Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Padma Puran Khand-i

Sharma,pt.shriram · 2012/08

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भूमिका 'गली है । गामाया गर्ग ( गृष्टि प्रम), प्रतिगर्ग }, गनगर और ऋषि-राजपा तथा राजाओ या इतिहाग--ये प पुगगी याना गया है । पर गय पुराणो मे ना गमान रूप नया गया।सा दोगा पुराणों में ही, जिनमें मुन्य परो 'या नाम जागा, पायो विषय यथोनित म्प से "प गये हैं । अग गगी मे गे युधा उद्देश्य नो पिगी विगेप देवता iगार यो प्रधानता प्रतिपादन रग्ना होता है, जैसे गिन-पुराण' पज गुराण' "प्रश वैषतं' 'दथी भागवत' "तिया-गाग' 'आदि-पुराण' पादि । पुष पुगणो मे तोयं और प्रतो या वर्णन से मुग्य रूप से दिया गया है में मन्द पुराग, मत्स्य-गुरागण आदि । घुछ पुराणों का उद्देश्य विविध प्रभार विद्याओ, यताओ. विभिन्न विषयों की जानयारी या परिचय देना भी ।एर लेराप गे इन नामारण 'विश्वकोपात्मा पुराण' दिया है । अग्नि- रारा, गरद-पुगग, पद-पुराण पी इनमे गिनती की जा सकती है । एक अंगी उन पुराणों की भी प्रथा मानी जा सवनी है जिनका उद्देश्य कुछ वशेष उपार यानी मा वर्णन करना ही होता है। जैसे 'माण्डेय पुराण' में हरिश्चन्द्र' और 'मदातमा' वा उपारयान विस्तारपूर्वक दिया गया और अन्तिम रश में यई राजाओ की कथाएँ और देवी वा उपास्यान ही विशेष रूप से दिये गये हैं। पुराणो ये आरभिक दो-तीन विषयो या वही सूक्ष्म रूप मे उल्लेख कर दिया गया है। 'पद्म-पुराण' को भी हम इसी श्रेणी वा मानते हैं। यद्यपि यह एवं विशाल पुराण है और समग्र पुराण- साहित्य में श्लोक संख्या की दृष्टि से इमका दर्जा दूसरा है। केवल 'स्वन्द पुराण' ही, जिसकी श्लोक संख्या ८१ हजार है, इससे बड़ा है । इसलिये इसमे सभी विपया का वर्णन तो स्थान-स्थ न - [ ४ ] पर आ गया है, पर प्रधानता उपारयानो तथा क्यानको को ही है । पर उपाख्यान केवल तीर्थ और व्रत सम्बन्धी ही नहीं है वरन् पौराणिक पुरुषो राजाओ आदि की तथा अन्य प्रकार की भी ऐसी-ऐसी कथायें इसमे पई जाती हैं जो अन्य पुराणों से बहुत भिन्न या नये रूप में परिणत की गई हैं। इसलिये पाठका का कौतुहल का भाव बहुत बढ जाता है। जो लोग सभी पौराणिक वर्णनो को यथातथ्य समझते है ये इस चक्कर में पड़ जाते हैं कि दोनो वानी मे से सही कौन सा है ? उदाहरण के लिए हिरनाकुश और प्रह्लाद की कथा को ही देखिये । सामान्यत यह प्रसिद्ध है कि राम नाम लेने के कारण हिरनायुश ने अपने पुत्र प्रह्लाद को मारने के लिए बडे-बडे अत्याचार किये, पर हर सूट में उसकी सहायता करने गये और अन्त में उन्होंने खम्भ मे से प्रय होकर हिरनापुश मा पेट फाड डाला । पर पद्म-दुगरण तथा दो-एक पुराणो । यह वर्णन है वि जब देवतामा ने जाकर भगवान् विष्णु से हिरनाकुश के अन्या अत्याचरो की शिकायत की तो वे नरसिंह रूप धारण करके हिरनाकुश वेद वार मे चले आये। प्रह्लाद उस समय उनको द्वार पर खडा हुआ मिला जिमने इस अभिनव प को देखकर आश्चर्य भी प्रकट किया। वे सीधे भीतर चले गये और हिरनायुश को मार दिया। इसी प्रकार की भिनता और भी अनेक क्या में हैं जिनका वर्णन अन्यत्र दिया गया है। इस प्रकार उपास्यानो की पहराता और विविधता पम-पुराण' की एक वटी विशेषता है, जिनमें से अनेक बडे विस्तार के साथ लिसे गपे हैं । इसमें । सन्देह नहीं कि इस कारण उनकी रोचकता बढ़ गई है और पाठको यो नदीनता या भी अनुभव होता है । 'नन्दानु-व्यान-बया' 'इन्याकु र युद्ध "गणेश द्वारा पुरि वध' 'वैन का जैन-ग्रहण' 'विद्य माली और शत्रुघ्न का सग्राम' 'अर्जुन और नारद का स्त्री वन जाना' शनिवार पर महाराज दशरथ की चढ़ाई' आदि शमी वयाएँ ऐमी हैं जो इमये सिवाम और ही नहीं मिलती। इस माम्प्रदायिर वर्णन भी यहुत बुद्ध भिरता रसने वाले हैं । 'पय पुराण'मायती विभाजित है--टिपण्ड, भूमिगण्ड, स्वर्ग- पर, सगष्ट, पातालगाष्ट्र, उत्तरगड, विसायोगमागर राण्ड पर भारद- - . - [ ५ ] पुराण' में 'पद्म-पुराण' की जो विषय-सूची दी गई है उसमे पाँच ही खण्ड वन- लाये गये है । 'ब्रह्मखण्ड' और 'क्रियायोगसार' का उसमे उल्लेख नहीं है । उसका अनुसरण करके भारतीय धार्मिक साहित्य का निवेनन करने वाले कई आधुनिक अन्यों में पांच ही खण्ड बतलाये है, जब पाठको को हमारे इस सस्करण में सतो. खण्ड मिलेंगे। यह एक प्रसिद्ध वैष्णव-गर,रण है, और इसके मतानुसार विष्णु की उपामना का प्रतिपादन करने वाले पुराण ही सात्त्विक' हैं जिनमे विष्णु', 'नारद', 'भागवत', 'गरण', 'वराह' और 'पा' की गिनती की गई है । 'ब्रह्माण्ड','ब्रह्म- वैवर्त', 'मार्कण्डेय', 'गविष्य' तथा 'ब.मन पुरण' 'राजग' श्रेणी में रसे गये हैं । 'शिव' लिंग' 'पूर्म' 'मत्स्य' 'स्कन्द' और 'अग्नि-पुरण' को शिव की प्रधा- नता प्रतिपादन करने को कारण 'तामस' घटेगी में रखा है। पर पय-पुराण' के उपाख्यानो मे शिवजी का वर्णन उत्कृष्ट रूप में ही दिया गया है, यद्यपि शेष- पुराणो की तरह उनको त्रिदेव में सर्वोच्च नहीं माना गया है ! 'नन्दाधेनु-उपाख्यान' में सत्य की महिमा- प्रभजन नामक राजा को मृगपा का बहुत अधिक व्यसा था । एक दिन उसने बच्चे को दूध पिलाती हुई हिरनी को वारण गे मार दिया। अपने छोटे बच्चे के मोह से हिरनी को इस प्रकार मरते हुए यदा म नसिक सन्ताप हुमा और उसने राजा को सिंह वनकार बन के जीवो को साते रहने का माप दे इला । जब अपना उपराध स्वीकार करके राजा ने बहुन क्षमा प्रार्थना की तो हिरनी ने कहा कि "सौ वर्ष के पश्चात् नन्दनु यहाँ आयेगी उमी के द्वारा तुम फिर मनुष्य योनि को प्राप्त हो जाओगे।" सो वर्ष तक वह राजा येवल गल जीवो को सापर अपना गिरा जीवन व्यतीत करता रस। तब उस जाल में समीर युद्ध पानी ने जानी बनाया गायों को लेकर पडाव डाला और उन्ही में गे गन्दा' नाम की गाय में भटक जाने से उग आन के पास पहुंच गई। जप व्याघ्र गे मारा गागाने को प्रस्तुत हुआ तो नन्ना ने उगगे प्रायंगा या रियर में सुपर को एट्टी दे, जिनमे यर पयाय मे जाकर अपने छोटे यणे यो देश भाव और चन - . उसे पालन-पोपण वे लिए अपनी सखियो-अन्य गायो के सिपुर्द व र आवे । सिंहने वहा कि इस बात का क्या भरोसा कि तू वहाँ जाकर फिर वापस आ जायगी। इस पर गाय ने बहुत प्रकार की शपथ खाते हुए कहा--- "अगर मैं अपने वचन की रक्षार्थ फिर वापस न आऊँ तो मुझे वही पाप हो जो पवित्र ब्राह्मण और माता-पिता का वध करने से होता है । जो पाप महालोगी, म्लेच्छ और दिप देने वालो को लगता है वही मुझे लगे अगर में फिर वापिस न आऊँ। जो एकबार क्रिमी कन्या का दान करके फिर स्वार्थ- वग उसे किमी दूसरे को देने को इच्छा करता है, उसे जो पाप होता है मैं भी उमी की भागी होऊँ। जो निर्वल बैलो से बलपूर्वक परिश्रम कराता है और पुण्य-कथा मे बाधा डालता है उन्ही का पाप मुझे भी लगे जो मैं प्रतिज्ञा या पालन न करूं।" जव व्याघ्र से छुट्टी पाकर नन्दानु अपने 'गोकुल' मे आई और उसने यह दुराद सम्वाद अपनी सखियो को सुनाया तो वे सब शोकमग्न हो गई और नन्दा को सलाह देने रगी कि जब वह व्याघ्र मे किसी प्रकार छुटकारा पाकर घर आ गई तो अब फिर उसके पास जाना अनावश्यक है। इसमे भूठ बोलने का दोप लग सकता है, पर शास्त्रो ने भी यह सम्मति दी है कि जब प्राण-रक्षा की समस्या उत्पन्न हो जाय तो असत्य-भापण क्षम्प होता है । इसलिए अब तुम अपने छोटे बच्चे के पालन-पोपण के निमित्त 'गोकुल' मे ही ठहरी रहो । यहाँ वह दुष्ट व्याघ्र तुम्हारा किसी प्रकार अहित नहीं कर सकेगा ? पर नन्दाधेनु को श्रद्धा 'सत्य' मे मुदृढ थी। वह इस प्रकार के तर्को से प्रभावित नहीं हुई और उसने अपनी सखियो के प्रेम के प्रति कृतज्ञता का भाव प्रकट करते हुए कहा-"यदि किसी अन्य प्राणी को प्रारस रक्षा का प्रश्न होता तो मैं असत्य भापण को क्षम्य मान सकती थी, पर अपने निजी जीवन को बचाने के लिए मैं सत्य का त्याग कभी नहीं कर सकती, क्योंकि प्रत्येक प्राणी को अपने शुभ-अशुभ यमा का प्रापिल जन्म जन्मान्तर में स्वयम् हा भागना पड़ता है। उमने सत्य की महिमा का बखान करते हुये कहा- "ये समस्त लोक 'सत्य' में ही प्रतिष्ठित हैं और धर्म का आधार भी [ ७ ] । सत्य ही है । यह विशाल सागर अपने सत्य-व क्यों के कारण ही मर्यादा का उलंघन नहीं करता । जब भगवान् विष्णु वामन का रूप धारण करके असुरो के सम्राट बलि को छलने आये तो उसने केवल अपनी सत्य-प्रतिज्ञा की रक्षा के लिये समस्त वैभव सहित तीनों लोको का राज्य त्याग दिया, पर वह असत्य व्यवहार करने के लिये तैयार न हुआ विन्ध्याचल अपनी संकडो चोटियो को ऊँचा करके आकाश को छूने लगा था, फिर अगस्त्य ऋपि से प्रतिज्ञा कर लेने पर वह नीचे पडा ही रह गया । ये स्वर्ग अपवर्ग और नरक सभी सत्य-वचन से ही तो स्थित हैं । जिसने अपने कहे हुये वचनों का लोपकर दिया उसने मानो सभी कुछ लोप कर दिया । जो अपने आपको 'अन्यथा' बना लेता है वह 'अन्यथा' को ही प्राप्त हुआ करता है।" नन्मा अपनी प्रतिज्ञानुसार यथा समय यात्र के समीप पहुंच गई । इस 'सत्य से प्रभावित होकर उस हिंसक जन्तु ने उसको अभयद न ही नहीं दिया वरन् सदा के लिये किसी प्राणी का अनिष्ट न करने का निश्चय कर पिया। एक प्राणी के सत्यव्रत-पालन ने न जाने कितने अन्य लोगो को सत्य-रक्षा की प्रेरणा दी और उसकी परम्परा को आगे बढाया । राजा बलि का सत्य-पालन- वामन भगवान् और राजा बलि की कथा भी सत्स-प्रतिज्ञा के पालन का एक उत्कृष्ट उपाख्यान है । यद्यपि परिस्थितियो की विषमता के कारण वलि का सत्यरक्षा के लिये किया गया ग्रिलोकी का 'महादान' राजा हरिश्चन्द्र के अयोध्या के राज्यदान के समान विशेष प्रतिद्धन हो सका, फिर भी पौराणिक लेखको ने उसको कम महत्व नहीं दिया है । हरिश्चन्द्र का उपास्यान केवल 'मार्कण्डेय पुराण' मे हो विस्तारपूर्वक दिया गया है, अन्यत्र केवल उसके नाम का उल्लेख ही मिलता है या कही कही अत्यन्त सक्षिप्त चर्चा देखने में आती है । पर वरि-वामन का उपम्यान 'दशावतार' का एक मुख्य अंश है और प्रत्येक पुराण मे उपका न्यूनाधिक वर्णन अनिवार्य रूप से दिया गया है । 'पद-पुराण' के अनुमार इन्द्र स्वयं ही वामन भगवान् को साथ लेकर वलि के पास पहुंचा और उससे कहा कि इस ब्राह्मण ने मुभमे तीन पैड़ भूमि - की याचना की है। पर इस समय मेरे पास तो कुछ भी शेप नहीं है क्योकि मेरा समस्त राज्य आप अपनी शक्ति द्वारा विजित कर चुके हैं । इसलिये अगर आप मेरी तरफ से इसे तीन पैड भूमि दे सकें तो वटी कृपा होगी। राजा बति ने इसे एक बहुत छोटी याचना मानकर तुरन्त स्वीकार कर लिया और तीन पैर भूमि देने की स्वीकृति देदी । जव उसके गुरु शुक्राचार्य को इस बात का पता चला तो उसने बहुत कुछ समझाया कि ये इन्द्र और वामन के रूप में विष्णु तुमको छलने के लिये आये है और ये तुम्हारा सर्वस्व अपहरण करलेंगे। पर वलि ने यही उत्तर दिया कि "जब इतने बड़े लोग याचक बना र मेरे सामो आये और मैंने भी उनको भूमिदान का वचन दे दिया, तो अब मैं उससे पीछे नहीं हट सकता। उसने शुक्राचार्य की चेतावनी वा उत्तर देते हुये कहा- "गुरुजी । मैंन धर्मोपार्जन की दृष्टि से इसको दान देने की प्रतिज्ञा कर दी है। जो प्रतिज्ञा की जाय उसका पालन करना मत्पुरुपो का सनातन धर्म है । यदि यह वागन वास्तव म विष्णु ही है, तो भी मैं अपनी प्रतिज्ञा पर बढ रहूँगा, क्योकि यह तो मेरे लिए और भी अधिक गौरव का विषय है कि साक्षात् भग- वान मेरे यहां याचक होकर आये ।" बलि और वामन की कथा मे समाज-कल्याण का एक बड़ा तय्य निहित है। समाज के सब सदस्यो को पारसरिक धवहार मे सत्र का पालन करना अनिवार्य है । यद्यपि सासारिक कारणो से विभिन लोगो मे मतभेद, विवाद, क्लह का होना आश्चर्यजनक नहीं है, पर इन कारणो से सत्य वा त्याग-- घोखाघडी और झूठ का व्यवहार न तो उचित कहा जा रकता है और न उससे पिसी का स्थायी हित सघन हो सकता है । बेईमानी या छल कपट के व्यवहार से मनुष्य चाहे थोडी देर लिए सपलता प्राप्त कर ले-थोडा-बहुत धन कमा सके, पर अन्तिम परिणाम पतन और नाग ही होता है। सत्य का पालनवर्ता चाहे विपत्तिग्रस्त हो जाय--उमे आर्थिव हानि उठानी पडे, पर अन्त मे उसकी विजय ही होती है । गजा ति को यद्यपि अपने राज्य से हाथ धोना पडा, पर पुगग्ग ये मतानुगार उमने भगव न वो पूर्णतया अपना अनुगत बना लिया और पातान में आज भी ये वति दे द्वार पर ही स्थित रहते हैं।

[६] तुलाधार का सत्य व्रत- तुलाधार का चरित्र पौराणिक साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है और अनेक स्थानो पर उसका वर्णन मिलता है । सम्भवत. वह एक पूर्ण काल्पनिक क्था है, जिसका उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने नियमित सासारिक कर्तव्य का पालन करते रहने और उसी को सर्वश्रेष्ठ धर्म मानने की शिक्षा देना है कहा गया है कि नरोत्तम नाम वाला एप तपस्वी वाहाण युवावस्था में ही अपने घर और मात -पिता को छोड़कर जङ्गल मे कठिन तपस्या करने लगा। पुछ समय पश्चात् उसे विशेष शक्ति प्राप्त हो गई । एक दिन पैड के ऊपर बंटी हुई एक चिड़िया की वीट उसके ऊपर गिर गई । उसने कोर करके जो ऊपर वी तरफ देखा तो वह चिडिया मरकर नीने गिर गई । इग घटना से उस नरोत्तम ग्राहाण के हृदय में अहवार की भावना उतन्न हो गई और उसी धुन मे वह समीप के एक गांव में जा पहुंचा। वहाँ जाकर उसने एक गृहस्थी के द्वार पर भिक्षा के लिए आवाज लगाई । घर में रहने वाली स्त्री उस समय अपने पति की सेवा में लगी हुई थी, इसलिये भिक्षा लेकर आने मे उसे कुछ देर लग गई । जव तपस्वी उसकी तरफ क्रोषयुक्त हरि से देखने लगा, तो स्त्री ने कहा-"महाराज ! मैं चिडिया नहीं हूं जो भस्म हो जाऊँगी।" यह सुनकर तपस्वी को बडा आश्चर्य हुआ कि उस एकान्त स्थान में होने वाली घटना का पता इम स्त्री को कैसे रग गया ? पूछने पर स्त्री ने बतलाया कि मैं पति-सेवा को सबसे बडा धर्म मगझती हूँ और उसी को पूरी निष्ठा के साथ पालन करती है। उती का प्रभाव है कि मुझे जङ्गलपी घटना का पता लग गया। जब नरोत्तम ने उमसे धर्म-तत्व के सम्बन्ध में कुछ अधिक जानने की जिज्ञामा यी तो स्त्री ने उमे काशी नगरी मे तुलाधार वंश के पान जाने की सम्मति दी। काशी मे जब उमने तुलाधार का पता लगाया तो देगा कि वह एक गामान्य दुपानदार है और अधिवाग समय उसी कार्य में व्यस्त रहता है। तपस्सी को देखते ही तुनापार ने कहा कि "पा आपयो अमुक ग्राम कोत्री ने धर्म-नर्चा करने को यहाँ भेना है ?" उमरी इन गातारी शक्ति को देवार तपस्वी और अधिक नक्ति हुआ और ऐमी गति गि प्रार प्राप्त होगी - [ १० ॥ यह प्रश्न क्यिा । तुलाधार ने बतलाया कि वह किसी प्रकार का साधन या तप नही जानता, वेचल अपनी दुकान का कार्य पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ करता रहता है । वह सब ग्राहको से ठीक दाम लेकर उत्तम चीज देता है और तोलने मे पूरी सचाई का ध्यान रखता है। उसने जन्म भर कभी कम तोलने का विचार नहीं किया और इसी सत्य व्यवहार के प्रभाव से उसे दूरवर्ती और अज्ञात विषयो को जानने की शक्ति प्रप्त हो गई है। आगे चलकर इम उपारयान में और भी कई प्रमग धर्म-तत्त्व के सम्बन्ध मे वर्णन किये गये हैं और यह निष्कर्ष निकाला है कि धर्म और पुण्य ऐसी वस्तु नहीं हैं जिनके लिए मनुष्य को घरवार और अपने सासारिक कर्तव्यो का त्याग करके एकल स्थ नो मे भजन साधन वरना आवश्यक हो। इसके विपरीत प्रत्येक साधारण मनुष्य इन पांच कर्तव्यों का पालन करके ही सर्वोच्च गति और आध्या- त्मिक शक्ति को प्राप्त कर सकता है-(१) अपने माता पिता की परम भक्ति- भाव से सेवा । (.) अपने पति की अर्चना। (३) समस्त प्रणियो के साथ मआत्मीयता का प्रेम युक्त व्यवहार करना । (४) मित्रो के साथ कभी द्रोह, छल- वरट न करना । (५) भगव न के चरणो में अनन्य निष्काम भक्ति रखना । जो व्यक्ति जैमी सासारिक स्थिति मे हो वह तदनुसार इनम से विमी एक कर्तव्य का पालन करके ही कृतकृत्य हो मरता है और उस सद्गति को प्राप्त कर सकस है जो वर्षों तक जङ्गल मे तपस्या करने वालो को भी प्राप्त नहीं होती। क्याकार का आशय यही है कि जिस प्रकार अनेक अनुभवहीन व्यक्तियो का विनार हो जाया करता है कि धर्म-साधन तथा स्वर्ग मोक्ष आदि श्रेष्ठ गति की प्रनि के लिये वठिन तपस्या, योग-म घन या बडे यज्ञ यागादि वरना अनि- वाय है और यह मोचकर वे अपने मासारिक कर्तव्यो की अवहेलना करके 'त्यागी. तपस्वी' बनने के उद्देश्य से गृह त्यागी हो जाते हैं, तो यह रास्ता बिल्कुल गलत है । पर जो मनुष्य अपने सामान्य उत्तरदायित्वो का अच्छी तरह पालन नहीं कर मक्ता, वग्न् उनमे भागकर एकात मेवन हरा 'धर्म' को प्राम करना चाहता है, उमे अकर्मण्य और भ्रमग्रस्त ही ममभना चह्मि । अगर मनुष्य अपने सार। रिस जीवन को ही पूर्ण सत्य व्यवहार द रा आदर्श बना मवे तो उमे महन हो [ ११ ] वास्तविक धर्म की प्राप्ति हो सकती है ! सत्य की महिमा इतनी अधिक है कि वह पारस-मणि की तरह लोहे को सोना बना सकता है । इस सम्बन्ध मे उपा. स्यान में कहा गया है- सत्य भावना और लोग का त्याग करके तथा किसी प्राणी के प्रति मत्सरता रहित होकर जो व्यवहार और उपकार किया जाता है उसका फल इतना अधिक होता है, मानो सौ यज्ञ पूरे कर लिये । सत्य के प्रभाव से ही सूर्य उदित होता है, वायु पलता है, समुद्र मर्यादा मे रहता है और धर्म भगवान् पृथ्वी को अपी पीठ पर धारण करते हैं । सत्य की शक्ति से ही सब रोक और पर्वन अपने स्थान पर स्थित रहते है । जो सत्य से भ्रष्ट हो जाता है उसका निश्चित रूप से अध.पतन हो जाता है । जो पुरुप सदैव सत्य वचन मे प्रीति रखने वाला है, किसी दशा मे मिथ्या वचन नहीं बोलता न कभी कोई असत् कार्य करता है, वह इस जन्म मे स्वर्ग जाकर अच्युतता को प्राप्त पर लेता है । सत्य के प्रभाव से ही ऋषि-मुनि भगवान् का सानिध्य प्राप्त करते है । सत्य का पालन करने से ही युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग मे जा सके, राजा बलि भगवान् को स्ववश कर सका और राजा हरिश्चन्द्र अपने समस्त प्रजा-जनी के साथ मत्यलोक में जाकर विराजमान हुआ । इसी सत्य भाषरण के प्रभाव तुलाधार भी बडे-बडे त्यागी तपस्वियो से अधिक उच्च स्थिति को प्राप्त हो सका । जिस समय सत्य को तराजू पर रखकर तोला गया तो वह सहस्र अश्व- मेध यशो से भी अधिक भारी और गौरवशाली सिद्ध हुआ। सत्य-पालन मे ऐसी अद्भुत शक्ति है कि उससे सभी कृछ साध्य हो जाया करता है। जो लोग सत्य का पालन करते है वे सदा उमके द्वारा सुरक्षित रहते हैं, पर मिथ्या का पाचरण नष्ट कर देने वाला होता है। जो लोग तोलने-नापने मे, सस्ता या महगा मूल्य बतलाने मे, न्यायालय के सम्मुप साक्षी देने में सदैव मत्स्-पालन का धान रखते हैं, वे उसी के बल से अक्षय स्वर्ग के अधिकारी बन जाते हैं।" इस प्रकार के कितने ही उपास्यानो द्वारा पुराणकार ने सत्य की महिमा प्रतिपादित की है और उसे अन्य समस्त कर्मकाण्ड और धार्मिक अनुष्टानी से बढकर बलाया है । यह ऐसा धर्म है जिसके पालन करने में किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं रहती। सर्वशा अकिञ्चन ( निधन ) यक्ति भी इमना पालन [ १२ ] कर सकता है । वास्तव में यह आत्मा का धर्म है और जो लाभ बहुत धन से • सम्पन्न होने वाले यज्ञ-याग,दि से नहीं हो सकता वह इसके द्वारा उपलब्ध हो जाता है । तुलाधार के प्रकरण मे ही कयाकार ने एक ऐरो शूद्र का उदा- हरण दिया है जो खेती से अन्न के दाने वी कर पेट भरता था और जिसके पास दो फटे-पुराने कपडो के सिवाय और कुछ पहिनने को भी न था। भगवान ने उसकी परीक्षा के लिये दो उत्तम वस्य मार्ग में गिरा दिये, पर वह उनको किसी अन्य का समझकर अपने रास्ते चला गया । फिर उन्होने उसके सम्मुग्व ऐसे गूलर दिखेर दिये जिनमे सो भरा था, पर उसने इस प्रकार के धन को हराम का मात समझकर हाय नहीं लगाया । भगवाई ने संन्यासी का रूप धारण करके उसे वह स्वर्ग लेने के लिये बहुत समझाया पर वह यही बहता रहा कि मुने परिश्रम से जो दाने मिल जाते है वे ही मेरे लिये अमृत स्वरूप हैं । अन्त मे वह अपने सत्यव्रत के प्रभाव से बडे-बडे पि-मुनियो के लिये दुर्लभ 'सत्यलो' का अधिकारी बना। सत्य-बत केवल धार्मिक औरआध्यात्मिक दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, वरर समाज की प्रगति और कल्याण का बहुत कुछ आधार भी उसी पर है। यदि योई राष्ट्र भौतिक दृष्टि से उन्नति कर ले और धन-वैभव मे दूमरो से आगे बढ़ जाय, तो भी सत्य का आश्रय लिये विना उसकी वृद्धि स्थायी नहीं हो सकती। यदि वहाँ के निवासियो को एक दूसरे की नीयत पर सन्देह बना रहा और वे परस्पर धोखाधी का व्यवहार करके दूसरो के अधिकारो का अपहरण करना राहे, तो उसका प्रतिफल अन्त में समस्त समाज के लिये अधिकारी सिद्ध होगा। यह एक ऐसा शरत सिद्ध त है जिसके सामने अनादि काल से प्रत्येक अन्यायी, अत्याचारी अहवारी को अन्तत अपना सिर नीचा करना पड़ा है । 'पद्म पुराण' दे रचविता ने विविध उपास्यानो द्वारा इसी कल्याणकारी तथ्य को पाठकों को हृदयगम करने का प्रयत्न किया है । चरित्र का महत्व सत्य के समान ही चरित्र का युद्ध और निप्पलक होना मानव-जीवन की मायाना के लिये अनिवार्य है। यदि यह कहा जाय कि आदर्श-जीन ।

[ १३ ] अनमा धर्ममम जीवन के दो पहिये सत्य और चरित्र हैं तो इसमें कोई अनुपयुक्त यार नहीं है । यद्यपि तार में आकर इहलोक और परलोक दोनो को सुधारने के लिये और भी अनेव गुणो की आवश्यकता होती है, पर जिन व्यक्तियों को गत्य प्रत पालन और चरिण रक्षा का धान रहेगा उनमे अन्य गुणो का समावेश अपिताश में स्वभावतः ही हो गायगा । इन दो गुग्गो मे युक्त मनुष्य अपना समप किमी प्रपार पे दूपित कर्मों अथवा व्यगनों नहीं लगा समता इमलिये वह सप्रवृत्तियों में ही सलग्न रहेगा और उनके ससर्ग मे गुणो की वृद्धि होती ही रहेगी। जमे जुआ, चोरी, मद्यपान, व्यभिचार आदि विमी एक दुळमन के लग जाने पर धीरे-धीरे अन्य दुर्व्यसन भी न्यूनाधिक मात्रा मे आही जाते है,उसी प्रकार किसी एक मूल सद्गुण को ग्रहण कर लेने पर अन्य सद्गुणो की ओर प्रवृत्ति स्वयमेव होने लग जाती है । इस तथ्य को दृष्टिगोचर रखकर 'पद्म-पुराण' ने 'सदाचार' पर भी बहुत बल दिया है । यद्यपि सदाचार का सबध बहुत कुछ आतरिक मनोभावो से हैं,पर वाह्य आचारो का भी मनुष्य की गनोवृत्ति पर बहुत प्रभाव पडता है । इसलिये 'पद्म-पुराण' में इस सम्बन्ध मे आचार पर विशेष जोर दिया गया है। उसका मत है कि आचारवान् पुरुप स्वयमेव दुर्व्यसनो से दूर रहेगा और इस प्रकार उसके चरित्र के शुद्ध बने रहने मे बहुत दूर तक सहायता मिलेगी। पुराणकार कहते हैं- "आचार की बहुत बडी महिमा है । आचार से मनुष्य की आयु की वृद्धि होती है, आचार से सुख की प्राप्ति होती है और यदि मनुष्य उस पर दृढता- पूर्वक अन्त तक आस्ढ रहे तो वह स्वर्ग और मोक्ष को भी पा सकता है । जो पुरुप आचार से हीन होता है वह लोक मे निन्दित हो जाता है। आचार शून्य पुरुष को मदैव दुख ही भोगने पड़ते हैं, यह रोगी और अल्प आयु वाला भी हो जाता है । जो व्यक्ति आचार से भ्रष्ट होता है, परलोक मे भी उसकी दुर्गति ही होती है। आचार का सर्व प्रथम अङ्ग शुद्धि और शुचिता है। घर को सदैव मिट्टी, गोमय, जल आदि द्वारा शुद्ध और स्वच्छ रखना चाहिए । प्रतिदिन प्रातः शौच, दन्तधावन, स्नान नियमपूर्वक करना आवश्यक है । मल का त्याग नदियों के तट, समुद्र-तीर, उपयोगी वृक्षो की जड के समीप, वगीचे के भीतर, पुप्प- वाटिका मे, जल के भीतर, किसी रम्य स्थान और राजपथ (सार्वजनिक सडक) [ १४ ] . पर कभी नहीं करना चाहिये । किसी भी विद्वान्, देवस्थान, गुरु, राजा, तपस्वी, पागल, अन्धा और स्त्री का धन अपहरण करता घोर असदाचार हैं । माग मे कोई रोगग्रस्त व्यक्ति, बोझा लादकर ले जाने वाला, गर्भिणी स्त्री और अशक्त दुर्वल पुरुप आ जाय तो पहले उनको गमन करने के लिये रास्ता छोड देना चाहिये । जो स्त्री दुष्ट-प्रकृति, असत् चरित्र, अपवाद ( बदनामी ) वाली, सदा कलह करने वाली, प्रमादयुक्त, लजारहित, वाह्यचारिणी हो, उससे किसी प्रकार सम्पर्क नहीं रखना चाहिये । क्योकि ऐसी स्त्री के सम्बन्ध से सदाचार- पालन मे बाधा होती है । इसी प्रकार असत् आचरण वाले पुरुप का सग भी कभी नहीं करना चाहिये और न उसके साथ कही आना-जाना चाहिये।" . "जो पुरुष स्पर्श योग्य न हो तथा जो पतित एवं कुपित हो उनके साथ कभी वात-चीत न करे । ऐसे पुरुषों से सम्भापण करने वाला कुपरिणाम का भागी होता है । गुरुजनो के सम्मुख आने उनका पदवी के अनुसार विनयपूर्वक अभिवादन करे । पर कई अवसरो पर उनका अभिवादन न करना भी उचित होता है । जैसे कोई गुरुजन तेल की मालिश कर रहा हो, उच्छिष्ट दशा मे हो, गीले वस्त्र पहिने हुये हो, रोग से ग्रस्त हो, किसी वडी चिन्ता मे उद्विग्न हो, तो ऐसी अवस्थाओ मे नियमानुसार अभिवादन नही करना चाहिये । जब वे शुद्ध अवस्था में हो जायें, तभी अभिवादन करना सदाचार का नियम है । इसी प्रकार जो यज्ञ अथवा ऐसे ही किसी कर्मकाण्ड मे सलग्न हो,स्त्रियो के साथ विनोद कर रहा हो, बच्चो के साथ क्रीडा कर रहा हो, पुष्प या कुशा ला रहा हो तो उसका अभिवादन करना भी उचित नही । इस जीवलोक मे स्वर्गीय-स्वभाव वाले व्यक्तियो मे चार गुण पाये जाते हैं-प्रशस्त दान, मधुर वाणी, देवताओ की भक्ति और विद्वानो का सम्मान । इसी प्रकार नारकीय-स्वभाव वालो के लक्षण ये बतलाये गये हैं-कृपणता का व्यवहार, स्वजनो की निन्दा, बुरे अथवा गन्दे वस्त्र धारण करना, नीच वृत्ति के मनुष्यो का सम्मान करना, अत्य- धिक क्रोध, क्डवी और कठोर वाणी आदि । जो व्यक्ति धर्मबीज से प्रसूत हुये हैं उनकी वाणी मक्खन के समान कोमल, अत्यन्त प्रिय, कररणा से पूर्ण होती है । पाप-बीज से उत्पन्न व्यक्तियो के लक्षण इससे विपरीत होते हैं ।"

[ १५ ] यद्यपि सदाचार की मीमासा प्राचीन धार्मिक भावो के अनुसार की गई है, पर तत्व की हष्टि से विचार किया जाय तो आज भी ये नियम उसी प्रकार उपयोगी हैं जैसा उनको हजार-दो हजार वर्ष पहले माना गया था । इसमे सबसे प्रथम स्थान शारीरिक शुद्धि को दिया गया है, जो बिल्कुल उचित और बुद्धि- सङ्गत है । जो व्यक्ति अपने शरीर को ठीक अवस्था में नहीं रस सवता उससे मानसिक और आत्मिक दशा को ठीक रख सकने की आशा करना निरर्थक है। मात्म-निर्माण का कार्य केवल बातो से पूरा नहीं हो सकता । उसके लिए व्यव- हारिक रूप से एक नियमित कार्यक्रम की पूर्ति करना आवश्यक होता है । उसमे सफलता प्राप्त करने के लिए शम, दम, नियम, सयम आदि देवी गुणो की आवश्यकता होती है । हमको शारीरिक, मानसिक अथवा आत्मिक कोई भी सुधार करना हो, उसके लिए अपनी प्रवृत्तियो को शुद्ध और पवित्र बनना अनि- याय है और यह कार्य सबसे पहले अपने शरीर को शुद्ध और पवित्र बनाने से आरम्भ होता है। पुराणकार ने कहा है कि शुद्ध आचार का पहला लाभ यह होता है कि मनुष्य रोग से बचा रहता है और उसकी आयु बढ जाती है । ये दोनों बातें जिस प्रकार भौतिक सफलता की दृष्टि से आवश्यक है उसी प्रकार धर्म-साधन भी इनके बिना नहीं हो सकता। शुद्धता और पवित्रता केवल व्यक्तिगत दृष्टि से ही नहीं की जानी चाहिये वरम् उसमें सामाजिक्ता यो सम्मिलित करना आवश्यक है। हमारे देश की अधिवास जनता में सामाजिक हित थी भावना पा बहुत पम स्याल है और इस सम्बन्ध में प्राचीन काल मे जो नियम स्थिर किये गये थे उनको भी लोगो ने अपनी अपमण्यता और प्रमाद यी भावना से निग्यंक पर दिया है। इसलिये जब हम 'पप-पुराण' मे यह आदेश पाते हैं कि "नदी तथा समुद्र के किनारे, वाग- पगीचो में, अमए के उपयुक्त रम्य स्थानो में तथा सार्वजनिक मार्ग के निाट मत-त्याग नहीं करना चाहिये" तो हमको उम ममय वो नागरिराता और सामा. जिक्ता की भावना पा एवं प्रमाण मिलता है । वर्तमान समय में गभ्यता मी सम्बी-चोटी बातें करने वालो मे से भी अनेर व्यक्ति इसके विपरीत आचरण फरते देसे जाते हैं।

[ १६ ] इममे रोगग्रस्त, अशक्त, बोभा ले जाने वाला, गभिरणी स्त्री आदि के लिए मार्ग छोड देने की जो सूचना दी गई है वह भी मामाजिकता और मनुप्यता की परिचायक है । आज हम सभ्य कहलाते हुए भी मोटर, रेल आदि सवारियो में चढने समय इस भावना की जरा भी परवाह नहीं करते और दुर्वलो को ढयेल पर सबसे पहले अपना अधिकार जमाने में ही कुशलता और चतुराई का प्रमाण मानते हैं । जब अधिक भीडभाड मे ऐसे दृश्य दिखलाई पड़ते है तो हर्गिज यह अनुमान नहीं होता कि ये किसी सम्य और सुसस्कृत जाति के लोग हैं । इमये विपरीत इङ्गलण्ड, अमरीका आदि के भौतिकवादी पहनाने वाले इस विषय में हमारी अपेक्षा दस गुना श्रेष्ट व्यवहार करते हैं । हमको केवल पुराणों की पूजा- उपासना की बातो को पढकर ही सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिए वरन् इस प्रकार की उपयोगी शिक्षाओ पर भी ध्यान देना आवश्यक है। सज्जन और दुर्जन के लक्षण-- सृष्टि के आदि मे प्रक्ट होने वाले महर्षि कश्यप के दो पत्नियां अदिति भौर दिति बतलाई गई हैं । अदिति से देवताओ (दैवी शक्तियो) की और दिति से दैत्य दानवो (आसुरी शक्तियो) की उत्पत्ति कही गई है । देवता सद्गुण सम्पन्न और धर्म मर्ग के अनुयायी थे और दैत्य दानव पाशविक शक्ति तथा भोग विलास मे जीवन की सफलता मानने वाले थे। इस कारण इन दोनो दलो मे मघर्प होना स्वाभाविक ही था । चूंकि दैत्यगण मुख्यत' अनियन्त्रित शक्ति मे ही विश्वास रखने वाले थे और युद्ध मे सब प्रकार के छल कपट, दाव पेंच से नाम लेते थे, इसलिए वे प्राय देवगण को परास्त करके उनके स्वत्त्व का अप- हरण कर लेते थे। ऐसे अवसर पर देवता भगवान की शरण में जाते थे और वे कोई न कोई मार्ग ढूंढ कर दैत्यो का विनाश कर डालते थे और देवगण को पुन अपने स्थान पर प्रतिष्ठित कर देते थे । ऐसे ही एक अवसर पर जब कश्यप पत्नी दिति ने अपने पुनो के निमित्त बहुत शोव विया और स्वयम् भी मरने की भावना प्रदर्शित की तो मर्पि व श्यप ने उसको मनुष्य शरीर की क्षणभगुरता का उपदेश दिया और साथ ही यह भी समभाया कि जो कोई अधर्म के मार्ग को ग्रहण करेगा-ससार में अन्य - [ १७ ] प्राणियो के साथ दुर्जनता पा व्यवहार करेगा, उसका कल्याण कभी नही हो सकता। यह बात ईश्वरीय न्याय के विरुद्ध है कि कोई भी व्यक्ति अथवा राष्ट्र दूसरो के साथ बुराई-अन्याय का व्यवहार करके स्वय स्थायी और वास्तविक सुख पा सके । ऐसे व्यक्ति यदि अजेय भी बन जायें, तो भी उनके 'कर्म' स्वय उन्ही मे आन्तरिक विग्रह करके उनको नष्ट कर डालते हैं । पुराणो मे परिणत 'सुन्द उपसुन्द नामक दैत्यो, द्वारिका के यादवकुल तथा मो हनी" को पथाएँ इसी भाव की प्रदर्शक हैं । इन तथ्यो का वर्णन करते हुये अन्त मे महर्षि ने समझ या- "ससार के प्रपचो को त्यागकर आत्म कल्याण की द से धर्म या पालन करना ही देवताओ ( सज्जनो) का मार्ग है । सदैव धर्म का ही चिन्तन करना चाहिय और धर्म-पालन के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिये । जो इस प्रकार धर्म का पालन करता है, भगवान् विष्णु सदा उसके ऊपर कृपा- युक्त रहते है । 'धर्म' ही भगवान् विष्णु की काया है और 'सत्य' ही उनका हृदय है । जो कोई इन धम और सत्य दोनो का पालन करता रहता है उस पर भगवान् अत्यन्त प्रसन हो जाते हैं । इसक विपरीत जो अधर्म के मार्ग पर चलकर 'धर्म' और 'सत्य' को दूपित करते है उनसे भगवान् घोर रट होते हैं और उनका नाश कर देते हैं । तप और सत्य म स्थित रहने वाले 'वैष्णव' धर्म का पालन करते हैं इसलिये भगवान् सदा उनकी रक्षा को सनद रहते हैं। पर तुम्हारे (दिति के) पुत्र दैत्य, दनु ये पुन दानव, सिंहिका ये पुत्र मिहिकेय- ये सब पाप-चित्त वाले थे और अधर्म तथा पाप का ही पालन करते थे इसलिये भगवान् वासुदेव ने उनको युद्ध क्षेत्र मे दण्डित रिया।" यद्यपि पौराणिक वर्णनो मे धर्म और अधर्म के स्वरूप को समभाने के लिये तरह-तरह की देव और दैत्य-दानवो की क्याएँ सुनाई गई हैं, जिससे सामान्य जनता भी उनसे कुछ शिक्षा ग्रहण कर सके, पर हमको निश्चित स्प से यह समझ लेना चाहिये कि उनका आराय सजनता तथा दुर्जनता या व्यवहार परने वालो से ही है । सभव है कि किसी समय में 'दानव' और 'दत्य' नामधारी पाशविक शक्ति के अनुयायिओ के बडे-बडे सङ्गठन बन गये हो, और आज जिस प्रकार रितने ही भौतिर शक्ति में विश्वास रसने वाले राष्ट्र 'एटम बम' (अणु- [ १८ ] अस्त्र) बनाकर ससार को आतकित कर रहे है, उसी प्रकार प्राचीन युग में भी किन्ही जातियो ने ऐसा प्रयल किया हो, पर वास्तव में ये सब 'धर्म' 'सत्य' 'न्याय' के विरोधी दुर्जन स्वभाव वाले व्यक्ति ही थे। ऐसे लोग सदा से ससार के लिये कटक स्वरूप होते आये हैं, और जव निरीह जनता, सजन स्वभाव के व्यक्ति उनके स्वार्थयुक्त व्यवहार और अन्यायो मे दुःखित होकर भगवान् का स्मरण करने लगते हैं तो उनके ऊपर देवी शक्ति का 'चक्र' चलता है और वे किसी न किसी प्रकार नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं । सयोग की बात है कि आज हम अपने नेत्रो से इन "दैत्य-दानव-विनाश" के नाटक की पुनरावृत्ति होते देख रहे हैं । आज भी अन्याय पर आथित अनियन्त्रित शक्ति से मदान्ध व्यक्ति गर्जन-तर्जन कर रहे है, और सरल प्रकृति के सज्जन दबे हुये आतक और निराशा का अनुभव कर रहे हैं । पर देवी-सत्ता ऐसे विपरीत-प्रकृति विरुद्ध वातावरण को अधिक समय तक स्थिर नहीं देने रह सकती। सूक्ष्म-जगत् मे भगवान् का चक्र घूमने लग गया है, और शीघ्र ही हम भगवद्-शक्ति के उम चमत्कार को देखने की आशा रख मक्ते है, जिसकी चर्चा इन पौराणिक कथाओ मे बार-बार की गई है। "वैष्णव" के लक्षण और महिमा- सत् और अमत् पुरुषों के विवेचन की दृष्टि में पद्म-पुराणान्तर्गत 'ब्रह्म- खण्ड" के आरम्भ मे जो "वैष्णव" जनो के लक्षण और वर्तव्यो का वर्णन किया गया है वह भी ध्यान देने योग्य है । आज-कल के बाह्याचार प्रधान समय में यद्यपि वैष्णव की पहिचान बडे-बडे रामानन्दी तिलक और तुलसी की मोटी माला ही रह गई है, पर यह उसका वास्तविक स्वरूप नहीं है । 'वैष्णव' अयग. 'विष्णुभक्त' का सबसे पहला लक्षण परोपकार और प्राणीमात्र की सेवा है । उसका मन्तव्य है कि जब विष्णु भगवान् ही समस्त जगत् में व्याप्त हो रहे हैं और चीटी से हाथी तक में उन्ही की आत्मशक्ति प्रकट हो रही है, तो किसी को पराया, विरोधी अथवा शत्रु से समझा जा सकता है ? सभी प्राणी अपने आत्म-स्वरूप हैं और उनके साथ 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' के सिद्धान्तानुसार न्यव- हार करना ही सच्चा धर्म है । इसकी व्याख्या करते हुये पुराणकार ने 'वैष्णय' में मुख्य लक्षण इस प्रकार बतलाये हैं- - [ १६ ] - हिंसादम्भ काम क्रोधजितश्चैव ये नराः । लोभ मोह परित्यक्ता ज्ञेयास्ते वैष्णवा द्विज ।। पितृभक्ता दयायुक्ताः सर्वप्राणिः हितैरताः । अमत्सरा वैष्णवा ये विज्ञेया सत्यभाषिणः ॥ "जो पुरुष हिंसा, दम्भ, वाम और क्रोध से रहित होते है और लोभ तथा मोह को जो त्याग देते हैं, उनको ही वैष्णव समझना चाहिये । जो पिता आदि गुरुजनो के भक्त होते है दयावान् होते हैं, मव प्राणियो के प्रति हिन. भावना रखते है, जिनके हृदय म किमी के प्रति ईप-द्वेष के भाव नहीं होते और सदैव सत्य व्यवहार करते है उनको ही वैरणव जानना चाहिये।" यह भी कहा गया है कि "जिस कुल में ऐमा कोई एस भी वैष्णव हो जाता है तो उस कुल के सभी व्यक्ति पापो से छुटकारा पाकर सद्गति के अधि- कारी हो जाते हैं । जो व्यक्ति ऐसे वैष्णव का चरणोदक अपने मस्तक पर धारण करता है तो फिर उसे किसी अन्य तीर्य में स्नान करने की आवश्यक्ता नहीं होती। ऐसे महात्मा वैष्णव का दो-चार क्षरण का सत्सग भी मनुष्य को भवसागर से तार देता है।" आगे चलकर पुराणकार ने तुलसी और शालिग्राम की उपासना, एका- दशी व्रत,भगवान कृष्ण और राधा की भक्ति और उपासना आदि बाह्याचार को भी आवश्यक बतलाया है, क्योकि इसके विना सामान्य जनो को ऐमे महात्माओं को जानने तथा लाभ उठाने का अन्य कोई उपाय नहीं होता । पर इसी परि- स्थिति में अनधिकारी अथवा वचन लोगो को दिमावटी वेप बनाकर लोगो वो भ्रम मे डालने का अवसर भी मिल जाता है । कुछ भी हो "वप्राव" का आदर्श बहुत ऊंचा है और जो वास्तव में उसके अनुमार आचरण का प्रयत्न करते हैं, वे निस्सन्देह पूजनीय है । वर्तमान काल ये 'युग-पुरुप' महात्मा गांधी भी 'वाव-आदर्ग' को ही अपना लक्ष्य मानते थे और उसका पालन करके वे भारतवर्ष के ही नहीं समस्त मसार के मार्ग-दर्शक बन गये । वे अपनी प्रार्थना मे नित्यप्रति एव भजन गाया करते थे जिसका कुछ प्रश यहाँ दिया जाता है- [ २० ] धन को वैष्णवजन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाने रे । पर दु.खे उपकार करे तोए मन अभिमान न पाने रे।। सकल लोक मां सहुने वन्दे निन्दा न करे केनी रे । वाच-काय-मन निश्चल राखे धन धन जननी तेनी रे॥ समदृष्टि ने ममता त्यागी पर-स्त्री जेने मात रे । जिह्वा थको असत्य न बोले पर धन नहि झाले हाथ रे ।। अर्थात् "वैष्णव कहलाने का अधिकारी तो वहीं हो सकता है जो दूसरे दुख को नमझे, अनुभव करे, उसे दूर करने का प्रयत्न करे, पर मन मे किसी प्रकार का अहङ्कार का भाव न लाये । ससार में प्रत्येक प्राणी को भग- वत्-स्वरूप मानकर उसकी वन्दना करे, किसी की निन्दा का भाव मन में न लाये, अपनी वाणी, शरीर और मन को शुद्ध, पवित्र और स्थिर रसे । सव को समदृष्टि से देखे, ममता का त्याग कर दे, पराई स्त्री को माता के समान माने, जिह्वा से कभी असत्यभापण न करे और न दूसरे के हाथ लगाये। यही वैष्णव के लक्षण है और ऐसे व्यक्ति को जो माता उत्पन्न करती है वह भी धन्य है। मनुष्य किमी भी धर्म अथवा सम्प्रदाय का अनुयायी क्यों न हो, परोप- कार, सेवा, सत्यपरायणता आदि सद्गुणो के बिना उसे धार्मिक नहीं माना जा सकता। वैसे प्रत्येक धर्म नै इन गुणो को महत्त्व दिया है और किसी न किसी रूप में अपने धर्म-नियमा मे इनको शामिल भी किया है, पर हम कह सकते हैं कि "वैष्णव-सिद्धान्त" में इनको जितनी परिपूर्णता तक पहुंचा दिया गया है, उसकी तुलना शायद ही एकाच अन्य सम्प्रदाय या मजहब कर सके। पर इतना ऊँचा आदर्श स्वीकार करके चलने में एक खतरा अवश्य रहता है कि मनुष्य के व्यवहार और आचार मे दम्भ का प्रवेश न हो जाय । कारण यह होता है कि पहले तो परम्परा या प्रशसा के भाव से मनुप्य इस आदर्श वो अगीकार कर लेता है, पर वाद मे उसका यथार्थ रूप मे पालन करना कठिन जान पाता है। इस प्रकार अपनी मान-मर्यादा को अक्षुण्ण रखने के लिये वह दिखावे के दङ्ग पर इन नियमो का अनुसरण तो करते रहते हैं, पर उनकी 4 [ २१ ] मानसिक स्थिति और अपरोक्ष कार्य इसके अनुकूल नहीं होते । यह दुरङ्गी स्थिति और भी शोचनीय होती है और मनुष्य न इघर का रहता है, न उधर का। इसलिये सचाई और बुद्धिमानी का मार्ग यही है कि मनुष्य अपने नियमित धर्म- विधान का पालन करते हुए उपरोक्त सद्गुणो के पालन करने का निरन्तर प्रयास करता रहे । वास्तव में इन गुणो को 'वैष्णव' या 'शव' सम्प्रदाय के नियम समझ लेना गलत है, ये तो मानवता के लक्षण हैं। इसलिये जब कभी और जिस प्रकार से इनका ज्ञान हो जाय तभी से उनको अपनी शक्ति के अनुसार ग्रहण करता चला जाय । ब्राह्मण गुणों से ही पूज्य होता है-- पुराणो मे ब्राह्मणो की मान्यता पर बहुत जोर दिया गया है। उनको पारो वर्णों मे सर्वश्रेष्ठ और समाज का अगुआ बतलाया गया है, और घोपित किया गया है कि अपराध करने पर भी ब्राह्मण को अन्य वर्ग वालो की अपेक्षा अल्प दण्ड दिया जाय । यह विधान पक्षपातपूर्ण तथा न्याय के विपरीत जान पडता है, पर जैसे वर्तमान ममय में भी अनेक व्यक्तियो को विसी बड़ी सायं- जनिक सेवा अथवा आत्म-त्याग के लिए विशेष सम्मान और विशेष अधिकारी से पुरस्कृत किया जाता है उमी प्रकार उस युग मे उन ब्राह्मणों को ये विशेषा- धिकार दिये गये थे,जो अपनी बहुमूध विद्या बुद्धि को निस्स्वार्थ भाव से जनता- जनार्दन के हित के लिय अपंग पर देते थे। कुछ लोगो का स्थान है कि ब्राह्मणी ने ये लाभदायव अधिकार स्वयम् ही अपने लिए लिप्स डाले है। पर जब हम 'पप-गुराण' मे परिगत ग्राह्मग्गो ये लक्षण और उनके वर्तव्यों का विवरण पढते हैं तो हमयो यही प्रतीत होता है if 'ग्राह्मग्ग' यी पदवी को गुणों के आधार पर प्राप्त करना सहन न था। पहले तो उन गों पर ध्यान देना चाहिये जिनका पालन करने में महाग ता का दर्जा पा गवता था- "जन्म गे अर्थात् ब्राह्मण में पर में उत्पन्न होने से तो कोई व्यक्ति "प्रार' मार रहा जा सकता है । वह 'हिज' तभी होता है जब उमके समु- चित मम्बार किये जाते हैं । जब यह मम्पूर्ण विद्या प्राप्त कर लेता है तब यह पिन' बनता है और श्रोत्रिय (वेदन) भी पदवी का अधिकारी हो मरना है- { २० ] वैष्णवजन तो तेने कहिये जे पीर पराई जाने रे । पर दुखे उपकार करे तोए मन अभिमान न माने रे॥ सकल लोक मां सहुने वन्दे निन्दा न करे केनी रे । वाच-काय-मन निश्चल राखे धन धन जननी तेनी रे ।। समदृष्टि ने ममता त्यागी पर-स्त्री जेने मात रे । जिह्वा थकी असत्य न बोले पर धन नहि झाले हाय रे ॥ अर्थात् "वैष्णव कहलाने का अधिकारी तो वही हो सकता है जो दूमरे के दुख को समझे, अनुभव करे, उसे दूर करने का प्रयत्ल करे, पर मन में किसी प्रकार का अहद्वार का भाव न लाये। समार में प्रत्येक प्राणी को भग- वत्-स्वरूप मानकर उसकी वन्दना करे, किसी की निन्दा वा भाव मन में न लाये, अपनी वाणी, गरीर और मन को शुद्ध, पवित्र और स्थिर रसे । सब को समष्टि से देखें, ममता का त्याग कर दे, पराई स्त्री को माता के समान माने, जिह्वा से कभी असत्यभापण न करे और न दूसरे के धन को हाथ लगाये। यही वैष्णव के लक्षण हैं और ऐसे व्यक्ति को जो माता उत्पन करती है वह भी धन्य है। मनुष्य किसी भी धर्म अथवा सम्प्रदाय का अनुयायी क्यो न हो, परोप- कार, सेवा, सत्यपरायणता आदि सद्गुणो के बिना उसे धार्मिक नहीं माना जा रानता । वैसे प्रत्येक धर्म ने इन गुणो को महत्त्व दिया है और किसी न विसी रूप में अपने धर्म नियमो में इनको शामिल भी दिया है, पर हम कह सकते हैं कि "वैष्णव-सिद्धान्त" मे इनको जितनी परिपूर्णता तक पहुंचा दिया गया है, उसकी तुलना शायद ही एकाध अन्य सम्प्रदाय या मजहब कर सके। पर इतना ऊँचा आदर्श स्वीकार करके चलने में एक सतरा अवश्य रहता है कि मनुष्य के व्यवहार और आचार मे दम्भ का प्रवेश न हो जाय । कारण यह होता है कि पहले तो परम्परा या प्रशसा के भाव से मनुष्य इस आदर्श को अगीकार कर लेता है, पर बाद में उसका यथार्थ रुप में पालन करना कठिन जान पड़ता है । इस प्रकार अपनी मान-मर्यादा को अक्षुण्ण रखने के लिये यह दिखावे के ढङ्ग पर इन नियमो का अनुसरण तो करते रहते है, पर उनकी , [ २१ ] मानसिक स्थिति और अपरोक्ष कार्य इसके अनुकूल नहीं होते। यह दुरङ्गी स्थिति और भी शोचनीय होती है और मनुष्य न इघर का रहता है, न उपर का। इमलिये सचाई और बुद्धिमानी का मार्ग यही है कि मनुष्य अपने नियमित धर्म- विधान का पालन करते हुए उपरोक्त सद्गुणों के पालन करने का निरन्तर प्रयास फरता रहे । वास्तव में इन गुणों को 'वैष्णव' या 'व' सम्प्रदाय के नियम समझ लेना गलत है, ये तो मानवता के लक्षण है। इसलिये जब कभी और जिम प्रकार से इनका ज्ञान हो जाय तभी से उनको अपनी शक्ति के अनुमार ग्रहण फरता चला जाय। ब्राह्मण गुणों से ही पूज्य होता है-- पुराणों में ब्राह्मणो गी मान्यता पर बहुत जोर दिया गया है । उनको पारों वर्षों में सर्वश्रेष्ठ और समाज या अगुआ बतलाया गया है, और घोपित किया गया है कि अपराध करने पर भी ब्राह्मण को अन्य वर्ग वालों की अपेक्षा अल्प पर दिया जाय । यह विधान पक्षपातपूरगं तया न्याय के विपरीत जान पड़ता है, पर जमे वर्तमान ममय में भी अनेक व्यक्तियों को किसी बड़ी गावं. जनिक मेवा अथवा आरम-त्याग के लिए विशेष सम्मान और विशेष अधिकारी मे पुरस्कृत किया जाता है उसी प्रकार उम युग मे उन ग्राह्मणों को ये विशेषा. पिकार दिये गये थे,जो अपनी यामूचविया बुद्धि को निम्म्मायं भाव गे जनता- जनार्दन के दिन मे निब अपंग पर देते थे। कुछ मांगों का मान है कि ब्राह्मणों ने मामदायक अधिकार म्पपम ही अपने लिए निगडाने हैं। पर अब म 'पप-पुगग्ग' में अगित ग्राणों मे सक्षण और उनके पसंयो या विपरण पर है हमरो यो गीत होता है. 'प्राण' मी पल्पी पी गुग्गी मे आपार पर. प्रास परना गहन न था। पहले तो उन गनों पर पान देना चाहिये जिनरा पानन मरले गेलण श्रेया मानांपा गाना पा- "जन्म में भी सारे पर में मान्न होने में तो कोई शक्ति 'M' मात्र का जागा है। या दिन' तभी होता है जब उसके ममु. नियमबार निमार या मागं विधा प्रात पर मैता है नय यह विनय और धोपित (पेटा) पोपनी का अपितारी हो मरना है- [ २२ ] . जन्मना ब्राह्मग्गो जेयः संस्कारद्विज उच्यते । विद्ययायाति विप्रत्त्व त्रिभिः श्रोत्रिय लक्षणम् ।। विद्यापूतो मन्त्रपूतो वेदपूतस्तव च तीर्थस्नानादिभिमध्यो विप्रः पूज्यतमः स्मृतः ॥ 'वेद-विद्या, मन्त्र-जप और तीर्थों के स्नान से पवित्र और आत्म-ज्ञान सम्पन्न होने पर ही विप्र वास्तविक पूजनीय माना जा सकता है। ऐसा ब्राह्मण सदैव नारायण के चरणों में भक्ति रसने वाला, शुद्ध अन्त करण वाला, इन्द्रियों को जीतकर उन्हें वश में रखने वाला, क्रोध को जीत लेने वाला और सब मनुष्यो को ममान टि से देखने वाला होना चाहिए । माता-पिता की मेवा का सदा ध्यान रखने वाला, समस्त गुरुजनो और अतिथियो का उचित सम्मान करने वाला, पराई स्त्री को ओर कभी न तारने वाला ब्राह्मण ही पूजनीय माना जा मक्ता है।" पुराणवार ने बहुत स्पष्ट रूप से धर्म का यह सिद्धान्त बतलाया है कि पूजा गुणों की ही होनी चाहिए । केवल किमी ब्राह्मण-दम्पति के घर मे जन्म ले लेने से कोई व्यक्ति मार्वजनिक सम्मान और विशेष अधिकारी का पान नहीं माना जा सकता। ब्राह्मण का मुख्य लक्षण विद्या और ज्ञान सम्पन्न होने के साथ ही 'सर्वजन हिताय' की भावना रखना भी है । जो अपनी विद्या को केवल पेट भरने का साधन बना लेता है, वह भी अन्य लोगो का श्रद्धाभाजन और विगेप आदर-सम्मान का अधिकारी नहीं माना जा सकता। पूजनीय वही है जो आनी शक्तियों को स्वार्थ के वजाय परमार्थ मे लगाता है । स्वयम् कष्ट सहकर दूमरो को विपत्ति से छुड़ाता है । जिसे समाज के उत्यान का ध्यान रहता है और इसके लिए अपने भौतिक सुन्दा को तिलाञ्जलि देकर ऐमा आदर्श और उदाहरण उपस्थित करता है जिससे अन्य लोगो को भी समाज की निस्स्वार्थ सेवा करने की प्रेरणा मिले और लोग आपाधापी की हीन मनोवृत्ति को त्याग- कर परोपकार का उच्च जीवन करने की स्पृहा करने लगें । 'पद्म-पुराण' ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस प्रकार की महान् पदवी प्राप्त कर सकना केवल ब्राह्मणो तक ही मोमिन नहीं है, वरन् जो कोई इन सद्गुणों को धारण करके 1 [ २३ ] अपना जीवन परमार्थ के हेतु समर्पित कर देता है वही सच्चा पूजनीय विप्र' माना जा सकता है । इसके लिये उच्च कुल, प्रसिद्ध वश अथवा सासारव वैभव आदि की कोई आवश्यकता नहीं है । नारदजी के यह प्रश्न करने पर कि क्या असत् (हीन ) कुल मे जन्म लेने वाला व्यक्ति भी पूज्य श्रोत्रिय बन सकता है । थी ब्रह्माजी ने उत्तर दिया- सच्छानिव कुलजातो ह्यक्रियो नैव पूजितः । असत् क्षेत्रकुले पूज्यो व्यास वैभाण्डको यथा ॥ क्षत्रियाणा कुले जातो विश्वामिनोऽस्ति मत्सम. । वेश्यापुत्रो वसिष्ठश्च अन्ये सिद्धा द्विजादय. ।। "कोई व्यषित चाहे उत्तम श्रोत्रिय ब्राह्मण के घर मे उत्पन्न हुआ हो पर यदि वह ब्रह्म-कर्तव्यो को पालन नहीं करता तो कदापि पूज्य नहीं माना जा सकता । पर श्रेष्ठ कर्तव्यो को व्यवहार रूप मे पूरा करके असत् कुल और असत् क्षेत्र (नीच जाति की स्त्री से उत्पन्न) व्यक्ति भी परम पूज्य बन जाना है। जिस प्रकार समस्त ऋषि-मुनियो के सम्मानास्पद व्यासजी मल्लाह की पुनी सत्यवती से उत्सन हुये थे। ऐसी ही स्थिति वभाण्डक ऋपि की थी। विश्वामित्र का जन्म क्षनिय माता-पिता से हुआ था । पर वे सार्वजनिक हित के लिए जीवन समर्पण कर देने से 'ब्रह्मपि' और भगवान के सदृश्य सम्मानीय बन गये। वनिष्ठजी, जिनके चरणो मे श्रीरामचन्द्रजी जैसे ईश्वरावतार भी निरन्तर गिरते रहते थे, वेश्या के पुत्र थे। इसी तरह और भी अनेक सिद्ध ऋपि-मुनियों के विषय में कहा जा सकता है।" जिन लोगो को पुराणो मे केवल ब्राह्मरणो को दान-दक्षिणा देने की बात ही दिखलाई देती है उनको इन श्लोको पर भी ध्यान देना चाहिए । हम जानते है कि कितने ही पुराण-लेखको ने ब्राह्मणो मे अन्ध-श्रद्धा और भक्ति रखने को ही बडा महत्त्व दे डाला है, पर उनकी ही बात को सत्य मान रेना यहाँ की बुद्धिमानी है । 'पद्म-पुराण' तथा और भी ममस्त पुराणो मे स्थान- स्थान पर आदर्श ब्राह्मण के ये ही लक्षण बतलाये गये है। तो भी जो लोग उनकी उपेक्षा वसे वेवल ब्राह्मणो को दान-दक्षिणा और विशेष अधिकारी वाले वाक्यो का ही उल्लेस किया करते हैं, उनको हम 'कुती' या 'पक्षपाती' के सिवाय और कुछ नहीं कह सकते हैं । निष्पक्ष व्यक्ति किसी को श्रुटियो के साथ उसके गुणो को भी स्वीकार करता है । जैसा म आरम्भ मे लिख चुके हैं पुराणो की कितनी ही थोरिणयां हैं। उनमे पटिया-बढिया-कई प्रकार की रच- नायें पाई जाती है और सिद्धान्त विवेचन की दृष्टि से भी काफी अन्तर देखने में बाता है। अगर हीनता की वातो की उपेक्षा करके उच्च आदर्श भी बातो को ही पाठको के सामने रखें तो उससे उनका अवश्य न्यूनाधिक लाभ हो सकता है । सजनो को 'कुतर्क' के बजाय यही जनहितकारी नीति अपनानी चाहिए। भगवन्नाम कीर्तन का गच्या स्वरूप- वर्तमान समय में देश के कितने ही भागों मे 'कीर्तन' का विशेष प्रचार हो गया है और उसके पक्ष विपक्ष मे अनेक प्रकार की बातें सुनने में आया करती हैं । कुछ लोग उसे मोक्ष का सर्वश्रेष्ठ मार्ग बतलाते हैं और दूसरे लोग कहते है कि केवल जिह्वा से नामोच्चारण करने से कोई लाभ नहीं हो सकता । कुछ। लोग ऐसे 'कीर्तन प्रेमियो' के उदाहरण देते हैं जो इस क्षेत्र में बड़े प्रसिद्ध हो चुके हैं, पर जिनका चरित और आचरण निन्दनीय हैं । कुछ लोग यह आक्षेप भी करते हैं कि 'कीर्तन' की आड मे स्त्री-पुरुष अपनी असद्वृत्तियों की पूर्ति विया करते हैं। वर्तमान दशा का भली प्रकार निरीक्षण करने पर हम कुछ अशो में इन आदोपा की सचाई स्वीकार करते हैं पर माथ ही हमारा यह भी मत है कि इनने वारण कीर्तन' को न तो निन्दनीय सिद्ध किया जा सकता है और न उसे त्यागने की सम्मति दी जा सकती है। कीर्तन का आशय यही नहीं है कि बहुत वडा जन-समूह एफनित होकर ढोन, बाजा गाजा के माथ स्नी पुरुप सम्मिलित होकर नामोच्चारण करें। इस मकार के सामूहिक-कीर्तन की प्रणली थी चैतन्य महाप्रभु ने प्रचलित की थी और उसके द्वारा मुसलमानी शासनकाल में निरसदेह हिन्दू-धर्म की रक्षा मे वडा सहायता प्राप्त हुई थी। पहले यह विशेष रूप से बगान मे ही प्रचलिाप इघर तीम च लीन वर्ष में उत्तर प्रदेश और अन्य हिन्दी-प्रान्तो में भी यह नोकप्रिय हो गया है।

[- २५.] 'पद्मपुराण के अनुसार कीर्तन, समाज या व्यक्ति में उत्पन्न हो जाने 'चाला धर्म विरोधी या बाधा डालने वाली प्रवृत्तियो के निराकरण के लिये विशेष उपयोगी और सहायक है। यह एक ऐसी सीधी-साधी और साथ ही प्रभावशाली उपासना-पद्धति है जो कही भी और सभी अवस्थाओ में प्रयुक्त की जा सकती है । पर इसमे मन और भावो की शुद्धता का ध्यान रखना अनि- वार्य है । केवल अच्छे सुर मे और भक्ति-भाव का अभिनय करते हुए कीर्तन ध्यर्थ होता है । अन्यथा यदि शुद्ध हृदय से तन्मयतापूर्वक किया जाय तो इससे बहुत शीघ्र परमात्मा की भक्ति का विकास होता है । 'पद्म-पुराण' में और भी कई ऐसे दोप बतलाये है, जिनका कीर्तन मे त्याग देना अत्यावश्यक है । इस सम्बन्ध सनत्कुमार के मुख से कहलाया गया है- "प्रथम तो नामोच्चारण करने वाले पुरुष का यही अपराध हो सकता है कि वह किसी सत्पुरुप की निन्दा करने लग जाय । दूसरा अपराध यह होता है कि अनेक व्यक्ति भक्ति करते हुये भी राम, कृष्ण, शिव आदि के नामो में भेद बुद्धि रखते है- शिवस्य श्रीविष्णोर्य इह गुण नामादि सकल । धिया भिन्न पश्येत्स खलु हरिनामा हितकरः ।। तीसरा अपराध अपने गुरु की किसी भी प्रकार अवज्ञा कर देना होता है । चौथा अपराध शति एवम् शास्त्रो की निन्दा करना है । पाँचवाँ यह कि हरिनाम का जो माहात्म्य बतल या जाय उसे अर्थवाद (बनावटी या प्रशमात्मक) समझा जाय । जो व्यक्ति मदेव 'मैं और मेरा' यही ध्यान करता रहता है वह भी नाम-अपराधी होता है । जो व्यक्ति इन अपराधो को जान-बूझकर पाप बुद्धि से करता है उसका उद्धार कभी नहीं होता। इस जीवन मे वह उसी प्रकार दुखी रहता है जैसे माता से रुष्ट होकर भोजन न करने वाला वालक । इस प्रकार दश प्रकार के नामापराध होते हैं, इनको त्यागकर नाम का जप करने से मनुष्य का पूर्ण कल्याण होता है। इनसे विदित होता है कि 'नाम कीन' तभी कल्याणकारी होता है जव उमेह दिय श्रद्धा से य जाता है और अपना अचरण भी पवित्र और परमार्थ [ २४ ] . वाले वाक्यो का ही उल्लेख किया करते हैं, उनको हम 'युती' या 'पक्षपाती' के सिपाय और कुछ नही यह सकते हैं । निषा व्यक्ति किगी की त्रुटियो के साथ उसके गुणो को भी स्वीकार करता है । जैसा हम आरम्भ मे लिख चुके हैं पुराणो की कितनी ही धरिगया हैं । उनमे पटिया-बढ़िया-कई प्रकार की रच. नाये पाई जाती है और सिद्धान्त विवेचन की दृष्टि से भी काफी अन्तर देखने में आता है । अगर हीनता की बातों की उपेक्षा करके उच्च आदर्श की यातो को ही पाठकों के सामने रखें तो उससे उनका अवश्य न्यूनाधिक लाभ हो सकता है । सजनो को 'कुतकं' के बजाय यही जनहितकारी नीति अपनानी चाहिए। भगवन्नाम कीर्तन का मच्या स्वरूप-- वर्तमान समय में देश के कितने ही भागो में 'कीर्तन' का विशेष प्रचार हो गया है और उसके पक्ष-विपक्ष मे अनेक प्रकार की बातें सुनने मे आया वरती हैं । कुछ लोग उसे मोक्ष का सर्वश्रेष्ठ मार्ग बतलाते हैं और दूसरे लोग कहते है कि केवल जिह्वा से नामोच्चारण करने से कोई लाम नहीं हो सकता । कुछ। लोग ऐसे 'कीर्तन प्रेमियो' के उदाहरण देते हैं जो इस क्षेत्र मे बडे प्रसिद्ध हो चुके हैं, पर जिनका चरित्र और आचरण निन्दनीय हैं । कुछ लोग यह आदोप भी करते हैं कि 'कीर्तन' की आड मे स्त्री-पुरम अपनी अमवृत्तियों की पूर्ति क्यिा करते हैं। वर्तमान दशा का भली प्रकार निरीक्षण करने पर हम कुछ प्रशो में इन आक्षेपो की सचाई स्वीकार करते हैं पर साथ ही हमारा यह भी मत है कि इनके कारण कीर्तन' को न तो निन्दनीय सिद्ध किया जा सकता है और न उसे त्यागने की सम्मति दी जा सकती है । कीर्तन का आशय यही नहीं है कि बहुत पडा जन-समूह एकत्रित होकर ढोल, वाजा गाजा के साथ स्त्री पुरुप सम्मिलित होकर नामोच्चारण करें। इस सकार के सामूहिक-कीर्तन की प्रणाली श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रचलित की थी और उसके द्वारा मुसलमानी शासनकाल मे निरसदेह हिन्दू-धर्म की रक्षा मे बड़ा सहायता प्रास हुई थी। पहले यह विशेष रूप में बङ्गाल में ही प्रचलित थ, इधर तीम-चालीन वर्ष से उत्तर प्रदेश और अन्य हिन्दी-प्रान्तो में भी यह लोकप्रिय हो गया है ।

। २५'] 'पद्म-पुराण के अनुमार पोतन, समाज या व्यक्ति में उत्पन्न हो जाने वाला धर्म विरोधी या बाधा डालने वाली प्रवृत्तियों के निराकरण के लिये विशेप उपयोगी और सहायर है। यह एक ऐसी सीधी-साधी और साथ ही प्रभावशाली उपासना-पद्धति है जो कही भी और सभी अवस्थाओ में प्रयुक्त की जा सकती है । पर इसमे मन और भावो की शुद्धता का ध्यान रखना अनि. वार्य है । केवल अच्छे सुर में और भक्ति-भाव रा अभिनय करते हुए कीर्तन व्यर्थ होता है । अन्यया यदि शुद्ध हृदय से तन्मयतापूर्वक किया जाय तो इसमे बहुत शीघ्र परमात्मा की भक्ति का विकास होता है । 'पग-पुराण' में और भी कई ऐमे दोप बतलाये हैं, जिनका कीर्तन में त्याग देना अत्यावश्यक है । इस सम्बन्ध सनत्युमार ये मुग्प से यहााया गया है- "प्रथम तो नामोच्चारण करने वाले पुरुष का पही अमराप हो गाता है कि वह पिसी सत्पुरुप यी निन्दा करने लग जाय । दूसरा अपराध यह होता है कि अनेयः व्यक्ति भक्ति करते हुये भी राम, कृष्ण, गिय आदि ये नामो में भेद युद्धि रखते हैं- शिवस्य श्रीविष्णोर्य इह गुग नामादि सपल । धिया भिन्न पश्यत्म सलु हरिनामाहितकरः ॥

[ २४ ] वाले वाक्यो का ही उल्लेख किया करते हैं, उनको हम 'कुतर्की' या 'पक्षपाती' के सिवाय और कुछ नहीं कह सकते हैं । निप्पक्ष व्यक्ति किसी की त्रुटियो के साथ उसके गुणो को भी स्वीकार करता है । जैसा हम आरम्भ मे लिख चुके हैं पुराणो की कितनी ही श्रोणियाँ हैं । उनमे घटिया-वढिया-कई प्रकार की रच- नायें पाई जाती है और सिद्धान्त विवेचन की दृष्टि से भी काफी अन्तर देखने में आता है । अगर हीनता की वातो की उपेक्षा करके उच्च आदर्श की बातो को ही पाठको के सामने रखे तो उमसे उनका अवश्य न्यूनाधिक लाभ हो सकता है । सजनो को 'कुतर्क' के बजाय यही जनहितवारी नीति अपनानी चाहिए । भगवन्नाम कीर्तन मा गच्चा म्वरूप- वर्तमान समय में देश के कितने ही भागो मे 'कीर्तन' का विशेष प्रचार हो गया है और उसके पक्ष-विपक्ष मे अनेक प्रकार की वातें सुनने में आया करती हैं । कुछ लोग उसे मोक्ष का सर्वश्रेष्ठ मार्ग बतलाते है और दूसरे लोग कहते है कि केवल जिह्वा से नामोच्चारण करने से कोई लाभ नही हो सकता । कुछ। लोग ऐसे 'कीर्तन प्रेमियो' के उदाहरण देते है जो इस क्षेत्र मे वडे प्रसिद्ध हो चुके हैं, पर जिनका चरित्र और आचरण निन्दनीय है । कुछ लोग यह आक्षेप भी करते हैं कि 'कीर्तन' की आड में स्त्री-पुरुष अपनी अमवृत्तियों की पूर्ति विया करते हैं। वर्तमान दशा का भली प्रकार निरीक्षण करने पर हम कुछ अशो में इन आक्षेपा की सचाई स्वीकार करते हैं, पर साथ ही हमारा यह भी मत है कि इनके कारण कीर्तन' को न तो निन्दनीय सिद्ध किया जा मक्ता है और न उसे त्यागने की सम्मति दी जा सकती है। कीर्तन या आशय यही नहीं है कि बहुत वहा जन-समूह एत्रित होर ढोत, वाजा गाजा के माथ स्त्री-पुरुष सम्मिलित होर नामोच्चारण करें। इस सकार के सामूहिक-कीर्तन की प्रणाली श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रचलित की थी और उसके द्वारा मुसलमानी शासनकाल में निरसदेह हिन्दू-धर्म की रक्षा म बडा सहायता प्राप्त हुई थी। पहले यह विशेष से बङ्गाल में ही प्रचलिाय, इधर नीम-चालीन वर्ष मे उत्तर प्रदेश और अन्य हिन्दी-पान्तो मे भी यर लोप्रिय हो गया है।

[. २५, ] 'पा-पुराण' के अनुसार कीर्तन, समाज या व्यक्ति में उत्पन्न हो जाने 'वाला धर्म विरोधी या बाधा डालने वाली प्रवृत्तियों के निराकरण के लिये विशेष उपयोगी और सहायक है। यह एक ऐसी सीधी-साधी और साथ ही प्रभावशाली उपासना-पद्धति है जो कही भी और सभी अवस्थाओ मे प्रयुक्त की जा सकती है । पर इसमे मन और भावों की शुद्धता का ध्यान रखना अनि- वार्य है । केवल अच्छे सुर मे और भक्ति-भाव का अभिनय करते हुए कीर्तन व्यर्थ होता है । अन्यया यदि शुद्ध हृदय से तन्मयतापूर्वक किया जाय तो इससे बहुत शीघ्र परमात्मा की भक्ति का विकास होता है । 'पद्म-पुराण' में और भी कई ऐसे दोप बतलाये है, जिनका कीर्तन में त्याग देना अत्यावश्यक है । इस सम्बन्ध सनत्कुमार के मुख से कहताया गया है- "प्रथम तो नामोच्चारण करने वाले पुरुष का यही अपराध हो सकता है कि वह किसी सत्पुरुप की निन्दा करने लग जाय । दूसरा अपराध यह होता है कि अनेक व्यक्ति भक्ति करते हुये भी राम, कृष्ण, गिव आदि के नामो में भेद बुद्धि रखते है- शिवस्य श्रीविष्णोर्य इह गुण नामादि सकल । धिया भिन्न पश्येत्स खलु हरिनामा हितकरः ।। तीसरा अपराध अपने गुरु की किसी भी प्रकार अवज्ञा कर देना होता है । चौथा अपराध शति एवम् शास्त्री की निन्दा करना है । पाँचवाँ यह कि हरिनाम का जो माहात्म्य बतल या जाय उसे अर्यवाद (बनावटी या प्रशमात्मक) समझा जाय । जो व्यक्ति सदैव 'मैं और मेरा' यही ध्यान करता रहता है वह भी नाम-अपराधी होता है। जो व्यक्ति इन अपराधो को जान-बूझकर पाप बुद्धि से करता है उसका उद्धार कभी नही होता। इस जीवन मे वह उसी प्रकार दुसी रहता है जैसे माता से रुष्ट होकर भोजन न करने वाला बालक । इस प्रकार दश प्रकार के नामापराध होते हैं, इनको त्यागकर नाम का जप करने से मनुष्य का पूर्ण कल्याण होता है । इनसे विदित होता है कि 'नाम कीन' तभी कल्याणकारी होता है जब उमेह रिया श्रद्धा से f य जाता है और अपना अचरग भी पवित्र और परमार्थ [ २६ ] की भावना से समन्वित रखा जाय । वर्तमान समय में लोगों में जो झूठी साम्प्रदायिकता बढ गई है उसपे पारण भने के व्यक्ति पेवल विसी एक माम को लेने का ही आग्रह करते हैं और दूसरे नामो को अवहेलना अथवा अवज्ञा की दृष्टि से देखते हैं । इस प्रकार की भेद बुद्धि कभी सभी धार्मिकता का लक्षण नहीं हो सकती। जो धर्म और अध्यात्म का थोडा भी मर्म समभता है वह केवल 'राम' और 'शिव' के नामो को ही समान श्रद्धास्पद नही मानता वरन् बौद्ध, पारसी, ईसाई, मुसलमान आदि किमी भी मजहब में प्रयुक्त होने वाले भगवान् के नाम को आदर के भाव से ही उच्चारण करेगा। भाषा का भेद होने से भगवान् नहीं बदल जाता । इमलिये सथा धार्मिक वही है जो धर्म-समन्वय और सहिष्णुता का भाव रखे । 'धर्म' को द्वैप और कलह का कारण बना लेना उसे वदनाम और कलङ्कित करना है । सामान्य धर्म क्रियाओं का महान फल- पुराणो की एक परिपाटी यह भी है कि उनमे जहाँ जिस चीज की उपासना या पूजा का प्रतिपादन किया है वहाँ उसे एक दम आकाश पर चढा दिया जाता है । चाहे वह एक मामान्य फूल या पत्ती का भगवान् पर चढाना हो, या किसी मूर्ति का दर्शन करना हो, या किसी तीर्थ मे एक दिन का उप- वाम आदि करना हो, तो भी पुराणकार उसकी तारीफो के पुल बांध देते है । 'पद्मपुराण' मे ही जहां धात्री (आमला) और तुलसी की पूजा का जिक्र आया है, अथवा गङ्गा स्नान का माहात्म्य बतलाना गया है या एकादशी व्रत का महत्त्व दिखलाया है, वहाँ इनमे से प्रत्येक को अपार पुण्य प्रदायक, पोर से घोर पापो का उपशमन करने वाला कहा गया है। प्रत्येक के लिये यही प्रदर्शित किया गया है कि उसका अनुष्ठान करने से मनुष्य बिना किसी शङ्का के स्वर्ग और मोम का अधिकारी बन जाता है । धात्री (आमला) का फल वास्तव में स्वास्थ्य की दृष्टि से बडा उपयोगी है । पर अनेक व्यक्ति उसके स्वाद में कमलापन अधिक होने से उसका व्यवहार कम करते हैं । इसके लिये आयुर्वेद के ज्ञाताओ ने उससे 'च्यवनप्राश अवलेह' बनाया जो स्वादिट और रोग निवारक दोनो गुण रखता है। पुराणकार ने [ २७ ] सर्वसाधारण का ध्यान इस तरफ आकर्षित करने के लिये उसका धार्मिक महत्त्व भी खूब बढा-चढा कर वर्णन कर दिया है- धात्रीफलं परं पूत सर्वलोकेषु विश्रुतम् । यस्यरोपानरोनारो मुच्यते जन्मबन्धनाद । घात्रोफलं च यत्रास्ते तत्र तिष्ठति केशवः । तत्र ब्रह्म स्थिरा पमा तस्मात्तां तु गृहेन्यसेत् ।। "धात्रीफल की पवित्रता तथा श्रेष्ठता सर्वविदित है । जो पुरप या स्त्री उमका पौधा लगाते है वे जन्म-मरण के बन्धन से छुटकारा पा जाते हैं । जहाँ धात्रीफल रहता है वहाँ भगवाद केशव, ब्रह्माजी और लक्ष्मी जी सदैव विद्यमान रहते हैं।" उमाहरणार्थ तुलसी को तो सभी वैष्णव पुराणो मे विष्णु भगवान की अत्यन्त प्रिय बतलाया गया है । 'ब्रह्मदेवतं पुगण' मे उमे भगवान कृष्ण के गोलोक की एक शापग्रस्त गोपी का प्रतीक बतलाया गया है । इमी प्रकार आमले को इन्द्र के अमृत-पाय से गिरी हुई बू दो द्वारा उत्सम कहा गया है। गङ्गाजी को उत्पति वामन-भगवान् चरणोदक के रूप में नही गई है। एकादशी-ग्रत को तो निश्चित रूप में यमराज के पास से एटकारा पाने का मर्वश्रेष्ठ साधन घोषित कर दिया गया है-- एकादश्यास्तु माहात्म्यं किमह वरिम साम्प्रतम् । श्रुत्वा चंकादशी नाम यमदूताश्च शकिता ।। इस प्रकार के वर्णनो को कई पाठन अनिगयोक्तिपूर्ण ममभनर अपमा कोहि मे देसने लग जाते हैं । हन भी इसके लिये उनको अधिर दोषी नहीं रह मरते, क्योकि पौराणिक लेपो और पौराणिय श्रोताओं को मनोति से ये अनजान होते हैं । विशेषत. ही माम्प्रदायिकता की भावना बनती हो जाती है, वहाँ स्वमत का प्रतिपादन करने में ये मिनी भी दो आंतशयोक्ति फरने में संकोच नहीं करते । तुनों वारा तथा उममें मिलने वाले पुन फा अनेक पुराणों में इतना अधिक विस्तार किया गया है कि उमे एक पान पर एकत्र पर दिया जाय तो एक बड़ा पन्य बन गाना है। इसी प्रसार गहा [ २ ] - १ की महिमा का भी वारापार नहीं है, जिसके एक बार में स्नान अथवा निकट जाकर दर्शन कर लेने मात्र से समस्त पाप नष्ट होकर स्वर्ग और मुक्ति की प्राप्ति निश्चित कह दी गई है-- गगेति स्मरणादेव क्षयं याति च पातकम् । कीर्तनातिपापानि दर्शनाद् गुरुकल्मपम् ।। इस तरह की अति-प्रशसा आज हमको अरुचिकर प्रतीत होती है, पर प्राचीन समय में जब शिक्षा का व्यापक प्रचार नहीं हुआ था और लोक तर्क तथा प्रत्यक्ष प्रमाणो के बजाय हार्दिक श्रद्धा द्वारा ही अधिकाश में प्रेरित होते थे, उस समय ऐसे वर्णन सर्वसाधारण मे 'पुण्य कर्मों' की अभिरुचि उत्पन्न फरने वाले माने जाते थे और इस दृष्टि से विद्वान् लोग भी उनको बुरा नहीं कहते थे। अब समय बदल गया है । समझदार पाठक इस प्रकार की वनस्प- तिमो और उवास, स्नान आदि धर्म किसानो को उनसे होने वाले वास्तविक लाभ पी दृष्टि से ही देखा करते है। इसलिये वे प्राचीन श्रद्धावादी श्रोताओं की परिस्थिति का अनुमान नहीं कर सकते और ऐसे वर्णनो का विरोध करने लग तो भी इतना मानना पडेगा पुराण लेखको ने जिन तुलसी, गगा आदि जैसी वस्तुओ की जो अति-प्रशसा करदी है और उनसे प्राप्त होने वाले 'पुण्य' की महिमा अपरम्पार बतलाई है, वे वास्तव मे बहुत लाभकारी हैं। उनकी कथाओ को अप माने चाहे न माने पर वैज्ञानिक प्रणाली से खोज करने पर भी उनकी उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है और उनका प्रयोग स्वास्थ्यरक्षा और अनेक व्याधियों से छुटकारा पाने के लिये प्रभावशाली माना गया है । प्राचीन प्रन्यो ने जहाँ तुलसी के 'विष्णु-प्रिया' होने की मनोरजक कथाये लिखी है वहीं पही-कहीं उनके गुणो पर भी प्रभाव बना गया है- त्रिकाल विनतापुत्र प्राशय तुलसी यदि । विशिष्यते कायशुद्धिश्चान्द्रायण शत विना ॥ तुलमी गन्धमादाय यत्र गच्छति मारुत. । दिशो दशश्च पूतास्तुभूत ग्रामश्चतुर्विधः ।।

- और वही एकमात्र ऐमा जर है, जो महीनो तक रगा रहने पाइपत नही अर्थात् 'हे गरुड जी । जो व्यक्ति नियमपूर्वक प्रतिदिन तीनो समय पर का सेवन करता रहता है उसका शरीर ऐसा शुद्ध हो जाता है जैसा चान्द्रायण तो द्वारा सम्भव होता है । इसी प्रकार तुलसी की गन्ध को वायु जहाँ वहता है, वह ग्राम और वहाँ की दिशायें पवित्र और दोष. हो जाती हैं।" तुलसी के जो गुण धर्म शास्न म बतलाये गये है वे यथार्थ है और अब समय पड़ने पर उनकी सचाई प्रकट हो सकती है। एक सामयिकः पर तुलसी की स्वास्थ्य सम्बन्धी उपयोगिता का वर्णन करते हुये यह घटना ली थी- "वम्बई में जव विक्टोरिया गर्डन' और 'अलवद म्यूजियम' (अजायब- ) मा निर्माण हो रहा था तो वहां काम करने वाले मजदूर मच्छरो से ऐसे रे गये कि सबवे सब मलेरिया बुख र के शिकार हो गये और निर्माण कार्य बडी वाधा उपरियत हो गई। तब एक चतुर हिन्दु ठेकेदार ने यह सुझाव या कि वाग की मीमा के किनारे विनारे चारो तरफ तुलसी के पौधे लगा दिये है। ऐसा करने से उस क्षेत्र म से मलेरिया का प्रकोप बहुत शोध गायब हो 14 और मजदूर तथा अन्य कायवर्ती स्वस्य रहकर अपना कार्य ठीक तरह रते रहे।" इसी प्रकार आमला के विषय में वैद्या प्रन्यो म "धानी फन सदा थ्यिम्" (आमला हर तरह से स्वास्थ्यप्रद है) सिय दिया गया है आधुनिक सानिया ने मामला को 'विटामिन सी' का भण्डार बतलाया है, जिससे अनेक बीमारियां दूर होती रहती हैं । गङ्गा-जल की कीटाणु नायक प्रसिद्ध है । इसी हटि से अपचर वादगाह और उसके उत्तराधिक गङ्गा में किसी रफी शामिर श्रद्धा न रखते हुये भी सदा हरिद्वार से या हुआ गङ्गा- पिया करते थे। एकादशी को यदि वास्तव में ठीक से उपवास किया आप तो वह स्वास्थ्य रक्षा में बहुत अधिक सहायक होता है, इसमे सन्दर करने का कोई कारण हो नहीं है। x ४ [ ३० ] . इस प्रकार विविध प्रकार के उपाख्यानो द्वारा पाठको मे शारी। सिक, आत्मिक उन्नति के उपायो का प्रचार और प्रसार करना 'पद्म-पुत की एक विशेषता है। पदि कथा सुनते-सुनते पाठक, चाहे श्रद्धा की भावन और चाहे प्रत्यक्ष लाभ के विचार से, यदि कुछ उपयोगी शिक्षा ग्रहण करता तो इस 'प्रणाली' को अनुचित नही कहा जा सकता। वैसे तो यह 'महा-ग्र ५ सैकडो ही नहीं हजारो 'धर्म कथाओ' का मग्रह है जिनमे सभी रुचि और प्रक तियो के पाठको का मन लग सकता है और वे अपनी परिस्थिति के अनुसा. न्यूनाधिक लाभ भी उठा सकते हैं । वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयायिओ के लिए तो यह विशेष रूप से मग्रह किया ही गया है और वे इसमे अवश्य ही बहुत-सी की बाते पा सकेगे। हमे प्रसनता है कि हम इतने बड़े पुराण का, जिर वृहदाकार और विस्तार देखकर सामान्य पाठक उसको हाथ लगाने का सा भी कठिनता से करते है,सारतत्त्व ऐसे सर्वोपयोगी रूप में उपस्थित कर सक। सफल हो सके । यदि पाठको ने इसका पारायण करके धर्म के वास्तविक के विषय मे कुछ प्रेरणा ग्रहण की तो हम अपना परिश्रम सफल समझेंगे । -श्रीराम शर्मा आचा पृष्ठ संख्या पद्म-पुराण (प्रथम खण्ड) की विषय-सूची उपय সুশি विषय-सूची ।। सृष्टि खण्ड ॥ मङ्गलाचरण काल-परिमाण वर्णन भमुद-मथन प्रस्ताव-दुर्वासा का इन्द्र को शाप दक्ष-यज्ञ विध्वस पृथु-यश श्यन मोमवा वर्गन क्रोप्दश विस्तार वर्णन अर्जुन तथा कर्ण की उत्पत्ति और वैर का कारण... पुष्कर तीयं की उत्पति , ब्रह्मदेव कृत यज्ञ वर्णन । नन्दाधेनु-व्याघ्न उपाख्यान वृत्रासुर वध तथा अगस्त उपाख्यान, इन्द्र-शाप से अग्ति-मारत का जन्म वर्णन वामनावतार चरित्र वर्णन 'पुष्कर तीयं का निर्माण कायन राम का अगस्त्य-आथम गमन पप का आविर्भाव तारकोपत्ति वर्णन १०७ १४१ १७० १६५ २३४ २४६ २५५ २६६ २८८ रण [ ३२ ] २०. म २२. भ्र ३ ४१ १६. सर्वदेयकृत बहास्तोत्र कार्तिक का जन्म और विजय २१. नृसिंहावतार वर्णन ब्राहाण के लक्षण और महिमा २३. मिदाचार वर्णन २४. पितृ-सेवा माहात्म्य २५. तुलाधार चरित २६ धात्री और तुलसी माहात्म्य २७. गङ्गा-माहात्म्य कथन २८ गणेश द्वारा पुरि वध' २६ /सूर्प माहात्म्य वर्णन ।। भूमि खण्ड ॥ ३० पच महाभूत शरीर कथन ३१ वैराग्य तथा आत्मा का सम्वाद १३२. आत्मा के स्वरूप का वर्णन ३३ ब्रह्मचर्य लक्षण ३४ पापियो के मरण-लक्षण ३५. ब्राह्मणत्व प्राप्ति के कारण ३६ वेन का छयालिडधारी से सम्वाद ३७ वेन का वैदिक धर्म परित्याग. ३८. सुदेवा का परित्र वर्णन ३६ मेरु-पर्वत मे इक्ष्वाकु के सैनिको के साथ यूकर का युद्ध । ricein

पन-पुराण
Moran
"मृष्टिखण्ड"
। मङ्गलाचरण ।
नारायण नमस्कृत्य नरञ्च व नरोत्तमम् ।
देवी सरस्वतीञ्च व ततो जयमुदीरयेत् ।।
ॐ स्वच्छ चन्द्रावदात करिकरमकरक्षोभसञ्जातफेन,
दामोद्भूतिप्रसक्त तनियमपरैः सेवित विप्रमुख्यः ।
प्रोकारालकृतेन त्रिभुवनगुरुणा ब्रह्मणा दृष्टिपूत,
सम्भागाभोगरम्य जलमशुभहर पोष्कर कः पुनातु ॥१
सूतमेकान्तमासीन व्यासशिष्यो महामतिः ।
लोमहर्पणनामा वा उग्रश्रवसमाह तत् ॥२
ऋषीणामाश्रमास्तात गत्वा धर्मान् समासतः ।
छता विस्तराद् ब्रू हि यन्मत्तः श्रु तवानसि ॥३
दव्यासान्मया पुन पुराणान्यखिलानि च ।
तयाख्यातानि प्राप्तानि मुनिम्योवदविस्तरात् ॥४
प्रयागे मुनिवर्यश्च यथा पृष्टः स्वय प्रभुः ।
प्टेन चानुशिष्टास्ते मुनयो धर्मकाक्षिणः ॥५
६. पुण्यमभोप्सन्तो विभुना च हितं पिणा ।
सुनाभ दिव्यरूपञ्च सत्यग शुभविक्रमम् १६.
अनौपम्यमिद चक्र वर्तमानमतन्द्रिताः ।
पृष्ठतो यात नियमात् पद प्राप्स्यथ यद्धितम् ॥७

[ पद्म । . : . गच्छतो धर्मचक्रम्य यत्र नेमिविशीर्यते । पुप्य: स देशो मन्तव्य इत्युवाच स्वयम्प्रभुः ॥८ परम पुगए पुरुष भगवान् नारायण तथा नरो मे सबंधेष्ठ नर । विद्या, बुद्धि की षिष्ठात्री देवी भगवती सरस्वती को नमस्कार करके । जय पान्द का उच्चारण करना चाहिए। परम लिमंल चन्द्रमा के समान, दर्ण से युक्त, हाथियो की सूड और मकरो के निरन्तर सञ्चालन से फेनो वाला, ब्रह्म की उत्पत्ति में संलग्न चित्त वाले, प्रत भोर नियमो के 41 पालन करने में तत्पर, प्रमुख विप्रवृन्दो के द्वारा भली-भांति सेवन किया पोवार से सविभूषित, सोनो भवनों के गुरु प्रति जनक तथा ब्रह्माजी को दृष्टि के पति से परम पुनीत, सम्भोग एव प्राभोग के करने सुरम्य और प्रमङ्गल के हरण करने वाला पोकर अर्थात् पद्म सम्बन्धी मापको पवित्र करे ॥ १॥ नितान्त एकान्त मे बैठे हुए भूतजी से महान मति व्यास जी के शिष्य अथवा लोम हर्पण नाम वाले उग्रश्रवा यह बोले ॥२॥ हे तात ! ऋपिगरण के पाश्रमों में जाकर सक्षेप से धर्म के विषय में पूछने या को जो मुझसे आपने श्रवण किया है उसे अब विस्तारपूर बतलामो ||३|| पुत्र ! भापके द्वारा कहे हुए समस्त पुराण मैंने वेद व्यासजी से प्राप्त किये हैं , अब मुनियो से विस्तार के साथ कहो।।४। प्रयाग मे मुनियो मे श्रेष ममुदाय के द्वारा प्रभु आप से स्वयं पूछा गया था। पूछे जाने पर प्रापने धर्म के ज्ञा की प्राकाँक्षा रखने वाले मुनिगण को अनुशिष्ट किया था अर्थात् उनको भला। भौति उपदेश देकर शासित किया था। ॥ सर्वत्र व्यापक और हित के चाहने वाले मापके द्वारा परम पुण्य देश के जानने की इच्छा रखने वाले ऋपियो से सुनाम, दिव्य रूप वाला, सत्य पर गमन करने वाला, शुभ विक्रमशील, उपमा से रहित यह वर्तमान चक्र है । इस पर निस्तन्द्र अर्थात् परम सावधान होकर पंछे चले जाओ तो जो हितकर पद है उसे अवश्य ही प्राप्त कर लोगे ।।६७१ इस गमन करने वाले धर्म चक्र को जहाँ पर नेमि विशीर्ण हो जाये वही परम- पुण्यमय देश है-ऐसा मापने स्वय ही कहा था ll उक्त्वा चवमृपीन् सर्वानदृश्यत्त्वमगात् पुनः । गङ्गावर्तसमाहारो नेमियंत्र व्यशीर्यत |

मङ्गलाचरण ]
[ ३५
ईजिरे दीर्घसत्रेण ऋपयो नमिपे तदा।
तत्र गत्वा तु तान् ब्रू हि पृच्छतो धर्मसंशयान् ॥१०
उग्रश्रवास्ततो गत्वा ज्ञानविन्मुनिपुङ्गवान् ।
अभिगम्योपसंगृह्य नमस्कृत्वा कृताञ्जालः ॥११
तोपयामास मेधावी प्रणिपातेन तानृपीन् ।
ते चापि सत्रिणः प्रीता ससदस्या महात्मने ॥१२
तस्मै समेत्य पूजाच यथावत् प्रतिपेदिरे ॥१३
कुतस्त्वमागतः मूत कस्माद्देशादिहागतः।
कारणञ्चागमे ब्रूहि वृन्दारकपमधु ते ॥१४
इस प्रकार से उन समस्त ऋपगरणो से कहकर फिर भाप अदृश्यता को
प्राप्त हो गये थे अर्थात् छिप गये थे। जहां पर गङ्गा के प्रावर्त का समाहार है
वहाँ नेमि विशीर्ण हो गई थी। उस समय उस नमिप क्षेत्र मे ऋषियों ने दीर्घ
सत्र के द्वारा यजन किया था। वहाँ जाकर धर्म के विषय में समुस्थित अनेक
सशयो को पूछने वालो को वे सब बतलाओ ।।६।१॥ इम अनन्तर ज्ञान के
परम वेत्ता उग्रश्रवा वहाँ जाकर पहुंचे मोर उन श्रेष्ठ मुनिगण के समीप जाकर
हाथ जोड़कर उन एकत्रित सबको सादर प्रणाम क्यिा ॥११॥ परम मेघा सपन्न
उनने प्रणिपात की विधि से समस्त ऋपियो को सन्तुष्ट किया था । सत्र करने
वाले वे सब भी सदस्यो के सहित परम प्रसन्न हुए और वे सब उन महान्
मात्मा वाले के समीप आकर यथा शैति उनको सबने पूजार्चना की थी।१२।
ऋपियो ने कहा-हे सूतजी | प्राप तो देवो के समान तेज वाले हैं। इस
समय में प्रापका यहाँ पर किस कारण से प्रागमन हुआ है और किस देश से
उसे बतलाने की कृपा करें आपके यहाँ पधारकर आने का जो भी कारण हो
मापने यहाँ पदार्पण किया है ? ॥१३।१४।।
पियाऽहन्तु समादिष्टो व्यामशिष्येण धीमता ।
शुथ पस्व मुनीन् गत्वा यत्ते पृच्छन्ति तद्वद ॥१५
वदन्तु भगवन्तो मा कथयामि कथान्तु याम् ।
पुराणञ्चतिहासं वा धर्मानथ पृथग्विधान् ।।१६

[ पापुर
-
सुरम्य
गच्छतो धर्मचक्रम्य यत्र नैमिविशीर्यते ।
पुष्य स देशो मन्तव्य इत्युवाच स्वयम्प्रभु. 10
परम पुगण पुरुष भगवान् नारायण तथा नरो मे सर्वश्रेष्ठ नर ए
विद्या, बुद्धि को मधिष्ठात्री देवी भगवती सरस्वती को नमस्कार करके
जय शब्द का उच्चारण करना चाहिए । परम निमल चन्द्रमा के समान,
वर्ण से मुक्त, हापियो की सूड भोर मकरो के निरन्तर सञ्चालन से
फेनो वाला, ब्रह्म की उत्पत्ति में संलग्न चित्त वाले, प्रत मोर नियमो के ५:
पालन करने में तत्पर, प्रमुख विप्रवृत्दो के द्वारा भली-भांति सेवन किया
प्रोङ्कार से सविभूषित, तीनो भुवनो के गुरु अर्थात् जनक तथा जान
ब्रह्माजी को दृष्टि के पात से परम पुनीत, सम्भोग एव प्राभोग के करने
और
प्रमङ्गल
के हरण करने वाला पोहकर अर्थात् पदा सम्बन्धी
मापको पवित्र करे ।।१॥ नितान्त एकान्त मे बैठे हुए मूतजी से महान् मति ५।'
व्यास जी के शिष्य अथवा लोम हर्षया नाम पाले उग्रश्रवा यह बोले ॥२॥
है तात ! ऋषिगण के प्राश्रमों में जाकर संक्षेप से धर्म के विषय में पूछने
को जो मुझने मापने श्रवण किया है उसे मब विस्तारपूर्वक बतलामो ॥३।।
पुत्र मापके द्वारा कहे हुए समस्त पुराण मैंने वेद व्यासजी से प्राप्त किये हैं
पब मुनियो से विस्तार के साथ कहो ॥४॥ प्रयाग मे मुनियो , मै धेष समुदायों
के द्वारा प्रभु आप से स्यं पूछा गया था। पूछे जाने पर प्रापने धर्म के ज्ञा
को प्राकांक्षा रखने वाले मुनिगण को अनुशिष्ट किया था अर्थात् उनको भनी
भाँति उपदेश देकर शासित किया था । ॥ सर्वत्र व्यापक और हित के चाहने
वाले मापके द्वारा परम पुण्य देश के जानने की इच्छा रखने वाले ऋषियो से
सुनाभ, दिव्य रूप वाला, सत्य पर गमन करने वाला, शुभ विक्रमशील, उपमा
से रहित यह वर्तमान चक्र है । इस पर निस्तन्द्र अर्थात् परम सावधान होकर
पंछे चले जाओ तो जो हितकर पद है उसे अवश्य हो प्राप्त कर लोगे
इस गमन करने वाले धर्म चक्र को जहाँ पर नेमि विशोणं हो जाये वही परम.
पुण्यमय देश है-ऐसा मापने स्वर हो कहा था ll
उक्त्वा चवमृपीन् सर्वानश्यत्वमगात् पुनः ।
गङ्गावर्तसमाहारो नेमिर्यत्र व्यशीर्यत ||
।
॥६७॥

मङ्गलाचरण ] [ ३५ ईजिरे दीर्घसत्रेण ऋपयो नमिपे तदा। तत्र गत्वा तु तान् ब्रूहि पृच्छतो धर्मसशयान् ॥१० उग्रश्रवास्नतो गत्वा ज्ञानविन्मुनिपुङ्गवान् । अभिगम्योपसंगृह्य नमस्कृत्वा कृताञ्जालः ॥११ तोपयामास मेधावी प्रणिपातेन तानृपीन् । ते चापि सत्रिणः प्रीता ससदस्या महात्मने ॥१२ तस्मै समेत्य पूजाच यथावत् प्रतिपेदिरे ॥१३ कुतस्त्वमागत. सूत कस्माद्देशादिहागतः । कारणञ्चागमे ब्रूहि वृन्दारकममधु ते ।।१४ इस प्रकार से उन समस्त ऋपिगणो से कहकर फिर पाप अदृश्यता को प्राप्त हो गये थे अर्थात् छिप गये थे। जहाँ पर गङ्गा के प्रावर्त का समाहार है वहाँ नमि विशीर्ण हो गई थी । उस समय उम न मिप क्षेत्र मे ऋषियो ने दीर्घ सत्र के द्वारा यजन किया था। वहाँ जाकर धर्म के विषय में समुत्थित अनेक सशयो को पूछने वालो को वे सब बतलाओ ।।६।१०॥ इस अनन्तर ज्ञान के परम वेत्ता उग्रश्रवा यहाँ जाकर पहुंचे प्रौर उन श्रेष्ठ मुनिगरा के समीप जाकर हाय जोडकर उन एकत्रित सबको सादर प्रणाम रिया ॥११॥ परम मेधा सपन्न उनने प्रणिपात की विधि से समस्त ऋपियो को सन्तुष्ट किया था । सत्र करने वाले वे सब भी सदस्यो के सहित परम प्रसन्न हुए और वे सब उन महान् प्रात्मा वाल के समीप आकर यथा ऐति उनकी सबने पूजार्चना की थी ॥१२॥ ऋपियो ने कहा है मूतजी प्राप तो देवो के समान तेज वाले हैं। इस समय में प्रापका यहाँ पर विस कारण से प्रागमन हुआ है और किस देश से उसे बतलाने की कृपा करें आपके यहाँ पधारकर आने का जो भी कारण हो मापने यहाँ पदार्पण किया है ? ॥१३.१४।। पियाऽहन्तु समादिष्टो व्यामशिष्येण धीमतः । शुश्रू पस्व मुनीन् गत्वा यते पृच्छन्ति तद्वद ॥१५ वदन्तु भगवन्तो मा कथयामि कथान्तु याम् । पुराणञ्च तिहासं वा धर्मानथ पृथग्विधान् ॥१६ [ पद्म-पुराण तां गिरं मधुरां तस्य शुश्रु वुपिसत्तमाः । अथ तेषां पुराणस्य शुभ्र पा समपद्यत ॥१७ दृष्ट्वा तमतिविश्वस्तं विद्वांसं लोमहर्पणिम् । तस्मिन् सो कुलपतिः सर्वशास्त्रविशारदः ॥१८ शौनको नाम मेधावी विज्ञानारण्यके गुरुः इत्यं तद्भावमालव्यं धर्मान् शुश्रू पुराह तम् ॥१६ त्वया सूत महाबुद्ध भगवान् ब्रह्मवित्तमः । इतिहासपुराणार्थ व्यासः सम्यगुपासितः॥२० दुदोहिथ मति तस्य त्वं पुराणाश्रयां शुभाम् । अमीपां विप्रमुख्याणां पुराणं प्रतिसम्प्रति ॥२१ शुश्र पास्ते महाबुद्ध तच्छावयितुमहसि । सर्वे होमे महात्मानो नानागोत्राः समागता ॥२२ ऋषियो के इस प्रश्न का सूत जी ने उत्तर दिया-परम बुद्धिमान, व्यास मदपि के शिष्य पिनाजी के द्वारा मुझे प्राज्ञा हुई है कि मुनिगण की जाकर सेवा करो और वे जो भी कुछ धर्म के विषय में पूछे उसे भली-भांति उन्हे बतलाओ ॥१५॥ प्रतएव भव प्राप लोग मुझे बतलायें जिम कथा को मैं मापके समक्ष में कहूं, मैं पापको पुराण-इतिहास सुनाऊँ या पृथक् पृथक् प्रकार के धर्मों को प्रवण कराऊं ॥१६॥ उन परम श्रेष्ठ ऋपिवृन्द ने सूतजी को उस अतिशय मधुर वाणी को सुना मोर इसके मनन्तर उन सबकी पुराणों के श्रवण करने को ममिलापा उत्पन्न हुई थी ॥१७॥ महान् विद्धन अत्यन्त विश्वस्त लोमहर्षरिण को देखकर उस सत्र में समस्त शास्त्री के महामनीयो के कुलपति थे ॥१८॥ वे महपि शोनक थे को बडे हो मेघावी थे और विज्ञानारण्यक में गुरु थे, उनने इस प्रकार से उनके भाव को प्राप्त कर घमं के विषय में श्रवण करने को इन्धा वाले ने सूतजी से कहा ॥१६॥ हे सूतगे। प्राय तो महान् बुद्धिमान हैं ब्रह्मवेत्ताओ मे परमधेष्ट भगवान् व्याप्त जी की उपासना मापने इतिहास- पुराणों के ज्ञानार्जन के लिए भली-भांति को है ॥२०॥ प्रापने पुगणो के रखने वाली उस शुभ उनको मति का दोहन किया है। अब इन विप्रों प्रमुग इन सबकी पुराणों के प्रति धारण करने की इच्छा उत्पन्न हुई है सो ।

.३८ ] [ एम-पुराण सबको आप लोगो को बतलाता हूँ ॥२७॥ सत्पुरुषों ने देवगणो का, पियों का मौर मपरिमित तेज से समन्वित राजाओं का यह सनातन सूत का धर्म देखा है ॥२८॥ वंशानां धारणं कार्य स्तुतीनाञ्च महात्मनाम् । इतिहासपुराणेषु दृष्टा ये ब्रह्मवादिनः ॥२६ न हि वेदेष्वधिकारः कश्चित् सूतस्य दृश्यते । वैन्यस्य हि पृयोर्यज्ञे वर्तमाने महात्मनः ।।३० मागधश्च व सूतश्च तमस्तोता नरेश्वरम् । तुप्टेनाथ तयोर्दत्तो वरो राज्ञा महात्मना ॥३१ सूताय सूतविषयो मगधो मागधाय च । तत्र सूत्यां समुत्पन्न सूतो नामेह जायते ॥३२ ऐन्द्र सने प्रवृत्ते तु ग्रहयुक्त बृहस्पती। तमेवेन्द्र बार्हस्पत्ये तत्र सूतो व्यजायत ।।३३ शिष्यहस्तेन यत् पृक्तमभिभूतं गुरोहविः । अधरोत्तग्धारेण जज्ञे तद्वर्णसङ्करम् ॥३४ येऽत्र क्षत्रात समभवन् ब्राह्मण्याश्चैव योनितः । पूर्वेणैव तु साधा धर्मास्ते प्रकीर्तिताः ॥३५ मध्यमो ह्यप सूतस्य धर्मः क्षेत्रोपजोविन. । पुराणेष्वधिकारो मे विहितो ब्राह्मणरिह ॥३६ इतिहास-पुराणों में जो ब्रह्मवादी गण देखे गये हैं उनके वंशो का धारण करना तथा महात्मामो की स्तुतियों का धारण करने का कार्य है ॥२६॥ वेदों में मूतजी का कोई भी मधिकार नहीं दिखलाई देता है । वेन राजा के पुत्र पृथु जो एक महान प्रात्मा वाले थे, उनके वर्तमान यज्ञ में मागप पोर मूत ने उम नृपति का स्तवन किया था। उस स्तुति से परम सन्तुष्ट महात्मा राजा ने उन दोनों को वरदान दिया था ॥३०॥३१॥ सून का विषय सून के लिये भौर मागध के लिये मगध दिया था। उस समय मे मूति में समुत्पन्न होने से यहाँ 'मूत'- यह नाम इनका हो जाते है ||३२॥ ऐन्द्र सत्र में प्रर्थात् इन्द्र के द्वारा किये गये

मङ्गलाचरण ]
[ ३६
मत्र में समस्त ग्रहों से युक्त वृहस्पति के प्रवृत्त होने पर उम वाहम्पत्य मे उमी
इन्द्र के सूत उत्पन्न हुए थे ॥३३॥ शिष्य के हाथ से पृक्त एव अभिभूत जो गुरु
का हविधा उसको अधरोन्तर धारण करने से। यह वर्ण-सहर की उत्पत्ति हुई
थी ॥३४ । जो यहाँ पर ब्राह्मणी की योनि से क्षत्रिय के द्वारा समुत्पन्न हुए
पूर्व के ही माघम्यं से वैधमं प्रकीत्तित हुए हैं ॥३॥ क्षेत्रों से अपनी जीविका
धनाने वाले सून का यह मध्यम धर्म है । मैंने यहां पर ब्राह्मणों के साथ उनका
केवल पुराणो मे ही अधिकार दिया था ॥३६।।
दृष्ट्वा धर्ममह पृष्टो भवद्भिव ह्मवादिभिः ।
त-मात् सम्यग भुवि न यां पुराणमृषिपूजितम् ॥३७
पितृणा मानसी कन्या वासव समपद्यत।
आपध्याता च पितृभिर्मत्स्यगर्भ बभूव सा ॥३८
अरणीव हुताशस्य निमित पुण्यजन्मनः ।
तस्या बभूव पूतात्मा महपिस्तु पराशरात् ॥३६
तस्मं भगवते कृत्वा नमः सत्याय वेधसे ।
पुरुपाय पुराणाय ब्रह्मवाक्यानुवत्तिने ।।
मानवच्छमरूपाय विष्णवे शंसितात्मने ।
जातमात्रञ्च यं वेद उपतस्थे ससंग्रहः ॥४०
मतिमन्यानभाविध्य येनासो श्रुतिसागरात् ।
प्रकाशो जनितो लोके महाभारतचन्द्रमाः ॥४१
भारतं भानुमान् विष्णुर्यदि न स्युरमी वयः ।
ततोऽज्ञानतमोन्धस्य कावस्या जगतोभवेत् ॥४२
प्रहा के वाद करने वाले, प्रयं वेदों की चर्चा करने वाले आप लोगों ने
धर्म को देखकर हो मुझसे पूछा है । इमलिये मैं उस भू-मण्डल में ऋपियों के
दारा मम्पूजित पुराण को भली मानि कहता हूँ ॥३७॥ पितृगण की मानमी
पन्या दामन पर्षात् इन्द्र के हुई थी। वह पितृगण के द्वारा अपघ्यात होती हुई
प्रस्प के गर्भ से हुई पो ॥३॥ जिस तरह भरणी में मग्नि का निवाम रहता
है उमी भान पूर्व जन्मा का निमित्त म उममें पराशर से पवित्र मारमा पारे
-

. ३८ ] [ पग-पुराण सबको आप लोगों को बतलाता हूँ ॥२७॥ सत्पुरुषों ने देवगणों का, ऋषियों का मौर अपरिमित तेज से समन्वित राजाओं का यह सनातन सूत का घमं देखा है ॥२८॥ वंशानां धारणं कार्य स्तुतीनाञ्च महात्मनाम् । इतिहासपुराणेपु दृष्टा ये ब्रह्मवादिनः ॥२६ न हि वेदेष्वधिकारः कश्चित् सूतस्य दृश्यते । वैन्यस्य हि पृयोर्यज्ञे वर्तमाने महात्मनः ॥३० भागघश्च व सूतश्च तमस्तोता नरेश्वरम् । तुष्टेनाथ तयोर्दत्तो वरो राजा महात्मना ॥३१ सूताय सूतविपयो मगधो मागधाय च । तत्र सूत्यां समुत्पन्न. सूतो नामेह जायते ॥३२ ऐन्द्र सो प्रवृत्ते तु ग्रहयुक्त वृहस्पती । तमेवेन्द्र बार्हस्पत्ये तत्र सूतो व्यजायत ॥३३ शिष्यहस्तेन यत् पृक्तमभिभूतं गुरोर्हविः । अधरोत्तरधारेण जज्ञे तद्वर्णसङ्करम् ॥३४ येऽत्र क्षत्रात समभवन ब्राह्मण्याश्चंव योनितः । पूर्वणव तु साधा धर्मास्ते प्रकीर्तिताः ॥३५ मध्यमो ह्यप सूतस्य धर्मः क्षेत्रोपजीविनः । पुराणेष्वधिकारो मे विहितो ब्राह्मणैरिह ।।३६ इतिहास-पुराणों में जो ब्रह्मवादी गण देखे गये हैं उनके वंशों का धारण करना तथा महात्मापों को स्तुतियों का धारण करने का कार्य है ॥२६॥ वेदों में मूती का कोई भी मधिकार नहीं दिखलाई देता है । वेन राजा के पुत्र पृथु जो एक महान् पात्मा वाले थे, उनके वर्तमान यज्ञ में मागय मौर मूत नृपति का स्तवन किया था। उस स्तुति से परम सन्तुष्ट महात्मा राजा ने उन दोनों को वरदान दिया था ॥३०॥३१॥ मून का विषय मून के लिये और मागध के लिये मगप दिया था । उम समय में मूति में समुत्पन्न होने से यहाँ 'मून'- यह नाम इनका हो जाता है ॥३२॥ ऐन्द्र मत्र में प्रर्थात् इन्द्र के द्वारा किये गये . ने राम मङ्गलाचरण ] [ ३६ । मत्र मे समस्त ग्रहो से युक्त वृहस्पति के प्रवृत्त होने पर उम वाहंम्पत्य में उमी इन्द्र के सूत उत्पन्न हुए थे ।।३३॥ शिष्य के हाथ से पृक्त एव अभिभूत जो गुरु का हविधा उमको अधरोन्तर धारण करने से यह वर्ण-सकर की उत्पत्ति हुई थी 1३४ । जो यहां पर ब्राह्मणी की योनि से सत्रिय के द्वारा समुत्पन्न हुए पूर्व के ही माधम्यं से वैधमं प्रकीतित हुए हैं ॥३॥ क्षेत्रो मे पानी जीविका घनाने वाले सूत का यह मध्यम धर्म है । मैंने यहां पर ब्राह्मणों के साथ उनका केवल पुराणो मे ही अधिकार दिया था ॥३६॥ दृष्ट्वा धर्ममह पृष्टो भवद्भिर्वह्मवादिभिः । त मात् सम्यग भुवि ब यां पुराणमृपिपूजितम् ॥३७ पितृणा मानसी कन्या वासव समपद्यत । प्रापध्याता च पितृभिमत्स्यगर्भ बभूव सा ।।३८ अरणीव हुताशस्य निमित्त पुण्यजन्मनः । तस्या बभूव पूतात्मा महपिस्तु पराशरात् ।।३६ तस्मै भगवते कृत्वा नमः सत्याय वेधसे । पुरुषाय पुराणाय ब्रह्मवाक्यानुवत्तिने । मानवच्छद्मरूपाय विष्णवे सितात्मने । जातमात्रश्च यं वेद उपतस्थे ससंग्रहः ॥४० मतिमन्यानभाविध्य येनासो थ तिसागरात् । प्रकाशो जनितो लोके महाभारतचन्द्रमाः॥४१ भारत भानुमान् विष्णुर्यदि न स्युरमी त्रयः । ततोऽज्ञानतमोन्धस्य कावस्या जगतोभवेत् ॥४२ ब्रह्म के वाद करने वाले, मयं वेदो की चर्चा करने वाले आप लोगों ने धर्म को देखकर हो मुझसे पूछा है । इमलिये मैं उस भू-मपहल में ऋपियों के दारा मम्पूजित पुरण को भली मानि कहता हूँ ॥३७॥ पितृगण की मानमो पग्या वासन प्रर्षात् इन्द्र के हुई थी। यह पितृगण के द्वारा •n मरूप के गर्भ से हुई यो ॥३८धिम तरह परणी मे मगि म रहना ६ उमा भान पूर्व जन्मा का निमित्त का उममें परासर से पति मारमा पारे २ होती हुई

४० ]
। पद्म-पुराण
महर्षि समुत्पन्न हुए थे ॥३६॥ ब्रह्म वाक्य का अनुवर्तन करने वाले, सत्य,
वेधा, पुर ए पुरुष्ट, मानय का घम स्वरूप धारण करने वाले प्रशमनीय मारमा
भगवान् विष्णु के लिये प्रणाम किया था जिनको कि उत्पन्न होते ही सग्रह
सहित समस्त वद उपस्थित था ॥४०॥ जिसने इस प्रतिगहन थुति स्वरूप सागर
से अपनी मति रूपिणी मथानिय से मच्छी तरह मन्थन करके इस लोक में महा.
भारत रूपी चन्द्रमा का प्रकाश समुत्पात विया या ।.४१।। इस जगत् मे भारत
अर्थात् महाभारत ग्रन्थ, सूर्यदेव और भगवान् विष्णु ये तीन न होते तो अज्ञान
के पन्धकार से युक्त इस जगत् की न मालूम क्या दशा हुई होती ॥४२।।
कृष्ण पायन व्यास विद्धि नारायण प्रभुम् ।
को ह्यन्य: पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद्भवेत् ।।४३
तस्मादहमुपाश्रौष पुराण ब्रह्मवादिनः ।
सर्वज्ञात सर्वलोकेषु पूजिताद्दीप्ततेजसः ।।४४
पुराण सर्वशास्त्राणा प्रथम ब्रह्मरणास्मृतम् ।
उत्तम सर्वलोकाना सर्वज्ञानोपपादकम् ॥४५
त्रिवर्गसाधन पुण्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
नि शेषेषु च लोकेषु वाजिरूपेण केशवः ।।४६
ब्रह्मणस्तु समादेशादानाहृतवानसौ ।
अङ्गानि चतुरो वेदान् पुराणन्यायविस्तरम् ॥४७
असुरेणाखिल शास्त्रमपहृत्यात्मसात्कृतम् ।
मत्स्यरूपेणाजहार कल्पादावुदकार्गवे ॥४८
प्रशेपमेतदवददुदकान्तर्गतो विभुः।
यत्वा जगाद च मुनीन् प्रति वेदाश्चतुर्मुखः ।।४६
कृष्ण द्वैगायन महर्षि व्यास जी को साक्षात् प्रभु नारायण ही समझना
चाहिए । भगवान् पुण्डरीकाक्ष नारायण के मतिरिक्त अन्य कौन हो सकता है
को महामारठ जैसे उत्तम ग्रन्य की रचना कर सके ॥४३॥ नन्ही परम ब्रह्मवादी,
मब कुछ के जोडा, सम्पूर्ण लोको मे पूजित, पोत तेज वाले महर्षि व्यासदेव
से मैंने पुराणों का वरण किया है ॥४४॥ ब्रह्माजी ने समस्त पात्री का सार

मङ्गाचरण [ ४. पुराण को सर्व प्रथम बताया है । यह सब लोको में उत्तम है और सभी प्रकार के ज्ञान का उप पादक है ॥४५॥। यह त्रिवर्ग का साधन, परम पुण्यमय और शतकोटि विस्तार वाला है। शेष लोकों में वे शव भगवान ने वाजि रूप से ब्रह्मा के आदेश से वेदो का ममाहाण किया था। चारो वेद, उनके पङ्ग शास्त्र, पुराण एव न्याय विस्तार सम्पूर्ण शास्त्रो को असुर ने पपहरण करके मात्ममात् कर लिया था। इल्प के मादि काल मे उदकार्णव मे मत्स्य रूप धारण कर सबका उद्धार किया था ॥४६॥४७१४८॥ जल के ही अन्दर स्थित होते हुए विमु ने यह सम्पूर्ण बतलाया था। चतुर्मुख ब्रह्माजी ने उसका श्रवण कर सम्पूर्ण वेदो को मुनियो को बतलाया था ॥४६॥ प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणस्याभवत्तदा । कालेनाग्रहण दृष्ट्वा पुराणस्य तदा विभुः ।।५० व्यासरूपस्तदा ब्रह्मा सग्रहार्य युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे जगौ ।।५१ तदाष्टादशधा कृत्वा भूलोकेऽस्मिन् प्रकाशितम् । अद्यापि देवलोकेषु शतकोटिप्रविस्तरम् ।।५२ तदेवात्र चतुर्लक्षं समेपेण निर्देशितम् । प्रवक्ष्यामि महापुण्यं पुराणं पामसंज्ञितम् ॥५३ तत्रादौ सृष्टिखण्डं स्वाद्भूमिसण्डंततःपरम् । स्वर्गखण्ड ततः पश्चात्तत. पातालखण्डकम् । पञ्चमञ्च ततः स्यातमुत्तरखण्डमुत्तमम् ।।५४ एतदेव महापद्ममुद्भूत यन्मयं जगत् । तद्वृत्तान्ताश्रय यस्मात् पायमित्युच्यते ततः ॥५५ उम समय में समस्त शस्त्रों की तथा पुगणों की प्रवृत्ति हुई थी फिर बुध काल ऐमा आया कि पुराणों का यणादि ग्रहण करना कम हो गया था। उम समय में विमु स्वयं धाम में प्रयोग हुए पे ॥५.1 इम रह पास के साप में स्थित ब्रह्माजी ने युग-युग में सपह पिया था और तार-द्वार में पार सास प्रमाण धाले पुराणों को धनमाया पा॥५१॥ ये पठारह होकर इम ४२ ] { पद्म पुराण भू-मण्डल मे प्रकाशित हुए हैं किन्तु देवलोको मे माज भी शतकोटि प्रकृष्ट विस्तार युक्त हैं ।।५२।। वह ही यहां पर मक्षेप से चार लाख निवेशित किया गया है। प्रत्र हम महान पुग्यमय पाप सज्ञा वाले महा पुराण को बतलाते हैं ॥५३। इस पान पुराण के आदि मे सृष्टिपण्ड है और इसके प्रागे भू-मण्डल है। फिर उसके पीछे स्वर्ग खण्ड और इसके अगे इसमे पाताल खण्ड है । इर के अनन्तर पाचवा सबसे उत्तम उत्तर खण्ड के नाम से प्रख्यात है ॥५४॥ यह ही महापय उद्भूत हुमा था जिससे पूरणं यह जगत् है । उमके सम्पूण वृत्तान्त का यह आश्रय है इसी कारण से इस महा पुराग का पाम यह नाम कहा जाता है ॥५॥ एतत् पुराणममल विष्णुमाहात्म्यनिर्मलम् । देवदेवो हरियंढे ब्रह्मरणे प्रोक्तवान् पुरा ॥५६ ब्रह्मणाभिहित पूर्व यावन्मात्र मरीचये। एतदेव च वै ब्रह्मा पाय लोके जगाद वै ॥५७ पञ्चभिःपर्वभि प्रोक्त सक्षेपाद्वधासकारितात् । पौधकर प्रथम पर्व यत्रोत्पन्न स्वय विराट् ॥५८ द्वितीय तीर्थपर्व स्यात् सर्वग्रहगणाश्रयम् । तृतीयपर्वग्रहणा राजानो भूरिदक्षिणा: ५६ वशानुचरितश्च व चतुर्थे परिकीर्तितम् । पञ्चमे मोक्षतत्वश्च सर्वतत्व निगद्यते ॥६० पौष्करे नवधा सृष्टि सपा ब्रह्मकारिता । देवनाना मुनीनाच पितृसर्गस्तथापरः 1.६१ द्वितीये पर्वताच्च व द्वीपा: राप्त ससागरा । तृतीये रुद्रसगंस्तु दक्षशापस्तथैव च ॥६२ चतुर्थ सम्भयो राना सर्ववशानुकीर्तनम् । अन्त्येऽपवर्गमस्थान मोक्षमास्वागीय सवमेतत् पुराणेऽस्मिन् कथयिष्यामि वो द्विजा ॥६४ इद पवित्र यशसो निधानमिद पितृणामतिवल्लभ स्यात् । इश्च देवस्य मुग्माय नित्यमिद महापातभिच्च पुसाम् ॥६५ कालपरिमाण वर्णन ] [ ४३ यह महा पुगण मन से रहित और भगवान विष्णु के माहात्म्य के होने के कारण प्रत्यन्त निर्मन है। देवो के भी देव श्रीहरि ने पहले इसे ब्रह्माजी से कहा था ॥५६॥ इसके अनन्तर पहिले ब्रह्मा ने जितना भाग मरीचि ऋपि से पहा था, इसी को ब्रह्मा ने लोक में इसको पान इस नाम से कहकर बताया या ॥५७ । यह पांच पा से युक्त सक्षेप मे महर्षि वेद व्याम के द्वारा कहा गया था। उन पाँव पो में प्रथम पोकर नाम वाला पर्व है जिसमे विराट् पुरुष स्वयं समुत्पन्न हुए थे । ५८|| दूसरा तीर्थ पर्व है जिसमे समस्त ग्रह गण का वर्णन किया गया है । तृतीय पर्व मे बहुत दक्षिणा देने वाले राजाओं का वर्णन है । चतुर्थ पर्व में वंशानुचरित का परिवर्तन किया गया है। पांचवें पर्व में मोमतत्त्व एवं सर्वतत्व कहा जाता है ।।५६ ६०॥ सर्व प्रथम पोकर पर्व में नो प्रकार की सृष्टि का वर्णन है और सबका सृजन ब्रह्माजी के द्वारा किया गया है । उसमे देवों का, मुनियों का पोर पितृगण का सगं बताया गया है । दूसरे मे पर्वत, द्वीप, सान सागगे के सृजन वा वर्णन किया गया है । (तीमरो रुद्रमगं है जिसमे प्रजापति दक्ष के शाप प्रादि का वर्णन है ॥६११६२।। (चतुर्थ सर्ग मे राजाओ की समुत्ति का वर्णन है और सबके वंशों का अनु कीर्तन किया गया है । अन्तिम मे भर वर्ग के संस्थान का कथन है और मोक्ष शास्त्र का वर्णन किया गया है ।।६३॥ हेद्विजगरण | इस पान महापुराण यह सभी विषय गित किय गया है । वह हम सभी प्रापको बत येंगे ।।६४॥ यह मह पुराण परम पवित्र है और यश को प्रदान करने वाला निधान है। यह पितृगण का अत्यन्त प्रिय है । यह महा पुराण देवतानो को सुख देने वाला है और मनुष्यो के समस्त पातको का नित्य नाश करने वाला है ॥६॥ कालपरिमाण वर्णन निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याथ महात्मनः । कथ सर्गादिकर्तृत्वं ब्रह्मणो ह्य पपद्यते ॥१ शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्याज्ञानगोचरा। यत्ततो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः ॥२

[ पद्य-पुराण
उत्पन्नःप्रोच्यते विद्वान्नित्य एवोपचारतः ।
निजेन तस्य मानेन आयुर्वपंशतं स्मृतम् ॥३
तत्परास्यं परार्द्धञ्च तदद्ध परिकीर्तितम् ।
काष्ठा पञ्चदशाख्याता निमेपो नृपसत्तम ॥४
काष्ठास्त्रिशत्कलास्त्रिशत्कला मोहूतिको विधिः ।
तावत्संख्यरहोरात्रं मुहूर्तमानुपस्मृतम् ॥५
मोरामारिण तावन्ति मासः पक्षद्वयात्मकः ।
तैः पमिग्यनं वर्षमयने दक्षिणोत्तरे ॥६
अयनं दक्षिणं रात्रिर्देवानामुत्तरं दिनम् ।
दिव्यवसहस्र स्तु कृतत्रेतादिसंज्ञितम् ॥७
भीष्म पितामह ने पुलस्त्य ऋपि से कहा है ऋषिवर ! ब्रह्म तो परम
विशुद्ध महान् प्रत्मा बाला है यह रिगुण एवम् मप्रमेय है अर्थात प्रमा नाम
.वाली बुद्धि का विपप नहीं है, ऐसे ब्रह्मा को इस समस्त सर्ग प्रादि का कर्ता
होना किस प्रकार में सगत हो मकता है ? पुलस्त्य ऋप ने कहा--समस्त
मावों की शक्तियो अचिन्त्य मर्थात् चिन्तन करने के योग्य नहीं हैं, वे तो केवल
ज्ञान के द्वारा ही गोचर होती हैं । इस कारण से ब्रह्मा को सर्मादि भाव शक्तियाँ
होती हैं । यद्यपि वह नित्य है तो भी उपचार से उसे उत्पन्न हुमा-ऐसा विद्वान
कहते हैं । उसके अपने मान से सौ वर्ष की उमको प्रायु कही गई है । उसका
पर भाग का नाम पराद्ध है जो उमका मधं भाग कहा गया है । हे नृपमत्तम !
पन्द्रह काष्ठा बताई गई है जो निमेष्ट होता है ॥१२॥३॥४॥ तोस कला है और
फला हो विधि का मुहूतं होता है । उतनी ही संख्या वाले मुहूतों से मनुष्य का
पहोरात्र (दिन और रात) होता है-ऐमा कहा गया है ॥५॥ उतने महोरात्र
होते हैं और दो पक्षों का एक माम ( महीना ) होता है। छ मासों का एक
भयन होता है । एक वर्ष में दक्षिणायन तथा उत्तरापण दो भयन हुमा करते
है ॥६॥ दक्षिण पपन देवों की रात्रि होती है मौर उत्तगयए उनका दिन
होता है। इस तरह दिध्य एक सहन्न वर्षों के सतयुग-येता मादि चारों युग
हमा करते है ॥७॥

कालपरिमाण वर्णन ] [ ४५ चतुर्युग द्वादश भिस्तद्विभाग निबोध मे। चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम् ।। दिव्याब्दानां सहस्राणि युगेप्वाहुः पुराविदः । तत्प्रमाणः शतं साध्या पूर्वातत्राभिधीयते । सन्ध्याशकश्च तत्तुल्यो युगस्यानन्तरो हि य. । सन्ध्या सन्च्याशयोरन्तः कालो यो नृपसत्तम ।।१० युगाख्यः स तु विज्ञेयः कृतप्रेतादिसज्ञित । कृतं त्रेता द्वापरञ्च कलिश्चैव चतुर्युगम् ॥११ प्रोच्यते तत्सहस्रन्तु ब्रह्मणो दिवस नृप । ब्रह्मणो दिवसे राजन् मनवश्च चतुर्दश ।।१२ भवन्ति परिमारगञ्च तेषां कालकृत शृणु। सप्तर्षय सुराः शक्रो मनुस्तत्सूनवोनृप ।।१३ एककाले हि सृज्यन्ते सहियन्तै स्वपूर्ववत् । चतु' गानांसख्यातासाधिकाो कसप्ततिः । १४ बारह वर्षों का चतुयुंग होता है, उसका विभाग पाप लोग मुझमे भली- भांति समझ लेवें । चार-तीन-दो और एक कृनादि में यथाक्रम हुप्रा करते हैं । पुरावेत्ता पुरुषों ने युगो मे दिव्य सहस्र वर्ष बतलाये हैं । उतने ही प्रमाण धाले सौ वर्षों की पूर्वसन्ध्या उसमे कही जाती है I युग के अनन्तर मे होने वाला सन्च्याश भी उमी के तुल्य होता है । है नृपो मे परम श्रेष्ठ ! मध्याशी का जो मध्य का समय होता है वही सन्ध्या कही जाती है ॥१०॥ कृतयुग- ग्रेना-द्वापर-कलियुग नाम वाले जो हैं उनको ही युग इस नाम से कहा जाता है । सतयुग, त्रेता आदि ये चार युग होते हैं ।।११।। हे नृप ! इस प्रकार से चारों युगों को एक महस्र चौकडी जब समाप्त हो जाती है तो ब्रह्मा का एक दिन होता है । हे राजन् ! ब्रह्म के एक दिन में चौदह मनु हो जाते हैं ॥१२॥ अब उनका काल के द्वारा किया गया परिमाण का श्रवण करो। सप्तपिंगण. सुर, इन्द्र, मनु मोर उनके पुत्र एक काल में स्व पूर्ववत् मृज्यमान और से हिय. मान हुपा करते हैं । धतु युगो की साधिक एक सप्नति (इकहत्तर) सस्या बताई गई है ।।१३।१४॥ ।

[ पद्मपुराण मन्वन्तरं मनोः कालः सुरादीनाञ्च पार्थिव ! अष्टौ शतसहस्राणि दिव्यया संख्ययास्मृतः ॥१५ द्विपञ्चाशत्तथान्यानिसहस्राप्यधिकानि च । निशदकोट्यस्तुसम्पूर्णाः संस्थाताःसंख्यया नृप ॥१६ सप्तपष्टिस्तथान्यानि नियुतानि महामते । विशतिश्च सहस्राणि कालोऽयमधिकं विना ॥१७ मन्वंतरस्य संख्येयं मानुपरिह वत्सरः । चतुर्दश गुणो ह्यपः कालो ब्राह्ममहःस्मृतम् ॥२८ ब्राह्मो नैमित्तिको नाम तस्यान्ते प्रतिसञ्चरः । तदा हि दह्यते सर्व लोक्यं भूभुवादिकम् ॥ जनप्रयान्ति तापार्ता महर्लोकनिवासिनः । एकावे तु लोक्ये ब्रह्मा ब्रह्मविदांवर ।।२० भोगिशय्यागतःशेतेत्रैलोक्यग्रासहितः । जनस्थोगिभिर्देवश्चिन्त्यमानो जगदविभुः ॥२१ हे पार्थिव ! मनु और सुर मादि का काल मन्वन्तर होता है जो कि दिव्य संख्या से मठ सौ सहस कही गई है ।। १५॥ हे नृप ! अन्य वामन सहस्र मधिक हैं । इस प्रकार संख्या से सम्पूर्ण तीस करोड सत्यात हुई पर्थात गिनी गई है ॥१६॥ हे महामते ! भन्य सड़सठ नियुक्त हैं और अधिक के बिना बीस सहस्र काल होता है ॥१७॥ यह मन्वन्तर को संख्या यहाँ पर मानुष पों से की गई है। यह समय जब ब्रह्माजी के दिन से होता है तो पौदह गुना काल बताया गया है ।।१८। ब्राह्म नैमित्तिक नाम है उसके अन्त में प्रत्येक सञ्चार के उस समय में यह सम्पूर्ण भूगुवादिक अलोदय दम्प हो जाता है ।।१।। महर्लोक के निवास करने व ले जन भी ताप से मत्यन्त मात्तं हो जाते हैं । ब्रह्म के बेत्तानों में परमश्रेष्ठ ब्रह्मा उस समय में जबकि सम्पूर्ण त्रैलोक्य केवल समुद्र मय हो जाता है, इस त्रिभुवन का ग्रास कर वृहित होता हमा शेष नाग की शय्या में सस्थित होकर चयन किया करता है। जनलोक मे स्थित योगीजनों के द्वारा उम जगत् में व्यापक विमुदेव का ध्यान एवं चिन्तन किया जाता ॥२०॥२१॥ .

कालपरिमाण वर्णन ] [ ४७ तत्प्रमाणां हि ता रात्रि तदन्ते सृजते पुनः । एवन्तु ब्रह्मणो वर्षमेव वर्षशत च तत् । २२ शत हि तस्य वर्षाणां परमायुमहात्मनः । एकमस्य व्यतीत तु पराद्ध ब्रह्मणोऽनघ ॥२३ तस्यान्तेऽभूनमहाकल्पः पाद्म इत्यभिविथ त । द्वितीयस्य पराद्धं स्य वर्तमानस्य वै नृप । वाराहइति कल्पोऽयं प्रथमः परिकल्पितः ।।२४ ब्रह्मा नारायणाख्यं ऽसौ कल्पादौ भगवान् गया । मसर्ज सर्वभूतानि तदाचक्ष्व महामुने ।।२५ प्रजा ससर्ज भगवाननादिः सर्वसम्भवः । अतीतकल्पावसाने निशासुप्तोत्थितः प्रभु ॥२६ सत्वोरक्तस्तथा ब्रह्मा शून्यं लोकमवक्षत । तोयान्तःसमहीज्ञात्वा निमग्नां वारिसप्लवे ॥२७ प्रविचिन्त्य तदुद्धार कर्तुकामः प्रजापति. । २८ जितने प्रमाण वाला दिन बताया गया है उतने ही प्रमाण को उस दिन की रात होती है । उस रात्रि के समाप्त हो जाने पर पुन. इस जगत् का सृजन होता है । इस प्रकार से ब्रह्मा का वर्ष होता है और ऐसे ही मौ वर्ष होते हैं जोकि उसकी अवस्था बतायी गई है ॥२२।। उस महान् प्रात्मा वाले की सो वर्षों की परमायु होती है । हे अनद्य ! इसका एक वर्ष व्यतीत हुआ है और मब ब्रह्मा का पराद्ध है ॥२३॥ इमके भन्न मे महा कल्प हुप्रा है जोकि पान- इस नाम से प्रस्यात है । हे नृप ! यह जो वर्तमान दूसरा पराद्ध है यह प्रथम वाराह कल्प परिकल्पित किया गया है ।।२४।। भीष्मदेव ने कहा-हे महामुने ! नारायण नाम धारी यही ब्रह्मा बल के प्रादि मे भगवान् की भांति समस्त भूतो का सृजन किया करता था इसे भव बतलाइये ॥२५।। पुलस्त्य अपि ने कहा-बीते हुए कल के अन्त में निशा के समय मै सोर उठे हुए प्रभु ने प्रजा का सृजन किया था जो कि मादि भगवान् हैं मोर जिनसे सभी को उत्पत्ति हमा करती है ।।०६।। उस समय मे सत्व से उवृक्त ब्रह्मा ने इम लोक को पून्य देखा था। इस भूमि को बल के मध्य मे मग्न तथा जल की बाढ मे एकदम

४८ ]
{ पम-पुराण
डूबी हुई ममझकर चिलन किया और प्रजापति ने इस मही के उद्धार करने को
इच्छा को थी ।।२७।२८।।
विष्णुरूपंतदाज्ञात्वापृथ्वी वाटु स्वतेजसा ।
मत्स्यकूर्मादिकाश्चान्यांवाराहीतनुमाविशत् ॥२६
वेदयज्ञमय रूपमाश्रित्य जगतः स्थिती।
स्थित.स्थिरात्मा सर्वात्मा परमात्माप्रजापति. ॥३०
प्रविवेश तदा तोय तोयाधारे धराधरः ॥३१
निरीक्ष्य तं तदा देवी पातालतलमागतम् ।
तुष्टाव प्रणता भूत्वा भक्तिनम्रा वसुन्धरा ।।
नमस्ते सर्वभूताय नमस्ते परमात्मने ॥३२
मामुद्धरास्मादद्यत्वं त्वत्तोऽह पूर्वमुत्थिता ।
परमात्मन् नास्तेऽस्तु पुरुपात्मन्नमोस्तुते ।।३३
प्रधानव्यक्तरूपाय कालभूताय ते नमः ।
त्व क सर्वभूनाना त्व पाता त्व विनाशकृत् ।।३४
सर्गादौ य. परो ब्रह्मा विष्णुरुद्रात्मरूपधृक् ।
भक्षयित्वा च सकल जगत्येकारांवीकृते ॥३५
उस समय में भगवान् विष्णु का रूप यह जानकर अपन तेज से पृथ्वी
को बहन करने के लिये मत्स्य, कूर्म प्रादिक तप अन्य यागह के शरीर में प्रवेश
कर गया था ॥२९॥ सबके मामा, स्थिर प्रास्मा वाले परमात्मा प्रजापति इस
जगत् की स्थिति मे वेद यज्ञमय रूप का ममाथय ग्रहण करके स्थित हुए
॥३०॥ उस समय में धरा को धारण करने वाले तोयाघार जल में प्रविष्ट हो
गये थे ॥३१॥ उम क्षण में वसुन्धरा देवी ने पाताल के तल मे पाये हुए उनका
दर्शन करके भक्ति-भाव से मतिशय विनम्र और प्रगत होकर उनकी स्तुति को
यो । पृथ्वी ने कहा-समस्त भूत स्वरूप परमश्रेष्ठ प्रत्मा वाले प्रापके लिये
धारमार नमस्कार है ।।३२॥ हे प्रभो! आप अब मेरा इससे उद्धार कीजिए।
प्रापके द्वारा में पहिले भी उठाई गई हूँ। हे परमात्मन् ! पापके लिये मेरा
नमस्कार है, है पुरुष स्मन् ! प्रापको मेरा प्रणाम है ॥३३॥ प्रधान व्यक्त रूप
कामे पालभूत पति पास स्वरूप पापके लिये नमसार है । हे भगवन् ! समस्त

कालपरिमाण वर्णन ] [ ४६ भूतो के माप ही बनाने अर्थात् सृजन करने वाले हैं तथा आप ही इन मम्पूरण भूतो के पालन कर्ता हैं और इसका विनाश भी प्राप ही किया करते हैं ॥१४॥ सग के प्रादि काल मे मृजन कार्य करने के लिये आप ही ब्रह्मा होत हैं जगत् के पालन करने के लिये प्राप विष्णु स्वरूप हैं और विनाश करने के वास्त भाप हो की भात्मा रुद्रदेव का स्वरूप धारण किया करत हैं जो एक केवल जलमय इस जगत् में सबका भक्षण करके स्थित रहा करते हैं ॥३॥ शेपे त्वमेव गोविन्द चिन्त्यमानो मनीषिभिः । भवतो यत्पर रूप तन्नजानाति कश्चन ||३६ अवतारेषु यद् प तदर्चन्ति दिवौकस । त्वामाराध्य पर ब्रह्म यातामुक्ति मुमुक्षव ॥३७ वासुदेवमनाराध्य को हि मोक्षमवाप्स्यति । यद् प मनसा ग्राह्य यद्ग्राह्य चक्षुरादिभि ॥३८ बुद्धया च यत्परिच्छेद्य तद्र पमखिल तव । त्वन्मय्यहत्वदाधारात्वत्सृष्टा त्वामुपाश्रिता ॥३६ माधवीमिति लोकोऽयमभिधत्तेततोहिमाम् । एव सस्तूयमानस्तु पृथिव्या पृथिवीधर । सामस्वरध्वनि श्रीमान् जगज परिघर्घरम् ॥४० तत समुत्क्षिप्य धरा स्वदष्ट्रया महावराह स्फुटपद्मलोचन । रसातलादुत्पलपनसन्निभ समुत्थितो नील इवाचलो महान् ॥४१ उत्तिष्ठता तेन मुखानिलाहत तदाप्लवाम्भो जनलोकसश्रयान् । सनन्दनादीनपकल्मपान्मुनीश्वकार भूयोऽपिपवित्रतास्पदम् ।।४२ प्रयान्ति तोयानि खुराग्रवीक्षते रसातलेध कृतशब्दसन्तति । बलाहकानाञ्च ततिस्तुतस्य श्वासानिलाम्तेपरित प्रयान्ति ॥४३ उत्तिष्ठतस्तस्य जलार्द्र कुक्षेमहावराहस्य मही विदार्य । विधुन्वतो वेदमय शरीर रोमान्तरस्था मुनयवो जुपन्ति ॥४४ हे गोविन्द । बडे-बडे मनोपियों के द्वारा चि.सन दिय जाने वाले पाप हो दोष को दाम्पा पर शयन किया करते हैं। मापका बो पर स्वरूप है उसे ५० ] [ पद्म पुराण कोई भी नहीं जानता है ॥३६॥ अब माप कोई भवतार धारण किया करते हैं और उम रूप को ग्रहण करके प्रकट होते हैं तो उमी मापके स्वम की देवगण प्रचना किया करते हैं । पर ब्रह्म आपको भाराधना करके मुक्ति की इच्छा रखन वाले लोग मोक्ष की प्राप्ति किया करते हैं ॥३७॥ भगवान वासुदेव को मार- धना न करके ऐमा कोन है जो मोक्ष की प्राप्ति करेगा? जो भापका रूप मन से ग्रहण करने के योग्य है और जिस स्वरूप को चक्षु प्रादि इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण किया जाता है तथा जो बुद्धि से परिच्छेद्य रूा है वह सम्पूर्ण पापका ही स्वरूप है । आप मुझ मे अर्थात् मेरे स्वरूप में हैं पौर में प्रापके ही समाश्रय वाली हूँ, पापके द्वारा मेरा सृजन हुमा है और आरके ही उपाधिन भी हूँ,समस्त लोक इसी कारण से मेरा नाम माधवी कहा करता है । इस प्रकार से पृथ्वी के धारण करने वाले पृथ्वी के द्वारा स्तुन हुए थे। फिर श्रीमान् प्रभु साम स्वर धनि वाले होकर परिघघर रूप में गर्जना करने वाले हो गये थे। इस तरह घरघराहट पूर्वक गजना करके उसके पश्चात् विकसित कमल के समान नेत्रो वाले महान वराह रूपधारी भगवान ने अपनी एक दाढ से भूमि को ऊपर उठा लिया था और रसातल से महान नील पवत के तुल्य कमल दल को भांति समयित हा गये थे ॥३८॥३६ ४० ४१।। कार को भोर उठने हुए वराह भगवान् के मुख से वायु निकला था उससे उम समय मे जल ने कार को एकदम ऊंचो उछाल मारी थी मोर उमने जनलोक में निवास करने वाले कल्मप से रहित सनन्दनादि मुनि- गरण का विशेष रूप स पवित्रता का स्थान बना दिया था प्रर्यात् जो पहिले ही परम पवित्र थे उनको भी फिर विशेप उस जल के स्पर्श से पुनीत कर दिया पा ॥४२॥ खुरो के अग्रभाग से पाहत जल लगातार ध्वनि करता हुआ नीचे रसातल मे जा रहा था और बलाहको पक्ति के द्वारा स्तुति किये गये वराह भगवान के श्वास वायु चारों ओर फैलकर जा रही थी ॥४३!! मही का विदा- रए कर कार को उठते हुए तथा जल से आई कुक्षि वाले एवम् वेदमय शरीर को कम्पायमान करने वाले महा वह भगवान् के शरीर की रोमानरो में स्थित मुनिगण सेवा करते हैं ॥४४॥ अकिस्रोतास्तुकथितो भवतायस्तु मानुपः । ब्रह्मनविस्तरतोहि ब्रह्मातमसृजद्यथा ॥४५

कालपरिमारण वर्णन ]
[ ५१
यथा सवर्णानसृजद गुणाश्च स महामुने।
यच्चतेपास्मृतंकर्म विप्रादीना तदुच्यताम् ।।.६
सत्वाभिध्यायिन पूर्व सिसृक्षोर्ब्रह्मण. प्रजाः
अजायन्तकृरुश्रेष्ठसत्वोद्रिक्तामुखात्प्रजाः ॥४७
वक्षसो रजसोद्रिक्तास्तथान्याब्रह्मणोऽभवन् ।
रजसस्तमसश्चंव समुद्रिक्तास्तथोरुनः ।।४८
पद्भ्यामन्याः प्रजा ब्रह्मा ससर्ज कुरुसत्तम ।
तम.प्रधानास्ता: सर्वाश्चातुर्वण्यमिद ततः ॥४६
भीष्म ने कहा-मापने प्रथम स्रोन जोकि मानुप है उसका वर्णन तो
कर दिया है । अब हे ब्रह्म ! ब्रह्मात्री ने जिम प्रकार से उसका सृजन किया
या उमका विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिए ॥४५॥ हे महामुने ! जिस रीनि से
वों सहित उनकी रचना की थी और उनके गुणो का सृजन किया था तथ निभ
मादि चारो वरणों के जो मं बनलाये थे. वह सब बतलाने की कृपा करिये ।
॥४६॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-सर्व प्रथम सत्व गुण के अभिध्यान करने वाले
सृजन करने के इच्छुक ब्रह्माजी को जो प्रजा उत्पन्न हुई थी है कुरु श्रेष्ठ !
यह समस्त प्रजा मत्यो द्विक्त मुख से ही ममुत्पन्न हुई थी ।।४७।। इसके अनन्तर
रजोगुण की प्रधानता रखन वाले वक्ष स्थल से ब्रह्मात्री की अन्य प्रमा की
समुत्पत्ति हुई थी। मके पश्चात् रजोगुण और तमोगुण दोनो से उक्ति
कुरु प्रदेश से प्रजा रहसन को थी। ४८॥ हे कुराओ में परम श्रेषु ! मन में
ब्रह्माजी ने अपने पैरो मे प्रजा का भृजन किया था। यह प्रपा तमोगुण की
प्रधानता वाली हुई थी । इस प्रकार से ये चारों वग्गों का मृदन हुमाया l
ब्राह्मणा क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्च नृपसत्तम ।
पादोरवक्षस्थलतो मुखतन समुद्गताः ।।५०
यमनिष्पत्तये सर्वमेतद् ब्रह्मा चकारह ।
चातुर्वण्य महाराज यज्ञमाधनमुत्तमम् । ५१
यमेनाप्यायिता देवा दृष्टय सर्गेण मानवा ।
आप्यायन्ते धर्मयमा यतः कल्यारणहेतवः ५२

५२ ] [ प पुराण निष्पद्यन्ते नरस्ते तु सुकर्मनिरतः सदा ! विरुद्धाचरम्गापेत. सद्भिः सन्मार्गगामिभिः ॥५३ स्वर्गापवर्गमानुध्यात् प्राप्नुवन्ति नरा नृप । यच्चाभिरुचितस्थानतशान्ति मनुजाविभो ॥५४ प्रजास्ता ब्रह्मणासृष्टाश्चातुर्वण्यव्यवस्थितौ । सम्यक् शुद्धा: समाचागचररणा नृपसत्तम ॥५५ यथेच्छावासनिरता: सर्ववाधाविवजिताः । शुद्धान्तकरणा. शुद्धाधर्मानुष्ठाननिर्मला. ॥५६ हे नृप श्रेष्ठ ब्रह्माजी मुख वक्षस्थल ऊरुप्रदेश और पदो से ब्राह्मण- क्षत्रिय--वैश्य एव शूद्र ये चार वर्ण उत्पन्न हुए हैं ॥५०॥ हे महाराज ! ब्रह्मा मी ने यज्ञ की निष्पत्ति करने के लिये ही इन चारो वर्षों की सृष्टि की थी क्योकि, ये चारों ही वर्ण यज्ञादि की सिद्धि के परम श्रेष्ठ साधन होते हैं ॥५१॥ देवगण यज्ञ से परम तृप्त होते हैं, मानव वृष्टि के उत्तगं होने से प्राप्यायन हुमा करते हैं क्योकि जो धर्म यज्ञ होते हैं वे पूर्णतया कल्याण करने के हेतु- भूत हुमा करते हैं ॥५२॥ सदा अच्छे कर्मों के करने मे सलग्न रहने वाल, विरुद्ध माचरणो से रहित, सन्माग के गमन करने वाले सत्पुस्पो के द्वारा वे यज्ञादि निष्पन्न किये जाते हैं ।।५३।। है नृप । मनुष्य इस अपने मानवमीवर से ही स्वर्ग तथा प्रप वग की प्राप्ति किया करते हैं। मनुष्यो को जो भी स्थान रुचिकर प्रतीत होता है उसी पद को वे प्राप्त किया करते हैं । ५४॥ इन चारो वणी की व्यवस्था का पालन करने वाली वह प्रजा ब्रह्माजी ने ऐसे उत्तम विधान से सृजित की पी सभी लोग पूर्णतया शुद्ध मोर मच्छे भाचरण करने वाले थे १५५।। जो भी अपनी इच्छा से जहां निवास करना चाहते थे उसी मे निरत रहते थे और सब तरह को विघ्न-बाधामो से रहित होते थे । सभी परम शुन अन्त करण वाले एव अपने विशुद्ध धर्म के अनुष्ठान करने के कारण निर्मन होले थे ।।५६॥ शुद्ध च तासा मनसि शुद्धान्तः सस्थिते हरौ । शुदज्ञान प्रपश्यन्ति ब्रह्मास्ययेनतत्पदम् ॥५७

मा परिमाण वर्णन ]
तत नानात्मकोयोडमो विरिचावास उच्यते।
ममारपातमत्यर्थ घोरमल्पाल्पसारवत् ॥५८
अधर्मवीजभूत तत्तमोलोमसमुद्गतम् ।
प्रजामु तामु राजेन्द्र रागादिकममाधनम् ॥५६
तत मा महजा मिद्धिस्तेपा नातीय जायते ।
राजन् वश्यादयश्चान्या मियोऽष्टौ भवन्ति या ॥६०
तासु क्षीग्गाश्वशेषामु यद्धमाने च पातये ।
द्वन्द्वाभिभवदु ग्याप्तस्तिा भवन्ति तत प्रगा ॥६१
ततोदुर्गागि ताश्रक पार्वनमौदाम् ।
धायिनप नया दुर्ग परगापंटकादियत् ॥'
गृहागि प यपान्याय तेदुमा पुगदिए।
नीततापारियाधाना प्रदामाय माममे ॥६३

५४ ] [ पच-पुराण पार्वत, धान्यन एवं प्रौदक दुर्गा की रमना की पोतमा पुर सायद प्रादिका भी निर्माण रिया था। उन नगरपुर और दुगो में ययानि गृहों की रचना कोपी किजिनमें निवास करने शीत एवं सार आदिको बायापो समन हो जाये ॥६२॥६॥ प्रतिहारमिमंकृत्वा शीतादेस्ता प्रजाः पुन. वार्तोपायंतत:श्चक हस्तसिद्धिचकर्मजाम् ॥६४ ग्रीहयश्न यवाश्चत्र गोधूमा प्रणवस्तिलाः। प्रियंगूकोविदाराश्च कोरदूषाः सचीनकाः ॥६५ मापा मुद्गा ममूराश्च निष्पावा: सकुलुत्मकाः । अढकाश्मणकाश्चैव शरणा. सप्तदश स्मृता. ॥६६ इत्येता मोषधोनान्तु ग्राम्याणां जातयो देप। ओपध्यो यज्ञियाश्चैवग्राम्यावन्याश्चतुर्दशा ॥६७ ग्रीहयः सयवा मापा गौघूमा अवस्तिलाः । प्रियंगू सप्तमाता प्रष्टमास्तुकुलुत्यकाः ॥६८ श्यामाकस्त्वथ नीवारो चतुलः सगवैधु । अथ वेणुयवा प्रोक्ता स्तद्वन्मर्कटकानृप ।।६६ ग्राम्या वन्या स्मृता. ह्येता प्रोपध्यश्च चतुर्दश । यज्ञनिष्पत्तये तद्वत्तथासां हेतुरुत्तमः ।।७० प्रजाजन के द्वारा इस प्रकार से इन नगरों एवं दुर्गों की रचना हुई थी जिनसे शीतादि के दुखो का प्रतिकार हो जावे । मावासों की रचना करने के पश्चात् प्रजाजन ने अपने जीवन के निर्वाह के लिये कम से उत्पन्न हाथों की सिद्धि के उपाय किये थे ॥६४॥ ब्रोहि, यव, गोधूम, प्रा. तिल, प्रियंगु, कोवि. दार, ब्रो हुष, चीनक, माप, मुद्ग, मसूर, निष्पाव, कुलुय, मढ़क, चणक भोर शण इन सत्रह घान्यादिक को उत्पत्ति की थी शा६६॥ हे नृप! ये सब जो कार में बताये गये हैं वे ग्राम्य मोपषियों को जातियां हैं। जो यक्षीय और ग्राम्य पोषधियाँ हैं वे मन्य भोर चौदह होती हैं ॥६६॥ ब्रीहि, यव, माप, गोधूम, मणु, तिल, मानवां प्रियगु पोर माठवा कुतुत्य, श्यामाक, नीवार,

परपारपान बताया गया। राग्रामों में नित्तिा न होने वाले क्षत्रियों का
ऐम स्थान हा गया३1३1४॥ अरने तषित पमं पानन परने वाले
पों का मायरामोदर दान पुष्प पोर परिषर्ण करने के
पालपरिमाण वर्णन ]
[ ५५
वर्तुल, गवेधु, वेणुयव, मकंटक हे नृप । ये चौदह अंपधियां ग्राम्य प्रर्थात्
गांवो मे पैदा होने वाली और वन्य मर्यात् जगलों में उत्पन्न होने वाली कुल
धौदह हैं । यज्ञों की सिद्धि के लिय इनकी समुत्पत्ति हुई थी और इन सबके
उन हाने का उत्तम हेतु है ॥६८।६६०००।
एताव महयज्ञेन प्रजाना कारण परम् ।
परापरविद प्राज्ञास्ततो यज्ञान वित वते ॥७१
अहन्यहन्यनुष्ठान यज्ञाना पार्थिवोत्तम ।
उपकारकर पु सां क्रियमाण फर्थिनाम् ॥७२
येषाञ्च कालसृष्टोऽसोपपाविन्दुमहामते ।
मर्यादा स्थापयामास यथास्थान यथागुणम् ।।७३
वर्णानामाश्रमानाच धर्मान् धर्मभृतावर ।
लोकाश्चसर्ववर्णाना सम्यग्धर्मानुपालिनाम् ।।७४
प्राजापत्य ब्राह्मणाना स्मृतस्थानन्तु पार्थिव ।
स्थानमन्द्र क्षत्रियाणासपामेप्वनित्तिनाम् ॥७५
पैश्याना मारुतस्थान स्वधर्ममनुत्तिनाम् ।
गान्धर्व शूद्रजातीना परिचर्यासु वत्तिनाम् ।।७६
ये पोप या यज्ञ के साथ प्रजामो का परम कारण है। इसके मनगर
परापर के वेत्ता प्राग पुष्प यज्ञो का विस्तार करते हैं ॥७१। हे पपिवीत्तर ।
दिन प्रतिदिन पनो का अनुवान फलों के पारने दस पुरुषों को किया हुमा
अत्यन्न उपचार करने वाला होता है ॥७२॥ हे महामति पाले । जिन बसों में
फर को काल की गृष्टि में पूरा चन्द्रमा ने पान पर पिया पा। यथा स्थान पौर
गुणों के अनुसार मर्याको स्थापना की थी। ७३॥ हे धर्म के धारण करने
दमों में परम | मय वर्णो मोर प्राश्रमों के पर्मों का पोर भनी मानि
पमं रे अनुगमन करने वामे ममन वर्षों के पोषों सपा ब्राह्मणों का

[ पच-पुराण अपने गमुचित धर्म में वर्तमान रहते हैं उनका गात्पर्य पान बताया गया है ॥७६७६॥ अथान्यान्मानसान पुत्रान् सदृशानात्मनोऽमृजत् । भृगुमांपुलहच वक्रनुमङ्गिरस तथा ।।७७ मरीचि दक्षमयिञ्च वसिष्ठच च मानसान् । नव ब्रह्माण इत्येते पुराणेनिश्चय गताः ॥७८ सनन्दनादयो ये च पूर्व सृष्टास्तु वेधसा । न ते लोकेष्वसज्जन्त निरपेक्षा प्रजासु ते ॥७६ सर्वे ह्यागतविज्ञाना वीतरागा विमत्सराः । तेष्वेवं निरपेक्षेषु लोकसृष्टी महात्मनः ।।८० ब्रह्मणोऽभून्महान क्रोधस्त्रलोक्यदहनक्षमः । तस्य क्रोधात् समुद्भूतजालामालावदीपित ।।८१ ब्रह्मणस्तु तदा ज्योति लोक्यमखिलदहत् । भ्र कुटीकुटिलातस्यललाटाक्रोधदीपितात् ॥२ समुत्पन्नस्तदा रुद्रो मध्याह्नसमप्रभः । अर्द्धनारोनरवपुः प्रचण्डोऽति शरीरवान् ॥८३ विभजात्मानमित्युक्त्वातब्रह्मान्त धेतत.। तथोक्तोऽसोद्विधास्त्रीत्वपुरुषत्वतथाकरोत् ।।४ इसके मनन्तर ब्रह्माजी ने अपने ही सदृश मानस पुत्रो का सृजन किया या। ये मानस पुत्र जो कि मन से ही समुत्पन हुए थे भृगु-पुलह---अतु-- मजिरा-मरोपि-दक्षा-प्रति और वसिष्ट नाम वाले थे । पुराण में निश्चय को प्राप्त हुए ये नौ ब्रह्मा ही पे ॥७७७८।। ब्रह्मा ने जो इनसे पहिले सनक- सनादन आदि का सृजन किया था उन्होंने लोकों के सृजन करने का कार्य नहीं विया या क्योंकि वे सब प्रजा की वृद्धि करने के कार्य की अपेक्षा ही नहीं रखते थे ॥७॥ ये सभी विज्ञान को प्रप्त करने वाले, वीतराग मोर मात्सर्य से रहित थे। इस प्रकार से महात्मा ब्रह्मा के द्वारा लोको की सृष्टि के कार्य मे इन सबके निरपेक्ष हो जाने पर ब्रह्मा जी को इन निलोको को दग्ध कर देने में समय E!में भागिदामोर कालारिमाण वर्णन ] . - महान को । उर,न्न हुपा पा और उनके क्रोध से जाला माला को प्रवदीप्ति करने वाली ज्योति ममुत्पन्न हुई थी ।।१०।८।। उस समय मे समस्त त्रैलोक्य को दग्य करने वाली ज्योति ब्रह्मा के क्रोध से पाविभूत हुई थी और कोच मे दीपिन उनके ललाट से भृकुरी टेढी हो गई ॥५२॥ उमी पबमर में मध्याह्न के सूर्य के ममान प्रभा वाले रुद्र ममुत्पन्न हुए थे । जिनका वपु अर्धनारी पोर नर के स्वहा व ला था, वह परम प्रचण्ड शरीर धारी थे 11८३॥ उनसे शीर का विभाजन कगे-ऐमा कह करके फिर ब्रह्मा उमी मै अन्तडित हो गये थे। ऐसा कहे जाने पर इनने स्त्रोत और पुरुषत्व ये दो भाग कर दिये थे ।।४।। विभेद पुरुषत्वञ्च दशधा चैकधा च सा । सौम्यासोम्यम्तथारूपं शान्त स्त्रीत्वचसप्रभुः ॥८५ विभेद बहुवा चैव स्वरूपंगसिते. सितः । ततो ग्रह्मा स्वयम्भूत पूर्व स्वायम्भुवंप्रभुम् ॥८६ मात्मानमेव कृतवान् प्राजापत्यैमनु नृप । मातरूपाच ता नारीतपोनिधूतकल्मपाम् ।।६७ स्वायम्भुयो मनु म पत्नीत्वे जगृहे प्रभुः । तम्माच पुरपादेवो शतरूपा व्यजातय ॥८८ प्रिपयतीत्तानपादप्रसूत्याकूतिस जितम् । ददी प्रमूति दक्षाय प्राकृति रुचयेपुरा ॥८६ प्रजापतिः स जग्राह तयोजंज्ञे स दक्षिणः । पुत्रो यज्ञो महाभाग दम्पत्योमिथुन ततः ॥१० याम्य दक्षिणायान्नु पुत्रा द्वादश जजिरे । यामाइतिसमास्यातादेयाः स्वायम्भुवेमनी ।९१ पर पुष्पवर पा उमका दमा मागी में विभक रासिया पातपाय पानाही भाग हा याग प्रमुख माना गोंदियामाया मोहोर गाय पाम गोय, मान मगर गाव पशि मे पागल कोयनों में भारत ran I HARE AITHIrYT SATY.

