आकार ६७५ ५ ६७।१४ ६८१ १ ६८०११ ७० १ ७०. ८ ७१।१७ ૭૨૭ ... ७४।१६ ७४।२५ ७५। ४ ७९/२६ ८०.२६ ८११५ - गोम्मटसार। पृ. पं. १०९1१४ ११०६ ... १११1१४ ११११२६ ११२। ४ ८७१२३ कषायोंके स्थान... . ११४।१३ गके कारण .. ११५।२८ ११६६ ११६११३ . . .. विषय विषय. दृष्टातद्वारा कायका कार्य ८१1१५ कषायमार्गणा अ:११ कायरहित-सिद्धोंका स्वरूप ८१।२६ कषायके निरुक्तिसिद्ध लक्षण • पृथ्वीकायिकादि जीवोंकी संख्या ८२।१० शक्तिकी अपेक्षा क्रोधादिके ४ मेद योगमार्गणा अ-९ गतियोंके प्रथम समयमे क्रोधादिका नियम योगका सामान्य लक्षण ... ८७ ९ योगका विशेष लक्षण कषायरहित जीव दश प्रकारका सत्य ८८1१३ कपायकी अपेक्षा जीवसंख्या अनुभय वचनके भेद Sola૪ चार प्रकारके मनोयोग और वचनयो- ज्ञानमार्गणा अ-१२ ज्ञानका निरुक्तिसिद्ध सामान्य लक्षण . ९१1१७ नयोगकेवलीके मनोयोगकी संभवता पाच ज्ञानोंका क्षायोपशमिक क्षायिकल- ९११२५ काययोगके प्रत्येक भेदका स्वरुप पसे विभाग ९२०१७ योगप्रवृत्तिका प्रकार मिथ्याज्ञानका कारण और स्वामी ९६।४ अयोगी जिन मिश्रज्ञानका कारण और मन पर्ययज्ञान- १६/११ शरीरमै कर्म नोकर्मका विभाग का स्वामी १६.१८ औदारिकादिके समयप्रवद्धकी संख्या.. दृष्टातद्वारा तीन मिथ्याज्ञानका स्वरूप . ९६।२६ मतिज्ञानका स्वरूप उत्पत्ति आदि औदारिकादिके समयप्रवद्ध और वर्गणा- श्रुतज्ञानका सामान्य लक्षण का अवगाहन प्रमाण ९७७१३ विनसोपचयका स्वरुप श्रुतज्ञानके भेद ९८१ कर्म नोकर्मका उत्कृष्ट संचय और स्थान पर्यायज्ञान ९८1१२ पर्यायसमास उत्कृष्ट संचयकी सामग्रीविशेष ९८२५ शरीराकी उत्कृष्ट स्थिति छह वृद्धियोंकी छह संज्ञा ९९ ३ छह वृद्धियोंकी कुछ विशेषता उत्कृष्ट स्थितिका गुणहानि आयाम १९.१४ गरीराके समयप्रवद्धका बंध उदय सत्व अवस्थामे द्रव्यप्रमाण श्रुतनिवद्ध विषयका प्रमाण ९९/१२ अक्षरसमास और पदज्ञान .. औदारिक और वैक्रियिक शरीरकी विशे- पदके अक्षरोंका प्रमाण पता १००1११ पदसमास और सघात श्रुतज्ञान औदारिक शरीरके उत्कृष्ट सचयका स्वामी १००।२८ संघातसमास आदि १३ प्रकारके श्रुतज्ञा- वैक्रियिक शरीरके उत्कृष्ट सचयका स्थान १०१। ५ नका विस्तृत स्वरूप तैजस कार्मणके उत्कृष्ट संचयका स्थान १०१1१६ योगमार्गणाम जीवोकी सख्या अगवाह्य श्रुतके भेद १०१।२५ श्रुतज्ञानका माहात्म्य वेदमार्गणा अ-१० अवधिज्ञानका स्वरूप और दो भेद तीन वेदोंके दो भेदोका कारण और दो प्रकारकी अवधिका स्वामी और उनकी समविषमता १०६। १ स्वरुप भाववेद और उसके तीन भेदोंका स्वरूप १०६।१३ गुणप्रत्यय और सामान्य अवधिके भेद वेदरहित जीव १०७/१५/अवधिका द्रव्यादिचतुष्टयकी अपेक्षा वेदकी अपेक्षा जीवसंख्या १०७३२३ वर्णन . ... ११६।२२ ११७३ ११८३ १२११२३ १२२। २ १२२।२८ १२४। ३ १२४/२० १२४॥२८ १२७११० १२७४२१ १२८३ १२८1११ १२८१२४ . अर्थाक्षर श्रुतज्ञान . . १२९। ४ १४०॥ ७ १४०1१९ १४१ १ ... .. १४१११५ १४१।२६ १४३॥ ८ १२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। १६५।११ ११1१3 १६५1१६ १६७२ १९९१ १६९1१० १७०३ १७०1१० ... १७०1१९ १७०१२८ १३१1१७ १५१२६ । १४८।१२टेगविरत १७. १७२३२५ ૧૭ રે १७३११२ विषय. विषय. अवधिका सबसे जघन्य द्रव्य १४३११७ विपुलमतिका द्रव्य अवधिका जघन्य क्षेत्र १४३२८ दोनों भेटोंके क्षेत्राटिका प्रमाण जघन्यक्षेत्रका विशेष कथन १४४॥ केवल ज्ञानका स्वरूप अवधिका समयप्रवद्ध १४५।२७ /ज्ञानमार्गणा जीवसंख्या ध्रुवहारका प्रमाण १४६। ५ संयममार्गणा अ-१३ मनोव्य-वर्गणाका जघन्य और उत्कृष्ट संयमका खस्प और उनके पात्र भेद प्रमाण १४१४/संयमकी उत्पत्तिमा कारण प्रकारान्तरसे ध्रुवहारका प्रमाण १४।२३ देगसंयन और असंगमका कारण देशावधिके द्रव्यकी अपेक्षा भेद १४७ सामायिक संयन क्षेत्रकी अपेक्षाजघन्य और उत्कृष्ट प्रमाण १४४४१५/छेदोपस्थापना मंयम वर्गणाका प्रमाण १४१२४ परिहारविशुद्धि संयम • . परमावधिके भेद १४८ ३ सूक्ष्मसापगग संयम देशावधिके विकल्प और उनके विषयभूत यथान्यात संयम क्षेत्रादिके प्रमाण निकालनेके क्रम... उन्नीस काण्डकमे दोनों क्रमोंका खरूप १५०1१० समयत ध्रुववृद्धिका प्रमाण १५२॥ ४ इन्द्रियोंके अहाईस विषय अध्रुववृद्धिका प्रमाण १५२।१६ संयमकी अपेक्षा जीवसंख्या उत्कृष्ट देशावधिके विपयभूत द्रव्यादिका दर्शनमार्गणा अ-१४ प्रमाण १५३॥ १ दर्शनका लक्षण ... परमावधिके जघन्य द्रव्यका प्रमाण १५३२२५ चक्षुदर्शन आदि भेदोंका मते स्वरप उत्कृष्ट व्यका प्रमाण १५४१ ३ दर्शनकी अपेक्षा जीवसंख्या सर्वावधिका विषयभूत द्रव्य १५४११११ लेझ्यामार्गणा अ-१५ परमावधिके क्षेत्र कालकी अपेक्षा भेद १५४।२२ लेब्याका लक्षण... विपयके असख्यातगुणितक्रमका प्रकार १५४।२० लेश्याओंके निर्देश आद्दि १६ अधिकार प्रकारातरसे गुणाकारका प्रमाण १५५११७ १ निग परमावधिके विषयभूत उत्कृष्ट क्षेत्र और २ वर्ण कालका प्रमाण निकालनेकेलिये दो ३ परिणाम करणसूत्र १५६११३ ४ संक्रम जघन्य देशावधिसे सर्वावधिपर्यत भाव- ५ कर्म का प्रमाण १५६१३० ६ लक्षण नरकगतिम अवधिका क्षेत्र १५७२० ७ गति तिर्यंच और मनुष्यगतिमे अवधि १५७१३० ८ स्वामी देवगतिमें अवधिका क्षेत्रादि १५८॥ ९ ९ साधन मन पर्यय ज्ञानका स्वरूप १६१।२८ १० सख्या मन पर्ययके भेद १६॥ ७ ११ क्षेत्र मनापर्ययके दो भेदोंका विशेष स्वरूप १६२।२६ १२ सर्श मन पर्ययका स्वामी आदि... १६४॥ १ १३ काल ऋजुमतिका जघन्य और उत्कृष्ट द्रव्य १६५।१४ १४ अंतर १७४१ १ १७४११८ १७५११३ १७९1११ .. .. १७५१ १ १७७१३ १७७२४ १७९।६ १८०११८ १८२ ९ १८३१ १ १८५। ९ १८९1१८ १९२१ . . १९२।१२ १९४२७ १९६६ १९८1१६ १९९1१२ गोम्मटसारः। १३ ... . २०३। ५/समुद्धातके भेद... ... ३ स्थिति ४ क्षेन विषय. विषय. पृ. पं. १५-१६ भाव और अल्पयहुल... २००।२७ संझी असंजीकी परीक्षाके चिन्ह २४५।१२ लेल्यारहित जीप २०१।११ संजी मार्गणामें जीवसंख्या. २४६। १ भन्यमार्गणा अ-१६ आहारमार्गणा अ-१९ भव्यभभव्यका स्वरूप २०१।२४ आहारका स्वरूप २४६।१० भव्यल अभध्यत्वसे रहित जीय २०२।२४/आहारक अनाहारकका विभेद २४६।२५ भव्यमार्गणाने जीवसाया २४७४४ पाच परिवर्तन २०३।१२ समुद्धातका स्वरूप २४७११२ सम्यस्त्वमार्गणा अ-१७ आहारक ओर अनाहारकका कालप्रमाण २४७।२६ आहारमार्गणामे जीवसंख्या २४८ ५ मन्ययत्वका खल्प २०८1१३ सात अधिकारोके द्वारा छह व्यका उपयोगाधिकार-२० उपयोगका स्वरुप और दो भेद २४८1१४ निरूपण २०८।२७ दोनो उपयोगोंके उत्तर भेद २४८१२२ १ नाम २०९। ५ साकार उपयोगकी विशेपता २४९। १ २उपल्टक्षण २०९/२२ अनाकार उपयोगाकी विशेपता २४९/१३ २१५/१२ उपयोगाधिकारमें जीवसंख्या २४९।२७ २१६॥ ३ अंतर्भावाधिकार १ ५माया २१७४२५ गुणस्थान और मार्गणाम शेष प्ररूपणा- शानस्वरूप २१८१२३ ओंका अतर्भाव २५०। ७ २२३॥ ४ परमाणुके स्कन्धरम परिणमनका कारण मार्गणाओम गुणस्थानादि २५०1१७ २२४॥२१ पचान्तिकाय गुणस्थानोंमें जीवसमासादि २५८/२० २२८/२६ आलापाधिकार २ नव पदार्थ २२९.१४ गुणस्थानकमसे जीवमरया नमस्कार और आलापाधिकारके कहनेकी २३०। ६ अजीवादि-तत्वांका संक्षिप्त खरूप प्रतिज्ञा २६३११६ २३८। ७ सायिक सम्यक्स मार्गणाओंके आलापोंकी २३९। ७ चेटक सम्यक्त्व . संख्या २६३।२४ २४०।२६ गुणस्थानोंमे आलाप २६४ १ उपशम सम्यक्त्व २४१1 ७ मार्गणाओमें आलाप २६५। १ पाच लब्धि २४१।२२ जीवसमासकी विशेषता २६९१२७ सम्यक्त्व ग्रहणके योग्य जीव २४२। ६ सम्यक्तमार्गणाके दूसरे भेद वीस भेदोंकी योजना २७०1११ २४२।२७ सम्यक्त्वमार्गणामे जीवसंख्या आवश्यक नियम २७०१२९ २४४। १ गुणस्थानातीत सिद्धोंका स्वरूप २७२। १ संझी मार्गणा अ-१८ वीस भेदोके जाननेका उपाय २७२।२१ संझी असजीका स्वरूप २४५। १) अतिम आशीर्वाद २७३।१० . . .. गुणस्थान और . . .
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालाद्वारा प्रकाशित ग्रन्थोंकी सूची। १ पुरुषार्थसिध्यपाय भाषाटीका यह श्रीअमृतचन्द्रखामी विरचित प्रसिद्ध शास्त्र है इसमें आचारसवन्धी वडे २ गूढ रहस्य हैं विशेष कर हिसाका खरूप बहुत खूबीकेसाथ दरसाया गया है, यह एक वार छपकर विकगयाथा इसकारण फिरसे सशोधन कराके दूसरीवार छपाया गया है। न्यो १रु २ पञ्चास्तिकाय संस्कृ.भा. टी. यह श्रीकुन्दकुन्दाचार्यकृत मूल और श्रीअमृतचन्द्रसूरीकृत सस्कृतटीकासहित पहले छपा था। अवकी वार इसकी दूसरी आवृत्तिमे एक संस्कृतटीका तात्पर्यवृत्ति नामकी जो कि श्रीजयसेनाचार्यने वनाई है अर्थकी सरलताकेलिये लगादी गई है तथा पहली सस्कृतटी- काके सूक्ष्म अक्षरोंको मोटा करादिया है और गाथासूची व विषयसूची भी देखनेकी सुगमताके लिये लगादी है । इसमें जीव, अजीव, धर्म, अधर्म और आकाश इन पांच द्रव्योका तो उत्तम रीतिसे वर्णन है तथा कालद्रव्यका भी संक्षपसे वर्णन किया गया है । इसकी भाषा टीका स्वर्गीय पाडे हेमराजजीकी भाषा- टीकाके अनुसार नवीन सरल भाषाटीकामे परिवर्तन कीगई है। इसपर भी न्यो २ रु ३ज्ञानार्णव भा. टी. इसके कर्ता श्रीशुभचन्द्रखामीने ध्यानका वर्णन बहुत ही उत्तमतासे किया है। प्रकरणवश ब्रह्मचर्यव्रतका वर्णन भी बहुत दिखलाया है यह एकवार छपकर विकगया था अव द्विती- यवार सशोधन कराके छपाया गया है। न्यो ४ रु. ४ सप्तसङ्गीतरंगिणी भा. टी. यह न्यायका अपूर्व ग्रन्थ है इसमे ग्रंथकर्ता श्रीविमलदासजीने स्या- टन्ति, स्यानास्ति आदि सप्तमजी नयका विवेचन नव्यन्यायकी रीतिसे किया है। स्थाद्वादमत क्या है यह जाननेकेलिये यह ग्रंथ अवश्य पढना चाहिये । इसकी पहली आवृत्तिमे की एकभी प्रति नहीं रही अव दूसरी आवृत्ति शीघ्र छपकर प्रकाशित होगी। न्यों १ रु ५ वृहहव्यसंग्रह संस्कृत भा. टी. श्रीनेमिचन्द्रखामीकृत मूल और श्रीब्रह्मदेवजीकृत संस्कृतटीका तथा उसपर उत्तम वनाई गई भाषाटीका सहित है इसमे छह द्रव्योंका खरुप अतिस्पष्टरीतिसे दिखाया गया है। न्यो २० ६ द्रव्यानुयोगतर्कणा इस ग्रंथमे शास्त्रकार श्रीमद्भोजसागरजीने सुगमतासे मन्दबुद्धिजीवोको द्रव्य- ज्ञान होनेकेलिये 'अथ, "गुणपर्ययवद्रव्यम्" इस महाशास्त्र तत्त्वार्थसूत्रके अनुकूल द्रव्य-गुण तथा अन्य पदार्योंका भी विशेष वर्णन किया है और प्रसंगवश 'स्यादस्ति' आदि सप्तमगोंका और दिगंवराचा- यंवर्य श्रीदेवसेनखामीविरचित नयचक्रके आधारसे नय, उपनय तथा मूलनयोंका भी विस्तारसे वर्णन किया है। न्यो. २० ७ सभाण्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्र इसका दूसरा नाम तत्त्वार्थाधिगम मोलशास्त्र भी है जैनियोंका यह परममान्य और मुख्य अन्य है इसमें जैनधर्मके संपूर्णसिद्धान्त आचार्यवर्य श्रीउमास्वाति ( मी) जीने वडे लाघवसे सग्रह किये हैं। ऐसा कोई भी जैनसिद्धान्त नहीं है जो इसके सूत्रोंमें गर्मित न हो। सिद्धा- न्तसागरको एक अत्यन्त छोटेसे तत्त्वार्थरूपी घटमे भरदेना यह कार्य अनुपमसामर्थ्यवाले इसके रचयि- ताका ही था। तत्त्वार्थके छोटे २ सूत्रोके अर्थगाभीर्यको देखकर विद्वानोंको विस्मित होना पडता है । न्यो २३ । ८ स्याद्वादमारी संस्कृत भा. टी. इसमें छही मतोका विवेचनकरके टीका कर्ता विद्वद्वर्य श्रीम- क्लिषेणसूरीजीने स्याद्वादको पूर्णरुपसे सिद्ध किया है। न्यो.४ रु ९ गोम्मटसार (कर्मकाण्ड ) संस्कृतछाया और संक्षिप्त भाषाटीका सहित । यह महान् ग्रन्थ श्रीनेमिचन्द्राचार्यसिद्धान्तचक्रवतीका बनाया हुआ है, इसमें जैनतत्त्वोंका स्वरुप कहते हुए जीव तथा कर्मका स्वरुप इतना विस्तारसे है कि वचनद्वारा प्रशसा नहीं होसकती देखनेसेही मालूम होसकता है . और जो कुछ संसारका झगडा है वह इन्हीं दोनो (जीव-कर्म ) के संवन्धस है सो इनदोनाका स्वरूप दिखानेकेलिये अपूर्व सूर्य है । न्यों. २ रु १० प्रवचनसार "श्रीअमृतचन्द्रसूरिकृत तत्त्वप्रदीपिका सं. टी., "जो कि यूनिवर्सिटीके कोर्नमें दाखिल है। तथा श्रीजयसेनाचार्यकृत तात्पर्यवृत्ति सं. टी और वालावबोधिनी भापाटीका उन तीन टीकाओं सहित-छपाया गया है इसके मूलकर्ता श्रीकुन्दकुन्दाचार्य है। यह अध्यात्मिक ग्रन्थ है। न्या. रु. ११ मोक्षमाळा-कर्ता मरहुमसतावधानी कवी श्रीमद्गजचंद्र छे. आ एक स्थावाट तत्वावचोप- वृक्षतुं बीज छे. आ प्रन्थ तत्व पामवानी जिज्ञासा उत्पन्न करीशके एवं एमां कंइ अगे पण दैवत राय छे. आ पुस्तक प्रसिद्ध करवानो मुख्य हेतु उछरता वाळ युवानी अविवेकी विधा पामी जे आत्मसिद्धीथी घाट थाय छे ते भ्रष्टता अटकाववानो छे. आ मोक्षमाळा मोक्षमेळववाना कारण रूप छ. आ पुस्तकनी चे ये आवृतिओ सलास थइ गइछे अने ग्राहकोनी यहोळी मागणी यी आ त्रीजी आवृति छपावी छ कीमत आना बार १२ भावनाबोध-आ ग्रन्थना कर्ता पण उक्त महापुरुपज छे. वैराग्य ए आ अन्थनो मुख्यविषय छे. पात्रता पामवानुं अने कपायमल दूर करवानुं आ अन्य उत्तम सावन छे. आत्मगवेपिओने आ अन्य आनंदोल्लास आपनार छ आ ग्रन्थनी पण वे आवृतिओ खपी जवाथी अने ग्राहकोनी यहोळी मागणी थी आ त्रीजी आवृति छपावी छे. कीमत आना चार. आवंने अन्यो गुजराती भापामा अने वालबोध टाइपमा छपावेल छ १३ परमात्मप्रकाश-यह ग्रंथ श्रीयोगींद्रदेव रचित प्राकृतदोहाऑमे है इसकी सस्कृतटीका श्रीब्रह्मदेवकृत है तथा भाषाटीका पं० दौलतरामजीने की है उसके आधारसे नवीन प्रचलित हिंदीभापा अन्वयार्थ भावार्थ पृथक करके वनाई गई है। इसतरह दो टीकाओ सहित छपगया है । ये अध्यात्मग्रंथ निश्चयमोक्षमार्गका साधक होनेसे बहुत उपयोगी है । न्यो० ३ रु. १४ षोडशकप्रकरण-यह प्रन्थ श्वेताम्बराचार्य श्रीमरिभद्रसूरिका बनाया हुआ सस्कृत आर्या छन्दोंमें है. इसमें सोलह धर्मोपदेशके प्रकरण हैं। इसका सस्कृत टीका तथा हिंदीभापाटीका सहित प्रकाशन होरहा है । एक वर्षमें लगभग तैयार होजाइगा । १५ लब्धिसार (क्षपणासार सहित) यह प्रन्थ भी श्रीनेमिचंद्राचार्य सिद्धांत चक्रवर्तीका बनाया हुआ है और गोम्मटसारका परिशिष्ट भाग है । इसीसे गोमटसारके स्वाध्याय करनेकी सफलता होती है। इसमें मोक्षका मूलकारण सम्यक्त्वके प्राप्त होनेकी पाच लब्धियोंका वर्णन है फिर सम्यक्त्व होनेके वाद कर्मोके नाश होनेका बहुत अच्छा क्रम बतलाया गया है कि भन्यजीव शीघ्र ही कर्मोंसे छूट अनंत सुखको प्राप्त होकर अविनाशी पदको पासकते हैं । यह भी मूल गाथा छाया तथा सक्षिप्त भाषा- टीका सहित छपाया जा रहा है। छह महीनेके लगभग तयार होजाइगा। इस शास्त्रमालाकी प्रशंसा मुनिमहाराजोंने तथा विद्वानोंने बहुत की है उसको हम स्थानाभावसे लिख नहीं सकते। और यह संस्था किसी स्वार्थकेलिये नहीं है केवल परोपकारकेवाले है । जो द्रव्य आता है। वह इसी शास्त्रमालामें उत्तमप्रन्थोंके उद्धारकेवास्ते लगाया जाता है । इति शम् ॥ ग्रंथोंके मिलनेका पत्ता- शा० रेवाशंकर जगजीवन जोहरी ऑनरैरी व्यवस्थापक श्रीपरमश्रुतप्रभावकमंडल जोहरी बाजार खाराकुवा पो० नं० २ बंबई.!
रायचन्द्रजैनशाखमाला। ॐ श्रीमन्नेमिचन्द्राय नमः। अथ छायाभापाटीकोपेतः गोम्मटसारः। जीवकाण्डम् । अथ श्रीनेमिचन्द्र सैद्धान्तिकचक्रवर्ती गोम्मटसार ग्रन्थके लिखनेके पूर्व ही निविन समाप्ति नास्तिकतापरिहार, शिष्टाचारपरिपालन और उपकारसरण-इन चार प्रयोजनोंसे इष्टदेवको नमस्कार करते हुए इस ग्रन्थमें जो कुछ वक्तव्य है उसकी "सिद्ध" इत्यादि गाथासूत्रद्वारा प्रतिज्ञा करते है:- सिद्धं सुद्धं पणमिय जिणिन्दवरणेमिचन्दमकलंक। गुणरयणभूसणुदयं जीवस्स परूवणं वोच्छं ॥१॥ सिद्धं शुद्धं प्रणम्य जिनेन्द्रवरनेमिचन्द्रमकलङ्कम् । गुणरनभूपणोदयं जीवस्य प्ररूपणं वक्ष्ये ॥१॥ अर्थ-जो सिद्ध अवस्था अथवा खात्मोपलब्धिको प्राप्त हो चुका है, अथवा न्यायके अनेक प्रमाणोंसे जिसकी सत्ता सिद्ध है, और जो चार घातिया-द्रव्यकर्मके अमावसे शुद्ध, और मिथ्यात्वादि भावकोंके नाशसे अकलङ्क हो चुका है, और जिसके हमेशाही सम्यक्त्वादि गुणरूपी रसोंके भूषणोंका उदय रहता है, इस प्रकारके श्रीजिनेन्द्रवरनेमिचन्द्र- खामीको नमस्कार करके, जो उपदेशद्वारा पूर्वाचार्य परम्परासे चला आरहा है इस लिये सिद्ध, और पूर्वापर विरोधादि दोषोंसे रहित होनेके कारण शुद्ध, और दूसरेकी निन्दा आदि न करनेके कारण तथा रागादिका उत्पादक न होनेसे निष्कलङ्क है, और जिससे सम्यक्त्वादि गुणरूपी रनभूपणोंकी प्राप्ति होती है जो विकथा आदिकी तरह रागका कारण नहीं है इस प्रकारके जीवप्ररूपण नामक ग्रन्थको अर्थात् जिसमें अशुद्ध जीवके खरूप भेद प्रभेद आदि दिखलाये है इस प्रकारके ग्रन्थको कहूंगा। गो. १ २ , , रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् । इस प्रकार नमस्कार और विवक्षित ग्रंथकी प्रतिज्ञाकर इस जीवकाण्डमें जितने अधिकारों के द्वारा जीवका वर्णन करेंगे उनके नाम और संख्या दिखाते है। गुणजीवा पज्जची पाणा सण्णाय मग्गणाओ य । उवओगोवि य कमसो वीसं तु परूवणा भणिदा ॥२॥ गुणजीवाः पर्याप्तयः प्राणाः संज्ञाश्च मार्गणाश्च । उपयोगोपि च क्रमशः विगतिस्तु प्ररूपणा भणिताः॥२॥ अर्थ:-गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, चौदह मार्गणा, और उपयोग इस प्रकार ये वीस प्ररूपणा पूर्वाचार्योंने कही है । भावार्थ इनहीके द्वारा आगे जीवद्रव्यका निरूपण किया जायगा । इसलिये इनका लक्षण यद्यपि अपने अपने अधिकारमें स्वयं आचार्य कहेंगे तथापि यहांपर संक्षेपसे इनका लक्षण कहदेना भी उचित है । मोह और योगके निमित्तसे होनेवाली आत्माके सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रगुणोंकी अवस्थाओंको गुणस्थान कहते है । जिन सदृशधर्मोके द्वारा अनेक जीवोंका सङ्ग्रह किया जासके उन सदृशधर्मों का नाम जीवसमास है । शक्तिविशेषकी पूर्णताको पर्याप्ति कहते है। जिनका संयोग रहनेपर जीवमें 'यह जीता है और वियोग होनेपर 'यह मरगया' ऐसा व्यवहार हो उनको प्राण कहते हैं । आहारादिकी वाञ्छाको संज्ञा कहते है। जिनके द्वारा अनेक अवस्थाओंमें स्थित जीवोंका ज्ञान हो उनको मार्गणा कहते है । बाह्य तथा अभ्यंतर कारणों के द्वारा होनेवाली आत्माके चेतना गुणकी परिणतिको उपयोग कहते है। उक्त वीस प्ररूपणाओंका अन्तर्भाव गुणस्थान और मार्गणा इन दो प्ररूपणाओंमेही हो सकता है, इस कथनके पूर्व दोनो प्ररूपणाओंकी उत्पत्तिका निमित्त तथा उनके पर्यायवाचक शब्दोंको दिखाते है। संखेओ ओघोत्ति य गुणसण्णा सा च मोहजोगभवा । वित्थारादेसोत्ति य मग्गणसण्णा सकम्मभवा ॥३॥ संक्षेप ओघ इति च गुणसंज्ञा सा च मोहयोगभवा । विस्तार आदेश इति च मार्गणसंज्ञा स्वकर्मभवा ॥३॥ अर्थ-संक्षेप और ओघ यह गुणस्थानकी संज्ञा है और वह मोह तथा योगके निमि- तसे उत्पन्न होती है, इसी तरह विस्तार तथा आदेश यह मार्गणाकी संज्ञा है और यह भी अपने २ कोंके उदयादिसे उत्पन्न होती है। यहांपर चकारका ग्रहण किया है इससे गुणस्थानकी सामान्य और मार्गणाकी विशेष यह भी संज्ञा समझना। यहांपर यह शङ्का होसकती है कि मोह तथा योगके निमित्से गुणस्थान उत्पन्न होते है नकि 'गुणस्थान' १ नामके एकदेशसे भी सम्पूर्ण नाम समझाजाता है इस लिये गुणशब्दसे गुणस्थान और जीवशब्दसे जीवसमास समझना।
- गोम्मटसारः। or , यह संज्ञा फिर संज्ञाको मोहयोगमवा (मोह और योगसे उत्पन्न ) क्यों कहा ? इसका उत्तर यह है कि यद्यपि परमार्थसे मोह और योगके द्वारा गुणस्थान ही उत्पन्न होते है न कि गुणस्थानसंज्ञा, तथापि यहाँपर वाच्यवाचकमें कथचित् अभेदको मानकर उपचारसे संज्ञाको भी मोहयोगभवा कहा है। उक्त वीस प्ररूपणाओंका अन्तर्भाव दो प्ररूपणाओंमें किस अपेक्षासे हो सकता है और वीसप्ररूपणा किस अपेक्षासे कही है यह दिखाते है। आदेसे संलीणा जीवा पजत्तिपाणसण्णाओ उपओगोवि य भेदे वीसं तु परूवणा भणिदा ॥ ४ ॥ आदेशे सलीना जीवाः पर्याप्तिप्राणसंज्ञाश्च । उपयोगोपि च भेदे विंशतिस्तु प्ररूपणा भणिताः ॥ ४ ॥ अर्थ-मार्गणाओंमें ही जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा और उपयोग इनका अन्तर्भाव हो सकता है इस लिये अभेद विवक्षासे गुणस्थान और मार्गणा ये दो प्ररूपणा ही माननी चाहिये, वीस प्ररूपणा जो कही है वे भेद विवक्षासे है। किस मार्गणामें कौन २ प्ररूपणा अन्तर्भूत हो सकती हैं यह वात तीन गाथाओद्वारा दिखाते है। इन्दियकाये लीणा जीवा पज्जतिआणभासमणो। जोगे काओ णाणे अक्खा गदिमग्गणे आऊ ॥ ५॥ इन्द्रियकाययोलीना जीवाः पर्यात्यानभापामनांसि । योगे कायः जाने अक्षीणि गतिमार्गणायामायुः ॥ ५ ॥ अर्थ-इन्द्रियमार्गणा तथा कायमार्गणामें स्वरूपखरूपवत्सम्बन्धकी अपेक्षा, अथवा सामान्यविशेषकी अपेक्षा जीवसमासका अन्तर्भाव हो सकता है, क्योंकि इन्द्रिय तथा काय जीवसमासके स्वरूप है और जीवसमास स्वरूपवान् है । तथा इन्द्रिय और काय विशेष हैं जीवसमास सामान्य है । इसीप्रकार धर्मम्मि सम्बन्धकी अपेक्षा पर्याप्ति भी अन्तर्मूत हो सकती है। क्योंकि इन्द्रिय धर्मा है और पर्याप्ति धर्म है। कार्यकारणसम्बन्धकी अपेक्षा श्वासोच्छ्रास प्राण, वचनवल प्राण, तथा मनोबलप्राणका, पर्याप्तिमें अन्तर्भाव हो सकता है। क्योंकि प्राण कार्य है और पर्याप्ति कारण है। कायवल प्राण विशेष है और योग सामान्य है इसलिये सामान्यविशेपकी अपेक्षा योगमार्गणामें कायबलप्राण अन्तर्भूत हो सकता है । कार्यकारण- सम्बन्धकी अपेक्षासेही ज्ञानमार्गणामें इन्द्रियोंका अन्तर्भाव होसकता है, क्योंकि ज्ञानकार्यके प्रति लब्धीन्द्रिय कारण है । इसीप्रकार गतिमार्गणामें आयुपाणका अन्तर्भाव साहचर्यसम्ब- न्धकी अपेक्षा हो सकता है, क्योंकि इन दोनोंका उदय साथही होता है। १ इन्द्रियज्ञानावरणकर्मके क्षयोपशमसे उत्पन्न निर्मलता।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । పం संज्ञाओंका अन्तर्भाव किस प्रकार होता है सो दिखाते है। मायालोहे रदिपुवाहारं कोहमाणगलि भयं । वेदे मेहुणसण्णा लोहलि परिग्गहे सण्णा ॥ ६ ॥ मायालोभयो रतिपूर्वकमाहारं क्रोधमानकयोर्भयम् । वेदे मैथुनसंज्ञा लोमे परिग्रहे संज्ञा ॥ ६ ॥ अर्थ-रतिपूर्वक आहार अर्थात् आहारसंज्ञा रागविशेप होनेसे रागका खरूपही है और माया तथा लोभकषाय दोनोंही खरूपवान् हैं इसलिये खरूपखरूपवत्सम्बन्धकी अपेक्षा माया और लोभकषायमें आहारसंज्ञाका अन्तर्भाव होता है । इसीप्रकार (खरूपखरूपवत्स- म्बन्धकी अपेक्षा) क्रोध तथा मानकपायमें भयसंज्ञाका अन्तर्भाव होता है। कार्यकारणस- म्बन्धकी अपेक्षा वेदकषायमें मैथुनसंज्ञाका और लोभकषायमें परिग्रहसंज्ञाका अन्तर्भाव होता है। क्योंकि वेदकषाय तथा लोभकपाय कारण है और मैथुनसंज्ञा तथा परिग्रह- संज्ञा कार्य हैं। उपयोगका अन्तर्भाव दिखानेके लिये सूत्र करते है । सागारो उबजोगोणाणे मग्गसि दंसणे मग्गे । अणगारो उबजोगो लीणोत्ति जिणेहिं णिदिदं ॥ ७ ॥ साकार उपयोगो ज्ञानमार्गणायां दर्शनमार्गणायाम् । अनाकार उपयोगो लीन इति जिननिर्दिष्टम् ॥ ७ ॥ अर्थ-उपयोग दो प्रकारका होता है एक साकार दूसरा अनाकार । साकार उपयोग उसको कहते हैं जिसमें पदार्थ 'यह घट है, यह पट है' इत्यादि विशेषरूपसे प्रतिभासित हों, इसीको ज्ञान कहते है इसलिये इसका ज्ञानमार्गणामें अन्तर्भाव होता है । जिसमें कोई मी विशेष पदार्थ प्रतिभासित न होकर केवल महासचाही विषय हो उसको अनाकार उपयोग तथा दर्शन कहते है इसका दर्शनमार्गणामें अन्तर्भाव होता है। यद्यपि यहांपर ऊपर सब जगह अमेद विवक्षासे दो ही प्ररूपणाओंमें शेष प्ररूपणाओंका अन्तर्भाव दिखलादिया है तथापि आगे प्रत्येक प्ररूपणाका निरूपण भेदविवक्षासे ही करेंगे। प्रतिज्ञाके अनुसार प्रथम क्रमप्राप्त गुणस्थानका सामान्य लक्षण करते है। जेहिं दु लक्खिजंते उदयादिसु संभवेहिं भावेहिं । जीवा ते गुणसण्णा णिहिटा सचदरसीहिं॥८॥ यैस्तु लक्ष्यन्ते उदयादिषु सम्भवैर्भावैः । जीवास्ते गुणसंज्ञा निर्दिष्टाः सर्वदर्शिमिः ॥८॥ अर्थ-दर्शनमोहनीयादि कर्मोंकी उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम आदि अवस्थाके गोम्मटसारः। होनेपर होनेवाले जिन परिणामोंसे युक्त जो जीव देखे जाते है उन जीवोंको सर्वज्ञदेवने उसी गुणस्थानवाला और परिणामोंको गुणस्थान कहा है। भावार्थ:-जिस प्रकार किसी जीवके दर्शन मोहनीयकर्मकी मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयसे मिथ्यात्व ( मिथ्यादर्शन ) रूप परिणाम हुए तो उस जीवको मिथ्यादृष्टि और उन परिणामोंको मिथ्यात्व गुणस्थान कहेंगे। गुणस्थानोंके १४ चौदह भेद हैं। उनके नाम दो गाथामोद्वारा दिखाते हैं। मिच्छो सासण मिस्सो अविरदसम्मो य देसविरदो य । विरदा पमत्त इदरो अपुत्व अणियह सुहमो य ॥९॥ १ मिथ्यात्वं २ सासनः ३ मिनः ४ अविरतसम्यक्त्वं च ५देशविरतश्च । विरताः ६ प्रमत्तः ७ इतरः ८ अपूर्वः९ अनिवृत्तिः १० सूक्ष्मश्च ॥ ९ ॥ अर्थ-मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, अविरतसम्यग्दृष्टि, देशविरत, प्रमत्तविरत, अप्रमत्त- विरत, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण, सूक्ष्मसांपराय । इस सूत्रमें चौथे गुणस्थानके साथ अविरतशब्द अन्त्यदीपक है इसलिये पूर्वके तीन गुणस्थानोंमेंभी अविरतपना समझना चाहिये। तथा छठे गुणस्थानके साथका विरत शब्द आदि दीपक है इस लिये यहांसे लेकर सम्पूर्ण गुणस्थान विरत ही होते है ऐसा समझना । उवसंत खीणमोहो सजोगकेवलिजिणो अजोगी य । चउदस जीवसमासा कमेण सिद्धा य णादवा ॥ १० ॥ ११ उपशान्तः, १२ क्षीणमोहः, १३ संयोगकेवलिजिनः, १४ अयोगी च । चतुर्दश जीवसमासाः क्रमेण सिद्धाश्च ज्ञातव्याः ॥ १० ॥ अर्थ-उपशान्तमोह,क्षीणमोह,सयोगकेवलिजिन, अयोगकेवली ये १४ चौदह जीवसमास (गुणस्थान ) है । और सिद्ध जीवसमासोंसे रहित है । अर्थात् इस सूत्रमें क्रमेण शब्द पड़ा है इससे यह सूचित होता है कि जीवसामान्यके दो भेद है एक संसारी दूसरा मुक्त। मुक्तअवस्था संसारपूर्वक ही होती है । संसारियोंके गुणस्थानकी अपेक्षा चौदह मेद है, इसके अनन्तर क्रमसे गुणस्थानोंसे रहित मुक्त या सिद्ध अवस्था प्राप्त होती है । इस गाथामें सयोग शब्द अन्त्यदीपक है इस लिये पूर्वके मिथ्यादृष्यादि सबही गुणस्थानवर्ती जीव योगसहित होते है । और जिन शब्द मध्यदीपक है इससे असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोगी पर्यन्त सभी जिन होते है। केवलि शब्द आदिदीपक है इसलिये सयोगी अयोगी तथा सिद्ध तीनों ही केवली होते है यह सूचित होता है।
६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । इस प्रकार सामान्यसे गुणस्थानोंका निर्देशकर अब प्रत्येक गुणस्थानों में जो २ भाव होते है उनका उल्लेख करते है। मिच्छे खलु ओदइओ विदिये पुण पारणामिओ भावो। मिस्से खओवसमिओ अविरदसम्महि तिण्णेव ॥ ११ ॥ मिथ्यात्वे खलु औदयिको द्वितीये पुनः पारणामिको भावः । मिश्रे क्षायोपशमिकः अविरतसम्यक्त्वे त्रय एव ॥ ११ ॥ अर्थ-प्रथम गुणस्थानमें औदयिक भाव होते हैं । और द्वितीय गुणस्थानमें पारणा- मिक भाव होते है। मिश्रमें क्षायोपशमिक भाव होते है । और चतुर्थ गुणस्थानमें औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक इस प्रकार तीनोंही भाव होते हैं। कर्मके उदयसे जो आत्माके परिणाम हों उनको औदयिक भाव कहते है। जो कर्मके उपशम होनेसे भाव होते है उनको औपशमिक भाव कहते है। सर्वघातिस्पर्धकोंके वर्तमान निकोंके विना फल दिये ही निर्जरा होनेपर और उसीके ( सर्वघातिस्पर्धकोंके ) आगामिनिषकोंका सदवस्थारूप उपशम होनेपर और देशघाति स्पर्धकोंका उदय होनेपर जो आत्माके परिणाम होते है उनको क्षायोपशमिक भाव कहते है । जिनमें कर्मके उदय उपशमादिकी कुछ भी अपेक्षा न हो उनको पारणामिक भाव कहते है। उक्त चारों ही गुणस्थानके भाव किस अपेक्षासे कहे है उसको दिखानेके लिये सूत्र कहते है। एदे भावा णियमा दसणमोहं पडुच भणिदा हु। चारित्तं णत्थि जदो अविरदअन्तेसु ठाणेसु ॥ १२ ॥ एते भावा नियमा दर्शनमोहं प्रतीत्य भणिताः खलु । चारित्रं नास्ति यतो अविरतान्तेपु स्थानेषु ॥ १२ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्ट्यादिगुणस्थानोंमें जो नियमवद्ध औदयिकादि भाव कहे है वे दर्शनमो- हनीय कर्मकी अपेक्षासे है; क्योंकि चतुर्थगुणस्थानपर्यन्त चारित्र नही होता । अर्थात् मिथ्यादृष्टयादि गुणस्थानों में यदि सामान्यसे देखा जाय तो केवल औदयिकादि भाव ही नहीं होते किन्तु क्षायोपशमिकादि भाव भी होते है तथापि यदि केवल दर्शनमोहनीय कर्मकी अपेक्षा देखा जाय तो औदयिकादि भाव ही होते है। क्योंकि प्रथमगुणस्थानमें दर्शनमोहनीयकर्मकी मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयमात्रकी अपेक्षा है इसलिये औदयिक भाव ही है । द्वितीयगुणस्थानमें दर्शनमोहनीयकी अपेक्षा ही नही है इसलिये पारणामिकमाव है। तृतीयगुणस्थानमें जात्यन्तर सर्वघाति मिश्रप्रकृतिका उदय है इसलिये क्षायोपशमिक भाव होते हैं । इसीप्रकार चतुर्थ गुणस्थानमें दर्शनमोहनीयकर्मके उपशम क्षय क्षयोपशम तीनोंका सद्भाव है इसलिये तीनों ही प्रकारके भाव होते हैं।
गोम्मटसारः। पञ्चमादिगुणस्थानोंमें जो २ भाव होते हैं उनको दो गाथाओंद्वारा अब दिखाते है देसविरदे पमत्ते इदरे य खओवसमियभायो दु। सो खलु चरित्चमोहं पडुच भणियं तहा उवरिं ॥१३॥ देशविरते प्रमत्ते इतरे च क्षायोपशमिकमावस्तु । स खलु चारित्रमोहं प्रतीस भणितस्तथा उपरि ॥ १३ ॥ अर्थ-देशविरत प्रमत्त अप्रमत्त इन गुणस्थानों में चारित्रमोहनीयकी अपेक्षा क्षायोपश- मिक भाव होते है तथा इनके आगे अपूर्वकरणादि गुणस्थानोंमें भी चारित्रमोहनीयकी अपेक्षासे ही भावोंको कहेंगे। तत्तो उवरिं उपसमभावो उवसामगेसु खवगेसु । खइओ भावो णियमा अजोगिचरिमोत्ति सिद्धे य ॥ १४ ॥ तत उपरि उपशमभावः उपशामकेपु क्षपकेषु । सायिको भावो नियमात् अयोगिचरिम इति सिद्धे च ॥ १४ ॥ अर्थ-सातवें गुणस्थानके ऊपर उपशमश्रेणिवाले आठमें नौ दशमें गुणस्थानमें तथा ग्यारहमेमें औपशमिकभाव ही होते है, इसीप्रकार क्षपकश्रेणिवाले उक्त तीन गुणस्थान तथा क्षीणमोह, सयोगकेवली अयोगकेवली गुणस्थानोंमे और सिद्धोंके नियमसे क्षायिक भाव ही होते है। क्योकि उपगम श्रेणीवाला तीनो गुणस्थानोंमें चारित्रमोहनीय कर्मकी इक्कीस प्रकृतियोंका उपशम करता है और ग्यारहमे सम्पूर्ण चारित्रमोहनीयका उपशम करचुकता है इसलिये यहांपर औपगामिक भाव ही होते है । इसीतरह क्षपकश्रेणिवाला इक्कीस प्रकृतियोंका क्षय करता है और क्षीणमोह, सयोगी, अयोगी और सिद्ध यहाँपर क्षय होचुका है इसलिये क्षायिक भाव ही होते है। इसप्रकार संक्षेपसे सम्पूर्ण गुणस्थानों में होनेवाले भाव और उनके निमित्तको दिखाकर गुणस्थानोंका लक्षण अब क्रमप्राप्त है, इसलिये पहले प्रथमगुणस्थानका लक्षण और उसके भेदोंको कहते है। मिच्छोदयेण मिच्छत्तमसद्दहणं तु तचमत्थाणं । एयंतं विवरीयं विणयं संसयिदमण्णाणं ॥१५॥ मिथ्यात्वोदयेन मिथ्यात्वमश्रद्धानं तु तत्वार्थानाम् । एकान्तं विपरीतं विनयं संशयितमज्ञानम् ॥ १५॥ अर्थ-मिथ्यात्वप्रकृति के उदयसे तत्वार्थके विपरीत श्रद्धानको मिथ्यात्व कहते है। इसके पाच भेद है एकान्त विपरीत विनय संशयित अज्ञान । अनेक धर्मात्मक पदार्थको किसी एक धर्मात्मक मानना इसको एकान्त मिथ्यात्व कहते है जैसे वस्तु सर्वथा क्षणिकही है, अथवा नित्य ही है, वक्तव्य ही है, अवक्तव्य ही है इत्यादि ।
रायचन्द्रजैनशाखमालायात् । धर्मादिकके खरूपको विपर्ययरूप मानना इसको विपरीत मिथ्यात्व कहते हैं जैसे हिंसासे खर्गादिककी प्राप्ति होती है । सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि देव गुरु तथा उनके कहे हुए शास्त्रोंमें समान बुद्धि रखनेको विनयमिथ्यात्व कहते है । जैसे जिन और बुद्ध तथा उनके धर्मको समान समझना ! समीचीन तथा असमीचीन दोनों प्रकारके पदार्थोमसे किसी भी एकका निश्चय न होना इसको संशय मिथ्यात्व कहते है । जैसे सग्रन्थ लिङ्गमोक्षका साधन है या निम्रन्थ लिङ्ग, अथवा सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्र इनकी एकता मोक्षका साधन है अथवा यागादि कर्म । कौके सर्वथा अभावसे अनन्तगुणविशिष्ट आत्माकी शुद्ध अवस्थाविशेषको मोक्ष कहते है यद्वा वुद्धि आदि विशेषगुणोंके अभावको मोक्ष कहते है। जीवादि पदार्थोको "यही है" "इसी प्रकार है। इस तरह विशेषरूपसे न समझनेको अज्ञानमिथ्यात्व कहते है। इस प्रकार सामान्यसे मिथ्यात्वके ये पांच भेद है विस्तारसे असंख्यातलोकप्रमाणतक मेद हो सकते है। उक्त मिथ्यात्वके पांच भेदोंके दृष्टान्तोंको दिखाते है। एयंत बुद्धदरसी विवरीओ वह तावसो विणओ। इंदो विय संसइयो मकडियो चेव अण्णाणी ॥ १६ ॥ एकान्तो बुद्धदर्शी विपरीतो ब्रह्म तापसो विनयः । इन्द्रोपि च संशयितो मस्करी चैवाज्ञानी ॥ १६ ॥ अर्थ-- ये केवल दृष्टान्तमात्र है इसलिये प्रत्येकके साथ आदि शब्द लगालेना चाहिये अर्थात् बौद्धादिमतवाले एकान्तमिथ्यादृष्टि है । याज्ञिक ब्राह्मणादि विपरीत मिथ्यादृष्टि है । तापसादि विनयमिथ्यादृष्टि है, इन्द्रनामक श्वेताम्बर गुरु प्रभृति संशयमिथ्या- दृष्टि है, और मस्करी आदिक अज्ञानी है। उक्त मिथ्यात्वके लक्षणको दूसरे प्रकारसे कहते है। मिच्छंतं वेदंतो जीवो विवरीयदंसणो होदि । ण य धर्म रोचेदि हु महुरं खु रसं जहा जरिदो॥१७॥ मिथ्यात्वं विदन् जीवो विपरीतदर्शनो भवति । न च धर्म रोचते हि मधुरं खलु रसं यथा चरितः ॥ १७ ॥ अर्थ-मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयसे उत्पन्न होनेवाले मिथ्या परिणामोंका अनुभवन करने- वाला जीव विपरीत श्रद्धानवाला हो जाता है । उसको जिसप्रकार पित्तज्वरसे युक्त जीवको मीठारस भी अच्छा मालुम नहीं होता उस ही प्रकार यथार्थ धर्म अच्छा मालुम नहीं होता है । भावार्थ-मिथ्यात्वप्रकृतिके उदयसे जो जीव देवगुरुशास्त्रके यथार्थ खरूपका -- गोम्मदसार। श्रद्धान न करके विपरीत श्रद्धान करता है उसको मिथ्यादृष्टि कहते है । यहांपर जो च शब्द डाला है उससे यह अभिप्राय समझना चाहिये कि यदि कोई जीव बाहिरसे सम्यग्ह- प्टिके समान आचरण कर और अन्तरङ्गसे उसके विपरीत परिणाम हों तो वह यथार्थमें मिथ्यादृष्टि ही है। इस अर्थको दृढ करनेके लिये ही मिथ्यादृष्टि के बाह्य चिहोंको दिखाते है। मिच्छाइट्टी जीवो उबइ8 पवयणं ण सद्दहदि । सद्दहदि असम्भावं उवइटं वा अणुवइह ॥ १८॥ मिथ्याष्टिर्जीव उपदिष्टं प्रवचनं न श्रद्दधाति । श्रद्दधाति असद्भावमुपदिष्टं वाऽनुपदिष्टम् ॥ १८ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि जीव समीचीन गुरुओंके पूर्वापर विरोधादि दोषोंसे रहित और हितके करनेवाले भी वचनका यथार्थ श्रद्धान नहीं करता। किन्तु आचार्यामासोंकेद्वारा उपदिष्ट या अनुपदिष्ट असद्भावका अर्थात् पदार्थके विपरीत खरूपका इच्छानुसार श्रद्धान करता है। इस प्रकार प्रथम गुणस्थानका स्वरूप, उसके भेद, और उनके दृष्टान्त, तथा बाह्य चिह्नोंको दिखाकर अव दूसरे सासादन गुणस्थानको कहते है । आदिमसम्मत्चद्धा समयादो छावलित्ति वा सेसे। अणअण्णदरुदयादो णासियसम्मोत्ति सासणक्खो सो ॥ १९॥ आदिमसम्यक्त्वाद्धा आसमयतः पडावलिरिति वा शेपे । अनान्यतरोदयात् नाशितसम्यक्त्व इति सासनाख्यः सः ॥ १९ ॥ अर्थ-प्रथमोपशम सम्यक्त्वके अथवा यहांपर वा शब्दका ग्रहण किया है इसलिये द्वितीयोपशम सम्यक्त्वके अन्तर्मुहूर्तमान कालमेंसे जब जघन्य एक समय तथा उत्कृष्ट छह आवली प्रमाण काल शेष रहे उतने कालमें अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभमेंसे किसीके भी उदयसे सम्यक्त्वकी विराधना होनेपर सम्यग्दर्शनगुणकी जो अव्यक्त अतत्व- श्रद्धानरूप परिणति होती है उसको सासन या सासादन गुणस्थान कहते है। अब इस गुणस्थानको दृष्टान्तद्वारा स्पष्ट करते है। सम्मत्तरयणपवयसिहरादो मिच्छभूमिसमभिमुहो। णासियसम्मत्तो सो सासणणामो मुणेयवो ॥२०॥ सम्यक्त्वरत्नपर्वतशिखरात् मिथ्यात्वभूमिसममिमुखः । नाशितसम्यक्त्वः सः सासननामा मन्तव्यः ॥२०॥ अर्थ पाल तुके शिखरसे गिरकर जो जीव मिथ्यात्वरूप भूमिके सम्मुख गो. २ - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १० हो चुका है, अत एव जिसने सम्यक्त्वकी विराधना (नाश) करदी है और मिथ्यत्वको प्राप्त नहीं किया है उसको सासन या सासादन गुणस्थानवी कहते है । भावार्थ-जिसप्रकार पर्वतसे गिरनेपर और भूमिपर पहुंचने के पहले मध्यका जो काल है वह न पर्वतपर ठहरनेकाही है और न भूमिपर ही ठहरनेका है। किन्तु अनुभय काल है। इसी प्रकार अनन्तानुबन्धी कषायमैसे किसी एकके उदय होनेसे सम्यक्त्वपरिणामोंके छूटनेपर, और मिथ्यात्व प्रकृतिके उदय न होनेसे मिथ्यात्व परिणामोंके न होनेपर मध्यके अनुभयकालमें जो परिणाम होते है उनको सासन या सासादन गुणस्थान कहते है। यहांपर जो सम्यक्त्वको रत्नपर्वतकी उपमा दी है उसका अभिप्राय यह है कि जिसप्रकार रलपर्वत अनेक रत्नोका उत्पन्न करनेवाला और उन्नतस्थान पर पहुंचानेवाला है उसही प्रकार सम्यक्त्व भी सम्यग्ज्ञानादि अनेक गुणरत्नोंको उत्पन्न करनेवाला है और सबसे उन्नत मोक्षस्थानपर पहुंचानेवाला है। क्रमप्राप्त तृतीयगुणस्थानका लक्षण करते है। सम्मामिच्छुदयेण य जत्तंतरसावधादिकज्जेण । णय सम्म मिच्छं पिय सम्मिस्सो होदि परिणामो ॥ २१ ॥ सम्यग्मिध्यात्वोदयेन च जात्यन्तरसर्वघातिकार्येण । नच सम्यक्त्रं मिथ्यात्वमपि च सम्मिश्रो भवति परिणामः ॥ २१ ॥ अर्थ-जिसका प्रतिपक्षी आत्माके गुणको सर्वथा घातनेका कार्य दूसरी सर्वघाति प्रकृतियोंसे विलक्षण जातिका है उस जात्यन्तर सर्वघाति सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयसे केवल सम्यक्त्वरूप या मिथ्यात्वरूप परिणाम न होकर जो मिश्ररूप परिणाम होता है उसको तीसरा मिश्र गुणस्थान कहते है । (शङ्का ) यह तीसरा गुणस्थान वन नहीं सकता, क्योंकि मिश्ररूप परिणाम ही नही हो सकते । यदि विरुद्ध दो प्रकारके परिणाम एकही आत्मा और एकही कालमें माने जाय तो गीतउष्णकी तरह परस्पर सहानवस्थान लक्षण विरोध दोष आवेगा। यदि क्रमसे दोनों परिणामोंकी उत्पत्ति मानीजाय तो मिश्ररूप तीसरा गुणस्थान नहीं बनता । (समाधान) यह शङ्का ठीक नहीं है, क्योंकि मित्रामित्र- न्यायसे एककाल और एकही आत्मामें मिश्ररूप परिणाम हो सकते है। भावार्थ-जिसप्रकार देवदत्तनामक किसी मनुष्यमें यज्ञदत्तकी अपेक्षा मित्रपना और चैत्रकी अपेक्षा अमित्रपना ये दोनों धर्म एकही कालमें रहते है और उनमे कोई विरोध नहीं है। उस ही प्रकार सर्वज्ञ निरूपित पदार्थके खरूपके श्रद्धानकी अपेक्षा समीचीनता और सर्वज्ञाभासकथित अतत्व- श्रद्धानकी अपेक्षा मिथ्यापना ये दोनों ही धर्म एक काल और एक आत्मामें घटित हो सकते है इसमें कोई भी विरोधादि दोष नहीं है। उक्त अर्थको ही दृष्टान्तद्वारा स्पष्ट करते है दहिगुडमिव वामिस्सं पुहभावं व कारिदुं सके।
गोम्मटसार। एवं मिस्सयभावो सम्मामिच्छोचिणादवो ॥ २२ ॥ दधिगुडमिव व्यामिश्र पृथग्भावं नैव कर्तु शक्यम् । एवं मिश्रकभावः सम्यग्मिध्यात्वमिति ज्ञातव्यम् ॥ २२ ॥ अर्थ-जिसमकार दही और गुडको परस्पर इस तरहसे मिलानेपर कि फिर उन दो- नोंको पृथक् २ नहीं करसके, उस द्रव्यके प्रत्येक परमाणुका रस मिश्ररूप (खट्टा और मीठा मिला हुआ) होता है । उस ही प्रकार मिश्रपरिणामोंमें भी एकही कालमें सम्यक्त्व और मिथ्यात्वरूप परिणाम रहते है ऐसा समझना चाहिये। इस गुणस्थानमें होनेवाली विशेषताको दिखाते है। सो संजमण गिण्हदि देसजम वा ण बंधदे आउं। सम्म वा मिच्छं वा पडिवजिय मरदि णियमेण ॥ २३॥ स संयम न गृहाति देशयमं वा न वनाति आयुः। सम्यक्त्वं वा मिथ्यात्वं वा प्रतिपद्य म्रियते नियमेन ॥ २३ ॥ अर्थ-तृतीय गुणस्थानवी जीव सकल संयम या देशसंयमको ग्रहण नहीं करता, और न इस गुणस्थानमे आयुःकर्मका बन्ध ही होता है। तथा इस गुणस्थानवाला जीव यदि मरण करता है तो नियमसे सम्यक्त्व या मिथ्यात्वरूप परिणामोंको प्राप्त करके ही मरण करता है, किन्तु इस गुणस्थानमें मरण नहीं होता। उक्त अर्थको और भी स्पष्ट करते हैं। सम्मत्तमिच्छपरिणामेसु जहिं आउगं पुरा बद्धं । तहिं मरणं मरणंतसमुग्धादो विय | मिस्सम्मि ॥ २४ ॥ सम्यक्त्वमिथ्यात्वपरिणामेषु यत्रायुष्क पुरा वद्धम् । तत्र मरणं मारणान्तसमुद्धातोपि च न मिने ॥ २४ ॥ अर्थ-तृतीयगुणस्थानवी जीवने तृतीयगुणस्थानको प्राप्त करने से पहले सम्यक्त्व या मिथ्यात्वरूपके परिणामोंमेंसे जिस नातिके परिणाम कालमें आयुकर्मका बन्ध किया हो उस ही तरहके परिणामोंके होने पर उसका मरण होता है, किन्तु मिश्रगुणस्थानमें मरण नहीं होता । और न इस गुणस्थानमें मारणान्तिक समुद्भात ही होता है। परन्तु किसी २ आचार्यके मतके अनुसार इस गुणस्थानमें भी मरण हो सकता है। १ मूल शरीरको विना छोडे ही आत्माके प्रदेशोका बाहिर निकलना इसको समुद्धात कहते है । उसके सात भेद हैं वेदना कषाय वैक्रियक मारणान्तिक तैजस आहार और केवल । मरणसे पूर्व समयमे होने वाले समुद्धातको मारणान्तिक समुद्धात कहते है।
१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । चतुर्थ गुणस्थानका लक्षण बताने के पूर्व उसमें होनेवाले सम्यग्दर्शन के औपशमिक क्षायिक क्षायोपशमिक इन तीन भेदोंमें से प्रथम बायोपशमिकका लक्षण करते है। सम्मत्तदेसधादिस्सुदयादो वेदगं हवे सम्म । चलमलिनमगाढं तं णिचं कम्मक्खवणहेदु ॥ २५ ॥ सम्यक्त्वदेशघातेरुदयाद्वेदकं भवेत्सम्यक्त्वम् । चलं मलिनमगाढं तन्नित्यं कर्मक्षपणहेतु ॥ २५ ॥ अर्थ-सम्यग्दर्शनगुणको विपरीत करनेवाली प्रकृतियों से देशघाति सम्यक्त्व प्रकृति के उदय होने पर ( तथा अनन्तानुबन्धि चतुष्क और मिथ्यात्व मिश्र इन सर्वघाति प्रकृति- योंके आगामि निषकोंका सदवस्थारूप उपशम और वर्तमान निपेकोंकी विना फल दिये ही निर्जरा होनेपर ) जो आत्माके परिणाम होते है उनको वेदक या क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन कहते है । वे परिणाम चल मलिन या अगाढ़ होते हुए भी नित्य ही अर्थात् जघन्य अन्त- मुहूर्तसे लेकर उत्कृष्ट छयासठ सागरपर्यन्त कर्मोंकी निर्जराको कारण है। जिसप्रकार एकही जल अनेक कल्लोलरूपमें परिणत होता है उसही प्रकार जो सम्यग्द- र्शन सम्पूर्ण तीर्थकर या अर्हन्तोंमें समान अनन्त शक्तिके होने पर भी 'श्रीशान्ति- नाथजी शान्तिकेलिये और श्रीपार्श्वनाथजी रक्षा करनेके लिये समर्थ है। इस तरह नाना विषयोंमें चलायमान होता है उस को चल सम्यग्दर्शन कहते है। जिस प्रकार शुद्ध सुवर्ण भी मलके निमित्तसे मलिन कहा जाता है उसही तरह सम्यक्त्व प्रकृतिके उदयसे जिसमें पूर्ण निर्मलता-नही है उसको मलिन सम्यग्दर्शन कहते है । जिस तरह वृद्ध पुरुष के हाथमें ठहरी हुई भी लाठी कांपती है उसही तरह जिस सम्यग्दर्शनके होते हुए भी अपने वनवाये हुए मन्दिरादिमें 'यह मेरा मन्दिर है' और दूसरेके वनवाये हुए मन्दिरादिमें ' यह दूस- रेके है' ऐसा भ्रम हो उसको अगाढ सम्यग्दर्शन कहते है। अब औपशमिक या क्षायिक सम्यग्दर्शनका लक्षण कहते है। सत्तण्ह उवसमदो उवसमसम्मो खयादु खइयो य । बिदियकसायुदयादो असंजदो होदि सम्मो य ॥ २६ ॥ सप्तानामुपशमत उपशमसम्यक्त्वं क्षयात्तु क्षायिकं च । द्वितीयकषायोदयादसंयतं भवति सम्यक्त्वं च ॥२६ ।। अर्थ-तीन दर्शनमोहनीय अर्थात् मिथ्यात्त्र मिश्र और सम्यक्त्व तथा चार अनन्तानु- बन्धी कषाय इन सात प्रकृतियोंके उपशमसे उपशम और सर्वथा क्षयसे क्षायिक सम्यग्दर्शन होता है । इस (चतुर्थगुणस्थानवर्ती) सम्यग्दर्शन के साथ संयम बिलकुल ही नही होता; क्योंकि यहा पर दूसरी अप्रत्याख्यानावरणकषायका उदय है । अत एव इस गुणस्थानवर्ती जीवको असंयतसम्यग्दृष्टि कहते है।
गोम्मटसार। इस गुणस्थानमें जो कुछ विशेषता है उसको दिखाते है। सम्माइटी जीवो उवइट पवयणं तु सहहदि । सदहदि असब्भावं अजाणमाणो गुरुणियोगा ॥ २७ ॥ सम्यग्दृष्टिजीव उपदिष्टं प्रवचनं तु श्रद्दधाति । श्रद्दधात्यसद्भावमज्ञायमानो गुरुनियोगात् ॥ २७ ॥ अर्थ-सम्यग्दृष्टि जीव आचार्योंके द्वारा उपदिष्ट प्रवचनका श्रद्धान करता है, किन्तु अज्ञानतावश गुरुके उपदेशसे विपरीत अर्थका भी श्रद्धान करलेता है । भावार्थ "अरह- तदेवका ऐसा ही उपदेश है" ऐसा समझकर यदि कोई पदार्थका विपरीत श्रद्धान भी क- रता है तो भी वह सम्यग्दृष्टि ही है। क्योंकि उसने अरहंतका उपदेश समझकर उस पदा- थका वैसा श्रद्धान किया है परन्तु- सुत्तादो तं सम्मं दरसिजंतं जदा ण सहहदि । सो चेच हवइ मिच्छाइट्टी जीवो तदो पहुदी ॥ २८ ॥ सूत्रात्तं सम्यक् दर्शयन्वं यदा न श्रद्दधाति । स चैव भवति मिथ्यारष्टि वस्तदा प्रभृति ।। २८ ॥ अर्थ-गणधरादिकथित सूत्रके आश्रयसे आचार्यादि के द्वारा भलेपकार समझाये जाने पर भी यदि वह जीव उस पदार्थका समीचीन श्रद्धान न करै तो वह जीव उस ही कालसे मिथ्यादृष्टि होजाता है। भावार्थ-आगममें दिखाकर समीचीन पदार्थके समझाने पर भी यदि वह जीव पूर्वमे अज्ञानसे किये हुए अतत्त्वश्रद्धानको न छोडे तो वह जीव उसही कालसे मिथ्याइष्टि कहा जाता है ॥ चतुर्थगुणस्थानवी जीवका और भी विशेष खरूप दिखाते है। णो इन्दियेसु विरदो णो जीवे थावरे तसे वापि जो सद्दहदि जिणुत्तं सम्माइट्ठी अविरदो सो ॥ २९॥ नो इन्द्रियेपु विरतो नो जीवे स्थावरे त्रसे वापि । यः श्रद्दधाति जिनोक्तं सम्यग्दृष्टिरविरतः सः॥ २९ ॥ अर्थ-जो इन्द्रियोंके विषयोंसे तथा त्रस स्थावर जीवोंकी हिंसासे विरक्त नहीं है, किन्तु जिनेन्द्रदेवद्वारा कथित प्रवचनका श्रद्धान करता है वह अविरतसम्यग्दृष्टि है। भावार्थ सयम दो प्रकारका होता है, एक इन्द्रियसयम दूसरा प्राणसयम । इन्द्रियोंके विषयोंसे विरक्त होनेको इन्द्रियसयम, और अपने तथा परके प्राणोंकी रक्षाको प्राणसंयम कहते है। इस गुणस्थानमें दोनों संयमोंमेंसे कोई भी संयम नहीं होता अत एव इसको अविरत सम्यग्दृष्टि कहते है । परन्तु इस गुणस्थानमें जो अपि शब्द पड़ा है उससे सूचित होता है कि विना प्रयोजन किसी हिंसामें प्रवृत्त भी नहीं होता।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । , पंचमगुणस्थानका लक्षण कहते हैं। पचक्खाणुदयादो संजमभावो ण होदि णवरितु । थोववदो होदि तदो देसवदो होदि पंचमओ ॥ ३०॥ प्रत्याख्यानोदयात् संयमभावो न भवति नरिं तु । स्तोकवतो भवति ततो देशव्रतो भवति पञ्चमः ॥ ३० ॥ अर्थ-~-यहां पर प्रत्याख्यानावरण कषायका उदय होनेसे पूर्ण संयम तो नहीं होता, किन्तु यह विशेषता है कि अप्रत्याख्यानावरणकपायका उदय न होनेसे देशव्रत होता है, अत एव इस पंचमगुणस्थानका नाम देशवत है। इस गुणस्थानको विरताविरत भी कहते हैं सो क्यों ? इसकी उपपत्तिको कहते हैं। जो तसवहाउविरदो अविरदओ तहय थावरवहादो एकसमयम्हि जीवो विरदाविरदो जिणेकमई ॥३१॥ यत्रसबधाद्विरतः अविरतस्तथा च स्थावरवधात् । एकसमये जीवो विरताविरतो जिनैकमतिः ॥ ३१ ॥ अर्थ-जो जीव जिनेन्द्रदेवमें अद्वितीय श्रद्धाको रखता हुआ त्रसकी हिंसासे विरत और उस ही समयमें स्थावरकी हिंसासे अविरत होताहै उस जीवको विरताविरत कहतेहैं । भावार्थ-यहां पर जिन शब्द उपलक्षण है इसलिये जिनशब्दसे जिनेन्द्रदेव, और उनके उपदेशरूप आगम, तथा उसके अनुसार चलनेवाले गुरुओंका ग्रहण करना चाहिये । अर्थात् जिनदेव, जिन आगम, जिनगुरुओंका श्रद्धान करनेवाला जो जीव एकही समयमै त्रस हिंसाकी अपेक्षा विरत और स्थावरहिंसाकी अपेक्षा अविरत होता है इसलिये उसको एकही समयमे विरताविरत कहते है। यहांपर जो तथा च शब्द पड़ा है उसका यह अभिप्राय है कि विना प्रयोजन स्थावरहिंसाको भी नहीं करता। छट्टे गुणस्थानका लक्षण कहते हैं संजलणणोकसायाणुदयादो संजमो हवे जम्हा । मलजणणपमादो वि य तम्हा हु पमचविरदो सो ॥ ३२ ॥ संज्वलननोकपायाणामुंदयात्संयमो भवेद्यस्मात् । मलजननप्रमादोपि च तस्मात्खलु प्रमत्तविरतः सः ॥ ३२ ॥ अर्थ सकलसंयमको रोकनेवाली प्रत्याख्यानावरण कषायका उपशम होने से पूर्ण सं. यम तो हो चुका है। किन्तु उस संयम के साथ संज्वलन और नो कषायके उदयसे संयममें मलको उत्पन्न करनेवाला प्रमाद भी होता है अत एव इस गुणस्थानको प्रमत्तविरत कहते है। १ विशेषता अर्थका द्योतक यह अव्यय है।
गोम्मटसार। - १५ वत्तावत्तपमादे जो वसइ पमत्तसंजदो होदि । सयलगुणशीलकलिओ महबई चित्तलायरणो ॥ ३३ ॥ व्यक्ताव्यक्तप्रमादे यो वसति प्रमत्तसंयतो भवति । सकलगुणशीलकलितो महाव्रती चित्रलाचरणः ॥ ३३ ।। अर्थ-जो महाव्रती सम्पूर्ण मूलगुण (२८) और शीलसे युक्त होता हुआ भी व्यक्त और अव्यक्त दोंनो प्रकारके प्रमादोंको करता है उस प्रमत्तसंयतफा आचरण चित्रले होता है। प्रकरणमें प्राप्त प्रमादोका वर्णन करते है । विकहा तहा कसाया इंदियणिहा तहेव पणयोय । चटु चदु पणमेगेगं होंति पमादा हु पण्णरस ॥ ३४ ॥ विकथा तथा कपाया इन्द्रियनिद्रास्तथैव प्रणयश्च । चतुःचतुःपञ्चैकैकं भवन्ति प्रमादाः खलु पञ्चदश ॥ ३४ ॥ अर्थ-चार विकथा ( स्त्रीकथा भक्तकथा राष्ट्रकथा अवनिपालकथा ) चार कषाय (क्रोध मान माया लोभ ) पांच इन्द्रिय ( स्पर्शन रसन प्राण चक्षु और श्रोत्र) एक निद्रा और एक प्रणय (मेह) ये पंद्रह प्रमादोंकी संख्या है। अब प्रमादोंका विशेप वर्णन करने के लिये उनके पांच प्रकारोंका वर्णन करते है। संखा तह पत्यारो परियट्टण णट्ट तह समुद्दिद। एदे पंच पयारा पमदसमुक्त्तिणे णेया ॥ ३५ ॥ संख्या तथा प्रस्तारः परिवर्तनं नष्टं तथा समुद्दिष्टम् । एते पञ्च प्रकाराः प्रमादसमुत्कीर्तने ज्ञेयाः ॥ ३५ ॥ अर्थ-प्रमादके विशेष वर्णनके विषयमें इन पांच प्रकारोंको समझना चाहिये । सं- ख्या, प्रस्तार, परिवर्तन, नष्ट, और समुद्दिष्ट । आलापोंके भेदों की गणनाको संख्या कहते है । संख्याके रखने या निकालनेके क्रमको प्रस्तार, और एक भेदसे दूसरे भेदपर पहुंच- नेके क्रमको परिवर्तन, संख्याके द्वारा भेदके निकालनेको नष्ट, और भेदको रखकर संख्याके निकालनेको समुद्दिष्ट कहते हैं। संख्याकी उत्पत्तिका क्रम बताते है । सवेपि सुधभंगा उवरिमभंगेसु एकमेकेसु । मेलतित्ति य कमसो गुणिदे उप्पजदे संखा ॥ ३६ ॥ १-२ जिसका खयं अनुभव हो उसको व्यक्त और उससे विपरीतको अव्यक्त प्रमाद कहते हैं। ३ चितकवरा अर्थात् जिसमें किसी दूसरे रगका भी सद्भाव हो । छ। गुणस्थानवर्ती मुनिका आचरण ; कषाययुक्त होनेसे चित्रल कहाजाता है।
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
सर्वेपि पूर्वभङ्गा उपरिमभङ्गेपु एकैकेपु ।
मिलन्ति इति च क्रमशो गुणिते उत्पद्यते संख्या ॥ ३६॥
अर्थ-पूर्वके सब ही भग आगेके प्रत्येक भङ्गमें मिलते है, इसलिये क्रमसे गुणाकार करने
पर संख्या उत्पन्न होती है । भावार्थ-पूर्वके विकथाओके प्रमाण चारको आगेकी कपायोंके
प्रमाण चारसे गुणा करना चाहिये, क्योंकि प्रत्येक विकथा प्रत्येक कपायके साथ पाई जाती है।
इससे जो राशि उत्पन्न हो (जैसे १६) उसको पूर्व समझकर उसके आगेकी इन्द्रियोंके
प्रमाण पांचसे गुणा करना चाहिये, क्योंकि प्रत्येक विकथा या कपाय प्रत्येक इन्द्रियके साथ
पाई जाती है । इसके अनुसार सोलहको पांचसे गुणने पर अस्सी प्रमादोंकी संख्या
निकलती है । निद्रा और प्रणय ये एक ही एक है इसलिये इन के साथ गुणा करनेपर
संख्या वृद्धि नहीं हो सक्ती।
अब प्रस्तारक्रमको दिखाते है।
पढमं पमदपमाणं कमेण णिक्खिविय उपरिमाणं च ।
पिंड पडि एकेक णिक्खित्ते होदि पत्थारो ॥३७॥
प्रथमं प्रमादप्रमाणं क्रमेण निक्षिप्य उपरिमाणं च ।
पिण्डं प्रति एकैकं निक्षिप्ते भवति प्रस्तारः ॥ ३७॥
अर्थ-प्रथम प्रमादके प्रमाणका विरलन कर क्रमसे निक्षेपण करके उसके एक एक
रूपके प्रति आगेके पिण्डरूप प्रमादके प्रमाणका निक्षेपण करनेपर प्रस्तार होता है । भावार्थ-
प्रथम विकथा प्रमादका प्रमाण ४, उसका विरलन कर क्रमसे ११११ इसतरह निक्षेपण
करना । इसके ऊपर कषायप्रमादके प्रमाण चारको प्रत्येक एकके ऊपर ४४४४ इसतरह नि-
क्षेपण करना, ऐसा करनेके अनंतर परस्पर (कषायको) जोड़ देने पर १६ सोलह होते
है । इन सोलहका भी पूर्वकी तरह विरलन कर एक २ करके सोलह जगह रखना तथा
प्रत्येक एकके ऊपर आगेके इन्द्रियप्रमादका प्रमाण पाच २ रखना। ऐसा करनेसे पूर्वकी तरह
परस्पर जोड़ने पर अस्सी प्रमाद होते है । इसको प्रस्तार कहते है। इससे यह मालम
हो जाता है कि पूर्वके समस्त प्रमाद, आगेके प्रमाद के प्रत्येकभेदके साथ पाये जाते है।
प्रस्तारका दूसरा क्रम बताते है ।
णिक्खित्तु विदियमेतं पढमं तस्सुवरि विदियमेकेकं ।
पिंडं पडि णिक्खेओ एवं सवत्थ कायवो ॥३८॥
निक्षित्वा द्वितीयमानं प्रथमं तस्योपरि द्वितीयमेकैकम् ।
पिण्डं प्रति निक्षेप एवं सर्वत्र कर्तव्यः ॥ ३८॥
- गोम्मटसारः। अर्थ-दूसरे प्रमादका जितना प्रमाण है उतनी जगहपर प्रथम प्रमादके पिण्डको रख- कर, उसके ऊपर एक २ पिण्ड प्रति आगेके प्रमादमेंसे एक २ का निक्षेपण करना, और आगे भी सर्वत्र इसी प्रकार करना । भावार्थ-दूसरे कषाय प्रमादका प्रमाण चार है इसलिये चार जगह पर प्रथम विकथाप्रमादके पिण्डका स्थापन करके उसके ऊपर पिण्ड पिण्डके प्रति एक २ कषायका (४) स्थापन करना । इनको परस्पर जोड़नेसे सोलह होते है । इन सोलहको प्रथम समझकर, इनसे आगेके इन्द्रिय प्रमादका प्रमाण पांच है इस लिये सोलहके पिण्डको पांच जगह रखकर पीछे प्रत्येक पिण्डपर क्रमसे एक २ इन्द्रियका स्थापन करना ( १६ १६ १६ १६ १६ ) इन सोलहको इन्द्रियप्रमादके प्रमाण पांचसे गुणा करने पर या पांच जगहपर रक्खे हुए सोलहको परस्पर जोड़नेसे प्रमादोंकी संख्या अस्सी निकलती है प्रथम प्रस्तारकी अपेक्षा अक्षपरिवर्तनको कहते है। तदियक्खो अंतगदो आदिगदे संकमेदि विदियक्खो। दोण्णिवि गंतूर्णतं आदिगदे संकमेदि पढमक्खो ॥ ३९ ॥ तृतीयाक्ष अन्तगत आदिगते संक्रामति द्वितीयाक्षः । द्वावपि गत्वान्तमादिगते संक्रामति प्रथमाक्षः ॥ ३९ ॥ अर्थ-प्रमादका तृतीयस्थान अन्तको प्राप्त होकर जब फिरसे आदिस्थानको प्राप्त हो. जाय तब प्रमादका दूसरा स्थान भी बदलनाता है । इसी प्रकार जब दूसरा स्थान भी अ- न्तको प्राप्त होकर फिर आदि को प्राप्त होनाय तब तीसरा प्रमादका स्थान बदलता है । भावार्थ-तीसरा इन्द्रियस्थान जब स्पर्शनादिके कमसे क्रोध और प्रथम विकथापर घूमकर अन्तको प्राप्त होजाय तब दूसरे कषायस्थानमें क्रोधका स्थान छूटकर मानका स्थान होता है । इसी प्रकार क्रमसे जब कषायका स्थान भी पूर्ण होजाय तब विकथामें स्त्रीकथाका स्थान छूटकर राष्ट्रकथाका स्थान होता है । इसक्रमसे स्वीकथालापी क्रोधी स्पर्शनेन्द्रियवशंगतो निद्रालुः स्नेहवान् आदि अस्सी हू भङ्ग निकलते है । निद्रा और स्नेह इनका दूसरा भेद नहीं है इसलिये इनमें अक्षसंचार नहीं होता। दूसरे प्रस्तारकी अपेक्षा अक्षसंचारको कहते है पढमक्खो अंतगदो आदिगदे संकमेदि विदियक्खो। दोण्णिवि गंतूर्णतं आदिगदे सकमेदि तदियक्खो ॥४॥ प्रथमाक्ष अन्तगत आदिगते संक्रामति द्वितीयाक्षः। द्वावपि गत्वान्तमादिगते संक्रामति तृतीयाक्षः ॥ ४० ॥ १ एक स्थानको छोडकर दूसरे स्थानपर जानेको परिवर्तन कहते हैं। गो. ३ १८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-प्रथमाक्ष जो विकथारूप प्रमादस्थान वह घूमता हुआ जब क्रमसे अंततक पहुं- चकर फिर स्त्रीकथारूप आदि स्थानपर आता है तब दूसरा कपायका स्थान क्रोधको छोड़कर मानपर आता है । इसी प्रकार जब दूसरा कपायस्थान भी अन्तको प्राप्त होकर फिर आदि (क्रोध) स्थानपर आता है तब तीसरा इन्द्रियस्थान बदलता है । अर्थात् स्पर्शनको छोड़कर रसनापर आता है। आगे नष्टके लानेकी विधि बताते हैं । सगमाणेहिं विभत्ते सेसं लक्खित्तु जाण अक्खपदं । लद्धे रूवं पक्खिव सुद्धे अंते ण रूवपक्खेवो ॥४१॥ स्वकमानैर्विभक्ते शेपं लक्षयित्वा जानीहि अक्षपदम् । लब्धे रूपं प्रक्षिप्य शुद्ध अन्ते न रूपप्रक्षेपः ।। ४१ ॥ अर्थ-किसीने जितनेमा प्रमादका भड्न पूछा हो उतनी संख्याको रखकर उसमें क्रमसे प्रमादप्रमाणका भाग देना चाहिये। भाग देनेपर जो शेप रहे उसको अक्षस्थान समझ जो लब्ध आवे उसमें एक मिलाकर, दूसरे प्रमादके प्रमाणका भाग देना चाहिये, और भाग देनेसे जो शेष रहै उसको अक्षस्थान समझना चाहिये । किन्तु शेष स्थानमें यदि शून्य हो तो अन्तका अक्षस्थान समझना चाहिये, और उसमें एक नहीं मिलाना चाहिये। जैसे किसीने पूछा कि प्रमादका वीसवां भङ्ग कौनसा है ? तो वीसकी संख्याको रखकर उसमें प्रथम विकथाप्रमादके प्रमाण चारका भाग देनेसे लब्ध पांच आये, और शुन्य शेषस्थानमें है इसलिये पांचमें एक नही मिलाना और अन्तकी विकथा ( अवनिपालकथा) समझना चाहिये। इसी प्रकार आगे भी कषायके प्रमाण चारका भाग देनेसे लब्ध और शेष एक २ ही रहा इस लिये प्रथम क्रोधकषाय, और लब्ध एकमें एक और मिलानेसे दो होते है इसलिये दूसरी रसनेन्द्रिय समझनी चाहिये । अर्थात् २० वा भड्न अवनिपालकथालापी क्रोधी रसने- न्द्रियवशंगतो निद्रालुः स्नेहवान् यह हुआ। अब उद्दिष्टका खरूप कहते हैं। संठाविदूण रूबं उबरीदो संगुणित्तु सगमाणे । अवणिज अणंकिदयं कुज्जा एमेव सवत्थ ॥ ४२ ॥ संस्थाप्य रूपमुपरितः संगुणित्वा स्वकमानम् । अपनीयानङ्कितं कुर्यात् एवमेव सर्वत्र ॥ ४२ ॥ अर्थ-एकका स्थापन करके आगेके प्रमादका जितना प्रमाण है उसके साथ गुणाकार करना चाहिये। और उसमें जो अनङ्कित हो उसका त्याग करै । इसीप्रकार आगे भी करनेसे उद्दिष्टका प्रमाण निकलता है । भावार्थ-प्रमादके भङ्गको रखकर उसकी संख्याके निकालने- dawn .
गोम्मटसारः। १९ को उद्दिष्ट कहते हैं । उसके निकालने का क्रम यह है कि किसीने पूछा कि राष्ट्रकथालापी मायी घ्राणेन्द्रियवशंगतः निद्रालः स्नेहवान् यह प्रमादका भङ्ग कितनेमा है। तो एक(१) संख्या को रखकर उसको प्रमादके प्रमाणसे गुणा करना चाहिये और जो अनंकित हो उसको उसमेंसे घटादेना चाहिये । जैसे १ एकका स्थापनकर उसको इन्द्रियोंके प्रमाण पांचसे गुणा करनेपर पांच हुए उसमेंसे अनंकित चक्षुः श्रोत्र दो है; क्योंकि भन्न पूछनेमें प्राणेन्द्रिय का ग्रहण किया है, इसलिये दोको घटाया तो शेष रहे तीन, उनको कषायके प्रमाण चारसे गुणा करनेपर बारह होते हैं, उनमें अनंकित एक लोभकषाय है इसलिये एक घटादिया तो शेष रहे ग्यारह, उनको विकथाभोंके प्रमाण चारसे गुणनेपर चवालीस होते है, उसमेंसे एक अवनिपालकथाको घटा दिया तो शेष रहे लेतालीस इसलिये उक्त भङ्ग तेतालीसमा हुआ। प्रथम प्रतारकी अपेक्षा जो अक्षपरिवर्तन वताया था उसके आश्रयसे नष्ट और उद्दिष्टके गूढयन्त्रको दिखाते है। इगिवितिचपणखपणदशपण्णरसं खवीसतालसही य । संठविय पमदठाणे णटुहिहं च जाण तिहाणे ॥ ४३ ॥ एकद्वित्रिचतुःपंचखपञ्चदशपञ्चदश खविंशचत्वारिंशत् षष्ठीश्च । संस्थाप्य प्रमादस्थाने नष्टोद्दिष्टे च जानीहि त्रिस्थाने ॥ ४३ ॥ अर्थ-तीन प्रमादस्थानों में क्रमसे प्रथम पांच इन्द्रियोंके स्थानपर एक दो तीन चार पांचको क्रमसे स्थापन करना । चार कषायोंके स्थानपर शून्य पांच दश पन्द्रह स्थापन करना । तथा विकथाओंके स्थानपर क्रमसे शून्य वीस चालीस साठ स्थापन करना । ऐसा करनेसे नष्ट उद्दिष्ट अच्छीतरह समझमें आसकते है। क्योंकि जो भङ्ग विवक्षित हो उसके स्थानोंपर रक्खी हुई सख्याको परस्पर जोड़नेसे, यह कितनेवां भङ्ग है अथवा इस सख्या- वाले भनमें कौन २ सा प्रमाद आता है यह समझमें आसकता है। दूसरे प्रस्तारकी अपेक्षा गूढयन्त्रको कहते है। इगिवितिचखचडवारं खसोलरागढ़दालचउसाहि। संठविय पमदठाणे णटुद्दिदं च जाण तिट्ठाणे ॥ ४४ ॥ एकद्वित्रिचतुःखचतुरष्टद्वादश खषोडशरांगाष्टचत्वारिंशचतुःपष्टिम् । संस्थाप्य प्रमादस्थाने नष्टोद्दिष्टे च जानीहि त्रिस्थाने ॥ ४४ ॥ अर्थ -दूसरे प्रस्तारकी अपेक्षा तीनों प्रमादस्थानोंमें क्रमसे प्रथम विकथाओंके स्थानपर १।२।३३४ स्थापन करना, और कषायोंके स्थानपर ०४।८।१२ स्थापनकरना, और १-रागशब्दसे ३२ लिये जाते हैं, क्योंकि "कटपयपुर स्थवर्णै" इत्यादि नियमसूत्रके अनुसार गका अर्थ ३ और रका अर्थ २ होता है । और यह नियम है कि "मोंकी विपरीत गति होती है। --- २० रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । इन्द्रियोंकी जगहपर ०।१६।३२।४८६४। स्थापन करना, ऐसा करनेसे दूसरे प्रस्तारकी अपेक्षा भी पूर्वकी तरह नष्टोद्दिष्ट समझमें आसकते है। सप्तमगुणस्थानका खरूप बताते है। संजलणणोकासायाणुदओ मंदो जदा तदा होदि । अपमत्तगुणो तेण य अपमत्तो संजदो होदि ॥ ४५ ॥ संज्वलननोकषायाणामुदयो मन्दो यदा तदा भवति । अप्रमत्तगुणस्तेन च अप्रमत्तः संयतो भवति ॥ ४५ ॥ अर्थ-जब संज्वलन और नोकपायका मन्द उदय होता है तब सकल संयमसे युक्त मुनिकें प्रमादका अभाव हो जाता है इसही लिये इस गुणस्थानको अप्रमत्तसंयत कहते हैं। इसके दो भेद हैं एक खस्थानाप्रमत्त दूसरा सातिशयाप्रमत्त । खस्थानाप्रमत्तसंयतका निरूपण करते है। गट्ठासेसपमादो वयगुणसीलोलिमंडिओ णाणी। अणुवसमओ अखवओ झाणणिलीणोहु अपमत्तो॥४६॥ नष्टाशेषप्रमादो व्रतगुणशीलावलिमण्डितो ज्ञानी । अनुपशमक अक्षपको ध्याननिलीनो हि अप्रमत्तः ॥ १६ ॥ अर्थ-जिस संयतके सम्पूर्ण व्यक्ताव्यक्त प्रमाद नष्ट हो चुके हैं, और जो समग्रही महावत अट्ठाईस मूलगुण तथा शीलसे युक्त है, और शरीर आत्माके भेदज्ञानमें तथा मोक्षके कारणभूत ध्यानमें निरन्तर लीन रहता है, ऐसा अप्रमत्त जवतक उपशमक या क्षपक श्रेणिका आरोहण नही करता तबतक उसको स्वस्थानअप्रमत्त अथवा निरतिशय अप्रमत्त कहते हैं। सातिशय अप्रमत्तका खरूप कहते हैं। इगवीसमोहखवणुवसमणणिमित्ताणि तिकरणाणि तहिं । पढम अधापवत्तं करणं तु करेदि अपमत्तो ॥४७॥ एकविशतिमोहक्षपणोपशननिमित्तानि त्रिकरणानि तेपु । प्रथममधःप्रवृत्तं करणं तु करोति अप्रमत्तः॥४७॥ अर्थ-अप्रत्याख्यान प्रत्याख्यान संज्वलन सम्बन्धी क्रोधमानमायालोम तथा हास्यादिक नव नोंकषाय मिलकर इक्कीस मोहनीयकी प्रकृतियोंके उपशम या क्षय करनेको आत्माके तीन करण अर्थात् तीन प्रकारके विशुद्ध परिणाम निमित्तभूत है, अधःकरण अपूर्वकरण अनि- वृत्तिकरण । उनमेंसे सातिशय अप्रमत्त अर्थात् जो श्रेणि चढनके सम्मुख है वह प्रथमके अधःप्रवृत्त करणको ही करता है।
गोम्मटसारः। अधःप्रवृत्तकरणका लक्षण कहते है। जला उपरिमभावा हेछिमभावहिं सरिसगा होति । तमा पढमं करणं अधापवत्तोत्ति णिहिहं ॥४८॥ यस्मादुपरितनभावा अधस्तनभावैः सहशका भवन्ति । तस्मात्प्रथमं करणमधःप्रवृत्तमिति निर्दिष्टम् ॥४८॥ अर्थ-अधःप्रवृत्तकरणके कालमेंसे ऊपरके समयवर्ती जीवोके परिणाम नीचेके समय- वर्ती जीवोके परिणामके सदृश-अर्थात् संख्या और विशुद्धि की अपेक्षा समान होते है इसलिये प्रथम करणको आगममै अधःप्रवृत्त करण कहा है। अधःप्रवृत्तकरणके काल और उसमें होनेवाले परिणामोंका प्रमाण बताते है। अंतोमुहुत्तमेत्तो तझालो होदि तत्व परिणामा । लोगाणमसंखमिदा उवरुवरि सरिसवाड्विगया ॥ १९ ॥ अन्तर्मुहूर्तमात्रस्तत्कालो भवति तत्र परिणामाः । लोकानामसंख्यमिता उपर्युपरिसदृशवृद्धिगताः ॥ ४९ ॥ अर्थ-इस अधःप्रवृत्तकरणका काल अन्तर्मुहूर्त मात्र है, और उसमें परिणाम असंख्या- तलोक प्रमाण होते है, और ये परिणाम ऊपर ऊपर सदृश वृद्धिको प्राप्त होते गये है। अर्थात् यह जीव चारित्रमोहनीयकी शेष २१ प्रकृतियोंका उपशम या क्षय करनेके लिये अधःकरण अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरणोंको करता है । उसमें से अधःकरण श्रेणि चढने के सम्मुख सातिशय अप्रमत्तके होता है, और अपूर्वकरण आठवें और अनिवृत्तकरण नववें गुणस्थानमें होता है । भावार्थ-करण नाम आत्माके परिणामोंका है। इन परिणामोंमें प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धता होती जाती है। जिसके बलसे कर्मोंका उपशम तथा क्षय और स्थितिखण्डन तथा अनुभागखण्डन होते है। इन तीनो करणोंका काल यद्यपि सामा- न्यालापसे अन्तर्मुहूर्तमात्र है, तथापि अधःकरणके कालके संख्यातवें भाग अपूर्वकरणका काल है, और अपूर्वकरणके कालसे संख्यातवें भाग अनिवृत्तकरणका काल है । अधःप्रवृत्तकरणके परिणाम असंख्यातलोक प्रमाण है । अपूर्वकरणके परिणाम अधःकरणके परिणामोंसे असं- ख्यातलोकगुणित है । और अनिवृत्तकरणके परिणामोकी संख्या उसके कालके समयोंके समान है । अर्थात् अनिवृत्तकरणके कालके जितने समय है उतने ही उसके परिणाम हैं। पूर्वोक्त कथनका खुलासा विना दृष्टान्तके नही हो सकता इसलिये इसका दृष्टान्त इसप्रकार समझना चाहिये कि:- कल्पना करो कि अधःकरणके कालके समयोंका प्रमाण १६, अपूर्व करणके कालके समयोंका प्रमाण ८, और अनिवृत्तकरणके कालके समयोका प्रमाण १ है। अधःकरणके परिणामोंकी संख्या ३०७२, अपूर्वकरणके परिणामोंकी संख्या ४०९६, और . रायचन्द्रजेनशास्त्रमालायाम् । २२ अनिवृत्तकरणके परिणामोंकी संख्या ४ है । एक समयमें एक जीवके एकही परिणाम होता है इसलिये एक जीव अधःकरणके १६ समयोंमें १६ परिणामोंको ही धारण कर सकता है। अधःकरणके और अपूर्वकरणके परिणाम जो १६ और ८ से अधिक कहे हैं, वे नाना जीवों- की अपेक्षासे कहे गये हैं। यहां इतना विशेष है कि अधःकरणके १६ समयोंमेंसे प्रथम समयमें यदि कोई भी जीव अधःकरण मांडैगा तो उसके अधःकरणके समस्त परिणामोंमेंसे पहले १६२ परिणामों में से कोई एक परिणाम होगा । अर्थात् तीन कालमें जब कभी चाहे जब चाहे जो अधःकरण मांगा तो उसके पहले समयमें नम्बर १ से लगाकर नम्बर १६२ तकके परिणामों मेंसे उसकी योग्यताके अनुसार कोई एक परिणाम होगा । इसही प्रकार किसी भी जीववे उसके अधःकरण मांडनेके दूसरे समयमें नम्बर ४० से लगाकर नम्बर २०५ तक १६॥ परिणामोंमेंसे कोई एक परिणाम होगा। इसही प्रकार तीसरे चौथे आदि समयोंमें भी क्रमस: नम्बर ८० से लगाकर २४९ तक १७० परिणामों से कोई एक और १२१ से लगाकर २९४ तकके १७४ परिणामोंमेंसे कोई एक परिणाम होगा । इसीतरह आगेके समयोंमें होनेवाले परिणाम गोम्मटसारकी बड़ी टीकामें, या सुशीला उपन्यासमें दिये हुए यन्त्रद्वारा समझलेने चाहिये । अधःकरणके अपुनरुक्त परिणाम केवल ९१२ हैं। और समस्त सम- योंमें होनेवाले पुनरुक्त और अपुनरुक्त परिणामोंका जोड़ ३०७२ है । इस अधःकरणके परिणाम समानवृद्धिको लिये हुए हैं अर्थात् पहले समयके परिणामसे द्वितीय समयके परिणाम जितने अधिक है उतने ही उतने द्वितीयादिक समयोंके परिणामोंसे तृतीयादिक समयोंके परिणाम अधिक है । इस समानवृद्धिको ही चय कहते हैं । इस दृष्टान्तम चयका प्रमाण ४ है, स्थानका प्रमाण १६, और सर्वधनका प्रमाण ३०७२ है । पृथमस्थानमें वृद्धिक अभाव है इसलिये अन्तिमस्थानमें एक घटि पद (स्थान) प्रमाण चय वर्द्धित है । अतएव एक घाटि पदके आधेको चय और पदसे गुणाकरनेपर १५४४४१६ ४८० चयधनका प्रमाण होता है। भावार्थ प्रथम समयके समान समस्त समयों में परिणामोंको मिन्न समझकर वर्द्धित प्रमाणके जोडको चयधन वा उत्तरधन कहते हैं। सर्वधनमेंसे चयधनको घटाकर शेषमें पदका भागदेनेसे प्रथम समयसम्बन्धी परिणाम पुंजका प्रमाण २०७३-४८७=१६२ होता है। इसमें क्रमसे एक २ चय जोड़नेपर द्वितीयादिक समयोंके परिणाम पुंजका प्रमाण होता है । एक घाटि पदप्रमाण चय मिलानेसे अंतसमयसम्बन्धी परिणामपुंजका प्रमाण १६२+१५४४२२२ होता है। एक समयमें अनेक परिणामोंकी सम्भावना है इसलिये एक समयमें अनेक जीव अनेक परिणामोंको ग्रहण करसकते है। अतएव एक समयमें नाना जीवों- की अपेक्षासे परिणामों में विसदृशता है। एकसमयमें अनेक जीव एक परिणामको ग्रहण कर सकते है इसलिये एक समयमें नानाजीवोंकी अपेक्षासे परिणामोंमें सदृशता है। भिन्नसमयोंमें अनेक जीवं अनेक परिणामोंको ग्रहण कर सकते है इसलिये भिन्न समयोंमें नानाजीवोंकी . गोम्मटसारः। २३ अपेक्षासे परिणामों में विसदृशता है । जो परिणाम किसी एक जीवके प्रथम समयमें हो सकता है वही परिणाम किसी दूसरे जीवके दूसरे समयमें, और तीसरे जीवके तीसरे समयमें, तथा चौथे जीवके चौथे समयमें हो सकता है, इसलिये भिन्नसमयवर्ती अनेक जीवोंके परिणामोसे सहगता भी होती है। जैसे १६२ नम्बरका परिणाम प्रथम द्वितीय तृतीय चतुर्थ समयमे होसकता है । प्रथम समयसम्बन्धी परिणामपुंजके भी ३९,४०, ४१,४२ इसतरह चार खण्ड किये गये है। अर्थात् नम्बर १ से लेकर ३९ नम्बर तक ३९ परिणाम ऐसे है जो प्रथम समयमें ही पाये जाते है, द्वितीयादिक समयोंमें नहीं, इनही ३९ परिणामोके पुंजको प्रथम खण्ड कहते है । दूसरे खण्डमें नम्बर ४० से ७९ तक ४० परिणाम ऐसे है जो प्रथम और द्वितीय समयमें पाये जाते है इसको द्वितीय खण्ड कहते है। तीसरे खण्डमें नम्बर ८० से १२० तक ४१ परिणाम ऐसे हैं जो प्रथम द्वितीय तृतीय समों में पाये जाते है । और चतुर्थ खण्डमें नम्बर १२१ से १६२ तक ४२ परिणाम ऐसे है जो आदिके चारोंही समयोंमें पाये जा सकते है । इसही प्रकार अन्य समयों मेंभी समझना । अधःकरणके ऊपर २ के समस्त परिणाम पूर्वपूर्व परिणामकी अपेक्षा अनन्त २ गुणी विशुद्धता लिये हुए हैं। अब अपूर्वकरण गुणस्थानको कहते है । अंतोमुहुत्तकालं गमिऊण अधापयत्तकरणं तं । पडिसमयं सुझंतो अपुधकरणं समल्लियइ ॥ ५० ॥ अन्तर्मुहूर्तकालं गमयित्वा अधःप्रवृत्तकरणं तत् । प्रतिसमय शुध्यन अपूर्वकरणं समाश्रयति ॥ ५० ॥ अर्थ-जिसका अन्तर्मुहूर्तमान काल है ऐसे अधःप्रवृत्तकरणको विताकर वह सातिशय अप्रमत्त जब प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धिको लिये हुए अपूर्वकरण जातिके परिणामोंको करता है तब उसको अपूर्वकरणनामक अष्टमगुणस्थानवर्ती कहते हैं। अपूर्वकरणका निरुक्तिपूर्वक लक्षण कहते है। एदलि गुणहाणे विसरिससमयडियहिं जीवहिं। पुचमपत्ता जमा होति अपुवा हु परिणामा ।। ५१ ॥ एतस्मिन् गुणस्थाने विसशसमयस्थितीवः । पूर्वमप्राप्ता यस्मात् भवन्ति अपूर्वा हि परिणामाः ॥५१॥ अर्थ-इस गुणस्थानमें भिन्नसमयवर्ती जीव, जो पूर्वसमयमें कभी भी प्राप्त नही हुए थे ऐसे अपूर्व परिणामोको ही धारण करते है इसलिये इस गुणस्थानका नाम अपूर्वकरण है । भावार्थ जिस प्रकार अधःकरणमें भिन्न समयवर्ती जीवोके परिणाम सहश और विस- .
. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २४ दृश दोनों ही प्रकारके होते है, वैसा अपूर्वकरणमें नहीं है, किन्तु यहाँपर भिन्नसमयवर्ती जीवोंके परिणाम विसदृश ही होते है सदृश नहीं होते। इस गुणस्थानका दो गाथाओंद्वारा विशेषखरूप दिखाते हैं। भिण्णसमयडियेहिं दु जीवहिं ण होदि सचदा सरिसो। करणेहिं एकसमयडियोहिं सरिसो विसरिसो वा ॥ ५२ ॥ भिन्नसमयस्थितैस्तु जीवैन भवति सर्वदा सादृश्यम् । करणैरेकसमयस्थितैः सादृश्यं वैसादृश्यं वा ॥ ५२ ॥ अर्थ-यहाँपर (अपूर्वकरणमें ) मिन्नसमयवर्ती जीवोंमें विशुद्ध परिणामोंकी अपेक्ष कभी भी सादृश्य नहीं पाया जाता; किन्तु एक समयवर्ती जीवोंमें सादृश्य और वैसादृश्य दोनोंही पाये जाते है। अंतोमुहुत्तमेत्ते पडिसमयमसंखलोगपरिणामा । कमउड्डा पुवगुणे अणुकट्ठी णत्थि णियमेण ॥ ५३ ॥ अन्तर्मुहूर्तमात्रे प्रतिसमयमसंख्यलोकपरिणामाः । क्रमवृद्धा अपूर्वगुणे अनुकृष्टिनास्ति नियमेन ॥ ५३ ॥ अर्थ- इस गुणस्थानका काल अन्तर्मुहूर्तमात्र है, और इसमें परिणाम असंख्यात लोक- प्रमाण होते हैं, और वे परिणाम उत्तरोत्तर प्रतिसमय समानवृद्धिको लिये हुए है । तथा इस गुणस्थानमें नियमसे अनुकृष्टिरचना नही होती है। भावार्थ-अधःप्रवृत्तकरणके कालसे अपूर्वकरणका काल यद्यपि संख्यातगुणा हीन है; तथापि सामान्यसे अन्तर्मुहूर्तमात्रही है। और इसमें परिणामोंकी संख्या अधःप्रवृत्तकरणके परिणामोंकी सख्यासे असंख्यातलोकगुणी है। और इन परिणामोंमें उत्तरोत्तर प्रतिसमय समान वृद्धि होती गई है। अर्थात् प्रथम समयके परिणामोंसे जितने अधिक द्वितीय समयके परिणाम हैं उतने २ ही अधिक द्वितीयादि समयके परिणामोंसे तृतीयादि समयके परिणाम है । तथा जिसप्रकार अधः- प्रवृत्तकरणमें भिन्नसमयवर्ती जीवोंके परिणामोंमें सादृश्य पाया जाता है इसलिये वहांपर अनुकृष्टि रचना की है उस प्रकार अपूर्वकरणमें अनुकृष्टि रचना नही होती; क्योंकि मिन्नस- मयवर्ती जीवोंके परिणामोंमें यहांपर सादृश्य नहीं पाया जाता । इसकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है। सर्वधनका प्रमाण ४०९६ है, चयका प्रमाण १६, और स्थानका प्रमाण ८ है। एक घाटिपदके आधेको चय और पदसे गुणाकरनेपर चयधनका प्रमाण ५४१६४८-४४८ होना है। सर्वधनमेंसे चयधनको घटाकर पदका भाग देनेसे प्रथमसमयसम्बन्धी परिणाम- पुंजका प्रमाण ४०९६-४४४५६ होता है । इसमें एक २ चय जोड़नेपर द्वितीयादिक .
- . गोम्मटसार। २५ समयमें होनेवाले परिणामोंका प्रमाण निकलता है। इसमें एक घाटि पदप्रमाण चय जोड़नेसे अंतसमयसंबन्धी परिणामोंका प्रमाण १५६+७४१६-५६८ होता है। इन अपूर्वकरण परिणामोंके द्वाराक्या कार्य होता है यह दो गाथाओंद्वारा स्पष्ट करते हैं। तारिसपरिणामठियजीवा हु जिणेहिं गलियतिमिरेहिं । मोहस्सपुवकरणा खवणुवसमणुजया भणिया ॥ ५४॥ ताशपरिणामस्थितजीवा हि जिनैगेलिततिमिरैः । मोहस्यापूर्वकरणाः क्षपणोपशमनोद्यता भणिताः ॥ ५४॥ अर्थ-अज्ञान अन्धकारसे सर्वथा रहित जिनेन्द्रदेवने कहा है कि उक्त परिणामोंको धारण करनेवाले अपूर्वकरण गुणस्थानवी जीव मोहनीय कर्मकी शेष प्रकृतियोंका क्षपण अथवा उपशमन करनेमें उद्यत होते है। णिहापयले णटे सदि आऊ उवसमंति उबसमया। खवयं दुके खवया णियमेण खवंति मोहं तु ॥ ५५ ॥ निद्राप्रचले नष्टे सति आयुपि उपशमयन्ति उपशमकाः । क्षपकं ढौकमानाः क्षपका नियमेन क्षपयन्ति मोहं तु ॥ ५५ ॥ अर्थ-जिनके निद्रा और प्रचलाकी बन्धव्युच्छित्ति हो चुकी है, तथा जिनका आयुकर्म अभी विद्यमान है, ऐसे उपशमश्रेणिका आरोहण करनेवाले जीव शेषमोहनीयका उपशमन करते हैं, और जो क्षपकश्रेणिका आरोहण करनेवाले हैं वे नियमसे मोहनीयका क्षपण करते है । भावार्थ-जिसके अपूर्वकरणके छह भागों से प्रथम भागमें निद्रा और प्रचलाकी बन्धव्युच्छित्ति होगई है, और जिसका आयुकर्म विद्यमान है (जो मरणके सम्मुख नही है ), अर्थात् जो श्रेणिको चढ़नेवाला है, क्योंकि श्रेणिसे उतरते समय यहांपर मरणकी सम्भावना है । इसप्रकारसे उपशमश्रेणिको चढ़नेवाले जीवके अपूर्वकरण परिणामों के निमित्तसे मोहनीयका उपशम और क्षपकश्रेणिवालेके क्षय होता है। नवमें गुणस्थानका खरूप कहते हैं। एकहि कालसमये संठाणादीहिं जह णिवट्ठति । ण णिवदंति तहावि य परिणामहिं मिहो जेहिं ॥ ५६ ॥ १ इस विशेषणसे उनके कहे हुए वचनमे प्रामाण्य दिखलाया है, क्योंकि यह नियम है कि जो परिपूर्ण ज्ञानका धारक है वह मिथ्या भाषण नहीं करता । २ इन दोनों कर्मोंकी वन्धव्युच्छित्ति यहीं पर होती है। इस कथनसे अष्टमगुणस्थानका प्रथम भाग लेना चाहिये क्योंकि उपशम या क्षयका प्रारम्भ यहीसे होजाता है। ३ मरणके समयसे पूर्वसमयमे होनेवाले गुणस्थानको भी उपचारसे मरणका गुणस्थान कहते है। ४ इस गाथामें 'तु' शब्द पड़ा है इससे सूचित होता है कि क्षपकौणिमे मरण नहीं होता। गो.४ २६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । एकस्मिन् कालसमये संस्थानादिमिर्यथा निवर्तन्ते । न निवर्तन्ते तथापि च परिणामैमियो यैः ॥५६॥ अर्थ-अन्तर्मुहूर्तमात्र अनिवृत्तिकरणके कालमेंसे आदि या मध्य या अन्तके एक समयवर्ती अनेक जीवोंमें जिस प्रकार शरीरकी अवगाहना आदि वाह्य कारणोंसे तथा ज्ञानावरणादिककर्मके क्षयोपशमादि अन्तरङ्ग कारणोंसे परस्परमें भेद पाया जाता है, उस प्रकार जिन परिणामोंके निमित्तसे परस्परमें भेद नही पाया जाता होति अणियट्टिणो ते पडिसमयं जेस्सिमेकपरिणामा । विमलयरझाणहुयवहसिहाहिं णिहड्ड कम्मवणा ॥५७॥ (जुम्मम्) भवन्ति अनिवर्तिनस्ते प्रतिसमयं येषामेकपरिणामाः । विमलतरध्यानहुतवहशिखाभिर्निर्दग्धकर्मवनाः ।। ५७ ॥ (युग्मम् ) अर्थ-उनको अनिवृत्तिकरण परिणाम कहते हैं । और अनिवृत्तिकरणका जितना काल है उतनेही उसके परिणाम है । इसलिये उसके कालके प्रत्येक समयमें अनिवृत्तिकरणका एक २ ही परिणाम होता है। तथा ये परिणाम अत्यन्तनिर्मल ध्यानरूप अग्निकी शिखा- ओंकी सहायतासे कर्मवनको भस्म करदेते है । भावार्थ-अनिवृत्तिकरणका जितना काल है उतनेही उसके परिणाम है, इसलिये प्रत्येक समयमें एक ही परिणाम होता है। अतएव यहाँपर भिन्नसमयवर्ती परिणामोंमें सर्वथा विसदृशता और एकसमयवर्ती जीवोंके परिणामोंमें सर्वथा सदृशता ही होती है । इन परिणामोंसेही आयुकर्मको छोड़कर शेष सात काँकी गुणश्रेणिनिर्जरा, गुणसंक्रमण, स्थितिखण्डन, अनुभागकाण्डकखण्डन होता है, और मोहनीय कर्मकी बादरकृष्टि सूक्ष्मकृष्टि आदि होती है। नवमें गुणस्थानके संख्यात भागोंमेंसे अन्तके भागमें होनेवाले कार्यको कहते है। पुवापुषप्फड्ढयवादरसुहमगयकिट्टिअणुभागा। हीणकमाणतगुणेणवरादु वरं च हेतुस्स ॥ ५९ ॥ पूर्वापूर्वस्पर्धकवादरसूक्ष्मगतकृष्टयनुभागाः । हीनक्रमा अनन्तगुणेन अवरातु वरं चाधस्तनस्य ॥ ५९ ।। अर्थ-पूर्वस्पर्धकसे अपूर्वस्पर्षकके और अपूर्वस्पर्धकसे बादरकृष्टिके तथा बादरकृष्टिसे सूक्ष्मकृष्टिके अनुभाग क्रमसे अनन्तगुणे २ हीन है। और ऊपरके (पूर्व २ के) जघन्यसे नीचेका (उत्तरोत्तरका) उत्कृष्ट और अपने २ उत्कृष्ट से अपना २ जघन्य अनन्तगुणा २ हीन है। भावार्थ:-अनेक प्रकारकी अनुभागशक्तिसे युक्त कार्मणवर्गणाओंके समूहको स्पर्धक कहते हैं। जो स्पर्धक अनिवृत्तिकरणके पूर्व में पायेजाय उनको पूर्वस्पर्धक कहते है। जिनका अनिवृ- चिकरणके निमित्तसे अनुमाग क्षीण हो जाता है उनको अपूर्वस्पर्धक कहते हैं । तथा जिनका गोम्मटसार। भनुभाग अपूर्वस्पर्घकसेभी क्षीण हो जाय उनको बादरकृष्टि, और जिनका अनुभाग बादरकृष्टिकी अपेक्षाभी क्षीण हो जाय उनको सूक्ष्मकृष्टि कहते है । पूर्वस्पर्धकके जघन्य अनुभागसे अपूर्वस्पर्धकका उत्कृष्ट अनुभाग भी अनन्तगुणा हीन है। इसीप्रकार अपूर्वस्पर्धकके जघन्यसे बादरकृष्टिका उत्कृष्ट और बादरकृष्टिके जघन्यसे सूक्ष्मकृष्टिका उत्कृष्ट अनुभाग अनन्तगुणा २ हीन है । और जिस प्रकार पूर्वस्पर्घकके उत्कृष्ट से पूर्वस्पर्धकका जघन्य अनन्तगुणाहीन है उसही प्रकार अपूर्वस्पर्धक आदिमें भी अपने २ उत्कृष्टसे अपना २ जघन्य अनुभाग अनन्तगुणा २ हीन है। दशमें गुणस्थानका खरूप कहते है। धुदकोसुंभयवत्थं होदि जहा सुहमरायसंजुत्तं । एवं सुहमकसाओ सुहमसरागोत्ति णादवो ॥ ५९॥ धौतकौसुम्भवस्त्रं भवति यथा सूक्ष्मरागसंयुक्तम् । एवं सूक्ष्मकपायः सूक्ष्मसराग इति ज्ञातव्यः ॥ ५९॥ अर्थ-जिस प्रकार धुले हुए कसूमी वसमें लालिमा (सुखी ) सूक्ष्म रहजाती है, उसही प्रकार जो अत्यन्तसूक्ष्म राग ( लोभ ) से युक्त है उसको सूक्ष्मसाम्पराय नामक दशम गुणस्थानवर्ती कहते है । भावार्थः-जहांपर पूर्वोक्त तीन करणके परिणामोंसे क्रमसे लोभकषायक विना चारित्रमोहनीयकी शेष वीस प्रकृतियोंका उपशम अथवा क्षय होनेपर सूक्ष्मकृष्टिको प्राप्त लोभकषायका उदय पाया जाय उसको सूक्ष्मसाम्पराय नामका दशमा गुणस्थान कहते है। इस सूक्ष्मलोभके उदयसे होनेवाले फलको दिखाते है। अणुलोहं वेदंतो जीवो उवसामगो व खवगो था। सो सुहमसंपराओ जहखादेणूणओ किंचि ॥ ६०॥ अणुलोमं विदन जीव उपशमको व क्षपको वा। स सूक्ष्मसाम्परायो यथाख्यतेनोनः किञ्चित् ॥ ६० ॥ अर्थ-चाहे उपशमश्रेणिका आरोहण करनेवाला हो अथवा क्षपकश्रेणिका आरोहण करनेवालाहो; परन्तु जो जीव सूक्ष्मलोमके उदयका अनुभव कर रहा है ऐसा दशमे गुण- स्थानवी जीव यथाख्यात चारित्रसे कुछही न्यून रहता है । भावार्थ-यहांपर सूक्ष्म लोमका उदय रहनेसे यथाख्यात चारित्रके प्रकट होनेमें कुछ कमी रहती है। ग्यारहमे गुणस्थानका खरूप दिखाते है। कदकफलजुदजलं वा सरए सरवाणियं व णिम्मलयं । सयलोवसंतमोहो उबसंतकसायओ होदि ॥ ६१ ॥ ।
- २८ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । कतकफलयुतजलं वा शरदि सरःपानीयं व निर्मलम् । सकलोपशान्तमोह उपशान्तकपायको भवति ॥ ६१ ।। अर्थ-निर्मली फलसे युक्त जलकी तरह, अथवा शरदऋतुमें होनेवाले सरोवर के जलकी तरह, सम्पूर्ण मोहनीयकर्मके उपशमसे उत्पन्न होनेवाले निर्मल परिणामोंको उपशा- न्तकषाय ग्याहरमा गुणस्थान कहते हैं बारहमें गुणस्थानको कहते हैं। हिस्सेसखीणमोहो फलिहामलभायणुदयसमचित्तो। खीणकसाओ भण्णदि णिग्गंथो चीयरायहि ॥ ६२॥ निःशेषशीणमोहः स्फटिकामलभाजनोदकसमचित्तः । क्षीणकषायो भण्यते निर्मन्थो वीतरागैः ॥ १२ ॥ अर्थ-जिस निम्रन्थका चित्त मोहनीय कर्मके सर्वथा क्षीण होनेसे स्फटिकके निर्मल पात्रमें रक्खे हुए जलके समान निर्मल होगया है उसको वीतरागदेवने क्षीणकषायनामक बारहमे गुणस्थानवर्ती कहा है। दो गाथाओंद्वारा तेरहवें गुणस्थानको कहते हैं। केवलणाणदिवायरकिरणकलावप्पणासियण्णाणो। णवकेवललडुग्गमसुजणियपरमप्पववएसो ॥६३ ॥ केवलज्ञानदिवाकरकिरणकलापप्रणाशिताज्ञानः । नवकेवललब्ध्युद्गमसुजनितपरमात्मव्यपदेशः ॥ ६३ ।। अर्थ-जिसका केवलज्ञानरूपी सूर्यकी अविभागप्रतिच्छेदरूप किरणोंके समूहसे ( उत्कृष्ट अनन्तानन्तप्रमाण) अज्ञान अन्धकार सर्वथा नष्ट होगया हो, और जिसको नव केवललब्धियोंके ( क्षायिक-सम्यक्त्व चारित्र ज्ञान दर्शन दान लाभ भोग उपभोग वीर्य) प्रकट होनेसे "परमात्मा" यह व्यपदेश (संज्ञा) प्राप्त होगया है, वहः- असहायणाणसणसहिओ इदि केवली हु जोगेण- जुत्तोत्ति सजोगिजिणो अणाइणिहणारिसे उत्तो ॥ ६४ ॥ असहायज्ञानदर्शनसहित इति केवली हि योगेन- युक्त इति सयोगिजिनः अनादिनिधनार्षे उक्तः ॥ ६४ ॥ अर्थ-इन्द्रिय आलोक आदिकी अपेक्षा न रखनेवाले ज्ञान दर्शनसे युक्त होनेके कारण केवली, और काययोगसे युक्त रहनेके कारण सयोगी, तथा घातिकर्मोंसे रहित होनेके कारण जिन कहा जाता है, ऐसा अनादिनिधन आर्ष आगममें कहा है। भावार्थ-बारहमे गुणस्था. - . . - गोम्मटसार। २९ नका विनाश होतेही जिसके ज्ञानावरणादि तीन घाति और सोलह अघाति प्रकृति, सम्पूर्ण मिलाकर ६३ प्रकृतियोंके नष्ट होनेसे अनन्त चतुष्टय तथा नव केवललब्धि प्रकट हो चुकी है और काय योगसे युक्त है उस अरहतको तेरहमे गुणस्थानवर्ती कहते है। चौदहमे अयोगकेवली गुणस्थानको कहते है। सीलेसिं संपत्तो णिरुद्धणिस्सेसआसवो जीवो। कम्मरयविप्पमुको गयजोगो केवली होदि ॥६५॥ शीलैग्यं संप्राप्तः निरुद्धनिःशेपास्त्रवो जीवः । कर्मरजोविप्रमुक्तो गतयोगः केवली भवति ।। ६५ ।। अर्थ-जो अठारह हजार शीलके भेदोंका खामी हो चुका है। और जिसके कौके आनेका द्वाररूप आसव सर्वथा बन्द होगया है । तथा सत्व और उदय अवस्थाको प्राप्त कर्मरूप रजकी सर्वोत्कृष्ट निर्जरा होनेसे, जो उस कर्मसे सर्वथा मुक्त होनेके सम्मुख है, उस काय योगरहित केवलीको चौदहमे गुणस्थानवर्ती अयोगकेवली कहते है । भावार्थ-शीलकी पूर्णता यहीपर होती है इसलिये जो शीलका खामी होकर पूर्ण सवर और निर्जराका पात्र होनेसे मुक्त अवस्थाके सम्मुख है ऐसे काययोगसे भी रहित केवलीको चौदहमें गुणस्थान- वर्ती कहते है। इसप्रकार चौदह गुणस्थानोंको कहकर, अब उनमें होनेवाली आयुकर्मके विना शेष सातकर्मोकी गुणश्रेणिनिर्जराको दो गाथाओं द्वारा कहते है । सम्मतुप्पत्तीये सावयविरदे अणंतकम्मसे। दसणमोहक्खबगे कसायउबसामगे य उबसंते ॥ ६६ ॥ सम्यक्त्वोत्पत्तौ श्रावकविरते अनन्तकाशे । दर्शनमोहक्षपके कषायोपशामके चोपशान्ते ॥ ६६ ॥ खबगे य खीणमोहे जिणेसु दवा असंखगुणिदकमा । तबिवरीया काला संखेजगुणकमा होति ॥ ६७ ॥ (जुम्म) क्षपके च क्षीणमोहे जिनेषु द्रव्याण्यसंख्यगुणितक्रमाणि । तद्विपरीताः कालाः संख्यातगुणक्रमा भवन्ति ॥ ६७ ॥ (युग्मम्) अर्थ-सातिशय मिथ्यादृष्टि, श्रावक,विरत, अनन्तानुबन्धी कर्मका विसंयोजन करनेवाला, दर्शनमोहनीयकर्मका क्षय करनेवाला, कषायोंका उपशम करनेवाले ८-९-१० गुणस्थानवर्ती जीव, उपशान्तकषाय, कषायोंका क्षपण करनेवाले ८-९-१० गुणस्थानवी जीव, क्षीण- मोह, सयोगी अयोगी दोनोंप्रकारके जिन, इन ग्यारह स्थानोंमें द्रव्यकी अपेक्षा कर्मकी १ मोहनीय कर्म पहले ही नष्ट हो चुका है इस लिये यहा तीनही लेना चाहिये । २ मोहनीय सहित ।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । निर्जरा क्रमसे असंख्यातगुणी २ अधिक होती है। और उसका काल इससे विपरीत है-क्रममे उत्तरोचर संख्यातगुणा २ हीन है। भावार्थ-सादि अथवा अनादि दोनोंही प्रकारका मिथ्या- दृष्टि जब करणलब्धिको प्राप्त कर उसके अधःकरणपरिणामोंको भी विताकर अपूर्वकरण परिणामोंको ग्रहण करता है, उस समयसे गुणश्रेणिनिर्जराका प्रारम्भ होता है। इस सातिशय मिथ्यादृष्टिके जो कमौकी निर्जरा होती है वह पूर्वकी निर्जरासे असंख्यातगुणी अधिक है। श्रावक अवस्था प्राप्त होनेपर नो कर्मकी निर्जरा होती है वह सातिगयमिथ्याष्टिकी निर्जरासे भी असंख्यातगुणी अधिक है । इसीप्रकार विरतादिस्थानोंमें भी उत्तरोत्तर क्रमसे असंख्यातगुणी २ कर्मकी निर्जरा होती है । तथा इस निर्जराका काल उत्तरोत्तर संख्यात- गुणा २ हीन है। अर्थात् सातिशय मिथ्यादृष्टिकी निर्जरामें जितना काल लगता है, श्रावककी निर्जरामें उससे संख्यातगुणा कम काल लगता है । इसी प्रकार विरतादिमें भी समझना चाहिये। इस प्रकार चौदहगुणस्थानोंमें रहनेवाले जीवोंका वर्णन करके अव गुणस्थानोंका अतिक- मण करनेवाले सिद्धोंका वर्णन करते है। अट्ठविहकम्मषियला सीदीभूदा णिरंजणा णिचा। अट्टगुणा किदकिचा लोयग्गणिवासिणो सिद्धा ॥ ६८॥ अष्टविधकर्मविकलाः शीतीभूता निरखना नित्याः । अष्टगुणाः कृतकृत्याः लोकापनिवासिनः सिद्धाः ॥ ६८ ॥ . अर्थ-जो ज्ञानावरणादि अष्ट कर्मोंसे रहित है, अनन्तसुखरूपी अमृतके अनुभव करनेसे शान्तिमय हैं, नवीन कर्मबन्धको कारणभूत मिथ्यादर्शनादि भावकर्मरूपी अजनसे रहित है, नित्य है, ज्ञान दर्शन सुख वीर्य अव्यावाध अवगाहन सूक्ष्मत्व अगुरुलघु ये आठ मुख्यगुण जिनके प्रकट हो चुके हैं, कृतकृत्य (जिनको कोई कार्य करना बाकी नहीं रहा है) है, लोकके अग्रभागमें निवास करनेवाले हैं, उनको सिद्ध कहते है। सिद्धोंको दियेहुये इन सात विशेषणोंका प्रयोजन दिखाते है । सदसिव संखो मकडि बुद्धोणेयाइयो य वेसेसी। ईसरमंडलिदसणविदूसणटुं कयं एदं ॥ ६९ ॥ सदाशिवः सांख्यः मस्करी बुद्धो नैयायिकश्च वैशेपिकः । ईश्वरमण्डलिदर्शनविदूषणार्थ कृतमेतत् ॥ ६९ ॥ अर्थ-सदाशिव, सांख्य; मस्करी, बौद्ध, नैयायिक और वैशेषिक, कर्तृवादी ( ईश्व- रको का माननेवाले), मण्डली इनके मतोंका निराकरण करने के लिये ये विशेषण दिये .
