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Rudrashtadhyayi
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भूमिका। . सम्पूर्ण जगत् में वेदकी महिमा कौन नहीं जानता, वेद हो सम्पूर्ण ज्ञानको भंडार है, सर्वज्ञ परमात्माका स्वरूपही वेद है, उपनिषद्, स्मृति, पुराण, मीमांसासूत्रादिमें वेदकी महाप्रशंसा पाईजाती है, पाराशरस्मृतिमें लिखाह-"वेदो नारायणः साक्षात्स्वय. म्भूरिति शुश्रुम" वेद साक्षात् नारायण स्वयम्भू ही है, ब्राह्मणभागमें भी वेद परमात्माका निःश्वसित कहा है-"अरे मैत्रेयि अस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्य- हग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदः" इति शतपथ० । जव कि वेद, नारायणरूप नारायणप्रेरित अपौरुषेय और अनादि है और अनन्तकल्पोंके पहले भी विद्यमान था इसमें अनेक प्रमाण हैं तव यह सम्पूर्ण धार्मिक पुरुषोंकी श्रद्धाकी सामग्री है इसमें शंका ही क्या है। वेद अपने धर्मका मूलान्य है, प्रवृत्तिलक्षण निवृत्तिलक्षण धर्म वेदमें विद्यमान हैं प्रवृत्तिलक्षणवाला धर्म, जिन पुरुषोंको वैराग्य नहीं है उनको क्रमकमसे निष्काम- कर्माका बोध कराकर उनसे मनशुद्धि करके निवृत्तिकी ओर लेजाता है, और निवृत्तिलक्षणवाला धर्म ज्ञान वैराग्यरूप होकर साक्षात् मोक्षका साधनरूप होता है, निवृत्तिलक्षणवाले धर्ममें भी ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यस्त इन आश्रमोंकी व्यवस्था है। ब्रह्मचर्य आश्रममें वेदविद्याके ज्ञानकी प्राप्ति, सन्ध्या, मग्निहोत्र, देवपूजा आदि वैदिककर्मीको करतेहुए आचार्यको सेवा करना मुख्य कर्तव्य है, इस आश्रमकी सम्पूर्णरीति पालन करनेसे इन्द्रिय और अन्तःकरण अपने वशमें होते है, पहले आश्रममें ही यदि जीवनपर्यंत ब्रह्मचर्यकी इच्छा करे और नैष्ठिक ब्रह्मचारी होकर वेदाभ्यास और योगसाधन को तो भी मोक्षमार्गमें पहुंचता है, इस आश्रमके उपरान्त ही चतुर्थ माश्रम संन्या- स ग्रहण कर संसारसे निवृत्त होजाय, यदि इन्द्रियसंयम नहीं हुआहै तो शक्तिके। अनुसार आचार्यको दक्षिणा देकर प्रसन्नतापूर्वक पिताके घर आकर विवाह करके, गृहस्थ आश्रममें वेदमें कहे धर्माका अनुष्ठान करता है। गृहस्थाश्रममें पडकर जिससे मन विषयलोलुप होकर मधोगतिको प्राप्त न हो, और अपनी वृत्तियोंको स्वच्छ रखसके इसके निमित्त रुद्रका अनुष्ठान करना मुख्य और उत्कृष्ठ साधव है यह रुद्रानुष्ठान ही प्रवृत्तिमार्गसे निवृत्तिमार्गको करा समर्थ है। जिस कार दूधर्मेसे मक्खन निकाल लिया जाताहै इसी प्रकार कल्याणके निमित्त यह रुद्राष्टाध्यायी वदेका साररूप महात्माओंने सोग (२) भूमिका । इसमें कुछमी संदेह नहीं कि इसमें गृहस्थधर्म, रामधर्म, ज्ञान, वैराग्य, शान्ति, ईश्वरस्तुति मादि भनेक, सर्वोत्तम विपर्योका वर्णन है। वेदमंत्रोंका विनियोग, बर्थ, ऋपियोंका स्मरणादि जाननेका माहात्म्य बाझपा और मनुक्रमणिकामें विशेषरूपसे वर्णन कियाहै, वर्ष और विनियोगको जानकर जो कार्य कियाजायगा वह कल्पवृक्षफी समान विशेषरूपसे फलदायक होताई इससे अर्थका ज्ञान अवश्य होनाचाहिये । जैसे "हे रुद्र । इत् दुःखं द्रावयति रुद्रा। चहा- 'रुगती' ये गत्यर्थास्ते ज्ञानार्थाः स्वर्ण रुत् ज्ञानमू मावे कि- तुगागमः । रुत् शानं राति ददाति रुद्रः ज्ञानप्रदः । यहां-"पापिनो नरान् दुःखभोगेन रोदयति रुद्रः । इस प्रकार अर्थक ज्ञानसे विशेष प्रतिपक्ति होनेसे श्रुतिमें भी विशेषफल प्रतिपादन कियाहै। उतत्वः पश्यन्न ददर्शवावमुतत्वःशृण्वन्न शृणोत्येनाम् उतोत्वस्मै तन्वं विससे जायेव पत्य उशती सुवासा ] इत्यादि मंत्रोंमें अर्थज्ञानकी प्रशंसासनी है, और [यदू गृहीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्यते । बननाविव शुष्कंधो न तज्ज्वलति कहिचित् ] इत्यादि वाक्यों के द्वारा अर्थ न जाननेकी निन्दा सुनी है । दूसरा वचन मी निरुतमें लिखाई [ स्थाणुण्यं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽयम् । योऽर्थज्ञ इत: सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ] अर्थात्-जो वेद पढकर उसका अर्थ नहीं जानता वह ढूँठकी समान भार ढोनेवाला है । और जो अर्थको जानता है वह सब कल्या- गों को प्राप्त होता है । और पापरहित हो वैकुण्ठको प्राप्त होताहै, इस वचनोंसे अर्थका नना सम्पूर्ण कल्याणोंका करनेवाला है। जो कहते हैं कि : स्वाध्यायोऽध्येतव्यः इस वचनसे पाठमात्रसे ही कर्मानुष्ठानमें सफलता होजाती है यह सत्य है, परन्तु अर्थज्ञा- नसे विशेष वीर्यवान होताहै, इससे अर्थज्ञान अवश्य होनाचाहिये । इस विषयमें पहु- तसे प्रमाण हैं, जिनका यहां लिखना हम उचित नहीं समझते वेदार्थज्ञानके निमित्त शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिपकी आवश्यकता होती है। परमायाम ये सब सुलभ होजाते हैं, इस कारण हमने संस्कृत और भाषा इन दो प्रकारांसे रुद्राष्टा. ध्यायीका भाष्य आरंभ कियाहै। उपनिषद्, स्मृति, पुराण आदिमें रुद्रनापका विशेष माहात्म्य वर्णन कियाहे मोक्षकी प्राप्ति, पापनाश, आरोग्य, आयुष्यकी प्राप्ति, रुद्रजापसे होती है। जापाल उपनिषदमें लिखाहै-अथ हैन ब्रह्मचारिण ऊचुः किंजप्येनैवामृतत्वमश्नुत ने दीति होवाच याज्ञवल्क्यः शतरुद्रियेण इति ] अर्य-ब्रह्मचारियोंने याज्ञव- पुषिसे प्रश्न किया कि क्या जपनेसे मोक्षकी प्राप्ति होतीहै । याज्ञवल्क्यने उत्तर । शतरुद्रियके जपसे। य उपनिषदूमें लिखा है-(यः शतरुद्रियमधीते सोऽग्निपूतो भवति स्वर्णस्तेया- ति पुरापानास्पूतो भवति ब्रह्महत्यातः पूतो भवति कृत्याकृत्यापूस्तो भूमिका । (३) मवति तस्मादविमुक्तमाश्रितो मवति मत्याश्रमी सर्वदा सकृद्धा जपेदनेन ज्ञानमामोति संसारार्णवनाशनं 'तस्मादेवं विदित्वैनं कैवल्यं फलमश्नुते' इत्याह शातातपः] अर्थ-जो शतरुद्रिय पाठ करता है वह जैसे अग्निसे निकाले पदार्थ सुवर्ण मादि पवित्र होजाते हैं, तहत् पवित्र होताहै, सोनेकी चोरीके पापसे छूटजाताहै, सुरापानके पापसे रहित होताहै, ब्रह्महत्या पवित्र होता, त्याकृत्यसे पवित्र होताहै, आश्रम- स्यागी भी एकवार पाठमात्रसे पवित्र होताहै, इसके जपले ज्ञानकी प्राप्ति होती है, संसारसागरसे पार होजाता है। इस कारण इसको जानकर कैवल्यकी प्राप्ति होती है इस प्रकार शातातप कहते हैं। [स्ते कृत्वा गुरुदारांश्व गत्वा मचं पीसा ब्रह्महत्यां च धृत्वा । मस्मच्छन्नो भस्मशय्याशयानो रुद्राध्यायी मुच्यते सर्वपापरिति । अर्थ-सुवर्णकी चोरी, गुरुस्त्रीमें गमन, मद्यपान, ब्रह्महस्यादि पाप करके सागमें मस्म लेपन करके 'मस्ममें शयन, करनेवाला सद्राध्यायीके पाठसे सब पापोंसे लूटनाबाद । याज्ञवल्क्य कहते हैं (सुरापः स्वर्णहारी व रुद्रजापी जले स्थितः । सहनशीपा- जापी च मुच्यते सर्वकिल्विषैः) अर्थात्-मय पीनेवाला सुवर्णकी चोरी करनेवाल। जो जलमें स्थित होकर रुद्राध्यायका जप करताहै, तथा सहस्रशीर्षा इस अध्यायको पढताहै, वह सब पापोंसे छूटजाताहै । तया च-( रुद्रकादाशनी जप्त्वा तदद्वैव विशु- भ्यति ) अर्यात-एकादश वार रुद्रनापसे उसी दिन शुद्ध होजाता है । महात्मा शङ्खजी कहते हैं (स्वर्णस्तेपी रुद्राध्यायी मुच्यते ।) अर्थात्-सुवर्णस्तेयी रुद्राध्यायके पाठसे मुक्त होता है। "तथा च वायुपुराणे- यश्च रुद्राक्षपेन्नित्यं ध्यायमानो महेश्वरम् । यश्च सागरपयंतां सशैलवनकाननाम् ॥ १॥ सर्वानास्मगुणोपेतां सुवृक्षजलशोभिताम् । दधारकाञ्चनसंयुक्तां भूमि चीपधिसयुताम् ।। तस्मादप्याधिकं तस्य सक्द्रजपावेत् ॥ २ ॥ मस मावं समुत्सृष्य यस्तु रुद्राञ्जपेत्सदा ॥ सतनव च देहेन रुद्रः संजायते ध्रुवम् ॥ ३ ॥ मर्थ-वायुपुगणमें लिखाद जो महेश्वरका ध्यान करताहुआ एकवार रुद्रीका जप करताहै उसको, जो शैल वन काननके सहित, सव श्रेष्ठगुणोंसे युक्त, अच्छे वृक्षो जलोंसे शोभित, सुवर्ण और पीपधिसहित, समुद्रपर्यंत पृथिवीको दान ।
. भूमिका । उससे भी अधिक फल होताहै । अर्थात् रुद्रानपका फल इससे विशेष है। और जोमम- बको छोडकर सदा रुद्रदेवका जप करताहै वह उसी देहसे निश्चय गुरु होजाता है। "चमकं नमकं चैव पौरुपसूक्तं तथैव च ॥ नित्यं त्रयं प्रयुञ्जानो ब्रह्मलोके महीयते ॥१॥ चमकं नमकं होतापुरुषसूक्तं जपेत्सदा ॥ प्रविशेस महादेवं गृहं गृहपतिर्यथा ॥२॥ भस्मदिग्धशरीरस्तु भस्मशायी जितोन्द्रयः ।। सततं रुद्रजाप्योऽसौ परां मुक्तिमवाप्स्यवि ॥ ३ ॥ रोगवान्पापांश्चैव रुद्रं जप्त्वा जितीन्द्रयः ॥ रोगापापाद्विनिर्मुक्तो ह्यतुल सुखमश्नुते ॥४॥ अर्थ-चमकनमक अध्याय तथा पुरुपसूक्त तीन वार जपनेसे ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठा पाताई ॥१॥ जो चमक नमक तथा युरुपसूक्तकासदाजप करते हैं, वह महादेवमें से प्रवेश करजाते हैं जैसे गृहपति अपने घरमें प्रवेश करजाते हैं ॥ २ ॥ शरीरमें भस्म लगानेसे, भस्ममें शयन करनेसे जितेन्द्रिय होकर निरन्तर रुद्राध्यायका पाठ कर- नेसे मनुष्य मुक्त होजाता है ॥ ३ ॥ और जो रोगी तथा पापी मी जितेन्द्रिय होकर रुद्राध्यायका पाठ करै तो रोग और पापसे निवृत्त होकर महासुखको प्राप्त होताहै ॥ ४॥ माइच शंख-(रहसि कृतानां महापातकानामपि शतरुद्रियं प्रायश्चित्तमिति ।) अर्थ-शंखऋषि कहते हैं गुप्तमहापातकोंकाभी प्रायश्चित्त शतरुद्रियका जप है। शवरुद्रिय इसका नाम इस कारण है कि रुद्रदेवता १०० संख्यावाले हैं यह रुदो पनिषद है इसमें शिवात्मकब्रह्मका निरूपण है । ब्रह्मके तीन रूप हैं एक तो कार्यरूप, सवफा उपादानकारण सर्वात्मक, दूसरा सृष्टिस्थितिसंहारनिमित्तक पुरुषनामवाला, तीसरा अविद्यासे परे निर्गुण निरञ्जन सत्य ज्ञान आनन्दके लक्षणवाला, यह रुद्रके मुख्य स्वरूप हैं। इस ग्रंथमें ब्रह्मके सगुण निगुण दोनों प्रकारके रूपोंका वर्णन, परमात्माकी उपासना, मक्तिमहिमा, शान्ति, पुत्रपौत्रादिकी वृद्धि, नीरोगता, यज्ञिय पदार्थ आदि, कितनाही वस्तुषोंका वर्णन है इसके पाठसे पाठकोको यह भली प्रकारसे विदित होजायगा, कि यह मंत्रविमागरूप ग्रन्थ अल्पकालका नहीं है । जव कि उपानेपदोंमें स्मृति पुराणोंमें इसके पाठका माहात्म्य वर्णन कियाहै तब प्राचीन समयमें ही या कार्यके योग्य संग्रह होचुकाथा इसमें कोई सन्देह नहीं है ।
भूमिका। जिस प्रकार पूजा पाठके गुटके विद्वान् महात्मा अपने पास रखते हैं इसी प्रकार त्रिवर्ण- मात्रको यह ग्रंथ अपने पास रखना चाहिये । यद्यपि संस्कृतभाष्य तथा टीकों सहित यह ग्रंथ एक दो जगह प्रकाशित हुआ है पर उसमें सर्वसाधारणकी उपयोगिता न होनेके कारण हमने उन त्रुटियोंको इसमेंसे दूर करके द्विजमात्रके उपयोगी इस ग्रंथको बनादियाहै। इसका क्रम इस प्रकारसे रक्खाहै कि पहले मंत्र, फिर उसका ऋपिछन्द-देवत तथा विनियोग, संस्कृतम पदार्थके सहित मंत्रमाग्य, पीछे भाषामें सरलार्थ वर्णन कियाहै । साथमे इस बातका भी विचार रक्खाहै कि जिससे भाषामें भी वेदके मंत्रोंका अर्थ ऐसा रहना चाहिये कि जिससे वेदार्थका विज्ञान भलीमकार होजाय । इसी शैलीसे यजुर्वेदीय उपासनाकाण्ड तथा मंत्रार्थदीपिका यह और दो ग्रंथ तैयार होरहेहैं, और आशा है कि वह वहुत शीघ्र तैयार होजायेंगे । एक वात हमको यहां विशेषरूपसे और कहनाहै, वह यह है कि इस समय भी देशमें पण्डितोंकी कमी नहीं है तथा अनुवादके ग्रंथ मी तैयार होतह पर जहांतक हम देख- तेहैं बहुत कम तैयार होते हैं, हां जिनके पास कुछ मसाला है वह केवल अपना महत्व विधायक ग्रंथ बनाकर छपादेतेहै जिससे धार्मिकसमूहोंको कोई लाभ नहीं पहुँचता, देखिये महाराजा बुक्ने सायणाचार्यजीसे वेदोका भाष्य कराकर कितना जगत्का उपकार कियाहै, अब भी श्रीमानोंके नरपतियोंके दूसरे कार्योंमें सहस्रों नहीं लक्षों रुपये व्यय होते हैं यदि थोडी भी श्रीमानोंकी कृपादृष्टि इधर होजाय और चारों वेदों, ब्राह्मणभागाका रहस्योंके सहित हिन्दीभाषामें अनुवाद होजाय तो जगत्का कितना उपकार होसकताह, जगत्में वेदोंका महत्त्व वहुत शीघ्र प्रकाशित होसकताहै । महामण्डलके नेताओंका ध्यान हम इस ओर आकर्षित करतहैं कि, पापलोगोंने प्रयाग जैसे पवित्र तीर्थराजमें कुम्मपर क्या क्या प्रतिज्ञायें की थीं, काशीमें ब्रह्मचारी- आश्रम खोलनेको कहाथा, शास्त्रप्रचारविभागसे वैदिकग्रंथोंके निकालनेकी प्रतिज्ञा की थी, धर्मवक्ताओंको मूलसहायक समझकर उनके उत्साहवृद्धिका प्रण कियाथा धर्मसमायोंको लाम पहुँचानेका वचन दियाया, आजतक उसमेंसे एक बात भी हुई ? एक भी नहीं, केवल माशाही आशा शब्द सुनाई आये यदि ऊपरी वाव छोडकर कर्तव्यपालन कियाजाय तो बहुत कुछ उपकार होसकताहै, यदि कोई अपने पुरुषार्थसे कोई कार्य कर और दूसरा उसके अपना कर्तव्य वतावै वो यह भुलावा या पालसीके सिवाय और क्या है । है। यदि शास्त्रप्रचार, विद्याप्रचार, धर्मप्रचारमें हम वैश्यवंशावतंस देशहितैषी धर्मप्रचारानिरत श्रेष्ठी श्रीयुत खेमराज श्रीकृष्णदासजी महोदय मालिक "श्रीवेंकटेश्वर 11 (६३) सूमिका। यंत्रालयको सहस्रों. धन्यवाद दें तो भी उनके लिये वह थोडे हैं, कारण कि आपने बहुतसा धन व्यय कर तथा परिश्रम उठाकर पुरातन उपयोगी ग्रंथोंकी खोज कर सर्वसाधारणके उपकारके निमित्त भाषानुवादसहित भनेक ग्रंथोंको प्रकाशित किपाद मौर कररहेहैं, इम परमात्मासे चाहते हैं प्रार्थना, करतेहैं कि, उक्त सेठज़ी दीर्घायु होकर पुत्रपौत्रोंकी वथा लक्ष्मीकी वृद्धि के सहित संसारका उपकार करतेहुए. चार पदार्थोके भागो हो। उन्ही सर्वगुणस म्पन्न सेठजीके लिये मैंने यह परमोपयोगी अन्य निर्माण करने सब प्रकारके सत्वसहित प्रकाश करनेको समर्पण करदिया है, इसके प्रकाशादि कर- नेके वही अधिकारी है। यहां यह कहदेना भी परम उपयोगी है कि इस भाष्यअनुवादमें श्रीसायणाचार्य, श्रीमहीधर भौर श्रीउब्बटजीके भाष्योंसे बहुतकुछ संग्रह कियाहै। इस प्रकारसे यह ग्रंथ पाठकोंके अवलोकनार्थ उपस्थित है, यदि इसमें कोई त्रुटि रहगई हो वो पावकण अपनी उदारतासे उसे क्षमा कर सूचना देंगे तो दूसरी बारमें। ठीक करवीजायगी। सन्जोंका अनुगृहीत- - माषाकृष्ण १३ संवत् १९६६ ज्वालाप्रसादमित्र, दिनदारपुरा मुरादाबाद.
॥ श्रीः ॥ '. अथ पूजाप्रयोगः। आवम्य प्राणानायम्य नमस्कारं कुर्यात् । श्रीमन्महागणाधिपतये नमः । इष्टदेवताभ्यो नमः । श्रीमदुमाहेश्वराभ्यां नमः । कुलदेवताभ्यो नमः । सर्वेभ्यो . देवेभ्यो नमः॥ 1 - सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ॥ लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥ १॥ धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः॥ द्वादशैतानि नामानि यः पठेचशृणुयादपि ॥२॥ विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ॥ संग्रामे सटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥३॥ शुक्लाम्बरधरं देवं शुलवण चतुर्भुजम् ।। प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥४॥ अभीप्सितार्थसिद्धयर्थ पूजितो या सुरासुरैः ।। सर्वविवहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः ॥५॥ सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तु ते ॥६॥ सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममंगलम् ॥ येपां हृदिस्थो भावान्मंगलायतनं हरिः ॥ ७॥ लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः ।। येपामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥ ८॥ सर्वेष्वारम्भकार्येषु प्रयस्त्रिभुवनेश्वराः ॥ देवा दिशन्तु नः सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः ॥ ९ ॥ विनायकं गुरुं मातुं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् ॥ सरस्वती मणीम्यादी सर्वकार्यार्थसिद्धये ॥ १०॥ अथ सङ्कल्पः। ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्यन- मणो द्वितीये पराः श्रीधेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे मार्यावर्ताम्तर्गतब्रह्मावर्तेकदेशे यौद्धावतारे अमुक- नामसंवत्सरे अमुकायने नमुफती अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकवासरे अमु- कतियो अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते चन्द्रे अमुकराशिस्थिते भास्कर (८) पूजाप्रयोगः। शेषेषु ग्रहेषु यथास्थानस्थितेषु सत्सु एवंगुणविशिष्टायां पुण्यतिथी ममात्मनः श्रुतिस्मृ. तिपुराणोक्तफलप्रात्यर्थम, ऐश्वर्याभिवृद्धयर्यम् अप्राप्तलक्ष्मीप्राप्त्यर्थ प्राप्तलदम्पाश्चिर- कालसरक्षणार्थम्, सकलकामनासंसिद्धयर्थम्, सर्वत्र यशोविजयलाभादिप्राप्त्यर्थम्, जन्म- जन्मान्तरदरितोपशमनार्थम्, मम सभार्यस्य सपुत्रस्य सवान्धवस्याखिल कुटुम्वसहितस्य सपशोः समस्तभयव्याधिराजपीडामृत्युपरिहारद्वारा आयुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थ तथा मम जन्मराशेः सकाशाये केचिद्विरुद्धचतुर्थाष्टमद्वादशस्थानस्थितक्रूरग्रहास्तस्सूचितं सूचयि- ध्यमाणं च यत्सर्वारिष्टं तद्विनाशद्वारा एकादशस्थानस्थितवतुभफलप्राप्त्यर्षम् पुत्रपौ. त्रादिसन्तवेरविच्छिन्नवृद्धयर्थमाधिदैविवाधिमौतिकाध्यात्मिकत्रिविधतापोपशमनार्थ धमा- र्थकाममोक्षफलमाप्त्यर्थ रुद्राभिषेकानन्तरं श्रीरुद्राष्टकस्य पाठमहं करिष्ये । अथ रुद्राभिषेकप्रकारः। ॐ यजाग्रत इत्यादिभिर्विभ्राढित्यनुवाकान्तः पञ्चमिरंगमन्त्रैः पूर्वमभिपेकः । ॐ भूः ॐ भुवः ॐवः ॐ नमस्ते रुद्रेत्यादिना तमेपां जम्भे दध्मः । ॐ भूः ॐ भुवा ॐ स्वः ॐ इत्यन्तेनाष्टप्रणवयुक्तेन रुद्राध्यायेन वामिषेकः । ॐ वर्डसोमेत्यष्टभिः कण्डिकाभिश्च कामेवानां तु सप्तकण्डिकाभिरिति विशेषः । ॐ उग्रश्चेति तिसृभिः सप्तभिर्वा रुद्रनटा. नाम्नीभिश्चेति परशुरामादयः निर्मूलत्वान्नेति देवयाज्ञिकादयः ॥ ॐ वाजश्चमे इत्यष्टानुवा. कात्मकेन चेति देवयाज्ञिकाः । महच्छिरसाभिषेकपक्षेन चमकानुवाकैराभिषेक । चमका - नुवाकैरामिषेकपक्षे तु न मइच्छिरसाभिषेकः इत्यपरे। ॐ प्राचं वाचं प्रपद्य इति शान्त्यध्या- येन शान्तिकरणम् । ॐ शान्तिरिति विरुवारणं वा इत्येको रुद्राभिषेकप्रकारः ॥ अथापरप्रकारः । ॐ यजायत इत्यादिभिर्नमरते उदेति रौद्राध्यायान्वैः पभिरंगमंत्री पूर्वमभिपेकः। ॐ भूःॐ भुवः ॐख ॐ नमस्ते रुद्रेत्यादिना तमेषां जन्भे दध्मः ॐ भूः ॐ भुवः स्वः मोमित्यन्तनाष्टप्रणवयुक्तेन रौद्राध्यायनाभिषिच्य*वठ-० सोमेत्यष्टभिः कण्डिकाभिरभिषेकः। ॐ उग्रश्चेति तिमृभिः सप्तभिर्वा । महच्छिरो रुद्रजटाभ्यामभिषेकाs. भावपक्षे तु ॐ वाजश्च म इत्यष्टानुवाकेनाभिषेकः । प्रचं वाचमिति शान्त्यध्यायेन पक्षदयेऽपि शान्तिकरणम् । ॐ शातिरिति विरुधारणं वा इति द्वितीयप्रकारः। बृहत्पाराशररुमृतिमते तु-पञ्चांगमन्त्रपूर्वकरीद्राध्यायस्येव जपोऽन्ते च शान्तिकरणमि- त्ययमेव रुद्रजपो न तु पुनरन्यस्य कस्यचिन्मंत्रस्य जप इनि विशेषः । एवमभिषिच्य षट्षष्टिनीलसूक्तं च पुनः पोडपऋचो जपेत् । एप ते द्वे नमस्ते नतं विद्वयमेव च। मोदृष्ट मोति चत्वारि ह्यतेच्च शतरुद्रयम् । नीलसूक्तं वयठ०सोमेत्यष्टी । इति तृतीयप्रकार ।
a श्रीवेदपुरुषाय नमः। अथरुद्राष्टाध्यायी। भाष्यसहिता। अथ प्रथमोऽध्यायः। मंत्रः। हरि ॐ ॥ गुणानान्त्वागुणपति हवामहे प्प्रियाणान्त्वाप्णियपतिर्छहवामहेनिधीना- न्वानिधिपति:हवामहेवसोमम ॥ आहम- जानिग धमात्त्वमजासिग धम् ॥१॥ ॐ गणानां त्वेत्यस्य प्रजापतित्रपिः । आषर्षी बृहती छंदः । लिङ्गोक्ता देवता अश्वप्रक्रमणे विनियोगः । व्वसोममेत्यस्य सानीपंक्ति- श्छन्दः । महिण्या अश्वसमीपे संवेशने विनियोगः ॥ १ ॥ भाष्यम्-हे ब्रह्मणस्पते वयम् (गणानाम् । गणानां मध्ये ( गणपतिम् ) गणा ऋष्माण्डादयः तेषां पालकम् । यदा-गणनीयानां पदार्थसमूहानां स्वामिनम् (स्व) त्वाम् (हवामहे ) आयामः । (प्रियाणाम् ) वल्लमानामिष्टमित्रादीना मध्ये (प्रियपतिम् ) प्रियस्य पालकम् (त्या) त्वाम् ( हवामहे ) आह्वयामः । (निधीनाम् ) निधयः पद्मादयः निधीना मध्ये (निधिपतिम् ) सुखनिधेः पाकलम् (त्वा) त्वाम् ( ह. वामहे ) बाहयामः । विघ्नोपशमाय भार्यादिमियलाभाय च त्वाम् आह्वयामीति वा- क्यार्थः (वसो) वसत्यस्मिन्सर्प जगदा यत्र वसति स वसुः तत्सम्बुद्धौ हे वसो सर्व. स्वभूतदेव ! त्वम् (मम ) मम पालको भूया इति शेषः । हे प्रजापते ( गर्सधम् ) गर्भ दधातीति गर्म, गर्भधारक रेतः । अर्थात् कर्मपालप्रजननसामर्थ्यधारक श्रद्धाख्य- - (प्रथमो- (२) . रुद्राष्टाध्यायी- मुदकम् ‘रेत' उदकनामसु पठितम, [ निघ० १११२ ] (या अजानि) माकृष्य क्षिपामि श्रद्धया स्वीकृत्य फलोन्मुखीकरोगि (त्वम् ) त्वञ्च (गर्भधम् ) रेतः श्रद्धाख्य- मुदकम् ( आ अजासि ) श्रद्धयाकृष्य क्षिपसि श्रद्धयाकृष्टा देवताः कर्मफलप्रदानमवश्यं कुर्वति ( यजु० म० २३ मं० १९) प्रमाणानि-गणानास्वागणपतिवामह इति पत्न्यः पारयन्त्यपहुक्त एवास्मा एत- दतोन्ये वास्मै ढुवतेऽथो धुवत एवैनं त्रिः पारयान्त त्रयो वा इमे लोका सभिवनं लोके- धुंवते । त्रिः पुनः परियान्ति पट् सम्पद्यन्ते पड्डाऽशतव ऋतुमिवनं धुवते ४ अप वा एतेभ्यः माणाः कामन्ति ये यज्ञे धुन्वनं तन्यते नवकृत्वा परियन्ति नव वै माणाः प्राणा- नेवात्मन्दधते नैभ्यः प्राणाः अपक्रामन्त्याहमजानि गर्भधमात्वमजामि गर्ममिति प्रजा वै पशवो गर्भः प्रजामेव पशूनात्मन्धत्ते [ श० कां० १३ अ० २ बा० २ के० ४-५ ] गणानान्त्वा गणपतिं हवामहं ब्रह्मणस्पत्यं ब्रह्म वै ब्रह्मणस्पतिब्रह्मणैवेनं तद्भिषज्यति [ एतरे० पं० १ कं० २१] राष्ट्रपश्वमेधाज्योतिखे तद्राष्ट्रे दधाति [ श० का० १३ २० २ बा०२ कं० १६ ] अयं मन्त्रः मंहितायामश्वमेधपस्ता पठितस्त- नोवस्तुतिरस्य मंत्रस्य वाच्योऽर्थः । स च यजमानपत्नीनां परिक्रमन्तीनां कीणामतो वयमिति बहुवचनान्तनास्मदो निर्देशः । सद्भावेऽपि वहीनां पत्नीनां यस्य न स्यात्यु- त्रोत्पादनं तेनाप्यस्य कर्त्तव्यता ज्ञायते ॥१॥ भाषार्थ-हे प्रजापते गणपते ! हम झूष्माण्डादि गोंके मध्यमें गणपतिरूपसे षा गणनीय- पदार्थोके मध्यमें स्वामीरूपसे आपको बुलाते हैं, प्यारे इष्टमित्रादिके मध्यमें प्रियजनों के पालक आपको बुलाते हैं, पद्मादिनिधियोंके मध्यमें सुखनिधिके पालक भापको हम बुलाते है, आशय यह कि विघ्नशान्ति मौर भार्यादि प्रियजनोंके लाभ के निमित्त हम मापकी स्तुति करते हैं। हे हमारे सर्वस्वधन | तुम हमारे पालक हो "अहं त्वया मनानि" मापने हमको प्र- गट किया है मैं गर्भसे उत्पन्न हू भाप मन अविनाशी सब जगत्को गर्भद्वारा प्रगट करते हो, जीव गर्भद्वारा प्रगट होताहै और आप स्वतत्रतासे प्रगट हुएहो, और तुमसे सब जगत् प्रगट होताहै । १ यजुर्वेद श्रोत कर्मानुष्ठानमें यह मंत्र अश्वमेघ प्रकरणों में प्रजापतिरूप मच- की स्तुतिमें है, इससे रानामें क्षात्रतेज और वैश्यों वैश्यत्व वृद्धिको प्राप्त होता है, मौर जिस सार्वभौम महीपालके सन्तान न हो अश्वमेध यइस उसके सन्तान होताहै इस अनुष्ठानमें महिषी पुत्रवती होती है इस मनुष्ठानमें इस कण्डिकाके पहले तीन मंत्रोंसे पत्नी तीन प्रद- क्षिण करे, तीन प्रकार इस भांति प्रदक्षिणा करनेसे प्रजापति देवताके ध्यानसे मानोत्रिलो- कीकी परिक्रमा की, फिर तीन परिक्रमा करनेसे छः होती हैं, ऐसा करनेसे, मानो छः ऋतुओंसे समृद्धि की, फिर तीसरे मत्रसे तीन परिक्रमा करनेसे, मानो नौ प्राण मात्मा धारण कियेनाते है, फिर वे प्राण दृट होजाते हैं, वह जो मश्व विश्वकी परिक्रमा कर आया है उसके प्रभावसे पत्नी दृढ प्राणवाला पुन चक्रवर्ती होताह उस प्राणवलके सम्पा- सन उपरान्त पत्नी 'आहमजानिए इस मनार्थको धारण करें । अध्यात्ममें प्रजापशु गर्म है प्रजापशुमै मात्माको धारण कियाजाताहै, परिक्रमाके समय पत्नीद्वारा चरितमंत्रार्य-. .
यायः १.] भाष्यसहिता। . (३) हे देवगणोंके मध्यमें गणरूपसे पालक । मापको हम बुलाती है, प्रयोंके मध्यमें प्रियाक पालक अथवा सबसे अधिक होनेसे आत्मा ही प्रियपात है कारण कि, आस्माके निमित्त सबको त्यागदेना होताहै, इससे प्रियपति आपको हम बुलाती हैं, मुखनिधियोंके मध्यमें वा विद्यामादि पोषण करनेवालोंके मध्यमें सुखनिधिके पालक आपको हम बुलाती है, हे प्रजापते । व्यापक होकर सब जगत्में निवास करने के कारण तुम मेरे पालक हूजिये । (अगले मंत्रसे मश्वका स्पर्श कर परमेश्वरसे प्रार्थना है ) मैं गर्भके धारण करानेवाले ऐते अर्थात् कर्मफल उत्पन्न करनेकी सामर्थ्य धारण करनेवाले श्रद्धानामक जलको सब प्रकारसे माकर्षण कर- तीहूं, मर्थात् श्रद्धासे स्वीकार करके फलके उन्मुख करतीह, आप गर्भधारण कराते अर्थात् श्रद्ध' नामक जळको आकर्षण कर उत्सर्ग अर्थात् फलोन्मुख करतहो । अथवा गर्भके समान सब ससारकी धारक प्रीतिके धारण करनेवाले वा अपनी शक्तिसे जगत्के अनादिकारण गर्मके धारण करनेवाले वा सम्पूर्ण मूर्तिमान पदार्थोकी रचना करनेवाले आपको सब प्रकारसे सन्मुख करतीहूं, सब जगत्के तत्वों में गर्मरूप वीनको धारण करनेवाले आप सब प्रकार मानते वा सन्मुख होते हो ॥ १॥ मन्त्रः। गायत्रीत्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप्पङ्यासह ॥ बहु- त्युष्णिहाकुप्सूचीमि शम्म्यन्तुत्त्वा॥२॥ ॐ गायत्रीत्यस्य प्रजापतित्राषिः । उष्णिक छन्दः । अश्वो देवता । अश्वशरीरे रेखाकरणे विनियोगः ॥२॥ माध्यम-हे अश्व (गायत्री ) गायत्री (त्रिष्टुप् ) त्रिष्टुप् (जगती) जगती (अनुष्टुप् ) अनुष्टुप् (पंत्या सह) पत्त्या सह ( बृहती) बृहती ( उष्णिहा सह) उष्णिहा सह (ककृप) ककुयू एतानि छन्दासि (सूचीभिः) एतामिः सूची- मिः (वा) त्वाम् (शम्पन्तु ) संस्कुर्वन्तु "विशो वै सूख्यो राष्ट्रमश्वमेधो विशं चवा- स्मिन राष्ट्र समीची दक्षाते' [ श० १३ । २ । १०२ ] प्रशो यत ईश्वरो वा अश्वः [१३ । ३1८1८] [ यजु० २३ । ३३३] ॥२॥ भाषार्थ-हे अश्वरूप देव । गायत्री अर्थात् गानेवालेका रक्षक गायत्रीछन्द, तीनों तापाका रोधक त्रिष्टुप्छन्द, जगत्में विस्तीर्ण जगती छन्द, संसारका दुःखरोधक मनुष्टप, पक्तिछन्दके । साथ वृहती, प्रभातप्रियकारी उष्णिक्छन्द, मच्छे पदार्थोंवाला ककुप्छन्द, सचिोहारा तुमको शान्त करे। प्रजाका नाम पक्षान्तरमें सूची राष्ट्र अश्वमेध है यही राज्यको शान्त रखता है ॥२॥ : ब्रह्मस्तुतिपक्षमें-गायत्री, बिष्टुप, जगती, अनुष्टुप, पक्ति, वृहती, उष्णिक, ककुप्छन्द, इन सबके द्वारा सव दिशाम सुन्दर उक्तियोंके द्वारा सव : कोई आपकी स्तुति प्रार्थना करते हैं ॥२॥ - - -
(४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[प्रथमो-
२४ म 'रका गायत्री छन्द, त्रिष्टप ४४ का, जगती १८, भनष्ट ३२, बृहत १६,
उष्णिक २८, पक्ति ४० अक्षरका होता है ॥ २॥
मन्त्रः।
दिपायाश्चतुष्पदाविपदायाश्चषट्पदा ।
बिच्छन्दायाश्चुसच्छन्दास्सूचीमिशम्म्य-
न्तुत्वा ॥३॥
ॐ द्विपदेत्यस्य प्रजापतित्रापिः । अनुष्टुप् छन्दः । अश्वा देवता
वि० पू० ॥३॥
भाज्यम्-(द्विपदा) दे पदे यासां ता द्विपदाः (याः) याः ( चतुष्पदाः) चतुष्पदाः
(या) या (त्रिपदाः) त्रिपदाः (याः) याः (पट्पदाः) पट्पदाः (याः
(विच्छन्दाः ) विगतं छन्दो याभ्यस्ताः छन्दोलक्षणहीनाः (याः) (सच्छन्दाः )
छन्दोलक्षणयुताः ताः सर्वा छन्दोलक्षणजातयः (सूचीभिः) सूचीभिः (त्या) त्याम्
(शम्यन्तु ) संस्कुर्वन्तु [ यजु० २३ । ३४ ] ॥ ३ ॥
भाषार्थ-दो पदोंवाले, जो चार पदोंवाले तीन चरणावाले लौर जो उहपदावाले, तया छन्द-
लक्षणोंसे होन और जो छन्दलक्षणों से युक्त छंद हैं वे सब छन्द सूचीद्वारा तुमको शान्त करें
या संस्कार करें । अर्थात्-इन छन्दोके उच्चारणसे तुममें शान्ति विराजमान हो ।
हे भगवन दुपाये ( पक्षी और मनुष्यादि), चौपाये, तीनपदावाले, पराधीन मौर स्वाधीन
समही मुन्दरक्तियोंसे आपकी मार्थना करते है ॥३॥
मन्त्रः।
सुहस्त्तौमाऽसुहच्छन्दसऽआवृत सुहप्प्रमाऽ
ऋषयत्सुप्तदैत्याः ॥ पूर्वेषाम्पन्यांमनुदृश्य
धीराऽअन्वालेभिरेरुत्थ्योनरश्मीन्॥ ४ ॥
ॐ सहस्तोमा इत्यस्य याज्ञवल्य ऋषिः त्रिष्टुप् छन्दः पयो देवता
पाठे विनियोगः ॥४॥
ऽध्यायः १.] भाज्यसहिता। (५) भाज्यम्-( सहस्तोमाः) रतः त्रिवृत्पञ्चदशादिभिः सह वर्तमानाः सहरचोमाः (सहच्छन्दसः) गायघादिभिः छन्दोभिः सह वर्तमानाः (पावृतः ) आवर्तमाना: (सहप्रमाः) प्रमितिः प्रमा यज्ञरयेपत्ता परिज्ञानं तेन सह वर्तमानाः ( देव्याः ) देवस्य प्रजापतेः सम्बन्धिनः (ऋषयः ) द्रष्टारः ( सप्त) सप्तसंख्याका शीर्षण्याः। यद्धा-मरीचिप्रमुखाः सप्तर्षयः होत्रादयः सप्त वषट्कारो वा एते (पूर्वेषाम् ) पूर्वपुरु- पागामझिम्मभृतीनां विवसना देवानां वा (पन्याम् ) अनुष्ठानमार्गम् ( अनुदृश्य ) क्रमण जात्रा (धीराः ) धीमतः मन्नः ( अन्यालेभिरे) क्रमेणारख्यवन्तः; यागा- नुष्टार प्रवृता इत्ययः । (न) यया (२८यः ) रथेन युक्ताः ग्थस्य नेतारः सूताः (श्मी- २ ) रये अश्वनिया गमार्थान् प्रप्रहान् सम्यग्रयस्य नयनाय इस्तेनान्धारभन्ो । यहा, देव्याः सप्तर्षयः, देवस्य प्रजापतः इमे देव्याः प्रजापतिप्राणाभिमानिनः सप्तर्षयः भरद्वाजकम्यागौनमात्रिवतिष्ठविश्वामित्र जमदग्निसंज्ञाः अन्धालेभिरे सृष्टवन्तः सृष्टिय- जमिति शेषः । किं कृत्वा, पूर्वेषां पन्यानमनुष्य-अधस्तनकल्पोत्पन्नानामवमिता- धिकाराणां मार्ग विलोक्य पूर्वक रोत्पन्नपिभिर्यथा सृष्टं तथा सृष्टान्त इत्यर्थः “सूर्या- चन्द्रमसौ धाता ययापूर्वमकल्पयत्" इति श्रुतेः । कथमिव रथ्यो न रश्मीन् नझार उपमा- र्थः । रथी यथा इष्टदेशमाप्त्यर्थं प्रथमं रश्मीन्प्रग्रहानालभते स्पृशति सृजति वा, तथा तेऽपि मृष्टियझं मृवन्तः । शिभूताः पयः स्तोमसहिताः गाय यादिभिः सहिताः (यावृतः ) बावृत्तशब्देन कनाच्यते सहावृतः कर्मसहिताः श्रद्धासत्यप्र-नानानां कर्म- णामनुष्टातारः ( सहप्रमाः ) प्रमाणं प्रमा तत्सहिताः शब्दप्रमाणपरीक्षणतत्परा: (धीगः) धीमन्तः [ यजु० ३४ । २९ ] ॥४॥ भाषार्य-शब्दप्रमाणके जान बाले धीर त्रिवृत्पचदशादि स्तोम गायञ्यादि छन्द और यज्ञका परिमाण इनक महित वामान देवप्रजापतिक सम्बन्धी सप्तऋषिस्थानिक चक्षुआदिक (पशु जमदग्नि ऋपिरिति श्रु। ) अथवा मरीचि मादिक अपने पूर्वज अगिरा आदिक मह पियोंका अनुष्ठिन ममझका सर्वज्ञ की समान यज्ञमें प्रवृत्त हुए, जैसे रययुक्त घोडौंकी लगाम पकडकर सारथि रथ को भलोप्रकार चलाताहै, अथवा प्रजापतिके प्राणाभिमानी सप्तऋषि- भरद्वान, कश्यप, गैतम, अत्रि, पसिष्ठ, विश्वामित्र और जमदग्निने पूर्वकल्पमें उत्पन्नहुए ऋपियोके मागीका अनुसरण करके हम मुष्टियज्ञका आरम किया अर्थात् जैसे पूर्वकल्पमें सृष्टि हुई उसी प्रकार सृष्टि की, जैसे रथी घोडौंको पशम रखनेके ठिये पहलेही लगाम बनाता है इसी प्रकार सृष्टि कार्यको सुशृखलाके लिये नवसे पहले यह ऋषि प्रगट हुए और साष्टकार्य किया ॥ ४॥ मन्त्रः। यज्जाग्रतोदरमुदतुिदेवन्तदुसुप्तस्यतथै रुद्राष्टाध्यायी- [प्रथमो- वैति । इङ्गमञ्ज्योतिषाज्योतिरेकन्त- न्भमन शिवसङ्कल्पमस्तु॥ ५॥ * यदित्यस्य याज्ञवल्क्य ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । मनो देवता। पाठे विनियोगः ॥५॥ भाष्यम्-(यत् ) यन्मनः (जाग्रतः) जाग्रतः पुरुषस्य (दूरम् उदेति) उद्गच्छति बक्षुरायपेक्षया दूरगामीत्यर्थः । यच्च (दैवम् ) दीव्यति प्रकाशते देवो विज्ञाना- स्मा तत्र मय वैवमात्मग्राहकमित्यर्थः (तत उ) यदः स्थाने तच्छन्दः उकारश्चार्यः । पच मनः ( सुप्तस्य) सुप्तस्य पुंसः (तथैव एति ) यथा गतं तथैव पुनरागच्छति' यञ्च (दूरंगमम् ) दूरं गच्छतीति दूरंगमम्, अतीतानागतवर्तमानविप्रकृष्टव्यवहितपदा- र्थानां प्राहकमिस्यर्थः । यच्च मनः ( ज्योतिपाम् ) प्रकाशकाना श्रोत्रादीन्द्रियाणाम् (एकं ज्योतिः) प्रकाशकं प्रवर्तकमित्यर्थः । प्रवर्तितान्येव श्रोत्रादीन्द्रियाणि स्वविषये प्रान्ते मात्मा मनसा संयुज्यते मन इन्द्रियेणेन्द्रियमर्थनेति न्यायोक्तेर्मनःसम्वन्ध- अन्तरा तेषामप्रवृत्तेः (तत्) तादृशम् (मे) मम ( मनः) मनः ( शिवसङ्कल्पम) शिवः कल्याणकारी धर्मविषयः सङ्कल्पो यस्य तादृशम् ( अस्तु) भवतु मन्मनास सदा धर्म एव भवतु न कदाचित्पापमित्यर्थः । यजु० ३४ ॥ १ ॥५॥ माषार्थ-जो मन, जागते पुरुषका चक्षुमादिकी अपेक्षासे दूर प्राप्त होताह जो शुतिमान् वा प्रकाशक देव विज्ञानात्माका ग्राहक है, वहीं सोतेषुए पुरुपके उसी प्रकारसे सुषुप्तिमवस्थामें फिर आगमन करताहै, जो दूर जानेवाला या अतीत-भविष्य-वर्तमान-विप्रकृष्ट व्यवहित पदार्थों का ग्रहण करनेवाला है, और जो प्रकाशक श्रोत्रादि इन्द्रियोंकी एक ज्योति है। अर्थात् सम्पूर्ण इन्द्रियोंका चालक है, आत्मा मनसे, मन इन्द्रिपसे, इन्द्रिय पदार्थोसे संयोग करती है, विना इसके शुछ प्रवृत्ति नहीं होती, वह मेरा भन कल्याणकारी सक्ल्पवाला धर्म विषपमें तत्पर हो मेरे मनमें भी पापन हो धर्मही सदा प्रवृत्त हो ॥ ५ ॥ येनुकर्माण्युपसोमनीषिणायज्ञकृण्वन्ति विदथेषुधीरांह॥ यदपूर्वव्युक्षमुन्तप्पुजा- नान्तन्मुमन-शिवसङ्कल्पमस्तु ।।६।।
(७) ऽय्यायः १.] माष्यसहिता। ॐ येनेत्यस्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ ६॥ भाष्यम्-( अपसः) “अप इति कर्मनाम" [निपं० २।१] अपो विद्यते येषां ते अपस्विनः कर्मवन्तः सदा कर्मनिष्ठा इत्यर्थः । (धीराः) धीमन्तः (मनीषिणः) मेधाविनः (यज्ञे ) यज्ञकर्मणि (येन ) मनसा सत्ता (कम्मर्माणि) कर्माणि (कृण्वन्ति) कुर्वन्ति मनःस्वास्थ्य विना कर्माऽप्रवृत्त केषु सत्सु ( विदथेषु ) ज्ञानेषु सत्सु विद्यन्ते ज्ञायन्ते तानि विदयानि तेषु यज्ञसम्बन्धिना हविरादिपदार्थानां ज्ञानेषु सरिस्वत्यर्थः । ( यत् ) यच्च मनः (अपूर्वम् ) न विद्यसे पूर्वमिन्द्रियं यस्मात्तदपूर्वम् इन्द्रियेभ्यः पूर्व मनसः सृष्टः । यद्धा अपूर्वमनपरमबाह्यमित्युक्तरपूर्वमात्मरूपमित्यर्थः । यच ( यक्षम् ) यष्टुं शक्तं यक्षम् यच्च (प्रजानाम् ) प्रजायन्ते इति प्रजास्नासां प्राणि- मात्राणाम् (अन्तः) शरीरमध्य आस्ते इतरोन्द्रियाणि बहिष्ठानि मनस्त्वन्नरिन्द्रिय- मित्यर्थः । तादृशं मे मनः शिवसङ्कल्पमस्त्विति व्याख्शतम् [ यजु० ३४२ ॥६॥ मावार्थ-कर्मानुष्टानमें तत्पर बुद्धिसम्पन्न भेधावी; यज्ञमें जिस मनसे उसमकर्मीको करते हैं मो प्राणिमात्र शरीरमध्यमें स्थित है भर्यात् इन्द्रियवाह्य और मन मन्तरमें स्थित है यज्ञ- सम्बन्धि वि भादि पदार्थों के ज्ञानमें जो अद्भुत का सबसे प्रथम पा मात्मरूपपूजनीयभावसे. स्थित है वह मेरा मन कल्याणकारी धर्मविषयकसंकल्पवाला हो ॥ ६ ॥ मन्त्रः। यत्मज्ञानमुत चेतोवृतिश्च यज्योतिरन्त- रमतम्प्रजासु ॥ यस्म्मान्नऽक्रुतेकिञ्चनक- म्मक्रियतेतन्मेमन-शिवसङ्कल्प्पमस्तु॥७॥ ॐ यत्प्रज्ञानमित्यस्य ऋप्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ ७॥ माध्यम्-(यत् ) मनः (प्रज्ञानम् ) विशेषेण ज्ञानजनकम् (उत ) अपि यन्मनः (चेवः) चेतयति सम्यग् ज्ञापयति तचेतः 'चिती संज्ञाने' सामान्यविशेषज्ञानज- नकमित्यर्थः । (च) यच्च मनः (धृतिः) धैर्यरूपं मनस्येव धैर्योत्पत्तर्मनप्ति धैर्य मुपधर्यत ( यत् ) यच्च ( अमृतम् ) आमरणधर्मि मात्मरूपत्वात् (प्रनासु ) जनेषु. (अन्तः ) अन्तर्वर्तमान। सत् ( ज्योतिः ) सर्वेन्द्रियाणां प्रकाशकमुक्तमा पुनरुच्यते (यस्मात् ) मनसः (ऋते ) विना (किञ्चन ) किमपि.( कर्म ) कर्म (न क्रियते) जनः सर्वकर्मसु प्राणिनां मनः पूर्व प्रवृत्तेः मनःस्वास्थ्यं विना कर्मा- मावादित्यर्थः (तन्मे मनः) इति व्याख्यातम् [ यजु० ३४ । ३ ॥७॥ भावार्थ-जो मन विशेषकर ज्ञानका उत्पन्न करनेवाला है और भली प्रकारसे सामान्य- विशेष-ज्ञानका प्रगट करनेपाला, चित्स्वरूप और धैर्यरूप है, आत्मरूप होनेसे अविनाशी,
(८)
रुद्राष्टाध्यायी-
[प्रथमो-
नो प्राणियोंके मध्यमें भन्तर वर्तमान प्रकाशक है, जिस मनके बिना मछमी कार्य नहीं
कियाजाता मह मेरा मन कल्याणकार्यम संकल्पवाला हो ॥ ७॥
मन्त्रः।
येनेदम्भतम्भुवनम्भावष्ण्यत्परिंगहीतम-
मृतेनुसबैम् ॥ ये युज्ञस्तायतैसुप्तहो-
तातन्मन:शिवसङ्कल्प्पमस्तु ।। ८॥
ॐ येनेदामित्यस्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ ८ ॥
भाष्यम्-(येन ) ( अमृतेन ) शाश्वतेन मुक्तिपर्यन्तं श्रीवादीनि नश्यन्ति
मनस्त्वनन्धरमित्यर्थः । मनसा (इदम्) (सर्वम्) सम्पूर्णम् (भृनम् ) भूतकालसम्बन्धि
वस्तु (भुवनम् ) भवतीति भुवनं वर्तमानक लसम्बन्धि, ( भविष्यत् ) मविष्यतीति
अविष्यत् (परिगृहीतम् ) सर्वतो ज्ञातं भवति त्रिकालसम्बद्धवस्तुपु मनः प्रवर्तत
इत्यर्थः । श्रोत्रादीनि तु प्रत्यक्षमेव गृहन्ति ( येन ) मनसा ( समहोता ) मतहो.
तारो देवानामाहातारी होतमैत्रावरुणादयो यत्र स सप्तहोता अग्निष्टोमे सप्ताहोता
भवन्ति । ( यज्ञः) अग्निष्टोमादिः (तायते ) विस्तार्यत ( तन्मे मनः ) इति
व्याख्यानम् [यजु० ३४।४] ॥ ८॥
भावार्थ-जिस अविनाशी मनसे (मुक्तिपर्यन्त रहनेसे मनको भविनाशी कहा ) यह
सम्पूर्ण भूतकालसम्बन्धी वस्तु, वर्तमान कालसम्बन्धी, होनेगले कालसम्पन्थी पदार्थ ग्रहण
कियेजातेहैं, (त्रिकालसम्बन्धी वस्तुमा मन प्रवृत्त होताह ) जिसके द्वारा सात होता होइ-
मैत्रावरुणादि-बाला मनिष्टोम यज्ञ विस्तार कियाजाताई वह मेरा मन यल्याणशरी स-
ल्पवाला हो॥८
मन्त्रः।
यल्म्मिन्नचुत्सामुयपि परिम्मन्प्रति-
ष्ठितारथनाभाविवारा ॥ यसिम्मश्चित्तर्छ
सङ्घमोतम्प्रजानान्तन्मेमन शिवसङ्कल्प्प-
मस्तु ॥९॥
। ऽध्यायः १.] भाष्यसहिता। (९) ॐ यास्मन्नित्यस्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥९॥ माष्यम्-(यास्मिन् ) मनसि (ऋचः) ऋचः (प्रतिष्टिताः) स्थिताः (यस्मिन् ) मनासे (साम) सामानि प्रतिष्ठितानि (यजुर्णपि) यजुर्मन्त्राः प्र० मनसः स्वास्थ्य एव वेदत्रयीस्फूर्तमनसि शब्दमात्रस्य प्रतिष्ठितत्वम् (रथनामी) रथचक्रनामी मध्ये (व) यथा (आराः) आराः प्रतिष्ठिताः तइच्छन्दजालं मनासि । किञ्च (प्रजानाम् ) प्रकृती- नाम् ( सर्वम् ) सर्वम् (चित्तम् ) ज्ञानं सर्वपदार्थविषाय ज्ञान ( यस्मिन् ) मनास ( बोतम् ) प्रोतं निक्षिप्त तन्तुसन्ततिः पटे इप सर्व ज्ञानं मनमि निहितम्, तन्मे मनः (शिवसंकल्पम् ) शान्तव्यापारम् ( अस्तु ) भवतु [ यजु० ३४५ ] ॥९॥ भावार्थ:-निस मनमें ऋचाएँ मर्यात् नाग्मेद स्थित है, जिसमें साम और यजुः स्थित हैं मनकीही स्वत्यतासे वेदश्यकी स्फूर्ति होती है। जिस प्रकार स्थचक्रकी नाभिम आरे स्थित है इसी प्रकार मनमें शब्दनाल स्थित है, प्रजाओंका सब ज्ञान जिसमें, पटमें तन्तुके समान मोतप्रोत है, वह मेरा मन पल्याणकारीकार्यमें सकल्पवान हो ॥ ९ ॥ सुषारविश्वानिवयन्मनुपण्यानेनीय।- भीशुभिर्वाजिन इव ॥ हृत्प्रतिष्ठेय्यदजिर- अविष्ठन्तन्मेमन शिवसङ्कल्प्पमस्तु॥१०॥ इतिसहितायांरुद्दपाठेप्रथमोऽध्यायः॥१॥ ॐ सुपारक्षिरित्यस्य ऋष्यादिविनियोगः पूर्ववत् ॥ १० ॥ भाग्यम्-( यत् ) मनः ( मनुष्यान् ) नरान् ( नेनीयते ') अत्यर्थमितस्ततो नयति । मनुष्यग्रहणं प्राणिमात्रोपलक्षणम् ( इव) यया' ( सुपारथिः ) शोभन: सारायः (अगीशुमिः) प्रग्रहः (वाजिनः ') वेगयुक्तान् ( अश्वान् ) अश्वान नेनीयने । यद्वा तत्र दृष्टान्तः (मुपारथिः) शोमतः सारथिर्यन्ता (इव ) यथा (अश्वान् अश्वान् कशया (ननीयते ) नेनीयते दिनीय। दृष्टान्तः ( इव ) यथा सुसारथः (थमीशुभिः) प्रोः (वाजिनः ) अश्वान्नेनीयत इत्यनुपङ्गः । उपमाद्यं प्रथमायां नयनं द्वितीयायां नियनम् । तथा मनः प्रवर्तयति नियच्छति च नरानित्यर्थः ( यत् ) यच्च मनः (अजिग्म ) जगरहितं वाल्ययौवनस्थापिरषु मनसस्तदवस्थत्वात् यच (जविष्टम् ) अतिनववढेगवत् जविष्ठम् “न वै वातात्किञ्चनाशीयोरित न मनसः किञ्च- (१०) रुद्राष्टाध्यायी- [द्वितीयो- - नाशीयोस्ति" इति श्रुतेः । यच्च मनः ( हत्प्रतिष्ठम् हृदि प्रतिष्ठा स्थितिर्यस्य तत् हृद्येव मना उपलभ्यत (तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.) इति व्याख्यातम । [ यजु० ३४॥ 1॥१०॥ भाषार्थ-जो मन, मनुष्यादि जीवाको इधर उधर लेनाता है। अर्थात-मनकी प्रेरणासही प्राणी कामि प्रवृत्त होते हैं, जैसे भन्छा सारथि लगामद्वारा वेगवान घोटाको रोजाना, जो मन बाश्य, युवा और मरासे रहित अतिशयवेगवान तुल्यादयमें स्थित है, अर्थात्-जैसे सारथी गामकी सहायतासे थोडौंको यथेच्छस्यलमें प्राप्त करताहै। इसी प्रकार चनुमादि इन्द्रिपोंको भवटम्बन करके मनुष्यादिके, शरीरके संगप्रत्यगको वारपार विविधविषयों प्रेरण करता, नो जरारहित और हृदय में स्थित है वह मेरा मन कल्याणकार्य साल्पवाका से॥ १०॥ इति श्रीरुद्राष्टके मुरादायादनिवासि-पण्डितण्यालाप्रमादमिश्रकृतसंस्कृनार्य- भाषामाप्यसमन्वित' प्रथमोऽध्यायः ॥ १॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः। मन्त्रः। सुहस्रशीर्षापुरुषत्सहस्राक्षासुहस्रपात् ।। सभूमिठसर्वतस्स्मृत्वात्यैतिष्ठदशाङ्गुलम् १ ॐ सहस्रशीपत्यस्य नारायण ऋषिः । निच्यदाय॑नुष्टप् छन्दः । पुरुषो देवता । स्तुतिकरणे विनियोगः ॥ १॥ भाष्यम्-( सहस्रशीपी ) सहस्रमसंख्यानि सर्वप्राणिशिरांसि यस्य सः । सर्वस्थूला- गोपलक्षणार्थमिदम् । (सहस्राक्षः ) सहसमसंख्यान्यक्षीणि यस्य सः । सर्वज्ञानेन्द्रि- योपलक्षणार्थमिदम् । ( सहस्रपात् ) सहस्रं पादा यस्य सः । सर्वकर्मेन्द्रिपोपलक्षणार्थ- मिदम् । एवंभूतः सः (पुरुषः) पूर्षु शेतऽवतिष्ठते तस्मात्पुरुषोऽन्यत्तादपि पर: साक्षी चेता परमात्मा ( भूमिम् ) पृथिव्यादिपंचभूतात्मकं सर्व भूमिमित्युपलक्षणं भूताना (सर्वतः) विश्वतः ( स्मृत्वा ) परिवेष्टय नामितः (दशांगुलम् ) दशांगुलपरिमित देशम् ( अत्यतिष्ठत् ) अतिक्रम्य व्यवस्थितः । हदयदेशेऽतिष्ठत् स्थितोऽस्ति स एवैक- स्तत्तद्देवतानामरूपैरुपास्यः । “सोय विज्ञानमयः पुरुषः प्राणिषु हृदयं ज्योतिः” इति । दशांगुलमित्युपलक्षणं ब्रह्माण्डादाहिरपि व्याप्यावस्थित इत्यर्थः । [ यजुर्वेदीयकत्रि- शोऽध्यायः। ॥१॥ भाषार्थ -अन्यक्त-महदादिसे विलक्षण, चेतन, श्रुतियों में प्रसिद्ध सब प्राणियोंकी समाष्टरुप ब्रह्माण्डरूप देहयुक्त विराट् है वही अनन्तशिरोसे युक्त है, जितने सब प्राणियोंके शिर है वह ज्यायः २.] भाष्यसहिता। (११) सम उसके शिरके अन्तर्वार्त होनेसे वह अनन्तशिर सपन्न है । सहस्रों नेत्रोंसे युक्त होनेसे सह साक्ष अर्थात सब ज्ञानेन्द्रियसपन्न है । सहस्रों चरणों से युक्त मात् कर्मेन्द्रिय संपन्न होनेसे यह सहस्रपात है वह पुरुष ब्रह्माण्डगोलकरूप भूमिको वा पंचभूतोंको तिर्यम, उ, नीचे, सब मोरसे व्यास करके वश मंगुल परिमित देशको अतिक्रमण करके स्थित हुआ। दशागुल ब्रह्मा- एका उपलक्षण है, अर्थात् ब्रह्माण्डसे बाहर भी सब ओर व्याप्त होकर स्थित है भयवा नामिके स्थानसे वश मंगुल अतिक्रमण करके हृदयमें स्थित है। ("सोय विज्ञानमयः प्राणेषु हृयन्त- ज्योतिः” इति श्रुतेः) विज्ञानात्मा, हृदयमें कर्मफल भुगाने के निमित्त अत्रस्थान करता है (हाम- पर्णा सयुजा सखाया समान वृक्षं परिपखजाते। तयोरन्यः पिफलं स्याहत्यननबन्यो अभिया' कशीति मग्वेदः ) इन कोकॉम पूर्ण करने और शयन करनेसे वह पुरुष है ॥ १ ॥ मन्त्रः। पुरुषऽएवेदठ-सत्यद्भूतयचंभाव्यम् ॥ उतामृतत्त्वस्येशांनोयदन्ननातिरोहति॥२॥ पुरुष इत्यस्य ना० ऋ० । निच्यदार्षीजगतीछन्दः । पुरुषो देवता । वि० पू० ॥२॥ ॐ माप्पम्-(इदम ) यत्किंचिद्वर्तमानकालीनं ( यद्धतम् ) यदतीतकालीनं (यच्च ) (माव्यम् ) भविष्यत्कालीनं तत (मर्वम् ) सम्पूर्णम् (पुरुष एव) परमात्मा एव यथास्मिन्कल्पे वर्तमानोः प्राणिदेहाः सर्वेऽपि विराटपुरुपस्यावयवाः तथैवातीतागामिनो- रपि कल्स्योटव्यमिति भावः । (उत ) अपि ( अमृतत्वस्य ) देवत्वस्य (ईशानः) स्वामी स पुहपः ( यत् ) यस्मात् ( अन्नन ) प्राणिनां मोग्येनानेन फलेन निमित्तभूतेन (अतिरोहति ) स्वीया कारणावस्थानतिक्रम्य परिदृश्यमाना, अगदवस्था प्रामोति । तस्मात्पुरुष एव प्राणिनां कर्मफलभोगाय जगदवस्थास्तीकारान्नेदं तस्य वस्तुत्वमित्यर्थः। अमृतवस्यामरणधर्मस्येशानः मुक्तरीशः यो हि मोक्षेश्वरो नासो नियत इत्यर्थः ॥२॥ मापार्थ-जो यह वर्तमान नगत् है, जो अतीत जगत् और नो जो मशिष्य जगत् है वह संपूर्ण पुरुषही है अर्थात् नेसे इस कल्ल्में वर्तमान प्राणियोंके देह विराटपुरुपके अवयव है वसे ही अतीत और मानेवाले कल्पोंके भी जानने और जो कि प्राणियों के भाग्यसे वा अनरूप फा के निमित्तसे अपनी कारण अवस्थाको अतिक्रमण करके जगतकी अवस्थाको प्राप्त होताह (भयवा मन्त्र के निमित्त जो संपूर्ण अतिरोहण जन्म मृत्यु होती है, उस सबन्धमें अमृतत्व देनेमें ईश्वर ही है) अर्थात् प्राणियोंके कर्मफल भुक्तानेको जगत्की अवस्था स्वीकार करताहै । पदि कहो कि जो सब पुरुष है तो परिणामी भी होसकताहै इसपर कहते हैं-मरणधर्मरहित मुक्तिका अधिपति अर्थात् सपूर्ण जीवीका जो कि ब्रह्मासे स्तम्पपर्यन्त हैं उनका अधिपति
--
M
(१२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[द्वितीयो-
पुरुष ही है, अर्थात् यही प्राणिगणको देवता करते हैं जिस कारण कि प्राणिगणके भोगोंके
निमित्त अपनी कारण अवस्था परित्यागपूर्वक कार्यावस्था मर्यात्-जगत्को स्वीकार कर
ते है ॥२॥
विशेष-भगवान यदि स्वय इस प्रकार अचिन्त्यशक्तिद्वारा जगतअवस्थाशे प्राप्त न हो तो यह
जगत् किसीके सबम्धमें स्वर्ग और किसीके संबध नरकरूप होनाय तो एकही वस्तु के लिये
स्वर्गनरकवरूप विरुद्धधर्मका प्रकाश असभव है। अनीश्वरवादी कहेंगे प्रकृतिका स्वभाव है,
"परन्तु ,आस्तिकगण कहेंगे जिसको नास्तिक प्रकृतिका स्वभाव कहते हैं उसीको इम ईश्वरकी
अचिन्त्यशक्ति कहते है ॥२॥
मन्त्रः।
एतावानस्यमहिमातोज्यायाँश्चपूरुषः ।।
पादास्यविश्वमितानित्रिपादस्थामृत-
.