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[ पद्म पुराण
तपश्चर्या से निधून कल्मषों वाली उस नारी को शत रूपा बनाया था ।
प्रभु स्वायम्भुव मनु ने उम शतरूपा को परमी के सा.से...ग्रहण किया था। देवी
शतरूपा ने उस स्वायम्भुव नामक पुरुष से प्रियदर, उत्तानाद, प्रसूति और
म कूति नामो वाली मन्तति को जन्म ग्रहण कराया था। दक्ष प्रजापति के लिये
प्रसूते को दिया था और रुचि को प्राकृति दे दी थी FIR प्रजापनि
उसने उन दोनों में दक्षिण को जन्म दिया था! हे महाभाग ! दोनों दम्पति से
८ पुत्र और फिर एक मिथुन हुमा था ॥६॥ यज्ञ के दक्षिणा मे बारह पुत्र.
समुत्पन्न हुए थे। स्वायम्भुव मनु के समय मे देवगण 'यामा'-इस नाम से
हए थे ।।६।।
समुद्र मन्थन प्रस्ताव तथा दुर्वासा का इन्द्र को शाप
क्षोराब्धौ तु तथा लक्ष्मीः किलोत्पन्ना मया श्रुता।
स्यात्या भृगोः समुत्पन्ना एतदाह कथं भवान् ।।१
कथं चदक्षदुहितादेहत्यक्तवतोशुभा।
मनायांगर्भसंभूतिमुमायाजन्मएवच १२
किमर्थदेवदेवेनालीहैमवतीकृता ।
विरोधचाथदक्षेणभगवास्तुबवीतुमे ॥३
इदं च शृणुभूपालयत्पृष्टोऽहमिहत्वया ।
श्रोसंबंधोमयाप्येपश्रुतआसीपितामहाद ।।४
अत्रिपुत्रस्तुदुर्वासा:परिभ्राम्यन्महीमिमाम् ।
विद्याधरीकरेमालांदृष्ट्वासागन्धकीशुभाम् ॥५
याचयामासमेदेहिजटाजूटेकरोम्यहम् ।
इनिविद्याधरीतेनपृष्टासाऋपिणातथा ॥६
ददौतस्मैमुदायुक्ता त मालासतदानृप ।
गृहीत्वासुचिरकाल शिरोमालावयह ७
भीष्म पितामह ने कहा-मैंने ऐमा धवण किया है कि लक्ष्मी सीर
सागर मे यमुराध हुई थी। हे भगवन् । मापने यह कसे कहा था कि मपी

समुद्र मन्थन प्रस्ताव तथा
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[ ५६
भृगु से गति में उत्पन्न हुई थी ॥१॥ परम शुभ वा वाली प्रजापति दक्ष की
पुषी गौरी ने प्राने देह का त्याग कगे किया था और फिर उसने मेगार के
उदर मे गर्म स्थित होकर उमा के स्वरूप में जन्म ग्रहण क्यो किया था ? ॥२॥
देवों के भो देव शिव ने हेमनी को पुन: किसलिये पत्तो के स्वरूप मे स्वीकार
किया था। प्रजापति दक्ष के साथ शिव का विरोध किम कारण से हुमा था ?
आप कृपाकर यह सब मुझे बतलाइये ॥३॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा-हे भूगल !
आपने जो कुछ इस समय मुझसे पूछा है उमगा उत्त' अव मार श्ररण कीजिए ।
मैंने भी यह धो का सम्बन्ध पितामह से सुना था 10 मपि प्रत्रि के पुत्र
दुर्गमा ऋप इसी मही मण्डल में भ्रमण कर हे थे उस समय मे परम सुग-
न्धित और मत्यन्त सुन्दर माला को विद्य धगे के हाथ मे देख कर उन्होंने विद्या.
धरी से याचना की थी कि इस माला को मुझको देहो, मैं इसको अपनी जटाजूट
मे धारण करू । इस प्रकार से उम ऋप के द्वारा वह विद्याधरी पूछी गई
थी। श६॥ हे नृप ! उम विद्य घरी ने परम प्रमन्नता के साथ उस माला को
ऋप के लिये दे दिया था और उसे ग्रहण कर ऋप ने बहुत समय तक अपने
शिर में बांध लिया था ७ ।
उन्मत्तप्रेतवद्विप्रः शोभमानोऽब्रवीदिदम् ।
इय विद्याधरीकन्या पोनोग्नतपयोधरा ।।
शोभालकारसौभाग्ययुक्तादृष्टाततोमनः ।
क्षोभमायातिमेचाधनाहकामेविचक्षणः ॥६
व्रजामितावदन्यत्रसौभाग्य स्वप्रदर्शयन् ।
एवमुक्त्वासराजेंद्रपरिवभ्राममेदिनीम् ॥१०
ऐरावतसमारूढंराजानंत्रिदिवौकसाम् ।
प्रैलोक्याधिपतिशकंभ्राजमानंशचीपतिम् ॥११
तामात्मशिरसोमालांभ्रमदुन्मत्तपट्पदाम् ।
आदायामरराजायचिक्षेपोन्मत्तवन्मुनिः ॥१२
गृहीत्वादेवराजेनमालासागजमूद्ध नि।
मुक्तारराजसामालालासेजाह्नवीयया ॥१३॥

१०] [ पद्म पुराण मदांधकारिताक्षोऽसौगंधाघ्राणेनवारणः । फरेरणादायचिक्षेपतामालापृथिवीतले ॥१४ उस अयत सुगन्ध सम्पन्न माला को अपने शिर की जटामों में बंधकर छह माह्मण परम शोभित होता हुमा एक उन्मत्त प्रेत को भौति यह बोला करता था कि यह विद्य धरी कन्या पोन (परिपुष्ट) पोर ऊँचे स्तनों वाली है ८) यह अति शोमा और सौभाग्य से सयुक्त है। मैंने इसको देखा है पौर तभी से मेरा मन क्षोम को प्राप्त हो गया है तथा में काम कला में परम विच. क्षण हूँ | मैं अब अपने सौभाग्य का स्वयं प्रदर्शन करता.हुमा अन्य स्थान में जाता हूँ। हे राजेन्द्र ! यह इस तरह से कहता हुमा इस 'मही मण्डल में प्रमा किया करता था ॥१०॥ एकबार देवों के राजा, त्रिलोकी के अधिपति, पाची के पति भ्राजमन इन्द्र को ऐरावन नामक हाथी पर सस्थित उम ऋषि ने देखा था ॥१२॥ उस समय एक सम्मत की भांति उम मुनि ने उम अपने गिर को जटामो में धारण की हुई माला को, जिसमे गन्ध-~-प्रमत्त मोरे लिपटे हुए घे, अपने सिर से उतार कर देवराज इन्द्र के कार का दिया था ॥१२. देव. राम इन्द्र ने उम माला को लेकर हाथी के मस्तक पर डाम दी थी और ऐग. घत हाथी के मस्तक पर रहने वाली मुक्ता पर पड़ी हुई उस माला की ऐमी तोमा दिखाई दे रही पी जमी फैलाश पर्वन पर गङ्गा की मुपमा होती है ॥१३ । मद में प्रकार युक नेत्रों वाले सपा उम माना को परम गुगबर गुगन्ध वा प्राण करते हुए महापी ने अपनी मूह से उसे उतार र पृथ्वी. स में फेक दिया था ॥४॥ ततस्तुमोपभगवान् दुर्वामामुनिपुङ्गवः । गजेन्द्र देवगजानं मदरचेदमुयाच ॥१५ ऐलयमवदुष्टारमप्रतिस्तब्धोऽगिवामय । धियोपामसपस्मान्महतामाभिनंदमि ॥१६ लापपयोग्तोमूयिनागमुपयास्यति । महमाभवतामामाशिमायस्मान्महीतसे ॥१७ तम्मागरमोनोपपनेमविध्यति । पस्यगंगातकोपरममपतिनगरम् । .

विनाशकोप्राम हो जामोंगे ॥१७॥मर तेरी यह न प बी सहमी का मम्पूर्ण ऐश्वयं नष्ट हो जायगा। जिसके हदय में उत्तमकोय से समस्त घराचर पोर मग अब प्रपिा प्रापना करने में भी माम नहीपगेम समुद्र मन्थन प्रस्ताव तथा. ] अत्यन्त दुष्ट मात्मा वाले तुमको अपने इस विशाल भव से बहन अधिक धमएड प्रतीत होता है कि इस प्रैलोक्य की घी में तुम इनने निरत हो गये हो कि भयभीत हो जाया करता है उसी मुझ दुर्भमा ऋषि को, हे देशों के राजन् ! पिरेकोप युक्त वचनों को सुनते हो देवराज इन्द्र बडोही दोघवा से हापी मेमोघे उतर माय पे ॥१८१६। उम समय में कल्मपरान मुनरोदने प्रपन्नतोहो गये थे ॥२०॥ किन्तु रहने मगे है पनगो ! तुम पहेलिना तमात्वमतिगणदेवराजावमन्यसे । महेदोवारणस्कधादवतीर्यवरात्वित ||१६ प्रसादयामासमुनिदुर्वाससमकल्मषम् । प्रसाद्यमान सतदाप्रणिपातपुरःसरम् ।।०२ नाहक्षमिष्येबहुनाकिमुक्त नशतक्रतो। इत्यक्त्वाप्रययौविप्रोदेवराजोऽपितपुन. ॥२१ हे राजेन्द्र ! उस समय में साक्षात् क्रोध के स्वरूप वाले, मुनि मण्डन में परम घेष्ठ भगवाय दुर्वासा ऋषि ने देवराज इन्द्र से प्रत्यम्न अत होकर यह कहा था ॥ १५॥ है इन्द्र । तुम अपने ऐश्वयं के मद से उन्मत्त हो रहे हो और हो रहा है जिसके कारण से परम धो से सम्पन्न मेरे द्वारा प्रदान की हुई इस माला कार तुम पमिनन्दन नहीं कर रहे हो ॥१६॥ मेरे द्वारा दी हुई इस माला को मापने तिरस्कार पूर्वक भूमि पर डाल दिया है इसी कारण से तुमको कुछ भी सूझ नहीं रहा है । हे महामूड । मेरा शाप है कि तुम शीघ्र ही भयान बढ़े हुए गर्व के वारण अपमानित करते हो। इस प्रकार दुर्गामा दुध मस्तु पर प्रमनिया या प्रशिात पूर्वक मस्तपन गन में दुर्गामा तुमको 3मा नहीं रखेंगा । इतना बहार विदुर्गमा परे गये पौर फिर मारे भी पपा गया पा॥२॥ माग गरतनागप्रयायमरायतीम् । तन प्रभृतिनिधीर गगममुग्नत्रयम् ।।२२ [ प पुराण नयज्ञाः सप्रवर्ततेनतपस्यतितापसाः। नचदादानानिदीयतेनष्टप्रायमभूजगत् ॥२३ एवमत्यंतनिश्रीकेत्रलोक्येसत्वजिते । देवान्प्रतिवलोद्योगंवदैतेयदानवाः ॥२४ विजितास्त्रिदशादैत्यैरिंद्राद्या: शरणययुः । पितामहमहाभागहुताशनपुगेगमाः ।।२५ यथावत्कथितेदेवव्रह्माप्राहतथासुरान् । क्षीरोदम्योत्तरंकूलंजगाममहित,सुरः । २६ गत्वाजगादभगवान्बासुदेवं पितामहः । उत्तिष्ठविणोशीघ्रत्वदेवतानाहितकुरु ॥२७ त्वयाविनादानवस्तुजिता सर्वेपुन पुनः । इत्युक्तःपुडरीकाक्ष पुरुप.पुरुषोत्तमः । २६ देवराज इन्द्र अपने ऐरावत हाथी पर मवार होकर अमरावती को चले गये थे। तभी में लेकर इन्द्र के महित तीनो मुग्न श्री हौन होगये थे ॥२२॥ तभी से ऐमा होगया कि न तो कहीं पर भी कोई यशादि किये जाते हैं पोरन तापस किमी प्रकार की तपश्चही पिया करते हैं। न कोई दान दिये जाते हैं । सम्पूर्ण जात नष्ट प्राय सा हो गया था ॥२३॥ जब इस रीति से यह प्रैलोक्य व मे रहिन और प्रान्त हो श्री हीन हो गया तो उसमें उस समय देस्य-दानवो ने अच्छा प्रवार देखा और देवगण के प्रति अपने बल का प्रयोग करने लगे थे ॥२४ा देशको ने इ द्वाति ममान देवगण को पाने बम-राक्रम से जीत लिया था। उस समय में इन्द्रादि देवो ने अग्नि को पागे करके महान भाग थाले पितामह की शरण को पहण क्यिा था ॥२॥ देवों ने अपनी सारी पपा ठोक ठोक सुरादो तो उस समय में ब्रह्माजी ने देयो से कहा पोर मुके महित स्वयं क्षीर मागर के उत्तर की ओर तट पर घने गये थे ॥२६॥ वही पहुंपकर भगवान पितामह ने वासुदेव से प्रायंका को पी कि हे विष्णुदेव ! पार प्रय सीघ्र ही शेप दास्या से उठिये और देवपण का हिन-पादन परिये ॥२७॥ हे भगवन् ! मारकी महायता के पिता ये समस्त देवगण बार. गर दमयों द्वारा पराजित कर दिए गये है। इस तरह ब्रह्मादि के द्वारा ] समुद्र मत्यन करने के बम के मध्य में इससे जो ममृत को उत्पत्ति होगी उसके समुद्र मन्थन प्रस्ताव तथ . भावना की गई तो परम पुरुष भगवान् पुण्डरीक के सदृश नेत्रो वाले पुरुपातम प्रभु ने यह श्रवण किया ॥२८॥ अपूर्वरूपसस्थानान्दृष्ट्वादेवानुवानुवाचह । तेजसोभवतादेवा करिष्याम्युपवृ हणम् ॥२६ वदाम्यहयक्रियताभवद्भिस्त दिदसुरा । आनीयसहितादैत्य क्षीराब्धीसकलौषधी ॥३० मथानमदरकृत्वानेत्रकृत्वाचवासुकिम् । मथ्यताममृतदेवा सहाये मय्यवस्थिते ॥३१ सामपूर्वचदैतेयास्तसम्भाष्यकमणि। समानफलभोक्तारोयूयचात्रभविष्यथ ।।३२ मथ्यमानेचतनाब्धीयत्ममुत्पद्यतेऽमृतम् । तत्पानाद्बलिनोयूयममरा सभविष्यथ ॥३३ तथैवाहकरिष्यामियथानिदश विद्विप । नप्राप्स्यत्यमृतदेवा केवलवलेशभागिन ॥३४ इत्युक्तादेवदेवेसर्वएवरत सुरा । सघानमसुरं कृत्वायत्नवतोऽमृतेभवन् ॥३५ उस समय में एक अपूर्व रूप और सस्थान वाले देवतापो को सकर भगवान विष्णु ने उन दत्रों से कहा- हे देवगण ! मैं भाप मवको पपने तेज से उपवृहित कर दूंगा ॥२६॥ मैं इस समय जो आपको बनलाता हूं वह पाप लोग बरें । पाप समस्त देवगण दैत्यो को भी साथ में लेकर इस क्षीर समुद्र में सकलौषधियो लामो पोर मन्दर पर्वत को मथान बनाकर तथा व सुकि सर्पराज को उसकी नेवी ( मन्यन करने वाली डोर ) बनाकर इस सागर से मन्थन कर अमृत को प्राप्त करो । इस महान काय को सफलता प्राप्त करने में आपको पूर्णतया सहायता करने वाला रहूँगा ।।३ ॥३१॥ उन दस्यो को शान्तिपूर्वक समझा दो कि इस मह न उद्योग के करने पर जो भी इसका सुफल सम्प्राप्त होगा उसको हम और पाप सब समान रूप से भोगगे ॥३२॥ .

[ पद्य पुराण पान करने से भाप समस्त देवगण महान् बल सम्पन्न हो जानोगे ॥३३॥ मैं उस पमृत पान के अवसर पर कुछ ऐसी . क्रिया कर दंगा कि आप लोगो के विद्वषो दैत्य उस अमृत को प्राप्त नहीं कर सकेंगे और हे देवगण ! वे समस्त दंश लोग इस सागर-मन्थन मे किये जाने वाले बलेश एव परिश्रम के ही भागी- दार रह जायेंगे ॥३४ । इस प्रकार से देवो के भी देव विष्णु भगवान के द्वारा कहे जाने पर तभी से सर देवतानो ने प्राकर मसुरो के साथ सलाह एव मेल जोल को यात चीत करके अमृत के निकालने के प्राल में सब सलग्न हो गये थे ॥३५॥ सौंषधीः समानीयदेवदैतेयदानवाः । क्षिप्वाक्षोराब्धिपसिशरदनामलस्विपि ।।३६ मंथानमंदरंकृत्वानेत्रकृत्वानवासुकिम् । ततो मयितुमारधाराजेद्रतरसामृतम् ॥३७. विबुधा.सहिताःसर्वेत.पुच्छततः स्थिता. । विष्णुनावासुकेर्दैत्या पूर्वकापनिवेशिताः ॥३८ तेतस्यप्राणवातेनवह्निनाचहत्विपः । निस्तेजसोऽसुराःसर्वेवभुतुरमरद्य ते ॥३६ तेनेवमुखनिःश्वासवायुनाथवलाहरु । पुच्छप्रदेशेवद्भिस्तदाचाप्ययिता.सुराः ॥४० क्षीरोदमध्येभगवान्ब्रह्माब्रह्मविदादरः । महादेवोमहातेजाविष्णुप्रनिवामिनी ॥४१ बाहुभ्यांमंदरंगृह्यपद्मवत्सपरतपः। शृङ्खलेचतदाकृत्वागृहीत्वामंदराचलम् ॥४२ ममस्त देव दैत्य मोर दानों ने सपिपिया एकत्रित को पी मोर उन्हे सारा के सात मानि ले और सार सभी हाम दिया ॥३६॥ हे राजेन्द्र 1 बन गयने मन्दराचसो मचान पनाया पौर यापन करने की नेत्री बनाकर यई बैग और बोर के साथ ममी,देव दान बमृत प्राति के लिये मापन करने लगे थे ॥३७॥ हित से युक्त समुद्र मन्थन प्रस्ताव तथा० ] [ ६५ समस्त देवता लोग जिधर वासुकि सर्प की पूछ यो उधर की पोर स्थित हो गये थे और भगवान विष्णु ने दैत्यों को वासुकि के पूर्वकाय अर्थात् मुख की मोर खडा करा दिया था ॥३८वे सब दैत्यगण वासुकि सर्प को अ युण्डा श्वासी से और बाह से क्षीण कान्ति बाले हो गये थे । हे प्रमर द्युति वाले ! सभी प्रसुरगण उस समय निस्तेज हो गये थे ||३६॥ उस समय में वासुकि सर्प के मुख से निसृत वायु से पूछ की पोर वर्षने वाले मेघों से मुरगण भन्छो तरह प्रप्त हो रहे थे प्रर्थात् देवों का धम शान्त हो रहा था ।।४०॥ उस क्षीर सागर के मध्य वेत्ताओं में परम श्रेष्ठ ब्रह्माणी थे। महान् देव और महातेज धाले विष्णु पृष्ठ निवामी थे ।।४।। उस परन्तप ने दोनो बाहुओं से उम मन्दराचल को पन की भांति ग्रहण कर लिया था और दोनों बाहुप्रो को गृहला बनाकर मन्दर गिरि का ग्रहण किया था। ४२।। देवानांदानवानांचवलमध्येव्यवस्थितः । क्षीरोदमध्येभगवान्कूर्मरूपीस्वयंहरिः ।।४३ अन्येतनेजसादेवानुपवृहितवान्हरिः । मथ्यमानेततस्तस्मिन्क्षीराब्यौदेवदानवः ॥४४ हविर्धान्यभवत्पूर्वसुरभि.सुरपूजिता । जग्मुमुदंतदादेवादानवाश्चमहामते ॥४५ व्याक्षिप्तचेतसःसर्वेवभूवुस्तिमितैक्षरणाः । किमेतदितिसिद्धानांदिविचितयतांतदा ॥४६ बभूववारुणोदेवीमदापूणितलोचना । कृतावर्ताततस्तस्मात्प्रम्सलंतीपदेपदे ॥४७ एकवक्षामुक्तकेशोरक्तांतस्तब्धलोचना। महंवलप्रदादेवीमायागृहन्तुदानवाः ||४८ प्रमुनिवारणीमत्वात्यक्तवंतस्तदासुराः जगृहस्तांतदादैत्याग्रहणान्तेसुरागवत् १४६ देवों और दानधों के पत के मध्य में विशेप हप में प्रयस्थित सौर मार सोप में भगवान् हरि स्वयं कूमंस में स्थित थे ॥४॥ सो अनन्तर

[ पद्म पुराण
देवों और दानवों के द्वारा उस क्षीर सागर के मन्थन किये जाने पर भगवान
हरि ने अन्य तन से देवों को वृहित किया था॥ ४४ ।। सुरों के द्वारा
पूजित हुई सुरभि पूर्व में हविर्शनी हुई यो । हे महामति बाले ! म समय में
: देवगण प्रौर दानवगण सब परम प्रसन्नता को प्राप्त हुए थे ॥४५॥ सब व्याक्षिप्त
चित्त वाले मौर स्तिमित नेत्रो वाले हो गये थे । ऐसा देखकर दिविलोक में
यस अवमर पर यह क्या कारण है-ऐसा सिद्ध पुरुष चिन्तन करने लगे थे
.}}४६. फिर उससे अमरों से सम्पन्न तया मद से पूणित नेगों वाली मौर
कदम-कदम पर गिरती-पडतो हुई वारुणो देवी प्रकट हुई थी ।।४७ 1 एक वरून
धारण करने वालो, केशों को सोले हुए तथा रक्त मौर मन्दर मे स्तब्ध नेत्रों
वाली वह देवी यह कह रही थी कि हे दानयो ! आप लोग मुझे ग्रहण करो,
मैं बल प्रदान करने वाली हूँ ॥४॥ देवगण ने उस वारुणी को मपवित्र समझ
कर त्याग दिया था पोर दैत्यो ने उम अवसर पर उमका ग्रहण किया था।
उसके ग्रहण करते ही वह अन्त में सुरा बन गई थी ।।४।।
.
मंथनेपरिजातोऽभूद्देवश्रीनन्दनोद्रमः ।
रूपौदार्यगुणोपेतास्ततश्चाप्सरसांगणाः ॥५०
पष्टिकोट्यस्तदाजातासामान्यादेवदानवैः ।
सर्वास्ताःकृतपूर्वास्तुसामान्याःपुण्यकर्मणा ॥५१-
ततः शीतांशुरभवदेवानांप्रीतिदायकः।
ययाचेशंकरोदेवोजटाभूपणकृन्मम ॥५२
भविष्यतिनसंदेहोगृहीतोऽयंमयाशशी।
अनुमेनेचतंब्रह्माभूपणायहरस्यतु ।।५३
ततोविपंसमुत्पन्न कालकूटभयावहम् ।
तेनवादितास्सर्वेदानवाःसहदेवतः ।।५४
महादेवेनतत्पोतविपंगृह्ययदृच्छया ।
तस्यपानाप्नीलबठस्तदाजातीमहेश्वरः ॥५५
पोतायशेषनागास्तुक्षीराब्धेस्तुसमुत्थितम् ।
ततधन्वंतरिजर्जातःवितांवरधरःस्वयम् ॥५६

समुद्र मन्थन प्रस्ताव तथा० ] [ ६७ समुद्र मन्थन करने में देव श्री नन्दन द्रुम पारिजात प्रकट हुमा था। इसके अनन्तर रूप और उदारता से सयुत अप्सराओं के समूह निकले थे । ५०।। उस समय में वे साठ करोड उत्पन्न हुई थी जो देव दानवों के लिये मामान्य थी। वे सब कृत पूर्वा अर्थात् पूर्व म ही को हुई और पुण्य कमं के द्वारा सामान्य हो गई थी ।। ५१ ॥ इसके अनन्तर शोताशु ( चन्द्रमा) हुआ था जो कि देवगण को प्रीति के प्रदान करने वाला था। उस चन्द्र को भगवान् शङ्कर देव ने मांग लिया था कि यह मेरी जटामो को विभूषित करने वाला भूपण बन जायगा ॥५२॥ यह मेरे शिर को मलकृत करने वाला होगा---- इसमें कुछ भी सन्देह नही है । अतएव इस चन्द्र को मैं ग्रहण कर लिया है । यह चन्द्रमा भगवान शिव को जटाम्रो का भूपण हो जाये इसका समर्थन ब्रह्माजी ने भी कर दिया था ।। ५३ ॥ इमके पथ त् फिर उस मन्थन किये जाने वाले समुद्र से महान् भय को देने वाला कालकूट की उत्पत्ति हुई थी। उस कालकूट महाविप से देवगण के सहित समस्त दानव भी आदिन अर्थात् दुखित हो गये थे ॥ ५४ । उस समय मे सबको परम समुत्पीडित एवम् वेचैन देखकर महादेव ने उन सबकी चिन्ता एवम् व्यथा को निवारण करने के लिये पपनी ही इच्छा मे रहग कर उसका पान कर लिया था । उसको पीकर कण्ठ मे हो धारण किये रहने से उसी समय से महेश्वर नीले कण्ठ वाले हो गये थे ॥५५॥ शिव के पीने वे मय जो कुछ थोडा भाग इधर उधर रह गया था उमा पान नागो ने कर लिया था, इसके उपरान्त उस क्षीर सागर से समुस्थित स्वप वेन वर्ण के वस्त्र धारगा किये हुए भगवान् धन्वन्तरि हुए थे ॥१६॥ विभ्रत्कमडलु पूर्णममृतम्यसमुत्थितः । तत स्वस्थमनस्तास्तवैद्यराजस्यदर्शनात् ।।५७ ततश्वाश्व समुत्पन्नोनागश्चरावतस्तथा । तन स्फुरत्कातमतिविकासिकमलेस्थिता ।।५८ श्रीदेवीपयसस्तस्मादुत्यिताधूतपक्जा। तातुप्टुयुर्मुदायुक्ता.धीमूक्तनमहपंयः ॥५६ विश्वावमुमुसास्तस्यग:पुरतोजगु ! घृतानीप्रमुपास्तमननृतुनाप्सरोगरणा ॥६० ६८ ] [ प पुगण गगाथा सरितस्तोय: स्नानार्थमुपस्थिरे। दिग्गजाहेमपारस्थमादाय विमलजलम् ॥६१ सापयाचक्रिरेदेवी सर्वलोकमहेश्वरीम् । क्षीरोदस्तु स्वयतस्यै मालामम्लानपक्जाम् ॥६२ ददौविभूपरणान्यगे विश्वकर्माचकारह । दिव्यमाल्यावरघरा स्नाता भूपणभूषिताम् ।।६३ भगवान् धन्वन्तरि अमृत से भरे हुए एक कमण्डलु को हाथ मे ग्रहण करते हुए हा समुद्र से उठकर प्रकट हुए थे। तब तो वहाँ सभी लोगों ने भग- वान वैद्यराज का दर्शन किया था और सबके मन को स्वस्थना एव शान्ति प्राप्त हुई थी ॥५७। इसके बाद मे एक अश्व और ऐरावत हाथो प्रकट हुए थे । फिर फुरित, कान्ति बाली तशा मति से युक्त और विकसित कमल में स्थित, हाप म कमल पुरुष धारण किये हुए उस सागर से श्री देवी उत्ति हुई यो । महषिगण ने श्री मूक क द्वारा परम प्रपन्न होते हुए उम देवी का स्तवन किया था ॥५८० ॥५६॥ श्री देवी के मागे समस्त गधों ने जिनमे विश्वावसु प्रमुख थे उसका यशोगान किया था। घृताची नाम वाली जिनकी शिरामरिण नेता था। ऐमी सब मसराम्रो ने श्री देवी के सामने नृत्य किया थी।॥६०। गङ्गा आदि सरि- ताएं अपने जल से देवी का स्नान कराने के लिए उपस्थित हुई थीं। दिशामो में रहने वाले गजों ने सुवणं के बडे-बडे कलशों मे वह परम विमल तीयों का जल भरकर सम्पूर्ण लोको को महेश्वरी श्री देवी का स्नान कराया था। क्षीर मागर ने स्वर मम्नान कमलो की माला लेकर उस महालक्ष्मी देवी को समरित की थी। मगों में मन्य समस्त भूपणो के द्वारा विश्वकर्मा ने उस देश को स्वलकृत किया था। उस समय वह देवी परमोत्तम माला पोर पत्यन्त दिज्य वस्त्रों का धारण कर स्नान करने के पश्चात् भूपों से विभूपित हो गई थी १६॥६॥६३। इन्द्राद्याश्चामरगणा विद्याधरमहोरगा. । दामबापमहादेत्यारक्षमाः सह मुहकं ॥६४ कन्यामभिलपन्तिस्म ततो ब्रह्माउवाच । वासुदेव त्वमेवनामयादत्तागृहाणवै ॥६५ ममुद्र मन्थन प्रस्ताव तया. ६६ देवाश्च दानवाश्चैवप्रतिपिद्धामयात्विह । तुष्टोऽहभवतस्तावदलौल्येनेहकर्मणा ॥६६ मातुश्रीह्मणाप्रोक्तादेविगच्छस्व केशवम् । मयादत्तपतिप्राप्यमोदस्वशाश्वती.समा ।।६७ उद्वेगचपरजमदत्याविष्णुपराङ्मुखाः । त्यक्तास्तुदानवालक्षम्याविप्रचितिपुरोगमाः ॥६८ ततस्तेजगृहुदैत्याधन्वन्तरिकरस्थितम् । अमृततन्महावीदिदैत्याः पापसमन्विता ॥६६ माययालोभयित्वातुविष्णु स्त्रीरूपसथय. । प्रागत्यदानवान्प्राह दीयतामेकमडलु ।।७० उस परम दिव्य स्वरूप वाली कन्या को प्राप्त करने को अभिल पा इन्द्र प्रादि देवगरण, विद्याधर, महोरग, दानव, महादैत्य मोर गुह्य को के सहित राक्षम मभी लोग कर रहे थे ।।६४।। इसके उपरान ब्रह्माजी ने कहा -हे वासुदेव ! मेरे द्वारा समर्पिन इम कन्या लक्ष्मी देवी को पाप ही ग्रहण कीजिए ।।६।। मैंने सभी इन देवो और दानवो से निषेध कर दिया है अर्थात् मैं इनमें किसी को भी इसे देना नही चाहता हूं। मेरा मन तो पापके परम शान्त स्वभाव से परम मन्तुष्ट है प्रत. इसे ग्रहण करने के लिये आप ही योग्य वर हैं ॥६६॥ ब्रह्माजी ने उम श्री देवी से कहा-हे देवि । तुम भगवान् केशव के समीप मे जानो। मेरे द्वारा दी हुई तुम भगवान् जमा पति प्राप्त करके बहुत से वर्षों नक मुदित रहो । ६७॥ यह देखकर विष्णु से पराड, मुख रहने वाले दैत्यो के हृदय मे बडा उद्वेग उत्पन्न हुमा या । विप्रचित्ति जिनमें प्रधान पा वे समस्त दानव लक्ष्मी के द्वारा परित्यक्त कर दिये गये थे ॥६८|| इसके पश्चात् उस समस्त दैत्यो ने भगवान् धन्वन्तरि के हाथ मे जो अमृत से परिपूर्ण कलश पा उसे ले लिया था क्योकि दैत्यगण तो महान् बलशाली घे पोर पाप कर्मों से युक्त भी थे ॥६६॥ परम सुन्दरी स्त्री का स्वरूप धारण करने वाले भगवान् विष्णु ने अपनी भुवन मोहनी माया से उन दैत्यो को प्रलोभन दिया था । मोहनी ने वहाँ माकर उन दानवो से कहा कि आप सब लोग एक मण्डल बनाकर स्थित हो जानो भोर इस अमृा के कमण्डल को मुझे दे दो। ७०॥

६५ ] । म पुगण - गगाद्या. सरितस्तोय: स्तानार्थमुपतस्थिरे। दिग्गजाहेमपाअस्थमादाय विमलजलम् ॥६१ सापयाचतिरेदेवी सर्वलोकमहेश्वरीम् । क्षीरोदस्तु स्वयतस्यै मालामम्लानपकजाम् ॥६२ ददौविभूषणान्यगे विश्वकर्माचकारह । दिव्यमाल्यावरधरां स्नातां भूपणभूपिताम् ॥६३ भगवान धन्वन्तरि अमृत से भरे हुए एक कमण्डलु हाथमग्रहण करते हुए ही समुद्र से उठकर प्रकट हुए थे। तब तो वहाँ सभी लोगों ने भग- वान वद्यराज का दर्शन किया था और सबके मन को स्वस्थता एव शान्ति प्राप्त हुई थी ॥५७।। इसके बाद मै एक अश्व पौर ऐरावत हाथी प्रकट हुए थे। फिर स्फुरित, कान्ति बाली तथा मति से युक्त मोर विकसित कमल मे स्थित, हाय कमल पुष्प धारण किये हुए उस सागर से श्री देवी उपित हुई थी। महर्षिगण ने थी सूक्त के द्वारा परम प्रपन्न होते हुए उम देवो का स्तवन किया था ।।५८. ॥५६) श्री देवी के प्रागे समस्त गन्धों ने जिनमे विश्वावसु प्रमुख थे उनका यशोगान दिया था। पुराची नाम वाली जिनकी शिरोमणि नेता था। ऐमी सब अप्सरामों ने श्री देवी के सामने नृत्य किया थी १६०) गङ्गा आदि सार- ताएं अपने जल से देश का स्नान कराने के लिए उपस्थित हुई थी। दिशामो में रहने वाले गजों ने सुत्रएं के बडे-बडे कमशों मे वह परम विमल तीयों का जल भरकर सम्पूर्ण लोको को महेश्वरी श्री देवी का स्नान कराया था। क्षीर सागर ने स्वय पम्तान कालों की माला लेकर उस महालक्ष्मी देवो वो समरित की थी। प्रगों में अन्य समस्त भूपणो क द्वारा विश्वकर्मा ने उम देवी को स्वलकृत किया था। उस समय वह देवी परमोत्तम माला मोर अत्यन्त दिव्य दम्रो को धारण कर स्नान करने के पश्चात् भूषणों से विभूपित हो गई थी।६।६।६३ इन्द्राद्यानामरगणा विद्याधरमहोरगाः । दानवाश्चमहादेत्याराक्षमाः सह गुहाक. ।।६४ कन्यामभिलपन्सिस्म ततो ब्रह्माउवाचह । वासुदेव त्वमेवनामयादत्तां गृहाणवै १६५ . - ।

] विष्णु ने अपनी भुवन मोहनी माया से उन दैत्यो को प्रलोभन दिया था। मोहनी ने वहां प्राकर उन दानवो से कहा कि आप सब लोग एक मण्डल बनाकर स्थित समुद्र मन्थन प्रस्ताव तया० ६६ देवाश्च दानवाश्चैवप्रतिपिद्धामयात्विह । तुष्टोऽहभवतस्तावदलील्येनेहकर्मणा ।।६६ मातुथी ह्मणाप्रोक्तादेविगच्छस्व केशवम् । मयादत्तपतिप्राप्यमोदस्वशाश्वती.समा ।।६७ उद्वेगचपरंजग्मुदत्याविष्णुपराङ्मुखाः । स्यक्तास्तुदानवालक्षम्याविप्रचित्तिपुरोगमाः ॥६८ ततस्तेजगृहुदैत्याधन्वन्तरिक रस्थितम् । अमृततन्महावीर्याददैत्या: पापसमन्विता. ॥६६ माययालोयित्वातुविष्णुःस्त्रीरूपसश्रय. । प्रागत्यदानवान्प्राह दीयतामेकमडलु ||७० उस परम दिव्य स्वरूप वाली कन्या को प्राप्त करने की अभिल.पा इन्द्र प्रादि देवगण, विद्याधर, महोरग, दानव, महादैत्य मोर गुह्यको के सहित राक्षम सभी लोग कर रहे थे ॥६४। इसके उपरान्त ब्रह्मा जी ने कहा-हे वासुदेव ! मेरे द्वारा मपिन इस कन्या लक्ष्मी देवी को प्राप ही ग्रहण कीजिए ।६।। मैंने सभी इन देवो और दानवो मे निषेध कर दिया है अर्थात् मैं इनमें किसी को भी इसे देना नहीं चाहता हूँ । मेरा मन तो प्रापके परम शान्त स्वभाव से परम मन्तुष्ट है प्रत. इसे ग्रहण करने के लिये आप ही योग्य वर हैं ॥६६।। ब्रह्माजी ने तम श्री देवी से कहा- हे देवि ! तुम भगवान् केशव के समीप में जापो। मेरे द्वारा दी हुई तुम भगवान् जैमा पति प्राप्त करके बहुत से वर्षों नक मुदित रहो । ६७॥ यह देखकर विष्णु से पराड, मुख रहने वाले दैत्यो के हृदय मे बडा उद्वेग उत्पन्न हुमा था। विप्रचित्ति जिनमें प्रधान या वे समस्त गनव लक्ष्मी के द्वारा परित्यक्त कर दिये गये थे ॥६॥ इसके पश्चात् उस समस्त दैत्यो ने भगवान धन्वन्तरि के हाथ मे जो अमृत से परिपूर्ण कलश या उसे ले लिया था कोंकि दैत्यगण तो महान् बलशाली थे पोर पाप कर्मों से हो जापो भौर इस प्रमृा के कमार को मुझे दे दो। ७०॥

७० ]
[ पय-पुराण
युष्माकंवशगाभूत्यास्थास्यामिभवतागृहे । ।
तांदृष्ट्वारूपसम्पन्नांनारीत्रैलोक्यसुन्दरीम् ।।७१
प्रार्थयानास्सुवपुर्पलोभोपहतचेतसः ।
दत्त्वाऽमृतंतदातस्यैततोऽअश्यन्ततेऽग्रतः ।।७२
दानवेभ्यस्तदादायदेवेभ्यःप्रददेऽमृतम् ।
तत.वपुःमुरगणाः शकाद्यास्तत्तदामृतम् ॥७३
उद्यतायुधनिस्त्रिशादैत्यांस्तांस्तेसमभ्ययुः ।
पं तेऽमृते च बलिभिजितादैत्यरमूस्तत ।।७४
वध्यमानादिशोभेजुः पातालंविविशुश्च ते ।
ततोदेवामुदायुक्ता. शंखचक्रगदाधरम् ।।७५
प्रणिपत्ययथापूर्वप्रययुस्तेत्रिविष्टपम् ।
ततः प्रभृतितेभीष्म स्त्रीलोलादानवाभवन् ॥७६
मोहनी ने दैत्यों से कहा-फिर मैं माप लोगों के वशीभूत होकर मापके
ही घर में रह जाऊँगी। इस बात को सुनकर उस अति सुन्दरता से सम्पन्न पौर
त्रिलोकी में ऐसी एक ही परमोत्कृष्ट रूप वाली उस नारी को देखकर लोभ से
उपहृत मित्त वाले दैत्यगण उसके सुन्दर शरीर का उपभोग करने की प्रार्थना
करते हुए उस अमृत के कलश को उसे देकर उसके सामने देखने लगे थे ॥७१।।
७२॥ उस मोहनी ने दानवो से वह अमृत का कलश लेकर उम अमृत को
देवताओ को पिला दिया था मोर तभी से मुरगण इन्द्र प्रादि सब भमर शरीर
वाले होकर निस्त्रिंश एवम् प्रायुधों से संयुत होकर उन दैत्यो मे युद्ध करने को
समुद्यत हो गये थे। अमृत पान करके अत्यन्त बलवान् देवों ने दैत्यो को सेना
पर विजय प्राप्प करली थी ।।७३ ७४}] दैत्यगण वध्यमान होकर दिशामो में
भाग गये थे और डरकर पाताल मे प्रवेश कर गये थे। इसके पश्चात् देवगण,
ने मानन्द से युक्त होकर शख, चक्र और गदा को धारण करने वाले भगवान्
विष्णु को प्रणाम किया था और फिर वे सब देवलोक (स्वर्ग) को चले गये थे।
तभी से लेकर है भीष्म ! दानवगण स्त्रियों के लिये चपल हो गये थे ॥७५१७६॥

दक्ष यज्ञ विध्ध कथानक । दक्षयज्ञ विध्वंस कथानक कधसतीदक्षसुतादेहत्यक्तवतीशुभा । दक्षयज्ञस्तुरुद्रणविध्वस्तःकेनहेतुना ।।? एतन्मेकोतुकंवान्कथंदेवोमहेश्वरः । जगामायक्रोधवशंमिपुरारिमहायशाः ॥२ गगाद्वारेपुराभीष्मदक्षोयज्ञमथारभत् । तत्रदेवासुरगणाःपितरोऽयमहर्षयः ।।३ समाजग्मुमुदायुक्ताः सर्वेदेवाःसवासवाः । नागायक्षाःसुपर्णाश्चवीरुदोषधयस्तथा ॥४ कश्यपोभगवानभिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । प्रचेतसोंगिराश्चंववसिष्ठश्चमहातपाः ।।५ तत्रवेदीसमांकृत्वाचातुर्होत्रंन्यवेशयत् । होतावसिष्ठस्तत्रासोदगिराध्वर्युसत्तमः ।। भीष्म पितामह ने कहा-परम शुभ दक्ष को पुत्री मनी ने अपने देह का त्याग क्यों किया था? और किस कारण से भगवान् रुद्र ने दक्ष के यज्ञ का विध्वस किया था ? ॥१॥ हे ब्रह्मन् ! मेरे हृदय में इस बात का बहा कौतूहल है कि महान् यश वाले त्रिपुरारि महेश्वर देव क्रोध के वशीभूत हो गये थे ।।२।। पुलस्त्य महर्षि ने कहा-पहिले गङ्गा के द्वार पर प्रजापति दक्ष ने यज्ञ का प्रारम्भ किया था। वहां पर सुरगण देव, पितर, महर्षि और इन्द्र के सहित समस्त देवता, नाग, यक्ष, सुपर्ण, वीरुद तथा औषधियां सभी मानन्द से युक्त हुए आये थे ।। ३।४ ॥ कश्यप, भगवान् अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्रचेतस, अङ्गिरा मौर महान तपस्वी वशिष्ठ सभी वहाँ प्राये थे ॥ ५ ॥ वहां पर वेदी समान बनाकर चातुर्होत्र को सग्निवेशित किया था। उस यज्ञ में पशिष्ट महर्षि तो होता थे और मध्वयु प्रो मे श्रेष्ठ अङ्गिरा ऋषि भध्वयु थे ॥६॥ बृहस्पतिरथोद्गाताब्रह्मावनारदस्तथा। यज्ञकर्मप्रवृत्तौ तु हूयमानेपु चाग्निपु॥७

७२ ]
[ पम-पुराण
मागतायसवः सर्व प्रादित्याद्वादशंवतु ।
अश्विनीमरुतश्चैवमनवश्वचतुर्दश ।
एवंयज्ञेप्रवृत्तेतृहूयमानेषुचाग्निपु ।
विभूतितोपरांतत्रभव्यभोज्यकृतांशुभाम् ।।
पालोक्यसर्वतोभूमिसमंताशयोजनम् ।
महावेदीकृतातग्रसर्वस्तरसमन्वितैः ।।१०
मन्देिवान्शकमुख्यान्य दृष्ट्वासतीशुमा ।
तदासानुनयंवाक्यप्रजापतिमभापत ॥११
ऐरावतंसमारूढो देवराजः शतक्रतुः ।
पल्याशच्यासहायातः कृतावास शतक्रतुः ॥१२
पापानांयोययिताधर्मरगामिणांप्रभुः ।
पल्याधुमारणंया सामिहायातःसदृश्यते ॥१३
यज्ञ कर्म के प्रवृत्त होने पर अग्नि के हवन किये जाने में वृहस्पति ब्रह्मा
पोर नारद उग्शता हुए थे ।। ७ ।। उस यज्ञ मे समस्त वसुगरण और बारहों
मादित्य भी माये थे । अश्विनीकुमार. मरुद्गण और चौदह मनु उपस्थित हुए
ये ।। ८ । इस प्रकार से उम यज्ञ के प्रवृत्त होने पर मर्यात् यज्ञ के कार्यों का
प्रारम्भ किये जाने पर तथा अग्नि मे हवन किये जाने पर वहाँ भक्ष्य भोज्य
पदायों के एकत्रित होने से परम शुभ म विभूति को देखकर और सर्व और .
दशयोजन भूमि मे एक महावैदी की रचना वह समागत सबके द्वारा की गई थी
मौर इन्द्रादि प्रधान समस्त देवगरण वहाँ उपस्थित थे इसको देखकर वह सती
देवी अपने पिता दक्ष प्रजापति से विनयपूर्वक बोली थी। मती ने कहा-यहाँ
पर देवराज शतक्रतु ऐरावत पर सवार हुए अपनी पत्नी शची के साथ पाये
हुए हैं मोर निवास बनाकर ठहरे हुए हैं । जो पापियों को दण्ड देने वाला है
पौर अधर्म करने वालो को मधर्म के द्वारा शासन करने का स्वामी यमराज है
वह भी धूमार्णा पत्नी के सहित यहां पर प्राये हुए दिखलाई दे रहे हैं 16 से १३॥
पुण्याराजर्षयश्चवपृथिव्यायेचपार्थिवाः ।
वर्णाश्चामिणश्चैवसर्वे येकर्मकारिणः ॥१४

दक्ष यज्ञ विध्वंस कथानक ]
[ ७३
किमत्रबहुनोक्त नब्राह्मोसृष्टिरिहागता ।
भगिन्योभागिनेयाश्वभगिनीपतयस्त्विमे ॥१५
स्वमार्यासहिता.सर्वेसपुत्रास्सहबांधवाः ।
त्वयासचिताःसर्वेदानमानपरिग्रहै ॥१६
श्रामंत्रणामंत्रितानांसर्वेपांमाननाता।
एकएवात्रभगवान्पतिमें न समागतः ।।१७
विनातेन त्विदसर्वशून्यवत्प्रतिभातिमे।
मन्येचाहतुभवता पतिम न निमत्रितः ।।१८
विस्मृतस्तै भवेन्नूनं सर्व शंसतु मे भवान् ॥१६
तस्यास्तदुक्त वचनं श्रु त्वा दक्षः प्रजापतिः ।।२०
परम पवित्र पुण्यमय राजपि लोग और पृथ्वी मे जो पार्थिव अर्थात्
राजा लोग हैं। वश्रिमी और सब मं करने वाले थे वहां यज्ञ मे उपस्थित
थे ।।१४। यहाँ पर अधिक क्या कहा जावे यहाँ तो सारी ब्राह्मी सृष्टि ही मा
गई है । वहिन भानजे ये भगिनी के पतिगण अपनी भार्यानों के साथ आये हैं।
अपने पुत्र-पौत्रादि समस्त बान्धवगण के सहित सभी लोग आये हुए हैं और
मापने इन सभी का दान-मान एवं परिग्रहो के द्वारा भली-भांति स्वागत-सत्कार
किया है ॥१५॥१६॥ भामन्त्रण प्रेषित कर निमन्त्रित किये हुए सबका सम्मान
मापने किया है । इस यज्ञ मे सभी लोग विद्यमान हैं मगर नहीं है तो केवल एक
मेरे स्वामी भगवान् शिव ही नही पाये हैं ॥१७॥ उनके बिना मुझे पापका यह
महान समारोह भी बिल्कुल सूना प्रतीत हो रहा है । मैं ऐमा स्याल करती हूँ
कि मापने मेरे पतिदेव को यहां इस यज्ञ मे निमन्त्रित ही नहीं किया है। सभव
है मापको उनको निमन्त्रण देने का विस्मरण (भूल) हो गया है। मुझे
यह सब साफ-साफ बता दीजिए । पुलस्त्य मुनि ने कहा-उस अपनी पुत्री सती
देवी के इन कहे हुए वचनों को प्रजापति दक्ष ने श्रवण किया था ॥१८ से २०॥
पतिस्नेहसमायुक्तांमारलेम्योपिगरीयसीम् ।
अंकमारोप्यतांवालांसाध्वीपतिपरायणाम् ॥२१
पतिव्रतांमहाभागांपतिप्रिय हितं पिरणीम् ।
प्राहगंभीरभावेनशृणुवत्से यथातथम् ॥२२

] । पप गाय येनाधारणेनेहातिरत न निमंत्रितः । गपालपात्रभृगचर्मीभस्मागृनतनुस्तथा ।।२३ पूलीमुण्डीयनग्ननगमगानेरमत गदा विभूम्यागानिसवाणिपरिमार्टिचनित्यागः ॥२४ व्याघ्रचर्मपरीधानोहन्तिगर्मपरिस्पदः । फपालमालाशिरमियट्यांगचफरेस्थितम् ॥२५ एतटोपैमयावरसेलोकानाचवलजपा । नाहानंतुष्टततस्यकारगनमयागुते ॥२६ यास्यास्यममाहीतुपूजा करवारवयासह । प्रानीयतर्यभर्तारवयासहत्रिलोचनम् ।। लोक्यस्याधियां पूजोकरिष्यामिचसरकृतः । एततेसर्वमाख्यातंत्रपाया.कारणंमहत् ॥२७ अपने पति के स्नेह से युक्त, प्राणों से भी अधिक पारी पनि परायण उम साध्वी वाला सती देवी को जो कि महापतिप्रता, पति के प्रिय हित में पाहने वाली एवम् महा भाग्यमामिनी यो दक्ष ने अपनी गोद में बिठाकर यडे ही गम्भीर भाव से कहा है पुनि ! तुम अब यथापं बात सुन लो ॥२१॥ जिन कारणो से तुम्हारे पति को इस यश के महोत्सव में निमन्त्रण नहीं दिया गया है के ये है कि वह नर कपाल के पात्र को धारण करने वाले हैं,व्याघ्र धर्म से मवंदा मावृत रहते हैं और समस्त शरीर मे भस्म धारण किये रहा करते हैं ॥२२॥ विमूलधारी, मुण्ड माला को पहिनने वाले नग्न मोर सर्वदा श्मशान में रति रखने वाले हैं तथा नित्य ही विभूति से सब अपने अङ्गों का परिमार्जन किया परते हैं ॥२३॥ वाप के चमडे का परिधान करने वाले तथा यो के धर्म को पोदने वाले हैं। नर कपालो की माला को मस्तक में डाले रहा करते हैं और हाय मे स्ट्वा का एक भाग अर्थात् पाया रखते हैं ॥२४॥ हे वत्से ! इन उप. युक्त सभी दोषो के होने के कारण लोक लज्जा से हे वैटी ! यही कारण है कि मैंने तुम्हारे पति को यहाँ इस समारोहोरमव मे नहीं बुलाया है ॥२५॥ जब यह यश का महोत्सव सानन्द समा त हो जायगा तो उस समय मे तुम्हारे पति पहर 1.uो 1ि:14ti है।॥10॥ २.गोगा जारी है। दक्ष यज्ञ विध्वंम क्यानक ] को यहाँ बुलवार तुम्हारे साथ ही उन त्रिलोचन का समचंन करूगा ॥२६॥ फिर उम अवसर पर मैं प्रत्यधिक सत्कार पूर्वक त्रिलोकी को भी पूजा करूंगा। यही मेरी मजा का सबसे बड़ा कारण है जो सब तुमको मैंने बतला दिया यदेभिरजितंपुण्यंतस्यैतेफलभागिनः । एवमुक्ता ततः सा तु सती भीष्म रुपान्विता ।।२८ विनिंदमानापितरकोधेनारुणितेक्षणा । एवमेतद्यथातात त्वयाचोक्त ममाग्रत: ।।२६ सर्वोजनः पुण्यभागी पुण्येनलभतेश्रियम् । पुण्येनलभतेजन्मपुण्येभोगा. प्रतिष्ठिताः ॥३० तदयजगतामीशःसर्वेपामुत्तमोतम. । स्थानान्येतानिसर्वपादत्तान्येतेनधीमता ॥३१ सत्येनतेनतेयज्ञविध्वंसयतुशकरः । यद्यस्तिमतप. किंचित्कश्विद्धर्मोऽयवाकृतः ॥३२ तेनमत्येनतेगवं.समाप्तिमभिगन्यतु । इत्युपत्यायोगमास्थायस्यदेहम्धेनतेजसा ॥३३ निदंदाहसदारमानरादेवामुग्पन्नगः । सिपिमेतदितिप्रोक्तगपर्वगणगुप. ॥३४ लगबने गि महान गय का मन पिया उपरे ये गरम । भागी होते हैं। मोम | प्रालि राम प्रसार मे हो भने वामी का वो तो पोप में युग हो गई पी ॥२८॥ गोपाल माम वासी ममी अपने पिरो बुराई सो १। भारने गरी ८ मुभमे पक्ष भी पर पानी पनि पुरा प्रभार में होनी है. पूर tam AIR मा भीalfrint. नेमगी- ही पीमा में Mitan CREA OR MELA [ प पुरा है मौर मैंने कोई पता है | मी मर में सेरा यह गवं वास हो जायगा- सना कहबार पर देवी सनी परने देह में स्थित तेज में गंग में समास्थित हो गई पो ।। १३३ ।। उस समय उम महीने अपने शरीर को दग्ध कर दिया या । इसे देखकर यहाँ सब देव, असुर, पतंग, गुह्मक और गन्यवं यह कहने लगे कि यह क्या हो गया है ? al गंगाकूलेतनामुक्तोदेहोवंशयातया । सोनकनामतत्तोथंगगायाः पश्विमेतंटे ॥३५ श्र त्वारुद्रस्तुतद्वार्तापल्यानाससुदुःखितः । हतु यज्ञंधीरभवत्देवानामिहपश्यताम् ॥३६ गएकोटि:समादिष्टाग्रहावनायकास्तथा । भूतप्रेतपिशाचाश्वदक्षयशविनाशने ॥३७ तंगत्वाविवुधास्सर्वेयशे निजित्यनाशिताः । हतेय तदादक्षो निरुत्साहोनिरुद्यमः ॥३८ उपगम्याद्रवीत्रस्तोदेवदेवपिनाकिनम् । नज्ञातोऽमिमगादेवदेवानांप्रभुरोश्वरः ॥६६ स्वमस्यजगतोऽधीश सुरास्सर्वत्वयाजिताः । कृपांकुरुमहेशानगणान्सन्निवर्तय १४० विशेष रूप से कुद्ध देवी सती ने उस समय में भागीरथी के तट पर अपने देह का त्याग किया था, वह पश्चिम तट पर गङ्गा का शौनक नाम वाला तीर्थ है ॥३५॥ इस सती के देह के त्याग देने का समाचार सुनकर रुद्र देव को अपनी पत्नी के नाम हो जाने से महान दुःख हुमाया। फिर वहाँ समस्त देव- गण के देखते हुए भावान रुद्र के हृदय में दक्ष के उस यज्ञ का विध्वंस करने का विचार हना था ३६।। भगवान शिव ने तुरन्त करोड़ो अपने गणों को, पह और वैनायकों को तथा भूत-प्रेत एवन् पिशाचों को दक्ष के यज्ञ का विध्वस करने की प्राशा दे दी थी ॥३७॥ उन सबने वहां पहुंचकर समस्त देवगण को जीत लिया था और नष्ट कर दिया था । उस यज्ञ के नष्ट हो जाने पर प्रजापति रक्ष बहुत ही उत्साह हीन और उद्यम से रहित हो गये थे ॥३८1 इसके अनन्तर 7 मारामीरा leure, दक्ष यज्ञ विध्वंम स्थानक ] [ ७७ यह दक्ष प्रत्यन्त भयभीत होकर देवों के देव पिनामधारी शिव के समीप में पहुंचे और उनमे प्रार्थना करने लगे कि हे भगवन् ! प्राप देवों के भी महान देव परम प्रभु और ऐसे सामध्यंधारी ईश्वर हैं--यह मैं नहीं जानता था ॥३६॥ हे भगवन् ! इस सम्पूर्ण जगद के आप ही मघोश्वर हैं और आपने सब देवगण को जीत लिया है। मब है महेशान ! मेरे ऊपर माप कृपा कीजिए पोर इन अपने गणो को वापिस लौटा लीजिए ॥४०॥ विरुपाक्षशुभाक्षायमहस्राक्षायवनमः । मुण्डाय चडमुण्डाय वरखट्वाङ्गधारिणे ।। काव्यरूपाय हव्याय सर्वसहारिणे नमः ।।४१ भक्तानुकंपिनेऽत्यर्थरुद्रजाप्यन्तुतायच । विरूपायमुस्पायरूपायरूपाणाशतकारिणे ॥४२ पचास्यायशुभास्यायचन्द्रास्यायनमोनमः । परदायवराहायपूर्मायच मृगायच ॥४३ लीलालकशिसहायकमडलुधरापच । विश्वनाम्नेऽयविश्वायविश्वेशायनमः॥४४ विनेनमाणमस्मायात्रिपुरघ्नविधीयताम् । वाइमनःफायभावस्तुप्रपन्नम्यमहेश्वर ।।४५ एवम्तृतम्तदादेवोदशेणापनदेहिना । दिव्येनानेनस्तोत्रेणभृशमाराषितस्तदा ॥४६ यह दिन दा ने मगवान तिन free पा- भगवन ! पाप विरों वाले, गुम नेनों काम तथा महमद मेरा ममसार है। पाप, गुण और गा पा पाने पार प्रसार पाr far पर Hि सराय १. पार गुर पाने है पोर को मारने वाला मुलाशा, तुम मुग पुरवा मग बा Mntri IIT AR म. REE REM और [ पद्म पुराण कमण्डलु धारी, विश्व नाम वाले, विश्व एवम् इम विश्व के ईश प्रापके लिय नमस्कार है, नमस्कार है ॥४४॥ हे त्रिपुरादसुर के नाशक । हमारे लिपे ग्रिनेत्र का कारण दीजिए। हे महेश्वर ! मैं मन-वाणी और शरीर से सब प्रकार की भावना पूरित होकर पापको शरणागत मे पाया हूँ, मेरी रक्षा कीजिए ॥४॥ इस प्रकार से प्रापत्ति से ग्रस्त देह वाले दक्ष प्रजापति के द्वारा उस समय में शिव की स्तुति की गई थी और इस उपयुक्त स्रोत के द्वारा प्रत्यधिक भाराधना की गई थी ॥४६॥ समग्र तेयज्ञफलमयादत्तप्रजापते । सर्वकामप्रसिद्धयर्थफलप्राप्म्यस्यमुत्तमम् ।।४७ एवमुक्तोभगवताप्रणम्याथसुरेश्वरम् । जगामस्वनिकेततुगणानामेवपश्यताम् ॥४८ पल्या शोकेनवदेवोगगाद्वारेतदास्थित । तासतीचिंतयानस्तुक्वनुसामेक्रियागता ॥४६ तस्यशोकाभिभूतस्यनारदोभवसन्निधौ। सातसतीयादेवेशभार्याप्रसमामृता ॥५० हिमवदुहितासाचमेनागर्भयमुद्भवा । जग्राह देहमन्य सा वेदवेदाथवेदिनी ॥५१ श्र त्वादेवस्तदाध्यानमवतीर्णामपश्यत । कृतकृत्यमथात्मानकृत्वादेवस्तदास्थित ॥५२ सप्राप्तयोवनादेवीपुनरेवविवाहिता । एवहिकथितभीष्मयथायज्ञोहय पुरा ॥५३ इस रीति से स्तवन करने पर परम प्रमन्न शिव ने पहा हे प्रमापते । धाहे तेरा यज्ञ ध्वस्त हो गया है किन्तु मैं तेरे इस यज्ञ का पूण फल देता हूँ मोर तुम सम्पूर्ण कामनामों को प्रसिद्धि के लिए परम श्रेष्ठ फल प्राश करोगे ॥४७॥ इस तरह शिव द्वारा कहे जाने पर दक्ष ने सुरों के स्वामी भोलानाथ शिव को प्रणाम दिया था और उनके गुणो का ही गान करते हुए अपने निवास स्थान को पले गये थे ॥४८॥ अपनी प्रिय पत्नी शती कवियोग से शोर ग्रस्त पृथु यज्ञ क्थन ] [ ७६ होते हुए शिव उम समय म गङ्गा के द्वार पर ही स्थित हो गये थे । उस सती के विपर में ही चिन्ना करते हुए रहत थे और साम में वह क्रिया न मालूम कहाँ गायव हो गई थी ॥४६॥ शोक से ग्रस्त एवम् अभिभूत शिव के समीप देवपि नारद प्राये मोर कहने लगे-ह देवेश ! मापके प्राणो के तुल्य वह सती भार्या थी जो कि मृत हो गई है ॥५०॥ वही आपकी प्राणोपमा भार्या सती अब हिमवान् की पुत्री हुई है और मेना के गम से उसका जन्म हुआ है वेद और वेदो के अर्थ को जानने वाली उसने अब अन्य देह ग्रहण किया है ॥५१॥ इस समाचार का श्रवण कर उसी समय महादेव ने ध्यान वरके उसका पुन अवतरण देख लिया था। तब देवेश्वर ने अपने प्रापको कृतकृत्य मानकर वहाँ पर ही वे स्थित हो गये थे । हे भीष्म । यौवन के प्राप्त होने पर उस देवी ने फिर शिव के ही साथ विवाह किया था । इस प्रकार से कह दिया गया जिस तरह से पहिले यज्ञ का ध्वस किया था॥५२ ५३॥ ॥ पृथु यज्ञ कथन ॥ बहुभिर्द्धरणीभुक्ता भूपाले धूयतेपुरा। पार्थिवा पृथिवीयोगात्पृथिवीकस्ययोगत ॥१ किमर्थं च कृतासज्ञाभूमेस्सापारिभापिकी । गीरितीयञ्चसज्ञा वा भुव वस्माद्ववी हिमे ॥२ पुराकृतयुगस्यासीदगोनाम् प्रजापति । मृत्योस्तुदुहितातेनपरिणीतातिदुर्मुखी ॥३ मुनीथानामतस्यास्तुवेनोनामसुत पुरा । अधर्मनिरतःकामीवलवान्वसुधाधिप ॥४ लाकस्याधर्मकृच्चापिपरमार्यापहारक । अथतस्यप्रसिद्धयर्थ जगदर्थमहर्षिभि ॥५ अनुनीतोऽपिनददावशुद्धात्माऽभयतत । शापेनमारयित्वैनमराजक्भयादिता ॥६ ममथुाह्मणास्तस्य बलाद्दे हमकल्मपा । तत्कायान्मथ्यमानातुजनिता म्लेच्छजातय 11७ ८० [ पद्म पुराण शरीरैमातुरशेन कृष्णाजनसमप्रभा. । पितुरशम्यसगेन धार्मिकोधर्मकारक: ॥ भीष्म ने कहा- - ऐमा सुना जाता है कि पहिने पहुन से राजामो के द्वारा इस धरणी का भोग किया गया था। जो राजा लोग पार्थिव-म नाम कहे जाते हैं वे तो पृथिवी के स्वामी होने के कारण ही पार्थिव कहे गये है किन्तु इम परणी को जो पृथिवी इस नाम से पुकारा जाता है वह नाम इमका किस योग में पड़ा है || इस भूमि को यह पारिभाविको सज्ञा किस कारण से हुई है। इस भूमि का नाम 'गो'-यह भी कहा जाता है। हे भगवन् ! इसका यह माम किस कारण से हमा १ कृपाकर यह मुझे बतलाइये ॥२॥ इस मोघम के प्रश्न को सुनकर पुलस्त्य ने कहा- पहिले कृतयुग में पङ्ग नाम वाला प्रजापति था। उसने मृत्यु को पुत्री जो कि भत्यान दुर्मुखी थी उसके माय विवाह किया था ॥३॥ उसका सुनीथा माम था पोर उसका वेन नाम वाला पहिना पुन हुमा या जो कि सदा अघमं के कामों में निरत रहा करता था, बहुत ही अधिक कामी पौर बलश ली इस भूमि का राजा हुआ था ॥४१ वह लाक के अपम को करने वाला था और पराई स्त्रियों का अपहरण करता था इमको देखकर मापियो न उसकी प्रसिद्धि के लिए मोर जगत् के कल्याण के वारते उसको बहुन कुछ समझाया था किन्तु यह इतनी पशुद्ध आत्मा वाला था कि कभी भी अभय का प्रदान नहीं किया था। लोक में बड़ो भारी मराजकता न फैल जावे इम भय से दुखित होकर उसे महपियों ने शाप देकर मार दिया था ॥५॥६॥ वल्मप रहित ऋषि एवम् ब्राह्मणो ने उसके देह का बलपूर्वक मथन लिया या । जब उसके शरीर का मन्थन हुमा तो उस मधिन भर म्लेच्छो की बनेको जानियाँ समुत्पन्न हो गई थीं ॥७॥ ये सब पारीर मे माता के मश होने से काले भजन के समान प्रभावालो थीं और पिता के प्रश के सुसग से धम के करने वानी धामिक दी। उत्पन्नोदक्षिणाद्धस्तात्सधनु सशरोगदी। दिव्यतेजोमम पुत्रस्यरत्नावचागद HC पृथुरेवाभवनाम्नासचविष्णुरजायत । सविपरभिषिक्तः सस्तप पृत्वासुदुष्करम् ।।१० पृथु यज्ञ कथन ] [८१ . विष्णोर्वरेणसर्वस्य प्रभुत्वमगमत्प्रभुः । नि:स्वाध्यायवपट्कारनिर्मवीक्ष्यभूतलम् ॥११ वेधुमेवोद्यत.कोपाच्छरेणामितविक्रमः । ततोगोरूपमास्थाय भू.पलायितुमुद्यता ।।१२ पृष्ठेत्वन्वगमत्तस्याःपृथु सेपुशरासनः । तत: स्थित्वैकदेशेतुकिंकरोमीतिचाप्रवीत् ।।१३ पृयुरप्यवदद्वाक्यमीप्सितदेहिसुव्रते । सर्वस्यजगतःशीघ्र स्थावरस्य चरस्य च ।।१४ उसके दाहिने हाथ से एक दिव्य तेज से परिपूर्ण पुष उत्पन्न हुमा था जो धनुप, बाण और गदा धारण किये हुए था पौर रलों से बटिल कवच एवम् मङ्गद धारण करने वाला था । वह नाम से पृथु हुआ था मोर वह विष्णु ही उत्पन्न हुए थे । विप्रवर्ग ने उसको राज्याभिषिक्त कर दिया था। उस पृथु ने परम सुदुष्कर तपस्या की थी ॥१०॥ उप्त तपश्चर्या के प्रभाव से उसने विष्णु से वरदान प्राप्त किया था मोर समस्त विश्व का स्वामी बन गया था। उमने उस समय में इस सम्पूर्ण जगत् को स्वाध्याय भोर वपट्कार से रहित बिना धर्म वाला देखा पा ॥११॥ अपरिमित पराक्रम पाला राजा क्रोध से दार के द्वारा वेधने के लिए उद्यत हो गया था। इसके मनन्तर गाय का स्वरूप धारण करके भूमि पलायन करने को उद्यत हो गई थी ।।१२।। इसके पीछे-पीने धनुष पर यारा पढ़ाकर राजा पृथु भी चल दिया था। इसके पश्चात् एक स्थान पर स्थित होकर पृथ्वी ने पहा-मैं या वह ॥१३॥ इसके उत्तर में राजा पृयु ने रहा-सुव्रते ! हमारा जो कुछ भी अभीष्ट पदार्थ हो उसे तू दे, यह अभीष्ट इस सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम जगत् का होगा ।।१४।। तथैतिचानवोद्भूमिहुँदोहसनराधिपः । स्वकेपाणीपृथुवंसं कृत्वास्वायंभुवंमनुम् ।।१५ तदनमभवदुग्धंग्रजाजीवंतियेनतु । ततस्तुमा विभिदुग्धावत्म.सोमस्तदाभवत् ॥१६ योग्यावाचस्पतिरभूपावेदस्तपोरसः । देवंचवमुपादुग्घा मरहोग्यातदाभस्त १७ .

८२ ] [ पद-पुराण आयुधनानिसौख्यंचपृथौराज्यप्रशासति । नदारिध तथारोगी नाधनोनचपापकृत् ।।१८ नोपसर्गानचाघातः पृथौराज्यप्रशासति । नित्यंप्रमुदितालोकादु.खशोकविवर्जिताः ॥१६ धनुष्कोट्या च शैलेंद्रानानुत्सायं समहाबलः । भूमडलंसमंचक्रे लोकानां हितकाम्यया ॥२० नपुरग्रामदुर्गाणिनचायुधधरानराः। नियन्तेयत्रदु खचनार्थशास्त्रस्यचादरः ।।२१ राजा पृथु के ऐसा कहने पर 'तथास्तु' अर्थात् मैं समस्त चराचर जात् का अभीप्सित देने को प्रस्तुत हूँ--यह पृथ्वी ने उत्तर दिया था और फिर राजा ने उसका दोहन किया था । राजा पृथु ने अपने हाथ मे स्वायम्भुव मनु को वत्स बनाया था ॥१५॥। वह अन्न हुआ जिससे सब प्रजा जीवित रहती है । इसके मनन्तर सप्तर्पियो ने दोहन किया था, उस समय सोम वत्स हुमा था ।।१६॥ दोग्धा मर्थात् दोहन करने वाला वाचस्पति हुमा, वेद पात्र हुए और तप ररा हुमा था । देवगण ने वसुधा ( भूमि ) का दोहन किया था उस समय मरुत दोहन करने वाला ॥१७॥ राजा पृथु के शासन करने पर प्रजा मे ओर सौत्य सभी थे । कही पर दरिद्रता नहीं थी, न कोई उसके राज्य में रोगी था और न कोई भी धन होन एवम् पाप कर्म करने वाला था ॥१८॥ पृथु के राज्य का शासन करने पर कोई भी उपसर्ग एवम् माघान नही थे । सभी लोग नित्य ही परम प्रसन्नता तथा दुख एवम् शोक से रहित थे ॥१६॥ उस महान बलशालो ने लोकों के कल्याण की कामना से अपनी धनुप की कोटि से बडे-बडे पर्वती को उत्सारित करके इस सम्पूर्ण भू मण्डल को सम बना दिया था ॥२०॥ उस समय ग्राम-पुर मौर दुगं नहीं थे पोर मायुधो को धारण करने वाले मनुष्य थे जो कि दुख मरते हो, उस अवसर मे अर्थशास्त्र का भी कोई मादर नहीं या ॥२१॥ श्रादित्यवंशमखिलंपदग्रह्मन्यथाक्रमम् । सोमवशचतत्वज्ञयथावद्वक्तुमर्हसि ।।२२ मायु, धन

पृथु यज्ञ कथन
]
विष्टि?रात्मिकातद्वत्कालत्वेनव्यवस्थिता ।
मनौवैवस्वतस्यापिदशपुत्रामहावलाः ।।२३
इलस्तुप्रथमस्तेषांपुढेष्ट्यासमकल्पि यः।
इक्ष्वाकु.कुशनाभश्चअरिष्टोधृष्टएवच ।।२४
नरिष्यतःकरूपश्चर्यातिश्चमहाबलः ।
पृपध्रश्चाथनाभागः सर्वतेदिव्यमानुपाः ॥२५
अभिपिच्यमनुःपूर्वमिलपुत्रंसधार्मिकम् ।
जगामतपसेभूय पुष्करंसतपोवनम् ॥२६
अथाजगामसिध्यर्थतस्यब्रह्मावरप्रदः ।
वरंवरयभद्रतेमानवेयंयथेप्सितं ॥२७
उवाचसतदादेवंपद्माक्षपद्मजविभुम् ।
वशेमेधर्मसंयुक्ताः पृथिव्यांसर्वपार्थिवाः ॥२८
भीष्म ने कहा--हे ब्रह्मन् ! प्राप तो पूर्ण तत्त्व के ज्ञाता हैं, पर माप
सूर्य वंश को क्रमानुसार प्रतलाइये और सोमवश को भी यथा रीति बतलाने के
भाप योग्य होते हैं ।।२२।। उस समय में घोर स्वरूप वाली विष्टि पर्थात् यरवश
मरको में ढकेलने का कार्य कालत्व के कारण व्यवस्थित हो गया था। वैवस्वत
मनु के दश महा बलवान् पुष हुए थे ॥२३॥ उन सबमें हल प्रथम पुत्र था जो
पुषेष्टि से समकल्पित हुप्रा था। इक्ष्याकु, कुशनाम, परिष्ट, धृष्ट, मरिष्यन्त फरूप,
महापली शर्याति, पृपध्र ये दस पुत्रों के नाम थे। ये सभी दिव्य मनुष्य ये
॥२४॥२५।। मनु ने पहिले परम धर्म के मानने वाले हल को मभिषिक्त किया
पा भोर फिर यह पुष्कर तपोवन में तपश्चर्या करने के लिए चले गये थे ॥२६॥
भनन्तर उसकी सिद्धि के लिए वरदान के प्रदान करने वाले ग्रह्माजी वहाँ
पाये थे और उन्होने कहा-तेरा वल्याण हो और मय सुझे वो भी मभीष्ट हो
यह यरदान मुझमे प्राप्त करले ॥२७॥ उम समय में उसने पप के समान नेत्रों
वाले पचन विभु श्री ब्रह्माजी में कहा-इम पिवी में घमं सयुक्त होकर सभी
राजा मेरे वशीभूत हो जायें । हे स्वामिन् ! प्रारके चरण कमन के प्रसाद से
मर पर हो । एमा ही होगा-पद हार देवेश्वर ब्रह्मा वहाँ पर ही
अन्नहिन हो गये ॥२८॥

[ पम-पुरार
भवेयुरीश्वरा स्वामिन्प्रसादात्तवकागज ।
तयेत्युक्त्वानुदेवेशस्तपंचातरधीयत ॥२६
ततोऽयोध्यासमागत्यसमतिष्ठद्ययापुरा ।
अर्थकदा रथारुढ इलोनिजसुतोमनोः ॥३०
निजंगामार्थसिध्यर्थमिनप्रायामहोमिमाम् ।
भ्रमन्द्वीपानिसर्वारिणक्ष्मामृत सप्रसाधयन् ।।३१
जगामोपवन शभोरथाकृष्ट प्रतापवान् ।
कल्पद्रु मलताकोणनाम्नाशरवणम ॥३२
रमतेयत्रदेवेश सोम.सोमाई शेखर ।
उमया समयस्ता पुरा शरवणेकृतः ॥३३
पुनामसजंयत्किचिदागमिष्यतिनोवनम् ।
स्त्रीत्वमेध्यतितत्सर्वदशयोजनमडले ॥३४
अज्ञातसमयोराजाइल:शरवरणगत ।
स्त्रीत्वजगामसहसावडवाश्चोऽभवत्क्षणात् ॥३५
इसके पनन्तर अयोध्या में आकर पूर्व की ही भौति वह समास्थित हो
गये थे। इसके अनन्तर एकबार मनु का सपना पुत्र इल रथ पर सवार हुमा
था ॥२६॥३०॥ रथारूढ होकर वह इस इल प्राया भूमि पर अर्थ सिद्धि के
लिए निकल पडा था। समस्त नृपो को सम्प्रसाधित करते हुए समस्त द्वीपों में
भ्रमण किया था ।३१। इसके पश्चात् वह मावपित होकर महान् प्रताप वाला
भगवाद शम्भु के क्रीडा स्यल उपवन मे पहुंच गया था। वह उपवन कल्पवृक्षो
और कल्पलतानी से भाकीर्ण था भौर उस महान उपवन का नाम शखण था
॥३२॥ जिस उपवन में देववर सोमा शेखर भगवान् सम्भु उमा देवी के साथ
रमा विया करते हैं। वहाँ पर पहिले शखण मे ऐसा निर्णय कर दिया गया
था कि इस वन मे दुरुप नामधारो कोई भी प्रावेगा तो इस दायोजन के मडर
में वह स्त्री हो जायेगा ॥३३॥३४॥ इस समय अर्थात् शिधा देश को जो नई
जामता पा वह इल राजा उप सप नामक उपवन में चला गया या मोर व
तुद ही स्त्रोत्र को प्राप्त हो गया भोर जो प्रश्न था यह भी ३६वा (घोडी
हो गई थी ॥१५॥

पृथु यज्ञ कपन ] पुरुषत्वेकृतं सर्वस्त्रोकाये विस्मृतंततः । इलेतिसभवनारीपीनोनतघनस्तनी ॥३६ समय,शंभुदयिताकृतःशरवणेपुरा। यःपुमान्प्रविशेञ्चायसनारोत्वमवाप्स्यति ॥३७ अयमश्वोऽपिनारीत्वमगाद्राजासहैवतु । इलःपुरुपतामेतियथासौधनदोपमः ॥३८ तथैवयत्नःकर्तव्यप्राराध्यचपिनाकिनम् । ततस्तेमानवाजग्मुर्यप्रदेवोमहेश्वरः ॥३६ तुष्टविविधः स्तोत्र पार्वतीपरमेश्वरी । तावूचतुरलचैप समयः किंनुसाम्प्रतम् ॥४० इक्ष्वाकोरश्वमेधेनयत्फलस्यातदावयोः । दत्वाकिंपुरुपोवीर.सभविष्यत्यसशयम् ॥४१ तथेत्युक्त्वातुतेसर्वेजामुर्वेवस्वतात्मजाः । इट्वाश्वमेधेनतत इलाकिंपुरुपोऽभवत् ।।४२ प्राचीन समय में यह ऐसा समय शत्रण में शम्भु को पत्नी के द्वारा किया गया था कि जो कोई पुरुष जाति बाला इस उपवन में प्रवेश करेगा वह तदारा ही नारीत्व को प्राप्त हो जायगा ||६|| यह प्रश्व भी रामा के साथ रुप जाति का होने के कारण स्त्रीत्व जाति को प्राप्त हो गया था । जिरा प्रवार से कुवेर के तुल्य यह नृपति हल पुरुषत्व को प्राप्त हो जावे वैसा ही कोई उपाय एव यत्न करना चाहिए-ऐमा विचारकर सब मनुष्यों ने पिनाकी प्रभु को मारापना की और सब वहाँ पर ही पहुंच गये थे जहाँ महेश्वर देव विराज- मान थे ॥३७॥३८॥ सब लोगों ने अनेक स्तोत्रों के द्वारा भगवती पार्वती और परमेश्वर शिव की स्तुति की थी उन दोनो ने स्तवन समाप्त होने के पश्चात् कहा-यह तो यहां आने वाले के लिये ऐसा समय के अनुसार होगा ही-इसमें क्या करना चाहिए । राजा इक्ष्वाकु के मश्वमेध से हम दोनों का जो फल होगा उसे देकर यह वीर किम्पुरप निश्चय हो हो जायगा ।। ३६,४०।४१ ।। ऐसा होगा-यह कहकर वे सब वसात के पुत्र चले गये थे। फिर अश्वमेध यज्ञ का यजन करके राजा इल बिम्पुरुष हो गया था ।।४२।।

८६ ]
[ पद्म-पुराण
.
मासमेकंपुमान्वीर.स्त्रीत्वमासमभूत्पुनः ।
बुधस्यभवनेतिष्ठशिलोग घरोऽभवत् ॥४३
अजीजनत्पुत्रमैकमनेकगुणसंयुतम् ।
बुध उत्पाद्य तं पूर्वसस्वर्गमगमत्युन. ॥४४
इलस्यनाम्नातद्वपमिलावृतम्भूतदा ।
सोमार्कवंशजोराजाइलोऽभूद्वंशवद्धनः ॥४५
एवपुरूरवा पूरोरभवढे शवद्धनः ।
इक्ष्वाकुरर्कवंशस्यतथैवोक्तोनरेश्वरः ॥४६
इल.किंपुरुषत्वेचसुद्य म्नइतिचोच्यते ।
पुन पुत्रत्रयमभूत्सुधु म्नस्यापराजितम् ।।४७
उत्कलोऽयगयस्तद्वद्धरिताश्वश्ववीर्यवान् ।
उत्कलस्योत्कलानामगयम्यतुगयापुरी ॥४८
हरिताश्वस्यदिग्याम्यासज्ञाताकुरुभिःसह ।
प्रतिष्ठानोऽभिषिच्याथसपुरूरवससुतम् ।।४६
वह वीर एक मास तक तो पुरुष होकर रहता था और फिर एक माम
के पश्चात् एक मास पर्यन्त स्त्री हो जाता था। बुध के भवन में रहकर स्त्री रूप
मे स्थित वह इल गर्भ धारण करने वाला हो गया था ॥ ४३ ।। उसने भनेक,
गुणगण से सयुत एक पुत्र को जन्म दिया था और बुध पहिले उम पुत्र का
उत्पादन कर फिर स्वर्ग को चला गया था ॥४४॥ तभी से राजा इल के नाम
से वह समय इलावृत प्रसिद्ध हो गया था। राजा इल सोम तथा सूर्य के वश में
उत्तराप्त होने वाला था मोर वही इन दोनो के वश का वर्घन करने वाला भी
था ।।४।। इसी तरह पुरूरवा पुरू के वश का मभिवर्धन करने वाला था।
राजा इक्ष्वाकु भी इसी भांति से सूर्य के वश की वृद्धि करने वाला हुमा था
॥४६॥ वह इल किम्पुरुषत्व को स्थिति में जब रहा था तब सुद्युम्न इस नाम
से कहा जाता था। फिर उम सुद्युम्न के किमी से भी पराजित न होने वाले
तीन पुत्र हुए थे ॥ ४७ । इन तीनों के नाम उकल, गय और हरिताच थे, ये
तीनो बडे बलवान हुए थे। उत्साल की उरकला, गय की गयापुरी नाम वाली

पुत्र उत्पन्न हुआ था। नामागोम्वरीप नाम बाले पात्मज ने जन्म ग्रहण
किया था और घृष्ट के तीन पुत्र हुए थे ॥५१॥ इन तीनों के शुभ नाम पृष्ठवे-
नाम बाला बडा प्रतापी पुत्र हुमा। उसके देश का नाम मी प्रानतं था और
उसकी कुशस्थली नाम बाली नारी पी ॥५३॥ रोचमान के रेव हुआ और रेव
पुष हुपा था। उसका दूसरा कयुमो नाम था प्रार पुत्रशत का ज्ये
पा॥५४॥ उसकी रेवती नाम वाली कन्या थी जो बलरामजी की मार्या प्रसिद्ध
पृथु या कथन ।
पुरो थी ॥४८॥ हरिताश्व को दिमाया पो । पुरषों के माप निशान उसमें
पुरूरवा पुत्र को ममिपित किया था l
जगामेलावृतंभोक्तुं दिव्यंवपफलाशनः ।
इक्ष्वाकुयंठदायादोमध्यदेशमवासवान् ।।५०
नरिप्पतस्यपुत्रोऽभूच्छुकोनामहाबलः ।
नाभागादवरीपस्तुघृष्टस्यतुमुतप्रयम् ॥११
धृष्टकेतु स्वधर्मायोरणघृष्टश्ववीर्यवान् ।
पानानामगर्यात सुकन्यावदारिका ।।५२
बानतस्याभवत्पुत्रोरोचमानःप्रतापवान् ।
पानानामदगोभूनगरोचकुशस्थती ॥५३
रोचमानस्यरेवोऽभूने वा वतएवच ।
ककुयीचापरनामज्येष्ठ पुत्रशतस्यच ॥५४
रेवतीतस्यसाकन्याभार्या रामस्यविध ता ।
करूपाच्चवकारूपावहव प्रथिताभुयि ॥५५
पृषधोगोषधाच्छूद्रोगुस्शापादजायत ।
इक्ष्वाकुपुत्रानाम्नायविकुक्षिनिमिदटका. ॥५९
पुरूरवा का अभिषेक करके वह दिव्य वर्ष पर्यन्त फलो का माहार करने
वाला इलावृत का भोग करने के लिये चला गमा पा । ज्येपू दायाद इक्ष्वाकु ने
मध्यदेश को प्राप्त किया था। नरिष्यन्त के महान् बलवान् शुक नामधारी
स्वधर्मा और रणधष्ट थे, ये सब बड़े वीर्य वाले थे। शर्याति के पानत नामक
पुत्र और सुकन्या नामधारिणी पुत्री उत्पन्न हुई थी ॥५२॥ आनतं कैरीचमान
से रेवत

२८ ] [ पय पुराए हुई थी। वरुपा मोर फारूपा बहुत सी भू मएटर मै प्रपित घों ।।५।। गोवध से पृषघ्र हुमा या जो गुरु के नाप से शूद्र हो गया था। वायु के विकुक्षि- निमि मोर दण्डर नाम वाले पुन हुए थे ॥५॥ श्रेष्ठा पुनशतस्यासम्पचाशचाय-सुता । मेरोरुत्तरतस्तेतुजाता पार्थिवसत्तमा १५७ चत्वारिंशत्तथाष्टान्येशतमध्ये वयेऽभवन् । मेरोदक्षिणतश्चैवराजानस्तेपपीतिता ॥५८ ज्येष्ठाकुत्स्थनामाभूत्मुतस्तस्यसुयोधन । तस्यपुत्र पृथुन मविश्वस्तस्यपृथो सुत ।।५६ आस्तस्यचपुनोऽभूध बनाश्वस्ततोऽभवत् । युवनाश्वस्यपुत्रोऽभूच्छावस्तोनामवीर्यवान् ॥६. निर्मितायेनशावस्तीह्य गदेशेनराधिप । शावस्ताबृहदश्वाऽभूत्वलाश्वस्ततोऽभवत् ॥६१ घुघुमारत्वमगमद्ध धु हत्वाऽसुरपुरा। तस्यपुत्रास्त्रयोजाताहढाश्वोघृणिरेवच ॥६२ कपिलाश्वश्वविख्यातोधौंधुमारि प्रतापवान् । हढाश्वस्यप्रमोदस्तुयश्वस्तस्यचात्मज ॥६३ पुत्रशत के परम श्रेष्ठ पचास सुत हुए थे और वे मेरु के उत्तर की ओर उत्तम नृप हुए थे ।। ५७ ॥ सौ के मध्य में अडतालीस भोर हुए थे, वे मेरु के दक्षिण दिशा की मोर राजा बताय गय हैं ॥५६॥ जो ज्येष्ठ था उससे ककुत्स्थ नाम वाला हुआ और उसके सुयोधन पुत्र ने जम ग्रहण किया था। उसका पुत्र पृथु हुमा भौर पृथु का सुन विश्व नाम वाला उत्पन्न हुआ या ॥५६॥ उसका सुत आदें हुआ और बाद का पुत्र युवनाश्व हुआ था । युवनाश्व के पुत्र का नाम सावस्त था जो बहुत वीर्य पराक्रम वाला था ॥६०॥ हे नराधिप । उसने मङ्ग देश म शावमी की रचना की थी। शावस्त से वृहदश्व हुआ और इसके पुत्र का नाम कुवनाश्व था ॥६॥। इसने पहिल धुधु नामक असुर का हनन करके धुधु- मारत्व को प्राप्त किया था। इसके तीन मुन हुए थे जिनके नाम दृढाश्व-- ८६ . था जो इन्द्र का मित्र प्रवल प्रतापशाली मुचुकुन्द इस नाम से प्रसिद्ध हुमा था। सभूति या मोर इस सभूति से विधवा की उत्पत्ति हुई थी। त्रिधन्दा का त्रय्या- ग्रत हुमा पोर उसमे फिर सत्यरथ की उत्पत्ति हुई। सत्यरथ के पत्र का नाम हरिश्चन्द्र था तथा हरिश्चन्द्र के रोहित पुत्र उत्पन हुप्रा ६८ रोहित से वृक पृथु यज्ञ कथन ] घृणि और कपिलाश्व थे। कपिलाश्व वडा प्रताप वाला घौघुमारि के नाम से विख्यात हुआ था । दृढ श्व के प्रमोद मोर उसके हर्यश्व आत्मज उत्पन्न हुमा था ॥६२१६३।। हर्यश्वस्य निकुभोऽभूत्सहताश्वस्ततोभवत् । अकृताश्वोरणाश्वश्वसंहताश्वसुतावुभौ ॥६४ युवनाश्वोरणाश्वस्यमाघाताचततोऽभवत् । मांधातुःपुरुकुत्सोभूद्धर्मसेतुश्चपार्थिवः ॥६५ मुचुकुन्दश्वविख्यातश्शक्रमित्रःप्रतापवान् । रुकुत्सस्यपुत्रोऽभूदु सहोनर्मदापतिः ।।६६ सभूतिस्तस्यपुत्रोऽभूत्रिधन्वाचततोऽभवत् । त्रिधन्वन मुतोजातस्त्रय्यारुणइतिस्मृत. ॥६७ तस्यसत्यवतोनामतम्मात्सत्यरथःस्मृतः । तस्यपुत्रोहरिश्चन्द्रोहरिश्चद्राच्चरोहितः । ६८ रोहिताच्चवृकोजातोवृकाद्वाहुरजायत । सगरम्नस्यपुत्रोऽभूद्राजापरमधार्मिकः ॥६६ द्वेभार्येसगरस्यापिप्रभाभानुमतीतथा । ताम्यामाराधिन पूर्वमौर्वाग्नि पुत्रकाम्बया ७० यंश्व के निकुम्भ पुत्र हुमा और निकुम्भ के वीर्य से संहताश्व ने जन्म ग्रहण किया था । सहताश्व के प्रकृनाव प्रोर उरण श्व नाम वाले दो सुतो ने जन्म तिया था ॥६४॥ उग्णाश्व के युवनाश्व हुआ और उसके मान्धाता उत्पन्न हुआ पा । मान्धाता के पुरुकुत्स नामक पुत्र हुमा था और धर्म सेतु राजा हुमा पुरुकुम का पुत्र नर्मदा पति दु सह हुमा था ॥६५॥६६॥ इसके पुत्र का नाम रुण नाम से विख्यात होने वाला पुत्र हुमाया ॥६५॥ त्रय्यारुण का सुत सत्य

६० ]
[ १-पुराण
और वृक्ष से वाहु समुत्पन्न हुमा था। इसके पुत्र का नाम सगर पा जो कि
परम पार्मिक राजा हुमा था ॥६६॥ रामा सगर के दो भार्या पौं । एक का
नाम ममा मोर दूसरी का नाम भानुमती था। इन दोनों ने पुत्र की कामना से
पहिले औग्नि को माराधना की थी 1७०)
और्वस्तुष्टस्तयो.प्रादाद्यथेष्टं वरमुत्तमम् ।
एकापटिसहस्राणिसुतमेवंतवापरा ७१
अगृहाशकारप्रभाऽगृलादहून्सुतान् ।
एकभानुमतीपुत्रमगृहादसमंजसम् ॥७२
ततःपष्टिसहस्राणिसुपुवेयादवीप्रभा ।
खनत.पृथिवीदग्धाविष्णुनायेश्वमार्गणे ॥७३
असमंजस्तुतनयोह्य शुमान्नामविश्रु तः ।
तस्यपुत्रोदिलीपस्तुदिलीपात्तुभगीरथः ।।७४
येनभागीरथीगङ्गातपःकृत्वावतारिता ।
भगीरथस्यतनयोनाभागइतिविथ तः ७५
नाभागस्यांवरीपोऽभूसिधुद्वीपस्ततोऽभवत् ।
तस्यायुतायुःपुत्रोऽभूदृतुपर्णस्ततोऽभवत् ॥७६
तस्य कल्माषपादस्तुसर्वकर्मातत स्मृतः ।
तस्यानरण्यःपुत्रोऽभूनिघ्नस्तस्यसुतोभवत् ।।७७
समाराधन से सन्तुष्ट होकर प्रोवं ने यथेष्ट वरदान दिया था। इनमे से
एक ने साठ सहस्र पुत्र और दूसरी ने एक पुत्र ही वश को चलाने वाला स्वी-
कार किया था। प्रभा ने बहुत से पुत्रो को प्राप्ति स्वीकार की थी । मानुमती
केवल एक भसमजस पुत्र प्राप्त किया था ।। ७१७२ ।। इसके भनन्तर यादवी
प्रभा ने साठ हजार पुत्रो को प्रसूत किया था जो कि विष्णु के द्वारा अश्व की
खोज करने के कार्य मे पृथ्वी को खोदते हुए दग्ध कर दिये गये थे ।। ७३ ।।
प्रसमजात का पुत्र प्रशुभान हुमा पोर इसके पुत्र का नाम दिलीप था
तथा दिलीप से भगीरथ ने जन्म ग्रहण किया था ७४|| यह भगीरथ महान
यस्वी राजा था जिसने भागीरथी गङ्गा का स्वर्ग से यहां भू-मण्डल मे

करने वाले हुए थे। भार्गव सत्तम महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम के चरित्र का पृथु यज्ञ कथन ] [ ६१ अवतरण कराया था। भगीरथ के पुत्र का नाम नाभाग हुमा था ।।७।। राजा नाभाग के अम्बरीष हुमा भौर फिर उसमे सिाघुद्वीप हुमा था। इसके पुत्र का नाम प्रयुतायु था और प्रयुतायु से ऋतुपर्ण ने जन्म ग्रहण किया था ॥७६।। इसके कल्मापगद नाम वाला पुत्र उत्पन्न हुआ और इसके पुत्र का नाम सर्वकर्मा था । सर्वकर्मा के अनरण्य हुप्रा और अनरण्य के पुत्र का नाम विघ्न या ॥७॥ निघ्नपुत्रावुभौजातावनमित्ररघूत्तमौ । अनमित्रोवनमगादरिनाशकृतेनृप ।।७८ रघोरभूदिलीपस्तुदिलीपाच्चाप्यजस्तथा । दीर्घवाहुरजाजात प्रजापालस्ततोऽभवत् 11७६ ततोदशरथोजातस्तस्यपुत्रचतुष्टयम् । नारायणात्मका सर्वेरामस्तस्याग्रजोऽभवत् ।।८० रावणातकरस्तद्वद्रघूणावशवर्द्धन. । वाल्मीकिर्यस्यचरितचक्रेभार्गवसत्तम. ।।८१ तस्यपुन कुशोनामइक्ष्वाकुलवर्द्धन. । अतिथिस्तुकुशाजातोनिपघस्तस्यचात्मज ८२ नलस्तुनिपधाजातोनभास्तस्मादजायत । नभस पु डरीकोऽभूत्क्षेमधन्वातत परम् ।।५३ तस्यपुनोऽभवद्वीरोदेवानीक प्रतापवान् । अहीनगुस्तस्यसुत सहस्राश्वस्तत पर ।।८४ राजा निघ्न के प्रनमित्र मोर रघूत्तम नाम वाले दो पुत्र उत्पन्न हुए थे। हे नृप । शत्रुप्रो के नाश करने पर अनमित्र वन मे चला गया था ॥७॥ राजा रघु से दिलीप की उत्पत्ति हुई थी और दिलीप के पुत्र का नाम मज था। अज से दीघंवाहु हुअा मोर इसके पुत्र का नाम प्रजापाल हुआ था । ७९। इससे राजा दशरथ की उत्पत्ति हुई जिसके चार पुत्र रत्न समुत्पन्न हुए थे। ये सभी नारायण के स्वरूप वाले थे। उनमे सबसे बड़े भाई राम हुए थे। यह श्रीराम लङ्का के राजा रावण के वध करन व ले और रघु के वश की वृद्धि १४ ] [ पद्म पुराण को लेकर एकत्रित किया था ॥ ८॥ प्रभु ने वेद शक्ति से परिपूर्ण रथ में अपने हाथ से उसको ब्रह्माजी ने समस्त मायुधो को धारण करने वाला युवा नर कर दिया था | उस पितामह ने उसे लोक में मारोपित करके अपना प्रात्मीय बना लिया था। इसके पश्चात् तभी से ब्रह्मषियों ने कहा था कि यह हमारा स्वामी होवे ॥ १०॥ समस्त ऋषि, देवगण, गन्धर्व पोर प्रप्परामों के द्वारा स्तुति किये गये उसका महान और प्रत्यधिक अन्तर हो गया था ॥११॥ तेज के वितान से भू मण्डल में दिव्य मोषधं उत्पन्न हो गई थी और उसको दीप्ति सदा रात्रि में अत्यधिक हुआ करती है ॥१२॥ इसी कारण से सोम प्रोधियों का स्वामी हो गया था और उसकी द्विजों में भी गणना की जाती है । यह वेदों फा घामरस है जो कि यह शुभ मण्डल दिखलाई देता है ।।१३।। यह चन्द्र का मण्डल कृष्ण पक्ष तथा शुक्ल पक्ष में सर्वदा क्षीण एवम् क्रम से पद्धमान हुमा करता है । प्राचेतस दक्ष ने रूप लावण्य से संयुक्त, सुन्दर वर्चस बाली सत्ताईस कन्यायें उसको दे दी थी। इसमे उसकी सहस्रों शक्तियो की सहस्रो दशाएँ हो गई थीं ॥१४४१५॥ तपश्चकारशीतांशुर्विष्णुध्यानकतत्परः । ततस्तुष्टश्चभगवांस्तस्मै नारायणोहरिः ॥१६ वरंवृणीष्वचोवाच परमात्मा जनार्दनः । ततो वने वरं सोमः शकलोके यजाम्यहम् ।।१७ प्रत्यक्षमेव भोक्तारो भवन्तु मम मन्दिरे । राजसूये सुरगणा ब्रह्माद्यायेचतुर्विधाः ॥१८ रक्षपाल सुरोऽस्माकमास्तांशूलधरोहरः । तथेत्युक्तः समाजहराजसूयतुविष्णुना ॥१६ होतात्रि गुरध्वर्युरदगाताचचतुर्मुखः। ब्रह्मत्वमगमत्तस्य उपद्रष्टा हरिः स्वयम् ॥२० सदस्याःसर्वदेवास्तुराजसूयविधिस्मृतः । वसवोऽध्वर्यवस्तद्विश्वेदेवास्तथैवच ॥२१ शीतल किरणों वाले चन्द्र ने भगवान् विष्णु के ध्यान में तरसर होकर तप किया था। उस सोम की तपश्चर्या में भगवान नारायण हरि परम सन्तुष्ट समस्त गृष्टि के द्वारा सरकृत दुष्प्राप्य ऐश्वयं को प्राप्त किया था ॥२२॥ उस ६५ उस यज्ञ में इस त्रिलोकी को दक्षिणा प्रतिपादित की थी। सोम ने सोमवंश वर्णन ] हो गये थे ॥१६॥ परमात्मा जनार्दन भगवान् ने प्रत्यन प्रसन्न होकर उससे कहा-जो भी तुझे मभीष्ट हो मुझसे वरदान प्राप्त करले । इस पर सोम ने प्रार्थना की थी कि मैं इन्द्रलोक में यजन करू-यही वरदान सोम ने उनसे मांगा था ।।१७। इसके अनन्तर भगवान् ने कहा-जो ब्रह्मादि चार प्रकार के सुरगण हैं वे सब राजसूय यज्ञ में मेरे मन्दिर में प्रत्यक्ष रूप से ही भोक्ता होवें ॥१८॥ उसमे राक्षसो का पालक शूलधारी देव हमारा रक्षक होगा---यह कह- कर भगवान् विष्णु ने राजसूय यज्ञ किया था ।।१९। उस यज्ञ में होता अत्रि मुनि, अध्वर्यु भृगु और उग्दाता चतुमुंख हुए थे। ब्रह्मा के पद को उस यज्ञ में उपद्रष्टा हरि ने स्वय ग्रहण किया था ॥२०॥ उस यज्ञ के सदस्य सभी देवगण थे। इस प्रकार से वह राजसूय यज्ञ की विधि बताई गई है । वसुगण अध्वर्यु थे पौर विश्वेदेवा भी अध्वयु हुए थे ।।२।। प्रैलोक्यदक्षिणातेन मृत्विग्म्य प्रतिपादिता । सोम.प्राप्याथदुष्प्राप्यमैश्वर्यसृष्टिमत्कृतम् ।।२२ सप्तलोकैकनाथत्व प्राप्तस्स्वतपसा तदा ॥२३ कदाचिदुद्यादगतामपश्यदनेकपुष्पाभरणोपशोभाम् । वृहन्नितबस्तनभारखेदा पुष्पावभगेऽप्यतिदुर्वलागीम् । भायां च ता देवगुरोरनगवारणाभिरामायतचारुनेनाम् ।।२४ तारा स ताराधिपति स्मरात केशेषु जग्राह विविक्तभूमौ । सापि स्मरार्ता सहते न रेमे तद्र पकात्या हृतमानसैव ॥२५ चिर विहृत्याथ जगाम तारा विधु हीत्वा स्वगृह ततोऽपि । न तृप्तिरासीत्स्वगृहेऽपि तस्य तारानुरक्तस्य सुखागमेषु ॥२६ बृहस्पतिस्तद्विरहाग्निदग्यस्तयाननिष्ठक्मना बभूव । शशाक शाप न च दातुमस्मै न मयशस्याग्निविपरनेक. ॥२७ तस्यापकतु विविध रुपाय वाभिचारैरपि वागधीराः। स याचयामास ततस्तु देव सोम स्वभार्यार्थमनगतप्त. ॥२८ [ १-पुराण - पुषो के समय में अपने तप से सातों लोको के स्वामी हो जाने का वैभव उसने प्राप्त किया था ॥२३॥ किसी एक समय में सोम ने उद्यान में गई हुई, पुषों के भाभ- रणों से परम शोभा वाली, बडे-बडे नितम्ब तथा स्तनों के भार से खिन्न हुई मङ्ग करने में भी प्रत्पन्न दुर्वल मङ्गो वाली, कामदेव के वाणो से अत्यन्त अभिराम, बडे और सुन्दर नेत्रो वालो देवगुरु की भार्या को देखा था ॥२४॥ ऐसी परम सुन्दरी उसे जिसका नाम तारा था, देखकर तारा के अधिपति सोम कामदेव से मत्यन्त प्रात्त होकर एकान्त स्थान में उसने उसके केश पकड़ लिये थे। वह भी काम से अभिभूत हो गई थी और उसके रूम की कान्ति से उप्स तारा का हृदय वशीभूत हो गया था। वह वहाँ पर अपने पापको नियन्त्रिन न कर सकी और वहाँ पर उसने रमण किया था ॥२५॥ चिरकाल तक वहाँ पर विहार करके फिर वहाँ से चन्द्र उसे अपने माथ ही मे लेकर अपने पर को चला गया था । उस परम सुन्दरी नारा में वह मोम ऐसो अनुरक्त हो गया था कि अपने घर मे उसे रखकर भी काम क्रीडा के मुख मे उसकी तृप्ति नहीं हुई थी ॥२६॥ देवगुरु वृहस्पति उसके विरह से अग्नि दग्ध से हो गये थे मौर रात-दिन उसी के ध्यान में निमग्न मन वाले हो रहे थे। यह बृहस्पति मन्त्र-शस्र-मग्नि मोर अनेक प्रकार के विष मादि से इसको शाप भी न दे सके थे ॥२७॥ पाणी के स्वामी देवगुरु मनेक उपायो के द्वारा और अभिचारी मे उसका कोई भी उपकार नहीं करना चाहते थे किन्तु काम से प्रत्यन्त उत्पी- डित होकर उनने सोम देव से अपनी भार्या के लौटा देने की याचना की थी॥२८॥ सयाच्यमानोऽपि ददौ न भायां वृहस्पतेः कामवशेनमोहितः । महेश्वरेणाथ चतुर्मुखेन साध्यमरुद्भिःसह लोकपाले. २९ ददी यदा तां न कथचिदिंदुस्तथा शिव क्रोधपरो बभूव । यो वामदेव. प्रथित:पृथिव्यामनेकरुद्राचिंतपादपधः ॥३० तत:सशिष्यो गिरिश. पिनाकी बृहस्पतेः स्नेहवशानुबद्धः । धनुऍहित्वाजगवपुरारिजंगाम भूतेश्वरसिद्धजुष्टः ।।३१ मुदाय सोमेन विशेपदीप्ततृतीयनेपानलमोमवक्त्रः । सहैव जग्मुश्च गणेश्वराणां विशाधिका यष्टिरयोग्रगतिः ।।३२ सोगवश वर्णन J तदा सुयुद्ध जगतां क्षयाय प्रवृद्धमालोक्यपितामहोऽपि । ततः प्रविश्याथ कथचिदेव निवारयामास सुरै.सहैव ।।३३ अकारणविक्षयकृजनानां सोम त्वयापीदमकार्यकार्यम् । यस्मात्परस्त्रीहरणाय सोम त्वया कृत युद्धमतीवभीमम् ॥३४ पापमहत्त्व भविता जनेषु पापोऽस्यलंवह्निमुखाशिना स्वम् । भार्यामिमार्पयवाक्पतेस्त्व प्रमाणयन्नेव मदीयवाचम् ॥३५ तथेति चोबाच हिमांशुमालो युद्धदापाक्रामदत प्रशातः । बृहस्पतिस्तामथ गृह्य तारा हृष्टो जगाम स्वगृहच रुद्रः ।।३६ उस सोम से याचना किये जाने पर भी कामदेव से प्रत्यन्त मोहित सोम ने वृहस्पति की भार्या को वापिम नही लौटाया था। उसे वापिस देने के लिये महेश्वर, चतुर्मुख, माध्यगण, मरुद्गण और समस्त लोकपालो ने सोम से कहा था ॥२६।। जब चन्द्र ने सबके कहने पर भी किसी भी प्रकार से उम तारा को वापिस नही किया तो भगवान शिव को महान क्रोध आ गया था जो कि इस पृथ्वी में वामदेव नाम से प्रसिद्ध हैं पोर नक रुद्रो के द्वारा समवित चरण. कमल वाले हैं ।।३०। इसके मनन्तर वृहस्पति के स्नेह मनुवद होते हुए पिनाकधारी गिरीश अग्न समस्त शिष्यगए क सहित धनुप ग्रहण कर भूतेश्वर पोर मिद्धो से सेवित होते हुए भगवान् पुरारि युद्ध के लिये प्रस्तुत हो गय थे ॥३१॥ सोम के साथ युद्ध करने के लिये जिस समय में भगवान शिव चने थे उस समय में उनका मुख विशेप दीनि वाले तीसरे नेत्र की अग्नि से महान् भ.पण दिखलाई दे रहा था । उनक साथ मे अत्यन्त उम्र स्वरूा वाले प्रस्ती गनेश्वर भी चल दिये थे ॥ ३२ ।। वह ऐसा भीषण युद्ध था जिसमें जगत् का पूर्ण क्षय ही था। इस प्रकार के उम बढ़े हुए युद्ध को देखकर पितामह ब्रह्मा ने देवगण के साथ वहां पहुंवकर बडी कठिनता से उसका निवारण किया था ॥३३॥ ब्रह्माजी ने सोम से कहा- हे सोम । बिना ही किसी कारण के सब जनो के वाय परा देने वाना यह कुरिसन कार्य क्यो किया है जिससे पराई स्त्री के हरण करने के लिये यह पत्यन्त भयानक युद्ध करने का विचार कर डाला है ? ॥३४11 तुम जनों में पाप ग्रह हो जानोगे भोर मय भी वह्नि मुसाशियों के १८ ] 1 पम-युगल महान् पारी हो गये हो । अव नुम इस मायां को वृहस्पति को वापिस लौटा दो पौर मेरे वचन को प्रमाण स्वम्प मममी ॥३शा ब्रह्माजी के ऐसा कहने पर हिमांशुमाली चन्द्र ने उनी क्यन को स्वीकार कर लिया था और युद्ध करने में अलग हो गया था। तब से सोम प्रशान्त हो गया था। बृहस्पनि भी प्रपनी भार्या तारा को लेकर परम प्रमय हो गये और देवगुरु तथा रुद्र दोनों अपने- अपने घर वापिम चले गये थे ॥३६॥ तत: संवत्सरस्यांतद्वादशादित्यसन्निभः । दिव्यपीताम्बरधरोदिव्याभरणभूपितः ॥३७ तारोदरविनिप्फन्तःकुमारस्सूर्यसनिमः । मथिंगास्वविद्विद्वान्हस्तिशास्त्रप्रवर्तकः ॥३८ तामयद्राजपुत्रोऽर्थविथ तोराजवैद्यकः । राज्ञःसोमस्यपुत्रत्वाद्राज पुत्रोवुध स्मृतः ॥३६ अभिपेक तत कृत्वा प्रदानमकरोद्विभुः । ग्रहमध्य प्रदायाथ ब्रह्मा ब्रह्मपिभियुतः ॥४० पश्यतां सर्वभूतानां तवांतरधीयत । इलोदरे च घर्मिष्ठं बुधः पुत्रमजीजनत् ।।४१ अश्वमेघशतमाग्रमकरोद्यस्वतेजसा । पुरूरवाइतिख्यातःसर्वलोकनमस्कृतः ॥४२ पुलस्त्य मुनि ने कहा-फिर एक वर्ष के पश्चात् बारह सूर्यों के समान सनस्यो, दिव्य पीताम्बरधारी तथा उत्तम आभरणो से सुविभूषित सूर्य के सदृश कुमार तारा के उदर से निकला था जो कि समान अर्थशास्त्रों का ज्ञाता, परम विद्वान पोर हस्ति शास्त्र का प्रवर्तक था ॥३७॥३८॥ इसका नाम राज पुत्र था जो कि मधं से विश्रुत राज बंधक होता है । राजा सोम का पुत्र होने के कारण राजपुत्र युध इम नाम से कहा गया था ॥३६॥ ब्रह्मपियों के सहित प्रह्मा ने रमेक करके, नो यों.का.मय,भारा.ण्द्र मिया'Yas. सभी मनुष्यों के देसते हुए वह यहीं पर पन्तर्ध्यान हो गये थे और फिर इसा के चुप ने परम मित्र पुत्र को जन्म प्रहाण कराया था ॥४१॥ जिसने में सोमवंत वर्णन ] [E अपने तेज से सौ मश्वमेघ यज्ञ किये थे। वह समरत लोको के द्वारा नमस्कृत होता हुमा पुरुरवा इस नाम से प्रसिद्ध हना था ॥४॥ हिमच्छिखरेरम्येसमाराध्यपितामहम् । लाकंश्वयंमगाद्राजन्मप्तद्वीपपतिस्तदा । ४३ के शिप्रभृतयोदैत्यास्तभृत्यत्वसमागता । उर्वशीयस्यपत्नीत्वमगमद् पमोहिता ।।४४ अजीजनत्सुतानष्टौनामतरतान्निबोधमे । आयुई ढायुर्वश्यायुर्वलायुधृतिमान्वसु ॥४५ दिव्यजायु शतायुश्चमर्वेदिव्यबलौजस । श्रायुपोनहुप,पुत्रो वृद्धशर्मातथैवच ।।४६ रजिदंडोविशाखश्ववीरा पच महारथा.। रजे पुत्रशत जज्ञ राजेयाइतिविथ तम् ॥४७ रजिराराधयामासनारायणमकल्मपम् । तपसातापितोविष्णुर्वरप्रादान्महीपते ॥४८ देवासुरमनुष्याणामभूत्सविजयोतदा । अथ देवासुर युद्धमभू पंशतत्रयम् ।।४६ हिमवान् पर्वत राज के सुन्दर शिखर पर भगवान् पिनामह को मारा- धना करके उसने लोको क ऐश्वय को प्राप्त किया था और उस समय वह सातो द्वीपो का स्वामी हो गया था । ४३॥ उमने पाठ पुत्री को उत्पन्न किया था। उनके नाम मुझसे श्रवण करा । अ यु, हायु वश्यायु, बलायु, धृतिमान, वसु, दिव्य जायु और शतायु ये उन मठो के नाम थे जो कि सभी दिन, योन एवम् बल वाल थे। आयु के नप और वृद्धशर्मा पुत्र हुए थे ।।४४ ४५॥ रजि, दण्ड और विशाख इस प्रकार से पांच महारथी पुत्र उत्पन्न हुए थे। रजि के एक सो पुत्रो की समुत्पत्ति हुई थी जो 'राजेय'--इस शुभ नाम स लोक में विश्रुत हुए थे ॥४६१.७।। रजि ने कमप से रहित भगवान नारायण की पाराधना को थी । तपश्व से परम प्रनन्न भगवान् विष्णु ने महीपति को वर प्रदान किया था ।।४८॥ वह फिर उस समय मे देव--प्रसुर पौर मनुष्यो में सब पर विजयो हा था । इमके अनन्तर तीन सौ वर्ष तक देवासुर युद्ध हुप्रा था ॥४६" पः - महायोगीमंग वनिजियो सयोः । सतादेयागुर.पृष्ट-पग्देवनाग. ॥५० मनोविजयोफिस्यादजियंतिमोग्नयो । जयायप्रायितीराजाराहायस्यमययन: ।५१ दैत्यःप्राहयादिस्वागीवोभवामिततस्त्यलम् । नागुरःप्रतिपन्समतिपन्नंसुरंस्तदा ॥५२ स्यामीभवत्यमस्माकलनाशायविधिपः । ससोविनाशिताःसय येवध्याववपाणिनः ॥५३ पुत्रत्यमगमत्तष्टस्तस्यद्रःकमणा ततः। दत्वद्राय पुरा राज्यं जगाम तपसे रमिः ।।५४ रजिपुस्तदाछिन्नंवलादिद्रस्य यदा। यज्ञभागश्च राज्य चतपोबल गुणान्वितं. १२५ राज्यभ्रष्टस्ततः शको रजिपुत्रनिपीडितः । पाहवाचस्पतिदीनःपीडितोऽस्मिरजे:सुतः ॥५६ मे प्रहलाद मौर इन्द्र इन दोनो मसुर और सुर का युद्ध बड़ा भीषण हा पा और इन दोनो मे कोई भी विजयो नहीं हुआ था। तब देशमुरों ने अलग- अलग चतुर्मुख ब्रह्माजी से पूछा था ॥५०॥ इन दोनों में विजयो कोन होगा? तब ब्रह्मा ने कहा या इस युद्ध में रजिका विजय होगा। उस समय मे जप प्राप्त करने के लिये राजा से प्रार्थना की गई थी कि माप हमारे इम युद्ध सहायता करने वाले बन जावें ॥५१॥ दैत्यो के द्वारा ऐसी प्रार्थना करने पर रजि ने कहा यदि मैं प्रापका स्वामी हो जाऊँ तो फिर पर्याप्त है। असुरों ने जो प्रतिपक्ष नहीं किया है वह उस समय सुरों ने प्राप्त किया है ॥५२।। फिर । मन्यो ने कहा कि शत्रुओ के बल के नाम परने के लिये माप हमारे स्वामो हो । जाइये । इससे जो वध्या बच हापों मे लेने वाले है वे सब विनाशित हो जायेंगे ॥५३।। इसके मनन्तर उसके गर्भ से सन्तुष्ट इन्द्र उसके पुत्रता को प्राप्त हो गया था मौर रजि पहिले समय में इन्द्र को अपना राज्य देकर तप करने के लिये वन में चला गण या ॥५४॥ उस समय में रजि के पुत्रो ने बलपूर्वक इन्द्र से पिवंश वर्णन ] ह सब छिन्न कर दिया था जो कि यज्ञ का भाग था और राज्य भा क्योकि वे प के बल और गुणों से युक्त थे । ५॥ इसके पश्चात् राज्य से परिभ्रष्ट होकर न्द्र रजि के पुत्रो के द्वारा प्रत्यन्त हो उत्पीडित हुआ था। उसने वाचस्पति से नाकर दीनता धारणकर प्रार्थना की थी कि मुझे रजि के पुत्री ने सताया है ॥५६॥ नयज्ञभागोराज्यमपीडितस्यवृहस्पते । राज्यलाभायमेयत्नंविधत्स्वधिपणाधिप ॥५७ ततोबृहस्पतिः शक्रमकरोदबलदर्पितम् । ग्रहशातिविधानेनपोष्टिकनचकर्मणा ॥५८ गत्वाथमीयामासरजिपुत्रान्बृहस्पतिः । जिनधर्मसमास्थायवेदवाह्य राधर्मवित् ॥५६ वेदत्रयीपरिभ्रष्टावकारधिपणाधिपः । वेदवाह्यान्परिज्ञायहेतुवागसमन्वितान् ॥६० जघानशकोवणसर्वा घमवहिष्कृतान् । नहुपस्यप्रवक्ष्यामिपुत्रान्सप्तवधार्मिकान् ॥६१ यतिर्थयातिश्शयतिरुत्तर:परएवच । अ (प्रा) यतिवियतिश्चवसप्ततेवशवईनाः ॥६२ यतिःकुमारभावेऽपियोगीखानसोऽभवत् । ययातिरकरोद्राज्यं धर्मकशरण सदा. ॥६३ इन्द्र ने बृहस्पति से कहा है धिपगणाधिप ! हे वृहस्पते ! मेरे पास अब न तो राज्य हो रहा है और न कोई यज्ञ का भाग ही है, मैं अत्यन्त पीडित हूँ। पर आप मेरे गज्य की प्राप्ति के लिये कोई यत्न कीजिएगा 11५७।। इसके मनन्तर बृहस्पति ने इन्द्र को बल मे पित कर दिया पा और वृहस्पति ने उसके लिये ग्रहो की शान्ति का विधान तथा पौष्टिक कम रिया या ॥५८|| फिर धर्म के वेता बृहस्पति ने वेदवाझ जिनके धर्म मे ममास्थित होकर वहाँ जाकर रजि के पुत्रों को सम्मोहित कर दिया था ५६ घिषणा भर्थात् बुद्धि के स्वामी देवगुरु ने उन सबको वेदत्रयों से परिभ्रष्ट कर दिया था। इन्द्र ने उन सबको OR १०२ ] . [ पद्म-पुराण मान लिया था कि वे सब वेदों से यहि कृत है और हेतुवाद से युक्त हो गये हैं ॥६.1 तब इन्द्र ने उन सब धर्म से बहिष्कृतों को वन से मार डाला था । अब मैं राजा नहुप के सांत परम धारिक पुत्रों के विषय में बतलाता हूं ॥६॥ नहुप के पुत्र यति- ययातिदर्याति-उत्तर-पर-प्रयाति और नियति ये सात ही हुए थे जो कि वंश की वृद्धि करने वाले ये ॥६॥ यति नाम वाला वो पुत्र था वह कुमारावस्था में ही देखानम योगी हो गया था। फिर ययाति ने राज्य का शासन क्रिया या जो कि धर्म की रक्षा करने वाला हुआ था ॥३॥ शमिष्ठातस्मभार्याभूदुहितावृषपर्वणः । भार्गवस्यात्मजावदेवयानीचसुव्रता ॥६४ ययाते.पंचदायादास्तान्प्रवक्ष्यामिनामत:। देवयानीयदुपुत्रंतुर्वसुचाप्यजीजनत् ॥६५ तथा ह्यमणं (नु) पूरुशमिष्ठाजनयत्सुतान् । यदुःपूरुषश्चभरतस्तेवैवंशविवद्धना: ॥६६ पूरोर्वशंप्रवक्ष्यामियत्रजातोऽसिपार्थिव । यदोस्तुयादवाजातायनतोबलकेशवौ ॥६७ भारावतारणार्थाय पांडवानां हितायच । यदो पुत्रा बभूवुश्च पंचदेवसुतोपमाः । ६८ सहस्रजित्तथाज्येष्ठःकोष्टानोलोजिकोरघुः । सहस्रजितोदायादः शतजिन्नामपार्थिवः । ६६ उस ययाति की भार्या शमिया नाम वाली हुई थी जो कि वृप पर्व की पुत्री पी । भार्गव को प्रात्मा (पुत्री) देवयानी परम सुव्रता थी ॥६४॥ राजा ययानि के पांच दायाद (पुत्र) हए थे । अब उनके सबके नामों का उल्लेख करके बतलाता हूँ । देवयानी ने यदु पोर तुवंमु पुत्र को नाम दिया था ॥६।। शमिष्ठा ने द्रुह्यमणे और पूरु पुत्रों को ममुत्पन्न किया था। यदु-पूरु प्रौर भरत ये पंक्षा की वृद्धि करने वाले हुए थे ।। ६६ ।। अब पूर के वश को बतलाता हूँ जिसमे जो जो राजा उत्पन्न हुए थे । यदु के पादय हुए थे जिसमें बसराम मोर भगवान केशव ने जन्म धारण रिया या ॥६॥ भूमि के भार को मारने के लिये और सोमवश वर्णन ] [ १०३ पाएडवों का हित-सम्पादन करने के लिये यदु के पांच देव पुत्रों के तुल्य सुत हुए थे ॥६५॥ सहस्रजित् सबमे ज्येष्ठ था, क्रोष्टा-नील-~-जिक और रघु ये पांव पुत्र थे । महाजित् का दायाद शनजित् नाम वाला राजा हुना था ।।६।। शतजितश्वदायादास्त्रयःपरमधामिकाः। हैहयश्च हयश्चैव तथा तालहयश्च यः ।।७० हैहयस्यतुदायादोधर्मनेत्र.प्रतिथ तः । धर्मनेत्रस्यकुतिस्तुसहतस्तस्यचात्मजः ॥७१ संहतस्यतुदायादोमहिष्मानामपार्थिवः । आसीन्महिष्मतःपुत्रोभद्रसेन प्रतापवान् ।।७२ वाराणस्यामभूद्राजाकथितःपूर्वमेवहि । भद्रसेनस्यपुत्रस्तुदुर्दमोनामधामिकः ।।७३ दुर्दमस्यसुतोभीमोधनकोनामवीर्यवान् । धनकस्यसुताह्यासंश्चत्वारोलोकविश्रु ताः । ७४ कृताग्नि कृतवीर्यश्चकृतधर्मातथैवच । कृतीजाश्चचतुर्थोऽभूत्कृतवीर्याच्चमोऽर्जुनः ॥७५ जातोवाहुसहस्रगसप्तद्वोपेश्वरोनृप । वर्पायुतंतपस्तेपेदुश्चरपृथिवीपतिः ॥७६ शतजित् के पुत्र परम धार्मिक तीन हुए थे जिनके नाम हैहय-हय और सालय थे ॥७०।। हैहय के दायाद का घमं नेत्र प्रसिद्ध था। धर्मनेत्र का कुन्ति हमा भोर कुन्ति का सहत पुत्र उत्पन्न हुमा था ॥७१॥ संहत का पुत्र महिष्मान नाम वाला राजा हुआ पा । महिष्मान् के पुत्र का नाम भट्रमेन था जो बड़ा ही प्रताप वाला था ॥७२।। यह वाराणसी मे राजा हुमा था जिसका वर्णन पहिले कर दिया गया है । भद्रसेन के पुत्र का नाम दुर्दम था जो कि राजा हुमा था पोर धामिक था ।। ७३ ।। दुर्दम का पुत्र भीम धनक नामधारी अत्यन्त वीर्य पराक्रम वाला था। धनक के चार पुत्र हुए थे जो कि लोक में प्रसिद्ध हुए थे ॥७॥ उनके नाम घृताग्नि-पृतवीर्य-कृतपर्मा-तोष थे। कृतयोयं में पर्जुन अर्थात् सहरजार्जुन समुत्पन्न हुपा था । ७५॥ यह मजुन सहस वाहमा । -

[ पम पुराण
वाला था और सात बीजों का (श्वर नृपति हुमा पा । इम पृथ्वी पति ने दश
सहम यपं पर्यन्त परम दुश्चर तप किया था ॥७६।।
दत्तगराधयामासकात्तवीर्यो निसंभवम् ।
तस्मैदत्तोवरान्प्रादाच्चतुर.पुरुपोत्तमः ७७
पूर्वबाहुसहस्रतुसव राजसत्तमः ।
अधमंध्यायमानस्यभीतिश्चापिनिवारणम् ॥७८
युद्धनपृथिवीजित्वाधर्मेणावाप्यवंगलम् ।
संग्रामवर्तमानस्यवधश्चवाधिकाद्भवेत् ॥
एष धन्वी धनु ह्य उसिक्त पंचभि शरः ।
लकेशं मोहयित्वातु सवलं रावणं बलात् । ८०
निजित्यबद्धात्वानीयमाहिष्मत्यांववधताम् ।
ततोगतोऽहंतस्याने अर्जुनसंप्रसादयन् । १
मुमोचराजन्पोत्रमेसरूपंकृत्वाचपाथिक ।
तस्यबाहुसहस्रस्यबभूवज्यातलस्वनः ।।५२
युगांताग्ने.प्रवृत्तस्यपाज्यातलनि.स्वनः ।
अहोबलविधेर्यिभार्गव.सयदाच्छिनत् ।।३
मृधे सहस्र वाहूनहिमतालवनयथा।
यवसिवस्तुसंक्रुद्धोह्य जुनंशप्तवान्विभुः ।।१४
यस्माद्वनं प्रदाधं ते विश्रुतं मम हैहय ।
तस्मात्तेदुष्कृतकर्मकृतमन्योहनिष्यति ।।६५
इस कार्तवीर्य ने मत्रिकुमार दत्त की माराधना की थी । उस पुरुषो में
परम श्रेष्ठ ने उसको चार वरदान दिये थे ।।७७॥ उस राजामो मेघष्ठ ने
पहिला वरदान तो एक सहस्र बाहुप्रो का होना मांगा था। प्रधर्म का ध्यान
करने वाले से जो मय हो उसका निवारण हो जाना यह दुमरा वर प्राप्त किया
था 11७1 युद्ध के द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी को जोतकर धर्म के द्वारा बल की प्राप्ति
करना तथा सग्राम मे वर्तमान चाहे कोई कितना भी अधिक हो उसका वध
कर देना ये चार वरदान प्राप्त किये थे ॥७६ स कर्तवीर्य ने धनुष्ट ग्रहण

सोमवंश वर्णन ] [ १०५ । करके पांच शरी से ही काम लिया था मोर अत्यन्त बलवान रावण को सेना के सहित बलपूर्वक मोहित कर दिया था | उसलमेश्वर को जीतकर बाध. कर ले माया मोर माहिष्मतो में बांध दिया था। फिर मैं वहाँ गया था और नसके मागे मैंने सहस्रार्जुन को प्रसन्न किया था । ८१॥ हे पायिव ! पुलस्त्य सहस्रार्जुन से कहा था कि मेरे साथ सख्य भाव को करके मेरे इम पौत्र को घोड दो तब उसने रावण को खोलकर छोड़ दिया था। उसकी जो एक सहस्र बाहुऐं थी उनमे धारण की हुई धनुप को डोरी का शव बडा भयानक होता पा.१८२॥ युगान्त के ममय मे प्रवृत्त पग्नि के समान उगकी ज्याका तल ध्वनि होती थी। उसके इस प्रकार के बल का छेदन भार्गव ने किया था 1 ८३॥ युद्ध में उन सहस्रो बाहुप्रो को हेमताल वन को भांति परशुराम ने छिन्न-भिन्नकर काट दिया था। महर्षि वशिष्ठ ने क्रोधित होकर महस्र जुन को शाप दे दिया था 11८४॥ महपि वसिष्ठ ने यह शाप दिया था कि हे हैहय ! तूने मेरा परम प्रसिद्ध वन दग्ध कर दिया है इस दुष्कृत से तुझे ऐमा परिणाम भोगना होगा कि कोई भन्य बली तेरा हनन कर देगा ॥५॥ छित्वावाहुसहस्रतेप्रमथ्यतरसावली । तपस्वं ब्राह्मणस्त्वांववषिष्यतिसभार्गवः ।।८६ तस्य रामोश्य हंतासीन्मुनिशापेनर्धामतः । तस्य पुत्रशतं त्यासीत्पंच तत्र महारथाः ।।८७ कृतास्त्रावलिन शूराधर्मात्मनोमहाबल । शूरसेनश्चगरश्च धृष्टो वै कृष्ण प्रवच ॥८८ जयध्वज सवैकप्रिवन्तिश्वरसापतिः । जयध्वजस्यपुत्रस्तुतालजघोमहाबलः ॥६ तस्यपुत्राश्शतान्येव तासजवा इतिस्मृताः। तेपी पंचकुलान्यासन्हैयानामहारमनाम् ॥६० वीतिहोमाश्वसं जाताभोजावावंतयस्तथा। तुडफेराश्वविक्रांतास्तालजधा:प्रकीर्तिताः HEY तेरी इन महयों याहुपों रा छेक्न र बगपूर्वक मेरा प्रमपन पर बालवाम् परम तपस्यो प्राह्मण परशुराम तेरा घर देगा ॥८६॥ मुनि के [ पद पुराण शाप के कारण परशुराम उसके वध करने वाले हुए थे। उसके एक मो पुत्र हए थे उनमे पांच महारथ ये 10 ये पांचो प्रस्त्रधारी, महा बलवान, भूर- वीर और धर्मात्मा थे। उनके नाम सू सेन-शूर-धृष्ट-~कृष्ण पौर जयध्वज थे। जयध्वज अवधि के करने वाला रमापति था। जयध्वज के पुत्र का नाम ताल नव था जो अत्यन्त बलवान् हुपा था ।।८६॥ सप्तके भी एक सौ पुष हुए थे जो तालज्छ-इम नाम से प्रसिद्ध हुए थे। उन महान् पारमा वाले हैहयों के पाव कूल हुए थे 1800 उन पांचो कुलों के नाम बीनिहोत्र-भोज- भवन्तिय-तुण्डकेर और विकान्त थे। ये सब तालाई के नाम से ही कात्तित ये ॥६ चौतिहोबसुनवापियनतोनामवीर्यवान् । दुर्जयस्तस्यपुत्रस्तुबभूवामित्रकर्षण ॥६२ सद्भावेनमहाराजःप्रजाधर्मेणपालयन् । कार्तवीर्यार्जुनोनामराजावाहुसहस्रधृत ।।६३ येनसागरपयंतानुपानिर्जितामही । यस्तस्यकीतयेन्नामकल्यमुत्यायमानवः ।।६४ न तस्य वित्तनाश.स्याग्नष्टं चलभते पुनः । कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेदिह धीमतः॥ यथा यष्टा यथा दाता स्वर्गलोके महीयते ।।९५ वोतिहोत्र ये सुत का नाम मनन्त था जो बहुत वीर्य पराक्रम वाला हुप्रा था। उसके पुत्र का नाम दुजय हुमा था को कि शत्रुप्रो का मर्पण करने वाला पा ॥१२॥ महान् रा कोसंबीर्यार्जुन एक सहन बाहुभो के धारण परने वाला था और अच्छे भाव से प्रभा धर्म को परि पतित करते हुए उसने पासन किया था। रिसने सागर पर्यस्तु सम्पूर्ण पृथ्वी को धनुष के द्वारा श्रीन लिया । जो मनुष्य प्रात काल मे उठकर उसके नाम का कीर्तन करता है उसके वितका कभी AIET नहीं होता है और जो नष्ट हो गया हो यह प्राप्त हो जाता है। जो कोई पातंगे के जन्म का गुणगान करता है उसका मह' होता है HEMIER , ।

{ ব-
भोर
उ काव्य को देवी ने देखा था ॥६॥ शत्रु के सपघात मे क्षम करते
सन्त दुर्वल दशा मे अवस्थित उनको वहाँ देखकर उस समय में पिता के द्वारा
अस रोति से वाक्य कहे गये थे उस देवी ने काथ्य के लिये वैसा ही किया
110
गोभिश्चवानुकालाभि.स्तुवंतीवल्गुभाषिणी ।
गावस वाहनं कालेसेवमानात्वच सुख. १८
व्रतचर्यानुकूलाभिरुपास्यबहुला. समाः ।
पूर्णे धूमवते तस्मिन्धोरे वर्षसहस्रके 16
वरेण च्छदयामास शिवः प्रीतोऽभवत्तदा ।
एतद्वत त्वयकेन चीणं नान्येन केनचित् ॥१०
तस्मादतपसाबुदयाथ तेनचबलेन ।
तेजसाचसुरान्सर्वास्त्वमेकोऽभिभविष्यसि ॥११
यच्चकिनिन्मयिब्रह्मन्विद्यतेभृगुनंदन ।
प्रतिदास्यामितत्सर्वत्वगावाच्यनकस्यचित् ।।१२
किंभापितेनबहुनाप्रवध्यस्त्वभविष्यसि ।
तान्दत्वातुवरांस्तस्मभागंवायपुन. पुन, ॥१३
प्रजेशत्वं धनेत्यमवध्यत्वंचवंददो।
एताल्लब्ध्वावराकाव्यः सप्रष्टतनूरह ॥१४
श्रुति प्रिय मधुर भाषण करने वाली उसने मनुकूल वचनो के द्वारा
स्तवन करते हुए उस समय मे स्वचा को सुख पहुंचाने वाले गात्र सवाहनो से
(शरीर में दक्षाने से) सेवा को पी 10 वतचर्या के अनुकूलतामो से बहुत-से
पौ तक उपामना करके पद यह एक सहल वर्ष में समाप्त होने वाला धूमदत
जोकि प्रत्यन्न घोर सन पा सम्पूर्ण हो गया तो भावाम् शिव परम प्रसन्न
हो गये और वरदान देकर सन्तुष्ट कर दिया था।॥६॥ भगवान् महेश्वर ने
कहा-यह महान कठिन प्रत है । इमको तूने ही पूर्ण किया है और प्राज सक
पन्य सिमी ने भी इसे नहीं दिया था ॥१०॥ इसोनिये पब तू तप-~बुद्धि--
और तेज से समस्त सुरो का अकेला ही अभिभूत कर देगा ॥११॥

कोष्टु वंश विस्तार दणंन ] , [ १०६ . है ब्रह्मन् ! हे 'भृगुनन्दन ! मोर जो भी कुछ मेरे अन्दर है वह मभी कुछ तुझे दे दूंगा अब तुमको किसी से भी कुछ कहना नहीं चाहिए ॥१२॥ बहुत कुछ कहने से क्या लाभ है इतना ही पर्याप्त है कि तू वध करने के योग्य नहीं हो। इस प्रकार से मार्गव के लिये इन घरों को देकर फिर भगवान् शिव ने उसे प्रभा का ईश होना-घन का स्वामी बनना प्रौर प्रवघ्या होने का भी वरदान प्रदान किया था। इन समस्त अत्युत्तम वरदानों को प्राप्त करके काम्य (भागंव) प्रसन्नता पुलक्ति हो गये थे ॥१३॥१४॥ एवमाभाष्यदेवेशमीश्वरं नीललोहितम् । प्रज्ञाग्वितस्ततस्तस्मैप्राञ्जलिः प्रणतोऽभवत् ।।१५ 'तत.सोंऽतहिते देवेजयंतीमिदमब्रवीत् । कस्यत्वं सुभगेकावादु खितेमयिदुःखिता ॥१६ महतातपसायुक्ता किमर्थमांजिगीपसि । अनयासस्थिता भक्त्याप्रथयेणदमेनच ॥१७ स्नेहेनचैवसुश्रोणि प्रीतोऽस्मिवरवणिनि । किमिच्छसियरारोहेकस्तेकामः समुद्यतः ॥१८ तंतेसपादयाम्यद्ययद्यपिस्यात्सुदुप्फरम् । एवमुक्ता प्रवीदेनं तपसाज्ञातुमर्हसि ॥१६ चिकोपितहिमेब्रह्म'स्त्वववदयथातथम् । एवमुक्तोऽनवीदेनां दृष्ट्वादिव्येन चक्षुपा ॥२० मयासहत्वंसुश्रोणिशतवर्षाणि भामिनि । सर्वभूतैरहश्यांतः सप्रंयोगमिहेच्छसि २१ इस प्रकार से नील लोहित देवों के अघोश्वर भगवान शिव से मामापण करके प्रजा से समन्वित भार्गव हाथ जोड़कर परम प्रणत हो गये थे ॥१२॥ इमके यनन्तर भगवान् शिव के मन्तान हो जाने पर भार्गव ने अपनी से महा-हे सुभगे ! तू कौन है और किमकी पुत्री है ? मेरे दुःसित होने पर तू पों दुःसित हो रही है ?॥१६॥ इस प्रकार की इस महान तपमर्या मे युक्त होकर किम प्रयोजन के लिये मेरी सेवा कर रही है ? सेगे यह ऐगी भक्ति [ पग-पुराण श्रद्धा-प्रश्रय और दम विस हेतु है ? ॥ १७ ॥ हे सुश्रोणि ! हे वरणिनि ! स्नेह के वशीभूत होकर मैं तुझ पर परम प्रसन्न हो गया है । हे वराहरोहे ! तू कपा चाहती है पोर तेरी क्या कामना है? 1१11 में जो भी तेरा कोई कार्य शेगा चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो, उसे मात्र पूर्ण कर दूंगा । इस तरह जब उस जयन्ती से भार्गव ने कहा तो वह इनसे बोली-माप तो मेरा जो भी कार्य है उसे तपोबल से जानने के योय ॥१॥ जयन्ती ने कहा- है ब्रह्मन् ! जा भी मेरा कुछ निकोषित (करने का मिलाप) है उसे माप ही ठीक-ठीक बतला दीजिएगा । इस प्रकार से कहे गये भार्गव ने मपनी दिव्य चक्षु से देखकर उससे कहा ।।२०।। हे सुन्दर श्रोणी भागो वाली ! हे भामिनि ! तुम मेरे साय यहाँ पर समस्त प्राणियो से मदृश्य होती हुई तो वर्ष तक मन्त सम्प्रयोग चाहती हो ॥२॥ देवि इंदीवरश्यामे वराहेंबामलोचने । एवंवृगोपिकामांस्त्वददेववल्गुभाषिते ।।२२ एवंभवतुगच्छाव गृहमैमत्तकाशिनि । तत: सगृहमागम्यजयंत्यायसह चोशना ॥२३ तयासहाबसद्देव्याशतवारिणभार्गवः । अदृश्यःसर्वभूतानां माययासंशितव्रतः ॥२४ कृतार्थमागतज्ञात्वा शुक्रपर्वेदितः सुताः । अभिजग्मुमुहंतस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः ।।२५ गतायदानपश्यति माययासंवृतगुरुम् । लक्षणतस्यचावुद्ध्वानाद्यागच्छतिनोगुरुः ।।२६ एवंतेस्वानिधिष्ण्यानिगताः सर्वेयथागताः । ततोदेवगणास्सर्वे गत्वां गरसमव वन ॥२७ दानवालयेतुभगवान्गत्वातत्रचतांचमूम् । मोहयित्वात्मवशगांक्षिप्रमेवतथाकुरु ॥२८ हे इन्दीवर श्याम ! हे देखि! हे वराहें ! हे मुन्दर नेपों याली ! हे मृदु एवं मधुर भाषण करने वालो ! तुम इस प्रसार रेयर मुझमे चाहती हो तो

कोष्टु वश विस्तार वर्णन ]
[ १११
मैं उन्हे देता हूँ ॥२२॥ अच्छा, ऐमा ही होगा। हे मतकाशिनि ! चलो, मेरे
घर मे चलो। इसके अनन्नर वह भार्गव जयन्ती के साथ घर में म गये थे
॥२३॥ फिर भार्गव ने उस जयनी के साथ एक सौ वर्ष तक निवास किया।
माया से सशित व्रत वाला होकर समस्त प्राणियों से प्रदृश्य होकर ही वास किया
था ॥२४॥ सब दिति के पुत्र दैत्यो ने अपने तप के कार्य में सफल होकर पाये
हुए टुक्र को जानकर परम प्रमन्न हुए और उन्हे देखने की इच्छा वाले वे सब
सुक के घर में गये थे ॥२५।। शुक्र के घर पर गये हुए उन दैत्यो ने जब शुक्र
को नहीं देखा था जो कि माया से सवृत थे पोर उनके कोई लक्षण भी वे न
जान पाये तो उन्होने विचार किया कि अभी हमारे गुरुदेव शुक्र वापिस नही
प्राये हैं ॥२६।। इस तरह निराश होकर ये सब जैसे प्राय थे वैसे ही अपने-
अपने घरो को वापिस लौटकर चले गये थे । इसके पश्चत् समस्न देवगण
पाङ्गिरस के समीप में पहुंचकर उनसे कहन लगे ॥ २७ ॥ हे भगवन् ! भाप
दानवो के आलय में पहुंचकर वहाँ उनको उस सेना को मोहित करके शीघाति.
दोन अपने वश मे कर लेवें ॥२८ ।
घिपणस्तान्सुरानाहएवमेवव्रजाम्यहम् ।
तेनगत्वादानवेंद्रः प्रह्लादोवैवशीकृत. ॥२६
शुकोभूत्वास्थितस्तत्रपौरोहित्यचकारसः ।
स्थितोवर्परातसाप्रमुशनाताबदागत ॥३०
दनुपुस्ततादृष्ट सभायातुवृहस्पतिः ।
उशना एक एवान द्वितीय किमिहागत ॥३१
मुमहत्कौतुकंचाप्रभविताविग्रहोदृढम् ।
किंवदिष्यतिलोकोऽयद्वारियोऽयव्यवस्थित ॥३२
सभायामास्थितीयोऽयगुरु विनोयदिप्यति ।
एवंप्रजल्पतातेपादनूनाकविरागतः ॥३३
स्वरूपधारिणतरदृष्ट्वामीनवृहस्पतिम् ।
उवाचवचनाद किमर्थयमिहागत ॥३४
शिष्यान्मोहपसेमेत्ययुक्त गुरगुरोम्तव ।
मूढास्तेरयानजान नित्वमायामोहिताघ्र वम् ।।३५

११२ । [ पम-पुराण तनयुक्त तपब्रह्मन्परशिष्यप्रधर्षणम् । वजस्वदेवलोकस्वतिष्ठधर्ममवाप्स्यसि ॥६६ देवतानो के द्वारा ऐसा कहने पर देवगुरु वृहस्पति नै उत देवगणो से कहा-हाँ ऐसा ही करूगा और पब मैं वहाँ जाता हूँ। उसने वहाँ जाकर दानवो का स्वामी जो प्रल्हाद था उमको पपना मशीकृत बना लिया था ॥२६॥ मुरगुरु स्वय शुक्राचार्या के स्वरूप वाले बन गये और वहाँ स्थित होकर दैत्यन्द्र का जो पोरोहित्य कम या उसे करने लगे थे। वह इस प्रकार सौ वर्ष से भी अधिक ठहर गये थे कि उसी बोच में भागय भी आ गये थे॥३०॥ तब तो दनु के पुत्रों ने सभा में वृक्षम्पनि को देखा था जो कि शुक्र के हरि स्वरूप में यहाँ पर थे । दयो न इन दानो को देखकर मन में सोचा कि तो एक ही है यह दूसरे कैसे,कहाँ से आगये हैं ? ॥३१॥ यह एक बड़ा कौतुक है मौर इसमें सुदृढ विग्रह हो जायगा । जो यह द्वार पर व्यवस्थित है इस विषय में लोक क्या कहना ॥ ३२ ॥ सभा में समास्थित जो हमारे गुरुदेव हैं वह क्या कहेगे....इस प्रकार से उन दनुओ के कहते हुए ही वहां पर भार्गव मा गये थे ।।३३।। अपने स्वरूप को धारण करने वाले बृहस्पति को वा बैठे हुए देखकर भगव बहन कुद्ध होते हुए यह वचन बोले-तुम यहाँ किमलिये मा गये हो ॥३४॥ हे देव. गुरु । तुम मेरे शिष्य दैत्यों को मोहित कर रहे हो क्या यह तुम्हारा चिर कर्तव्य है ? ये मूढ हैं और तुम्हारी माया से मोहित होगय हैं पतएव ये तुमको नहीं पहचान पा रहे हैं ॥३५॥ है ब्रान् परये शिध्यो का इस तरह प्रधपरत (धोका देना) करमा तुम्हारा युक्त कार्य नहीं है। प्रार पब देवलोक में चन जओ मोर वहाँ पर रहो अपने धर्म को प्रात कगेगे ॥६॥ शिष्योहिमेकच पूर्वहतोदानवपु गदैः । विद्यार्थीतनयोब्रह्म स्तवायोग्यागतिस्त्वत् ॥३७ त्वानुतम्यतमाक्यस्मितत्वावदद्गुरुः । सतिचोरा. पृथिव्यायेपरद्रव्यापहारिणः ॥३८ एव विधानदृष्टाश्वरूपदेहापहारिण । वृषपातेन चेंद्रस्य ब्रह्महत्या पुराभवत् ।।३६ ।

क्रोष्टुवंश विस्तार वर्णन ] [ ११३ लोकायतिकशास्त्रेणभवतासातिरस्कृता । जानामित्वामांगिरसंदेवाचार्यवृहस्पतिम् ।।४० मद्र पधारिणंप्राप्तंसपश्यतदानवाः । एपवोमोहनायालंप्रामोविष्णुविचेष्टितः ॥४१ तदेनंशृङ्खलवद्ध्वाक्षिपेतलबणार्णवे । पुनरेवाववीच्छुक:पुरोधार्यदिवौकसाम् ।।४२ पहिले दानव श्रेष्ठों के द्वारा मेरा कच शिष्य मार दिया गया था। विद्यार्थी तनय है । यहाँ तुम्हारी मति भयोग्य है ।।३७।। भार्गव के द्वारा कहे हुए इस वार को सुनकर मुस्कराते हुए देवगुरु ने कहा-गृथिवी में जो पराये धन का अपहरण किया करते हैं ऐसे चोर है ।।३८॥ इस प्रकार से रूप मौर देह के अपहरण करने वाले विधान मे देखे गये हैं। वृत्रासुर के घात करने से अर्थात् मार देने से पहिले इन्द्र को ब्रह्म हत्या लगी थी ।। ३६ । लोकायतिक शस्त्र के द्वारा आपने उसका तिरस्कार किया था। आप प्रङ्गिरा के पुत्र बृहस्पति देवाचार्य हैं-मैं आपको भली-भांति जानता हूँ ॥ ४० ॥ आप यहाँ मेरा रूप धारण करके पाये हैं। मव दानवो ! तुम इनको अच्छी तरह देख लो। यह विष्णु को विरोप चेष्टानो के कारण यहाँ आप सबको मोहन करने के लिये प्राप्त हुए हैं ।।४१।। सो अव आप लोग इनको शृद्धलापो से बांधकर खारो सागर में डाल दो। फिर शुक्राचार्य ने कहा-यह देवो के पुरोहित हैं ॥४२॥ मोहितानूनमेतेनक्षयंयास्यथदानवाः । भोग्रहंदानवेंद्र हवंचितोऽस्मिदुरात्मना ।।४३ किमर्थंभवतात्यक्त कृतश्चान्य.पुरोहितः । देवाचार्योऽगिरःपुगएपएववृहस्पतिः ।।४४ वंचितोऽसिनसन्देहोहितार्थतुदिवौकसाम् । त्यजस्वनमहाभागशत्रुपक्षजयावहम् ॥४५ अनुशिष्यभयाद्यातः पूर्वमेवमहंप्रभो । जलमध्ये स्थितः पीतोमहादेवेन शम्भुना ।।४६ उदरस्थस्य में जातं साग्नं घशतकिस । उदराच्छुकरपेणसिनेनाहंविजितः ।।४७ - ११४ ] [ एम-पुराण वरद प्राहमादेवश्शुक्रष्ट त्ववरवृणु। मया वृतो वर राजदेवदेव पिनाक्धृत् ।।४८ मनसाचितितार्थामानसेयेस्थितावराः । भवतुमयितैसर्वे प्रसादात्तव शकर ॥४८ शुरु ने कहा-~-इसके द्वारा भाप सब लोग निश्चित रूप से मोह को प्राप्त हो गये हैं पौर अब दानव क्षय को प्राप्त हो जायंगे। हे दानवेन्द्र में इस दुरात्मा के द्वारा वञ्चित हो गया हूँ ।। ४३ ।। मापने मुझे क्यो त्याग दिया है और अन्य को अपना पुरोहित बना लिया है । यही अङ्गिरा का पुत्र देवो का मावायं वृहस्पति है ।। ४४ ॥ इसके द्वारा प्राप ठगे गये है-इसमें तनिक भी मन्देह नहीं है । यह आपकी प्रतारणा इसने देवगण के हित-सम्पादन करन के लिये ही की है। हे महाभाग ! इसका शीघ्र ही त्याग कर दो, इसका यहाँ रहना शत्रु के पक्ष की विजय कराने वाला ही होगा ॥४५॥ हे प्रभो 'पहिले ही अनुशिष्प के भय से यहां से चला गया था और जल के मध्य में स्थित रहा तथा ५ द्वारा पीत हो गया था ॥४६|| उदर में स्थित मुझे सौ वर्ष बीत गये थे। फिर उदर से शिश्न के द्वारा शुक्र रूप से मैं विजिर हुमा है ॥४७॥ इसके पश्च त् घर देने वाले देव ने मुझसे कहा था -है शुक्र तु अपना अभीष्ट वरदान मुझमे मांग ले । तब देवो के भी देव पिनाक के धारण करने व ले शिव से मैंने वरदान प्राप्त किया है ॥४८1) मैंने शिव से यही वरदान प्राप्त किया था कि हे शङ्कर ! मेरे मनके द्वारा जो भी अर्थ मोचे जावें और जो मेरे मन मे स्थित मनोरथ हो वे सभी मेरे पूर्ण हो ऐमो प्रापकी कृपा होनी चाहिए ॥४६॥ एवमस्त्विति देवेन प्रेपितोऽस्मि तवातिकम् । तावदत्राभवच्चायपुरोधास्ते वृहस्पति. ॥५० दृष्ट सत्यदानवेंद्रमयोक्त त्वनिशामय । बृहस्पतिस्तदावाक्यालादप्रत्यभापत ॥५१ नाहमेतप्रजानामि देव वा दानवनरम् । मद् पधारिणराजन्वचनार्थ तवागतम् ॥५२ शम्भु महादेव क्रोष्टुवंश विस्तार दर्णन ] ततस्तेदानवा:सर्वसाधुसाध्वितिवादिनः । पुरोधा.पौर्विकोनोऽस्तुयोवाकोवाभवात्विति ॥५३ नानेनकार्यमस्माकंयातुटपयथागतः । सक्रोधमशपत्काव्योदानवेंद्रारामागतान् ।।५४ त्यक्तोयथाहंयुष्माभिस्तथासर्वाचिरा दिव । गतश्रीकान्गतप्राणान्पश्येयंदुःखजीविकान् ॥५५ सुघोरामापदप्राप्तानचिरादेवसर्वशः । एवमुक्त्वागतःकाव्योयदृच्छातस्तपोवनम् ॥५६ ऐसा ही होवे-यह देव ने कहकर मुझे अब तुम्हारे समीप में भेजा है । इसी बीच में तब तक यह वृहस्पति यहाँ प्राकर तुम्हारा पुरोहित बन गया है ॥५०॥ मैंने इसे पुरोहित के रूप मे भव देखा है । हे दानवेन्द्र ! यह मेरा कथन मरय है । तुम इसको सुना दो । उस समय देवगुरु वृहस्पति ने प्रह्लाद को उत्तर दिया पा ॥५१॥ मैं इसको नही जानता हूं कि यह देव है या दानव है अथवा पोई नर है । यह मेरा-मा ही रूप धारण करके हे राजन् ! तुम्हें ठगने के लिये यहाँ प्रागया है ।। ५२ ।। इसके पश्चात् वे समस्त दानव "साघु-माधु" मात. पिस्तुल ठीक है ऐमा कहते हुए यो बोले कि हमारा पहिला ही पुरोहित है चाहे यह कोई भी होये ॥५३॥ इग पाने वाले से हमको कुछ भी कार्य नही है । यह जमे ही आया है वैसे ही यहां गे प्रव बारिम चला जाये। उग भार्गव ने यो मारो क्रोध के माप उन ममागत दानवेन्द्रों को शाप दे दिया था ॥५४॥ गार्गव ने कहा-जिस तरह सुम सम लोगों ने मुझे स्याग दिया है वमे ही में सुम गरको निरकाम पसंत श्री में होन, प्राण रहित पोर दुःग से जीवन व्य. तीन करने वाले देगा :.५५॥ सुम मम पो ही समय में महान पोर प्राति में पान ए दुषित होपोगे--ऐमा हार पाम्प मर्यात गुगपाय अपनी ही दिशेनपने गये ॥५॥ तस्मिन्गतततः गुस्यतस्तम्यहम्पतिः । पानमन्मानयास्तजिपिरालमनिष्टन ॥५, गंभूपटाया गयावागुरम् ॥५८ सनीय निशाले प्रतिमानरेनर।

[ पच-पुराए
संसारेऽस्मिन्नसारेतुकिंचिज्ज्ञानप्रयच्छ नः ।
येनमोक्षवजामश्चप्रसादातवमृवत ॥५६
तत.सुरगुरुःप्राहकाव्यरूपोतदागुरु. ।
ममाप्येपागतिः पूर्व या युष्माभित्दाहृता ।।६०
क्षणं कुर्वन्तुसहिताशुचीभूयसमाहिताः ।
ज्ञानवक्ष्यामिवोदैत्याअहंवमोक्षदायियत् ।।६१
एपाथ तिर्वेदिकीयाऋग्यजु सामसंज्ञिता।
वैश्वानरप्रसादात्तदुःखदाप्राणिनामिह ॥६२
यशश्राद्ध कृतक्षुद्ररेहिकस्वार्थतत्परैः ।
येत्वमीवैष्णवाधर्माये च रुद्रकृतास्तथा ॥६३
शुक्राचार्य के तपोवन में चले जाने पर वहाँ पर मुद्गुरु वृहस्पति स्थिर
हो गये थे । वहाँ पर दानवो का कुछ समय तक परिपालन करते हुए थोडे कात
तक ठहरे थे ॥५७।। हे नरेश्वर ! इसके अनन्तर बहन-सा समय प्रतीत हो जाने
पर समस्त दानवो ने एकत्रित होकर उस समय में गुरु से पूछा था ॥५॥ यह
सम्पूर्ण संसार तो मार से होन है इसमे हम लोग उत्पन्न होकर मा गये हैं तो
अब कृपाकर हमको कुछ ज्ञान दीजिए। हे सुवन ! ऐसा ज्ञान प्रदान कीजिए
जिसे पाकर हम लोग मोक्ष की प्राप्ति कर लेवें । आपके प्रसाद से हमारा प्रावा.
गमन का भव-बन्धन छूट जावे ॥५६॥ ऐमा पाइने पर भार्गव के स्वरूप को
धारण करने वाले सुरगुरु ने कहा- मैगे भी यह बुद्धि पहिले हो यो अर्थात्
मेरे
हृदय
में भी यही विचार था जिसको तुमने अब मेरे सामने प्रस्ट किया है
॥६॥ एषक्षण भर के लिये आप लोग पवित्र होकर सावधान हो जामो तब
मैं है दैत्यो! आप सब को वह मोक्ष प्रदान पर देने वाला ज्ञान बतलाऊँगा
11६१॥ --यजु मोर साम सभा वाली को यह वैदिको श्रुति है यह वैश्वानर
के प्रमाद से इस समार में प्राणियो को दुख प्रदान करने वाली ही है ॥२॥
लोविक तुच्छ स्वायं में परायण लोगो के द्वाग समोर श्राद्ध मादि किये जात
है । जो ये विष्णु मे सबध रखने वाले धर्म है और जो रद कृत धर्म है मद इसी
प्रकार के हैं॥६६॥

क्रोष्टुवंश विस्तार वर्णन ]
। ११७
कुधर्मादारसहितहिसाप्रायाःकृताहितः ।
श्रद्धनारीश्वरोरुद्रःकथंमोक्षंगमिष्यति ॥६४
वृतोभूतगणभूरिभूपितश्वास्थिभिस्तथा ।
नस्वर्गानवमोक्षोऽग्रलोकाःक्लिश्यंतिवैतथा ॥६५
हिंसायामास्थितोविप्णुःकथमोक्षं गमिष्यति ।
रजोगुणात्मकोब्रह्मास्त्रासृष्टिमुपजीवति ॥६६
देवपयोऽययेचान्येवैदिकंपक्षमाश्रिताः ।
हिंमाप्रायाः सदाक्रूरामांसादाः पापकारिणः ॥६७
सुरास्तुमद्यपानेनमासादाब्राह्मणास्त्वमी।
धर्मेणानेनकःस्वर्गकथमोक्षंगमिष्यति ।।६८
यच्चयज्ञादिकंकर्म स्मातथाद्धादिकंतथा ।
तत्रनवापवर्गोऽस्तियत्रपाथ यतेश्रु तिः ।।६६
यशंकृत्वापशुहत्वाकृत्वारुधिरकर्दमम् ।
यद्य वगम्यतेस्वर्गोनरक. केन गम्यते ॥७०
ये सभी कुत्मित्त धर्म हैं । दारानो के सहित अहित पुरुपो के रा ही
किये जाते हैं जो कि हिमा पूर्ण होते हैं । अधं नारीश्वर रुद्र हैं वह किस तरह
मोक्ष को प्राप्त होगे ? ॥६४।। उनको अहनिश भूतगण घेरे रहा करते हैं और
श्मशान को भस्म से तथा मस्थियो से उनका शरीर भूपित रहता है । ऐसे
पुरुषो का न तो स्वर्ग मे ही निवास होता है और न वे मोक्ष ही प्राप्त किया
करते हैं। यहां लोग व्ययं ही कतेश उठाया करते हैं ॥६५॥ विष्णु भी हिंसा
मे समास्थित रहा करते उनकी मुक्ति भी किम प्रकार से होगी ? ब्रह्माजी भी
रजोगुण के स्वरूप वाले हैं जो अपनी सृष्टि को ही लेकर उप जीवित रहा करते
हैं ॥६६॥ देवषिगण और जो भी कोई अन्य वैदिक पक्ष का प्राश्रय लेने वाले हैं
वे सभी हिंसा प्राय, सदा क्रूरता धारण करने वाले,मांम का भक्षण करने वाले,
महान् पाप कर्मों के करने वाले हैं ॥६॥ सुरगण मद्य का पान करते हैं और
ग्र ह्मण लोग मांस भोजी हैं। इस धर्म से कैसे स्वर्ग का निवास होगा और
कैसे मोक्ष प्राप्त होगा ॥ ६८ ॥ जो यज्ञादिक कर्म हैं और जो स्मारी अर्थात्
ये

[ पम पुगए स्मति में बहे गये श्राद्धादिक कर्म है । उनमें अप वर्ग को प्राप्ति नहीं होती है कहा कि यह श्रुति सुनो जाती है ॥६६॥ यज्ञ करके उममें पशु का हनन करके रुधिर का कीच दिया जाता है। यदि इस प्रकार के कर्मों से बिनमे हिंसा की प्रधानता रहा करती है स्वर्ग के सुखोपभोग हो जाये तो फिर नरक को यातना किस में से भोगी जायगी? ॥७॥ यदिभुक्तमिहान्येनतृप्तिरन्यस्यजायते । दद्यात्प्रवसतः श्राद्धन सभोजनमाहरेत् ॥७१ श्राकारागामिनोविमा.पतितामांसभक्षणात् । तेषां न विद्यतेस्वोमोसोनवेहदानवाः ॥७२ जातस्यजीवितंजतोरिष्ट सर्वस्यजायते । आत्ममांपोपमं मांसं कथं खादेत पडितः ।।७३ योनिजास्तुकथंयोनिसेवंते जंतवस्त्वमी। मैथुनेन कथ स्वर्ग यास्यंते दानवेश्वर ।। मृद्भस्मना यत्र शुद्धिस्तवशुद्धिस्तु का भवेत् ।।७४ विपरीततमलोकपश्यदानव यादृशम् । विण्मूत्रस्य कृतोत्सर्गशिश्नापानेतुगोधनम् ॥७५ मसभारोऽस्तिवदनेमृदातोयेनवापुनः । भुक्त वाभोजनेराजन्कर्थनापानशिश्नयोः ७६ क्रियतेशोधनलद्वद्विपरीतास्थितिस्त्वियम् । यत्र प्रक्षालन प्रोक्त तत्रतेनैवकुर्वते ।।७७ यदि भोग दूसरे के द्वारा किया जावे पोर तृप्ति अन्य को प्रास हो जाया करती हो तो प्रवास में रहने वाले को श्राद्ध दे दिया जाने पर वह प्रवासी को भोजन की प्राप्ति हो जानी चाहिए किन्तु ऐसा नही होता है ॥७॥ आकाश में गमन करने वाले विप्र मांस के भक्षण करने से पतित हो गये हैं। हे दानवगए ! उन वित्रों को स्वर्ग प्राप्त नहीं होता है और उन्हें मोक्ष भी नहीं मिलता है ॥७२॥ जो जीव जन्म घागरण करता है उम मरका परम अभीष्ट जीवन हो होता है। अपने मांस के तुल्य ही अन्य का मॉम भी होता है ! उस मास को परिजन कोप्टुवंश विस्तार वर्णन ] [ ११६ ! कैसे साते हैं ? ॥७३॥ मभी लोग योनि से ही उत्पन्न हुमा करते हैं और फिर उस योनि का सेवन करके जीवगण कैसे आनन्दित हा करते हैं । हे दानवेश्वर! मैपुन कम करने से स्वयं का लाभ किस तरह हो सकता है-अर्थात् मैथुन सेवियों को स्वर्ग का गमन नहीं होगा। भस्म से मृत्तिका की जहाँ शुद्धि होती है वहाँ क्या सुचिता होगी ? |७४|| हे दानव ! इस तरह से यह लोक बिल्कुल पिपरोत है इसे देखो । मल मूत्र के त्याग करने पर जिस प्रकार का शिश्न प्रोर अपान का शोधन होता है ।।७५॥ हे राजन् ! भोजन के सा लेने पर मुख मिट्टी और जल से कुछ भी शोधन का सम्भार नहीं किया जाता है तो फिर उसके रयाग करने पर गुदा और शिश्न का यह शोधन क्यो किया जाता है ? 11७६। इनका भी शोधन चंगा ही करना चाहिए। इनके शोधन मै यह विप. येत स्थिति क्यो की जाती है ? जहाँ प्रक्षालन कहा गया है वहाँ उसीसे किया मरते है ।।७७॥ एतदन्यच्चजगतिदृश्यते पापदायकम् । एवविधो यत्र धर्म. परमार्थोमतस्तुकः ।।७८ वदस्व व दानवेद्र वद भूयो वदामि ते। गुरोस्तुगदितश्रु त्वापरमार्थान्वितवचः ।। जातकोतूहलास्तत्र विविक्तास्तु भवार्णवात् ॥७६ दीक्षयस्व गुरो सर्वान्प्रपन्नाभक्तिन स्थितान् ।।८० येन वैन पुनर्मोहबजामस्तवशासनात् । सुविरक्ताम्मससारेशोकमोहंप्रदायिनि !!२१ उद्धरस्थ गुरो सर्वान्केशाकरणकूपतः । कस्य देवस्य शरणगच्छामोब्राह्मणोत्तम ।।२ दैवत च प्रपन्नानाप्रकाशयमहामते । म्मरणेनोपवासेन ध्यानधारणया तथा ॥८३ पूजोपहारेचकृते अपवर्गस्तुलभ्यते । विरक्तास्मकुटु बेतुभूयोनारयतामहे ॥८४ यह और अन्य जगत् में सभी पापों के देने वाले हैं। जहां पर इस प्रकार का धर्म है वहाँ परमार्थ क्या हो सकता है ? | हे दानवेंद्र ' मब १२० ] । पम पुराण पाप कहिये जिसको मैं पुनः सुमको बतलाऊँ। गुरु के इस भाषण का श्रवण कर जो कि परमार्थ से ममक्ति तथा समस्त दानवगण को वडा कौतूहल उत्पन्न हो गया था मोर वे सब ससार सागर से विविक्त हो गये ||७६दानवो ने इस गुरु के प्रवचन को श्रवण वर प्रार्थना करते हुए कहा-हे गुरुचरण ! ये सब पापको प्रपत्ति ग्रहण करने के लिये समुपस्थित है और भक्ति-भाव मे पूर्णतया समन्वित हैं। अाप इनको दीक्षा दीजिए ॥ ५० ॥ भव पाप हमको ऐसी ही दीक्षा दे कि घिमसे हम लोग आपके शामन को 18 कर फिर मोह को कभी भी प्राप्त न होवें । यह ससार तो शोक मोर मोह को प्रदान करने वाला है। इसे हमने भली-भांति समझ लिया है। हमको इस संसार से अब पूर्ण वैराग्य हो गया है ।।८१हे गुरुवयं ! कुए में गिरे हुए को उसके केश परडकर जैसे उसका उद्धार किया जाता है वैसे ही माप हमारे केशों का पापण कर इस ससार से उद्धार कर दीजिए । हे ब्राह्मणो मे परम श्रेष्ठ ! मब हम किस देव जावे ? १८२॥ मापकी शरणागति में पाये हुए हमारे माप ही देवत हैं । हे महान मनि काले ! हमको प्रकाश प्रदान कीजिए। स्मरण-उप- वास-~-ध्यान-धारणा-पूजा पोर उपहार के करने से अपवर्ग का लाभ किया जाता है । अब हम लोग कुटुम्ब से पूर्ण विरक्त हो गये हैं। फिर हम लोग इसमें कुछ भी यल नही करेगे ॥५३॥८४॥ कीदारण एवचवगुरुश्छन्नस्तरुक्तोदनुपुंगवः। चितयामासतत्कार्यकथमेतत्कंरोम्यहम् ।।८५ कथमेतेमयापापा.कर्तव्यानरकौकसः विडंबनाच्छु तेर्वाह्यास्त्रलोक्येहास्यकारिण. १८६ इत्युक्त्वाधिपणोराजश्चितयामासकेशवम् । तस्यतच्चितितंज्ञात्वामायामोहजनार्दनः ।।८७ समुत्पाद्यददौतस्यप्राहचेश्वृहस्पतिम् । मायामोहोऽयमसिलास्तान्दैत्यान्मोहयिष्यति ।।८८ भवतासहित.सर्वाग्वेदमार्गबहिष्कृतान् । एवामादिश्य भगवानतीन जगामह ।।८६ कोष्टुवा विस्तार वर्णन.] [ १२१ तपस्यभिरतान्सोऽथमायामोहोगतोऽसुरान् । तेपाममीपमागत्यवृहस्पतिरुवाचह ॥६० अनुहार्थयुष्माकंभक्त्याप्रीतस्त्विहागत. । योगोदिगम्बरोमुण्डोहिपत्रधरोह्ययम् ॥६१ इत्युक्त गुरुणापश्चान्मायामोहोऽब्रवीद्वचः । भो भो दैत्याधिपतयः प्रब ततपसिस्थिताः ।। ऐहिकाथं तु पारक्य तपस फलमिच्छथ ॥६२ गुप्त रूप में रहने वाले सुरगुरु से इस तरह उन दनु श्रेष्ठो ने कहा था । तब गुरु ने उम कार्य के विषय मे चिन्तन किया था कि इस कार्य को मैं कैसे करू ||शा मेरे द्वारा ये सब पापात्मा नरकगामी किस तरह से करने चाहिए। विडम्बना से ये श्रुति से बहिष्कृत है और त्रिलोकी मे हास्यकारी हैं ।।६।। हे राजन् ! ऐसा मन मे कहकर वृहस्पति ने भगवान् केशव का ध्यान किया था सुर गुरु के उस चिन्तन को जानकर भगवान् जनार्दन ने माया-मोह समुत्पन्न कर फिर उसे दे दिया था और वृहस्पति से यह वचन बोले-~~यह माया-मोह है जो उन समस्त दैत्यो को मोह पैदा कर देगा ।।१७।८८॥ आप हित पूर्वक उन सब वेद के मार्ग से बहिष्कृत दनुजों को मोहित कर देना- इस प्रकार से भादेश देकर भगवान् अन्नहित हो गये थे ।।६।। इसके प्रनन्नर माया-मोह को प्राप्त हुए वह बृहस्पति तप मे अभिरत उन असुगे के समीप मे आकर कहने लगे ।।६०॥ माप लोगो की भक्ति भाव से प्रसन्न,पाप सबके जार अनुग्रह करने के लिये यह वहिपत्रधारी मुण्ड दिगम्बर योगी यहाँ प्राया है ।।६१॥ गुरु ने तो इतना ही कहा था इसके पश्चात् माया मोह यह वचन बोला था-हे दैत्यो के अधिपतियो | आप लोग तपश्चर्या में स्थित हैं । श्रार बतलाइये कि तपस्या का फन ऐहलौकिक चाहते हैं या पारलौकिक फल की इच्छा रखते हैं ? ॥१२॥ कुरुध्व मम वाक्यानि यदि मुक्तिमभीष्मथ । आहेत सर्वमेतच्च मुक्तिद्वारमसवृतम् । धर्माद्विमुक्त राज्य नंतस्मादपरः पर ।६३ अनवावस्थिता.स्वर्ग मुक्ति वापि गमिन्यथ । एवप्रक, रंबहुभिमुक्ति शंनवजित 1,६४ ग भायामादमागण्या मार्गसिगा finiग मनादिपति ५ fayti irriinfinition | Primar II जगमगायलिया। farrintifying IRS मामामासनमः PRATARREARRApr ime with at AE HIMANI Hh र पहा | पाया POnly amrit RaMeinergiraftar vinyim kith ansh gy reif को 41 4g Enterarian Itihup मा याद गौम्य है। मग mintirA IIEIf Mini Khettyfrको HIM Avritin | Ki Hartugh yfriminir rferitam और miah hamarth Margarithm in याद और सnant ite and telar Hit a great Porane tagiri नाम पर माह कि परमार्थ भी HOTE MEET for wife है। in Hing औरणी महुन । मारमा पार Hum Hth Mata ratraptim॥१७॥ १ मे ht Mait at niti ARIAL IN Imसयों Mujhhamal tal utumnimals PARAMPARMA सीमामAmailसेटगुगः । Hiranditkirurineraiमिता: 11१०० .