गोम्मटसार।
३१
हैं। भावार्थ-सदाशिव मतवाला जीवको सदा कर्मसे रहितही मानता है, उसके निराकर-
णके लिये ही ऐसा कहा है कि सिद्ध अवस्था प्राप्त होनेपर ही जीव कर्मोंसे रहित होता है
सदा नहीं । सिद्ध अवस्थासे पूर्व ससार अवस्थामे कौसे सहित रहता है । सांख्यमत-
वाला मानता है कि "बन्ध मोक्ष सुख दुःख प्रकृतिको होते है आत्माको नहीं"। इसके
निराकरणके लिये "सुखस्वरूप" ऐसा विशेषण दिया है । मस्करीमतवाला मुक्तजीवोंका
लौटना मानता है, उसको दूषित करनेके लिये ही कहा है कि "सिद्ध निरजन है" अर्थात्
मिथ्यादर्शन क्रोध मानादि भावकों से रहित है, क्योंकि बिना भावकर्मके नवीन कर्मका ग्रहण
नही हो सकता और विना कर्मग्रहणके निर्हेतुक संसारमें लौट नहीं सकता। बौद्धोंका मत
है कि "सम्पूर्ण पदार्थ क्षणिक अर्थात् क्षणध्वंसी है' उसको दूषित करनेके लिये कहा है
कि वे " नित्य" है। नैयायिक तथा वैशेषिकमतवाले मानते है कि "मुक्तिमें बुद्ध्यादि.
गुणोंका विनाश होनाता है," उसको दूर करनेकेलिये "ज्ञानादि आठगुणोंसे सहित है"
ऐसा कहा है। ईश्वरको कर्ता माननेवालोंके मतके निराकरणके लिये "कृतकृत्य" विशेषण
दिया है। अर्थात् अब (मुक्त होनेपर) जीवको सृष्टि आदि बनानेका कार्य शेष नही रहा है।
मण्डली मतवाला मानता है कि "मुक्तजीव सदा ऊपरको गमन ही करता जाता है, कभी
ठहरता नहीं" उसके निराकरणके लिये "लोकके अग्रभागमें स्थित है" ऐसा कहा है।
इति गुणस्थानप्ररूपणानामा प्रथमोऽधिकारः।
क्रमप्राप्त जीवसमासमरूपणाका निरुक्तिपूर्वक सामान्य लक्षण कहते हैं ।
जेहिं अणेया जीवा णते बहुविहा वि तजादी।
ते पुण संगहिदत्था जीवसमासात्ति विण्णेया ॥ ७० ॥
यैरनेके जीवा नयन्ते बहुविधा अपि तज्जातयः ।
ते पुनः संगृहीतार्थी जीवसमासा इति विज्ञेयाः॥ ७० ॥
अर्थ-जिनके द्वारा अनेक जीव तथा उनकी अनेक प्रकारकी जाति जानी जाय उन
धर्मोको अनेक पदार्थोंका संग्रह करनेवाला होनेसे जीवसमास कहते है, ऐसा समझना
चाहिये । भावार्थ-उन धर्मविशेषोंको जीवसमास कहते है कि जिनके द्वारा अनेक जीव
अथवा जीवकी अनेक जातियोंका संग्रह किया जासके ।
उत्पत्तिके कारणकी अपेक्षा लेकर जीवसमासका लक्षण कहते है ।
तसचदुजुगाणमज्झे अविरुद्धेहिं जुदजादिकम्मुदये।
जीवसमासा होति हु तब्भवसारिच्छसामण्णा ॥ ७१ ॥
१ सदाशिव सदाऽकर्मा साख्यो मुक्त सुखोज्झितं । मस्करी किल मुकाना मन्यते पुनरागतिम् ॥ १॥
क्षणिकं निर्गुणं चैव बुद्धो यौगश्च मन्यते । कृतकृयं तमीशानो मण्डलीचोर्ध्वगामिनम् ॥ २ ॥
३२ रायचन्द्रजनशाखमालायाम् । सचतुर्युगलाना मध्ये अविरुद्वैर्युतजातिकर्मोदय । जीवसमासा भवन्ति हि तद्भवसाग्यसामान्याः ॥ ७१ ।। अर्थ-सस्थावर वादरसूक्ष्म पर्याप्तअपर्याप्त प्रत्येकसाधारण इन बार युगलों से अविरुद्ध त्रसादि कर्मोंसे युक्त जाति नामकर्मका उदय होनेपर जीवोंमें होनेवाले ऊर्ध्वता- सामान्यरूप या तिर्यक् सामान्यरूप धर्मोंको जीवसमास कहते है । मावार्थ-एक पदार्थकी कालक्रमसे होनेवाली अनेक पर्यायोंमें रहनेवाले समानधर्मको ऊर्ध्वतासामान्य अथवा सादृश्यसामान्य कहते है। एक समयमें अनेक पदार्थगत सदृश धर्मको तिर्यक् सामान्य कहते हैं । यह उर्ध्वतासामान्यरूप या तिर्यक सामान्यरूप धर्म, त्रसादि युगलों से अविरुद्ध कर्मोंसे युक्त एकेन्द्रियादि जाति नामकर्मका उदय होनेपर उत्पन्न होता है । इसीको जीवसमास कहते है। जीवसमासके चौदह मेदोंको गिनाते हैं। वादरसुहमेइंदियवितिचउरिदियअसण्णिसण्णी य । पजत्तापजत्ता एवं ते चोहसा होति ॥ ७२ ।। वादरसूक्ष्मैकेन्द्रियद्वित्रिचतुरिन्द्रियासंनिसंजिनश्च । पर्याप्तापर्चामा एवं ते चतुर्दश भवन्ति ।। ७२ ।। अर्थ-एकेन्द्रियके दो भेद है, बादर तथा सूक्ष्म । द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असजिपंचेन्द्रिय, संज्ञिपंचेन्द्रिय । ये सातो ही प्रकारके नीव पर्याप्त और अपर्याप्त दोनों ही प्रकारके होते हैं । इसलिये जीवसमासके सामान्यसे चौदह भेद हुए। विस्तारपूर्वक जीवसमासोंका वर्णन करते है। भूआउतेउवाऊणिचचदुग्गदिणिगोदथूलिदरा । पत्तेयपदिछिदरा तसपण पुण्णा अपुण्णदुगा ॥७३॥ भ्वप्तेजोवायुनित्यचतुर्गतिनिगोदत्यूलेतराः। प्रत्येक प्रतिष्ठेतराः त्रसपश्च पूर्णा अपूर्णद्विकाः ॥ ७३ ॥ अर्थ-पृथिवी, जल, तेज, वायु, नित्यनियोद, इतरनिगोद, इन छहके बादर सूक्ष्मके भेदसे बारह भेद हुए । तथा प्रत्येकके दो भेद, एक सप्रतिष्ठित दूसरा अप्रतिष्ठित । और द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी, संज्ञी इसतरह उसके पांच मेद । सब मिलाकर उन्नीस भेद होते हैं । ये सभी पर्याप्त, निर्वृत्यपर्याप्त, लब्ध्यपर्याप्त होते है । इसलिये उनी- सका तीनके साथ गुणा करनेपर जीवसमासके उत्तरभेद ५७ होते हैं। जीवसमासके उक्त ५७ भेदोंके भी अवान्तर भेद दिखानेके लिये स्थानादि चार अषि- कारोंको कहते हैं। १ त्रसकर्मका वादरकेसाथ अविरोध और सूक्ष्म के साथ विरोध है, इसीप्रकार पर्याप्तक्रमका साधारणकमके- साथ विरोध और प्रत्येकके साथ अविरोध है। इसीतरह अन्यत्र भी यथासम्भव लगाना ।
.. गोम्मटसारः। ३३ ठाणेहिं वि जोणीहिं वि देहोग्गाहणकुलाणभेदेहि । जीवसमासा सवे परूविदवा जहाकमसो ॥ ७४ ॥ स्थानैरपि योनिभिरपि देहावगाहनकुलानां भेदैः । जीवसमासाः सर्वे प्ररूपितव्या यथाक्रमशः ॥ ७४ ॥ अर्थ-स्थान, योनि, शरीरकी अवगाहना, कुलोंके भेद इन चार अधिकारोंके द्वारा सम्पूर्ण जीवसमासोंका क्रमसे निरूपण करना चाहिये । एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय आदि जातिभेदको स्थान कहते है । कन्द मूल अण्डा गर्म रस स्वेद आदि उत्पत्तिके आधारको योनि कहते है । शरीरके छोटे बडे भेदोंको देहावगाहना कहते है। भिन्न २ शरीरकी उत्पत्तिको कारणभूत नोकर्मवर्गणाके भेदोंको कुल कहते है। क्रमके अनुसार प्रथम स्थानाधिकारको कहते है। सामण्णजीव तसथावरेसु इगिविगलसयलचरिमदुगे । इंदियकाये चरिमस्स य दुतिचदुपणगभेदजुदे ॥ ७५ ॥ सामान्यजीवः त्रसस्थावरयोः एकविकलसकलचरमद्विके । इन्द्रियकाययोः चरमस्य च द्वित्रिचतुःपञ्चभेदयुते ॥ ७५ ॥ अर्थ-सामान्यसे (द्रव्यार्थिक नयसे) जीवका एकही भेद है, क्योंकि "जीव" कह- नेसे जीवमात्रका ग्रहण हो जाता है । इसलिये सामान्यसे जीवसमासका एक भेद । त्रस और स्थावरकी अपेक्षासे दो भेद । एकेन्द्रिय विकलेन्द्रिय (द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय) सकलेन्द्रियकी (पंचेन्द्रिय) अपेक्षा तीन भेद । यदि पचेन्द्रियके दो भेद करदिये जाय तो जीवसमासके एकेन्द्रिय विकलेन्द्रिय सज्ञी असज्ञी इस तरह चार भेद होते है । इन्द्रियोकी अपेक्षा पांच भेद है, अर्थात् एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय। पृथिवी जल अमि वायु वनस्पति ये पाच स्थावर और एक त्रस इसप्रकार कायकी अपेक्षा छह भेद है। यदि पांच स्थावरों में त्रसके विकल और सकल इसतरह दो भेद करके मिला दिये जाय तो सात भेद होते है । और विकल असंज्ञी संज्ञी इसप्रकार तीन भेदकरके मिलानेसे आठ भेद होते है । द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय इसतरह चार भेद करके मिलानेसे नव भेद होते है । और द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय असंज्ञी सज्ञी इसतरह पांच भेद करके मिलानेसे दश भेद होते हैं। पणजुगले तससहिये तसस्स दुतिचदुरपणगभेदजुदे । छहुगपत्तेयम्हि य तसस्स तियचदुरपणगभेदजुदे ॥ ७६ ॥ पञ्चयुगले त्रससहिते प्रसस्य द्वित्रिचतुःपञ्चकभेदयुते । पडूद्विकप्रत्येके च त्रसस्य त्रिचतुःपञ्चभेदयुते ॥ ७६ ।। - गो.५ - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-पांच स्थावरोंके बादर सूक्ष्मकी अपेक्षा पांच युगल होते हैं । इनमें अस सामा. न्यका एक भेद मिलानेसे ग्यारह भेद जीवसमासके होते हैं । तथा इनही पांच युगलोंमें त्रसके विकलेन्द्रिय सकलेन्द्रिय दो भेद मिलानेसे वारह । और उसके विकलेन्द्रिय सज्ञी असंज्ञी इसप्रकार तीन भेद मिलानेसे तेरह । और द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय ये चार भेद मिलानेसे चौदह । तथा द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय असज्ञी संज्ञी ये पांच भेद मिलानेसे पन्द्रह भेद जीवसमासके होते है । पृथिवी अप तेज वायु नित्यनिगोद इतर निगोद इनके बादर सूक्ष्मकी अपेक्षा छह युगल और प्रत्येक वनस्पति इनमें उसके उक्त विकलेन्द्रिय असंज्ञी संज्ञी ये तीन भेद मिलानेसे सोलह, और द्वीन्द्रियादि चार भेद मिलानेसे सत्रह, तथा पांच भेद मिलानेसे अठारह भेद होते हैं । सगजुगलम्हि तसस्स य पणभंगजुदेसु होति उणवीसा । एयादुणवीसोत्ति य इगिवितिगुणिदे हवे ठाणा ॥ ७७ ॥ सप्तयुगले त्रसस्य च पंचभंगयुतेपु भवन्ति एकोनविशतिः। एकादेकोनविशतिरिति च एकद्वित्रिगुणिते भवेयुः स्थानानि ॥ ७७ ॥ . अर्थ-पृथिवी अप तेज वायु नित्यनिगोद इतरनिगोदके बादर सूटमकी अपेक्षा छह युगल और प्रत्येकका प्रतिष्ठित अप्रतिष्ठितकी अपेक्षा एक युगल मिलाकर सात युगलोमें सके उक्त पांच भेद मिलानेसे जीवसमासके उन्नीस भेद होते है । इस प्रकार एकसे लेकर उन्नीस तक जो जीवसमासके भेद गिनाये है, इनको एक दो तीनके साथ गुणा करनेपर क्रमसे उन्नीस, अड़तीस, सचावन, जीवसमासके अवान्तर भेद होते है। एक दो तीनके साथ गुणाकरनेका कारण बताते है। सामण्णण तिपंती पढमा विदिया अपुण्णगे इदरे । पजत्ते लद्धिअपजचेऽपढमा हवे पंती॥७८ ॥ सामान्येन त्रिपङ्ख्यः प्रथमा द्वितीया अपूर्णके इतरस्मिन् । पर्याप्त लब्ध्यपर्याप्तेऽप्रथमा भवेत् पतिः ॥ ७८ ॥ अर्थ-उक्त उन्नीस भेदोंकी तीन पति करनी चाहिये । उसमें प्रथम पनि सामान्यकी अपेक्षासे है । और दूसरी पति अपर्याप्त तथा पर्याप्तकी अपेक्षासे है । और तीसरी पड्डि पर्याप्त निर्वृत्यपर्याप्त लब्ध्यपर्याप्तकी अपेक्षासे है। भावार्थ-उन्नीसका जब एकसे गुणा करते है तब सामान्यकी अपेक्षा है, पर्याप्त अपर्याप्तके भेदकी विवक्षा नहीं है । जब दोके साथ गुणा करते है तब पर्याप्त अपर्याप्तकी अपेक्षा है। और जब तीनके साथ गुणा करते है तब पर्याप्त निवृत्त्यपर्याप्त लब्ध्यपर्याप्तकी अपेक्षा है । गाथामें केवल लब्धि शब्द है उसका अर्थ लब्ध्यपर्याप्त होता है। क्योंकि नामका एक देशभी पूर्णनामका बोधक होता है। -
गोम्मटसारः।
॥
३५
जीवसमासके और भी उत्तर भेदोंको गिनानेकेलिये दो गाथा कहते है।
इगिवणं इगिविगले असण्णिसंण्णिगयजलथलखगाणं ।
गम्भभवे सम्मुच्छे दुतिगं भोगथलखेचरे दो दो ॥ ७९ ॥
एकपञ्चाशत् एकविकले असंज्ञिसंज्ञिगतजलस्थलखगानाम् ।
गर्भभवे सम्मूळे द्वित्रिकं भोगस्थलखेचरे द्वौ द्वौ ॥ ७९ ॥
अर्थ-जीवसमासके उक्त ५७ भेदोंमेंसे पञ्चेन्द्रियके छह भेद निकालनेसे-एकेन्द्रिय
विकलेन्द्रियसम्बन्धी ५१ भेद शेप रहते है । कर्मभूमिमें होनेवाले तिर्यञ्चोंके तीन भेद है,
जलचर स्थलचर नभश्चर । ये तीनों ही तिर्यञ्च सज्ञी और असञ्जी होते है। तथा गर्भज
और सम्मूर्छन होते है। परन्तु गर्भजोंमें पर्याप्त और निर्वृत्यपर्याप्त ही होते है, इसलिये
गर्भजके बारह भेद, और सम्मूर्छनोंमें पर्याप्त नित्यपर्याप्त लब्ध्यपर्याप्त तीनोंही भेद होते है,
इसलिये सम्मूर्छनोंके अठारह भेद, सब मिलाकर कर्मभूमिज तिर्यञ्चोंके तीसभेद होते है।
भोगभूमिमें पंचेन्द्रियतिर्यञ्चोंके स्थलचर नभश्चर दो ही भेद होते है । और ये दोनोंही
पर्याप्त तथा निर्वृत्यपर्याप्त होते है । इसलिये भोगभूमिज तिर्यञ्चोंके चार भेद, और उक्त
कर्मभूमिज सम्बन्धी तीस भेद, उक्त ५१ भेदोंमें मिलानेसे तिर्यग्गति सम्बन्धी सम्पूर्ण
जीवसमासके ८५ भेद होते है। भोगभूमिमें जलचर सम्मूर्छन तथा असंज्ञी जीव नहीं होते।
मनुप्य देव नारकसम्बन्धी भेदोंको गिनाते है।
अज्जवमलेच्छमणुए तिदु भोगकुभोगभूमिजे दो दो।
सुरणिरये दो दो इदि जीवसमासा हु अडणउदी ॥८॥
आर्यम्लेच्छमनुष्ययोत्रयो द्वौ भोगकुभोगभूमिजयो द्वौ ।
सुरनिरययोद्वौँ द्वौ इति जीवसमासा हि अष्टानवतिः ॥ ८०
अर्थ-आर्यखण्डमें पर्याप्त निवृत्यपर्याप्त लब्ध्यपर्याप्त तीनोंही प्रकारके मनुष्य होते है।
म्लेच्छखण्डमें लब्ध्यपर्याप्तकको छोड़कर दो प्रकारके ही मनुष्य होते है । इसीप्रकार भोग-
भूमि 'कुभोगभूमि देव नारकियोंमें भी दो दो ही भेद होते हैं । इसलिये सब मिलाकर
जीवसमासके ९८ भेद हुए । भावार्थ-पूर्वोक्त तिर्यञ्चोंके ८५ भेद, और ९ भेद मनुष्यों के
तथा दो भेद देवोंके, दो भेद नारकियोंके, इसप्रकार सब मिलाकर जीवसमासके अवान्तर
भेद ९८ होते है।
इसप्रकार स्थानाधिकारकी अपेक्षा जीवसमासोंका वर्णन किया। अब दूसरा योनि अधि-
कार क्रमसे प्राप्त है । उस योनिके दो भेद है, एक आकारयोनि दूसरी गुणयोनि । उसमें
प्रथम आकारयोनिको कहते है।
संखावत्तयजोणी कुम्मुण्णयवंसपत्तजोणी य ।
तत्थ य संखावचे णियमादु विवजदे गम्भो ॥ ८१॥
३६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । शंखावर्तकयोनिः कूर्मोन्नतवंगपत्रयोनी च । तत्र च शंखावर्ते नियमात्तु विवय॑ते गर्भः॥ ८१॥ अर्थ-योनिके तीन भेद है, शंखावर्त कूर्मोन्नत वंशपत्र । उनमेंसे शंखावर्त योनिमें गर्भ नियमसे वर्जित है । भावार्थ-जिसके भीतर शंखके समान चक्कर पडे हों उसको शंखा- वर्त योनि कहते है । जो कछुआकी पीठकी तरह उठी हुई हो उसको कूमोन्नत योनि कहते हैं । जो वांसके पत्ते के समान लम्बी हो उसको वंशपत्र योनि कहते है । ये तीन तरह की आकार योनि है। इनमेंसे प्रथम शंखावर्तमें नियमसे गर्भ नहीं रहता। कुम्मुण्णयजोणीये तित्थयरा दुविहचकवट्टी य । रामा वि य जायते सेसाए सेसगजणो दु ॥ ८२ ॥ कूर्मोन्नतयोनौ तीर्थकरा द्विविधचक्रवर्तिनश्च । रामा अपि च जायन्ते शेषायां शेषकजनस्तु ।। ८२ ॥ अर्थ-कूर्मोन्नतयोनिमें तीर्थकर अर्धचक्री चक्रवर्ती तथा वलभद्र और अपिशब्दकी सामर्थ्यसे साधारण पुरुष भी उत्पन्न होते हैं। तीसरी वंशपत्रयोनिमें साधारण पुरुष ही उत्पन्न होते है तीर्थंकरादि महापुरुष नहीं होते। जन्म तथा उसकी आधारभूत गुणयोनिके भेदोंको गिनाते है। जम्मं खलु सम्मुच्छणगभुवबादा दु होदि तज्जोणी। सचित्तसीदसंउडसेदरमिस्सा य पत्तेयं ॥ ८३ ॥ जन्म खलु सम्मूर्छनगर्भोपपादास्तु भवति तद्योनयः । सचित्तशीतसंवृतसेतरमिश्राश्च प्रत्येकम् ॥ ८३ ।। अर्थ-जन्म तीन प्रकारका होता है, सम्मूर्छन गर्भ उपपाद । तथा इनकी आधारभूत सचित्त शीत संवृत, अचित्त उष्ण विधूत, मिश्र, ये गुण योनि होती है । इनमेंसे यथासम्भव प्रत्येक सम्मुर्छनादि जन्मके साथ लगालेनी चाहिये । किन जीवोंके कोनसा जन्म होता है यह बताते है। पोतजरायुजअंडजजीवाणं गम्भ देवणिरयाण। उववाद सेसाणं सम्मुच्छणयं तु णिहिटं ॥ ८४ ॥ पोतजरायुजांडजजीवानां गर्भः देवनारकाणां । उपपादः शेषाणां सम्मूर्छनकं तु निर्दिष्टम् ॥ ८४ ।। अर्थ-पोत (जो उत्पन्न होते ही भागने लगें, जैसे शेर विल्ली हिरन आदि), जरायुज १ आत्मप्रदेशोंसे युक्त पुद्गलपिण्डको सचित्त कहते हैं।२ ढका हुआ। ३ खुला हुआ। ४ दोका मिला हुआ, जैसे सचित्त और अचित्तको मिलकर एक मिश्र योनि होती है।
गोम्मटसार। sho (जो जेरके साथ उत्पन्न हों), अण्डज (जो अण्डेसे उत्पन्न हों) इन तीन प्रकारके जीवोंका गर्भ जन्म ही होता है। देव नारकियोंका उपपाद जन्म ही होता है। शेष जीवोंका सम्मूर्छन जन्म ही होता है। किस जन्मके साथ कौनसी योनि सम्भव है यह तीन गाथाओंद्वारा बताते है। उववादे अचित्तं गम्भे मिस्सं तु होदि सम्मुच्छे । सचित्तं अचित्तं मिस्सं च य होदि जोणी हु ॥ ८५॥ उपपादे अचित्ता गमें मिश्रा तु भवति सम्मूर्छ । सचित्ता अचित्ता मिश्रा च च भवति योनिर्हि ।। ८५ ॥ अर्थ-उपपाद जन्मकी अचित्त ही योनि होती है। गर्मजन्मकी मिश्र योनि ही होती । तथा सम्मूर्छन जन्मकी सचित्त अचित्त मिश्र तीनो तरहकी योनी होती है। उववादे सीदुसणं सेसे सीदुसणमिस्सयं होदि । उववादेयक्खेसु य संउड वियलेसु विउलं तु ॥ ८६ ॥ उपपादे शीतोष्णे शेषे शीतोप्णमिश्रका भवन्ति । उपपादकाक्षेषु च संवृता विकलेपु विवृता तु ॥ ८६ ॥ अर्थ-उपपाद जन्ममे शीत और उष्ण दो प्रकारकी योनि होती है। शेष जन्मोंमें शीत उष्ण मिश्र तीनों ही योनि होती है । उपपाद जन्मवालोंकी तथा एकेन्द्रिय जीवोंकी योनि संवृत ही होती है। और विकलेन्द्रियोंकी विवृत ही होती है। गम्भजजीवाणं पुण मिस्सं णियमेण होदि जोणी हु । सम्मुच्छणपंचक्खे वियलं वा विउलजोणी हु॥ ८७ ॥ गर्भजजीवानां पुनः मिश्रा नियमेन भवति योनिर्हि । सम्मूर्छनपंचाक्षयोः विकलं वा विवृतयोनिाई ।। ८७ ॥ अर्थ-गर्भजजीवोंकी योनि नियमसे मिश्र (संवृत विवृतकी अपेक्षा) होती है। पंचेन्द्रिय सम्मूर्छन जीवोंकी विकलेन्द्रियोकी तरह विवृत योनि ही होती है। उक्त गुणयोनिकी उपसहारपूर्वक विशेषसंख्याको बताते है। सामण्णण य एवं णव जोणीओ हति वित्थारे । लक्खाण चदुरसीदी जोणीओ होति णियमेण ॥ ८८॥ सामान्येन चैवं नव योनयो भवन्ति विस्तारे । लक्षाणां चतुरशीतिः योनयो भवन्ति नियमेन ॥ ८८॥ १ देवोंके उत्पन्न होनेकी शय्या और नारकियोंके उत्पन्न होनेके उष्ट्रकादि स्थानोंको उपपाद कहते हैं, उनमे उत्पन्न होनेको भी उपपाद कहते हैं। २ चारो तरफसे पुदलका इकट्ठा होना (जू मच्छर आदिके जन्मविशेषमे रूड)।३माताके सचित्तरज और पिताके अचित्त वीर्यके मिलनेसे मिश्र योनि होती है।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अर्थ-पूर्वोक्त क्रमानुसार सामान्यसे योनियोंके नियमसे नव ही भेद होते हैं। विस्ता-
रकी अपेक्षा इनके चौरासी लाख मेद होते है।
योनिसम्बन्धी विस्तृत संख्याको दिखाते है ।
णिचिदरधादुसत्त य तरुदस वियलिंदियेसु छच्चेव ।
सुरणिरयतिरियचउरो चोइस मणुए सदसहस्सा॥ ८९॥
नित्येतरधातुसप्त च तरुदश विकलेन्द्रियेपु पट् चैव ।
सुरनिरयतिर्यक्चतस्रः चतुर्दश मनुप्ये शतसहस्राः ।। ८९ ॥
अर्थ-नित्यनिगोद इतरनिगोद पृथिवी जल अग्नि वायु इन प्रत्येककी सात २ लाख,
वनस्पतिकी दशलाख, द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय इन प्रत्येककी दो २ लाख अर्थात्
विकलेन्द्रियकी छह लाख, देव नारकी तिर्यञ्च इन प्रत्येककी चार २ लाख, मनुष्यकी
चौदह लाख, सब मिलाकर ८४ लाख योनि होती है।
किस गतिमें कौनसा जन्म होता है यह दो गाथाओंद्वारा दिखाते है।
उववादा सुरणिरया गमजसम्मुच्छिमा हु णरतिरिया ।
सम्मुच्छिमा मणुस्साऽपजत्ता एयवियलक्खा ॥ ९ ॥
उपपादाः सुरनिरया गर्भजसम्मूछिमा हि नरतिर्यञ्चः
सम्मूच्छिमा मनुष्या अपर्याप्ता एकविकलाक्षाः ॥ ९० ॥
अर्थ-देवगति और नरकगतिमें उपपाद जन्मही होता है । मनुष्य तथा तिर्यञ्चोंमें
गर्भ और सम्मूर्छन दो ही प्रकारका जन्म होता है; किन्तु लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्य और
एकेन्द्रिय विकलेन्द्रियोंका सम्मूर्छन जन्म ही होता है।
पंचक्खतिरिक्खाओ गम्भजसम्मुच्छिमा तिरिक्खाणं ।
भोगभुमा गम्भभवा नरपुण्णा गव्भजाचेव ॥ ९१॥
पञ्चाक्षतिर्यञ्चो गर्भजसम्मूर्छिमा तिरश्वाम् ।
भोगभूमा गर्मभवा नरपूर्णा गर्भजाश्चैव ॥ ९१ ॥
अर्थ-कर्मभूमिया पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च गर्भज तथा सम्मूर्छन ही होते हैं । तिर्यञ्चोंमें जो
भोगभूमिया तिर्यश्च है वे गर्भन ही होते है । और जो पर्याप्त मनुष्य हैं वे भी गर्मज
ही होते है।
लब्ध्यपर्याप्तकोंकी कहां २ सम्भावना है और नहीं है यह बताते है ।
उववादगम्भजेसु य लद्धिअपज्जत्तगाण णियमेण ।
णरसम्मुच्छिमजीवा लद्धिअपज्जत्तगा चेव ॥ ९२॥
गोम्मटसारः। ३९. उपपादगर्भजेषु च लब्ध्यपर्याप्तका न नियमेन । नरसम्मूर्छिमजीवा लब्ध्यपर्याप्त काश्चैव ॥ ९२ ।। अर्थ-उपपाद और गर्म जन्मवालोंमें नियमसे लब्ध्यपर्याप्तक नहीं होते । और सम्मू- र्छन मनुष्य नियमसे लब्ध्यपर्याप्तक ही होते है। भावार्थ-देव नारकी पर्याप्त नित्यपर्याप्त ही होते है । और चक्रवर्तीकी रानी आदिको छोड़कर शेष आर्यखण्डकी स्त्रियोंकी योनि काख स्तन मूत्र मल आदिमें उत्पन्न होनेवाले सम्मूर्द्धन मनुष्य लब्ध्यपर्याप्तक ही होते हैं नरकादि गतियोंमें होनेवाले वेदोंका नियम करते हैं। णेरइया खलु संढा णरतिरिये तिण्णि होति सम्मुच्छा। संढा सुरभोगभुमा पुरिसिच्छीवेदगा चेव ॥९३ ॥ नैरयिकाः खलु षण्ढा नरतिरश्चोत्रयो भवन्ति सम्मूर्छा:- पण्डाः सुरभोगभूमाः पुरुषस्त्रीवेदकाश्चैव ॥ ९३ ॥ अर्थ-नारकियोंका द्रव्यवेद तथा भाववेद नपुंसक ही होता है। मनुष्य और तिर्यञ्चोंके तीनोंही (स्त्री पुरुष नपुंसक ) वेद होते है । देव और भोगभूमियाओंके पुरुषवेद और स्त्रीवेद ही होता है । भावार्थ-देव नारकी भोगभूमिआ और सम्मूर्छन जीव इनका जो द्रव्यवेद होता है वही भाववेद होता है। किन्तु शेष मनुष्य और तिर्यञ्चोंमें यह नियम नहीं है। उनके द्रव्यवेद और भाववेदमें विपरीतता भी पाई जाती है । आङ्गोपाङ्ग नामक- भके उदयसे होनेवाले शरीरगत चिहविशेषको द्रव्यवेद, और मोहनीयकर्मकी वेदप्रकृतिके उदयसे होनेवाले परिणामविशेषोंको भाववेद कहते हैं। शरीरावगाहनाकी अपेक्षा जीवसमासोंका निरूपण करनेसे प्रथम सबसे उत्कृष्ट और जघन्य शरीरकी अवगाहनाओंके खामियों को दिखाते है। सुहमणिगोदअपज्जत्तयस्स जादस्स तदियसमयम्हि । अंगुलअसंखभागं जहण्णमुक्कस्सयं भच्छे ॥ ९४ ॥ सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तकस्य जातस्य तृतीयसमये । अङ्गुलासंख्यभागं जघन्यमुत्कृष्टकं मत्स्ये ॥ ९४ ॥ अर्थ--उत्पन्न होनेसे तीसरे समयमें सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवकी अङ्गुलके असं- ख्यातमे भागप्रमाण शरीरकी जघन्य अवगाहना होती है । और उत्कृष्ट अवगाहना मत्स्यके होती है । भावार्थ-ऋजुगतिकेद्वारा उत्पन्न होनेवाले सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवकी उत्पत्तिसे तीसरे समयमें शरीरकी जघन्य अवगाहना होती है, और इसका प्रमाण घनामुलके १ उत्पत्तिके प्रथम समयमे आयतचतुरस्र और दूसरे समयमै समचतुरस होता है, इस लिये प्रथम द्वितीय समयमे जघन्य अवगाहना नहीं होती, किन्तु तीसरे समयमे गोल होजानेसे जघन्य अवगाहना होती है। .
. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । असंख्यातमे भागप्रमाण है । उत्कृष्ट अवगाहना खयम्भूरमण समुद्रके मध्यमें होनेवाले महामत्स्यकी होती है । इसका प्रमाण हजार योजन लम्बा, पांचसो योजन चौड़ा, दाईसौ योजन मोटा है । जघन्यसे लेकर उत्कृष्ट पर्यन्त एक २ प्रदेशकी वृद्धिके क्रमसे मध्यम अवगाहनाके अनेक भेद होते है । अवगाहनाके सम्पूर्ण विकल्प असंख्यात होते है। इन्द्रियकी अपेक्षा उत्कृष्ट अवगाहनाका प्रमाण बताते है। साहियसहस्समेकं वारं कोसूणमेकमेकं च । जोयणसहस्सदीहं पम्मे वियले महामच्छे ॥९५ ॥ साधिकसहस्रमेकं द्वादश क्रोशोनमेकमेकं च । योजनसहस्रदीर्घ पद्धे विकले महामत्स्ये ॥ ९५॥ अर्थ-पद्म (कमल), द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय,महामत्स्य इनके शरीरकी अवगाहना क्रमसे कुछ अधिक एक हजार योजन, बारह योजन, तीनकोश, एक योजन, हजार योजन लम्बी समझनी चाहिये । भावार्थ-एकेन्द्रियोंमें सबसे उत्कृष्ट कमलकी कुछ अधिक एक हजार योजन, द्वीन्द्रियोंमें शंखकी बारहयोजन, त्रीन्द्रियोंमें श्रेष्मी (चीटी) की तीन कोश, चतुरिन्द्रियोंमें भ्रमरकी एक योजन, पंचेन्द्रियोंमें महामत्स्यकी एक हजार योजन लम्बी शरीरकी अवगाहनाका प्रमाण है । यहांपर महामत्स्यकी एक हजार योजनकी अव- गाहनासे जो पद्मकी कुछ अधिक अवगाहना वतलाई है, और पूर्वमें सर्वोत्कृष्ट अवगाहना महामत्स्यकी ही बतलाई है, इससे पूर्वापर विरोध नही समझना चाहिये। क्योंकि यहांपर केवल लम्बाईका वर्णन है, और पूर्वमें जो सर्वोत्कृष्ट अवगाहना बताई थी वह घनक्षेत्रफ- लकी अपेक्षासे थी, इसलिये पद्मकी अपेक्षा मत्स्यके शरीरकी अवगाहना ही उत्कृष्ट समझनी चाहिये, क्योंकि पद्मकी अपेक्षा मत्स्यके शरीरकी अवगाहनाका क्षेत्रफल अधिक है। पर्याप्तक द्वीन्द्रियादिकोंकी जघन्य अवगाहनाका प्रमाण क्या है ? और उसके धारक जीव कोन २ है यह बताते है। वितिचपपुण्णजहणं अणुंधरीकुंथुकाणमच्छीसु । सिच्छयमच्छे विदंगुलसंखं संखगुणिदकमा ॥ ९६ ॥ द्वित्रिचपपूर्णजघन्यमनुंधरीकुंथुकाणमक्षिकासु । सिक्थकमत्स्ये वृन्दाङ्गुलसंख्यं संख्यगुणितक्रमाः ॥ ९६ ॥ अर्थ-द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय जीवोंमें अनुंधरी कुंथु काणमक्षिका सिक्थमत्स्यके क्रमसे जघन्य अवगाहना होती है । इसमें प्रथमकी घनाङ्गुलके संख्यातमें भागप्रमाण है । और पूर्वकी अपेक्षा उत्तरकी अवगाहना क्रमसे संख्यातगुणी २ अधिक है। भावार्थ-द्वीन्द्रियों में सबसे जघन्य अवगाहना अनुंधरीके पाई जाती है और उसक गोम्मटसार। ४१ प्रमाण घनाङ्गुलके संख्यातमें भागमात्र है। उससे संख्यातगुणी त्रीन्द्रियोंकी जघन्य अव- गाहना है, यह कुंथुके पाई जाती है। इससे संख्यातगुणी चौइन्द्रियोंमें काणमक्षिकाकी, और इससे भी संख्यातगुणी पंचेन्द्रियोंमें सिक्थमत्स्यके जघन्य अवगाहना पाई जाती है। यहांपर आचार्योंने द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय आदि शब्द न लिखकर "बि, ति, च, प," ये शब्द जो लिखे है वे 'नामका एकदेश भी सम्पूर्ण नामका बोधक होता है। इसनियमके आश्रयसे लाघवके लिये लिखे है। जघन्यसे लेकर उत्कृष्ट अवगाहनापर्यन्त जितने भेद है उनमें किस भेदका कौन खामी है? और अवगाहनाकी न्यूनाधिकताका गुणाकार क्या है ! यह पांच गाथाओंद्वारा बताते है। मुहमणिवातेआभूवातेआपुणिपदिहिदं इदरं । वितिचपमादिल्लाणं एयाराणं तिसेढीय ॥९७ ॥ सूक्ष्मनिवातेआभूवातेअनिप्रतिष्ठितमितरत् । द्वित्रिचपमाद्यानामेकादशानां त्रिश्रेणय. ॥ ९७ ॥ अर्थ-एक कोठेमें सूक्ष्मनिगोदिया वायुकाय तेजकाय जलकाय पृथिवीकाय इनका क्रमसे स्थापन करना। इसके आगे दूसरे कोठेमें वायुकाय तेजकाय जलकाय पृथिवीकाय निगोदिया प्रतिष्ठित इनका क्रमसे स्थापन करना । और तीसरे कोठेमें अप्रतिष्ठित द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रियोका क्रमसे स्थापन करना । इसके आगे उक्त सोलह स्थानों मेंसे आदिके ग्यारह स्थानोकी तीन श्रेणि मांडना चाहिये । भावार्थ-तीनकोठोंमें स्थापित सोलह स्थानोंके आदिके ग्यारहस्थान जो कि प्रथम द्वितीय कोठेमें स्थापित किये गये हैं अर्थात् सूक्ष्मनिगोदियासे लेकर प्रतिष्ठित पर्यन्तके ग्यारह स्थानोंको क्रमानुसार उक्त तीन कोठा ओंके आगे पूर्ववत् दो कोठाओंमें स्थापित करना चाहिये, और इसके नीचे इनही ग्यारह स्थानोंके दूसरे और दो कोठे स्थापित करने चाहिये, तथा दूसरे दोनों कोठोंके नीचे तीसरे दो कोठे स्थापित करना चाहिये इसप्रकार तीन श्रेणिमें दो २ कोठाओंमें ग्यारह स्थानीको स्थापित करना चाहिये । और इसके आगे:- अपदिहिदपत्तेयं वितिचपतिचविअपदिहिदंसयलं । तिचविअपदिद्विदं च य सयलं वादालगुणिदकमा ॥ ९ ॥ अप्रतिष्ठितप्रत्येक द्वित्रिचपत्रिचढ्यप्रतिष्ठितं सकलम् । त्रिचव्यप्रतिष्ठितं च च सकलं द्वाचत्वारिंशद्गुणितक्रमाः ॥ ९८ ॥ अर्थ-छट्टे कोठेमें अप्रतिष्ठित प्रत्येक द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चौइन्द्रिय पंचेन्द्रियका स्थापन करना। इसके आगेके कोठेमें क्रमसे त्रीन्द्रिय चौइन्द्रिय द्वीन्द्रिय अप्रतिष्ठित प्रत्येक पंचेन्द्रियका स्थापन करना। इससे आगे के कोठेमें त्रीन्द्रिय चौइन्द्रिय द्वीन्द्रिय अप्रतिष्ठित प्रत्येक गो.६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ४२ पंचेन्द्रियका क्रमसे स्थापन करना। इन सम्पूर्ण चौंसठ स्थानों में व्यालीस स्थान उत्तरोत्तर गुणि- तक्रम हैं। भावार्थ-आदिके तीन कोठोमें स्थापित सोलह स्थान और जिन ग्यारहस्थानोंको तीन श्रेणियों में स्थापित किया था उनमेंसे नीचेकी दो श्रेणियों में स्थापित वाईस स्थानोंको छोड़कर ऊपरकी श्रेणिके ग्यारहस्थान । तथा इसके आगे तीन कोठोंमें स्थापित पन्द्रह खान । सब मिलाकर व्यालीस स्थान उत्तरोत्तर गुणितक्रम हैं । और दूसरी तीसरी श्रेणिके वाईस स्थान अधिकक्रम है । व्यालीस स्थानोंके गुणाकारका प्रमाण और वाईसस्थानोंके अधिकका प्रमाण आगे बतावेंगे। यहांपर उक्त स्थानोंके खामियोंको बताते हैं। अवरमपुण्णं पढम सोलं पुण पढमविदियतदियोली। पुण्णिदरपुण्णयाणं जहण्णमुक्कस्समुकरस ॥ ९९ ।। अवरमपूर्ण प्रथमे षोडश पुनः प्रथमद्वितीयतृतीयावलिः। पूर्णेतरपूर्णानां जघन्यमुत्कृष्टमुत्कृष्टम् ॥ ९९ ॥ अर्थ-आदिके सोलह स्थान जघन्य अपर्याप्तकके है । और प्रथम द्वितीय तृतीयश्रे- णि क्रमसे पर्याप्तक अपर्याप्तक तथा पर्याप्तककी जघन्य उत्कृष्ट और उत्कृष्ट समझनी चाहिये। भावार्थ-प्रथम तीन कोठोंमें विभक्त सोलह स्थानों में अपर्याप्तककी जघन्य अवगा- हना बताई है । और इसके आगे प्रथम श्रेणिके ग्यारह स्थानोंमें पर्याप्तककी जघन्य और इसके नीचे दूसरी श्रेणिमें अपर्याप्तककी उत्कृष्ट तथा इसके भी नीचे तीसरी श्रेणिमें पर्याप्तकोंकी उत्कृष्ट अवगाहना समझनी चाहिये । पुण्णजहण्णं तत्तो वरं अपुण्णस्स पुण्णउक्कस्स। वीपुण्णजहण्णोत्ति असंखं संखं गुणं तत्तो ॥ १०॥ पूर्णजघन्यं ततो वरमपूर्णस्य पूर्णोत्कृष्टम् । द्विपूर्णजघन्यमिति असंख्य संख्यं गुणं ततः ॥१०० ॥ अर्थ-श्रेणिके आगेके प्रथम कोठेमें (छट्टे कोठेमें ) पर्याप्तककी जघन्य और दूसरे कोठेमें अपर्याप्तककी उत्कृष्ट तथा तीसरे कोठेमें पर्याप्तककी उत्कृष्ट अवगाहना समझनी चाहिये। द्वीन्द्रिय पर्याप्तककी जघन्य अवगाहना पर्यन्त असंख्यातका गुणाकार है, और इसके आगे संख्यातका गुणाकार है । भावार्थ-पहले जो व्यालीस स्थानोंको गुणितक्रम वताया था उनमेंसे आदिके उनतीस स्थान ( सूक्ष्मनिगोदिया अपर्याप्तक जघन्यसे लेकर द्वीन्द्रिय पर्याप्तकी जघन्य अवगाहना पर्यन्त) उत्तरोत्तर असंख्यातगुणे २ हैं । और इसके आगे तेरह स्थान उत्तरोत्तर संख्यातगुणे २ हैं। गुणाकार रूप असंख्यातका और श्रेणिगत वाईस स्थानोंके अधिकका प्रमाण बताते हैं। सुहमेदरगुणगारो आवलिपल्लाअसंखभागो दु । सहाणे सेढिगया अहिया तत्थेकपडिभागो.॥ १०१॥ .
गोम्मटसार। . ४ सूक्ष्मेतरगुणकार आवलिपल्यासंख्येयभागस्तु । स्वस्थाने श्रेणिगता अधिकास्तत्रैकप्रतिभागः॥१०१॥ अर्थसूक्ष्म और बादरोंका गुणकार खस्थानमें क्रमसे आवली और पन्यके असंख्यात में भाग है । और श्रेणिगत वाईस खान अपने २ एक प्रतिभागप्रमाण अधिक २ है। भावार्थ-सूक्ष्म निगोदियासे सूक्ष्म वायुकायका प्रमाण आवलीके असंख्यातमें भागसे गुणित है, और इसीप्रकार सूक्ष्मवायुकायसे सूक्ष्म तेजकायका और सूक्ष्मतेजकायसे सूक्ष्मजलकायका सूक्ष्मजलकायसे सूक्ष्म पृथिवीकायका प्रमाण उत्तरोत्तर आवलीके असंख्यातमें २ भागसे गुणित है । परन्तु सूक्ष्म पृथिवीकायसे बादर वातकायका प्रमाण परस्थान होनेसे पल्यके असंख्यातमें भागगुणित है। इसीप्रकार बादर बातकायसे बादर तेजकायका और बादर तेजकायसे बादर जलकायादिका प्रमाण उत्तरोत्तर क्रमसे पत्यके असंख्यातमे भाग २ गुणा है। इसीप्रकार आगेके स्थान भी समझना । परन्तु श्रेणिगत वाईस स्थानों में गुणाकार नही किन्तु उत्तरोत्तर अधिक २ है, अर्थात् वाईस स्थानोमें जो सूक्ष्म है वे आवलीके असंख्या- तमे भाग अधिक है, और जो वादर है वे पल्यके असंख्यातमे भाग अधिक हैं। सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तककी जघन्य अवगाहनासे सूक्ष्म वायुकायकी अवगाहना आवलीके असंख्यातमे भाग गुणित है यह पहले कह आये है। अब इसमें होनेवाली चतु:- स्थानपतित वृद्धिकी उत्पत्रिका क्रम तथा उसके मध्यमें होनेवाले अनेक अवगाहनाके भेदोंको कहते हैं। अवरुवरि इगिपदेसे जुदे असंखेजभागवडीए । आदी णिरंतरमदो एगेगपदेसपरिवड्डी ॥ १०२॥ अवरोपरि एकप्रदेशे युते असंख्यातभागवृद्धः । आदिः निरन्तरमतः एकैकप्रदेशपरिवृद्धिः ॥१०२ ॥ अर्थ-जघन्य अवगाहनाके प्रमाणमें एक प्रदेश और मिलानेसे जो प्रमाण होता है वह असंख्यातभागवृद्धिका मादिस्थान है । इसके आगे भी क्रमसे एक २ प्रदेशकी वृद्धि करना चाहिये । और ऐसा करते २- अवरोग्गाहणमाणे जहण्णपरिमिदअसंखरासिहिदे । अवरस्सुवरि उढे जेट्टमसंखेजभागस्स ॥ १०३ ॥ अवरावगाहनाप्रमाणे जघन्यपरिमितासंख्यातराशिहते । अवरस्योपरि वृद्धे ज्येष्ठमसंख्यातभागस्य ॥ १०३ ॥ अर्थ-जघन्य अवगाहनाके प्रमाणमें जघन्यपरीतासंख्यातका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने प्रदेश जघन्य अवगाहनामें मिलानेपर असंख्यातमागवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है।
४४ - . - - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । तस्सुवरि इगिपदेसे जुदे अवत्तवभागपारम्भो। घरसंखमवहिदवरे रूऊणे अवरउपरिजुदे ॥ १०४ ॥ तस्योपरि एकप्रदेशे युते अवक्तव्यभागप्रारम्भः । वरसंख्यातावहितावरे रूपोने अवरोपरि युते ।। १०४ ।। अर्थ-असंख्यातभागवृद्धिके उत्कृष्ट स्थानके आगे एक प्रदेशकी वृद्धि करनेसे अवक्तव्य भागवृद्धिका प्रारम्भ होता है। इसमें एक २ प्रदेशकी वृद्धि होते २, जब जघन्य अवगा- हनाके प्रमाणमें उत्कृष्ट संख्यातका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसमें एक कमकरके जघन्यके प्रमाणमें मिलादिया जाय तव:- तबड्डीए चरिमो तस्सुवार रूवसंजुदे पढमा । संखेजमागउड्डी उबरिमदो रूवपरिवड्डी ॥ १०५ ॥ तद्वृद्धेश्वरमः तस्योपरि रूपसंयुते प्रथमा । संख्यातभागवृद्धिः उपर्यतो रूपपरिवृद्धिः ॥ १०५ ॥ अर्थ-अवक्तव्यभागवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है । इसके आगे एक और मिलानेसे संख्यातभागवृद्धिका प्रथम स्थान होता है और इसके आगे एक २ की वृद्धि करते २ जवः- अवरः अवरबरि उहे तवहिपरिसमची हु। रूवे तदुवरि उड्ढे होदि अवत्तवपढमपदं ॥ १०६ ॥ अवरा? अवरोपरिवृद्धे तवृद्धिपरिसमाप्तिर्हि । रूपे तदुपरि वृद्ध भवति अवक्तव्यप्रथमपदम् ॥ १०६ ॥ अर्थ-जघन्यका जितना प्रमाण है उसमें उसका (जघन्यका ) आधा और मिलानेसे संख्यातभागवृद्धिका उत्कृष्टस्थान होता है । इसके आगे भी एक प्रदेशकी वृद्धि करनेपर अवक्तव्यवृद्धिका प्रथम स्थान होता है। रूऊणवरे अवरुस्सुवरि संवडिदे तदुक्कस्सं । तसि पदेसे उड्डे पढमा संखेजगुणवड्डी ॥ १०७ ॥ रूपोनावरे अवरस्योपरि संवद्धिते तदुत्कृष्टम् । तस्मिन् प्रदेशे वृद्धे प्रथमा संख्यातगुणवृद्धिः ॥ १० ॥ अर्थ-जघन्यके प्रमाणमें एक कम जघन्यका ही प्रमाण और मिलानेसे अवकन्यव- द्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है। और इसमें एक प्रदेश और मिलानेसे संख्यातगुणवृद्धिका प्रथम स्थान होता है। अवरे वरसंखगुणे तचरिमो तम्हि स्वसंजुत्ते । । उग्गाहणम्हि पढमा होदि अवत्तवगुणवही ॥ १०८ ॥ । .
. 3 . गोम्मटसार। ४५ अवरे वरसंख्यगुणे तच्चरमः तस्मिन् रूपसंयुक्ते । अवगाहने प्रथमा भवति अवक्तव्यगुणवृद्धिः ॥ १०८॥ अर्थ-जघन्यको उत्कृष्ट संख्यातसे गुणा करनेपर संख्यातगुणवृद्धिका उत्कृष्टस्सान होता है । इस संख्यातगुणवृद्धिके उत्कृष्ट स्थानमें ही एक प्रदेशकी वृद्धि करनेपर अवक्तव्यगुणवृ- द्धिका प्रथमस्थान होता है। अवरपरित्तासंखेणवरं संगुणिय रूवपरिहीणे । तचरिमो रूवजुदे तलि असंखेजगुणपढमं ॥१०९॥ अवरपरीतासंख्येनावरं संगुण्य रूपपरिहीने। तचरमो रूपयुते तस्मिन् असंख्यातगुणप्रथमम् ॥ १०९ ॥ अर्थ-जघन्य अवगाहनाका जघन्यपरीतासंख्यातके साथ गुणा करके उसमें से एक घटाने पर अवक्तव्यगुणवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है। और इसमें एक प्रदेशकी वृद्धि होनेपर असंख्यातगुणवृद्धिका प्रथम स्थान होता है। ख्वुत्तरेण तत्तो आवलियासंखभागगुणगारे। तप्पाउग्गेजादे वाउस्सोग्गाहणं कमसो ॥११॥ रूपोत्तरेण तत आवलिकासंख्यभागगुणकारे । तत्प्रायोग्ये जाते वायोरवगाहनं क्रमशः ॥ ११०॥ अर्थ-इस असंख्यातगुणवृद्धिके प्रथमस्थानके ऊपर क्रमसे एक २ प्रदेशकी वृद्धि होते २ जव सूक्ष्म, अपर्याप्त वायुकायकी जघन्य अवगाहनाकी उत्पत्तिके योग्य आवलिके असंख्यातमें भागका गुणाकार उत्पन्न होजाय तब क्रमसे उस वायुकायकी अवगाहना होती है। भावार्थ-जघन्य अवगाहनाके ऊपर प्रदेशोत्तर वृद्धिकेक्रमसे असंख्यातभागवृद्धि संख्या- तभागवृद्धि संख्यातगुणवृद्धि असंख्यातगुणवृद्धिको क्रमसे असंख्यात २ वार होनेपर, और इन वृद्धियोंके मध्यमें अवक्तव्यवृद्धिको भी प्रदेशोत्तरवृद्धिके क्रमसे ही असंख्यात २ वार होनेपर, जव असंख्यातगुणवृद्धि होते २ अन्तमें अपर्याप्त वायुकायकी जघन्य अवगा- हनाको उत्पन्न करने में योग्य आवलीके. असंख्यातमे भागप्रमाण असंख्यातका गुणाकार आजाय तब उसके साथ जघन्य अवगाहनाका गुणा करननेसे अपर्याप्त वायुकायकी जघन्य अवागाहनाका प्रमाण निकलता है । यह पूर्वोक्त कथन विना अंकसंदृष्टिके समझमे नहीं आसकता इसलिये यहांपर अंकसंदृष्टि लिखदेना उचित समझते है । वह इस प्रकार है- कल्पना कीजिये कि जघन्य अवगाहनाका प्रमाण ९६० है और जघन्य संख्यातका प्रमाण २ तथा उत्कृष्ट संख्यातका प्रमाण १५ और जघन्य परीतासंख्यातका प्रमाण १६ है। इस जघन्य अवगाहनाके प्रमाणमें जघन्य अवगाहनाका ही भाग देनेसे १ लब्ध आता है ६ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । ४६ उसको जघन्य अवगाहनामै मिलानेसे असंख्यातभागवृद्धिका आदिस्थान होता है । और जघन्य परीतासंख्यात अर्थात् १६ का भाग देनेसे ६० लब्ध आते हैं उनको जघन्य अवगाहनामें मिलानेसे असंख्यातभागवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है। उत्कृष्ट संख्यातका अर्थात् १५ का जघन्य अवगाहनामें भाग देनेसे लब्ध ६४ आते हैं इनको जघन्य अवगाहनामें मिलानेसे संख्यातमागवृद्धिका आदिस्थान होता है । जघन्यमें २ का भागदेनेसे जो लब्ध आवे उसको अर्थात् जघन्यके आधेको जघन्यमें मिलानेसे संख्या- तभागवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है। परन्तु उत्कृष्ट असंख्यातमागवृद्धिके आगे और जघन्य संख्यातभागवृद्धिके पूर्व जो तीन स्थान है, अर्थात् जघन्यके ऊपर ६० प्रदेशोंकी वृद्धि तथा ६४ प्रदेशोंकी वृद्धिके मध्यमें जो ६१-६२ तथा ६३ प्रदेशोंकी वृद्धिके तीन स्थान हैं, वे न तो असंख्यातभागवृद्धिमें ही आते हैं और न संख्यातभागवृद्धिमें ही, इसलिये इनको अवक्तव्यबृद्धिमें लिया है । इसके आगे गुणवृद्धिका प्रारम्भ होता है, जघन्यको दूना करनेसे संख्यातगुणवृद्धिका आदिस्थान ( १९२०) होता है । इसके पूर्वमें उत्कृष्ट संख्यातभाग द्धिके स्थानसे आगे अर्थात् १४४० से आगे जो १४४१ तथा १४४२ आदि १९१९ पर्यंत स्थान हैं वे सम्पूर्ण ही अवक्तव्यवृद्धिके स्थान हैं । इसही प्रकार अधन्यको उत्कृष्ट संख्यातसे गुणित करनेपर संख्यातगुणवृद्धिका उत्कृष्ट स्थान होता है। और इसके आगे जघन्यपरीतासंख्यातका जघन्य अवगाहनाके साथ गुणा करनेपर असंख्यातगुणवृद्धिका आदिस्थान होता है। तथा इन दोनोंके मध्यमें भी पूर्वकी तरह अवक्तव्य वृद्धि होती है । इस असंख्यातगुणवृद्धिमें ही प्रदेशोत्तरवृद्धिके क्रमसे वृद्धि होते २ सूक्ष्म वातकायकी जघन्य अवगाहनाकी उत्पत्तिके योग्य गुणाकार प्राप्त होता है उसका जघन्य अवगाहनाके साथ गुणा करनेपर सूक्ष्म वातकायकी जघन्य अवगाहना उत्पन्न होती है । इस अंकसंदृष्टिके अनुसार अर्थ संदृष्टि भी समझना चाहिये, परन्तु अंकसंदृष्टिको ही अर्थसंदृष्टि नहीं समझना चाहिये। इसप्रकार सूक्ष्म निगोदियाके जघन्य अवगाहनास्थानोंसे सूक्ष्म वातकायकी जघन्य अव- गाहनापर्यन्त स्थानोंको बताकर तैजस्कायादिके अवगाहनास्थानोंके गुणाकारकी उत्पत्तिके क्रमको बताते हैं। एवं उपरि विणेओ पदेसवढिकमो जहाजोग्गं । सबत्थेकसि य जीवसमासाण विच्चाले ॥ १११॥ एवमुपर्यपि ज्ञेयः प्रदेशवृद्धिक्रमो यथायोग्यम् । सर्वत्रैकैकासिँच जीवसमासानामन्तराले ॥ १११ ॥ अर्थ-जिसप्रकार सूक्ष्म निगोदिया अपर्याप्त से लेकर सूक्ष्म अपर्याप्त वातकायकी जघन्य अवगाहना पर्यन्त प्रदेश वृद्धिके क्रमसे अवगाहनाके स्थान वताये, उसही प्रकार भागे - ४७ . गोम्मटसार। भी तेजस्कायिकसे लेकर पर्याप्त पञ्चेन्द्रियकी उत्कृष्ट भवगाहना पर्यन्त सम्पूर्ण जीवसमासोंके प्रत्येक अन्तरालमें प्रदेशवृद्धिक्रमसे अवगाहनास्थानोंको समझना चाहिये। उक्त सम्पूर्ण अवगाहनाके स्थानों में किसमें किसका अन्तर्भाव होता है इसको मत्स्यरच- नाक द्वारा सूचित करते हैं। हेटा जेसि जहण्णं उबरि उकस्सयं हवे जत्थ । तत्थंतरगा सधे तेसिं उग्गाहणविअप्पा ॥ ११२ ॥ अधस्तनं येषां जघन्यमुपयुत्कृष्टकं भवेधन । तत्रान्तरगाः सर्वे तेषामवगाहनविकल्पाः ॥ ११२ ॥ अर्थ-जिन जीवोंकी प्रथम जघन्य अवगाहनाका और अनन्तर उत्कृष्ट अवगाहनाका जहां २ पर वर्णन किया गया है उनके मध्यमें जितने भेद हैं उन सबका मध्यके भेदोंमें अन्तर्भाव होता है। भावार्थ-जिनके अवगाहनाके विकल्प अल्प है उनका प्रथम विन्यास करना, और जिनकी अवगाहनाके विकल्प अधिक है उनका विन्यास पीछे करना । जिसके जहासे जहांतक अवगाहना स्थान हैं उनका वहाँसे वहांतक ही विन्यास करना चाहिये । ऐसा करनेसे मत्स्यका आकार होजाता है । इस मत्स्यरचनासे किस जीवके कितने अवगा- हनाके स्थान हैं और कहांसे कहांतक हैं यह प्रतीत होजाता है। इसप्रकार स्थान योनि तथा शरीरकी अवगाहनाके निमित्तसे जीवसमासका वर्णन करके कुलोंके द्वारा जीवसमासका वर्णन करते है। वावीस सत्त तिषिण य सत्त य कुलकोडिसयसहस्साई । णेया पुढविदगागणि वाउकायाण परिसंखा ॥ ११३॥ द्वाविंशतिः सप्त त्रीणि च सप्त च कुलकोटिशतसहस्राणि । ज्ञेया पृथिवीदकाग्निवायुकायकानां परिसंख्या ॥ ११३ ॥ अर्थ-पृथिवीकायके बाईस लाख कुलकोटि है, । जलकायके सात लाख कुलकोटि है। अमिकायके तीन लाख कुलकोटि हैं। और वायुकायके सात लाख कुलकोटि हैं । भावार्थ- शरीरके भेदको कारणभूत नोकर्मवर्गणाके भेदको कुल कहते है । ये कुल क्रमसे पृथिवी- कायके वाईस लाख कोटि, जलकायके सात लाख कोटि, अमिकायके तीन लाख कोटि, और वायुकायके सात लाख कोटि समझने चाहिये। अद्धत्तेर सवारस दसयं कुलकोडिसदसहस्साई। जलचरपक्खिचउप्पय उरपरिसप्पेसु णव होति ॥ ११४ ॥ अर्द्धत्रयोदश द्वादश दशकं कुलकोटिशतसहस्राणि । जलचरपक्षिचतुष्पदोपरिसर्वेषु नव भवन्ति ॥ ११४ ॥ .
रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । अर्थ-जलचरोंके कुल सादेवारह लाख कोटि, पक्षियोंके वारह लाख कोटि, पशुओंके दश लाख कोटि, छातीके सहारे चलनेवाले जीव दुमुही आदिके नव लाख कोटि कुल है। छप्पंचाधियवीसं बारसकुलकोडिसदसहस्साई। सुरणेरइयणराणं जहाकम होति याणि ॥ ११५ ॥ पटपञ्चाधिकविंशतिः द्वादश कुलकोटिशतसहस्राणि । सुरनैरयिकनराणां यथाक्रम भवन्ति ज्ञेयानि ।। ११५ ॥ अर्थ-देव नारकी तथा मनुष्य इनके कुल क्रमसे छब्बीस लाख कोटि, पच्चीस लाख कोटि, तथा वारह लाख कोटि है। पूर्वोक्तप्रकारसे भिन्न २ जीवोंके कुलोंकी संख्याको बताकर सबका जोड़ कितना है यह बताते है। एया य कोडिकोडी सत्ताणउदीय सदसहस्साई। पण्णं कोडिसहस्सा सवंगीणं कुलाणं य ॥ ११६ ॥ एका च कोटिकोटी सप्तनवतिश्च शतसहस्राणि । पञ्चाशत्कोटिसहस्राणि सर्वाङ्गिनां कुलानां च ॥ ११६ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण जीवोंके समस्त कुलोंकी संख्या, एक कोडाकोड़ि सतानवे लाख तथा पचास हजार कोटि है। भावार्थ-सम्पूर्ण कुलोंकी संख्या एक कोड़ि सतानवे लाख पचास हजारको एककोटिसे गुणनेपर जितना लब्ध आवे उतनी है । अर्थात् १९७५०० ०००००० प्रमाण है। इसप्रकार स्थान योनि देहावगाहना तथा कुलके द्वारा जीवसमास नामक दूसरे अधि- कारका वर्णन किया। इति जीवसमासप्ररूपणो नाम द्वितीयोऽधिकार। 1 इसके अनन्तर तीसरे पर्याप्तिनामक अधिकारका प्रतिपादन करते है। जह पुण्णापुण्णाई गिहघडवत्थादियाई दवाई। तह पुण्णिदरा जीवा पजत्तिदरा सुणेयवा ॥ ११७ ॥ यथा पूर्णापूर्णानि गृहघटवस्त्रादिकानि द्रव्याणि । तथा पूर्णेतरा जीवाः पर्याप्ततरा मन्तव्याः ॥ ११७ ।। अर्थ-जिसप्रकार घर घट वस्त्र आदिक अचेतन द्रव्य पूर्ण और अपूर्ण दोनों प्रकारके होते है। उस ही प्रकार जीव भी पूर्ण और अपूर्ण दो प्रकारके होते है। जो पूर्ण हैं उनको पर्याप्त और जो अपूर्ण है उनको अपर्याप्त कहते है। भावार्थ-गृहीत आहारवर्गणाको खल- रस भागादिरूप परिणमानेकी जीवकी शक्तिके पूर्ण होजानेको पर्याप्ति कहते हैं । यह ।
गोम्मटसार। ४९ पर्याप्ति जिनके पाई जाय उनको पर्याप्त, और जिनकी वह शक्ति पूर्ण नहीं हुई है उन जीवोंको अपर्याप्त कहते हैं । जिसप्रकार घटादिक द्रव्य वनचुकनेपर पूर्ण और उससे पूर्व अपूर्ण कहे जाते है । इसही प्रकार पर्याप्ति सहितको पर्याप्त और पर्याप्ति रहितको अपर्याप्त कहते हैं। पर्याप्तिके छह भेद तथा उनके खामियोंका नाम निर्देश करते है। आहारसरीरिदियपज्जती आणपाणमासमणो। चत्तारि पंच छप्पि य एइंदियवियलसण्णीणं ॥ ११८॥ आहारशरीरेन्द्रियाणि पर्याप्तयः आनप्राणभाषामनान्सि । चतस्रः पञ्च षडपि च एकेन्द्रियविकलसंज्ञिनाम् ॥ ११८॥ अर्थ-आहार शरीर इन्द्रिय श्वासोच्छास भाषा मन इस प्रकार पर्याप्तिके छह भेद हैं। जिनमें एकेन्द्रिय जीवोंके आदिकी चार पर्याप्ति, और द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय तथा असं- ज्ञिपंचेन्द्रियके मनःपर्याप्तिको छोड़कर शेष पाच पर्याप्ति होती है। और सज्ञि जीवोंके सभी पर्याप्ति होती है। भावार्थ-एक शरीरको छोड़कर नवीन शरीरको कारणभूत जिस नोकर्म- वर्गणाको जीव ग्रहण करता है उसको खल रस भागरूप परिणमावनेकेलिये जीवकी शक्तिके पूर्ण होजानेको आहारपर्याप्ति कहते है। और खलमागको हड्डी आदि कठोर अवयवरूप तथा रसभागको खून आदि द्रव (नरम ) अवयवरूप परिणमावनेकी शक्तिके पूर्ण होनेको शरीरपर्याप्ति कहते है। तथा उस ही नोकर्मवर्गणाके स्कन्धमेंसे कुछ वर्गणाओंको अपनी २ इन्द्रियके स्थानपर उस उस द्रव्येन्द्रियके आकार परिणमावनेकी शक्तिके पूर्ण होजानेको इन्द्रियपर्याप्ति कहते है । इसही प्रकार कुछ स्कन्धोंको श्वासोच्छ्रासरूप परिणमावनेकी जो जीवकी शक्तिकी पूर्णता उसको श्वासोच्छ्रास पर्याप्ति कहते हैं। और वचनरूप होने के योग्य पुद्गल स्कन्धोंको (भाषावर्गणाको) वचनरूप परिणमावनेकी जीवकी शक्तिके पूर्ण होनेको भाषापति कहते है । तथा द्रव्यमनरूप होनेको योग्य पुद्गलस्कन्धोंको (मनोवर्गणा) द्रव्य- मनके आकार परिणमावनेकी शक्तिके पूर्ण होनेको मनःपर्याति कहते है। इन छह पर्या- तियोंमेंसे एकेन्द्रिय जीवोंके आदिकी चार पर्याप्ति ही होती है। और द्वीन्द्रियसे लेकर असं- जिपंचेन्द्रिय पर्यन्त मनःपर्याप्तिको छोड़कर पांच पर्याप्ति होती है। और संज्ञि जीवोंके सभी पर्याप्ति होती है। जिन जीवोंकी पर्याप्ति पूर्ण हो जाती है उनको पर्याप्त, और जिनकी पूर्ण नहीं होती उनको अपर्याप्त कहते हैं । अपर्याप्त जीवोंके भी दो भेद है-एक निर्व- त्यपर्याप्त दूसरा लब्ध्यपर्याप्त । जिनकी पर्याप्ति अभीतक पूर्ण नहीं हुई है। किन्तु अन्तर्मु- इतके वाद नियमसे पूर्ण होजायगी उनको निर्वृत्त्यपर्याप्त कहते है। और जिसकी अभीतक भी पर्यासि पूर्ण नहीं हुई और पूर्ण होनेसे प्रथम ही जिसका मरण भी होनायगा-अर्थात् अपनी आयुके कालमें जिसकी पर्याप्ति कभी पूर्ण न हो उसको लध्यपर्याप्तक कहते है। गो. ७ 7 रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । इन पर्याप्तियों से प्रत्येक तथा समस्तके प्रारम्भ और पूर्ण होनेमें कितना काल लगता है यह बताते है। पजत्तीपट्टवणं जुगवं तु कमेण होदि णिवणं । अंतोमुहुत्तकालेणहियकमा तचियालावा ॥ ११९ ।। पर्याप्तिप्रस्थापनं युगपत्तु क्रमेण भवति निष्ठापनम् । अन्तर्मुहूर्तकालेन अधिकक्रमास्तावदालापात् ।। ११९ ।। अर्थ-सम्पूर्ण पर्याप्तियों का आरम्भ तो युगपत् होता है; किन्तु उनकी पूर्णता क्रमसे होती है।इनका काल यद्यपि पूर्व २ की अपेक्षा उत्तरोत्तरका कुछ २ अधिक है। तथापि सामान्यकी अपेक्षा सबका अन्तर्मुहुर्तमात्र ही काल है। भावार्थ-एकसाथ सम्पूर्ण पर्याप्तियोंके प्रारम्भ होनेके अनन्तर अन्तर्मुहूर्त कालमें आहारपर्याप्ति पूर्ण होती है । और उससे संख्यातभाग अधिक कालमें शरीर पर्याप्ति पूर्ण होती है । इस ही प्रकार आगे २ की पर्याप्तिके पूर्ण होने में पूर्व २ की अपेक्षा कुछ २ अधिक २ काल लगता है, तथापि वह अन्तर्मुहूर्तमान ही है। क्योंकि असंख्यात समयप्रमाण अन्तर्मुहूर्तके भी असख्यात भेद है; क्योंकि असंख्यातके भी असंख्यात भेद होते है। इस लिये सम्पूर्ण पर्याप्तियोंके समुदायका काल भी अन्तर्मुहूर्तमात्र ही है। पर्याप्त और नित्यपर्याप्तका काल बताते है। पजत्तस्स य उदये णियणियपजत्तिणिहिदो होदि । जाव सरीरमपुण्णं णिवत्ति अपुण्णगो ताव ॥ १२०॥ पर्याप्तस्य च उदये निजनिजपर्याप्तिनिठितो भवति । यावत् शरीरमपूर्ण निर्वृत्यपूर्णकस्तावत् ॥ १२०॥ अर्थ-पर्याप्त नामकर्मके उदयसे जीव अपनी २ पर्याप्तियों से पूर्ण होता है, तथापि जबतक उसकी शरीरपर्याप्ति पूर्ण नही होती तबतक उसको पर्याप्त नहीं कहते; किन्तु निर्वृत्यपर्याप्त कहते है । भावार्थ-इन्द्रिय श्वासोच्छ्रास भाषा और मन इन पर्याप्तियोंके पूर्ण नहीं होनेपर भी यदि शरीरपर्याप्ति पूर्ण होगई है तो वह जीव पर्याप्त ही है, किन्तु उससे पूर्व निर्वृत्यपर्याप्तक कहा जाता है । लब्ध्यपर्याप्तकका खरूप दिखाते है। उदये दु अपुण्णस्स य सगसगपजत्तियं ण णिवदि । अंतोमुहुत्तमरणं लद्धिअपजत्तगो सो दु॥ १२१ ॥ उदये तु अपूर्णस्य च स्वकस्वकपर्याप्तीननिष्ठापयति । अन्तर्मुहूर्तमरणं लब्ध्यपर्याप्तकः स तु ॥ १२१ ।। । - . -
गोम्मटसार।
अर्थ-अपर्याप्त नामकर्मके उदय होनेसे जो जीव अपने २ योग्य पर्याप्तियोंको पूर्ण न
करके अन्तर्मुहूर्तकालमें ही मरणको प्राप्त होजाय उसको लब्ध्यपर्याप्तक कहते है।
भावार्थ-जिन जीवोंका अपर्याप्त नामकर्मके उदयसे अपने २ योग्य पर्याप्तियोंको पूर्ण न
करके अन्तर्मुहूर्तमें ही मरण होजाय उनको लब्ध्यपर्याप्तक कहते हैं । इस गाथामें जो
तु शब्द पडा है उससे इस प्रकारके जीवोंका अन्तर्मुहूर्त में ही मरण होता है, और दूसरे
चकारसे इन जीवोंकी जघन्य और उत्कृष्ट दोंनो ही प्रकारकी स्थिति अन्तर्मुहूर्तमान है,
ऐसा समझना चाहिये । यह अन्तर्मुहूर्त एक श्वासके अठारवें भागप्रमाण है । इस प्रकारके
लब्ध्यपर्याप्तक जीव एकेन्द्रियसे लेकर पंचेन्द्रिय पर्यन्त सबहीमें पाये जाते है।
यदि एक जीव एक अन्तर्मुहूर्तमें लब्ध्यपर्याप्तक अवस्थामे ज्यादेसे ज्यादे भवोंको
धारण करे तो कितने करसकता है? यह बताते है।
तिण्णिसया छत्तीसा छावद्विसहस्सगाणि मरणाणि ।
अन्तोमुहुत्तकाले तावदिया चेव खुहमवा ॥ १२२ ॥
त्रीणि शतानि पत्रिशत् षट्षष्टिसहस्रकाणि मरणानि ।
अन्तर्मुहूर्तकाले तावन्तश्चैव क्षुद्रभवाः ॥ १२२ ।।
अर्थ-एक अन्तर्मुहूर्तमें एक लब्ध्यपर्याप्तक जीव छयासठ हजार तीनसौ छत्तीस
मरण और इतने ही भवोंको (जन्म) भी धारण कर सकता है । भावार्थ-एक लब्ध्यप-
प्तिक जीव यदि निरन्तर भवोंको धारण करै तो ६६३३६ जन्म और इतने ही मरणोंको
धारण कर सकता है। अधिक नही करसकता।
उक्त भवों में एकेन्द्रियादिकमेंसे किसके कितने भवोंको धारण करता है यह बताते है।
सीदी सही तालं वियले चउवीस होति पंचक्खे।
छावट्टि च सहस्सा सयं च बत्तीसमयक्खे ॥ १२३ ॥
अशीतिः षष्टिः चत्वारिशद्विकले चतुर्विशतिर्भवन्ति पंचाक्षे ।
पटूपष्ठिश्च सहस्राणि शतं च द्वात्रिंशमेकाक्षे ॥ १२३ ॥
अर्थ-विकलेन्द्रियोंमें द्वीन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकके ८० भव, त्रीन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकके
६०, चतुरिन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकके ४० और पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकके २४, तथा एकेन्द्रि-
योंके ६६१३२ भवोंको धारण कर सकता है, अधिकको नहीं ।
एकेन्द्रियोंकी संख्याको स्पष्ट करते है।
पुढविदगागणिमारुदसाहारणथूलसुहमपचेया।
एदेसु अपुण्णेसु य एकेके वार खं छकं ॥ १२४ ॥
५२
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
पृथ्वीदकाग्निमारुतसाधारणस्थूलसूक्ष्मप्रत्येकाः ।
एतेषु अपूर्णेषु च एकैकस्मिन् द्वादश खं पट्कम् ।। १२४ ॥
अर्थ स्थूल और सूक्ष्म दोनोंही प्रकारके जो पृथ्वी जल अनि वायु और साधारण,
और प्रत्येक वनस्पति, इसप्रकार सम्पूर्ण ग्यारह प्रकारके लब्ध्यपर्याप्तकोंमेसे प्रत्येक (हर-
एक) के ६०१२ भेद होते है । भावार्थ-स्थूल पृथिवी सूक्ष्म पृथिवी स्थूल जल सूक्ष्म
जल स्थूल वायु सूक्ष्म वायु स्थूल अमि सूक्ष्म अमि स्थूल साधारण सूक्ष्म साधारण तथा
प्रत्येक वनस्पति इन ग्यारह प्रकारके लब्ध्यपर्याप्तकों से प्रत्येकके १०१२ भव होते हैं।
इसलिये ११ को ६०१२ से गुणा करनेपर एकेन्द्रिय लध्यपर्याप्तक जीवोंके उत्कृष्ट
भवोंका प्रमाण (६६१३२) निकलता है।
समुद्धात अवस्थामें केवलियोंके भी अपर्याप्तता कही है सो किस प्रकार हो सकती है
यह बताते हैं।
पजत्तसरीरस्स य पजतुदयस्स कायजोगस्स।
जोगिस्स अपुण्णत्तं अपुण्णजोगोत्ति णिहिटं ॥ १२५ ॥
पर्याप्तशरीरस्य च पर्याप्युदयस्य काययोगस्य ।
योगिनोऽपूर्णत्वमपूर्णयोग इति निर्दिष्टम् ॥ १२५ ॥
अर्थ-जिस सयोग केवलीका शरीर पूर्ण है, और उसके पर्याप्ति नाम कर्मका उदय
भी मौजूद है,तथा काययोग भी है, उसके अपर्याप्तता किसप्रकार हो सकती है। तो इसका
कारण योगका पूर्ण न होना ही बताया है। भावार्थ-जिसके अपर्याप्त नामकर्मका उदयहो,
अथवा जिसका शरीर पूर्ण न हुआ हो उसको अपर्याप्त कहते है। क्योंकि पहले "जाव
सरीरमपुण्णं णिव्वत्तिअपुण्णगो ताव" ऐसा कह आये है। अर्थात् जब तक शरीर पर्याति
पूर्ण न हो तब तककी अवस्थाको निर्वृत्यपर्याप्ति कहते हैं । परन्तु केवलीका शरीर भी
पर्याप्त है, और उनके पर्याप्ति नामकर्मका उदय भी है, तथा काययोग भी मौजूद है, तब
उसको अपर्याप्त क्यों कहा ? इसका कारण यह है कि यद्यपि उनके काययोग आदि सभी
मौजूद है, तथापि उनके कपाट, प्रतर, लोकपूर्ण तीनोंही समुद्धात अवस्थामें योग पूर्ण
नहीं है, इस ही लिये उनको आगममें गौणतासे अपर्याप्त कहा है। मुख्यतासे अपर्याप्त
अवस्था जहापर पाई जाती है ऐसे प्रथम द्वितीय चतुर्थ और छहा ये चार ही
गुणस्थान हैं।
किस २ गुणस्थानमें पर्याप्त और अपर्याप्त अवस्था पाई जाती हैं ? यह बताते हैं।
लद्धिअपुण्णं मिच्छे तत्थवि विदिये चउत्थछट्टे य ।
णिवत्तिअपजत्ती तत्थवि सेसेसु पजनी ॥ १२६ ॥
गोम्मटसार। ५३. लब्ध्यपूर्ण मिथ्यात्वे तत्रापि द्वितीये चतुर्थषष्ठे च । निवृत्त्यपर्याप्तिः तत्रापि शेषेषु पर्याप्तिः ॥ १२६ ॥ अर्थ लब्ध्यपर्याप्तक मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही होते है । निर्वृत्यपर्याप्तक प्रथम द्वितीय चतुर्थ और छट्टे गुणस्थानमें होते है । और पर्याप्ति उक्त चारो और शेष सभी गुणस्थानोंमें पाई जाती है। भावार्थ-प्रथम गुणस्थानमें लब्ध्यपर्याप्ति निर्वृत्यपर्याप्ति पर्याप्ति तीनों अवस्था होती हैं । सासादन असंयत और प्रमत्तमें निर्वृत्यपर्याप्त पर्याप्त ये दो अवस्था होती है। उक्त तथा शेष सब ही गुणस्थानों में पर्याप्ति पाई जाती है । प्रमत्त गुणस्थानमें जो निर्वृत्यपर्याप्त अवस्था कही है, वह आहारक मिश्रयोगकी अपेक्षासे है । इस गाथामें जो च शब्द पड़ा है उससे सयोगकेवली भी नित्यपर्याप्तक होते है यह वात गौणतया सूचित की है। सासादन और सम्यक्त्वके अभावका नियम कहां २ पर है यह बताते हैं । हेहिमछप्पुढवीणं जोइसिवणभवणसघइत्थीणं । पुण्णिदरे णहि सम्मो ण सासणो णारयापुण्णे ॥ १२७ ॥ अधःस्तनपटूपृथ्वीनां ज्योतिप्कवनभवनसर्वस्त्रीणाम् । पूर्णेतरस्मिन् न हि सम्यक्त्वं न सासनो नारकापूर्णे ॥ १२७ ॥ अर्थ-द्वितीयादिक छह नरक और ज्योतिषी व्यन्तर भवनवासी ये तीन प्रकारके देव, तथा सम्पूर्ण स्त्रिया इनकी अपर्याप्त अवस्थामें सम्यक्त्व नहीं होता । और सासादन सम्यग्दृष्टी अपर्याप्त नारकी नहीं होता । भावार्थ-सम्यक्त्वसहित जीव मरण करके द्वितीयादिक छह नरक ज्योतिषी व्यन्तर भवनवासी देवोंमें और समग्र स्त्रियोंमें उत्पन्न नहीं होता। और सासादनसम्यग्दृष्टि मरण कर नरकको नहीं जाता। इति पर्याप्तिप्ररूपणो नाम तृतीयोऽधिकारः। अब प्राणप्ररूपणा क्रमप्राप्त है उसमें प्रथम प्राणका निरुक्तिपूर्वक लक्षण कहते हैं। बाहिरपाणेहिं जहा तहेव अभंतरेहिं पाणोहिं। पाणंति जेहिं जीवा पाणा ते होंति णिहिट्ठा ॥ १२८ ॥ बाबपाणैर्यथा तथैवाभ्यन्तरैः प्राणैः। प्राणन्ति यैर्जीवा: प्राणास्ते भवन्ति निर्दिष्टाः ॥ १२८ ॥ अर्थ-जिस प्रकार अभ्यन्तरमाणों के कार्यभूत नेत्रोका खोलना, वचनप्रवृत्ति, उच्छास निःश्वास आदि बाह्य प्राणोंके द्वारा जीव जीते है, उसही प्रकार जिन अभ्यन्तर इन्द्रिया- बरणकर्मके क्षयोपशमादिके द्वारा जीवमे जीवितपनेका व्यवहार हो उनको प्राण कहते है । भावार्थ-जिनके सद्भावमें जीवमें जीवितपनेका और वियोग होनेपर मरणपनेका व्यवहार रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । हो उनको प्राण कहते है । ये प्राण पूर्वोक्त पर्याप्तियोंके कार्यरूप हैं-अर्थात् प्राण और पर्याप्तिमें कार्य और कारणका अन्तर है । क्योंकि गृहीत पुद्गलस्कन्ध विशेषोंको इन्द्रिय वचन आदिरूप परिणमावनेकी शक्तिकी पूर्णताको पर्याप्ति, और वचन व्यापार आदिकी कारणभूत शक्तिको, तथा वचन आदिको प्राण कहते है । प्राणके भेदोंको गिनाते है। पंचवि इंदियपाणा मणवचिकायेसु तिणि वलपाणा। आणापाणप्पाणा आउगपाणेण होति दस पाणा ॥ १२९ ॥ पश्चापि इन्द्रियप्राणाः मनोवचःकायेपु त्रयो बलप्राणाः । आनापानप्राणा आयुष्कप्राणेन भवन्ति दश प्राणाः ॥ १२९ ॥ अर्थ-पांच इन्द्रियप्राण-स्पर्शन रसन घ्राण चक्षुः श्रोत्र । तीन बलप्राण-मनोबल वचनबल कायबल । श्वासोच्छास तथा आयु इस प्रकार ये दश प्राण हैं। द्रव्य और भाव दोनोंही प्रकारके प्राणोंकी उत्पत्तिकी सामग्री बताते हैं। वीरियजुदमदिखउवसमुत्था णोइंदिये दियेसु वला । देहुदये कायाणा वचीवला आउ आउदये ॥ १३० ॥ वीर्ययुतमतिक्षयोपशमोत्था नोइन्द्रियेन्द्रियेपु बलाः । देहोदये कायानौ वचोबल आयुः आयुरुदये ॥ १३०॥ अर्थ-मनोबल प्राण और इन्द्रिय प्राण वीर्यान्तराय कर्म और मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयो- पशम रूप अन्तरङ्ग कारणसे उत्पन्न होते है । शरीरनामकर्मके उदयसे कायबलप्राण होता है। श्वासोच्छ्रास और शरीरनामकर्मके उदयसे प्राण-श्वासोच्छ्रास उत्पन्न होते हैं । खरनाम- कर्मके साथ शरीर नामकर्मका उदय होनेपर वचनबल प्राण होता है। आयुःकर्मके उदयसे आयुःप्राण होता है। भावार्थ-वीर्यान्तराय और अपने २ मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे उत्पन्न होनेवाले मनोबल और इन्द्रियप्राण, निज और पर पदार्थको ग्रहण करनेमें समर्थ लब्धिनामक भावेन्द्रिय रूप होते है । इस ही प्रकार अपने २ पूर्वोक्त कारणसे उत्पन्न होनेवाले कायबलादिक प्राणोंमें शरीरकी चेष्टा उत्पन्न करनेकी सामर्थ्यरूप कायबलप्राण, श्वासोच्छासकी प्रवृत्तिमें कारणभूत शक्तिरूप श्वासोच्छास प्राण, वचनव्यापारको कारण- भूत शक्तिरूप वचोबल प्राण, नरकादि भव धारण करनेकी शक्तिरूप आयुःप्राण होता है। प्राणोंके खामियोंको बताते है। ऊणि य पुण्णापुण्णेसु पुण्णगे आणा। यचीमणो सण्णिपुण्णेव ॥ १३१ ॥ - .
गोम्मटसार। , इन्द्रियकाया!पि च पूर्णापूर्णेपु पूर्णके आनः । द्वीन्द्रियादिपूर्णे वचः मनः संज्ञिपूर्णे एव ॥ १३१ ॥ ' अर्थ-इन्द्रिय काय आयु ये तीन प्राण, पर्याप्त और अपर्याप्त दोनोंही के होते हैं। किन्तु श्वासोच्छास पर्याप्तके ही होता है । और वचनबल प्राण पर्याप्त द्वीन्द्रियादिके ही होता है । तथा मनोवल प्राण सज्ञिपर्याप्तकके ही होता है । एकेन्द्रियादि जीवोमें किसके कितने प्राण होते है इसका नियम बताते है । दस सण्णीणं पाणा सेसेगुणंतिमस्स घेऊणा। पजत्तेसिदरेसु य सत्त दुगे सेसगेगूणा ॥ १३२ ॥ दश संज्ञिनां प्राणाः शेपैकोनमन्तिमस्य ब्यूनाः । पर्याप्त वितरेपु च सप्त द्विके शेपकैकोनाः ॥ १३२ ॥ अर्थ-पर्याप्त संज्ञिपंचेन्द्रियके दश प्राण होते है । शेषके पर्याप्तकोंके एक २ प्राण कम होता जाता है। किन्तु एकेन्द्रियोके दो कम होते है । अपर्याप्तक सज्ञि और असज्ञी पंचेन्द्रियके सात प्राण होते है और शेपके अपर्याप्त जीवोके एक २ प्राण कम होता जाता है । भावार्थ-पर्याप्त संज्ञिपंचेन्द्रियके सबही प्राण होते हैं । असंज्ञिके मनो- बलप्राणको छोड़कर वाकी नव प्राण होते है । चतुरिन्द्रियके श्रोत्रन्द्रियको छोड़कर आठ, और त्रीन्द्रियके चक्षुको छोड़कर बाकी सात, द्वीन्द्रियके प्राणको छोड़कर बाकी छह, और एकेन्द्रियके रसनेन्द्रिय तथा वचनबलको छोड़कर बाकी चार प्राण होते हैं। यह सम्पूर्ण कथन पर्याप्तककी अपेक्षासे है । अपर्याप्तकमें कुछ विशेषता है । वह इस प्रकार है कि संज्ञि और असंज्ञि पंचेन्द्रियके श्वासोच्छास वचोबल मनोबलको छोड़कर बाकी पाच इन्द्रिय कायवल आयुःप्राण इसप्रकार सात प्राण होते है। आगे एक २ कम होता गया है-अर्थात् चतुरिन्द्रियके श्रोत्रको छोड़कर बाकी ६ प्राण, त्रीन्द्रियके चक्षुः को छोड़कर ५, और द्वीन्द्रियके प्राणको छोड़कर ४, तथा एकेन्द्रियके रसनाको छोड़कर बाकी तीन प्राण होते हैं। इति प्राणप्ररूपणो नाम चतुर्थोऽधिकारः। । इह जाहि वाहियावि य जीवा पार्वति दारुणं दुक्खं । सेवंताविय उभये ताओ चत्वारि सण्णाओ॥१३३ ॥ इह यामिर्वाधिता अपि च जीवाः प्रामुवन्ति दारुणं दुःखम् । सेवमाना अपि च उभयस्मिन् ताश्चतस्त्रः संज्ञाः ॥ १३३ ॥ अर्थ-जिनसे संकशित होकर जीव इस लोकमें और जिनके विषयका सेवन करनेसे दोनो ही भवोंमें दारुण दुःखको प्राप्त होता है उनको संज्ञा कहते है । उसके चार भेद हैं।
1 ५६ रायचन्द्रजैनशानमालायाम् । भावार्थ-संज्ञानाम वांछाका है, जिसके निमित्तसे दोनोंही भवोंमें दारुण दुःखकी प्राप्ति होती है उस वांछाको संज्ञा कहते है। उसके चार भेद हैं, आहारसंज्ञा भयसंज्ञा मैथुनसंज्ञा परिग्रहसंज्ञा। आहारसंज्ञाका खरूप बताते हैं। आहारदसणेण य तस्सुवजोगेण ओमकोठाए । सादिदरुदीरणाए हवदि हु आहारसण्णा हु॥१३४ ॥ आहारदर्शनेन च तस्योपयोगेन अवमकोष्ठया । सातेतरोदीरणया भवति हि आहारसंज्ञा हि ॥ १३४ ।। अर्थ--आहारके देखनेसे अथवा उसके उपयोगसे और पेटके खाली होनेसे तथा असातावेदनीयके उदय और उदीर्णा होनेपर जीवके नियमसे आहारसंज्ञा उत्पन्न होती है। भावार्थ-किसी उत्तम रसयुक्त आहारके देखनेसे अथवा पूर्वानुभूत भोजनका सरण करनेसे यद्वा पेटके खाली होजानेसे और असाता वेदनीयके उदय और उदीर्णासे इत्यादि और भी अनेक कारणोंसे आहारसंज्ञा अर्थात् आहारकी वान्छा उत्पन्न होती है। भयसंज्ञाके कारण और उसका खरूप बताते है। अइभीमदसणेण य तस्सुवजोगेण ओमसत्तीए । भयकम्मुदीरणाए भयसण्णा जायदे चदुहि ॥ १३५ ॥ अतिभीमदर्शनेन च तस्योपयोगेन अवमसत्त्वेन । भयकर्मोदीरणया भयसंज्ञा जायते चतुभिः ॥ १३५॥ अर्थ-अत्यन्त भयंकर पदार्थके देखनेसे, अथवा पहले देखे हुए भयंकर पदार्थ मरणादिसे, यद्वा शक्तिके हीन होनेपर, और अंतरंगमें भयकर्मकी उदय उदीर्णा होनेप इत्यादि कारणोंसे भयसंज्ञा होती है। मैथुनसंज्ञाको बताते है। पणिदरसमोयणेण य तस्सुवजोगे कुसीलसेवाए। वेदस्सुदीरणाए मेहुणसण्णा हवदि एवं ॥ १३६ ॥ प्रणीतरसभोजनेन च तस्योपयोगे कुशीलसेवया । वेदस्योदीरणया मैथुनसंज्ञा भवति एवम् ॥ १३६ ॥ अर्थ-खादिष्ट और गरिष्ठ रसयुक्त भोजन करनेसे, और पहले मुक्त विषयोंका मरण आदि करनेसे, तथा कुशीलका सेवन करनेसे और वेद कर्मका उदय उदीर्णा आदिसे मैथुनसंज्ञा होती है। परिग्रह संज्ञाका वर्णन करते हैं। उवयरणसणेण य तस्सुवजोगेण मुच्छिदाए य । लोहस्सुदीरणाए परिम्गहे जायदे सण्णा ॥ १३७ ॥ .
गोम्मटसारः। उपकरणदर्शनेन च तस्योपयोगेन मूञ्छिताये च । लोभस्योदीरणया परिग्रहे जायते संज्ञा ॥ १३७ ॥ अर्थ-इत्र भोजन उत्तम वस सी आदि भोगोपभोगके साधनभूत पदार्थोके देखनेसे, अथवा पहले भुक्त पदार्थोंका सरण करनेसे, और ममत्व परिणामोंके होनेसे, लोमकर्मका उदय उदीर्णा होनेसे, इत्यादि कारणोंसे परिग्रहसंज्ञा उत्पन्न होती है। किस जीवके कौनसी संज्ञा होती है यह बताते है। णठपमाए पढमा सण्णा णहि तत्थ कारणाभावा । सेसा कम्मस्थित्तेणुवयारेणत्थि णहि कजे ॥ १३८ ॥ नष्टप्रमादे प्रथमा संज्ञा न हि तत्र कारणाभावात् । शेपाः कर्मास्तित्वेनोपचारेण सन्ति न हि कार्ये ॥ १३८॥ अर्थ----अप्रमत गुणस्थानमें आहारसंज्ञा नही होती, क्योंकि यहापर उसका कारण असातवेदनीय कर्मका उदय नही है। और शेषकी तीन संज्ञा उपचारसे वहांपर होती है। क्योंकि उनका कारण कर्म वहांपर मौजूद है। किन्तु उनका कार्य वहांपर नहीं होता। भावार्थ-साता असाता वेदनीय और मनुष्य आयु इन तीन प्रकृतियोंकी उदीरणा प्रमत्तवि- रतमें ही होती है-आगे नहीं । इसलिये सातवें गुणस्थानमें आहारसंज्ञा नहीं है। किन्तु शेष तीन संज्ञा उपचारसे होती है, वास्तविक नही। क्योंकि उनका कारणभूत कर्म वहापर है। किन्तु भागना रतिक्रीडा परिग्रहखीकार आदिमें प्रवृत्तिरूप उनका कार्य नहीं है। क्योंकि वहांपर ध्यान अवस्था ही है। अन्यथा कभी भी ध्यान न हो सकेगा, और कर्मोंका क्षय तथा मुक्तिकी प्राप्ति भी नही होसकेगी। इति संज्ञानरूपणो नाम पञ्चमोऽधिकारस। अथ मङ्गलपूर्वक क्रमप्राप्त मार्गणा महाधिकारको कहते हैं। धम्मगुणमग्गणाहयमोहारिवलं जिणं णमंसित्ता । मग्गणमहाहियारं विविहहियारं भणिस्सामो ॥१३९ ॥ धर्मगुणमार्गणाहतमोहारिवलं जिनं नमसित्वा । मर्गणामहाधिकारं विविधाधिकारं भणिष्यामः ॥ १३९॥ अर्थ-सम्यग्दर्शनादि अथवा उत्तमक्षमादि धर्मरूपी धनुष, और ज्ञानादि गुणरूपी प्रत्यंचा (डोरी), तथा चौदह मार्गणारूपी वाणोंसे जिसने मोहरूपी शत्रुके बलको नष्ट करदिया है इसप्रकारके जिनेन्द्रदेवको नमस्कार करके, मार्गणा महाधिकारको जिसमें कि और भी अनेक अधिकारोंका अन्तर्भाव होता है, वर्णन करूंगा। गो.
५८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । इसप्रकार मार्गणानिरूपणकी प्रतिज्ञा करके प्रथम उसका (मार्गणा) निरुक्तिपूर्वक लक्षण कहते है। जाहि व जासु व जीवा मग्गिजते जहा तहा दिहा। ताओ चोदस जाणे सुयणाणे मग्गणा होति ॥ १४० ॥ यामिर्वा यासु वा जीवा मृग्यन्ते यथा तथा दृष्टाः । ताश्चतुर्दश जानीहि श्रुतज्ञाने मार्गणा भवन्ति ॥ १४०॥ अर्थ-जिसप्रकारसे प्रवचनमें देखेगये हों उसही प्रकारसे जीवादि पदार्थोंका जिन भावोंके द्वारा अथवा जिन पर्यायोंमें विचार किया जाय वे ही मार्गणा है । ऐसा समझना चाहिये । उनके चौदह भेद है। चोदह मार्गणाओंके नाम बताते हैं। गइइंदियेसु काये जोगे वेदे कसायणाणे य । संजमदंसणलेस्साभवियासम्मत्तसण्णिआहारे ॥ १४१॥ गतीन्द्रियेषु काये योगे वेदे कपायज्ञाने च । संयमदर्शनलेश्याभव्यतासम्यक्त्वसंझ्याहारे ॥ १४१ ॥ अर्थ-गति इन्द्रिय काय योग वेद कषाय ज्ञान सयम दर्शन लेश्या भव्य सम्यक्त्व सज्ञा आहार । ये चौदह मार्गणा है । अन्तरमार्गणाओंके भेद, तथा उनके कालका नियम बताते हैं । उबसमसुहमाहारे वेगुधियमिस्सणरअपजत्ते । सासणसम्मे मिस्से सांतरगा मग्गणा अट्ठ॥१४२ ॥ उपशमसूक्ष्माहारे वैगूर्विकमिश्नरापर्याप्ते । सासनसम्यक्त्वे मिश्रे सान्तरका मार्गणा अष्ट ॥ १४२ ॥ अर्थ-उपशमसम्यक्त्व सूक्ष्मसांपराय आहारकयोग आहारकमिश्रयोग वैक्रियिकमिश्र अपर्यास मनुष्य सासादनसम्यक्त्व मिश्र ये आठ अन्तरमार्गणा है । उक्त आठ अन्तरमार्गणाओंका उत्कृष्ट और जघन्य काल बताते है । सत्चदिणा छम्मासा वासपुधत्तं च बारसमुहुत्ता। पल्लासंखं तिण्डं वरमवरं एगसमयो दु॥ १४३॥ सप्तदिनानि पण्मासा वर्षपृथक्त्वं च द्वादशमुहूर्ताः । पल्यासंख्यं त्रयाणां वरमवरमेकसमयस्तु ॥ १४३ ॥ अर्थ-उक्त आठ अन्तर मार्गणाओंका उत्कृष्ट काल क्रमसे सात दिन छह महीना - J गोम्मटसारः। ५९ पृथक्त्व वर्ष पृथक्त्व वर्ष वारहमुहूर्त और अन्तकी तीन मार्गणाओंका काल पल्यके असंख्या- तवें भाग है। और जघन्य काल सवका एक समय है। भावार्थ-उपशम सम्यक्त्वका उत्कृष्ट काल सात दिन, सूक्ष्मसापरायका छह महीना, आहारकयोगका पृथक्त्ववर्ष, तथा आहारक- मिश्रका पृथक्त्ववर्ष, वैक्रियिकमिश्रका बारह मुहूर्त, अपर्याप्त मनुष्यका पल्यके असंख्यातवें भाग, तथा सासादन सम्यक्त्व और मिश्र इन दोनोंका भी उत्कृष्ट अंतरकाल पल्यके असख्यातवें भाग है । और जघन्य काल सबका एक समय ही है। अंतरमार्गणाविशेपोंको दिखाते है। पढमुवसमसहिदाए विरदाविरदीए चोद्दसा दिवसा। विरदीए पण्णरसा विरहिदकालो दुबोधचो ॥ १४४ ॥ प्रथमोपशमसहिताया विरताविरतेश्चतुर्दश दिवसाः । विरतेः पञ्चदश विरहितकालस्तु वोद्धव्यः ॥ १४४ ॥ अर्थ-प्रथमोपशमसम्यक्त्वसहित पंचमगुणस्थानका उत्कृष्ट विरहकाल चौदह दिन, और छठे सातमें गुणस्थानका उत्कृष्ट विरहकाल पंद्रह दिन समझना चाहिये । भावार्थ-उपशम- सम्यक्त्वके दो भेद है, एक प्रथमोपशम सम्यक्त्व दूसरा द्वितीयोपशम - सम्यक्त्व । चार अनन्तानुबन्धी तथा एक दर्शनमोहनीय (मिथ्यात्व) के, अथवा तीनों दर्शनमोहनीय और चार अनंतानुबंधी, इस प्रकार पाच या सातके उपशमसे जो हो उसको प्रथमोपशम सम्यक्त्व कहते है । और अनन्तानुवन्धी चतुष्कका विसयोजन और दर्शनमोहनीयत्रिकका उपशम होनेसे जो सम्यक्त्व होता है उसको द्वितीयोपशम सम्यक्त्व कहते है। इनमेंसे प्रथमोपशम सम्यक्त्वसहित पंचमगुणस्थानका उत्कृष्ट विरहकाल चौदह दिन, और छढे सातवें गुणस्थानका पंद्रह दिन है। किन्तु जघन्य विरहकाल सर्वत्र एक समय ही है । गतिमार्गणाका प्रारम्भ करते हुए प्रथम गतिशब्दकी निरुक्ति और उसके भेदोंको गिनाते है गइउदयजपज्जाया चउगइगमणस्सहेउ वा हु गई। णारयतिरिक्खमाणुसदेवगइत्तिय हवे चदुधा ॥ १४५ ॥ गत्युदयजपर्यायः चतुर्गतिगमनस्य हेतुर्वा हि गतिः। नारकतिर्यग्मानुपदेवगतिरिति च भवेत् चतुर्धा ॥ १४५॥ अर्थ-गतिनाम कर्मके उदयसे होनेवाली जीवकी पर्यायको अथवा चारों गतियोंमें गमन करनेके कारणको गति कहते है । उसके चार भेद है, नरकगति तिर्यग्गति मनुष्य- गति देवगति ।
- ६० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गतिमार्गणामें कुछ विशेष (चारों गतियोंका पृथक् २) वर्णन पांच गाथाओं द्वारा करते है। ण रमंति जदो णिचं दवे खेत्ते य कालभावे य । अण्णोण्णेहि य जमा तसा ते णारया भणिया ॥ १४६ ॥ न रमन्ते यतो नित्यं द्रव्ये क्षेत्रे च कालभावे च। अन्योन्यैश्च यस्मात्तस्मात्ते नारता भणिताः ॥ १४६ ।। अर्थ-द्रव्य क्षेत्र काल भावमें खयं तथा परस्परमें प्रीतिको प्राप्त नहीं होते अतएव उनको नारत (नारकी) कहते है । भावार्थ-शरीर आर इन्द्रियके विषयोंमें, उत्पत्ति शयन विहार उठने बैठने आदिके स्थानमे, भोजन आदिके समयमें, अथवा और भी अनेक अवस्थाओं में जो खयं अथवा परस्परमें प्रीति ( सुख ) को प्राप्त न हों उनको नारत कहते हैं । इस गाथामें जो च शब्द पड़ा है उससे इसका दूसरा भी निरुक्तिसिद्ध अर्थ समझना चाहिये । अर्थात् जो नरकगतिनाम कर्मके उदयसे हों उनको, अथवा ( नरान् ) मनुप्योंको (कायन्ति ) क्लेश पहुंचावें उनको नारक कहते है । क्योंकि नीचे सातो ही भूमियों में रहनेवाले नारकी निरन्तर ही खाभाविक शारीरिक मानसिक आगन्तुक तथा क्षेत्रजन्य इन पांच प्रकारके दुःखोंसे दुःखी रहते है। तिर्यग्गतिका खरूप बताते है । तिरियंति कुडिलभावं सुविउलसण्णा णिगिट्ठिमण्णाणा । अचतपावबहुला तमा तेरिच्छया भणिया ॥ १४७॥ तिरोञ्चन्ति कुटिलभावं सुविवृतसंज्ञा निकृष्टमज्ञानाः । अत्यन्तपापवहुलास्तस्मात्तरश्चका भणिताः ॥ १४७ ॥ अर्थ-जो मन वचन कायकी कुटिलताको प्राप्त हों, अथवा जिनकी आहारादि विषयक सज्ञा दूसरे मनुष्योंको अच्छीतरह प्रकट हो, और जो निकृष्ट अज्ञानी हों, तथा जिनमें अत्यन्त पापका बाहुल्य पाया जाय उनको तिर्यच कहते है । भावार्थ-जिनमें कुटिलताकी प्रधानता हो; क्योंकि प्रायःकरके सबही तिर्यच जो उनके मनमें होता है उसको वचनद्वारा नहीं कहते; क्योंकि उनके उसप्रकारकी वचनशक्ति ही नहीं है, और जो वचनसे कहते है उसको कायसे नहीं करते, तथा जिनकी आहारादिसंज्ञा प्रकट हो, और श्रुतका अभ्यास तथा शुभोपयोगादिके न करसकनेसे जिनमें अत्यन्त अज्ञानता पाई जाय । तथा मनुष्यकी तरह महाव्रतादिकको धारण न करसकने और दर्शनविशुद्धि आदिके न होसकनेसे जिनमें अत्यन्त पापका बाहुल्य पाया जाय उनको तियेच कहते है। मनुष्यगतिका खरूप बताते है। मण्णंति जदो णिचं मणेण णिउणा मणुक्कडा जला। मण्णुब्भवा य सवे तसा ते माणुसा भणिदा ॥ १४८॥ 4 . .
गोम्मटसारः। मन्यन्ते यतो नित्यं मनसा निपुणा मनसोत्कटा यस्मात् । मनूद्भवाश्च सर्वे तस्मात्ते मानुपा भणिताः ॥ १४८॥ अर्थ-जो नित्य ही हेय उपादेय तत्व अतत्त्व धर्म अधर्मका विचार करें, और जो मनके द्वारा गुणदोषादिका विचार सरण आदि कर सकें, जो पूर्वोक्त मनके विषयमें उत्कृष्ट हों, तथा युगकी आदिमें जो मनुओंसे उत्पन्न हुए हों उनको मनुष्य कहते है। भावार्थ- मनका विषय तीव्र होनेसे गुणदोषादिका विचार मरण आदि जिनमें उत्कट रूपसे पाया जाय, तथा चतुर्थ कालकी आदिमें आदीश्वर भगवान् तथा कुलकरोंने उनको व्यव- हारका उपदेश दिया इसलिये जो आदीश्वर भगवान् अथवा कुलकरोंकी सतान कहे जाते है, उनको मनुष्य कहते है । इस गाथामें एक यतः शब्द है दूसरा यमात् शब्द है, अर्थ दोनोंका एक ही होता है, इसलिये एक शब्द व्यर्थ है; वह व्यर्थ पड़कर ज्ञापन करता है कि लन्ध्यपर्याप्तक मनुष्योंमें यद्यपि यह लक्षण घटित नहीं होता तथापि उनको मनुष्यगति नामकर्म और मनुष्य आयुकर्मके उदयमात्रकी अपेक्षासे ही मनुष्य कहते हैं ऐसा समझना चाहिये। तिर्यच तथा मनुप्योंके भेदोको गिनाते हैं। सामण्णा पंचिंदी पजत्ता जोणिणी अपज्जत्ता। तिरिया णरा तहावि य पंचिंदियभंगदो हीणा ॥ १४९ ॥ सामान्याः पंचेन्द्रियाः पर्याप्ताः योनिमत्यः अपर्याप्ताः । तिर्यञ्चो नरास्तथापि च पंचेन्द्रियभंगतो हीनाः ॥ १४९॥ अर्थ-तिर्यचौके पाच भेद है, सामान्यतियेच पंचेन्द्रियतियेच पर्याप्ततियेच योनिमती- तिर्यंच और अपर्याप्ततियच । इसही प्रकार मनुष्यके भी पचेन्द्रियके मंगको छोड़कर वाकी चार भेद होते है । भावार्थ-तियचोंमें पंचेन्द्रियके प्रतिपक्षी एकेन्द्रियादि जीवोंकी सम्भावना है इसलिये तिर्यंचोंमें पंचेन्द्रियके भंगसहित पाच भेद है, किन्तु मनुष्योंमें पंचेन्द्रियके प्रतिपक्षकी सम्भावना नहीं है इसलिये उनके सामान्यमनुष्य पर्याप्तमनुष्य योनिमती- मनुष्य अपर्याप्तमनुष्य इसप्रकार चार ही भेद होते है । देवोंका खरूप बताते है। दीचंति जदो णिचं गुणेहिं अटेहिं दिवभावहिं। भासंतदिचकाया तहा ते वणिया देवा ॥ १५॥ दीव्यन्ति यतो नियं गुणैरष्टाभिर्दिव्यभावैः । भासमानदिव्यकायाः तस्मात्ते वर्णिता देवाः ॥ १५०॥ अर्थ-जो देवगतिमें होनेवाले परिणामोंसे सदा सुखी रहते है । और अणिमा महिमा है . रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ६२ आदि आठ गुणों ( ऋद्धियों) के द्वारा सदा अप्रतिहतरूपसे विहार करते हैं। और जिनका रूप लावण्य यौवन आदि सदा प्रकाशमान रहे उनको परमागममें देव कहा इसप्रकार संसारसम्बन्धी चारों गतियांका खरूप बताकर अन ससारसे विलक्षण पांचमी सिद्धगतिका खरूप बताते है । जाइजरामरणभया संजोगविजोगदुक्खसण्णाओ। रोगादिगा य जिस्से ण संति सा होदि सिद्धगई॥ १५१ ॥ जातिजरामरणभयाः संयोगवियोगदुःखसंज्ञाः । रोगादिकाश्च यस्यां न सन्ति सा भवति सिद्धगतिः ॥ १५१ ।। अर्थ-पंचेन्द्रियादि जाति बुढ़ापा मरण भय अनिष्टसंयोग इष्टवियोग इनसे होनेवाला दुःख आहारादिविषयक सज्ञा (वाञ्छा) और रोगादिक जिस गतिमें नहीं पाये जाते उसको सिद्धगति कहते है । भावार्थ-एकेन्द्रियादि जाति, आयुःकर्मके घटनेसे शरीरके शिथिल होनेरूप जरा, आयुःकर्मके अभावसे होनेवाला प्राणत्यागरूप मरण, अनर्थकी आशंका करके अपकारक वस्तुसे भागनेकी इच्छारूप भय, क्लेशके कारणभूत अनिष्ट पदार्थ की प्राप्तिरूप सयोग, सुखके कारणभूत इष्ट पदार्थके दूर होनेरूप वियोग इत्यादि दुःख, और आहारसंज्ञा आदि तीनसज्ञा, (क्योंकि भयसज्ञाका पृथक् ग्रहण हो चुका है), खांसी आदि अनेक रोग, तथा आदिशब्दसे मानभंग वध बन्धन आदि दुःख जिस गतिमें अपने २ कारणभूत कर्मके अभाव होनेसे नहीं पाये जाते उसको सिद्धगति कहते है। गतिमार्गणामें जीवसंख्याका वर्णन करनेकी इच्छासे प्रथम नरकगतिमें जीवसंख्याका वर्णन करते है। सामण्णा जेरइया घणअंगुलविदियमूलगुणसेढी। विदियादि वारदसअडछत्तिदुणिजपदहिदा सेढी ॥१५२॥ सामान्या नैरयिका घनाङ्गुलद्वितीयमूलगुणश्रेणी। द्वितीयादिः द्वादशदशाष्टषत्रिद्विनिजपदहिता श्रेणी ।। १५२ ।। अर्थ-सामान्यसे सम्पूर्ण नारकियोंका प्रमाण धनाङ्गुलके दूसरे वर्गमूलसे गुणित जगच्छ्रेणी प्रमाण है । द्वितीयादि पृथिवियोंमें होनेवाले नारकियोंका प्रमाण क्रमसे अपने वारहमे दशमे आठमे छडे तीसरे दूसरे वर्गमूलसे भक्त जगच्छ्रेणीप्रमाण समझना चाहिये । भावार्थ-धनामुलके दूसरे वर्गमूलका जगच्छ्रेणीके साथ गुणा करनेपर जो राशि उत्पन्न हो उतने ही सातो पृथिवियोंके नारकी है । इसमेसे द्वितीयादिक पृथिवियोंके नारकियोंका प्रमाण बतानेके लिये कहते हैं कि अपने अर्थात् सम्पूर्ण नारकियोंका जितना प्रमाण १ इस प्रन्यके अन्तमें गणितका प्रकरण लिखेंगे वहापर इन सवका प्रमाण स्पष्ट रूपसे बताया जायगा।
गोम्मटसारः। उसके बारहमे वर्गमूलका जगच्छ्रेणीमें भागदेनेसे जो लब्ध आवे उतने ही दूसरी पृथिवीके नारकी है। इस ही प्रकार दशमे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने तीसरी पृथिवीके, और आठमे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने चौथी पृथिवीके, तथा छडे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने पांचमी पृथिवीके, और तीसरे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने छडी पृथिवीके, तथा दूसरे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने सातमी पृथिवीके नारकी होते हैं। यह उत्कृष्ट सख्याका प्रमाण है-अर्थात् एक समयमै जादेसे जादे इतने नारकी हो सकते है। इसतरह नीचेकी छह पृथिवियोंके नारकियोका प्रमाण बताकर अब प्रथम पृथिवीके नारकियोंका प्रमाण बताते हैं । हेछिमछप्पुढवीणं रासिविहीणो दु सचरासी दु । पढमावणिनि रासी णेरइयाणं तु णिद्दिडो ॥ १५३॥ अधस्तनपपृथ्वीनां राशिविहीनस्तु सर्वराशिस्तु । प्रथमावनी राशिः नैरयिकाणां तु निर्दिष्टः ॥ १५३ ॥ अर्थ-नीचेकी छह पृथिवियोंके नारकियोंका जितना प्रमाण हो उसको सम्पूर्ण नारकरा- शिमसे घटानेपर जो शेष रहे उतना ही प्रथम पृथ्वीके नारकियोंका प्रमाण है। तिर्यग्जीवोंकी सख्या बताते है । संसारी पंचक्खा तप्पुषणा तिगदिहीणया कमसो। सामण्णा पंचिंदी पंचिंदियपुण्णतेरिक्खा ॥ १५४ ॥ संसारिणः पञ्चाक्षास्तत्पूर्णाः त्रिगतिहीनकाः क्रमशः । सामान्याः पञ्चेन्द्रियाः पञ्चेन्द्रियपूर्णतैरश्चाः ॥ १५४ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण जीवराशिमैसे सिद्धराशिको घटानेपर जितना प्रमाण रहे उतना ही संसारराशिका प्रमाण है । ससारराशिमसे नारक मनुष्य देव इन तीन राशियोंको घटानेपर जो शेप रहे उतना ही सामान्य तियचोंका प्रमाण है । सम्पूर्ण पंचेन्द्रियोंमेंसे उक्त तीन गतिके पंचेन्द्रियोको घटानेपर जो शेप रहें उतने पंचेन्द्रिय तियेच है । तथा पंचेन्द्रिय पर्याप्तकों के प्रमाणमेंसे उक्त तीन गतिके पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवोंका प्रमाण घटानेपर जो शेष रहें उतने ही पर्याप्त तिर्यच पंचेन्द्रिय जीव है। छस्सयजोयणकदिहिदजगपदरं जोणिणीण परिमाणं। पुण्णूणा पंचक्खा तिरियअपज्जतपरिसंखा ॥१५५ ॥ १-२ पंचेन्द्रिय और पर्याप्तकोका प्रमाण आगे बतावेगे। - - रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ६४ षट्शतयोजनकृतिहितजगत्प्रतरं योनिमतीनां परिमाणम् । पूर्णोनाः पंचाक्षाः तिर्यगपर्याप्तपरिसंख्या ॥ १५५ ॥ अर्थ-छहसौ योजनके वर्गका जगत्प्रतरमै भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना ही योनि- मती तियचोंका प्रमाण है। और पंचेन्द्रिय तिर्यचोंमेंसे पर्याप्त तियेचोंका प्रमाण घटानेपर जो शेष रहे उतना अपर्याप्त पंचेन्द्रिय तिर्यचौंका प्रमाण है। मनुष्योंका प्रमाण बतानेके लिये तीन गाथाओंको कहते है। सेढीसूईअंगुलआदिमतदियपदभाजिदेगूणा । सामण्णमणुसरासी पंचमकदिघणसमा पुण्णा ॥ १५६ ॥ श्रेणी सूच्यङ्गुलादिमतृतीयपदभाजितैकोना। सामान्यमनुष्यराशिः पञ्चमकृतिघनसमाः पूर्णाः॥ १५६ ॥ अर्थ-सूच्यंगुलके प्रथम और तृतीय वर्गमूलका जगच्छ्रेणीमें भाग देनेसे जो शेष रहे उसमें एक और घटानेपर जो शेष रहे उतना सामान्य मनुष्य राशिका प्रमाण है। इसमेंसे द्विरूपवर्गधारामें उत्पन्न पांचमे वर्ग (वादाल ) के धनप्रमाण पर्याप्त मनुष्योंका प्रमाण है। पर्याप्त मनुष्योंकी संख्याको स्पष्टरूपसे बताते है। तललीनमधुगविमलंधूमसिलागाविचोरभयमेरू। तटहरिखझसा होति हु माणुसपजत्तसंखंका ॥१५७ ॥ तललीनमधुगविमलंधूमसिलागाविचोरभयमेरू । तटहरिखझसा भवन्ति हि मानुषपर्याप्तसंख्याङ्काः ॥ १५७ ॥ अर्थ-तकारसे लेकर सकारपर्यन्त जितने अक्षर इसगाथामें बताये है, उतने ही अङ्कप्रमाण पर्याप्त मनुष्योंकी सख्या है। भावार्थ--इस गाथामें तकारादि अक्षरोसे अकोंका ग्रहण करना चाहिये; परन्तु किस अक्षरसे किस अङ्कका ग्रहण करना चाहिये इसके लिये "कटपयपुरस्स्थवर्णैर्नवनवपंचाष्टकल्पितः क्रमशः । स्वरजनशून्यं संख्यामात्रोपरिमा- क्षरं त्याज्यम् । यह गाथा उपयोगी है। अर्थात् कसे लेकर आगेके झतकके नव अक्षरोंसे क्रमसे एक दो आदि नव अङ्क समझने चाहिये । इस ही प्रकार टसे लेकर नव अक्षरोंसे नव अङ्क, और पसे लेकर पांच अक्षरोंसे पाच अङ्क, तथा यसे लेकर आठ अक्षरोंसे आठ अङ्क, एवं सोलह खर और न न इनसे शून्य (०) समझना चाहिये । किन्तु मात्रा और ऊपरका अक्षर, इससे कोई भी अङ्क ग्रहण नहीं करना चाहिये । इस नियमके और "अङ्कोंकी विपरीत गति होती है" इस नियमके अनुसार इस गाथामें कहे हुए अक्षरोंसे पर्याप्त मनुष्योंकी सख्या ७९२२८११२५१४२६४३३७५९३५४३९५०३३६ निकलती है . " गोम्मटसार। ६५ मानुपी तथा अपर्याप्त मनुष्योकी सख्या बताते हैं । पजत्तमणुस्साणं तिचउत्थो माणुसीण परिमाणं । सामण्णा पुण्णूणा मणुवअपजत्तगा होति ॥ १५८ ॥ पर्याप्तमनुष्याणा त्रिचतुर्थों मानुपीणां परिमाणम् । मामान्याः पूर्णांना मानवा अपर्याप्तका भवन्ति ॥ १५८॥ अर्थ-पर्याय मनुष्योंका जितना प्रमाण है उसमें तीन चोथाई (1) मानुपियोंका प्रमाण है । सामान्य मनुप्यराशिमंसे पर्याप्तकोका प्रमाण घटानेपर जो शेष रहे उतना ही अपर्याप्त मनुष्योका प्रमाण है। इसप्रकार चारो ही प्रकारके मनुष्याकी सख्या बताकर अब देवगतिके जीवोंकी संख्या बताते हैं। तिषिणसयजोयणाणं सदछप्पण्ण अंगुलाणं च । कदिहिदपदरं वैतरजोइसियाणं च परिमाणं ॥ १५९ ॥ त्रिशतयोजनानां द्विशतपट्पश्चाशदङ्गुलानां च । कृतिहितमतर व्यन्तरज्योतिप्काणां च परिमाणम् ॥ १५९ ॥ अर्थ-तीनसौ योजनके वर्गका जगप्रतरंग भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना व्यन्त- रदेवोंका प्रमाण है । और २५६ प्रमाणानुलोके वर्गका जगत्प्रतरम भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना ज्योतिषियोका प्रमाण है। घणअगुलपढमपदं तदियपदं सेढिसंगुणं कमसो। भवणे सोहम्मदुगे देवाणं होदि परिमाणं ॥ १६० ॥ घनागुलप्रथमपद तृतीयपदं श्रेणिसंगुणं क्रमशः। भवने सौधर्मद्विक देवानां भवति परिमाणम् ॥ १६०॥ अर्थ-जगच्छ्रेणीके साथ घनामुलके प्रथम वर्गमूलका गुणा करनेसे भवनवासी, और तृतीय वर्गमूलका गुणा करनेसे सौधर्मद्विकके देवोंका प्रमाण निकलता है । तचो एगारणवसगपणचउणियमूलभाजिदा सेढी। पल्लासंखेजदिमा पत्तेयं आणदादिसुरा ॥ १६१ ॥ तत एकादशनवसप्तपञ्चचतुर्निजमूलभाजिता श्रेणी। पल्यासंख्यातकाः प्रत्येकमानतादिसुराः ॥ १६१ ॥ अर्थ-इसके अनन्तर अपने ( जगच्छेणी ) ग्यारहमे नवमे सातमे पांचमे चौथे वर्ग- मूलसे भाजित जगच्छ्रेणी प्रमाण देवोंका प्रमाण है। आनतादिकमें प्रत्येक कल्पके देवोंका १ यह योजन प्रमाणाहुलकी अपेक्षासे है। गो. ९ ६६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । प्रमाण पल्यके असख्यातमें भाग प्रमाण है। भावार्थ-ऐशान खर्गसे आगे सानत्कुमार माहेन्द्र खर्गके देवोंका प्रामाण जगच्छ्रेणीमें जगच्छ्रेणीके ग्यारहमे वर्गमूलका भाग देनेसे जितना लब्ध आवे उतना ही है । इसही प्रकार जगच्छ्रेणीके नवमे वर्गमूलका जगच्छेणीमें भाग देनेपर जो लब्ध आने उतना ब्रह्म ब्रह्मोत्तर खर्गके देवोंका प्रमाण है, और सातमे वर्ग: मूल (जगच्छ्रेणीका) का जगच्छ्रेणीमे भाग देनेसे जो लव्ध आवे उतना लान्तब कापिष्ठ खर्गके देवोंका प्रमाण है। पांचमे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना शुक्र महाशुक्र खर्गके देवोंका प्रमाण है। चौथे वर्गमूलका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना सतार सहस्रार वर्गके देवोंका प्रमाण है । आनत प्राणत आरण अच्युत नव ग्रैवेयक नव अनुदिश विजय वैजयंत जयंत अपराजित इन छन्वीस कल्पोंमसे प्रत्येक कल्पमें देवोंका प्रमाण पत्यके असख्यातमें भाग है। सर्वार्थसिद्धिके देवोंका तथा सामान्यदेवराशिका प्रमाण बताते हैं । तिगुणा सत्तगुणा वा सवटा माणुसीपमाणादो। सामण्णदेवरासी जोइसियादो विसेसहिया ॥ १६२ ॥ त्रिगुणा सप्तगुणा वा सर्वार्थी मानुषीप्रमाणतः। सामान्यदेवराशिः ज्योतिष्कतो विशेषाधिकः ।। १६२ ।। अर्थ-मनुष्यस्त्रियोंका जितना प्रमाण है उससे तिगुना अथवा सतगुना सर्वार्थसिद्धिके दवोंका प्रमाण है । ज्योतिष्क देवोका जितना प्रमाण है उससे कुछ अधिक सम्पूर्ण देवरा- शिका प्रमाण है । भावार्थ-मानुषियोंसे तिगुना और सतगुना इसतरह दो प्रकारसे जो सर्वार्थसिद्धिके देवोंका प्रमाण बताया है वह दो आचार्योक मतकी अपेक्षासे है । सम्पूर्ण देवोंमें ज्योतिषियोंका प्रमाण बहुत अधिक है, शेष तीन जातिके देवोंका प्रमाण बहुत अल्प है इसलिये ऐसा कहा है कि सामान्यदेवराशि ज्योतिषियोंसे कुछ अधिक है। ॥ इति गतिमार्गणाधिकारः ।। क्रमप्राप्त इन्द्रियमार्गणामें इन्द्रियोंका विषय खरूप मेद आदिका वर्णन करनेसे प्रथम उसका निरुक्तिपूर्वक अर्थ बताते है। अहमिंदा जह देवा अविसेसं अहमहति मण्णता। ईसंति एकमेकं इंदा इव इंदिये जाण ॥ १६३ ॥ अहमिन्द्रा यथा देवा अविशेषमहमहमिति मन्यमानाः। ईशते एकैकमिन्द्रा इव इन्द्रियाणि जानीहि ॥ १६३॥ अर्थ-जिस प्रकार अहमिन्द्र देवोंमें दूसरेकी अपेक्षा न रखकर प्रत्येक अपने २ को खामी मानते हैं, उसही प्रकार इन्द्रियां भी है। भावार्थ-इन्द्रके समान जो हो उसको इन्द्रिय कहते है । इसलिये जिस प्रकार नव अवेयकादिवासी देव अपने २ विषयों में गोम्मटसार। ६७ दूसरेकी अपेक्षा न रखनेसे अर्थात् खतन्त्र होनेसे अपने २ को इन्द्र मानते हैं । उस ही प्रकार स्पर्शनादिक इन्द्रियां भी अपने २ स्पर्शादिक विषयोंमें दूसरेकी (रसना आदिकी) अपेक्षा न रखकर खतत्र हैं। अतएव इनको इन्द्रके ( अहमिन्द्रके) समान होनेसे इन्द्रिय कहते है। इन्द्रियके सक्षेपसे भेद और उनका खरूप बताते है । मदिआवरणखओवसमुत्थविसुद्धी हु तजबोहो वा। भाबिंदियं तु दवं देहुदयजदेहचिण्हं तु ॥ १६४ ॥ मत्यावरणक्षयोपशमोत्थविशुद्धिर्हि तज्जबोधो वा। भावेन्द्रियं तु द्रव्यं देहोदयजदेहचिहं तु ॥ १६४ ॥ अर्थ-इन्द्रियके दो भेद है एक भावेन्द्रिय दूसरा द्रव्येन्द्रिय । मतिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे उत्पन्न होनेवाली विशुद्धि, अथवा उस विशुद्धिसे उत्पन्न होनेवाले उपयोगा- त्मक ज्ञानको भावेन्द्रिय कहते है। और शरीरनामकर्मके उदयसे होनेवाले शरीरके चिहवि- शेषको द्रव्येन्द्रिय कहते है। इन्द्रियकी अपेक्षासे जीवोंके भेद कहते हैं। फासरसगंधरूबे सद्दे णाणं च चिण्हयं जेसि । इगिवितिचदुपंचिंदियजीवा णियमेयभिण्णाओ ॥ १६५ ॥ स्पर्शरसगंधरूपे शब्दे ज्ञानं च चिह्नकं येषाम् । एकद्वित्रिचतुःपञ्चेन्द्रियजीवा निजभेदभिन्नाः ॥ १६५ ॥ अर्थ-जिन जीवोंके बाह्य चिह्न (द्रव्येन्द्रिय ) और उसके द्वारा होनेवाला स्पर्श रस गंध रूप शब्द इन विषयोंका ज्ञान हो उनको क्रमसे एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय जीव कहते हैं। और इनके भी अनेक अवान्तर भेद है। भावार्थ-जिन जीवोंके स्पर्शविषयक ज्ञान और उसका अवलम्बनरूप द्रव्येन्द्रिय मौजूद हो उनको एकेन्द्रिय जीव कहते हैं । इस ही प्रकार अपने २ अवलम्बनरूप द्रव्येन्द्रियके साथ २ जिन जीवोंके रसविषयक ज्ञान हो उनको द्वीन्द्रिय, और गंधविषयक ज्ञानवालोको त्रीन्द्रिय, तथा रूपवि- षयक ज्ञानवालोंको चतुरिन्द्रिय, और शब्दविषयक ज्ञानवालोंको पंचेन्द्रिय जीव कहते है। इन इकेन्द्रियादि जीवोंके भी अनेक अवान्तर भेद हैं । तथा आगे २ की इन्द्रिय- वालोंके पूर्व २ की इन्द्रिय अवश्य होती है । जैसे रसनेन्द्रियवालोंके स्पर्शनेन्द्रिय अवश्य होगी और प्राणेन्द्रियवालोंके स्पर्शन और रसना अवश्य होगी। इत्यादि पंचेन्द्रिय पर्यन्त ऐसा ही समझना। - - - ६८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । इसप्रकार एकेन्द्रियादि जीवोंके इन्द्रियोंके विषयकी वृद्धिका क्रम बताकर अब इन्द्रिय- द्धिका क्रम बताते है। एइंदियस्स फुसणं एकं वि य होदि सेसजीवाणं । होति कमउड्डियाइं जिभाषाणच्छिसोत्ताई ॥ १६६ ॥ एकेन्द्रियस्य स्पर्शनमेकमपि च भवति शेपजीवानाम् । भवन्ति क्रमवर्द्धितानि जिहाघ्राणाक्षिश्रोत्राणि ॥ १६६ ॥ अर्थ-एकेन्द्रिय जीवके एक स्पर्शनेन्द्रिय ही होती है। शेष जीवोंके क्रमसे जिहा प्राण चक्षु और श्रोत्र वढ़ जाते है। भावार्थ-एकेन्द्रिय जीवके केवल स्पर्शनेन्द्रिय, द्वीन्द्रि- यके स्पर्शन रसना (जिह्वा), त्रीन्द्रियके स्पर्शन रसना प्राण (नासिका), चतुरिन्द्रियके स्पर्शन रसना प्राण चक्षु, और पंचेन्द्रियके स्पर्शन रसना प्राण चक्षु श्रोत्र होते हैं। स्पर्शनादिक इन्द्रियां कितनी दूर तक रक्खे हुए अपने विषयका ज्ञान कर सकती हैं यह बतानेके लिये तीन गाथाओंमें इन्द्रियोंका विषयक्षेत्र बताते है । धणुवीसडदसयकदी जोयणछादालहीणतिसहस्सा। अट्ठसहस्स धणूणं विसया दुगुणा असण्णित्ति ॥ १६७ ॥ धनुर्विशत्यष्टदशककृति: योजनषट्चत्वारिंशद्धीनत्रिसहस्राणि । अष्टसहस्रं धनुषां विपया द्विगुणा असंज्ञीति ॥ १६७ ॥ अर्थ-स्पर्शन रसना प्राण इनका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र क्रमसे चारसौ धनुष चौसठ धनुष सौ धनुष प्रमाण है । चक्षुका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र दो हजार नवसौ चौअन योजन है। और श्रोत्रेन्द्रियका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र आठ हजार धनुष प्रमाण है । और आगे असज्ञिपर्यन्त दूना दूना विषय बढ़ता गया है। भावार्थ-एकेन्द्रियके स्पर्शनेन्द्रियका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र चारसौ धनुष है । और द्वीन्द्रियादिकके वह दूना २ होता गया है । अर्थात् द्वीन्द्रियके आठसौ त्रीन्द्रियके सोलहसौ चतुरिन्द्रियके वत्तीससौ असंज्ञीपंचेन्द्रियके चौसठसौ धनुष स्पर्शनेन्द्रि- यका उत्कृष्ट विषय क्षेत्र है। द्वीन्द्रियके रसनेन्द्रियका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र चौसठ धनुष है और वह भी त्रीन्द्रियादिकके स्पर्शनेन्द्रियके विषयक्षेत्रकी तरह दूना २ होता गया है । इस ही, प्रकार प्राण चक्षु और श्रोत्रका विषयक्षेत्र भी समझना । संज्ञी जीवकी इन्द्रियोंका विषयक्षेत्र बताते हैं। सण्णिस्स वार सोदे तिण्हं णव जोयणाणि चक्खुस्स। सत्तेतालसहस्सा बेसदतेसठिमदिरेया ॥ १६८ ॥ संज्ञिनो द्वादश श्रोत्रे त्रयाणां नव योजनानि चक्षुषः । सप्तचत्वारिंशत्सहस्राणि द्विशतत्रिपष्टयतिरेकाणि ॥ १६८॥ ..