न्दिवि ॥३॥
ॐ एतावानस्येत्यस्य नारायण ऋषिः । निच्यदापर्यनुष्ठपूछन्दः।
पुरुषो देवता । वि० पू० ॥३॥
भाष्यम्-(एतावान्) अतीतानागतवर्तमानरूपं जगद्यावदरित सर्वोपि ( अस्य)
पुरुषस्य (महिमा) स्वकीयसामर्थ्यविशेषः न तु तस्य वास्तव स्वरूपम् (च)(पुरुषः
अतः) अतो महिम्नोऽपि ( ज्यायान् ) अतिशयेन अधिकः (अस्य) पुरुषस्य (विश्वा)
सर्वाणि (भूतानि ) कालत्रयवर्तीनि प्राणिजातानि (पादः) चतुर्थाशः ( अस्य) पुरुष-
स्य अवशिष्टम् (त्रिपात् ) त्रिपादस्वरूपम् ( अमृतम् ) विनाशरहितं' सन् (दिवि )
द्योतनात्मके प्रकाशस्वरूपे व्यवसिष्ठत इमि शेषः । यद्वा त्रिपादू विज्ञानमयानंदरूपं दिवि
विद्योतने स्वमाहिनि स्वर्णे द्वारे व्यातिष्ठतीत्यर्थः । यदा-योगिध्येयं तदेव त्रिपात् दिवि
सत्यसंकल्पादी गुणे स्थितमित्यर्थः ॥ ३ ॥
भाषार्थ-अतीत, अनागत, वर्तमान कालसे सम्बद्ध जितना जगत् है यह सब इस पुरुषकी
सामर्थ्यविशेष विभूति है । वास्तविकस्वरूप नहीं है, और पुरुष तो इस महिमावाले जगत्से
अतिशय अधिक है, सपूर्ण तीनकालॊमें वर्तनेवाले प्राणिसमूह इस पुरुषका चतुर्थाश। इस
परमात्माका भवशिष्ट त्रिपात्स्वरूप विनाशाहित प्रकाशात्मक अपने स्वरूपमें स्थित है ।
यद्यपि ( सत्य ज्ञानमनन्त ब्रह्म) इस तैत्तिरीयारण्यकके वचनसे ब्रह्मकी इयत्ता कोई निरू-
पण नहीं करसकता तोमी उसकी अपेक्षा यह जगत् अतिअल्प है, इस कारण पादरूपसे
निरूपण किया है ॥ ३॥
ऽध्यायः २- भाष्यसहिता। (१३) मन्त्रः। त्रिपादुईऽउदैत्पुरुषुत्पादौस्येहामवत्पु- न ॥ ततोधिष्ण्वुव्यकामत्साशनानशु- नेऽअभि ॥४॥ ॐ त्रिपादूई इत्यस्य नारायण ऋषिः । आर्ण्यनुष्टुप् छन्दः । वि. भाष्यम्-(त्रिपात् ) योऽयं त्रिपात् (पुरुषः ) संसारस्पर्शरहितः ब्रह्मस्वरूप: (अर्द्धः) अस्मात् अज्ञानकार्यात् संसारात् बहिर्भूतोऽवत्यैः गुणदोपैरस्पृष्ट उत्कर्षे ण (उदैव ) स्थितवान् वा पादत्रयस्वरूप ऋग्यजुःसामलक्षणो भगवानादित्यः सोऽभ्यु- दैत् कर्मवन्धनिन्वधनानां स्थावरजंगमादीनामुपरिभूतः (मस्य) (पादः) लेशः (इह ) मायायां (पुनः) पुनरपि ( माभवत् ) सृष्टिसंहाराभ्यां पुनःपुनरागच्छति (ततः) मायायामागत्यानन्तरम् (विष्वक) देवतिर्यगादिरूपेण विविधः सन् (साश- नानशने ) साशनं मोजनादिव्यवहारोपेतं चेतन प्राणिजातं लक्ष्यते, अनशनं तद्र हितमचेतनं गिग्निद्यादिकं तदुभयं यथा स्यात्तथा ( अमि ) स्वयमेव विविधो मृत्वा (व्यकामत ) व्याप्तवान् ॥ ४ ॥ भाषार्थ-जो यह तीनपादयुक्त ससारस्पर्शरहित ब्रह्म, इस मज्ञानकार्यससारसे बहिर्भूत अर्यात्-इसके गुणदोषीसे अस्पृट होकर उत्कृष्टतासे स्थित हुभाई, इसका लेशरूप जगत् इस मायामें फिर प्राप्त होताहुआ, अर्याव-सृष्टि सहार द्वारा वारवार आगमन करताहुआ (विष्ट- भ्याइमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ) माया मानेके उपरान्त देवत्तियंगादिमें विविधरूप होकर अशनादिव्यवहारयुत्ता चेतनप्राणिसमूह इससे रहित गिरिनदीमादिक अर्थात्-स्थावर जंगमको देखकर व्याप्त करता हुआ । अर्थात् इन सबको निर्माण कर इनमें प्रवेश कर अनेक रूपसं व्याप्त हुआ ॥ ४॥ मन्त्रः। -- ततौछिराडजायत िराजोऽअधिपूरुषः ।। सजातोऽअत्यरिच्यत पश्चाभूमिमथोपुर, ॐ तत इत्यस्य ना० ऋ० । शेपं पूर्ववत् ॥५॥ ,
(१४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[द्वितीयो-
भाष्यम्-(ततः) अनन्तरमादिपुरुपात (विराष्ट्र) ब्रह्माण्डदेहः ( मनायत )
उत्पन्नः (विराजः ) विविधानि राजन्ते वस्तून्यप्रेति विराट् (मधि ) देहस्योपरि
तमेव देहमधिकरणं कृत्वा ( पुरुषः) तदेहाभिमानी कश्वित्पुरमानजायत योऽयं सर्व-
वेदान्तवेद्यः परमात्मा स एव स्वकीयमायया विराइदेहं ब्रह्माण्डरूपं सृष्ट्वा तत्र जीव-
रूपेण प्रविश्य ब्रह्माण्डामिमानी देवताल्मा जीवोऽभवत् (सः) विराट् पुरुषः (जात
जातः सन् ( अत्यरिच्यत ) अतिरिक्तोऽभूत् । विराडतिरिक्तो देवतिर्यमनुष्यादि
पोऽभूत् ( पश्चात् ) देवादिजीवभावादूर्ध्व (भूमिम् ) ससजेति शेषः अनन्तरं तेषां
जीवानां पुरः पूर्यन्ते सप्तमिर्धातुभिरिति पुरः शरीराणि ससर्ज ॥५॥
भाषार्थ-इसके उपरान्त उस आदिपुरुपसे ब्रह्माण्डदेड-जिसमें अनेकप्रकारकी वस्तु विरान-
मान होतीहै वह प्रकट हुआ, विरादेहको ऊपर उसी देहको अधिकरण परके उस देहका
अभिमानी एकही पुरुष हुआ, मीत-सपूर्णवन्दान्तसे जानने योग्य परमात्मा अपनी मायासे
विराट्देह ब्रह्माण्डकी रचना कर उसमें जीवरूपसे प्रवेश करके उसका मभिमामी देवतात्मा
नीवरूप हुमा, और वह विराट्र पुरुष प्रगट होकर अतिरिक्त-देवता, तिर्य, मनुष्यादिरूप
हुमा, देवादिजीवभावके उपरान्त भूमिकी रचना करताहुआ, भूमिरपनाके उपरान्त उन
जीवोंके सात धातुभोंसे पूर्ण होनेवाले शरीरॉकी रचना करताहुआ ॥ ५ ॥
मन्त्रः।
तस्म्माधुज्ञासङ्घहुतुत्सम्भृतम्पृषदाज्य-
स॥ पुर्णताँश्चकवायुयानारण्याग्या-
म्याश्चये॥६॥
ॐ तस्मादित्यस्य नारायण ऋषिः । आचीपंक्तिश्छन्दः । पुरुषो
देवता। वि० पू० ॥६॥
भाष्यम्-('तस्मात् ) ( सर्वहुतः ) ( सर्वात्मकः ) पुरुषो यस्मिन् यज्ञे हयते सोऽयं
सबहुतः तादृशातस्मात् पूर्वोक्तात् मानसात् ( यज्ञात् ) पुरुषमेधाख्ययज्ञरूपात
सर्वव्यापकात् पुरुषचतुर्थपादात (पृषदाज्यम् ) दधिमिश्रमाज्यं (सम्भृतम) समुत्प-
नम् भोगजातं सर्व सम्पादितमित्यर्थः । तथा ( तान् ) ( वायव्यान ) वायुदेवताकान्
(पशून) पशून् ( चक्रे) उत्पादितवान् (ये) मारण्याः (हरिणादयः) व (ग्राम्या:)
छागादयः तानपि चक्रे ॥६॥
भाषार्थ-उससे सर्वात्मा पुरुष जिसयज्ञमें हवनद्वारा पूजेनाते हैं, उस पुस्पमेधयज्ञसे दघिमि-
श्रित घृत संपादित हुमा, दघि आज्य आदि भोग्यजात वस्तु पुरुषद्वारा प्रकट हुई भार उस
पुरुषने उन वायुदेवतावाले पशुओंको उत्पन्न किया “अन्तरिक्षदेवस्याः खलु वे पशवः इति
श्रुतेः) नी वनके पशु हारेणादिक और ग्रामके पा गौ अश्व अदिक है ॥ ६॥
ऽध्यायः २.]
भाष्यसहिता।
(१५)
विशेष:-सर्व विश्व (संसार) पुरुष जिस यज्ञमें माहुप्तहुए, उस मानसयोगको सर्वहुत
करते हैं, सर्व प्रथम दधिवृतादि वस्तु प्रगट हुई, यहाँ दधिवृतादिभोग्य वस्तुसे वृक्षोंके रस
विशेष जानने यह घृत, दधि उपलक्षण है । पर्वतवासी योगीगण इन्हीं वृक्षोंके पृषदाज्यस्वरूप
मनफलोंको भोजन कर क्षुधा तृष्णा निवृत्त करते है, यहाँ दधि धृतसे उत्पन्न होनेवाले जीवों-
के खाद्यपदार्थकी सृष्टि जाननी, कोई कहते हैं-उस सर्वहुत यज्ञपुरुषद्वारा दधिमिश्रित घृत
सपादित हुआ, उससे ग्रामधारी अरण्यचारी और (प)कहनेसे नमश्चारी जीव उत्पन्न हुए।
इस स्थल में ययार्थ कर्तृत्व ब्रह्मको मानकर ब्रह्मसे अस्मदाविपर्यन्त यथार्थ कर्तृत्व नहीं है
ऐसा दिखाया है इसीसे कहा है कि उससे प्रगट हुए ॥ ६ ॥
मन्त्रः।
तस्माद्यज्ञात्वहुतुऋचुऽसामानिजज्ञिरे॥
छन्दांसिजजिरेतस्म्माघजस्तस्मादजा-
यत॥७॥
ॐ तस्मादित्य नारायण ऋपिः। आर्यनुष्टुप् । पुरुषो देवता ।
वि० पू० ॥ ७॥
माण्यम्-( तस्मात् ) (सर्वहुतः) सहूयमानात् ( यज्ञात् ) यज्ञपुरुषात् (ऋषः)
ऋग्वेदाः ( सामानि ) सामवेदाः (जज्ञिरे) जाताः (तस्मात् ) पुरुषात् छन्दा
सि) गायत्रीप्रभृतीनि (जज्ञिरे ) जाताः ( तस्मात् ) ब्रह्मणः (यजुः ) यजुराप
(अजायत ) जात इत्यर्थः ॥ ७ ॥
मापार्थ-उस सर्वहुत यज्ञपुरुषसे अस्, साम, उत्पन्न हुए। उसीसे छन्द अथर्वमत्र प्रकट
हुए, उससे यज्ञात्मक यजुः प्रगट हुभा ॥ ७ ॥
मन्त्रः।
तस्मादश्चा अजायन्तुयेकेचौभयादतः॥
गावाहजज्ञिरेतस्म्मात्तस्माज्जाताऽअंजा-
वर्यः ॥८॥
ॐ तस्मादित्यस्य नारायण ऋषिः । निच्यदाय॑नुष्टुप् छंदः ।
पुरुपो दे० वि० पू॥८॥
(१६)
रुद्राष्टाध्यायो-
(द्वितीयो
भाष्यम्-( तस्मात् ) ( यज्ञात् ) सर्वरूपयज्ञरूपात् ( अश्वाः ) यश्वाः (अजाय-
न्त ) प्रकटीभूताः (च) (ये के ) ( उभयादतः ) अश्वव्यतिरिक्ता गर्दभादय उनीधो-
भागयोर्दन्तयुक्तास्तेपि अजायन्त (ह) प्रसिद्धौ (तस्मात् ) पुरुषात् ( गावः )
गावश्च ( जज्ञिरे) अजायन्त (तस्मात् ) सर्वव्यापकात ( अजाक्यः) अजा अव-
यश्च अनाः छागाः अवयो मेषाश्च (जाताः ) जज्ञिरे । अत्र कण्डिकात्रय यत्किंचि.
विरास्मक विध्यर्थवादमन्त्राश्रया वेदाश्च पुरुषोत्तमात्पुरुषमेधयज्ञस्वरूपादेव सर्व
जातमिति वाक्यार्थः ॥ ८ ॥
भाषार्थ-उस यज्ञपुरुषसे घोडे उत्पन्न हुए जो कोई घोटोंसे मतिरिक्त गर्दमादि तथा
उपरनाचेके दांतोंसे युक्त हैं वे उत्पन्न हुए, प्रसिद्ध है कि उस यज्ञपुरुषसे गोएं प्रस्ट हुई,
उसीसे भेड बकरी उत्पन्न हुई ॥ ८॥
विशेष-पूर्वमत्रमें सामान्यतासे मारण्य और ग्रामके पशु उत्पन्न होने कहे, इस मंत्रमें यनका.
साधक विशेष पशुओका निरूपण किया है। ब्राह्मणभागमें उनके चित्र भी लिखे हैं। (स्यूल
पृषतीमाग्निवारुणीमनबाहीमालमेत ) अर्थ-निसका शरीर हष्ट पुष्ट गोल बडे बडे चित्रोंसे
युक्त हो नेत्र सूर्य और आग्निके समान रक्तवर्ण हों, उस गोशे यज्ञके घृत, दुग्यके निमित्त
ग्रहण करके फिर प्रदान करदे । इत्यादि यहाँ याज्ञेय पशुओं का वर्णन किपहि, इससे पहले
६मंत्रोंसे इसमें भेद है ॥ ८॥
मन्त्रः।
तंव्यज्ञम्बर्हिषिप्प्रोक्षुन्पुरुषजातमतः॥
ते देवाऽअयजन्तसाध्याऽऋषयश्चये॥९॥
ॐ तं यज्ञमित्यस्यादिपूर्ववत् ।। ९ ॥
भाष्यम्-( अग्रतः ) ( जातम् ) सृष्टेः पूर्व जातम्, पुरुषत्वनोत्पन्नं ( तम् .)
( यज्ञम् ) यज्ञसाधनमूतम् ( पुरुषम् ) यज्ञपुरुषं पशुत्वभावनया यूगे बद्धं
( वहिषि) मानसे यज्ञे (प्रोक्षन् ) प्रोक्षितवन्तः मानसयागं निष्पादिवन्तः (तेन)
पुरुषेण ( साध्याः) सृष्टिसाधनयोग्याः प्रजापतिप्रभृतयः (देवाः) निर्जनः (च)
(ऋषयः ) मंत्रद्रष्टारः ( अयजन्त ) यागं कृतवन्तः । अत्र कारण कार्योपचारात्
यज्ञेन यज्ञसाधनमभिधीयते प्रौक्षन् ग्रहणं सकलसंस्कागेपलक्षणार्थ तथा व पुरुष
पृषदाज्यादिरू यज्ञसाधनभूतं प्रोक्षणादिसंस्कारः संस्कृत्य तेन पृपदाज्यादिरूपेण
देवा याग कृतवन्त इति वाक्यार्थः ॥९॥
भाषार्थ-सृष्टिके पूर्वमें प्रकट हुए अर्यात-पुरुषरूपसे प्रादुर्भूत उस यज्ञमाधनभूत पुस्पको
मानखयज्ञमें प्रोक्षणादि सस्कारोंसे सस्कार करते हुए, उसी पुरुषसे जो साध्य देवगण मौर
ऋषि अर्थात् सृष्टिसाधनयोग्य प्रजापति और उनके अनुकूल मत्रद्रष्टा ऋषि मानसयागको
निष्पन्न करतेहुए ॥ ९॥
ऽध्यायः २ भाष्यसहिता। (१७) मन्त्रः। यत्पुरुधुव्यधुस्कतिघाव्यकल्पयन् ॥ मु- खुदिमस्यासीत्किम्बाहू किमूरू पादाऽउ- च्यते॥१०॥ ॐ यत्पुरुषमित्यस्य नारायण ऋषिः । नि० छं० पुरुषो दे० ॥ वि० पू०॥१०॥ माण्यम्-( यत् ) यदा ( पुरुष ) विराडपं ( व्यदधुः) प्रजापतेः प्राणरूमा देवा संकल्पेनोत्पादितवन्तः (तदा) तस्मिन्काले (क्षतिधा) कतिमिः प्रकारः (व्यकल्प- यन् ) विविधं कल्पितवन्तः (अस्य ) पुरुषस्य ( मुखम् ) मुखम् (किम् आसीत् ) किमासीत् ( को वाहू ) को वाहू अभूताम् (किम् ) (अरू) की उरू ( पादौ ) क च पादौ च्येते ) पादावपि किमास्तामित्यर्थः । पुरुषावयवनिरूपणे द्विवचनम् ॥ १० ॥ भाषार्थ-प्रश्नोत्तर रूपसे ब्राह्मणादिकी सृष्टि कहते हैं-प्रजापतिके प्राणरूपदेवता तथा साध्य गणादि निस समय विराष्ट्रपुरुपको संकल्पद्वारा प्रकट करतेहुए उस समय कितने प्रकारले कल्पना करतेहुए मर्थात्-पूर्ण करतेहुए इस पुरुषका मुख क्या हुआ, क्या भुजा, क्या जथा. कोन चरण कहे जातेहै ॥ १० ॥ विशेष-पहिले सामान्यप्रश्न और मुखादि विशेषप्रश्न है, अर्थात्-देवगण सृष्टि के निमित्त मानसयाग विस्तार करके जिस समय निन अमोघ संकल्पद्वारा विराटपुरुषको सृजन करतेहुए उस समय यह विराट् कितने प्रकारसे पूर्ण हुमा, क्या पदार्थ उसका मुख बाहु ऊरू मार चरण हुमा। तात्पर्य यह है कि-अपियोंने मानसयागमें सूक्ष्मदृष्टिसे ब्रह्मरूप प्रजापति के मुख वाहू आदि मंगोंका अवलोकन किया और उसमें ब्राह्मणादि जातिका दर्शन किया॥१०॥ " मन्त्रः। ब्राहमुणोस्युमुखमासीद्वाहूराजन्य कृता ।। ऊरूतस्युयीश्य पुद्भयाशद्रोऽमजाय- त॥११॥ ॐब्राह्मणोस्यत्यस्य वि० पू० ॥ ११॥ २ .
(१८) रुद्राष्टाध्यायी- [द्वितीयो- भाष्यम्-ब्राह्मण इति पूर्वकण्डिकायां स्तुत्यर्थ विकल्पः कृतः आकाशोत्यापना- पात्र स्तुतिमाह-(ब्राह्मणः) बाह्मणत्वजातिविशिष्टः पुरुषः (अस्य) प्रजापतेः (मुखम्) मुखम् (आसीत् ) मुखादुत्पनः (राजन्य ) क्षत्रियः (पाहू कृतः) वाहुत्वेन निष्पादितः ( अस्य) प्रजापतेः ( यत् ) यौ (ऊरू) (तद् वैश्यः ) तपो वैश्यः सम्पन्नः अरु- भ्यामुत्पन्न इत्यर्थः । (पद्भ्याम् ) पादाभ्यां (शूद्रः ) शूद्रत्वजातिमान् पुरुषः ( अजा- यत) उत्पन्नः । अयमेव ब्राह्मणादिचतुष्टयरूप इति वाक्यार्थः । अयमेव कृष्णयजुःस हितायां सप्तमकाण्ड स मुखतत्रिवृत्तं निगमिमीत इत्यादी विस्पष्टमानातः ॥११॥ भाषार्थ-ब्राह्मणत्वनातिविशिष्ट पुरुष इस प्रजापतिका मुख हुआ, अर्यात-मुखसे उत्पन्न हुमा, क्षत्रियत्वजातिविशिष्ट पुरुप बाहुरूपसे निप्पादित हुआ, सर्यात-भुजाओंसे प्रकट हुमा । इसकी जो जघा है वह वैश्य हुअ चरणोंसे शूद्रजाति विशिष्ट पुरुप उत्पन्न हुमा, मुखादिसे ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति कृष्णयजु के सप्तम काडमें लिखी है, (स मुखतविकृतं निर- मिमीत ) तथा (तिसृभिरस्तुवतब्रह्मामूख्यत [१४ । २८ यजः . ]) इस प्रकार स्पष्ट लिखी है, इसीसे सायणाचार्य और महीधरने इसी प्रकार मर्य किया है यहां कल्पना और उत्पन्न होना दो शब्द इस कारण आये है कि, पुरुपमेधर्मे जो सब जातिके पुरुष बैठे हैं उनको वि- राटरूपसें मानना कल्पना है और सृष्टिपक्षमै उत्पत्ति है इससे दो शब्द आये हैं ॥ ११ ॥ मन्त्रः। चन्द्रमामनसोजातश्चक्षोह सूर्योऽअजा- यत । श्रोत्राहायश्वष्ाणश्चमुखाग्निर- जायत ॥ १२॥ ॐ चन्द्रमा इत्यस्य नारायण ऋ० । आर्यनुष्टुप् छ । पुरुषो देवता । वि० पू० ॥ १२॥ भाष्यम्-अस्य प्रजापतेः (मनसः) सकाशात् (चन्द्रमाः ) शशी (जात:) उत्पन्नः (चक्षाः) चक्षुषः (सूर्यः)सूर्यः (अजायत ) उत्पन्नः (च)(श्रीवात् ) कर्ण- विराद ( वायुः ) पवनः (प्राणश्च ) प्राणोऽपि (मुखात् ) स्यात् (मग्निः पतिः ए अजायत) उत्पन्नः। अन्यत्र चन्द्रमाः सूर्यो वाहुभ्यो मनश्चक्षुः श्रोत्रेभ्य इति चन्द्रम:- प्रभृतीनामुत्पत्तिरिति सृष्टिक्रमः । अत्र तु अचिन्त्यमहिन्नि पुरुषे मनश्चक्षुः श्रोत्रेभ्यः चन्द्रमाप्रभृतीनामुत्पत्तिकम इति विपरीतोऽर्थः स्वतिारीत वाक्यार्थः ।। १२ ॥
- . ऽध्यायः २] भाष्यसहिवा। (१९) भापार्थ-जैसे गौमादि, ब्राह्मणादि उससे उत्पन्न हुएहैं, इसी प्रकार उसके मनसे चन्द्रमा प्रगट हुआहे, चक्षुओंसे सूर्य प्रगट हुआई, श्रोत्रसे वायु.और प्राण प्रगट हुए और मुखसे भग्नि प्रगट हुई ॥ १२॥ विशेष-यह जो भनि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा लक्षित होतेहैं इनमें चेतनता है या नहीं इसका विचार इस प्रकार जानना कि, इनमें मषिष्ठित होकर विराट्का अश (शक्ति) चेतनवस्तु है, जिसको चन्द्र कहते हैं, वह चन्द्र देवताके रहनेका एक प्रधान गोलक इसी प्रकार दृश्य- मान मूर्य, मान भी सूर्य और अग्निदेवताके रहने के प्रधान स्थान हैं, इसी प्रकार सवदेवता- ऑमें जानलेना । इन संपूर्ण देवताओंके प्रधान स्यान एक एक गोला होकर भी इनके संपूर्ण अश अपने अपने कारणस्थानमें अधिष्ठातृदेवता होकर अवस्यान करते हैं जिस प्रकार जलका प्रधानस्थान समुद्र होकर भी उसके किचित् २ मा सपजीवों में हैं इसी प्रकार विराटके मन- से समष्टि चन्द्र हुमा उसके कुछ २ मंश कारणस्यान मनमें स्थितहो भधिष्ठाह देवतारूपसे समस्थान करते हैं अधिष्ठातृदेवता ही अधिष्ठानका चालक होता है। इसी प्रकार सूर्यका भी प्रधानस्थान यह दृश्यमान सूर्यलोक वा सूर्यगोलक होकर भी उसके किचित् भश हमारे चक्षु- अभि मावर अधिष्ठातृदेवतारूप होकर रहते है जिससे हम देखते है । अधेका अधिष्ठातृदेवता विदारूप है, इसी प्रकार अग्निदेवताका प्रधानस्यान अन्तरिक्ष यु और जठर-यह तीन हैं तो भी अपने किचित् अंशसे अपने कारणस्यान (हमारे मुखमें स्थित वाक्-इद्रियमें स्थित होकर अधिष्टावदेवता होकर मवस्यान करते हैं इसी प्रकार सपूर्ण देवताओंमें जानना. मजब्राह्मणमें महाँ (मृब्रवीत्मापोऽनुवन् ) ऐसा आताह वा ( तेहेमेप्राणामहंश्रेयसेविवदमानब्रह्मजग्मुः कॉपीतकी) प्राणादिक अपनी श्रेष्ठतासंपादन करते प्रजापतिके समीप जाकर कहनेलगे ऐसे स्थानों में यही जानना कि, यह जडके संपोधन नहीं किन्तु उनके मधिष्ठातृदेवता हैं, सो प्रारंभमें भी कहकह, पिछला साधा (मुखादिवश्वाग्निश्च प्राणाहायुरजायत) ऐसा है मुखसे भग्नि और ब्राह्मण दोनोंकी उत्पत्ति है इस कारण दोनोंमें माहुति होती है ॥ १२ ॥ मंत्रः । नामयोऽभासीइन्तरिक्षशीषणोद्यौल्स- मवर्त्तत॥पुद्भयाम्भमिर्दिशुल्श्रोत्रात्ता लोकशाऽअकल्प्पयन् ॥१३॥ ॐ नाभ्या इत्यस्य विनियोगः पूर्ववत् ॥ १३॥ माप्यम्-(नाभ्याः) प्रजापते भेः (अन्तरिक्षम् ) आकाशम् (आसीत् ) उत्प- नम् (शीर्णः ) शिरसः (द्यौः ) धुलोकः (समवर्तत) उत्पन्नः (पद्भ्याम् ) पादाभ्यां (भूमिः ( पृथिवी) श्रोत्रात् (कर्णात् ) दिशः (दिश उत्पन्नाः) तथा ( इत्थम्) लो- -(२२) रुद्राष्टाध्यायी- [द्वितीयो- सप्तच्छन्दोरूपाः") इक्कीस समिधामाकी अर्थात् बारह महीने पांच ऋतु तीन कोक और यह मादित्य यह इस यज्ञमें काष्ठरूपसे भावित कियेगये मयवा सात क्षीरादि समुद्र यज्ञकी परिषी हुई। कारण कि-भरतखण्डमें यज्ञ होते हैं और गायत्रीआदि सात अतिजगतीआदि सात और कृत्यादिसात यह इक्कीस छन्द इसके सानिधारूप हुए यही इस ब्रह्माण्डके और शरीरके भावरण हैं इन्नी स्थिति है ॥ १५॥ मन्त्रः। युशेनयज्ञमयजन्तदेवास्तानिधम्माणिष्ण- थुमान्याछन् । तेहुनाकम्मदिनान सचन्तु यत्रपसाध्ध्याइसन्तिदेवा ॥१६॥ ॐ यज्ञनेत्यस्य नारायण ऋषिः । ब्राष्णिक्छं० यज्ञा देवता। वि० पू० ॥१६॥ भाष्यम् ( देवाः) प्रजापतिप्राणरूपाः सिद्धसंकल्पाः ( यज्ञेन) यथोक्तेन यज्ञसा- धनभूतेन संकल्पेन सामय्या वा ( यज्ञम् ) पुरुष यज्ञस्वरूपं प्रजापति विष्णुं वेति । “यज्ञो वै विष्णुः” इति श्रुतेः । (अयजन्त ) पूजितवन्तः ( तानि) ते (धर्माणि ) धर्माः ( प्रथमानि ) मुख्यानि (आसन् ) आभूषन् । अन्यत्र तदर्शनमसंभावितमेवे- त्यर्थः । (यत्र ) यस्मिन् विराट्प्राप्तिरूपे नाके (पूर्व ) पूर्व ( साध्याः ) साध्यादयो देवाः ( सन्ति ) वर्तन्ते तम् ( नाकम् ) विराप्राप्तिरूपं स्वर्ग (ह) निश्चयेन (ते) (महिमानः) तदुपासकाः ( सचन्ते ) समवयन्ति प्राप्नुवन्ति । इति पुरुपसूक्तान, बाकः ॥ १६ ॥ मांषार्थ-सिद्धसंकल्प देवता मानसयज्ञसे यज्ञस्वरूप प्रजापतिका पूजन करतेहुए, वे यज्ञ- पुरुष पूजनसवधि धर्म वा जगदूपविकारोंके धारण करनेवाले मुख्य हुए अर्थात् उसके फल्के चिरन्तन धर्म प्रथम हुए । यहाँतक सृष्टिप्रतिपादक सूक्तमाग है । अगला उपासनारूप फला- नुवादक भाग कहते है, जिस विराट्माप्तिरूप स्वर्गमे पुरातन विराट् उपाधिसाधक देवता स्थित रहते हैं. विराट्प्राप्तिरूप स्वर्गको ही वे उपासक महात्मा प्राप्त होते हैं, इससे सृष्टिका प्रवाह निस्य दिखाया । ( "सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्" इति ) ॥ १६ ॥ अथोत्तरनारायणम् । मन्त्रः। अद्भयत्सम्भृतः पृथिव्यैरसांचविश्वकर्मणुल ऽध्यायः २.] भाष्यसहिता। (२३) समवर्तुताग्दै ॥ तस्युत्वष्टाविदद्वपमें- तितन्मय॑स्पदेवत्वमाजानुग्मये ॥१७॥ ॐ अद्भय इत्यस्य नारायण ऋषिःभुरिणाषत्रिष्टुप्छन्दः। आदित्यो दे । सूर्योपस्थाने वि० ॥१७॥ भाष्यम्-(पृथिव्यै ) पृथिव्या अपि (च) (अद्यः) जलात् (सम्भृतः) पुष्टः भत्र पृथिवीपदं पंचभूतोपलक्षणार्थ तेन पंचभूतोत्पत्तिपूर्वकाल एव सम्भृतः पुष्ट इत्यर्थः । (विश्वकर्मणः) विश्वं कर्म यस्य तस्य कालस्य ( रसान् ) प्रीतिर्यो रसः (मने) प्रथमं (समवर्तत ) समभवत् । यदा विश्वकर्मणो जगन्निर्माणेच्छाऽभूत्दैव समवर्तत इत्यर्थः । भुतपंचकस्य कालस्य सबै प्रति कारणत्वात् पुरुषमेधयाजिनो लिंगशरीरे पंचभूतानि तुष्टानि कालश्च । ततस्तुष्टेभ्यः कश्चिद्सविशेषफलरूप उत्तमज- न्माद उत्पन्नः वेत्यर्थः । (तस्य ) रसस्य (पं) तद्रूपं ( विदधन् ) धारयन् (खष्टा) आदित्यः (एति) प्रत्यहमुदयं करोति । (अने) प्रथमं (मर्त्यस्य ) मनु- । व्यस्य सतस्तस्य पुरुषमेधयाजिनः ( आजानम् ) मुख्यम् (तत्) (देवत्वम् ) सूर्यरू- पेण-तस्मात्तस्यादित्यस्य तद्रूपं मण्डलाकार मर्त्यस्य मनुष्याणां सृष्टितोऽपि अग्रे पूर्व देवत्वं विदधत् धारयत एति वेत्यर्थः । द्विविधाः देवाः कर्मदेवा आजानदेवाश्व-उत्कृष्टेन कर्मणा देवत्व प्राप्ताः कर्मदेवाः सृष्टयादाकुत्पन्ना आजानदेवाः ॥ १७ ॥ भाषार्थ-पृथिवीआदि टिके निमित्त अथवा पृथिवीसे और जलोंसे पृथिवीके ग्रहण करने पंचभूतका ग्रहण है, अर्थात् पचभूतोसे जो रस पुष्ट हुआ, और जिसका विश्व कर्म है उस कालकी प्रीतिका रस सबसे प्रथम होताहुआ, पचभूत और काल इन सबके प्रति कारण होने पुरुषमेघयाजीके लिंगशरीरमें पांच भत और काल तुष्ट होते है, उनके तुष्ट होनेसे कोई रस फछविशेष उत्तमजन्मका देनेवाला उत्पन्न हुमा । उस रसको रूप धारण करताहुआ आदित्य प्रतिदिन उदय करता है प्रथम मनुष्यरूप उस पुरुषमेधयाजी के सूर्यरूपसे मुख्य उस देव- वको प्राप्त करता है, दो प्रकारके देवतां होते हैं-कर्मदेव और आनानदेव, कर्मसे देवत्वको प्राप्तहुए कर्मदेव, सृष्टिकी आदिमें उत्पन्नहुए आजानदेव होते हैं. कर्भदेवोंसे सौगुणा अधिक मानन्द आनानदेवताओंको होताहै ('ते कर्मदेवेभ्यः श्रेष्ठाः ये शत कर्मदेवानामानन्दाः स, एक आजानदेवानामानन्दः' इति श्रुतेः।) [ बृहदारण्यक ४ । १ । ३५ । ] पुरुषमेधयाजी, पूर्वकल्पमें आदित्यरूपको प्राप्तहुआ स्तुति किया है ॥ १७ ॥ विशेष-पृथिवीआदि सष्टिके निमित्त उसके द्वारा जलसे रस हुमा। वही सब जगत्का उपा- दानस्वरूप है, उससे ही यह समस्त जगत् जो आगे वर्तमान था उसकी सृष्टि हुई, तब इस नगदके रूपविधानार्थ त्वष्टाकी सृष्टि हुई, उन्होंने इस मर्त्यभुवनमें कर्मदेवत्व प्रगट किया। मुक्तपक्षम-पुरुषमेधयानीके कर्मले फलरूप रस प्रगट होताहै । वह कर्मफलका देनेवाला यह । 4 (२४) रुद्राष्टाध्यायी- [द्वितीयो- सूर्य है, यह पुरुष सूर्यमें गमन कर आदित्यरूपको प्राप्त हो जाता है। और यही मुक्तिको मार्ग है सो आगे प्रगट करते हैं ॥ १७ ॥ मन्त्रः। वेदाहमेतम्पुरुषम्महान्तमादित्यवर्णन्त- मसत्पुरस्तात् ॥ तमेवविदित्वातिमृत्यु मैतिनान्यपन्थविद्युतय॑नाय ।। १८॥ ॐ वेदाहमित्यस्य नारायण ऋषिः । निच्युदापत्रिष्टुपू छ० पुरुषों दे० । वि० पू० ॥१८॥ भाष्यम्-(अहम्) (एतम् महान्तम् ) सर्वोत्कृष्टम् (आदित्यवणम् ) सूर्य- सदृशम् उपमान्तराभावाद स्वोपमम् (तमसः) अंधकारस्य ( परस्तात् ) दूरतरम् तमोरहितमित्यर्थः । तमाशब्देनाविद्याच्यते ( पुरुषम् ) सूर्यमण्डलस्थं (वेद) जानामि (तम् ) आदित्यम् (एव) (विदित्वा ) ज्ञात्वा (मृत्युम) मरणम् ( अत्येति) अविकामति परं ब्रह्म गच्छति (अयनाय ) आश्रयाय (अन्य ) द्वितीयः (पन्था) मार्गः (न विद्यते) नास्ति । पुनरावृत्तये मोक्षाय अन्यः पन्था न विद्यते तथा चायमेव पुरुषो ध्यानगम्यो जातो मोक्षं ददातीति वाक्यार्थः । यथा मादित्यः स्वप्रकाशकः परा- नापि प्रकाशयति तथाऽयमपि स्वप्रकाशब्रह्मरूपी जगदपि प्रकाशयीत्यर्थः ॥ १८ ॥ मषार्थ- मैं इस सबसे उत्कृष्ट आदित्यरूप और उपमा न होनेसे अपनी ही समान संघ- बारसे परे अधकाररूपी भविद्यासे दूर पुरुषको जानताहूँ उसही आदित्यको जानकर मृत्युको आक्रमण करताहै, अर्थात् परमब्रह्मको प्राप्त होताहै, आश्रयके निमित्त दूसरा मार्ग नहीं है, सूर्यमण्डलके अन्तमें आत्मरूप पुरुषको ही जानकर मुक्ति होताहै ॥ १८ ॥ विशेष-उस कारणरूप सबसे उत्कृष्ट जगदीश्वर भादित्यवर्ण विद्याप्रकाशक परमेश्वरके ज्ञानसे ही मनुष्यकी मुक्ति होतीहै, यही देवयान मार्ग कहाताहै, इसके सिवाय मुक्तिका दूसरा मार्ग नहीं है, इसीसे आत्मा तदाकार होताहै उस समय जो ईश्वरकी महिमा है उसको यह जानता है ॥ १८॥ मन्त्रः। प्रजापतिश्चरतुिगर्भऽअन्तरजायमा- नोबहुधाबिजायते । तस्युयोनिम्परि- ऽध्यायः २.] भाष्यसहिता। (२५) श्यन्तिवीरास्तस्मिन्हतस्त्युब्र्भुव॑नानि विश्वा ॥१९॥ ॐ प्रजापतिरित्यस्य नारायण ऋषिः । भुरिगाषी त्रिष्टुप् छ । पुरुषो देवता । वि० पू० ॥ १९ ॥ भाष्यम्-(प्रजापतिः) प्रजानां पतिः (अन्तः) अन्तहदि स्थितः सन् (ग) मध्ये ( चरति ) प्रविशति प्राणिनां मध्ये जीवात्मकरूपतया वसतीत्यर्थः । ( अजा- यमानः) नित्यत्वादनुत्पत्तिधर्माऽपि (बहुधा) बहुप्रकारेण कार्यकारणरूपेण (जायते) स्थावरजङ्गमात्मकदेहेषु जन्म लभते, यद्वाऽजायमानोऽपि गर्ने बहुधा विजायते रामा- दिशरीरेणेत्यर्थः । गायया प्रपञ्चरूपेणोत्पद्यत इति वा । (धीराः ) ब्रह्मविदः (तस्य ) प्रजापतेः (योनि) स्थान स्वरूपम् ( परिपश्यन्ति ) अहं ब्रह्मास्मीति जानन्ति ध्यानेन सम्यगुपलक्ष्यन्त इत्यर्थः । (ह) ( तस्मिन् ) तस्मिन्नेव ब्रह्मणि (विश्वा) सर्वाणि (भुवनानि ) भूसजातानि (तस्थुः) स्थितानि स्वर्गमृत्युपाता- लादिस्थितानि सवै तदात्मकमेवेत्यर्थः ॥ १९ ॥ माषार्थ-त्मिा प्रजापति अन्तर्हृदयमें स्थित हुमा प्रत्येक गर्भके मध्यमें प्रविष्ट होताहै। उत्पन्न न होनेवाला और नित्य होकर भी अनेक प्रकार कार्यकारणरूपसे उत्पन्न होताहै, अर्थात मायाद्वारा प्रपंचरूपसे रामादिशरीर घर उत्पन्न होताहै, ब्रह्मके ज्ञाता उस प्रजापति के स्थान- स्वरूपको देखतेहैं, ( अहं ब्रह्मास्मीति ) इस प्रकारसे जानते हैं संपूर्ण भूतसमूह प्राणी उसी कारणात्मा ब्रझमें स्थित हैं अर्थात् संपूर्ण जगत् तदात्मक है, आशय यह कि सर्वत्र परमात्मा स्थित है, वही सबमें व्याप्त होकर मनन्मा होकर भी अनेकरूप धारण करता है ॥ १९ ॥ मन्त्रः। योदेवेश्यऽआतपतियो देवानाम्पुरोहि- तलं ॥ पूर्वायोदेवेश्योजातोनमौरुचायु ब्राह्मये ॥२०॥ ॐ यो देवेभ्य इत्यस्य नारायण ऋ० । आय॑नुष्टुप् छं० पुरुषो दे । वि० पू० ॥२०॥ भाष्यम्-(यः) प्रजापतिरादित्यरूपः ( देवेभ्यः) देवानां प्रयोजनाय ( भाव- पति ) आ समन्ताद्भावेन द्योतते (यः) ( देवानाम् ) अमराणाम् ( पुरोहितः ) -- (२६) रुद्राष्टाध्यायी- [द्वितीयो- कार्येष्वने नीतः देवानां हविदर्दानाय पूर्वमग्निरूपेणाधीयत इत्यभिप्रायः । (य) (देवेभ्यः) देवेभ्यः सकाशात् (पूर्व) (जातः) उत्पन्नः तस्मै (रुचाय) रोचमानाय (ब्राह्मये)ब्रह्म- भूताय ब्रह्मण अपत्यं ब्राहिः तस्मै, बह्मावयवमूताय वेत्यर्थः । (नमः) नमोऽस्तु ॥२०॥ भाषार्थ-जो आदित्यरूप प्रजापति देवताओंके निमित्त सब मोरसे प्रकाशित होताई, नो देवताओंका सब कार्योंमें अग्रणी है, या प्रथम हितकर तथा पूज्य है, जो सब देवतामा प्रयम प्रगट हुआहै उस दीप्यमान ब्रह्मके अवयंवरूपके निमित्त नमस्कार है ॥ २० ॥ विशेष-जो सूर्यरूपसे सब देवताओंको तपाते, जो अग्निरूपसे देवताओंके ,पुरोहित, जो कारणजलसे सबसे पूर्व प्रगट हुए है उन ब्राह्मीकान्तिमान्के निमित्त नमस्कार है ॥ २० ॥ फुचम्बाहमञ्जुनयन्तो वाऽअग्रेतदेवयन् ॥ यस्दैवम्बाहमणोछिद्यातस्य देवाऽअसु- वश ॥२१॥ ॐ रुचमित्यस्य नारायण ऋ० । आष्यंतुष्टपू छ । पुरुषो देवता। वि० पू० ॥२१॥ भाष्यम्-(देवाः) ब्रह्मादयः यदा दीप्यमानाः प्राणाः ( रुचम् ) शोमनम् (ब्राह्मम्) ब्रह्मणोऽपत्यमादित्यम् (जनयन्तः) उत्पादयन्तः (बग्रे) प्रथमम् (तत्) ( अन् वन्) अयमेवास्माकं मुख्य इत्युक्तवन्तः । किं च हे पुरुषोत्तम (यः) (ब्राह्मणः) ब्राह्मणः (त्वा) त्वाम् (एवम् ) उक्तविधिना (विद्यात् ) जानीयात (तस्य) आदित्यो- पासकस्य ब्राह्मणस्य (देवाः) देवगणाः (वशे) इच्छायाम् (असन्) भवन्ति । आदित्यो- पासको जगत्पूज्यो भवति तथा च सहस्रशीत्यादिग्रन्थतोऽर्थतश्चाधीत्य यो ब्राह्मणः पुरुषोत्तमं जानाति ब्रह्मादयः देवास्तस्यामिलपिवान्सम्पादयन्तीति वाक्यार्थः ॥ २१ ॥ भाषार्थ-दीप्तिमान इन्द्रियोंके देवता शोभन ब्रह्म ज्योतिरूप आदित्यको प्रगट करतेहुए प्रथम वह वाणी बोलतेहुए हे आदित्य । जो ब्राह्मण तुमको उक्त प्रकारसे प्रगट हुआ अजरामर जाने उस आदित्यउपासनावाले ब्राह्मणके देवता वशमें होते हैं ॥ २१ ॥ मन्त्रः॥ श्रीश्यतेलुक्ष्म्मीचुपक्यावहोरापाव नक्षत्राणिरुपमुश्विनीऽध्यातम् ॥
ऽध्यायः २.] माष्यसहिता । (२७) ष्ष्णनिषाणामुम्मऽइषाण सर्वलोकमऽ इषाण॥२२॥ इतिसहितायांरुद्रपाठेद्वितीयोऽध्यायः२॥ ॐ श्रीश्चत इत्यस्य नारायण ऋ० । निच्यूदापत्रिष्टुप् छन् । पुरुषो देवता। वि० पू० ॥२२॥ माण्यम् हे देव पुरुषोत्तम (श्रीः) श्रीयतेऽनया श्रीः सम्पत्तिः (च) (लक्ष्मीः सौन्दर्यम् (ते) तब (पल्यौ) नायास्थानीये (' च ) ( अहोरात्रे ) अहोरात्रे (पाश्वे) पार्श्वस्थानीये । अहः शब्दः परब्रह्मपरः तस्य विद्यात्मकत्वेन प्रकाशरूपत्वात रात्रिशब्दः संसारपरः प्रकृतिपरः तस्याविद्यात्मकत्वेन प्रकाशरूपत्वात् एतेन धर्मार्थ- कामात्मकः संसारमोक्षश्च श्रीपरमेश्वरपाश्र्वद्धयमित्युक्तं भवति । ( नक्षत्राणि ) गग- नगास्ताराः (रूपम् ) तव मूर्तिः (अश्विनौ ) द्यावापृथिव्या (व्यात्तम् ) विकासित- मुखस्थानीये विवृतं मुखमित्यर्थः । (इष्णन् ) कर्मफलमिच्छन् सन् (इषाण) गच्छ अनुगृहाण ( अमुम् ) परलोकम् (मे)(इपाण ) मम परलोकः समीचीनोऽस्तु मे इमं लोकं भार्यापुत्रजनादिकमिषाण न केवलममुं किन्तु भूरादिसप्तलोकम् इषाणायं वाक्यार्थः। (सर्वम् ) पशुपुत्रादिधनयुक्तामिह लोकं स्वर्गमोक्षादिकमिच्छितवाञ्छामात्रेणैव सवै (में) मह्यम् (इपाण) इच्छेत्यर्थः । सर्वात्मकोऽहं भवेयमितीच्छेत्यर्थः ॥२२॥ भाषार्थ-हे स्वप्रकाशस्वरूपं । श्री जिसकेद्वारा सपूर्णनन माश्रणीय होते हैं, और.निसके द्वारा देखानाताह सौंदर्य रूप लक्ष्मी भापकी वीस्थानीय है और दिनरात पार्श्वस्थानीय हैं आकाशमें स्थित नक्षत्र आपका रूप हैं कारण कि तुम्हारेही तेजसे प्रकाशित हैं द्यावापृथिवी तुम्हारे मुखस्थानमें व्याप्त है ( "अश्विनी द्यावापृथिव्या इमे हीद ७ सर्वमश्नुमाताम् " इति श्रुतेः।) कर्मफळकी इच्छा करते इच्छा करो, परलोककी मेरे निमित्त इच्छा करो अर्थात मेरे निमित्त परलोक समीचीन हो ऐसी अमोघ इच्छा हो सवलोकात्मक मै होजाऊ. अर्थात मुक्त होनाऊँ ऐसी मेरे निमित्त इच्छा करो ॥ २२ ॥ सरलार्थ-मनुष्योंको इस प्रकार ब्रह्मबोध काम करना चाहिये कि हे देव । श्री और लक्ष्मी शोभा वा कान्ति और सपत्ति यह तुम्हारी पत्नीरूप हैं, दिनरात तुम्हारे दोनों पार्श्वचारी, तुम्हारे रूपसे नक्षत्र रूपवान हैं, द्यावापृथिवी तुम्हारे शरीरके रक्षकरूपसे सावधानतासे तुमको दृष्टिपूर्वक व्याप्त करके स्थित है, यदि तुम इच्छा करो तो यह लोक तो तुम्हारी इच्छानुगत है सवलोकही तुम्हारी इच्छानुगत है, मुझ उपासकको ब्रह्मप्राप्ति हो, मै सर्वन आपको अनुभव करूँ, यह आदित्यमें ब्रह्मउपासना है ॥ २२ ॥ इति श्रीरुद्राष्टके पण्डितज्वाळासादमिश्रकृतसस्कृतार्यभाषाभाष्यसमन्वितो, द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥ ,
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(२८)
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रुद्राष्टाध्यायी-
[तृतीयो-
अथ तृतीयोऽध्यायः।
मन्त्रः।
आशुशिशांनोवृषभोनीमोघनाघुनक्षो-
भणश्चर्षणीनाम् ॥ सुक्रन्दनोनिमिषाएं
कवीरशुतहसेनाऽअजयत्साकमिन्द्र ॥२॥
ॐ आशुरित्यस्याप्रतिरथ ऋषिः आपी त्रिष्टुप्० । इन्द्रो देवता जपे
विनियोगः ॥ १॥
माप्यम्-( बाशुः) शीघ्रकारी व्यापको वा (शिशानः) शावनकर्ता (वृषभः
वृषभः (न) इव (भीमः) भयानकः (घनाधना) घातक शत्रूणां हन्ता ( चर्ष-
णीनाम् ) मनुष्याणाम् (क्षोभणः) सञ्चालक ( संक्रन्दनः ) सम्यक् क्रन्दयिता
प्राणिनामाकर्षण प्रहारेण वा (अनिमिषः) अप्रमादी चक्षुर्निमेषरहितः सर्वदा स्वयज्ञ-
गमनयुद्धादिकार्येष्वनलस इत्यर्थः । (एकवीरः ) विक्रान्तः असाहाय्येन कार्यक्षम
इत्यर्थः । (इन्द्रः) इन्द्रो देवता (शर्त सेनाः) वह्वीः सेनाः ( साकम् ) एकदैव
( अजयत्) जितवान् [ यजु० १७ । ३३ ] ॥१॥
भाषार्थ-शीघ्रगामी, वज्रकी तीक्ष्णकारी वर्षणशीलकी उपमावाला, भयकारी, शत्रुमौका
अतिशयघातक वा वृष्टि करनेमें मेघरूप, मनुष्योंके क्षोभका हेतु, बारबार गर्जन करनेवाला,
मथवा शत्रुओंका आह्वान करनेवाला, देवता होनेसे पलक न लगानेवाला अत्यन्तसावधानवा
निरंतर जाग्रत् वा उपर २ विद्युत्प्रकाशयुक्त एक अद्वितीय वीर इंद्रनामसे प्रसिद्धने साथही
एक सौ २ शत्रुसेनाको जय कियाहै, इस मंत्रके विशेषण अवतारोम भी घटते है तथा इस
मन्त्रमें सेनानायकके गुणोंकाभी वर्णन है कि, वह इस प्रकारका होना चाहिये ॥ १ ॥
मन्त्रः।
सुकन्दनेनानिमिषेण जिष्णुनाथुत्कारे-
दुश्च्यबुने धष्णुना ॥ तदिन्द्रेणजयतुत
सहदुष्युधोनरऽइपुहस्तेनुनुष्ष्णा॥२॥
ॐ सङ्कन्दनेनेत्यस्याप्रतिरथ ऋषिः । विराड्ब्रायनुष्टुप्० इन्द्रो
दे० वि० पू० ॥२॥
ऽध्यायः ३.] भाष्यसहिता । (२९) माष्यम्-(युधः) हे योद्धारः ( नरः) हे मनुष्याः ( धृष्णुना ) प्रसहनशीलेन (संक्रन्दनेन ) शब्दकारिणा (युत्कारेण ) युद्धकारिणा ( अनिमिषेण ) निमेषराहतेन एकवित्तेन वा (इषुहस्तेन ) बाणपाणिना ( जिष्णुना ) जयशीलेन (दुश्यवनेन ) अपच्युतस्वभावेन (वृष्णा) वर्षणशीलेन (इन्द्रेण ) इन्द्रेण (वत् ) तयुद्धं (जयत) जयत (तत्) शत्रुबलम् (सहध्वम् ) अमिमवत ॥२॥ माषार्थ-हे युद्ध करनेवाले मनुष्यो। प्रगल्भ भयरहित शब्द करनेवाले, बहुत युद्ध करनेवाले, एकचित्त, माण हाथमें धारण किये, जयशील, अजय्य, कामनामोंके वर्षानेवाले, इन्द्रकै प्रभा- वसे उस शत्रुसेनाका जय करो और उस शत्रुसेनाको वशीकरके विनाश करो । सेनानायकोंका यह मत्र पढकर इन्द्रकी सहायतासे युक्त हो युद्ध करना चाहिये [यजु० १७३४] ॥ २॥ मन्त्रः। सऽइपुंहस्तत्सनितिमिर्चशीस वष्टास युधुऽऽइन्द्रोगुणेन ॥ सुठसृष्टुजित्खौमुपा- बाहुशद्धयंग्प्रचंन्यापतिहिताभिरस्तां ॥३॥ ॐ सऽइषुहस्तरित्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः । आपत्रिष्टुप० । इन्द्रो देवता वि० पू० ॥३॥ भाष्यम्-(सः) (वशी) जितेन्द्रिय कान्तो वा (इषुहस्तैः)वाणहस्तैः (निषङ्गि- भिः) निषङ्गः खड्गः तद्वद्भिः भटैः ( संस्रष्टा) एकीभवनशीला (स.) (गणेन)शत्रुसं- घेन ) युधः युद्धकता (स इन्द्रः) इन्द्रः (संसृष्टजित्) संसृष्टान् शत्रून् जयति (सोमपाः) सोमस्य पाता (वाशी) वाहुवलोपेतः (उग्रधन्वा ) उद्यतधन्वा (प्रतिहिवामिः) प्रेरितामिरिषुभिः (अस्ता) मारयिता । ईदृशेनेन्द्रेण जयति सम्बन्धः । [ यजु०१७ 1 ३५] ॥३॥ भाषार्थ-वह नितेन्द्रिय पा शत्रुओंको पश करनेवाला अथवा मनोहर सर्वजनोंका प्रिय, अथवा स्वतंत्र वा शत्रुओका ऐश्वर्य ग्रहण करनेपाला बाण हाथमे लिये धनुषधारियोंसे युद्धके निमित्त ससर्ग करनेवाला, वह शत्रु समूहोंसे युद्ध करनेवाला है, वह इद्र युद्धके निमित्त संगतहुए शत्रुमोका जीतनेवाला, यजमानोंके यज्ञमें सोमपान करनेवाला, बाहुओंके बलसे युक्त, उत्कृ- धनुषवाला, मपने धनुपसे प्रेरित वाणोंसे शत्रुओंपर चलताहै वह इन्द्र हमारी रक्षा करे ॥ ३ ॥ मन्त्रः। बृहस्प्पतुपरिंदीयारथैनरक्षोहामित्राँ २।।
(३०) रुद्राष्टाध्यायी- द्वितीयो- अपबाधभानः ॥ प्रभुञ्जन्सेनाप्रमुणो युधाजयन्नुस्माकमेद्ध्यत्तिारानाम॥४॥ ॐ बृहस्पत इत्यस्याप्रतिरथ ऋषिः। आपी त्रिष्टुप् छ। बृहस्पति देवता । वि० पू० ॥ ४॥ भाष्यम्-(बृहस्पते ) बृहतां पते पालयितः देव (रक्षोहा) रक्षसां हन्ता (स्थेन) (परिदीयाः) परिगच्छ (अमित्रान् ) शत्रून् ( अपवाधमानः) सर्वतो नाशयन् (सेनाः) शत्रुसम्बधिनीः सेनाः ( प्रभञ्जन ) प्रकर्षण नाशयन् ( युधा ) युद्धेन (प्रमृणः) प्रमर्दकान् ( जयन्) जयन् ( अस्माकम् ) (स्थानाम) स्थानाम् (अविता) गोप्ता ( एधि ) भव [ यजु० १७ । ३६ ] ॥ ४ ॥ भाषार्थ-वाणीके पति व्याकरणकर्ता होने से इन्द्रका नाम वृहस्पति है,मथवा उनके पुरोहित बृहस्पतिका सपोधन है, हे कृस्पते । तुम राक्षसों वा विनोंके नष्ट करनेवाले हो, रथ द्वारा सब ओर गमन करते शत्रुओंको पीडा देतेहुए शवओकी सेनाको अतिशय पीडा करतेहुए युद्धसे हिंसा कारियोंको जय करतेहुए हमारे रथोंके रक्षक हो ॥४॥ मन्त्रः। बलविज्ञायस्स्थविरहप्रवीरसहस्वान्याजी साहमानऽउग्य ॥ अभिवारोऽअभिसत्त्वा सहोजाजैत्रमिन्द्ररथमातिष्ठगोवित्॥५॥ ॐ बलविज्ञाय इत्यस्याप्रतिस्थ ऋषिः । आषी त्रिष्टुप् छन्दः । इन्द्रो दे० वि० पू०॥५॥ माष्यम्-(इन्द्र ) हे इन्द्र त्वम् ( बलविज्ञायः) सर्वभूतवलं विजानातीति चलविज्ञायः ( स्थवीरः ) सर्वानुशासकः सर्वमान्यश्चिरन्तनो वा ( प्रवीरः प्रकृष्टो वीरः (सहस्वान् ) वलवान (वाजी ),वाजमान् वाजमन्नम् ( उग्रः) उद्गुणबलः ( अमिवीरः ) वीरमभिलक्षीकृत्य गच्छतीत्यभिवीरः ममिगता वीरा चीवन्तोऽनुचरा यस्य सः तथोक्तः । ( अभिसत्त्वा ) सत्त्वममितिष्ठति स:
ऽध्यायः ३.]