[ १२३ प्रोटुवंश विस्तार वर्णन ] तरप्यत्येपरेतेश्वरन्योन्यस्तथापरे । नमोऽहते चेति सर्व संगमे स्थिरवादिनः ॥१०१ मल्परहोमिःसंत्यक्तास्तदैत्यःप्रायशयो। पुनरश्चरक्तांबरधृन्मायामोहोजितेक्षणः ।।१०२ सोऽन्यानप्यसुरान्गत्वाऊचेऽन्यन्मधुराक्षरम् । स्वर्गार्ययवियोवाहानिर्वाणार्यायवापुनः ।।१०३ तदपशुधातादिदुष्टधमनियोचत । विज्ञानमयमेत स्वीपमधिगच्छत ॥१०४ मध्य मेरा धर्म है जो कि माया मोह ने कहा है । उस धर्म के प्राश्रित होने पान ये माईत हो गये थे l माया-मोह के द्वारा ये सब देय वेदत्रयो पर्म में गुहार अमुर परा दिये गये थे। उनाद्वारा प्रबोधित किये गये पाय सोग भी नदी के स्यम्प वाले वैसे ही वैदिक धर्म को त्यागने वाले हो गये ६१.०॥ नरे द्वारा पौर दूसरे और दूसरों के द्वारा और लोग भी मभी गम में पिरवानी होने हुए अर्हन को नमसार है मा पहने पे ॥१.१॥ पांडे ही दिनों में सभी दस्यों न वैदषयी प्रतिपादित धर्म मे छुटा दिये गये थे पौर फिर मान पम्पों को पारा पर थाना माया मोह विजयमाली हो गया पा॥ १.२ 11 पद फिर मा रीति में अन्य जो पमुर थे उनके पास पहुंचकर पोरान मयुर यानी में बोनता था कि यदि पाप लोगों की स्व- निग की यहाँ के मुपो या मोग करना या निर्वाणरम प्राप्त करने भिम पारपना बानो यज्ञादि मा पशु पाप करना याद कर दो पोरी-माति ममममो । पर मर विषमान परिपूर्ण है घाउ पो जान मो॥१०॥१०॥ युप्पय में यन. गम्यायुधंग्यमिहादिनम् । जगदेनलाधारशानिशानानुनम् 11१०५ रामादिगुटमपंचारतनयमाटे। मानाप्रभार यमन ग तना मुनियोजितम् ।।१०६ समानुपादित जुम्ने यया यया । मिनिला येशना देवानामनृप ११०० १२४ ] । पा पुराण यज्ञकर्मकलापस्यतचाचान्ये द्विजन्मनाम् । नेता क्तिसहंवाक्यंहिमाधर्मायजायते ॥१०८ हवीष्यनलदग्धानिफलान्यर्ह तिकोविदाः । निहतस्यपशोर्यज्ञेस्वर्गप्राप्तियदीप्यते ॥१०६ स्वपिता यजमानेन किं वा तत्र न हन्यते । तृप्तये जायतेसो भुक्तमन्येन चेद्यदि ॥११० दद्याच्छाद्ध प्रवसतोनवहेयुः प्रवासिनः । यज्ञैरनेकर्देवत्वमवाप्येन्द्रण भुज्यते ॥१११ शम्यादि यदिचेत्काष्ठं तद्वरं पत्रभुक्पशुः । जनाश्रद्धयमित्येतदगवम्य तु तद्वचः ।।११२ उपेक्ष्य श्रयसे वाक्यं रोचतायन्मयेरितम् । नह्याप्तवादानभसोनिपतंतिमहासुरा. ११३ मेरे वचनो को पच्छी तरह समझ लो, इसको बडे-बडे बुधजनो ने ही कहा है। यह सम्पूर्ण जगत् प्राधार से रहित है और इसमे केवल भ्रान्ति का ज्ञान ही भरा हुमा है । यह राग प्रादि रोअत्यधिक दंप पूर्ण है । इसीसे यह जीवात्मा इस संसार के सङ्कट में भ्रमित किया जाता है। इस प्रकार से उसने मुक्ति से योजित अनेक प्रकार के वचन कहे थे ॥१०५५१०६।। उसने उसी भौति से कहा था कि वे जिस-जिस रीति से धर्म को त्याग देखें । हे नृप ! कुछ लोग वेदो को विशेष बुराई करते थे और दूमरे लोग देवो की निन्दा करते थे ।। १०७ ।। अन्य लोग यज्ञादि कर्मों के समूह को निन्दा करते थे और दूसरे द्विजन्मा ह्मणो की बुगई करते थे । यह वचन युक्ति सङ्गत कभी भी नही हो सकते कि हिमा मे धर्म होता है ।।१०८}) कोविदगण भग्नि में दाध किये हुए हवि फलो का हनन नहीं करते हैं । यज्ञ में वध किये हुए पशु से जो स्वर्ग की प्राप्ति की इच्छा की जाती है ||१०६।। यदि ऐमा ही है तो यजमान के द्वारा वहाँ पर अपने पिता का हनन क्यो नहीं किया जाता है । लोग कहते थे कि यदि अन्य के द्वारा खाये हुए मे पितृगण की तृप्ति होती है तो.प्रवास में रहने वाले को भी प्राद दिया जान मे वह प्रवासी भी उसे प्राप्त कर तृप्त होजाना

प्रोप्टुवंश विस्तार वर्णन ]
[ १२५
चाहिए । जहां पर अनेक यज्ञों से देवत्व को प्राप्त करके इन्द्र के द्वारा स्वर्ग का
भोग किया जाता है ॥११०११११।। शमो प्रादि यदि काठ है तो उससे श्रेष्ठ तो
पत्तो को ख ने वाला पशु है । ये सब बातें जनो की श्रद्धा के योग्य नहीं है-
इसी तरह से उसके वचनो को जानकर उपेक्षा करके सेवन करते हो या मेरे
द्वारा कथितं वचन आपको रुचिकर लगते हैं । जो सत्य बोलने वाले प्राप्त पुरुपो
के वरह होते है । हे महासुरो ! वे कभी योही आकाश से नही गिरा करते हैं
॥११२।११३॥
युक्तिमद्वचनं ग्राह्य मयान्यश्च भवद्विधैः ।
तत्त्ववादेवयं सर्वे प्रपन्नास्तव भक्तितः ।।११४
कुरण्वानुग्रहचायप्रसनोऽसियादिप्रभो।
संभारानाहरामोऽद्यदीक्षायोग्यांश्वसर्वशः ॥११५
प्रसादत्तवयेनाशुमोक्षोहस्तगतोभवेत् ।
ततस्तानववीत्सर्वान्मायामोहोऽसुरांस्तदा ॥११६
प्रपन शासना पगदीयोगुरुरग्यधीः ।
दीक्षादास्यतियुप्मानिदेशान्ममसत्तमः ॥११७
एतान्दीक्षयभोब्रह्मन्वचनान्ममपुत्रकान् ।
गतेमोहेदानवास्तेभार्गवंवाक्यमव वन् ॥११८
देहिदीक्षामहाभागसर्वससारमोचनीम् ।
तथेत्याहोशनादैत्यांन्गच्छामोनर्मदामनु ।।११६
आपके समान सुयोग्य पुरुषो को मेरे द्वारा कहे गये हों या अन्य किन्ही
के द्वारा कहे गये हो किन्तु यदि युक्ति युक्त है तो अवश्य ही ग्रहण करने चाहिए
दानवो ने कहा-तत्त्ववाद मे हम सब लोग सहमत हैं और भक्ति के भाव से
आपके शरणामति में प्राप्त हुए हैं ॥११४।। हे प्रभो ! यदि प्राप प्रमन्न हैं तो
अब हमारे कार अनुग्रह कीजिएगा । हम अाज ही दीक्षा के योग्य जो भी
सामान होवे हम सब ले मावें ।।११।। प्रापके ही प्रसाद का यह फल होगा कि
जिससे हमारे हाय में मोक्ष शोघ्र प्राप्त हो जावेगा । इतना कहने के पश्च त्
उन सब असुरों से उस समय मे माया-मोह ने कहा-||११६॥ मैं गुरु के शासन

१२६ ]
[पा पुराण
.
मे प्रसन्न रहने वाला हूँ। यह मेरे घट बुद्ध वाले गुरुवरण प्रापको मेरो प्रार्थना
से दीक्षा दे देगे। यह परम श्रेष्ठ हैं ।।१२७॥ माया-मोह ने कहा-हे ब्रह्मन् !
मेरे वचन से पाप इन मेरे पुत्रो को दीक्षा दे दीजिएगा । यह कहकर माया-मोह
यहां से चला गया था और उसके वले जाने पर उन समस्त दानवों ने भार्गव
स्वरूपधारी गुरु से यह वचन कहे ॥११८॥ हे महाभाग्य वाले ! माप इस समार
से मोचन (छुटकारा) कराने वाली दीक्षा हम लोगो को दे दीजिए। ऐमा ही
होगा-~-यह कहकर वह उशनवेपो गुरु बोले-हे दंत्यो । नर्मदा के तट पर
चलो ।।११६॥
भोभोस्त्यजतवासांसिदीक्षांकारयितास्मिकः ।
एव तेदानवाभीष्मभृगुरूपेणधीमता ॥१२०
प्रागिरसेनतेतकृतादिग्वाससोऽमुराः ।
वहिपिच्छध्वजतेपागु जिकाचारुमालिकाम् ।।१२१
दत्वा चकार तेपा तु शिरसो लुचनततः ।
केशम्योत्पाटनचैवपरमधर्मसाधनम् ।।१२२
धनानामीश्वरोदेवोधनद केशलुचनात् ।
सिद्धिपमिकाप्राप्ता सदावेपस्यधारणात् ॥१२३
नित्यत्वलभ्यते ह्य वपुरावाहाहंत स्वयम् ।
वालोत्पाटेनदेवत्वंमानुपलभ्यतेत्विह ।।१२४
किनकुर्वीतततस्मान्महापुण्यप्रदयतः ।
मनोरथो हि देवानां लोके वैमानुपेकदा ।।१२५
अस्मिन्स्याद्भारनेवजन्मनः श्रावकेकुले ।
तपसायुज्महेऽस्मान्वकेशोत्पाटनपूर्वकम् ॥१२६
हे दैत्यगणो ! भाप सब लोग वस्त्रो का त्याग कर देवें अब मैं आपको
दीक्षा प्रदान करूंगा। हे भीष्म ! इस प्रकार से धीमान भृगु रूपधारी वृहस्पति
ने ये सब असुर दानव यहाँ पर दिगम्बर अर्थात् मग्न कर दिये थे। फिर उन
सबको उसने वहिपिच्छ की ध्वजा और गुजा की माला दे दी थी।।१२०।।
मह देकर फिर उनके मिरो का लुचन किया था तथा ये शो का उत्पादन भी

क्रोष्टुवंश विस्तार वर्णन ] [ १२७ - किया था जो कि धर्म का परम साधन था ।।१२।। धनो का स्वामी घनद देव है । सदा वेप के धारण करने से और केशो के लुञ्चन से परमित्र मिद्धि को प्राप्त हो गये थे ॥१२२॥ इस प्रकार से नियत्व की प्राप्ति होती है यह पहिले प्रहंत ने स्वये अपने मुष से कहा था। यहां पर बालों के उत्पादन करने से मनुष्यों को देवत्व की प्राटिन हो जाती है ।।१२३॥ इसलिये उसे क्यो न किया जावे क्योकि यह महान पुण्य के प्रदान करने वाला कार्य है । लोक में मानुग जीवन में देवों का मनोरथ कब होता है ॥१२॥ इस भारतवर्ष मे देवगण का यही मनोरथ रहता है कि श्रावक कुन मे जन्म प्राप्त कर केशोत्पादन पूर्वक हम लोग तपस्या युक्त होवें ॥१२।। उन्होने चौबीस तीर्थबार पुरस्कृत किये थे। फणीन्द्र ने ध्यान माग के प्रदर्शन करने वाले छाया स्वरूप हो किया है ।।१२६।। तीर्थंकराश्चतुविशत्तथास्तुपुरस्कृताः। छायाकृतफणीन्द्रेणध्यानमार्गप्रदर्शकम् ॥१२७ रबन्तमनवादेनस्वर्गाहस्तगतोऽहतम् । मोक्षोगमवितानून विचार कोऽत्रकथ्यते ॥१२८ पदास्यामर्पयो भूत्वासूर्याग्निममतेजम । जप्त्वाविरागिरणश्च वमनुपचागकतथा ॥१२६ तथातपम्यतामृत्यु गताना कालपर्ययात् । पापाणेनशिरोभन्नभवतेपुण्यकर्मणाम् ११३० अरण्ये निज नेवास कदावै भविताहिन.। परांजप्यथावकाश्चकरिप्यतिसमाहिता । १३१ भन्यवाद के द्वारा पहत का स्तवन करने वाले व्यक्ति के लिये स्वर्ग तो हाय मे माया हुमा ही हो जाता है । अथवा मोक्ष हो जायगा-यह बिल्कुल निश्चय ही है । इसमें क्या विचार कहा जाता है प्रर्थान् इममे कुछ भी विचारने को थावश्यकता ही नही है ॥१२७॥ पञ्चाङ्ग मन्त्र को जपते हुए विरागी और पमपंग होकर मब मूय को मग्नि में समान तेज वाले होगे ।।१२८।। उस प्रकार से ता करने वाले कान के पर्यय से मृत्यु को प्राप्त होन वाले लोगों के पुष्प का ना पद पापारा से शिरका भग्न होगा । १२६॥ हम लोगो का वन मे १२८ ] पर पुराण जहा कि कोई भी नही रहना हो पर नियाम होगा मोर यावर होकर परम सावधान होते हुए पर जाप परेंगे ॥१३॥ हे अपवर ! पापको यहाँ से नहीं जाना चाहिए क्योरि मा ती मोम मार्गी है। वो भी स्थान प्राप्त किये हैं ये सब पुनः प्रावृत्त कराने वाले ही है ॥१३१॥ भोभोटनगतव्यमाक्षनागीयनोमवान् । लब्धानियानिस्थानानिभूयोवृत्तिाराणि च ।।१३२ भवध्व सहितायूयं ते तथा मोक्ष भागिनः । एवमुक्त्यारानियमान्कृत्वातान्दनुपुगवान् ।।१३३ जगामधिपणो राजन्देवलोक दिवौकसाम् । पाचचक्षे स तत्सर्वदानवाना च कारितम् ॥१३४ ततस्तत्वसुराजग्मुर्नर्मदामभितोयमन् । वातान्दानवास्तत्र प्रह्लादेन विनाकृतान् ॥१६५ देवराजस्ततो हृष्टो नमुचित्राहवैवषः । हिरण्याक्ष यज्ञह्न धर्मघ्न वेदनिंदकम् ।।१३६ राक्षस क्रूरकर्माण प्रघस विघसतथा । मुचिचंय तथा वारण विरोचनमथापि वा ॥१३७ महिपाक्ष वाष्कल च प्रचण्डंचडकतथा । रोक्मान तथात्युन सुपेण दानवोत्तमम् ॥१३८ एतान्दा तथा चान्यान्दानवेन्द्रानपानबीद। दानवेद्राः पुराजाताः कृत राज्यं निविष्टपे ॥१३६ माप लोग समार के ध्वस करने वाले तथा मोक्ष के भागो होगये हैं--- इस प्रकार से कहकर वृहस्पति है राजन् ! देवो के लोक में चले गये थे मौर दानवो में श्रेष्ठ पुरुषो को सब नियम बद्ध कर दिया था तथा दानदो को जो भी कराना था वह सब कह दिया या १३२११३३।। इसके पश्चात् दे समस्त दानव एवम् भसुर वहाँ गये मोर नर्मदा के तट पर सब भोर निशस करने लगे थे। प्रलाद से बिना कृन समस्त दानवों को वहां पर इन्द्र ने देखा था ॥१३४॥ देवराज इस तरह उन मसुरो को देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए मोर नमुचि से क्रोष्टुवश विस्तार वर्णन ] [ १२६ बोले-वहाँ पर यज्ञो के हनन करने वाले, धर्म के न शक और वेद की निन्दा करने वाले हिरण्याक्ष को, क्रूर वगं करने वाले प्रधस तथा विधस गक्षस को, मुचि-बाण एवम् विरोचन को, महिपाक्ष, वाकर, प्रचण्ड, चण्डक, रोचमान और अत्यन्त उग्र दानवो में उत्तम सुषेण को इन सबको तथा अन्य दानवे द्रो को वहाँ देखकर इन्द्र ने कहा था-इन्द्रदेव बोले हे दानवेन्द्रो ! प्राप लोग तो पहिले उत्पन्न हुए हैं और आपने नो स्वर्ग में राज्य शासन किया है ॥ १३५ से १३६ इदानी कथमेवेद व्रतं वेदविलोपवाम् । भवद्भिः कर्तुमारब्ध नग्नमुडि कमडलु ॥१४० मयूरध्वजधारित्व कथं चंवेह तिष्ठथ । त्यक्त सर्वासुरभाव ऋपिधर्मे वय स्थिताः ॥१४१ धर्मवृद्धिकर कर्म चरामः सर्वजतुपु । लोक्य राज्यमखिलं भुक्ष्व शक प्रजस्व च ॥१४२ तथेति चोक्त्वा मघवा पुनर्यात स्त्रिविष्टपम् । एवते मोहिता' सर्वे भीष्म देवपुरोधसा ॥१४३ नर्मदा सरित प्राप्य स्थिता दानवमत्तमा । ज्ञात्वा शुक्रगते सर्वे वृत्तातमनुबोधिता ॥ तदा लोक्यहरणे चा क्र रां पुनर्मतिम् ।।१४४ हम समय में पाप मबने यह वेदो के विलोप करने वाले धर्म को एवम् घन करना से प्रारम्भ कर दिया है ? और नान मुण्डो वाले कमण्डलु. पारी क्यो हो गये हैं ? मोर की पख की ध्वजा को धारण करने वाले यहाँ पर क्यों स्थित हो रहे हो ? दानवों ने इस तरह इन्द्र द्वारा पूछे जाने पर उत्तर दिया था कि हमने वह असुरत्व का भाव बिल्कुन हो त्याग दिया है और मध हम लोग ऋषि धर्म में स्थित हो गये हैं ।। १४०।१४१ ।। अव हम सब लोग समस्त जन्तुपो में धर्म की वृद्धि करने वाले कर्म का प्रावरण करते हैं । हे इन्द्र. देव ! प्रव पाप ही समस्त विलोतरी के राज्य का सुखोपभोग कीजिये और यहाँ में चले जाइये ॥१४२।। ऐमा ही दिया जायगा~यह कहकर सुरराज इन्द्र पद्म पुराण फिर स्वर्गलोक चले गये थे। हे भीष्म ! इस प्रकार से देवो के पुरोहित बृहस्पति ने उन सब प्रसुरी को मोहित कर दिया था ॥१४३॥ समस्त दानव श्रेष्ठ नर्मदा नदी के तट पर जाकर स्थित हो गये थे। असुर गुरु शुक्राचार्य ने इसको जान- कर उन सब असुरों को यह पूरा-पूरा वृत्तान्त बताकर भली-भांति समझाया था तब तो उन ममुरों ने पुन: त्रैलोक्य का हरण करने को वही तर बुद्धि बनाली थी ॥१४४॥ । अर्जुन तथा कर्ण की उत्पत्ति और पैर का कारण || कथं त्रिपुरुषालातो हर्जुनः परवीरहा । कथं करणंस्तु कानीनः सूतज. परिकोर्त्यते ॥१ वैरंतयोः कथं भूत निसर्गादेव तद्वद । वृहत्कोतहलं मह्यं तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥२ छिन्ने वक्त्रे पुरा ब्रह्मा क्रोधेन महता वृतः। ललाटे स्वेदमुत्पन्न गृहीत्वाऽताडयद्धवि ॥३ स्वेदतः कुडली जशे स धनुष्कोमहेपुधिः । सहस्रकवची वीरः किंकरोमोत्युवाच ह ॥४ तमुवाच विरिंचस्तु दर्शयन्द्रमोजसा। हयतामेप दुर्घ दिर्जायते न यथा पुनः ।।५' ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा धनुरुद्यम्य पृष्ठतः । सप्रतस्थे महेशस्य बाणहस्तोऽतिरौद्रहक ॥६ हवा पुरपमत्युग्र भीतस्तस्य त्रिलोचनः । अपनांतस्ततोगाद्विष्णोराश्रममन्यगात् ७ भीष्म ने कहा-पातुओं पे वारों का हनन करने वाला अर्जुन त्रिपुरुष से कैसे समुत्पन्न हुआ था और वर्ण सून से उन बानीन (न्या से उसन) श्यों कहा जागा है ? ॥१॥ इन दोनों महायोरों का पारस्परिक स्वमात्र से ही करण हो गया था-इसे माल पाने की कोरिए। मुझे हृदय में इस पातमा बा मारो गौतहस हो रहा है । माप इस गुस्पीरो ममी भांति गुल. भाने में योर एवम् मापं है ॥२॥ पुनरय मुनि ने महा-प्राचीन काप में मुग मर्नुन तथा करणं को उत्पत्ति. ] [ १३१ के छिप्त हो जाने पर ब्रह्माजी को बड़ा भारी क्रोध हो गया था और उस क्रोध के प्रतिशप के कारण उनके ललाट पर पसीना उत्पन्न हो गया था जिसे लेकर उन्होंने भूमि पर ताडित किया था ॥३॥ उम पसीने की कुण्डली हुई और उसने वह एक धनुषधारी महेषुधि सहस्र कवध वाला वीर समुत्पन्न किया था जो उठ- कर कहने लगा मैं क्या करूं? ॥४॥ तब ब्रह्माजी ने रुद्र को दिखाते हुए उससे कहा-तू इसको पोज से मार डाल जिससे कि फिर ऐसी दुर्बुद्धि उत्पन्न न होगी ॥५॥ वाह्मण ने यह विधाता का वचन सुनकर धनुप प्रस्तुत करके महेश के पीछे से चल दिया था। इसके हाथ में संधाना हुमा धनुष-बाण था और यह अत्यन्त रौद्र (भयानक) उस समय में दिखलाई दे रहा था ।।६।। उस अत्यंत उन पुरुप को पीछे पाते हुए देखकर भगवान् त्रिलोचन डर गये थे मोर बड़े वेग के साथ वहाँ से अपक्रमण करके भगवान् विष्णु के प्राथम में चले गये थे॥७॥ त्राहि त्राहीतिमांविष्णो नरादस्माच्च शत्रुहन् । ब्रह्मणानिर्मितः पापो म्लेच्छरूपोभयंकरः ॥८ यथा हन्यान्नमां ऋद्धस्तथा कुरु जगत्पते । हुकारध्वनिना विष्णुर्मोहयित्वा तु तंनरम् 16 अदृश्यः सर्वभूतानां योगात्मा विश्वदृक्प्रभुः । तत्रप्राप्त विरूपाक्षं सांत्वयामास केशवः ।। ततस्स प्रणतो भूमौ दृष्टो देवेन विष्णुना ।।१० पौत्रो हि मे भवान्रुद्र क ते कामं करोम्यहम् ॥११ दृष्ट्वा नारायणं देव भिक्षा देहोत्युवाच ह । कपालं दर्शयित्वाग्रे प्रज्वलंस्तेजसोत्कटम् ॥१२ कपालपाणि सप्रेक्ष्यरुद्र विष्णुरचिन्तयत् । कोऽन्योयोग्योभवेद्भिक्षुभिक्षादानस्य सांप्रतम् ॥१३ योग्योऽयमिति संकल्प्य दक्षिणं भुजमर्पयत् । तविभेदातितीक्ष्णेन शूलेन शशिशेखरः ॥१४ वहां पहुंचकर महेश्वर ने कहा-हे विष्णु भगवन् ! माप तो शत्रुषों के [ पद्म-पुराण हनन करने वाले हैं । इस नर से मेरी मदरसा करो, घाण करी । यह महा. पायो ब्रह्माजी ने निर्मित किया है। यह महाम्लेच्छ स्वरूप वाला और अत्यन्त भयङ्कर है | हे जगतो के स्वामिन् ! यह कोधित होकर आ रहा है यह मुझे मार न डाले-ऐया ही आप करें। भगवान विष्णु ने महेश को इस कारण पुकार का श्रवण कर हवार को ध्वनि उस नर को मोहित कर दिया था [HI1 योग के स्वरूप पाले समस्त प्राणियों को न दिखाई देने वाले होकर विश्व की रचना करने वाले प्रभु केशव ने वहाँ पर प्राप्त होने वाले विरूपाक्ष को सान्त्वना दी थी अर्थात उसे शन्त कर दिया था। इसके मनन्तर देव विषणु ने उसे भूमि में प्रणत होकर प्रणाम करते हुए उसे देखा था ॥१०॥ भगवान् विष्णु ने कहा है। ! माप तो मेरे पात्र ( नातो ) हैं अब बतलामो में तुम्हारी किस कामना को पूर्ण करूं? ॥११॥ भगवार नारायण को देखकर उसने कहा कि मुझे आप भिक्षा प्रदान कीजिए। उसने भिया के ग्रहण करने का कपाल उनके सामने कर दिया था। वह उस समय में अपने तेज से अत्यन्त सट एवम प्रज्वलित दिखलाई दे रहा था ॥१२॥ भावान् विष्णु ने हाथ में कपाल लिये हुए रुद्र को देखकर विचार किया था कि इसके प्रनिरिक्त इस समय में अन्य भिक्षा दान के योग्य कौन मित्रु होगा ॥१३॥ यह परम योग्य दान के लिये भिकारी प्राप्त हुपा है ऐसा मन मे सकल फरके उसे अपना दाहिना भुज प्रदान कर दिया था। शशि को शिर मे धारण करने वाले ने इसका मत्यन्त सौदण शूल से विभेदन कर दिया था ॥१४॥ प्रावर्ततततोधारा शोणितस्य विभो जात् । जोवूनदरसाकारा वह्निज्वालेव निर्मिता ॥१५ निपपात कपालांतश्शम्भुनासाप्रभिक्षिता । ऋज्वी वेगवती तोबा स्पृशंतीत्वंचरंजवात् ॥१६ पंचामाद्योजनाध्याद्विस्ताराशयोजना। दिव्यवयंसहस्र सा समुवा हरेभुजात् ॥१७ इयं तं कालमीशोऽसौ मिक्षा जग्राह भिक्षुकः । दत्तानारायणेनाथ कापालेपायउत्तमे ॥१८ - अर्जुन तथा कर्ण की उत्पत्ति० ] [ १३३ ततो नारायणः प्राह शंभुपरमिदं वचः । सपूर्ण वानवापानं ततो वै परमेश्वरः ॥१६ सतोयाबुदनिर्घोप श्रुत्वा वाक्य हरेहरः । शशिसूर्याग्निनयनः शशिशेखरशोभितः ॥२० कपाले दृष्टिमावेश्य विभिनेत्रैर्जनार्दनम् । अगुल्या घटयन्प्राह कपालं परिपूरितम् ।।२१ इसके मनन्तर विभु की भुजा से रक्त की धारा निकलने लगी थी और वह रक्त-धारा जागवूनद के रस के प्राकार वाली वह्नि को ज्वाला की भांति मित हो गई थी ॥१५।। शम्भु के द्वारा भिक्षा याचना की हुई वह भुना के कटने से रक्त की धारा उस कपाल के अन्दर गिर गई थी। यह धारा ऋजु थी और उत्पन्न वेग वाली एवम् तं व थी और ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो पावर का वेग से सशं करती हुई चलो पा रही हो ।।१६।। दीर्घना में यह पवाम योजन वाली थी और विस्तार में दश योजन थी। वह धारा एक सहस्र वर्ष दिव्य वर्ष पर्यन्न हारे की भुजा से प्रवाहमान हुई थी ॥१७ । इस भिक्षुक ईश ने उम समय में यह भिक्षा ग्रहण की थी और भगवान् नारायण ने उत्तम कपाल पात्र में उसे प्रदान किया था ।।१८। इसके पश्चात् नारायण ने शम्भु से पाह परम वचन कहा था कि आपका यह भिक्षा का पात्र कपाल भर गया अथवा नही भरा है ॥१९॥ तब तो हर ने मजलमेघ के तुल्य निर्घोप वाले हरि के वचन का श्रवण किया था । ब्रह्मचन्द्र को मस्तक मे धारण करने वाले शिव के दोनो नेत्र चन्द्र और सूर्य को अग्नि के समान तेज से पूर्ण ये ॥२०॥ तब तो अपने तीनो नेत्रों के द्वारा कपाल में दृष्टि डालकर अपनी अंगुलि से सकेत करते हुए यह बतला दिया था कि मेरा कपाल भर गया है ॥२शा श्रत्वा शिवस्यतावारणीविष्णुर्धारांसमाहरत् । पश्यतोऽयहरेरीश.म्वागुल्यामधिरतदा ॥२२ दिव्यवसहस्र च दृष्टिपातममय सः । मध्यमाने ततो रक्त कलिलं बुबुदं कमात् ॥२३ बभूव च ततः पश्चारिकरीटी स शरासनः। बद्धतूणीरयुगलो वृपस्कन्धोऽङ्गलिगवान् ।।२४ १३४ ॥ [ प पुराए पुरुषो वह्निसंकाश: कपाले सप्रदृश्यते । त दृष्ट्वा भगवान्विष्णुः प्राहरुद्रमिदं वचः ।।२५ कपाले भव को वाय प्रादुर्भूतोऽभवन्नरः । वच:श्रुत्वा हरेरीशस्तमुवाचविभोशृणु ॥२६ नरोनामैप पुरुषः परमात्रविदावरः । भवतोक्तो नर इति नरम्तस्माद्भविष्यति ॥२७ नरनारायणी चोभी युगे रूपातो भविष्यतः । संग्रामे देवकार्येषु लोकानां परिपालने ॥२८ शिव की उस वारणी का श्रवणकर भगवान् विष्णु ने रक्तधारा को समाहृत कर लिया था। फिर हरि के देखते हुए ईश ने अपनी पेंगुलि से उस रुधिर का एक महल दिव्य वर्ष पर्यन्न दृष्टिपाती के द्वारा मन्थन किया था। उस रक्त के मथित किये जाने पर उसमे कलिल मौर बुबुद के तुल्य कम से हो गया था ॥२२॥२३।। इसके पश्चात शरासन से युक्त किरीट धारी, दो सूरगीरों को बांधे हुर, वृप स्कन्ध, अगुलियवान वह्नि के तुल्प पुरुष कपाल में दिखलाई देता है उसको देखकर भगगन विष्णु रुद्र देव मे यह वचन बोले ये ॥२४॥२५॥ हे भव ! इस कपाल मे कोन नर प्रादुर्भूत हो गया है ? इस प्रकार विष्णु के वचन श्रवण कर ईश ने उनसे कहा- हे विभो ! आप मुभमे मुनिपे ॥२६॥ नर नाप घारी यह पुरुप परमास्त्रो पे ज्ञानामों मे थेठ है । मापने इमको 'नर'-इस नाम से कहा है इमी से यह नर हो होगा ॥२७॥ ये दोनों नर और नारायण इन दो नामों से लोक में प्रमिदहोंगे। ये संग्राम की बेला में, देवगणो के कार्यों में मोर लोगों के परिपाल में कार्य करेंगे ॥२॥ एप नारायणगयो नरस्तस्माद्भविष्यति । प्रथासुरवधे साह्य तवक महायु तिः ॥२६ मुनिज्ञानपरीक्षायां जेता सोकेभविष्यति । तेजोऽधिकमिदं दिव्यं ब्रह्मा.पंचमंशिरः ॥३० तेजसो ग्रहगोदीताजम्प नब नोणितान् । ममदृष्टिनिपाताच्चत्रीणितजासियागिगु ॥३१

जुन तपाप की उत्सति.
....-
[ १३१
तत्संयोगसमुत्पन्नः शयुयुद्ध विजेप्यति ।
अवघ्याये भविष्यति दुजंया पपि नापरे ॥३२
पकस्य चाराणां च तेषामेषभयकरः।
एवमुक्त्वास्थितः शंभुविस्मितम हरिस्तदा ॥३३
कपालम्थः स तव तुष्टाव हरकेगवौ ।
सिरस्वजलिमाधाय तदा वीर उदारधी३४
किंकरोमं तिताप्राह इत्युवस्वा प्रणतः स्थितः ।
तमुवाचहर:श्रीमान्ब्रह्मणाम्येनतेजसा ।।३५
यह मारापण सपना है रमी में नर होगा। यह महती दरगाम
गुरों के ५ करने का में पायो महायना बरेगा ॥२६ प मुनि मान
पी परीक्षा में सोर में विजय रने दामादगा। य: या 11 गिर
fun तेज गुरु पोर दिय है मादीस से मे. प्रारी भुग
फरत और मेरिट गिराने में ममें मोनो भोगापा
६, उन मागयोग में पर, माना है। पहपुर में आयी और
सपा । प्राय मोग जो यि भीमर प्रसाराय में जायेंगे र
मग पराकम में हम रह जायेंगे ।।३।३२॥ देवोगा और
रेमिय पर महान भपर होगालना बहार हो रहे
और माप में भगवान हरि भी हमें परम पाप
गम में चि उगने वापरहीर और कार RR for
पारि ने सिरोही ि गम
सार उसले पोर ने उन दोनों मे ॥ r frh ! १
पर पर होरहो कार में भी
३४.६॥
गृी नरोधनुपातिनानि ।
सपमुगानिपर गुबारसे नरम र
रापंवात्रमियर गरिमाप करना।
जापानमा

[ पद-पुराण 1 स एप पुरुपो रोद्रो योमयावेदितस्तव । विष्णुहुंकाररचितमोहनिद्रा प्रवेशितः ।।१८ विवोधयनत्वरितमित्युक्त्वान्तर्दधै हरः । नारायणस्य प्रत्यक्ष नरेणानेनवस्तदा ॥३६ वामपादहतःसोऽपि समुत्तस्थौमहानलः । ततो युद्ध समभवत्स्वेदरक्तजयोर्महद ॥४० विस्फारितधनु शब्दं नादिताशेपभूतलम् । कवच स्वेदजन्य रक्तजेन वपाकृतम् ॥४१ एव समेतयोयुद्ध दिव्य वर्षद्वयंतयोः । युध्यतोः समतीतं च स्वेदरक्तजयोनृप ॥४२ ब्रह्माजी ने अपने तेज से यह एनुप हाथ मे ग्रहण कराने वाला और सृजित किया है । तू इमको निपूदित कर दे । इस प्रकार से कहकर शङ्कर ने स्तुति करते हुए मानि धारी उस नर को और मजलि-सबद्ध दोनो हायो को पकडकर तथा कपाल से उसे उठाकर फिर वचन कहे थे ।।३६॥३७॥ वह यह ही रौद्र पुरुष है जिसके विषय मे मैंने तुमसे कहा था । विष्णु को हुड्डार से रचित मोह निद्रा में प्रवेश किया हुमा है ।।३८11 तू इसको अतिशीघ्र विशेष रूप से समझ ले-~~यह कहकर मनान हो गये थे। नारायण के सामने ही उसी समय मे नर ने उसे बांये पाद से हत किया था पोर महान् बलवान भी खडा हो गया था। तब तो फिर स्वेद और रक्त से समुत्पन्न होने वाले उन दोनो में महान सग्राम हुआ था ॥३६॥४०॥ जिसमे धनुष का शब्द विस्फारित हो रहा था और समस्त भू-मएडल जिससे शब्दायमान हो रहा था। ऐसे स्वेदन के एक कवच को रक्ता ने मपाकृत कर दिया था अर्थात् दूर कर दिया था। ४१|| इस प्रकार मे एकत्रित हुए उन दोनो के युद्ध मे दो दिव्य वपं युद्ध करते हुए थे। हे नृप उन दोनो में एक पीने से उत्पन्न होने वाला था और दूसरा विष्णु को भुजा के रुधिर से उत्पन्न या ॥४२॥ रक्तजं द्विभुजं दृष्ट्वा स्वेदजंचवसंगती। विचिन्त्य वासुदेवोऽगाद्ब्रह्मणः सदनं परम् ॥४३ अर्जुन तथा वरणं की उत्पत्ति० ] [ १३७ - ससंभ्रममुवाचेदं ब्रह्माणं मधुसूदनः । रक्तजेनाद्यभाब्रह्मस्वेदजोऽयंनिपातितः ।।४४ श्रु त्वंतदाकुलो ब्रह्मा बभापे मधुसूदनम् । हरेऽधजन्मनि नरो मदीयो जोवतादयम् ॥४५ तथा तुष्टोऽब्रवोत्तं च विष्रपुरेवं भविष्यति । गत्वा तयो रणमपि निवाहि च तावुभौ ।।४६ अन्यजन्मनिविताकलिद्वापरयोमिथः । सधौमहारणेजातेत त्राहंयोजयामिवाम् ॥४७ विष्णुनातुसमाहूयग्रहेश्वरमुरेश्वरी । उक्ताविमौनरोभद्रौपालनीयौममाज्ञया ।।४८ सहस्रांशोस्वेदजोऽयंस्वकीयोंऽशोधरातले । द्वापरतेऽवतायोऽयदेवानांकार्यसिद्धये ॥४६ दो भुजामों वाले रक्ता और स्वेदन इन दोनो को मङ्गत देसकर भगवान वासुदेव ने विशेष चिन्तन किया था और फिर ब्रह्माजी के सदन में गये थे ॥४३॥ मधुसूदन ने सम्भ्रम के सहित ब्रह्माजी से यह कहा था-हे ग्रह्मन् ! आज घिर समुत्पन्न होने वाले ने हम स्वेदज को निपातित कर दिया है । ४४।। यह अषण करके उम समय में ब्रह्माकी व्याकुन हो गये पे मोर फिर भगवान् मधु. मूदन से योले । हे हरे ! माग यह मेरा नर जन्म में जीवित हो जावे ॥४५॥ ब्रह्मा को इस प्रकार से की गई प्रार्थना से विष्णु सन्तुष्ट हो गये और यह बोले कि ऐमा ही होगा । फिर वह युद्ध स्थल में पहुंचकर उन दोनों के युर को भी निवारित कर दिया था और उन दोनों से कहा पा ॥४६॥ दूपरे उन्म में यह युद्ध तुम दोनों का होगा। जिम समय कमि भो द्वापर इन दोनों युगों को मापस मे सन्धि का काल होगा उस समर में एक महान् रण होगा उममे में तुम दोनों को योजित करूंगा ॥४७॥ भगयान विगु ने ग्रहों के स्वामी पौर गुरों के ईश्वर को बुलाकर उन दोनों से कहा पा कि ये दोनों परम भद्र नर है। पर मेरो आशा से इन दोनों का पालन करना पाहिए ॥८॥ हे महसमा (किरणों) याले यह स्वेरन इस घरातन में अपना ही अंग है। इस प्रकार से । पद-पुराण में द्वापर के अन्त मे वरना है जो कि देवों की कार्य सिद्धि के लिये ही करना होगा | यदुनातुकुलेभावीरोनाममहाबलः । तस्य कन्या पृथानामरूपेणाप्रतिमाभुवि ॥५० उत्पत्स्यतिमहाभागादेवानांकार्यसिद्धये । दुर्वासास्तुवरंतस्य मंत्रयामंप्रदास्यति ॥५१ मंत्रणानेनयंदेवंभवत्याआवाहयिष्यति । देवि तस्य प्रसादात्तु तव पुत्रो भविष्यति ॥५२ साचत्वामुदयेदृष्ट्वासाभिलापारजस्वला । चिताभिपन्नातिष्ठन्तीभजितव्याविभावसो ॥५३ तस्यागमत्वयंभावीकानीन कुतिनन्दनः । भविष्यति सुतोदेवदेवकार्यार्थसिद्धये ॥५४ तथेतिचोक्त्वाप्रोवाचतेजोराशिदिवाकरः। पुत्रमुत्पादयिष्यामिकानीनबलगवितम् ॥५५ यस्यकोंतिवनामलोकःसर्वोवदिष्यति । मत्प्रसादादस्य विष्णोविप्राणांभावितात्मनः ।।५६ यह नर नाम वाला महान बलवान् यदुमो के कुल मे उत्पन्न होगा। उसको कन्या होगी जिसका नाम पृथा होगा और वह इस भू-मण्डल में रूप- मौन्दर्य से अनुम्म होगी ॥५०॥ वह महान भाग वाली देवो की कार्य-मिति के लिये ही स्पस होती । दुर्वामा पि उसे वरदान पोर मन्त्रों का समूह प्रदान करेंगे ॥५१॥ दुर्वासा ने कहा था इस मन्त्र के द्वारा निम देवता की भक्ति से उपासना करेगी और उसका भावान करेगी हे देवी! उसी देवता के प्रसाद से तेरे पुत्र की उत्पत्ति होगी ॥५२॥ है विभावसो ! वह पृथा तुमको उदय काल में ऐखार रजस्वला होकर प्रभिलापा वाली होगी और चिन्ता से भिन्न होकर थित हेगी। उम समय मे पाएको सेवन पवश्य ही करना चाहिए ॥१३॥ उसके गर्भ में होने वाला कानीन कुन्ति नन्दन होगा। यह पुन देयो के वायों को मिदिरे लिये उसान होगा।५४॥ क्षेत्र के समूह भगवान् दिवाकर ने ऐसा भर्जुन तथा कर्ण की उत्पत्ति०] [ १३६ 4 ही किया जायगा—यह कहकर फिर बोले-मैं बल पराक्रम के गर्व से समन्वित कानीन (कन्या से जन्म लेने वाला) पुत्र समुत्पन्न कर दूंगा ॥५५॥ समस्त लोक उमका 'करण'-यह नाम कहेगे। मेरे प्रसाद से वह भगवान विष्ण का और 'विनों का परम भक्त होगा ॥५६॥ प्रदेयनास्तिवलोकवस्तुकिचिच्चकेशव । एव प्रभाव चवैन जनये वचनात्तव ॥५७ एवमुक्त्वासहस्राशुदेवदानवघातिनम् । नारायण महात्मानं तवांतर्दधे रविः ॥५८ प्रदर्शनगतेदेवेभास्करे वारितस्करे। वृद्धश्रवसमप्येवमुवाच प्रीतमानसः ॥५६ सहस्रनेत्ररक्तोत्थोनरोऽयमदनुग्रहात् । स्वाशभूतोद्वापरातेयोक्तव्योभूतलेत्वया ॥६० यदापाडुर्महाभागः पृथाभार्यामवाप्स्यति । माद्रीचापिमहाभागतदारण्यगमिष्यति ॥६१ तस्याप्यरण्यसस्थस्यमृग शापप्रदास्यति । तेनचोत्पन्नवैराग्यः शतशृंगगमिष्यति ।।६२ पुनान भोप्सन्क्षेत्रोत्थान्भार्यासप्रवदिष्यति । अनीप्सतीदाकुतीतभरिसावदिष्यति ॥६३ है केशब । उमकी ऐसी वृत्ति होगी कि लोक में कोई भी वस्तु न देने ले योग्य नही होगी। अापके वचन से मैं ऐसे हो दानशीलता के प्रभाव से परि. पूर्ण इमको जन्म ग्रहण कराऊँगा ॥१७॥ सूर्यदेव ने इस प्रकार से दानवो के धात करने वाले महात्मा देव नारायण से कहकर रवि वही पर अहित हो गये थे॥५॥ जनों के शोषण करने वाले भास्कर देव के लोग हो जाने पर प्रीति से युक्त मन वाले ने वृद्धश्रवा से इस प्रकार कहा ॥५६॥ सहस्र नेत्र वाले के रक्त मे स्थित यह नर मेरे मनुग्रह से प्रापको भूनन में सकीय प्रश रूप इमको द्वापर के अन्त मे युक्त करना चाहिए ॥६०॥ जिस समय में महान् भाग्य वाला राजा पाण्डु पृथा नामवाली भार्या को प्राप्त करेगे मोर माद्री पत्नी को

१४०11]
{ এয়-
प्राप्त करेंगे तब वह महाभाग परएय में चले जायेंगे ।।६१।। मरण्य में स्थित
रहने वाले भी उसको एक मृग शाप देगा। इसमे वैराग्य उत्पन्न हो जाने वाला
वह पतङ्ग को चले जायेंगे ॥६२सा वह अपने क्षेत्र से अर्थात् मार्या के उदर
से जान पुषों की इच्छा रखते हुए अपनी भाषा से कहेगा । उस समय में वह
कुन्ती इच्छा न रखती हुई अपने स्वामी से बहेगी ।।६।।
नाहमर्त्यस्यबराजन्पुत्रानिच्छकथचन ।
देवतेभ्यःप्रसादाच्चत्रानिच्छे नराधिप ॥६४
पार्थयत्यत्वयाशाकुन्त्यैदेयोनरस्ततः ।
वचसा च मदीयेन एवं कुरु शचीपते ॥६५
मथाववीत्तदाविष्णु देवेशोदु.खितोवच: ।
अस्मिन्मन्वंतरेऽतीतेचतुर्विशतिकेयुगे ॥६६
भवतीर्य रघुकुलेगृहे दशरथस्यच ।
रावरणस्य वधार्थाय शान्त्यर्थं च दिवौकसाम् ॥६७
रामरूपेण भवता सीतार्थ मटतावने ।
मत्पुत्रोहिसितोदेव सूर्यपुत्रहितार्थिना ॥६८
पालिनामाप्लवंगेद्रः सुग्रीवा त्वयाहतः ।
दुःखेनानेन तप्तोऽहगृह्णामि न सुतंनरम् ॥६६
पगृलूमानदेवेंद्र कारणांतरवादिनम् ।
हरिःप्रोचे शुनासीर भुवोभारावतारणे ।।७०
अवतार करिष्यामि मर्त्यलोकेत्वह प्रभो।
सूर्यपुत्रस्य नाशार्थ जयार्थ मात्मजस्य ते ॥७१
कुन्ती रहेगी कि हे राजन् ! मैं मनुष्य के पुत्रों को किसी प्रकार से भी
इच्छा नहीं रखती हूँ और हे नराधिप ! मैं तो देवी से उनके ही प्रसाद के स्व.
रूप पुत्रों की अभिलापा रखती हूँ।। ६४ ॥ हे शक! तब प्रार्थना करने वाली
कुन्ती को प्रापके द्वारा नर देना चाहिए । हे शची के स्वामिन् ! मेरे वचन से
आप इस तरह से करें ॥६५॥ इसके मन्तर देवेश्वर इन्द्र बहुत ही दुःखित
होकर भगवान विष्णु से यह वचन बोला था। इस मन्वन्तर के व्यतीत हो जाने
६

पुष्कर तीर्थ की उत्पत्ति ] [ १४१ पर चौबीम युग में रघुकुन म दशरथ के यहां अवतार लेकर रावण के वध के लिये और देवगण को शानि प्रदान करने के लिये मापने श्रीराम का रूप धारण किया था। उस समय सीता की खोज करने के लिय वनो म भ्रमण करते हुए सूय पुत्र के हित चाहने वाले पापने हे देव । मेरे पुत्र को हिसित कर दिया था ।।६६।६७।६८।। मापने अपने सखा सुग्रीव के हित का सम्पादन करने के लिये वानरो के राजा बाली का वध कर दिया था । मैं इस दुख से बहुम हो सताप से युक्त हूँ इसलिये मैं इस सुतनर को ग्रहण नहीं करना हूँ ॥६६॥ इस प्रकार से ग्रहण न करते हुए और इम ग्रहण न करने का अन्य कारण बताने वाले शुरासीर से भू मण्डल का भार उतारने के लिये भगवान ने कहा ७ ॥ हे देवराज । मैं मनुष्य लोक मे भी सूर्य के पुत्र के नाश करने के निये और आपके मात्मज की विजय के लिये अवतार लू गा । ७१।। । पुष्कर तीर्थ की उत्पत्ति ॥ भभा कातिमतीनाम देवाना शर्मदायिका । पिसघसमायुक्ता मुनिवृन्द निपेविता ॥१ द्विजातिसामशब्देन नादितानददायिनी। तस्या निविष्टो दवेश सध्यासक्त पितामह ॥२ ध्यायतिस्म पर देव येनेद निर्मितजगत् । ध्यायतो वुद्धिरुत्पन्ना कथ यज्ञ करोम्यहम् ।।३ कस्मिस्थाने मया यज्ञ कार्य कुन घरातले । काशीप्रयागस्तु गा च नैमिप शृङ्खल तथा ॥४ काची भद्रा देविका च कुरुक्षेत्र सरस्वती। प्रभासादीनि तीर्थानि पृथिव्यामिहमध्यत ॥ क्षेत्राणि पुण्यत्तीर्थानि सति यानीह सर्वश । महादेशाच्च रुद्रेण कृतान्यन्यानिभूतले ॥६ ययाह सर्वदेवेषु प्रादिदेवो व्यवस्थित । तथाचर पर तीर्थमादिभूत परोम्यहम् ।।७ [ पद्म-पुराण पुलस्त्य मुनि ने कहा- कान्तिमतो नाम वाली देवतायो को कल्याण प्रदान करने वाली एक सभा पी जोकि ऋषियों के सघ से समायुक्त थी और मुनिगण के द्वारा भी सेवित रहा करती थी ॥१॥ यह सभा द्विजातियों के द्वारा की गई सामवेद की ध्वनि से ध्वनित रहा करती थी तथा मत्यन्त हो मानन्द के प्रदान करने वाली थी। उस सभा में देवो के अधीश्वर पितामह निविष्ट होकर मन्ध्या वन्दना मे सप्तक्त हो गये थे ॥२॥ फिर पिनामह ने परदेवता का ध्यान किया था जिसने इस जगत् का निर्माण किया है । इस प्रकार से ध्यान करते हुए उनकी बुद्धि में पाया था कि मैं यज्ञ कमे करूं ? ।।३।। इस धरातल मे कहाँ पर किस स्थान मे मुझे यज्ञ करना चाहिए ? इस पृथ्वी के मध्य में काशी, प्रयाग, तुहा, नैमिष्ट, शृङ्गल, काची, भद्रा, देविका, कुरुक्षेत्र, सरस्वती और प्रमाम प्रादि अनेक तीर्थ स्थल हैं ।। ४।५ ॥ इस तरह के जो पुण्य क्षेत्र तीर्थ यहाँ पर सभी प्रोर हैं और मेरे आदेश से रुद्र ने इस पर भू मण्डल मे अन्य स्थल भी बना दिये हैं ।। ६ ।। जिस प्रकार से समस्त देवो मे मुझे पादि देव व्यवस्थित किया गया है उसी प्रकार से मैं एक सबमे परम श्रेष्ठ मादिभूत तीर्थ करना चाहता है ॥७॥ अहं यत्र समुत्पन्न पय तद्विष्णुनाभिजम् । पुष्करं प्रोच्यते तीर्थमृपिभिर्वेदपाठकः ।।८ एवं चितयतस्तस्य ब्रह्मरणस्तु प्रजापतेः । मतिरेपा समुत्पन्ना व्रजाम्येपधरातले ।। प्राकस्थान स समासाद्य प्रविष्टस्तनोतमम् । नानाद्र मलताकीर्णनानापुष्पोपशोभितम् ।।१० तद्वन नन्दनसमं मनोहष्टिविवर्धनम् । पायोनिस्तु भगवस्तिथा रूप वनोत्तमम् ।।११ ददर्शादर्शवदृष्ट्या सौम्यया पायनिय । तावृक्षपंक्तयः सर्वा दृष्ट्वा देव तथागतम् ।।१२ निवेद्य ब्रह्मणे भक्त्या मुमुचुः पुष्पसपदः । पुप्पप्रतिग्रहं कृत्वा पादपानां पितामहः ।।१३ पुष्कर तीथं की उत्पत्ति ] [ १४३ वरं वृणीध्वं भद्रवः पादपानित्युवाच सः । एवमुक्ता भगवता तरवो निरवग्रहाः ।।१४ ऊचुः प्रांजलयः सर्वे नमस्कृत्वा विरिचिनम् । वर ददासि चेद्देव प्रपन्नजनवत्सल ॥१५ इहैव भगवनित्य वने सनिहितोभव । एप नः परम: कामः पितामहः नमोस्तु ते ॥१६ जिस स्थान पर मैं समुत्पन्न हुआ था वहाँ भगवान विष्णु की नाभि से उत्पान पा है । उस स्थल को वेदो के पाठ करने वाले ऋपियो के द्वारा पुष्कर कहा जाता है । इस प्रकार चिन्तन करते हुए प्रजापति ब्रह्माजी वो यह बुद्धि उत्पन्न हुई धरातल में मैं चला जाऊँ । पहिले वह उस स्थान में पहुंचे पौर फिर उसके उत्तम वन मे उनने प्रवेश दिया था जो वन अनेक तरह के वृक्ष मोर लताओ से घिरा हुआ था पोर विविध प्रकार के पुष्पो से सुशोभित हो रहा था ॥ १० ॥ वह वन नन्दन वन के तुल्य था जो मन मोर नेत्रो को मानन्द की बुद्धि करने वाला था । पद्म से उत्पन्न होने वाले भगवान ब्रह्माजी ने उस प्रकार के परम सुन्दर श्रेष्ठ वन को देखा था मानो मादर्श को भाति सौम्य दृष्टि से पिला रहे हों। उन वृक्षो पक्तियो ने वहाँ पर समागत देव को देखकर ब्रह्माजी को भक्ति-भाव से निवेदन करके विविष पुष्पो को वर्षा की थी पितामह ने वृक्षों के द्वारा समपित पुष्पों का प्रतिग्रह स्वीकार किया था ॥११॥ ॥१२।१३।। ब्रह्माजी ने वृक्षों से कहा था तुम्हारा पल्याण हो मोर अब तुम जो भी पाहो वह वरदान मुझसे मांग लो। इस प्रकार से ब्रह्मा के द्वारा कहे गये प्रवग्रह से रहित उन वृक्षो ने ब्रह्मात्री को नमस्कार फरके दोनों हाय चोरते हुए कहा-हे पारण में पाये हुए लोगों पर स्नेह परने वाले देव ! यदिमाप पृपापर वरदान देते है तो हम यही वरदान बापसे पाहते हैं यन् ! यहाँ पर ही हम वन मे सन्निहित होकर रहें। हे पितामह ! यही हम समी परम पामना है । हम सयमा भापतो नमस्कार है ।।१४।१५।१६॥ उत्तमं सर्व क्षेत्राणां पुण्यमेतद्नविष्यति । नित्यं पुष्पफलोपेता नित्यं मुस्थिरपौवनाः ॥१७ आप हे मग १४४ ] [ म पुराण कामगा:कामरूपाश्व कामरूपफलप्रदा:। कामसंदर्शनाःपुसा तप.सिद्ध्युज्ज्वलानृणाम् ॥१८ श्रिया परमया युक्ता मत्प्रसादाद्भविष्यथ । एवं स वरदो ब्रह्मा अनुजग्राहपादपान् ॥१६ स्थित्वा वर्षसहस्र तु पुष्करप्राक्षिपद्भुवि । क्षितिनिपतितातेन व्यकंपत रसातलम् ॥२० विवशास्तत्यजुर्वेला सागराः क्षुभितोर्मयः । शकाश निहतानीवव्याघ्रव्यालावृतानि च ॥२१ ब्रह्माजी ने कहा-यह वनस्थली समस्त अन्य पुण्य क्षेत्रो से परम श्रेष्ठ होगी । इसमें नित्य हो पुष्प और फल रहा करेंगे और सर्वदा सुस्थिर यौवन वाली रहेगी ।।१७। यहाँ माप सब कामनापो के गामो, इच्छा रूप वाले, काम स्वरूपानुरूप फलो के प्रदाता, इच्छा के अनुसार दर्शन देने वाले मनुष्यों को तपस्या की मिद्धि देने से उज्ज्वल होंगे ||१८|| मेरे प्रसाद के प्रभाव से प्राप सब परमोत्तम श्री से सम्पन्न हो जायेंगे । इस रीति से पितामह ब्रह्माजी ने वर- दान प्रदान करके उन पादपो पर पूर्ण अनुग्रह किया था । १६॥ एक सहस वर्ष पर्यन्त वहाँ पर ब्रह्माजी ने अपनी स्थिति बनाकर भू मण्डल में पुष्कर को प्रक्षिप्त कर दिया था मौर उससे पृथ्वी रसातल की जाती हुई विशेष रूप से कम्पित हो गई थी ।। २० ।। क्षोभ से युक्त तरङ्गों वाले सागरो ने विवश होकर वेला का त्याग कर दिया था ! पर्वनों को चोटियां जो व्य ध्र और व्यालो से मावृत थीं वे इन्द्र के वज के प्रहार को भाति मानो निहित होयो थीं। २१॥ शिखराण्यप्यशीयंत पर्वतानां सहस्रशः । देवसिद्धविमानानि गंधर्वनगराणि च ॥२२ प्रचेलुवभ्रंमु.पेतुविविशुश्च घरातलम् । कपोतमेधाःसारपेतुः पुटसंवातदशिनः ॥२३ ज्योतिर्गरगांवादयंतो बभूवुस्तीयभास्कराः। महता तस्य गन्देन मूफान्धवधिरोकृतम् ॥२४ बभूव व्याकुलं सर्व लोगयं स चराचरम् । सुरामुराणांसर्वेषां सरोराणिमतासि च ॥२५ [ १४५ पुष्कर तीर्थ की उत्पत्ति ] अवसेदुश्वकिमितिकिमित्येतनजज्ञिरे। धैर्यमालंव्य सर्वेऽथ ब्रह्माणं चाप्यलोकयन् ॥२६ न च ते तमपश्यंतकुत्र ब्रह्मो गतोह्यभूत् । किमर्थं कंपिता भूमि निमित्तोत्पातदर्शनम् ॥२७ तावद्विप्रणुगतस्तत्र यत्र देवा व्यवस्थिताः । प्रणिपत्य इदं वाक्वमुक्तवतोदिवौकसः ।।२८ महवा पर्वतों के शिखर वज्र के आघात के समान शोणं हो गये थे। देवों और सिद्धों के विमान तथा गन्धों के नगर सब चलायमान हो गये, चकर साने लगे और गिरकर घरातल मे प्रविष्ट हो गये थे। पुट संवाल के देखने वाले कपोल मेघ आकाश से पतित हो गये थे ॥२२ २३॥ तीव्र सूर्य ज्योतिगरणी का छैदन करते हुए अस्थिरता को प्राप्त हो गये थे। उस पुष्कर के पास ऐसो महान् घोर ध्वनि हुई पो उसने सबको मूक (गूगा ) और बहरा बना दिया था ॥२४॥ स्थायर जङ्गम रामस्त चराचर ती. लोक व्याकुल हो उठे थे पौर मुर तथा ममुर सबके शरीर एवं मन प्रसाद से सिन्न हो गये थे ॥२५॥ यह क्या कारण, यह रिसका ऐसा घोर परिणाम है-इसे कोई भी न जान पाये थे। इसके मनन्तर सबने धंयं धारण किया और सबके सब ब्रह्माजी को देखने लगे थे ॥२६॥ किन्तु उन्होंने वहां ब्रह्मा जी को नही देखा था। ये विधा- रने लगे कि ब्रह्मा कहाँ चले गये हैं ? यह भूमि किस लिये ऐमो कम्पित हुई है । यह तो किमी उत्पात का ही कोई निमित्त है ॥२७॥ इसी बीच में वहाँ पर भगवान् विष्णु पहुँच गये थे जहाँ पर देव लोग प्रवस्थित थे। सब देवगणों ने विणको प्रणाम पिया मोर उनसे यह वाक्य बोने थे ॥२८॥ किमेतद्भगवन्द्र हि निमित्तोत्पातदर्शनम् । प्रैलोक्य कंपित येन सयुक्त कालधर्मणा ॥२६ गुमोऽशुभोवागन्दोऽयंप्रैलोक्यस्यदिवौकसाम् । भावयदिजानासिकिमेतत्वाययस्वनः ।।३० एवमुक्तोऽग्रवीद्विष्णुः परमेणानुभावितः । माभेष्टमस्त सर्वे शृणुध्वंचान कारणम् ॥३१ । १८ पुराण ? निश्चयेनानुविज्ञाय वक्ष्याम्येपयथाविधम् । पग्रहस्तोहिभगवान्ब्रह्मा लोकपितामहः ।।३२ भूप्रदेशेपुण्यराशौ यज्ञ कत्तुं व्यवस्थितः । अवरोहे पर्वताना बने चातीवशोभने ॥३३ कमलतस्य हस्तात्तु पतित घरगीतले । तस्यशब्दोमहानेष येन यूप प्रकपिता ॥३४ तवासी तरुवृदेन पुष्पामोदाभिनदितः । अनुगृह्यायभगवान्वनतत्समृगाडजम् ॥३५ हे भगवन् ! यह क्या हो रहा है और किस उत्पात के दिखावे का निमित्त है-इसे याप कृपाकर बतलाइये । काल धर्म से सयुक्त त्रिलोको को जिसने कम्पायमान कर दिया है ।।२६ लोक्य के देवगणो के लिये यह शब्द शुभ है अथवा अशुभ है । हे भगवन् । यदि आप इसे जानते हैं तो कृपया बतला दीजिये कि यह क्या है ? ॥३०॥ इस तरह से जब भगवान् विष्णु से प्रार्थना की गई तो मत्यन्त अनुग्रह से मनुभावित होकर विष्णु ने देवगण से कहा--- ( हे देवगणो । माप लोग भयभीत मव होयो । इसका कारण आप लोग मुझसे श्रवण करलो ॥३१॥ मैं पूर्ण निश्चय करके और समझकर पूरी बात जो भी जसी है तुम्हे बतलाता हूँ । लोको के पितामह भगवान् ब्रह्माजी पद्म हाय में धारण करने वाले हैं ।।३२।। उन्होंने पुण्य स्थल भू-मण्डल मे यज्ञ करने की व्यवस्था का निश्चय किया है । पर्वतो के अपरोह में मोर मतीव शोमा सम्पन्न चन में उस यज्ञ करने का विचार किया है ॥३॥ उनके हाथ से पर धरणी तल पर गिर गया है । उस कमल के पातन होने का यह महान पशब्द है जिससे कि भीत होकर पाप लोग कम्पयुक्त हो गये हैं । वहा पर सरुमो के द्वारा इन ब्रह्माजी का पुष्पों को गन्ध से अभिनन्दन किया गया है । मृगाडग के सहित उस वन को ब्रह्माजी ने मनुगृहीत किया है ॥३४॥३५॥ जगतोऽनुग्रहार्थाय शस तमन्दरोग्यद । पुष्करं नाम ततीर्थ क्षेत्र वृपभमेव च ॥३६ जनितं तद्भागवता लोकाना हितकारिणा। ग्रह्माणतनवंगत्वा तोपयध्वं मया सह ॥३७

पुष्कर तोयं की उत्पत्ति ]
[ १४७
प्राराध्यमानो भगवान्प्रदास्यतिवरान्वरान् ।
इत्युक्त्वाभगवान्विष्णुः सहतर्देवदानवैः ॥३८
जगामतद्वनोद्देशं यत्रास्ते स तु कजजः ।
प्रहृष्टास्तुष्टमनसः कोकिलालापलापिताः ॥३६
पुप्पोच्चयोज्ज्वलं शस्तं विविशुनं ह्मणोक्नम् ।
संप्राप्तंसर्वदेवस्तु व नंदनमितम् ॥४०
पधिनीमृगपुष्पाढय सुदृढं शुशुभे तदा ।
प्रविश्याथ वनंदेवाः सर्वपुप्पोपशोभितम् ।।४१
इहदेवोऽस्तीतिदेवा वभ्रमुश्चदिदृक्षवः ।
मृगयं तस्ततस्ते तु सर्वेदेवाः सवासवाः ॥४२

१४८ ]
[ पम-पुराण
अद्भुतस्यवनस्यांतं न ते ददृशुरामुगाः ।
विचिन्वद्भिस्तदादेवं देवैर्वायुविलोकितः ॥४३
स तानुवाच ब्रह्माणं न द्रक्ष्यथ तपोविना ।
तदाखिलाविचिन्वंतस्तस्मिन्पर्वतरोधसि ॥४४
धर्मनेत्रमाणमस्मादधिकं कर्तुमर्हसि ।
वाङ्मनःकायभावस्त्वां प्रपन्नास्मः पितामह ॥४५
एचस्तुतस्तदादेवयमा ब्रह्मविदां वरः ।
प्रदास्यामि स्मृतोवाढममोघं दर्शनं हि वः ॥४६
अवंतुवांछितंपुत्राः प्रदास्यामि वरान्वरान् ।
एवमुक्ता भगवतादेवा वचनमब्रुवन् ।।४७
एपएवाद्य मगवन्सु पर्याप्तोमहान्वरः ।
जनितीनः सुशब्दोऽयंकमलंक्षिपतात्वया ॥४८
किमर्थकंपिताभूमिर्लोकाश्चाकुलिता:कृताः ।
नैतभिरर्थक देव उच्यतामनकारणम् ।।४६
प्रत्यन्तं शीघ्रता से गमन करने वाले भी वे सब उस परम प्रभुत
वन का अन्त न देख पाये थे। उस समय में सब ब्रह्माजी की खोज करने वाले
देवों ने वायु को देखा था ॥४३॥ उस वायु ने उन सबसे कहा था कि आप लोग
तपश्चर्या के बिना ब्रह्माजी को नहीं देख सकेंगे। उस समय उस पर्वतो के मध्य
ने ब्रह्मा को ढूंढते हुए सब अत्यन्त खिन्न हो गये थे 1॥४४॥ देवों ने वहाँ पर
ब्रह्मा का बहुत कुछ स्तवन किया था मोर कहा-हे धर्मनेत्र ! इतने ही से
प्राप हमारी रक्षा करने के योग्य होते हैं। हम सभी लोग मन-वाणी और
शरीर से आपकी धारणागति में समुपस्थित हो गये हैं। हे पितामह ! हमारे
ऊपर अनुग्रह कोलिए ॥ ४५ ॥ इस प्रकार से देवगण के द्वारा स्तुति किये गये
ब्रह्मवेत्तामों में श्रेष्ठ ब्रह्माजी ने कहा था-पाप लोगों के द्वारा स्मृत हुमा मैं
आप सभी को अपना दर्शन दूंगा ॥४६॥ हे पुत्रो ! माप लोग अपना प्रभीप्सित
बतलायो। मैं पापको श्रेष्ठ वरदान प्रदान करूंगा। इस रीति से कहे गये
देवताओ ने अपने वचन कहे थे ॥ ४७ ॥ हे भगवन् ! यह ही माज बहुत ही

रक्षा करने के लिये होहमा है। इसमे जो भी कारण है उस सुन लो ॥५०॥ यह नाम नाम वाला मसुरो बानीको पे अपहरण करने वाला है। पद रसातल के तल को अपना प्राश्रय बनाकर तथा उसे पधष्टब्ध करके अवस्थित पा रहा है। माप सबका यहाँ मागमन जानकर तपश्चर्या में स्थित निहित भायुधों पाले माग सबके हनन करने की इच्छा वाला वह दुश्माचार वाला था। पुपर तीर्य की उत्पत्ति ] [ १४६ पर्याप्त (काफी) महान् वरदान है कि मापने अपने हाथ के कमल को फैकते हुए यह वडा ही सुन्दर शब्द समुत्पन हमारे लिये पैदा कर दिया था ||४|| यह समस्त भू-मण्डल मापने किस प्रयोजन की सिद्धि के लिये प्रकम्पित किया है और ये लोक सब क्यो ध्याचल कर दिये हैं ? हे देव । यह सब कुछ धिना किमी प्रयोजन के व्यर्थ तो नही है । इसका प्रयश्य ही कुछ प्रयोजन है। माप इसका जो भी कारण हो उसे ही बताने का अनुग्रह करें ।।४।। युष्मतितार्थमेतद्व पद्म विनिहितंमया । देवतानां च रक्षार्थ श्रू यतामयकारणम् ॥५० असुरोवञ्चनाभोऽयं बालजीवापहारकः । मवस्थितस्त्ववष्टभ्यरसातलतलाश्रयम् ।।५१ युष्मदागमनं ज्ञात्वा तपस्थानिहितायुधान् । हतुकामोदुराचार सेंद्रानपि दिवौकसः ।।५२ घात.कमलपातेन मयातस्यविनिर्मितः । स राज्येश्वर्यदर्पिष्ठस्तेनासौनिहतोमया ।।५३ लोकेऽस्मिन्समये भक्तामाह्मणा वेदपारगाः । मेव ते दुर्गतिं यांतुलभंतांसुगतिपुनः ।।५४ देवानां दानवानांच मनुष्योरगरक्षसाम् । भूतनामस्यसर्वम्य समोऽस्मित्रिदिवौकसः ।।५५ युष्मद्धितार्थपापोऽसोमयामणघातितः । प्राप्त पुण्यकृतांलोकान्कमलस्याम्यदर्शनात् ।।५६ इस पर ब्रह्माजी ने कहा- मैने पाप मय लोगों की भलाई के निगे ही यह पर विशेष रूप से निहित किया है । इस कमल का फेंका जाना देवताओं को ३ १५० ] [ पद्म पुराण t इन्द्र के महित सभी देवताओं मार डानने की इच्छा कर रहा था॥५२॥ ॥५२॥ मेरे इम कमल के गिरा देने से उसका घात कर दिया था। वह अपने राज्य के ऐश्वर्य में बहुत ही अत्यन्त घमण्ड वाला था। इमसे मैंने उसको मार डाला है ॥५३॥' इस समय लोक में वेदो के परगामी ग्राह्मण भक्त सब दुर्गति को प्राप्त न होवें और सभी पुनः सुगनि का लाभ करें ॥५४॥ हे देवगण ! में सो देवों के, दानवों के, मनुष्यों के, उरगों के, राक्षसों के और सम्पूर्ण प्राणिमात्र के लिये समान हूँ अर्थात् सभी का कल्याण चाहने वाला हूँ ॥५५॥ आप सभी के पत्याए करने के लिये मैंने इस महान् पापारमा का मात्र से घात किया है मोर भब वह इस कमल के दर्शन से ही पुण्यकारी लोको को प्राप्त हो गया यन्मयापयमुक्त'तु तेनेदंपुष्करं भुवि । ख्यातंभविष्यते तीयं पावनं पुण्यदंमहद ॥५७ पृथिव्यां सर्वजंतूनाम्पुण्यदं परिपठ्यते । कृतोह्यनुग्रहोदेवा भक्तानां भक्तिमिच्छताम् ।।५% वनेऽस्मिन्नित्यवासेन वृक्षरभ्ययितेनच । महाकालोदनेऽवागादागतस्य ममानघाः ॥५६ तपस्यतांच भवतांमहज्ज्ञानं प्रदर्शितम् । कुरुध्वं हृदयेदेवाः स्वार्थचैव परार्थकम् ॥६० भवद्भिर्दर्शनीयं तु नानारूपधरभुवि । द्विपन्वैज्ञानिनविनं पापेनवादितोनरः ॥६१ नविमुच्येत पापे जन्मकोटिशतैरपि । वेदांगपारगं विप्रं नहन्यानचदूपयेत् ॥६२ एकस्मिनिहते यस्मात्कोटिर्भवतिघातिता। एझवेदातगं विधंभोजयेच्छद्धयान्वितः ॥६३ मैंने जो यह पन मुक्त किया है इससे भू-मण्डल में गह पुष्कर प्रमिद्ध होगा जो कि परम पुष्प दे प्रदान करने वाला एक महान् पावन तीथं होगा ॥५७॥ पृथ्यो में समस्त जन्तुमो को पुप प्रदान कराने वाला कहा जाता है।

पुष्कर तीर्थ की उत्पत्ति ]
हे देवगण ! भक्ति की इच्छा रखने वाले भक्तो के लिये मैंने यह अनुग्रह ही
किया है ॥५८। इम वन में निवास करने से और वृक्षो के द्वारा प्रम्ययित होने
से मेरा यहां पर पाये हुए को महान काल होगया है ॥५६॥ हे प्रनयो ! तप.
स्या करने वाले माप लोगों को महान जान प्रदर्शित होगा । हे देवताओ ! प्राप
लोग हृदय में स्वार्थ तथा परायं दोनों ही कगे ॥६०|| भू-मण्डल में नाना रूपी
के पारण करने वाले प्रापको द्वेष भाव रखने वाले और ज्ञानी विप्र देखने योग
होगे यह मनुष्य पाप के द्वारा ही अदित हो रहा है ।।६१॥ सैकडों करोड जन्मो
मे भी पाप से विमुक्त नहीं होता है। प्रतएव जावेद का पारगामी विप्र है
उसका हनन तथा दूपण नहीं करना चाहिए ॥६२॥ एक का भी विदनन करने
से करोडो को घात हो जाया करती है इतना महान् पाप है । एक वेदान्त शास्त्र
के पूर्ण ज्ञान रखने वाले विप्र को परम श्रद्धा से समन्वित होकर भोजन कराना
पाहिए । ६३॥
क्षेत्रनिवेशया मासयथावत्कथयामिते ।
उत्तरे चद्रनद्यास्तु प्राची यावत्सरस्वती ॥६४
पूर्वतुनदनाकृत्स्नयावस्कल्पसपुष्करम् ।
वेदीह्य पाकृतायज्ञे ब्रह्मणालोककारिणा ॥६५
ज्येष्ठ तुप्रथमत्रेयतीर्थ लोक्यपावनम् ।
रुपातनब्रह्मदेवत्यं मध्यम वैष्णवं तथा ॥६६
फनिष्ठ रुद्रववत्यं ब्रह्मा पूर्वमकारयन् ।
आद्यमेतत्पर क्षेत्र गुह्य वेदेषु पठ्यते ॥६७
अरण्य पुष्करास्यं तु ब्रह्मासग्निहित.प्रभुः ।
अनुग्रहोभूमिभागेकृतोपग्रह्मणास्वयम् ॥६८
अनुग्रह र्थ विप्राणां सर्वेपाभूमिचारिणाम् ।
सुवर्णवज्रपयंता वेदिकाका महीकृता ।।६६
विचित्रकुट्टिमारले. कारिनासर्यशोभना ।
रमतेतत्र भगवान्ब्रह्मालोकपितामहः ।।७०
ग्रह्माजी ने देवो से कहा-इस क्षेत्र में जो भी मैंने निवेशित लिया है
पह सब ठीक ठोक तुमको बतलाता हूँ। चन्द्र नदी के उत्तर में जब तक प्राची

१५० ] [ पथ पुराण इन्द्र के सहित सभी देवतामो को मार डालने की इच्छा कर रहा था ॥५॥ ॥५२।। मैंने इम बमल के गिरा देने से उसका पात पर दिया था। वह अपने राज्य के ऐश्वर्य मे बहुत ही अत्यन्त घमण्ड वाला था। इमसे मैंने उसको मार हाला है ॥५३॥ ' इस समय लोक में वेदो के परगामी ब्राहाण भक्त सब दुर्गति को प्राप्त न होवें और सभी पुन: सुगति का लाभ करे ॥५४॥ हे देवगण ! मैं तो देवों के, दानवों के, मनुष्यों के, उरगों के, राक्षसो के और सम्पूर्ण प्राणिमात्र के लिये समान हूँ अर्थात् सभी का कल्याण चाहने वाला हूँ ॥५५॥ आप सभी के क्ल्याए करने के लिये मैंने इस महान् पापात्मा का मन्त्र से घात किया है मोर अब वह इस कमल के दर्शन से ही पुष्पकारी लोको को प्राप्त हो गया है ॥५६॥ यन्मयापन मुक्ततु तेनेदंपुष्करं भुवि । ख्यातंभविष्यते तीर्थ पावनं पुण्यदमहत् ॥५७ पृथिव्यां सर्वजंतूनाम्पुण्यद परिपठ्यते । कृतोह्यनुग्रहोदेवा भक्तानां भक्तिमिच्छताम् ॥५% बनेऽस्मिन्नित्यवासेन वृक्षरयथितेनच । महाकालोवनेऽत्रागादागतस्य ममानघाः ॥५६ तपस्यतांच भवतामहज्ज्ञानं प्रदर्शितम् । कुरुवं हृदयेदेवाः स्वार्थचव परार्थकम् ॥६० भवद्भिर्दर्शनीयं तु नानारूपधरभुवि । द्विपन्वैज्ञानिनं विप्रं पापेनैवादितोनरः ॥६१ नविमुच्येत पापेर जन्मकोटिशतरपि । वेदांगपारगं विप्रं नहन्यानचदूपयेत् ॥६२ एकस्मिन्निहते यस्मात्कोटिर्भवतिघातिता। एकवेदातगं विप्रभोजयेच्छद्धयान्वितः ॥६३ मैंने जो यह पद्म मुक्त किया है इससे भू-मण्डल होगा जो कि परम पुष्प में प्रदान करने वाला एक महान् पावन तीर्थ होगा ॥५७।। पृथ्वी मे समस्त जन्तुप्रो को पुष्प प्रदान कराने वाला कहा जाता है। मे यह पुष्कर प्रसिद्ध रमतता भगरान्यानामपितामह ७० पल्लाको मेदेवी सेह-जो भी ने निषेनिन पियर है रायठोरठौर तुमको बताने उर मामी पुष्कर तीर्थ की उत्सत्ति ] [ १५१ ह देवगण ! भक्ति की इच्छा रखने वाले भक्तो के लिये मैंने यह अनुग्रह ही किया है १५८॥ इस वन म निवास करने से और वृक्षो के द्वारा प्रथिन होने से मेरा यहाँ पर प्राय हुए को महान काल होगया है ॥५६॥ हे अनघो । तप- स्या करने वाले पाप लोगो को महान् ज्ञान प्रदशिन होगा। हे देवतामो । प्राप लोग हाथ म स्वाय तथा पराय दोनों ही करो ॥६०॥ भू मण्डल मे नाना तो के धारण करने वाले प्रापको देष भाव रखने वाले और ज्ञानी विप्र दखने योग्य मागे यह मनुष्य पाप के द्वारा ही प्रदित हा रहा है ॥६१॥ सैकडो बरोड जन्मो में भी पाप से विमुक्त नहीं होता है। प्रताव जो वेद मा पारगामो विप्र है उसका हनन तथा दूपण नही करना चाहिए १६२॥ एक का भी विहनन करने म करोडा को पात हो जाया करती है इतना महान् पाप है । एक वेदान्त शास्त के पूर्ण ज्ञान रमन वाले विप्र को परम श्रद्धा से समन्वित होकर भोजन कराना चाहिए । ६३॥ क्षेन निवशया मासयथावत्कथयामिते । उत्तर चदनद्यास्तु प्राची यावत्सरस्वती ॥६४ पूवतुनदनात्कृत्स्नयावत्कल्पसपुष्करम् । वेदी पाकृतायज्ञे ब्रह्मणालोककारिणा ॥६५ ज्येष्ठ तुप्रथमश्यतीर्थ लोक्यपावनम् । यातनद्बह्मदेवत्य मध्यम वैष्णव तथा ॥६६ पनिष्ठ रुद्रववत्य ब्रह्मा पूर्वमकारयत । माधमत्त पर क्षेत्र गुह्म वेदेषु पठ्यते ॥६७ धरण्य पूष्करास्य तु ब्रह्मासग्निहित प्रमु । अनुग्रहोभूमिभागेयतोयब्रह्मरणास्थयम ॥६८ अनुग्रह में विप्राणा सर्वेषाभूमिचारिणाम् । गुवणवचपयंता वेदिकाका महौष्टता ॥६६ विनियट्टि मारलं पारितारायसोभना ।

१५२ ] [ पद्म पुराण अर्थात पूर्व दिशा हो सरस्वती है ॥६४॥ नन्दन में पूर्व जितना भी मम्पूर्ण कल्प है वह पुष्कर है । लोकों के धारण करने वाले ब्रह्मा ने यज्ञ में यह वेदी बनाई यो ।।६।। सबसे बडा, प्रथम और त्रिलोकी में परम पावन इम तीर्थ को सम- झना चाहिए । इसको मषियतृ देवता ब्रह्माजी हैं-ऐसा ही प्रसिद्ध है । तथा जो मध्यम तीथं है वह वैष्णव है अर्थात् उसके अधिष्ठातृ देवता विष्णु हैं ॥६६॥ सबसे छोटा रुद्र के अधिष्ठातृ देवता वाला सीथं है । ऐसा ही ब्रह्माजी ने पहिले किया था, यह परम श्रेष्ठ माद्य क्षेत्र है जो वेदों में अति गोपनीय पढा जाता है ॥६॥ पुष्कर नाम वाला जो अरण्य (बन) है वहां पर प्रभु ब्रह्मा सनिहित रहा करते हैं । इस भूमि के भाग में ब्रह्माजी ने स्वयं परम कृपा को है ॥६॥ समस्त भूमि पर विचरण करने वाले विनों के ऊपर अनुग्रह करने के लिये इस मही को सुवर्ण वज पर्यन्त वेदिका के मङ्क वाली कर दिया है ।। ६६ ॥ यह वेदो मति पिवित्र कुट्टिम रत्न से सब प्रकार की शोभा वाली बनादी है जहाँ पर भगवान् पितामह ब्रह्मलोक के अधिष्ठाता रमण किया करते हैं ॥७॥ विष्णुरुद्रौतथादेवीवसवोऽप्यश्विनावपि । मरुतश्चमहेंद्रण रमतेचदिवौकसः ॥७१ एततेतथ्यमाख्यातलोकानुग्रहकारणम् । संहितानुक्रमेणाप्रमंश्वविधिपूर्वकम् ॥७२ वेदान्ठतियेविप्रा गुरुशुश्रू पणेरताः । वसंति ब्रह्मसामीप्येसर्वेतेनानुभाविता: ॥७३ भगवन्केन विधिनापरण्येपुटकरेनरैः । ब्रह्मलोकमभीप्सद्भिर्वस्तव्यंक्षेत्रवासिभिः ।।७४ किंमनुष्यरुतस्त्रीभिरुतवर्णाश्रमान्वितः। वसद्भिः किमनु यमेतत्सर्व प्रवीहिमे ॥७५ 'नर:स्त्रीमिश्ववस्तव्यंवर्णाश्रमनिवासिभिः । स्वधर्माचारनिरतदभमोहविजितः 11७६ यहाँ पर भगवान् विष्णु, रुद्र, इन्द्रदेव, अश्विनीकुमार, परत, महेन्द्र तया पन्य मय देवगण भी रमण दिया करते हैं ॥५१॥ यह परम सरय मैंने

ब्रह्मदेव कृत यज्ञ वणन ]]
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बता दिया है जो लोगो के कार अनुग्रह के लिये ही किया गया है । यही इसका
कारण है । यहाँ पर जो विप्र सहिता के अनुक्रम से वेदो का पाठ किया करते
हैं तया विधि विधान के सहित मात्रो से वेदो को पढ़ते हैं और अपने गुरचरण
की सेवा म अनुरक्त रहा करते हैं वे सब अनुभावित होते हुए ब्रह्म के ही समोप
में निवाम किया करते हैं । ७२७३ ।। भीष्म ने पूछा था - हे भगवन् । इस
परण्य में मनुष्यो को किस विधि से निवास करना चाहिए जो कि ब्रह्मलोक की
इच्छा रखत हैं और इस क्षेत्र मे वास किया करते हैं। मनुष्यों को, स्त्रियों को
और वर्णाश्रमों से युक्त रहने वालो को यहां निवास करते हुए क्या करना
चाहिए--यह सब कृपाकर हमको बताइये । पुलस्त्य मुनि ने कहा-पुरुषो को
तथा स्त्रिी को वर्णाश्रम के मनुगार हो अपने-अपने धर्मों का प्राचार पालन
करते हुए मोह और दम्भ से रहित होकर यहाँ पर निवास करना चाहिए
।।७४।७५७।।
॥ ब्रह्मदेव कृत यज्ञ वर्णन ॥
यदेतत्यथित ब्रह्म स्तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् ।
कमलस्याभिपातेन तीर्थजात धरातले ॥१
तपस्थेन भगवता विष्णुमा शवरेण च ।
यरत मुनिशार्दूल तत्सर्व परिणीतंय ॥२
पथ यज्ञाहिदेवेन विभुना तत्र कारित ।
पेसदस्याऋत्विजश्न ग्राह्मग्गा पेसमागता ॥३
के भागास्तस्य यशस्य विद्रव्य याचदक्षिणा ।
कावेदोषिप्रमाणात तग विनिचिना ॥४
योयाज्य सर्व देयानां वेद रायंन पठाते।
पचपाममभिघ्यायवेधायापार ॥५
पपागौदयदेशो मजरामर ।
तयारय म्यगंस्तम्रदेवम्य हस्यो।
अन्यपानदेयागत स्यामदारमना ।
पग्निहोनापंमुपनविदासपा

१५४ 1 [ पागल भीम को कहा-हे ब्रह्मच ! मापने पुष्कर तोपं का परयन्त उसम माह रम्य का वर्णन किया है जो कि इस घरातल में ब्रह्माजी के हाप से गिरे हुए कमल से यह तोपं हुपा है ॥१॥ हे मुनियों में शार्दूल ! पर आप यह वर्णन करने को कृपा कोरिये कि उस तीर्य में स्थित भगवान् विष्णु और शकर ने जो भी क्या किया था {1 विभुदेव ने यहां पर किस प्रकार से पश कराया था। उस या में कौन-कौन हारा हो पाये थे और उस यज्ञ के सदस्य तथा ऋत्विज बने थे ||३|| उस यज्ञ के कितने कौन-कौन से भाग थे। उसमे क्या-क्मा द्रष्य थे और क्या उसको दक्षिणा दी। उसकी वेदी पंसी और कितनी लम्बी-चौडी ब्रह्माजी ने वहाँ पाकर बनाई पो ॥४ा जो मनस्त देवो का यजन करने के योग्य है वह वेदों के द्वारा सर्वन पढा हो जाता है । वेघा ने किम कामना के लिये यह यज्ञ वहाँ पर किया था | जिस प्रकार से यह देवो का भी देवेवर जरा (वृक्षायस्था) और मृत्यु मे रहित है तथा उस देव का कभी क्षय को प्रास न होने वाला स्वर्ग दिखलाई देता है ।।६। इस महान पमा पाले ने अन्य देवो को स्वर्ग प्रदान किया है। अग्निहोत्र का कार्य संपादन करने के लिये ये समस्त वैद एवं मौघियाँ समुत्पन्न हुए हैं 11७॥ येचान्येपरावोभूमौसतेयज्ञकारणात् । सृष्टा भगवतानेन इत्येषा वैदिकी तिः ।। तदनकौतुपमा थत्वेदतवभापितम् । यकाममधिकृत्यक यत्फलं यां च भावनाम् । कृतश्चानेनवैयनःसर्वशंसितुमर्हसि । शतारूपा च यानारीसावित्रीसात्विहोच्यते ॥१० भार्यासाब्रह्मय प्रोक्ताचपोरगांजननोचसा । पुलस्त्याद्यान्मुनीन्सप्तदक्षाधास्तुप्रजापतीत् ।।११ स्वायंभुवादीश्वमनून्सावित्रीसमजीजनत् । धर्मपलीतुतांब्रह्मापुत्रिणीमात्मन:प्रियाम् ॥१२ पतियतामहाभागासुदनाचारहासिनीम् । पथसतीरित्यज्यभार्यामन्यामविदत ॥१३ ब्रह्मदेव कृत यज्ञ वर्णन ] [ १५५ किनाम्नी किसमाचाराकस्यसातनयाविभोः। क्वमादृष्टाहिदेवेनकेनचास्यप्रदर्शिता ॥१४ इम भूमि पर जो ये सब पशु हैं वे सभी /यज्ञ कार्य की पूर्ति करने के कारण से ही इन भगवान के द्वारा सृजित किये गये हैं-ऐसी वेदोक्त श्रुति है ।।८।। इस विषय में मुझे आपके इस भाषण का श्रवणकर बडा भारी कौतुक होता है । जिस कामना को लेकर या जिस भावना को हृदय में रखका जो किया जाता है उसका एक फल होता है ।।९।। इन महापुरुषो ने यज्ञ क्यिा पा सो यह सभी आप मुझे बनाने के योग्य होते हैं । जो शतरूपा मारी थी वह सावित्री कही जाती है ॥१०॥ वह ऋषियों को जन्म देने वाली माता है पुल. स्त्य प्रादि मुनियो को और दक्ष प्रमृति, सान प्रजापतियों को एक स्वायम्भुव प्रादि मनुमो को उसी सावित्री ने जन्म प्रदान किया था। उसे ब्रह्मा की भार्या बनाया गया है । मपनी प्रिय पुत्री उस धर्म पत्निी को ब्रह्मा जी ने जो कि परम पतिव्रता-सुभगा, सुव्रता, सती और चारहामिनी पी, उसका परित्याग कर कैसे दूसरी भार्या को प्राप्त कर लिया था ॥११।१२।१३॥ वह किम नाम वाली थी, उसका प्राचार नया था पौर वह किसकी पुत्री थी? देवदेव ने उसको कहाँ पर देखा या और किसने इनको इसे दिखलाया था ? ॥१४॥ किंरूपासातूदेवेशीदृष्टाचित्तविमोहिनी। यातुदृष्ट्वासदेवेश कामस्यवशमेयिवान् ॥१५ वर्णतोरूपतश्चैवसाविश्यास्त्वविकामुने । यामोहितवतीदेव सर्वलोकेश्वरविभुम् ।।१६ यथागृहीतवान्देवोनारीतालोकसुन्दरीम् । यथाप्रवृत्तीयज्ञोऽमौतथासर्वप्रकीर्तय । १७ तादृष्ट्वाग्रह्मण.पार्वेसावित्रीकिंचकारह । सावित्र्यातुतदाब्रह्माकातुवृत्तिमवर्तत ।।१८ सन्निधौका निवाक्यानिसाविनोब्रह्मणातदा । उक्ताप्युक्तवतीभूय सर्वशसितुमर्हसि ॥१६ किंकृततत्रयुष्माभि.कोपोवायक्षमापिया। यवृततमयदृष्टं यत्तवोक्त मयारिवह ॥२० [ पद्म पुराग विस्तरेण्ड्सर्वाणिकर्माणिपरमेष्टिनः । श्रोतुमिच्छाम्यशेपेरणविधेयंशविधिपरम् ॥२१ वह देवी किस प्रकार के हम-सौ दर्य वाली थी जो कि वित्त को विमो. हित करने वाली देखी गई थी जिमका एकबार ही दर्शन करके यह देवेश्वर काम के वशीभूत हो गये थे ।।१५।। हे मुन ! क्या यह सुन्दर वरणं और रूप लावण्य से सावित्री से भी अधिक थी जिसने समस्त लोको के स्वामी विभु को भी इस प्रकार से मोहित कर लिया था? ॥१६॥ जिस प्रकार से इम देवेश्वर ने उस लोक सुन्दरी का ग्रहण किया था और जिस रीति से उनके द्वारा यह या प्रवृत्त किया गया था यह सब कुछ पार वर्णन करिये ॥१७ । ब्रह्माजी के समीप में प्रहण को हुई उस नारी को देखकर फिर सावित्री ने क्या दिया था मोर सावित्री विषय में उस समय में ब्रह्मा ने किस वृत्ति का वरताव किया था ॥१८॥ उम समय में ब्रह्मा के समीप में सावित्री ने कौन से वाक्य कहे थे और उसके कहने पर फिर उमसे क्या कहा गया था ?-यह सभी कुछ पाप बताने का मनुग्रह कीजिए ॥१६॥ आपने कोप अथवा क्षमा किसलिये किया था और जो कुछ किया था तथा अपका वहाँ जो देखा था एवम् मैंने कहा था-इन सबको पर- मेटी के कर्मों को मैं पूर्ण रूप से श्रवण करने की इच्छा करता हूं तथा विधाता की यज्ञ की विधि भी मुनना चाहता हूँ॥२०॥२१॥ प्रश्नभारोमहानेप त्वयोक्तो ब्रह्मरणश्चय । यथाशक्तिनु वक्ष्यामि थ यतातत्सर यश. ॥२२ सहस्रास्य सहस्राक्ष सहस्रचरणचयम् । सहस्रश्रवण चैव सहस्रकरमव्ययम् ॥२३ सहस्रजिह्व साहस सहस्रपरमप्रभुम् । सहस्रद सहस्रादि सहरभुजमध्ययम् ॥२४ हवन सवन चैव हव्यहोतारमेव च । पात्रानि च पवित्राणि वेदी दीक्षा चरुस वम् ॥२५ स्र क्मोममवभृच्चैव प्रोक्षणी दक्षिणाधनम् । पवयु सामग विप्र सदस्यान्सदनंमद १२६ यादेव वृत यज्ञ वर्णन ] । १५७ - यूपं समित्कुशं दर्वी चमसोलुखलानि च । प्राग्वंशं यज्ञभूमि च होतारं बन्धनंचयत् ।।२७ हस्वान्यतिप्रमाणानिप्रमाणस्थावराणिच । प्रायश्चित्तानिवाजाश्वस्थंडिलानिकुशास्तथा ॥२८ पुलस्त्य मुनि ने कहा-मापने ब्रह्मा के विषय में बहुत से प्रश्नों का बोझा मेरे समक्ष में रख दिया है । मैं अपनी शक्ति के अनुसार बतलाता हूँ उस परम यश का पाप श्रवण करो ॥२२॥ वह सहस्र मुषो मे युक्त है, सहस्त्र क्षेत्र, शहन चरणो का समुदाय, सहस्र श्रवण प्रौर सहस्र प्रव्यय हाय हैं ॥२३॥ उसके सहस्र जिह्वा हैं । वह सहस्रो सहस्र परम प्रभु हैं । सहस्रों के प्रदान करने वाले, महस्रादि तथा सहन्न प्रक्षय भुजाओ वाला ॥२४॥ हवन-सवन- हव्य होना-पवित्र पार–वेदी-दीक्षा-चर-व-सक्-सोम-अब- भृप-प्रोक्षणी-दक्षिणा देने के लिये धन-सामवेद का गान करने वाला विप्र-~सदस्य-सदन-सद-यूर-समिधा--कुश-दी-धमस-उलूखल-- प्राग्वंश-यशभूमि होता और जो बघन है। ये ह्रस्व हैं और प्रत्यधिक प्रमाण वाले तथा स्थावर प्रमाण वाले हैं। प्रायश्रित-बाजस्थएिडल और कुशाएं भी उसी प्रकार के हैं ॥२५ से २८।। मंत्रयज्ञच हवनं बलिभाग भवचमम् । अग्ने भुज होममुजं शुभाचिपमुदायुधम् ॥२६ प्राहुर्वेदविदोविमा योयज्ञ.शाश्वतःप्रभु । यां पृच्छसि महाराजपुण्यादिव्यामिमांकथाम् ॥३० यदर्थभगवान्ब्रह्माभूमौ यज्ञमयाकरोत् । हितार्थसुरमानांलोकानांप्रभवायच ॥३१ ब्रह्माय कपिलश्चैव परमेष्ठी तथैव च । देवा:सप्तर्पयश्चैव त्र्यंबकश्च महायशाः ॥३२ सनत्कुमारश्च महानुभावो मनुमहात्मा भगवान्प्रजापतिः । पुराणदेयोऽथ तथा प्रचक्रे प्रदीप्तवैश्वानरतुल्यतेजाः ॥३३ पुरा कमलजातस्य स्वपतस्तस्यकोटरे । पृष्करे यत्र सभूतादेवापिगरणास्तथा ॥३४ १५८ ] [ पदा-पुरारा एपपोष्करकोनामप्रादुर्भावोगहात्मनः । पुराणं कथ्यतयत्र वेदस्मृतिगुसहितम् ॥३५ मन्त्र, यज्ञ, हवन, वह्निभाग, भव, चम, अग्नि भुज, होम भुज, सुभाचि पौर उदायुध को वेदों के शतावित्रों ने बताया है । जो यज्ञ है वह मानव प्रभु है । हे महाराज ! प्राप जो परम दिव्य एक पुण्यमयी कथा को मुझसे पूछ रहे हैं। भगवान ब्रह्मा ने भू-मण्डल में जिस लिये यह किया था उसका कारण देव- गए और मनुष्यों का हित का सम्पादन तथा लौकी के प्रभव के लिये किया या ॥२६॥३०॥३१॥। इसके अनन्तर ब्रह्मा-कपिल-परमेष्ठी-देवगण- मप- महान यस वाले त्र्यम्बक-महानुभाव सनत्कुमार-~-महात्मा 'मनु-भगवान् प्रजापति मौर प्रदीप्त अग्नि के समान तेज वाले पुरण देव किये गये थे ।।३।। ॥३३॥ पहिले समय में शपन करने वाले कमल से समुत्पार होने पाले के कोटर पुष्कर में देवा तथा ऋषिगण उत्पन्न हुए थे ॥३४।। महान् मारमा पाले का यह पोकर नाम वाला प्रादुर्भाव है जिसमे घेर स्मृति से सुसहित पुराण कहा जाता है ।।३५॥ वराहस्तुश्र तिमुखः प्रादुर्भूतोविरिचिनः । सहायार्थ सुरश्रेष्ठो वाराह रूपमास्थितः ॥३६ विस्तीर्ण पुष्करे कृत्वा तीर्थ कोकामुखं हि तु । वेदपादोयूपदंष्ट्र ऋतुहम्तश्वितोमुखः ॥३७ अग्निजिह्वोद रोमाब्रह्मशीर्पोमहातपाः । महोराभेक्षणोदिव्योवेदागःच तिभूपरणः ॥३८ आज्यनासः स्वतुडःसामघोपस्वनोमहान् । सत्यधर्ममयः थोमान्कर्म विक्रमसत्कृतः ।।३६ प्रायश्चित्तनखोधीरः पशुजानुमंखाकृतिः । उदगावंत्रो होमलिंगो फलवीजमहौषधिः ॥४० वाय्वंतरात्मा में स्थिराप: स्फिक सोमशोणितः । वेदस्कन्धो हविगंधो हव्यकव्यातिवेगवान् ।।४१ प्राग्वशकायोद्य तिमानानादीक्षाभिरचितः । दक्षिणाहृदयोयोगोमहासत्रमयोमहान् ॥४२ ब्रह्मदेव कृत यज्ञ वर्णन 1 [ १५६ । श्रुति के मुस वाला वराह विरञ्चि (ब्रह्मा) से प्रादुर्भूत हुमा था। सुरगण में परम श्रेष्ठ देव ने सहायता करने के लिये ही वाराह रूप को धारण किया था ॥३६॥ पुष्कर में कोका मुख तीर्थ को विस्तार युक्त करके इस रूप मे समास्थिन हुए थे । वेद जिसके चार चरण थे और यूप दाढ़े यो, ऋतु हस्त थे तथा चिनी मुख वाले थे ॥३७॥ अग्नि की जिह्वा-दों के रोम और ब्रह्म के मस्तक वाले महान् तप से युक्त उनका स्वरूप था 1 महीरान ही उनके दोनो नेय थे तथा वेदो के प्रङ्ग श्रुति भूषण थे ॥३८॥ प्राज्य अर्थात् घृत हो उनकी नासिका यो सब तुण्ड था। सामवेद की ध्वनि हो उम वाराह रूपधारी प्रभु का पोप था जो कि अति महान् था। धो से सम्पन्न वाराह भगवान् सत्य और धर्म से परिपूर्ण थे तथा कर्म एवम् विक्रम से सत्कार मुक्त थे ॥३६॥ प्रायश्चिन हो उनके नस थे, घोर उनके पशु जानु थे और मख को माकृति वाले थे। उग्दातन्त्र-दोन लिङ्ग वाले, फल, बोज पोर महोपधि से युक्त वायु की भन्त- रात्मा वाले, मन्त्रों की मस्थियो से युक्त थे । जल ही उनके स्फिक् थे और मोम रुधिर था, वेद सन्ध पे, हवि गन्ध पा मोर हव्य तथा पव्य रूपी वेग से संयुन थे 1॥४०॥४१॥ माग्दश उनका दारीर था, वे युति से युक्त थे तया भनेक प्रकार की दीक्षामो से समवित थे। दक्षिणा उनका हृदय था धाराह भगवान योगी महान सत्र मे परिपूर्ण ये ॥४२॥ उपाकर्मष्टिरुचिरःप्रवर्गावतंभूषणः । छायापत्निसहायोमणिशृङ्गमियोच्छितः ॥४३ सर्वलोकहितात्मायोदंष्ट्रयाम्भुजहारगाम् । ततःस्वस्थानमानीयपृथिवीपृथिवीधरः ॥४४ ततोजगामपृथिवी निर्वागंधारणाद्धरः। एवमादिवराहेण धृत्वाना हिताविना ।।४५ उद्धृता पुष्करेपृथ्वीसागरांयुगतापुरा। मृतः दमदमाभ्यायोदिन्येकोकायुगेस्थितः ॥४६ मादित्ययंसुमि-साध्यमहर्दिवत सह । रविश्वसहायध यारामनि: ms पोर [ पम-पुराण एपपोकरकोनामप्रादुर्भावोमहात्मनः । पुराणं कथ्यतेयत्र वेदस्मृतिसुसहितम् ॥३५ मात्र, यज्ञ, हवन, वह्निमाग, भद, पम, अग्नि मुज, होम भुज, शुभाचि मौर उदायुध को वेदों के ज्ञाता विप्रों ने बताया है । जो यश है वह सात प्रमु है । है महाराज ! पाप जो परम दिव्य एक पुण्यमयी कथा को मुझसे पूछ रहे हैं । भगवान् ग्रह्मा ने भूमण्डल में जिस लिये यह किया था उसका कारण देव- .गण और मनुष्यो का हित का सम्पादन तथा लोको के प्रमव के लिये किया या ॥२६।३०।३१।। इसके पनन्तर ब्रह्मा-कपिल-परमेष्ठी-देवगण-समाप- महान यश वाले व्यत्रक-महानुभाव सनत्कुमार-महात्मा 'मनु-भगवान प्रजापति पोर प्रदीप्त अग्नि के समान तेज वाले पुरण देव किये गये थे ॥३२॥ ॥३३॥ पहिले समय में शयन करने वाले कमल से समुत्पन्न होने वाले के कोटर पुष्कर में देवना तया ऋषिगण उत्पन्न हुए थे ॥३४॥ महान् मात्मा वाले का यह पीकर नाम वाला प्रादुर्भाव है जिसमें वेर स्मृति से सुसहित पुराण कहा जाता है॥३॥ वराहस्तुश्रु तिमुखः प्रादुमूतोविरिचिनः । सहायार्थ सुरश्रेष्ठो वाराह रूपमास्थितः ॥३६ विस्तीर्ण पुष्करे कृत्वा तीर्थ कोकामुखं हि तु । वेदपादोयूपदंष्ट्र कतुहम्तश्चितोमुखः ॥३७ अग्निजिह्वोदभरोमाब्रह्मशीर्पोमहातपाः । अहोराअक्षरणोदिव्योवेदागःथु तिभूषणः ॥३८ याज्यनासः स चतुडःसामघोपस्वनोमहान् । सत्यधर्ममय. श्रीमान्कर्मविक्रमसत्कृतः ।।३६ प्रायश्चित्तनखोघोर: पशुजानुर्मखाकृतिः । उदगावंत्रो होमलिंगो फलबीजमहौषधिः ॥४० वारवंतरात्मा मत्रास्थिराप: स्फिक् सोमशोणित: । वेदस्कन्धो हविगंधो हव्यकव्यातिवेगवान् ।।४१ प्राग्वशकायो तिमानानादीक्षाभिरचितः । दक्षिणाहृदयोयोगीमहासबमयोमहान् ।।४२ ग्रहादेव वृत यज्ञ वर्णन ] [ १५६ थुति के मुख वाला वराह विरचि (ग्रगा) से प्रादुर्भूत हुपा था। सुरगण में परम श्रेष्ठ देव ने सहायता करने के लिये ही वाराह रूप को धारण किया था ॥३६॥ पुष्कर मे कोका मुख तीर्य को विस्तार युक्त करके इस रूम में समास्पित हुए थे । वेद जिसके चार चरण थे और यूप दाढ़े थी, फतु हस्त थे तथा चिनी मुम वाले थे ॥३७, अग्नि को जिह्वा--दों के रोम प्रोर ब्रह्म के मस्तक वाले महान् तप से युक्त उनका स्वरूप था। महोरात्र ही उनके दोनों नेत्र थे वया वेदो के प्रङ्ग श्रुति भूपण थे ॥३८॥ माज्य प्रति घृत हो उनको मापिका यी सब तुण्ड था । सामवेद की ध्वनि हो उस वाराह रूपधारी प्रभु का घोप था जो कि प्रति महान था। श्री से सम्पन्न वाराह भगवान सत्य भोर धर्म से परिपूर्ण पे तथा कर्म एवम् विक्रम से मत्कार युक्त थे ॥३६॥ प्रायश्चित ही उनके नरा , पोर उनसे पशु नानु थे और मख को प्राकृति वाले थे। उदातरहोर लिङ्ग पाले, फल, मोज और मझोपघि से युक्त वायु को मन्त- रारमा पाले, मन्त्रों की पस्थियों से युक्त थे । जल हो उनके स्फिक पे और सोम घिर था, वेद सत्य थे, हवि गन्ध पा मोर हव्य तया कव्य रूपी वेग से संयुत पे ।।४०॥४१॥ माग्दा उनका शारीर पा, वे शुति से युक्त थे तथा अनेक प्रकार को दीक्षामो समचित थे। दक्षिणा उनका हृदय पा पाराइ भगवान् योगी और महान मर में परिपूर्ण ये ।।४।। उपापम टिचिर:प्रबावतंभूषणः । छायापरिनमहायोवेमखियङ्गमिवोच्छितः।।३ मरलोहितात्मायोदष्ट्रयान्भुजहारगाम् । सत.स्वस्थानगानीयपृथिवीपृथिवीधरः ॥४४ सनोजगामपृथिवी निर्वागंधारणाद्धरः। एवमादियराहेण धृत्वाग्राहितायिना ।।५ उना पुरेपृप्लोमागरांयुगतापुरा। ग: समरमान्यांयोदियकोपामुगेरियाः ।।४६ पादिमुभि माय मंगनिदेवनं.गह । दिविश्वमहाया पाराशर [ पच पुराण दिग्निविदिभिः पृथिवीनदीभिः सह सागरैः। चराचरगुरु श्रीमान्ब्रह्माब्रह्मविदांवरः ॥४८ उवाचवचनंकोकामुखतीर्थत्वयाविभो । पालनीयंसदागोप्यंरक्षाकार्यामसेत्विह ॥४८ एवंकरिष्येभगवस्तदाब्रह्माणमुक्तवान् । उवाचतंपुनहाविष्णुदेवंपुरः स्थितम् ।।५० उपाकर्म इष्टि से रुचिर और प्रववित्तं के भूषण वाले थे। घाया रूपिणी पत्नी की सहायता वाले और मणियों को शिखर को भांति भयुनत स्वरूप था ॥४३।। समस्त लोकों की हित-कामना से पूर्ण उस वाराह भगवान् ने अपनी ट्रा से भूमि का उद्धार किया था। इसके प्रान्तर उन वाराह रूपी पृथ्वीधर भगवान ने अपनी दाद पर पृथ्वी को उठाकर अपने स्थान पर उसे ले पाये थे ।४४। इसके पश्चात् हरि के द्वारा धारण करने से वह पृथ्वी भी निर्वाण को प्राप्त हो गई थी। इस तरह से ब्रह्मा के हित करने वाले भगवान् आदि वाराह ने पृथ्वी को दाढ पर धारण किया था पोर ममुद्र के जल के मध्य में गई हुई पृथ्वी का पहिले पुष्कर मे उद्धार किया था । जो शमदमो से युक्त दिव्य कोका मुख में स्थित हो गये थे ॥ ४५।४६ ॥ समस्त प्रादित्य--वसुगरण- साध्य-मरुद्गण और देवों के साथ, रुद्रगण, विश्व के सहायक यक्ष-राक्षस और किन्नरों के सहित, दिशा, विदिशा, पृथिवी, नदी और समस्त सागरी के साथ ब्रह्म के वेत्तानो में परम श्रेष्ठ चर और मचर सबके गुरु श्रीमान ब्रह्माजी ने कोका मुख तीर्थ से यह वचन कहे थे-है विभो ! तुमको मेरे वचनो का पालन करना चाहिए और सदा उनको गोपनीय रखना । यहाँ पर तुमको मख में रक्षा करनी चाहिए ॥४७१४८।४६।। तब उसने ब्रह्माजी से कहा था-~हे भगवन् ! मैं इसी प्रकार से करूंगा। इसके पश्चात् पुनः समक्ष मे संस्थित विष्णुदेव से ब्रह्माजी ने कहा था॥५०॥ त्वं हि मे परमोदेवस्त्वहि मे परमोगुरुः । त्वं हि मेपरमधामशक्रादीना सुरोत्तम ॥५१ उत्फुल्लामलपद्माक्ष शत्रुपक्षक्षयावह । यथायज्ञेन मेध्वसोदानवैश्चविधीयते ॥५२ ब्रह्मदेव कृत यज्ञ वर्णन ] । १६१ यथावयाविधातव्य प्रणतस्यनमोऽस्तुते । भयत्यजस्वदेवेशक्षयनेप्यामिदानवान् ।।५३ येचान्येविनकारीयातुधानास्तथासुराः । घातयिष्याम्यहंसनिस्वस्तितेस्तुपितामह ॥५४ एवमुक्त्वास्थितस्तत्रसाहाय्येन कृतक्षणः । प्रववुश्चशिवावाताः प्रसन्नाश्च दिशोदश ॥५५ सुप्रभारिणवज्योतीपिचद्रं चक्रुः प्रदक्षिणम् । नविग्रहंग्रहाश्चकः प्रसेदुश्चापि सिंघवः ॥५६ हे शक्र प्रादि मे श्रेष्ठ देव ! पाप ही मेरे परम देव हैं भोर पाप हो मेरे परम गुरु हैं । हे देवेश्वर ! प्राप ही मेरे परम धाम है ॥५१॥ हे विकसित विशुद्ध कमल के समान नेत्रो वाले ! माप तो शत्रुप्रो के पक्ष का क्षय कराने वाले हैं । दानवों द्वारा मेरे यश का ध्वम किया जाता है सो पाप कृपया ऐसा करिये जिससे वह न हो मैं पापकी सेवा मे प्रणत हूँ और मेरा पापको नमस्कार है । है देवेश ! माप भय का त्याग कर दीजिए। मैं दानवों का क्षय कर दूंगा ॥५२॥५३॥ और जो अन्य निहनो के करने वाले हैं चाहे वे यातुधान हो या असुर हो, मैं उन सबको मार ड लूगा । हे पितामह ! भापका कल्याण हो ॥५४।। इस प्रकार से कहकर महायता से कृतक्षण अर्थात् परम प्रसन्न होता हुमा Art पर ही स्थित हो गये थे। उस समय में मङ्गलकारी वायु वहन करने लगा मोर दशो दिशाएँ अत्यन्त प्रसन्न दिखलाई देने लगी ।। ५५ ।। माकाश में जितने भी ग्रहनक्षत्र आदि थे वे सब उत्तम प्रभा वाले होकर चन्द्रमा को प्रद- क्षिणा करने लगे थे । ग्रह परस्पर मे विग्रह नहीं करन वाले हो गये तथा मिधु भी प्रसन्न थे ॥५६॥ मीरजस्काभूमिरासीत्सकताहृदयस्त्रयः । जम्मु स्वमार्गस रितोनापिचुभुभुरावा. १५७ प्रासशुभानीद्रियाणिनराणामतरात्मनाम् । महर्पयोगतशोकावेदानुच्चरवाचयन् ॥५८ यशेतस्मिन्हवि: पाकेशिवपासश्चपावताः । प्रवृत्तधर्मसद्वत्तलोकामुदितमानसाः ।।५६ [ पद्म पुराण । विष्णो:सत्यप्रतिशस्यत्वारिनिधनागिरः । ततोदेवा:समायातादानवाराक्षसंसह ॥६. भूतप्रेतपिशाचाश्चसर्वतत्रागता:कमात् । गन्धर्वाप्सरसश्चचनामाविद्याधरागणाः ॥६१ वानस्पत्याश्वोषधयोयच्चेहयचनेहति । ब्रह्मादेशान्मारुतेनमानीताः सर्वतोदिशः १६२ यज्ञपर्वतमासाद्यदक्षिणाममितोदिशम् । सुराउत्तरतः सर्वे मर्यादापर्वते स्थिताः ॥६३ भूमि रज से रहित हो गई थी। तीनों हादी कला से युक्त हो गये थे। समस्त नदिया अपने सही मार्ग में रहने लगी और सागर सोम से रहित होग • पे॥५७॥ मनुष्यों को अन्तरामानों को सव इन्द्रियां शुभ हो गई थी। जो महपि सोग थे उनके सब सोक न हो गये थे और वे वेदों का उच्च स्वर से धाचन कर रहे थे ॥५८॥ उस पवित्र यज्ञ में हवि कल्याणकारी या एवं पावक मङ्गल करने वाले थे। जितने भी लोक घे वे मब धर्म का गौर सदवृत्त में प्रवृत्ति वाले होकर प्रसन्न मन छाले थे ॥५६॥ सत्य प्रतिज्ञा वाले भगवान विमण की शत्रुओं के निधन कर देने वाली पाणी यवरण कर फिर राक्षमों के सहित दानवगण मौर देवता वह मा गये ॥६०॥ भूत-प्रेत मोर पिशाप सभी प्रम से वहाँ पर पा गये। गापवं, प्रमराए, नाग; विद्यापरगण, पनादिया और प्रोधियो जो यहाँ यो मोर यहाँ नहीं भी पो उनको बहला के बादेश में मान ने सम दिशापों से यहां ला दिया था ॥६१६२॥ पज होने वाले परत पा दक्षिण दिशा में सब प्रोर से मुरगण उतर दिशा के सभी उस मादा परत पर स्थित हो गये पे ॥६॥ गंपर्वापारसश्चयमुनयो वेदपारगाः। पश्चिमांदिशमास्यायस्थितास्तत्रमहामती ॥६४ सवदेवनिपायानदानवाचासुरागणा: । ममपंपृष्न कृत्वासप्रीतास्तेपरस्परम् ॥६५ प्रापोन्पपंचरल्सयेशुष पन्मापास्तथा। वषयो प्रापयनिय दिजादेवयंयस्तया ६६ प्रह्मदेव कृत या वरगंन । [ १६३ राजयो मुख्यतमास्ममायातास्सम तन । पतमश्च सरोऽप्यन बतौ याज्यो भविष्यति ॥६७ पसव पक्षिणश्चेवतमायातादिदृक्षवः । ब्राह्मणाभोगनुकामाश्च सर्येवर्णानुपूर्वशः ।।६८ स्वयचवरुपोरत्नदक्षश्चान्नस्वयददौ । आगत्यवरुणोलोकात्मवंचान्नस्वतोऽपचत् ॥६६ वायुभंक्षविकाराचरसपाचीदिवापर. । अन्नपारनत्सोमोमनिदाताबृहस्पति ७० धनदान धनाध्यक्षोवम्मारिणविविधानिच । सरस्वती नदाध्यक्षोगलादेवीसनमंदा ७१ उस महान् प्रतु में गन्धव-मसरोगण और वेद के पारगामी मुनि लोग वहाँ पर पश्चिम दिशा में पास्पित होर ठहर गये पे ॥१४॥ ममरत देवो के निकाय, दानव और प्रमुरगण पोछे से ममपं कर वे सर मापम में सुप्रमग्न पे ॥६५॥ सब लोग ऋषिगण प्रौर प्रहमणों की গুধা उनको परिचर्या करते थे। यहां पर ऋपि-महापि-शि-देवपि पौर राजपि ओ मुग्यतम ये वे सभी एप माप मा पे यहा पर कौन सा सराय में यजन परने योप होगा ॥६६६७॥ पशु और पक्षी भी देयने पोया गते हुए पहा पर आये थे। भोजन करने को मना पास माहा मोर सभी व वाले लोग प्रम मे वहा उपस्थित हुए पे॥६॥ वरुण देव ने स्वय यही उपित होकर न पापा ने स्वय बार मन मषित frया पारण ने प्रपने तो मे मार पर मन को स्वयं हो पाया था ॥६॥ायु मे भाविकोपने वासराना रिपापा पोर दिपार मापापन परने पापा हमापा । पान का पालन करने वाना मोम पा मोर महिनी प्रदान ने कार गुरगुरु वृहस्पति 13.1 पापा मार पना दान रमा पा और पनर र लोको मरम्पती प्रदान कर रही थी। मम ममगादेवी समर मा महिलांनी पक्ष पोam देवानामनिपीनाथपिभिनसमागमे । बमोक्षिणेपाय पितयितु गनातन IS२ .

१६४, ।
[पुर ए
वामपार्वेस्थितोरुद्रःपिनाकीवरद:प्रभुः।
ऋत्विजांचापिवरणकृतंतत्रमहात्मना ।।७३
भृग्रहोंतावृतस्तत्रपुलस्त्योऽध्वयुं सत्तमः ।
तत्रोद्गातामरीचिस्तुब्रह्मावनारदःकृतः ॥७४
सनत्कुमारादयो ये सदस्यास्तत्रतेऽभवन् ।
प्रजापतयो दक्षाद्या वर्णा ब्राह्मणपूर्वका. १७५
ब्रह्मरणश्चसमोपेतु कृता ऋत्विस्विकाल्पना ।
वस्राभरणंयुक्ताः कृता वंश्रवणेन ते ११७६
अंगुलीयः सकटक मुकुट पिताद्विजाः ।
चत्वारो द्वौ दशान्येच ततस्ते पोडशत्विजः ।।७७
ब्रह्मरणा पूजिता:सर्वे प्रणिपातपुरःमरम् ।
अनुग्राह्यो भवद्भिस्तु सर्वेरस्मिन्क्रताविह !'७८
यहाँ उस महामख में देवगण की सनिधि में और ऋषिगरण साथ
समागम में ब्रह्माजी के दक्षिण पार्श्व मे सनातन विष्णु स्थित थे।७२।।
ब्रह्मा के बाये पाव मे पिनाक को धारण करने वाले वरदाता प्रभु रुद्र सस्थित
हुए थे। वहां पर महान् प्रात्मा वाले ने ऋत्विजो का वरण किया था ॥७३॥
होता के पद पर वहां यज्ञ में भृगु ऋषि का वरण किया गया था और पुरस्त्य
का वरण उत्तम प्रध्वयु के पद पर किण गया था । मरीचि ऋषि उस यज्ञ में
उग्दाता थे तथा देवपि नारद ब्रह्मा बनाये गये थे। ७४॥ सनत्कुमार शादिको
मन्य थे ये सब उस यज्ञ में सदस्य हुए थे। प्रजापति दक्ष प्रादि जो थे हमण
पूर्वक वर्ण थे ॥७५ । ब्रह्मा के समीप में ऋपित्वजों की विशेष कल्पना की गई
थी। वयवरण (कुवेर) ने उन सबको वस्त्र घोर
(पणों से समन्वित किया ।
था ॥७६|| अंगूठो-कडे थोर मुकुट मादि मामरणों से द्विजो को विभूषित
किया गया था। इस तरह से चार-दो और दश कुल सोलह स्विज समय
में वरण किये गये थे ॥७७। इन सबका पूजन प्रणिपात के सहित ब्रह्माजी के
द्वारा किया गया था। ब्रह्मा ने प्रार्थना की थी कि माप को इस यज्ञ में मुझे
पूर्ण रूप से अनुग्रहीत करना चाहिए ॥७॥

ब्रह्म देव कृत यज्ञ वर्णन । [ १६५ मुमत्कृताचपत्नी सा सावित्री व वरांगना । प्रध्वयु णाममाहूता एहि देवि त्वरान्विता LIVE उत्थिनाश्चाग्नगः मर्वेदीक्षाकाल उपागतः । उपग्रासाकार्यकरघोस्वभावेन नागता in८० सावित्रीव्याकुलादेवप्रसक्तागृहकर्मणि । सरुयोनाम्यागतायावत्तावन्नागमनं मम १८१ एवमुक्तोऽस्मि वै देव कालश्चाप्य तिवत्तंते । यत्तेऽधरुचितं तावत्तत्कुरुष्व पितामह ॥२ एवमुक्तस्तदा ब्रह्मा किचित्कोपममन्वितः । पत्नी चान्यां मदर्थे वै शीघ्र शक इहानय ०३ यथा प्रवर्तते यनःकालहीनो नजायने । तथागीघ्र विधरस्वत्वं नारीकांचिदुपानय ।।८४ यावद्यज्ञसमाप्तिवर्णत्वमाकृयामनः । भूयोऽपिता प्रमोक्ष्यामि समाप्तोतुक्रतोरिह ।।८५ यह वर अङ्गो बाली मावित्री पत्नी उस यज्ञ मे भली-भाति मस्कार या की गई थी। मध्वयु ने उसे बुलाया था कि हे देवि ! पाप तीघ्रता से यहा आइपे । ये सम्पूरणं पग्नि ममुस्थित हो गई है और अब दीक्षा का समय उपस्थित हो गया है । वह कार्यों के करने में बहुत मन हो रही थी भोर स्त्री- जन स्वभावश वहां नहीं आई पी ॥७६८०॥ हे देव ! सावित्री देवी इस 'समा में पास है और यह के कार्यों में सलग्न है । उनने कहा है कि इस "सर मेरो सियो नही माती है तब तक मेरा प्रागमन नही हो सकता है ॥८॥ हे देच ! मुझमे दम प्रकार से कहा गया है और अब समय का पति- 'यता हो रहा है । हे पितामह ! माज प्रब जो भी कुछ पाएको रुचे वही इस समय कीजिए ।२॥ इस तरह से जब ब्रह्मात्री से कहा गया तो उनको कुछ कोष उत्पन्न हो गया था । ब्रह्माजी ने कोप से युक्त होकर इन्द्रदेव में वहा- ह इन्द्रदेव ! मेरे विप इस ममय में या कार्य सम्पन्न करने के लिये दूसरी कोई पनी को शीघ्र ही व्यवस्था कये। मे अभी यहां से पापा 11 ८३ ॥ । - १६६ ॥ [ पद्म पुराण जिस तरह भी यज्ञ का कार्य प्रवृत्त हो जावे और समय की हानि होने से उसमे कोई होनता उत्पन्न न हो। तुम उसी प्रकार से भत्यात शोधता करो और किसी नारी को यहां ले पामो || जब तक मेरे इस यज्ञ की समाधि हो मैं तेरा वरण करता हूं-इसका कोई भी विचार मन मे मत करना । फिर इस यज्ञ की समाप्ति हो जाने पर उसका मोक्ष कर दूगा ॥१५॥ एवमुक्तस्तदाशनोगत्वासवंधरातलम् । खियोदृष्टास्तुयास्तेनसर्वास्तास्सपरिग्रहा: ॥८६ आभीरकन्या रूपान्या सुनासा चारुलोचना । नदेवीनचगन्धर्वीनासुरीनचपन्नगी ।।८७ नचास्ति तादृशी कन्या यादशीसा रागना । ददर्शतासुचावंगीश्रियदेवीमिवापराम् ।।८८ सक्षिपन्तीमनोवृत्तिविभव रूपसपदा । यद्यत्तुवस्तुसौंदर्याद्विशिष्ट लम्पते क्वचित् ।।८६ तत्तच्छरीरसलग्नतन्वग्या ददृशे वरम् । तां दृष्ट्वा चिंतयामास यद्यपा कन्यका भवेत् ॥१० तन्मत्त कृतपुण्योन्योवदेवोमुविविद्यते। योपिद्रत्नमिदसेयंसद्धाग्याया पितामहः ।।११ इस तरह से जब इन्द्र से कहा गया था तो देवराज उस समय में सम्पूर्ण धरातल में पूमा था। उसने को भी लियां देखी थी वे सभी परिग्रह से मुक्त हो मिली थी ॥८६॥ एक आभीर (महोर) को कन्या मिलो पो जो रूप- लावण्य से सम्पन्न पो। उसकी नासिका बहुत सुन्दर पी पौर नेत्र भी उसके बहुत सुन्दर एवम् मनोरप थे। उस तरह की कोई भी देरी-गन्धर्वी~आसुरी मौर पन्नगी मही पी11८७॥ जैसी परम सुन्दरो वह भाभोर पन्मा थी वैसी मान्य कोई भी सुन्दरी नहीं थी। इन्द्रदेव ने मनोहर प्रों वानी उस कन्या को दूसरी लक्ष्मी देवी के सदृश हो देखा था। रूप-सौन्दर्य को सम्पत्ति से मनोवृत्ति के वैभव को सक्षिप्त करती हुई वह कन्या थी। जो भी वस्तु सौन्दर्य विशेषता वाली हो वह रहीं प्राण को जाया करती है | उसके शरीर -

ब्रह्मदेव कृत यज वर्णन )
[ १६०
मे मलान वही वही सवगी का परम श्रेष्ठ देखा था । उस कन्या को देखकर
इन्द्र में सोचा था कि यह कन्या ब्रह्मा की पत्नी हो सकती है ॥६॥ हम भूमि
मे मुझमे पधिक अन्य कोई भी पुष्प वाला नहीं है। यह स्त्रियो म त के
समान है । पितामह ब्रह्मामी के साथ सौभाग्य प्राप्त करने क योग्य यही एक
मारी है ।
कासि कस्य कुतश्चत्वमागतासुभ्र कथ्यताम् ।
एकाकिनी किमर्थचवीथीमध्येतुतिष्ठसि ॥२
गोपकन्यावह वीर विक्रीणामीह गोरसम् ।
नवनीतमिद शुद्ध दधि चेद विमण्डकम् ॥६३
दना चवार तक्रण रसेनापि परतप ।
मार्स रेससि सद्गहि प्रयहीद रश्शेपिसनम Mr
एवमुक्तस्तदा शको गृहीत्वा ता करे दृहम् ।
अनयत्ता विशालाक्षी यम ब्रह्माम्यवस्थितः ॥
नीयमाना तु सा तेन कोसन्ती पितृमातरो।
हातातमातहभिातनयस्येप नरो वलात् ।।६६
इत्यमाभाष्यमाणस्तु तया शकोऽनयच्च ताम् ।
ब्रह्मण पुरत स्थाप्यप्राहास्यार्थेमयाबले ।
पानीता सि विशालाक्षि माशुचोवरवाणिपि।
गोपान्याचत दृष्ट्वागौरवपमहाद्य तिम् ॥६७
फमलाक्षसुवास पुडकिनिभेक्षणम् ।
तप्तकाचनसद्भितिसदृशापीनवासम् ॥६८
मत्तेभहस्तवृत्तोरुरतोत्तुंगनखस्विषम् ।
प्राप्तसाऽमन्यतास्मानमन्मथस्येपुगोवरे ICE
तत्प्राप्तिहेतुकधिया गतचित्तेवरक्ष्यते ।
प्रभुत्वमात्मनोदानेगोपकन्याऽयमन्यत ॥१००
देवराज इन्द्र ने उस बराङ्गना पूछा-हे मुभ्र ! पाप कोन है,
विरोभारमजा है और कहाँ मे बाई है-रह य .साइये । पार यहाँ बीमो के

१५. ]
। पय-पुराण
थो ॥१०६॥ उदुम्बर (गुलर) ३ दश से युक्त तथा मृगवर्म से सात बह्माजी
उस समय में उस महान् पश्वर में अपने ही अद्भुत तेज की महिमा से परम
शोमित हो रहे थे ।।१०७। तब तो वेदो के पूर्ण वेता ब्राह्मणो के द्वारा उस
-भूमि में होन का कार्य भारभ कर दिया गया था। भृगु महपि के सहित सब
स्विजो ने उसी समय वेद में जो भी कम बनाया गया है वह प्रारम्भ कर
दिया था। उस सयम में जो यह महान यज प्रारम्भ हुमा पा वह
युग पर्यन्त पुष्कर क्षेत्र मे हुआ था |
॥ नन्दा धेनु -व्याघ्र उपाख्यान ।।
प्रथ देवव्रतःप्राह किमन्यासा सरिद्वरा ।
एतन्मे कौतुक ब्रह्मन्नदाशब्दा सरस्वती ॥१
यथाभूता येन कृता कारणेन सरिद्वरा।
एवमुक्त पुलस्त्य स भीष्मायतत्पुरातनम् ॥२
श्राख्यातुमुपचकाम नन्दा नाम यतस्स्मृता।
क्षत्ननतघरो नित्यमासीद्राजा प्रभजनः ॥३
प्रवृत्तोऽऽसौ मृगान्हतु वने तस्मिन्महावल. ।
स ददर्श ततस्तस्मिन्मृगीगुल्मातरेस्थिताम् ॥४
मार्गणेन सुतीपरणेन ता विव्याध पुरोगताम् ।
सा विलोक्य दिश: सर्वास्त दृष्ट्वा शरपाणिनम् ॥५
माह कि ते कृत मूढ त्वयैतत्वाम दुष्करम् ।
स्तन तावत्प्रयच्छामि सुतस्याधोमुखो स्थिता ॥६
मांसलोभेन विवाह तरसा ह्यकुतोभया ।
पिवत गुप्तवत्स च गूढमथुनमागतम् ॥७
एवविध मृग राजनहन्यात्प्राइमया श्रुतम् ।
स्तन तु तनयस्यास्य प्रयच्छनी स्वपाहता ।
यौमूाजी ने कहा- इसके अनन्तर देव वन ने कहा-वह 4 मार
तापो में परम श्रेष्ठ क्या है ? हे पान । मेरे हृदय में यह बड़ा कौतु है।

नन्दा धेनु- व्याघ्र उपाध्यान -- नन्दा शब्द वाली सरस्वती जिस प्रकार से मौर जिस कारण से सरिता की गई थी-यह सब कृपाकर मुझे बतलाइये । इस तरह से पूछे जाने पर पुलस्य मुनि ने भीष्म के लिये यह पुराना इतिहास बताने का मारम्भ किया था कि जिस कारण से नया यह नाम पड़ा था। पहिले एक क्षत्रियों के प्रत को धारण करने वाला प्रभजन नामधारी राजा हुप्रा पा ॥१२॥३॥ महान बलशालो यह राजा उम वन में मृगो का हनन करने के लिये प्रवृत्त हुमा था। उमने वहाँ उस वन मे झाडियों के बीच मे बैठी हुई हि नो को देखा था ॥४॥ मामने आई हई उम हिरनी को देखकर उस रारा भजन में अपने एक मस्यत तीक्षण वारा से उसे बिद्ध कर दिया था। उम हिरनी ने समस्त दिशापो को देखते हुए हाय में धरों को धारण करने वाले उस राजा को देखा था ॥५॥ वह हिरनी उससे बोली-मरे मून ! तूने यह कया दुष्कर कर्म कर डाला है । मैं नीचे की मोर मुख करके इस समय में अपने पुत्र को स्तन पिला रही थी ॥६॥तूने मुझे मांस के लोभ से विद्ध कर दिया है। मैं तो इस समय मे निर्भय होकर स्तन का पान करा रही थी। छिपकर मेरे समीप मे स्थित स्तन का पान करने वाले गुप्त वरस का मैं पोपण कर रही थी॥७॥ इस प्रकार की स्थिति में रहने वाले मृग को नही मारना चाहिए। हे राजन! मैंन ऐसा पहिले सुना था। मैं बिस समय में अपने पुत्र को स्तन का पान परा रहा थी उसी दशा मे तूने मुझे मार डाला है ।। बाणेनाशनिकल्पेन निर्दोपा वनमागता। तस्मात्त्वमपि दुवुद्ध ज्यादत्वमवाप्स्यसि ।। वनेऽस्मिन्कटकाकीणं व्याघ्ररूपं त्वमाप्नुहि । शापप्रदानं श्रुत्वव स राजा पुरतःस्थितः ।।१० प्रोवाच प्राजलिभूत्वा ता मृगी व्यथितेंद्रियः । स्तन तु तनयस्येह प्रयच्छती न मे मना ॥११ प्रज्ञानेत हता भद्र प्रमोद मुसमाधिना। व्याघ्ररूपमह त्यक्त्वाप्राप्स्यामि मानुष कदा ॥१२ एवविधस्य शापस्य विमोक्षं गस में मृगि । एवमुक्त मृगी तस्य प्रोवाच वनन शुभम् ॥१३

[ पग-पुराण
थो १०६॥ उदुम्बर (गूला) के दए से युक्त तथा मृगचर्म से मान ग्रह्माजी
उस समय में उस महान् प्राबर में अपने ही अद्भुत तेज को महिमा से परम
शोभित हो रहे थे ॥१०॥ तब तो वैक्षों के पूर्ण वेता ब्राह्मणों के द्वारा उस
यम भूमि में होत्र का कार्य जारंम कर दिया गया था । भृगु महपि के सहित सब
भूविजों में उसी समय वेद में जो भी कम पाया गया है यह प्रारम्भ कर
दिया था। उस समन में जो यह महाग या प्रारम्भ हुआ पा वह दो सदस
युग पर्यत पुष्कर क्षेत्र मे हुमा पा॥१८
॥ नन्दा धेनु-
-~व्याघ्र उपाख्यान ॥
अथ देवयतःप्राह किमन्यासा सरिरा।
एतन्मे कौतुक बहान्नदाशब्दा सरस्वती ॥१
यथाभूता येन कृता कारणेन सरिद्वारा।
एवमुक्त पुलस्त्य स भीष्मायतत्पुरातनम् ॥२
प्राख्यातुमुपचकाम नन्दा नाम यतस्स्मृता।
क्षत्रवतघरो नित्यमासीद्राजा प्रभजनः ।।३
प्रवृत्तोऽऽसौ मृगान्हतु वने तस्मिन्महाबलः ।
स ददर्श ततस्तस्मिन्मृगीगुल्मातरेस्थिताम् ॥४
मार्गरणेन सुतीपरणेन ता विव्याध पुरोगताम् ।
सा विलोक्य दिश: सर्वास्तं दृष्ट्वा शरपाणिनम् ॥५
माह कि ते कृत मूढ त्वयैतत्कर्म दुष्करम् ।
स्तन तावत्प्रयच्छामि सुतस्याधोमुखी स्थिता ॥६
मांसलोमैन विद्धाह तरसा ह्यकुतोमया।
पिवत गुप्तवत्स व गूढमथुनमागतम् १७
एवविध मृग राजन्नहन्याप्राङ्मया श्रुतम् ।
स्तन त तनयस्यास्य प्रयच्छनी वयाहता ॥
श्रीमूजी ने कहा-इसके मनन्तर देव ने कहा-वह अन्य मरि
तामों में परम श्रेष्ठ क्या है ? हे मान ! मेरे हृदय में यह बड़ा कौतुक है।

नन्दा धेनु-व्याघ्र उपाख्यान ] [ १७१ नन्दा शब्द वाली सरस्वती जिस प्रकार से मोर जिस कारण से ये सरिता की गई थी -यह सब कृपाकर मुझे बतलाइये । इस तरह से पूछे जाने पर पुलस्त्य मुनि ने भीष्म के लिये यह पुराना इतिहास बताने का प्रारम्भ किया था कि जिस कारण से नन्दा यह नाम पड़ा था। पहिले एक क्षत्रियो के प्रत को धारण करने वाला प्रभजन नामधारी राजा हुमा पा ॥१।२।३।) महान बलशाली यह राजा उस वन में मृगो का हनन करन के लिये प्रवृत्त हुमा था। उमने यहाँ उस वन मे माहियो के बीच में बैठी हुई हि नो को देखा था ॥४॥ मामने आई हुई उस हिरनी को देखकर उम राजा प्रभजन न अपन एक अत्यंत तीक्ष्ण वारण से उसे बिद्ध कर दिया था। उम हिरनी ने समस्त दिशाम्रो को देखते हुए हाय मे शरों को धारण करने वाले उस राजा को देखा था ॥५॥ वह हिरनी उससे बोली-अरे मूढ । तुन यह क्या दुकर कम कर डाला है । मैं नीचे को प्रोर मुख करके इस समय में अपने पुत्र को स्तन पिला रही थी ॥६।। तूने मुझे मांस के लोभ से विद्ध कर दिया है। मैं तो इस समय मै निर्भय होकर स्तन का पान करा रही थी। दिपकर मेरे समीप मे स्थित स्तन का पान करने वाले गुप्त वरस का मैं पोपण कर रही थी।। ७॥ इस प्रकार की स्थिति में रहने वाले मृग को नहीं मारना चाहिए । हे राउन् । मैंने ऐसा पहिले सुना था। मैं जिस समय मे अपने पुत्र को स्तन का पान करा रहा थी उमी दशा मे तूने मुझे मार डाला है ।।८।। बाणेनाशनिकल्पेन निदोपा वनमागता। तस्मात्त्वमपि दुर्बुद्ध ध्यादत्वमवाप्स्यसि । वनेऽस्मिन्कटकाकीर्ण व्याघ्ररूप त्वमाप्नुहि । पापप्रदान श्रुत्वव स राजा पुरतःस्थित. ॥१० प्रोवाच प्रालि त्या ता मृगी व्यथितेंद्रियः । स्तन तु तनयस्येह प्रयच्छनी न मे मना ।।११ प्रज्ञानेन हता भद्रे प्रमोद सुसमाधिना । व्याघ्ररूपमह त्यक्त्वाप्राप्स्यामि मानुष कदा ॥१२ एवविधस्य शापस्य विमोक्ष स मे मृगि। एवमुक्त मृगौ तस्य प्रोवाच ययन शुभम् ।।१३ [ पन पुराण राजन्नन्दशताते तु शापस्यागतया गया। नदया सह सवादमासाद्यातो भविष्यति ॥१४ दोप रहित मुझको जबकि मैं इस वन म यहाँ मा गई पी ने वज के सुल्य तोकग व ण स मेरा यष कर दिया है । इसलिय हे दुष्ट युद्धि वाले । मैं यह शाप देती हूँ कि तू राक्षमस्व को प्राप्त हो जायगा । इगो वन मे जोकि पारो मोर से काटा स घिरा हुआ है तू व्याघ्र का रूप प्राप्त करेगा। इस तरह से सामने स्थित उम राजा न हिरनी क द्वारा दिये हुए शाप का अस किया था॥१०॥ राजा ध्यथित इन्द्रियो वाला होकर अपने दोनों हाथों को जोडते हुए उस मृगी से बोला-मुझे यह ज्ञान नहीं था कि तू अपने पुत्र को स्तन पिला रही थी ।। ११ ।। है भट्टै । मैंने तुम्हारा हनन प्रज्ञान स हो किया है । अब तुम मुझ पर प्रसन्न होकर मुझे यह बतलादो कि ध्याघ्र के रूप को त्य ग कर फिर मैं मनुष्य का शरीर कष प्राप्त करूंगा ॥१२॥ हे मृग । तुमने जो मुझे यह शाप दिया है उमस मेरा छुटकारा प हा जायगा~यह मुझे बत लादो । राजा क इस प्रकार से कहने पर उस हिरनी न शुम वचन बाले ।।१३।। हे राजन् । एक सौ वर्ष के पश्चत् माई हुई गो मन्दा क स थ सम्बाद प्रास करके फिर इस शाप का प्रान हो जायगा ॥१४॥ मृग्योक्त वचने राजा व्याघ्र एवाभवत्तदा । नखदष्ट्रायुधोपेतो व्यत्ररूपोऽतिमीपण ॥१५ तत्रासो भक्षयन्नास्तेमृगान्हत्वा चतुष्पद । द्विपदानपि तत्रस्थान्कालेन मयोजितान् ।।१६ एव तत्र वने तस्य सवत्सरशत गतम् । आत्मान निदमानस्य मृगमासानि खादत ॥१७ पदाहं मानुष भाव गमिष्यामीदृश पुनः। कुत्सित न करिष्यामि वियोनिकरण महद ॥१८ कुर्वता मामलोभेन मृगया परिघावता । आपदासहित प्राप्त मानुपाणा भयावहम् ।।१६ दर्शन दुखद मह्य भूगाणा मानुपै सह । पापेन पापता नीतो ह्यापेऽपि सताकुले ।।२० - नन्दा धेनु-व्याघ्र उपापान ] [ १७३ उत्पन्नो विकृति नीतः पश्य कालस्य पर्ययम् । तस्मान्मे सुकृतं नास्ति हिंसाप्येकं विहिता ॥२१ तया तु प्राप्यते दुःखं न च मोक्षो भविष्यति । कथं मे भविता मोक्षः कथं सत्या मृगी भवेत् ॥२२ मृगी के द्वारा यह वचन कहे जाने पर उसी समय राजा प्रभजन व्याघ्र हो गया था जिसके बडे तीक्ष्ण नख और दाढ़ों के प्रायुध थे। वह महान् भीषण व्याघ्र के स्वरूप वाला हो गया था ॥१३॥ यह व्याघ्र वहाँ उस वन में चौपायों पोर हिरनो को मारकर भक्षण करता हुप्रा रहता था। वहीं पर स्थित मोर क्रम से योजित द्विपदों को भी समय पर भक्षण कर लेता था ॥१६।। इस प्रकार से उम वन में रहते हुए उसके एक सौ वर्ष व्यतीत होगये थे । मृगों के मांस खाते हुए वह अपने पापको बहुत ही बुरा समझता था ॥१७॥ वह मन में सोचता था कि मैं फिर किस समय मनुष्यता को प्राय पलंगा? अब भविष्य में फिर ऐसा बुरा कोई भी काम नहीं करूंगा जो कि दूसरी कुत्सित योनि प्रदान करने वाला होवे ॥१८॥ मांस के लोभ से परिधावन करते हुए शिकार करने वाले मैंने मनुष्यों को भय देने वाला प्रापत्ति से परिपूर्ण यह जन्म प्राप्त किया है ||१६|| अब तो मनुष्यों के साथ मृगो का दर्शन भी मुझे दु:खद होगया है । पाप रहित सत्पुरुषों के कुन में भी रहते हुए मैंने मपने ही किये हुए पाप कम से इस पाप योनि को प्राप्त किया है ।।२०। सत्कुल मे समुत्पप्न होकर भी मैं इस तरह की विकृति को प्राप्त हो गया हूँ यह कमा पाल का विपर्यय है। इससे यह ज्ञात होता है कि मेरा एक भी सुकृत नहीं है और यह विशेष निन्दित हिंसा है ॥२१॥ उसी हिंसा से मुझे यह दुःख प्राप्त होता है मौर मेरा मोक्ष नहीं होगा। मेरा मोक्ष किस प्रकार से होगा भोर यह हिरनी को वात कब किस प्रकार से मय होगी ॥२२॥ गते वर्षशते तस्य वसतस्तद्वने तदा । प्रायातं गोकुलं काले यवसोदककारणात् ।।२३ गोवाटवाटीसंस्थानं तत्तभ समवस्थितम् । वनोपकण्ठे मंथानरवेणापूरितं च यत् ।।२४ १७४ । { মশাই क्षीयैर्गोप:समाकोरणं पादपरपि तद्वनम् । निशि वंशरवोपेतं गोपीनां च शुभप्रदम् ॥९५ एवं तु वसतस्तस्य सर्जूरवनसंसदि । हृष्टा तुष्टा च पुष्टा च नदा वै नाम नामतः ॥२६ गोमण्डलस्य सा मुख्या हसवर्णा घटस्रवा। दीघंघोणा विभक्तागी वधुरागी तनुत्वचा ॥२७ नीलकण्ठा शुभग्रीवा घण्टाली मधुरस्वना । सा च यूथस्य सर्वस्य पुरश्चरति निर्भया ॥२८ घासस्थानं चरेच्छन्नं गत्वका च यथासुखम् । यथेष्टकामा सुरभिश्छन्न चरति वं तृणम् ।।२९ उस समय में उस वन में निवास करते हुए उसको एक सौ वर्ष व्यतीत होगये थे। समय पर यवस और उदक के कारण से वहा गोकुल मापा था ॥२३॥ वहाँ पर गो वाट और वाटी का सस्थान समवस्थित हो गया था जो कि वन के समीप में मन्थर को ध्वनि से परिपूर्ण हो गया था ।।२४। यह धन मतवाले गोपों और पादपो से समाकीरणं हो रहा था। रात्रि के समय में गोपियों की वशी की ध्वनि से यह वन बहुत ही शुभ प्रद होगया था ॥२५।। उस खजूरो के वन रूपी संसद में इस प्रकार से उसका निवास करते हुए परम प्रसन्न, सतुष्ट और परिपुष्ट गम से नन्दा नाम वाली धेनु वहाँ पर रहती थी ।।२६।। वह नन्दा धेनु उस सम्पूर्ण गो-मण्डल मे प्रधान यो । उसका वर्ण इसके समान पा तथा वह घटस्तवा यो अर्थात् उसके ऐन पद की भाति सवा करने वाले थे । उसकी नासिका लम्बी थी। उस समस्त प्रजावयव ठीक तरह से विभक्त थे तथा उसके सभी पङ्ग उतार-चढाव के भनुसार सुडोल थे। उमकी त्वचा पतली यो॥२७॥ वह नन्दा नीले कण्ठ वाली थी ! उसकी गरदन बहुत शुभ थी, यह भएटाली मोर मधुर ध्वनि वाली थी। वह सर्वदा गायो के यूथ के भागे निडर होकर चला करती थी ॥२८॥ जहाँ पर पास होती थी वहाँ चुपचाप मकेली जाकर सुखपूर्वक घास को चरा करती थी। यथेष्ट कामना वाली वह सुरभि गुप्त रूप से तृण को खाया करती थी ॥२६॥ - 1

नन्दा धेनु - व्याघ्र उपाख्यान ]
[ १७५
रोहितो नाम तत्रान्यः पर्वतः सरितस्तटे ।
अनेककन्दरदरीगुहासत्त्वनिपेवित ॥३०
तस्य पूर्वोत्तरे भागे घोरे तृणसमाकुले ।
सङ्कटे विपमे दुर्गे भैरवे लोमहपणे ॥३१
मृगसिंहसमाकीणे बहुश्वापदसेविते ।
वल्लीवृक्षादिगहने शिवाशतनिनादिते ॥३२
दुर्गेऽस्मिन्वसते रौद्र: कामरूपी भयंकरः ।
द्वीपी शोणितदिग्धांसो घोरदष्ट्रा नखायुधः ॥३३
नंदो नाम स धर्मात्मा स च गोपीहिते रतः ।
अच्छिन्नाग्रस्तृगर्दीघर्गोधन परिरक्षति ॥३४
तस्य यूथपरिभ्रष्टा सा नंदा तृणलिप्सया ।
चरती व्याघ्रपुरतः सा धेनुः प्रत्युपस्थिता ॥३५
वहाँ पर रोहित नाम वाला सरिता के तट पर एक अन्य पर्वत था
जिसमे बहुत-सी गुफा मोर कन्दराएं थीं जिनमे अनेक प्रकार के जीव-जन्तु रहा
करते थे ॥३०॥ उस पर्वत के पूर्वोत्तर भाग में एक दुर्ग था जो बडा हो सङ्कट
पूर्ण-घोर-विषम-भैरव और लोमहर्पण मर्थात् रोमाञ्च खड़े कर देने
वाला था ॥३१॥ वह दुर्ग मृग मोर सिंहों से घिरा हुमा या तथा उसमे भन्य
बहुत-से श्वापद पशु रहा करते थे। उसमें वल्लियाँ और वृक्ष इतने घने थे कि
यह बड़ा हो गहन हो रहा था। वहाँ पर सैकडो गोदडो की ध्वनियो से सदा
शब्दायमान वह रहा करता था ॥३२।। इस दुर्ग मे महान् रौद्र रूप भयङ्कर-
शोणित ( रुधिर ) से दिग्ध अस वाला-चोर दादों से युक्त नखों के आयुधों
थाला-अपनी इच्छा से रूप धारण करने वाला द्वीपी रहा करता पा॥३३॥
नन्द नामधारी धर्मात्मा था जो सर्वदा गोपियो के हित में अनुराग रखने वाला
था। वह विना टूटे हुए अन माग वाले तृणों से गोधन की परिरक्षा किया करता
पा ॥३४॥ उसकी नन्दा नामवाली पेनु यूष से परिभ्रष्ट हो गई थी और तृणों
के चरन को लिप्सा से चरती हुई वह धेनु व्यान के सामने उपस्थित हो गई
पी॥३५॥

१७६ ] [ पन पुराए अभ्यद्रवच्च ता द्वीपी तिष्ठ तिप्ठेति चालवीत् । त्वमद्य विहितों भक्ष स्वय प्राप्तासि धेनुके ॥३६ द्वीपिनश्च वच श्रुत्वा निष्ठुर रोमहर्पणम् । शुक्लरूपान्वितं बाल भद्रमिदुसमप्रभम् ।।३७ वत्स स्मरति सा धेनु स्नेहाक्ता गदगदाक्षरम् । दह्य ती पुत्रशोकेन नदा सा पुत्रवत्सला ॥३८ रुदती करुण चैव निराशा पुत्रदर्शने। द्वीपी दृष्ट्वा तु ता धेनुकदमाना सुदु खिताम् ।।३६ उवाच वचन घोर धेनुके किं प्ररुद्यते । देवात्सुखोपपन्नासि भक्षस्त्व मे यदृच्छया ॥४० रुदत्या वा हसत्या वा तवात्त जीवित भवेत् । विहित भुज्यते लोके स्वय प्राप्तासि धेनुके ॥४१ मृत्युस्ते विहितोऽद्य व वृथा किमनुशोचसि । पप्रच्छ ता पुन:पी किमयं रुदित त्वया ॥४२ वह द्वीपी उसे देखकर उसने धेनु पर आक्रमण कर दिया था पोर "खडी रह-खडी रह" ऐसा उसने धेनु से कहा था। हे धेनु: । प्राज तू ही मेरा भक्ष हुआ है जो कि स्वय तू यहाँ प्राप्त हो गई है ॥३६॥ उम द्वीपी के प्रतिशय निर्दयतापूर्ण और रोमहर्षण इस वचन का श्रवण कर वह धेनु भरने शुक्ल रूप से समन्वित; परम भद्र मौर चन्द्रमा के समान प्रभा वाले वत्स का स्मरण करती हुई स्नेह से द्रवित होकर गद्गद पक्षगे वाली सतप्त पुत्र पर वात्सल्य रखने वाली यह नन्दा पुत्र के शोक से अत्य त खिन्न हो गई थी ॥३७॥ ॥३८॥ वह करुणा के साथ रुदन करती हुई पब मपने पुत्र के दशन करने में बिल्कुल ही निराश हो गई थी। उस द्वोपी ने उस धेनु को क्रन्दन करती हुई पौर भत्यन्त हो दुखिन देखा था ।। ३६ ।। वह दोपी उस धेनु से बोला पौर परम घोर वचन कहकर पूछा- धेनुके । तू रुदन क्यों कर रही है ? देववश सुख से ही तू यहाँ उपपन्न हो गई है और तू यहच्छया प्राप्त होने वाला मेरा भक्ष है ॥४०॥ रुदन करने वाली हो या हमती हुई हो तेरा जीवन तो अब नन्दा घेनु-व्यान उपाररान ] [ प्रव - ममाप्त ही होगा क्योकि लोर मे विहिन का भोग रिया जाता है । हे धेनुके । तू ता यहाँ स्वय ही प्राप्त हो गई है ॥४१॥ माज हो तेरी मौत निशिन है। तू व्यर्थ ही क्यों मोच कर रही है । इसके पश्नात् दीपं न उप्त धेनु से फिर पूछा था कि तू किसलिय रुदन करती है ॥४२॥ कौतुब चान मे जात महन्मे कथयस्व वै व्याघ्रस्य वचन श्रत्वा नदावाक्यमधात्रवीत् ॥४३ क्षतुमर्हसि मे माथ कामरूपिनमोऽस्तु ते। त्वा समासाद्य लोकम्य परिवार न विद्यते ॥४४ जीवितार्थ न योचामि प्राप्तव्य मरण मया । जातस्य हि ध्र वो मृत्युध्रुव जन्ममृतस्यच ।।४५ तम्मादपरिहार्येऽर्थे न शोचामि मृगाधिप । देवरपि यथा सर्वेमंतव्यमवर्शवम् ॥४६ तस्मात्तु नाहमेवैका व्याघ्र शोचामि जीवितम् । विनु स्नेहेन साधो दु सेन रुदित मया ॥४७ अस्ति मे हृदि सतापस्त च त्व श्रीतुमर्हसि । प्रथमे वयसि प्राप्त प्रमूताऽह मृगाविप I४ इष्ट प्रथमजातच मुतस्तु मम बालक । क्षीरपायी च मे वत्सम्तृण नाद्यापि जिघ्रति ॥४६ म च गोपयुले गद्ध धानों मामवेक्षते । तमह चानुशोचामि यथ जीविप्यते मुतः ।।५० दीपो न कहा कि इस प्रकारे प्रश्न को देषकर मेरे एदय में रह भागेतुन उरपान हो रहा है । मनिय तू मके इमरा कारण बनम - म्यानमारा प्रयाण कर मदा यह वारय मोरी-४ राम हो पारण करन वाला है नाप । भाप मुझे शमा पर देने के योग्य है। भेगमापणे प्रणाम है। मारो शह पर मारा परित्राण नहीं होता ॥४॥ मैं इस समय में पपा जीयन के मियोr नहीं पर रहो। क्योकि पुता मुझे प्राणी है। से भी कोई जन्म सेपर यहाँ ससार में

१७८ ]
[ पम पुराण
'समुत्पन हुआ है उसकी मृत्यु का होना निश्चित ही है और जो मृत्यु को कभी भी
प्राप्त होता है उसको जन्म ग्रहए वरना भी परम निश्चित है ॥४५॥ है मृगो
के स्वामिन् । यह जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त होना तो सभी के लिये थपि.
रिहार्य है पति टलने के योग्य नहीं है । ऐमे विषय में मैं चिता नही करती
हूं। क्योंकि देवगरण के द्वारा भी सबको भवश होकर निश्चय ही मरना ही होता
है ।। ४६ ।। इमनिये हे ध्यान ! मैं शोच नहीं कर रही हूं किन्तु मैं एक ही
अकेली नही हूँ । हे साधो । स्नेह के कारण से मुझे दुख है और उसी से मैंने
रुदन किया है ॥४७)। मेरे हृदय में जो एक सन्ताप है उसे पाप सुनने के योग्य
होते हैं । हे मृगाधिप । प्रथम वय में जब मैं प्राप्त हुई तो मैंने प्रसव किया था
॥४८॥ प्रथम ही समुत्पन्न मेरा वालक सुत मुझे बहुत ही प्यारा है । वह मेरा
नन्हा-सा बच्चा अभी दूध पीता है और अभी वह इतना छेटा है कि तृण नहीं
घरता है ॥ ४६॥ वह विचारा गोपो के समूह में बंधा हुमा है और भूख से
पीडित होकर मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा। मैं इस समय मे उसी अपने पुत्र
के लिये सोच कर रही हूँ कि मेरे मर जाने के पश्चात् वह कैसे जीवित
रहेगा २१५०॥
तस्येच्छामि स्तन दातु पुत्रस्नेहवश गता।
पायित्वा स्तन वत्समवलिह्य च मूद्ध नि ॥५१
सखीनामपयित्वा तु सदिश्य च हिताहितम् ।
पुन प्रत्यागमिष्यामि यथेष्ट भक्षयिष्यसि ॥५२
स नदाया वचः श्रुत्वा मृगेद्र पुनरब्रवीत् ।
विते पुत्रेण कर्तव्य मरण किं न बुध्यसे ॥५३
स्यति सर्वभूतानि म्रियते मा निरीक्ष्य च ।
त्व पुन कृपयाविष्टा पुत्र पुनेति भापसे १५४
न पुत्रा न तपोदान न माता नपिता गुरु ।
शक्नुवति परित्रातु नर कालप्रपीडितम् ।।५५
कथ त्व गोकुल गत्वा गोपीजनसमाकुलम् ।
वृषभर्नादित दिव्य बालवत्सविभूपितम् ॥५६