गोम्मटसार। ६९ अर्थ-सझी जीवके स्पर्शन रसन घाण इन तीनमें प्रत्येकका विषय क्षेत्र नव २ योजन है । और श्रोत्रेन्द्रियका बारह योजन, तथा चक्षुका सेंतालीस हजार दोसौ त्रेसठसे कुछ अधिक उत्कृष्ट विषयक्षेत्र है। चक्षुके उत्कृष्ट विषयक्षेत्रकी उपपत्तिको बताते है। तिण्णिसयसष्ठिविरहिदलक्खं दसमूलताडिदे मूलम् । णवगुणिदे सहिहिदे चक्खुप्फासस्स अद्धाणं ॥ १६९ ॥ त्रिशतपष्ठिविरहितलक्षं दशमूलताडिते मूलम् । नवगुणिते पष्ठिहिते चक्षुःस्पर्शस्य अध्वा ॥ १६९ ॥ अर्थ-तीनसौ साठ कम एक लाख योजन जम्बूद्वीपके विस्कम्भका वर्ग करना और उसका दशगुणा करके वर्गमूल निकालना, इससे जो राशि उत्पन्न हो उसमें नवका गुणा और साठका भाग देनेसे चक्षुरिन्द्रियका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र निकलता है । भावार्थ-सूर्यका चारक्षेत्र पाचसौ बारह योजन चौड़ा है। उसमें तीनसौ वचीस योजन तो लवणसमुद्र में हैं और शेष एकसौ अस्सी योजन जम्बूद्वीपमें है। इस लिये जम्बूद्वीपके दोनों भागके तीनसौ साठ योजन क्षेत्रको छोड़कर वाकी निन्यानवे हजार छहसौ चालीस योजन प्रमाण जम्बू- द्वीपके विष्कम्भकी परिधि करणसूत्रके अनुसार तीन लाख पन्द्रह हजार नवासी योजन होती है । इस अभ्यन्तर परिधिको एक सूर्य अपने भ्रमणके द्वारा साठ मुहूर्तमें समाप्त करता है । और निषधगिरिके एक भागसे दूसरे भाग तककी अभ्यन्तर वीथीको अठारह मुहूर्तमें अपने श्रमण द्वारा समाप्त करता है। इसके विलकुल वीचमें अयोध्या नगरी पड़ती है । इस अयोध्या नगरीके वीचमें बने हुए अपने महलके ऊपरले भागपरसे भरतादि चक्रवर्ती निविधगिरिक ऊपर अभ्यन्तर चीथीमें उदय होते हुए सूर्यके भीतरकी जिन प्रतिबिम्बका दर्शन करते है । और निषधगिरिक उस उदयस्थानसे अयोध्या पर्यन्त उक्तरी- तिके अनुसार सूर्यको भ्रमण करनेमें नव मुहूर्त लगते है। इसलिये साठ मुहूर्तमें इतने क्षेत्रपर भ्रमण करे तो नव मुहूर्तमें कितने क्षेत्रपर भ्रमण करै ? इसप्रकार त्रैराशिक करनेसे अर्थात् फलराशि ( परिधिका प्रमाण ) और इच्छाराशिका (नव) गुणा कर उसमें प्रमाणराशि साठका भागदेनेसे चक्षुरिन्द्रियका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र सेतालीस हनार दोसौ सठसे कुछ अधिक निकलता है । अर्थात् ज्यादेसे ज्यादे इतनी दूर तकका पदार्थ चक्षुकेद्वारा जाना जा सकता है। १ "विकम्भवग्गदगुणकरिणी वहस्स परिरहो होदि" अर्थात् विष्कम्भका जितना प्रमाण है उसका वर्गकर दशगुणा करना पीछे उसका वर्गमूल निकालना ऐसा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो उतना ही वृत्तक्षेत्रकी परिधिका प्रमाण होता है। २ तीन लाख पन्द्रह हजार नवासी योजन। ३ सातयोजनके वीस भोगोंमेंसे एक भाग।
- रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । इन्द्रियोंका विषयक्षेत्र बताकर अब उनका आकार बताते है । चक्खू सोदं घाणं जिन्भायारं मसूरजवणाली। अतिमुत्तखुरप्पसमं फासं तु अणेयसंठाणं ॥ १७ ॥ चक्षुःश्रोन्नघ्राणजिव्हाकारं मसूरयवनाल्य- तिमुक्तक्षुरप्रसमं स्पर्शनं तु अनेकसंस्थानम् ॥ १७ ॥ अर्थ-मसूरके समान चक्षुका जवकी नलीके समान श्रोत्रका तिलके फूलके समान घाणका तथा खुरपाके समान जिव्हाका आकार है। और स्पर्शनेन्द्रियके अनेक आकार हैं। इन्द्रियोंके ( द्रव्येन्द्रियोंके ) आकारमें जो आत्माके प्रदेश है उनका अवगाहन प्रमाण बताते हैं। अंगुलअसंखभागं संखेजगुणं तदो विसेसहियं । तत्तो असंखगुणिदं अंगुलसंखेजयं तत्तु ॥ १७१ ॥ अङ्गुलासंख्यभाग संख्यातगुणं ततो विशेषाधिकम् । ततोऽसंख्यगुणितमङ्गुलसंख्यातं तत्तु ॥ १७१ ॥ अर्थ-आत्मप्रदेशोंकी अपेक्षा चक्षुरिन्द्रियको अवगाहन धनाङ्गुलके असंख्यातमे भाग- प्रमाण है। और इससे संख्यातगुणा श्रोत्रेन्द्रियका अवगाहन है। श्रोत्रेन्द्रियका जितना प्रमाण है उससे पल्यके असख्यातमे भाग अधिक घाणेन्द्रियका अवगाहन है। प्राणेन्द्रियके अवगाहसे पल्यके असंख्यातमे भाग गुणा रसनेन्द्रियका अवगाहन है। परन्तु सामान्यकी अपेक्षा गुणाकार और भागहारका अपवर्तन करनेसे उक्त चारों ही इन्द्रियोंका अवगाहन प्रमाण धनाङ्गुलके संख्यातमे भागमात्र है। स्पर्शनेन्द्रियके प्रदेशोंका अवगाहनप्रमाण बताते है। सुहमणिगोदअपजचयस्स जादस्स तदियसमयसि । अङ्गुलअसंखभागं जहण्णमुक्कस्सयं मच्छे ॥ १७२ ॥ सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तकस्य जातस्य तृतीयसमये। अङ्गुलासंख्यभागं जघन्यमुत्कृष्टकं मत्स्ये ॥ १७२ ॥ अर्थ-स्पर्शनेन्द्रियकी जघन्य अवगाहना घनामुलके असंख्यातमे भाग प्रमाण है । और यह अवगाहना सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तकके उत्पन्न होनेसे तीसरे समयमें होती है । उत्कृष्ट अवगाहना महामत्स्यके होती है इसका प्रमाण सख्यातघनाङ्गुल है । १ द्रव्येन्द्रियके दो भेद हैं, निर्वृति और उपकरण । निर्वृतिके भी दो भेद है, बाह्य तथा आभ्यन्तर। यहापर आभ्यन्तर निर्वृतिरूप द्रव्येन्द्रियका प्रमाण वताते हैं।
गोम्मटसार।
इस प्रकार इन्द्रियज्ञानवाले संसारी जीवोंका वर्णन करके अतीन्द्रियज्ञानवालोंका
निरूपण करते है।
णवि इंदियकरणजुदा अवग्गहादीहि गाहया अत्थे।
णेव य इंदियसोक्खा अणिदियाणतणाणसुहा ॥ १७३ ॥
नापि इन्द्रियकरणयुता अवग्रहादिभिः ग्राहका अर्थे ।
नैव च इन्द्रियसौख्या अनिन्द्रियानन्तज्ञानसुखाः ॥ १७३ ॥
अर्थ-वे मुक्त जीव इन्द्रियोंकी क्रियासे युक्त नहीं है । तथा अवग्रहादिक क्षायोपश-
मिक ज्ञानके द्वारा पदार्थका ग्रहण नहीं करते । और इन्द्रियजन्य सुखसे भी युक्त नहीं है,
क्योंकि
उन मुक्त जीवोंका अनन्तज्ञान और अनन्तसुख अनिन्द्रिय है । भावार्थ-मुक्त-
जीवोंका अनन्त ज्ञान और अनन्त सुख अपनी प्रवृत्तिमें इन्द्रियव्यापारकी अपेक्षा नही
रखता; क्योंकि वह निरावरण है जो सावरण होता है उसको दूसरेकी अपेक्षा होती है।
और जो स्वयं अपने कार्यके करनेमें समर्थ है उसको दूसरेकी अपेक्षा नही होती।
इस ही लिये वे मुक्त जीव इन्द्रियव्यापारसे रहित है । और त्रिकालवर्ती समस्त पदार्थोको
अनन्तज्ञान के द्वारा प्रत्यक्ष जानते है, अवग्रह ईहा अवाय धारणा स्मृति प्रत्यभिज्ञान तर्क
अनुमान आदि क्षायोपशमिक ज्ञानके द्वारा नही जानते । और उनके इन्द्रियजन्य सुख भी
नहीं है । क्योंकि उसके कारणभूत प्रतिपक्षी कर्मका सर्वथा अभाव होचुका है।
सक्षेपसे एकेन्द्रियादि जीवोंकी संख्याको बताते हैं
थावरसंखपिपीलियभमरमणुस्सादिगा सभेदा जे ।
जुगवारमसंखेजाणताणंता णिगोदभवा ॥ १७४ ॥
स्थावरशङ्खपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादिकाः सभेदा थे।
युगवारमसंख्येया अनन्तानन्ता निगोंदभवाः ॥ १७४ ॥
अर्थ-स्थावर एकेन्द्रिय जीव, शड्ड आदिक द्वीन्द्रिय, चींटी आदि त्रीन्द्रिय, अमर
आदि चतुरिन्द्रिय, मनुष्यादिक पंचेन्द्रिय जीव अपने २ अन्तर्भेदोंसे युक्त असख्यातास-
ख्यात है। और निगोदिया जीव अनन्तानन्त है। भावार्थ-नस प्रसेक वनस्पति पृथिवी
जल अमि वायु इनको छोड़कर वाकी ससारी जीवोंका (साधारण जीवोंका) प्रमाण
अनन्तानन्त है । और साधारणको छोड़कर वाकी एकेन्द्रिय स्थावर तथा द्वीन्द्रिय चतुरिन्द्रि-
य पंचेन्द्रिय इनमें प्रत्येकका प्रमाण जगत्प्रतरके असख्यातमे भागमात्र असख्यातासख्यात है।
तसहीणो संसारी एयक्खा ताण संखगा भागा।
पुण्णाणं परिमाणं संखेजदिमं अपुण्णाणं ॥ १७५ ॥
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । सहीनाः संसारिण एकाक्षास्तेपां संख्यका भागाः। पूर्णानां परिमाणं संख्येयकमपूर्णानाम् ॥ १७५ ।। अर्थ संसारराशिमेंसे त्रसराशिको घटानेपर जितना शेष रहे उतने ही एकेन्द्रिय जीव है। और एकेन्द्रियजीवोंकी राशिमें संख्यातका भाग देना उसमें एक भागप्रमाण अपर्याप्तक और शेष बहुभागप्रमाण पर्याप्तक जीव हैं। बादरसुहमा तेसिं पुण्णापुण्णेति छविहाणंपि । तकायमग्गणाये भणिजमाणकमो यो ॥ १७६ ॥ वादरसूक्ष्मास्तेषां पूर्णापूर्ण इति पडूविधानामपि । तत्कायमार्गणायां भणिष्यमाणक्रमो ज्ञेयः ॥ १७६ ॥ अर्थ-एकेन्द्रियजीवोंके सामान्यसे दो भेद हैं बादर और सूक्ष्म । इसमें भी प्रत्येकके पर्याप्तक और अपर्याप्तकके भेदसे दो २ भेद हैं । इस प्रकार एकेन्द्रियोंकी छह राशियोंकी संख्याका क्रम कायमार्गणामें कहेंगे वहांसे ही समझलेना । भावार्थ-एकेन्द्रिय जीवोंकी छह राशियोंका प्रमाण कायमार्गणामें विशेषरूपसे कहेंगे। इस प्रकार एकेन्द्रिय जीवोंकी संख्याको सामान्यसे बताकर अव त्रसजीवोंकी संख्याको तीन गाथाओंमें बताते हैं। 'वितिचपमाणमसंखेणवहिदपदरंगुलेण हिदपदरं । हीणकर्म पडिभागो आवलियासंखभागो दु ॥ १७७ ॥ द्वित्रिचतुःपञ्चमानमसंख्येनावहितप्रतराङ्गुलेन हितप्रतरम् । हीनक्रमं प्रतिभाग आवलिकासंख्यभागस्तु ॥ १७७॥ अर्थ-प्रतराङ्गुलके असंख्यातमें भागका जगत्प्रतरमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना सामान्यसे त्रसराशिका प्रमाण है । परन्तु पूर्व २ द्वीन्द्रियादिककी अपेक्षा उत्तरोत्तर त्रीन्द्रि- यादिकका प्रमाण क्रमसे हीन २ है । और इसका प्रतिभागहार आवलिका असंख्यातमा भाग है। इस उक्त सराशिके प्रमाणको स्पष्टरूपसे विमत करते है। बहुमागे समभागो चउण्णमेदेसिमेकभागलि । उत्तकमो तत्थवि बहुमागो बहुगस्स देओ दु ॥ १७८ ॥ बहुभागे 'समभागश्चतुर्णामेतेषामेकभागे। उक्तक्रमस्तत्रापि बहुभागो बहुकस्य देयस्तु ॥ १७८ ॥ अर्थ-त्रसराशिम आवलिके असंख्यातमे भागका भाग देकर लब्ध. बहुभागके समान चार भाग करना। और एक २. भागको द्वीन्द्रियादि चारोहीमें विभक्त कर, शेष एक भागमें .
गोम्मटसार। फिरसे आवलिके असंख्यातमे भागका भाग देना चाहिये, और लब्ध बहुभागको बहुतसं- ख्यावालेको देना चाहिये । इस प्रकार अन्तपर्यन्त करना चाहिये । भावार्थ-कल्पना की जिये कि त्रसराशिका प्रमाण दोसौ छप्पन है । और प्रतिभागहाररूप आवलीके असख्यातमे भागका प्रमाण ४ चार है। इसलिये दोसौ छप्पनमें चारका भाग देनेसे लब्ध ६४ आते हैं। इस ६४ के एक भागको अलग रखदेने पर बहुभागका प्रमाण एकसौ वानवे वाकी रहता । इस बहुभागके अडतालीस २ के समान चार भाग करके द्वीन्द्रियादि चारोंको विभक्त करना चाहिये । और शेप चौसठमें फिर चारका भाग देना चाहिये । इससे लब्ध सोलहके एक भागको अलग रखकर वाकी अडतालीसके बहुभागको बहुतसंख्यावाले द्वीन्द्रियको देना चाहिये । और शेप सोलहके एकभागमें फिर चारका भाग देनेसे लब्ध बारहके बहु- भागको क्रमप्राप्त त्रीन्द्रियको देना चाहिये । और शेष चारके एक भागमें फिर चारका भाग देनेसे लब्ध तीनके बहुमागको चतुरिन्द्रियको देना चाहिये। और शेष एक पंचेन्द्रियको देना चाहिये । इस प्रकार त्रसोंकी २५६ राशिसे द्वीन्द्रियोंका प्रमाण ९६, त्रीन्द्रियोंका प्रमाण ६०, चतुरिन्द्रियोंका प्रमाण ५१, और पंचेन्द्रियोका प्रमाण ४९ हुआ। जिसप्र- कार अंकसंदृष्टिमें यह प्रमाण बताया है उसही प्रकार अर्थसंदृष्टिमें भी समझना; परन्तु अङ्कसंदृष्टिको ही अर्थसंदृष्टि नहीं समझना चाहिये। वसोंमें पर्याप्तक और अपर्याप्तकोका प्रमाण बताते है। तिविपचपुण्णपमाणं पदरंगुलसंखभागहिदपदरं। हीणकर्म पुण्णूणा वितिचपजीवा अपजता ॥ १७९ ॥ त्रिद्विपञ्चचतुःपूर्णप्रमाणं प्रतराङ्गुलसंख्यभागहितप्रतरम् । हीनक्रम पूर्णोना द्वित्रिचतुःपंचजीवा अपर्याप्ताः ॥ १७९ ।। अर्थ-प्रतरामुलके सख्यातमे भागका जगत्मतरमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना ही त्रीन्द्रिय द्वीन्द्रिय पंचेन्द्रिय चतुरिन्द्रियमें प्रत्येक पर्याप्तकका प्रमाण है । परन्तु यह प्रमाण " बहुभागे समभागो" इस गाथामे कहे हुए क्रमके अनुसार उत्तरोत्तर हीन २ है। अपनी २ समस्तराशिमसे पर्याप्तकोंका प्रमाण घटानेपर अपर्याप्तक द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवोंका प्रमाण निकलता है। इति इन्द्रियमार्गणाधिकार- समाप्तः॥ कायमार्गणाका वर्णन क्रमसे प्राप्त है । अतः उसकी आदिमें कायका लक्षण और उसके भेदोंको बताते है। जाईअविणाभावीतसथावरउदयजो हवे काओ। सो जिणमदमि भणिओ पुढवीकायादिछन्भेयो ॥ १८ ॥ गो - ७४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । जात्यविनामावित्रसस्थावरोदयजो भवेत् कायः । स जिनमते भणितः पृथ्वीकायादिपडूभेदः ।। १८०।। अर्थ-जातिनामकर्मके अविनाभावी त्रस और स्थावर नामकर्मके उदयसे होनेवाली आत्माकी पर्यायको जिनमतमें काय कहते हैं । इसके छह भेद हैं, पृथिवी जल अमि वायु वनस्पति और त्रस। पांच स्थावरोंमेंसे वनस्पतिको छोड़कर बाकी पृथिवी आदि चार स्थावरोंकी उत्पत्तिका कारण बताते हैं। पुढवीआऊतेऊवाऊकम्मोदयेण तत्थेव । णियवष्णचउक्कजुदो ताणं देहो हवे णियमा ॥ १८१ ॥ पृथिव्यप्तेजोवायुकर्मोदयेन तत्रैव । निजवर्णचतुष्कयुतस्तेपां देहो भवेनियमात् ॥ १८१॥ अर्थ-पृथिवी अप् (जल) तेज (अमि) वायु इनका शरीर, नियमसे अपने २ पृथिवी आदि नामकर्मके उदयसे, अपने २ योग्य रूप रस गंध स्पर्शसे युक्त पृथिवी आदिकमें ही बनता है। भावार्थ-पृथिवी आदि नामकर्मके उदयसे पृथिवीकायिकादि जीवोंके अपने २ योग्य रूप रस गंध स्पर्शसे युक्त पृथिवी आदि पुद्गलस्कन्ध ही शरीररूप परिणत होजाते हैं। शरीरके भेद और उनके लक्षण बताते हैं। वादरसुहुमुदयेण य बादरसुहमा हवंति तदेहा । घादसरीरं थूलं अघाददेहं हवे सुहुमं ॥ १८२ ॥ बादरसूक्ष्मोदयेन च बादरसूक्ष्मा भवन्ति तदेहाः । घातशरीरं स्थूलमघातदेहं भवेत् सूक्ष्मम् ॥ १८२ ॥ अर्थ-बादर नामकर्मके उदयसे बादर और सूक्ष्म नामकर्मके उदयसे सूक्ष्म शरीर होता है । जो शरीर दूसरेको रोकनेवाला हो अथवा जो दूसरेसे रुके उसको बादर (स्थूल ) कहते हैं । और जो दूसरेको न तो रोके और न खयं दूसरेसे रुके उसको सूक्ष्म शरीर कहते हैं। शरीरका प्रमाण बताते हैं। तहेहमंगुलस्स असंखभागस्स बिंदमाणं तु । आधारे थूला ओ सवत्थ णिरंतरा सुहुमा ॥ १८३ ॥ तदेहमङ्गलस्यासंख्यभागस्य वृन्दमानं तु । आधारे स्थूलाः ओ सर्वत्र निरन्तराः सूक्ष्माः ॥ १८३ ॥ १ इस गाथामें " ओ" शिष्यसम्बोधनके लिये आया है। ।
गोम्मटसार। अर्थ-बादर और सूक्ष्म दोंनो ही तरहके शरीरोंका प्रमाण घनाङ्गुके असख्यातमे भागप्रमाण है । इनमें से स्थूल शरीर आधारकी अपेक्षा रखता है; किन्तु सूक्ष्म शरीर विना व्यवधानके सब जगह अनन्तानन्त भरे हुए है। वनस्पतिकायका खरूप और भेद बताते है । उदये दु वणप्फदिकम्मस्स य जीवा वणप्फदी होति । पत्तेयं सामण्णं पदिडिदिदरेत्ति पत्तेयं ॥ १८४ ॥ उदये तु वनस्पतिकर्मणश्च जीवा वनस्पतयो भवन्ति । प्रत्येक सामान्यं प्रतिष्ठितेतरे इति प्रत्येकम् ।। १८४ ॥ अर्थ-वनस्पति नामकर्मके उदयसे जीव वनस्पतिकायिक होते है। उनके दो भेद है, एक प्रत्येक दूसरा साधारण । प्रत्येकके भी दो भेद है, प्रतिष्ठित और अप्रतिष्ठित। भावार्थ- प्रत्येक उसको कहते हैं कि जिसके एक शरीरका एक जीव मालिक हो । जहाँपर अनेक जीव समानरूपसे रहें उसको साधारण शरीर कहते है। प्रत्येक वनस्पतिके दो भेद है। एक प्रतिष्ठित दूसरी अप्रतिष्ठित । प्रतिष्ठित प्रत्येक उसको कहते है कि जिस एक शरीरमें एक जीवके मुख्यरूपसे रहनेपर भी उस जीवके आश्रय से अनेक निगोदिया जीव रहै । और जहांपर एक मुख्य जीवके आश्रयसे अनेक निगोदिया जीव नहीं रहते उनको अप्र- तिष्ठित प्रत्येक कहते है। मूलग्गपोरवीजा कंदा तह खंदवीजवीजरहा । सम्मुच्छिमा य भणिया पत्याणंतकाया य ॥ १८५ ॥ मूलाग्रपर्ववीजाः कन्दास्तथा स्कन्धवीजवीजरुहाः। सम्मूछिमाश्च भणिताः प्रत्येकानंतकायाश्च ॥ १८५-॥ अर्थ-जिन वनस्पतियोका बीज, मूल, अग्र, पर्व, कन्द, अथवा स्कन्ध है, अथवा जो वीजसे ही उत्पन्न होजाती है, यद्वा सम्मूर्छन है, वे सभी वनस्पतिया सप्रतिष्ठित तथा अप्र- तिष्ठित दोनो प्रकार की होती है। भावार्थ-वनस्पति अनेक प्रकारकी होती है। कोई तो मूलसे उत्पन्न होती है, जैसे अदरख हल्दी आदि। कोई अग्रसे उत्पन्न होती है जैसे गुलाव । कोई पर्वसे (पंगोली) उत्पन्न होती है, जैसे ईख वेंत आदि । कोई कन्दसे उत्पन्न होती हैं, जैसे सूरण आदि । कोई स्कन्धसे उत्पन्न होती हैं, जैसे ढाक । कोई अपने २ वीजसे उत्पन्न होती हैं, जैसे गेहूं चना आदि । कोई मट्टी जल आदिके सम्बन्धसे ही उत्पन्न होजाती है, जैसे पास आदि । परन्तु ये सब ही वनस्पति सप्रतिष्ठित प्रत्येक और अपति- ठित प्रत्येक दोनों प्रकारकी होती है।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । सप्रतिष्ठित प्रत्येक और अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पतिकी पहचान (परीक्षा-चिन्ह) बताते हैं। गूढसिरसंधिपचं समभंगमहीरुहं च छिण्णरुहं । साहारणं सरीरं तबिवरीयं च पत्तेयं ॥ १८६ ॥ गूढशिरासन्धिपर्व समभङ्गमहीरुकं च छिन्नरहम् । साधारणं शरीरं तद्विपरीतं च प्रत्येकम् ॥ १८६॥ अर्थ-जिनकी शिरा सघि पर्व अप्रकट हों, और जिसका भङ्ग करनेपर समान भंग हों, और दोनों भगोमें परस्पर तन्तु न लगा रहै, तथा छेदन करने पर भी जिसकी पुनः वृद्धि होजाय उसको सप्रतिष्ठित प्रत्येक, और इससे विपरीतको अप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते है। मूले कंदे छल्लीपवालसालदलकुसुमफलवीजे। समभंगे सदि गंता असमे सदि होति पत्तेया ॥ १८७ ॥ मूले कन्दे त्वक्प्रवालशालादलकुसुमफलवीजे । समभङ्गे सति नान्ता असमे सति भवन्ति प्रत्येकाः ॥ १८७ ।। अर्थ-जिन बनस्पतियोंके मूल कन्द त्वचा प्रवाल (नवीन कोंपल) क्षुद्रशाखा (टहनी ) पत्र फूल फल तथा वीजोंको तोड़नेसे समान भङ्ग हो उसको सप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति कहते है। और जिनका भङ्ग समान न हो उसको अप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते है। कंदस्स व मूलस्स व सालाखंदस्स वावि बहुलतरी। छल्ली साणंतजिया पत्तेयजिया तु तणुकदरी ॥ १८८ ॥ कन्दस्य वा मूलस्य वा शालास्कन्धस्य वापि बहुलतरा। त्वक् सा अनन्तजीवा प्रत्येकजीवा तु तनुकतरा ॥ १८८॥ अर्थ-निस वनस्पतिके कन्द, मूल, क्षुद्रशाखा या स्कन्धकी छाल मोटी हो उसको अनन्तजीव (सप्रतिष्ठित प्रत्येक ) कहते है। और जिसकी छाल पतली हो उसको अप्रतिष्ठित प्रत्येक कहते हैं। वीजे जोणीभूदे जीवो चंकमदि सो व अण्णो वा। जे वि व मूलादीया ते पत्चेया पढमदाए ॥ १८९ ॥ वीजे योनीभूते जीवः चामति स वा अन्यो वा। येपि च मूलादिकास्ते प्रत्येकाः प्रथमतायाम् ॥ १८९॥ अर्थ-जिस योनीमत बीजमें वही जीव या कोई अन्य जीव आकर उत्पन्न हो वह और मूलादिक प्रथम अवस्थामें अप्रतिष्ठित प्रत्येक होते हैं। भावार्थ-वे चीज जिनकी कि ८ गोम्मटसार। अड्डर उत्पन्न करनेकी शक्ति नष्ट नहीं हुई है, और जिनमें या तो वही जीव आकर उत्पन्न हो जो पहले उसमें था, या कोई दूसरा जीव कहीं अन्यत्रसे मरण करके आकर उत्पन्न हो, और मूल कन्द आदि जिनको कि पहले सप्रतिष्ठित कहा है वे भी अपनी उत्पत्तिके प्रथम समयसे लेकर अन्तमहर्तपर्यन्त अप्रतिष्ठित प्रत्येक ही रहते हैं। इस प्रकार प्रत्येक और साधारणके भेदसे दो प्रकारकी वनस्पतियों में से प्रत्येकका वर्णन करके अब साधारणका वर्णन करते है। साहारणोदयेण णिगोदसरीरा हवंति सामण्णा । ते पुण दुविहा जीवा वादरसुहमाचि विण्णेया ॥ १९० ॥ साधारणोदयेन निगोदशरीरा भवन्ति सामान्याः। ते पुनर्द्विविधा जीवा वादरसूक्ष्मा इति विज्ञेयाः ॥ १९॥ अर्थ-जिन जीवोंका शरीर साधारण नामकर्मके उदयसे निगोदरूप होजाता है उनही को सामान्य या साधारण कहते हैं । इनके दो भेद है, एक बादर दूसरा सूक्ष्म । भावार्थ-साधारण नामकर्मके उदयसे इस प्रकारका जीवोंका शरीर होता है कि जो अन- न्तानन्त जीवोंको आश्रय दे सकें। इस सरीरमें एक मुख्य जीव नही रहता; किन्तु अनन्तानन्त जीव समानरूपसे रहते है । अत एव इनका नाम सामान्य या साधारण जीव है । इनके दो भेद है, एक बादर दूसरा सूक्ष्म । साहारणमाहारो साहारणमाणपाणगहणं च । साहारणजीवाणं साहारणलक्खणं भणियं ॥ १९१ ॥ साधारणमाहारः साधारणमानापानग्रहणं च । साधारणजीवानां साधारणलक्षणं भणितम् ॥ १९१ ॥ अर्थ इनका ( साधारण जीवोंका ) साधारण ( समान ) ही तो आहार होता है, और साधारण ही श्वासोच्छासका ग्रहण होता है । साधारण जीवोंका लक्षण साधारण ही । परमागममें कहा है । भावार्थ-साथ ही उत्पन्न होनेवाले जिन अनन्तानन्त ( साधारण) जीवोंकी आहारादिक पर्याप्ति और उनके कार्य सहश और समान कालमें होते हों उनको साधारण कहते है। जत्थेक्कमरइ जीवो तत्थ दु मरणं हवे अणंताणं । वकमइ जत्थ एको बकमणं तत्थ गंताणं ॥ १९२ ॥ यत्रको नियते जीवतत्र तु मरणं भवेत् अनन्तानाम् । प्रक्रामति यत्रका प्रक्रमणं तत्रानन्तानाम् ॥ १९२ ।। अर्थ-साधारण जीवोंमें जहा पर एक जीव मरण करता है वहांपर अनन्त जीवोंका . .
७८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । मरण होता है। और जहांपर एक जीव उत्पन्न होता है वहां अनन्त जीवोंका उत्पाद होता है। भावार्थ-साधारण जीवोंमें उत्पत्ति और मरणकी अपेक्षा भी सादृश्य है । प्रथम समयमें उत्पन्न होनेवाले साधारण जीवोंकी तरह द्वितीयादि समयोंमें भी उत्पन्न होनेवाले साधारण जीवोंका जन्म मरण साथ ही होता है । यहां इतना विशेष समझना कि एक बादर निगोद शरीरमें या सूक्ष्म निगोद शरीरमें साथ उत्पन्न होनेवाले अनन्तानन्त साधारण जीव या तो पर्याप्तक ही होते है या अपर्याप्तक ही होते है। किन्तु मिश्ररूप नही होते; क्योंकि उनके समान कर्मोदयका नियम है। बादर निगोदिया जीवोंकी सख्या बतानेको दो गाथा कहते हैं। खंधा असंखलोगा अंडरआवासपुलविदेहा वि । हेडिल्लजोणिगाओ असंखलोगेण गुणिदकमा ॥ १९३ ॥ स्कन्धा असंख्यलोका अंडरावासपुलविदेहा अपि । अधस्तनयोनिका असंख्यलोकेन गुणितक्रमाः॥ १९३ ॥ अर्थ स्कन्धोंका प्रमाण असख्यातलोकप्रमाण है । और अंडर आवास पुलवि तथा देह ये क्रमसे उत्तरोचर असख्यातलोक २ गुणित है । भावार्थ-अपने योग्य असंख्यातका लोकके समस्त प्रदेशोंसे गुणा करनेपर जो लब्ध आवे उतना समस्त स्कन्धोंका प्रमाण है। और एक एक स्कन्धमें असंख्यातलोक प्रमाण अंडर है, एक २ अंडरमें असंख्या- तलोक प्रमाण आवास हैं, एक २ आवसमें असख्यातलोक प्रमाण पुलवि है, एक २ पुल- विमें असंख्यातलोकप्रमाण वादर निगोदिया जीवोंके शरीर हैं । इस लिये जब एक स्कन्धमें असंख्यात लोक प्रमाण अंडर है तब समस्त स्कन्धोंमें कितने अंडर होगे? इस प्रकार इनका त्रैराशिक करनेसे अंडर आवास पुलवि तथा देह इनका उत्तरोत्तर क्रमसे असंख्यातलोक असंख्यातलोक गुणा प्रमाण निकलता है। इसका दृष्टान्त बताते हैं। जम्बूदीवं भरहो कोसलसागेदतग्घराई वा। खधंडरआवासापुलविशरीराणि दिटुंता ॥ १९४ ॥ जम्बूद्वीपो भरतः कोशलसाकेततगृहाणि वा। स्कन्धाण्डरावासाः पुलविशरीराणि दृष्टान्ताः ॥ १९४ ॥ अर्थ जम्बूद्वीप भरतक्षेत्र कोशलदेश साकेतनगरी ( अयोध्या) और साकेत नग- रीके घर ये क्रमसे स्कन्ध अंडर आवास पुलवि और देहके दृष्टान्त है। भावार्थ-जिस प्रकार जम्बूद्वीप आदिक एक २ द्वीपमें भरतादिक अनेक क्षेत्र, एक २ भरतादि क्षेत्रमें १ स्कन्ध अंडर आवास आदि प्रत्येकजीवोंके शरीरविशेष हैं।
गोम्मटसार।
कोशल आदि अनेक देश, एक २ देशमें अयोध्या आदि अनेक नगरी, और एक २
नगरीमें अनेक घर होते है । उस ही प्रकार एक २ स्कन्धमें असख्यातलोक २ प्रमाण
अंडर, एक २ अंडरमें असंख्यातलोक २ प्रमाण आवास, एक २ आवासमें असंख्यात-
लोक २ प्रमाण पुलवि, और एक २ पुलविमें असख्यातलोक २ प्रमाण बादर निगोदिया-
जीवोंके शरीर होते हैं।
एक निगोदशरीरमें द्रव्यकी अपेक्षा जीवोंका प्रमाण बताते हैं।
एगणिगोदशरीरे जीवा दवप्पमाणदो दिट्ठा ।
सिद्धेहिं अर्णतगुणा सवेण वितीदकालेण ॥ १९५ ॥
एकनिगोदशरीरे जीवा द्रव्यप्रमाणतो दृष्टाः।
सिद्धैरनन्तगुणाः सर्वेण व्यतीतकालेन ॥ १९५ ॥
अर्थ-द्रव्यकी अपेक्षा सिद्धराशिसे और सम्पूर्ण अतीतकालके समयोंसे अनन्तगुणे
जीव एक निगोद शरीरमे रहते है।
नित्यनिगोदका लक्षण कहते है।
अस्थि अणंता जीवा जेहिं ण पत्तो तसाण परिणामो।
भावकलङ्कसुपउरा णिगोदवासं ण मुंचंति ॥ १९६ ॥
सन्ति अनन्ता जीवा यैर्न प्राप्तः सानां परिणामः ।
भावकलकसुप्रचुरा निगोदवासं न मुञ्चन्ति ॥ १९६ ॥
अर्थ-ऐसे अनन्तानन्त जीव है कि जिन्होंने बसोंकी पर्याय अभीतक कभी नहीं पाई
है, और जो निगोद अवस्थामें होनेवाले दुलेश्यारूप परिणामोंसे अत्यन्त अभिभूत रहनेके.
कारण निगोदस्थानको कभी नहीं छोड़ते। भावार्थ-निगोदके दो भेद हैं, एक इतरनिगोद
दूसरा नित्यनिगोद । जिसने कभी बस पर्यायको प्राप्त करलिया हो उसको इतरनिंगोद
कहते है। और जिसने अभीतक कभी त्रसपर्यायको नही पाया, अथवा जो कभी त्रस
पर्यायको नहीं पावेगा उसको नित्यनिगोद कहते हैं। क्योंकि नित्यशब्दके दो अर्थ होते
एक तो अनादि दूसरा अनादि अनन्त । इन दोनों ही प्रकारके जीवोंकी संख्या
अनन्तानन्त है।
दो गाथाओंमें त्रस जीवोंका खरूप मेद और उनका क्षेत्र आदि बताते है ।
विहि तिहि चदुर्हि पंचहि सहिया जे इंदिएहि लोयलि।
ते तसकाया जीवा णेया वीरोवदेसेण ॥ १९७॥
द्वाभ्यां त्रिभिश्चतुर्मिः पञ्चमिः सहिता ये इन्द्रियैर्लोके ।
ते त्रसकाया जीवा ज्ञेया वीरोपदेशेन ॥ १९७ ॥
, रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-जो जीव दो तीन चार पांच इन्द्रियोंसे युक्त हैं उनको वीर भगवानके उपदे- शसे त्रस काय समझना चाहिये। भावार्थ-पूर्वोक्त स्पर्शनादिक पांच इन्द्रियों से आदिकी दो, तीन, चार, या पांच इन्द्रियोंसे जो युक्त है उसको त्रस कहते है । अत एव इन्द्रि- योंकी अपेक्षा त्रसोंके चार भेद हुए-दीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय । उववादमारणंतियपरिणदतसमुज्झिऊण सेसतसा । तसणालिवाहिरसि य णत्थित्ति जिणेहिं णिद्दिटुं॥ १९८॥ उपपादमारणान्तिकपरिणतत्रसमुज्झित्वा शेपत्रसाः। बसनालीबाह्ये च न सन्तीति जिननिर्दिष्टम् ॥ १९८ ।। अर्थ-उपपाद और मारणान्तिक समुद्धातवाले त्रस जीवोंको छोड़कर बाकीके त्रस जीव त्रसनालीके बाहर नही होते यह जिनेन्द्रदेवने कहा है। भावार्थ-किसी विवक्षित भवके प्रथम समयकी पर्यायको उपपाद कहते है । अपनी आयुके अन्तिम अन्तर्मुहूर्तमें जो समुद्धात होता है उसको मारणान्तिक समुद्धात कहते है । लोकके विलकुल मध्यमें एक २ राजू चौड़ी और मोटी तथा चौदह राजू ऊंची नाली है-उसको त्रसनाली कहते है। क्योंकि त्रस जीव इसके भीतर ही होते है-वाहर नहीं होते | किन्तु उपपाद और मारणान्तिक समुद्धातवाले त्रस, तथा इस गाथामें च शब्दका ग्रहण किया है इसलिये केवल- समुद्धातवाले भी त्रसनालीके -बाहर कदाचित् रहते है । वह इस प्रकारसे कि लोकके अन्तिम वातवलयमें स्थित कोई जीव मरण करके विग्रहगतिद्वारा त्रसनालिमें त्रसपर्यायसे उत्पन्न होनेवाला है, वह जीव जिस समयमें मरण करके प्रथम मोड़ा लेता है उस सम- यमें त्रसपर्यायको धारण करने पर भी त्रसनालीके बाहर है । इस लिये उपपादकी अपेक्षा त्रस जीव बसनालीके बाहर रहता है । इसही प्रकार त्रसनालीमें स्थित किसी उसने मारणान्तिक समुद्धातके द्वारा त्रसनालीके बाहिरके प्रदेशोंका स्पर्श किया; क्योंकि उसको मरण करके वही उत्पन्न होना है, तो उस समयमें भी त्रस जीवका अस्तित्व त्रसनालीके बाहिर पाया जाता है । इस ही तरह जब केवली केवलसमुद्धातके द्वारा त्रसनालीके बाबा प्रदेशोंका स्पर्श करते है उस समयमें भी त्रसनालीके बाहर त्रस जीवका सद्भाव पाया जाता है । परन्तु इन तीनको छोड़कर बाकी त्रस जीव त्रसनालीके वाहर कभी नहीं रहते । - जिस तरह वनस्पतियोंमें प्रतिष्ठित अप्रतिष्ठित भेद है उस ही तरह दूसरे जीवों में भी ये भेद होते है यह बताते है। पुढवीआदिचउण्हं केवलिआहारदेवणिरयंगा। अपदिहिदा णिगोदहिं पदिहिदंगा हवे सेसा ॥ १९९॥ पृथिव्यादिचतुर्णा केवल्याहारदेवनिरयानानि । अप्रतिष्ठितानि निगोदैः प्रतिष्ठिताङ्गा भवन्ति शेषाः ॥ १९९ ।। , ..
गोम्मटसार। ८१ अर्थ-पृथिवी, जल, अमि, और वायुकायके जीवोंका शरीर तथा केवलिशरीर आहार- कशरीर और देवनारकियोंका शरीर निगोदिया जीवोंसे अप्रतिष्ठित है। और शेष वनस्प- तिकायके जीवोंका शरीर तथा द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च और मनुष्योंका शरीर निगोदिया जीवोंसे प्रतिष्ठित है। स्थावरकायिक और त्रसकायिक जीवोंका आकार बताते है । मसुरंबुर्विदुसूईकलावधयसण्णिहो हवे देहो। पुढवीआदिचउण्हं तरुतसकाया अणेयविहा ॥ २०॥ मसूराम्बुविन्दुसूचीकलापध्वजसन्निभो भवेद्देहः । पृथिव्यादिचतुर्णा तरुत्रसकाया अनेकविधाः ॥ २०० ॥ अर्थ-मसूर ( अन्नविशेष ), जलकी बिन्दु, सुइयोंका समूह, ध्वजा, इनके सदृश क्रमसे पृथिवी अप् तेज वायुकायिक जीवोंका शरीर होता है । और वृक्ष तथा त्रसोंका शरीर अनेक प्रकारका होता है । भावार्थ-जिस तरहका मसूरादिकका आकार है उस तरहका पृथिवीकायिकादिकका शरीर होता है, किन्तु वृक्ष और सोंका शरीर एक प्रकारका नहीं; किन्तु अनेक आकारका होता है। इस प्रकार कायमार्गणाका निरूपण करके, अब कायविशिष्ट यह संसारी जीव कायके द्वारा ही कर्मभारका वहन करता है यह दृष्टान्तद्वारा बताते है। जह भारवहो पुरिसो वहइ भरं गेहिऊण कावलियं । एमेव वहइ जीवो कम्मभरं कायकावलियं ॥ २०१॥ यथा भारवहः पुरुषो वहति भारं गृहीत्वा कावटिकाम् । एवमेव वहति जीवः कर्मभरं कायकावटिकाम् ॥ २०१ ॥ अर्थ-जिस प्रकार कोई भारवाही पुरुष कोवटिकाके द्वारा भारका वहन करता है, उस ही प्रकार यह जीव कायरूपी कावटिकाके द्वारा कर्मभारका वहन करता है। भावार्थ- जिस प्रकार मजूर कावटिकाके द्वारा निरन्तर वोझा ढोता है, और उससे रहित होनेपर सुखी होता है, उस ही प्रकार यह ससारी जीव कायके द्वारा कर्मरूपी वोझाको नाना गतियोंमें लिये फिरता है; किन्तु इस काय और कर्मके अभावमें परम सुखी होता है। कायमार्गणासे रहित सिद्धोंका खरूप बताते है । जह कंचणमग्गिगयं मुंचइ किट्टेण कालियाएं य । तह कायबंधमुक्का अकाइया झाणजोगेण ॥ २०२॥ १ अर्थात् इतने जीवोंके शरीरके आश्रय निगोदिया जीव नहीं रहते हैं । २ वहॅगी-कावड़ी। . गो.११ सुवर्णमें ८२ रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् । यथा कंचनमग्निगतं मुच्यते किट्टेन कालिकया च । तथा कायवन्धमुक्ता अकायिका ध्यानयोगेन । २०२॥ अर्थ-जिस प्रकार अग्निके द्वारा सुसस्कृत सुवर्ण बाह्य और अभ्यन्तर दोनो ही प्रकारके मलसे रहित होजाता है। उस ही प्रकार ध्यानके द्वारा यह जीव शरीर और कर्मवन्धसे रहित होकर सिद्ध होजाता है। भावार्थ-जिस प्रकार सोलह तावके द्वारा तपाये हुए वाह्य और अभ्यन्तर दोनों ही प्रकारके मलका विलकुल अभाव होजानेपर फिर किसी दूसरे मलका सम्बन्ध नहीं होता । उस ही प्रकार शुक्लध्यान आदिरूपी अमिके द्वारा सुतप्त आत्मामें काय और कर्मके सम्बन्धके सर्वथा छूटने पर फिर उनका वन्ध नहीं होता। ग्यारह गाथाओंमें पृथिवी कायिकादि जीवोंकी संख्याको बताते हैं। आउहुरासिवारं लोगे अण्णोण्णसंगुणे तेऊ । भूजलवाऊ अहिया पडिभागोऽसंखलोगो दु । २०३ ॥ सार्धत्रयराशिवारं लोके अन्योन्यसंगुणे तेजः । भूजलवायवः अधिकाः प्रतिभागोऽसंख्यलोकस्तु ॥ २०३ ॥ अर्थ-शलाकात्रयनिष्ठापनकी विधिसे लोकका साढ़े तीन बार परस्पर गुणा करनेसे तेजस्कायिक जीवोंका प्रमाण निकलता है । पृथिवी जल वायुकायिक जीवोंका उत्तरोत्तरस तेजस्कायिक जीवोंकी अपेक्षा अधिक २ प्रमाण है । इस अधिकताके प्रतिभागहारका प्रमाण असंख्यातलोक है । भावार्थ-लोकप्रमाण (जगच्छ्रेणीके धनका जितना प्रमाण है उसके वरावर ) शलाका विरलन देय इस प्रकार तीन राशि स्थापन करना । विरलन राशिका विरलन कर (एक २ वखेर कर) प्रत्येक एकके अपर उस लोकप्रमाण देय राशिका स्थापन करना, और उन देय राशियोंका परस्पर गुणा करना, और शलाका राशिमेसे एक कम करना । इस उत्पन्न महाराशिप्रमाण फिर विरलन और देय ये दो राशि स्थापन करना, तथा विरलन राशिका विरलन कर प्रत्येक एकके ऊपर देयराशि रखकर पूर्वकी तरह परस्पर गुणा करना, और शलाका राशिमेंसे एक और कम करना । इस ही प्रकारसे एक २ कम करते २ जव समस्त शलाका राशि समाप्त होजाय तव उस उत्पन्न महाराशिप्रमाण फिर विरलन देय शलाका ये तीन राशि स्थापन करना, और विरलन राशिका विरलन और देय राशिका उत्तरीतिसे गुणा करते २ तथा पूर्वोक्त रीतिसे ही शलाका राशिमसे एक २ कम करते २ जव दूसरी वार भी शलाका राशि समाप्त होजाय, तव उत्पन्न महा- राशिप्रमाण फिर तीसरी वार उक्त तीन राशि स्थापन करना। और उक्त विधानके अनुसार ही विरलन राशिका विरलन देय राशिका परस्पर गुणाकार तथा शलाका राशिमेंसे एक २ - गोम्मटसार। ८३ कम करना। इस प्रकार शलाकात्रयनिष्ठापन कर चौथी बारकी स्थापित महाशलाकाराशि- मेंसे पहली दूसरी तीसरी शलाका राशिका प्रमाण घटानेपर जो शेष रहे उतनी बार उक्त क्रमसे विरलन राशिका विरलन और देयराशिका परस्पर गुणाकार तथा शेष महाशलाका- राशिमसे एक २ कम करना । ऐसा करनेसे अन्तम जो महाराशि उत्पन्न हो उतनाही तेज- स्कायिक जीवोका प्रमाण है। इस तेजस्कायिक जीवराशिम असख्यात लोकका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उस एक भागको तेजस्कायिक जीवराशिम मिलानेपर पृथिवीकायिक जीवोंका प्रमाण निकलता है। और पृथिवीकायिक जीवोंके प्रमाणमें असख्यात लोकका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उस एक भागको पृथिवीकायिक जीवोंके प्रमाणमें मिलानेपर जलकायके जीवोंका प्रमाण निकलता है । जलकायके जीवोके प्रमाणमे असख्यात लोकका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उस एक भागको जलकायकी जीवराशिमे मिलानेपर वायुका- यिक जीवोका प्रमाण निकलता है। अपदिद्विदपत्तेया असंखलोगप्पमाणया होति । तचो पदिहिदा पुण असंखलोगेण संगुणिदा ॥२०४ ॥ अप्रतिष्ठितप्रत्येका असंख्यलोकप्रमाणका भवन्ति । ततः प्रतिष्ठिताः पुनः असंख्यलोकेन संगुणिताः ॥ २०४ ।। अर्थ-अप्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पतिकायिक जीव असख्यातलोकप्रमाण है, और इससे भी असख्यातलोकगुणा प्रतिष्ठितप्रत्येक वनस्पतिकायिक जीवोका प्रमाण है। तसरासिपुढविआदीचउकपत्तेयहीणसंसारी। साहारणजीवाणं परिमाणं होदि जिणदिटुं॥२०५॥ सराशिपृथिव्यादिचतुष्कप्रत्येकहीनसंसारी । साधारणजीवानां परिमाणं भवति जिनदिष्टम् ॥ २०५॥ अर्थ-सम्पूर्ण संसारी जीवराशिमसे, अस, पृथिव्यादि चतुष्क ( पृथिवी अय् तेज वायु) प्रत्येक वनस्पतिकायका प्रमाण घटानेसे जो शेष रहे उतना ही साधारण जीवोंका प्रमाण है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है। सगसगअसंखभागो बादरकायाण होदि परिमाणं। सेसा सुहमपमाणं पडिभागो पुवणिहिटो ॥२०६ ॥ खकखकासंख्यभागो वादरकायानां भवति परिमाणम् । शेषाः सूक्ष्मप्रमाणं प्रतिभागः पूर्वनिर्दिष्टः ॥ २०६ ॥ अर्थ-अपनी २ राशिका असंख्यातमा भाग बादरकाय जीवोंका प्रमाण है। और ८४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । शेष सूक्ष्म जीवोंका प्रमाण है । इसके प्रतिभागहारका प्रमाण पूर्वोक्त असंख्यातलोकप्रमाण है। भावार्थ-पृथिवीकायिकादि जीवोंकी अपनी २ राशिमं असंख्यात लोकका भाग देनेसे जो लब्ध आवे वह एक भाग प्रमाण बदर, शेष बहुभागप्रमाण सूक्ष्म जीवोंका प्रमाण है। सुहमेसु संखभाग संखा भागा अपुण्णगा इदरा । जस्सि अपुण्णद्धादो पुण्णद्धा संखगुणिदकमा ॥ २०७॥ सूक्ष्मेषु संख्यभागः संख्या भागा अपूर्णका इतरे । यस्मादपूर्णाद्धातः पूर्णाद्धा संख्यगुणितक्रमाः ॥ २०७ ॥ अर्थ-सूक्ष्म जीवों में संख्यात भागमेंसे एक भागप्रमाण अपर्याप्तक और बहुभागप्रमाण पर्याप्तक है। क्योंकि अपर्याप्तकके कालसे पर्याप्तकका काल संख्यातगुणा है। पल्लासंखेजवहिदपदरंगुलभाजिदे जगप्पदरे । जलभूणिपवादरया पुण्णा आवलिअसंखभजिदकमा ॥ २०८ ॥ पल्यासंख्यावहितप्रतराजुलभाजिते जगत्पतरे । जलभूनिपवादरकाः पूर्णा आवल्यसंख्यभजितक्रमाः ॥ २०८ ॥ अर्थ-पल्पके असंख्यातमे भागसे भक्त प्रतराङ्गुलका जगत्प्रतरमे भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना बादर पर्याप्त जलकायिक जीवोका प्रमाण है । इसमे अवलिके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो शेष रहे उतना वादर पर्याप्त पृथ्वीकायिक जीवोंका प्रमाण है। इसमें भी आवलिके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो शेष रहे उतना सप्रतिष्ठित प्रत्येक पर्याप्त जीवराशिका प्रमाण होता है । पूर्वकी तरह इसमे भी आवलीके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो शेष रहे उतना अप्रतिष्ठित प्रत्येक पर्याप्त जीवराशिका प्रमाण है - विंदावलिलोगाणमसंखं संखं च तेउवाऊणं । पजताण पमाणं.तेहिं विहीणा अपजता ॥ २०९॥ वृन्दावलिलोकानामसंख्यं संख्यं च तेजोवायूनाम् । पर्याप्तानां प्रमाणं तैर्विहीना अपर्याप्ताः ॥ २०९ ॥ अर्थ-घनावलिके असख्यात भागोंमेंसे एक भाग प्रमाण पर्याप्त तेजस्कायिक जीवोंका प्रमाण है । और लोकके संख्यात भागोंमेंसे एक भागप्रमाण पर्याप्त वायुकायिक जीवोंका प्रमाण है। अपनी २ सम्पूर्ण राशिमेंसे पर्याप्तकोंका प्रमाण घटानेपर जो शेष रहे वही अप- प्तिकोंका प्रमाण है । भावार्थ सूक्ष्म जीवोंका अलग वर्णन किया गया है। इसलिये "पल्लासंखेज्जवहिद" और "बिंदावलिलोगाण" इन दो गाथाओंमें बादर जीवोंका ही प्रमाण गोम्मटसार। ८५ समझना । और इन दो गाथाओंमें कहे हुए पर्याप्तक जीवोंके प्रमाणको अपनी २ सामा- न्य राशिमेंसे घटानेपर जो शेष रहे उतना अपर्याप्तकोंका प्रमाण है। साहरणवादरेसु असंखं भागं असंखगा भागा। पुण्णाणमपुण्णाणं परिमाणं होदि अणुकमसो ॥२१॥ साधारणवादरेपु असंख्य भागमसंख्यका भागाः। पूर्णानामपूर्णानां परिमाणं भवत्यनुक्रमशः ॥ २१० ॥ अर्थ-साधारण वादर जीवोंमें असख्यात भागमैसे एक भागप्रमाण पर्याप्त और बहुमागप्रमाण अपर्याप्त है। आवलिअसंखसंखेणवहिदपदरजुलेण हिदपदरं। कमसो तसतप्पुण्णा पुण्णूणतसा अपुण्णा हु ॥ २११॥ आवल्यसंख्यसंख्येनावहितप्रतराजुलेन हितप्रतरम् । क्रमशस्त्रसतत्पूर्णाः पूर्णोननसा अपूर्णा हि ॥ २११ ॥ अर्थ-आवलीके असख्यातमे भागसे भक्त प्रतरामुलका भाग जगप्रतरमें देनेसे जो लव्ध आवे उतना ही सामान्य त्रसराशिका प्रमाण है । और आवलीके सख्यातमे भागसे भक्त प्रतरामुलका भाग जगत्मतरमें देनेसे जो लब्ध आवे उतना पर्याप्त त्रस जीवोंका प्रमाण है । सामान्य त्रसराशिमसे पर्याप्तकोंका प्रमाण घटानेपर शेष अपर्याप्त सौंका प्रमाण निकलता है। वादर तेजस्कायिकादि जीवोंकी अर्द्धच्छेद सख्याको बताते है। आवलिअसंखमागणवहिदपल्लूणसायरद्धछिदा । वादरतेपणिभूजलवादाणं चरिमसायरं पुण्णं ॥ २१२ ॥ आवल्यसंख्यभागेनावहितपल्योनसागरार्धच्छेदाः। बादरतेपनिभूजलवातानां चरमः सागरः पूर्णः ।। २१२ ।। अर्थ-आवलीके असख्यातमे भागसे भक्त पल्यको सागरमेंसे घटानेपर जो शेष रहें उतने वादर तेजस्कायिक जीवोंके अर्द्धच्छेद है । और अप्रतिष्ठित प्रत्येक, प्रतिष्ठित प्रत्येक, वादर पृथ्वीकायिक, बादर जलकायिक जीवोंके अर्द्धच्छेदोंका प्रमाण क्रमसे आवलीके *असख्यातमे भागका दो वार, तीन वार, चार वार, पाच वार पल्यमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसको सागरमें घटानेसे निकलता है । और बादर वातकायिक जीवोंके अर्द्धच्छेदका प्रमाण पूर्ण सागरप्रमाण है। भावार्थ-किसी राशिको जितनी वार आधा २ करनेसे एक शेष रहे उसको अर्द्धच्छेद राशि कहते है। जैसे दोकी एक, चारकी दो, आठकी तीन, सोलहकी चार, और बचीसकी पाच अर्द्धच्छेद राशि है। इस ही प्रकार बादर तेजस्कायिक जीवोकी ८६ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । अर्द्धच्छेद राशिका प्रमाण एक वार आवलीके असंख्यातमे भागसे भाजित पल्यको सागरमें घटानेपर जो शेष रहे उतना है। दो बार आवलीके असख्यातमे भागसे भाजित पल्यको सागरमें घटानेपर अप्रतिष्ठित प्रत्येक जीवोंके अर्द्धच्छेदोंका प्रमाण निकलता है। तीन वार आवलीके असंख्यातमे भागसे भाजित पल्यको सागरमें घटानेसे शेष प्रतिष्ठित प्रत्येक जीवोंक अर्द्धच्छेदोंका प्रमाण होता है। चार वार आवलीके असंख्यातमे भागसे भाजित पल्यको सागरमें घटानेसे बादर पृथ्वीकायिक जीवोंके अर्धच्छेदोंका प्रमाण निकलता है। पांच वार आवलीके असंख्यातमे भागसे भाजित पल्यको सागरमैसे घटानेपर शेप बादर जलका- यिक जीवोंके अर्द्धच्छेदोंका प्रमाण होता है। और बादर वातकायिक जीवोंके अर्द्धच्छेदों का प्रमाण पूर्ण सागर प्रमाण है। तेवि विसेसेणहिया पल्लासंखेजभागमेत्तेण । तम्हा ते रासीओ असंखलोगेण गुणिदकमा ॥ २१३ ॥ तेपि विशेपेणाधिकाः पल्यासंख्यातभागमात्रेण । तस्मात्ते राशयोऽसंख्यलोकेन गुणितक्रमाः॥ २१३ ॥ अर्थ-ये प्रत्येक अर्द्धच्छेद राशि पत्यके असंख्यातमे २ भाग उत्तरोचर अधिक हैं । इसलिये ये सभी राशि (तेजस्कायिकादि जीवों के प्रमाण) क्रमसे उत्तरोत्तर असं- ख्यातलोकगुणी हैं। भावार्थ-बादर तेजस्कायिक जीवोंकी अपेक्षा अप्रतिष्ठित, और अप्रति- ष्ठितोंकी अपेक्षा प्रतिष्ठित जीवोंके अर्द्धच्छेद पल्यके असख्यातमे २ भाग अधिक हैं । इसी प्रकार पृथिवीकायिकादि के भी अर्द्धच्छेद पूर्व २ की अपेक्षा पल्यके असंख्यातमे भाग अधिक हैं । इस लिये पूर्व २ राशिकी अपेक्षा उत्तरोत्तर राशि (मूल) असंख्यात लोकगुणी है । उक्त असंख्यातलोकगुणितक्रमको निकालनेके लिये करणसूत्रको कहते हैं। दिण्णच्छेदेणवहिदइच्छेदहिं पयदविरलणं भजिदे। लद्धमिदइट्टरासीणण्णोण्णहदीए होदि पयदधणं ॥ २१४ ॥ देयच्छेदेनावहितेष्टच्छेदैः प्रकृतविरलनं भाजिते । लब्धमितेष्टराश्यन्योन्यहत्या भवति प्रकृतधनम् ॥ २१४ ॥ अर्थ-देयराशिके अर्द्धच्छेदोंसे भक्त इष्ट राशिके अर्धच्छेदोंका प्रकृत विरलन राशिमें भागदेनेसे जो लब्ध आवे उतनी जगह इष्ट राशिको रखकर परस्पर गुणा करनेसे प्रकृत- धन होता है। भावार्थ-इसकी अंकसंदृष्टि इस प्रकार है कि जब सोलह जगह दूआ माड़ (सोलह जगह दोका अंक रखकर ) परस्पर गुणा करनेसे पण्णही (६५५३६ ) उत्पन्न होती है तब ६४ जगह दुआ माड़ परस्परस्पर गुणा करनेसे कितनी राशि उत्पन्न होगी ! तो देयराशि दोके अर्धच्छेद एकका इष्टराशि पण्णट्ठीके अर्धच्छेद सोलहमें भागदेनेसे लब्ध ८७ गोम्मटसार। सोलहका भाग प्रकृतविरलन राशि ६४ में दिया, इससे चारकी संख्या लब्ध आई इसलिये चार जगह पर पण्णट्ठीको रखकर परस्पर गुणा करनेसे प्रकृतधन होता है । इस ही प्रकार अर्थसंदृष्टि में जब इतनी जगह (अर्धच्छेदोंकी राशिप्रमाण) दुआ माडि परस्पर गुणा करनेसे इतनी राशि उत्पन्न होती है तब इतनी जगह ( आगेकी राशिके अर्धच्छेदप्रमाण) दूआ माड़ि परस्पर गुणा करनेसे कितनी राशि उत्पन्न होगी ? इस प्रकार उक्त क्रमसे त्रैराशिक विधान करनेपर पूर्व २ की अपेक्षा उत्तरोत्तर राशि असल्यातलोकगुणी सिद्ध होती है। इति कायमार्गणाधिकारः योगमार्गणा क्रमप्राप्त है इसलिये प्रथम ही योगका सामान्य लक्षण कहते है। पुग्गलविवाइदेहोदयण मणवयणकायजुत्तस्स । जीवस्स जा हु सत्ती कम्मागमकारणं जोगो ॥ २१५॥ पुद्गलविपाकिदेहोदयेन मनोवचनकाययुक्तस्य । जीवस्य या हि शक्तिः कर्मागमकारणं योगः ॥ २१५ ॥ अर्थ-पुद्गलविपाकिशरीरनामकर्मके उदयसे मन वचन कायसे युक्त जीवकी जो कोंके ग्रहण करनेमे कारणभूत शक्ति है उस ही को योग कहते है । भावार्थ-आत्माकी 'अनन्त शक्तियोंमेंसे एक योग शक्ति भी है। उसके दो भेद है, एक भावयोग दूसरा द्रव्य. योग । पुद्गलविपाकी आङ्गोपाङ्गनामकर्म और शरीरनामकर्मके उदयसे, मनो वचन काय पर्याप्ति जिसकी पूर्ण होचुकी है और जो मनोवाक्कायवर्गणाका अवलम्बन रखता है ऐसे ससारी जीवकी जो समस्त प्रदेशोंमें रहनेवाली कर्मोंके ग्रहण करनेमें करणभूत शक्ति है उसको भावयोग कहते है। और इस ही प्रकारके जीवके प्रदेशोंका जो परिस्पन्द है उसको द्रव्ययोग कहते है। यहां पर कर्मशब्द उपलक्षण है इसलिये कर्म और नोकर्म दोनोको ग्रहण करनेवाला योग होता है ऐसा समझना चाहिये । योगविशेषका लक्षण कहते है। मणवयणाणपउत्ती सच्चासचुभयअणुभयत्थेसु । तण्णामं होदि तदा तेहि दु जोगा हु तजोगा ॥ २१६ ॥ मनोवचनयोः प्रवृत्तयः सत्यासत्योभयानुभयार्थेषु । तन्नाम भवति तदा तैस्तु योगात् हि तद्योगाः॥ २१६ ॥ अर्थ-सत्य असत्य उमय अनुभय इन चार प्रकारके पदार्थों से जिस पदार्थको जानने या कहनेकेलिये जीवके मन वचनकी प्रवृत्ति होती है उस समयमें मन और वच-
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्
नका वही नाम होता है । और उसके सम्बन्धसे उस प्रवृत्तिका भी वही नाम होता है ।
भावार्थ-सत्य पदार्थको जाननेकेलिये किसी मनुष्यके मन या वचन की प्रवृत्ति हुई तो
उसके मनको सत्यमन और वचनको सत्य वचन कहेंगे। तथा उनके द्वारा होनेवाले योगको
सत्यमनोयोग और सत्य वचनयोग कहेंगे । इस ही प्रकार मन और वचनके सत्य असत्य
उभय अनुमय इन चारों भेदोंको भी समझना चाहिये।
सम्यग्ज्ञान के विषयभूत पदार्थको सत्य कहते हैं, जैसे यह जल है। मिथ्याज्ञानके विष-
यभूत पदार्थको मिथ्या कहते है, जैसे मरीचिकामें यह जल है । दोनोंके विषयभूत पदा-
र्थको उभय कहते है जैसे कमण्डलुमें यह घट है, क्योंकि कमण्डलु घटका काम देता है
इसलिये कथंचित् सत्य है और घटाकार नहीं है इसलिये असत्य भी है। जो दोनोंही
प्रकारके ज्ञानका विषय न हो उसको अनुमय कहते हैं जैसे सामान्यरूपसे यह प्रतिभास
होना कि "यह कुछ है"। यहां पर सत्य असत्यका कुछ भी निर्णय नही होसकता इस-
लिये अनुमय है।
योगविशेषोंका लक्षण कहते है।
सब्भावमणो सच्चो जो जोगो तेण सच्चमणजोगो
तविवरीओ मोसो जाणुभयं सच्चमोसोत्ति ॥ २१७ ॥
सद्भावमनः सत्यं यो योगस्तेन सत्यमनोयोगः ।
तद्विपरीतो मृपा जानीहि उभयं सत्यमुपेति ॥ २१७॥
अर्थ-समीचीन भावमनको ( पदार्थको जाननेकी शक्तिरूप ज्ञानको) अर्थात् समी-
चीन पदार्थको विषय करनेवाले मनको सत्यमन कहते है। और उसके द्वारा जो योग
होता है उसको सत्यमनोयोग कहते है । सत्यसे जो विपरीत है उसको मिथ्या कहते है।
तथा सत्य और मिथ्या दोनों ही प्रकारके मनको उभय मन कहते हैं।
ण य सचमोसजुत्तो जो दुमणो सो असचमोसमणो।
जो जोगो तेण हवे असचमोसो दु मणजोगो ॥ २१८ ॥
न च सत्यमृषायुक्तं यत्तु मनः तदसत्यमृषामनः ।
यो योगस्तेन भवेत् असत्यमृषा तु मनोयोगः ॥ २१८ ॥
अर्थ-जो न तो सत्य हो ओर न मृषा हो उसको असत्यमृषा मन कहते है । और
उसके द्वारा जो योग होता है उसको असत्यमृषामनोयोग कहते है।
दसविहसचे वयणे जो जोगो सो दु सञ्चवचिजोगो।
तधिवरीओ मोसो जाणुभयं सचमोसोत्ति ॥ २१९ ॥
गोम्मटसारः। दशविधसत्ये बचने यो योगः स तु सत्यवचोयोगः । तद्विपरीतो मृषा जानीहि उभयं सत्यमृषेति ।। २१९ ॥ अर्थ-दश प्रकारके सत्य अर्थके वाचक वचनको सत्यवचन और उससे होनेवाले योगको सत्यवचनयोग कहते है । तथा इससे जो विपरीत है उसको मृषा और जो कुछ सत्य और कुछ मृषाका वाचक है उसको उभयवचनयोग कहते है। जो णेव सञ्चमोसो सो जाण असचमोसवचिजोगो । अमणाणं जा भासा सण्णीणामंतणी आदी॥ २२०॥ यो नैव सत्यमृपा स जानीहि असत्यमृषावचोयोगः। अमनसां या भाषा संज्ञिनामामनण्यादिः ॥ २२०॥ अर्थ-जो न सत्यरूप हो और न मृषारूप ही हो उसको अनुमय वचनयोग कहते हैं । असज्ञियोंकी समस्त भाषा और सज्ञियोकी आमन्त्रणी आदिक भाषा अनुमय भाषा कही जाती है। दशप्रकारका सत्य बताते है। जणवदसम्मदिठवणाणामे सवे पडुचववहारे । संभावणे य भावे उवमाए दसविहं सचं ॥ २२१॥ जनपदसम्मतिस्थापनानानि रूपे प्रतीत्यव्यवहारयोः । संभावनायां च भावे उपमायां दशविघं सत्यम् ॥ २२१ ॥ अर्थ-जनपदसत्य, सम्मतिसत्य, स्थापनासत्य, नामसत्य, रूपसत्य, प्रतीत्यसत्य, व्यव- हारसत्य, सभावनासत्य, भावसत्य, उपमासत्य, इस प्रकार सत्यके दश भेद है। दश प्रकारके सत्यका दो गाथाओंमें दृष्टान्त बताते है । मत्तं देवी चंदप्पहपडिमा तह य होदि जिणदत्तो। सेदो दिग्धो रज्झदि कूरोत्ति य ज हवे वयणं ॥ २२२ ॥ सको जंबूदीपं पल्लदृदि पाववजवयणं च । पल्लोवमं कमसो जणवदसञ्चादिदिलुता ॥ २२३ ॥ भक्तं देवी चन्द्रप्रमप्रतिमा तथा च भवति जिनदत्तः । श्वेतो दीर्घो रष्यते क्रूरमिति च यद्भवेद्वचनम् ॥ २२२ ।। शको जम्बूद्वीपं परिवर्तयति पापवर्जवचनं च । पल्पोपमं च क्रमशो जनपदसत्यादिदृष्टान्ता. ॥ २२३ ॥ अर्थ-उक्त दश प्रकारके सत्यवचनके ये दश दृष्टान्त है । भावार्थ-तत्तद्देशवासी मनुष्योंके व्यवहारमें जो शब्द रूढ होरहा है उसको जनपद सत्य कहते है । जैसे भक्त- , गो. १२ . , रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । मात-कुलु । बहुत मनुष्योंकी सम्मतिसे जो साधारणमें रूढ हो उसको सम्मतिसत्य या संवृतिसत्य कहते है। जैसे पट्टराणीके सिवाय किसी साधारण स्त्रीको भी देवी कहना । भिन्न वस्तुमें भिन्न वस्तुके समारोप करनेवाले वचनको स्थापनासत्य कहते हैं। जैसे प्रति- माको चन्द्रप्रभ कहना । दूसरी कोई अपेक्षा न रखकर केवल व्यवहारकेलिये जो किसीका संज्ञाकर्म करना इसको नामसत्य कहते हैं। जैसे जिनदत्त । यद्यपि उसको जिनेन्द्रने दिया नहीं है तथापि व्यवहारकेलिये उसको जिनदत्त कहते है । पुद्गलके रूपादिक अनेक- गुणोंमेंसे रूपकी प्रधानतासे जो वचन कहा जाय उसको रूपसत्य कहते है । जैसे किसी मनुष्यके केशोंको काला कहना, अथवा उसके शरीरमें रसादिकके रहने पर भी उसको श्वेत कहना किसी विवक्षित पदार्थकी अपेक्षा दूसरे पदार्थक खरूपका कथन करनाइसको प्रतीत्यसत्य अथवा आपेक्षिकसत्य कहते है। जैसे किसीको बड़ा लम्बा या स्थूल कहना । नैगमादि नयोंकी प्रधानतासे जो वचन बोला जाय उसको व्यवहारसत्य कहते है। जैसे नैगम नयकी प्रधानतासे 'भात पकाता हूं' सग्रहनयकी अपेक्षा 'सम्पूर्ण सत् है 'अथवा' सम्पूर्ण असत् है" आदि । असभवताका परिहार करते हुए वस्तुके किसी धर्मको निरूपण करनेमें प्रवृत्त वचनको समावना सत्य कहते है । जैसे इन्द्र जम्बूद्वीपको लौटादे अथवा लौटा सकता है। आगमोक्त विधि निषेधके अनुसार अतीन्द्रिय पदार्थों में सकल्पित परिणामोंको भाव कहते है, उसके आश्रित जो वचन हों उसको भावसत्य कहते है। जैसे शुष्क पक तप्त और निमक मिर्च खटाई आदिसे अच्छीतरह मिलाया हुआ द्रव्य प्रासुक होता है । यहां पर यद्यपि सूक्ष्म जीवोंको इन्द्रियोंसे देख नही सकते तथापि आगमप्रामाण्यसे उसकी प्रासु- कताका वर्णन किया जाता है । इसलिये इसही तरहके पापवर्ज वचनको भावसत्य कहते है। दूसरे प्रसिद्ध सदृश पदार्थको उपमा कहते हैं। इसके आश्रयसे जो वचन बोला जाय उसको उपमासत्य कहते है। जैसे पल्य । यहां पर रोमखण्डोंका आधारभूत गड्डा, पत्य अर्थात् खासके सदृश होता है इसलिये उसको पल्प कहते है। इस सख्याको उपमासत्य कहते है। इस प्रकार ये दशप्रकारके सत्यके दृष्टान्त है इसलिये और भी इस ही तरह जानना । दो गाथाओंमें अनुभय वचनके भेदोंको गिनाते है। आमंतणि आणवणी याचणिया पुच्छणी य पण्णवणी। पचक्खाणी संसयवयणी इच्छाणुलोमा य ॥ २२४ ॥ णवमी अणक्खरगदा असञ्चमोसा हवंति भासाओ। सोदाराणं जम्हा वत्तावचंससंजणया ॥ २२५ ॥ आमन्त्रणी आज्ञापनी याचनी आपृच्छनी च प्रज्ञापनी। प्रत्याख्यानी संशयवचनी इच्छानुलोनी च ॥ २२४ ।।
गोम्मटसारः। नवमी अनक्षरगता असत्यमृपा भवन्ति भापाः। श्रोतृणां यस्मात् व्यक्ताव्यक्तांशसंज्ञापिकाः ॥ २२५ ॥ अर्थ-आमन्त्रणी, आज्ञापनी, याचनी, आपृच्छनी, प्रज्ञापनी, प्रत्याख्यानी, सशयवचनी, इच्छानुलोनी, अनक्षरगता ये नव प्रकारकी अनुभयात्मक भाषा है। क्योंकि इनके सुननेवालेको व्यक्त और अव्यक्त दोनोही अंशोंका ज्ञान होता है। भावार्थ हे देवदत्त ! यहां आओ इसतरहके बुलानेवाले वचनोको आमन्त्रणी भाषा कहते है। यह काम करो इसतरहके आज्ञावचनोंको आज्ञापनी भाषा कहते हैं । यह मुझको दो इसतर- हके प्रार्थनावचनोंको याचनी भाषा कहते है । यह क्या है ? इसतरहके प्रश्नवचनोंको आपृच्छनी भाषा कहते है । मै क्या करूं इसतरहके सूचनावाक्योंको प्रज्ञापनी भाषा कहते है। इसको छोड़ता हूं इसतरहके छोडनेवाले वाक्योको प्रत्याख्यानी भाषा कहते है। यह बलाका है अथवा पताका ऐसे संदिग्ध वचनोंको सशयवचनी भाषा कहते है । मुझको भी ऐसा ही होना चाहिये ऐसे इच्छाको प्रकटकरनेवाले वचनोंको इच्छानुलोनी भाषा कहते है। द्वीन्द्रियादिक असज्ञिपचेन्द्रियपर्यन्त जीवोकी भाषा अनक्षरात्मक होती है। ये सब ही भाषा अनुभयवचन रूप है क्योकि इनके सुननेसे व्यक्त और अन्यक्त दोनो ही अंशोंका बोध होता है । इसलिये सामान्य अंशके व्यक्त होनेसे असत्य भी नही कहसकते, और विशेष अशके व्यक्त न होनेसे सत्य भी नहीं कहसकते । चारो प्रकारके मनोयोग तथा वचनयोगका मूलकारण बताते है। मणवयणाणं मूलणिमित्तं खलु पुण्णदेहउदओ दु । मोसुभयाणं मूलणिमित्तं खलु होदि आवरणं ॥ २२६ ॥ मनोवचनयोर्मूलनिमित्तं खलु पूर्णदेहोदयस्तु । मृपोभययोर्मूलनिमित्तं खलु भवत्यावरणम् ॥ २२६ ॥ अर्थ-सत्य और अनुमय मनोयोग तथा वचनयोगका मूलकारण पर्याप्ति और शरीर- नामकर्मका उदय है । मृषा और उभय मनोयोग तथा वचनयोगका मूलकारण अपना २ आवरण कर्म है। सयोगकेवलीके मनोयोगकी सभवता बताते है । मणसहियाणं वयणं दिलु तप्पुवमिदि सजोगम्हि । उत्तो मणोवयारेणिदियणाणेण हीणम्हि ॥ २२७ ॥ मनःसहितानां वचनं दृष्टं तत्पूर्वमिति सयोगे। उक्तो मन उपचारेणेन्द्रियज्ञानेन हीने ॥ २२७ ॥ अर्थ-अमदादिक छद्मख मनसहित जीवोंके वचनप्रयोग मनपूर्वक ही होता है ।
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
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इसलिये इन्द्रियज्ञानसे रहित सयोगकेवलीके भी उपचारसे मन कहा है। मावार्थ-यद्यपि
उनके मन मुख्यतया नहीं है तथापि उनके वचनप्रयोग होता है। और वह वचनप्रयोग
असदादिकके विना मनके होता नहीं इसलिये उनके भी उपचारसे मनकी कल्पना की
जाती है।
असदादिक निरतिशय पुरुषों में होनेवाले स्वभावको देखकर सातिशय भगवानमें भी
उसकी कल्पना करना अयुक्त है फिर भी उसकी कल्पना करनेका क्या हेतु है ? यह,
बताते है।
अंगोवंगुदयादो दवमणटुं जिणिंदचंदम्हि ।
मणवग्गणखंधाणं आगमणादो दुमणजोगो ॥ २२८ ॥
आङ्गोपाङ्गोदयात् द्रव्यमनोर्थ जिनेन्द्रचन्द्रे ।
मनोवर्गणास्कन्धानामागमनात् तु मनोयोगः ।। २२८ ॥
अर्थ-आङ्गोपाङ्गनामकर्मके उदयसे हृदयस्थानमें विकसित अष्टदल पद्मके आकार
द्रव्यमन होता है । इस द्रव्यमनकी कारणभूत मनोवर्गणाओंका सयोगकेवली भगवान्के
आगमन होता है। इस लिये उपचारसे मनोयोग कहा है। भावार्थ-यद्यपि कार्य नहीं हैं,
तथापि उसके एक कारणका सद्भाव है अतः उसकी अपेक्षासे उपचारसे मनोयोगको
भी कहा है।
काययोगकी आदिमें औदारिक काययोगको निरूक्तिपूर्वक कहते है।
पुरुमहदुदारुरालं एयद्यो संविजाण तम्हि भवं ।
औरालियं तमुच्चइ औरालियकायजोगो सो ॥ २२९ ॥
पुरुमहदुदारमुरालमेकार्थः संविजानीहि तस्मिन् भवम् ।
औपलिकं तदुच्यते औरालिककाययोगः सः ।। २२९ ।।
अर्थ-पुरु महत् उदार उराल ये शब्द एकार्थवाचक है । उदारमें जो होय उसको
औदारिक कहते है। यहां पर भव अर्थमें ठण् प्रत्यय होता है। उदारमें होनेवाला जो
काययोग उसको औदारिक काययोग कहते है। मावार्थ-मनुष्य और तिर्यञ्चोंका शरीर
वैक्रियकादिक शरीरोंकी अपेक्षा स्थूल है इसलिये इसको उदार अथवा उराल कहते है,
और इसके द्वारा होनेवाले योगको औदारिक काययोग कहते है। यह योगरूढसंज्ञा है ।
औदारिकमिश्रयोगको कहते है।
ओरालिय उत्तत्थं विजाण मिस्सं तु अपरिपुण्णं तं ।
जो तेण संपजोगो ओरालियमिस्सजोगो सो ॥ २३०॥
औरालिकमुक्तार्थ विजानीहि मिनं तु अपरिपूर्ण तत् ।
यस्तेन संप्रयोगः औरालिकमिश्रयोगः सः ॥ २३०॥
गोम्मटसारः। अर्थ-जिस औदारिक शरीरका खरूप पहले वताचुके है, वही शरीर जब तक पूर्ण नहीं होता तबतक मिश्र कहाजाता है । और उसके द्वारा होनेवाले योगको औदारिकमि- श्रयोग कहते हैं। भावार्थ-शरीरपर्याप्तिसे पूर्व कार्मणशरीरकी सहायतासे होनेवाले औदा- रिक काययोगको औदारिकमिश्रकाययोग कहते हैं। वैक्रियिक काययोगको बताते है। विविहगुणइडिजुत्तं विकिरियं वा हु होदि वेगुवं । तिस्से भवं च णेयं वेगुचियकायजोगो सो ॥ २३१ ॥ विविधगुणर्द्धियुक्तं विक्रियं वा हि भवति विगूर्वम् । तस्मिन् भवं च ज्ञेयं वैगूर्विककाययोगः सः ॥ २३१ ॥ अर्थ-नाना प्रकारके गुण और ऋद्धियोंसे युक्त देव तथा नारकियों के शरीरको वैकि- यिक अथवा विगूर्व कहते है। और इसके द्वारा होनेवाले योगको वैगूर्विक अथवा वैक्रियि- ककाययोग कहते है। वैक्रियिक काययोगकी सम्भावना कहां २ पर है यह बताते है। वादरतेऊयाऊपंचिदियपुण्णगा विगुवंति । ओरालियं सरीरं विगुवणप्पं हवे जेसि ॥ २३२ ॥ वादरतेजोवायुपंचेन्द्रियपूर्णका विगूर्वन्ति । औरालिकं शरीर विगूर्वणात्मकं भवेत् येषाम् ॥ २३२ ॥ अर्थ-बादर (स्थूल ) तेजस्कायिक और वायुकायिक तथा सज्ञी पर्याप्त पंचेन्द्रिय, और भोगभूमिज तिर्यगू मनुष्य भी विक्रिया करते है । इसलिये इनका भी औदारिक शरीर वैक्रियिक होता है। भावार्थ-इन जीवोंका भी औदारिकशरीर वैक्रियिक होता है। परन्तु यह विक्रिया अपृथक् विक्रिया होती है। किन्तु भोगभूमिज और चक्रवर्ती पृथक् विक्रिया करते है। वैक्रियिक मिश्र काययोगको बताते है। वेगुधियउत्तत्थं विजाणमिस्सं तु अपरिपुण्णं तं । जो तेण संपजोगो वेगुधियमिस्सजोगो सो ॥ २३३ ॥ वैगुर्विकमुक्तार्थ विजानीहि मित्रं तु अपरिपूर्ण तत् । यस्तेन संप्रयोगो वैगूर्विकमिश्रयोगः सः ॥ २३३ ।। अर्थ-उक्त वैक्रियिक शरीर जबतक पूर्ण नहीं होता तब तक उसको वैक्रियिकमिश्र कहते हैं। और उसके द्वारा होनेवाले योगको वैक्रियिकमिश्रकाययोग कहते है। भावार्थ- ९४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। उत्पत्तिके समयसे अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त वैक्रियिक शरीरसे जब कार्मण शरीरकी सहायतासे योग होता है तब उस योगको वैक्रियिक मिश्र काययोग कहते हैं। आहारक काययोगका निरूपण करते हैं। आहारस्सुदयेण य पमत्तविरदस्स होदि आहारं । असंजमपरिहरणटुं संदेहविणासणटुं च ॥ २३४ ॥ आहारस्योदयेन च प्रमत्तविरतस्य भवति आहारकम् । असंयमपरिहरणार्थ संदेहविनाशनार्थ च ॥ २३४ ॥ अर्थ-असंयमके परिहार तथा सदेहको दूर करनेकेलिये छठे गुणस्थानवर्ती मुनिके आहारकशरीरनामकर्मके उदयसे आहारक शरीर होता है। णियखेत्ते केवलिदुगविरहे णिकमणपहुदिकल्लाणे । परखेत्ते संवित्ते जिणजिणघरवंदणटुं च ॥ २३५ ॥ निजक्षेत्रे केवलि द्विकविरहे निःक्रमणप्रभृतिकल्याणे । परक्षेत्रे संवृत्ते जिनजिनगृहवंदनार्थ च ।। २३५॥ अर्थ-अपने क्षेत्रमें केवली तथा श्रुतकेवलीका अभाव होनेपर किन्तु दूसरे क्षेत्रमें जहां पर कि औदारिक शरीरसे उस समय पहुंच नहीं सकता, तपकल्याणक आदिके होनेपर, और जिन जिनगृह ( चैत्यालय ) की वन्दनाकेलिये भी आहारक ऋद्धिको प्राप्त छठे गुणस्थानवर्ती मुनिके आहारक शरीर उत्पन्न होता है। उत्तमअंगम्हि हवे धादुविहीणं सुहं असंहणणं । सुहसंठाणं धवलं हत्थपमाणं पसत्थुदयं ॥ २३६ ॥ उत्तमाओं भवेत् धातुविहीनं शुभमसंहननम् । शुभसंस्थानं धवलं हस्तप्रमाणं प्रशस्तोदयम् ॥ २३६ ।। अर्थ-यह आहारक शरीर रसादिक धातु और सहननसे रहित, समचतुरस सस्थानसे युक्त, चन्द्रकांतके समान श्वेत, एक हस्तप्रमाणवाला आहारकशरीरादिक शुभ नामकर्मके उदयसे उत्तम शरीरमें होता है। अवाघादी अंतोमुहुत्तकालहिदी जहण्णिदरे। पजत्तीसंपुण्णे मरणंपि कदाचि संभवइ ॥ २३७ ॥ अव्याघाति अन्तर्मुहूर्तकालस्थिती जघन्येतरे । पर्याप्तिसंपूर्णायां मरणमपि कदाचित् संभवति ।। २३७ ॥ अर्थ- तो इस शरीरकेद्वारा किसी दूसरे पदार्थका और न दूसरे पदार्थके द्वारा इस शरीरका ही व्याघात होता है । तथा इसकी जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्त- गोम्मटसारः। मात्र है । आहार शरीरपर्याप्तिके पूर्ण होने पर कदाचित् आहारकऋद्धिवाले मुनिका मरण भी हो सकता है। आहारक काययोगका निरुक्तिसिद्ध अर्थ बताते है। आहरदि अणेण मुणी सुहमे अत्थे सयस्स संदेहे । गत्ता केवलिपासं तम्हा आहारगो जोगो ॥ २३८॥ आहरत्यनेन मुनिः सूक्ष्मानर्थान् स्वस्य संदेहे । गत्वा केवलिपार्थ तस्मादाहारको योगः ॥ २३८ ॥ अर्थ-छठे गुणस्थानवर्ती मुनि अपनेको सदेह होनेपर इस शरीरके द्वारा केवलीके पासमें जाकर सूक्ष्म पदार्थोंका आहरण (ग्रहण ) करता है इसलिये इस शरीरके द्वारा होनेवाले योगको आहारककाययोग कहते है। आहारक मिश्रयोगका निरूपण करते है। आहारयमुत्तत्थं विजाण मिस्सं तु अपरिपुण्णं तं । जो तेण संपजोगो आहारयमिस्सजोगो सो ॥ २३९ ॥ आहारकमुक्तार्थ विजानीहि मिनं तु अपरिपूर्ण तत् । यस्तेन संप्रयोग आहारकमिश्रयोगः सः॥ २३९ ॥ अर्थ उक्त आहारक शरीर जब तक पर्याप्त नहीं होता तब तक उसको आहारक- मिश्र कहते हैं । और उसके द्वारा होनेवाले योगको आहारकमिश्रयोग कहते है कार्मणकाययोगको बताते है। कम्मेव य कम्मभवं कम्मइयं जो दुतेण संजोगो। कम्मइयकायजोगो इगिविगतिगसमयकालेसु ॥ २४० ॥ कम्मैव च कर्मभवं कार्मणं यस्तु तेन संयोगः । कार्मणकाययोग एकद्विकत्रिकसमयकालेषु ॥ २४०॥ अर्थ-ज्ञानावरणादिक अष्टकमोंके समूहको अथवा कार्मणशरीर नामकर्मके उदयसे होनेवाली कायको कार्मणकाय कहते है। और उसके द्वारा होनेवाले योगको कार्मणका- ययोग कहते है । यह योग एक दो अथवा तीन समयतक होता है । भावार्थ-विग्रहगतिमें और केवलसमुद्धातमें भी तीन समय पर्यन्त ही कार्मणकाययोग होता है। किन्तु दूसरे योगोंका ऐसा नियम नही है । यहा पर जो समय और काल ये दो शब्द दिये है उससे यह सूचित होता है कि शेष योगोंका अव्याघातकी अपेक्षा अन्तर्मुहूर्त और व्याघातकी १ दो प्रतर और एक लोकपूर्ण समुद्धातकी अपेक्षा केवलसमुद्धातमे भी कार्मणयोगको तीन ही समय लगते हैं।
६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
अपेक्षा एक समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्तपर्यन्त काल है । यह काल एक जीवकी अपेक्षासे
है। किन्तु नाना जीवोंकी अपेक्षा आठ अन्तर मार्गणाओंको छोड़कर वाकी निरन्तरमार्गणा-
ओंका सर्व काल है।
योगप्रवृत्तिका प्रकार बताते है।
वेगुधियआहारयकिरिया ण समं पमत्तविरदम्हि ।
जोगोवि एककाले एकेव य होदि णियमेण ॥ २४१ ॥
वैगूर्विकाहारकक्रिया न समं प्रमत्तविरते ।
योगोऽपि एककाले एक एव च भवति नियमेन ॥ २४१॥
अर्थ-छठे गुणस्थानमे वैक्रियिक और आहारक शरीरकी क्रिया युगपत् नहीं होती।
और योग भी नियमसे एक कालमे एक ही होता है।
योगरहितका वर्णन करते है।
जेसि ण संति जोगा सुहासुहा पुण्णपावसंजणया।
ते होंति अजोगिजिणा अणोवमाणंतवलकलिया ॥ २४२ ॥
येषां न सन्ति योगाः शुभाशुभाः पुण्यपापसंजनकाः ।
ते भवन्ति अयोगिजिना अनुपमानन्तवलकलिताः ॥ २४२ ॥
अर्थ-जिनके पुण्य और पापके करणभूत शुभाशुभ योग नहीं हैं उनको अयोगिजिन
कहते हैं । वे अनुपम और अनन्त बल करके युक्त होते है।
शरीरमें कर्म नोकर्मका विभाग करते है।
ओरालियवेगुधियआहारयतेजणामकम्मुदये।
चउणोकम्मसरीरा कम्मेव य होदि कम्मइयं ॥ २४३ ॥
औरालिकवैगूर्विकाहारकतेजोनामकर्मोदये ।
चतुर्नोकर्मशरीराणि कर्मैव च भवति कार्मणम् ॥ २४३ ।।
अर्थ-औदारिक वैक्रियिक आहारक तैजस नामकर्मके उदयसे होनेवाले चार शरी-
रोंको नोकर्म कहते हैं। और कार्मण शरीर नामकर्मके उदयसे होनेवाले ज्ञानावरणादिक
आठ कोंके समूहको कार्मण शरीर कहते है।
औदारिकादिकोंकी समयप्रबद्धकी संख्याको बताते हैं।
परमाणूहि अणंतहि वग्गणसण्णा हु होदि एका हु।
ताहि अगंतहि णियमा समयपबद्धो हवे एको ॥ २४४ ॥
परमाणुमिरनन्वैर्वर्गणासंज्ञा हि भवत्येका हि।
तामिरनन्तैर्नियमात् समयप्रवद्धो भवेदेकः ॥ २४४ ॥
गोम्मटसारः। ९७ अर्थ-अनन्त ( अनन्तानन्त ) परमाणुओंकी एक वर्गणा होती है । और अनन्त वर्गणाओंका नियमसे एक समयप्रबद्ध होता है । ताणं समयपबद्धा सेढिअसंखेजभागगुणिदकमा । णतेण य तेजदुगा परं परं होदि सुहम खु ॥ २४५ ॥ तेपां समयप्रबद्धाः श्रेण्यसंख्येयभागगुणितक्रमाः । अनन्तेन च तेजोद्विका परं परं भवति सूक्ष्म खलु ॥ २४५ ॥ अर्थ-औदारिक वैक्रियिक आहारक इन तीन शरीरोंके समयप्रबद्ध उत्तरोतर क्रमसे श्रेणिके असख्यातमे भागसे गुणित है । और तैजस तथा कार्मण अनन्तगुणे है। किन्तु ये पांचो ही शरीर उत्तरोत्तर सूक्ष्म है । भावार्थ-यौदारिकसे चैक्रियिकके और वैक्रियिकसे आहारकके समयप्रबद्ध श्रेणिके असख्यातमे भाग गुणित है। किन्तु आहारकसे तैजसके अनन्तगुणे और तैजससे कार्मणशरीरके समयप्रबद्ध अनन्तगुणे हैं । इस तरह समयप्रब- द्धोंकी संख्या अधिक २ होनेपर भी ये पाचो शरीर उत्तरोत्तर सूक्ष्म २ है। औदारिकादिक शरीरोंके समयप्रबद्ध और वर्गणाओंका अवगाहनप्रमाण बताते है । ओगाहणाणि ताणं समयपवद्धाण वग्गणाणं च । अंगुलअसंखभागा उवरुवरिमसंखगुणहीणा ॥ २४६ ॥ अवगाहनानि तेषां समयप्रबद्धानां वर्गणानां च । अकुलासंख्यभागा उपर्युपरि असंख्यगुणहीनानि ॥ २४६ ॥ अर्थ-इन शरीरोंके समयप्रबद्ध और वर्गणाओंकी अवगाहनाका प्रमाण सामान्यसे अंगुलके असख्यातमे भाग है। किन्तु आगे आगेके शरीरोंके समयप्रबद्ध और वर्गणामोंकी अवगाहनाका प्रमाण क्रमसे असख्यातगुणा २ हीन है। इस ही प्रमाणको माधवचन्द्र विद्यदेव भी कहते है। तस्समयबद्धवग्गणओगाहो सूइअंगुलासंख- भागहिदविंदअंगुलमुवरुवरि तेण भजिदकमा ॥ २४७ ॥ तत्समयवद्धवर्गणावगाहः सूच्यडलासंख्य- भागहितवृन्दाङ्गुलमुपर्युपरि तेन भजितक्रमाः ॥ २४७ ॥ अर्थ-औदारिकादि शरीरोंके समयप्रवद्ध तथा वर्गणाओंका अवगाहन सूच्यङ्गुलके असंख्यातमे भागसे भक्त घनाङ्गुलप्रमाण है । और पूर्व २ की अपेक्षा आगे २ की अव- गाहना क्रमसे असंख्यातगुणी २ हीन है । १ इस गाथाकी सस्कृतव्याख्या श्रीमदभयचन्द्रसूरीने और हिन्दीभापा टीका विद्वद्वर्य श्रीटोडरमलजीने की है इसलिये हमने भी इसको यहापर लिख दिया है। किन्तु केशववर्णी टीकामे इसकी व्याख्या हमारे देखनेमे नहीं आई है। गो रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । विससोपचयका खरूप बताते है जीवादो गंतगुणा पडिपरमाणुम्हि विस्ससोवचया। जीवेण य समवेदा एककं पडि समाणा हु ॥ २४८ ॥ जीवतोऽनन्तगुणाः प्रतिपरमाणौ विनसोपचयाः। जीवेन च समवेता एकैकं प्रति समाना हि ॥ २४८॥ अर्थ-पूर्वोक्त कर्म और नोकर्मकी प्रत्येक परमाणुपर समान संख्याको लिये हुए जीवराशिसे अनन्तगुणे विनसोपचयरूप परमाणु जीवके साथ सम्बद्ध है । भावार्थ- जीवके प्रत्येक प्रदेशोंके साथ जो कर्म और नोकर्म बंधे है, उन कर्म और नोकर्मकी प्रत्येक परमाणु के साथ जीवराशिसे अनन्तगुणे विनसोपचयरूप परमाणु सम्बद्ध हैं । जो कर्मरूप तो नही है किन्तु कर्मरूप होनेकेलिये उम्मेद वार हैं उन परमाणुओंको विनसोपचय कहते है। कर्म और नोकर्मके उत्कृष्ट संचयका खरूप तथा स्थान बताते है। उकस्सटिदिचरिमे सगसगउकस्ससंचओ होदि । पणदेहाणं वरजोगादिससामग्गिसहियाणं ॥ २४९ ॥ उत्कृष्टस्थितिचरमे खकस्वकोत्कृष्टसंचयो भवति । पञ्चदेहानां वरयोगादिखसामग्रीसहितानाम् ॥ २४९ ॥ अर्थ-उत्कृष्ट योगको आदि लेकर जो २ सामग्री तत्तत्कर्म या नोकर्मके उत्कृष्ट संच- यमें कारण है उस २ सामग्रीके मिलनेपर औदारिकादि पांचो ही शरीरवालोके उत्कृष्ट- स्थितिके अन्तसमयमें अपने २ योग्य कर्म और नोकर्मका उत्कृष्ट संचय होता है। भावार्थ-स्थितिके प्रथम समयसे लेकर प्रतिसमय समयप्रवद्धका बंध होता है, और उसके एक २ निषेककी निर्जरा होती है । इस प्रकार शेष समयोंमें शेष निषेकोंका संचय होते २ स्थितिके अन्त समयमें आयुः कर्मको छोड़कर शेष कर्म और नोकर्मका उत्कृष्ट सचय होता है । यह संचय उत्कृष्ट योगादिक अपनी २ सामग्रीके मिलनेपर पांचो शरीरवालोंके होता है। उत्कृष्ट संचयकी सामग्रीविशेषको बताते है। आवासया हु भवअद्धाउस्सं जोगसंकिलेसोय। ओकढुक्णया छचेदे गुणिदकम्मसे ॥ २५० ॥ आवश्यकानि हि भवाद्धा आयुष्यं योगसंक्लेशौ च । अपकर्षणोत्कर्षणके षद् चैते गुणितकर्माशे ॥ २५० ॥ J - गोम्मटसारः। अर्थ-कर्मोंके उत्कृष्ट संचयसे युक्त जीवके उत्कृष्ट सचय करनेकेलिये ये छह आव- श्यक कारण होते है । भवाद्धा, आयुष्य, योग, सक्लेश, अपकर्षण, उत्कर्षण । पाचशरीरोंकी उत्कृष्टस्थितिका प्रमाण वताते है । पल्लतियं उवहीणं तेत्तीसंतोमुहुत्त उवहीणं । छवट्ठी कम्मद्विदि बंधुक्कस्सहिदी ताणं ॥ २५१ ॥ पल्यत्रयमुदधीनां त्रयस्त्रिंशदन्तर्मुहूर्त उदधीनाम् । पट्पष्टिः कर्मस्थितिबन्धोत्कृष्टस्थितिस्तेषाम् ॥ २५१ ॥ अर्थ-औदारिक शरीरकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य, बैंक्रियिक शरीरकी तेतीस सागर, आहारक शरीरकी अन्तर्मुहूर्त, तैजस शरीरकी छयासठ सागर है । कार्मण शरीरकी सामान्यसे सत्तर कोडाकोडी सागर किन्तु विशेषरूपसे ज्ञानावरण दर्शनावरण वेदनीय और अन्तराय कर्मकी उत्कृष्ट स्थिति तीस कोडाकोडी सागर है । मोहनीयकी सत्तर कोडाकोडी सागर, नाम गोत्रकी वीस कोडाकोडी सागर, और आयुः कर्मकी केवल तेतीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है। पांच शरीरोंकी उत्कृष्टस्थितिके गुणहानि आयामका प्रमाण बताते है । अंतोमुहुत्तमेत्तं गुणहाणी होदि आदिमतिगाणं । पल्लासंखेजदिमं गुणहाणी तेजकम्माणं ॥ २५२ ॥ अन्तर्मुहूत्रमात्रा गुणहानिर्भवति आदिमत्रिकानाम् । पल्यासंख्याता गुणहानिस्तेज कर्मणोः ॥ २५२ ।। अर्थ औदारिक वैक्रियिक आहारक शरीरकी गुणहानिका प्रमाण अन्तर्मुहूर्तमात्र है। और तैजस तथा कार्मण शरीरकी गुणहानिका प्रमाण पत्यके असख्यातमे भाग- मात्र है। औदारिकादि शरीरोंके समयप्रबद्धका बंध उदय और सत्त्व अवस्थामें द्रव्यप्रमाण कितना रहता है यह बताते है। एक समयपबद्धं बंधदि एक उदेदि चरिमम्मि । गुणहाणीण दिवढं समयपवद्ध हवे सचं ॥ २५३ ॥ एक समयप्रबद्धं बनाति एकमुदेति चरमे । गुणहानीनां व्यर्ध समयप्रवद्धं भवेत् सत्त्वम् ॥ २५३ ॥ अर्थ-प्रति समय एक समयप्रबद्धका बंध होता है, और एक ही समयप्रवद्धका उदय होता है, किन्तु अन्तमें कुछ कम डेढ गुणहानि गुणित समयप्रबद्धोंकी सत्ता रहती है। भावार्थ-पाचो शरीरों से तैजस और कार्मणका तो प्रतिसमय बंध उदय सत्त्व होता है,
१००
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
इस लिये इन दोनोंके समयप्रबद्धका प्रतिसमय बंध और उदय होता है, तथा किसी विवक्षित
समयप्रबद्धके चरमनिषेक समयमें डेढ गुणहानि गुणित समयमबद्धोंकी सचा रहती है।
किन्तु औदारिक तथा वैक्रियिक शरीरके समयप्रवद्धोंमें कुछ विशेपता है । वह इस प्रकार
है कि जिस समयमें शरीर ग्रहण किया उस समयमें बंधको प्राप्त होनेवाले समयमबद्धके प्रथ-
म निषेकका उदय होता है और द्वितीयादि समयोंमे द्वितीयादि निषकोंका उदय होता है।
और दूसरे समयमें बंधको प्राप्त होनेवाले समयप्रबद्धका प्रथम निषेक तथा प्रथम समयमें
बद्ध समयप्रबद्धका द्वितीय निषेक उदित होता है। इस ही तरह तृतीयादिक समयोंका
हिसाब समझना चाहिये । इसलिये इस क्रमसे अन्तमें धर्धगुणहानि-गुणित समयप्रवद्धोंकी
सत्ता रहती है । किन्तु आहारक शरीरका युगपद् प्रथम समयप्रवद्धमान द्रव्यका उदय
सत्त्व सचय रहता है।
औदारिक और वैक्रियिक शरीरमें विशेषताको वताते है।
पवरि य दुसरीराणं गलिदवसेसाउमेत्तठिदिवंधो।
गुणहाणीण दिवटुं संचयमुदयं च चरिमम्हि ॥ २५४ ॥
नवरि च द्विशरीरयोर्गलितावशेषायुर्मात्रस्थितिबन्धः ।
गुणहानीनां व्यर्ध संचयमुदयं च चरमे ॥ २५४ ॥
अर्थ-औदारिक और वैक्रियिक शरीरमें यह विशेषता है कि इन दोनों शरीरोंके
बध्यमान समयप्रबद्धोंकी स्थिति भुक्त आयुसे अवशिष्ट आयुकी स्थितिप्रमाण होती है।
और इनका आयुके अन्त समयमें डेढ़ गुणहानिमात्र उदय तथा सचय रहता है । भावार्थ-
शरीरग्रहणके प्रथम समयमें बंधको प्राप्त होनेवाले समयप्रबद्धकी स्थिति पूर्ण आयुःप्रमाण
होती है और दूसरे समयमें बंधको प्राप्त होनेवाले समयप्रबद्धोंकी स्थिति एक समय कम
आयुःप्रमाण और तीसरे समयमें बंधको प्राप्त होनेवाले समयप्रबद्धोंकी स्थिति दो समयकम
आयु प्रमाण होती है। इस ही प्रकार आगेके समयप्रबद्धोंकी स्थिति समझना चाहिये।
इस क्रमके अनुसार अन्तसमयमें बंधको प्राप्त होनेवाले समयप्रबद्धकी स्थिति एक समय-
मात्र होती है।
आयुके प्रथम समयसे लेकर अन्तसमय पर्यन्त बंधनेवाले समयप्रबद्धोंकी अवस्थिति,
आयुके अन्तसमयसे आगे नहीं रह सकती इसलिये अन्त समयमें कुछ कम डेढ गुणहा-
निमात्र समयप्रबद्धोंका युगपत् उदय तथा सचय रहता है।
किस प्रकारकी आवश्यक सामग्रीसे युक्त जीवके किस स्थान पर औदारिक शरीरका
उत्कृष्ट सचय होता है यह वताते है।
ओरालियवरसंचं देवुत्तरकुरुवजादजीवस्स ।
तिरियमणुस्सस्स हवे चरिमदुचरिमे तिपल्लठिदिगस्स ॥ २५५॥
गोम्मटसारः। १०१ औरालिकवरसंचयं देवोत्तरकुरूपजातजीवस्य । तिर्यग्मनुष्यस्य भवेत् चरमद्विचरमे त्रिपल्यस्थितिकस्य ॥ २५५ ॥ अर्थ-तीन पल्यकी स्थितिवाले देवकुरु तथा उत्तरकुरुमें उत्पन्न होनेवाले तिर्यञ्च और मनुष्योंके चरम तथा द्विचरम समयमें औदारिक शरीरका उत्कृष्ट सचय होता है । वैक्रियिक शरीरके उत्कृष्ट सचयका स्थान बताते है। वेगुधियवरसंचं वावीससमुद्दआरणदुगम्हि । जमा वरजोगस्स य वारा अण्णत्थ णहि बहुगा ॥ २५६ ॥ वैगूर्विकवरसंचयं द्वाविंशतिसमुद्रमारणद्विके । यस्मात् वरयोगस्य च वारा अन्यत्र नहि बहुकाः ॥ २५६ ॥ अर्थ-वैक्रियिक शरीरका उत्कृष्ट सचय, वाईस सागरकी आयुवाले आरण और अच्युत खर्गके ऊपरके विमानोमें रहनेवाले देवोंके ही होता है । क्योंकि वैक्रियिक शरीरका उत्कृष्ट योग तथा उसके योग्य दूसरी सामग्रिया अन्यत्र अनेकवार नहीं होती। भावार्थ-आरण अच्युत वर्गके उपरितन विमानोंमें रहनेवाले देवोंके ही जिनकी आयु वाईस सागरकी है वैक्रियिक शरीरका उत्कृष्ट योग तथा दूसरी सामग्री अनेक वार होती है, इसलिये इन देवोंके ही वैक्रियिक शरीरका उत्कृष्ट सचय होता है । तैजस तथा कार्मणके उत्कृष्ट सचयका स्थान बताते है। तेजासरीरजेडं सत्तमचरिमम्हि विदियवारस्स । कम्मस्स वि तत्थेव य णिरये बहुवारभमिदस्स ॥ २५७ ॥ तैजसशरीरज्येष्ठं सप्तमचरमे द्वितीयवारस्य । कार्मणस्यापि तत्रैव च निरये बहुवारभ्रमितस्य ॥ २५७ ॥ अर्थ-तैजस शरीरका उत्कृष्ट सचय सप्तम पृथिवीमें दूसरीवार उत्पन्न होनेवाले जीवके होता है । और कार्मण शरीरका उत्कृष्ट सचय अनेक वार नरकोंमें भ्रमण करके सप्तम पृथिवीमें उत्पन्न होनेवाले जीवके होता है। आहारक शरीरका उत्कृष्ट सचय आहा- रक शरीरका उत्थापन करनेवाले प्रमत्तविरतके ही होता है। योगमार्गणामें जीवोंकी सख्याको वताते है। वादरपुण्णा तेऊ सगरासीए असंखभागमिदा। विकिरियसचिजुत्ता पल्लासंखेजया वाऊ ॥२५८ ॥ बादरपूर्णाः वैजसाः स्वकराशेरसंख्यभागमिताः। विक्रियाशक्तियुक्ताः पल्यासंख्याता वायवः ॥ २५८ ॥ अर्थ-बादर पर्याप्तक तैजसकायिक जीवोंका जितना प्रमाण है उसमें असंख्यात
१०२
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
भागप्रमाण विक्रिया शक्तिसे युक्त है। और वायुकायिक जितने जीव हैं उनमें पत्यके
असंख्यातमे भाग विक्रियाशक्तिसे युक्त है।
पल्लासंखेजाहयविंदंगुलगुणिदसेढिमेत्ता हु।
बेगुचियपंचक्खा भोगभुमा पुह विगुवंति ॥ २५९ ॥
पल्यासंख्याताहतवृन्दाङ्गुलगुणितश्रेणिमात्रा हि ।
वैगूर्विकपञ्चाक्षा भोगभुमाः पृथक् विगूर्वन्ति ॥ २५९ ॥
अर्थ-पल्पके असंख्यातमे भागसे अभ्यस्त (गुणित) घनामुलका जगच्छ्रेणीके
साथ गुणा करने पर जो लब्ध आवे उतने ही पर्याप्त पंचेद्रिय तियेचोमें वैक्रियिक योगके
धारक हैं। और भोगभूमिया तिर्यंच तथा मनुष्य तथा कर्मभूमियाओंमें चक्रवर्ती पृथक्
विक्रिया करते हैं । भावार्थ-विक्रिया दो प्रकारकी होती हैं, एक पृथक् विक्रिया दूसरी
अपृथक् विक्रिया । जो अपने शरीरके सिवाय दूसरे शरीरादिक बनाना इसको पृथकू
विक्रिया कहते हैं । और जो अपने शरीरके ही अनेक आकार बनाना इसको अपृथक्
विक्रिया कहते है। इन दोनों प्रकारको विक्रियाके धारक तियेच तथा मनुष्योंकी सख्या
ऊपर कही हुई है।
देवेहिं सादिरेया तिजोगिणो तेहिं हीण तसपुषणा।
वियजोगिणो तदूणा संसारी एकजोगा हु ॥ २६० ॥
देवैः सातिरेकाः त्रियोगिनस्तैहानाः त्रसपूर्णाः ।
द्वियोगिनस्तदूना संसारिणः एकयोगा हि ॥२६॥
अर्थ देवोंसे कुछ अधिक त्रियोगियोंका प्रमाण है। पर्याप्त त्रसराशिसे त्रियोगि-.