भाष्यसहिता।
(३१)
(सहोजाः ) बलाज्जातः (गोवित् ) स्तुविज्ञाता (' सहमानः ) शत्रूणाममिभाववा
(जैत्रम् ) जयशीलम् (रथम् ) रयम् ( आतिष्ठ ) पस्य साहाय्यार्थमारोहु-
महोस [ यजु० १७ । ३७ ] ॥ ५ ॥
माषार्थ-हे इन्द्र ! तुम दूसरोंका वल जाननेवाले पुरातन, सबके अनुशासन करनेवाले,
मतिशय शूर, महाबलिष्ठ, मन्त्रवान, युद्धमें क्रूर, सब मोरवारोंसे युक्त, सब ओर परि-
चारकों से युक्त, वळसे ही उत्पन्न, स्तुतिको जाननेवाले, शत्रुमौंके तिरस्कारकर्ता हो, अपने
नयशील रथम आरोहरण करो ॥ ५ ॥
मन्त्रः।
गोत्रमिदंडोवि बज्जबाहुजयन्तमज्म-
प्रमुणन्तुमोजसा ।। कुमठसंजाताऽअनु-
बीरयमिन्द्रठसखायोऽअनुसरभम
"
ॐ गोत्रभिदमित्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः। भूरिगापों त्रिष्टुप छं ।
इन्द्रो देवता । वि० पू० ॥६॥
भाष्यम्-(सजाताः ) सहोत्पन्ना योद्धारः (सखायः) परस्परं सखिभूना यूयं
(इमम्) (गोत्रमिदम् ) वृष्टयर्थ मेघं भिनत्ति त पर्वतानां भेत्तारं वा (गोविदम् )
पण्डितम् (वज्रवाहुम् ) वज्रहस्तम् (अज्म जयन्तम् ) संग्राम जयन्तम् अज्मे-
वि युद्धनाम् [निघ०२।१७।४३ ]" (ओजसा ) बलेन (प्रमृणन्तम् ) मईयन्तम्
(इन्द्रम् ) देवेन्द्रम् ( अनुवीरयध्वम् ) वीरकर्म युद्धं कुरुवम् ( अनुसंरभध्वम् )
अनुगम्य संरंमं कुरुत [ यजु० १७ । ३८ ]॥६॥
भाषार्थ-हे समानजन्मवाले देवताओ । इस असुरलोकके नाशक वा मेषके भेदन करनेवाले
देववाणीके ज्ञाता, पंडित, हाथमें वज्र धारण करनेवाळे, सग्रामके जीतनेवाले वळसे शत्रुओंको
मारनेवाले, इन्द्रको वीरकर्मका उत्साह दिवाभो, और इस वेग करनेवालेके उपरान्त
तुम वेग करो ॥६॥
मन्त्रः।
अभिगोत्राणुिसहसागाहमानोदयोवीरशु-
तमैन्युरिन्द्र ॥ दुश्च्यवन पृतनापाडयु-
द्धृयोल्म्माकुर्छ सेनाऽअवतुष्प्रयुत्सु॥७॥
(३२)
रुद्राधान्यायी-
[तृतीयो-
ॐ अभिगोत्राणीत्यस्याप्रतिरथ ऋषिः । निच्युदापी विष्णुप० ।
इन्द्रो देवता । वि० पू ॥ ७ ॥
माष्यम्-( अदयः ) निवासः निर्दयो वा (वीरः) विक्रान्तः (शतमन्युः) बहुयज्ञः
बहुक्रोधो वा (दुश्च्यवनः ) अन्यरचाल्यः ( पृतनापाट् ) शत्रसेनानामगिभविता
(अयुध्या ) सम्पहर्तुमशक्यः (इन्द्रः ) ऐश्वर्ययुक्तदेवः (युत्सु) संग्राम्पु (गोत्राणि)
अभ्राणि असुरकुलानि या ( सहसा) वलेन ( अभिगाहमानः) प्रविशन ( अस्माकम् )
(सेनाः) चमः (प्रावतु ) रक्षतु [ यजु० १७ । ३९] ॥ ७ ॥
भाषार्थ-शत्रुओंपर दयारहित, विक्रान्त, अनेक प्रकारकै क्रोधयुक्त, वा, शतयज्ञकर्ता,
निसको कोई च्यावित न करसके, अजेय सप्राममें सेनाको सहकर तिरस्कार करनेवाला, कि-
सके संग कोई युद्ध नहीं करसकता, सो इन्द्र युद्धोम ममुरकुनेको वा मेघवृन्दाको एकसायही
विलोडित करताहुमा हमारी सेनाकी रक्षा करें ॥ ७ ॥
मन्त्रः।
इन्द्रऽआसान्नेताबृहस्पतिर्दक्षिणायुज्ञ:पुर
sएंतुसोमः ॥ देवसेनानामभिभातीना-
अयन्तीनाम्मुरुतोयुन्त्वग्ग्रंम् ।। ८॥
ॐ इन्द्र इत्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः । ब्रायुष्णिक छं० । इन्द्रो
देवता वि० पू० ॥ ८॥
भाष्यम्-(आसाम् ) अस्मत्सहायार्थमागतानाम् (देवसेनानाम् ) व्यूहरचनानाम
(इन्द्रः) देवेन्द्रः (नेता) नायकः अस्तु (बृहस्पतिः) वृहस्पतिः (पुः) पुरस्तात्
(एतु) आगच्छतु ( दक्षिणा) दक्षिणस्यां दिशि ( यजः ) ज्ञः (सोमः ) सोमः
(पुर एतु) अग्रे आगच्छतु यदा दक्षिणायज्ञः सोमः पुर एतु सेनानाम् । किम्भूतानाम्द
( अमिभञ्जतीनाम् )शत्रून् मर्दयन्तीनाम् ( जयन्तीनाम् ) विजयमानानाम् तासाम
(मरुत) मरुद्गणः (अग्रम् ) सेनाप्रमागम् (यन्तु) गच्छतु [ यजु०१७।४०]॥ ८ ॥
भाषार्थ-बृहस्पति, इन्द्र, इन शत्रुओंको मर्दन करनेवाली विनयशीळदेवसेनासों शिक्षक
या पालक हैं, यज्ञपुरुष विष्णु वा यज्ञ सोमदक्षिणा मागे गमन कैर, गणदेवता सेनाके सन-
मागमें गमन करें । अथवा विष्णु दक्षिणओरसे रक्षाको गमन करें, वा यज्ञ सोम दक्षिणा
फुल जपको प्राप्त करें, यही प्रकार सेना चलानेका है ॥ ८ ॥
ऽध्यायः ३.] भाष्यसहिता। मन्त्रः। इन्द्रस्यवृष्णोबरुणस्युराज्ञऽआदित्याना- म्मुरुता शर्द्धऽ उग्ग्रम ॥ महामनसा म्भुवनच्युवानाकोषों देवानाअयंतामु स्थात॥२॥ ॐ इन्द्रस्येत्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः । आषी त्रिष्टुप् छन्दः । इन्द्रा- दयो देवताः। वि० पू० ॥९॥ भाष्यम्-(वृष्णः ) वर्पतुः (इन्द्रस्य ) देवेन्द्रस्य ( राज्ञः) (वरुणस्य ) वरुणदे- वस्य (आदित्यानाम् ) आदित्यसंज्ञकानाम् ( मरुताम् ) मरुद्गणानाम् ( शर्द्धः । इस्त्यश्वपादान्तलक्षणं वलम् ( उग्रम् ) उद्गीर्णायुधं यथा स्यात्तथा उद्धभूक (जयताम् ) जयशालिनाम् । ( महामनसाम् ) उत्कृष्टचित्तानाम् (भुवनच्यवानाम् भुवनच्यवनसमर्थानाम् (देवानाम् ) देवतानाम् ( घोषः ) जितंजितमिति शब्द (उदस्थात् ) उत्तिष्ठति [ यजु० १७ । ४१] ॥ ९ ॥ भाषार्थ-महामन अर्थात् युद्धमै स्थिरचित्त, लोकनाशकी सामर्थ्यवाले, जयशील देवता चारह आदित्य मरुद्गणों और कामनाकी वर्षा करनेवाले इन्द्र और राना वरुणका उत्कृष्ट बल अर्थात् गन, तुरग, रथ, पैदलोंकी सेनाका देववलकी जय देववलकी जय यह शब्द सम्य- प्रकारसे हुआ, अर्थात् देवताओंकी वलप्रकाशक उग्रवज्र पनि सर्वदा समुत्थित ताहै। सेनानायकोंको इन देवताओंका स्मरण कर जयशदपूर्वक सेना चलानी चाहिये ॥ ९ ॥ मन्त्रः। उईर्षयमघवन्नायघान्युत्सत्वनाम्साम- कानाम्मनांसि ॥ उबृहन्याजिनांजा- जिनान्तर्धानाअयंताव्यन्तुघोषासा१०॥ ॐ उद्धर्पयेत्यस्य अप्रतिस्थ ऋपिः । ब्राहयुष्णिक छन्दः । इन्ड्रो देवता । वि० पू० ॥ १० ॥ माष्यम्-(भगवन् ) हे इन्द्र ( आयुधानि ) अस्मदीयानि शस्त्राणि ( उपर्य) उद्गतहर्षाणि कुरु प्रहरणेपूयुक्तानि भवन्त्वित्यर्थः । ( मामकानाम् ) अस्मदीयानस ३
(३४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ तृतीयो-
का सत्यानाम् ) सैनिक्षानाम् ( मनासि ) चेतांसि (उत् ) उद्धर्पय (वृत्रहन ) हे
देवेन्द्र (वाजिनाम् ) श्वानाम् (वाजिनानि ) बलानि ( उत् ) उद्धर्पय तथा
(जयताम् ) जयशालनाम् ( स्थानाम् ) (घोपाः ) शब्दाः ( उद्यरतु ) उद्गन्ठन्तु
[ यजु० १७ । ४२] ॥ १०॥
भाषार्थ-हे इन्द्र ! अपने आयुधोंको भली प्रकार तीक्ष्णतापूर्वक हपित करो, हमारे जीवोंके
बीरोंके मन हर्पित करो, घोडोंके शीघ्रगमनको उत्कृष्टतायुक्त करो, हे इन्द्र जयशीलरयोंके
शुन्द फैले अर्थात् विजयी रथोंकी हपध्वनि प्रकाशित हो ॥ १० ॥
मन्त्रः।
अल्माकमिन्दुसमतेषुद्धजेष्वम्लाउँथ्या-
जवस्ताजयन्तु।। अपामावीराऽउत्तरेमव
ननुरूमाँ २॥ऽउंदेवाऽअवताहवैषु॥११॥
ॐ अस्माकमित्यस्याप्रतिस्थ ऋषिः । निच्यदापी त्रिष्टुप् छन्दः ।
इन्द्रादयो देवताः। वि० पू० ॥११॥
माण्यम्-( अस्माकम् ) अस्माकं सम्बन्धिष्वेव (समृतेषु ) परसेनां सम्मासेषु
(ध्वजेषु) धनवत्सु सैनिकेषु (इन्द्रः ) इन्द्रः भविता भवतु (अस्मासयू) अस्मा-
कम् (या इषवः ) ये बाणाः सन्ति (ताः) ता एव (जयन्तु ) जयशो भवन्तु ।
तथा (अस्माकम् )(वीराः ) मटाः (उत्तरे ) उपारे (भवन्तु ) विजयिनो भान्त
किंच ( देवाः ) हे देवाः (हवेषु ) संग्रामेषु ( अरमान ) (3) निश्चयेन ( ब )
रक्षत । [ यजु० १७ । ४३ ] ॥ ११॥
माषार्थ-धजायोंके मिलनेमें अर्थात् जिस समय हमारी रणपताका शत्रुओंकी रणपताकासे
सम्मिलित हो, उस समय इन्द्र हमारी रक्षा करें, और हमारे जो बाण है वे प्रयोग करनेमें शत्रु
सेनाको ताडन करके जय प्राप्त करें, हमारे शूर शत्रुके योधाषि उत्कृष्ट हो, और देवता
संग्रामोंमें हमारी रक्षा करें ॥ ११ ॥
मन्त्रः
अमीषांञ्चुितप्रतिलोमयन्तीगृहाणा-
शान्यये परेंहि ॥ अमिोहिनि हहत्सु
शोरन्धेनामिन्चात्तसंसासचन्ताम्॥१२॥
ऽध्यायः ३.]
भाष्यसहिता।
(३५)
ॐ अमीषामित्यस्याप्रतिस्थ ऋषिः । ब्राहयुष्णिक् छन्दः । इन्द्रसे-
ना देवता । वि०पू० ॥१२॥
भाष्यम्-( मधे ) हे पापाभिमानिनि देवते त्वम् ( अमीषाम् ) योद्दणां शत्रूणाम्
(चित्तं ) मलांसि (प्रतिलोपयन्ती) विमोहयन्ती सती (अङ्गानि ) शिरमादिकान्
(गृहाण) स्वीकुरु । ततः (परेहि ) परागच्छ ( अभिप्रेहि ) अभिगच्छ तेषां समीपं
गत्श च (हृत्सु) हृदयेषु (शो) दुःखः (निदेह ) नितरां भस्मीकुरु (अमित्राः)
यस्पच्छनकः ( अन्धेन तमसा ) अज्ञानलक्षणेन (सचन्ताम् ) सेवन्ताम् ॥ [ यजु०
१७ । ४४ ] ॥ १२ ॥
भापार्य-हे शत्रुओं के प्राणोंको कष्ट देनेवाली व्याधी। इन शवों के चित्तोंको मोहित करती
हुई शत्रुओंके शरीरोंको ग्रहण करतीहुई दूर चलीजा, सब ओरसे दूसरे शत्रुओंको ग्रहण
करके चल उनके हृदयाँको धन पुत्र नाश आदिके निमित्तसे दुग्ध करो, हमारे शत्रु गाढ
अहंकारसे सगतिको प्राप्त हो ॥ १२ ॥
विशेष-इन वारह मत्रोंमे परमात्माने यह उपदेश कियाहै कि सेना सेनापति शूरवीर इस
प्रकारके गुणयुक्त एकचित्त परस्पर सहायकारी होने चाहिये और इन्द्ररूप परमात्माकी प्रार्थना
कर शत्रुओपर चढाई करनेसे धर्मसे विजय प्राप्त होगी यह विचारे तथा सब देवताओंकी
तृप्ति साधन कर विजयको गमन कर मध्यात्मपक्षमें काम, क्रोध, लोम और मोह ही
शव हैं इन्हीका जय करना है । सप्वा व्याधिकी अधिष्ठात्री देवता है ॥ १२ ॥
अवसृष्टापरांपतुशध्ये ब्रह्मसर्लशिते ।
गच्छानिवामपंचास्वमामीयाङ्कञ्चनो
च्छिषः ॥ १३॥
ॐ अवसृष्टत्यस्याप्रतिस्थ ऋषिः । आर्ण्यनुष्टुप् छन्दः । इषुदैवता।
इघुप्रयोगे विनियोगः ॥ १३ ॥
माध्यमू-(ब्रह्मशंसिते) मंत्रेण तीक्ष्णीकृते ( शख्ये ) हिंसाकुशले इषो त्वम्
(अष्टा ) सिता सनी (परायत ) इतो देशात् नियत (गच्छ ) गत्वा च (अमि-
त्रान् ) शत्रून् (प्रपद्यस्व ) प्राप्नुहि ( ममीषाम् ) शत्रूणां मध्ये (कञ्चन ) किंचिदपि
(मा उच्छिपः) अवशिष्टं मा कुरु । शत्रूनुत्कृत्तमूलान् कुर्वित्यर्थः। [ यजु० १७ ॥
४५] ॥ १३ ॥
भाप र्थ-ब्रह्ममासे तीक्ष्ण किये हुए है पाणरूप ब्रह्मास्त्र ! तुम हमसे छोडे हुए एक साथ
शत्रुसेनापर गिरो, गिरकर शवगोको ग्रास करो और शत्रुमोके शरीरमें प्रवेश करके इनमें
किसीको भी मत छोडो॥ १३ ॥
रुद्राष्टाध्यायी-
[तृतीयो-
-
मन्त्रः।
प्रेताजयंतान इन्द्रोबुहशम्मयच्छतु॥ उमा-
वसन्तुबाहवानाधृष्ष्यायथासंथ॥ १४ ॥
ॐ प्रेत इत्यस्याप्रतिस्थ ऋषिः । विराडार्ण्यनुष्टुप् छन्दः । योधा
देवता। वीरोत्तेजने विनियोगः !! १४॥.
भाष्यम्-( नरः) हे मनुष्या नेतारः संग्रामस्य निर्वाठारो योद्धारः (प्रेत) प्रकर्षण
गच्छत गत्वा च ( जयत) प्रतिभटान जयत (इन्द्रः ) इन्द्रः (क ) युष्माकम्
(शर्म) कल्याणम् ( यच्छतु ) ददातु, किंच (वः) भवताम् (वाहवः ) भुजाः
(उग्राः) उद्गुर्णवलाः ( सन्तु ) भवन्तु । तथा (अनाधृष्याः) अन्यरनमिभाव्या:
(यथा) यथा यूयम् ( असथ ) भविष्यथ तथा वो वाइवः उग्राः सन्तु [ यजु०
१७ १ ४६ ] ॥१४॥
भाषार्थ-हे हमारे योषामनुष्यों । शत्रुओंकी सेनापर शीघ्रतासे जामो, और विजय प्राप्त
को अवश्य जय होगी, इन्द्र तुमको जयसे प्राप्त हुए सुखको प्रदान करें, तुम्हारी भुजायें
उद्गूर्णायुधवाली हृष्ट पुष्ट हों, जिससे तुम किसीसे भी तिरस्कार न पानेवाले हो ॥ १४ ॥
मन्त्रः।
असाव्यासेनामरुतत्परेषामुळ्येतिनुऽओज
सारुष्प्पर्द्धमाना ताहतुतमुलापत्रतेनुय-
थामीऽअन्योऽअन्यन्नजानन्॥१५॥
ॐ असौ इत्यस्य अप्रतिस्थ ऋषिः । निच्यदार्षी त्रिष्टुप् छ ।
मरुतो देवता सेनोत्तेजने विनियोगः ॥ १५ ॥
भाष्यम्-( मरुतः) हे मरुतः (असौ या सेना वाहिनी)(ना) अस्मान् (ओजसा)
चलेन (स्पर्द्धमाना) स्पृहायुक्ता (परेषां) शत्रूणां (मभ्येति ) अभिमुखमति ( ताम्)
सेनाम् ( अपव्रतेन ) अपगतकर्मणा "व्रतमिति कर्मनाम" [निघ०२।१। ७ )
(तमसा ) अंधकारेण तथा(गृहत) व्याप्नुत (यथा) येन (अमी) योद्धारः (अन्यः
अन्यम् ) अन्योऽन्यम् (न जानन )न जानीयुरित्यर्थः। [यजु०१७। ४७ ॥ १५ ॥
ऽध्यायः ३.]
भाष्यसहिता।
(३७)
भाषार्थ-हे मारुतो ! वा है सेनानायकगण ! जो यह शत्रुमोंकी सेनों वलसे स्पर्धा कर-
तीहुई हमारे सन्मुख भागमन करती है, उस सेनाको कर्मरहित अंधकारसे इस प्रकार
आच्छादित करो, कि-जिस प्रकार यह शसेनाके लोग परस्पर नही जानते हुए परस्पर अस्त्र
चलाकर नर हा ॥ १५॥
मन्त्रः।
यत्रबाणासुम्पतन्तिकुमाराविशिखाऽईव ।।
तन्नुऽइन्द्रोबृहस्पतिरदितिशम्मयच्छतुवि-
श्वाहाशमयच्छतु ॥ १६ ॥
ॐ यत्रेत्यस्य अप्रतिस्थ उपिः पंक्तिश्छन्दः । ब्रह्मणस्पतिरदिनिश्च
देवते । प्रार्थने चिनि० ॥ १६ ॥
माष्यम्-चित्र ) संग्रामे (विशिखाः) मुण्डिताः (कुमाराः ) वालकाः (इक
(वाणाः) शगः (सम्पतन्ति ) सम्यक्तया पतन्ति (तत्) तत्र (इन्द्रः ) इन्द्र
(वृहस्पतिः) वृहनां पतिः (यदितिः ) देवमाता (शर्म) सुखम् (ना) अस्माकम्
(यच्छतु ) ददातु (विश्वाहा) सर्वदा (गर्म ) मुखम् ( यच्छतु ) ददातु पुनरुक्ति-
रादगी [ यजु० १७ । ४८] ॥ १६ ॥
भाषार्य- जिस रणक्षेत्र में वीरगकि छोडे हुए बाण इधर उधर गिरते हैं, जिस प्रकार
शिलारहित या लसीयावाटे छोटे पालक चपलताके कारण इधर उधर फिरते हैं, उस युद्ध में
वृहस्पति देवता मथवा मंत्रोंक पालक विजयके उचित मोंकी जाननेवाली देवमाता अथवा
अखण्डितशक्ति इन्द्र हमको कल्याण प्रदान कर, वह सम्पूर्ण शत्रुओंको मारनेवाला कल्याण
प्रदान करें ॥ १६॥
मन्त्रः।
मम्माणितवाणाच्छादयामिसोमस्त्वारा-
जामृतलानुवस्ताय ॥ छोरीयोवरणस्वेक-
गोतुजयन्तुन्स्वानुदेवासदन्तु ॥ १७ ॥
इति सहितायां लजाप्ये तृती-
घोऽध्यायः॥३॥
(३८)
रुद्राष्टाध्यायी-
[चतुर्थी-
ॐ मर्माणीत्यस्य अप्रतिरथ ऋषिः त्रिष्टुप् छन्दः । सोमवरुणो
देवते । कवचप्रयच्छने विनियोगः ।। १७॥
भाष्यम-हे राजन् (ते) त्वदीयानि (माणि) येपु स्थानेषु विद्धः सद्यो म्रियते वानि
मणि (वर्मणा ) मंत्रपूतेन कवचेन (छादयामि ) आच्छादनं करोमि ( सोमाराजा)
सोमराजा (वा) साम् (मनु) छादनानन्तरम् (अमृतेन) अमृतरूपेण द्रव्येण
विस्ताम् ) आच्छादयतु (वरुणः) वरुणदेवोऽपि (ते ) तव दर्म ( उर्वरीयः )
उत्कृष्टादप्युत्कृष्टम् (कृणोतु ) करोतु (जयन्तम् ) जयशालिनन् (वा) वाम
(देवा) देवाः ( अनुमदन्तु ) महर्षयन्तु । [ यजु० १७ । ४९) ।। २७ ॥
भाषार्थ-हे राजन् मैं | कवचसे आपके मर्मस्थानोंको [ कि जिनके चिन्न होनेसे शीत्रही
मरण होता है ] आच्छादन करताहू. राजा सोम आपको अमृतसे आच्छादन करे, और
वरुण आपके वर्मको उत्तमोत्तम करे, तथा देवता आपको विजय पात' देखकर आनन्दयुक्त
डो॥ १७॥
इत्यप्रतिरयसूक्तम् ।
इति श्रीरुद्राष्टके पण्डितन्वालाप्रसादमिश्रकृतसस्कृतार्यभाप.भाप्यसमनिस्ट
तीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
अथ चतुर्थोऽध्यायः।
मन्त्रः।
विनाबृहल्पिबतुसोन्यायुधंद्यु-
ज्ञातावविहृतम् ।। बाजतोषोऽअमिरक्ष
तित्वमनाजापुपोषपुरुधाधिराजति॥१॥
ॐ विवाडित्यस्य विभाइऋषिः । जगती छन्दः । सूर्यों देवता।
सौर्यपुरोरुकमंत्रपाठे विनियोगः ॥ १॥
भाष्यमु-(विभ्राद) विशेषेण भ्राजते दीप्यत इति विभ्राट् सूर्यः ( बृहत् )
महत (सोभ्यम् ) सोममयम् ( मधु) मधु (पिबतु ) पिबतु किकुर्वन् ( यज्ञपत्नी)
यजमाने ( आहितम् ) अकुटिरम् ( आयुः ) ( दधत् ) स्थापयत् (यः ) सूर्यः
(वातजूतः) महावायुना मेर्यमाणः सन् ( मना) आत्मना स्वयमेव ( अभिरक्षाति)
सर्व जगदधिपश्यन् पालयति “राशिचक्रस्य वायुप्रेयवान सूर्यस्यापि तत्प्रेर्यत्वम् सः
सूर्यः (प्रजाः) प्रजाः (पुपोष ) वृष्टयादिप्रदानेन पोषयति ( पुरुधा) बहुधा
(विराजति) विशेषण दीप्यते व ॥ [ गजु० ३३ । ३० । ] ॥१॥
.
ऽध्यायः ४.]
भाष्यसहिता।
(३९।
भाषार्थ-विशेपदीप्तिमान सूर्य देवता यजमानमें अखण्ड आयुको स्थापन करतेहुए
बडे स्वादुरससे युक्त सोमरूप हविको पान करो, जो सूर्य वायुसे प्रेरित मात्माद्वारा प्रजाकी
रक्षा करता या पालता है पृष्ट करता है वह भनेकप्रकारसे विराजमान होताहै । माशष्ट
यह कि जो मधिक कान्तिमान सूर्य परमात्माके नियमसे वायुवेगसे निरन्तर भ्रमण
करते अनावर्गकी रक्षा करते है पोषण करते हैं और चन्द्रनक्षत्रादिकी ज्योतिरूपसे अनेक-
रूपसे विराजमान हैं वह आज इस अतिमधुर अधिक सोमरसका पान कर मोर यज-
मानकी आयुकी वृद्धि करै ॥ १ ॥
--
,
-
उबुत्यजातवेदसुन्डेववहन्तिकुती ॥ -
शेविश्वायुसूय॑म् ॥ २॥
ॐ उदत्यमित्यस्य प्रस्कन ऋषिः । भुरिगार्षी गायत्री छन्दः ।
सूर्यों देवता । आज्येन शालाबार्येऽशौ हवने विनियोगः ॥ २ ॥
भाष्यमू-केतवः ) सूर्यरममयः सूर्याश्वा वा (जातवेदसम्) अग्नितेजोमयं यहा-
जातं वेदः कर्मफलं यस्मात् ( त्यम् ) प्रसिद्धं तम् (सूर्य देवम् ) द्योतमानं सूर्यम्
(विश्वाय) विश्वस्य (शे) दर्शनाय (उदहन्ति ) ऊर्भ वहन्ति ॥२॥
मापार्थ-ब्रह्मव्योति इस जातवेदस सर्य देवताको सव ससारकी दर्शनक्रिया सम्पादन
करनेके निमित्त उर्वभागनिरन्तर वहन करता है । अथवा उदयको प्राप्त हुए अग्निकी
समान समरत प्राणियोंका कार्य करनेवाले रासारके लव पदार्थोके दर्शनके निमित्त जिसने
सूर्यको प्रकाशित किया है उस परमात्माकी विद्वान् पुरुप उपासना करते है ॥ २ ॥
मन्नः।
येनापावकचक्षसामरुण्यन्तञ्जनाँ २॥अ-
नु ॥ वरुणुपश्यति॥ ३॥
ॐ येनेत्यस्य प्रकण्व ऋषिः । गायत्री छन्दः। सूर्यों देवता ।
वि० पू० ॥ ३॥
माध्यमू-(पावक ) हे शोधक (वरुण) अनिष्टनिवारक सूर्य ( त्वम् ) त्वम्,
(येन) येन (चक्षसा) दर्शनेन (जनान् ) जातान् पाणिनः ( भुरण्यन्तम् ) धार-
यन्तं पोषयन्तं वेमें लोकं येन चक्षमा प्रकाशेन (अनुपश्यासि ) अनुक्रमेण प्रकाशेयति
वेन ज्ञानेन यस्मानपि भुरण्यतः पश्येत्यर्थः ॥ [ यजु० ३३ । ३२ ] ॥३॥
(४०) रुद्राष्टाध्यायी- [ चतुर्क- भाषाथ-हे पावक । अर्याद सबके शुद्ध करनेवाले वरुणदेव । इस सब ब्रह्माण्डको अपनी ज्योतिसे आच्छादन करके स्थित हुए तुम जिस सूर्यरूप ज्योतिसे वा अनुग्रहप दृष्टिसे उस सुपर्णरूपको देखने हो अर्थात् सर्वमेघयाजीको पक्षीके समान शीघ्रतासे स्वर्गमें गमन करते देखते हो उसी दृष्टिसे हम अपने जनौको भी सव प्रकारसे देखिये ॥ ३ ॥ मन्त्रः। यावर्षऽआगंतु रथेनुसूयंत्वचा ।। मांषज्ञठसमाथे। तम्प्रत्नथायवन- श्चित्रन्देवानाच ॥४॥ ॐ देव्याक्त्यिस्य प्रस्कण्व ऋषिः । गायत्री छन्दः । दैव्याव! देवते। वि० पू० ॥ ४॥ भाष्यम्-(देव्यो) देवानामिमौ देव्यौ ( अध्व! ) हे अश्विनौ युवाम् (सूर्यत्वचा) सूर्यदीप्तिमता (स्थेन ) रथेन ( मागतम् ) आगच्छतम् एत्यव ( मन्त्रा) मधुस्वाद बता विषा सोमपुरोडाशदध्यादिना ( यज्ञम् ) अस्मद्यज्ञम् (समजाये ) संरक्ष यतम्, वहूनि हवींषि कुरुत । “तम्प्रत्नथा ७।१२। अयम्बेनः ७ । १६ चित्रन्देवानाम ७१४३ तिन प्रतीकोक्ताः" [ यजु० ३३ । ३३ ] ॥४॥ भाषाथ-हे दिव्य अश्विनीकुमार । आप सूर्यको समान कान्तिमान् रथके द्वारा आइये, मथुर हवि सोमपुरोडाश दधि मादिद्वारा यज्ञको सोचकर बहुत हविषाला करो । इससे पक्षमें सूर्य कान्तिरूप में आरूढ हुए, यह दिनरात्रिरूप अध्वर्यु भग्निष्टोमादियज्ञके और सटरूप महायज्ञके सम्पादक हैं ॥ ४ ॥ मंत्रः । सम्मुत्क्रयापर्वाहिश्श्वथेषाज्येष्ठतांति- म्बार्डिपर्दष्वर्विदेव ॥ अतीची नवजन- दोहसेपनि माशु यन्तुअनुयालुबईले ॥५॥ ॐ तम्प्रत्कथा इत्यस्य अवत्सार ऋषिः । निच्दापी जगती छन्दः । विश्वेदेवा देवता । शुक्रग्रहग्रहणे विनियोगः ॥५॥ भाष्यम्-(प्रकथाः ) पुगतना यजमाना इव ( पूर्वथाः) अस्मदीयाः पूर्व यथा विश्वया ) विशे सर्व प्राणिनो यथा (इमथा ) इदानीं वर्तमाना यजमाना यये- ऽध्यायः ४.] भाष्यसहिता। (४१) न्द्रस्य स्तुत्या फलं लभन्ते हे अन्तरात्मन् (ज्येष्ठतातिम् ) उत्कृष्टविस्तारमथवा प्रश- स्यम् (बर्हिपदम् ) वहिपि तिष्ठन्तम् (स्वदिमु ) सर्वज्ञ सर्वस्य लंमयितारं फलं भाव- वितार (प्रतीचीनम् ) आत्मनोऽभिमुखम् (वृजनम् ) बनवन्तम् ( आशुम) शीघ्र- गामिनम् (जयन्तम् ) सर्वमभिभवन्तम् (धुनिम् ) कम्पयितारं शत्रूणामिति शेषः । इन्द्रं स्तुत्या साधनेन (दोहसे ) पूस्यसि ( यासु ) स्तुतिषु (बर्दसे ) प्रवृद्धो भवास रदयसि वेन्द्रं यथा स्तुत्येति यास्विति व्यत्ययेन वचनम् । [ यजु० ७.१२ ] ॥५॥ भाषाय-हे इन्द्र ! जो कि तुम, हमसे प्रतिकूल गमन करनेवाले आलस्य अश्रद्धा मादिको हमसे रिक्त अर्थात् विनाश करतेहो जिन क्रियाओंमें आपके अनुग्रहसे शत्रुमोको कम्पित करते, शधिकारी सम्यक् अनुष्ठानसे और यजमानोंसे अधिक इस यजमानके पीछे सोमपान र स्तुतिसे जो तुम वृद्धिको प्राप्त होतेहो उन क्रियाओंमें सर्वश्रेष्ठ उस तुमको हम स्तुति करतेहैं ! जैसे पुरतन भृगु मादिने, पूर्व पितर आदिने, अतीत यजमानोंने इस समयके यजमानोंने तुम्हारी स्तुति की है उसी प्रकार हम करते हैं । जो कि तुम सर्व- ज्येष्ठ यज्ञके सविधान में स्थित यजमानके देने योग्य स्वर्गको जानतेहो ॥ ५ ॥ अयवेनश्चोदयत्पृश्निगर्भाज्योतिर्जरा- यूरज॑सोद्यिमाने ।इममुपासजमेसूर्य- ल्युशिशुन्नविष्प्रामुतिभीरिहन्ति ॥६॥ मैं अयव्येन इत्यस्थावत्सारः कश्यप ऋषिः । निच्युदाषर्षी त्रिष्टुप् । सोमो दे० । मन्थीग्रहणे वि० ॥ ६॥ भाष्यम् (ज्योतिरायुः ) ज्योतिर्विद्युलक्षणं जरायुः वेष्टनं यस्य सः । (अयम् ) (वेनः ) कान्तश्चन्द्रः ( रजसः) उदकस्य ( विमाने ) निर्माणकाले श्रीमान्ते प्राप्त ( पृश्निगी) अपः (चोदयत् ) प्रेरयति पृश्निथुलांक मादित्यो वा गर्भावस्थानं यास ताः द्यलोकस्था रावस्था वा अपो वर्षति (विपाः ) विद्वांसो ब्राह्मणाः (इमम् ) (सोमम्) सोमम् (अपाम् )( सूर्यस्य) देवस्य ( संगमे) संगमे सति ( शिशुं न ) बालमिव (मतिभिः ) मतिपूर्वाभिवन्मिः (रिहन्ति ) स्तुवन्ति ! धापो अपां सूयस्य च संगमे गृह्यन्ते ता वै वहन्तीनां स्यन्दमानानां दिषा गृह्णीयात्" इति श्रुतः । [ यजु० ७।१६ ] ॥ ६ ॥ मापार्थ-यह अनुपमकान्तिमान् चन्द्रदेवता जलवर्पण करनेके निमित्त उद्यत होकर पृश्निगर्म (पृश्रिशन्झे सूर्य और दालोक लेने ) पृथिवीके समस्त रस सूर्यकी किरणोंसे खोचकर झुलोकमें मेवरूपसे बढतेहुए काल पायकर वर्षते हैं । अतएव इस स्थानमें इस मेघरूपगर्भ के
(४२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ चतुर्थी-
पि सूर्य और माता (लोक हैं, और ज्योतिर्जरायु (ज्योति विजली, सो यहाँपर नरायु-गर्भ
पष्टन है) सृष्टिको प्रेरण करतेहै, विहान्छोग जलसंगमके विषयमें इनको सूर्यका प्रियपुत्र
समझकर स्तुति कियाकरते हैं ॥ ६॥
मन्त्रः।
ঙ্গিলালাগ্রলীপ্ত ব্রিক্ষ্ম
वरुणस्याग्ने
आप्नाद्यावापृथिवी-
अन्तरिक्षमष्ठलाऽआत्माजगतस्तुत्यु-
एच॥७॥
ॐ चित्रमित्यस्य कुत्स ऋषिः । भुरिगापी निएप छन्दः । सूर्यो
देवता । शालाबायेऽनो हवने विनियोगः ॥ ७॥
भाष्यम्-(देवानाम् ) दीव्यन्तीति देवा रश्मयस्तेषां देवजनानामेव वा (अनीम् )
जासमूहरूपम् ('चित्रम् ) आश्चर्यकरम (मित्रस्य ) (वरुणस्य ) ( अनेः) त्रयाणां
देवानाम् (चक्षुः) उपलक्षितानां जगतां चक्षुः मसौ सूर्यः ( उदगात् ) उदितो वभूव
उदयं प्राप्य च (द्यावापृथिवी) दिवं पृथिवीम् ( अन्तरिक्षम् ) आकाशम् (आप्राः)
स्वकीयेन तेजसा आ समन्तादापूरितवान् । ईदृग्भुतमण्डलान्तर्वती (सूर्यः) सूर्यदेवोऽन्त.
योमितया सर्वस्य प्रेरक परमात्मा (जगतः) जंगमरय (तस्थुषः) रथावरस्य (आत्मा)
स्वरूपभूतः सकलसंसारमयोऽयमेव सूर्य इत्यर्थः ॥ [ यजु०७ १ ४२] ॥ ७ ॥
भाषार्थ-अहो । क्या आश्चर्य है, यह किरणपुंज देवता प्रतिदिन ही उदित होतेहैं, भूलोकसे
शुयोऋतक तीनों लोकोंमें अपनी किरणोंका जाल विस्तार करके समस्त संसारकै नेवरूप
होकर प्रकाशमान होरहेहै, यह स्थावर जगम समस्तपदाथाके जीवन और सूर्यनामसे प्रसिद्ध
है, इन देवताके निमित्त दियाहुमा यह हवि सुन्दरप्रकारसे ग्रहण कियाजाय ॥ ७ ॥
आनुऽक्वाभिर्विक्थेषुशस्तिविश्वानर स-
वितादेवऽएतु॥ अपुियाबुवालोमत्सथानो-
विश्वुअर्गदमिपुत्त्वमनीषा ॥८॥
ऽध्यायः ४]
माष्यसहिता।
(४३)
* ॐ आन इडासिरित्यस्थागस्त्य ऋषिः । त्रिष्टुप्० छ । सविता
देवता । वि० पू० ॥८॥
भाष्यम्-(विश्वानरः) विश्ववतिनो जनान् स्वत एव रक्षकः ( सविता) (देवः)
प्रेरको देवः (नः ) अस्माकम् (विदथे ) यज्ञे (मुशस्तिमिः ) शोभनशंसनहेतुभूतैः
( इडामिः ) यज्ञकारणभृताभिः इडाभक्षणेन सुशस्ति शोभना शस्ति प्रशंसा यरयां कि-
यायां तथा यथा सर्व इडां भक्षयन्ति तथा (आ एतु) आगच्छतु । सूर्यमुक्ता देवा-
नाह-(युवानः ) हे जरारहिता देवाः (अपि) निश्चितम् ( अभिपित्वे ) आगमनकाले
(यथा) येन प्रकारेण (मत्तय) यूयं तृप्यथ तथा (नः) अस्माकम् (विश्वम् )
सर्वम् ( जगत ) पुत्रगवादिजम् ( मनीषा) मनीपया बुध्या तपयथ । यथा भवद्धि-
स्तृप्तिः क्रियते तयास्मत्प्रजास्तर्पणीया इत्यर्थः । यजुः ३३ । ३४ ] ॥ ८ ॥
भाषार्थ-सब प्राणियोंका हितकारी सबका प्रेरक देव हमारे सुन्दर अन्नोद्वारा प्रशंसायुक्त,
यनगृहमें सागमन के, अर्थात मनसे सुन्दर प्रशासपन्न यज्ञगृहमें आगमन करै । हे देव-
ताभो ! जरारस्ति तुम भागमन में जिस प्रकारसे हो पैसे तृप्त होकर हमारे सपूर्ण जगम
पुत्र गौ आदिको बुद्धिपूर्वक सब प्रकार तृप्त करो ॥८॥
विशेष-अथवा विश्वके हितकारी सविता देवता, प्रतिदिन अपने नियमसे उदिन होकर
इम मुष्टियन में अन्नउत्पन्नकी प्रशसा लाभ करते हैं। उस मनसे हम देवताओंको तृप्त करतेहैं
वे हमारे परिवारको तृप्त करें ॥ ८॥
मन्त्रः।
यदुद्याचचत्रहन्नुदगाऽअभिसूर्य ॥ सर्डन्त
दिन्द्रतव” ॥ ९॥
ॐ यदवेत्यस्य श्रुतकक्षकक्षी ऋषिः। गायत्री छन्दः । सूर्यो
देवता। वि० पू० ॥ ९॥
माप्यम्-(वृत्रहन ) वृत्रस्यायामावरकस्य मेघस्य इन्तः (सूर्य) हे सूर्यात्मकेन्द्र
(यद्य) बस्मिन्दिने (यत कच्च) यत्किञ्चित्पदार्थजातम् ( अमि) अभिमुखीकृत्य
(उदगाः ) प्रादुर्भुतोऽसि (इन्द्र) हे ऐश्वर्यसम्पन्न ( तत्सर्वम् ) स्यावरजंगमात्मक
जगत् (ते) तब ( वशे ) वधीनं भवति । उदिते सूर्य त्वदधीनं प्राक्कर्म कुन्ति
जुइति च । [ यजु:३३ । ३५ ] ॥ ९ ॥
मापार्थ-हे अधकारके नाशक हे ऐश्वर्ययुक्त सूर्यदेव । आज जो कहीं किसी प्रदेशमै उदय
होतेहो यह सब तुम्हारे वशमें है अर्थात् जो लोक सूर्य के प्रकाशसे प्रकाशित हैं उनकी
स्थिति सूर्यकेही अधीन है ॥९॥
(४४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ चतुर्थी-
मन्त्रः।
तुरणिव॒िश्श्वदर्शतोज्ज्योतिष्कृदसिसूर्य।
विश्वमामासिरोचुनम् ॥१०॥
ॐ तरणिरित्यस्य प्रस्कण्व ऋषिः गायत्री छन्दः । सूर्या देवता ।
वि०पू०॥ १०॥
भाष्यम्-(सूर्य ) हे सूर्य त्वम् (तरणिः) तरिता अन्येन गन्तुमास्यस्य महतोऽ-
बनो गन्तासि तथा च स्मर्यते-“योजनानां सहस्से हैं। शते हैं च योजने । एकेन
निमिपान क्रममाण नमोऽस्तु ते" ।। यहा उपासकान् गंगालाग्यसि ( विश्वगतः )
विश्वैः सर्वैः प्राणिभिर्दर्शनीयः । यहा-विश्वं सकलभृतजातं दर्शतः द्रष्टव्यं प्रकाश्य येन
मा तथोक्तः । (ज्योतिष्कृत् ) प्रकाशस्य कर्ता । यहा-चन्द्रादीनां गत्री प्रकाशायमा
(असि) असि ( विश्वम् ) व्याप्तम् (गेवनम् ) रोचमानमन्तरिक्षमासमन्तात् (मासि)
प्रकाशयति । यदा-हे सूर्य अन्तर्यामितया सस्य प्रेरक परमात्मन् त्वम् तणिः संसा-
राब्धेः तारकोसि यस्मात्त्वं विश्वदर्शनः विश्वैः सर्वमुमुक्षुभिर्दर्शितः द्रष्टव्यः साक्षात्क-
तव्य इत्यर्थः । ज्योतिष्कृत् सूर्यादेः कर्ता ईशस्त्वं चिम्पतया विश्व' सर्व दृश्यजातं
'रोचनं' दीप्यमानं यथा भवति तथा (आभासि ) प्रकाशयसि चैतन्यस्फुरणे हि सर्वे
जगदृश्यते । “तमेव भान्तमनु भाति सर्वम्" इत्यादि श्रुतेः। [यजु.३३॥३६॥१०॥
भाषार्थ-हे सूर्यदेव । आप महामार्गमें गमन करनेवाळे, अयषा उपामकों के रोग दूर करने.
वाले सब प्राणियोंके दर्शनयोग्य, भयवा-दृश्यवर्ग के प्रकाशक हो । अपवा-चन्द्रादिकमें भी
आपहीका प्रकाश है, आपही उनके प्रकाशक है, आपही दीप्यमान सन्तरिक्षका प्रकाश करते
हो । अथवा अन्तर्यामीरूपसे प्रेरक हे परमात्मन् । संसारसागरसे सापही पार लगानेवाले हैं।
इस कारण सम्पूर्ण मुमुक्षुजनोंसे आपही देखनेयोग्य है । इसमे मापही साक्षात् करने के योग्य
॥ १० ॥
मन्त्रः।
तत्सूर्यस्यदेवचन्तकाहित्यम्मुख्याकतों-
वितर्वस भार॥युददयुलहरित सुधस्था-
दाद्राचीवासस्तनुतेसिमस्म्य ॥११॥
ऽध्यायः ४.] भाष्यसहिता। (४५) ॐ तत्सूयैत्यस्य कुत्स ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः सूर्यों देवता। वि० पू० ॥ ११ ॥ माष्यम्-( सूर्यस्य ) सर्वप्रेरकस्य आदित्यस्य (सत् ) ( देवत्वम् ) ईश्वरत्वम् ( महित्वम् ) महत्त्वम् माहात्म्यञ्च यत् (कतोंः ) कर्मणोः (मध्या) मध्ये (विततम) विस्तीर्ण स्वकीयं रश्मिजालम् ( सञ्जभार ) अस्तं गच्छन्नस्माल्लोकात्स्वात्मनि उपसं- हरति (यदा) यस्मिन्नेव काले (हरितः ) रसहरणशीलान् स्वरश्मीन हरिद्वर्णानश्वा- न्वा ( सधस्थात् ) सहस्यानादस्मात्पार्थिवाल्लोकादादाय (ईत) एव (अयुक्त) अन्यत्र संयुक्तान फगेति । -यदा असौ स्वरमीनवान् सधस्थात् सह तिष्ठत्यस्मिन्निति सधस्यो ग्यस्तस्मादयुक्त अञ्चत् (आत् ) अनन्तरमेव ( रात्री ) निशा (वासः) पाच्छादवित्तमः सिमस्मै ) मर्वस्मै ( तनुते ) विस्तारयति । एवमेक आदित्यसहित ज्योतिरन्यत्र तमः आदित्यप्रभावादसतीत्यभिप्रायः । [ यजु० ३३।३७ ] ॥ ११॥ भाषार्थ-मूर्यका वही देवम है वही महत्व है, कि जो ईश्वरके कार्य श्रेष्ठ जगत्के मध्यमें स्थित होकर विस्तीर्ण किये ग्रहमडलको अपनी कि णोद्वारा अथवा अपने मावर्षणसे निज- वाम नियमित रखते हैं, जवही हरितवर्षकी रश्मियोंसे युक्त आकाशमडलसे अपनेमें युक्त करते हैं, अर्थत-जब यह संध्याकालमें किरणोंको आकाशसे अपनेमें युक्त करते है तब रात सबके निमित्त बत्रको विस्तार करती है। अर्थात् मधकारसे पाच्छादन करती है. अथवा-जिस समय यह रथारोहण कर गमन करते है रात्रि अपने सीमान्तमें वनाच्छादन करती है। अर्थात् रात्रिरूपी अधकार दिशाओंके मध्यमें गमन करता है ॥ ११ ॥ मन्त्रः। तुन्मुित्रस्युवरुणस्यामिवक्षेलूयोरपणुते योरुपस्थै ॥ अनन्तमुन्यदुशदस्युपाजः कृष्णमुन्यबुरितहसम्भरन्ति ॥१२॥ ॐ तन्मित्रस्येत्यस्य विनियोगः पूर्ववत् ॥ १२ ॥ भाष्यम्-( सूर्यः) पादित्यः (योः) धुलोकस्य (उपस्थे ) संगमे ( मित्रस्य ) मित्रदेवस्य (वरुणस्य ) वरुणदेवस्य (तत् ) (रूपम् ) रूपम (कृणुते) कुरुते येन रूपेण जनान् ।(अभिवक्षे ) अभिचष्टे पश्यति, मित्ररूपेण सुकृतिनोऽनुगृङ्गति, वरुणरूपेण दुष्कृतिनो निगृह्णातीत्यर्थः । ( अस्य ) सूर्यस्य (अन्यत् ) एकम् (पाजः)
(४६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ चतुर्थी-
रूपम् (मनन्तम्) कालतो देशतस्तथा परिच्छेद्यम् (रुशत ) शुरू दीप्यमानं जग-
मरणाद्ययुक्तं विज्ञानघनानन्दमयमित्यर्थः । ( अन्यत्) (कृष्णम् ) दैतलक्षणं रूपम्
(हरितः ) दिश इंद्रियवृत्तयो वा (संभरन्ति ) धारयति । इंद्रियग्राय द्वैतरूपमे शुद्ध
तन्यमद्वैतामिति । रूपे सूर्यस्य सगुणं निर्गुणं ब्रह्म सर्व एवेत्यर्थः । [बजु.
३३२३८]॥१२॥
भाषार्य-सूर्य द्युलोककी गोदीमें मित्र भोर वरणका वह रूप करता है जिसे मनुष्योंको
देखता है अर्थात्--मित्ररूपसे पुण्यात्माओंपर मनुग्रह करता, वरुणरूपसे पापियाँको निग्रह
करता है इस सूर्यका एक रूप देशकालले सपरिच्छेद्य शक दीप्यमान विज्ञानघनानन्द
ब्रह्म ही है । एक कृष्णवर्ण देतरक्षणवाला रूप है उसको दिशाका इन्द्रियवृत्ति धारण करती
है । अर्थात् इन्द्रियग्राह्य द्वैतरूप है । एक शवचैतन्य है इस कारण ब्रह्मके सगुण निर्गुण दो
रूप कहें हैं ॥ १२ ॥
विशेष -अद्वैतरूप मित्र अर्थात् --उत्तरायण दिन है, इसमें पुण्यात्मा गमन करते हैं. कृष्ण
दक्षिणायन रानि है, इसमें पापियोंका वरुणरूपसे निग्रह करता है ॥ १२ ॥
।
बण्ण्नुहाँ२॥ असिलर्घबडादित्यनुहा २।।
अति ॥ महसुसमिहिमापनस्यतुद्धादेव-
महाँ २॥ असि॥ १३॥
ॐ बण्महानित्यस्य जमदग्निर्मषिः । बृहती छन्दः। सूयौँ देवता
वि०
० पू०॥ १३॥
भाष्य-(सूर्य) हे सूर्य त्वं (बद् ) सत्यम् (महान् ) तेजसाधिकः ( मसि)
महदसि ब्रह्मत्यर्थः । (आदित्य) हे आदित्य ( वट् ) सत्यम् (महान् असि ) वर्ले-
नाप्यधिकोऽसि । किञ्च-(महः) महत: (सतः) (ते) तव ( महिमा) (महाभाग्यम्
(पनस्यते ) सः प्राणिभिः स्तूयते पूज्यते वा. अतः (देव) हे देव दानक्रीडादियुक्त
(पद्धा) तत्त्वतः ( महान् असि ') वीर्येणाऽप्यधिकोऽसि अभ्यासे भूयांसमर्थमन्यत
यथा दर्शनीयोऽर्थनीयोन पुनरुक्तिदोषः । [ यजु०३३ । ३९ ॥ १३ ॥
भाषार्थ हे जगत्को अपने अपने कार्यमें प्रेरण करनेवाले सूर्यरूप परमात्मन् ! सत्य ही
आप सबसे अधिक हो, हे आदित्य ! सबके ग्रहण करनेवाले सत्यही आप वडे हो, वडे होनेसे
आपकी महिमा लोकोंसे स्तुति की जाती है। प्यिमान परमात्मन् । सत्यही तुम सबसे श्रेष्ठ
हो आदरके निमित्त पुनरुक्ति है ॥ १३ ॥
ऽध्यायः ४.] भाष्यसहिता । (४७) बसव्यं श्रादसामुहाँ।। अखिसुत्रादेवमहाँ शायति । महादेवालामसुय-पुरोहितोवि- भुज्योतिरदारश्यम् ॥१४॥ ॐ बसूर्येत्यत्य जमदनिषिः । सतोवृहत्ती छन्दः । सूर्यों दे । वि० पू०॥ १४॥ माप्या-(सूर्य) हे सूर्य ( ब ) सत्यम् (श्रवसा ) श्रवणीयेन बलेन (महान् असि ) सर्वाधिकोऽसि (देखें ) हे द्योतमान ( सत्रा) सत्यम् (महानसि ) अधिकोऽ- सि किञ्च-(महा) स्वकीयमहत्वेन ( देवानासू ) सुराणां मध्ये ( अपुर्यः) असुगणा इन्ता । यहा-वसुरस्यास्तीति मसुरः प्राणस्तस्मै हितः प्राणिनां हित इत्यर्थः । (पुरो- हितः ) प्रथमपृज्यः (विभुः ) व्यापक ते (ज्योतिः ) तेजः (अक्षाभ्यम् ) केनाप्य- हिस्यम् । यदा-अनुपहिस्यज्योतिः विज्ञानघनानन्दमयमित्यर्थः। [ यजु० ३३ । ४०] ॥ १४ ॥ भापार्थ-हे सूर्य ! माप सत्यही धन वा यशसे वा अन्नके प्रगट करनेसे श्रेष्ठ हो, हे दीप्य- मान प्राणियों के हितकारी देवताओं मध्यमें भ प्रस्थापित अर्यात्-सपकार्यों में प्रथम पूज्य अर्थत्-प्रथम तुमको अर्चदान करनेपर पीछे दूसरे देवताओंकी पूजा अधिकार है, व्यापक उपमारहित किसीसे न रुकनेवाले तेजसे युक्त आप यज्ञद्वारा महत्त्व अधिक श्रेष्ठ हो, अर्थात् तुम माहात्म्य के प्रभावसे एककालमें सर्वदेशव्यापी प्रतिद्वन्दीशून्य ज्योति विरसार करते प्राणि- मानक हितकारी स्वररूपसे सबके आगे पूजनीय हो ॥ १४ ॥ मन्त्रः। श्रायन्तऽवसूयविश्वेदिन्द्रस्यभक्षत । লিভাললাগালাঙ্গানগল্প- दौधिम ॥ १५॥ ॐ प्रायन्त इत्यस्य नृमेध ऋषिः । बृहती छन्दः । सूर्यों देवता। वि० पू० ॥१५॥ माप्यम्-हे अस्मदीया जनाः यथा सर्यरश्मयः ( सूर्यम् ) सूर्यम् (श्रायन्त इव ) समाश्रिताः सूर्य भजन्ते तथा (इन्द्रस्य) इन्द्रमम्बन्धीनि, इन्द्रानुज्ञातनि (विश्धेत् )
-
(५८)
रुद्राष्टाध्यायी-
[चतुर्यो-
विश्वानि धनानि (भक्षत ) मजत (वसनि ) धनानिः पुत्रपौत्रप्रपौत्रादी (जनमाने)
जनिष्यमाणे भविष्यत्काले ( ओजसा) वलेन ज्ञानसमुच्चयकारितया (प्रतिभागम)
न) नकार उपमार्थायः प्रतिपुरुष भागमिव ( दीधिमः ) स्थापयामः । इन्द्रः यानि
वसूनि वलेन जनिष्यमाणानि करोति पित्र्यम्भागमिव तानि धनानि प्रतिधारयेमेत्यर्थः ।
[ यजु०३३ । ४१] ॥ १५ ॥
भाषार्थ-सूर्यको आश्रय करतीहुई विरण ही इन्द्र के संपूर्ण धन अर्थात् पृष्टि धान्यनिष्पा-
दक सम्पत्तिको सेवन करती भक्षण करती है, अर्थात् विभागार प्राणियोंको देती है। मा-
शय यह कि, सूर्यकी शिरणे इन्द्रकी दी हुई वृष्टिको भूमिमें विभाग करती हैं। और हम उन धनी-
को पत्रादिके उत्पन्न होने में अपने भागके समान तेजके सहित धारण या स्थापन करते हैं ॥१५॥
सरलार्थ-हम सूर्यको आश्रय करके जिससे विश्वाधिपति परमपिताके विषयभोग, समर्थ
होते हैं, उनके उत्कृष्ट वा उत्सम्यमान सपूर्णसंपत्तिमें भी मनके बलपूर्वक उसने २ प्रातभा-
गमें अधिकार किये है, अर्थात्-सूर्यकी सहायतासे ही सय कार्यकी प्रवृत्ति होती है। आशय
यह कि-भूमिमधिकारीके माग्यके अनुसार न्यूनाधिक वर्णन करते है ॥ १५ ॥
अधादेवाऽउदितासूर्यस्यु लिर्छहसलपि-
पुतानिवुयात् ॥ तन्नोमिनोबरुणोमाम-
हन्तामनितिरसिन्धु-पृथिवीऽउतद्यौ॥१६॥
ॐ अद्येत्यस्य कुत्स ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । देवा देवता दनादि-
त्यग्रहश्रयणे विनियोगः ॥१६॥
भाष्यम्-( देवाः ) हे द्योतमानाः सुर्यरमयः ( अद्या) अरि काले (मर्या)
आदित्यस्य ( उदिता) उदयकालीनाः उदये सति इतस्ततः प्रततो यूयमस्माद
(महसः ) पापात् ( निष्पिपृतः ) निर्मुञ्चत ( अवद्यात्) दुर्यशसोऽपि निर्मुञ्चत ।
यदिदमस्माभिरुक्तम् (नः) अस्मदीयम् (तत् ) ( मित्रः) महाभिमानी देवः
(वरुणः) अनिष्टानां निषारयिता राज्यभिमानी (अदितिः ) अखण्डनीया देवमाता
(सिन्धुः) स्यन्दनशीलोदकाभिमानी देवता ( पृथिवी ) भृलोकस्याधिष्ठात्री (धौः)
घालोकामि मानी (टत ) समुच्चये (मा) माम् (महन्ताम् ) पूजयन्तु अनुमन्यता-
मिति [यजु० ३३ । ४२] ॥ १६ ॥
माषार्थ-हे राश्मियों में स्थित देवताभो । माज अब सूर्यको उदय हमको पापसे तथा दुर्घ-
शसे पृथक् कर, मित्र, वरुणदेवता, देवमाता, सिन्धुनदी, पृथिवा मोर स्वर्ग इस हमारे वप.