नन्दा धेतु-ध्यान उपाध्यान ] [ १९ भूपरणं देवलोकस्य स्वगं तुल्यं न संशयः । नित्यं प्रमुदित दिव्यं सर्व देवप्रपूजितम् ॥५७ गोलोक प्रतिमं दृष्ट्वा कर्य प्रत्यागमिष्यसि । पञ्चभूतानि मे भद्र पिपतु रुधिरं तव ॥५८ पुत्र के स्नेह से वशीभूत होकर मैं उसे अपने स्तन का दूध पिलाना पाहती हूं और स्तन पिलाकर अपने वरस के मस्तक को पाटने की भी इच्छा रखती हूँ ॥५१।। इसके पश्चात् उमे अपनी सखियो के सुपुर्द करके उनके हित एवम् अहित के विषय में पूरा सन्देश उन्हें देकर मैं फिर तुम्हारे पास यापिस आ जाऊँगी। फिर पाप मुझे अपनी इच्छा के अनुसार भक्षण कर लेगे ।।१२।। उस व्याघ्र ने नन्दा धेनु के एम वचन का प्रवण कर यह मृगेन्द्र फिर बोला- तुझे अब पुत्र से क्या करना है ? यश तू पपनी मौत को नहीं जानती है ? ॥ ५३ ॥ समस्त प्राणी मुझमे प्रस्त हो जाते हैं पौर मुझे दंगकर मर जापा परते हैं । तू ही एक ऐसी है कि कृपा से ममाविष्ट होती हुई हा पुत्र-हा पुत्र- ऐसा कह रही है ।।५४॥ पाल से जो पीडित होना है अर्थात् जिसकी मौत मा जाती है उग मर को पुत्र-तपश्चर्या -दान-माता-पिता घोर गुरु कोई भी इनमें से रक्षा नहीं कर पाता है ॥ ५५ ॥ तू उम गोप मे बाकर भी गोमेजनो मे पिरा हुमा है, जिसमें वृपमों का नाद हो रहा है जो मत्युत्तम और छोटे छोटे कामों से विशेष म्प में भूपित है, जो देवलो का भूषण है पौर स्वगं ये तुल्य है यह म्यान सो निष्पनी प्रमोद से परिपूर्ण रहता है पोर परपम्न उत्सम एपम् गमात देगा ये दारा पूज़िम है। उस गोलोक के गमान स्पन की दंपकर तू वापिम मे मापेगी ? हे म ! मेरे पागों इपिरोपीयें ॥५६.५० ५८॥ न निविणानि भूनानि वाल्माण करोम्यहम् । एप प्रयमयरमापा मृगेंद्र गुमे यमः ॥५६ घट्ना मागो मुतं पाल गन प्रतिपालयान् । गोपीजनमुपामान्य जननी व विशेषतः ।।६० अपंगमिष्यामि मन्यगे पति मुचनाम् । पला पायायायां मातापिपधेपुच ॥६१ १८० ] [ पम-पुराण ३ । तेन पापेन लिप्येऽहं यद्यहं नागमे पुनः । यत्पापं लुब्धकानां तु म्लेच्छानां गरदायिनाम् ॥६२ तेन पापेन लिप्येऽह यद्यहं नागमे पुनः । गोषु विघ्नांश्च ये कुयुः स्वपंती ताडयंति च ॥६३ मैं वाणीमात्र से प्राणियो को वैराग्य युक्त नहीं करता हूँ। इसके मनन्तर नन्दा ने कहा-हे मृगेन्द्र ! प्रथम वरस को ममुत्पन्न करने वाले मेरे वचन को आप सुनिये ॥५६॥ मैं अपनी सखो~मुत बालक गोपगण-प्रति- पालक-गोपीजन तथा विशेष रूप से जननो का उपामन्त्रण करके शपथ पूर्वक कहती हूँ कि मैं फिर आपके पास प्रा जाऊंगो। यदि माप मेरा कथन सत्य मानते हैं तो मुझे छोड दीजिए । जो पाप ब्राह्मण को हत्या करने में होता है तथा जो पाप माता-पिता के वध करने में होता है उसी पाप से मैं भी लिह हो जाऊं अगर फिर मैं वापिस न माऊ । जो पाप लुब्धको को होता है तथा म्लेच्छो को पोर दिप देने वालो को लगता है वही पाप मुझे भी लगेगा यदि में वापिस फिर न याऊँ ॥६०१६१।६२।६३।। तेन पापेन लिप्येऽह यद्यहं नागमे पुनः । सकृद्दत्वा तु यः कन्यां द्वितीये दातुमिच्छति ॥६४ तस्य पापेन लिप्येऽह यद्यहं नागमे पुनः । यस्त्वनहन्विलीपर्दान्विपमे वाहयेत्पुमान् ।।६५ कथायां कथ्यमानायां विघ्नं कारयते तु यः । तेन पापेन लिप्येऽहं यद्यहं नागमे पुनः ॥६६ गृहे यस्यागतं मित्र निराश प्रतिगच्छति । तस्य पापेन लिप्येऽहं यद्यह नागमे पुनः ॥६७ इत्येतेः पातकै?रैरागमिष्याम्यह पुनः । बुद्ध्वा संप्रत्य द्वीपो पुनर्वचनमग्रवीत् ॥६८ सजातः प्रत्ययोऽस्माकं शपथर्धेनुके तव । कदाचितन्यसे गत्वा मूर्योऽयं वञ्चिता मया ॥६६ अगापि केचिद्वक्ष्यंति शपथे नास्ति पातकम् । कामिनीपु विवाहेषु गवांमुक्ती तथैव च 11७० नन्दा धेनु-व्याघ्र उपाख्यान ] [ १५१ । पोपों में जो लोग विघ्न किया करते है और सोती हुई का जो ताड़न करते हैं उनको जो पाप लगता है उसी पाप से मैं भी लिप्त हो जाऊं अगर फिर वापिस मैं न आऊँ । जो एकबार किसी कन्या को देकर मर्यात् दान करके फिर उसी कन्या को दूसरे किसी को देने की इच्छा करता है उसे जो पाप लगता है मैं भी उसी पाप की भागिनी बन जाऊँ अगर फिर वापिस लौटकर मैं भापके पास न मा जाऊं 1जो अयोग्य वलो को विषम स्थल में वाहन किया फरता है और जो पुरुष कही जाने वाली कथा मे विघ्न उपस्थित किया करता है उसे जो पाप होता है मैं भी उसी पाप से युक्त पापिनी हो जाऊँ अगर मैं फिर तुम्हारे पास वापिस लौटकर न आऊँ ॥६४.६५६६६।। जिसके घर पर माया हुमा मिन निराश होकर वापिस लौट जाता है उसे जो पाप होता है वही पाप मुझे लगे यदि मैं पुनः वापिस न पाऊं ॥६७।। इन इतने घोर पातको से मैं पुनः आपके पास लोटकर आऊंगी। द्वीपो ने उसके कहे हुए वचनो से पूर्ण विश्वास समझकर फिर वह वचन बोना-व्याघ्र ने कहा--!१६८॥ है धेनुके ! तेरी शपयो से हमको पूर्ण विश्वास हो गया है । कदाचित तू ऐसा भी मानती हो कि मैंने इस मूर्ख को ठग लिया है ।।१६। इस विषय मे भी कुछ लोग ऐसा कहा करते हैं कि शपथ मे कुछ भी पातक नहीं होता है । कामनियों के विषय मे--विवाह कार्य के मामलों में प्रौर गोमो को मुक्ति के मामले में शपथ लेने पर भी कोई पाप नही माना जाता है ।।७०॥ प्राणत्यागे समुत्पन्ने श्रद्धातव्यं न च त्वया । लोकेऽस्मिन्नास्तिकाः केचिन्मूर्खाः पडितमानिनः ।।७१ भ्रामयिष्यति ते चित्रं चक्राढमिव क्षणात् । कुतर्कहेतुवृत्तातरज्ञानावृतचेतस. ||७२ मोहयति नरा: क्षुद्रा आगमार्थविशारदाः । अतथ्यान्यपि तथ्यानि दर्शयत्यतिपेशला. ७३ स्वयंव दर्शित सर्व यथेष्टं कुरु साप्रतम् । एवमेव महासाघो कस्त्वां वञ्चयितु क्षम. ७४ आत्मैव वचितस्तेन यः परं वञ्चयिष्यति । धेनुके पश्य गच्छ त्वं पुत्रकं पुत्रवत्सले ७५ १५२ 1, [ पध-पुराण अनुज्ञाता मृगेंद्रण प्रयाता पुणवत्सला। अथ पूर्णमुखी दीना वेपमाना सुदुःखिता १७६ अशक्ता स्वपरित्राणे विलपती मुहुर्मुहुः । सा तत्र गोकुल प्राप्ता हरिग्नद्यास्तटे स्थितम् ।।७७ प्राणत्याग के समुत्पन्न होने पर भापको कभी भी श्रद्धा नहीं करनी चाहिए--ऐसा कहकर इस लोक में नास्निक,मपने पापको महान मनीपो मानने वाले कुछ मूर्ख भ्रम में डाल देते हैं ॥७१।। ऐसे ही लोग चक्र पर प्रारूढ की भ्रामित किया करते हैं, यह एक बडी विचित्र बात है । कुस्मित तक, हेतु और वृत्तान्तो के द्वारा प्रज्ञान से भावृत चित्त वाले शुद्र नर मोह को प्राप्त कर दिये जाया करते हैं । प्रागमो के अर्थ के विशेष विद्वान् प्रत्यन्त मृदु होते हुए जो अतथ्य है उसे भी तथ्य दिखा दिये करते हैं १७२।७३।। तुमने सभी कुछ दिख• लामा है पर जो चाहो वह करो। नन्दा ने कहा-हे साघो! ऐसा ही है परन्तु आपको वञ्चित कर देने की मामध्यं वाला कौन है ? जो किमी दूसरे को प्रतारित किया करता है यह अपनी प्रात्मा को ही वस्तुतः वञ्चित किया करता है ॥५४॥ द्वीपी ने कहा-हे धेनुके ! तुम पुत्र वत्सला हो, इसलिये जानो और अपने पुत्र को देखो ॥७५॥ इस प्रकार मृगेन्द्र के द्वारा प्राज्ञा पास हुई वह पुत्र वत्सला धेनु वहाँ से रवाना हो गई थी किन्तु वह उस समय मे अश्रुमो से परि- पूर्ण नेत्रों वालो~प्रत्यन्त दैन्य भाव से समन्वित, कापती हुई और बहुत ही दु:खिन थी ।।७६। अपने प्रापके परिवारण करने में असमर्थ वह बार-बार विलाप करती हुई हरिनदी के तट पर स्थित गोकुल में प्राप्न हो गई यो ७७॥ श्रु त्वा वत्सं तु क्रोगतं पर्यधावत समुखी। उपसृप्य च त बाल वाष्पपर्याकुलेक्षणम् ॥७८ सप्राप्य मातर वत्सःशकित. परिपृच्छति । न ते पश्याम्यहं स्वास्थ्यं धर्य नवाद्य लक्षये ॥७६ उद्विग्ना चापि ते दृष्टिीता चातोव लक्ष्यसे । पिब पुत्र स्तन मेऽद्य कारण यदि पृर्थ्यास ८० अशक्ताह तवास्यातु कुरु तृप्तिं यथेप्सिताम् । अपश्चिम तु ते पुत्र दुर्लभं मातृदर्शनम् ॥८१ नन्दा धेनु-व्याघ्र उपाख्यान ] [ १८३ एकाहमद्य मे पीत्वा प्रभाते कस्य पास्यसि । त्वां त्यक्त्वा पुत्रगंतव्यं शपथैरागता यहम् ॥८२ शुरक्षामस्य च व्याघ्रस्य दातव्यमात्मजीवितम् । नदायाश्च वचः श्र त्वा वत्सो वचनमब्रवीत् ।।८३ वहाँ पर उसने अपने वत्स के रुदन का श्रवण किया था और वह उसी के सामने दोडकर पहुंची थी। उसने अपने बालक को वाष्पों से भरे हुए नेत्रों वाला पाया और यह उसके समीप में प्राप्त हो गई थी ॥७८|| उस वत्स ने अपनी माता को प्राप्त करके कुछ शङ्कित-सा होते हुए उससे पूछा है माता ! माज मैं तेरा अच्छा स्वास्थ्य और धंयं नहीं देख रहा हूँ। तेरी यह दृष्टि भी कुछ उद्वेग से पूर्ण है मौर भाज तो तू बहुत ही डरी हुई दिखलाई दे रही है ॥७९॥ इस प्रकार से पुत्र के कहने पर नन्दा ने कहा-हे पुत्र ! अब माज तो तू मेरा स्तन का पान कर ले । यदि इम सबका तू कारण ही पूछता है ।।१०।। तो उसको यताने मे में असमर्थ हूं । मब तू यवेच्छ रूप से अपनी तृप्ति कर ले। हे पुत्र'! इसके पीछे तो तुझे अपनी माता का दर्शन दुर्लभ हो जायगा ॥१॥ मैं एक ही हूँ । प्राज मेरा स्तन पीकर फिर प्रमात मे तू किसका स्तन पोयेगा ? मैं तो भव तुझे यही छोडकर चली जाऊंगी क्योंकि मैं सपथ से ही यहां पर पाई हूँ ।।२।। भूख से क्षीण व्याघ्र को मुझे अपना जीवन देना है । नन्दा के इन वचनो को सुनकर वत्म ने यह वचन कहा-८३|| अहम् तत्र गमिष्यामि यत्र त्व गतुमिच्छसि । श्लाघ्यममापि मरण त्वया सह न संशयः ।।८४ एकाकिनापि मर्तव्यंमयार्तेन त्वया विना । यदि मासहित मातबने व्याघ्रो हनिष्यति ।।८५ यागतिर्मातृभक्तानां ध्रुव सा मे भविष्यति । तस्मादबश्ययास्यामि त्वया सह न मशयः ।।८६ प्रयवा तिष्ठ मातस्त्वं शपथा: संतु मे मम । जनन्या च वियुक्तस्यजवितीक प्रयोजनम् ।।१७ प्रनाथस्यवने नित्य कोमे नाथोभविष्यति । नास्तिमातृममोवन्धुर्वालानांक्षीरजीविनाम् 11८८ १८४ । [ पम पुराण नास्ति मातृसमो नायो नास्ति मातृसमा गतिः । नास्ति मातृसमः स्नेहो नास्ति मातृसमंसुखम् ICE नास्ति मातृसमो देव इह लोके परम च । एवं वै परमोधर्म: प्रजापतिविनिर्मित: ।।१० ते तिष्ठति सदा पुनास्ते याति परमा गतिम् । ममेव विहितो मृत्युनंत्य पुत्रागमिष्यसि ॥६१ दस बोला-हे माता ! जहाँ आप जाना चाहती है वहां पर मैं पाऊँगा। तुम्हारे ही साथ मेरा मरण भी बहुत ही श्लाघनीय होगा-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ॥५४॥ जब तू यहाँ नही होगा तो मकेले रह जाने पर भी मुझे मरना हो पडेगा क्योकि उस दशा मे में बडा दुःखित हो जाऊँगा। हे माठा! यदि मेरे सहित हो वह व्याघ्र हनन करेगा तो मेरी भी वही गति होगी जो कि मातृ-भक्तो को निश्चित होती है । इसलिये मैं तेरे ही साथ अवश्य हो जाऊंगा-इसमें घुध भी सराय नहीं है ।१८॥८६॥ अथवा है माता ! पाप यही रहो, वे शपथ जो तुम्हारी हैं मुझे हो जावें क्योंकि जननी से जुदा रहने घाले के जीवित रहने में क्या प्रयोजन हो सकता है ||८७। जब मैं बिना नाय वाला रह जाऊँगा तो इस वन मे मेरा दूसरा कौन नाथ होगा ? जो बच्चे केवल मपनी माता के हो दूध पर जीवित रहा मारते है उन बालको का माता के समान अन्य कोई भी ब.घु नही होता है ।। ८८ 11 बच्चो का माता के सदृश अन्य कोई भी नाथ नहीं होता है और माता के तुल्य अन्य काई गति भी नहीं है । माता के जैसा स्नह किसी भी अन्य का कभी नहीं होता है। माता की समीपता के तुल्य छोटे दुधमुहे बच्चे को अन्य कोई भी सुख नही होता है 1) हे माता ! इस लोक मे पौर परलोक में दोनो ही जगह में माता के. तुल्य कोई गुमरा देव नही है । इसी प्रकार का धर्म प्रजापति ने निर्मित किया है ॥ १०॥ जो सवदा पुत्र माता के पास रहते है वे परमगति को प्राप्त हुआ। करते हैं। इस पर नन्दा ने वहा-हे पुत्र ! यह तो मेरी ही मृत्यु का विधान दिया गया है । वहाँ तुम नही जामागे ॥६॥ न चायमन्यजीवाना मृत्युः स्यादन्य मृत्युना । मपश्चिममिमम्पुत्र मातृसदेशमुत्तमम् ॥६२ - ।

मन्दा धेनु- -~याघ्र उपाख्यान । [ १८५ अत्रातिष्ठस्व मद्वाक्यात्तत.शुश्रू परणं पुनः । जले स्थले च विचरन्प्रमादं तात मा कुरु ।।१३ प्रमादात्मर्वभूतानि विनश्यति न संशयः । न च लोभेनचर्तव्य विषमस्थं तृण क्वचित् ।।६४ लोभाद्विनागः सर्वेपामिहलोके परत्र च । समुद्रमटवी पुत्र विशति लोभमोहिताः ।।६५ लोभादकार्यमत्युग्र विद्वानपि समाचरेत् । लोभात्प्रमादाद्वि भात्त्रिभि शोभवेन्नृणाम् ।।९६ तस्माल्लोभं न कुर्वीत न प्रमादं न विश्वसेत् । प्रात्मा हि सतत पुत्र रक्षितव्यः प्रयत्नतः ।।६७ यह मृत्यु का ऐसा ही नियम है जिसको मृत्यु होने को है उसी को वह होती है। अन्य जीवो की मृत्यु प्रन्य किसी को कभी नहीं हो सकती है । हे पुत्र ! मेरा अब यह आखिरी एक उत्तम सन्देश है ।।१२॥ तू मेरे वाक्य से यहाँ पर हो रहो, और फिर मेरी बात सुनो । हे तात ! जल तथा स्थल में विचरण करते हुए कभी प्रमाद मत करना ॥६३॥ प्रमाद बहुत बुरा होता है । इस प्रमाद से समस्त प्राणी विनष्ट हो जाया करते हैं-इममे तनिक भी सशय नहीं है । कभी लोभ मे अभिभूत होकर विषम स्थल मे रहने वाले तृगण को कही पर भी नही वरना ॥६॥ लोभ एक नाशकारी दुगुण है। इस लोभ से सबका यहाँ और परलोक मे भी विनाश हो जाता है । हे पुत्र । लोभ से मोहित होन वाले लोग हो गहरे घोर समुद्र समुद्र में तथा गहन-भीपण वन में प्रवेश किया करते हैं IIEI/ लोभ से अत्यन्त उग्र प्रकायं को विद्व न पुरुप भी कर डाला करते हैं । मनुष्यो के नाश होने के लोभ, प्रमाद और विधम्म ये तीन ही कारण हुमा करते हैं । ६६|| इसलिये लोभ और प्रमाद कभी नही करना चाहिए तथा विश्वास भी कदापि न करे। हे पुत्र ! अपने मात्मा का सतत रक्षण प्रयत्न के स थ काना चाहिए ॥१७॥ सर्वा सर्वप्रदा नित्यं रक्षध्व मम वालवम् । अनाथ विवल दोन रक्षध्व मम पुत्रकम् । ६८ १८६ ] 1. पद-पुराण मातृशोकाभिसंतप्तं भगिन्य पालयिष्यथ । भगिनीनामय पुत्रो ह्यपितस्वसुतो मया IRE पाल्यो बालश्च सर्वाभिः पोष्यः पाल्यश्च पुत्रवत् । तस्मादनाथमवलं पुत्रवत्पालयिष्यथ ॥१०० प्रकर्तु मुद्यतं भीम नंदा त्वं सत्यवादिनी। शपथ. सत्यवाक्येन वचयित्वा महाभयम् ॥१०१ यद्बाल स्वसुतं त्यक्त्वा सत्यलोभेन गम्यते । अत्र गाथा पुरा प्रोक्ता ऋपिभिसावादिभिः ॥१०२ प्रणत्यागे समुत्सन्ने शपथैर्नास्ति पातकम् । उक्त्वाऽनृत भवेद्यत्र प्राणिनां प्राणरक्षणम् ॥१०३ अनृतं तत्र सत्य स्यात्सत्यमप्यनृत भवेत् । कामिनीपु विवाहेपु गवां मुक्तो तथैव च ॥१०४ ब्राह्मणानां विपत्तौ च शपथैनास्ति पातकम् । परेपा प्राणरक्षार्थ वदाम्येवानृतं वचः ॥१०५ इसके मनन्तर उस नन्दा धेनु ने अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त अन्य समस्त सखियो को सुनाकर उनसे प्रार्थना को यो कि भब बाप लोग सब कुछ प्रदान करने वाली है । भविष्य में पाप लोग नित्य ही मेरे इस बालक की पूर्ण रक्षा करें। यह मेग दुधमु हा विचारा बच्चा परम दीन-बेचन और मनाय है । पाप सब लोग इसकी रक्षा करें ॥६६॥ यह विचारा अपनी माता के वियोग- जन्य शोक से बड़ा ही सन्तापयुक्त है । हे बहिनो ! माप इसका पालन करोगी, यह भाप समस्त बहिनो का ही पुत्र है। मैं इस अपने पुत्र को प्राप सबकी सेवा में समरित करती हूं HER इम बालक को आप ही सबको पालन करना चाहिए और अपने ही पुत्र को भांति इसका पोपण करें। देखो, यह एक अनाथ बिना माता वाला बच्चा है । इसका पालन-पोषण अपने ही पुत्र की तरह मार सब करेंगी ।।१००। इस नन्दा के विनम्र कथन को मुनकर सबने नन्दा से कहा- मन्दा तू तो बहुत ही सत्य बोलने वाली है और इस समय में एक महान भीषण पार्य करने को उद्यत हो रही है तो शायों के द्वारा ही सरप वचनो से महान्

नन्दा धेनु व्याघ्र उपाख्यान ]
[ १८७
भय को वञ्चिन कर दिया है मोर सत्य की रक्षा के लोभ से तू अब अपने इस
नन्हे से पुत्र को त्यागकर वहाँ पुन जा रही है । तू महा धन्य है । परन्तु इस
विपप में बड़े बडे ब्रह्मादी ऋपियो के द्वारा कही हुई एक गाथा है जो पहिले
बताई गई थी॥१०१।१०२॥ जव अपने प्राणो का त्याग उपस्थित हो जावे तो
उनकी रक्षा के लिये जो शपथ को जावें उनमे कुछ भी पातक नहीं होता है ।
अनून ( प्रमत्य ) वचन कहकर भी प्राणियो को अपने प्राणों की रक्षा करना
चाहिए ॥१०३।। यहाँ पर झूठ भी सत्य हो जाता है और महा सत्य भी मिप्या
हो जाया करता है। इसी प्रकार से कामनियो क साप प्रेमालाप में प्रणय की
रक्षा करने के लिये, विवाह-मम्बन्धो के जुडाने मे मोर गायो के प्राणो की
रक्षा के लिये तथा ब्राह्मणो को विपत्ति का निवारण करन के विषय मे जो
मिच्या शपथ भी लेनी पड़े तो अवश्य ही ल लेव क्योकि इन उपयुक्त दशामों
में शपथो के लेने में कुछ भी पाप नहीं होता है ।।१०४।। इस पर नन्दा ने कहा-
पाप सबके कपन का मैं प्रादर करती हूँ पौर इमका तात्पर्य यही है कि दूमरो
को प्राणों की रक्षा के लिय में भी मिया भाषण किया करती है ।।१०।।
नात्माथ मुत्सहे वक्तु जीवितार्थे क्थचन ।
एक मश्लिप्यते गर्भ मरणे भरणे तथा ॥१०६
भुक्त चैक मुखद खमत सत्य वदाम्यहम् ।
सत्येप्रतिष्ठिता लाका धर्म सत्य प्रतिष्ठित ॥१०७
उदधिम्मत्यवाक्येन मर्यादाम न विलघत ।
विष्णये पृथिवी दत्त्वावलि पातालमाश्रित ॥१००
छद्मनापिलिवद सत्यवाक्य न चात्पजन् ।
प्रवर्धमान शंलेन्द्र तथा ममुत्थित ॥१०६
सत्येन सस्थिती विध्यः प्रव.प नातिवतंत ।
म्वगांपवगनरका मत्यपानि प्रतिहिना ॥११०
यम्लु लोपयते वाचमशेप तेन नापितम् ।
योन्यथा मनमात्मानमन्यया प्रतिपद्यते ।।१११
f.तुम प्रपन शैपन की रक्षा सम्म मोसार भोमिया

१५८ ] [ पम पुराण बोलने के लिये उत्साह नही कर सकती हूँ । एक ही यह प्राणी गर्भ मे सदिल होता है और वही अकेला भरण तथा मरण के सुख-दुःखो का भोग किया करता है । इसलिये मैं तो सदा सत्य ही बोलना चाहती हूँ। ये समस्त लोक सत्य में ही प्रतिष्ठित हैं और धर्म भी सत्य में प्रतिष्ठिन है ॥१०६.१७७यह महान सागर अपने सत्य वाक्य से ही मर्यादा का लङ्घन नहीं किया करता है । देखो, मसुरों के राजा बलि ने विष्णु को जो वामन बनकर उसे छलने के लिये पाये थे, सम्पूर्ण राज्य के वैभव के सहित समस्त पृथ्वी दे दी थी भोर स्वय अवसान मे पाताल लोक में निवासाथ चला गया था किन्तु उसने कहे हुए वचनो की रक्षाकर सत्य का परिपालन किया था। छल से उस राजा बलि को बांध लिया गया था किन्तु महान् घोर कष्टो को सहन करके भी सत्य का त्याग नहीं किया था 1 प्रबर्धमान शैलों का राजा सो शिखरो वाला होकर उठ खडा हुमा था । 11१0८/१० सत्य से ही यह विन्ध्याचल सस्थित होकर रह गया है और विन्ध्य ने प्रबन्य का प्रतिवर्जन नहीं किया है । ये स्वर्ग, अपवर्ग मोर नरक सभी कुछ सत्य वचन मे हो तो प्रतिष्ठित हो रहे हैं ॥११०।। जो अपने कथित वचनो का लोप कर दिया करता है उसने सभी कुछ का लोप कर दिया है--- ऐसा समभना चाहिए । जो अपने प्रापको अन्यथा बना लेता है वह अन्यथा ही प्राप्त किया करता है ॥११॥ दृष्ट्वागोपीजन सर्व परिक्रम्य च गोकुलम् । नन्दा सप्रस्थिता देवान्वृक्षावापृछयसापुनः ॥११२ चरमाणस्य कर्तव्य सानुकोशैस्तु रक्षणम् । सदिश्य नदा प्रीत्यैव पुत्रस्नेहवश गता ॥११३ शोकाग्निा च सन्दीप्ता विच्छिन्ना पुनदर्शने । वियुक्ता चक्रवाकोव लतेव पतिता तरो ॥११४ अन्धेव दृष्टिरहिता प्रस्खलती पदे पदे। अगच्छत्सापुनस्तत्र यमार्मा पिशिताशन ॥११५ प्रास्ते विस्फूजितमुपस्तीक्ष्णदष्ट्रो भयावह । तावत्तस्या मुतो वत्स ऊर्ध्वपुच्छोऽतिवेगवान् ।।११६ नन्दा धेनु व्याघ्र उपाख्यान ] [ १८६ प्रागत्यमातुरग्रेऽसौ मृगेंद्रस्याग्रतोऽभवत् । भागत तु सुत दृष्ट्वा मृत्यु तमयतः स्थितम् ।।११७ व्याघ्र दृष्ट्वा तु सा धेनुरिद वचनमब्रवीत् । भो भो मृगदागताह सत्यधर्मव्रते स्थिता ।।११८ इसके पश्चात् उम नन्दा ने समस्त गोपी जनो से भेट की थी और फिर उस मम्पूर्ण गोल की परिक्रमा की थी। फिर वह नन्दा सब देवगण तथा यहाँ के वृक्षो से पादेश प्राप्तकर सम्ञस्थित हो गई थी ।।११२।। उसने पुन: प्रार्थना की कि पाप सब दयापूर्वक चरण करते हुए मेरे वत्स का गरक्षण फरना । इस तरह से नन्दा प्रीति से सन्देश देकर प्रपन पुत्र के स्नेह में वशीभूत हो गई थी ॥११३।। वह नन्दा पुत्र के वियोग से उत्पन्न शोक रूपी मग्नि से एकदम सतप्त हो रही थी और अपने पुत्र के देखने में विच्छिन्न हो गई थी। वह चक्रवाको को भौति जुदा होती हुई वृक्ष की लता के समान नीचे गिर पडी थी। ॥११४।। एक मन्धे के समान वह दृष्टि से हीन होकर कदम-कदम पर प्रस्खलित हो रही थी। इस तरह गिरती-पडतो वह वहाँ पर ही चली गई थी जहाँ यह मौसभोगी रहता था ।।११।। वहाँ पर प्रपना मुख खोले हुए तीक्ष्ण दाढो वाला महान् भयानक वह व्याघ्र स्थित था। हमी बीच में उस नन्दा का पुत्र, वत्स कार को अपनी पूछ उठाये हुए प्रत्यन्त वेग से युक्त यहाँ पर ही पा गया था ॥११॥ यह क्त्म वहां पहुंचकर अपनी माता के सामने मोर उस वाघ के भागे हो गया था। उस माय हुए अपने पुत्र को मोर उसके सामने ही उस मृत्यु स्वरूप व्याघ को देखा था ।।११७॥ उस व्याघ्र को देखकर उग धेनु ने यह वचन कहा-~~हे मृगेन्द्र ! मैं अपने सत्य धर्म व्रत में स्थित होने ली पिके ममा में उपस्थित हो गई हूँ ॥११॥ कुरु तृप्ति यथाकाममस्त-मासेन साप्रतम् । सतपयस्व भूतानि पिब व शोणित मम ।।११६ मृताया तु मयि त्व भी भक्षयेम तु बालकम् । स्वागत तव कल्याणि धेनुके सत्यवादिनि ॥१२० न हि सत्यवता किंचिदशुभ भवति क्वचित् । स्त्रयोक्त धेनुके पूर्व सत्य प्रत्यागमे पुनः ।।१२१ १६० ] [ पद्म पुराण तेन मे कौतुकं प्राप्त प्राप्तागच्छेत्कथपुनः । तव सत्यपरीक्षार्थ प्रेषितासि मया पुनः ।।१२२ अन्यथा मां समामाद्य जीवंती यास्यसे कथम् । यच्च न: कौतुकं जात सत्यस्यान्वेषणं मम ।।१२३ तस्माददेन सत्येन मुक्तऽसि च मयाधुना । भगिनी भक्ती मह्य भागिनेयः सुतस्तव ।।१२४ दत्तोपदेशस्य शुभे मम पापिष्टकर्मणः । सत्ये प्रतिष्ठिता लोका धर्मः सत्ये प्रतिष्ठित: ॥१२५ सत्येन गौः क्षीरधारा प्रमुचति हविः प्रियाम् । सवै धन्यतमो गोपो यस्त्वत्क्षीरेण जीवति ॥१२६ हे मृगे द्र ! अब पाप मेरे माँम से अपनी इच्छा के अनुसार अपनी तृप्ति 'कर लीजिये । अपने भूतो को सन्तृम करे और मेरे रुधिर का पान करें ॥१६६।। जब मुझे मारकर भाप खा लेवें तो मेरे मर जाने के पश्चात् पाप मेरे इम पुत्र का भी भक्षण कर ले । म दा के इस निवेदन को सुनकर द्वीपी बोला- हे सत्य बोलने वाली धेनुके ! हे कल्याणी ! तेरा स्वागत है ।।१२०॥ जो मत्य के पूर्ण पालन करने वाले होते हैं उनका कभी भी कही कुछ अशुभ नहीं हुमा करता है । हे धेनुके । तूने पुन. यहाँ भागमन करने के विषय में पहिले बिल्कुल सत्य वचन कहे थे ॥१२१॥ इमसे मेरे हृदय मे बड़ा ही फौतुक तू यहाँ से जाकर भी पुनः कैसे यहाँ वापिस लौटकर मा गई है। मैंन तेरे सत्य की परीक्षा लेने के लिये ही यहां से भेज दिया था ॥१२२॥ मन्यथा मुझको प्राप्त कर तू जीवित रहते हुए कैमे चली जाती । जो मुझे इस समय में कौतुक मेरा एक सत्य का अन्वेषण ही है ।।१२३|| इमलिये अब तेरे हम सत्य के पूर्ण पालन करने के कारण मेरे द्वारा तू मुक्त की जाती है। तू अब याज से मेरी भगिनी हो गई है मोर यह तेरा पुत्र अब मेरा भानजा हो चुका है ॥१२४॥ हे शुभे ! सूने तो मुझ जैसे महान् पाप कर्म करने वाले को बड़ा उपदेश प्रदान किया है कि सत्य में ही ये समस्न लोक प्रतिक्षित है पोर धर्म भी सरम में प्रतिष्ठित है ॥१२॥ मत्य से ही गो हवि को प्रिय क्षीर को धारा नन्दा धेनु-ज्यान उपाख्यान ] [ १६१ का प्रमुञ्चन किया करती है । वह गोप परम धन्य एवम् महान् भाग्यशाली है जो तुझ जैमी सत्यपालिका धेनुके दूध से जीवन धारण किया करता है ।१२६। तत्करिष्याम्यह कर्म येन मुच्येय किल्विपात् । मया जीवसहस्राणि भक्षितानि शतानिच ।।१२७ गति का मिहगच्छामि दृष्ट्वा गो: सत्यमीदृशम् । अह पापो दुराचागे नृशसोजीवघातकः ॥१२८ कास्तुलोकान्गमिष्यामि कृत्वा कर्म सुदारुणम् । गमिप्ये पुण्यतीर्थानि करिष्ये पापशोधनम् ॥१२६ पतिध्ये गिरिमारुह्य प्रवेक्ष्ये वा हुनाशनम् । धेनोऽद्य यन्मया कार्य तप पापाद्विशुद्धये ॥१३० तदा दिशस्व सक्षेपान कालो विस्तरस्य तु । तप कृते प्रशसति त्रेताया ज्ञानमेव च ॥१३१ द्वापरे यज्ञ मित्याहुनमेक कलौ युगे । सर्वेपामेव दानानामिदमेवैकमुत्तमम् ॥१३२ द्वीपी व्याघ्र ने अन्त मे कहा था कि मैं अब ऐसा ही कर्म करूगा, जिससे में किये हुए पापो से छुटकारा पा जाऊँ । मैंन सेकडो और सहमो जीवो को मारकर खा लिया है ।।१२७।। इस ससार मे मैं किस गति को प्राप्त होऊँगा । मैंने इस गो के इस प्रकार के सत्य-परिपालन को देख लिया है। मैं तो महान् पापी, दुष्ट प्राचार वाला, अत्यन्त क्रूर और जीवो के घात करने वाला हूँ ॥१८॥ मैंने ऐसे-ऐसे महान दारुण वर्म किये हैं कि मैं किन लोको में मरकर जाऊँगा ? अब तो पुण्य तीर्थो का घटन करूगा और किये हुए अपने पापो का शोधन करूंगा ? ॥१२६।। मैं पर्वत पर चढकर उससे नीचे गिरूगा अथवा अग्नि में प्रवेश करूंगा' हे धेनो ! मुझे अपने किये हुए पापो वे शोधन करने के लिये जो कुछ भी करना चाहिए उसे तुम सक्षेप मे मुझे बतादो क्योकि विस्तार से कथन करने का मब अधिक समय नहीं है ॥१३०॥ इस प्रकार व्याघ्र के द्वारा कहे जाने पर उस धेनु ने कहा-घृतयुग में तो तप- श्चर्या का वरना हो सर्वोत्तम उपाय ममझा जाता है। प्रेतायुग मे ज्ञान का

१६२ ]
[ पम-पुराण
मर्जन करने से कल्याण होता है ।।१३।। द्वापर में यज्ञादि के श्यों के करने से
उद्धार होना है और बालियुग में नो वेवन दान से ही पात्म बल्याण हो जाता
है और सम्पूर्ण प्रकार के दानो में यही एक दान सबसे उत्तम एवम् परमश्रेष्ठ
होता है ।।१३२॥
अभय सर्वभूताना नास्ति दानमत परम् ।
चगचराणा भूतानामभय य प्रयच्छति ॥१३३
स च सर्वभयान्मुक्त पर ब्रह्माधिगच्छिति ।
नारत्यहिंसासमदान नास्त्यहिंसासम तप ॥१३४
यथा हस्तिपदेवन्यत्यद मर्व प्रलीयते ।
सर्व धर्मास्तथा व्याघ्र प्रलीयते ह्यहिंमया ॥१३५
योगवृक्षम्य छाया या तापत्रयविनाशिनी ।
धर्मज्ञाने च पुष्पाणि स्वर्ग मोक्षौ फ्लानि च ॥१३६
दु खरयाभितप्तस्य छाया योगतरो स्मृता।
न बाध्यते पुनर्दु सं प्राप्य निर्वाणमुत्तमम् ॥१३७
इत्येतत्परम श्रेय कीर्तित ते समासत ।
ज्ञात चैव त्वया सर्व केवल मा तु पृछसि ।।१३८
समार में समस्त प्राणियो को समय का दान देना चाहिए । इस समय
के दान रु उत्तम अन्य कोई भी दान नहीं है। चर पोर मचर भूतो को जो
सर्वदा अभय का दान दिया करता है वह प्राणी मभी भयो से छुटकारा पाकर
परम ब्रह्म की प्राप्ति का लाभ मिया करता है। हिंमा के समान भन्य कोई
भी दास इस लोक में नहीं है मोर पारिसयों की हिंसा न करने के महा अन्य
कोई तप नहीं होता है ।।१३३३१३४।। जिस प्रकार से हाथी के पैर के विह्न म
अन्य सभी जीवो के पदचिह्न आ जाया करते हैं उनी भांति हे व्यान । सम्पूर्ण
धर्म महिमा में ही प्राणाया करते हैं ।।१३ या पो को जो पाया है.
वह माधिभौतिक, प्राधिदैविक और माध्यामिक इन तीनो प्रकार के तापी
का विनाश करने वाली है। इस वृक्ष के धर्म और ज्ञान पुष्प हैं तथा स्वर्ग को
प्राप्ति एवम् मोक्ष ये दोनों इस वृक्ष के फन होते हैं ।।१३६।। उपर्युक्त तीनो

नन्दा धेनु-व्याघ्र उपास्यान ] [ १६३ प्रकार के तापो से सन्तप्त प्राणी को शान्ति प्रदान करने के लिये योग रूपी वृक्ष की छाया ही बतलाई गई है। निर्वाण पद की प्राप्ति करके यह प्राणी फिर दु खो से बधित नहीं किया जाता है ।।१३७॥ यह ही जीवो के लिये परम श्रेय है जो कि मैंने आपके सामने प्रति सक्षेप में बतना दिया है। प्राप तो इस सबको स्वय ही जानते हैं । मुझमे तो आप वैसे ही केवल पूछ रहे हैं ॥१३८।। अह मृग्या पुरा शप्तो व्याघ्रस्पेरणसस्थितः । तत प्राणिवधात्सर्वमशेपममविस्मृतम् ॥१३६ त्वत्सम्पर्कोपदेशाभ्यां सातस्मरणमम । त्वचाप्यनेनसत्येनगमिष्यसिपरां गतिम् ॥१४० तदह त्वा पुनः पृच्छे प्रश्नमेक हृदि स्थितम् । सान वर्षशत जात चितयानस्य मे शुभे ॥ ४१ भवत्या भाग्ययोगेन कदाचित्स्वर्गशोभने । कृतधर्मस्य सस्थानं सता मार्गग्ग प्रतिष्ठितम् ॥१४२ कितेऽभिधान कल्याणि ब्रूहि मेऽज्ञस्य सुबते । मम नन्देति सज्ञा तु कृता नन्देन स्वामिना ॥१४३ साप्रत भक्षयामीति हतिष्ठ: केन हेतुना । नन्देति च त्वा तन्नाममुक्तशापप्रभञ्जनः ।।१४४ पुनर्नृपत्वमापन्नो बलरूपसमन्वितः । एतस्मिन्नन्तरे धर्मम्ता ज्ञात्वा सत्यवादिनीम् ॥१४५ द्रष्टु समागतस्तन प्रायवोच्च पयस्विनीम् । तव सत्यव्रताद्धृष्टो धर्मोऽहमिह चागत ।।१४६ इसके मनन्तर द्वीपी ने कहा-मैं पहिले भी व्याघ्र के रूप में सस्थित पा मोर मुझे एक मृगो ने शाप दे दिया था। इसके पश्चात् प्राणियों के वध परने से मुझे यह सभी कुछ विस्मृत हो गया था॥१३६॥ अब तुम्हारे सम्पर्क प्राप्त होने से मोर उपदेश से मुझे उमका स्मरण हो गया है। इस सत्य के परि- पाउन से तूभी परमातियो प्राप्त होवेगी ।।१४०॥ मैं तुझसे फिर एक प्रश्न पूछता यह मेरे हृदय में विज्ञासा स्थित है । है सुभे ! इस तरह चिन्तन करते वर !

१६४ ] [ पम पुराण हुए मुझे एक सौ वर्ष से अधिक समय होगया है ।।१४१॥ भारत से, भाग्य के योग से कदाचित धर्म का संस्थान मत्पुरुषो के मार्ग में स्वर्ग को प्रतिष्ठित किया गया है । हे कल्याणी! हे सुयते ! तेरा नाम क्या है-~यह मुझे तू बतलादे क्योंकि मैं तेरे नाम को भी अभी तक नही जानता हूँ । इस तरह से उस ध्यान के पूछने पर नन्दा ने कहा- मेरा नाम मन्दा है जो कि मेरे स्वामी नन्द ने रक्खा है ।।१४२२१४३।। अभी भक्षण करता हूं-ऐसा कहकर प्राप किस कारण से रुक गये हैं ? नन्दा-यह नाम सुनकर उसके नाम से वह राजा प्रभजन मुक्त शाप वाला होगया था ॥१४४।। शाप से मुक्ति हो जाने पर वह वल मोर -मौन्दर्य से समन्वित होकर पुन: नृपत्व को प्राप्त होगया था। इसी बीच में धर्म उस धेनु को सत्य बोलने वाली जानकर उसे देखने के लिये वही पर भाया था और उस पयस्विनी से कहा-तेरे सत्य बोलने के व्रत से बहुत ही प्रसन्न होकर मैं धर्म यहाँ पर माया हूँ ॥१४॥१४॥ नन्दे वृणीष्व भद्र ते वरं वरतमं हि यत् । एवमुक्ता हि सा देवी नन्दा तं प्रार्थयद्वरम् ।।१४७ तवानुभावात्ससुता गच्छामि पदमुत्तमम् । भवेदिदंशुभ तीथं मुनीनां धर्मदायकम् ।।१४८ मन्नाम्ना च सरिदियं नन्दा नाम सरस्वती। वरप्रदानाद्देवेश तदेतत्प्रार्थितं मया ॥१४६ सातत्क्षणाद्गता देवी स्थानं सत्यवतां शुभम् । प्रभञ्जनोऽपि तद्राज्यं संप्राप्तः प्रागुपाजितम् ॥१५० नन्दा येन गता स्वर्ग नन्दां प्राप्य सरस्वतीम् ।। तेनाख्यया बुधैस्तस्याः प्रोक्ता नन्दा सरस्वती ।।१५१ फिर धर्म ने उस धेनु से कहा-हे नन्दे ! तेरा कल्याण हो, तुझे जो भी मभीष्ट हो वह परम श्रेष्ठ वरदान मुझसे मांग ले। इस प्रकार से धर्म के द्वारा कहे जाने पर उस देवी नन्दा ने वर की प्रार्थना की थी ॥१४७॥ नन्दा ने.कहा-आपके भनुग्रह से मैं अपने पुत्र के सहित उत्तम पद को प्राप्ति कई मोर यह स्थल एक.परम सुन तीर्थ स्थान बन बावे जोकि मुनियों को धर्म - वृत्रासुर-वध तथा मगस्त्यः [ १६५ प्रदान करने वाला होवे ।। १४८ ।। मेरे ही माम से यह नदी नन्दा नामवाली सरस्वती वरदान से हो जाये । है देवेश ! यही मेरी प्रार्थना है जिसे मैंने इम समय कर दिया है ॥ १४६ ।। पुलस्त्य मुनि ने कहा-वह देवो उमी क्षण में सत्यवानों के प्रति शुभ स्थान को वहां से चली गई थी। राजा प्रभजन भी पहिले से समुपाजित अपने राज्य में चला गया था ॥१५०॥ जिस मरस्वती को नन्दा नाम प्राप्त करके स्वगं वो गई थी उमी नाम से बुध लोगों के द्वारा उसका नन्दा सरस्वती नाम प्रख्यात किया गया था।॥१५॥ ॥ वृत्रासुर-बध तथा श्रगस्त्य उपाख्यान वर्णन ॥ कथयामि समासेन शृणु त्वं सुसमाहितः । पूर्व कृतयुगे भीष्म दानवा युद्धदुर्मदाः ॥१ कालेया इति विख्याता गणाः परमदाणाः । ते तु वृवं समाश्रित्य नानाग्रहरणोद्यतः ॥२ समन्तात्पर्यधावन्त महेन्द्रप्रमुखान्मुरान् । ततो वृत्रवधे यत्नमकुवंखिदशाः पुरा ।।३ पुरन्दर पुरस्कृत्य ब्रह्माणमुपतस्थिरे । कृताञ्जलीस्तु तान्मन्परमेष्ठीत्युवाच ह ।।४ विदित मे मुरासवं यद्वःकार्य चिकीर्पितम् । तमुपाय प्रवक्ष्यामि यथा वृनं वधिप्यय ।।५ दधीचिरिति विस्यातो महानृपिरदारधीः । त गत्वासहितास्सर्वं वरं च प्रतियाचत ॥६ स यो दास्यतिधर्मात्मा मुप्रीतेनान्तरात्मना । स पाच्य सहितःसर्वेभवद्भिर्जयसाक्षिभिः ॥७ पुरत्या महान ने कहा है ! में पारि सो मे हमा उमे तुम परम मावधान होरर या परो । मस्ययुग में पहिने दाना लोग पुर नेमि हो दुमंद होगये थे ॥१॥ इन शनयों का परवान दाणगण पा योति'-म नाम से पोषों में HिE ! दे सर वृत्रामुर के १९६ ] [ पद्म-पुराण . माश्रय में प्राप्त हो गये थे और अनेक प्रकार के अस्त्र-गस्त्रों से सुसज्जित होकर रहा करते थे ॥२॥ ये सभी अपना धावा कर दिया करते थे तथा इन्द्र प्रादि प्रमुख देवतामो के कार भाक्रमण कर दिया था। इसके पश्चात् देवतालों ने प्राचीन समय में वृत्रासुर के वध के लिये यल किया था ॥३॥ मत्यन उत्पीड़ा होकर देवगण इन्द्रदेव को अपना नेता बनाकर ब्रह्माजो के पाम उपस्थित हुए थे। सब वहाँ हाथ जोडकर खडे हुए उन देवगणों से परमेो ब्रह्मा जी ने कहा था ॥४॥ हे देवताओ ! मुझे पहिले से ज्ञात होगया है जिस कार्य के लिये भार सब लोग यहाँ पर आये हैं । मैं प्रव प्रापको वही उपाय बतलाता हूं जिससे वृत्रा- सुर का वध हो जावेगा ॥ ५॥ एक दधीचि नाम वाले महान् उदार बुद्धि से समन्वित महपि हैं । उनके पास प्राप सभी लोग उपस्थित होकर वरदान प्राप्त करने की याचना करें ।। ६॥ वह महाप बहुत ही धर्मात्मा है । वह तुमको अवश्य ही वरदान प्रदान कर देगे। वह अपनी अन्तरात्मा से परम प्रसन्न हो जायेगे। उस समय में विजय की माकांक्षा रखने वाले आप सबको मिलकर उनसे यह कहना चाहिए ||७|| स्वान्यस्थोनि प्रयच्छस्व त्रैलोक्यहितकाक्षया । स शरीरं समुत्सृज्य स्वान्यस्थीनि प्रदास्यति ।। तस्यास्थिभिर्महाघोरं वन संक्रियतां दृढम् । महच्छत्रुहन दिव्यं तदनमानः स्मृतम् ॥ तेन वर्षण वै वृनं वधिप्यति शतक्रतुः। एतद्वः सर्वमाख्यातं तस्मात्सर्व विधीयताम् ।।१० एवमुक्तास्ततो देवा अनुज्ञाप्य पितामहम् । शतक्रतुपुरस्कृत्य दधीचेराश्रमं ययुः ।।११ सरस्वत्या परेपारे नानाद्र मलतावृतम् । पट्दोद्गीतनिनदैरुघुष्ट समागरिव ॥१२ त्रिविष्टपसमप्रख्यं दधीच्याश्रममागमन् । तत्रापश्यन्दधीचि त दिवाकरसमप्रभम् ॥१३ जाज्वल्यमानवपुपा यथा लक्ष्म्या चतुर्भुजम् । 'तस्य पादौ सुरा राजन्नभिवंद्य प्रणम्यच ॥१४ वृत्रासुर-वध तथा प्रगस्त्य० ] [ १६७ अयाचंत वरं सर्वे यथोक्त परमेष्ठिना । ततो दधीचिः परमप्रतीतश्च सुरोत्तमान् ॥१५ ब्रह्माजी ने देवतामों से कहा--जब वह परम प्रसन्न होकर तुमको दर- दान प्राप्त करने को कहें तो उस समय में माप लोग उनसे कहा कि प्राप अपनी पम्थियों तीनो लोकों को भलाई को कामना से हमको प्रदान कर देखें। ऐसी तुम्हारी याचना करने पर वह पि सपने शरीर का त्याग करके अपनी पस्थियां सुमको प्रदान कर देंगे || उनकी अस्थियों से पाप लोग महार घोर आप चनाये जो कि अत्यन्त दृढ़ होगा। यह महान् शत्रु के हनन करने वाला अति दिध्य भस्थ व कहा लाने वाला होगा ॥६उम बज से इन्द्रदेव वृत्रा. गुर का वध करेंगे। मैंने यह गभी कुछ पाप लोगों को बता दिया है सो भय भाप यह सब कार्य मम्पादित करो 1१०। इसके पश्चात् देवगण पो ग्रह्मा हारा ऐसा कहा जाने पर उन देयतामो ने ब्रह्माजी से वायमा पिया और मादेश प्राप्त करके ये मय इन्द्र को अपना अगुमा पनाकर महर्षि दधीचि के आश्रम में पले गये थे ॥११॥ दधीधि महापि का आश्रम मरस्वती नदी के परली पार पर पा मओ विविध प्रकार के वृक्ष मोर सताओ से मायन पा। वहाँ पर पुष्पों पा मकर पान करने वाले भ्रमरो की गुजा से यह माधम पदापमान हो रहा पा से यहाँ यदिक लोग सामवेद के मन्त्रों का मान कर रहे हो ॥१२॥ वह मामुनि घोपि वा प्राप्तम गं के तुल्य पा ऐमे परमोत्तम आश्रम में समस्त देवमण आये थे और वहां पर उन्होंने गूर्य के समान प्रभा वाले दधीचि का गंन रिपा पा ॥१३॥ दधीचि मुनि भगने नगर को पानि से जाग्वल्यमान ऐगे डिमना रहे थे नमें कदमी में महिल घार मुशाओं वाले साक्षात् भग- पान् नारायण विराजमान हों। वहां पहुंचार ममस्त देवगण ने उनके घरणों पो अभिवन्दना और प्रगाम रिया पा! फिर लिग प्रकार गायत्री ने पहा पा उगी गति मग महामुनि की गेया में अपनी याचना को पी। तब गोपीपि मुनि पहन हो प्रमन्ना और उन मुर्गे में उन्होने कहा 11१४१५॥ उवाच प्रगतो मूग विदं पायंकरं वनः । इन्द्राचारस्वागता देवाः किमयं तद्वान्नु मे ॥१६ १६८ ] पदा-पुराण पौड्यमानानहं मन्ये हतप्रभसुरोत्तमाः । यदर्थ पीडितारमानस्तद्वदन्तु निराकुलम् ।।१७ स्वदस्यिकृतशस्त्रेण देवास्सन्तु निरामयाः । करोमि यद्वो हितमद्य देवाः स्वं वापि देहं त्वहमुत्सृजामि । तानेवमुक्त्वा द्विपदांवरिष्ठः प्राणास्ततोऽसौ सहतोत्ससर्ज ॥१८ सुरास्तदस्थीनि सवासवास्ते यथोपयोग जगृहु-स्म तस्य । प्रष्टरूपाश्च जयाय देवस्त्वष्टारमासाद्य तमर्थमूचुः ॥१६ स्वष्टा तु तेषां वचनं निगम्य प्रहृष्टरूपः प्रयतः प्रयत्नात् । चकार वर्ष भृशमुग्रवीयं कृत्वा च शस्त्रं तमुवाच हृष्टः ॥२० अनेन शस्त्र प्रवरेण देव भस्मीकुरुप्वाद्य सुरारिमुग्रम् । ततो हतारिः सगणः सुखं त्वं प्रशाधि कृत्स्न त्रिदिव दिविष्टः । त्वष्टा तथोक्तस्तु पुरंदरश्च वज़ प्रष्ट प्रयतो ह्यगृहात ॥२१ 1 दधीचि ने प्रगत होकर जो भी वधन देवगण से कहे थे वे कार्य को पूर्ण करने वाले थे । दधीवि ने कहा-आप देवराज इन्द्र आदि समस्त देवगया यहाँ पर आये हैं । यह बताइये कि पाप लोग किस प्रयोजन से यहाँ उपस्थिन हुए हैं ? ॥१६॥ मैं ऐसा समझता हूँ कि माप सब उत्पीडित है और मापको कान्ति क्षीण-सी हो रही है । जिस कारण से पाप लोग पीडित हैं उमे शान्ति पूर्वक बिना किसी व्याकुलना के स्पष्ट मुझे बता दीजिए ॥१७॥ नब देवो ने कहा- हम समस्त देवगण मारकी मस्थियो से निरित किये हुए शस्त्र से स्वस्थ एवम् मुखी होवेंगे। इम थिन पर महपि दधीचि ने कहा था- -हे देवगण! माप लोगो का जिममे हित होगा वही मैं मान करता हूं। मैं अपने देह का भी स्याग करता हूँ। पुनस्त्य ऋप ने कहा द्विपदो अर्थात् मनुष्यो मे परम श्रेय दधीचि ऋषि ने उन देवतायों से इस प्रकार कहकर फिर उसने शीघ्र ही अपने प्राणो का त्याग कर दिया था ॥१८॥स्ने समस्त देवतामो ने इ.द्र के सहित उनकी उन अस्थियों को उपयोग के अनुसार ग्रहण कर लिया था। परम प्रसन्न रूप वाले देवों ने अपनी विजय प्राप करने के लिये त्वष्टा अर्थात् प्रत्र निर्माण करने वाले के समीप हुँवर अपना जो मस्थियो से मन बनवाने का प्रयोजन वृयासुर-वष तथा प्रगस्त्य० ] [ १६९ था यह कह दिया था ॥१६॥ त्वष्टा ने भी उनके वचनों को सुनकर परम प्रमन होते हुए उस कर्म मे वह प्रयत्नपूर्वक संलग्न या होगया था और उसने बहुत ही उग्र पराक्रम वाले वचास्त्र का निर्माण करके प्रसन्न होते हुए उनसे कहा ॥२०॥ हे देव ! इस अति श्रेष्ठ शस्त्र से आप बाज ही देवो उग्र शत्रु को भस्मी भूत कर दीजिए । इमके पनन्तर शत्रु को मार देने वाले माप अपने गणों के सहित देवलोक में निवास करते हुए सम्पूर्ण त्रिदिव पर शासन कीजिए । स्वष्टा के द्वारा इस प्रकार से कहे गये इन्द्रदेव ने अत्यन्त प्रसार होकर उस पचास्त्र को बड़े ही प्रयत्नपूर्वक ग्रहण कर लिया था ॥२१॥ ततः सववण युतो दैवत रभिपूजितः । पाससाद ततो वृत्रं स्थितमावृत्य रोदसी ॥२२ ज्ञात्वा बलस्थं विदशाधिप त ननाद वृत्रस्मुमहानिनादम् । तस्य प्रणादेन धरादिशश्च ख द्योनंगाश्चेति चचाल सर्वम् ।।२३ ततो महेंद्रः परमाभितप्तः श्रुत्वा रव घोरतरं महान्तम् । भयेन मग्नस्त्वरित मुमोच व महान्तं खलुतस्य शीर्षे ॥२४ स शकववाभिहतः पपात महास्वनः काञ्चनमाल्यधारी । यथा महाशलवर पुरस्तात्ममन्दरी विष्णुकरात्प्रमुक्तः ॥२५ तस्मिन्हते दैत्यवरे भयात शक्रः प्रदुद्राव मरः प्रवेष्टुम् । वचंच मेने स्वकरात्प्रमुक्त वृत्र भयाच्चैव हतं न पश्यति ॥२६ मर्वे च देवा मुदिताः प्रहृष्टा महर्पयश्चनमयो स्तुवन्ति । शेषांश्च देत्यांस्त्वरित समेत्य जघ्नुः सुराः वृप्रवधाभितप्तान् ।।२७ ते वध्यमाना खिदम्नदानी महासुग वायुममानवेगाः । समुद्रमेवाविविगुर्भयार्ता प्रविश्य बोदधिमप्रमेयम् ॥२८ इम पश्चात् वह इन्द्राव उग वय रो पुन होकर समस्त देवगण के द्वारा मान होते हर दम रोदमी को मात करके स्थित होने वाले वृत्रासुर संगमीर में प्राश हो गये थे ॥२२॥ यह युवामुर भी विमरे पषिष्ट इन्द्र को २९ में पित होने वाला जान गया या पोर उम वृत्र गेसी मारी गजनी शनि की यो। ममी इन गन से पनि में यह भूमि-मयम्न दिशाएँ- २०० ] [ पम-पुराण प्राकाश-धौ और पर्वत सव कम्पित होकर हिल उठे थे ॥२३।। उस समय इस महान् घोर ध्वनि को सुनकर देवराज इन्द्र अत्यन्त अभिताप से युक्त हो गया था। वह भय से निमग्न होकर अत्यन्त प्रस्त हो गया था और उसने फिर उसके मस्तक में वह महान् वज्ज छोड दिया था ॥२४॥ वह वृत्रासुर जो कञ्चन से निर्मित माला को धारण करने वाला या इन्द्र के छोडे हुए वज्र से अभिहत होकर अत्यन्त घोर शब्द करता हुआ गिर गया। उस समय में गिरता हुमा वह ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे कोई महान् शैत्र सामने मन्दराचल के सहित भगवान् विष्णु के हाथ से छूट गया हा ॥२५॥ उप्स महान् दत्य के हत हो जाने पर भय से पीडित होकर इन्द्र सर में प्रवेश करने के लिये दौड गया था। उस देवराज ने अपने हाथ से छूटा हुमा वन तो समझ लिया था किन्तु भय के कारण उसने वृत्र को मरकर गिरते हुए नहीं देखा था ॥२६॥ सब देवता बहुत ही प्रानन्द मग्न एव परम प्रसन्न हो गये और म.पि गण भी बहुत खुश होकर इमका स्तवन कर रहे थे । बचे हुए जो प्रमुर उस समय उस युद्ध स्थल मे थे वे सब वृन के बध हो जाने से अभितप्त हो रहे थे । उनको देवो ने एकत्रित होकर शीघ्र ही मार दिया था ॥२७॥ उम समय मे देवगण के द्वारा मारे गये वे महासुर जिनका वायु के समान वेग था भय से पीडित होते हुए प्रथाह समुद्र में घुमवर उभी मे प्रवेशवर विलीन हो गय ॥२८॥ झपाकुल रत्नसमाकुल च तदास्म मन्न सहिता प्रचक्रः । तत्रस्म केचिन्मतिनिश्चयज्ञास्तास्तानुपायापरिचिन्तयन्त ॥२६ भयादिता देव निकायतप्तास्नलोक्यनाशाय मतिप्रचक्रु । तेपा तु तत्र क्षयकालयोगाद्धोरामतिश्चिन्तयता बभूव ॥३० ये सन्ति विद्या तपसोपपन्नास्तैपा विनाश प्रथम च कार्य । लोकाश्च मर्वे तपसा ध्रियन्ते तस्मात्यरध्व तपमा क्षयाय ॥३१ ये सति केचिद्धि कम-धराया तपस्विनो धर्मविश्च तज्ञा । तेपा वधश्च क्रियता हि क्षिप्र तेषु प्रनप्टेपु जगद्विनष्टम् ।।३२ एव हि सवें गतबुद्धिभावा जगद्विनाशे परमप्रहृष्टाः । दुर्ग समाश्रित्य महोमिमन्त रत्नाकरं वारुणमालय स्म ।।३३ वृत्रासुर-वध तथा अगस्त्य० ] [ २०१ . . समुद्र ते समासाद्य वारुणं त्वम्भसानिधिम् । कालेयास्समपद्यन्त त्रैलोक्यस्य विनाशनेः ॥३४ ते रात्री समभिद्धा बभक्षुस्तांस्तदा मुनीन् । प्राश्रमेपुच ये सन्ति पुण्येष्वायतनेषु च ।।३५ झप मछलियो से घिरे हुए और रलो से आकुल उस समुद्र में सबने एकत्रित होकर मन्त्रणा की थी। वहां पर कुछ लोग मति निश्चय के ज्ञाता उन-उन उपायो का चिन्तन कर रहे थे |२६|| भय से पीड़ित मौर देवो के समुदाय से सतप्त होने वाले उन्होने त्रिलोकी के नाश कर देने की बुद्धि की थो । नहाँ पर चिन्तन करने वाले उनको कालक्षय के योग से अति घोर बुद्धि हो गई थी ॥३०॥ जो भी कोई विद्या और तप से समन्वित हैं उनका विनाश सबसे पहिले करना चाहिए । समस्त लोक तप से हो धारण किये जाते हैं इसलिये तप के लिये ही शीघ्रता से कार्य करें ॥३१॥ जो कोई भी इस पृथ्वी पर तपस्वीजन हो और धर्म के ज्ञाता पुरुप हो उनका ही वध शीघ्राति शीघ्र कर दिया जावे । उनके नष्ट हो जाने पर यह समस्त जगत् नट हो जायगा । ॥३२॥ इस प्रकार से सभी लोग हीन बुद्धि हो गये थे और सम्पूर्ण जगत् के विनाश के कार्य से बहुत ही प्रसन्न थे। महान् मियो से युक्त रतो की खान उस वरुण देव के प्रालय सागर को अपना एक किला समझकर वे मब उसी में समाश्रित हो रहे थे । ३३।। जलो के निघि उस वारुण समुद्र को प्रप्तकर वे कालेय तीनो लोको के विनाश करने में सनग्न हो गये थे ॥३४॥ वे लोग अत्यन्त अभिऋद्ध होकर रात्रि में उस समय उन मुनियो का भक्षण करते थे जो अपने पाश्रमो मे और पुष्प मायतनो में निवास किया करते थे ।।३५ । अाजग्मु परमोद्विग्नास्त्रिदशा मनुजेश्वर । समेत्य ममहेन्द्रास्तु भयान्मन प्रकिरे ॥३६ नागयण पुरस्कृत्य वैकुण्ठपपगजिनम् । ततो देवास्समेतास्ते तदोचुर्मधुसूदनम् ॥३७ त्व न स्रष्टाच गोप्ता च भर्ता च जगत'प्रभोः । त्वयासृष्ट-जगत्सर्व यच्चेङ्ग यच्चनेगति ॥३८ २०२ ] । पा-पुराण ते प्रविश्योदधि घोरं नानाग्राहसमाकुलम् । उत्सादनार्थ लोकस्य रात्री नन्ति मुनीनिह ॥३६ न तु शक्या.क्षय नेतं समुद्रान्तहिता हि ते । समुद्रस्य क्षये वुद्धिर्भवद्भि परिचिन्त्यताम् ।।४० एतच्छु त्वा वचो देवा विष्णुना समुदाहृतम् । परमेष्ठिनमासाद्य अगस्त्यस्याश्रम ययु. ४१ तत्रापश्यन्महात्मान वारुण दीप्ततेजसम् । उपास्यमानमृपिभिर्देवैरिव पितामहम् ।।४२ तेऽभिगम्य महात्मान मैवावरुणिमुत्तमम् । अप्रमत्त तपोराशि कर्म भि स्वरनुष्टितं. ॥४३ हे मनुजेश्वर | उम समय में अत्यन्त उद्विग्न होकर देवता वहाँ पर पाये थे और महेन्द्र के सहित सब एकत्रित होकर भय से भोत हुए मन्त्रणा करने लगे ॥३६।। इसके अनन्तर एकत्रित हुए वे सब देवता अपराजित वैकुण्ठ निवासी नारायण के आगे होकर भगवान् मधुसूदन में बोले । हे इस सम्पूर्ण जगत् के स्वामिन् ! पाप हो हम सबके सृजन करने वाले हैं । माप ही रक्षक और सबका भरण करने वाले हैं। इस सम्पूर्ण जगत् को जो स्थावर और जङ्गम स्वरूप वाला है आपने ही रचा है ॥ ३७१३८ ॥ देवगण के द्वारा इम प्रकार से प्रार्थना करने पर भगवान् विष्णु ने कहा-हे समस्त सुरगणो ! मुझे प्रजा के क्षय होने का कारण ज्ञात होगया है । मैं भाप सबको भी बतलाता है। प्राप सब सन्ताप का त्याग करके उसका प्रवण करो। परम दारुण कुछ गण हैं जो कालकेय'--इम नाम से प्रसिद्ध हैं ॥३९॥ वे वृत्रासुर को मरा हुआ देखबर जो कि इन्द्र ने अपनी बुद्धि के बल से मार डाला था, मपने जीवन की रक्षा करते हुए वरुणदेव के प्रालय समुद्र में प्रविष्ट हो गये हैं ॥ ४० ॥ अनेक ग्राही से घिरे हुए हप पोर उदधि में वे प्रवेश परके लोको के नाश करने के लिये रात्रि में मुनियों को मारा करते हैं ॥४॥ वे समुद्र के अन्दर छिपे हुए रहते हैं इगलिये उनका क्षय नही किया जा सकता है। अब पाप लोग इस समुद्र क जल का ही शोषण होवर क्षय हो जाये-ऐमी कोई बुद्धि का चिन्तन

वृत्रासुर-बध तथा अगस्त्य०
[ २०३
करो ।। १२ ।। भगवान विष्णु के द्वारा कहे हुए इस वचन को मुनकर देवगण
परमेष्ठी ब्रह्माजी के पास पहुंचकर फिर अगस्त्य मुनि के आश्रम में गये थे ।४३
नहुपेणाभितप्तानां लोकानां त्वं गतिः पुरा ।
भ्र शितश्च सुरैश्वर्याल्लोकार्थ लोककण्टकः ॥४४
कोधात्प्रवृद्ध समहान्भास्करस्य नगोत्तमः।
वचतवानतिकामन्विन्ध्य.शैलो न वर्धते ॥४५
तमसाच्छादिते लोके मृत्युनाभ्यर्दिता प्रजाः ।
त्वामेव नाथमागम्य निवृति परमागताः ।।४६
अस्माक भयभीताना नित्यमेव भवान्गतिः।
ततस्त्वद्य प्रयाचामस्त्वां वर वरदो ह्यसि ॥४७
विदशानांवच श्रु त्वा मैत्रावरुणिरब्रवीत् ।
किमर्थं समुपायाता वरमत्त किमिच्छथ ॥४८
एवमुक्तास्तदा तेन देवास्त मुनिमव बन् ।
इच्छाम एक वरमद्भुत वय पिवार्णव देवमुने महात्मन् ॥४६
एव त्वयेच्छेमकृले मह महारराव पीयमान समग्रम् ।
ततो विहन्याम च सानुवन्ध कालेयसज्ञ सुरविद्विपा बलम् ॥५०
त्रिदशानावच श्रुत्वा तथेति मुनिरब्रवीत् ।
करिष्ये भवता कामलोकानासुखकारकम् ।।५१
वहां पर देवो के द्वारा पितामह की भांति ऋपयो के द्वारा उपासित
होने वाते-दीप्त तेज से युक्त महात्मा व रुण का देवगरा ने दर्शन प्राप्त किया
था। वे मब परमोत्तम महान् प्रात्मा वाले-प्रमाद से रहिन अपने किये हुए
कमो र तप के समूह मैत्रावरिण के पास उपस्थित हुए थे ॥४४॥४५॥ देवगए
ने कहा-हे मुनिवर ! पहिले नहुष के द्वारा अभिताप ६ सयुत लोगो को माप
हो गति हुए थे अर्थात् प्रापन ही लोको को उद्धार किया था। लोकों की भलाई
के लिये उम लोगो को कष्ट देने वाले कण्टक रूपी दुध का सुरंश्वयं से भ्रम
किया था ।।४६।। वह भ कर का नगोत्तम अर्थात् पर्वनी में श्रेष्ठ बहुत बड़ा था
मोर प्रोध से अत्यधिक बढ़ता ही जा रहा था। उस समय उसने प्र.पवे वचन

२०४ [ पद्म पुराण को भी अवहेलना करदी थी। इसका परिणाम यह हुमा कि अब वह विष्प नहीं बढ़ता है ।। ४७ ॥ मन्धकार मे समाच्छादित इस लोक में सम्पूर्ण प्रजा अत्यन्त ही मृत्यु के द्वारा उत्पीडित हो रही थी । उस समय में नाय मापको हो प्राप्त करके समस्त प्रजा परम निति को प्राप्त हुई थी ॥ ४ ॥ हम लोग जब कभी भी भय से त्रस्त होते हैं उस समय में हमेशा ही माप हमारे उतार करने वाले हुमा करते हैं । इसीलिये माज भी हम सब मापको याचना कर रहे है । माप ही परम श्रेष्ठ और रक्षक हैं । पब माप हमको वरदान प्रदान करने वाले हो जाः ॥ ४६॥ देवानों के हम प्रार्थनापूर्ण वचन को श्रवणकर मंत्रावरुणि बोले-हे देवतांनो ! माप लोग यहाँ किस प्रयोजन की सिद्धि के लिये पाये हैं और माप लोग मुझमे क्या वरदान चाहते हैं ? ॥ ५० ॥ उस महपि के द्वारा इस प्रकार से कहे गये देवगण उम मुनि से बोले- हम लोग मापसे एक प्रत्यद्भुत वरदान चाहते हैं । हे महात्मन् ! हे देवमुने ! माप इस सागर का पान कर लीजिये । है मह ! हम लोग भापके द्वारा इस सम्पूर्ण महासागर को पोया हुमा चाहते हैं पापके द्वारा इस प्रकार किये जाने पर फिर हम देवो के शत्रुओं के कालेय सज्ञा वाला जो बल है उसे मनुबन्ध के सहित नष्ट कर देंगे ।। ५१॥ एवमुक्त्वा ततोऽगछत्समुद्र निधिमम्भसाम् । तप.सिद्ध श्च मुनिभि-सार्धदेवश्च सुव्रत ॥५२ मनुष्योरगगंधर्वा यक्षाः किंपुस्पास्तथा। अनुजग्मुर्महात्मानं द्रष्टुकामास्तदद्भुतम् ॥५३ ततोऽभ्यपश्यत्साहितः समुद्र भीमनिःस्वनम् । नृत्यन्तमिवचोर्मीभिर्वलगन्तमिव वायुना ॥५४ हसतमिव फेनौ र स्खलन्तं कन्दरेपु च । नानाग्राहममाकीर्ण नानाद्विजगणैर्युतम् ।।५५ अगस्त्यसहिना देवाः सगंधर्व महोरगाः । ऋषयश्च महाभागा. समासेदुमहोदधिम् ॥५६ समुद्र' स समानाथ वारुणिर्भवानृषिः । उवाच सहितान्देवानृपीस्तांस्तु समागतान् ।।५७ .

वृत्रासुर-बध तथा अगस्त्य० ] [ २०५ देवगण के इस वचन को सुनकर मुनि ने 'तथास्तु' अर्थात् ऐसा ही किया जायगा--यह कहकर स्वीकार कर लिया था। मुनि ने इसके उत्तर में कहा था-हे देवगण ! मैं आप लोगो का कार्य कगा क्योकि वह भापकी अभिलापा लोको को सुख प्रदान करने वाली है ॥५२॥ हे सुव्रत ! इस प्रकार से कहकर फिर वह जलों के निघि समुद्र के समीप चले गये थे । जनके साथ बहुत- से तपस्या में सिद्ध-मुनि और देवगण भी गये थे ॥५३। इस परम अद्भुत कार्य को देखने की इच्छा वाले उन महात्मा के पीछे पीछे मनुष्य-उरग- गन्धर्व-यक्ष-विम्पुम्प भी चले गये थे ।।१४।। इसके मनन्तर सबके साथ उन मुनि ने महान् भयानक शब्द करने वाले अमियो (लहरों) के द्वारा नृत्य सा करता हुआ मोर वायु से वल्गते हुए समुद्र को देखा था। फेनों के समूह से हास करते हुए की भांति वन्दराओ मे स्गलन करते हुए अनेक प्रकार के ग्राहो से समन्वित पौर विविध भांति के पक्षियों से युक्त सागर को उन मुनि ने देखा था ।।५५.५६॥ मगस्त्य मुनि के सहित देवगण, गन्धवों के साथ महोरग, कृषि वृन्द पोर महाभाग्य वाले सब लोग समुद्र के पास प्राप्त हो गये थे ॥५७।। पातुकामः समुद्र च अगस्त्यपिमत्तमः । एप लोहितार्थाय पियामि वरुणालयम् ॥५८ भवतां यदनुप्ठेयंतच्छीघ्र सविधीयताम् । एतावदुत्वा वचन मंत्रावरुणिरमनः ॥५६ समुद्रमपिवत्कुदःमर्वलोकस्य पश्यन: । पीयमान समुद्र तु दृष्ट्वा देवाः सयामवाः ॥६० विस्मय परमंजग्मुस्स्तुतिभिश्वाप्यपूजयन् । त्व नम्माता विधाता च लोकाना लोकभावनः ॥६१ त्वत्प्रसादात्ममुत्सेधमुपगच्छेत्मम जगत् ॥६२ सपूज्यमानस्त्रिदामहात्मा गन्धयं मुग्येपु नदरमु य । दिव्यंश्च पुष्परवकोयंमारणो महार्णवं निगसिल चकार ॥६३ दृष्टा वृत निःमलिलं महार्गवं सुरा:समस्ना. परमप्रष्टाः । प्रगृह्य दिशानि वरायुधानि तान्दानवाशानुग्दीनमत्याः । ६४ [ एष पुगए वह भगवान् धारणि मापि ममुद के समीप में पहुंचकर पाये हुए उन समस्त देवता और स्मृतियो से बोल-11५८॥ सपियों में परम था मगस्त्य पर समुद्र के पान करने की इच्छा वाले हैं। यह में लोको के हित मम्पादन करने से हो लिये इस वक्ष्ण के मालय सागर पा पान रता हूँ। ५६॥ इम समय में माप लोग को जो भी कुछ करना हो उसे अति शीघ्रता से बर डालना चाहिये । इनता वचन वार मैना वरिण ने सत्र के प्रागे सभी लोगों में देखते हुए ऋद्ध होकर समुद्र का पान कर लिया था। पीये गये उम समुद्र को देख कर इन्द्र के सहित सब देवगण वहाँ उपस्थित थे ॥६०१६ सभी लोग परम मायचयं को प्राप्त हुए थे और फिर सबन स्तुनियों के द्वारा उनकी अर्चना की पो। माप लोकों पर मनुयह करने वाले हैं । माय हमारी रक्षा करने वाले हैं ॥६२।। पापकी कृपा से यह सम्पूर्ण जगत् समुति को प्रास हो गया ॥६३।। गन्धों प्रमुखों के द्वारा जयकार को ध्वनि को जाने पर यह महान आत्मा वाले महपि प्रगस्त्य देवगण के द्वारा भली भांति पूजित हुए थे । देवाङ्गनामो के द्वारा दिव्य पुमो की भाकाश से उन पर वृष्टि की गई यो। इस तरह से उम महर्षि ने उस सागर को पीकर जलयूय बना दिया था ॥४॥ ते वध्यमानास्त्रिदशर्महात्मभिर्महावलवेगयुत दद्धि । न से हिरे वेगवता महात्मना वेग तदाधारयितु दिवौकसा ॥६५ ते वध्यमानास्त्रिदशैर्दानवा भीमनि स्वना । चक्र सुतुमुलयुद्ध मुहूर्तमिव भारत १६६ ते पूर्व तपसादग्धा मुनिभिर्भावितात्मभि । मतमाना पर शात्या निदर्शनिनिपूदिता ॥६७ ते हेमनिष्क भरणा कुण्डलाङ्गधारिण । निहता वह्वशोभत पुष्पिताइव किंशुका ॥६८ हतशिष्टास्तत केचित्कालेयदनुजोतमा । विदार्य वसुधा देवी पातालतलमाश्रिता ॥६६ निहतान्दानवान्दृष्ट्वा विदशा मुनिपुङ्गवम् । तुष्टुवुविविधर्वाक्यरिदचैवाव वन्वय ५० वृत्रासुर-यघ तथा अगस्त्य० ] [ २०० उम महासागर को जल से रहित बनाया हुपा देयकर समस्त देवता अत्यन्त ही प्रसन्न हुए थे । पूर्ण मत्त मे समन्वित देवी ने अपने पि एव परम प्रेष्ठ घायुधो को ग्रहण कर उन ममुद्र में छिपकर रहने वाले दानों को मार दिया था ॥६५।। महात्मा देवगणो के द्वारा वध किये जान याले दे दानव उम समय में उनके वेग को रोकने में ममयं नहीं हो मरे थे। ये देवता भी महान यन में मम्मन थे और अत्यात वेग से युक्त सिंहगर्जन करने वाले थे। ऐम देव गण वा वेग मी महान् हो था जिसका महन करना बहुत ही पानको के लिये कठिन हो रहा था ।।६६।। हे भारत । जिम ममय में वे दानवरा देवी , द्वारा वध किये जा रहे थे वे बडा ही भयानक पद पर रहे थे पौर घोडी देर त देवो पे गाए उन्होंन महान पोर युट भी frया पा ॥६७। वे दानव पहिले तो भावितारमा मुनियों के द्वारा ता से दग्घ दिये गय गये में फिर थे प्रयत्नशील देवगण द्वारा पति से नए रिय गये ॥६॥ ये गुणं रे निष्प याभरण वाले पोर पुण्डल सपा पदो प धारण करने वाले भाव जय निहत होर भूमि पर पड़े हुए थे तय सब सिने हुए पृषों से युक्ता frer ये वृक्षों के समान प्रत्यधिक शोभित हो रहे थे । ६७।। म समय में जो भी दानव नन में दोप बच गए थे, जो दनों में उत्तम रालेय नाम गे प्रमित थे, वे इस भूमि का विदारण पर पताण सम में जारर स्पिा हो गय थे। वहा पर ही उन्होंने अपना आश्रय ना लिया ॥ त्वत्प्रमादान्महामांग लोक प्राप्त महत्गुनम् । त्यतेजमा च निहता पालयाभीमविनमा ७१ पूग्यस्त्र महाविप्र गमुद्र लोपभायनम् । यत्वया गरिसीवनदम्गिगुनमग ०२ एवमुक्त प्रत्युवाच भगशामुनिपुनय । जोगदि ममा तोपपायाम्प प्रनिनयमाम् ॥७३ परगाय गमुदाय भवायलमाग्यितः । एय अत्यात यगन महाभायिनान्मनः । यिस्मिनाभ विपणा या माशामुराः। परस्परगनुाप्प प्रगम्य मुनियम् ॥५ २०८ ] [ पद-पुराण प्रजाःसर्वामहाराज निमाजग्मर्यथागतम् । विदया विष्णुनासाद्धं मनुजम्मुः पितामहम् ॥७६ पूरणार्य समुद्रस्य मन्त्रयन्तःपरस्परम् । ऊचुःप्रासलयस्सर्वे सागरस्य हि पूरणम् ।।७७ समस्त दानवों को निहत (मरे हुए) देषकर देवगए मुनियो में प्रत्यु.. त्तम अगम्त्य का स्तवन करने लगे थे मोर अनेक प्रकार के वाक्यो से उनकी स्तुति की थी। फिर देवतानों ने उनसे यह वचन बोले थे--1७१॥ हे महा भाग ! पाज भापके ही प्रसाद से समस्त लोकों ने यह महान सुख प्राप्त किया है । यह प्रापके ही तेज का प्रभाव है कि बडे ही भीषण पराक्रम वाले ये कालेय दानव मारे गये है । ७२॥ हे महावित्र! प्रब भाप इस लोक पर कृपा करने वाले इम समुद्र को पूरित कर दीजिये । मापने जो इसके जल का पान कर लिया है उसे पुन: इसी मे छोड दीजिये । जिमसे यह फिर पूर्व की भौति जल से भरा पूरा दिखलाई देने लगे ॥७३॥ इस तरह से प्रार्थना किये गये मुनि श्रेष्ठ ने उन देवों से कहा था कि वह जन तो मुझे सब पच गया है । अब तो इसका कोई अन्य उपाय ही सोचिये। यदि भाप लोग इस सागर को जल से पूरित करना चाहते हैं तो पाप कोई भी और यत्न करने में समास्थित हो जाइये । इस तरह भावित आत्मा वाले उस महपि के वचन को उन समस्त देवों ने श्रवण किया था ॥६४॥ तब तो समस्त सुरगण बहुत ही प्राश्चर्य मे समन्धित और अत्यन्त विपाद से सयुक्त हो गये थे। उन सबने मापस में अनुज्ञापन करके मुनि श्रेष्ठ को प्रणाम किया था ||७|| हे महाराज ! उस ममय में सारी प्रजा मोर विप्रगरण जैसे ही वहां पर पाये थे, चले गये थे। गमस्त देवगए भगवान् विष्णु के साथ फिर पितामह के पास चले गये थे। ११७६॥ सभी देवता उम समुद्र को जल से भरा पूरा करा देने के लिये प्रापस मे मन्त्रणा करते हुए हाथ जोडकर सबने सागर की पूर्ति के लिये प्रार्थना की थो।।७७॥ तानुवाच समेतांस्तु ब्रह्मा लोकपितामहः । गच्छध्वं वियुधास्सर्वेयथाकामं यथेप्सितम् ॥७८

वृत्रासुर वध तथा भगस्त्य० ।
[ २०६
महताकालयोगेन प्रकृति यास्यतेऽर्णवः ।
ज्ञातीस्तु कारणं कृत्वा महाराजोभगीरथः ७६
गगोधेन समुद्र च पुन मपूरयिष्यति ।
एव ते ब्रह्मणा देवा प्रेपिता ऋपिसत्तमाः ।।५०
उवाच भगवांस्तुष्टस्त्वगस्त्यमृपिसनमम् ।
देवकार्य तु भवता दानवानां विनागनम् ।।८१
यतस्सतारिता देवास्तेनतुष्टोऽस्मि वै मुने।
अभिप्रेतो वरो यस्ते याचयस्व ददाभितम् ।।८२
एवमुक्तम्तदागस्त्यः प्रणिपातपुर सरम् ।
इहस्थेन मया देव देवकार्यमिद कृतम् ।।८३
सर्वाश्रमायां प्रवरो भवत्वेप ममाश्रमः ।
स्वया चोक्तस्तु भगवन्भविता नात्र संशयः ।।८४
उन समस्त ममागत हुए देवतापो से पितामह श्री ब्रह्माजी ने कहा था
के है देवगण ! माप सब लोग अपनी इच्छा के अनुसार अपने-अपने अभीष्ट
स्थान पर चले जावे ॥७८॥ महान् काल के योग से यह महासागर अपने ही
माप स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो जायगा । महाराज भगीरथ अपने भाइयो
तथा पूर्वजों के उद्धार का कारण बनकर ऐसा ही कोई कार्य करेंगे । ७६
इस सागर को गङ्गा के प्रवाह मे फिर पूरित कर देंगे।
हे ऋपियो मै श्रेष्ठ गयो । पितामह ने उन देवतानो को वापिस भेज दिया था
1501 फिर भगवान् ने परम प्रसन्न होते हुए अगस्त्य सृपि श्रेष्ठ से कहा था
कि आपने देवतामो का बहुत बडा यह कार्य किया है जिससे कि दानवो का
पूर्ण विनाश हो गया है ।।१।। हे मुने । भाग्ने समस्त देवो को संतारित कर
दिया है, इससे मैं पाप से बहुत ही प्रसन्न एप तुट हो गया हूं। अब पापको जो
भी अपना अभीष्ट वरदान हो वह मुझ से इस समय में मांग लो। उसे ही मैं
आपको दे दूंगा 1६२॥ इस रीति से जद मुनि से कहा गया तो अगस्त्य मुनि
ने प्रणाम करके कहा है देव ! मैने यहां पर स्थित होकर ही यह देवगण
का महान कार्य सम्पन्न कर दिया है ।।४। इसनिये अब मेरी यही प्रार्थना है

. २१. ] [ पद्म-पुराण कि यह मेरा माश्रम समस्त प्रायमों से पृतम हो जाये । प्राप ने जब यह दिया है तो यह अवश्य ही ऐमा ही हो जायगा--इस में लेशमात्र भी समय नहीं है।॥४॥ अाश्रमेषु यथोक्त पु यथोक्त वै द्विजातयः। ये वर्तन्ते समन्त्रास्तु तेपा लोकामहोदयाः ८५ ये न हिंसन्ति भूतानि कर्मणा मनसा गिरा। अनृशंसतराः सन्तः सर्वदा व प्रियंवदाः ।।८६ अग्निहोत्ररतानित्यं नित्यं चातिथिपूजकाः । नित्यं स्वादयायवन्तश्च नित्य स्नानपरायणाः ॥८७ मातृवत्स्वसृवच्चय तथा दुहितृवच्च ह । परदाराप्रपश्यन्ति सततं विगतस्पृहः ।। येऽधिक्षिप्ता: न कुप्यन्ति न हिंसन्ति च हिसिताः । समदुःखसुखाः सन्तो महात्मानो जितेन्द्रियाः । ते हि सर्वे प्रपश्यन्ति पुरा रुमहीमिमाम् । समाधिना चिन्तयन्तो ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥६० ब्रह्माजी के वरदान से फिर ऐसा ही प्रभाव हुमा था कि ययोका पायमों में जो द्विजातिगण थे वे सभी ठीक-ठीक प्राश्रमो का परिपालन करने वाले थे । जो वहाँ रहते थे वे सब मन्त्रो से युक्त थे और उनके लोक भी महान दपा वाले थे 11८५|| वहाँ पर कोई भी मन-बागी और कर्म के द्वारा प्राणियो की हिंसा नहीं करते थे । सभी लोग नृशमता से रहित होते हुए मदा परम प्रिय वचन बोलने वाले थे १८६|| समस्त लोग अग्निहोत्र करने में रत रहने वाले थे और नित्य ही अतिथियो की अर्चना किया करते थे। सभी लोग नित्य ही स्वाध्याय क्यिा करते थे और नित्य स्नान करने में तत्पर रहते थे ।।१७॥ सब लोग पराई त्रियों को माता, भगिनी और पुत्री के समान देखा करते थे और सर्वदा कोई भी किसी प्रकार की स्पृहा नहीं किया करते थे ।।८। उन पर कोई प्रधिप भी कर देता या तो भी वे किमी भी प्रकार कोर नहीं किया करते थे। यदि कोई पुरुप उनके प्रति हिमा का भाव रखता था तो वे स्वयं - 1 वृत्रासुर वध तथा अगस्त्यः ] [ २११ हिंसित होकर भी किसी प्रकार भी बदले में हिमा नहीं किया करते हैं । सभी । महान् प्रारमा वाले, इन्द्रियो को अपने वश में रख कर उन्हे जीत लेने वाले थे और उनके लिये सुख तथा दुख दोनो ही समान थे ॥६॥ पे सब पहिले इस भूमि पर समभाव से देखते हुए विचरण किया करते थे । समाधि से सर्वदा सनातन ब्रह्मलोक का चिन्तन किया करते थे 11ol अथाभवदनावृष्टि. कदाचिन्महती तदा । कृच्छ प्रायोह्यभूत्तत्र सर्वलोक. श्रुधादितः ॥६१ ततो निरन्नेलोकेऽस्मिश्चात्मानं ते परीप्सव. । मृत कुमारमादाय कृच्छ्रप्रायास्तदापचन् ॥६२ अथ पर्यचरत्तत्र क्लिश्यमानान्हि तानृपीन् । दृष्ट्वा राजा विपादात. प्रोवाचेद वचम्तदा ॥६३ प्रतिग्रहो ब्राह्मणाना दृष्ट्वा वृत्तिरनिन्दिता । तस्मात्प्रतिग्रहान्मत्तो गृह्णीध्वमुनिसत्तमा. ॥६४ वरान्ग्रामान्तीयिवारत्नानि काञ्चनम् । गाश्च धेनूश्च तत्सर्व मा मास पचत द्विजा: ।।९५ राजन्प्रतिग्रहो घोरो मध्वास्वादो विपोपम. । तज्जानता नः कस्मात्त्व कुरुपे सम्प्रलोभनम् ॥९६ दशसूनासमश्वको दशचक्रिममो ध्वजी। दशध्वजिसमा वेश्या दशवेश्यासमो नृप ॥६७ दशसूना सहस्राणि यो वायति शौण्डिकः । तेन तुल्यस्ततोराजा घोरस्तस्य प्रतिग्रह ॥ इसके अनन्तर किसी समय मे यहा पर बडो भारी अनावृष्टि हुई थी और वहां पर उम समय में सबका जीवन बहुत कष्टो से परिपूर्ण होगया था तथा सभी लोग भूख से पीडित हो गये थे ।।६।। उस समय लोक में प्रश्न का पूर्ण- तया प्रभाव होगया था और ऐमा महान् भीपण समय उपस्थित होगया कि लोग अपने प्राणो की रक्षा को इच्छा रखते हुए अपने ही मृा हुए कुमार को कष्टापन्न होकर पकाने लग गये थे ।।६२॥ वहाँ पर राजा ने क्लेश को प्राप्त हुए

२१२ ]
[ पम-पुराण
उन पियो को देसकर उनको परिचर्या की थी और उस समय मे विपाद से
अत्यन्त मात्त होकर उनसे वह यह वचन बोना । राजा ने कहा-ब्राह्मणो
का प्रतिग्रह एक मनिन्दित वृत्ति है-ऐमा देखकर मैं प्रार्थना करता हूं कि इम.
लिये हे मुनिश्रेष्ठो ! आप लोग मुझ मे प्रतिग्रह को ग्रहण करो ॥१४॥ पाप लोग
श्रेष्ठ ग्राम, ग्रीहि और यव, रम, रत्न, सुवरणं, गौ और धेनु ये सभी मुझ में प्राप्त
करो किन्तु हे द्विजगण ! आप लोग मांम का पाचन मत करो ||१५|| ऋषियों
मैं कहा-हे राजन् ! यह प्रतिग्रह तो महान् घोर मदिरा के या मधु के प्रस्वाद
के समान है किन्तु यह परिणाम में विष के हो तुल्य होता है। इसको भली.
भांति जानने वाले हम को ग्राप क्यों इसका प्रलोभन कर रहे हैं ? ॥६६॥ दश
सूनो के समान एक चक्री होता है और दश पक्रियो के तुल्य एक वजी होता
है। दश ध्वजियो के बराबर एक वेश्या होती है और दश वेश्याओ के समान
एक नृप हुमा करता है । सहस दशसूनों का जो वाहन करता है वह शोरिडक
होता है उसके ममान राजा कहा गया है । इमलिये राजा का प्रतिग्रह तो महान्
घोर होता है 1816
यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति ब्राह्मणो लोभमोहितः ।
तामिस्रादिपु घोरेपु नरकेषु सपच्यते ॥६E
तद्गच्छ कुशल तेऽस्तु सहदानेन पार्थिव ।
अन्येपा दीयतामेतदित्युक्त्वा ते वनं ययुः ॥१००
अथराजः समादेशात्तत्र गत्वाथ मन्त्रिणः ।
उदुम्बराणि व्यकिरन्हे मग रिण भूतले ॥१०१
ततो ह्यन्न विचिन्वन्तो गृह्ण श्चोदुम्बराण्यपि ।
गुरुरिण हि विदित्वा तु न ग्राह्यण्यत्रिरब्रवीत् ।।१०२
नास्महे मूढविज्ञाना नास्महे मन्दबुद्धयः ।
हैनीमानि जानीमः प्रतिबुद्धाः स्मज्ञानिनः ॥१०३
इहैवेद वसुप्रीत्य प्रेत्य वैकुण्ठितोदयम् ।
तस्मान ग्राह्यमेवैतत्मुसमानन्त्यमिच्छता ॥१०४
शतेन गुरिणतं निप्कं सहस्रण समन्वितम् ।
यश्चान्यतः प्रतीच्छेत्म पापिधा लभते गतिम् ।।१०५

[ पद्म-पुराण
अकिञ्चनत्वं राज्यं च तुलया समतोलयत् ।
प्रकिञ्चनत्वमधिकं राज्यादपि हितात्मनः ।।११०
अनर्थों ब्राह्मणस्यप यस्त्वर्थ निचयो महान् ।
अर्थश्वर्यविमूढो हि श्रेयसो भ्रश्यते द्विजः।
अर्थसंपतिमोहाय विमोहो नरकाय च ॥१११
तस्मादर्थमनाख्यं श्रेयोऽर्थीदूरतस्त्यजेत् ।
यस्य धर्मार्थमर्थेहा तस्यानीहा गरीयसी ॥११२
वसिष्ठ मुनि ने कहा-एक तो यहां पर तप का संग्रह करता है और
दूसरा जिम के पास घन का सञ्षय होता है। इन दोनो मे तप का मञ्चय ही
विगेपता से युक्त होता है धन का माह तो उसके मुकाबले में कुछ भी महत्त
नहीं पता है ।।१०७॥ इमलिये सभी प्रकार के मंचयों को त्याग दो। ये सभी
उपद्रव हैं मोर इनसे नाश की प्राप्ति हमा करती है । इम गंमार में कोई भी
सवय करने वाला पुरुप उपद्रव से रहित नहीं दिखाई देता है ॥ १०८।।
वाण जैसे-जैसे पमयनिग्रह को ग्रहण नहीं करता है यमे ही सन्तोष पाया
करने से उमा। प्राह्म-तेज बतमा है ।।१०।। मरिश्चनस्य अर्थात् पाम में कुछ
भी न रहना और राम के विशाल यमय को तुना में तोला गया था तो नग
समय में हिसारमा का जो अविश्वनस्य पा यह राज्य के मय मे पयिक प्राप्त
हुपा पा ११० पश्यप ऋण ने कहा- जो ग्रहगर पाम प्रथम महान
निमय होता है वह प्राण में वियं एक प्रसार का मन हो होता है। जो
प्राण ऐश्वर्य में विमूर हो जाता है यह अंय में प्रष्ट हो जाया करता है।
प्रपोजो मम्मति होनी है उममे विशेष मोह हो जाया परमार
शिमोह नरम निपेशकमा है ।।११।। ममिय यह गोप (धन-कौनस)
है ५ प्रम माम
याहा है मग हम अपं में भनी त
गदा होती । जो भर पाने पापा को गदर में ही ग प को
देवा पाएगी का धर्म पाने पिये पापो प्रावी.
मागी पी पी होती. भा होगा
न पिलगा पापी धान ॥११॥

-
वृत्रामुर-बध तथा अगस्त्य.
। २१५
ये लोका दानशीलानां स तानाप्नोति शाश्वतान् ।
योऽर्थानिच्छेन्नृपाद्विप्र शोचितव्यो महर्षिभिः ।।११३
न स पश्यति मूढात्मा नरके यातनाभयम् ।
प्रतिग्रहसमर्थोऽपि न प्रमज्येत्प्रतिग्रहे ॥११४
प्रतिग्रहेण विधारणा ब्राह्म तेज प्रशाम्यति ।
प्रतिग्रहसमर्थाना निवृत्ताना प्रनिग्रहात् ॥११५
य एव ददता लोकास्ता एवप्रतिहनाम् ।
विमतंतुर्यथानित्यमम्भस्थस्सतत वियेत् ॥११६
तृष्णा चैवमनाद्य ता तथा देहगतासदा ।
या दुम्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीयं तिजीयंत: ॥११७
योऽसी प्राणान्तिको रोगस्ता तृष्णा त्यजत मुखम् ।
इत्युक्त्वा हेमग रिण त्यक्त्वा तानि फनानि वै ।।११८
ऋपयोजंग्मुरन्या सर्व एव हनवता. ।
ततस्ते विचरन्तो वै मध्यम पुष्कर गता. ॥११६
दानशील पुरुषों के जो लोक होते हैं वे शाश्वत अर्थात् निरय होते हैं ?
उनको यह शक्ति जो धन में प्राप्न बरन नो इच्छा नही करते हैं प्रान किया
परते हैं। जो विप्र राजा से धन प्राप्त करने की मारिया करते हैं ये महपियो
के द्वारा शोचनीय होते हैं ॥११॥ वह ऐमा मूड पामा यात्रा होता है कि
उमे नरक में मिलने वाली पाननापोरा भय भी नदी दिपना दिया परता
है । प्रतिपद में ममा होते हुए भी प्रतिमाह में प्रमति नही रता है ।।११४॥
प्रतिग्रह लेन गे विप्रो का जो ब्रह्म रोज होता है यह नष्ट हो जाया करता है।
जो प्रनिग्रह व महा परम की गति रयत और फिर भी प्रनिग्रह सेनेग
निवृत होतोम प्रसार ही उन्ह हो मोग दन है और ये ही उमे प्रहण
नही लिया है। पन्धनी -fRT प्रसार गे विग मानतु जम में
पित हर ही मदा वा रिया करता है ॥१९॥११॥ यह कृष्णा मादि
मोर मा म रहित होती है और माइम देदन माप हो सगो रहा करती है।
यह नृगा ऐसी ही होती है युगे युधिवानों द्वारा यह स्याग करने के

[ पन पुराण योग्य नहीं होती है । यह जीरा शरीर हो जाने पर कभी जीणं नहीं हुमा करती है ॥११७।। इस प्रकार से कहते हुए उन्होंने उन मध्य में सुवरणं वाले उदुम्बरों का त्याग कर दिया या॥११॥ वे समस्त ऋषि लोग बहुत ही मुदृढ प्रत वाले थे और वहां से किसी अन्य स्थान में चले गये थे। इसके मनन्तर वे विचरण करते हुए मध्यम पुष्कर में पहुंच गये थे ॥११॥ ददृशुः सहसा प्राप्त परिवाज शुन.सखम् । तेनेह सहितास्तत्र गत्वा किञ्चिद्वनान्तरम् ।।१२० सरः परमपश्यन्त वृतं पद्मर्जलासयम् । निविष्टा,सरसस्तीरे चिन्तयन्तो गतिशुभाम् ॥१२१ शुनःसखो मुनीन्सर्वानुवाच क्षुधितांस्तदा । सर्वे वदन्तु सहिता, कोदशी क्षुत्प्रवेदना १६१२२ तमुचु महिनास्ते तु परिव्राजं शुन.ससम् । शक्तिखड़गगदाभिश्च चक्रतोमरसायकः ।।१२३ बाधितवेदना या तु क्षुधयासापि निजिता । श्वासकुठक्षयाठोली बरापस्मारमूलकै ।।१२४ याधिभिजनितासापि क्षुधायानाधिकाभवेद । हिरण्याङ्गदकेयूरमुकुटोज्ज्वलकुण्डलाः ॥१२५ वहाँ पर उन्होने सहसा प्राप्त हो जाने वाले परिव्राज शुर:मख को देखा या । उमी के साथ मिलकर वे किसी दूसरे वन मे चले गये थे ॥१२०।। वहीं पर कमलो से घिरा हुमा बहुत ही उत्तम एक जल का मामय मरोवर देखा था। वे सब उप सरोवर के तट पर बैठ गये थे और शुभ गति के होने के विषय में चिन्तन करने लगे ॥१२१॥ उस समय में क्षुधा से युक्त और पीडिन उन समस्त मुनियो से शुनःसख परिव्राजक ने पूछा था-माप लोग सब हित के सहित यह बनला कि भुरा के कारण उत्पन्न होने वाली वेदना किस प्रकार की होती है ॥१२२।। उस रीति से पूछे जाने पर उन सब ऋपियो ने मिलकर उस परिवाजक शुन,मख को उत्तर देते हुए कहा था कि शक्ति खत-गद घ--तोमर और सायक प्रायुधों से वाधिन किये जाने पर जो वेदना उत्पन्न . जिम प्रकार ममूर्य की किग्ग भूमि में रहने वाले जन वा विपण वृत्रासुर वध तथा प्रगस्त्य० ] [ २१७ होती है उसको भी क्षुधा से होने वाली वेदना ने जीत लिया है अर्थात् उपयुक्त शस्त्रास्त्रो के द्वारा प्रहार प्राप्त करने से होने वाली वेदना से भी कहीं अधिक वेदना क्षुधा के कारण हुमा करती है । श्वाम-कुष्ठ (कोढ)-क्षय- अष्टोली- ज्वर-अपस्मार (मृगी) और शून रोगो से जो वेदना मनुष्यों को हुप्रा करती है वह भी क्षुधा के कारण से होने वाली वेदना से अधिक नहीं होती है । क्षुधा के कारण तो ऐमो विकलता उत्पन्न हो जाती है कि सुवर्ण के निर्मित अङ्गद- केयूर-मुकुट और अत्युजवल कुण्डल ये समस्त भूपण क्षुधा में अच्छे नही लगा करते हैं, वहां पर जो भी मनुष्य स्थित होते हैं उन्हे कुछ भी नहीं सुहाया करता है ॥१२३३१२४।१२।। क्षुधाया न विराजन्ते तनये सस्थिता नराः। यथा भूमिगत ताय रविरश्मिविवर्पति ॥१२६ तद्वच्छरीरजानाड्यःशोषयन्ते जठगग्निना । न शृणोति न दाघ्राति चक्षुपा नैव पश्यति ॥१२७ दह्यते क्षोयते मूढ शुष्यते क्षुधयादित । न पूर्वा दक्षिणा चापि पश्चिमा नोत्तरामपि ॥१२८ नचाधो नैव चोर्ध्व चक्षुधाविष्टो हि विन्दति । मूत्व बधिरत्व च जडत्वमथपड गुता ।।१२६ भैरवत्वममर्याद क्षुबाया सप्रवर्द्धन । जनक जननी पुवान्भार्या दुहितर तथा ३१३० भ्रातर स्वजन वापि न्यजति क्षुधयादित । न पितृन्पूजयेत्सम्यग्देव चापि गुरु तथा ॥१३१ पीनुपगतानापि क्षधाविष्टो न विन्दति । एवमन्नविहीतम्य भवन्त्येनानि देहिनाम् ॥१३२ अशात्परमतो तोके न भूत न भविष्यति । अन्नमूल जगत्गर्वमन्ने चैव प्रतिष्ठितम् ॥१३३ दिया करती है, ठी। उमी भौति जठर में स्थित अग्नि के दाग शरीर २१८ ] [ पद्म-पुराण मैं समुत्पन्न नाडियों का शोषण क्षुधा को दशा में हुआ करता है। जो क्षुधा से समुत्पीडित व्यक्ति होता है वह उस समय में कुछ भी धवण नहीं किया करता है-न वह सूघता है और न वह कुछ भी देखा करता है। तात्पर्य यह है कि क्षुधा से क्षीण पुरुष को कर्ण, घ्राण और चक्षु आदि ज्ञानद्रियां ऐसी शिथिल एवम् शक्तिहीन हो जाती हैं कि अपना कुछ भी कार्य नहीं कर सकती हैं 1 भुग से दुखिन मनुष्य एकदम मूद होकर शोपित, दग्य और क्षीण होता रहा करता है । उसे क्षुरा के कारण पूर्व-पश्चिम-दक्षिण और उत्तर दिशाम्रो का भी ज्ञान नहीं रहता है ॥१२६।१२७ १२८।। जो पुरुष क्षुधा से आविष्ट होता है उसे ऊर्व भाग और अधो भाग का भी कुच ज्ञान नहीं रहा करता है । क्षुधा गंगापन–बहिरापन -जडता और पगुता-भैरवना और मर्यादा से रहित हो जाना काफी बढ जाया करते हैं। जो प्रादमी भूख से पीडित होता है वह अपने पिना को-माता को-पुत्र को-भार्या को-पुत्री को-भाई को और अपने जनों को भी त्याग दिया करना है । भूग्वा व्यक्ति अपने पितरो को- देवगणो को तथा गुरुओ को भी भली भांति समचित नहीं करता है ।।१२६।। ॥१३०११३२।। यदि ऋपिगरण भी घर पर आ जायें तो क्षुधा से पीडित पुरुष उनका भी समुचित समादर सत्कार नहीं किया करता है। इसी प्रकार से प्रश्न से रहित देहयारियों में उपयुक्त बाते सभी उलन हो जाया करती है । इस लोक में भी अन की बहुत बड़ी महिमा है । इस ससार मे अन्न से बढ कर अन्य कुछ भी नहीं है-न कभी अन्न से अधिक महत्त्व वाला कुछ भी पहिले हुमा था और न भविष्य में भी इससे ज्यादा कुछ वस्तु होगी। यह सम्पूर्ण ससार का मून एकमान मन ही है मौर सभी कुछ मन में ही प्रतिष्ठिन है। इस प्रश्न की बडा विशाल महिमा है ।।१३२।१३३।। देवद्विजसमीपस्थोऽन्नस्य दाता विमुच्यते । प्रबुद्धो वा प्रमत्तो वा प्रमङ्गादागतोऽपि वा ।।१३४ भक्त्याविरहितो वापि शृण्वन्पापाद्विमुच्यते । दानसापुरता विप्रा मुखिनोधर्मभागिन. ४१६५ यमो दमो वै नियम. प्रोक्तस्तत्त्वार्थशिभि.। ब्रह्मणाना विशेपेरण दमो धर्म. सनातन ॥१३६ -- हनासुर-वध तथा मगस्त्य. [ २१६ - दान में दमस्तेजो वर्द्ध यति पवियो दम उत्तमः । विपाप्मा चव तेजस्वी पुरुषो दमतो भवेत् ॥१३७ ये के चिनियमालोके ये च धर्मारशुभान्वयाः । सर्वयज्ञफल चापि दमस्तेभ्योविशिष्यते ॥१३८ तपो यस्तथा दान दमादेव प्रवर्तते । किमरण्ये त्वदान्तम्य दान्तस्यापि विमाश्रमे ॥१६६ देव-द्विज के समीप में स्थित रहने वाला, अन्न का दान करने वाला पुष्प विमुक्त हो जाया करता है.चाहे वह प्रबुद्ध र ज्ञान से सम्पन्न हो अथवा प्रमत्त हो या प्रसङ्गवश माया हुमा हो ॥ १३४ ।। भक्ति-भाव से हीन होता हुना भी श्रवण करता हुप्रा पापो स विमुक्ति पा ज या करता है । जो विगण सयुक्त हुप्रा करते हैं वे अधिक मुख वाले और धर्म के भागी होते हैं ॥१३५।। तत्त्व क अर्थो के जानन वाले महानुभावो न यम-दम और नियम को बतलाया है किन्तु विशेष रूप से ब्राह्मणो म दम ही एक मनातन धर्म होता है ।।१३६॥ दम तज की वृद्धि किया करता है और दम परम पवित्र एवम् उत्तम होता है । दम के साधने से पुरप पागे से रहित तथा अत्यन्त तेजम्बी हो जाया परता है ।।१३७॥ लोक म जो कुछ भी नियम होते हैं और जो शुभ को प्रदान करने वाले धर्म काय होत है तथा मम्पूर्ण प्रकार के यज्ञो का फल जो होता है इन सभी से दम विशेषता रखन वाना होता है अर्थात दम सबमे श्रेष्ठ होता है ११३८॥ सब प्रकार की तपश्चर्या-ममस्त यज्ञयागादि और दान में सभी दम से प्रवृत्त हुमा करते हैं प्रर्थात् इन सबका दम ही साधन स्वरूप होता है । जो दम स रहित है वह यदि अरण्य म भी रहकर निवास करने वाला होवे तो उमका वहाँ पर रहना भी व्यथ ही हाता है। तरपर्य यह है कि बिना दम कुछ भी फल नहीं मिलता है । जो दान्त अर्थात् दमशील है उसको आश्रम में जाकर रहन को कोई मावश्यकता नहीं है क्योकि दम करने वाला जहाँ कही भी रहेगा वही उसमा फन उम प्राप्त हो जायगा। तात्पय यह है कि दम का रखना परम मुख्य है । १३६।। यत्र यत्र बसेद्दान्तस्तदरण्य महाश्रम ।

२२० ]
[ पद्म पुराण
शीलवृत्तसमेतस्य निगृहीतेन्द्रियस्य च ।
प्रार्जवे वर्तमानस्य आश्रमैः किं प्रयोजनम् ।।१४०
वनेऽपि दोपाः प्रभवन्ति रागिरणां गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः ।
अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते निवृत्तरागस्य गृह तपोवनम् ॥१४१
सुकर्मधर्माणितजीवितानां सदा च सन्तुष्य गृहे रतानाम् ।
जितेन्द्रियाणामतिथिप्रियाणां गृहेऽपि धर्मो नियमस्थितानाम्।१४२
न शब्दशास्त्रे निरतस्य मोक्षो न चैव रम्यावसथप्रियस्य ।
न भोजनाच्छादनतत्परस्य न लोकचित्तग्रहणे रतस्य ॥१४३
एकांतशीलस्य दृढ़व्रतस्य सर्वेन्द्रियप्रीतिनिवर्तकस्य ।
अध्यात्मयोगे गतमानसस्य मोक्षो ध्रुवं नित्यमहिमकस्य ।।१४४
सुखं च दान्तः स्वपिति सुखेन प्रतिबुध्यते । .
समः सर्वेषु भूतेपु मनो यस्य प्रवुध्यते ॥१४५
न रथेन सुख याति न हयेन न दन्तिना ।
यथात्मना विनीतेन सुख याति महापथे ॥१४६
न तु कुर्याद्धरिः स्पृष्टः सर्वोवाप्यतिरोपितः ।
अरिर्वानित्यसंक्रुद्धो यथात्मा दमवजितः ।।१४७
न यमं यममित्याहुरात्मा वै यमउच्यते ।
प्रात्मा वै यमितो येन स यमस्तु विशिष्यते ॥१४८
यमो यम इति प्रोक्तो वृथा तुद्विजतेः जनः ।
प्रात्मा वैयमितो येन यमस्तस्य करोति किम् ? ॥१४६
दमशील पुष्प जहाँ-जहाँ भी निवाम किया करता है वही मरण्य एवं
सबमे बडा तथा श्रेष्ठ आश्रम जमा हो जाया करता है । जो व्यक्ति शील और
चरिन से समन्वित होता है तथा जिमने अपनी इन्द्रियों को नियन्त्रित कर अपने
वश में कर लिया है एवं ,जो मरल स्वभाव में समास्थित है उस पुरुष को किसी
भी विशेष स्थान तथा माश्रमो में रहने की क्या मावश्यकता है? ऐमा पुरुप
तो जहाँ भी रहेगा वही उमका वल्गण हो जायगा ।।१४011 जिनका स्वभाष
राग से युक्त है अर्थात् जिनके मन में काम, क्रोधादि शमी ने निवास कर

वृत्रासुर-उघ तथा अगम्त्य० ] [ २२१ रखा है वे भते ही वन में जाकर मवने दूर नितान्त एकान्त स्थान में भी निवास क्यों न करे उनको वहां पर भी दोषो का प्रभाव अवश्य ही हो जाता है क्योकि उनका अन्तःकरण शुद्ध नही होता है और वे दमशील नहीं होते हैं । जिन पुरुपो ने अपनी पांचो इन्द्रियो को निगृहीत कर अपने काबू में कर रक्खा है उनका घर में रहते हुए भी पूर्ण तप का साधन बन जाया करता है क्योकि सबसे मुख्य इन्द्रियो पर विजय प्राप्त कर दम रखना ही होता है । जो व्यक्ति सर्वदा सत्कर्मों में ही अपनी प्रवृत्ति रखना है ऐसे राग से निवृत्ति प्राप्त करने वाले पुरप को घर ही तपोवन के समान हो जाता है ।।१४।। जो पुस्प अच्छे कर्मों के द्वारा किये हुए धर्म से अपनी जीविका का प्रजंन करने वाले पुरुप है मोर जो सर्वदा परम सन्तोष रखने की वृत्ति से अपने घर में ही रति रखा करते हैं तथा जिन पुरुषो ने अपनी इन्द्रियो को जीत लिया है एव जो व्यक्ति घर पर ममागत अतिथियो को प्यार करते हैं अर्थात् उनका समुचित सत्कार किया करते हैं ऐसे नियमों में सस्थित पुरुषो का घर मे भी रहकर पूर्ण धर्म का परिपालन हो जाता है ॥१४२।। शब्द शास्त्र अर्थात् व्याकरण शास्त्र मे सदा निरत रहने वाले का मोक्ष अर्थात् जन्म-मरण के प्रावागमन रूपी भवबन्धन से छुटकारा नहीं होता है । परम सुन्दर प्राश्रमो में निवास करने वाले की भी मुक्ति नही होती है जो अहनिश अपने ही भोजन तथा प्राच्छादन ( वस्त्र ) की चिन्ना एवं प्राप्ति के कार्य में तत्पर रहते हैं उनका भी मोक्ष नही होता है । जो दूमरे लोगों के चित्त को अपने मधुर भापण एवम् कुशल व्यवहारादि से मापित करने के कार्य मे अनुराग रखते हैं उनका भी मोक्ष नही होता है । ॥१४३।। जो सदा एकान्त-निवास करने के स्वभाव वाले होते हैं, जिनके व्रत अनि सुदृढ होते हैं, जो अपनी ममस्त इन्द्रियो की प्रीति रखने के कार्यों से निवृत्ति प्राप्त कर लेते हैं, जो सर्वदश अध्यात्म विनन के योग में अपने मन को लगाने वाले हैं और जो सदा हिंसा के कार्यों से दूर रहते हैं उनका ही निश्चित रूप से अवश्य ही मोक्ष होता है ॥१४४॥ दान्त अर्थात् दमशोल पुरुष सुख पूर्वक यन करता है और दमशील पुष्प सुखपूर्वक ही प्रतियुद्ध होता है अर्थात् जागृत हो जाता है । जिस मन से समस्त प्राणियो मे समभाव रखने वाला होता है वह ही प्रतिबुद्ध हो जाता है ।।१४।। महापथ में रथ के द्वारा २२२ ] [ पद्म पुराण भी कोई मुग्व से नही गमन किया करना है--प्रश्व के द्वारा एवं हाथो के द्वारा भी मुम्ब से गमन नहीं किया जा सकता है, जिम प्रकार से विनीत भाव से युक्त मात्मा के द्वारा महारथ मे मुख से गमन किया करता है ॥१४६॥ दम से रहित आत्मा जितना भी अनिष्ट कर देता है वैसा सिंह, स्पर्श किया हुप्रा अत्यन्त क्रोधित सर्प तथा नित्य ही क्रोध से भरा हुमा यात्रु भी नही किया करता है । तात्पर्य यह है कि दम के न होने से महान् अनिष्ट हुआ करता है और ऐमा ममङ्गल होता है जैसा अन्य किसी पर भयानक मे भी भयानक से नहीं हो सकता है ॥१४७ । यम को यग नहीं कहते हैं प्रत्युत् प्रात्मा हो यम कहा जाता है । जिसने प्रात्मा को यमित कर लिया है वह यम तो विशिष्ट होता है ।।१४८।। यम को यम कहा गया है । मनुष्य व्यर्थ ही उमसे उद्विग्न होते है । जिमने अपनी मात्मा की यमित अर्थात् यम से समन्वित कर लिया है उसका वह यमराज क्या करेगा ? अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकता है ।।१४६।। आत्मानमपि जानीयात्परं दोपैरतुनाक्षिपेत् । मन्त्रहीन क्रियाभिर्वा जन्मनाप्पथवापुनः ।।१५० दमश्छादयते सर्व हीनमग पटो यथा । अधीयते निरथं ते नाभिजानन्ति ये दमम् ॥१५१ श्रु तस्य हि दमो मूलं दमो धर्मः सनातनः । यो ह्यात्मनस्तुलयते सुवर्ण तुलया दमम् ॥१५२ स तेन धृतिमान्ख्यातो न तु द्रव्येण मोहितः । बतानामपि सर्वेपा दम एव परायणम् ॥१५३ यद्यधीते पडङ्गानि वेदतत्त्वार्थ विद्विजः । दमेन तु विहीनश्च पूज्यत्व नेह गच्छति ॥१५४ 'दमैन हीनं न पुर्नति वेदा यद्यप्यधीता सह पड़भिरगैः । सायं च योगश्च कुलं च जन्म तीर्थाभिपेकश्च निरर्थकानि ।।१५५ अपनी पात्मा के अन्दर रहने वाले दोपो को समीक्षा भली-भांति करनी चाहिए। तात्पर्य यह है कि अपने दोपों को समझकर उन्हे हटाना चाहिए । दमरो के दोषो को देख कर उनके विषय में कभी भी नाक्षेप नहीं करना पाहिए .

वृषासुर-उध तथा प्रगस्त्य० ] [ २२३ वह जैसा भी हो चाहे मन्त्री से हीन हो, क्रियानो से शून्य प्रयदा जन्म से विहीन हो ॥१५०॥ कोई भी किसी प्रकार की हीनता क्यो न हो यदि दम. शोलता है तो वह अकेला दम ही ममस्त कमियो को ढक दिया करता है अर्थात् किमी दीप का फिर उस पर कोई बुरा प्रभाव नहीं हुप्रा करता है, जिस प्रकार वस्त्र किमी होन शरीर के अङ्ग को माच्छादित करके प्रकट नहीं होने देता है । जो दम को नही जानते हैं वे ही लोग अध्ययन किया करते हैं किन्तु दम के ज्ञ न के बिना उनका अध्ययन निरर्थक हो होता है ।। १५१ ॥ श्रुत अर्थात् शास्त्र का मूल दम ही होता है और दम ही हमेशा से चले पाने वाला धर्म है । जो अपनी प्रात्मा के दम को तुला के द्वारा सुवरणं में तोलता है ।।१५२।। वह आदमो धृते वाला उस दम से रपात अर्थात् प्रसिद्ध होता है । द्रव्य से कभी मोहित नहीं होता है । समस्त प्रकार के जो वृक्ष हैं उनमे दम ही एक परायण होता है॥१५३।। जो द्विज वेदो के पथ के तत्त्वो को जानने वाला वेदो के छ अङ्गो का अध्ययन किया करता है । ऐसा द्विज भी यदि दम स हीन है तो चाहे वह पडङ्ग समन्वित वेदो का कितना ही अच्छा ज्ञाता क्यो न हो समाज में कभी भी पूज्य नही हो सकता है । ता पय यह है कि दम रहित विद्वान का भी वाती समाज मे समादर नहीं होता है ।। १५४ ॥ जो दम से हीन व्यक्ति होता है उमको वेद भी पवित्र नही किया करते हैं । चाहे छटो निरुक्त दि अङ्गो के सहित उनका भली-भांति स्वाध्याय किया गया हो । साथ्य शास्त्र--योगदर्शन एवम् योगाभ्याम-कुल-जन्म अर्थात् शुभमुयोग मे उत्पत्ति तथा तीर्यों में अभिपेक ये समस्त साधन दम से हीन होने पर निष्प्रयोजन हो होते हैं । तात्पर्य यह है कि इन उपयुक्त साधना के हाने से भी कोई कल्याण नहीं हो सकता है ॥१५॥ स धर्मनावमारुह्य दुर्गाण्यतितरिप्यति । दमाध्यामिम पुण्य सतत थावयेद्विज ॥१५६ स ब्रह्मलोकमाप्नोति तस्मान्न च्यवते पुन । थू यता धर्मसर्वस्व श्रुत्वा चैतत्प्रचायंताम् ॥१५७ आत्मन प्रतिकूलानि परेपा न समाचरेत् । मातृवत्परदाराश्च परद्रव्याणि लोष्टवत् ॥१५८ .

२२४ ] [ पम-पुराण आत्मवत्सर्वभूतानि य पश्यतिः स पश्यति । पचन वैश्वदेवार्थे परार्थे यच्च जीवितम् ॥१५६ पुत्रार्थ मैथुन यस्य स्वर्गार्थ तस्य जीवितम् । एतद्भवेच्च सर्वस्व धातूनामिव काञ्चनम् ।।१६० सर्वभूतहित राजनधीत्यामृतमश्नुते । एव वै धर्मसर्वस्वमुक्त्वा ते तु शुन सखम् ॥१६१ जो द्विज इस परम पुण्य दम के महत्व बतलाने वाले अध्याय का निरतर श्रवण कराया करता है वह धर्म रूपी नौवा पर समारोहण करके समस्त धोर कष्ट एवम् महापातको से अतितरण कर जाता है ।। १५६ ॥ दमाध्याय का अध्येता तथा श्रवण कराने वाला विप्र सीधा ब्रह्मलोक की प्राप्ति का लाभ लिया करता है और उसमे फिर कभी भी च्युत नही होता है । इस धर्म के सर्वस्व दमाध्याय को श्रवण करो और सुनकर इमकी भली भांति धारणा करनी चाहिए ॥१५७॥ सम्पूर्ण कर्म का सर्वस्व सार यही है कि जो अपनी प्रास्मा के प्रतिकूल कम-वचन प्रथवा भावना हो उसे कभी भी भय लोगो के प्रति प्रयुक्त नहीं करना च हिए क्योकि जो हमको बुरा प्रतीत होता है, वह दूसरो को भी उमी तरह प्रतिकूल प्रतीत अवश्य हो होगा और उसके मन को बडी ठेस लगेगी। प्रापका सताना बुरा फन देने वाला होगा। एक तो यह बात है और दूसरी बाम यह है कि पराई स्त्रियो के प्रति अपनी माता के समान भाव रखना चाहिए । तीसरी बात यह है कि पराये धन को मिट्टी के ढेले के तुल्य समझार कभी भी उस पर अपनी नीयत न विगाडनी चाहिए ॥ १५८ ॥ जो समस्त प्राणियो को अपने ही समान देखता है वही वस्तुन देखा करता है। तात्पर्य यह है कि यही सब प्राणियों के विषय में मोचना-समझना चाहिए जमा दुग्न- मुख हमको हाता है वैसा ही प्रत्यक भूतमात्र को हुआ करता है। अपने ममान समझने से कोई भी कमी किसी को उत्पीडित न कर सर्वदा मुख ही पहुंचाने पाप्रपल करेंगी। वश्वदेव वर्मको ममादित करने के लिये पाचन बरना और दूसरो की भलाई करने के लिय जीवन धारण करना हो सिद्धान्त में उचित विचार है । सपने ही उदर मरने ये हेतु पार रारा तथा देवन मुमों का

त्रामुर बधापा मगर
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[ २२५
उपभोग करने के लिये जीवन ग्मना मूटना की भावना है ॥१५६॥ जिमनी
मैथुन क्रियान्दिा मुखाम्मान के लिये न होकर देवन पुत्रोत्पत्ति के लिये
होनी है उसका जीवन मग के निये हो होता है। यही धर्म मच मार है
त्रिम प्रकार म ममस्त धातुओ मे सुगं मोंत्तम होता है वैसे ही यह सबसे
उत्तम धर्म होता है ||१५०। ममम्म प्राणियों के हित को पढ़कर है राजन् !
अमृतत्व का नाम क्या करता है । इस प्रकार में उन्होंन गुनःसन से यम के
मस्त मार को १:१॥
तेनैव सहिताः सर्वे निविष्टास्मरसस्तटे ।
मरोऽध्यन्मुधिम्नीगा पयोत्पलजलावृतम् ।।१६२
तपावनारकृत्वा ते विसानि च फलापनः ।
त रेनिक्षिप्य मम्मश्चक : पुण्या जलक्रियाम् ॥१६३
प्रथोत्तीर्थजलात्तम्मात्ते मगत्य परम्परम् ।
बिमान्येतान्यपध्यन्न इद व वनमव बन ॥१६४
केन क्षत्राभितप्तानामस्माक पापफमणाम् ।
नृगसेनापनीतानि विमान्यहारकाक्षिगा ॥१६५
ते शङ्कमानास्त्वन्योन्य पर्यपृच्छन्द्विजोत्तमा ।
चक्रश्च निश्चय मर्वे शपथ प्रति पायिव ॥१६६
इष्टमेव द्विजातीना यदिद शपथीकृतम् ।
त्वया कृत विभस्तन्य सर्वेपा न गुन मस ॥१६७
उमीक माय व मव मपवर के तट पर निविष्ट हो गये थे। उन सबने
उम मगंवर का प्रायन विस्तार मे युक्त मोर पोरनी म समवित्त, जल से
परिपूगा देखा पा ॥१६॥ उम मगेवर मे भीतर उतरकर लापरः समस्त
विशो यो अर्थात् मृणाल तन्तुओ को तोर पर निक्षिप्त करके उम मरोवर की
पुण्य जल क्रिया की थी ॥१६३।। इमा अनन्तर उम जन में उतरकर वे पर.
र म एकत्रित होगये थे और इन विशो को न दवते हुए यह वचन बोले-
९ १० १६४ ।। स्मृषियो ने कहा- सुपर से प्रभितप्त-पाप मं करन वाले हमारे
१ इन दिशो को किम प्रत्यन्त कर और ग्राहक्षा की छापने वाले न यहाँ में

२२८ ], [ . प पुराण और देवो के शत्रु अमुगे के विनाश के लिये ऐमो प्राज्ञा दी थी। इसके पश्च त् महस्रो दानवी को निर्दग्ध उसके द्वारा किया गया था ॥२।३।४।। तारक-कम- लाक्ष-कालदष्ट्र---परावसु-विशेवन-सह्राद ये सब वास करते थे सो प्रयाण कर गये थे | ये सब समुद्र के अन्दर प्रवेश करके इन्होंने वहां पर ही सन्नि वेश किया था। वे सब शक्तिहीन थे इसीलिये वे प्रग्नि और मारत के द्वारा उपेक्षित कर दिये गये थे ।।६। तभी से लेकर भुजङ्गों के सहित देवो को,मनुष्यों को और समस्त मुनियों को सम्यक् प्रकार से पीडित करके ये सब फिर समुद्र के जल के अन्दर प्रवेश कर जाया करते हैं ।।७।। एव युगसहस्रांगिग ते वीराः सप्त पञ्च च । जलदुर्गबलाद्राजन्पीडयन्ति जगत्त्रयम् ।। ततः पुनरयो वह्निमारुतावमराधिपः । पादिदेशाचिरादम्बुनिधिरेप विशोष्यताम् । यस्मादस्मद्विषां चैप शरणं वरुणालयः । तस्माद्भवद्भ्यामद्य व शोपमेप प्रणीयताम् ॥१० तावूचतुम्ततः शक मयशम्बरसूदनम् । अधर्म एप देवेन्द्र सागरस्य विनाशनम् ॥११ यस्माज्जीवनिकायस्य महतः सक्षयो भवेत् । तस्मादुपायमन्य तु समाश्रय पुरन्दर ॥१२ यस्य योजनमात्रेऽपि जीवकोटिशतानिच। निवसन्ति सुरश्रेष्ठ स कथं नाशमर्हति ॥१३ एवमुक्तः सुरेन्द्रस्तु क्रोधसंरक्तलोचनः । उवाचेदं वचो रोपादमरावग्निमारुतौ ॥१४ इस प्रकार में वे सात प्रौर पांच अर्थात् बारह वोर है राजन् ! सहसों युगो तक जल के दुर्ग के बल से तीनो लोको को पीडा दिया करते थे ॥ ८ ॥ इमके अनन्नर ममरों के म्वामो इन्द्रदेव ने प्रग्नि और मात इन दोनो को पुनः यह आदेश प्रदान किया था कि तुरन ही जलों के निधि इस ममुद्र को शोपित कर डालो ।। ६ ।। हम गोषण करने का यही एक कारण है कि इस सागर ने इन्द्र शाप से अग्नि मारुन पा० ] [ २२६ हमारे शत्रुप्रो की शरण ही है । इसीलिये प्राप दोनो को इम ममुद्र का शोपरण प्राज ही कर देना चाहिए ॥१०॥ इस प्रकार से प्राजा देने पर उन दोनो देवों ने मय और शम्वर के हनन कर देने वाले देवराज इन्द्र से कहा था-है देवेन्द्र । इम तरह से सागर का विनाश कर डालना बडा मघमं का फाय है ।।११।। क्योकि सागर का शोषण किया जायगा तो तमाम इसके अन्दर निवाम करने बाले जीवो के ममूह का सक्षम हो जायगा । हे पुरादर । इमलिये इस शत्रुओ क विनाश का कोई अन्य हो पाय का ममाश्रय ग्रहण कीजिए ॥१२॥ हे मुगे मे परम श्रेष्ठ । जिसके एक योजन मात्र परिमारग म भी मैकडो, करोडो जीव निवास किया करते हैं । ऐमा मागर किम प्रकार से नाश करने के योग्य हो सकता है ? ॥१३॥ पुलस्त्य ऋषि ने कहा--इस प्रकार से कहे जाने पर सुरेन्द्र क्रोध से सरक्त नेत्रो वाला हो गया था । देवराज ने रोष से अग्नि और मारत इन दोनो देवो मे यह वचन कहा-॥१४॥ न धर्माधर्मसयोग प्राप्नुवन्त्यमरा' क्वचित् । भवन्तौ तु विशेषण महात्मानौ च तिष्ठत ॥१५ ममाज्ञानकृता यम्मान्मारुतेन सम त्वया । मुनिव्रतपरो भूत्वा परिगृह्य कलेवरम् ।।१६ धर्मार्थशावरहिता योनि प्रति विभावसो । सम्मादेकेन वपुपा मुनिरूपेण मानुपे ॥१७ मारुतेन सम लोके तव जन्म भविष्यति । यदा तु मानुपत्वेऽपि त्वया गण्डूपशोपित ॥१८ भविष्यत्युदधिर्वह्न तदा देवत्वमाप्स्यसि । इतीन्द्रशापात्पतितो तत्क्षणात्ती महीतले ॥१६ हावाप्तवन्तौदेह च कुम्भाजन्मततोऽभवत् । मित्रावरुणयो-द्विसिष्ठश्चारमजोऽभवत् ।।२० ततोऽगस्त्य उग्रतपा बभूव मुनिसत्तम । अस्मभ्रातु सवैभ्राता वसिष्ठस्यानुजो मुनि. ॥२१ इन्द्रदेव ने कहा-देवगण कही भी धर्म और अधम का प्रयोग प्राप्त २३० । [ पद्म पुराग -- लिये मनुष्य नही किया करते हैं। अप दोनो तो विशेप रूप से महान प्रात्मा वाले देव हैं ॥१५॥ मुझे ईम बात का ज्ञात नहीं हुमा है। इसी कारण से भाप माला के माष मुनियों के से ग्रनो में परायण होकर शरीर को घारगा करें ॥ १६ ॥ हे विभावसो | वह शरीर भी धर्म-प्रयं भोर शास्त्र से रहित योनि में हो। इस• के रूप में मुनि के रूप वाले एक ही शरीर से मारुत के साथ लोक मे तेरा जन्म होगा। जिस ममय में मानुष के स्वरूप में भी रहते हुए आपके द्वारा यह समुद्र मण्डषों के द्वारा शोपित होगा उस ममय मे हे वह्न । प्राप देवत्व के स्वरूप को प्राप्त कर लोग । पुलस्त्य मुनि ने कहा- इन्द्राव के शाप मे जमी समय में ये दोनो महीनल मे पतित होगय थे ॥१७।१८ १६ । उन दोनों ने देह की प्राप्ति की थी मोर कुम्भ से जन्म हुआ था। मित्रावरुण के वीर्य से वसिष्ठ अ त्मज हुमा था ।। २० । इसके अनन्नर उग्र तपश्चर्या वाले अगस्त्य मुनियो मे परम श्रेष्ठ हुए थे । हमारे भाई के वे भाई थे तथा मुनि वसिष्ठ के अनुज थे ॥२१॥ कथ च मित्रावरुणो पितरावस्य तौ स्मृतौ । जन्मकुम्भादगस्त्यस्य यथाभूत्तद्वदाधुना ॥२२ पुरा पुराणपुरुप कदाचिद्गन्धमादने । भूत्वा धर्मसुतो विष्णुनचार विपुल तप ॥२३ तपसा चास्य भीतेन विघ्नार्थे प्रेपितावुभौ । गण माधवानगावप्मरोगणसयुतौ ॥२४ यदा च गीतवाद्यन भावहावादिना हरिः । न काममाघवाम्या च मोह नेतुमशक्यत ।।२५ तदा काममधुस्त्रीया विपादमभजद्गणः । मक्षोभाय ततस्तेपामुरुदेशान्नराग्रज ॥२६ नारीमुत्पादयामास प्रैलोक्यस्यापि मोहिनीम् । समोहितास्तया देवास्तौ तु चैव सुरावुभौ ॥२७ अप्पराणा समक्ष हि देवानामनवीद्धरिः। उर्वशोति च नाम्नेय लोके ख्याति गमिष्यति ॥२८ इन्द्र शाप से अग्नि मामत का ) [ २३१ मोम ने कहा-इसके ये दोनो मित्रावरुण कैसे पिता हुए थे ? कुम्भ मे जिस प्रकार में अगस्त्य मुनि का जन्म हुअा था यह मब इस ममय माप बनलाइये ॥२२॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा- प्राचीन काल में पुराण पुरुष भगवान विष्णु ने किमी समय में गन्ध मादन नाम वाले पर्वत पर धर्म का पुत्र होकर पहत तपश्वर्या की थी॥ २३ ॥ इनके तप मे भयभीत होकर देवराज ने उसमे विघ्न डालने के लिये प्रप्म राम्रो के मण से युक्त माधव और अनङ्ग इन दोनो को भेजा था ।। २४ ।। जब भगवान् हरि काम और माधव के द्वारा गीत वाद्य तथा भाय-हाय प्रादि में मोड़ को प्राप्त नहीं किये जा सके थे ॥ २५ ।। उस ममय में काम-मधु और निको का गण प्रत्यान हो अपनी विफलता पर विपाद वो शाम होगया था । इसके उपरान्न नरो के प्रमज ने उनके सक्षोभ के लिये अपने अरु भाग में एक नारी की उत्पत्ति की थी जो कि इतनी सुन्दरी थी कि समस्त लोक्य को भी अपने रूप-लावण्य में मोहित करने वाली थी उसके सोकोत्तर मोक्ष्यं को मुपमा मे मय देवगण और वे दोनो सुर भी मोहित हो गये ये ॥२६॥२७॥ उन सब अप्सरानी के दौर देवो के समक्ष में हरि ने कहा- पह नारी 'जी'म नाम मे लोक में प्रसिद्धि प्राप्त करेगो॥२८॥ तत कामयमानेन मित्रेणाहूयतोवशी । प्रोक्ता मा रमयस्वेति बाढमित्यब्रवीच सा ॥२६ गच्छन्ती तु तत. मूर्यलोकमिन्दीवरेक्षणा । वरणेन वृता पश्चाद्वचन नमभापत ॥३० मिणाह वृता पूर्व मम मूर्य पति:प्रभो। उवाच वरुणश्चित मयि सन्यस्य गम्यताम् ।।३१ गताया वाइमित्युक्त्वा मित्रसापमदादथ । प्रद्य व मानुपे लोके गच्छ सोमसुतात्मजम् ।।३२ भजस्वेति यतो मिथ्याधम एप त्यया कृतः । जनकुम्भे ततो वीर्य मिण वरुणेन च ॥३३ प्रशिसमय सातौ द्वावेव मुनिसत्तमो। निमि म नृपः नीभिः पुरा तमदीया ॥३४ । तदन्तरऽम्याजगाम वसिष्ठो नामम्भव । तस्य पूजामकुर्वाग्ग शशाप म मुनिनु पम् ॥५५ इसके अन तर कामवासना म अभिभूत हुए मूयदेव ने उम उवशी को धुलाकर कहा था कि तू मुझे रमगा करा दे । इस मूय क कयन पर उमन बहुत पन्छा ऐमा हो करूंगा --यह उत्तर दिया था ॥२६॥ कमल के समान मु दर लोचना वाली यह उवशी सूय ला मजा ही रही थी माग म वरुण दवता ने उसका वरण किया था। उससे वह बोनी-॥३०॥ मुझे पहिले सूय दव ने वरण किया है इसलिये हे प्रभा । मेरा सूर्य ही पति है । इस पर फिर वरुण ने कग-मुझ म अपना वित्त का त्याग करके चली जा ॥३१॥ बहुत अच्छा-यह कहकर नसके चले जाने पर मित्र ने शाप द दिया था कि तू माज ही सोम सुता क प्रात्मज के पास मनुष्यलोर म चली जा । वहाँ जाकर उसका सबन कर क्याकि तूने मिथ्या धम यह किया है । इसके अन तर जल कुम्भ म मित्र (सूय) और वरुण ने अपना बीय प्रक्षिप्त किया था ॥३२॥३३॥ इसके पश्चात् दो मुनि श्रप समुत्पन्न हुए थे । निमि नाम वाला नृा पहिले स्त्रिया के साथ द्यूत क्रीडा किया करता था ।।३। इसी बीच म ब्रह्मपुत्र वशिष्ठ वहाँ पर मा गय थ । जब उस राजा ने जो कि चूत क्रीडा म स नग्न था उन मुनि की पूजा सक्रिया नहीं की तो मुनि ने उसे शाप दे दिया था ॥३॥ विदेहस्त्व भवस्वेति शप्तस्तेनाप्यसौमुनि । अन्योयशापादुभयोविशरीरे तु तजसी ।।२६ जन्मतुश्शापनाशाय ब्रह्माण जगत पतिम् । अथ ब्रह्मसमादेशाल्लोचनेष्ववसन्निमि ॥३७ निमेषा स्युश्च लोकाना तद्विश्रामायपार्थिव । वसिष्ठोऽप्यभवत्तस्मिञ्जलकुम्भे च पूर्ववत् ॥३८ ततो जातश्चतुर्वाहु साक्षसूकमण्डलु । अगस्त्य इति शान्तात्मा बभूव ऋपिसत्तम ॥३६ मलयस्यकदेशे तु वैखानसविधानत । समा सयो विप्रेस्सएश्वक सुढाकारम् ४४० इन्द्र माप में मग्न माकन का ततः कालेन महता: तारकादिनिपीडितम् । जगद्वीक्ष्य स कोपेन पीतवान्वरुपालयम् ॥४१ ततोऽस्य वरदास्सर्वे बभूवुः शङ्करादयः । ब्रह्मा विष्णुश्च भगवान्वरदानाय जग्मतुः ।।४२ वमिष्ठ ने यह शार दिया था कि तू विदेर हो जा। इस पर वह मुनि को भी वम नृप के द्वारा शाप दे दिया गया था। परस्पर में एक-दूसरे के शाप से दोनों के बिना शरीर वाले तेव जगत् के पति ब्रह्माजी क ममोप में मापी के विनाश करने के लिये गये थे। इसके उपरान्त ब्रह्माजी के प्रादेश में निमि नर ने लोधनो में निवास किया था ॥३६॥३७॥ है पायिव ! वह लोको के विश्राम के लिये निमेप होते हैं । धमित्र भी पूर्व की भांति उस जन कुम्भ हुये पे ॥३८॥ इम के उपरान चार भुजाओ दाना, पक्षमूत्र पोर कमण्डलु से युक्त परम शान्त स्वरूप से समन्वित ऋषि थे अगस्त्य उत्पन्न हुए थे । ३६॥ मालय पर्वत पे एक भाग में खानत के विधान से विप्रो के द्वारा सवृर भार्या के सहित उसने परम दुष्पर तपस्या की थी ॥४०॥ इसके मननर बहु काल में तारक मादि में परम उत्पीडित इस जगन् को देश पर उम अगस्त्य महर्षि ने इस ममुद्रा पान कर गला पा ॥४१॥ इसके पश्चात् शङ्कर प्रभृति- माया मोर भगवान् विष्णु ममी इनको वर देने वाले हो गये मोर वरदान देने लिये इनके ममीप मे सब गये पे ॥४२॥ वरं वृणीव भद्र ते यश्चाभीष्टोऽयःव मुने । यावद् ब्रह्मसहस्राणा पञ्चविशतिकोटयः ॥४३ वैमानिको भविष्यामि दक्षिणाम्बरवत्मनि । मद्विमानोदयात्कुर्याद्यः कश्रित्पूजन मम ।।४४ स गालोकाधिपतिः पर्यायेण भविष्यति । पम्त्यायम पुष्करे तु मन्नाम्ना परिकीतयेत् ।।४५ म वपुष्यता यातु वर एप वृतो मया । थाद यत्र फरिष्यन्ति पिण्डपूर्व तु भक्तिनः ।।४६ तेपा पितृगणाम्गवं मया मह दियि स्थिता । एतलाल वसिष्यन्ति एपाय बरो मम ।।

. २३४ ] [ पद्म-पुराण एवमस्त्विति तेऽप्युक्त्वा जग्मुर्देवा यथागतम् । तस्मादर्घ, प्रदातव्यो ह्यगस्त्याय सदा वुधः ॥४८ वहाँ सबने मुनि से कहा- हे मुने ! प्रापका कल्याण हो, पापको यहाँ ओ भी कुछ अभीष्ट हो हममे वर मांग लो। अगस्त्य मुनि ने कहा--ब्रह्म सहस्रो की जितनी पच्चीस कोटियाँ हैं मैं वैमानिक होकर रहूँ । दक्षिणाम्बर के मार्ग में मेरे विमान के उदय मे जो कोई भी मेरा पूजन करे वह पर्याय से मातों लोकों का अधिपति होवेगा । जो पुष्कर में मेरे नाम से प्राश्रम को परिकीर्तित करेगा वह भी परम पुण्य को प्राप्त होवे-यही वरदान मैं चाहता हूँ। जो यहाँ पर मुक्तिभाव से पिण्डदान पूर्वक श्राद्ध करेंगे उनके समस्त पितृगण मेरे ही माथ दिवलोक में स्थित होते हुए इतने ही समय तक वास करेंगे-~~यही मेरा वरदान प्रभीष्ट है ॥ ४३ ॥ मे ॥४७॥ ऐसा ही होगा~यह कहकर वे सब देवता जमे ही पाये थे वापिस चले गये । इमलिये सबको ही भगवान् अगस्त्य मुनि के लिये प्रघं अवश्य ही देना चाहिए ॥४॥ ॥ वामनावतार चरित्र वर्णन ॥ सम्यक्पृच्छसि भोस्त्वं यत्सशृणुत्वं समाहितः । यथा पूर्व पदन्यासः कृतो देवेन विष्णुना ॥१ यज्ञपर्वतमासाद्य गिलापर्वतरोधमि। पुरा कृतयुगे भीष्म देवकार्यार्थसिद्धये ॥२ विष्णुना च कृतं पूर्व पृथिव्यर्थे परन्तप । विदिवं सर्वमानीतं दानवैलवत्तरः ॥३ त्रैलोक्यं वनमानीय जित्वा देवान्सवासवान् । दानवा यज्ञभोक्तारस्तत्रासन्बलवत्तरा.॥४ कृता बाप्कलिना सर्वे दानवेन बलीयसा । बनूते जमा होफे लरक्ये सरसर ५ परमाति ययौ शक्रो निराशो जीविते कृतः । स वाप्कालिदानवेन्द्रोऽवध्योऽयं ममसंयुगे ॥६ न प्रावतंन्त हानिस्तु तेरस्माकं दिने दिने ॥१३ चामनावतार चरित्र का वर्णन ] [ २३५ ब्रह्मणो वरदानेन सर्वेषां तु दिवौकसाम् । तदहं ब्रह्मणो लोकवृत. सर्वैदिवौकसः॥७ पुलस्त्य मुनि ने कहा-हे भीष्म ! आपने बहुत ही सुन्दर प्रश्न किया है । अब प.प परम गावधान होकर मन्दी तरह श्रवण करो जिस तरह विष्णु देव ने पूर्व पद का न्यास किया था ॥ १॥ हे भीष्म ! पहिले समय में देवताओं के कार्यों की सिद्धि के लिये कृतयुग मे विष्णु ने यश पर्वत पर पहुंच कर शिला पर्वत रोष पर पृथिवी के लिये परम दुष्कर तप किया था क्योकि प्राधिक बलशाली दानवों ने सब त्रिदिव को ले लिया था ।। २।३ ॥ समस्त लोक्य को अपने वश मे लेकर इन्द्र के महित समस्त देवी को जीतकर वहाँ पर दानव ही यज्ञो के भोग करने वाले होगये थे क्योकि वे सब अधिक बलवान् थे ॥४॥ प्रत्यन्त बली वाकलि दानब ने मब अपने वश में कर लिये थे । इम चराचर मिलोकी में इस प्रकार की उस समय दशा के हो जाने पर इन्द्र अपने जीवन मे भी निराश होकर प्रत्यन्त दुःसित हो गया था और मोवने लगे कि यह दानवेन्द्र वाकलि मेरे युद्ध मे वध के योग्य होजाना चाहिए ॥५६॥ ब्रह्मा के वरदान से ममस्त देवतामो का मैं ब्रह्मा लीक्वृत सब देवगण के द्वारा हो गया था ॥७॥ प्रजामि शरणं देवं गतिरन्या न विद्यते । एवं विचिन्त्य देवेन्द्रो वृतः सर्वेदिवौकसः । जगाम त्वरितो भीष्म यत्र देव: पितामहः । ब्रह्मरण स पदप्राप्य वृतस्तंश्च दिवौकसः ।। प्रवीजगतः कार्य प्राप्तामापदमुत्तमाम् । कि न जानासिर्व देव यतो नो भयमागतम् ॥१० देत्ययंदाहृतं सर्व वरदानाच ते प्रभो। कपित व मयामवं वाप्कलेश्च दुरात्मनः ॥११ क्रियता चाविलम्बेन पिता त्वं न: पितामहः । मत्त्वं चिन्तयदेवेशशारययं जगतस्त्विह ॥१२ तेषां च पश्यतां किञ्चिन्द्रौतस्मादिका.क्रियाः ।

[ पद्म पुराण अब मैं देव को शरण में जाता हूं क्योकि मेरी अन्य कोई गति नही है । इस प्रकार से विचारकर मब देवगण के द्वारा देवेन्द्र वृा हुअा था ।। ८ ।। हे भीष्म ! फिर वह शीघ्र ही वहां पर चला गया जहाँ पर पितामह देव थे पोर ब्रह्मा के पक्ष को प्राप्त कर सभी देवतानो के द्वारा वरण किया गया था | जगत् का समस्त कार्य बतलाया कि बठी भारी प्रापत्ति प्राप्त हो गई है हैं देव । क्या माप नही जानते हैं कि हमको भारी भय उपस्थित हो गया है ? हे प्रभो ! तुम्हारे वरदान से ओ मच दैत्यो ने आहरण कर लिया है मैं दुष्ट वाकलि का सभी कुछ कह दिया है ।१०।११।। उसे मद बिना किसी विलम्ब के किये हुए कर दीजिए क्योकि पाप हमारे पिता तथा पितामह हैं। हे देवेश ! यहाँ पर जगत् की शान्ति के लिये किसी तत्व वस्तु का चिन्तन करें ॥१२।। उन सबके देखते हुए ही कुछ भी श्रीत एव स्मार्त क्रिया मादि प्रवृत्त नहीं हुई हैं इसीलिये दिन पर दिन हम सबकी हानि हो रही है ॥१३॥ जानामि वाकलिं तं तु वरदानाच्च गवितम् । अजेयभवतामन्येविष्णुसाध्योभविष्यति ॥१४ निरुध्य सस्थितो ब्रह्मा भावं तत्वमयं तदा। समाधिस्थस्य तस्यैवध्यानमात्राच्चतुभुजः ॥१५ स्तोकेनैव हि कालेन चिन्त्यमानः स्वयम्भुवो । प्राजगाम मुहूर्तेन सर्वेपामेव पश्यताम् ॥१६ भोभोब्रह्मनिवर्तत्व ध्यानादस्मान्निवारितः । यदर्थ मिष्यतेध्यानंसोऽहंत्वांसमुपागतः ॥१७ महाप्रसाद एपोऽत्र स्वामिनो हि प्रदर्शनम् । कस्यान्यस्यभवेच्चपाचिन्तायाजगतः प्रभो ॥१८ ममंद तावदुत्पत्तिजगदथें विनिमिता । जगदेतत्त्वदर्थीयं तत्त्वतो नास्ति विस्मयः ॥१६ भवता पालनं कार्य संद्र द्र एव तु । एवम्भूते जगत्यस्मिञ्शक्रस्यास्य महात्मनः ।।२० हृत राज्यं वाप्कलिना त्रैलोक्य सचराचरम् । भृत्यस्य नियतासाद्य मन्त्रदानेनकेशवः ।।२१

! पम-पुराण
-
गृह्य प्रतिगृह तस्य दानवस्य पितामह ।
त बद्ध्वा च ततो यत्नात्कृत्वा पातालवामिनम् ॥२६
दधार दिव्य वर्षाणां महलं दिव्यमीश्वरम् ।
ततः समभवत्तस्या वामनोभूतवामनः ॥२७
जातन येन चल पिदानवानां हृतानि ।
जातमात्रे ततस्तस्मिन्देवदेवे जनार्दने ।।२८
नद्यः स्वच्छाम्बुवाहिन्यो वगै गन्धवहोऽनिलः ।
कश्यपोऽपि मुस लेभे तेन पुत्रेण भास्वता ॥२६
सर्वेषां मानसोत्साहस्त्रलोक्यान्तरवासिनाम् ।
सञ्जातमात्रे तु ततो जनाधिप जनार्दने १३०
भगवान् वासुदेव ने कहा-~पने ही उस वरदान दिया है इमलिये इस
समय तो वध करने के योग्य नहीं है । इपलिये यहाँ पर बम्पन से उसे बुद्धि क
द्वारा ही साध्य करना चाहिए अर्थात् बुद्धि से ही उसे काबू में लेना है ।।२२।।
मैं वामन (बौना) होऊँगा जो कि समस्त मानवो का विनाश करने वाला हो
जाऊंगा। मेरे ही माथ यह भी वालि के घर में चले ॥२३॥ वहां जाकर यह
मेरे लिये इस प्रकार से वर की याचना करे कि हे राजन् ! इम वामन विप्र को
तीन पैड भूमि प्रदान कर दो। यह याचन मेरे द्वारा की हुई होगी। शक्र के
द्वारा कहे जाने पर यह दानवो का राजा अपने जीवन को भी दे देगा ॥२४॥२५॥
है पितामह ! उस दानव के द्वारा प्रदान किया हुप्रा वह भूमि का प्रतिग्रह
ग्रहण करके मैं उमका बन्धन कर दूंगा और यज्ञ द्वारा उमे फिर यहां से हटा
कर पाताल लोक का निवाम करन चाला बना दूंगा ॥ २६ ॥ दिव्य वर्षों के
सहस्र ने दिव्य ईश्वर को धारण किया था। इसके मनानर उममे बामनोभून
वामन हुआ था ।।२७।। इसन उत्पन्न होते ही दानवो के चक्षुमो का हगा कर
लिया था। उन देवो के भी देव भगवान् बनार्दन के उत्पन्न हो जाने पर ही
ममस्त नदियाँ अनि स्वच्छ वारि के वाहन करने वाली हो गई थी और वायु
सुन्दर गन्ध के वहन करने वाला होगया या ) उम परम या ममान पुत्र को
देखकर वश्यप महर्षि को भी प्रत्यधिक सुख की प्राप्ति हुई थी ॥२८॥२६॥

वामनावनार चरित्र का दान ] 1 २३६ है जनाधिप ! उन भगवान् जनार्दन के जन्म ग्रहण परने मात्र से ही लोक्य में निवास करन वाले मभी प्राणियो के मन में एक तरह का प्रद्भुत उत्साह समुत्पन्न हो गया था ॥३०॥ परमासाद्य य विष्णु ब्रह्मा जगतः कृते । जातोऽय भवतामय वामनो यदपीश्वरः ।।३१ एप ब्रह्मा च विष्णुश्च एष एव महेश्वरः । एप वेदाश्च यज्ञाश्च स्वगश्चैप न सशयः ॥३२ सर्वथा वामनोदेवो देवकार्य करिष्यति । एव चिन्तयतातेषा भाविताना दिवौकसाम् ॥३३ जगाम शक्रसहितो वाकलेश्च निवेशनम् । दूरादेव च ता दृष्ट्वा पुरी तस्यसमावृत्ताम् ॥३४ पाण्डुरै. खगमागम्य सर्वरत्नोपशोभित । शोभिता भवन मुख्यस्तुविभक्तमहापथैः ।।३५ जिस परम विष्णु को प्राप्त करके मैं इस जगत् के लिये ब्रह्मा हूँ। यह यद्यपि ईश्वर ही साक्षात् है तो भी पाप सबके कार्य की मिद्धि के लिये वामन होकर समुत्पन्न हुए हैं ॥३१॥ यह ह। ब्रह्मा हैं-यदी विष्णु हैं और यह महेश्वर है-यही सम्पूर्ण वेद हैं-यही सब यज्ञ हैं और यह ही स्वर्ग हैं- इसमे कुछ भी संशय नही है ॥३२॥ यह वामन देव पूर्णतया देवो के कार्य को मिद्ध कर देंगे- इसी प्रकार से भावितात्मा देवो क चिन्नन करते हुए होने पर वह वामनदेव देवराज इन्द्र के सहित दानवेन्द्र वाकाल के निवास स्थान पर पहुंच गये थे। उन्होने दूर से ही उसकी ममान आकार वालो पुरी को देखा था ॥३३३३४।। उस पुरी में सब प्रकार के रत्नो से उप शोभित प्राकाश वो गमन करने वाले अर्थात बहुत ऊचे ऊँचे पाण्डुर वर्ग के भवन बने हुए थे और भली- भांति से उस पुरी में महा पय विभक्त हो रहे थे । तात्पर्य यह है कि सभी मार्ग प्रलग-अलग अच्छे ढग वाल घे ॥३॥ इन्द्रपुरागत दृष्ट्वा दानवेन्द्राय पार्थिव । इदमूचुस्तदा गत्वा दानवा युद्धदुर्मदा. ॥३६

२३८ ]
1 पम-पुराण
गृह्य प्रतिगृह तस्य दानवम्य पितामह ।
त बद्ध्वा च ततो यत्नात्कृत्वा पातालवामिनम् ॥२६
दधार दिव्य वर्षाणां सहस्र दिव्यमीश्वरम् ।
तत. समभवत्तस्या वामनोभूतवामन. ॥२७
जातेन येन चल पिदानवाना हृतानिचे ।
जातमात्रे ततस्तस्मिन्देवदेवे जनार्दन ।।२८
नद्यः स्वच्छाम्वुवाहिन्यो वगै गन्धवहोऽनिलः ।
कश्यपोऽपि मुख लेभे तेन पुत्रेण भास्वता ॥२६
सर्वेषा मानसोत्साहस्त्रलोक्यान्तरवासिनाम् ।
सञ्जातमात्रे तु ततो जनाधिप जनार्दने ॥३०
भगवान् वासुदेव ने कहा-~-अपने ही उस वरदान दिया है इसलिये इस
समय तो वध करने के योग्य नही है । इसलिये यहां पर बन्धन से उसे बुद्धि के
द्वारा ही साध्य करना चाहिए अर्थात बुद्धि से ही उसे काबू में लेना है ।।२२।।
मैं वामन (बौना) होगा जो कि समस्त मानवो का विनाश करने वाला हो
जाऊगा । मेरे हो माथ यह भी वालि के घर में चले ॥२३॥ वat जाकर यह
मेरे लिये इस प्रकार से वर की या वना करे कि हे राजन् ! इम वामन विन को
तीन पंड भूमि प्रदान करदो। यह याचन मेरे द्वारा को हुई होगी। शक के
द्वारा कहे जाने पर यह दानवो का राजा अपने जीवन को भी दे देगा ॥२४१२॥
है पितामह ! उम दानव के द्वारा प्रदान किया हुपा वह भूमि का प्रतिग्रह
ग्रहण करके मैं उसका बन्धन कर दंगा और यज्ञ द्वारा उसे फिर यहाँ से हटा
कर पाताल लोक का निवाम करन वाला बना दूंगा ॥ २६ ॥ दिव्य वर्षों के
सहस्र ने दिव्य ईश्वर को धारण किया था। इसके अनन्नर उममें वामनोभून
वामन हुआ था ।॥२७॥ इसने उत्पन्न होने ही दानवो क चक्षुमो का हरण कर
लिया था। उन देवी क भी देव भगवान् जनार्दन के उत्पन्न हो जाने पर ही
ममस्त नदियां अति स्वच्छ वारि के वाहन करने वाली हो गई थी और वायु
सुन्दर गन्ध के वहन करने वाला होगया था। उम परम या ममान पुष
देखकर कश्यप महर्षि को भी प्रत्यधिक मुख को प्राप्ति हुई थी ॥२८॥२६॥

वामनावनार चरित्र का दणंन । [ २३६ हे जनाधिप ! उन भगवान् जनार्दन के जन्म ग्रहण करने मात्र से ही लोक्य में निवास करन वाले मभी प्राणियो के मन में एक तरह का अद्भुन उत्साह समुत्पन्न हो गया था ॥३०॥ परमासाद्य य विष्णु ब्रह्माह जगतः कृते । जातोऽय भवतामर्थे वामनो यदपीश्वरः ॥३१ एप ब्रह्मा च विष्णुश्च एष एव महेश्वरः । एप वेदाश्च यज्ञाश्च स्वगरचैप न संशयः ।।३२ सर्वथा वामनोदेवो देवकार्य करिप्यति । एव चिन्तयतातेपा भाविताना दिवौकसाम् ||३३ जगाम शकसहितो वाकलेश्च निवेशनम् । दूरादेव च ता दृष्ट्वा पुरी तस्यसमावृत्ताम् ।।३४ पाण्डुरै. खगमागम्य: सर्वरत्नोपशोभितः । शोभिता भवनमुख्यस्तुविभक्तमहापर्थः ॥३५ जिस परम विष्णु को प्राप्त करके मैं इस जगत् के लिये ब्रह्मा हूं। यह यद्यपि ईश्वर ही साक्षात् है तो भी आप सबके कार्य की मिद्धि के लिये वामन होकर समुत्पन्न हुए हैं ।।३१॥ यह हा ब्रह्मा है-यही विष्णु हैं और यह महेश्वर हैं-यही सम्पूर्ण वेद हैं-यही सब यज्ञ है और यह ही स्वर्ग हैं-इममें कुछ भी संशय नही है ॥३२॥ यह वामन देव पूर्णतया देवों के कार्य को मिद्ध कर देंगे---इसी प्रकार से मावितात्मा देवो के चिन्तन करते हुए होने पर वह वामनदेव देवराज इन्द्र के सहित दानवेन्द्र वालि के निवास स्थान पर पहुंच गय थे। उन्होने दूर से ही उसकी ममान आकार वाली पुरी को देखा था ।।३३।३४।। उम पुरी में सब प्रकार के रत्तो से उप शोभित प्रकाश को करने वाले अर्थात बहुत ऊचे ऊँचे पाण्डुर वर्ण के भवन बने हुए थे और भली. भाति से उम पूरी मे महा पथ विभक्त हो रहे थे । तात्पर्य यह है कि सभी मार मलग-अलग प्रच्छे ढङ्ग वाले थे ॥३२॥ इन्द्रपुरागत दृष्ट्वा दानवेन्द्राय पार्थिव । इदमूचुस्तदा गत्वा दानवा युद्धदुर्मदाः ॥३६ गमन २४० ]] । पप-पुगणे प्राश्चयं मिनि वै कृत्वा इन्द्रोभ्येति पुरी तव । एकारी द्विजमुस्येन वामनेन सहप्रभो ॥३७ अस्माभिर्यदनुप्ठेयं साम्प्रत नो वद स्वराट् । दानवानववीत्सर्वान्पुरे तिष्ठत संकुलम् । प्रवेश्यतां देवराज. पूज्यः स तु ममाद्य यं ॥३८ एतस्मिन्नेव काले तु वामनः स च वासव. । भागतौ दनुनाथेन प्रेम्णाचवावलोकितौ ॥३६ कृतार्थ मन्यतात्मान प्रणिपातपुरःसरम् । उवाच वचनं राजा दानवानां धुरन्धरः ॥४० प्रद्य वै निपु लोकेषु नास्ति धन्यतरो मया । योऽहश्रिया वृतःशक्रं पश्यामिगृहमागतम् ॥४१ अथित्वकाम्यया यस्तु मामयं याचयिष्यति । गृहागतस्य तस्याहं दास्येप्राणानपिध्र वम् ।।४२ दारान्पुत्रास्तथागारं लोक्ये का कथा मम । आगत्य संमुख तस्य असमानीय सादरम् ।।४३ परिष्वज्याभिनन्ध नं गृह प्रावेशयत्स्वकम् । तस्य स्वागतमाद्य कृत्वा पूजा प्रयत्नतः॥४४ है पार्थिव ! युद्ध करने मे दुमंद दानव उम समय में प्रागे भये हुए इन्द्र को देखकर दानवो के राजा व कलि के समीप में जाकर यह बोल- 1३६।। दानवो ने कहा-हे प्रभो । यह माज बहुत ही अधिक आश्चर्य हो रहा है कि यह देवो का राजा इन्द्र भापकी पुरी मे पा रहा है। यह अकला ही है केवल इसक साथ में एक वामन ब्राह्मण है ।।३७॥ प्रबहप मबको इस समय जो कुछ भी करना चाहिए वह प्राप हमको आदेश प्रदान कीजिए । ऐसा दानवी के कहने पर उनमें दानवेन्द्र ने कहा--तुम मब पुर में सकुल होकर स्थित रहो भौर उस देवराज को हमारे पाम प्रविष्ट कर दो क्शेकि आज मेरी पूजा करने का योग है ॥३८॥ इसी समय मे वह वामन देव और देवराज इन्द्र 'वह पर मा गये थे और दानवो के राजा के द्वारा ही प्रेम के साथ देखे गये थे।३१॥ - यानापार मायावर । २४१ उम ममय पान प्रापको परम तर्थ मानन हुए प्रणिपार पूरी दानयो के धुन्धर राजा ने यह यान वहा था ॥४०॥ नाजनीनो लोको म मुझ मधिक अन्य कोई भी पन्य एवम् भाग्यशाली नहीं है जो कि मैं श्री में वृाहीर भी घर पर पाये हुए देवराज या दान कर रहा है ।।४।। अर्षी जान गी कामना मे जो यह मुभसे कुछ भी याचना करेगा तो मेरे पर पर आये हा इमको मैं अपने प्राण भी निश्चय ही दे दूगा ।।४।। त्रिों को, पुत्रो पो नया लोक्य के समस्त अपार को डालू गा, मेरी तो पान हो पा है-म प्रकार गे विचार करते है। उमरे मम्मुव आकर बहुत ही मादर के माय मानी गोद में बिठाकर उसके साय ममालिशन दिया और पच्छो नरह अभिनन्दन करके अपने निज पर मे उग देवराज या प्रवेश पराया था। फिर उमा स्वागत मतार कर दि से प्रयत पूर्व पूमा की थी॥४३॥४४॥ अद्य मे सफर जन्म पूर्णा मर्वे मनोरथा । यस्त्वा पश्याम शनाद्य स्वयमेव गृहागतम् ।।४५ ख्य प्योऽह दनुमुरुपाना देवराज त्वया कृत. । श्रागच्छता मम गृह पुण्यता तु परा हि मे ॥४६ जानेऽह दनुभुस्थानाप्रधान त्यातुवाकले । नात्याश्चर्यमिद भाति त्वयि दृष्टऽमुत्तम ।।४७ विमुगा नापिनो यान्ति भवतो गृहमागता । अथिना कल्पवृक्षाऽसि दाता चान्यो न विद्यते ॥४८ प्रभाया मूर्यतुल्योऽसिगाम्भीर्ये सागरोपम । सहिप्रगुत्वे घगचेव श्रियानारायणापम ||४६ ब्रह्मण कश्यपकुले जातोऽय वामन शुभे । प्राथितोऽहमनेनैव भमेर्देहि पदत्रयम् ॥५० दन राम ने फिर कहा-प्राज मय जाम मफन है और आज मेरे सभी मोग्य पूर्ण हो गये हैं क्योकि मैं आज स्वय हो चलार मेरे घर पर माये हुए हे देवराज । मापका दशन प्राप्त कर रहा हूँ। ४५।। हे देवराज । आपने ही मुझे दानयों में प्रमुग्व प्रसिद्ध कर दिया है । मापन स्वय मेर घर पर शुभागमन २४२ । [ पद्म पुराण करके मुझे परम पुण्यवान बना दिया है ॥ ४६ ।। देवराज इन्द्र ने कहा है वाकले ! दानवो में परम प्रधान प्रापको मैं भली-भांति जानता हूँ। हे असुरों में परम श्रेष्ठ ! प्रापक देखने पर मुझे यह कुछ अत्यन्न आश्चर्य नही प्रतीत होता है।॥४७॥ मापका स्वभाव ही ऐमा है कि जो भी कोई याचना करने वाले पाप के घर पर प्रा जाते हैं व कभी भी विमुष होकर वापिस नही जाया करते हैं। प्राप तो याचना करने वालो के लिये तो कल्पवृक्ष के ही समान ममस्त मनोरथ पूर्ण करन वाले हैं । आपके तुल्य तो सनार में अन्य कोई दान- दाता विद्यमान ही नहीं है ॥४८॥ प्रभा में तो पाप तेजस्वी सूर्यदेव के समान हैं और गम्भीरता मे सागर के तुल्य है । सहनशीलता तो प्राप में भूमि के सदृश विद्यमान है तथा श्री-मम्पन्नता ऐनी है कि आप साक्ष द नारायण जैसे हैं । देखिए यह वामन परम शुभ ब्रह्माजी के कश्यप कुल में समुत्पन्न हुआ है। इसने मुझम याचना की थी कि नोन पद प्रमाण बाली भूमि का दान मुझे दे दो ॥४१॥५०॥ ममाग्निशरणार्थाय यत्र कुर्या मख त्वहम् । तदस्य कारण कृत्वा अर्थितंपा मम प्रभो ॥५१ लोकत्रय मेऽपहृतन्त्वया विक्रम्य वाकले । निवृत्तिको निर्धनोऽस्मि यदित्सेन तदस्ति मे ॥५२ यदि ते रुचित वीर दानवेन्द्र महायुते । तदस्मै दीयता शीघ्र वामनाय महात्मने ।।५३ देवेन्द्र स्वागत तेऽस्तु स्वस्ति प्राप्नुहि मा चिरम् । त्व समीक्ष स्वधात्मान सर्वेपा च परायणम् ॥५४ बृहत्नपा मे दवेन्द्र यद्भूमेस्तु पदत्रयम् । ब्राह्मराम्य विशेपेरण प्रार्थित तु, त्वया विभो ।५५ दाम्ये गमवरानस्य भवतस्तुत्रिविष्टपम् । गजानभूमिधत स्निग्रचोद्भिन्नतचुदाः प्रग्नि शरणार्थता के लिये जिस स्थान पर मैं मस क्यिा करता हूँ उमीनाम से है प्रमो! इमने यह मेरी गचकता ग्रहण की थी ॥५१॥ है .