योंको घटानेपर जो शेष रहे उतना द्वियोगियोंका प्रमाण है । ससारराशिमेंसे द्वियोगी तथा
त्रियोगियोंका प्रमाण घटानेसे एकयोगवालोंका प्रमाण निकलता है। भावार्थ-नारकी
देव सज्ञिपर्याध पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त मनुष्य इनका जितना प्रमाण है उतना ही त्रियो-
गियोंका प्रमाण है । असराशिमेंसे त्रियोगियोंका प्रमाण घटानेपर द्वियोगियोंका और
ससारराशिमेंसे त्रियोगि तथा द्वियोगियोंको प्रमाण घटानेपर एकयोगियोंका प्रमाण
निकलता है।
अंचोमुहुत्तमेत्ता चउमणजोगा कमेण संखगुणा।
तजोगो सामण्णं चउवचिजोगा तदो दु संखगुणा ॥ २६१॥
अन्तर्मुहूर्तमात्राः चतुर्मनोयोगाः क्रमेण संख्यगुणाः ।
तद्योगः सामान्य चतुर्वचोयोगाः ततस्तु संख्यगुणाः ॥ २६१ ॥
गोम्मटसारः।
१०३
अर्थ-सत्य असत्य उभय अनुमय इन चार मनोयोगोंमें प्रत्येकका काल यद्यपि
अन्तर्मुहूर्तमात्र है तथापि पूर्व २ की अपेक्षा उत्तरोत्तरका काल क्रमसे सख्यातगुणा है।
और चारोंके जोड़का प्रमाण भी अन्तर्मुहूर्तमात्र ही है । इस ही प्रकार चारों मनोयोगोंके
जोड़का जितना प्रमाण है उससे सख्यातगुणा काल चारों वचनयोगोंका है । और प्रत्येक
वचनयोगका काल अन्तर्मुहूर्त है । तथा पूर्व २ की अपेक्षा उत्तरोत्तरका प्रमाण संख्यातगुणा
है। और चारोंके जोड़का प्रमाण भी अन्तर्मुहूर्त है ।
तज्जोगो सामण्णं काओ संखाहदो तिजोगमिदं ।
सवसमासविभजिदं सगसगगुणसंगुणे दु सगरासी ॥ २६२ ॥
तद्योगः सामान्यं कायः संख्याहतः त्रियोगिमितम् ।
सर्वसमासविभक्त खकखकगुणसगुणे तु स्खकराशिः ॥ २६२ ॥
अर्थ-चारो वचनयोगोके जोड़का जो प्रमाण हो वह सामान्यवचनयोगका काल है
इससे सख्यातगुणा काययोगका काल है। तीनों योगोके कालको जोड़देनेसे जो समयोंका
प्रमाण हो उसका पूर्वोक्त त्रियोगिजीवराशिमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उस एक
भागसे अपनी २ राशिका गुणा करने पर अपनी २ राशिका प्रमाण निकलता है ।
भावार्थ-तीनो योगोंके जोड़का काल ८५४१७०१ अन्तर्मुहूर्तमात्र है । इसके जितने
समय हों उनका त्रियोगिजीवोंके प्रमाणमें भाग दीजिये । लब्ध एक भागके साथ सत्यम-
नोयोगीके कालके जितने समय है उनका गुणा कीजिये, जो लब्ध आवे वह सत्यमनोयो-
गवाले जीवोंका प्रमाण है । इस ही प्रकार असत्यमनोयोगीसे लेकर काययोगी पर्यन्त
जीवों में प्रत्येकका प्रमाण समझना ।
कम्मोरालियमिस्सयओरालद्धासु संचिदअणंता ।
कम्मोरालियमिस्सयओरालियजोगिणो जीवा ॥ २६३ ॥
कार्मणौदारिकमिश्रकोयलाद्धासु संचितानन्ताः।
कार्मणौरालिकमिश्रकौरालिकयोगिनो जीवाः ॥ २६३ ॥
अर्थ-कार्मणकाययोग औदारिकमिश्रयोग तथा औदारिककाययोगके समयमें एकत्रित
होनेवाले कार्मणयोगी औदारिकमिश्रयोगी तथा औदारिककाययोगी जीव अनन्तानन्त हैं
इस ही अर्थको स्पष्ट करते है।
समयत्तयसंखावलिसंखगुणावलिसमासहिदरासी।
सगगुणगुणिदे थोवो असंखसंखाहदो कमसो ॥ २६४ ॥
समयनयसंख्यावलिसंख्यगुणावलिसमासहितराशिम् ।
स्वकगुणगुणिते स्तोकः असंख्यसंख्याहतः क्रमशः ॥ २६४ ॥
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १०४ अर्थ-कार्मणकाययोगका काल तीन समय, औदारिकमिश्रयोगका काल संख्यात आवली, औदारिक काययोगका काल संख्यात गुणित (औदारिकमिश्रके कालसे) आवली है । इन तीनोंको जोड़ देनेसे जो समयोंका प्रमाण हो उसका एकयोगिजीवरा- शिमें भाग देनेसे लब्ध एक भागके साथ कार्मणकालका गुणा करने पर कार्मणकाययोगी जीवोंका प्रमाण निकलता है । इस ही प्रकार उसी एक भागके साथ औदारिकमिश्रकाल तथा औदारिककालका गुणा करनेपर औदारिकमिश्रकाययोगी और औदारिककाययोगी जीवोंका प्रमाण होता है । इन तीनों तरहके जीवोमें सबसे कम कामण काययोगी है उनसे असंख्यातगुणे औदारिकमिश्रयोगी है और उनसे सख्यातगुणे औदारिककाय- योगी हैं। चार गाथाओंमें वैक्रियिकमिश्र तथा वैक्रियिककाययोगके धारक जीवोंका प्रमाण बताते है। सोवकमाणुवकमकालो संखेजवासठिदिवाणे । आवलिअसंखभागो संखेजावलिपमा कमसो ॥ २६५ ॥ सोपक्रमानुपक्रमकालः संख्यातवर्षस्थितिवाने । आवल्यसंख्यभागः संख्यातावलिप्रमः क्रमशः ॥ २६५ ॥ अर्थ-सख्यातवर्षकी स्थितिवाले उसमें भी प्रधानतया जघन्य दश हजार वर्षकी. स्थितिवाले व्यन्तर देवोंका सोपक्रम तथा अनुपक्रम काल क्रमसे आवलीके असंख्यातमे भाग और संख्यात आवली प्रमाण है । भावार्थ-उत्पचिसहित कालको सोपक्रम काल कहते है । और उत्पचिरहित कालको अनुपक्रम काल कहते हैं। यदि व्यन्तर देव निरन्तर उत्पन्न हों तो आवलीके असंख्यातमे भागमात्रकाल पर्यन्त उत्पन्न होते ही रहें। यदि कोई भी व्यन्तर देव उत्पन्न न हो तो ज्यादेसे ज्यादे संख्यात आवलीमात्र काल पर्यन्त (बारह मुहूर्त ) उत्पन्न न हो, पीछे कोई न कोई उत्पन्न हो ही। तहिं सबे सुद्धसला सोवकमकालदो दु संखगुणा। तत्तो संखगुणूणा अपुण्णकालम्हि सुद्धसला ॥ २६६ ॥ तस्मिन् सर्वाः शुद्धशलाकाः सोपक्रमकालतस्तु संख्यगुणाः । ततः संख्यगुणोना अपूर्णकाले शुद्धशलाकाः ॥ २६६ ।। अर्थ- जघन्य दश हजार वर्षकी स्थितिमें अनुपक्रमकालको छोड़कर पर्याप्त तथा अप- यप्ति कालसम्बन्धी सोपक्रम कालकी शलाकाका प्रमाण, सोपक्रमकालके प्रमाणसे संख्यात- गुणा है। और इससे संख्यातगुणा कम अपर्याप्तकालसम्बन्धी सोपक्रमकालकी शलाकाका गोम्मटसार। १०५ प्रमाण है। भावार्थ-स्थितिके प्रमाणमें जितनीवार सोपक्रम कालका सम्भव हो उसको शलाका कहते है। इसका प्रमाण उक्त क्रमानुसार समझना । तं सुद्धसलागाहिदणियरासिमपुण्णकाललद्धाहिं। सुद्धासलागाहिं गुणे उतरवेगुवमिस्सा हु ॥ २६७ ॥ तं शुद्धशलाकाहितनिजराशिमपूर्णकाललब्धामिः । शुद्धशलाकाभिर्गुणे व्यन्तरवैगूर्वमिश्रा हि ॥ २६७ ।। अर्थ-पूर्वोक्त व्यन्तर देवोंके प्रमाणमें शुद्ध उपक्रम शलाकाका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसका अपर्याप्त-काल-सम्बन्धी शुद्ध उपक्रम शलाकाके साथ गुणा करने पर जो प्रमाण हो उतने ही वैक्रियिकमिश्रयोगके धारक व्यन्तरदेव समझने चाहिये । भावार्थ-संख्यात वर्षकी स्थितिवाले व्यन्तरदेव अधिक उत्पन्न होते है इसलिये उनकीही मुख्यतासे यहां प्रमाण बताया है। तहिं सेसदेवणारयमिस्सजुदे सबमिस्सवेगुवं । सुरणिरयकायजोगा वेगुधियकायजोगा हु ॥ २६८ ॥ तस्मिन् शेषदेवनारकमिश्रयुते सर्वमिश्रवैगूर्वम् । सुरनिरयकाययोगा वैगूर्विककाययोगा हि ॥ २६८ ॥ अर्थ-उक्त व्यन्तरोंके प्रमाणमें शेष भवनवासी, ज्योतिषी, वैमानिक और नार- कियोंके मिश्र काययोगका प्रमाण मिलानेसे सम्पूर्ण मिश्र वैक्रियिक काययोगका प्रमाण होता है। और देव तथा नारकियोंके काययोगका प्रमाण मिलानेसे समस्त वैक्रियिक काय- योगका प्रमाण होता है। आहारककाययोगी तथा आहारकमिश्रकाययोगियोंका प्रमाण बताते है। आहारकायजोगा चउवणं होंति एकसमयम्हि । आहारमिस्सजोगा सचावीसा दु उक्कसं ॥ २६९ ॥ आहारकाययोगाः चतुष्पञ्चाशत् भवन्ति एकसमये । आहारमिश्रयोगा सप्तविंशतिस्तूत्कृष्टम् ॥ २६९ ॥ अर्थ-एक समयमें आहारककाययोगवाले जीव अधिकसे अधिक चौअन होते हैं। । और आहारमिअयोगवाले जीव अधिकसे अधिक सचाईस होते है । यहां पर जो उत्कृष्ट शब्द है वह मध्यदीपक है । भावार्थ-जिस प्रकार देहलीपर रक्खा हुआ दीपक बाहर और भीतर दोनों जगह प्रकाश करता है उसही प्रकार यह शब्द भी पूर्वोक्त तथा जिसका आगे वर्णन करेंगे ऐसी दोनोंही संख्याको उत्कृष्ट अपेक्षा समझना यह सूचित करता है। इति योगमार्गणाधिकारः॥ गो.१४ १ १०६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । क्रमप्राप्त वेदमार्गणाका निरूपण करते हैं। पुरिसिच्छिसंढवेदोदयेण पुरिसिच्छिसंडओ भावे । णामोदयेण दवे पाएण समा कहिं विसमा ॥ २७० ।। पुरुषस्त्रीपण्ढवेदोदयेन पुरुषस्वीपण्डाः भावे । नामोदयेन द्रव्ये प्रायेण समाः कचिद् विषमाः ॥ २७० ॥ अर्थ-पुरुष स्त्री और नपुंसक वेदकर्मके उदयसे भावपुरुष भावत्री भाव नपुंसक होता है । और नामकर्मके उदयसे द्रव्य पुरुष द्रव्य स्त्री द्रव्य नपुसक होता है । सो यह भाववेद और व्यवेद प्रायःकरके समान होता है, परन्तु कही २ विषम भी होता है। भावार्थ-वेदनामक नोकषायके उदयसे जीवोंके भाववेद होता है, और भाङ्गोपाङ्गनामकर. मके उदयसे द्रव्यवेद होता है । सो ये दोनों ही वेद प्रायःकरके तो समान ही होते हैं, अर्थात् जो भाववेद वही द्रव्यवेद और जो व्यवेद वही भाववेद । परन्तु कही २ विष- मता भी होजाती है, अर्थात् भाववेद दूसरा और द्रव्यवेद दूसरा । वेदस्सुदीरणाए परिणामस्स य हवेज संमोहो। संमोहेण ण जाणदि जीवो हि गुणं व दोपं वा ॥ २७१ ॥ वेदस्योदीरणायां परिणामस्य च भवेत् संमोहः । संमोहेन न जानाति जीवो हि गुणं वा दोपं वा ।। २७१ ।। अर्थ-वेद नोकषायके उदय अथवा उदीरणा होनेसे जीवके परिणामोंमें बड़ा भारी- मोह उत्पन्न होता है। और इस मोहके होनेसे यह जीव गुण अथवा दोषका विचार नही कर सकता। पुरुगुणमोगे सेदे करेदि लोयम्मि पुरुगुणं कम्म। पुरुउत्तमो य जम्हा तम्हा सो वण्णिओ पुरिसो ॥ २७२ ॥ पुरुगुणभोगे शेते करोति लोके पुरुगुणं कर्म पुरुरुत्तमश्च यस्मात् तस्मात् स वर्णितः पुरुषः ॥ २७२ ॥ अर्थ-उत्कृष्ट गुण अथवा उत्कृष्ट भोगोंका जो खामी हो, अथवा जो लोकमें उत्कृष्ट- गुणयुक्त कर्मको करै, यद्वा जो खयं उत्तम हो उसको पुरुष कहते है। छादयदि सयं दोसे णयदो छाददि परं वि दोसेण । छादणसीला जम्हा तम्हा सा वणिया इत्थी ॥ २७३॥ १ यद्यपि शीड् धातुका अर्थ खम है, तथापि "धातूनामनेकार्थः" इस नियमके अनुसार खामी, करना तथा स्थिति अर्थ मानकर पृषोदरादि गणके द्वारा यह शब्द सिद्ध किया गया है। पुरुषु शेते इति पुरुष इत्यादि । अथवा पोऽन्तकमणि इस धातुसे इस शब्दकी सिद्धि समझना चाहिये। पुरु शब्दका अर्थ उत्तम होता है।
गोम्मदसार। १०७ छादयति वकं दोपे नवतः छादयति परमपि दोषण ! छादनगीला बलान् वलात् सा वर्णिता बी ॥ २७३ ।। अर्थ-जो निव्यादर्शन अज्ञान असंयम भादि दोपोंने अपनेको आच्छादित करे, और नृदु भाषण तिरछी चितवन आदि व्यापारते जो दूसरे पुरुषोंकी मी हिंसा अब्रह्म आदि दोपोसे आच्छादित करे, उसको अच्छादन-वभावयुक्त होनेते ली कहते है। भावार्थ-यद्यपि बहुन सी तियां अपनेको तथा दूसरोंको दोषोसे आच्छादित नहीं भी करती है तत्र मी बहुलता की अपेक्षा यह निरुक्तिसिद्ध लक्षण किया है। वित्थी व पुमं णउंसओ उहयलिशविदिरिचो। इटावग्गिसमाणगवेदनगरो कलुसचिचो ॥ २७४ ।। नैव श्री नैव पुमान नपुंसक उभयलिङ्गव्यतिरितः। इष्टापाकामिसनानम्वेदनागुरुकः कलुपचित्तः ।। २७४ ।। अर्थ--जो न ली हो और न पुरुष हो ऐते दोनो ही लिङ्गाने रहित जीबको नपुंसक कहते हैं। इसके अवा (म) में पकी हुई ईंटकी अमिके समान तीन कपाय होती है। अत एव इसका चित्त प्रतिसमय कलुपित रहता है। वेदरहित जीवोंको बताते हैं। तिणकारिसिपागम्गिसरिसपरिणामवेदांम्मुकश। अवगयवेदा जीवा सगसंभवणंतबरसोक्खा ॥ २७५ ॥ तृणकारीपेष्टपाकाग्निसशपरिणामवेदनोन्मुताः। अपगतवेदा जीवा: खकसम्भवानन्तवरसौख्याः॥ २७५ ॥ अर्थ-तृणकी अनि कारीप अभि इष्टपाक अमि ( अवाकी अग्नि ) के समान वेद के परिणामोसे रहित जीवाको अपगतवेद कहते हैं। ये जीव अपनी आत्माते ही उत्सन्न होनेवाले अनन्त और सर्वोत्कृष्ट सुखको भोगते हैं। वेदमार्गणामें पांच गाथाओं द्वारा जीवसंख्याका वर्णन करते है। जोइसियवाणजोणिणितिरिक्खपुरुसा य सणिणो जीवा। तचेउपम्मलेस्सा संखगुणूणा कमेणेदे ॥ २७६ ।। ज्योतिष्कवानयोनिनीतियापुरुषाश्च संझिनो जीवाः । तत्वेज:पद्मलेझ्याः संख्यगुणोनाः क्रमेणैते ॥ २५६॥ अर्थ-ज्योतिषी, व्यन्तर, योनिमती तिथेच, संज्ञी तिर्यंच, संत्री तिर्यच तेजोलेश्वा- वाले, तथा सनीतियेच पद्मलेश्यावाले जीव क्रमसे उत्तरोत्तर संख्यातगुणे संख्यातगुणे १ स्वं पर वा दोष स्त्रीणाति माच्छादयति इति श्रीन बीन पुमानिति नपुनकः।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १०८ हीन हैं। भावार्थ-१५५३६ से गुणित प्रतरामुलका भाग जगत्मतरमें देनेसे जो लब्ध आवे उतना ही ज्योतिषी जीवोंका प्रमाण है। इसमें क्रमसे असंख्यातगुणा २ कम करनेसे आगे २ की राशिका प्रमाण निकलता है। इगिपुरिसे बत्तीसं देवी तज्जोगभजिददेवोघे सगगुणगारेण गुणे पुरुषा महिला य देवेसु ॥ २७७ ॥ एकपुरुषे द्वात्रिंशद्देव्यः तद्योगभक्तदेवौधे । स्वकगुणकारेण गुणे पुरुषा महिलाश्च देवेषु ।। २७७ ॥ अर्थ-देवगतिमें एक देवकी कमसे कम बत्तीस देवियां होती है। इसलिये देव और देवियोंके जोरूप तेतीसका समस्त देवराशिमें भाग देनेसे जो लव्ध आवे उसका अपने २ गुणाकारके साथ गुणा करनेसे देव और देवियोंका प्रमाण निकलता है । भावार्थ-समस्त देवराशिमें तेतीसका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसका एकके साथ गुणा करनेसे देवों- का और बचीसके साथ गुणा करनेसे देवियोंका प्रमाण निकलता है । यद्यपि इन्द्रादिकोंकी देवियोंका प्रमाण अधिक है; तथापि प्रकीर्णक देवोंकी अपेक्षा इन्द्रादिका प्रमाण अत्यल्प है, अतः उनकी यहां पर विवक्षा नहीं की है। देवेहि सादिरेया पुरिसा देवीहिं साहिया इत्थी। तेहिं विहीण सवेदो रासी संढाण परिमाणं ॥ २७८ ॥ देवैः सातिरकाः पुरुषा देवीमिः साधिकाः खियः। तैविहीनः सवेदो राशिः षण्डानां परिमाणम् ॥ २७८ ॥ अर्थ-देवोंसे कुछ अधिक, मनुष्य और तिर्यग्गतिसम्बन्धी पुंवेदवालोंका प्रमाण है। और देवियोंसे कुछ अधिक मनुष्य तथा तिर्यग्गति सम्बन्धी स्त्रीवेदवालोंका प्रमाण है। सवेद राशिमेंसे पुंवेद तथा स्त्रीवेदका प्रमाण घटानेसे जो शेष रहे वह नपुंसकोंका प्रमाण है। गब्भणपुइत्थिसपणी सम्मुच्छणसण्णिपुण्णगा इदरा । कुरुजा असण्णिगन्भजणपुइत्थीवाणजोइसिया ॥ २७९ ॥ थोवा तिसु संखगुणा-तत्तो आवलिअसंखभागगुणा। पल्लासंखेजगुणा तत्तो सवत्थ संखगुणा ॥ २८० ॥ गर्भनपुखीसंज्ञिनः सम्मूर्छनसंज्ञिपूर्णका इतरे । कुरुजा असंज्ञिगर्भजनपुत्रीवानज्योतिष्काः ॥ २७९ ॥ तोकाः त्रिषु संख्यगुणाः वत आवल्यसंख्यभागगुणाः। पल्यासंख्येयगुणाः ततः सर्वत्र संख्यगुणाः ।। २८०॥ .
गोम्मटसार। १०९ अर्थ-गर्मज संज्ञी नपुंसक १ पुल्लिश २ तथा त्रीलिङ्ग ३ । सम्मूर्छन संज्ञी पर्याप्त । और अपर्याप्त ५ । भोगभूमिया ६ । असंज्ञी गर्भज नपुंसक ७ पुल्लिङ्ग स्त्रीलिङ्ग ९ । व्यन्तर १० । और ज्योतिषी ११ । इन ग्यारह स्थानोंको क्रमसे स्थापन करना चाहिये। जिसमें पहला स्थान सबसे स्तोक है । और उससे आगेके तीन स्थान संख्यातगुणे २ हैं। पांचमा स्थान आवलीके असख्यातमे भाग गुणा है । छठा स्थान पल्यके असंख्यातमे भागगुणा है । इससे आगेके स्थान क्रमसे संख्यातगुणे २ है । भावार्थ-चोथे और पांचमे स्थानवाले जीव नपुंसक ही होते है । छट्टे स्थानवाले पुल्लिङ्ग और स्त्रीलिज ही होते हैं। ६५५३६ से गुणित प्रतराङ्गुलका, आठवार संख्यातका, एकवार आवलीके असंख्यातमे भागका, एकवार पत्यके असख्यातमे भागका, जगातरमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना ही पहले स्थानका प्रमाण है। इससे आगेके तीन स्थान क्रमसे संख्यातगुणे २ है। पांचमा स्थान आवलीके असंख्यातमे भागगुणा, छट्ठा स्थान पल्यके असंख्यातमे भागगुणा, सातमा आठमा नौमा दशमा ग्यारहमा स्थान क्रमसे सख्यातगुणा २ है। इति वेदमार्गणाधिकारः ॥ क्रमप्राप्त कषाय-मार्गणाके वर्णनकी आदिमें प्रथम कषायका निरुक्तिसिद्ध लक्षण वताते हैं। सुहदुक्खसुबहुसस्सं कम्मक्खेतं कसेदि जीवस्स। संसारदूरमेरं तेण कसाओति गं बेंति ॥ २८१ ॥ सुखदुःखसुबहुसस्यं कर्मक्षेत्रं कृषति जीवस्य । संसारदूरमर्याद तेन कषय इतीमं ब्रुवन्ति ॥ २८१ ॥ अर्थ-जीवके सुख दुःख आदि अनेक प्रकारके धान्यको उत्पन्न करनेवाले तथा जिसकी संसाररूप मर्यादा अत्यन्त दूर है ऐसे कर्मरूपी क्षेत्रका (खेत) यह कर्षण करता है इसलिये इसको कषाय कहते है। कृष धातुकी अपेक्षासे कषाय शब्दका अर्थ बताकर अब हिंसार्थक कष धातुकी अपेक्षासे कषाय शब्दकी निरुक्ति बताते है। सम्मत्तदेससयलचरित्तजहक्खादचरणपरिणामे । घादंति वा कषाया चउसोलअसंखलोगमिदा ॥ २८२ ॥ सम्यक्तदेशसकलचरित्रयथाख्यातचरणपरिणामान । घातयन्ति वा कषायाः चतुःषोडशासंख्यलोकमिताः ॥ २८२ ।। अर्थ-सम्यक्त्व देशचारित्र सकलचारित्र यथाख्यातचारित्ररूपी परिणामोंको जो कषे पाते न होनेदे उसको कषाय कहते है। इसके अनन्तानुबन्धी अप्रत्याख्यानावरण प्रत्या- - ११० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ख्यानावरण संज्वलन इसप्रकार चार भेद है। अनन्तानुबन्धी आदि चारोंके क्रोध मान माया लोम इस तरह चार २ भेद होनेसे कषायके उत्तरभेद सोलह होते है। किन्तु कपायके उदयस्थानोंकी अपेक्षासे असंख्यात लोकप्रमाण भेद है। जो सम्यक्त्वको रोके उसको अन- न्तानुबन्धी, जो देशचारित्रको रोके उसको अप्रत्याख्यानावरण, जो सकलचारित्रको रोके उसको प्रत्याख्यानावरण, जो यथाख्यातचारित्रको रोके उसको संज्वलन कषाय कहते है। शक्तिकी अपेक्षासे क्रोधादि चार कषायोंके चार गाथाओंद्वारा भेद गिनाते हैं। सिलपुढविभेदधूलीजलराइसमाणओ हवे कोहो। णारयतिरियणरामरगईसु उप्पायओ कमसो ॥ २८३ ॥ शिलापृथ्वीभेदधूलिजलराजिसमानको भवेत् क्रोधः । नारकतिर्यग्नरामरगतिपूत्पादकः क्रमशः ॥ २८३ ।। अर्थ-क्रोधं चार प्रकारका होता है । एक पत्थरकी रेखाके समान, दूसरा पृथ्वीकी रेखाके समान, तीसरा धूलिरेखाके समान, चौथा जलरेखाके समान । ये चारो प्रकारके क्रोध क्रमसे नरक तिर्यक् मनुष्य तथा देवगतिमें उत्पन्न करनेवाले है। सेलटिकटुवेत्ते णियमेएणणुहरंतओ माणो। णारयतिरियणरामरगईसु उपायओ कमसो ॥ २८४ ॥ शैलास्थिकाष्ठवेत्रान् निजभेदेनानुहरन् मानः नारकतिर्यनरामरगतिपुत्पादकः क्रमशः ॥ २८४ ॥ अर्थ-मान मी चार प्रकारका होता है । पत्थरके समान, हड्डीके समान, काठके समान, तथा उतके समान । ये चार प्रकारके मान भी क्रमसे नरक तिर्यञ्च मनुष्य तथा देव गतिके उत्पादक हैं । भावार्थ-जिस प्रकार पत्थर किसी तरह नहीं नमता, इस ही प्रकार जिसके उदयसे जीव किसी भी तरह नम्र न हो उसको शैलसमान (पत्थरके समान ) मान कहते हैं। ऐसे मानकेउदयसे नरकगति उत्पन्न होती है । इस ही तरह अस्थिसमान ( हड्डीके समान) आदिक मानको भी समझना चाहिये। वेणुवमूलोरभयसिंगे गोमुत्तए य खोरप्पे । सरिसी माया णारयतिरियणरामरगईसु खिबदि जियं ॥२८५॥ वेणूपमूलोरभ्रकशृङ्गेण गोमूत्रेण च क्षुरप्रेण । सदृशी माया नारकतिर्यग्नरामरगविषु क्षिपति जीवम् ॥ २८५ ॥ अर्थ-माया भी चार प्रकारकी होती है । वांसकी जड़के समान, मेढ़ेके सींगके समान, गोमूत्रके समान, खुरपाके समान । यह चार तरहकी माया भी क्रमसे जीवको १ अनन्तानुवन्धी आदि चार प्रकारके क्रोधमे प्रत्येक क्रोधके ये चार २ भेद समझने चाहिये.
गोम्मटसार।
१११
नरक तिर्यश्च मनुष्य और देवगतिमें लेजाती है। भावार्थ-मायाके ये चार भेद कुटि-
लताकी अपेक्षासे है। जितनी अधिक कुटिलता इसमें पाई जाय उतनी ही उत्कृष्ट माया
कही जाती है, और वह उक्त क्रमानुसार गतियोंकी उत्पादक होती हैं ।
किमिरायचकतणुमलहरिदराएण सरिसओ लोहो ।
णारयतिरिक्खमाणुसदेवेसुप्पायओ कमसो ॥ २८६ ॥
क्रिमिरागचक्रतनुमलहरिद्धारागेण सरशो. लोमः ।
नारकतिर्यग्मानुपदेवेपूत्पादकः क्रमशः ॥ २८६ ।।
अर्थ-लोभ कपाय भी चार प्रकारका है। क्रिमिरागके समान, चक्रमल( रथ आदिकके
पहियोंके भीतरकी ओंगन ) के समान, शरीरके मलके समान, हल्दीके रंगके समान ।
यह भी क्रमसे नरक तिर्यञ्च मनुष्य देवगतिका उत्पादक है । भावार्थ-जिस प्रकार कि-
रिमिजीका रंग अत्यंत गाढ़ होता है बड़ी ही मुश्किलसे छूटता है । उसी प्रकार जो लोम
सबसे जादे गाढ़ हो उसको किरिमिजी के समान कहते हैं । इससे जो जल्दी २ छूटने-
वाले है उनको क्रमसे ओंगन, शरीरमल, हल्दी के रंगके समान कहते है,
नरकादि गतिमें उत्पत्तिके प्रथम समयमे बहुलताकी अपेक्षासे क्रोधादिकके उदयका
नियम बताते हैं।
णारयतिरिक्खणरसुरगईसु उप्पण्णपढमकालम्हि ।
कोहो माया माणो लोहुदओ अणियमो वापि ॥ २८७ ॥
नारकतिर्यमरसुरगतिपूत्पन्नप्रथमकाले ।
क्रोधो माया मानो लोभोदयः अनियमो वापि ॥ २८७ ॥
अर्थ-नरक तिर्यश्च मनुष्य तथा देवगतिमें उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें क्रमसे क्रोध
माया मान और लोभका उदय होता है । अथवा अनियम भी है। भावार्थ-नरकगतिमें
उत्पन्न होनेवाले जीवके प्रथम समयमें क्रोधका उदय होता है। परन्तु किसी २ आचार्यका
मत है कि ऐसा नियम नहीं है । इस ही प्रकार तिर्यग्गतिमें उत्पन्न होनेवालेके प्रथम
समयमें किसी आचार्यके मतसे नियमसे माया कषायका उदय होता है । और मनुष्यगतिके
प्रथम समयमें मानका तथा देवगतिके प्रथम समयमें लोभ कषायका उदय होता है।
कपायरहित जीवोंको बताते है।
अप्पपरोभयवाधणबंधासंजमणिमित्तकोहादी।
जेसि पत्थि कसाया अमला अकसाइणो जीवा ॥ २८८ ॥
आत्मपरोभयवाधनवन्धासंयमनिमित्तक्रोधादयः ।
येषां न सन्ति कषाया अमला अकषायिणो जीवाः ॥ २८८ ॥
११२ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । - अर्थ-जिनके, खुदको दूसरेको तथा दोनोंको ही बाधा देने और बन्धन करने तथा असंयम करनेमें निमित्तभूत क्रोधादिक कषाय नहीं है, तथा जो बाह्य और अभ्यन्तर मलसे रहित है ऐसे जीवोंको अकषाय कहते है क्रोधादि कषायोंके शक्तिकी अपेक्षासे स्थान बताते है। कोहादिकसायाणं चउ चउदसवीस होति पदसंखा। सत्तीलेस्साआउगवंधाबंधगदभेदेहि ॥ २८९ ॥ क्रोधादिकषायाणां चत्वारश्चतुर्दशविशतिः भवन्ति पदसंख्या:। शक्तिलेश्याऽऽयुष्कवंधाबंधगतभेदैः॥ २८९ ॥ अर्थ-शक्ति, लेश्या, तथा आयुके बंधावन्ध गत भेदोंकी अपेक्षासे क्रोधादिक कषायोंके. क्रमसे चार चौदह और वीस स्थान होते है । भावार्थ-शक्तिकी अपेक्षा चार, लेश्याकी अपेक्षा चौदह और आयुके बन्धाबन्धकी अपेक्षा क्रोधादि कषायोंके वीस स्थान होते हैं। शक्तिकी अपेक्षासे होनेवाले चार स्थानोंको गिनाते है। सिलसेलवेणुमूलकिमिरायादी कमेण चत्तारि । कोहादिकसायाणं सत्तिं पडि होति णियमेण ॥ २९॥ शिलाशैलवेणुमूलक्रिमिरागादीनि क्रमेण चत्वारि । क्रोधादिकषायाणां शक्ति प्रति भवन्ति नियमेन ॥ २९०॥ अर्थ-शिलाभेद आदिक चार प्रकारका क्रोध, शैलसमान आदिक चार प्रकारका मान, वेणु (वांस ) मूलके समान आदिक चार तरहकी माया, क्रिमिरागके समान आदिक चार प्रकारका लोभ, इस तरह क्रोधादिक कषायोंके उक्त नियमके अनुसार कमसे शक्तिकी अपेक्षा चार २ स्थान हैं। लेश्याकी अपेक्षा होनेवाले चौदह स्थानोंको गिनाते हैं। किण्हं सिलासमाणे किण्हादी छक्कमेण भूमिम्हि । छक्कादी सुक्कोत्ति य धूलिम्मि जलम्मि सुक्केका ॥ २९१ ॥ कृष्णा शिलासमाने कृष्णादयः षट् क्रमेण भूमौ । षट्कादिः शुक्लेति च धूलौ जले शुबैका ॥ २९१ ॥ अर्थ-शिलासमान क्रोधमें केवल कृष्ण लेश्याकी अपेक्षासे एक ही स्थान होता है। पृथ्वीसमान क्रोधमें कृष्ण आदिक लेश्याकी अपेक्षा छह स्थान हैं। धूलिसमान क्रोधमें छह लेश्यासे लेकर शुक्ललेश्यापर्यन्त छह स्थान होते हैं। और जलसमान क्रोधमें केवल एक शुक्कलेश्या ही होती है। भावार्थ-शिलासमान क्रोधमें केवल कृष्णलेश्याका एक गोम्मटसारः। ही स्थान होता है । पृथ्वीभेदसमान क्रोधमें छह स्थान होते हैं, पहला केवल कृष्णले- श्याका, दूसरा कृष्ण नील लेश्याका, तीसरा कृष्ण नील कपोत लेश्याका, चौथा कृष्ण नील कपोत पीत लेश्याका, पांचमा कृष्ण नील कपोत पीत पद्म लेश्याका, छट्टा कृष्ण नील कपोत पीत पद्म शुक्ललेश्याका । इस ही प्रकार धूलिरेखा समान क्रोधमें भी छह स्थान होते हैं । पहला कृष्णादिक छह लेश्याका, दूसरा कृष्णरहित पांचलेश्याका, तीसरा कृष्ण नीलरहित चारलेश्याका, चौथा कृष्ण नील कपोतरहित अन्तकी तीन शुम लेश्याओंका, पांचमा पद्म और शुक्ल लेश्याका, छट्ठा केवल शुक्ल लेश्याका । जलरेखा समान क्रोधमें एक शुक्ल लेश्याका ही स्थान होता है । जिस प्रकार क्रोधके लेश्याओंकी अपेक्षा ये चौदह स्थान बताये उस ही तरह मानादिक कषायमे भी चौदह २ भेद समझना चाहिये। आयुके बंधाबंधकी अपेक्षासे तीन गाथाओद्वारा वीस स्थानोंको गिनाते हैं। सेलगकिण्हे सुण्णं णिरयं च य भूगएगविठ्ठाणे । णिरयं इगिबितिआऊ तिठाणे चारि सेसपदे ॥ २९२ ॥ शैलगकृष्णे शून्यं निरयं च च भूगैकद्विस्थाने । निरयमेकद्विन्यायुत्रिस्थाने चत्वारि शेषपदे ॥ २९२ ॥ अर्थ-शैलगत कृष्णलेश्यामें कुछ स्थान तो ऐसे है कि जहांपर आयुबन्ध नहीं होता, इसके अनन्तर कुछ स्थान ऐसे है कि जिनमें नरक आयुका बन्ध होता है । इसके बाद पृथ्वीभेदगत पहले और दूसरे स्थानमें नरक आयुका ही बन्ध होता है । इसके भी बाद कृष्ण नील कपोत लेश्याके तीसरे भेदमें (स्थानमें ) कुछ स्थान ऐसे है जहा नरक आयुका ही बन्ध होता है, और कुछ स्थान ऐसे है जहा नरक तिर्यश्च दो आयुका बन्ध होसकता है, तथा कुछ स्थान ऐसे है जहापर नरक तिर्यञ्च तथा मनुष्य तीनों ही आयुका बन्ध हो सकता है। शेषके तीन स्थानों में चारो आयुका बन्ध हो सकता है। धूलिगछक्कटाणे चउराऊतिगदुर्गच उवरिलं । पणचदुठाणे देवं देवं सुण्णं च तिट्ठाणे ॥ २९३ ॥ धूलिगषट्कस्थाने चतुरायूंषि त्रिकद्विकं चोपरितनम् । पञ्चचतुर्थस्थाने देवं देवं शून्यं च तृतीयस्थाने ॥ २९३ ॥ अर्थ-धूलिभेदगत छहलेश्यावाले प्रथम भेदके कुछ स्थानोंमें चारो आयुका बन्ध होता है, इसके अनन्तर कुछ स्थानोंमें नरक 'आयुको छोड़कर शेष तीन आयुका और कुछ स्थानोंमें नरक तिर्यञ्चको छोड़कर शेष दो आयुका बन्ध होता है । कृष्णलेश्याको छोड़कर पाचलेश्यावाले दूसरे स्थानमें तथा कृष्ण नीललेश्याको छोड़कर शेप चार लेश्या- गो. १५
।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
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वाळे तृतीयस्थानमें केवल देव आयुका बंध होता है । अन्तकी तीन शुभ लेश्यावाले चौथे
भेदके कुछ स्थानोंमें देवायुका बन्ध होता है और कुछ स्थानों में आयुका अवन्ध है।
सुण्णं दुगइगिठाणे जलम्हि सुण्णं असंखभजिदकमा।
चउचोदसवीसपदा असंखलोगा हु पत्तेयं ॥ २९४ ॥
शून्यं द्विकैकस्थाने जले शून्यमसंख्यभजितक्रमाः ।
चतुश्चतुर्दशविंशतिपदा असंख्यलोका हि प्रत्येकम् ॥ २९४ ॥
अर्थ-इस हीके (धूलिभेदगतहीके ) पद्म और शुक्ललेश्यावाले पांचमे स्थानमें और
केवल शुक्ललेश्यावाले छठे स्थानमें आयुका अबन्ध है, तथा जलभेदगत केवल शुक्ललेश्या-
वाले एक स्थानमें भी आयुका अवन्ध है । इस प्रकार कषायोके शक्तिकी अपेक्षा चार
भेद, लेश्याओंकी अपेक्षा चौदह भेद, आयुके बन्धावन्धकी अपेक्षा वीस भेद हैं। इनमें
प्रत्येकके असंख्यात लोक प्रमाण भेद है । तथा अपने २ उत्कृष्टसे अपने २ जघन्यपर्यन्त
क्रमसे असंख्यातगुणे २ हीन है।
कषायमार्गणामें तीन गाथाओंद्वारा जीवोंकी संख्या बताते है।
पुह पुह कसायकालो णिरये अंतोमुहुत्तपरिमाणो ।
लोहादी संखगुणो देवेस य कोहपहुदीदो ॥ २९५ ॥
पृथक् पृथक् कषायकालः निरये अन्तर्मुहूर्तपरिमाणः ।
लोभादिः संख्यगुणो देवेषु च क्रोधप्रभृतितः ॥ २९५ ।।
अर्थ-नरकमें नारकियोंके लोभादि कषायका काल सामान्यसे अन्तर्मुहूर्त मात्र होने-
पर भी पूर्व २ की अपेक्षा उत्तरोत्तर कषायका काल पृथक् २ संख्यातगुणा २ है । और
देवोंमें क्रोधादिक लोमपर्यन्त कषायोंका काल सामान्यसे अन्तर्मुहूर्त; किन्तु विशेषरूपसे
पूर्व २ की अपेक्षा उत्तरोत्तरका संख्यातगुणा २ काल है । भावार्थ-यद्यपि सामान्यसे
प्रत्येक कषायका काल अन्तर्महुर्त है, तथापि नारकियोंके जितना लोभका काल है उससे
सख्यातगुणा मायाका काल है, और जितना मायाका काल है उससे सख्यातगुणा मानका
काल है, मानके कालसे भी संख्यागुणा क्रोधका काल है। किन्तु देवोंमें इससे विपरीत है।
अर्थात् जितना कोधका काल है उससे सख्यातगुणा मानका काल है, मानसे संख्यातगुणा
मायाका और मायासे सख्यातगुणा लोभका काल है।
सबसमासेणवहिदसगसगरासी पुणोवि संगुणिदे ।
सगसगगुणगारेहि य सगसगरासीणपरिमाणं ॥ २९६ ॥
सर्वसमासेनावहितखकखकराशौ पुनरपि संगुणिते ।
खकखकगुणकारैश्च खकखकराशीनां परिमाणम् ॥ २९६ ॥
गोम्मटेसार।
११५
अर्थ-अपनी २ गतिमें सम्भव जीवराशिमें समस्त कषायोंके उदयकालके जोड़का
भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसका अपने २ गुणाकारसे गुणन करनेपर अपनी राशिका
परिमाण निकलता है । भावार्थ-कल्पना कीजिये कि देवगतिमें देव राशिका प्रमाण
१७०० है और कोषादिकके उदयका काल क्रमसे ४, १६, ६४, २५६ है । इस लिये
समस्त कपायोदयके कालका जोड़ ३४० हुआ । इसका उक्त देवराशिमें भाग देनेसे लब्ध
५ आते है । इस लब्ध राशिका अपने कषायोदयकालसे गुणा करने पर अपनी २ राशिका
प्रमाण निकलता है । यदि क्रोधकषायवालोंका प्रमाण निकालना हो तो ४ से गुणा करने
पर वीस निकलता है, यदि मानकषायवालोंका प्रमाण निकालना हो तो १६ से गुणा
करनेपर ८० प्रमाण निकलता है। इस ही प्रकार आगे भी समझना । जिस तरह यह
देवोंकी अङ्कसदृष्टि कही उस ही तरह नारकियोंकी भी समझना, किन्तु अङ्कसदृष्टिको ही
अर्थसदृष्टि नही समझना। क्रोधादि कषायवाले जीवोंकी संख्या निकालनेका यह क्रम केवल
देव तथा नरकगतिमें ही समझना ।
मनुष्य तथा तिर्यञ्चोंमें कषायवाले जीवोंका प्रमाण बताते हैं
णरतिरिय लोहमायाकोहो माणो विइंदियादिव ।
आवलिअसंखभजा सगकालं वा समासेज ॥ २९७ ॥
नरतिरश्चोः लोभमायाक्रोधो मानो द्वीन्द्रियादिवत् ।
आवल्यसंख्यभाज्याः स्वककालं वा समासाद्य ॥ २९७ ॥
अर्थ-जिस प्रकार द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय तथा पंचेन्द्रिय जीवोंकी संख्या पहले
निकाली है उसही क्रमसे मनुष्य तथा तिर्यञ्चोंके लोभ माया क्रोध और मानवाले जीवोंका
प्रमाण आवलीके असख्यातमे भाग क्रमसे निकालना चाहिये । अथवा अपने २ कालकी
अपेक्षासे उक्त कषायवाले जीवोंका प्रमाण निकालना चाहिये । भावार्थ-चारो कषायोंका
जितना प्रमाण है उसमें आवलीके असख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसके
बहुभागको चारों जगह समान रूपसे विभक्त करना और शेष एक भागका "बहुमागे
समभागो" इस गाथामें कहे हुए क्रमके अनुसार विभाग करनेसे चारो कषायवालोंका
प्रमाण निकलता है । अथवा यदि इतने कालमें इतने जीव रहते है तो इतने कालमें
कितने रहेंगे इस त्रैराशिक विधानसे भी कषायवालोंका प्रमाण निकलता है।
इति कषायमार्गणाधिकारः॥
क्रमप्राप्त ज्ञानमार्गणाके प्रारम्भमें ज्ञानका निरुक्तिसिद्ध सामान्य लक्षण कहते है।
जाणइ तिकालविसए दवगुणे पजए य बहुभेदे ।
पञ्चक्खं च परोक्खं अणेण णाणेति णं बैंति ॥ २९८ ॥
११६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । जानाति त्रिकालविषयान् द्रव्यगुणान् पर्यायांश्च बहुभेदान् । प्रत्यक्षं च परोक्षमनेन ज्ञानमिति इदं ब्रुवन्ति ॥ २९८ ॥ अर्थ-जिसके द्वारा जीव त्रिकालविषयक ( भूत भविष्यत् वर्तमान ) समस्त द्रव्य और उनके गुण तथा उनकी अनेक प्रकारकी पर्यायोंको जाने उसको ज्ञान कहते है । इसके दो भेद है, एक प्रत्यक्ष दूसरा परोक्ष । ज्ञानके भेदोंको दिखाते हुए उनका क्षायोपशमिक और क्षायिकरूपसे विभाग करते हैं। पंचेव होंति णाणा मदिसुदओहीमणं च केवलयं । खयउवसमिया चउरो केवलणाणं हवे खइयं ॥ २९९ ॥ पञ्चैव भवन्ति ज्ञानानि मतिश्रुतावधिमनश्च केवलम् । क्षायोपशमिकानि चत्वारि केवलज्ञानं भवेत् क्षायिकम् ॥ २९९ ॥ अर्थ-ज्ञानके पांच भेद है । मति श्रुत अवधि मनःपर्यय तथा केवल । इनमें आदिके चार ज्ञान क्षायोपशमिक है, और केवलज्ञान क्षायिक है। मिथ्याज्ञानका कारण और स्वामी बताते है। अण्णाणतियं होदि हुसण्णाणतियं खु मिच्छअणउदये। णवरि विमंगं णाणं पंचिदियसण्णिपुण्णेव ॥ ३००॥ अज्ञानत्रिकं भवति हि सदूज्ञानत्रिकं खलु मिथ्यात्वानोदयें। नवरि विभङ्गं ज्ञानं पञ्चेन्द्रियसंज्ञिपूर्ण एव ॥ ३००॥ अर्थ-आदिके तीन (मति श्रुत अवधि ) ज्ञान समीचीन भी होते हैं और मिथ्या भी होते है । ज्ञानके मिथ्या होनेका अन्तरङ्ग कारण मिथ्यात्व तथा अनन्तानुबन्धी कषा- यका उदय है। मिथ्या अवधिको विभंग भी कहते है। इसमें यह विशेषता है कि यह विभंग ज्ञान संज्ञी पर्याप्तक पंचेन्द्रियके ही होता है। मिश्रज्ञानका कारण और मनःपर्ययज्ञानका खामी बताते हैं। मिस्सुदये सम्मिस्सं अण्णाणतियेण णाणतियमेव । संजमविसेससहिए मणपजवणाणमुदिई॥३०१॥ मिश्रोदये संमिश्रमज्ञानत्रयेण ज्ञानत्रयमेव । संयमविशेषसहिते मनःपर्ययज्ञानमुद्दिष्टम् ॥ ३०१ ।। अर्थ-मिश्र प्रकृतिके उदयसे आदिके तीन ज्ञानों में समीचीनता तथा मिथ्यापना दोनों ही पाये जाते है, इसलिये इनको मिश्र ज्ञान कहते हैं। मनःपर्ययज्ञान जिनके विशेष संयम होता है उनहीके होता है । भावार्थ-मनःपर्यय ज्ञान प्रमच गुणस्थानसे लेकर क्षीणकषाय गोम्मटसारः। ११७ गुणस्थानपर्यन्त सात गुणस्थानोंमें होता है; परन्तु इनमें भी जिनका चारित्र उत्तरोत्तर बर्धमान होता है उनहीके होता है। तीन गाथाओंमें दृष्टान्तद्वारा मिथ्याज्ञानोंको स्पष्ट करते है। विसजंतकूडपंजरवंधादिसु विणुवएसकरणेण । जा खलु पवइ मई मइअण्णाणत्तिणं वेति ॥ ३०२ ॥ विपयत्रकूटपसरवंधादिपु विनोपदेशकरणेन । या खलु प्रवर्तते मतिः मयज्ञानमिति इदं ब्रुवन्ति ।। ३०२ ॥ अर्थ-दूसरेके उपदेशके विना जो विष यन्त्र कूट पंजर तथा बंध आदिकके विषयमें जो बुद्धि प्रवृत्त होती है उसको मत्यज्ञान कहते है । भावार्थ-जिसके खानेसे जीव मर सके उस द्रव्यको विप कहते है । भीतर पैर रखते ही जिसके किवाड़ बन्द होजाय, और जिसके भीतर वकरी आदिको बाधकर सिंह आदिकको पकड़ा जाता है उसको यन्त्र कहते है। जिससे मूसे वगैरह पकडे जाते है उसको कूट कहते है । रस्सीमे गांठ लगाकर जो जाल बनाया जाता है उसको पंजर कहते है । हाथी आदिको पकडनेके लिये जो गड्ढे आदिक बनाये जाते है उनको बंध कहते है । इत्यादिक पदार्थोंमें दूसरेके उपदेशके विना जो बुद्धि प्रवृत्त होती है उसको मत्यज्ञान कहते है क्योकि उपदेशपूर्वक होनेसे वह ज्ञान श्रुतज्ञान कहा जायगा। आभीयमासुरक्खं भारहरामायणादिउवएसा । तुच्छा असाहणीया सुयअण्णाणंति णं ति ॥३०३॥ आभीतमासुरक्षं भारतरामायणायुपदेशाः । तुच्छा असाधनीया श्रुताज्ञानमिति इदं ब्रुवन्ति ॥ ३०३ ॥ अर्थ-चौरशास्त्र, तिथा हिसाशास्त्र, भारत, रामायण आदिके परमार्थशून्य अत एव अनादरणीय उपदेशोंको मिथ्या श्रुतज्ञान कहते है । विवरीयमोहिणाणं खओवसमियं च कम्मवीजं च । वेभंगोत्ति पउच्चइ समत्तणाणीण समयम्हि ॥ ३०४ ॥ विपरीतमवधिज्ञानं क्षायोपशमिकं च कर्मवीजं च । विभङ्ग इति प्रोच्यते समाप्तज्ञानिनां समये ॥ ३०४ ॥ अर्थ-सर्वज्ञोके उपदिष्ट आगममें विपरीत अवधि ज्ञानको विभङ्ग कहते हैं। इसके दो भेद है, एक क्षायोपशमिक दूसरा मवप्रत्यय । भावार्थ-देव नारकियोंके विपरीत अवधि- ज्ञानको भवप्रत्यय विभङ्ग कहते है, और मनुष्य तथा तिर्यञ्चोंके विपरीत अवधिज्ञानको क्षायोपशमिक विभंग कहते है। इस विभङ्गका अन्तरङ्ग कारण मिथ्यात्व आदिक कर्म .
११८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । है। इसके निमित्तसे विशिष्ट ( समीचीन) अवधिज्ञानके भड होनेको (विपरीत होनेको) विभङ्ग कहते है। यह इसका (विमङ्गका) निरुक्तिसिद्ध अर्थ है । मतिज्ञानका खरूप, उत्पत्ति, कारण, भेद, विपय नौ गाथाओमें दिखाते है। अहिमुहणियमियवोहणमाभिणिवोहियमणिदिइंदियजम् । अवगहईहावायाधारणगा होति पत्तेयं ॥ ३०५॥ अभिमुखनियमितबोधनमाभिनिवोधिकमनिन्द्रियेन्द्रियजम् । अवग्रहहावायधारणका भवन्ति प्रत्येकम् ।। ३०५ ।। अर्थ-इन्द्रिय और अनिन्द्रिय ( मन ) की सहायतासे अभिमुख और नियमित पदा- । र्थका जो ज्ञान होता है उसको आमिनिबोधिक कहते है । इसमे प्रत्येकके अवग्रह ईहा अवाय धारणा ये चार २ मेद है । भावार्थ-स्थूल वर्तमान योग्य क्षेत्रमें अवस्थित पदा- र्थको अभिमुख कहते है । और जैसे चक्षुका रूप विषय है इस ही तरह जिस इन्द्रियका जो विषय निश्चित है उसको नियमित कहते है। इस तरहके पदार्थोंका मन अथवा स्पर्शन आदिक पांच इन्द्रियोंकी सहायतासे जो ज्ञान होता है उसको मतिज्ञान कहते है। इस प्रकार मन और इन्द्रियकी अपेक्षासे मतिज्ञानके छह भेद हुए । इसमें भी प्रत्येकके अवग्रह ईहा अवाय धारणा ये चार २ भेद होते है। प्रत्येकके चार २ भेद होते है इसलिये छहको चारसे गुणा करने पर मतिज्ञानके चौवीस भेद होते है। अवग्रहके भी भेद आदिक दिखाते है। वेंजणअत्थअवग्गहभेदा हु हवंति पत्तपत्तत्थे । कमसो ते वावरिदा पढमं ण हि चक्खुमणसाणं ॥ ३०६ ॥ व्यञ्जनार्थावग्रहमेदौ हि भवतः प्राप्ताप्राप्तार्थे । क्रमशस्तौ व्यपृतौ प्रथमो नहि चक्षुर्मनसोः ॥ ३०६॥ अर्थ-अवग्रहके दो भेद है, एक व्यञ्जनावग्रह दूसरा अर्थावग्रह । जो प्राप्त अर्थके विषयमें होता है उसको व्यञ्जनावग्रह कहते है, और जो अप्राप्त अर्थक विषयमें होता है उसको अर्थावग्रह कहते है। और ये पहले व्यञ्जनावग्रह पीछे अर्थावग्रह इस क्रमसे होते है। तथा व्यञ्जनावग्रह चक्षु और मनसे नहीं होता । भावार्थ-इन्द्रियोंसे प्राप्त सम्बद्ध अर्थको व्यञ्जन कहते है, और अप्राप्त असम्बद्ध पदार्थको अर्थ कहते है। और इनके ज्ञानको क्रमसे व्यञ्जनावग्रह, अर्थावग्रह कहते है। (शङ्का) राजवार्तिकादिकमें व्यञ्जन शब्दका अर्थ अव्यक्त किया है, और यहां पर प्राप्त अर्थ किया है, इस लिये परस्पर विरोध आता है। (उत्तर) व्यञ्जन शब्दके अनमिव्यक्ति तथा प्राप्ति दोनो अर्थ होते है। इसलिये इसका ऐसा अर्थ समझना चाहिये कि इन्द्रियोंसे सम्बद्ध होने पर भी जब तक प्रकट न "- गोम्मटसारः। ११९ हो तब तक उसको व्यञ्जन कहते है, प्रकट होनेपर अर्थ कहते हैं । अत एव चक्षु और मनके द्वारा व्यञ्जनावग्रह नही होता; क्योंकि ये अप्राप्यकारी है। जिस तरह नवीन मट्टीके सकोरा आदिपर एक दो पानीकी बूंद पड़नेसे वह व्यक्त नहीं होती; किन्तु अधिक वृंद पड़नेसे वही व्यक्त हो उठती है । इस ही तरह श्रोत्रादिकके द्वारा प्रथम अव्यक्त शब्दादि- कके ग्रहणको व्यजनावग्रह, और पीछे उसहीको प्रकटरूपसे ग्रहण करनेपर अर्थावग्रह कहते है। व्यंजन पदार्थका अवग्रह ही होता है, ईहा आदिक नहीं होते, इसलिये चार इन्द्रियोंकी अपेक्षा व्यंजनावग्रहके चार ही भेद है। पूर्वोक्त चौवीस भेदोंमें इन चार भेदोंको मिलानेसे मतिज्ञानके अट्ठाईस भेद होते है। विसयाणं विसईणं संजोगाणंतरं हवे णियमा । अवगहणाणं गहिदे विसेसकंखा हवे ईहा ॥ ३०७ ॥ विषयाणां विषयिणां संयोगानन्तरं भवेत् नियमात् । अवग्रहज्ञानं गृहीते विशेषाकांक्षा भवेदीहा ॥ ३०७॥ अर्थ-पदार्थ और इन्द्रियोंका योग्य क्षेत्रमे अवस्थानरूप सम्बन्ध होनेपर सामान्यका अवलोकन करनेवाला दर्शन होता है। और इसके अनन्तर विशेष आकार आदिकको ग्रहण करनेवाला अवग्रह ज्ञान होता है । इसके अनन्तर जिस पदार्थको अवग्रहने ग्रहण किया है उसहीके किसी विशेष अंशको ग्रहण करनेवाला ईहा ज्ञान होता है। भावार्थ-जिस तरह किसी दाक्षिणात्य पुरुषको देखकर यह कुछ है इस तरहके महासामान्यावलोकनको दर्शन कहते है। इसके अनन्तर 'यह पुरुष है। इस तरहके ज्ञानको अवग्रह कहते है। और इसके अनन्तर "यह दाक्षिणात्य ही होना चाहिये" इस तरहके विशेष ज्ञानको ईहा कहते है। ईहणकरणेण जदा सुणिण्णओ होदि सो अवाओ दु । कालांतरेवि णिण्णिदवत्थुसमरणस्स कारणं तुरियं ॥३०८॥ ईहनकरणेन यदा सुनिर्णयो भवति स अवायस्तु । कालान्तरेऽपि निर्णीतवस्तुस्मरणस्य कारणं तुर्यम् ॥ ३०८॥ अर्थ-ईहा ज्ञानके अनन्तर वस्तुके विशेष चिह्नोंको देखकर जो उसका विशेष निर्णय होता है उसको अवाय कहते है । जैसे भाषा वेष विन्यास आदिको देखकर "यह दाक्षिणात्य ही है" इस तरहके निश्चयको अवाय कहते है । जिसके द्वारा निर्णीत वस्तुका कालान्तरमें भी विसरण न हो उसको धारणा ज्ञान कहते है । उक्त चार तरहके ज्ञानोंका वारह तरहका विषय दिखाते हैं। बहु बहुविहं च खिप्पाणिस्सिदणुतं धुवं च इदरं च । तत्येकक्के जादे छत्तीसं तिसयभेदं तु ॥ ३०९ ॥ ।
१२० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । बहु बहुविधं च क्षिप्रानिःसूदनुक्तं ध्रुवं च इतरच । तत्रैकैकस्मिन् जाते पत्रिंशत् त्रिशतभेदं तु ॥ ३०९॥ अर्थ-उक्त मतिज्ञानके विषयभूत व्यंजन पदार्थके वारह भेद हैं । बहु, एक, वहुविध, एकविध, क्षिप, अक्षिप, अनिसृत् , निसृत्, अनुक्त, उक्त । इनमेंसे प्रत्येक विषयमें मति- ज्ञानके उक्त अट्ठाईस भेदोंकी प्रवृत्ति होती है । इसलिये बारहको अट्ठाईससे गुणा करनेपर मतिज्ञानके तीनसौ छत्तीस भेद होते हैं। बहुवत्तिजादिगहणे बहुवहुविहमियरमियरगहणम्हि । सगणामादो सिद्धा खिप्पादी सेदरा य तहा ॥३१॥ बहुव्यक्तिजातिग्रहणे बहु बहुविधमितरदितरग्रहणे । खकनामतः सिद्धाः क्षिप्रादयः सेतराश्च तथा ॥ ३१०॥ अर्थ-एक जातिकी बहुतसी व्यक्तियोंको वहु कहते है । अनेक जातिके बहुत पदा- थोंको बहुविध कहते है । एक जातिकी एक व्यक्तिको अल्प (एक) कहते है । एक जातिकी अनेक व्यक्तियोंको एकविध कहते है। क्षिप्रादिक तथा उनके प्रतिपक्षियोंका उनके नामसे ही अर्थ सिद्ध है। भावार्थ-शीघ्र पदार्थको क्षिप्र कहते हैं, जैसे तेजीसे वहता हुआ जलप्रवाह । मन्द पदार्थको अक्षिप्र कहते है, जैसे कछुअ', धीरे २ चलनेवाला घोडा मनुष्य आदि । छिपे हुएको ( अप्रकट ) अनिसृत कहते है, जैसे जलमें डूबा हुआ हस्ती आदि । प्रकट पदार्थको निसृत कहते है, जैसे सामने खड़ा हुआ हस्ती । जो पदार्थ अमि- प्रायसे समझा जाय उसको अनुक्त कहते है । जैसे किसीके हाथ या शिरसे इसारा करने पर किसी कामके विषयमें हा या ना समझना । जो शब्दके द्वारा कहा जाय उसको उक्त कहते है, जैसे यह घट है । स्थिर पदार्थको ध्रुव कहते है, जैसे पर्वत आदि । क्षणस्थायी ( अस्थिर ) पदार्थको अध्रुव कहते है, जैसे विजली आदि । अनिसृत ज्ञानविशेषको दिखाते है। वत्थुस्स पदेसादो वत्थुग्गहणं तु वत्थुदेसं वा। सयलं वा अवलंविय अणिस्सिदं अण्णवत्थुगई ॥ ३११ ॥ वस्तुनः प्रदेशात् वस्तुग्रहणं तु वस्तुदेशं वा । सकलं वा अवलम्ब्य अनिसृतमन्यवस्तुगतिः ॥ ३११॥ अर्थ-वस्तुके एकदेशको देखकर समस्त वस्तुका ज्ञान होना, अथवा वस्तुके एकदेश या पूर्ण वस्तुका ग्रहण करके उसके निमित्तसे किसी दूसरी वस्तुके होनेवाले ज्ञानको भी अनिसृत कहते है। .
गोम्मटसारः। , इसका दृष्टान्त दिखाते हैं। पुक्खरगहणे काले हथिस्स य वदणगवयगहणे वा। वत्थंतरचंदस्स य घेणुस्स य बोहणं च हवे ॥३१२ ॥ पुष्करग्रहणे काले हस्तिनश्च वदनगवयग्रहणे वा । वस्त्वन्तरचन्द्रस्य च धेनोश्च बोधनं च भवेत् ॥ ३१२ ॥ अर्थ-जलमें डूबे हुए हस्तीकी सूंडको देखकर उस ही समयमें जलमम हस्तीका ज्ञान होना, अथवा मुखको देखकर उस ही समय उससे मिन्न किन्तु उसके सदृश चन्द्रमाका ज्ञान होना, अथवा गवयको देखकर उसके सदृश गौका ज्ञान होना । इनको अनिस्त ज्ञान कहते है। सामान्य विषय अर्घ विषय और पूर्ण विषयकी अपेक्षासे मतिज्ञानके स्थानोंको गिनाते हैं। एकचउकं चउवीसट्टावीसं च तिप्पडि किच्चा। इगिछवारसगुणिदे मदिणाणे होंति ठाणाणि ॥ ३१३ ॥ एकचतुष्कं चतुर्विंशत्यष्टाविंशतिश्च त्रिप्रति कृत्वा । एकपडूद्वादशगुणिते मतिज्ञाने भवन्ति स्थानानि ॥३१३ ॥ अर्थ-मतिज्ञान सामान्यकी अपेक्षा एक भेद, अवग्रह ईहा अवाय धारणाकी अपेक्षा चार भेद, पांच इन्द्रिय और छट्टे मनसे अवग्रहादि चारके गुणा करनेकी अपेक्षा चौवीस भेद, अर्थावग्रह व्यञ्जनावग्रहकी अपेक्षासे अट्ठाईस भेद मतिज्ञानके होते है। इनको क्रमसे तीन पंक्तियोंमें स्थापन करके एक छह और बारहसे यथाक्रमसे गुणा करनेपर मतिज्ञानके सामान्य अर्ध और पूर्ण स्थान होते हैं । भावार्थ-विषयसामान्यसे यदि इन चारका गुणा किया जाय तो क्रमसे एक चार चौवीस और अट्ठाईस स्थान होते हैं। और यदि इन चार हीका बहु आदिक छहसे गुणा किया जाय तो मतिज्ञानके अर्ध स्थान होते हैं । और बहु आदिक बारहसे यदि गुणा किया जाय तो पूर्ण स्थान होते है। क्रमप्राप्त श्रुत ज्ञानका विशेष वर्णन करनेसे पहले उसका सामान्य लक्षण कहते हैं अत्थादो अत्यंतरमुवलंमंत भणंति सुदणाणं । आभिणिवोहियपुर्व णियमेणिह सहज पमुहं ॥ ३१४ ॥ अर्थादर्थान्तरमुपलभमानं भणन्ति श्रुतज्ञानम् । आमिनिबोधिकपूर्व नियमेनेह शब्दजं प्रमुखम् ॥ ३१४ ॥ अर्थ-मतिज्ञानके विषयभूत पदार्थसे मिन्न पदार्थक ज्ञानको श्रुतज्ञान कहते हैं। यह ज्ञान नियमसे मतिज्ञानपूर्वक होता है । इस श्रुतज्ञानके अक्षरात्मक अनक्षरात्मक इस तरह, गो. १६ १२२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अथवा शब्दजन्य और लिङ्गजन्य इस तरहसे दो भेद हैं,इनमें मुख्य शब्दजन्य श्रुतज्ञान है। श्रुतज्ञानके भेद गिनाते हैं। लोगाणमसंखमिदा अणक्खरप्पे हवंति छहाणा। वेरूवछठवग्गपमाणं रूऊणमक्खरगं ॥ ३१५ ॥ लोकानामसंख्यमितानि अनक्षरात्मके भवन्ति पट् स्था- नानि । द्विरूपषष्ठवर्गप्रमाणं रूपोनमक्षरगम् ॥ ३१५॥ अर्थ-अनन्तभागवृद्धि असंख्यातभागवृद्धि संख्यातभागवृद्धि संख्यातगुणवृद्धि असं- ख्यातगुणवृद्धि अनन्तगुणवृद्धि इन षट्स्थानपतित वृद्धिकी अपेक्षासे अनक्षरात्मक श्रुतज्ञानके सबसे जघन्य स्थानसे लेकर उत्कृष्ट स्थान पर्यन्त असंख्यातलोकप्रमाण भेद होते हैं । द्विरूप- वर्गधारामें छड़े वर्गका जितना प्रमाण है (एकही) उसमें एक कम करनेसे जितना प्रमाण वाकी रहे उतना ही अक्षरात्मक श्रुतज्ञान का प्रमाण है भावार्थ-अनक्षरात्मक श्रुतज्ञानके असंख्यात मेद है । अपुनरुक्त अक्षरात्म श्रुतज्ञानके संख्यात भेद है, और पुनरुक्त अक्षरात्मकका प्रमाण इससे कुछ अधिक है। दूसरी तरहसे श्रुतज्ञानके भेद दो गाथाओमें गिनाते है। पजायक्खरपदसंघादं पडिवत्तियाणिजोगं च । दुगवारपाहुडं च य पाहुडयं वत्थु पुवं च ॥ ३१६ ॥ तेसिं च समासेहि य वीसविहं वा हु होदि सुदणाणं । आवरणस्स वि भेदा तचियमेत्ता हवंतित्ति ॥ ३१७ ॥ पर्यायाक्षरपदसंघात प्रतिपत्तिकानुयोगं च । द्विकवारप्राभृतं च च प्राभृतकं वस्तु पूर्व च ॥ ३१६ ॥ तेषां च समासैश्च विंशविध वा हि भवति श्रुतज्ञानम् । आवरणस्यापि भेदाः तावन्मात्रा भवन्ति इति ॥ ३१७ ॥ अर्थ-पर्याय पर्यायसमास अक्षर अक्षरसमास पद पदसमास संघात संघातसमास प्रति- पचिक प्रतिपत्तिकसमास अनुयोग अनुयोगसमास प्रामृतप्रामृत प्राभृतप्रामृतसमास प्रामृत प्रामृतसमास वस्तु वस्तुसमास पूर्व पूर्वसमास, इस तरह श्रुतज्ञानके वीस मेद हैं। इस ही लिये श्रुतज्ञानावरण कर्मके भी वीस भेद होते है। किन्तु पर्यायावरण कर्मके विषयमें कुछ भेद है उसको आगेके गाथामें बतायेंगे। चार गाथाओंमें पर्याय ज्ञानका खरूप दिखाते है। णवरि विसेसं जाणे सुहमजहण्णं तु पजयं णाणं । पज्जायावरणं पुण तदणंतरणाणभेदम्हि ॥ ३१८॥ - - - गोम्मटसारः। १२३ नवरि विशेष जानीहि सूक्ष्मजघन्यं तु पर्यायं ज्ञानम् । पर्यायावरणं पुनः तदनन्तरज्ञानभेदे ॥ ३१८ ॥ अर्थ-सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तकके जो सबसे जघन्य ज्ञान होता है उसको पर्याय ज्ञान कहते है। इसमें विशेषता केवल यही है कि इसके आवरण करनेवाले कर्मके उदयका फल इसमें (पर्याय ज्ञानमें) नहीं होता; किन्तु इसके अनन्तरज्ञानके (पर्या- यसमास ) प्रथम भेदमें होता है। भावार्थ-यदि पर्यायावरण कर्मके उदयका फल पर्याय- ज्ञानमे होजाय तो ज्ञानोपयोगका अभाव होनेसे जीवका भी अभाव होजाय, इसलिये पर्यायावरण कर्मका फल उसके आगेके ज्ञानके प्रथम भेद में ही होता है। इसीलिये कमसे कम पर्यायरूप ज्ञान जीवके अवश्य पाया जाता है। सुहमणिगोदअपज्जत्तयस्स जादस्स पढमसमयम्हि । हवदि हु सवजहणं णिचुग्घाडं णिरावरणम् ॥ ३१९ ॥ सूक्ष्मनिगोवापर्याप्तकस्य जातस्य प्रथमसमये। भवति हि सर्वजघन्यं नित्योद्घाटं निरावरणम् ॥ ३१९ ॥ अर्थ-सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवके उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें सबसे जघन्य ज्ञान होता है। इसीको पर्याय ज्ञान कहते है। इतना ज्ञान हमेशह निरावरण तथा प्रकाशमान रहता है। पर्याय ज्ञानके खामीकी विशेषता दिखाते है। सुहमणिगोदअपजचगेसु सगसंभयेसु भमिऊण । चरिमापुण्णतिवक्काणादिमवक्कट्टियेव हवे ॥ ३२०॥ सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तगेषु खकसम्भवेषु भ्रमित्वा । चरमापूर्णत्रिवाणामादिमवक्रस्थिते एव भवेत् ॥ ३२० ॥ अर्थ-सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवके अपने २ जितने भव (छह हजार बारह ) सम्भव है उनमें भ्रमण करके अन्तके अपर्याप्त शरीरको तीन मोड़ाओंके द्वारा ग्रहण करनेवाले जीवके प्रथम मोड़ाके समयमे सर्वजघन्य ज्ञान होता है। सुहमणिगोदअपज्जतयस्स जादस्स पढमसमयम्हि । फासिंदियमदिपुवं सुदणाणं लद्धिअक्खरयं ॥ ३२१ ॥ सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तकस्य जातस्य प्रथमसमये । स्पर्शेन्द्रियमतिपूर्व श्रुतज्ञानं लब्ध्यक्षरकम् ॥ ३२१ ॥ अर्थ- सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीवके उत्पन्न होनेके प्रथम समयमें स्पर्शन इन्द्रियजन्य मतिज्ञानपूर्वक लब्ध्यक्षररूप चुतज्ञान होता है । भावार्थ-लब्धि नाम श्रुत- ज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमका है, और अक्षर नाम अविनश्वरका है। इसलिये इस ज्ञानको हु १२४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । लब्ध्यक्षर कहते हैं। क्योंकि इस क्षयोपशमका कभी विनाश नही होता, कमसे कम इतना क्षयोपशम तो जीवके रहता ही है। पर्यायसमास ज्ञानका निरूपण करते है। अवरुवरिस्मि अणंतमसंखं संखं च भागवड्डीए । संखमसंखमणंतं गुणवड्डी होति कमेण ॥ ३२२॥ अवरोपरि अनन्तमसंख्यं संख्यं च भागवृद्धयः । संख्यमसंख्यमनन्तं गुणवृद्धयो भवन्ति हि क्रमेण ॥ ३२२ ॥ अर्थ-सर्वजघन्य पर्याय ज्ञानके ऊपर क्रमसे अनन्तभागवृद्धि असंख्यातमागवृद्धि संख्यातमागवृद्धि संख्यातगुणवृद्धि असंख्यातगुणवृद्धि अनन्तगुणवृद्धि ये छह वृद्धि होती हैं। जीवाणं च य रासी असंखलोगा वरं खु संखे । भागगुणम्हि य कमसो अवठिदा होति छट्ठाणा ॥ ३२३ ॥ जीवानां च च राशिः असंख्यलोका वरं खलु संख्यावम् । भागगुणयोश्च क्रमशः अवस्थिता भवन्ति षट्स्थाने ॥ ३२३ ॥ अर्थ-समस्त जीवराशि, असंख्यातलोकप्रमाण राशि, उत्कृष्ट संख्यात राशि ये तीन राशि, पूर्वोक्त अनन्तभागवृद्धि आदि छह स्थानोंमें भागहार अथवा गुणाकारकी क्रमसे अवस्थित राशि है। भावार्थ अनन्तभागवृद्धि और अनन्तगुणवृद्धि इनका भागहार और गुणाकार समस्त जीवराशिप्रमाण अवस्थित है । असंख्यातभागवृद्धि और असंख्यातगुण- वृद्धि इनका भागहार और गुणाकार असख्यातलोकप्रमाण अवस्थित है । संख्यातभाग- वृद्धि संख्यातगुणवृद्धि इनका भागहार और गुणाकार उत्कृष्ट संख्यात अवस्थित है। लाघवके लिये छह वृद्धियोंकी छह संज्ञा रखते हैं। उर्वकं चउरंकं पणछस्सत्त्रक अट्ठअकं च । छबड्डीणं सण्णा कमसो संदिठिकरणहूं ॥३२४ ॥ उर्वकश्चतुरङ्कः पञ्चषटूसप्ताङ्क: अष्टाङ्कश्च । षड्वृद्धीनां संज्ञा क्रमशः संदृष्टिकरणार्थम् ॥ ३२४ ॥ अर्थ-लघुरूप संदृष्टिकेलिये क्रमसे छह वृद्धियोंकी ये छह संज्ञा है। अनन्तभागव- द्धिकी उर्वक, असंख्यातमागवृद्धिकी चतुरक, संख्यातमागवृद्धिकी पञ्चाङ्क, संख्यातगुण- द्धिकी पड़त, असंख्यातगुणवृद्धिकी सप्ताङ्क, अनन्तगुणवृद्धिकी अष्टाङ्क । अङ्गुलअसंखभागे पुब्बगवड्डीगदे दु परबड्डी। एकं वारं होदि हु पुणो पुणो चरिमउहिती ॥ ३२५ ॥ . - गोम्मटसार। - १२५ अकुलासंख्यातमागे पूर्वगवृद्धिगते तु परवृद्धिः । एक वारं भवति हि पुनः पुनः चरमवृद्धिरिति ॥ ३२५ ॥ अर्थ-सूच्यङ्गुलके असख्यातमे भागप्रमाण पूर्व वृद्धि होनेपर एक वार उत्तर वृद्धि होती है। यह नियम अंतकी वृद्धि पर्यन्त समझना चाहिये । भावार्थ-सूच्यंगुलके अस- ख्यातमे भागप्रमाण अनन्तभागवृद्धि होनेपर एक वार असख्यातभागवृद्धि होती है, इसके अनन्तर सूच्यङ्गुलके असख्यातमे भागप्रमाण अनन्तभागवृद्धि होनेपर फिर एकवार असं- ख्यातभागवृद्धि होती है । इस क्रमसे असख्यातभागवृद्धि भी जब सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागप्रमाण होजाय तब सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागप्रमाण अनन्तभागवृद्धि होनेपर एक नगर सख्यातभागवृद्धि होती है। इस ही तरह अन्तकी वृद्धिपर्यन्त जानना। आदिमछट्ठाणम्हि य पंच य वड्डी हवंति सेसेसु छच्चड्डीओ होति हु सरिसा सवत्थ पदसंखा ॥ ३२६ ॥ आदिमपटूस्थाने च पञ्च च वृद्धयो भवन्ति शेपेषु । पयुद्धयो भवन्ति हि सदृशा सर्वत्र पदसंख्या ॥ ३२६ ॥ अर्थ-असख्यातलोकप्रमाण षट्स्थानोमेसे प्रथम पदस्थानमें पांच ही वृद्धि होती हैं, अष्टाक वृद्धि नहीं होती। शेष सम्पूर्ण षट्स्थानोंमें अष्टाङ्कसहित छह वृद्धि होती है। सूच्यङ्गुलका असंख्यातमा भाग अवस्थित है इसलिये पदोंकी संख्या सब जगह सहश ही 'समझनी चाहिये। प्रथम पदस्थानमें अष्टाङ्कवृद्धि क्यों नहीं होती इसका हेतु लिखते है। छठ्ठाणाणं आदी अट्टकं होदि चरिममुचकं । जम्हा जहण्णणाणं अट्टकं होदि जिणदिलृ॥३२७ ॥ षट्स्थानानामादिरष्टाकं भवति चरममुर्वकम् । यस्माजघन्यज्ञानमष्टाकं भवति जिनदृष्टम् ॥ ३२७ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण षट्स्थानोंमें आदिके स्थानको अष्टाङ्क और अन्तके स्थानको उर्वक कहते हैं, क्योंकि जघन्य पर्यय ज्ञान भी अगुरुलधु गुणके अविभागप्रतिच्छेदोंकी अपेक्षा अष्टाङ्क हो सकता है ऐसा जिनेन्द्रदेवने प्रत्यक्ष देखा है। एकं खलु अष्टकं सत्कं कंडयं तदो हेटा । रूवहियकंडएण य गुणिदकमा जावमुचकं ॥ ३२८ ॥ एकं खलु अष्टावं सप्ताङ्क काण्डकं ततोऽधः । रूपाधिककाण्डकेन च गुणितक्रमा यावदुर्वङ्कः ॥ ३२८॥ अर्थ-एक षस्थानमें एक ही अष्टाङ्क होता है । और सप्ताङ्क सूच्यंगुलके असंख्या- - . १२६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। तमे भागमात्र होते है । इसके नीचे षडंक पञ्चांक चतुरंक उवैक ये एक २ अधिकवार सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागसे गुणित कम है। भावार्थ-पडंक दो वार सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागसे गुणित है, और पञ्चांक तीन वार सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागसे गुणित है । इस ही तरह चतुरंकमे चार वार और उर्वकमें पांच वार सूच्यंगुलके असंख्या- तमे भागका गुणाकार होता है। सम्पूर्ण षड्वृद्धियोंका जोड़ बताते हैं। सवसमासो णियमा रूवाहियकंडयस्स वग्गस्स । बिदस्स य संवग्गो होदित्ति जिणेहिं णिदिलु ॥ ३२९ ॥ सर्वसमासो नियमात् रूपाधिककाण्डकस्य वर्गस्य । वृन्दस्य च संवर्गों भवतीतिजिननिर्दिष्टम् ॥ ३२९ ॥ अर्थ-एक अधिक काण्डकके वर्ग और धनको परस्पर गुणा करनेसे जो प्रमाण लब्ध आवे उतना ही एक षट्स्थानपतित वृद्धियों के प्रमाणका जोड है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है। मावार्थ-एक अधिक सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागको पांच जगह रख कर परस्पर गुणा करनेसे जो लब्ध आवे उतनी वार एक षट्स्थानमें अनन्तभागवृद्धि आदि होते है। उक्कस्ससंखमेत्तं तत्तिचउत्थेकदालछप्पण्णं । सत्तदसमं च भागं गंतूणय लद्धिअक्खरं दुगुणं ॥ ३३० ॥ उत्कृष्टसंख्यातमात्र तत्रिचतुर्थैकचत्वारिंशत्षट्पञ्चाशम् । सप्तदशमं च भागं गत्वा लब्ध्यक्षरं द्विगुणम् ॥ ३३०॥ अर्थ-एक अधिक काण्डकसे गुणित सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागप्रमाण अनन्तभाग- वृद्धिके स्थान, और सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागप्रमाण असंख्यातभागवृद्धिके स्थान, इन दो वृद्धियोंको जघन्य ज्ञानके उपर होजानेपर एक वार संख्यातभागवृद्धिका स्थान होता है । इसके आगे उक्त क्रमानुसार उत्कृष्ट संख्यातमात्र संख्यातभागवृद्धियोंके होजानेपर उसमें प्रक्षेपक वृद्धिके होनेसे लब्ध्यक्षरका प्रमाण दूना होजाता है । परन्तु प्रक्षेपककी वृद्धि कहां २ पर कितनी २ होती है यह बताते है। उत्कृष्ट सख्यातमात्र पूर्वोक्त संख्यातभागवृद्धिके स्था- नोंमेंसे तीन-चौथाई भागप्रमाण स्थानोंके होजानेपर प्रक्षेपक और प्रक्षेपकप्रक्षेपक इन दो वृद्धियोंको जघन्य ज्ञानके ऊपर होनानेसे लब्ध्यक्षरका प्रमाण दूना होजाता है। पूर्वोक्त सख्याव- भागवृद्धियुक्त उत्कृष्ट संख्यातमात्र स्थानोंके छप्पन भागों से इकतालीस भागोंके वीतजानेपर प्रक्षेपक और प्रक्षेपकप्रक्षेपककी वृद्धि होनेसे साधिक (कुछ अधिक) जघन्यका दूना प्रमाण होजाता है। अथवा संख्यातभागवृद्धिके उत्कृष्ट संख्यातमात्र स्थानों मेंसे सत्रह स्थानोंके अनन्तर गोम्मटसार। १२७ प्रक्षेपक प्रक्षेपकप्रक्षपके तथा पिशूलि इन तीन वृद्धियोंको साधिक जघन्यके ऊपर करनेसे साधिक जघन्यका दूना प्रमाण होता है। एवं असंखलोगा अणक्खरप्पे हवंति छठ्ठाणा। ते पज्जायसमासा अक्खरगं उवरि वोच्छामि ॥ ३३१ ॥ एवमसंख्यलोका अनक्षरात्मके भवन्ति षट्स्थानानि । ते पर्यायसमासा अक्षरगमुपरि वक्ष्यामि ॥ ३३१ ॥ अर्थ-इस प्रकारसे अनक्षरात्मक श्रुत ज्ञानके असंख्यात लोकप्रमाण षट्स्थान होते है। ये सब ही पर्यायसमास ज्ञानके भेद है। अब इसके आगे अक्षरात्मक श्रुत ज्ञानका वर्णन करेंगे। अक्षर श्रुतज्ञानको बताते है। चरिमुकेणवहिदअत्थक्खरगुणिदचरिममुर्वकं । अत्थक्खरं तु णाणं होदिति जिणेहिं णिद्दिढ ॥ ३३२ ॥ चरमोर्वकणावहितार्थाक्षरगुणितचरमोर्वकम् । अर्थाक्षरं तु ज्ञानं भवतीति जिननिर्दिष्टम् ॥ ३३२ ॥ अर्थ-अन्तके उवैकका अर्थाक्षरसमूहमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसको अन्तके उकसे गुणा करनेपर अक्षर ज्ञानका प्रमाण होता है ऐसा जिनेन्द्र देवने कहा है। भावार्थ-असख्यात लोकप्रमाण पदस्थानोंमें अन्तके षस्थानकी अन्तिम उवैक-वृद्धिसे , युक्त उत्कृष्ट पर्यायसमास ज्ञानसे अनन्तगुणा अक्षर ज्ञान होता है । यह अर्थाक्षर सम्पूर्ण श्रुतकेवल ज्ञानरूप है। इसमें एक कम एकहीका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना ही अर्थाक्षर ज्ञानका प्रमाण होता है । श्रुतनिबद्ध विषयका प्रमाण बताते है। पण्णवणिजा भावा अणंतभागो दु अणभिलप्पाणं । पण्णवणिजाणं पुण अणंतभागो सुदणिवद्धो ॥३३३ ॥ प्रज्ञापनीया भावा अनन्तभागस्तु अनमिलाप्यानाम् । प्रज्ञापनीयानां पुनः अनन्तभागः श्रुतनिबद्धः ॥ ३३३ ॥ अर्थ-अनभिलप्य पदार्थोके अनंतमे भाग प्रमाण प्रज्ञापनीय पदार्थ होते है। और प्रज्ञापनीय पदार्थोंके अनन्तमे भाग प्रमाण श्रुतमें निबद्ध है । भावार्थ जो केवल केवल- ज्ञानके द्वारा जाने जासकते है, किन्तु जिनका वचनके द्वारा निरूपण नहीं किया जासकता ऐसे पदार्थ अनन्तानन्त है । इस तरहके पदार्थोंसे अनन्तमें भाग प्रमाण वे पदार्थ है कि रायचन्द्रजनशास्त्रमालायाम् । जिनका वचनके द्वारा निरूपण होसकता है, उनको प्रज्ञापनीय भाव कहते हैं। जितने प्रज्ञापनीय पदार्थ है उनका भी अनंतमा भाग श्रुतमें निरूपित है। अक्षरसमास ज्ञान तथा पदज्ञानका खरूप बताते हैं । 3. एयक्खरादु उवार एगेगेणक्खरेण वढतो। संखेजे खलु उड्ढे पदणामं होदि सुदणाणं ॥ ३३४ ॥ एकाक्षरातूपरि एकैकेनाक्षरेण वर्धमानाः। संख्येये खलु वृद्धे पदनाम भवति श्रुतज्ञानम् ॥ ३३४ ॥ अर्थ-अक्षर ज्ञानके ऊपर क्रमसे एक.२ अक्षरकी वृद्धि होते २ जब संख्यात अक्ष- रोंकी वृद्धि होजाय तब पदनामक श्रुतज्ञान होता है । अक्षर ज्ञानके ऊपर और पदज्ञानके पूर्व तक जितने ज्ञानके विकल्प है वे सब अक्षरसमास ज्ञानके भेद है। एक पदके अक्षरोंका प्रमाण बताते है। सोलससयचउतीसा कोडी तियसीदिलक्खयं चेव । सत्सहस्साठसया अट्ठासीदी य पदवण्णा ॥ ३३५ ॥ षोडशशतचतुस्त्रिंशत्कोट्यः व्यशीतिलक्षकं चैव । सप्तसहस्राण्यष्टशतानि अष्टाशीतिश्च पदवर्णाः ॥ ३३५ ॥ अर्थ-सोलहसौ चौतीस कोटि तिरासी लाख सात हजार आठसौ अठासी (१६३४ ८३०७८८८) एक पदमें अक्षर होते है । भावार्थ -पद तीन तरहके होते है, अर्थपद प्रमाण पद मध्यम पद । इनमेंसे "सफेद गौको रस्सीसे बाघो" "अग्निको लाओ" इत्यादि अनियत अक्षरोंके समूहरूप किसी अर्थविशेषके बोधक वाक्यको अर्थपद कहते है। आठ आदिक अक्षरों के समूहको प्रमाणपद कहते है, जैसे श्लोकके एक पादमें आठ अक्षर होते है । इस ही तरह दूसरे छन्दोंके पदोंमें भी अक्षरोंका न्यूनाधिक प्रमाण होता है। परन्तु गाथामें कहे हुए पदके अक्षरोंका प्रमाण सर्वदाकेलिये निश्चित है, इस ही को मध्यमपद कहते है। संघात श्रुतज्ञानको बताते हैं। एयपदादो उरि एगेगेणक्खरेण वढतो। संखेजसहस्सपदे उड्डे संघादणाम सुदं ॥ ३३६ ॥ एकपदादुपरि एकैकेनाक्षरेण वर्धमानाः। संख्यातसहस्रपदे वृद्ध संघातनाम श्रुतम् ॥ ३३६ ॥ अर्थ-एक पदके आगे भी क्रमसे एक २ अक्षरकी वृद्धि होते होते संख्यात हजार पदकी वृद्धि होजाय उसको सघातनामक श्रुत ज्ञान कहते है । एक पदके ऊपर और संघा- L - . - गोम्मटसार। १२९ त ज्ञानके पूर्व जितने ज्ञानके भेद है वे सब पदसमासके भेद है। यह संघात नामक श्रुतज्ञान चार गतिमेंसे एक गतिके खरूपका निरूपण करनेवाले अपुनरुक्त मध्यम पदोंका समूहरूप है। प्रतिपत्तिक श्रुतज्ञानका खरूप बताते हैं। एकदरगदिणिरूवयसंघादसुदादु उवरि सुचं वा । वणे संखेजे संघादे उहम्हि पडिवत्ती॥ ३३७ ॥ एकतरगतिनिरूपकसंघातश्रुतादुपरि पूर्व वा । वर्णे संख्ये ये संघाते वृद्ध प्रतिपत्तिः ॥ ३३७ ॥ अर्थ-चार गतिमेंसे एक गतिका निरूपण करनेवाले सघात श्रुतज्ञानके ऊपर पूर्वकी तरह क्रमसे एक २ अक्षरकी वृद्धि होते २ जब सख्यात हजार संघातकी वृद्धि होजाय तब एक प्रतिपत्ति नामक श्रुतज्ञान होता है । सघात और प्रतिपत्ति श्रुतज्ञानके मध्यमें जितने ज्ञानके विकल्प हैं उतने ही संघातसमासके भेद है । यह ज्ञान नरकादिक चार गतियोंका विस्तृत खरूप जाननेवाला है। अनुयोग श्रुतज्ञानका खरूप बताते है । चउगइसरूवरूवयपडिवत्तीदो दु उपरि पुर्व वा। वण्णे संखेजे पडिवत्तीउड्डम्हि अणियोगं ॥ ३३८ ॥ चतुर्गतिखरूपरूपकप्रतिपत्तितस्तु उपरि पूर्व वा । वर्णे संख्याते प्रतिपत्तिवृद्ध अनुयोगम् ॥ ३३८ ॥ अर्थ-चारों गतियोंके खरूपका निरूपण करनेवाले प्रतिपत्ति ज्ञानके ऊपर क्रमसे पूर्वकी तरह एक २ अक्षरकी वृद्धि होते २ जब संख्यात हजार प्रतिपत्तिकी वृद्धि होजाय तब एक अनुयोग श्रुतज्ञान होता है । इसके पहले और प्रतिपत्ति ज्ञानके ऊपर सम्पूर्ण प्रतिपत्तिसमास ज्ञानके भेद है । अन्तिम प्रतिपतिसमास ज्ञानके भेदमें एक अक्षरकी वृद्धि होनेसे अनुयोग श्रुतज्ञान होता है । इस ज्ञानके द्वारा चौदह मार्गणाओं का विस्तृत खरूप जाना जाता है। प्राभूतप्राभृतकका खरूप दो गाथाओं द्वारा बताते है । चोइसमग्गणसंजुदअणियोगादुवरि वहिदे वण्णे। चउरादीअणियोगे दुगवारं पाहुडं होदि ॥ ३३९ ॥ चतुर्दशमार्गणासंयुतानुयोगादुपरि वर्धिते वर्णे । चतुरायनुयोगे द्विकवार प्राभृतं भवति ॥ ३३९ ।। गो. १७ se १३० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-चौदह मार्गणाओंका निरूपण करनेवाले अनुयोग ज्ञानके ऊपर पूर्वोक्त क्रमके अनुसार एक २ अक्षरकी वृद्धि होते २ जब चतुरादि अनुयोगोंकी वृद्धि होजाय तव प्रामृत- प्राभृतक श्रुतज्ञान होता है। इसके पहले और अनुयोग ज्ञानके ऊपर जितने ज्ञानके विकल्प है वे सव अनुयोगसमासके भेद जानना। अहियारो पाहुडयं एयहो पाहुडस्स अहियारो। पाहुडपाहुडणाम होदिति जिणेहिं णिहिटं ॥ ३४० ।। अधिकारः प्राभृतमेकार्थः प्राभृतस्याधिकारः । प्राभृतप्राभृतनामा भवतीति जिननिर्दिष्टम् ।। ३४०॥ अर्थ-प्रामृत और अधिकार ये दोनों एक अर्थक वाचक है। अत एव प्राभृतके अधि- कारको प्राभृतप्राभूत कहते है, ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है । भावार्थ-वस्तुनाम श्रुतज्ञा- नके एक अधिकारको प्रामृत और अधिकारके अधिकारको प्राभृतप्राभूत कहते है । प्राभृतका खरूप बताते है। दुगवारपाहुडादो उवरि वण्णे कमेण चउवीसे। दुगवारपाहुडे संउड्ढे खलु होदि पाहुडयं ॥ ३४१ ॥ द्विकवारपाभृतादुपरि वर्णे क्रमेण चतुर्विशतौ । द्विकवारप्राभृते संवृद्धे खलु भवति प्राभृतकम् ॥ ३४१ ॥ अर्थ-प्राभृतप्रामृत ज्ञानके ऊपर पूर्वोक्त क्रमसे एक २ अक्षरकी वृद्धि होते २ जब चौवीस प्राभूतप्रामृतककी वृद्धि होजाय तब एक प्रामृतक श्रुत ज्ञान होता है। प्राइतके पहले और प्राभृतप्राभृतके ऊपर जितने ज्ञानके विकल्प है वे सब ही प्रामृतप्रामृतसमासके भेद जानना । उत्कृष्ट प्रामृतप्रामृतसमासके भेदमें एक अक्षरकी वृद्धि होनेसे प्राभूत ज्ञान होता है। वस्तु श्रुतज्ञानका खरूप दिखाते है। वीस वीसं पाहुडअहियारे एकवत्थुअहियारो। एकेकवण्णउड्डी कमेण सवत्थ णायचा ॥ ३४२ ॥ विंशतौ विंशतौ प्राभृताधिकारे एको वस्त्वधिकारः। एकैकवर्णवृद्धिः क्रमेण सर्वत्र ज्ञातव्या ॥ ३४२ ॥ अर्थ-पूर्वोक्त क्रमानुसार प्राभूत ज्ञानके ऊपर एक २ अक्षरकी वृद्धि होते २ जब क्रमसे वीस प्राभृतकी वृद्धि होजाय तब एक वस्तु अधिकार पूर्ण होता है । वस्तु ज्ञानके पहले और प्राभूत ज्ञानके ऊपर जितने विकल्प हैं वे सब प्राभृतसमास ज्ञानके भेद है । उत्कृष्ट प्राभूतसमासमें एक . अक्षरकी वृद्धि होनेसे वस्तुनामक श्रुतज्ञान पूर्ण होता है।
गोम्मटसारः। १३१ भावार्थ-एक २ वस्तु अधिकारमें वीस २ प्राभूत होते हैं और एक २ प्रामृतमें चौवीस २ प्राभृतप्राभूत होते है। पूर्व ज्ञानके भेदोंकी सख्या बताते है दस चोदसट्ट अट्ठारसयं वारं च बार सोलं च । बीसं तीसं पण्णारसं च दस चदुसु वत्थूणं ॥ ३४३॥ दश चतुर्दशाष्ट अष्टादशकं द्वादश च द्वादश षोडश च । विशतिः त्रिंशत् पञ्चदश च दश चतुर्पु वस्तूनाम् ॥ ३४३ ॥ अर्थ-पूर्व ज्ञानके चौदह भेद है जिनमें से प्रत्येकमें क्रमसे दश, चौदह, आठ,अठारह, बारह, बारह, सोलह, वीस, तीस, पंद्रह, दश, दश, दश, दश वस्तु नामक अधिकार है। चौदह पूर्वके नाम गिनाते है। उप्पायपुवगाणियविरियपवादत्थिणत्थियपवादे । णाणासचपवादे आदाकम्मप्पवादे य ॥ ३४४ ॥ पञ्चाक्खाणे विजाणुवादकल्लाणपाणवादे य । किरियाविसालपुवे कमसोथ तिलोयविंदुसारे य ॥ ३४५ ॥ उत्पादपूर्वाग्रायणीयवीर्यप्रवादास्तिनास्तिकप्रवादानि । ज्ञानसत्यप्रवादे आत्मकर्मप्रवादे च ॥ ३४४ ॥ प्रत्याख्यानं वीर्यानुवादकल्याणप्राणवादानि च । क्रियाविशालपूर्व क्रमशः अथ त्रिलोकविन्दुसारं च ।। ३४५ ॥ अर्थ-उत्पादपूर्व, आग्रायणीयपूर्व, वीर्यप्रवाद, अस्तिनास्तिप्रवाद, ज्ञानप्रवाद, सत्यप्र- वाद, आत्मप्रवाद, कर्मप्रवाद, प्रत्याख्यान, वीर्यानुवाद, कल्याणवाद, प्राणवाद, क्रियावि- शाल, त्रिलोकविन्दुसार, इस तरहसे ये क्रमसे पूर्वज्ञानके चौदह भेद है । भावार्थ- वस्तुज्ञानके ऊपर एक २ अक्षरकी वृद्धिके क्रमसे पदसघातआदिकी वृद्धि होते २ जब क्रमसे दश वस्तुकी वृद्धि होजाय तब पहला उत्पादपूर्व होता है । इसके आगे क्रमसे अक्षर पद सघात आदिककी वृद्धि होते २ जब चौदह वस्तुकी वृद्धि होजाय तब दूसरा आग्रायणीय पूर्व होता है । इसके आगे भी क्रमसे अक्षर पद सघात आदिकी वृद्धि होते २ जब क्रमसे आठ वस्तुकी वृद्धि होजाय तब तीसरा वीर्यप्रवाद होता है । इसके आगे क्रमसे अक्षरादिककी वृद्धि होते २ जब अठारह वस्तुकी वृद्धि होजाय तब चौथा अस्ति- नास्तिप्रवाद होता है । इस ही तरह आगेके पांचमे आदिक पूर्व भी क्रमसे बारह, बारह, सोलह, वीस, तीस, पन्द्रह, दश, दश, दश, दश, वस्तुकी वृद्धिके होनेसे होते हैं । अर्थात् अस्तिनास्तिप्रवादके ऊपर क्रमसे बारह वस्तुकी वृद्धि होनेसे पांचमा ज्ञानप्रवाद,
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
और ज्ञानप्रवादके ऊपर भी क्रमसे बारह वस्तुकी वृद्धि होनेसे सत्यप्रवाढ होता है । इस
ही तरह आगेके आत्मप्रवाद आदिकका प्रमाण भी समझना चाहिये।
चौदह पूर्वके समस्त वस्तुकी और उनके अधिकारभूत समस्त प्राभृतोंके जोड़का प्रमाण
बताते हैं।
पणणउदिसया वत्थू पाहुडया तियसहस्सणवयसया।
एदेसु चोहसेसु वि पुबेसु हवंति मिलिदाणि ॥ ३४६ ॥
पञ्चनवतिशतानि वस्तुनि प्राभृतकानि त्रिसहस्रनवशतानि ।
एतेषु चतुर्दशखपि पूर्वेषु भवन्ति मिलितानि ॥ ३४६ ॥
अर्थ-इन चौदह पूर्वोके सम्पूर्ण वस्तुओंका जोड़ एकसौ पचानवे ( १९५) होता .
है। और एक २ वस्तुमें वीस २ प्राभूत होते है इस लिये सम्पूर्ण प्राभृतोंका प्रमाण तीन
हजार नौ सौ (३९०० ) होता है ।
पहले वीसप्रकारका जो श्रुतज्ञान बताया था उस हीका दो गाथाओंमें उपसंहार करते है।
अत्थक्खरं च पदसंघातं पडिवत्तियाणिजोगं च ।
दुगवारपाहुडं च य पाहुडयं वत्थु पुर्व च ॥ ३४७ ॥
कमवण्णुत्तरवड्डिय ताण समासा य अक्खरगदाणि ।
णाणवियप्पे वीसं गंथे वारस य चोद्दसयं ॥ ३४८ ॥
अर्थाक्षरं च पदसंघातं प्रतिपत्तिकानुयोगं च ।
द्विकबारप्राभृतं च च प्राभृतकं वस्तु पूर्व च ॥ ३४७ ॥
क्रमवर्णोत्तवर्धिते तेषां समासाश्च अक्षरगताः ।
ज्ञानविकल्पे विंशतिः ग्रन्थे द्वादश च चतुर्दशकम् ।। ३४८॥
अर्थ-अर्थाक्षर, पद, संघात, प्रतिपत्तिक, अनुयोग, प्रामृतप्रामृत, प्राभृत, वस्तु, पूर्व,
ये नव'तथा क्रमसे एक २ अक्षरकी वृद्धिके द्वारा उत्पन्न होनेवाले अक्षरसमास आदि नव
इस तरह अठारह भेद द्रव्य श्रुतके होते है। पर्याय और पर्यायसमासके मिलानेसे वीस भेद
ज्ञानरूप श्रुतके होते हैं । यदि ग्रन्थरूप श्रुतकी विवक्षा की जाय तो आचाराङ्ग आदि बारह
और उत्पादपूर्व आदि चौदह भेद होते है।
द्वादशाङ्गके समस्त पदोंकी सख्या बताते है।
बारुत्तरसयकोडी तेसीदी तहय होति लक्खाणं।
अठावण्णसहस्सा पंचेव पदाणि अंगाणं ॥ ३४९ ॥
द्वादशोत्तरशतकोट्यः व्यशीतिस्तथा च भवन्ति लक्षानाम् ।
अष्टापञ्चाशत्सहस्राणि पञ्चैव पदानि अङ्गानाम् ॥ ३४९ ॥
-- गोम्मटसारः। १३३ अर्थ-द्वादशागके समस्त पद एक सौ बारह करोड़ व्यासी लाख अट्ठावन हजार पांच (११२८३५८००५) होते है । अङ्गबाह्य अक्षर कितने है उनका प्रमाण बताते है। अडकोडिएयलक्खा असहस्सा य एयसदिगं च। पण्णत्तरि वण्णाओ पइण्णयाणं पमाणं तु ॥३५०॥ अष्टकोट्येकलक्षाणि अष्टसहस्राणि च एकशतकं च । पञ्चसप्ततिः वर्णाः प्रकीर्णकानां प्रमाणं तु॥ ३५०॥ अर्थ-आठ करोड़ एक लाख आठ हजार एकसौ पचहत्तर (८०१०८१७५) प्रकी- कि (अङ्गवाह्य ) अक्षरोंका प्रमाण है। चार गाथाओंद्वारा उक्त अर्थको समझनेकी प्रक्रिया बताते हैं। तेत्तीस बेंजणाई सत्तावीसा सरा तहा भणिया। चत्वारि य जोगवहा चउसठ्ठी मूलवण्णाओ ॥ ३५१ ॥ त्रयस्त्रिशत् व्यंजनानि सप्तविशतिः खरास्तथा भणिताः। चत्वारश्च योगवहा. चतुःषष्ठिः मूलवर्णाः ॥ ३५१ ॥ अर्थ-तेतीस व्यंजन सत्ताईस खर चार योगवाह इस तरह कुल चौसठ मूलवर्ण होते । भावार्थ-खरके विना जिनका उच्चारण न हो सके ऐसे अर्धाक्षरोंको व्यजन कहते है। उनके कू ख से लेकर इ पर्यन्त तेतीस भेद है।अ इ उ ऋ ल ए ऐ ओ औ ये नव खर है, इनके हख दीर्घ प्लतकी अपेक्षा सत्ताईस भेद होते है। अनुसार विसर्ग जिह्वामूलीय उपध्मानीय ये चार योगवाह है । सब मिलकर चौसठ अनादिनिधन मूलवर्ण है। यद्यपि दीर्घ लु वर्ण संस्कृतमें नहीं है तब भी अनुकरणमें अथवा देशान्तरोंकी भाषामें आता है इसलिये चौसठ वर्षों में इसका भी पाठ है। चउसद्विपदं विरलिय दुगं च दाउण संगुणं किया। रुऊणं च कुए पुण सुदणाणस्सक्खरा होंति ॥ ३५२ ॥ चतुस्पष्ठिपदं विरलयित्वा द्विकं च दत्त्वा संगुणं कृत्वा । रूपोने च कृते पुनः श्रुतज्ञानस्याक्षराणि भवन्ति ॥ ३५२ ॥ अर्थ -उक्त चौसठ अक्षरोंका विरलन करके प्रत्येकके ऊपर दोका अङ्क देकर परस्पर सम्पूर्ण दोके अकोंका गुणा करनेसे लब्ध राशिमें एक घटा देनेसे जो प्रमाण रहता है उतने ही श्रुत ज्ञानके अक्षर होते है। वे अक्षर कितने है उसका प्रमाण बताते है।
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्।
एकट्ठ च च य छस्सत्तयं च च य सुण्णसत्ततियसत्ता।
सुण्णं णव पण पंच य एक छक्केकगो य पणगं च ॥ ३५३ ।।
एकाष्ट च च च पट्सप्तकं च च च शून्यसप्तत्रिकसप्त ।
शून्यं नव पञ्च पञ्च च एकं पट्कैककश्च पञ्चकं च ॥ ३५३ ।।
अर्थ-परस्पर गुणा करनेसे उत्पन्न होनेवाले अक्षरोंका प्रमाण यह है । एक आठ
चार चार छह सात चार चार शून्य सात तीन सात शुन्य नव पांच पाच एक छह एक
पांच । भावार्थ-१८१४६७४४०७३७०९५५१९१५ इतने अङ्गप्रविष्ट और अङ्गबाह्य
श्रुतके समस्त अपुनरुक्त अक्षर है। पुनरुक्त अक्षरोंकी संख्याका नियम नहीं है।
इन अक्षरों से अङ्गप्रविष्ट और अङ्गवाह्य श्रुतके अक्षरोंका विभाग करते हैं।
मझिमपदक्खरवहिदवण्णा ते अंगपुगपदाणि ।
सेसक्खरसंखा ओ पइण्णयाणं पमाणं तु ॥ ३५४ ॥
मध्यमपदाक्षरावहितवर्णास्ते अङ्गपूर्वगपदानि ।
शेषाक्षरसंख्या अहो प्रकीर्णकानां प्रमाणं तु ॥ ३५४ ॥
अर्थ-मध्यमपदके अक्षरोंका जो प्रमाण है उसका समस्त अक्षरोके प्रमाणमें भाग
देनेसे जो लब्ध आवे उतने अन और पूर्वगत मध्यम पद होते हैं। शेष जितने अक्षर
रहें उतना अङ्गबाह्य अक्षरोंका प्रमाण है। भावार्थ-पहले मध्यम पदके अक्षरोंका प्रमाण
बताया है कि एक मध्यम पदमें सोलहसौ चौतीस करोड़ तिरासी लाख सात हजार आठ-
सौ अठासी अक्षर होते है । जव इतने अक्षरोंका एक पद होता है तव समस्त अक्षरोंके
कितने पद होंगे इस तरह त्रैराशिक करनेसे-अर्थात् फलराशि ( एक मध्यम पद ) और
इच्छाराशिका (समस्त अक्षरोंका) परस्पर गुणा कर उसमे प्रमाण राशिका (एक मध्यम-
पदके समस्त अक्षरोंके प्रमाणका ) भाग देनेसे जो लब्ध आवे वह समस्त मध्यम पदोंका
प्रमाण है । इन समस्त मध्यम पदोंके जितने अक्षर हुए वे अङ्गप्रविष्ट अक्षर हैं और जो
शेष अक्षर रहे वे अङ्गवाह्य अक्षर है।
तेरह गाथाओंमें अङ्गोंके और पूर्वोके पदोंकी संख्या बताते है।
आयारे सुद्दयडे ठाणे समवायणामगे अंगे।
ततो विक्खापण्णत्तीए णाहस्स धम्मकहा ॥ ३५५ ॥
तो वासयअज्झयणे अंतयडे गुत्तरोववाददसे।
पण्हाणं वायरणे विवायसुत्ते य पदसंखा ॥ ३५६ ॥
आचारे सूत्रकृते स्थाने समवायनामके अङ्गे ।
ततो व्याख्याप्रज्ञप्तौ नाथस्य धर्मकथायां ॥ ३५५ ॥
.. 1. अर्थ-पूर्वोक्त ग्यारह अहोके पदोंका जोड चारोह का दोहन ५०२०००) होता है । बारहमे दृष्टिवाद यह यूध ११८ होते है। और अगवाह्य अक्षरोका प्रमाण आटबन्धसद ETr गोम्मटसार। वत उपासकाध्ययने अन्तकृते अनुत्तरौपपाददशे। प्रश्नानां ज्याकरणे विपाकसूत्रे च पदसंख्या ॥ ३५६ ॥ अर्थ-आचाराङ्ग, सूत्रकृताङ्ग, स्थानाइ, समवाया, व्याख्याप्रज्ञति, धर्मकथाङ्ग, उपा- सकाध्ययनाज, अन्तकृदशाह, अनुत्तरोपपादिकदशाङ्ग, प्रभव्याकरण, और विपाकसूत्र इन ग्यारह अङ्गोंके पदोंकी संख्या क्रमसे निम्नलिखत है । अट्ठारस छचीसं वादालं अडकडी अडवि छप्पणं । सत्तरि अहावीसं चउदालं सोलससहस्सा ॥ ३५७ ॥ इगिदुगपंचेयारं तिवीसदुतिणउदिलक्ख तुरियादी। चुलसीदिलक्खमेया कोडी य विवागसूत्तम्हि ॥ ३५८ ॥ अष्टादश पत्रिशत् वाचत्वारिंशत् अष्टकृतिः अष्टद्वि षट्पञ्चाशत् । सप्ततिः अष्टाविंशतिः चतुश्चत्वारिंशत् षोडशसहस्राणि ॥ ३५७ ॥ एकद्विपश्चैकादशत्रयोविंशतिद्वित्रिनवतिलक्षं चतुर्थादिपु । चतुरशीतिलक्षमेका कोटिश्च विपाकसूत्रे ।। ३५८ ॥ अर्थ-आचाराङ्गमें अगरह हजार पद हैं, सूत्रकृताङ्गमें छत्तीस हजार, साना में किया- लीस हजार, समवायाङ्गमें एक लाख चौसठ हजार, व्याख्याप्रज्ञप्तिमें दो लाख अनाईम हजार, धर्मकथाङ्गमें पाच लाख छप्पन हजार, उपासकाध्ययनामें ग्यारह लाख र अंतःकृद्दशाझमें तेईस लाख अट्ठाई हजार, अनुत्तरौपपादिक दशाश्में बानयं अब लीस हजार, प्रश्नव्याकरण अङ्गमें तिरानवे लाख सोलह हजार पद हैं। विपाकसूत्र अझमें एक करोड़ चौरासी लाख पद हैं। सम्पूर्ण पदोंका जोड़ बताते हैं। बापणनरनोनानं एयारंगे जुदी हु वादम्हि। कनजतजमताननमं जनकनजयसीम बाहिर प्रणा 341 वापणनरनोनानं एकादशाङ्गे युतिहि वाई। कनजतजमताननमं जनकनजयसीम बाथे की 111 पचहत्तर (८०१०८१७५) है। चारहमे अडके भेद औ डॉका नाम मत है।
- '१३६ रायचन्द्रजैनशानमालायाम् । चंदरविजंबुदीवयदीवसमुद्दयवियाहपण्णत्ती। परियम्म पंचविहं सुत्तं पढमाणिजोगमदो ॥ ३६० ॥ पुवं जलथलमाया आगासयरूवगयमिमा पंच। भेदा हु चूलियाए तेसु पमाणं इणं कमसो ॥ ३६१ ॥ चन्द्ररविजम्बूद्वीपकद्वीपसमुद्रकव्याख्याप्रज्ञप्तयः । परिकर्म पञ्चविधं सूत्रं प्रथमानुयोगमतः ॥ ३६० ॥ पूर्व जलस्थलमायाकाशकरूपगता इमे पञ्च । भेदा हि चूलिकायाः तेपु प्रमाणमिदं क्रमशः ॥ ३६१ ॥ अर्थ-बारहमे दृष्टिवाद अङ्गके पांच भेद है-परिकर्म सूत्र प्रथमानुयोग पूर्वगत चूलि." का । इसमें परिकर्मके पांच भेद है-चन्द्रप्रज्ञप्ति सूर्यप्रज्ञप्ति जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति द्वीपसागरप्रज्ञप्ति व्याख्यापज्ञप्ति । पूर्वगतके चौदह भेद हैं जिनका वर्णन आगे करेंगे । चूलिकाके पाच भेद है जलगता स्थलगता मायागता आकाशगता रूपगता । अव इनके पदोंका प्रमाण क्रमसे बताते है। गतनम मनगं गोरम मरगत जवगातनोननं जजलक्खा। मननन धममननोनननामं रनधजधराननजलादी ॥ ३६२।। याजकनामेनाननमेदाणि पदाणि होति परिकम्मे । कानवधिवाचनाननमेसो पुण चूलियाजोगो ॥ ३६३ ॥ गतनम मनगं गोरम मरगत जवगातनोननं जजलक्षाणि । मननन धममननोनननामं रनधजधरानन जलादिषु ॥ ३६२ ।। याजकनामेनाननमेतानि पदानि भवन्ति परिकर्मणि । कानवधिवाचनाननमेषः पुनः चूलिकायोगः ॥ ३६३ ॥ अर्थ क्रमसे चन्द्रप्रज्ञप्तिमें छत्तीस लाख पांच हजार, सूर्यप्रज्ञप्तिमे पांच लाख तीन हजार, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिमें तीन लाख पच्चीस हजार, द्वीपसागरप्रज्ञप्तिमें बावन लाख छत्तीस हजार, व्याख्याप्रज्ञप्तिमें चौरासी लाख छत्तीस हजार पद है। सूत्रमें अठासी लाख पद हैं । प्रथमानुयोगमें पांच हजार पद है। चौदह पूर्वोमें पचानवे करोड़ पचास लाख पांच पद है। पांचो चूलिकाओंमेंसे प्रत्येकमें दो करोड़ नौ लाख नवासी हजार दो सौ पद हैं। चन्द्रप्रज्ञप्ति आदि पांचप्रकारके परिकर्मके पदोंका जोड़ एक करोड़ इक्यासी लाख पांच हजार है । पाच प्रकारकी चूलिकाके पदोंका जोड़ दश करोड़ उनचास लाख छयालीस हजार (१०४९४६०००है। भावार्थ--यहा पर जो अक्षर तथा पदोंका प्रमाण बताया है वह अपुनरुक्त अक्षर तथा पदोंका प्रमाण समझना।
गोम्सटसार। . १३७ चौदह पूर्वोमसे प्रत्येक पूर्वके पदोंका प्रमाण बताते हैं। पण्णटुंदाल पणतीस तीस पंण्णास पण्ण तेरसदं। णउदी दुदाल पुवे पणवण्णा तेरससयाई ॥३६४ ॥ छस्सय पण्णासाई चउसयपण्णास छसयपणुवीसा । बिहि लक्खेहि दु गुणिया पंचम रूऊण छज्जुदा छठे ॥३६५॥ पञ्चाशदष्टचत्वारिंशत् पञ्चत्रिंशत् त्रिंशत् पञ्चाशत् पञ्चाशत् त्रयोदशशतम् । नवतिः द्वाचत्वारिंशत् पूर्वे पञ्चपञ्चाशत् त्रयोदशशतानि ॥ ३६४ ॥ षटूछतपञ्चाशानि चतु:शतपञ्चाशत् षट्छतपञ्चविंशतिः । द्वाभ्यां लक्षाभ्यां तु गुणितानि पञ्चमं रूपोनं षट्युतानि षष्ठे ।। ३६५ ॥ अर्थ-चौदह पूर्वोमेंसे क्रमसे प्रथम उत्पाद पूर्वमें एक करोड़ पद है। दूसरे आरायणीय पूर्वमें छ्यानवे लाख पद है। तीसरे वीर्यप्रवादमें सत्तर लाख पद है। चतुर्थ अतिनास्तिप्रवाद पूर्वमें साठ लाख पद हैं। पांचमे ज्ञानप्रवादमें एक कम एक करोड़ १९९९९९९९) पद हैं। छठे सत्यप्रवाद पूर्वमें एक करोड़ छह (१००००००६) पद है । सातमे आत्मप्रवादमें छन्वीस करोड़ पद हैं। आठमे कर्मप्रवाद पूर्वमें एक करोड़ अस्सी लाख पद है। नौमे प्रत्याख्यान पूर्वमें चउरासी लाख पद है । दशमे विद्यानुवाद पूर्वमें एक करोड़ दश लाख पद है । ग्यारहमे कल्याणवाद पूर्व में छन्वीस करोड़ पद है । बारहमे प्राणावाद पूर्वमें तेरह करोड़ पद है। तेरहमे क्रियाविशाल पूर्वमें नौ करोड़ पद है। चौदहमे त्रिलोकवि- न्दुसारमें बारह करोड़ पचास लाख पद हैं। भावार्थ-चौदह पूर्वमिसे किस २ पूर्व में कितने २ पद है यह इन दो गाथाओं में बता दिया है। अब प्रकरण पाकर यहांपर द्वादशाङ्ग तथा चौदह पूर्वोमें किस २ विषयका वर्णन है यह सक्षेपसे विशेष बताया जाता है। प्रथम आंचाराङ्गमें किस तरह आचरण करै । किस तरह खड़ा हो ! किस तरह वैठे किस तरह शयन करै ? किस तरह भाषण करै । किस तरह भोजन करे ? पापका बन्ध किस तरह से नही होता ?' इत्यादि प्रश्नोंके अनुसार 'यत्नपूर्वक आचरण करै, यलपूर्वक खड़ा हो, यत्नपूर्वक बैठे, यत्नपूर्वक शयन करे, यत्न पूर्वक भाषण कर, यत्नपूर्वक भोजन कर इस तरहसे पापका बन्ध नही होता' इत्यादि उत्तररूप वाक्योके द्वारा मुनियोंके समस्त आचरणका वर्णन किया है। दूसरे 'सूत्रकृताङ्गमें ज्ञानविनय आदि निर्विन अध्ययन- क्रियाका अथवा प्रज्ञापना कल्पाकल्प छेदोपस्थापना आदि व्यवहारधर्मक्रियाका, तथा खसमय और परसमयका खरूप सूत्रोंके द्वारा बताया है। तीसरे स्थानागमें सम्पूर्ण द्रव्योंके १ कयं चरे कयं चिढे कथमासे' कथं सए, कथं मुंजीन भासेन जदो पावं ण बंधई" इसके उत्तरमें "जदं चरे जद चिठे जदमासे जदं सये जदं भुजीन भासेन एवं पावं ण बंधई" इत्यादि । गौ. १० - १३८ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । एकसे लेकर कितने विकल्प होसकते है उन विकल्पोंका वर्णन किया है। जैसे सामान्यकी अपेक्षासे जीवद्रव्यका एक ही स्थान (विकल्प भेद) है, संसारी और मुक्तकी अपेक्षासे दो भेद हैं, उत्पाद व्यय ध्रौव्यकी अपेक्षासे तीन भेद है, चार गतियोंकी अपे- क्षासे चार भेद है, इत्यादि । इस ही तरह पुद्गल आदिक द्रव्योंके भी विकल्प समझना। चौथे समवायाङमें सम्पूर्ण द्रव्योंमें परस्पर किस २ धर्मकी अपेक्षासे सादृश्य है यह बताया है। पाचमे व्याख्याप्रज्ञप्ति अङ्गमें जीव है या नही ! वक्तव्य है अथवा अवक्तव्य है ! नित्य है या अनित्य है । एक है या अनेक है ? इत्यादि साठ हजार प्रश्नोंका व्याख्यान है । छट्टे नाथधर्मकथा अथवा ज्ञातृधर्मकथा अनमें जीवादि वस्तुओंका खभाव, तीर्थंकरों का माहाम्य, तीर्थंकरोंकी दिव्यध्वनिका समय तथा माहात्म्य, उत्तम क्षमा आदि दश धर्म, सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रयधर्मका खरूप बताया है । तथा गणधर इन्द्र चक्रवर्ती आदिकी कथा उपकथाओंका वर्णन है । सातमे उपासकाध्ययन अङ्गमै उपासकोंकी ( श्रावकोंकी) सम्यग्दर्शनादिक ग्यारह प्रतिमासम्बन्धी व्रत गुण शील आचार तथा दूसरे क्रिया काण्ड और उनके मन्त्रादिकोंका सविस्तर वर्णन किया है । आठमे अन्त कृद्दशाङ्गमें प्रत्येक तीर्थकरके तीर्थमें जो दश २ मुनि चार प्रकारका तीव्र उपसर्ग सहन करके संसारके अन्तको प्राप्त हुए उनका वर्णन है । नौमे अनुचरौपदादिकदशाङ्गमें प्रत्येक तीर्थकरके तीर्थमें होनेवाले उन दश दक्ष मुनियोंका वर्णन है जो कि घोर उपसर्गको सहन करके अन्तमें समाषिके द्वारा अपने प्राणोंका त्याग करके विजय आदि पांच प्रकारके अनुचर विमानोंमें उत्पन्न हुए । दशमे प्रश्नव्याकरण अङ्गमें दूतवाक्य नष्ट मुष्टि चिन्ता आदि अनेक प्रकारके प्रश्नोंके अनुसार तीन कालसम्बन्धी धन धान्यादिका लामालाम सुख दुःख जीवन मरण जय पराजय आदि फलका वर्णन है । और प्रश्नके अनुसार आक्षेपणी विक्षेपणी संवेजनी निर्वेजनी इन चार प्रकारकी कथाओंका वर्णन है । ग्यारहमे विपाकसूत्रमें द्रव्यक्षेत्र काल भावके अनुसार शुभाशुभ कर्मोंकी तीन मंद मध्यम आदि अनेक प्रकारकी अनुभाग-शक्तिके फल देनेरूप विपाकका वर्णन है। बारहमे दृष्टिवाद अङ्गमें तीन सौ सठ मिथ्या मतों का वर्णन और उनका निराकरण है। दृष्टिवाद अङ्गके पांच भेद हैं परिकर्म सूत्र प्रथमानु- योग पूर्वगत चूलिका । परिकर्ममें गणित के करणसूत्रोंका वर्णन है । इसके (परिकर्मके) पांच भेद है, चन्द्रप्रज्ञप्ति सूर्यप्रज्ञप्ति जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति द्वीपसागरप्रज्ञप्ति व्याख्याप्रज्ञप्ति । चन्द्रप्रज्ञप्तिमें चन्द्रमासम्बन्धी विमान आयु परिवार ऋद्धि गमन हानि वृद्धि पूर्ण ग्रहण अर्थ ग्रहण चतुर्थांश ग्रहण आदिका वर्णन है। इस ही प्रकार सूर्यप्रज्ञप्तिमें सूर्यसम्बन्धी आयु परिवार गमन ग्रहण आदिका वर्णन है । जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिमें जम्बूद्वीपसम्बन्धी मेरु १ एक वीर्यकरके अनन्तर जब तक दूसरा तीर्थकर उत्सन न हो तब तकके समयको प्रथम तीर्थकरका तीर्थ कहते हैं।
गोम्मटसार। . कुलाचल महाहद ( तलाव) क्षेत्र कुंड वेदिका वन व्यन्तरोंके आवास महानदी आदिका वर्णन है । द्वीपसागरप्रज्ञप्तिमें असंख्यात द्वीप और समुद्रोंका खरूप तथा वहांपर होने. वाले अकृत्रिम चैत्यालयोंका वर्णन है। व्याख्याप्रज्ञप्तिमें भव्य अभव्य-भेद प्रमाण लक्षण रूपी अरूपी जीव अजीव द्रव्योंका और अनन्तरसिद्ध परंपरासिद्धोंका तथा दूसरी वस्तुओंका भी वर्णन है । दृष्टिवादके दूसरे भेद-सूत्रमें तीनसौ त्रेसठ मिथ्यादृष्टियोंका पूर्वपक्षपूर्वक निराकरण है। तीसरे मेद प्रथमानुयोगमें त्रेसठ शलाका-पुरुषोंका वर्णन है। चौथे पूर्वके चौदह भेद है। उनमें किस २ विषयका वर्णन है यह संक्षेपसे क्रमसे बताते है । उत्पाद- पूर्वमें प्रत्येक द्रव्यके उत्पाद व्यय दौम्य और उनके संयोगी धोका वर्णन है । आपाय- णीय पूर्वमें द्वादशनमें प्रधानभूत सातसौ सुनय तथा दुर्णय पञ्चास्तिकाय षद्रव्य सप्त तत्व नव पदार्थ आदिका वर्णन है । वीर्यानुवादमें आत्मवीर्य परवीर्य उभयवीर्य कालवीर्य तपोवीर्य द्रव्यवीर्य गुणवीर्य पर्यायवीर्य आदि अनेकप्रकारके वीर्य ( सामर्थ्य ) का वर्णन है। अस्तिनास्तिप्रवादमें स्यादखि स्यान्नाति आदि सप्तमंगीका वर्णन है । ज्ञानप्रवादमें मति श्रुत अवधि मनःपर्यय केवल रूप प्रमाण-ज्ञान, तथा कुमति कुश्रुत विमङ्ग रूप अप्रमाण ज्ञानके खरूप सख्या विषय फलका वर्णन है । सत्यप्रवादमें आठ प्रकारके शब्दोच्चारणके स्थान, पाच प्रयत्न, वाक्यसंस्कारके कारण, शिष्ट दुष्ट शब्दों के प्रयोग, लक्षण, वचनके भेद, बारह प्रकारकी भाषा, अनेक प्रकारके असत्यवचन, दशप्रकारका सत्यवचन, वाग्गुप्ति, मौन आदिका वर्णन है । आत्मप्रवादमें आत्माके कर्तृत्व आदि अनेक धर्मोंका वर्णन है। कर्मप्रवादमें मूलोत्तर प्रकृति तथा बंध उदय उदीरणा आदि कर्मकी अनेक अवस्थाओंका वर्णन है । प्रत्याख्यानपूर्वमें नाम स्थापना द्रव्य क्षेत्र काल भाव, पुरुषके संहनन आदिकी अपेक्षासे सदोष वस्तुका त्याग, उपवासकी विधि, पाच समिति, तीन गुप्ति आदिका वर्णन है। विद्यानुवादमें अंगुष्ठप्रसेना आदि सातसौ अल्पविद्या, तथा रोहिणी आदि पांचसौ महा विद्याओंका खरूप सामर्थ्य मन्त्र तन्त्र पूजा-विधान आदिका, तथा सिद्ध विद्याओंका फल और अन्तरिक्ष भौम अंग खर खाम लक्षण व्यंजन छिन्न इन आठ महानिमित्तोंका वर्णन है। कल्याणवादमें तीर्थंकरादिके गर्मावतरणादि कल्याण, उनके कारण पुण्यकर्म षोडश भावना आदिका, तथा चन्द्र सूर्य ग्रह नक्षत्रोंके चारका, ग्रहण शकुन आदिके फलका वर्णन है। प्राणावादमें कायचिकित्सा आदि आठ प्रकारके आयुर्वेदका, इडा पिंगला आदिका, दश प्राणोंके उपकारक अपकारक द्रव्योंका गतियोंके अनुसारसे वर्णन किया है। क्रिया- विशालमें सगीत छंद अलङ्कार पुरुषोंकी बहत्तर कला स्त्रीके चौसठ गुण, शिल्पादि- विज्ञान, गर्भाधानादि क्रिया, नित्य नैमित्तिक क्रियाओंका वर्णन है । त्रिलोकविन्दुसारमें लोकका खरूप; छत्तीस परिकर्म, आठ व्यवहार, चार बीज, मोक्षका खरूप, उसके गम- नका कारण, क्रिया, मोक्षसुखके खरूपका वर्णन है। दृष्टिवादनामक वारहमे अंगका पाचमा रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । भेद चूलिका है, उसके पांच भेद हैं, जलगता थलगता मायागता आकाशगता रूपगता। इनमेंसे जलगतामें जलगमन अग्निस्तम्भन अमिभक्षण अमिका आसन अमिप्रवेश आदिके मन्त्र तत्र तपश्चर्या आदिका वर्णन है । स्थलगतामें मेरु कुलाचल भूमि आदिमें प्रवेश शीघ्रगमन आदिके कारण मन्त्र तत्र आदिका वर्णन है। मायागतामें इन्द्रजाल सम्बन्धी मन्त्रादिका वर्णन है । आकाशगतामें आकाशगमनके कारण मन तब आदिका वर्णन है। रूपगतामें सिंहादिक अनेक प्रकारके रूप बनानेके कारणभूत मन्त्रादिका वर्णन है। अङ्गबाह श्रुतके भेद गिनाते हैं। सामाइयचउचीसत्थयं तदो वंदणा पडिकमणं । वेणइयं किदियम्मं दसवेयालं च उत्तरज्झयणं ॥ ३६६ ॥ कप्पववहारकप्पाकप्पियमहकप्पियं च पुंडरियं । महपुंडरीयणिसिहियमिदि चोहसमंगवाहिरयं ॥ ३६७ ॥ सामायिकचतुर्विशस्तवं ततो वंदना प्रतिक्रमणम् । वैनयिक कृतिकर्म दशवकालिकं च उत्तराध्ययनम् ॥ ३६६ ॥ कल्प्यव्यवहार-कल्पाकलिल्यक-महाकल्प्यं च पुंडरीकम् । महापुंडरीकनिषिद्धिके इति चतुर्दशाङ्गवाह्यम् ॥ ३६७ ॥ अर्थ-सामायिक, चतुर्विंशस्तव, वन्दना, प्रतिक्रमण, वैनयिक, कृतिकर्म, दशवैका- । लिक, उत्तराध्ययन, कल्पव्यवहार, कल्पाकल्प्य, महाकल्प, पुंडरीक, महापुंडरीक, निषि- द्धिका ये अङ्गबाबश्नुतके चौदह भेद हैं। श्रुतज्ञानका माहात्म्य बताते हैं। सुदकेवलं च गाणं दोण्णिवि सरिसाणि होति बोहादो। सुदणाणं तु परोक्खं पञ्चक्खं केवलं जाणं ॥ ३६८ ॥ श्रुतकेवलं च ज्ञानं द्वेऽपि सहशे भिवती बोधात् । श्रुतज्ञानं तु परोक्षं प्रत्यक्षं केवलं ज्ञानम् ॥३६८ ॥ अर्थ-ज्ञानकी अपेक्षा श्रुत ज्ञान तथा केवल ज्ञान दोनों ही सदृश हैं । परन्तु दोनोंमें अन्तर यही है कि श्रुत ज्ञान परोक्ष है और केवल ज्ञान प्रत्यक्ष है। भावार्थ-जिस तरह श्रुत ज्ञान सम्पूर्ण द्रव्य और उनकी पर्यायोंको जानता है उस ही तरह केवल ज्ञान भी सम्पूर्ण द्रव्य और पर्यायोंको जानता है। विशेषता इतनी ही है कि श्रुत ज्ञान इन्द्रिय और मनकी सहायतासे होता है इसलिये इसकी अमूर्त पदार्थों में और उनकी अर्थपर्याय तथा दूसरे सूक्ष्म अंशोमें स्पष्टरूपसे प्रवृत्ति नहीं होती। किन्तु केवल ज्ञान निरावरण होनेके कारण समस्त पदार्थोंको स्पष्टरूपसे-विषय करता है। । ।
गोस्मटसार।
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१४१
क्रमप्राप्त अवधि ज्ञानका निरूपण करते हैं।
अवहीयदिचि ओही सीमाणाणेत्ति वणियं समये ।
भवगुणपञ्चयविहियं जमोहिणाणेत्ति णं वेति ॥ ३६९ ॥
अवधीयते इत्यवधिः सीमाज्ञानमिति वर्णितं समये ।
भवगुणप्रत्ययविधिकं यदवधिज्ञानमिति इदं ब्रुवन्ति ॥ ३६९ ॥
अर्थ-बन्य क्षेत्र काल भावकी अपेक्षासे जिसके विषयकी सीमा हो उसको अवधि
ज्ञान कहते हैं । इस ही लिये परमागमसे इसको सीमाज्ञान कहा है । तथा इसके जिने-
द्रदेवने दो भेद कहे है, एक भवप्रत्यय दूसरा गुणप्रत्यय । भावार्थ-नारकादि भवकी
अपेक्षासे अवधिज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होकर जो अवधिज्ञान हो उसको भवप्नत्यय
अवधि कहते है । जो सम्यग्दर्शनादि कारणोंकी अपेक्षासे अवधिज्ञानावरण कर्मका श्योप-
शस होकर अवधिज्ञान होता है उसको गुणप्रत्यय अवधि कहते हैं। इसके विषयको परि-
मित होनेसे इस ज्ञानको अवधिज्ञान अथवा सीमाज्ञान कहते है । यद्यपि दूसरे मतिज्ञाना-
दिके विषयकी भी सामान्यसे सीमा है, इसलिये दूसरे ज्ञानोंको भी अवधिज्ञान कहना
चाहिये; तथापि सममिरूढनयकी अपेक्षासे ज्ञानविशेषको ही अवन्ति ज्ञान कहते हैं।
दोनों प्रकारके अवधि ज्ञानका खामी तथा खरूप बताते है।
भवपञ्चइगो सुरणिरयाणं तित्थेवि सवअंगुत्यो।
गुणपञ्चइगो णरतिरियाणं संखादिचिहभवो ॥ ३७०॥
भवप्रत्ययकं सुरनारकाणां तीर्थेऽपि सर्वाङ्गोत्थम् ।
गुणप्रत्ययकं नरतिरश्चां संखादिचिह्नभवम् ॥ ३७० ॥
अर्थ-भवप्रत्यय अवधिज्ञान देव नारकी तथा तीर्थंकरोंके होता है । और यह ज्ञान
सम्पूर्ण अनसे उत्पन्न होता है। गुणप्रत्यय अवधिज्ञान पर्याप्त मनुष्य तथा संज्ञी पंचेन्द्रिय
तियैचोंके भी होता है। और यह ज्ञान शंखादि चिहोंसे होता है। भावार्थ-नामिके ऊपर
शंख पन वज्र खखिक कलश आदि जो शुभ चिह्न होते है; उस जगह के आत्मप्रदेशोंमें
होनेवाले अवधिज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशमसे गुणप्रत्यय अवधिज्ञान होता है। किन्तु भव-
प्रत्यय अवधि सम्पूर्ण आत्मप्रदेशोंसे होता है।
उत्तरार्धमें प्रकारान्तरसे सामान्य अवधिक तथा पूर्वार्धमें गुणप्रत्यय अवधिके मेदोंको
गिनाते है।
गुणपञ्चइगो छद्धा अणुगावहिदपवड्डमाणिदरा।
देसोही परमोही सचोहिन्ति.य तिघा ओही ॥३७१ ॥
रायचन्द्रजैनशाखमालायाम्।
गुणप्रत्ययकः षोढा अनुगावस्थितप्रवर्धमानेवरे ।
देशावधिः परमावधिः सर्वावधिरिति च त्रिधा अवधिः ।। ३७१ ॥
अर्थ-गुणप्रत्यय अवधिज्ञानके छह भेद हैं, अनुगामी अननुगामी अवस्थित अनव-
स्थित वर्षमान हीयमान । तथा सामान्यसे अवधिज्ञानके देशावधि परमावधि सर्वावधि इस-
तरहसे तीन भेद भी होते है । भावार्थ-जो अवधिज्ञान अपने खामी जीवके साथ जाय
उसको अनुगामी कहते है। इसके तीन भेद है, क्षेत्रानुगामी भवानुगामी उभयानुगामी ।
जो दूसरे क्षेत्रमें अपने खामीके साथ जाय उसको क्षेत्रानुगामी कहते हैं। जो दूसरे भवमें
साथ जाय उसको भवानुगामी कहते है । जो दूसरे क्षेत्र तथा भव दोनोंमें साथ जाय
उसको उभयानुगामी कहते हैं । जो अपने खामी जीवके साथ न जाय उसको अननु-
गामी कहते हैं, इसके भी तीन भेद है क्षेत्राननुगामी भवाननुगामी उभयाननुगामी । जो
सूर्यमण्डलके समान न घटे न बढे उसको अवस्थित कहते है। जो चन्द्रमण्डलकी तरह
कभी कम हो कभी अधिक हो उसको अनवस्थित कहते हैं । जो शुक्लपक्षके चन्द्रकी
तरह अपने अन्तिम स्थानतक बढ़ता जाय उसको वर्धमान अवधि कहते है । जो कृष्ण-
पक्षके चन्द्रकी तरह अन्तिम स्थानतक घटता जाय उसको हीयमान कहते है।
भवपच्चइगो ओही देसोही होदि परमसघोही।
गुणपञ्चइगो णियमा देसोही वि य गुणे होदि ॥ ३७२ ॥
भवप्रत्ययकोऽवधिः देशावधिः भवति परमसर्वावधी।
गुणप्रत्ययको नियमात् देशावधिरपि च गुणे भवति ॥ ३७२ ।।
अर्थ-भवप्रत्यय अवधि नियमसे देशावधि ही होता है। और दर्शनविशुद्धि आदि
गुणोंके निमित्तसे होनेवाला गुणप्रत्यय अवधि ज्ञान देशावधि परमावधि सर्वावधि इस तरह
तीनों प्रकारका होता है।
देसोहिस्स य अवरं णरतिरिये होदि संजदम्हि वरं।
परमोही सबोही चरमसरीरस्स विरदस्स ॥ ३७३ ॥
देशावधेश्च अवरं नरतिरश्चोः भवति संयते वरम् ।
परमावधिः सर्वावधिः चरमशरीरस्य विरतस्य ॥ ३७३ ॥
अर्थ-जघन्य देशावधि ज्ञान संयत तथा असंयत दोनों ही प्रकारके मनुष्य तथा तिर्य-
चौके होता है । उत्कृष्ट देशावधि ज्ञान संयत जीवोंके ही होता है। किन्तु परमावधि और
सर्वावधि चरमशरीरी और महाव्रतीके ही होता है।
पडिवादी देसोही अप्पडिवादी हवंति सेसा ओ।
मिच्छत्तं अविरमणं ग य पडिवजंति चरिमदंगे ॥ ३७४ ॥
गोम्मटसारः। १४३ ४ - प्रतिपाती देशावधिः अप्रतिपातिनौ भवतः शेषौ अहों। मिथ्यात्वमविरमणं न च प्रतिपद्यते घरमद्विके ॥ ३७४।। अर्थ-देशावधि ज्ञान प्रतिपाती होता है। और परमावधि तथा सर्वावधि अप्रतिपाती होते है । तथा परमावधि और सर्वावधिवाले जीव नियमसे मिथ्यात्व और अव्रत अवस्था- को प्राप्त नहीं होते। भावार्थ-सम्यक्त्व और चारित्रसे च्युत होकर मिथ्यात्व और असंय- मकी प्राप्तिको प्रतिपात कहते है। यह प्रतिपात देशावधिवालेका ही होता है। परमावधि और सर्वावधिवालेका नही होता। अवधि ज्ञानका द्रव्यादि चतुष्टयकी अपेक्षासे वर्णन करते हैं। दवं खेतं कालं भावं पडि रूवि जाणदे ओही। अवरादुक्कस्सोति य वियप्परहिदो दु सबोही ॥ ३७५ ॥ द्रव्यं क्षेत्रं कालं भावं प्रति रूपि जानीते अवधिः । अवरादुत्कृष्ट इति च विकल्परहितस्तु सर्वावधिः ॥ ३७५ ॥ अर्थ-जघन्य भेदसे लेकर उत्कष्ट भेदपर्यन्त सब ही अवधि ज्ञान द्रव्य क्षेत्र काल भावकी अपेक्षासे रूपि (पुद्गल ) द्रव्यको ही जानता है। तथा उसके सम्बन्धसे ससारी जीव द्रव्यको भी जानता है। किन्तु सर्वावधि ज्ञानमें जघन्य उत्कृष्ट आदि भेद नहीं हैं वह निर्विकल्प है। अवधि ज्ञानके विषयभूत सबसे जघन्य द्रव्यका प्रमाण बताते हैं। णोकम्मुरालसंचं मज्झिमजोगजियं सविस्सचयं । लोयविभत्तं जाणदि अवरोही दवदो णियमा ॥ ३७६ ॥ नोकौरालसंचयं मध्यमयोगार्जितं सविनसोपचयम् । लोकविभक्तं जानाति अवरावधिः द्रव्यतः नियमात् ॥ ३७६ ॥ अर्थ-मध्यम योगके द्वारा संचित विनसोपचयसहित नोकर्म औदारिक वर्गणाके संचयमें लोकका भाग देनेसे जितना द्रव्य लब्ध आवे उतनेको नियमसे, जघन्य अवधि ज्ञान द्रव्यकी अपेक्षासे जानता है। भावार्थ-विनसोपचयसहित और जिसका मध्यम योगके द्वारा संचय हुआ हो ऐसे डेद्रगुणहानिमात्र समयबद्धरूप औदारिक नोकर्मके समूहमें लोकप्रमाणका भाग देनेसे जो द्रव्य लब्ध आवे उतने द्रव्यको जघन्य अवधि ज्ञान नियमसे जानता है। अवधि ज्ञानके विषयभूत जघन्य क्षेत्रका प्रमाण बताते हैं। सुहमणिगोदअपज्जवयस्स जादस्स तदियसमयम्हि । अवरोगाहणमाणं जहण्णय ओहिरवेनं तु ॥ ३७७ ॥. .