नको अनुमोदन करें ॥ १६ ॥
व्यायः ४.]
भाष्यसाहता।
मन्त्रः।
आकृष्णेनुरज॑सावर्त्तमानोनिवेशर्यत्रमृत-
म्मय॑ञ्च॥हिरण्ययै नसवितारथेनादेवो
योतिभुवनानिपश्यन्॥१७॥
इति सहितायांकनपाठेचतुर्थोऽध्यायः४॥
* आकृष्णेन इत्यस्य हिरण्यस्तूप ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । सविता
देवता। सावित्रग्रहणे वि०॥ १७॥
भाष्यम्-( सविता) देवानां प्रसविता (देवः) स्तुतिदीप्तिक्रीडायुक्तः ( कृष्णेन)
कृष्णवर्णेन ( रजसा ) लोकेन लोका रजांस्युच्यन्ते' अन्तरिक्षलोको हि सूर्यागमनात्पुरत
कृष्णवर्णो भवति तेनान्तरिक्षमार्गेण (मावर्तमानः) पुनः पुनरागच्छन् (अमृतम् ) देशम
(मयम् ) मनुष्यम् (च) (निवेशयन् ) स्वस्वव्यापारे स्थापयन् । यहा-'अमृतम'
मरणरहितं प्राण 'मयम्' मरणसहितं शरीरं च 'निवेशयन्' स्थापयन् ( भुवनानि
सर्वान् लोकान् (अपश्यन् ) भवेक्षमाणः प्रकाशयनित्यर्थः । (हिरण्येन) सुवर्णनिर्मि-
तेन (रयेन ) यानेन (मायाति) अस्मत्समीपमागच्छति । भुवनवतिलोमान् पुण्यपा-
पकर्तृन् क्षिप्रं निरीक्षमाणः यः सविता देवः देवमनुष्यव्यापारस्थापका यश्च पुण्यपाप-
साक्षी तस्या दिकमुचितामिति वाक्यार्थः । [ यजु० ३१ । ४३] ॥ १७ ॥
मापार्थ-सबके प्रेरण करनेवाले सविता देवता सुवर्णमय स्थमैं आरूड होकर कृष्णार्य
रात्रिलक्षणाले पन्तरिक्ष मार्गमें पुनरावर्तन क्रमसे भ्रमण करते देवादि और मनुष्यादिको
अपने अपने व्यापारमें स्थापन करते सम्पूर्ण भुवनोंको देखते हुए आगमन करते है । मथा
सब लोकोको प्रकाश करते आगमन करते है । भाशय यह कि-भुषनवर्ती छोकों पुण्य
पापको शीघ्रतासे निरीक्षण करते हुए पुण्यपापके साक्षी यह सविता देवता है इनकी उपा-
सना पूजा उचित है ॥ १७ ॥
इति श्रीरुद्राष्टके मुरादावादनिवासि-पण्डितण्यालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्य-
भाषाभाष्यसमन्वितम्वतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥
५०)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पश्रमा
अथ पंचमोऽध्यायः।
मन्त्रः॥
ॐ नमस्तेरुद्रमन्धर्वऽउतोतुऽइषवेनमः ॥
बाहुण्यांमुततुनम ॥१॥
ॐ नमस्त इत्यस्य परमेष्ठी ऋषिः । गायत्री छन्दः । रुदो दे ।
'पाठे विनियोगः॥१॥
भाष्यम्-हेरुद्र ! यद्रोदन रु दुःखं द्रावयति रुद्रः । यहा-रुद्रमुपशान्तयति, ये गत्य-
चौस्ते ज्ञानार्थाः खणं रुत् ज्ञान भावे कि तुगागमः । रुत् ज्ञानं राति दहातीति रुद्रः
मोहनिवारकः परमेश्वरः । यद्वा-पापिनो जनान् दुःखमोगेन रोदयतीति रुद्रः जगच्छा.
नसकः । हे रुद्र (त) तव (मन्यवे) रोपाय (नम:) नमस्कारोऽस्तु, (इत ) अपि (ते)
उप (इषवे ) शराय ( नमः) नमस्कारोऽस्तु (उत) अपि च (ते ) तव (वाह-
म्याम् ) भुजाभ्याम् (नमः ) नमः तव क्रोधवाणहस्ता घस्मच्छत्रुष्वेव पतन्तु नास्मा-
स्वित्यर्थः। [यजुर्वेदीयपोडशोऽध्यायः ॥ १॥
भाषार्थ-हे दुःखके दूर करने मथवा ज्ञानके देनेशले अथवा पापी जोंको उनका कर्मफक
लेकर रुलानेवाळे रुद्रदेव । आपके क्रोधके निमित्त नमस्कार है ! और तुम्हारे वाणों के निमि-
त नमस्कार है । और तुम्हारी दोनों भुजामोंके निमित्त नमस्कार है, मर्यात हे रुद्रदेव ।
आपका क्रोध और घाणधारी इस्त शत्रुओपर पडें हमको शान्ति हो ॥१॥
विशेष-तत्ववादी मेघों के अन्तर शक्तिमय रुद्रका निवास कहते हैं। कि गर्जना उनका
झोप है । उल्कापात बाण हैं, समुद्र में उठे तरग एक भुजा, भौर महाधारा वी सनकी
सुसरी भुजा-रूप हैं। उससे शत्रुओंका अनिष्ट हो और हमको मगल हो,। अयथा-पापि-
गोंके नाशको तुम बाण मोर क्रोधरूप हो । इस अध्याय में परमेश्वरका सगुणनिर्गुणरूप स्म
देोपासनासे वर्णन किया है ॥ १॥
मन्त्रः।
याते रुद्राशिवातुनरघोरापापकाशिनी।।
तानस्तुन्वाशन्तमयागिरिशन्ताभिचा
कशीहि ॥२॥
ऽध्याय: ५.]
भाष्यसहिता।
(५१)
ॐ यात इत्यस्य परमेष्ठी ऋषिः । आषी स्वराडनुष्टुप्छन्द रुद्रो
दे । वि० पू० ॥२॥
भाष्यम्-(रुद्र) हे देव (या)(ते) तव ( अघोरा) सौम्या (अपापकाशिनी)
पापमसुखं काशयति प्रकाशयति पापकाशिनी न पापकाशिनी या भक्तानाम् पुण्यफल-
मेव ददाति न पापफलामत्यर्थः । (शिवा) शान्ता मंगलरूपा (तनूः ) शरीरमस्ति
(गिरिशन्त) कैलासवासी गिरौ कैलासे स्थितः प्राणिनां शं सुखं विस्तारयति वा गिरि
वाचि स्थितः शं तनोति वा गिरौ मे स्थितो वृष्टिद्वारेण शं तनोति वा गिरी शेते गिरि-
शः अमति गच्छति जानातीति वा अन्तः सर्वज्ञः, अमगतौ' भजने शब्दे कतरिक्त
गिरिशश्वासावन्तश्च गिरिशन्तस्तत्सम्बुदिः, शकन्ध्वादित्वात्पररूपम् । ( तया )
( शन्तमया) सुखतमया (वन्या ) शरीरण (न: ) अस्मान् (अभिचाकशीहि
अभिपश्य ॥२॥
भाषार्थ-कैलासपर्वतपर स्थित होकर प्राणियोंके सुखको विस्तार करनेवाळे भयवा बाणीमें
स्थित होकर सुखका विस्तार करनेवाले, अथवा मेघमें स्थित होकर वर्षाआदिके रूपसे सुख-
को विस्तार करनेवाले, वा पर्वतपर शयन करनेवाले सर्वज्ञ, हे रुद्र ! जो तुम्हारा शान्त मंग-
रूप विषमतारहित-होनेसे सौम्य पाप फलको न देकर पुण्यफलका ही देनेवाला शरीर
है, उस सुखभरे शरीरसे इमको अवलोकन कीजिये ॥ २ ॥
विशेष-जो सर्वव्यापी आत्माका भी मारमा है दृश्य अदृश्य सपूर्ण शरीरोंमें उसकी स्थि-
ति है केवल तत्व विचारवाले कहते हैं कि, इस स्यलमें रुद्रका मेघोदयरूप शरीर देखनेकी
प्रार्थना है, किन्तु जिससे गृहपतन और बाढकी प्राप्ति हो उसके उदयकी प्रार्थना नहीं है.
किन्तु जिसके उदयसे कृषिआदिकी उन्नति हो उसीकी प्रार्थना है । यहाँ रुद्रका कल्याणमय
शरीर मार केलासवास होनेसे शिवका विग्रह भी कथन किया है, अथवा हे रुद्र ! मापका
कल्याणकारी विस्तार मनोहर है, पापाको दूर करके हमको महामुख दो। इससे सगुण ब्रह्म-
प्रतिपादित है ॥२॥
"
यामिङ्गिरिशन्तुहस्तैबिभुष्य॑स्तये॥
शिवाङ्गिरित्रुताङ्गुरुमाहिठसी पुरुषुञ्ज-
गत् ॥३॥
ॐ यामिषुमित्यस्य परमेष्ठी ऋषिः । विराडार्ण्यनुष्टुप् छ । रुदो
देवता । वि०पू० ॥३॥
(५२)
रुद्राटाध्यायी-
[पश्चमो-
भाष्यम्-(गिरिशन्त ) देव (याम् ) (इपुम् ) शरम् ( अस्तवे ) शाबून क्षेष्ठ
(हस्ते) करे (विपि ) धारयसि (गिरित्र ) गिगै कैलासे रिपत्वा भूतानि प्रायो
इति तत्सबुद्धिः (ताम् ) वाणम् (शिवाम् ) कल्याणकारिणी (कुरु ) किच
(पुरुषम् ) पुत्रपौत्रादिकम् (जगत् ) जंगममन्यदपि गवाश्चादिकम् ( माहिटसी)
मारधीः सर्वयाऽस्मदगो शान्ति कुर्वित्यर्थः ।। ३ ।।
भाषार्थ-हे वेदवाणी में स्थित [ वा पर्वतपर उदित भेषवृन्दफे अन्तर स्थित होकर जाग-
का कल्याण करनेवाले फैलास वा वेदवाणीमें स्थित होकर प्राणियोंकी रक्षा करनेवाले तुम
निस वाणको शत्रुओंके नाश वा प्रलयमें जगत्के अस्त करनेको हाथमें धारण करते हो, है
रक्षक ! उस वाणको कल्याणकारी करो । पुत्र पौत्र भादि जगत्के गावादिको मत मारो,
अर्थात् अकालमें हमको भौर इस संपूर्ण जगत्को नष्ट मत करो ॥ ३ ॥
विशेष-गिरिशृङ्गमें जो रहते है मिन्नभागके मेघोपद्रव उनका मनिष्ट नही करसकते इस
निमित्त मघवारी दुर्घटनाके अन्तर स्थित; देवताको गिरित्र कहते हैं। यह तयादी जल
कहते हैं ॥ ३॥
मंत्रः ।
शिवेनुवचसात्वागिारशाच्छाबदामसि ।
योगल्सतमिजदयुक्ष्मपुमनाऽअसत् ।।
ॐ शिवनेत्यस्य परमेष्ठी ऋषिः । निच्यदायेनु० छ । रु० दे० ।
वि० पू०॥४॥
भाष्यम्-(गिरिश ) गिरी कैलासे शेते गिरिशः तत्सम्बुद्धौ हे गिरिश (शिवेन)
अंगलरूपेण (वचसा ) वचनेन (वा) त्वाम् ( अच्छ) प्राप्तुम् (बदामसि ) वदामः
मार्थयामहे (नः ) अस्माकम् (सर्वम् ) सम्पूर्णम् (जगद ) जंगमं मनुष्यपश्यादि
(यपा) येन प्रकारेण ( अयक्ष्मम् ) च्याधिरहितम् (सुमनः) शोभनं मनः ( असत्)
तथा कुर्वित्यर्थः ॥ ४ ॥
माषाय-हे वेदवचन वा केलासमें शयन करनेवाले । मंगल सुतिरूप वचनसे तुमको प्राप्त
होनेको हम प्रार्थना करते हैं। हमको सपही जंगम, मनुष्य, पशु मादे जिस प्रकार नारोग
शुम मनवाळा होवे सो करो, अर्थात् यह जगत् स्वस्य और रोगरहित हो । यही मापसे
हमारी प्रार्थना है सो सीकार करो ॥ ४ ॥
विशेष-जिसका उदय सर्वदा ही पर्वत पृष्ठपर देखा जाताहै, ऐसे मेधक मन्तर स्थित देव-
ताको गिरिश कहते हैं, यह तत्ववादी जनोंका कथन है। तात्पर्य यह है कि रुद्रदेवता सर्पन
विद्यमान है वह जगत में मगल कर मजामें कोई रोग न हो ॥ ४॥
व्यायः ५.]
भाष्यसहिता ।
(५३)
मन्त्रः।
अवयवोचदधिवक्ताप्रथुमोदैयौभिषक् ।।
अहरिचसचिम्भयुनत्सवांश्च यातुधान्यो-
राचील्परांसुव ॥५॥
ॐ अध्यवोचदित्यस्य प्रजापतिषिः । भुरिगाषी बृहती छन्दः ।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥५॥
भाष्यम्-( अधिवक्ता) अधिवदनशील निगमकयनतत्परः (प्रथमः) पूज्य-
वात्सर्वेषां मुख्यः (दैव्य.) देवेभ्यो हितः (भिषक ) स्मरणेनव रोगनाशको रुद्रः
( अध्यवोचत् ) मा सर्वाधिक वति, अयं याजका सर्वाधिको भवत्विति । परोक्षमु-
कृत्वा प्रत्यक्षमाइ-हे रुद्र ! (च) (सर्वान् ) सम्पूर्णान् (महीन् ) सर्पव्याघ्रादीन
(जम्भयन् ) विनाशयन् ( सर्वाः ) समस्ताः ( अधराची ) अधोधोगमनशीला:
( यातुधान्या ) राक्षसी: (च)(परासुव ) अस्मत्तो दूरीकुरु ॥५॥
भाषार्थ-साधिकवदनशील सर्वदा निगम कथन करनेवाले, सब देवताओंमें मुख्य, पुजनीया
देवतामोंके हितकारी, स्मरण ही ससार तथा जन्म मरणके रोगनाशक रुद्र हमको सबसे
अधिक कहैं, मांत् सबसे अधिक करें। और सब सर्प व्याघ्र आदिको विनाश करते हुए
सपूर्ण अधोगमनशील राक्षसी आदिको भी हमसे दूर करो ॥ ५ ॥
मध्यात्म-परमात्मा हमको महावाक्यका उपदेश करो और सर्पके समान इसनेवाले
काम आदिको नाश करो, और अयोगमनशील कामकलारूपी राक्षसियोंको दूर करो. अथवा
संपूर्ण विद्याओंके कहनेले ही यह सबमें श्रेष्ठ गिने जाते हैं, इसीसे दिव्यगुणयुक्त ज्ञानसे
सबके संसारी रोगके दूर करनेवाले है ॥५॥
जडवादी कहते हैं कि, गर्नन ही प्रधान शब्द है । अति पृष्टि होनेसे ज्वरादि रोग और
सपीका प्रादुर्भाव होता है हनस मृत्युसख्या अधिक होनेकी समावना है, प्रेतभयं उपस्थित
न हो इस कारण तीनों भय के सिवारण करने के निमित्त रुद्रदेवसे प्रार्थना है ॥५॥
मन्त्रः॥
अखीयस्तुाम्रोऽअरुणऽतिबच समाल।
बेचैनसुद्धाऽअभितो विक्षुश्श्रुितासहस्र-
शबिषा हेडऽईमहे ॥६॥
(६४) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- * असौ य इत्यस्य प्रजापतिषिः । विराडापी पंक्तिश्छन्दः । रुद्रो दे० । वि० पू० ॥६॥ भाष्यम्-मादित्यरूपेणाऽत्र रुद्रः स्तूयते-(यः असौ) प्रत्यक्षो रुद्रो रविरूपश्च (ताम्रः) उदयेऽत्यन्तरक्तवर्णः (च अरुणः) यरुणरूपःउत ) अपि ( वचः) अस्वकाले पिंगलवर्णः ( सुमंगलः) शोभनानि मंगलानि यस्य सः । सूर्योदये सर्व मंगलप्रवर्तनात् क्रमेणैतानि रूपाणि दधातीत्यभिप्रायः । अथवा असौ यस्ताम्रा परुणाः सुमंगलः प्रयोजनवशात् नानारूपाणि करोति (च) पुनः (ये )(सहस्रशः) सह- स्रशः संख्याः (रुद्राः) रुद्राः (एनम् ) (अभितः) सर्वतः (दिक्षु ) प्राच्यादि- दिक्षु (श्रिता) आश्रिताः (एषाम् ) रुद्राणाम् ( हेडा) अस्मदपगधनं क्रोध (ईमहे) भक्त्या निवारयामः ॥६॥ भाषार्थ-मौर जो यह प्रत्यक्ष रुद्र सूर्य्यरूप उदयसमयमें अत्यन्त लालवर्ण, मस्तके समय रक्तवर्ण और मध्याह्न समयमें पिंगळवर्ण मगलरूप काँका उदयम विरतार करनेवाले हैं, और जो सहस्रों रुद्रांशरूप वा किरणरूपसे इनके सब मोर दिशा में स्थित है, अर्यात् जो अब सहस्रों देवता नक्षत्रमंडल इन देवताके दशौ दिशामा देदीप्यमान हैं इन्हीका क्रोध इम भक्तिद्वारा निवारण करते है ॥ ६ ॥ मन्त्रः। असोयोस्पतुिनीलग्रीवोबिलोहिता ॥ उतै डोपाऽअदृश् श्रुन्नदृश्अन्नदहा[-सदृष्टो मुंडयातिनः ॥७॥ + ॐ असौ य इत्यस्य प्रजापतिषिः । विराडार्षी पंक्तिश्छन्दः । रुद्रो देवता। वि० पू० ॥ ७॥ भाष्यम्-( यः) (असौ) मादित्यरूपः ( नीलग्रीवः ) विषधारणेन नीला प्रीवा कण्ठो यस्य मस्तमये नीलकण्ठ इव लक्ष्यः (उत) (विलोहितः )रक्तः ( अवसपति) उदयास्तमयौ कुर्वन्निरन्तरं गच्छति (एनम् ) रुद्रम् (गोपाः ) गोपालाः वेदोक्तसं- स्कारहीनाः ( अदृश्रन् ) पश्यन्ति ( उदहार्यः ) जलहारिण्यो योपित अपि ( मह- भन्) पश्यन्ति (स.) शंकर (दृष्टः ) दृष्टः सन् (न:) अस्मानू ( मृडयाति ) शुखयतु ॥ ७॥ भाषार्य-जो यह विषधारणसे नीलग्रीव वा मस्तसमयमै नीलकण्ठके समान और विशेष वक्तवर्ण आदित्यरूपसे उदय मस्त करते निरन्तर गमन करते हैं, इनको वेदोक्त सस्कारहीन ऽध्याय: ५.] भाष्यसहिता । (५५) गोपालतक देखते हैं, जळ ले जानेवाली नारी भी दर्शन करती हैं, वह रुद्र दर्शनपथमें प्राप्त होते ही हमको मुखी करें। सूर्यमें नीलिमा आकाशका नीलतासे कही है । गोष्ठम गोपाळ नदी आदि तीरपर पनिहारी इनकी शोमा अतिशय देखतीहैं । पक्षान्तरम-इन्द्रियगोलकोंकी रक्षक इन्द्रियशक्ति गोप, मऔर अमृतकी प्राप्त करनेवाली प्राज्ञशक्ति उदाहारी है ॥७॥ मन्त्रः। नमोस्तुनीलग्ग्रीवायसहस्राक्षायमुद्विषे ।। अोयेऽअस्युसत्त्वानोहन्तेश्योकरन्नमः८ ॐ नमोस्त्वित्यस्य प्रजापतिषिः । निच्यदायॆनुष्टुप् छन्दः । रुदो देवता । वि० पू० ॥ ८॥ भाष्यमू-( नीलग्रीवाय) नीलकण्ठाय (सहस्राक्षाय ) सहस्रमक्षीणि यस्य इन्द्र- स्वरूपिणे (मीपे ) वृष्टिकत्र पर्जन्यरूपाय ( नमः ) नमस्कारः ( अस्तु ) भव (अयो) अपि (अस्य) रुदस्य (ये) (सत्त्वाना) माणिनः सेवकाः सन्ति (तेभ्या) (अहम् ) स्तुतिकर्ता (नमः) नमस्कार (अकरम् ) करोमि ॥ ८॥ माषार्थ-नीलकण्ठ, सहस्रनेत्र, सब जगतको देखनेवाले, अथवा इन्द्रस्वरूप वा बहु रश्मि- रूप सेचनमें समर्थ पर्नन्यरूप रुद्रके निमित्त नमस्कार हो । और रुद्रदेवताके जो अनुच- रविशेष हैं, मेषादि राशि है, उनके निमित्त मै नमस्कार करता हूँ | तात्पर्य यह-या सवहीं शिवरूप है सबमें रुद्र वर्तमान हैं ॥ ८॥ मन्त्रः। प्रमुञ्चधन्वनुस्त्वमुभयोरात्वन्ााम् ।। याश्चतुहस्तऽइपबुरूपराताभगवोवप ॥९॥ *प्रमुञ्चेत्यस्य प्रजापतिषिः । भुरिगार्युष्णिक छन्दः . रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ९॥ भाष्यम्-(भगवः) हे भगवन् परमैश्वर्यसम्पन्न (धन्वनः) धनुषः (उमयोः । दयोः (मात्न्याः) कोटयोः स्थिताम् (ज्याम् ) मौर्वीम् (वं) (प्रमुञ्च) दूरीकुछ (च) (याः) (ते) तव ( इस्ते ) करे ( इषवः) वाणाः सन्ति (ताः) शरान्द, (परावप) पराक्षिप ॥९॥ माषार्थ-डे पडेम्वर्यसम्पन्न भगवन् ! भाप धनुषकी दोनों कोटियों में स्थित ज्याको दूर करो अर्थात् उतार को। और जो आपके हाथमे बाण है उनको दूर त्यागदो हमारे निमित्त सौम्य- मात हो जाओ। हमारे लिये किसी प्रकारका रोग शोक न हो यही आपसे प्रार्थना है ॥ १. !
रुद्राष्टाध्यायी-
[पचमो-
मन्त्रः।
हिज्युन्ध कदिनोबिशल्योबाणवाँर।।
ऽउत ॥ अनेशन्नस्युषाऽइषवऽआभुरस्यनि-
षडधिः ॥१०॥
ॐ विज्यन्धनुश्त्यिस्य प्रजापतिऋषिः । भुरिगार्ण्यनुष्टुप्छन्दः ।
रूद्रो देवता । वि० पू० ॥१०॥
माध्यम्-(कपर्दिनः ) कपर्दी जटाजूटोऽस्यास्तीति कपः तस्य रुद्रस्य (धनु)
शरासनम् ( विज्यम् ) मौरिहितमस्तु (उत ) च वाणवान् इषुधिः ( विशल्यः )
विफलोऽस्तु ( अस्य ) रुद्रस्य (याः) (इफ्रः) शराः ताः ( अनेगन् ) नश्यन्तु
अस्य ) रुद्रस्य (निपंगाधिः)कोशः सः (आभुः ) खगराइतोऽस्तु । रुद्र भस्मा-
प्रति न्यस्तसर्वशस्त्रोऽस्त्वित्यर्थः ॥ १० ॥
माषार्थ-जटाजूटधारी रुद्रका धनुप ज्यारहित हो, भौर तरकस भालेवाले बाणोंसे रीता
हो, एन देवताके जो वाण है वे भदर्शनको प्राप्त हों, इनके खड्ग रखनेका कोश रीता हो
मर्याद रुद्र हमारे प्रति सर्वथा न्यस्तशस्त्र हो ॥ १० ॥
सातहतिम्माष्टमहस्तैबभवतेध त-
यास्मान्चिश्वतुस्त्वमयुक्षपयापरिभुज॥११॥
ॐ यात इत्यस्य प्रजापतिपिः । निच्यदनुष्टुछन्दः । रुदो
देवता । वि० पू० ॥ ११॥
भाष्यम्-(मीदृष्टम ) सेकृतम ववर्धक (ते) तब हस्ते (या)(हेतिः) धनूरूप-
'मायुधमस्ति (ते हस्ते ) करे (धनुः ) धनुः ( बभूव ) अस्ति ( तया) धनूरूपया
(अयक्षमया) निरुपद्रवया दृढया इत्या ( विश्वतः ) सर्वतः ( अस्मान् ) नः
(परिभुज) परिपालय ॥ ११ ॥
भाषार्थ-हे अत्यन्त ज्ञानामृत वा वर्षासे सीचनेवाले ! तुम्हारे हाथमें जो आयुध है
थापके हाथमें जो धनुष है इस उपद्रमरहित धनुषरूप छतिसे आप सब ओरसे हमको
शरुन करो, अर्थात् भाप वर्षा करनेवाले अस्त्रको ही धारण कीजिये किन्तु उससे कोई
उपदान हो ॥ ११॥
स्थापय ॥ १२ ॥ ऽध्याय: ५.] भाष्यसहिता। (५७) मन्त्रः। परितुधन्वनोहेतिरम्मान्वृणाविश्वमा अथो यऽइषुधिस्तवारेऽ अस्म्मन्निहि तम् ॥ १२ ॥ ॐ परीत्यस्य प्रजापतिषिः । निच्यदायॆनुष्टुप्छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥१२॥ भाष्यम्-हे रुद्र (वे) तव (धन्वनः ) धनु सम्बन्धि (तिः ) मायुधम् (विश्वतः) सर्दतः (अस्मान् ) (परिघृणक्तु) त्यजतु (मथो) मपि च (या) (तर ) (इषुधिः ) कोशोऽस्ति ( तम् अस्मत् ) सकाशात् (पारे) दूरे (निधेहि ) भाषार्थ-हे रुद्र ! तुम्हारे धनुसंवधी आयुध सव ओरसे हमको त्यागन करे, और नौ तुम्हारा तरकस है उसको हमारे निकटसे दूर स्थापन करो । आशय यह कि, हमारे कमी- द्वारा जो व्याधि होती है वह तुम्हारी सत्तासे हैं सो हमको कष्ट न दें ॥ १२ ॥ मन्त्रः। अवतत्त्युधनुष्ठन्सहस्राक्षुशतेषुधे । नि- शीव्यंशुल्यानाम्मुखांशिवोनन्सुमनाम- व ॥ १३ ॥ ॐ अवतत्त्येत्यस्य प्रजापतित्राषिः । निच्यदायनुष्टुप् छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ १३॥ भाष्यम्-(सहस्राक्ष) सहस्रमक्षीणि यस्य तत्सम्बुद्धौ (शतेषुवे) शतमिषुधयो यस्य तत्सम्बुद्धी (त्वम् ) (धनुः ) शरासनम् (सातत्य अपज्या कृत्वा ( शल्यानाम्) शराणाम् (सुखाः) अग्राणि (निशीय) शीर्णानि कृत्वा ( नः ) अस्मान्मति (शिवा) शान्तः (सुमनाः ) शोभनाचित्तश्च ( मव) अनुगृहाणेत्यर्थः ॥ १३ ॥ भाषार्थ-हे विराट्र ! हे सहस्रनेत्र । हे सहस्रों तरकसवाले ! तुम धनुषको ज्यारहित करो और माणोंके मुख (माल) निकालकर हमको शान्त, शोमनचित्त हो मति हमपर कृपा करो ॥ १३॥ F
(५८)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ पञ्चमो-
मन्त्रः।
नमस्तु आयुधायानांततायधृष्ण्णवै ॥ उभा-
क्यांमुततुनमोबाहुण्यान्तवुधन्वने ॥१४॥
ॐ नमस्त इत्यस्य प्रजापतिर्ऋषिः । भुरिगार्म्युणिक् छन्दः । रुद्रो
देवता । वि० पू० ॥ १४ ॥
भाष्यम्-हे रुद्र (ते) तव ( बनातताय धनुष्यनारोपिताय (आयुधाय)
वाणाय ( नमः) नमोऽस्तु (ते) तव (धृष्णवे ) धर्पणशीलाय रिपून हन्तुं प्रगल्माय
(धन्वने ) धनषेऽपि (नमः ) नतिरस्तु ( उत) च (ते)तव (बाभ्याम् ) द्वाभ्याम्
बाहुभ्याम् ) भुजाभ्याम् ( नमः ) नमस्कारोऽस्तु ॥ १४ ॥
भाषार्थ-हे रुद्र आपके धनुषपर न घटाये हुए वाणके निमित्त नमस्कार है, आपके दोनों
बाहुओंके निमित्त और आपके शत्रु मारनेमें प्रगल्भ धनुषके निमित्त नमस्कार है ॥ १४ ॥
मन्त्रः।
मानौमुहान्तमुतमानोऽअद्भुकम्मानुऽउ-
अन्तमतमानऽउक्षितम् । मानौवधीपि-
तरम्मोतमातरम्मान-प्प्रियास्तुन्वोरुद्र-
रीरिषः ॥१५॥
* मानो महान्त इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्युदापी जगती छन्दः ।
रुद्रो० दे० । वि० पू० ॥ १६॥
भाष्यम्-हे रुद्र (नः) अस्माकम् (महान्तम) वृद्धं गुरुपितृव्यादिकम् (मावधी:)
मा हिंसी: ( उत) अपि (ना) अस्माकम् (अर्भकम् ) पालकम् (मा) मावधीः
(न:) अस्माकम् ( उक्षन्तम् ) सिञ्चन्तं तरुणम् (मा) मावधीः (उत ) अपि
(नः) अस्माकम् ( उक्षितम् ) सिक्तं गर्भस्थम् ( मा ) मावधीः (नः ) अस्माकम्
(पितरम् ) जनवम् (मा) मावधी: ( उत ) अपि (न:) ( मातरम् ) जननीम
(मा) मावधीः (नः) बस्माकम् (प्रियाः ) वल्लभा (तन्वः) पुत्रपौत्ररूपाणि शरी;
शाण (मा रोरिषः) मा हिंसीः ॥ १५ ॥
ऽध्यायः ५.] भाष्यसहिता। (५९) भाषार्थ-हे रुद्र ! हमारे वृद्ध गुरु पितृव्य मादिको कर्मानुसार मत मारो। और हमारे बालकको मत मारो, हमारे तरुणको मत मारो और हमारे गर्भस्थ बालकको मत मारो, हमारे पिताको मत मारो, और हमारी माताको मत मारो, हमारे प्यारे शरीर पुत्र पौत्र आदिको मत मारो । आशय यह कि, यदि कर्मानुसार उनकी आयु पूरी होगई हो तो भी आपकी कृपा होनी चाहिये । १५॥ मन्त्रः। मानस्तुोकेतनयमानुऽआयुषिमानोगोषु मानोऽअश्वेपुरीरिषः॥ मानौवीरान्द्र- भामिनौवधी विष्म॑न्तुल्स मित्त्वाहवा- महे ॥ १६ ॥ ॐ मानस्तोक इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्यदार्षी जगती छन्दः । रुदो दे० । वि० पू०॥ १६ ॥ भाष्यम्-हे रुद्र (नः ) अस्माकम् ( तोके) पुत्रे (तनये ) पौत्रे ( मा रिषः) मा हिंसीः (नः वायुपि ) जीवने (मा) मा हिंसीः (नः) (गोषु ) धेनुषु (मा) मा हिंसी (नः) (अश्वेषु ) तुरगेषु (मा) मा हिंसीः (नः भामिनः) क्रोधयुतान् . (वीरान् ) भृत्यान् (मा वधीः) मा हिंसी (हविष्मन्तः ) हवियुक्ताः (सदमित्) सदैव त्वा) (हवामहे ) वयं यागायावयामः । त्वदेकशरणा वयमित्यर्थः ॥ १६ ॥ भाषार्थ-हे रुद्र ! हमारे पौत्र पुत्रको मत मारो, हमारी आयुको मत नष्ट करो, हमारी गौ- ऑमें प्रहार मत करो, हमारे घोडोंमें प्रहार मत करो, हमारे ऋोगयुक्त पीर पुरुषोंको मत मारो । इवियुक्त निरन्तर आपको हम यज्ञके निमित्त आह्वान करते हैं । अर्थात् भापकी ही शरण है । तात्पर्य यह है कि-ईश्वर रुद्र किसीको नहीं मारते पर कर्मानुसार रोगादिमें अपनी शक्तिकी प्रेरणा करते हैं उन पापोंसे मनिष्ट न होनेकी प्रार्थना है ॥ १६ ॥ मन्त्रः। नमोहिरण्यबाहवे सेनान्यदिशाचुपतयेन- मोनमोवृक्षेश्योहरिकेशक्यापशूनाम्पत- युनमोनम शुधिप्पजरायु.त्त्विषीमतेपथी- . . -- ॥ (६०) रुद्राष्टाध्यायी [पञ्चमो- नाम्पतयेनमोनमोहरिकेशायोपवीतिनैपु- ष्टानाम्पतयेनमोनमोबालुशाय॥१७॥ ॐ नम इत्यस्य कुत्स ऋषिः। नियतिधतिश्छन्दः । रुद्रो देवता। जपे विनियोगः ॥ १७॥ भाष्यम्-(हिरण्यवाहवे) हिरण्यमाभरणरूपं वाहोर्यस्य स हिरण्यवाहुः तस्मै (सेनान्ये सेनां नयतीति सेनानीः तस्मै (नमः) रुद्राय नमः (च)(विशांपतये) "पालकाय रुद्राय (नमः ) नमः (हरिकेशेभ्यः) हरितवर्णाः केशाः पर्णरूपाः येषां ते हरिकशास्त्रेभ्यः (वृक्षेभ्यः ) वृक्षरूपरुद्रेभ्यः (नमः) नमः ( पशूनाम् ) जीवानाम् (पतये) पालकाय रुद्राय ( नमः ) नमः ( विषीमते ) विपिदीतिरस्यास्ति तस्मै (शपिञ्जराय) शष्पं बालतृणं तदपिञ्जराय पीतरक्तवाय रुद्राय ( नमः ) नमोऽस्तु (पथीनाम् ) मार्गाणां पालकाय सद्राय ( नमः ) नमः ( हरिकेशाय ) नीलवर्णकेशाय जरारहिताय (उपवीतिने) मंगलार्थयज्ञोपवीवधारिणे रुद्राय (नम:)नतिरस्तु (पुष्टानाम) गुणपूर्णानां नराणाम् (पतये) पालकाय स्वामिने (नमः ) नमोऽस्तु ॥ १७ ॥ भाषार्थ-भुनामोंमें सुवर्ण धारण करनेवाले महाबाहु सेनापालक रुद्रके निमित्त नमस्कार है। दिशाओं के अधिपति अर्थात् समस्त जगतको अपनी भुनामों के नीचे रक्षा करनेवाले सेनापति- के निमित्त भी नमस्कार है, पर्णरूप हरे वालोवाले वृक्षरूप रुद्रोंके निमिस नारवार नमस्कार है, जीवोंके पालन करनेवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है, कान्तिमान् चालतृणवत् पीतवर्णवाले करके निमित्त नमस्कार है, मार्गों के पालन करनेवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है, मगल्के निमित्त उपवीत धारण करनेवाले नीलवर्णकेश वा जरारहित रुद्रके निमित्त नमस्कार है, गुण- पूर्ण मनुष्यके स्वामी रुद्रके निमित्त नमस्कार है ॥ १७ ॥ तात्पर्य-तात्पर्य यह-सब मामि शान्तरूप रुद्र है, अश्वत्थादि वृक्षापर जैसे आकाश बेक आदि निर्मूल लता होती हैं तद्वत् यज्ञोपवीत धारे है विना रुद्रके किसीकी स्थिति नहीं होमती इससे रुद्र सबके स्वामी पालक कहाते हैं ॥ १७ ॥ मन्त्रः। नमोबालुशायव्याधिनत्रानाम्पतयेनमो नमोमवस्यहित्य जगताम्पतये नमोनमो रुद्रायांततायिनेक्षेत्राणाम्पतयेनमोनम ऽध्यायः ५.] भाष्पसहिता। (६१) सूतायाहन्त्येवनानाम्पतयेनमोनमोरेहि- ताय ॥१८॥ * नम इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्यदष्टिछन्दः । रुद्रो देवता वि० पू० ॥१८॥ भाष्यम्-(बलुशाय ) कपिलवर्णाय यदा-विभर्ति रुद्रमिति बलवृषभस्तस्मिन् शेते स वभ्लशस्तस्मै रुद्राय ( नमः) नमः ( व्याधिने ) विध्यति शत्रूनिति व्याधी तस्मै रुद्राय नमः ( मन्नानाम् ) धान्यानाम् (पतये ) पालकाय (नमः) नमः ( भव- स्य) संसारस्य (त्ये) मायुधाय संसारनिवर्वकाय द्राय ( नमः ) नतिरस्तु (भगतां पतये ) पालकाय रुद्राय (नमः ) नमः ( माततायिने ) माततेन विस्तृतेन धनपा सह एति गच्छत्तीति आततायी उद्यतायुधस्तस्मै रुद्राय ( नमः ) नमः (क्षेत्रा- णाम) देहानाम् (पतये ) रक्षकाय पालकाय (नमः) नमः (महन्त्रे) न हन्तीति अहन्ति-तस्मै (सताय) सारथये तद्रूपाय ( नमः) नमः ( वनानाम् ) मरण्यानाम् (पतये) पालकाय (नमः) नमोऽस्तु ॥ १८ ॥ भाषार्थ-कपिलवर्ण वा वृषमपर स्थित होनेवाले शत्रुओंको बेधनेवाले व्याधिरूप रुद्रको नमस्कार है । अन्नों के पालक रुद्र निमित्त नमस्कार है, ससारके आयुध अर्थात् संसारनि. पर्तक रुद्रफे निमित्त नमस्कार है, संसारके पालक रुद्रके निमित्त नमस्कार है उयत आयु- थयाल रुद्रके निमित्त नमस्कार है, देहोंके पालन करनेवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है, नही मारनेवाले, पापसे रक्षक प्रधान सारथिरूपके निमित्त नमस्कार है, पनोंक पालक के निमित्त नमस्कार है।॥१८॥ विवरण-ौगिपोंका रक्तवास होनेपर नो वर्ण होताहै उसफो यस्ठुश कहते हैं ॥ १८ ॥ मन्त्रः। नमोरोहितायत्त्युपतयेवृक्षाणांपतयनमोन- मौभुवुन्तयैवारिवत्कृतायौषधीनाम्पतयेन- मोगयो मुन्धिणेवाणुजाक्षाणाम्पतये नमोनमऽश्चिषायाअन्दयते पत्तीना- म्पतये नमो कलनाय॥१९
(६२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पञ्चमो--
ॐ नम इत्यस्य कुत्स ऋषिः । विराडतिधृतिश्छन्दः । रुदो
देवता । जपे विनियोगः ॥ १९॥
भाष्यम्-(रोहिताय ) लोहितवर्णाय ( स्थपतये ) स्थपतिहादिकर्ता विश्वकर्म-
रूपेण तस्मै ( नमः ) नतिरस्तु ( वृक्षाणाम् ) तरूणाम् ( पतये ) पालकाय ( नमः)
नमः (भुरन्तये) भूमण्डलविस्तारकारिणे (वारिवस्कृताय ) स्थानभोग्यकराय (नमः)
नमोऽस्तु ( ओषधीनाम् ) ग्रांम्पारण्यानामोषधीनाम् ( पतये) पालकाय ( नमः )
नमोऽस्तु (मंत्रिणे) सचिवरूपिणे ( वाणिजाय ) व्यापारका सदाय ( नमः )
नमोऽस्तु ( कक्षाणाम) वनोत्पन्ना गुल्मवीरुधादयः कक्षानेपाम् ( पतये ) पालकाय
(नमः) नमोऽस्तु (उचैः घोपाय) युद्ध महाशब्दाय ( माक्रन्दयते) पिपुगेदकाय
(नमः ) नमोऽस्तु ( पत्तीनाम् ) पक्षातीनाम् ( पनये) पालकाय ( नमः ).
नसोऽस्तु ॥ १९ ॥
भाषार्थ-लोहितपर्ण गृहादिकर्ता विश्वकर्मरूपके निमित्त नमस्कार है, वृक्षोंके पाठकक
निमित्त नमस्कार है, भूमडलके विस्तार करनेवाले स्यान भोग्य करनेवालेके निमित्त नम-
स्कार है, ग्राम्य और मारण्य सोपधियोंके पालकके निमित्त नमस्कार है, भालापनमें शल
घ्यापारक्ताओंके रूपमें स्थितके निमित्त नमस्कार है, वनके गुल्मवीरुधादिके पालक के
निमित्त नमस्कार है, शत्रुमोको रुलानेवाले, युद्धमै वडा स्य शब्द करनेशले स्ट्रके निमित्त
नमस्कार है, एक रय, एक हाथी, तीन घोडे, पांच पैदलमा नाम पत्ति है । इस प्रकार सेना-
विशेषके पालक रुद्रके निमित्त नमस्कार है ॥ १९ ॥
विशेप-स्यपति-शब्दसे रहनादि निर्माण करनेवाले इनके मन में सदा ही इटकाको चिन्ता
जगारहता है, इस कारण इनका अन्तरदेवता लोहितवर्ण कहाँहे, कारण कि इष्टका लाळ
होती हैं ॥ १९ ॥
नसंकरस्नायतयाधावतुसत्त्वानाम्पतये
लमुत्सहमानायनियाधिन आध्याधिनी-
नाम्पतयेनमोनमोनिषुङ्गिणककुमार्यस्तु-
मानाम्पतयनमोनमोनिचरवपरिचराया-
रण्यानाम्पतयेनमोनमोहचते ।। २० ॥
ॐ नम इत्यस्य कुत्स ऋषिः अतिधृतिश्छन्दः । रुद्रो देवता।
वि० पू० ॥२०॥
ऽध्यायः ४]
भाष्यसहिता।
(६३)
भाष्यम्-(कृत्स्नायतया) कृत्स्नं समग्रमायतं विस्तृतम् अर्थाद्धनुर्यस्य स कृत्स्ना -
यतस्तस्य भावः कृत्स्नायतता तया आकर्णपूर्णधनुष्टेन (धावते) युद्धे शीघ्रं गच्छते
रुद्राय (नमः) नतिरस्तु । अथवा कृत्स्नः सर्व भायो लाभो यस्य सः कृत्स्नायस्तस्य
भावः कृत्स्रायता तया (धावते) सलाममापकत्वेन धावने (सत्त्वानाम् ) शरणाग - १
तानां माणिनाम् (पतये) पालकाय ( नमः ) नमोऽस्तु ( सहमानाय ) अमिभवनशी -
लाय (निव्याधिने ) नितरां विध्यति हन्ति शत्रूनिति निव्याधी तस्मै ( नमः ) नमः
(आव्याधिनीनाम् ) या समन्ताद्विध्यन्तीत्याव्याधिन्यः शूरसेनास्तासामू ( पतये )
पालकाय (नमः) नमः ( निषङ्गिणे ) खड्गयुक्ताय (ककुभाय ) महते रुद्राय नमः
(स्तेनानाम् ) गुप्तचोराणाम् (पतये ) पालकाय ( नमः) नमः (निचेखे ) नितरां
चेहः निरुः तस्मै (परिचराय ) परितः चरतीति परिचरस्तस्मै ( नमः ) नमः
(परण्यानाम् ) बनानाम् (पतपे) पालकाय (नमः) नतिरस्तु ॥ २० ॥
भाषार्थ-जो हमारी रक्षाके निमित्त कर्णपर्यन्त धनुष बँचकर धावमान होते है, उन रुद्रके
निमित्त नमस्कार है, अथवा समलाभ प्राप्त करानेवालेके निमित्त नमस्कार है, शरणमें आये
पुए प्राणियों के पालक रुद्रके निमित्त नमस्कार है, शत्रुओका तिरस्कार करनेवाले, शत्रुओंको
अधिक मारनेवाले के निमित्त नमस्कार है, सब प्रकारसे प्रहार करनेवाली शूरसेनामौके पाल-
के निमित्त नमस्कार है, उपद्रवकारियोंपर खङ्ग चलानेवाले महान् रुद्रके निमित्त नमस्कार
है, गुप्तधनहारी जनोंके सन रूप होनेसे पालन करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, अपहारकी
इद्धिसे निरन्तर फिरनेवाले तथा मापणस्थानमें हरणकी इच्छासे फिरनेवालों (गठकों) के
अन्तर्यामीके निमित्त नमस्कार है, पनों के पालन करनेवाले के निमित्त नमस्कार है ॥ २० ॥
विवरण-जगत्मरमें सस्मिा रुद्र है, इस कारणसे स्तेनादि भी रुद्ररूप लिखेह, स्तेनादिक
शरीरमें नीव ईश्वर इन दो रूपोंसे ईश्वर स्थित है, जोवरूप स्तनादिशब्दवाच्य है, ईश्वर रुद्र-
रुपमे लक्षित है-जैसे शाखाके मनसे चन्द्रमाको दिखाते हैं इस प्रकार लक्ष्यार्थकी विवज्ञासे
संत्रोंमें लौकिकशब्द लिखे हैं ॥ २० ॥
मन्त्रः।
नमोबचते परिवञ्चतेस्तायूनाम्पतयेनमो-
नमोनिषङ्गिणऽधिमते तस्कराणुाम्पत
येनमानम मुकायियो जिघासयो
मुष्ण्णुताम्पतयेनमोनमौ सिमयोन-
चरयोविकुन्तानाम्पतयनम॥ २१ ॥
(६४) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- ॐ नमोवञ्चत इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्युदतिधृतिश्छंदः । रुदो देवता । वि० पू० ॥२१॥ माण्यम्-( वश्चते ) वञ्चति प्रतारयति तस्मै, वा गमनशालाय रुद्राय ( नमः ) नमोऽस्तु ( परिवञ्चते ) सर्वतो गमनशीलाय वा संबव्यवहारे धनापहवः परिवञ्चना । गुप्तचौरा द्विविधाः-रात्रौ वैश्मनि खातादिना द्रव्यहारः स्वीया एवाऽहर्निशं जातारो हतारश्च पूर्व स्तेना उत्तरे स्ताय तेपाम् (पतये ) पालकाय ( नमः। नमोऽस्तु (निषङ्गिणे ) खगिने ( इषुधिमते ) इषुधिस्तुणस्तत्सहिताय ( नमः) नमोऽस्तु (तस्कराणाम् ) प्रकटचौराणाम(पतये ) पालकाय ( नमः) नमोऽस्तु (सृकायिभ्यः) सुकेण वज्रेण सह यन्ति गच्छन्तीत्येवंशीलाः सकायिणः ते-पः ( जिघांसह्यः हन्तुमिच्छङ्ग्यः तेभ्यो कद्रेभ्यः ( नमः ) नमोस्तु (मुष्णताम् ) क्षेत्रादिपु धान्यान मपहर्तारो मुष्णन्तस्तेषाम् ( पतये ) पालकाय (नमः ) नमोस्त ( असिमदः असियुक्तेभ्यः ( नक्तञ्चरद्भ्यः) रात्री गच्छद्यः रुद्रेभ्यः ( नमः) नमोस्तु (विकृन्ता- नां) विकर्तनशीलानाम् (पतये) पालकाय ( नमः ) नमोस्तु ।। २१ ॥ भाषार्थ-उगोंके मन्तर्यामीके निमित्त स्वामीको अपना विश्वास दिलाकर व्यवहार में उनका बंधन करनेवालों के साक्षीके निमित्त नमस्कार है, गुप्तचोरॉके पाठकके निमित्त नमस्कार है, खड्गधारी, बाणधारीके अर्थात-उपद्रप करनेवाले के शान्त करनेवालों के निमिस नमस्कार है, प्रकाश चोरोंके पालकके निमित्त नमस्कार है, पन लेकर पहनेवाले हत्यावारीजनों मन्त यामी वा उनके रूप रुद्रोंके निमित्त नमस्कार है, क्षेत्रमादिसे धनादिके हरण करनेवालों के पालन करनेवाले रुद्रके निमित्त नमस्कार है, खड्गधारी रात्रि में फिरनेवाले दस्युगोंके हदय, स्थितके निमित्त नमस्कार है, छेवन करके पराया धन हरनेवाले दस्युगणके पालनकरनेवालेके निमित्त नमस्कार है ॥ २१॥ मन्त्रः। नर्मऽउष्ण्णीषिणगिरि चुरायकुलुबानाम्- तनभोनमऽइघुमड्योधन्यायिजयको লীলঙ্গবন্ধ-বিজাল- शवोनमो नमऽआयच्छयोस्रो नमोलमोविसृजधु ॥३२॥ THANI १ ऽध्यायः५.] भाष्यसाहता। (६५ ॐ नम उष्णीषिण इत्यस्य कुत्स ऋषिः। नियष्टिश्छन्दः । रुद्रो. देवता । वि० पू० ॥ २२॥ भाष्यम्-(उष्णीषिणे) उष्णीपं शिरोवेष्टनमस्यास्तीत्युष्णीपी तस्मै ( गिरिक राय) गिरी चरति पर्वतमंचारिणे ( नमः) नमोऽस्तु ( कुलञ्चानाम् ) कुं भूमि क्षेत्र गृहादिरूपां लुञ्चन्ति हरन्ति हुलुञ्चाः तेषाम् (पतये ) पालकाय ( नमः) नमोऽस्तु, (इघुमद्भ्यः) जनान् भीषयितुं वाणधारिणस्तेभ्यो रुद्रेभ्यः (नमः) नमोऽस्तु (क) अपि (धन्वायिभ्यः) हे रुद्राः धनुर्धारिभ्यः (वः) युष्मभ्यम् ( नमः ) नमोऽस्तु (पातन्वानभ्यः) भातन्वन्त्यारोपयन्ति ज्यां धनुपीत्यातन्वानास्तद्रूपेभ्यः ( नमः । नमोऽस्तु (च) अपि (प्रतिदधानभ्यः) प्रतिदधते सन्दधते वाणं धनुषीति सन्दधाना- स्तेभ्यः (वो) युष्मभ्यम् (नमः ) नमोऽस्तु (आयच्छद्यः) मायच्छन्त्याकन्ति धपि ते यायच्छन्तस्तेभ्यः ( नमः) नमः (च) अपि ( अस्यद्यः ) अस्यन्ति। क्षिपन्ति वाणानित्यस्यन्तस्तेभ्यः (वः) युष्मद्यः ( नमः) नमोऽस्तु ॥ २२॥ भापार्थ-उप्णीप (पगडी) धारण करनेवाले सभ्यगण ग्रामोंमें विचरनेवाले, शून्यमस्तक गिरि वनमें फिरनेवाले दोनों प्रकार दलोंके हदयमें स्थित रुद्रके निमित्त नमस्कार है, छल 'बल कौशलसे दूसरोंकी गृह भूमि मादि हरण करनेवालोंके पालकके निमित्त नमस्कार है,मन- प्योंके डरानेको पाण धारण करनेवाले और धनुप साथ लेकर चलानेवाले वा मुलञ्चगोंकि दमनार्थ पाणधारी माप रुद्रके निमित्त नमस्कार है, कुलुचौके दमनार्थ धनुषपर ज्या आरोपण करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, और धनुषपर वाण चढानेवाळे आफ्के निमित्त नमस्कार है धुलुचोंके दमनके निमित्त धनुषको आकर्षण करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, और बाणोंके निक्षेप करनेवाले आपके निमित्त नमस्कार है ॥ २२ ॥ मंत्रः। नोविसृजयो वियद्यश्ववानमो नमः स्वपद्भयाजाग्रहृयश्च वोनमो नमुशाने- क्युऽआसिलेक्यश्चवो नमोनमस्तिष्ठद्गयो घाबद्भयश्चवीनभोनम-सुभाना२३॥ ॐ नमो विसृजद्भय इत्यस्य कुत्स ऋषिः। निच्युदतिजगतीछन्दः । रुद्रो देवता। वि० पू० ॥ २३॥ ५ --
१६६)
स्द्राष्टाध्यायो-
[पञ्चमो-
भाष्यम्-(विसृजद्यः ) विमुञ्चन्ति वाणानाध्विति विमृजन्तः तेभ्यः (नमः )
• च) अपि (विध्यन्यः) शत्रून् ताडयद्यः (व:) गुप्मभ्यम् (नमः ) नमोऽस्तु
(स्वपद्यः) स्वप्नावस्थामनुभवद्यः (जाग्रद्भ्यश्च) जाग्रदवस्थावन्तस्तेभ्यो (वः)
युष्मालम् नमोऽस्तु (शयानेभ्यः ) सुपुत्यवस्थावन्यः (च आसीनेम्यः ) यासते ते
गसीनाः तेभ्यश्च (वो नमः) नमोऽस्तु (तिष्ठन्यः ) स्थितिं कुर्वन्द्यः (नमः)
नमोऽस्तु (धावझ्यः ) धावन्ति ते धावन्ता वेगवद्गतयस्वेभ्यः (वो नमः ) नमोऽस्तु
परमदैतप्रतिपादनाय स्तुतिः ॥ २३ ॥
भाषार्थ-पापियोंके दमनार्थ वाण त्यागनेवाले के निमित्त नमस्कार है, और शनने के लक्ष्य
देनेवाले आपके निमित्त नमस्कार है, और जाग्रत् अवस्था अनुभवी मापके निमित्त नम-
रहार है, सुषुप्तिमस्यावालों के अन्तरमें रियत सापके निमित्त नमस्कार , दुनोंके
अन्तरमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है, वेगवान्गतिव लोक सन्तरमें स्थित मापके
निमित्त नमस्कार है ॥ १३ ॥
मन्त्रः।
नम-सुभाक्य सुभापतिज्यश्चवोनमो
नयोजयोपतिवयश्चवोनोगड-
आध्याधिनीक्योविबिद्धयन्तीमयश्चवो
नमोनमुऽउगंणामयारतृहुदीक्यचयो
समोगमोगुणेक्यं ॥ २४॥
ॐ नमः सभाप इत्यस्य कुत्स ऋषिः । शकरी छन्दः। स्नो दे-
वृता । वि० पू० ॥२४॥
भाष्यम्-(समाभ्यः ) सभारूपेभ्यः रुद्रेभ्यः (नमः) नमोऽस्तु (च सभापतिभ्यः)
सभायाः पतिभ्यः (वो नमः ) नमेऽस्तु समादिषु दृष्टिः कर्तव्योत तात्पपेन् ।
(बशेभ्यः) यशास्तुरगास्तेभ्यः (नमः) नमोऽस्तु (अपविभ्यः ) अशानां पति-
यः (यो नमः ) नमोऽस्तु (याव्याधिनीभ्यः) आविध्यन्तीत्याव्याधिन्यः सेनास्ता-
स्य (नमः ) नमः (ब) अपि (विविध्यन्तीभ्यः ) विशेषेण विध्यन्तीति विविध्य-
त्या ताभ्यः (वो नमः ) नमोऽस्तु (उगणाय ) उत्कृष्टा गणाः भृत्यसमूहाः यासांता:
उयणा ब्राह्मादयः मातरस्ताभ्यः ( नमः) नमोऽस्तु (च) अपि (दतीभ्यः)
हन्तुं समर्थाः दुर्गादयस्ताभ्यः (वौ नमः) नमोऽस्तु ॥ २४ ॥
.
यायः ६.]