धामनावतार चत्रि या वर्णन ] [ २४३ - वावले ! प्रपने तो मेरे तीनो ही लोक अपने बल-विक्रम से अपहरण कर लिये हैं। मैं तो इस समय बिना वृत्ति पाला और एकदम निधन हो गया हूं कि जो कुछ भी मेरी दे देने की इच्छा भी हो तो वह अच मेरे पास कुछ भी नही रहा है ।।५२॥ हे दानवेन्द्र चोर ! प्राप तो महती | ति वाले हैं । यदि प्रापको उचित एवम् रुचिकर प्रतीत हो तो इम महान् पास्मा वाल वामन के लिये शीघ्र ही प्रदान कर दीजिए ॥५३॥ वाकलि ने कहा- देवेद्र । अापका परम स्वागन है । अप शीघ्र ही कल्याण की प्राप्ति करें। माप मब के परायण हैं अपने पापको स्वघात्मा ही देखें ।। ५४ ॥ किन्तु है देवेन्द्र ! मुझे बहुत ही अधिक लज्जा हो रही है कि प्रापने इम ब्रह्मण के लिो वे वन तीन पैड भूमि की ही प्रार्थना की है ।।५५।। मैं इस वामन को बहुत ही श्रेष्ठ ग्राम दूंगा पोर मापको निविष्टप दे दूंगा। इनके अतिरिक्त बहुत से मश्व-ज-भूमि, धन तथा समुन्नत वक्ष. ग्थल की सुन्दर स्त्रियां भी दूंगा ॥५६।। पुरोधास्तूशना प्राह दानवेन्द्र तदा वच. । भवावाजा दानवेन्द्र ऐश्वर्येऽष्टविधे स्थित १५७ युक्तायुक्त न जानामि देय कम्य मया क्वचित् । मन्त्रिभि सुममालोच्य युक्तायुक्त परीक्ष्य च ॥५८ प्राप्त प्रैलोक्यराज्यत्व जित्वा देवान्सवासवान् । वाक्यस्यास्यावसाने च भवान्प्राप्स्यति बन्धनम् ।।५६ य एप वामनोराजन्विगुरेव मनातन । नास्य व भवता देय पिता ते घातित. स्वयम् ॥६० प्रय ते पितृहा प्राप्तो मातृहा वन्धुघातक । वशोच्छेदकरम्तुग्य भूतश्चैव भविष्यति ॥६१ न चैप धर्म जानाति शनादीना हिते रत. । मायाविना दानवा ये मायया येननिजिता ॥६२ मायया ब्राह्मण रूप वामन च प्रदर्शितम् । अय कि यहुनोक्तन नास्य देव तु फिश्चन ॥६३ मक्षिकापादमा तु भूमिरस्य प्रतिग्रहः । विनासमेध्यमि क्षिप्र सत्य सत्य मया थनम् ॥६४ २४४ ॥ [ पद्म पुराण उसी ममय मे शानयों के पुरोहित जो शुक्राचार्य थे उन्होने दानवेन्द्र से यह वचन कहे थे-हे दानवेन्द्र । माप राजा हैं और माठ प्रकार के ऐश्वर्यों में इम समय मधिष्ठित हैं प्रर्यान् मभी ऐश्वर्य अपको प्राप्त हैं ।।५७ । बिनु माप क्या युक्त हैं और क्या भयुक्त हैं—यह बिलुन भी नही जानते हैं । किस समय मे मुझो किम के लिये,क्या देना चाहिए इसका ज्ञान प्रापको नही है। पाएको चाहिए कि अपने मन्त्रियो के माय भली-भांति समालोचना परके और युक्त तथा प्रयुक्त की परीक्षा करके दना नाहिए ॥५८।। इन्द्र के सहित समस्त देवों को जो नकर आपने अपने ही बल विक्रम से यह नोक्य के राज्य-वैभव को प्राप्त किया है । अब जो दान देने का वचन तो प्राप दे चुके हैं किन्तु इसके पूर्ण करने के प्रयमान में ही प्राप बन्धन को प्राप्ति करेगे ||१६| हे र जन् । जो यह वामन (बौना) व ह्मण है यह साक्षात् सनातन विष्णु ही है । इसको मापके द्वारा कुछ भी नहीं देना चाहिए क्योकि इमने स्वय ही आपके पिता का हनन किया था ।। ६० ।। यही तुम्हारे पिता को मारने वाला है जो यहाँ अब प्राप्त हमा है, यही माना का हनन करने वाला और बन्धुप्रो का घात करने वाला है। यह आपके वश का उच्छेद करने वाला है, सर्वदा से रहा है और भविष्य में भी रहेगा ।। ६१ ॥ यह धर्म की तथा न्याय की बात कुछ भी नही म-झता है और सर्वदा इन्द्र आदि देवगणो का ही हित करने मे सनग्न रहा करता है । यह बहुत ही मायावी है । इसने अपनी माया से ही समस्त दानवो को निजित दिया है ।। ६२ ।। इस समय भी माया से ही ब्राह्मण वामन का स्वरूप प्र-शित किया है । मैं अब इमसे अधिक बहुत क्या कहूं, सक्षेप मे मेरा कथन यही है कि इसको कुछ भी नहीं देना चाहिए। तीन पंड तो बहुत है इसे तो मक्खी के चरण के बाबर भी भूमि का दान देना तेरे विनाश का करने वाला हो जायगा भौर वह भी बहुत ही शीघ्र होगा। मैं यह पूर्णत सत्य सत्य कहता हूँ ।।६३ ६४॥ गुरुणाप्येवमुक्तस्तु भूयो वाक्यमथाब्रवीत् । धर्माथिना मया सर्व प्रतिज्ञात गुगे त्विदम् ॥६५ प्रतिज्ञापालन कार्य सता धर्म सनातनः । यद्यप भगवान्विरगुर्नास्ति धन्यतरो मया ॥६६

धामन वजार चरित्र का वर्णन ]
[ २४५
गृह्य प्रतिग्रह मत्तो यदि देवान्नुभूपति ।
भूयोऽपि धन्यता नीतो देवेनानेन वै गुरा ॥६७
य योगिना ध्यानयुक्ता ध्य यमाना हि दर्शनम् ।
न लभन्ते तथा विप्रास्साऽय दृष्टा मयाद्य वै ।।६८
एतच्छ त्वा गुरस्तत्र प्रपयाऽधोमुख स्थित ।
अयिता भवत। देव दया मर्वा धरा मया ॥६६
अपाकर भवेन्मह्य यदस्य भूपदप्रयम् ।
सत्यमतदानवेन्द्र यदुक्त भवता हि म ।।७०
भूम पदयायित्व द्विजेनानन म पृतम् ।
एतारता (वय चार्थी मयाप्यम्य कृत भवान् ॥७१
दानवा क गुरु शुक्राचाय पद गस प्रकार में यह जान पर दनवद्र
ने फिर यह वचन कहा था-ह गुग' धम र पर्थी में। मनो दान दन की
प्रनिगा कर दी है ॥६५।। कोई प्रतिमा का पालन करना मा पा गगा.
सन धम होता है। यदि या माक्षात भगगन् णुि ा व मन । म्या
धारण पर मर पाम भूमि की याचना परम र मियप्रय है तो फिर इम मगार
म मुभम पधिर कोई भी धन्य एबम् भाग्यशाली नही है ॥६६॥ गुरवर
यदि मुझम दार ग्रहण करक भी यह देश यो विभूपिन पर देवेंग तो मैं पौर
भी पति इमरापयता प्रसार दिया जऊंगा ॥६॥ प्रिमी
पान निमग्न हो.रान रत हुए भी यागोजन शन म नहीं मा पान ,
पौर विप्र लोग भी प्रिमरी प्राप्ति नही किया रत उमीना मात्र मैन अरन
ही घर पर प्राप्त हुपा दय लिया है-यमा यही मागोमाग्य की बात है
* 141 पुनारय महपिन कहा-दानयको यह बात सुनार गुर पुशपय
मात्रा नीच को मार मुप बस म्यिन हो गय । पानि न पहा.
पापने जो मुझर भूमि से पाच की है यह मम्पूण भूपि मुझे Rani
मानो हो है ितु य: नीर पं. भूमि का दान मुझे प्राप्त हो मम्मा
दन पाना हो रहा है। महादानय : 1 मारन शे दुध भी मुझो
रहा है यह पुणत गप है ६ महिने मुमो कपन टोनी

२४६ ]
1 पद्म पुराण
भूमि को याचना की थी। यह यावर इतनी ही भूमि का इच्छुक है अतएव मैंन
भी मापसे उतनी ही भूमि के दान के लिये निवेदन किया है ।।७।।
दनुपुत्रो याचितोऽसि वरमेतत्प्रदीयताम् ।
पदमयं वामनाय देवराज प्रतीच्छ मे ७२
तत्र व सुचिरं काल सुखी सुरपते वस ।
एवमुक्त्वा वाकलिना वामनाय पदप्रयम् ॥७३
तोयपूर्व तदा दतं प्रीयतां मे हरिःस्वयम् ।
दत्ते तु दानवेन्द्रण त्यक्त्वा रूपं च वामनम् ।।७४
हरिराचक्रमे लोकान्देवानां हितकाम्यया ।
यज्ञपर्वतामासाद्य गत्वाचैव उदङ्मुखः ।।७५
देवस्य वामचरणे निविष्टो दानवालयः ।
तय क्रमं स प्रथमं ददौ सूर्ये जगत्पतिः ।।७६
द्वितीयं च भ्र वे देवस्तृतीयेन च पार्थिय ।
ब्रह्माण्डस्ताडितस्तेन देवनागुनफार्मणा ।।७७
अंगुष्ठानण भिन्नेऽण्डे जलं भूरि विनिःसृतम् ।
नावयित्वा ब्रह्मलोकान्सल्लिोकाननुक्रमात् ॥७८
मैंने दनु के पुर पारसे यही याचना की है। इतनी ही भूमि प्रदान
करने का कार्य है और वही पाप इस समय प्रदान कर दीजिए । वापि
ने कहा- देवरान ! वही पर यह त समय तक मुमी होकर नियाम करें
॥७२॥ पुनस्रय महापि ने पहा~म प्रकार से कहकर यानि मे याम
के निजम पूर्वान पर प्रमाण भूमि उस गमय मे प्रदान मार दीयोमोर
यह रहा पर कि श्रीहरि मावान सय मुग पर प्रसन्न हो । दागवेन्द्र के मारा
हम प्रकार से मारभूमि का दान देने पर वामन ने पान पर
(A) KA Rain fen 11 ७३.७४ | फिर हरिदेवों को
ना में ममतमोहोरोमानकर पिया 11 पर्यससे प्रार
बह रही उमा गुगर HिRA ||७५ ॥ वाम परणा
सजवाया गनिनिगपा पार पर उनमें से किसी

वामनावतार चरित्र का वर्णन ] २४७ से मूर्य में प्रथम क्रम पिया था। ७६।। देव न द्वितीय पदकम ध्रुव में दिया था। है पार्थिव । तीमरे से उम देव ने अपने अद्भुत कमं के द्वारा ब्रह्माण्ड को साडित कर दिया था ७७॥ अगुष्ठ क अग्रभाग से अण्ड के भिन्न हो जाने पर बहुत-सा जत्र निकल पड़ा था। उस जल न ब्रह्मनोको को तथा अनुकम सभी लोको को लावित कर दिया था। ७८॥ म वाप्कलिमिनेन उक्त पूरय मे क्रमान् । अधोमुग्वस्तदा जात उत्तर नाम्यविन्दति ॥७६ मौनीभूत तु त दृष्ट्वा पुरोधा वाक्यमनवीन् । स्वाभाविकी दानशक्तिनं तु बटु वय क्षमा ८० यावतोय धरा देव सा दत्ताऽनेन ते प्रभो। उक्तो वाकलिना विष्णुर्यावन्मात्रा वमुन्धरा ।।८१ या सृष्टा भवना पूर्व सा मया न च गोपिता। अल्पा भूमिर्भवान्दी? न तु मृप्टेरह क्षम ॥८२ इच्छाशक्ति प्रभवति प्रभोस्ने दव मवदा । निरुत्तरम्तदा विष्णुमत्वा त सत्यवादिनम् ।।८३ हि दानवमुख्य त्व कते काम करोम्यहम् । मम हस्तगत तोय त्वया दत्त तु दानव ॥८४ तेन त्व वरयोग्योऽमि वराग्गा भाजन शुभम् । दास्येऽह भवत कामम येनगुप्वह ।।८५ विजप्तो हि तदा तेन देवदेवो जनार्दन । भक्तिं वृणामि देवेग त्वद्धम्तान्मरण हि मे ।।८६ व्रजामि श्वेतद्वीप ते दुर्लभ तु तपस्विनाम् । पाहैवमुक्त विष्णुस्ता तिहस्बैक युगान्तरम् ।।८७ वाराहरूपी यदाह प्रवेक्ष्यामि धरातलम । सदा हनिप्येऽह त्वा तु मदग्रे कर मार बसला । •न से, राजा दशरथ व मरन से और भाई धामन I इन तीनों कारणी मे में बहुत ही परितप्त हो रहा पूरा परो! द्वारा कापित इस वचन दो प्रयण कर उस समय मे यि श्रेट २४८ [ पथ पुगण होगया था और इममा पोई भी उतर वामन को प्राप्त नहीं हुप्रा था ॥७६॥ जब वह वाकनि मौनी होगर स्थित होगया तो उसको उस स्थिति में स्थित देखकर पुगेहितजी ने यह वचन कह थे-सुफ ने कहा-है प्रभो ! यह दान की तो स्वाभाविको है जो भी वस्तु जिस रूप में वर्तमान है उमी के उसी रूप में दान करने की मेरे यजमान में शक्ति । हम लोग नई भूमि की रचना करने में तो कुछ भी मामय नही रखते हैं कि तुरन्त सृजन करके प्रापको वार दे दिप जावे मोर शेष की पूत्ति करदी जाये । हे देव ! जितनी भी घरा इस दानवेन्द्र मेरे शिष्य के पास थी वह ममी तो इमने पापको देवी है ।।८ ॥ पुनस्त्य महपि ने वहा---उस समय में वाकलि के द्वारा भगवान् विष्णु से कहा गया था कि जितनी यह भूमि थी पौर जिसका सृजन मापने पूर्व में किया था उममे से तो मैंने कुछ भी लिया कर नहीं रखा है। यह भूमि तो बहुन ही थोडी है पौर मापका स्वरूप इस समय मे बहुत दी है। मैं सृष्टि करने के काय में समर्थ नहीं हूँ ॥८१॥ हे देव ! हे प्रभो । प्रापकी मवंदा इच्छा शक्ति ही प्रभव किया करती है। तब तो भगवान् विष्णु निरुत्तर हो गये थे और उसको सर्वथा सत्य बोलने वाला मान लिया था।) ८२ । भगवान् विष्णु ने इसके पश्चात् उससे कहा-हे दानवो मे परम प्रधान ! अब तुम बोनो कि मैं तुम्हारी कौन-पी कामना को पूर्ण करून हे दानव ! मेरे हाथ मे तो सरप करक तुम्हारे द्वारा दिया हुआ जल वर्तमान है ।।८३॥ इससे तो तुम अवश्य हो वरदान देने के योग्य हो पौर परम शुभ वरदान प्राप्त करने के पात्र भी हो। मैं तुम्हारी कामना के अनुमार ही दूगा जो भी प्रापका अर्थ हो मांग लो १८४॥ उस समय में देवो के देव भगवान् जनार्दन को भली-भांति जान लिया गया था। वाकलि ने कहा-हे देवेश ! मैं तो आपकी भक्ति प्राप्न करने का वरदान हो चाहता हूँ। मरा मरण हो।2म श्वेत द्वीप को जाता हूं जो कि तप- स्वियो को भी परम दुर्लभ म्यान है ॥ ५॥ पुलस्त्य ने कहा-इस प्रकार से (वामन) स्वरूा त्याग दिया कारक युगान्तर पर्यन्त वहाँ तुम रहो। मैं 71 मे प्रवेश करूंगा उसी समय में कामना से समस्त लोको को आक्रान्त कर। ॥८६८७७८॥ वहाँ जाकर ही उदड मुख होकर स्थित हुए ॥ ७५ ॥ दानवालय सब निविष्ट हो गया था । वहाँ पर उनमे जो निजगर आपके हाथ विध

पुष्कर तीर्थ का निर्माण कथन ]
। २४६
|| पुष्कर तीर्थ का निर्माण कथन ।।
तथान्य ते प्रवक्ष्यामि इतिहास पुरातनम् ।
यथा रामेण वै तीर्थ पुष्कर तु बिनिमितम् ॥१
चित्रकूटात्पुग रामो मैथिल्या लक्ष्मणेनच ।
अनेराश्रममासाद्य पप्रच्छ मुनिसत्तमम् ।।२
पानि पुण्यानि तीर्यानि किं वा क्षेत्र महामुने ।
यत्र गत्वा नरो योगिन्धियोगं सह वन्धुभिः ॥३
नव प्राप्नोति भगवन्स्तन्ममाचक्ष्वसुव्रत ।
अनेन वनवासेन राज्ञस्तु मरणेन च ।।४
भरतस्य बियोगेन परितप्ये ह्यह बिभिः ।
तद्वाक्य राघवेणोक्त श्रुत्वा विप्रर्पभस्तदा ।।५
ध्यात्वा च मृधिरं कालमिदं वचनमब्रवीत् ।
साधु पृष्ट त्वया वीर रघूणा वशवर्धन ॥६
मम पित्रा कृत तीर्थ पुष्कर नाम विश्रुतम् ।
पर्वतो द्वौ च विख्यातो मर्यादायज्ञपर्वतो।
कुण्डत्रय तयोमध्ये ज्येष्ठमध्यकनिठकम् ।।७
महपि पुलस्त्य ने कहा-अब मैं एक दूसरा बहुत ही पुराना इतिहास
तुमको बतलाता हूँ कि जिस प्रकार से राम ने इस पुष्कर नाम वाले तीर्थ का
निर्माण किया था ।। १ ।। पुराने समय में जर्बाक श्रीराम अपनी पत्नी मैथिली
पोर छोटे भाई लक्ष्मण के साथ अनि मुनि के माश्रम में पहुंचे थे और उन्होंने
मुनियों में श्रेष्ठ से पूछा था ॥२॥ श्रीराम ने कहा था-हे महामुने ! परम पुण्य
तीर्थ कौन-कौन से हैं तथा पुण्य क्षेत्र कौन है ? हे योगिन् ! जहां पर मनुष्य
पहुंचकर अपने बन्दुनों के साथ वियोग कभी नहीं प्रस किया करता है । है
सुन्दर व्रतो वाले । हे भगवन् ! वह हमको कृपा करके प्राप बतला दीजिए।
इस घोर, महा कठिन वनवास करने से, राजा धारथ के मरने से और भाई
भरत के वियोग हो जाने से इन तीनो कारणो से मैं बहुत ही परितप्त हो रहा
है थं राम के द्वारा कथित इस वचन को प्रवण कर उस समय में विप्र श्रेष्ठ
+

२५० ।
[ गण
मति ने बहुत समय ना ध्यान किया था और फिर इसके उपरान यह यचन
वे बोले -~-13॥४॥ ५॥ महाप भनिने यहा पा.हे राघवेन्द्र !
मापने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया है। माप तो रघु के वंश की वृद्धि करने
पाने हैं ।। ६॥ मेरे पितात्री ने 'पुष्कर'--इम नाम में परम प्रमिन सी की
रचना की थी। मयांदा भौर का पर्वत-इन दो नामों दाने राम विन्यात
पक्षन है । उन दोनों पनी रे मन में मेर--मध्यम घोर निट ये लोन पुण
वर्तमान हैं 100
तेपु गत्वा दशरथं पिण्डदानेन तर्पय ।
तीर्थानां प्रवर तोयसेशरणामपि चोत्तमम् ।।
मावियोगा च गुरसा वापी रघुकुलबह ।।
पितृन्मन्तपंयामाम अद्भिदेवांन मर्यशः ।
स्नानायमाने रामेण माफी मुनिहाय
आगच्छमियनयुक्तो दृष्टस्तय धीमता।
गत्या वे मम्मुम तस्य प्रणिपस्य च सादरम् ॥१०
पृष्टीवियोगदः मूतपः फनमस्यां दिशि प्रभो।
गुनो दाम्पस्याह रामो नाम जनः स्मृतः ।।११
गौभाग्यवापीता द्रष्टुमहं ग्रामोनियामनात् ।
सल्यानंती चैय कृपो भगवान्प्रयोत मे ॥१२
यमुक्ता रामेण मायट प्रत्युवाप है।
मापु गपय भद्रं ते मुन भवना नम्॥१३
तीर्यपानाममन यरमामोडीह गाम्नतम् ।
पायाममप म्यम्य पासी नायियोगमा १४
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पुरतीयं का निर्माण क्या ]
[ २५१
कर लिया था उसा अन्त मे श्रीराम न मुनिया में श्रेय मार्कण्डेय मुनि को शिष्यो
से मयुक्त व प्राते हुए दखा था। उनके सामने जाकर बहुत ही आदर
के माथ धीमान् राम न प्रणाम किया था 18|१०|॥ श्रीराम ने उन मुनि श्रेष्ठ
से पूछा था-हे प्रभो । वियोग के न देने वाला वह कूप यहाँ किम दिशा में
है ? मैं मह राज दशरथ का पुत्र हूँ जिसको कि मनुष्यों के द्वारा 'राम'--यह
नाम कहा जाता है ॥११॥ श्रीगम ने कहा था कि मैं तो अग्रिमुनि की प्राता
से उम सौभाग्य वापी का दश करने के लिये ही यहां पर प्राय है। अब
माप कृपाव र वह स्थान और वे दोनों कूप मुझे बतला दीजिये ।।१२।। इम
प्रकार से श्रीराम के द्वारा कहे जाने पर मार्कण्डय मुनि ने इसका प्रत्युत्तर दिया
था। मार्कण्डेय ऋषि ने कहा है राघव । बहुत अच्छा किया, पाप का कल्यागा
हो, आपने बडा सुकृत किया है ॥१३॥ माप तीर्थ यात्रा के प्रमग से ही यहाँ
पर प्राप्त हुए हैं तो माप मेरे साथ इस समय पाइये, मैं पापको उम प्रवियोग
प्रदान करने वाली वागी को दिखलाता हूँ उसे प्राप देख लीजिये ।।१४ ।
अवियोगश्च सर्वेश्च कूप एवात्र जायते ।
आमुग्मिके चैहिके च जीवतोऽपि मृतस्य वा ।।१५
एतद्वाक्य मुनीन्द्रस्य श्रु त्वा लक्ष्मणपूर्वज ।
सस्मार रामो राजान तदा दशरथ नृप ।।१६
भरत सह शत्रुघ्न भ्रातृनन्याश्च नागरान् ।
एव चिन्तयतस्तस्य सन्ध्याकालो व्यजायत ॥१७
उपास्य पश्चिमा सन्ध्या मुनिभि सह राघव. ।
सुप्वाप ता निशा तन भ्रातृभार्यासमन्वित ॥१८
विभावर्यवसाने तु स्वप्नान्ते रघुनन्दनः ।
चित्रा माना तथा चान्यरयोव्याया स्थित. किल ।।१६
विवाहमङ्गले वृत्तं बहुभिर्वाधवै. मह ।
समासीन सभार्योऽमावृपिभिः परिवारित ॥२०
लक्ष्मणेनाप्येवमेव दृष्टोऽमी सीत्या तथा ।
प्रभाते तुमुनीनातत्सर्वमेव प्रकीर्तितम् ॥२१

२५२ ] [ पद्म पुराण ऋषिभिश्चतथेत्युक्त सत्यमेतद्रघूत्तम । मृतस्य दर्शने श्राद्ध कार्य मावश्यकं स्मृतम् ॥२२ या पर पूग ही ऐसा है कि इस लोक में प्रौर परलोक में जीविन प्रथा मृत प्राणी मब के साथ वियोग नही होता है ।। १५ । महामुनीन्द्र मार्कण्डेय के इस धनन को लक्ष्मण के ज्येष्ठ भ्राता श्रीराम ने सुनकर है नृप ! उसी समय में राम ने महाराज दशरथ का स्मरण किया था।॥ १६ ॥ इसके अतिरिक्त भरत-शत्रुधन, अन्य भाई-~- -दूसरे नगर में निवासी इन सबका ध्यान करते थीगम को सन्ध्या काल हो गया था ॥ १७॥ मुनियो के साथ ही श्रीगन ने पश्विम सन्ध्या की उपासना करके अपने छोटे भाई और भार्या के साथ उप गत्रि मे वहाँ पर ही शयन किया था ।। १८ ।। जब रात्रि का अन्त हो गया था उमी समर मे स्वप्नान में श्री रघुनन्दन प्ररने पिता-माता तथा अन्यों के साथ भयोध्या में स्थित थे ।। १६ । बान्धवी के साथ विवाह- मगल के होने पर यह अपनी भार्या के माय भूपयो से परिवृत होते हुए विद्य. मान थे ॥२०॥ इसी प्रकार मे लक्ष्मण ने भी सीता के सहित देखा था । जब प्रभात काल हो गया तो उम समय में श्रीराम ने मुनियों से यह घटना कही थी ।।२१।। ऋषियों ने भी 'ठोक ऐसा ही है'-यह कहते हुए कहा-हे रघूत्तम ! यह बिल्कुल सत्य है । मृत पुस्प के दर्शन करने पर श्राद्ध करना परमावश्यक बताया गया है।॥ २२॥ स्नात्वा रामो योगवाप्या मुनीस्ताननुपालयन् । मध्याह्नाचलिते सूय कालेकुतपकेतथा ॥२३ आयाताऋपयः सर्वे येरामेणानुमलिताः। तानागनान्मुनीन्दृष्ट्वा वैदेही जनकात्मजा ॥२४ रामान्तकं परित्यज्य वीडिताऽन्यत्रसस्थिता। विस्मयोरफुल्लनयना चिन्तयानाचवेपती ।।२५ ब्राह्मणा नेह जानन्तिश्राद्धकाले ह्य पस्थिताः । रामेण भोजिता विप्राः मृत्युक्तेन यथाविधि ॥२६ वैदिक्यश्च कृतास्सर्वा. सक्कियायास्समीरिताः । पुराणोक्तो विधिश्चैव वैश्वदेविकपूर्वकः ।।२७ पृटपर तीथ का निर्माण कथन ] । २५३ भुक्तवत्सु च विप्रेपु दत्वा पिण्डाव्यथाक्रमम् । प्रेषितेषु यथाशक्ति दत्वातेपुचदक्षिणाम् ।।२८ उस ममय में श्रीराम ने योग वापी में स्नान करके उन मुनियो को आमन्त्रित किया था । मध्य ह से मूर्य के वनित हो जाने पर प्रौ। ऐरा समय उपस्थित हो जाने पर जबकि ताप कुछ कम हो गया था, वे सभी पगरण वहां आकर उपस्थित हो गये थे जो-जो श्रीराम के द्वारा निभत्रित किय गये थे । उन समागत मुनियो को देखकर जनर को पुबो वैदही र म के समीपस्थ स्थान को त्यागकर नजित होती हुई दूसरे स्थान पर जाकर सस्थित हो गई थी, उम समय में जानकी के मंत्र विस्मय से उत्फुल्ल हो रहे थे और वह चिनित सो होकर कॉप रही थी॥२३॥२४॥२५॥ श्राद्ध के समय पर उपस्थित होने वाले पाह्मए या नही जानते थे । श्रीराम ने उन समस्त ब्र हागो को स्मृतियो मे कही हुई विधि से भोजन कराया था ॥२६॥ वैदिको अर्थात् वेद में बनाई हुई सभी सस्क्रियाएँ भली भांति की गई थी। पुराणों में जो विधि विधान श्रद्ध के विषय मे बनाया गया है वह भी वैश्वदेविक पूर्वक किया गया था ॥२७॥ समस्त विनों के भोजन कर लेने पर क्रम के अनुसार पिएडो को देकर सबको यक्षाशक्ति दक्षिणा देकर उनको मरका वापिस विदाई दे दी पी 11 गर्नेषु विप्रमुरयेपु प्रियारामोऽभवी दिदम् । किमर्थ सुभ्र नष्टानि मुनीन्दृष्ट्वा विहागतान् ॥२६ तत्सर्वं त्वमिद तत्व पारण बंद मा चिरम् । भवितव्य कारणेन तच्च गोप्यनमे कुरु ।।३० शापितामि मम प्रारणलक्ष्मणस्य शुचिस्मिते । एवमुक्ता तदा भर्ना नपाउनाड मुमो स्थिता ३१ विमुञ्चन्ती साऽय पात गधव वाक्यमन्त्रवीत् । शृणुत्व नाथ यदृष्टमाश्चयं मिह यादृशम् ॥३२ गम त्वया चिन्त्यमानो राजेन्द्रमियह वागतः। सर्वाभरणमयुक्तो वो चान्यो च तयाविधौ ॥३३ द्विजाना देहमयुक्त म्ययस्ले ग्घुनन्दन । पितरस्तु मया दृष्टा ब्राहाणापु राघव ३४

४४ ]
[ प पुराण
मुस करके
दृष्ट्वा अपाविता चाहमपनान्ता तवास्तिकात् ।
स्वया व भोजिता विप्राः कृतं थाई यथाविधि ।।३५
जब समस्त विओं ने भानर कर लिया था तो इसके उपरान भगवान
श्रीराम ने अपनी शिया वैदेही में कहा था-हे सुभ्र, ! यहाँ पर प्राये हुए इन
मुनियो को देखकर भाप यहाँ मनप यो चली गई थी? 1॥२६॥ आप इराका
सम्पूर्ण तत्व तथा कारण हमको बतलाइये और इसके बताने में विलम्ब न
। इसका कोई न कोई कारण तो अवश्य ही होना चाहिए । मब उस कारण
को मुझपे मत विरामो ॥३०॥ हे पुचिस्मित वाली | मागको मेरी तथा लक्ष्मण
की शपथ है अगर तुम इसे मुझमे ट्रिगती हो। इस तरह से अपने स्वामी के
द्वारा जर जानको से कहा गया तो वह सहा से नीचे की ओर
स्थित हो गई थी ।। ३१ ॥ जानको अपने नेत्रो से मासुमो का पात करतोदई
श्रीराम से यह वचन बोलो-हे नाथ ! मैंने यहाँ पर जो भी, जिस प्रकार का
बाश्चर्य देखा था उसका आप घयण कीजिए ।॥३२॥ है राम । मापके द्वारा
ध्यान किय जाने पर राजेन्द्र यहाँ पर आये थे। समस्त पाभरणो से सुसमन्वित
उसी प्रकार के दो अन्य पुरुष भी थे ॥३३॥ है रघुनन्दन ! द्विवो के देह से
सयुक्त वे तीन पिनर ब्र हाणों के पङ्गी में राधा ! मैंने देखे थे ।।३४11 उनको
देखकर लजा से पृत होकर प्रापके समीप से मैं मलग चली गई पी। पापने
जन ग्राह्मणों को भोजन करा दिया है और विधि के अनुसार पूरा श्राद्ध कर
लिया है ११३५॥
वत्व लाजिनसवीता कथ राज्ञ.पुर मरा।
भवामि रिपुवीरघ्न मत्यमेतद् दाहृतम् ॥३६
तत्र वागधचा नीतः प्रिया का प्रियवादिगीम् ।
अङ्गमानीयसुदृढ परिष्वज्यच सादरम् ॥३७
भुक्तो भोज्य तदा वीरौ पश्चागुक्ता च जानको ।
एवं स्थिती तदा सा च ता रात्रि तय गवौ १३८
उदिते च सहमागौ गमनाय मनो दधुः ।
प्रत्यड मग गत कोश मे यापञ्च पुष्पग्म् ॥३९

वा अगम्त्याश्रम गमन ]
[ २५५
यह सुनकर गघवन्दु प्रत्यल ही प्रसन्न हुए और उस परम प्रिय भापण
ने वाली अपनी प्रिया को अपनी गोद में बिठाकर प्रादर और दृढ़ता क साथ
का समालिङ्गा किया था ।। ३६ ॥ उसी समय उन दोनो वीरो ने भोज्य
पार्थों का भोजन किया था और इनक भाजन कर लेने के पश्चात् जानकी ने
भोजन किया था । इस प्रकार से वही पर उन दोनो राम लक्ष्मण ने तपा
जानकी ने उस रात्रि में विश्राम किया ॥३७ ३८।। जब प्रात काल मे सूर्य उदित
हुए थे तो उस समय म इनने गमन करने का मन में विचार किया था। पश्चिम
को पोर मुख करके एक कोश पर्यन्न गय धे जहाँ तक कि ज्येष्ठ पुष्कर था ।३६॥
॥ राम का अगस्त्याश्रम गमन ।।
ततो देवा प्रयातास्त विमानर्यहुभिस्तदा ।
रामोऽप्यनुजगामाशु कुम्भयोनेस्तपोवनम् ॥१
उक्त भगवता तेन भूयोऽप्यागमन कृथा. ।
पूर्वमेव सभाया च यो मा द्रष्टु समागत. ॥२
तदह देवतादेशात्तत्कार्यार्थे महामुनिम् ।
पश्यामि त मुनि गत्वा देवदानवपूजितम् ।।३
दृष्ट्वा च देवान्सम्प्राप्तानगस्त्यो भगवानृपि ।
अध्यमादाय सुप्रीतः सर्वान्तानन्यपूजयत् ।।४
ते तु गृह्य तत पूजा सम्भाष्यचमहामुनिम् ।
जग्मुम्त त्रिदशा हृष्टा नाकपृष्ठ सहानुगा ॥
सुतो दशरथस्याह भवन्नमभिवादितुम् ।
प्रागतो वै मुनिश्रेष्ठ सौम्येनेक्षस्व चक्षुषा ॥६
निधूतपापस्त्वा दृष्ट्वा भवामीह न सगय ।
एतावदुक्त्वा त मुनिमभिवाद्य पुन पुन 119
महवि पुमत्स्य ने वहा-इस अनन्नर वे ममात देवगण उमो समय
मे उन बहुत से विमानो ये मारा रवाना हो गये थे। श्रीराम भी उनके पंधे
हो शीघ्र पुम्भयोनि पि के तपोवन को चन दिये ये ॥१॥ धुम्मयोनि भगवान

२५४ ] पद्म पुराण दृष्ट्वा अपाविता चाहमपत्रान्ता तवान्तिकात् । त्वया व भोजिता विप्राः कृत था यथाविधि ॥३५ जब ममम्त विषों ने भानन कर लिया था तो इसके उपरान्त भगवान् श्रीराम ने अपनी प्रिया वैदेही से कहा था-हे सुन ! यहाँ पर भाये हुए इन मुनियो को देखकर प्राप यहाँ अलग क्यों चली गई थी ? ||२६|| आप इसका मम्पूरणं तत्त्व तथा कारण हमको बतलाइये और इसके बताने में विलम्ब न करो। इसका काई न कोई कारण तो अवश्य ही होना चाहिए । पब उस कारण को मुझमे मत छिगामो ॥३०॥ हे शुचिस्मित वाली ! मापको मेरी तथा लक्ष्मण की शपथ है अगर तुम इमे मुझमे छिपाती हो। इस तरह से अपने स्वामी के द्वारा जब जानकी से कहा गया तो वह लज्जा से नीचे की पोर मुम्ब करके स्थित हो गई थी ।। ३१ ।। जानरी अपने नेत्रो से मासुमो का पात करती हुई श्रीराम से यह वचन बोली-है नाय ! मैंने यहाँ पर जो भी, जिस प्रकार का आश्चयं देखा था उमका आप श्रवण कीजिए ॥३२॥ है राम मापके द्वारा ध्यान किये जाने पर राजेन्द्र यहां पर आये थे। समस्त पाभरणो से सुसमन्वित उसी प्रकार के दो अन्य पुरुष भी थे ॥३॥ हे रघुनन्दन । द्विजो के देह से सयुक्त वे तीन पितर ब्रह्मणो के पड़ो में हे राघर ! मैंने देखे थे ॥३४॥ उनको देखकर लगा से युक्त होकर प्रापके ममोप मे मैं अलग चली गई थी। मापने उन ब्राह्मणों को भोजन करा दिया है और विधि के अनुसार पूरा श्राद्ध कर लिया है ॥३॥ वत्वलाजिनसबीता क्थ राज्ञ.पुर मग। भवामि रिपुवीरघ्न मत्यमेतद्र दाहृतम् ।।३६ तछ त्यागधव. प्रीतः प्रिया ता प्रियवादिनीम् । अङ्कमानीयमुदृढ परिप्पज्यच सादरम् ।।३७ भुक्तो भोज्य तदा वीगे पश्चागुक्ता च जानको। एव स्थितौ तदा सा च ता रायि तत्र राघवौ ॥३८ उदिते च सहयाशी गमनाय मनो दधुः । प्रत्यड मप गत नोशं ज्ये' यावच्च पुपरम् ॥३६

राम बारयाप्रम गमन ]
[ २५५
यह सुनकर गबन्दु अत्यन्त ही प्रसन्न हुए और उस परम प्रिय भापण
करने वाली अपनी प्रिया को अपनी गोद में बिठाकर प्रादर और दृढता के साथ
उसका समालिङ्गा किया था ॥ ३६ ।। उसी समय उन दोनो वीरो ने भोज्य
पदार्थों का भोइन किया था और इनक भोजन कर लेने के पश्चात् जानको ने
भी भोजन किया था। इस प्रकार से वर पर उन दोनो राम लक्ष्मण ने तथा
जानकी ने उस रात्रि में विश्र म किया ॥३७ ३८|| जब प्रात काल में सूर्य उदित
हुए थे तो उस समय म इनने गमन करने का मन में विचार किया था । पश्चिम
की मोर मुख करके एम कोश पर्यन गय थे जहाँ तक कि ज्येष्ठ पुदकर था ३६।
॥ राम का अगस्त्यायम गमन ।
ततो देवा प्रयातास्तविमानबहुभिस्तदा।
रामोऽप्यनुजगामाशु कुम्भयोनेस्तपोवनम् ।।१
उक्त भगवता तेन भूयोऽप्यागमन कृथाः ।
पूर्वमेव सभाया च यो मा द्रप्टु समागत ॥२
तदह देवतादेशात्तत्कार्थेि महामुनिम् ।
पक्ष्यामि त मुनि गत्वा देवदानवपूजितम् ।।३
दृष्ट्वा च देवान्सम्प्राप्तानगस्त्यो भगवानृपि ।
अध्यमादाय सुप्रीतः सर्वास्तानभ्यपूजयत् ।।४
ते
तु गृह्य तत पूजा सम्भाव्यचमहामुनिम् ।
जग्मुस्ते त्रिदशा हृष्टा नाकपृष्ठ सहा ॥
सुतो दशरथस्थाह भवन्तमभिवादितुम् ।
आगतो वे मुनिश्रेष्ठ सौम्येनेक्षस्व चक्षुपा ॥६
निध्तपापस्त्वा दृष्ट्वा भवामीह न सशय ।
एतावदुक्त्वा स मुनिमभिवाद्य पुन पुन 119
म.पि पुनस्त्य ने कहा-इसके अनन्नर वे समस्त देवगण उमो समय
में उन बहुत से विमानो के द्वारा रवाना हो गये थे। श्रीराम भी उनके पंछे
हो शीघ्र कुम्भयोनि ऋपि के तपोवन को चन दिय थे ॥११॥ कुम्भयोनि भगवान

[ पद्म पुगण
ने मुझो कहा था कि प्राप फिर भी यहाँ प्राने की कृपा करे। जो पूर्व में हो
ममा में मुझे दखने के लिये आये थे ॥ २॥ मो में देवता के प्रादेश मे उसके
कार्य के लिये उम महा मुनि के ममी में जाकर जो कि देवो और दानवो दोनो
परम पूजन है नम मुनिवर का दर्शन करूगा ||३|| अगस्त्य भगवान ऋप
ने उन वहां प्रम होने वाले देवो का दशन करके अयं पात्र हाथ मे उठाकर
अत्यन्त प्रमान एवम् पीति सयुत होते हुए उन सबकी पूजा की थी ॥४॥ उन
मबने भी अगस्त्य द्वारा की हुई पूजा को स्वीकार करके महा मुनि से सम्भाषण
करके वे ममम्त देवगण अपने अनुगमन करने वालो के साथ नाक पृष्ठ को चले
गये थे ॥५॥ पोराम ने निवेदन पिया था-है मुनि श्रेष! मैं महाराज दशरथ
का पुत्र हूं इस समय मापका अभिवादन करने के लिये ही यहां पर उपस्थित
हुप्रा हूँ । अव म प मुझे पती मोम्य दृष्टि से देखने की कृपा करें।६। मैं
इम समय प्रारका परम पावन दर्शन प्राप्त करके अपने सम्पूर्ण पापो को नित
कर देने वाला होगया हूँ अर्थात् मेरे सभी पाप नष्ट हो गये हैं-इम मे तनिक
झी मशय नही है । पुलस्त्य मुनि ने कहा-इतना भर् कहकर श्रीराम ने मुनि
मा बारम्बार अभिवादन किया था ।।७।।
कुशल भृत्यवर्गस्य मृगाणा तनयस्य च ।
भगवद्दर्शनाकाक्षी शूद्र हत्वा विहागतः ॥
स्वागत ते रघुवे जगद्वन्द्य सनातन ।
दर्शनातव कान्य पूतोह मुनिभि सह ।।
त्वत्कृते रघुशार्दूल गृहाणाघ महाद्य ते ।
म्यागत नशार्दूल दिष्टया प्राप्तोऽमि शत्रुहन् ।।१०
इद चाभरण सौम्य मृत विश्वकर्मणा ।
धि दिव्यन यापा दोप्यमान म्वतेजमा ॥११
प्रतिगृह्णी व राजेन्द्र मत्प्रिय र राषय ।
लब्धम्य हि पुननि गुमहरफलमुच्यते ॥१२
त्व हिगत परिपातु सेन्द्रानपि मुरोनमान् ।
नम्मायनाम्ये विधिवत्प्रतीच्यम्प नरपंभ ॥१३

राम का मगस्त्याश्रम गमन ] अथोवाच महावाहुरिक्षवाकूगा महारथः । कृताञ्जलिमुनिश्रेष्ठं स्व च धर्ममनुस्मरन् ।।१४ श्रीराम ने अगस्त्य मुनि से पूछा या--कहिए, अापके भृत्य-वर्ग, वन के मृगगण और मापके पुत्र का कुशल तो है ? इसके पश्चात् उन्होने कहा था कि शूद्र का हनन करके प्रापके पवित्र दर्शन वी प्राकाक्षा रखने वाला मैं यह पर पाया हूँ । ८॥ अगस्त्य ने कहा-हे मम्पूर्ण जगत् के द्वारा वन्दना करने योग्य ! हे सदा सर्वदा से चले प्राने वाले ! हे रघुश्रेष्ठ ! आपका स्वागत है । हे काकुत्स्थ ! माज आपके दर्शन प्राप्त कर मुनिगण के सहित मैं पून होगया हूँ III हे रघु के वश में शार्दूल के ममान ! पाप तो महान द्युति से सम्पन्न हैं । आपके लिये जो यह अयं समर्पित किया जा रहा है, उसे पाप अङ्गीकार कीजि- एगा । है नर शार्दूल ! मापका स्वागत है। आप तो शत्रुनो के हनन करने वाले हैं । आज बहुत ही प्रसन्नता की बात है कि पापने यहां पर पदार्पण किया है ॥१०॥ हे सौम्य ! यह एक प्राभरण है जिसको विश्वकर्मा ने निमित किया है । यह दिव्य वपु से अपने तेज के द्वारा दीप्तिमान होकर रिव्य है ।।११॥ हे राजेन्द्र ! भाप इसको प्रति ग्रहण करे और मेरा प्रिय करने का अनुग्रह कीजिए। हे राघव ! जो वस्तु लब्ध हुई हो उसका फिर दान कर देने में महान फल की प्राप्ति होती है ।। १२ ।। हे नरर्पभ ! आप तो इन्द्र के सहित समस्त सुरश्रेष्ठों को परित्राण करने के लिये ममर्थ हैं । इस कारण से मैं इगको विधि के साथ आपको दूंगा माप इसको स्वीकार कीजिए ।। १३ ॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा-~~~ इसके उपरान्त महान् बाहुप्रो वाले और इक्ष्वाकुओ में महारथी भगवान श्रीराम हायो को जोडते हुए अपने धर्म का अनुस्मरण करते हुए उन मुनियो में देश अगस्त्य से बोले-श्रीरा ने कहा-॥१४॥ प्रतिग्रहो वै भगवस्तव मेऽत्र विहितः । क्षत्रियेण कथ विप्र प्रतिग्राह्य विजानता ॥१५ ब्राह्मणेन तु यद्दत्त तन्मे त्व वक्तुमर्हसि । सपुत्रो गृहवानस्मि समर्थोऽस्मि महामुने ।।१६ प्रापदा च न चाक्रान्तः कथं ग्राह्यः प्रतिग्रहः । भार्या मे सुविर नष्टा न चान्या मम विद्यते ॥१७ २५८ ] [ पध-पुराण । केवलं दोपभागी च भवामीह न संशयः । कष्टां चैव दशांप्राप्यक्षत्रियोऽपि प्रतिग्रहम् ॥१८ न च प्रतिग्रहे दोपो गृहीतपार्थिवैर्नृप । भवान्वैतारणे शक्तस्त्रैलोक्यस्यापि राधय ।।१६ तारय ब्राह्मणं राम विशेषेण तपस्विनम् । तस्मात्प्रदास्य विधिवत्प्रतीच्छस्व नराधिप ।।२० हे भगवन् ! मापके द्वारा दिया हुमा यह प्रतिग्रह यहां पर मेरे लिये स्वीकार करना तो एक निन्दिन वार्य है । हे विष ! मैं तो क्षत्रिय हूँ मुझे इसका भली-भांति ज्ञान है तो फिर आपके द्वारा यह प्रतिग्रह किस प्रकार से ग्रहण कर लेना उचित होगा ? ॥१॥ ब्रह्मण के द्वारा जो दिया जावे वह क्या मुझे लेना ठीक है ? इसे तो आप ही बनाने के योग्य हैं। मैं पुत्र वाला हूँ गृहस्थ हूँ पौर हे महामुने । सभी प्रकार से समपं भी हूँ।॥ १६ ॥ मैं किसी प्रकार की मापत्ति में भी इस समय में माक्रन्तु नहीं हो रहा हूं तो फिर मापका प्रदान किया हुप्रा यह प्रतिग्रह मुझे किस तरह ग्रहण कर लेना चाहिए? मेरी भार्या तो बहुत समय से नष्ट हो गई है अन्य कोई भी भार्या मेरी इस समय में नहीं है ।। १७ ।। मैं तो इसको ग्रहण करके केवल दोष का ही भागी बन जाऊंगा इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । यदि किसी को से परिपूर्ण दशा को प्राप्त करके क्षत्रिय भी प्रतिग्रह को ग्रहण करे तो वह कर सकता है ॥१८॥ कष्टो से दुर्दशापन ऐसा कर भी लेता है तो उसे कोई दोप नहीं लगता है-ऐसा महपि मनु ने बनलाया है । वृद्ध माता-पिता, मती-साध्वी भार्या और शिशु सुत हो तो सैकडो प्रकार्य करके भी उनका भरण-पोपण करना चाहिए-ऐसा भी मनु ने कहा है । अतएव हे विप्र ! यह प्रापका प्रदान किया हुआ प्रतिग्रह मैं नहीं लेना चाहता हूँ । हे सुरपूजित ! आपको मेरे इम निषेधकर देने पर किसी भी प्रकार का कोप नहीं करना चाहिए। अगस्त्य मुनि ने कहा-हे नृप ! जो राजा हैं उनके द्वारा प्रतिग्रह के प्रहण करने पर भी कोई दोष नहीं होता है । भाप तो हे राघव ! इस त्रिलोकी के भी तारण कर देने मे पूर्ण समर्थ हैं ।१६। हे राम! इस ब्राह्मण को और विशेष करके तपस्वी ब्र ह्मण का तारण कीजिए, राम का प्रगस्त्याश्रम भागमन ] [ २५६ हे नराधिप । इसी कारण स मैं इसको आपके लिये मर्पित करता हूँ। भाप इसको विधिपूर्वक अङ्गीकार कीजिए ।॥२०॥ क्षत्रियेण कथ विप्र प्रतिग्राह्य विजानता। ब्राह्मणेन यथा दत्त तन्मे त्व वक्तुमर्हसि ॥२१ ततो राम. प्रजग्राह मुनेहस्तान्महात्मन । दिव्यमाभरण चित्र प्रदीप्तमिव भास्करम् ॥२२ प्रतिगृह्य ततोऽगस्त्याद्राघव परवीरहा । निरीक्ष्य सुचिर काल विचार्य च तुन पुन ॥२३ मौक्तिकानि विचिनाणि धात्रीफलसमानि च । जाम्बूनदनिबद्धानि वनविद् मनीलक. ।।२४ पद्मराग सगोमेधेडूयः पुप्परागक, । सुनिबद्ध सुविभक्त सुकृत विश्वकर्मणा ।।२५ दृष्ट्वा प्रीतिसमायुक्तो भूयश्चेद व्यचिन्तयत् । नेशानि च रत्नानि मया दृष्टानि कानिचित् ।।२६ अत्यद्भुतमिद ब्रह्मन्नप्राप्य च महीक्षिताम् । कथ भगवता प्राप्त कुतो वा केन निर्मितम् ।।२७ कुतूहलवशाच्चैव पृच्छामि त्वा महामते । करतले स्थिते रत्ने करमध्य प्रकाशते ।।२८ । श्रीराम ने कहा-यह सभी कुछ का ज्ञान रखते हुए क्षत्रिय को हे विप्र । यह प्रतिग्रह किस प्रकार से ग्रहण करना चाहिए जो कि एक ब्राह्मण के द्वारा दिया जा रहा है । माप हो इस विषय पर व्यवस्था देने के लिये पूर्ण- तया इस समय मे योग्य होते हैं ॥२१॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा- अब अपने उद्धार करने के लिये ही अगस्त्य मुनि ने उस समर्पित करने का अत्यधिक मनु. रोध किया तो फिर उस महान मारमा वाले मुनि के हाथ से उस प्रनिग्रह को राम ने ग्रहणकर लिया था जो कि एक ऐसा दिव्य प्राभरण था कि बहुत विचित्र पा मोर ऐसा वह देदीप्यमान हो रहा था जैसे सूर्य ही हो ॥२२॥ शत्रु दम के वीरो के हनन करने वाले श्रीराम ने इमकै अनन्तर उसे ग्रहण करके ? २१० [ पप पुगण अगस्त्य में अधिक समय तक देवा मौर वारपार विमार विया था॥२३॥ इस पाभग्रा में मवले के कनों के समान अति विचित्र मौलिक हैं । जाम्बूनद के सदृश हीरा-विद्रुम और नीलम रलो म यह निश्द है ।।२४॥ इममे पराग मणियाँ-~गामेघ-~वडूयं मणियों मोर पुष्पराग मगियो भी बहुत ही सुन्दरता क साथ निबद्ध हैं को सुस्पष्ट तया विभक्त हैं । विश्वकर्मा ने इसे बहुत ही अच्छी तरह से निमित किया है ॥२॥ परम प्रोति त समन्वित होकर पुन प्रोगम ने विनम पिया था कि मैंने मणे तक इस तरह के कोई भी रत्न पहिले मही दखे पे ॥२६।। श्रीराम ने कहा- यह प्राभरण तो अत्यन्त ही अद्भुत है और राजामो को भी प्राप्त नहीं होने के याग्य है । मापने इमको किम प्रकार में प्राप्त कर लिया है और कहाँ से प्राप्त किया है तथा इसका निर्माण किसने किया है ? ॥२७ । हे महामने । मुझे हृदय में बड़ा भारी कुतूहल हो रहा है । इसी मे मैं आपसे यह पूछ रहा हूं। करतल पर रत्न स्थित हैं और करके मध्य म प्रकाश कर रहै हैं ॥२८॥ शृणु राम पुरावन पुरानेतायुगेमहत् । द्वापरे समनुप्राप्त बने यदृष्ट्यानहम् ।।२६ आश्चर्य सुमहाबाहो निवोध रघुनन्दन । पुरा त्रेतायुगे ह्यासीदरण्य बहुविस्तरम् ॥३० समन्ताद्योजनशत मृगव्याघ्रविजितम् । तस्मिन्निप्पुरुषेऽरण्ये चिकीर्षुस्तप उत्तमम् ॥३१ अहमान मितु सौम्य तदरण्यमुपागत । तस्यारण्यस्य मध्य तु युक्त मूलफलै सदा ॥३२ शाहुविधाकारनानारूप मुकानन । तस्यारण्यस्य मध्ये तु पञ्चयोजनमायतम् । ३३ हाकारण्डवाकीर्ण चक्रवाकोपशोभितम् । तत्राश्चयं मयादृष्ट सर परमशोभितम् ॥३४ अगस्त्य मुनि ने कहा--हे राम । मब आप एक पुरावृत्त मुनो जो पहिले त्रेता युग म घटित हुआ था और महान् या। द्वापर युग के समात होने

राम का अगर गश्रम गमन ]
[ २६१
पर मैंने जिसको देखा था ॥२६॥ हे महा बाहुओं वाले रघुनन्दन । इस माश्चर्य
को आप समझिये । पहिले येता युग में एक अत्यधिक विस्तार वाला भराय
या ॥३०॥ चारों ओर उमका सो योजन का विस्तार था और वह मृग तथा
ध्यान से रहित पा । उस निर्जन मरण्य मे उत्तम तपश्चर्या करने की इच्छा
रखने वाले मैंने यहां जाकर तप करने को उस अरण्य मे अपनी उपस्थिति है
सौम्य ! की थी । उस अरण्य का जो मध्यभाग था वह सर्वदा मूल और फलों
से समवित रहा करता पा ॥३२३२।। बहुत-से आकार-प्रकार वाले तथा भनेक
रूप वाले जगमी शाको से मध्य में पांच योजन विस्तार वाला उस परण्य का भाग
था ॥३३॥ हम-कारण्डवो से आकीरणं और चक्रवाको से शोभित वह भरण्य
का भाग था । उसमें मैंने यह एक माश्चर्य देखा था कि एक परम शोभित
सरबर था।३४॥
प्रभाते पुनरुत्थाय सरस्तदुपचक्रमे ।
प्रथापश्य शवमहमस्पृष्टजरम क्वचित् ॥३५
तिष्ठन्त परया लक्ष्म्या सरसो नातिदूरत ।
तदर्थ चिन्तयानोऽह मुहूर्तमिव राधव ।।३६
अस्य तीरे न वै प्राणी को वाप्येप सुरर्षभ ।
मुनिर्वा पार्थिवो वापि क्व मुनि पार्थिवोऽपि वा ॥३७
अथवा पार्थिवमुतस्तस्यैव सम्भव कृत ।
अतीतेऽहनि रानौ वा प्रातर्वापि मृतो यदि ॥३८
अवश्य तु मया ज्ञेगा सरसोऽस्य विनिप्किया।
यावदेव स्थितश्वाह चिन्तयानो रघूत्तम ॥३६
अथापश्य मुहूर्तात्तु दिध्यमद्भुनदर्शनम् ।
विमान परमोदार हसयुक्त मनोजवम् ।।४०
पुरस्तत्र सहस्र तु विमानेऽम्मरमा नृप ।
गन्धर्वाश्च तत्सस्या रमयन्ति वर नरम् ॥४१
प्रात काल में फिर उठकर मैं इस सर के समीप मे पहुंचा था। इसके
प्रनन्नर मैंने वहां पर एष शव देखा था जिसमे जरा अवस्था मस्पष्ट थी और

२६२ ] । पद्म-पुराण 1 - अत्यन्त श्री से समन्वित था और उस सरोवर के निकट ही में वह स्थित था । है राघव ! उसके विषय मे मुहूत्तं मात्र पर्यन्त ध्यान करता रहा था ॥३५॥३६॥ मैंने विचार किया था कि इस सरोवर के तट पर कोई भी प्राणी नही है फिर यह कोई श्रेष्ठ देव है, मुनि है अथवा कोई पाविद है । मुनि अथवा पार्थिव भी कहाँ से यहां पर माया है ॥३७॥ अथवा यह किसी राजा का पुत्र है किन्तु उसका भी इस तरह से यहाँ माना समय से हुआ है । यह गत दिन मे, राषि मे या प्रात काल में यदि मृत हुआ है ।।३८॥ मुझे तो अवश्य ही इस सर की विशेष निस्कियां जाननी चाहिए । हे रघूत्तम । जब तक मैं वहाँ पर स्थित रहा था ।।३६। इसके अनन्तर मैंने मुहूर्त मात्र मे हो एक परम अद्भुन दिख• लाई देने वाला, परम उदार अर्थात लम्बा-चौडा, हसो से युक्त और मन के समान वेग वाला विमान देखा था ॥४०॥ हे नृप । उस विमान के मागे सहम मप्सरायें थी जो कि विमान में स्थित थीं और इतनो सख्या गायों की भी थी को कि श्रेष्ठ नर को रमण कराते हैं ॥४१॥ गायन्ति दिव्यगेयानि वादन्ति तथापरे । अथापश्य नर तस्माद्विमानादवरुह्य तु ॥४२ शवमास भक्षयन्त स्नात्वा रघुकुलोद्वह । तत्तो भुक्त्वा ययाकाम समास बहुपीवरम् ॥४३ अवतीयं सर शीघ्रमारोह दिव पुनः । तमह देवसद्धाश श्रिया परमयान्वितम् ।।४४ भोभोस्वगिन्महाभाग पृच्छामि त्वा कथ विदम् । जुगुप्राितस्तवाहारो गतिश्चेय तवोत्तमा ॥४५ शृणुष्वाद्य यथावृत्त ममेद सुखदु खजम् । कामो हि दुरतिक्म्य. शृणु यत्पृच्छसे द्विज ॥४६ पुरा वैदर्भको राजा पित्ता मे हि महायशा । वासुदेव इति स्यातस्थिषु लोकेषु धार्मिक. 18 तम्य पुरद्वय ब्रह्मन्द्वाभ्या स्त्रीभ्यामजायत । प्रद श्वेन इति ख्यातो यवीयान्सुग्योऽभयद ४८ राम का प्रगस्त्याप्रम गमन ] [ २६३ वे मति दिव्य मोतो का गायन कर रहे थे तथा दूसरे लोग वादन कर रहे थे । इसके पश्चात् मैंने उस विमान से मवगेहण करने वाले नर को देखा था ।।४२।। हे रघुकुल को उद्वहन करने वाले ! उस मनुष्य ने वहा स्नान क्यिा पा और नस शव के मान का भक्षण किया था। माम से युक्त और प्रत्यन्त मोटे-ताजा उसको इच्छ पूर्वक खाकर एवम् सरोवर मे अवतरण करके पुनः यह शीघ्र ही दिवनोक में मारोहण करके चला गया था। उस समय मै परमो- तिम थी से सयुत देवता के समान आपसे हे स्वगिन् ! हे महाभाग ! मैं कैसे यह पंछु ? मापका यह वाहार तो शिलना गहित है और प्रारको यह गति कमो वतम है ।। ४२२४३।४४१४५ ॥ श्वेन ने कहा-प्राज मार धवण करो। जिस प्रकार से मुझे यह सुख मौर दु.ख से उत्पन्न होने वाला हुमा है। हे द्विज ! यह काम बहुत ही दुप से अतिक्रमण करने के योग्य होता है । आप जो मुझ पूछ रहे हैं उसे भव सुनो ॥४६॥ पहिले समय मे मेरा पितामह वर्शभक राजा महान यश वाला था। वह वासुदेव इस नाम से तीनो लोको में परम पार्मिक ख्यात हुमा पा ॥४७॥ हे ब्रह्मन् ! उसके दो स्त्रियों से पुत्र हुए थे । मैं तो श्वेत इम नाम से प्रमिद हुपा मोर छोटा मुरप नाम वाला हमा पा॥४॥ पितयु परते तस्मिन्पोरा मामभ्यपेचयन् । तमाह कारयन्राज्य धर्मे चास समाहितः ।।४६ एच वर्षसहस्राणि बहूनि समुपावजन् । मम राज्य कारयत. परिपालयनः प्रजा. ॥५० मोह निमिते कस्मिनिराग्येण द्विजोत्तम । मरण हृदये कृत्वा तपोवनमुगागमम् ।।५१ दशवपंसहस्राणि तपस्तप्या महावने । शुभ तु भवन प्राप्तो ब्रह्म तोरामनामयम् ॥५२ स्वर्गस्यमपि मा ब्रह्मन्सुलिपागे निजोत्तम । अबाधेता भृन चाहमभव व्ययितेन्द्रिय. ॥५३ ततस्त्रिभुवनश्रीधमबोच व पितामहम् । भगवनम्वर्गलोकोऽय क्षुत्पिपामाविवर्जितः ॥५४ २६४ ] [ पप-पुराण । फस्येयं कर्मणः पक्तिः क्षुत्पिपासे यतो हि मे। पाहार: कश्चमे देव हित्वं श्रीपितामह ॥५५ मेरे पिताजी के मृत्युगत हो जाने पर पुरवासियो ने मेरा ही उनके राज्यासन पर पभिषेक कर दिया था। वहां पर मैं राज्य का शासन चलाता हुमा परम समाहित होकर धर्म मे सस्थित रहता था ॥ ४६ ।। इसी प्रकार से शासन चलाते हुए बहुत सहस्र वपं हो गये थे मौर में बराबर राज्य का कार्य कर रहा था तथा भली विधि प्रजा का पालन भी करता था ॥५०॥ वही में किसी निमित मे वैराग्यवान होगया था। हे द्विजो मे परम श्रेष्ठ ! मैंने वैराग्य से ही अपने चित्त मे मरण का निश्चय कर लिया था और मैं फिर इसी तपो- मन में मा गया या ॥५१॥ इस महा वन मे दश सहस वर्ष पर्यन्त घोर तपश्चर्या करके मैंने परम शुभ भवन मनामय ब्रह्मलोक को प्राप्त कर लिया था ॥५२॥ हे द्विजोत्तम । हे ब्रह्मन् । स्वर्ग मे स्थित रहने वाले भी मुझको भूख और प्याम बहुत ही अधिक सताया करती थी और मैं वहाँ पर भी व्यथित इन्द्रियो वाला हो गया पा॥५३॥ इसके अनन्तर मैंने त्रिभुवन में परमाति परम श्रेष्ठ पितामह से कहा था- हे भगवन् ! यह तो स्वर्गलोक है जो कि भुपा तथा तृपा से रहित हा करता है ॥५४॥ मेरे किस कर्म का परिपाक है जो कि क्षुधा और पिपासा मुझे यहाँ पर रहते हुए भी सना रही है ? हे श्री पितामह । हे देव । अब मेरा क्या होगा-इसे माप मुझे बतला देवें ॥५५) तत पितामह सम्यक्चिर ध्यात्वा महामुने । मामुवाच ततो वाक्य नास्ति भोज्य स्वदेहजम् ।।५६ ऋते स्वानि तु मासानि भक्षय त्व तु नित्यश। स्वशरीर त्वया पुष्ट कुर्वता तपउत्तमम् ॥५७ नादत्त जायते तात श्वेत पश्य महीतले । प्राग्रहाद्भिक्षमारणाय भिक्षापि प्राणिने पुरा ॥५८ स त्व प्रपुष्टमहारैः स्वशरीरमनुत्तमम् । भक्षयस्व च राजेन्द्र सा ते तृप्तिर्भविष्यति ॥५६ एवमुक्तस्ततो देव ब्रह्माणमहमुक्तवान् । भालते च स्वके देहे पुनरन्यन्न में विभो ॥६० राम का मगस्त्याश्रम गमन ] [ २६५ क्षुधानिवारणे नव देहस्यास्य विनोदनम् । खादामि यक्षय देव प्रियं मे न हि जायते ।।६१ ततोऽब्रवीत्पुनर्वह्या तव देहोऽक्षयः कृतः । दिने दिने ते पुष्टात्मा शवः श्वेत भविष्यति ।।६२ यावर्षशतं पूर्ण स्वमासं खाद भोनृप । यदागच्छति चागस्त्यः श्वेतारण्ये महातपाः ।।६३ हे महामुने ! तब तो भली-भांति चिरकाल पर्यन्त पितामह ने ध्यान किया था और मुझमे कहा था कि अपने देह से उत्पन्न होने वाला तुम्हारा कुछ भी भोज्य नहीं है ॥५६॥ अपने मांसो को छोड़कर प्राप नित्य ही भक्षण करें। मापने अपने इस शरीर को परमोत्तम तप करके ही समके प्रभाव से अपने शरीर को परिपुष्ट किया है ॥५७। हे श्वेन ! हे तात ! सुम देखलो, इस महीतल में जो दिया नहीं गया है वह नहीं होता है । तुमने बडे प्राग्रह से भिक्षा मांगते हुए भिवारी को भी पहिले किमी प्रारगी के लिये भिक्षा नहीं दी थी ।।५८॥ ऐमे मापने उत्तम माहागे के द्वारा केवल अपने ही इम मघम शरीर को विशेष रूप से परिपुष्ट किया था। हे राजेन्द्र ! अब पाप उस अपने ही शरीर का भक्षण करो। इमोसे तुम्हारी वह तृप्ति होगी ॥५६॥ इस प्रकार से ब्रह्मा के द्वारा कहे जाने पर फिर देव ब्रह्माजी से मैंने कहा था-~हे विभो। अपने देह के बालेने पर फिर कुछ अन्य मेरे लिये खाने का पदार्थ नहीं रहेगा। ।। ६० ॥ शुपा के निवारण करने के कार्य में इस शरीर का प्रोदन के बिना नही होता है । हे देव ! मुझे तो कुछ ऐमा मक्षय पदार्थ बनाइये जिसको मैं खा लिया करू। मापने जो यह बताया है यह तो मुझे प्रिय भक्ष्य नही लगता है ॥६१॥ ऐमा मेरे द्वारा कहे जान पर ब्रह्माजी ने फिर मुझमे पहा था कि हमने तुम्हारा देह ही पक्षय बना दिया है अर्थात् उमे ऐसा कर दिया है कि वह कभी ममाप्न ही नहीं होगा । है श्वेत । आये दिन तेरे शरीर का शव पुष्ट स्वरूप वाला हो जायगा 11६२हे ना ! जर तक एक मौ वर्ष पूर्ण होगे तब तब तुम अपने ही माम का माण परो । महान तपस्वी मगम्त्य जिम समय में इन वैतारण्य में भाव तब तक तुम इमी प्रसार करते रहो।।६।।

२६६ ]
[ पम-पुराण
भगवानतिदुर्घस्तदा कृच्छाद्विमोक्ष्यते ।
स हि तारयितुं शक्तः सैन्द्रानपि सुरासुरान् ॥६४
तं मुनि कृच्छ्रमन्तप्तश्चिन्तयामि दिवानिशम् ।
कदा वै दर्शनं मह्य समुनिर्दास्यतेवने ॥६५
एवं मे चिन्तयानस्य गतवर्षशतन्त्विह ।
सोऽगस्त्यो हि गति झन्मुनिमें भविताघ्र वम् ।.६६
न गतिविता मह्यकुम्भयोनिमृतेद्विजम् ।
श्रु त्वेत्थं भापित राम दृष्ट्वाहार च फुत्सितम् ॥६७
कृपयापरया युक्तस्तं नृप स्वर्गगामिनम् ।
करोम्यह मुघाभोज्य नाशयामि च कुत्सितम् ॥६८
चिन्तयन्नित्यवोचं तमगस्त्यः किं करिष्यति ।
ग्रहमेतस्कुत्सितं तैनायामि महामते ॥६६
मितं प्रार्थयस्वास्मान्मनः प्रीतिकरं परम् ।
सस्वर्गी मां ततः प्राह कयं ब्रह्मवचोऽन्यथा ॥७०
-
भगवान पगरप पश्यन्त दुर्घपं है । उमो ममय मे तुम इस पर से मुक्त
होप्रोगे। वह ही सहित ममात मुर और असुरो हो तारने में समपं है
॥६॥ त ने Rur तपस्या ये बट से सनत होने वाले उही मुनि.
परसोरान सिन रियारसा है कि मि ममप में मुझे यह महामुनि
गपत में न देंगे ॥६५॥ रमी प्रसार में पिउन पसे हुए मुझे एसमो वर्ष
यहा परमोड होगये है। ब्रह्मन् ! यह प्रगम्य मुनीहार मेरी गगि निय
कीहाँग पनि मेरा म एक माम मण से उससा से पाने
प्रापही होगे ॥६६॥ अन्य कोई भी दुमपानि बिना मेरा मार
परने वाला होगा। राम ! गो मार से पाम दुमित पार
गरपोर उमामायण हे ना! पर पुष,
में गमन ने पाको गुषा । भोपन र पामा
१६ मा भीम परा मार मग
पिन TIME-प्रनार Hinा? हे महाम!

राम का मगस्त्याश्रम गमन ] इस कुत्सित भोजन को नष्ट कर देता हूँ॥६७६८१६६॥ तुम अपने अभीष्ट की प्रार्थना करो, हमारा मन परम प्रीति करने वाला है । ऐसा कहने पर उस स्वर्ग गमन करने वाले ने फिर मुझसे कहा था कि ब्रह्मा का कहा हुमा वचन मन्यथा अर्थात् मिथ्या किस प्रकार से होगा ? ॥७॥ कतुमुने मया शक्यं न चान्यस्तारयिष्यति । ऋते वै कुम्भयोनि तं मंत्रावरुणसम्भवम् ।।७१ अपृष्टोऽपि मया ब्रह्मन्नेवमूचे पितामहः । एव ब्रुवारण तं श्वेतमुक्तवानहमस्मि सः ॥७२ भागतस्तव भाग्येन दृष्टोऽहं नात्र सशयः । ततः स्वर्गी समां ज्ञात्वा दण्डवत्पतितो भुवि ।।७३ तमुत्याप्य ततो रामवव किं ते करोम्यहम् । पाहारात्कुत्सिताद्ब्रह्मस्तारयस्वाद्यदुष्कृतात् ।।७४ येन लोकोऽक्षय. स्वर्गों भविता त्वत्कृतेन मे । ततः प्रतिग्रहो दत्तो जगद्वन्द्यनृपेण हि ॥७५ भवान्मामनुगृह्णातु प्रतीच्छम्ब प्रतिग्रहम् । इदमा भरण सौम्य तारणार्थ द्विजोत्तम ॥७६ ब्रह्म प्रतिगृह्णीय प्रमाद कर्तुमर्हसि । इह गाश्च सुवर्ण च धन वखममन्वितम् ॥७७ भध्य भोज्य च विप्र ददाम्पाभरण त्वम् । मर्वकामप्रदं तुम्य मन्भिोगाश्न ते द्विज ॥७८ हे मुने ! मेरे पिया जामाता है किन्तु उम मेमावरण मे उसात्ति पाले एम्भ योनि के बिना अन्य नहीं तारेगा ।। ७१ ॥ हे ब्रह्मन् ! मेरे द्वारा बिना पूधे हुए हो पितामह ब्रह्माजी ने इस प्रकार मे बहा पा-इस तरह में परी वाम उम अंत में मैं हा पाfr वह मैं ही है 11७२॥ मैं तुम्हारे भाग्य मे हो यह आगया पौर में देग लिया गया हूं-हममे पुछ भी मायनही है। म पनन्नर उम स्वर्ग निवामो ने मुझो जानार फिर मह भूमि मेरे भामे की भाति प्रणाम करने के लिये गिर गया पा। फिर मैंने उनको भूमि में २६६ ] . [ पद्म-पुराण उठा लिया था और है राम ! फिर मैंने उससे कहा था कि बोल, मैं तेरा क्या करू ? ।। ७३ ।। इस प्रकार से मेरे कहने पर वह राजा बोला--हे ब्रह्मन् ! माज मेरे इस बहुत ही निन्दित बुरे माहार से मेरा उद्धार कर दीजिएगा ।।७४।। जिससे आपके ही द्वारा इस महान कार्य के करने से यह स्वर्गलोक मेरे लिये क्षप से रहित हो जायेगा। इसके प्रनन्तर उस जगत् के द्वारा वन्दनीय नृप ने प्रतिग्रह मुझे दिया था 11७५|| उसने मुझसे कहा-माप मेरे ऊपर अनुग्रह कर देवें और यह प्रतिग्रह स्वीकार करें। हे द्विजों में परमोत्तम ! हे सौम्य ! तारण के लिये यह पाभरण है 1७६|| हे ब्रह्म ! भाप इस मेरे द्वारा समर्पित प्रति- ग्रह स्वरूप पाभरण को अङ्गीकार कीजिएगा भोर मेरे ऊपर प्रसाद करने के लिये पाप योग्य होते हैं । यहाँ पर है द्विज ! गौएँ-सुवर्ण-पत्रों से समन्वित धन-भय पदापं और भोज्य पदार्य सम्पूर्ण कामनामो के प्रदान करने वाला सया समस्त भोगों को प्रदान करने वाला यह भाभरण पापको देता हूँ ॥७७१७६॥ तारणे तु भवान्मह्यप्रसादं कर्तुं महति । तस्याहं स्वगिणी वाक्यं श्रुत्वा दु:ससमन्वितम् ॥७६ कृता मतिस्तारणाय न लोभाद्रघुनन्दन । गृहीते भूपणे राम ममहस्तगते तदा 1100 मानुपः पौविक्रो देहस्तदा नष्टोऽस्यभूपते । प्रनप्टे तु शरीरे च राजर्पिः परया मुदा ॥८१ मयोक्तोऽमो विमानेन जगाम निदिव पुनः । तेन में रामतुल्येन दत्तमामरण गुभम् ॥६२ तस्मिनिमित्त काकुत्स्थ दत्तमद्धतकर्मणा । स्वेतो वैदर्भको राजा सदाभूदगतकात्मपः ॥२३ आप तो पर मेरे मारने के.पारने के लिये मेरे बार प्रमाद परने के योग्य होते है। इस प्रकार में उस स्वर्ग निवास करने वाले पुरुष पाम टुप में मन्दिा वचनों को मैंने प्रण शियापाई युनादन ! समय में में। उकसा पारिरी पी कि वह रिमो मासष पद्म का अविर्भाव [ २६६ के कारण नहीं किया था । हे राम ! उम समय में उस गपग के ग्रहण कर लेने पर तथा उगको मेरे हाथ मे मा जाने पर उसी क्षण मे हे भूपते ! उसका पूर्व में रहने वाला जो मानवीय शरीर था वह नष्ट हो गया था। उम शरीर के नष्ट हो जाने पर वह राजपि परम प्रसन्न होगया था 100१॥ फिर प्रस- नता से युक्त उसको मेरे द्वारा प्राज्ञा दी गई थी और फिर उसी विमान से बिदिव को चला गया था । देवराज इन्द्र के समान उसने मुझे यह परम शुभ प्राभरण प्रदान किया था !! ८२ ॥ हे काकुन्स्थ ! उस निमित्त मे अद्भुत् कर्म के द्वारा यह भाभरण दिया गया है। उस समय में वह वैदभिक श्वेत राजा समस्त कल्मपो से छूट गया था और फिर उममे कोई भी पाप शेप नहीं रहा था । यही परम पाश्चर्य से समन्वित एक पुरावृत्त है ।।३।। ॥ पद्म का अविर्भाव ॥ ततेऽहं कथयिष्यामि यथाभक्ति यथाश्रु ति । यद्विज्ञातं मया सम्यगृषिमार्गेण सत्तम ॥१ कः समुत्सहते ज्ञातु परं नारायणात्मकम् । विश्वावितारं ब्रह्मायं न वेदयति तत्वतः ॥२ तत्कर्म विश्वदेवानां तद्रहस्य महर्षिषु । स इज्यस्सर्वयज्ञानां स तत्त्वं तत्त्वदर्शिनाम् ॥३ अध्यात्ममध्यात्म विदां नरकं च विवामिणाम् । अधिदेव च तद्देवमधिदेवतसंज्ञितम् ॥४ अधिभूतं च तद्भूतं परं च परमाथिनाम् । स यज्ञो वेदनिर्दिष्टस्स्तत्तपः कवयो विदुः ॥५ यः कर्ता कारको बुद्धियंतः क्षेत्रज्ञ एवच । प्रणवः पुरुषः शास्ता एकश्चेति विभाव्यते ॥६ प्राणः पञ्चविधश्चैव ध्रुवमक्षरमेव च । काल: पाकाश्च यज्ञश्च यष्टा चाधोतमेव च ।।७ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-हे भीम ! भापकी जो नारायण के श्रवण करने की ऐमी प्रभिन है वह आपके वंश के अनुरूप ही है। मैंने.' अपने गुरु २७० ] [ पप-पुराण वैरायन से जो भी श्रवण किया है उसे प्रापमे मपनी भक्ति और पुति के अनु- सार कहता हूँ। मैंने तो है धनम् ! ऋप मार्ग के द्वारा ज्ञान प्राप्त किया है मोर भली-भांति जान लिया है ॥१॥ मन्यथा इस विश्व के रक्षक परम नारा. यण के स्वरूप को कौन ऐमा है जो जान लेने का उरमाह कर सस्ता है । यह ब्रह्मा भी तत्त्वत: अर्थात टीक रूप से नहीं जानते हैं ॥ २ ॥ विश्व देवो का वह कर्म है, महपियों में वह रहस्य है, समस्त यज्ञो का वह यजन करने के योग्य है पौर तत्वो के दर्शन करने वालों का वह तत्व है ।।३.1 जो अध्यात्म के शता अर्थात् म.त्मा के सम्बन्ध में पूर्ण मान रखने वाले हैं उनका वह अध्य त्म विषय है । जो कुत्सित बुरे कर्मों के करने वाले पुरुष हैं उनके लिये वह नरक है, वह मधिदेव, देव और अघिदैवत संज्ञा वाला है ॥४॥ वह अधिभून, भूत और पर- भाथियो का पर है । वेदो के द्वारा निर्दिष्ट किया हुअा वह यज्ञ है तथा कवि लोग उसे तप ही जानते हैं ।। ५ ।। जो कर्ता, कारक मात् कराने वाला है क्योकि वह ही बुद्धि है और वह ही क्षेत्रज्ञ है, वह प्रणव, पुरुष और शासन करने वाला और एक ही विभावित होता है ।। ६॥ वह पांचो प्रकार का प्राण है तथा वह ध्रुव पौर अक्षर है । वह ही काल है, पाक है, यज्ञ है, यजन करने वाला है तथा वह ही अबोत है ॥७॥ उच्यते विविधर्भावः स एवायं तु तत्परम् । स एव भगवान्सर्व करोति न करोति च ।। सोऽस्मिन्कारयते सर्व स्थानिना च कृतिः कृता । यजामहे तमेवाद्य स एवोत्थाननिर्वृतः ॥ यत्नत्यं यदनृतमादिमध्यभूत यच्चान्त्यं निरवधिकं च यद्भविष्यं । यत्किञ्चिच्चरमचर यदस्ति चान्यत्सर्वतत्पुरुषवरः प्रधानभूतः ।।१० चत्वार्याहुः सहस्राणि वीणा तत्कृतयुगम् । तस्य तावच्छती सन्ध्या द्विगुणा कुरुनन्दन ॥११ यत्र धर्मश्चतुष्पादस्त्वधर्म. पादविग्रह । स्वधर्मनिरताः शान्ता जायन्ते यत्र मानवाः ॥१२ विप्रा. स्थिता धर्मपरा राजवृत्तिस्थिता नृपाः । कृष्यामभिरता वैश्या शूद्राः शुश्रू पवस्तथा ॥१३ पन का पविर्भाव ] [ २७१ - तदा सत्यं च सत्वं च धर्मश्चव विवर्धत । सद्भिराचरितो धर्मोयेन लोक. प्रवर्तते ॥१४ अनेक प्रकार के भावो के द्वारा यह कहा जाता है और यह ही तत्पर है । वह ही भगवान सभी कुछ किया करते हैं और कुछ भी नहीं करते हैं ।।६।। वह ही इम जगत् मे सब कुछ कराया करता है और स्थानियो की, को हुई वृति है, हम लोग सभी उसका ही यजन किया करते हैं और वह ही उत्थान से लिवंत होता है | जो सत्य है, जो मिथ्या है, जो प्रादि और मध्यभूत है तथा जो अन्त्य है, अवधि से रहित है और जो भविष्य है, जो कुछ भी चर तथा अधर है मोर अन्य सब है वह ही पुरुषो मे परम श्रेष्ठ प्रधानभून है ॥१०॥ हे बुरु नन्दन ! चार सहस्र वर्षों का कृतयुग कहा गया है। उम कृ'युग की दुगुनी उतने संकडा सन्ध्या होती है ॥११॥ जिस युग में धर्म चारो पाद वाला होता है मौर अधर्म का विग्रह एक पाद है । जिस युग में मनुष्य अपने धर्म में निरत रहा करते हैं तथा परम शान्त स्वभाव वाले होते हैं ॥१२॥ विप्र सब धर्म में तत्पर होकर स्थित रहते हैं। जो नृर अर्थात् क्षत्रिय वर्ग वाले हैं वे भी सब मरनी हो राजा से जो वृति नियत है उमी में स्थित रहते थे । वैश्यो का काम शास्त्र में कृषि करना बताया गया है वे उमी काम मे सदा अभिरत रहते थे और शूद्र जो थे वे मदा सेवा में सलान रहते थे। १३।। उम समय में सत्य सत्त्व पौर धर्म विशेष रूप से बढ रहे थे । सत्पुरुषो के द्वारा धर्म का गमाचरण किया जाना था जिसमे लोक प्रवृत्त होता था ।।१४॥ एतत्कृतयुगे वृत्त सर्वेषामेव पार्थिव । प्राणिना धर्मसज्ञाना नराणां नीचजन्मनाम् ।।१५ श्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते । तस्य तावच्छती सन्ध्या द्विगुगा परिकोर्तिता ॥१६ द्वाभ्यामधर्मः पादाम्यां निभिर्धों व्यवस्थितः । यत्र सत्य च सत्वं च क्रिया धर्मो विधीयते ॥१७ त्रेतायां विकृति यान्ति वर्णा लोभेन संयुताः । चातुर्वण्य॑स्य वैकृत्यं क्षान्तिदीर्वल्यमैव च ॥१८ एपा त्रेतायुगगतिविचित्रा देवनिमिता।

- २७२ ] [ पम पुनर द्वापरं द्विसहस्र तु वारणां कुरुनन्दन ।।१६ तस्य तावच्छती सन्ध्या द्विगुणयुगमुच्यते । तत्राप्यतीवार्थपरा: प्राणिनो रजसाहता. ॥२० शठा नेप्कृतिकाः क्षुद्रा जायन्ते कुरुनन्दन द्वाभ्यां धर्मः स्थितः पद्भयामधर्मस्त्रिभिरुत्थितः ॥२१ है पार्थिव ! कृतयुग में सभी को इमी प्रकार से बरताव करना होता पा। जो कि प्राणी ऐसे थे जिनका मीच जाति मे जन्म हुमाया वे भी नर धर्म का पालन करने वाले थे। यह कृतयुग मे सबकी धर्म प्रवृत्ति रहा करती थी |१५|| तीन महस्र वर्ष का प्रेतायुग कहा जाता है । उम घेतायुग की भी उतने हो सौ वर्ष द्विगुनी सन्ध्या होती थी ॥ १६ ॥ त्रेतायुग मे से पाद वाला भधर्म पा और तीन पाओ वाला धर्म व्यवस्थित था। जिम त्रेतायुग में सत्य, सत्त्व, पिया और घमं किये जाते थे ॥१७॥ त्रेतायुग में सभी वणं लोभ से युक्त होकर विकृति को प्राप्त हो जाते हैं । उस समय में चातुवण्यं की विकृति, क्षान्ति और दुर्बलता हो गई थी ।। १८ ।। इस प्रकार से क्षेत्रायुग की गति विचित्र ही देव निमित थी । हे कुरु नन्दन ! त्रेता के पश्च तु द्वापर युग पाता है जो दो सहस्र वर्षों के समय वाला होता है । उस युग की भी उतने ही सौ वर्ष की द्विगुणित सन्ध्या कही गई है । इस द्वापर युग में भी समस्त प्राणी बहुत ही अधिक अर्थ परायण और रजोगुग्ग से समाहत थे ।।१६ २०।। द्वापर मे शठ, निष्कृति युक्त, क्षुद मनुष्य उत्पन्न होते हैं । हे कुरु नन्दन ! इस युग मे धर्म तो दो पादो से युक्त या पौर अधर्म तीन चरणो वाला होकर समुस्थित हो गया था ॥२१॥ विपर्ययशतैर्धर्मः क्षयमेति कलो युगे । ब्रह्मण्यभावश्च्यवते तयास्तिक्य विवय॑ते ।।२२ व्रतोपवासास्त्यज्यन्ते कलो वै युगपर्यये । तदा वर्षसहस्रं तु वाणा द्वे शते तथा ॥२३ सन्ध्यया सहसड स्यातः क्रूरः कलियुगस्तथा। यत्राधमंचतुष्पादो धर्मः पादपरिग्रहः ॥२४ कामिनस्तापसाः क्षुद्रा जायन्ते यत्र मानवाः । न चावसायिकः कश्चिन्न माधुर्न च सत्यवाक ॥२५ “पा का माविर्भाव ] '[ २७३ नास्तिका ब्राह्मणा भक्ता जायन्ते तत्र मानवाः । अहकारगृहीताश्च प्रक्षीरणस्नेहवन्धनाः ॥२६ विप्राः शूद्रसमाचारास्सन्ति सर्वे कलो युगे। आश्रमाणां विपर्यासः कली सम्प्रति वर्तते ॥२७ वनां चैव सन्देहो युगान्ते कुरुनन्दन । एपा द्वादशसाहस्री युगाख्या पूर्व निमिता ॥२८ इसके अनन्तर कलियुग माता है इसमे तो संकडो विपरीत कृत्यों से धर्म पूर्णतया क्षीण हो जाया करता है । ब्रह्मण्य भावना को तो एकदम च्युति हो जाती है और प्रास्तिकता भी नही रहा करती है ।। २२ ।। इस बिल्कुल विपरीत कलियुग मे समस्त व्रत भोर उपवास छोड़ दिये जाते हैं । इम युग का समय एक सहस वर्ष होता है तथा दो सौ वर्ष को युग-साध्या होती है । सन्ध्या के साथ सस्था किया गया यह कलियुग अत्यन्त ही तर युग होता है। इस युग मे अधर्म चार चरणो से युक्त रहता है और धर्म केवल एक ही पाद वाला रहा करता है ।।२३।२४ ॥ इस कलियुग में जो तपस्या करने वाले पुरुप होते हैं वे भी कामवासना से समन्वित होते हैं और सभी मानव प्रत्यन्त क्षुद्र मनोवृत्ति वाले उत्पन्न हुमा करते हैं। इस कलियुग में न तो कोई भवसायिक होता है मौर न कोई साधुवृत्ति वाला सत्यभापी ही होता है ॥२५।। कलियुग में ब्राह्मण लोग ईश्वर की सत्ता को नहीं मानने वाले नास्तिक हो जाते हैं। इस में जो मानव भक्त होते हैं वे बडे महङ्कारी होते हैं पौर स्नेह के बन्धन को क्षोए कर देने वाले हो जाते है अर्थात् कलियुग मे मनुष्यों में बिल्कुल स्नेह को भावना रहती ही नही है ॥ २६ ॥ यह कलियुग का समय ऐसा होता है कि सभी विष के समान माचरण करने वाले हो जाया करते हैं । कलियुग में पारों माप्रमो मे विपरीतता उत्पन्न हो जाया करती है ॥२७॥ है पुरु नन्दन ! इस युग के अन्त मे तो वों का भी सन्देह होता है। यह युग को पास्या शरह सहस्र वालो पूर्व निमित है ॥२८॥ सहस्रयुगपर्यन्तं तदाह्ममुच्यते । ततोऽहनि गते तस्मिन्सर्वेपामेव जीविनाम् ॥२९ इममे शूद्र ..

२७४ ) | पद्म पुराण शरोरनिवृति दृष्ट्वा काल सहारबुद्धिमान् । देवताना च सर्वपा ब्राह्मणाना महीपते १३० दत्याना दानवाना च यक्षराक्षसपक्षिणाम् । गन्धर्वाणामप्सरसा भुजङ्गाना च पार्थिव ।।३१ पर्वताना नदीना च पशूनां चैव सत्तम । तिर्यग्योनिगताना च निमीणा दशिना तथा ।।३२ सर्वभूतपति पञ्च भूत्वा भूतानि भूतकृत् । जगत्सहरणार्थाय कुरुते वैशस महत् ॥३३ भूत्वा सूर्यश्चक्षुपी प्राददानो भूत्वा वायु प्राणिना प्राणिजातम् । भूत्वा वह्निनिर्दहन्सर्वलोकान्भूत्वा मेघो उग्रोऽभ्यवपत् ॥३४ एक सहस्र युग पयं त ब्रह्मा का दिन कहा जाता है। उम ब्रह्माजी के दिम के समाप्त हो जाने पर समस्त जीवधारियों के शरीर की निवृति को देख- कर सहार को बुद्धि रखने वाला काल, हे महीपते । सब देवतामो-समस्त ब्राह्मणो, दैत्यो दानवा और यक्ष-राक्षम तथा पक्षियो, गन्धर्वो अप्सरामो, भुजङ्गो, पर्वत--नदी-पशुओ, तियायोनियो मे रहने वालो-क्रिमियों, दशियो के भूतो के करने वाला, समस्त भूतो का स्वामी, भूतो को पांच करके इस जगत के सहार करने के लिये महान् वैशम करता है ॥ २६ से ३३ ।। चक्षुओ का मादान करने वाला सूर्य होकर प्राणिया का प्राणिजात वायु होकर समस्त लोको को निदग्ध करते हुए वह्नि होकर भोर उम्र मेघ होकर वर्षा की थी॥३४॥ भूत्वा नारायणो योगी सर्व मूर्तिविभावसु । गभस्तिभि प्रदीप्ताभि सशोपयति सागरान् ।।३५ तत पीत्वारगवान्सर्वानदीकूपाश्च सर्वत । पघताना च सलिल सर्वमादाय योगवित् ॥३६ भत्वा चव सहस्राचिमही भित्वा रसातले। रमते जलमादायापवत्रसमनुत्तमम् ।।३७ मूर्तीमूर्ते तदन्यच्च यदस्ति प्राणिपु ध्रुवम् । तत्सर्वमरविन्दाक्ष प्रादत्ते पुरुषोत्तम ॥३८ पन का प्राविर्भाव ] २७५ वायुश्च बलवान्भूत्वा विधुन्वानोऽखिलं जगत् । प्राणापान समासाद्य वायुनाक्रमते हरिः ।।३६ ततो देवगणाना च सर्वेषा चव देहिनाम् । पञ्चेन्द्रियगुणास्सर्वे भूतान्येव च यानि च ॥४० ध्रयं घ्राण शरीर च पृथिवी संथिता गुणाः । लोकयाया भगवता मुहूर्तेन विनाशिता ॥४१ सर्व मूत्ति योगी नारायण विभावसु होकर मपनो मत्यन्त तोच एवम् प्रदीप्त किगो से सागरी का शोषण करता है ।। ३५ ।। इसके अनन्तर समस्त समुद्रो को तथा सर्वत्र नदियो पोर कूपो को पान करके योग का ज्ञाता पर्वती 'के सम्पूर्ण जल को लेकर फिर वह सहस्र किरणों वाला होकर इस मही या भेदन करके रसातल मे उत्तम रम का पान करके जल को लेकर रमण करती है ॥३६॥३७।। मूर्त-प्रमूर्त में वह प्राणियो में ध्रुव पन्य जो भी है उस सबको अरविन्द के समान नेत्रो वाले पुरुषोत्तम ग्रहण कर लेते हैं ॥ ३८ ॥ यह वायु अत्यधिक बलवान होकर इस सम्पूर्ण जगत् को कंपाता हुमा हरि प्रारणापान का समासादन कर वायुप्रो को प्राक्रमण करता है ॥ ३६॥ इसके अनन्तर सव देवगणो को और ममस्त देहपारियों को मब पांचो इन्द्रियों के गुण पोर जो भूत हैं, प्रेय-ध्राण-शरीर-पृथियो में सधित गुण, भगवान् ने एक मुहूर्त मात्र में सब लोकयात्रा का विनाश कर दिया था ॥४॥४१॥ जिह्वा रसश्च स्नेहश्च सथिताः सलिले गुणा । रूपचक्षुर्विभागश्चनेत्र ज्योति. श्रितागुणा. ॥४२ स्पर्श प्राणश्च चेष्टा च पवन सथिता गुणाः । शब्दः थोत्रे च श्रवणं गगन सश्रिता गुणाः ।।४३ मनोवुद्धिश्च चित्त च क्षेत्रज्ञ चेति सश्रिताः । परेण परमेष्टी च हुपीकेशमुपाश्रिताः ॥४४ ततो भगवतस्तस्य रश्मिभिः परिवारिताः । वायुना परिनुनाश भूमिशासामपाश्रिताः ॥४५ तेपा संहरणोद्भूतः पावकः शतधाज्वलन् । प्रदहनखिल विश्व वृत्तः पवतंकोऽनलः ।

२७६ ॥ [ पम-पुराण सपर्वतद्रु मान्गुल्माल्लतावल्लीम्तृगानि च । विमानानि च दिव्यानि पुरारिणविविधानि च ।।४७ यानि चाश्रयणीयानि सर्वाण्यप्यदहद् भृशम् । भस्मीकृत्य तु तान्सल्लिोव गुरोगुरु ॥४८ स भूतिं धारयामास युगान्ते लाकसभवाम् । सहस्रबृष्टि शतधा भूत्वा कृष्णो महाघन II४E दिव्यतोयेन हविपातर्पयामास मेदिनीम् । तत क्षीरनिकाशेन स्वादुना परमाम्भसा ॥५० सजिल में सश्रित गुण जिह्वा-रस-स्नेह तथा ज्योति में सश्रित गुण रूप-चक्षु-विभाग मोर नेत्र है ।।४२॥ पवन में सश्रय रखने वाले गुण स्पर्श प्रारण मौर चेष्टा हैं । पाकाश का समाश्रय करने वाले शब्द-योत और श्रवण हैं ।। ४३ ॥ मन-बुद्धि और चित्त य क्षेत्रज्ञ का समाश्रय करने वाले होते हैं। पद के द्वारा परमेष्ठी ने हृषीकेश का उपाश्रय किया था। इसके पश्चात् उस भगवान की रश्मियो स परिवारित और वायु के द्वारा परिनुन भूमि शाखा को उपाश्रित थे।। ४४।४५ ।। उनक सहार करने से उत्पन्न होने वाला पावक संकडो प्रकार से जलता हुग्रा इस सम्पूर्ण विश्व को प्रदग्ध करता हुमा सवत्तंक मनल हागया था ।।४६|| उस महान ज्वाला वाले अनल ने पर्वत, द्रुम, गुल्म, लता, बल्ली, तृण, विमान, दिव्य भनेक पुर और जो भी प्राथय करन के योग्य स्थल थे उन सभी को अच्छी तरह से जला दिया था। लोको के गुरु के भी गुरु ने उन सम्पूण लोका को भस्मीभूत कर दिया था ॥४७॥४८॥ लोको के जला देने पर जो विभूति हुई थी उस लोक सम्भव भस्म को युग के मस्त म उस प्रभु ने धारण कर लिया था। इसके उपरान्त महान् कृष्ण वरण वाला मेघ होकर जो कि संक्डो स्वरूप वाला था सहस्र वृष्टि करने वाला हमापा ॥४॥ उस वर्षा के दिव्य जल स हवि के द्वारर इस भूमि को प्रत्यन्त स्व दु उत्तम जल जो कि सौर के तुल्य था उससे सतृप्त किया था ॥५०॥ शिशिरेण च पुण्येन महो निवारणमागमत् । तेन तोयेन सम्पृक्ता पयस्साघम्यतो घरा ॥५१ पद्म का प्राविर्भाव । [ २७७ एकार्णवजलीभूता सर्वसत्त्रविजिता । महासस्वान्यपि विभुप्रविष्टायमितौजसम् ।।५२ नष्टार्कपषनाकाशे सूक्ष्मेजगतिसवृत्त । संशोपमात्मना कृत्वा समुद्राणां च देहिनः ।।५३ दग्ध्वा सङ्कोच्य च तथा स्वपित्येकः सनातनः । पौराणां रूपमास्पाय स्वपित्यमितविक्रमः ॥५४ एकासंबजले व्यापी योगी योगमुपासित । अनेकानि सहस्राणि युगान्येकार्णवाम्भसि ॥५५ उस शिशिर और पुण्य से यह मही निर्वाण को प्रास हुई थी और उस समय में यह धरा पय के साधर्म से उस जल के द्वारा सम्पृक्त हो गई थी ॥५१॥ उस काल में एकमान सागरमयी यह भूमि थी जिसमे कोई भी किसी प्रकार मस्व शेष नहीं रह गया था । जो बडे बडे महा सत्त्व थे वे भी उस अमित भोज धाले विभु में प्रवेश कर गये थे ।। ५२ ।। सब समुद्रो का पौर देहधारियो का अपने द्वारा भली-भांति शोपण करक सूर्य-पवन भोर पाकाश सन विनष्ट होकर इस सूक्ष्म जगत् में सवृत हो गये थे ॥ ५३ ।। सबको दाप करके और सकुचित करके वह मनालन प्रभु भकेला एक ही फिर भयन किया करता है। अमित विक्रम वाला विभु पौरो के रूप में आस्थित होकर शयन करते हैं ॥५४।। एकमात्र सागर में व्यापक योगी फिर योग को उपामना में संलग्न होते हैं और इम तरह से उसी एक सागर के जल में योग निद्रा में व्यस्तु उस विभु को प्रनेको सहस्र युग ध्यतीत हो जाया करते है ॥५५॥ श्र यता तु तदा विप्रो मार्कण्डेयः कुतूहलात् । गीणों भगवतातन कुमावासीरमहामुनिः ॥५६ बहुवर्पमहनायुस्तस्यैव वरतेजसः । भदस्तीर्थप्रसङ्गन पृथिवी तीर्थगोचरः ।।५७ प्राधमारिण च पुण्यानि देवतायतनानि च । देशाग्राष्ट्राणि चित्राणि पुराणि विविधानि च ॥५८ जपहोमपराः शान्ताम्तपोभिरमला:स्मृता । माकण्डे यस्ततस्तस्य सर्वमाद्विनिर्गतः ।।५६ २७८ । [ पद्म पुराण . निष्कामन्त न चात्मान जानीते देवमायया। निष्क्रम्य तस्य उदरादेकार्णवमथोजगत् ॥६० सर्वतस्तमसाच्छन्न मारंण्डेयोग्यवेक्षत। तस्योत्पन्न भय तीव्र व्यत्यय चात्मजीवितम् ॥६१ सुप्त न्यग्रोधशाखाया वालमेक निरीक्ष्य च । तथैवकार्णवजले नीहारेरणावृतान्तरे ॥६२ अव्यक्तक्रीडिते लोके सर्वभूतविजिते । स मुनिविस्मयाविष्ट कौतूहलममन्वितः ॥६३ वालमादित्यसङ्काश न शक्नोत्यभिवी क्षितुम् । सोऽप्यचिन्तयदकान्ते स्थित्वा सलिलसन्निधौ ॥६४ भब तुम यह श्रवण करो कि कुतूहल से उन भगवान के द्वारा जीणं किये हुए माकण्डेय विप्र उस समय उनकी कुक्षि मे थे ।। ५६।। उमी वर तेज थाले उस ऋपि को बहुत से सहस्र वर्षों को मायु है, वह तीर्थों के प्रसङ्ग से सर्वत्र पयटन करते रहा करते हैं और समस्त पृथ्वी के तीर्थों में गोचर हुमा करते हैं ।।५७॥ परम पुण्यमय आश्रम मौर देवो के प्रायतन, देश, राष्ट्र अति विचित्र अनेक पुर, जप तथा हाम करने में परायण, परम शान और तपा के द्वारा प्रमल कहे गये हैं । इसके उपरान्त उन भगवान के मुख से वह मार्कण्डेर महामुनि घोरे से बाहिर निकल आये थे ॥५८१५९) देव माया के का ण बाहिर निकलते हुए अपने आपको उ होने नहीं जाना था और भगवान के उदर से बाहिर निकलकर इस मम्पूण जगत् को एक सागरमय ही देखा ॥ ६॥ यह सारा जगत् अन्धकार से समाच्छन्न था --ऐमा म कण्डेयजी ने उम ममय में इसे देसा । उम माकण्डेय को बहुत तीव भय उत्पन्न हुपा और उनका अपना जीवन ध्यत्यय युक्त होगया था ॥६१।। उस समय । उन्होने एक वट को शाखा म उस एकाणवी भूत जल में, जो कि नीहार से समावृत अ तर वाला था, शयन करते हा एक बालक को देसा पा ॥६२॥ सम्पूण भूतो से विवजित और अव्यक्त से कोडा युक्त इस लोक में उमको देखकर उम मुनि का मत्यन्त विस्मय हुमा या मौर यह विशेष कौतूदन से समन्वित होगय थे ॥६३॥ यह वर के पत्र के पर - प्रम का आविर्भाव [ २७६ पायन करने वाला बालक-इतना तेजस्वी या जैसे कोई सूर्य हो हो । उसको दृष्टि से देख नहीं सकते थे। उन मुनि ने एकान्त स्थन में सलिल को समिपि में समाधिस्थ होकर ध्यान किया था ॥६॥ पूर्वदृष्टमिदं मेने शङ्कितो देवमायया । अगाधै सलिले होते मार्कण्डेयः सविस्मयः ।।६५ पूर्ववृत्तसो द्रष्टुमव्रजत्रस्तलोचनः । स तस्मै भंगवानाह स्वागतं वाल भो इति ।।६६ बाप मेघतुल्येन स्वरेण पुरुषोत्तमः । मार्कण्डेय न भेतव्यमागच्छस्व ममान्तिकम् ॥६७ फो नाम्ना कीर्तयति मां कुर्वन्परिभवं मम । दिव्यवर्पसहस्राण्यं धर्पयश्चैव में वयः ॥६८ न ह्यप व सदाचारी देवेप्वपि ममोचितः । मां ब्रह्मापि हि सस्नेहो दो युरितिभापते ॥६६ कस्तपोधोरमासाद्य ममाय त्यत्ताजीवितः। मार्कण्डेयेति मामक्त्वा मृत्यूमीक्षितुमर्हसि ॥७० २०i [ पप-पुराण एवं प्रक्षुभितः क्रोधान्मार्कण्डेयो महामुनिः। तदनं भगवान्भूयो वमापे मधुसूदनः ॥७१ अहते जनको वत्स हुपीकेशः पितागुरुः। आयुःप्रदाता पौराणः किं मां त्वं नोपसपंसि ॥७२ इच्छामि तत्त्वती ज्ञातुमिमां मायां तवानघ । यदेकार्णवमध्यस्थः शेषे त्वं बालरूपवान् ॥७३ कि संज्ञश्चैव भगवाल्लोके विज्ञायसे प्रभो। तकयेऽहं महात्मान को धन्यः स्थातुमर्हसि ॥७४ अहं नारायणो ब्रह्मन्सर्वभूतविनाशनः । अहं सहस्रशीपस्यिः सहस्रपदसंयुतः ।।७५ आदित्यवर्णः पुरुषो मुखे ब्रह्ममयो ह्यहम् । अहमग्निहव्यवहः सप्तसप्तभिरन्वितः ॥७६ अहमिन्द्रपदः शक ऋतूनां परिवत्सरः । अहं योगिषु साङ्ख्याख्यो युगान्तावर्त एव च ॥७७ अह सर्वाणि सत्त्वानि देवतान्य खिलानि च । भुजगानामहं शेषस्तार्योऽहं सर्वपक्षिणाम् ॥७८ उस समय मे वह महामुनि मार्कण्डेय क्रोध से इस प्रकार प्रक्षुध होगये थे । तब तो भगवान् मधुसूदन पुनः इनसे कहने लगे-श्री भगवान् कहा- हे वत्स ! मैं ही तुम्हारा जनम देने वाला हृषीकेश पिता एवम् गुरु हूँ। मैं ही तुमको भायु के प्रदान करने वाला हूँ। मैं परम पुराण पुरुष हूँ। क्या आप इस समय मेरे समीप में नहीं आ रहे हो? और क्या कारण है जो तुम मेरे निकट नहीं आते हो ? ॥७१७२।। माकण्डेय मुनि ने कहा-हे मनघ ! मैं तत्त्व स्व. रूप से भापको इस माया को जानना चाहता हूं कि इस एकमात्र सागर के जल के मध्य में स्थित होकर शेप की शय्या पर बालक के स्वरूप शयन कर रहे हैं ॥७३॥ हे प्रभो ! माप लोक मे किस नाम से जाने जाते हैं ? मैं तो प्रापको कोई महान् प्रारमा दाला ही सोचता हूँ क्योंकि अन्य कौन इस अवस्था मे स्थित हो सकता है । ७४॥ श्री भगवान ने कहा-हे ब्रह्मन् ! समस्त मूओं का विनाश ने पन का माविर्भाव ] [ २८१ -- करने वाला मैं नारायण हूँ। मैं सहस्र शीर्ष पौर मुख वाला तथा सहस्र पदो से समन्वित हूं १७५॥ मै मादित्य के धणं वाला पुरुप हूँ। मैं मुख मे ब्रह्ममय हूँ। मैं ही अग्नि हूँ जो हव्य वहन करने वाला प्रौर सप्त-मप्त प्रतियो से युक्त होता है ।।७६॥ मैं इन्द्र पद वाला ऋतुमो का परिवत्सर शक हूँ। मैं योगियो में सारूम नाम वाला युगान्ताव हूँ ७७11 में ही सम्पूर्ण सत्त्व स्वरूप वाला हूँ पौर समस्त देवतमय हूँ। भुजगो में रोष हूँ तपा समस्त पक्षियों में गरड मेरा ही स्वरूप है ॥७॥ कृतान्त सर्वभूतानां विज्ञेयः कालसशितः । यह धर्मस्तपश्चाहं सर्वाश्रमनिवासिनाम् 11७९ अयं दयापरो धर्म. क्षीरोदोऽहं महार्णवः । यत्सत्य तत्पर वे अहमेव प्रजापतिः ॥८० अह साहयामह योगो ह्यहं तत्परमं पदम् । अहमिज्या क्रिया चाहमह विद्याधिप स्मृत ॥८१ अह ज्योतिरह वायुरह भूमिरह जलम् । आकाशोऽहं समुद्राश्व नक्षत्राणि दिशो दश ॥२ अह वर्षमह सोम. पर्जन्योऽहमह रविः । अह पुराण परम तथैवाह परायणम् ॥६३ भविप्ये चापि सर्वत्र भविष्यत्सर्वसङ्ग्रहः । यक्तिचित्पश्यसे विप्र यच्छरगोपि व किञ्चन ।।८४ समान प्राणियों का वृतान्त पाल समा वाला मुझे ही समझी। में ही धर्म है, तप हूँ जो म भाप्रमों में नियाम करन वालों के हृदय में रहा कराना है 1980 में ही दया में परायण धम है तथा यह महार्णव धोरोद भी में है। ओ मस्य है वह पद है और एक है यह मैं हो प्रजापति हूँ 12011 में ही साम्प हूं और योग भी मेरा हो स्वरूप है। में हो सभी को है पद भी हूँ । इग्या-क्रिया और समस्त विधामों का स्वामी भी मैं हो है 10 में ही योनि हूँ. मैं ही वायुहू पोर में ही जम हूँ। मैं पाराय है, पमान ममुर, नक्षत्र पोर दसों दिशाएं भी मर मेरा हो पर है ॥२॥ मैं वर्ष-मोम- २८२ ] [ पद्म पुराण पर्जन्य और रवि हूँ। मैं परम पुराण तथा मैं हो परायण हूँ ॥८३|| भविष्य में सर्वत्र होने वाला सब का संग्रह हूँ, जिस किमो को भी तुम देखते हो, हे विप्र ! जो कुछ भी तुम श्रवण करते हो वह सभी कुछ मैं ही हूँ |४|| यच्चानुभवसे लोके तत्सर्व मामनुस्मर । विश्व सृष्ट मया पूर्व सृजेऽद्यापि च पश्यमाम् ॥८५ युगे युगे च रक्षामि मार्कण्डेयाखिलं जगत् । तदेतत्कथित सर्व मार्कण्डेयावधारय ।।८६ शुश्रू पुरपि धर्मेपु कक्षौ चर सुख मम । मम ब्रह्मा शरीरस्थो देवाश्च ऋपिभि सह ॥८७ व्यक्तमव्यक्तयोग मामवगच्छ मुरद्विपम् । अहमेकाक्षरो मन्त्रस्यक्षरश्च पितामहः ॥८८ परत्रिवर्ग अोकार. परमात्मप्रदर्शनः । एवमादिपुराण च वदते मा महामते ॥६६ वक्त्रमाहृतवानीशो मार्कण्डेयमथो हरि । ततो भगवत कुक्षि प्रविष्टो मुनिसत्तमः ।।१० यदक्षय विविधमुपाश्रित तु तन्महार्णवे व्यपगतचन्द्रभास्करे । शनैश्वरन्प्रभुरथ हसज्ञत. सिंसृजञ्जगद्विहरति कालपर्यये ॥६१ इम लोक में जो भी कुछ तुम अनुभव करते हो यह सब मुझको ही समझ लेना चाहिए । मैंने ही पहिले इम सम्पूर्ण विश्व का सृजन किया था और माज भी मद मैं इसका सृजन करता हूँ,माप मुझको देखें ॥६हे मार्कण्डेय ! इस समस्त जगत् को मैं युग युग मे रक्षा किया करता हूं। हे माकण्डेय । यह सभी कुछ तुमको बता दिया है। अब इसका ठीक अवधारण कर लो॥८६॥ धर्मों में शुश्रूषा करने वाला होता हुआ भी मेरी कुक्षि मे सुखपूर्वक विचरण फरो । ब्रह्मा भी मेरे ही शरीर में स्थित है और सब देवगण भी ऋपियों के साथ वहाँ पर स्थित रहते है ।'८७ । व्यक्त-प्रव्यक्त योग-मुर शत्रु का नाशक मुझको जान लो । मैं ह। एकाक्षर मन्त्र हूँ मोर तीन मक्षर वाला पितामह हूँ III हे महान मनि वाले ! पर-त्रिग-ओङ्कार परमात्म प्रदर्शन में हो पद का माविर्भाव । । २८३ है। इस प्रकार से मुझको ही प्रादि पुरुष तथा परम पुरुष कहते हैं | ८६ ॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-~-उन ईश्वर हरि ने इसके उपरान्त मार्कण्डेय मुनि को अपने मुम्न मे समाहृत कर लिया था और फिर वह मुनियों में परम श्रेष्ठ भग- धान को कुक्षि में प्रविष्ट होगये थे ॥ ६ ॥ जो आप नहीं होने वाला है और अनेक स्वरूपो में उपाधित होता है इस महार्णव में जिसमें चन्द्रमा और सूर्य भी व्यपगत होगये हैं वह प्रभु हंस सजा वाला धीरे-धीरे विचरण करते हुए इस जगत् को सृजन करते हुए काल पर्यय में बिहार किया करते हैं ॥१॥ अथवं शुचिर्भूत्वा चचार स तु वै तपः । छादयित्वात्मनो देह पयसाम्बुजसम्भवः ।।६२ ततो महात्मातिवलोमर्त्यलोकविमर्जने । महतां चैव भूतानां विश्वो विश्नमचिन्तयत् ।।६३ तस्य चिन्तयमानस्य नियते मंस्थितेऽर्णवे। निराकाशे तोयमये मूक्ष्मे जगति सक्षये ॥६४ ईश. संक्षोभयामास सोऽसव सलिल गतः । प्रथालरादा मूक्ष्ममर्थाच्छद्रमभूत्पुरा १६५ मन्द प्रति ततो भूतो मारुतश्छिद्रमम्भवः । सलब्ध्वान्तरमक्षोभ व्यवधंत समोरगाः ॥६६ नभम्वता बलवता वेगाद्विक्षोभिताडगांव: । तम्यायस्य क्षुब्धस्य तस्मिन्नम्भसि मयतः १६७ धारणवा समभवत्प्रभुश्वानरी महान् । ततः समापयामास पावकः सलिलं बहु । म प्रनतर परम शुचि होकर उमने तपस्या को ममापरण किया था। कमन गेममुन्न होने पाले ने उनमे अपने देश ममदान किया पा॥२॥ हर बननर महान भरमा बारे प्रति स्यात् यि ने मस्यंमोर विपन करने में महान मोरे विश्व के वियर में किन frar पा॥३॥ म रोनि पिनाते हुए वमको निरन मोर मपित मागरम बहन तोमारास ही पा मोरम मूलामो उममें ममी मान २८६ ॥ -- [ पद्म पुराण - यत्पद्म सा रसा देवी पृथिवी परिकथ्यते । ये पद्मकेशरा मुख्यास्तान्दिव्यान्पर्वतान्धिदु.॥१११ हिमवन्त च नील च मेरु निपधमेवच । कैलासं शृङ्गवन्तं च तथाद्रि गन्धमादनम् ॥११२ पुण्यं विशिखरं चैव कान्तं मन्दरमेवच । उदार पिञ्जरं चैव विन्ध्यमस्तं च पर्वतम् ।।११३ एत एव गणानां च सिद्धानां च महात्मनाम् । आथयाः पुण्यशीलानां सर्वकामफलप्रदाः ॥११४ महर्षि पुलस्त्य ने कहा-इसके अनन्तर योगाभ्यास करने वालो मे परम श्रेष्ठ-अत्यधिक वर्चम वाले, सब पोर मुखों वाले, लोकों की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा का सृजन किया गया था ।।१०८।। उस हिरएमय पद्म मे जो बहुत से योजनो के विस्तार वाला था तथा सब के तेज और गुणों से परिपूर्ण था एवं पार्थिव लक्षणों से वृर था पृथिवी रूप पुराभूत उत्तम वह पद्य हुमा या जिमको महपिंगण नारायण से समुद्भूत बतलाते हैं ।।१०६।११०॥ जो वह पद्म था वही रसा देवी पृथिवी परिकल्पित की जाती है । जो उस पद्म में केशर मुख्य थे उनको दिव्य पर्वत कहते हैं ।।१११॥ उन दिव्य पर्वतो के नाम बतलाये जाते हैं जो उस दिव्य नाभि से समुत्थित पद्म के केशर थे । हिमवान्–नील- मेरु-निषध-कैलास-शृङ्गवान्-गन्धमादन-पुण्य त्रिशिखर-कान्त मन्दर-- उदार पिञ्जर और विन्ध्य ये पर्वत हैं ।।११२।११३॥ ये पर्वत समस्त कामनाप्रो के फलो के प्रदान करने वाले और सिद्धगण-महात्मा तया पुण्यशीलों के आश्रय होते हैं प्रर्थात् इन्ही पवंतो पर महापुरुष सिद्ध लोग अपना पाश्रम बनाया करते हैं और तपश्चर्या किया करते हैं ॥११४|| एतेपामन्तरे द्वीपो जम्बूद्वीप इतिस्मृतः । जम्बूद्वीपस्य सस्थान यज्ञिया यत्र च क्रियाः ॥११५ तेभ्योयद्रवते तोयं दिव्यामृतरसोपमम् । दिव्यतीर्थशताधारा: सरस्यः सर्वतः स्मृताः ॥११६ यान्येतानीह पद्मस्य केसराणि समन्ततः । असंख्येयाः पृथिव्यां ते विविधाश्चैवपर्वताः ॥११७

मय का आमिर्माव]
[ २८७
यानि पनि पद्यस्य भूरि पूर्वाणिपार्थिव ।
ते दुर्गमा शलचिताम्लेच्छदेशा प्रकीर्तिताः ।।११८
यात्यधोभागपत्राणि-तानि वासास्तु भागशः ।
दैत्यानामसुराणा च पन्नगाना व पार्थिव ॥११६
इन पर्वतों के मध्य में जो द्वीप है वही जम्बूद्वीप नाम से कहा गया है।
जम्बूद्वीप वह सस्थान है जहां पर यज्ञ सम्बन्धी क्रियाएँ निष्पन्न हुआ करती
हैं ।।११५॥ इन पर्वती से जो जल द्रवित होकर वहता है वह दिव्य अमृत रस
के समान होता है । दिव्य तीर्थों की सैकडो धाराएं सर-सी ( नदियो ) सभी
भोर कही गयी हैं ।।११६॥ इन प्रमुख केशरी के प्रतिरिक्त जो अन्य उस पक्ष
को केशर हैं वे चारो ओर मे अगणित है और वे इस पृथिवी तल में विविध
पर्वतो के रूप में विद्यमान हैं ॥११७ ) जो उम दिव्य पध के पत्र हैं वे हे
पार्थिव ! बहुत अधिक हैं और वे सब शलचितम्लेच्छो के दुर्गम देश कहे गये
हैं ।।११८) जो उम पद्म के प्रधोभाग मे पत्र हैं वे हे पार्थिव ! भागशः दैत्यो
को-मसुरो के मोर पन्नगो के निवास स्थान हैं ।।११६॥
तेषा मध्येऽन्तर यत्तु तद्रसातलसज्ञितम् ।
महापातककर्माणो मज्जन्ते यत्र मानवाः ॥१२०
पद्मस्य चान्तरे पद्म एकाएंवगता मही ।
चतुर्दिश.सु सघाताश्चत्वारः सलिलाकराः ॥१२१
एवनारायणस्यार्थे मही पुष्करमम्भवा ।
प्रादुर्भावोऽप्यय तस्मान्नाम्ना पुष्करसज्ञितः ।।१२२
एतस्मात्कारणाद्यज्ञे पुराणः परमषिभिः ।
यज्ञियर्वेदष्टान्तयज्ञयू पचितिः कृता ।।१२३
एव भगवता तेन विश्व व्याप्यधराचिता।
पर्वताना नदीना च रचना चैव निर्मिता ॥१२४
विश्वस्य यश्चाप्रतिमप्रभावः प्रभाकराभो वरुणोऽमितद्यति ।
शनै स्वयम्भूत्यं सृजत्सुषुस पनिधि महार्णवै ॥१२५
उन पप के पयो के मध्य में जो मन्तर है वही रसातल नाम वाला

२०८ ] । पम-पुराण स्थान है । महान् पाठ से युक्त कमों को करने वाले मनुष्य जहाँ पर जाकर मजिन हमा करते हैं ॥१२०॥ और पन के मन्तर मे एकारणं वगता पृथिवी है। वहाँ चारो दिशामो मे चार सदस्या वाले जलाशय हैं ॥१२१।। इस प्रकार से नागयरण के लिये पुष्कर से समुत्पन्न होने वाली मही है। इस तरह इसके प्रादु. र्भाव के नाम से ही इसकी पुष्कर-यह सज्ञा हुई है ॥१२२॥ इसी कारण से हो यज्ञ में परम प्रावीन, याजिक, वेदो के अन्त पर्यन्त द्रष्टा परम पियो के द्वारा यज्ञो के से यूपचिति की गई यो ॥१२३॥ इमी प्रकार से उन भगवान ने विश्व को व्याप्त करके इस धरा को चित किया है और पर्वतो को तथा नदियो को रचना का निर्माण भी किया है ।।१२४॥ जो इस सम्पूर्ण विश्व का अप्रतिम प्रभाव है, प्रभाकर की प्राभा वाला है, वरुण को अपरिमिस युति से सम्पन्न है, उस स्वयम्भू ने, स्वय जो जगन्मय है उस महार्णव में पधनिधि सुपुप्त जगत् का विशेष सृजन किया था ॥१२॥ ॥ तारकोत्पत्ति वर्णन ॥ वशक्षयकरा देवा. सर्वेपामेव दानवाः । अस्माक जातिधर्मेण विरूढ वैरामक्षयम् ॥१ वय तपश्चरिष्यामः सुराणा निग्रहाय तु । स्वबाहुबलमाश्रित्य सर्व एवन सशयः ॥२ तच्छत्वा समत कृत्वा पग्यिान ययौगिरिम् । निराहार. पञ्चतपा पत्रमुग्वारिभोजन ॥३ शत शत समाना तु तपास्येतान्यथाकरोत् । एव तु कशिते देहे तपो राशित्वमागते ॥४ ब्रह्माऽऽगत्याह दैत्येन्द्र वर वरय सुव्रत । स व सर्वभूतेभ्यो न मे मृत्युभवेदिति ॥५ तमुवाच ततो ब्रह्मा देहिना मरण ध्रुवम् । यतस्ततोऽपि वरय मृत्यु यस्मान शड्वसे ॥६ तत सञ्चिन्त्य दैत्येन्द्र शिशो सप्तवासरात् । वन्न महासुरो मृत्यु मोहितोयवलेपत. ॥७ तारकोत्पत्ति वर्णन ] [ २८९ दानवो मे परम श्रेष्ठ तारक ने समस्त पसुरो से कहा-हे समस्त असुरो । माप सब महान् बल-विक्रम से सम्पन्न है। अब पाप सब लोग मेरे वचनो का श्रवण करो। हे दानयो ! ये जो सब देवता लोग हैं वे सभी हमारे वशो का क्षय करने वाले हैं और इनके साथ जाति के धर्म से ही हमारा प्रक्षय वैर विशेष रूप से समारूढ हो गया है ।। १ ।। अब हम सबको इन सुरों के निग्रह करने के लिये तपश्चर्या करनी चाहिए और हम सबको अपने ही बाहुबल का प्राश्रय ग्रहण करना चाहिए। इम में बिल्कुल भी संशय नही है ॥२॥ पुलस्य मुनि ने कहा-तारक के इन वचनो का श्रवण करके समरत दानवो ने परस्पर मे सम्मति की और फिर उन सबके साथ वह परिपात्र नाम वाले पर्वत पर चला गया था । यहाँ पर उसने अपने प्राहार का त्याग कर दिया था और पायो तपो को करने लगा था ! पणो को और जल को ही माहार के स्थान में ग्रहण करता था ॥३। उसने वहाँ पर सौ सौ वर्ष तक इस प्रकार की तपस्या की थी । इम रोति मे देह के कर्शित हो जाने पर वह उसके तप की एक महान राशि सञ्चित हो गई थी ॥४॥ जब तारकासुर को तपस्या अत्यधिक मात्रा में हो गई तो ब्रह्माजी ने वहाँ उसके पास भाकर कहा-हे मुव्रत : तुम वरदान मांग लो। ब्रह्माजी के इस कथन पर उसने यह वरदान मांगा था कि प्राणियो से मेरी मृत्यु न होये ।। इस वरदान को याचना करने पर ब्रह्माजी ने कहा था कि जो भी कोई देहधारी होते हैं उनका मरण तो निश्चित ही है । इसलिये इम पटल नियम को सोचकर ऐसा ही वरदान प्राप्त करो जिनसे तुमको अपनी मृत्यु की शका हो उनसे तुम्हारी मृत्यु न होवे ।।६।। इसके अनन्तर मच्छो तरह विचार करके उस दैत्येन्द्र ने सात दिन के शिशु से मृत्यु का वरण मांगा था । वह महान असुर घमण्ड के कारण कम समय मोहित होगया था ७॥ जगामोमित्युदाहृत्य ब्रह्मा दैत्यो निजं गृहम् । अथाह मन्त्रिणस्तूर्ण बल मे सम्प्रयुज्यताम् ।। यदि वो मत्प्रिय कार्य निग्राह्याः सुरसत्तमाः । निगृहीतेषु मेप्रीतिर्जायतेचातुलाऽसुरा IE तारकस्य वच. श्रुत्वा ग्रसनो नाम दानवः । सेनानीदैत्यराजस्य सज चक्रे बलं च तद ।।१० २६० ] पद्म पुराण प्रतस्थेऽमरयुद्धाय बहुपत्तिपदाकिकम् । एतस्मिन्नन्तरे वायुर्देवदूताऽसुरालये ।।११ दृष्ट्वा तद्दानववल जगामेन्द्रस्यशसितुम् । स गत्वा तु सभा दिव्या महेन्द्रस्यमहात्मनः ।।१२ शशममध्ये देवाना तत्कार्यसमुपस्थितम् । तच्छु त्वा देवराजस्तु निमीलितविलोचनः ॥१३ बृहस्पतिमुवाचेद वाक्य काले महाभुजः। सम्प्राप्नोति विमर्दोऽय देवाना दानव. सह ।।१४ 'मोम्' अर्थात् ऐमा ही होगा-यह कहकर ब्रह्माजी भोर देत्येन्द्र दोनो ही अपने अपने निवास स्थान पर चले गये थे। इसके अनन्तर अपने गृह पर पहुंचकर उसने अपने मन्त्रिपो म कहा था कि बहुत शीघ्र सेना को सम्प्रयुक्त करो। यदि भाप लोग सब मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो सबको यही करना चाहिये कि समस्त सुरगणो को निगृहीत कर लेना है। इन सब देवगणो के निगृहीत हो जाने पर मुझे अतुलनीय प्रसन्नता होगी ॥६॥ तारक के इस वचन को सुनकर दैत्यराज को सेना का नायक सेनानी जो प्रसन नामधारी दानव था उसने अपनी सेना को सुसज्जित कर दिया था॥१०॥ फिर वह देवों के साथ युद्ध करने के लिये बहुन पदाति और पताकामो वाली सेना रवाना हो गई थी। इसी बीच में देवो के दून वायु ने भसुगे के घर मे यह सब सग्राम को सुमज्जा को देखा था और उस दानवो के दल के विषय मे वह इन्द्र को कहने के लिये गया था। वह महात्मा महेन्द्र की दिव्य सभा में पहुंच गया मोर उसने समस्त देवों के मध्य में उस समुपस्थित कार्य को कह सुनाया था। यह सब सुनकर देवराज इन्द्र ने अपने नत्र मूद लिये थे मोर मह न भुजाम्रो वाले समय में सुरगुरु बृहस्पति से यह वचन कहे थे । इन्द्र ने कहा-प्रद दानवों के साथ देवो का यह विमदं प्रर्थात् झमहा सम्प्राप्त होगया है । ११-१४|| कार्पकिमत्र तबू हि नीत्युपायोपवृहितम् । यतच्छत्वा तु वचन महेन्द्रस्य गिरापति. ॥१५ इत्युवाच महाभागो वृहस्पतिरुदारधीः । सामपूर्वा श्रुता नीतिश्चतुरङ्गा पताकिनी ॥१६ उस तारकोत्पत्ति वर्णन ] 1 २६१ जिगीपता सुरश्रेष्ठ स्थितिरेपा सनातनी । सामभेदस्तथादान दण्डश्चाङ्गचतुष्टयम् ।।१७ न सान्त्वगोचरेलुब्धा नभेद्यास्त्वेकर्मिणः । न दानमात्र संसिद्ध्यप्रसह्य वापहारिणाम् ।।१८ एकोऽभ्यपायो दण्डोऽत्र भवतां यदि रोचते। एवमुक्तः सहस्राक्ष एवमेतदुवाचह ॥१६ कर्तव्यतां च सञ्चिन्य प्रोवाचामरससदि। अवधाने न मे वाचं शृणुध्व नाकवासिनः ॥२० भवन्तो यज्ञभोक्तारो दिव्यात्मानो हि सान्वयाः। स्वे महिम्नि स्थिता नित्यं जगतः पालने रताः ॥२१ इस विषय मे अब क्या करना चाहिए वह नीति के उपाय से वृहित कोई राय पाप बतलाइये । इन्द्र के इस वचन को श्रवण कर वाणी के स्वामी महाभाग मोर उदार बुद्धि वाले वृहस्पति ने यह कहा-~~||१५॥ सुरगुरु बोले- चतुरङ्गिणी सेना है और सबसे पूर्व साम का साधन अपनाना चाहिए यह मोति बतलाई गई है। हाथी-घोडे-~-रथ और पैदल चारों प्रकार के साधन जिस सेना में होते हैं उसे ही चतुरङ्गिणी कहा जाता है ॥१६॥ हे सुरश्रेष्ट जीतने की इच्छा वालों को यह सनातनोमर्थात् सदा से चलो माने वाली स्थिति होती है। साम-भेद-दान मोर दण्ड-ये चार नीति के मङ्ग होते हैं। समझा-बुझाकर शाति से काम निकाल लेना साम है । आपस मे फूट पैदा करके सिद्धि करना भेद होता है । कुछ दे दिवाकर कार्य सम्हालना दान है और जब तीनो उपाय विफल हो तो अन्त मे दण्ड नीति अपनानी चाहिए ।।१७। ये लुब्ध हैं मतः साम से कोई कार्य नहीं बनेगा । ये सभी एक ही धर्म वाले हैं प्रतः भेदन के योग्य भी नहीं हैं । बलात् अपहरण करने वाले इनके विषय दाम भी सिदि करने के लिये पर्याप्त उपाय नहीं बनता है । यहाँ तो केवल इन चारो में से एक दरड हो उपाय है याद मापको रुचिकर प्रतीत होता हो। इस तरह से कहे जाने पर इन्द्र ने इस प्रकार से यह कहा मोर पत्तव्यता का संचिन्तन करके देवों को समा मे बोला। इन्द्र ने कहा-माप समस्त स्वर्ग में निवास करने २१२ ] 1 [प-पुराण वाले देवगण यहुत ही पान पूर्वर मेरे पपको गुने ॥ १८१६२० ॥ आप मध मोग यहोरे भोगा और 4 महिन यिारमा। अपनी महिमा में निस्य ही स्थित हैं मोर जगत् के पालन में मपंदा रति रपने वारे ॥२॥ क्रियतासमरोद्योग. मंन्यं सयोज्यतामम । अहियन्ताच पास्त्राणि पूज्यन्तारादेवताः ॥२२ यानानि विमानानि योजयध्वं ममेश्वरा. । यम सेनापति कृत्वा शीघ्रमेव दिवारगः ॥३२ सहस्र दृग्वन्दितपादपल्लवस्त्रिविष्टपेऽगोमत पापमामनः । तुरजमातकुलोधसड बुला सीतातपयध्वजशालिनी च । बभूव सा दुर्जयपत्तिसन्तता विभाति नानायुधयोधदुम्तरा ।।२४ ततोऽश्विनौ च मरतः ससाध्याः सपुरन्दराः । यक्ष राक्षस गन्या दिव्यनानास्त्रपारायः ॥२५ जघ्नुर्देत्येश्वर सर्वे सम्भूय तु महायलाः । न चैवास्याण्यमजन्त गाने वधाचलोपमे ॥२६ प्रथोरथादवप्लुत्य तारकोदानवाधिपः । जघान कोटिशो देवान्करपाणिभिरेवच ।।२७ हतशेपाणि सैन्यानि देवानाविप्रदुद्र वुः । दिशो भूतानि सन्त्यज्य रणोरकरणानिच । दृष्ट्वा तान्विद् तान्देवास्तारको वाक्यमनवीत् ॥२८ देवराज इन्द्र ने देवगण से कहा था कि प्रब तो सग्राम करने का उद्योग पाप सभी लोग कर लेवें पौर मेरी जो सेना है उसे सयोजित कीजिए। समस्त शस्त्रो का माहुत परे तथा उन शस्त्रो के देवताओ की पर्चा मरिये ॥२२॥ मेरे ईशर देवगयो । सब वाहन और विमानो को योजित करो। यमराज को अपनी सेना का अधिपति बनामो मोर यह सब कार्य सम्पन्न करने में शीघ्रता करो ॥३३॥ उस समय मे सहस्र नेत्रो वाला इन्द्रदेव जिसके हर RTE बन्यमान , उस त्रिविष्टप (स्वर्ग) मे अत्यन्त शोभा को प्राप्त हुआ था। उसको सेना भी अश्व हायो मादि के समूहो से सकुल यो मोर सीतात पत्र और ध्वजो को

सारकोशत्ति वर्णन ]
। २६३
शोभा वाली थी । दुर्जय पैदल सैनिकों से विस्तृत और अनेक प्रकार के मायुधो
याले योधामो से अत्यन्त दुस्तर वह सेना गोभित हो रही थी ॥ २४ ॥ इसके
पश्चात् अश्विनीकुमार--मरुत-साध्यगण और पुरन्दर के सहित यक्ष-राक्षस-
गन्धर्व जो कि अनेक प्रकार के यस्त्र अपने हाथो मे ग्रहण किये हुए थे, ममी
महान बल वालो ने मिलकर दैत्येश्वर पर प्रहार किया था किन्तु उसके बच के
पर्वत की भांति शरीर मे पत्रो का युछ भी प्रभाव नहीं होता था ॥२५॥२६॥
इमके अनन्तर दानव दल के स्वामी तारकासुर ने स्वय रप से नीचे उतर कर
पाणियो से ही करोडो देवो का हननकर दिया था ॥२७॥ मरने से जो कुछ भी
थोडेबहुत देवो के सैनिक शेप बच गये थे वे दिशामो में भग गये थे मोर भूतों
को तथा रण करने के सम्पूर्ण उपकरणों को भी वहां पर संग्राम स्थल मे ही
छोडकर चले गये थे। उन समर स्थल को त्यागकर भागने वाले देवी से तारका-
तुर ने यह बाप कहा था ॥२८॥
भाव पिष्टमुरान्दैत्या वज्राङ्गाय च मन्दिरे ।
शीघ्रमानीयदय॑न्ताम्बद्धा पश्यत्वय सुरान् ।।२६
लोकपालास्ततो दैत्यो बद्ध्वा चेन्द्रमुखात्रणे ।
सरुन्द्रान्सुदृढ पार्श पशुपाल. पशूनिय ॥३०
स भूयो रथमास्थाय जगाम स्ववमालयम् ।
सिद्धगन्धर्वमधुष्ट विपुलाचनमस्ताम् ।
स्तूयमानो दितिसुतरप्यरोभि सुसेपित ॥२१
तारव बोरा--हे देत्या । प्रय इन मुरो हो मन मारो मोर मोघ्र ही
मेरे मन्दिर में लाकर मुझ य र मग वाले को इन्द दिखलामो । मैं सुरोसो
देसू ॥१६॥ पुनस्रय महपि ने कहा- इन्द्र जिनमें प्रधान था ऐन रुद्रो ये सहित
समस्त मोक्तालों को वैधवारर जमे कोई पगुमौका पाला पामों को मुटा
पायों से बाप लेना है उमो भाति दस्य न उन मयरो बंधवा दिया था। यह
फिर मरने रण में बंधार पने निपाम स्पार का पना गया पा11३1३६
पर वह मिलगा मोर गन्धर्गेरे ममुदाय र द्वारा गपुर होताहमा वितान
'पवन मनात माता बाना दयराज दिनि रे पुर देशराम और अमरानों
देसरा भी भौनि मुमेदिन होरर ममाग्थित हो रहा था॥३१॥

२६४ ]
[ पम-पुराण
.
॥ सर्वदेव कृत ब्रह्मस्तोत्र ॥
प्रादुरासीत्प्रतीहारः शुभ्रचीनाशुकाम्बरः।
सजानुभ्यां मही गत्वापिहितास्यश्चपारिगना ॥१
उवाचानाविलं वाक्यमल्पाक्षरपरिष्कृतम् ।
दैत्येन्द्रपकंवृन्दाभं विभ्रतं भास्करं वपुः ।।२
कालनेमि. सुरान्बना प्रादाय द्वारितिष्ठति ।
स विज्ञापयति स्थेय क्ववन्दिनिचयः प्रभो ॥३
तन्निशम्यानवी त्यः प्रतीहारस्य भापितम् ।
यथेष्ट स्थीयतामेभिगृह मे भुवनत्रयम् ॥४
केवलं वासव त्वेक मुण्डयित्वा विमुच्यताम् ।
सितवस्त्रपरिच्छन्नाशुनः पादेनचिह्नितम् ।।५
एवं कृते ततो देवा दूयमानेन चेतसा ।
जग्मुर्जगद्गुरुं द्रष्टुं शरणं कमलोद्भवम् ॥६
विनिविण्णास्तमासाद्य शिरोभिद्धरणीगताः ।
तुष्टुवुः सुष्ठु वर्णात्य वचोभिःकमलमासना ॥७
पुलस्त्य महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर वहाँ पर शुभ्र और चीताशुक
घस्रो के धारण करने वाला प्रतीहार उपस्थित हुआ था। वह अपने हाथ में
मुख को ढककर जानुपो के द्वारा भूमि पर चलकर अनादिल वाक्य जिसमें
बहुत ही कम अक्षर परिष्कृत हो रहे थे सूर्य के समुदाय की प्राभा वाले और
भास्कर वपु को धारण करने वाले दैत्यराज से कहने लगा कि कालनेमि सुरों
को बांधकर ले पाया है मौर द्वार पर खड़ा हुआ है । उसने प्रार्थना की थी कि
हे प्रभो। उसे प्रब बन्दी बनाये हुए देवो के समूह को लेकर किम स्थान पर
रहना चाहिए ॥१॥२३॥ प्रतीहार के इस कथन को श्रवण कर उस दैत्यराज
ने प्राज्ञा दे दी थी कि जहाँ भी इच्छा हो रहे क्योकि अब तो ये तीनों ही
भुवन मेरा ही घर है ।।४।। देवल एक इन्द्र का मुण्डन कराकर उसे छोड दो
उसको श्वेत वस्त्रों से परिच्छिन्न कर दो भौर श्वान के पाद से उसको एक चिह्न
लगाकर छोड दो॥ ५ ॥ इस प्रकार में किये जाने पर फिर देवगण वहन ही

सवंदेव कृत ब्रह्मास्तोर ] [ २६५, दुखित चित्त से युक्त होते हुए कमल से बलान होने वाले जगत् के गुर ब्रह्माजी को शरण समझकर उनसे मिलने को गये पे ।।६।। परपन्न हो वैराग्य से युक्त होने वाले उन देवतामो ने ब्रह्मात्री के पास पहुंचकर प्रपना-अपना मस्तक भूमि पर रख दिया मा मोर उन कमलामत ब्रह्मानो को सुन्दर वर्षों से समधित वपनो के द्वारा वे वहाँ पर स्तुति करने लगे थे ।१७॥ विरेमुरमराः स्तुत्वा ब्रह्माणमितिकारणम् । तस्थुमनोभिरिटार्य सम्प्राप्ति प्रार्थनास्ततः । एव स्तुती चिरिश्चिस्तु प्रसाद परम गतः । अमरान्वरदोऽप्याह वामहम्तेन निर्दिशन् । पुरहतमुखाः रावला निमिपा विजिताः प्रसभं किल दैत्यशतक। फतको विहिता भवता स्थितये जगता च महातचित्रगुणा ॥१७ प्रपि यसकृतः श्रतकामफला विहिता पयस्तत एव पुरः । अपि माकमभूत्किल यशभुजा मवती चिनियोगवशात्सततम् ॥१॥ अपहृत्य विमानगण सकृतो दनुजेन महाकरभूमिसमः । कृतवानसि सर्व गुणातिशय यमपमहीधरराजतया ॥१२ प्रयध्यस्तारको दैत्यः सबरपि सुरासुरं । यस्य वभ्यम्सनाद्यापि जातस्त्रिभुवने पुमान् ॥१३ ममा म वरदानेन छन्दयित्वा निवारितः। तपय साम्प्रत राजा लोक्यदहनामा १४ स तु वर्य वध देगविगत सप्तधामरात् । सनु मादिनी वाल. शङ्कराद्योभविष्यति ॥१५ पूनररप मुनिन महायानो स्तुति देवगण विरत होगये पौर पर मन में प्रान भीट पर्यो वामना से वह पर स्पिन हो गये पे || 5 कार से स्तबन चिजार पर प्रयागो परम मार और फिर पास में निगरानी उन देवगडे में हो l पलोग मय दाम पयों है? मा प्रधानी के मारा पूरे गाने पर मम देवो मे प्रेरित होर ग ने दागे ने या प्रमुग २६६ । पम-पुराण काम- हैं ऐसे सबल समस्त देवों को विजित कर दिया है। मापने जगतो के हित- सम्पादन के लिये और स्थिति के लिये महान अद्भुत एवम् प्रति विचित्र गुणों वाले यज्ञों को बनाया है । इनके भी पूर्व यज्ञो को करने वाले तया श्रुत नाप्रो के फलों से युक्त ऋपियो की रचना की थी। आपके विनियोग के वश से यज्ञों के भोग करने वालो का स्वर्ग निरन्तर रहने का स्थान रहता था। उस स्वर्ग को दानव ने महान कर वाली भूमि के समान कर दिया है और सब विमानो का उसने अपहरण कर लिया है। जिस स्वर्ग को आपने समस्त भूमि के राज्यों से भी अधिक समस्त गुणो के अतिशय होने वाला बनाया था ॥१०॥ ॥११॥१२॥ देवगण का यह भाषण श्रवण करके ब्रह्माजी ने देवतामों से कहा- वह तारक असुर तो आप समस्त देवो तथा असुरो से भी वध करने के योग नही है । जिसके द्वारा उसका वध किया जा सकता है वह पुरुष तो अभी तक इस त्रिभुवन मे समुत्पन्न हो नहीं हुआ है ॥ १३ ॥ मैंने ही उसे ऐमा वरदान देकर छन्दित करक निवारित कर दिया है । तपस्या के प्रभाव से इस समय मे वह राजा इस त्रिलोकी को दहन करने के स्वरूप वाला है ॥२४॥ उम दैत्य ने मुझसे ऐसा ही वरदान प्राप्त किया था कि सात दिन का एक कोई शिशु सुत ही उसका वध करने वाला होवे । वह सान दिन का बालक भगवान् शकर से ही होगा ||१५|| तारकस्य निहन्ता स भाष्कराभो भविष्यति । साम्प्रतं चाप्य पत्नीकः शइरो भगवान्प्रभुः ॥१६ हिमाचलस्य दुहितायाच देवी भविष्यति । तस्याः सकाशाद्य. सनुररण्या. पावकोयथा ॥१७ जनियति स त प्राप्य तारको न भविष्यति । मयाऽभ्युपायः कथितोयर्थप हि भविष्यति ॥१८ शेपं चाप्यस्य विभवं विभजध्वमनन्तरम् । स्तोककाल प्रतीक्षाध्वं निर्विशङ्कन चेतसा ॥१६ इत्युक्तास्त्रिशास्तेन साक्षात्कमलयोनिना । जग्मुस्ते प्रणिपत्येश यथायोग दिवौकसः ।।२० .