१४४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तकस्य जातस्य तृतीयसमये । अवरावगाहनमान जघन्यकमवधिक्षेत्रं तु ॥ ३७७ ।। अर्थ--सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तककी उत्पन्न होनेसे तीसरे समयमें जो जघन्य अवगाहना होती है उसका जितना प्रमाण है उतना ही अवधि ज्ञानके जघन्य क्षेत्रका प्रमाण है। भावार्थ:-इतने क्षेत्रमें जितने जघन्य द्रव्य होंगे जिसका किं प्रमाण पहले बताया गया है उनको जघन्य देशावषिवाला जान सकता है इसके बाहर नहीं । जघन्य क्षेत्रके विषयमें विशेष कथन करते हैं। अवरोहिखेतदीहं वित्थारुस्सेहयं ण जाणामो। अण्णं पुण समकरणे अवरोगाहणपमाणं तु ॥ ३७८ ॥ अवरावधिक्षेत्रदीर्घ विस्तारोत्सेधकं न जानीमः। अन्यत् पुनः समीकरणे अवरावगाहनप्रमाणं तु ॥ ३७८ ॥ अर्थ जघन्य अवधि ज्ञान के क्षेत्रकी उंचाई लम्बाई चौड़ाईका भिन्न २ प्रमाण हम नही जानते। तथापि यह मालुम है कि समीकरण करनेसे जितना जघन्य अवगाहनाका प्रमाण होता है उतना ही जंघन्य अवधिका क्षेत्र है। अवरोगाहणमाणं उस्सेहंगुलअसंखभागस्स। सूइस य धणपदरं होदि हु तक्खेत्तसमकरणे ॥ ३७९ ॥ अवरावगाहनमानमुत्सेधाडलासंख्यभागस्य । सूचेश्च घनप्रतरं भवति हि तत्क्षेत्रसमीकरणे ॥ ३७९ ॥ अर्थ-उत्सेघाङ्गुलकी अपेक्षासे उत्पन्न व्यवहार सूच्यङ्गुलके असंख्यातमे भागप्रमाण- मुजा कोटी और बेधमें परस्पर गुणा करनेसे जितना जघन्य अवगाहनाका प्रमाण होता है उतना ही समीकरण करनेसे जघन्य अवधि ज्ञानका क्षेत्र होता है। भावार्थ-गुणा करनेसे अङ्गुलके असंख्यातमे भागप्रमाण जघन्य अवधिका क्षेत्र होता है। अवरं तु ओहिखे उस्सेहं अंगुलं हवे जम्हा । सुहमोगाहर्णमाणं उचरि पमाणं तु अंगुलयं ॥ ३८० ॥ अवरं तु अवधिक्षेत्रमुत्सेधमङ्गुलं भवेद्यस्मात् । सूक्ष्मावगाहनमानमुपरि प्रमाणं तु अड्डुलकम् ॥ ३८० ।। अर्थ-जो जघन्य अवधिका क्षेत्र पहले बताया है वह भी उत्सेधाङ्गुल ही हैं, क्यों कि वह सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तककी जघन्य अवगाहना प्रमाण है। परन्तु आगे र लसे प्रमाणाकुलका ग्रहण करना । भावार्थ-जघन्य अवगाहनाके समान अङ्गुलके असंख्यातमे भाग जो जघन्य अवधिका क्षेत्र बताया है वह भी उत्सेपांडुलकी अपेक्षासे ही है 1 1 गोम्मटसारः। १४५ ऐसा समझना चाहिये क्यों कि परमागमका ऐसा नियम है कि शरीर गृह ग्राम नगर आदिके प्रमाण उत्सेधाङ्गुलसे ही लिये जाते है। परन्तु आगे अङ्गुलशब्दसे प्रमाणाङ्गुल लेना चाहिये। अवरोहिखेत्तमज्झे अवरोही अवरदवमवगमदि। तहवस्सवगाहो उस्सेहासंखघणपदरा ॥ ३८१ ॥ अवरावधिक्षेत्रमध्ये अवरावधिः अवरद्रव्यमवगच्छति । तद्रव्यस्थावगाहः उत्सेधासंख्यधनप्रतराः ॥ ३८१ ॥ अर्थ जघन्य अवधि अपने जघन्य क्षेत्रमें जितने जघन्य द्रव्य है उन सबको जानत है। उस द्रव्यका अवगाह उत्सेघाङ्गुलके असख्यातमे भागका धनप्रतर होता है। भावार्थ- "पद्यपि जघन्य अवधिके क्षेत्रसे जघन्य द्रव्यके अवगाह क्षेत्रका प्रमाण असख्यातगुणा हीन है, तथापि घनरूप उत्सेधाअग्लके असख्यातमे भागमात्र है । इसकी भुजा कोटी तथा वेधका प्रमाण सूच्यंगुलके असख्यातमे भाग है। आवलिअसंखभागं तीदभविस्संच कालदो अवरं । ओही जाणदि भावे कालअसंखेजभागं तु ॥ ३८२ ॥ आवल्यसंख्यभागमतीतभविष्यच्च कालतः अवरम् । अवधि: जानाति भावे कालासंख्यातभागं तु ॥ ३८२ ॥ अर्थ-जघन्य अवधि ज्ञान कालकी अपेक्षासे आवलीके असंख्यातमे भागप्रमाण द्रव्य- की व्यंजन पर्यायोंको जानता है । तथा जितनी पर्यायोंको कालकी अपेक्षासे जानता है उसके असंख्यातमे भागप्रमाण वर्तमान कालकी पर्यायोंको भावकी अपेक्षासे जानता है। इस प्रकार जघन्य देशावधि ज्ञानके विषयभूत द्रव्य क्षेत्र काल भावकी सीमाको बताकर द्रव्यादि चतुष्टयकी अपेक्षासे देशावधि ज्ञानके विकल्पोंका वर्णन करते है। अवरद्दवादुवरिमदववियप्पाय होदि धुवहारो। सिद्धाणंतिमभागो अभवसिद्धादर्णतगुणो ॥ ३८३ ॥ अवरद्रव्यादुपरिभद्रव्यविकल्पाय भवति ध्रुवहारः। सिद्धानन्तिमभागः अभव्यसिद्धादनन्तगुणः ॥ ३८३ ॥ अर्थ जघन्य द्रव्यके ऊपर द्रव्यके दूसरे भेद निकालनेके लिये ध्रुवहार होता है । इसका (ध्रुवहारका) प्रमाण सिद्धराशिसे अनन्तमे भाग और अमव्यराशिसे अनन्तगुणा है। अवधि ज्ञान के विषयमें समयप्रबद्धका प्रमाण बताते है । धुवहारकम्मवग्गणगुणगारं कम्मवग्गणं गुणिदे। समयपबद्धपमाणं जाणिजो ओहिविसयम्हि ॥ ३८४ ॥ . गो. १९
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
१४६
ध्रुवहारकार्मणवर्गणागुणकारं कार्मणवर्गणां गुणिते ।
समयप्रबद्धप्रमाणं ज्ञातव्यमवधिविषये ॥ ३८४ ॥
अर्थ-ध्रुवहाररूप कार्मण वर्गणाके गुणाकारका और कार्मण वर्गणाका परस्पर गुणा कर-
नेसे अवधि ज्ञानके विषयमें समयप्रवद्धका प्रमाण निकलता है।
ध्रुवहारका प्रमाण विशेषतासे बताते है।
मणदधवग्गणाण वियप्पाणंतिमसमं खु धुवहारो।
अवरकस्सविसेसा रूवाहिया तवियप्पा हु॥३८५ ॥
मनोरन्यवर्गणानां विकल्पानन्तिमसमं खलु ध्रुवहारः ।
अवरोत्कृष्टविशेषाः रूपाधिकास्तद्विकल्पा हि ॥ ३८५ ॥
अर्थ-मनोद्रव्य-वर्गणाके उत्कृष्ट प्रमाणमेंसे जघन्य प्रमाणके घटानेसे जो शेष र
उसमे एक मिलानेसे मनोव्य-वर्गणाके विकल्पोंका प्रमाण होता है। इन विकल्पोंका
जितना प्रमाण हो उसके अनन्त भागोंमेंसे एक भागकी वरावर अवधि ज्ञानके विषयभूत
द्रव्यके ध्रुवहारका प्रमाण होता है।
मनोद्रव्य-वर्गणाके जघन्य और उत्कृष्ट प्रमाणको बताते हैं।
अवरं होदि अणंतं अणंतभागेण अहियमुक्कस्सं ।
इदि मणभेदाणंतिमभागो दवम्मि धुवहारो ॥ ३८६ ॥
अवरं भवति अनन्तमनन्तभागेनाधिकमुत्कृष्टम् ।
इति मनोभेदानन्तिमभागो द्रव्ये ध्रुवहारः ॥ ३८६ ॥
अर्थ-मनोव्यवर्गणाका जघन्य प्रमाण अनन्त, इसमे इसीके (जघन्यके ) अन
भागोंमेंसे एक भाग मिलानेसे मनोवर्गणाका उत्कृष्ट प्रमाण होता है । इस प्रकार जितने
मनोवर्गणाके मेद हुए उसके अनन्त भागोंमसे एकभाग-प्रमाण अवधि ज्ञानके विषयभूत
द्रव्यके विषयमें ध्रुवहारका प्रमाण होता है।
प्रकारान्तरसे फिर भी ध्रुवहारका प्रमाण बताते हैं।
धुवहारस्स पमाणं सिद्धाणंतिमपमाणमेचं पि।
समयपवद्धणिमित्तं कम्मणवग्गणगुणादो दु॥ ३८७ ॥
होदि अणंतिमभागो तग्गुणगारो वि देसओहिस्स।
दोऊणदत्वमेदपमाणबुवहारसंवग्गो ॥ ३८८ ॥
ध्रुवहारस्य प्रमाणं सिद्धानन्तिमप्रमाणमात्रमपि ।
समयप्रवद्धनिमिचं कार्मणवर्गणागुणतस्तु ॥ ३८७ ।।
भवसनन्तिमभागस्तद्गुणकारो पि देशावधेः ।
ब्यूनद्रव्यभेदप्रमाणभुवहारसंवर्गः ॥ ३८८ ॥
. गोम्मटसारः। १४७ अर्थ-यद्यपि ध्रुवहारका प्रमाण सिद्धराशिके अनन्तमे भाग है, तथापि अवधि-ज्ञान- विषयक समयप्रवद्धका प्रमाण निकालनेके निमित्तभूत कार्मण वर्गणाके गुणकारसे अनन्तमे भाग समझना चाहिये । द्रव्यकी अपेक्षासे देशावधि ज्ञानके जितने भेद है उनमें दो कम करनेसे जो प्रमाण शेष रहे उसका ध्रुवहारप्रमाण परस्पर गुणा करनेसे कामण वर्गणाके गुणकारका प्रमाण निकलता है। देशावधि ज्ञानके द्रव्यकी अपेक्षा कितने भेद है यह बताते है। अंगुलअसंखगुणिदा खेत्तवियप्पा य दवभेदा हु। खेतवियप्पा अवरुक्कस्सविसेसं हवे एत्थ ॥ ३८९ ॥ अकुलासंख्यगुणिताः क्षेत्रविकल्पाश्च द्रव्यभेदा हि । क्षेत्रविकल्पा अवरोत्कृष्टविशेषो भवेदन ॥ ३८९ ॥ अर्थ-देशावधि ज्ञानके क्षेत्रकी अपेक्षा जितने भेद है उनको सूच्यंगुलके असंख्यातमे भागसे गुणा करनेपर, द्रव्यकी अपेक्षासे देशावधिके भेदोंका प्रमाण निकलता है। क्षेत्रकी अपेक्षा उत्कृष्ट प्रमाणमेंसे सर्व-जघन्य प्रमाणको घटाने और एक मिलानेसे जो प्रमाण शेष रहे उतने ही क्षेत्रकी अपेक्षासे देशावधिके विकल्प होते है। क्षेत्रकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट प्रमाण कितना है यह बताते है। अंगुलअसंखभागं अवरं उकस्सयं हवे लोगो। इदि वग्गणगुणगारो असंखधुवहारसंवग्गो ॥ ३९० ॥ अकुलासंख्यभागमवरमुत्कृष्टकं भवेल्लोकः । इति वर्गणागुणकारोऽसंख्यध्रुवहारसंवर्गः ॥ ३९० ॥ अर्थ-देशावधिका पूर्वोक्त लब्ध्यपर्याप्तककी जघन्य अवगाहनाप्रमाण, अर्थात् धनामुलके असंख्यातमे भागखरूप जो प्रमाण बताया है वही जघन्य क्षेत्रका प्रमाण है। सम्पूर्ण लोकप्रमाण उत्कृष्ट क्षेत्र है । इसलिये असख्यात ध्रुवहारोंका परस्पर गुणा करनेसे कार्मण वर्गणाका गुणकार निष्पन्न होता है। वर्गणाका प्रमाण बताते हैं। वग्गणरासिपमाणं सिद्धाणंतिमपमाणमत्तं पि। दुगसहियपरमभेदपमाणवहाराण संवग्गो ॥ ३९१ ॥ वर्गणाराशिप्रमाणं सिद्धानन्तिमप्रमाणमात्रमपि । द्विकसहितपरमभेदप्रमाणावहाराणां संवर्गः॥३९१ ॥ अर्थ-कामण वर्गणाका प्रमाण यद्यपि सिद्धराशिके अनन्तमे भाग है; तथापि परमाव- १ध्रुवहारका जितना प्रमाण है उतनी वार ।
. १४८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । पिके भेदोंमें दो मिलानेसे जो प्रमाण हो उतनी जगह ध्रुवहार रखकर परस्पर गुणा करनेते लब्धराशिप्रमाण कार्मण वर्गणाका प्रमाण होता है। परमावधिके कितने भेद है यह बताते हैं। परमावहिस्स भेदा सगओगाहणवियप्पहदतेक। इदि धुवहारं वग्गणगुणगारं वग्गणं जाणे ॥ ३९२ ॥ परमावधेर्भेदाः खकावगाहनविकल्पहततेजसः । इति ध्रुवहारं वर्गणागुणकारं वर्गणां जानीहि ॥ ३९२ ।। अर्थ तेजस्कायिक जीवोंकी अवगाहनाके जितने विकल्प है उसका और तेजस्का- यिक जीवराशिका परस्पर गुणा करनेसे जो राशि लब्ध आवे उतना ही परमावधि ज्ञानक द्रव्यकी अपेक्षासे भेदोंका प्रमाण होता है । इस प्रकार ध्रुवहार, वर्गाणाका गुणकार, और वर्गणाका खरूप समझना चाहिये। देसोहिअवरदवं धुवहारेणवहिदे हवे विदियं । तदियादिवियप्पेसु वि असंखवारोत्ति एस कमो ॥ ३९३ ॥ देशावध्यवरद्धव्यं भुवहारणावहिते भवेत् द्वितीयम् । तृतीयादिविकल्पेष्वपि असंख्यवार इत्येषः क्रमः ॥ ३९३ ॥ अर्थ-देशावधि ज्ञानके जघन्य द्रव्यका जो प्रमाण पहले बताया है उसमें ध्रुवहारका एक वार भाग देनेसे देशावधिके दूसरे विकल्पके द्रव्यका प्रमाण निकलता है। दूसरे विक- ल्पके द्रव्यमें ध्रुवहारका एक वार भाग देनेसे तीसरे विकल्पके द्रव्यका और तीसरे विक- पके द्रव्यमें ध्रुवहारका भाग देनेसे चौथे विकल्पके द्रव्यका प्रमाण निकलता है । इसी तरह आगेके विकल्पोंके द्रव्यका प्रमाण निकालनेकेलिये क्रमसे असंख्यात वार ध्रुवहारका भाग देना चाहिये। देसोहिमज्झभेदे सविस्ससोवचयतेजकम्मंग तेजोमासमणाणं वग्गणयं केवलं जत्थ ॥ ३९४ ॥ पस्सदि ओही तत्थ असंखेजाओ हवंति दीउवही। वासाणि असंखेजा होति असंखेजगुणिदकमा ॥ ३९५ ॥ दशावधिमध्येभेदे सविस्रसोपचयतेजःकर्माङ्गम् । तेजोभाषामनसां वर्गणां केवलां यत्र ॥ ३९४ ॥ पश्यत्यवधिस्तत्र असंख्येया भवन्ति द्वीपोदधयः । वर्षाणि असंख्यातानि भवन्ति असंख्यातगुणितक्रमाणि ॥ ३९५ ।। MAR ..
गोम्मटसारः। १४९ अर्थ-इस प्रकार असख्यात वार ध्रुवहारका भाग देते २ देशावविज्ञानके मध्य मेदोंमेंसे जहां पर प्रथम भेद विससोपचयसहित तैजस शरीरको विषय करता है, अथवा इसके आगेका दूसरा मध्यभेद विससोपचयसहित कार्मण शरीरको विषय करता है, अथवा तीसरा भेद विखसोपचयरहित तैजस वर्गणाको विषय करता है, अथवा चौथा भेद विससोपचय- रहित भाषा वर्गणाको विषय करता है, अथवा पांचमा भेद विससोपचयरिहत मनोबर्ग- णाको विषय करता है, वहां पर सामान्यसे देशावधिके उक्त पांचो ही मध्य भेदोंके क्षेत्रका प्रमाण असख्यात द्वीपसमुद्र और कालका प्रमाण असल्यात वर्ष है। परन्तु विशेषताकी अपेक्षासे पूर्व २ भेदके क्षेत्र और कालके प्रमाणसे उत्तरोत्तर भेदके क्षेत्र और कालका प्रमाण असख्यातगुणा असख्यातगुणा है; क्योंकि असख्यातके भी असंख्यात भेद होते है। तत्तो कम्मइयस्सिगिसमयपबद्धं विविस्ससोपचयं । धुवहारस्स विभजं सबोही जाव ताव हवे ॥ ३९६ ॥ ततः कार्मणस्य एकसमयप्रवद्धं विविखसोपचयम् । ध्रुवहारस्य विभाज्यं सर्वावधिः यावत् तावत् भवेत् ॥ ३९६ ॥ अर्थ-इसके अनन्तर मनोवर्गणामें ध्रुवहारका भाग देना चाहिये । इस तरह भाग देते २ विलसोपचयरहित कार्मणके एक समयमबद्धको विपय करता है। उक्त क्रमानुसार इसमें भी सर्वावधिक विषयपर्यन्त ध्रुवहारका भाग देते जाना चाहिये । एदम्हि विभजते दुचरिमदेसावहिम्मि वग्गणयं । चरिमे कम्मइयस्सिगिवग्गणमिगिवारभजिदं तु ॥ ३९७ ॥ एतस्मिन् विभज्यमाने द्विचरमदेशावधौ वर्गणा । चरमे कार्मणस्यैकवर्गणा एकवारभत्ता तु ॥ ३९७ ॥ अर्थ-इस समयप्रबद्धमें भी ध्रुवहारका भाग. देनेसे देशावधि ज्ञानके द्विचरम भेदके विषयभूत द्रव्यका कार्मण वर्गणारूप प्रमाण निकलता है। इस एक कार्मण, वर्गणामें भी एक- वार ध्रुवहारका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना देशावधिके चरम भेदके विषयभूत द्रव्यका प्रमाण निकलता है। अंगुलअसंखभागे दववियप्पे गदे दुखेतम्हि । एगागासपदेसो वहृदि संपुण्णलोगोति ॥ ३९८ ॥ अकुलासंख्यभागे द्रव्यविकल्पे गते तु क्षेत्रे । एकाकाशप्रदेशो वर्धते संपूर्ण लोक इति ॥ ३९८ ॥ अर्थ-सूच्यंगुलके असंख्यातमे भाग प्रमाण जब द्रव्यके विकल्स होजॉय तब क्षेत्रकी .
१५० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अपेक्षा एक आकाशका प्रदेश बढता है । इस ही क्रमसे एक २ आकाशके प्रदेशकी वृद्धि वहांतक करनी चाहिये कि जहां तक देशावधिका उत्कृष्ट क्षेत्र सर्वलोक हो जाय। आवलिअसंखभागो जहण्णकालो कमेण समयेण। वड्ढदि देसोहिवरं पलं समऊणयं जाव ॥ ३९९ ॥ आवल्यसंख्यभागो जघन्यकालः क्रमेण समयेन । वर्धते देशावधिवरं पल्यं समयोनकं यावत् ॥ ३९९ ॥ अर्थ जघन्य देशावधिक विषयभूत कालका प्रमाण आवलीका असंख्यातमा भाग है। इसके ऊपर उत्कृष्ट देशावधिक विषयभूत एक समय कम एक पल्यप्रमाण काल पर्यन्त, ध्रुव तथा अध्रुव वृद्धिरूप क्रमसे एक एक समयकी वृद्धि होती है। उक्त दोनों क्रमोंको उन्नीस काण्डकों में कहनेकी इच्छासे आचार्य पहले प्रथम काण्डकमें उनका ढाई गाथाओंद्वारा वर्णन करते है। अंगुलअसंखभागं धुवरूवेण य असंखवारं तु । असंखसंखं भागं असंखवारं तु अद्धवगे ॥४०॥ अङ्गुलासंख्यभागं ध्रुवरूपेण च असंख्यवारं तु । असंख्यसंख्य भागमसंख्यवारं तु अध्रुवगे॥४००॥ अर्थ-प्रथम काण्डकमें चरम विकल्पपर्यन्त असंख्यात वार घनाङ्गुलके असंख्यातमे भागप्रमाण ध्रुव वृद्धि होती है। और इस ही काण्डकके अन्त पर्यन्त धनाङ्गुलके असंख्यातमे और संख्यातमे भाग प्रमाण ध्रुव वृद्धि भी असख्यात वार होती है। धुवअडवरूवेण य अवरे खेचम्हि वड्डिदे खेत्ते। अवरे कालम्हि पुणो एकेक वडदे समयं ॥४०१॥ ध्रुवावरूपेण च अवरे क्षेत्रे वर्द्धिते क्षेत्रे । अवरे काले पुनः एकैको वर्धते समयः ॥ ४०१॥ अर्थ-जघन्य देशावधिके विषयभूत क्षेत्रके ऊपर धुवरूपसे अथवा अधुवरूपसे क्षेत्रकी वृद्धि होनेपर जघन्य कालके ऊपर एक एक समयकी वृद्धि होती है संखातीदा समया पढमे पचम्मि उभयदो वड्डी। खेतं कालं अस्सिय पढमादी कंडये वोच्छं ॥१०२॥ संख्यातीताः समयाः प्रथमे पर्वे उभयतो वृद्धिः। क्षेत्रं कालमाश्रित्य प्रथमादीनि काण्डकानि वक्ष्ये॥४०२॥ अर्थ-प्रथम काण्डकमें ध्रुवरूपसे और अध्रुवरूपसे असंख्यात समयकी वृद्धि होती है। इसके आगे प्रथमादि काण्डकोंका क्षेत्र और कालके आश्रयसे वर्णन करते है। - गोम्मटसारः। १५१ अंगुलमावलियाए भागमसंखेजदोवि संखेजो। अंगुलमावलियंतो आवलियं चांगुलपुत् ॥ ४०३ ॥ अङ्गुलावल्योः भागोऽसंख्येयोऽपि संख्येयः । अङ्गुलमावल्यन्त आवलिकश्वाङ्गुलपृथक्त्वम् ॥ ४०३ ॥ अर्थ-प्रथम काण्डकमे जघन्य क्षेत्रका प्रमाण धनाङ्गुलके असंख्यातमे मागप्रमाण, और उत्कृष्ट क्षेत्रका प्रमाण घनामुलके सख्यातमे भाग प्रमाण है। और जघन्य कालका प्रमाण आवलीका असख्यातमा भाग, तथा उत्कृष्ट कालका प्रमाण आवलीका संख्यातमा भाग है। दूसरे काण्डकमें क्षेत्र घनाङ्गुलप्रमाण और काल कुछ कम एक आवली प्रमाण है। "तीसरे काण्डकमें क्षेत्र धनाङ्गुल-पृथक्त्व और काल आवली-पृथक्त्व-प्रमाण है। आवलियपुधत्तं पुण हत्थं तह गाउयं मुहत्तं तु । जोयणभिण्णमुहत्तं दिवसंतो पण्णुवीसं तु ॥४०४॥ आवलिपृथक्त्वं पुनः हस्तस्तथा गव्यूतिः मुहूर्तस्तु । योजनं भिन्नमुहूर्त:दिवसान्तः पञ्चविंशतिस्तु ॥ ४०४ ॥ अर्थ-चतुर्थ काण्डकमें काल आवलीपृथक्त्व और क्षेत्र हस्तप्रमाण है । पाचमे काण्ड- कम क्षेत्र एक कोश और काल अन्तर्मुहूर्त है । छठे काण्डकमें क्षेत्र एक योजन और काल मिनमुहूर्त है। सातमे काण्डकमें काल कुछ कम एक दिन और क्षेत्र पचीस योजन है। भरहम्मि अद्धमासं साहियमासं च जम्वुदीवम्मि । वासंच मणुवलोए वासपुधत्तं च रुचगम्मि ॥ ४०५ ॥ भरते अर्धमासः साधिकमासश्च जम्बूद्वीपे । वर्पश्च मनुजलोके वर्षपृथक्त्वं च रुचके ।। ४०५॥ अर्थ-आठमे काण्डकमें क्षेत्र भरतक्षेत्र प्रमाण और काल अर्धमास (पक्ष ) प्रमाण है। नौमे काण्डकमें क्षेत्र जम्बूद्वीप प्रमाण और काल एक माससे कुछ अधिक है । दशमे काण्डकमें क्षेत्र मनुष्यलोक प्रमाण और काल एक वर्षप्रमाण है । ग्यारहमे काण्डकमें क्षेत्र रुचक द्वीप और काल वर्षपृथक्त्वप्रमाण है। संखेजपमे वासे दीवसमुद्दा हवंति संखेजा। वासम्मि असंखेजे दीवसमुद्दा असंखेज्जा ॥ ४०६ ॥ संख्यातप्रमे वर्षे द्वीपसमुद्रा भवन्ति संख्याताः । वर्षे असंख्येये द्वीपसमुद्रा असंख्येयाः ॥ ४०६ ॥ १ वीनसे नौ तककी संख्याको पृयकृत्व कहते हैं।
K १५२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। अर्थ-बारहमे काण्डको संख्यात वर्ष प्रमाण काल और संख्यात द्वीपसमुद्रप्रमाण क्षेत्र है। इसके आगे तेरहमे से लेकर उन्नीसमे काण्डक पर्यन्त असंख्यात वर्ष-प्रमाण काल और असंख्यात द्वीपसमुद्र-प्रमाण क्षेत्र है। कालविसेसेणवहिदखेत्तविसेसो धुवा हवे वड्डी। अदुववडीवि पुणो अविरुद्धं इटकंडम्मि ॥ ४०७ ॥ कालविशेषेणावहितक्षेत्र विशेषो ध्रुवा भवेत् वृद्धिः । अध्रुववृद्धिरपि पुनः अविरुद्धा इष्टकाण्डे ॥ ४०७ ॥ अर्थ-किसी विवक्षित काण्डकके क्षेत्रविशेषमें कालविशेषका भाग देनेसे जो शेष रहे उतना ध्रुव वृद्धिका प्रमाण है । इस ही तरह अविरोधरूपसे इष्ट काण्डकमें अध्रुव वृद्धिका भी प्रमाण समझना चाहिये । इस अनुव वृद्धिका क्रम आगेके गाथामें कहेंगे। भावार्थ- विवक्षित काण्डकके उत्कृष्ट क्षेत्रप्रमाणसे जघन्य क्षेत्रप्रमाणको घटाने पर जो शेष रहे उसको क्षेत्रविशेष कहते है। और उत्कृष्ट कालके प्रमाणमेसेजघन्य कालके प्रमाणको घटानेपर जो शेष रहे उसको कालविशेष कहते है। किसी विवक्षित क्षेत्र विशेषमें उसके कालविशे- पका भाग देनेसे जो प्रमाण शेष रहे उतना ध्रुव वृद्धिका प्रमाण है । तथा अध्रुव वृद्धिका क्रम किसी भी विवक्षित काण्डकमें अविरोधकरके सिद्ध करना चाहिये। अभुव वृद्धिका क्रम बताते है। अंगुलअसंखमार्ग संखं वा अंगुलं च तस्सेव । संखमसंखं एवं सेढीपदरस्स अद्धवगे ॥ ४०८ ॥ अंगुलासंख्यभागः संख्यं वा अङ्गुलं तस्यैव संख्यमसंख्यमेवं श्रेणीप्रतरयोः अध्रुवगायाम् ॥ ४०८॥ अर्थ-घनामुलके असंख्यातमे भागप्रमाण, वा धनाङ्गुलके सख्यातमे भागप्रमाण, वा घनाङ्गुलमात्र, वा संख्यात घनाङ्गुलमात्र, वा असंख्यात धनाङ्गुलमात्र, वा श्रेणीके असंख्यातमे भागप्रमाण, वा श्रेणीके संख्यातमे भागप्रमाण, वा श्रेणीप्रमाण, वा संख्यात श्रेणीप्रमाण, वा असंख्यात श्रेणीप्रमाण, वा प्रतरके असंख्यातमे भाग-प्रमाण, वा प्रतरके संख्यातमे भाग- प्रमाण, वा प्रतरप्रमाण, वा संख्यात प्रतर-प्रमाण, वा असंख्यात प्रतर-प्रमाण प्रदेशोंकी वृद्धि होने पर एक एक समयकी वृद्धि होती है। यही अधुव वृद्धिका क्रम है। भावार्थ- जहां पर जितने प्रकारकी वृद्धियोंका होना सम्भव हो, वहां पर उतने प्रकारकी वृद्धियों- मेंसे कभी किसी प्रकारकी और कभी किसी प्रकारकी प्रदेश वृद्धिके होने पर एक एक समयकी वृद्धिका होना यही अध्रुव वृद्धिका क्रम है।
गोम्मटसार। १५३ उत्कृष्ट देशावधिक विषयभूत द्रव्य क्षेत्र काल भावका प्रमाण बताते हैं। कम्मइयवग्गणं धुवहारेणिगिवारभाजिदे दई। उक्कस्सं खेत्त्रं पुण लोगो संपुषणओ होदि ॥४०९ ॥ कार्मणवर्गणां ध्रुवहारेणैकवारभाजिते द्रव्यम् । उत्कृष्टं क्षेत्रं पुनः लोकः संपूर्णो भवति ॥ ४०९ ॥ अर्थ-कामण वर्गणामें एकवार ध्रुवहारका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना देशाव- धिके उत्कृष्ट द्रव्यका प्रमाण है । तथा सम्पूर्ण लोक उत्कृष्ट क्षेत्रका प्रमाण है। पल्लसमऊण काले भावेण असंखलोगमेता हु। दवस्स य पजाया वरदेसोहिस्स विसया हु॥ ४१० ॥ पल्यं समयोनं काले भावेनासंख्यलोकमात्रा हि। द्रव्यस्य च पर्याया वरदेशावधेविषया हि ॥ ४१०॥ अर्थ-कालकी अपेक्षा एक समय कम एक पल्य, और भावकी अपेक्षा असंख्यात- लोकप्रमाण द्रव्यकी पर्याय उत्कृष्ट देशावधिका विषय है । भावार्थ-काल और भाव शब्दके द्वारा द्रव्यकी पर्यायोंका ग्रहण किया जाता है। इसलिये कालकी अपेक्षा एक समय कम पल्य-प्रमाण और भावकी अपेक्षा असंख्यातलोकप्रमाण द्रव्यकी पर्यायोंको उत्कृष्ट दिशावधि ज्ञान विषय करता है। काले चउण्ण उड्डी कालो भजिदछ खेत्तउड्डी य। उड्डीए दवपज्जय भजिदघा खेत्तकाला हु ॥ ११ ॥ काले चतुणा वृद्धिः कालो भजितव्यः क्षेत्रवृद्धिश्च । वृद्ध्या द्रव्यपर्याययोः भजितव्यो क्षेत्रकालौ हि ॥ ४११ ॥ अर्थ-कालकी वृद्धि होने पर चारो प्रकारकी वृद्धि होती है । क्षेत्रकी वृद्धि होने पर कालकी वृद्धि होती भी है और नहीं भी होती है । इस ही तरह द्रव्य और भावकी अपेक्षा वृद्धि होने पर क्षेत्र और कालकी वृद्धि होती भी है और नहीं भी होती है। परन्तु क्षेत्र और कालकी वृद्धि होने पर द्रव्य और भावकी वृद्धि अवश्य होती है। देशावधिका निरूपण समाप्त हुआ, अतः क्रमप्राप्त परमावधिका निरूपण करते है। देसावहिवरदवं धुवहारेणवहिदे हवे णियमा। परमावहिस्स अवरं दवपमाणं तु जिणदितुम् ॥ ४१२ ॥ देशावधिवरद्रव्यं ध्रुवहारेणावहिते भवेत् नियमात् । परमाधेरवरं द्रव्यप्रमाणं तु जिनदिष्टम् ॥ ४१२ ।। गो. २०
रायचन्द्रजैनशानमालायाम् ।
१५४
अर्थ-देशावधिका जो उत्कृष्ट द्रव्य-प्रमाण है उसमें ध्रुवहारका भाग देनेसे नियमसे
परमावधिके जघन्य व्यका प्रमाण निकलता है ऐसा जिनेन्द्र देवने कहा है।
परमावधिके उत्कृष्ट द्रव्यका प्रमाण बताते है ।
परमावहिस्स भेदा सगउग्गाहणवियप्पहदतेऊ ।
चरमे हारपमाणं जेस्स य होदि दव्यं तु॥ ४१३ ॥
परमावधेर्भेदाः स्वकावगाहनविकल्पहततेजाः ।
चरमे हारप्रमाणं ज्येष्ठस्य च भवति द्रव्यं तु ॥ ४१३ ॥
अर्थ-अपनी ( तेजस्कायिक जीवराशि ) अवगाहनाके भेदोंका जो प्रमाण है, उसका
तेजस्कायिक जीवराशिके साथ गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो उतने ही परमावर
धिके भेद है । इनमेंसे सर्वोत्कृष्ट अन्तिम भेदमें द्रव्य ध्रुवहारप्रमाण होता है
सवावहिस्स एको परमाणू होदि णिवियप्पो सो।
गंगामहाणइस्स पवाहोच धुवो हवे हारो॥ ४१४ ॥
सर्वावधेरेकः परमाणुर्भवति निर्विकल्पः सः।
गंगामहानद्याः प्रवाह इव ध्रुवो भवेत् हारः ॥ ४१४ ॥
अर्थ-परमावधिक उत्कृष्ट द्रव्यप्रमाणमें ध्रुवहारका एकवार भाग देनेसे लब्ध एक
परमाणु-मात्र द्रव्य सर्वावधिका विषय होता है। यह ज्ञान तथा इसका विषयभूत परमाणु
निर्विकल्पक है । भागहार गंगा महानदीके प्रवाहकी तरह ध्रुव है। भावार्थ-जिसतरह
गंगा महानदीका प्रवाह हिमाचलसे निकलकर अविच्छिन्न प्रवाहके द्वारा वहता हुआ
पूर्व समुद्र में जाकर अवस्थित होगया है। उसी तरह यह भागहार जघन्य देशावधि द्रव्य-
प्रमाणसे आगे परमावधिके सर्वोत्कृष्ट द्रव्यपर्यन्त अविच्छिन्न रूपसे जाते २ परमाणुपर
जाकर अवस्थित होगया है।
परमोहिदधभेदा जेत्तियमेत्ता हु तेत्तिया होति ।
तस्सेव खेत्तकालवियप्पा विसया असंखगुणिदकमा ।।-४१५ ॥
परमावधिद्रव्यभेदा यावन्माना हि तावन्मात्रा भवन्ति ।
तस्यैव क्षेत्रकालविकल्या विषया असंख्यगुणितक्रमाः ।। ४१५ ।।
अर्थ-परमावधिके जितने द्रव्यकी अपेक्षासे भेद है उतने ही भेद क्षेत्र और कालकी
अपेक्षासे है । परन्तु उनका विषय असख्यातगुणितक्रम है।
असल्यावगुणितक्रम किस तरहसे है यह बताते है।
आवलिअसंखभागा इच्छिदगच्छधणमाणमेत्ताओ।
देसावहिस्स खेत्ते काले वि य होति संवग्गे ॥ ४१६ ॥
गोम्मटसारः। १५५ आवल्यसंख्यभागा इच्छितगच्छधनमानमात्राः । देशावधेः क्षेत्रे कालेऽपि च भवन्ति संवर्गे ॥ ४१६ ॥ अर्थ-किसी भी परमावधिके विवक्षित विकल्पमें अथवा विवक्षित कालके विकल्पमें संकल्पित धनका जितना प्रमाण हो उतनी जगह आवलीके असख्यातमे भागोंको रखकर परस्पर गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो वही देशावधिके उत्कृष्ट क्षेत्र और उत्कृष्ट कालमें गुणकारका प्रमाण होता है । भावार्थ-परमावधिके प्रथम विकल्पमें सकल्पित धनका प्रमाण एक और दूसरे विकल्पमें तीन तथा तीसरे विकल्पमें छह चौथे विकल्पमें दश पांचमे विकल्पमें पन्द्रह छठे विकल्पमें इक्कीस सातमे विकल्पमें अट्ठाईस होता है । इसी तरह आगे भी सकल्पित धनका प्रमाण समझना चाहिये । परमावधिके जिस विकल्पके क्षेत्र या कालका प्रमाण निकालना हो, उस विकल्पके संकल्पित धनके प्रमाणकी बराबर आवलीके असंख्यातमे भागोंको रखकर परस्पर गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो, उसका देशावधिके उत्कृष्ट क्षेत्र और उत्कृष्ट कालके प्रमाणके साथ गुणा करनेसे परमावधिक विवक्षित विकल्पके क्षेत्र और कालका प्रमाण निकलता है । जितनेमा भेद विवक्षित हो वहां पर्यन्त एकसे लेकर एक एक अधिक अङ्क रखकर सबको जोड़नेसे जो राशि उत्पन्न हो वह उस विवक्षित भेदका सकल्पित धन होता है। जैसे प्रथम भेदका एक, दूसरे भेदका तीन, तीसरे भेदका छह, इत्यादि । प्रकारान्तरसे गुणकारका प्रमाण बताते है। गच्छसमा तत्कालियतीदे रूऊणगच्छधणमेता। उभये वि य गच्छस्स य धणमेत्ता होति गुणगारा ॥ ४१७ ॥ गच्छसमांः तात्कालिकातीते रूपोनगच्छधनमात्राः । उभयेऽपि च गच्छस्य च धनमात्रा भवन्ति गुणकाराः ॥ ४१७ ॥ अर्थ-विवक्षित गच्छकी जो सख्या हो उतने प्रमाणको विवक्षित गच्छसे अव्यव- हित पूर्वके गच्छके प्रमाणमें मिला कर एक कम करनेसे जो राशि उत्पन्न हो उसमें विवक्षित गच्छकी संख्या मिलानेसे सकल्पित धनका प्रमाण होता है । यही गुणकारका प्रमाण है। भावार्थ-जैसे चौथा भेद विवक्षित है, तो गच्छके प्रमाण चारको अव्यवहित पूर्वके भेद तीनमें मिलाकर एक कम करनेसे छह होते हैं, इसमें विवक्षित गच्छके प्रमाण चारको मिलानेसे दश होते है, यही गुणकारका प्रमाण है। तथा विवक्षित भेदका सकल्पितधन है। परमावहिवरखेत्तेणवहिदउकस्सओहिखेत्तं तु । सचावहिगुणगारो काले वि असंखलोगो दु॥ ४१८ ॥ १ यही तीसरे भेदका सकल्पितधन है। .
१५६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
परमावधिवरक्षेत्रेणावहितोत्कृष्टावधिक्षेत्रं तु ।
सर्वावधिगुणकारः कालेऽपि असंख्यलोकस्तु ॥ ४१८ ।।
अर्थ-उत्कृष्ट अवधि ज्ञानके क्षेत्रमें परमावधिके उत्कृष्ट क्षेत्रका भाग देनेसे जो लब्ध
आवे उतना सर्वावधिसम्बन्धी क्षेत्रकेलिये गुणकार है । तथा सर्वावधिसम्बन्धी कालका
प्रमाण लानेके लिये असंख्यात लोकका गुणकार है । भावार्थ-असंख्यात लोकके प्रमाणको
पांचवार लोकके प्रमाणसे गुणा करने पर जो राशि उत्पन्न हो उतना सर्वावधि ज्ञानके
उत्कृष्ट क्षेत्रका प्रमाण है । इसमें परमावधिके उत्कृष्ट क्षेत्रका भाग देनेसे सर्वावधिके क्षेत्र-
सम्बन्धी गुणकारका प्रमाण निकलता है। अर्थात् इस गुणकारका परमावधिके उत्कृष्ट क्षेत्र-
प्रमाणके साथ गुणा करनेसे सर्वावधिके क्षेत्रका प्रमाण निकलता है। और इस ही तरह
सर्वावधिके कालका प्रमाण निकालनेकेलिये असंख्यात लोकका गुणकार है । अर्थात् अस।
ख्यातलोकका परमावधिके उत्कृष्ट कालप्रमाणके साथ गुणा करनेसे सर्वावधिके कालका
प्रमाण निकलता है।
परमावधिक विषयभूत उत्कृष्ट क्षेत्र और उत्कृष्ट कालका प्रमाण निकालनेकेलिये दो
करणसूत्रोंको कहते है।
इच्छिदरासिच्छेदं दिण्णच्छेदेहिं भाजिदे तत्थ ।
लद्धमिददिण्णरासीणब्भासे इच्छिदो रासी ॥४१९ ॥
इच्छितराशिच्छेदं देयच्छेदैर्भाजिते तत्र ।
लव्धमितदेयराशीनामभ्यासे इच्छितो राशिः ॥ ४१९॥
अर्थ-विवक्षित राशिके अर्धच्छेदोंमें देय राशिके अर्घच्छेदोंका भाग देनेसे जो लब्ध
आवे उतनी जगह देयराशिको रखकर परस्पर गुणा करनेसे विवक्षित राशिका प्रमाण
निकलता है।
दिण्णच्छेदेणवहिदलोगच्छेदेण पदधणे भजिदे ।
लद्धमिदलोगगुणणं परमावहिचरिमगुणगारो ॥ ४२० ॥
देयच्छेदेनावहितलोकच्छेदेन पदधने भजिते ।
लव्धमितलोकगुणनं परमावधिचरमगुणकारः ॥ ४२० ॥
अर्थ-देयराशिके अर्धच्छेदोंका लोकके अर्धच्छेदोंमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे
उसका विवक्षित संकल्पित धनमें भाग देनेसे जो प्रमाण लब्ध आवे उतनी जगह लोकप्रमा-
णको रखकर परस्पर गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो वह विवक्षित पदमें क्षेत्र या कालका
गुणकार होता है। ऐसे ही परमावधिके अन्तिम भेदमें भी गुणकार जानना ।
आवलिअसंखभागा जहण्णदबस्स होति पज्जाया।
कालस्स जहण्णादो असंखगुणहीणमेत्ता हु॥४२१ ॥
गोम्मटसारः। १५७ आवल्यसंख्यभागा जघन्यद्रव्यस्य भवन्ति पर्यायाः। कालस्य जघन्यतः असंख्यगुणहीनमात्रा हि ॥ ४२१ ॥ अर्थ जघन्य देशावधिक विषयभूत द्रव्यकी पर्याय आवलीके असंख्यातमे भागप्र- माण है । और जघन्य देशावधिक विषयभूत कालका जितना प्रमाण है उससे असंख्यात- गुणा हीन जघन्य देशावधिक विषयभूत भावका प्रमाण है। सबोहित्ति य कमसो आवलिअसंखभागगुणिदकमा । दवाणं भावाणं पदसंखा सरिसगा होंति ॥ ४२२ ॥ सर्वावधिरिति च क्रमशः आवल्यसंख्यभागगुणितक्रमाः। द्रव्यानां भावानां पदसंख्याः सदृशकाः भवन्ति ॥ ४२२ ॥ अर्थ-देशावधिक जघन्य द्रव्यकी पर्यायरूप भाव, जघन्य देशावपिसे सर्वावधिपर्यन्त आवलीके असंख्यातमे भागसे गुणितक्रम है । अत एव द्रव्य तथा भावके पदोंकी सख्या सदृश है । भावार्थ-जहा पर देशावधिक विषयभूत द्रव्यकी अपेक्षा जघन्य भेद है वहा पर भावकी अपेक्षा भी आवलीके असख्यातमे भाग प्रमाण जघन्य भेद होता है। और जहां पर द्रव्यकी अपेक्षा दूसरा भेद होता है, वहां भावकी अपेक्षा भी प्रथम भेदसे आव- लीके असख्यातमे भागगुणा दूसरा भेद होता है। जहां पर द्रव्यकी अपेक्षा तीसरा भेद होता है वहा पर भावकी अपेक्षा दूसरे भेदसे आवलीके असख्यातमे भागगुणा तीसरा भेद होता है । इस ही क्रमसे सर्वावधिपर्यन्त जानना । अवधि ज्ञानके द्रव्यकी अपेक्षासे जितने भेद है उतने ही भेद भावकी अपेक्षासे है । अत एव द्रव्य तथा भावकी पद- सख्या सहश है। नरक गतिमें अवधिक विषयभूत क्षेत्रका प्रमाण बताते हैं। सत्तमखिदिम्मि कोसं कोसस्सद्धं पवढदे ताव । जाव य पढमे णिरये जोयणमेकं हवे पुणं ॥ ४२३॥ सप्तमक्षितौ कोशं क्रोशस्यार्धाध प्रवर्धते तावत् । यावच प्रथमे निरये योजनमेकं भवेत् पूर्णम् ॥ ४२३ ॥ अर्थ-सातमी भूमिमें अवधि ज्ञानके विषयभूत क्षेत्रका प्रमाण एक कोस है। इसके ऊपर आध २ कोस की वृद्धि तव तक होती है जब तक कि प्रथम नरकमे अवधि ज्ञानके विषयभूत क्षेत्रका प्रमाण पूर्ण एक योजन हो । भावार्थ-सातमी पृथ्वीमें अवधिका क्षेत्र एक कोस है । इसके ऊपर प्रथम भूमिके अवधि-क्षेत्र पर्यन्त क्रमसे आध २ कोसकी वृद्धि होती है। प्रथम भूमिमे अवधि-क्षेत्रका प्रमाण एक योजन है। तिर्यग्गति और मनुष्यगतिमें अवधिको बताते है ।
१५८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । तिरिये अवरं ओपो तेजोयंते य होदि उकस्सं । मणुए ओघं देवे जहाकम सुणह वोच्छामि ॥ ४२४ ॥ तिरश्चि अवरमोघः तेजोऽन्ते च भवति उत्कृष्टम् । मनुजे ओघः देवे यथाक्रम शृणुत वक्ष्यामि ॥ ४२४ ।। अर्थ-तिर्यञ्चोंके अवधि ज्ञान जघन्य देशावधिसे लेकर उत्कृष्टताकी अपेक्षा उस भेदपर्यन्त होता है कि जो देशावधिका भेद तैजस शरीरको विषय करता है। मनुष्य गतिमें अवधि ज्ञान जघन्य देशावधिसे लेकर उत्कृष्टतया सर्वावधिपर्यन्त होता है। देवगतिमें अवधि ज्ञानको यथाक्रमसे कहूंगा सो सुनो। प्रतिज्ञाके अनुसार देवगतिमें अवधिके क्षेत्रादिका वर्णन करते हैं। पणुवीसजोयणाई दिवसंतं च य कुमारभोम्माणं । संखेजगुणं खेतं बहुगं कालं तु जोइसिगे ॥ २५ ॥ पञ्चविंशतियोजनानि दिवसान्तं च च कुमारभौमयोः। संख्यातगुणं क्षेत्रं बहुकः कालस्तु ज्योतिष्क ।। ४२५ ॥ अर्थ-भवनवासी और व्यन्तरोकी अवधिके क्षेत्रका जघन्य प्रमाण पच्चीस योजन और जघन्य काल कुछ कम एक दिन है। और ज्योतिषी देवोंकी अवधिका क्षेत्र इससे संख्यातगुणा है और काल इससे बहुत अधिक है। असुराणमसंखेजा कोडीओ सेसजोइसंताणं । संखातीदसहस्सा उक्कस्सोहीण विसओ दु॥४२६ ॥ असुराणामसंख्येयाः कोट्यः शेषज्योतिष्कान्तानाम् । संख्यातीतसहस्रा उत्कृष्टावधीनां विषयस्तु ॥ ४२६ ॥ अर्थ-असुरकुमारोंकी अवधिका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र असंख्यात कोटि योजन है। शेष नौ प्रकारके भवनवासी तथा व्यन्तर और ज्योतिषी इनकी अवधिका उत्कृष्ट विषयक्षेत्र असंख्यात हजार योजन है। असुराणमसंखेजा वस्सा पुण सेसजोइसंताणं । तस्संखेजदिमागं कालेण य होदि णियमेण ॥ ४२७॥ असुराणामसंख्येयानि वर्षाणि पुनः शेषज्योतिष्कान्तानाम् । तत्संख्यातभागं कालेन च भवति नियमेन ॥ ४२७ ॥ अर्थ-असुरकुमारोंकी अवधिक उत्कृष्ट कालका प्रमाण असंख्यात वर्ष है। और शेष नौ प्रकारके भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी इनकी अवधिके उत्कृष्ट कालका प्रमाण असुरोंकी अवधिक उत्कृष्ट कालके प्रमाणसे नियमसे संख्यातमे भागमात्र है। .
गोम्मटसारः। १५९ भवणतियाणमधोधो थोवं तिरियेण होदि बहुगं तु । उडेण भवणवासी सुरगिरिसिहरोत्ति पसंति ॥ ४२८ ॥ भवनत्रिकाणामधोऽधः स्तोकं तिस्था भवति बहुकं तु । ऊर्बेन भवनवासिनः सुरगिरिशिखरान्तं पश्यन्तिः ॥ ४२८ ॥ अर्थ-भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी इनकी अवधिका क्षेत्र नीचे २ कम होता है और तिर्यग् रूपसे अधिक होता है। तथा भवनवासी देव अपने अवस्थित स्थानसे सुर- गिरिके ( मेरुके ) शिखरपर्यन्त अवधिदर्शनके द्वारा देखते है। सकीसाणा पढमं विदियं तु सणकुमारमाहिंदा । तदियं तु वम्हलांतव सुकसहस्सारया तुरियं ॥ ४२९ ॥ शत्रैशानाः प्रथम द्वितीयं तु सनत्कुमारमाहेन्द्राः । तृतीयं तु ब्रह्मलान्तवाः शुक्रसहस्रारकाः तुरियम् ॥ ४२९ ।। अर्थ-सौधर्म और ईशान वर्गके देव अवधिके द्वारा प्रथम भूमिपर्यन्त देखते है। सनत्कुमार माहेन्द्र वर्गके देव दूसरी पृथ्वीतक देखते है । ब्रह्म ब्रह्मोत्तर लांतव कापिष्ठ स्वर्गवाले देव तीसरी भूमि तक देखते है । शुक्र महाशुक्र शतार सहस्रार खर्गके देव चौथी भूमि तक देखते है। आणदपाणदवासी आरण तह अजुदा य पस्संति । पंचमखिदिपेरंतं छडि गेवेजगा देवा ॥ ४३०॥ आनतप्राणतवासिनः आरणास्तथा अच्युताश्च पश्यन्ति । पञ्चमक्षितिपर्यन्तं पष्ठी अवेयका देवाः ॥ ४३० ॥ अर्थ-आनत प्राणत आरण अच्युत वर्गके देव पाचमी भूमि तक अवधिके द्वारा देखते हैं। और अवेयकवासी देव छट्ठी भूमि तक देखते है । सवं च लोयणालिं पस्संति अणुत्तरेसु जे देवा । सक्खेत्ते य सकम्मे रूबगदमणंतभागं च ॥ ४३१ ॥ सर्वा च लोकनाली पश्यन्ति अनुत्तरेषु ये देवाः । स्वक्षेत्रे च खकर्मणि रूपगतमनन्तभागं च ॥ ४३१ ॥ अर्थ-अनुत्तरवासी देव सम्पूर्ण लोकनालीको अवधिद्वारा देखते है । अवधिक विष- यभूत क्षेत्रका जितना प्रदेशप्रचय है उसमें से एक २ कम करते जाना चाहिये और अवधिज्ञानावरण कर्मका जितना द्रव्य है उसमें भुवहारका भाग देते जाना चाहिये । अवधिक क्षेत्ररूप प्रदेशप्रचयमें एक २ प्रदेश कहा तक कम करना चाहिये ? और अवधिज्ञानावरण कर्मरूप द्रव्यमें ध्रुवहारका भाग कहा तक देते जाना चाहिये। इसीको आगे स्पष्ट करते हैं।
-- १६० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। कप्पसुराणं सगसगोहीखेत्तं विविस्ससोवचयं । ओहीदवपमाणं संठाविय धुवहरेण हरे ॥ ४३२ ॥ सगसगखेचपदेससलायपमाणं समप्पदे जाव । तत्थतणचरिमखंडं तत्थतणोहिस्स दवं तु ॥ ४३३ ॥ कल्पसुराणां स्खकखकावधिक्षेत्रं विविनसोपचयम् । अवधिद्रव्यप्रमाणं संस्थाप्य ध्रुवहरेण हरेत् ॥ ४३२ ॥ खकखकक्षेत्रप्रदेशशलाकाप्रमाणं समाप्यते यावत् । तन्त्रतनचरमखण्डं तत्रतनावधेर्द्रव्यं तु ।। ४३३ ।। अर्थ-कल्पवासी देवोंमें अपनी २ अवधिक क्षेत्रका जितना २ प्रमाण है उसका एक जगह स्थापन कर, और दूसरी जगह विनसोपचयरहित अवधिज्ञानावरण कर्मरूप द्रव्यका स्थापन कर, द्रव्यप्रमाणमें ध्रुवहारका भाग देना चाहिये और प्रदेशप्रमाणमें एक कम करना चाहिये । द्रव्यप्रमाणमें भुवहारका एकवार भाग देनेसे लब्ध द्रव्यप्रमाणमें दूसरीवार ध्रुव- हारका भाग देना चाहिये और प्रदेशप्रचयमें एक और कम करना चाहिये । दूसरी बार भाग देनेसे लब्ध द्रव्यप्रमाणमें तीसरी वार ध्रुवहारका भाग देना चाहिये और प्रदेशप्रचयमें तीसरी वार एक कम करना चाहिये । इस प्रकार उत्तरोत्तर लब्ध द्रव्यप्रमाणमें ध्रुवहारका भाग, एक २ प्रदेश कम करते २ जब सम्पूर्ण प्रदेशप्रचयरूप शलाका राशि समाप्त होजाय वहां तक देना चाहिये । इसतरह प्रदेशप्रचयमें एक २ प्रदेश कम करते २ और द्रव्यप्रमाणमें ध्रुवहारका भाग देते २ जहां पर प्रदेशप्रचय समाप्त हो वहां पर द्रव्यका जो स्कन्ध शेष रहे उतने स्कन्धको अवधिके द्वारा वे कल्पवासी देव जानते है कि जिनकी अवधिक विषयभूत क्षेत्रका प्रदेशप्रचय विवक्षित हो । भावार्थ-जैसे सौधर्म और ईशान- कल्पवासी देवोंका क्षेत्र प्रथम नरक पर्यंत है। ईशान कल्पके ऊपरके भागसे प्रथम नरक डेढ़ राजू है । इसलिये एक राजू लम्बे चौड़े और डेढ़ राजू ऊंचे क्षेत्रके जितने प्रदेश हों उनको एक जगह रखना, और दूसरी जगह अवधि ज्ञानावरण कर्मके द्रव्यका स्थापन करना। द्रव्यप्रमाणमें एक बार ध्रुवहारका भागदेना और प्रदेशप्रमाणमेसे एक कम करना, इस पहली वार ध्रुवहारका भाग देनेसे जो लब्ध आया उस द्रव्यप्रमाणमें दूसरीवार ध्रुवहारका भाग देना और प्रदेशप्रमाण से दूसरा एक और कम करना । इस तरह प्रदेशप्रमाण से एक २ कम करते २ तथा उत्तरोत्तर लब्ध द्रव्यप्रमाणमें भुवहारका भागदेते २ प्रदेशप्रचय समाप्त होनेपर द्रव्यका जो परिमाण शेष रहे उतने परमाणुओंके सूक्ष्म पुद्गलस्कन्धको सौधर्म और ईशान कल्पवासी देव अवधिके द्वारा जानते है । इससे स्थूलको तो जानते ही हैं। किन्तु इससे सूक्ष्मको नहीं जानते । इस ही तरह आगे भी समझना।
- गोम्मटसारा सौधर्म ईशान कल्पवासी देवोंका क्षेत्र डेढराजू, सनत्कुमार माहेन्द्रवालोंका चार राजू, ब्रह्म ब्रह्मोचरवालोंका साढ़े पांच राजू, लांतव कापिष्ठवालोंका छह राजू, शुक्र महाशुक्रवा- लोका साढ़े सात राजू, सतार सहस्रारवालोंका आठ राजू, आनत प्राणतवालोंका साढ़े नव- राजू, आरण अच्युतवालोंका दश राजू, अवेयकवालोंका ग्यारह राजू, अनुदिश विमानवा- लोका कुछ अधिक तेरह राजू, अनुत्तरविमानवालोंका कुछ कम चौदह राजू क्षेत्र है । इस क्षेत्रप्रमाणके अनुसार ही उनकी ( कल्पवासी देवों की) अवधिके विषयभूत द्रव्यका प्रमाण उक्त क्रमानुसार निकलता है। सोहम्मीसाणाणमसंखेजाओ हु वस्सकोडीओ। उपरिमकप्पचउक्के पल्लासंखेज्जभागो दु॥ ४३४ ॥ : तत्तो लांतवकप्पप्पहुदी सवत्थसिद्धिपेरते। किंचूणपल्लमत्तं कालपमाणं जहाजोग्गम् ॥ ४३५ ॥ सौधर्मशानानामसंख्येया हि वर्षकोट्यः । उपरिमकल्पचतुष्के पल्यासंख्यातभागस्तु ॥ ४३४ ॥ ततो लान्तवकल्पप्रभृति सर्वार्थसिद्धिपर्यन्तम् । किश्चिदूनपल्यमानं कालप्रमाणं यथायोग्यम् ॥ ४३५॥ अर्थ-सौधर्म और ईशान खर्गके देवोंकी अवधिका काल असख्यात कोटि वर्ष है। इसके ऊपर सनत्कुमार माहेन्द्र ब्रह्म ब्रह्मोचर कल्पवाले देवोंकी अवधिका काल यथायोग्य पल्यका असख्यातमा भाग है। इसके ऊपर लान्तव खर्गसे लेकर सर्वार्थसिद्धिपर्यन्त बाले देवोकी अवधिका काल कुछ कम पल्यप्रमाण है। जोइसियंताणोहीखेत्ता उत्ता ण होति घणपदरा । कप्पसुराणं च पुणो विसरित्थं आयदं होदि ॥ ४३६ ॥ ज्योतिषकान्तानामवधिक्षेत्राणि उक्तानि न भवन्ति धनपतराणि । कल्पसुराणां च पुनः विसहशमायतं भवति ॥ ४३६॥ अर्थ भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी इनकी अवधिका क्षेत्र बराबर घनरूप नहीं है। कल्प- वासी देवोंकी अवधिका क्षेत्र आयतचतुरन (चौकोर; किन्तु लम्बईमें अधिक और चौड़ाईमें थोड़ा) है। शेष मनुष्य तियेच नारकी इनकी अवधिका विषयभूत क्षेत्र बराबर घनरूप है। ॥ इति अवधिज्ञानप्ररूपणा ॥ r - । मनापर्यय ज्ञानका खरूप बताते हैं। चिंतियमचिंतियं वा अद्धचिंतियमणेयमेयगयं । मणपजवं ति उचइ जं जाणइ तं खु परलोए ॥ ४३७ ॥ गो.११ १६२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। चिन्तितमचिन्तितं वा अर्ध चिन्तितमनेकभेदगतम् । मनःपर्यय इत्युच्यते यजानाति तत्खलु नरलोके ॥ ४३७ ॥ अर्थ-जिसका भूत कालमें चिन्तवन किया हो, अथवा जिसका मविप्यत् कालमें चिन्तवन किया जायगा, अथवा वर्तमानमें जिसका आधा चिन्तवन किया है, इत्यादि. अनेक भेदखरूप दूसरेके मनमें स्थित पदार्थ जिसके द्वारा जाना जाय उस ज्ञानको मन:- पर्यय कहते हैं। यह मनःपर्यय ज्ञान मनुष्यक्षेत्रमें ही होता है, बाहर नहीं। मनःपर्ययके भेदोंको गिनाते है । मणपजवं च दुविहं उजुविउलमदित्ति उजुमदी तिविहा । उजुमणवयणे काए गदत्थविसयाति णियमेण ॥ ४३८॥ मनःपर्ययश्च द्विविधः ऋजुविपुलमतीति ऋजुमतित्रिविधा । ऋजुमनोवचने काये गतार्थविपया इति नियमेन ॥ ४३८ ।। अर्थ-सामान्यकी अपेक्षा मनःपर्यय एक प्रकारका है। और विशेष भेदोंकी अपेक्षा दो प्रकारका है। एक ऋजुमति दूसरा विपुलमति। ऋजुमतिके भी तीन भेद हैं। ऋजुमनोगतार्थ- विषयक, ऋजुवचनगतार्थविषक, ऋजुकायगतार्थविषयक । परकीयमनोगत होने पर भी जो सरलतया मन वचन कायके द्वारा किया गया हो ऐसे पदार्थको विषय करनेवाले ज्ञानको ऋजुमति कहते है । अतएव सरल मन वचन कायके द्वारा किये हुए पदार्थको विषय कर- नेकी अपेक्षा ऋजुमतिके पूर्वोक्त तीन भेद है। विउलमदीवि य छद्धा उजुगाणुजुवयणकायचित्तगयं । अत्थं जाणदि जम्हा सइत्थगया हु ताणत्या ॥ ४३९ ॥ विपुलमतिरपि च षोढा ऋजुगानृजुवचनकायचित्तगतम् । अर्थ जानाति यस्मात् शब्दार्थगता हि तेषामर्थाः ॥ ४३९ ।। अर्थ-विपुलमतिके छह भेद है । ऋजु मन वचन कायगत पदार्थको विषय करनेकी अपेक्षा तीन भेद, और कुटिल मन वचन कायके द्वारा किये हुए परकीय मनोगत पदा- याँको विषय करनेकी अपेक्षा तीन भेद । ऋजुमति तथा विपुलमति मनःपर्ययके विषय शब्दगत तथा अर्थगत दोनो ही प्रकारके होते है। तियकालविसयरूवि चिंतितं वहमाणजीवेण । उजुमदिणाणं जाणदि भूदभविस्सं च विउलमदी ॥४४॥ त्रिकालविषयरूपि चिंतितं वर्तमानजीवेत - ऋजुमतिज्ञानं जानाति भूतभविष्यच विपुलमतिः ॥ ४४०॥ -- , गोम्मटसारः। अर्थ—पुद्गल द्रव्य त्रिकालविषयक है। उसमें वर्तमान जीवके द्वारा चिन्यमान (वर्व- मानमें जिसका चितवन किया जा रहा है) पदार्थको ऋजुमति मनःपर्यय ज्ञान जानता है। और विपुलमतिज्ञान भूत भविष्यत्को भी जानता है। भावार्थ-जिसका भूतकाल में चिन्तवन किया हो अथवा जिसका भविष्यत्में चिन्तवन किया जायगा यद्वा वर्तमानमें जिसका चिन्तवन होरहा है, ऐसे तीनों ही प्रकारके पदार्थको विपुलमति मनःपर्यय ज्ञान जानता है। सवंगअंगसंभवचिण्हादुप्पजदे जहा ओही। मणपज्जवं च दवमणादो उप्पजदे णियमा ॥ ४४१॥ सर्वाङ्गाङ्गसम्भवचिहादुत्पद्यते यथावधिः । मनःपर्ययं च द्रव्यमनस्त उत्पद्यते नियमात् ॥ ४४१ ।। अर्थ-जिस प्रकार अवधिज्ञान शंखादि शुभ चिहोंसे युक्त समस्त अङ्गसे उत्पन्न होता है। उस तरह मनःपर्यय ज्ञान जहां पर द्रव्यमन होता है उनही प्रदेशोंसे उत्पन्न होता है। भावार्थ-जहांपर द्रव्य मन होता है उस स्थानपर जो आत्माके प्रदेश है वहीं मनःपर्यय ज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होता और वहींसे मनःपर्यय ज्ञान उत्पन्न होता है। किन्तु अवधि सर्वाङ्गसे होती है। क्योंकि यद्यपि अवधि शंखादि चिन्हों के स्थानसे ही होती है -तथापि इन चिन्हों का स्थान द्रव्यमन की तरह निश्चित नहीं है । यह उत्पचिस्थानकी अपेक्षा अवधि और मनःपर्यय ज्ञानमें अंतर है। हिदि होदि हु दधमणं वियसियअठ्ठच्छदारविंदं वा। अङ्गोवंगुदयादो मणवग्गणखंघदो णियमा ॥ ४४२ ॥ हृदि भवति हि द्रव्यमनः विकसिताष्टछदारविंदवत् । आङ्गोपाङ्गोदयात् मनोवर्गणास्कन्धतो नियमात् ॥ ४४२ ॥ अर्थ-आङ्गोपाङ्गनामकर्मके उदयसे मनोवर्गणाके स्कन्धोके द्वारा हृदयस्थानमें निय- मसे विकसित आठ पाखडीके कमलके आकारमें द्रव्यमन उत्पन्न होता है। णोइंदियत्ति सण्णा तस्स हवे सेसईदियाणं वा। वत्तचाभावादो मणमणपजं च तत्थ हवे ॥ ४४३॥ नोइन्द्रियमिति संज्ञा तस भवेत् शेषेन्द्रियाणां वा । व्यकत्वाभावात् मनो मनःपर्ययश्च तत्र भवेत् ॥४४३ ॥ अर्थ-इस द्रव्यमनकी नोइन्द्रिय सज्ञा भी है, क्योंकि दूसरी इन्द्रियोंकी तरह यह व्यक्त नहीं है । इस द्रव्यमन के होनेपर ही भावमन तथा मनःपर्यय ज्ञान उत्पन्न होता है।
१६४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । मनःपर्यय ज्ञान का खामी बताते हैं। मणपजवं च णाणं सत्सु विरदेसु सत्तइड्डीणं । एगादिजुदेसु हवे वढतविसिहचरणेसु ॥ ४४४ ॥ मनःपर्ययश्च ज्ञानं सप्तसु विरतेपु सप्तर्षीनाम् । एकादियुतेषु भवेत् वर्धमानविशिष्टाचरणेषु ॥ ४४४ ॥ अर्थ-प्रमचादि क्षीणकषायपर्यन्त सात गुणस्थानों से किसी एक गुणस्थानवालेके, इस पर भी सात ऋद्धियों से किसी एक ऋद्धिको धारण करनेवालेके, ऋद्धिमाप्तमें भी वर्धमान तथा विशिष्ट चारित्रको धारणकरनेवालोंके ही यह मनःपर्यय ज्ञान उत्पन्न होता है। इंदियणोइंदियजोगादि पेक्खित्तु उजुमदी होदि । जिरवेक्खिय विउलमदी ओहि वा होदि णियमेण ॥ १४५॥ इन्द्रियनोइन्द्रिययोगादिमपेक्ष्य ऋजुमतिर्भवति । निरपेक्ष्य विपुलमतिः अवधिर्वा भवति नियमेन ॥ ४४५ ॥ अर्थ-अपने तथा परके स्पर्शनादि इन्द्रिय और मन तथा मनोयोग काययोग वचन- योगकी अपेक्षासे ऋजुमति मनःपर्यय ज्ञान उत्पन्न होता है । अर्थात् वर्तमानमें विचार- प्राप्तस्पर्शनादिके विषयोंको ऋजुमति जानता है। किन्तु विपुलमति अवधिकी तरह इनकी अपेक्षाके विना ही नियमसे होता है। पडिवादी पुण पढमा अप्पडिवादी हु होदि विदिया हु। सुद्धो पढमो बोहो सुद्धतरो विदियवोहो दु॥४४६ ॥ प्रतिपाती पुनः प्रथमः अप्रतिपाती हि भवति द्वितीयो हि। शुद्धः प्रथमो बोधः शुद्धतरो द्वितीयवोधस्तु ॥ ४४६॥ अर्थ ऋजुमति प्रतिपाती है। क्योंकि ऋजुमतिवाला उपशमक तथा क्षपक दोनों श्रेणियोंपर चढ़ता है। उसमें यद्यपि क्षपककी अपेक्षा ऋजुमतिवालेका पतन नहीं होता। तथापि उपशम श्रेणीकी अपेक्षा पतन सम्भव है । विपुलमति सर्वथा अप्रतिपाती है । तथा ऋजुमति शुद्ध है, और विपुलमति इससे भी शुद्ध होता है। परमणसिठियमढें ईहामदिणा उजुट्टियं लहिय पच्छा पच्चक्खेण य उजुमदिणा जाणदे णियमा ॥ ४४७॥ परमनसिस्थितमर्थमीहामत्या अजुस्थितं लब्ध्वा । पश्चात् प्रत्यक्षेण च ऋजुमतिना जानीते नियमात् ॥ ४४७॥ अर्थ-ऋजुमतिवाला दूसरेके मनमें सरलताके साथ स्थित पदार्थको पहले ईहामति- ज्ञानके द्वारा जानता है, पीछे प्रत्यक्ष रूपसे नियमसे ऋजुमति ज्ञानके द्वारा जानता है ।
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गोम्मटसारः।
१६५
चिंतियमचिंतियं वा अद्धं चिंतियमणेयमेयगयं ।
ओहि वा विउलमदी लहिऊण विजाणए पच्छा ॥४४८॥
चिन्तितमचिन्तितं वा अर्द्ध चिन्तितमनेकभेदगतम् ।
अवधिर्वा विपुलमतिः लब्ध्वा विजानाति पश्चात् ॥ ४४८॥
अर्थ-चिन्तित अचिन्तित अर्धचिन्तित इस तरह अनेक भेदोंको प्राप्त दूसरेके मनोगत
पदार्थको अवधिकी तरह विपुलमति प्रत्यक्षरूपसे जानता है।
दवं खेत्तं कालं भावं पडि जीवलक्खियं रूबि।
उजुविउलमदी जाणदि अवरवरं मज्झिमं च तहा ॥ ४४९ ॥
द्रव्यं क्षेत्रं कालं भावं प्रति जीवलक्षितं रूपि ।
ऋजुविपुलमती जानीतः अवरवरं मध्यमं च तथा ॥ ४४९ ॥
अर्थ-द्रव्य क्षेत्र काल भावकी अपेक्षासे रूपि (पुद्गल) द्रव्यको तथा उसके सम्ब-
न्धसे जीवद्रव्यको भी ऋजुमति और विपुलमति जघन्य मध्यम उत्कृष्ट तीन तीन प्रकारसे
जानते है।
ऋजुमतिका जघन्य और उत्कृष्ट द्रव्यप्रमाण बताते है।
अवरं दवमुदालियसरीरणिजिण्णसमयबद्धं तु ।
चक्खिदियणिजण्णं उकस्सं उजुमदिस्स हवे ॥ ४५० ॥
अवरं द्रव्यमौरालिकशरीरनिर्जीर्णसमयप्रबद्धं तु ।
चक्षुरिन्द्रियनिर्जीणमुत्कृष्टमृजुमतेर्भवेत् ॥ ४५० ॥
अर्थ-औदारिक शरीरके निर्जीर्ण समयप्रबद्धप्रमाण ऋजुमतिके जघन्य द्रव्यका प्रमाण
है। तथा चक्षुरिन्द्रियकी निर्जरा-द्रव्य-प्रमाण उत्कृष्ट द्रव्यका प्रमाण है।
विपुलमतिके द्रव्यका प्रमाण बताते है ।
मणदधवग्गणाणमणंतिमभागेण उजुगउकस्सं ।
खंडिदमेत्तं होदि हु विउलमदिस्सावरं दवं ॥ ४५१ ॥
मनोद्रव्यवर्गणानामनन्तिमभागेन ऋजुगोत्कृष्टम् ।
खण्डितमानं भवति हि विपुलमतेवर द्रव्यम् ॥ ४५१ ।।
अर्थ-मनोद्रव्यवर्गणाके जितने विकल्प है, उसमें अनन्तका भाग देनेसे लब्ध एक
भागप्रमाण ध्रुवहारका, ऋजुमतिके विषयभूत उत्कृष्ट द्रव्यप्रमाणमें भाग देनेसे जो लब्ध
आवे उतने द्रव्यस्कन्धको विपुलमति जघन्यकी अपेक्षासे जानता है।
अट्टण्डं कम्माणं समयपवद्धं विविस्ससोबचयम् ।
धुवहारेणिगिवारं भजिदे विदियं हवे दवं ॥ ४५२ ॥
. रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १६६ अष्टानां कर्मणां समयप्रवद्धं विविससोपचयम् । ध्रुवहारेणैकवारं भजिते द्वितीयं भवेत् द्रव्यम् ॥ ४५२ ।। अर्थ-विससोपचयसे रहित आठ कर्मोंके समयप्रबद्धका जो प्रमाण है उसमें एकवार ध्रुवहारका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना विपुलमतिके द्वितीय द्रव्यका प्रमाण होता है। तविदियं कप्पाणमसंखेजाणं च समयसंखसमं। धुवहारेणवहरिदे होदि हु उक्कस्सयं दधं ॥ ४५३ ॥ तद्वितीयं कल्पानामसंख्येयानां च समयसंख्यासमम् । ध्रुवहारेणावहृते भवति हि उत्कृष्टकं द्रव्यम् ।। ४५३ ।। अर्थ-असंख्यात कल्पों के जितने समय है उतनी वार विपुलमतिके द्वितीय द्रव्यमें, ध्रुवहारका भाग देनेसे विपुलमतिके उत्कृष्ट द्रव्यका प्रमाण निकलता है। गाउययुधत्तमवरं उकस्सं होदि जोयणपुधत्तं । विउलमदिस्स य अवरं तस्स सुधत्तं वरं खु णरलोयं ॥ ४५४ ॥ गन्यूतिपृथक्त्वमवरमुत्कृष्टं भवति योजनपृथक्त्वम् । विपुलमतेश्च अवरं तस्य पृथक्त्वं वरं खलु नरलोकः ॥ ४५४ ॥ अर्थ-ऋजुमतिका जघन्य क्षेत्र दो तीन कोस और उत्कृष्ट सात आठ योजन है। विपुलमतिका जघन्य क्षेत्र आठ नव योजन तथा उत्कृष्ट मनुष्यलोकप्रमाण है। णरलोएत्ति य वयणं विक्खंभणियामयं ण वहस्स। जम्हा तग्घणपदरं मणपज्जवखेत्तमुद्दिढं। ४५५॥ नरलोक इति च वचनं विष्कम्भनियामकं न वृत्तस्य । यस्मात् तद्धनप्रतरं मनःपर्ययक्षेत्रमुद्दिष्टम् ॥ ४५५ ॥ अर्थ-मनःपर्ययके उत्कृष्ट क्षेत्रका प्रमाण जो नरलोकप्रमाण कहा है सो नरलोक इस शब्दसे मनुष्यलोकका विष्कम्भ ग्रहण करना चाहिये नकि वृत्त; क्योंकि दूसरेके द्वारा चिंतित और मानुषोत्तर पर्वतके वाहर स्थित पदार्थको भी विपुलमति जानता है; क्योकि मनःपर्यय ज्ञानका उत्कृष्ट क्षेत्र समचतुरस्र धनप्रतररूप पैतालीस लाख योजनप्रमाण है। दुगतिगभवा हु अवरं सत्तभवा हवंति उकसं। अडणवभवा हु अवरमसंखेजं विउलउक्कस्सं ॥४५६ ॥ द्विकनिकभवा हि अवरं सप्ताष्टभवा भवन्ति उत्कृष्टम् । अष्टनवभवा हि अवरमसंख्येयं विपुलोत्कृष्टम् ॥ ४५६॥ अर्थ-कालकी अपेक्षासे ऋजुमतिका विषयभूत जघन्य काल दो तीन भव और उत्कृष्ट सात आठ मव, तथा विपुलमतिका जघन्य आठ नौ भव और उत्कृष्ट पत्यके असख्यातमे भागप्रमाण है। men
गोम्मटसारः।
१६७
आवलिअसंखभागं अवरं च वरं च वरमसंखगुणं ।
तत्तो असंखगुणिदं असंखलोगं तु विउलमदी ॥ ४५७ ॥
आवल्यसंख्यभागमवरं च वरं च वरमसंख्यगुणम् ।
तत:असंख्यगुणितमसंख्यलोकं च विपुलमतिः ॥ ४५७ ॥
अर्थ-भावकी अपेक्षासे ऋजुमतिका जघन्य तथा उत्कृष्ट विषय आवलीके असंख्या-
तमे भागप्रमाण है; तथापि जघन्य प्रमाणसे उत्कृष्ट प्रमाण असख्यातगुणा है। विपुलम-
तिका जघन्यप्रमाण ऋजुमतिके उत्कृष्ट विषयसे असख्यातगुणा है, और उत्कृष्ट विषय
असंख्यात लोकप्रमाण है।
मज्झिमदवं खेत्तं कालं भावं च मज्झिमं णाणं ।
जाणदि इदि मणपजवणाणं कहिदं समासेण ॥ ४५८ ॥
मध्यमद्रव्यं क्षेत्रं कालं भावं च मध्यमं ज्ञानम् ।
जानातीति मनःपर्ययज्ञानं कथितं समासेन ॥ ४५८ ॥
अर्थ-इस प्रकार द्रव्य क्षेत्र काल भावका जघन्य और उत्कृष्ट प्रमाण बताया इनके
मध्यके जितने भेद हैं उनको मनःपर्यय ज्ञानके मध्यम भेद विषय करते है। इस तरह
संक्षेपसे मनःपर्यय ज्ञानका निरूपण किया।
केवलज्ञानका निरूपण करते है।
संपुण्णं तु समग्गं केवलमसवत्त सबभावगयं ।
लोयालोयवितिमिरं केवलणाणं मुणेदवं ॥ ४५९ ॥
सम्पूर्ण तु समय केवलमसपत्नं सर्वभावगतम् ।
लोकालोकवितिमिर केवलज्ञानं मन्तव्यम् ॥ ४५९ ॥
अर्थ-यह केवलज्ञान, सम्पूर्ण, समग्र, केवल, प्रतिपक्षरहित, सर्वपदार्थगत, और लोका-
लोकमें अन्धकार रहित होता है । भावार्थ-यह ज्ञान समस्त पदार्थोंको विषय करनेवाला
है और लोकालोकके विषयमें आवरण रहित है । तथा जीवद्रव्यकी ज्ञान शक्तिके जितने
अंश है वे यहांपर सम्पूर्ण व्यक्त होगये है इसलिये उसको (केवल ज्ञानको) सम्पूर्ण कहते
हैं। मोहनीय और अन्तरायका सर्वथा क्षय होजानेके कारण वह अप्रतिहतशक्ति युक्त है,
अत एव उसको समग्र कहते है। इन्द्रियों की सहायता की अपेक्षा नही रखता इसलिये
केवल कहते है। समस्त पदार्थोके विषयकरनेमें उसका कोई बाधक नहीं है इसलिये
उसको असपत्न (प्रतिपक्षरहित ) कहते है।
ज्ञानमार्गणामें जीवसंख्याका निरूपण करते है।
चदुगदिमदिसुदवोहा पल्लासंखेजया हु मणपजा।
संखेजा केवलिणो सिद्धादो होति अतिरित्ता ॥ ४६०॥
१६८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । चतुर्गतिमतिश्रुतबोधाः पल्यासंख्येया हि मनःपर्ययाः। संख्येयाः केवलिनः सिद्धात् भवन्ति अतिरिक्ताः ॥ ४६० ॥ अर्थ-चारों गतिसम्बन्धी मतिज्ञानियोंका अथवा श्रुतज्ञानियोंका प्रमाण पल्यके असं- ख्यातमे भागप्रमाण है। और मनःपर्ययवाले कुल सख्यात है। तथा केवलियोंका प्रमाण सिद्धराशिसे कुछ अधिक है । भावार्थ सिद्धराशिम जिनकी (अर्हन्तोंकी) संख्या मिलानेसे केवलियोंका प्रमाण होता है। ओहिरहिदा तिरिक्खा मदिणाणिअसंखभागगा मणुगा। संखेजा हु तदूणा मदिणाणी ओहिपरिमाणं ॥ ४६१ ॥ अवधिरहिताः तिर्यश्चः मतिज्ञान्यसंख्यभागका मनुजाः । संख्येया हि तदूना मतिज्ञानिनः परिमाणम् ॥ ४६१ ।। अर्थ-अवधिज्ञानरहित तिर्यञ्च-मतिज्ञानियोंकी सख्याका असंख्यातमा भाग, और अवधिज्ञानरहित मनुष्यों की संख्यात राशि इन दो राशियोंको मतिज्ञानियोंके प्रमाणसे घटाने पर जो शेष रहे उतना ही अवधि ज्ञानका प्रमाण है। पल्लासंखघणंगुलहदसेडितिरिक्खगदिविभङ्गजुदा । णरसहिदा किंचूणा चदुगदिवेभङ्गपरिमाणम् ॥ ४६२ ॥ पल्यासंख्यघनाङ्गुलहतश्रेणितिर्यग्गतिविभंगयुताः। नरसहिताःकिञ्चिदूनाः चतुर्गतिवैभङ्गपरिमाणम् ।। ४६२ ॥ अर्थ-पल्यके असंख्यातमे भागसे गुणित घनाङ्गुलका और जगच्छ्रेणीका गुणा करनेसे जो राशि उत्पन्न हो उतने तिर्यञ्च, और संख्यात मनुष्य, घनाङ्गुलके द्वितीय वर्गमूलसे गुणित जगच्छ्रेणी प्रमाण नारकी', तथा सम्यग्दृष्टियोंके प्रमाणसे रहित सामान्य देवराशि, इन चारों राशियोंके जोड़नेसे जो प्रमाण हो उतने विमङ्गज्ञानी हैं। सण्णाणरासिपंचयपरिहीणो सवजीवरासी हु। मदिसुदअण्णाणीणं पत्तेयं होदि परिमाणं ॥ ४६३ ॥ सद्ज्ञानराशिपञ्चकपरिहीनः सर्वजीवराशिर्हि । मतिश्रुताज्ञानिनां प्रत्येकं भवति परिमाणम् ॥ ४६३ ॥ अर्थ-पांच सम्यग्ज्ञानी जीवोंके प्रमाणको (केवलियोंके प्रमाणसे कुछ अधिक) सम्पूर्ण जीवशिके प्रमाणमेंसे घटानेपर जो शेष रहे उतने कुमतिज्ञानी तथा उतने ही कुश्रुतज्ञानी जीन है। इति ज्ञानमार्गणाधिकारः॥ १ परन्तु इसमेंसे सदृष्टियोंका प्रमाण घटाना। ।
गोम्मटसारः।। -- ॥ अथ संयममार्गणाधिकारः। बदसमिदिकसायाणं दंडाण तहिंदियाण पंचण्ह। धारणपालणणिग्गहचागजओ संजमो भणिओ ॥ ४६४ ॥ व्रतसमितिकषायाणां दण्डानां तथेन्द्रियाणां पञ्चानाम् । धारणपालननिग्रहत्यागजयः संयमो भणितः ॥ ४६४ ।। अर्थ-अहिसा अचौर्य सत्य शील (ब्रह्मचर्य) अपरिग्रह इन पांच महाव्रतोंका धारण करना, इर्या भाषा एषणा आदाननिक्षेण उत्सर्ग इन पांच समितियोंका पालना, चारप्रका- रकी कपायोंका निग्रह करना, मन वचन काय रूप दण्डका त्याग, तथा पांच इन्द्रियोंका जय, इसको संयम कहते हैं । अतएव सयमके पांच भेद है। सयमकी उत्पत्तिका कारण बताते है। वादरसंजलणुदये सुहुमुदये समखये य मोहस्स । संजमभावो णियमा होदिति जिणेहिं णिहिं ॥ ४६५ ॥ वादरसंज्वलनोदये सूक्ष्मोदये शमक्षययोश्च मोहस्य । संयमभावो नियमात् भवतीति जिननिर्दिष्टम् ॥ ४६५ ॥ अर्थ-वादर सज्वलनके उदयसे अथवा सूक्ष्मलोमके उदयसे और मोहनीय कर्मके उपशमसे अथवा क्षयसे नियमसे सयमरूप भाव उत्पन्न होते है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है। इसी अर्थको दो गाथाओं द्वारा स्पष्ट करते है। दरसंजलणुदये वादरसंजमतियं खु परिहारो। पमदिदरे सुहुमुदये सुहुमो संजमगुणो होदि ॥ ४६६ ॥ वादरसंज्वलनोदये बादरसंयमत्रिकं खलु परिहारः। प्रमत्तेतरस्मिन् सूक्ष्मोदये सूक्ष्मः संयमगुणो भवति ॥ ४६६ ॥ अर्थ-जो सयमके विरोधी नही है ऐसे बादर सज्वलन कषायके देशघाति स्पर्धकोंके उदयसे सामायिक छेदोपस्थापना परिहारविशुद्धि ये तीन चारित्र होते है। इनमेंसे परि- हारविशुद्धि सयम तो प्रमत्त और अप्रमत्तमें ही होता है, किन्तु सामायिक और छेदोप- स्थापना प्रमचादि अनिवृत्तिकरणपर्यन्त होते है । सूक्ष्मकृष्टिको प्राप्त सज्वलन लोभके उदयसे सूक्ष्मसांपराय गुणस्थानवर्ती सयम होता है। जहखादसंजमो पुण उवसमदो होदि मोहणीयस्स । खयदो विय सो णियमा होदिति जिणेहिं णिहिडें ॥ ४६७ ॥ यथाख्यातसंयमः पुन: उपशमतो भवति मोहनीयस्य । क्षयतोऽपि च स नियमात् भवतीति जिनैनिर्दिष्टम् ॥ ४६७ ॥ , गो. २२
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्।
१७०
अर्थ-यथाख्यात संयम नियमसे मोहनीय कर्मके उपशम तथा क्षयसे भी होता है
ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है।
तदियकसायुदयेण य विरदाविरदो गुणो हवे जुगवं।
विदियकसायुदयेण य असंजमो होदि णियमेण ॥ ४६८ ॥
तृतीयकपायोदयेन च विरताविरतो गुणो भवेत् युगपत् ।
द्वितीयकषायोदयेन च असंयमो भवति नियमेन ॥ ४६८॥
अर्थ-तीसरी प्रत्याख्यानावरण कषायके उदयसे विरताविरत देशविरत-मिश्रविरत
पांचमा गुणस्थान होता है । और दूसरी अप्रत्याख्यान कषायके उदयसे असयम (संयमका
अमाव ) होता है।
सामायिक संयमका निरूपण करते है।
संगहिय सयलसंजममेयजममणुत्तरं दुरवगम्मं ।
जीवो समुबहतो सामाइयसंजमो होदि ॥ ४६९ ॥
संगृह्य सकलसंयममेकयममनुत्तरं दुरवगम्यम् ।
जीवः समुद्वहन सामायिकसंयमो भवति ॥ ४६९ ॥
अर्थ-उक्त व्रतधारण आदिक पांच प्रकारके संयममें सग्रह नयकी अपेक्षासे अभेद
करके " मै सर्व सावद्यका त्यागी हूं" इस तरह जो सम्पूर्ण सावधका त्याग करना'
इसको सामायिक संयम कहते है । यह संयम अनुपम तथा दुर्धर्ष है । इसके पालन करने
वालेको सामायिकसंयम (मी) कहते है।
छेदोपस्थापना सयमका निरूपण करते है।
छेत्तूण य परियायं पोराणं जो ठवेइ अप्पाणं।
पंचजमे धम्मे सो छेदोवट्ठावगो जीवो ॥ ४७० ॥
छित्त्वा च पर्यायं पुराणं यः स्थापयति आत्मानम् ।
पंचयमे धम्म सः छेदोपस्थापको जीवः ॥ ४७०॥
अर्थ-प्रमादके निमित्तसे सामायिकादिसे च्युत होकर जो सावध क्रियाके करनेरूप
सावधपर्याय होती है, उसका प्रायश्चित्तविधिके अनुसार छेदन करके जो जीव अपनी
आत्माको व्रतधारणादिक पाचप्रकारके सयमरूप धर्ममें स्थापन करता है उसको छेदोपस्था-
पनसयमी कहते है।
परिहारविशुद्धिसंयमीका खरूप बताते है।
पंचसमिदो तिगुत्तो परिहरइ सदावि जो हु सावजं ।
पंचेकजमो पुरिसो परिहारयसंजदो सो हु॥ ४७१ ॥
गोम्मटसारः।
पञ्चसमितः त्रिगुप्तः परिहरति सदापि यो हि सावधम् ।
पञ्चैकयमः पुरुषः परिहारकसंयतः स हि ॥ ४७१ ॥
अर्थ -पांच प्रकारके संयमियोंमेंसे जो जीव पांच समिति तीन गुप्तिको धारण कर सदा
सावधका त्याग करता है उस पुरुषको परिहारविशुद्धिसंयमी कहते है।
इसीका विशेष खरूप कहते हैं।
तीसं वासो जम्मे वासपुधत्तं खु तित्थयरमूले।
पञ्चक्खाणं पढिदो संझुणदुगाउयविहारो ॥ ४७२ ॥
त्रिशद्वाो जन्मनि वर्षपृथक्त्वं खलु तीर्थकरमूले ।
प्रत्याख्यानं पठितः संध्योनद्विगव्यूतिविहारः ॥ ४७२ ॥
अर्थ-जन्मसे तीस वर्षतक सुखी रहकर दीक्षा ग्रहण करके श्री तीर्थकरके पादमूलमें
आठ वर्पतक प्रत्याख्यान नामक नौमे पूर्वका अध्ययन करनेवाले जीवके यह संयम होता
। इस संयमवाला जीव तीन संध्याकालोंको छोड़कर दो कोस पर्यन्त गमन करता है।
किन्तु रात्रिको गमन नहीं करता । और वर्षाकालमें गमन करनेका नियम नहीं है ।
भावार्थ-जिस संयममें परिहारके साथ विशुद्धि हो उसको परिहारविशुद्धि संयम कहते
। प्राणिपीडाके त्यागको परिहार कहते है । इस संयमवाला जीव जीवराशिमें विहार
करता हुआ भी जलसे कमलकी तरह हिसासे लिप्त नहीं होता।
सूक्ष्मसाम्पराय संयमवालेका खरूप बताते हैं।
अणुलोहं वेदंतो जीवो उवसामगो व खवगो वा।
सो सुहुमसांपराओ जहखादेणूणओ किंचि ॥ ४७३ ॥
अणुलोमं विदन् जीवः उपशामको वा क्षपको वा।
स सूक्ष्मसाम्परायः यथाख्येतेनोनः किश्चित् ॥ ४७३ ॥
अर्थ-जिस उपशमश्रेणी अथवा क्षपक श्रेणिवाले जीवके सूक्ष्मकृष्टिको प्राप्त लोमक-
पायका उदय होता है, उसको सूक्ष्मसांपरायसयमी कहते है। इसके परिणाम यथाख्यात
चारित्रवाले जीवके परिणामोंसे कुछ ही कम होते हैं। क्योंकि यह सयम दशमे गुणस्थानमें
होता है, और यथाख्यात सयम ग्यारहमेसे शुरू होता है।
यथाख्यात सयमका खरूप बताते है।
उवसंते खीणे वा असुहे कम्मम्मि मोहणीयम्मि ।
छदुमठो व जिणो वा जहखादो संजदो सो दु॥४७४ ॥
१ परिहारद्धिसमेत जीव षदकायसकुले विहरत् । पयसेव पनपत्रं न लिप्यते पापनिवहेन ॥१॥
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
उपशान्ते क्षीणे वा अशुभे कर्मणि मोहनीये ।
छास्थो वा जिनो वा यथाख्यातः संयतः स तु॥ ४७४ ।।
अर्थ-अशुभरूप मोहनीय कर्मके सर्वथा उपशम होजानेसे ग्यारहमे गुणस्थानवी
जीवोंके, और सर्वथा क्षीण होजानेसे बारहमे गुणस्थानवी जीवोके, तथा तेरहमे चौद-
हमे गुणस्थानवालोंके यथाख्यात सयम होता है। भावार्थ-यथावस्थित आत्मखभावकी
उपलब्धिको यथाख्यात सयम कहते है। यह सयम ग्यारहमेसे लेकर चौदहमे तक चार
गुणस्थानोंमें होता है । ग्यारहमेमें चारित्र-मोहनीय कर्मके उपशमसे और ऊपरके तीन
गुणस्थानों में क्षयसे यह संयम होता है।
दो गाथाओंद्वारा देशविरतका निरूपण करते है।
पंचतिहिचहुविहेहिं य अणुगुणसिक्खावयेहिं संजुत्ता।
उचंति देसविरया सम्माइट्ठी झलियकम्मा ॥ ४७५ ॥
पञ्चत्रिचतुर्विधैश्च अणुगुणशिक्षाव्रतैः संयुक्ताः ।
उच्यन्ते देशविरताः सम्यग्दृष्टयः झरितकर्माणः ॥ ४७५॥
अर्थ-जो सम्यग्दृष्टी जीव पांच अणुव्रत तीन गुणवत चार शिक्षावतसे युक्त हैं उनको
देशविरत अथवा संयमासंयमी कहते है। इस देश संयमके द्वारा जीवोके असंख्यातगुणी
कोंकी निर्जरा होती है।
देशसंयमीके ग्यारह भेदोंको गिनाते है।
दसणवयसामाइय पोसहसचिचरायभत्ते य ।
बम्हारंभपरिग्गह अणुमणमुच्छितृदेसविरदेदे ॥ ४७६ ॥
दर्शनव्रतसामायिकाः प्रोषधसचित्तरात्रिभक्ताश्च ।
ब्रह्मारम्भपरिग्रहानुमतोद्दिष्टदेशविरता एते ॥ ४७६ ॥
अर्थ-दर्शनिक, बतिक, सामायिकी, प्रोषधोपवासी, सचित्तविरत, रात्रिभुक्तिविरत
ब्रह्मचारी, आरम्भविरत, परिग्रहविरत, अनुमतिविरत, उद्दिष्टविरत ये देशविरत ( पाच
गुणस्थान ) के ग्यारह भेद है।
असंयतका खरूप बताते है।
जीवा चोइसमेया इंदियविसया तहट्टवीसं तु
जे तेसु णेव विरया असंजदा ते मुणेदवा ॥ ४७७ ॥
जीवाश्चतुर्दशभेदा इन्द्रियविषयाः तथाष्टाविशतिस्तु ।
ये वेषु नैव विरता असंयताः ते मन्तव्याः ॥ ४७७ ॥
गोम्मटसारः। १७३ अर्थ-चौदह प्रकारके जीवसमास और अट्ठाईस प्रकारके इन्द्रियोंके विषय इनसे जो विरक्त नहीं है उनको असयत कहते है। अट्ठाईस इन्द्रियविषयोंके नाम गिनाते है। पंचरसपंचवण्णा दो गंधा अट्टफाससचसरा । मणसहिदहावीसा इंदियविसया मुणेदवा ॥ ४७८ ॥ पञ्चरसपञ्चवर्णाः द्वौ गन्धौ अष्टस्पर्शसप्तस्वराः। मनःसहिताः अष्टाविंशतिः इन्द्रियविपयाः मन्तव्याः॥४७८॥ अर्थ-पांच रस ( मीठा खट्टा कषायला कडुआ चरपरा ) पाच वर्ण (सफेद पीला हरा लाल काला ) दो गंध (सुगंध दुर्गध ) आठ स्पर्श ( कोमल कठोर हलका भारी शीत उष्ण रूखा चिकना) आठ खर (षड्ज ऋषभ गाधार मध्यम पंचम धैवत निपाद ) और एक मन इस तरह ये इन्द्रियोंके अट्ठाईस विषय है। संयममार्गणामें जीवसंख्या बताते है। पमदादिचउण्हजुदी सामयियदुर्ग कमेण सेसतियं । सत्तसहस्सा णवसय णवलक्खा तीहि परिहीणा ॥४७९ ॥ प्रमत्तादिचतुर्णा युतिः सामायिकद्विकं क्रमेण शेषत्रिकम् । सप्त सहस्राणि नव शतानि नव लक्षाणि त्रिमिः परिहीनानि ॥ ४७९॥ अर्थ-प्रमत्तादि चार गुणस्थानवी जिवोका जितना प्रमाण है उतने सामायिकसं- यमी होते है । और उतने ही छेदोपस्थापनासंयमी होते है । परिहारविशुद्धि संयमवाले तीन कम सात हजार ( ६९९७ ), सूक्ष्मसापराय संयमवाले तीन कम नौ सौ (८९७), यथाख्यात संयमवाले तीन कम नौ लाख ( ८९९९९७ ) होते है। पल्लासंखेजदिमं विरदाविरदाण दवपरिमाणं । पुवुत्तरासिहीणा संसारी अविरदाण पमा ॥ ४८०॥ पल्यासंख्येयं विरताविरतानां द्रव्यपरिमाणम् । पूर्वोक्तराशिहीना संसारिणः अविरतानां प्रमा ॥ ४८० ॥ अर्थ-पल्यके असंख्यातमे भाग देशसंयमी जीवद्रव्यका प्रमाण है । उक्त संयमियोंकी राशियोंको संसारी जीवराशिमेंसे घटाने पर जो शेष रहे उतना असंयमियोंका प्रमाण है। ॥ इति संयममार्गणाधिकारः॥ क्रमप्राप्त दर्शनमार्गणाका निरूपण करते है। १ आठ करोड़ नव्वे लाख निन्यानवे हजार एकसौ तीन ( ८९०९९१०३)
१७४
शयचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
जं सामण्णं गहणं भावाणं णेव कटुमायारं ।
अविसेसदूण अढे दसणमिदि भण्णदे समये ॥ ४८१ ॥
यत् सामान्यं गृहणं भावानां नैव कृत्वाकारम् ।
अविशेष्यार्थान् दर्शनमिति भण्यते समये ॥ ४८१ ॥
अर्थ-सामान्यविशेषात्मक पदार्थके विशेष अंशका ग्रहण न करके केवल सामान्य
अंशका जो निर्विकल्परूपसे ग्रहण होता है उसको परमागममें दर्शन कहते हैं।
उक्त अर्थको ही स्पष्ट करते है।
भावाणं सामण्णविसेसयाणं सरूवमेज।
वण्णणहीणग्गहणं जीवेण य दंसणं होदि ॥ ४८२ ॥
भावानां सामान्यविशेषकानां खरूपमात्रं यत् ।
वर्णनहीनग्रहणं जीवेन च दर्शनं भवति ॥ ४८२ ।।
अर्थ-निर्विकल्परूपसे जीवके द्वारा जो सामान्यविशेषात्मक पदार्थोकी खपरसत्ताका
अवमासन होता है उसको दर्शन कहते है । भावार्थ-पदार्थोमें सामान्य विशेष दोनों ही
धर्म रहते है। किन्तु केवल सामान्य धर्मकी अपेक्षासे जो खपरसत्ताका अभासन होता
है उसको दर्शन कहते हैं। इसका शब्दोंके द्वारा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता।
इसके चारमेद है चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन अवधिदर्शन केवलदर्शन ।
प्रथम चक्षु दर्शन और अचक्षु दर्शनका खरूप कहते हैं:-
चक्खूण जं पयासइ दिस्सइ तं चक्खुदंसणं वेति ।
सेसिदियप्पयासो णायबो सो अचक्खूति ॥ ४८३॥
चक्षुषोः यत् प्रकाशते पश्यति तत् चक्षुदर्शनं युवन्ति ।
शेषेन्द्रियप्रकाशों ज्ञातव्यः स अचक्षुरिति ॥ ४८३ ॥
अर्थ-जो पदार्थ चक्षुरिन्द्रियका विषय है उसका देखना, अथवा वह" जिसके द्वारा
देखा जाय, यद्वा उसके देखनेवालेको चक्षुदर्शन कहते है। और चक्षुके सिवाय दूसरी
चार इन्द्रियोंके अथवा मनके द्वारा जो अपने २ विषयभूत पदार्थका सामान्य ग्रहण होता
है उसको अचक्षुदर्शन कहते है।
अवधिदर्शनका खरूप बताते है।
परमाणुआदियाई अंतिमखंधत्ति मुचिदवाई।
तं ओहिदसणं पुण जे पस्सइ ताई पञ्चक्खं ॥ ४८४ ॥
परमाण्वादीनि अन्तिमस्कन्धमिति मूर्तद्रव्याणि ।
तदवाधिदर्शनं पुनः यत् पश्यति तानि प्रत्यक्षम् ॥ ४८४ ॥
गोम्मटसार। १७५ अर्थ-अवधिज्ञान होनेके पूर्व समयमें अवधिक विषयभूत परमाणुसे लेकर महास्क- न्धपर्यन्त मूर्तव्यको जो सामान्यरूपसे देखता है उसको अवधिदर्शन कहते है । इस अवधिदर्शनके अनन्तर प्रत्यक्ष अवधि ज्ञान होता है। केवलदर्शनको कहते है। बहुविहबहुप्पयारा उजोवा परिमियम्मि खेतम्मि । लोगालोगवितिमिरो जो केवलदसणुजोजो ॥ ४८५॥ वहुविधबहुप्रकारा उद्योताः परिमिते क्षेत्रे । लोकालोकवितिमिरो यः केवलदर्शनोद्योतः॥४८५ ॥ अर्थ-तीन मंद मध्यम आदि अनेक अवस्थाओंकी अपेक्षा तथा चन्द्र सूर्य अदि पदार्थोकी अपेक्षा अनेक प्रकारके प्रकाश जगत्में परिमिति क्षेत्रमें रहते हैं, किन्तु जो लोक और अलोक दोनों जगह प्रकाश करता है ऐसे प्रकाशको केवलदर्शन कहते है। भावार्थ-समस्त पदार्थोंका जो सामान्य दर्शन होता है उसको केवल दर्शन कहते हैं। दर्शनमार्गणामें दो गाथाओंद्वारा जीवसंख्या बताते है । जोगे चउरक्खाणं पंचक्खाणं च खीणचरिमाणं । चक्खूणमोहिकेवलपरिमाणं ताण णाणं च ॥ ४८६ ॥ योगे चतुरक्षाणां पञ्चाक्षाणां च क्षीणचरमाणाम् । चक्षुषामवधिकेवलपरिमाणं तेषां ज्ञानं च ॥ ४८६ ॥ और अर्थ-क्षीणवताय गुणस्थानपर्यन्त जितने पञ्चेन्द्रिय है उनका तथा चतुरिन्द्रिय जीवों- की सख्याका परस्पर जोड़ देनेसे जो राशि उत्पन्न हो उतने चक्षुर्दर्शनी जीव है। और अवधिदज्ञानी तथा केवलज्ञानी जीवोंका जितना प्रमाण है उतना ही अवधिदर्शनी तथा केवलदर्शनवालोंका प्रमाण है। भावार्थ-चक्षुदर्शन दो प्रकारका होता है, एक शक्तिरूप दूसरा व्यक्तिरूप । चतुरिन्द्रिय पञ्चेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक जीवोंके शक्तिरूप चक्षुदर्शन होता है, और पर्याप्त जीवोंके व्यक्तिरूप चक्षुदर्शन होता है । इनमेंसे प्रथम शक्तिरूप चक्षुदर्शनवा- लोका प्रमाण बताते है। आवलीके असंख्यातमे भागका प्रतराङ्गुलमें भाग देनेसे जो लब्ध, आवे उसका भी जगत्पतरमें भाग देनेसे जितना लब्ध आवे उतनी राशिप्रमाण सराशि है। उसमेंसे त्रैराशिक द्वारा लब्ध चतुरिन्द्रिय पञ्चेन्द्रियोंके प्रमाणमेंसे कुछ कम करना; क्योंकि द्वीन्द्रियादि जीवोंका प्रमाण उत्तरोत्तर कुछ २ कम २ होता गया है । तथा लब्ध राशिमेंसे पर्याप्त जीवोंका प्रमाण घटाना। शेष शक्तिरूप चक्षुदर्शनवाले जीवोंका प्रमाण है । इस ही. तरह पर्याप्त स राशिमें चारका भाग देकर दोसे गुणा करनेपर जो राशि उत्पन्न हो रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। १७६ उसमें से कुछ कम व्यक्तरूप चक्षुदर्शनवालोंका प्रमाण है । अवधिज्ञानियोंकी बराबर अव- घिदर्शनवाले और केवलज्ञानियोंकी बराबर केवल दर्शनवाले जीव है। अचक्षुदर्शनवालोंका प्रमाण बताते है। एइंदियपहुदीणं खीणकसायंतणंतरासीणं । जोगो अचक्खुदंसणजीवाणं होदि परिमाणं ॥ ४८७ ॥ एकेन्द्रियप्रभृतीनां क्षीणकपायान्तानन्तराशीनाम् । योगः अचक्षुर्दर्शनजीवानां भवति परिमाणम् ।। ४८७ ॥ अर्थ-एकेन्द्रिय जीवोंसे लेकर क्षीणकषायपर्यन्त अनन्तराशिके जोड़को अचक्षुदर्श नवाले जीवोंका प्रमाण समझना चाहिये। ॥ इति दर्शनमार्गणाधिकार क्रमप्राप्त लेश्यामार्गणाका वर्णन करनेके पहले लेश्याका निरुक्तिपूर्वक लक्षण कहते हैं। लिंपइ अप्पीकीरइ एदीए णियअपुण्णपुण्णं च । जीवोत्ति होदि लेस्सा लेस्सागुणजाणयक्खादा ॥ ४८८ ॥ लिंपत्यात्मीकरोति एतया निजापुण्यपुण्यं च । जीव इति भवति लेश्या लेश्यागुणज्ञायकाख्याता ॥ ४८८॥ अर्थ लेश्याके गुणको-खरूपको जाननेवाले गणधरादि देवोंने लेश्याका खरूप ऐसा कहा है कि जिसके द्वारा जीव अपनेको पुण्य और पापसे लिप्त कर पुण्य और पापके अधीन करै उसको लेश्या कहते है। उक्त अर्थको ही स्पष्ट करते है। जोगपउत्ती लेस्सा कसायउदयाणुरंजिया होइ । तचो दोणं कजं बंधचउकं समुद्दिहं ॥ ४८९ ॥ योगप्रवृत्तिश्या कषायोदयानुरक्षिता भवति । ततः द्वयोः कार्य बन्धचतुष्कं समुद्दिष्टम् ॥ ४८९ ॥ अर्थ-कषायोदयसे अनुरक्त योगप्रवृत्तिको लेश्या कहते है । इस ही लिये दोनोंका बन्धचतुष्करूप कार्य परमागममें कहा है। भावार्थ-कषाय और योग इन दोनोंके जोड़को लेश्या कहते है। इस ही लिये लेश्याका कार्य बन्धचतुष्क है। क्योंकि बन्धचतु- एकमेंसे प्रकृति और प्रदेश-बन्ध योगके द्वारा होता है। और स्थिति अनुभागबन्ध कषा- यके द्वारा होता है। जहां पर कषायोदय नही होता वहांपर केवल योगको उपचारसे लेश्या कहते हैं। अतएव वहां पर उपचरित लेश्याका कार्य भी केवल प्रकृति प्रदेश बन्ध ही होता है, स्थिति अनुभागबन्ध नहीं होता।
गोम्मटसारः। १७७ दो गाथाओंद्वारा लेश्यामार्गणाके अधिकारोंका नामनिर्देश करते है। णिदेसवण्णपरिणामसंकमो कम्मलक्खणगदी य । सामी साहणसंखा खेत्तं फासं तदो कालो ॥ ४९० ॥ अंतरभावप्पवहु अहियारा सोलसा हवंतित्ति । लेस्साण साहणटुं जहाकम तेहिं वोच्छामि ॥ ४९१ ॥ निर्देशवर्णपरिणामसंक्रमाः कर्मलक्षणगतयश्च । खामी साधनसंख्ये क्षेत्रं स्पर्शस्ततः कालः ॥ ४९० ॥ अन्तरभावाल्पबहुत्वमधिकाराः षोडश भवन्तीति । लेश्यानां साधनार्थ यथाक्रम तैर्वक्ष्यामि ॥ ४९१ ॥ अर्थ-निर्देश, वर्ण, परिणाम, संक्रम, कर्म, लक्षण, गति, खामी, साधन, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव, अल्पवहुत्व ये लेश्याओंकी सिद्धिके लिये सोलह अधिकार परमागममें कहे हैं। इनके ही द्वारा क्रमसे लेश्याओंका निरूपण करेंगे। प्रथम निर्देशकद्वारा लेश्याका निरूपण करते है। किण्हा णीला काऊ तेऊ पम्मा य सुक्कलेस्सा य । लेस्साणं णिदेसा छच्चेव हवंति णियमेण ॥ ४९२ ॥ कृष्णा नीला कापोता तेजः पद्मा च शुक्लेश्या च । लेश्यानां निर्देशाः षट् चैव भवन्ति नियमेन ॥ ४९२ ॥ अर्थ-लेश्याओंके नियमसे ये छह निर्देश है। कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, तेजोलेश्या (पीतलेश्या), पद्मलेश्या, शुक्ललेश्या। भावार्थ-इस गाथामें कहे हुए एव शब्दके द्वारा ही नियम अर्थ सिद्ध होज़ानेसे पुनः नियम शब्दका ग्रहण करना व्यर्थ ठहरता है । अतः वह व्यर्थ ठहरकर ज्ञापन करता है कि लेश्याके यद्यपि सामान्यकी अपेक्षा छह भेद है। तथापि पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षासे लेश्याओंके असंख्यात लोक- प्रमाण भेद होते है। वर्णकी अपेक्षासे वर्णन करते है। वण्णोदयेण जणिदो सरीरवण्णो दु दवदो लेस्सा। सा सोढा किण्हादी अणेयभेया सभेयेण ॥ ४९३ ॥ वर्णोदयेन जनितः शरीरवर्णस्तु द्रव्यतो लेश्या। सा षोढा कृष्णादिः अनेकभेदा स्वभेदेन ॥ ४९३ ॥ अर्थ-वर्ण नामकर्मके उदयसे जो शरीरका वर्ण होता है उसको द्रव्यलेश्या कहते गो. २३ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। १७८ है। इसके कृष्ण नील कापोत पीत पद्म शुक्ल ये छह भेद है । तथा प्रत्येकके उत्तर भेद अनेक है। छप्पयणीलकबोदसुहेमंबुजसंखसण्णिहा वण्णे। संखेजासंखेजाणंतवियप्पा य पत्तेयं ॥ ४९४ ॥ पट्पदनीलकपोतसुहेमाम्बुजशङ्खसन्निभाः वर्णे। संख्येयासंख्येयानन्तविकल्पाश्च प्रत्येकम् ॥ ४९४ ।। अर्थ-वर्णकी अपेक्षासे अमरके समान कृष्णलेश्या, नीलमणिके ( नीलमके) समान नीललेश्या, कबूतरके समान कापोतलेश्या, सुवर्णके समान पीतलेश्या, कमलके समान पद्मलेश्या, शंखके समान शुक्ललेश्या होती है । इनमेंसे प्रत्येकके इन्द्रियोंसे प्रकट होनेकी अपेक्षा संख्यात भेद है, तथा स्कन्धकी अपेक्षा असंख्यात और परमाणुभेदकी अपेक्षा अनन्त भेद है। किस गतिमें कोनसी लेश्या होती है यह बताते है। णिरया किण्हा कप्पा भावाणुगया हु तिसुरणरतिरिये। उत्तरदेहे छक्कं भोगे रविचंदहरिदंगा ॥ ४९५ ।। निरयाः कृष्णाः कल्पाः भावानुगता हि त्रिसुरनरतिरश्चि । उत्तरदेहे षटकं भोगे रविचन्द्रहरिताड़ाः॥ ४९५ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण नारकी कृष्णवर्ण है । कल्पवासी देवोंकी द्रव्यलेश्या (शरीरका वर्ण) भावलेश्याके सदृश होता है । भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी मनुष्य तिर्यञ्च इनकी द्रव्य- लेश्या छहों होती है । तथा विक्रिया के द्वारा उत्पन्न होनेवाले शरीरका वर्ण भी छह प्रका- रमेंसे किसी एक प्रकारका होता है । उत्तम भोगभूमिवालोंका सूर्यसमान, मध्यम भोग- भूमिवालोंका चन्द्रसमान, तथा जघन्य भोगभूमिवालोंका हरितवर्ण शरीर होता है। बादराऊतेऊ सुकातेऊय वाउकायाणं । गोमुत्तमुग्गवण्णा कमसो अवचवण्णो य ॥ ४९६ ॥ बादराप्तैजसौ शुक्छतेजसौ वायुकायानाम् । गोमूत्रमुद्रवर्णी क्रमशः अव्यक्तवर्णश्च ॥ ४९६ ॥ अर्थ-क्रमसे बादर जलकायिककी द्रव्यलेश्या शुक्ल और बादर तेजस्कायिककी पीत होती है । वायुकायके तीन भेद है, घनोदधिवात, धनवात, तनुवात । इनमेंसे प्रथमका शरीर गोमूत्रवर्ण, दूसरेका शरीर मूंगसमान, और तीसरेके शरीरका वर्ण अव्यक्त है। सोसि सुहमाणं कायोदा सब विग्गहे सुका। सबो मिस्सो देहो कवोदवण्णो हवे णियमा ॥ ४९७॥ , गोम्मटसार। १७९ सर्वेपां सूक्ष्माना कापोताः सर्वे विग्रहे शुक्लाः । सर्वो मिश्रो देहः कपोतवों भवेनियमात् ॥ ४९७ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण सूक्ष्म जीवोंकी देह कपोतवर्ण है। विग्रहगतिमें सम्पूर्ण जीवोंका शरीर शुक्लवर्ण है । तथा अपनी २ पर्याप्तिके प्रारम्भ समयसे शरीरपर्याप्तिपर्यन्त समस्त जीवोंका शरीर नियमसे कपोतवर्ण होता है। इस तरह वर्णाधिकारके अनन्तर पांच गाथाओंमें परिणामाधिकारको कहते हैं । लोगाणमसंखेजा उदयठाणा कसायगा होति । तत्थ किलिहा असुहा सुहा विसुद्धा तदालावा ॥ ४९८ ॥ लोकानामसंख्येयान्युदयस्थानानि कषायगाणि भवन्ति । तत्र लिष्टान्यशुभानि शुभानि विशुद्धानि तदालापात् ॥ ९४८ ॥ अर्थ-कपायोंके उदयस्थान असंख्यात लोकप्रमाण है । इसमेंसे अशुभ लेश्याओंके सक्केशरूप स्थान यद्यपि सामान्यसे असंख्यात लोकप्रमाण है; तथापि विशेषताकी अपेक्षा असंख्यातलोक प्रमाणमें असंख्यात लोकप्रमाण राशिका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसके बहुभाग प्रमाण संक्लेशरूप स्थान है । और एक भागप्रमाण शुभ लेश्याओंके विशुद्ध स्थान- है । परन्तु सामान्यसे ये भी असंख्यात लोकप्रमाण ही है। तिचतमा तिघतरा तिचा असुहा सुहा तहा मंदा। मंदतरा मंदतमा छट्ठाणगया हु पत्तेयं ॥ ४९९ ॥ तीव्रतमारतीब्रतरास्तीवा अशुभाः शुभास्तथा मन्दाः । मन्दतरा मन्दतमाः षट्स्थानगता हि प्रत्येकम् ॥ ४९९ ॥ अर्थ-अशुभ लेश्यासम्बन्धी तीव्रतम तीव्रतर तीव्र ये तीन स्थान, और शुभलेश्या- सम्बन्धी मन्द मन्दतर मन्दतम ये तीन स्थान होते हैं, क्योंकि कृष्ण लेश्यादि छह लेश्याओंके शुभ स्थानोंमें जघन्यसे उत्कृष्टपर्यन्त और अशुभ स्थानों में उत्कृष्टसे जघन्यपर्य- न्त प्रत्येकमें पदस्थानपतित हानिवृद्धि होती है। असुहाणं वरमज्झिमअवरसे किण्हणीलकाउतिए। परिणमदि कमेणप्पा परिहाणीदो किलेसस्स ॥ ५०० ।। अशुभानां वरमध्यमावरांशे कृष्णनीलकापोतत्रिकानाम् । परिणमति क्रमेणात्मा परिहानितः क्लेशस्य ॥ ५००॥ अर्थ-कृष्ण नील कापोत इन तीन अशुभ लेश्याओंके उत्कृष्ट मध्यम जघन्य अंशरू- पमें यह आत्मा क्रमसे संक्लेशकी हानि होनेसे परिणमन करता है। भावार्थ-इस आत्माकी जिस २ तरह संक्लेशपरिणति कम होती जाती है उसी २ तरह यह आत्मा रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १८० अशुम लेश्याओं से उत्कृष्ट कृष्ण लेश्याको छोड़कर नील लेश्यारूपमें और नीलको छोड़कर कापोतरूपमें परिणमन करता है। काऊ णीलं किण्हं परिणमदि किलेसवड्डिदो अप्पा । एवं किलेसहाणीवहीदो होदि असुहतियं ॥ ५०१॥ कापोतं नीलं कृष्णं परिणमति केशवृद्धित आत्मा । एवं केशहानिवृद्धितः भवति अशुभत्रिकम् ॥ ५०१ ॥ अर्थ-उत्तरोत्तर संक्लेशपरिणामोंकी वृद्धि होनेसे यह आत्मा कापोतसे नील और नीलसे कृष्णलेश्यारूप परिणमन करता है । इस तरह यह जीव सक्लेशकी हानि और बृद्धिकी अपेक्षासे तीन अशुभ लेश्यारूप परिणमन करता है। तेऊ पडमे सुके सुहाणमवरादिअंसगे अप्पा । सुद्धिस्स य वड्डीदो हाणीदो अण्णदा होदि ॥ ५०२ ॥ तेजसि पद्मे शुळे शुभानामवराधेशगे आत्मा । शुद्धेश्च वृद्धितो हानितः अन्यथा भवति ॥ ५०२ ॥ अर्थ-उत्तरोत्तर विशुद्धिकी वृद्धि होनेसे यह आत्मा पीत पद्म शुक्ल इन तीन शुभ लेश्यामोंके जघन्य मध्यम उत्कृष्ट अंशरूपमें परिणमन करता है । तथा विशुद्धिकी हानि होनेसे उत्कृष्टसे जघन्यपर्यन्त शुक्ल पद्म पीत लेश्यारूप परिणमन करता है । इस तरह शुद्धिकी हानि वृद्धि होनेसे शुभ लेश्याओंका परिणमन होता है। उक्त परिणामाधिकारको मनमें रखकर सक्रमाधिकारका निरूपण करते हैं। संकमणं सहाणपरहाणं होदि किण्हसुकाणं । वड्डीसु हि सट्ठाणं उभयं हाणिम्मि सेस उभयेवि ॥ ५०३ ॥ संक्रमणं खस्थानपरस्थानं भवति कृष्णशुक्लयोः । वृद्धिषु हि स्वस्थानमुभयं हानौ शेषस्योमयेऽपि ॥ ५०३ ॥ अर्थ-परिणामोंकी पलटनको सक्रमण कहते है । उसके दो भेद है, एक खस्थान- संक्रमण दूसरा परस्थान-सक्रमण । किसी विवक्षित लेश्याका एक परिणाम छूटकर उस ही लेश्यारूप जब दूसरा परिणाम होता है, वहां खस्थान-संक्रमण होता है । और किसी विवक्षित लेश्याका एक परिणाम छूटकर किसी दूसरी लेश्या (विवक्षित लेश्यासे भिन्न) का जब कोई परिणाम होता है वहा परस्थान-सक्रमण होता है। कृष्ण और शुक्ललेश्यामें वृद्धिकी अपेक्षा खस्थान-संक्रमण ही होता है । और हानिकी अपेक्षा खस्थान परस्थान दोनों ही सक्रमण होते हैं। तथा शेष चार लेश्याओंमें हानि तथा वृद्धि दोनों अपेक्षाओं में स्वस्थान परस्थान दोनों संक्रमणोंके होनेकी सम्भावना है। - गौम्मटसारा भावार्थ-कृष्णलेश्या अशुभलेश्या है, इस लिये उसमें यदि सक्लेशताकी वृद्धि होगी तो कृष्णलेश्याके उत्कृष्ट अंशपर्यन्त ही होगी। तथा शुक्ललेश्या शुभलेश्या है इस लिये शुक्ल- । लेश्याम यदि शुभपरिणामोंकी वृद्धि होगी तो शुक्ललेश्याके उत्कृष्ट अंशपर्यन्त ही होगी इस लिये वृद्धिकी अपेक्षा कृष्ण और शुक्ललेश्यामें खस्थानसंक्रमण ही है । तथा कृष्ण- लेश्याम सक्लेशताकी यदि हानी हो तो कृष्णलेश्याके जघन्य अंशपर्यन्त भी होसकती है, और इसके नीचे नील कापोत लेश्यारूप भी होसकती है, इसलिये कृष्णलेश्यामें हानिकी अपेक्षा दोनों सक्रमण संभव है। इस ही तरह शुक्ललेश्यामें यदि विशुद्धताकी हानि होय तो शुक्लेश्याके जघन्य अंशपर्यन्त भी होसकती है, और उसके नीचे पद्म पीत लेश्यारूप भी होसकती है, इसलिये इसमें भी हानिकी अपेक्षा दोनों संक्रमण सम्भव है। किन्तु मध्यकी चारलेश्याओमेंसे अशुभलेश्याओंमें संक्शताकी हानि हो या वृद्धि हो दो प्रकारके सक्रमणोंमेंसे कोई भी सक्रमण होसकता है । तथा शुभलेश्याओंमें विशुद्धताकी हानि हो या वृद्धि हो दो प्रकारके सक्रमणोंमेंसे कोई भी सक्रमण हो सकता है । जैसे पद्मलेश्यामें यदि विशुद्धताकी वृद्धि हुई तो वह पद्मलेश्याके उत्कृष्ट अंशपर्यन्त भी हो सकती है इसलिये खस्थानसक्रमण, और शुक्ललेश्यारूप भी परिणाम होसकता है इसलिये परस्थान सक्रमण भी सम्भव है । इसीप्रकार पीत तथा नील और कापोतलेश्यामें भी समझना चाहिये। लेस्साणुकस्सादोवरहाणी अवरगादवरवडी । सहाणे अवरादो हाणी णियमा परहाणे ॥ ५०४ ॥ लेश्यानामुत्कृष्टादवरहानिः अवरकादवरवृद्धिः । स्वस्थाने अवरात् हानिनियमात् परस्थाने ॥ ५०४ ॥ अर्थ-खस्थानकी अपेक्षा लेश्याओंके उत्कृष्ट स्थानके समीपवर्ती स्थानका परिणाम उत्कृष्ट स्थानके परिणामसे अनंतभागहानिरूप है । तथा खस्थानकी अपेक्षासे ही जघन्य- स्थानके समीपवर्ती स्थानका परिणाम जघन्य स्थानसे अनन्तभागवृद्धिरूप है । सम्पूर्ण लेश्याओंके जघन्य स्थानसे यदि हानि हो तो नियमसे अनन्तगुणहानिरूप परस्थान सक- मण ही होता है । भावार्थ-किसी विवक्षित लेश्याके जघन्य स्थानसे हानि होकर उसके समीपवर्ती लेश्याके उत्कृष्ट स्थानरूप यदि परिणाम हो तो वहांपर परस्थान सक्रमण ही होता है, और यह स्थान अनन्तगुणहानिरूप होता है। जैसे कृष्णलेश्याके जघन्यस्थानके समीप नीललेश्याका उत्कृष्ट स्थान है, वह कृष्णलेश्याके जघन्यस्थानसे अनन्तगुणहानिरूप है। उपर्युक्त निरूपणका कारण क्या है ? यह बताते है। संकमणे छठाणा हाणिसु वड्डीसु. होति तण्णामा । परिमाणं च य पुवं उचकर्म होदि सुदणाणे ॥५०५ ॥ ? 1 '१८२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । संक्रमणे पटूस्थानानि हानिपु वृद्धिषु भवन्ति तन्नामानि । परिमाणं च च पूर्वमुक्तक्रमं भवति श्रुतज्ञाने ॥ ५०५ ॥ अर्थ-संक्रमणाधिकारमें हानि और वृद्धि दोनों अवस्थाओंमें पदस्थान होते है । इ. षट्स्थानोंके नाम तथा परिमाण पहले श्रुतज्ञानमार्गणामें जो कहे है वेही यहांपर भी सम- झना । भावार्थ-षट्स्थानोंके नाम ये है अनन्तभाग असख्यातभाग सख्यातमाग संख्या- तगुण असंख्यातगुण अनन्तगुण । इन षट्स्थानोंकी सहनानी क्रमसे उवैक चतुरंक पञ्चाङ्क षडङ्क सप्ताङ्क अष्टाक है। और यहांपर अनन्तका प्रमाण जीवराशिमात्र, असंख्यातका प्रमाण असंख्यातलोकमात्र, और संख्यातका प्रमाण उत्कृष्ट संख्यात है। लेश्याओंके कर्माधिकारको कहते हैं। पहिया जे छप्पुरिसा परिभट्टारण्णमझदेसम्हि । फलभरियरुक्खमेगं पेक्खित्वा ते विंचितंति ॥ ५०६ ॥ जिम्मूलखंघसाहुवसाहं छिउँ चिणितुं पडिदाई। खाउं फलई इदि जं मणेण वयणं हवे कम्मं ॥ ५०७॥ पथिका ये षट् पुरुषाः परिभ्रष्टा अरण्यमध्यदेशे । फलभरितवृक्षमेकं प्रेक्षित्वा ते विचिन्तयन्ति ।। ५०६॥ निर्मूलस्कन्धशाखोपशाखं छित्वा चित्वा पतितानि । खादितुं फलानि इति यन्मनसा वचनं भवेत् कर्म ॥ ५०७ ।। अर्थ-कृष्ण आदि छह लेश्यावाले छह पथिक वनके मध्यमें मार्गसे भ्रष्ट होकर फलोंसे पूर्ण किसी वृक्षको देखकर अपने २ मनमें इस प्रकार विचार करते है, और उसके अनुसार वचन कहते है। कृष्णलेश्यावाला विचार करता है और कहता है कि मै इस वृक्षको मूलसे उखाड़कर इसके फलोंका भक्षण करूंगा । और नीललेश्यावाला विचारता है और कहता है कि मै इस वृक्षको स्कन्धसे काटकर इसके फल खाऊंगा । कापोतलेश्या- वाला विचारता है और कहता है कि मैं इस वृक्षकी बड़ी २ शाखाओंको काटकर इसके फलोंको खाऊंगा। पीतलेश्यावाला विचारता है और कहता है कि मै इस वृक्षकी छोटी २ शाखाओको काटकर इसके फलोंकों खाऊंगा । पद्मलेश्यावाला विचारता है और कहता है कि मै इस वृक्षके फलोंको तोड़कर खाऊंगा। शुक्कलेश्यावाला विचारता है और कहता है कि मै इस वृक्षसे खयं टूट कर पड़े हुए फलोंको खाऊंगा। इस तरह जो मनपूर्वक वचनादिकी प्रवृत्ति होती है वह लेश्याका कर्म है । यहां पर यह एक दृष्टान्तमान दिया- गया है इसलिये इस ही तरह अन्यत्र भी समझना चाहिये।