भाष्यसहिवा।
(६७)
मापार्य-मय वातसज्ञक रुद्र जो रुद्रलोकमें निवास करतेहै, अद्वतप्रतिपादनके निमित्त
उनका वर्णन करतेहैं-समारूप स्द्रके निमित्त नमस्कार है, सभामादिमें रुद्रष्टि करनी चाहि-
ये। और समापतिरूप आपके निमित्त नमस्कार है, प्रत्येक मधोंके अन्तरमें स्थित आपके
निमित्त नमस्कार है, और भोंके मधिपति आपके निमित्त नमस्कार है, देवसेनामों में स्थित
आपके निमित्त नमस्कार है, और विशेषकर वेधनेवाली देवसेनाओं में स्थित आपके निमित्त
नमस्कार है, उत्कृष्ट मृत्यसमहवाली ब्राह्मीमादि माता वा सेनामें स्थित रुद्रके निमित्त
नमस्कार है, और युद्ध में प्रहार करनेवाले दुर्गादिमें स्थित मापके निमित्त नमस्कार है॥२४॥
मन्त्रः।
नमोगुणेल्योगुणपतियश्चवनिमोनमो
वाक्यो ब्वातपतिभ्यश्चवानमोनमोग-
लैच्यो गृलपतियश्च वोनसोनमोवि-
रूपेश्योति पेजयश्ववोनमोनमुहले-
नान्यः॥२५॥
अनमो गणेभ्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । भुरिक्छकरी छन्दः । रुद्रो
देवता । वि० पू० ॥२५॥
भाष्यम्-गणेभ्यः) गणः समूहः तत्स्वरूपेभ्यः (नम:) नमः, (गणपति पश्च)
गणपालकास्तेभ्यश्च ( वो नमः ) नमस्कारः, (वातेभ्यः ) नानाजातीयाना संघास्तेभ्यः
(नमः) नमः (च)(वातपतिभ्यः ) वातपालकास्तेभ्यः (क) (नमः ) नमः
(गृत्सेभ्यः) गृत्सा मेधाविनस्तेभ्यः ( नमः) नमः (च) गृत्सपतयस्तत्वालका-
र तेभ्यः (व.) युष्माकम् (नमः) नमः ( विरूपेभ्यः ) नग्नमुण्डजटिळादयस्तेभ्यः
( नमः) नमः (विश्वरूप यः ) नानाविध रूपं येषांते विश्वरूपास्तुरङ्गवदनहयग्रीवा
दयस्तेभ्यः (वः) (नमः) नमः ॥ २५ ॥
मापार्थ-देवानुचर भूतविशेषोंके निमित्त नमस्कार है, गणों के अधिपति आपके निमित्त
नमस्कार है, विशष गण अथवा अनेकजातियोंके समूइके निमित्त नमस्कार है, वातगणोंके
अधिपति आपके निमित्त नमस्कार है, बुद्धिमानोंके अथवा विषयलपटके निमित्त नमस्कार
मौर बुद्धिमानों के रक्षक आपके निमित्त नमस्कार है, नग्न-मुण्ड-जीटलादि-विकृतरूपके
निमित्त वा विविधरूपवालों के निमित्त नमस्कार है, सर्वरूप नानाविधरूप वा तुरगवदन
इयग्रीवादिरूप मापके निमित्त नमस्कार है ॥ २५ ॥
[पञ्चमो-
(६८)
रुद्राष्टाध्यायी-
मन्त्रः।
नमुत्सेनान्यत्सेनानियश्चवोनमोनमो
रथिक्योऽअरथेश्यश्ववानमो नमः क्षुत्त-
क्य सङ्ग्रहीतयश्चवोनमोनमोमुहयोऽ
अब् केन्फ्यश्चवोनमः ॥२६॥
ॐ नमः सेनाभ्य इत्यस्य कुत्स ऋपिः । भुरिगतिजगती छन्दः ।
रुद्धो देवता । वि० पू० ॥२६॥
भाष्यम्-(सेनाभ्यः ) चमूस्वरूपेभ्यः ( नमः ) नमः (च)(सेनानिभ्यः ) सना-
नयन्तीति सेनान्यः तेभ्यः (क) ( नमः ) नमः (रायिभ्यः ) ग्था येषां ते रयिनस्ते-
भ्यः ( नमः) नमः (च) (अरयेभ्यः ) रथवर्जिता योद्धारस्तेभ्यः (वो नम:) नमः ।
(क्षतृभ्यः ) रथानामधिष्ठातारस्तेभ्यः ( नमः ) (च) (संग्रहीतभ्यः ) संग्रहीतारः सा-
रथयस्तेभ्यः (वो नमः) नमः ( महद्भ्यः ) जातिविद्यादिभिरुत्कृष्टास्तेभ्यः (च)
(अमकेभ्यः) प्रमाणादिभिरल्पास्तभ्यः (वो नमः ) नमः ॥ २६ ॥
भाषार्थ-सेनारूपके निमित्त नमस्कार है, सेनापतिरूप आपके निमित्त नमस्कार है, प्रश-
सित रथवालोंके निमित्त नमस्कार है, रथहीन आपके निमित्त नमस्कार है, रथके माध-
शाहके अन्तरमें स्थितके निमित्त नमस्कार है, और साथियों के अन्तरम स्थित वा रणसाम-
श्रीग्रहणकर्ता आपके निमित्त नमस्कार है, जाति, विद्या, और ऐश्वर्यमें उत्कृष्ट पूज्यरूपके
निमित्त नमस्कार है, प्रमाणादि अल्परूप मापके निमित्त नमस्कार है ॥ २६ ॥
मन्त्रः।
नमस्तक्षम्योरपकारेश्मवोनमानमुह
कलालक्यका रजयश्चबानमोनम
निषादेव्य-पुञ्जिष्टेयश्चवोनमो नमः
श्वनिक्यामगुयुझ्यश्चवोनमोनमुश्व-
काय ॥२७॥
ऽध्यायः ५.] माष्यसहिता। (६९) नमस्तक्षभ्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । निच्यच्छक्करी छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥२७॥ भाष्यम्-(तक्षभ्यः) तक्षाणः शिल्पजातयस्तेभ्यः ( नमः) नमः (च) ( रथ- कारेभ्यः) रथं कुर्वन्तीति स्थकारास्तेभ्यः (वः) (नमः) नमः (कुलालेभ्यः ) कुम्भकारेभ्यः ( नमः) नमः (च) कारेभ्यः लोहकारेभ्यः ( वो नमः ) नमोऽस्तु (निपादेभ्यः ) भिल्लेभ्यः ( नमः ) नमः (च) (पुञ्जिष्ठेभ्यः ) पुक्कसादिभ्यः ( वो नमः) नमोऽस्तु (श्वनिभ्यः) शुनो नयन्तीति वन्यस्तेभ्यः (नमः ) नमोऽस्तु (च) (मृगयुभ्यः) मृगान् कामयन्त इति लुब्धकास्तेभ्यः (वो नमः) नमोऽस्तु ॥ २७ ॥ भाषार्थ-वाष्टकी शिल्पविद्याके जाननेवालोंमें व्याप्तके निमित्त नमस्कार, और विमान रय निर्माणकारी उत्कृष्ट तक्षाके अन्तरमें स्थित आपको नमस्कार है, प्रशसित मृत्तिकाके पात्र बनानेवालोम स्थितके निमित्त नमस्कार, भोरलोहेके शस्त्र यनानेवालोंमें स्थितके निमित्त नमस्कार है, गिरिचारी भीलआदिमें स्थित रुद्र के निमित्त नमस्कार, और पक्षिघातक पुल्कस आदि वा सकीर्णजातियोंके अन्तरमें स्थित च्याप्त आपके निमित्त नमस्कार है, कुत्तोंके गळेमें रस्सी पापकर धारण करनेवालोंके अन्तरको जानने वाले के निमित्त नमस्कार है, मृगोंकी कामनाशले व्यापक अन्तर स्थित मापको नमस्कार है ॥ २७ ॥ मन्त्रः। नमुल्वक्युस्श्वपतिझ्यश्चवानमोनमोभु- हार्यचरुवायचुनम शुश्विपशुपतयेचु- नमोनीलग्रीवायचशितिकण्ठाय नमः कपदिले ॥२८॥ ॐ नमः सभ्य इत्यस्य कुत्स ऋषिः । आपी जगती छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥२८॥ भाग्यम्-(श्वभ्यः ) कुकुररूपेभ्यः (नमः ) नमोऽस्तु (व) ( श्वपतिभ्यः ) श्वपालकेभ्यः (43) युष्मभ्यम् ( नमः ) नमोऽस्तु इत उत्तरं रुद्रनामानि ( च ) (भवाय) मवन्ति उत्पद्यन्ते जन्तवोऽस्मादिति भवस्तस्मै ( नमः ) नमोस्तु (च रुद्राय )रु दुःखं द्रावयति रुद्रस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (शर्वाय) पापहा- रिणे (नमः) नमोऽस्तु (च) (पशुपतये) जीवाना पालकाय वा अज्ञान् पाति रक्षतीति पशुपतिस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (नीलप्रविय ) नीला श्यामा श्रीवा यस्य स .
रुद्राष्टाध्यायी- (७०) [ पत्रमो- तस्मै (शितिकण्ठाय ) शिानः श्वेतः कण्ठो नीलातिरिक्तमागो यस्य शिनिकटस्तर ( नमः) नमोऽस्तु ॥२८॥ भापार्थ-बुकुरों के अन्तरमें 'स्थतके निमित्त नमस्कार है, सरोके अधिपति किरातीके मन्तरमें स्थित आपके निमित्त नमस्कार है, (यह पूजावाचवा वः-शब्द है। उभयतो नम- स्कारवाले मत्र पूर्ण हुए । अव नमस्कारोपक्रम मन्त्र लिखते है ) और जिनमें सब जगत उत्पन्न होता है उनके निमित्त नमस्कार है, इस दर करनेवाले देवरे निम्न नमस्कार है और पापके नाश करनेवाले के निमित्त नमस्कार है। प्राणियोंकि सधिपति निमित्त नमधारहे, नीलवर्णनीवावाले अथवा नीलवर्ण भाकाशमें उदित में स्थित निमिन नमस्कार है, नील- कण्ठमाले वा मेघसहित माकाशमें उदित हुए गर्यके भन्तरमें पित, निमित्त नन- स्कार है ॥२८॥ मन्त्रः। नमकपर्दिनेचुट्युप्तकेशायचुनम सहा- क्षायंचशतधन्वनेच नमोगिरिशुयार्थच शिपिविष्टायचुनौमीदुष्टमायुरेपुरतेचन्द्र- मौजुदाय ॥२९॥ ॐ ननः कपर्दिने इत्यस्य कुता ऋपिः । भुरिगतिजगती छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥२९॥ माष्यम्-( कपर्दिने ) जटाजूटधारिणे ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (व्युतकशाय) मुण्डितकेशाय (नमः ) नमोऽस्तु (च) (सहवामाय) बहुने प्राय (ब) (मतध- न्वने) बहुधन्वने (नमः ) नमोऽस्तु (च) (गिरिशयाय ) गिरी गेते गिरिशयस्तस्मै (च)(शिपिविष्टाय ) विष्णुरूपाय यदा-शिपिपु पशुपु विष्ठः प्रविष्टः' 'पगयो शिपिः' इति श्रुतेः (व) (मीदुष्टमाय) सेतृतमाय यूने परिणामहीनाय (च) (इघुमते ) शग्युक्ताय (नमः ) नमोऽस्तु ॥ २९ ॥ माषार्थ-जटाजूटधारी के निमित्त भी नमस्कार है, मुण्डितकेशके निमित्त नमस्कार है मार सहस्रलोचन इन्द्ररूपके निमित्त नमस्कार है, बहुत धनुष धारण करनेवालेकै निमित्त नम- स्कार और सवप्राणियोंके अन्तर व्यापक विष्णुरूपके निमित्त नमस्कार ("विष्णुः शिपि- विष्टः" इति श्रुतेः । अथवा पशवो वे शिपिः इति श्रुतेः) वगणोंमें व्याप्तके निमित्त नम- स्कार है, (अथवा यज्ञो वै शिपिः ) यज्ञमें अधिष्ठातृदेवतारूपसे प्रविष्ट अयना शिपिः
ऽध्यायः५.]
भाष्यसहिता।
(७१)
मादिस्यमडरूमें स्थित ("शिपयोऽत्र रश्मय उच्यन्ते तैराविष्टो भवति" इति ) के निमित्त
नमस्कार है । और तृप्तिकर्ता मेषरूपसे वप्तिकर्ता वा चार पदार्थोकी वर्षा करनेवाले के निमित्त
भोर बाणधारीके निमित्त नमस्कार है ॥ २९ ॥
मन्त्रः।
नमोहत्यायचहामुनाचुगमोबृहतेचुवर्षीय
सेचनमोबुद्धायचसुवृधेचुनमोग्यायचष्प्र-
थुमार्यचुनमऽआशा ॥३०॥
ॐ नमो हवायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । विराडा त्रिष्टुप् छन्दः ।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥३०॥
भाष्यम्-(हस्वाप) लघुपमाणका हवः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च)
(वामनाय ) संचितादयवाय (च) (वृहते ) बृहन् प्रौढाइस्तस्मै (च) ( वर्षी
यसे) वर्षीयानतिशयेन वृद्धरतस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (वृद्धाय ) वृद्धो वयसा-
धिरस्वस्मै (च) (सवृधे) वन्ति विद्याविनयादिगुणैस्ते वृधः पण्डिताः किपू तैः सह
वर्तत इति तत् तस्मै (नमः ) नमोऽस्तु (च ) (अध्याय ) जगतामग्रे भवः अश्य-
स्तस्मै (च)(मयमाय ) मुख्याय ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ३० ॥
भाषार्थ-मल्पशगरके निमित्तभी नमस्कार है। और समुचित अवयवमें व्याप्तके निमित्त
नमस्कार है, प्रोटाङ्गके निमित्त नमस्कार है, अतिवृद्धिके निमित्त नमस्कार है, अवस्था
भाधिकके निमिन नमस्कार है, विद्या विनय मादि गुणयुक्त पडितोके साथ वर्तनव ले युवाक
निमित्त नमस्कार है। और मुख्य सब जगत्में प्रादुर्भाव होनेवालेके निमित्त नमस्कार है
सबमें प्रथम मुख्य निमित्त नमस्कार है ॥ ३० ॥
विशेष-आशय यह कि, जब सृष्टि नहीं थी तब आप थे, आप सबसे प्रथम और मार
कहे जाते हैं मापको नमस्कार है ॥ ३० ॥
-
मन्त्रः।
नमऽआशवैचाजिरायचुनमुख्शीव्यायचुशी-
श्यायचुनमुऽऊम्म्यायचावस्वन्यायचुन-
मौनादेयायचठ्ठीप्यायच ॥३१॥
८७२) रुद्राष्टाध्यायी- [पचमो- ॐ नम आशव इत्यस्य कुत्स ऋपिः स्वराडाी पदिश्छन्दः । को देवता। वि० पू० ॥ ३१ ॥ माध्यम-( आशवे) जगद्व्यापिने (च) (पजिराय) गतिशीलाय (नमः) नमोऽस्तु (च) (शाध्याय ) वेगवस्तुनि भवः शीध्यः तस्मै (च) (शाभ्याय) शोभते कत्यते इति शीभ आत्मश्लाघी पचायच तत्र भव हात छान्दसो यत्प्रत्ययः । शीमो जलप्रवाहो वा शीभाक्षियो वा तत्र भवाय (नमः ) नमोऽस्तु (च) (उाच) फलोलेषु भवः उHः तस्मै (च) (अवन्याय ) अर्वाचीनं गच्छन् उनकम्य स्खनो शनिः आवन्धनः शत्र भवाय ( नमः ) नमः (च) (नादेयाय ) नद्यां मा नादेय. सस्म (च) (द्वप्यिाय) द्वीपे भयो द्वीप्यस्तस्म ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ३१ ॥ भाषार्थ-जगत्-व्यापक के निमित्तभी नमरकर है, गतिशीलय निमित्त सर्वत्र व्याप्तके निमित्त नमस्कार है, और वेगवाली वस्तुमा विद्यमान मोर जलप्रवाहमें विद्यमान मात्मा श्वाधी वा आत्मारूपके निमित्त नमस्कार है, जलतरगमें होनेवाले और म्यिरजलों में विद्य- मानके निमित्त नमस्कार है, नदीमें होनेवालके निमित्त और द्वीप मर्यात् टापूमें होनेवालेके निमित्त नमस्कार है ॥३१॥ गूढार्थ-प्राणोंके पुष्ट करनेवाले भन्तःकरणचतुष्टयके पुष्ट करनेवाले शीघ्रगमनादि मुखकी भाप्तिकी लहरें, शब्दादिका सुनना, शब्द करना, इत्यादि शक्तियोंके दाता आपको नमस्कार ईद्वीप दीपान्तरोंकी शक्ति देनेवा मापको नमस्कार है ॥ ३१ ॥ मन्त्रः। लमौज्ज्येष्ठायचकलिष्ठायचनम-पर्बुजार्य चापरणायचनमोमध्यमार्यचाफ्गुरुम्माय- चुनौ जघुन्यायचबुद्धन्यायचुनमुत्सो अयाय॥३२॥ ॐ नमो ज्येष्ठायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । स्वराडापी त्रिष्टुप् छन्दः । रुद्धो देवता । वि० पू० ॥३२॥ भाष्यम्-( ज्येष्ठाय ) अत्यन्तं प्रशस्यो ज्येष्ठस्तस्मै ( च ) (कनिष्ठाय) अत्यन्त युवाऽल्पो वा कनिष्ठस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (पूर्वजाय ) पूर्व जग. दादौ हिरण्यगर्भरूपेणोत्पन्नः पूर्वजस्तस्मै (च) (अपरजाय ) अपरस्मिन्काले प्रलये कालाग्निरूपेण जात अपरजस्तस्मै (नमः) नमः (च) (मध्यमाय ) गध्ये भवो H ऽध्यायः ५.] माष्यसहिता। (७३) मध्यमस्तस्मै देवतिर्यगादिरूपिणे (अपगल्भाय ) अव्युत्पन्नेन्द्रियरूपाय, वा एक- पर्मान्तरितोऽपगल्मस्तस्मै (नमः) नमोऽस्तु (च) (जघन्याय ) जघनं गादीनां पश्चान्नागस्तत्र भयो जघन्यस्तस्मै (च) ( बुध्न्याय ) बुने वृक्षादिमूले भवो बुध्न्यस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ३२ ॥ भाषार्य-अतिप्रशस्य ज्येष्ठरूपके निमित्त और अतियुवा वा कनिष्ठरूपके निमित्त नम- स्कार है, (मर्यात् सृष्टिके आरम्ममें जो प्रयम उत्पन्न हुमा तिसके मन्तरमें भी विद्यमान सौर उसके पीछे जो श्छ होरहाह उस सबके हृदयमें भी विद्यमान होनेसे ज्येष्ठकनिष्ठरूप है) और जगतकी मादिम हिरण्यगर्भरूपसे उत्पन्न और प्रलयकालमें कालाग्निरूपसे होने- वाले के निमित्त नमस्कार है । मोर मुष्टिसहारके अनन्तर देवतिर्यगादिरूपसे होनेवाले के निमित्त नमस्कार है, (अर्थात् प्रथम गर्भाधानमें यालकके रक्षकरूपसे उस बालकके आत्मा- का मारमा होकर गर्भ में कस करके उस बालकके साथ ही उत्पन्न होताई तिसके उपान्तर गर्भाधानमें भी और गर्भमें भी इसी प्रकार इसको प्रथम द्वितीय तथा सपूर्ण ही सन्तान कहा जाताहै ) और मप्रगल्भ अव्युत्पन्न इदिय प्रकाशरहित मण्डरूपके निमित्त नमस्कार और गवारिके पश्चाद्भागमें होनेवाले स्वेदन काम कीटादिमें वर्तमानके निमित्तं नमस्कार है, तथा वृक्षादिके मूलमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है ॥ ३२ ॥ विशेष यह सवयवविधायक नमस्कार है ॥ ३२ ॥ मन्त्रः। लमुत्सोन्यायचष्प्रतितुल्यायचु नमोवा- रम्यायचुक्षेम्यायचुलमुहम्श्लोक्क्यायचा- बसान्यायचनमऽउ विच खल्ल्पायच नमोबन्याय ॥३३॥ ॐ नमः सोभ्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । आपी त्रिष्टुप्छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ३३ ॥ माप्यम्-(सोभ्याय) सोमं गन्धर्वनगर तत्र अवस्तस्मै यदा-सोभ्यः उभाभ्यां पुण्यपापाभ्यां सहितः मनुष्यलोकस्वत्र मकः सोभ्यस्तस्मै (च) (प्रतिसर्याय) प्रति- सरो विवाहोचितं हस्वसूत्रमभिचारो वा तत्र भवस्तस्पै ( नमः ) नमोऽस्तु ( च ) (याम्याय) पापिनां नरकार्तिदाता तस्मै (च) (क्षेम्याय) क्षेमे कुशले भवः क्षेम्यस्तस्मै (नमः) नमोऽस्तु (च) (श्लोस्याय) श्लोका वैदिकमंत्रा यशो वा तत्रभवः श्लोक्य- स्वस्मै (च) (अवसान्याय ) अवसानं समाप्तिर्वेदान्तो वा तत्र भवः तस्मै ( नमः) (७४) रुद्रायाध्यायी- [पञ्चमो- नमोऽस्तु (च)(उयाय) उर्वरा सर्वसस्याढ्या भूमिस्तत्र धान्यरूपेण भवस्तर (च) (खल्याय) खले धान्यविवचनदेशस्तत्र भवस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु॥३३॥ भाषार्थ-गन्धर्वनगरमें होनेवाले अथवा पुण्यपापसाहत वर्तमान मनुष्यलोकमे होनेवाले ("पुण्येन पुण्यलोक नयति पाऐन पापमुभाभ्यां मनुष्यलोकम् इति ) अथवा पृथिवीलोकमें बस्पन्न होनेके समय जन्मे पालकके अन्तर देवतारूपके निमित्त भी नमस्कार है, और विवाहादिकार्य में हाथमें बंधे मगलमूत्र में विद्यमानके निमित्त नमस्कार है | सौर प.पि. याँको दुःख देनेको यममें वर्तमान और कुशलमें होनेवाले वा परलोक गये हुए प्राणीके. कल्याणमें विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, और इस ससारमें यशप्रचारके कारण वा वैदिक मत्ररूपी यशम होनेवालको और वेदान्तमें स्थित वा जिसके प्रसादसे प्राणी जन्म- मृत्युसे छुटकारा पाताह उसके निमित्त नमस्कार है, उपजाट भूमिमें उत्पन्न हुए धान्या- दिके अन्तरमें भी विद्यमानके निमित्त नमस्कार है और धान्यविवेचन देशमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है ॥ ३३ ॥ मन्त्रः। नमोबन्यायचकक्ष्यायचुनमः श्रुवायच प्रति श्रुवायचुनमऽआशुणाय चाशुर- थायचुनमुशूरायचावभेदिने चुलमोंबि- लिम्सने ॥ ३४॥ ॐ नमो बन्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । स्वराडापी निष्प छन्दः। रुद्रो दे० । वि० पू० ॥ ३४ ॥ भाष्यम्-(इन्याय ) वने वृक्षादिरूपेण भवो वन्यस्तस्मै (च) ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (कक्ष्याय ) कक्ष तृणं वल्ली वा तत्र भाः कक्ष्यस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (वाय ) शब्दरूपाय (च) प्रतिश्रवाय ) मातशब्दरूपाय (नमः ) नमोऽस्तु (च) (बाशुषेणाय) माशु शीघ्रा सेना यस्य सः तस्मै (च) ( बाशुग्याय ) शीघ्रो रथो यस्य तः आशुस्थस्तस्मै ( नमः) नमः (च) ( शूगय) युद्धीगया (च) (अमेदिने ) अवभेदी अर्वाचीन भत्तुं शीलमस्येति अवमेदी तर (नमः) नमोऽस्तु ॥ ३४॥ भाषार्थ-वनमें वृक्षादिरूपसे होनेवाले के निमत्त वा घरमें विद्यमानी भी नमस्कार है, और तृणवल्लीमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है, शब्दरूप वा ध्वनिमें वर्तमानके निमित्त नमस्कार है, और प्रतिध्यान में विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, शीघ्र चल्नेपाली सेनाकी, ऽध्यायः५. ] माष्यसहिता। (७५) श्रेणी में विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, भौर शीघ्र चलनेवाले रथोंकी श्रेणी में विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, युद्धविशारदोंके हृदय विद्यमानके निमित्त, और शत्रुका हृदय घेघ- नवोल शस्त्रमें भी विद्यमानके निमित्त नमस्कार है ॥ ३४ ॥ नमोबिल्म्मिचकवाचिचनमौसम्मिणे चवरूथिनेचुनमः श्रतायचश्रुतसेनायचन मौजुन्ब्क्यायचाहनुयायचनलोधष्ण- वै॥३५॥ ॐ नमो बिलिमन इत्यस्य कुत्स ऋषिः । स्वराडापी । त्रिष्टुप छन्दः। रुदो देवता। वि० पू० ॥ ३५॥ भाष्यम्-(विल्मिने) विल्ममस्यास्तीति विल्मी, विल्म शिरस्त्राणमस्यास्तीति विल्मी तस्मै (च)( काचिने ) पटस्यूतं कासिगर्भ देहरक्षक कवचं तदस्यास्तीति तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (ब) (वर्मिणे ) लोइमयं शरीररक्षकं वर्म तदस्यारत्तीदि तस्मै (च) (वरूथिने ) वख्यः स्थगुप्तिर्वा सोऽत्यास्तीति वरूथी तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) (श्रुताय) प्रसिदाय (च) (श्रतसेनाय ) श्रुता प्रसिद्धा सेना यस्य स श्रुतसेनः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) (दुन्दुभ्याय) दुन्दुभी मनः दुन्दुभ्यस्तस्मै (च) (हनन्याय) आहनने भवः आइनन्यः तस्मै (नमः) नमोऽस्तु ॥ ३५ ॥ भाषार्य-शिरस्त्राण धारण करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, वा पेलपत्र धारणले प्रसन्न होनेवालेके निमित्त नमस्कार है । और देहावरण स्यूत अगरणा काच धारण करनेवालेके निमित्त नमस्कार है। बस्तर धारण करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, रथका गोपनस्थान वा हायोके अपरकी अम्वारीमें विद्यमानके निमित्त नमस्कार है । और प्रसिद्ध के निमित्त नम- स्कार है, प्रसिद्धसेनावालके निमित्त भी नमस्कार है । और रणके बो में विद्यमानके निमित्त और वाद्यसाधनदण्डआदिमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है ॥ ३५ ॥ भावार्थ-यह ससार विल्वके तुल्य है, इसमें जलके तुल्य आपकी शीतल वेदवाणी भाप कवचके समान मायासे ऐसे ढके हैं जिस प्रकार शरीर वखारसे आच्छादित होता है, सद्गुण सस्यविज्ञान धनादिसनारूप हैं, जिससे पापादि शत्रु मागते हैं आपका यश वेदा- दिमें बहुत प्रकारसे मुना है, इसीसे वेदको श्रुति कहते है वही दोषरूपी शत्रुके निवारण कग्नेकी सेना है, उसके शब्द दुन्दुभी हैं, जिस सेनासे पापार्दिशत्रुओंका हनन होताहै ऐसे भापके निमित्त नमस्कार है ॥ ३५ ॥ ।
(७६) रुद्राष्टाध्यायी [पञ्चमो मन्त्रः। नमोघष्णवेचप्पमशायचनमोनिषङ्गिणेचे पुधिमतेचनसंस्तुक्षिणेषवेचायधिनैचुनमः स्वायुधायचसुधन्वनेच ॥ ३६॥ ॐ गमो धृष्णव इत्यस्य कुत्स ऋषिः । भुरिगापी पक्तिश्छन्दः । रुद्रो देवता वि० पू० ॥३६॥ माष्यम्-(च) (धृष्णवे ) धृष्णुः प्रगल्भः तस्मैः (नमः ) नमोऽस्तु (च) (प्रमृगाय) पंडिताय नमः (च)( निपङ्गिणे ) खड्गयुताय (च) (इषुधिमते) नृणयुताय (नमः ) नमोऽस्तु (च) (तीक्ष्णेपो) तीणा असह्या इपको वाणा 'यस्य सः तीक्ष्णेषुस्तस्मै (च) (आयुधिने ) भायुधधारिण ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (स्वायुधाय ) शोभनायुधाय (च) (सुधन्वने ) शोभनधनुषे ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ३६॥ भाषार्थ-प्रगल्भरूप अपने पक्षकी रक्षा करनेवाले निमित्त नमस्कार है, विचारशीक पंडितरूप वा विपक्षदटन करनेवाले के निमित्त नमस्कार है । और खगधारीके निमित्त नम स्कार है, तरकसयुक्तके निमित्त नमस्कार है; तीक्ष्णपाणधारीके निमित्त मोर मुद्रादि मायुध धारण करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, शोभन मायुध, विशाल, लोह, शिलादि धारण करनेवालेके निमित्त नमस्कार है । और पिनाक श्रेष्ठधनुषधारी के निमित्त नमस्कार है ॥२६॥ मन्त्रः। नमुल्जुत्यांवचुपथ्योपचुनमुकाट्याय चुनीप्यायचुनसुकल्यायचरल्यायच नमोनादेयायंचवैशुन्तायंचुनमुह कूप्या- य॥ ३७॥ ॐ नमः सुत्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । निवृदापी त्रिष्टुप् छन्दः । रुद्धो देवता । वि० पू० ॥ ३७॥ भाष्यम्-(च) (खुत्याय) सुतिः नद्याः क्षुद्रप्रवाहस्तत्र भवः सुत्यस्तस्मै (च) (पथ्याय) पथि भवः पथ्यः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) ( काट्याय) काटे
ऽस्याय: ५.]
भाष्यसहिता।
(७७)
मवः काटयः कुत्सितम् अटति काटः विषममार्गः तत्र भवः काट्यः तस्मै (च)
(नीप्याय) नीवर्गच्छन्त्पापो यत्र स नीपः निम्नभूमिः तत्र भवः तस्मै (नमः) नमोड-
स्तु (च) (कुल्याय) कुल्या अल्पा कृत्रिमा सरित् कुलेषु देहेषु वाऽन्तयामिरूपेण
भवः कुल्यः तस्मै (च) (सरस्याय) सरसि मवः सरस्यः तस्मै (नमः) नमः (च)
(नादेयाय ) नद्यां भवो नादेयः तस्मै नदीजलरूपाय (च)(वैशन्ताय ) वेशन्तोऽ-
ल्पसरः तत्र भवः वैशन्तः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ३७ ।।
भाषार्थ-भुद्रमार्ग ग्रामकी बाटमें स्थितके निमित्त और राजमार्गमें होनेवाले के निमित्त
नमस्कार है, दुर्गम मार्गमें स्थितके निमित्त और पर्वतके नीचे मागमें स्थितके निमित्त नम.
स्कार है, नहरके मार्ग स्थितके निमित्त वा देहोंमें अन्तर्यामीरूपसे स्थितके और सरोवरोंमें
होनेवालेके निमित्त नमस्कार है, नदीमें जलरूपसे स्थितके निमित्त और मल्पसरोवर गोष्प-
दादिके जलमें स्थितके निमित्त नमस्कार है ॥ ३७ ॥
गर्भित आशय-वेदही सबके निमित्त सुगम मार्ग है, इसमें चलनेसे दुःखादि नहीं सताते
कारण कि इसमें कटक नहीं हैं। और छोटे बडे सरोवररूप जो आश्रमोंका वर्णन है उनके
द्वारा आप प्राप्त होते हो ॥ ३७॥
मन्त्रः।
नमुस्कप्यायचावटयाएचनमोबीघ्याय
चातुप्यायचनमोमेग्घ्यायचविद्युत्यायच
नमो वयायचावायचनमो बायां-
य॥ ३८॥
ॐ नमः कूप्यायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । भुरिगा पंक्तिश्छन्दः ।
रुद्धो देवता । वि० पू० ॥ ३८॥
भाष्यम्-(च) (कृप्याय) कूपे मवः कूप्यः तस्मै (च) (अवट्याय ) अवटे
गर्ने भवः अवट्यः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (वीध्याय ) विशेषेण इनं निर्मल
शरदभ्रं तत्र भवो वीध्यः । यदा-विगतं इथ्रो दीप्तिर्यस्मात्स बीधी धनागमः तत्र भवाय
(च)(आतप्याय) यातपे भवः आतप्यः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (मेवाय)
मेवे भवः मेग्ध्यः तस्मै (च) (विद्युताय) विद्युति भवः विद्युत्यः तस्मै ( नमः)
नमोऽस्त (च) (वाय ) वर्ष भवो वयः तस्मै (च)(अवाय ) अवर्षे मको
अवय॑स्तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ३८ ॥
(७८) द्राधान्यायी- [पञ्चमो- मापार्थ-कूपमें होनेवाले के निमित्त और गर्तमें होनेवालेके निमित्त नमस्कार है, और महा- प्रकाश था घोर अधकारमें स्थितके निमित्त और धूप वा प्रकाशमें होनेवाले निमित्त नमस्कार है मेधमें होनेवाले के निमित्त और बिजलीमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है। और वाकी चारामें स्थितके निमित्त, तथा दृष्टिक प्रतिबंध होनेवालेके निमित्त नमस्कार है ॥ ३८ ॥ नमोबायांयचरेषाम्योपचुनमोबास्तुट्या- यचवास्तुपायचुनमुहसोमायचाहार्यचन्- मस्तानायचारुणायचुगम-शुङ्गवे ॥३९॥ ॐ नमो वात्यायेत्यस्य कुत्स ऋपिः। स्वराडाषी पंक्तिश्छन्दः। रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ३९॥ भाष्यम्-(च) और (वात्याय ) वाते भवः वात्य तस्मै (च) (रेम्याय ) रिष्यन्ते नश्यन्ति भूतान्यत्रेति रेष्मा प्रलयकालः तत्रभवः रेण्यः तस्मै ( नमः) नमोऽ. -स्तु (च) (धारतव्याय ) वास्तु गृहं तत्र भाः वास्तव्यः तस्मै (च) (चास्नुपाय) वास्तु गृहं पाति वास्तुपः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च)(सोमाय) उमासहितः सोम- स्तस्मै (च) (रुद्राय ) दुःनाशकाय ( नमः) नमोऽस्तु (च) (ताम्राय) उद- यादविरूपेण तस्मै (च) ( अरुणाय) अरुणल्पाय ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ३९ ॥ भाषार्थ-वायुप्रवाहमें होनेपालके निमित्त नमस्कार है, मोर प्रलयकी पवनमें होनेवाले निमित्त नमस्कार है । वास्तुगृहमें होनेवाले के निमित्त और वास्तुगृहके पालनेवाले के निमित्त समस्कार है । चन्द्रमामें स्थितके निमित्त वा उमासहितके निमित्त, और दुःखनाशक रुद्ररूप या मग्निरूपके निमित्त नमस्कार है । सायकालके सूर्य में स्थितके निमित्त प्रमातकालीन सूर्यमें स्थितके निमित्त नमस्कार है वा उदयकालीन ताम्र और उदयकालके उपरान्त कुछ रक्तरूपसूर्यमें स्थितके निमित्त नमस्कार है ॥ ३९ ॥ आशय-वायु आदिके परमाणुमौंको एकत्र कर पचीकरणकी रीतिसे इस ससारकी सपूर्ण अस्तुओंके रचनेवाले और सबके रक्षक सोम यव आदिके उत्पादक पापादि दोष निवारणको मयानकरूप अग्रिसे तप्त धातुके समान शुद्ध रजोगुणसे संसार उत्पादकके निमित्त नमः स्कार है ॥ ३९ ॥ मन्त्रः। नमन्शुङ्गवैचपशुपतयेचनमऽउग्यायची- व्याय: ५.] माष्यसहिता। (७९) मन्त्रः। सायंचनसोंग्ग्रेवधायचरेवधाय चुनमोह- बेचहनीयसेचनमौवृक्षेब्झ्योहरिकेशेल्यो नमस्तारायं ॥४०॥ ॐ नमः शंगर इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्देवा ऋषयः । सुरिगति- शबरी छन्दः । रुनो देवता । वि० पू०॥ ४०॥ भाष्यम्-(शगवे) शं सुखं गमयतीति शंगुः सुखरूपा गावा पाचो वेदरूपा यस्पति वा तस्मै () (पशुपतये ) प्राणिनां पालझाय ( नमः ) नमोऽस्तु ( च) (उपाय ) शत्रून् हन्तुमुद्गुर्णायुधाय (च) (भीमाय ) भीमः शत्रुभयोत्पादकः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) (अग्रे वधाय ) अग्रे स्थितो इन्तीति अग्रेधः तस्मै (च) दूरे वधाय) दूरे स्थितो हन्तीति दूग्वका तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (इन्द्र) इननकत्र लोके यो हन्ति वढूपेण रुद एव हन्तीत्यर्थः । (च)(हनीयसे) अतिशयह- ननकः ( नमः ) नमोऽस्तु (च (हरिकेशेभ्यः ) हरिता वर्णा केशा इस येषां तेभ्यः (शेभ्यः) कल्पतरूपेभ्यः ( नमः) (च) (ताराय) तारयति संसारमिति तारः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु ॥ ४० ॥ मापार्थ-कल्याणरूप देववाणीवाले के निमित्त नमस्कार है,और प्राणियोंके पालक्के निमित्त नमस्कार है, शत्रुओं के मारनेको कठिन आयुध उठाये कठिन अन्तःकरणवाले के निमित्त और शभपउत्पादक भयानकदर्शनके निमित्त नमस्कार है, सन्मुखके शत्रुका वच करनेवाले के निमित्त और दूरके शत्रुका वध करनेवाले के निमित्त नमस्कार है, मारनेवाले के रूपमें स्थित स्यावर पदार्थक लयकारी निमित्त नमस्कार मोर भतिशपहन्ता सदाको मृत्युका अभाव करनेवाले निमित्त नमस्कार है, हरेपत्तेवर केशवाले कल्पतरुरूपके निमित्त नमस्कार है, मारके तारनेवाले शाररूप निमित्त नमस्कार है ॥ १० ॥ नर्सःशम्भुवायंचमयोभुवायचुनम शङ्करा- यचमयस्स्कुरायचनम शिवायचशिवत- रायच॥४१॥ -- रुद्राष्टाध्यायी- - (८०) [पञ्चमो- - ॐ नमः शम्भवायेत्यस्य परमेष्टी ऋपिारुद्रो देवता। वि०पू०४१॥ भाष्यम्-(शम्भवाय ) शं भवत्यस्मादिति शम्भवः । यद्वा-शं मुखरूपश्चाती भवः संसाररूपश्च मुक्तिरूपो भवरूपश्च मानन्दविज्ञानघनरूपश्च तस्मै (नमः ) नमोऽस्तु (च) ( मयोभवाय ) सुखरूपाय (च)(शङ्कराय ) शं करोतीति शङ्करः लौकिक सुखकराय (नमः) नमोऽस्तु (व) मयस्कराय मयः मोक्षसुखं करोतीति मयस्करस्तस्मै (च) (शिवाय) कल्याणरूपाय ( नमः ) नमः (च) (शिवतराय ) निर्विकाराय निति- शयसर्ववीजाय भक्तानपि निष्पापान कगेतीत्यर्थः । तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ॥ ४१ ।। भाषार्थ-इस लोकके कल्याणकारी जिनसे मुख होताहे अथवा सुखरूप, संसाररूप और मुक्तिरूपके निमित्त नमस्कार है, ससारसुखदाता पारलौकिक कल्याणके आकारके निमित्त नमस्कार है, लौकिकसुख करनेवाले के निमित्त नमस्कार है और मोक्षसुख करनेवालेके निमित्त नमस्कार है, कल्याणरूप निष्पापके निमित्त नमस्कार है और भक्तोंके अत्यन्त कल्या- मकारक तथा निष्पाप करनेवालेके मिमित्त नमस्कार है। ॥ ११ ॥ विशेष-सक्षदनादिरूपसे लौकिकमुख शास्त्रज्ञानसे मोक्षरख देनेवाले हैं। ४१ ॥ मन्त्रः। नमुपायायचावाथ्यायचनमःप्तरणा- यचोत्तरणायचनमस्तीप्यायचकल्ल्याय चुनमुहशष्प्यायचुफेन्यायचुनम सिकुत्त्या- य॥४२॥ ॐ नमः पार्यायेत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिर्देवा ऋषयः । निच्य दापी त्रिष्टुप् छन्द । रुद्रो देवता । दि० पू० ॥ ४२ ॥ भाष्यमू-(च) (पार्याय ) पारे भवः पार्यः संसाराधेः परतीरे जीवन्मुक्त- रूपेण वा मवः पार्थः तस्मै (च)(आवायर्याय ) अवारि संसारमध्ये संत्तारित्वेन भव आवार्य तस्मै (नमः) नमोऽस्तु (च ) ( प्रतरणाय ) प्रकर्षण मंत्रजपादिनः पापतरणहेतुर्वा प्रतरति येन प्रतरणं नौकादि लघुद्रव्यं तत्र भवः त मैं (च ) (उत्तर- गाय) उत्कृष्टेन तत्त्वज्ञानेन संसारतरणहेतुरुत्तरणं वा उत्तरति भनेनेत्युत्तरणं तीरः तत्र मवः तस्मै (नमः ) नमः (च)(तोर्थ्याय ) तीर्थ प्रयागादौ भवः तीय; तस्म ऽध्याय: ५.] भाष्यसहिता। (च) (कूल्याय)कूले तटे मवः कूल्यः तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) (शष्प्या- य) शष्पे शरतणे मवः शष्प्यः तस्मै (च) (फेन्याय) फेने भवः फेन्यः तस्मै (नमः) नमोऽस्तु ॥ ४२ ॥ मापार्थ-समुद्रके भी विद्यमान मथवा संसारसागरके परंपारमें जीवन्मुक्तरूपसे वर्तमानके निमित्त भोर सागरके इस पारमें भी विद्यमान वा ससारमध्यवर्तीके निमित्त नमस्कार है। जहाजमें विद्यमान वा मतिमंत्र जपादिसे पापके तारनेके कारणके निमित्त और डॉगमें भी विद्यमान पा उत्कृष्ट तत्वज्ञानसे संसारसागरके पार करनेवालेके निमित्त नमस्कार है, सागर- मादिके गर्भमै वा तीर्थ प्रयाग पुष्करआदिमें विद्यमानके निमित्त और जळप्रणाल वा किना- रोमें प्रगट होनेपाटेके निमित्त नमस्कार है, गगादिके तटम उत्पन्न कुशमंकुरादिमें विद्यमानके निमित्त मोर सागरादिके फेनमें होनेवाले के निमित्त नमस्कार है ॥ ४२ ॥ मन्त्रः। नम:सिकुत्त्यायचप्प्रवाहायचुनमकि- शिलापंचक्षयणायचुगर्म कपुर्दिने चपु- लुस्तयेचुनमऽइरिण्याय च प्रपत्त्थ्यायच नमोवज्याय॥४३॥ ॐ नमः सिकत्यायेत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्देवादय ऋषयः । - गती छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥१३॥ माप्यम्-(च) (सिकत्याय) सिकतासु भवः मिकत्यः तरमै (च) (प्रवाह्याया) प्रवाहे स्रोतसि मयः प्रवाः तस्मै (नमः) नमोऽस्तु (च) (कि शिलाय) कुत्सिता क्षुद्राः शिलाः शर्करारूपाः पापाणा यत्र प्रदेशे स किशिलः तदूपाय (च) ( क्षय- गाय) क्षियन्त्यस्मिन्नाप इति क्षयणस्तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) ( कपर्दिने ) जटाजूटयुक्ताय (च) (पुलस्तये ) पुरोऽग्रे तिष्ठति पुलस्तिः । यदा-पूर्षु शरीरघुर, घरित सत्ता यस्य स पुलस्तिः सर्वान्तर्यामी तरमै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) ( इरि- ण्याय) इरिण भवः इरिण्यः तस्मै (च)(प्रपथ्याय) प्रकृष्टः पन्थाः प्रपन्थी बहुल सेवितो मागस्तत्र भवः प्रपथ्यः तस्मै (नमः ) नमोऽस्तु ॥ ४३ ॥ भापार्य-नदीआदिवी रेतीमें विद्यमान और नदी आदिके प्रवाहमें होनेवाले के निमित्त नम- स्कार है, नदीमादिके भीतर वृक्षककरादिमें विद्यमान वा क्षुद्र पाषाणकी शर्करायुक्त स्थान में स्थितके निमित्त और स्थिरनल में विद्यमानके निमित्त नमस्कार है, जटाजूटयुक्त वाघूमताए (८२) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- जलमें विद्यमान और पुरजलमें विद्यमान अथवा शरीरोंमें अन्तर्यामीरूपसे विद्यमान निमित्त और तृणरहित उपरभूमिमें विद्यमान और वासेत्रित मार्गवालोंमें विद्यमानके नामत नमस्कार है ।। ४३ ॥ मन्त्रः। नमोबज्यायचुगोष्ठयायचे नमुस्तल्प्प्या- यचगेहायचुनमौहदव्याय च निष्प्या- यचनमस्काघ्यायचगह्वरेष्ठाय च नमशु- ध्याय ।। ४४॥ अनमोव्रज्यायेत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतित्रपिः। आपी त्रिष्टुप् छन्दः॥ रुद्रो देवता वि० पू० ॥४४॥ भाष्यम्-(च) (व्रज्याय ) बजे गोसमूहे मवः व्रज्यः तस्मै (च) (गोष्ठ्याय) पावस्तिष्ठन्ति यत्रेति गोष्टः तत्रभवो गोष्ठ्यस्तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च ) (तल्प्या. य) तल्पं शय्या तत्र भवस्तल्प्यः तस्मै (च)(गेह्याय) गेहे भयो गेह्यः तस्मै (नमः) नमोऽरव (च) (हृदय्याय ) हृदये भवो हृदय्यो जीवस्तरमै (च) (निवेऽप्याय) निवेष्प्यं पावर्तो नीहारजलं वा तत्र भवो निवेष्प्यः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु ( च ) ( फाट्याय ) काटे भवः काट्यः काटः कूपः कुत्सितमटन्ति गच्छन्ति जना यत्र स काटो दुर्गारण्यदेशस्तत्र भवः तस्मै (च) (गहरेष्ठाय ) गहरे विषमे गिरिगुहादी गम्भीरे जले वा तिष्ठतीति गहरेष्ठः तस्मै (नमः) नमोऽस्तु ॥४४ ॥ मषार्थ-गोचारणस्थानमें विद्यमान और गोठ में विद्यमानके निमित्त नमस्कार है । शय्यामें विद्यमानके निमित्त और घरमें विराजमानके निमित्त नमस्कार है हृदयमें जीवरूपसे स्थितके निमित्त और हिमसमूहमें विराजमानके निमित्त नमस्कार है, दुर्गम मार्ग में विराजमानके निमित्त और गिरिगुहा वा गरिजल में विराजमानके निमित्त नमस्कार है ॥ ४४ ॥ मन्त्रः। नमुहशुष्क्यायचहरित्यायचुनम पाउंसु- घ्यायचरजुस्यायचनमोलोप्प्यायचोलु-
ऽध्याय: ५]
भाष्यसहिता।
(८३)
प्प्यायचुनमऽउड्यायचुसूयायचुनम पु-
प्राय ॥४५॥
ॐ नमः शुष्क्यायेत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्वा देवा ऋ० । निच्यु-
दार्षी त्रिष्टुप् छन्दः । रुनो देवता । वि० पू० ॥ ४५ ॥
भाष्यम्-(च)(शुष्क्याय ) शुष्क काष्ठादौ भवः शुष्श्यस्तस्मै (ब) (हरित्याय)
आर्द्र काष्ठादी भवः हरित्यः तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) ( पांसव्याय ) पांसुषु
धूलिषु भवः पांसव्यः तस्मै (च) (रजस्याय) रजसि गुणे परागे वा भवः रजस्यः
तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (लोप्याय) लोपे भवः लोप्यः तस्मै (च) (उल-
प्याय ) उलपा बल्वजादितृणविशेषास्तत्र भवः उलप्यः तस्मै (नमः) नमोऽस्तु (च)
(ऊयाय ) ऊन्या भूमौ भवः ऊः तस्मै (च) ( सूर्याय ) शोभनः जयः
कल्पानला तत्र भवः तरमै (नमः ) नमोऽस्तु ॥ ४५ ॥
भाषार्थ-सूखे काष्ठादिमें विराजमानके निमित्त और हरे पत्ते मादिमें विराजमानके निमित्त
नमस्कार है, धरिमें विराजमानके निमित्त और रजोगुण वा पुप्पधुरिमें विराजमानके निमित्त
नमस्कार है, अगम्यदेशमें विराजमानके निमित्त और बल्वजादि तृणमें विराजमानके
निमित्त नमस्कार है। भूमि वा वस्वानलमें विराजमानके निमित्त और महाप्रलयकी अग्निमें
विराजमानके निमित्त नमस्कार है ॥ ४५ ॥
मन्त्रः।
नसम्पुर्णायचपर्णशुदायचुनमंऽउद्गुर-
मांणायचाभिनुतेचन आखिइतेचष्प्र-
खिदुतेचुनमऽइषुकृत्यों धनुष्कृड्युश्चवोन
मोनोवाकिरिकक्यों देवानाठहृदये-
क्योनमौविचिन्वुत्केब्क्यो नमौविक्षिण-
स्केक्योनमऽआनिहतेक्यः ॥ ४६ ॥
ॐ नमः पर्णायेत्यस्य परमेष्ठीऋ । स्वराट्र प्रकृतिश्छन्दः। रुद्रो
देवता। वि० पू० ॥१६॥
-
(८४)
रुद्राष्टाव्यायी-
[पञ्चमो-
भाष्यम्-(व)(पर्णाय) पत्ररूपाय (च) (पर्णशदाय) पतितपर्णावस्थानको
(नमः) नमोऽस्तु (च)(उद्गुरमाणाय) उद्यमशीलाय (च) (अभिन्नते) मामि-
हन्ति शवनित्यभिन्नन् तस्मै ( नमः ) नमोऽस्तु (च) (आखिदते ) आसमंतात् खि-
यते दैन्यं करोत्यभक्तानामित्याखिदन् तस्मै (च) (प्रखिदते ) प्रकपण खेदयात
पापिनामिति प्रखिदन तस्मै ( नमः) नमोऽस्तु (च) (इपुकृद्यः) ये इपको बाणान
कुर्वन्ति तेभ्यः (च) (धनुष्कृत्यः ) ये यूयं धनुष्कृतस्तेभ्यः (वः ) ( नमः )
नमोऽस्तु वो युष्मदादेशात्मत्यक्षा एते रुद्राः तिस्रोशीतयो रुद्राः समातः 1 एवं चत्वा-
रिंशदधिकशतव्यमन्त्रै रुद्रस्य सर्वात्मत्वमुक्तम् । इदानी रुद्राणां हृदयभूनानामग्निवायु-
सूर्याणां सम्बन्धीनि यजूपि उच्यन्ते (1) युष्मभ्यम् ( नमः ) नमोऽस्तु केभ्यः
(किरिकेभ्यः ) कुर्वन्तीदं जगदृष्टयादिद्वारेणेति किरिकाः वाय्वनिसर्याः किंभृतेभ्यः
(देवानां हृदयेभ्यः ) देवानामग्निवायुसूर्याणां हृदयभृता इत्यर्थः ।(नम:) नमोऽस्तु (वि-
चिन्वत्केभ्यः ) विचिन्वन्ति पृथकुर्वन्ति धर्मशारिणं पापकारिणं चंनि विविन्वतः
भ्यः (नमः) नमोऽस्तु (विक्षिणकेभ्यः) विविध क्षिण्वन्ति हिंसन्ति पापमितिविक्षिः
गत्कास्तेभ्योऽग्यादिभ्यो नमः ( बानिहतेभ्यः) मा समन्तानिर्गताः सर्गादी लोकेभ्यो
इत्यानिहतास्तेभ्यो नमः । हन्तिर्गत्यर्थः । ("तेभ्यस्तप्तेभ्यत्रीण ज्योवार्टण्यजायन्ता.
निर्योऽयं पवते सूर्यः") इतिश्रुतेः ॥ ४६ ॥
माषार्थ-पर्णमें विद्यमानके निमित्त और पर्णपतित पर्णस्थित देशरूप वा पर्णमें उत्पन्न का.
बादिमें भी विद्यमानके निमित्त नमस्कार है निरन्तर द्यमी उत्पन्न करनेवालेके निमित्त
गोरे शत्रुभोंके संहारक निर्मित नमस्कार है, मभक्तोंफो सदा दुःखाता त्रिविधतापके
प्रेरकके निमित्त और त्रिविध तापके उत्पन्नकर्ता वा पापियाँको अतिदुःखदायीके निमित्त नमः
स्कार है, बाणको उत्पन्न करनेवाले के निमित्त और धनुपके करनेवाले रुद्ररूप आपके निमित्त
नमस्कार है (युष्मदादेशसे यह प्रत्यक्ष रुद्र है, यहां २४. पूर्ण हुए) ( यहांतक स्द्रकी
प्रधानता कहकर अब प्रधानभूत अग्नि वायु सूर्यादिकपसे वर्णन करते हैं) प्रथम यजु १४ का
और तीन सात अक्षरके व्याहृतिसज्ञक है, जो देवताओंके हृदयस्वरूप प्रधान अग्नि सूर्यके हद-
यरूप वृष्टयादि द्वारा जगतको सृजन करते हैं, ऐसे भाप निमित्त नमस्कार है, जो देवता
देवताओंके हृदयस्वरूप है, जो वृष्टि आदिसे जगत्का पान करते, जो धर्मात्मा और पापा-
स्माओंको पृथक् करते हैं उन अग्नि, वायु और सूर्यके हृदयरूपके निमित्त नमस्कार है,
विविधपापाको दूर करनेवाले अग्नि मादिके निमित्त नमस्कार है, अर्थात् जो देवताओंका
यस्वरूप विक्षिणत्क वृष्टि मादिसे जगत्का संहार करते हैं आग्ने वायु सूर्यके हृदय स्वरूप
उनके निमित्त वारवार नमस्कार है सृष्टिको आदिमें होनेवाले रुद्रावतारोंके निमित्त नमस्कार
है अर्थात् जो देवतामाका हृदयस्वरूप आनिहत "काल प्राप्त होनेसे स्वयं भी गुप्त होजाताहे"
था जो सृष्टिकी आदिमें होते है इससे आनिहत कहते हैं जो अग्निा वायु भोर
सूर्यका मी हृदयस्वरूप है, उसको वारपार नमस्कार है ॥ ४६॥
ऽध्यायः ५.] (८५) माष्यसहिता। मन्त्रः। द्वापेऽअन्धसस्प्पते दरिद्रुनीललोहित ॥ आसाम्प्रजानामुषाम्पशूनाम्माभेम्मारोङ्- मोचन किञ्चनाममत् ।। ४७॥ ॐ द्राप इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिऋषिः । भुरिगार्षी बृहती छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥१७॥ भाष्यम्-(दापे) द्रा कुस्सायां गतौ च द्रापयतीति द्रापि पापकारिणां कुत्सिता गति नयतीत्यर्थः (अन्धसस्पते ) सोमस्य पालक ( दरिद्र) हे निष्परिग्रह (नीललो- हित) कण्ठे नीलोऽन्यत्र लोहितः शिव (न ) अस्माकम् ( आसाम् प्रजानाम् ) पुत्रादीनाम् (एषाम् ) (पशूनाम् ) मस्मदीयानां गवादीनाम् ( मा ) मा भैषीः भयं मा कुरु (मा रोक) भङ्गमा कार्पोः (च) (किञ्चन ) अपत्यादि ( मा ) (आममत् ) मा भीः मा रुग्णं कुरु ॥ ४७ ।। भाषार्थ-हे पापियों की दुर्गति करनेवाले ! हे सोमके पालक ! अद्वितीय होनेसे सहायशून्य निष्परिग्रह के नील और लोहित एक मंश नील दूसरा लाल शुक्ल कृष्ण उभयात्मक पा कठमें नील भन्यत्र लोहित शिव ! हमारे इन पुत्र पौत्रादि और इन पशुओंको मत भय करो तथा अना पशुमोका भंग मत करो और किसी प्रकार भी हम तथा हमारी प्रजा पशुको मत रूण करो सम प्रकार प्रजापशमें मंगल कगे ॥ १७ ॥ मन्त्रः। हमारुद्राय॑तव सैकपर्दिनेक्षुयवीरायु प्रमरा- महेमुती ।। अथाशमसहिपदेचतुष्पदेविश्व- म्पुष्टामेऽस्मिन्ननातुरम ॥४॥ ॐ इमारुद्धायेत्यस्य कुत्स ऋषिः । आषी जगती छंदः । रुद्रो देवता । वि० पू०॥४८॥ भाष्यम्-( यथा) येन प्रकारेण ( दिपदे) पुत्रादये ( चतुष्पदै ) गधादिपशवे (शम् ) सुखम् भवतु तथा ( अस्मिन् ) (ग्रामे ) वासस्थाने (विश्वम् ) सबै प्राणि. गतम् (पुष्टम् ) समृद्धम् ( अनातरम् ) निरुपद्रवम् ( असत.) भवत् तेन प्रकारेण
(८६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पञ्चमो-
वयम् ( इमाः) अस्मदीया ( मतीः) बुद्धीः ( तवसे) महत (कपदिने ) जटिलाय
क्षयद्वीराय ) क्षयन्तो निवसन्ता वीराः शूग यत्र स क्षयहीरस्तस्मै क्षयन्तो नश्यन्तो
चीरा रिपवो यस्मादिति वा (रुद्राय ) रुद्रदेवाय । प्रभरामहे) समर्पयामः ॥ ४८ ॥
भाषार्थ-जिस प्रकार पुत्रादिमें गवादिपशुओंमें सुखकी प्राप्ति हो तथा इस ग्राममें संपूर्ण
प्राणिसमूह पुष्ट उपद्रवरहित हो उसी प्रकार हम इन अपनी वृद्धियोवा महावली जटिलशूरवी-
रॉके निवासभूत रुद्रदेवताके निमित्त समर्पण करते हैं ॥ ४८ ॥
मन्त्रः।
यातेरुद्राशिवातनाशिवाविश्वाहामेषजी ॥
शिवातरुतस्यभेषजीतयांनोमृडजीवसै४९॥
ॐ याते रुद्र इत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिर्वा देवा पयः । आयतुष्टुप
छंदः । रुद्रो देवता । वि०पू० ॥ ४९॥
भाष्यमू-(रुद्र) हे शंकर (या) (ते) तव (शिवा) शान्ता ( विश्वाहा)
सर्वदा (शिवा) कल्याणकारिणी (भेषजी) औषधरूपा संसारख्याधिनिवर्तका तथा
(रुतस्य ) व्याधेः (शिवा ) समीचीना (भेषजी ) निवर्तकोपधिः (तनूः ) शरीर
मस्ति (तया) (तन्वा) शरीरेण शत्या वा (नः) अस्मान (जीवसे ) जीवितुम्
(मृड) सुखय ॥ ४९ ॥
भाषार्थ-हे शकर । जो आपकी शान्त निरतर कल्याणकारिणी लोवधिरूप संसारकी
व्याधिनिवृत्त करनेवाली तथा शरीरव्याधिकी समीचीन भौषधी रूप शरीर वा शक्ति है उस
शक्ति हमारे जीवनको सुखी करो ॥ ४२ ॥
मावार्थ-हे रुद्र ! तुम्हारी कल्याणरूपिणी जो तनू सबके कल्याणसापनी जो सप रो-
गोकी महौषधि है उस तनुके द्वारा हमको सुखी करो ॥ १९ ॥
मन्त्रः॥
परिनोरुद्रस्यहतिव॑णक्तुपरित्वेषस्य॑ दुर्म-
तिरपायोः ॥ अवस्थुिरामघवन्यस्वनुष्य-
मीदस्तोकायुतनयायमृड॥५०॥
ॐ परिन इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिर्देवा ऋ० आष| त्रिष्टुप् छंदः ।
रुद्रो देवता । वि० पू० ॥५०॥
.. ऽध्यायः५.] भाष्यसहिता। (८७ माध्यम्-(रुद्रस्य ) शिवस्य (हेतिः ) खायुधम् ( नः ) अस्मान् ( परिवूणक्तु) परिवर्तयतु ( त्वेषस्य ) क्रुद्धस्य ( अघायोः) पापशीलस्य (दुर्मतिः ) दुष्टा मतिह- स्वास्मान् (परि ) परिवृणक्तु ( मीड्स) सेक्तः ( मझ्यः ) मघं हविलक्षणं धनं मियते येषां ते यजमानास्तदर्थः यजमानानां भयनिवृत्तये (स्थिरा) स्थिराणि दृढान्दि धनूंषि (अवतनुष्ष ) अवतारय ज्यारहितानि कुरु किञ्च (तोकाय) पुत्राय ( तन- याय) पौत्राय ( मृड) सुखय ॥ ५० ॥ भाषार्थ-रुद्रके सपूर्ण आयुध हमको परित्याग करें। पापियोंपर क्रोधित अर्थात् कोपरख- भाव दण्ड देनेकी इच्छावाली दुर्मति हमको सब प्रकार स्याग को । हे अभिलतिफलप्रद । हविरूप धनसे युक्त यजमानाके भय दूर करनेको दृढ धनुषाको ज्याहीन करो, हमारे पुत्र पौत्रादिको सुख दो॥ ५० ॥ मन्त्रः। भीढुष्टमुशिव॑तमशिवोलः सुमनामव॥पुर- मेबृक्षऽआयुधन्निधायुकृत्तिवसानुऽआर्चर पिनाकुम्बिभ्रदागहि ॥५१॥ ॐ मीढुष्टम इत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिर्देवा ऋ० । निच्यदार्षी यव- मध्या त्रिष्टुप् । रुदो देवता। वि० पू० ॥५१ ॥ भाष्यम्-(मीदुष्टम ) सेक्ततम (शिवतम ) हे अत्यन्त कल्याणकर्तः। ( नः ) यस्माकम् (शिवः) शान्तः (सुमनाः ) हष्टचित्तः (अव) भवतु ( परमे ) दूरस्ये उन्नते वा ( वृक्षे ) वटादी ( आयुधम् ) त्रिशूलादिकं ( निधाय ) संस्थाप्य ( कृर्ति- वसानः) चर्म परिदधानः सन् ( आचर) आगच्छ तपश्चरेति वा ( पिनाकम् ) धनुः (विभ्रत् ) ( आगहि ) आगच्छ ज्याशरहीनं धनुर्मा शोभार्थ धारयन्नागच्छे- त्यर्थः ॥५१॥ भावार्य-३ भतिशय फलमदाता । हे अत्यन्त कल्याणकर्ता । हमको शान्त सुन्दरमनवाले हो दूरास्थित वा ऊंच वृक्षपर अपना विशाल रखकर मृगचर्म धारण किये आगमन कीजिये का तप कीजिये, पिनाक धनुषको धारण किये आगमन करो अर्थात् ज्या और बाणोंसे हीन धनुष शोभाके निमित्त धारण किये माइये ॥ ५१ ॥ मावार्य-माव यह कि, ससाररूपी वृक्षपर पापोंके सहारकी शक्तिको फैलाकर कार्यकारिण, शक्ति से वश कर हमारी रक्षा करो, इस मत्रका तात्पर्य वडा गूढ है, इसमें संसारियोंके निमित्त शस्त्र है, मुमुक्षओंके निमित्त मभय है इत्यादि तपस्वी महात्माओंके जानने योग्य है ।। ५१॥ .