सर्वदेव कृत ब्रह्मस्तोत्र ] [२९७ ततो यातेपु देवेषु ब्रह्मा लोकपितामहः । निमां सस्मार भगवांस्तां देवी पूर्वमम्भवाम् ॥२१ ततो भगवती रात्रिरुपतस्थे पितामहम् । तां विविक्त समालोक्य ब्रह्मोवाच विभावरीम् ।।२२ इम महान बली'तारक देय का निहनन करने वाला वह बालक भास्कर के ममान मामा से युक्त होगा । भगवान् प्रभु शर इस समय में भायपरतीक हैं ।।१६।। हिमाचल पो पुगी जिम समय में देवी रा स प्राह परेगी उमी के सकाम में जो पुत्र गमुराम होगा वह ऐने ही होगा जिस तरह से अरणी के द्वारा अग्नि उरामहमा करती है ॥१॥ यह प्रय लोक में समुपन हो जायगा तो फिर यह दानवेन्द्र तारक नहीं बच सरेगामैंने मारको यह मारमा दिया है कि इसी रीति से होगा ॥१८॥ प्राप्त होने के योग्य शेष विमय पाया में विभाग र सेना। आप लोग गय निश्मिदिन वित्त से पोहे गमय Anxilar ॥ १६॥ पुनम्त्य मुनि ने रहाउन मास त् कमरयोनि के द्वारा इस प्रकार में उन समस्त देवगणो मे रहा गया पाता दे फिर मम देवना भगवान सागो प्रणाम रपे यायोग पानी पसे गये थे।॥ २० ॥ मरे उपरान उन देवगणो चले जाने पर पारी के पितामह, प्रहमामी ने नियामा स्मरण रिया पार की पूर्व में होगमुहान ची॥२१॥ म बाद में वह भायी रात्रि HिIRE + ममस में गमुम्पिन पी। उग विभावगे पान में दंगार यात्री में उगमे पदा-1॥२२॥ विभावनिमहायं देवाना समुपम्पितम् । तापतंग खपादेवि शृण फापम्यनित्रयम् ॥२ सारमा नाम दरगन्द्रः गुरमा निजिनः । तम्बाभवाय गायिनि गंधरः ॥२४ मुन ग भविता सम्पमारपम्पागार। सम्पामासानो मना दाता गया॥२५. मादुपियामिलानो। भारतीहिमाल दुधियानोमानिन २६८] [ पग-पुराण विरहेण हरस्तस्या मत्वा शून्यं जगत्त्रयम् । स तस्य हिमशैलस्य कन्दरे सिद्धसेविते ॥२७ प्रतीक्षमाणस्तजन्म किञ्चित्काल निवत्स्यति । तयोः सुतप्तपसार्भवितायोमहान्सुतः ॥२८ भविष्यति स दत्यस्य तारकस्य विनाशकः । जातमात्रा च सा देवी स्वल्पसंज्ञेव भामिनी ॥२६ ब्रह्माजी ने कहा-हे विभावरि ! इस समय में देवतामों का एक बहुत बड़ा कार्य उपस्थित होगया है । हे देवि ! वह कार्य प्रब तुमको करता है । तुम मुझसे उस कार्य का जो भी निश्चय है उसका श्रवण कर लो ॥२३॥ एक तारक नाम. वाला दैत्यों का राजा है । वह सुरों का महान् शत्रु है पौर प्रनिजित हो गया है । उस दैत्येन्द्र के नाश करने के लिये भगवान ईश्वर एक पुत्र समुत्पन्न करेंगे ।। २४ । वह उसका पुत्र होगा जो इस तारकासुर का अन्त करने वाला निश्चय ही होगा । जो प्रजापति दक्ष की पुत्री है वह सती भगवान शंकर की पत्नी हुई थी।॥ २५ ॥ वह सती किमी कारण विशेष के होने पर देवी सपने पिता दश से कुपित हो गई थी वही फिर पर्वतो के राजा हिमवान् की होने वाली पुत्री थी जो लोको को मत्यन्त करुणा से देखने वाली थी ॥ २६ ॥ जब सती ने अपना शरीर त्याग दिया था तो भगवान् शंकर इम त्रैलोक्य को बिल्कुल ही शून्य ममझने लगे थे। उप्त समय में मिद्धो के द्वारा सेवित एक हिमवान् पर्वत की कदरा में वह शिव कुछ समय तक सती के जन्म की प्रतीक्षा करते हुए निवास करेंगे । उन दोनों के भली-भांति किये हुए तप से जो एक महान् प्रभावशाली सुन समुत्पन्न होगा वही शिव-पार्वती का पुत्र इम दैत्येन्द्र तारक का विनाश करने वाला होगा । वह देवी पार्वती उस पुत्र के समुत्पन्न होते ही स्वल्प सज्ञा वाली भामिनी की भांति होगी ।।२७।२८।२६ । विरहोत्कण्ठिता गाढ हरसङ्गमलालसा । तलो सुतमतपमोः संयोगः स्याच्छुभावहः ॥३० ततस्ताभ्यां तु जनित: स्वल्पो वाफलहोभवेत् । ततस्तु संभयो भूयस्तारकस्य च दृश्यते ॥३१ सर्वदेव कृत ब्रह्मस्तोत्र ] [ २६६ तयोः संयुक्तोस्तस्मात्सुरतासक्तिकारणे । विध्न त्वया विधारव्य यथा ताभ्यां तथा शृणु ॥३२ गर्भस्थमेव तन्मातुः स्वेन रूपेण सज्ञया । ततो विहस्य सर्वस्तो विषण्णो नर्मपूर्वकम् ।।३३ भर्स यिष्यति तां देवी ततः सा कुपिता सती। प्रयास्यति तपश्चर्तु ततः सा तपमा युता ॥३४ जनयिप्यति त शर्वादमितद्य तिमण्डलम् । सम्भविष्यति हन्ताऽसौ सुरारीणामसशयम् ॥३५ इधर शिव के विरह से पार्वती भी भगवान् शकर से मिलने के लिये अत्यन्त उत्कष्ठित हो रही थी। पार्वती के हृदय में हर के साथ सगम करने की बहुत अधिक लालपा पो। भली-भांति तप करने वाले उन दोतो का सयोग धहुत ही भषिक शुभावह होगा ॥३०॥ इसके प्रनन्तर उन दोनो का थोडा-सा पाकलह होगया था । इससे तो फिर तारक दैत्य के विनाश में सशय होगया था ॥ ३१ ॥ सुरत क्रीडा की मामक्ति कारण से जद उन दोनो का सयोग हो तो तुमको विघ्न कर देना चाहिए । उनमे जिस प्रकार से हो, उमका धरण करो ॥३२॥ धमकी माता के गर्भस्थ को ही अपने रुप से तज्ञा के द्वारा करे । इसके पश्चान् शिव उसको हमकर नर्म बिलामपूर्वक विषादयुक्त हो गये थे ॥३३॥ वह कुपित होती हुई मी फिर उस देवी को भमना देगी और इसके पश्वन तप से युक्त होती हुई वह तपश्चर्या करने को चनी जायगी ॥ ३४ ॥ अपरिमित थुति के मण्डल वाले उसको शिव से वह जन्म देगी और वह मुरो के शत्रुषों का निस्सन्देह हनन करने वाला समुत्पन्न होगा ॥३५॥ त्वयापि दानवा देवि हातव्या लोकदुर्जयाः । यावत्सुरेश्वरी देहसड कान्नगुणमञ्चश ३६ तत्सङ्गमेन तावत्त्व देत्यान्हन्तु न शक्यसे । एव कृते तपस्तप्त्वा त्वयासर्व करिष्यति ॥३७ समातनियमा देवि यदा चोमा भविष्यति । तदा स्वमेव मारूप शैलजा प्रतिपत्म्यते ॥३

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[ पद्मपुराण
तदा त्वयापि सहिता भवानी सा भविष्यति ।
रूपाशेनतुसयुक्ताउमायास्त्व भविष्यसि ॥३६
एकाऽनशेति लोकस्त्वा वरदे पूजयिष्यति ।
भेदेवहुविधाकार सर्वगाकामसाधिनाम् ॥४०
प्रोकारवक्या गायत्री त्वमिति ब्रह्मवादिभिः ।
आक्रान्तजिताकाराराजभिश्चमहाभुजै. ॥४१
त्वभूरिति विशा माता शूद्रेश्शवेति पूजिता ।
क्षान्तिमुनोनामक्षोभ्यादयानियमिनामपि ॥४२
त्व महोपायसन्देहो नीति यविसर्पिणाम् ।
परिचितिस्वमर्थानात्वमीहाप्राणिहच्छया ॥४३
हे देवि ! लोक में दुर्जय दानव प्रापके द्वारा भी हनन करने के योग्य
हैं । पाप तो सम्पूर्ण मुरो की ईश्वरी हैं । सभी देवो के देहो से गुणों के सत्य
को सक्रान्त करने वाली हैं ।।३६।। केवल उसके सङ्गम मात्र से प्राप दैत्यों का
हनन नहीं कर सकती हैं । ऐसा करने पर तपश्चर्या करके पाप सभी कुछ कर.
देंगी ॥३७॥ हे देवि | सब अपने नियमो को समाप्त कर देने वाली जिस समय
में पाप होगी और उमा हो जायगी उसी समय में वह शैलजा अपने ही रूप
को प्रप्त हो जायगी ।। ३८ ॥ उस समय में मापके भी साथ वह भवानी हो
जायगी प्राप उमा के रूपाश से सयुक्त होकर रहेगी ॥३६॥ हे वरदे ! लोक
तुमको एकाप्रनशा है-ऐसा कहकर पूजित करेगा। अनेक प्रकार के माकार
वाले भेतो में आप सवत्र गमन करने वालो और समस्त कामो का साधन करने
वाली होगी ।। ४० ।। जो ब्रह्मवादी पुरुष हैं उनके द्वारा भाप मोकार के मुख
वाली गायत्री हैं । महान भुवानो वाले आक्र न्त राजाओ के द्वारा आप जित
प्राकार वाली हैं ।। ४१ ।। वैश्यो को आप भू-म
-माता हैं और शूद्रो के द्वारा
शंना इस नाम से प्राप पूजित होगी । मुनिया को आप शान्ति स्वरूप वाली हैं
मौर नियमो को धारण करने वालो को प्रक्षास्य दया के स्वरूप से युक्त हैं
॥४२॥ आप महान् उपाय का सन्देह हैं और नयविषियों को प्राप नीति है ।
प्रयों की साप परिचित है और प्राणियो के हृदय में शयन करने वाली ईहा
है ॥४॥

सर्वदेव कृत ब्रह्मस्तोत्र ] त्वं मुक्तिस्सर्वभूतानां त्वं गति: मर्वदेहिनाम् । रतिस्त्व रतचित्तानां प्रीतिस्त्व हृदि देहिनाम् ।।४४ त्वं कीर्ति. मत्यभूताना त्व शान्तिदुष्टकर्मणाम् । त्व भ्रान्ति सर्वभूताना त्व गति. प्रतुयाजिनाम् ।।४५ जलधीना महावेला त्वच लीला विलासिनी । प्रियकण्ठग्रहानन्ददायिनी त्व विभावरी ॥४६ इत्येनेकविधदेवी रूपोकत्वचिता। ये त्वा स्तोष्यन्ति वरदे पूजयिष्यन्ति चापि ये। ते सर्वकामानाप्स्यन्ति नियता नात्र संशय. ।।४७ इत्युक्ता तु निशादेवी तथेत्युक्त्वा कृताञ्जलि । जगाम त्वरिता तूर्ण गृह हिमगिरेमहत् ।।४८ तमासीना महाहयरत्नभित्तिममाश्रयाम् । ददर्श मेनामापाण्डुच्छविवकनसरोरुहाम् ॥४६ हे देवि ! आप समस्त प्राणियों की मुक्ति हैं और सय देहयारियो की पाप गति हैं । जिनका चित्त रत होता है उनकी रति माप ही का स्वरूप है। देहधारियो के हृदय में जो प्रीति होती है वह भी प्रापका स्वरूप ही है ॥४४॥ सत्य का समाथय ग्रहण करने वाले प्राणियो की प्रार कात्ति हैं और दुष्ट चम करने वालो की शान्ति हैं। समस्त भूतो की माप भ्रान्ति हैं तथा जो क्रतुपो के द्वारा यजन वाले पुस्प हैं उनको आप गति हैं ।। ४५ ।। जलधियो की आप महावेला हैं । माप दिलास करने वाली लीला के स्वरूप वाली हैं। अपने प्रिय तम के कण्ड को ग्रहण करने में अति प्रानन्द को प्रदान करने वाली आप विभावरी के स्वरूप वाली है ॥ ४६॥ इस प्रकार से अनेक मति के रूपो मे देवी पाप लोक मे समचित होती हैं। हे वरदान प्रदान करने वालो ! जो मनुष्य का स्तवन करेने और जो पुस्य मापकी एका करेगे दे मापूर्ण मानी कामनामो को प्राप्त कर लेंगे. यह सर्वया नियत है इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है 11४७]] पुलस्त्य महपि ने कहा-इन प्रकार से कही गयी निशा देवो ने 'तथास्तु'--ऐमा ही होगा-यह कहकर वह शीघ्र हो हिमवान का जो १०२ ] । पप्र-पुराण गृह पा यहा पर वगयुक्त होनी हा हाथ जोडकर चली गई यो ॥४८114 पर उमने महान हम्मं ( भवन ) मे येठो हुई और ररनो द्वारा निर्मित भीनमा माय ग्रहण करने वाली तथा योहो पाण्डु वगं को वि से सयुम मुसकमम पाली हिमवान् रोनराजोपानी मेना गो देवा पा ॥४॥ किंचिदाकुलता प्राप्ते मेनानेवाम्बुनद्वये । प्राविवेश मुमे रागिसुपमद्धतम गमा॥१० उन्मादाय जगन्मातु. क्रमेण जठरान्तरे। प्राविवेशातुलं जन्म मन्यमाना कदा तु वै ।।५१ अरजयद्गृह देव्या गुहारण्ये विभावरी। ततो जगत्यानिर्वाण हेतुहिमगिरिप्रिया ॥५२ . ब्राह्म मुहूर्ते सुभगे प्रासूयत गुहारणिम् । तस्या तु जायमानाया जन्तवः स्थाणुजङ्गमाः ॥५३ अभवन्सुखिनः सर्वे सर्वलोकनिवासिनः । नारकाणामपि तदा सुखं स्वर्गसमं महत् ॥५४ तस्मिन्महोत्सवे प्राप्त दिव्याः प्रसृतपाणयः । मागरास्सरितश्चैव समाजग्मुश्च सर्वशः ॥५५ हिमशैलोऽभवल्लोके तदा सर्वेश्वराचरः । ससेव्यश्चाधिगम्यश्व साधयश्चाचलोत्तमः ॥५६ अनुभूयोत्सवं देवा जग्मु स्वानिलयास्तदा । देवनागेन्द्रगन्धर्व शैल लीलावती गणं ॥५७ हिमशैलसुतादेवी वहम्पूर्विकयातत.। क्रमेणबुद्धिमानीता विद्याञ्चानलसर्बुधैः ॥५८ मेना के दोनो नेत्र कमलो को कुछ माकुलता प्राप्त होने पर पद्भुत सक्षम वाली राषि ने सुखपूर्वक उसके मुख मे प्रवेश प्राप्त कर लिया या ५०॥ क्रम से जठर के अन्दर बगम्माता के उन्माद के लिये किस समय मैं यह भतुल जम्म होगा-ऐसा मानती हुई प्रवेश किया था ॥५१॥ देवी के गुहारण्य में विभा. वरी ने गृह रजित कर दिया था। इसके अनन्तर जगत् में आनिर्वाण हेतु सर्वदेव कृत ब्रह्मस्तोत्र ] हिमवान गिरि की प्रिया ने परम सुभग ब्रह्म मुहूर्त में गुहारणि का प्रसव किया था। उसके जन्म ग्रहण कर लेन पर चर-अचर समस्त जन्तुगण और सब लोको के निवास करने वाले परम सुखी हुए थे। उस समय मे नरको म भी, जहाँ पर सर्वदा प्रति तीव्र यातनाएं रहा करती है, स्वग के ही तुल्य महान् सुख समुत्पन्न होगया या ॥५२॥५३॥५४॥ उस समय में देवी के जन्म पर होने वाले महोत्सव मे सभी पोर से परम दिव्य अपने हाथो को फैलाये हुए सागर पोर सरिताएं वहाँ पर आये थे।॥ ५५ ॥ उस समय में हिमवान् शैललोर में समस्त चरो पौर प्रचरो के द्वारा भली भांति सवन करने के योग्य--अधि. गमन करने की योग्यता वाला-आश्रय से सम्पन्न और सब पवंती में प्रत्युत्तम होगया था ॥५६॥ देवगरण ने भी वहां पर उपस्थित होकर उस महोत्सव के मानन्द का अनुभव किया था पोर इसके पश्चात् वे अपने अपने निलय स्थानो को लौटकर चले गये थे। देवगन्धर्व-नागेन्द्र और शेल लीलावती के गणो के द्वारा वह हिमवान् पवंतगज की पुत्री देवी का अहम्पूविका के साथ क्रम से ध्यान किया गया या मोर आलस्य रहित होकर बुधजनो ने भी उस विद्या को अपनी चुद मे ग्रहण किया था ॥५७१५८|| कमेण रूपसौभाग्यप्रबोधभुवनत्रये । सम्पूर्णलक्षणा जाता हिमालयमता तथा ॥५६ एतस्मिन्नन्तरे शको नारद देवसमतम् । देवपिमथ सस्मार कार्यसाधनतत्पर ॥६० स तु शक्रस्य विज्ञाय काइ क्षित भगवास्तदा । अाजगाम मुदा युक्तो महेन्द्रस्य निवेशनम् ॥६१ त तु दृष्ट्वा सहस्राक्ष समुत्थाय महासनात् । यथाhण तु पाद्य न पूजयामास वासवः ॥६२ शकपरिणहिता पूजा प्रतिगृह्य यथाविधि । नारद कुशल देवमपृच्छत्साशासनम् ।। पृष्टं च कुशले शक प्रोवाच वचन प्रभु ।।६३ कम से रूप-लावएम प्रौर सौभाग्य तथा प्रयोष के द्वारा तीनो भुक्नो [ पप-पुराण वह हिमवान् शलराज को पुत्रो सम्पूर्ण सुलक्षणों वाली समुतन हुई थी ॥५६।। इसी बीच में देवगज इन्द्र ने देवों के वन्दित देवपि भगवान नारदजी का कार्य साधन में तत्पर होते हुए स्मरण किया था ॥६०॥ उन देवपि ने भी उस समय मे इन्द्रदेव को इच्छा वो समझकर बडे ही मानन्द के साथ महेन्द्र के घर पर समागमन किया था ॥ ६१ ॥ समारत भगवान् श्री नारदजी को देखकर देवराज अपने मिहामन से उठकर उन के स्वागत करने के लिये खडे हो गये थे और फिर इन्द्रदेव ने यथोचित अध्यं पाद्य प्रादि के द्वारा उनका पूजन किया था ।। ६२ ॥ देवराज के द्वारा की हुई प्रचना को यथाविधि अङ्गीकार करके नारदजी ने पाकशासन इन्द्रदेव से सर्व प्रथम उनका क्षेम-कुशल पूछा था । जब कुशल प्रश्न समाप्त हो गया तो इन्द्रदेव ने नारदजी से यह वचन कहे धे ॥६॥ कुशलस्याङ्कुरस्तावत्संवृत्तो भुवनत्रये । तत्फलोद्भवसम्पत्ती त्वं मया विदितो मुने ।।६४ वेत्स्येव तत्समस्त त्व तथापि परिचोदितः । निवृति परमा याति निवेद्यार्थ सुहृजने ॥६५ तद्यथा शैलजा देवी योगं यायापिनाकिना। शीघ्रतोद्यम: सरस्मत्पाविधीयताम् ॥६६ अवगम्यार्थमखिलं तत आमन्त्र्य नारद:। शीघ्रजगाम भगवान्हिमशैलनिकेतनम् ॥६७ तत्र द्वारे स विप्रेन्द्रश्चिबवेबलताकुले । वन्दितो हिमशैलेन निर्गतेन पुरो मुनिः ॥६८ स ह प्रविश्य भवन भुवो भूपणता गतम् । निवेदिते स्वय हैमे हिमशैलेन विस्तृते ॥६९ महासने मुनिवरो निषसादातुला तिः । यथार्हमध्ये पाद्य च शैलस्तस्मै न्यवेदयत् ।।७० इन्द्रदेव ने कहा-इस समय में तोन भुवनों में कुशल होने का अंकुर सो समुत्पन्न हो गया है । है मुने ! उस प्रकुर से जो फल होगा उसकी उत्पत्ति

मव देव कृत ब्रह्मस्तोत्र ]
सम्पत्ति में मैंने भापको ही ममझा है ।। ६४॥ धमे तो प्राप सभी कुछ भली.
भांति जानते ही है तो भी मैं प्रापको प्रेरित करन की धृष्टता करता है। ऐसा
नियम है कि अपने सुहृतजनो से प्रयोजन का निवेदन कर देने पर निवृत्ति की
प्राप्ति हो जाया करती है ॥ ६५ ।। वह यह है कि हिमवान की पुत्री देवी भग.
वान् शिव के साथ योग की प्रति करे ऐसा ही हमारे पक्ष बाले मब को अत्यन्त
शीघ्र ही उद्यम करना चाहिए ।। ६६ ।। पूलरत्य महामुनि ने कहा--देवपि
नारद जी ने सम्पूर्ण प्रथं को जानकर और इन्द्रदेव के इस माम ना को स्वी-
कार करके वह फिर तुरन्त ही हिमय न शैलराज के घर पर चले गय थे ।।६७।।
चित्र क्षेत्रलता से घिरे हुए वहाँ द्वार पर विप्रेन्द्र नारदजो की इन्दना की गई
थो मौर शैलराज हिमवान स्वय मुनि का स्वागत करने के लिये निकल कर
बाहिर भा गये थे ॥६८।। इसके अनन्नर देवर्षि नारदको ने इस भूमि के भूपए
स्थरूप हिमवान् के घर में प्रवेश किया था । हिमवान् अपराग के द्वारा निवे.
दित किये हुए परम विशाल हिम व आसन पर अनुपम कानि वाले मुनवर
सस्थित होगय थे। फिर दर्शनराजन योचित विधान के महिन प्रध्य-पद्य
मुनिवर को समर्पित किया था ॥६६७०।।
मुनि. स प्रतिजग्राह तमय विधिवत्तदा ।
गृहीताम्मुनिश्रेष्ठमपृच्छच्छ्लक्ष्णया गिरा ७१
कुशल तपम. शैल शन फुल्लाननाम्बुज ।
मुनिरप्याद्विराजानमपृच्छत्कुशल तदा ॥७२
ग्रहो धर्मोचितस्तेऽस्ति सनिवेशो महागिरे।
पृथुत्व मनमा तुल्य कन्दरागा तवानघ १७३
गुरुत्व ते गुणोधाना स्थावरादतिरिच्यते ।
प्रसन्नता च तोयस्य मुनिभ्यश्चाधिका तय ।।७४
न लक्षयाम शैलेन्द्र कुप्रविनयता स्थिता ।
नानातपोभिमुनिभिज्वलनासमप्रभ ।।७५
इत्युक्तवति देवपों नारदे सादर गिरा।
हिमशेलम्य महिपी गेना मुनिदिदृशया ॥७६

३०६ ] [ पद्म-पुराण अनुयाता दुहित्रा तु स्वल्पालिपरिचारिका । लज्जा प्रणयनम्राङ्गी प्रविवेश निकेतनम् ॥७७ उस समय में मुनिवर ने विधिपूर्वक उस निवेदित प्रध्यं को मङ्गीकार किया था। जब मुनिवर अध्यं ग्रहण कर लिया तो शनराज ने अपना मुख कमन्न विकसित करते हुए अति श्लक्ष्या वाणी के द्वारा घोरे-धोरे तपश्चर्या का क्षेम कुशल मुनिवर से पूछा था । मुनिवर ने भी इसी भांति अदिगज से कुशल-क्षेम पूछा था ।। ७१ ।। श्री नारदजी ने कहा-हे महान् गिरिराज ! पापका यह सग्निवेश धर्म के उचित ही है । हे अनघ ! मापके मनकी विशालता कन्दराओ के ही समान है ॥ ७२ ।। प्रापका गौरव जो मारके गुणों के समूह का है वह स्थावर मे भी प्रत्यधिक है । आपके जल को प्रसन्नता मुनियों के प्रसाद से भी ज्यादा है ।।७३।७४।। हे शैलेन्द्र ! अनेक भांति के तप करने वाले मुनियों से जो कि आज्वल्यमान सूर्य के ममान प्रभाव वाले हैं पविनयता कहां पर स्थित है-यह हम नहीं देख पा रहे हैं ।। ७५ ।। पुलम्त्य मुनि ने कहा-आदर के सहित वाणी के द्वारा नारद मुनि ने जब ऐसा कहा तो इस पर हिमवान् पर्वत राज की महिपी मेना ने मुनिवर के दर्शन करने की इच्छा से उम निवेतन मे प्रवेश किया था जिसके साथ मे उमको दुहिता भी थी और वह थोडी बहुत रुहेली एवम् परिचारिकामों से समन्वित थी तथा लज्जा एवम् प्रणय से विनम्र अङ्गो वाली थी ॥६७ ७७॥ यत्रस्थितो मुनिवर: शैलेन सहितो वशी। त दृष्ट्वा तेजसो राशि मुनि शैलप्रिया तदा ७८ ववन्दे गूढवदना पाणिपद्मकृताञ्जलिः। तां विलोक्य महाभागां देवपिरमिता तिः ॥७९ आशीभिरमृतोद्गाररूपाभिस्तां व्यवद्ध यत् । ततो विस्मितचित्ता तु हिमवगिरिपुत्रिका ।। शरीरलक्षणानां च परिज्ञानाय कौतुकात् । खोस्वभावात्स्वदुहितुचिन्तां हृदि समुद्वहन् ।।८१ ज्ञात्वा तदिङ्गितं शैलो महिप्या हृदयेन तु । अनुदोर्णाकृतिर्मने रम्यमेतदुपस्थितम् ।।८२ मदेव कृत ब्रह्मस्तोत्र ] [ ३०७ चोदितः शैलमहिपीसख्या मुनिवरस्ततः । स्मिताननो महाभागो वाक्य प्रोवाचनारदः ।।८३ न जातोऽव्याः पतिर्भ लक्षणश्च विवजितः। उत्तानहस्ता सतत चरगव्य॑भिवारिभिः ।।८४ सुच्छायास्या भविष्येयं किमन्यद्वहुभाष्यते ॥८५ श्रु त्वंतत्सम्भ्रमाविष्टो ध्वस्तधेर्यो हिमाचलः । नारद प्रत्युवाचाथ साथ कण्ठो महागिरिः ॥८६ जिग स्थान पर शैलराज के साथ वशी मुनिवर नारदको सस्पित थे वहाँ पर उन तेज की राशि महामुनि को उस समय में शैलप्रिय मेना ने देखा था और गूढ वदन वाली वसने अपने कर कमलों की अजलि बांधकर उनको प्रणाम किया था । उस महान भाग वाली मेना को देख कर ममित घति वाले देवपि ने अमृतोद्गार स्वरूप वाले प्राशीर्वाद से उनका विशेष वर्धन किया था । तब हिमवान् गिरि की पुत्री का चित्त अत्यन्त ही विम्मययुक्त होगया था ॥७॥७६ ८०॥ उस देवी ने अद्भुत स्वरूप से समन्वित नाद मनि का दर्शन किया था और ऋपियर ने भी अपनी स्नेह सयुन मधुर वाणी से उस देवी से कहा था कि हे वत्स ! यहाँ प्रामो ॥ ८१॥ स्त्री स्वभात्र वश अपनी पुत्री के शरीर के लक्षणों का कौतुक से परिज्ञान प्राप्त करने म लिये मेरा के हृदय में चिन्ता हो रही थी ।। ८२ ॥ शलराज ने भी अपनी महिपो के हृदय की बात को इङ्गित मे जान लिया था क्योकि उम समय मैना अनुदीगं कृति वाली हो रही थी। यह बहुत ही सुन्दर र मय उपस्थित हो गया था |८|| इसके पश्चात् शंलराज की महिपो को सखो के द्वारा तब मुनिवर को प्रेरित किया गया था । महाभाग नारदमुनि मुख पर मुस्कर हट करने हुए बोले-1८४॥ नारदजी ने कहा-हे भने । हम पुत्री का पनि तो उत्पन ही नही हुमा है और लक्षणो से वह विवजित है । व्यभिचारी चरणो से यह उत्तान इस्तो वाली है । इमकी यह सुन्छाया होने वाली है। इससे अधिक मोर या कहा जावे ॥२५॥ यह सुनकर हिमाचल सम्भ्रम से समावि हो गया था और उसका धंय छूट गया था। म ममम अपात करते हुए गद्गद व एठ वाले हिमवान् ने नारदजी से पहा था1८६॥

३०८ ]
[ पद्म-पुराण
तत्रापि श्रेयमी ह्याशा मुने न प्रतिभाति नः ।
शरीरलक्षणाश्चान्ये पृथक्फलनिवेदिनः ।।८७
इत्युक्त्वाविरतेशैले महादुःखविचारिणि ।
स्मितपूर्वमुवाचेद नारदो देवपूजितः ।।
हर्षस्थाने च महति त्वया दुःख निम्च्यते ।
अपरिच्छिन्नवावयार्थों मोहयासि महागिरे ।।८६
इमां शृणु गिर मत्तो रहस्यपरिनिष्ठिताम् ।
समाहितो महाशलमयोक्तस्य विचारणाम् ।।६०
न जातोऽस्याः पतिर्देव्या यन्मयोक्त हिमाचल ।
सनजातोमहादेवो भूतभव्यभवोद्भवः ॥६१
शरण्यः शास्वतः शास्ता शङ्करः परमे बरः ।
ब्रह्मरुद्र न्द्रमुनयो गर्भजन्मजरादिताः ॥१२
शनराज ने कहा-हे मुने ! इसमे भी हमको कोई अच्छी कल्याण
कारिणी प्राशा नहीं प्रतीत होती है क्योकि अन्य को लक्षण हैं वे तो पृथक
फल बताने वाले ही होते हैं ।। ८७ ।। पुलस्त्य मुनि ने कहा-इतना कहकर
शैलराज के विरत हो जाने पर तथा महान् दुःख का विचार करने पर उम
समय में देवो से पूजित नारद मुनि मुस्कराते हुए बोले-८८|| श्री महामुनि
नारदजी ने कहा-इम प्रति महान हपं के स्थान मे माप इतने दुःख पूर्ण होकर
यह क्या कह रहे हैं ? हे महागिरे। मेरे इस वाक्य का अर्थ तो अपरिच्छिन्न
है। आप तो इससे इम समय में मोह को प्राप्त हो रहे हैं ॥ ८ ॥ रहस्य से
परिनिष्ठित मेरी वाणी को मुझसे भाप श्रवण करे । हे महाशल! मैंने को
कुछ भी कहा है उसका विचार करने में समाहित होइये ॥६०॥ हे हिमाचल !
मैंने यही तो कहा था कि इसका पति उत्पन्न नहीं है सो इसका प्रथं ठीक ही
है । क्योकि भूत भव्य भव का उद्भव जिससे होता है वह महादेव कभी उत्पन्न
नही हुए हैं ।।६१॥ परमेश्वर भगवान् शकर तो सबके शरण अर्थात् रक्षक हैं-
मदा-सर्वदा रहने वाले हैं-मव पर शासन करने वाले हैं । बाकी अन्य ब्रह्मा-
रद्ध--इन्द्र और समस्त मुनिगरा गर्भ, जन्म एवम् जरा से प्रदित होने वाले होते
हैं ।। ६२॥

सर्व देव कृन ब्रह्मस्तोत्र ] तस्य ते परमेशस्य सर्वे क्रीडनका गिरे। ब्रह्माण्डतस्तदिच्छातः सम्भूतो भुवनप्रभुः ।।६३ विष्णुयुगे युगे जातो नानाजातिमहातनु । मन्यसे मायया जात विष्णुचापि युगेयुगे ॥६४ प्रात्मनो नविनाशोऽस्ति स्थावरान्तऽपिभूधर । ससारे जायमानस्य नियमारणस्यदेहिन. ९५ नश्यते देह एवात्र नात्मनो नाश उच्यते । ब्रह्मादिस्थावरान्तोऽयं ससारो यः प्रकीर्तितः ।।६६ स जन्ममृत्युदु सार्हो ह्यनिश परिवर्तते । महादेवोऽवल: स्थाणु नंजातो जनकोऽजर: ।।६७ भविष्यति पतिः सोऽस्या जगन्नाथोनिरामयः । यदुक्त च मया देवी लक्षणे जितातव 180 हे गिरिवर ! उस परमेश के तो वे सब खिलोने ही हैं । उमी की इच्छा से भुवनों का प्रभु ब्रह्मा पएड मे समुत्पन्न हुआ था ६३॥ विष्णु तो युग-युग मे नाला जाति वाला और महार तनु याला उत्पन्न हुपा ही है और युग-युग में माया के द्वारा समुत्रन हुए विष्णु को आप भी मानते हैं । हे भूधर ! स्थानरान्त मे भी इस मारमा का तो विनाम होता ही नहीं है । जो इस संसार में जन्म ग्रहण किया करता है और मरता है उम देही का भी प्रात्मा तो नित्य हो होता है ।।१४६५।। यहाँ पर देह का हो नारा होता है। मात्मा का नाश तो कभी कहा ही नहीं जाता है जो यह ब्रह्मा से आदि लेकर स्थावर के अन्त पर्यन्त है वह सब ससार कहा गया है ॥६६॥ यह मारमा जन्म. म-मृत्यु दुःख से अत्यन्त प्रारी होता हुमा निरनर परिवर्तन को प्राप्त होता रहता है । महा- देव तो अचल स्थाणु हैं । वह कभी उत्पन्न नहीं हुए हैं मोर न यह जनक हैं तथा वे जरा से रहित हैं ।।९७वही महादेव इम पुत्री के पति होगे जो इम सम्पूर्ण जगत् के नाप हैं और मामय से रहित हैं अर्थात् मयंदा स्वस्य है । मैंने जो कहा है वह पापको देवी लक्षणी से वजिता है ॥६॥ एपा भार्या जगद्भर्तुपाकस्प महीधर । जननी सर्वलोकस्य सम्भूता भूतभाविनी IIRE ३१० ॥ [ पद्म पुराण शिरेय पावनायव त्वत्ोत्रे पावन तिः । तद्यया शीघ्रमेवैपा योगं ययात्पिनाकिन. ॥१०० तयाविधेय विधिवत्वया शलेन्द्रसत्तम । अस्त्या हि महत्कार्य देवाना हिमभूधर ॥१०१ एव थत्वा तु शैलेन्द्रो नारदात्सर्वमेव हि । स्वमात्मान पुनर्जात मेने मेनापतिस्तदा । उवाच चापि सहृष्टो नारद तु हिमाचलः ।।१०२ दुम्तरानरकाद्धोरादुद्धृतोऽस्मित्वया विभो । पातालदहमुद्धृत्य सप्तलोकाधिप कृत. ॥१०३ हिमाचलोऽस्मि विख्यातस्त्वया मुनिवराधुना । हिमाचलाच्छतगुणा प्रापितोऽस्मि समुन्नतिम् ॥१०४ है महीधर । यह प्रापको पुत्री तो इस सम्पूर्ण जगत् के स्वामी भगवान् वृषाङ्क को भार्या होगी और यह समस्त लोको को जननी प्राणियों पर पूर्ण कृपा करने वाली समुत्पन्न हुई है ॥ पावन द्युति वानी यह शिवा आपके क्षेत्र में सबको परम पावन करने के लिये ही आई है। सो अब प्रत्यन्त शीघ्र ही यह भगवान् पिनाक घारी शिव के साथ योग प्राप्त करेगी ॥१०॥ हे शैलेंद्रो में परम श्रेष्ठ । हे हिमघर । यह आपको प्रात्मजा इस प्रकार की ही उत्पन्न हुई है । सो आप विधि-विधान के साथ इम योग को सम्पन्न करें । इममें तो देवगण का बहुत ही महान कार्य होगा ।।१०१॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-इस तरह से देवर्षि श्री नारदजी से शलराज हिमवान् ने सम्पूर्ण वृत्तान्त श्रवण करके मेना के पति ने अपने आपको पुन इस संसार में उत्पन्न हुमा माना था । मोर फिर परम प्रसन्नता से युक्त होकर हिमाचल ने श्री नारद मुनि से कहा- ॥१०२॥ हिमाचल बोले-है विभो ! इस समय मे मापने तो मुझे बहुत ही दुस्तर घोर नरक से उद्धार कर बचा लिया है और पाताल के दह से उद्धृत करके सानों लोको का स्वामी बना दिया है । ११०३३॥ हे मुनिवर । इस समय में प्रापके ही प्रसाद से मैं लोक मे हिमाचल है-ऐसा प्रसिद्ध हो गया हूं। मैं हिमाचत्र से सौ गुनी समुन्नति को प्राप्त हो गया हूं ॥१०४।।

सर्वदेव कृत प्रहास्तोत्र ]
इत्युक्तवति शैलेन्द्र स तदा हर्ष निर्भरः ।
उवाच नारदो वाक्य कृत सर्वमिति प्रभो ॥१०५
सुरकार्य स एवार्थस्तवापि सुमहत्तर ।
इत्युक्त्वा नारद. शीघ्र जगाम निदिव ततः ॥१०६
त गत्वा देवभवन महेन्द्र सन्ददर्श ह ।
ततोऽनुरूपे स मुनिरुपविष्टो महामने ॥१०७
पृष्ट. शक्रण प्रोवाच गिरिजासश्रया कथाम् ॥१०६
यन्मह्यमुक्त कर्तव्य तन्मया कृतमेव हि ।
कि तु पञ्चशरस्येपु गोचरत्वमपेक्षितम् ।।१०६
इत्युक्तो देवराजस्तु मुनिना कार्यदशिना ।
चूताड कुरास्त्र सस्मार भगवान्पाकशासन ॥११०
सस्मृतस्तु तदा क्षिप्रं सहस्राक्षेण धीमता ।
उपतस्थे रलियुत्त स विलामो झषध्वजः ।
प्रादुर्भूत च त दृष्ट्वा शन प्रोवाच मन्मयम् ॥१११
उपदेशेन बहुना कि त्वा प्रति रतिप्रिय ।
मनोभवोऽसितेन त्व वेत्ति भूतमनोगतम् ॥११२
तद्ययानुक्रम तु त्व कुरु नाकसदा प्रियम् ।
शङ्कर योजय क्षिप्र गिरिपुत्र्या मनोभव ॥११३
सयुक्तो मधुनानेन गच्छ रत्या सहायवान् ।
इत्युक्तो मदनस्तेन शक्रेण स्वार्थसिद्धये ।।
प्रोवाच पञ्चवारणोऽथ वाक्य भीतः शतकतुम् ।।११४
पुलस्त्य महामुनि ने कहा- इतना इस रीति से शैलेन्द्र के कहने पर
वह देवपि हप से पूर्ण हो गये थे और फिर नारदजी ने यह वाक्य कहा था कि
हे प्रभो ! मैंने तो सभी कुछ कर दिया है ॥१०॥ देवों के कार्य में बहुत बड़ा
प्रापका प्रपोजन भी होगा-~-इतना कहकर नारद ऋपि शीघ्र ही वहां से त्रिदिव
को चले गये ये ॥१०६॥ फिर नारदजी ने देवो के भग्न मे महेन्द्र को देखा
था पौर फिर वहाँ पर अपने स्वरूप के अनुरूप प्रामन पर वह मुनि सस्थित

३१२ ] [ १ पुगण हो गये थे । इन्द्रदेव के द्वारा पूछने पर नारद मुनि ने गिरिजा में सा रमने वालो सम्पूर्ण कथा वह सुनाई यो । नारद मुनि ने कहा-जो अापने मुझसे कहा पा कि यह मुझे करना है व मन मभी कुछ पूर्ण कर दिया है किन्तु अब पनि शगे वाले कामदेव के बागों के लक्ष्य होने का कार्य प्रावश्यक है ।।१७० ॥१०८।। पुलस्त्य ने कहा-कार्यदर्शी मुनि नारद के द्वारा इम रोति से कहे गये इन्द्रदेव ने उमी समय में प्रामाङ्घार के अस्त्र वाले कामदेव का स्मरण किया था । १०६।। महेन्द्र के द्वारा याद करते हो उमो समय में शीघ्र प्रपती पत्तो रति के महित, विनामयुक्त, मीन की धना धारण करने वाला मन्मथ वहाँ पर उपस्थित हो गया था और प्रादुर्भाव करने वाले उम अनङ्ग देव को देवकर इन्द्रदेव ने उसमे कहा-॥११०॥ महेन्द्र बोले-हे रति-प्रिय ! प्राप तो स्वय हो बहुत निपुण हैं प्रतएन आपको अत्यधिक उपदेश देने को तो कोई पावश्यकता ही नहीं है । माप तो ममोभव मर्थात् मन में ही जन्म लेने वाने हैं इसलिये आप स्वयं प्राणियो के मन मे ममुत्रम हुई बात को स्वयं ही भली- भाति से जानते है ।।१११॥ इस समय में पाप कुछ उस प्रकार का अनुक्रम कीजिये जो स्वर्गवामी देवगए का परम प्रिय हो । हे मनोभव ! माप भगवान् शहर को शीघ्र ही हिमवान् की पुत्री के माय योजित कर दो।।११२।। इम बमन्त ऋतुराज के माथ सयुक्त होकर रति को सहायता वाले अाप शीघ्र ही वहाँ चले जाओ। इस तरह से इन्द्र के द्वारा मदन को प्रेरित किया गया था जो कि अपने स्वयं की सिद्धि के लिये ही यह प्रेरणा दी थी। उसे सुनार कामदेव भत्यात भयभीत होता हुमा इन्द्र से कहने लगा या ॥११३।११४॥ अनया देवसामग्रया मुनिदानवभीमया । दुःसाध्यशङ्करो देवः किं न वेरिस जगत्प्रभो ॥११५ तस्य देवस्य वेत्थ त्वं कारणं पदमव्ययम् । प्रायःप्रसादे कोपेऽपि सर्व हि महतांमहत् ।।११६ सर्वोपभोगसारं हि सौन्दर्य स्वर्गसम्भवम् । विशेपं काक्षता शक्र सामान्याद्मशनंफलात । श्रुत्वतद्वचनं शक्रस्तमुवाचामरयुतः ॥११७ मदेव कृत बा-तोत्र ] वयं प्रमाणे ते तत्र रतिकान्त न संशयः । सन्दंशेन विना शक्तिरयरकादस्य नेष्यते ॥ कस्यचिच्च क्वचिदृष्ट सामर्थ्य न तु सर्वतः ।।११८ इत्युक्तः प्रययौ कामः सखायं मधुमाश्रितः । रतियुक्तो जगामाशु प्रस्थं तुहिनभूभृतः ।।११६ स तु प्राप्याकरोचिन्ता कार्यस्योपायपूर्विकाम् । महात्मानो हि निष्कम्पा मनस्तेपा सुदुर्जयम् ॥१२० तदादावेच संक्षोभ्य नेत्थं तम्य जयोभवेत् । संसिद्धि प्रायशरचव पूर्व संशोध्य मानसम् ।। १२१ कामदेव ने कहा-हे जगत्प्रभो । इन मुनि और दानवों के लिये ही परम भीषण देव सामग्री से भगवान शङ्कर देव बहुत ही दु:पाध्य हैं अर्थात् इम माधन-सामग्री में शङ्कर के मन में विकार उत्पन्न कर देना बहुत ही कठिन काम है । यह तो साधारण मुनि और दानवो को ही कादू में ले पाने वाली मामग्री है। क्या आप इसे नहीं जानते हैं ? ॥ ११५ ।। उम परम देव का कारण और भव्यय पद भी पाप अच्छी तरह मे जनते ही हैं,बहुधा महान पुरुषों के प्रसाद और कोप में भी मब महान ही परिणाम हुमा करते हैं ।।११६॥ समस्त उपभोगों का मार स्वर्ग में सम्भव होने वाले मोश्यं को विशेष रूप से चाहने वालो का मामान्य फन मे भ्रश हो जाता है। इस कामदेव के द्वारा माहे दए वचन को सुनकर देवो मे सयुक्त इन्द्र ने कहा-॥११७१ दशक बोना-- हे रतिकान्त | वहां पर तेरे लिये हम प्रमाण स्वरूप हैं । सन्देश के बिना अयस्क से इसकी शक्ति इष्ट नहीं होती है । किमी को मामध्यं कही पर हो देखी जाती है ॥११॥ पुनस्त्य ने कहा-~इम प्रकार से सम्प्रेरित हुआ कामदेव प्राने मित्र मधु का प्राधय ग्रहणकर रनि के महित हिमाचल के प्रम्य पर तुरन्त ही वहां से चला गया था ॥११६॥ यह कामदेव वहां पर पहुँच हो गया पा किन्तु उसने कार्य का उपाय पूर्व वाली चिन्ता मन मे को धो क्योकि महादेव को में विकार उत्पन्न कर देना कोई आसान कार्य नहीं था। उसने मन में सोचा था कि महान प्रात्मा वाले यह पुरुप तो निकम्प होते हैं। मोर - ३१४ ] [ पद्म पुराण उनका मन भी मासानी से जीत लेने के योग्य नही हमा करता है प्रत्युत उसका जोत सेना अत्यन्त ही वठिन काम है ।।१२०॥ मो प्रारम्भ मे ही संक्षोभ किया जाये तो इस प्रकार में उनके मन पर जय प्राप्त करना कदापि सम्भव नही होगा। प्राय: पहिले मानस का संशोधन करके हो ससिद्धि हुप्रा करती है ॥१२॥ स तस्य हृदये शुद्ध नाम शाली महाशर । पपात परुप. प्राशुः पुष्पवाणो विमोहनः ।।१२२. ' तत: करणसन्दोहे विद्धे तु हृदये भवः । बभूव भूतपोऽकम्प्य धैर्योऽपि मदनोन्मुसः ॥१२३ तत. प्रभुत्वाद्भावानामावेशं स्वमपश्यत । वाक्य बहु बभापेऽथ प्रत्यूहप्रसवात्मकम् ।।१२४ ततः कोपानलोदभूतघोरहुङ्कारभीपणे । बभूव वदने नेत्र तृतीयमनलाकुलम् ।।१२५ रुद्रस्य रौद्रवपुपो जगत्सहारभैरवम् । तदन्तिकस्थे मदने व्यस्फारयत धूर्जटिः ॥१२६ तन्नेत्र विस्फुलिङ्गन कोगता नाकवासिनाम् । गमितोभस्मता तूर्ण कन्दर्पः कामदर्पकः ।।१२७ स तु त भस्मसात्कृत्वा हरनेत्रोद्भवोऽनलः । व्यजृम्भत जगद्दग्धुज्ञात्वा हुकारघस्मरम् ।।१२८ उस कामदेव ने उसके हृदय के शुद्ध हो जाने पर पाली नाम वाला एक महान् शर फेका था जो कि शर मत्यन्त ही कठोर--प्रांशु और विशेष रूप से मोहन करने वाला पुष्प वारण था ॥१२२१६ करए सन्दोह हृदय के विद्ध हो जाने पर भूतो के पति भगवान् भव प्रकम्प, धैर्यशाली और मदन की ओर उन्मुख हो गये थे ।। १२३ ।। इसके अनन्तर प्रभुत्व होने के कारण से उन्होंने अपने मावेश को देखा पा 1 इसके पश्चात् विघ्नों के प्रसव रूप बहुत से वाक्य वे बोरे थे ॥१२३६१२४|| इसके उपरान्त क्रोध की अग्नि से उत्पन्न जो महान घोर हुवार थी उससे उनका मुख अत्यन्त भीपण होगया या उस मुख मे तीसरा जो नेत्र या वह उस कोप की अग्नि से मादुल होगया था ॥१२॥ भगवान सर्वदेव कृत ब्रह्मत्रोत्र ] रुद्र के रौद्रता मे परिपूर्ण शरीर मे जगत् के सहार करने के लिये महान भैरव जो वह तीसरा मे था उसको अपने ममीप में स्थित कामदेव पर धूटि (दिव) ने खोलकर देखा था ॥१२६॥ खुले हुए उस तीसरे नेत्र के अग्नि कणो से माक्रोश करते हुए स्वर्ग वासियो के समक्ष मे ही काम के दर्प रखने वाला कन्दर्भ तुरन्त ही भस्मता को प्राप्त कर दिया गया था । १२७ । भगवान हर के नेत्र मे उत्पन्न अग्नि ने उस कामदेव को भस्म के तुला वय करके हुकार की प्वनि को जानकर इस सम्पूर्ण जगत् को दग्ध करने के लिये वह मचेष्ट हा पा॥१२८॥ विलोक्य हरहुकारज्यालाभस्मीकृत म्मरम् । विललाप रति क्रूर बन्धुना मधुना सह ॥१२६ ततोविलय नहुशो मधुना परिसान्विता। जगाम शरण देवमिन्दुमोलि त्रिलोचनम् ॥१३० भविष्यति च कामोऽय कालेन्तेऽचिरादय । अनङ्ग इति लोकेपु स विख्याति गमिष्यति ॥१३१ इत्युक्ता शिरसावन्द्य गिरीश कामवल्लभा । जगामोपवन चान्यद्रतिस्तुहिन पर्वते ॥१३२ रुरोद चापि बहुशो दीना रम्ये स्थले स्थले। मरणव्यवसायापि निवृता च शिवाजया ॥१३३ भगवान हर की हुदार की ज्वाला मे भस्मीभूत हुए परामदेव को देख- कर उसकी पत्नी रति रामदेव के वन्यु मधु के साथ विलाप करने लगी थी ॥ १२६ ॥ इस मनन्नर बहुत नाप करके बसने उस रतिको सान्त्वना दी थी और फिर इन्दु यो मस्तव में धारण करने वाले भगवान विलोचन देव की शरण में चला गया पा॥ १३०॥ भगवान् शबर ने अपनी शरणागति में समुपस्थित उनको देखकर कहा था कि यह काम शीघ्र ही बान्त बाल ये उप- स्थित होने पर जोषित हो जायगा और फिर यह आज मे ही लोगों में 'भनङ्ग' इस नाम से ही प्रमिति को प्राप्त करेगा ॥१३१॥ शिच ये द्वारा इस प्रकार में कही गई कामदेव की पत्नी रति न शिरम शिव यो प्रणाम पिया पा मोर

३१६ ]
[ पग पुगण
फिर वह रनि हिमवान् पवत के मय उपवन को चली गई थी ।। १३२ ॥ वह
रति मत्यन्त दीन हीन होकर जो भी कोई रम्य स्थल मिलता था वही-वी पर
रुदन किया करती थी । उम रनि ने तो अपने पति काम के भम्मीभूत हो जाते
पर स्वय हो मरने का निश्चय कर लिया था कि तु भगवान् शिव की आज्ञा से
हो वह अपने उम निश्चय से निवृत्त हो गई थी ॥१३३।।
अथ नारदवाक्येन चादितो हिमभूधर ।
कृताभरणसस्करा कृतकौतुकमङ्गलाम ॥१३४
स्वगपुष्पकृतापीडा शुभ्र चीनगशुकाम्बराम् ।
सखीभ्या सयुता शंलागृहीत्वास्वसुतातत ।।१३५
जगाम सुभगे योगे तदासम्पूरणमानस ।
स काननान्युपाक्रम्य वनान्युपवनानि च ।।१३६
ददर्श रुदती नारीमप्रता महौजसम् ।
न रूपेरणेदृशी लोके रम्येषु वनसान्पु ॥१३७
कौतुकेन परामृष्टस्तादृष्ट्वा रुदती गिरि ।
उपसृप्य ततस्तस्या निकट सोऽप्यपृच्छत ॥१३८
कासि कम्यासि कल्याणि किमर्थं चापिगेदिपि ।
नेतदल्पमह मन्येकारणलोकसुन्दरि ॥१३६
सा तस्य वचन श्रुत्वा उवाच मधुना सह ।
रुदन्ती शाकवचन श्वसन्ती दैन्यवधनम् ।।१४०
इसके अनातर देवपि नारदजी के वचन से प्रेरित होकर भूधर हिम
वान् माभूषणो क द्वाग किय हुए सस्कारो से समन्वित-कौतुक मङ्गलमय सूत्र
से युक्त-स्वयि पुष्पों को माला के द्वारा शोभित वोटो वाली-शुभ्र चीना-
शुको से ममावृत मोर सखियों के सहित अपनी पुत्री को अपने साथ मे लेकर
उस समय में मम्पूण चित्त वाला होकर मुन्दर योग म चल दिया था। उसने
'फामन, च और उपवना को उपक्रमित किया था । उसो या महिमवान ने
प्रतकता वे अयोग्य महान् प्रोज म सम्पन्न रोती हुई नारी को देखा था । वह
ऐमी मुदरो यो नि लाक म सुम्य वन को गिम्बरो म ऐमा अन्य कोई नारी

सवदेव कृत ब्रह्मस्तीन ] । ३१७ नही थी ॥१३३१३४११३५११३६११३७॥ उस रुदन करती हुई नारी को देख- कर शेषराज ने कौतुक से ही विचार किया था कि इसका परिचय प्राप्त किया जावे । इसके उपरान्त वह उसके समीप में पहुंचकर उससे पूछने लगे ॥१३८11 हिमनान ने कहा- हे कल्याणि! प्राप कौन हैं और किस की पत्नी है तथा यहाँ आप किस हेतु से रुदन कर रही हैं ? हे लोक मुन्दरि । मैं आपके इस करण क्रन्दन का कोई सामान्य कारण नहीं समझता हूँ अर्थात् मापके रोने का कोई विशेष कारण अवश्य ही होना चाहिए । १३८।। उस रति ने उस शेमराज के वचन को सुनकर मधु के माय दीनता के बढाने वाले श्वासो को लेती हुई मौर शोक के वचनो को कहकर रुदन करती हुई वह बोली ।।१४०।। कामस्य दयिता भार्या रति मा विद्धि मुव्रत । गिरावस्मिश्च भगवान्गिरिशस्तपसिस्थितः ॥१४१ तेन प्रत्यूहरुप्टेनक्रोधाद्विस्फार्यलोचनम् । विमुच्याग्निशिखाज्यालाकामोभस्मावशेपितः ।।१४२ शरीर परिरक्षिष्ये किश्चित्काल महाद्य ते । इत्युक्तस्तु तया रत्या शैल यम्भ्रमभीषण ॥१४३ पारणावादाय तनया गन्तुमच्छत्स्वकपुरम् । भाविनोऽवश्यभावित्वाद्भवित्रीभूतभाविनी । लज्जमाना सखिमुखैरुवाच पितर गिरिम् ॥१४४ दुर्भगेन शरीरेण किममानेन कारणम् । कथ च ता दशा प्राप्तश्शङ्करो मे पतिर्भवेत ॥१४५ तपोभि प्राप्यतेऽभीष्ट नासाध्यन्तु तपस्यतः । दुर्भगत्व वृथालोके विहिते सत्ति साधने ॥१४६ तपसि भ्रष्टमन्देहा तत स्वार्थ जिगोपया। एवन्तप करिष्येऽह यामीत्युक्तवती सुताम् । उवाच वाया शंलेन्द्रो गद्गदस्परपर्णका ॥१४v रति ने कहा- हे सुवन । कामदेव को प्यारी भायों मुझको रति सम. भिये । इस पर्वत में भगवान गिरोश तपश्चर्या में सस्थित है ।। १४१ ।। उन THA [ पम-पुराण भगवान शिव ने विघ्न होने के कारण रुष्ट होकर क्रोधावेश में अपने तृतीय नेत्र को खोल दिया था। फिर उस नेत्र से अग्नि की शिक्षा की ज्वालामो को विमुक्त करके क मदेव मेरे पति को तुरन्त ही भस्मावशेषित कर दिया था ॥ १४२ ।। हे महान् ति वाले ! मैं इस अपने शरीर को कुछ समय पर्यन्त रक्षित रक्खू गी । इस रीति से उस रति के द्वारा कहे जाने पर वह निराज भोपए सम्भ्रम से युक्त हो होगया था ॥ १४३ ।। फिर अपनो तनया का हाथ पकड़कर वापिम अपने ही नगर में जाने की इच्छा को पो । होने वाली बात अवश्य ही होती है इस कारण से समस्त भूनो पर कृपा करने वाली पार्वती ने अपनी सखियो के द्वारा पिता शैलराज से कहा-||१४४। शैल पुत्री ने कहा- मेरे इस माग्य हीन शरीर से क्या प्रयोजन होगा? क्या कारण है और क्यों भग- वान् शकर उम दशा को प्राप्त होगये हैं। इस प्रकार से दशा में वे मेरे पति कैसे होगे ?॥१४५।। मैं समझती हूँ कि तप के द्वारा अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति हो जाया करती है और तपश्चर्या करने वाले के लिये कोई भी वस्तु असाध्य नहीं है । माधनों के करने पर यह जो दुर्भाग्य की बात की जाती है यह सब व्यर्थ ही है। तात्पर्य यह है कि माघनो द्वारा अभीष्ट सिद्धि अवश्य हो जाती है और दुर्भाग्य को चर्चा तो माघनो के न करने वाले ही व्यर्थ ने कहा करते हैं 1१४६।। जो नप मे भ्रष्ट सन्देह वाले हैं वे अपने अर्थ को प्राप्त करने की इच्छा से तप ही किया करते हैं । इस प्रकार से मेरा यह निश्चय है कि मैं अब तप ही करूंगी तथा मैं जारहो हूं, इस रोनि से कहने वाले पानी पुत्री से शैलेन्द्र गद्गद स्वर एवम् वर्णों वाली वाणी से बोला ।।१४७।। उमेति चापलं पुत्रि नक्षमतावकं वपुः । सोलु क्लेगानुरूपस्य तपमः सौम्यदर्शने ॥१४८ भाविन्यपि च कार्याणि पदार्थानि सदैव तु । भाविनोC भवन्त्येव बहवोऽनिच्छतोऽपि हि ।।१४६ तस्मान तपसा तेऽस्ति वाले किञ्चित्प्रयोजनम् । भवनं चव गच्छामि चिन्तयिष्यामि तत्र वै ॥१५० इत्युक्ता तु यदानव गृहमन्वेति शैलजा । ततोऽद्रिश्चिन्तयाविष्टः स्वमुतां प्रशशंस च ॥१५१ सर्वदेव कृत ब्रह्मस्तोत्र ] [ ३१६ ततोऽन्तरिक्ष दिव्या च वागभूदुवनत्रये ! उमेति चापलं पुत्रि त्वयोक्ता तनया यत ॥१५२ उमेति नाम तेनास्या भुवनेषु भविष्यति । सिद्धिमूतिमतीत्वेषासाधयिष्यति चिन्तितम् ।।१५३ इति थुत्वा तु वचनं स तदाकाशमण्डले । अनुज्ञाय सुता शैलो जगमाशु स्वमन्दिरम् ॥१५४ हिमवान् ने कहा- हे पुत्रि । यह तो तेरी चपलता है । हे उमे ! तेरा यह मतिशय मृदुल एवम् मनोहर शरीर तपश्चर्या करने में सक्षम नहीं है । हे सौम्य दर्शन वाली ! क्लेश सहन करने के अनुरूप तप करने वाला शरीर ही दूसरा होना है जो उन समस्त क्लेशो को मह लेना है ॥१४८।। जो कार्य और पदार्थ होने वाले होते हैं वे सदा हो होने वाले अर्थ मे अवश्य ही हुआ करते हैं । उनमे बहुत मे ऐसे भी कार्य हुमा करते हैं कि उनको नहीं चाहते हैं तो भी वे अवश्यम्भावी होने के कारण हो हो जाया करते हैं । १४६॥ हे बाले ! इसलिये तुझे तपस्या करने का कोई भी प्रयोजन नहीं है । अब तो अपने भवन को ही चलते हैं वह पहुंचकर विचार करेंगे ।।१५०। हम नगह निषेध पूर्वक कही हुई भी वह शैलजा जब वापिस घर पर उन प्रान पिता के साथ नहीं गई तो वह शैलेन्द्र हिमवान बडी भारी चिन्ता से समाविष्ट हो गये थे और उन्होंने पपनी पुत्री के इस कार्य की प्रशमा की थी॥१५१ । इसके अनन्तर मी समय में प्राकाश मे तीनो भुवनो मे परम दिदा पाकाशवाणी हुई थी कि तूने हे उमे । यह तेरी चपलता है -यह जो पुत्री से कहा था इसीलिये इम तुम्हारी पुषी का उमा- यह नाम तीनों भुवनो मे होगा । यह तो तेगे पुत्री सिद्ध मूत्ति और यह अपने मभोट की सिद्धि प्राप्त करेगी। उस समय में बाकाश मडल में जो यह वचन कहे गये थे उनका श्रवण करके उस शैलराज ने अपनी पुत्री को तपस्या करने की आज्ञा प्रदान करदी थी भोर पाप स्वय अपने निवाम स्थान को बना गया था ॥१५२११५३६१५४।। शैलजापि ययौ शैलमगम्यमपि देवतः । सखोभ्यामनुयाता तु नियता नगराजजा ॥१५५ ३२० ] [ पद्म-पुर, शृङ्ग हिमवत पुण्य नानाधातुविभूषितम् । दिव्यपुष्पलताकोणं भ्रमरो ष्टपादपम् ।।१५६ त्यक्त मूर्यस्य रुचिभिभिन्नसहतपल्लवम् । तत्राम्बराणि सन्त्यज्य भूपणानि च शैलजा ॥१५७ सवीतावल्कलैदिव्यदर्भनिर्मितमेखला। नि:स्नाता पाटलाहारा बभूव शरदाशतम् ॥१५८ शतमेकेनजीर्णेन पणेनावर्तयत्तदा । निराहारा शतं साऽभूत्समाना तपसोनिधिः ॥१५६ ततउद्वे जिताः सर्वे प्राणिनस्तपसोऽग्निना । ततः सस्मार भगवान्मुनीन्सप्त शतक्रतुः ।।१६० ते समागम्य मुदिताःमर्वे समुदितास्तथा । पूजितास्ते महन्द्र ण पप्रच्छुस्तत्प्रयोजनम् ।।१६१ पुलस्त्य महर्षि ने कहा- यह शैल कुमारी देवतामों क द्वरा भी प्रति प्रगम्य उस शैल पर चली गई थी। वह नगराज की पुत्री अपने निश्चय पर दृढ थी और उसके साथ दो सखियां भी गई थी ।। १५५ ॥ यह हिमवान् का शिखर परम पुण्यमय स्थल था जहां पर अनेक प्रकार की धातुप्रो की शोभा थी। वह स्थान परम दिव्य पुष्प और लतानो से समावीणं था और वहां वृक्षो पर पुष्पो के मकरन्द का मास्वादन करने के लिये भौंरे उद्धोप कर रहे थे । १५६।। वह स्थल लता पादयो के पत्रो से ऐमा सहत हो रहा था कि सूर्य की किरणों का प्रकाश भी वहाँ नही पहुंचता था। वहां पर पहुंचकर शैलजा ने समस्त अपने भूपण और वस्त्रो का त्याग कर दिया था ।।१५७ ।। उम शैलेन्द्र कुमारी ने दिव्य वालो से अपने शरीर को सथन किया था और द को मेखला तिमित करती पी। वह तीन बार स्नान किया करती थी पोर पाटलो का प्रहार करती थी। इस प्रकार से उसे तपस्या करते हुए एक सौ वर्ष व्यतीत हो गये थे ॥ १५ ॥ इसके पश्चात् उसने एक सौ वर्ष पुराने पत्तो के प्राहार करके ठातीत दिये थे। फिर इसके उपरान्त एकमो वर्ष तक बिल्कुल बिना प्राहार वाली होकर तपस्वी के समान रही थी ।। १५६ ।। उस समय उसकी तपश्चर्या की प्रग्नि से समस्त सर्वदेव पृन ब्रह्मस्तोत्र । प्रागी उद्वेजित हो गये थे। इसके पश्चात् इन्द्रदेव ने सातो मुनियो का स्मरण किया था । १६० ॥ ये सापियो कारण परम आनन्दित एवम् प्रत्यन्त प्रसन्न होते हुए वहां पर आ गये थे । हे द्र देव ने उनकी पूजा की थी। इसके मनानर उन ऋपियों ने उनके वहां पर स्मरण करके बुलाने का प्रयोजा इन्द्रदेव से पूछा था ॥१६॥ किमयं हि सुरश्रेष्ठ सस्मृतास्तु वय त्वया । शक प्रोवाच शृण्वन्तु भगवन्त. प्रयोजनम् ॥१६२ हिमाचले तपो घोर तप्यते भूधरात्मजा । तस्याभिमतयोगेन भवन्त कर्तुमर्हथ । तप समापन देव्या जगदयं त्वगन्विता ॥१६३ तथेत्युक्त्या तत. शैल सिद्धसवातसेवितम् ॥१६४ ऊचुरागम्य मुनयस्तामयो मधुराक्षरम् । पुत्रिक स्ते व्यवसित काम कमललोचने। तानुवाच ततो देवी सादर गौरवान्मुनीन् ॥१६५ तपस्यन्तो महाभागा प्रोद्य मौनमवादृशाम् । वन्दनायनियुक्ताधीचियत्यविकल्पितम् ॥ ६६ सुप्रसन्नमुखा यूय गृहीत्वासनमादित । उपविष्टा श्रम मुक्त्वा तत प्रक्ष्यथ मामनु ॥१६७ इत्युक्तास्ते ततश्चकस्तनासनपरिग्रहम् । साचताविधिवत्पूर्व पूजयित्वा विधानत ॥१६८ उवाचादित्यसङ्काशामुनीन्समऋपीन्छन । स्यक्त्वावतात्मकमाननत्यायविधिवन्मुनीन् । भगवन्तोऽपि मोनान्ते तस्या. सप्तपंयाऽप्यथ । गौरवाधारता प्राप्ता पप्रच्छुस्ता पुनस्तथा ।।१६६ सप्तपियो ने कहा- हे मुरश्रेष्ठ मापने किम प्रयोजन के लिये इन सरका स्मरण क्या है ? देवराज ने कहा था कि माप राब महानुभाव उस आगमन का प्रयोजन सुनिये ।।१६२६) इन्द्रदेव ने कहा-इम समय में हिमवान [ प पुगण गलराज यो पुमो हिमाचल पयंत पर प्रत्या पार सपर्या कर रही है उसका जोपा प्रपोजा मतपस्या है उगमा योग प्राप लोग ही करने के योग्य होते हैं । जगत् के बल्याण के लिये ही देश के तपमा गमापन गरिय । प्रार लोग मानता से युक्त होरर इस कार्य को करें ॥१६६।। 'तथास्तु' अर्थात ऐमा ही परेंगे यह पहार ये समपि गिों के समुदाय के द्वारा गसेवित उम शैन पर गये और मुनियों ने उम तप मरती हुई देवी से यहुन ही मधुर वचनों में कहा पा। है पुषि! हे कमल के समान लोचनों वाली ! म अत्यन्त पोर तपश्वर्या परने की क्या कामना है जिसका मापने निश्चय किया है ? ऐमा प्रश्न मुनियो द्वारा किये जाने पर उस देवो ने गौरव से बहुत ही पादर के माप उनको उत्तर दिया था ।।१६४१६५।। देवी ने कहा-हे महाभागो ! आप म तपस्वी है, माप जैसे महापुरपो की वन्दना करने के लिये अपना मौन अत्याग कर मेरी नियुक्त बुद्धि अविकल्पित की याचना करतो है अर्थात् मेरो याचना ऐसी है जिसका दूसरा कोई भी विकल्प नहीं है ।। १६६ ।। मात्र सब सुप्रसन्न मुख थाले होते हुए सबसे प्रथम भासन को ग्रहण करे। फिर उन प्रासनो पर सस्थित होकर प्राप समागमन के श्रम का त्याग कीजिए। इसके अनन्तर फिर मुझमे जो भी कुछ पूछना हो उमे पूछिये ॥ १६७ ॥ इस तरह से उस देवी के वहे जाने पर उन पियो ने प्राप्तन का ग्राण किया था। उस देवी ने सबसे पूर्व वन महर्षियों का विधि के साथ पूजन किया था ॥ १६८ ।। उन भगवान मतपियों ने भी उसके मान के अन्त मे गौरव की प्राधारता को प्राप्त हुई उससे फिर पूछा था ।।१६६। सापि गौरवगर्भण मनसा चारहासिनी । मुनीन्सर्वास्तथालोक्य प्रोवाचप्रोद्यवाग्यमम् ।।१७० भगवन्तो विजानीथ प्राणिना मनसेप्सितम् । शरीरादिभिरत्यर्थ दर्थ्यन्ते हि देहिन ॥१७१ केचित निपुणास्तत्र घटन्ते विविधोद्यमः । उपायदुर्लभान्भावान्प्राप्नुवन्ति ह्यतन्द्रिता ॥१७२ अपरे तु परिच्छिद्य नानाकारानुपकमान् । देहान्तरार्थ सारम्भमाश्रयन्ति हि तदव्रतम् ॥१७३ सर्वदेव कृत ब्रह्मस्तोत्र ] [ ३२३ . ममत्वाकाशसम्भूतकुसुमत्रविभूपित्तम् । विन्ध्य शृङ्ग स्प्रष्टकामो हस्तः प्रसरते मुहुः ॥१७४ अह किल भव देवं पति प्राप्तुसमुद्यता । प्रकृत्यैव दुराराध्य तपस्यन्त च सम्प्रति ।।१७५ सुगसुरैरनिीतं परमार्थ क्रियाश्रयम् । साम्प्रत चापि निर्दग्धो मदनो वीतरागिणा । कथमाराधयेदोशमादृशी तादृश शिवम् ।।१७६ नम देवी ने भी अन्दर मे गोरव रखने वाले मन स सुन्दर हाम करने वाली होती हुई उन समस्त मुनियों को उम प्रकार से प्रश्न करने वाले देखकर अपने वाणी के सयम का त्याग करके वहा था ॥१७०॥ माप लोग तो प्राणियो के मन को इच्छा को जानने हैं । ये देहधारी शरीरादि के द्वारा अत्यधिक कद- चित हुप्रा करते हैं ।। १७१ ।। उनमें कुछ लोग तो बहुत कुशल होते हैं जो कि अनेक प्रकार के उद्यमो के द्वारा सम्पन्न होते हैं और उपायों से निस्तन्द्र होकर दुर्लभ भावो की भी प्राप्ति कर लिया करते हैं प्रर्यात् उन निपुण पुरुपो के उपाय पूरी लगन के साथ ऐसे ही होते हैं। यठिन से भी कठिन पातु की भी प्राप्ति उन्हें हो ही जाया करती है ।।१७२।। दूसरे ऐसे भी लोग है जो माना भांति के उपक्रमो को करके भी देहान्नर के लिय आरम्भ के सहित उम प्रत या समाधप लिया करते हैं । इस प्रकार से ये दो तरह के मनुष्य होते है। ॥१७३॥ मेरा तो यह हाथ विन्ध्याचल को प्रत्युच्च चोटी के स्पश करने की कामना रखकर बार वार प्रमनटोना है जो fram में मपटा करयो

। पम-पुराण
३२४ ]
इत्युक्ता मुनयस्ते तु स्थिरतां मनमस्ततः।
ज्ञातुमस्या वचःप्रोचुः प्रक्रमात्प्रकृतार्थकम् ॥१७७
द्विविधं तु सुखं तावत्पुनिलोके विभाव्यते।
शरीरस्यास्य संयोगश्चेतसश्चापिनिवृतिः ॥१७
प्रवृत्या तु स दिग्वासा भीमो भस्मास्थिभूपरणः ।
कपाती भिक्षुको नग्नो विरूपाक्षोऽस्थिरक्रियः ।।१७६
प्रमत्तोन्मत्तकाकारोबीभत्सोकृतसङ ग्रहः ।
पत्या न तेन चास्त्यर्थोमूनिघुनकाक्षितः ॥१८०
यदि स्वस्य शरीरस्य सुखमिच्छसि शाश्वतम् ।
तत्कथं ते महादेवाद्भूतभाजो जुगुप्सितात् ॥१८१
इत्युक्तवत्सु कुपिता मुनिवर्येषु शैलजा।
उवाच ब्रोवरक्ताक्षी विस्फुरदशनच्छदा ॥१८२
असद्ग्रहस्य का नोतिळमनस्य कन यन्त्रणा ।
विपरीतार्थबोद्धारः सत्पथे केन योजिताः ॥१८३
एवं मांवित्थदुष्प्रज्ञामस्थानासद्ग्रह प्रियाम् ।
न मां प्रति विचारोऽस्तियदहड्वारमानिनी ॥१८४
पुलस्त्य महर्षि ने कहा- इस रीति से उस देवी के द्वारा कहे गये उन
मुनियो ने उसके मन की स्थिरता का ज्ञान प्राप्त करने के लिये प्रक्रम से प्रकृत
अर्थ वाले वचन उससे कहे ये ॥ १७७ ॥ सप्तपियो ने उस देवी से कहा- हे
मुनि : इस लोक मे दो प्रकार का सुख होता है। एक तो इस शरीर का सयोग
प्रास करना और दूसरा चित्त को भी निवृति का लाम करना है ।। १७८ ।।
वंसे देखा जाये तो वह शिव तो प्रकृति से ही ऐसे हैं कि वह निरन्तर नग्न रहा
करते हैं-उनको भाकृति भयानक है-वे सर्वदा अपने शरीर पर भस्म धारण
किया करते हैं और मृत पुरुषो को हड्डियां ही उनके शरीर का भूपण हैं । वे
मुण्डो की माला पहिनने वाले हैं-भिक्षाचरण किया करते हैं-नग्न रहते
है--विगन रुप वाले नेत्रो से युक्त और अस्थिर क्रिया वाले रहते हैं ॥ १७६।।
जैसे कोई प्रमत्त या उन्मादयुक्त हो मा हो उनका प्राकार है। वे तो बहुत ही

मदेव कृ7 ब्रह्मतोत्र ] [ ३२५ प्रात करने वीभम तथा सग्रह न करने पाले देव हैं । ऐसे उनको पति के स्वरूप मे च हना तो बिल्कुल ही एक साक्ष त् मूतं अनर्थ की ही प्राकाक्षा करना है ।। १६० ।। है देवि ! यदि तुम मबंदा स्थिर रहने वाले अपने मगेर के सुख को इन्छा कती हो तो महादेव को पति रूप मे प्राप्त करने से कदापि यह प्राप्त नही हो सकता है जो कि महादस सा भूतो के साथ रहते हैं और अत्यन्त निन्दित है.। उनसे फेमे यह शारीरिक सुख मिल सकता है ? 11 १८१|| पुजा मुनि ने कहा- जघ उन सप्तपियो ने उम देवी से इस तरह कहा तो वह बोल पुभी उन मुनियों पर अन्यन्त क्रोधित हो गई थी और क्रोध से लाल प्रायो को करते हुए अपने ओष्ठ भोर दानों को विस्फूर्त करके उमने उनमे कहा-१९८२॥ शाल पुत्री बोली-प्रमद् के ग्रहण करने की क्या नीति है और यमन को यन्त्रणा कहाँ पर है ? आप लोग तो बिल्कुल विरुद्ध प्रथं के जानने वाले हैं । आप लोगो को सपथ पर किस ने योजित किया है ?॥१३॥प्राप लोग मनुचित एव अमद् वस्तु की प्रतिको इच्छा पाली तथा दुष्ट बुद्धि से युक्त इस तरह मुझको समझते हैं । अप लोग मेरे प्रति पुछ भी विचार प्राट न करें पोfrif तो पपने सभीष्ट लक्ष्य के प्राप्त करने के अभिमान वाली हूँ॥१४॥ जाते लोकविधाने तु सत्य तत्कार्यमुत्तमम् । प्रालेपशैलस्य शङ्कातत्काल एपिणः ॥१८५ सत्यमुत्कण्ठिताः सर्वे ये ये कार्यार्थमुद्यताः । तेपालगन्तचेतामि विन्तु नाममहात्मनाम् ॥१८६ लोकयामानुगन्तध्या विशेपेणविवक्षितः। यतस्तरममेधन्ते तत्प्रामाण्य परे धृताः ॥१८७ इत्युक्त्वा मुनयो जग्मुस्त्वरितातुहिनानलम् । तय ते पूजितास्तेन हिमर्श लेन सादरम् । ऊचुर्मु निवरा: प्रीता स्वल्पक तु घरान्विता ॥१८८ देवो दुहितर साक्षास्पिनायो तव मार्गते । तच्छीघ्र पारयात्मानमाहुत्येवानले हृतम् ॥१८॥ कार्य हि तच देवाना मुचिर परिवर्तते । जगत्सारणापंप विधातव्यः ममुधमः ।।१६० प्राय.

२२६ ] [ पद्म पुर रा - सप्तपियो ने कहा-इम लोर के विधान में जो वार्य उत्तम है वही मत्य होता है । बहुधा हिमवान शंन को शङ्का उस समय के अनुरूप ही है। हम मब लोग तो सस्य के लिये उतितण्ठिन हैं जो कि यहां पर कार्य करने के निये इम समय में समुद्यत हुए हैं। उन मह न मारमा वालो के चित्त एमा कार्य करने को शीघता किया करत हैं । १८५८।। विशेष रूप से विवक्षितों के द्वारा लोषयात्रा का अनुगमन करना चाहिए जिससे धर्म की वृद्धि होती है और इसका प्रमाण नो वे ही महापुरुष हैं जिन्होन मह वा धारण कर रखा है ॥१८७ । पुनस्त्य मुनि ने कहा--तना कहकर वे मुनिगण शीघ्रता से तु है. नाचल के समीप में चले गय थे । वहाँ पर हिमवान् शेषराज के द्वारा वे पग्म समादर के साथ पूजित हुए थे । उन मुन्विरी ने स्वरा से युक्त होत हुए प्रमन्नता के साथ थोडा-सा ही म हिमवन में कहा था ।।१८८ । मुनयो ने कहा- साक्षात भगवान पिनाको देव आपकी पुत्री को चाहते हैं मो अग्नि में हुन को हुई आहुति की भांति धार अति शीघ्र अपने आपको पावन करिये । इमसे देवो का कार्य चिरकाल मे परिवत्तित होता है । यह यन ऐमा है जिसमें ममस्त जगत् का उद्धार होता है अन इसे निष्पन्न करने के लिये प्रति शीघ्र उद्यम पापको करना चाहिए ॥१८६१६०॥ इत्युक्तस्तु तदा शैलो हविशवशान्मुनीन् । असमर्थाऽभवद्वक्तुमुत्तर प्रार्थयन्निव ।।१६१ ततो मेना मुनीन्वन्ध प्रोवाच स्नेहविकलवा। दुहितुस्तान्मुनीश्चैवववन स्वयमयंवत् ॥१९२ यदर्थं दुहितुर्जन्म चेच्छन्त्यपि महाफलम् । तदेवोपस्थित सर्व प्रक्रमेणव साम्प्रतम् ॥१६३ कुलजन्मवयोरूप विभुत्वस्सहितोऽपियः । वरस्नस्यापिनाहूय सुता देया ह्ययाचत ॥१६४ दिग्वासा जटिल शूली दग्धकामोऽपि कामद । स तु मत्सुतया घोरः क्थ नाम उपास्यते ॥१९५ ऐश्वर्यमवगच्छस्व शङ्करस्य सुरासुरा । प्राराध्यमानपादाब्जयुगलाश्च सुनिताः ॥१६६ सर्व देव वृत ब्रह्ममोन ] यस्योपयोगि यद्र प तेन तत्प्रार्थ्यते चिरम् । पोर तपस्यते बाला तेन रूपेण निर्वृता ।।१९७ यत्सा व्रतानि दिव्यानि नयिष्यति समापनम् । तदनावहिता तावदस्मास्वेव भविष्यति ।।१६८ पुगस्त्य मुनि ने कहा-इस तरह जब मुनियो के द्वारा वह शैनराज कहा गया था तो वह इतना प्रपन्न होगया था कि उस हप के ग्रावेश से प्राथना करत उनको उत्तर देन म भी अममर्थ हो गया था अर्थात् प्रसनता के प्राधिक्य ६ कारण हिमवान् से कुछ भी बोला न जा सका था ॥१६१।। इसके अनन्तर शैलराज को पत्नी मेना ने मुनियो को वदना की थी और पुत्री के वह स्नेह म विकल होती हुई उन मुनियो से बोली और म्वय हो अथवान् वचन कहे ॥१६२।। मेना ने कहा--सि कार्य की निष्पत्ति कलिय मेरी पुत्री का यह जन्म हुप्रा है मैं उमी महान फन की इच्छा करने वाली हूँ। वह ही इस समय मे सब कुछ प्रक्रम में उपस्थित हो गया है ।। १६३ ॥ पुल, ज म, प्रवस्था, स्प और विमुक्त्व स जो युक्त हो ऐसा हो वर होने उसका समाहार करके भी बिना याचना विय ही अपनी पुत्री को उमे दे देना चाहिए ।।१६४॥ दिशाप्रो के वसन धारण करने वाला अर्थात् नग्न-~-इटाजूट घारगण करने वाला~विशूलधारो- कामदेव को भस्म कर देने वाला भी कामामो वो प्रदान करने वाला शिव है । ऐमा महान् घोर शार है कि मेरी पुत्री के द्वारा वही न मालूम क्यो उपासित किया जा रहा है ? ॥१६॥ मुनियो ने वहा~माप उनके ऐश्वर्य को समझो । ममस्त सुर मोर पसुर उन मकर के चरण युग की प्राराधना करने वाले हैं और उस माराधना से वे परम प्रानन्द एवम् शान्ति प्राप्त किया परसे हैं । १९६॥ निसको जो रूप उपयोगी होता है उमी रूप से वह चिरकाल पर्यन्त प्रथित किया जाता है । यह मापकी वाला उपके घोर स्वरूम की हो प्रथंग कर रही है मौर उगी उनके स्वरूप से उसे सुनिवृति प्राप्त होती है ॥१९॥ घह अपने दिव्य वनो की समाति परेगी वैसे ही हम वहाँ पर सावधानता में स्थित हैं यह मब हमारे ही कार सम्पन्न होगा ।।१६८ द्रष्टु वयमिहायाता शङ्कर गुणनायकम् । त्रिलोचन विजानीहि सुरकार्यप्रचोदिता ६१६६ ३२८ ] [ पम पुगण त्वमेव नो गतिस्तत्र यथाकालानतिकामः । स्यात्प्रार्थनपा प्रायेण प्रतीहारमयी प्रभो ॥२०० इत्युक्तो मुनिभिः सोऽथ गौरवातानुयाचह । स वनस्यापरी सन्ध्यां कतुं मन्दाकिनों गतः ॥२०१ पारणेन भाविता विप्रास्ततो द्रक्ष्यथ लिनम् ।।२०२ इत्युक्ता मुनयस्तस्युयंत्नात्कार्य विचक्षणाः । गम्भोराम्बुधरं प्रावृतृपिताश्चातका यथा ॥२०३ तथा क्षरोन निष्पन्नसमाचारक्रियाविधिम् । वीरासनकृतोद्देशश मृगचर्मनियामितम् ॥२०४ ततो विनीतो जानुभ्यामवलम्व्य मही मुदा । उवाच वीरको देवं प्रणयकसमाश्रयम् ।।२०५ ऋषियों ने कहा-हम सब यहाँ पर भगवान शंकर का दर्शन करने के लिये ही उपस्थित हुए हैं जो गुणों के नायक हैं । ऋपियो ने शकर से मिलने के लिये हिमाचल के शिखर पर पहुंचकर यह कहा कि हम सब तो देवताओ के कार्य के लिये हो प्रेरित होकर यहाँ पर उपस्थित हुए हैं । अतएव भगव न शंकर की सेवा में यह हमारा निवेदन कर दीजिए ॥१६६ ऋपियों ने वीरक से कहा था कि हमारी तुम ही एक गति हो, ऐसा ही करें जिससे काल का अतिक्रमण न हो । हे प्रभो! यह प्रतीहारमयी हमारी प्राय: प्रार्थना है ॥२००। पुलस्त्य मुनि ने कहा-मुनियों के द्वारा जिस समय में उस वीरक से इस भांति कहा गया तो फिर वीरक गौरव से उन मुनियो से बोला-वीरक ने कहा- इस समय मे भगवान् शङ्कर अपरा संघ्या करने के लिये मन्दाकिनी पर गये हुए हैं ।।२०१।। एक्क्षण के पश्चात् हो हे विप्रगण ! आप सब लोग भगवान शूली के दर्शन प्राप्त कर लेंगे ॥२०२।। इस तरह मे कहे जाने पर पुनस्त्य मुनि ने कहा कि वे सब मुनिगण वहां पर स्थित हो गये थे क्योकि ये सब यत्नपूर्वक अपना कार्य करने मे बहुत ही कुशल थे । वे सब लोग उस समय इम भाति भगवान शङ्कर के दर्शन की प्रतीक्षा कर रहे थे जिस तरह वर्षा ऋतु मे तृपित चातक गम्भीर मेघ को प्रतीक्षा किया करते हैं ॥२०३।। इसके पश्चात् क्षणभर मे ही सर्वदेव कृत ब्रह्मस्तोत्र ] । ३२६ भली-माति मानार की क्रिया विधि को निष्पन्न कर लेने वाले, वीरासन से संस्थित, मृग के चर्म को लपेटे हुए तथा प्रणय के एकमात्र प्राश्रय वाले देव से भूमि पर अपने दोनो घुटनो को टेककर परम विनीत भाव से प्रसन्नता के साथ वीरक ने निवेदन किया था ॥२०४।२०५॥ सम्प्राप्ता मुनयः सप्त द्रष्टु त्वां दीप्ततेजसम् । विभो समादिशद्रष्टुं ततो ध्यानमिहार्हसि ।।२०६ इत्युक्तो धूर्जटिस्तेन वीरकरण महात्मना । भ्र भङ्गसंज्ञया तेपां प्रवेशाज्ञां ददौ तदा ॥२०७ मूद्ध कम्पेन तान्सप्त वीरकोऽपि महामुनीन् । प्राजुहाव विदूरस्थान्दर्शनाय पिनाकिनः ॥२०८ स्वराबद्धजटास्ते च लम्बकृष्णाजिनाम्बराः । विविगुर्वेदिकांदिव्यागिरिशस्यविभोस्ततः ।।२०६ बद्धपाणिपुटाक्षिप्तनाक पुष्पोत्करास्ततः । पिनाकिपादयुगलं वन्द्य नाकनिवासिनः ॥२१० तत: स्निग्धेक्षिता सन्तो मुनय. शूलपाणिना। गिरीश तु ततो ते समं तुष्टुवुर्मुदा २११ वीरक बोला-हे विमो ! दीप्त तेज वाले प्रापका दर्शन प्राप्त करने के लिये सात मुनि प्राये हुए हैं । श्राप दर्शन प्रदान करने को प्राशा देखें और आप इस पोर अपना ध्यान देने के योग्य होते हैं ।। २०६ ।। पुलस्त्य मुनि ने कहा-जब महात्मा वीरक ने भगवान् धूर्जटि से इस तरह कहा तो शंकर ने अपनी भ्रमण की सज्ञा से उम ममप उनके प्रवेश की प्राज्ञा प्रदान कर दी यो । २०७ ।। फिर वीरक ने भी अपने मम्तक को कम्पित करने के संकेत से बिना कुछ सो के समुच्चारण क्येि हुए अधिक दूरी पर समास्थित उन मुनियों भगवान् पिनाको के दर्शन प्रान करने के लिये माह्वान रिया troll उन मुनियों ने भी शोघ्रता से अपनी जटामो को बांधकर लम्वे कृष्ण मृग चमं के अम्बों को धारण किये हुए विभु गिरीश को दिव्य वैदिका में प्रवेश किया था ॥२०६॥ उन मुनियों के दोनों हाथों की सजलि बंधी हुई थी और उनमें ३३० ] [ पद्म पुराण स्वर्गीय पुष्पों की राशि भरी हुई थी प्रर्थात् दोनो हाथो मे स्वर्ग के पुष्प लिये हुए थे जिन पुष्यों को स्वगवासियो के वन्दनीय शर के चरण युगल में उन्होने समषित कर दिया था ॥२१०॥ भगवान् शूलपाणि क द्वारा वे पब मुनिगण स्नेह भरी दृष्टि से देखे गये थे। उन्होने भी गिरीश के दर्शन प्राप्त रक पर- मानन्द साथ शिव का स्तवन करना आरम्भ कर दिया था ॥२१॥ ग्रहो कृतार्था वयमेव साम्प्रत सुरेश्वरैर्वन्दितपादपल्लवम् । विलोकयामो गुणगौरवद्धिभि समादिशे कार्यमशेपरक्षणम् ॥२१२ ततः प्रहस्य सर्वज्ञ उवाच मुनिसत्तमान् ॥२१३ भवता यद्धृदि गत कार्य तत्कुरुताधुना ॥२१४ इत्यक्ता मुनयस्तूर्ण ययर्यत्र च शैलजा। बभापिरे विभागज्ञा गिरिजा गिरिगहरे ॥२१५ रम्य प्रियमनोहारि मा रूप तपसा दह । प्रोतस्ते शङ्कर. पाणिमेप प्रतिग्रहीष्यति ॥२१६ वयथितवन्तस्ते पितर पूर्वमागता । पिना सह गृह गच्छ वय याम स्वमन्दिरम् ।।२१७ मुनिगरण ने कहा -अहो भाग्य हमारा है, हम सब लोग आज सुरेश्वरी के द्वारा वन्दित आपके चरण युगल को देखने का सुअवमर प्राप्त कर रहे हैं । अब पाप गुणो के गौरव को बढ़ाने वाले वचनो के द्वारा सबको रक्षा करने के कार्य के लिय माझा प्रदान कीजिए ॥२२॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा-इसदे अनन्तर सब कुछ ज्ञाता भगवान् शकर हंसकर उन समस्त मुनियो से बोले ।। २१३ ।। भगवान् शकर ने कहा-पाप लोगो के हृदय में रहने वाला जो भी कुछ कार्य है उसे प्रब करिये ।। २१४ ॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा--जब इस भांनि भगवान् शकर ने मुनिया को आदेश दे दिया तो वे समादिष्ट होकर शीघ्र हो वहाँ पर पहुंचे जहा पर शैलजा तपश्चर्या कर रही थी और विभाग के ज्ञाता उन्होने गिरि को बन्दर से देवरिया से कहा था ॥३१५॥ ऋपियों ने कहा- हे देवि । अब आप अपने इस परम रम्प, प्रिय और मनाहारी रूप को इस प्रकार की टिन तपश्चर्या से नष्ट मत करो । भगवान् शकर मब पाप पर प्रसन्न हो गये हैं

सर्वदेव कृत ब्रह्मस्तोत्र ]
[ ३३१
और वे प्रापमा पाणिग्रहण करेंगे ॥ २१६ ॥ हमने पहिले ही ग्राकर प्रापके
पिताजी से भी प्रार्थना करदी है मो अब प्राप पिताजी के साथ अपने घर की
चनी जाम्रो और हम मो सब अपने नियम स्थान को जा रहे हैं ।।२१७ ।
इत्युक्ता तपसः सत्यं फलमस्तीति चिन्त्य सा ।
त्वरमाग्गा ययौ वेश्म पितुर्दिव्यं सुशोभितम् ।।२१८
सा तत्र रजनी मेने वर्पायुतसमां सती ।
हरदर्शनसजातसमुत्कण्ठा हिमाद्रिजा ।।२१८
ततो मुहूर्त ब्राह्म तु तस्याश्चक्रुः सुहृत्क्रियाम् ।
नानामङ्गलरान्दोहान्यथावत्क्रमपूर्वकम् ॥२२०
अभवन्मनयो नागा यथागन्धर्वकिन्नगः ।
शङ्करस्यापि विबुधागन्धमादनपर्वते ॥२२१
सजमण्डनसम्भारास्तस्थुनिर्मलमूर्तयः ।
शर्वस्याथ जटाजूटे चन्द्रखण्ड पितामहः ।।२२२
बबन्ध प्रयोद रविस्फारितविलोचनः ।
कमलमालां विपुला चामुण्डा मूनिवघ्नती ॥२२३
उवाच गिरिशं काली पुत्र जनय शङ्कर ।
यो दैत्येन्द्रकुल हत्वा मां रक्त स्तर्पयिष्यति ।।
वायवश्वववुस्तीक्ष्ण हिमगिरिप्रभम् ।
वृप विभूपयामासुहरयान मनोजवम् ।।२२४
पुलस्त्य मुनि कहा-इस प्रकार से मुनियों के द्वारा कही गई उस
गिरिजा ने तपस्या का फल बिल्कुल है-ऐसा विचार किया और फिर
दो घता से सयुत होती हुई वह अपने पिता के प्रत्युत्तम एवम् गोमा से सम्पन्न
घर में तपोभूमि से गई थी।। २१८ ।। वहां पर उस सनी ने उम रात्रि को दश
हजार वप के तुल्य माना था क्योकि उस हिमाद्रि की पुत्री को तो भगवान शिव
के दर्शन प्राप्त करने को मत्यन्त उत्कण्ठा उत्पन्न हो रही थी ।। २१६ ।। इसके
अनन्तर ब्राह्म मुहूर्त में उसकी सहक्रिया की थी और उचित रोति से क्रम.
पूर्वक अनेक प्रकार के मङ्गल कार्यों के ममूह भी किये गये थे ॥२२०।। इधर

कार्तिक का जन्म और विजय ] [ ३३५ - छत्रचामरजालश्च भूपणश्व विलेपनै । अभिपिक्तो विधानेन यथावत्पण्मुखः प्रभुः ॥१२ सुतामस्मै ददौ शक्रो देवसेनेति विश्रु ताम् । पल्यथं देवदेवेशो ददौ विष्णुरथायुधम् ।।१३ यक्षाणां दशलक्षारिण ददावस्यधनाधिप । ददौहुताशनस्तेजो ददौवायुश्च वाहनम् ॥१४ उस बालक के स्कन्द, विशाख, पड्वक्व और कतिकेय ये नाम प्रसिद्ध हैं । चैत्र मास के बहुल पक्ष में पञ्चदशी तिथि में महान बल सम्पन्न और सूर्य के समान प्रभा वाले विशाल शरो के वन में उत्पन्न हुए थे। शुक्ल पक्ष में पश्चमी तिथि में उसी प्रकार से ये पावक-मनल हुए थे। बालको में से एक को सन्ध्या मे हो भूति के लिये किया था। फिर उमो पश्री तिथि मे प्रभु गुद का अभिषेक किया गया था ।।पाए १०॥ उन भगवान् परमुख प्रभु का भभि- पेक विधि पूर्वक ममस्त देवगण-ब्रह्मा उपेन्द्र, इन्द्र, भास्कर के द्वारा गन्ध, माल्य, शुभ धूप, क्रीडनक, छत्र, चामरों का समूह, भूपण पोर विलेपनो से किया गया था ॥११॥१२॥ देवराज इन्द्र ने अपनी पुत्री देव सेना नाम मे प्रसिद्ध होने वाली को इस परमुख प्रभु को दे दिया था। देवदेवेश ने अपनी कन्या को पत्नी के स्वरूप में इनको प्रदान की थी। भगवान् विष्णु ने पायुध दिया था ॥१३॥ धन के स्वामी कुवेर ने इनको दश लाख यसो को सेना प्रदान की थी । हुताशन देव ने तेज दिया था तथा वायु ने वाहन प्रदान किया था ॥१४॥ ददौकीडनक त्वष्टा कुक्कुट कामरूपिणम् । एव सुरास्तु ते सर्वे परिवारमनन्तकम् ।।१५ ददुमुदितचेतस्का स्कन्दायादित्यवर्चसे । जानुभ्यामवनौ स्थित्वा सुरस वास्तमस्तुवन् । स्तोत्रेणानेन वरद पणग्य मुख्यशः मुराः ॥१६ क व कामं प्रयच्छामि भवन्तो व्रत निवृताः। यद्यप्यसाध्यं कृत्य नो हृदये चिन्तितं चिरम् ।।१७ इयुक्तास्तु मुरास्तेन प्रोचुः प्रणतमौलयः । सर्वएव महात्मानं गुह मुदिमानमाः ॥१८

३३६ 1
। पद्म-पुराण
दैत्येन्द्रस्तारको नाम समिरकुलान्तकृत् ।
बलवान्दुर्जयस्तीक्ष्णो दुराचारोऽतिकोपनः ।।१६
तमेव जहि दुर्धर्ष दैत्यं सर्वविनाशनम् ।
उपस्थितः कृत्यशेपो ह्यस्माकं च भयावह ॥२०
हिरण्यकशिपुश्चोनो ह्यवध्यो देवतागणः । -
यज्ञघ्नः पापकर्मा वै येन ब्रह्मापि तापितः ।।
एतो हरस्व भद्र ते तावक च महावलम् ॥२१
स्विष्टा देव ने कामरूपी कुक्कुट प्रोडनक प्रदान किया था। इस प्रकार से
वे समस्त सुरगण उसका अनन्त परिवार था ॥ १५ ॥ भगव न सूर्य के सदृश
वचंस वाले भगवान् स्कन्द के लिये मव देवताओं ने बहुत ही प्रसन्न चित्त से
युक्त होकर ये वस्तुएँ प्रदान की थीं। सब देवता भूमि पर घुटनो से स्थित होकर
उससे बोले और सुरो ने मुख्यतया वरद प्रभु का स्तोत्र के द्वारा स्तवन भी
किया था ॥ १६ ॥ कुमार ने कहा- मैं आपकी किम कामदा को पूर्ण एवम्
सफल कस् । पाप सब लोग सुनिवृत होते हुए मुझे बतलादो.। चाहे वह कार्य
प्रसाध्य ही क्यो न हो, आपने जिसको चिरकाल से हृदय मे सोच रक्खा हो
उसे ही मुझमे कह दो ।। १५ । पुलस्त्य मुनि ने कहा-इम तरह से स्कन्द के
द्वारा जब देवगण से कहा गया तो समस्त देवताओं ने अपना मस्तक उनके
प्रागे झुका दिया था मोर फिर बहुत ही अधिक प्रसन्न मन वाले होकर महान्
आत्मा वाले भगवान् गुह से बोले ॥१८॥ देवों ने कहा-हे भगवन् ! तारक
नाम वाला एक दैत्यो का राजा है । वह समस्त देवतामों के कुन का विनाश
करने वाला है । वह बहुत ही अधिक बलवान्, दुर्गम, अत्यधिक तीक्ष्ण और
बहुत ज्यादा क्रोप वाला है ।।१६। उसी दुष्ट दुर्धर्ष और सम्पूर्ण देवो के नाशक
दैत्य का प्रा५ वध कर दीजिए। हम लोगो का प्रत्यन्त भयावह यही एक कृत्य
शेप है जो कि इस समय उपस्थित हैं ॥२०॥ हिरण्यकशिपु भी अत्यन्त उग्र और
देवगणों के द्वारा प्रवध्य है । वह यज्ञो के नाश करने वाला और पाप कर्मों के
करने वाला है। वह ऐसा भीषण देश्य है कि जिसने ब्रह्माजी को तापित कर
दिया था। इसका अपहरण कीजिए क्योकि प्रापका तो महान बल
है।॥ २१॥

कनिक का जन्म और विजय ] [ ३३७ एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा समिरपदानुग । जगाम जगता नाथ स्तूययमानोऽमरेश्वर. ॥२२ तारक्स्य वधार्थाय जगता कण्टकस्य च । ततश्चप्रेषयामास शक्रो लब्धसमाश्रय. ॥२३ दूतं दानवसिंहस्य परुपाक्षरवादिनम् । स तु गत्वाऽब्रवीत्यमभयो भीमदर्शनम् ।।२४ शक्रस्त्वामाह देवशोदैत्यकेतु दिवस्पतिः । तारकासुर तच्छक्त्या घटयस्व यथेच्छया ॥२५ यज्जगज्ज्वलनोद्दीप्तं किल्विप च त्वया कृतम् । तम्याह सादकस्तेऽद्य राजाऽस्मि भुवनप्रये ॥२६ श्रुत्वैतदद्भुत वाक्यं कोपसरतलोचनः । उवाच दूत दुष्टात्मा नष्टप्रायविभूतिकः ॥२७ दृष्ट ते पौरुप शक्र शतशोऽथ महारणे। नित्रयत्वान्न ते शान्तिविद्यते शक्र दुमंते ॥२८ पुलस्त्य ने कहा-इम रीति से देवो के द्वारा प्रार्थना करने पर ऐमा ही किया जायगा-यह पण्मुख ने कहा था। उस समय समस्त देवता उनके चरणों में गिरकर प्रणाम करने लगे थे। इस तरह देवेश्वरी के द्वारा स्तुत होकर यह जगत् का स्वामी चला गया था ॥२२॥ उमने जगत् के कण्टक स्वरूप दु.ख- दायी तारक के वध करने के लिये गमन किया था। इसके अनन्तर पर मुख का समाश्रय प्रास करके इन्द्र ने दानवों मे मिह वे ममा तारक के पास एक दून को भेज दिया था जो बहुत ही कठोर भापण करने वाला था। वह दूत उसके पाम पहुंचा और निभय होकर उसने दैत्य से कहा-॥२३॥२४॥ दूत बोला- स्वर्गलोक के स्वामी देवराज इन्द्र ने देस्य तु प्रापये ममीप में यह सन्देश कहलाकर भेजा है कि हे तारकासुर! अब पाप अपनी पूर्ण शक्ति का इच्छा. पूर्वक प्रयोग कर लीजिए ॥२५॥ मारने इम सम्पूर्ण जगत् को ताप दाप करके जो अत्यन्त बद्दीप्त पाप किया है मैं उसका मादक हूं मोर आज ही उम पाप का फल में दंगा क्योकि इन तीनो भुवनो का राजा हूँ ॥२६॥ पुलस्त्य ने कहा- ३३८ ] [ पद्म पुराण दून के द्वारा कथित इस अद्भुत वाक्य को सुनकर पेह तारक क्रोध से लाल श्रो वाला हो गया था और अपनी सम्पूरा भूिति को प्राय: न करने वाला वह दुष्ट आत्मा वाला दूत मे बोला-॥२७॥ तारकासुर ने कहा-उस इन्द्र का मैंन एक बार नही सैकडो बार सग्राम भूमि में पौरुप देख लिया है। हे दुष्ट बुद्धि वाले इन्द्र ! तू तो बहुत ही निलंज्ज है और अभी तक भी तुझे शान्ति नहीं हुई है, इसका कारण तेरो लज्जाशून्यता ही है ॥२८॥ एवमुक्त गते दूते चिन्तयामास दानवः । नालब्धसथयश्शको वक्तुमेवमिहार्हति ।।१६ जातः स्कन्दोऽपुना शज्ज्ञिायते समुपाश्रयः । निमित्तौघास्तदा दुष्टान्सोऽपश्यन्नाशवेदिनः ।।३० पासुवर्पमसृक्पात गगनादवनीतले । वामनेत्रप्रकम्पं च वक्रशोपं मनोभयम् ॥३१ स्वकाना वक्त्रपद्माना म्लानतां च व्यलोकयत् । दुष्टाश्च प्राणिनो रौद्रान्सोऽपश्यदृष्टवादिनः ॥३२ तदचिन्त्यवदितिजोन्यस्तचित्तोऽभवत्क्षणात् । यावद्गजघटाघण्टाघनत्काररवोत्कटाम् ॥३३ तद्वत्तुरङ्गमवातहेपोत्साहविभूषिताम् । संन्यस्सेनान्तरोदग्रध्वजराजविराजिताम् ।।३४ विमानश्चाद्धताकारश्चलितामलचामरैः । विभूषणपिनद्धां च किन्नरोद्गीतनादिताम् ॥३५ पुलस्त्य मुनि ने कहा-ऐसा कहने के पश्च त् दूत के चले जाने पर उस देन्द्र ने विचार किया था कि विना किमी बड़ी शक्ति का समाश्रप पाये यह इन्द्रं इस प्रकार में निहर होकर कहने के योग्य नहीं हो सकता है। ऐमा प्रतीत होता है कि भगवान् शकर से इस समय में सन्द का जन्म हो गया है और वहीं इम इन्द्र का ममाप्रय हो सकता है ।।२६॥ उम समय में नाश के ज्ञापन परने वाय प्रत्यन्त दुष्ट निमित्तो के गमूहों को उम तारकासुर ने देखा पा ॥३०॥ माया में धूलि वो वर्षा मोर भूमि पर रक्त का पात उस समय में होने लगा कार्तिक का जन्म मौर विजय ] ថ្មី - था । उम तारक के वाम नेत्र प्रकम्पित होने लगे तथा उसके मुख शुप्कता प्रा गई थी और मन मे महान भय , समुत्पन्न हो गया था ॥३१ || उसने अपने मुख पर पनो में म्लानता देवी थी । तारक दैत्येन्द्र ने दुष्ट प्राणियों को अत्यन्त द्रि रूप वाले और दूषित भाषण करने वाले देखा था ॥३२॥ इन सब बुरे कुशकुनो को तथा बुरे निमित्तो को कुछ भी परवाह न करके एक ही क्षण में न्यस्त चित्त वाला होगया था। जितने भी उसकी सेना मे हाथी थे उनके समूहो के घण्टापो की ध्वनि से उत्कट उसकी सेना वहां उसने देखी थी ॥३३॥ इमी भांति वह सेना प्रश्वो के समुदाय को f नहिनाहट के उत्साह में समन्धित हो गई थी। सेनान्तर के उदग्र ध्वजराजो से संयुत सैनिकों से भी वह सुशोभित हो रही थी ।।३४ । अद्भुत प्राकार वाले और जिनमे निर्मल चमर दुराये जा रहे थे ऐमे विमानो से उसकी सेना समवित थी। बहुत से भूपणो से पिनद्ध उमकी सेना थी और उस सेना में किन्नरो के द्वारा गाये हुए गीतो को ध्वनि की गूज छायी हुई थी ।।३५॥ नानानाकतरूत्फुल्लकुसुमापीडधारिणीम् । विशोकात्रपरिस्फार चर्म निर्मलदर्शिनीम् ।।३६ विद्य त्पुष्टा तिधरा नानावाद्यविनादिताम् । सेना नाकसदादैत्यः प्रासादस्थोव्यलोकयत् ॥३७ सचिन्तयामाम तदा किञ्चिद्विभ्रान्तमानसः । अपूर्वः को भवेद्योद्धा योमयान विनिर्जितः ॥३८ ततश्चिन्ताकुलो दैत्याः शुश्राव कटुकाक्षरम् । सिद्धवन्दिभिरुघुष्टमिद हृदयदारुणम् ॥३६ श्रुत्वंतत्तारकः सर्वमधुष्ट देववन्दिभिः । सस्मार ब्रह्मणो वाक्य वधवालादुपस्थितम् ।।४० स्मृत्वा धर्मापविध्वसी सदा वीरपदानुग. । मन्दिरानिर्जगामागु शोकनस्तेन चेतसा ॥४१ कालनेमिमृखादैत्या सन्त्रस्ता भ्रान्तचेतसः । स्वप्वनीकेपु च तदात्वराविस्मितचेतसः । हिरण्यकशिपुप्राह दानवानां धुन्धरः ॥४२ ३४. ] [ पद्म-पुराण अनेक प्रकार के स्वर्ग के वृक्षो के विकसित पुष्पो के मापीड को धारण करने वाली वह तारक की सेना थी। विशोकास्त्र के परिस्फार, चर्म से निमल खि ई देने वाली थी। हित को पा पृष्ट दृति को धारण करने द लं विविध प्रकार के दायो से निनादित ती हुई ना को स्गव सियो के प्रसाद मे स्थित उस दैत्येन्द्र तारक ने देखा था ॥३६।। उस समय उस सुविशाल अपनी सेना को सुमज्जित देखकर उस दैत्यराज ने कुछ विशेष रूप से भ्रान्त मन वाला होकर चिन्तन किया था कि ऐमा कौन अपूर्व योधा है जो मेरे द्वारा नहीं जीता जा सकता हो ।॥३७॥ इसके अनन्तर फिर चिन्ता से व्याकुल हुए उस दैत्येन्द्र ने यह पति कटु अक्षरो वाले हृदय को दारुण लगने वाले और सिद्धगण तथा वन्दिगरण के द्वारा उद्धष्ट वचन सुने थे जो कि भगवान् स्कन्द के जय-जयकार को सूचित कर रहे थे ॥३८॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा-उस तारक असुर ने इस देवगण तथा वन्दिगण के द्वारा उद्घोषित किये हुए वचनो का श्रवण करके फिर ब्रह्माजी के उन वचनो का स्मरण किया था जो वरदान प्रदान करने के समय में किसी सात दिन के बालक से वध होने के विषय में कहे गये थे ॥ ३६ ।। सवंदा जिसके वीर लोग पदानुगमन करने वाले रहते हैं ऐसे धम क समूह का विश्वस करने वाला वह तारक असुर शोक से ग्रस्त चित्त से सयुन होकर पति- शीघ्र ही अपने मन्दिर से निकल गया था ॥४०॥ कालनेमि जिनमे प्रधान था ऐसे सभी दैत्यगरण बहुत ही भयभीत और भ्रान्त चित्त वाले हो रहे थे। अपनी अपनी सेनामो मे समास्थित होकर उस समय मे त्वरा (शीघ्रता) से विस्मित चित्त वाले होते हुए वहाँ पर समुपस्थित थे । दानवो मे धुरन्धर हिरण्यरशिपु से वाला ॥४१॥४२॥ पाकर भवेन्मह्य बलादस्मात्पलायनम् । यद्यह हन्तवे यामि सोऽपि कमलाश्रित ॥४३ हत्वाऽह वालकचन दुस्स्पर्श स्यामकारणम् । यात धावत गृहीत योजयध्व वरूथिनीम् ॥४४ कुमार नारको दृष्ट्वा वभाषे भीपणाकृति । कि बाल योद्ध पामोऽसि प्रीड कन्दुक्लीलया। रसि त्व विसृष्टोऽत्र सङ्गरे ते हि भोरव. ॥४५ काकि का जन्म और विजय ] [ ३४१ बालस्वादथ ते वुद्धिरेव स्वल्पार्थशिनी। कुमारोऽपि तमग्रस्थं बभापे हर्षवत्तमम् ।।४६ शृणुतारकशास्त्रार्थ इह नैव निरूप्यते । शस्त्ररर्था न दृश्यन्ते समरे निर्भर भये ॥४७ शिशुत्व मावमस्थामे शिशुः कष्टो भुजङ्गमः । दुप्प्रेक्षो भास्करो वालस्तथाहदुर्जयः शिशुः । अल्पाक्षरो न मन्त्र किं सस्फुरो दैत्य दृश्यते ॥४८ तारकासुर ने कहा- इस वर्तमान समय में इस सेना से मेरा भाग जाना तो मेरे लिये अत्यन्त ही लजाजनक होगा । यदि मैं उम हनन करने वाले के सम्मुख जाता हूं तो वह भी कमलाधित है । मैं इस बालक को मारकर बिना ही किसी कारण के दुस्पश हो जाऊँगा ? जानो, दोडो, पकड लो भोर सेना को योजित करो ॥४३।। पुलम्स्य मुनि ने कहा-उम तारकासुर ने जब कुमार को देखा था तो उस ममय में यह अत्यत ही भोपा आकृति वाला होकर कुमार से बोला-तारक ने कहा-हे बालक ! क्या तू मुझ से युद्ध करने की इच्छा वाला होकर इम रणभूमि में उपस्थित हुआ है ? सभी तो तू बहुत ही छोटा बच्चा है । गेंद के खेल से अपना दिल बहला। जिन लोगो ने तुझ छोटे से बालक को यहां पर युद्ध करने के लिये भेज दिया है, ये तो इस सग्राम में स्वय बहुत ही भयभीत रहने वाले हैं ॥४४ । तू अभी बहुत ही छोटा बचा है इमलिये बचपन के कारण होने से ही तेरी बुद्धि इस प्रकार से स्वरूप अयं को ही देखने वाली है । इसके पश्चात् मागे स्थित भौर प्रत्यन्त हपंयुक्त उस दैत्येन्द्र से कुमार ने भी कहा था । ४५॥ कुमार बोले-है तारक ! सुनिये, इस समय मे शास्त्री के पथं नहीं निरूपित किये जाते हैं, यह तो संग्राम स्थल है इस समर. भूमि में भय में निर्भर ध्यक्ति को पात्रो में मपं नही दिसलाई दिया करते हैं। १४॥ हे देशराज I मुझे छोटा.मा एक शिशु मत समझो। यह शिशु पस्यात कष्टप्रा भुजङ्गम है । भास्कर भी यही कठिनाई मे जिगको देख समता है ऐसा मैं दुर्जय शिशु पालक हूँ । क्या प्रस्प प्रक्षरों वाला मन्त्र नहीं होता है ? हे देस्य ! यह भी स्फुरण्य से युक्त दिसलाई दिया करता है ।।४७.४८।।

३४२ ] [ पच-पुराग पुमारे प्रोक्तवत्येवं देस्यविक्षेप मुद्गरम् । युमारस्तं तु चिच्छेद चकणामोधवचंगा ४९ तश्विक्षेप दैत्येन्द्री भिन्दिपालमयोमयम् । करेगा त च जग्राह कातिकेयोऽमगरिहा ॥५० गदां मुमोच देत्याय समुत्याय सरस्वनाम् । तया हतस्ततो दैत्यश्वकम्पेऽनल राडिय ॥५१ मेने च दुर्जयं दैत्यस्तदा वालं सःसहम् । चिन्तयामास बुद्धया प्राप्त:कालो नमंगयः ॥५२ कम्पितं च ममालोक्य कालनेमि पुरोगमा: । सर्वे दैत्येश्वराः जघ्नुः युमार रणदारुणम् ॥५३ स तैः प्रहाररस्पृष्टस्तथा क्लेशहाद्य तिः । स वालो बलिभिवेंगरयुध्यदानवे रणे ॥५४ रणशौण्डान दैत्येन्द्रा:पुनर्जघ्नुःमिली मुसः । कुमारं ममरे दैत्याः बलिनो देवकण्टकाः ॥५५ कुमारस्य व्यया नाभूइत्यास्त्र निहतस्य तु । प्राणान्तकरण जातं देवानां दानवाहवम् ॥५६ देवाग्निपीडितान्दृष्ट्वा कुमारः कोपमाविशत् । ततोऽस्त्रारयामास दानावानामनीकिनीम् ।।५७ .. पुलस्त्य महपि ने कहा-कुमार ने जब इस प्रकार से कहा तो इम बहने पर ही दैत्यगज ने कुमार पर मुद्गर का प्रहार कर दिया था। कुमार ने अपने प्रमोघ वर्चस बाले चक्र से उस मुद्गर को छिन्न कर दिया था ॥ ४६ ।। इसके पश्चात् दैत्येन्द्र ने लौह से परिपूर्ण भिन्दिपाल नामक मस्त्र का प्रक्षेप किया था । देवों के शत्रुमों का हनन करने वाले कात्तिकेय ने उम भिन्दिपाल पत्र को अपने हाथ से ही ग्रहण कर लिया था ॥५॥ फिर कुमार ने अत्यन्त विरध्वनि वाली गदा को उठाकर उस दैत्य पर उसको छोड दिया था। उम गदा के प्रहार से हत हुमा दैत्य एक महान् पर्वत को भांति कांप उठा था ॥५१॥ इस गदा के प्रहार से चोट लाकर उस तारक दैत्य ने उस ममय मे उस बालक कुमार को कालिक का जन्म और विजय ] । ३४३ - दुर्जय पौर दु:मह मान लिया था। उसने फिर तो अपनी बुद्धि विचार किया था कि प्रध तो मेग काल प्रा हो गया है-इसमें लेशमात्र भी मशय नहीं है ।। ५२ ॥ दैत्येन्द्र तारक को कमान देखकर समस्त दैत्यों ने जिनमें कालनेमि प्रमुग्व या रण में परम दारुण कुमार पर हनन करने के लिये प्रहार किये थे।॥५३॥ किन्तु उन समस्त किये हुए प्रहारो से वह कुमार बालक परपृष्ट हो रहे थे अर्थात उन प्रहारों का स्पर्श भी उनके शरीर से नहीं हुआ था । उन फ्लेशों से महान धुनि वाले यह कुमार येग वाले और अत्यन्त बलधारी दानवों से उस रणभूमि मे युद्ध करने लगे थे ॥५४॥ रण मे शोएड अर्थात् अत्यन तेज- स्वी, धीर देत्येन्द्रो ने फिर कुमार पर वाणों के द्वारा प्रहार किये थे । घेदत्य समर में अत्यन्त बलशाली थे और देवो के कएट पर्थात दु.ख देने वाले थे ॥५५॥ विविध भानि में अस्त्रों के प्रहारो से भी कुमार को कुछ भी व्यथा नही, हुई थी और दैत्य बराबर अपने अस्त्रों से उन्हे निहत करते चले जा रहे थे । यह दानयो का महान युद्ध देवो के प्राणो का अन्त करने वाला होहमा पा ॥५६॥ देवों को अत्यन्त उत्पीडित देखकर कुमार को बड़ा भारी क्रोध पा गया था। इसके पश्चात् उसने दानवो को सेना को अपने अस्त्रों से विदीर्ण कर दिया था ।।५७॥ तरस्पनिष्प्रतीकारस्ताडितास्सुरकण्टकाः । कालनेमिमुखाः सर्वे रोह्यासम्पराङ मुखाः ।।५८ विद् तेषु च दैत्येपु प्रहतेषु समन्ततः । किनरोद्गारगीतैश्च हास्यसंन्यस्तचेतनः ।।५६ जध्ने कुमार गदया निष्टप्लकनकत्रिपा। शरमयूरचित्रंश्व चकार विमुख रणे ॥६० दृष्ट्वा पराङ्मुखो देवो मुक्तरक्त स्ववाहनम् । जग्राह शक्ति विमलां रणे कनकभूपणाम् ।।६१ चाहुना हेमकेयूररुचिरेण षडाननः । ततोऽनवीन्महासेनस्तारक दानवाधिपम् ॥३२ तिष्ठतिष्ठ सुदुर्बुद्धे यमलोकं विलोकय । हतोह्यसि मया शक्त्या स्मरस्वं दैत्यचेष्टितम् ॥६३ ३४४ ] [ पद्म पुराण बिना प्रतीकार होने वाले उन अस्रो से वे सुरो के कण्टक दुःव देने वाले कालनेमि प्रमुख समस्त दैत्य उस संग्राम में पराङ्मुख हो गये ये पौर हार मान गये थे, क्योकि जिन-जिन प्रस्त्र शस्त्रों का वे स्कन्द कुमार पर प्रक्षेप कर प्रहार करते थे उनका उमके शरीर पर स्पश तक न होकर कोई भी परिणाम नही होता था और वे सभी व्यथं चले जाया करते थे ॥५८|| जब सभी मोर से दैत्य भाग खड़े हुए और मारे गये थे तो किन्नरो के द्वारा गाये गये जो गीत थे उनमे, उमका हास्य किया था। उस हास्य से सन्यस्त चेतना वाले उस देत्येन्द्र ने संतान सुवर्ण के समान कान्नि वाली गदा से कुमार पर प्रहार किया था पोर विचित्र शरो से उस रणभूमि में स्कन्द के वाहन मयूर को विमुष कर दिया था १ ५६६० ।। स्कन्द देव ने देखा कि उनका अपना वाहन मयूर युद्ध स्थन में पराङ मुख हो गया है और उसके शरीर से रक्त-पात हो रहा है तो फिर तम स्कन्द देव ने कनक भूषण शक्ति को जो कि विमल पी ग्रहण किया था ।।६१।। भगवान् पडानन ने हेम के केयूर (पङ्गर) से सुशोभित एवम् परम सुन्दर भुजा से उस शक्ति को लेकर फिर वह महामेन दानवों के भधिप तारकासुर से, बोले ॥ ६ ॥ महापन प्रभु ने कहा-हे अत्यन्त दुध बुद्धि वाले दैत्यराज ! खडा, रह, खड़ा रह, मोर अब तू यमलोक की पोर अपनी दृष्टि डाल ले । अव तू मेरी इस महतो शक्ति से समझ ले, मारा जा रहा है । अब तू अपने दैत्यो द्वारा किये हुए चेष्टितो (कमों) का अच्छी तरह से स्मरण करले ॥६॥ इत्युक्त्वा तु तत. शक्ति मुमोच दितिज प्रति । सा कुमारभुजोत्सृष्टा तत्केयूररवानुगा ॥६४ विभेद दैत्यहृदय वज्रर्श लेन्द्र कर्कशम् । गतासु. स पपातोया प्रलये भूधरो यथा ॥६५ विकीर्ण मुकुटोष्णीषोविस्रस्ताखिलभूषणः। तस्मिन्विनिहते दैत्ये दानवानां धुरन्धरे ॥६६ नाभूत्कश्चित्तदा दुखी नरकेप्वपि पापकृत् । स्तुवन्तः पण्मुखं देवाः प्राक्रो डन्नागतस्मिताः ॥६७ जग्मुः स्वानेवभुवनान्निरस्या संस्तथोत्सुकाः ।

कार्तिक का जन्म और विजय ] [ ३४५ : ददुश्चापि वर सर्वे देवास्ते पण्मुखाय तु ! तुष्टाः सम्प्राप्तसर्वार्थास्मह सिद्ध स्तपोधनः ।।६८ यः पठेत्स्कन्दसम्बन्धो कथामेतां महामति.। शृणुयाच्छावयेद्वापि स भवेत्कीतिमान्नरः ।।६६ वहायुः सुभगः श्रीमान्कोतिमाञ्छुभदर्शनः । भूतेभ्योनिर्भयश्चापि सर्वदुःखविवर्जितः ।।७० सन्ध्यामुपास्य य पूर्वा स्कन्दस्य चरित पठेत् । सयुक्तः किन्नरे. सर्वमहाधनपतिर्भवेत् ।।७१ पुलस्त्य महर्षि ने कहा- इतना कहकर फिर स्कन्द देव ने उस शक्ति को उम दिति के पुत्र पर छोड़ दिया था । उस मुवर्ण के केयूर को धारण करने वाली भुजा से छोडी हुई उम गक्ति ने बच के पर्वत के तुल्य अत्यन्त कर्कश दैत्येन्द्र के हृदय का भेदन कर दिया था। वह फिर प्राणो के त्याग कर जाने वाला दैत्यराज प्रलय काल में पर्वत की भांति भूमि पर गिर पडा था ।। ६४०६५ ।। जब मरकर भूमि पर गिर गया था, तो उसके मस्तक का मुकुट मोर उशीप (पाग) विकीरणं होगये थे तथा अन्य सम्पूर्ण भूषण भी टूट-फूट- कर इधर उपर फैन गये थे । उम दानवो के महान धुन्धर दैत्यराज तारक के मर जाने पर उम समय मे कोई पापो के करने वाला नरकों में भी दुखिन नहीं मब देवता लोग हमले और प्रसन्न होते हुए भगवान् परमुख स्तुनि करते हुए वहाँ पर आकर आनन्द में कोड़ा करने लगे थे ॥६६॥ फिर वे सब अपने भुवनी को छोडकर वहाँ पर बडो उत्सुकता वाले होकर चले गये थे। वहाँ पर सब देवगणों ने भगवान् पण्मुख के लिये वरदान दिया था। मिद नोग तथा तपस्वीजनों के साथ सभी लोग परम मन्तुष्ट हुए ये मोर उनके समी मर्थ निष्पन्न हो गये थे 1 ६७॥ देवों ने कहा-जो कोई भी महान मति वाला पुरुष इम भगवान् बाद में मम्बन्ध रखने तारकामुर के वध को क्या का अध्ययन करेगा या इसका श्रवण करेगा अपवा इम कपा को किसी को अपए गयेगा वह मनुष्य अत्यधिक कीति वाला हो जायगा । वह बहुत अधिक मायु वाला, सोमाय-मम्पन्न, श्रीमान-पोति समन्वित, गुभ दर्शन वाला--ममस्त प्राणियों - हुप्रा था।

३४६ ]
[ पय पुराग
से भय रहित और समस्त प्रकार के कष्टों से रहित हो जायगा । यह ऐसी परम
पुण्यमयो क्या है कि इसके भक्तिपूर्वक पढ़ने-सुनने पौर सुनान स ये सभी उपयुक्त
फल वाले हो जाते हैं। जो कोई भी मनुष्य अपनी प्रान कालीन सध्या की उपा.
सना करक इस स्कन्द दव के द्वारा किये गये तारकासुर के वध किये जान वाले
परित्र को क्या को पढता है । वह समम्न किन्नरो से समन्वित होकर महान
पनपति हो जाता है ।। ६८ से ७१ ।।
।। नृसिंहावतार वर्णन ॥
इदानी श्रोतुमिच्छामि हिरण्यकशिपोर्वधम् ।
नरसिंहस्य माहात्म्य तथा पापविनाशनम् ॥१
पुरा कृतयुगे राजन्हिरण्यकशिपु. प्रभु ।
दैत्यानामादिपुरुषश्चकार सुमहत्तप. ॥२
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
जलवासी समभवत्स्नानमौनधृतग्रतः ॥३
वृत शमदमाम्या च ब्रह्मचर्येण चैव हि ।
ब्रह्मा प्रीतोऽभवत्तस्य तपसा नियमेन च ॥४
तत स्वयम्भूभंगवान्स्वयमागत्य तन हि ।
विमानेनाकंवर्णन हसयुक्त न भास्वता ॥५
प्रीतोऽस्मि तव भक्तस्य तपसानेन सुव्रत ।
वर वरय भद्र ते यथेष्ट काममाप्नुहि ॥६
भीष्म देव ने कहा-हे भगवन् । प्रम में हिरण्यकशिपु का वध किस
प्रकार से हुमा था-यह ध्वण करने की इच्छा करता हूँ। मेरो यह भी इच्छा
है कि भगवान नरसिंह का, पापो को विनष्ट करने वाला माहात्म्य भी मापसे
सुन्तु ॥१॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा- प्राचीन समय म कृतयुग मे है राजन् । त्यो
के प्रादि पुरुष प्रभु हिरण्यकशिपु मे महान तप किया था ॥ २ ॥ स्नान पोर
प्रत को धारण करने वाला होकर उस हिरण्यकशिपु ने ग्यारह हजार वर्ष नक
जल में ही निवास किया था |॥३॥ उसने शम और दम का प्रत धारण किया

नृसिंहावतार वर्णन ] 1 ३४७ था और ब्रह्मनयं के महावत से युक्त वह रहा था। इस तरह के अत्यन्त दुष्कर तप से और नियमों के धारण करने से उस पर ब्रह्माजी बहुत अधिक प्रमन्न हो गये थे ।।४। इसके अनन्तर सूर्य के समान वर्ण वाले भासमान हम युक्त विमान के द्वारा भगवान् स्वयम्भू वहाँ पर आये थे, जहां वह दैत्यराज हिरण्यकशिपु घोर तपश्चर्या कर रहा था ॥ ५॥ ब्रह्माजी ने कहा--हे सुमन ! मेरे परम भक्त तुम्हारे इस शेर नप से मैं बहुत प्रसन्न होगया हूँ । अब तुम कोई भी वरदान मुझसे प्राप्त कर लो जिससे तुम्हारी यथेष्ट कामना पूर्ण हो जावे-तेरा कल्याण हो ॥६॥ न देवाः सुरगन्धर्वा न यक्षोरगराक्षसा. । न मानुपा: पिशाचाश्च हन्युर्मा देवसत्तम ॥७ ऋपयो मानवाः शापर्नशपेयुः पितामह । यदि मे भगवान्प्रीतो वर एप वृतो मया 16 न शस्त्रेण न चास्त्रेण गिरिरणा पादपेन वा। न शुष्कण न चाण न स्याञ्चान्येन मे वधः ॥६ भवेयमहमेवार्क सोमो वायुहुताशन । सलिल चान्तरिक्ष च नक्षत्राणि दिशो दश ॥१० अह क्रोधश्च कामश्च वरुणो वासवो यमः। धनदश्च धनाध्यक्षो यक्ष. किम्पुरुपाधिपः ॥११ एप दिव्यो घरस्तात मया दत्तस्तवाद्भुत । सर्वकामप्रदो बरा प्राप्यसि त्व न समय ॥१२ एवमुक्त्वा स भगवाजगामाकाशमेव हि । वैराज ब्रह्मसदन ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥१३ ततो देवाश्च गन्धर्वा. ऋषिभिः सह चारणा । वरप्रदान श्रुत्वैव पितामहमुपस्थिता. ॥१४ हिरण्यकशिपु ने कहा-हे देवो मे परम श्रेष्ठ ! यदि पाप मुझ पर परम प्रसन्न हैं तो मैं यह वरदान चाहना हूँ कि मुझे देव, गन्धर्व, सुर, यक्ष, उरग, राक्षम, मनुष्य और पिशाच इनमे कोई भी न मार समें। हे ३४८ ] [ पय पुगण - पितामह ! अपिगण और मुनिवृन्द मुझे किमी प्रकार के पाप न दे सकें। किमी भी शस्त्र प्रस्त्र, गिरि और पाप, शुष्क तथा गोले के द्वारा मेरा वय न हो। ७॥ ICICI मैं ही मूर्य-सोम या अग्नि-सलिल-अन्तरिम समस्त नक्षत्र, दश दिशाएं। प्रोप-काम-वरण-वासव और यम हो जाऊं ॥१०॥ में घनद जो कि सम्पूर्ण धन का स्वामी है और किम्पुरुषो का प्रधिति यक्षराज हो आज-ऐसा ही घरदान मुझे दीजिए ॥११॥ ब्रह्माजी ने कहा-हे तात ! यह वरदान बहुत ही दिध्य है और अत्यन्त प्रद्भुत है किन्तु मैं तो तुझ पर इतना प्रमन्न हो गया हूँ कि मैंने भाज दे ही दिया है । यह वरदान नो तेरी मम्पूर्रा कामनामों के प्रदान करने वाला होता है । हे वत्स! तू इसे अवश्य ही प्राप्त करेगा। इसमें लेशमात्र भी सशय नहीं है ॥ १२ ॥ पुलस्त्य मुनि ने पढ़ा-~-इस प्रकार मे यह भगवान् ब्रह्माजी उस हिरण्यकशिपु से कहकर प्राकाश में जा बराम-ब्रह्मर्षिगण के द्वारा सेवित ब्रह्म-सदन है वहाँ पर चले गये थे। इसके अनन्तर समस्त देवता-गर्व पौर ऋषियो के साथ चारण लोग इस हिरण्यकशिपु को दिये गये वरदान का श्रवण कर पितामह के समीप मे समुपस्थित होगये थे ॥१३ १४॥ वरप्रदानाद्भगवन्वधिष्यति स नोऽसुर । तत्प्रसादश्च भगवान्वधोऽप्स्यविचिन्त्यताम् ॥१५ भगवान्सर्वभूतानामादिकर्ता स्वयं प्रभुः । स्रष्टा च हव्यकव्यानामव्यक्तप्रकृतिः परः ॥१६ सर्वलोकहित वाक्य श्रुत्वा देव प्रजापतिः । प्राश्वासयामास तदा सुशीतवंचनाम्बुभिः ॥१७ अवश्य त्रिदशास्तेन प्राप्तव्य तपस फलम् । तपसोऽन्तेऽस्य भगवान्वधं विष्णु करिष्यति ॥१६ तच्छु त्वा विबुधा वाक्य सर्वे पङ्कजजाननात् । स्वानि स्थानानि दिव्यानि विप्रं जग्मुमुदान्विता. ॥१६ लब्धमात्रे वरे सोऽथ प्रजास्सर्वा अवधित । हिरण्यकशिपुर्देत्यो वरदानेन गवितः ॥२० पाश्रमेषु महाभागामुनीन्दै प्रासितव्रतान् । सत्यधर्मपरान्दान्तान्धर्षयामास दानव ॥२१ नृसिंहावतार वर्णन ] [ ३५१ देते हैं । पाप सब लोग पूर्व की भाँति उसी प्रकार से त्रिदिव की प्राप्ति कर लेगे इस कार्य के होने में अब अधिक विलम्ब नहीं है । अर्थात् पाप सब देवता शीघ्र ही स्वर्ग के स्वामी हो जायेगे ॥२७।। इस तरह ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त कर प्रत्यन्त गर्व मे भरे हुए और वध करने के अयोग्य, अमरो के द्वारा गणो के सहित उस दैत्य हिरण्यकशिपु को मैं मार दूंगा ।।२८।२६।। एवमुक्त्वा तु भगवान्विश्वपो विष्णुरव्यय. । हिरण्यकशिपुस्थानं जगाम हरिरीश्वरः॥३० तेजसा भास्कराकारः शशीकान्त्येव चापरः। नरस्य कृत्वाघननु सिंहस्याद्ध तनु तथा ॥३१ नारसिंहेनवपुपा पाणि सगृह्यपाणिना । ततोददर्श विस्तीर्णा दिव्या रम्यामनोरमाम् ।।३२ सर्वकामयुता शुभ्रा हिरण्यकशिपोः सभाम् । विम्ती योजनशतं शतमध्यमायताम् ॥३३ वैहायसी कामगमा पञ्चयोजनमुच्छ्रिताम् । जराशोकक्षमापेता निष्प्रकम्प्यां शिवा सुखाम् ॥३४ पुलस्त्य मुनि ने कहा-इम समस्त विश्व के पालन करने वाले भगवान अव्यय विष्णु ने इस रोति से उन देवगण को कहकर फिर वह ईश्वर हरि हिरण्यकशिपु के निवास स्थान में चले गये थे। उस समय मे वह भगवान् विष्णु तेज से सूर्य के समान प्राकार वाले थे मोर पारीर को कान्ति उनकी ऐमो यो मानो वह दूसरे चन्द्रमा हो हो । उन्होने अपना आधा शरीर तो मनुष्य का.मा धारण किया या भोर पाषा परीर शेर जैसा बना लिया था। अर्थात् नरसिंह स्वरूपधारी मद्भुत बन गये थे जो कि नर मोर सिंह दोनों ही एक मिश्रित स्वरूप या ॥३०॥ उन नरसिंह वपुधारी मागन ने अपने हाथ में उमका हाप पड लिया था और फिर उसकी परम विस्तीर्ण प्रत्यन्त मनोरम-रम्य एवं दिव्य सभा का निरीक्षण रिया पा॥३१॥ उसकी यह ममा गम्पूर्ण कामनाओं से समन्वित पी मोर भत्पन्न शुध्र वर्ष वाली घो। हिरपशिपु को उमममा पा विस्तार सो योजन पापा और शतमध्य उमका पायतन पा ।। ३२ ।।

३५२ ]
[ पद्म पुराए
प्राकास में अपनी इच्छा एवम् कामना के प्रनुमार ही गमन करने वाली वह
उसकी मभा थी । एक योजन चार कोस का होता है इस प्रमाण से पनि योजन
को उस दैत्यराज की सभा को ऊँचाई थी । जरा (वृद्धना), शोक और क्षमा से
वह रहित थो अर्थात् उस ममा में जो भी कोई स्थित रहते थे उन पर जग
'पौर शोक का कुछ भी प्रभाव नहीं होता था। उसकी सभा प्रकम्पन के योग्य
नहीं थी अर्थात उसे कोई भी प्रकम्पित नही कर सकता था । हिरण्यकशिपु की
समा परम मङ्गलमयो पोर मुख प्रदान करने वालो यो ।।३३।३४॥
महाराज महावाहो दैत्यानामादिसम्भव ।
न श्रुतं नैव मे दृष्टं नारसिंहामिदं वपु ॥३५
अव्यक्त परम दिव्य किमिदं रूपमागतम् ।
दैत्यान्तकरणं घोरं शसतीव मनो मम ॥३६
अस्यदेवाः शरीरस्थाः सागरा: सरितस्तथा।
हिमवान्पारियात्रश्च ये चान्येकुलपर्वताः ॥३७
चन्द्रमास्सहनक्षत्ररादित्यो रश्मिभिः सह ।
धनदो वरुणश्चैव यमः शक्र. शचीपतिः ॥३८
मरुतो देवगन्धर्वा. ऋपयश्च तपोधनाः ।
लागायक्षाः पिशाचाश्च राक्षसाः भीमविक्रमाः ॥३६
ब्रह्मा देवा. पशुपतिललाटस्था: भ्रमन्ति हि ।
स्थावराणि च सर्वारिंग जङ्गमानि तथैव च ॥४०
भवाश्च सहितोऽस्माभिः सर्वद त्यगरणवृतः ।
विमानशतसवीणा सर्वा या भवत: सभा ॥४१
सर्व त्रिभुवन राजैल्लोकधर्मश्वशाश्वत: ।
दृश्यन्ते नरसिंहेऽस्मिस्तथेदं निखिल जगत् ।।४२
प्रलार ने कहा है महाराज ! हे महान बाहनो वाले ! प्राप तो
देश्यों के पदि सम्भव हैं मर्यात् दैत्यों में मबमे पादि में मापके जैसे स्वरूप
वाले हुए हैं । मैंने तो माज तक न कहीं भी प्रवण किया है और न मैंने सभी
तक पाप जसे नारसिंह परीर का अवलोकन ही किया है। यह प्रमा अवसर

सिंहावतार वर्णन ] [ ३५३ ही है जो प्राधे नर पोर माधे मिह के स्वरूप को मैं इस समय मे देख रहा हूँ ॥३५।। यह आपका परम दिव्य मोर अव्यक्त क्या रूप पाया है ? मेरा मन यह कहता है कि यह मापका स्वरूप जो कि अत्यन्त पोर है समस्त दैत्यो की समाप्ति कर देने वाला है ।। ३६ ॥ पापक इस स्वरूप में समस्त देव---मागर नदियाँ शरीर में स्थित हैं । हिमवान्-पारिपात्र और अन्य कुल-पवत भी स्थित हैं ।। ३७ ॥ ममस्त नक्षत्रा के साथ चन्द्रमा प्रौर रश्मियो के साथ सूर्य, धनद, वरुण, पिशाच और भीम पराक्रम वाले राक्षस-ब्रह्मा, देवगण मरुत, गन्यवं, तप के ही धन वाले पिगण, नाग, पक्ष, यम, शची का पति इद्र, पशुपति य एव प्रापके ललाट में स्थित होकर भ्रमण किया करत हैं । समस्त स्थावर तथा सब घर-पाप जी कि हमारे सबके महित हैं और समस्त दैत्य- गणो से वृत है इनके स्वरूप म स्थित हैं । सकडो विमानो से सङ्कोणं यह मापकी पूरी सभा सम्पूर्ण त्रिभुवन और हे राजन् शाश्वत लोक धर्म सभी कुछ तथा यह पूरा जगत् इन भगवान् नृसिंह के स्वरूप में दिखलाई दे रहा है ॥ ३८ से ४२॥ प्रह्लादस्य वच श्रुत्वा हिरण्यकशिपु. प्रभुः । उवाच दानवान्सर्वान्गणाश्व सगणाधिप ।।४३ मृगेन्द्रा गृह्यतामेप अपूर्वा तनुमास्थित । यदि वा सशय कश्चिद्वध्यता बनगोचर ॥४४ ते दानवगणास्सर्वे मृगेन्द्र भीमविक्रमम् । परिक्षिपन्ता मुदितावासयामासुराजसा ।।४५ मिहनाद विमुच्याऽथ नरसिंहो महाबल । वभत्र ता सभा सर्वां व्यादितास्यइवान्नर ॥४६ सभाया भज्यमानाया हिरण्यकशिपुः स्वयम् । चिक्षेपास्त्रारिणसिंहम्य रोपव्याकुललोचन ॥४७ सर्वास्त्राणामथश्रेष्ठ दण्डमस्न सुदारुणम् । कालचक तथा घोर विष्णुचक्र तथापरम् ।।४८ पंतामह महात्युग्न लोक्यनिर्मित महत् । विचियामशनिचव शुष्का चाशनिद्वयम् ॥४६ २५४ ] [ पद्म पुराण पुलस्त्य मुनि ने कहा-प्रह्लाद के इम वचन को श्रवण करके प्रभु हिरण्यकशिपु जो कि सभी गणो का प्रधिप था अपने समस्त गणो से मौर दानवों से बोला ॥४३।। हिरण्यकशिपु ने कहा-इस मृगेन्द्र को पकड लो को अपने इस अद्भुत शरीर में समास्थित होकर भाया है । अथवा यदि कोई सशय हो तो इस वन में भ्रमण करने वाले को मार डालो ।। ४४ ॥ पुलस्त्य मुनि ने कहा-हिरण्यकशिपु के ऐमा कहने पर वे समस्त दानव भीषण पराक्रम वाले ग्रोन्द्र पर परिक्षेप करते हुए बहुत ही प्रसन्न हुए थे तथा अपने प्रोज से भगवान् नरसिंह को त्रास देने लगे थे ।। ४५ ।। इसके अनन्तर महान् बलवान् नरसिंह ने सिंहनाद किया था मोर केलाये हुए मुख वाले अनक को भाति उस पूरी दैत्यराज को सभा को भल कर दिया था ॥४६॥ सम अपनी सभा के भङ्ग हो जाने पर हिरण्यकशिपु ने स्वयं ही क्रोध से व्याकुल लोचनो वाला होकर नरसिंह भगवान् पर प्रस्त्रो का प्रक्षेप किया था ॥ ४७ ॥ उन प्रस्त्रों में परम श्रेष्ठ एवम् सुदारुए काल चक्र तया दूसरा परम घोर विष्णु चक्र था। महत् लोक्य में निमित अत्यन्त उग्र पितामह अस्त्र था। विचित्र अशनि और शुष्का, मशनि ये दोनो अशनि थे ॥४८॥४६॥ दण्ड भस्म था। हिरण्यकशिपु दैत्या विषप्णाश्शरण ययुः । ततः प्रज्वतितः क्रोधात्प्रदहन्निव तेजसा ॥५० तस्मिन्क्रुद्ध तुदैत्येन्द्र तमोभूतमभूजगत् । श्रावह. प्रवहश्चैव विवहोऽथ समीरणः ॥५१ पगवहस्संवहन उद्वहश्च महाबलः । तथा परिवहः श्रीमानुत्पातभयश मिनः ॥५२ इत्येव शुभिताः सप्त मानो गगनेचराः । ये ग्रहास्मवलोकस्य क्षये प्रादुर्भवन्ति हि ॥५३ ते सर्वे गगने हृष्टा व्यचरं यथासुसम् । प्रयोगतचाप्यचरद्योग निशि निगाचरः।।५४ मग्रहः महनक्षस्तागपतिररिंदम । विधाता च भगवागतो दिवि दिवारः ॥५५ नृसिंहावतार वर्णन ] । ३५५ , कृष्णः कवन्धन तदा लक्ष्यते सुमहान्दिवि । असृजच्चासिता सूर्योधूमवत्ताविभावसु ॥५६ उस समय में देवगण एकदम त्रस्त होकर परम विपाद को प्राप्त होगये थे और सबने हिरण्यकशिपु की शरण ली थी। इसके पश्चात् तेज से प्रदग्य- सा होते हुए वह क्रोध से एकदम प्रज्वलित होगया था ॥ ५० ॥ उस दैत्येन्द्र के इस प्रकार से क्रुद्ध होने पर सम्पूर्ण जगत् अन्धकारमय होगया था। समीरण (वायु) प्रावह-प्रवह और विवह हो गया था ।। ५१ ।। महान् बलवान् वायु परावह, सवह, उदह और परिवह के स्वरूप वाला होकर उत्पातो के भय का कहने वाला था ॥५२॥ इस प्रकार से सात प्रकार शुभित वायु प्र क श में सञ्चरण करने वाले हो रहे थे । जो समस्त लोको के ग्रह थे वे क्षय मे प्रादुर्भूत ।। ५३ ।। वे सब गगन में यथासुख हृष्ट होते हुए विचरण कर रहे थे। प्रयोग में निशा मे निशाचर भी योग का माचरण कर रहा था ।। ५४ ।। हे अरियो के दमन करने वाले ! समस्त ग्रहों के साथ और सब नक्षत्रो के सहित तारापति और दिन मे भगवान् दिवाकर विवाना को प्राप्त होगये थे ।। ५५ ।। उस समय में दिव में महान कृष्ण कवन्ध दिखलाई दे रहा था। विभावसु सूर्य असित धूमवत्ता का सृजन कर रहा था ॥५६॥ गगनस्थश्च भगवानभीक्ष्ण परिविष्यते । सप्तधूमनिभा घोरा सूर्याः दिवि समुत्यिता ।।५७ सोमस्य गगनाथस्य ग्रहास्तिष्ठन्ति शृङ्गगा । वामे च दक्षिणे चैव स्थिती शुक्रवृहस्पती ॥५८ शनैश्चरो लोहिताङ्गो लोहिताङ्गसमधु ति । सम समधिगेहात सर्वे वै गगनेचराः ॥५६ शृङ्गारिणशनकै?रा: युगान्तावर्तनग्रहाः । चन्द्रमान सनक्षत्रो ग्रहै सह तमोनुदः ।।६० चरायविनाशाय रोहिणी मान्यमन्दत । गृहीतो राहुणा चन्द्र उल्काभिरभिहन्यते ॥६१ उल्का प्रज्जलिताश्चन्द्र व्यचरन्त यथासुखम् । देवानामधिपोदेव सोऽप्यवर्षतशोरिगतम् ॥६२ पद्म पुराण आकाश में स्थित रहने वाले भगवान् प्रभीक्षा में परिविष्ट हो रहे थे। दिव में सात धूम के सहश सूर्य जिनका महान् घोर स्वरूप था समुदित हो गये थे ॥५७॥ अन्तरिक्ष मे स्थित चन्द्रमा के ग्रह शृङ्गगामी होकर स्थित थे और वामभाग तथा दक्षिण भाग में शुक्र भोर वृहस्पति स्थित हो गये थे ॥ ५ ॥ शनैश्चर जो ग्रह था उसका वर्ण लोहित मङ्ग वाला होगया था जो रक्ताङ्ग समान द्युति वाला था । समस्त गगनेचर ग्रह समरूप से ममाधिरोहण कर रहे पे ॥ ५६ ।। युगान्त के आवर्तन करने वाले ग्रह घोर रूप वाले होते हुए शन: शन. थनो को मधिरोहण कर रहे थे और नक्षत्रों के सहित चन्द्रमा समस्त ग्रहो के साथ तम का नोदन करने वाला था ॥६०॥ वह सम्पूर्ण चर पोर अचर के विनाश के लिये रोहिणी का अभिनन्दन नहीं कर रहा था। राहु के द्वारा ग्रहण किया गया चन्द्रमा उल्काओ के द्वारा अभिन्यमान किया जा रहा था था ॥६१॥ प्रज्वलित उल्का चन्द्रमा मे सुखपूर्वक विचरण कर रहे थे। देवो के स्वामी जो देव थे वे भी शोणित (धिर) की वर्षा कर रहे थे ।।६२॥ दृश्यन्ते विविधोत्पाता: घोगः घोरनिदर्शनाः । एते चान्ये च बहवो घोररूपा समुत्थिता ॥६३ दैत्येन्द्रस्य विनाशाय दृश्यन्ते रणशसिन । मेदिन्यां कम्पमानाया द त्येन्द्र रण महात्मना ॥६४ महीधराः नागगरणाः निपेतुरमितौजस । विपज्वालाकुलवक्त्रविमुञ्चतो हुताशनम् ।।६५ चतु.शीर्पाः पञ्चशी सप्तशीपश्चि पन्नगा: । वामु'कस्तक्षकश्चैव व कर्कोटकधनञ्जयो ।।६६ एलामुख कालियश्च महापद्मश्च वीर्यवान् । सहस्रशीपरशुद्धाङ्गो हेमतालध्वज प्रभुः ॥६७ शेपोऽनन्तो महानागो ह्यप्रकम्प्यश्च कम्पिताः । दीप्यन्तेऽन्तर्जलस्थानि पृथिवीविराणि वै ।।६८ सप्तदंत्येन्द्रकोपेन कम्पितानि समन्ततः। नानातेजोधराश्चापि पातालतलचारिणः ॥६६ नृमिहावतार वन ] [ ३५७ पातालेसहसा क्षुब्धे दुष्प्रकम्प्याः प्रकम्मिताः । हिरण्यकशिपु त्यस्तदासंस्पृष्टवान्महीम् ॥७० इस प्रकार से उस समय में भनेर प्रकार के पत्यन्त घोर दिपलाई देने वाले महार घोर उत्पात जो भी ये बतलाये गये हैं तथा इनके प्रनिरिक्त मन्य भी बहन से घोर स्वरूप वाले समुस्थित होकर दियनाई दे रहे थे ॥ ६३ ॥ सब उत्पात दैत्येन्द्र के विनाश करने के लिये रण बतलाने वाले थे जो कि उम समय में दिम्ब लाई दे रहे थे। महान आत्मा वाले देवेन्द्र हिरण्यकशिपु के द्वारा यह भूमि कम्पमान हो रही थी और उम प्राम्पित भूमि पर बडे-बडे मोज वाले जो नागगग एवम् महीधर (पर्वत) थे वे गिर रहे थे जो कि अपने मुमो मे विष को बाला से ममालित पग्नि का मोचन करते जा रहे थे। ॥६४०६५।। प्रप उन नागगणों के नामों का उल्लेग किया जाता है कि उनमें चार भोपो वाले थे-च मस्तक याले -मात शिसे वाले थे ऐसे मपं थे। उनमे यासुषि, सक्षक, कर्कोटर, पनजय, काला मुग, कालिय, योवान महा- पन, गहस्र पीपा वाला, मुदान, हेमनान वन, शेष, अनन्त मोर महानाग ये मराज ऐसे में जो भी भी बम्पायमान होन योग्य नहीं है, किन्तु उस घोर समय में ये भी रनि हो उठे थे और जन के मन्दर पित हए तथा पृषियी के वियरो मे मस्थित होकर दाह हो रहे ।। ६६६६७६८ । सातो भुवन देस्येन्द्र कोर से मभी भोर कम्पिा होगये थे । बो भनेर प्रसार तेज को धारण करने वाले पातास मा तमचारी घे पोर मा दुधारा पर्यात भी नहीं पाये जाने रे योग्य थे वे भी जिम समय में पामाम मोr मेधोम हमा पानो उमरे शुस्य होन पर प्रालि हो गये थे । उम समय पहिर- पशि ने महो रामपा रिया पा ॥६६॥ गदी मूली वगलव हिरण्यपनिम्नया । जोमूनधननिघोंगो जीपूर र गगन ॥७॥ देवादिनिजी हां मिह ममुपाटन् । गतु तेन ततनोदणे मृगेन्द्रंग महानगं.। सदानुारमहापन सय निहलो युधिः ।।७२ ३५८ ] [ पद्म पुराण मही च कालश्च शशी नभश्च ग्रहाश्च सूर्याश्च दिशश्च सर्वा । नद्यश्च शैलाश्च महार्णवाश्च गता प्रसाद दितिपुत्रनाशात् ।।७३ ततः प्रमुदिताः देवाः ऋषयश्च तपोधनाः । तुष्टुवुर्नामभिदिव्यरादिदेव सनातनम् ।।७४ यत्त्वया विधृत देव नारसिंहमिद वपु । एतदेवा यष्यन्ति परापर विदो जना. ॥७५ गदो, शूली, कराल, हिरण्यकशिपु, नीमूत, पन नि?प जो कि जीमूत के समान वेगवान् था-देवारि-दितिज पोर दृप्स इन सबने भगवान् नृसिंह के ऊार आक्रमण किया था, किन्तु वह हिरण्यकशिपु मृगे द्र के द्वारा अपने अत्यन्त तं पण महान् नखो से मोङ्कार की सहायता से विदीर्ण करके युद्ध मे मार दिया गया था ।। ७१।७२।७३ ॥ उस दिति के पुत्र हिरण्यकशिपु के नाश से अर्थात् मर जाने से मही, काल, चन्द्रमा, नभ, सब ग्रह, सूर्य, सम्पूर्ण दिशाएं, नदियो, शैल मौर समस्त महार्णव प्रसाद (प्रसन्नता) को प्राप्त होगय ये ॥७४।। इसके उपरान्त सव देवगण भोर तप को ही धन समझने वाले अपि लोग बहुत ही प्रसन्न हुए थे मोर दिव्य नामो के द्वारा उन सबने उम सनातन आदि देव की स्तुति की थी। उन्होंने नृसिंह भगवान में कहा था- - हे देव ! मापने इम समय में जो यह नृहि स्वरूप वाला शरीर धारण किया है, मापके इमदारीर का परापर के ज्ञाता लोग ममर्थन करेगे ॥७५।। भवान्ग्रह्माचन्द्रश्च महेन्द्रो देवसत्तम । भवान्या विकर्ता च लोकाना प्रभवोऽव्यय ॥७६ परा च सिद्धिं च पर च सत्व पर रहस्य परम हविश्च । पर च धर्म परम यशश्च त्वामाहुरग्य परम पुराणम् ।।७७ पर च सत्य परम तपश्च पर पवित्र परम च मार्गम् । पर च यज्ञ परम च होन त्वामाहुरग्य परम पुराणम् ॥७८ पर शरीर परम च ब्रह्म पर च योग परमा च वाणीम् । पर रहस्य परमा गतिं च स्वापारम्प परम पुगणम् ॥GE एवमुनन्या तु भगवान्मर्वलोकपितामह । स्तुत्वा नारायण देव ब्रह्मलोक गत प्रभु ॥३० प्रागा के लक्षण और महिमा ] [ ३५९ ततो नदत्सु तूर्येपु नृत्यन्तीप्वप्सरः सु च । क्षीरोदस्योत्तर कूल जगाम हरिरीश्वरः ॥८१ नारसिंह वपुर्देवः स्थापयित्वा मुदीप्तिमान् । पौराण रूपमास्थाय प्रययो गरुडध्वजः ॥८२ अष्टवक्रेण यानेन भूतियुक्त न भास्वता । अन्यक्तप्रकृतिदेवः स्वस्थानं गतवान्प्रभुः ॥८३ ब्रह्माजी ने कहा- हे नृसिंह देव ! भाप ही ब्रह्मा-रुद्र मौर देवो में परम श्रेष्ठ महेन्द्र हैं । माप इन समस्त लोको के मृजन करने वाले विकर्ता अर्थात् विघटन करने वाले पोर प्रभु हैं तथा पाप नाश रहित हैं ॥७७।। प्राप ही परासिदि, परम मत्व, परम रहस्य, परम हपि, परम धर्म, परम यश, माय पोर परम पुगण कहे गये हैं 11४७॥ हे देव ! पापको परम सत्य-परम तप-परम पवित्र-परम मार्ग-परम यश-परम होत्र और पापको हो परम पुराण आदि मे होने वाले कहते हैं 1५८ परम गरीर, परम ब्रह्म, परम योग, परमावाणी, परम रहस्य, परमागति पौर परम पुराण मय पापको ही कहते हैं ॥७६। पुलस्त्य मुनि ने कहा--समस्त लोको के पितामह भगवान ब्रह्माजी इस प्रकार से नृमिह देव मे प्रार्थना करके और नारायणदेव का स्तवन करके ब्रह्माजी फिर अपने ब्रह्मलोक को पले गये थे ॥८०।। इसके अनतर हर्षा. निरेक के कारण पूर्ण के बजाये जाने पर मोर ममरापो के नृत्य किये जाने पर भगवान् हरि ईश्वर क्षीर सागर के उत्तर तट पर चले गये थे ॥८॥ ने अपना नारमिह पारीर पहा पर स्थापित करके फिर मुदीप्तिमान भगवान् गरुडध्वज मरने पुराने स्वरूप मे ममास्थित होकर वहाँ में पले गये थे ॥२॥ अव्यक्त प्रकृति वाले प्रभु प्राट पहिए वाले-विभव में गमवित देदीप्यमान यान के द्वारा अपने स्थान को चले गये धे॥८॥ ॥ ब्राह्मण के लवण और महिमा ।। कञ्चपूज्यनमो विप्रो लग्यो वाऽथ को भवेत् । विप्रम्य लक्षण हि याथातथ्य गुरोरपि ॥१

३६० ]
[ पम पुराण
पूज्यः श्रोत्रियको नित्यं सदाचारसमन्वितः ।
सवृत्तः कलुपमुक्तस्तीर्थभूतोजनोऽनघः ॥२
जातः कः श्रोत्रियस्तात मत्कुले वाप्यसत्कुले ।
सदसत्कर्म कर्ता वा कः पूज्यो भुवि वाडवः ॥३
सच्छोत्रियकुलेजातो ह्यक्रियो नेवपूजितः ।
असत्क्षेत्रकुले पूज्यो व्यास वैभाण्डको यथा ॥४
क्षत्रियाणां कुले जातो विश्वामित्रोऽस्ति मत्समः ।
वेश्यापुत्रो वमिष्ठश्च अन्ये सिद्धा: द्विजादय. ॥५
तस्मात्सच्छोनियादीना शृणु पुनक लक्षणम् ।
धराया तीर्थभूताना सर्वपापहराय च ॥६
जन्मनाबाह्मणो शेय. संस्कारद्विज उच्यते ।
विद्ययायातिविप्रत्व प्रिभि:श्रोत्रिय लक्षणम् ॥७
श्री देवपि नारद जी ने कहा-इस लोक में मबसे अधिक पूज्यतम विप्र
कौन-मा होता है और अपूज्य कौन-सा विप्न होता है ? नारद मुनिने ब्रह्माजी से
पूछा था कि गुर जी ! वित्र का ठीक-ठीक लक्षण मुझे बतलाइये । १।। ब्रह्माजी
ने कहा-जो विप्र श्रोत्रिय हो और नित्य हो सदाचार से ममन्वित हो, सत्
चरित्र वाला हो, समस्त प्रकार के क्लुपो के मुक जो अनघ विप्र होता है वह
तीर्थ स्वरूप हुमा करता है ॥२॥ नारद जी ने कहा है नात ! साकुन
मे प्रयवा
असत्कुल मे भी कोन श्रोत्रिय समुत्पन्न हुपा है ? सत्कर्म प्रयवा अमकर्म का
करने वाला कोन है ? और इस भू मण्डन में पूजा के योग्य बाइब कौन है ?
श्री ब्रह्माजी ने कहा-जो मत् पोर श्रोत्रिय कुल मे उत्पन्न हुमा हो और क्रिया
से हीन हो तो वह कभी भी पूजित नहीं हो सकता है। जो अमत्कुल मे तथा
अमत् क्षेत्र में समुत्पन्न हुप्रा हो वह भी पूज्य हो जाना है जिस तरह व्यास तथा
चमाण्डक पूज्य हो गये है ॥४॥ विश्वामित्र महपि तो क्षत्रिय कुन में उत्पन्न हुए
थे किन्तु उनकी तपश्चर्या की क्रिया ऐमी उत्त्चस्तर को थी कि वह मेरे समान
ही जगत्पूज्य एवम् वन्दनीय हो गये है । वमिष्ठ महामुन वेश्या समुत्सन्न पुन
है-मौर इनके अतिरिक्त अन्य भी द्विज प्रादि मिद्ध हैं। ५॥ इमलिये हे पुन !

प्राह्मण के लक्षण और महिमा ] । ३६१ . इम घरा मंडल में सम्पूर्ण प्रकार के पापों के हरण करने के लिये तीर्थ स्वरूप श्रोत्रिय प्रादि के लक्षण तुम मुझ मे श्रवण कर लो ।।६।। ब्राह्मण तो जन्म से . होता है अर्थात् ब्राह्मण के यहाँ उत्पन्न होने से ब्राह्मण कहलाता है किन्तु यह द्विज तभी होता है, जबकि उसके समुचित संस्कार किये जाते हैं। जब उसे विद्या प्राप्त होती है तो उसको विश्व का पद मिलता है। ये तीनों प्रकार के लक्षण प्राप्त होने पर ही श्रोत्रिय कहलाता है। ब्राह्मण कुल में उत्पत्ति-- सस्कारों से मन पौर विद्वत्ता का लाभ ये तीनों ही होने पर श्रोत्रिय का लक्षण घटित होता है ||७|| विद्यापूतो मन्त्रपूतो वेदपूतस्तथैव च । तीर्थस्नानादिभिर्मेध्यो विप्रः पूज्यतमः स्मृतः । नारायसदा भक्तः शुद्धान्तःकरणस्तथा । जितेन्द्रियो जितक्रोधस्समः मर्वजनेषु च 16 गुरुदेवातिथेभंक्तः पित्रोः शुधू पणेरतः । परदारे मनो यस्य कदाचिन्नव मांदते ॥१० कामक्रोधादिनिमुक्त इन्द्रियरमितः पुमान् । परदागन गृह्णाति मनसाऽपि गृहागतान् ।।११ विद्या प्रति वेद विद्या से पवित, मन्त्री मे अर्थात् सभी प्रगर के सुमंस्कारों के द्वारा पून मोर वेद म पवित्र तथा तीयों के स्नान प्रादि पवित्र विरही परम पूज्य कहा गया है। भगवान् नारायण के चरणों में मांदा भक्ति रखने वाला~-प्रत्यन्त शुद्ध अम: पालाइन्द्रियो को अपने वा में उम्पकर उन्हे मीन लेने वाला-ग्रोध पर नियन्त्रण परके कभी भी क्रोपको न करने वाला और समस्त मनुष्यों को समान पि मे देगने वाला पर्यात मर को प्यार करने वाला जो विप्र होता है व ममा परम पूज्य होता है l अपने श्री गुरुपरण-देवगण पोर पतिथियों में से भक्ति भाव रमने वाला है अपने माता-पिता की मेवा में गवंदा जोरलि रखना है पोर परात्री में निता पन कभी भी मुदिन नही होता है वही विप्र मा पृश्यतम ता है to प्रो साम, कोय मामि गमो मेगा मुक रहता है और शिम

३६२ ]
[ पग-पुराण
ऊपर इन्द्रियों का कोई भी प्रभाव नहीं होता है अर्थात् जो पुरुष इन्द्रियों को
जीत लेता है तथा पराई स्त्रियों को कभी भी ग्रहण नही किया करता है और
घर मे आकर स्वय समुपस्थित हो जावें तब भी उनकी भोर जिसके मन में भी
कोई विकार समुत्पन्न नहीं होता है वही पुरुष सबसे अधिक पूज्यतम होता
गायत्र्या लक्षणं किं वा प्रत्येकाक्षरजंगुणम् ।
कुक्षि चरण गोत्राणा तस्याव हिसुनिश्चयम् ।।१२
छन्दो गायत्रीगायत्र्याः सविता देवता ध्रुवम् ।
शुक्लवर्णा त्वग्निमुखा विश्वामित्रऋपिस्तथा ॥१३
ब्रह्मणश्शिर प्रारूढा रुद्रविप्गुहृदि स्थिताः ।
उपनयने नियोगः स्यात्सालघायनसगोत्रजा ॥१४
त्रैलोक्यचरणा ज्ञेया पृथिवीकुक्षि संस्थिता ।
चतुर्विशतिस्थाने च पादादौ मस्तकान्तके ।।१५
चतुर्विशत्यक्षर न्यस्य ब्रह्मलोक स विन्दति ।
प्रत्यर्णदेवताज्ञात्वाविष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ।।१६
अपरच प्रवक्ष्यामि गायत्र्या लक्षण ध्र वम् ।
सप्त पञ्च तथा ब्रह्मा यजुरष्टादशाक्षरम् ।।१७
ज्वलनादिहकारान्त जले स्थित्वा शतं जपेत् ।
उपपातककोट्या तु तथातिपातकैरपि ॥१८
ब्रह्महत्यादिभिः पापमुक्ता यान्ति ममालयम् ।

ब्राह्मण के लक्षण और महिमा ] स्थान में होती है ।। १५ । इस प्रकार में इसके इन चौबीस अक्षरों का न्यास करने वाला पुरुष ब्रह्मलोक को प्राप्त किया करता है। प्रत्येक वर्ण के देवतापों का ज्ञान प्राप्त करने वाला पुरुप ब्रह्म सायुज्य को प्राप्ति करने का लाम किया करता है ॥१६॥ अब हम दूसरा गायत्रो का सुनिश्चित लक्षण बतलाते हैं । सप्त तथा पञ्च ब्रह्मा तथा अष्टादशाक्षर एजुज्वलन प्रादि लेकर हफार के पात पर्यन्त जल मे संस्थित होकर एक सौ बार जाप करे तो करोडो उपपातक तथा अति पातको से भी मुन्न हो जाता है ॥ १७॥१८ । ब्रह्म हत्या आदि के जो महान पाप होते हैं, उनसे भी मुक्त होकर फिर वह जाप करने वाले पुरुप सीधे मेरे ग्रालय ब्रह्मलोक को ही प्राप्त होते हैं । मन्त्र का प्राकार यह है-"ॐ पाने वकि पुसि यजुर्वेदेन जुधात सोमं पिब स्वाहा" ॥१६॥ . गायत्री यो जपेन्नित्यं प्राणायाम समन्विताम् । प्रत्यक्षगमरंयुक्ता स्वाङ्गोविन्यस्थतामपि ॥२० सर्वपापाद्विनिमुक्तो जन्मकोटिकृतादपि । ब्रह्मण पदवी प्राप्य स गच्छेत्प्रकृते परम् ॥२१ प्राणायामयुता तस्माद्गायत्री जप नारद ॥२२ प्राणायामाः कथ ब्रह्मन्प्रत्येकाक्षरदेवता । तपा न्यास तथाङ्गपु ३६ नात यथाक्रमम् ॥२३ गुददेशेवयान स्यादिप्रारणोऽस्तिदे हन । सम्माद्गुदममाकुन्च्य प्रारणेनसहयोजयेत् ।।२४ पूरकेण तदा पुत्र कृत्वा कुम्भव मुत्तमम् । प्राणायाममय कृत्वा गायत्री सञ्जपेदाद्विज ॥२५ अनेनैव जपेद्यस्तु महापातकसञ्चय । सकृदुचारितेनैव क्षय यात्युपपातकम् ॥२६ प्रतिवर्णस्वर ज्ञात्वा विन्यसेद्यः बलेवरे । स जनो ग्रहातामेति फल वक्तुं न शक्नुमः ॥२७ प्रत्यक्षरम्य यद्दे व शृगु पुय वदाम्यहम् । याप्रका व पुनर्मानु स्तन न पिनति दिन. १२८ ३६४ ] [ पम पुगए जो पुरुष प्राणायाम पूर्वक अर्थात् प्राणायामो के सहित गायत्री का जाप नित्य ही किया करता है, जिस गायत्री के प्रत्येक प्रक्षरो के देवतामो का भी स्मरण करते हुए जाप करे तथा उन प्रत्येक अक्षरो का विन्यास भी अपने समुचित मङ्गो पर यथाविधि करके ही गायत्री का जप करना चाहिए ॥२०॥ इम रीति से गायत्री का जप करने वाता पुरुष समस्त प्रकार के महान् से भी महान् पापो से विनिमुक्त हो जाया करता है, चाहे वे पाप करोडो जन्मो में क्यो न किये हो । गायत्री के जाप को करने वाला पुरुष ब्रह्मा की पदवी को प्राप्त करके प्रकृति से भी पर को चला जाया करता है ॥ २१ ॥ देवपि श्री नारदजी ने ब्रह्माजी से पूछा था-नारद बोले-है ब्रह्मन् ! भव माप कृपाकर यह बतलाइये कि जो मापने प्राणायामो का बहुन अधिक महत्त्व बतलाया है वे प्राणायाम किस विधि से किये जाते है ? और यह भी बतलाइये कि जिस वेद जननी भगवती गायत्री देवी के चौबीम अक्षर हुमा करते हैं, उन अक्षरो के देवता कौन-कौन होते हैं तथा उनका प्रक्षरों का न्यास अपने शरीर के मङ्गो में किस प्रकार से भोर किम विधि से किया जाता है ? हे तान ! यह सब क्रम- पूर्वक मुझे बतलाइये ॥२२ २३॥ इम रोनि से नारद के प्रश्न करने पर ब्रह्माजी ने कहा-मानव के शरीर के जो प्रङ्ग हैं उनमे गुद देश मे तो पान वायु रहता है और देहधारी के हृदय मे प्राण वायु निवास किया करता है । इसलिये गुदा का ममाकुचन करके उमको प्राए के साथ योजित करे ॥२४॥ उस समय पूरक के द्वारा फिर उत्तम कुम्भक करे । प्राए वायु को ऊपर खीचन को पूरक मोर उमे रोककर रखने को कुम्भक कहते हैं । इम रीति से द्विम को चाहिए कि तीन बार प्राणायाम करे और उस प्राणायाम में गायत्री का जाप करता रहे । कुम्भक के पश्चात् जो प्राणायाम मे श्वास को शन. शनैः छोहा जाता है उसका नाम रेचक होता है ॥५॥ इमी रीति से जो जप पिया करता है उसके महापातकों का ममुदाय भी हो तो सब विनष्ट हो जाया करता है। एक ही बार उच्चारित करने से उपपाता का क्षय हो जाता है ।। २६ ।। प्रत्या वर्ग और स्वर का ज्ञान प्राप्त करके जो पुरष अपने शरीरावयवो में उनका विन्याम दिया मरता है वह मनुष्य तो ब्रह्मा के स्वरूप को ही प्राप्त हो जाता है । उभा और विशेष जो भी फल होता है उसे तो हम वर्णन करने में है पुत्र .