गोम्मटसारः। १८३ लेश्याओंके लक्षणाधिकारका निरूपण करते है। चंडो ण मुचइ वरं भंडणसीलो य धम्मदयरहिओ। दुछो ण य एदि वसं लक्खणमेयं तु किण्हस्स ॥ ५०८ ॥ चण्डो न मुञ्चति वैर भण्डनशीलश्च धर्मदयारहितः। दुष्टो न चैति वशं लक्षणमेतत्तु कृष्णस्य ।। ५०८॥ अर्थ-तीन क्रोध करनेवाला हो, वैरको न छोड़े, युद्धकरनेका ( लड़नेका ) जिसका खभाव हो, धर्म और दयासे रहित हो, दुष्ट हो, जो किसीके भी वश न हो ये सब कृष्णलेश्यावालेके चिह (लक्षण) है। नीललेश्यावाले के चिह्न बताते है। मंदो बुद्धिविहीणो णिविण्णाणी य विसयलोलो य। माणी मायी य तहा आलस्सो चेव भेजो य॥५०९॥ णिहावंचणबहुलो धणधण्णे होदि तिवसण्णा य। लक्खणमेयं भणियं समासदो णीललेस्सस्स ॥५१०॥ मन्दो बुद्धिविहीनो निर्विज्ञानी च विषयलोलञ्च । मानी मायी च तथा आलस्यश्चैव भेद्यश्च ॥ ५०९॥ निद्रावञ्चनबहुलो धनधान्ये भवति तीव्रसंज्ञश्च । लक्षणमेतद्भणितं समासतो नीललेश्यस्य ॥५१०॥ अर्थ-कामकरनेमें मन्द हो, अथवा खच्छन्द हो वर्तमान कार्य करनेमें विवेकरहित हो, कला चातुर्यसे रहित हो, स्पर्शनादि पाच इन्द्रियोंके विषयोंमें लम्पट हो, मानी हो, मायाचारी हो, आलसी हो, दूसरे लोग जिसके अभिप्रायको सहसा न जान सके, तथा जो अति निद्राल और दूसरोंको ठगनेमें अतिदक्ष हो, और धनधान्यके विषयमें जिसकी अतितीव्र लालसा हो, ये नीललेश्यावालेके संक्षेपसे चिह्न वताये हैं। तीन गाथाओंमें कपोतलेश्यावालेका लक्षण कहते है। रूसइ जिंदइ अण्णे दूसइ बहुसो य सोयमयवहुलो। असुयइ परिभवइ परं पसंसये अप्पयं बहुसो ॥५११॥ ण य पत्तियइ परं सो अप्पाणं यिव परं पि मण्णंतो। थूसइ अभित्थुवंतो ण य जाणइ हाणिवहिं या ॥ ५१२ ॥ मरणं पत्थेइ रणे देइ सुवहुगं वि थुधमाणो दु। ण गणइ कजाकजं लक्खणमेयं तु काउस्स ।। ५१३ ॥
, - १८४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । रुष्यति निन्दति अन्यं दुष्यति बहुशश्च शोकभयबहुलः । असूयति परिभवति परं प्रशंसति आत्मानं बहुशः ॥ ५११॥ न च प्रत्येति परं स आत्मानमिव परमपि मन्यमानः । तुष्यति अभिष्टुवतो न च जानाति हानिवृद्धी वा ॥ ५१२ ॥ मरणं प्रार्थयते रणे ददाति सुबहुकमपि स्तूयमानस्तु । न गणयति कार्याकार्य लक्षणमेतत्तु कापोतस्य ॥ ५१३ ।। अर्थ-दूसरेके ऊपर क्रोध करना, दूसरेकी निन्दा करना, अनेक प्रकारसे दूसरोंको दुःख देना अथवा औरोंसे वैर करना, शोकाकुलित तथा भयग्रस्त होना, दूसरेके ऐश्वर्या- दिको सहन न करसकना, दूसरेका तिरस्कार करना, अपनी नानाप्रकारसे प्रशंसा करना, दूसरेके ऊपर विश्वास न करना, अपनेसमान दूसरों को भी मानना, स्तुति करनेवाले पर सतुष्ट होजाना, अपनी हानि वृद्धिको कुछ भी न समझना, रणमें मरनेकी प्रार्थना करना, स्तुति करनेवालेको खूब धन दे डालना, अपने कार्य अकार्यकी कुछ भी गणना न करना, ये सब कपोतलेश्यावालेके चिह है। पीतलेश्यावालेके चिह्न बताते है। जाणइ कज्जाकजं सेयमसेयं च सवसमपासी। दयदाणरदो य मिदू लक्षणमेयं तु तेउस्स ॥ ५१४ ॥ जानाति कार्याकार्य सेव्यमसेव्यं च सर्वसमदर्शी । दयादानरतश्च मृदुः लक्षणमेतत्तु तेजसः॥ ५१४ ॥ अर्थ-अपने कार्य अकार्य सेव्य असेव्यको समझनेवाला हो, सबके विषयमें समदर्शी हो, दया और दानमें तत्पर हो, कोमलपरिणामी हो, ये पीतलेश्यावालेके चिह्न है । पद्मलेश्यावालेके लक्षण बताते है। चागी भहो चोक्खो उजवकम्मो य खमदि बहुगं पि । साहुगुरुपूजणरदो लक्खणमेयं तु पम्मस्स ॥ ५१५ ॥ त्यागी भद्रः सुकरः उद्युक्तकर्मा च क्षमते बहुकमपि । साधुगुरुपूजनरतो लक्षणमेतत्तु पद्मस्य ॥ ५१५ ॥ अर्थ-दान देनेवाला हो, भद्रपरिणामी हो, जिसका उत्तम कार्य करनेका खभाव हो, इष्ट तथा अनिष्ट उपद्रवोंको सहन करनेवाला हो, मुनि गुरु आदिकी पूजामें प्रीतियुक्त हो, ये सब पालेश्यावालेके लक्षण है।
गोम्मटसारः। १८५ शुक्ललेश्यावालेके लक्षण बताते है। ण य कुणइ पक्खवायं णवि य णिदाणं समो य सबेसि । णत्थि य रायबोसा होवि य सुकलेस्सस्स ॥ ५१६ ॥ न च करोति पक्षपातं नापि च निदानं समश्च सर्वेषाम् । नास्ति च रागद्वेषौ स्नेहोऽपि च शुक्ललेश्यस्य ॥ ५१६॥ अर्थ-पक्षपात न करना, निदानको न बांधना, सब जीवोंमें समदर्शी होना, इष्टसे राग और अनिष्टसे द्वेष न करना, स्त्री पुत्र मित्र आदिमें खेहरहित होना, ये सब शुक्कले- श्यावालेके लक्षण है। क्रमप्राप्त गति अधिकारका वर्णन करते है। लेस्साणं खलु अंसा छवीसा होंति तत्थ मज्झिमया । आउगवंधणजोगा अढवगरिसकालभवा ॥ ५१७ ॥ लेश्यानां खलु अंशाः पडूविंशतिः भवन्ति तत्र मध्यमकाः। आयुष्कबन्धनयोग्या अष्ट अष्टापकर्षकालभवाः ।। ५१७ ॥ अर्थ-लेश्याओंके कुल छब्बीस अंश है, इनमेंसे मध्यके आठ अंश जो कि आठ अपकर्ष कालमें होते है वे ही आयुकर्मके बन्धके योग्य होते है । भावार्थ जैसे किसी कर्मभूमिया मनुष्य या तिर्यचकी भुज्यमान आयुका प्रमाण छह हजार इकसठ है । इसके तीन भागमेंसे दो भाग वीतने पर और एक भाग शेष रहने पर, इस एक भागके प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्तपर्यन्त प्रथम अपकर्षका काल कहा जाता है । इस अपकर्ष कालमें परमवसम्बन्धी आयुका बन्ध होता है । यदि यहा पर भी बन्ध न हो तो अव- शिष्ट एक त्रितीय भागमैसे भी दो भाग वीतने पर और एक भाग शेष रहने पर प्रथम समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त द्वितीय अपकर्ष कालमें परभवसम्बन्धी आयुका बन्ध होता है । यदि यहा पर भी बंध न हो तो तीसरे अपकर्षमें होता है । और तीसरेमे भी न हो तो चौथे पाचमे छडे सातमे आठमे अपकर्षमेंसे किसी भी अपकर्षमें परमवस- म्बन्धी आयुका बन्ध होता है । यदि किसी भी अपकर्षमें बन्ध न हो तो असक्षेपाद्धा (भुज्यमान आयुका अन्तिम आवलीके असख्यातमे भागप्रमाण काल ) से पूर्वके अन्तर्मु- हूर्तमें अवश्य ही आयुका बन्ध होता है। मुज्यमान आयुके तीन भागोमेंसे दो भाग वीतने पर अवशिष्ट एक भागके प्रथम अन्तर्मुहूर्त प्रमाण कालको अपकर्ष कहते है । इस अपकर्ष कालमें लेश्याओंके आठ मध्य- माशोंमेंसे जो अंश होगा उसके अनुसार आयुका बन्ध होगा। तथा आयुबन्धके योग्य आठ मध्यमाशोंमेंसे कोई अंश जिस अपकर्षमे होगा उस ही अपकर्षमें आयुका बन्ध होगा, दूसरे कालमें नहीं। गो. २४ १८६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । जीवोंके दो भेद है एक सोपक्रमायुष्क दूसरा अनुपक्रमायुष्क । जिनका विषभक्षणादि निमित्तके द्वारा मरण संभव हो उनको सोपक्रक्रमायुष्क कहते है । और इससे जो रहित है उनको अनुपक्रमायुष्क कहते हैं। जो सोपक्रमायुष्क है उनके तो उक्त रीतिसे ही पर- भवसम्बन्धी आयुका बन्ध होता है । किन्तु अनुपक्रमायुप्कोंमें कुछ भेद है, वह यह है कि अनुपक्रमायुष्कोंमें जो देव और नारकी है वे अपनी आयुके अन्तिम छह महीना शेष रहने पर आयुके बन्ध करनेके योग्य होते है। इसमें भी छह महीनाके आठ अपकर्पका- लमें ही आयुका बंध करते है-दूसरे कालमें नहीं । जो भोगभूमिया मनुष्य या तिर्यंच है वे अपनी आयुके नौ महीना शेष रहने पर नौ महीनाके आठ अपकर्षांमसे किसी भी अपकर्षमें आयुका बन्ध करते है । इस प्रकार ये लेश्याओंके आठ अंश आयुबन्धको कारण है । जिस अपकर्षमें जैसा जो अंश हो उसके अनुसार आयुका वध होता है शेष अठारह अंशोंका कार्य बताते है। सेसद्वारस अंसा चउगइगमणस्स कारणा होति। सुकुक्कस्संसमुदा सबटुं जांति खलु जीवा ॥ ५१८ ॥ शेषाष्टादशांशाश्चतुर्गतिगमनस्य कारणानि भवन्ति । शुक्लोत्कृष्टांशमृता सर्वार्थ यान्ति खलु जीवाः ॥ ५१८ ॥ अर्थ-अपकर्षकालमें होनेवाले लेश्याओंके आठ मध्यमांशोंको छोड़कर बाकीके अठा- रह अंश चारो गतियोंके गमनको कारण होते है । तथा शुक्लेश्याके उत्कृष्ट अंशसे, संयुक्त जीव मरकर नियमसे सर्वार्थसिद्धिको जाते है। अवरंसमुदा होति सदारदुगे मज्झिमंसगेण मुदा। आणदकप्पादुवरि सबटाइल्लगे होंति ॥ ५१९ ॥ अवरांशमृता भवन्ति शतारद्विके मध्यमांशकेन मृताः। आनतकल्पादुपरि सर्वार्थादिमे भवन्ति ।। ५१९ ।। अर्थ-शुक्ललेश्याके जघन्य अंशोंसे संयुक्त जीव मरकर शतार सहस्रार खर्गपर्यन्त जाते है । और मध्यमांशोंकरके सहित मरा हुआ जीव 'सर्वार्थसिद्धिसे पूर्वपूर्वके तथा आनत खर्गसे ऊपरके समस्त विमानोंमेंसे यथा सम्भव विमानमें उत्पन्न होता है। और आनत खर्गमें भी उत्पन्न होता है। पम्मुकस्संसमुदा जीवा उवजांति खलु सहस्सारं । अवरंसमुदा जीवा सणकुमारं च माहिंदं ॥ ५२० ॥ पद्मोत्कृष्टांशमृता जीवा उपयांति खलु सहस्रारम् । अवरांशमृता जीवाः सनकुमारं च माहेन्द्रम् ॥ ५२०॥ - . गोम्मटसार। १८७ अर्थ-पालेश्याके उत्कृष्ट अंशोंके साथ मरे हुए जीव नियमसे सहस्रार वर्गको प्राप्त होते है । और पद्म लेश्याके जघन्य अंशोंके साथ मरे हुए जीव सनत्कुमार और माहेन्द्र खर्गको प्राप्त होते है। मझिमशेण मुदा तम्मझ जांति तेउजेडसुदा । साणकुमारमाहिदंतिमचर्किदसेदिम्मि ॥ ५२१ ॥ मध्यमांशेन मृता तन्मध्यं यान्ति तेजोज्येष्ठमृताः। सनत्कुमारमाहेन्द्रान्तिमचक्रेन्द्रप्रेण्याम् ॥ ५२१ ॥ अर्थ-पद्मलेश्याके मध्यम अंशोके साथ मरे हुए जीव सनत्कुमार माहेन्द्र वर्गके पर और सहसार खर्गके नीचे २ के विमानोमें उत्पन्न होते है । पीतलेश्याके उत्कृष्ट अंशोके साथ भरे हुए जीव सनत्कुमार माहेन्द्र खर्गके अन्तिम पटलमें चक्रनामक इन्द्रक सम्बन्धी श्रेणीबद्ध विमानमें उत्पन्न होते है। अवरंसमुदा सोहम्मीसाणादिमउडम्मि सेदिम्मि। मज्झिमसेण मुदा विमलविमाणादिवलमहे ॥ ५२२ ॥ अवराशमृताः सौधर्मेशानादिमा श्रेण्याम् । मध्यमांशेन मृताः विमलविमानादिबलभद्रे ॥ ५२२ ।। अर्थ-पीतलेश्याके जघन्य अंशोके साथ मरा हुआ जीव सौधर्म ईशान खर्गके ऋतु (जु)नामक इन्द्रक विमानमें अथवा श्रेणीबद्ध विमानमें उत्पन्न होता है। पीत लेश्याके मध्यम अंशोके साथ मरा हुमा जीव सौधर्म ईशान खर्गके दूसरे पटलके विमल नामक इन्द्रक विमानसे लेकर सनत्कुमार माहेन्द्र खर्गके द्विचरम पटलके (अन्तिम पटलसे पूर्वका पटल) बलभद्रनामक इन्द्रक विमानपर्यन्त उत्पन्न होता है। किण्हवरसेण मुदा अवधिट्ठाणम्मि अवरअंसमुदा। पंचमचरिमतिमिस्से मज्झे मज्झेण जायते ॥ ५२३ ॥ कृष्णवरांशेन मृता अवधिस्थाने अवरांशमृताः। पञ्चमचरमतिमिने मध्ये मध्येन जायन्ते ॥ ५२३॥ अर्थ-कृष्णलेश्याके उत्कृष्ट अंशोंके साथ मरे हुए जीव सातमी पृथ्वीके अवधिस्थान तामक इन्द्रक बिलमें उत्पन्न होते हैं । जघन्य अंशोंके साथ मरे हुए जीव पाचमी पृथ्वीके अन्तिम पटलके तिमिश्रनामक इन्द्रक बिलमें उत्पन्न होते है । कृष्णलेश्याके मध्यम अंशों- के साथ मरे हुए जीव दोनोंके ( सातमी पृथ्वीका अवधिस्थान नामक इन्द्रकविल और पाचमी पृथ्वीके अन्तिम पटलसम्बन्धी तिमिश्र बिल) मध्यस्थानमें यथासम्भव उत्पन्न - रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । १८८ नीलुकस्संसमुदा पंचम अंधिंदयम्मि अवरमुदा। वालुकसंपज्जलिदे मज्झे मज्झेण जायते ॥ ५२४ ॥ नीलोत्कृष्टांशमृताः पञ्चमान्धेन्द्र के अवरमृताः। वालुकासंप्रज्वलिते मध्ये मध्येन जायन्ते ।। ५२४ ॥ अर्थ-नीललेश्याके उत्कृष्ट अंशोके साथ मरे हुए जीव पाचमी पृथ्वीके द्विचरम पटलसम्बन्धी अन्ध्रनामक इन्द्रकबिलमें उत्पन्न होते है । कोई २ पाचमे पटल में भी उत्पन्न होते है । इतना विशेष और भी है कि कृष्णलेश्याके जघन्य अंशवाले भी जीव मरकर पांचमी पृथ्वीके अन्तिम पटलमें उत्पन्न होते है । नीललेश्याके जघन्य अंशवाले जीव भरकर तीसरी पृथ्वीके अन्तिम पटलसम्बन्धी संप्रज्वलित नामक इन्द्रकविलमे उत्पन्न होते, हैं। नीललेश्याके मध्यम अंशोवाले जीव मरकर तीसरी पृथ्वीक संप्रज्वलित नामक इन्द्रक- बिलके आगे और पाचमी पृथ्वीके अन्ध्रनामक इन्द्रकविलके ऊपर ऊपर जितने पटल और इन्द्रक है उनमें यथायोग्य उत्पन्न होते है। वरकाओदंसमुदा संजलिदं जांति तदियणिरयस्स। सीमंतं अवरमुदा मज्झे मज्झेण जायते ॥ ५२५ ॥ वरकापोतांशमृताः संज्वलितं यान्ति तृतीयनिरयस्य । सीमन्तमवरमृता मध्ये मध्येन जायन्ते ॥ ५२५ ॥ अर्थ-~-कापोतलेश्याके उत्कृष्ट अंशोंके साथ मरे हुए जीव तीसरी पृथ्वीके द्विचरम पटलसम्बन्धी संज्वलित नामक इन्द्रकविलमें उत्पन्न होते है । कोई २ अन्तिम पटलस- म्बन्धी संप्रज्वलित नामक इन्द्रकबिलमें भी उत्पन्न होते है । कापोतलेश्याके जघन्य अंशोंके साथ मरे हुए जीव प्रथम पृथ्वीके सीमन्त नामक प्रथम इन्द्रकविलमें उत्पन्न होते हैं । और मध्यम अंशोके साथ मरे हुए जीव प्रथम पृथ्वीके सीमन्त नामक प्रथम इन्द्रकविलसे आगे और तीसरी पृथ्वीके द्विचरम पटलसम्बन्धी सज्वलित नामक इन्द्रक- बिलके ऊपर तीसरी पृथ्वीके सात पटल, दूसरी पृथ्वीके ग्यारह पटल और प्रथम पृथ्वीके बारह पटलोंमें यथायोग्य उत्पन्न होते है। किण्हचउकाणं पुण मज्झंसमुदा हु भवणगादितिये। पुढवीआउवणप्फदिजीवेसु हवंति खलु जीवा ॥ ५२६ ॥ कृष्णचतुष्काणां पुनः मध्यांशमृता हि भवनकादित्रये । पृथिव्यवनस्पतिजीवेषु भवन्ति खलु जीवाः ।। ५२६ ॥ अर्थ-कृष्ण नील कपोत इन तीन लेश्याओंके मध्यम अंशोंके साथ मरे हुए कर्म- भूमियां मिथ्याइष्टि तियेच वा मनुष्य, और पीतलेश्याके मध्यम अंशोंके साथ मरे हुए .
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गोम्मटसारः।
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भोगभूमियां मिथ्यादृष्टि तियेच वा मनुष्य, भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी देवोंमें उत्पन्न
होते है । तथा कृष्ण नील कापोत पीत लेश्याके मध्यम अंशोंके साथ मरे हुए तिर्यच
वा मनुष्य भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी वा सौधर्म ईशान खर्गके मिथ्यादृष्टि देव, बादर
पर्याप्त पृथ्वीकायिक जलकायिक वनस्पतिकायिक जीवॉमें उत्पन्न होते है।
किण्हतियाणं मज्झिमसमुदा तेउवाउवियलेसु ।
सुरणिरया सगलेस्सहिं परतिरियं जांति सगजोग्गं ॥ ५२७ ॥
कृष्णत्रयाणां मध्यमांशमृतातेजोवायुविकलेषु ।
सुरनिरयाः स्वकलेश्यामिः नरतिर्यञ्चं यान्ति स्वकयोग्यम् ॥ ५२७ ॥
अर्थ-कृष्ण नील कापोत इन तीन लेश्याओंके मध्यम अंशोके साथ मरे हुए तियेच
ग्रा मनुष्य, तेजकायिक वातकायिक विकलत्रय असंज्ञी पंचेन्द्रिय साधारण-वनस्पति इनमें
यथायोग्य उत्पन्न होते है। और भवनत्रय आदि सर्वार्थसिद्धिपर्यन्तके देव तथा सातो
पृथ्वीसम्बन्धी नारकी अपनी २ लेश्याके अनुसार मनुष्यगति या तियेचगतिको प्राप्त होते
है। भावार्थ-जिस गतिसम्बन्धी आयुका बन्ध हुआ हो उस ही गतिमें मरण समयपर
होनेवाली लेश्याके अनुसार उत्पन्न होता है। जैसे मनुष्यअवस्थामें किसीने देवायुका बन्ध
किया और मरणसमयपर उसके कृष्ण आदि अशुभ लेश्या हुई तो वह मरण करके भवन-
त्रिकमें उत्पन्न होगा-उत्कृष्ट देवोमें नहीं होगा। यदि शुभ लेश्या हुई तो यथायोग्य कल्प-
वासियोंमें भी उत्पन्न होगा।
क्रमप्राप्त खामी अधिकारका वर्णन करते है।
काऊ काऊ काऊ णीला णीला य णीलकिण्हा य।
किण्हा य परमकिण्हा लेस्सा पढमादिपुढवीणं ॥ ५२८ ॥
कापोता कापोता कापोता नीला नीला च नीलकृष्णे च।
कृष्णा च परमकृष्णा लेश्या प्रथमादिपृथिवीनाम् ॥ ५२८॥
अर्थ-प्रथम पृथ्वीमें कपोतलेश्याका जघन्य अंश है। दूसरी पृथ्वीमें कपोतलेश्याका
मध्यम अंश है। तीसरी पृथ्वीमें कपोतलेश्याका उत्कृष्ट अंश और नीललेश्याका जघन्य
अंश है। चौथी पृथ्वीमें नीललेश्याका मध्यम अंश है। पाचमी पृथ्वीमें नीललेश्याका
उत्कृष्ट अंश और कृष्णलेश्याका जघन्य अंश है । छठ्ठी पृथ्वीमें कृष्णलेश्याका मध्यम
अंश है। सातमी पृथ्वीमें कृष्णलेश्याका उत्कृष्ट अश है । भावार्थ खामी अधिकारमें
भावलेश्याकी अपेक्षा ही कथन है, इस लिये उपर्युक प्रकारसे नरकोंमें भी भावलेश्या
ही समझना।
णरतिरियाणं ओपो इगिविगले तिणि चउ असण्णिस्स ।
सण्णिअपुण्णगमिच्छे सासणसम्मेवि असुहतियं ॥ ५२९ ॥
१९० रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । नरतिरश्चामोध एकविकले तिखः चततः असंजिनः । संश्यपूर्णकमिथ्यात्वे सासनसम्यक्त्वेपि अशुभत्रिकम् ॥ ५२९ ।। अर्थ-मनुष्य और तिर्यंचोंके सामान्यसे छहों लेश्या होती हैं । एकेन्द्रिय और विकलत्रय (द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय) जीवोंके कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्या ही होती है। असंज्ञी पञ्चेन्द्रिय पर्याप्त जीवोंके कृष्ण आदि चार लेश्या होती है। क्योंकि असंज्ञी पंचेन्द्रिय कपोतलेश्यावाले जीव मरणकर पहले नरकको जाता है। तथा तेजोले- श्यासहित मरनेसे भवनवासी और व्यन्तर देवोंमें उत्पन्न होता है । कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्यासहित मरनेसे यथायोग्य मनुष्य या तियैचोंमें उत्पन्न होता है । सज्ञी लब्ध्य- पर्याप्तक तथा अपि शब्दसे असंज्ञी लब्ध्यपर्याप्तक और सासादन गुणस्थानवर्ती निर्वृत्यप-, यति तथा भवनत्रिक जीवोंमें कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्या ही होती है। उपशम सम्य. पत्वकी विराधना करके सासादन गुणस्थानवाले जीवके अपर्याप्त अवस्थामें तीन अशुभ लेश्या ही होती है। भोगा पुण्णगसम्मे काउस्स जहण्ण्यिं हवे णियमा। सम्मे वा मिच्छे वा पज्जत्ते तिषिण सुहलेस्सा ॥ ५३०॥ भोगापूर्णकसम्यक्त्वे कापोतस्य जघन्यकं भवेत् नियमात् । सम्यक्त्वे वा मिथ्यात्वे वा पर्याप्ते तिस्रः शुभलेश्याः ॥ ५३०॥ अर्थ-भोगभूमियां नित्यपर्याप्तक सम्यग्दृष्टि जीवोंमें कापोतलेश्याका जघन्य अंश होता है । तथा भोगमूमिया सम्यग्दृष्टि या मिथ्यादृष्टि जीवोंके पर्याप्त अवस्थामें पीत आदि तीन शुभ लेश्या ही होती हैं । भावार्थ-पहले मनुष्य या तियेच आयुका बंध करके पीछे क्षायिक या वेदक सम्यक्त्वको खीकार करके यदि कोई कर्मभूमिज मनुष्य या तिर्यच सम्यक्त्वसहित' मरण करे तो वह भोगभूमिमें उत्पन्न होता है, वहा पर उसके कापोत लेश्याके जघन्य अंशरूप सक्लेश परिणाम होते है । परन्तु पर्याप्त अवास्थामें सम्यग्दृष्टि या मिथ्यादृष्टिके शुभ लेश्या ही होती है। अयदोत्ति छ लेस्साओ.सुहतियलेस्सा हु देसविरदतिये । तत्तो सुक्का लेस्सा अजोगिठाणं अलेस्स तु॥ ५३१॥ असंयत इति षड् लेश्याः शुभत्रयलेश्या हि देशविरतत्रये । ततः शुक्ला लेश्या अयोगिस्थानमलेश्यं तु ।। ५३१ ॥ अर्थ, चतुर्थ गुणस्थानपर्यन्त छहों लेश्या होती है। तथा देशविरत प्रमत्तविरत अप्रमत्त विरत इन तीन गुणस्थानोंमें, तीन शुमलेश्या ही होती है। किन्तु इसके आगे गोम्मटसार। १९१ अपूर्वकरणसे लेकर सयोगकेवलीपर्यन्त एक शुक्कलेश्या ही होती है । और अयोगकेवली गुणस्थान लेश्यारहित है। गठुकसाये लेस्सा उच्चदि सा भूदपुवगदिणाया। अहवा जोगपउत्ती मुक्खोत्ति तहिं हवे लेस्सा ॥ ५३२॥ नष्टकषाये लेश्या उच्यते सा भूतपूर्वगतिन्यायात् । अथवा योगप्रवृत्तिः मुख्यति तन भवेल्लेश्या ।। ५३२ ।। अर्थ-अकषाय जीवोंके जो लेश्या बताई है वह भूतपूर्वप्रज्ञापन नयकी अपेक्षासे बताई है । अथवा, योगकी प्रवृत्तिको लेश्या कहते है, इस अपेक्षासे वहां पर मुख्यरूपसे भी लेश्या है, क्योंकि वहां पर योगका सद्भाव है । तिण्हं दोण्हं दोण्हं छण्हं दोण्हं च तेरसण्हं च । एत्तो य चोइसण्हं लेस्सा भवणादिदेवाणं ॥ ५३३ ॥ तेऊ तेऊ तेऊ पम्मा पम्मा य पम्मसुक्का य । सुक्का य परमसुक्का भवणतिया पुण्णगे असुहा ॥ ५३४ ॥ त्रयाणां द्वयोर्द्वयोः षण्णां द्वयोश्च त्रयोदशानां च । एतस्माच चतुर्दशानां लेश्या भवनादिदेवानाम् ॥ ५३३ ॥ तेजतेजस्तेजः पद्मा पद्मा च पद्मशुक्ले च । शुक्ला च परमशुक्ला भवनत्रिका अपूर्णके अशुभाः॥ ५३४ ॥ अर्थ-भवनवासी व्यन्तर ज्योतिषी इन तीन देवोंके पीतलेश्याका जघन्य अंश है। सौधर्म ईशान खर्गवाले देवोंके पीतलेश्याका मध्यम अंश है । सनत्कुमार माहेन्द्र वर्गवा- लोंके पीतलेश्याका उत्कृष्ट अंश और पद्मलेश्याका जघन्य अश है। ब्रह्म ब्रह्मोचर लांतव कापिष्ठ शुक्र महाशुक्र इन छह खर्गवालोंके पालेश्याका मध्यम अंश है । शतार सहस्रार खर्गवालोंके पालेश्याका उत्कृष्ट अंश और शुक्ललेश्याका जघन्य अंश है । आनत प्राणत आरण अच्युत तथा नव अवेयक इन तेरह वर्गवाले देवोंके शुक्ललेश्याका मध्यम अंश है। इसके ऊपर नव अनुदिश तथा पाच अनुत्तर इन चौदह विमानवाले देवोंके शुक्ल लेश्याका उत्कृष्ट अंश होता है । भवनवासी आदि तीन देवोंके अपर्यास अवस्थामें कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्या ही होती है । भावार्थ-जब भवनत्रिक देवोंके अपर्याप्त अव- स्थामें अशुभ तीन लेश्या और पर्याप्त अवस्थामें पीत लेश्याका जघन्य अंश बताया इससे मालम होता है कि शेष वैमानिक देवोंके पर्याप्त और अपर्याप्त अवस्थामें लेश्या समान ही होती है।
, १९२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । इस प्रकार खामी अधिकारका वर्णन करके साधन अधिकारका वर्णन करते है। वण्णोदयसंपादितसरीरवण्णो दु दवदो लेस्सा। मोहुदयखओवसमोवसमखयजजीवफंदणं भावो ॥ ५३५ ॥ वर्णोदयसंपादितशरीरवर्णस्तु द्रव्यतो लेश्या । मोहोदयक्षयोपशमोपशमक्षयजजीवस्पन्दो भावः॥ ५३५ ।। अर्थ---वर्णनामकर्मके उदयसे जो शरीरका वर्ण (रंग) होता है उसको द्रव्यलेश्या कहते है । मोहनीय कर्मके उदय या क्षयोपशम या उपशम या क्षयसे जो जीवके प्रदे- शोंकी चंचलता होती है उसको भावलेश्या कहते हैं। भावार्थ-द्रव्यलेश्याका साधन वर्णनामकर्मका उदय है । भावलेश्याका साधन असंयतपर्यन्त चार गुणस्थानोंमें मोहनीय, कर्मका उदय, और देशविरत आदि तीन गुणस्थानों में मोहनीय कर्मका क्षयोपशम, उपश-. मश्रेणिमें मोहनीय कर्मका उपशम, तथा क्षपकश्रेणिमें मोहनीय कर्मका क्षय होता है। क्रमप्राप्त संख्या अधिकारका वर्णन करते है। किण्हादिरासिमावलिअसंखभागेण भजिय पविभत्ते। हीणकमा कालं वा अस्सिय दवा दु भजिदचा ॥ ५३६ ॥ कृष्णादिराशिमावल्यसंख्यभागेन भक्त्वा प्रविभक्त । हीनक्रमाः कालं वा आश्रित्य द्रव्याणि तु भक्तव्यानि ।। ५३६ ।। अर्थ-संसारी जीवराशिमेंसे तीन शुभ लेश्यावाले जीवोंका प्रमाण घटानेसे जो शेष रहै उतना कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्यावाले जीवोंका प्रमाण है। यह प्रमाण ससारी जीवराशिसे कुछ कम होता है । इस राशिमें आवलीके असख्यातमे भागका भाग देकर एक भागको अलग रखकर शेष बहुमागके तीन समान भाग करना । तथा शेष-अलग रक्खे हुए एक भागमें आवलीके असख्यातमे भागका भाग देकर बहुभागको तीन समान भागोंमेंसे एक भागमें मिलानेसे कृष्णलेश्यावाले जीवोंका प्रमाण होता है। और शेष एक भागमें फिर आवलीके असख्यातमे भागका भाग देनेसे लब्ध बहुभागको तीन समान भागोंमेंसे दूसरे भागमें मिलानेसे नीललेश्यावाले जीवोंका प्रमाण होता है। और अवशिष्ट एक भागको तीसरे मागमें मिलानेसे कापोतलेश्यावाले जीवोंका प्रमाण होता है । इस प्रकार अशुभ लेश्यावालोंका द्रव्यकी अपेक्षासे प्रमाण कहा। यह प्रमाण उत्तरोतर कुछ २ घटता २ है। अब कालकी अपेक्षासे प्रमाण बताते है। कृष्ण नील कापोत तीन लेश्याओंका काल मिलानेसे जो अन्तर्मुहुर्तमात्र काल होता है, उसमें भावलीके असख्यातमे भागका भाग देना। इसमें एक भागको जुदा रखना और बहुभागके तीन समान भाग करना । तथा अवशिष्ट एक भागमें आवलीके असख्यातमे भागका फिर भाग देना । लब्ध एक भागको thomaan गोम्मटसारः। १९३ अलग रखकर बहुभागको तीन समान भागोंमेंसे एक भागमें मिलानेसे जो प्रमाण हो वह कृष्णलेश्याका काल है । लब्ध एक भागमें फिर आवलीके असख्यातमे भागका भाग देनेसे लब्ध बहुभागको तीन समान भागोंमसे दूसरे भागमें मिलानेसे जो प्रमाण हो वह नीललेश्याका काल है। अवशिष्ट एक भागको अवशिष्ट तीसरे समान भागमें मिलानेसे जो प्रमाण हो वह कापोतलेश्याका काल है । इस प्रकार तीन अशुभ लेश्याओंके कालका प्रमाण भी उत्तरोत्तर अल्प २ समझना चाहिये। खेत्तादो असुहतिया अणंतलोगा कमेण परिहीणा। कालादोतीदादो अणंतगुणिदा कमा हीणा ।। ५३७ ।। क्षेत्रतः अशुभत्रिका अनन्तलोकाः क्रमेण परिहीनाः । कालादतीतादनन्तगुणिताः क्रमाद्धीनाः ॥ ५३७ ॥ अर्थ-क्षेत्रप्रमाणकी अपेक्षा तीन अशुभलेश्यावाले जीव लोकाकाशके प्रदेशोंसे अन- न्तगुणे है, परन्तु उत्तरोत्तर क्रमसे हीन २ है । कृष्ण लेश्यावालोंसे कुछ कम नील लेश्या- वाले जीव है और नीललेश्यावालोंसे कुछ कम कापोत लेश्यावाले जीव है । तथा कालकी अपेक्षा अशुभ लेश्यावालोंका प्रमाण, भूतकालके जितने समय है उससे अनन्तगुणा है। यह प्रमाण भी उत्तरोचर हीनक्रम समझना चाहिये। केवलणाणाणंतिमभागा भावादु किण्हतियजीवा । तेउतिया संखेजा संखासंखेजभागकमा ॥ ५३८ ॥ केवलज्ञानानन्तिमभागा भावातु कृष्णत्रिकजीवाः । तेजस्त्रिका असंख्येयाः संख्यासंख्येयभागक्रमाः ॥ ५३८॥ अर्थ-भावकी अपेक्षा तीन अशुभ लेश्यावाले जीव, केवल ज्ञानके जितने अविभाग- प्रतिच्छेद है उसके अनन्तमे भागप्रमाण है । यहा पर भी पूर्ववत् उत्तरोत्तर हीनक्रम सम- झना चाहिये । पीत आदि तीन शुभ लेश्यावालोंका प्रमाण सामान्यसे असख्यात है। तथापि पीतलेश्यावालोंसे सख्यातमे भाग पद्मलेश्यावाले है। और पद्मलेश्यावालोंसे अस- ख्यातमे भाग शुक्ललेश्यावाले जीव है। क्षेत्रप्रमाणकी अपेक्षा तीन शुभ लेश्यावालोंका प्रमाण बताते हैं । जोइसियादो अहिया तिरिक्खसण्णिस्स संखमागो दु । सूइस्स अंगुलस्स य असंखभागं तु तेउतियं ॥ ५३९ ॥ ज्योतिष्कतः अधिकाः तिर्यक्संज्ञिनः संख्यभागस्तु । सूचेरकुलस्यं च असंख्यभागं तु तेजस्रयम् ॥ ५३९ ॥ अर्थ-ज्योतिषी देवोंके प्रमाणसे कुछ अधिक तेजोलेश्यावाले जीव है । और तेजो- गो. २५
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
लेश्यावाले संज्ञी तिर्यच जीवोंके प्रमाणसे सख्यातगुणे कम पद्मलेश्यावाले जीव हैं। और
सूच्यङ्गुलके असंख्यातमे भाग शुक्ललेश्यावाले जीव है । भावार्थ-पैंसठ हजार पांचसौ
छत्तीस प्रतरामुलका भाग जगत्प्रतरको देनेसे जो प्रमाण शेष रहे उतने ज्योतिपी देव
है। और पांच वार सख्यातसे गुणित पण्णट्ठी प्रमाण प्रतरामुलका भाग जगत्पतरको देनेसे
जो प्रमाण रहे उतने तियेच, और सख्यात मनुष्य, इन दोनो राशियोंके जोड़नेसे जो प्रमा-
ण हो उतने तेजोलेश्यावाले जीव है। तथा तेजोलेश्यावालोसे संख्यातगुणे कम पाले-
श्यावाले और सूच्यङ्गुलके असख्यातमे भाग शुक्ललेश्यावाले जीव है।
उक्त अर्थको ही स्पष्ट करते है।
वेसदछप्पण्णंगुलकदिहिदपदरं तु जोइसियमाणं ।
तस्स य संखेजदिमं तिरिक्खसण्णीण परिमाणं ॥ ५४०॥
द्विशतषट्पञ्चाशदडलकतिहितप्रतरं तु ज्योतिष्कमानम् ।
तस्य च संख्येयतमं तिर्यक्संज्ञिनां परिमाणम् ॥ ५४०॥
अर्थ-दो सौ छप्पन अंगुलके वर्गप्रमाण (पण्णद्वीप्रमाण-६५५३६ ) प्रतराङ्गुलका
भाग जगत्पतरमें देनेसे जो प्रमाण हो उतने ज्योतिषी देव है। और इसके संख्यातमे
भागप्रमाण सज्ञी तिर्यंच जीव है।
तेउटु असंखकप्पा पल्लासंखेजभागया सुका ।
ओहिअसंखेजदिमा तेउतिया भावदो होंति ॥ ५४१॥
तेजोया असंख्यकल्पाः पल्यासंख्येयभागकाः शुक्लाः।
अवध्यसंख्येयाः तेजस्त्रिका भावतो भवन्ति ॥ ५४१ ॥
अर्थ-असंख्यात कल्पकालके जितने समय है उतने ही सामान्यसे तेजोलेश्यावाले
और उतने ही पद्मलेश्यावाले जीव है। तथापि तेजोलेश्यावालोंसे पद्मलेश्यावाले संख्या-
तमे भाग है। पल्यके असंख्यातमे भागप्रमाण शुक्ललेश्यावाले जीव है। इस प्रकार काल-
की अपेक्षासे तीन शुमलेश्याओंका प्रमाण समझना चाहिये । तथा अवधिज्ञानके जितने
विकल्प है उसके असंख्यातमे माग सामान्यसे प्रत्येक शुभलेश्यावाले जीव हैं। तथापि
तेजोलेश्यावालोंसे संख्यातमेमाग पद्मलेश्यावाले और पद्मलेश्यावालोंसे शुक्ललेश्यावाले
असंख्यातमेभागमात्र हैं।
क्षेत्राधिकारके द्वारा लेश्याओंका वर्णन करते हैं।
सठ्ठाणसमुग्धादे उववादे सघलोयमसुहाणं ।
लोयस्सासंखेजदिमागं खेतं तु तेउतिये ॥ ५४२ ॥
गोम्मटसारा १९५ स्वस्थानसमुद्धाते उपपादे सर्वलोकमशुभानाम् । लोकस्यासंख्येयभागं क्षेत्रं तु तेजत्रिके ॥ ५४२ ॥ अर्थ-तीन अशुभलेश्याओंका सामान्यसे खस्थान तथा समुद्धात और उपपादकी अपेक्षा सर्वलोकप्रमाण क्षेत्र है। और तीन शुम लेश्याओंका क्षेत्र लोकप्रमाणके असख्या- तमे भागमात्र है। भावार्थ यह सामान्यसे कथन किया है। किन्तु लेश्याओंके क्षेत्रका विशेष वर्णन, खस्थानखस्थान, विहारवत्वस्थान सात प्रकारका समुद्धात, एक प्रकारका उपपाद इस तरह दश कारणोंकी अपेक्षासे किया है । सो विशेषजिज्ञासुओंको वह बड़ी टीकामें देखना चाहिये। उपपादक्षेत्रके निकालनेके लिये सूत्र कहते है। मरदि असंखेजदिमं तस्सासंखा य विग्गहे होति । तस्सासंखं दूरे उववादे तस्स खु असंखं ॥ ५४३ ॥ म्रियते असंख्येयं तस्यासंख्याश्च विग्रहे भवन्ति । तस्यासंख्यं दूरे उपपादे तस्य खलु असंख्यम् ॥ ५४३ ॥ अर्थ-धनाङ्गुलके तृतीय वर्गमूलका जगच्छ्रेणीसे गुणा करनेपर जो प्रमाण हो उतने सौधर्म और ईशान खर्गके जीवोंका प्रमाण है । इसमें पत्यके असख्यातमे भागका भाग देनेसे एक भागप्रमाण प्रतिसमय मरनेवाले जीव है । मरनेवाले जीवोंके प्रमाणमें पल्यके असख्यातमे भागका भाग देनेसे जो बहुभागका प्रमाण हो उतने विग्रहगति करनेवाले जीव है । विग्रहगतिवाले जीवोंके प्रमाणमें पल्यके असख्यातमे भागका भाग देनेसे जो बहुभागका प्रमाण हो उतने मारणान्तिक समुद्धातवाले जीव हैं । इसमे भी पल्यके अस- ख्यातमे भागका भाग देनेसे लव्ध एक भाग प्रमाण दूर मारणान्तिक समुद्धातवाले जीव है । इसमें भी पल्यके असख्यातमे भागका भाग देनेसे लब्ध एक भागप्रमाण उपपाद जीव हैं । यहा पर तिर्यंचोंकी उत्पत्तिकी अपेक्षासे एक जीवसम्बन्धी प्रदेश फैलनेकी अपेक्षा डेढ़ राजू लम्बा संख्यात सूच्यंगुलप्रमाण चौड़ा वा ऊंचा क्षेत्र है, इसके धन-क्षेत्र- फलको उपपाद जीवोंके प्रमाणसे गुणा करनेपर जो प्रमाण हो उतना ही उपपाद क्षेत्रका प्रमाण है । भावार्थ-जिस स्थानवाले जीवोंका क्षेत्र निकालना हो उस स्थानवाले जीवोंकी संख्याका अपनी २ एक जीवसम्बन्धी अवगाहनाप्रमाणसे अथवा जहा तक एक जीव गमन कर सकता है उस क्षेत्रप्रमाणसे गुणा करनेपर जो प्रमाण हो सामान्यसे उतना ही उनका क्षेत्र कहा जाता है । यहापर पीतलेश्यासम्बन्धी क्षेत्र का प्रमाण बताया है । पद्म लेश्यामें तथा शुक्ल लेश्यमें भी क्षेत्रका प्रमाण इस ही प्रकारसे होता है कुछ विशेषता है सो वड़ी टीकासे देखना।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्।
सुक्कस्स समुग्धादे असंखलोगा य सबलोगो य ।
शुछायाः समुद्धाते असंख्यलोकाश्च सर्वलोकश्च ।
अर्थ-इस सूत्रके पूर्वार्ध, शुक्ललेश्याका क्षेत्र लोकके असंख्यात भागोंमसे एक भागको
छोड़कर शेष बहुभाग प्रमाण वा सर्व लोक बताया है सो केवल समुद्धातकी अपेक्षासे है।
भावार्थ-शुक्ल लेश्याका क्षेत्र दूसरे स्थानों में उक्त रीतिसे ही समझना।
क्रमप्राप्त स्पर्शाधिकारका वर्णन करते है।
फासं सब लोयं तिठाणे असुहलेस्साणं ॥ ५४४ ॥
स्पर्शः सर्वो लोकत्रिस्थाने अशुभलेश्यानाम् ॥ ५४४ ।।
अर्थ-कृष्ण आदि तीन अशुभ लेश्यावाले जीवोंका स्पर्श खस्थान, समुद्धात, उप-
पाद, इन तीन स्थानों में सामान्यसे सर्व लोक है भावार्थ-वर्तमानमें जितने प्रदेशोंमें
जीव रहे उतनेको क्षेत्र कहते है । और भूत तथा वर्तमान कालमें जितने प्रदेशोंमें जीव
रहे उतनेको स्पर्श कहते है । सो तीन अशुभलेश्यावाले जीवोंका स्पर्श उक्त तीन स्था-
नोंमें सामान्यसे सर्वलोक है । विशेषकी अपेक्षासे कृष्णलेश्यावालोंका दश स्थानोंमेंसे
खस्थानखस्थान, वेदना कषाय मारणान्तिक समुद्धात, तथा उपपादस्थानमें सर्वलोकप्रमाण
स्पर्श है । सख्यात सूच्यंगुलको जगत्प्रतरसे गुणा करने पर जो प्रमाण उत्पन्न हो उतना
विहारवत्खस्थानमें स्पर्श है । तथा वैक्रियिक समुद्धातमें लोकके संख्यातमे भागप्रमाण स्पर्श.
है। और इस लेश्यामें तैजस आहारक केवल समुद्धात नहीं होता । कृष्णलेश्याके समान
ही नील तथा कापोतलेश्याका भी स्पर्श समझना ।
तेजोलेश्या स्पर्शका वर्णन करते है।
तेउस्स य सहाणे लोगस्स असंखभागमेत्तं तु ।
अडचोहसभागा वा देसूणा होति णियमेण ॥ ५४५॥
तेजसश्च स्वस्थाने लोकस्य असंख्यभागमानं तु ।
अष्ट चतुर्दशभागा वा देशोना भवन्ति नियमेन ॥ ५४५॥
अर्थ-पीतलेश्याका खस्थानखस्थानकी अपेक्षा लोकके असंख्यातमे भागप्रमाण स्पर्श
है। और विहारवस्वस्थानकी अपेक्षा त्रसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम आठ भागप्र-
माण स्पर्श है।
एवं तु समुग्धादे णव चोदसभागयं च किंचूर्ण ।
उववादे पढमपदं दिवडचोइस य किंचूर्ण ॥ ५४६ ॥
एवं तु समुद्धाते नव चतुर्दशभागश्च किञ्चिदूनः ।
उपपादे प्रथमपदं ब्यर्धचतुर्दश च किच्चिदूनम् ॥ ५४६ ॥
गोम्मटसार। १९७ अर्थ-विहारवत्वस्थानकी तरह समुद्रातमें भी सनालीके चौदह भागों से कुछ कम आठ भागप्रमाण स्पर्श है । तथा मारणान्तिक समुद्धातकी अपेक्षा चौदह भागों में से कुछ कम नव भागप्रमाण स्पर्श है । और उपपाद स्थानमें चौदह भागमेंसे कुछ कम डेढ भाग- प्रमाण स्पर्श है । इस प्रकार यह पीत लेश्याका स्पर्श सामान्यसे तीन स्थानों में बताया है। डेढ़ २ गाथामें पन तथा शुक्ललेयशका स्पर्श बताते हैं। पम्मस्स य सट्टाणसमुग्धाददुगेसु होदि पढमपदं । अड चोइस भागा या देसूणा होति णियमेण ॥ ५४७॥ पद्मायाश्च खस्थानसमुद्धातद्विकयोः भवति प्रथमपदम् । अष्ट चतुर्दश भागा वा देशोना भवन्ति नियमेन ॥ ५४७ ॥ अर्थ-पालेश्याका विहारवत्वस्थान, वेदना कषाय वैक्रियिक तथा मारणान्तिक समुदातम चौदह भागोंमसे कुछ कम आठ भागप्रमाण स्पर्श है । तैजस तथा आहार समु- दातमें सख्यात धनाङ्गुल प्रमाण स्पर्श है । यहा पर च शब्दका ग्रहण किया है इसलिये खसानखस्थानमें लोकके असख्यातभागोंमेंसे एक भाग प्रमाण स्पर्श है। उववादे पढमपदं पणचोदसभागयं च देसूणं । सुकस्स य विट्ठाणे पढमो छचोदसा हीणा ॥ ५४८॥ उपपादे प्रथमपदं पञ्चचतुर्दशभागकश्च देशोनः । शुक्लायाश्च त्रिस्थाने प्रथमः पचतुर्दश हीनाः ॥ ५४८ ॥ अर्थ-पालेश्या शतार सहस्रार खर्गपर्यन्त सम्भव है । इसलिये उपपादकी अपेक्षासे पालेश्याका स्पर्श त्रसनालीके चौदह भागोंमेसे कुछ कम पाच भागप्रमाण है । शुक्ल- लेश्यावाले जीवोंका खस्थानखस्थानमें तेजोलेश्याकी तरह लोकके असख्यातमे भागप्रमाण स्पर्श है। और विहारवत्खस्थान, तथा वेदना कषाय वैक्रियिक मारणान्तिक समुद्धात और उपपाद, इन तीन स्थानों में चौदह भागोंमेंसे कुछ कम छह भाग प्रमाण स्पर्श है। तेजस आहारक समुद्धातमें सख्यातघनाङ्गुल स्पर्श है। णवरि समुग्धादम्मि य संखातीदा हवंति भागा वा। सद्यो वा खलु लोगो फासो होदिन्ति णिहिटो ॥ ५४९ ॥ नवरि समुद्धाते च संख्यातीता भवन्ति भागा वा। सों वा खल लोकः स्पर्शो भवतीति निर्दिष्टः ॥ ५४९ ॥ अर्थ-केवल-समुद्धातमें विशेषता है, वह इस प्रकार है कि दण्ड समुद्रातमें स्पश क्षेत्रकी तरह सख्यात प्रतराङ्गुलसे गुणित जगच्छ्रेणी प्रमाण है। और स्थित वा उपविष्ट कपाट समुदातमें संख्यातसूच्यङ्गुलमात्र जगत्पतर प्रमाण है। प्रतर समुद्रातमें लोकके १९८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । असंख्यात भागोंमेंसे एक भागको छोड़कर शेष बहु भागप्रमाण स्पर्श है । लोकपूर्ण समु- द्वातमें सर्वलोकप्रमाण स्पर्श है। भावार्थ-केवलसमुद्धातके चार भेद हैं। दण्ड कपाट प्रतर लोकपूर्ण । दण्ड समुद्धातके भी दो भेद है, एक स्थित दूसरा उपविष्ट । और स्थित तथा उपविष्टके भी आरोहक अवरोहककी अपेक्षा दो २ भेद है । कपाट समुदात के चार भेद है पूर्वाभिमुख स्थित उत्तराभिमुख स्थित पूर्वाभिमुख-उपविष्ट उत्तराभिमुख-उपविष्ट । इन चारमेंसे प्रत्येकके आरोहक अवरोहककी अपेक्षा दो २ भेद है । तथा प्रतर लोकपू- र्णका एक २ ही भेद है। यहां पर जो दण्ड और कपाट समुद्रातका स्पर्श बताया है वह आरोहक और अवरो- हककी अपेक्षा दो भेदोंमेंसे एक ही भेद का है, क्योकि एक जीव समुद्धात अवस्थामें जितने क्षेत्रका आरोहण अवस्थामें स्पर्श करता है उतने ही क्षेत्रका अवरोहण अवस्थामें भी स्पर्श करता है। इस लिये यदि आरोहण अवरोहण दोनों अवस्थाओंका सामान्य स्पर्श जानना हो तो दण्ड और कपाट दोनों ही का उक्त प्रमाणसे दूना २ स्पर्श समझना चाहिये। प्रतर समुद्रातमें लोकके असख्यातमे भागप्रमाण वातवलयका स्थान छूट जाता है इसलिये यहां पर लोकके असख्यात भागोंमेंसे एक भागको छोड़कर शेष बहुभागप्रमाण स्पर्श है। ॥ इति स्पशाधिकार॥ क्रमप्राप्त कालाधिकारका वर्णन करते है। कालो छल्लेस्साणं णाणाजीवं पडुच सबदा । अंतोमुत्तमवरं एवं जीवं पडुच हवे ॥ ५५० ॥ कालः षड्लेश्यानां नानाजीव प्रतीत्य सर्वा । अन्तर्मुहूर्तोऽवर एकं जीवं प्रतीत्य भवेत् ॥ ५५० ॥ अर्थ-नाना जीवोंकी अपेक्षा कृष्ण आदि छहों लेश्याओंका सर्व काल है। तथा एक जीव अपेक्षा सम्पूर्ण लेश्याओंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्तमात्र है। उवहीणं तेत्तीसं सचर सत्तेव होति दो चेव । अट्ठारस तेचीसा उकस्सा होति अदिरेया ॥ ५५१ ॥ उदधीनां त्रयस्त्रिंशत् सप्तदश सप्तव भवन्ति द्वौ चैव । अष्टादश त्रयस्त्रिंशत् उत्कृष्टा भवन्ति अतिरेकाः ।। ५५१ ॥ अर्थ-उत्कृष्ट काल कृष्णलेश्याका तेतीस सागर, नीललेश्याका सत्रह सागर, कापोत- लेश्याका सातसागर, पीतलेश्याका दो सागर, पद्म लेश्याका अठारह सागर, शुक्ल लेश्याका तेतीस सागर से कुछ अधिक है । भावार्थ--यह अधिकका सम्बन्ध छहो लेश्याओंके उत्कृष्ट कालके साथ २ करना चाहिये; क्योंकि यह उत्कृष्ट कालका वर्णन देव और नार- ।
गोम्मटसारः। १९९ कियोंकी अपेक्षासे है । सो जिस पर्यायको छोडकर देव या नारकी उत्पन्न हो उस पर्या- यके अन्तके अन्तर्मुहूर्तमे तथा देव नारक पर्यायको छोडकर जिस पर्यायमें उत्पन्न हो उस पर्यायके आदिके अन्तर्मुहूर्तमें वही लेश्या होती है । इस ही लिये छहों लेश्याओंके उक्त उत्कृष्ट कालप्रमाणमे दो २ अन्तर्मुहूर्तका काल अधिक २ समझना । तथा पीत और पन्न- लेश्याके कालमें कुछ कम आधा सागर भी अधिक होता है। जैसे सौधर्म और ईशान वर्गमे दो सागरकी आयु है । परन्तु यदि कोई घातायुष्क सम्यग्दृष्टि सौधर्म या ईशान स्वर्गमें उत्पन्न हो तो उसकी अन्तर्मुहूर्त कम ढाई सागरकी भी आयु हो सकती है । इस ही तरह पातायुप्क मिथ्यादृष्टिकी पत्यके असख्यातमें भागप्रमाण आयु अधिक हो सकती है। परन्तु यह अधिकपना सौधर्म खर्गसे लेकर सहस्रार खर्ग पर्यन्त ही है। क्योंकि आगे घातायुष्क जीव उत्पन्न नहीं होता। ॥ इति कालाधिकारः॥ दो गाथाओं में अन्तर अधिकारका वर्णन करते है। अंतरमवरकस्सं किण्हतियाणं मुहत्तअंतं तु । उवहीणं तेतीसं अहियं होदित्ति णिद्दिढ॥ ५५२ ॥ तेउतियाणं एवं णवरिय उक्कस्स विरहकालो दु। पोग्गलवरिवहा हु असंखेजा होति णियमेण ॥ ५५३ ॥ अन्तरमवरोत्कृष्टं कृष्णत्रयाणां मुहूर्तान्तस्तु । उदधीनां त्रयविशदधिकं भवतीति निर्दिष्टम् ।। ५५२ ॥ तेजस्रयाणामेवं नवरि च उत्कृष्टविरहकालस्तु । पुद्गलपरिवर्ता हि असंख्येया भवन्ति नियमेन ॥ ५५३ ॥ अर्थ-कृष्ण आदि तीन अशुभलेश्याओंका जघन्य अंतर अन्तर्मुहर्तमात्र है। और उत्कृष्ट अंतर कुछ अधिक तेतीस सागर होता है। पीत आदि तीन शुभ लेश्याओंका अंतर' भी इस ही प्रकार है। परन्तु कुछ विशेषता है । शुभ लेश्याओंका उत्कृष्ट अंतर नियमसे असंख्यात पुद्गल परिवर्तन है। भावार्थ-किसी विवक्षित एक लेझ्याको छोड़कर दूसरी लेश्यारूप परिणमन करके जितने कालमें फिरसे विवक्षित लेश्यारूप परिणमन करै उतने कालको विवक्षित लेश्याका विरहकाल या अन्तर कहते है । इस प्रकारका अंतर कृष्ण- लेश्याका जघन्य अन्तर्मुहूर्तमात्र है । उत्कृष्ट अंतर दश अन्तर्मुहर्त और आठवर्षकम एक कोटिपूर्व वर्ष अधिक तेतीस सागर प्रमाण है । इस ही प्रकार नील तथा कापोत- लेश्याका भी अंतर जानना । परन्तु इतनी विशेषता है कि नील लेश्याके अंतरमें आठ अंतर्मुहूर्त और कापोतलेश्याके अंतरमें छह अंतर्मुहूर्त ही अधिक है.। अब शुम लेश्या-
२००
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
ओंका उत्कृष्ट अंतर दृष्टान्तद्वारा बताते हैं । कोई जीव पीत लेश्याको छोड़कर क्रमसे
एक २ अन्तर्मुहूर्तमात्रतक कपोत नील कृष्ण लेश्याको प्राप्त हुआ, कृष्ण लेश्याको प्राप्त
होकर एकेन्द्रिय अवस्थामें आवलीके असंख्यातमे भागप्रमाण पुद्गलद्रव्यपरिवर्तनोका
जितना काल हो उतने काल पर्यन्त भ्रमण कर विकलेन्द्रिय हुआ, यहां पर भी उत्कृष्ट-
तासे संख्यात हजार वर्ष तक भ्रमण किया। पीछे पंचेन्द्रिय होकर प्रथम समयसे एक
२ अंतर्मुहूर्त में क्रमसे कृष्ण नील कपोत लेश्याको प्राप्त होकर पीत लेश्याको प्राप्त हुआ
इस प्रकारके जीवके पीत लेश्याका उत्कृष्ट अंतर छह अंतर्मुहूर्त और संख्यात हजार वर्ष
अधिक आवलीके असंख्यातमे भागप्रमाण पुद्गलद्रव्यपरावर्तन है । पद्म लेश्याका उत्कृष्ट
अंतर इस प्रकार है कि कोई पद्मलेश्यावाला जीव पद्मलेश्याको छोड़कर अंतर्मुहूर्त तक
पीत लेश्यामें रह कर पल्यके असंख्यातमेमाग अधिक दो सागरकी आयुसे सौधर्म ईशान
खर्गमें उत्पन्न हुआ, वहासे चयकर एकेन्द्रिय अवस्थामें आवलीके असंख्यातमे भागप्रमाण
पुद्गलपरावर्तनोंके कालका जितना प्रमाण है उतने काल तक भ्रमण किया। पीछे विक-
लेन्द्रिय होकर संख्यात हजार वर्ष तक भ्रमण किया। पीछे पंचेन्द्रिय होकर प्रथम समयसे
लेकर एक २ अन्तर्मुहूर्ततक क्रमसे कृष्ण नील कपोत पीत लेश्याको प्राप्त होकर पद्म-
लेश्याको प्राप्त हुआ इस तरहके जीवके पांच अंतर्मुहूर्त और पत्यके असंख्यातमे भाग
अधिक दो सागर तथा संख्यात हजार वर्ष अधिक आवली के असंख्यातमे भागप्रमाण पुल-
परावर्तनमात्र पद्मलेश्याका उत्कृष्ट अंतर होता है । शुक्ल लेश्याका उत्कृष्ट अंतर इस प्रकार,
है कि कोई शुक्ल लेश्यावाला जीव शुक्ललेश्याको छोड़कर क्रमसे एक २ अन्तर्मुहूर्ततक
पद्म पीत लेश्याको प्राप्त होकर सौधर्म ईशान खर्गमें प्राप्त होकर तथा वहां पर पूर्वोक्त
प्रमाण कालतक रह कर पीछे एकेन्द्रिय अवस्थामें पूर्वोक्त प्रमाण काल तक भ्रमण कर
पीछे विकलेन्द्रिय होकर भी पूर्वोक्त प्रमाण काल तक भ्रमण करके क्रमसे पंचेन्द्रिय होकर
प्रथम समयसे लेकर एक २ अन्तर्मुहूर्त तक क्रमसे कृष्ण नील कपोत पीत पद्म लेश्याको
प्राप्त होकर शुक्ल लेश्याको प्राप्त हुआ इसतरहके जीवके सात अंतर्मुहूर्त संख्यात हजार
वर्ष और पल्यके असंख्यातमे भाग अधिक दो सागर अधिक आवलीके असंख्यातमे भाग-
प्रमाण पुलपरावर्तनमात्र शुक्ललेश्याका उत्कृष्ट अंतर होता है।
॥ इति अंतराधिकार
क्रमप्राप्त भाव और अल्पबहुत्व अधिकारका वर्णन करते हैं।
भावादो छल्लेस्सा ओदयिया होति अप्पवहुगं तु ।
दवपमाणे सिद्ध इदि लेस्सा वृण्णिदा होति ॥ ५५४ ॥
गोम्मटसारः। २०१ भावतः पडूलेश्या औदयिका भवन्ति अल्पबहुकं तु । द्रव्यप्रमाणे सिद्धमिति लेश्या वर्णिता भवन्ति ।। ५५४ ॥ अर्थ-भावकी अपेक्षा छहों लेश्या औदयिक है, क्योंकि योग और कषायके सयो- गको ही लेश्या कहते है, और ये दोनो अपने २ योग्य कर्मके उदयसे होते है । तथा लेश्याओंका अल्पवहुत्ल, पहले लेश्याओंका जो सख्या अधिकारमें द्रव्य प्रमाण बताया है उसीसे सिद्ध है। इनमें सबसे अल्प शुक्ललेश्यावाले है, इनसे असंख्यातगुणे पद्माले- श्यावाले और इनसे भी सख्यातगुणे पीतलेश्यावाले जीव है। पीत लेश्यावालोसे अनंता- नंतगुणे कपोतलेश्यावाले है, इनसे कुछ अधिक नील लेश्यावाले और इनसे अधिक कृष्णलेश्यावाले जीव है। ॥ इति अल्पबहुत्वाधिकार इस प्रकार सोलह अविकारोंके द्वारा लेश्याओंका वर्णन करके अब लेश्यारहित जीवोंका वर्णन करते है। किण्हादिलेस्सरहिया संसारविणिग्गया अणंतमहा। सिद्धिपुरं संपत्ता अलेस्सिया ते मुणेयथा ॥ ५५५ ॥ कृष्णादिलेश्यारहिताः संसारविनिर्गता अनंतसुखाः । सिद्धिपुर संप्राप्ता अलेश्याते ज्ञातव्याः ॥ ५५५ ॥ अर्थ-जो कृष्ण आदि छहो लेश्याओंसे रहित हैं, अतएव जो पंचपरिवर्तनरूप संसारसमुद्रके पारको प्राप्त होगये है, तथा जो अतीन्द्रिय अनंत सुखसे वृक्ष है, और आत्मो- पलब्धिरूप सिद्धिपुरीको जो प्राप्त होगये है, उन जीवोंको अयोगकेवली या सिद्धभगवान् कहते है । भावार्थ-जो अनंत सुखको प्राप्तकर संसारसे सर्वथा रहित होकर सिद्धि पुरको प्राप्त होगये है वे जीव सर्वथा लेश्याओंसे रहित होते हैं अत एव उनको अलेश्य-सिद्ध कहते है। ॥ इति लेश्याप्ररूपणा समाता ॥ - क्रमप्राप्त भव्यमार्गणाका वर्णन करते है। भविया सिद्धी जेसि जीवाणं ते हवंति भवसिद्धा। वचिवरीयाऽभवा संसारादो ण सिझंति ॥ ५५६ ॥ भव्या सिद्धिर्येषा जीवानां ते भवन्ति भवसिद्धाः । तद्विपरीता अभन्याः संसारान सिध्यन्ति ॥ ५५६॥ गो. २६ । २०२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-जिन जीवोंकी अनन्तचतुष्टयरूप सिद्धि होनेवाली हो अथवा जो उसकी प्राप्तिके योग्य हों उनको भव्यसिद्ध कहते है । जिनमें इन दोनोंमेंसे कोई भी लक्षण घटित न हो उन जीवोंको अभव्यसिद्ध कहते हैं । भावार्थ-कितने ही भव्य ऐसे है जो मुक्तिकी प्राप्तिके योग्य है; परन्तु कभी मुक्त न होंगे; जैसे वन्ध्यापनेके दोषसे रहित विधवा सती स्त्रीमें पुत्रोत्पत्तिकी योग्यता है; परन्तु उसके कभी पुत्र उत्पन्न नही होगा। कोई भव्य ऐसे है जो नियमसे मुक्त होंगे । जैसे बन्ध्यापनेसे रहित स्वीके निमित्त मिलने पर नियमसे पुत्र उत्पन्न होगा। इन दोंनो खभावोंसे जो रहित है उनको अभव्य कहते है । जैसे बन्ध्या स्त्रीके निमित्त मिले चाहे न मिलै; परन्तु पुत्र उत्पन्न नहीं हो सकता है। जिनमें मुक्तिप्राप्तिकी योग्यता है उनको भव्यसिद्ध कहते हैं इस अर्थको दृष्टान्तद्वारा स्पष्ट करते हैं। भवत्तणस्स जोग्गा जे जीवा ते हवंति भवसिद्धा। ण हु मलविगमे णियमा ताणं कणओवलाणमिव ॥ ५५७ ।। भव्यत्वस्य योग्या ये जीवास्ते भवन्ति भवसिद्धाः। न हि मलविगमे नियमात् तेषां कनकोपलानामिव ॥ ५५७ ॥ अर्थ-जो जीव अनन्तचतुष्टयरूप सिद्धिकी प्राप्तिके योग्य है; परन्तु उस सिद्धिको कमी प्राप्त न होंगे उनको भवसिद्ध कहते है । इसप्रकारके जीवोंका कर्ममल नियमसे दूर- नही हो सकता । जैसे कनकोपलका। भावार्थ-ऐसे बहुतसे कनकोपल है जिनमें निमित्त मिलनेपर शुद्ध खर्णरूप होनेकी योग्यता है; परन्तु उनकी इस योग्यताकी अभिव्यक्ति कभी नही होगी । अथवा जिसतरह अहमिन्द्र देवोंमें नरकादिमें गमन करनेकी शक्ति है परन्तु उस शक्तिकी अभिव्यक्ति कभी नही होती । इस ही तरह जिन जीवोंमें अनंतचतुष्टयको प्राप्त करनेकी योग्यता है परन्तु उनको वह कभी प्राप्त नहीं होगी उनको भवसिद्ध कहते हैं। ये जीव सदा संसारमें ही रहते हैं। ण य जे भवामधा मुत्तिसुहातीदणंतसंसारा। ते जीवा णायवा व य भवा अभवा य ॥ ५५८ ॥ न च ये भव्या अभव्या मुक्तिसुखा अतीतानन्तसंसाराः। ते जीवा ज्ञातव्या नैव च भव्या अभव्याश्च ॥ ५५८ ॥ अर्थ-जिनका पांच परिवर्तनरूप अनन्त संसार सर्वथा छूट गया है, और जो मुक्ति- सुखके भोक्ता है उन जीवोंको न तो भव्य समझना चाहिये और न अभव्य समझना चाहिये; क्योंकि अब उनको कोई नवीन अवस्था प्राप्त करना शेष नही रहा है इसलिये वे भव्य भी नही है । और 'अनन्त चतुष्टयको प्राप्त हो चुके है इसलिये अभव्य भी गोम्मटसारः। २०३ नहीं हैं। भावार्थ-जिसमें अनंत चतुष्टयके अभिव्यक्त होनेकी योग्यता ही न हो उसको अभव्य कहते है। अत: ये अभव्य भी नहीं है, क्योंकि इन्होने अनंत चतुष्टयको प्राप्त कर लिया है। और भव्यत्वका परिपाक हो चुका अतः अपरिपक्क अवस्थाकी अपेक्षासे भव्य भी नहीं है। भव्यमार्गणामें जीवोंकी संख्या बताते है। अवरो जुत्ताणतो अभचरासिस्स होदि परिमाणं। तेण विहीणो सबो संसारी भवरासिस्स ॥ ५५९ ॥ अवरो युक्तानन्तः अभव्यराशेर्भवति परिमाणम् । तेन विहीनः सर्वः संसारी भव्यराशेः ।। ५५९ ॥ अर्थ-जघन्य युक्तानन्तप्रमाण अभव्य राशि है । और सम्पूर्ण संसारी जीवराशिमैसे अभव्यराशिका प्रमाण घटाने पर जो शेष रहे उतना ही भव्यराशिका प्रमाण है। भावार्थ- भन्यराशि बहुत अधिक है और अमन्य राशि बहुत थोड़ी है। अभव्य जीव सदा पांच परिवर्तन रूप संसरसे युक्त ही रहते हैं । एक अवस्थासे दूसरी अवस्थाका प्राप्त होना इसको ससार-परिवर्तन कहते है। इस संसार अर्थात् परिवर्तनके पाच भेद है। द्रव्य क्षेत्र काल भव भाव । द्रव्यपरिवर्तनके दो भेद हैं, एक नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन दूसरा कर्मद्रव्यपरिवर्तन । यहा पर इन परिवर्तनोंका क्रमसे खरूप बताते हैं। किसी जीवने, निग्ध रूक्ष वर्ण गन्धादिके तीन मंद मध्यम भावों से यथासम्भव भावोंसे युक्त, औदा. रिकादि तीन शरीरोंमेंसे किसी शरीर सम्बन्धी छह पर्याप्तिरूप परिणमनेके योग्य पुद्गलोंका एक समयमें ग्रहण किया। पीछे द्वितीयादि समयोंमें उस द्रव्यकी निर्जरा करदी। तथा पीछे अनंतवार अग्रहीत पुगलोंको ग्रहण करके छोड़ दिया, अनन्तवार मिश्रव्यको ग्रहण करके छोडदिया, अनंतवार ग्रहीतको भी ग्रहण करके छोड़ दिया । जब वही जीव उनही स्निग्ध रूक्षादि भावोंसे युक्त उनही पुदलोंको जितने समयमें ग्रहण करें उतने कालसमुदायको नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन कहते है। पूर्वमें ग्रहण किये हुए परमाणु जिस समयबद्धरूप स्कन्धमें हो उसको ग्रहीत कहते हैं। जिस समयप्रबद्ध में एसे परमाणु हों कि जिनका जीवने पहले ग्रहण नहीं किया हो उसको अग्रहीत कहते है । जिस समयपबद्धमें दोनोंप्रकारके परमाणु हों उसको मिश्र कहते हैं। अग्रहीत परमाणु भी लोकमें अनन्तानन्त है। क्योंकि सम्पूर्ण जीवराशिका समयबद्धके प्रमाणसे गुणा करने पर जो लब्ध आवे उसका अतीतकालके समस्त समयप्रमाणसे गुणा करनेपर जो लब्ध आवे उससे भी अनन्तगुणा पुद्गलद्रव्य है। इस परिवर्तनका काल अग्रहीतग्रहण ग्रहीतग्रहण मिश्रग्रहणके भेदसे तीन प्रकारका है। इसकी घटना किस तरह होती है यह अनुक्रम यन्त्रद्वारा बताते है ।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २०४ -- ००४ ०.x xxo XXO Xx० Xx० XXO xx० द्रव्वपरिवर्तन यन्त्र. ००१ oox ००४ xx१ xx१ xx१ xx१ xx१ xx१ ११४ ११४ ११० ११४ ११४ ११० इस यन्त्रमें शून्यसे अग्रहीत, हंसपदसे ( x इस चिह्नसे) मिश्र और एकके अंकसे ग्रहीत समझना चाहिये । तथा दोवार लिखनेसे अनन्तवार समझना चाहिये। इस यन्त्रके देखनेसे स्पष्ट होता है कि निरन्तर अनन्तवार अग्रहीतका ग्रहण होचुकनेपर एक वार मिश्रका ग्रहण होता है, मिश्रग्रहणके बाद फिर निरन्तर अनन्तवार अग्रहीतका ग्रहण हो चुकने पर एकवार मिश्रका ग्रहण होता है। इस ही क्रमते अनन्तवार मिश्रका ग्रहण हो चुकने पर अग्रहीतग्रहणके अनंतर एक वार ग्रहीतका ग्रहण होता है । इसके बाद फिर उस ही तरह अनंत वार अग्रहीतका ग्रहण हो चुकने पर एक बार मिश्रका ग्रहण और मिश्रग्रहणके बाद फिर अनन्तबार अग्रहीतका ग्रहण होकर एकवार मिश्रका ग्रहण होता है। तथा मिश्रका ग्रहण अनन्तवार होचुकने पर अनन्तवार अग्रहीतका ग्रहण करके एकवार फिर ग्रहीतका ग्रहण होता है। इस ही क्रमसे अनन्तवार ग्रहीतका ग्रहण होता है। यह अभिप्राय सूचित करनेके लिये ही प्रथम पडिमें पहले तीन कोठोंके समान दूसरे भी तीन कोठे किये हैं। अर्थात् इस क्रमसे अनंतवार ग्रहीतका ग्रहण होचुकने पर नोकर्मपुदलपरिवर्तनके चार भेदों से प्रथम भेद समाप्त होता है । इसके बाद दूसरे भेदका प्रारम्भ होता है। यहां पर अनन्त- बार मिश्रका ग्रहण होनेपर एकवार अग्रहीतका ग्रहण, फिर अनंतवार मिश्रका ग्रहण होने पर एक वार अग्रहीतका ग्रहण इस ही क्रमसे अनन्तवार अग्रहीतका ग्रहण होकर अनंत चार मिश्रका ग्रहण करके एक वार ग्रहीतका ग्रहण होता है । जिस क्रमसे एकवार ग्रही- तका ग्रहण किया उस ही क्रमसे अनंतवार ग्रहीतका ग्रहण होचुकने पर नोकर्मपुदलपरि- वर्तनका दूसरा भेद समाप्त होता है । इसके बाद तीसरे भेदमें अनन्तवार मिश्रका अहम करके एकवार ग्रहीतका ग्रहण होता है, फिर अनन्तवार मिश्रका ग्रहण करके एकवार ग्रहीतका ग्रहण इस क्रमसे अनंतवार ग्रहीतका ग्रह्ण हो चुकने पर अनंतवार मिश्रका ग्रहण करके एकवार अग्रहीतका ग्रहण होता है । जिस तरह एकवार अग्रहीतका प्रण किया उस ही तरह अनंतवार अग्रहीतका ग्रहण होनेपर नोकर्मपदलपरिवर्तनका तीसरा भेद समाप्त होता है । इसके बाद चौथे भेदका प्रारम्भ होता है, इसमें प्रथम ही अनन्तवार अहीतका ग्रहण करके एकवार मिश्रका ग्रहण होता है, इसकेबाद फिर अनंतवार ग्रही-
गोम्मटसारः।
२०५
तका ग्रहण होनेपर एकवार मिश्रका ग्रहण होता है। इस तरह अनंतवार मिश्रका ग्रहण
होकर पीछे अनंतवार महीतका ग्रहण करके एकवार अग्रहीतका ग्रहण होता है । जिस
तरह एकवार अग्रहीतका ग्रहण किया उस ही क्रमसे अनंतवार अग्रहीतका ग्रहण हो
चुकने पर नोकर्मपुद्गलपरिवर्तनका चौथा भेद समाप्त होता है । इस चतुर्थ भेदके समाप्त
होचुकने पर, नोकर्मपुदलपरिवर्तनके प्रारम्भके प्रथम समयमें वर्ण गन्ध आदिके जिस
भावसे युक्त जिस पुदलद्रव्यको ग्रहण किया था उस ही भावसे युक्त उस शुद्ध ग्रहीतरूप
पुदलद्रव्यको जीव ग्रहण करता है। इस सबके समुदायको नोकर्मद्रव्यपरिवर्तन कहते है।
तथा इसंग जितना काल लगे उसको नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनका काल कहते है।
इस ही तरह दूसरा कर्मपुद्गलपरिवर्तन भी होता है। विशेषता इतनी ही है कि जिस
तरह नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनमें नोकर्म पुद्गलोंका ग्रहण होता है उस ही तरह यहां पर कर्म-
पुद्गलोका ग्रहण होता है । परन्तु क्रमम कुछ भी विशेषता नही है। जिस तरहके चार
भेद नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनमें होते है उस ही तरह कर्मद्रव्यपरिवर्तनमे भी चार भेद होते
। इन चार भेदोंमें भी अग्रहीतग्रहणका काल सबसे अल्प है, इससे अनंतगुणा काल
मिश्रग्रहणका है । इससे भी अनंतगुणा ग्रहीतग्रहणका जघन्यकाल है इससे अनंतगुणा
हीतग्रहणका उत्कृष्ट काल है । क्योंकि प्रायःकरके उस ही पुद्गलद्रव्यका ग्रहण होता है
कि जिसके साथ द्रव्य क्षेत्र काल भावका सस्कार हो चुका है। इस ही अभिप्रायसे यह
सूत्र कहा है कि-
सुहमहिदिसंजुत्तं आसण्णं कम्मणिजरामुकं ।
पाऐण एदि गहणं दवमणिहिट्ठसंठाणं ॥१॥
सूक्ष्मस्थितिसयुक्तमासन्नं कर्मनिर्जरामुक्तम् ।
प्रायेणैति ग्रहणं द्रव्यमनिर्दिष्टसंस्थानम् ॥१॥
अर्थ-जिन कर्मरूप परिणत पुद्गलोकी स्थिति अल्प थी अत एवं पीछे निजाण होकर
जिनकी कर्मरहित अवस्था होगई हो परन्तु जीवके प्रदेशोके साथ जिनका एकक्षेत्रावगाह हो
तथा जिनका संस्थान (आकार) कहा नहीं जा सकता इस तरहके पुद्गल द्रव्यका ही प्राय:-
करके जीव ग्रहण करता है । भावार्थ-यद्यपि यह नियम नहीं है कि इस ही तरहके
पुगलका जीव ग्रहण कर तथापि बहुधा इस ही तरहके पुद्गलका ग्रहण करता है। क्योंकि
यह द्रव्य क्षेत्र काल भावसे संस्कारित है।
द्रव्यपरिवर्तनके उक्त चार भेदोका इस गाथामें निरूपण किया है:-
अगहिदमिस्सं गहिदं मिस्समगहिदं तहेव गहिदं च ।
मिस्सं गहिदसगहिदं गहिदं मिस्सं अगहिदं च ॥२॥
२०६ रांयचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अग्रहीतं मिभं ग्रहीतं मिश्रमग्रहीतं तथैव ग्रहीतं च । मिश्र ग्रहीतमग्रहीतं ग्रहीतं मिश्रमग्रहीतं च ॥२॥ अर्थ-पहला अग्रहीत मिश्र ग्रहीत, दूसरा मिश्र अग्रहीत ग्रहीत, तीसरा मिश्र ग्रहीत अग्रहीत, चौथा ग्रहीत मिश्र अग्रहीत, इस तरह चार प्रकारसे पुद्गलोंका ग्रहण होनेपर परिवर्तनके प्रारम्भ समयमें ग्रहण किये हुए पुद्गलोंका ग्रहण होता है । और तब ही एक द्रव्यपरिवर्तन पूरा होता है । इसका विशेष खरूप पहले लिख चुके है । भावार्थ- यहां पर प्रकरणके अनुसार शेष चार परिवर्तनोंका भी खरूप लिखते हैं । क्षेत्रपरिवर्तनके दो भेद हैं, एक खक्षेत्रपरिवर्तन दूसरा परक्षेत्रपरिवर्तन । एक जीव सर्व जघन्य अवगाहनाको जितने उसके प्रदेश हों उतनीवार धारण करके पीछे क्रमसे एक २ प्रदेश अधिक २ की अवगाहनाओंको धारण करते २ महामत्स्यकी उत्कृष्ट अवगाहनापर्यन्त अवगाहनाओंको जितने समयमें धारण करसके उतने काल समुदायको एक खक्षेत्रपरिवर्तन कहते हैं। कोई जघन्य अवगाहनाका धारक सूक्ष्मनिगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक जीव लोकके अष्ट मध्य- प्रदेशोंको अपने शरीरके अष्ट मध्य प्रदेश बनाकर उत्पन्न हुआ, पीछे वही जीव उस ही रूपसे उस ही स्थानमें दूसरी तीसरी वार भी उत्पन्न हुआ । इसी तरह घनाङ्गुलके असंख्यातमे भागप्रमाण जघन्य अवगाहनाके जितने प्रदेश हैं उतनीवार उसी स्थानपर क्रमसे उत्पन्न हुआ और श्वासके अठारहमे भागप्रमाण क्षुद्र आयुको भोग २ कर मरणको प्राप्त हुआ। पीछे एक २ प्रदेशके अधिकक्रमसे जितने कालमें सम्पूर्ण लोकको अपना जन्मक्षेत्र बनाले उतने कालसमुदायको एक परक्षेत्रपरिवर्तन कहते है। कोई जीव उत्सर्पिणीके प्रथम समयमें पहलीवार उत्पन्न हुआ, इस ही तरह दूसरीवार दूसरी उत्सर्पिणीके दूसरे समययें उत्पन्न हुआ, तथा तीसरी उत्सर्पिणीके तीसरे समयमें तीसरीवार उत्पन्न हुआ। इसही क्रमसे उत्सर्पिणी तथा अवसर्पिणीके वीस कोड़ाकोड़ी सागरके जितने समय है उनमें उत्पन्न हुआ, तथा इसही क्रमसे मरणको प्राप्त हुआ, इसमें जितना काल लगे उतने कालसमुदायको एक कालपरिवर्तन कहते है। कोई जीव दशहजार वर्षके जितने समय है उतनीवार जघन्य दश हजार वर्षकी आयुसे प्रथम नरकमें उत्पन्न हुआ, पीछे एक २ समयके अधिकक्रमसे नरकसम्बन्धी तेतीस सागरकी उत्कृष्ट आयुको क्रमसे पूर्ण कर, अन्तर्मुहुर्तके जितने समय हैं उतनीवार जघन्य अन्तर्महुर्तकी आयुसे तिर्यंचगतिमें उत्पन्न होकर यहांपर भी नरगतिकीतरह एक २ समयके अधिकक्रमसे तिर्यग्गतिसम्बन्धी तीन पल्यकी उत्कृष्ट आयुको पूर्ण किया । पीछे तिर्यग्ग- तिकी तरह मनुष्यगतिको पूर्ण किया, क्योंकि मनुष्यगतिकी भी जघन्य अन्तर्मुहर्तकी तथा उत्कृष्ट तीन पल्यकी आयु है । मनुष्यागतिके बाद दश हजार वर्षके जितने समय है उतनीवार जघन्य दश हजार वर्षकी आयुसे देवगतिमें उत्पन्न होकर पीछे एक २ समयके गोम्मटसारः। २०७ अधिफक्रमसे इकतीस सागरकी उत्कृष्ट आयुको पूर्ण किया, क्योंकि यद्यपि देवगति- सम्बन्धी उत्कृष्ट आयु तेतीस सागरकी है तथापि यहाँपर इकतीस सागर ही ग्रहण करना चाहिये, क्योंकि मिथ्यादृष्टि देवकी उत्कृष्ट आयु इकतीस सागरतक ही होती है। और इन परिवर्तनीका निरूपण मिथ्यादृष्टिकी अपेक्षासे ही है। क्योंकि सम्यग्दृष्टि ससारमें अर्धपुद्गल परिवर्तनका जितना काल है उससे अधिक कालतक नही रहता । इस क्रमसे चारों गति- यौमें भ्रमण करनेमें जितना काल लगे उतने कालको एक भवपरिवर्तनका काल कहते है। तथा इतने कालमै जितना भ्रमण किया जाय उसको एक भवपरिवर्तन कहते है। योगस्थान अनुभागवन्धाध्यवसायस्थान कपायाध्यवसायस्थान स्थितिखान इन चारके निमितसे पावपरिवर्तन होता है। प्रकृति और प्रदेशबन्धको कारणभूत आत्माके प्रदेश- परिस्पन्दरूप योगके तरतमरूप स्थानोंको योगस्थान कहते है। जिन कपायके तरतमरूप स्थानोसे अनुमागबंध होता है उनको अनुभागबन्धाध्यवसायस्थान कहते है। स्थितिबन्धको कारणभूत पायपरिणामोको कपायाध्यवसायस्थान या स्थितिबन्धाध्यवसायस्थान कहते है। बन्धरूप कर्मकी जघन्यादिक स्थितिको स्थितिस्थान कहते है। इनका परिवर्तन किस तरह होता है यह दृष्टान्तद्वारा नीचे लिखते है। श्रेणिके असख्यातमे भागप्रमाण योगस्थानोंके होजानेपर एक अनुभागबंधाध्यवसाय- स्थान होता है, और असख्यातलोकप्रमाण अनुभागबंधाध्यवसायस्थानोंके होजानेपर एक कपायाध्यवसायस्थान होता है, तथा असख्यातलोकप्रमाण कषायाध्यवसायस्थानोंके होजाने पर एक स्थितिस्थान होता है । इस क्रमसे ज्ञानावरण आदि समस्त मूलप्रकृति वा उत्तर- प्रकृतियों के समस्त स्थानोंके पूर्ण होनेपर एक भावपरिवर्तन होता है। जैसे किसी पर्याप्त मिथ्यादृष्टि सज्ञी जीवके ज्ञानावरण कर्मकी अंत:कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण जघन्य स्थितिका बंध होता है। यही यहाँपर जपन्य स्थितिस्थान है। अतः इसके योग्य विवक्षित जीवके जघन्यही अनुभागवन्धाध्यवसायस्थान जघन्य ही कषायाध्यवसायस्थान और जघन्य ही योगस्थान होते है । यहासे ही भावपरिवर्तनका प्रारम्भ होता है । अर्थात् इसके आगे श्रेणीके असंख्यातमे भागप्रमाण योगस्थानोंके क्रमसे होजानेपर दूसरा अनुभागवन्धाध्य- वसायस्थान होता है । इसके बाद फिर श्रेणीके असख्यातये भागप्रमाण योगस्थानोंके क्रमसे होजानेपर तीसरा अनुभागबंधाध्यवसायस्थान होता है । इसही क्रमसे असख्यात लोकप्रमाण अनुभागवन्धाध्यवसायस्थानोंके होजानेपर दूसरा कषायाध्यवसायस्थान होता है । जिस क्रमसे दूसरा कपाध्यवसायस्थान हुआ उसही क्रमसे असख्यातलोक प्रमाण कषायाध्यवसायस्थानों के १ एक ही कपाय परिणाममे दो कार्य करनेका खभाव है । एक स्वभाव अनुभाग बंधको कारण है, और दूसरा स्वभाव स्थिति वधको कारण है। इनको ही अनुभागबंधा-यवसाय और कषायाध्यवसाय २०८ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । होजानेपर जघन्य स्थितिस्थान होता है। जो क्रम जघन्य स्थितिस्थानमें बताया वही क्रम एक २ समय अधिक द्वितीयादि स्थितिस्थानोमें समझना चाहिये। तथा इसी क्रमसे ज्ञानावरणके जघन्यसे लेकर उत्कृष्ट तक समस्त स्थिति स्थानोंके हो जानेपर, और ज्ञानावरणके स्थिति स्थानोंकी तरह क्रमसे सम्पूर्ण मूल वा उत्तर प्रकृतियोंके समस्त स्थितिस्थानोंके पूर्ण होनेपर एक भावपरिवर्तन होता है । तथा इस परिवर्तनमें जितना काल लगे उसको एक भावपरिवर्तनका काल कहते है। इस प्रकार संक्षेपसे इन पांच परिवर्तनोंका स्वरूप यहां- पर कहा है। इनका काल उत्तरोत्तर अनन्तगुणा २ है । नानाप्रकारके दुःखोंसे आकुलित पांच परिवर्तनरूप संसारमें यह जीव मिथ्यात्वके निमित्तसे अनंतकालसे भ्रमण कर रहा है। इस परिश्रमणके कारणभूत कोंको तोड़कर मुक्तिको प्राप्त करनेकी जिनमें योग्यता नहीं.. है उनको अभव्य कहते है। और जिनमें कौको तोड़कर मुक्तिको प्राप्त करनेकी योग्यता है उनको भव्य कहते हैं। ॥ इति भव्यत्त्वमार्गणाधिकार समाप्तः ॥ क्रमप्राप्त सम्यक्त्व मार्गणाका वर्णन करते है। छप्पंचणवविहाणं अत्थाणं जिणवरोवइटाणं । आणाए अहिगमेण य सदहणं होइ सम्मत् ॥ ५६० ॥ षट्पश्चनवविधानामर्थानां जिनवरोपदिष्टानाम् । आज्ञया अधिगमेन च श्रद्धानं भवति सम्यक्त्वम् ॥ ५६०॥ अर्थः-छह द्रव्य पांच अस्तिकाय नव पदार्थ इनका जिनेन्द्र देवने जिस प्रकारसे वर्णन, किया है उस ही प्रकारसे इनका जो श्रद्धान करना उसको सम्यक्त्व कहते है। यह दो प्रकरासे होता है एक तो केवळ आज्ञासे दूसरा अधिगमसे । भावार्थ-जीव पुद्गल धर्म अधर्म आकाश काल ये छह द्रव्य है । तथा कालको छोड़कर शेष ये ही पांच अस्तिकाय कहे जाते है । और जीव अजीव आस्रव बन्ध सवर निर्जरा मोक्ष पुण्य पाप ये नव प्रकारके पदार्थ हैं । इनका 'जिनेन्द्रदेवने जैसा खरूप कहा है वास्तवमें वही सत्य है, इस तरह विना युक्तिसे निश्चय किये ही जो श्रद्धान होता है उसको आज्ञासम्यक्त्व कहते है । तथा इनके विषयमें प्रत्यक्ष परोक्षरूप प्रमाण, द्रव्यार्थिक आदि नय, नाम स्थापना आदि निक्षेप इत्यादिकेद्वारा निश्चय करके जो श्रद्धान होता है उसको अधिगम सम्यक्त्व कहते है। छह द्रव्योंके अधिकारोंका वर्णन करते है। छहवेसु य णामं उवलक्षणुवाय अत्थणे कालो। अत्यणखेत्तं संखा ठाणसरूवं फलं च हवे ॥ ५६१॥ १ सभी परिवर्तनोंमें जहा क्रमभंग होगा वह गणनामें नही आवेगा। E H - गोम्मटसारः। २०९ षड्द्रव्येषु च नाम उपलक्षणानुवादः अस्तित्वकालः । अस्तित्वक्षेत्र संख्या स्थानखरूपं फलं च भवेत् ॥ ५६१ ॥ अर्थ-छह द्रव्योंके निरूपण करनेमें ये सात अधिकार है। नाम, उपलक्षणानुवाद, स्थिति, क्षेत्र, सख्या, स्थानखरूप, फल । प्रथमही नाम अधिकारको कहते है। जीवाजीवं दवं रूवारूवित्ति होदि पत्तेयं । संसारत्था रूवा कम्मविमुक्का अस्वगया ॥ ५६२ ॥ जीवाजीवं द्रव्यं रूप्यरूपीति भवति प्रत्येकम् । संसारस्था रूपिणः कर्मविमुक्ता अरूपगताः ॥ ५६२ ।। अर्थ-द्रव्य सामान्यके दो भेद है । एक जीवद्रव्य दूसरा अजीव द्रव्य । जीवद्रव्यके भी दो भेद है। एक रूपी दूसरा अरूपी । जितने ससारी जीव है वे सब रूपी है, क्योंकि उनका कर्म-पुद्गलके साथ एकक्षेत्रावगाहसम्बन्ध है । जो जीव कर्मसे रहित होकर सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हो चुके है वे सब अरूपी है; क्योंकि उनसे कर्मपुद्गलका सम्बन्ध सर्वथा छूट गया है। अजीव द्रव्यमें भी रूपी अरूपीका भेद गिनाते है। अजीवेसु य रूवी पुग्गलदवाणि धम्म इदरोवि। आगासं कालोवि य चत्वारि अरूविणो होंति ॥ ५६३॥ अजीवेषु च रूपीणि पुद्गलद्रव्याणि धर्म इतरोऽपि । आकाशं कालोपि च चत्वारि अरूपीणि भवन्ति ।। ५६३ ॥ अर्थ-अजीव द्रव्यके पांच भेद है, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल । इनमें एक पुद्गल द्रव्य रूपी है । और शेष धर्म अधर्म, अकाश, काल ये चार द्रव्य अरूपी है। उपलक्षणानुवाद अधिकारको कहते है। उवजोगो वण्णचऊ लक्खणमिह जीवपोग्गलाणं तु । गदिठाणोग्गहवत्तणकिरियुवयारो दु धम्मचऊ ॥ ५६४ ॥ उपयोगो वर्णचतुष्कं लक्षणमिह जीवपुद्गलानां तु । गतिखानावगाहवर्तनक्रियोपकारस्तु धर्मचतुर्णाम् ॥ ५६४ ॥ अर्थ-ज्ञानदर्शनरूप उपयोग जीवद्रव्यका लक्षण है । वर्ण गन्ध रस स्पर्श यह पुद्गलद्रव्यका लक्षण है। जो जीव और पुद्गलद्रव्यको गमन करनेमें सहकारी हो उसको धर्म- द्रव्य कहते है।जो जीव तथा पुद्गलद्रव्यको ठहरनेमें सहकारी हो उसको अधर्मद्रव्य कहते है । जो सम्पूर्ण द्रव्योको स्थान देनेमें सहायक हो उसको आकाश कहते है। जो समस्त द्रव्योंके अपने २ खभावमें वर्तनेका सहकारी है उसको कालद्रव्य कहते है। गो. २७ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २१० गदिठाणोग्गहकिरिया जीवाणं पुग्गलाणमेव हये। धम्मतिये णहि किरिया मुक्खा पुण साधका होति ॥ ५६५ ॥ गतिस्थानावगाहक्रिया जीवानां पुद्गलानामेव भवेत् । धर्मत्रिके नहि क्रिया मुख्याः पुनः साधका भवन्ति ॥ ५६५ ॥ अर्थ-वामन करनेकी या ठहरनेकी अथवा रहनेकी क्रिया जीवद्रव्य या पुद्गलद्रन्यकी ही होती है। धर्म अधर्म आकाशमें ये क्रिया नहीं होती, क्योंकि न तो इनके स्थान चलायमान होते है। और न प्रदेश ही चलायमान होते है । किन्तु ये तीनो ही द्रव्य जीव पुद्गलकी उक्त तीनों क्रियाओंके मुख्य साधक है । भावार्थ-मुख्य साधक कहनेका अभिप्राय यह नही है कि धर्मादि द्रव्य जीव पुगलको गमन आदि करनेमें प्रेरक हैं; किन्तु इसका अमि- प्राय यह है कि जिस समय जीव या पुद्गल गति आदिमें परिणत हो उस समय उनकी गति आदिमें सहकारी होना धर्मादि द्रव्यका मुख्य कार्य है। गति आदिमें धर्मादि द्रव्य किसतरह सहायक होते है यह दृष्टान्त द्वारा दिखाते हैं। जत्तस्स पहं ठत्तस्स आसणं णिवसगस्स वसदी वा। गदिठाणोग्गहकरणे धम्मतियं साधगं होदि ॥ ५६६ ॥ यातस्य पन्थाः तिष्ठतः आसनं निवसकस्य वसतिर्वा । गतिस्थानावगाहकरणे धर्मत्रयं साधकं भवति ॥ ५६६ ॥ अर्थ-गमन करनेवालेको मार्गकी तरह धर्म द्रव्य जीवपुद्गलकी गतिमें सहकारी होता। है। ठहरनेवालेको आसनकी तरह अधर्म द्रव्य जीव पुगलकी स्थितिमें सहकारी होता है। निवासकरनेवालेको मकानकी तरह आकाशद्रव्य जीव पुदल आदिको अवगाह देनेमें सहकारी साधक होता है। वत्तणहेदू कालो वत्तणगुणमविय दवणिचयेसु । कालाधारेणेव य वस॒ति हु सचदवाणि ॥ ५६७ ॥ धर्तनाहेतुः कालो वर्तनागुणमवेहि द्रव्यनिचयेषु । कालाधारेणैव च वर्तन्ते हि सर्वद्न्याणि ॥ ५६७ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण द्रव्योंका यह खभाव है कि वे अपने २ स्वभावमें सदा ही बते । परन्तु उनका यह वर्तना किसी वाध सहकारीके विना नहीं हो सकता इसलिये इनको वर्तानेका सहकारी कारणरूप वर्तनागुण जिसमें पाया जाय उसको काल कहते है; क्योंकि कालके आश्रयसे ही समस्त द्रव्य वर्तते है। मूर्तीक जीव पुद्गलके वर्तनेका सहकारी कारण होना काल द्रव्यमें सम्भव है, परन्तु धर्मादिक अमूर्तीक तथा व्यापक द्रव्योंमे किसतरह घटित होसकता है। इस शाका समाधान करते है।
गोम्मटसारः। J . २११ धम्माधम्मादीणं अगुरुगुलहुगं तु छहिँ वि वड्डीहिं। हाणीहि वि वडंतो हायंतो वट्टदे जमा ॥ ५६८ ॥ धर्माधर्मादीनामगुरुकलघुकं तु षडूभिरपि वृद्धिमिः । हानिभिरपि वर्धमानं हीयमानं वर्तते यस्मात् ॥ ५६८ ॥ - अर्थ-धर्मादिक द्रव्योंमें अगुरुलधु नामका एक गुण है । इस गुणमें तथा इसके निमित्तसे धर्मादिक द्रव्यके शेष गुणोंमें छह प्रकारकी वृद्धि तथा छह प्रकारकी हानि होती है। और इन वृद्धि हानिके निमित्तसे वर्धमान तथा हीयमान धर्मादि द्रव्योंमें वर्तना सम्भव है। भावार्थ-धर्मादि द्रव्योंमें खसत्ताका नियामक कारणभूत अगुरुलघु "गुण है । इसके अनन्तानन्त अविभागप्रतिच्छेदोंमें अनन्तभागवृद्धि असख्यातमागवृद्धि, संख्यातभागवृद्धि, सख्यातगुणवृद्धि, असख्यातगुणवृद्धि, अनन्तगुणवृद्धि ये छह वृद्धि, तथा अन्तभागहानि, असख्यातभागहानि, सख्यातमागहानि, सख्यातगुणहानि, अस- ख्यातगुणहानि, अनंतगुणहानि ये छह हानि होती है । तथा इस गुणके निमित्तसे दूसरे गुणोंमे भी ये हानि वृद्धि होती है । इसलिये धर्मादि द्रव्योंके इस परिणमनका भी बाह्य सहकारी कारण मुख्य काल द्रव्य ही है। वर्तनाका कारण कालद्रव्य किसतरह है यह स्पष्ट करते है। ण य परिणमदि सयं सो ण य परिणामेइ अण्णमण्णेहि । विविहपरिणामियाणं हवदि हु कालो सयं हेदु ॥ ५६९ ॥ न च परिणमति स्वय स नच परिणामयति अन्यदन्यैः। विविधपरिणामिकानां भवति हि कालः स्वयं हेतुः ॥ ५६९ ॥ अर्थ-परिणामी होनेसे कालद्रव्य दूसरे द्रव्यरूप परिणत हो जाय यह बात नहीं है, वह तो खयं दूसरे द्रव्यरूप परिणत होता है, और न दूसरे द्रव्योको अपने खरूप अथवा भिन्नद्रव्यखरूप परणमाता है। किन्तु अपने खभावसे ही अपने २ योग्य पर्यायोंसे परिणत होनेवाले द्रव्योंके परिणमनमें कालद्रव्य उदासीनतासे खय बाह्य सहकारी होजाता है। कालं अस्सिय दवं सगसगपजायपरिणदं होदि । पजायावहाणं सुद्धणये होदि खणमेत्तं ॥ ५७० ॥ कालमाश्रित्य द्रव्यं स्वकखकपर्यायपरिणतं भवति । पर्यायावस्थानं शुद्धनयेन भवति क्षणमात्रम् ॥ ५७० ॥ अर्थ-कालके आश्रयसे प्रत्येक द्रव्य अपने २ योग्य पर्यायोसे परिणत होता है। इन पर्यायोंकी स्थिती शुद्धनयसे एक क्षण मात्र रहती है। २ २१२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ववहारो य वियप्पो भेदो तह पजोत्ति एयहो। ववहारअवठ्ठाणहिदी हु ववहारकालो दु॥ ५७१॥ व्यवहारश्च विकल्पो भेदस्तथा पर्याय इत्येकार्थः। व्यवहारावस्थानस्थितिर्हि व्यवहारकालस्तु ।। ५७१ ॥ अर्थ-व्यवहार विकल्प भेद पर्याय इन शब्दोंका एक ही अर्थ है । व्यंजनपर्यायके ठहरनेका जितना काल है उतने कालको व्यवहारकाल कहते हैं। अवरा पजायठिदी खणमेतं होदितं च समओत्ति। दोण्हमणूणमदिक्कमकालपमाणं हवे सो दु ॥ ५७२ ॥ अवरा पर्याय स्थितिः क्षणमात्रं भवति सा च समय इति । योरण्वोरतिक्रमकालप्रमाणं भवेत् स तु ॥ ५७२ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण द्रव्योंकी पर्यायकी जघन्य स्थिति एक क्षणमात्र होती है, इसीको समय भी कहते है। दो परमाणुओंके अतिक्रमण करनेके कालका जितना प्रमाण है उसको समय कहते है। भावार्थ-समीपमें स्थित दो परमाणुओमसे मंद गमनरूप परिणत होकर जितने कालमें एक परमाणु दूसरी परमाणुका उल्लंघन करै उतने कालको एक समय कहते है । इतनी ही प्रत्येक पर्यायकी जघन्य स्थिति है। प्रकारान्तरसे समयका प्रमाण बताते हैं। भएयपयेसत्थो परमाणु मंदगइपबढतो। बीयमणंतरखेत्तं जावदियं जादि तं समयकालो॥१॥ नभएकप्रदेशस्थः परमाणुर्मन्दगतिप्रवर्तमानः । द्वितीयमनन्तरक्षेत्रं यावत् याति सः समयकालः ॥१॥ अर्थ-आकाशके एक प्रदेशपर स्थित एक परमाणु मन्दगतिके द्वारा गमन करके दूसरे अनन्तर प्रदेशपर जितने कालमें प्राप्त हो उतने कालको एक समय कहते हैं। प्रदेशका प्रमाण बताते है। जेतीवि खेत्तमेत्तं अणुणा रुद्धं खु गयणदवं च । तंच पदेसं मणियं अवरावरकारणं जस्स ॥२॥ यावदपि क्षेत्रमात्रमणुना रुद्धं खलु गगनद्रव्यं च । सच प्रदेशो भणित: अपरपरकारणं यस्य ॥ २॥ अर्थ-जितने आकाशद्रव्यमें पुलका एक अविभागी परमाणु आजाय उतने क्षेत्र- मात्रको एक प्रदेश कहते हैं। इस प्रदेशके निमित्तसे ही आगे पीछेका अथवा दूर समी- १-२ ये दोनों ही गाथा क्षेपक हैं। .