(८८) रुद्राष्टाध्यायी- [पञ्चमो- मन्त्रः। विकिरिबिलोहितुनमस्तेऽअस्तुभगवः ॥ यास्तै सुहवठहुतयोन्यमुस्म्मन्निवपन्तु ताः॥५२॥ ॐ विकिरिद्रेत्यस्य परमेष्ठी प्र० ऋ० आर्ण्यनुष्टुप् ०। रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ १२ ॥ भाष्यम्-(विकिनिद्र) विविध पातागुपदर दास्यतीति विकिन्दिः तत्सम्बुद्धी है विशिरिद (विलोहित ) विगतकलुपभाव (भगवः) हे भगवन् (ते) (नमः) नमः ' अस्तु ) अस्तु (सा) (ते) (सहसठहेतयः ) असंख्यात्यायुधानि सन्ति (ता.) तानि ( अस्मत् ) (अन्यम् ) अस्मद्व्यतिरिक्तम् (निवपन्तु ) नन्तु ॥५२ ॥ भाषर्थ- अनेक उपद्रव नाश करनेवाले । हे शुद्धस्वरूप भगवन् | आपके निमित्त नम. स्कार हो तुम्हारे जो सहस्रों शस्त्र हैं वे हमको छोडकर मौर कहीं उपद्रवियोंपर पटें (विलो- हतका अर्थ अत्यन्त रक्तवर्ग संहारमति भी है) ॥ ५२ ॥ मन्त्रः। सुहखाणिसहरुशोबास्तबडतर्यक ॥ ता- सामीशानोभगवत्पगुचीनामुखाकृधि ५३॥ ॐ सहस्राणीत्यस्य परमेष्ठी प्रजा० ऋ० । निच्यदाण्यनुष्टुप् छन्दः। रुद्रो देवता । वि० पू० ॥५३॥ माध्यम्-(मगवः) हे पड्गुणैर्यसम्पन्न ( तव) (बाहोः ) हस्तयोः ( सह- शाणि ) असंख्यातानि ( सहस्रशः) सहस्रशः (हेतयः) आयुधानि सन्ति (ईशानः) जगन्नाथरत्वम् (तासाम् ) हेतीनाम् (मुखाः) मुखानि (पराचीनाः ) अस्मत्तः परा- इमुखानि (कृषि) कुरु ॥५३ ॥ भाषार्थ-हे भगवन् पिडैश्वर्यसंपन्न! आपकी मुजाओंमें बहुत प्रकारके सहस्रों सगशलादि आयुध है जगत् के पाते आप उन संहारकारी आयुधोंके मुख हमसे पराङ्मुख कीजिये ५३॥ मावार्थ-दृश्यादृश्य जितने बाहुयुगल हैं वह सवही उन्के हैं या सबसमें उनकी सत्ता -आशय यह कि पापोंके द्वारा प्राणी दुःख पातेहै माप उन पापोंको नीचे मुख कीजिये भोर हमको सुखी कीजिये ।। ५३ ॥
sध्याय: ५.]
(८९)
भाष्यसहिता।
मन्त्रः।
असङ्ख्याता सुहस्राणि ये सुद्राऽ अधिभ-
मम्याम् ॥ तेषांसहस्रयोजनेव धन्वानि
तन्मसि ॥५४॥
ॐ असंख्याता इत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिऋषिः । विराडार्ण्य-
नुष्टुप् छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥५४॥
माध्यम्-(असंख्यातासहस्त्राणि ) असंख्यातानि सहस्राणि अमितानि ( ये )
रुद्राः (भूम्याम् ) भूमेः ( अधि) उपरि स्थिताः (तेषाम् ) रुदाणा (धन्वानि )
धनूंषि ( सहस्रयोजने) सहस्राणि योजनानि यस्मिस्तादृशे पथि सहस्रयोजनव्यव-
हिते मार्ग ( अवतन्मसि) अवतन्मः अवतारयामः ॥ ५४॥
भाषार्थ-जो असख्य सहस्रों रुद्र भिके अपर स्थित हैं, उनके धनुष सहस्र योभन दूर
प्यह मत्र पठकर प्रार्थनाके पलसे डालकर अभय होतेहैं। इस मत्रसे रुद्रका असख्यत्व वा
असंख्य वस्तुमें एकरुद्रका व्यापकत्व सिद्ध हुआ ॥ १४ ॥
मन्त्रः।
अस्म्मिन्महत्यर्णवेन्तरिक्षेमवाऽअधि ।
तेषांसह ॥५५॥
ॐ अस्मिन्नित्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिऋषिः । भुरिगाष्णि-
क्छन्दः । रुद्रो दे। वि० पू० ॥१५॥
भाष्यम्-अन्तरिक्षस्था रुद्रा उच्यन्त ( अस्मिन् ) मस्मिन् ( महति ) विशाले
(मर्णवे ) अणीस जलानि विद्यन्ते यत्र तदर्णवम् । मेघाधारत्वात् (अन्तरिक्षे )
मन्तोरक्ष (अधि) अधिश्रित्य ये (भवाः) रुद्राः सन्ति तेषां धन्वान्यवतन्मसीति
पूर्ववत् ॥ ५५॥
भाषाय-अतरिक्षके रुद्रांका वर्णन करते हैं इस अंतरिक्षमें और बडे सागर अर्थात् आकाश
गगानामस. प्रसिद्ध नक्षत्रपुन धाराप्रवाहमें आश्रय करके जो रुद्र स्थित है उनके संपूर्ण
वनुष मत्रवलसे सहस्रयोजन र ज्यारहित करडालते हैं ॥ १५ ॥
गूढाशय-इस बडे संसाररूपी समुद्र में उत्पन्न हुए नीपॉके हृदय अन्तरमें जो ज्ञानयुक्त
भरमश स्थित है उस असख्यात फलदाताका विचार करो ॥ ५५ ॥
(९०)
[पञ्चमो-
रुद्राष्टाध्यायी-
नीलग्रीवालशितिकण्ठादिवठेरुद्राऽउप-
श्रिताः ॥तेषां०॥५६॥
ॐ नीलग्रीवा इत्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिः । निच्यदाय॑नुगुप्
छन्दः । रुद्रो देवता। वि० पू० ॥५६॥
भाष्यम्-द्यलोकस्थिना रुद्रा उच्यन्ते (नीलग्रीवाः) कृष्णकण्ठा ( शितिकण्ठाः)
श्वेतकण्ठाश्च (रुद्राः ) ये रुद्राः (दिवम् ) दालोसम् ( उपश्रिताः ) उपरिस्थिताः
तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ५६ ॥
भाषार्थ-युलोकास्थित रुद्रोंका वर्णन | नील ग्रोवावाले श्वैतकठमाले विपक्षणसे क्तिनाएक
कण्ठ श्वेत और कितनाएक नील सथवा निर्मल आकाश मौर मेधसहित माशिम चन्द्र
तारादिमें वर्तमान नो रुद्र झुलोकमे आश्रय किये हुए हैं उनके स धनुप सहनयोजन दूर
मंत्रबलसे निक्षेप करते है ॥ ५६ ॥ .
मन्त्रः।
नीलग्रीवा शितिकण्ठात्शर्वाऽअधक्षमा-
चुराहतेषां० ॥५७॥
ॐ नीलग्रीवा इत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिऋषिः । निच्यदाये-
नुष्टुप्छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥१७॥
भाष्यम्-पातालस्था रुद्रा उच्यन्ते ( नीलग्रीवा ) कृष्णग्रीयाः ( शिति-
कण्ठाः) श्वेतग्रीवा ये (शाः ) रुद्राः (अधः ) अधोभागे (क्षमावराः ) पाताले
वर्तमानाः (तेषाम् ) तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ५७ ॥
भाषार्थ-पातालस्थित रुद्रोंका वर्णन । नीलीगर्दनवाले, श्वेतकठपाले जो शर्वनामक रुद्र नीचे
पातालमें स्थित हैं, उनके सब धनुष सहस्रयोजन दूर मंत्रवलसे निक्षेप करते हैं ॥ ५७ ॥
मन्त्रः।
येवृक्षेषुशुष्पिजरानीलग्गीवादिलोहि-
ता॥ तेषा०॥ ५८॥
ऽध्यायः ५.] भाष्यसहिता। ॐ ये वृक्षेष्वित्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिषिः । निच्यदाय॑नुष्टप् छन्दः । रुद्रो देवता वि०पू०॥५८॥ भाष्यम्-(ये) (शपिञ्जराः) शष्पा इव पिञ्जरवर्णाः हरितवर्णाः (नीलग्रीवाः) नीलकंठाः (विलोहिताः ) विशेषेण रक्तवर्णाः विगतकलुषमावा वा (वृक्षेषु) अश्वत्थादिषु स्थिताः तेषामित्यादि पूर्वषत् । लोहितशब्देन धातव उच्यते तेन त्वग्लो- हितमञ्जादियुक्ता इत्यर्थः ॥५८ ॥ भाषार्थ-जो हरितपर्ण नीलग्रीवापाले विशेष रक्तवर्ण मयवा तेजोमय शरीरवाळे वृक्षों में मर्यात् पत्ते शाखा कोपल आदिमें वर्तमान है, उनके सपूर्ण धनुष सहनयोजन दूर मत्रवलसे- निक्षेप करते है ।। ५८॥ . मन्त्रः। येभूतानामधिपतयोक्षिशिखास कपर्दि- नः॥ तेषां०॥ ५९॥ अयं भूतानामित्यस्य परमेष्टी प्रजापति । आष्यनुष्टप्छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ १९ ॥ भाष्यम्-(ये) रुद्राः (भूतानाम् ) देवविशेषाणाम् ( अधिपतयः ) अन्तर्हित. शरीराः सन्तो मनुष्योपदक्कग भूतास्तेपी पालका: ( विशिखासः ) शिखारहिता मुण्डा इत्यर्थः (कपर्दिनः ) अन्ये जटाजूटयुताः तेपामित्यादिपूर्ववत् ॥ ५९ ॥ भापार्थ-जो रुद्र देव विशेषोंके अधिपति है अर्थात् अन्तर्हितशरीर होकर मनुष्योंमें उपद्रव करनेवाले भूतोंके पालक हैं, तथा शिखाहीन मुण्डितशिर जो जटाजूटपे युक्त है, उनके सपूर्ण धनुप सहनयोजन दूर प्रक्षेप करते ६ ॥ १९ ॥ मन्त्रः। येपुथाम्पथुिरक्षयऽऐलवृदाऽआयर्बुधः॥ तेषा० ॥६०॥ ॐ ये पथामित्यस्य परमेष्टी प्रजापतित्रपिः । आर्ण्यनुष्टुप् छन्दः । रुदो देवता । वि० पू० ॥ ६॥ भाष्यम्-(ये) ये रुद्राः (पथाम् ) लौकिकवैदिकमार्गाणाम् ( पथिरक्षयः माधिपतयः तथा पथिरक्षस: (ऐलभृतः) इलानामन्नानां समूहः ऐलं ये विभ्रति ते ।
(९१) रुद्राष्टाध्यायी- [पश्चमो- यदा-इला पृथिवी तस्या इदमैलमन्नं तद्विभ्रति ते ऐलभृतः अन्नन्तूनां पोषका इत्ययः । (आयुयुधः ) यावज्जीवयुद्धकराः । आयुरेख जीवनं पाणी कृत्य युध्यन्ति तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ६ ॥ मापार्थ-जो लौकिक वैदिक मागीके अधिपति, मागाके पालक, राज्यशासनकारी वा अन्न- के धारक अथवा अन्नसे प्राणियोंको पुष्ट करनेवाले जीवनपर्यन्त युद्ध करनेमें रसद उनके सन धनुष सहस्रयोजन दूर निक्षेप करतेहैं ॥ ६० ॥ मन्त्रः। येतीनिष्प्रचरन्तिसकाहस्तानिपुङ्गि- णमा तेषां०॥६॥ ॐ ये तीर्थानत्यिस्य परमेष्टी प्रजापातत्रपिः । निच्यदायन- ष्टुप्छन्दः । रुदो देवता । वि०पू०॥ ६ ॥ भाष्यम् (ये) रुद्राः (सकाहस्ताः ) सकेत्यायुधनाम सका आयुधानि हस्ते येषां ते ( निषाङ्गिणः ) निपङ्गा खड्गा हस्ते येषां ते ( तीर्थानि ) प्रयागकाश्यादीनि (चरन्ति ) गच्छन्ति तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ६१ ॥ भाषार्थ-जो रुद्र आयुधविशेष (दाल) हाथमें लिये तया सद्मधारण किये, काशीप्रया गादि तीर्थों में फिरते हैं वा जो तीर्थीका तया धर्मका प्रचार करते हैं, उनके सपूर्ण धनुप सहस्त्र- योजन दूर निक्षेप करते है ॥ ६१ ॥ मन्त्रः। बेन्नैषुत्रिविद्धयन्तुिपात्रेषुपिबतुोजनान् ।। तेषा०॥६२॥ ॐ येनेष्वित्यस्य परमेष्ठी प्रजापतिदेवा ऋषयः । विराडार्ण्यनु- 'सुप् छंदः । रुदो दे० । वि० पू०॥ ६२॥ भाष्यम्-(ये) रुद्राः ( अनेषु ) भुज्यमानेषु ( जनान् ) प्राणिजातान् (विवि यान्ति ) विशेषेण ताडयन्ति धातुवैषम्यं कृत्वा रोगानुत्पादयन्तीत्यर्थः। तथा (पात्रेषु ) पात्रस्थक्षीरोदकादिषु स्थिताः सन्तः (पिषतः ) क्षीरादिपानं कुर्वतो जनान् विविद्धयन्ति तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ६२ ॥ माषार्थ-नो रुद्र भन्नभोजन करने में प्राणियोंको विशेप करके ताडन करते हैं अर्थात् धातुकी विषमता कर रोगोंको उत्पन्न करते है, पात्रोंमें जल दूध आदि पीते हुए जनोंके कुत्सित जन भादिसे रोगग्रसित करते हैं, उनके सपूर्ण धनुको सहस्रपोजन दूर निक्षेप करते हैं ।। ६२॥
ऽध्याय: ५.] माण्यसहिता। (९३), मन्त्रः। यऽएतावन्तश्चमयांसश्चदिशौरुद्रावित- स्त्थुिरे॥ तेषा०॥६३॥ ॐ य इत्यस्य परमेष्टी प्रजापतिर्देवा ऋषयः । निच्युदाष्यनु- ष्टुप् छन्दः । रुदो देवता । वि० पू०॥ ६३ ॥ भाष्यम्-(च) (ये)(रुद्राः) रुद्राः (एतावन्तः) एतत्प्रमाणं येषां ते (च) (भूयांसः) अतिशयेन बरवो भूयासः (दिशः) दश दिशः (वितस्थिरे ) मा- श्रिताः दश दिशो व्याप्य स्थितास्तेषामित्यादि पूर्ववत् ॥ ६३ ॥ भाषार्थ-और जो रुद्र इन दशों दिशाओंमें मथवा इतने और इन कहे हुऑसे भी मधिक सम्पूर्ण' दिशाओंमें आश्रित हैं अर्थात् जिनके दर्शन हमको नहीं होते और जिना दर्शन इन मत्रोंमें नहीं हुमा उनके सपूर्ण धनुष सहस्रयोजनकी दूरी पर मत्रवलसे निक्षेप करते हैं। ६३॥ मन्त्रः। नमोस्तुरुदेब्झ्योयेदिवियेषाँबुर्षमिषवः ।। तेक्योदशप्माचीईशदक्षिणादर्शप्पतीची- ईशोदींचीईशो ः तेक्योनमोऽअस्तु तनोवन्तुतेनौमूडएन्तुत्यहिष्मोपचन द्वेष्टितमेषासम्भवध्मः ॥६४॥ ॐ नमोऽस्त्वित्यस्य परमष्ठी प्रजापतिऋषिः । नियति श्छन्दः । रुद्रो देवता । वि० पू० ॥ ६॥ माष्यम्-त्रिलोकस्था रुद्रा उच्यन्ते-(ये ) सदाः ( दिवि ) धुलोके वर्वे (येषाम् ) रुद्राणाम् (वर्षम्) वृष्टिरेख( इपवः ) शरा: मायुधस्थानीया वृष्टिः (तेम (रुद्रेभ्यः ) (नमोऽस्तु ) नमस्कारोऽस्तु (तेभ्यः) रुद्रेभ्यः (दश प्राची ) दश ख्याकाः प्राचीः प्रागमिमुखाः अङ्गुलीः कुर्व इति शेषः । (दश दक्षिणाः ) दक्षिा मिमुखाः दशांगुलीः कुर्वे (दश प्रतीचीः) प्रत्यङ्मुखादशांगुली कुर्वे (दशोदांची उदीचीः उदमुखाः दशांगुलीः (दशोर्धाः) उपरि दशांगुली: , मञ्जालें ।
(९४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पञ्चमो-
-सर्वदिक्षु नमस्करोमीत्यर्थः ।
नमः ) नमोऽस्तु (ते ) रुद्राः (न: ) अस्मान्
(अवन्तु ) रक्षन्तु (ते) (नः) अस्मान (मृडपन्त) मुखयन्तु (ते) रुद्राः (यम)
पुरुषम् (द्विष्मः ) द्वेषं कुर्मः (च) (य:) पुरुषः (नः ) अस्मान् ( देष्टि ) द्वेष
करोति (तम् ) पुरुषम् (एपाम् ) पूर्वोक्तानां रुद्राणाम् (जम्मे) दंष्ट्राकराले मुखे
(दध्मः ) स्थापयामः । अस्मद्विषमस्मद्वेष्यं च नरं पुर्वोक्ता रुद्रा भक्षयन्तु, यस्मा-
श्वावन्तु चेत्यर्थः ॥ ६४ ॥
भाषार्थ-जो रुद्र (लोकमें विद्यमान है, जिन मुद्रोंके वृष्टि ही वाण है उन न्द्रोंके निमित्त
नमस्कार है, उन रुद्रोंके निमित्त पूर्वदिशाम दश अंगुली होकरके अर्थात् हाथ जोडकर,
दक्षिण में दशमगुली होकर, पश्चिममें दशअगुली होकर, उत्तरम दशाली होका, उनमें
दशमगुली अर्थात् कर जोडकर प्रार्थना करताहू, उनके निमिन नमस्कार हो, वे न्द्र हमारी
रक्षा करे, वे हमको मुखी कैरे, वे रुद्र जिससे हम द्वेप करतेहै पोर जो हमसे हेप करता है
उनको इन रुद्रोंके गढमें स्थापन करतेहै ॥ ६॥
माषार्थ-जो देवता [लोक हे तिनके वाण बाट है अर्थात् टिद्वारा सृजन पालन और
अतिबाटसे सहार कियाकरते है, सपदिशाओं में उनको हाथ जोडकर प्रणाम करते हैं ॥ ६ ॥
मन्त्रः।
नमोस्तुरलेल्योषन्तरि वेषाँशतुऽइष-
व ॥ तेव्स्योदशुष्माचीईशंदक्षिणादशंष्ण-
तीचीईशोबीचीईशोाः। तेजपोनमोऽ
अस्तुतेनोवन्तुतेनोमडयन्तुतेयन्हिसम्म्यो
यश्चनोवेष्टितमैषाजम्भेदध्मः॥६५॥
ॐ नमोस्त्वित्यस्य परमेष्ठी प्रजापतित्रपिः । धृतिश्छन्दः ।
रुदो देवता । वि० पू० ॥ ६५ ॥
माष्यम्-( रुद्रेभ्यः ) रुद्रेभ्यः ( नमोऽस्तु ) नमस्कारोऽस्तु (ये ) ( अन्तरिक्षे )
अन्तारक्षे वर्तन्ते (येषाम् ) रुद्राणाम् ( वातः) वायुः (इषवः) आयुधस्थानीयः
कुर्वातेनानं विनाश्य वातरोगं चोत्पाद्य जनान् प्रन्ति तेभ्योऽन्तरिक्षस्थेभ्यो रुद्रेभ्यो
नमः । शेषं पूर्ववत् ॥ ६५ ॥
भाषार्थ-उन रुद्रके निमित्त नमस्कार हो, जो रुद्र अन्तरिक्षमें विद्यमान हैं जिनके नाण
पवन है अर्थात् पवनद्वारा जो सृजन, पालन और आधी आदिसे सहार करतेहैं उनके
निमित्त नमस्कार है, शेष पूर्ववत् ॥ ६५ ॥
ऽध्यायः ५.] माष्यसहिता । मन्त्रः। नमोस्तुरुदेनयोयेथुिझ्याँथ्येषामन्नुमिर्ष- बशातेक्योदशुष्प्राचीईशंदक्षिणादर्शप्पती- चीईशोदीचीईशोमातेक्योनमोऽअस्तु तेनोहन्तुतेनो मृडयन्तुतेयन्दिधम्मोयश्चनो द्वेष्टितमेषाञ्जम्मेहध्य६६॥ इतिसहितायांरुदपाठेपञ्चमोऽध्यायः५ ।। ॐ नमोस्त्वित्यस्य परमेष्टी प्रजापतिर्वा देवा ऋपयः। धृतिश्छन्दः। रुद्रो देवता । वि० पू० ॥६६॥ याप्यम्- (रुदेभ्यः ) रुदेभ्यः ( नमः) नमस्कारः (ये ) रुद्राः (पृथिव्याम् ) भूम्याम् वर्तन्ते (यषाम् ) (इपवः) वाणाः (अन्नम् ) अदनीयं वस्तु आयुधम् यथान्नभक्षणे चौयं वा प्रवर्त्य रोगमुत्पाद्य जनान्न नन्ति तेभ्यो नमः तेऽस्मानवन्तु । शेर्ष पूर्ववत् ।। ६६ ॥ भापार्य-उन द्रोंके निमित्त नमस्कार है, जो रुद्र पृथिवी में स्थित है, जिनके वाण अन्न है, जो अन्नद्वाराही सृजन, पालन जोर मियाहारविहारसे रोग उत्पन्न कर प्राणियोंका संहार करते है, उनके निमित्त नमस्कार है, शेष पूर्वके समान ॥ ६६ ॥ भावार्य-निस समय मनुष्यको रुद्रका सर्वभाव विदित होजाय और उसकी दृष्टि में यह भाव समाजाय कि, यह सव कुछ रुद्रद्वारा होरहाहै वही शकर रुद्र नीललोहित कपदी आदि अनेक नामोंको कार्यानुसार धारण कर रहाहै उसके सिवाय नहीं है तब वह अवैतनिष्ठ होताह और रुद्रकी महिमाको प्राप्त हो जीवन्मुक्त होकर विचरता है । इस प्रकार इस षोडश अध्यायमें रुद्रदेवताका संपूर्ण जगत् में अधिकार वर्णन किया है अर्थात् सपूर्ण जगत्में वह परमात्मा रुद्ररूपसे व्याप्त है कोई स्यान उससे भिन्न नहीं है इसी कारण स्थावर जगम सब- हाको प्रणाम किया है, इष्ट अनिष्ट सब उसीके द्वारा होता है, त्रिलोकीका उत्पसि, पालन, प्रय सब रुद्रसेही होता है, (एको स्द्रो न द्वितीयः) इस श्रुतिके अनुसार एका अद्वैतरुद्रका प्रतिपादन होताह, वेद नुसार उनकी उपासना करनी चाहिये, रुद्रकी उपासनासे सब उपद्रवं दूर होकर चारों पदाथीकी प्राप्ति होती है इसका पाठ करनेसे सब मनोरथ सिद्ध होते है ॥६६॥ इति श्रीरुद्राष्टके पण्डितज्यालाप्रमादमिश्रकृतसंस्कृतार्यभाषाभाष्यसमन्धितः पचमोऽध्यायः ॥
PaNU
(९६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पयो-
अथ षष्ठोऽध्यायः।
मन्त्रः।
हरिः ॐ बुयर्छसोमवते तवु मनस्तुनषुबि-
तह॥ प्रजावन्तत्सचेमहि ॥ १॥
७ वर्हन्सोम इत्यस्य बन्धुब्रपिः । गायत्री छन्दः । सोमो
देवता । दक्षिणाग्न्युपस्थाने विनियोगः ॥१॥
भाष्यम्-(सोम ) हे सोमदेव (वयम् ) क्वादयः ( तव व्रते') त्वदीयकर्मणि
वर्तमानाः (तनृषु ) त्वदीयेष्वङ्गेषु जाग्रत्स्वमसुषुप्त्यादिषु ( मनः) मनः (विभ्रतः)
धारयन्तः (प्रजावन्तः ) पुत्रपौत्रादिमियुक्ताः सन्तः ( मचेमहि ) सङ्गन्छेमहि ।
मजु•३॥५६॥ १॥
माषार्थ-हे सोम । (पितृयज्ञका सौमदेषता है " सोमाय पिमते सथा। इस मामे हो
दीनाती है ) हम यजमान तेरे व्रतसंवधिकर्ममें वर्तमगन हुए आपके शरीरावयव का जायदा
स्वम सुषुप्तिमें मन धारण करते पा लगाये हुए आपहीकी कृपासे पुत्रपौत्रादिसे युक्त हुए हम
सेवन करते हैं पा सदा तुम्हारे संबंधवाले हैं।॥ १ ॥
मन्नः।
एषतेरुसाग सुहस्तसादिक्यातपस्नु
स्वाषते ागऽआखुस्तैपशु॥२॥
ॐएषत इत्यस्य बन्धुपिः। प्राजापत्या वृहती छन्दः । रुने
देवता । अवदानहोंमे विनियोगः ॥ २ ॥
माण्यम्-(रुद्र) हे रुद्र (एम) अत्मनिरुपकार्यमाणोऽतिरिक्तः पुरोडाशः
(ते) तव (स्वला) मागिन्या ( अम्बिकया ) अम्बिमानाम्न्या (सह ) (भागः,
भजनीयः स्वीकत योग्यः "अम्बिका ह वै नामास्य स्खसा" इत्यादिश्रुतेः । (तम्) पुरो-
डाशम् ( जुषस्व ) सेवस्व (वाहा ) सुहुतमस्तु । अतः परमाखूतिकरं परिफिराति
(रुद्र) हे रुद्र (एपः) अस्माभिरुपकीर्यमाणोऽतिरिक्तः पुरोडाशः (ते) तब (भागः)
संशः तथा (ते) तब ( भाखुः) मूषक (पशुः) पशुत्वेन समर्पितः । पाखुदा-
नेन तुष्टो रुद्रस्तयाऽम्बिकया यजमानपशून्न मारयतीत्यर्थः । [ यजु०३१५७ ] ॥ २ ॥
ऽव्यायः ६.] माष्यसहिता (९७) माषार्थ-विरोधियाँको, पापियोंको, अधर्मियोंको, मन्यायियों को उनके कर्मका फल देकर रुलानेवाले हे रुद्रदेशता । तुम्हारी भगिनी अम्बिकाके साथ यह हमसे दियाहुमा पुरोडाश स्वीकार करनेके योग्य है इस पुरोडाशको सेवन करो हे रुद्रा हमारे द्वारा अवकीर्ण (बखेरा) हुआ यह पुरोलाश तुम्हारे सेवनीय है तथा आपका विलमध्यमें रहनेवाला भूसा ( चहा) रक्षणीय पशु है, इस कारण शेषमाग इसको भी देते है ॥ २॥ विशेप-मापिका नामकी रुद्रकी यहन है, उसके साथ रुद्रदेव विरोधियों के मारनेकी इच्छा करतह, सो इस रपेवता अम्पिकाके साथ उसे मारते हैं, वह मम्बिका शरतूरूप हो जरा- दिक उत्पन्न कर उस विरोधीको मारती है, रुद्र अम्बिकाकी उग्रता इस हविसे शान्त होती है। केवल तत्ववादी कहते है-स्दशब्द मेघगर्जनका आदिकारण विशुदनिविशेष है। मम्छि काशब्दका प्रकृत अर्थ गमनशील अर्याव जगत है यही शररूपसे रुद्रकी भगिनी होकर कार्यसाधन करती है । रुद्राध्यायमें मेरा ऋनु आदिमें भी रुद्रका निवास लिखा है, इसके यह भी होसमताह मेनियाण होनेसे शरहतु प्राप्त हेतिह, वही उनकी भगिनीरूप है, प्राचीन कालमें शरसे ही नवीमवर्ष प्रारम होताया और एकवर्ष बीतनेसे शरीरमें परिवर्तन होता वही जा है । जया शरमें वर्षाके उपरान्त एक नवीन ज्वरप्रारम होताहै जो बडा काट करता। इसको ही अम्बिकाकृत जरा कहतेहैं। इसमें बहुधा मनुष्य असावधानीसै मृतक होनातह इसके निमित्त हान अवश्य करना चाहिये और इन्ही रोगांकी शान्तिके निमित्त चातुर्मासके अन्तर्गत यह भी हवन है, इस सगय भी शरस्कालमें नवदुर्गाओंमें जो हवन होताह वह मालिकादेवीका ही विधान है परन्तु घर घर होनेसे बात उपचार होसकतहि, इस मंत्रमें वड़ा गूढ तय है बुद्धिमान इससे बहुत कुछ जानसकने है, इस कारण दिग्दर्श ममात्र लिखा है ॥ २॥ अवरुदखती मुख्यादेवन्न्यम्बकम् ॥यर्था नोबस्य सुल्कएयथानुहश्लेयसुस्वरधानो व्यवसाययात् ॥३॥ ॐ अवरुदमित्यस्य वन्धुत्रपिः । विराट् पंक्तिश्छन्दः । रुद्रो देव- ता। जपे विनियोगः॥३॥ भाष्यम्-(दम्-मा) असी सद इति गनसा तम् अवगत्य (अंदीमहि ) त्वद. नुग्रहादन्नं भक्षयेम । तथा (व्यम्बकम् ) त्रीणि सम्बकानि नेत्राणि यस्य ताई देवम् (बब) अवनत्यादीमहीत्यनुवर्तते । यद्वाऽन्यदेवताभ्यः पृथकृत्य रुद्रमहामा मधामो भोजयामः ( यथा) येन प्रकारेण (न:) अस्मान् (वस्यसः ) वस्तृतरान वसनशीलान् (कग्द) असौ कुर्यात् (यथा) येन प्रकारेण (नः) अस्मान (श्रेयस्त स
१९८)
स्द्राष्टाध्यायी-
[षष्ठे-
'फरत ) ज्ञातिषु प्रशस्यतराव कुर्यात् । ( यथा) यथा व (नः) अस्मान् ( व्यर-
साययात् ) सर्वेषु कार्येषु निश्चययुक्ताम् कुर्यात् तथैनं जपाम इत्यर्थः । [यजु०३१५८]
भाषार्थ-पापियोंको रुलानेवाले तीननेत्र वा लोक, अन्तरिक्षलोक, झुलोकाप वा गमन-
शील या जिनके नेत्रसे तीनलोक प्रकाशित होते है वा जिनके नेमप्रकाशसे तीन लोक आकृष्ट
होते अथवा तीन वेद, तीन काल, आधिदोषक आध्यात्मिक, आधिभौतिक ही जिनके नेत्र
ऐसे सादिसे क्रीडाकरनेवाले शहजेता प्राणियों में मात्मरूपले वर्तमान द्युतिमान स्तोत्रोते
जुति किये हुए रुद्रदेवकी और देवताओंसे पृथक कर वा उस्कृष्ट जानकर सब दुःख नाश करते
है वा उनके लनुग्रहो भन्नभक्षण करते हैं वा त्रिनेत्र जानार उनको भाग देते हैं जिस-
मकार हमको वह उत्तम प्रकार से निवासकरनेवाले धेरै, जिस प्रकार हमको ज्ञातियों में श्रेष्टनर
करे, जिसप्रकार हमको सब कार्यों में निश्चययुक्त के इस प्रकार इनका जप करते हैं (भा-
शीर्वाद है)॥३॥
तत्त्वाविचार-जिनकी अम्बिका भागनी है वह पंषक होते हैं, तीन लोकमें गमन होनेसे
अम्बिका विशुदग्निविशेष रुद्रदेवताकी भगिनीस्थानीय है ॥ ३ ॥
भावार्थ-तीनकालों में एकरसरूप परमात्माका भजन करना सबको उचित है यह रुद्ररूपले
प्रार्थनीय है धनसपत्ति वही देवताहै तेनकी वृद्धि वही करता है ॥ ३ ॥
मन्त्रः।
मेषजभसि । मधुजङ्गवेश्वायुपरुषायमेष-
जम् । सुखम्लेषायमुष्ध्यै॥४॥
ॐ भेषजमसीत्यस्य बन्धुर्ऋषिः । स्वराङ्गायत्री छन्दः । रुद्रो
देवता । जपे विनियोगः ॥ ४॥
भाष्यम्-हे रुद्र त्वम् (भेषजम् ) औषधवत्सर्वोपद्रवनिवारकः ( असि ) सर्वप्रा.
'णिनां हितकारी भवसि, अतः प्रार्थयामि, अस्मदीयेभ्यः ( गवे ) (अश्वाय ) (पुरु.
'पाय) (भेषजम् ) सर्वव्याधिनिवारकमौषधं देहि (मेपायमेष्य) (मुखम् ) क्षेम
देहीति शेषः । सुहित खेभ्यः प्राणेभ्यः इति सुखम् । अनेन मन्त्रेण गृहपशूनां क्षमप्रा.
निर्मवति ( यजु० ३५९] ॥ ४ ॥
भाषार्थ-हे रुद्र ! माप अपवित्र संपूर्ण उपद्रवों के निवारण करनेवाले हो इस कारण हमारे
गौ, घोडे, पुत्र, पौत्र, भ्राता और परिजनों के निमित्त सव रोग दूर करनेको औषधि दो या
भौषधिरूप प्रकाश करो तथा भेष मेषी आदि पशुओं के उपद्रवरहित जीवनके निमित्त सुखें-
नायक अपना भेषजस्वरूप प्रकाश करो (इस मनसे घरके पशुओंकी क्षेमप्राप्ति होती है)।
विशेष-पदार्थविद्याव ले यहाँ विद्युत्का अर्थ करके कहते हैं कि, विद्युत् कितनी उत्कृष्ट
मेपन है, यह भेषनके व्यवसायी ही विशेषरूपसे जानसकते है ॥ ४ ॥
ऽध्यायः ६.] माष्यसहिता। (९९) मन्त्रः। ऽयम्बकंव्यजामहेसुगन्धिम्'ट्रिबर्द्धनए। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृ- तात्।। भ्यम्बकँव्यजामहे सुगन्धिम्पतिवेद नम् ॥ उर्वारुकमिवबन्धनादितोसुक्षीयु- मामुर्तः ॐ अम्बकमित्यस्य वशिष्ठ ऋषिः । वाइब्राह्मी त्रिष्टुप्छन्दः। रुद्रो ५॥ देवता । परिक्रमणे विनियोगः ॥६॥ माष्यम्-( सुगन्धिम् ) दिव्यगंधोपेतं मर्यधर्महीनम् ( पुष्टिव ईनम् ) धनधान्या दिपुष्टेयितारम् (व्यंबकम् ) नेत्रत्रयोपेतं शिाम् ( यजामहे ) पूजयामः । ततो रुद्रप्रमादात् (मृत्योः) अप-योः संसारमृत्योश्च (मुक्षीय ) मुक्तो भूयासम् ( अमृ. सात् ) स्वर्गरूपान्मुक्ति पाच (मा ) मुक्तो मा भूयासम् अभ्युदयनिःश्रेयमरूपा फलट्यान्मम भंशो माभूदित्यर्थः । मृत्यौमीचने दृष्टान्तः (इव) यथा (उर्वारुकम्) फर्कन्वादेः फलमत्यन्तपकं सत् (इन्धनात् ) वृन्तात् स्वपमेव मुच्यते तद्वत् त्र्यम्बक- प्रसादेन मुक्तो भूयामम् । यजमानसम्बान्धन्या कुमार्यापि त्र्यंबकमंत्रेणाग्नि विपरि- पन्ति ( पतिवेदनम् ) पति वेदयतीति तं भर्तुलम्भयितारम् ( सुगन्धिम् ) दिव्यगन्ध- युक्तम् (श्वकम् ) देवं शिरम् ( यजामहे ) पूजयामः ( इनः ) मातृपितृभ्रातृवर्गान. (मुक्षीय ) मुक्ता भूयासम् (उतः ) विवाहादूर्ध मविष्यतः पत्युः ( मा ) मुक्तामा भूयासम् । जनकस्य गोत्रं गृहं च परित्यज्य परयुगांत्रे गृहे च सर्वदा व्यस्वकासादात् घसामीत्यर्थः । सा यदित इत्याइ-ज्ञातिभ्यस्तदाह-मामुत इति पतिभ्यस्तदाहेति राक्ष २।१४ श्रुतेरितोऽमुतः शब्दाभ्यां पितृपतिवर्गो ग्राह्यौ । [ यजु० ३।६० ] "समुद्दिश्य महादेवं त्र्यम्बकं अंपयूचा । एतत्पशतं कृत्वा जीवेद्वपंश ते प्लखी ॥ १ ॥ त्रिरात्रं निपतोपोष्य अपयेस्पायसं चरम् । तेनाहुतिशतं पूर्ण जुहुयाच्छसि तत्रतः॥२॥" ॥५॥ भापार्य-दिव्यगंधसे युक्त, मर्यधर्महीन उमयलोकोंके फलदाता धनधान्यादिसे पुष्टि बढाने- माले पूर्वाक्तनेत्रत्रयसंपन्न शिवशंकरका पूजन कर है, यह रुद्र हमको मृत्यु, अपमृत्यु, षा संसा- रके मरणसे मुक्त करें वा छुडावे, निम प्रकार अपने बंधनसे पकेहुए कर्कटीफल अर्थात जैसे
(१००)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ षष्ठो-
पक्कफल अपनी प्रथिसे टूटकर भूपतित होताहै इस प्रकार शिवकी कृपासे जन्ममरणधनसे
चिरमुक्त होजाउ और स्वर्गरूपमुक्तिसे न छ । अभ्युदय निश्रेयसरूप दोनों फलसे भ्रष्ट न
होऊ, पतिके प्राप्त करानेवाले वा सपूर्णगुणसपन्नमुन्दरपतिके विधान करनेवाले दिव्ययश सौर-
मपूर्णधर्माधर्मके ज्ञाता न्यचकदेव शिवको पूजन करताहू, जैसे किफ घनसे हटनाता
है इस प्रकार इस माता पिता भ्रातृवर्गसे वा इनके गोबसे छूटकर विवाह उपरान्त पतिके सभी-
पसे मत छुटाओ । आशय यह कि पिताके गोत्र और परखो छोडकर पतिके गोत्र मौर घरमें
शिवनीके प्रसादसे सदा निवास करें॥५॥
विशेष-पहला मत्रही महामृत्युजय बहलाता है इसको विधिपूर्वक शिवपूनन करके जप
करनेसे अपमृत्यु निवारण होती है इसमें सदेह नही, और इस मत्रसे यह भी विदित होता है कि
भुक्त होकर फिर संसार में नहीं माता इस मंत्रसे तीन दिनतक व्रत पर चस्की सो माहुति
देतो १०० वर्ष जियें ॥ ६॥
एवत्ते। रुद्राबसन्तेलपुरोमजबुतोशीहि ।।
अवततधन्वापिनाकवासुकृत्तिवासाऽअ-
हिसन्नाशिवोतीहि॥६॥
ॐ एतत्त इत्यस्य वशिष्ठ ऋषिः । भुरिगास्तारपंक्तिश्छन्दः । रुद्रो
देवता । वंशयाष्टिसंसर्जन विनियोगः॥६॥
भाष्यम्-( रुद्र) हे रुद्र (एतत् ते) तव (अवलम् ) हविशेषाख्यं भोज्यम्
"अवसशब्देन देशान्तरं गच्छतो मार्गमध्ये तदाकादिसमीपे भोक्तव्य ओदनविशेष
उच्यते" तेन सहितस्त्वम् ( मृजवतः ) पर्वतात् “भूजवान्नाम कश्चित्पर्वतो रुद्रस्य
वासस्थानम्” (परः) परभागवर्ती सन् (अतीहि ) अतिक्रम्य गच्छ कीदृशस्त्वम्
र अवततधन्वा) अवरोपितधनुष्कः । अस्मदिरोधिनी त्वया निवारितवादित अन्न
धनुषि ज्यासमारोपणस्य प्रयोजनाभावादवरोपणमेवेदानी युक्तं तथा ( पिनाकवास:
पिनाकाख्यं त्वदीयं धनुरावस्ते सर्वत बाच्छादयतीति पिनाकवासः यया धनुर्दृष्ट्या
पाणिनो न विभ्यति तथा त्वदीयं धनुर्वस्त्रादिना प्रच्छाय गच्छेत्यर्थः । हे रुद् त्वम्
(कृत्तिवासाः) धर्माम्बरः (ना) अस्मान् ( अहिंसन् ) हिंसामकुर्वन् (शिवः)
अस्मदीयपूजया सन्तुष्टः कोपरहितो भूत्वा (. अतीहि ) पर्वतमतिकम्य गच्छ ।
। यजु०३। ६१॥६॥
ज्याय: ६.]
साष्यसहिवा
भाषार्थ-हे उक्तगुणसंपन्न महादेव । यह आपका इविशेषाख्य भोजन है, देशान्तरको
जाते हुए मार्गमें जो तडागादिके समीप बैठकर मोदना आदि भक्ष्य खाधाना है उसे
अवस कहते है) इसके साथ तुम हमारे विरोधियों के निवारण होनि ज्या उतार हुए धनुषको
के अपने पिनाक धनुषको वनमें छिपाये मूलवान नाम पर्वतके परमागवर्ती होकर गमन करो
सर्यात् इस सपने मागको लेकर दीर्घ गन्तव्यपथ अतिक्रमण घर अपने निवासभूत सुंन.
पाद नाम पर्वतके शिखरपर उपस्थित हो अथवा तुम्हारा निरन्तर विस्तृत धनुष है तुम अपने
जसे स्वर्गपर्यन्त आच्छन्न करके गमन करनेमें समर्थ हो तुमको किसी प्रकारकी सहायताको
मायश्यकता ना ( पनुष छिपाकर जानेका कारण यह कि प्राणी भयभीत न हो अर्थात् रुद्रने
अपना धनुष अब सार लिया) हे रुद्र । तुम पाम्नरपारण किये हो वा सपूर्ण प्राणियों के
मन्तर रहनेसे चाम्बरधारी हो हमारी हिसा न करते अर्थात् हमारी सब शारीरिक विप.
तको नतिजाम कर रक्षाके अभिप्रायसे हमारी पूजाले सन्तुष्ट वा कोपरहित होनेके कारण
पाल्याण स्वरुप होकर अपने स्थानमें निवास करो वा पर्वतको अतिक्रम परजाओ ॥६॥
विशेप-शिव धनुषका नाम पिनाक है गनचर्म धारण करनेसे कृत्तिवास है पौराणिक
पदार्थ विद्यावाले कहते हैं पर्वतके उपर मेघोंके उदय होनेले सदा इन्द्र पनुष देखा जाताहै।
हम कारण यहाँही स्द्रका निवास स्थान कथन किया है विद्युत में सपूर्ण शरीरके चर्मान्त-
रखता है इस कारण स्ट्रको विद्युत में होनेसे कृतिशास और महादेव कहा है ॥ ६ ॥
यायुषअलदग्नेस्कुश्यपस्यम्पायुषच ।।
देशेषुब्धायु पन्तन्नोऽ अल्तुत्व्यायुषः ॥७॥
पायुपमित्यत्र नारायण ऋषिः। उष्णिक छन्दः । रुद्रो
देवता । वएनादी जपे विनियोगः ॥ ७ ॥
भाज्यम्-(जमदनेः ) मुनेः (व्यायुपसू ) त्रयाणां बाल्यवौवनस्थाषिराणामायुषों
समाहारख्यायुपम् । तथा (कश्यपश्य ) एतनामकस्य प्रजापतेः सम्बन्धि यत
(व्यायुपसू) पायुपम् । तथा (देवेषु ) इन्द्रादिषु (यत् ) यत् (व्यायुषम् ) व्यायु.
पारित (तत्) तत्सर्वम् (ज्यायुधम् ) व्यायुपम ( नः ) अस्माकं यजमानानामू
मस्तु ) भूयात् जमदग्यादीना पाल्गादिषु यादृशं चरितं सादृशन्नो मूयादित्यर्थः ।
[यजु० ॥६२ ] || ७॥
भाषार्व-हे सदा जमदग्नि मषिकी जो बाल्य यौवन वृद्धावस्था है तथा कश्यप प्रनापतिकी
जसी तीनो अबस्थाएँ है जैसे देषगणकी भारया चरित्र है वह सब व्यायुप मुझ यनमा-
मको प्राप्त हो अर्थात् इन परीक्त महात्मामकिसे चरित्र हमारे होजायें ॥ ७ ॥
(१०२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[पठो-
शिबोनामांत्रिवधितिस्तेपुितानमस्तेऽअ-
स्तुमामाहिसील ॥ निवर्त्तयाम्म्यायुपेन्ना-
द्यायप्णजननायरायस्पोपायसुष्मजास्त्वा-
यसबीवाय॥८॥
इति सहितायां रुद्दपाठे षष्ठोऽध्यायः॥६॥
* शिवोनामासीत्यस्य नारायण ऋपिः । भुरिग्जगती छन्दः ।
क्षुरग्रहणे वपने च विनियोगः ॥ ८॥
भाष्यल-हे क्षुर त्वम् ( नाम) नाम्ना (शिवः) शान्तः (असि ) असि (स्व
धितिः) वज्रम (ते) तब (पिता) पिता (ते) तुल्यम् ( नमः ) नमः (यस्त)
मवतु (मा) माम् (माहिर्छन्सी) मा नाशय । हे यजमान त्वाम् ( निर्वतयामि
क्षुण्डयामि किमर्थम् (मायुषे) जीरनाय (पन्नाधाय ) बन्नभक्षणाय (प्रजननाय
सन्तानाय (रायस्पोचाय ) रायो धनं तस्य पोपाय पुष्टय (मुजास्त्वाय ) शोभना
सत्यतायै (सुवीर्याय ) शोभनसामर्थ्याय [ यजु० ३।६३ ] ॥ ८ ॥
भाषार्थ-सर्वव्यापी होनेसे क्षुरमें व्याप्त क्षुराधिष्ठित देव ! तुम नामकरके शान्तस्यभार
कल्याण कारक हो वज्र तुम्हारा पालक रक्षक है तुम्हारे निमित्त नमस्कार है मुझको मत
भाघात करना । हे यजमान । इस क्रियाके फलसे जोपनके निमित्त अन्नादि मलमको
निमित्त बहुत प्रजा बहुत धन पुष्टि उत्कृष्ट प्रजननसामथ्र्य प्रशंसनीय यलकी प्राप्ति
निमित्त मुण्डन करताहूं ॥ ८॥
इति श्रीरुद्राष्टके पण्डितन्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्थमाषाभाष्यसमन्वितः षष्ठोऽध्यायः॥६॥
किसी २ रुद्राष्टक. यह दो मंत्र विशेष देले जाते हैं-
मन्त्रः।
२
नतम्बिदायऽडुमाजुजानान्ययुष्म्माकुम-
न्तरम्बभूव ॥ नीहारेणुप्माताजल्प्यांचा
सुतृपंऽउक्थुशासश्चरन्ति ॥१॥
ऽध्यायः ७.] (१०३) माष्यसहिता। अथ सप्तमोऽध्यायः। मन्त्रः। हरिः ॐ उग्यश्व मीमश्चध्यान्तभ्यधुनिश्च। सासुबाश्चाभियुवाचविक्षिपरवाहा॥१॥ ॐ उग्रश्चेत्यस्य परमेष्टा प्रजापतित्राषिः । गायत्री छन्दः । मरुतो देवताः । अरण्ये पिमुखपुरोडाशहोमे वि०॥१॥ माज्यमू-( उग्रः) उत्कृष्टः (च)( भीमः ) विभेत्यस्मादसौ मीमः (च), (ध्वान्तः ) वनति शब्दं करोतीति ध्वान्तः (च) (धुनिः ) धूनयति कंपयति शत्रू निति धुनिः (च) (सासवान् ) सहतेः शत्रनाममवति स सद्वान् (च) ( अभि- घुम्वा ) अभियुनक्ति यस्मत्संमुख योगं मामोत्यामियुग्मा (च) ( विक्षिपः ) विविध क्षिपति रिपूनिति विक्षिपः, एवे उपादिनायकाः सप्त मरुतः तेभ्यः ( स्वाहा ) सुहृत. मस्तु [ यजु० ३९ ७ ] ॥१॥ भाषार्थ-उत्कृष्ट क्रोधन स्वभाव और जिससे भय लगे भयानक स्वभाव और ध्वनिकारी और शत्रओंको कम्पानेवाले मोर सबके तिरस्कारमें समर्थ तथा सब वस्तुमके सहित योग पाले भऔर प्राणी के शरीर बुद्धि आदि मौर वृक्षशाखादिक्षेपणकारी वा शत्रु के नाशक बायु देवताकी प्रीति के निमित्त यह आहुति देते हैं भली प्रकार गृह त हो ॥ १ ॥ भावार्य-जिस परमात्माने इस सप जगत्को उत्पन्न किया है वह तुमसे भिन्न होकर तुम्हारे हृदयमें स्थित है । तुम जो अज्ञान और वृथा जल्पना प्रवृत्त हो और पुत्रपौत्रका- मादिसे हप्त तथा स्वर्ग फसलोभमात्रके लिये यज्ञानुष्ठान करते विचरण करते हो, इस कारण उसका तत्व मवगत नहीं होता, वह निष्काम कर्म और तत्वविचारसे ध्यानमें भाता है | मन्त्रः। विश्वकम्मास्यनिष्टदेवऽआदिद्वन्धोऽs- भवद्धितीय ॥ तृतीय पिताजनितीषधीना- मुपाङ्गव्यदधात्पुरुन्ना ॥२॥ भाषार्थ-विश्वकर्माने प्रथम देवगणकी सृष्टि की, गन्धर्वगण उसकी दूसरी सृष्टि है, पर्जन्य उसकी तीसरी सृष्टि है, यह औषधियों के उत्पादक पर्जन्य अनेक स्थलोमें गर्भ धारण करते।।
११०४)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ सप्तमो-
मन्त्रः।
अग्निठहर्दयनाशनिहत्याग्णपशुपतिङ्क-
स्नुहृदयेननुवंध्यका ॥शर्छम्मतरनाक्य-
मीशानम्मुन्धुमा महादेवान्तहपशुध्येलोग्न-
न्देवंचलिष्टुनावशिष्ठहरशिङ्गीनि होश्या-
स्याम् ॥२॥
ॐ.
।
ॐ अनिमित्यत्य अनापतित्रापिः । भुरिबाली त्रिष्टुप् छन्दः ।
यजमानो देवता
अश्वाङ्गदेवताभ्यश्चतुर्ग्रहीताज्याहुतिदाने
वि० ॥२॥
भाष्यम्-( हृदयेन ) अंगेने (माग्निम् ) आमिदेवं प्रोणामि (हृदयाग्रेण ) हृदय-
स्याग्रभागेन ( अशनिम् ) अशनि दें प्राणामि (सहृदयेन) समग्रहृदयेन (पशु
पतिम् ) पशुपति देवम् ( यता ) यकृता (भवम् ) भवं देवन् (मत्स्नाभ्याम् ) मत्ले
हृदयास्थिविशेषौ ताभ्याम् (शर्वम् ) शर्व देवम् ( मन्युना ) अश्वसम्बन्धिकोधेन
(ईशानम् ) ईशानं देवम् (अन्तःपर्शव्येन ) अन्तर्वर्तमानेन पर्तव्येन पार्धास्थिस-
पन्धिना मासेन (महादेवस् ) महादेवसू (वनिष्टुना ) वनिष्टुः स्मृलान्नं तेन (उ
देवम् ) उग्रं देवम् ( वशिष्ठहनुः ) वशिष्ठस्य देवस्य हनुः कपोलेकदेशो ज्ञातव्यः ।
अथवा वसिष्ठाया इनुः कपोलाघोदेशः 'तत्पराः' इत्यमरः । वसिष्टहन्वा ( कोश्या-
भ्याम् ) कोशो हृदयकोशः तत्स्थाभ्यां मांसपिण्डाभ्यां च ( शिंगीनि ) शिंगिसंज्ञानि
देवतानि प्रीणामि [ घजु० ३९।८]॥२॥
भाषार्थ-हृदयद्वारा अग्नि देवताको प्रसन्न करताहूँ १, हृदयके अग्रभागसे अशनिदेव-
साको २, संपूर्ण हृदयले पशुपति देवताको ३, यकृत् (कालखंड) द्वारा प्रभव देवताको प्रसन्न
करताहूँ ४, हृदयास्थिविशेषद्वारा शर्व देवताको प्रसन्न करताहूँ, ५ कोषाधारद्वारा ईशान
देवताको प्रसन्न करताहूँ ६, पार्श्वस्यके मध्यगत मांससे महादेवको प्रसन्न करताहूँ ७,
स्थूलान्त्रसे उग्रदेवको प्रसन्न करताहूँ ८, कपोलके एकदेश का भघोदेश और हृदयकोशमै
स्थित मांध पिण्डद्वारा शिङ्गी देवताको प्रसन्न करताहूँ ९, (नद्वारा वशिष्ठको प्रसन्न करता
हूं, ऐसा भी किसीका मत है १०) ॥२॥
अध्यायः ७.1
भाष्यसहिता।
(१०६)
उर|ल्लोहितेन मित्रसौव्व्रत्त्येनरुहन्दौत्र-
त्यनेन्दम्पक्छोडेनमुरुतोबलेन साख्या-
नप्पमुदा ।। भवस्एकाठमुहल्यान्तर
राश्यमहादेवल्युबईच्छुईल्यवानास्प-
शुपतत्पुरातत् ॥ ३॥
में उपमित्यस्य प्रजापतिविः । निद्राही त्रिष्टुप् छन्दः ।
यजमानो देवता । वि० पू० ॥३॥
माध्यम्-(लोहितेन ) बसना (जनम् ) उग्रं देवं प्रोणामि ( सौत्रत्येन) शोभन
जत कर्म यस्य सः सुव्रतस्तस्य भावः सौनत्यं शोभनमत्यादिकर्मफत्वं तेन (मित्रम्)
मित्रं देवं प्रीणामि (दोवत्येन) दुष्ट स्खलनोच्छनादि व्रतं यस्य स दुर्वतः तस्य
मावो दौत्यं तेन (रुदम् )द्र देवं प्रीणामि ( प्रक्रीडेन) प्रकृष्ट क्रीडन प्रक्रीड:
तन (इन्द्रम् ) इन्द्रं दें प्रोणामि (वन) सामर्थ्येन ( मवतः) मरुतो देवान प्रोणा-
{म ( प्रमुदा) प्रकृष्टा मुत् हर्षः प्रमुत् तया (साड्यान् ) साध्यान्देवान् प्रो० (भवस्य)
मत्र षष्ठयन्तो देवः अंग प्रथमान्तम् मवदेवस्य (कण्ठ्यम् ) कण्ठे मई मांसमस्तु विम-
क्तिव्यत्ययो वा कण्ठयेन मयं देव प्रोणामि । एमग्रेऽपि (अन्तः पार्थम्) पार्श्वस्या-
प्तमध्ये भव मांसमन्तः पाचम् ( रुद्रस्य) रुद्रस्यास्तु (यकृत् ) पालखण्डम् (महा-
देवस्य ) महादेवस्यास्तु (वनिष्ठः) स्थूलान्त्रम् (शर्वस्य ) शास्यास्तु (पुरीतत् )
हृदयाच्छादकमन्त्रमू (पशुपतेः) पशुपतर्देवस्यास्तु [ यजु० ३९।९] ॥ ३ ॥
भाषाय-लोहितद्वारा उग्रदेवताको प्रसन्न करताहूँ १, श्रेष्ठगत्यादि कर्म करनेवालेसे मित्र
देवताको प्रसन्न करताहूँ २, जो शरीरका शोणित दुरयकरनेको प्रवृत्त होताहै उससे रुद्र
देवताको प्रसन्न करताहूँ ३, क्रीडा करने में समर्थ रक्तद्वारा इन्द्रको प्रसन्न करताहूँ ४, बल-
प्रकाशमें समर्थ रक्तबारा मरुतोको प्रसन्न करताहूँ ५, प्रतत्रता कानेवालेसरा साध्यदेव
ताने प्रसन्न करताहूँ ६, कंठमें होनेवालेसे भवदेवताको प्रसन्न करताहूँ ७, पार्श्वकी मध्यर
क्तिमासे रुद्रको प्रसन्न करताहूँ ८, यकृतके रक्तद्वारा महादेवको प्रसन्न करताहूँ ९, स्थूला-
नहारा देवताको प्रसन्न करताहूँ १०, हृदयाच्छादकनाडीकी रक्तिमासे पशुपतिको
मसन्न करताहूँ ११, मर्याद सर्वाग देवताओंके है इससे सर्वस्वत्याग है ममत्व कुछ नहीं है।
इसमें स्थानगत रुधिरके गुण कहे हैं ॥ ३ ॥
(१०६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[सप्तमो-
.
मन्त्रः।
लोमक्युलस्वाहा लोमस्क्युलस्वाहा त्वचे
स्वाहात्वचेवाहालोहिताय स्वाहालोहि-
वायुस्याहा मेदोक्युरस्बाहामेयोन्युक्त्वा-
हो|माणुसक्युवाहां मामयुत्स्वा-
हास्नावश्युलस्वाहा समहत्वाहास्य-
व्युत्स्वाहास्थयुत्स्वाहांमुज्जमन्युक्रवा-
हांमुज्जफ्युत्स्वाहा ॥ रेतलुस्वाहाँ पायके
स्वाहा ॥४॥
ॐ लोमभ्य इत्यस्य पंचाक्षरमंत्राणां प्रजापतित्रापिः । देवी
पंक्तिश्छन्दः । अङ्गानि देवता । चतुरक्षरमन्त्राणां देवी बृहती.
षडक्षरमन्त्राणां देवी विष्टप० । अष्टाक्षरमन्त्राणां देवी त्रिष्टुप्०
प्रायश्चित्तातिदाने विनियोगः ॥ ४॥
भाष्यम्-लोमभ्यः स्वाहेति प्रायश्चित्ताहुतयो द्विचत्वारिंशलोमादीन्यगानि ( लोन
अभ्यः स्वाहा) लोमानि जुहोमीत्यर्थः । (त्वचे) त्वचे (लोहिताय ) लोहिताय
(मेदोभ्यः) मेदो धातुविशेषः (मांसभ्यः ) मांसेभ्यः (स्नावभ्यः) स्नावानः स्नायको
नसा ( अस्थभ्यः) अस्थिभ्यः ( मजभ्यः) मज्जा षष्ठो धातुः (रेतसे ) रेतो वार्य
(पायवे) पाथुदम् । [ यजु: ३९।१० ] ॥४॥
भाषार्थ-लोमोंके निमित्त सुहुत हो १, व्यष्टिलोमोंके निमित्त सहत हो २, स्वचाके निमित्त
बहुत हो ३, व्यष्टित्वचाके निमित्त मात हो ४, लोहितके निमित्त सुहुत हो ५, लोहि
तके निमित्त बहुत हो ६, मेदके निमित्त सुहुत हो ७, मैदके०८, मांसके निमित्त सुहुत
हो ९, मांसके० १०, स्नायुओंके निमित्त सुहुत हो ११, स्नायुके निमित्त० १२, मस्थि.