ब्राह्मण के लक्षण और महिमा ] की शक्ति ही नहीं रखते हैं ॥२७।। गायत्री के प्रत्येक अक्षर के जो देवता होते हैं हे पुत्र ! उनको मैं तुम्हे बतलाता हूँ, तुम श्रवण करो ! इन सब गायत्री के प्रक्षगे के देवताओं का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाला पुरुष फिर इस ससार में जन्म प्रहरण कर माता का स्तन नही पिया करता है। तात्पर्य फिर उसका जन्म ही नही होता है ॥२॥ प्राग्नेय प्रथम ज्ञेयं वायव्य तु द्वितीयकम् । तृतीय सूर्यदेवत्य चतुर्थ वे (यु) त तथा ॥२६ पञ्चम यमदं वत्य वारुण पष्ठमुच्यते । सप्तम वाहम्पत्य तु पाजन्य चाष्टम विदुः ।।३० ऐन्द्र व नवम ज्ञेय गान्धर्व दशम तथा । पौरामेकादश विद्धि मंत्र द्वादशक म्मृतम् ।।३१ त्वाष्ट्र त्रयोदश ज्ञेय वासव तु चतुर्दशम् । मारुत पञ्चदशक सौम्य पोडशक स्मृतम् ॥३२ आङ्गिरस सप्तदश वैश्वदेवमतः परम् । आश्विन चैकोनविंश प्राजापत्य तु विशकम् ।। सर्वदेवमय ज्ञेयमेशिकमक्षरम् । रौद्र द्वाविशक शेय ब्राह्म ज्ञयमत परम् ॥३३ वैधरणव तु चतुविशमेता अक्षरदेवताः । जपक ले तु मञ्चिन्त्य तासु सायुज्यता व्रजेत् ॥३४ ज्ञात्वा तु देवतास्तस्य वाडमय विदित भवेत् । सर्वपापविनिमुक्तो ब्रह्मणः पदवी व्रजेत् ।।३५ गायत्री का जो प्रथम अक्षर है उसे प्राग्नेय ही समझना चाहिए प्रांत उग प्रथप पक्षर का देवता प्रग्नि होता है। दूसरा मशर वायटय है प्रति गायत्री के दूसरे पक्षर का देवना वायु है । तृतीय पक्षर वा देवता मूर्य है पोर चतुषं पहर का भी सूर्य हो देवता होते हैं ॥२६॥ पश्चम वर्ण का यम देवता है-छठे प्रक्षर का वरुण देवता है-सप्तम वणं का वृहस्पति देवना है-गायत्री के माठ वर्ण का पर्जन्य देवता है।३०॥ नवम प्रसर का देवता इन्द्र होता [ पद्म-पुराण । - है। दशम अक्षर का गन्धर्व देवता है । एकादश का अक्षर पूषा देवता होता है, बारहवें भक्षर का देवता मित्र होता है। ऐसा घतलाया गया है |॥३१॥ तेरहवें अक्षर का देवता त्वष्टा है । चौदहवें अक्षर का देवता वासव है । पन्द्रहवें वर्ण का मरुत देवता है । सोलहवें व का देवता सोम होता है ऐसा कहा गया है ॥३२॥ सत्रय वर्ग का देवता मङ्गिरा है-अठारहवें वर्ग का विश्वेदेवा देवता है । उन्नीसवें भक्षर का देवना अश्विनीकुमार है । बीसवें वर्गा का देवता प्रजा. पति होते हैं ॥ ३३ ॥ गायत्री का जो इकोसा प्रक्षर है उसके सभी ऊपर बताये देवना हुमा करते हैं। बाईसवें वर्ण के देवता मद्र हैं तथा तेईसवें वणं के देवता ब्रह्मा होते हैं ।३४. गायत्री देवी का जो चौबोसयां प्रक्षर है उसके देवता भगवान् विष्णु होते हैं । इम रीति से चौबीसो अक्षरी के ये देवता हमा करते हैं । जिस समय में गायत्री मन्त्र का जाप किया जावे उम समय में इन अक्षरो के बताये हुए देवो का भी ध्यान करते हुए जप करे। ऐसा करने पर मह जापक तनमें सायुज्यता को प्राप्त किया करता है । गायत्री के देवतामो के ज्ञान को प्राप्त करके जो जप किया करता है उसे सम्पूर्ण पाइ मप विदित हो जाता हैं मोर वह फिर मब पापो से छुटकारा पाकर मन में ब्रह्मा की पदवी को प्राप्त कर लेता है ।।३।। गायत्री विन्यसेत्पूर्व शरीरे चात्मनो बुधः। चतुर्विशतिस्थानेषु प्रापादमस्त केषु च ॥३६ तत्कारं विन्यसेद्योगी पादाड गुप्ठेविचक्षणः । मकार गुल्फदेशे तु विकारं जङ्घयोन्यसेत् ॥३७ तुकारं जानुपध्ये च वकारं चोरुदेशत: । रेकारं गुह्यदेशे तु शिकारं वृपणेन्यसेत् ॥३८ यद्वार कटिंदेशे तु भकारं नाभिमण्डले । गोकार जठरे न्यस्य देकार स्तनयोन्यसेत् ।।३६ वकार हृदये न्यस्य स्थकार करदेशतः। धोकार वदने न्यस्य मकार तालुके न्यसेत् ॥४० हिकार नासिकाग्रे च धिकार चक्षुपोन्यसेत् । योगारंतु भ्र वोर्मध्ये योकार च ललाटके ।।४१ ब्राह्मण के लक्षण और महिमा ] नः कार तु मुखे पूर्व प्रकार दक्षिण मुखे । चोकार पश्चिमे न्यस्य दकार चोत्तरे न्यसेत् ॥४२ गायत्री मन्त्र मे चौबीस मक्षर होते हैं मोर जन चौबीस प्रक्षरो के पृथक् पृथक् प्रत्येक प्रक्षर के देवता हुमा करते हैं जिनका वर्णन कर किया गया है। गायत्री जप के समय में उनका ध्यान करते हुए ही जप करना चाहिए अब उन चौधोमो अक्षरो का अपने मङ्गो में न्याम करने का विधान बतलाया जाता हैं । बुध पुरुष को सर्व प्रथम अपने शरीर मे उन अक्षरों का न्याम करना चाहिए । पद से लेकर मस्तक पर्यन्त शरीर के चौबीम स्थान हैं, उनमें ही सन चौगोस अक्षरो का विन्याम करे ॥३६॥ विचक्षण योगी पुरुष को गायत्री का जो प्रथम प्रक्षर "तत्"-है । उसको प्रपन शरीर के चरण अंगूठे में म्यास करना चाहिए । इसके पश्चात गायत्री का दूसरा पक्षर ""-है उमका स्याम गुल्क मे करे । "वि"-.इमका न्याम दोनो जांघो मे करे । ३७॥ "तु"-इमका न्याम जानुप्रो के मध्य में करे । "व"- याप्त का देश में करना चाहिए। "रे"-कान्यास गुह्य देश मे परे । "fण'-~4 न्याम दोनो पक्षों में करना चाहिए ॥३८॥ "य"-इस मक्षर का विन्याम शरीर के कटि (व मर) देदा में करे। “भ"-इस वणं का न्यास नाभि मण्डल में करना चाहिए। "गो"- इसका दिन्यास अपन जठर (पेट ) मे करे । "८" " स्याम स्तनों में बरे ॥३६॥ "व"-~इस वर्ग का न्याम हृदय में करना चाहिए । "स्य"- याम करो में घरे । घो"-~का विन्याम वदन में कर । "म"-11 तातु में विन्यास परना चाहिए ।।४।। "हि" '-हम वर्ग का विधाम नामिका कमग्रभाग में परे । "घि"-~मा न्यास दोनो नेत्रो में परे। "यो"--इगया न्याम दोनों भौहों के मध्य में करना चाहिये । दूसरे "यो"-मा न्याम लमाट में करे ॥४॥ ":"-इमका न्यास मुम्ब में करे अर्थात् मुख के पूर्व भाग में करना चाहिए। ":"--का मुय के दक्षिण भाग में, "चो"-41 मुम के पश्चिम भाग में और "द"- न्यास मुम के उत्तर भाग में करना चाहिए ॥४२॥ यात्कार मूनि विन्यम्यसर्वव्यापी व्यवस्थितः । एतान्विन्यस्य धर्मात्मा ब्रह्मा विष्णुभिवात्मकः ।।४३ ब्राह्मण के लक्षण और महिमा ] [६६ ॐस्व', महः, जनः, चाहिए । "ॐ धियो यो नः प्रचोदयात्"- '-इमका न्यास दोनों हायों मे करे । ॥४६।। "ॐ प्रापो ज्योतीरसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्"-इससे उधक के केवल स्पर्श करने से हो पाप से पूत होकर भगवान् हरि की समिधि में श्याम करने वाला पहुंच जाता है । ४७ । गायत्री का पूरा स्वरूप-ॐ भूः, ॐ भुरः, ॐ तपः, ॐ सत्यम्, ॐ तत्सवितुर्वरेण्य भगो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्, ॐ प्रापो ज्योती रमाऽमृत ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम्" यह है ।।४८१४६। इस प्रकार मे समस्त व्याहृतियों से समन्वित-प्रणवो से । युक्त, दश मोकारो वाली गायत्री को मध्योपामना करने के समय में प्राणा- याम के कुम्भक में तीन बार जार करे । मूर्यो स्थान में चौबीम अक्षरो पाली सावित्री का जाप करके द्विज महाविद्या से अधिक सम्पन्न हो जाया करता है । पौर ब्रह्मत्व की प्राप्ति कर लेता है । हे पुत्र ! छ कुक्षिमी के लक्षणो वाली गायत्री का तुम यत्न पूर्वक श्रवण करो जिसका ज्ञान प्राप्त करके द्विज परम ग्रह्म स्थान को प्राप्त करता है । गायत्री का साधारण स्वरूप-"ॐ तस्मवितु- वरेण्य भगो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्" यह होता है ।।५।। एव विप्रो न जानाति स एव ग्राहाणाधमः । न तस्य क्षीयते पाप्मा भवेद्भरि प्रतिग्रहः ।।५१ इमा यो वेत्ति गायत्री सर्ववीजसमन्विताम् । म वेत्ति चतुगे वेदान्योगज्ञान जपत्रयम् ॥५२ य एना नेय जानाति मशूद्रात्परतः स्मृतः। तस्थापूनस्य विप्रम्य न देय पितृपावणम् ॥५३ न स्नानफलद कश्चित्सवंच निष्फलं भवेत् । विद्याक्त्ति तथा जन्मद्विजत्वकारगयतः ॥५४ निष्फल मकल तस्य मेध्य पुष्प यथाऽनुचौ । चतुर्वेदाश्च गायत्री पुरा व तुलिता मया ५५ चतुर्वेदात्पगगुरू गायत्री मोक्षदा स्मृता ! दाभिन्मजनितं पातेन च पुरातम् ॥५६ वियुग तु महह्मण गायत्री हन्ति वित्विषम् । गायत्रीमक्षमालापा गायं पातश्व को जात् ॥५७ ३७० ) [ प पुराण इस प्रकार से जो विप्र नहीं जानता है वह हो प्रथम ग्राह्मण होता है। • उस ब्राह्मण के पायो का कभी क्षय नहीं हुआ करता है और वह जो प्रतिग्रह लेता है उससे वह पाप मोर भी अधिक हो जाता है ॥५१॥ जो विप्र इम वेद जननी गायत्री को ममस्त बीजों से समन्वित होने वाली भली भांति से जानता वह चारो वेदो का ज्ञान रखना है अर्थात् चारो वेदों के ज्ञान का फल उमे प्राप्त होता है और योग का ज्ञान तथा तीनो जपों का फन उसे मिल जाता है ॥५॥ जो विप्र इम परादेवी गायत्रो का यथायं ज्ञान नहीं रराता है वह शूद्र से भी मधिक नोंच है-ऐसा बताया गया है । ऐमे अपून अर्थात् पवित्रता से होन विप्र को कभी भी पितृ पार्वण श्राद्ध नहीं देना चाहिए अर्थात् पितृगण के पार्वरण श्राद्ध के योग्य पात्र नही होता है ॥५३॥ कोई भी स्नान के फल का प्रदान करने वाला नही होता है । उमका मभी कुछ निष्फन होता है क्योकि हिमत्व प्रप्त करने के कारण ब्राह्मण कुल में जन्म विद्यारित होता है ॥५४॥ ऐमे सस्तार होन ब्राह्मण का सभी कुछ निष्फल होता है जिस प्रकार से पवित्र पुष्प किमी अपवित्र स्थान में पड जाने पर वेकार हो जाया करता हैं । ब्रह्माजी ने नारद से कहा कि मैंने पहिले चारो वेद और ग यत्रो को तुला मे रखकर तोला या ॥५५॥ चारों वेदो से गायत्री गोरव वाली हुई थी जो कि पर मोक्ष के प्रदान करने वाली है । यह वेद जननी गायत्री दश जन्मों में उत्पन्न हुए और सो जन्म मे पहिले किय हुए, तीन युग और सहत्र जन्म में किये हुए भी पाप का नाश कर दिया करती है । इसको इस प्रकार की महिमा है। जो विप नित्यप्रति प्रक्षमाला म सायङ्काल और प्रातःकाल म गायत्री का जप पिया करता है उसको पाप कभी भी नही लगता है तथा वह परमार्थ मोक्ष की प्राप्त कर लेना है जिससे इस संसार में जन्म मरण का दुख कभी नहीं होता है ॥५६५७॥ ॥ सदाचार वर्णन ॥ ब्राह्मणस्यसदाचार क्रम ब्रूहि च कर्मणाम् । इतरेषा च वर्णाना प्रवृत्तमखिलवद ॥१ प्राचाराल्लभते चायुराचाराल्लभतेसुखम् । प्राचागेत्स्वर्गमोक्ष च प्राचारोहन्त्यलक्षणम् ॥२ सदाचार वर्णन ] [ ३७१ अनाचारो हिपुरुपो लोकेभवतिनिन्दित । दुखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च ॥३ नरकेनियतवासो ह्यनाचारानरस्य च । आचाराच्च पर लोकमाचार शृणुतत्त्वतः ॥४ गोमयेन ग्रहेनित्यं प्रकुर्यादुपलेपनम् । प्रक्षालयेत्तत.पीठं काष्ठं पात्र शिलातलम् ॥५ भम्मना कांस्यपान तु ताम्रमम्लेन शुद्धयति । शिलापान तु तैलेन फाल गोपाल केनतु ॥६ स्वर्णरोप्यादिपाय तु जलमात्रेणशुध्यति । अग्निनालोहपानं तु पाकप्रक्षालनेन तु ॥७ । देवर्षि नारदजी ने ब्रह्माजी से पूछा-हे भगवन् ! माप मुझे पावर यह्मण का मटाचार क्या होता है और उनके कर्मों का क्रम किम प्रकार का हुआ करता है-यह बतलाइये । ब्राह्मणों के अतिरिक्त क्षत्रिय-वश्य और शूद्र जो इनर वर्ण होते हैं उनके विषय में भी बतलाने का मभी कुछ क्रम रहिए II ब्रह्माजी ने कहा-हे नारद । प्राचार को बहुत बड़ी महिमा है । प्राचार से पुरुप प्रायु को प्रधिकता का लाभ प्राप्त पिया करता है। प्राचार से मनुष्य का सुख मिलता है । यह प्राचार ही एक ऐमा महत्त्वशाली होना है कि इससे मनुष्य को स्वर्ग तथा मोक्ष को भी प्राप्ति हो जाती है। प्राचार बुरे लोगो या विनाश कर देता है ।। २ ॥ जो पुरप प्राचार से होन होना है वह लोक में निन्दिन हो जाता है। प्राचार शून्य पुरुष को सर्वदा दुस हो दुस भोगने परा करते हैं और रोगी तथा छोटो घायु वाला भी हो गया करता ३ माधार में रहित मनुष्य होता है उसका नरक में निपन रूप मे वामहमा करना है । जो पावार से युक्त होता है वह परम प्रेट लोक की प्राप्ति किया करता है सब तास्तिक हा मे तुम आचार या श्रवण करो ॥४॥ सर्व प्रथम प्रापार रा पाजो शुदि एवम् पिता है, उमे रतलाया जाता है । नित्यनि पर में गोमय से उपनेपन करना चाहिए। इसके उपरान्त जस में पोर---पात्र और शिमा तना प्रक्षालन करे। पीठादि को गुदि जल प्रशासन से ही हो २७२ ] [ पप-पुगण जातो है ॥ ५॥ पारी के पात्र की मुधि भस्म में होती है और सास के पात्र खटाई डालकर गुर किये जाते हैं । शिला के प्रति पाथर के जो पात्र होते हैं उनकी शुद्धि तेल से सपा काम की शुद्धि गोपालों के जरिये से होती है ॥६॥ स्वर्ण और रोय मर्यात घादी के जो पात्र होते हैं उनको दादि वन जन के प्रक्षालन में हो हो बाती है । लोहगार को शुदि अग्नि पोर पाक प्रक्षालन से हमारती है ॥७॥ सननादाहनाच्चव उपलेपनधावनात् । पर्जन्यवपणाच्चव भूरमेध्या विशुध्यति ।। तेजसानां मणीनाञ्चमर्वम्याश्ममयस्य च । भस्मभिमृत्तिकाभिश्च गुद्धिरक्ता मया पुग IIE शय्या भार्या शिशुवस्त्रमुपवीत कमण्डलुः । प्रात्मन.ययिताशुद्धा न परेषां कदाचन ॥१० न भुञ्जीतकवस्त्रेण न स्नायादेकवाससा। न धारयेत्तरस्यैव स्नानवस्य कदाचन ।।११ सस्कार केशदन्ताना प्रातरेव समाचरेत् । गुरूणां च नमस्कार नित्यमेव समाचरेत् ॥१२ हस्तपादे मुखेचैव पञ्चाद्रों भोजनचरेत् । पञ्चाकस्तु भुञ्जान दात वर्षाणि जीवति ॥१३ देवताना गुरोगज्ञा स्नातकाचार्ययोरपि। नाकामेकामतश्छाया विप्रम्य दीक्षितस्य च ॥१४ जो अपवित्र एम् शुचि भूम का भाग होता है उसको शुद्ध कई प्रकार से होती है । खोदार ऊरर की मिट्टी अलग कर देने से, भूपि पर काष्ठ फूम मादि डालकर जला देने से, ग मय पादि से लोपने से और धावन से मोर मेघ के द्वारा वृष्टि हो जाने में प्रमैध भूमि की शुद्धि हो जाती है । उक्त विधानो में से कोई भी एक विधान भूमि का शोधक होता है ॥८॥ मैंने पहिले मी तुमको बता दिया था कि जो पदार्थ तेज से युक्त होते हैं उनकी और मणिपों की तथा मममय पदार्थों की सुद्धि भस्म से या मृत्तका से हो जाती है ।। ६ || शय्या- सदाचार वर्णन 1 [ ३७३ । भाषा-शिशु-~~वस्थ-उपवीत और कमण्डलु ये पदार्थ अपने ही शुद कहे गये हैं हमरो के शुद्ध नहीं होते हैं । तात्पर्य यह है कि दूसरे के उपर्युक्त पदार्थ कभी सेवन नहीं करने चाहिए । क्योकि वे प्रशुचि बनाये गये हैं ।। १० । एक वस्त्र धारण करके कभी भी भोजन न करे भोजन के मवर पर दूसरा कोई वस्त्र पवश्य ही पारीर पर होना चाहिए । इसी तरह एक ही वस्त्र धारण करके स्नान भी नहीं करे । स्नान के समय में भी दूसरा कोई वस्प होना आवश्यक है और किसी दूसरे का स्नान वस्त्र कभी भी धारण नहीं करना चाहिए ॥११॥ मनुष्य को अपने केशों और दांतों का सस्कार प्रात.काल के समय में ही करना चाहिए । प्रत्येक का मद् आचार के अनुसार कर्तव्य है कि नित्य प्रति प्रात.काल में अपने गुरु के चरणो मे नमस्कार करे ॥१२॥ दोनो हाय, दोनो चरण पोर मुख इन पांचो प्रगो को गोला करके ही भोजन करना चाहिए। जो पुरुष इन पांचों को भोजन के समय में भीगा हुआ रखता है वह सो वर्ष तक जीवित रहा करता है । तात्पर्य यह है कि इनके भीगे हए रहने से भोजन करने पर मायु को वृद्धि होती है ।। १३ ॥ अपने इष्ट देव नामों की, गुरु की पार स्नातक तथा प्राचार्य को लाज्ञा का कभी उल्लघन नही करना चाहिए। किसी भी विप्र को पौर दीक्षिन पुरुष की छाया का स्वेच्छा से पाक्रान्त नहीं करे ॥१॥ गोगण देवत विप्र घृत मधुचतुष्पथम् । प्रदक्षिण प्रति प्रख्याताल वनस्पतीन् ॥१५ गोविप्रावग्निवित्री च विप्रो द्वौ दम्पती तथा। तयोर्मध्ये न गच्छेन स्वर्गस्थोऽपि पतेद् ध्रुवम् ॥१६ उच्छिष्टो न स्पृशेदग्नि ग्राह्मण देवतं गुरुम् । स्वशीर्प पुष्पवृक्षच यज्ञवृक्षमधामि ॥१७ त्रीणि तेजामि नोन्छिष्ट उदीक्षेत गदाचन । सूर्याचन्द्रममावेव नक्षत्राणि च सर्वग ।।१८ ने दिन गुरु देव राजान यतिना वरम् । योगिन देवकर्माण धर्माणा कथक द्विजम् ।।१६ नदीना व प्रतीरे पत्युश्च सरिता तथा । यज्ञ क्षम्य मूले च उद्याने पुरवाटके ॥२० ३७४ ] [ पद्म पुराण शरीरस्य मलत्याग न कुर्याजीवने तथा । विप्रस्यायतने गोप्ठे रम्ये राजपथेषु च ।।२१ गायो का समुदाय-देवता-विप्र-घृत-मघु मोर चतुष्पथ को दाहिनी मोर करके चले अथवा इनको प्रदक्षिणा करके चले तथा जो परम प्रख्यात बनस्पति हो उनको भी प्रदक्षिण करे ।। १५ ।। गो पौर विप्र-पग्नि मौर विध-दो विप्र मौर दम्पती अर्थात् पति पत्नी इनके मध्य में होकर कभी नहीं जाना चाहिए । इनके मध्य में होकर जाने वाला व्यक्ति स्वर्ग में रहने वाला भी हो तो भी उसका पतन हो जाता है यह सुनिश्चित है ॥ १६॥ यदि स्त्रम उच्छिष्ट अवस्था में हो तो उसे अग्नि, ब्राह्मण, देवता, गुरु, अपना मस्तक, पुष्पों वाला वृक्ष यज्ञ वृक्ष मौर ऐमा पुरुष जो धार्मिक न हो, इनका भी भी स्पर्श नही करना चाहिए । कुछ भी खान पान करने पर जब तक कुल्ली कर मुंह तथा हाथ, पैरो को नहीं धो लेता है मनुष्य सच्छिा पुरुष किमी भी दशा में निम्नलिखित तीन तेजो का दर्शन न करे। उन तीन तजो मे सूर्य-चन्द्रमा और सभी नक्षत्र हैं ॥१।। उच्छिष्ट रहते हुए गुरु देवना, राजा, यतिवर, योगी, देवो के कम करने वाले और धर्मों का कयन करने वाले द्विज का भी दशन नहीं करना चाहिए । १६॥ अपने शरीर का जो माल है उसका त्याग मदियो के तट पर--सागर के तर पर-यज्ञ वृक्ष के मूल में-उद्यन के र-पुष्पो की वाटिका मे-जल के मध्य मे-विप्र क आयतन म-गोष्ट म-- राय स्थल मे पोर राज-पथ म कभी नहीं करना चाहिए ।२०१२१ । न क्षौर कारयेद्धीर कुजस्याह्नि कदाचन । मल न धारयेइन्ते नख न वदने क्षिपेत् । २२ तैलाभ्यङ्ग न कुर्वीत वासरे रविभौमयो । स्वगात्रामनयोधि गुरोरेकासनादनम् ॥२३ न हरेच्छ त्रियस्व च देवस्यापि गुरोरपि । राज्ञस्तपस्विना चैव पङ्गोरन्धस्य योपित ॥२४ पन्था देयो ब्राह्मणाय गोभ्यो राजभ्य एव च । रोगिणे भारतप्ताय गुविण्य दुर्बलाय च ॥२५ अन्दर- सदाचार वर्णन ] । ३७५ विवाद न च कुर्वीत नृपविप्रचिकित्सकैः । ब्राह्मण गुरुपत्नी च दूरत परिवर्जयेत् ॥२६ पतित कुष्ठसयुक्त चाण्डाल च गवाशिनम् । निधूत ज्ञानहीन च दूरत. परिवर्जयेत् ॥२७ स्त्रिय दुष्टां च दुर्वृत्तामपवादप्रदायिनीम् । फुकर्मकारिणी दुष्टा सदैव कलहप्रियाम् ॥२८ प्रमत्तामधिकाङ्गोञ्च निर्लज्जा ब्राह्मचारिणीम् । व्ययशीलामनाचारां दूरत परिवर्जयेत् ।।२६ भोमधार के दिन मे धीर पुरुष को किसी भी दशा में क्षौर र्म नहीं पराना चाहिये । दांतो में कभी मेल नही रक्खे अर्थात् दातो की सफाई सर्वदा रहनी चाहिए । अपने मुह में नाखून कभी नहीं लगाये । दांतो से नखो वे काटते रहने का स्वभाव बहुत दूषित होता है जो कि सदाचार के विरुद्ध है । २२।। रविवार और मोमवार के दिनो मे तेल शरीर पर नहीं लगाना चाहिए। मपने गाय और अपने पर वाध नरखे तथा अपने गुरु चरण के साथ एक ही मामन पर स्थित न होवे ॥२३॥ निमी भी घोत्रिय विप्र का धन-देवता मा धन- गुरु का धन-राजा-तपस्वी~-पगला-अन्धा और स्त्री के धन का हरण नही करना चाहिए । ऐमा करना सदाचार के विपरीत होता है ।। २४ ।। मार्ग गमन करने के समय में यदि कोई रामा-ब्राह्मण और गौ सामने से ना जावे तो स्वयं एक तरफ हटते हुए रुककर इनको जाने के लिये मागं खाली कर देना पाहिए । मार्ग में कोई रोग से ग्रस्त मनुप्य~~बोझ लादकर लाने-ले जाने पाला पुरुष-गभिणी स्त्री और शक्तिहीन दुर्वल पुरुष पाजावे तो पहिले इनको गमन करने के लिये मार्ग छोड देना चाहिए ॥२१॥ रामा-विप्र-चिसा करने वाला यहाण-गुर की पत्नी इनके माप रिमो भी विषय पर विवाद (बहम) नहीं करना चाहिए। यदि कोई अवमर भी उपस्थित हो तो इनको दूर से हो वारत वर दवे ॥२६॥ पनिन--कोड में युक्त-चाण्डाल-गो मास का भक्षण करने वाला-नित-शान से होन पुरष को भी दूर हो से त्याग देना पाहिए अर्थात् इनके माय किसी भी तरह का सम्परं न रखें क्योंकि यह ऐमा ३७६ ], । [ पम-पुराण करना सदाचरण के विरुद्ध है।॥ २० ॥ जो स्त्री दुष्ट प्रकृति वानी हो-बुरे रित्र वालो हो-मपवाद (प्रयश-बदनामी) को देने वाली हो-बुरे कर्मों के करने वाली दूषित-सदा ही कलह से प्यार करने वाली हो-प्रमाद से युक्त रहने पाली-अधिक प्रङ्ग पाली -~-लज्जा से रहित-बाह्य नारिणी अर्थात सर्वदा बाहिर हो संचरण करते रहने वाली हो-अधिक खर्चा करने के स्वभाव पाली मोर जो माचार से रहित हो ऐमी स्त्री का दूर से ही त्याग कर देना पाहिए कोंकि ऐमी स्त्री के साथ रहने है सदाचार की सुरक्षा में बाधा होती है।॥२८॥२६॥ मलिनां नाभिवन्दैत गुरुपत्नी कदाचन । न स्पृशेतां च मेघावी स्पृष्ट्वा जानेन शुद्धयति ॥३० वधू पुत्रस्य भ्रातुश्च स्वपुत्री युवती ध्रुवम् । अन्या च गुरुपत्नी च नेक्षेत्स्पर्श न कारयेत् ॥३१ ताभिः मह कथालाप तथा भू भगदर्शनम् । कलह नित्रपां वाणी सदैव परिवजयेत् ॥३२ न दद्याच मदापाद तुपाझारास्थिमम्मपु। कार्पामाथिपु निर्माल्योचितियाप्ठेचितो गुगे ॥३३ गुप्फ मीन न भक्षेत् पूतिगन्धिममध्यकम् । विषम नान्यदृच्छिष्ट पाफार्थ च परस्य च ॥३४ नम्यानम्यं नगन्तव्य क्षणमप्यमना मह । न तिप्टेन्च क्षगंधीरो दीपच्छाये कलिद में ।।३५ अपने परनी भी यदि ममिनायाया मेमोगमा में जगी भी बन्दना नहीं करनी चाहिए। मेगा मगर को गिम दिया गुफ पनी RE R और यदि भून में मां मी जातो मान रन । पिन नामे MRIE को माना है। पानी भीको प्रपितामोनोरमा पाति भी मरे। गुरु सामोशे भीमगर वो सो पदमा में घाण र म Feanानीमा in a Tri-भाई की सदाचार घर्णन ] [ ३७७ वधू-अपनी पुत्री जो युवती हो- ऐसी ही अन्य कोई युवती-गुरु की पत्नी हनको न तो देखे और न इनका स्पश ही करे ॥३२॥ इसके साथ कथा लाप- भूमो के भङ्ग का देखना ---कलह मोर लज्जा से रहित वाणी का सदा ही परिवर्जन कर देवे ॥ ३३ ॥ तुपाङ्गार--अस्थि-भस्म-कपास की भस्थियों में-निर्माल्य-चिता का वाष्ठ और गुरु चिनि मे सदा ही पाद नही देवे । शुष्क-~-दुर्गध से युक्त-अपवित्र-वधस-दूसरे के द्वारा अच्छिष्ट की हुई और दूसरे के लिये पाक करने को लाई हुई मीन को कभी नहीं खाना चाहिए ॥३४।। जो असत पुरुष हो उसके साथ कभी नहीं रहना चाहिए और ऐसे पुरुष के माय में कही पर गमन न करना चाहिए। धीर पुरुष को दीमक की छाया मे मोर कलिद्रुम मे एक क्षणमात्र भी नहीं ठहरना नाहिए ।।३।। अस्पृश्यस्सह चालाप पतितै. कुपितः सह । न कुर्यात्क्षणमात्र तु कृत्वा गच्छेन्द्र रौरवम् ॥३६ कनिष्ठ नाभिवन्देत पितृव्य मातुल तथा । उत्थाय चासन दद्यात्कृताञ्जल्यग्रत स्थित ॥३७ तैलाम्यक्त ततोच्छिष्टमाद्रवस्त्र च रोगिणम् । पारावारगतोद्विग्न वहन्त नाभिवादयेत् ॥३८ यज्ञस्यान्तर्गत नष्ट कोडन्तस्त्रीजन सह । वालनीडागत चापि पुष्पयुक्त बुशैयुतम् ॥३६ गिर प्रावृत्य कौँ वा अप्मु मुक्तशिखोऽपि वा। अकृत्वा पादया पूजा नाचामेद् दक्षिणामुखः॥४० उपवीतविहीनश्च नग्नको मुक्तकच्छकः । एकवलपिधानश्च प्राचान्तोनैत्र शुद्धर्यात ॥४१ मध्यमाभिमुप पूर्वनिमृमि समुपस्पृशेत् । अङ्गुष्ठदेशिनीभ्या च नासा च तदनन्तरम् ॥४२ पुरुप स्पर्श करने के योग्य न हो उनके साथ तथा जो पतित एवं कुपित पुस्प हो उनके साथ कभी भी एक्षिण मात्र के लिये वार्तालाप न करें। जो भी कोई ऐसे पुरुषों के माय मम्भाषण करते हैं वे रौरव नरस में गिरते ३७८ ] [ पप-पुराण है ।। ३६ ।। जो सबसे छोट पितृप ( चाचा ) भोर मातुल हो पर्यात् अपनी अवस्था से बहुत ही छोटे हों तो उनके चरणों में वन्दना नहीं करे। जब भी वे पावें तो गात्रोत्थान उन्हे देवे अर्थात् नन्हे देखकर खडा हो जाये और उनके बैठने के लिये मासन देकर हाथ जोडकर उनके सामने सस्थित होवे-यही उनका पर्याप्त सत्कार सदाचार समन्वित होता है ॥३७॥ वन्दनीय पुरुषों में भी कुछ अवसर ऐसे हैं जबकि वन्दना नहीं करनी चाहिए । जो कोई तेल सेव्यक्त हो अर्थात् जिमके शरीर मे तेल लगा हुआ हो-उच्छिष्ट दशा मे स्थित हो- गोले वस्त्र पहिने हुए हो-रोग से ग्रस्त हो-पारावारगत मौर उद्विग्न हो तथा कुछ वह न कर रहा हो. ऐसी अवस्थाओ मे अवस्थित पुरुष का अभिवादन नही करना चाहिए । जब शुद्ध स्थिति मे हो जायें तभी अभिवादन करे--यही सदाचार युक्त है ॥३॥ जो यज्ञ के मनगंत हो, नष्ट हो गया हो, स्त्रीजनो के साथ जो क्रीडा कर रहा हो, बाल क्रीडा में रत और पुप्पो से युक्त तथा कुशा से समन्वित हो उसका भी अभिवादन न करे ।। ३६ ॥ शिर और कानो को प्रावृत करके जल में स्थित होकर तपा चोटी खोलकर चरणो की पूजा न करके दक्षिण दिशा को प्रोर मुख करने वाला होकर माचमन नही करना चाहिए 1॥४०॥ यज्ञोपवीत से रहित-नग्न और मुक्त कन्छ वाला तथा वस्त्र पहिन हुए जो पाचमन करता है वह कभी शुद्ध नहीं होता है ।। ४१ ॥ पहिले तीन मध्यमा अंगुलियो से मुख का समुप्र स्पश करे फिर इसके अनन्तर अंगूठा पौर देशिनी अंगुलि से नासिका समुप्र स्पर्श करे ॥४२॥ अगुठानासिकाम्या च चक्षुपी समुपस्पृशेत् । कनिष्ठाड गुतश्श्रोत्रे नाभिमड गुष्ठकेन तु ॥४३ तलेन हृदयं न्यस्य सर्वाभिमस्तकोपरि । बाहूचारण सस्पृस्य ततः शुद्धो भवेन्नरः ।।४४ अनेनाचमन कृत्वा मानवः प्रयतो भवेत् । सर्वपापविनिमुक्त स्वर्ग चाक्षयमश्नुते ॥४५ प्रागस्निपुटशृगया च व्यानोऽपानश्च मुदया। समानस्तु समस्ताभिरुदानस्तर्जनीविना ॥४६ सदाचार वर्णन ] [ ३७६ नाग कूर्मश्च कृकरो देवदत्तो धनमय । उपप्रोगन्तु ते प्रोता येभ्यो भूमौ प्रदीयते ।।४७ शयन चापादेन शुकपादेन भाजनम् । नायकारे च शयन भोजन नैव कारयेत् ॥४८ पश्चिमे दक्षिरणे चैव न कुर्याद्दन्तधावनम् । उत्तरे पश्चिमेचंव न म्वद्धि कदाचन ॥४६ स्वप्नादायु क्षय याति ब्रह्महा पुरुपो भवेत् । न कुर्वीत तत स्वप्नशस्त च पूर्वदक्षिणम् ।।५० इमक उपरान्त अंगुष्ठ और प्रतिमिका से दानों नेत्री का समुप स्पश करना चाहिए । कनिपिका और अंगुष्ट स पात्र म, अंगूठा से नाभि को, तन मे हृदय पर याम करके फिर सभी में मस्ताकार ग्यारासरे और मप्र भाग से दोनों वाहमा का सम्पर्श करर फिर मनुष्य शुद्ध हो जाता है ॥४३॥४४॥ इस उक्त विधि म माचमन करक मनुष्य प्रयत हाय तो ममस्त प्रकार पापी छुटकारा पाकर वह स्वग म पक्षय निवाग प्राप्त क्यिा करना है ॥४५॥ त्रिपुट शमीम प्राण वायुमुद्रा स म्यान मोर मा? वायु-तीक रिनामय सममो स तमा7 वायु-नाग पूम, यमर, दवदत्त पौर पनि मिय भूमि प्रदान की जाती है । सभी प्रमान पोर उपरिणत हो ॥४६ ८७॥ भोगे हुन पादों म युक्त हारर शया बरना--गूगे हुए परों वाला होरर भोगन परमा-प्रधेरे स्थान मशन परना और प.धारण म्यान म भोजन परमा- याम कभी भी नही करन माहिय। इनम हानि होती है और मापारर विपरीत है ॥४८॥ धिम दिशा और दिशा की ओर मुत परसमी ८ तायत नहीं करे मोर उत्तर तथा पश्चिम प्रा मुग भी सन ही करना चाहिए ॥४६॥ परीति स मोन में प्रयुको सोना और जा पाप हम मिया या परता है वह ब्रह्म हत्या र पारस भागी होता है। पता उन दिशि म भूमार भा भी सपन महीना पाहि पूर्व और निको पार करना प्रमाना गया है ॥1॥ आयुष्य प्राइमुमो भुन याम्य दक्षिणामुन । थिय प्रापड मुगी भुक्तं यशानु त उपमुग ॥५१ ३८२ ] [ १५ पुराण यद्यत्कृत्वा च देवानां पूज्योनाके भवेन्नरः । तत्तद्वद च नो ग्रह्मन्प्रसादो भवधर्मतः ॥५ पञ्चाख्यानं वदिष्यामि शृणुध्वं तपपूर्वतः । पञ्चनामेककं कृत्वा विन्दम्मोक्ष दिवं यशः ॥६ पित्रोरर्चाऽथ पत्युश्च साम्यं सर्वजनेषु च । मित्राद्रोही विभक्तिरेतेपञ्च महामयाः ॥७ भीष्म पितामह ने पुलस्त्य मुनि में कहा है विप्रवर ! इस समार में मदा-सर्वदा मबके द्वारा माना हुप्रा जो पुण्य मबसे अधिक होना हो और निमको पहिले होने वाले मभी पूर्व पुरुषो ने किया हो उसके विषय में आप अपनी इच्छा से ही कुछ वर्णन कीजिये ॥ १॥ पुलस्त्य मुनि ने भीष्म के ऐसे प्रश्न के पूछे जाने पर कहा-- एकबार व्याम देव के समस्त शिष्यों ने बहुत ही पादर पूर्वक महरि व्यामजी के ममोप में उपस्थित होकर उन्हें प्रणाम किया था और फिर सब द्विजगगा ने उनमे ऐसा ही प्रश्न किया था और इसका उतर उनसे पूछा था जमा प्राज प्र.प में पढ़ रहे हैं ॥२॥ द्विजो ने कहा था- हे भगवन् ! इस लोक में समस्त पुष्पो में भी प्रत्यधिक श्रेष्ठ पुण्य तया जो ममस्त प्रकार धर्मों में प्रत्युत्तम म ना जाने वाला हो वह कौन सा है जिसको लोक में मनुष्य करके अक्षय स्वर्ग के निवाम का सुख भोगा करते हैं ? प्राप हम लोगो को यह बनलाइये ॥३॥ ऐमा ही कोई एक नतु वनलाइये जिसको बढे पौर छोटे सभी लोग कर सकें और सभी द्वारा साध्य होवे। जिसके सम्पादन करने में कोई विशेष कष्ट न होता है तथा मबके द्वारा प्राप्त करने के भी योग्य हो। इम मस्यलोक में निवास करने वाले समस्त वरणों के लोगो के लिये शुद्ध भी हो ॥ ४ ॥ ऐसे किसी परम श्रेष्ठ पुण्यमय कर्म के विषय में प्राप इस समप मे हम लोगो को बदलाने की कृपा कीजिए जिसको करके मनुष्य स्वर्ग मे देवगणा का भी पूज्य हो जाये । हे ब्रह्मन् ! आप प्रसन्न होकर ऐसे ससार मे किये जाने वाले धर्म की प्राख्या कीजिए || इस प्रकार के शिष्यो द्वारा किये हुए प्रश्नमयी प्रार्थना को सुनकर महर्षि वेद व्यासजी ने कहा-हे द्विजगए ! मैं पन्नाख्यान बतलाऊँगा । उसे अप लोग उनको पूर्व से ही सुने ।

पितृ-सेवा माहात्म्य ] - इन पांचों में से किमी भी एक को करके मनुष्य दिवलोक का निवास-यश की प्राप्ति और मोक्ष का लाभ प्राप्त किया करता है। वे पांच महान् मख ये हैं--पपने माता-पिता को परम भक्ति-भाव से पूजा, अपने पति की अचंना, समस्त प्राणियों के माथ समान प्रेमादर पूर्वक व्यवहार, मित्रगण के साथ कभी भी द्रोह न करना और भगवान् विष्णु के चरणों में निष्काम अनन्य भक्ति- ये पांच सबसे श्रेष्ठ एवम् महान् यज्ञ हैं डिनको सभी लोग बिना किमी कष्ट के कर सकते हैं पोर सभी धर्मों में इनको माना एवम् किया जा सकता है । इनका परमाद्भुत फल प्राप्त होता है जो अन्य किसी का भी नहीं हो सकता है ।।६.७।। प्रापित्रोरर्चया विप्रा यद्धर्म साधयेन्नरः । न तत्क्रनुगत रेव तीर्थयात्रादिभिभुवि ।।८ पिताधर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परम तरः। पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवता: 16 पितरो यस्य तृप्यन्ति सेवया च गुणेन च । तस्यभागीरथीस्नानमहन्यहनि वर्तते ॥१० सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय पिता । मातरं पितर तस्मात्सर्वयत्नेन पूजयेत् ॥११ मातरं पितर चैव यग्नु कुर्यात्प्रदक्षिणम् । प्रदक्षिणीकृता तेन मप्तद्वोपावसुन्धरा ।।१२ जानुनी च करो यस्य पित्रोः प्रणमतः शिरः । निपतन्ति पृथिव्या च सोऽक्षयां लभते दिवम् ॥१३ सर्व प्रथम अपने माता-पिता को मचंना करके विष को जिम महान् धर्म की मिद्धि होनी है वैमी इस भू-मण्डन मे सेकडो प्रज्ञों के करने से तथा महान् तीर्थों की यात्रा मादि के करने से भी नहीं हो सकी है। अतएव ब्राह्मणो का यही परम कर्तव्य है कि माता-पिता की पूग एवम् गुश्रूषा भक्ति- भाव पूर्वक करें ॥६॥ संमार में पिता ही साक्ष त् घमं का स्वरूप है, पिता को माराधना से धर्म प्राप्त हो जाता है । पिता हो स्वर्ग है अर्थात् पिता की पूजा- सेवा से ही स्वर्गीय सुख प्राप्त हो जाता है । पिता की मेवा कर उन्हे मुन्नु

३८४ ]
[ पय पुराण
करना सबसे बडी तपश्चर्या है । जब पुत्र पर उसके पिता प्रसन्न हो जाते हैं तो
उस पर सभी देवगण प्रसन्न होकर कृपा किया करते हैं ॥ ६॥ जिसके पितर
सेवा भाव से मोर गुण-गरिमा से पूर्ण तृप्त एवम् सन्तुष्ट हो जाते हैं उसको
प्रतिदिन भागीरथी गङ्गा के स्नान के समान परम पुण्य प्राप्त हुपा करता है
॥१०॥ माता के अन्दर सभी तीथ विराजमान रहा करते हैं मोर पिता समस्त
देवो के समान होता है । अतएव मब कुछ का त्याग करके पूर्ण प्रयलो से पान
माता-पिता की पूजा एवम् सेवा करनी चाहिए ।। ११ ।। जो अपने माता-पिता
को प्रदक्षिणा करता है उस पुग्प को सान द्विपो वाते सम्पूर्ण भू-मण्डल की
परिक्रमा के फल प्राप्त करने का लाभ होता है जिसके घुटने-हाय और शिर
अपन माता पिता को प्रणाम करने के लिये पृथ्वी मे गिरते हैं वह कभी न क्षीण
होने वाले स्वर्ग का निवाम प्राप्त करता है ।।११।१३।।
तयोश्चरग योर्यावद्रजश्चिह्नानि मस्तके ।
प्रतीके च विलग्नानि तावत्पूत सुतस्तयो ॥१४
पादारविन्दसलिल य पित्रो पिबतसुत ।
तस्य पाप क्षय याति जन्मकोटिशनाजितम् ॥१५
धन्योऽसौ मानवो लोके पूनोऽमो सर्वकल्मपात् ।
विनायकत्वमाप्नोति जन्मनकेन मानव ॥१६
पितरौल व येद्यस्तु वचोमि पुरुषाधम ।
निरये च वसेत्तावद्यावदाभूतसम्प्लम् ॥१७
पित्रोरनर्चन कृत्वा भुक्ते यस्तु सुताधमः ।
वृमिकूपेऽथनरके कल्पान्तमुपतिष्ठति ॥१८
रोगिण चापि वृद्ध च पितरवृत्तिकर्शितम् ।
विकलनेत्रात्यक्त्वागच्छेच्चरौरवम् ।।१६
अन्त्यजातिपु म्लेच्छेषु चाप्डालेष्वपिजायते ।
पित्रोरपोपण कृत्वासर्वपुण्यक्षयोभवेत् ॥२०
नाराध्य पितरौ पुत्रस्तीथदेवान्भजन्नपि ।
तयोनं फलमाप्नोति कोटवद्रमते महीम् ॥२१

सुजाधार नम्ति ]
।
३०१
जिम समय पुत्र अपने माता पिता परणो में भूमि पर सिर रखकर
प्रणाम करता है तो ठमके मस्तक पर जो रजमाण के चिन्ह लग जाते है और
प्रतीक स्वरूप रहा करते हैं ये यही बताते है कि उसने ममप तक के लिये .
उनका पुत्र पवित्र होगया है ॥१४॥ जो कोई पुत्र अपने माता-पिता के चरणो
वो घोर उम जम का पान कर लेता है उसके साठो परोहो जम्मों के संचित
हए भी पाप क्षीण हो जाया करते हैं ॥१५॥ ऐसा पुरुष यान भाग्यशाली और
पाय है जो हम लोग में अपने माता पिता को प्रसना सपा भक्ति-भाव समन्विन
मेवा वारा समस्त करुमपों से छुटकारा पाकर पवित्रामा पन जाता है। ऐसा
मानव तो फिर एक ही जन्म में विमायकस्व पक्ष को प्राप्त कर लेता है ॥१६॥
जो मनुष्य अपने माता-पिता को वाणियो फे हारा लहन किया करता है
अर्थात् वचनो पो कहार निरस्कार करता है वह बहुत ही अधम पुरष होता
है । वह नीष पुरुप जय तक भून-सा होता है तब तक मरक में निवास
क्यिा Trar है ॥ १७ ।। जो प्रथम पुत्र माता-पिता को पूजा न करके स्वयं
भोजन कर ले। है वह नरक में कृमियो में पूर्ण कुरा मे कल क अन्न पर्यन
निवाम किया करता है ।।१८। जो पुरुष रोगो में प्रस्त, वृद्ध, जीविका से कशित
अर्थात् कुछ भी जीविका न रखने वाला नेत्र भोर कानो मे विकल पिता का
त्याग कर देता है वह गैरव नरक में जाकर यातना भोगता है ॥१९॥ जो अपने
मामा-पिता का पोपरण नहीं किया करता है यह दूसरे जन्म मे मन्त्यज जातियो
मे-म्लेच्छो मे तथा चाण्डालो मे जाकर जन्म प्रतरण करता है और उन नीच
अघन्य जातियो के दूपित कर्मों को कर तीम यातनाएं भोगता है। ऐसे पुरुष
के समस्त पुण्यो का क्षय हो जाता है ।।२०।। जो अपने माता-पिता की तो कभी
पाराधना करता नही है और देवो का प्रचन तथा तीर्थाटन किया करता है वह
पुत्र इन देवाचंन और तीर्थाटन दोनो का कुछ भी फल प्रास नही किया करता
है मौर एक कोट की भांति भूमि में रमण किया करता है। माता पिता को
सेवा-ममर्चा की बहुत बड़ी महिमा है जिसका प्रतुल पुण्य एवम् प्रभाव मनुष्य
को प्रास होता है ॥२१॥

३८६ 15 [ पम पुराण ॥ तुलाधार चरित ॥ तुलाधारस्य चरित प्रभावमतुल प्रभो। वक्तुमहंस्योपेण यदि मय्यस्त्यनुग्रह. ।।१ सत्यभावादलोभाच्च दद्याद्यो त्वमत्सरात् । नित्यंयज्ञशतंतस्य सुनिष्पन्न सुदक्षिणम् ॥२ सत्येनोदयते सूरो वाति वातस्तथैवच । न सिन्धुलवयेवला धतेकूर्मोधरां तथा ॥३ सत्येन लोकास्तिष्ठन्ति सर्वे च वसुधाधरा. । सत्याद् भ्रष्टोऽय य सत्त्वोऽप्यघोवासी भवेद् ध्रुवम् ।।४ सत्यवाचि रतो यस्तु सत्यकार्यरत. सदा । स शरीरेण स्वर्लोकमागत्याच्युततां व्रजेत् ।।५ सत्येन मुनयः सर्वे मां च गत्वा स्थिरास्स्थित.। सत्याद्य धिष्ठिरो राजा सशरीरो दिवगत. ॥६ द्विज ने कहा-हे प्रभो ! आपका यदि मुझ पर पूर्ण अनुग्रह है तो मेरी प्रर्थना है कि माप कृपाकर तुलाधार का चरित्र भोर उमका अनुपम प्रभाव पूर्ण रूप से वर्णन करन के योग्य होते हैं ॥१॥ भगवान बोले-सत्य भावना से और लोभ के प्रभाव से तथा मात्सर्य दृष्टि से रहित होर तुम जो कुछ भी दान करते हो उसका इतना अधिक फल होता है कि मानो नित्य ही दक्षिणा के सहित सो यज्ञ उसने पूर्ण कर लिये हैं ॥२।। मत्य के ही प्रभाव से सूर्य उदिन होता है और इस सत्य के प्रभाव से वायु वहन किया करता है। यह सागर सस्य के ही प्रभाव से अपनी मर्यादा का उल्लघन नहीं किया करता हैं और सत्य के बल से ही कूर्म इस भूमि को अपने कार धारण किया करता है ॥३॥ सत्य हो की शक्ति से ये समस्त लोकथित रहते हैं मोर सत्य के ही प्रभाव से सब वसुधाघर ( पर्वत ) सस्थित हैं । जो सत्त्व सत्य से भ्रष्ट हो जाता है वह निश्चित रूप से अधोवामी हो जाया करता है प्रर्यात पतन हो जाता है ।।४॥ जो पुरुष सदा सत्य वचन मे रति रखने वाला है अर्थात् सर्वदा सत्य भाषण किया करता है भोर किसी भी दशा में कभी भी मिथ्या वचन नहीं बोलता है, तुलाधार चरित ] [ ३० जो पुरुप सत्यता से ममन्वित हो कार्य किया गता है और कभी भी कोई असत् कार्य नही करता है,वह पुरुष इमो शरीर से स्वर्गलोक में पाकर पतता को प्राप्त करता है ।।५॥ यह मत्य का हो अनुपम प्रभाव है कि समन मुनिगण उमको शक्ति में मुझको प्राप्त करफे घिर होकर रहा करते हैं। सस्य को सामर्थ्य मे हो राजा युधिष्ठिर इमो पाँच भौतिक शरीर से स्वर्गलोक को चले गये थे क्योंकि युधिष्ठिर सवदा सत्य व्रत का पालन करने वाले पे । ६॥ सर्वशत्रुगण जित्वा लोको धर्मेण पालितः । प्रकरोच्च मख शुद्ध राजसूय सुदुर्लभम् ।।७ चतुरशीतिसहस्राणि ब्राह्मणाना च नित्यशः । भोजयेद्र पमपापु राजोपकरणेषु च ॥ भोजयित्वोपफरणास्तेभ्योदत्त्वा विसर्जयेत् । यदभीष्ट द्विजातीनामतोऽन्यद्दापयेद्धनम् । प्रदरिद्र ततो ज्ञात्वा द्विजव्यूह परित्यजेत् । तथैव स्नातकाना तु सहस्राणि तु पाडग ॥१० नित्य सम्भोजयेद्राजा सत्येनैव विमत्सरः। प्रतिष्ठ स्ते गृहे पूर्व चिर तस्य जिगीपया ॥११ जित तेन जगत्सर्व प्रारणानुग्रहकारणात् । मत्येन चासुरो राजा बलिगिन्द्रो भविष्यति ।।१२ पातालस्थस्य तस्यैव भूयस्तिष्ठामि वैश्मनि । निरन्तर च तिष्ठामि स्वान्तेपुण्यकरमण ॥१३ यद्वा पुरा मया बद्धो दैत्ययोनेविमोक्षणात् । तल चंवामरत्वं हि शक्रत्य प्रददाम्यहम् ॥१४ राजा युधिष्ठर न सत्य के प्रभाव से अपने मब शत्रुओ को जीत रिया था और फिर.लोक का धर्म मोनि के ग.प पामन पिया था। इसके उपरान राजा युधिष्ठिर ने मत्यन्त दुर्लभ पौर प्रति शुभ रात्रय यन किया था ॥ ७ ॥ पारा युधिष्ठिर राजार योग्य उपकरणों में सुवर्ण में निमिन पात्रों में नित्य ही पौरामी हमार ब्राह्मणो को भोजन कराने थे ॥ ॥ उन ब्राह्मणों को पहिने ३८८ ] [ एम पुगए भोजन कराकर फिर राजोचित समस्त उपकरण उनको दान में देकर विदा किया करते थे। उन द्विजातियो को जो कुछ अन्य वस्तु भी अभीष्ट होती थी वह भी वाला दिया करते थे और विशेष श्नमा दान करते थे ॥६॥ जब यह समझ लिया जाता था कि द्विजों में कोई भी दरिद्र नहीं रहा है तभी उन द्विजो को विदाई करते थे। इसी प्रकार से सोलह सहस्र स्नातको को भी गजा नित्य प्रति मत्सरता रहित होकर सत्य भाव से ही भोजन कराया करते थे। वे पहिले बहुत समय तक उसको जिगोपा से उसके घर में स्थित रहा करते थे ।। १०।११ ।। प्राणियो पर पूर्ण रूप से अनुग्रह करने के कारण से हो उस गजा युधिष्ठिर ने सम्पूर्ण जगत् को जित कर लिया था । सत्य की बहुत महिमा है इसी के प्रभाव से मसुर बलि राजा इन्द्र हो जायगा ॥ १२ ॥ वह पाताल म स्थित है। किन्तु उसके सस्प के प्रभाव से मैं वहाँ पर उसके घर में स्थित रहा करता हूँ। वह अपने हृदय मे बहुत पुण्य क्मों के करने की भावना रखता है इसीलिये मैं उसके घर में निरन्तर स्थित रहा करता हूँ ॥ १३ ॥ यद्यपि मैंने मसको दैत्ययोनि से छुटकारा पाने के लिये बाध लिया था किन्तु उसे तललोक में वास दिया है। उसे ममरत्व पौर इन्द्र का पद मैं दे रहा हूँ ।। १४ ।। हरिश्चन्द्रो नृपस्सत्यात्सवाहनपरिच्छदः । स्वशरीरेण शुद्धन सत्यलोके प्रतिष्ठितः ।।१५ राजानो बहवश्चान्ये ये च सिद्धा महर्षयः । ज्ञानिनो यतयश्चैव सर्वे सत्येऽच्युताभवन् ॥१६ तस्मात्सत्यरतो लोके संसारोद्धरणक्षमः । तुलाधागे महात्मावं सत्यवाक्ये प्रतिष्ठित. ॥१७ लोके तत्सदृशो नास्ति सत्यवाक्यस्य कारणात् । अश्वमेघसहस्रेण सत्य तु तुलया धृतम् ।।१८ अश्वमेघसहस्रादि सत्यमेव विशिष्यते । सर्व सत्याद्भवेत्साध्य सत्यो हि दुरतिकमः॥१९ सत्यवाक्येन सा धेनुर्वहुला स्वर्गगामिनी । सवंगष्ट्र समाधाय पुनरावृत्तिदुलंभा ॥२० तुनाधार चरित ] [ ३८६ तथाऽय सर्वदा साक्षो मृपा नास्ति कदाचन । बर्षमल्पमघ च क्रयविक्रयणे सुधी ॥२१ सत्यवाक्य प्रशस्त च विशेषात्साक्षिणो भवेत् । साक्षिण: सत्यमुक्त्वा च अक्षय स्वर्गमाययु ॥२२ मत्य के ही प्रभाव से राजा हरिश्चन्द्र अपने समस्त वाहन और परिच्छन्द फे सहित अपने शुद्ध सागर से ही सस्य लोक में प्रतिष्ठित हुए थे ॥१५।। बहुत मे पन्य राजा, सिद्ध और महर्षिगण तथा शानी एव यति धग सस्य के प्रभाव से सत्य लोक मे च्युत न होने वाले होकर प्रतिष्ठित हो गये हैं ॥१६।। इसलिये हो मस्य में रति रखने वाला और लोक में सासारिक बाधामो से उद्धार करने मे समथ महान् प्रात्मा वाला तुलाधार सत्य वचन मे प्रतिष्ठित हुआ था ॥१७॥ लोक मे उम तुलाधार के समान सत्य वाक्य के कारण से अन्य कोई भी नहीं है। सौ अश्वमेध यज्ञो को मत्य के साथ तुला मे रखवा गया था ॥१८।। जिस समय मे तोला गया तो एक सहस्र अश्वमेध से भी अधिक गौरवशाली सत्य हो हुमा या । सत्य पालन मे ऐसी अद्भुत शक्ति है कि इसस सभी कुछ साध्य हो जाया करता है किन्तु यह सत्य हो दुरतिक्रम होता है । १९॥ सत्य वाक्य से यह धेनु बहला स्वग मे गमन करने वाली हुई थी। सम्पूर्ण राष्ट्र को समा. धान करके वह इस लोक मे जन्मवृत्त से रहित हो गई थी ।।२०। इस रीति स सत्य सर्वदा इम बन का साक्षी है और मिथ्या कुछ भी नहीं है । बहुत प्रथं (मूल्य ) और अल्प प्रथ तथा क्रय पोर विक्रय करने में सुधी-सत्य वाक्य पौर प्रशस्त विशेष रूप से साक्षी होते हैं, वे सत्य कहकर अक्षय स्वर्ग का निवास प्रास किया करते हैं ।।२१।२२।। वावदूक सभाप्राप्य सत्य वदति वाक्यति । सयाति ब्रह्मणो गेह यज्ञरन्यैश्च दुर्लभम् ।।२३ सभाया यो वदेत्सत्यमश्वमेध फला लभेत् । लोभाव पामृषोक्त्वा च रौरव नरक व्रजेत् ।।२४ सर्वसाक्षी तुलाधारो जनाना शूरएव च । विशेषाल्लोभसन्त्यागानाके निर्जरता व्रजेत् ॥२५ ३६. ] 1 रन पुराग . कश्चिच्छूद्रो महाभागो न लोभे वर्तते क्वचित् । वृत्तिश्नाकेन दुःखेन तया शिलोञ्छतो भृशम् ॥२६ जर्जर वस्त्रयुग्म च क्टोगात्रे च सर्वदा । सदापि लोभविरहो न परस्व गृहीतवान् ॥२७ तस्य जिज्ञासयैवाह गृहीत्वा वस्त्रयुग्मकम् । अवकोटे नदीतीरे स्थितस्सस्थाप्य सादरम् ॥२८ चावदूक (अधिक बोलने वाला) ममा में प्राप्त होकर वाणी का स्वामी सत्य हो बोलता है । ऐमा सत्य वचन बोलने वाला वह ब्रह्मा के लोक को प्राप्त किया करता है जो कि अन्य यज्ञ के द्वारा भी कठिन है ॥२३॥ मभा में उप स्थित होकर जो सत्य वचन बोलना है वह मश्वमेघ यज्ञ के पुण्य फल को प्राप्त क्यिा करना है । किसी लोभ के वशीभूत होकर अथवा द्वेष के कारण से जो सभा में मिपा भाषण करना है व पुरुप रव नरक को जन किया करता है ॥२४॥ सब का साक्षो तुलाधार है और वह जनो मे शूरवोर ही है। विशेष लोम का भली भांति त्याग कर देने में वह स्वग मे जाकर देवत्व के पद को प्राप्त हुआ था ॥२५॥ कोई महान् भाग्य वाला शूद्ध है जो कभी भी लोभ में लिप्त नहीं होता है । वह अपनी वृत्ति शा मे और शिलोच्छ से बडे ही दुख के साथ किया करना है ॥२६॥ उसके पास दो वस्त्र हैं जो बहुत ही जजर हैं । उनमे मे एक तो वह कटि मे घारग किया करता है और दूसरा शरीर पर डाले रहा करता है । ऐसो उमकी प्रायिक दयनीय दशा है तो भी सर्वदा उसमें लोम का प्रभाव रहना है मौर पराये धन को यह कभी ग्रहण नहीं करता था ॥२७॥ उसकी इस प्रकार की वृत्ति वहां तक मत्यता रखती है-इमके जानने को इन्छा से मैंने दो वस्त्र लेकर नदी के तट पर भवकोट में जाकर फिर मैं नहीं प्रादर २ माप उनको ग्यकर स्थित हो गया था ।।२।। स दृष्ट्वा वस्त्रयुग्म सन्नलोभे कुरते मन । इतरस्य परिज्ञाय तरक्षान्त्या स्वगृह गयो । ततो विचिन्तगित्वा तु हृदा ग्वल्पमिति द्विज । उदुम्बर हेमगर्भ मातव पातितम् ॥३०

तुलाधार चरित ]
[ ३६१
कीटे च नदीतीरे विकारणे जनजिते ।
तस्य या तस्य देशे तु दृष्टं तेन तदद्भुतम् ॥३१
अलं विधानमेतत्तु कृत्रिम चोपलक्ष्यते ।
ग्रहणेवाधुना चास्य अलोम नष्टमेव मे ॥३२
एतद्विमृश्य शूद्रोऽसौ परित्यज्य गृह गतः ।
स्वस्था देवा मुदा तत्र साधु साध्विति चाय वन् ।।३३
निर्गन्थिरूपमादाय तस्यान्तिकगृह तथा ।
गत्वाऽह देवसवादमवदं भूतवर्तनम् ॥३४
ततोऽभ्यासप्रसङ्गाच्च जनाना च परिप्लवात् ।
तस्य योपा तदागत्य पप्रच्छ देवकारणम् ॥३५
ततोऽहमवद तस्य यद्वाचेतोगत द्रुतम् ।
निभृतोऽथ निनादस्य कारण कथित मया ॥३६
उसने उन दोनों वस्त्रो को देखकर यह समझ लिया था कि ये किसी
पन्य पुरुष के है । उसके मन मे किञ्चित मात्र भी लोभ लसन नही हुआ पा
मोर वह क्षान्ति से अपने घर को चला गया था ॥२६॥ हे द्विज ! मैंने हृदय
मे सोचा था कि शायद यह बहुत ही स्वल्प मूलग की वस्तु है ऐसा विचार कर
तो नहीं छोड गया है, इसलिये मैंने फिर वही पर एक हेम जिसके मध्य मे या
ऐमा उदुम्बर गिरा दिया था ॥३०॥ कोकट में मोर नदी के तौर पर जनों से
रहित विकोण मे उसने उम अद्भुत वस्तु को देखा था। यह विधान पर्याप्त है
किन्तु यह बनावटी दिखलाई देता है । उस ने सोचा कि यदि मैं इसे ग्रहण करता
हूँ तो इमी ममय मे मेरे मलोभ अर्थात् लालच का न करना जो एक अत्यावश्यक
धर्म है, वह नष्ट ही हो जायगा ।। ३१३३२ ॥ इस भांति से उस शूद्र ने विचार
करके उसका त्याग कर दिया और वह अपने घर को चला गया था। देवगण
यह देखकर परम स्वस्थ होते हुए परम प्रसन्न हुए और सब "स धु-साधु"-
पर्थात् बहुत अच्छा-मच्छा मुंह से कहने लगे ॥३३॥ फिर निन्धि स्वरूप को
लेकर मैं उसके घर पर गया और फिर मैंने भूतवर्तन देव सम्बाद उससे कह
दिया था ॥३४॥ इसके उपरान्त अभ्यास के प्रसग से भौर जनों के परिप्लव से
-

३१२ ] [१ पुगण से उसकी स्त्री ने उम समय में माकर इम देवररण को पूछा था ॥३५॥ इसके मनन्तर जो भी चित्त में था वह मैन शीघ्र ही उससे कह दिया था मोर निभृत होते हुए निनाद का जो भी कारगा था मैंने बना दिया था ॥३६॥ हृद्गत पतिना तेऽा विधिना दत्तमज्ञवत् । परित्यक्त महामागे पुनर्नास्तीह ते वसु ॥३७ यावजीवति दौविध्य तस्य भक्ता न सशय । गच्छमातह शून्यम ब्ध तत्प्रपृच्छ तम् ॥३८ थत्वा तद्वं शिव मा च वचनपत्युरन्तिके । गत्वाप्रोवाचदुवृत्त तच्छु त्वाविस्मयगत. ME स विचिन्त्य तया सार्धमागतोऽमोममान्तिकम् । निभृत मामुवाचेद क्षपणत्वचकीर्तय ॥४० चाक्षुप चिरमशुद्ध हेलयातृणवत्कथम् । त्वया त्यक्त यतस्तात नास्तिभाग्यमकण्टकम् ।।४१ ऐश्वर्यमतुल शौर्य शीर्यतेभावुक पुन । स्ववन्धूनां महद्दु खमाजन्ममरणान्तिकम् ॥४२ द्रक्ष्यसे चात्मना नित्य मृताना गतिघेवम् । तस्मात्तद्गृह्यता तूर्णं भुदव भोग्यमकण्टकम् । ऐश्वर्यमतुल शौर्य लोकाना विस्मय वरम् ।।४३ है महाभागे । यज्ञ की भांति विधि के द्वारा प्रदत्त माज तेरे पति ने हद्गत का त्याग कर दिया था फिर यहां पर तेरा धन नही है ॥३६॥ जब तक जीवित है यह दौविध्य है अर्थात् दुर्भाग्य है । उसके भक्त है—इसम सशय नहीं है । हे माता । गृह को जानो। अलव्ध शूय गृह को देखकर यह उससे पूछा पा॥३८॥ उमने यह सब वचन श्रवण कर जो कि एक मङ्गल सम्बाद था उसने अपने पतिदेव के ममोप म पहुंचकर दुवृत्त कह दिया था। पति को यह सब सुनकर बहुन पाश्चयं हुप्रा था ॥३९॥ उसने सभी कुछ सुनकर फिर उमी को माय ले लिया और मेरे पाम उपस्थित होगया निभृत में वह मुझप दोना- है क्षपणक । माप मुझे सब बताइये ॥४०॥ क्षाएक बोला-चपी के समक्ष ।

तुनाघार चरित ] * जो प्रत्यक्ष था उमे प्रापने हेलावश होकर तृण की भांति क्यो त्याग दिया था ? है तात ! यही कारण है । भाग्य मकराट नही है ॥४१॥ अतुल ऐश्वयं भोर और तेरा भ वुक शोर्य शीणं होता है । अपने बन्धुओं का महान दु.स जन्म से लेकर मरण पर्यन्त है ॥४२॥ तू नित्य ही अपने द्वारा मृत पुरुपो की जो निश्चित गति है वह देखता है । इसलिये उसे शीघ्र ही ग्रहण करो मोर अब एटक भोग्य का उपभोग कगे। प्रतुन ऐश्वर्य और शौर्य लोको का विस्मय वर है ॥४३॥ अकामाच्च व्रत सर्वमक्रोधात्तीर्थ सेवनम् । दया जप्यसमा शुद्ध सन्तोपो धनमेव च ॥४४ अहिंसा परमा मिद्धि शिलोञ्छवृत्तिरुत्तसा। शाकाहार. सुधातुल्य उपवास. परन्तप ।।४५ सन्तोपो मे महाभोग्य महादान वराटकम् । मातृवत्परदाराश्च परद्रव्यारिण लोटवत् ।।४६ परदारा भुजङ्गाभा. सर्वे यज्ञा इद मम । तम्मादेन न गृह्णामि सत्य सत्य गुणाकर ।। प्रक्षालनाद्धि पङ्कम्य दूरादस्पर्शन वरम् ।।४७ इत्युक्त तु नरश्रेष्ठ पुष्पवर्ष पपात ह । मूनि देशे तनौ तस्य सर्वदेवेरित 'द्वज ॥ देवदुन्दुभयो नेदुनृत्यन्त्यप्सरसा गणा । जगुर्गन्धर्वपतयो विमान चापतद्दिवः ।।४६ ऊचुर्देवगणास्तम विमानमिदमारुह । सत्यलोक समासाद्य मुड्क्ष्य भोग्य महेन्द्रवत् ॥५० यह शूद्र बोला- मैंने बिना किसी भी कामना के यह सब प्रत किया है मौर कोष से रहित होते हुए ही तोपों का सेवन किया है। जो यह दया है वही मन्त्र-जाप के समान है मौर शुद्ध सन्नोप ही धन है ।।४1 किमी भी प्राणी को मन-वाली पोर शरीर से हिमान करना सबसे बडीलिद है। येतो मे शिला बीनकर अपने उदर को पूति वरना मबसे उत्तम वृति है। पारी का माहार कर लेना अमृतपान रे तुल्य है पोर उपयाम वरना ही । पद्म पुराण सबसे बड़ा श्रेष्ठ तप है । ४५॥ सन्तोप ही मेग महा भोग्य है मोर एक वरा• टक (कौडी) ही महान् दान है । पराई स्त्रियों को माता के समान समझना तथा पराये द्रव्य को मिट्टी के ढेले की तरह मानना श्रेष्ठ व्रत है ॥४६।। पराई स्त्री तो भुजङ्ग के समान भयानक हैं- ये ही मेरे समम्त या हैं। इसलिये हे गुणाकर ! मैं इगका ग्रहण नहीं करूंगा-यह सर्वथा सत्य है और पुनः सत्य है । कोच को लगाकर फिर उसका प्रक्षालन करने से तो पहिले ही उससे दूर रहकर उस कोच का स्पर्श न करना ही श्रेष्ठ होता है जो फिर उसके प्रक्षालन करने का कभी अवसर हो उपस्थित न होवे ।।४७ । भगवान् ने कहा-है नर श्रेष्ठ ! उस शूद्र के द्वारा इतना कहने पर भाक,श से पुष्पो की वृष्टि हुई थी और हे 'द्वज ! सब देवो के द्वारा की हुई फूलो को वर्षा उसके मम्तक पर- उम स्थान पर और उसके शरीर पर पड़ी थी। उम समय में देवगण दुन्दुभि बजाने लगे थे। प्रप्पराएँ नृत्य कर रही थी-गन्धर्व पति गान करने लगे थे । उसी समय में स्वग से एक विमान नीचे आया था ॥४८॥४६॥ फिर मब देवता उमसे बोले कि आप इस विमान पर ममारूढ होइये और अब इस पर चढकर सत्य लोक को प्राप्त करे और वहाँ पर महेन्द्र के समान सम्पूर्ण भोगो का सानन्द उपभोग करें ॥५०॥ ॥ धात्री और तुलमी माहात्म्य ॥ अपरस्यापि पृच्छामि फलस्य पूततां तरो. । सर्वलोकहितार्थाय वद नो जगदीश्वर ॥१ धात्रीफल परं पूत सर्वलोकेषु विथ तम् । यस्परोपानरो नारी मुच्यते जन्मवन्धनात् ॥२ पावनवासुदेवस्य फलप्रीतिकरं शुभम् । अस्य भक्षणमात्रेण मुच्यते सवंकल्मपात् ।।३ भक्षणे च भवेदायुः पाने वै धर्मसञ्चय. । अलक्ष्मीनाशन स्नाने सर्वेश्वर्यमवाप्नुयात् ।।४ यस्मिन्गृहे महासेन धात्री तिष्ठति सर्वदा । तस्मिन्गृहे न गच्छन्ति प्रेता देतेय राक्षसा ॥५ घात्री और तुलसी माह रम्य ] [ ३६५ न गङ्गा न गया चैव न काशी न च पुष्करम् । एकैव हि नृणा धात्री सम्प्राप्ते हरिवासरे ॥६ एकादश्या पक्षयुगे धात्रीस्नानं करोति यः । सर्वपाप क्षयं याति विष्णुलोके महीयते ।।७ श्री स्कन्द ने कहा-हे जगदीश्वर ! दूसरे तरु के फल को भी पूतता मैं प्रापसे पूछता हूँ। आप समस्त लोको के हित-सम्पादन के लिये कृपाकर हमको बतल इये ॥१॥ ईश्वर ने कहा-घात्री (प्रावला) का फल सम्पूण लोको में सबमे अधिक पवित्र फल होता है-यही प्रसिद्ध है । इसलिये भविले के वृक्ष के समारोपण करने का बड़ा महत्व होता है । इसके लगाने से नर और नारी सामारिक जन्म-मरण के दुःखप्रद बन्धन से छुटकारा पा जाया करते है ।।२।। भगवान् वासुदेव को यह पत्री फन परम पावन तथा शुभ और प्रसन्नता देने वाला होता है । इम फल के भक्षण मात्र से मनुष्य सब अल्मपो से मुक्त हो जाता है ।।३ । इसके भक्षण करने से प्रायु की वृद्धि होती है और इसके रस के पान करने से धर्म का मञ्चय होता है । इसके साथ स्नान करने से प्रलक्ष्मी का नाश होता है और उसे सब प्रकार क ऐश्वर्य की प्रालि हुपा करती है ।। ४ ।। हे महामेन ! जिस घर में मर्वदा यह पात्री स्थित रहता है उस घर में प्रेत, दैत्य और रक्षस कभी नहीं जाया करते हैं ॥५॥ हरिवार के दिन मे धात्री के ही एक मात्र हो जाने पर इतना महान पुण्य होता है कि जितना गङ्गा- गया--काशो और पुष्कर के स्नान मे भा नहीं होता ।।६॥ पक्ष युग मे अर्थात् दोनों कृष्ण पौर शुक्न पक्ष में एकादशी तिथि में जो कोई भी पुरुष धात्री, स्नान किया करता है उसके सभी पाप क्षीण हो जाते हैं और वह विष्णुलोक मेमन्त में विवास कर महिमान्वित होता है ॥७॥ धात्रीफलं सदा सेव्यं भक्षणे स्नान एव च । नियतपारणे विष्णो. स्नानमात्रेहरेदिने । सयते पारणे चैत्र धान्येकम्पशं ने नरः । भुक्त्वा तु लड्वयेद्यस्तु एकादश्यां सितासिते ॥६ एकेनैवोपवासेन कृतेन तु पडानन । सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः ॥१० | पम-पुगण अक्षयं लभते स्वर्ग विष्णुमायुज्यमाव्रजेत् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन धात्रीव्रतं समाचर ॥११ धात्रीद्रवेण सततं यस्य केशाः सुरञ्जिताः । न पिबेत्स पुनर्मातुः स्तनं कश्चित्पडनान ॥१२ धात्रीदर्शनसस्पर्शानाम्न उच्चारणेऽपि वा। वरदः सम्मुखो विष्णुः सन्तुष्टोभवति प्रियः ॥१३ धात्रीफलं च यत्रास्ते तत्रतिष्ठनि केशवः । तत्रब्रह्मास्थिरापमा तस्मात्ता तु गृहेन्यसेत् ॥१४ धात्री का फल ( मावला ) सर्वदा सेवन करना चाहिए इसका भक्षण करे और इससे स्नान भी करे । विष्णु के पारण मे निपत रूप से इसका प्रयोग करे और हरि के दिन में स्नान मात्र मे घात्री का प्रयोग करे ॥ ८॥ सयत पारण में और धात्री के स्पर्शन में मनुष्य को इसका प्रयोग करना चाहिए । इसको खाकर जो कृष्ण पौर शुक्ल पक्ष मे एकादशी के दिन लड्चन करता है हे पडानन ! ऐसे एक ही उपवास का ऐसा महान पुण्य होता है कि इससे ही सात जन्मो में किये हुए पाप से मनुष्य मुक्त हो जाता है- इसमे लेशमात्र भी सशय नहीं है ।।६।१०॥ इसके प्रभाव से असय स्वर्गवास प्राप्त होता है जिसमें यह कभी भी च्युत नही होता है। मनुष्य इसके सेवन के प्रभाव से भगवान् विष्णु के सायुज्य की प्राप्ति कर लेता है । इसलिये सभी प्रकार के प्रयत्नो से घात्री-व्रत का समाचरण करना चाहिए ।।११।। पात्री फल (मविला) के स्व. रस से जिस पुरुष के वेश सुरत्रित होते है, हे पहानन ! इस केशाजन का ऐसा विशाल प्रभाव होता है कि वह फिर इस संसार मे जन्म ग्रहण करके माता का स्तन नही पोता है अर्थात् उसकी मुक्ति हो जाती है और जन्म-मरण के मावागमन से हो छुटकारा पा जाता है ॥१२॥ धात्री के दर्शन से, स्पर्श से पौर केवल इमके नाम के उच्चारण मात्र से ही प्रभु विष्णु प्रत्यन्त सन्तुष्ट और प्रसन्न होकर उस व्यक्ति के सम्मुख वक्षन देने को प्रस्तुत हो जाया करते हैं ॥१३॥ धात्री का फल जिस स्थान पर रहता है वहां पर केशव भगवान् स्थित रहा करते हैं। वहाँ पर ब्रह्मा भी उपस्थित रहते हैं मोर लक्ष्मी तो धात्री भोर तुलमो महात्म्य ] [ ३६७ सुस्थिर होकर विद्यमान रहती है । प्रतएव धात्री फल को सर्वदा अपने घर में रसना ही चाहिए ॥१४॥ अलक्ष्मीनश्यते यत्र तत्र धात्री प्रतिष्ठति । सन्तुष्टास्सर्वदेवाश्च न त्यजन्ति क्षरणं मुदा ।।१५ धामीफलेन नैवैद्य यो ददाति महाधनम् । तस्यतुष्टो भवेद्विष्णुर्नान्यः क्रतुशतैरपि ॥१६ स्नात्वा धात्रीद्रवेणेव पूजयेद्यस्तु माधवम् । सोऽभीष्टफलमाप्नोति या मनसि वर्तते ॥१७ तथैव लक्षणं स्मृत्वा पूजयित्वा फलेन तु । सुवर्णशतसाहस्र फलमेति नरोतमः ॥१८ या गति निनां स्कन्द मुनीनां योगसे विनाम् । गति तां समवाप्नोति धात्रीसेवारतो नरः॥१६ तीर्थसेवाभिगमने प्रतश्च विविधस्तथा। सा गतिलंम्यते पुंसां धात्रीफलसुसेवया ॥२० प्रोतिश्च सर्वदेवानां देवीनां नो गणस्य च । सम्मुग्या वरदा स्नाने धात्रीफलनिपेवणे ॥२१ ग्रहादृष्टाश्च ये केचिदुग्राश्च दैत्यराक्षमाः। सर्वे न दुष्टता यान्ति धामीफलमुमेवनात् ।।२२ सर्वयज्ञेषु कार्येषु शस्तं चामलकोफलम् । सर्वदेवस्यपूजायां वर्जयित्वा वि मुत ! ॥२३ । तस्मादविदिने तातमतम्यां च विशेषतः। धात्रीफलानि सततं दूरतः परिवर्जयेन् ॥२४ जिम स्थान पर पात्री प्रतिक्षित होता है वही पर असो वा नारा हो जाता है। सभी देवमा पारी के रहने में प्रत्यन मन्तुष्ट हो जाण से और वे मुक्षिस होरर हो पर स्पिर रहते है सपा ए सण को भी सम स्पान । साप नहीं रिया से है ॥१५॥ पुरुष पानी पर मानव गति मरता है यह महापन है । इगो भगवान् forg पाम मातुर होगेर २६ ] [ प पुगए अन्य संबडो किये हुए यशो से भी नही होते है ॥१६॥ धात्री के स्वरस से स्नान करके जो भगवान् माघर को पूजा करता है वह अपने प्रभीष्ट फल की प्राप्ति किया करता है जो भी उमके मन में होता है ।। १७ ।। उमी प्रकार के लक्षण का स्मरण करके पोर फल के द्वारा पूजन करके मरों में उत्तम मनुष्य शत. सहस्र सुवर्ण के फल को प्राप्त कर लेता है ॥१८॥ हे स्कन्द ! जो उत्तम गति शान थाले महा पुरुषों की होती हैं पोर सद्गति योगाम्याम करने वाले मुनियो को हुमा करती है वही परम श्रेष्ठ गति धात्री की सेवा में रत रहने वाले मनुष्य को होती है ।। १६ ।। तीयों के सेवन तथा तीर्थों में मभिगमन करने से और अनेक प्रकार के व्रतो के करने से जो सुगति प्राप्त होती है वही गति मनुष्यों को धात्री के फलो के सुमेवन से प्राप्त हो जाती है ।।२०।। समस्त देवगण और सब देवियो की तथा गण की प्रसन्नता इसके मेवन मे होती है। धात्री फके सेवन और स्नान से मब देवी देवता वरदान प्रदान करने को उमके मामने उपस्थित रहा करते हैं ।। २१ ।। जो कोई दुष्ट ग्रह और जो उग्न राक्षम तथा दैत्य हैं वे सभी धात्री फल के सुसेवन करने से दुश्ता नही किया करते हैं ॥२२॥ सब प्रकार के यज्ञो में प्रौर समस्त शुभ कार्यों में प्रामल को का फल प्रशस्त माना जाता है । हे सुन ! केवल रविदेव को छोडकर अन्य सभी देवतानों के पूजन मे धात्री फल को बहुत बडी महिमा बनाई गई है ॥ २३ ॥ इमोलिये हे तान ! रविवार के दिन में और सप्तमी तिथि में विशेष रूप से धात्री के फनो को मदा दूर से ही त्याग देना चाहिए ।।२४।। सर्वेभ्य.पत्रपुष्पेभ्य.सत्तमा तुलसीशिवा । सर्वकामप्रदा शुद्धा वैष्णवी विष्णुसुप्रिया ॥२५ भुक्तिमुक्तिपदामुख्या सर्वलोकपरा शुभा। यामाश्रित्यगताःस्वर्गमक्षय मुनिसत्तमाः॥२६ हितार्थ सर्वलोकानां विष्णुना रोपिता पुरा । तुलसीपत्रपुष्प च सर्वधर्मप्रतिष्ठितम् ।।२७ यथाविष्णो प्रियालक्ष्मीयंथाऽहं प्रिय एव च । तथेय तुलमीदेवी चतुर्थो नोपपद्यते ।।२८ धात्री और तुलमो माहात्म्य ] [ ३६६ तुलसीपत्रमेकं तु शतहेमफलप्रदम् । नान्य. पुप्पैस्तथा पनयिर्गन्धानुलेपनैः ॥२६ तुध्यते देत्यहा विष्णुस्तुलस्याश्च दलविना । अनेन पूजितो येन हरिनित्य परागया ॥३० भगवान् ईश्वर ने कहा-समस्त प्रकार के पत्र और पुष्पो में तुलसी पत्र सबमे श्रेष्ठ है । यह तुनमी मानव को सम्पूर्ण कामनामों के प्रदान करने वाली होती है। यह परम शुद्ध है वैष्णवी है भोर भगवान् विष्णु को प्रत्यात प्रिय होती है ॥२५॥ तुलसी भगवान की भक्ति और संमार से मुक्ति दोनो ही को देने वाली है और इनके प्रदान करने में इसका मुख्य स्थान माना जाता है। समस्त लोको मे यह परा एवम् प्रति शुभ मानी जाती हैं। इस तुलमी का ममाश्रय ग्रहण करके श्रेष्ठ मुनिगरण प्रक्षय स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं ।।२६।। पहिले समय में समस्त लोकों के हित सम्पादन करने के लिये ही भगवान् विष्णु ने इस तुनमी का मारोपण किया था। तुनमी पत्र प्रौर पुष्प मे सभी धर्म प्रति. ष्ठित होते हैं ॥२७॥ जिम प्रकार से विष्णु को प्यारो लक्ष्मी है मौर जिस भांति मैं उनका प्रिय हूँ उमी प्रकार से यह तुलमी देवी है । चौया विष्णु भगवान का कोई भी प्रिय नहीं है । २८|| तुलसी का एक पत्र भत हैम के फल को प्रदान करने वाला है । अन्य प्रकार के पुष्पों में-पत्रों से तथा अन्य गन्धानुपनों मे दैत्यों के हनन करने वाले भगवान् विष्णु मन्नुष्ट नहीं होते हैं जब तक कि तुलसी के दल उनके साथ न हों। तुनमी दल के द्वारा पूजित हरि भगवान् नित्य ही पराशा के पूर्ण करने वाले होते हैं ॥२९॥३०॥ तेन वत्त हुतं ज्ञात कृतं यज्ञवतादिकम् । जन्मजन्मनि भासित्वं सुखंभाग्यं यःथियम् ॥३१ कुलंगील कलम च पुत्रंदुहितरं तया । धनं राज्यमरोगत्वं ज्ञानविज्ञानमेव च ॥३२ वेदवेदाङ्गशास्त्रं च पुराणागममंहिताः । सर्व करगतं मन्ये तुलस्याभ्यर्चनेहरेः ।।३३ यथागङ्गा पवित्राङ्गी सुरलोके विमोक्षदा । यया भागीरथीपुण्या तयेयंतुलमी गिवा ।।३४

[ प पुराण
किं च गङ्गाजलेनैव कि च पुष्करसेवया ।
तुलसीदलमिश्रण जलेनैव प्रमोद्यते ॥३५
माधव सम्मुग्वोयस्य जन्मजन्मसु धीमत ।
तस्य श्रद्धा भवेच्छ त्वा तुलस्या हरिमचितुम् ।।३६
तुलसी के द्वारा दत्त (दिया हुआ दान)-हुत (किया हुमा हवन)-
ज्ञात (प्राप्त किया हुपा ज्ञान)-कृत (किया हुमा कम)-यज्ञ पौर प्रन आदि
सब जन्म-जन्मों भासमान होते हैं तथा सुख, भाग्य, यश श्री, कुल, शील,
कलत्र, पुत्र, पुत्रो, धन, राज्य, नौरोगता, जान, विज्ञान, वेट, वेदाङ्ग, शास्त्र,
पुराण, आगम संहिता सभी कुछ तुलसी दल के द्वारा हरि का पम् र्चन करने से
हस्तगत हो जाया कररो हैं-ऐसा मैं मानता । चोक्य को कोई भी वस्तु
तुलसो द्वारा हरि की पूजा करने पर मलम्य नहीं रहती है ॥३१॥३२॥३३।। जिस
तरह भागीरथी गङ्गा परम पवित्र मत वाली है मौर मुर लोक मे मोक्ष प्रदान
करने वाली होती है तथा भागीरथी परम पुण्यमयी है उमी भौति यह तुलसी
परम शिवा होती है ।। ३४ ॥ गगा के जल से क्या पौर पुष्कर के जल सेवन
से भी क्या विशेष फल होता है जोकि तुलसो दल के मिथिन केवल साधारण
जल से ही भगवान् प्रसन्न हो जाते हैं ॥३५॥ जो तुलसी दल से सुसम्पप्त जल
से भगवान् समचन करता है उस धीमान् मनुष्य के जन्म-जन्मो मे भगवान्
माधव सम्मुख स्थित रहा करते है। तुलसी के द्वारा भगवान् हरि का भचना
श्रवण करके उसकी श्रद्धा हो जाती है ।।३।।
यो मञ्जरीदलैरेव तुलस्या विष्णुमर्चयेत् ।
तस्य पुण्यफलस्कन्द कथित नवशक्यते ॥३७
तत्र केशवप्सान्निध्य यत्रास्ति तुलसोवनम् ।
तम ब्रह्मा च कमला सर्वदेवगण सह ॥३८
तस्मात्ता सनिकृप्टे तु सदा देवी प्रपूजयेत् ।
स्तोत्रमन्त्रादिक यद्वा सर्वमानन्त्यमश्नुते ॥३६
ये च प्रेताच कूष्माण्डाःपिशाचा ब्रह्मराक्षमा ।
भूतदैत्यादयस्तत्र पलायन्ते सदैव हि ॥४०

घात्री पोर तुलमो म हार य -- अलक्ष्म र्नाशिनीपूर्णा या डाकिन्यादिमातर । सर्वा मड्कुचिता यान्तिदृष्ट्वातृतुलसीदलम् ॥४१ ब्रह्महत्यादयः पापधाधय पाउसम्भवा । कुमन्त्रिणा कृता ये च सर्वेनश्यन्ति तत्र वै ॥४२ भूतले वापि ते येन हर्यर्थ तुलमीवनम् । कृत क्रतुशत तेन विधिवत्प्रियदक्षिणम् ।।४३ जो तुलसी को महजरी के दलो के द्वारा भगवान् विष्णु की अर्चना किया करता है हे कद । उके जो पुण्य का फल प्राप्त होता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है ।। ३७ ।। जहाँ पर तुलसी का वन होता है वहाँ पर वेशव का सानिध्य रहा करता है । वहाँ पर ब्रह्म-लक्ष्मी और अन्य समस देवगण भी वेशन भगवान् के साथ में रहते हैं ||३|| इसीलिये उसको सनिकृष्ट होने पर सदा देवी का पूजन करना चाहिए । इस ममीर में स्थित होकर किमी भी स्रोत का पाठ तथा मन्त्र का जाप किया जाना है वह सभी अनन्त फल प्रदान करन वाला हा जाता है ॥३।। जो भी प्रे-कू माण्ड-पिशाच राक्षम- ब्रह्मराक्षम-भूत-दैत्य प्रादि दुष्ट यानियो वाल हैं वे वहाँ स मदा ही पलायमान हो जाया करते हैं ॥ ४० ॥ अलक्ष्मी-नाशिनी-धू और डाकिनी आदि माताएं ये सभी सकुचित होकर तुलमो दन का दर्शन करते ही वहाँ म चली जाया करती हैं ।। ४१ ।। ब्रह्म हत्या प्रभृति, पापो से उत्पन्न होने वाली पाप व्याधियां तथा कुमात्र वाले के द रा जो भी की गई है ये सब तुलसी दान से विनष्ट हो जाती है ।।४२।। इस भूनल में भी जिमने हरि को समचना के लिय तुलसी का बन लगा दिया है उस पुरुष ने पूण विधि विधान के साथ प्रिय दक्षिणा मे समन्वित मौ कतु कर लिये है तात्पर्य यह है कि सो यज्ञ के समान उसका पुण्य फन होता है ।।४३॥ हरिलिङ्ग पु चान्येषु शालग्रामशिलामु च । तुलसीग्रहण कृत्वा विष्णो सापूज्यमाव्रजेत् ।।४४ नन्दन्तिपुरुपास्तस्य माधवार्थे क्षितौ तु य. । तुलसी रोपयेद्धीरःमयाति माधवालयम् ॥४५

४०२ ]
[ पम पुगए
पूजयित्वा हरिदेव निर्माल्य तुलसीदलम् ।
धारयेद्य. स्वशी तु पापात्पूतोदिव प्रजेत् ॥४६
पूजने कीर्तने ध्याने रोपणे धारणे कलौ ।
तुलसी दहते पाप स्वर्ग मोक्ष ददाति च ॥४७
उपदेश दिशेदस्याः स्वयमाचरते पुनः ।
स याति परम स्थान माधवस्य निकेतनम् ॥४८
हरेः प्रियकर यच्च तन्मे प्रियतर भवेत् ।
सर्वेपामपि देवाना देवीना च समन्तत. ॥४९
श्राद्ध पु यज्ञकार्येपु पर्णमेक पडानन ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तुलसीसेवन कुरु ।।५०
तुलसीसेविता येन तेन सर्व तु सेवितम् ।
शिवाया तुलसी कृत्वा यस्तु प्राणान्परित्यजेत् ।
दुप्कृतीधाद्विनिमुक्त स्वर्गमेति निरामयम् ।।५२
भगवान् हरि क चरणो में तथा हरि के विग्रहो पर एव अन्य शालग्राम
शिलानो पर जो कोई पुस्प तुलमी दल ग्रहण कराता है अर्थात् चढाता है वह
भगवान विष्णु के मायुज्य को प्राप्त हो जाता है ॥४४॥ जो कोई भी पुरुष इम
पृथिवा में भगवान् माधव की पूजा के लिये तुलसी के पौधो का समारोपण
किया करता है वह धीर पुरुष निश्चय ही माधव के निवास स्थान में चला जाता
है और पुरुप महान् प्रानन्दित होते हैं ॥ ४५ ॥ भगवान् श्री हरि देव की पूजा
करके उनके चरणो मे चढी हुई तुलसी के दल को जो कि निर्माल्य स्वरूप हो
गया है उसे अपने मस्तक पर धारण करता है वह समस्त पापो से छुटकारा
पाकर परम पवित्र एवम् शुद्ध हो जाता है और फिर अन्त मे उसको स्वर्ग का
निवाम प्राप्त होता है ।।४६।। इस घोर कलियुग मे तुलसी का पूजन-तुलसी
की महिमा का कीर्तन-तुलसी का ध्यान-तुलसी के विरवा का आरोपण और
तुलसी का रूप धारण करता है वह तुलसी उस पुरुष के पापो को दग्ध कर देती
है पोर अन्तकाल में उसे स्वर्गलोक का निवास और मोक्ष प्रदान कर देती है
।। ४७ ।। इम तुलसी की महिमा का उपदेश अन्य लोगो को जो देता है और

गङ्गा माहात्म्य कथन । [ ४०३ पडानन स्वय भी उमी प्रकार के ममाचरण को करता है वह पुप यो भगवान् माधय के निवास स्थान को जो कि मबसे उत्तम परम स्थान है प्राप्त हो जाता है 1॥४८ । श्री हरि का जो प्रिय है वह मुझे अधिक प्रिय है । समस्त दवो को प्रौर देवियो को मभी पोर प्रिय है ||४|| श्राद्धो में तया यश कार्यों में तुलमी का एक दल प्रयुक्त करे । इसस मद प्रकार क प्रयत्नो से तुलसी दल का सेवन करो ॥ ५ ॥ जिप पुरुप ने इम लोक में तु नमी का सेवन कर लिया है उपने सभी की सेवा कर ली है। हे परामुख । तुलसी के सेवन करने वाले ने अपने गुरु--विप्र और देव तथा तीर्थों के सवन करने के फल प्राप्त कर लिये है । इमलिये तुम भी तुलमो का सेवन करो ॥५१॥ अपनी शिखायें जो तुलसी के दल मे रखकर प्राणो का परित्याग करता है वह जीवन में किये हुए सम्पूर्ण दुष्कर्मों के समूह म छुटकारा पाकर निराभय होता हुप्रा सीधा स्वर्गलोक को चला जाता है । ५२॥ ॥ गगा माहात्म्य कथन || गति चिन्तगता विप्रास्तूर्ण सामान्यजन्मनाम् । स्त्रीपु सामीक्षणाद्यस्माद् गङ्गा पाप व्यपोहति ।।१ गङ्गनि स्मरणादेव क्षय याति व पातकम् । कीतनादतिपापानि दशनाद्गुरुकल्मषम् ॥२ स्नानापानाच्च जाह्नव्या पितॄणा तर्पणात्तथा । महापातकवृन्दानि क्षय याति दिने दिने ॥३ अग्निना दह्यते तुल तृण शुष्क क्षणाद्यथा । तथा गङ्गाजलस्पर्शात्पु सा पाप दहेक्षणात् ।।४ सम्प्राप्नोत्यक्षय स्वगं गङ्गास्नानेन केशवम् । यशो राज्य लभेत्पुण्य स्वगमन्ते परा गतिम् १५ पितृनुद्दिश्य गङ्गाया यस्तु पिण्ड प्रयच्छति । विधिना वाक्यपूर्वेण तस्य पुण्यफन शृणु ॥६ अन्न केन तु साहस्र वर्ष पूज्य सुरालये। तिलेन द्विगुण विद्धि तथा मेध्यफलेन ॥७ ४० ] [ पद्म पुराण गव्येन विधिना विप्राः स्वर्गस्यान्तोन विद्यते । एवं पिण्डप्रदानेन नित्यं अनुशतं भवेत् ॥८ महर्षि व्यास देव ने विप्रो से कहा-हे विप्रगण ! जो साधारण जन्म पौर वाले पुरुष हैं और अपनी सद्गति होने का चिन्तन दिया करते हैं उन पुरय स्त्रियो को चाहिए कि गङ्गा का दर्शन करें क्योकि भागीरथी गङ्गा केवल उसके दशन करने से हो पाप का विनाश कर देती है ॥१॥ भगवती गङ्गा के स्मरण मात्र से ही समस्त पातको का क्षय हो जाता है । गङ्गा की महिमा का कीर्तन करने से जो अति पाप होते हैं उनका नाश होता है और गङ्गा के दर्शन से इससे भी बडे भारी क्ल्ापो का विनाश होता है ॥२॥ गङ्गा के जल में स्नान करन से, गङ्गाजल का पान करने से, गङ्गाजल में पितृगण का तर्पण करने से महान् जो पातको के समुदाय होते हैं वे दिन-दिन मे क्षय को प्राप्त हो जाते हैं ॥३॥ जिम प्रकार से अग्नि के द्वारा रुई मोर सूषा हुमा तृण क्षण भर में- दग्ध हो जाता है उसी मांति भागीरथी गङ्गा के जल से केवल स्पर्श करने से ही मनुष्यो के पाप क्षण भर मे दग्ध हो जाया करते हैं । ४॥ गङ्गा के जल में नान करने की बहुत बडो महिमा है । इसके करने से कभी नाश को न प्राप्त होने वाला स्वर्गलोक का निवास मिल जाता है, भगवान श्री केशव के चरणो की प्राप्ति होती है, समार मे उत्तम यश प्राप्त होता है, राज्य का लाभ होता है धौर महान् पुण्य मिलता है तथा अन्त समय में स्वर्गलोक पीर परा गति होती- है ।।५।। अपने पितृगण का उद्देश्य लेकर जो गङ्गा में पिण्ड देता है और विधि- विधान के साथ वार पूर्वक पिण्डदान करता है उसका जो पुण्य फल होता है उसका श्रवण तुम करो।।६।। जो केवल एक प्रन्न का ही पिएड बनाकर देता है बड़े एक सहस्र वर्ष पर्यन्त सुरालय में पूज्य होता जो कोई तिलो के सहित पिण्डदान करता है उसके उक्त स्वर्ग निवास के समय दुगुना होता है । मेध्य ( पवित्र ) फल एव मध्य से युक्त पिण्डो का दान किया करता है हे विप्रो । उसे जो स्वर्गलोक का निवाम मिलता है उसका कभी भन्त नहीं होता है । इस प्रकार से पिएडों का प्रदान करने से नित्य ही सो ऋतुमो का पुण्य फल होता है | समय गङ्गा माहात्म्य कथन ] । ४०५ . . एको गच्छति गङ्गां यः पूयन्ते तस्य पूरुपाः । एतदेव महापुण्यं तरते तारयत्यपि IIE गङ्गाकृत्स्नगुणं वक्नु न शक्तश्चतुरानन. । अतः किञ्चिद्वदाम्यत्र भागीरथ्या द्विजा गुणम् ।।१० मुनय सिद्धगन्धर्वा ये चान्ये सरसत्तमाः । गङ्गातोरे तपस्तप्त्वा स्वर्गलोकेऽच्युताभवन् ॥११ पारिजातसमा. पुष्पवृक्षाः कल्पद्र मोपमा । गङ्गातीरे तपस्तप्त्वा तत्रश्वर्य लन्ति हि ।।१२ तपोभिवंहुभिर्यपतनानाविधस्तथा । पुम्दानगतिर्या च गङ्गा ससेवता च सा ॥१३ जो कोई केवल एक ही भागीरथी गङ्गा पर स्नानादि करने के लिये - जाता है उसके ममा पूर्व पुरुप पवित्र हो जाते हैं । यह ही एक महान् पुण्य है । वह गङ्गा पर स्नान करने वाला स्वय ही तर जाता है और प्राने पूर्व, पुरुपा को भी तार देना है ।। हे द्विजगण ! गङ्गा के पूर्गा जो गुण हैं उनको अन्य पोई तो क्या साक्षात् भगवान ब्रह्मा भी जिनके चार मुख हैं स्वयं उनका वर्णन नहीं कर सकते हैं । इमलिये में भी यहाँ कुछ थोड़े से भागीरथी के गुण तुमको बतलाता हूं।।१०।। मुनिगण-मिद्ध लोग-गन्धर्व वृन्द और जो अन्य -देवो मे परम श्रेष्ठ हैं वे गङ्गा के तट पर तपस्या करके म्वर्गलोक में स्थायी रूप से निवास प्राप्त कर प्रच्युत होते हुए ही वहाँ रहते है ॥११॥ गङ्गा के तट पर तपश्चर्या करके वहाँ पर परम ऐश्वर्य का लाभ लिया करते हैं कि वहाँ पर जो पुष्पो वाले वृक्ष है वे पारिजात ( देवरु ) के समान हैं और समस्त मनो- कामना पूर्ण कर दने वाले कल वृक्षो के तुल्य होते हैं ।।१२।। बहुत प्रकार के -तपो से-~~यज्ञ और नाना प्रकार के प्रतो से तथा अधिक दानो से जो मनुष्य को गति प्राप्त होती है वही गति भागीरथी गङ्गा के जल में स्नानादि से प्रात होती हैं अत. इस गङ्गा वा भली-भांति सेवन करना चाहिए ॥१३॥ जारज पतित दुष्टमन्त्य गुरुघातिनम् । सर्वद्रोहेण संयुक्त सर्वपातकसयुतम् ॥१४ -

४०४ ]
। पम पुराण
गव्येन विधिना विप्राः स्वर्गस्यान्तो न विद्यते ।
एव पिण्डप्रदानेन नित्य ऋतुशत भवेत् ।।८
महषि वयाम देव ने विप्रो से कहा-हे विप्रमण | जो साधारण जन्म
वाले पुस्प हैं और अपनी सद्गति होन का चिन्तन क्यिा करते हैं उन पुरुष और
त्रियों को चाहिए कि गङ्गा या दर्शन करें क्योकि भागीरथी गङ्गा केवल उसक
दशन करने से ही पाप का विनाश कर देती है ।।१।। भगवती गगा के स्मरण
मात्र से ही समस्त पातको का भय हो जाता है । गङ्गा की महिमा का कीर्तन
करने से जो प्रति पाप होते हैं उनका नाश होता है और गड़ा के दर्शन से
इससे भी बड़े भारी क्ल्मपी का विनाश होता है ।२।। गङ्गा के जल म स्नान
करन से, गङ्गाजल का पान करने से, गङ्गाजल में पितृगण का तर्पण करने
से महान् जो पातको के समुदाय होते हैं वे दिन-दिन मे क्षय को प्राप्त हो जाते
हैं ॥३॥ जिम प्रकार से अग्नि के द्वारा रुई और सूखा हुमा तृण क्षण भर में
दग्ध हो जाता है उमी मोति भागोरथो गङ्गा के जल से केवल स्पर्श करने से
ही मनुष्यो के पाप क्षण भर मे दग्ध हो जाया करते हैं । ४॥ गङ्गा के जनम
स्नान करने की बहुत बडो महिमा है । इसके करने से कभी नाश को न प्राप्त
होने वाला स्वर्गलोक का निवाम मिल जाता है, भगवान श्री केशव के चरणो
की प्राप्ति होती है, समार मे उत्तम यश प्राप्त होता है, राज्य का लाभ होता है
धौर महान पुण्य मिलता है तथा अन्त समय मे स्वर्गलोक मीर परा गति हाती
है ॥५॥ अपने पितृमण का उद्देश्य लेकर जो गङ्गा में पिण्ड देता है और विधि-
विधान के साथ वाक्य पूर्वक पिण्डदान करता है उसका जो पुण्य फल होता है
उसका श्रवण तुम करो।।। जो केवल एक अन्न का ही पिण्ड बनाकर देता
है वह एक सहय वर्ष पर्यन्त सुरालय मे पूज्य होता है । जो कोई तिलो के
सहित पिण्डदान करता है उसके उक्त स्वग निवास के समय से दुगुना समय
होता है । मेध्य ( पवित्र ) फल एव गव्य से युक्त पिण्डो का दान किया करता
है हे विप्रो । उसे जो स्वर्गलोक का निवाम मिलता है उसका कभी मन्त नहीं
होता है । इस प्रकार से पिएडों का प्रदान करने से नित्य ही सो ऋतुम्रो का
पुण्य फर होता है ॥७॥

गगा माहात्म्य कथन ]
। ४०५
है
एको गच्छति गङ्गां यः पूयन्ते तस्य पूरुपाः ।
एतदेव महापुण्यं तरते तारयत्यपि 16
गङ्गाकृत्स्नगुण वन गक्तश्चतुरानन. ।
अतः किञ्चिद्वदाम्यत्र भागीरथ्या द्विजा गुणम् ॥१०
मुनयः सिद्धगन्धर्वा ये चान्ये मृरसत्तमाः ।
गङ्गातीरे तपस्तप्त्वा स्वर्गलोकेऽच्युताभवन् ॥११
पारिजातसमाः पुष्पवृक्षाः कल्पद्र मोपमा.।
गङ्गातीरे तपस्तप्त्वा तश्वर्य लन्ति हि ।।१२
तपोभिबहुभिर्यज्ञप्रतैर्नानाविधस्तथा ।
पुम्दानगतिर्या च गङ्गा ससेवता च सा ॥१३
जो कोई केवल एक हो भागोरथो गङ्गा पर स्नानादि करने के लिये
-जाता है उमक ममस पूर्व पुरुष पवित्र हो जाते हैं । यह हो एक महान पुष्प
। वह गङ्गा पर स्नान करने वाला स्वय ही तर जाता है और पाने पूर्व.
पुरुषों को भी तार देना है ॥६॥ हे द्विजगण | गङ्गा के पूर्ण जो गुण हैं उनको
अन्य कोई तो क्या माक्षात भगवान ब्रह्मा भी जिनके चार मुग हैं म्बय जनका
वर्णन नहीं कर सकते हैं । इसलिये मैं भी यहाँ कुछ थोड़े से भागीरथी के गुण
तुमको बतलाना हूँ ॥१०॥ मुनिगण---मिड बोग-वृन्द और जो अन्य
--देशों में परम घेत हैं वे गङ्गा के तट पर तपस्या करके ग्वगंनोक में स्थायी म्प
में निवाम प्राप्त कर पच्युन होते हुए ही वहाँ रहने है ।।११॥ गङ्गा के तट पर
तान करके वह पर परम ऐश्वर्य का नाम लिया करते हैं कमेकि वहां पर
जो पुणों वाले वृक्ष है वे पारिजात ( देवरु ) के समान हैं पोर ममस्त मनी.
सामना पूर्ण पर दन वाले कला वृक्षों के तुन्य होते हैं ॥१॥ यहुन प्रकार के
-तपों मे-या पोर नाना प्रकार से प्रतो मे तपा अधिक दानों में जो मनुष्य
को गति प्राप्त होती है वही गति भागीरण ग िजल में स्नानादि में प्राप्त
होती है अन मग ती मानि भया करना चाहिए ।।१।।
जारज पतित दुष्टमन्त्यज गुग्यातिनम् ।
रापंद्रोहण मंयुक्त गर्वपातामंयुनम् ॥१४

[ पम-पुराण
त्यजन्ति पितर पुनाः प्रिय पत्त्य सुहृद्गणा ।
अन्ये च बान्धवा सर्वे गङ्गा तु न परित्यजेत् ॥१५
यथा माता म्बय जन्म मलशौच च कारयेत् ।
कोडीकृत्य तथा तेपा गङ्गाप्रक्षालयेन्मलम् ॥१६
भवन्ति ते मुविख्याता भोग्यालङ्कारपूजिताः।
दर्शने कियते गङ्गा सकृद्भक्त्या नरैस्तुयः ॥१७
तेपा कुलीना लक्ष तु भवात्तारयते शिवा ।
स्मृतातिही याता सस्नुना साधुमोदिता ॥१८
गगा तारयते नृणामुभौ वशौ भवार्णवात् ।
मडकान्तिपु व्यतीपाते ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो ॥१६
पुष्ये स्नात्वा तु गाङ्गया कुलकोटि समुद्धरेत ।
शुक्लपक्षे दिवा मां गङ्गायामुत्तरायण ॥२०
धन्या देह विमुञ्चन्ति ह दस्थे जनार्दने च ।
अनेन विधिना यस्तु भागीरथ्या जले शुभे ॥२१
प्राणाम्त्यक्त्वा व्रजेत्स्वर्ग पुनरावृत्तिवजितम् ।
यो गगानुगतो नित्य सर्वदेवानुगो हि स ।।२२
जार (उपपनि) से ममुत्पन्न-पतित (दपिन कर्मों के करने से जो अपनी
जाति-धर्म और वर्ग में गिर गया)-दु ( दूपिन कम करने वाला )-
अन्त्यज ( मबसे नीच जाति मे ममुत्पन्न )-गुरु का पत करने वाला—मभी
लोगो क माथ दाह वग्न म युक्त मोर सब प्रकार के भतरो म मम वन पि ।
को
पुन
भी स्याग दिया करते हैं तथा पलियां भी अपने परम प्रिय पनि का
त्याग पर दिया करनी हैं ऐमे उपयुक लोगो को उसके सहदगण और वधव
भी छोड दिया करते हैं कि तु गगा ही। ऐमी है जो ऐम व्यक्ति का भी कभी
स्थाग न कर प्रपना लनी है ॥१४॥१५॥ जिम प्रसार में बच्चे की माता म्बय
उमको जन्म देती है और उसका मन पून का परिकार भो रिया करती है।
मा अपन बच्चे में लिमो भी दशा मे घृणा नही बरती है और उसे गोद मे
ठिती है उमो भनि गा माता भी माय च हे कमा भी नीच स नीद मौर

गङ्गा माहारम्य वपन [ ४०७ पापी क्यो न हो, उम मल का प्रक्षालन कर उसे परम पवित्र बना दिया परतो है ॥१६जो एक बार ही भक्ति-भाव से गगा का दर्शन करते हैं वे नर भोगने ६ योग्य पदार्थों में तथा अनेक अल वागे मे पूजिन पोर मुविम्यान हो जाते हैं ॥१७॥ उन पुरुषों के माम युनो को यह गगा ममार रे वधो में हार दिया करती है । जो पुरुष इमा ध्यान पगते हैं तथा भली-भांति स्तवन पिया ते * उमसे अभी सरह में प्रसन्न होती हुई यह गंगा स्मरण कोई होकर दुयों का हनन करने वाली होती है |१८|| राशियो पर यूपं में मवमण न यारे दिनो में पोर पार तथा मूर्य ग्रहण के समय में यम् पमीपान के दिन में गगा के जल स्नान करने में यह मनुष्यों में दोनो यनारो गगार रूपी समुद में तार दिया करनी है । १९le नक्षत्र में गगा र जम में स्नान करने में रोड पुनों या उसार हो जाता है। उत्तरायण गुर्य हो जाने पर शनि पर में और दिन रे ममय में जो मनुष्य गगा में प्रति गगारे गमोप पर पयवा मट पर मप में भगवान जमानान कर हटा करने ! IT मृ गुगत होते है और हम fairnो भागीरपी + शुभ प्रम में प्राणों । स्याग पिया करते हैं व स्थगनार को प्राप्त हो जाने l फिर ग गंगार में पाति नही होती है। जानिय होगमा पर गहना, मोमभी. जा रहारते, ॥२१॥२२॥ गवदेवमयां धियगुगंगा बिगुमयी यत । गजाय पियानेन मिणा निलोदरं ॥२ नग्माम्या दिव यानि स्यगंम्या मोसमाप्नुयु । परदारपद्रप्य राधामोरपगम्य ॥२॥ गनिमगुप्यमारम्य गाय परमा गनि । पगारविहीनम्य गुगनिन्दापण्य ममयागारमानाय नाम्नि गमागमा गमिः। Fruirपितास्य:गिभि: गापः म्यगमोरा मगमोमासरता। निर्म.riftaraiशिमगंध

४०६ ]
[ पद्म-पुराण
त्यजन्ति पितर पुत्राः प्रिय पल्पः सुहृद्गणा ।
अन्ये च वान्धवा सर्वे गङ्गा तु न परित्यजेत् ॥१५
यथा माता म्वय जन्म मलशौच च कारयेत् ।
क्रोडीकृत्य तथा तेपा गङ्गाप्रक्षालयेन्मलम् ॥१६
भवन्ति ते मुविख्याता भोग्यालङ्कारपूजिताः ।
दर्शने कियते गङ्गा सकृद्भक्त्या नरैस्तुयः ॥१७
तेपा कुलाना लक्ष तु भवात्तारयते शिवा ।
म्मृतातिही यैर्ध्याता सस्तुना साधुमोदिता ॥१८
गगा तारयते नृणामुभौ वशौ भवार्णवात् ।
मकान्तिपु व्यतीपाते ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो ॥१६
पुष्ये स्नात्वा तु गाङ्गया कुलकोटि समुद्ररेत ।
शुक्लपक्षे दिवा मा गङ्गायामुतरायणी ॥२०
धन्या देह विमुञ्चन्ति हृदिस्थे जनार्दने च ।
अनेन विधिना यस्तु भागीरथ्या जले शुभे ।।२१
प्रागाम्त्यवत्वा व्रजेत्स्वर्ग पुनरावृत्तिजितम् ।
यो गङ्गानुगनो नित्य सर्वदेवानुगो हि म ॥२२
जार (उपपति) से ममुरपल-तिन (पिन कमों के करने में जो अपनी
जाति-धर्म और वर्ग में गिर गया)-दु ( दूपित मं करने वाला)-
भस्यज ( मममे नीच जाति मे ममुरपान )-गुरु का घन करने वाला-भी
चांगो गाय द्रोह करने में युग्म और गय प्रकार के पातलो मे मर्मावत पिण
को पुत्र भी स्याग दिया करते है तथा पस्निया भी अपने परम प्रिय पनि का
रमाग पर दिया करती हैं. ऐमे अक मांगों को उमरे महदगण पौर व व्यय
भी मोर दिया को किन्तु गगाहर ऐसी है जो ऐमें शाक्ति गभी कभी
स्थागन र प्रपना मेनी है ॥१४॥१शा प्रिम प्रारमै बनेकी मामा म्य
ममी और उगा कर पूरा परिवार भी पानी है।
को अपने में गो भोटमा में पानी करती है और उसे गोद में
टिकी है उसी मामा माना भी मनुष्य रहे पंगा भी नीष गेनार पोर
.

गङ्गा माहात्म्य पयन ] [ ४०७ पापी क्यों न हो, उसके मल का प्रक्षालन कर उभे परम पवित्र बना दिया करती है ॥१६॥ जो एक बार ही भक्ति-भाव में गगा पा दांन पर वे नर भागने में योग्य पदार्थों मे तथा अनेक अलवा मे पूजिन पोर मुविम्यान हो जाते हैं ॥१७॥ उन पुरुषों के लाख दुनो को यह गगा ममार के मो मे तार दिया करता है । जो गुरुप इसका ध्यान करते हैं नपा भनी भनि स्तवन रियारते हैं उनसे अच्छी तरह मे प्रमन्न होती हुई यह गंगा स्मरण की हुई होकर दुमो का हनन करने वाली होती है ॥१८॥ राशियों पर गूर्य के मक्रमण न याने दिनो में प्रौर चन्द्र तथा मूपं के ग्रहण के समय में एवम् गनीपान दिन में गगा के जाल में स्नान मारन में यह मनुष्यों रे दोनों यगो को मगार तो ममुर मे तार दिया करती है । १६ नक्षत्र में गंगा प प में स्नान परने में कोड पुलो वा उमार हो जाता है। रायण गूयं के हो जाने पर पुन पक्ष में और दिन में समय में जो मनुष्य गगा में पर्षा गगा गमोप यन पपया मट परहस्य में भगवान नानाध्यानपाय करने । अर्या गृ युगत है और हम fafu में जो भागोरपी में मुभ मप्राणोंग स्याग पिया से स्वानोर यो प्रारा हो जाने में फिर म गंगार मेवातिनी होती है । जो सिप होगा पर 1, मी गभी. पण मरते है ॥२॥२१॥२२॥ मवदेवमयां विष्णुगंगा पिपगुमपी यत । गदाग पिण्डदानेन शिगावं निनादक ॥२३ नग्यम्पादिव यानि म्यगम्या मोसमाप्नुयः । परमारपदरापाहपरम्प ॥२४ गनिमनुष्यमा गम्प गय परमा गति। येदवारविधीनस्य गुगनिम्नापराय ग २५ मममामागीनाय नागि गलाममा गतिः। निवगिताम: गुरुप्पः॥६ ग्यमांशामा मुगमोमागिता। SHE Iोगशिपः।

४०६ [ पम-पुगण भुक्तिमुक्तिप्रदा गङ्गा सुसमीक्षाग्रन स्थिता । अनेकजन्मसवातपाप पु साविनश्यति ।।२८ भगवान् विष्णु ममस्त देवगण से परिपूर्ण होते हैं प्रर्थान् विष्णु मे मभी देवनानी का निवाम रहता है और भागीरथी गगा मे उन्ही मव देवमय भगवान् विष्णु का यि निवाम रहता है । ऐमो विष्णुमयी गगा के जन में निलोटक के महिन पितृगगा के पिण्डदान से जो पितृगणो मे कोई भी पिनर अपने दुलो के पागण नाक मे यातनाएं भोगा करते हैं वे तुम्न ही नावो मे छुपारा पाकर स्वगलोक में गगा जल मे पिण्ड देने के प्रभाव में जाकर निघाम करन वाले हो ज ते हैं और जो पहिले ही पितर म्वगं ठोक के निवापी होते हैं उनका फिर गगा के प्रभाव में मोक्ष हो जाया करता है। पगई -पराये धन म जो बाधा होती है और दूसरे के माथ द्रोह करने में जो मनुष्य मात्र को पार होता है ऐसे मनुष्य को परम गति करने वालो एकमात्र गगा ही होती है। जो पुरप वेद और शो के मद्ज्ञान से शू य होना है और जो अपन गुरु को निन्दा करने में नि सुना है तथा जो ममय पर किये जाने वाले प्राचार में विहीन होता है ऐमे पुरुष को मद्गति प्रदान करने वानी गङ्गां के ममान अन्य कोई भी नही है । अत्यधिक धन का व्यय होने वाले बहत मे यज्ञो के करने से क्या लाभ है और प्रत्यन्त घोर कष्ट देने वाले तपश्चर्या करने मे गे क्या प्रयोजन है जबकि सुख प्रोर मौभाग्य से पूजित हुई एक मात्र गङ्गा हो सानो का निवास और ममार के बारम्बार जन्म मरण के बन्नों में छुटकारा दिलाने वाली भागोग्धी गङ्गा उपस्थित है। फिर नित्य ही परम नियमो के पालन करने से और चित्त का निरोध करने वाले योग के अभ्याम में क्या लाभ है कि इनके करन का व्यर्थ ही वन भोगा जावे ॥२३ २४।२५।२६२७।। मनुष्यों के ममक्ष मे युक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाली मुम्ब से ही मोक्ष कारिगी गङ्गा स्थित है । इम महा महिमामयो गङ्गा के प्रभाव से मनुष्यो ये अनेक जन्मों के पानी का सहात नष्ट हो जाना है ॥२८॥ - स्नानमात्रेण गङ्गाया सद्य स्यात्पुण्यभाड नरः । प्रभासे गोमहस्रस्य राहुग्रस्ते दिवाकरे ॥२६ गङ्गा माहात्म्य क्थन ] लभते यत्फल दाने गङ्गास्नानादिने दिने। दृष्ट्वा तु हरते पाप स्पृष्ट्वा तु लभते दिवम् ॥३० प्रमङ्गादपि सा गङ्गा मोक्षदा ववगाहिता । सर्वेन्द्रियाणा चापल्य वासनाशक्तिसम्भवम् ॥३१ निघूणत्व ततो गङ्गा दर्शनात्प्रविनश्यति । परद्रव्याभिका क्षत्व परदाराभिलापिता ॥३२ परधर्म रुचिचव दर्शनादेव नश्यति । यदृच्छाताभसन्तोपस्स्वधर्म प्रवर्तते ॥३३ सर्वभूतसमत्व च गङ्गाया मज्जनाद्भवेत् । यस्तु गङ्गा समाथित्य मुखनिति मानवः ।। जीवन्मुक्तम्स एवह सर्वेपामुत्तमोत्तमः । गङ्गा सश्रित्य यस्तिष्ठेत्तस्य कार्य न विद्यते ॥३५ भ गीरथी गङ्गा क जल में वेवल स्नान कर लेने ही मे मनुष्ा तुना ही पुण्यात्मा बन जाया करता है । राहु से ग्रस्त सूय के होने पर प्रर्यात मूर्य का ग्रहण पडने पर प्रभान क्षेत्र में एक मास गोगो के दान का जो फल प्राप्त होता है वह पुण्य फल गङ्गा क जल में स्नान करने में प्रतिदिन हो जाया करता है । वैवल गङ्गा क दशन करन से वह मनुष्य के पापों का हरण कर लेनी है और गङ्गा जल का स्पा करने से वह स्वगलोक का निवाम प्रदान करती है ॥२६३ ।। किसी अन्य काय स भी कोई प्रसावश गगा तट पर पहुँच जाये और खास तौर से गगा के स्नान रा उद्देश्य ले न जाये तो भी l पर उसके जल में स्नान करने से मोक्ष प्रदान कर देती है । समस्त इन्द्रियों में जो चलता होती है, अर्थात् इन्द्रिी अपने विषय की मोर जा दौर लगाया करती हैं उम चञ्चलता को जो कि मान्नरोप पापना के कारण ममुत्पन्न होती है उसे भौर निगात्व को गगा दान से ही विष्ट पर दिया करती है। मनुष्य में जादूगर के धन को प्राप्त करने को प्रभिक्षा रहा करता है नया पगई जियो साय रमण वरन को जो अभिलाया मन में रहती है एव दूसरे धम में ओ रचि होती है--ये सभी विधुतिया गगा में गंन मात्र से ही स्वनः ४१० ] [ पद्म पुराण । नष्ट हो जाया करती हैं। गगा का ऐसा प्रभाव होता है कि हममे मनुष्य यहच्छा लाभ से ही मन्तोप कर लिया करता है और फिर उम पुरुष की अपने हो परम्परागत धर्म में प्रवृत्ति रहती है ।।३१॥३२॥३३॥ गगा के जल मे मजन फरने से मनुष्य के हृदय में समस्त प्राणियो को ममभाव से देखन का गुण ममुत्पन्न हो जाता है । जो पुरुप भगवती गगा का ममाश्रय ग्रहण करके सुख पूर्वक वहाँ पर ही स्थित रहता है वह पुरुष जीवित रहते हुए मुक्त हुए के ममान होता है और सभे पुरुषों में परम श्रेष्ठ होता है। गगा का समाप्रय ग्रहण करके अर्थात् उमो को अपना परमार ध्य इष्टदेव समझकर उमी के बल-भरोमे पर पडा रहने वाला पुरुष जो उमके तट पर स्थित रहता है उसका फिर कोई भी कार्य नही रहता है ॥३४॥३५॥ गगायाच मृतो मत्यं स्वर्ग मोक्ष चविन्दति । या गतिर्योगयुक्तस्य मत्वस्थस्यमनीपिरण ||३६ मा गतिस्त्यजतः प्राणान्गङ्गाया तु शरीरिणः । चान्द्रायणमहस्राणि यश्चरेत्कायशोधनम् ।।३७ पान कुर्याद्यथेच्छ च गङ्गाम्भ स विशिष्यते । तावत्प्रभावस्तीर्थाना देवाना तु विशेपत. ॥३८ तावत्प्रभावो वेदाना यावन्नाप्नोति जाह्नवीम् । निस्र कोट्योऽर्धकोटी च तीर्थाना वायुरब्रवीत् ।।३६ दिविभुव्यन्तरिक्षे च तानि ते सन्तिजाह्रवि । विष्णुपादाब्जसम्भूते गङ्ग त्रिपथगामिनि ॥४० धर्मद्रवेति विस्याते पाप मे हर जाह्नवि । विष्णुपादप्रसूतासि वैष्णवी विष्रगुपूजिता ।।४१ त्राहि मामेनसम्नस्मादाजन्ममरणान्तिकात् । श्रद्धया धर्मसम्पूर्णे श्रीमतारजसा च ते ॥४२ अमृतेन महादेवि भागीरथि पुनीहि माम् । प्रिभिःश्लोकवररेभियंः स्नायाजाह्नवीजले ।।४३ जन्मकोटिकृतात्पापान्मुच्यते नात्रसंशय. । मूलमन्त्र प्रवक्ष्यामि जाह्नव्या हरिभापितम् ॥४४ गङ्गा माहात्म्य कयन । - यह मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है और मुक्त हो जाता है। ऐसा मनुष्य जोवामुक्त ही कहा जाया करता है। यक्ष-दान-ay-~~~जाप-श्राद्ध और देवगण का पूजन जो भी कुछ गगा के तट पर यदि पिया जाता है तो वह सब नित्य ही करोडो से अधिक गुण वाला होता है । गगा के समीप मृत्यु को प्रत होने वाला मनुष्य स्वर्ग का निवास और मोक्ष दानों का नाम प्राप्त किया करता है। जो गति योगाभ्यान में निरन्तर निरत एवं योगी पुष्प को होती है और मत्व मे सस्थित एक महा मनीपो पुष्प की गति हुप्रा करती है वही गति उम पुरुष को भी होती है जो गगा के तट पर अपने प्राणी का स्याग किया करता है । एक सहस चान्द्र यण महा वन करके जो काया की शुदि की जाती है उस से भी अधिक यथेच्छ रूप से गगा के जल का पान १रने से होती है । समस्त देवो का-प्रभाव तथा सब नीया का प्रभाव विशेष रुप में और वेदो का प्रभाव तभी तक रहता है जब ता मनुष्य गम) को प्राप्त नही किया करता है । वायु ने बताया है कि सई तीन करोड तीर्थ है । दिवलोक, भूलोक पौर मन्तरिक्ष म य सब नीर्थ द्यिम न है । हे जाहवि ' हे गगे । प्रापका प्र दुर्भाव तो भगवान् शिशु के चरणो से हमा है मोर प्रिपथ में गमन करने वाली हैं ।।३७१३८।३६४०॥ आप नाम 'धम प्रव"-ऐमा लोको में विस्यान है । है जाह्नवि ! आप मेरे पापो को हरण कीजिए। पाप विष्णु के चरागों से समुत्पन्न हुई हैं । प्राप परम वैष्णवी है और भगवान विष्णु के द्वारा समविन हुई है। इसलिये पाप पागो में मेरी रक्षा कीजिए जो कि जन्म में लेकर मरमा पर्यन्त मैंने किये हैं। श्रद्धा से, धम स परिपूरण श्री मम्पन्न मापसी रज से जो प्रिमृत के तुल्य है हे भागीरथि । मुझे मब आप हे महादवि ! पवित्र कर दोजिये । इन तीन पद्यों को पढ़ते हुए जो पुरुष गगा के जन पे स्नान करता है वह निश्चय ही करोडो जन्मो के किये हुए पापा से मुन हो जाता है-इसमे शिश्चिमात्र भी समय नहीं है। ये तीनो लोक गगा क स्तवन रे लिये परम धेट हैं। 4ब मैं उम मूल मन्त्र वो भी बतलाता हूँ जो गगा का भगवन श्रीहरि ने भापित किया है ॥४१ मे ४४।। साजपानर पूतो विष्णुदेहे प्रतिष्ठति मन्त्रश्नायम् । ॐ नमो गङ्गाय विश्व पिण्य नागययनमोनमः ।।

४१२ ]
[ पल-पुगा
जाह्नवीनीरसम्भूनां मृदं मुना विति यः ।
सर्वपापविनिमुक्तो गङ्गास्नान बिना नरः ।।४६
गङ्गाजलोमिनिधूतपवन स्पृश्यते यदि ।
स पूतः कल्मपादोरारस्वर्ग चाक्षयमंश्नुते ।।४७
यावदस्थिमनुष्यम्य गङ्गातोये प्रतिष्ठति ।
तावद्वपमहस्रागिग स्वर्गलोके महीयते ॥४८
इस भगवन के द्वारा कहे हुए गगा के मूल मन्त्र का एक्वार भी जाप
कर लेने से मनुष्य परम पवित्र हो जाया करता है और वह विष्णु के देह प्रति-
टित होता है
वह मन्त्र यह है-~"प्रों नमो गङ्गायै विश्व रूपिण्यै नारापण्य
नमो नमः" इसका प्रथ है-विश्व रूप वाली साक्षात् नारायण स्वरूपा भगवती
गगा के लिये मे । बारम्ब र प्रणाम है ॥ ४५ ॥ गगा तट पर ममुत्पन्न हुई
गगोटी मृत्तिका को जो पुरुष अपने मस्तक पर धारण किया करता है वह
मनुष्य गङ्गा के जश्न में स्नान के बिना ही मब प्रकार के घोराति घोर पापो मे
विमुक्त हो जाया करता है ।। ६॥ गङ्गा की लहरो में उत्पन्न हुई वायु का भी
यदि कोई स्पर्श कर लेना है तो वह घोर कल्मपो से छुटकारा पाकर पवित्रात्मा
हो जाया करता है भोर अन्न म कभी क्षीण न होने वाला स्वर्ग का निवाम
उमे मिलना है ।४७ । मनुष्य की अस्थियां जितने समय ता गङ्गा के जन मे
रहा करती हैं उनने हो म स वर्षों तक वह प्राणी स्वर्ग नोक में प्रतिटिन रहा
करता है । इमोलिये मृत प्राणी की हड्डयो को गङ्गा जल में प्रवाहित किया
जाता है क्योधि उपका महान् पुण्य फल मृतात्मा को प्राप्त होता है ॥४||
॥ गणेश द्वारा त्रैपुरि वध ॥
चतुभिस्तुरगंजुष्ट रथ सूर्यसमप्रभम् ।
पुरिः समरोहाथाब्रवीद्वाक्य गणाधिपम् ।।१
पिता मे निहत: पि.ग्रा. तब, यम्मदराधिप ।
तस्मात्त्वामद्य विगिरनंयामि यमसादनम् ॥२
ततस्तमवीवो गणेशस्त्रिपुरात्मजम् ॥३

गणेश द्वारा पुरि वध ] । ४१३ तव तातेन दुष्टेन सुराणामहित पुरा । कृतं कम महत्पापं श्रुतं नो जनकेन हि ॥४ पापकर्मरत दुष्ट ज्ञात्वा ज्ञानबलेन च । अवधीत्तं शरैकेन पितरं ते बलेन च ॥५ पक्षात्प्रतारितो मोहात्प्रेपितो यममन्दिरम् । त्वा चाह तत्पथं दैत्य प्रेपयामि क्षरणादिह ।।६ उक्तवन्तं महाप्राज्ञ सुराणां च गणाधिपम् । विव्याधदशभिस्ती. कालानलसमप्रभः॥७ ततः शरसहस्र स्तु दैत्यं विव्याध साहसात् । यमदण्डसमारणक्षुरप्रैश्च शिलीमुखः ।। महर्षि व्यास देव ने कहा-चार अश्वों से युक्त मूर्य के समान प्रभा वाले रथ में पुरि समारूढ हो गया था और रथ पर चढकर उमने गणों के स्वामी से कहा था -पुरि बोला- हे गणाधिप ! क्योंकि प्रापके पिता शिव ने मेरे पिता का बध किया था इमलिये अपने पिता का बदला लेने के लिये प्राज में इस रण स्थल में अपने वालों के द्वारा तुमको यमपुर भेजूगा प्रति तुम्हाग बध करूगा ॥१२॥ व्यास जी ने कहा-इमका यवरा कर फिर गणेश भग. घान् ने उम त्रिपुर दैत्य के पुत्र मे यह कहा या ॥३॥ गणेश देव बोले- मैंने अपने पूज्य पिता से सुना है कि तेरे पिता ने पहिले अपनी दुध प्रकृति के कारण देवों का बहुत अधिक पहित किया या पोर महान् घोर पाप कर्म किये थे ॥४॥ इम तरह पाप पूर्ण कर्मों में रत उम तेरे पिता को महान् दुष्ट समझार हो जो कि उन्होंने अपने ज्ञान के बल मे जान लिया था, उन्होने बलपूर्वक एक ही वाण में तेरे दृष्ट पिता का वध कर दिया था|| ५ || मेरे पिताजी ने इस मोह के बीच से उमका उद्धार करके ही यमलोक में भेजा था । हे देस्य ! मैं मप पान एक ही क्षण में उमी मार्ग में तुझको भेजता है ॥ ६ ॥ महपि वर ध्याम जी ने कहा-इस प्रकार से कहने वाले देवगण में महान बुद्धि वाले भगवान गणाधिप को कालाग्नि के ममान प्रभा याने प्रत्यन्त तीण दवा वालों मे उमदेव ने भेदन दिया था॥७॥मरे मननर साहम पूर्वक एक महरा

४१४ ]
[ पद्म-पुराण
शरो से गणपति ने उम दैत्य को भेद दिया था ! ये गणपति वे द्वारा छोडे हुए
वाण बहुत ही तीक्ष्ण थे और यमराज के दण्ड के समान ही भीपण थे। ।
कडूपमहातीक्ष्णर्वजानलसमप्रभ ।
विचकत शराश्चास्य लम्बोदरः सुराचित. ॥६
पुनर्विव्याध विशिख सहसा भिदुरोपमै ।
शरदितसर्वाङ्गो मूच्छितस्त्वपतद्भुवि ॥१०
ततो भद्रश्च सौभद्रो भीपणो निजरान्तकः ।
स्वा स्वा गदा समादाय दुद्र वुस्त विनायकम् ॥११
शरै. सम्पातयामास धरण्या गणनायकान् ।
लाघवात्तु रथ चान्य गत्वा त्रिपुरनन्दनः ।।१२
विशिखैर्वज्रसङ्काशै सबिभेद गणाधिपम् ।
रुधिरेणावसिक्ताङ्गो रुपा घोरयमप्रभः ।।१३
ललाटे च त्रिभिणिस्सप्तभिश्च स्तनान्तरे।
चतुभिर्नाभिदेशे च पञ्चभिर्मुष्टिमस्तके ॥१४
सविभेद महाक्रोधो बलिन शम्भुनन्दनः ।
शरैरदितसर्वाङ्गः स दैत्यो रणमूर्धनि ॥१५
कम्मल पर परम गत्वा सम्पपात रथोपरि।
ततः सूतेन धीरेण अपनीतो रणाजिरात् ।।१६
देवगण के द्वारा पूजित गणपति ने इस दैत्य के वारणो को जो कि उसने
इन पर छाडे थे अपने कङ्कपत्र मोर प्रत्यन्त तीक्ष्ण नया वध और अनल के
तुल्य प्रभा वाले वरणों से छेदन कर दिया था अर्थात् दैत्य के द्वारा प्रयुक्त वारण
मभी काट डाले थे ॥ ६॥ भोर फिर वज के समान बाणो मे सहसा गणेशजी
ने उस दैत्य वेघ दिया था। उन वारणो से अत्यन्त पीहिन होकर समस्त प्रङ्ग
जिसके छिन्न-भिन्न हो गये थे ऐमा वह दैत्य मूठित होकर भूमि पर गिर पडा
था ॥१०॥ इसके उपरान्त भद्र-सौभद्र-भीपण दैत्य जो कि देवो के माश
कर देने वाले थे अपनी-प्रपनी गदा कर एक साथ सबके सब उन विनायक पर
पडे थे ॥११॥ शगे पे द्वारा गणनायका को भूमि पर गिरा दिया था पर बहुत

गणग द्वारा पुरि वध } [ ४१५ होकर शम्भु के पुत्र ही फुर्ती से वह त्रिपुर दैत्य का पुन दूसरे रथ पर जाकर वन के तुल्य वाणो से उमने गएो के स्वामी का भेदन मच्छी तरह से किया था । रुघिर से पव. पिक्त अङ्गो वाला-क्रोध में महान् घोर यम के तुल्य, महान् क्रोध से युक्त उम बलवान् दैत्य को तन व रणों से फिर ललाट मे मात वाम्गो से स्तनो के मध्य छाती में-चार गे से नाभि भाग में मोर पांच वाग्गो से मुष्टि मस्तक में भेदन किया था। इस प्रकार मे वाणो ये द्वारा अदित अङ्गो वाला वह दैत्य रण भूमि में परम दुखित होकर रथ के ऊपर गिर गया था और फिर रथवाहन ने धीरे से उम रणक्षेत्र मे उसे हटा दिया था ॥१२. ॥१३॥१४॥१५॥१६॥ विमुख नाह्नच्छूगे विनायक. सुराचित । चिरात्सज्ञा समालभ्य यन्तार चाब्रवीद्वचः ।।१७ गच्छ मूत रणे भोरु विनायक हरात्मजम् । ततो यन्ताऽब्रवीद्वाक्य सत्य पथ्य च कोमलम् ॥१८ हगत्मजगरान्सोटु कस्समर्थों रणाजिरे । नम्मान्मोहगतस्त्व च मयानीत. प्रभासुत ॥१६ एतज्ज्ञात्वा त्विदानी भो यद्य क्त तद्विधीयताम् ॥२० मुरो के द्वारा वन्दित विनायक ने जब देया कि वह रणभूमि में विमुष हो गया है तो फिर उमका हनन उमने नहीं किया था। बहुत ममय रे पश्चात् जब होदा आयो तो अपने रप के यन्ता से यह वचन बोला ॥ १७ ।। पुरि ने कहा-हे भूत । रण में चलो जहाँ पर वह हरपोक शिव का पुत्र विनायर विद्यमान है । महषि व्यामजी ने कहा-हमके पश्चात उम रथ वाहक ने मरय, हितकर और मति कोमल यमन यहा ॥१८॥ मारपि ने कहा-इस रणभूमि में के घरों को मदन करने को मिली मामध्यं है ---पति उनले वागो ये प्रहागे को कोई भी सहन नहीं कर पाता है। मोनिया पर बेहोश हो गये थे । यही मे में ही प्रभामुन पायो यहाँ से पापा पा ॥१६॥ यह जानार इस समय भी प्राप चिन मममें वही करे | भगवान् हर के

[ पद्म पुराम
एतस्मिन्नन्तरे राज्ञा प्रेरित. कविसत्तमः ।
औषधादिप्रयोगेण गज मज्ञामवोययत् ॥२१
अकारयच्छत गुगाप्राण च जयमादिशत् ।
प्राग्जल मन्त्रित दत्त्वा रुगेध स्याङ्गावगान् ॥२२
स गजोदशनैरेव स्फोटयामाम वै गिरिम् ।
एवशतसहस्राणि सैन्यानि मैन्यपालकान् ॥२३
पातयामास समिती गज परमदुजयः ।
सदैत्यस्तस्य पृष्ठस्थ शरै कालानलप्रभ ।।२४
हत्वा स्वपातयच्चो- मुख्यमुख्यान्सुगधिपान् ।
शरस्तस्य तदा देवायमदण्डसममुभं ॥२५
निपतन्ति महावीर्या रुधिरौघपरिप्लुता ।
यस्मिन्यस्मिश्च मार्गे तु सदैत्य सगजो गतः ॥२६
तत्र तत्र चकागशु भीपण सञ्चित शरै ।
गजेन पातिता केचिद्गजारोहण चापरे ॥२७
वेगेन भ्रमणेनैव सुरा केचित्प्रतापिताः ।
एव सुरगणाध्यक्षा. शस्त्रास्त्रविविधश्च तम् ।।२८
व्याम जी ने कहा-इसी बीच में राजा के द्वारा श्रष्ठ कविराज वहाँ
भेजा गया था। प्रौपय मादि के प्रयोग मे गज ने सज्ञा को प्राप्त किया था।
उसके प्राण को शतगुण वाला कर दिया था और जप का प्रादश दिया था ।
पहिले उसे अभिमन्त्रित जल दिया गया था और उसके अगो के प्रमों को रोध
किया था ॥ २१॥२२ ।। वह गज अपने दानो से ही गिरि
स्फुटित कर देता
था । इस प्रकार मे सैकडो-महस्रो मेनामो और सेना के पाल को उस परम
दुर्जय गज ने ममिति मे गिरा दिया था। वह दैत्य उमके पीठ पर स्थित था।
उस दैत्य ने कालानि के तुल्य यगे के द्वारा जो मुख्य-मुरय सुहाधिप थे उनको
मारकर भूमि पर गिरा दिया की उम समय में उत्त दैत्य के गरी से जो कि
यम के दण्ड के तुल्य भीपण थे देवाण महान् वीय वाले भी होते हुए रक्त के
मोघ से लथपथ होकर गिर रहे थे जिम-जिस मार्ग मे वह दैत्य उम गज के

गरोग द्वारा पुरि वध । [४१७ . माहित गया था यहीं पर देव निपतित हो जाते थे ।। २३-२६ ॥ उन उन स्थलों पर शोधता में शरों के द्वारा प्रत्यन्त भीषण मञ्चार किया था। कुछ लोग तो गज ने गिग दिये थे और दूसरे लोग गजारोह के द्वारा गिराये गये थे । बडे भारी वेग से जो वहाँ पर भ्रमण किया था उमसे कुछ देवना नापित हो गये थे। इस प्रकार उम युद्ध स्था मे लडाई होने पर फिर समस्त सुरगणी के अध्यक्षो ने अपने नाना भांति के शस्त्र तथा प्रस्त्री से उस पर प्रहार किया - था।। २७॥२८॥ स गजं युद्धनिर्भीना निजध्नुर्बहुभिः पारे । तथापि तद्द्यन योधु न शक्तास्ते महाबलाः ॥२६ क्षिप्र तास्तु गजो दन्तस्त्रपुरोऽपातयच्छरैः । न गता ये धरण्यां च देवा जर्जरविग्रहाः ॥३० धरण्या गणप जग्मुर्भातास्ते वेदनातुराः । देवाना दन दृष्ट्वा गणाधीशः प्रतापवान् ॥३१ स गज ताडयामास वज्रानलममें शरे । स गजोवेगसरुद्धः शरेण च समुत्थितः ॥३२ अयो तो द्वो शरैरेव विभिदाते परस्परम् । उभी तो नर्दमानौ च अन्योन्य जयमच्छनाम् ॥३३ शोणितैलिप्तसर्वागी वीपमुख्योसुरासुरो । प्रथाखु स गजो मत्तो विभेद दशनं. स्वकः ॥३४ प्राखुनाऽभिद् तो नागो घोरयुद्ध तयो परम् । अधोत्र सविभागे च चतुभियुद्धमद्भुतम् ॥३५ उन्होने युद्ध से निर्भान होते हुए बम गज पर बहन से वारणो से प्रहार किये थे तो भी वे महान् बल वाले उस गज के साथ युन करने में समर्थ न हो सके थे ॥ २६ ॥ उमपुर गज ने बहुत ही शीघ्र उनको प्रपने दांतो से और त्रिपुर के पुत्र ने वाणो से नीचे गिरा दिया था। जो देवता धरणो में नहीं गिरे थे वे जर्जरित शरीर वाले हो गये थे ॥३०॥ धरणो पर वे सब बहुत ही डरे हुए होकर वेदना से प्रत्यन प्रातुर होते हुए गणों के स्वामी के समीप में पहुंचे ४१८ ] [ पद्म पुराण थे प्रकार का थे । देवतामो के इस कदन को प्रताप वाले गणपति मे देखा था ॥३१॥ तब गणपति ने अपने वचाग्नि के तुल्य शरो से उस गज को ताडित किया था। वह गज शर के द्वारा वेग से सरुद्ध हो गया था और फिर वह वढा था ॥३२॥ इमके मनन्तर वे दोनो परस्पर मे विशेप रूप से शरी के द्वारा भेदित हुए थे। वे दोनो एक दूसरे पर विजय प्राप्त करने की इच्छा रखते हुए नईमान हुए ॥३३।। वे सुर मौर मसुर दोनो मुख्य वोर रक्त से लिप्त अंगो व ले हो गये थे। इसके उपरान्त उम मदमत्त गज ने अपने दोतों से आखु ( भूषक ) को भेदित किया था ॥३४॥ फिर उस आखु ने भी उस गज को अभिद्रत किया था। उन दोनो का परम घोर युद्ध हुपा था। नीचे ऊपर और सविभाग मे चारों के द्वारा उमममय मे हमा था ॥३५॥ स शब्द तुमुल युद्ध सर्वलोकभयङ्करम् । दशनर्दशनैरेव शरैरेव शरोत्तमैः ॥३६ तद्घोरमभवद्य द्ध देवदानव सगरे । पाखुको भेदयाञ्चके महानाग महावलम् ॥३७ पशुनापृष्ठवशा स्थित्वा तेनाहनत्पुनः । दैत्यस्य दशनद्वारे हृदिस्कन्धेऽथ लाघवात् ॥३८ स गज. सपपातोव्यां गतासुलॊहित वमन् । शशसुमुनयो देवास्साधुसाध्विति चाव वन् ॥३६ गणप पुप्पगन्धैश्च गन्धधूपैरपूजयन् । दुद्र वुर्दैत्यसङ्घाश्च भीताश्च प्रारणकातराः॥४० नथैव सह पार्वत्या सुरानाह महेश्वरः ॥४१ अथान्येऽम्बरमोघेश्च दैत्यानाजघ्नुराहवे । यावत्तु सेनयो व जययुद्ध समापयेत् ॥४२ उस समय शब्द के सहित महान तुमुल युद्ध हुमा या जो समस्त लोकों के लिये मत्यन्त ही भयानक था। उस युद्ध मे दांतों से दांतो के द्वारा और परी से पारों के द्वारा युद्ध किया गया था अर्थात् दातों के प्रहार का जवाब सातों से दिया गया और जब वाणों से प्रहार किया गया पा,उसका उत्तर शरों

मूर्य माहात्म्य वर्णन ]
[ ४१६
ने
मे दिया गया था ।। ३६ । उम देवाण और दानव वृद वा जो युद्ध हुप्रा था
वह महान् घोर संग्राम हुआ था । उम अ खु महान् बलशाली नाग (गज)
को भेदित कर दिया था ॥३७॥ फिर उसने पृष्ठ वशान में स्थित होकर पशु
के द्वारा उमका हनन किया था और बहुत ही फुरी के साथ दंत्य के दशन द्वार
मे-हृदय और स्थन्ध में भेदन किया था ।। ३८ ॥ वह गज मुख से घिर का
वमन करता हुपा गत प्राण वाला होकर भूमि पर गिर गया था । यह देखकर
मुनिगण पौर समस्त देवता लोग 'माधु माधु" अर्थात् 'बहुत अच्छा हुमा-
बहुत अच्छा हुआ'--ऐमा मुख से वालते हुए प्रशमा करने लगे थे ॥३६॥ फिर
मबने भगवान गणपति का पुष्प-गन्ध-धूप प्रादि उपचारो के द्वारा
पूजन किया था और दैत्यो के समुदाय प्राणों के नाश से भयभीत होकर
यहां से भागने लगे थे।।४०॥ भगवान महेश्वर अपनी पारी पत्नी पार्वती देवी
के साथ यहाँ प्राकर सुरी में बोले ॥४१॥ महेश्वर ने कह --यहाँ पर अयों ने
अपने अमीय प्रस्त्रो के द्वारा इस युद्ध मे दैत्यो का हनन किया है और
जब तक दोनो सेनामो का जय युद्ध ममाप्त न हो तब तक हनन परते
रहो।। ४२॥
॥ सूर्य माहात्म्य वर्णन ॥
प्रभवत्ययमाकाशे नित्य द्विजवर प्रभो ।
कोऽय का वा प्रभावोऽस्य कुत्रजातो घृणीश्वरः ।।१
कि करोति हि कार्य वै यतो रश्मिमयोभृशम् ।
देवमुनिवरैस्सिद्ध श्चारणर्दैत्यराक्षस ॥२
निखिलौनुपै पूज्य सदैव ब्राह्मणादिभिः ॥३
परम ब्रह्मास्तेजो ब्रह्मदेहाद्विनिस्सृतम् ।
साक्षाद्ब्रह्ममय विद्धि धर्मकामार्थमोक्षदम् ।।४
मयूखैनिमलः कूटमतिचण्ड सुदु सहम् ।
दृष्ट्वा प्रदुद्र वुर्लोका करंश्चण्ड प्रपीडिताः ॥५
ततश्च सागरा: सर्वे वरनधो नदादय ।
गुष्यन्ति जन्तवस्तम म्रियन्ते चातुगजना ॥६

४२० ] [ पम-पुगण अथ गकादयो देवा ब्रह्माणं समुपागताः । इममर्थ तदा प्रोचुर्देवांश्च विधिरब्रवीत् ।।७ श्री वैशम्पायन मुनि ने कहा-हे प्रभो ! हे द्विजों में परम श्रेष्ठ ! यह जो नित्य ही इस नभ मण्डल में उदित होता है यह घृणीश्वर कौन है, इसका क्या प्रभाव है और इम का जन्म कहाँ हुमा था? ॥१॥ यह क्या कार्य किया करता है, क्योकि यह बहुत तोरण किरणो से परिपूर्ण रहता है । इसको क्या ऐमी महान् महिमा है कि मभी देवगण-मुनिवृन्द–सिद्धो का समुदाय-- चारणगण-~-दस्यवर्ग-राक्षस और सम्पूर्ण मनुष्यों के द्वारा तथा ब्राह्मण प्रादि सब घों के द्वारा सर्वदा हो इसको बडी भारी पूजा की जाया करती है, महपि व्यास ने कहा- यह ब्रह्मा का परमोत्कृष्ट तेज है जो कि ब्रह्मा के देह से ही निकला था। इसको साक्षात् ब्रह्ममय ही समझना चाहिए । यह धर्म-प्रथं- काम और मोक्ष चारों पदार्थों का प्रदान करने वाला है ।। ४ ।। इसको मत्यन्त निमन किरणो से यह बहुत ही तेजयुक्त है और इसका ऐसा तीक्ष्ण तेज है जिस को सहन करना महान् कठिन होता है । जब यह निकला था तो इस इतने तीन तेजस्वी को देखकर लोग भागने लग गये थे और इसको अत्यन्त तीक्ष्ण किरणो से सभी लोग प्रपीडित एवम् संतप्त हो गये थे ।।५। इसका उस समय में फिर ऐसा प्रभाव हुअा था कि समस्त सागर, सभी नदियां और नद मादि जितने भी जलाशय थे सूख गये थे भौर जो जल मे रहने वाले जन्तु थे वही पर अत्यन्त दुःखित होकर मरने लग गये थे । इनके अतिरिक्त अन्य भी सब प्राणी सताप से पीडित होते हुए प्राण त्यागने लगे थे ॥६।। उस समय में ऐपो सहार- मयी दशा को देखकर देवराज इन्द्र आदि सभी देवता पितामह ब्रह्माजी के समीप में उपस्थित हुए थे और उस समय मे लोको को इस दुर्दशा का हाल उन्होंने ब्रह्माजी से कहा था। तब ब्रह्मा जी ने उन देवतामो को बनलाया । था॥७॥ पादिय मतनोर्देवा सत्त्वगो जनकः प्रभुः । प्रय रजोमयः साक्षात्सुधांशुस्तनुमध्यगः । एताभ्यां पालितालोकास्त्रैलोक्ये सचराचराः । दिव्योपपादका देवा येवानव जरायुजाः ।।

मूर्य माहात्म्य वर्णन । [ ४२१ अण्डजारम्वेदजाश्व ये वाऽत्रवोद्भिजादयः । मूर्यस्यास्यप्रभावं तु वक्तुमेव न शक्नुमः ।।१० अनेन रक्षिता लोका जनिता पालिताध्र वम् । अस्यवसदृशो नास्ति सर्वेपा परिरक्षणात् ।।११ यं च दृष्ट्वाप्युपः काले पापराशिः प्रलीयते । तमाराध्य जना मोक्ष साधयन्ति द्विजातय ।।१२ सन्ध्योपासनकाले तु विप्रा ब्रह्मविदः किल । उद्वाह्वो भवन्त्येव ते च देवप्रपूजिता ॥१३ अस्यंव मण्डलस्थां च देवी सन्ध्यास्वरूपिणीम् । ममुपास्य द्विजास्मर्वे लभन्ते स्वर्गमोक्षको ।।१४ पितामह ब्रह्मा बोले-हे देवगण ! सत्त्व में गमन करने वाला ब्रह्म-तनु वा आदि जनक प्रभु है । यह तनु के मध्य मे गमन करने वाला रजोमय साक्षात् सुधाशु है III इन दोनो के द्वारा ही ये समस्त लोक जो भी इस त्रिभुवन मे घर मोर अचर है पाले गये है। दिव्य उपपादक देवता और जो यहाँ पर ही जरायुज प्राणी हैं तथा अएडज-स्वेदज एवम् उद्भिज प्रादि सभी प्रकार के प्रागी जो हैं वे कोई भी इस सूर्य के प्रभाव को बतलाने में समर्थ नहीं होते हैं 11९1१०॥ इसने ही समस्त लोकों की रक्षा को है, इमोसे मब को उत्पत्ति हुई है और इसके द्वारा ही निश्चित रूप से सम्पूर्ण त्रिभुवन का पालन एव पोपण भी होता है । सबके परिपक्षण करने मे इसके ममान यहाँ अन्य कोई भी नहीं है ॥११॥ प्रायु के काल मे इमका दर्शन करके पापो का समुदाय प्रलीन हो जाया करता है । इमको सम धना करके द्विजाति लोग अपने यहां पर बार- बार जन्म लेना और मरने के प्रावागमन के कष्ट से छुटकारा प्राप्त करने की सिद्धि प्राप्त करते है ॥१२॥ मध्या-वन्दन के समय में ब्रह्म के वेत्ता विप्र लोग अपनी बाहुप्रो को ऊपर को मोर उठाते हुए इसकी पारायना किया करते हैं जो कि देवो के भी द्वारा वन्द्यमान होते हैं ।। १३ । इमी सूर्य के मण्डन के मध्य में सस्थित मन्ध्या स्वरूप वाली देवी है जिसको गायत्री-पावित्री तथा वेदजननी प्रादि शुभ नामो से पुकारा करते हैं। इसकी भनी भांति प्राराधना ४२२ ] । पप-पुरात एवम् उपासना करके समस्त द्विजगण स्वगं का निवाग पौर परम पुरुपार्थ मोक्ष की प्रप्ति किया करते हैं ॥१४॥ धरायांपतितोच्छिष्टा पूतास्तेचास्यरश्मिभिः । सन्ध्योपासनमात्रेणकल्मपात्पूनतांब्रजेत् ।।१५ दृष्ट्वा चाण्डालक गोघ्नं पतित कुष्ठसङ्गतम् । महापातकमङ्कीर्णमुपपातकसवृतम् ॥१६ पश्यन्ति ये नरास्सूर ते पूता गुरुकिल्बिपात् । अस्योपासनमात्रेण सर्वरोगात्प्रमुच्यते ॥१७ नान्धत्व न च दारिद्य न दु ख न च शोच्यताम् । लभते च इहामुत्र समुपास्य विरोचनम् ॥१८ प्रदृष्टा नैव लोकश्च देवा हरिहरादय । ध्यानरूपप्रगम्यास्ते दृष्टो देवो ह्यय स्मृतः ॥१६ अस्तु प्रसादनाराध्यश्चास्तूपासनपूजनम् । अन्यत्र दर्शनं ब्रह्मन्प्रलयानलसमितम् ।।२० सर्वे नगदयस्सत्त्या मृतावस्थागता भुवि । अम्य तेज प्रभावेण प्रनष्टास्सागरादयः ।।२१ न समर्था वय सोढु कथमन्ये पृथग्जनाः । तस्मात्तवप्रसादाच्च पूजयामो यथा रविम् । यजन्ति च नरा भक्त्या तदुपायो विधीयताम् ॥२२ धग मे पतित होकर उच्छिष्ट जो भी है वे इसकी किरणो ही पवित्र होते हैं । मन्ध्या की उपापना मात्र से ही कल्मषो से पवित्रता हो जाती है। मर्थात् केवल एकमात्र सध्या ममय में नियम से विधिपूर्वक उपामना करने का ऐमा प्रभाव होता है कि इमोसे ममस्त कल्मपो का क्षय हो जाया करता है ॥१५॥ नागडाल का देवकर, गाय का वध करने वाले-पतित-कुष्ठ रोग स अम्त-महा पातक से युक्त नया उपासको में युक्त को देखकर जो पार होता है उम महान किस्विप से मनुष्य मूर्य का दर्शन करके मुन हो जाते हैं। मूय को केवल उपामना से ही मनुष्य सब प्रकार के रोगों से मुक्त हो जाया करते हैं ॥१६॥११॥ इम संमार मे भगवान सूर्य देव को उपासना का महान् प्रभाव होता मू माहात्म्य वर्णन ] [ ४२३ है । इसकी उपामना से नेत्रों की दृष्टि की हीनता--दरिद्रता-मन्य किसी भी प्रकार का दुःख पोर शोक एवम् चिन्ता पादि कुछ भी नहीं होता है ।। १८ ॥ हरि मौर हर प्रादि पन्य महान् देवतामों के दर्शन लोकों ने कभी साक्षात् रूप मे नही किये हैं। इन सभी देवगणो का तो फेवल ध्यान ही किया जाना है मोर उम ध्यान के द्वारा ही उनका ध्यानमय दर्शन लोग किया करते हैं, किन्तु यह भगवान् मूर्य तो प्रत्यक्ष देव हैं जो माक्षात सबको अपना दर्शन दिया करते हैं ॥१६॥ यह पितामह के कहे जाने पर देवगण ने कहा है पितामह ! प्रापने जो मूर्य देव को माराधना की महिमा बतलाई है वह बहुत ठीक है कि इस देव को प्रमन्न किया जाये और यह मबकी पाराधना के योग्य है. इसकी उपा- सना तथा पूजा भी करनी चाहिए । रितु हे बह्मन् । इम देव के दर्शन तो साक्षात् प्रलय काल की महान् भ पण एवम् असह्य अग्नि के ममान है । इसकी महान तीक्षण किरणो के कारण कैमे इसके कोई दर्शन करे ? ।। २० ।। इस ममय में भू-मण्डल मे ममस्त मनुष्य प्रभृति प्राणी इसके प्रतप्त किरणो के तेज से मृता. वस्था को प्राप्त हो रहे हैं । इमका इतना भीषण उग्र तेज है कि उसके नाप मे समी मागर प्रादि विशाल जलाशय भी प्रनष्ट हो गये है। अर्थात् मब का जल सूख गया है ॥ २१ ।। जब हम सब देवगण भी इमके तेज को पहन करने में ममर्थ नही हो रहे हैं तो विचारे अन्य क्षुद्र जन्तु कैसे इमे महन कर सकते है ? इगलिये माप इस ममय मे ऐमी कृपा कोजिये कि इस सूर्य देव की हम सब समचना करने में समर्थ हो सके । सभी मनुष्य भक्ति की भावना से मूर्य देव की पूजा-यजन किया करें वही कोई पाप उपाय बताइये ॥२२॥ देवाना वचन श्रुत्वा गतो ब्रह्मा खगेश्वरम् । गत्वा स्तोतु समारेभे सर्वलोकहिताय वै ॥२३ देवत्व सर्वलोकस्य चक्षुर्भूतो निरामयः । ब्रारूपधरः साक्षाद्दुष्प्रेक्ष्यः प्रलयानलः ॥२४ सर्व देवस्थितस्त्व हि सदा वायुसखस्तनौ । अन्नादिपाचनत्वत्तो जीवन च भवेद्भवम् ॥२५ उत्पत्तिप्रलयो देव त्वमेको भुवनेश्वरः । स्वदृते सर्वलोकानां दिनकं नास्ति जोवनम् ॥२६ ४२४ ] -- पध पुराण प्रभुस्त्व सर्वलोकानां प्राता गोमा पिता प्रमू. । चराचराणा सर्वेपा त्वत्प्रमादाद्धृत जगत् ॥२७ देवेषु त्वत्समो नास्ति भगवंस्त्वग्मिलेपुच । अन्तदहेपु वाह्य पु सर्वेषु भुवनेप च ॥२८ सर्वन तेऽस्ति सद्भावम्त्वयंतद्धारित जगत् । रूपगन्धादिकारी व रसाना स्वादुता त्वया ॥२६ महपि व्यासजी ने कहा-देवों को इस प्रार्थना का श्रवण पर ब्रह्माजी खगेश्वर के समीप में गये थे पोर वहाँ जाकर उन्होने मब प्राणियों के हिन- सम्पादन करने के लिये उनका स्तवन करना प्रारम्भ कर दिया था ।। २३ ॥ ब्रह्माजी ने कहा-हे देव ! पाप तो समस्त लोकों के चक्षुम्वरूप एवं निरामय हैं । पाप साक्ष त् ब्रह्म के ही रूप को धारण करने वाले हैं, किन्तु प्रापका दशन प्राप्त करना महान् कठिन है । मापको कोई भी जीव देस ही नही सकता है क्यो कि आपको किरणो में ऐसा प्रखर तेज विद्यमान है जो साक्षात् प्रलय काल की अग्नि के समान ही है। ।। २४ ।। ममस्त देवगण में आपकी स्थिति रहती है और आप अपने शरीर में वायुदेव को एक मखा की भात मयंदा रखते हैं । प्रापमे अन्न पादि का पाचन भी होता है और निश्चित रूप से प्रापमे ही सब का जोवन होना है ।। २५ ।। इम लोक्य की उत्पत्ति और अन्त में इसका महार भी प्रापसे ही होता है । हे देव ! प्राप ही एक इम भुवन के ईश्वर हैं । मापके बिना तो सभी लोकों का जीवन एक भी दिन तक नहीं हो सकता है । ॥ २६ ॥ हे देव ! भाप ही सब लोको के प्रभु हैं, मबको रक्षा करने वाले है. मबका पोपण-रक्षण करने वाले हैं और सबको प्रसब देने वाले पिता भी प्राप ही हैं । यह मम्पूण चर और मचर जीवो का जगत् केवल प्रापके ही प्रसाद से धारण किया हप्रा स्थित है ॥ २७ ॥ समस्त देवो में आप ही सबसे बड़े हैं और प्रापके समान अन्य कोई भी देव नहीं है । हे देव । पाप मबके अन्तदेहो में, बाह्य भागो मे पोर समस्त भुवनो मे स्थित हैं ।। २८ ॥ ऐमा कोई भी स्थल नही है जहां पर माप विद्यमान न हों, सर्वत्र प्रापको सना है । मापने ही इस जगत् को धारगा कर रखा है । रूप गन्ध प्रादि के करने वाले भी प्राप ही हैं और रमों में जो स्वादुता है वह भी माप ही के कारण होती है ।।६।।

मूर्य म हास्य वर्णन ] [ ४२५ एवविश्वेश्वर. सूरो निखिलस्थितिकारक । तीर्थाना पुण्यक्षेत्रारणा मसाना जगत. प्रभो. ॥३० त्वमेक प्रयतो हेतुम्सर्वसाक्षी गुणाकरः। सर्वज्ञ सर्वकर्ता च हर्ता पाता सदोत्सुक. ॥३१ धान्नपङ्कामयनश्च दारिद्य दु खनाशन । प्रेत्येह च परो बन्धु मर्वज्ञ सर्वलोचन ॥३२ स्त्रहते सर्वलोकानामुपकारी न विद्यते ॥३३ पितामह महाप्राज्ञ विश्वेन्द्र विश्वभावक । व हि शीघ्र पर यत्ते करिष्यामि मत विधे ।।३४ मयूखस्तेऽतिचण्डश्च लोकानामतिदु मह । यथैव मृदुतामेति तथा कुरु सुरेश्वर ॥३५ इस प्रकार में यह विश्व का ईश्वर सूर्य देव इम समस्त स्थिति के करने वाले हैं है भो। आप ही सब तीथों के-मखो के मोर इम जगत् के स्वामी हैं ॥३०।। प्राप ही एक प्रयत इन सब के हतु हैं पौर सबके सक्षी तथा गुणो की खान हैं । पाप सब कुछ के ज्ञाता है,पाप ही सबके करने वाले हैं पाप हो सपूर्ण विश्व के महार करने वाले हैं और पाप ही इमक रक्षक एव पालक भी है । प्रापही सदा उत्सुक रहा करत हैं ॥ ३१ ॥ प्राप थोर मायकार-प और प्रामय ( राग ) क नाशक करन वाले हैं । माप मानवो को दरिद्रना के दुख को मिटा देन वाले हैं। और यहाँ पर मरकर प्राने वाले के परम बन्धु हैं भाप सर्वज्ञ हैं तथा सबक नत्र हैं ॥ ३२ । ह भगवन् आपक बिना ममस्त लोका का उपकार करने वाला अन्य कोई भी नहीं है ।। ३३ ।। भगवान् प्रादित्य देव ने कहा- हे पितामह । पाप तो महान् विद्वान् एष मनीषी हैं, माप इम विश्व के इन्द्र हैं और भाप विश्व पर पूर्ण कृपा करने वाले हैं। हे विधे। पाप मुझे अति गीघ्र प्रादेश प्रदान कीजिए जिमम कि में आपक वधनो का पालन कर प्राप जो भी कुछ बोलेगे उसको में पूरा कर गा॥ ३४ ॥ मूपदव के इस प्रकार में कहने पर ब्रह्माजी ने कहा- हे मुरेश्वर । आपको विगणो का समुदाय बहुन हो अधिक तेज है जिसको कि लाग सहन करने में असमथ हैं। जिस गति स भी यह मृदुलता को प्रास हो जावे वही उपाय या विधान प्राप करे ॥शा ४२६ ] [ पण पुराण किरणा: कोटिकोटिमें लोकनाशकराः पराः। न चाभीष्टकरा लोके प्रयोगा च्छिन्धि तान्प्रभो ॥३६ ततोयिरिचिना तूर्ण रविवाक्यवशाध्र वम् । आहूयविश्वकर्माणकृत्वा वचमयीभ्रमिम् ।।३७ चिच्छेद च रवे नू-प्रलयानलसग्निभान् । तैरेव रवित तत्र विष्णोश्चक्र सुदर्शनम् ॥३८ अमोघ यमदण्ड च मूल पशुरतेस्तथा । कालस्य च परः खड्गशक्तिगुरुप्रमोदिनी ।।३६ चण्डिकायाः पर शस्त्र विचित्र मूलक तथा । चकेब्रह्माऽऽज्ञयाशीघ्र विश्वकर्मा तु तेन वै ॥४० सहस्रकिरण शिष्टमन्यच्चव प्रशातितम् । अजनोपाय भावेन पुनश्च कश्यपान्मुने ।।४१ अदितगर्भसञ्जात आदित्य इति व स्मृतः । अय च रतिविश्वान्ते मेरुशृङ्ग भ्रमत्यपि ॥४२ सदोर्ध्व दिनरात्रं च धरण्या लक्षयोजने । ग्रहाश्चन्द्रादयस्तत्र चरन्ति विधिनीदिताः ॥४३ मादित्य देव ने कहा-मेरी करोडो-करोडो किरणें हैं और ये लोकों के नाश करने में तत्पर हैं । लोक मे ये प्रयुक्त होने वाली एवम् अभीष्ट के करने घाली नहीं हैं । अतः हे प्रभो ! माप उनका छेदन कर दीजिए ॥ २६ ॥ याय देव ने कहा-इस प्रकार से मूर्य के बहन पर ब्रह्माजी ने रविदेव के वक्य के घश हो तुरन्त ही विश्वकर्मा को बुलाकर निश्चित रूप से एक बचपी भ्रमि तैयार कर ली थी ।। ३७॥ उस नमि से सूर्य को जो वच ग्नि के समान किरणों थी उनका छेदन कर दिया था और जो किरणें सूर्य की छिन्न करके पृयक कर दी गयी थी उन्हीं किरणो के द्वारा एक सुदर्शन नाम वाला भगवान् विष्णु का म युध निर्मित किया गया था ।। ३८ ॥ यही एक चक्रमात्र नही उन किरणों से अन्य प्रायुध भी प्रस्तुत किये गये थे । यमराज का प्रमोघ जो दण्ड है जिससे वह पापियों को ताडना दिया करता है, वह बनाया गया-भगवान पशुपति का

मूर्य माहात्म्य दान ।
त्रिशून जो कि महान् भीषण एवम् शत्रु सहार करने वाला है उसकी रचना की
गयी थी । कालदेव का परम उन खङ्ग का निर्माण भी इन्ही घटी हुई विरो
हा था जिसका प्रहार वह समस्त चराचर प्राणियों पर प्रनिश किया
करता है और गुरु प्रमोदिनी शक्ति बनाई गयी थी ॥ ३९ ॥ चण्डिका देवी
का जो परम प्रधान प्रस्त्र है जिसका नाम भी शुल है और जिममे महारिणी
एक प्रसुत शक्ति विद्यमान है इन्ही किरणों से बनाया गया था। ब्रह्मा की
प्रज्ञा मे ये मब अति शीघ्र किया गया था । विश्वकर्मा ने इनके अतिरिक्त अन्य
एक महल किरो भी काटी थीं। 'मजनोपाय भाव' मे फिर कश्यप मुनि से
वह अदिति के गर्भ से समुत्पन्न हुप्रा जो कि प्रादिया इस नाम से कहा गया है ।
यह रति विश्वस्त में मेरु पर्वत के शिखर पर भ्रमण किया करता है । ४० ।।
५ ४१६४२ ।। मयंदा कार दिन-रात इस धरणी में एक लाख योजन ऊँचा है
जो कि विधि के द्वारा प्रेरित हुए समस्त ग्रह चन्द्र प्रभृति से घिरा रहता है
पर्यात उमम स्थित ये मभी रहते हैं । ४३॥
सर सञ्चरते मामान्द्वादश द्वादशात्मक ।
सक्रमादस्य सहकान्त सवेरेव प्रतीयते ॥४४
तामु यद्वा फल ब मो लोकाना निखिल मुने।
धनुमिथुनमीनेपु कन्याया पडशीतय ॥४५
वृप वृश्चिक कुम्भेषु सिंह विष्णुपदी स्मृता।
तर्पण चाक्षय विद्धि दान देवाचंन तथा १४६
पडशीतिसहस्राणि पडशीतो फल भवेत् ।
विष्णुपद्या तु लक्ष तु अयने कोटिकोटिकम् ॥४७
विष्णुपद्या तु यदानमक्षय परिकीर्तितम् ।
दातुर्वदामि मानिध्य सदा जन्मनि जन्मनि ॥४८
गोते तूलपटीदानान्न दुख जायते तनौ ।
तुलादाने तल्पदाने द्वयोरेवाक्षय फलम् ।।४६
सर्वोगकरणा शय्या यो ददाति विमत्सर.।
वर्गामुख्याय विधाय म राजपदवी लभेत् ।।५०

४३० ] [ पम पुराण - । । भी वास्तविकता नही है । यह जो भी पिता-पुत्रादि का सम्बन्ध संमार में होता है वह माया और मोह से युक्त हो होता है ।।३।। हे देवि ! यह प्राणो स्वयं ही अपने आपका पिता है, स्वध माता तथा बान्धय हैं, यह स्वय हो अपना स्वजन वर्ग है मौर स्वयं ही सनातन ( सदा-मवंदा चले आने वाला ) धर्म है ।।४। हे देवि ! यहाँ पर लोक में भाचार को बहुत बडो महिमा है । उम सदाचार के पूर्णतया पालन करने से नर को सुख उस्सन्न होता है। जो आचारे का पालन न कर अनाचरण किया करते हैं उमसे महान् पाप होता है और फिर इसका परिणाम यह होता है कि निश्चय ही उसका नाश हो जाया करता है ॥ ५ ॥ हे देवि | दूपिन दुराचरण के करने से मनुष्य महान् र योनि में जन्म ग्रहण किया करता है-इसमे तनिक भी संशय नहीं है । सत्य से होन कम से और महान् पाप से मोहित होकर ही मनुष्य दुराचारी हो जाया करता है .१६॥ रिपुत्त्रे वर्तते मर्त्यः प्राणिना नित्यसस्थितः । ग्पिवस्तस्य वर्तन्ते यत्र तत्र न सशयः ॥७ मैत्रेण वर्तते मर्यो यदा लोके प्रिये शुभे । तदातस्य भवन्त्येव मित्रा सर्वत्रः भामिनि । कृषिकारो यदा देवि च्छन्न वीज सुसस्थितम् । यादृश तु भवत्येवतादृश फलगश्नुते ॥E तथा तव च पुत्रश्च साधुभि स्पषितंसह । कर्मणस्तस्यतत्प्राप्तफलभुड्क्षसुसस्थितम् ॥१० तव पुत्रा महा भागे तप शान्तिविजिताः। तेन पापेन ते सर्व पतिता वै महत्पदात् ।।११ एव ज्ञात्वा शम गच्छ मुञ्चदुख सुख तथा । कस्यपुत्राश्वमित्राणि कस्यस्वजनवान्धवा ॥१२ प्रात्मकर्मानुसारेण सुखजीवन्ति जन्तव । परार्थे चिन्तन देवि तत्त्वज्ञानेन पण्डिताः ॥५३ न कुर्वन्ति महात्मानो व्यर्थमेव न सशयः । पञ्चभूतात्मक काय केवल सन्धिजर्जरम् ॥१४ पत्र मह भूत शरीर कथन ] [ ४३१ 1 जो इस प्रकार से नित्य हो भनाचरण में संस्थित रहता है उसके सभी प्राणी प्रायः शत्रु हो जाया करते है। ऐसे मनुष्य के जहां-तहां रिपु विद्यमान रहते है इसमे कुछ भी सशय नहीं है । क्योकि दुराचरणाशील मनुष्य बिना शत्रुओं वाला होता ही नहीं है ॥७॥ हे शुभे ! हे प्रिये ! जब इस लोक मे मित्रता की भावना से सबके माथ व्यवहार करता है तब तो हे भामिनि ! उस मनुष्य के सभी जगह सभी प्राणी मित्र हो जाया करते हैं ॥८॥ कृषि करने वाला जिस समय में हे देवि ! बीज को सछन्न करके भली-भांति स्थित करता है तो जमा ही वह होता है वैसा ही उसका फल भी होता है अर्थात् किसान जैसा भी बोज भूमि वपन किया करता है वमो ही उसकी फसल उगकर उसे लाभ देती है ।।६।। उसी प्रकार से तुम्हारे पुत्रो ने साधुमो के साथ स्पर्धा की थी, उम कर्म का यह फल प्राप्त हुमा है। उस फल को जो मुसंस्थित हो गया है भोगना चाहिए ॥१०॥ है महाभागे ! मापके जो पुत्र हैं वे तप पौर शान्ति से रहित हैं । इमी पाप के प्रभाव से ये सब महान् पद में च्युत होकर पतित हो गये हैं ।। ११ ॥ इस प्रकार से किये हुए कर्मों पर विचार करके शान्ति का समाधय प्रहण करो पौर जो तुम्हारे हाय में महान दुःस हो रहा है उसका त्याग कर दो और अपने आप में मुष का अनुभव करो। इस संमार में किसके कोई पुत्र, मित्र सपा स्वजन, बान्य होते हैं ? अर्थात् कोई भी किसी का कुछ नहीं होता है ॥१२॥ पपने हो किय हुए कर्मों के पनुमार अन्तुगण मुग पूर्वक जीवित रहा करते हैं । हे देवि ! पण्डिन लोग परायं का तत्व मान से चिन्तन पिया करते हैं ॥१३॥ जिनकी महान मारमा होती है वे ध्ययं का कर्म कमी नही करते-- इसमें संशप नहीं है। यह मानव का शरीर पाच भूतों से मिमिन मा है और वम सन्धियों में यह शरीर बजरीमूत होता है । इस पारीर के मास्तित्व में कुछ मास्था नहीं है ॥१४॥ प्रारमा मि तं तेन सर्व देवि मुमागया। प्रात्मा नाम महापुण्यः सर्वगः सवंदगंकः ॥१५ सर्वमिद्धिस्तु सर्वारमा सात्त्विकः सर्वमिद्धिदः । एवंममयो देवि भमत्यैको निरशनः ॥१६

४३२ ]
[ पप-गुराग
भ्रमता निर्जने येन मूर्तिमन्तो द्विजोत्तमाः ।
चत्वारो दर्शिताः पृण्यामूर्तिमन्तोमहौजसः ॥१७
पञ्चमः श्वसनश्च व पूर्वाणामित्रमेव च ।
अथो आत्मा समायातो ज्ञानसाहाय्यमेव वा ॥१८
स तान्दृष्ट्वा महात्मा वैज्ञानमात्मा समग्रवीत् ।
ज्ञान पश्य अमीपञ्चमन्त्रयन्तःपरस्परम् ॥१६
एतान्गत्वा अवीहित्वं यूयं क इति पृच्छह ।
ज्ञानं वाक्य परं न त्वा सार्थ तस्यमहात्मनः ।।२०
तदाऽऽहात्मानमाराध्य मेतः किते प्रयोजनम् ।
तत्त्वतो व हि मे देव सदाशुद्धोऽसिसर्वदा ॥२१
हे देवि ! जिसने अपने ही मारमा को मित्र बनाया है अर्थात् अपना हित
के सम्पादन करने वाला समझ लिया उमने सुख को माशा से सभी कुछ कर
लिया है। यह आत्मा जिसका नाम है वह महान पुण्य हैं। यह सर्वत्र गमन
करने वाला और सभी कुंछ को देखने वाला है ।
१५ ॥ यह सम्पूर्ण सिद्धियों
वाला है, यह सर्वात्मा, सात्विक मोर सब सिद्धियों के प्रदान करने वाला है
अर्थात् इसी के उत्थान-चिन्तन मोर उत्कर्ष में सारी सिदिया हस्तगत हो जाया
करती हैं। है देवि !
इस प्रकार से यह प्रात्मा ऐसा है जिसमे सभी देवता
निवाम किया करते हैं। वह एक ही अकैला निरजन स्वरूा वाला भ्रमण
किया करता है ॥१६॥ जिसने निर्जन में भ्रमण करते हुए मूत्तिमान चार श्रेष्ठ
द्विज जो कि परम पुण्य स्वरूप मूत्तिमान महान मोज पाले थे, देखे थे ॥१७ ।
पाँचवाँ वमन है जो पूर्वो का ही मित्र है। इसके अनन्तर पात्मा माया जो
ज्ञान साहाय्य वाला है ।।१८।। वह वैज्ञानात्मा महान् मात्मा वाला जब माया
तो उसने उनको देखा था और उनसे वह बोला हे ज्ञान ! इन पांचो को पर•
स्पर में मन्त्रणा करते हुए देखो ॥ १६ ।। इनको पहिचान कर तुम इनसे बोलो
और इनसे पूछो कि माप लोग कौन हैं । उस महात्मा के साथी ज्ञान ने परम
वाक्य का श्रवण किया था ॥२०॥ उस समय में बोला कि प्रात्मा का ही समा-
राधन करो इनसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है । हे देव ! प्राप मुझे तत्व स्वरूप
में बनलाइये । माप तो सर्वदा हो सदा शुद्ध हैं ॥२१॥

]
करता रहता है ॥२५॥ प्रात्मा ने कहा-ह ज्ञान ! आप मुझमे निपेय करते है
किन्तु पाप स्वय इनकी मन्नति क्यो किया करते है ? हे पण्डित । इसका
पन महाभून गरीर क्या
[ ४३३
एतेपञ्च महाभागारूपवन्तो मनम्बिनः ।
गत्वासन्दर्शयाम्येनानाभाप्ये ज्ञान थ यताम् ।।२२
भव्यानेतान्प्रवक्ष्यामि पञ्चमी गनिमागतान् ।
दूतत्वं गच्छ भो ज्ञान कुशलो दूतकर्मणि ।।२३
त्वमात्मञ्छणु मे वाक्य सत्य सत्यवदाम्यहम् ।
एतेपासङ्गतिस्तात कार्यानव त्वयाक्दा ।।२४
पञ्चानामपि मुखात्मन्न कार्य शुभमिच्छता ।
भवत सङ्गतिमोह इच्छत्येप महामते ॥२५
एतेपा सङ्गतिज्ञान कस्माद्वारयते भवान् ।
तन्मेत्व कारण व हि याथातथ्येन पण्डित ॥२६
एतेपा सङ्गमात्रात्तु महद्दु ख भविष्यति ।
दु समूलाहि पञ्च व शोकसन्तापकारकाः ।।२७
एवमस्तु महाप्राज्ञ करिष्ये वचन तव ।
ज्ञानमाभाष्य सह्यात्मा ध्यानेन सह सगत ॥२८
प्रात्मा ने यह श्रवण कर कहा है ज्ञ न ! पाप अब श्रवण करो, ये
पांच महान् भाग्य वाले रूप धारी मनस्वी हैं। मैं चलकर इनको भली-भांति
दिखलाता हूं और बोनता हूँ ॥ २२ ॥ य पांचो महान भव्य हैं जो कि पाचवी
गति को समायान हुए हैं, मैं इनसे बातें करता हूँ। हे ज्ञान ! आप दूत के कर्म
करने में बहुत ही अधिक निपुण हैं अतएव प्राप दूत बन जाइये ॥२३॥ ज्ञान ने
कहा-हे प्रात्मन् ! प्राप मेरे वचनों को श्रवण करो। मैं इस समय मैं बिल्कुल
सच-सच बोल रहा हूँ। हे लात ! मैं यह आपको अपना परामर्श देता हूं कि
बाप इनको कभी भी सङ्गति न करें ।।२४॥ हे शुद्धात्मन् ! यदि माप शुभ कार्य
करने की इच्छा रखते हैं तो इन पांचो को मोहवत्त प्रापको कदापि नहीं करनी
चाहिए । हे महामति वाले यह मोह पापको सङ्गति करने की बराबर इच्छा
कारण है वह आप मुझे यथार्थ रूप से सही मही बता दीजिए ॥२६॥

[ पद्म पुराण कहा- इनके सङ्ग मात्र से ही महान दुख होगा। ये पांचो हो दुख के मूलभूत हैं पोर शोक नथा सन्ताप के करने वाले होते हैं। हे महाप्राज्ञ । मापने जो कहा है वह वंसा होगा । मैं प्रापके वचनों का पूर्ण पालन करूंगा। इस तरह से वह प्रात्मा ज्ञान से कहकर स्वय ध्यान के साथ सङ्गत होगया था ॥२७॥२८॥ ततः पञ्च व ते तत्राद्राक्षुरात्मानमेव तम् । बुद्धिमूचु समाहूय सगाच्छात्मानमेवहि ॥२६ दूतत्व कुरुकल्याणि अस्माकमात्मना सह । पञ्चतत्त्वामहात्मानो विश्वस्यधारका शुभा ॥३० भवत्या मनमिच्छन्ति इत्याभाष्य महामतिम् । गत्वाबुद्ध त्वया कार्य कर्तव्य नइतोवज ॥३१ एवमस्तु महाभागा करिष्ये कार्यमुत्तमम् । एवमाभाषित तेपा गत्वाऽऽहात्मानमेवतम् ॥३२ अह बुद्धि महाभाग भवन्त समुपागता । दूतत्वे महता पार्शतेषा त्व वचन शृणु ॥३३ भवन्मंत्री समिच्छन्ति अक्षया पञ्चआत्मका । कुरुमंत्री महाप्राज्ञ जहि ध्यान सुदूरतः ।।३४ कश्यप मुनि ने कहा-~-इसके अनन्तर उन पांचो ने वहां पर उम पात्मा को ही देखा था । फिर उन्होने बुद्धि को बुलाकर उससे कहा कि प्रात्मा के हो साय रहो ॥२६।। उन्होने बुद्धि से कहा था कि हे कल्यारिण! भाप मात्मा के साप सम्वाद सम्प्रेषण के कार्य में हमारे दूत बन जाने का कार्य करो। ये महान पारमा पाले पांवो तत्त्व इस विश्व के धारक एवम् परम शुभ हैं ॥३०॥ पालो ने बुद्धि से 'हम प्रापके साथ मैत्री चाहते हैं' कहा । वहाँ महान मति वाले मात्मा क समोप मे जावर तुमको कार्य करना चाहिए मोर यहां से चली जापो ॥३१।। ऐसा ही होगा-यह कहकर बुद्धि ने उनसे कहा है महाभागो । मैं मापका यह उत्तम कार्य करगी हम प्रकार से उनका जो मामापित था उसने नम प्रारमा से जाकर वह दिया था ॥ ३२ ॥ बुद्धि ने प्रारमा से कहा कि है महामाम । मेरा नाम बुद्धि है और मैं पापक समीप उपस्थित हुई हूँ। मैं महान् पच महाभून शरीर कथन ] [ ४३५ नागों को दूत बनकर ही यहां पर पाई हूँ आज आप उनके जो वचन (सन्देश) हैं उनका श्रवण कीजिए ॥ ३३ ॥ ये पानी प्रात्मक प्रापकै साथ प्रक्षय मैत्री चाहते हैं। हे महान् पण्डिन प्रार उन सबके साथ मित्रता करली पोर इम ध्यान को दूर मे ही त्याग दो ॥३४॥ न कर्त्तव्यस्त्वया चात्मन्नेतेपा वै समागम । एपा ससर्गमात्रेण महदु ख भविष्यति ॥३५ मयाज्ञानेन हीनस्त्वं कथ कर्म करिष्यसि । एवमेव न कर्तव्यस्तेषा चैत्र समागम ॥३६ गर्भवास नयिष्यन्ति भवन्त नान्यथा विभो । ज्ञानेनैव मयाहीनो अज्ञान यास्यसि ध्रुवम् ॥३७ एवमुक्त्वा तमात्मान विरराम महामतिम् । ततस्तामागता बुद्धिमान्मा प्रोवाचनिश्चित ॥३८ ज्ञानध्यानौ महात्मानौ मन्दिरणी मम शोभनौ । तत्र य न नमेयुक्त तद्बुद्ध किकरोम्यहम् ।।३६ एवथु त्वा ततोवुद्धिस्तेपा पार्वे यशस्विनी। समाचष्ट समग्र तत्कथन ज्ञानध्यानयो ॥४० ततस्ते पञ्चका सर्वे प्रात्मान प्रतिजग्मिरे । मंत्रीमेव प्रतीच्छामो, भवतो नित्यमेव हि ॥४१ ज्ञान ने कहा-है मात्मन् । प्रापको उन सबका समागम नहीं करना चाहिए । इनके केवल समर्ग से ही प्रापको महान् दुख होगा ।।३५ । मुझ ज्ञान से हीन होकर पाप फिर किम प्रकार से कम करेगे। किसी प्रकार से उनका समागम नही करना चाहिए ॥३६॥ हे विभो । ये सब साथ में रहकर आपको गर्भ के प्रावास को ले जायगे पोर इनके सम्पर्क में रहकर माप मुझसे हीन हो जायेगे तथा फिर अज्ञान को निश्चय ही प्राप्त हो जायेंगे ॥३७॥ इस प्रकार से महान् मति वाले मात्मा से इस तरह से कहकर वह विरत हो गई थी। इसके अनन्तर आई हुई उस बुद्धि से निनित होकर मारमा ने कहा या ॥३८॥ हे बुद्ध ! महान् मारमा वाले ज्ञान और ध्यान मेरे बहुत ही प्रच्चे दोनों [ पप-पुरण वे मन्त्री हैं। वहाँ पर मेरा यान युक्त नहीं है । अब मैं क्या करू? ॥३६।। इस प्रकार मे सुनकर फिर वह यशस्विनी बुद्धि वापिस उनके पास पहुंचकर ज्ञान और ध्यान का जो कथन था वह उनसे कह दिया था ||४०1। इसके पश्चात् सब पांचो भारमा के पाम गये थे। उन्होंने कहा था कि हम सब भापके साथ नित्य ही मैत्री चाहते हैं ॥४॥ एवमस्तु महाभागा भवतां प्रियमेव च । करिष्ये नात्र सन्देहो मैत्रं हि प्रीतिकारणात् ।।४२ वार्यमाणो महाभागो ज्ञानेनापिमहात्मना । ध्यानेन च महात्माऽमी तेपा सङ्गतिमागतः ।।४३ सते. प्रमोहितस्तत्र गद्वपादिभिस्तदा। पञ्चतत्त्वसमायुक्त कायित्वङ्गतवान्प्रभुः ॥४४ यदागर्भसमायातो विष्ठामूत्रसमाकुले । दुर्गन्धे पिच्छिलावर्ते पतितस्तैः स संयुतः ।।४५ अङ्गन व्याकुलीभूत. पञ्चात्मकानुवाच सः। भोभो. पञ्चात्मकाः सर्वे शृणुध्वं वचनं मम ।।४६ भवतासप्रसङ्गन महादुःखेनमोहितः । नत्वस्मिन्पिच्छिले घोरे पतितो हि महाभये ॥४७ तावत्संस्थीयता राजन्यावद्गर्भः प्रपूरयेत् । पश्चानिर्गमनं ते वै भविष्यति न सशयः ॥४८ अस्माकं हि भवान्स्वामी कायदेशे व्यवस्थितः । राज्यमेवं प्रकर्तव्यं सुखभोक्ता भविष्यति ॥४६ तेषां तद्वचनं थु त्वा आत्मा दु.वेनपीडितः । गन्तुमिच्छन्नसोतस्मात्पलायनपरोऽभवत् १५० कहा-है महान भागो वालो ! ऐसा ही होगा मैं प्रापका जी भी प्रिय होगा वहीं करूंगा-इममे किञ्चित् मात्र भी सन्देह नहीं है। मैत्री तो प्रिय होने के कारण से ही हुधा करती है ॥ ४२ ॥ महात्मा ज्ञान के द्वारा और ध्यान के भी द्वारा निवारण किया गया था, किन्तु वह महाभाग महाद आत्मा ने वैराग्य तथा प्रात्मा का गवाद ] ४३७ - अत्मा ( स्वरूप ) वाला उनको मङ्गति में प्रा गया था ।। ४३ ।। उन्होने यहाँ पर उम ममय में राग-द्वेष आदि मे उमे प्रमोहित कर दिया था और पञ्चतत्वों में ममायुक्त होकर प्रभु कायित्व को प्राप्त हो गया था अर्थात् शरीर को धारण करने वाला बन गया था। ४४ ॥ जिम ममय में वह माता के गर्भ में आया तो मल-मूत्र में ममाकुल दुर्गन्ध वाले पिच्छल प्रावत्त मे उन पांचों से समन्वित होकर गिर गया था ॥ ४५ ॥ प्रमो से वह प्रत्यन ध्याकुल होकर वह उन पंचात्मको में बोला-हे पश्चात्मको प्राप मब मेरे दम वनन का करो॥ ४६ ।। मैं तो इस समय में आप सबके मप्रसङ्ग में महान दुग्व में मोहित हो गया हूँ देखो, मैं इम मय में महान् भय वाले घोर पिच्छन में पटा ॥ ४७ ।। वे पचात्मक बोले-हे राजन् प्राप उम वक्त तक इसमें मम्धिन रहिए जब तक यह गर्भ प्रपूरित होता है । इसके पूर्ण हो जाने पर यहाँ में आपका निकाम हो जायगा--इममें कुछ भी संशय नही है ।। ४ ।। हमारे पाप ग्वामी हैं और शरीर के देश में पाप विशेष रूप में अवस्थित रहा करते है । इमी भौति यह राज्य का शामन भी करना चाहिए। ऐमा करने में प्राप मुखो के उपभोग करने वाले होंगे ।। ४६ ॥ उनके इम वचन का श्रवण करके वह प्रामा अत्यन्त दुःस से उत्पीडिन हुआ था और यह उस स्थान में जाने की इच्छा करता हुमा पलायन (दौड) करने में तत्पर हो गया था ।।५०॥ ॥ वैगग्य तथा ग्रान्मा का संवाद ।। म गर्भ व्याकुलो जात खिद्यमानो दिने दिने । दुपाक्रान्तो हि धर्मात्मा सर्वपीटाभिपीहितः ॥१ अधोमुग्मस्तु गर्भस्थो मोहजालेन बन्धितः । आधिव्याधिममाकान्तो हाहाभूतोविचेतनः ।। दुःखेन महताविष्टो ज्ञानमोहप्रपीडितः।।२ तव वाक्यं महाप्रान न कृत.तु मया तदा । ध्यानेन वार्यमाणोऽपि पततो गर्भसङ्कटे ॥३ तस्माद्रक्ष महाप्रान गर्भवामात्सुदारणात् ॥४ [ पपपुर मन्त्री हैं । यहाँ पर मेरा यार युक्र नहीं है। प्रय मैंग का ? ||३६ इम प्रकार में मुनकर फिर पर याम्पिनी युधियामि उन पाम पर मान मोर ध्यान सा जोपन था वह अमेह दिया पा.मा पधर में सय पचों पारमा के पाम गये थे। उन्होने कहा था कि हम सब पापक माय निस्प हो मैत्री वाहते हैं ॥४१॥ एवमस्तु महाभागा भवतां प्रियमेव च । वरिष्ये नात्र सन्देही मंत्र हि प्रीतियारणाद ।।४२ वार्यमाणो महाभागो शानेनापिमहात्मना । ध्यानेन च महात्माऽमौ तेषां मङ्गतिमागतः ।।४३ सतैः प्रमोहितस्तत्र रागद्वेषादिभिस्तदा । पञ्चतत्त्यममायुक्त कायित्वङ्गतवान्प्रभुः ।।४४ यदागर्भसमायातो विष्ठामूबसमाकुले । दुर्गन्धे पिच्छिलावत पतितस्तः स संयुतः ।।४५ अङ्ग न व्याकुलीभूतः पञ्चात्मकानुवाच सः । भोभोः पश्चात्मकाः सर्वे शृणुध्वं वचनं मम ॥४६ भवतांसप्रसङ्गन महादु.खेनमोहितः । नत्वस्मिन्पिच्छिले घोरे पतितो हि महामये ॥४७ तावत्संस्थीयता राजन्यावद्गर्भः प्रपूरयेत् । पश्चानिर्गमनं ते व भविष्यति न संशयः ॥४८ अस्माकं हि भवान्स्वामी कायदेशे व्यवस्थितः । राज्यमेवं प्रकर्तव्यं सुखभोक्ता भविष्यति ॥४६ तेपां तद्वचनं श्रुत्वा आत्मा दुःमेनपीडितः । गन्तुमिच्छन्नसोतस्मात्पलायनपरोऽभवत् ।।५० आत्मा ने कहा है महान भागो वालो ! ऐसा ही होगा मैं भापका जो भी प्रिय होगा वही करूंगा--इसमे किञ्चित् मात्र भी सन्देह नहीं है। मैत्री तप्रिय होने के कारण से है। हुमा करती है ॥ ४२ ॥ महात्मा ज्ञान के द्वारा मौर ध्यान के भी द्वारा निवारण किया गया था, किन्तु वह महाभाग महान .