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M-
गोम्मदसारः।
२१३
पका व्यवहार सिद्ध होता है। भावार्थ-अमुक पदार्थ अमुक पदार्थके आगे है और
अमुक पदार्थ पीछे है । अथवा अमुक पदार्थ अमुक पदार्थके समीप है और अमुक पदा-
थैसे दूर है इस व्यवहारको सिद्ध करनेवाला प्रदेशविभाग ही है।
व्यवहारकालका निरूपण करते है।
आवलिअसंखसमया संखेज्जावलिसमूहमुस्सासो।
सत्तुस्सासा थोवो सचत्योवा लबो भणियो ॥ ५७३ ॥
आवलिरसंख्यसमया संख्येयावलिसमूह उच्छासः ।
सप्तोच्छ्रासः स्तोकः सप्तस्तोको लबो भणितः ॥ ५७३ ॥
अर्थ-असख्यातसमयकी एक आवली होती है । सख्यात आवलीका एक उच्छास
होता है । सात उच्छासका एक स्त्रोक होता है । सात खोकका एक लव होता है।
उच्छासका खरूप क्षेपक गाथाद्वारा बताते है।
अवस्स अणलस्स य णिरुवहदस्स य हवेज जीवस्स।
उस्सासाणिस्सासो एगो पाणोति आहीदो ॥१॥
आयस्यानलसस्य च निरुपहतस्य च भवेत् जीवस्य ।
उच्छासनिःश्वास एका प्राण इति आख्यातः ॥ १ ॥
अर्थ-मुखी, आलस्यरहित, रोग पराधीनता चिन्ता आदिसे रहित जीवके सख्यात-
आवलीके समूहरूप एक श्वासोच्छास प्राण होता है। भावार्थ-दुःखी आदि जीवके
संख्यात आवलीममाण कालके पहले भी श्वासोच्छ्रास होजाता है । इसलिये यहा पर सुखी
आदि विशेषणोंसे युक्त जीवका ग्रहण किया है।
अट्टत्तीसद्धलया नाली बेनालिया मुहत्तं तु ।
एगसमयेण हीणं भिण्णमुहुर्च तदो सेसं ॥ ५७४ ॥
अष्टत्रिशदधलवा नाली बिनालिको मुहूर्तस्तु ।
एकसमयेन हीनो भिन्नमुहूर्तखतः शेषः ॥ ५७४ ।।
अर्थ-साढ़े अड़तीस लवकी एक नाली (घड़ी) होती है । दो घड़ीका एक मुहूर्त
होता है। इसमें एक समय कम करनेसे भिन्नमुहूर्त अथवा अन्तर्मुहर्त होता है । तथा
इसके आगे दो तीन चार आदि समय कम करनेसे अन्तर्मुहूर्तके ही भेद होते है।
जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्तका प्रमाण क्षेपक गाथाके द्वारा बताते है।
ससमयमावलि अवरं समऊणमुहत्तयं तु उकस्स।
महासंखवियप्पं वियाण अंतोमुत्तमिणं ॥१॥
दो २१४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ससमय आवलिरवरः समयोनमुहर्तकस्तु उत्कृष्टः । मध्यासंख्यविकल्पः विजानीहि अन्तर्मुहूर्तमिमम् ॥१॥ अर्थ-एक समयसहित आवलीप्रमाण कालको जघन्य अन्तर्मुहूर्त कहते हैं । एक समय कम मुहूर्तको उत्कृष्ट अन्तर्मुहुर्त कहते हैं। इन दोनोंके मध्यके असंख्यात भेद हैं। उन सबको भी अन्तर्मुहूर्त ही जानना चाहिये। दिवसो पक्खो मासो उडु अयणं वस्समेवमादी हु। संखेज्जासंखेजाणताओ होदि ववहारो ॥ ५७५ ॥ दिवसः पक्षो मास ऋतुरयनं वर्षमेवमादिहिं। संख्येयासंख्येयानन्ता भवन्ति व्यवहाराः ॥ ५७५ ॥ अर्थ-तीस मुहूर्तका एक दिवस ( अहोरात्र )• पन्द्रह अहोरात्रका एक पक्ष, पक्षका एक मास, दो मासकी एक ऋतु, तीन ऋतुका एक अयन, दो अयनका एक वर्ष इत्यादि व्यवहार कालके आवलीसे लेकर सख्यात असंख्यात अनन्त भेद होते हैं । ववहारो पुण कालो माणुसखेतम्हि जाणिदयो दु। जोइसियाणं चारे ववहारो खलु समाणोत्ति ॥ ५७६ ॥ व्यवहारः पुनः कालः मानुपक्षेने ज्ञातव्यस्तु । ज्योतिष्काणां चारे व्यवहारः खलु समान इति ॥ ५७६ ॥ अर्थ-परन्तु यह व्यवहार काल मनुप्यक्षेत्रमें ही समझना चाहिये; क्योंकि मनुष्य- क्षेत्रके ही ज्योतिषी देवोंके विमान गमन करते है,और इनके गमनका काल तथा व्यवहार काल दोनों समान है। प्रकारान्तरसे व्यवहारकालका प्रमाण बताते है। ववहारो पुण तिविहो तीदो पट्टतगो भविस्सो दु । तीदो संखेजावलिहदसिद्धाणं पमाणं तु ॥ ५७७ ॥ व्यवहारः पुनखिविधोऽतीतो वर्तमानो भविष्यस्तु । अतीत: संख्येयावलिहतसिद्धानां प्रमाणं तु ॥ ५७७ ॥ अर्थ-व्यवहार कालके तीन भेद है। भूत वर्तमान भविष्यत् । सिद्धराशिका संख्यात आवलीके प्रमाणसे गुणा करनेपर जो प्रमाण हो उतना ही अतीत कालका प्रमाण है। समओ हु वट्टमाणो जीवादो सवपुग्गलादो वि भावी अणंतगुणिदो इदि ववहारो हवे कालो ॥ ५७८ ॥ समयो हि वर्तमानो जीवात् सर्वपुद्गलादपि । भावी अनंतगुणित इति व्यवहारो भवेत्कालः ॥ ५७८ ॥. . - -- गोम्मटसारः। - है २१५ अर्थ-वर्तमान कालका प्रमाण एक समय है। सम्पूर्ण जीवराशि तथा समस्त पुद्गलद्र- व्यराशिसे अनंतगुणा भविष्यत् कालका प्रमाण है । इस प्रकार व्यवहार कालके तीन भेद होते है। कालोविय ववएसो सम्भावपरूवओ हवदि णियो। उप्पण्णप्पद्धंसी अवरो दीहतरहाई ॥ ५७९ ॥ कालोऽपि च व्यपदेशः सद्भावप्ररूपको भवति नित्यः ।। उत्पन्नमध्वंसी अपरो दीर्घान्तरस्थायी ॥ ५७९ ॥ अर्थ-काल यह व्यपदेश ( सज्ञा ) मुख्यकालका बोधक है। क्योंकि विना मुख्यके गौण अथवा व्यवहारकी मी प्रवृत्ति नहीं होसकती। यह मुख्य काल द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा नित्य है तथा पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा उत्पन्नध्वंसी है । तथा व्यवहारकाल वर्त- नकी अपेक्षा उत्पन्नध्वंसी है और भूत भविष्यत्की अपेक्षा दीर्घन्तरस्थायी है। क्रमप्राप्त स्थिति अधिकारका वर्णन करते है। छद्दवावठाणं सरिसं तियकालअत्थपजाये। वेंजणपजाये वा मिलिदे ताणं ठिदित्तादो॥५८०॥ पद्रव्यावस्थानं सदृशं त्रिकालार्थपर्याये। व्यंजनपर्याय वा मिलिते तेपां स्थितित्वात् ॥ ५८० ॥ अर्थ-अवस्खान स्थिति छहों द्रव्योंकी समान है। क्योंकि त्रिकालसम्बन्धी अर्थपर्याय वा व्यंजनपर्यायके मिलनेसे ही उनकी स्थिति होती है । भावार्थ-छहों द्रव्य अनादिनि- धन है। क्योंकि कथंचित् द्रव्य पर्यायोंसे भिन्न कुछभी चीज नहीं है । और इन पर्यायोंके दो भेद है एक व्यंजनपर्याय दूसरी अर्थपर्याय । वाग्गोचर-वचनके विषयभूत स्थूलपर्यायको व्यंजनपर्याय कहते है, और वचनके अगोचर सूक्ष्म पर्यायोंको अर्थपर्याय कहते है। ये दोनोंही पर्याय पर्यायत्वकी अपेक्षा त्रिकाली अर्थात् अनादिनिधन है। इस ही अर्थको स्पष्ट करते हैं। एयदवियम्मि जे अत्यपजया वियणपजया चावि। तीदाणागदभूदा तावदियं तं हयदि दवं ॥ ५८१ ॥ एकद्रव्ये ये अर्थपर्याया व्यञ्चनपर्यायाश्चापि । अतीतानागतभूवाः तवत्चत् भवति द्रव्यम् ॥ ५८१ ॥ अर्थ-एक द्रव्यमें जितनी त्रिकालसम्बन्धी अर्थपर्याय या व्यंजनपर्याय हैं उतना ही द्रव्य है । भावार्थ-त्रिकाल सम्बन्धी सस्थानखरूप (आकाररूप ) प्रदेशवत्त्वगुणकी पर्याय-व्यंजनपर्याय, तथा प्रदेशवत्वगुणको छोड़कर शेषगुणोकी नियालसम्बन्धी -
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्।
समस्तपर्याय ( अर्थपर्याय ) इनका जो समूह है वही द्रव्य है । त्रिकालवी पर्यायोंको
छोड़कर द्रव्य कोई चीज नहीं है।
इस प्रकार स्थिति अधिकारका वर्णन करके क्रमके अनुसार क्षेत्र अधिकारका वर्णन
करते है।
आगासं वजिता सवे लोगम्मि चेव णत्थि वहिं।
वावी धम्माधम्मा अवडिदा अचलिदा णिचा ॥ ५८२ ॥
आकाशं वर्जयित्वा सर्वाणि लोके चैव न सन्ति बहिः।
व्यापिनी धर्माधर्मों अवस्थितावचलितौ नित्यौ ॥ ५८२ ॥
अर्थ-आकाशको छोड़कर शेष समस्तद्रव्य लोकमें ही है-बाहर नहीं हैं। तथा धर्म
और अधर्मद्रव्य व्यापक है, अवस्थित हैं, अचलित है, और नित्य है। भावार्थ-आकाश-
द्रव्यके दो भेद हैं, एक लोक दूसरा अलोक । जितने आकाशमें जीव पुद्गल धर्म अधर्म
काल पायाजाय उतने आकाशको लोक कहते हैं। इसके बाहर जितना अनन्त आकाशद्रव्य
है उसको अलोक कहते हैं। धर्म अधर्मद्रव्य सम्पूर्ण लोकमें तिलमें तैलकी तरह
व्याप्त है । तथा ये दोनों ही द्रव्य आकाशके जिन प्रदेशोंमें स्थित है उनही प्रदेशोंमें
स्थित रहते है । जीवादिकी तरह एक स्थानको छोड़कर दूसरे स्थानमें गमन नहीं करते।
और अपने स्थानपर रहते हुए भी इनके प्रदेश जलकल्लोलकी तरह सकम्प नहीं होते है।
और न ये दोनों द्रव्य कभी अपने स्वरूपसे च्युत होते है । अर्थात् न तो इनमें
विभाव पर्याय होती है और न इनका कभी सर्वथा अभाव ही होता है।
लोगस्स असंखेजदिमागप्पहुदि तु सबलोगोत्ति ।
अप्पपदेसविसप्पणसंहारे वावड़ो जीवो ॥ ५८३ ।।
लोकस्यासंख्येयाविभागप्रभृतिस्तु सर्वलोक इति ।
आत्मप्रदेशविसर्पणसंहारे व्यापूतो जीवः ॥ ५८३ ॥
अर्थ-एक जीव अपने प्रदेशोंके सहारविसर्पकी अपेक्षा लोकके असंख्यातमे भागसे
लेकर सम्पूर्ण लोकतकमें व्याप्त होकर रहता है। भावार्थ-आत्मामें प्रदेशसहारविसर्पल
गुण है । इसके निमित्तसे उसके प्रदेश सकुचित तथा विस्तृत होते है। इसलिये एक
जीवका क्षेत्र शरीरप्रमाणकी अपेक्षा अङ्गुलके असंख्यातमे भागसे लेकर हजार योजन
तकका होता है । इसके आगे समुद्धातकी अपेक्षा लोकके असंख्यातमे भाग, संख्यातमे
भाग, तथा सम्पूर्ण लोकप्रमाण भी होता है।
पोग्गलदवाणं पुण एयपदेसादि होंति भजणिज्जा ।
एकेको दुपदेसो कालाणूणं धुवो होदि ॥ ५८४ ॥
गोम्मटसारः। २१७ पुद्गलद्रव्याणां पुनरेकप्रदेशादयो भवन्ति भजनीयाः। एकैकस्तु प्रदेशः कालाणूनां नुवो भवति ॥ ५८४ ॥ अर्थ-पुद्गलद्रव्यका क्षेत्र एकप्रदेशसे लेकर यथासम्भव समझना चाहिये-जैसे परमा- णुका एक प्रदेशप्रमाण ही क्षेत्र है, तथा व्यणुकका एक प्रदेश और दो प्रदेश भी क्षेत्र है, त्र्यणुकका एक प्रदेश दो प्रदेश तीन प्रदेश क्षेत्र है इत्यादि । किन्तु एक २ कालाणुका क्षेत्र एक २ प्रदेश ही निश्चित है । भावार्थ-कालद्रव्य अणुरुप ही है । कालाणुके पुद्ग- लद्रव्यकी तरह स्कन्ध नहीं होते। जितने लोकाकाशके प्रदेश है उतनी ही कालाणु है । इस लिये रत्नराशिकी तरह एक २ कालाणु लोकाकाशके एक २ प्रदेशपर ही सदा स्थित रहती है । तथा जो कालाणु जिस प्रदेशपर स्थित है वह उसी प्रदेशपर सदा स्थित रहती है। किन्तु पुद्गल द्रव्यके स्कंध होते हैं अतः उसके अनेक प्रकारके क्षेत्र होते है। संखेजासंखेजाणंता वा होति पोग्गलपदेसा। लोगागासेव ठिदी एगपदेसो अणुस्स हवे ॥ ५८५ ॥ संख्येयासंख्येयानन्ता वा भवन्ति पुद्गलप्रदेशाः। लोकाकाश एव स्थितिरेकप्रदेशोऽणोर्भवेत् ॥ ५८५ ॥ अर्थ-पुद्गल द्रव्यके स्कन्ध संख्यात असख्यात तथा अनन्त परमाणुओंके होते हैं; परन्तु उन सबकी स्थिति लोकाकाशमें ही होजाती है, किन्तु अणु एक ही प्रदेशमें रहता है। भावार्थ-जिस तरह जलसे अच्छीतरह मरे हुए पात्रमें लवण आदि कई पदार्थ आसकते है उसी तरह असंख्यातप्रदेशी लोकमें अनंतप्रदेशी स्कन्ध आदि समा सकते है। लोगागासपदेसा छहवेहि फुडा सदा होति । सवमलोगागासं अण्णेहिं विवजियं होदि ॥ ५८६ ॥ लोकाकाशप्रदेशाः षडूद्रव्यैः स्फुटाः सदा भवन्ति । सर्वमलोकाकाशमन्यैर्विवर्जितं भवति ॥ ५८६ ॥ अर्थ-लोकाकाशके समस्त प्रदेशोंमें छहों द्रव्य व्याप्त हैं । और अलोकाकाश आका- शको छोड़कर शेषद्रव्योंसे सर्वथा रहित है। इस तरह क्षेत्र अधिकारका वर्णन करके सख्या अधिकारको कहते हैं । जीवा अणंतसंखाणंतगुणा पुग्गला हु तत्तो दु। धम्मतियं एकेक लोगपदेसप्पमा कालो ॥ ५८७ ॥ जीवा अनन्तसंख्या अनन्तगुणाः पुद्गला हि ततस्तु । धर्मनिकमेकैकं लोकप्रदेशप्रमः कालः॥ ५८७ ॥ गो. २८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २१८ अर्थ-जीव द्रव्य अनन्त है । उनसे अनन्तगुणे पुद्गलद्रव्य हैं । धर्म अधर्म आकाश ये एक २ द्रव्य है । तथा लोकाकाशके जितने प्रदेश है उतने ही कालद्रव्य है। लोगागासपदेसे एकके जेठिया हु एकेका । रयणाणं रासी इव ते कालाणू मुणेयवा ॥ ५८८ ॥ लोकाकाशप्रदेशे एकैके ये स्थिता हि एकैकाः। रत्नानां राशिरिव ते कालाणवो मन्तव्याः ।। ५८८ ।। अर्थ-वे कालाणु रत्नराशिकी तरह लोकाकाशके एक २ प्रदेशमें एक २ स्थित हैं, ऐसा समझना चाहिये । भावार्थ-जिसतरह रनोंकी राशि भिन्न २ स्थित रहती है उसी तरह प्रत्येक कालाणु लोकाकाशके एक २ प्रदेशपर भिन्न २ स्थित है। इसी लिये जितने लोकाकाशके प्रदेश हैं उतने ही कालद्रव्य है। बवहारो पुण कालो पोग्गलदचादणंतगुणमेचो। तत्तो अणंतगुणिदा आगासपदेसपरिसंखा ॥ ५८९ ॥ व्यवहारः पुनः कालः पुद्गलद्रव्यादनन्तगुणमात्रः । ततः अनन्तगुणिता आकाशप्रदेशपरिसंख्या ॥५८९ ॥ अर्थ-पुद्गलद्रव्यके प्रमाणसे अनन्तगुणा व्यवहारकालका प्रमाण है । तथा व्यवहार कालके प्रमाणसे अनन्तगुणी आकाशके प्रदेशोंकी सख्या है। लोगागासपदेसा धम्माधम्मगजीवगपदेसा। सरिसा हु पदेसो पुण परमाणुअवटिदं खेत्तं ॥ ५९०॥ लोकाकाशप्रदेशा धर्माधमैकजीवगप्रदेशाः। सहशा हि प्रदेशः पुनः परमाण्ववस्थितं क्षेत्रम् ॥ ५९० ॥ अर्थ-धर्म, अधर्म, एक जीवद्रव्य, तथा लोकाकाश, इनकी प्रदेशसंख्या परस्परमें समान है । जितने क्षेत्रको एक पुद्गलका परमाणु रोकता है उतने क्षेत्रको प्रदेश कहते हैं। स्थानखरूपाधिकारका वर्णन करते है। सबमरूवी दवं अवटिदं अचलिआ पदेसा वि। रूवी जीवा चलिया तिवियप्पा होति हु पदेसा ॥ ५९१॥ सर्वमरूपि द्रव्यमवस्थितमचलिवाः प्रदेशा अपि । रूपिणो जीवाश्चलितास्त्रविकल्पा भवन्ति हि प्रदेशाः ॥ ५९१ ॥ अर्थ-सम्पूर्ण अरूपी द्रव्य जहां स्थित है वहा ही सदा स्थित रहते है, तथा इनके प्रदेश भी चलायमान नहीं होते । किन्तु रूपी ( ससारी)जीवद्रव्य चल है, तथा इनके प्रदेश तीन प्रकारके होते है । भावार्थ-धर्म अधर्म आकाश काल और मुक्त जीव ये 1 गोम्मटसारः। २१९ अपने स्थानसे कभी चलायमान नहीं होते तथा एक स्थान पर ही रहते हुए भी इनके प्रदेश कभी सकम्प नहीं होते। किन्तु ससारी जीवोंके प्रदेश तीन प्रकारके होते है। चल भी होते है, अचल भी होते हैं, तथा चलाचल भी होते हैं। विग्रहगतिवाले जीवोंके प्रदेश चल ही होते है। अयोगकेवलियोंके प्रदेश अचल ही होते है । और शेष जीवोंके प्रदेश चलाचल होते है। पोग्गलदधम्हि अणू संखेजादी हवंति चलिदा हु। चरिममहक्खंधम्मि य चलाचला होति हु पदेसा ॥ ५९२ ॥ पुद्गलद्रव्येऽणवः संख्यातादयो भवंति चलिता हि । चरममहास्कन्धे च चलाचला भवन्ति हि प्रदेशाः ॥ ५९२ ॥ अर्थ-पुद्गलद्रव्यमें परमाणु तथा सख्यात असख्यात आदि अणुके जितने स्कन्ध हैं वे सभी चल है, किन्तु एक अन्तिम महास्कन्ध चलाचल है। क्योंकि उसमें कोई परमाणु चल हैं और कोई परमाणु अचल है । परमाणुसे लेकर महास्कन्ध पर्यन्त पुद्गलद्रव्यके तेईस भेदोंको दो गाथाओंमें गिनाते है। अणुसंखासंखेजाणता य अगेजगेहिं अंतरिया। आहारतेजभासामणकम्मइया धुवक्खंधा ॥ ५९३ ॥ सांतरणिरंतरेण य सुण्णा पत्तेयदेहधुवसुण्णा । वादरणिगोदसुण्णा सुहुमणिगोदा णभो महक्खंधा ॥ ५९४ ॥ अणुसंख्यासंख्यावानन्ताश्च अपायकामिरन्तरिताः । आहारतेजोभाषामनःकार्मणा भुवस्कन्धाः ॥ ५९३ ॥ सान्तरनिरन्तरया च शून्या प्रत्येकदेह वशून्याः । वादरनिगोदशून्याः सूक्ष्मनिगोदा नमो महास्कन्धाः ॥ ५९४ ॥ अर्थ-पुद्गलद्रव्यके तेईस भेद है । अणुवर्गणा, सख्याताणुवर्गणा, असख्याताणुव- गंणा, अनन्ताणुवर्गणा, आहारवर्गणा, अग्रामवर्गणा, तैजसवर्गणा, अग्राह्यवर्गणा, भाषाव- गंणा, अग्राह्यवर्गणा, मनोवर्गणा, अग्राह्यवर्गणा, कार्मणवर्गणा, भुववर्गणा, सांतरनिरंतर- वर्गणा, शून्यवर्गणा, प्रत्येकशरीरवर्गणा, ध्रुवशून्यवर्गणा, बादरनिगोदवर्गणा, शून्यवर्गणा, सूक्ष्मनिगोदवर्गणा, नभोवर्गणा, महास्कन्धवर्गणा । इन वर्गणाओंके जघन्य मध्यम उत्कृष्ट भेद तथा इनका अल्पबहुत्व बताते है । परमाणुवग्गणम्मि ण अवरुकस्सं च सेसगे अत्थि । गेज्झमहक्खंधाणं वरमहियं सेसगं गुणियं ॥ ५९५ ॥ - , २२० - रायचन्द्रजैनशाखमालायाम्। परमाणुवर्गणायां नाबरोत्कृष्टं च शेषके अस्ति । ग्राहमहात्कन्धानां वरमधिकं शेषकं गुणितम् ।। ५९५ ॥ अर्थ-तेईस प्रकारकी वर्गणामोंमसे अणुवर्गणाने जघन्य उत्कृष्ट मेद नहीं है। शेष वाईस जातिकी वर्गणाओंमें जघन्य उत्कृष्ट भेद है। तथा इन वाईस जातिकी वर्गणाओं में भी आहारवर्गणा, तैजसवर्गणा, भाषावर्गणा, मनोवर्गणा, कार्मणवर्गणा, ये पांच ग्राह्य वर्गणा और एक महास्कन्ध वर्गणा इन छह वर्गणाओंके जघन्य उत्कृष्ट भेद प्रतिभागकी अपेक्षाले हैं। किन्तु शेष सोलह नातिकी वर्गणाओंके जघन्य उत्कृष्ट भेद गुणाजारकी अपेक्षासे हैं। पांच ग्राह्यवर्गणाओंका तथा अन्तिम महास्कन्धाका उत्कृष्ट भेद निकालनेके लिये प्रति- भागका प्रमाण बताते हैं। सिद्धाणतिमभागो पडिभागो गेझगाण जेट। पल्लासंखेजदियं अंतिमखंघस्स जेमुटुं॥ ५९६ ॥ सिद्धानन्तिमभागः प्रतिभागो ग्राह्याणां ज्येष्टार्थम् । पल्यासंख्येयमन्तिमस्कन्धख व्येष्ठार्थम् ॥ ५९६ ॥ अर्थ-पांच ग्राह्यवर्गणाओंका उत्कृष्ट भेद निकालनेकेलिये प्रतिभागका प्रमाण सिद्ध- राशिके अनन्तमे भाग है । और अन्तिम महास्कन्धका उत्कृष्ट भेद निकालनेकेलिये प्रति- भागका प्रमाण पल्यके असंख्यातमे भाग है । भावार्थ-सिद्धराशिक अनंतमे भागका अपने २ जघन्यमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसको अपने २ जघन्यनें मिलानेसे पांच ग्राह्य वर्गणाओंके अपने २ उत्कृष्ट भेदका प्रमाण निकलता है। और अन्तिम महास्कन्धक जघन्य भेदमें पत्यके असंख्यातमे भागका भाग देनसे जो लञ्च आवे उसको जपन्यके प्रमाणमें मिलानेसे महास्कन्धले उत्कृष्ट भेदका प्रमाण निकलता है। संखेजासंखेजे गुणगारो सो दु होदि हु अणंते। चत्तारि अगेजेसु वि सिद्धाणमणंतिमो भागो ॥ ५९७ ॥ संख्यातासंल्यातायां गुणकारः स तु भवति हि अनन्तायाम् । चतरपु अप्राशाखपि सिद्धानामनन्तिमो भागः ॥ ५९७ ॥ अर्थ-संख्याताणुवर्गणा और असंख्याताणुवर्गणानें गुणकारका प्रमाण अपने २ उह- टमें अपने २ जघन्यका भाग देनेते जो लब्ध आवे उतना है। इस गुणकारके साथ अपने २ जघन्यका गुणा करनेते अपना २ उत्कृष्ट भेद निकलता है। और अनन्ताणुवर्गणा क्या चार अग्राह्यवर्गणामोंके गुणकारका प्रमाण सिद्धराशिके अनंतमे मागमात्र है । इस गुणका- रके साथ अपने जघन्यका गुणा करनेसे अपना २ उत्कृष्ट भेद निकलता है।
गोम्मटसारः। २२१ जीवादोणंतगुणो धुवादितिण्हं असंखभागो दु । पल्लस्स तदो तत्तो असंखलोगवहिदो मिच्छो ॥ ५९८ ॥ जीवादनन्तगुणो ध्रुवादितिसृणामसंख्यभागस्तु । पल्यस्य ततस्ततः असंख्यलोकावहिता मिथ्या ॥ ५९८॥ अर्थ-भुववर्गणा, सांतरनिरंतरवर्गणा, शून्यवर्गणा, इन तीन वर्गणाओंका उत्कृष्ट भेद निकालनेकेलिये गुणकारका प्रमाण जीवराशिसे अनन्तगुणा है । तथा प्रत्येकशरीर वर्ग- णाका गुणकार पत्यके असंख्यातमे भाग है । और ध्रुवशून्यवर्गणाका गुणकार, मिथ्यावृष्टि जीवराशिमें असख्यात लोकका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना है । इस गुणकारके साथ भजघन्य भेदका गुणा करनेसे उत्कृष्ट भेदका प्रमाण निकलता है। सेढी सूई पल्ला जगपदरा संखभागगुणगारा । अप्पप्पणअवरादो उक्कस्से होति णियमेण ॥ ५९९॥ श्रेणी सूची पल्यजगत्प्रतरासंख्यभागगुणकाराः। आत्मात्मनोवरादुत्कृष्टे भवन्ति नियमेन ॥ ५९९ ॥ अर्थ-बादरनिगोदवर्गणा, शून्यवर्गणा, सूक्ष्मनिगोदवर्गणा, नभोवर्गणा इन चार वर्ग- णाओंके उत्कृष्ट भेदका प्रमाण निकालनेके लिये गुणकारका प्रमाण कमसे जगच्छ्रेणीका असंख्यातमा भाग, सूच्यंगुलका असख्यातमा भाग, पत्यका असंख्यातमा भाग, जगत्मतरका असख्यातमा भाग है। अपने २ गुणकारके प्रमाणसे अपने २ जघन्यका गुणा करनेसे अपने २ उत्कृष्ट भेदका प्रमाण निकलता है। भावार्थ-यहां पर पुद्गलद्रव्यकी तेईस वर्गणाओंका एकपलिकी अपेक्षा वर्णन किया है । जिनको नानापतिकी अपेक्षा इन वर्ग- णाओंका खरूप जानना हो वे बड़ी टीकामें देख लें। किसी भी वर्तमान एक कालमें उक्त तेईस वर्गणाओंमेंसे कौन २ सी वर्गणा कितनी २ पाई जाती है, इस अपेक्षाको लेकर जो वर्णन किया जाता है उसको नाना पतिकी अपेक्षा वर्णन कहते है। हेडिमउकसं पुण रूवहियं उपरिमं जहण्णं खु । इदि तेवीसवियप्पा पुग्गलदवा हु जिणदिठ्ठा ॥ ६००॥ अधस्तनोत्कृष्टं पुनः रूपाधिकमुपरिमं जघन्यं खलु। इति त्रयोविंशतिविकल्पानि पुद्गलद्रव्याणि हि जिनदिष्टानि ॥ ६००॥ अर्थ-तेईस वर्गणाओंमेसे अणुवर्गणाको छोड़कर शेष बाईस वर्गणाओंमे नीचेकी वर्गणाके उत्कृष्ट भेदका नो प्रमाण है उसमें एक मिलानेसे आगे की वर्गणाके जघन्य भेदका प्रमाण होता है । जैसे सख्यावाणुवर्गणाके उत्कृष्ट भेदका जो प्रमाण है उसमें एक मिलानेसे असख्याताणुवर्गणाका जघन्य भेद होता है । और असख्याताणुवर्गणाके उत्कृष्ट . 4.
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २२२ भेदमें एक मिलानेसे अनन्ताणुवर्गणाका जघन्य भेद होता है । इसी तरह आगे भी समझना । इसी क्रमसे पुद्गलद्रव्यके बाईस भेद होते है; किन्तु एक अणुवर्गणाको मिला- नेसे पुद्गलद्रव्यके तेईस भेद होते हैं यह जिनेन्द्रदेवने कहा है। प्रकारान्तरसे होनेवाले पुद्गलद्रव्यके छह भेदोंके दृष्टान्त दिखाते है। पुढवी जलं च छाया चउरिदियविषयकम्मपरमाणू । छविहमेयं भणियं पोग्गलदचं जिणवरेहिं ॥६०१॥ पृथ्वी जलं च छाया चतुरिन्द्रियविपयकर्मपरमाणवः । पडिघमेदं भणितं पुद्गलद्रव्यं जिनवरैः ॥६०१॥ अर्थ-पुद्गलद्रव्यको जिनेन्द्र देवने छह प्रकारका बताया है। जैसे १ पृथ्वी २ जल ३ ४ छाया, नेत्रको छोड़कर शेष चार इन्द्रियोंका विषय, ५ कर्म, ६ परमाणु । इन छह भेदोंकी क्या २ सज्ञा है यह बताते है। बादरवादर बादर बादरसुहमं च सुहमथूलं च । सुहमं च सुहमसुहमं धरादियं होदि छन्भेयं ॥ ६०२॥ बादरबादरं बादरं वादरसूक्ष्मं च सूक्ष्मस्थूलं च । सूक्ष्मं च सूक्ष्मसूक्ष्मं धरादिकं भवति षडूभेदम् ।। ६०२॥ अर्थ-बादरबादर, बादर, बादरसूक्ष्म, सूक्ष्मबादर, सूक्ष्म, सूक्ष्मसूक्ष्म, इस तरह पुद्ग- लद्रव्यके छह भेद है, जैसे उक्त पृथ्वी आदि । भावार्थ जिसका छेदन भेदन अन्यत्र प्रापण हो सके उस स्कन्धको बादरबादर कहते है, जैसे पृथ्वी काष्ठ पाषाण आदि । जिसका छेदन भेदन न हो सके किन्तु अन्यत्र प्रापण हो सके उस स्कन्धको बादर कहते हैं जैसे जल तैल आदि । जिसका छेदन भेदन अन्यत्र प्रापण कुछ भी न हो सके ऐसे नेत्रसे देखने योग्य स्कन्धको बादरसूक्ष्म कहते है । जैसे छाया, आतप, चांदनी आदि । नेत्रको छोड़कर शेष चार इन्द्रियोंके विषयभूत पुगलस्कन्धको सूक्ष्मस्थूल कहते है जैसे शब्द गन्ध रस आदि । जिसका किसी इन्द्रियके द्वारा ग्रहण न हो सके उस पुद्गलस्क- न्धको सूक्ष्म कहते है जैसे कर्म । जो स्कन्धरूप नही है ऐसे अविभागी पुद्गल परमाणु- ओंको सूक्ष्मसूक्ष्म कहते है। खधं सयलसमत्थं तस्स य अद्धं भणंति देसोत्ति । अद्धद्धं च पदेसो अविभागी चेव परमाणू ॥६०३॥ स्कन्धं सकलसमर्थ तस्य चार्थ भणन्ति देशमिति । अर्धार्द्ध च प्रदेशमविभागिनं चैव परमाणुम् ॥ ६०३ ॥ . । - - है। यह अवगाह क्रिया आकाशद्रव्यके निमित्तसे ही होती है । तथा प्रत्येक पदार्थकी वर्तना निया कालद्रव्यके निमित्तसे होती है। (शङ्का ) सूक्ष्म पुद्गलादिक भी एक दूसरेको अवकाश देते है इसलिये अवगाहहेतुत्व आकाशका ही असाधारण लक्षण क्यों कहा? (समाधान) यद्यपि सूक्ष्म पुद्गलादिक एक दूसरेको अवगाह देते है तथापि ये सम्पूर्ण द्रव्योंको अवगाह नही दे सकते । समस्त द्रव्योंको अवगाह देनेकी सामर्थ्य आकाशमें ही. है। इसलिये आकाशकाही अवगाहहेतुत्व यह असाधारण लक्षण युक्त है । यद्यपि अलो: काकाश किसी द्रव्यको अवगाह नहीं देता, तथापि उसका अवगाह देनेका खभाव वहां पर गमन नहीं करते इसलिये अलोकाकाश किसीको अवगाह नहीं देता। गोम्मटसारः। २२३ अर्थ-जो सौशमें पूर्ण है उसको स्कन्ध कहते है। उसके आधेको देश और आधेके आधेको प्रदेश कहते है । जो अविभागी है उसको परमाणु कहते हैं। ॥ इति स्थानस्वरूपाधिकारः॥ क्रमप्राप्त फलाधिकारको कहते है। गदिठाणोग्गहकिरियासाधणभूदं खु होदि धम्मतियं । वत्तणकिरियासाहणभूदो णियमेण कालो दु॥६०४ ॥ गतिस्थानावगाहक्रियासाधनभूतं खलु भवति धर्मत्रयम् । वर्तनाक्रियासाधनभूतो नियमेन कालस्तु ॥ ६०४ ॥ । अर्थ-गति, स्थिति, अवगाह, इन क्रियाओंके साधन क्रमसे धर्म, अधर्म, आकाश- द्रव्य है । और वर्तना क्रियाका साधन काल द्रव्य है । भावार्थ क्षेत्रसे क्षेत्रान्तकी प्राप्तिकी कारणभूत जीव पुद्गलकी पर्यायविशेषको गति कहते है । इस गतिक्रियाका साधन (उदा- सीन निमित्त ) धर्मद्रव्य है । जैसे जलमें मच्छियोंकी गतिक्रिया जलके निमित्तसे होती है । गतिविरुद्ध पर्यायको स्थिति कहते है । यह पर्याय जीव पुगलकी होती है । तथा यह स्थितिक्रिया अधर्मद्रव्यके निमित्तसे ही होती है । कहीं पर भी रहनेको अवगाह कहते भी है। किन्तु धर्मद्रव्यका निमित्त न मिलनेसे जीवादि अवगाह्य पदार्थ अलोकाकाशमें जीव और पुद्गलका उपकार (फल) बताते है । अण्णोण्णुवयारेण य जीवा वटुंति पुग्गलाणि पुणो। देहादीणिवत्तणकारणभूदा हुणियमेण ॥ ६०५॥ अन्योन्योपकारेण च जीवा वर्तन्ते पुद्गलाः पुनः। . देहादिनिर्वर्तनकारणभूता हि नियमेन ॥ ६०५ ।। अर्थ-जीव परस्परमें उपकार करते है । जैसे सेवक खामीकी हितसिद्धिमें प्रवृत्त होता है, और खामी सेवकको धनादि देकर सतुष्ट करता है । तथा पुद्गल शरीरादि उत्पन्न २२४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । करनेमें कारण है । भावार्थ-शरीर इन्द्रिय मन श्वासोच्छ्रास आदिके द्वारा पुद्गलद्रव्य जीवका उपकार करता है । तथा पुद्गलद्रव्य जीवका उपकार करता है यही नहीं किन्तु परस्परमें भी उपकार करता है। जैसे शास्त्रका उपकार गत्ता वेष्टन करते है। यहां पर चकारका ग्रहण किया है इसलिये जिस तरह परस्परमें या एक दूसरेको जीव पुद्गल उप- कार करते है उस ही तरह अपकार भी करते है। इसी अर्थको दो गाथाओंमें स्पष्ट करते है। आहारवग्गणादो तिणि सरीराणि होति उस्सासो। हिस्सासोवि य तेजोवग्गणखंधादु तेजंग ॥ ६०६ ॥ आहारवर्गणात: त्रीणि शरीराणि भवन्ति उच्छासः। निश्वासोपि च तेजोवर्गणास्कन्धात्तुतेजोऽङ्गम् ॥ ६०६॥ अर्थ-तेईस जातिकी वर्गणाओं से आहारवर्गणाके द्वारा औदारिक वैक्रियिक आहा- रक ये तीन शरीर और श्वासोच्छ्रास होते है । तथा तेजोवर्गणारूप स्कन्धके द्वारा तैजस शरीर बनता है। भासमणवग्गणादो कमेण भासा मणं च कम्मादो। अढविहकम्मदचं होदित्ति जिणेहिं णिटिं॥ ६०७॥ भाषामनोवर्गणातः क्रमेण भाषा मनश्च कार्मणतः। अष्टविधकर्मद्रव्यं भवतीति जिननिर्दिष्टम् ।। ६०७ ॥ अर्थ-भाषावर्गणाके द्वारा चार प्रकारका वचन, मनोवर्गणाके द्वारा हृदयस्थानमें अष्ट दल कमलके आकार द्रव्यमन, तथा कार्मण वर्गणाके द्वारा आठप्रकारके कर्म बनते हैं। ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है। अविभागी पुल परमाणु स्कन्धरूपमें किस तरह परिणत होती हैं, इसका कारण . बताते है! णिद्धत्तं लुक्खत्तं बंधस्स य कारणं तु एयादी। संखेजासंखेजाणंतविहा णिद्धणुक्खगुणा ॥ ६०८ ॥ स्निग्धत्वं रूक्षत्वं बन्धस्य च कारणं तु एकादयः। संख्येयासंख्येयानन्तविधा निग्धरूक्षगुणाः॥ ६०८॥ अर्थ-बन्धका कारण स्निग्धत्व या रूक्षत्व है। इस निधित्व या रूक्षत्व गुणके एकसे लेकर संख्यात असंख्यात अनन्त भेद है । भावार्थ-एक किसी गुणविशेषकी खिग्धत्व और रूक्षत्व ये दो पर्याय है। ये ही बन्धकी कारण है । इन पर्यायोंके अविभागप्रतिच्छे- दोंकी (शक्तिके निरंश अंश) अपेक्षा एकसे लेकर संख्यात असंख्यात अनंत भेद हैं गोम्मटसारः । २२५ जैसे खिग्ध पर्यायके एक अंश दो अंश तीन अश इत्यादि एकसे लेकर संख्यात असं- ख्यात अनंत अंश होते है और इन्हीकी अपेक्षा एकसे लेकर अनंततक भेद होते है । उस ही तरह रूक्षत्व पर्यायके भी एकसे लेकर सख्यात असख्यात अनंत अंशोंकी अपेक्षा एकसे लेकर अनंत तक भेद होते है । अथवा, बन्ध कमसे कम दो परमाणुओंमें होता है । सो ये दोनों परमाणु स्निग्ध हों अथवा रूक्ष हों या एक स्निग्ध एक रूक्ष हो परन्तु बंध हो सकता है। जिस तरह दो परमाणुओंमें वन्ध होता है उस ही तरह सख्यात अस- ख्यात अनंत परमाणुओंमें भी बन्ध होता है, क्योंकि बन्धका कारण स्निग्धरूक्षत्व है। उक्त अर्थको ही स्पष्ट करते है। एगगुणं तु जहण्णं णिद्धत्तं विगुणतिगुणसंखेजा- संखेजाणंतगुणं होदि तहा रुक्खभावं च ॥६०९ ॥ एकगुणं तु जघन्यं स्निग्धत्वं द्विगुणत्रिगुणसंख्येयाs-। संख्येयानन्तगुणं भवति तथा रूक्षभावं च ॥ ६०९ ॥ अर्थ-स्निग्धत्वका जो एक निरश अश है उसको ही जघन्य कहते हैं। इसके आगे स्निग्धत्वके दो तीन आदि सख्यात असख्यात अनंत भेद होते है । इस ही तरह रूक्ष- त्वके भी एक अंशको जघन्य कहते है। और इसके आगे दो तीन आदि सख्यात असं. ख्यात अनंत भेद होते है। एवं गुणसंजुचा परमाणू आदिवग्गणम्मि ठिया । जोग्गदुगाणं बंधे दोण्हं वंधो हवे णियमा ॥६१०॥ एवं गुणसंयुक्ताः परमाणव आदिवर्गणायां स्थिताः । योग्यद्विकयोः बंधे द्वयोर्बन्धो भवेनियमात् ॥ ६१० ॥ अर्थ-इस प्रकार खिग्ध या रूक्ष गुणसे युक्त परमाणु अणुवर्गणामें ही है । इसके आगे दो आदि परमाणुओका बन्ध होता है, परन्तु यह दोका बन्ध भी तब ही होता है जब कि दोनों नियमसे बन्धके योग्य हों। जब कि सामान्यसे बन्धका कारण स्निग्धरूक्षत्व बतादिया तब उसमें योग्यता और अयोग्यता क्या है ? यह बताते है। णिद्धणिद्धा ण वझंति रुक्खरुक्खा य पोग्गला। णिद्धलुक्खा य बझंति रूवारूवी य पोग्गला ॥६११॥ स्निग्धस्निग्धा न बध्यन्ते रूक्षरूक्षाश्च पुद्गलाः । स्निग्धरूक्षाश्च बध्यन्ते रूप्यरूपिणश्च पुद्गलाः ॥ ६११॥ अर्थ-खिग्ध खिग्ध पुद्गलका और रूक्ष रूक्ष पुगलका परस्परमें बन्ध नहीं होता। गो. २९ २२६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । किन्तु निग्ध रूक्ष और रूपी अरूपी पुद्गलोंका परस्परमें बन्ध होता है। भावार्थ- यद्यपि यहां पर यह कहा है कि सिग्धस्निग्ध और रूक्षरक्षका बन्ध नहीं होता तथापि यह कथन सामान्य है क्योंकि आगे चलकर विशेष कथनके द्वारा स्वयं ग्रन्थकार इस बातको स्पष्ट कर देंगे कि निग्धसिग्ध और रूक्षरूक्षका भी वन्ध होता है। और इस ही लिये यहांपर रूपी अरूपीका बन्ध होता है ऐसा कहा है। रूपी अरूपी सज्ञा किसकी है यह बताते है। णिद्धिदरोलीमज्झे विसरिसजादिस्स समगुणं एकं । रूवित्ति होदि सण्णा सेसाणं ता अरूवित्ति ॥१२॥ निग्धेतरावलीमध्ये विसरशजातेः समगुण एकः । रूपीति भवति संज्ञा शेषाणां ते अरूपिण इति ।। ६१२ ।। अर्थ-खिग्ध और रूक्षकी श्रेणिमे जो विसदृश जातिका एक समगुण है उसकी रूपी सज्ञा है । और समगुणको छोड़कर अवशिष्ट सबकी अरूपी संज्ञा है । भावार्थ-जब कि विसदृश जातिके एक समगुणकी ही रूपी संज्ञा है और शेषकी अरूपी, और रूपी अरू- पीका बन्ध होता है, तब यह सिद्ध है कि विग्धस्निग्ध और रूक्षरूक्षका भी वन्ध होता है । खिग्धकी अपेक्षा रूक्ष और रूक्षकी अपेक्षा सिग्ध विसदृश होता है। रूपी अरूपीका उदाहरण दिखाते हैं। दोगुणणिद्धाणुस्स य दोगुणलुक्खाणुगं हवे रूबी। इगितिगुणादि अख्वी रुक्खस्स वि तंव इदि जाणे ॥६१३॥ द्विगुणस्निग्धाणोश्च द्विगुणरूक्षाणुको भवेत् रूपी । एकत्रिगुणादिः अरूपी रूक्षस्यापि तद्व इति जानीहि ॥ ६१३ ॥ अर्थ-निग्धके दो गुणोंसे युक्त परमाणुकी अपेक्षा रूक्षका दोगुण युक्त परमाणु रूपी है शेष एक तीन चार आदि गुणोंके धारक परमाणु अरूपी हैं। इस ही तरह रूक्षका भी समझना चाहिये । भावार्थ-रूक्षके दो गुणोंसे युक्त परमाणुकी अपेक्षा सिग्धका दो गुणोंसे युक्त परमाणु रूपी है और शेष एक तीन आदि गुणोंके धारक पर- माणु अरूपी है। णिद्धस्स णिद्धेण दुराहिएण लुक्खस्स लुक्खेण दुराहिएण। णिद्धस्स लुक्खेण हवेज बंधो जहण्णवजे विसमे समे वा ॥६१४॥ स्निग्धस्य स्निग्धेन व्यधिकेन रूक्षस्य रूक्षेण व्यधिकेन । स्निग्धस्य रूक्षेण भवेद्वन्धो जघन्यवयं विषमे समे वा ॥६१४॥ अर्थ-एक सिग्ध परमाणुका दूसरी दो गुण अधिक निग्ध परमाणुके साथ बन्ध गोम्मटसारा। २२७ होता है । एक रूक्ष परमाणुका दूसरी दो गुण अधिक रूक्ष परमाणुके साथ बन्ध होता है। एक स्निग्ध परमाणुका दूसरी दो गुण अधिक रूक्ष परमाणुके साथ भी बन्ध होता है । सम विषम दोनोंका बन्ध होता है किन्तु जघन्यगुणवालेका बन्ध नहीं होता। भावार्थ-एक गुणवालेका तीनगुणवाले परमाणुके साथ बन्ध नहीं होता। शेष स्निग्ध या रूक्ष दोनों जातिके परमाणुओंका समधारा या विषमधारामें दो गुण अधिक होनेपर बन्ध होता है। दो चार छह आठ दश इत्यादि जहां पर दोके ऊपर दो दो अंशोंकी अधिकता हो उसको समधारा कहते है। तीन पांच सात नौ ग्यारह इत्यादि जहां पर तीनके ऊपर दो दो अंशोंकी वृद्धि हो उसको विषमधारा कहते है। इन दोनों धाराओंमें जघन्य गुणको छोड़कर दो गुण अधिकका ही बन्ध होता है औरका नहीं । णिद्धिदरे समविसमा दोत्तिगआदी दुउत्तरा होति। उभयेवि य समविसमा सरिसिदरा होति पत्तेयं ॥ ६१५ ॥ स्निग्धेतरयोः समविषमा द्वित्रिकादयः व्युत्तरा भवन्ति । उभयेऽपि च समविषमाः सहशेतरे भवन्ति प्रत्येकम् ॥ ६१५ ॥ अर्थ-स्निग्ध और रूक्ष दोनोंमेंही दोगुणके ऊपर जहां दो २ की वृद्धि हो वहां सम- धारा होती है। और जहां तीन गुणके ऊपर दो २ की वृद्धि हो उसको विषमधारा कहते है । सो स्निग्ध और रूक्ष दोनों ही दोनों ही धारा होती हैं । तथा प्रत्येक धारामें रूपी और अरूपी होते है। इस ही अर्थको प्रकारान्तरसे स्पष्ट करते है। दोचिगपभवदुउत्तरगदेसणंतरदुगाण बंधो दु । णिद्धे लुक्खे वि तहावि जहण्णुभयेवि सवत्थ ॥ ६१६ ॥ द्वित्रिकप्रभवद्युत्तरगतेष्वनन्तरद्विकयोः बन्धस्तु । स्निग्धे रूक्षे पि तथापि जघन्योभयेऽपि सर्वत्र ॥ ६१६ ॥ अर्थ-खिग्ध या रूक्ष गुणमें समधारामें दो अंशोके आगे दो दो अशोंकी वृद्धि होती है। और विषमधारामें तीनके आगे दो २ की वृद्धि होती है । सो इन दोनोंमें ही अनन्त- रद्विकका बन्ध होता है। जैसे दो गुणवाले स्निग्ध या रूक्षका चारगुणवाले खिग्ध या रूक्षके साथ तथा तीनगुणवाले खिग्ध या रूक्षका पाच गुणवाले खिग्ध या रूक्षके साथ बन्ध होता है। इसी तरह आगे भी समझना चाहिये । किन्तु जघन्यका बन्ध नही होता । दूसरी सब जगह खिग्ध और सक्षमें बंध होता है । भावार्थ-निग्ध या रूक्ष गुणसे युक्त जिन दो पुगलोंमें बंध होता है उनके खिग्ध यारूक्ष गुणके अंशोंमें दो अंशोंका अंतर होना चाहिये। जैसे दो चार,तीन पांच, चार छह, पांच सात इत्यादि । इस तरह दो अंश अधिक
२२८
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
रहनेपर सर्वत्र बंध होता है। इस नियमके अनुसार एकगुणवाले और तीनगुणवालेका
भी बंध होना चाहिये किन्तु सो नहीं होता; क्योकि यह नियम है कि जघन्य गुणवालेका
बंध नहीं होता । अतएव एक गुणवालेका तीन गुणवालेके साथ बंध नहीं होता; किन्तु
तीन गुणवालेका पांच गुणवालेके साथ बंध हो सकता है। क्योंकि तीन गुणवाला
जघन्यगुणवाला नहीं है, एकगुणवालेको ही जघन्य गुणवाला कहते हैं।
णिद्धिदरवरगुणाणू सपरहाणेवि गेदि वंध।
बहिरंतरंगहेदुहि गुणंतरं संगदे एदि ॥ ६१७ ॥
खिग्धेतरावरगुणाणुः स्वपरस्थानेऽपि नैति वन्धार्थम् ।
बहिरंतरजहतुमिर्गुणान्तरं संगते एति ॥ ६१७ ॥
अर्थ-खिग्ध या रूक्षका जघन्य गुणवाला परमाणु खस्थान या परस्थान कहीं भी बन्धको
प्राप्त नही होता । किन्तु बाह्य और अन्तरङ्ग कारणके निमित्तसे किसी दूसरे गुणवाला-
अंशवाला होने पर बन्धको प्राप्त होते है । भावार्थ-स्निग्ध या रूक्ष गुणका जब
एक अंश-अविभागप्रतिच्छेद-रूप परिणमन होता है तब उसका न स्वस्थानमें बंध
होता है और न परस्थानमें बंध होता है । किन्तु बाख अभ्यन्तर कारणके निमित्तसे जब
जघन्य स्थानको छोड़कर अधिक अंशरूप परिणमन होजाय तब वे ही स्निग्ध रूक्ष गुण
बंधको प्राप्त हो सकते हैं।
णिद्धिदरगुणा अहिया हीणं परिणामयंति बंधम्मि।
संखेजासंखेजाणंतपदेसाण खंधाणं ॥ ६१८ ॥
निग्धेतरगुणा अधिका हीनं परिणामयंति वन्धे ।
संख्येयासंख्येयानन्तप्रदेशानां स्कन्धानाम् ॥ ६१८॥
अर्थ-संख्यात असंख्यात अनंतप्रदेवाले स्कन्धोंमें स्निग्ध या रूक्षके अधिक गुणवाले
परमाणु या स्कन्ध अपने से हीनगुणवाले परमाणु या स्कन्धोंको अपनेरूप परणमाते है। जैसे
एक हजार स्निग्ध या रूक्ष गुणके अंशोंसे युक्त परमाणु यास्कन्धको एक हजार दो अंशवाला
स्निग्ध या रूक्ष परमाणु या स्कन्ध परणामाता है। इसी तरह अन्यत्र भी समझना चाहिये।
॥ इति फलाधिकार॥
इस तरह सात अधिकारोंके द्वारा छह द्रव्योंका वर्णन करके अब पंचास्तिकायका वर्णन
करते हैं।
दवं छकमकालं पंचत्थीकायसण्णिदं होदि।
काले पदेसपचयो जम्हा णस्थिति णिदिदं ॥ ६१९ ॥
गोम्मटसारः।
२२.९
द्रव्यं पटूमकालं पञ्चास्तिकायसंशितं भवति ।
काले प्रदेशप्रचयो यस्मात् नास्तीति निर्दिष्टम् ॥ ६१९ ॥
अर्थ-कालमें प्रदेशप्रचय नहीं है इसलिये कालको छोड़कर शेष द्रव्योंको ही पञ्चा-
स्तिकाय कहते हैं। भावार्थ-जो सद्प हो उसको अस्ति कहते है। और जिनके प्रदेश
अनेक हो उनको काय कहते है । काय दो प्रकारके होते है,एक मुख्य दूसरा उपचरित ।
जो अखण्डप्रदेशी है उन द्रव्योंको मुख्य काय कहते हैं। जैसे जीव धर्म अधर्म आका-
श। जिसके प्रदेश तो खण्डित हों; किन्तु खिग्ध रूक्ष गुणके निमित्तसे परस्परमें बन्ध
होकर जिनमें एकत्व होगया हो, अथवा बन्ध होकर एकत्व होनेकी जिसमें सम्भावना हो
उसको उपचरित काय कहते है, जैसे पुद्गल । किन्तु कालद्रव्य खयं अनेकप्रदेशी न
नेसे मुख्य काय भी नही है । और स्निग्ध रूक्ष गुण न होनेसे बंध होकर एकत्वकी भी
उसमें सम्भावना नहीं है, इसलिये वह (काल) उपचरित काय भी नहीं है । अतः
कालद्रव्यको छोड़कर शेष जीव पुद्गल धर्म अधर्म आकाश इन पांच द्रव्योंको ही पंचास्ति-
काय कहते है । और कालद्रव्यको कायरूप नहीं किन्तु अतिरूप कहते है।
नव पदार्थोंको बताते है
णव य पदत्था जीवाजीवा ताणं च पुण्णपावदुगं ।
आसवसंवरणिजरबंधा मोक्खो य होतित्ति ॥ ६२० ।।
नव च पदार्था जीवाजीवाः तेषां च पुण्यपापद्विकम् ।
आस्रवसंवरनिर्जराबन्धा मोक्षश्च भवन्तीति ॥ ६२०॥
अर्थ-मूलमें जीव और अजीव ये दो पदार्थ है। इन हीके सम्बन्धसे पुण्य और
पाप ये दो पदार्थ होते है । इसलिये चारपदार्थ हुए । तथा पुण्यपापके आसव बंध सवर
निर्जरा मोक्ष ये पांच पदार्थ होते है । इसलिये सब मिलाकर नव पदार्थ होते है।
भावार्थ-जिसमें ज्ञानदर्शनरूप चेतना पाई जाय उसको जीव कहते है । जिसमें
चेतना न हो उसको अजीव कहते है । शुभ कर्मोंको पुण्य और अशुम कौंको पाप कहते
है। कोंके आनेके द्वारको, या मन वचन कायके द्वारा होनेवाले आत्मप्रदेशपरिस्पन्दको,
अथवा बन्धके कारणको आसव कहते है । अनेक पदार्थों में एकत्वबुद्धिके उत्पादक सम्ब-
न्धविशेषको अथवा आत्मा और कर्मके एकक्षेत्रावगाहरूप सम्बन्धविशेषको बन्ध कहते
है। आसवके निरोधको सवर कहते है । बद्ध कर्मोंके एकदेश क्षयको निर्जरा कहते है।
आत्मासे समस्त कर्मोके छूट जानेको मोक्ष कहते है। ये ही नव पदार्थ है।
जीवदुर्ग उत्तटुं जीवा पुण्णा हु सम्मगुणसहिदा ।
बदसहिदावि य पावा तबिवरीया हवंतिचि ॥ ६२१ ॥
२३० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । जीवद्विकमुक्तार्थ जीवाः पुण्या हि सम्यक्त्वगुणसहिताः। व्रतसहिता अपि च पापास्त द्विपरीता भवन्तीति ।। ६२१ ॥ अर्थ-जीव और अजीवका अर्थ पहले बताचुके है । जीवके भी दो भेद हैं, एक पुण्य और दूसरा पाप । जो सम्यक्त्वगुणसे या व्रतसे युक्त हैं उनको पुण्य जीव कहते है। और इससे जो विपरीत है उनको पाप जीव कहते है। गुणस्थानक्रमकी अपेक्षासे जीवराशिकी संख्या बताते है मिच्छाइट्टी पावा पंताणता य सासणगुणावि । पल्लासंखेजदिमा अणअण्णदरुदयमिच्छगुणा ॥ ६२२ ॥ मिथ्यादृष्टयः पापा अनन्तानन्ताश्च सासनगुणा अपि । पल्यासंख्येया अनान्यतरोदयमिथ्यात्वगुणाः ।। ६२२ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि पाप जीव हैं । ये अनंतानंत हैं, क्योंकि द्वितीयादि तेरह गुणस्थानवाले जीवोंका प्रमाण घटानेसे अवशिष्ट समस्त संसारी जीवराशि मिथ्यादृष्टि ही है। तथा सासादन गुणस्थानवाले जीव पल्यके असंख्यातमे भाग है । और ये भी पाप जीव ही है क्योंकि अनंतानुबंधी चार कषायोंमेंसे किसी एक कषायका इसके उदय हो- रहा है । इसलिये यह मिथ्यात्व गुणको प्राप्त है । भावार्थ-सासादन गुणस्थानवालेका पहले यह लक्षण कह आये हैं कि "किसी एक अनंतानुबंधी कषायके उदयसे जो सम्य- क्त्वरूपी रत्नपर्वतसे तो गिरपड़ा है; किन्तु मिथ्यात्वरूप भूमिके सम्मुख है-अर्थात् अभी- तक जिसने मिथ्यात्वभूमिको ग्रहण नहीं किया है, किन्तु एक समयसे लेकर छह आवली- तकके कालमें नियममे वह उस मिथ्यात्व भूमिको ग्रहण करलेगा ऐसे जीवको सासादन- गुणस्थानवाला कहते हैं । अतः इस गुणस्थानवाले जीवोंको पुण्य जीव नहीं कह सकते, क्योंकि अनंतानुबंधी कषायके उदयसे इनका सम्यक्त्वगुण भी नष्ट हो चुका है और इनके किसी प्रकारका व्रत भी नहीं है । किन्तु नियमसे ये मिथ्यात्व गुणस्थानको प्राप्त होंगे इसलिये इनको मिथ्यादृष्टि-पापजीव ही कहते है। इन जीवोंकी संख्या पत्यके असख्यातमे भाग है। और मिथ्याइष्टि जीवोंकी संख्या अनंतानंत है। मिच्छा सावयसासणमिस्साविरदा दुवारणता य । पल्लासंखेजदिममसंखगुणं संखसंखगुणं ॥ ६२३ ॥ मिथ्याः श्रावकसासनमिश्राविरता द्विवारानन्ताश्च । पल्यासंख्येयमसंख्यगुणं संख्यासंख्यगुणम् ॥ ६२३ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि अनंतानंत है। श्रावक पल्यके असंख्यातमे भाग है । सासाद गुण- स्थानवाले श्रावकोंसे असंख्यातगुणे है । मिश्र सासादनवालोंसे संख्यातगुणे है । अत्रतस- - गोम्मटसारः। २३१ म्यम्हष्टि मिश्रजीवोंसे असख्यातगुणे है । इनमें अन्तके चार स्थानोमें कुछ २ अधिक सम- झना चाहिये। भावार्थ-मनुष्य और तिर्यंच इन दो गतियोंमें ही देशसंयम गुणस्थान होता है । इनमें तेरह करोड़ मनुष्य और पल्यके असख्यातमे भाग तिर्यच है । सासादन गुणस्थान चारों गतियोमें होता है। इनमें बावन करोड़ मनुष्य और श्रावकोंसे असंख्यात- गुणे इतर तीन गतिके जीव है। मिश्र गुणस्थान भी चारो गतियों में होता है इनमें एकसौ चार करोड़ मनुष्य और सासादनवालोंसे सख्यातगुणे शेष तीन गतिके जीव है । तथा अव्रत गुणस्थान भी चारो गतियोमे होता है । इनमें सातसौ करोड़ मनुष्य है और मिश्रवालोसे असख्यातगुणे शेष तीन गतिके जीव है। तिरधियसयणवणउदी छण्णउदी अप्पमत्त वे कोडी। पंचेव य तेणउदी णवठ्ठाविसयच्छउत्तरं पमदे ॥ ६२४ ॥ व्यधिकशतनवनवतिः पण्णवतिः अप्रमत्ते द्वे कोटी। पञ्चैव च त्रिनवतिः नवाष्टद्विशतपडुत्तरं प्रमत्ते ॥ ६२४ ॥ अर्थ-प्रमत्त गुणस्थानवाले जीवोंका प्रमाण पांच करोड़ तिरानवे लाख अठानवे हजार दो सौ छह है (५९३९८२०६ )। अप्रमत्त गुणस्थानवाले जीवोंका प्रमाण दो करोड़ ज्यानवे लाख निन्यानवे हजार एक सौ तीन (२९६९९१०३) है। तिसयं भणंति केई चउरुत्तरमत्थपंचयं केई । उवसामगपरिमाणं खवगाणं जाण तहुगुणं ॥ ६२५ ॥ त्रिशतं भणन्ति केचित् चतुरुत्तरमस्तपञ्चकं केचित् । उपशामकपरिमाणं क्षपकाणां जानीहि तद्विगुणम् ॥ ६२५ ॥ अर्थ--उपशमश्रेणिवाले आठवें नौमे दशमे ग्यारहमे गुणस्थानवाले जीवोंका प्रमाण कोई आचार्य तीनसौ कहते है । कोई तीनसौ चार कहते है । कोई दो सौ निन्यानवे कहते है । क्षपकश्रेणिवाले आठमे नौमे दशमे बारहमे गुणस्थानवाले जीवोंका प्रमाण उप- शम श्रेणिवालोंसे दूना है। उपशमश्रेणिवाले तीनसौ चार जीवोंका निरंतर आठ समयोंमें विभाग करते है । सोलसयं चउचीसं तीसं छत्तीस तह य बादालं। अडदालं चउववण्णं चउण्णं होंति उवसमगे ॥ ६२६ ॥ पोडशकं चतुर्विशतिः त्रिंशत् पत्रिंशत् तथा च द्वाचत्वारिंशत् । अष्टचत्वारिंशत् चतुःपञ्चाशत् चतुःपञ्चाशत् भवन्ति उपशमके ॥ ६२६ ॥ अर्थ-निरंतर आठ समयपर्यन्त उपशमश्रेणि मांडनेवाले जीवोंमे अधिकसे अधिक प्रथम समयमें १६, द्वितीय समयमें २४, तृतीय समयमें ३०, चतुर्थ समयमें ३६, पांचमे समयमै १२, छठे समयमें ४८, सातमेमें ५४, और आठमेमें ५४, जीव होते है।
. २३२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । बत्तीसं अडदालं सट्ठी वावत्तरी य चुलसीदी। छण्णउदी अष्टुत्तरसयमद्दुत्तरसयं च खवगेसु ॥ ६२७ ।। द्वात्रिशदष्टचत्वारिंशत् पष्टिः द्वासप्ततिश्च चतुरशीतिः । षण्णवतिः अष्टोत्तरशतमष्टोत्तरशतं च क्षपकेषु ॥ ६२७ ॥ अर्थ-अंतरायरहित आठ समयपर्यन्त क्षपकश्रेणि माडनेवाले जीव अधिकसे अधिक, उपर्युक्त आठ समयोंमें होनेवाले उपशमश्रेणि वालोंसे दूने होते है । इनमें प्रथम समयमें ३२, दूसरे समयमें ४८, तीसरे समयमें ६०, चतुर्थ समयमें ७२, पांचमे समयमें ८४, छढे समयमें ९६, सातमे समयमें १०८, आठमे समयमें १०८ होते हैं । अटेव सयसहस्सा अट्ठाणउदी तहा सहस्साणं । संखा जोगिजिणाणं पंचसयविउत्तरं वंदे ॥ ६२८॥ अष्टैव शतसहस्राणि अष्टानवतिस्तथा सहस्राणाम् । संख्या योगिजिनानां पंचशतब्युत्तरं वन्दे ।। ६२८ ॥ अर्थ-सयोगकेवली जिनोंकी संख्या आठ लाख अठानवे हजार पांचसौ दो है। इनकी मैं सदाकाल वन्दना करता हूं । भावार्थ- निरंतर आठ समयोमें एकत्रित होनेवाले सयोगी जिनकी संख्या दूसरे आचार्यकी अपेक्षासे इस प्रकार कही है कि “छसु सुद्धसम- येसु तिण्णि तिण्णि जीवा केवलमुप्पाययंति, दोसु समयेसु दो दो जीवा केवल मुप्पाययंति एवमट्ठसमयसंचिदजीवा वावीसा हवंति" अर्थात् आठ समयोमेंसे छह समयोंमें प्रतिस- मय तीन तीन जीव केवलज्ञानको उत्पन्न करते है, और दो समयों में दो दो जीव केवल- ज्ञानको उत्पन्न करते है। इस तरह आठ समयोंमें वाईस सयोगी जिन होते हैं। जब केवलज्ञानके उत्पन्न होनेमें छह महीनाका अंतराल होता है तब अन्तराल न पड़- नेसे निरंतर आठ समयोंमें वाईस केवली होते है। इसके विशेष कथनमें छहप्रकारका राशिक होता है। प्रथम यह कि जब छह महीना आठ समयमात्र कालमें वाईस केवली होते है तब आठ लाख अठानवे हजार पांच सौ दो केवली कितने कालमें होंगे। इसका चालीस हजार आठसौ इकतालीसको छह महीना आठ समयोंसे गुणा करने पर जो कालका प्रमाण लब्ध आवे वही उत्तर होगा। दूसरा छह महीना आठ समयोमें निरंतर केवलज्ञान उत्पन्न होनेका काल आठ समय है तब पूर्वोक्त प्रमाण कालमें कितने समय होंगे। इसका उत्तर तीन लाख छबीस हजार सात सौ अट्ठाईस है। तथा दूसरे आचार्योके मतकी अपेक्षा आठ समयोमें वाईस या चवालीस या अठासी या एकसौ छिहत्तर जीव केवलज्ञानको उत्पन्न करते है तव पूर्वोक्त समयप्रमाणमें या उसके आधेमें या चतुर्थीशमें या अष्टमांशमें कितने जीव केवलज्ञानको उत्पन्न करेंगे। इन चार प्रकारके त्रैराशिकोंका उत्तर आठ लाख अठानवे हजार पाचसौ दो होता है।
गोम्मटसारः। २३३ क्षपक तथा उपशमक जीवोंकी युगपत् संभवती विशेष संख्याको तीन गाथाओंमें कहते है। होति खवा इगिसमये बोहियबुद्धा य पुरिसवेदा य । उक्स्सेणटुत्तरसयप्पमा सग्गदो य चुदा ॥ ६२९ ॥ पत्तेयबुद्धतित्थयरत्थिणउंसयमणोहिणाणजुदा । दसछक्कबीसदसवीसट्टावीसं जहाकमसो ॥ ६३०॥ जेहावरबहुमज्झिमओगाहणगा दुचारि अद्वैव । जुगवं हवंति खवगा उपसमगा अद्धमेदेसि ॥ ६३१ ॥ भवन्ति क्षपका एकसमये बोधितबुद्धाश्च पुरुषवेदाश्च । उत्कृष्टेनाष्टोत्तरशतप्रमाः स्वर्गतश्व च्युताः ॥ ६२९ ॥ प्रत्येकबुद्धतीर्थकरतीनपुंसकमनोवधिज्ञानयुताः। दशषट्कविंशतिदशविंशत्यष्टाविंशो यथाक्रमशः ॥ ६३० ॥ ज्येष्ठावरबहुमध्यमावगाहा द्वौ चत्वारोऽदैव । युगपत् भवन्ति क्षपका उपशमका अर्धमेतेषाम् ॥ ६३१ ॥ अर्थ-युगपत् एक समयमें क्षपकश्रेणिवाले जीव अधिकसे अधिक होते है तो कितने होते है ? उसका हिसाव इस प्रकार है कि बोषितबुद्ध एकसौ आठ, पुरुषवेदी एकसौ आठ, खर्गसे च्युत होकर मनुष्य होकर क्षपकश्रेणि माडनेवाले एकसौ आठ, प्रत्येकबुद्धि ऋद्धिके धारक दश, तीर्थकर छह, स्त्रीवेदी वीस, नपुंसकवेदी दश, मनःपर्ययज्ञानी वीस, अवधिज्ञानी अट्ठाईस, मुक्त होनेके योग्य शरीरकी उत्कृष्ट' अवगाहनाके धारक दो, जघन्य अवगाहनाके धारक चार, समस्त अवगाहनाओंके मध्यवर्ती अवगाहनाके धारक आठ । ये सब मिलकर चारसौ बत्तीस होते है। उपशमश्रेणिवाले इसके आधे (२१६ ) होते है । भावार्थ-पहले तो गुणस्थानमें एकत्रित होनेवाले जीवोंकी संख्या बताई थी, और 'यहां पर श्रेणिमें युगपत् सम्भवती जीवोंकी उत्कृष्ट सख्या बताई है। सर्व सयमी जीवोंकी सख्याको बताते है । सत्तादी अटुंता छण्णवमज्झा य संजदा सके। अंजलिमौलियहत्यो तियरणसुद्धे णमंसामि ॥ ६३२ ।। सप्तादयोऽष्टान्ताः षण्णवमध्याश्च संयताः सर्वे । अञ्जलिमौलिकहस्तत्रिकरणशुद्ध्या नमस्यामि ॥ ६३२ ॥ १ तान् इत्यध्याहार । गो.३० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम। २३४ अर्थ छठे गुणस्थानसे लेकर चौदहमे गुणस्थानतकके सर्व संयमियोंका प्रमाण तीन कम नव करोड़ है (८९९९९९९७) । इनको मै हाथ जोड़कर शिर नवाकर मन वचन कायकी शुद्धिपूर्वक नमस्कार करता हूं। भावार्थ-प्रमत्तवाले जीव (५९३९८२०६) अप्रमत्तवाले (२९६९९१०३) उपशमश्रेणीवाले चारो गुणस्थानवर्ती (१९९६) क्षपकश्रेणीवाले चार गुणस्थानवर्ती (२३९२) सयोगी जिन (८९८५०२) इन सबका जोड़ (८९९९९- ३९९) होता है सो इसको सर्वसंयमियोके प्रमाण से घटाने पर शेष अयोगी जीवोंका प्रमाण (५९८ ) रहता है । इसको संयमियोंके प्रमाणमें जोड़नेसे संयमियोंका कुलप्रमाण तीन कम नौ करोड़ होता है। चारो गतिसम्बन्धी मिथ्यादृष्टि सासादन मिथ और अविरत इनकी संख्याके साधक- भूत पल्यके भागहारका विशेष वर्णन करते हैं। ओघासंजदमिस्सयसासणसम्माणभागहारा जे रूऊणावलियासंखेजेणिह भजिय तत्य णिक्खित्ते ॥ ६३३ ॥ देवाणं अवहारा होति असंखेण ताणि अवहरिय। तत्थेव य पक्खिचे सोहम्मीसाण अवहारा ॥ ६३४ ॥ ओघा असंयतमिश्रकसासनसमीचां भागहारा ये । रूपोनावलिकासंख्यातेनेह भक्त्वा तत्र निक्षिप्ते॥ ६३३॥ देवानामवहारा भवन्ति असंख्येन तानवहत्य । तत्रैव च प्रक्षिप्त सौधमैशानावहाराः ॥ ६३४ ॥ अर्थ-गुणस्थानसख्याम असयत मिश्र सासादनके भागहारोका जो प्रमाण बताया है उसमे एक कम आवलीके असंख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लव्ध आवे उसको भाग- हारके प्रमाणमें मिलानेसे देवगतिसम्बन्धी भागहारका प्रमाण होता है। तथा देवगतिस- म्बन्धी भागहारके प्रमाणमें एक कम आवलीके असख्यातमे भागका माग देनेसे जो लब्ध आवे उसको देवगतिसम्बन्धी भागहारके प्रमाणमे मिलानेसे सौधर्म ईशान खर्गसम्बन्धी भागहारका प्रमाण होता है । भावार्थ-जहां नहाका जितना २ भागहारका प्रमाण बताया है उस २ भागहारका पल्यमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने २ ही वहां २ जीव सम- झने चाहिये। पहले गुणस्थानसख्यामें असंयत गुणस्थानके मागहारका प्रमाण एकवार असं- ख्यात कहाथा, इसमें एक कम आवलीके असख्यातमे भागका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसको भागहारके प्रमाणमे मिलानेसे देवगतिसम्बन्धी असंयत गुणस्थानके भागहा- रका प्रमाण होता है, इस देवगतिसम्बन्धी भागहारके प्रमाणका पल्यमें भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने. देवगतिसम्बन्धी असंयतगुणस्थानवी जीव है। तथा देवगतिसम्बन्धी असंयतगुणस्थानके भागहारका जो प्रमाण है उसमें एक कम आवलीके असंख्यातमे भागका गोम्मटसारः। २३५ भाग देनेसे जो लब्ध आवे उसको उस भागहारमें मिलानेसे सौधर्म ईशान खर्गसम्बन्धी असंयतगुणस्थानके भागहारका प्रमाण होता है । इस भागहारका पल्यमें भाग देनेसे जो ६ लब्ध आवे उतना सौधर्म ईशान खर्गसम्बन्धी असयत गुणस्थानवी जीवोंका प्रमाण है। इसी तरह मिन और सासादनके भागहारका प्रमाण भी समझना चाहिये। सनत्कुमार माहेन्द्र खर्गके असयत मिश्र सासादनसम्बन्धी भागहारका प्रमाण बताते है। सोहम्मसाणहारमसंखेण य संखरूवसंगुणिदे। उवरि असंजदमिस्सयसासणसम्माण अवहारा ॥ ६३५ ॥ सौधर्मेशनहारमसंख्येन च संख्यरूपसगुणिते । उपरि असंयतमिश्रकसासनसमीचामवहाराः ॥ ६३५॥ अर्थ सौधर्म ईशान खर्गके सासादन गुणस्थानमें जो भागहारका प्रमाण है उससे असख्यातगुणा सानत्कुमार माहेन्द्र खर्गके असंयतगुणस्थानके भागहारका प्रमाण है । इससे असख्यातगुणा मिश्र गुणस्थानके भागहारका प्रमाण है। तथा मिश्रके भागहारसे सख्यातगुणा सासादन गुणस्थानके भागहारका प्रमाण है। इस गुणितक्रमकी व्याप्तिको बताते है। सोहम्मादासारं जोइसिवणभवणतिरियपुढवीसु । अविरदमिस्से संखं संखासंखगुण सासणे देसे ॥ ६३६ ॥ सौधर्मादासहस्रार ज्योतिषिवनभवनतिर्यक्पृथ्वीषु । अविरतमिश्रेऽसंख्यं संख्यासंख्यगुणं सासने देशे ।। ६३६ ॥ अर्थ-सौधर्म खर्गसे लेकर सहस्रार खर्गपर्यन्त, ज्योतिषी, व्यंतर, भवनवासी, तिर्यच, सातों नरकपृथ्वी, इनके अविरत और मिश्र गुणस्थानमे असख्यातका गुणक्रम है । और सासादन गुणस्थानमें सख्यातका तथा देशसयम गुणस्थानमें असख्यातका गुणक्रम समझना चाहिये । भावार्थ-सौधर्म ईशान खर्गके आगे सानत्कुमार माहेन्द्र के असयत मिश्र सासादन गुणस्थानके भागहारोंका प्रमाण बता चुके हैं । इसमें सासादन गुणस्थानके भाग- हारका जो प्रमाण है उससे असख्यातगुणा ब्रह्म ब्रह्मोत्तरके असंयत गुणस्थानका भागहार है । इससे असंख्यातगुणा मिश्रका भागहार और मिश्रके भागहारसे संख्यातगुणा सासाद- नका भागहार है । ब्रह्म ब्रह्मोचरसम्बधी सासादनके भागहारसे असंख्यातगुणा लातव कापि- ठके असंयत गुणस्थान सम्बन्धी मागहारका प्रमाण है । और इससे असंख्यातगुणा मिश्रका भागहार और मिश्रके मागहारसे संख्यातगुणा सासादनका भागहार है । इसी क्रमके अनुसार शुक्र महाशुक्रसे लेकर सातमी पृथ्वीतकके असंयत मिश्र सासादनसम्बन्धी भाग- १ यहा पर सख्यातकी सहनानी बारका अक है।
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २३६ हारोंका प्रमाण समझना चाहिये । विशेषता यह है कि देशसंयम गुणस्थान खगोंमें तथा नरकोंमें नहीं होता; किन्तु तिर्यञ्चोंमें होता है । इसलिये तिर्यचोंमें जो सासादनके भागहा- रका प्रमाण है उससे असंख्यातगुणा तिर्यचौके देशव्रत गुणस्थानका भागहार है । तथा तिर्यंचोंके देशसंयम गुणस्थानके भागहारका जो प्रमाण है वही प्रथम नरकके असंयत गुणस्थानके भागहारका प्रमाण है। किन्तु देशव्रतके भागहारका प्रमाण स्वर्ग तथा नरकमें नही है। आनतादिकमें गुणितक्रमकी व्याप्तिको तीन गाथाओंद्वारा बताते है। चरमधरासाणहरा आणदसम्माण आरणप्पहुदि। अंतिमगेवजंतं सम्माणमसंखसंखगुणहारा ॥ ६३७ ॥ चरमधरासानहारादानतसमीचामारणप्रभृति । अंतिमवेयकान्तं समीचामसंख्यसंख्यगुणहाराः ॥ ६३७ ।। अर्थ-सप्तम पृथ्वीके सासादनसम्बन्धी भागहारसे आनत प्राणतके असंयतका भाग- हार असंख्यातगुणा है । तथा इसके आगे आरण अच्युतसे लेकर नौमे ग्रैवेयकपर्यंत दश स्थानोंमें असंयतका भागहार क्रमसे संख्यातंगुणा २ है। तत्तो ताणुत्ताणं वामाणमणुहिसाण विजयादि । सम्माणं संखगुणो आणदमिस्से असंखगुणो ॥ ६३८॥ ततस्तेषामुक्तानां वामानामनुदिशानां विजयादि-। समीचां संख्यगुण आनतमित्रे असंख्यगुणः ॥ ६३८ ॥ अर्थ-इसके अनंतर आनत प्राणतसे लेकर नवम अवेयक पर्यतके मिथ्यादृष्टि जीवोंका भागहार क्रमसे अंतिम अवेयक सम्बन्धी असंयतके भागहारसे संख्यातगुणा संख्यातंगुणा है। इस अंतिम अवेयक सम्बन्धी मिथ्यादृष्टिके भागहारसे क्रमपूर्वक संख्यातगुणा संख्या- तगुणा नव अनुदिश और विजय वैजयंत जयंत अपराजितके असंयतोंका भागहार है । विजयादिकसम्बन्धी असंयतके भागहारसे आनत प्राणत सम्बन्धी मिश्रका भागहार असं- ख्यातगुणा है तत्तो संखेजगुणो सासणसम्माण होदि संखगुणो। उत्तहाणे कमसो पणछस्सत्त©चदुरसंदिट्ठी ॥ ६३९ ॥ ततः संख्येयगुणः सासनसमीचां भवति संख्यगुणः । उक्तस्थाने क्रमशः पञ्चषटूछताष्टचतुःसंदृष्टिः ॥ ६३९ ।। । १-२-३ इन स्थानोंमे संख्यातकी सहनानी क्रमसे पाच अक छह अक तथा सातका अक है । इस वातको आगेके गाथामें कहेगे।
गोम्मटसारः। २३७ अर्थ-आनत प्राणतसम्बन्धी मिश्रके मागहारसे, आरण अच्युतसे लेकर नवम अवे- यक पर्यंत दश स्थानोंमें मिश्रसम्बन्धी भागहारका प्रमाण क्रमसे संख्यातगुणा संख्यातगुणा है। यहांपर संख्यातकी सहनानी आठका अंक है । अंतिम अवेयकसम्बन्धी मिश्रके भाग- हारसे आनत प्राणतसे लेकर नवम अवेयकपर्यंत ग्यारह स्थानोमें सासादनसम्यग्दृष्टीके भाग- हारका प्रमाण क्रमसे संख्यातगुणा २ है । यहा पर संख्यातकी सहनानी चारका अंक है। इन पूर्वोक्त पाच स्थानोंमें सख्यातकी सहनानी क्रमसे पांच, छह, सात, आठ, और चारके अंक है। सगसगअवहारहिं पल्ले भजिदे हवंति सगरासी। सगसगगुणपडिवण्णे सगसगरासीसु अवणिदे वामा ॥ ६४०॥ खकखकावहारैः पल्ये भक्ते भवन्ति स्वकराशयः । खकखकगुणप्रतिपन्नेषु स्वकस्वकराशिषु अपनीतेषु वामाः ॥ ६४०॥ अर्थ-अपने २ भागहारका पल्यमें भाग देनेसे अपनी २ राशिके जीवोंका प्रमाण निकलता है। तथा अपनी २ सामान्य राशिमेसे असंयत मिश्र सासादन तथा देशव्रतका प्रमाण घटानेसे अवशिष्ट मिथ्याइष्टि जीवोंका प्रमाण रहता है । भावार्थ-यहा पर मनुष्योंके भागहारका प्रमाण नहीं बतायां है, तथा देशव्रत गुणस्थान मनुष्य और नियंच इन दोनों हीके होता है, इसलिये तिर्यचोंकी ही सामान्य राशिमेंसे असंयत मिश्र सासादन तथा देश- व्रत गुणस्थानवाले जीवोंका प्रमाण घटानेसे मिथ्यादृष्टि तियेच जीवोंका प्रमाण होता है। किन्तु देव और नारकियोकी सामान्य राशिमेंसे असंयत मिश्र और सासादन गुणस्थानवाले, जीवोंका ही प्रमाण घटानेसे अवशिष्ट मिथ्यादृष्टि जीवोंका प्रमाण होता है । परन्तु जहा पर मिथ्यादृष्टि आदि जीव सम्भव हों वहां पर ही इनका ( मिथ्यादृष्टि आदि जीवोंका) प्रमाण निकालना चाहिये, अन्यत्र नहीं; क्योंकि अवेयकसे ऊपरके सब देव असंयत ही होते है। मनुष्यगतिमें गुणस्थानोंकी अपेक्षासे जीवोंका प्रमाण बताते है। तेरसकोडी देसे वावण्णं सासणे मुणेदचा। मिस्सावि य तहुगुणा असंजदा सत्तकोडिसयं ॥ ६४१॥ त्रयोदशकोट्यो देशे द्वापञ्चाशत् सासने मन्तव्याः । मिश्रा अपि च तद्विगुणा असंयताः सप्तकोटिशतम् ॥ ६४१ ॥ अर्थ-देससयम गुणस्थानमें तेरह करोड़, सासादनमें बावन करोड़, मिश्रमें एकसौ चार करोड़, असयतमें सात करोड़ मनुष्य है । प्रमत्तादि गुणस्थानवाले जीवोंका प्रमाण पूर्व ही बता चुके है। इस प्रकार यह गुणस्थानों में मनुष्य जीवोंका प्रमाण है।
२३८ रायचन्द्रजैनशाखामालायाम् । जीविदरे कम्मचये पुण्णं पायोति होदि पुण्णं तु । सुहपयडीणं दवं पावं असुहाण दचं तु ॥ ६४२ ॥ जीवेतरस्मिन् कर्मचये पुण्यं पापमिति भवति पुण्यं तु। शुभप्रकृतीनां द्रव्यं पापमशुभप्रकृतीनां द्रव्यं तु ॥ ६४२ ॥ अर्थ-जीव पदार्थमें सामान्यसे मिथ्यादृष्टि और सासादन गुणस्थानवाले जीव पाप है । और मिश्र गुणस्थानवाले पुण्य और पापके मिश्ररूप है। तथा असयतसे लेकर सब ही पुण्य जीव है। इसके अनंतर अजीब पदार्थका वर्णन करते है। अजीव पदार्थमें कार्मण स्कन्धके दो भेद हैं । एक पुण्य दूसरा पाप । शुभ प्रकृतियोंके द्रव्यको पुण्य और अशुभ प्रकृतियोंके द्रव्यको पाप कहते है । भावार्थ-कार्मण स्कन्धौ सातावेदनीय, नर- कायुको छोड़कर शेष तीन आयु, शुभ नाम, उच्च गोत्र, इन शुभ प्रकृतियोंके द्रव्यको पुण्य कहते है । इनके सिवाय घातिकर्मकी समस्त प्रकृति और असातावेदनीय, नरक आयु, अशुभ नाम, नीच गोत्र, इन प्रकृतियोंके द्रव्यको पाप हो । आसवसंवरदचं समयपवद्धं तु णिजरादर तत्तो असंखगुणिदं उक्कस्सं होदि णियमेण ॥ ६४३ ॥ आनवसंवरदव्यं समयप्रवद्धं तु निर्जराद्रव्यम् । ततोऽसंख्यगुणितमुत्कृष्टं भवति नियमेन ॥ ६४३ ॥ अर्थ-आस्रव और संवरका द्रव्यप्रमाण समयप्रवद्धप्रमाण है । और उत्कृष्ट निर्जरा- द्रव्य समयप्रबद्धसे असंख्यातगुणा है । भावार्थ-एक समयमें समयप्रवद्धप्रमाण कर्मपुद्ग- लका ही आस्रव होता है, इसलिये आसवको समयप्रबद्धप्रमाण कहा है । और आस्रवके निरोधरूप संवर है । सो यह संवर भी एकसमयमें उतने ही द्रव्यका होगा, इसलिये द्रव्य-संवरको भी समयप्रबद्ध प्रमाण कहा है। गुणश्रेणिनिर्जरामें असंख्यात समयप्रबद्धोंकी निर्जरा एक ही समयमें हो जाती है, इसलिये उत्कृष्ट निर्जराद्रव्यको असंख्यात समयप्रबद्ध- प्रमाण कहा है। बंधो समयपबद्धो किंचूणदिवड्डमेचगुणहाणी। मोक्खो य होदि एवं सद्दहिदवा दु तचट्ठा ॥ ६४४ ॥ बन्धः समयप्रबद्धः किञ्चिदूनव्यर्धमात्रगुणहानिः । मोक्षश्च भवत्येवं श्रद्धातव्यास्तु तत्वार्थाः ॥ ६४४ ॥ अर्थ-बन्धद्रव्य समयप्रबद्धप्रमाण है, क्योंकि एक समयमें समयप्रबद्धप्रमाण ही कर्म- प्रकृतियोंका बंध होता है । तथा मोक्षद्रव्यका प्रमाण अर्धगुणहानिगुणितसमयप्रबद्ध प्रमाण १ पुण्य और पाप प्रकृतियोकी मिन्न २ सख्या कर्मकाण्डमे देखना चाहिये। - . है गोम्मटसारः। २३० है। क्योंकि अयोगि गुणस्थानके अन्तमें जितनी कर्म प्रकृतियोंकी सचा रहती है उतना ही मोक्षद्रव्यका प्रमाण है । तथा यहां पर ( अयोगि गुणस्थानके अंत समयमें ) कोंकी सत्ता वर्धगुणहानिगुणित समयप्रवद्धप्रमाण है। इसलिये मोक्षद्रव्यका प्रमाण भी व्यर्धगुणहानि- गुणितसमयप्रवद्धप्रमाण ही है । इस प्रकार इन सात तत्वोंका श्रद्धान करना चाहिये । भावार्थ-पूर्वमें जो छह द्रव्य पञ्चास्तिकाय नव पदार्थोंका खरूप बताया है उसके अनु- सार ही उनका श्रद्धान करना चहिये क्योंकि इनके श्रद्धानको सम्यक्त्व कहते है। सम्यक्त्वके भेदोंको गिनाने के पहले क्षायिक सम्यक्त्वका खरूप बताते है । खीणे दंसणमोहे जं सद्दहणं सुणिम्मलं होई तं खाइयसम्मत्तं णिचं कम्मक्खवणहेदु ॥ ६४५ ॥ क्षीणे दर्शनमोहे यच्छ्रद्धानं सुनिर्मलं भवति । तत्क्षायिकसम्यक्त्वं नित्यं कर्मक्षपणहेतु ॥ ६४५ ॥ अर्थ-दर्शनमोह.भीमके क्षीण होजाने पर जो निर्मल श्रद्धान होता है उसको शायिक सम्यक्त्व कहते है। यह सम्यक्त्व नित्य और कोंके क्षय होनेका कारण भावार्थ-यद्यपि दर्शनमोहनीयके मिथ्यात्व मिश्र सम्यक्त्वप्रकृति ये तीन ही भेद है। तथापि अनंतानुबंधी कषाय भी दर्शन गुणको विपरीत करता है इसलिये इसको भी दर्श- जमोहनीय कहते है । इसी लिये आचार्योंने पञ्चाध्यायीमें कहा है कि 'सप्तैते दृष्टिमोहनम्' अतएव इन सात प्रकृतियोंके सर्वथा क्षीण होजानेसे दर्शन गुणकी जो अत्यन्त निर्मल अवस्था होती है उसको क्षायिक सम्यक्त्व कहते है । इसके प्रतिपक्षी कर्मका एकदेश भी अवशिष्ट नहीं रहा है इस ही लिये यह दूसरे सम्यक्त्वोकी तरह सात नहीं है । तथा इसके होनेपर असंख्यातगुणी कोकी निर्जरा होती है इसलिये यह कर्मक्षयका हेतु है। इसी अभिप्रायका वोधक दूसरा क्षेपक गाथा भी है। वह इसप्रकार है कि- दसणमोहे खविदे सिज्झदि एकेव तदियतुरियमवे। णादिकदि तुरियभवं ण विणस्सदि सेससम्म व ॥१॥ दर्शनमोहे क्षपिते सिद्ध्यति एकस्मिन्नेव तृतीयतुरीयभवे । नातिक्रामति तुरीयभवं न विनश्यति शेषसम्यक्त्वं व ॥१॥ अर्थ-दर्शनमोहनीय कर्मका क्षय होजाने पर उस ही भवमें या तीसरे चौथे भवमें जीव सिद्धपदको प्राप्त होता है, किन्तु चौथे भवका उल्लंघन नही करता, तथा दूसरे सम्य- क्त्वोंकी तरह यह सम्यक्त्व नष्ट नही होता । भावार्थ-क्षायिक समग्दर्शन होने पर या तो.उस ही भवमें जीव सिद्धपदको प्राप्त होजाता है । या देवायुका बंध होगया हो तो तीसरे भवमें सिद्ध होता है। यदि सम्यग्दर्शनके पहले मिथ्यात्व अवस्थामे मनुष्य या २४० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । तिर्यंच आयुका बंध होगया हो तो चौथे भवमें सिद्ध होता है किन्तु चतुर्थ भवका अति- क्रमण नहीं करता। यह सम्यक्त्व साधनंत है। क्षायिकसम्यक्त्वका विशेषखरूप बताते हैं। वयणेहिं वि हेहि वि इंदियभयआणएहिं स्वेहि। वीभच्छजुगुच्छाहिं य तेलोकेण वि ण चालेजो ॥ ६४६ ॥ वचनैरपि हेतुमिरपि इन्द्रियभयानीतै रूपैः। वीमत्स्यजुगुप्सामिश्च त्रैलोक्येनापि न चाल्यः ।। ६४६ ॥ अर्थ-श्रद्धानको भ्रष्ट करनेवाले वचन या हेतुओंसे अथवा इन्द्रियोंको भय उत्पन्न करनेवाले आकारोंसे यद्वा ग्लानिकारक पदार्थोंको देखकर उत्पन्न होनेवाली ग्लानिसे विश बहुना तीन लोकसे भी यह क्षायिक सम्यक्त्व चलायमान नही होता । भावार्थ-क्षायिक सम्यक्त्व इतना दृढ़ होता है कि तर्क तथा आगमसे विरुद्ध श्रद्धानको भ्रष्ट करनेवाले, वचन या हेतु उसको भ्रष्ट नहीं कर सकते । तथा वह भयोत्पादक आकार या ग्लानिका- रक पदार्थों को देखकर भी भ्रष्ट नहीं होता। यदि कदाचित् तीन लोक उपस्थित होकर भी उसको अपने श्रद्धानसे भ्रष्ट करना चाहें तो भी वह भ्रष्ट नहीं होता। यह सम्यग्दर्शन किसके तथा कहां पर उत्पन्न होता है यह बताते है। दसणमोहक्खवणापट्ठवगो कम्मभूमिजादो हु। मणुसो केवलिमूले णिवगो होदि सवत्थ ॥ ६४७ ॥ दर्शनमोहक्षपणाप्रस्थापकः कर्मभूमिजातो हि । मनुष्यः केवलिमूले निष्ठापको भवति सर्वत्र ॥६४७॥ अर्थ-दर्शनमोहनीय कर्मके क्षय होनेका प्रारम्भ केवलीके मूलमे कर्मभूमिका उत्पन्न होनेवाला मनुष्य ही करता है, तथा निष्ठापन सर्वत्र होता है । भावार्थ-दर्शनमोहनीय कर्मके क्षय होनेका जो क्रम है उसका प्रारम्भ केवली या श्रुतकेवलीके पादमूलमें (निकट) ही होता है, तथा उसका (प्रारम्भका ) करनेवाला कर्मभूमिज मनुष्य ही होता है । यदि कदाचित् पूर्ण क्षय होनेके प्रथम ही मरण होजाय तो उसकी (क्षपणकी) समाप्ति चारों गतियोंमेसे किसी भी गतिमें हो सकती है। वेदकसम्यक्त्वका खरूप बताते है। दसणमोहुदयादो उप्पजइ जं पयत्थसद्दहणं । चलमलिणमगाढं तं वेदयसम्मत्तमिदि जाणे ॥६४८॥ दर्शनमोहोदयादुत्पद्यते यत् पदार्थश्रद्धानम् । चलमलिनमगाढं तद् वेदकसम्यक्त्वमिति जानीहि ॥ ६४८॥ .
गोम्मटसारः। .२४१ अर्थ-सम्यक्त्वमोहनीय प्रकृतिके उदयसे पदार्थोंका जो चल मलिन अगाढरूप श्रद्धान होता है उसको वेदक सम्यक्त्व कहते है। भावार्थ-मिथ्यात्व मिश्र और अनंतानुबंधी चतुष्क इनका सर्वथा क्षय अथवा उदयाभावी क्षय और उपशम हो चुकने पर; किन्तु अवशिष्ट सम्यक्त्वप्रकृतिके उदय होते हुए पदार्थोंका जो श्रद्धान होता है उसको वेदक सम्यक्त्व कहते हैं। यहां पर भी सम्यक्त्व प्रकृतिके उदयजनित चलता मलिनता और अगाढता ये तीन दोष होते है । इन तीनोंका लक्षण पहले कहचुके है। तीन गाथाओंमें उपशम सम्यक्त्वका खरूप और सामग्रीका वर्णन करते है। दसणमोहुवसमदो उप्पजइ जं पयत्यसदहणं । उवसमसम्मत्तमिणं पसण्णमलपंकतोयसमं ॥ ६४९ ॥ दर्शनमोहोपशमादुत्पद्यते यत्पदार्थश्रद्धानम् । उपशमसम्यक्त्वमिदं प्रसन्नमलपङ्कतोयसमम् ॥ ६४९ ।। अर्थ-उक्त सम्यक्त्वविरोधिनी सात प्रकृतियोंके उपशमसे जो पदार्थोंका श्रद्धान होता है उसको उपशमसम्यक्त्व कहते है । यह सम्यक्त्व इस तरहका निर्मल होता है जैसा कि निर्मली आदि पदार्थोंके निमित्तसे कीचड़ आदि मलके नीचे बैठ जाने पर जल निर्मल होता है । भावार्थ--उपशम सम्यक्त्व और क्षायिक सम्यक्त्व निर्मलताकी अपेक्षा समान है, क्योंकि प्रतिपक्षी कोका उदय दोनों ही स्थानपर नहीं है। किन्तु विशेषता इतनी ही है कि क्षायिक सम्यक्त्वके प्रतिपक्षी कर्मका सर्वथा अभाव होगया है, और उपशम सम्यक्त्वके प्रतिपक्षी कर्मकी सत्ता है। जैसे किसी जलमें निर्मली आदिके द्वारा ऊपरसे निर्मलता होने पर भी नीचे कीचड़ जमी रहती है, और किसी जलके नीचे कीचड़ रहती ही नहीं। ये दोनों जल निर्मलताकी अपेक्षा समान है । अन्तर यही है कि एकके नीचे कीचड़ है दूसरीके नीचे कीचड़ नही है। खयउवसमियविसोही देसणपाउग्गकरणलद्धी य। चत्वारि वि सामण्णा करणं पुण होदि सम्मचे ॥ ६५०॥ क्षायोपशमिकविशुद्धी देशना प्रायोग्यकरणलब्धी च । चतस्रोऽपि सामान्याः करणं पुनर्भवति सम्यक्त्वे ॥ ६५०॥ अर्थ-क्षायोपशमिक, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य, करण, ये पाच लब्धि हैं। इनमें चार तो सामान्य है, किन्तु करण-लब्धि विशेष है-इसके होनेपर सम्यक्त्व या चारित्र नियमसे होता है । भावार्थ-लब्धि शब्दका अर्थ प्राप्ति है । प्रकृतमें सम्यक्त्व ग्रहण करनेके योग्य सामग्रीकी प्राप्ति होना इसको लब्धि कहते है । उसके उक्त पांच भेद है। सम्यक्त्वके योग्य कर्मों के क्षयोपशम होनेको क्षायोपशमिक लब्धि कहते है। निर्मलता- विशेषको विशुद्धि कहते है । योग्य उपदेशको देशना कहते है । पंचेन्द्रियादिखरूप गो. ३१ २४२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । योग्यताके मिलनेको प्रायोग्यलब्धि कहते है । अधःकरण अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरणरूप परिणामोंको करणलब्धि कहते है। इन तीनों करणोंका खरूप पहले कह चुके हैं। इन पांच लब्धियोंमेंसे आदिकी चार लब्धि तो सामान्य हैं-अर्थात् भव्य अभव्य दोनोंके होती हैं, किन्तु करण लब्धि असाधारण है-इसके होने पर निययसे सम्यक्त्व या चारित्र होता है। जब तक करणलब्धि नहीं होती तब तक सम्यक्त्व नहीं होता। उपशम सम्यक्त्वकी प्राप्तिके योग्य सामग्रीको बताकर उसको ग्रहण करनेकेलिये योग्य जीव कैसा होना चाहिये यह बताते है। चद्गदिभवो सण्णी पजचो सुज्झगो य सागारो। जागारो सल्लेसो सलद्धिगो सम्ममुवगमई ॥६५१ ॥ चतुर्गतिभव्यः संज्ञी पर्याप्तः शुद्धकच साकारः । जागरूकः सल्लेश्यः सलब्धिकः सम्यक्त्वमुपगच्छति ॥ ६५१ ॥ अर्थ-जो जीव चार गतियोंमेंसे किसी एक गतिका धारक, तथा भव्य, सज्ञी, पर्याप्त विशुद्धियुक्त, जागृत, उपयोगयुक्त, और शुभ लेश्याका धारक होकर करणलब्धिरू परिणामोंका धारक होता है वह जीव सम्यक्त्वको प्राप्त करता है। चत्वारिवि खेत्ताई आउगवंधेण होदि सम्मत्तं । अणुवदमहत्वदाई ण लहइ देवाउगं मोतुं ॥ ६५२ ॥ चत्वार्यपि क्षेत्राणि आयुष्कबन्धेन भवति सम्यक्त्वम् । अणुव्रतमहानवानि न लभते देवायुष्कं मुक्त्वा ॥ ६५२ ।। अर्थ-चारो गतिसम्बन्धी आयुकर्मका बन्ध होजाने पर भी सम्यक्त्व हो सकता है किन्तु देवायुको छोड़कर शेष आयुका बंध होने पर अणुव्रत और महाव्रत नहीं होते भावार्थ-चारो गतिमेंसे किसी भी गतिमें रहनेवाले जीवके चार प्रकारकी आयुमेंसे किसी भी आयुका बंध होने पर भी सम्यक्त्वकी उत्पत्ति हो सकती है-इसमें कोई बाधा नहीं है । किन्तु सम्यक्त्व ग्रहण होनेके अनन्तर अणुव्रत या महाव्रत उसी जीवके हो- सकते हैं जिसके चार आयुकोंमेंसे केवल देवायुका बंध हुआ हो, अथवा किसी भी आयुका बंध न हुआ हो । नरकायु तिर्यगायु मनुष्यायुका बंध करनेवाले सम्यग्दृष्टिके अणु- व्रत या महाव्रत नहीं होते। सम्यक्त्वमार्गणाके दूसरे भेदोंको गिनाते है। ण य मिच्छत्तं पत्तो सम्मत्तादो य जो य परिवडिदो। सो सासणोति यो पंचममावेण संजुत्तो ॥ ६५३ ॥ न च मिथ्यात्वं प्राप्तः सम्यक्त्वंतश्च यश्च परिपतितः। स सासन इति ज्ञेयः पंचमभावेन संयुक्तः ॥ ६५३ ।।
गोम्मटसारः। २४३ अर्थ-जो जीव सम्यक्त्वसे तो च्युत हो गया है किन्तु मिथ्यात्वको प्राप्त नही हुआ है उसको सासन कहते हैं। यह जीव पांचमे पारणामिक भावोंसे युक्त होता है । भावार्थ- सासनरूप परिणामोंका होना भी सम्यक्त्वगुणका एक विपरिणाम है, इसलिये यह भी सम्यक्त्वमार्गणाका एक भेद है । अत एव यहां पर इसका वर्णन किया है। क्योंकि सम्य- क्त्वमार्गणामे सामान्यसे सम्यक्त्वके समस्त भेदोका वर्णन करना चाहिये । इस गुणस्थानमें दर्शनमोहनीयकी अपेक्षा पारणामिक भाव होते है, तथा अनन्तानुबधी आदिकी अपेक्षा औदायिकादि भाव होते हैं । और इसका विशेष खरूप गुणस्थानाधिकारमें कह चुके है इसलिये यहा नही कहते है। मिश्रगुणस्थानका खरूप बताते है। सदहणासद्दहणं जस्स य जीवस्स होइ तचेसु । विरयाविरयेण समो सम्मामिच्छोत्ति णायचो ॥ ६५४ ॥ श्रद्धानाश्रद्धानं यस्य च जीवस्य भवति तत्त्वेषु । विरताविरतेन समः सम्यग्यिथ्य इति ज्ञातव्यः ॥ ६५४ ॥ अर्थ-विरताविरतकी तरह जिस जीवके तत्त्वके विषयमें श्रद्धान और अश्रद्धान दोनो हों उसको सम्यग्मिथ्यादृष्टि समझना चाहिये । भावार्थ-जिसतरह विरत और अविरत दोनों प्रकारके परिणामोंके जोड़की अपेक्षा विरताविरत नामका पाचमा गुणस्थान होता है, उसी तरह श्रद्धान और अश्रद्धानरूप परिणामोंके जोड़की अपेक्षा सम्यग्मि- थ्यात्व नामका तीसरा गुणस्थान होता है। यह भी सम्यक्त्वमार्गणाका एक भेद है। मिच्छाइट्टी जीवो उवइटे पवयणं ण सद्दहदि । सदहदि असम्भावं उवइलु वा अणुवइट ॥ ६५५ ॥ मिथ्याष्टिीव उपदिष्टं प्रवचनं न श्रद्दधाति । श्रद्दधाति असद्भावमुपदिष्टं वा अनुपदिष्टम् ॥ ६५५ ॥ अर्थ-जो जीव जिनेन्द्रदेवके कहे हुए आस आगम पदार्थका श्रद्धान नहीं करवा; किन्तु कुगुरुओंके कहे हुए या विना कहे हुए भी मिथ्या पदार्थका श्रद्धान करता है उसको मिथ्याहष्टि कहते है । भावार्थ-मिथ्यात्व-दर्शनमोहनीयके उदयसे दो प्रकारके विपरि- णाम होते है । एक ग्रहीत विपरीत श्रद्धान दूसरा अग्रहीत विपरीत श्रद्धान । जो कुगुरु- ओके उपदेशसे विपरीत श्रद्धान होता है उसको ग्रहीतमिथ्यात्व कहते है। और जो विना उपदेशके ही विपरीत श्रद्धान हो उसको अग्रहीतमिथ्यात्व कहते है। इन दोनों ही प्रका- रके विपरिणामोंको मिथ्यात्व इस सामान्य शब्दसे कहते है। तथा यह मिथ्यात्व सम्यक्त्वमार्गणाका एक भेद है। इसलिये इसी गाथाको एकवार गुणस्थानाधिकारमें आने पर भी यहा दूसरीवार कहा है।
२४४ रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । सम्यक्त्वमार्गणामें तीन गाथाओंद्वारा जीवसख्या बताते है । बासपुधत्ते खझ्या संखेजा जइ हवंति सोहम्मे । तो संखपल्लठिदिये केवदिया एवमणुपादे ॥ ६५६ ॥ वर्षपृथक्त्वे क्षायिकाः संख्येया यदि भवन्ति सौधम्म । तहि संख्यपल्यस्थितिके कति एयमनुपाते ॥ ६५६ ॥ अर्थ-झायिकसम्यग्दृष्टि जीव सौधर्म ईशान खर्गमें पृथक्त्व व संख्यात उत्पन्न होते है तो संख्यात पख्यकी स्थितिमें कितने जीव उत्पन्न होंगे ! इसका त्रैराशिक करनेसे क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवोंका प्रमाण निकलता है। क्योंकि क्षायिकसम्यग्दृष्टि बहुधा कल्पवासी देव होते है और कल्पवासी देव बहुत करके सौधर्म ईशान खर्गमें ही है। भावार्थ- फलराशि संख्यातका और इच्छाराशि संख्यात पल्यका परस्पर गुणा करके प्रमाण राशि पृथक्त्ववर्षका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतना ही क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीवोंका प्रमाण है। इस प्रकार त्रैराशिक करनेसे लब्धप्रमाण कितना आया यह बताते है। संखावलिहिदपल्ला खइया तत्तो य वेदमुवसमगा। आवलिअसंखगुणिदा असंखगुणहीणया कमसो ॥ ६५७ ॥ संख्यावलिहितपल्या क्षायिकास्ततश्च वेदमुपशमकाः । आवल्यसंख्यगुणिता असंख्यगुणहीनकाः क्रमशः ।। ६५७ ॥ अर्थ-संख्यात आवलीसे भक्त पल्यप्रमाण क्षायिकसम्यग्दृष्टि है। क्षायिक सम्यग्दृष्टिके प्रमाणका आवलीके असंख्यातमे भागसे गुणा करने पर जो प्रमाण हो उतना ही वेदकस- म्यादृष्टि जीवोंका प्रमाण है। तथा क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवों के प्रमाणसे असल्यातगुणा हीन उपशम सम्यग्दृष्टि जीवोंका प्रमाण है। सासादन मिश्र और मिथ्यादृष्टि जीवोंका प्रमाण बताते है। पल्लासंखेजदिमा सासणमिच्छा य संखगुणिदा हु। मिस्सा तेहि विहीणो संसारी वामपरिमाणं ॥ ६५८ ॥ पल्यासंख्यावाः सासनमिथ्याश्च संख्यगुणिवा हि। मित्रास्तविहीनः संसारी वामपरिमाणम् ।। ६५८ ॥ अर्थ-पल्यके असंख्यातमे भागप्रमाण सासादनमिथ्याइष्टि जीव हैं। और इनसे संख्यातगुणे मिश्र जीव है । तथा ससारी जीवराशिमेंसे क्षायिक औपशमिक क्षायोपशमिक सासादन मिश्र इन पांच प्रकारके जीवोंका प्रमाण घटानेसे जो शेष रहे उतना ही मिथ्या- दृष्टि जीवोंका प्रमाण है। ॥ इति सम्यक्त्वमार्गणाधिकारः॥
गोम्मटसारः। क्रमप्राप्त संज्ञिमार्गणाका निरूपण करते है। गोइंदियावरणखओवसमं तजवोहणं सण्णा । सा जस्स सो दु सण्णी इदरो सेसिंदिअवबोहो ॥ ६५९ ॥ नोइन्द्रियावरणक्षयोपशमस्तज्जबोधनं संज्ञा । सा यस्य स तु संज्ञी इतरः शेषेन्द्रियावबोधः ॥ ६५९ ॥ अर्थ-नोइन्द्रियावरण कर्मके क्षयोपशमको या तजन्य ज्ञानको सज्ञा कहते हैं । यह संज्ञा जिसके हो उसको संज्ञी कहते है । और जिनके यह सज्ञा न हो किन्तु केवल यथा- सम्भव इन्द्रियजन्य ज्ञान हो उनको असज्ञी कहते है। भावार्थ-जीव दो प्रकारके होते है एक संज्ञी दूसरे असंज्ञी । जिनके लब्धि या उपयोगरूप मन पायाजाय उनको संज्ञी कहते हैं। और जिनके मन न हो उनको असंज्ञी कहते है। इन असंज्ञी जीवोंके यथा- सम्भव इन्द्रियजन्य ज्ञान ही होता है। संज्ञी असज्ञीकी पहचान के लिये चिहोंका वर्णन करते है। सिक्खाकिरियुवदेसालावग्गाही मणोवलंबेण । जो जीवो सो सण्णी तबिवरीओ असण्णी दु॥ ६६०॥ शिक्षाक्रियोपदेशालापग्राही मनोऽवलम्बेन । यो जीवः स संज्ञी तद्विपरीतोऽसंज्ञी तु॥६६०॥ अर्थ-हितका ग्रहण और अहितका त्याग जिसके द्वारा किया जा सके उसको शिक्षा कहते है । इच्छापूर्वक हाथ पैरके चलानेको क्रिया कहते है । वचन अथवा चाबुक आदिके द्वारा बताये हुए कर्तव्यको उपदेश कहते हैं । और श्लोक आदिके पाठको आलाप 3 है । जो जीव इन शिक्षादिकको मनके अवलम्बनसे ग्रहण-धारण करता है उसको सज्ञी कहते हैं। और जिन जीवोमें यह लक्षण घटित न हो उनको असज्ञी कहते है। मीमंसदि जो पुर्व कजमकजं च तचमिदरं च । सिक्खदि णामेणेदि य समणो अमणो य विवरीदो ॥ ६६१॥ मीमांसति यः पूर्व कार्यमकार्य च तत्त्वमितरच । शिक्षते नाना एति च समनाः अमनाश्च विपरीतः ॥ ६६१ ॥ अर्थ-जो जीव प्रवृत्ति करनेके पहले अपने कर्तव्य और अकर्तव्यका विचार करे, तथा तत्त्व और अतत्त्वका खरूप समझ सके, और उसका जो नाम रक्खा गया हो उस नामके द्वारा बुलाने पर आसके, उसको समनस्क या सज्ञी जीव कहते है। और इससे जों विपरीत है उसको अमनस्क या असज्ञी कहते है।
२४६
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम ।
संज्ञीमार्गणागत जीवोंकी संख्याको बताते है।
देवोहि सादिरेगो रासी सण्णीण होदि परिमाणं ।
तेणूणो संसारी सबेसिमसण्णिजीवाणं ॥ ६६२ ॥
देवैः सातिरेको राशिः संज्ञिनां भवति परिमाणम् ।
तेनोनः संसारी सर्वेपामसंज्ञिजीवानाम् ॥ ६६२ ।।
अर्थ-देवोंके प्रमाणसे कुछ अधिक संज्ञी जीवोंका प्रमाण है । सम्पूर्ण संसारी जीव
राशिमेंसे संज्ञी जीवोंका प्रमाण घटाने पर जो शेष रहे उतना ही समस्त असंज्ञी जीवोंका
प्रमाण है।
॥ इति संशिमार्गणाधिकारः ॥
क्रमप्राप्त आहारमार्गणाका वर्णन करते है।
उदयावण्णसरीरोदयेण तदेहवयणचित्ताणं ।
णोकम्मवग्गणाणं गहणं आहारयं णाम ॥ ६६३॥
उदयापन्नशरीरोदयेन तदेहवचनचित्तानाम् ।
नोकर्मवर्गणानां ग्रहणमाहारकं नाम ॥ ६६३ ॥
अर्थ-शरीरनामा नामकर्मके उदयसे देह वचन और द्रव्य मनरूप बननेके योग्य
नोकर्मवर्गणाका जो ग्रहण होता है उसको आहार कहते है।
निरुक्तिपूर्वक आहारकका अर्थ लिखते है।
आहरदि सरीराणं तिण्हं एयदरवग्गणाओ य ।
भासमणाणं णियदं तम्हा आहारयो भणियो॥ ६६४ ॥
आहरति शरीराणां त्रयाणामेकतरवर्गणाश्च ।
भासामनसोनियतं तस्मादाहारको भणितः ॥ ६६४ ॥
अर्थ-औदारिक, वैक्रियिक, आहारक इन तीन शरीरोंमेंसे किसी भी एक शरीरके
योग्य वर्गणाओंको तथा वचन और मनके योग्य वर्गणाओंको यथायोग्य जीवसमास तथा
कालमें जीव आहरण ग्रहण करता है इसलिये इसको आहारक कहते है।
जीव दो प्रकारके होते है एक आहारक दूसरे अनाहारक । आहारक जीव कौन २
होते हैं और अनाहारक जीव कौन २ होते है यह बताते है ।
विग्गहगदिमावण्णा केवलिणो समुग्घदो अजोगी य ।
सिद्धा य अणाहारा सेसा आहारया जीवा ॥ ६६५॥
विग्रहगतिमापन्ना केवलिनः समुद्धाता अयोगिनश्च ।
सिद्धाश्च अनाहाराः शेषा आहारका जीवाः ॥ ६६५ ॥
गोम्मटसारः। २४७ अर्थ-विग्रहगतिको प्राप्त होनेवाले चारो गतिसम्बन्धी जीव, प्रतर और लोकपूर्ण समु- दात करनेवाले सयोगकेवली, अयोगकेवली, समस्त सिद्ध इतने जीव तो अनाहारक होते है। और इनको छोड़कर शेप जीव आहारक होते है । समुद्धात कितने प्रकारका होता है यह बताते है। वेयणकसायवेगुवियो य मरणंतियो समुग्धादो। तेजाहारो छटो सत्तमओ केवलीणं तु ॥ ६६६ ॥ वेदनाकपायवैगूर्विकाश्च मारणान्तिकः समुद्धातः । तेज आहारः पष्ठः सप्तमः केवलिनां तु ॥ ६६६ ॥ अर्थ-समुद्धातके सात भेद है। वेदना, कषाय, वैक्रियिक, मारणान्तिक, तैजस, 'आहारक, केवल । इनका खरूप लेश्यामार्गणाके क्षेत्राधिकारमें कहा जाचुका इस लिये यहा पर नही कहा है। समुद्घातका खरूप बताते है। मूलसरीरमछंडिय उत्तरदेहस्स जीवपिंडस्स। णिग्गमणं देहादो होदि समुग्धादणामं तु ॥ ६६७ ॥ मूलशरीरमत्यक्त्वा उत्तरदेहस्य जीवपिण्डस्य । निर्गमनं देहाद्भवति समुद्धातनाम तु ॥ ६६७ ॥ अर्थ-मूल शरीरको न छोड़कर तैजस कार्मण रूप उत्तर देहके साथ २ जीवप्रदे- शोंके शरीरसे बाहर निकलनेको समुदात कहते है। आहारमारणंति य दुगं पिणियमेण एगदिसिगं तु । दसदिसि गदा हु सेसा पंच समुग्धादया होंति ॥ ६६८॥ आहारमारणांतिकद्विकमपि नियमेन एकदिशिकं तु । दशदिशि गता हि शेपाः पञ्चसमुद्धातका भवन्ति ॥ ६६८॥ अर्थ उक्त सात प्रकारके समुद्धातोंमेसे आहार और मारणान्तिक ये दो समुद्धात तो एक ही दिशामें गमन करते है। किन्तु वाकीके पांच समुद्धात दशों दिशाओंमें गमन करते है। आहारक और अनाहारकके कालका प्रमाण बताते है। अंगुलअसंखभागो कालो आहारयस्स उकस्सो । कम्मम्मि अणाहारो उक्कस्सं तिण्णि समया हु॥ ६६९ ॥ अकुलासंख्यभागः कालः आहारकस्योत्कृष्टः । कार्मणे अनाहारः उत्कृष्टः त्रयः समया हि ॥ ६६९॥ - 1 २४८ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-आहारकका उत्कृष्ट काल सूच्यंगुलके असंख्यातमें भागप्रमाण है। कार्मण शरी- रमें अनाहारका उत्कृष्ट काल तीन समयका है, और जघन्य काल एक समयका है । तथा आहारका जघन्य काल तीन समय कम श्वासके अठारहमे भाग प्रमाण है, क्योंकि विग्रह- गतिसम्बन्धी तीन समयोंके घटाने पर क्षुद्र भवका काल इतना ही अवशेष रहता है। आहारमार्गणासम्बन्धी जीवोंकी संख्याको वताते हैं। कम्मइयकायजोगी होदि अणाहारयाण परिमाणं । तविरहिदसंसारो सबो आहारपरिमाणं ॥ ६७० ॥ कार्मणकाययोगी भवति अनाहारकाणां परिमाणम् । तद्विरहितसंसारी सर्व आहारपरिमाणम् ॥ ६७० ॥ अर्थ-कार्मणकाययोगी जीवोंका जितना प्रमाण है उतना ही अनाहारक जीवोंका प्रमाण है। और संसारी जीवराशिमेंसे कार्मणकाययोगी जीवोंका प्रमाण घटाने पर जो शेष रहे उतना ही आहारक जीवोका प्रमाण है। ॥ इति आहारमार्गणाधिकारः॥ क्रमप्राप्त उपयोगाधिकारका वर्णन करते हैं। वत्थुणिमित्तं भावो जादो जीवस्स जो दु उवजोगो। सो दुविहो णायवो सायारो चेव णायारो॥ ६७१ ॥ वस्तुनिमित्तं भावो जातो जीवस्य यस्तूपयोगः । स द्विविधो ज्ञातव्यः साकारश्चैवानाकारः॥ ६७१ ॥ अर्थ-जीवका जो भाव वस्तुको (ज्ञेयको) ग्रहण करनेकेलिये प्रवृत्त होता है उसको उपयोग कहते है । इसके दो भेद है एक साकार ( सविकल्प ) दूसरा निराकार (निर्वि- कल्प)। दोनोंप्रकारके उपयोगोंके उत्तरमेदोंको बताते हुए यह उपयोग जीवका लक्षण है यह बताते है। णाणं पंचविहंपि य अण्णाणतियं च सागरुवजोगी। चदुर्दसणमणगारो सबै तल्लक्खणा जीवा ॥ ६७२ ॥ ज्ञानं पंचविधमपि च अज्ञानत्रिकं च साकारोपयोगः । चतुर्दर्शनमनाकारः सर्वे तलक्षणा जीवाः ॥ ६७२ ॥ अर्थ-पांच प्रकारका सम्यग्ज्ञान और तीन प्रकारका अज्ञान ये साकार उपयोग है। चार प्रकारका दर्शन अनाकार उपयोग है। यह उपयोग ही सम्पूर्ण जीवोंका लक्षण है। .