भोंके निमित्त सुहुत हो १३, मस्थियोंके० १४, मज्जाके निमित्त श्रेष्ठ होम हो १५, मज्जावे
निमित्त मुहुत हो १६, वीर्षके निमित्त सुइत हौ १७, गुदाके निमित्त सुहुनहो॥ १८ ॥ ४ ॥
ऽध्याय: ५. माज्यसहिता। (१०७ आयासायुस्वाहाँ प्रायासायु स्वाहा सं- व्याखायुस्वाहावियासायुस्वाहोद्यालाय स्वाहा ॥ शुचेल्वाहाशोचतुस्वाहाशोच- मानायुस्वाहाशोकायुस्वाहा ॥५॥ - ॐ आयातायेत्यस्य विनियोगः पूर्ववत् ॥६॥ भाष्यम्-(आयासाय ) बायासादयो देवविशेषाः प्रायासाय संयासाय विया साय उद्यासाय शुचे, शोचते, शोचमानाय, शोकाय, देवविशेषाय (स्वाहा) बुहुत- मस्तु ।[यजु० ३९।११ ] ॥५॥ भाषार्थ-आयासदेवताके निमित्त सुहुत हो १, प्रायासके निमित्त सुहुत हो २, संघासदे. बताके निमित्त सुहत हो ३, दियालदेवताके निमित्त सुहुत हो ४, उद्यासदेवताके निमित्त हुत हो ५, शुचदेवताके निमित्त सुहुत हो ६, शोधदेवताके निमित्त सुहुत हो ७, शोष- मानके निमित्त मुहुत हो ८, शोकके निमित्त सुहुत हो ९॥५॥ विशेष-देहपरिश्रमको भोग हो, इन्द्रियपरिश्रमको भोग हो, मानसपरिश्रमको भोग हो. अधिपरिश्रमको भोग हो, प्राणपरिश्रमको भोग हो, यह मायाप्सादि पाचौंका अर्थ है ॥ ५ ॥ वपसुवाहा तप्प्यतुस्थाहावप्प्यमाना- युस्वाहातुप्सायुस्याहाँघुर्मायुस्वाहा ॥ निष्कृत्यै स्वाहाप्प्रायश्चित्त्यै स्वाहामेषुजा- युस्वाहा ॥६॥ ॐ तपस इत्यस्य विनियोगः पूर्ववत् ॥६॥ माज्यम्-(तपसे ) तप्यते, तप्यमानाय, तप्ताय, धर्माय 'निष्कृत्यै, प्रायश्चित्य, मेषजाय स्वाहा । [ यजु० ३९।१२ ॥६॥ भाषार्थ-तपके निमित्त सुहुत हो १, तप्यत्के निमित्त सुहुत हो २, तप्यमानके निमित्त सहुत हो ३, तप्तके निमित्त सुहुत हो ४, धर्मके निमित्त सुहुत हो , निष्कृति के निमित्त - (१०८) रुद्राष्टाध्यायी- [अष्टमी मुहुत हो ६, प्रायश्चित्त के निमित्त सुहुत हो ७, भेषजके निमित्त भोगसमर्पण हो ८॥६॥ मन्त्रः। बुमायुस्वाहान्तकायुस्वाहामत्यवेस्वाहा।। ब्रह्मणे स्वाहां ब्रह्महत्यायै स्वाहा विश्थे भयोगपुरवावाधावापृथिन्क्यिा -- स्वाहा॥७॥ तिलहितायांरुदपाठसप्तमोऽध्यायः ७॥ ॐ यमायोति विनियोगः पूर्ववत् ॥ ७॥ माध्यम-(यमाय ) मेतपतये (अन्तज्ञाय ) फालाप ( मृत्यवे ) मृत्युनामकाय (ब्रह्मणे ) परमात्मने (ब्रह्महत्यायै ) ब्रह्महत्याय (विश्वेभ्यो देवेभ्यः ) एतेभ्यो देवेभ्यः (स्वाहा ) सुहतमस्तु ( पावापृथिवीभ्याम् ) यावापृथिवीभ्याम् ( स्वाहा ) सहुतमस्तु । इत्यन्तामाहुति जुहुयात् [ यजुः ३९०१३ ] ॥ ७ ॥ भाषार्थ-यमके निमित्त सुहुत हो १, भन्तकके निमित्त सुहुत दो २, मृत्युके निमित्त सहुत हो । ब्रह्मके निमित्त सुहुत हो , ब्रह्माहत्याके निमित्त सुहुत हो ५, संपूर्णदेवता- मोके निमित्त सुहृत हो ६, भूलोकसे झुलोकपर्यन्त जितने देवता हैं उन सबकी प्रीतिके निमित्त यह शेष पूर्णा हुति दीनाताई भलीप्रकारसे गृहीत हो ॥ ७ ॥ इति श्रीरुद्राष्टके पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्यभापाभाष्यसमन्वितः सप्तमोऽध्यायः । अथाष्टमोऽध्यायः हरिः ॐ ॥बाजश्च लेभलुवश्च मेप्रयंति- श्चमेप्रसितिश्चमेधीतिमेऋतुश्चमेस्वर श्चमेश्लोकश्श्चमे अवश्चमे अतिश्चमे ज्योतिश्चमुस्वश्चमेयुशेनकलप्पन्ताम
ऽध्याया८.]
भाष्यसहिता।
(१०९)
ॐ वाजश्च म इत्यस्य देवा ऋषयः शकरी छन्दः। अनिर्देवता ।
वसो(राहुतिहोमे विनिः ॥१॥
भाष्यसू-यजमान माज्यसंस्कृत्यायपरिमाणया महत्यौदुम्बयो वक्षा महता वेण
पंवार गृहीतमाध्यमरण्येनूच्ये पुरोडाशे तदुपरि सन्ततं विच्छिन्नधारं यथातथा वसो.
र्धारासंज्ञामाहुति जुहोति । इतेनिप्राप्ते सति वाजश्वेत्यादिहोममंत्रारम्माः । वकाराः समु.
चयाः। (बाजः) पन्नम् ( प्रसव ) अन्नदानाभ्यनुज्ञा दीयतां भुज्यतामिति,
(प्रयतिः) शुद्धिः (प्रसितिः ) बन्धनमन्नविषयौत्सुक्यम् (धीतिः) ध्यानम् (क्रतु:)
संकल्पो यज्ञो वा (स्वरः) साधुशब्दः (श्लोकः ) पचवन्धः स्तुतिर्वा ( श्रवः) वेद.
मन्त्राः श्रवणसामर्थ्य वा ( श्रुतिः) ब्राह्मणम् श्रवणसामथ्र्य वा (ज्योतिः) प्रकाश
(स्वः) स्वर्ग: एवे (मे) मम ( यज्ञेन ) यज्ञेन (कल्पन्ताम् ) सम्पन्ना भवन्तु स
यज्ञो वाजादीनां दातारमभ्यं भवत्तित्यर्थः । एवमने सर्वत्र । [यजु० १८॥१] ॥ १॥
भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवगण मेरे निमित्त अन्न और मेरे निमित्त (वीयता भज्यताम्)
इस प्रकार शन्नदानकी अनुज्ञा और मेरे निमित्त, शुद्धि अन्न विषयक उत्सुकता, ध्यान
विचार और संकल्प वा यज्ञ और साधुशब्द, पद्यपंधन पाहतुति और वेदमत्रोंका श्रवण या
उसकी सामर्थ्य, ब्राह्मण श्रवणकी सामर्थ्य, प्रकाश भोर स्वर्ग मात करें, अर्थात् यज्ञके फलसे
यह सब पदार्य हमको प्राप्त हो॥१॥
मन्त्रः।
प्राणश्चमेपानश्चमेध्यान चुमेसुश्चमचित्त
ञ्चमुऽआधीतञ्चमेवाक्चमेमनश्चमेचक्षुश्च
मे श्रोबेश्चमेवा मेजलेश्चमेयुजेनकरुप्प-
न्ताम् ॥२॥
ॐ प्राण इत्यस्य देवा ऋषयः । निच्युदतीजगती छन्दः । अग्नि-
देवता । वि० पू० ॥२॥
भाष्यम्-(माणः ) अर्श्वसंचारी शरीरवायुः (अपानः ) अधोवृत्तिर्वायुः (न्यान!)
सर्वशरीरगामी वायुः (यः ) प्रवृत्तिमान वायुः (चित्तं ) मानसा संकल्पः (माधी
तमू ) वाह्यविषयज्ञानम् (वाक) वागिन्द्रियम् (मनः) प्रसिद्धम् (चक्षुः) चक्षुरिन्द्रियम
(श्रोत्रम्) श्रवणेन्द्रियम् (दक्षः) ज्ञानेन्द्रियकौशलम् (वल्म) कर्मेन्द्रियकौशलम् एतानि
(मे) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पन्ना भवन्तु । [यजु० १८१२]॥२॥
(११०) रुद्राष्टाध्यायी- [ अष्टमो- माषार्थ-मेरे निमित्त अवश्य प्राण (उर्चायें) और मेरे निमित्त अपान ( अधोवायु. प्रवृत्ति ) और मेरे निमित्त शरीर संचारी षायु, प्रवृतिमान् वायु, मानससंकल्प, वाह्यविषय- वान, शागिन्द्रियसामर्थ्य, मन-चच-इन्द्रिय-सामर्थ्य, श्रोत्रइन्द्रियसामन्यं, जानेन्द्रियको कुशलता और वह इस यज्ञके फलसे प्राप्त हो ॥२॥ ओजचमेसहश्चमऽआत्मार्चमेतुनश्चमे शम्मचमेवम्मचुमेशानिचुमेस्थीनिचमेपरूं ७षिचमेशरीराणियम आयुश्चमेजुराचमे बुज्ञेनंकल्प्पन्ताम् ॥३॥ ॐ ओज इत्यस्य देवा ऋषयः । सुरिक्छवरी छन्दः । अमि- देवता । वि० पू० ॥ ३॥ भाष्यम्-(ओजा) दलहेतुरष्टमो धातुः (सहा) शारीर वलं सम्पन्नामिभक्ति पा(आत्मा) परमात्मा (तनूः) रम्यं वपुः (शर्म) सुखम् (वर्म ) कवचम् ( अंगानि ) इस्ताद्यवयवाः (अस्थीनि ) शरीरंगतानि (परुपि ) मंगुल्यादिपर्वाणि (शरीराणि ) पूर्वानुक्ताः शरीरावयवाः (मायुः ) जीवनम् (जरा) वार्धक्यान्तमायुः एते (मे) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । यजु० १८१३ ] ॥ ३ ॥ भाषार्थ-वलहेतु शरीरकी आठवीं धातु, शत्रुका तिरस्कार करनेवाला वल, भारमज्ञान मनो कर शरीर, मुख, कवच इस्तादिअवयवोंकी दृढता, शरीरकी अस्थियोंकी दृटता, संगुल्यादि पाँकी दृढता, शरीरका आरोग्य, जीवन और वार्धक्यपर्यन्त आयु मेरे निमित्त इस यज्ञ फलसे देवता संपादन करें ॥ ३ ॥ ज्यैष्ठ्यञ्चमुऽआधिपत्त्यञ्चमेमन्युश्चमेभा- मंश्चममश्चमेम्भश्चमेजेमार्चमेमहिमाचमे वरिमाचमेप्पधिमाचमे वार्षिमाचमेद्राधुि-
अध्यायः ८.]
भाष्यसहिता।
(१११)
मार्चमबृद्धश्चमेवृद्धिश्चमेषज्ञेनकलप्प-
न्ताम्॥४॥
ॐ ज्येष्ठमित्यस्य देवा ऋपयः । निच्युदयष्टिइछ अनिदै
पता। वि० पू० ॥४॥
भाष्यम्-(ज्येष्ठ्यम् ) प्रशस्तत्वम् ( आधिपत्यम् ) स्वामित्वम् (मन्युः) मानस:
शोधः (भगः) अधिक्षपादिलिग वायः क्रोधः । (अमः ) न मीयत इत्यमा अप-
रिमेयत्तम् ( अम्मा) शीतमधुरं जलसू (जेमा)जयस्य भावो जयसामर्थ्यम् (महिमा)
महतो भावो महिमा महत्त्वम् (परिमा) उरोर्मावो वरिमा प्रनादिविशालता (प्रथिमा)
पृयोर्भावः गृहक्षेत्रादिविस्तार (वर्पिमा ) दीर्घजीवित्वम् (द्राधिमा) अविच्छिन्नषशवम
(वईम् ) प्रभूतमन्नधनादि (वृद्धिः ) विद्यादिगुणैरुत्कर्षः एते मे यज्ञेन कल्प
न्ताम् । [ यजु० १८१४ ] ॥४॥
मापार्य-और वनाई, स्वामित्व, मानसकोप, वाह्यकोप, गंभीरता, अपरिमेयत्व, शीत,
मधुर जल जयकी सामर्थ्य, महत्व, प्रजादिविशालता, गृहक्षेत्रादिविस्तार, दीर्घजीवित्व यह
सब मेरे निमित्त प्राप्त हो, वशपरपराकी प्राप्ति, बहुत मन धनादि, विद्यादिगुणकी उत्कर्षता
पनके द्वारा संपादन करें अर्याद दें ॥ ४ ॥
मन्त्रः।
सुत्योद्धार्थमुजगचमेघनश्चमेविश्व-
ञ्चमेमहश्चमेचीडाचमुमोदश्चमेजातञ्चमे
जनिष्ण्यमाणञ्चमेसूक्तञ्चमेसुकतञ्चमेयुज्ञे
नकल्प्यन्ताम् ॥५॥
सत्यमित्यस्य देवा ऋषयः । विराद शकरी छन्दः । अग्नि-
यता । वि० पू० ॥६॥
माण्यम्-(सत्यम् , यथार्थभावित्वम् (श्रद्धा) परलोकविश्वासः (जगत् ) जंगम
सवादि (धनम् ) कनकादि (विश्वम् ) स्थावरम् (महः) दीप्तिः (क्रीडा) अक्षा-
वादिः ( मोदः) क्रीडादर्शनजो हर्षः (जातम्) पुत्रोत्पन्नमपत्यम् (जनिष्यमाणम् )
मविष्यदपत्यम् (सूक्तम् ) ऋक्समूहः ( सुवातम्) अपाठजन्यं शुमादृष्टम् एते
(यज्ञेन कलान्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [यजु०१८॥ ५॥५॥
(११२) रुद्राष्टाध्यायी- [ अष्टमो- भाषार्थ और मेरे निमित्त यथार्थभाषण, परलोकविश्वास, जगमगवादि, सुवर्णादि स्थावर पदार्थ, दीप्ति, क्रीडा, क्रीडादर्शनका हर्ष, पुत्रसे उत्पन्न अपत्य, होनेवाले अपत्यसन्तान, ऋचाओंका समूह, ऋचामोंके पाठसे शुभअदृष्ट देवताओं द्वारा इस यज्ञरे फल से प्राप्त हो॥५॥ मन्त्रः। झुतच मृतश्चमेयुक्ष्मञ्चमेनामयच्च जीवा- तुचमेदीर्घायवञ्चमेलमित्रञ्चममयञ्चमेसु- खञ्चमेशर्यनञ्चमेसूपाश्चमेसुदिनञ्चमेयुज्ञेन कल्प्यन्ताम् ॥६॥ ॐ ऋतमित्यस्य देवा ऋषयः । भुरिगतिशकरी छंदः । अग्नि- देवता । वि० पू० ॥६॥ भाग्यमू-(महतम् ) यज्ञादिकम् (अमृतम् ) तत्फलभूतं स्वर्गादि (भक्ष्मः ) यक्ष्मणोऽभावोऽयम धातुक्षयादिरोगाभावः अनामयत् ) सामान्यव्याधिराहित्यम् (जीवातुः) व्याधिनाशकमौषधम् ( दीर्घायुतम् ) बहुकालमायुः (अनमिनन् शत्र, ग्रहित्यम् ( अभयम् ) भीतिराहित्यम् (सुखम् ) आनन्दः ( शयनम् ) संस्कृता शय्या (सपा) शोमन उषः स्नानसंध्यादियुक्त प्रात:कालः (सुदिनम् ) यज्ञ दानाध्ययनादियुक्त सबै दिनम् एले (मे ) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सिध्यन्तु । यजु० १८।६] ॥६॥ भाषार्थ-यज्ञादि कर्म, उसका फल स्वर्गादि, धातुक्षयादि रोगका अभाव, सामान्यव्या.. विका अभाव, व्याधिनाशक औषधि, दीर्वायु, शवगोंका अभाव, निर्भयता, आनन्द, सजाई हुई सैज, सध्यावदनादियुक्त सुप्रभात और यज्ञदानाध्ययनादियुक्त संपूर्ण दिन इस यज्ञके फलसे देवता यह सब मेरे निमित्त प्रदान करें ॥ ६ ॥ मन्त्रः। युन्ताचमेधुचिमुमश्चमेघृतिश्चमेशिव- अमेमहश्चमे विचीज्ञाश्चमेसश्चमनस- श्वमुसीरञ्चमुलयश्चमेषुज्ञेनकलप्पन्तामा७॥
-- ऽध्यायः ८. माष्यसहिता। (११) ॐ यन्ता चेत्यस्य देवा ऋषयः । निच्यदतिजगती छन्दः । अग्नि- देवता । वि० पू० ॥ ७॥ भाष्यम्-(यन्ता ) अश्वादेनियन्ता (धर्ता) पोषकः पित्रादिः (क्षेमः) विद्य- मानधनस्य रक्षणशक्तिः (धृतिः) भापत्स्वपि स्थिरचित्तत्वम् ( विश्वम् ) सर्वानुकू ल्यम् (महः ) पूजा ( संवित ) वेदशास्त्रादिज्ञानम् (ज्ञात्रम् ) विज्ञानसामर्थ्यम् (सू) पुत्रादिपेरणसामर्थ्यम् (प्रसूः) पुत्रोत्पत्त्यादिसामर्थ्यम् (सीरम् ) हलादिकृषिकृतधा- न्यनिष्पत्तिः (लयः ) कृषिप्रतिवन्धनिवृत्तिः । एते (मे) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ), सम्पयन्ताम् । [यजु० १८७] ॥७॥ भाषार्थ-भश्वआदिका नियन्तृत्व, प्रजाकी पालनशक्ति विद्यमानधनकी रक्षणशक्ति, आपत्ति में भी स्थिरचित्तता, सबकी अनुकूलता, पूजासत्कार, वेदशास्त्रादिका ज्ञान, विज्ञानकी सामर्थ्य, माज्ञाप्रदान वा पुत्रादिप्रेरणकी सामर्थ्य, पुत्रोत्पत्ति मादिकी सामर्थ्य, कृषिमादिक उपयोगी हलादि वा कृषिकृत धान्यकी प्राप्ति और कृषिक प्रतिबंधकी निवृत्ति, अनावृष्टिका मभाव यह सव यज्ञद्वारा अर्यात् इस यजके फलसे मेरे निमित्त देवता प्रदान करें ॥ ७ ॥ मन्त्रः॥ शंचमेमयश्चमेणियञ्चमेनुकामश्चमुकाम- श्चमेसीमनुसश्चममगश्चमेविणश्चमेमुद्द- चमुश्रेयश्चमेवभीयश्चमेयशश्यमे बुझेनं कल्प्पन्ताम् ॥८॥ ॐ शमित्यस्य देवा ऋषयः । विराट्शकरी छन्दः। अग्निदेवता वि० पू० ॥ ८॥ माष्यम्-(शम् ) ऐहिकं सुखम् ( मयः) भामुष्मिकं सुखम् (प्रियम् ) प्रोन्युत्पा- दकं वस्तु ( अनुकामः) अनुकूलयलसाध्या पदार्थः ( काम: ) विषयभोगजनिती सुखम् (सौमनसः) मनःस्वास्थ्यकरो बन्धुवर्गः (भगः) सौमाग्यम् ( द्रविणम् ) धनम् (भद्रम् ) ऐहिक कल्याणम् (श्रेयः) पारलौकिकम् (वसीपः) निवासयोग्यो पान गृहादिः (यशः) कीर्तिः । एते (मे) मम (यज्ञेन कल्पन्ताम् ) क्लासा । [ यजु० १८१८] ॥८॥ ८
(११४)
रुद्राष्टाध्यायी-
अष्टमो-
माषार्थ-इस लोकका सुख, परलोकका मुख, प्रीतिआदिकी उत्पादक वस्तु, अनुकूल यल-
से साध्य पदार्थ, विषयभागजानित सुख, मनके स्वास्थ्यकारी वंधुवर्ग, सौमाग्य, धन इस
लोकका कल्याण, पारलौकिक कल्याण, निवासयोग्य धनयुक्त गृहादि और कीर्ति यह सब
मेरे निमित्त देवता यज्ञके फलसे प्रदान करें ।। ८॥
मन्त्रः।
उक्र्चमेसूनृतांचमुपय॑श्चमेरसंश्चमेघृतञ्च
मेलवचमेसग्घिश्चमेसपीतिश्चमेकाषिश्व
पेवष्टिश्चमेजवञ्चमुऽऔद्भिद्यचमेयुज्ञेनक-
रूपन्ताम् ॥ ९॥
ॐ उक्चेत्यस्य देवा ऋषयः। शकरी छन्दः । अनिदेवता ।
वि० पू०॥९॥
भाष्यम्-( उक्व ) अन्नम् (सन्ता) प्रिया सत्या वाक् ( पयः) दुग्धम् (रस:)
सारः (घृतम् ) आध्यम् ( मधु ) क्षौद्रम् (सरिका) वन्धुभिः सह भोजनम् (8-
पीतिः) वन्धुभिः सह पानम् (कृषिः) तत्कृतधान्यसिदिः ( वृष्टिः) धान्यानपा.
दिकानुकूला (जैत्रम् ) जयसामर्थ्यम् (बौद्भियम् ) आम्रादिवृक्षात्पत्तिः एते मम
यज्ञेन कल्पन्ताम् । [ यजु० १९९] ॥९॥
भापार्य-अन्न, प्रियसत्यवाक्य, दूध, दुग्धसार, घृत, शहत वा मधुर पदार्थ, पांचोंके
साथ एकत्र भोजन, बधुजनोंके साथ एकत्र पान कृषिद्धारा धान्यसिद्धि, धान्य उत्पन्न होनेकी
अनुकूल वृष्टि, जयकी सामर्थ्य और आम्रादिवृक्षोंकी उत्पत्ति, यह सब इस यज्ञके फलसे दे-
बता मेरे निमित्त प्रदान करें। ९ ॥
मन्त्रः।
रपिश्चरायश्चमेपुष्टश्चमपुष्टिश्चमेविमर्च
समभचमेपर्णश्चमेपूर्णतरञ्चमेकर्यवंचुमेक्षि
तंचमेनचुमेचमेथुज्ञेनकल्प्पन्ताम् ॥१०॥
अरविश्चेत्यस्य देवा ऋषयः । निच्यच्छकरी छन्दः । अग्निदेवता
वि० पू० ॥ १० ॥
प्रत्याय: ८.] भाष्यसहिता। भाष्यम्-( रविः) सुवर्णम् (रायः) मुक्तादिमणयः (पुष्टम् ) धनपोषः (पुष्टिः) शरीरपोषक: (विभुः) व्यातिसामर्थ्यम् (प्रभुः) ऐश्वर्यम् ( पूर्णम् ) धनपुत्रादि- बाहुल्यम् ( पूर्णवरम् ) अत्यंत पूर्णतरं गजतुरगादिवाहुल्यम् (कुयवम् ) कुत्सित. धान्यमपि (अक्षितम् ) क्षयहीन धान्यादि ( अन्नम् ) मोदनादि ( क्षुत् )भुक्ता- नपरिपाकः एते ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पन्ना भवन्तु । [ यजु० १८३१० ] ॥१०॥ भाषार्य-सुश्ण, मोती आदि, धनकी पुष्टि, शरीरकी पुष्टता, व्याप्तिसामर्थ्य, ऐश्वर्य वा प्रभुताकी सामर्थ्य, धनपुत्रादिकी बहुतायत, गनतुरंगमादिकी बहुतायत, निकृष्टया वा नि- कृष्टयवासे मिले व्रीहि मादि मन्न, क्षयहीन धान्यादि, चावल, भात अदि, और भोजन किये मनपाक, यह सब मेरे निमित्त इस यज्ञके फलसे देवता कल्पना करें ॥१०॥ छित्तीवेद्यञ्चमेभूतंचपेशवष्ण्र्चमेसु- गंचमेसुपुत्थ्यञ्चमाजुद्धशमुऽऋदिश्व में मुस्तञ्चमेकसिश्चये मुतिश्वमिसुमतिश्चले यु- ज्ञेनंकल्प्यन्ताम् ॥११॥ ॐ वित्तमित्यस्य देवाः। सुरिक्छकरी छन्दः । अग्निदेवता । वि० पू० ॥११॥ भाष्यमू-(वित्तम् ) पूर्वलब्धं धनम् (वद्यम् ) लब्धव्यम् (भृतम् ) पूर्वसिद्ध क्षेत्रादि (मादिप्यत् ) सम्पत्स्यमानं क्षेत्रादि ( सुगम् ) मुखेन गम्यते यत्र तत्सुगं सुगम्यो देशः (सुपथ्यम् ) शोभनं हितम् (ऋद्धम् ) समृद्धं यज्ञफलम् (ऋद्धिः) यज्ञादिसमृद्धिः (क्लप्तम् ) कार्यक्षेमें द्रव्यादि (क्लप्तिः) स्वकार्यसामर्थ्यम् (मतिः) पदार्थमात्रनिश्चयः (सुमतिः) दुर्घटकार्यादिपु निश्चयः एते (मे) मम (यज्ञेन कल्प- न्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [ यजु० १८।११ ॥ ११ ॥ मापार्य-पूर्वलब्ध धन, संपद्यमान धन, पूर्वसिद्ध क्षेत्रादि, मविष्यकालमें होनेवाले क्षेत्रादि सुखगम्य देश वा उखवोपकी सामर्थ्य, शोमनहित, समृद्धयनका फल, यज्ञादिकी समृद्धि, कार्यसाधक अपर्याप्त धन द्रव्य, स्वकार्यसाधनसामर्थ्य, पदार्थमात्रका निश्चय और दुर्घटका- यादिका निश्चय यह सा मेरे निमित्त इस यनके फलसे देवता प्रदान करें ।। ११ ॥
(११६) [अष्टमो- रुद्राष्टाध्यायी- मन्त्रः। बीहर्यश्वमेयाश्चमेमाषांश्चमेतिलाश्च मे मुद्गाश्चमेखल्ल्बाश्चमेप्रियवश्चमेणवश्व मेश्यामाकोश्चमेनीबाराश्वमेगाधमांश्च मे मुसरांश्चमेयुशेनकल्प्पन्ताम् ॥ १२॥ ॐ ब्रीय इत्यस्य देवा ऋषयः । भुरिगतिशकरी छन्दः । अग्नि- देवता । वि० पू० ॥ १२ ॥ भाष्यम्-(बीहयः) बीडयः (यवाः) यवाः (मापाः) मापा: (तिला) तिला (मुद्राः) मुगाः (खल्लाः) चणका लङ्गाश्च (प्रियंगवः) कंगवः प्रसिद्धाः (अणवः) चीनकाः (श्यामाका) तृणधान्यानि ग्राम्याणि कोद्रवत्वेन प्रसिद्धानि (नीवाराः) तृणधान्या. न्यरण्यानि (गोधूमाः) गोधूमाः (मसूराः) मसूराश्च एते धान्याविशेपाः (मे) मम (यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [ यजु० १८।१२ ] ॥ १२ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको व्रीहिधान्य प्रदान करें, इस यजके फलसे देवतालोग मुझको जौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको उडद प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तिल प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको भूग प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चना प्रदान करें, इस यज्ञके फल से देवता- लोग मुझको कंगनी प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चीनक दुल प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तृणधान्य श्यामाक प्रदान करें, इस यजके फलसे देवतालोग मुझको नीवार धान्य प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको गेहूँ प्रदान कर , इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मसूर प्रदान करें । १२ ॥ मन्त्रः। अम्मांचमुमृत्तिकाचमेगिरयश्चमेपर्वता- श्वमेसिकताश्वमेवनस्प्पतयश्चमे हिरण्य- चमेयश्चमेश्यामश्चमेलोहश्चमे सीसश्च मे पुंचमेयुज्ञेनकल्प्पन्ताम् ॥ १३॥.
ऽध्यायः ८.] भाष्यसहिता। (११७) ॐ अश्मेत्यस्य देवा ऋषयः। भुरिगतिशकरी छन्दः । अमि- दैवता । वि० पू० ॥१३॥ भाष्यम्-(अश्मा) पाषाणः (मृत्तिका ) प्रशस्ता मृत् (गिरयः ) क्षुद्रपर्वता: गोवईनार्बुदरैवतकादयः (पर्वताः) महान्तो मंदरहिमालयादयः (सिकताः) शर्कराः (वनस्पतयः) पुष्पं विना फलवन्तः पनसोदुम्बरादयः (हिरण्यम् ) सुवर्णम् रजवं का ( अयः) लोहम् ( श्यामम् ) ताम्रलोहम् (लोहम् ) लोई कालायसम् (सीसम् ) सीसं प्रसिद्धम् (प्रयु) रंगम् एते कार्यविशेषेषु (मे ) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् [ यजु० १८.१३ ] ॥ १३ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पाषाण प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देव- तालोग सझको श्रेष्ठ मृत्तिका प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको छोटे पति प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मन्दरादि बडे पर्वत प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको बालू प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वनस्पति प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सुवर्ण प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको लोहा प्रदान करे, इस यज्ञक फळसे देवतालोग मुझको नांवा प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको काखी प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सीसा प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको राँग प्रदान की मर्थात् मनुष्योंको इन वस्तुमासे कार्य कोशल करके अपनी उन्नति करनी चाहिये ॥ १३ ॥ मन्त्रः। अग्निश्चमुऽभापश्चमे वीरुधश्चमुऽओषधय- श्चमेकृष्टपुच्च्याच मेकृष्टपुच्च्याश्चमेग्राम्या- श्चमेपुशर्वआरण्ण्याश्चमे वित्तञ्चमेवित्तिश्च ममतञ्चमुभूतिश्चमेयुशेनकल्प्यन्ताम॥१४॥ ॐ अमिरित्यस्य देवा ऋषयः । निच्यदष्टिश्छन्दः । अग्निदेवता। वि० पू० ॥१४॥ भाष्यम्-(अग्निः ) पृथिवीस्थो वह्निः ( थापः ) अन्तरिक्षस्थानि जलानि (वीरुधः) गुल्माः ( बोषधयः ) फलपाकान्ताः (कृष्टपन्याः ) भूमिकर्षणबीजवा- पादिकमभिनिष्पाद्या ओषधयः (अकृष्टपच्याः ) स्वयमेवोत्पधमाना: नीवारगवेघु- कादयः (ग्राम्याः ) ग्रामे भवाः (पशवः) गोऽश्वमहिपाजाविमर्दभोष्ट्रादयः (भारण्याः) अरण्ये भवाः पशवः हस्तिसिंहशरभमृगगवयमर्कटादयः ( वित्तम् ) पूर्वलब्धमू ।
। (११८) रुद्राष्टाध्यायो- [ अष्टमा- (वित्तिः) भाविलामः (भूतम् ) जातपुत्रादिकम् (भृतिः ) ऐश्वर्य स्वार्जितम् । एतानि (यज्ञेन कल्पन्तान ) सम्पद्यन्ताम् [ यजु० १८११४ ] ॥ १४ ।। माषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अग्निकी अनुकूलता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको जलकी अनुकूलता प्रदान करें, इस यनके फलसे देवतालोग मुझको लता प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको फल पकनेतक रहनेवाली ओपधि प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको जोतने बोनेसे प्राप्त होनेवाली सोपधि प्रदान को, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको स्वय उत्पन्न होनेवाले नीवार गवेधुकादि प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको विटालादि प्रदान करें, इस यनके फलसे देवतालोग मुझको हाथी आदि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पूर्वसन्ध प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको होनहार छाम प्रदान करे, इस यनके फलसे देवतालोग प्रझको विद्यमान पुत्रादि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ऐश्वर्य प्रदान कर ॥ १४॥ मन्त्रः। वसुचमेवसतिश्लेकम्मर्मचमेशक्तिश्वमेयर मुपमश्वमऽहत्याचमगतिश्चमेवजेनकलप्प. न्ताम् ॥१५॥ ॐ वसुचेत्यस्य देवा ऋषयः। विराडा बृहती छं० । अग्निदेवता वि० पू० ॥ १५॥ भाष्यम्-(वसु ) धनं गवादिकम् (वसतिः) वासस्थानं गृहम् (कर्म ) अग्नि- होत्रादि (शक्तिः) तदनुष्ठानसामर्थ्यम् ( अर्थः ) अभिलषितः पदार्थः (एमः ) प्राप्तव्योऽर्थः (इत्या) मावे क्या अयनामिष्टप्राप्युपायः (गतिः ) इष्टप्राप्तिः एते (मे) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [यजु० १८.१५ ]॥ १५ ॥ माषार्थ-इस यज्ञके फलखे देवतालोग मुझको धन प्रदान करें, इस यज्ञके, फळसे देवता लोग मुझको वासस्थान (गृह) प्रदान कर, इस यज्ञके फल देवतालोग मुझको मग्नि होत्रादि प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको उसके अनुष्ठानकी सामर्थ्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अभिलषित पदार्थ प्रदान करें। इस यज्ञके फलसे देव- तालोग मुझको प्राप्तियोग्य अर्थ प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इष्ट प्राप्तिका उपाय प्रदान करें, इस वज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इष्टकी प्राप्ति प्रदान करें। ॥ १५ ॥ मन्त्रः। अग्निश्चमुऽइन्श्चमेसोमश्चमुइन्द्रश्चमेसवि- -
ऽध्यायः ८.]
माष्यसहिता।
(११९)
ताचमुऽइन्द्रश्चमेसरस्वतीचमुऽइन्द्रश्चमेपू-
पाचमुऽइन्द्रश्चमेबृहस्पतिश्चमऽइन्द्रश्चमेय-
शेनकल्प्पन्ताम् ॥१६॥
ॐ अग्निरित्यस्य देवा ऋषयः । नियूद्राह्मी पतिश्छन्दः ।।
गागिर्दैवता । वि० पू० ॥१६॥
भाष्यम्-अथार्धन्द्राणि जुहोति अर्धस्येन्द्रदेवत्यत्वादर्धस्य नानादेवत्यत्वात् ( अग्निः)
(इन्द्रः) (सोमः) (इन्द्रः) (सविता)(इन्द्रः) (सरस्वती ) ( इन्द्रः )
(पूषा) (इन्द्रः) (बृहस्पतिः) (इन्द्रः) एते प्रसिद्धाः देवताः । तैः समानमान-
वादिन्द्र एकैकया सह पठ्यते यास्कोक्ता इन्द्रशब्दस्य नानार्थाः कार्या एवमग्रेऽपि
कण्डिकाइये ज्ञातव्यम् । एते कल्पन्ताम् । यजु० १८.१६ ] ॥ १६ ॥
भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको भग्निकी अनुकूलता प्रदान करै, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको इन्द्रदेवकी अनुभूलता प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग
मुझको सोमदेवताकी अनुकूलता प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र
प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सविता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देव-
तालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सरस्वती (वाणी ) की
अनुकूलता प्रदान करै, इस यज्ञके फरसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करै, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको पूषादेवता प्रदान की, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र
प्रदान करें, इस यज्ञ के फलसे देवतालोग मुझको बृहस्पति प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे
देवतालोग मुझको इन्द्रकी अनुकूलता प्रदान करें ॥ १६ ॥
4
मन्त्रः।
मित्रमुऽइन्द्रश्यमेवरुणश्चमऽइन्वश्वमेधा-
ताचमुऽइन्द्रश्चमेत्त्वष्टाचमुऽइन्द्रश्चनेमुरुत-
श्चमुऽइन्द्रसमविश्वेचमेवाऽइन्द्रश्चमेबु-
शेनकल्प्यन्ताम् ॥ १७॥
ॐ मित्र इत्यस्य देवा ऋषयः। विराट् शकरी छन्दः । अग्निदेवता ।
वि० पू० ॥१७॥
(१२०) रुद्राथध्यायी- [मष्टमो-- भाष्यम्-(मित्रः) (वरुणः) (धाता) (त्वष्टा) (मरुतः) (विश्वेदेवाः ) प्रसिद्धाः । प्रत्येकामिन्द्रः । एते (मे) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् [ यजु० १८.१७ ] ॥ १७॥ भाषार्थ-मित्रदेवता, इन्द्र, वरुण, इन्द्र, धाता, इन्द्र, त्वष्टा, इन्द्र, मरुत, इन्द्र, 'विश्वेदेवा. देवता और इन्द्रकी मनुस्ता यह सव इस यज्ञके फलसे देतालोग मुझको प्रदान करें॥१७॥ मन्त्रः। पधिवीचमऽइन्द्रश्वमेन्तरिक्षञ्चमऽइन्द्रश्चमे चौसमऽइन्द्रश्चमेसमांश्चमुऽइन्द्रश्चमे नक्ष- त्राणिचमुऽइन्द्रश्वमेदिशश्चमऽइन्द्रश्चमेघुज्ञे- नकल्प्पन्ताम् ॥१८॥ ॐ पृथिवी चेत्यस्य देवा ऋषयः । भुरिकछवरी छं० । अग्नि- देवता । वि० पू० ॥१८॥ भाष्यम्-(पृथिवी ) पृथिवी ( अन्तारक्षम् ) मन्तरिक्षम् (यौः ) दिवबैलोक्यम् (समाः) वषाधिष्ठात्र्यो देवताः (नक्षत्राणे ) अभिन्यादीनि (दिशः) प्रागाद्याः एते (मे) मम ( यज्ञन कलान्ताम) सम्पद्यन्ताम् । [यजु० १८.१८ ॥ १८॥ भाषार्थ-इस यज्ञक फलसे देवतालाग मुझको पृथिवी प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता. लोग मुझको इन्द्र प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अन्तरिक्षलोक प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको द्यौ प्रदान को, इस यज्ञके फल देवतालोग मुझका इन्द्र प्रदान करें, इस यनके फलस देवतालोग मुझको वर्षाके अधिष्ठात् देवता प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको नक्षत्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको दिक् प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इन्द्र ऐश्वर्य प्रदान करें । १८ ॥ मन्त्रः। अशुश्चमेरुम्मिश्चमेदाक्यश्चमेधिपति- श्चमउपाशुश्चमेन्तव्यमिश्र्चऽऐन्द्रवायुव- श्वमे मैत्रावरुणश्चम आश्चिनश्चमे
अध्यायः ८.]
माझ्यसहिता।
(१२१)
प्रतिप्फुस्थानश्चमेशुक्रश्श्चमेमुन्धीचमेय
ज्ञेनकल्प्पन्ताम् ॥१९॥
ॐ अंशुरित्यस्य देवा ऋषयः । निच्युदत्यष्टिइछंदः । अग्नि-
वता । वि० पू० ॥ १९ ॥
भाष्यम्-अथ ग्रहान् जुहोति, अश्वादयः सोमप्रहविशेषाः सोमप्रकरणे प्रसिद्धाः ।
(अंशुः) ( रश्मिः) (पदाभ्यः ) अदाभ्यस्यैव गृह्यमाणत्वदशायां पृथक्कृत्य ग्रहणे
रश्मिशब्देन निर्देशः । मीना तदहणे साधनत्वात् अह्नो रूपे सूर्यस्य रश्मिषु इति
८१४८ मंत्रलिंगात् ( अधिपतिः ) अधिपतिशब्देन निग्राह्यो विशक्षितः तस्य ज्येष्ठत्वा-
दाधिपत्यन् । 'ज्येष्ठो वा एष ग्रहाणाम्' इति श्रुतेः। (उपांशु ) ( अन्तर्यमः
(ऐन्द्रनायवः) (मैत्रावरुणः ) आश्विनः ( प्रतिप्रस्थानः ) प्रतिप्रस्थानशब्देन
निग्राह्यो विवक्षितः (शुक्रः) (मन्थी ) एते प्रसिद्धाः ग्रहाः (मे ) मम ( यज्ञेन )
(कल्पन्ताम् ) क्लप्ता भवन्तु । [ यजु० १८.१९ ] ॥ १९ ॥
भापार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अशु प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देव-
तालोग मुझको ररिम प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अदाभ्य प्रदान करें. इस
यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको निग्राह्य प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको
उपांशु प्रदान करे, इस यज्ञके फळसे देवतालोग मुझको अन्तर्याम प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको ऐन्द्रयायव ग्रह प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देताळोग मुझको
मैत्रावरुण प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको आधिन प्रदान करें, इस यज्ञके
फलसे देवतालोग मुझको प्रतिप्रस्यान प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शुक्र
प्रदान करें। इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको मथीग्रह प्रदान कैर, यह सव यज्ञके ग्रह-
पात्र हैं इनकी प्राप्ति यज्ञ करनेकी सामर्थ्य है ॥ १९॥
मन्त्रः।
आग्रयणश्चमेक्वैश्वदेवश्चमेध्रुवश्चमेवैश्वा
नुरश्चमऽऐन्द्रग्निश्चमे मुहावैश्वदेवश्चमे
मरुत्वतीयांश्चमेनिष्कैवल्यश्चमेसावित्र-
श्चमेसारस्वतश्वभपात्नीवृतश्चमे हारि-
योजुनश्चमेयुज्ञेनकलप्पन्ताम् ॥२०॥
(१२२) रुद्राष्टाध्यायी- [अष्टमो- ॐ आग्रयण इत्यस्य देवा ऋषयः । निच्युदत्यष्टिइछन्दः । अग्निदेवता । वि० पू० ॥२०॥ भाष्यम्-( आग्रयणः ) (वैश्वदेवः) मातासवनगतः आयो वैश्वदेवः ( ध्रुवः ) ध्रुवनामा ग्रहः (वैश्वानरः) (ऐन्द्रामः) (महावैश्वदेवः ) तृतीयसवनगतः ( मरुत्व. तीयाः) महामरुत्वतीयाः (निष्केवल्यः) ( सावित्रः) (सारस्वतः ) अभिषेचनीये सरस्वतीनामपां ग्रहणमेव सारस्वतों अहः सारस्वतं ग्रहं गृह्णातीति तत्राम्नानाद ( पाक्नोवतः ) ( हारियोजनः ) एते मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) । [ यजु०१८।२०] ॥ २० ॥ माषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालीम मुझको माययण ग्रह प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वैश्वदेव प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ध्रुव- ग्रह प्रदान करें, इस यजके फलो देवतालेग मुझको वैश्वानर प्रदान करें, इस यज्ञकै फलसे देवतालोग मुझको ऐन्द्राग्न प्रदान करै, इस यजके फलसे देवतालोग मुझको वश्वदेव प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको महत्वतीय प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देव- तालोग मुझको निष्कैवल्य प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवताळोग मुझको सावित्र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सारस्वत ग्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देव तालोग मुझको पाकीवत ग्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फरसे देवतालोग मुझको हारियोजन ग्रह प्रदान करें ॥२०॥ मन्त्रः जुर्चश्वमेचमुसाश्चमहायुझ्यानिचारे हो- णकलुशवसेन्यावाणश्चमेधिषवणचमे पतमञ्चमऽआघवनीश्वमेवेदिश्चमे बहि श्वमेवभूयश्चमेस्वागाकारश्र्चमेयुज्ञेनक- ल्प्यन्ताम्॥२१॥ *मुच इत्यस्य देवा ऋषयः । विराट् धतिश्छंदः । अग्निदेवता। वि० पू०॥२१॥ माण्यम्-(सूचः) जुबादयः (चमसाः) चमसानि ग्रहपात्राण (वायव्यानि पात्रविशेषाः (द्रोणकलशः) (ग्रावाणः) (बाधिपवणे) काष्ठफलके ( पूतभृत् ) (आधवनीयः ) द्वौ सोमपात्रविशेषौ (वेदिः) (बहिः) (अवभृथः) (स्वगाकार) ऽध्यायः८.] भाष्यसहिता । (१२३) शम्युवाकः तेन यथास्वं देवतानां हविरंगीकारात् । एते (मे ) मम ( यज्ञेन कल्प. न्ताम् ) सम्पयन्ताम् । [ यजु० १८२१] ॥ २१ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको र प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवता- लोग मुझको चमस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वायव्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको द्रोणकलश प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ग्रावा प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अधिषवण प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझका पूतभूत प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको माधवनीय प्रदान करे, इस यज्ञके फलस दवतालोग मुझको वेदि प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वर्हि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अवभृथ प्रदान्त करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शम्युयाकनाम पात्र प्रदान करै ॥ २१ ॥ अग्निश्चमे घुमश्चमेकश्चमे सूख्यश्च मे प्प्राणश्चमेश्वमेधश्चमेपृथिवीचमेदितिश्च मेदितिश्चमेघौश्वभेङ्गुलयर शकरयोदिश श्वमेयुज्ञेनकल्प्पन्ताम् ॥ २२॥ ॐ अगिरित्यस्य देवता ऋषयः । भुरिक्छकरी छन्दः । अग्नि- दैवता । वि० पू० ॥२२॥ माष्यम्-कण्डिकाये यज्ञक्रतुहोमः । अर्थतान्यज्ञक्रतुञ्जुहोत्यनिश्च म इति ९।३। ३३१ श्रुतेः । (अनिः) चीयमानो वहिराग्नेष्टोमो वा (धर्मः) प्रवर्यः (अकः ) इन्दायार्कवते पुरोडाशमिति विहितो यागेोऽकी (सूर्यः) सौर्य चमिति विहितः सूर्यः (प्राणः) गवामयनम् ( अवमेधः ) प्रसिद्धः (पृथिवी ) पृथिवी (दितिः) (अदितिः) भादीना देवमाता ( द्यौः ) दिवः एते देवविशेषाः ( अगुल्यः ) विरात्पुरुपावयवाः (शक्करयः) शक्तयः ( दिशः ) प्राच्याघाः ( मे ) मम ( यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ) [ यजु० १९।२२] ॥ २२ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चीयमान अग्नि वा भग्निष्टोम प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको प्रवर्य प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पुरोडाशसंबंधी यज्ञ प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सूर्यसंबंधी चरु प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको प्राण ( गवामयनसत्र) प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको अश्वमेध यज्ञ प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पृथिवी प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको दिति प्रदान करै, इस ८ (१२४) रुद्राष्टाध्यायी- [अष्टमो-- -यजके फलसे देवतालोग मुझको मदिति प्रदान करें, इस यनके फलसे देवतालोग मुझको शुलोक प्रदान करें, इस यजके फलसे देवतालोग मुझको अलि प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शक्तियें प्रदान करें, इस यजके फलसे देवतालोग मुझको प्राची -आदि दिशाओंकी अनुकूलता प्रदान करें ॥ २२ ॥ मन्त्रः। चुतचमऽऋतवश्चमे तपश्चमेसंवत्सुरश्च मे होरात्रेऽव॑ष्टीवेहवयन्तुरेचमे युजेनक- ल्प्यन्ताम् ॥ २३॥ ॐव्रतमित्यस्य देवा ऋषयः । पश्छिन्द । अग्निदेवता । वि० पू० ॥२३॥ भाष्यम्-(व्रतम् ) नियमः (ऋतवः) वसन्तादयः (तपः ) कृच्छ्रचान्द्राय- गादि (संवत्सरः) प्रभवादिः ( अहोरात्रे ) दिननिशे ( उर्वष्ठावे ) अरू चाष्टी- वन्तौ जानुनी च ऊर्वष्ठीवे अवयवविशेषौ (वृहद्रयन्तरे ) एतन्नामके सामनी ( मे ) मम ( यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पयन्ताम् । [ यजु० १८।२३ ] ॥ २३ ॥ भावार्य-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शरीरके नियम प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वसन्तआदि ऋतु प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तप (कृच्छ्रचान्द्रायण आदि) प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको संवत्सर प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको उरु और जानु प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको बृहद्रथन्तर साम प्रदान करै ॥ २३ ॥ मन्त्रः। एकाचमतिश्चमेतिखश्चमपञ्चचमपञ्च चमेसुप्तचमेसुप्तचमुनवंचमेनवचमुऽए कादशचमुऽएकादशचमे त्रयोदशचमेत्र योदशचमेपञ्चदशचमेपञ्चदशचमेसुप्तद शचमेसुप्सदेशचमेनवदशचमेनबंदशचम प ऽध्यायः ८.] माष्यसहिता। (१२५) एकविशतिश्चम एकविठशतिश्चमे त्र- यौविशतिश्वमुत्रयोविठशतिश्चमे पञ्च विठशतिश्चमेपञ्चविशतिश्चमेसप्तवि शतिश्चमेसुप्तविशतिश्चमुनवविठश- तिश्चमे नवविठ्शतिश्चमऽएकत्रिशच मुऽएकविशिचमेवयासर्वशचमे घुज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥२४॥ * एकाचेत्यस्य देवा ऋषयः । पूर्वार्द्धस्य संकृतिश्छन्दः शेषस्या विराट्रसंकृतिः। अग्निदेवता । वि० पू० ॥ २४ ॥ भाष्यम्-अयुग्मस्तोमहोमार्था मन्त्राः, अथायुजस्तोमान् जुहोतीति ९ । ३।३।२ श्रुतेः । एकामादाय द्वितीयां विहाय तृतीयामादाय चतुर्थी बिहाय परित्यक्तसमसंख्याके नातविषमसंख्याकेन मन्त्रेणायुग्मान् स्तोमान् जुहुयादित्यर्थः । मादरातिशयद्योतनार्थी सर्वत्र पुनरुक्तिः । अयुग्मस्तोमहामः सर्वकामावाप्तिः । तथा च श्रुतिः-"एतद्वै देवाः सर्वान्कामानाप्ता युग्मिः स्तोमैः स्वर्ग लोकमायंस्तथैवैतद्यजमानः सर्वान्कामानाप्ता युग्मि: स्तोमः स्वर्ग लोकमत" इत्यादि । एका व मेति सुगमम् । [यजु० १८।२४]॥२४॥ भापार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको एक प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवताला मुझको तीन प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पाँच प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सात प्रदान करें, इस यज्ञके फउसे देवतालोग मुझको नौ प्रदान कैर, इस यज्ञके फळसे देताळोग मुझको ग्यारह प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवताकोग मुझको तेरह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पद्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सत्रह प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको उन्नीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको इक्कीस प्रदान करें। इस यज्ञके फळसे देवतालोग मुझको तेईस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको पच्चीस प्रदान करें, इस यज्ञकं फलसे देवतालोग मुझको सत्ताईस प्रदान करै, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको उन्तीस करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको एकतीस प्रदान करें, इस यज्ञके फल से देवतालोग मुझको तेतीस प्रदान करे ॥ २४ ॥ विशेष-स मत्रमें गणितविद्या मी कथन की है यन धातुका संगतिकरण अर्थ होने किसी सख्याका जोडदेना और दान अर्थसे व्यय करदेना है कारण गुणन भाग वर्ग घन मूल
(१२६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[अष्टमो-
आदि यह सब इसीके अन्तर्गत होते है, संख्याके जोडनेको योग जैसे ५+५=१० मार
अनेकबार एकसी सख्याकै जोडनेको गुणन करते है जैसे ४ ४ ५-२० चारको पाँच स्थानमें
जोडनेसे बीस होते हैं, चारको चौगुना किया तो चारके वर्ग सोलह हुए इसी प्रकार अन्तरसे
भाग वर्ग मूल धन आदि निप्पन्न होते हैं, तो संख्या बुद्धिमानोंको यथायोग्य जाननी उचित
है । मूलमात्र दिखलाया है। अङ्कगणित वीजगणित आदि सब सख्याएँ इसमे उत्पन्न
होती है ॥२४॥
मन्त्रः।
चखश्चमेष्टीचमष्टीचमेद्वादशचमे द्वादश
चमेषोर्डशचमेषोडशचमविशुतिश्चमेखि
ठंशतिश्चमुच विठशतिश्च मेचतुविठश
तिश्चमेष्टाविठशतिश्चमेऽष्टाविठशतिश्चमे
हाजिशवमेदाविठयाचमुषत्रिशचमे षड़
विठशचमेचत्वारिशर्चमे चत्वारि शर्चमे
चतुश्चत्वारिशचनुचतुश्चत्वारिठशचमेष्टा
चत्वारिठशवमयुशेनकल्प्यन्ताम् ॥ २५ ॥
ॐ चतनन्धेत्यस्य देवा ऋषयः । उत्कृतिश्छन्दः । अग्निदेवता ।
वि ० पू० ॥ २५॥
भाष्यम्-एककण्डिकया युग्मस्तोमान् जुहोति । अथ युग्मतो जुहोति चततश्च म
इति ९ । ३।३। ४ तत्सल स्वर्गमाप्तिः । एवंदै छन्दास्यद्वन् यातयामा वा अयुः
जस्तोमायुग्ममियर्टस्तोमैः स्वर्ग लोकमयामेति तयेतद्यजमानो युग्ममिस्तोमैः स्वर्ग
लोकमोत" इति श्रुतेः । पूर्वपूर्वमुत्तरेण सम्वन्धेनातिवृक्षारोहणवत तथा च श्रुतिः "पूर्व-
पूर्वमुत्तरेणोत्तरेण मंयुनक्तिः यथा वृक्षं रोहन्नुत्तरामुत्तराशाखासमालम्भरोदत्ताह-
तात्" इति । अत्रोक्ता संख्या संख्येयनिष्ठा । एते यज्ञेन कल्पन्ताम् । [ यजु० १८ ।
२५ ] ॥२५॥
ऽध्यायः ८.] माष्यसहिता। (१२७) भापार्य-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चारसंख्याका स्तोम प्रदान कर, इस यज्ञके फक्से देवतालोक मुझको आठ प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको वारह प्रदान करे, इस यसके फलसे देवतालोग मुझको सोलह प्रदान कर, इस यज्ञके फलो देवतालोग मुझको वीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चौबीस प्रदान करें, इस यज्ञके फरसे देवतालोग मुझको माईस प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको बत्तीस प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको छत्तीस प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देव- तालोग मुझको चालीस प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चावालीस प्रदान कन, इस यज्ञके फलसे देवताठोग मुझको अडतालोस प्रदान कर * ॥ २५ ॥ ज्यविश्चमेव्युवीचमेहित्यवाटचमेबित्यो- हीचमेपञ्चाविश्चमेपञ्चावचिमेनियरखाच पत्रिवत्सार्चपेतुर्युवाचमेतुष्य हीचने युज्ञेर्नकलप्पन्ताम् ॥२६॥ ॐ त्र्यविश्चेत्यस्य देवा ऋषयः । ब्राह्मी वृहती छन्दः । अग्निदेवता । वि० पू० ॥ २६ ॥ माप्यम्-काण्डकाव्यं क्योहामे विनियुक्तम् । तथा च श्रुतिः अथवयाऽसि जुहोति व्यश्चि म हात पशवो वे क्यासि पराभग्वनमेतदन्तेन मीणात्ययो पसुमिरेवेनमेतद. नेगामिपिञ्चति' इति । बामपणमासात्मक काळ (व्यविः) त्रयोऽयो यस्य व्यविः सार्वसंवत्सरो वृषः तादृशी गौः (व्यवी) (दित्यवाट् ) दिसंवत्सरो वृषो दित्यवाट् तादृशी गौः (दित्यौही ) ( पञ्चाविः) पञ्चावयो यस्य सः पञ्चावि । साद्रिमंवत्सरो वृपः (पञ्चावी) ताशी गीः (त्रिवत्सः ) यो वत्सा यस्य सः त्रिवत्सः त्रिवर्षी वृषः (त्रिवत्सा ) तादृशी गौः (तुर्यवाटू) सार्धत्रिवर्षो वृषः (तुर्थीही) तादृशो गीः एते (मे) मम (यज्ञेन कल्पन्ताम् ) सम्पद्यन्ताम् । [ यजु० १८।२६ ] ॥२६ ॥ मापार्य-इस यजके फलसे देवतालोग मुझको डेढवर्षकी मायुका बछडा प्रदान करें, इस यनके फलसे देवतालोग मुझको डेढवर्षको आयुकी वछिया प्रदान करे, इस यज्ञके फलसे देव- एक दो तीन चारसे इस वातका भाव भी सूचित होता है कि, एकासे वही एक अद्वि- तीया ब्रह्मशक्ति, दोसे दो सुपर्ण, तीनसे वेदत्रयी वा तीन काल, चारसे चार वेद, पांचसे पांच चाण, उसे छः मनु, सातसे सात सागर, आठसे आठ दिशा वा माठ लोकपाल वा आठ बल्ल लेन, नौसे अंक भी इसी प्रकार आगे जानना ।
[ अष्टमो- (१२८) रुद्राष्टाध्यायी- तालोग मुझको दो वर्षका वृक्ष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको दो वर्षकी गौ प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ढाई वर्षका वृष प्रदान कर इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको ढाई वर्षकी गौ प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको तीन वर्षका वृष प्रदान कर, इस यजके फलसे देवतालोग मुझको तीन वर्षकी गाय प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको साढे तीन वर्षका वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको साढे तीन वर्षकी गौ प्रदान कर ॥ २६ ॥ मन्त्रः। पुष्टुवाट्चमेपष्ठीहीचमऽनक्षाचमेवशाचम ऽऋषभश्चमेजेहाचमेनडाँचमेधेनश्चमवज्ञेनं कल्प्पन्ताम् ॥२७॥ * पष्ठवाडित्यस्य देवा ऋषयः । निच्यद्बायुष्णिक् छन्दः । आनिर्देवता । वि० पू०॥२७॥ माध्यम्-(पष्ठबाट् ) पष्ठं वर्षचतुष्कं वहतीति पष्ठवाट चतुर्वर्षों वृषः (पष्टीही) वादृशी गौः (उक्षा) सेवनक्षमो वृषः (वशा) वन्ध्या गौः (ऋषभः) अतियुवा वृषः (बेहत) गर्भघातिनी गौः (अनड्डान् ) अनः शकटं वहतीत्यनड्वान् शकटवाहनक्षमो वृषः (धेनुः ) नवप्रसूता गौः एते (मे) मम (योन कल्पन्ताम् ) स्वस्वव्यापार- समर्था भवन्तु । यद्वा एते यज्ञेन मम कल्पन्ताम् । मह्यमुपभोगक्षमा भवन्त्वित्ययः । एवं पूर्वत्र । [ यजु० १८ । २७ ] ॥ २७ ॥ भाषार्थ-इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चार वर्षका वृष प्रदान कर, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको चार वर्षकी गौ प्रदान करें, इस.यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको सेचनसमर्थ वृष मदान करें, इस यज्ञके फरसे देवतालोग मुझको बन्ध्या गौ प्रदान करें, इस यज्ञक्के फलसे देवतालोग मुझको अतियुवा वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको गर्भपातिनी गो प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको शकट (छकडा) वहन परनेमें समर्थ वृष प्रदान करें, इस यज्ञके फलसे देवतालोग मुझको नवप्रसूता गौ प्रदान करें, वह सब यजक्के संपादनके निमित्त हैं ॥ २७॥ - बाजायुस्वाहाप्रसुवायु स्वाहापिजाय स्वाहाकतबुस्वाहावसवस्वाहाहर्पतये ऽध्यायः ८.] माध्यसहिता। (१२९) स्वाहाङेमुग्धायुक्त्वाहामग्घार्यवैनऊशि नायु स्वाहां बिनुर्छशिन आन्त्यायुनायु स्वाहान्यायभौवनायुस्वाहामुवनस्युपत येस्वाहाधिपतये स्वाहाप्पुजापतये स्वा- हां ॥ हुयन्तुराणिम्मुत्रार्ययुन्तासियमनऽ कुन्नत्वावृष्टय त्वा जानान्त्याधिपत्या- य॥२८॥ ॐ वाजायेत्यस्य देवा ऋषयः । पूर्वार्द्रस्याची बृहती छं० । आग्नि- देवता । वि० पू० ॥२८॥ भाष्यम्-पथ नामग्राहहोमः । तथा च श्रुतिः-[ अथ नामग्राई जुहोति वाजाय. स्वाहेत्येत देवाः सर्वान्कामानास्वाथैतमेव प्रत्यक्ष प्रोणातीति ९।३।३।८ ] ( वाजाय) चाजोऽनं तस्मै (स्वाहा ) स्वाहा वाजादीनि चैत्रादिमासानां नामानि तन्नाम गृहीत्वा होतव्यमित्यर्थः । अन्नप्राचुर्याच्चैत्रोऽमनरूपः । ( प्रसवाय ) अनुज्ञारूपाय जलक्री- सदा अभ्यनुजादानात्प्रसवो वैशाखः तस्मै० (अपिजाय) अप्सु जायतऽइत्यपिजः जलक्रीडारतत्वादपिजो ज्यष्ठः तस्मै० । (क्रतवे ) यागरूपाय चातुमास्यादियागप्राचु- यति ऋतुरापाढ तस्मैः । ( वसवे ) वासयति वसुः चातुर्मास्ये यात्रानिषेधा- नमः श्रावणः । ( अहर्पतये) दिनस्वामिने सूर्यरूपाय तापकरत्वाभाद्रपदस्थाहपतित्व तस्मै० । ( मुग्धाय ) अढे तुषारादिना मोहरूपाय दिवसाय तुषारबाहुल्यान्मुग्धमह आश्विनः । (अमुग्धाय वैन शिनाय ) विनश्यतीति विनंशी विनश्येव वैनंशिनः स्वा थकोऽण अल्पघटिकावत्वेन विनाशशीलाय कार्तिकाय स्नाननियमादिना पापनाशक- वादमुग्धाय मोहनिवर्तकाय कार्तिकाय० (अविनशिने आन्त्यायनाय) न विनश्यती- त्यविनंशी तस्मै विनाशरहिताय अन्ते सर्वेषां नाशे भवमन्त्यं तदयनं चेत्यत्यायनी तत्रभवः मान्न्यायनस्तस्मै । सर्वनाशेऽप्यवशिष्टायात एवाविनाशिने विष्णुरूपायामार्ग शोपाय " मासानां मार्गशीर्षास्मीति । भगवनी० १०॥३५ "। ( आन्त्यायय मौवनाय ) भुवनानामयं भौवनः अन्ते स्वरूपे भव मान्त्यस्तस्मै । लोकस्वरूपपुष्टि करत्वात्तत्र भवत् जाठराग्नीप्तिकरत्वेन पुष्टिकरवं पौषस्य । ( भुवनस्पतये ) भूतना- ९ (१६०) रुद्राष्टाध्यायी- [अष्टमी तस्य पालकाय भाशय स्नानादिना पुण्यजनकत्वेन पालकत्वं माघस्य (अधिपतये । अधिकपाकाय फलानाय वान्तवा (प्रजापनये ) द्वादशमासाधिष्टाने मजापति लामकाय देवाय (स्वाहा) सुहुनमस्तु । हे (इयम् ) ( ते ) तब (राह ) राज्यम् । यत्र यागाः क्रियन्ते तत्त्व राज्यम् । किश्च-हे पन त्वं (मिनाय) मित्रस्य सस्युर्यजमानस्य (यन्ता) नियामशः ( बसि ) असि । पाठ्यर्य चतुर्या मित्रायेति । तथा त्वम् (यमनः) यमयतीति यमनः अग्निष्टोमादिकर्मा सान्नियमयन् मतः (अ) विशिष्टान्नसाय (वा) त्यामभिपिञ्चामीति शेपः । तया (पृष्टय) वर्षणाय (ला) स्वामनुभिपिश्चामीति । तथा ( प्रजानामाधिपत्याय ) मनास्वामित्वाप्ये त्वाममिषि- चामि वसोरिया "प्रजानामाधिपत्यायेत्पन्न वा उननं पृष्टिग्न्नेनैवनमेतमीणाति " क्षति ९।३।३ । १०-११\" । [यजु० १८१२८]। २८ ॥ मापार्य-चैत्रमासके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, वैशाखके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, ज्येष्टके नि- मित्त श्रेष्ठ होम को मापाटके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, श्रावणके निमित्त श्रेष्ठ होम हमाद्र पदके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, आश्विनके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, फातिकके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, मार्गशीर्षके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, पापके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, मारके निमित्त श्रेट होम हो, फाल्गुनके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, संवत्सर के निमित्त श्रेष्ठ होम हो, मुश्नपरिक निमित्त श्रेष्ठ होम हो, अधिपतिके निमित्त श्रेष्ठ होम हो, हादश महीनोंके अधिष्ठावान अनापति के निमित्त श्रेष्ठ होम हो, हे प्रजापते यह तुम्हारा राज्य हे जयात् जहाँ या होता वह सब तुम्हारा ही राज्य है, अग्निष्टोमादिकमीम सबके नियन्ता तुम सखारूप इस यनमा लके नियामक हो विशिष्ट मन्नरसके निमित्त तुमको वसुधारास सिंचित करत हूं अतिदानसे मच्छी पोती। प्रनाम सामित्वप्राप्ति के निमित्त वसुधारासे तमोभभि- ऐक करताहूं ॥ २८॥ "मग्निम आयुर्पोनकरूप्पताप्पाणीपुझेनंकल्प साञ्चक्षुर्घशेनकलप्पतालोन बुज्ञेनक কম্বল অঙ্কবাদঘলীলক प्पयामात्वमायुझन कल्पताम्बुलायुज्ञेन कल्प्पयायोनियुज्ञेन कल्पना स्वयं शेनकल्प्यता पृष्ठंब्युशेन लप्पताधुज्ञोयु ध्याय: ८.] माष्यसहिता । (१३१) शेनकलप्पताम् ॥ स्तोश्रुवर्जुऽश्चु अक् चुसामन्चबहाव रयन्तुरञ्च । वहुँवाऽअर्ग- न्मामृतोऽअश्मयुजातिहणजाऽश्रमामुलेट स्वाहा ॥२९॥ इतिसहितायांपाठेऽष्टमोऽध्यायः॥८॥ ॐ आयुरित्यस्य देवा ऋषयः । विराट् विष्ठतिश्छन्दः । अग्नि- देवता । वि० पू० ॥२९॥ भाष्यम्-कल्पहोमः कल्पतामिति लिङ्गगद । अथ कल्पाञ्जुहोति ९।६।३।१२। ] ( यज्ञेन ) निमित्तेन (मायुः) जीवनकाल ( कल्पताम् ) साध्यतां प्राप्यताम् (यत्नेन) निमितेन (प्राणः) प्राणः ( कल्पताम् ) साध्यताम् ( यज्ञेन ) निमित्तेन (चक्षुः) चक्षुः (कल्लताम ) साध्यताम् ( यज्ञेन ) निमित्तेन (श्रोत्रम् ) श्रोत्रम् (कल्पताम) साध्यताम् ( यज्ञन ) निमित्तेन (वाक्) वाक् ( कल्पताम् ) साध्यताप्न (यज्ञेन) निमित्तेन (मनः) मनः (कल्पताम्) प्राप्यताम् ( यज्ञेन ) निमित्तेन ( आत्मा ) देहः "आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तत्याहुमनीषिणः" । इति स्मृतः । ( यज्ञेन ) निमित्तेन (ब्रह्मा) वे: (करसताम् ) साध्यताम् (ज्योतिः ) स्वयंप्रकाशः परमात्मा ( यज्ञेन) निमित्तेन (कल्पतार) साध्यताम् । पुण्यकर्मानुष्ठानं परमात्मज्ञाने कारणम् । (:) सर्गः ( यज्ञ न कल्पनाम् ) साध्यताम् (पृटम् ) वर्गस्थानं स्तोत्रं वा ( यजेन कल्पनाम ) यज्ञेन साध्यताम् (यज्ञः) (यज्ञेन ) ( कल्पताम् ) यज्ञो सोने लुप्तो भक्तु " यज्ञेन यज्ञमयजन्न देवाः" इति श्रुतेः । (स्तोमम् ) स्तोमस्त्रिवृत्पञ्चदशादि (यजु०) अ. नियतपादो मंत्रः (ऋक् ) नियतपादा ( साम) गीतिपधानम् (बृहद्रथन्तरः ) - द्रयन्तरे तद्विशेपी व सोधारयै नमग्निमभिषिच्यात्मानं यजमानः प्रशंमति, क्यं यजमाना: (देवाः) देश भूता (स्था) स्वर्गम् ( अगन्ध ) गतवन्तः गा च (अमृताः) अमरणधर्मिणः (अभूम) अभूम (प्रजापतेः) हिरण्यगर्भस्य (प्रजाः) प्रजाः (अभूम) अभूमेति फलवचनम् । अनेन वसोर्धारायाः सर्वकामप्राप्तहतुत्वमुक्तम् । (वेट् स्वाहा). बसोध/राहोमार्थों मंत्री वेडिति वषट्कारः । “वषट्कारो देष परोक्षं यरेट्कारोवषट्कारणं (१३२) रुद्राष्टाध्यायी- [ नवमो- वा वै स्वाहाकारेण वा देवेभ्योऽन्नं प्रदीयत" इति ९।३।३।१४ श्रुतेः इति वसोधीराहो- ममन्त्राः समाप्ताः । [यजु:०१८।२९ ] ॥२९॥ माषार्थ-इस यज्ञके मसादसे मायुकी वृद्धि हो, यज्ञके प्रसादसे प्राण रोगरहित होकर पलिट- हों, इस यज्ञके प्रसादसे नेत्र इन्द्रिय उत्कृष्टताको प्राप्त हो, इस यज्ञके प्रसादसे श्रोत्रहन्द्रियकी श्रेष्ठता सिद्ध हो, इस यज्ञके प्रसादसे वागिन्द्रियकी श्रेष्ठता सिद्ध हो. इस यज्ञके प्रमादसे मनकी स्वस्थता हो, इस यज्ञके प्रसाद आत्मा प्रसन्न हो, इस यज्ञके प्रसादसे ब्रह्म प्रसन्न हो, इस यज्ञके प्रसादसे ज्योति प्राप्त हो, इस यजके प्रसादसे सुख प्राप्त हो, इस यनके प्रसादसे पामसुख प्राप्त हो, इस यज्ञके प्रसादसे महायज करनेशी सामर्थ्य प्राप्त हो, इस यज्ञके प्रमा- दसे स्तोम यजु अक्.साम वृहत् और स्यन्तर साम यह सबही प्रसन्न हो, इस यज्ञके प्रसा- दसे हम स्वर्गीय देवत्व प्राप्त करने तथा अमर होने में समर्थ हो, इस यनके प्रसादसे हम हिरण्यगर्भ प्रजापतिकी प्रियतम प्रजा होसकै । कयन किये हुए समस्त देवताओंकी प्राप्तिके निमित्त ही यह वसोर्धारा हवन आहुत हुमा यह समस्त माहुतियां भली प्रकार गृहीत हो।॥१२॥ विशेष-यज्ञ और उसका साधन तथा प्राणियोको जो कुछ माश्यकता होती है उसका वर्णन इन मत्रोंमें कियागयाहै यज्ञके फलसे यह ऊपर कही ३४७ वस्तु सम्मन होसफ्ताह यह सब कुछ यज्ञके निमित्त ही सम्पादन हो । मनुष्यका सर्वस्व ईश्वरका है और यज्ञसे सब कुछ प्राप्त होसकता है इस कारण यज्ञके निमित्त सय सम्पन्न हो यही प्रार्थना है ॥ २१ ॥ इति श्रे,रुद्रारक पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसस्कृतार्यभाषाभाष्यसमन्वितोऽटमोऽध्यायः८ अथ नवमोऽध्यायः। - ॥हरिः ॐ ॥ ऋचं बाचुम्नपंखे मनोयजु पर्पधेसामप्माणमपयेदार श्रीब्रुभपये। बागोज-सुहौजोमयिष्याणागुनौ॥१॥ ॐऋचं वाचमित्यस्य दधीच ऋषिः। जगती छन्दः । लिङ्गोक्ता देवता । शान्तिपाठे विनियोगः ॥३॥ भाष्यमू-(ऋचसू) ऋग्रूपाम् (वाचम् ) वाचम् ( प्रपये) प्रविशामि शरणं व्रजामि ( यजुः) यजूरूपम् (मनः) मनः (प्रपये) प्रविशामि (प्राणम् ) प्राण- रूपम् ( साम) साम (प्रपये) प्रविशामि ( चक्षुः) चक्षुरिन्द्रियम् (श्रोत्रम् ) प्रोत्रेन्द्रियं च (प्रपये) प्रविशामि (वा) वागिन्द्रियम् (ओजः ) मानसं वलं याष्टर्यम् (सोजः) शारीरं बलम् ( प्राणापानौ ) उच्छासनिश्वासवायू च एते (सह) अकीभूताः सन्तः ( माय) मयि वर्तन्ते । वागादिगाणं सप्तदशावयवोपलक्ष सप्त-
ऽध्यायः ९.]