वैराग्य तथा पात्मा का मवाद ] मे श्रग अत्मा ( स्वरूप ) बाला उनको सङ्गति में प्रा गया था ॥ ४३ ।। उन्होंने वहाँ पर उम ममय में राग-द्वेष आदि से उमे प्रमोहित कर दिया था और पञ्चतत्त्वो ममायुक्त होकर प्रभु दायित्व को प्राप्त हो गया या अर्थात् गरीर को धारणा वरने वाला बन गया था ॥ ४४ ।। जिम ममय में वह माना के गर्भ मे आया तो मल-मूत्र में समाकुल दुर्गन्ध वाले पिच्छल प्रावतं मे उन पांचो से ममन्वित होकर गिर गया था।॥ ४५ ॥ अगो से वह अत्यन्न व्याकुल होकर वह उन पंचात्मको से बोला-हे पश्चात्मको प्राप मद मेरे इस वनन का करो।। ४६ ।। मैं तो इस समय मे आप सबके मप्रमङ्ग से महान दुख मे मोहित हो गया हूं देखो, मैं इसमय में महान् भय वाले घोर पिच्छल मे पडा हुप्रा हूँ ॥ ४७ ॥ वै पचात्मक वोले-हे राजन् प्राप उम वक्त तक इसमे मस्थित रहिए जब तक यह गभं प्ररित होता है । इसके पूर्ण हो जाने पर यहाँ मे आपका निकाम हो जायगा-- इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।। ४८ ।। हमारे प्राप स्वामी हैं और शरीर के देश में प्राप विशेष रूप में प्रवस्थित रहा करते हैं । इसी मानि यह राज्य का शामन भी करना चाहिए। ऐमा करने में प्राप मुखो के उपभोग करने वाले होगे ।। ४६ ॥ उनके इम वचन का श्रवण करके वह मात्मा अत्यन्त दुख से उत्पीडिन हुआ था और यह उम स्थान में जाने की इच्छा करता हुमा पलायन (दौड) करने में तत्पर हो गया था ॥५॥ ॥ वैराग्य तथा प्रात्मा का मंवाद ।। स गर्ने व्याकुलो जात खिद्यमानो दिने दिने । दु साक्रान्तो हि धर्मात्मा सर्वपीटाभिपीडितः ॥१ अधोमुखम्तु गर्भस्थो मोहजालेन वन्धितः । आधिव्याधिममाक्रान्तो हाहाभूतोविचेतनः ।। दु.खेन महताविष्टो ज्ञानमोहप्रपीडित. ॥२ तव वाक्य महापान न कृत.तु मया तदा । ध्यानेन वार्यमाणोऽपि पतितो गर्भसङ्कटे ॥३ तस्माद्रक्ष महाप्राज्ञ गर्भवामात्सुढारणात् ।।४ ४.८ ] [ पध-पुगण . मया त्व वारितो ह्यात्मवृत वाक्य न चंव में । पन्चात्मयं महाकरं पातितो गर्भस छूटे ।।५ इदानी गच्छ व ध्यान तस्मात्मम्प्राप्स्यसे मुगम् । गर्भवासाविध्यम्ते मोक्ष एव न सशय ॥६ कश्यप महामुनि ने कहा-~वह मारमा जिम ममय में माता के गम में भागया था तो अत्यन सेद का अनुभव करता हुमा यह प्रतिदिन बहुत ही व्याकुन हो रहा था । दुखो के द्वारा अत्यन्त प्राकल होता हुमा यह धर्मात्मा मब प्रकार की प्रकृष्ट पीहाओं समभी तरह उत्पीडित हो गया था ॥ १ ॥गर्भ की स्थिति में रहत हुए उसका मुन्ड ना नीचे की ओर हो रहा था। और मोह के जाल में अच्छी तरह वैधा हुमा पा । मानसिक व्यपा मोर शारीरिक कष्टोस एक दम घिरा हुपा होकर हाहाकार कर रहा था तथा बेहोश, ज न भूमा हो गया था, क्योंकि वह महान् दु प म माविष्ट था और न एच मोह स बहन ही मताया हया था ॥२॥मात्मा ने कहा-हे महान् प्रज्ञा वाले परम विद्वान मैंने यापक व क्य को उम मम मे नहीं माना था। ध्यान के द्वारा मुझे पारित भी किया किया गया था किन्तु फिर भी मैं इस गर्भवाम क स म भाकर पतित हो गया और यहाँ पर फंस ही गया, कितनी मेगे ही मूबना हुई हैं। इससे हे महाप्राज्ञ | अब मेरी रक्षा करो यह गभ का निवास तो बहुत ही अधिक दारुण है हमम मेरा परिवारण किसी भी प्रकार से करो ॥ ३४ ॥ नब ज्ञान ने कहा-हे म त्मन् । मैंन तो आपको उन दुयो के मम्पक एव मङ्गति मे जान से बहुत गेका य ,किन्तु प्रापन मेरे यचनो को स्वीकार ही नही किया था । इन पञ्चात्मको ने जो महान क्रूर है प्रापको यहाँ लाकर गभवास के कष्टों में माखिर- कार डाल ही दिया है जिसके सङ्कट पाप इस समय में भोग रहे हैं ॥ ५ ॥ अब तो आपका यही कर्तव्य है कि आप ध्यान के समीप में चले जाइये अर्थात् ध्यान का समाश्रवण करें । इमी के करने से आपको सुख प्राप्त हो सकगा। इस गभं के निवाम से आपक। यही करन से छुटकारा होगा इसमें कुछ भी सदाय नहीं है ॥६॥ तस्य तद्ववन शु त्वा ज्ञात्वा ज्ञानस्य तस्वताम् । ध्यानमाहूय प्रोवाच श्रू यता वचन मम ॥७

वैगग्य तथा ग्रात्मा का मवाद ]
४६६
त्वामहं शरण प्राप्तो ध्यान मां रक्ष नित्यगः ।
एवमस्तु महाप्राज्ञ ध्यानमाहमहामतिम् ।।
एतद्वाक्यं ततः श्रुत्वा प्रात्मा वै ध्यानमागतः ।
ध्यानेन हिममं गर्भमंस्थितोमोह वजितः ।
यदा ध्यानं गतो ह्यात्मा विस्मृतं गभज भयम् ।
स द्वाम्यां सहिनस्तत्र आत्मामोह विनाकृतः ।।१०
चिन्तयन्लेववं नित्यमात्मक सुखमेव हि ।
इतो निष्क्रान्तमात्रम्तु त्यजे पश्चात्मकं वपुः ।।११
एव चिन्तयते नित्य गर्भवासगतः प्रभुः ।
मूतिकाले तु सम्प्राप्ते प्राजापत्ये वरानने ॥१२
वायुना चलितो गर्भ. प्रारणेनापि बलीयसा ।
योनिर्विकाममायाति चतुविशाङ्गुल तदा ॥१३
पञ्चविंशाङ्गुलोगर्भस्तेन पीडा विजायते ।
एव मम्मीड्यमानम्तु मू छयामूच्छित प्रिये ॥१४
इस प्रकार के उम ज्ञान के इन वचनो का श्रण करके और ज्ञान की
तत्त्वता को खूब अच्छी तरह से समझार उसने फिर ध्यान को बुताकर कहा
या कि मेरे वचन को मुनो। प्रात्मा ने जो कि गर्भ में पड़ा हुआ था ध्यान
का स्मरण कर उमस कहा-हे ध्यान ! मैं इम ममय में आपकी दरगामति में
आ गया हूँ, पब माप मुझे नित्य ही सुरक्षित रसिए । मामा की हम प्रार्थना
को मुनकर पान न बहा- ऐमा ही होगा' हे महाप्राज्ञ ! पार चिन्तित न हो-
यह महामति वाले प्रात्मा में ध्यान वाला था 1८|| इस ध्यान के वचन को
मुनकर पात्मा फिर ध्यानगन हो गया था। उम ध्यान के माप रहकर वह
आरमा गम के बाग मे भी मोह में वरित हो गया था। जिम समय में वह
पारमा रान में संलग्न हो गया था उस समय मे उमने गर्भ मे ममुररान जो
महान् भर पा मे एक्दम भुला ही दिया था। पर मारमा जब जन पौर
ध्यान दोनों में महित हो गया पातो मे रिमी भी प्रकार समोहनी
रहा पा॥ १ ॥ हो तो यह फिर निस्प हो पारमोय मृग का चिन्तन

[ माग
लगा था और यही मोचता था कि यहां से निकलते हैं। इस पाच भौतिक शरीर
को मैं अवश्य हो त्याग दूंगा ।।११।। वह प्रभु गर्भ के घोर वास में रहना हमा
नित्य ही चिन्तन किया करता है। जब हे वरानने ! प्राजापत्य प्रमव होने
का ममय सम्प्राप्त हपा था ॥१२॥ उम ममय में प्राणो से भी अधिक बलवान्
वायु के द्वारा वह गर्भ सञ्चालित किया गया था। उस समय में स्त्री का जो
योनि दार है वह विकमित ( चौडा ) हो जाया करता है और चौथीम अंगुल
चौडा हो जाया करता है ॥१३॥ विन्तु वह गर्भस्थ बालक पच्चीस अंगुल के
प्रमाण वाला होता है। निकलने के योनि द्वार से भी एक अंगुल अधिक होता
है। इमलिये उम समय मे उसके निष्क्रमण करने में अत्यधिक पीडा होती है ।
स.नी के द्वारा यिचे हुए तार के ममान उसके मभी मङ्गो पर भिचाव की महान
पीडा होती है। हे प्रिये । सम्पीडित होकर वह मुश्री में वेहोश मा हो जाता
है । १४।।
पतितो भूमिभागे तु ज्ञानध्यानसमन्वितः ।
प्राजापत्येन दिव्येन वायुना स पृथवकृत ॥१५
भूमिसस्पममात्रेण ज्ञानध्याने तु विस्मृते ।
ससारबन्धसन्दिग्ध प्रात्माप्रियतयास्थितः ।।१६
गुणदोपसमाक्रान्ती महामोह समन्वित ।
स्नानपानादिकसर्वमिच्छत्येव दिनेदिने ॥१७
एवसम्पुष्यमाणस्तुग्रात्मापञ्चात्मकः सह ।
व्याप्यते हीन्द्रिय. सर्वे विपये पापकारिभि. ॥१८
बान्धवाना समोहेन भार्या दीना तथैव च ।
आकुलव्याकुलोदेवि जायते च दिने दिने ॥१६
महामोहेन सन्दिग्धो मोहजालगतः प्रभु ।
कैवर्तेन यथा बद्ध शकुलो जालबन्धनैः ॥२०
चलितु नैव शक्तोऽस्ति तयात्मासीत्प्रवन्धितः ।
मोहजालस्तुतै मर्वेद ढबन्धेस्तुवन्धित. ॥२१
गर्भ घोर निवाम स्थल से वह किसी प्रकार से महान कष्टों का

वैराम्प तथा पात्मा का सबाद ] [ ४४१ अनुभव करते हुए ज्ञ न तथा ध्यान से सयूत होकर यहाँ भूमि के ऊपर गिरता है और प्राजापत्य दिव्य वायु के द्वारा वह पृयक् किया जाता है। १५ ।। जैसे ही इस भूमि का स्पश उसक शरीर में होता है वैसे ही उसक वे शान और ध्यान दोनो पहिले गभ वास क मायी भुला दिये जाते हैं । इस समार क बधन से वह सदिग्ध हो जाया करता है और वह ग्रात्मा इमे हो प्रिय समझकर स्थित हो जाता है ।।१६।। ज म ग्रहण करने के पश्च त् तो वह गुगो और दोषो मे समानत होकर महान मोह से घिर जाया करता है और स्नान तथा पान प्रादि की दिनो दिन इन्छा किया करता है ॥१७॥ इस प्रकार स उन पञ्च मको के महित म३८पमाण होता हुपा फिर वह प्रात्मा मभी इन्द्रिगे के द्वारा तथा उन पापकारी विभिन्न विषयो के द्वारा व्याप्त कर लिया जाता है ।। १८ ।। धीरे धीरे उसे अपने बांधवो का मोह उत्पन्न हो जाया करता है और बडा हो जाने पर अपनी भार्या तथा मन्तति का माह पूर्णतया उस घेर लिया करता है । ह दवि | फिर वह प्राय दिा परम प्राकुल और विशप स्म से वेचैन हो जाता है ।।१६।। महान माह म वह अच्छी तरह सक्रिय हो जाया करता है और वह मामा प्रम माह के जाल में पूर्णतया फेम जाता है। जिम तरह काई पंत जालक बन्या ममत्स्य वो कर लिया करता है वही दशा इम आत्मा का हाती है ।।२०॥ वह प्रात्मा उस ममय म ऐमा प्रबन्धित हो जाया करता है कि यहाँ म थोडा भी चलने की शक्ति उमम नही रह जाती है क्योकि मागारिष पदार्थों के मोह का जाल ऐमा मुदृढ होता है वि उमसे वह खूब ही अच्छी तरह घद हो जाया करता है ।।२१।। एवमादिप्रपञ्चेन व्याप्तोऽमौव्यापवेनहि। ज्ञानविज्ञानविभ्रष्टो रागद्वपादिभिहत ॥२२ कामेन पीड्यमानस्तु बोधेनैव तथैव च । प्रवृत्याकर्मगगा बद्धा महामूढो व्यजायत ।।२३ एव मूढो यदात्माऽमो काममोघवागत । लाभगगादिभि नर्वेापृतस्तदुरात्मभि ॥२४ इय भार्या हय पुत्र इद मियमिद गृहम् । एवं समारजालेन महामाहेन बन्धित ॥५ [ gm पुत्रशोकादिभिर्दु संविविधरापुलस्तदा । जरया व्याधिभिनव मडग्रस्तश्चाधिभिस्तथा ॥९६ एरमात्मा मम्प्रतप्तो दुखमा मुदाम्प । अभिमानानभडगर्नानादु संश्च यति ॥२७ वृद्धत्वेन तथा देवि शबलत्वेन पीडित । दुम चिन्तयते नित्य हाहाभूता विचेतन ॥९ इस प्रकार के प्रपञ्च म यह प्रात्मा व्यास हो जाया परना है जान प्रान्च महान पापक है। फिर यह जान पोर मान से भी भ्रष्ट हारर राग प आदि के द्वारा पूर्णतय त बना दिया जाया करता है ।।२॥ कामवामना उस अच्छी तरह पीडिन क्यिा करती है। क्रोध वा भी आकर उसका पूण हना कर दे । है । प्राकृतिक काय म बंधा हुमावद महान मूढ हो जाया करता है ।।२३।। इस तरह से यह प्रात्मा जिम ममय म काम भौर क्रोध मादिक वश में पा जाता है। फिर लाभ और राग पा भी जो प्रत्यन्त ही दुगमा होत हैं सभी उस पात्मा का प्रावर चाग मोर म घेर लिया करते हैं ॥२४॥ उस फिर ऐका इम समार का महान मोड हो जाता है कि वह, यह मेो भार्या -यह मरा पुत्र है-यह मेरा मित्र है और यह मेग पर है, इन सभी मामा- रिक वस्तुप्रो में मिया मोह के कारण अपनत्व की भावना किया करता है । ऐसा महान् भीषण माह का जाल उम घेर लता है कि जिनस अपना कुछ भी मम्ब ध नहीं है उस वह पूर्णतया अपना समझकर उन घोर चक्र म कमा रहता है ॥२५॥ पुत्र के शोर मादि । दु खो स जो कि विविध प्रकार के यहा हुमा करते हैं उनमें रान दिन उस दशा म वह व्याकुल रहता है । उसे बुढ़ प के दुख भागन पडत है । मनेक व्याधियाँ आकर इम शरीर का ग्रस्त कर दुख पहुचाती हैं और माह वश मानसिक प्राधियों पोडिन किया करती हैं ॥२६॥ इम प्रकार से इस माह के जाल स परिपूग्ण समार म सुगरण दवा से प्रत्यन मनात यह मामा अनक अभिमान~मान भङ्ग और नाना भानि क दुखो से नरिडा होर रहा करता है ॥२७॥ हे देवि । जब मह शरीर वृद्धना का प्राप्त है ता बलहीनता और शिथिलता के कारण विचित्र दशा इमको हो

गप तथा आत्मा का संवाद ।
[ ४४३
जाती है। महान् पीडित यह होता है । उस अवस्था मे मनिश दुःखो का
चिन्नन किया करता है और हाहाकार करता हुमा ज्ञान शून्य सा हो जाता
है .1॥
राची स्वप्नाप्रपश्येत दिवा चैतन्यवजितः ।
वरल्येन तथाङ्गानां व्याप्तो देवि दिनेदिने ॥२६
मसारे भ्रममारणेन वैराग्यं तत्र दर्शितम् ।
नि.गई बन्धुहीन च प्रगान्तं तुष्टमेव च ॥३०
तमुवाच तदात्मा व कालक्रोधविजितम् ।
को भवानग्नहोगा कथंमिन लजमे ॥३१
यत्रलोका. स्त्रियो वृदा युवत्योमातरम्तथा ।
एतामां हिं गतोमध्ये न विपिाप नावृतः ।।३२
यो नग्नी म्यत न ननोऽम्मीति व य:।
मुगम्यदलमेवापिपरिधानसमन्वितः ।।६३
नमग्नोऽस्मिकदा दिप भवानग्नः प्रहस्पते ।
इन्द्रियावी या मर्यादा परिवजिनः ।।
पुरुषम्य पाहि मर्यादातामाचक्ष्व च मुद्यत ।
विस्तरेगा महाप्राज्ञ यदि जानागिनिधितम् ॥३५

४४४ -- [ पद्म पुराण है- -इन सबके मध्य में पाप नग्न रूप से बिना किसी बम्नावरण के प्रमाण करते रहते हैं और जरा भी भय नही किया करते है ? ॥ ३२ ॥ कोतराग ने कहा-~-यहां पर कौन नान नही दिखलाई देता है ? मैं क्व नान है ? आप भी परिधान से अच्छी तरह सुसम्बद्ध होते हुए भी नग्न हैं ॥३३॥ मैं तो कभी भी नग्न नही हूं प्रत्युत मुझे तो आप ही नग्न दिखलाई दे रहे है जो कि इन्द्रियों के वश मे परताव किया करते हैं और ममुचित जो मानव की मर्यादा है उमसे पाप रहित हैं जिमने मर्यादा को छोड दिया वही वास्तव में नम्न है, वस्त्रों से रहिन नान नही होता है ॥३४॥ वीतराग के इम थन का श्रवण कर मारमा ने कहा-हे महानुभाव : हे मुव्रत ! आप कृपा करके मुझे यह यतलाइये कि पुरुप को मर्यादा क्या होती है ? हे महाप्राज्ञ ! आप यदि उस मर्यादा को जानते हैं तो मुझे निश्चित रूप में विस्तार के साथ बतला दीजिए ॥३५॥ वीतरागो महाप्राजस्तुमुवाच महामतिः ।।३६ सुम्थयं भजते चित्त सुखदुखेषु नित्यशः । क्लेशित सर्वभावश्च तेषु तेषु परित्यजेत् ॥३७ अथ लज्जा प्रवक्ष्यामि मनो याऽनिविंशत्यलम् । मयाऽद्य वं न कर्तव्य नग्न, स्थान विवजितः ॥३८ पश्चात्तापे मुसलीनः सा लज्जापरिकथ्यते । कस्यलजा प्रवर्तव्या द्वितीयोनास्तिसर्वदा ॥३६ एक्श्चपुरुपो दिव्य कस्यकिंचिन्ननाशयेत् । अथलोकान्प्रवक्ष्यामि ये स्वयापरिकीर्तिताः॥४० यथाकुलालकचके मृपिण्डञ्च निधापयेत् । भ्रामयित्वा तु सूत्रेणनानाभेदान्प्रकाशयेत् ।।४१ भाण्डानां तु सहस्राणि स्वेच्छया मतिसस्थितः । तथायं सृजते धाता नानारूपाणि नान्यथा ॥४२ महामुनि कश्यप जी ने कहा-महतो मति वाले और महान मनीषी वीतराग ने उम मात्मा से कहा-~वीतराग बोला--नित्य ही सुख और दुःख में यह चित्त मुरथों के द्वारा जिमका सेवन किया परता है और सर्व भावो से वैराग्य तथा प्रत्मा का सवाद क्लेशित होता है उन-उनमे परित्याग कर देना चाहिए ॥ १६।३७ । इसके अनन्तर मैं लज्जा के विषय में बतलाता हूँ जो कि मन मे अच्छी तरह से प्रदेश किया करती है। मुझे प्राज इस प्रकार से स्थान से विजित पौर नग्न होते हुए नही करना चाहिए । इस तरह पश्चात्ताप में सुमलीन जो होता है-वही अवस्था लज्जा कही जाया करती है । यहाँ किसकी लज्जा करे क्योकि यहाँ पर कोई दूसरा तो सर्वदा हैं ही नहीं ॥३८॥३६।। एक ही दिव्य पुरुष है । किसी का कुछ भी नाश नही करता है। इसके अनन्तर मैं लोको के विषय में बत- लाता हूँ जो कि मापने अभी कीत्तित किये थे ।। ४० ।। जिस तरह से कुम्हार अपने वक्र (चाक) मे एक मिट्टी का लोथ रख देता है और फिर उसको घुमा- कर सूत से अनेक प्रकार के बरतन बना दिया करता है ।।४।। मपनी हो बुद्धि में स्थित होकर अपनी इच्छा से सहस्रो बरतनो का निर्माण किया करता है ठीक उसी भौति घाता भी इन लोगो को सृजित किया करता है । इमोलिये इन के अनेक रूप दिखलाई देते हैं । अन्यथा कोई कारण नहीं है । मिट्टी एक ही प्रकार की है वैसे ही ये सब भी एक हो हैं ॥४२॥ पश्चाद्विनाशमायान्ति येन केनापि हेतुना । सर्वदेवस्थिता ये च ये लोकाश्च सनातनाः॥४३ तेपा लज्जा प्रकर्तव्या नाचर्तन्ते हि ते भुवि । आकाशावायुतेजासि पृथ्वी चापश्चपञ्चम ।।४४ अमी लोका प्रकाशन्ते ये च सर्वस स्थिताः । सत्त्वानामङ्गदेशेषु पञ्च तेपुसुसस्थिताः॥४५ सर्ववच वर्तन्ते कस्य लज्जा विधीयते । स्त्रीणा रूप प्रवक्ष्यामि श्रू यता तातसाम्प्रतम् ।।४६ यथा घटसहस्रपु सोदकेपु विराजने। एकश्चन्द्रो हि सर्वत्र भवास्तद्विराजते ।।८७ गते जन्तुसहस्रपु मोहं चक्रे महात्मवान् । स्थावरेपु च सर्वेषु जङ्गमेपु तथा भवान् ॥४८ पीछे जिस किसी हेतु से ये विनाश को प्राप्त हो जाते हैं । जो सर्वदेव में स्थित है मोर जो सनातन लोर हैं। उनको लज्जा करनी पाहिए क्योकि [ पा-पुराण - इस भू मण्डल मे फिर प्रावत्तिन नहीं होते हैं। प्राकाश-वायु-तेज-पृथ्वी और चा जल है ।। ४३१४४ ॥ ये लोक प्रकाशित होते है और ये सर्वत्र सस्थित होते हैं । जीवो के प्रङ्ग-देशो में ये पांच सुसस्थित रहते हैं ॥४५॥ ये तो सर्वत्र हो रहा करते हैं फिर किसकी लज्जा की जाती है ? अब मैं स्त्रियो के रूप के विषय मे बतलाता हूं हे तात ! तुम इस समन मे उसका श्रवण करो ॥४६।। जिम प्रकार से जल से भरे हुए सहस्रो घटो में एक ही चन्द्रमा का प्रतिविम्ब दिखलाई दिया करता है ठीक उसी की भांति आप ही सर्वत्र विराज- भान रहते हैं ।।४७॥ स्थावर मोर जङ्गम सब सहस्रो जन्तुप्रो में महात्मवान् मापने मोह किया है ॥४८॥ भवान्कोहिसमायातो मम सन्तापनाशकः । विस्तरेगसमाख्याहि स्वरूपमात्मन.स्वयम् ।।४६ यस्मात्कामा निवर्तन्ते निराशा: सर्व एव से । य दुष्टत्वान्न पश्यन्ति कर्माण्येतानि नान्यथा ॥५० यत्ममीप हि नायाति प्राशा चैव कदाचन । क्रोघोलोभस्तथा मोहो यद्भयात्प्रलय गता ॥५१ वीतरागोऽस्मि भद्र ते विवेको मम वान्धवः ।।५२ कीदृशोऽसौतव भ्राता विवेको नामनामतः । तस्प त्वं लक्षण यूहि भ्रातुरात्मन एवच ॥५३ सुखेनस्थीयते देव भवता विश्वनायक । प्रागतेत्वयि संमारे किं किं भुक्तमुखस्वयम् ।।५४ गर्भवासो महदुःसमस ह्य दारुण मया । भुक्तमेव महाप्राज्ञ ज्ञानहीनेन वे सदा ॥५५ देहपि ज्ञानविभ्रष्टः सोऽहं जातो ह्यनेकधा । बाल्यावस्थां गतेनाथ कृत्याकृत्य कृतं मया ॥५६ प्रारमा ने कहा-पार कौन है जो यहां पर माये हए है ? माप तो मेरे ममान मनाप के नाम परने याने है । पार कृपा करके अपने स्वरूप हो विस्तार पूर्व स्वयो बनाइये ॥ ४६ || पारमा के इस प्रश्न को गुनकर

वैगम तथा प्रात्मा का मवाद ]
वीतराग ने कहा-जिसके काम निवृत्त हो जाते हैं वे गब हो निराश होते हैं ।
जिसको दुष्टत्व होने से ये कम नही देखते है, अन्यथा नहीं है ॥ ५० ॥ जिसके
ममीप मे प्राशा कभी भी नही पाती है । क्रोध-लोभ और मोह जिसके भप
से प्रलय को प्राप्त हो जाते हैं ॥५१॥ मै तो वीतराग हूँ तुम्हारा कल्याण हो,
मेरा बान्धव विवेक होता है ।।५२।। मात्मा ने कहा- यह प्रापका भाई जिमका
नाम विवेक है किस प्रकार का है ? प्राप उसका, अपने भाई का पूरा लक्षण
बताइये और अपना भी लक्षण बताइये ।। ५३ ।। विवेक ने कहा-हे विश्व.
नायक ! हे देव ! पाप सुख से स्थित होते हैं। माप प्रब यह बताइये आपके
इस संसार मे आजाने पर मापने स्वय क्या क्या सुख भोगा है ? ॥५४|| भात्मा
ने कहा-हे महाप्राज्ञ ! ज्ञान से हीन मैंने गर्भ का निवाम किया था जिसमें
असह्य और महान दारण दु.ख मैंने मदा ही भोगा है ।। ५५ ।। ज्ञान से विदोप
रूप से भ्रष्ट में देह में भी अनेक प्रकार से समुत्पन्न हुमा हूँ। वाल्यावस्या को
प्राप्त होने वाले मैंने कृरम और अकृत्य सभी कुछ किये थे अर्थात् जो करने
पौर न करने के योग्य कर्म थे वे भी मैंने किये थे ॥५६।।
तारुण्येन कृता क्रीडा भुक्ता भार्याानेकशः ।
वार्धकप्राप्यसतप्तः पुत्रशोकादिभिस्तथा ॥५७
भार्यादीनां वियोगस्तु दग्धोऽस्म्यहमहर्निशम् ।
दुग्वैरनेकसवरण संतप्तोऽस्मि दिनेदिने ॥५८
दिवारात्री महाप्राज्ञ न विन्दामि सुखक्वचित् ।
एवंदु.खैः सुसंतप्त. किं करोमिमहामते ।।५६
तमुपायं वदस्वंव सुख विन्दामि येन वं
अस्मात्ससारजालौघान्मोचयाद्य सुवन्धनात् ॥६०
भवाञ्छुद्धोऽसि निद्वन्द्वी हपापोऽसिजगत्पते ।
एनं गच्छ महात्मानंवीतरागसुखप्रदम् ॥६१
नि:संशय त्वयादृष्टं नग्नमाचारवजितम् ।
सुखप्रदर्शकोह्य प सर्वमन्तापनाशकः ॥६२
एवमाकण्यं शुद्धात्मा वीतरागगतः पुनः।
तमुवाच श्वसम्दीनः श्रूयतां वचनं मम ॥६३

४४८ ] । पद्म पुराण प्रत्यन्त सन्ताप वाला सुखंविन्दामि येनाह तमार्ग मम दर्शय । एवमस्तु महाप्राज्ञ करिष्ये वचनं तव ॥६४ जिस समय में मैं तरुण भवस्था में पहुंच गया तो मैंने अनेक प्रकार से भार्या के साथ क्रीडा को थी और सूब भोग किया था। जब मैं वृद्धता को प्राप्त हो गया तो मैं पुत्रादि के शोक से अत्यधिक संतप्त हो गया था बुढापे में मुझे बहुत प्रकार का सन्ताप हुप्रा था ।। ५७ ॥ भार्या मादि का कभी-कभी वियोग भी हो जाता था तो मै इस दुःख से महनिश दग्य होता रहता हूँ । मैं दिन-प्रतिदिन इस तरह के अनेक स्वरूप वाले दु.खो रहता हूँ ॥५८१ हे महाप्राज्ञ ! आप मेरे सुख भोगने के विषय में पूछते हैं, मुझे सुख तो है ही नहीं मैं तो दिन-रात मे सुख कही भी प्राप्त नहीं करता हे महान मति वाले ! इस प्रकार से दु.खो से भली भांति मनात होने वाला मैं क्या करू ? ॥५६।। माप मुझे वही उपाय बताइये जिसके द्वारा मैं मुख को प्राप्ति कर सकू। आज प्रब पाप अत्यन्त बन्धन से सयुन इप ससार के जाल के समूह से मेरा मोचन करा दीजिये ॥६०|| इस प्रात्मा के वचन को सुनकर विवेक ने कहा--हे जगत् के स्वामिन् ! माप तो परम शुद्ध स्वरूप वाले हैं, प्राप निर्द्वन्द्व हैं और आप पाप रहित हैं । अब भाप यही करिये कि इस महान प्रारमा वाले, सुख के प्रदान करने वाले वीतराग के समीप में जाइये ॥६१॥ इसमे कुछ भी सशय नहीं है मापने इसको बिल्कुल नग्न और भाचार से रहित देखा है किन्तु यह सुखों को प्रदर्शित करने वाला है तथा समस्त प्रकार के मन्तापो के नाश करने वाला है ॥६२॥ इस तरह के विवेक के कहे हुए वचन को सुनकर वह शुद्धात्मा पुनः वीतराग के समीप मे गया था और वह अत्यन्त दीन होकर श्वास छोडता हुमा उमसे बोला था कि मेरे वचनो को आप श्रवण कीजिए । मैं जिस मार्ग के द्वारा सुख की प्राति कर सकू वही मर्ग माप मुझे दिखला दीजिए । ऐसा ही होगा-हे महाप्राज्ञ ! मैं प्रापका वचन करूंगा-यह उस ने उसको उत्तर दिया था ।।६३६६४॥ पुनर्गच्छ विवेकं हि सुखवार्ता कृतात्वया । मुखमार्गस्य दैवक्ता तवचैप भविष्यति ॥६५ वैराग्य तथा भात्मा सवाद ] वीतरागेण पुण्येन प्रेपितो गतवान्प्रभु.। तमुवाच महात्मानं विवेक शुद्धसत्तमम् ।।६६ सुख मेदर्शय त्व हि वीतरागेण प्रेषिता। भवच्छरणमापनोरक्ष ससारदारुणात् ॥६७ ज्ञान गच्छ महाप्राज्ञ स ते सर्व वदिष्यति । श्रात्मा तथोक्त सम्प्राप्तोयत्रज्ञानप्रतिष्ठितम् ॥६८ भामाज्ञान महातेज सर्वभावप्रदशक । शरणं त्वामह प्राप्त सुखेमार्ग प्रदर्शय ॥६६ पाप फिर विवेक क पाग जाइय । नापने मुख को वार्ता को थी। पारको सुख की विधि का माग बतलाने वाला यह ही होगा ॥ ६५ ॥ परम पुण्यमय वीतराग के द्वारा प्रेषित वह प्रभु प्रारमा विवक क समीप म गया पा मोर पुखी म परम श्रेष्ठ उस महात्मा विवक स बात ॥६६॥ मुझे पाप पाग में वीतराग ने हो भैनर है पतएर माप ही मुझे सुग्प मा माग दिखानाइये । मापको शरणागति म पस्थित हा गया है। प्रब आप मेरी इस दारुण ससार रक्षा कीजिए ॥६७ । यह सुनकर विवेक ने कहा- T-हे महाभाग । के समीप में जाय । वह सभी एछ पापको पतला देगा। इस तरह से कहें जान पर वह पारमा वहाँ पर जाकर पहुंचा या जहाँ पर मौत प्रतिषित पा ॥६॥ मारमा न मान से निवेदन किया पा-हे ज्ञान । माप महान तज। सा बन हैं मार सब भावा का प्रदर्शन करने यार हैं। मैं इम ममय म प्रारको वरणागति म आया है मुझे थाप मुग या माग गर दिसला दीजिए ॥६i भृत्याऽहनबलोरेश व मा वैरिम न मुयत । मयाध्यानेन व पूर्व वारितस्त्व पुन पुन ॥७० पञ्चात्मवाना सझन प्रापद प्राप्तवान्भवान् । ध्यान गच्छ महाप्राज मतदातामुसस्यच ॥७१ शानेन प्रेपिनो धात्मा ध्यानमाश्रित्य मस्थित । मुंबमस्यलगिद्ध च घ्यामदर्शयस्वह ।।७२ भवच्दरणमायात मामेव परिरक्षय । एवं सम्भापित तस्य ध्यानमाययं तच ist से मापन ४५० ] [ पग-पुराण समुवाच पुनश्चापि तमात्मानं प्रहृष्टवान् । नव त्याज्योऽम्म्यहं.तात सर्व कर्मसुनिश्चितः ।।७४ स्वयंव वीतरागेण विवेकेन सदैव हि । ध्यानयुक्तो भवम्वत्वमात्मानमवलोकय ॥७५ आत्मवास्त्वस्थिरोभूत्वानि रातकोविकल्पतः । यथादीपोनिवातस्थ कज्जलवमतेस्थिरः ॥७६ तथादोपान्प्रज्वलित्वा निर्वाण हि प्रयास्यति । एकान्तस्थोनिराहारोमिताशीभवसर्वदा ।।७७ निर्द्वन्द्वः शब्दसहोनोनिश्चलोह्यासनेस्थित । प्रात्मानमात्मनाघ्यायन्ममेवस्थिरबुद्धिना । प्राप्स्यसे परम स्थान तद्विष्णोः परम पदम् ॥७८ . पारमा के इस विनम्र आवेदन को श्रवण कर ज्ञान ने कहा-हे लोकों के ईश । मैं तो प्रापका एक भृत्य हूं। हे सुन्दर व्रतो वाले ! माप मुझको नही जानते है । मैंने मोर ध्यान ने प्रापको बारम्बार निवारित किया था ॥ ७० ॥ इन पञ्चात्मको वो मङ्गति से ही आप इस विपत्ति को प्राप्त हो गये हैं । हे महाप्राज्ञ ! आप ध्यान के समीप में जाइये । वही भापको सुख का देने वाला है ॥७१॥ ज्ञान के द्वारा प्रेषित किया हुमा वह सारमा ध्यान का प्राश्रय ग्रहण करके संस्थित हो गया था मोर उसने ध्यान से कहा-है ध्यान ! मुझे आप अत्यन्त सिद्ध सुख का दर्शन करा दीजिए । ७२ ।। मैं आपको शरण में पाया हूँ, प्रब पाप हो मेरो रक्षा कीजिए । इस प्रकार के उम मात्मा के कथित वचन को ध्यान ने श्रवण किया था ॥७३॥ फिर अत्यन्त हर्ष से युक्त होकर पुनः उस मात्मा से कहा था कि हे तात ! अब पाप मुझको कभी भी न त्याग देवें क्योकि मैं सर्व कर्मों से मुनिश्चित हूँ ॥७॥ प्राप हो वीतराग और विवेक के द्वारा सदा ही ध्यान से युक्त होवें प्रौर स्वत्त्व अपने पापका अवलोकन करें ॥७॥ श्राप मात्मवान् स्थिर होवें और विकल्प से निरातल हो जावें जिस तरह निर्वात स्थान में रखा हुआ दीपक स्थिर होर पज्जल का वमन किया करता है ॥७६॥ उसी प्रकार से पाप भी अपने समस्त दोषो को भस्मीभूत करके निर्धारण आत्मा स्वरूप का वर्णन ] بما , पद को प्राप्त करेंगे। सर्वदा माप एकान्त मे स्थित रहे-बिना कुछ आहार ग्रहण किये ही स्थिर रहे । यदि भोजन ही करें तो बहुत ही मित प्रशन ग्रहण करें, सर्वदा इसी रीति से ध्यान मग्न रहे ॥७७॥ द्वन्द्वो से रहित-विना कुछ भी मुख से शब्दोच्चारण किये अर्थात् मौन व्रत धारण कर-निश्चल होकर प्रामन पर स्थित रहे । अपनी मात्मा से ही प्रात्मा का ध्यान करते हुए स्थिर बुद्धि से मेरा ही प्राश्रय लेवें। इसका यह परिणाम होगा कि अन्त मे भगवान् विष्णु के परम पद सर्वोत्तम स्थान को आप प्राप्त करलेगे ।।७।। ॥ आत्मा के स्वरूप का वर्णन ॥ एव सबोधितस्तत्र आत्मा ध्यानादिकैस्तदा । त्यक्तुकाम स तत्कार्य पञ्चात्मक स वद्धिमान् ॥१ निमित्तान्येव पश्यन्वैप्राप्य तास्तान्प्रयातिस. । विहाय कायनिर्लक्ष्य पतितनव पश्यति ।।२ सहवद्धितयोर्नास्ति सम्बन्धः प्राणदेहयो । धनपुत्रकलत्रैश्च सम्बन्ध: केन हेतुना ॥३ एव ज्ञात्वा शम गच्छ क्लैब्य मा भज सुप्रिये । अयमेव पर-ब्रह्म अयमेव सनातनः ।।४ अयमात्मस्वरूपेण दैत्यदेवेपु सस्थितः । अय ब्रह्मा ह्ययं रुद्रोह्यय विष्णु सनातनः ।।५ अय सृजतिविश्वानि अय पालयते प्रजा । सहरत्येप धर्मात्मा धर्मरूपी जनार्दन ॥६ अनेनोत्पादिता देवा दानवाश्च व सुप्रिये । देवाश्चाधर्मनिमुक्ता धमहीनाः सुतास्तव ।।७ महपि कश्यप ने कहा-वहाँ पर इस प्रकार से पान प्रादि के द्वारा भली भांति ज्ञान प्राप्त कराये जाने वाले उस मात्मा ने उस समय में परम बुद्धि- मत्ता से उन प्रञ्चारमको का त्याग करने की इच्टर की पी मौर वही करना योग्य सममा पा ॥१॥ वह निमित्तो को ही देखता हुआ उन उनी प्रात कर .

1. पल- पुणे प्रयाण करता है। कामा को लक्ष्य होन छोडकर पतित को नही देखता है ॥शा सहदित प्राण और देह का सम्बन्ध नहीं है। जब प्राणो और देह ही काई सम्बन्ध नहीं है तो फिर धन-पुत्र प्रौर कलत्र प्रादि से किस हेतु से सम्बन्ध हो सकता है 11३६६ हे सुप्रिये । इस प्रकार से ममभकर शम को प्राप्त होओ और क्लीवता का धारण मत करो। यह ही परम ब्रह्म है और यह हो सनातन है ।।४॥ यह ही प्रात्मा के स्वरूप स दैत्य और दवों B संस्थिति किया करता है । यह ही ब्रह्मा-रुद्र और रावेदा से चले जाने वाला सनातन विष्णु है ॥५॥ यह हो समस्त विश्वो तथा प्रजानो का सृजन किया करता है और मह ही उन प्रजाजनो का पालन पोषण करता है । यह हो धर्म ने रूप वाला परम धर्मात्मा भगवान जनादन सबका सहार किया करता ॥६॥ हे सुप्रिय 1 इमन ही सब देवता पोर दानव उत्पादित किये हैं । देवताओं को और धर्म म भुक्त धर्महीन तुम्हारे पुत्रों को भी इमो ने समुत्पन किया है ॥७॥ धर्मोऽय माधवस्याङ्ग सर्वदवैश्व पालितम् । धर्म च चिन्तयेदेवि धर्म चैव तु पालयेत् ॥८ तस्य विष्णु स वर्मात्मा सर्वदेव प्रसादवान् । धर्मेण वर्तिता देना स येनतपसाक्लि । है यया विष्णु प्रसन्नो वै धर्मस्तै रिह पालित । विष्णा कायमिद धर्म सत्य हृदयमेवच ।।१० यस्तो पालयते नित्य तस्य विष्णु प्रसीदति । टूपयेद्य सत्यघमी पापमव प्रपातयेत् ॥११ तम्य विष्णु प्रकुप्येत नाशयेदति वीर्यवान् । वणवै पालित धमतप सत्येनसंस्थित ॥१२ तेपा प्रसमा धर्मामा रक्षामव करोति च । तव पुत्रा दमा पुत्रा सैहिकेयास्तथैव च ॥१३ अधर्मेणापि पापन वतिता पापचैतस । सूदिता वासुदेवेन समर चक्रपाणिनां ॥१४ यह धर्म है पौर समस्त दवगण के द्वारा पालित माधव का प्रङ्ग है है देवि ! मवंदा धर्म का हो चि न करना पाहिर औt धर्म की ही पालने मात्मा के स्वरूप का वर्णन ] करना चाहिए ||८|| उसके लिए धर्मात्मा वह भगवान् विष्णु मयंदा ही प्रसाद वाले होते हैं । धर्म से ही देवगण वत्तित होते हैं~-सत्य से और तप से वे यत्तित हुमा करते हैं 10 जिनके ऊपर भगवान विष्णु परम प्रमान होते हैं उन्होंने पूर्ण रूप से धर्म का पालन कर लिया है । भगवान् विष्णु का यह धर्म- फाया है और सत्य ही हृदय है ॥१०॥ जो इन दोनो धर्म और सत्य का पालन किया करता है उसके ऊपर भगवान विष्णु परम प्रसन्न हो जाते हैं । जो इन धर्म और सत्य को दूपित किया करते हैं वे केवल पाप ही को पालते हैं ।।११।। इनको दूपित करन वाले पर भगवान् विष्णु प्रकुपित होते हैं और अति वीर्य थाले विष्णु उनका नाश कर देते हैं । तर भोर सत्य से सस्थित वैष्णको के हरा धम पालित होता है ।।१२।। उन वैष्णवो पर भगवान् परम प्रगान होते हैं नयो कि उनका स्वाप ही धर्म का है फिर वे उनकी पूर्ण रक्षा भी दिया करते हैं तुम्हारे पुत्र-दनु के पुत्र मोर से हिकय, ये सब पाप के चित्त बाले प्रधर्म से और पाप से वतित होते हैं । पौर चक्रपाणि भगवान् वासुदेव ने समर मे इनको सूदित किया था ।।१३।१४।। योऽभावात्मा मया प्रोक्त पूवमेव तवाग्रत । साऽयविष्णुर्नसन्देहोधर्मात्मासर्व पालक. ॥१५ दैत्यकायेषु य. स्वस्थ पापमेव समास्थितः । जनिवान्दानवान्देवि सच क्रुद्धोमहामतिः ।।१६ सबाह्याभ्यन्तरे भूत्वा तव पुत्रा निपातिता। येन चोन्पादिता दयितेनरिनिपातिता ॥१७ नेपा मोहन्तु पर्तव्यो भवत्या वचन शृणु । पापेन वर्तते योग्लो स एव निधन व्रजेत् ॥१८ तस्मान्मोह परित्यज्य सदा धर्म ममाश्रय ॥१६ एवमस्तु महाभाग करिष्य वचन तव । कश्यप न मुनिश्रेष्ठमेयमाभाध्य दुमिता ॥२० चोधिना सा मुनिता दुग सन्त्यज्य मस्थिता ॥२१ सोयह मारमा मैने पहिने ही प्रापरं गामन पहा पा ही यह भगवार विष्णु है जो परम धर्मात्मा मोर सरे पाना -दमे युध भी मम्मेद नहीं ४५४ ] । पप-पुराण है ॥१५॥ दस्यों के दारी में जो स्वस्थ रूप से समास्थित है वह पाप ही है । हे देवि ! उम महान मति व ले ने युद्ध होकर दानवो को मारा था ।। १६ ॥ उमने हो बाहर मोर भोनर होरर तुम्हारे पुत्रो या निपातन किया है । है देवि। जिसने उनका उत्पादन किया था उमी ने उनका विशेष रूप से निपानन भी किया है । अर्थात् उत्पन्न करने तथा वध करने वाला वह एक ही है दूसरा कोई भी नही है ॥१७॥ अब प्राप को मेग वचन श्रवण करना चाहिए भोर इनका प्रत्यधिक मोह नहीं वरना हो उचित है । जो यही पर पाप से पतित हमा करता है वह ही निधन (मृ-यु) को प्राप्त होता है ।।१८ । इस कारण से मन मोह का बिल्कुल त्याग करके वेवल धर्म का ही समाश्रयण करना चाहिए ॥१९॥ दिति ने जो कि महपि को एक पत्नी यो कहा था अब ऐसा ही होगा- मर्थात् मै ऐसा ही करूंगी। हे मह न भाग्य वाले स्वामिन् ! मैं मापके वचनो का पूर्णतया पालन करूंगी। इस प्रकार से मुनियों में परम श्रेष्ठ कश्यप से कह 'कर प्रत्यन्त मन मे दु.खित हुई थी ॥२०॥ फिर मुनिवर ने उसे भली भांति समझाया था तो वह उस द ख का त्याग करके सस्थित ई थी ॥२१॥ ॥ ब्रह्मचर्य लक्षण ॥ नित्य मत्येरतियंस्य पुण्यात्मा तुष्टता व्रजेत् ॥१ ऋतौ प्राप्ते व्रजेन्नारी स्त्रीया दोपविजितः ॥२ म्बकुलस्य सदाचार दानव विमुञ्चति । एतदेव समाख्यात गृहस्थस्य द्विजोत्तम ॥३ ब्रह्मचर्य मयाप्रोक्त गृहिणामुत्तम किल । यनीना तु प्रवक्ष्यामि तन्मया गदित शृणु।।४ दमसत्यममायुक्त पापादीतस्तु सर्वदा । भार्यामङ्ग वर्जयित्वा ध्यानज्ञानप्रतिष्ठित ॥५ यतीना ब्रह्मचर्य च समास्यात तवाग्रत.। तप एवं प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदत शृणु ॥६ प्राचारेगा प्रवर्तेत कामक्रोधविजितः । प्राणिनामुपकागय सस्थित उद्यमावृत ॥७ ब्रह्मचर्य लक्षण ] सोम शर्मा ने कहा-ब्रह्मचर्य का क्या लक्षण होता है इसे मेरे सामने माप विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिए। हे स्वामिन ! ब्रह्मचर्य कैसा होता है- यह यदि आप जानते हैं तो बतलाइये ।। १ ।। सुमना ने कहा-जिप्तकी नित्य हो मत्य मे रति होती है वह परम पुण्यात्मा पुरुष होता है और पूर्ण सुष्टता को प्रास हुप्रा परता है । जिस समय में नारी ऋतुमती हो उमी समय में उसका अभिगमन करे और स्त्रो मे दोप से विवजित होकर ही भोग करना चाहिए ॥२॥ अपने कुल का जो सदा से परम्परागत मदाचार हो उसका पिभी भी ममय मे त्याग नही करना चाहिए। है द्विजोत्तम ! गार्हस्थ्य प्राश्रम में रहने पाले पुरुष का यही धर्म कहा गया है ।। ३ ।। मैंन ब्रह्मचर्य को गृही पुरुषो का वत्तम धर्म बतलाया है। अब यती लोगो का जो धर्म है उसे बतलाया जाता है-उसका श्रवण करो॥४॥ दम पोर सत्य से समायुक्त होकर सर्वदा पापो से भयभीत रहे पौर भार्या के गङ्ग का त्याग करके ध्यान भोर ज्ञान मे प्रति पित रहे ।।५ । पतिगण का ब्रह्मचर्य तो मैंने तुम्हारे मामने बतला दिया है । अब मैं उनके तपाही वर्णन करता हूं उसे सुनो जिसको कि मैं कह रहा हूँ 1॥६॥ सवंदा पाचार से ही प्रवृत्त रहना चाहिए और काम तथा क्रोध से सर्वथा दूर रहे । मदा ममस्त प्राणियों के उपकार के किये हो उद्यमशील होकर उसे सस्थित रहना चाहिए ॥७॥ तपएव रामास्त्रात सत्यमेव वदाम्यहम् । परद्रयेविलोलुप्त्व परस्त्रीषु तथंव च १८ दृष्ट्वा मतिर्न यस्य स्यात्ससत्य परिकीर्तितः । दानमेव प्रवक्ष्यामि येनजीवन्तिमानवाः ।। प्रात्मसौख्य प्रतीच्छेद्य स इहैव परत्र वा। अनस्यापि महादान मुसम्यय ध्र वस्य वा ॥१० ग्राममात्र नथादेय शुधार्ताय न सशयः । इत्तेमति महत्पुण्यममृत मोनुने सदा ।।११ दिनदिने प्रदानय ययाविभव सम्भवम् । शुग गया । वचन गृहच्छायो गुगोतलाम ॥१२ .

[ पृन पुराण भूमिमपस्तथा चानं प्रियवाक्यमनुत्तमम् । प्रासनं वचनालाप कौटिल्येन विजितम् ॥१३ आत्मनो जीवनार्थाय नित्यमेव करोति यः । देवान्पितृन्समम्पर्य एवदान ददाति यः ॥१४ इम रीति से तप कहा गया है। मैं इस प्रकार से बिल्कुल सत्य ही यतला रहा हूं। पराये धन में लोलुपता न करे-और पराई स्त्रियों मे कभी अपना मन न लगावे ।।। पराया धन मोर पराई स्त्री को देखकर भी जिसकी कभी बुद्धि उस मोर नहीं जाती है वह हो मत्य कहा गया है । मैं दान के विषय में बतलाता हूँ जिसके प्रभाव से मनुष्य जीवित रहा करते हैं ।। ६ ॥ जो पुरप आरमा का सुख प्रदान करता है वह इस लोक में भी होता है और परलोक मी हुमा करता है । ध्रव (मटल) का साधन भोर महादान मन का भी होता है ॥१०॥ जो भूख से पीडित प्राणी है उसे चाहे ववल एक ही प्रामक लिये अन्न का दान करे परन्तु करना अवश्य हो चाहिए । इसमें तनिक भी सशप नहीं है कि ऐमा मन का दान देने पर महान पुण्य होता है मोर इस प्रकार के मन दान के प्रभाव से सदा ममृत का उपभोग किया करता है ।। ११ ।। जंसा भी ब्रह्मचर्य लक्षण ] उपकारेपु पुण्येषु नियमोऽयं प्रकीर्तितः । क्षमारूप प्रवक्ष्यामि थू यता द्विजसत्तम ॥१८ पराकोश हिसंच त्य ताडितेसतिकेनचित् । क्रोध न चैव गच्छेत्तृ ताडितो न हि ताइयेत् ॥१६ सहिष्णु स्यात्सधर्मात्मा न हि रागप्रयातिच । समश्नाति परंसौख्यमिह चामुत्रवापि च ॥२० एवंक्षमा समारयाता शौचमेव वदाम्यहम् । सबाह्याभ्यन्तरे यो वे शुद्धी रागविवजितः ॥२१ इस प्रकार के दानों के देने वाला दाता पुरुष यहाँ पर ही संमार मे परम भादम्द की प्राप्ति किया करता है और फिर पर लोक में भी वह अत्यन्त सुखा. नाद से सुसम्पन्न होता है । जो पुरुष प्रत्येक दिन को दान-~-मध्ययन और सम्म इनसे सवाभ्य रखना है अर्थात् इनके पिये बिना किसी भी दिन को नहीं जाने देता है वह देखने मे तो अवश्य मनुष्य स्वरूप वाला होता है किन्तु वह साक्षात् देवता ही होता है इसमें कुछ भी सराय नहीं है । पब हम निगम के विषय में बतलाते हैं जो धम का प्रत्युत्तम साधन होता है ।।१५।१६।। हे सुन्दर पनी के करने वाले ! जो पुरुष सर्वदा देवगण और ब्राह्मणों को यजना में मभिरनि रखना है और नित्य-प्रति दान एवम् प्रा में नियम पूर्व मयुक्त रहा करता है वह महान पुण्यात्मा है ॥१७॥ मरो को भलाई हर प्रकार से करने में मोर पुण्यों में यह ही नियम बनाया गया है । हे दिनों में परम श्रेष्ठ ! मय (मैं क्षमा के स्वरूप को बतलाता है उसे सुनो ॥१८दूसरे धारा बुराई को सुनकर भी अर्थात जो कोई भी अन्य पुरुप बुरे-मे भी बुरे शद कद देवे या निन्दा परे तो उसे सुनकर भी एवम् काई नाडना भी कर तो दूसरे के द्वारा प्रताड़ित होने पर भी सभी कोप नही सरना नाहिर और ताटिन होगर म पिटार फिर स्य भी उसे नीटना नही चाए || १६ | यह पुरप पूर्ण मे सहिगु है, वह पर घमिक है और वह कभी भी गग की प्राप्ति नहीं किया करता है। ऐसा महापुरुष प्रति क्षमाशील होता है वह हम लो मे और परवा में भी दोनो जगह परम गुली के उमभाग लिया है ॥२०॥ मा इसी

४५८ ]
[ पम पुगए
प्रकार की बतलाई गई है। पब हम शौच के विषय में बतलाते हैं। जो राग
से रहित होता है वही बाहर मौर भीतर दोनो प्रकार से परम शुद्ध होता
है ।। २१ ॥
स्नानाचमनरेव व्यवहारेण वर्तते ।
शौचमेव समाख्यातमहिमा तु वदाम्यहम् ॥२२
तृणमपि विनाकाय छेतव्य न विजानता।
अहिमानिरतो भूयाद्ययात्मनि तथापरे ॥२३
शान्तिमेव प्रपक्ष्यामि शान्त्या सुखसमश्नुते ।
शान्तिरेव प्रकर्तव्या क्लेशान्नव परित्यजेत् ॥२४
भूतवैर विसृज्यव मनएव प्रकारयेत् ।
एव शान्ति समाख्याता अस्तेय तु वदाम्यहम् ॥२५
परत्वनैव हर्तव्य पराजाया तथैव च ।
मनोभिवचनं.कायमन एव प्रकारयेत् ।।२६
दममेव प्रवक्ष्यामि तवाग्रे द्विजसत्तम ।
दमनादिन्द्रियारण। वै मनसोऽपि विकारिण. ॥२७
औद्धत्य नाशयेत्तेपा सचैतन्योवशी तदा ।
शुश्रू पा तु प्रवक्ष्यामि धर्मशास्नेषु यादृशी ।।२८
प्रातरिक मन की शुद्धि का अधिक महत्त्व है वस्तुनः यही शुद्धि प्रमुख
है। कार को शरीर–वस्त्र और भावाम की गुद्धि को ही मामतौर से लोग
क्यिा करते हैं और इमोको सब पुच मान बैठते हैं मसली मान्तरिक शुद्धि ऐस
लोगों में होती ही नही है जोकि परम प्रध पौर प्रत्यावश्यक है। इस तरह
गौच बतना दिया है । इसके उपरान्त हम भव महिंसा के विषय में वर्णन करते
हैं ॥ २२ ॥ एक तृण का भी जो कि तुच्छानितुच्छ है, छेदन बिना किसी कार्य
के कभी नहीं करना चाहिए क्योकि तृण में भी मूक्ष्म वेदना अवश्य ही होती है
मौर वही एक प्रकार की डिमा ही है । मानव को मदा महिमा में निरत रहना
हो चाहिए। जिस प्रक र से परने मन में पीहा होती है वैसे ही दूसरे को भी
पीड़ा सा मनुभव हाता है-ऐमा विचार रखना चाहिए ॥२३।। मब शनि के

ब्रह्मवयं लक्षण ] [ ४५६ विषय में बतलाया जाता है । शान्ति भी एक परम अदभुत सुख का साधन होता हैं। इससे सुख की प्राप्ति होती है । प्रतएव शान्ति अवश्य ही करनी चाहिए और क्लैश से इसका कभी भी त्याग न करे ॥२४॥ प्राणियों में किसी से भी पैर की भावना न खसे-इसी प्रकार का अपना मन बना लेना चाहिए कि सर्वजन प्रियता उसमें स्थिर होकर बैठ जाये । इमो गति से शान्ति का समा- धान कर दिया है। प्रव अस्तेय (चोरी न करना) के विषय में बतलाया जाता है ॥२५॥ पराया धन कभी भी न हरण करना चाहिए। चाहे वलात् उमका हरण हो या छिपकर हो अथवा स्वतः भूल से पडा हुमा ही क्यो न हो, जो अपना नही है यह पराया है उसे कभी ग्रहण न करे । जिस तरह से पराया घन अस्वीकृत होने की वस्तु है वैसे ही पराई को भी एक प्रकार का धन है उसका भी ग्रहण किसी भांति भी नही करना चाहिए। मन-वचन और शारीरिक धर्म से इस तरह पराये धन से गदा दूर ही रहना चाहिए । मन को भी ऐमा ही बना लेने की प्रावश्यकता है यही प्रस्तेय है जिसकी बहुत बडी महिमा है और धर्म का एक अङ्ग है ॥ २६ ॥ हे द्विज श्रेष्ठ ! प्रब हम दम की ध्यामा करते हैं कि दम क्या होता है । दमन को ही दम कहा जाता है । इन्द्रियां जो अपने-अपने विषयो के भोगने की मोर प्रतिश भागती रहा करती हैं उन पर पूरा काबू कर उन्हें दवाना हो दम है। यह मन भी बहुत विकारो से भरा रहता है । दुर्बल मन वाला कभी दमन नहीं कर सकता है भतः मनको भी दाबकर अपने वश में करना चाहिए । इन्द्रियो और मन की जो उद्धता है इसका चन्यामा को नाश कर देना चाहिए और सवा इनसे मतकं रहे धौर यश में रवशे यही दमन होता है । अब हम शुभ्रूपा को बताते हैं जिमको धमशास्त्रों में जिस तरह की बताया गया है ॥२७ २८।। पूर्वाचायर्यथाप्रोक्ता तामेव प्रवदाम्यहम् । वाचा देहेन मनसा गुरुलार्य प्रसाधयेत् ।।२९ जायतेऽनुग्रहो यत्र शुश्रूषा मानिमद्यते । माङ्गोधर्मः समाख्यातस्तवाग्रे द्विजसत्तम ॥३० अन्यच्च ते प्रवक्ष्यामि श्रोतुमिच्छसि यत्पते । ईदृशे चापि धर्मतु वर्तते यो नरःसदा ।।३१ ४६० ] [ पन-पुराण भब ससारे तस्य सम्भूति.पुनरेव न जायते । स्वर्ग गच्छति धमेण सत्य सत्य वदाम्यहम् ॥३२ एवज्ञाना महाप्राज्ञ धर्ममेव व्रजस्व हि । सर्वं हि प्राप्यते कान्त यदसाध्य महीतले ॥३३ पूर्व में होने वाले प्राचार्यों ने इसको जिस रीति को बतलाई है वही हम बतलाते हैं । मन-वचन और शरीर से गुरुजन के कार्य का सम्पादन करना चाहिए। मन में भी सेवा की भावना मति सत्य एवमू सुदृढ होनी चाहिए ॥२६जिस शुश्रूपा मे अनुग्रह हो जावे वही वास्तविक शुश्रूषा कही जाती है मर्थात् ऐमी शुश्रूषा हो कि गुरुजन का हृदय उमे पाकर दुपा करने के लिये विवश हो जावे और अनुग्रह किये बिना रह ही न सकें । हे द्विज सत्तम ! मैंने समस्न अङ्गों से सुसम्पन्न धर्म प्रापको संक्षेप में बतला दिया है ।।३०॥ और और भी बतलाता हूं जो भी कुछ माप मुझमे श्रवण करना चाहते हैं । इस प्रकार के धम में जो मनुष्य सर्वदा वत्तमान रहता है उम पुरुष को इस ससार में पुन उत्पत्ति कभी नही होती है अर्थात् वह जन्म-मरण स्वरूप मावा- गमन मे पूर्णतया छुटकारा पा जाता है। वह पुरय तो मीधा स्वर्गलोक का निवास प्राप्त करता:--यह मैं पूरा सत्य सत्य तुम्हे बतला रहा हूं। भतएव सबका निष्पं सारभूत यही है कि यह समझार हे महाप्रज्ञ! केवल एकमात्र घम का ही समाश्रय ग्रहण करो। यह एक उत्तम साधन है कि इमसे जो भी कुछ भू भएडा म मसाध्य है वह सभी इमस प्राप्त पिया जाता है ॥३१-३३।। ॥ पापियों के मरण-लक्षण । पापिनामरण भद्र कीदृशैर्लक्षणयु तम् । तन्मत्व विस्तराद् व हि यदिजाना मिभामिनि ॥१ श्रू यतामभिधास्यामि तम्मात्सिदाच्छुत मया । पापिना मरणे कान्न यादृश लिङ्गमेवच ॥२ महापातविना स्थान चेष्टावदाम्यहम् विण्मूषामेव्यमयुक्ता भूमिगापमन्विताम् ॥३ पादियों के मरण-लक्षण सता प्राप्य सुदुष्टात्मा प्राणान्दु.सेन मुञ्चति । चाण्डालभूमि सम्प्राप्य मरणं याति दुःस्थितः ॥४ गर्दभाचरिता भूमि वैश्यागेहं समाश्रितः । चर्मकारगृहं गत्वा निधनायोपगच्छति ।। अस्थिचमनख पूर्णमाथितं पापकिल्बिपः । ताप्राप्य स दुष्टात्मामृत्यू यानिसुनिश्चितम् ॥६ अन्यांपापसमाचारांप्राप्य मृत्यु सगच्छति । अथचेष्टां प्रेवयामि दूतानांतुतमिच्छताम् ।। सोम शर्मा ने कहा है भर्दै ! पाप करने वाले मानवो या मरण किस प्रकार के लक्षणो से युक्त होता है । हे भामिनि ! यदि पाप जानती हैं तो उन्हे हमको विस्तार पूर्वक बतलाइये ॥१॥ सुगना ने कहा--प्राप लोग श्रवण करें मैंने सिम से मुना है । है कान्त ! पापियो की मृत्यु मिम तरह की होती है और जमा भी उममे लक्षण होता है ॥२॥ में महान् पातको के करने वालों का जी स्थान और जैमी उनको चेष्टा होती है उमे भी बतलाता हूं। मल-मूत्र आदि प्रमेय (अपवित्र) पदार्थों से संयुत और पाप से युक्त भूमि ही उपका निवास स्थान होता है ।। ३।। वह दुष्ट आत्मा वाला ऐमी भूमि को प्राप्त कर बहुत ही अधिक दुःख से अपने प्राणो का त्याग किया करता है । युगे स्थिति में गस्थित होने वाला यह चाण्डाल भूमि को प्राप्त कर मरण को प्राप्त होता है ॥४॥ जिम भूमि पर गर्भ विचरण किया करते हैं उम भूमि मे-वैश्या के घर में समाश्रित होना हुमा अथवा चमडे के काम करने वाले चमार के घर में जाकर हो पापी पुरुष निधन (मृत्यु) को प्राप्त होता है ॥५॥ हड्डी-चमहा- नाखूनो मे परिपूर्ण पाप और किल्विषो से समाश्रित जो भूमि होती है उमी का पाश्रय ग्रहण करके यह दुध मामी याला पापी मनुष्य निश्चित रूप में मृत्यु को प्राप्त हुमा करता है ॥ ६ ॥ इमी तरह की दूंमसे भी जो पापों से और महाई दूषित पायों से समावरित भूम होती है उमो में पहुंचकर पो को मौत हमा करती है। पर मैं उम महान् दुष्ट पापो पुरुप की चेष्टा के विषय में वन फरता हूँ जबकि यम के दून उसे लेने के लिये इच्छा रसकर माया करते

४६२ ]
[ पम पुराण
भैरवान्दारुणान्धोरानतिकृष्णान्महोदरान् ।
पिङ्गाक्षाम्पीतनीलांश्न अतिश्वेतारमहोदरान् ।
अत्युच्चाविकरालांश्चशुष्कमांसवसोपमान् ।
रौद्रदष्ट्राकरालाश्वसिंहास्यान्सपहस्तकान् ॥
स तान्दृष्ट्वा प्रकम्पेत खिद्यते च मुहुर्मुहुः ।
शिवासनादवद्धोरान्महारावान्महामते ।।१०
मुञ्चन्तिदूतका: सर्वेकर्णमूले तु तस्य हि ।
गलेपार्शः प्रवद्ध्वा ते कटिं बद्ध्वातयोदरे ।।११
समाघृष्य निपात्येत हाहेति वदते मुहुः ।
मारणस्य या चेष्टा तामेवं प्रवदाम्यहम् ॥१२
परद्रव्यापहरण परमार्याविडम्बनम् ।
ऋण परस्य सर्वस्वं गृहीत यत्तु पापिभि. ॥१३
पुनर्नव प्रदत्त हि लोभास्वादविमोहतः ।
अन्यदेव महापापं कुप्रतिग्रहमेव च ।।१४
यमराज के दूतो का स्वरूप महान् भीषण होता है । ये दूत बहुत ही
भैरव म्प वाले हैं-महान् दारुण हैं-
-प्रत्यन्त घोर होते हैं--प्रधिक काले वर्ण
से युक्त हैं और इनके उदर बहुत बडे होते हैं । पोली इनको पाखें होती हैं,
पोत मौर नीले रङ्ग होते हैं, प्रति श्वेत और बडो तौंद होती है ।। ८ ।। बहुत
हो ऊंचे भाकार वाले होते हैं तथा प्रत्यान विकराल इनका स्वरूप होता है । सूखे
हुए मांस और वसा (चर्बी) के सदृश हुआ करते हैं । यम के दूतो को दाढ़े महान्
रौद्र रूप वाली वडी होती हैं और प्रत्यन्त ही कराल होते हैं। इन दूतो का
मुख सिंह जैसा होता है और इनके हाथ सरों के समान हुआ करते हैं। ऐसे
यम के दूतो को देखकर पापी पुरुष कांप जाता है और पारम्बार पपी से
अत्यन्न खिन्न हो जाता है जिस समय में वह शिया के सवाद के तुल्य घोर
ध्वनि करने वाले उसे दिखलाई दिया करते हैं । ६० ।। वे यम के दूत सब
उस पानी के रण मूल में घोर ध्वनि किया करते हैं । दूत उसको पाशो से गले
में बाय दो हैं--कमर को कस देते हैं और उदर को बद्ध कर देते हैं । फिर

पापियो के भरण-लक्षण ]
[ ४६३
उसको समाधषित कर नीचे गिरा देते हैं और हा-हा-ऐसा बार-बार बोलते
हैं । मरते हुए पापी को उस समय म जो चेष्टा होती है उसे में अब बतलाता हूं।
॥ ११॥१२ ॥ पराये धन का अपहरण करना, पराई स्त्री को बिउम्बित करना,
दूमरे के ऋण को ले लेना तथा दूसरे का सर्वस्व ग्रहण कर लेना मोर फिर
लौटाकर उनको वापिस न देना---ये सब कुस्मित मं लोभ के प्रास्वाद से माहित
होकर पापी मनुष्य जो किया वरत । इनके अतिरिक्ति अन्य भी महान् पाप
होते हैं और कुप्रतिग्रह भी होता है ॥ १३॥१४ ।।
कण्ठमायान्ति ते सर्व नियमारणस्य तस्य च ।
यानि कानि च पापानि पूर्वमेवकृतानिच ।।१५
पायान्ति कण्ठमूल ते महापापस्य नान्यथा ।
दुख मुत्पादयन्त्येते कफवन्धेन दारुणम् ॥१६
पीडाभिलिंगाभिस्तु कण्ठो घुरघुरायते ।
रोदते रम्पतेऽत्यर्थ मातर पितर पुन ।।१७
स्मरते भ्रातर तत्र भार्यां पुयान्पुन पुन ।
पुनविस्मरण याति महापापेन मोहित ॥१८
तस्य प्रारणा न गच्छन्ति बहुपीडासमाकुला ।
पतते कम्पते चैव मूर्च्छते च पुन पुन ॥१६
एवपीडाममायुक्तो दुख भुक्तऽतिमोहित ।
तस्यप्रारगा सुदु खेन महाकप्टै प्रचालिता ॥२०
अपानमार्गमाश्रित्य शृणु कान्त प्रयान्ति ते ।
एव प्राणी महामुग्धा लोभमोहसमन्वितः ॥२१
नीयते यमदूतस्तु तस्य दुस वदाम्यहम् ।।२२
जब ऐमा पापी मृत्यु के निकट होता है तो वे सब उमके कण्डम प्रा
जाया करते हैं जो भी कुछ उसके पूर्व में किये हुए पाप कम होत हैं वे मव
महान् पापो के कण्ठमूल मे प्रा जाया करते हैं, अन्यथा नहीं पाते हैं। ये सब
उसके पफ का बन्धन करके उसे महान दारुण द्य समुत्पन्न किया पारते हैं ।
।।१५।१६ ।। उस समय में होने वाली दारुण पोडापो से उय पापो पुरुप का
१

-
-
। पर-पुराण
कण्ठं घुर-घुर किया करता है । उम समय में मायात उत्पीड़ित होकर बड़
रुंदन किया करता है, कामता रहता है मोर पुनः माता-पिता का स्मरण किया
करता है । भाई की याद उस पीडित देश में उसे होती है अपनी भार्या और
पुत्रों को याद किया करता है फिर इन सबको महापाप से मोहित होता हुआ
भूल जाया करता है ।।१७।६। उस समय ऐमी भयानक पीडा उस होती है
कि उससे समाकुन्न होकर उसके प्राण भी नहीं निकला करते हैं और बारम्बार
गिरता है-पिता है और बेहोश हो जाया करना है इस प्रकार में प्रति पीडा
से युक्त होकर वह पापो पुरुष अत्यधिक मोहित होना हुमा दुःग्यो को भोगी
करता है। उसके प्राण उस दुःस से मौर महाने कष्टो से प्रचालित हो जाते हैं
फिर वे प्राण पान वायु के मार्ग का पाश्रय ले लिया करते हैं । हैं कान्त
पाप मुंनिये, वा होकर पापी के प्राण प्रयाण किया करते हैं । इस शनि में
वह पापामा प्राणी महाचे मुग्ध और लोभ, मोह तथा मद से समन्वित होता
है । उसे फिर यमराज के दून यमपुरी में ले जाया करते हैं । उम समय में हूँ ।
द्वारा ले जाये जाने में भी उम महान मागे मै दुख होता है । उसे भी हम म
वतायेंगे ।। १ से ३२॥
॥ ब्राह्मणच प्राप्ति के कारण ।।
पूर्वजन्मकृतं पापं त्वयाख्यातं च मे मुने ।
शूद्रत्वेन तु विप्रेन्द्र मयैव परिवर्जितम् ॥
विप्र त्वं हि मयाप्राप्त तत्कय द्विजसत्तम
तत्सर्व कारणंव हि ज्ञानविज्ञानपण्डित ॥
यत्त्वया चेष्टितं पूर्व कर्मधर्माश्रित द्विजें।
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि श्रू यता यदिमन्यसे ॥३
ग्राह्मणः कश्चिदनधःसदाचारःसुपण्डितः ।
विष्णुभक्तस्तु धर्मात्मा नित्यविपरायणः ।।
यात्राध्याजेन तीर्थानां भ्रमत्येकः स मैदिनीम् ।
अटमान.समायांतस्तवगेहे महामतिः ॥
।

ब्राह्मणत्व प्राप्ति के कारण ] [ ४६५ याचितं स्थानमेक देवासार्थ द्विजसत्तम । तवैव भार्यया दतं त्वया च सहपुरकः ॥६ एयतामेयतांब्रह्मन्सुखेन सुगृहे मम । वैष्णव ब्राह्मणं पुण्यमित्युवाच पुनःपुनः ।।७ सोम शर्मा ने कहा-हे मुनिवर । पापने मुझे पूर्व जन्म में किये हुए पापो का वर्णन करके सुना दिया है । हे विप्रेन्द्र ! मेरे द्वारा हो यूटप से परि- वजित किया है ॥ १॥ हे द्विज सत्तम ! मैंने विप्रत्व को प्रास किया पासो वह मुझे किस प्रकार से प्राप्त हुमा है । उम सबका पार पाप मुझ पतलाइये क्यों कि माप तो ज्ञान और विज्ञान के पूर्ण पण्डिर हैं ।। २॥ वसिष्ठ मुनि ने कहा-हे द्विज ! आपने जो पूर्व मे पेट की पी और धर्म तथा कर्म का प्राश्रय ग्रहण किया था। मैं उस मयत्रो इस समय में भली-भांति यतलाता है। भार इसे श्रवण करना ठीक मानते हैं तो उस गुनिये ॥ ३॥ कोई गम प्रपों में रहित, सदाचार से समन्वित और बहन ही गच्या विद्वान् प्राणपा। यह भगवान् विष्णु का परम भक्त था और अत्यन्त धर्मात्मा था। निरय की भगवान विष्णु के यजनापन में तत्पर रहा यरता था || ४ || यात्रा प्रगम से यह एक ही प्रकेला तीर्थों का बटन परसा हा भूमि पर भ्रमण पिया कारला था । यह महान् मति वाला इगी तरह में पर्यटग परता एपा आप पर पर आ गया था ॥ ५॥ है द्विजपं । उगो नियाग पर लिये स्थानी याचना की थी। मावी ही भार्या न तथा पुत्रों से गाय पापने का स्थान दे दिया था।॥ ६॥ हे ब्रह्मान ! प्राध्ये, पाप, माप प पूर्ण गैरे ही पर में निवास पोजिये । उस परम या प्राण में जो प्रायात पुरयारमा पाधार मार यह पहा था॥७॥ सुमेन स्यीयतामा गृहोऽयं तब तुमा । अद्यधन्योऽस्म्यहं पुण्यमद्यतीर्थमहगतः ।। प्रद्यतीर्यफप्राप्त तपाध्रिद्रयदर्णनात् । गयाम्यान वरपुण्यं नियामाय नियेदितम् ।। अगमवाहनं कृत्वा पादौन प्रमदिती। क्षालितो च उनम्नाय ग्नात पादोदोग हि ॥१० ।

[ पम-पुगण सद्यो घृतंदधिक्षीरमन्नंतकं प्रदत्तवान् । तस्मै च ब्राह्मणायैव भवानित्य महात्मने ॥११ एवं सन्तोपितो विप्रस्त्वया च सहभार्यया पुनःसाधं महाभागो वैष्णवोज्ञानपण्डितः ।।१२ अथ प्रभाते मम्प्राप्ते दिनेपुण्ये सुभाग्यदे । आपाढस्य तु शुद्धस्यकादशी पापनाशिनी ॥१३ तस्मिन्दिनेसुसम्प्राप्ता सर्वपातकनाशिनी। यस्यांदेवो हृषीकेशोयोगनिद्रा प्रगच्छति ॥१४ ता प्राप्य च ततो लोकास्तत्यजुयु द्धिपण्डिना । गृहस्य सर्वकर्माणि विष्णुध्यानरता द्विज ॥१५ हे सुन्दर व्रतो से समन्वित । पाप यहां पर ही मुख के साथ ठहरिये । यह तो मापका ही घर है । प्राज मैं परम धन्य हो गया हूँ। माज मैंने परम पुण्यमय तीर्थ को प्राप्त कर लिया है ।। ८ । आज मैंन समस्त महान् तीर्थों के फल को प्राप्त कर लिया है क्योंकि माज मुझे आपके दोनो चरणो का दर्शन प्राप्त हुमा है । यह गोप्रो के रहने का स्थान बहुत ही श्रेष्ठ मोर परम पवित्र है जिसे मैंने उन्हें निवेदित किया था ।। ६ ।। फिर उनके प्रङ्गो का सवान करके अर्थात् अङ्गो को दबाकर इसके उपरान्त चरगो का प्रमदन किया था । इसके अनन्तर जल से उन चरणो को धोया था । और उनके चरणो के धुले हुए घरणामृत जल से मैंने स्वय स्नान किया था ॥ १० ॥ इसके पश्चात् तुरन्त ही ताजा घृत-दधि-क्षीर-अन्न और मट्ठा मैंने उनकी सेवा में समर्पित किये थे । उम महान मारमा पाले ग्राह्मण के लिये प्रापन इस प्रकार से भोज्य पदार्थ दिये थे ।। ११ ॥ मापने प्रपनी भार्या के सहित उम विप्र को पूर्णतया सन्तुष्ट किया था। पुत्रो को भी साथ में लेकर उम महान् भाग्य वाले परम विष्णु के भक्त का जो कि ज्ञान में महान परिडन था प्रापने भली-भांनि मृकृत किया था ।। १२ ।। इसके मनन्तर प्रात:काल में पुण्य दिन के ममाप्त हो जाने पर जो कि मुभाग्य का प्रदान करने वाला था, शुद्ध मापाढ माग को पापो के नाश करने वाली एकादशी तिथि माई पो ॥ १३ ॥ उस दिन में मम्मूणं पानको का 1 ४६७ 1 प्राह्मणत्व प्राप्ति के कारण ] नाश करने वाली वह पुण्य तिथि प्राई थी जिम तिथि में भगवान हृषीकेश देव योग निद्रा को प्राप्त होते हैं । हे द्विज ! उग तिथि को पाकर बुद्धिमानों ने घर के सब कर्म त्यागकर विष्णु भगवान् के ध्यान में तत्पर हो गये थे ।।१४।१५।। उत्सवं परमंचार्गीतमङ्गलवादनः । स्तुवन्ति ब्राह्मणाःसर्वे वेदै स्तोत्र.सुमङ्गलः ॥१६ एवं महोत्सवं प्राप्य स च पाह्मणासत्तमः । तस्मिन्दिनस्थितस्तत्र सम्प्राप्त समुपोषणम् ।।१७ एकादश्यास्तु माहात्म्य पठित ब्राह्मणेन वै । भार्यापुढेम्त्वयासाद श्र त धर्ममनुत्तमम् ॥१८ श्र ते तस्मिन्महापुण्ये भार्यापुत्रन्तु प्रेरितः । ससईदस्य विप्रस्य व्रतमेतत्समाचर ॥१६ तदाकण्यं महद्वाक्य सर्वपुण्यप्रदायकम् । व्रतमेतत्करिष्यामि इतिनिश्चितमानस: ॥२० भार्यापुवै समं गत्वानद्यास्नानं कृत त्वया । हृष्टेनमनसा विप्र पूजितो मधुसूदनः ।।२१ उम देव दयनी एकादशी के दिन में मभी ने गीत प्रौर मङ्गलमय- चादनों के द्वाग महान् उत्सव मनाया था । समस्त ब्राह्मगा वेदोक्त स्तोत्रो के भगवान् स्तुति करने लगे थे ।।१६।। इम प्रकार का महान् उत्सव प्राप्त करके उम श्रेय ब्राह्मण ने भी उम दिन मै वहीं पर अपनी स्थिति करती थी और वहां उसने उपवाम भी किया था ॥१७॥ ब्राह्मण ने एकादशी तिथि के माहात्म्य का पाठ किया था। भार्या और पुत्रों के सहित वह माहात्म्य तथा उत्तम धर्म मापने भी सुना था ॥१८॥ उम महा पुण्यमय माहात्म्य के श्रवण करने पर भार्या और पुत्रो ने प्रेरणा दी थी कि इस विप्र के ससगं से प्राप भी इस व्रत का समाचरण करो ॥ १६॥ उस समय मे उसे महत्त्वपूर्ण वचन का श्रवण कर जो कि सभी तरह के पुरयो का प्रदान करने वाला या। मैंने भी ऐमा निश्चित मन से निर्णय किया था कि मैं भी इस व्रतं को अवश्य ही करूंगा ।। २० ॥ फिर तो मैंने अपनी भार्या और पुत्रो के सा द्वारा और मङ्गल वचनो से ४६८ ॥ [ पद्म पुराण नदी पर गमन किया या मोर नदी में जार स्नान किया था। है विप्र ! मापने परम प्रसन्न मन से फिर भगवान् मधुसूदन का पूजन दिया था ॥२१॥ सर्वोपहार.पुण्यश्च गन्धघूपादिभिस्तथा । रात्री जागरणकृत्वा नृत्यगीतादिभिस्तया ॥२२ ब्राह्मणस्य प्रमङ्गन नद्यास्नान पुन कृतम् । पूजितो देवदेवेश.पुप्पधूपादिमङ्गलः ॥२३ भक्त्या प्रणम्य गोविन्द म्नापयित्वा पुन.पुनः । निर्वापं तादृशदत्त ब्राह्मणाय महात्मने ॥२४ भक्त्या प्रणम्य तं विप्रं दत्तातस्मै सुदक्षिणा । कृतवान्पारण विप्र पुनर्भार्यादिभिःसमम् ॥२५ प्रेपितो भक्तिपूर्वेण सद्भावेन त्वयैव सः । एवं व्रतं समाचीरणं त्वया वै द्विजसत्तम ॥२६ सङ्गत्या ब्राह्मणस्येव विष्णोश्च व प्रसादतः । भवान्ब्राह्मणता प्राप्त.सत्यधर्मसमन्वितः ॥२७ तेन व्रतप्रभावेणत्वया प्राप्त महत्कुलम् । भूसुराणा महाप्राज्ञ सत्यधर्म समाविलम् ॥२८ परम पुण्यमय समस्त उपहारो के द्वारा तथा गन्ध प्रक्षत धूपादि के द्वारा विष्णु भगवान की पूजा की थी और रात्रि मे जागरण किया था। रात्रि में नृत्य गीतादि से भगवान् का कीर्तन किया गया था ।। २२ ॥ उस ब्राह्मण के सम्पर्क से पुन: नदी में स्नान किया था भौर देवो के भी देवेश भगवान् का पुष्प घूपादि मङ्गलमय उपचारो से पूजन किया या ॥२३॥ भक्ति की भावना से भगवान् गोविन्द को प्रणाम करके और बारम्बार स्नान कराकर फिर उस प्रकार का निर्वाण महात्मा ब्राह्मण के लिये दिया था ॥२४॥ भक्ति पूर्वक उस विप्र की प्रदक्षिणा करके तथा प्रणाम करके फिर ससको प्रच्छी दक्षिणा समर्पित की थी। है विप्र! इसके उपरान्त पुत्रो पौर भार्या के साथ स्वय पारण किया था प्रर्यात् कुछ खाकर व्रत सोला था ॥२५॥ प्रापके द्वारा वह बहुत हा सद्भावना से भक्ति-भाव पूर्वक प्रेपित किया गया

पायत्त प्राजिरे वारण ]
[re
पारगमार ने दिनों में परम घे! मापने को समायोपिया
पा॥२६॥ प्रात्मण को मनि म और भगवान विष्णु प्रमार में मर एर
धर्म से मयुन रहगे हुए प्रारतो यह ग्राम पर पो प्रानि ॥२॥ उग पर
पे महान प्रभाव में ही परमादाण सा महान् पुन मिला है। महामाम !
ब्राह्मण भूमि देवता होने है उन पुम मम पार पग में समादिन होता
६॥ २८ ॥

.. ४७१ ] [ पद्म पुराण का ही मच्चय किया था और कभी भी मापने ब्राह्मणों को तथा अन्य परम: दीन-हीन दुःपिनो को कुछ भी दाम नही किया था । अपनी स्त्रियो में एवम् पुत्रों में ही प्रानिश अपने मन को सलग्न करके मृत्यु को प्राप्त हुए थे । उस ममय में भी नाशवान् मिया मामारिक मोह के जाल में उलझे रहने के महान पाप के प्रभाव में ही यह दरिद्रता मापको प्राप्त हुई है ॥३०॥३१॥३२।। पुत्र लालच का परित्याग पर प्रौर स्नेह को दूर से ही त्याग करके आप बिना पुन वाले समुत्पन्न हुए हैं। यह उमो पाप का फल है ॥३३॥ पापको यह ज्ञान होना चाहिए कि सुन्दर परमासापालक सदाचारी पुत्र, उत्तम कुल, धन-धान्य, भूमि, अति प्रिया स्त्री, मुन्दर जम, प्रति सुमनोरम विविध भोग, सुख, राज्य, मृत्यु, वर्ग निवाम और संमार के जन्म-मरण वे सदा पावागमन से छुटकारा तथा जो-जो भी अत्यन्त दुलभ वस्तु हैं ये सभी महात्मा भगवान् विष्णुदेव की कृपा से ही प्राप्त हुमा करत है । इमोलिये मामय से रहित भगवान् गोविन्द की समाराधना करो जो साक्षात् नारायण हैं। इम माराधना के ही प्रभाव से आपको परम प्रासन्ध स्थान जो विष्णु देव का पद है वह अवश्य ही प्राप्त हो जायगा ॥३४॥३५॥३६॥ सुपुत्रत्वं धनधान्य सुभोगान्सुसमेव च । पूर्वजन्मकृत सर्व यत्वया परिचेष्टितम् ॥३७ तन्मया कथित विप्र तवाने परिनिष्ठितम् । एव ज्ञात्वा महाभाग नारायणपरोभव ।।३८ ब्रह्मात्मजेनापि महानुभाव सविप्रवयं परिबोधितो हि । हर्पण युक्त स महानुभावो भक्त्या वसिष्ठप्रणिपत्य तत्र !!३६ सुन्दर सपूत पुन-धन धान्य, सुयो के उपभाग पोर परम सुख ये मभी पूर्व जन्म के कृन पुण्स क प्रभाव से होत हैं जो हे वित्र ! आपने परिचेष्टित दिये हैं ॥३७॥ है विप्र यह सब मैंने अापके आगे बतला दिया है जोकि वास्तव मे परिनिष्ठिन है | इस प्रकार में समझार हो हे महामाग ! अब पाप नारायण में वापर हो जाइये । इमसे प्रापमा पूर्ण कल्याण होगा। वह महान अनुभावो वाला विप्र | ब्रह्माजी में मात्मज (पुत्रो ) के द्वारा भी अच्छी रीति से परि.

वेन का धमालगवारो से० ]
घोषित किया गया था। फिर परम हर्ष से समन्वित होकर वह महानुभाव
पसिष्ठ के समीप मे पहुंचे और भक्ति की भावना से वसिष्ठ महर्षि के चरणों में
उन्होने प्रणाम किया था ॥३८१३६।।
। वेन का छमलिङ्गधारी से संवाद ।।
एक्वेनस्य चैवासीत्सृष्टिरेव महात्मनः ।
धर्माचार परित्यज्य कथं पापमतिर्भवेत् ।।१
ज्ञानविज्ञानसंपन्ना मुनयस्तत्त्ववेदिनः ।
शुभाशुभं वदन्त्येव तनस्यादिह चान्यथा २
तप्यमानेन तेनापि सुशङ्खन महात्मना ।
दत्त शाप कथ विप्रा न यथावच्चजायते ॥३
वेनस्य पातकाचार सर्वमेव वदाम्यहम् ।
तम्मिन्छामति धर्म प्रजापाले महात्मनि ॥४
पुरुषः कश्चिदायातश्छालिङ्ग धरम्तदा ।
नग्नरूपी महाकायः शिरोमुण्डो महाप्रभः ॥५
मार्जनी शिपिपप्राणा कक्षाया स हि धारयन् ।
गृहीत पानगाव तु नालिकेरमयं करे ॥६
पठमानीत्य पच्छाम्ब वेदधर्मविदूषकम् ।
या वेनामहाराजनवायातस्त्वरान्वितः ७
सभाया नम्प वेनम्य प्रविवेग म पापवान् ।
त दृष्ट्वा ममनुप्राप्त वेन तदाकरोत् ।।
पयो न कहा-महात्मा वेन मी गृष्टि हो इस प्रकार को पी। वह
पेन पमं मामार रा परिगम करके पापो में मनि रसने यामा यों हो गया
पा? गूतजी न कहा---गान पौर विज्ञान मे युक तत्व के नाना मुनि सोग मुम
तथा प्रमुभ में विपक्ष में इमार में रह दिया परते है शिवह यहां पर फिर
पन्या नहीं होता है ।।१२। महान् साना वाले मुमत ने प्रस्थान तपमान
दोकरार दिया था। विगण ! वह पावन से नहीं होता ।।३।। पर

४७२ ] [ पत्र-पुराण 1 मैं राजा वेन का सम्पूर्ण पातकाचार बतलाता है। जिस समय धर्म का ज्ञान, प्रजा का पातक, महात्मा वह राज्य पर शासन कर रहा था उस समय में कोई एक पुरुष कपट का चिह्न धारण करके वहां आया था, जिसका नग्न स्वरूप या-अति विशाल गरीर था, शिर मुण्डित हो रहा था और वह महान प्रमा रे समन्वित था ।।४।शा वह कक्षा में शिखि पत्रो की मार्जनी धारण किये हुए थे। उमने हाथ मे नारियल से परिपूर्ण एक पान पान ग्रहण कर रखा था ॥६॥ वह असत् शास्त्र का पाठ कर रहा था जो कि वेदो में कहे हुए धर्म को दूपित करने वाला था जिस स्थान पर राजा वेन स्थित था वही पर वह तेजी के साथ प्रा गया था ।।७।। उस वेन राजा को सभा मे वह पापी प्रविष्ट हुमा या। उमको वहां पर सम्प्राप्त हुमा देखकर वेन ने उससे प्रश्न किया था | भवान्को हि समायात ईयू पधरो मम । सभाया वर्तमानस्य पुरः कस्मात्समागत है को वेप किन्तु ते नाम को धर्म कर्म ते वद । को वेदम्ते क प्राचार कितप का प्रभावना ॥१० किं ज्ञान क प्रभावस्ते कि सत्यधर्मलक्षणम् । तत्त्व सर्व समाचक्ष्व ममाग्रे सत्यमेव च ॥११ श्र त्या वेनस्य तद्वाक्य पापो वाक्यमुदाहरन् । करोष्येव वृथा राज्यमहामूढो नसशय ॥१२ अह घमंस्यसर्वम्वमहपूज्यतमस्मुरः। ग्रह ज्ञानमहमत्यमह धाता सनातन ॥१३ अह धर्म अह मोक्ष सवदेवमयो ह्यहम् । बहादेहात्समुद्भूतः सत्यमन्योऽम्मिनान्यथा ॥१४ जिनम्प विजानीहि सत्ताधर्मक्लेवरम् । मामेव हि प्रधावलि योगिनो ज्ञानतत्परा ॥१५ मार कौन है जो इस प्रकार का मीपण वरूप धारण करने यहाँ मेरी ममा में प्राय है । जिस समय मैं य. पर विद्यमान है तो आप मेरे सामने क्यो मा गये है । ६ ॥ प्रापका यह क्या अद्नुन वेप है ? ग्राप यह बनलाइये कि 7 वेन का छपलिङ्गधारी स० ] [ ४७३ 1 मापका नाम क्या है ? प्राप किस धर्म के मानने वाले हैं पोर मापका क्या कर्म है ? अापका कौन सा वेद है तथा क्या प्राचार है ? माप क्या तपश्चर्या रिया करते है और प्रापकी भावना विस प्रकार को है ।।१०॥ आपका ज्ञान क्या है ? प्रभाव क्या है और मत्य धर्म का लक्षण ध्या है ? पाप मेरे सामने बिल्कुल सच सच सब तत्व बतलाइये ॥ ११ ॥ राजा वेन के इम वचन का श्रवण कर उस पाप ने उत्तर दिया था। उसने पहा-इम,प्रकार से तो महा मूढ राज्य को वृथा करते हैं-इसमे सशय नहीं है ।।११।१२।। मैं धर्म का सर्वस्व हूँ और में सुरगण के द्वारा पूजित होता हूँ मैं ही ज्ञान का स्वरूप हूँ और मैं हो सत्य हूँ तथा मनातन धाता भी मैं हो हूँ ॥१मैं ही धर्म हूँ मौर में हो मोक्ष का स्वरप हूँ। मैं समस्त देवी से परिपूर्ण हूँ। मेरी उत्पत्ति ब्रह्म के देह से हुई है और इस जगत में सत्य-प्रतिज्ञा करने वाला हूँ-इम में लेगमात्र भी संशय नहीं है ॥१४॥ सत्य मोर पर्म का कलेवर धारण करने वाला मुझे जिन रूप सम- झिये । भान मे मदा परायण रहने वाले योगीजन मेरी भार हो ध्यान भरते हुए अपनी दोर लगाया करते हैं ।।१५।। तय कोश कर्म किंते दर्शनमेव च । किमाचारो वदस्वैहि इत्युक्त तेन भूभुजा ॥१६ प्रहन्तो देवता यय निग्रंत्यो दृश्यते गुरु दयाचैव परोधर्मस्तत्र मोक्षः प्रदृश्यते ॥१७ दर्शनेऽस्मिन्नसन्देह आचाराप्रवदाम्यहम् । यजन याजन नास्ति वेदाध्ययनमेव च ॥१८ नास्ति सन्ध्या तपो दान म्बधास्वाहाविवजिनम् । हव्यकव्यादिक नास्ति नव नादिवालिया ॥१६ पितृगणा तर्पण नास्ति नातिविश्वविरम् । क्षपरगण्य वरापूजा प्रहमा ध्यानमुत्तमम् ।।२० प्रय धर्मममाघारी जनमार्ग प्रहश्यने । एतत् मय मापात निजधर्मस्य लक्षणम् ॥२१ जिन मी इम उक्ति को मुनार राजा देन ने रहा है मगर १७४ ] [ पप-पुराण रिम प्रसार पर्म होता है और मापा दार्शनिक सिद्धान्त क्या है ? उस राजा नक । था कि पार यह बतलाइये कि प्रापका आधार क्या होता है ? ॥१६॥ पातवा न कहा-जिम धर्म मे महन्त देवता होता है भोर निन्य गुरु दिसलाई दिया करता है । इममे दया का करना ही सबसे बड़ा प्रमुख धर्म है और इसी में मोक्षा या दर्शन हुप्रा करता है ॥१७॥ इस दर्शन में कुछ भी सन्देह का प्रद. सर नहीं होता है । इस घम में क्या आचार होते हैं उन्हें मैं पव बतलाता है। इम धर्म मे यजन परता तथा यजन करान का काम बिल्कुल भी नहीं है । वेदो का मध्ययन भी नहीं किया जाता है । इस धर्म में सन्ध्योपासना-तपश्चर्या- 'दान पौर स्वधा (तपए) मोर स्वाहा अर्थात् हवन ये कुछ भी नही होते हैं । इममे इन सबका तिपेय होता है । इसमे हम कव्य प्रभृति कुछ भी नहीं है और यज्ञ आदि के कम भी कुछ नहीं किय जाते हैं ।। १८३१६ । इसमे पितरों के लिये श्राद्ध एवम् लपण कुछ नहीं किये जाते हैं। मतिषियो का स्वागत सत्कार भी इसमें कुछ नहीं है और न बलि वैश्वदेव ही किया जाता है । इस धर्म में तो व बल लक्षण का पूजन करना ही परम प्रधान प्रचना मानी जाती है और आहात का ध्यान करना ही सर्वोत्तम ध्यान माना गया है । यह घम का समाचार जैन माग में दिखलाई देता है । यह सभी कुछ अपने धम का लक्षण मैंन मापके सामने भली-भांति बतला दिया है ॥२०॥२२॥ वेदप्रोक्तो यथा धर्मो यत्र यज्ञादिका. क्रिया. । पितृणा तर्पण थाद्ध वैश्वदेव नदृश्यते ।।२२ न दान तप एवास्ति वास्ते धर्मस्यलक्षणम् । वद सत्य ममाग्रे तु दयाधर्मश्च कीदृश. ॥२३ पञ्चतत्वप्रवृद्धोऽय प्राणिना काय एव च । प्रात्मावायुस्वरूपोऽयतेपानास्तिप्रसङ्गता ॥२४ यथा जलेषु भूतानामपि सङ्गमवेहि तत् । जायते बुद्बुदा कार तद्वद्भूतसमागम. ॥२५ पृथ्वोभावो रज स्थन्तु चापस्तत्रैव सस्थिता । ज्योतिस्तत्र प्रदृश्येतमुवायुवततेत्रिपु ॥२६

वेन का छद्मलिङ्गधारी से० ]
[ ४७५
प्राकाशमावृणोत्पश्चाबुद्बुदत्वं प्रजायते ।
अप्सु मध्ये प्रभात्येव सुतेजो वर्तुलवरम् ॥२७
क्षणमात्र प्रदृश्येत क्षणानं च दृश्यते ।
तद्वद्भूतसमायोगः सर्वन परिदृश्यते ॥२८
अन्तकाले प्रयात्यात्मा पञ्चपञ्चसुयान्तिते ।
मोहमुग्धास्ततो मा वर्तन्ते चपरस्परम् ॥२६
राजा ने वैन ने कहा-वेद ने जिम प्रकार का धर्म बतलाया है उसमें
तो र मादि की सम्पूर्ण वियाग्रो के करने का विधान होता है और उसमें तो
पितरों का तर्पण श्राद्ध प्रौर वलि वैश्वदेव के करने का भी विधान दिखलाई"
देता है ।। २२ ॥ आपके धर्म में न तो दान है और न तपस्या ही है ऐमा धर्म
कहाँ है ? और यह क्या धर्म का लक्षण है ? भार मेरे सामने सर्वथा सत्र
वर्गन कीजिए कि मापका यह दया करने वाना धर्म किस तरह का होता है ?
।। २३ ।। इस कथन को सुनकर पाक ने कहा-धारिणयो का यह शरीर पांच
त्त्विो से प्रवृद्ध होता है अर्थात् शरीर की रचना और वृद्धि पृथ्वी-जल-नेज-
प्राकार और वायु, इन पांच तत्वो से होती है यह पांच भौतिक हैं। यह आत्मा
वायु स्वरूप वाला है अत. उन पांच तत्वों से इसका कोई भी प्रमझ ही नहीं
होता है ॥२४।। जिम प्रकार से जल मे भूतो का सङ्ग होता है वम ही ममझ
लेना चाहिए। वह बुदबुदे का प्राकार वाला होता है ठीक उमी भांति भूती
का समागम भी हुआ करता है ।। २५ ।। रज में स्थित पृथ्वी भाव है, जल भी
वहा पर ही स्थित होते है, ज्योनि वहाँ दिखलाई देती है और वायु तीनो में
वत्तमान है ॥२६ । पीछे प्राकाश को प्रावृत करता है और बुद्बुद के स्वरूप में
हो जाया करता है । जल के मध्य मे मुतेज उत्तम वत्तुंलाकार वाला भासित
होता है ॥ २७ ॥ क्षणमात्र के लिए दिखलाई दिया करता है और क्षणभर में
ही अश्य हो जाता है । इस तरह का इन भूतों का समायोग होता है जो कि
सबन दिखलाई दिया करता है ॥२८॥ जब इम प्राणी का मन्नकाल उपस्थित
होता है उस समय मे यह ारमा चना जाया करता है और ये पांच तत्व भी
अपन अपने में जाकर मिल जाते हैं। फिर मनुष्य मोह से मुग्ध होहर ही
आपम में बरतार किया करते हैं ॥२६॥

४७६ ]
पप पुराण
थादपुर्वन्ति मोहेन क्षयाहे पितृतर्पणम् ।
क्यास्तमृत.समानातिकीशोऽमौनृपोत्तम ॥३०
विज्ञान कीदृशं कार्य केनदृष्टं वदस्व नः ।.
मिष्टान्न भोजयित्वा च तृप्तायान्ति च ब्राह्मणाः ।।३१
कस्य श्राद्ध प्रदीयेत सा तु श्रद्धा निरथिका ।
अन्यदेव प्रवक्ष्यामि वेदानाकर्मदारुणम् ॥३२
यदाऽतिथि! हे याति महोक्ष पचते द्विजः।
अजं वा राजराजेन्द्र प्रतिथिपरिभोजयेत् ॥३३
अश्वमेधमसे अश्व गोमेधे वृपमेव च ।
नरमेधेनरं राजन्वाजपेये तथाह्यजान् ॥३४
राजसूये महाराज प्राणिना घातनं बहु ।
पुण्डरीके गजन्याद्गजमेधेऽय कुञ्जरम् ।।३५
सौबामण्यां पशु मेध्य भेषमेव प्रदृश्यते ।
नानारूपेषु सर्वेषु थ यतांनृपनन्दनः ॥३६
मनुष्य मोह के वश मे आकर मृत पुरुषों का श्राद्ध किया करते हैं और
जिस तिथि मे उनका क्षय होता है उस दिन उनका तर्पण भी करते हैं । हे
नृतम ! वह मरा हुप्रा मनुष्य फिर कहाँ पर रहता है ? मर्थात् कहीं पर भी
वह नहीं रहना जो कि उस श्राद्ध मे दिये हुए भन्न को खा सके। वह अगर है
तो बनाइये वह कैसा है ? ॥३०॥ क्या ज्ञान है-कैमा उसका कार्य है किसने
फिर उसे ( मृत को ) देखा है ? प्राप ही बतलाइये। यह वास्तव में कुछ भी
नहीं है केवल इम ब्रहाने में ब्राह्मणों को मिष्टान्न खिलाकर उन्हे तृप्त किया जाता
है ॥३१।। जब किमी का मृत्यु के पश्चात् अस्तित्व नहीं होता तो फिर किसको
श्राद दिया जाना है । यह श्रद्धा तो यर्थ की ही होती है। इसके अतिरिक्त मैं
मापके वेदो में बताये हुए दारुण मं के विषय मे बतलाता हूँ 11 ३२ ॥ जिस
ममय में कोई प्रतियि घर में जाता है तो द्विज महोक्ष का पाचन किया करता
है। हे राजराजेन्द्र ! भयवा मज का पाचन करता है और प्रतिथि का भोजन
कराया जाता है ।। ३३ ।। अश्वमेव यज्ञ में मश्व-गोमेघ में वृप-नरमेध में

वेन का छालिङ्गधारी से० ] [ ४७७ मनुष्य और हे राजन् ! वाजपेय यज्ञ में बकरों का धात किया जाता है । हे महाराज : आपके वैदिक धर्मानुसार जो राजसूय नामक यज्ञ होता है उसमे बहुत प्राणियों का हनन होता है । पुण्डरीक में गज का और गजमेघ में कुञ्जर का हनन किया जाता है ॥३४१३५॥ सौभ्रामणि मे मेध्य पशु मेध ही प्रदशित किया जाता है । हे नृपनन्दन ! इस प्रकार से अनेक स्वरूपो वाले यज्ञ यागादि मे विविध अति प्राणियों की हिंसा का विधान है तो फिर दानादि करने का क्या फल है ? ॥३६॥ दयाहीनं चापलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि । एते वेदा न वेदास्युः दया यत्र न विद्यते ॥३७ दयादानपरो नित्य जीवमेव प्ररक्षयेत् । चाण्डालोऽप्यथ शूद्रो वा स वै ब्राह्मण उच्यते ॥३८ यथा श्राद्धस्य वै चिह्न तथा दानस्य लक्षणम् । जिनस्यापि च तद्धर्म भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥३६ एते विप्राश्च प्राचार्या गङ्गाद्याः सरितस्तथा । वदन्ति पुण्यतीर्थानि बहुपुष्यप्रदानिच । तत्कि वदस्य सत्यं मे यदि धर्म मिहेच्छसि ।।४० श्राकाशाद महाराज मेघा वन्ति वे जलम् । भूमौ हि पर्वतेप्वेवं सर्वत्र पतते जलम् ॥४१ साप्लाव्य ततस्तिछेद्दयां सर्वत्र भावयेत् । नद्यः पापप्रवाहास्तुतासुतीथं श्रुतं कथम् ।।४२ दया को जहां कमी है वह तो चपलता ही होती है भोर वही धर्म नहीं है। ये वेद जो कहे जाते है वे वेद हो नहीं हैं जिनमें दया का विधान ही नही है ।। ३७ ॥ जो दया पोर दान में परायण होता हशा जीवो को ही रक्षा किया करता है पाहे वह यूद्र हो पपवा पाएहाम भी पर्यों न हो वही प्रहाण कहा जाता है ।। ३८ ॥ जिस प्रकार में याद का जो चिह्न होता है, माही दान का भी लक्षण होता है । धिनका जो धर्म होता है वह मुक्ति और मुक्ति का प्रदान करने वाला होता है ||३॥ राजा येन ने कहा-- विन, भाचार्य- '४७६ | [ पद्म पुराण जो गङ्गा भादि सरिता आदि को पुण्य तीथं पोर अत्यधिक पुण्य प्रदान करने वाली बताया करते हैं सो माप बतलाइये और सत्य-सत्य कहिये कि यह धर्म है क्या आप चाहते हैं ? ॥ ४ ॥ पातक ने कहा-हे महाराज ! प्राकाश से मेघ जल की वर्षा किया करते हैं। वह वृष्टि का जल सर्वत्र हो भूमि और पर्वनों पर गिरा करता है ।।४१।। वह प्राप्लावित कर फिर ठहर जाया करता है वैसे ही दया का भी सर्वत्र प्रभाव होता है और होना भी चाहिए । ये नदियाँ तो पापो का ही प्रवाह होता है। इन में तीथ कैसे हो सकता है ।।४।। जलाशया महाराज तडागाः सागरास्तथा । पृथिव्या धारकाचे व गिरयो अदमराशयः ॥४३ नास्त्येतेषु च वै तीर्थ जलजलदमुत्तमम् । स्नाने यदा महत्पुण्य कस्मान्मत्स्येपु वैनहि ॥४४ दृष्टास्नानेन वै सिद्धिीना. शुद्धयन्तिनान्यथा । यजिनस्तत्र तीर्थ तत्र धर्म सनातनः ।।४५ तपोदानादिक सर्व पुण्य तन्त्र प्रतिष्ठितम् ।।४६ एको जिनः सर्वमयो नृपेन्द्र नास्त्येव धर्म परम हि तीर्थम् । अय तु लाभ परमस्तु तस्माद्धयायस्व नित्य सुसुखो भविष्यसि ।। विनिन्ध धर्म सकल सवेद दान सपुण्यं परयज्ञरूपम् । पापस्य भावंर्चहुबोधितो नृपस्त्वङ्गस्य पुनो भुवि तेन पापिना।।४८ हे महाराज ! ये जितने भी जलाशय हैं चाहे तडाग हो या मागर हों ये गमी मोर पापाणो के ढेर स्वरूप पर्वत पृथको के हो धारक होते हैं ।।४।। इनमे तीर्थस्व मानना गलत है। ये तीर्थ होते ही नहीं हैं। जलदो के द्वारा जो जन वाया जाना है यही बल वास्तव में उत्तम जन होता है । यदि जलागयो में स्नान करने में ही महान पुण्य होता है तो फिर मत्स्यो मे मबमें अधिक उमा पुण्य क्यों नहीं माना जाता है ? |॥४४॥ स्नान से ही मिद्धि होती हो सो फिर मोन ही गुड होती हैं जो महनिम पन में ही स्नान किया करती हैं भन्यथा नहीं है । जहाँ पर जिन है वहाँ पर ही तीर्थ है और वही मनातन धर्म है।॥ ४५ ॥ यहाँ पर तो तप तपा दान मादि का सम्पूर्ण पुण्य प्रतिष्ठित होता वेन का वैदिक धर्म परित्याग ] । ४७९ है ॥ ४६ ।। हे नृपेन्द्र । एकमात्र जित ही ऐसा है जिसमे सभी कुछ होता है । उसके अतिरिक्त कोई भी धर्म नहीं है और न कोई तीथ ही है। यह हो परम लाभ है इसलिये पाप उसी का ध्यान कीजिए फिर नित्य ही आपको बहुत ही अच्छा सुख प्राप्त हो जायगा ॥४७॥ यह जो वेदो का बताया हुमा धर्म है और वेद हैं-दान-पुण्य और यज्ञ यागादिक सब हैं इनको छोडिये कवल जिन था ही समाश्रय ग्रहण कीजिए। इस प्रकार से अङ्ग के पुत्र वेन को पापा के स्व- भावो द्वारा उम पापो ने इस भू-मण्डल मे खूब समझा दिया था और उस सुदृढ बना दिया था ॥४८|| ॥ वैन का वैदिक-धर्म परित्याग । एव सम्बोधितो वेन. पापभाव गत किल । पुरुपेण तेन जैनेन महापापेन मोहित ॥१ नमस्कृत्य तत पादौ तस्यैव च दुरात्मन । वेदधर्म परित्यज्य सत्यधर्मादिकाक्यिाम् ॥२ सुयज्ञाना निवृत्ति स्यावदाना हि तथैव च । पुण्यशास्त्रमयो धर्मस्तदा नव प्रवर्तित ॥३ सर्वपापमयो लोक सञ्जातस्तस्यशासनात् । नवयागाश्च वेदाश्च धर्मशास्त्रार्थ मुत्तमम् ॥४ न दानाध्ययन विप्रास्तस्मिन्छासति पार्थिवे । एव धर्मप्रलोपोऽभून्महापाप प्रवर्तितम् ॥५ अङ्गन वार्यमारणस्तु अन्यथा कुरुते भृशम् । न ननाम पितु पादौ मातुश्च व दुरात्मवान् ॥६ मूतजी ने कहा-इस रोनि से उम पापी के द्वारा अच्छी तरह मे मम. झाया राजा वेन पाप भाव को प्राप्त हो गया था। उस महान् पापी जन पुरप ने उसे मोहित कर दिया था ॥ १ ॥ उस राजा वेन ने फिर तो मोहित होकर उसके चरणो को वन्दना को थी जो कि महान दुरात्मा उम पाम माया या पौर फिर वैदिक धर्म का त्याग कर दिया था तथा सत्य धर्मादि के जो समस्त

गप्पांग के पास राजाओं का आगमन ]
मड्डुधारी तदा देवो वीणाधारी च तालनः ।
यत्मजः कांस्यधारी च बलसानिर्गहाबलः ॥३२||
मातुरो स्थिता स्ते वै ननृतः प्रेमविक्षलाः ।
माहिता देवकी चासीन नातं तम कारगाम् ।।३।।
मोहितां मातरं घना परं हपंमुपाययुः ।
तदा तां कथयामागुर्वयं ते तनया हि भोः
नत्या तो प्रयाः सर्वे पुरी माहिष्मती शुभाम् ।
नगरं मोहयामागुर्वाधगानविगारदा.
उन्होंने मलना को प्रणाम करके पोर रागाने प्रकार के दान
देरये गा गेनारो मम पिसा में मा गरे पे ॥२६।। उन पुरु
करने पोधा रगने यारों का मार्ग में एक पा ही माना। यही
र उपोर यन को काटकर पिनेरू प्रादही र मरिमे
मुक पा उमगे उन्होंने अपनी सेना को नियाम सासरा पा पोर महान् पर
गांगे निभंग ॥३०॥ देवगिह के मन में हो ये उम समर गर पोपी होगये ।
राधा तो नर होमपा पापोरवासामधार nिam
र मापारी, an दो मेरे पास, एमर मारग्यारी पोर पाल
भी राप पकानेवारीपापा से मिहान् र पासाये
गय माता पिपरे और मेरमाको नई
मोहित होyि Inात नही सारा
पानी
मोरगर गरको परमहडपा TITLER रिम
पा के पुत्र उसको र मुभ माहिमisht
प्रारम । गारदरा पxिii RITrim
मोरा
मा मालिनी TriAn।
मृगानागा सा मोजे : ||
For TITrir: मामा ।
HAPTT मामी xfrim
-

४९४ ] [ भविष्य पुराण दृष्ट्वा सा सुदरं रूपं श्यामांगं पुरुषोतमम् । मुमोह वशमापन्ना मैथुनार्थ समुद्यता ॥३८॥ दृष्ट्वा तथा गता नारी कृष्णाशःश्लपणया गिरा। शत्रोभदं च पप्रच्छ कामिनी मदविह्वलाम् ॥३६॥ साह भी देवकीपुत्र यदि पाणि ग्रहीष्यसि । तहि ते कथयिष्यामि पितृ दं हि दारुणम् ।।४।। तथेत्युक्त्वा स बलवाँस्तस्या:पाणि गृहीतवान् । मात्वा भेदं रिपोः सर्व तामास्वास्य ययौ मुदा ॥४१॥ एतस्मिन्नन्तरे राज्ञी वाधिता प्राह योगिनम् । देशराजप्रियाहारं नवलक्षस्य मूल्यकम् । तुभ्यं दास्यामि संतुष्टा नृत्यगानविमोहिता ॥४२।। कार्य में तत्पर वे सब दूती के साश रिपु के घर में गये थे और नृत्य, गान तथा सुन्दर वाद्यो के द्वारा वे राजा के मोहन करने मे सलग्न हो गये थे ॥३६॥ सब को मोहन करने वाले कृष्णाश ने महिपी (रानी) को संज्ञाहीन करके वहां पहुंच गया जहां पर उसकी पुत्री विजय पिणो थी ॥३७॥ उसने श्याम अङ्गों वाले उस सुन्दर रूप को देखा जो कि पुरुषो मे सर्वोत्तम था और वह मोहित होगई थी तथा वश में प्राप्त हुई मैथुन के लिये प्रस्तुत होगई थी ॥३९॥ उस प्रकार की दशा में प्राप्त हुई नारी को देखकर कृष्णाश ने बडी श्लक्ष्ण वाणी से उस मद से विह्वन कामिनी से शत्रु का भेद पूछा था ॥३६॥ यह बोली-है देवकी के पुत्र ! यदि प्राप मेरा पाणि का ग्रहण करोगे तो मैं पिता का दावण भेद सब कह दूगी ।।४०1। ऐसा ही होगा-यह कह कर उस बलवान् ने उसका हाय ग्रहण कर लिया था। रिपु का समस्त भेद जान कर और उसको पाश्वासन देकर बडे प्रेम से वह चला गया था ॥४१॥ इस बीच में रानी वाधिना योगी से बोली-देशराज की प्रिया का हार नौ लास मूल्य पा...इट में नमाज भतरे नृत्य-गान से विशेष रूपसे मोहित होगई हु ॥४२॥ ।

कृष्णांश के पास राजाओं का आगमन ] [ ४०५ ॥४७॥ इति श्रुत्वा वत्ससुतस्तां प्रशस्य गृहीतवान् । प्रययौ बंधुभि: साई जम्बुको यत्र तिष्ठति ॥४३॥ ननर्त तत्र कृष्णांशो बलखानिरगायत । आह्लादस्तालनो देवो दध्मुर्वाद्यगतोमुदा ॥४४॥ मोहितोऽभून्नृपस्तत्र कालियः स्वजनैः सह । कामं वरय कृष्णांग यन्त्र ते हृदये स्थितम् ॥४५॥ इति श्रुत्वा वचः शत्रोर्बलखानिमहावलः । तमाह भो महीपाल लक्षावतिर्वरांगना । स्वविद्यां दर्शयेन्मह्यं तदा तृप्ति व्रजाम्यहम् ॥४६।। इति श्रुत्वा तथा मत्वा लक्षावति नृपोतम: । सभायां नर्तयामास देशराजप्रियां तथा सा वेश्या सुतमाह्लादं ज्ञात्वा योगित्वमागतम् । रुरोद ता दुःखार्ता नेवादणि मुंचती ॥४८॥ रुदितां तां समालोक्य रुदन्नालाद एव सः । स्वभुजौ ताडयामास तत्प्रियार्थे महाबलः ॥४६॥ कृष्णांशस्तत्र तं हारं तस्याः कंठे प्रदत्तवान् । उवाच क्रोधताम्रक्षस्तामाश्वास्य पुनः पुनः ॥५०॥ यह सुनकर वत्म सुत ने उसकी बड़ी प्रशंसा करके उप्तको ग्रहण कर लिया था मौर बन्धुप्रो के साथ वहाँ गया जहां पर जम्बुक रहता पा ॥४॥ कृपणांश वहाँ पर नाचा मोर वलसानि ने गान किया था। माहाद-तालन देव ने बडे भानन्द से वाद्यों को गति से यजाया पा ||४|| यहाँ पर कालिय नृप मोहित होगया था जोकि अपने जनो के साप पा। हे कृत्यांग ! जो भी इच्छा हो वरदान मांग ले और अपने दिल के मनुगार मागले ॥४॥ महान बलवान् बलराति मनु के मह बना मुनका उरागे योना-हे महीपाल ! सादात्ति पराङ्गना मुझको अपनी विद्या को दिगावे तब हो में पूर्ण तृप्ति को प्राप्त होगा ॥४६॥ यह सुनार मौर इस बात को मानकर नप सासा -भा में नचाया था जो कि देशराज की प्रिया यो। उम वेश्या ने यो ४८६ [ भविष्य पुराण प्राप्त हुए पालाद सुन को जान लिया था और वह नेग्रो से प्रासुमों को टपकाती हुई दुःख से प्रार्त होकर रोने लगी थी ॥४७॥४८॥ रोती हुई उसको देखकर वह पाह्लाद भी रोने लगा था। महाबल ने उस प्रिया के लिये अपनी भुजाओं का ताड़न किया था । कृष्णांश ने वहां पर उम हार को उसके कण्ट मे डाल दिया था । क्रोध से लाल प्रासें करके उसका बार-बार पाश्वासन करके बोला ॥४६॥५॥ अहं चोदयसिंहोऽयं पितुर्वैरार्थमागतः । हनिष्यामि रिपु भूपं सात्मजं सबलं तया ॥५१॥ इति श्रुत्वा वचस्तस्य कालियो बलवत्तरः । पितुराज्ञा पुरस्कृत्य शत मन्वितः ॥५२॥ तेषां च बंधनायैव कपाट समरुद्ध सः । ताञ्छत्रून्समनुज्ञाय पाशहस्तान्सशस्त्रगान् ॥५३॥ स्वस्वं खड्ग समाकृष्य क्षत्रियास्ते समानत । शतरे हते तेश्च कालियो भयकातरः ॥५४॥ त्यक्त्वा तातं प्रदुद्राव ते तु गेहादहिययुः । , स्वसैन्यं शीघ्रमासाद्य युद्धाय समुपस्थितः । शिबिराणि कृतान्येव नर्मदाकूलमास्थितः ॥५५॥ कृत्वा तु नर्मदासेतु नल्वमानं सुपुष्टिदम् । स्वसैन्य तारयागास चतुरङ्गसमन्वितम् ॥५६॥ यह मैं उदयसिंह हूं पिता के बैर के लिये ही यहाँ माया हूं । प्रव मैं दात्रु राजा को पुत्रो के सहिन तथा मेना के महित मार दूंगा ॥५१॥ उसके यह वचन सुनकर अधिक बलवान् कालिय पिता को प्राज्ञा को आगे करके शन व्यूह से समन्वित होकर उनके बन्धन के लिये उसने कपाट बन्द कर दिये थे। उन- उन गनुमो को जिनके हाथों मे पाश तथा शल थे समनुज्ञात करके अपना. भपना बड़ा खीचकर उन क्षत्रियो ने मार दिया था । शत शूरो को उनके द्वारा हत हो जाने पर कालिय भय से कातर होगया पा ॥५२॥५३॥५४॥ वह अपने पिता को त्यागार भाग गया था और वे भी गृह मे बाहिर चले गये .

वृपणांस के पास राजाओं का प्रागमन ] [ ४५७ । शीघ्र ही अपनी सेना को प्राप्त कर युद्ध के लिये समुपस्थित होगये । नर्मदापूल मे प्रास्थितो के द्वारा शिविर बनाये हुए थे ।।५।। नत्वमान मुपुष्टि देने याला नर्मदा या सेतु बनाकर अपनी सेना को जो कि पतुरङ्ग समन्वित पी उतार दिपा पा ॥५६|| रुरोध नगरी सर्वा बलमानिलयुतः शतघ्नीरग्रतः कृत्वा महाशब्दकरीस्तदा । माहिप्मत्याच हागि पातयामास भूतले ॥५७।। नराश्च स्वपुलः साई मुत्पद्रव्यगमन्विताः । विध्याश्च गुहां प्राप्य पुभंयकातराः ॥५॥ कालियस्तु गजानीके पश्चदगजे स्थितः । हस्तिपा दामाहया युद्धाय समुपाययुः ॥५६॥ तस्यानुजः मूर्यवर्मा बिसन्तुरगतः । तु'दिलश्च रथं माद रथस्यत्र गहमकः ॥६॥ रखणो वागनोभो चतुर्लक्षपदातिभिः । जामतुरती महाम्नच्छौ म्लेच्यभूपगहायक: । दाक्षिणात्य ग्रामपाने तो पुरगृत्य संययुः ॥२१॥ उभे गंगे ममामाद्य युद्धाय समुपन्यिते। तयोश्च तुमुल युद्धमभवलोमहर्गग्गम् ॥३२॥ नियामे रघिरनेपा नदी प्राचतंत दुनम् । दृष्ट्वान्ना नदी पोरा मामादमवाहिनीम् । चनगानिग्गयात्मा गगपाणिनरोपयो ॥६॥ मेना में गुरु य मानिने गणनारीको घेर सिमा पा उम समय महान् हारे पल या amit fati] पा सो मारियो के मागे पोभूमि पर गिरा दिला 121 परि मनुष्य पाने के मा मुम हम से मुल शेर पिन कोश में गारर भयभीत होर निया ने पर मे ॥१८॥ कामिक गो को ना में १२ गत पर स्पिा हार ४८८-J [ भविष्य पुराण और दश सहस्र हस्तिप युद्ध के लिये प्राय थे ॥५६॥ उसका छोटा भाई सूर्य वर्मा तीन लाख भरवो से युक्त होकर प्राया था जो एक महस रपस्थो के साथ तुन्दिल से युद्ध किया था। रकण और बंकण ये दोनो महाम्लेच्छ भार लास पदातियो के साथ थे एक सहस्र म्लेच्छ राजाओं के माय गमे थे । दाक्षिणात्य ग्रामप जो थे वे उन दोनो को प्रामे करके गये थे ॥६॥६१॥ दोनो सेनाएँ वहाँ प्राप्त होकर युद्ध करने के लिये पूर्णतया तयार होगई थी। उन दोनो सेनाप्रो का एक बड़ा ही भीषण एवं रोमाञ्चकारी तुमुल शब्द हुपा या ॥६२॥ तीन प्रहर में उनके घिर से शीघ्र ही एक नदी बनवा बहने लगी थी । उस खून से समुत्पात बहुत ही 'घोर मास के कोच के वाहिनी नदी को देखकर अमेयारमा बलखानि हाय में सड़ग लेकर वहाँ गाथा ।।६।। भलहस्तस्तदा देवो 'मनोरथहये स्थितः । बिदुलस्थश्च कृष्णाशः खड्गेनैव रिपूहनम् ॥६४|| आह्लादश्च गदाहस्तः पोथयामास वाहिनीम् । रूपणो नाम शूद्रश्च, शक्तिहस्तोन्यहनिपूम् ।। सालनो हस्तिनिधिशो माहिष्मत्या हनन्ययौ ॥६५॥ एवं महाभये । जाते रगणे तस्मिन्महावले । दुद्र चुः सर्वतो वोरा.! पाहिपाहोत्यथान वन् ॥६६॥ प्रमग्न स्वबलं दृष्ट्वा कालियो बलखानिकम् । गजस्थस्ताइयामास स्ववाणस्त महाबलः ॥६७]] हरिणी वडवा तस्य ज्ञात्वा स्वायिनमातुरम् । गजोपरि समास्थाय स्वपादस्तमपातयत् ॥६८)] पतिते कालिये वोरे पञ्चशब्दो महागजः । शृङ्खलस्ताडयामास शुरांस्तान्मदमत्तकान् ॥६६|| मूच्चिने पञ्चभूरे तु रूपणो भयकातरः । -- देवी वर्णयामास व्याजातं गजेन वै ७०॥

कृष्णांश के पास राजाओ का आगमन ] [ ४८६ वाला यष्ठा हाथ मे भाला लेकर उस समय में देव मनोरथ अश्व पर चढकर स्थित था, कृष्णाश वि.दुल नामक अश्व पर सवार था जिसने खड्ग से ही रिपुमो का हनन किया था ॥६४॥ प्राह्लाद ने हाथ में गदा लेकर सेना को पोषित किया था । रूपण नाम वाला शूद्र जो था उसने अपने हाथ मे शक्ति को ग्रहण करके शत्रुनो का हनन किया था । तालन हस्ति निस्त्रिंश होकर माहिष्मती नगरी में हनन करता हुप्रा गया था ।।६।। इस प्रकार से वह महान् बल ही भयानक युद्ध होने पर सभी मोर से वोर लोग बचासो-बचामो की ध्वनि करते हुए भागने लगे थे ॥६६।। उम समय मे मालिय ने अपनी सेना को भंग होते हुए देखक र मलखानि पर हाथी पर स्थित होकर महान बलवान ने अपने यानो के द्वारा ताडन किया था ।।६७ । उसकी हरिणी नाम वाली बडवाने अपने स्वामी को भय से मातुर देखकर गज ये ऊपर समास्थित होकर अपने पादों उसको गिरा दिया था ॥६८। कालिय धीर के गिर जाने पर पच- पशब्द नामा महा गज ने शृङ्खलामो से उन मध्यस्त सूरो यो ताडना की थी ॥६६॥ पञ्चशूर के मूच्छित होने पर रूपण भय से पातर हो गया था और गज से यथा जात को उसने देवपी को वर्णन किया था ॥७॥ - तदा तु दु.सिता देवी दोलामारुह्य सत्वरा । त गज न समासाद्य वर्गयामास यारणम् ।।७।। गजराज नमस्तुभ्य रामदत्त महावन्न एते पुधास्तु ते वीर पालनीया यथा पितुः ॥७२॥ इति श्रुत्वा दिव्यगजो देवमायाविशारदः । देवकी शरण प्राप्य क्षमस्यागम्कृत मम. ॥७॥ इत्युक्ते गजराजे तु कृपणागो बलवत्तरः । त्यक्त्वा मूच्छां ययौ यमाहादश्च मूच्छितः ।।७।। तमुत्याप्य परस्परोंचलमानिममन्वितः । पितुगंज महामत्तमाह्मादाय प्रदत्तवान् परालमम्य दिव्याग म्परणाय तदा ददो 150

४६० }
। भविष्य पुराण
मूच्छितं कालियं यात्रु बसा स निगड हैः ।
सेनान्तं प्रेपयामास बलगानिमहाबलः ॥७॥
सूर्यवर्मा तदा ज्ञात्वा बद्ध बंधुन कालियम् ।
प्रययौ शत्रुसेनान्तं सोधेन स्फुरियाधरः ॥७॥
उस समय देवकी बहन :पित होकर शीघ्र ही स्वयं दोमा पर पापा
होकर उम कारण गज के समीप पहुंच कर उसका स्तवन करने लगी थी।
हे गजराज ! हे दानदत महाबल ! तुम्हारे लिये मेरा नमस्कार है । हे वीर !
ये तेरे पुत्र हैं इनका पालन तुमको पिता के समान ही अवश्य करना चाहिए।
॥७२॥ यह मुनकर यह देवमाया का पण्डित दिव्य गज देवकी को पपने शरण
में प्राप्त करके कहने लगा मेरे अपराध को क्षमा कर दो ॥७३॥ उस गजराज
के ऐसा कहने पर अधिक बलवान् कृष्णांश मूर्या का त्याग कर वहां पहुंचा था
जहाँ पर पालाद मच्छित हो गया था 11७४॥ घलखानि से समन्वित होकर
करके स्पर्श से उसे उठाकर महामत पिता के गज को माह्लाद के लिये उसने
दे दिया था। और करान प्रश्व को रूपण के लिए प्रारोहण करने को दिया
या ॥७५।। तब उस मूच्छित कालिय को रिगडों से खूब मजबूती के साथ बांध
कर उसने महा चलवान बलखानि ने उसे मेना के समीप मे भेज दिया था।
१।७६।। तब सूर्यवर्मा ने अपने बन्धु कालिय को बंधा हुआ देखकर क्रोध से होटों
को फडफाते हुए यह शत्रु सेनान्त के पास चला गया था ।।७।।
तमायान्तं समालोक्य ते वीरा युद्धदुर्मदाः ।
रथस्थं मंडलीकृत्य स्वस्वमत्रं समाक्षिपन् ॥७८।।
कुठितेऽस्त्रे तदा तेषां विस्मितास्तेऽभवन्सुखे ।
चिन्तां च महती प्राप्ताः कथं वध्यो भवेदयम् ॥७॥
तस्यास्त्रैस्ते महावीरा व्रणार्तिभयपीडिताः ।
त्यक्त्वा युद्ध पुनर्गत्वा रणं चक्र : पुनः पुनः ।।८०॥
एवं कति दिनान्येव बभूव रण उत्तमः ।
आल्हादो वत्सजो देवस्तालनो भयसंयुतः ।
कृष्णांशं शरणं जग्मृस्तेन वीरेण मोहिताः ॥१॥

कृष्णांश के पास गजाओं का आगमन ]
[ ४६१
कृष्णस्तु तं तथा दृष्ट्वा देवी विश्वविमोहिनीम् ।
तुशव मनसा वीरो रात्रिसूक्तं पठन्हृदि ॥१२॥
तदा तुष्टा जगद्धात्री दुर्गा दुर्गातिनाशिनी ।
मोहयित्वा तु त वीरं तत्रैवांतरधीयतः ॥५॥
निद्रया मोहित दृष्ट्वा कृष्णांशस्तु महाबलः ।
बबंध निगडस्तं च देवक्यन्ते समागमात् ॥४॥
उन युद्ध दुर्मद वीरो ने उसे आते हुये देखकर रथ मे स्थित को मण्डल
से घेरकर उस पर अपने २ अस्त्रो की बौछार करने लगे थे ॥७॥ उस समय
उनके प्रस्त्रो के कुण्ठित हो जाने पर वे सब बहुत ही विस्मित हो गये थे मोर
उन्हे बहुत बड़ी चिन्ता हो गई थी कि मह कसे वध के योग्य होगा 19६॥
उसके अस्त्रो से वे महावीर वषो की आत्ति से भय पीडित हो गये थे । युद्ध को
छोडकर फिर बारबार युद्ध करने लगे थे ।।८०॥ इस तरह से कितने ही दिनी
तक यह उत्तम रस होने लगा था पालाद, वत्मज, देव और तालन सभी भय
से युक्त हो गये थे। तब वे सब कृष्णाश को शरण मे गये क्योंकि उस समय में
उस वीर के द्वारा मोहित हो गये थे॥१॥ कृष्णाश ने उसको उस प्रकार का
देसकर मन से विश्व मोहिनी देवी का स्तवन किया था और वीर ने हृदय
रात्रिसूक्त का पाठ किया था ||८२॥ तव जगत् को धात्री दु सो के नाश करने
वाली दुर्गा प्रसन्न हो गई और उम वीर को मोहित करके वहाँ पर ही अन्त-
पनि हो गई थी ॥५३॥ जब वह निद्रा से मोहित हो गया तो महान बलवान
वृष्णाश ने उसे देखकर निगडो से उसे दृढता से बांधकर देवकी के समीप में ले
गया था ॥४॥
तु दिलश्च
तथा ज्ञात्वामातृशोकपरिप्लुतः ।
आजगाम यादः मगहस्तो महाबलः ।
रिपुरांन्यस्य मध्ये तु बहूशूरानताडयत् ।।८।।
माहिम्मत्याश्च ते शूरा रंकणेन समन्विताः ।
तत्संन्यं भञ्जयामामुस्तालनेन प्रपालितम् ॥८६॥

४६२ ] । भविष्य पुराण प्रद्रतं स्वं बल दृष्ट्वा तालनः परिघायुधः शिरासिपोथयामास म्लेच्छाना च पृथक्पृथक् ।।८७॥ वंकणं च तथा हत्वा सड्गेनैव च रंकणम् । तु दिल च तथा वद्ध्वा दिनान्ते शिविरं ययौ ||८|| कालिये च रिपो बद्धे सुवढे सूर्यवर्मरिण । तु दिले च तथा बद्धे रंकणे बंकणे हते ॥६॥ सहस्र म्लेच्छराजानो हतशेपा बलान्विताः । पक्षमात्रमहोरात्र युद्ध चक्र : समततः ।।६०॥ प्रत्यहं तालनो वीरः सेनापतिरमर्पण: पष्टि भूपाञ्जघानाशु शत्रुसैन्यभयंकरः ॥६॥ तुन्दिल ने उस प्रकार का ज्ञान करके भाई के शोक से परिप्लुप्त होकर हाथ मै खड्ग धारण करते हुए घोडे पर सवार होकर वह महा बलवान् वहाँ या गया था । शत्रु की सेना के मध्य में उसने बहुत से रिपुशूर वीरो का हनन किया था ॥५॥ माहिष्मती नगरी उन शूरो नै रङ्कण से युक्त होकर तालन के द्वारा रक्षित उस सेना का भञ्जन कर दिया था ।।१६।। जब तालन देखा कि उसकी सेना के लोग भागने लगे तो उसने परिध नाम का आयुध लेकर म्लेच्छो के मस्तयो को अलग-अलग करके काट दिया था ||८७॥ वकण और रक्षण को भी उसने अपने सड्ग से मार गिराया। और तुन्दिल को बांधकर दिन के मन्त मे शिविर में चला गया था 11 कालिय और सूर्यवर्मा शनुमो के बद्ध हो जाने पर तथा तुन्दिल के भी वैध जाने पर और रङ्कण एव वङ्कण के मारे जाने पर एक सहस्र म्लेच्छ राजा लोगो ने जोकि मरने से बचे हुए थे और सेना से समन्वित थे एक भर पर्यन्त धारो प्रोर से युद्ध डटकर ॥६॥०॥ प्रतिदिन वीर तालन और प्रमर्पण सेनापति साठ भूपो को शीघ्र ही मार देता था क्योकि यह शत्रु की सेना के लिए महान भयङ्कर था ॥१॥ भयभीता रिपोः शूरा हता भूपा हतौजसः । ॥६॥ या था। हतशेषा ययुर्गहमर्द्धसैन्या भयातुराः कृपयांश के पास राजाओं का आगमन ] [ ४६३ जम्बुकस्तु तथा श्रुत्वा दुःसितो गेहमाययो । यतं धनशनं कृत्या रात्री शोचनशेत सः ॥६३।। निशीथे समनुप्राप्ते तत्गुता विजय पिणो । पूर्णा तु सा कला या राधाया प्रजवासिनी ।।१४|| आश्वास्य पितरं तं च ययौ मायाविशारदा । रक्षमान्छिविराणां च मोहयित्वा समाययो । भातरो तत्र गत्वामी या मानवोधयत् । कृत्या सा राक्षसी मायां पंचवीरानमोहयद ।।६।। निरकवचान्यंधून्प्रतिदोलां समारहत् पितु रतिकमासाद्य तस्मै भ्रातृन्ददी मुदा ॥७॥ प्रभाते बोधिताः सर्वे स्नानध्यानादिकाः क्रियाः । कृत्वा ययू रिपोः पाला दृष्टयन्तो न तास्तदा ॥८॥ - भय रोहरे हुये पात्र के शूर मारे गये थे क्योंकि वे मय भूप हन पोन वाले हो गये थे । जो भी सुध मरने से शेष रह गये थे ये भयातुर पर्ष संन्य अपने पर मे पसे गये थे ॥२॥ जम्बुक ने इस प्रकार का वृत्ताल गुना तो यह परम दुगिरा होगर पर में पा गया था। उसने मनगत प्रत किया भोर यह दगी पिला गो परताहमा रात में भी नहीं गोता पा it३॥ परात्रि के प्राप्त होने पर उसकी पुत्री विजयषिणी राधा की ब्रज में निवास करने वाली पूगंगना हो जाननी पाहिए ।।६४|| माया मे परम पण्डिना वह अपने पिता यो मायागन देकर पती गई थी। यह शिविरी ये रक्षको को मोहिन करके गई पोशाय जारर इसने जरो माई पे उन मसो योषित किया पा। उमने राक्षमो मायामो पंसारर पपगीरों को मोहिल पर दिया था। HEIनिरम्म पसर याने पापुपी यो प्रयक दौना में पा दिया पा। पिता गमीर पर निये प्रगन्ना माइयो गोदिया पाप्रातः पान में रजगेनो स्नान ध्यान मादिममम्न शियामों से निवृत्त हो पर जाना पो उगोने देगा तो उस ममप में उनसे यहा नहीं देगा पा 11 सब लोग बहुत ही दुःखित हुये थे और विचार कर रहे थे कि इसका क्या कारण है और कैसे ऐसा हो गया है। उस समय में उनसे देव ने यहा रिपुको सुता माई थी। उसने राक्षसी माया करके उनका हरण करके पर मे लेकर चली गई थी। इससे भाप लोग मेरे साथ चलो जहा कि इसका गुरु रहता हैं ||१०० विन्ध्याचल के ऊपर बडे विशाल वन में जहां कि अनेक प्रकार के रात्व रहा करते हैं उसको वहाँ पर ही कुटिया है। उसका नाम ऐल- विली है। यह योग की सिद्धियों से परिपूर्ण है और कामी है तथा राक्षसो से सदा निर्भय रहा करता है ॥१०१॥ जम्बुक की सुता वहाँ पर मएने जनो से युक्त प्रतिदिन तथा प्रकेली ही रात्रि में जाकर उस अपने गुरु को रमण ४६४ ] [ भविष्य पुरा वभूवुर्दु:खिताः सर्वे किमिदं कारणं कथम् । तानुवाच तदा देवः प्राप्ताः पत्र रिपोः सुता IIEI कृत्वा सा राक्षसी मायां हत्वा तान्गेहमाययो । तस्माद्य यं मया साद्धं गत्वा यत्रैव तद्गुरुः ॥१००।। विघ्योपरि महारण्ये नानासत्त्वनिषेविते । कुटीर तस्य तत्रौत्र वाम्नवैलविली हि सः । योगसिद्धियुतः कामी राक्षसेभ्यो हि निर्भयः ॥१०१।। जम्बुकस्य सुता तत्र प्रत्यहं स्वजनयुता । एकाकिनी च सा रात्री स्वं गुरु तमरीरमत् ॥१०२॥ कृतेयं चैलविलिना माया मनुजमोहिनी कार्यसिद्धि गमिष्यामो गत्वा तं पुरुपाधमम् । इति श्रुत्वा तु चत्वारो विनाह्नदं ययुर्वनम् ॥१०३।। गीतनृत्यप्रवाद्य श्च मोहयित्वा च तं दिने । वासं चक्र श्च तौव धूर्त मायाविशारदम् ।।१०४॥ स तु पूर्वभवे दैत्यश्चित्रो नाम महासुरः । वारणकन्यामुपां नित्यमवाञ्छच्छिव पूजकः । जात ऐलविली नाम पक्षपूजी स वेगवान् ॥१०५॥ कहा कि कृष्णांश के पास राजाओं का आगमन ] [ ४६५ कराया करती थी ॥१०२।। उस ऐलीविली ने यह मनुष्यो को मोहित करने पाली माया की है । उस अधम पुरुप के पास जाकर हम कार्य की सिद्धि को प्राप्त कर लेगे । यह सुनकर चारो पालाद के बिना उस वन मे गए थे ॥१०३।। गीत, नृत्य और वाद्यो से दिन में उसे मोहित करके रात्रि में उन्होंने उस धूतं माया विशार के वहाँ पास मे ही निवास किया था ॥१०४॥ वह पहिले जन्म मे चित्र नामधारी महान् अमुर दैत्य था। उसने शिव की पूजा करते हुए वाण की कन्या उपा के प्राप्त करने की इच्छा की थी। पक्षपूजी वह वेगवान अब ऐलविली के नाम वाला उत्पन्न हुअा था ॥१०॥ तयोर्मध्ये प्रमाणोऽयं विवाहो मे यदा भवेत् । तदाह त्वा भजिष्यामि संत्यक्त्वोद्वाहितं पतिम् ।।१०।। हते तस्मिन्महाधूर्ते गत्वा संग्राममूर्द्धनि । जम्बुकस्य ययुदुर्ग दृष्ट्वा ते त समारुहन् । हत्वा तत्र स्थितान्वीराञ्छतघ्न्य. परिखाकृताः ॥१०७।। तदा तु जम्बुको राजा शिवदत्तवरो बली । जित्वा पञ्च महावीरान्वदूध्या तानिगडेदृ'. । शैव यज्ञ च कृतवास्तेपा नाम्नोपवृहितम् ॥१०८।। रूपेणस्तु तथा ज्ञात्वा देवकी प्रत्यवर्णयत् । तदा तु दु.सिता देवी भवानी भयहारिणीम् । मनसा च जगामाशु शरण्या शरणं सती ॥१०६।। तदा तुष्टा जगाद्धात्री स्वप्नाते तामवरर्णयत् । अहो देवकि कल्याणि पुत्रशोक त्याजधुना ॥११०॥ यदा तु जम्बुको राजा शिवदत्तवरो बली। होमं कर्ता स मदात्मा तेपा च बलिहे तये ॥१११॥ मोहयित्वा तदाह त मोचयित्वा च ते मुतान् । विजय ते प्रदास्यामि मा च शोके मनः कृथाः ॥१४॥ उन दोनो के मध्य में यह प्रमाण है कि जब मेरा विवाह हो जावेगा तो उस उदाहिन पनि का त्याग कसे में तेरा ही मेवन पगी ॥१०॥ जय ४६६ ] भविष्य पुर महाधूत के मारे जाने पर संग्राम के मूर्या में जाकर जम्बुक के दुर्ग मे चले थे। वे वहां उसको देखकर उन्होने उम पर चढाई कर दी थी। वहां पर वीरो को मारकर शनियो को परिसाकृत बना दिया था ॥१०७। उम मे राजा जम्बुक जोकि शिव का दत्तवर और वली था पाचो महावीरो को उन्हे निगडो से दृढता के साथ बाँध दिया था और उसने उनके नाम से उस शैव यज्ञ किया था ॥१०८।। रूपण को जब इसका ज्ञान प्रास हुआ तो देवकी का स्तवन किया था । तब दु.खित देवी ने भय के हरण करने भवानी को मन से ध्यान किया था जोकि बडी शरण्य है और मती शरण्ये शीघ्र ही रक्षिका होती हैं ॥१०९।। तब तो वह जगदम्बा प्रसन्न हुई और स्वमान्त मे उससे कहा-हे देवकि ! हे फ्ल्याणि ! अब तुम पुत्र के शोक त्याग दो । जवकि राजा जम्बुक शिव के वरदान पाने वाला बलवान हो करने वाला है और वह मन्दात्मा उनकी बलि के लिये ही यह यज्ञ कर रह ॥११०॥११॥ उम समय मे मैं उसको मोहित करके तुम्हारे पुत्रो को । वाकर विजय तुझे दूंगी, मन मे शोक मत करो ॥११२॥ इति श्रुत्वा सती देवी नमस्कृत्य महेश्वरीम् । पूजयामास विधिवद्भ पदीपोपहारकैः ।।११३॥ एतस्मिन्न तरे राजा देवमायाविमोहितः । सुप्वाप तत्र होमान्ते ते च जाता ह्यवंधनाः ॥११४।। तैवंद्धो जम्बुको राजा निगडेरायसह ढे. । ते तं वद्ध्वा ययुः शीघ्र देवकी प्रति निर्भयाः ॥११।। एतन्मिन्नतरे तत्र कालियाद्यास्त्रयः सुताः । विलक्षा सैन्यमादाय युद्धाय समुपाययुः ॥११६।। पुनयुद्धमभूद्धोरं सेनयोरुभयोस्तदा । तालनाद्याश्च चत्वारो हत्वा ता रिपुवाहिनीम् ।।११७।। श्रीञ्छन्कोष्ठकीकृत्य स्वशस्त्रौर्जघ्नुरूजिताः । एव दिनानि कतिचित्तत्र जातो महारणः ॥११८।।

'पद्म-पुराण' की कुछ उल्लेखनीय बातें सात वडे-बडे विभागो मे बँटा हुआ 'पद्म पुरागप' निस्सन्देह एक महा- थ है। इसमें प्रसिद्ध पौराणिक पटनाओ के सम्म अपने विशिष्ट दृष्टिकोण लिवी बडी बडी क्याएँ और उमारयान तो दिये हो गये है, साथ ही कितने ििमद्धान्त सम्बन्धी और जीवनोपयोगी विपयो पर भी इममे विशेष बल दिया या है । 'वप्रावो के लक्षण', 'तुलमी और घासी (आमला ) माहात्म्य हाजी की महिमा' आदि कई विपयो की इसमें बार-बार विवेचना की गई है, तुतमी और धात्री माहात्म्य' ही इसम तीन स्थानो पर('सृष्टि-सण्ड', 'ब्रह्म-खण्ड और 'उतर-पण्ड' मे) दिया गया है । (इनम से हमने एक ही दिया है, क्योकि व एर से ही हैं । ) इस प्रकार एक ही विषय की अनेक वार पुनरावृत्ति क्यो की गई इसके बई वारण हो सकते हैं पर अधिक सम्भावना यह जान पडतो दि पुराणकार को ये विषय अधिक महत्वपूर्ण विदित होने हो अथवा विशेष रय लगते हो। वषमया के लक्षण" पर हम भूमिका मे पर्याप्त प्रमाश डाल चुपे हैं। विषय 'उत्तर सण्ड' में पुन दिया गया है और उसमे एक मुग्य बात यह पि शूदी ये 'महान वैष्णव-भक्त' होन मा विशेष रूप से वर्णन दिया है, पपानीमो ने गिरती में प्रश्न रिया कि 'सगार में विष्णु भगवान् ये सच्चे और भरा मौन हूँ" सो उहोंने कहा- शूद्रा भवन्ति ये दामा वणवा नारदाययः । प्रलादनाम्बरीपाया भक्तास्तै नगनन्दिनी ।। ब्रह्ममियारतो नित्य वेद वेदाङ्ग पाठक. । माद वादिनी या स + वैष्णय उच्यते ।

स । पम-पुरार ४६८ ] द्विज सेवारतो नित्य नित्यं विष्णु प्रपूजकः । शृणोति बहुधा चैव पुराण वेद सम्मितम् ॥ शूद्रो हरिदासस्तु इत्युक्तो नगनदिनि । सवै भक्त इति प्रोक्तः सवं माधुपु समतः । ध्रुवा दयस्ते विजया अम्बरीपा दयश्च ये ।। भक्ताश्च मुनिभिः प्रोक्ता: मर्व कालेपु भामिनि । फलो धन्यतमा शूद्रा विष्णु ध्यान परायणाः ॥ अर्थात्-"नारद, प्रह्लाद, अम्बरीप आदि प्रसिद्ध विप्णु भक्तो ने धू, थे विष्णुदाम होने का प्रतिपादन दिया है। अध्यात्म-मार्ग पर चलने वा वेद और और वेदाङ्ग वा मर्म जानने वाले और शरस तथा चक्र से अट्वि व्यक्ति ही सच्चे वैष्णव हैं । जो ऐसे श्रेष्ठ द्विजो (सद्गुणी और सस्कारयुक्त की सदैव सेवा और विष्णु की पूजा करता है वह शूद्र निश्चय ही वैष्णव औ विष्णुदास कहा जायगा ! इस दान का समर्थन समस्त सजनो और ध्रुव ता अम्बरीप जैसे प्राचीन महा-भक्तो ने किया है। समस्त भक्तो और ऋपियो सदैव यह कहा है कि कलियुग में विष्णु ध्यान परायण शूद्र सर्वाधिक धन्य हैं। वास्तव में वैष्णव सम्प्रदाय का मदा एक मुरय लक्ष्य समाज में ऊँच-नीच की भावना को यथासम्भव कम करना रहा है। इस बात को ह यो भी कह सकते हैं कि जब वैदिक धर्मकाण्ड को 'ब्राह्मणो' ने अत्यन्त विस्तृ और जटिल बनासर उसमे अन्य लोगो का प्रवेग हो सकना प्राय असम्भव व दिया तो उनके विरोध मे जैन और वैष्णव जैसे ज्ञानमार्गी और भक्तिमा सम्प्रदायो का उद्भव हुआ । वैष्णव सिद्धान्त मे विष्णु को सर्वव्यापक प्रा पादित करके यह घोपित किया गया कि प्राणीमान एक उसी देवी शक्ति प्रश हैं, इसलिए किसी को छोटा या नीच समझना भूल है । प्रत्येक व्यक्ति भीतर उसी परम-पुरुष की चतन्य ज्योति जगमगा रही है, इसलिये वह च तो ससार में कितनी भी उन्नति कर सकता है और किसी भी पदवी पर पहुँ सस्ता है । श्रीमद्भगवत् गीता में भी इस सिद्धान्त का बहुत स्पष्ट रूप से समर्थ दिया गया है- 4

Padma Puran Khand-i

Author
Sharma,pt.shriram
Title
Padma Puran Khand-i
File name
Padma Puran Khand-i
Text
OCR done
Citation
1968
Published
2012/08
Publisher
Barely.,chamanlal Gouttam Sanskriti Sansthan
Language
Sanskrit
Pages
499
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313013
Barcode
99999990321744.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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