गोम्मटसारः। २४९ साकार उपयोगमें कुछ विशेषताको बताते है मदिसुदओहिमणेहिंय सगसगविसये विसेसविण्णाणं । अंतोमुत्तकालो उवजोगो सो दु सायारो ॥ ६७३ ॥ मतिश्रुतावधिमनोभिश्च स्वकखकविपये विशेषविज्ञानम् । अन्तर्मुहूर्तकाल उपयोगः स तु साकारः ॥ ६७३ ॥ अर्थ-मति श्रुत अवधि और मनःपर्यय इनकेद्वारा अपने २ विपयका अन्तर्महर्तकालपर्यन्त जो विशेषज्ञान होता है उसको ही साकार उपयोग कहते है। भावार्थ-साकार उपयोगके पाच भेद है । मति श्रुत अववि मनःपर्यय और केवल । इनमेंसे आदिके चार ही उपयोग छनस जीवोंके होते है । उपयोग चेतनाका एक परिणमन है। तथा एक वस्तुके ग्रहणरूप यह चेतनाका यह परिणमन छद्मस जीवके अधिकसे अधिक अन्तर्मुहूर्तकालतक ही रह सकता है। इस साकार उपयोगमें यही विशेषता है कि यह वस्तुके विशेष अंशको ग्रहण करता है। अनाकार उपयोगका खरूप बताते है। इंदियमणोहिणा या अत्थे अविसेसिदूण जंगहणं । अंतोमुत्तकालो उवजोगो सो अणायारो ॥ ६७४ ॥ इन्द्रियमनोऽवविना वा अर्थे अविशेष्य यगृहणम् । अन्तर्मुहूर्तकालः उपयोगः स अनाकारः ।। ६७४ ॥ अर्थ-इन्द्रिय मन और अवधिकेद्वारा अन्तर्मुहुर्तकालतक पदार्थोंका जो सामान्यरूपसे ग्रहण होता है उसको निराकार उपयोग कहते है। भावार्थ-दर्शनके चार भेद है, चक्षु- दर्शन अचक्षुदर्शन अवधिदर्शन और केवलदर्शन । इनमेंसे आदिके तीन ही दर्शन छमस्थ जीवोंके होते है । नेत्रकेद्वारा पदार्थका जो सामान्यावलोकन होता है उसको चक्षुदर्शन कहते हैं। और नेत्रको छोड़कर शेष चार इन्द्रिय तथा मनकेद्वारा जो सामान्यावलोकन होता है उसको अचक्षुदर्शन कहते है । अवधिज्ञानके पहले इन्द्रिय और मनकी सहाय- ताके विना आत्ममात्रसे जो रूपी पदार्थविषयक समान्यावलोकन होता है उसको अवधि- दर्शन कहते है। यह दर्शनरूप निराकार उपयोग भी साकार उपयोगकी तरह छमस्थ जीवोंके अधिकसे अधिक अन्तर्मुहूर्ततक ही होता है। उपयोगाधिकारमें जीवोंका प्रमाण बताते है। णाणुवजोगजुदाणं परिमाणं णाणमग्गणं व हवे । दसणुवजोगियाणं दसणमग्गण व उत्तकमो ॥ ६७५ ॥ गो. ३२ २५० रायचन्द्रजैनशाखमालायाम् । ज्ञानोपयोगयुतानां परिमाणं ज्ञानमार्गणावद्भवेत् । दर्शनोपयोगिनां दर्शनमार्गणावदुक्तक्रमः॥ ६७५ ॥ अर्थ-ज्ञानोपयोगवाले जीवोंका प्रमाण ज्ञानमार्गणावाले जीवोंकी तरह समझना चाहिये । और दर्शनोपयोगवालोंका प्रमाण दर्शनमार्गणावालोंकी तरह समझना चाहिये। इनमें कुछ विशेषता नहीं है। ॥ इति उपयोगाधिकारः॥ उक्त प्रकारसे वीस प्ररूपणाओंका वर्णन करके अब अन्तर्भावाधिकारका वर्णन करते है। गुणजीवा पजत्ती पाणा सण्णा य मग्गणुवजोगो। जोग्गा परूविदचा ओघादेसेसु पत्तेयं ॥ ६७६ ॥ गुणजीवाः पर्याप्तयः प्राणाः संज्ञाश्च मार्गणोपयोगी योग्याः प्ररूपितव्या ओघादेशयोः प्रत्येकम् ।। ६७६ ॥ अर्थ–उक्त वीस प्ररूपणाओंमेसे गुणस्थान और मार्गणास्थानमें यथायोग्य प्रत्येक गुणस्थान जीवसमास पर्याप्ति प्राण संज्ञा मार्गणा उपयोगका निरूपण करना चाहिये । भावार्थ-इस अधिकारमें यह बताते हैं कि किस २ मार्गणा या गुणस्थानमें शेष किस २ प्ररूपणाका अन्तर्भाव होता है। परन्तु इस अन्तर्भावका निरूपण यथायोग्य होना चाहिये। किस २ मार्गणामें कौन २ गुणस्थान होते है ? उत्तरः- चउपण चोइस चउरो णिरयादिसु चोदसं तु पंचक्खे। तसकाये सेसिदियकाये मिच्छं गुणहाणं ॥ ६७७ ॥ चत्वारि पञ्च चतुर्दश चत्वारि निरयादिषु चतुर्दश तु पञ्चाक्षे । त्रसकाये शेषेन्द्रियकाये मिथ्यात्वं गुणस्थानम् ॥ ६७७ ॥ अर्थ-तिमार्गणाकी अपेक्षासे क्रमसे नरकगगितमें आदिके चार गुणस्थान होते हैं, और तिर्यग्गतिमें पांच, मनुष्यगतिमे चौदह, तथा देवगतिमे नरकगतिके समान चार गुण- स्थान होते हैं । इन्द्रियमार्गणाकी अपेक्षा पंचेन्द्रिय जीवोंके चौदह गुणस्थान और शेष एकेन्द्रियसे लेकर चतुरिन्द्रियपर्यन्त जीवोंके केवल मिथ्यात्व गुणस्थान ही होता है। कायमा- गंणाकी अपेक्षा त्रसकायके चौदह और शेष स्थावर कायके एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही होता है। भावार्थ-यहां पर यह बताया है कि अमुक २ गति इन्द्रिय या कायवाले जीवोंके अमुक २ गुणस्थान होता है। इसी तरह जीवसमासांदिकोंको भी यथायोग्य सम- झना चाहिये । जैसे कि नरक और देवगतिमें पर्याप्ति और निर्वृत्यपर्याप्ति ये दो जीवसमास होते है। तिर्यम्गतिमें चौदह तथा मनुष्यगतिमें संज्ञीसम्बन्धी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो जीवसमास ।
गोम्मटसारः। २५१ होते है । इन्द्रिय मार्गणामें एकेन्द्रिय जीवोंके बादर पर्याप्त अपर्याप्त सूक्ष्म पर्याप्त अपर्याप्त ये चार जीवसमास होते है । द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय जीवोंके अपने २ पर्याप्त अप- याप्त इसतरह दो २ जीवसमास होते है । पंचेन्द्रियमें सज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त असज्ञी.पर्याप्त अपर्याप्त ये चार जीवसमास होते है । कायमार्गणाकी अपेक्षा स्थावरकायमें एकेन्द्रियके समान चार जीवसमास होते है। और त्रसकायमें शेष दश जीवसमास होते है। मज्झिमचउमणवयणे सण्णिप्पहुदि दु जाव खीणोत्ति । सेसाणं जोगिति य अणुभयवयणं तु वियलादो ॥ ६७८ ॥ मध्यमचतुर्मनोवचनयोः संज्ञिप्रभृतिस्तु यावत् क्षीण इति । शेषाणां योगीति च अनुभयवचनं तु विकलतः॥ ६७८ ।। अर्थ-असत्यमन उभयमन असत्य वचन उभय वचन इन चार योगोंके खामी संज्ञी मिथ्याष्टिसे लेकर क्षीणकषायपर्यंत बारह गुणस्थानवाले जीव है । और सत्यमन अनु- भयमन सत्यवचन इनके खामी आदिके तेरह गुणस्थानवाले जीव है । अनुमय वचनयोग विकलत्रयसे लेकर सयोगीपर्यन्त होता है । अनुभय वचनको छोड़कर शेष तीन प्रकारका वचन और चार प्रकारका मन, इनमें एक सज्ञी पर्याप्त ही जीवसमास है । और अनुभय वचनमें पर्याप्त द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय असज्ञी सज्ञी ये पाच जीवसमास होते है। ओरालं पजते थावरकायादि जाव जोगोति । तम्मिस्समपजचे चदुगुणठाणेसु णियमेण ॥ ६७९ ॥ औरालं पर्याप्त स्थावरकायादि यावत् योगीति । तन्मिश्रमपर्याप्त चतुर्गुणस्थानेषु नियमेन ॥ ६७९ ॥ अर्थ-औदारिककाययोग, स्थावर एकेन्द्रिय पर्याप्त मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगी पर्यन्त होता है । और औदारिकमिश्रकाययोग नियमसे चार अपर्याप्त गुणस्थानोमें ही होता है। औदारिक काययोगमें पर्याप्त सात जीवसमास होते है, और मिश्रयोगमें अपर्याप्त सात जीव- समासे है। अपर्याप्त चार गुणस्थानोंको गिनाते है। मिच्छे सासणसम्मे पुंवेदयदे कवाडजोगिम्मि । गरतिरियेवि य दोण्णिवि होतित्ति जिणेहिं णिदिहं ॥ ६८० ॥ मिथ्यात्वे सासनसम्यक्त्वे वेदायते कपाटयोगिनि । नरतिरश्चोरपि च द्वावपि भवन्तीति जिननिर्दिष्टम् ॥ ६८० ॥ १ गुणस्थानोका कम गुणस्थानाधिकारसे समझना। २ इनमे एक सयोगीको मिलानेसे आठ जीव. समास होते है।
२५२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-मिथ्यात्व, सासादन, पुरुषवेदके उदयसंयुक्त असंयत, तथा कपाटसमुदात कर- नेवाले सयोगकेवली, इन चार स्थानोंमें ही औदारिकमिश्रकाययोग होता है। तथा औदा- रिक काययोग और औदारिकमिश्रकाययोग ये दोनों ही मनुष्य और तिर्यञ्चोंके ही होता है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है। वेगुवं पजचे इदरे खलु होदि तस्स मिस्सं तु । सुरणिरयचउठाणे मिस्से णहि मिस्सजोगो हु॥ ६८१॥ वैगूर्व पर्याप्ते इतरे खलु भवति तस्य मित्रं तु । सुरनिरयचतु:स्थाने मिन्ने नहि मिनयोगो हि ॥ ६८१ ॥ अर्थ-मिथ्याप्टिसे लेकर असयतपर्यंत चारो ही गुणस्थानवाले देव और नारकियोंके पर्याप्त अवस्थामें वैक्रियिक काययोग होता है, और अपर्याप्त अवस्थामें वैक्रियिकमिश्रयोग होता है। किन्तु यह मिश्रयोग चार गुणस्थानोंमसे मिश्र गुणस्थानमें नहीं होता; क्योंकि कोई भी मिश्रयोग मिश्रगुणस्थानमें नहीं होता । वैक्रियिक योगमे एक संज्ञीपर्याप्त ही जीवसमास है और मिश्रयोगमे एक संज्ञी नित्यपर्याप्त जीवसमास है। आहारो पजचे इदरे खलु होदि तस्स मिस्सो दु। अंतोमुहुत्तकाले छटगुणे होदि आहारो॥ ६८२ ॥ आहारः पर्याप्ते इतरे खलु भवति तस्य मिश्रस्तु । अंतर्मुहुर्तकाले षष्ठगुणे भवति आहारः॥ ६८२ ।। अर्थ-आहारकाययोय पर्याप्त अवस्थामें होता है, और आहारकमिश्रयोग अपर्याप्त अवस्थामें होता है । ये दोनों ही योग छठे गुणस्थानवाले मुनिके ही होते हैं। और इनके उत्कृष्ट और जघन्य कालका प्रमाण अंतर्मुहूर्त ही है । भावार्थ-यहांपर जो पर्याप्तता या अपर्याप्तता कही है वह आहारक शरीरकी अपेक्षासे कही है, औदारिक शरीरकी अपेक्षासे नहीं कही है। क्योंकि औदारिकशरीरसम्बन्धी अपर्याप्तता छ? गुणस्थानमें नहीं होती। ओरालियमिस्सं वा चउगुणठाणेसु होदि कम्मइयं । चदुगदिविग्गहकाले जोगिस्स य पदरलोगपूरणगे ॥ ६८३ ॥ औरालिकमित्रों वा चतुर्गुणस्थानेषु भवति कार्मणम् । चतुर्गतिविग्रहकाले योगिनश्च प्रवरलोकपूरणके ॥ ६८३ ।। अर्थ-औदारिक मिश्रयोगकी तरह कार्मण योग भी चार गुणस्थानोंमें और चारों विग्रहगतियोंके कालमें होता है, विशेषता केवल इतनी है कि औदारिकमिश्रयोगको जो सयोगकेवलिगुणस्थानमें बताया है सो कपाटसमुद्धात समयमें बताया है, और कार्मणयोगको प्रतर और लोकपूरण समुद्धात समयमें बताया है । यहा पर औदारिकमिश्रकी तरह जीव- समास भी आठ होते है।
गोम्मटसारः।
२५३
थावरकायप्पहुदी संढो सेसा असण्णिआदी य।
अणियद्विस्स य पढमो भागोति जिणेहिं णिदिदं ॥ ६८४ ॥
स्थावरकायप्रभृतिः षण्डः शेषा असंश्यादयश्च ।
अनिवृत्तेश्च प्रथमो भाग इति जिननिर्दिष्टम् ॥ ६८४ ॥
अर्थ-वेदमार्गणाके तीन भेद है, स्त्री, पुरुष, नपुंसक । इसमें नपुंसक वेद स्थावर-
काय मिथ्याष्टिसे लेकर अनिवृत्तिकरणके पहले सवेद भागपर्यन्त रहता है। अत एव
इसमें गुणस्थान नव और जीवसमास चौदह होते है। शेष स्त्री और पुरुषवेद असंज्ञी पंचे-
न्द्रिय मिथ्याष्टिसे लेकर अनिवृत्तिकरणके सवेद भाग तक होते है। यहा पर गुणस्थान तो
पहलेकी तरह नव ही है; किन्तु जीवसमास असंज्ञी पंचेन्द्रियके पर्याप्त अपर्याप्त और
'संजीके पर्याप्त अपर्याप्त इसतरह चार ही होते है।
थावरकायप्पहुदी अणियट्टीबितिचउत्थभागोति ।
कोहतियं लोहो पुण सुहमसरागोत्ति विण्णेयो ॥ ६८५ ॥
स्थावरकायप्रभृति अनिवृत्तिद्वित्रिचतुर्थभाग इति ।
क्रोधनिक लोमः पुनः सूक्ष्मसराग इति विज्ञेयः ।। ६८५ ॥
अर्थ-कषायमार्गणाकी अपेक्षा क्रोध मान माया ये तीन कषाय स्थावरकायमिथ्याष्टिसे
लेकर अनिवृत्ति करणके दूसरे तीसरे चौथे भाग तक क्रमसे रहते है । और लोमकवाय
दशमे सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान तक रहता है । अतएव आदिके तीन कषायोमें गुणस्थान
नव और लोभकषायमें दश होते है, किन्तु जीवसमास दोनों जगह चौदह २ ही होते है।
थावरकायप्पडदी मदिसुदअण्णाणयं विभंगो दु ।
सण्णीपुण्णप्पहुदी सासणसम्मोत्ति णायचो ॥ ६८६ ॥
स्थावरकायप्रभृति मतिश्रुताज्ञानकं विभङ्गख।
संज्ञिपूर्णप्रभृति सासनसम्यगिति ज्ञातव्यः ॥ ६८६ ॥
अर्थ--कुमति और कुश्रुत ज्ञान स्थावरकाय-मिथ्यादृष्टिसे लेकर सासादन गुणस्थानतक
होते है । विमङ्गज्ञान संज्ञी पर्याप्त मिथ्यादृष्टिसे लेकर सासदनपर्यन्त होता है। कुमति
कुश्रुत ज्ञानमें गुणस्थान दो और जीवसमास चौदह होते है। विभङ्गमें गुणस्थान दो और
जीवसमास एक संज्ञीपर्याप्त ही होता है ।
सण्णाणतिगं अविरदसम्मादी छटुगादि भणपजो।
खीणकसायं जाव दु केवलणाणं जिणे सिद्धे ॥ ६८७ ॥
सज्ञाननिकमविरतसम्यगादि षष्ठकादिर्मन:पर्ययः ।
क्षीणकषायं यावच केवलज्ञानं जिने सिद्धे ॥ ६८७ ॥
२५४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । अर्थ-आदिके तीन सम्यग्ज्ञान (मति श्रुत अवधि ) अव्रतसम्यग्दृष्टि से लेकर क्षीण- कषायपर्यन्त होते है । मनःपर्ययज्ञान छटे गुणस्थानसे लेकर बारहमे गुणस्थान तक होता है । और केवलज्ञान तेरहमे चौदहमे गुणस्थानमें तथा सिद्धोंके होता है । भावार्थ- आदिके तीन सम्यग्ज्ञानोमे गुणस्थान नव और जीवसमास संज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो होते है। मनःपर्यय ज्ञानमें गुणस्थान सात और जीवसमास एक संज्ञीपर्याप्त ही है। यहां पर यह शंका नहीं हो सकती कि आहारक मिश्रयोगकी अपेक्षा अपर्याप्तता भी सम्भव है इस- लिये यहां दो जीवसमास कहने चाहिये? क्योंकि मनःपर्यय ज्ञानवालेके नियमसे आहारक- ऋद्धि नही होती । केवलज्ञानकी अपेक्षा गुणस्थान दो ( सयोगी, अयोगी) और जीवस- मास भी सज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो होते है। सयोगकेवलियो के समुद्रात समयमें अपर्या- सता भी होती है यह पहले कहचुके है । गुणस्थानोसे रहित सिद्धोंके भी केवलज्ञान होता है। अयदोत्ति हु अविरमणं देसे देसो पमत्त इदरे य । परिहारो सामाइयछेदो छहादि थूलोत्ति ॥ ६८८ ॥ सुहमो सुहमकसाये संते खीणे जिणे जहक्खादं । संजममग्गणभेदा सिद्धे णस्थिति णिदिई ॥ ६८९ ॥ अयत इति अविरमणं देशे देशः प्रमत्तेतरस्मिन् च । परिहारः सामायिकश्छेदः पष्ठादिः स्थूल इति ॥ ६८८॥ सूक्ष्मः सूक्ष्मकपाये शान्ते क्षीणे जिने यथाख्यातम् । संयममार्गणभेदाः सिद्धे न सन्तीति निर्दिष्टम् ॥ ६८९ ॥ अर्थ-सयममार्गणामें असयमको भी गिनाया है, इसलिये यह ( असंयम) मिथ्याह- प्टिसे लेकर अवतसम्यग्दृष्टितक होता है। अतः यहां पर गुणस्थान चार और जीवसमास चौदह होते है। देशसयम पांचमे गुणस्थानमें ही होता है। अतः यहा पर गुणस्थान एक और जीवसमास भी एक सज्ञी पर्याप्त ही होता है। परिहारविशुद्धि संयम छढे सातमे गुणस्था- नमे ही होता है, यहांपर भी जीवसमास एक सज्ञीपर्याप्त ही होता है; क्योंकि परिहा- रविशुद्धिवाला आहरक नहीं होता। सामायिक और छेदोपस्थापना सयम छठेसे लेकर अनिवृतिकरण गुणस्थानतक होता है । इसलिये यहांपर गुणस्थान चार और जीवसमास दो होते है । सूक्ष्मसापराय संयम दशमे गुणस्थानमे ही होता है। अतः यहाँपर गुणस्थान और जीवसमास एक २ ही है । यथाख्यात सयम उपशातकषाय क्षीणकषाय सयोगकेवली और अयोगकेवलियोंके होता है। यहा पर गुणस्थान चार और जीवसमास सज्ञी पर्याप्त तथा केवलसमुद्धातकी अपेक्षा अपर्याप्त ये दो होते है । सिद्ध गुणस्थान और मार्गणाओंसे रहित है अतः उनके कोई भी सयम नहीं होता।
गोम्मटसार। २५५ क्रमप्राप्त दर्शनमार्गणाकी अपेक्षा यथासम्भव गुणस्थान और जीवसमास घटित करते है। चउरक्खथावरविरदसम्माइट्ठी दु खीणमोहोत्ति । चक्खुअचक्खू ओही जिणसिद्ध केवलं होदि ॥ ६९० ॥ चतुरक्षस्थावराविरतसम्यग्दृष्टिस्तु क्षीणमोह इति । चक्षुरचक्षुरवधिः जिनसिद्ध केवलं भवति ॥ ६९०॥ अर्थ-दर्शनके चार भेद है चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन अवधिदर्शन केवलदर्शन यह पहले बताचुके है। इनमें पहला चक्षुदर्शन चतुरिन्द्रियसे लेकर क्षीणमोहपर्यन्त होता है। और अच- क्षुदर्शन भी स्थावरकायसे लेकर क्षीणमोहपर्यन्त ही होता है। तथा अवधिदर्शन अबतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणमोहपर्यन्त होता है । केवलदर्शन सयोगकेवल और अयोगकेवल इन दो गुण- स्थानों में और सिद्धोंके होता है। भावार्थ-अक्षुदर्शनमें गुणस्थान बारह और चतुरि- न्द्रिय तथा पंचेन्द्रियके असज्ञी सज्ञीसम्बन्धी अपर्याप्त पर्याप्तकी अपेक्षा जीवसमास छह होते हैं। अचक्षुदर्शनमें गुणस्थान वारह और जीवसमास चौदह होते है। अवधिदर्शनमें गुणस्थान नव और जीवसमास सज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो होते है । केवलदर्शनमें गुणस्थान दो और जीवसमास भी दो होते है । विशेपता यह है कि यह (केवलदर्शन) गुणस्थानातीत सिद्धोंके भी होता है। लेश्याकी अपेक्षासे गुणस्थान और जीवसमासोंका वर्णन करते है। थावरकायप्पहुदी अविरदसम्मोति असुहतियलेस्सा। सपणीदो अपमत्तो जाव दु सुहतिण्णिलेस्साओ ॥ ६९१ ॥ स्थावरकायप्रभृति अविरतसम्यगिति अशुभत्रिकलेश्याः। संज्ञितः अप्रमत्तो यावत्तु शुभास्तिस्रो लेश्याः ।। ६९१ ॥ अर्थ-लेश्याओंके छह भेदोंको पहले वताचुके है। उनमें आदिकी कृष्ण नील कापोत ये तीन अशुभ लेश्या स्थावरकायसे लेकर चतुर्थ गुणस्थानपर्यन्त होती है। और अंतकी पीत पद्म शुक्ल ये तीन शुभलेश्या सज्ञी मिथ्यादृष्टिसे लेकर अप्रमत्तपर्यन्त होती है । भावार्थ- अशुभ लेश्याओंमें गुणस्थान चार और जीवसमास चौदह होते है, तथा शुभलेश्याओंमें जीवसमास दो होते है। इस कथनसे शुक्ललेश्या भी सातमे गुणस्थानतक ही सिद्ध होती है अतः शुक्ललेश्याके विषयमें अपवादात्मक विशेष कथन करते है। णवरि य सुक्का लेस्सा सजोगिचरिमोति होदि णियमेण । १ क्योंकि यह समीचीन अवधिज्ञानकी अपेक्षासे कथन है। जो मिथ्या अवधि है उसको विभंग कहते हैं। विभंगके पहले दर्शन नहीं होता। - - २५६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गयजोगिम्मि वि सिद्धे लेस्सा णस्थिति णिहिटं ॥ ६९२ ॥ नवरि व शुक्ला लेश्या सयोगिचरम इति भवति नियमेन । गतयोगेऽपि च सिद्ध लेश्या नास्तीति निर्दिष्टम् ।। ६९२ ॥ अर्थ-शुक्लेश्याम यह विशेषता है कि वह सज्ञी पर्याप्त मिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोग- केवल गुणस्थानपर्यन्त होती है । और इसमें जीवसमास दो ही होते है । इसके ऊपर चौदहमे गुणस्थानवी जीवोंके तथा सिद्धोंके कोई भी लेश्या नहीं होती यह परमागममें कहा है। थावरकायप्पहुदी अजोगि चरिमोत्ति होति भवसिद्धा। मिच्छाइडिट्ठाणे अभवसिद्धा हवंतित्ति ॥ ६९३ ॥ स्थाचरकायप्रभृति अयोगिचरम इति भवन्ति भवसिद्धाः। मिथ्यादृष्टिस्थाने अभव्यसिद्धा भवन्तीति ॥ ६९३ ।। अर्थ-भव्यसिद्ध स्थावरकाय-मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगिपर्यंत होते हैं। और अभव्य- सिद्ध मिथ्यादृष्टिस्थानमें ही रहते है । भावार्थ-भव्यत्त्वमार्गणाके दो भेद है, एक भव्य और दूसरे अभव्य-इन्हीको भव्यसिद्ध अभव्यसिद्ध भी कहते है । जिसके निमिचसे वाय निमिच मिलनेपर सिद्धपर्यायकी तथा उसके साधनभूत सम्यग्दर्शनादिसम्बन्धी शुद्धपर्यायकी प्राप्ति होसके जीवकी उस शक्तिविशेषको भव्यत्त्वशक्ति कहते हैं। जिसके निमित्तसे वाय निमित्तके मिलने पर भी सम्यग्दर्शनादिककी तथा उसके कार्यरूप सिद्धपर्यायकी प्राप्ति न हो सके जीवकी उस शक्तिविशेषको अभव्यत्त्वशक्ति कहते है। भव्यत्त्वशक्तिवालोंको भव्य और अभव्यत्त्वशक्तिवाले जीवोंको अभव्य कहते है । भव्यजीवोंके चौदह गुणवान और चौदह जीवसमास होते है। और अमन्य जीवोंके चौदह जीवसमास और एक मिथ्यात्व गुणस्थान ही होता है। सम्यक्त्वमार्गणाकी अपेक्षा वर्णन करते है। मिच्छो सासणमिस्सो सगसगठाणम्मि होदि अयदादो। पढसुवसमवेदगसम्मत्तदुर्ग अप्पमत्तोत्ति ॥ ६९४ ॥ मिथ्यात्वं सासनमित्रौ खकखकस्थाने भवति अयतात् । प्रथमोपशमवेदकसम्यक्त्वद्विकमप्रमत्त इति ॥ ६९४ ।। अर्थ-सम्यक्त्वमार्गणाके छह भेद है मिथ्यात्व, सासन, मिश्र, औपशमिक क्षायिक, क्षायोपशमिक । इनमें आदिके तीन सम्यक्त्व तो अपने २ गुणखानमें ही होते है। और प्रथमोपशम तथा वेदक ये दो सम्यक्त्व चतुर्थ गुणस्थानसे लेकर सातमे गुणस्थानतक होते है। भावार्थ-मिथ्यादर्शनका गुणस्थान एक प्रथम और जीवसमास चौदह । सासादनका - . गाम्मसाला २५७ गुणस्थान एक दूसरा जीवसमास सात होते है। वे इस प्रकार है कि बादर एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी, संज्ञी इनसम्बन्धी अपर्याप्त और एक संज्ञीप- प्ति । मिश्रदर्शनका गुणस्थान एक तीसरा और जीवसमास भी संज्ञी पर्याप्त यह एक ही होता है। उपशमसम्यक्त्वके दो भेद है-एक प्रथमोपशम दूसरा द्वितीयोपशम । जो प्रतिपक्षी पांच या सात प्रकृतियों के उपशमसे होता है उसको प्रथमोपशम सम्यक्त्व कहते है।और जो सम्यग्दर्शन तीन दर्शनमोहनीयप्रकृतियों के उपशमके साथ २ चार अनंतानुबंधी कषायोंके विसंयोजनसे उत्पन्न होता है उसको द्वितीयोपशम सम्यक्त्व कहते है। इनमेंसे एक प्रथमोपशम सम्यक्त्व तथा वेदक सम्यक्त्व असंयतसे लेकर अप्रमत्तपर्यन्त होता है। प्रथमोपशमसम्यक्त्व अवस्थामें मरण नही होता। इसलिये जीवसमास एक संज्ञी- 1 पर्याप्त ही होता है । और वेदकसम्यक्त्वमें संज्ञीपर्याप्त अपर्याप्त ये दो जीवसमास होते है। क्योंकि प्रथम नरक, भवनत्रिकको छोड़कर शेष देव, भोगभूमिज मनुष्य तथा तिर्यंचोंमें अपर्याप्त अवस्थामें भी वेदक सम्यक्त्व रहता है। द्वितीयोपशमसम्यक्त्वको कहते है। विदियुवसमसम्मत्तं अविरदसम्मादि संतमोहोति । खइगं सम्मं च तहा सिद्धोत्ति जिणेहिं णिबिटुं॥ ६९५ ॥ द्वितीयोपशमसम्यक्त्वमविरतसम्यगादिशांतमोहइति । क्षायिक सम्यक्त्वं च तथा सिद्धइति जिनैनिर्दिष्टम् ॥ ६९५ ॥ अर्थ-द्वितीयोपशम सम्यक्त्व चतुर्थ गुणस्थानसे लेकर उपशांत मोहपर्यन्त होता है । क्षायिक सम्यक्त्व चतुर्थगुणस्थानसे लेकर सिद्धपर्यन्त होता है । द्वितीयोपशम सम्य- क्त्वमें संज्ञीपर्याप्त और देव अपर्याप्त ये दो जीवसमास होते है। क्षायिक सम्यक्त्वमें संज्ञी- पर्याप्त अपर्याप्त ये दो जीवसमास होते है । तथा यह सम्यक्त्व सिद्धोंके भी होता है; परन्तु वहांपर कोई भी जीवसमास नहीं होता। भावार्थ-यहा पर चतुर्थ पंचम तथा षष्ठ गुण- स्थानमें जो द्वितीयोपशम सम्यक्त्व बताया है उसका अभिप्राय यह है कि यद्यपि द्विती. योपशम सम्यक्त्व सातमे गुणस्थानमें ही उत्पन्न होता है। परन्तु वहासे श्रेणिका आरोहण करके जब ग्यारहमे गुणस्थानसे नीचे गिरता है तब छढे पांचमे चौथे गुणस्थानमें भी आता है इस अपेक्षासे इन गुणस्थानों में भी द्वितीयोपशम सम्यक्त्व रहता है। १ विशेषता इतनी है कि द्वितीयोपशम सम्यक्त्वसे च्युत होकर जो सासादन गुणस्थानको प्राप्त होता है उसके सज्ञीपर्याप्त और देवअपर्याप्त ये दो ही जीवसमास होते हैं। २ अनतानुबधीका अप्रत्याख्याना- दिरूप परिणमन होना। ३ वेदकसम्यक्त्वका लक्षण पहले कह चुके हैं। गो.३३
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
२५८
संज्ञामार्गणाकी अपेक्षा वर्णन करते है।
सण्णी सण्णिप्पहुदी खीणकसाओत्ति होदि णियमेण ।
थावरकायप्पहुदी असण्णित्ति हवे असण्णी हु ॥ ६९६ ॥
संज्ञी संज्ञिप्रभृतिः क्षीणकपाय इति भवति नियमेन ।
स्थावरकायप्रभृतिः असंज्ञीति भवेदसंज्ञी हि ॥ ६९६ ।।
अर्थ-संज्ञी जीव संज्ञी मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषायपर्यन्त होते है। इनमें गुणस्थान
बारह और जीवसमास संज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो होते हैं। असंज्ञी जीव स्थावरकायसे
लेकर असंज्ञीपंचेन्द्रियपर्यन्त होते हैं । इनमे गुणस्थान एक मिथ्यात्व ही होता है, और
जीवसमास संज्ञीसम्बन्धी पर्याप्त अपर्याप्त इन दो भेदोंको छोड़कर शेप बारह होते है।
थावरकायप्पहुदी सजोगिचरिमोत्ति होदि आहारी।
कम्मइय अणाहारी अजोगिसिद्ध विणायबो ॥ ६९७ ॥
स्थावरकायप्रभृतिः सयोगिचरम इति भवति आहारी ।
कार्मण अनाहारी अयोगिसिद्धेपि ज्ञातव्यः ॥ ६९७ ॥
अर्थ-स्थावरकायमिथ्यादृष्टिसे लेकर सयोगकेवलीपर्यन्त आहारी होते है। और
कार्मणकाययोगवाले तथा अयोगकेवली अनाहारक समझने चाहिये । भावार्थ-कार्मण-
काययोग और अयोगकेवल गुणस्थानवाले जीवोंको छोड़कर शेष समस्त संसारी जीव आहा- )
रक होते है । आहारक जीवोंके आदिके तेरह गुणस्थान और चौदह जीवसमास होते है।
अनाहारक जीवोंके गुणस्थान पांच (मिथ्यादृष्टि सासादन असंयत सयोगी अयोगी) और
जीवसमास सात अपर्याप्त और एक अयोगीसम्बन्धी पर्याप्त इसप्रकार आठ होते है ।
किस २ गुणस्थानमें कौन २ सा जीवसमास होता है यह घटित करते है।
मिच्छे चोइस जीवा सासण अयदे पमत्तविरदे य ।
सण्णिदुर्ग सेसगुणे सण्णीपुण्णो दुखीणोति ॥ ६९८ ॥
मिथ्यात्वे चतुर्दश जीवाः सासनायते प्रमत्तविरते च ।
संज्ञिद्विकं शेषगुणे संज्ञिपूर्णस्तु क्षीण इति ।। ६९८ ॥
अर्थ-मिथ्यात्वगुणस्थानमें चौदह जीवसमास है। सासादन असंयत प्रमत्तविरत चका-
रसे सयोगकेवली इनमें संज्ञी पर्याप्त अपर्याप्त ये दो जीवसमास होते है । शेष गुणस्थानोंमे
संज्ञीपर्याप्त एक ही जीवसमास होता है।
मार्गणास्थानों में जीवसमासोको संक्षेपसे दिखाते है।
तिरियगदीए चोइस हवंति सेसेसु जाण दो दो दु। .
मग्गणठाणस्सेवं णेयाणि समासठाणाणि ॥ ६९९ ॥
गोम्मटसारः। २५९ तिर्यग्गतौ चतुर्दश भवन्ति शेषेषु जानीहि द्वौ द्वौ तु । मार्गणास्थानस्यैवं ज्ञेयानि समासस्थानानि ॥ ६९९ ॥ अर्थ-मार्गणास्थानके जीवसमासोंको संक्षेपसे इसप्रकार समझना चाहिये कि तिर्यग्ग- तिमार्गणामें तो चौदह जीवसमास होते है। और शेष समस्त गतियोंमें दो दो ही जीवस- मास होते है। गुणस्थानोंमें पर्याप्ति और प्राणोंको बताते है। पजती पाणावि य सुगमा भाविंदयं ण जोगिम्हि । तहि वाचुस्सासाउगकायत्तिगदुगमजोगिणो आऊ ॥ ७०० ।। पर्याप्तयः प्राणा अपि च सुगमा भावेन्द्रियं न योगिनि । तस्मिन् वागुच्छासायुष्ककायत्रिकद्विकमयोगिन आयुः ॥ ७०० ॥ अर्थ-पर्याप्ति और प्राण ये सुगम है, इसलिये यहां पर इनका पृथक् उल्लेख नहीं करते क्योंकि बारहमे गुणस्थानतक सव ही पर्याप्ति और सब ही प्राण होते है। तेरहमे गुणस्थानमें भावेन्द्रिय नही होती; किन्तु द्रव्येन्द्रियकी अपेक्षा छहों पर्याप्ति होती है। परन्तु प्राण यहांपर चार ही होते है-वचन श्वासोच्छास आयु कायबल । इसी गुणस्थानमें वचनबलका अभाव होनेसे तीन और श्वासोच्छासका अभाव होनेसे दो प्राण रहते है। चौदहमे गुणस्थानमें काययोगका भी अभाव होजानेसे केवल आयु प्राण ही रहता है। क्रमप्राप्त सज्ञाओंको गुणस्थानों में बताते हैं । छटोति पढमसण्णा सकज सेसा य कारणावेक्खा। पुच्चो पढमणियट्टी सुहुमोत्ति कमेण सेसाओ ॥ ७०१ ॥ पष्ठ इति प्रथमसंज्ञा सकार्या शेषाश्च कारणापेक्षाः। अपूर्वः प्रथमानिवृत्तिः सूक्ष्म इति क्रमेण शेषाः ॥ ७०१॥ अर्थ-मिथ्यात्व गुणस्थानसे लेकर प्रमत्तपर्यन्त आहार भय मैथुन और परिग्रह ये चारों ही सज्ञी कार्यरूप होती है। किन्तु इसके ऊपर अप्रमत्त आदिकमें जो तीन आदिक सजा होती है वे सब कारणकी अपेक्षासे होती है । छठे गुणस्थानमें आहारसज्ञाकी व्यु. च्छिति होजाती है। शेष तीन सज्ञा कारणकी अपेक्षासे अपूर्वकरणपर्यन्त होती है। यहा- पर ( अपूर्वकरणमें) भयसज्ञाकी भी व्युच्छिति होजाती है। शेष दो सज्ञा अनिवृत्तिकरणके सवेदभागपर्यन्त होती है । यहा पर मैथुनसज्ञाका विच्छेद होनेसे सूक्ष्मसापरायमें एक परिग्रह सज्ञा ही होती है। इस परिग्रह सज्ञाका भी यहा विच्छेद होजानेसे ऊपर उपशा- तकषाय आदि गुणस्थानोमें कोई भी सज्ञा नहीं होती।
२६० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। मग्गण उवजोगावि य सुगमा पुर्व परूविदत्तादो। गदिआदिसु मिच्छादी परूविदे रूविदा होति ॥ ७०२ ॥ मार्गणा उपयोगा अपि च सुगमाः पूर्व प्ररूपितत्वात् । गत्यादिपु मिथ्यात्वादौ प्ररूपिते रूपिता भवंति ।। ७०२ ।। अर्थ-पहले मार्गणास्थानकमें गुणस्थान और जीवसमासादिका निरूपण करचुके हैं इसलिये यहां गुणस्थानके प्रकरणमें मार्गणा और उपयोगका निरूपण करना सुगम है। भावार्थ-मार्गणा और उपयोग किसतरह सुगम है यह सक्षेपमें यहा पर स्पष्ट करते है। मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें नारकादि चारो ही गति पर्याप्त और अपर्याप्त होती है । सासादन गुणस्थानमें नरकगतिको छोड़कर शेष तीनों गति पर्याप्त अपर्याप्त होती है। और नरक गति पर्याप्त ही है । मिश्रगुणस्थानमें चारो ही गति पर्याप्त ही होती है । असयत गुणस्था- नमें प्रथम नरक पर्याप्त भी है अपर्याप्त भी है। शेष छहो नरक पर्याप्त ही है । तिर्यग्ग- तिमें भोगभूमिज तिर्यच पर्याप्त अपर्यात दोनों ही होते है । कर्मभूमिज तिर्यंच पर्याप्त ही होते है। मनुष्यगतिमें भोगभूमिन मनुष्य और कर्मभूमिज मनुष्य भी पर्याप्त अपर्याप्त दोनों प्रकारके होते है। देवगतिमे भवनत्रिक पर्याप्त ही होते है । और वैमानिक देव पर्याप्त भी होते है और अपर्याप्त भी होते है । देशसंयत गुणस्थानमें कर्मभूमिज तियेच और मनुष्य ये दो ही और पर्याप्त ही होते है । प्रमत्तगुणस्थानमें मनुष्य पर्याप्त ही होते हैं। किन्तु आहारक शरीरकी अपेक्षा पर्याप्त अपर्याप्त दोनों होते है । अप्रमत्तसे लेकर क्षीणकषायपर्यन्त मनुष्य पर्याप्त ही होते है। सयोगकेवलियोंमें पर्याप्त तथा समुद्धातकी अपेक्षा अपर्याप्त भी मनुष्य होते हैं । अयोगकेवलियोंमें मनुष्य पर्याप्त ही होते है । इन्द्रि- यमार्गणाके पाच भेद है । ये पाचो ही मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमै पर्याप्त अपर्याप्त दोनों प्रकारके होते है । सासादनमें पांचो अपर्याप्त होते है। किन्तु पंचेन्द्रिय पर्याप्त ही होता है अर्थात् अपर्याप्त अवस्थामें पाचो ही इन्द्रियवालोके सासादन गुणस्थान होता है; किन्तु पर्याप्त अवस्थामें पंचेन्द्रियके ही सासादन गुणस्थान होता है । मिश्रगुणस्थानमें पंचेन्द्रिय पर्याप्त ही है । असंयतमें पंचेन्द्रिय पर्याप्त वा अपर्याप्त होते है। देशसंयतसे लेकर अयोगी- पर्यन्त सर्वगुणस्थानों में पंचेन्द्रिय पर्याप्त ही होते है। किन्तु छठे गुणस्थानमे आहारककी अपेक्षा और सयोगीमें समुद्धातकी अपेक्षा अपर्याप्त पंचेन्द्रिय भी होता है। कायके छह भेद हैं । पाच स्थावर और एक त्रस । ये छहों मिथ्यात्वमें पर्याप्त अपर्याप्त दोनो होते है। सासादनमें बादर-पृथ्वी जल वनस्पती तथा द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय असंज्ञी पंचेन्द्रिय अपर्याप्त ही होते हैं और संज्ञी पंचेन्द्रिय पर्याप्त अपर्याप्त दोनों ही होते है। मिश्रगुणस्थानसे लेकर अयोगीतक संज्ञी त्रसकाय पर्याप्त ही होता है। किन्तु असंयत गुणस्थानमें तथा गोम्मटसारः। २६१ आहारककी अपेक्षा प्रमत्तमें और समुद्धातकी अपेक्षा सयोगीमें संज्ञीत्रसकाय अपर्याप्त भी होता है । भावयोग आत्माकी शक्तिरूप है यह पहले कहचुके है । मन-वचन-कायके निमित्तसे जीवप्रदेशोंके चचल होनेको द्रव्य योग कहते है। इसके तीन भेद है, मन वचन काय। इसम मन और वचनके चार २ भेद है-सत्य असत्य उभय अनुभय । काययोगके सात भेद है-औदारिक वैक्रियिक आहारक और इन तीनोंकेमिश्र तथा कार्माण ।इस प्रकार योगके पन्द्रह भेद होते है। इनमेंसे किस २ गुणस्थानमें कितने २ योग होते है यह बतानेकेलिये आचार्य सूत्र करते है- तिसु तेरं दस मिस्से सत्तासु णव छट्ठयम्मि एयारा । जोगिम्मि सत्त जोगा अजोगिठाणं हवे सुण्णं ॥ ७०३ ॥ त्रिपु त्रयोदश दश मिश्रे सप्तसु नव पप्ठे एकादश । योगिनि सप्त योगा अयोगिस्थानं भवेत् शून्यम् ॥ ७०३ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि सासादन असयत इन तीन गुणस्थानोंमें उक्त पन्द्रह योगोंमेंसे आहारक आहारकमिश्रको छोड़कर शेष तेरह योग होते है । मिश्रगुणस्थानमें उक्त तेरह- योगसे औदारिकमिश्र वैक्रियिकमिश्र कार्माण इन तीनोके घटजानेसे शेष दश योग होते है । इसके ऊपर छटे गुणस्थानको छोड़कर सात गुणास्थानोंमें नव योग होते है, क्योंकि । उक्त दश योगोमेंसे क्रियिक योग और भी घट जाता है। किन्तु छठे गुणस्थानमें ग्यारह योग होते हैं; क्योंकि उक्त दश योगोमेंसे वैक्रियिक योग घटता है और आहारक आहा- रकमिश्र ये दो योग मिलते है। सयोगकेवलीमें सातयोग होते है वे ये है सत्यमनोयोग अनु- भवयोग सत्यवचनयोग अनुभयवचनयोग औदारिक औदारिकमिश्र कार्माण । अयोगकेवलीके कोई भी गुणस्थान नहीं होता। भावार्थ-इस सूत्रमें प्रत्येक गुणस्थानमें कितने २ योग होते है उनको वताकर अब वेदादिक मार्गणाओंको बताते है । वेदके तीन भेद है, स्त्री पुरुष नपुंसक।ये तीनों ही वेद अनिवृत्ति करणके सवेद भागपर्यन्त होते है-आगे किसी भी गुणस्थानमें नहीं होते । कपायके चार भेद है । क्रोध मान माय लोभ-इनमें प्रत्येकके अनंतानुवन्धी आदि चार २ भेद होते है। इस प्रकार कषायके सोलह भेद होते है। इनमेंसे मिथ्यात्व और सासादन गुणस्थानमें अनंतानुवन्धी आदि चारो कषायका उदय रहता है । मिश्र और असयतमें अनंतानुवधीको छोडकर शेष तीन कपाय रहते है। देशसयतमें प्रत्या- ख्यान और सज्वलन ये दो ही कषाय रहते है । प्रमचादिक अनिवृत्तिकरणके दूसरे भागप- र्यन्त सज्वलन कषाय रहता है। तीसरे भागमें संज्वलनके मान माया लोभ ये तीन ही भेद रहते है-क्रोध नहीं रहता । चौथे भागतक माया और लोभ, तथा पाचमे भागतक बादर लोम रहता है। दशमे गुणस्थान तक सूक्ष्मलोम रहता है । इसके ऊपर सर्व गुणस्थान कपायरहित २६२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ही है। ज्ञानके आठ भेद हैं, कुमति कुश्रुत, विमंग, मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय, केवल । इनमें आदिके तीन मिथ्या और अंतके पांच ज्ञान सम्यक् होते हैं । मिथ्यादृष्टि सासादनमें आदिके तीन ज्ञान होते है। मिश्रमें भी आदिके तीन ही ज्ञान होते है, परन्तु वे विपरीत या समीचीन नही होते; किन्तु मिथरूप होते है । असंयत देशसंयतमे सम्यग्ज्ञानमिसे आदिके तीन होते है । प्रमत्तादिक क्षीणकषायपर्यन्त आदिके चार सम्यग्ज्ञान होते हैं। सयोगी अयो- गीमें केवल केवलज्ञान ही होता है। संयमका सामान्यकी अपेक्षा एक सामायिककिन्तु विशेष अपेक्षा सात भेद है। असंयम देशसयम सामायिक छेदोपस्थापना परिहारविशुद्धि सूक्ष्मसांपराय यथाख्यात । इनमें आदिके चार गुणस्थानोंमे असंयम और पांचमें गुणस्था- नमें देशसंयम होता है । प्रमत्त अप्रमत्तमें सामायिक छेदोपस्थापना परिहारविशुद्धि ये तीन संयम होते है। आठमे नवमेमें सामायिक छेदोपस्थापना दो ही संयम होते है। दशमे गुणस्थानमें सूक्ष्मसापराय होता है। इसके ऊपर सब गुणस्थानों में यथाख्यात संयम ही होता है । दर्शनके चार भेद है, चक्षु अचक्षु अवधि केवल । मिश्रपर्यन्त तीन गुणस्थानों में चक्षु अचक्षु दो दर्शन होते है । असंयतादि क्षीणकपाय पर्यन्त चक्षु अचक्षु अववि ये तीन दर्शन होते है । सयोगी अयोगी तथा सिद्धोंके केवलदर्शन ही होता है । लेश्याके छह भेद है, कृष्ण नील कापोत पीत पद्म शुक्ल । इनमें आदिकी तीन अशुभ और अंतकी तीन शुभ है । आदिके चार गुणस्थानोंमें छहों लेश्या होती है । देशसंयतसे लेकर अप्रमत्चपर्यन्त तीन शुभ लेश्या होती है । इसके ऊपर सयोगी पर्यन्त शुक्ल लेश्या ही होती है। और अयोगी गुणस्थान लेश्यारहित है । भव्यमार्गणाके दो भेद है, भव्य अभव्य । मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें भव्य अभव्य दोनों होते है । सासादनादि क्षीणकषायपर्यन्त भव्य ही होते है। सयोगी और अयोगी भव्य अभव्य दोनोंसे रहित है । सम्यक्त्वके छह भेद है, मिथ्यात्व, सासादन, मिश्र, उपशम, वेदक, क्षायिक । मिथ्यात्वमें मिथ्यात्व, सासादनमें सासादन, मिश्र मिश्र सम्यक्त्व होता है। असयतसे अप्रमत्ततक उपशम वेदक क्षायिक तीनो सम्य- क्त्व होते है। इसके ऊपर उपशमश्रेणीमें-अपूर्वकरण आदि उपशातकषायतक उपशम और क्षायिक दो सम्यक्त्व होते हैं। क्षपक श्रेणीम-अपूर्वकरण आदि समस्त गुणस्थानोंमें तथा सिद्धोंके क्षायिक सम्यक्त्व ही होता है । सज्ञीमार्गणाके दो भेद है-एक सज्ञी दूसरा असंज्ञी । प्रथम मिथ्यात्व गुणस्थानमें सज्ञी असज्ञी दोनों ही मार्गणा होती है। इसके आगे सासादन आदि क्षीणकषायपर्यन्त सज्ञी मार्गणा ही होती है । सयोगी अयोगीके मन नही होता अतः कोई भी सज्ञा नही होती। आहारमार्गणाके भी दो भेद है-एक आहार दूसरा अनाहार । मिथ्यादृष्टि सासादन असंयत सयोगी इनमें आहार अनाहार दोनों ही होते है। अयोगकेवली अनाहार ही होते है। शेष नव गुणस्थानोंमे आहार ही होता है।
गोल्ड गुणस्थानोंने नार्गपानी बताकर अब अयोगी बनते हैं। दोण्हं पंच य छचेव दोन मिस्तन्नि हॉति वामित्ता। सत्त्वजोगा सत्तसु दो चे जिणे य सिद्ध च ॥ ७०४ ॥ द्वयोः पञ्च च उद् चैव योनि भवन्ति मानिशः! समोपयोगाः समतु द्वौ चैव जिने च तिढे च ॥ ४ ॥ अर्थ-दो गुणस्थानों में पाच, और दोनें छह, निभने बिरूप इ. सात गुस्तानने सात, जिन और सिद्धोंके दो उपयोग होते है। भावार्थ-ज्योगके ने दो भेद है, एक ज्ञान दूसरा दर्शन । ज्ञातके आठ भेद हैं इनके नान पहले पता चुके हैं। दर्शनके चार भेद है इनके भी नम पहले गिना चुके है। इसतरह उपयोग के बारह भेद है। इनमसे मिथ्यात्व और सासादनने आदिके तीन ज्ञान चौर बादिके दो दर्शन ये पांच उपयोग होते है । असयत और देशसयतने मति ध्रुत अवधि तथा चक्षु अननु अनषिदर्शन ये छह उपयोग होते हैं। मिश्र गुणस्थानमें ये हो ब्ह उपयोग मिधला होते है । प्रमत्तादि क्षीणकपायपर्यन्त सात गुणस्थानोंमे मनःपर्ययसहित सात उपयोग होते है। सयोगी अयोगी तथा सिद्धोके केवलज्ञान और केवलदर्शन ये दो ही उपयोग होते है। इसप्रकार गुणस्थानोमे वीसप्ररूपणानिरूपणनामा इक्कीसमा अधिकार समाप्त हुआ। इष्टदेवको नमस्कार करते हुए आलापाधिकारको कहनेकी प्रतिज्ञा करते है। गोयमथेरं पणमिय ओघादेसेसु वीसभेदाणं । जोजणिकाणालावं वोच्छामि जहाकम सुणह ॥७०५ ॥ गौतमस्थविर प्रणम्य ओघादेशयोः विशभेदानाम् । योजनिकानामालापं वक्ष्यामि यथाक्रमं शृणुत ॥ ७०५ ॥ अर्थ-सिद्धोको वा वर्धमान-तीर्थकरको यद्वा गौतमगणधरखामीको अथवा साधुसमू- हको नमस्कार करके गुणस्थान और मार्गणाओके योननिकारूप वीस भेदोंके आलापको क्रमसे कहता हूं सो सुनो। ओघे चोदसठाणे सिद्धे वीसदिविहाणमालावा । वेदकपायविभिण्णे अणियट्टीपंचभागे य ॥ ७०६ ॥ ओघे चतुर्दशस्थाने सिद्धे विशतिविधानामालापाः । वेदकपायविमिन्ने अनिवृत्तिपञ्चभागे च ॥ ७०६ ॥ अर्थ-चौदह गुणस्थान और चौदह मार्गणास्थानोंमे उक्त वीस प्ररूपणाओके सामान्य पर्यात अपर्याप्त ये तीन आलाप होते है । वेद और कषायकी अपेक्षासे अनिवृत्तिकरणके पाच भागोंमें पाच आलाप भिन्न २ समझने चाहिये। .
२६४ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गुणस्थानोंमें आलापोंको बताते है। ओघे मिच्छदुगेवि य अयदपमत्ते सजोगिठाणम्मि । तिण्णेव य आलावा सेसेसिक्को हवे णियमा ॥७०७ ॥ ओघे मिथ्यात्वद्विऽके पि च अयतप्रमत्तयोः सयोगिस्थाने । त्रय एवचालापाः शेषेष्वेको भवेत् नियमात् ॥ ७०७ ॥ अर्थ-मिथ्यात्व सासादन असयत प्रमत्त सयोगकेवली इन गुणस्थानों में तीनों आलाप होते है। शेष गुणस्थानोंमें एक पर्याप्त ही आलाप होता है। इसी अर्थको स्पष्ट करते है। सामण्णं पजत्तमपजत्तं चेदि तिण्णि आलावा। दुवियप्पमपजत्तं लद्धीणिच्चत्तगं चेदि ॥ ७०८ ॥ सामान्यः पर्याप्तः अपर्याप्तश्चेति त्रय आलापाः । द्विविकल्पोऽपर्याप्तो लब्धिर्निवृत्तिकश्चेति ।। ७०८ ॥ अर्थ-आलापके तीन भेद है-सामान्य पर्याप्त अपर्याप्त । अपर्याप्तके दो भेद है एक लब्ध्यपर्याप्त दूसरा निर्वृत्त्यपर्याप्त । दुविहं पि अपजत्तं ओघे मिच्छेच होदि णियमेण । सासणअयदपमत्ते णिवत्तिअपुण्णगो होदि ॥ ७०९ ॥ द्विविधोप्यपर्याप्त ओघे मिथ्यात्व एव भवति नियमेन । सासादनायतप्रमत्तेपु निर्वृत्त्यपूर्णको भवति ॥७०९ ।। अर्थ-दोनों प्रकारके अपर्याप्त आलाप समस्त गुणस्थानोंमेंसे मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही होते है । सासादन असयत प्रमत्त इनमे निर्वृत्त्यपर्याप्त आलाप होता है । भावार्थ-अप- प्तिके जो दो भेद गिनाये है उनमेंसे प्रथम गुणस्थानमें दोनों और सासादन असंयत प्रमत्त इनमें एक निवृत्त्यपर्याप्त ही होता है, किन्तु सामान्य और पर्याप्त आलाप सर्वत्र होते है। जोगं पडि जोगिजिणे होदि हुणियमा अपुण्णगचं तु । अवसेसणवट्ठाणे पजचालावगो एको ॥ ७१० ॥ योगं प्रति योगिजिने भवति हि नियमादपूर्णकत्वं तु । अवशेषनवस्थाने पर्याप्तालापक एकः ॥ ७१०॥ अर्थ-सयोगकेवलियोंमें योगकी ( समुद्धातकी) अपेक्षासे नियमसे अपर्याप्तकता होती है, इसलिये उक्त पाच गुणस्थानोंमें तीन २ आलाप और शेष नव गुणस्थानों में एक पर्याप्त ही आलाप होता है।
गोम्मटसारः। २६५ क्रमप्राप्त चौदह मार्गणाओमें आलापोंका वर्णन करते है। सत्तण्डं पुढवीणं ओघे मिच्छे य तिण्णि आलावा । पढमाविरदेवि तहा सेसाणं पुण्णगालावो ॥७११ ॥ सप्तानां पृथिवीनामोघे मिथ्यात्वे च त्रय आलापाः । प्रथमाविरतेपि तथा शेपाणां पूर्णकालापः ॥ ७११ ॥ अर्थ-सातो ही पृथिवियोमें गुणस्थानोमेसे मिथ्यात्व गुणस्थानमें तीन आलाप होते हैं। तथा प्रथमा पृथिवीके अविरत गुणस्थानमें भी तीन अलाप होते है। शेष पृथिवि. योमें एक पर्याप्त ही आलाप होता है । भावार्थ-प्रथम पृथिवीको छोड़कर शेष छह पृथियो में सासादन मिश्र असयत ये तीन गुणस्थान पर्याप्त अवस्थामें ही होते है । अतः इन छह पृथिवीसम्बन्धी तीन गुणस्थानोमें और प्रथम पृथिवीके सासादन तथा मित्रमें एक पर्याप्त ही आलाप होता है शेष स्थानोमे तीनो ही आलाप होते है। तिरियचउकाणोघे मिच्छदुगे अविरदे य तिण्णे व । णवरि य जोणिणि अयदे पुण्णो सेसेवि पुण्णो दु ॥ ७१२ ॥ तिर्यक्चतुष्काणामोघे मिथ्यात्वद्विके अविरते च त्रय एव । नवरि च योनिन्ययते पूर्णः शेषेऽपि पूर्णस्तु ॥ ७१२ ॥ अर्थ-तिर्यञ्च पांच प्रकारके होते है-सामान्य, पचेन्द्रिय, पर्याप्त, योनिमती, अप- प्ति । इनमेंसे अंतके अपर्याप्तको छोड़कर शेष चार प्रकारके तिर्यंचोके पाच गुणस्थान होते है। जिनमेंसे मिथ्यात्व सासादन असयत इन गुणस्थानोमें तीन २ आलाप होते है। इसमें भी इतनी विशेषता है कि योनिमती तियेचके असयत गुणस्थानमें एक पर्याप्त आलाप ही होता है। शेष मिश्र और देशसयतमें भी पर्याप्त ही आलाप होता है। तेरिच्छियलद्धियपजत्ते एको अपुण्ण आलावो । मूलोपं मणुसतिये मणुसिणिअयदम्हिपजत्तो ॥ ७१३ ॥ तिर्यग्लब्ध्यपर्याप्त एकः अपूर्ण आलापः । मूलो मनुष्यनिके मानुष्ययते पर्याप्तः ॥ ७१३ ॥ अर्थ-लब्ध्यपर्याप्त तिर्यचोके एक अपर्याप्त ही आलाप होता है। मनुष्यके चार भेद है। सामान्य, पर्याप्त, योनिमत् , अपर्याप्त । इनमेंसे आदिके तीन मनुष्योंके चौदह गुण- स्थान होते हैं। उनमें गुणस्थानसामान्यके समान ही आलाप होते है । विशेषता इतनी १ यहा यह शंका नहीं हो सकती कि 'योनिमत् मनुष्यके छठे आदि गुणस्थान किस तरह हो सकते हैं क्योंकि जीवकाण्डमै जीवके भावोंकी प्रधानतासे वर्णन है। अतएव यहभी भावभेदकी अपेक्षा कथन है। गो. ३४ २६६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । है कि असंयत गुणस्थानवी मानुषीके एक पर्याप्त ही आलाप होता है । भावार्थ-गुण- स्थानोंमें जिस क्रमसे आलापोंका वर्णन किया है उस ही क्रमसे मनुष्यगतिमें भी आला. पोंको समझना चाहिये; किन्तु विशेषता यह है कि योनिमत् मनुप्यके असयत गुणस्था- नमें एक पर्याप्त आलाप ही होता है । मणुसिणि पमत्तविरदे आहारदुगं तु णत्थि णियमेण । अवगदवेदे मणुसिणि सण्णा भूदगदिमासेज ॥ ७१४ ॥ मानुष्यां प्रमत्तविरते आहारद्विकं तु नास्ति नियमेन । अपगतवेदायां मानुष्यां संज्ञा भूतगतिमासाद्य ॥ ७१४ ।। अर्थ-जो द्रव्यसे पुरुष है। किन्तु भावकी अपेक्षा स्त्री है ऐसे प्रमत्तविरत जीवके आहारक शरीर और आहारक आङ्गोपाङ्ग नामकर्मका उदय नियमसे नहीं होता। वेदर- हित अनिवृत्तिकरण गुणस्थानवाले भावस्त्री-मनुप्यके जो मैथुनसज्ञा कही है वह भूतगति- न्यायकी अपेक्षासे कही है। भावार्थ-जिस तरह पहले कोई सेठ था परन्तु वर्तमानमें वह सेठ नही है तो भी पहलेकी अपेक्षासे उसको सेठ कहते है। इसी तरह वेदरहित जीवके यद्यपि वर्तमानमें मैथुनसज्ञा नहीं है तथापि पहले थी इसलिये वहां पर मैथुनसंज्ञा कही जाती है । इस गाथामें जो तु शब्द पड़ा है उससे इतना विशेष समझना चाहिये कि स्त्रीवेद या नपुंसकवेदके उदयमें मनःपर्यय ज्ञान और परिहारविशुद्धि सयम भी नहीं होता । द्रव्यस्त्रीके पांच ही गुणस्थान होते है। किन्तु भावमानुपीके चौदहों गुणस्थान होस- कते है । इसमें भी भाववेद नौमे गुणस्थानसे ऊपर नही रहता । तथा आहारक ऋद्धि और परिहारविशुद्धिसयमवाले जीवोंके द्वितीयोपशम सम्यक्त्व नहीं होता। णरलद्धिअपजत्ते एको दु अपुण्णगो दु आलावो। लेस्साभेदविभिण्णा सच वियप्पा सुरठाणा ॥ ७१५ ॥ नरलब्ध्यपर्याप्ते एकस्तु अपूर्णकस्तु आलापः । लेश्याभेदविभिन्नानि सप्त विकल्पानि सुरस्थानानि ॥ ७१५ ॥ अर्थ-मनुष्यगतिमें जो लब्ध्यपर्याप्तक है उनके एक अपर्याप्त ही आलाप होता है। देवगतिमें लेश्यामेदकी अपेक्षासे सात विकल्प होते है । भावार्थ-देवगतिमें लेश्याकी अपेक्षासे सात मेदोंको पहले बताचुके है कि; भवनत्रिकमें तेजका जघन्य अंश, सौधर्मयु- गलमें तेजका मध्यमांश, सनत्कुमार युगलमें तेजका उत्कृष्ट अंश और पद्मका जघन्य अंश, ब्रह्मादिक छह वर्गों में पद्मका मध्यमांश, शतारयुगलमें पद्मका उत्कृष्ट और शुक्लका जघन्य अंश, आनतादिक तेरहमें शुक्लका मध्यमांश, अनुदिश और अनुत्तरमें शुक्ललेश्याका उत्कृष्ट अंश होता है।
१ गोम्मटसारः। २६७ सबसुराणं ओघे मिच्छदुगे अविरदे य तिण्णेव । णवरि य भवणतिकप्पित्थीणं च य अविरदे पुण्णो ॥ ७१६ ॥ सर्वसुराणामोघे मिथ्यात्वद्विके अविरते च त्रय एव । नवरि च भवनत्रिकल्पस्त्रीणां च च अविरते पूर्णः ॥ ७१६ ।। अर्थ-समस्त देवोके चार गुणस्थान सम्भव है। उनमें से मिथ्यात्व सासादन अविरत गुगस्थानमे तीन २ आलाप होते हैं। किन्तु इतनी विशेषता है कि भवनत्रिक देव और कन्पवासिनी देवी इनके असयत गुणस्थानमे एक पर्याप्त ही आलाप होता है। मिस्से पुण्णालाओ अणुहिसाणुत्तरा हु ते सम्मा। अविरद तिण्णालावा अणुहिसाणुत्तरे होति ॥ ७१७ ॥ मिश्रे पूर्णालापः अनुदिशानुत्तरा हि ते सम्यञ्चः । अविरते त्रय आलापा अनुदिशानुत्तरे भवन्ति ॥ ७१७ ॥ अर्थ-नव अवेयकपर्यन्त सामान्यसे समस्त देवोंके मिश्र गुणस्थानमे एक पर्याप्त ही आलाप होता है । इसके ऊपर अनुदिश और अनुत्तर विमानवासी सब देव सम्यग्दृष्टि ही होते है। अतः इन देवोके अविरत गुणस्थानमे तीन आलाप होते है। क्रमप्राप्त इन्द्रियमार्गणा आलापोंको बताते है । वादरसुहमेइंदियवितिचउरिदियअसण्णिजीवाणं । ओघे पुण्णे तिण्णि य अपुण्णगे पुण अपुण्णो दु ॥७१८ ॥ वादरसूक्ष्मैकेन्द्रियद्वित्रिचतुरिन्द्रियासंज्ञिजीवानाम् । ओघे पूर्ण त्रयश्च अपूर्णके पुनः अपूर्णस्तु ॥ ७१८ ।। अर्थ-एकेन्द्रिय-बादर सूक्ष्म, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों- मेंसे जिनके पर्याप्ति-नामकर्मका उदय है उनके तीन आलाप होते है। और जिनके अपर्याप्ति- नामकर्मका उदय होता है उनके लब्ध्यपर्याप्त ही आलाप होता है। भावार्थ-नित्यपर्याप्तके भी पर्याप्ति नामकर्मका ही उदय रहता है अतः उसके भी तीन ही आलाप होते है । सण्णी ओघे मिच्छे गुणपडिवण्णे य मूलआलावा । लद्धियपुण्णे एकोऽपजत्तो होदि आलाओ ॥ ७१९ ॥ संश्योघे मिथ्यात्वे गुणप्रतिपन्ने च मूलालापाः लव्ध्यपूर्णे एकः अपर्याप्तो भवति आलापः॥ ७१९ ॥ अर्थ-संज्ञी जीवके जितने गुणस्थान होते है उनमेंसे मिथ्यादृष्टि या विशेष गुणस्था- नको प्राप्त होनेवालेके मूलके समान ही आलाप समझने चाहिये । और लब्ध्यपर्याप्तक संजीके एक अपर्याप्त ही आलाप होता है । भावार्थ-संझी जीवोंमेंसे तिर्यश्चके पाच ही
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रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् ।
गुणस्थान होते है। इनमेंसे मिथ्यात्व सासादन असंयतमें तीन २ आलाप होते है। और
मिश्र देशसंयतमें एक पर्याप्त ही आलाप होता है । दूसरे संज्ञी जीवोंमें सामान्य गुणस्थानोंमें
जो आलाप कहे है उसी तरह समझना चाहिये । सज्ञी जीवोमें नारकी और देवोंके चार
तथा मनुष्योंके चौदहों गुणस्थान होते है ।
क्रमप्राप्त कायमार्गणाके आलापोको दो गथाओंमें गिनाते हैं।
भूआउतेउवाऊणिचचदुग्गदिणिगोदगे तिण्णि ।
ताणं थूलेदरसु वि पत्तेगे तहुभेदेवि ॥ ७२० ॥
तसजीवाणं ओघे मिच्छादिगुणे वि ओघ आलाओ।
लद्धिअपुण्णे एकोऽपजतो होदि आलाओ ॥ ७२१ ॥
भ्वप्तेजोवायुनित्यचतुर्गतिनिगोदके त्रयः ।
तेषां स्थूलेतरयोरपि प्रत्येके तहिमेदेपि ॥ ७२०॥
त्रसजीवानामोघे मिथ्यात्वादिगुणेऽपि ओघ आलापः ।
लब्ध्यपूर्णे एक अपर्याप्तो भवत्यालापः ॥ ७२१ ॥
अर्थ-पृथिवी जल अग्नि वायु नित्यनिगोद चतुर्गतिनिगोद इनके स्थूल और सूक्ष्म
भेदोमें तथा प्रत्येकके सप्रतिष्ठित अप्रतिष्ठित दो भेदोमे तीन २ आलाप होते है। त्रसजीवोमें
चौदह गुणस्थान होते है। इनके आलापोमें कुछ विशेषता नहीं है । गुणस्थानसामान्यके
जिस तरह आलाप बताये ह उसी तरह यहां भी समझना चाहिये । पृथ्वीसे लेकर त्रसपर्यंत
जितने भेद है उनमें जो लब्ध्यपर्याप्त हैं उनके एक लब्ध्यपर्याप्त ही आलाप होता है
योगमार्गणामें आलापोंको बताते है।
एक्कारसजोगाणं पुण्णगदाणं सपुण्णआलाओ।
मिस्सचउकस्स पुणो सगएकअपुण्णआलाओ ॥ ७२२ ॥
एकादशयोगानां पूर्णगतानां स्वपूर्णालापः।
मित्रचतुष्कस्य पुनः स्वकैकापूर्णालापः॥ ७२२ ।।
अर्थ-चार मनोयोग चार वचनयोग सात काययोग इन पन्द्रह योगोंमेंसे औदारिक
मिश्र वैक्रियिकमिश्र आहारकमिश्र कार्माण इन चार योगोंको छोड़कर शेष ग्यारह योगोमें
अपना २ एक पर्याप्त आलाप होता है। और शेष उक्त चार योगोमें अपना २ एक अप-
यात आलाप ही होता है।
अवशिष्ट मार्गणाओंके आलापोंको संक्षेपमें कहते हैं।
वेदादाहारोचि य सगुणठ्ठाणाणमोघ आलाओ।
णवरि य संढित्थीणं णत्थि हु आहारगाण दुगं ॥ ७२३ ॥
गोम्मटसारः। २६९ वेदादाहार इति च स्वगुणस्थानानामोघ आलापः । नवरि च पण्ढस्त्रीणां नास्ति हि आहारकानां द्विकम् ॥ ७२३ ॥ अर्थ-वेदमार्गणासे लेकर आहारमार्गणापर्यन्त दशमार्गणाओंमें अपने २ गुणस्थानके पमान आलाप होते हैं । विशेषता इतनी है कि जो भावनपुंसक या भावस्त्रीवेदी हैं उनके आहारक-काययोग और आहारक-मिश्रकाययोग नहीं होता । भावार्थ-जिस २ मार्गणाम जो २ गुणस्थान सम्भव है और उनमे जो २ आलाप बताये है वे ही आलाप उन २ मार्गणाओंमें होते है इनको यथासम्भव लगालेना चाहिये । गुणस्थानोंके आलापोंको पहले बताचुके है अतः पुनः यहापर लिखनेकी आवश्यकता नहीं है। गुणजीवापजत्ती पाणा सण्णा गइंदिया काया। जोगा वेदकसाया णाणजमा दंसणा लेस्सा ॥ ७२४ ॥ भवा सम्मत्तावि य सण्णी आहारगा य उवजोगा। जोग्गा परूविदवा ओघादेसेसु समुदायं ॥ ७२५ ॥ गुणजीवाः पर्याप्तयः प्राणाः संज्ञाः गतीन्द्रियाणि कायाः । योगा वेदकपायाः ज्ञानयमा दर्शनानि लेश्याः ॥ ७२४ ॥ भव्याः सम्यक्त्वान्यपि च संज्ञिनः आहारकाचोपयोगाः । योग्याः प्ररूपितव्या ओघादेशयोः समुदायम् ॥ ७२५ ॥ अर्थ-चौदह गुणस्थान, चौदह जीवसमास, छह पर्याप्ति, दश प्राण, चार संज्ञा, चार गति, पाच इन्द्रिय, छह काय, पन्द्रह योग, तीन वेद, चार कषाय, आठ ज्ञान, सात सयम, चार दर्शन, छह लेश्या, भव्यत्व अभव्यत्व, छह प्रकारके सम्यक्त्व, संज्ञित्व असं- ज्ञित्व, आहारक अनाहरक, बारह प्रकारका उपयोग इन सबका यथायोग्य गुणस्थान और मार्गणास्थानों में निरूपण करना चाहिये । भावार्थ-इन वीस स्थानोमेंसे कोई एक विव- क्षित स्थान शेष स्थानोमें कहा २ पर पाया जाता है इस बातका आगमके अविरुद्ध वर्णन करना चाहिये । जैसे चौदह गुणस्थानोमेंसे कौन २ सा गुणस्थान जीवसमासके चौदहभेदो- मेंसे किस २ विवक्षित भेदमै पाया जाता है । अथवा जीवसमास या पर्याप्तिका कोई एक विवक्षित भेदरूप स्थान किस २ गुणस्थानमें पायाजाता है इसका वर्णन करना चाहिये। इसी प्रकार दूसरे स्थानोमें भी समझना चाहिये। जीवसमासमें कुछ विशेषता है उसको बताते है। ओघे आदेसे वा सण्णीपजंतगां हवे जत्थ । तत्त य उणवीसंता इगिवितिगुणिदा हवे ठाणा ॥ ७२६ ॥ र , २७० रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ओघे आदेशे वा संज्ञिपर्यन्तका भवेयुर्यत्र । तत्र चैकोनविंशांता एकद्वित्रिगुणिता भवेयुः स्थानानि ।। ७२६ ।। अर्थ-सामान्य (गुणस्थान) या विशेषस्थानमें ( मार्गणास्थानमें ) संज्ञी पंचेन्द्रिय- पर्यन्त मूलजीवसमासोंका जहां निरूपण किया है वहां उत्तर जीवसमासस्थानके भेद उन्नीस- पर्यन्त होते है । और इनका भी एक दो तीनके साथ गुणा करनेसे क्रमसे उन्नीस अड़- तीस और सत्तावन जीवसमासके भेद होते है । भावार्थ-गुणस्थान और मार्गणाओमें जहां संज्ञिपर्यन्त भेद बताये है, वहां ही जीवसमासके एकसे लेकर उन्नीसपर्यन्त और पर्याप्त अपर्याप्त इन दो भेदोंसे गुणा करनेकी अपेक्षा अड़तीस भेद, तथा पर्याप्त निर्वृत्य- पर्याप्त लब्ध्यपर्याप्त इन तीन भेदोंसे गुणा करनेकी अपेक्षा सत्तावन भेद भी समझने चाहिये । इसका विशेष खरूप जीवसमासाधिकार कहचुके है । "गुणजीवे"-त्यादि गाथाके द्वारा बताये हुए वीस भेदोंकी योजना करते है। वीरमुहकमलणिग्गयसयलसुयग्गहणपयउणसमत्थं । णमिऊणगोयममहं सिद्धतालावमणुवोच्छं ॥ ७२७ ॥ वीरमुखकमलनिर्गतसकलश्रुतग्रहणप्रकटनसमर्थम् । नत्वा गौतममहं सिद्धान्तालापमनुवक्ष्ये ॥ ७२७ ।। अर्थ-अंतिम तीर्थकर श्रीवर्धमानखामीके मुखकमलसे निर्गत समस्त श्रुतसिद्धान्तके ग्रहण करने और प्रकट करनेमें समर्थ श्रीगौतमखामीको नमस्कार करके मै उस सिद्धान्ता- लापको कहूंगा जो कि वीर भगवान्के मुखकमलसे उपदिष्ट श्रुतमें वर्णित समस्त पदार्थोके प्रकट करनेमें समर्थ है । भावार्थ-जिस तरह श्रीगौतमखामी तीर्थंकर भगवान के समस्त उपदेशको ग्रहण और प्रकट करनेमें समर्थ है उसी तरह सह आलाप भी उनके (भग- वान्के ) समस्त श्रुतके ग्रहण और प्रकट करनेमें समर्थ है। क्योंकि इस सिद्धान्तालापमे उन्ही समस्त पदार्थोंका वर्णन है जिनको कि श्रीगौतमखामीने भगवान्के समस्त श्रुतको ग्रहण करके प्रकट किया है पहले गुणस्थान जीवसमास आदि वीस प्ररूपणाओंको बताचुके है उनमें तथा उनके उत्तर भेदोंमें क्रमसे एक २ के ऊपर यह आलाप आगमके अनुसार लगालेना चाहिये कि विवक्षित किसी एक प्ररूपणाके साथ शेष प्ररूपणाओंमेंसे कौन २ सी प्ररूपणा अथवा उनका उत्तर भेद पाया जाता है। इनका विशेष खरूप देखनेकी जिनको इच्छा हो वे इसकी सस्कृत टीका अथवा बड़ी भाषाटीकामे देखै । इन आलापोंको लगाते समय जिन बातोंका अवश्य ध्यान रखना चाहिये उन विशेष बातोंको ही आचार्य यहां पर दिखाते है गोम्मटसारः। २७१ सधेसि सुहुमाणं काओदा सबविग्गहे सुक्का । सबो मिस्सो देहो कोदवण्णो हवे णियमा ॥१॥ सर्वेषां सूक्ष्माणां कापोताः सर्वविग्रहे शुक्लाः । सर्यो मिश्रो देहः कपोतवों भवेनियमात् ॥१॥ अर्थ-पृथिवीकायादि समस्त सूक्ष्म जीवोंके कपोत लेश्या ही होती है। तथा समस्त विग्रहगतिसम्बन्धी कार्मणशरीरकी शुक्ल लेश्या होती है । तथा समग्र मिश्र शरीर नियमसे कपोतवर्णवाला होता है । भावार्थ-अपर्याप्त आलापोमें द्रव्यलेश्या कपोत और शुक्ल ये दो ही होती है । इसके सिवाय और भी विशेषता है वह यह है कि मनुष्यरचना सम्बन्धी प्रमचादि गुणस्थानोंम जो तीन वेद बताये है वे द्रव्यवेदकी अपेक्षासे है। भाववेवकी अपे- क्षासे एक पुरुष वेद ही होता है । तथा स्त्री नपुंसक वेदके उदयमें आहारक योग मनः- पर्यय ज्ञान परिहारविशुद्धि सयम ये नहीं होते । नारकियोंके अपर्याप्त अवस्थामें सासादन गुणस्थान नहीं होता । तथा किसी भी अपर्याप्त अवस्थामें मिश्र गुणस्थान नही होता । इत्यादि और भी जो २ नियम "पुढवी आदि चउण्हं" आदि पहले बताये है उनको तथा अन्यत्र भी कहे हुए नियमोंको आलाप लगाते समय ध्यानमें रखना चाहिये। कुछ नियमोंको गिनाते है। मणपज्जवपरिहारो पढमुवसम्मत्त दोण्णि आहारा। एदेसु एकपगदे णस्थित्ति असेसयं जाणे ॥ ७२८ ॥ मनःपर्ययपरिहारौ प्रथमोपसम्यक्त्वं द्वावाहारौ । एतेपु एकप्रकृते नास्तीति अशेपकं जानीहि ॥ ७२८ ॥ अर्थ-मनःपर्यय ज्ञान परिहारविशुद्धि सयम प्रथमोपशमसम्यक्त्व और आहारकद्वय इनमें किसी भी एकके होनेपर शेप भेद नहीं होते ऐसा जानना चाहिये। विदियुवसमसम्मत्तं सेढीदोदिण्णि अविरदादी । सगसगलेस्सामरिदे देवअपजत्तगेव हवे ॥ ७२९ ॥ द्वितीयोपशमसम्यक्त्वं श्रेणितोऽवतीर्णेऽविरतादिपु । स्वकस्वकलेश्यामृते देवापर्याप्तक एव भवेत् ॥ ७२९ ॥ अर्थ-उपशमश्रेणिसे उतरकर अविरतादिक गुणस्थानोंको प्राप्तकरनेवालोंमेंसे जो अपनी २ लेश्याके अनुसार मरण करके देवपर्यायको प्राप्त करता है उसहीके अपर्याप्त अवस्थामे द्वितीयोपशम सम्यक्त्व होता है । भावार्थ-चारगतिमेंसे एक देव अपर्याप्तको छोडकर अन्य किसी भी गतिकी अपर्याप्त अवस्थामें द्वितीयोपशम सम्यक्त्व नहीं होता। १ यह गाथा यद्यपि पहले लेश्या मार्गणाम भी आचुकी है तथापि यहापर भी इसको उपयोगी सम- शकर पुनः लिसदिया है।
२७२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । गुणस्थानियोंका खरूप बताकर गुणस्थानातीत सिद्धोंका खरूप बताते हैं। सिद्धाणं सिद्धगई केवलणाणं च दसणं खयियं । सम्मत्तमणाहारं उवजोगाणकमपउत्ती॥ ७३० ।। सिद्धानां सिद्धगतिः केवलज्ञानं च दर्शनं क्षायिकम् । सम्यक्त्वमनाहारमुपयोगानामक्रमप्रवृत्तिः ॥ ७३० ॥ अर्थ-सिद्ध जीवोंके सिद्धगति केवलज्ञान क्षायिकदर्शन क्षायिकसम्यक्त्व अनाहार और उपयोगकी अक्रम प्रवृत्ति होती है। भावार्थ-छद्मस्थ जीवोंके क्षायोपशमिक ज्ञान दर्शनकी तरह सिद्धोंके क्षायिक ज्ञान दर्शनरूप उपयोगकी क्रमसे प्रवृत्ति नहीं होतीकिन्तु युगपत् होती है । तथा सिद्धोंके आहार नही होता-वे अनाहार होते है। क्योंकि उनसे कर्मका और नोकर्मका सर्वथा सम्बन्ध ही छूटगया है । "णोकम्मकम्महारो कवलाहारो य लेप्पमाहारो ओजमणोवि य कमसो आहारो छभिहो यो' ॥ १ ॥ इस गाथाके अनुसार नोकर्म और कर्म भी आहार ही हैं अतः सर्वथा अनाहार सिद्धोंके ही होता है । गुणजीवठाणरहिया सण्णापजत्तिपाणपरिहीणा। सेसणवमग्गणूणा सिद्धा सुद्धा सदा होंति ॥ ७३१ ।। गुणजीवस्थानरहिताः संज्ञापर्याप्तिप्राणपरिहीनाः। शेषनवमार्गणोनाः सिद्धाः शुद्धाः सदा भवन्ति ॥ ७३१॥ अर्थ-सिद्ध परमेष्ठी, चौदह गुणस्थान चौदह जीवसमास चार सज्ञा छह पर्याप्ति दश प्राण इनसे रहित होते है । तथा इनके सिद्धगति ज्ञान दर्शन सम्यक्त्व और अनाहारको छोड़कर शेष नब मार्गणा नही पाई जाती । और ये सिद्ध सदा शुद्ध ही रहते हैं। क्योंकि मुक्तिप्राप्तिके वाद पुनः कर्मका बन्ध नहीं होता। अंतमें वीस भेदोंके जाननेके उपायको बताते हुए इसका फल दिखाते है णिक्खेवे एयत्थे णयप्पमाणे णिरुचिअणियोगे। मग्गइ वीसं भेयं सो जाणइ अप्पसम्भावं ॥ ७३३॥ निक्षेपे एकार्थे नयप्रमाणे निरुत्यनुयोगयोः। मार्गयति विशं भेदं स जानाति आत्मसद्भावम् ॥ ७३२ ॥ अर्थ-जो भव्य उक्त गुणस्थानादिक वीस भेदोंको निक्षेप एकार्थ नय प्रमाण निरुक्ति अनुयोग आदिके द्वारा जानलेता है वही आत्मसद्भावको समझता है। भावार्थ- जिनके द्वारा पदार्थों का समीचीन व्यवहार हो ऐसे उपायविशेषको निक्षेप कहते है । इसके चार भेद है, नाम स्थापना द्रव्य और भाव । इनकेद्वारा जीवादि समस्त पदार्थोंका समी- चीन व्यवहार होता है। जैसे किसी अर्थ विशेषकी अपेक्षा न करके किसीकी जीव यह गोम्मटसारः। २७३ सज्ञा रखदी इसको जीवका नामनिक्षेप कहते है। किसी काष्ठ चित्र या मूर्ति आदिमें किसी जीवकी 'यह वही है। ऐसे सकल्परूपको स्थापनानिक्षेप कहते है । स्थापनमें स्थाप्यमान पदार्थकी ही तरह उसका आदर अनुग्रह होता है । भविष्यत् या भूतको वर्तमानवत कहना जैसे कोई देव मरकर मनुष्य होनेवाला है उसको देवपर्यायम मनुष्य कहना, अथवा मनुष्य होनेपर देव कहना यह द्रव्यनिक्षेपकाविषय है। वर्तमान मनुष्यको मनुष्य कहना यह भावनिक्षेपका विषय है । प्राणभूत असाधारण लक्षणको एकार्थ कहते हैं । जैसे जीवका लक्षण दश प्राणों से यथासम्भव प्राणोंका धारण करना या चेतना ( जानना और देखना) है। यही जीवका एकार्थ है । वस्तु के अंशग्रहणको नय कहते है । जैसे जीवशब्दके द्वारा आत्माकी एक जीवत्वशक्तिका ग्रहण करना । एक शक्तिके द्वारा समस्त वस्तुके ग्रहणको प्रमाण कहते है। जैसे जीवशब्दके द्वारा सम्पूर्ण आत्माका ग्रहण करना । जिस धातु और प्रत्ययके द्वारा जिस अर्थमें जो शब्द निष्पन्न हुआ है उसके उसही प्रकारसे दिखानेको निरुक्ति कहते है । जैसे-जीवति जीविष्यति अजीवीत् वा स जीव जो जीता है या जीवेगा या जिया हो उसको जीव कहते है । जीवादिक पदार्थोके जानने के उपायविशेषको अनुयोग कहते है । उसके छह भेद है । निर्देश (नाममात्र या खरूप अथवा लक्षणका कहना) खामित्व, साधन (उत्पत्तिके निमित्त) अधिकरण, स्थिति (कालकी मर्यादा ) भेद । इन उपायोंसे जो उक्त वीसप्ररूपणाओंको जानलेता है वही आत्माके समीचीन खरूपको समझसकता है। ॥ इति आलापाधिकार॥ अन्तम आशीर्वावखरूप गाथाको आचार्य कहते है। अजजसेणगुणगणसमूहसंधारिअजियसेणगुरू। भुवणगुरू जस्स गुरू सो राओ गोम्मटो जयतु ॥ ७३३॥ आर्यायसेनगुणगणसमूहसंधार्यजितसेनगुरुः । भुवनगुरुय॑स्य गुरुः स राजा गोम्मटो जयतु ।। ७३३ ।। अर्थ-श्रीभार्यसेन आचार्यके अनेक गुणगणको धारण करनेवाले और तीनलोकके गुरु श्रीअजितसेन आचार्य जिसके गुरु है वह श्री गोम्मट (चामुण्डराय) राजा जयवन्ता रहो। Hus ॥ इति गोम्मटसारस्य जीवकाण्डं समासम् ॥ HING गो०३५
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अकारादिके क्रमसे गाथासूची। गाथा. पृ. गा. १०२।२६१ ४७५११४ . . ४१९८ ... ... . • ... ... . अवरे वरसख .. पृ गा गाथा. अतोमुहुत्तमेत्ता ५६।१३५ अद्धत्तेरस वारस ७०1१७१ अपदिछिदपत्तेयं १२४॥३३५ अपदिहिदपत्तेया १४७३८९ अप्पपरोभय १४३३९० अयदोत्ति छ १४९।३९८ अयदोत्ति हु अवि १५०१४०० अवरद्दन्वादुवरिम १५२।४०८ अवरद्ध अवरुव ૨૪૭૬૬૬ अवरपरित्ता १५११४०३ अवरमपुण्ण १२।२२८ अवरा पज्जाय २७३१७३३ अवरुवरि इगि... ३५.८० अवरुवरिम्मि २०९।५६३ २१३१५७४ अवरोग्गाहण ३०६८ अवरोग्गाहण १६५४५२ अवरो जुत्ताणतो १३५।३५७ अवरोहिखेत २३२१६२८ १३३॥३५० अवरोहिखेत्त ११६।३०० अवर तु ओहिं २२३१६०५ अवर दन्चमुदा २०१६०/अवरसमुदा होंति १७१।४७३/अवरसमुदा सो २१९१५९३ / अवर होदि अणतं १३२॥३४७/ अवहीयदित्ति १२११३१४ अन्वाघादी अतो ७९/१९६ असहायणाण १७७४४९१ असुराणमसखे १९९८५५२/ असुराणमस २३१५० असुहाणं वर २४१५३ अहमिदा जह देवा २११४९ अहिमुहणियमिय ९९।२५२ अहियारो पाहुडयं अइभीमदंसणेण अगुलअसख अगुलअसख अगुलअसख अगुलअसस ... अगुलअसंख अगुलअसख अगुलअसख अगुलअसख अगुलमावलिया अगोवंगुदया अज्जज्नसेणगुण अन्नवमलेच्छ. अजीवेसुय रूबी अठत्तीसद्धलवा अठविहकम्म अढण्हं कम्माणं... अहारसछत्तीस... अठेव सयसहस्सा अडकोडिएय अण्णाणतियं होदि अण्णोण्णुवयारेण अणुलोहं वेदंतो अणुलोहं वेदंतो अणुसखासखे. अत्थक्खरच अत्थादो अत्यंतर अस्थि अणंता जीवा अतरभावप्पब . अतरमवरकस्स अतोमुहुत्तकाल अतोमुहुत्तमेत्ते अतोमुहुत्तमेत्तो अतोमुत्तमत्तं . ८३।२०४ ११.२८८ १९०१५३१ ૨૫૪૬૮૮ १४५१३८३ ४४११०६ ४५।१०९ ४२१९९ २१२।५७२ ४३।१०२ १२४१३२२ ४४११०० ४३.१०३ १४४॥३७९ २०३३५५९ १८४१३७८ १४५।३८१ ૧૪૪૨૮૦ १६५।४५० १८६५१९ १८७७५२२ १४६॥३८६ १४११३६९ ९४/२३७ २०६४ १५८४२६ १५८४२७ १७९५०० ६६३१६३ ११८३३५ १३०३४० . . . . ... ... . . ... . . ... . . . . ... ...
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । २ गाथा. पृ. गा. गाथा. इच्छिदरासिच्छे आ ८२।२०२/इंदियकाये २१६।५८२ इंदियकायाऊणि पृ..गा. १५६४१९ २१५ ધજા ૨૧ १६४/४४५ २४९/६७४ ५५।१३३ आउनुरासि आगास वज्जित्ता आणदपाणद आदिमछठाण "दिनसम्मत्त .. . .. . ई ११९।३०८ उ .. ... . .." .. . .. मिीयमासुर. आमंतणि आण आयारे सुइयडे आवलिअसखस आवलिअसखभा आवलिअसख. आवलिअसख आवलिअसख... आवलिअसख आवलिअसख. आवलिअसख.. आवलियपुधत्त आवासया हु. आसवसवर आहरदि अणेण.. आहरदि सरीराणं आहारसरीरिं आहारदसणेण... आहारस्सुदयेण आहारयमुत्तत्थं आहारकायजो आहारवग्गणादो आहारमारण आहारो पजत १५९/४३० इंदियणोइंदिय... १२५३२६ इंदियमणोहिणा ९।१९/इह जाहि वाहिया २१४ ११७१३०३/ईहणकरणेण ... ९०।२२४ १३४१३५५) उकस्साहिदि १५।२११/उकस्ससखमेतं ५।२१२/ उत्तमअगम्हि. १४५।३८२ उदयावण्णसरी १५०।३९९/उदये दु अपुण्ण १५३६४१६/उदये दु वणप्फ १५६।४२१/उप्पायपुव्वगाणिय १६७१४५७/उवजोगो वण्ण २१३१५७३/उववादगम्भजेसु १५११४०४/उववादमारणंतिय ९०१२५०/उववादा सुरणिरया २३८१६४३ उववादे अचित्तं ९५।२३८ उववादे सीदुसणं २४६।६६४ उवसमसुहमाहारे ४९।११८ उवसते खीणे. ५६।१३४ उवसतरवीण ९४१२३४/उववादे पढम ९५।२३९/उवहीणं तेत्तीस १०५।२६९/उव्वकं चउरक २२४१६०६ २४७१६६७/एइंदियपहुदीणं २५२१६८२/एइंदियस्सफुसणं एकहचचय १३५१३५८ एकम्हि काल ... १०८।२७७/एक खलु अट्ठक ३५।७९/एकचउक्क चउ १९४३ एकदरादि १९।४४ एक समयपवद्धं २०४७ एकारस जीवा ... ९८२४९ १२६१३३० ९४४२३६ २४६३६६३ ५०1१२१ ७५।१८४ १३११३४४ २०९/५६४ ३८१९२ ८०1१९८ ३८१९० ३७१८५ ३७४८६ ५८.१४२ १७१।४७४ ५।१० १९७१५४८ १९८५५१ १२४॥३२४ ... ... ... .. :': ... . . ... ૧૭૬૪૮૭ ६८1१६६ १३४॥३५३ २५१५६ १२५/३२० १२११३१३ १२९।३३७ ९१।२५३ २६८७२२ . इगिदुगपंचे इगिपुरिसे वत्तीस इगिवणं इगि... इगिवितिचपण इगिवितिचखच इगिवीसमोह ... ... Fe ..
गोम्मटसार। ३ गाथा. गाथा. पृ गा. ... ... ... ... ... १११।२८६ ३६८२ ૨૮૬૨ १९३१५३० . .. एगगुण तुज एगणिगोदसरीरे एदम्हि गुणठाणे एदम्हि विभजते एदे भावा णियमा एयक्खरादु एयदवियम्मि... एयपदादो उव एया य कोडिकोडी ... ... ख . ... ... ... .. २२२६६०३ ७८1१९३ २४१।६५० २९॥६७ २३९।६४५ १९३१५३७ .एयंत युद्ध ... ... एवं असखलोग एव उवरि विणेभो एव गुणसजुत्त... एवं तु समुग्धादे ग क ... . पृ. गा. २२५।६०९ किमिरायचक ७९।१९४/ कुम्मुण्णय जो... २३१५१/ केवलणाणदि १४९।३९७ केवलणाणाणं ६.१२ १२८१३३४ खंघ सयल २१५।५८१/खधा असखलोगा १२८१३३६/खयउपसमिय. ४८।११६/सबगे य खीणमोहे ८1१६ सीणे दंसणमोहे १२॥३३१/खेत्तादो असुह ४६११११ २२५।६१० गइदंदियेसु १९६१५४६ गइउदयज गच्छसमा तका २०६१/गतनममनगं ७६।१८८ गदिगणोग्गह.. १४०।३६७/गदिठाणोग्गह... १६०४३२ गम्भजजीवाणं... २४८१६७० गम्भणपुइत्थि... १५३१४०९/गाउयपुधत्त ९५।२४० गुणजीवा १०३।२६३ गुणजीवा पज्जत्ती १३२१३४० गुणजीवा पजत्ती १८०५०१ गुणजीवठाण... १८९।५२० गुणपञ्चइगो १५२॥४०७ गूढसिरसधि १५३६४११/गोयमथेर १९८१५५० २१५।५७९/घणअगुलपढम २१११५७० १८८१५२६ चउगइसरूव १८५१५२७ चउ पण चोइस १८७३५२३ चउरक्खथावर ११२।२९१/चरसठिपदं १७७१४९२ चक्खूण ज पया- १९२१५३६ चक्रुसोदं २०११५५५/चंडो ण मुचह... .. ५८।१४१ ५९।१४५ १५५।४१७ १३६६३६२ २१०१५६५ २२३।६०४ ३७१८७ ૧૦૮૭૨ १६६०४५४ २।२ २५०१६७६ २६९/७२४ २७२/७३१ १४१६३३१ ७६।१८६ २६३१७०५ ... .. .. . . .. ... ... कदकफलजुद कंदस्स व मूलस्स कप्पषवहार फप्पसुराणं कम्मइयकाय कम्मइयवग्गणं कम्मेव य कम्मभव ... कम्मोरालिय ... कम्मवण्णुत्तर काऊणीलकिण्हं काऊ काऊ काऊ कालविसेसेण काले चउण्ण ... कालो छालेस्सा कालोवि य पवएसो कालं अस्सिय... किण्हचउकाण.. किण्हतियाण किण्हपरसेण मुदा किण्हं सिलास... किण्हा णीला काऊ ... किण्हादिरासि . किण्हादिलेस्स ... ... . ... घ ६५।१६० ... च ... . १२९।३३० २५०।६७७ २५५।६९० १३३१३५२ १७४१४८३ ७०1१७० १८३१५०८ ... ... १ • रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ४ पृ. गा. ८1१४० ... . ... . ... . . गाथा. चत्तारिवि खे चदुगदि भन्वों चद्गदिमदि चंदरविजयु चरमधरासाण गवंकण भदो चोक्सो वतियमचितियं चितियमचितियं चोइसमग्गण .. . १२९/६२१ २१७५८७ १७२१४७ २०११५६२ १२४१३२३ १८/१४८ २०११५९८ २३८१६४२ २३३२६३१. १६२४२ ३१७० १०२७६ १६१४४३६ .. पृ गा. गाया २४२१६५२ जाहिव जासु व २४२।३५१ जीवदुगं उत्तर १६७४६५० जीवा अणंतससा १३६।३६० जीवा चौहममे २३६।३३७/जीवाजीव दवं १२७१३३२/जीवाणं च य रासी १८४५१५/जीवादोणत १६१।४३७/जीवादोणतगु १६५।४४८ जीविदरे कम्म १२९।३३९ जेहावरयहु जेमि ण सति... १२५।३२७ जेहि अणेया २५९१७०१/ जोइसियवाण २१५।५८० जोइमियंताणो... २०८१५६१ जोइसियादो अहिया . १७८१४९४ जोगपउत्ती ४८।११५ जोगं पडि जोगि २०८१५६०जोगे चउरक्सा ६३।१५५ जोणेव सचमोसो १३७१३६५ १०६।२७३ १७०।४७० ठाणेहिवि जोणीहि . ... छठाणाणं आ ... छठोत्ति पढम छद्दव्वावठाणं छद्दन्वेसु य णाम छप्पयणील छप्पंचाधिय छप्पंचणव वि... छस्सय जोयण छस्सयपण्णासाई छादयदि सयं... छेत्तूणय परि.... १७६८९ २६८1७१० १७५५४८६ ८९/२२० जो तसवहादु. १४॥३३॥ ठ ३३/७४ ज ण जणवदसम्मदि जत्तस्स पहं जत्थेकमाइ ... जम्म खलु सम्म ... .. ... जम्बूदीवं भरहो जम्हा उवरिम जं सामण्णं जह कंचणमग्गि जहरवादसजमो जह पुण्णापुण्णाई जह भारवहो जाइजरामरण.. जाई अविणाभावी আগ শীকল जाणइ तिकाल ८९।२२१) णहकसाये २१०।५६६ णपमाए पढमा ७७११९२/णहासेसपमादो ३६४८३ णय कुणइ पक्खवायं... ७८११९४ णय जे भव्वाभब्वा २११४८णय परिणमदि १७४१४८१/णय पत्तिय ८१।२०२/णय मिच्छतं १६९।४६७ णय सचमोस... ४८।११७/णरतिरियाणं ८१।२०१/णरतिरिय ६२११५१/ण रमति जदो... ७३।१८० णरलद्धिअपज्जत्त १८४०५१४ णरलोएत्ति य ... ११५।२९० णवमी अणक्खर १९११५३२ ५४१३८ २०४६ १८५/५१६ २०२।५५८ २१११५६९ १८३१५१२ २४२१६५३ ८८/२१८ १८९१५२९ ११५१२९२ ६०।१४६ २६६१७१५ १६६१४५५ ९०२२५, . ... . . . ... ...
गोम्मटसारः। ५ गाया. पृ. गा. पृ. गा. णत्रय पदस्था वरि य दुस ... . ... .. :-: ... ... " .." . . ... ... . . ... . ... ... ... .. वरि विसेस वरि समुग्धा वरि य सुका णवि इंदिय पाणं पंचविहं. णागुवजोगजुदाण पारयतिरिक्स रिक्सित्तु विदिय णक्खेचे एयत्ये णिच्चिदरधादु णिदापयले णिहावंचण णिदेसवण्णपरि णिद्धत्तं लक्खत्त णिद्धणिद्धा ण णिद्धस्स णिद्धण णिद्धिदरोली गिद्धिदरवरगु णिद्धिदरगुणा णिद्धिदरे सम णिम्मूलखंध णियखेत्ते केवलि णिरया किण्हा. हिस्सेसखीण णेरइया खल वित्थी व णोइंदियआवरण णोइदियत्ति णो इदियेसु वि... णो कम्मुरालस.. . गाथा. २२९१६२० तत्तो लातव ... १००।२५४ तत्तो सखेन १२२।३१८ तहमंगुलस्स १९५४९/तदियक्खो अत २५५।६९२/तदियकसाय ७१।१७३ तललीनमधुग... २४८१६७२ तब्बड्डीए चरिमो २४९१६७५/तविदियं कप्पाण १११।२८७ तसचदुजुगाण १६॥३८ तसजीवाण २७२१७३२तसरासिपुढवि... ३९२८९/तस्समयवद्ध २५।५५/तस्सुवरि इगि १८३१५१० तसहीणो ससारी १७७४४९० तहिं सव्वे सुद्ध २२४॥६०० तहिं सेसदेव २२५।६११ तं सुद्धसलागा... २२६१६१४ ताणं समयपवद्धा २२६१६१२ तारिसपरिणाम २२८।६१७ तिगुणा सत्तगुणा २२८१६१८ तिणकारिसिठ २२७१६१५/तिण्णिसया १८२१५०० तिणिसयजोय- ९४२३५/तिण्णिसयसहि १७८१४९५/तिण्हं दोण्हं दोण्ह २८।६२ तिविपच पुण्ण ३९।९३ तियकालविसय १०६।२७४ तिरघियसय २४५।६५९ तिरियगदीए १६३६४४३ तिरियचउका १३३२९ तिरिये अवर ... १४३३७६ तिरियति कुडिल तिव्वतमा तिव्व- १०३१२६२/तिसयं भणति १४तिसु तेर दस ६५।१६१/तीस वासो जम्मे १४९।३९६ तेउतियाणं एवं २३६६३८ तेउदु असस ... १६११४३५ २३६।६३९ ७४।१८३ १७१४० १७०१४६८ ६४।१५७ ४४११०५ १६६०४५३ ३१७१ २६८१७२१ ८३३२०५ ९७२४७ ४४११०४ ७१११७५ १०४।२६६ १०५।२६८ १०५।२६७ १७२४५ २५1५४ ६६।१६२ १०७७२७५ ५१।१२२ ६५।१५९ ६९/१६९ १९११५३३ ७३।१७९ १६२१४४० २३१।६२४ २५८६९९ २६५/७१२ १५८१४२४ ६०११४७ १७९/४९९ २३११६२५ २६११७०३ १७१/४७२ १९९/५५३ १९४५४१ . . ... . ... . ... ... ... . . . . त ... तज्जोगो सामण्ण तत्तो उवरि तत्तो एगार तत्तो कम्मइय तत्तो ताणुत्ताणं ... ... . .
रायचन्द्रजैनशालमालायाम् । गा.. १०८११३८ 10. गाथा. उस्सय सहा.. तेऊ तेऊ तेऊ तेऊ पढमे मुके तेजा सरीरजेट तेतीसवेंजणाई तेरसकोडी देसे तेरिच्छियलद्धि तेवि विसेसेण... तेसिं च समासे तो वासय अज्झय .. १५३४१३ 13 १।७३ २२६ २० २२.१६ . ध ६८०६७ ... थावरकायप्पहुदी थावरकायप्प यावरकायप्प थावरकायप्प थावरकायप्प थावरकायप्प थावरसस थोवा तिसु .. । ... पृ. गा. गावा. १९६१५४५, देवाणं अवहारा १९११५३४ देवहि सादिरया १८०-८०/देवहि सारिया १०१।२५, देवेहिं सादिरेगों १३३१३५० देसविर २३१६४१, देमावहिवर २६५/०१३ देसोहिमवर ८६।२१३, देसोहिमस १२२१३३७दमोहिस्मय १३१३५६ दोगुणगिद्धाणु दोण्ह पंचय २५३१९८४ दोत्तिगपभव २५३/५४५, २५३४३८६,धणुवांमददस. २५५/६९१'धम्मगुणनग्गणा २५६१६९३ चन्माधम्मादीणं २५८३६१७१ धुवअद्धवरूवे .. ७११७४ धुवकोमुंभय १०८।२८.धुवहारकम्म धुवहारस्स य ... १४३॥३७५ धूलिगमा १६५।४४९ २२८१६१९ / नीलकस्सस १३१४३४३ ८८२१९/पञ्चक्खाणुदयादो ५५।१३२/पञ्चक्खाणेव... २४०१६४७ पंचक्खतिरि... २४०।६४८ पंचतिहिचहु २४११६४९ पंचवि इदिय १७२।४७६ पंचरस पंच १०१२२/पंचसमिदो तिगुत्तो ८६२१४/पंचेव हॉति णाणा १५६०४२० पबत्तस्स य ... २१४१५७५/पज्जत्तसरीरस्स ६१११५० पचत्तमणुस्साण १६६४५६/पजत्तीपटवणं ... १३०३४१ पजत्ती पाणावि २६४१७०९ पलायक्खर २१५७ १५.12.1 ૨૨ १४५३८४ १४६१८ ११३१२२३ . द . ३. न दव्वं खेत्तं कालं दव्वं खेतं कालं दव्वं छक्कमकालिय दस चोदसह दसविहसच्चे ... १८८1५२८ .. प दस सग्णीणं ... . .. . . . ... दसणमोह दसणमोहुद दसणमोहुब दसणवयसामाइय दहिदुडमिव वा दिण्णच्छेदे दिण्णच्छेदेणवहिद दिवसो भिण्ण. दीवंति जदो. दुगतिगमवा हु... दुगवारपाहुडादो १४११० १३११३७५ ૨૮૧ १७२१४७५ ५४११२९ १७३१४७८ १७०१४७९ ११६३९९ ५०1१२० ५२।१२५ ६५/१५८ ५०१११९ २५९/७०० १२२१३१६ ... .. ... ... . ... दुविहपि अप ... . ...
गोम्मटसारः । पृ गा. ... ... ... ... ... ... ... ... ... ... ४२११०० १०६२७० १०६२७२ ९२।२२९ १३६१३६१ २६५८ ११४१२९५ २१९॥५९२ २१६१५८४ ३६१५४ ... ... .. ... ... - ... .. फ य ... ६७४१६५ ... ... ... .. . ... ... गाथा. पडिवादी दे-... पडिवादी पुण... पढमक्खो अत- पढम पमदपमा- पडमुवसमसहि- पणजुगले तस पण्णदाल पण- पणणउदिसया पण्णवणिज्जा पणिदरसभोय- पणुवीस जोय- पत्तेयबुद्धतित्थ- पमदादिचउ- पम्मस्स य सहाण पम्मुकस्ससमुदा परमणसिठियम परमाणुआदि परमाणुवग्गणादो परमाणूहि अणं- परमावहिवर परमावहिस्स परमावहिस्स परमोहिदव पल्लतियं उव- पल्लसमऊण पल्लासखघण-... पल्लासखेजव पल्लासखेज- पल्लासखेज पल्लासखेजा- पस्सदि ओही ... पहिया जे छप्पु- पुक्खरगहणे पुग्गलविवाद पुढविदगागणि पुढवी आऊ तेऊ पुढवी आऊ देऊ पुढवी जलं च पृ. गा. गाथा. १४२२३७४ पुण्णजहण्णं १६५४४६ परिसिच्छिसंढ ११३९/पुरुगुणभोगे १६॥३७ पुरुमहदुदारु ... ५९।१४४ पुवं जलथल... ३३१७६ पुवापुवफलय १३६१३६४ पुहपुहकसाय १३२।३४६ पोग्गलदवम्हि १२॥३३३ पोग्गलदव्वाणं ... ५६।१३७ पोतजरायुज- १५८४२५ १३३१६३० फासरसगंध १७३१४७९ १९७५४७ बधो समयप- १८६१५२० वहुवहुविहं च... १६४।४४७ बहुभागे समभागो १७४१४८४ वहुवत्तिजादि २१९।५९५बहुविहवहुप्प- ९६२४४ वादरआऊ १५५।४१८ वादरतेऊवाक १४८३३९२ वादरपुण्णायेऊ १५४१४१३/वादरवादर १५४१४१५/वादरसुहमे ९९२५१/वादरमुहमा १५३१४१०वादरसुहम १६८१४६२/वादरसजल-... ८४१२०८ वादरसजलणु १७३३४८० वाबीस सत्त २४४१६५८ वारुत्तरसय १०२।२५९ / वाहिरपाणेहि १४८१३९५ १८२१५०६ वितिचपमाण १२११३१२ विदियुवसम ४॥२१५/ विहिं तिर्हि चदुर्हि ५१११२४ बीजे जोणीभूदे ७४/१८१ ८०1१९९/भत्तं देवी चंदप्पह २२२१६०१/भरहम्मि अद्ध ... ... ... ... ... ... ... .. ... ... .. २३८६४४ ११९४३०९ ७२/१७८ १२०१३१० १७५५४८५ १७८४९६ १३३२३२ १०१।२५५ २२२१६०२ ३२।७२ ७२।१७६ ७४/१८२ १६९४६५ १६९।४६६ ४७१११३ १३२।३४९ ५३११२८ ४०1९६ ७२।१७७ २७११७२९ ७९.१९७ ७६।१८९ ... ... ... ... ... ... -- ... ... - वितिचप पुण्ण ... .. ... ... ... ... ... ... .. ८९.२२२ १५१४०५ ... . गो० ३६ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । ८ पृ. गा. - ... गाथा. भवणतियाण भवपञ्चइगो भवपञ्चइगो भव्वत्तणस्स जोग्गा भव्वासम्मत्तावि भविया सिद्धी... भावाणं सामण्ण भावादो छल्लेस्सा भासमणवग्ग- भिण्णसमयक्ति... भूआउट भूआउतेउवाक २३०१६२२ २३०१६२३ ६112 २५८१६९० २५१६८० ७१५ ५४९ २५६१६९ ११६१३०१ २६१७१७ २४५११६१ ७५।१८५ २४७१६६७ ७६।१८७ - .. भोगा पुण्णग म य १३६३६३ र पृ. गा. गाथा. १५६१४२० मिच्छाइट्ठी जीवो १४११३७० मिच्छाइटी पावा १४२३७२ मिच्छा सावय २०२१५५७ मिच्छे सलु २६९।७२५/ मिच्छे चोइस २०१५५६ मिच्छे सासण... १७४१४८२ मिच्छोदयेण २००१५५४ मिच्छो सासण २२४१६०७ मिच्छो सासण २४१५२/ मिस्सुदये सम्मिस्सं ३२१७३ मिस्से पुण्णालाओ २६८१७२० मीमासदि जो पुव्व १९०१५३० मूलग्गपोरवीजा मूलसरीरमर्छ- २६०१७०२ मूले कदे छल्ली १८७१५२१ २५११६७८ याजकनामेनानन १६७४४५८ १३४१३५४ रुऊणवरे अवरु ६०११४८ रुयुत्तरेण तत्तो १४६।३८५/रुसइ जिंदा १६५।४५१ १६२१४३८ लद्धिअपुण्णं १६४१४४४ लिंपइ अप्पीकीरइ २७११७२०लेस्साणं खु ८४१२१६ लेस्साणुकस्सा- ११२२६/लोगस्सअसखे- ९१।२२७/ लोगागासपदेसा २६६१७१४ लोगागासपदेसे ६४१६४ लोगागासय २४९।६७३/लोगाणमसं- १८३१५०९ लोगाणमस- १८३३५१३ १९५५४३ वग्गणरासि ८१२०० वण्णोदयेण ४.६/वण्णोदयसपा- ८1१७ वत्तणहेदू कालो ९.१८/वत्तावत्तपमादे ४४११०७ ४५/११० १८३३५११ मरगणउयजोगा मज्झिमअसेण मज्झिमचर मज्झिमदव्वं खेत्तं मज्झिमपदक्खर- मण्णंति जदो... मणदव्ववग्गणा मणदब्ववग्गणा मणपज्जवच मणपज्जवं च मणपज्जवपरिहारो मणवयणाण मणवयणाणं मणसहियाणं मणुसिणिपमत्त मदिआवरण मदिसुदओही मंदो बुद्धिविहीणो मरणं पत्थेइ मरदिअसखेन- मसुरंखुर्विदु मायालोहे मिच्छत्तं वेदंतो मिच्छाइही जीवो ल - ५२।१२६ ૧૭૬૪૮૮ १८५६५१७ १८११५०४ २१६।५८३ २१७७५८६ । २१८१५८८ २१८१५९० १२२।३१५ १७१४४९८ .. ... . ... ... ... व १४॥३९१ १७४४९३ १९२१५३५ २१०१५६५ १५।३३ MAR गोम्मटसारः। . ... ... ... ... ... ... ... . पृ. गा. १५९।४२९ ८९४२२३ १५/३५ १५०४०२ ३५1८१ २४४०६५७ ૨૨ १५१।४०६ २१७५८५ २२०१५९७ ३४१७७ १८.४१ ८३१२०६ १६०१४३३ २३७१६४० १७०1४६९ १४॥३२ ... ... - ... . . ... .. ... ... ... . ... ... गाथा. वत्तीस अडदा- वत्युणिमित्तं वत्युस्स पदे-... वदसमिदिकसा- वयणेहि वि वरकाओदंस ववहारो पुण का- ववहारो पुण ति- ववहारो पुण ववहारो य विय- वादरसुहमे वापणनरनो वासपुधत्ते सइया विउलमदीवि विकहा तहा विग्गहगदिमा- विदावलिलोगाण विदियुवसम विवरीयमोहि विविहगुण विसजतकूड विसयाण विस- वीरमुहकमल. वीरियजुदमदि वीस वीस पाहुड वेगुव्वं पजत्ते... वेगुन्विय आहारो वेगुग्विय उत्तत्य वेगुब्वियवरस- बैंजणअत्थ वेणुवमूलोर- वेदस्सुदीरणाए वेदादाहारोत्ति- वेयणकसाय वेसदछप्पण्णं- . ... - .. पृ गा गाथा. २३२।६२७/सकीसाणा पढम २४८१६७१/सको जम्बूदीव १२०१३११ सखा तह पत्यारो १६९।४६४ सखातीदा सम २४०१६४६ सखावत्तय जोणी १८८१५२५/सखावलिहिद २१४१५७६ सखेओ ओघो २१४१५७७ सखेजपमे वासे २१८५८९/सखेजासखेजा २१२१५७१/सखेजासखे- २६३७१८/सगजुगलम्हि १३५३३५९ सगमाणेहिं विभत्ते २४४१६५६ सगसगअसंख... १६२।४३९/सगसगखेत्त १५॥३४ सगसगअवहा २४६।६६५/संगहिय सयल ८४२०९/संजलणणोकसा- २५७१६९५/सजलणणोकसा- ११७३०४ सहाणसमुग्धा- ९३३२३१ संठाविदूण रूवं ११॥३०२/सण्णाणतिगं ११९/३०७/सण्णाणरासि २७०।७२७ सण्णिस्स वार ५४११३०सण्णी मोघे मिच्छे १३०/३४२/सण्णी सण्णिप्प २५२१६८१ सत्तण्ह उवसमदो ९६।२४१ सत्तण्हं पुढवीणं ९३३२३३/ सत्तदिणा छम्मासा १०१।२५६/सत्तमरिवदिम्मि ११८१३०६ सत्तादी अढ़ता ११०।२८५/सदसिवसंखो १०६।२७१ संपुण्ण तु समग्ग २६८१७२३ सद्दहणासदहण २४७१६६६ सम्भावमणो सच्चो ... १९४१५४० समो हु वध्मा- सम्मत्तदेसघादि १८११५०५ सम्मत्तदेस स- १८०५०३ सम्मत्तमिच्छपरि- . . - ... . ... .. ... . . ... २०४५ १९४१५४२ १८१४२ २५३१६८७ १६८१४६३ ६८।१६८ २६७५७१९ २५८।६९६ १२।२६ २६५।७११ ५८११४३ १५७७४२३ २३३।६३२ ३०६९ १६४५९ ૨૪ર૬૬૪ ८८१२१७ २१४१५७८ १२।२५ १०९।२८२ ११।२४ ... .. ... ... .. ... ... ... . ... ... स संकमणे छठाणा संक्रमण सहाण ...
रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् । १० यू गा. गाथा. - .. .. .. ... ... १९६३५४४ ११४।२९४ १३२८ १४०।३६८ ३९/९४ ७०1१७२ १२३३३१९ १२३३३२० १२३१३२१ १४३।३७७ १०९।२८१ ८४१२०७ ४२११०१ ४१९९७ २५४१६८९ ६४/१५६ .२२११५९९ ११३३२९२ ११०१२८४ १८६१५१८ २३११६२६ १०४।२६५ १११२३ २३५५६३५ २३५।६३६ १६१४३४ १२८१३३५ 4 सम्मत्तरयण सम्मत्तुप्पत्तीए समयत्तयसंखा सम्माइटी जीवो सम्मामिच्छुदये सव्वंगअगसंभव सव्वं च लोयणालिं सव्वमरूवी सव्वसमासे सव्वसमासो सव्वसुराणं ओघे सव्वावहिस्स एक सन्वेपि पुचभंगा सम्वेसिं सुहमाणं सम्वोहित्ति य क- ससारी पंचक्खा सागारो उबजोगो सातरणिरतरेण सामण्णजीव सामण्णा गेरड्या सामण्णा पंचिंदी सामण्णेण य एवं सामण्णेण तिपंती सामण्ण पज्जत्त सामाइयचउ ... साहरणवादरेसु साहारणोदयेण साहारणमाहारो साहियसहस्समेकं सिक्खाकिरियु- सिद्धसुद्ध सिद्धाणंतिम सिद्धाणं सिद्धगई सिलपुढवि सिलसेलवेणु सीदी सही तालं सीस सपत्तो ... पृ. गा गाथा. ९.२० सुकस्स समुग्धा- २९१६६ सुण्हं दुगइगि १०३।२६४ सुत्तादो तं सम्म १३।२७ सुदकेवलं चणाण १०।२१ सुहमणिगोद १६३६४४१ सुहमणिगोद १५९।४३१ सुहमणिगोद २१८१५९१ सुहमणिगोद ११४।२९६ सुहमणिगोद १२६१३२९/सुहमणिगोद २६७७१६ सुदुक्खसुबहु १५४४१४ सुहमेसु संख ... १५।३६ सुहमेदरगुण १७८१४९७ मुहमणिचाते १५७४२२ सुहमो सुहम ६३।१५४ सेढी सूई अगुल १७ सेढी सूई पल्ला- २१९१५९४ सेलगकिण्हे ३३१७५/सेलहिक ६२११५२ सेसहारसअसा. ११११४९ / सोलसयं चउ... ३१८८ सोवकमाणुवकम ३४१७८ सो सजमं ण गि- २६४१७०८ सोहम्मसाण १४०६३६६ सोहम्मादासा- ८५।२१० सोहम्मीसाणा... ७७११९० सोलससय ७७॥१९१ ४०१९५/हिदि होदि हु २४५।६६० हेठिमउकस्सं ... . . ह ... १६३।४४२ ... २२११६०० ११ हेठा जेसि ४७१११२ . ... २२०५९६ हेछिमछप्पुढवीणं २७२।७३० हेहिमछप्पुढवीणं ११०।२८३ ११२।२९० होति अणियहिणो ५१११२३/होति खवा इगि २९६५/होदि अणंतिम . ... ५३११२७ ६३११५३ २६१५७ २३३३६२९ ૧૪૬૨૮૮ .