भाष्यसहिवा।
(१३३)
1
दशावयवं प्रजापतेः लिङ्गं प्रपये इत्यर्थः । त्रयीविद्या लिाशरीरं च प्रपन्नं भवो न
नाशयेदिति भावः। [यजु०३६ । १] ॥१॥
मापार्य-अचारूप वाणीकी शरण होताहूँ, यजुःरूप मनकी शरण प्राप्त होताहूँ, प्राणरूप
सामकी शरण होताहूँ, चचन्द्रिय श्रोत्रइन्द्रियकी शरण होताहूँ मनका पल शारीरिक
पर उवास निश्वास वायु यह स्वस्थ होकर मुझमें स्थित हो ॥ १ ॥
विशेष-वागादिग्रहमसे सप्तदश भवयवका उपलक्षण है, सप्तदश मवयव युक्त प्रजापतिक-
शरीर है, उसकी शरण होता है, त्रयीविद्यारूर लिंगशरीर है, परमात्माकी कृपासे सप भवा
यवल सम्पन्न हो।१॥
मन्त्रः।
यन्मेछिद्रञ्चक्षुषोह्रदयस्युमनसो हातितृष्ण,
म्बृहस्प्पतितधातु ॥ शन्नौमवतुमर्वन-
स्युयस्प्पति ॥२॥
ॐ यन्म इत्पस्य दधीच ऋषिः । पंक्तिश्छन्दः । बृहस्पतिर्देवता ।
शान्तिपाठे विनियोगः ॥२॥
माष्यम्- मे ) मम (चक्षुषः ) चक्षुरिन्द्रिगस्य (यद् ) यत् (छिद्रम् ) भव-
खण्डनं जातं प्रवयीचरणेत (हृदयस्य ) बुद्धी यत् छिद्रं जातम् (मनसः) मनस:
(वा) यत् ( पतिण्णम् ) अतिहिसितम् । प्रवर्याचरणेन यचक्षुर्बुद्धिमनसां व्याकु-
लत्वं जातम् (बृहस्पतिः) वृहतां पतिर्देवगुरुः (मे) मम (तत्) छिद्रमविक्षणं
(दधातु ) संदधातु, छिद्र निर्तियतु (भुवनस्य) भूतजावस्य (यः ) ( पतिः)
मधिपतिः प्रवर्यरूपो यज्ञः सः (न:) अस्माकम् (शम् ) मुखरूपः ( भवतु ।
भवतु । वृहस्पतिना छिदापाकरणात्मवयः कल्याणख्योऽस्त्विर्थः । [यजु०३६।२] ॥२
भाषार्थ-मेरी च इन्द्रियकी जो न्यूनता है परमात्मा मेरी उस न्यूनता मन बुद्धिकी
ध्याकुलताको निवृत्त करो, हमारे निमित्त कल्याण हो, जो संपूर्ण भुवनोंका अधिपति है वह
हमको सुस्वरूप हो, अर्थात् त्रिभुवनके अधिपति देवता हमारा कल्याण करें ॥ २॥
मन्त्रः।
भूर्भुवस्वस्तत्सवितुर्वरेण्यम्भगोदेवस्य
धीमहि॥ धियोयोन प्रचोदयात्॥३॥
रुद्राष्टाध्यायी- (१३४) [ नवमी- ॐ तत्सवितरित्यल्य विश्वामित्र ऋषिः। निच्यगायत्री छन्दः । सविता देवता। वि० पू० ॥३॥ माण्यमू-यः सविता देवः (न:) अस्माकम् ( धियः) बुद्धीः (प्रचोदयाद ) प्रेरयेत्-(वत् ) तत्तस्य सर्वासु श्रुतिपु प्रसिद्धस्य (देवस्य ) द्योतमानस्य (सवितुः ) सर्वान्तर्यामितया प्रेरकस्य जगनष्टुः परमेश्वरस्यात्मभूतम् (वरेण्यम् ) सर्वरुपास्यतया ज्ञेयतया च सम्मननीयम् (भगः ) अविद्यावकार्ययोजनागर्गः स्वयज्योतिः पर- ब्रह्मात्मकं तेजः (धीमहि ) तद्योइं सोऽसौ योऽसौ सोहमिति वय व्यायेम । यहा- तदिति भाविशेषणं सवितुर्दवस्य तत्तादृशं भर्गो धीमहि किं तदपेक्षायामाह-य इतीति लीव्यत्ययः । यद्भ! धिया प्रचोदयादिति तयायेमेति समन्वयः । यदा-या सविता सूर्यः धियः' कर्माणि 'प्रचोदयात्' प्रेरयति तस्य 'सवितुः सर्वस्य प्रसवितुर्दवम्य द्योत्तमानस्य सूर्यस्य तत्सदृश्यमानतया प्रसिद्धं वरेण्यं सर्वः सम्भजनीयं भर्गः' पापा- नां तापकं तेजोमण्डलम् 'धीमई ध्येयतया मनसा धारयेम, यदा-भोःशब्देनान्नम- भिधीयते । यः सविता देवो धियः प्रचोदयति तस्य प्रसादागानादिलक्षणं फलं धीमहि धारयामः । तस्याधारभूता भवेमेत्यर्थः । भगवान् शंकराचार्यस्तु-'अथ सर्व देवात्मनः सर्वशक्तेः सर्वानभाषकतेजोमयस्य परमात्मनः सर्वात्मकवद्योतनाथै सर्वा- त्मकत्वप्रतिपादकगायत्रीमहामन्त्रस्योपासनप्रकारः प्रकाश्यते, तत्र गायत्री प्रणवादिस . सव्याहत्युपेतां शिरसमेतां सर्ववेदसारमिति बदन्ति । एवं विशिष्टा गायत्री प्राणायाम रुपास्या सप्रणवन्याहतित्रयोपेता प्रणवान्ता गायत्री जपादिभिरुपास्या तत्र शुद्धगायत्री प्रत्यक्ब्रह्मैक्यवोधिका 'धियो यो नः प्रचोदयात्' इति नोऽस्माकं धियो बुद्धीः यः प्रचोदयात् प्रेरयेदिति सर्वबुद्धिः संज्ञान्तःकरणप्रकाशकसर्वसाक्षी प्रत्यगात्मेत्युच्यते । तस्य प्रचोदयाच्छब्दनिर्दिष्टस्यात्मनः स्वरूपभूतं परब्रह्म तत्सवितुरित्यादिपदैनिर्दिश्यते । 'तत्र “ॐतत्सदितिनिर्दिशी ब्रह्मणविविधः स्मृतः” इति तच्छब्देन प्रत्याभूत स्वतःसिद्ध परब्रह्मोच्यते, सवितुरिति सृष्टिस्थितिलयलक्षणकस्य सर्वप्रपञ्चस्य समस्तदैतविभ्रमस्या- धिष्ठान लक्ष्यते । वरेण्यमिति सर्ववरणीपं निरतिशयानन्दरूपम् । मर्ग इत्यविद्यादिदो- षभर्जनात्मज्ञानेकविषयत्वम् । देवस्येति सर्वद्योतनात्मकाखण्डचिदेकरसम् । सवितुदर- स्थेत्यत्र षष्ठ्यर्थो राहोः शिरोवदौपचारिकः । वुझ्यादिसर्वदृश्यसाक्षिलक्षणं यन्मे स्वरूप तत्सर्वाधिष्ठानभूतं परमानन्दं निरस्तसमस्तानर्थरूपं स्वप्रकाशचिदात्मकं ब्रह्मत्येवं धीमहि ध्यायेम । एवं सति सह ब्रह्मणा स्वविवर्तजडप्रपञ्चेन रज्जुसन्यायेनापवादसामानाधिकर• ण्यरूपमेकत्वं सोयमिति न्यायेन सर्वसाधिप्रत्यगात्मनो ब्रह्मणा सह तादात्म्यरूपमेकत्वं भवतीति । सर्वात्मकब्रह्मबोधकोऽयं गायत्रीमंत्रः सम्पयते । सप्तव्याहतीनामयमर्थः ।
- ऽध्यायः ९] भाष्यसहिता। (१३५) भूरिति-सन्मात्रमुच्यते, भुव इति-सम्भावयति प्रकाशयतीति व्युत्पत्त्या चिदूपमुच्यते सुबियत इति व्युत्पत्त्या स्वाति-सुष्टु सँब्रियमाणसुखस्वरूपमुच्यते, मह इति-महीयते पूज्यत इति व्युत्पत्या सर्वातिशयत्वमुच्यते, जन इति-जनयति इति जनः सकलका- रणत्वमुच्यते, तप इति-सर्वतेजोरूपत्वम्, सत्यामति-सर्वबाधारहितत्वम् । एतदुक्तं भवति-यल्लोके स्वरूपं तदोकारवाच्यं ब्रह्मैव आत्मनोऽस्य सचिद्रूपस्य भावादिति, अथ भूरादयः सर्वलोका कारवाच्यब्रह्मात्मकाः न तझ्यातिरिक्तं किञ्चिदस्तीति व्याहृत- योऽपि सर्वात्मकब्रह्मवोधिकाः गायत्रीशिरसोऽप्ययमेवार्थः “आपोज्योतीरसो मृतं ब्रह्म- भूर्भुवः स्वरोम्" आप इत्यामातीति व्युत्पत्त्या व्यापित्वमुच्यते । ज्योतिरितिप्रकाश- रूपत्वम् । रस इति सर्वातिशयत्वम् । अमृतामति-मरणादिसंसारनिर्मुक्तत्वं सर्वव्यापि- सर्वप्रकाशकसर्वोत्कृष्टनित्यमुक्तमात्मरूपं सच्चिदानंदात्मकं यदोकारवाच्यं ब्रह्म तदहम- स्मीति गायत्रीमन्त्रार्थः । “गुहाशयब्रह्महुताशनोहं कर्तेदमंशारख्यहविर्तुतं सत् । विली- यते नेदमहं भवानीत्येषप्रकारस्तु विभिद्यतेऽत्र ॥ यदस्ति यदाति तदात्मरूपं नान्य- ततो भाति न चान्यदस्ति । स्वभाव संवित्प्रतिभाति केवला ग्राह्यं ग्रहीतति मृऔर कल्पना" ॥ इति शंकरभगवतः कृतौ गायत्रीभाष्यम् । योगियाज्ञवल्क्यस्तु- तच्छब्देन तु यच्छब्दो वोद्धव्यः सततं बुधैः। उदाहते तु यच्छब्दे तच्छब्दः स्यादुदाहृतः ॥ १ ॥ सविता सर्वभूतानां सर्वभावान्प्रसूयते । सवनात्पावनाचैव सविता तेन चोच्यत ॥ २ ॥ दीव्यते क्रीडते यस्माद् द्योतते रोचते दिीव । तस्मादेव इति प्रोक्तः स्तूयते सर्वदेवतैः ॥ ३ ॥ चिन्तयामो वयं भर्ग धियो यो नः प्रचोदयात् । धर्मार्थकाममोक्षेषु बुद्धिवृत्तीः पुनःपुनः ॥ ४ ॥ भ्रस्जपाके भवेद्धातुर्यस्मात्पाचयते ह्यसौ । भ्राजते दीप्यते यस्माजगच्चान्ते हरत्यपि ॥५॥ कालाग्निरूपमास्थाय सप्ताः सप्तराऽमामः । भ्राजते यत्स्वरूपेण तस्माद्भर्गः स उच्यते ॥ ६॥ भात भषियने लाकान रोति रञ्जयत प्रजाः । गत्या गच्छत्यजत्रं यो भगवान्भर्ग उच्यते ॥७॥ वरेण्यं वरणीयं च संसारभयभीरुभिः । आदित्यान्तर्गतं यच्च भर्गारख्यं वा मुमुक्षुभिः ॥ ८ ॥ जन्ममृत्युविनाशाय दुःखस्य त्रिविधस्य च । ध्यानेन पुरुषो यस्तु दृश्यः स सूर्यमण्डले ॥९॥ न .
(१३६) रुद्राष्टाध्यायी- [ नवमों- भाषार्थ-यह गायत्री मत्रही सर्वोपरि मंत्र है यही ब्रह्मकी उपासना का ध्यानका परम मंत्र है इसके सौ अर्थ मिलते हैं संस्कृतम कई अर्थ हमने लिखे हैं संक्षेपसे भाषार्थ लिखते हैं । उस प्रकाशात्मक प्रेरक अन्तर्यामी, विज्ञानानन्दस्वभाव, हिरण्यगर्भोपाध्यवच्छिन्न अथवा मादित्यके अन्तर स्थित पुरुष वा ब्रह्मके सबसे प्रार्थना किये हुए संपूर्ण पापके वा संसारके आवागमन दूर करने में समर्थ, सस्य ज्ञान आनन्द आदि तेजको हम ध्यान कर- ते हैं, जो सविता देव हमारी बुद्धियोंको सत्कर्मके मनुष्ठानके निमित्त प्रेरणा करता है, जग- तके उत्पन्न करनेवाले उन परमदेवताका जो कि भूलोक, भुवलोंक, स्वर्लोक व्यापी भर्ग है, उनका हम ध्यान करते हैं॥३॥ विशेष-योगि याज्ञवल्क्यने जो अर्थ किया है उसका वर्णन करते हैं, उसका तेन इम ध्यान करते हैं, यहां तत् भर्गका विशेषण नहीं है, तथापि तत्के प्रयोगसे ही यक्का प्रयोग होजाता है, यही इस श्लोकका भाशय है कि तत्के साथमें यत् शब्द सदा जानना ॥ १ ॥ पूर्ण प्राणी और संपूर्ण भावोंका उत्पन्नकर्ता सेवन और पवित्र करनेसे उसे सविता कहते हैं ॥ २॥ जिस कारण कि वह प्रकाशित होता क्रीडा करता माकाशमें दीप्तिमान होता सब देवताओंसे स्तुतिको प्राप्त होताहै, इस कारण उसे देव कहते हैं ॥ ३ ॥ हम उस भर्ग तेजका ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धिवृत्तियोंको पारंवार धर्म, अर्थ, काम और मोक्षमें प्रेरणा करता है || ४ || भ्रस्ज-धातु पकाने में है जिस कारण यह पकाता शोभित दीप्तिमान होता हुआ अन्तमें जगत्को हरण करताहै ॥ ५ ॥ कालाग्निरूपमें स्थित होकर आग्नसूर्यमें स्थित अपने रूपसे प्रकाशित होता है। इस कारण उसको भर्ग कहते हैं ॥ ६ ॥ मकारसे सवलोकोंको भयभीत करताहुआ, रसे प्रजाको प्रसन्न करता है, गसे जो निरन्तर गमना गम करता है इस कारण उसको भर्ग कहते है, पामार्थ चिन्तामें सविता मोर भर्गमें भेद नहीं है ॥ ७ ॥ ससारके भयसे भीतहुए प्राणी जिसकी प्रार्थना करते हैं । जो यह सूर्यके अन्तर्गत भर्ग है इसको मुमुक्षु जन्म मृत्यु और दैहिक दैविक भौतिक दुःख, इनके नाश करनेके निमित्त ध्यान करते हैं वह पुरुष सर्यमंडलमें ध्यान करना चाहिये ।। ८॥ ९ ॥ इस प्रकार गायत्रीका माहात्म्य वर्णन करके उसी के महाप्रभावमें सात व्याहृतियोंका स्वशेषण जानना । किस प्रकारका वह भर्ग है ? जो भूरादि सात लोकोंको ध्याप्त कर स्थित होरहाहै, अर्थात् मा (भूमि) भुवः (अन्तरिक्ष ) स्वः (स्वर्लोक) महः ( महर्लोक) जनः (जनलोक ) तपः (तपोक) सत्यम् (सत्यलोक) इस प्रकार क्रमसे लोकोंको व्याप्त करके यह भर्ग इन सात लोको दीपकके समान प्रकाश करताहै । अयश सात महाव्याहृति ही भरादिका भगीदिसे भेद करके प्रकाश करतीहैं, अर्थात् वह तेन कैसा है जो ( आपो ज्योती- रसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम् ) जल, ज्योति, रस, अमृत, ब्रह्म, भूः भुवः स्वः ॐ रूप है, 'उसका ध्यान करते हैं ॥३॥ मन्त्रः। कानश्चिनुऽआ वस्ती सुदाबधा सखा । क्याशचिष्ठयाबुता ॥४॥ 1
ऽध्यायः ९.]
भाष्यसहिता ।
(१३७)
ॐ कयान इत्यस्य वामदेव ऋषिः । गायत्री छन्दः । इन्द्रो देवता।
शान्तिपाठे विनियोगः॥४॥
भाष्यम्-(सदावृधः) सदावर्धमानः (चित्रः) चायनीयः पूजनीयः ( सखा)
मित्रभूत इन्द्रः (किन्या) (ऊतीः ) ऊत्या अवनेन तर्पणन प्रीणनेन वा ( नः )
अस्माकम् ( आभुवत् ) आभिमुख्येन भवेत् (शविष्ठया) प्रज्ञावत्तमया प्रज्ञासहित-
अनुष्ठीयमानेन (कयावृत्ता) केन वर्ततेन कर्मणा च अमिमुखे भवेत् । शचीति कर्म-
नाम । इन्द्रः कया अत्या अस्माकं सहाय मामिमुख्येन भवति तथा अतिशयवत्या
यागक्रिययाऽस्माकं सखा भवतीति विशदार्थः [ यजु० ३६४] ॥ ४ ॥
भाषार्थ-सदा वृद्धि करनेवाले विचित्र वा पूज्य इन्द्र किस तर्पण वा प्रीतिसे किस वर्त-
मान भतिशय क्रियाद्वारा हमारे सहायक अभिमुख होताहै, अर्थात् हम क्या उत्तम कर्म
करें, क्या क्रिया करें जिससे परमात्मा हमारे सहायकारी हॉ और अपनी पालनशक्तिद्वारा
हमारे निरन्तर वृद्धिकारी सखा हो ॥ ४॥
मन्त्रः।
कस्त्वांसुत्योमदानाम्माहिष्ठोमत्सुदन्छ
सह ॥ ढाचिदारुजेवसु ॥५॥
ॐ कस्त्वेत्यस्य वामदेव ऋषिः। गायत्री छ। इन्द्रो देवतावि०पू०५
भाष्यम्-हे इन्द्र ( मदानाम् ) मदयन्ति वानि मदानि भदजनकानि हवींषि तेषां
मध्ये (मंहिष्ठः ) श्रेष्ठः अत्यन्तमदजनकः ( अन्धसः) अन्नस्य सोमरूपस्य (क)
का अंशः (वा) त्वाम् (मत्सत् ) मायति मत्तं करोति 'मदी- येनांशेन मत्तः
सन् (दृढाचित् ) दृढान्यपि (वसु ) वसूनि धनानि कनकादीनि त्वम् ( मारुजे )
'कजो-भगे' आरजसि चूर्णयसि दातुं भनक्षि भक्त्वा भड्क्त्वा ददासीत्यर्थः ।
[यजु० ३६५ ]॥५॥
मापार्थ-हे परमेश्वर । सोमरूप अन्नका कौनसा प्रसन्नताओंका अत्यन्त करनेवाला मंश
आपको प्रसन्न करताहै, अर्थात् सब अन्नों में कौनसा अन्न आपको माधक तृप्त करताहै
निस सशसे प्रसन्न होकर आप दृढतासे रहनेवाले सुवर्णादिधनको भक्तोंके निमित्त चूर्ण
कर अर्यात विभाग कर देतेहो ॥५॥
मन्त्रः।
अभीषणुल्सखीनामवितारितृणाम् ॥
शुतम्भवास्यूतिभिः॥६॥
(१३८) कद्राष्टाध्यायी- | नवमो- ॐ अभीषण इत्यस्य वामदेव ऋषिः। गायत्री छन्दः । इन्द्रो देवता। वि० पू० ॥६॥ माध्यम-हे इन्द्र त्वम् ( सखीनाम् ) समानख्यातीनाम् ( जरितॄणाम् ) स्तोतृ. णाम् ( अविता ) रक्षिता (शतम् ) शतेन वहामिः ( अतिभिः) रक्षाभिः सह (नः ) अस्माकम् (सु) सुष्टु ( जमिमवासि) भाभिमुखो भव भक्तानां पालनाय नानारूपाणि दधासीत्यर्थः । [यजु० ३६१६] ॥ ६॥ भाषार्थ-हे परमेश्वर तुम मित्रों और स्तुति करनेवाले हम ऋरिवनों के पालन करनेवाले हो तथा हमसे भक्तों की रक्षा निमित्त भलीप्रकार अमिमुख होनेद्वारा बहुत रूप होते हो अर्थात् अपने भक्तोंकी रक्षाके निमित्त माप सैनडों रूप धारण करते हो वा सैकड़ों उपाय अवलंबन करते हो ॥६॥ मन्त्रः। कयात्वन्नऽजुत्यासिष्प्रर्मन्दसेवृषन् ।क- योस्तोतफ्यु आमेर ॥७॥ ॐ कयात्वमित्यस्य दधीच ऋषिः । गायत्री छन्दः । इन्द्रो देवता । शान्तिपाठे वि० ॥७॥ भाष्यम् ( वृषन् ) वर्षतीति वृषा हे सेक्ता इन्द्र (कया) (अत्या) केन तर्प- गेन हविर्दानेन (ना) अस्मान् (अभिप्रमन्दसे). अभिमोदयसि (कया ) कया अत्य तृप्त्या (स्तोतृभ्यः) स्तुतिकर्तृभ्यः यजमानेभ्यः (आभर ) आहार माहरसि धन. दातुमिति शेषः । तइयेन तथा वयं कुर्म इति शेषः। [ यजु० ३६७ ] ॥ ७ ॥ भषार्थ हे लयकामनामोंके वर्षानेवाले आप किस तृप्ति वा हविनिसे हमको प्रसन्न करतेहो, किन उतिद्वारा स्तुति करनेवाले यजमानोंके निमित्त धनदान करनेको लातेहो मर्यात क्रियावश होकर स्तुति करनेवालोंको पूर्णमनोरथ करते हो ॥ ७ ॥ इन्द्रोशिश्वत्यराजति ॥ शन्नोऽअस्तुतिपदे शञ्चतुष्पदे॥८॥ .
ऽध्याय: ९.]
माष्यसहिता।
(१३९)
ॐ इन्द्र इत्यस्य दधीच ऋषः। द्विपदा विराट् छन्दः । इन्द्रो
देवता । वि० पू० ॥ ८॥
भाष्यम्-(विश्वस्प) सर्वस्य जगतः (इन्द्रः ) परमेश्वरः महावीरः आदित्यो
वा यः (राजति) देदीप्यते (न) भस्माकम् (द्विपदे) द्विपदा पुत्रादीनाम् (शम्)
सुखरूपः (अस्तु ) अस्तु (चतुष्पदे ) चतुष्पदा गवादीनाञ्च (शम् ) सुखरूपोऽस्तु
[ यजु० ३६८ ] ॥ ८॥
मापार्थ-सबका स्वामी परमेश्वर प्रकाश करताहै, हमारे पुत्रादिमें कल्याण हो, चौपा-
योंमें कल्याण हो अर्थात् परमेश्वर्यसंपन्न पाभदेवता इस संपूर्ण ससारका राजा है, वह क्या
विपद क्या चतुष्पदको निर्माण करके ही कल्याणाविधान में तत्पर रहताहै ॥ ८ ॥
मन्त्रः।
शन्नोप्रिनाविरुण शन्नोमवत्वया ॥ श-
इन्द्रोबहुरूप्पति शन्नोबिष्णुरुरुक्कल.९॥
ॐ शन्न इत्यस्य दधीच ऋषिः । अनुष्टुप् छंदः । सूर्यों देवता ।
शान्तिपाठे विनियोगः ॥ ९ ॥
भाष्यम्-(मित्रः) मित्रो देवः मद्यात मक्तेषु स्निह्यतीति मित्रः ( नः )
अस्माकम् (शम् ) सुखरूपो भवतु (वरुणः) वरुणो देवो वृणोत्यङ्गीकरोति भक्त-
मिति वरुणो देवः (शम् ) सुखरूपो भवतु ( अर्यमा ) इयति गच्छति भक्तं प्रतात्य.
येमा (शम् ) अस्माकं मुखरूपो भवतु ( इन्द्रः ) देवेशः (न) अस्माकं सुखरूपो
भवतु (बृहस्पतिः ) बृहनाम्पतिदेवगुरुः (नः ) अस्माकम् (शम ) सुखरूपो भवतु
(उरुक्रमः ) अरुविस्तीणः क्रमः पादन्यासो यस्य सः (विष्णुः ) परमेश्वरः (ना)
अस्माकम् (शम् सुखरूरी भवतु । [यजु० ३६९ ] ॥ ९॥
मापार्य-मित्रदेवता हमारे निमित्त सुखरूप हो, भक्तके भगीकार करनेवाले वरुण सुख-
रूप हो, भक्तके प्रति गमनशील अर्यमा हमारे निमित्त सुन कर, देवेश हमको कल्याण करें
देवगुरु और विस्तीर्णपादन्यासवाले व्यापक विष्णु भगवान हमारे कल्याणकारी हो ॥ ९ ॥
मन्त्रः।
शन्नोवात पयता शास्तपतसयशन्न
कनिक्कददेवपुजन्योऽअभिवर्षतु॥१०॥
१४०) द्राष्टाध्यायी- [ नवमो- ॐ शन्न इत्यस्य दधीच ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । वातादयो देवताः वि० पू० ॥१०॥ माध्यमू-(वातः) वायुः (न:) अस्माकम् (शम् ) सुखकारी अपरुपः अव्या- धिजनकश्च (पवताम् ) वहताम् (सूर्यः ) जनान स्वस्कव्यापारेषु प्रेरयति सर्यः (शम् ) सुखरूपः अदहनो भेषजरूपश्च ( न: ) अस्माकम् ( तपतु ) किरणान् विस्तारयतु (पर्जन्यः) पिपर्ति पूरयति जनामिति पर्जन्यः पर्जन्येशः ( देवः) देवः (कनिक्रदत् ) अत्यन्तं कन्वतीति शब्दं कुर्वन् ( नः ) अस्माकम् (शम् ) सुखकरम् ( अभिवर्पतु ) काशनिक्षाररहितं यथातथा अभिसिञ्चतु [यजु० ३६१० ] ॥१०॥ भाषार्थ-उसकी कृपासे वायु हमको सुखरूप वहन करो, सूर्य हमको कल्याणके निमित्त ताप शान करो, मनुष्योंको जलसे तृप्त करनेवाला शब्दायमान देव हमको सुखरूप होकर वर्षा करो॥ १० ॥ मन्त्रः। अहानिशम्भवन्तनशठरात्रीप्रतिधीय ताम ॥ शन्नाइवानीभवताभवाभिशन्नड इन्द्रावरुणारातहव्या ॥ शन्नऽइन्द्रापूष णाबाजेसाती शमिन्द्रासोमांसुवितायुश व्योः॥ ११॥ ॐ अहानीत्यस्य दधीच ऋषिः । द्विपदा गायत्री छं० । अहो रात्र्यादथो देवताः। वि० पू०॥ ११॥ भाष्यम्-(महानि ) दिनानि ( न. ) अस्माकम् ( शम् ) सुखरूपाणि (भवन्तु ) भवन्तु ( रात्रीः) रात्री (शम) सुखरूपाः अस्मासु (प्रतिधीयताम ) प्रतिदधातु महावीर इति शेषः। (इन्द्राग्नी इन्द्राग्नी ( अबोभिः ) पालनैः कृत्वा (ना) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपौ भवताम् (रातहव्या ) रातं दत्तं हव्यं ययोस्ती रातहव्यो हवितृप्तौ (इन्द्रावरुणा) इन्द्रावरुणौ (नः) अस्माकम् ( शम्) शम्भ- वताम् ( वाजसातौ ) वाजस्य अन्नस्य सातौ निमित्तभूते ( इन्द्रापुषणा ) इन्द्रपूषसंज्ञौ देवी (ना) अस्माकम् (शम् ) सुखरूपी भवताम् । तथा ( सुविताय) माधुगमनाय
ऽध्यायः ९.]
भाष्यसहिता।
(१४१)
साधुप्रसवाय वा तथा (शम् ) रोगाणां शमनाय (योः) यवनाय पृथक्करणाय च
भयानां रोगं भयं च निवर्त्य (इन्द्रासोमा) इन्द्रसोमो देवी (शम् ) सुखरूपी भवताम
[ यजु० ३६ । ११ ]॥ ११ ॥
भाषार्थ-उसी परमात्माकी कृपासे सपूर्ण दिन हमारे निमित्त कल्याणरूप हो, सपूर्ण रात्री
कल्याणविधान करै, इन्द्र भोर भग्नि अपनी पालनाओंसे हमको सुखरूप हो, वृष्टिप्रद इन्द्र
और वरुण हमको कल्याण विधान करै अन्नको उत्पन्न करनेवाले इन्द्र और पूषा देवता हमको
सुखकारी हो, इन्द्र भोर सोमदेवता श्रेष्ठ गमन वा श्रेष्ठ उत्पत्तिके निमित्त तथा रोगोंको
शान्त करने के निमित्त रोग भयके पृथक् करनेके निमित्त सुखकारी हों अथवा सुखकारी इन्द्र
सोम देवता हमको कल्याणकारी हो ॥ ११ ॥
मन्त्रः।
शन्नोंदेवीरसिष्टयुऽापोमवन्तुपीतये॥
शंथ्योरभिनवन्तुनः ॥१२॥
ॐ शन्न इत्यस्य दधीच ऋषिः । गायत्री छं । आपो देवताः ।
वि०पू०॥ १२॥
भाष्यम्-(देवी) देव्यः दीप्यमानाः (मापः) जलानि (न.) अस्माकम् (प.
भिष्टये ) अभिपकायाभीष्टाय वा (पीतये ) पानाय (च)(शम् ) सुखरूपा (मवन्तु)
भवन्तु, अस्माकं स्नाने पाने चापः सुखयियो भवन्तु । आप ( शंयोः ) रोगाणां
शमनं भयानां यवनं पृथकरणं च ( अभिनवन्तु ) (न.) अस्माकं भयरोगनाशं कुर्व-
नित्वत्यर्थः [ यजु० ३६ । १२ ] ॥ १२ ॥
भाषार्थ-दीप्यमान जब हमारे अभिषेक मभीष्ट और पानके निमित्त सुखरूप हो, हमारे
स्नान पानमें जल सुखरूप हो, रोगीक शमन और भयके पृथक् करनेमें स्रवण करें मर्थात् पर-
मात्माके प्रसादसे जल हमको सुखकारी हों, अर्थात उत्तम जलपान करनेको मिलें जिससे
नोरोग रहै ॥ १२ ॥
मन्त्रः।
स्योनापृथिविनोभवान्नृक्षुरानिवेशनी॥
यच्छानुस्शम्मसुप्रथाः ॥१३॥
ॐ स्योनेत्यस्य मेधातिथिऋषिः। त्रिष्टुप् छं। पृथिवी देवता ।
वि० पू०॥१३॥
(१४२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ नवमी-
भाष्यम्-(अक्षा) अक्षरः कण्टका कन्तपो वा कण्वतर्वा कृन्ततेर्वा स्याद्गतिका
भंग इति [ निरुक्त० ९ । ३२ ] तहणं चौरदायादिदुःखनिवृत्यर्थम् । न मन्ति
क्षः कण्टका दुःखदायिनो यस्यां सा अनुक्षरा (निवशिनी) निविशान्ति जना यस्यां
सा तथा । ( सप्रथाः ) प्रथमं प्रथा विस्तारः पयसा सह वर्तमाना समयाः सर्वतः पृथुः
(पृथिवि) हे पृथिवि त्वम् (ना अस्माकम् (स्योना) सुखरूपा (भा) मा । किच
(ना) अस्मभ्यम् (शर्म ) शरणम् ( यच्छ ) देहि [ यजु० ३६ । १३ ] ॥१३॥
भाषार्थ-हे भूमि ! कंटकहीन अर्यात दुःखदायियोंसे हीन सुखले बेठनेयोग्य सप बोरसे
पृथु हमको सुखरूप हो, हमको कल्याण दो अर्थात् पृथिवीम स्थित सुकोमल स्तृित यह शग्या
इमको सुखकारी हो, जळ हमारे पापोंको दूर कर, पा अपरूप परमेखर हमारे पारोंको भस्म
करें, अथवा यह जल हमारे शरीरका मल दूर करके हमको शुचि कर ॥ १३ ॥
आपोहिष्ठानयोसुवस्तानऽऊर्जेदधातन।
सहेरणाचक्षसे ॥१४॥
आपोहिष्ठत्यस्य सिन्धुदीप ऋषिः। गायत्री छन्दः । आपो देवता
वि० पू०॥१४॥
माप्यम्-(मापः ) हे गापो या यूयमेर (मयोभुवः) सुखस्य भावविच्या (स्थ)
भवय, स्नानपानादिहेतुत्न सुवोत्पादकत्वमपां प्रसिई तास्तादृग्यो सूर्यम् (न)
अरमाकम् (जर्ने ) रसाय ( दधातन ) स्थापयन यथा वयं सर्वस्य भोग्यस्य रसस्य
भोक्तारो भोम तथाऽस्मान्कुरुतेति भावः । किञ्च (महे) महते ( रणाय ) रमणीयाय
(चक्षसे) दर्शनाय चास्मान् दधातनेत्यनुवर्तते । महदमणीयं दर्शनं ब्रह्माक्षात्कारलक्षणं
तदस्माकं कुरुत । ऐहिकपारलैक्षिकसुखं दत्त चोभावः । [यजु० ३६।१४] ॥१४॥
भाषाय-हे जलसमूह तुम सुखके करनेवाले सुखकी भावना करनेवाले स्नानपान भादिसे
सुखके उत्पादक हो । हमारे बडे रमणीय दर्शनके निमित्त अर्यात् ब्रह्माक्षात्कार लक्षणयुक्त
और निश्चय ही रसानुभव वा ब्रह्मानन्दके अनुभव के निमित्त हमको स्थापन करो ॥ १४ ॥
मन्त्रः।
यो-शिवतमोरसुतल्यमाजयतेहनः॥
शुतीरिवमातरः ॥१५॥
ऽध्यायः ९.] भाष्यसहिता। (१४६) ॐ योव इत्यस्य सिन्धुदीप ऋषिः । गायत्री छं । आपो देवता। वि० पू० ॥१५॥ भाष्यम्-हे आपः (व) युष्माकम् (य) (शिवतमः ) शान्ततमः सुखैकहेतु: ( रसः) रसोऽस्ति (इह) अरिमन्कर्मणि इह लोके वा स्थितान् (नः ) अस्मान् (तस्य) तस्य रसस्य (भाजयत) भागिनः कुरुत । तत्र दृष्टान्तः (उशती) उशल्या काम- यमानाः प्रीतियुक्ताः (मातरः) मातरः (इव) यथा सकीयस्तन्यरसं वालं पाययन्ति तहत् । [ यजु० ३६ । १५] ॥ १५ ॥ भाषार्थ-हे नो ! तुम्हारा शानारूप मुखमा एकही कारण रस इस कर्म वा इस लोकमें है हमको उस रसका भागी करो, प्रीतियुक्त माता जैसे अपने स्तनोंको बालकोंको पिलाती गूढार्थ-हे परमात्मन् । आपका जो शान्तरूप ब्रह्मानन्द है कृपा कर हमको उस अमृ. तका भागी करो ॥ १५॥ मन्त्रः। तम्माऽअरङ्गमामवोयल्युक्षयांयुजिन्नाथ । आपोजुलयथाचुनः ॥१६॥ ॐ तस्मा इत्यस्य सिंधुदीप ऋषिः । गायत्री छन्दः । आपो देवताः । वि० पू० ॥ १६ ॥ भाष्यमू-(भारः)हे आपः यूपम् ( यस्य ) पापस्य (क्षयाय) विनाशाय अस्मान् (जिन्वथ) मीणयथ ( तस्मै) तादृशाय पापक्षयाय (रम् ) क्षिप्रम् (वः) अस्मान (गमाम) गच्छाम वयं शिरसि प्रक्षिपामेत्ययः । यद'-(यस्य ) अन्नस्य (क्षयाय) निरासाथम् यूयपीपी: (जिन्वय) तर्पयथ तस्मै तान्नमुद्दिश्य वयम् ( अरम् ) पर्याप्त यथा भवति तथा (वः) चस्मान् (गमाम ) गच्छाम । किञ्च हे भापः (ना) अस्मान् (जनयथ चे) पुत्रपौत्रादिजनने प्रपोजतेत्यर्थः । यहा हे आपः वः युष्मत्सम्ब. विनस्तस्य पर्याप्तिं वयं गपाम गच्छेम यस्य क्षयाय चतुर्थी षष्ठ्यर्थे । क्षयस्य निवा- सस्य जगतामाधारभूनस्य यस्याहुतिपरिणामभूनस्य रसस्यैकदेशेन यूयं ब्रह्मादिस्तम्ब- पर्यन्तं जगत् जिन्वय तर्पय य पञ्चाहुतिपरिणामक्रमेणेति भावः । हे आपः नोऽस्मान् तत्र भोक्तत्वेन जनयथ उत्पादयथ ॥ १६ ॥ भाषार्थ-हे जलो ! तुम्हारे सबंधी उस रसके निमित्त हम शीघ्र प्राप्तिको चले, जिसके निवास जगत्के आधारभूत अर्थात् आहुतिपरिणामभूत जिस रसके एकदेशसे तुम ब्रह्मासे १
(१४४)
छद्राष्टाध्यायी-
[ नवमी-
स्तम्बपर्यन्त जगत्को तृप्त करते अर्थात् पचाहुतिके परिणामक्रमसे तृप्त कर प्रसन्न करतेहो
और उसके मोगसे हमको उत्पन्न करतेहो, भयया जिसके निवाससे तुम प्रसन्न होतेहो उस
गुण पा रसकी प्राप्तिके निमित्त विशेषकर हम तुम्हारे निकट प्राप्त है, हे जलो । तुम हमको
अना उत्पन्न करनेकी सामर्थ्य दो परमारमाकी प्रार्थना भी इसी मत्रमें है, जिसके प्रसाद
मुक्तिका सुख प्राप्त होता है ॥ १६॥
मन्त्रः।
द्यौशान्तिरन्तरिक्षुर्छशान्ति पृथिवी शा-
न्तुिरापत्शान्तुिरोषधयुत्शान्तिः ॥ वन-
स्प्पयह शान्तिर्विश्वेदेवा शान्तिब्रह्मशा-
न्तुिल्स ठशान्तुि शान्तिरेवशान्तित्सा
माशान्तिरेधि ॥१७॥
ॐ द्योरित्यस्य दधीच ऋषिः । शक्करी छन्दः । विश्वेदेवा देवता।
शान्तिपाठे विनियोगः ॥ १७ ॥
माष्यमू-(यौः) द्युलोकरूपा या (शान्तिः) शान्तिः ( अन्तरिक्षम् ) अन्तरि-
क्षरूपा च या ( शान्तिः) शान्तिः ( पृथिवी ) भूलोकरूपा या ( शान्तिः ) शान्तिः
(आप) जलरूपा या (शान्तिः ) शान्तिः (ोषधयः) ओपधिरूपा या (शान्तिः)
(वनस्पतयः ) वनस्पतिरूपा या शान्तिः (विश्वेदेवाः ) सर्वदेवरूपा या (शान्तिः ।
शान्तिः (ब्रह्म) त्रयीलक्षणपरं वा तद्रूपा या (शान्तिः) शान्तिः (सर्वम् ) सर्व-
जगद्पा या (शान्तिः) (शान्तिरेव शान्तिः) या स्वरूपतः शान्तिः (या)शान्तिः
(मा) मा प्रति (एधि) अस्तु । महावीरप्रसादात् सर्व शान्तिरूपं मां प्रत्यस्वित्यर्थः ।
यादा-द्योरित्यादिषु विभक्तिव्यत्ययः । पृथिव्यामप्स्योषधिषु सर्वस्मिंश्च या शान्तिः सा
मां प्रत्यस्त्वित्यर्थः । [यजु० ३६ । १७ ] ॥ १७ ॥
भाषार्थ-द्युलोकरूप शांति, और मन्तरिक्षरूप शान्ति, पृथिवीरूप शान्ति, जलरूप शांति,
औषधिरूप शांति, वनस्पतिरूप शांति, विश्वेदेवासवधि शांति, या सर्वदेवरूप शान्ति, त्रयी
युक्त शांति, सर्वजगतरूप शांति, स्वरूपसेही शांति, जो शांति है वह शांति मेरे प्रति से
अर्थात् यह सब मुझको शान्तरूप हो ॥ १७ ॥
ऽध्यायः ९.]
भाष्यसहिता।
(१४५)
मन्त्रः।
दृतुहमामित्रस्यमाचक्षुषासवाणिभूता-
निसमीक्षन्ताम् ॥ मित्रस्याहञ्चक्षुषासा-
णिमतानुसमीक्षे ॥ मित्रस्युचक्षुषासमी-
क्षामहे ॥ १८॥
ॐ हत इत्यस्य दधीच ऋषिः । भुरिगार्षीजगतीछन्दः । महावीरो
देवता । वि० पूर्ववत् ॥ १८॥
माष्यम्-(हते ) -विदारे विदीर्णे जराजर्जरितेऽपि शरीरे हे महावीर (मा) माम्
(ठह) दृढीकुरु । यदा-टो विदीर्णे कर्मणि मां दृह अच्छिदं कर्म कुरु । यदा-स-
सुपिरत्वात् सेत्तृत्वाच्च दृति-शब्देन महावीरः हे हते महावीर मां त्वं दृढीकुरु कथं
दाढ्यम्, तदाह-(सर्वाणि भूतानि ) प्राणिनः ( मा ) माम् ( मित्रस्य ) मित्रस्य
(चक्षुपा) नेत्रेण ( समीक्षन्ताम् ) सम्यक् पश्यन्तु मित्रदृष्टया सर्वे मां पश्यन्तु नारि-
दृष्ट्या सर्वेषां प्रियो भूयासमित्यर्थः ( अहम् ) सहमपि ( सर्वाणि भूतानि ) प्राणि-
जातानि ( मित्रस्य चक्षुषा) मित्रदृष्टया ( समीक्षे ) पश्यामि सर्वे मे प्रियाः सन्तु
(मित्रस्य चक्षुषा) मित्रदृष्टया ( समीक्षामहे ) वयं पश्यामः । परस्पराद्रोहेण सर्वानहि-
सन्तो मित्रदृष्टया पश्याम इति सरलार्थः । [ यजु० ३६।१८] ॥ १८ ॥
भाषार्थ-हे सेचनसमर्य देव । मुझको दृढ कीजिये सपूर्ण प्राणी मुझको मित्रके नेत्रोंसे सर-
लोकन कर, मे सब प्राणियोंको मित्रकी चक्षुसे देखताहूं, अर्थात् सर मुझे प्यारे हो, अर्याद
मित्रचक्षु शान्त होती है, न मित्र किसीको मारता न मित्रको कोई मारताहै, इस प्रकार र
स्पर किसीको अहित न विचारते हम मित्रकी चक्षुसे सपको मवलोकन करें ।। १८॥
मन्त्रः।
हतुदृठहमाज्योक्तैसुन्दर्शिजीच्यासुध्यो
क्तेसुन्दशिजीयासम् ॥ १९॥
ॐहत इत्यस्य दधीच ऋषिः। आयुष्णिकू छन्दः । महावीर
देवता । शान्तिपाठे वि० ॥ १९॥
(१४६)
रुद्राष्टाध्यायी-
[नवमो-
भाष्यम्-(हते ) हे वीर (मा) मां (दृछह ) दृढीकुरु, आदगथै पुनर्वचनम् ।
हे महावीर (ते) तव ( सन्दशि ) सन्दर्शनं अहम् (ज्योक ) चिरम् ( जीव्यासम्)
जीवेयम् । पुनरुक्तिरादारार्थी हे देवेश ते सन्ताश ज्योक जीव्यासम् । चिरत्रीवेयमि-
त्यर्थः । [ यजु० ३६।१९ ] ॥ १९ ॥
भाषाय-हे महावीर पामदेव ! मुझको दृढ करो, तुम्हारी दृष्टिम वा आप दर्शन में चिर-
कालतक मैं जीवित रहूँ, मापके दर्शन करता दीर्घकालतक में जीवित रहूं ॥१९॥
मन्त्रः॥
नमस्तुहरसेशोचिषुलमस्तेऽअस्त्वर्षेि ॥
अन्यौले अदस्यत्तपन्तुहेत-पाको
सम्मपयनशिनोभव॥२०॥
ॐ नमस्त इत्यस्य लोपामुद्रा ऋपिः । भुरिगापी बृहतीछ० अग्नि-
दैवता । चित्यारोहणे वि० ॥२०॥
भाष्यम्-(हिरण्यसकलसहितं भुवस्थमाज्यं दधिमधुघृतकुशमुष्टियुता पात्री एत-
द्यमादायाध्वयुश्चित्यानिमारोहति ब्रह्मयजमानी वग्नेर्दक्षिणत उपविशत इति हे पग्ने (ते)
तव (हरसे ) हरति सर्वर सानिति हरस्तस्मै ( शोचिषे ) शोचनहेतवे तेजसे ( नमः)
नमोऽस्तु (वे) तव ( अधिपे) पदार्थपकाशकाय तेन (नमः) नमोऽस्तु (ते)
तव (हेतयः ) ज्वालाः ( अस्मत् ) अस्मत्सकागात् ( अन्याः ) अन्यान्यस्मदिरो-
धिनः विरुद्धाः (तान्तु ) दहन्तु एवं त्वम् ( पावकः ) शोधका सन् (अस्मभ्यम्)
शिवः) कल्याणः (भव ) एतदर्थं च नमस्कृतेऽग्निामाकं विरुद्धान् दहत्वस्माकं
कल्याणाय भवत्वित्यर्थः। [ यजु० ३६।२०] ॥२०॥
भाषार्थ-दे अग्ने । तुम्हारे सब रसोंके आकर्षण वरनेवाले तेजस्वरूप ज्वालाके निमित्त
नमस्कार है, तुम्हारे पदार्थप्रकाशक तेजके निमित्त नमस्कार हो, मापी ज्वाला हमसे दूस-
रॉको तपाओ हमको शोधक कल्याणकारक हो ॥ २० ॥
मन्त्रः।
नमस्तेअस्तुविद्युतुनमस्स्तुतलायुलवे ।।
नमस्तेमगवनस्तुयतुलस्य सुमीहसे॥२१॥
ऽध्यायः ९.] माष्यसहिता। (१४७) ॐ नमस्त इत्यस्य दधीच ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः विद्युत्स्तनायित्नु- रूपे देवते । वि० पू० ॥२१॥ माष्यम्-( भगवन् ) हे भगवन् ! हे महावीर (विद्युते ) विद्युइपाय (स्तनीय लवे ) स्तनयित्नुः गर्जितं तद् राय (ते ) ( नमः) नमः (बस्तु ) बस्तु (यतः यतः कारणात् (स्वः) स्वर्गतुं त्वं (समीहसे ) चेष्टोऽतः (ते) तुभ्यम् (नमोऽस्तु) नतिरस्तु । [ यजु० ३६।२१] ॥ २१ ॥ भाषार्थ-हे भगवन् । आपके विद्युत्रूपके निमित्त नमस्कार हो, गर्जनारूप आपके निमि- त्त नमस्कार है, जिस कारण स्वर्गसुख देनेको चेष्टा करते हो, इस कारण आपके निमित्त वार- भार नमस्कार हो, अर्थात् आपके अनेक रूप है, आप सब प्रकार हमारे सुखके निमित्त यत्न करतेहो मापको प्रणाम है ॥ २२ ॥ मन्त्रः। यतोयतत्समीसुततोनोऽअभयङ्गुरु॥ शन्न कुरुष्प्रजाभ्योमयन्त्रपशुस्य ॥२२॥ ॐ यत इत्यस्य दवीच ऋषिः भुरिक प्राजापत्या त्रिष्टुप् छन्दः । परमात्मा देवता । वि० पू०॥२२॥ भाष्यम्-हे महानोर ( यतः यतः) यस्माद्यस्मापात् समीहसे । यहा-यस्माद्यस्मा- दुश्चरितात्त्वम् ( समीहसे ) अस्म.स्वपकर्तुश्चेष्टसे (ततः ) ततस्ततः ( नः ) अस्माकम (अभयम् ) निर्भयम् (कु) कुरु किंच (नः) अस्मांक (प्रजाभ्यः) प्रजाभ्यः (शम् ) सुखम् (कुरु कुरु (न:) अस्माकम् (पशुभ्यः) पशुभ्यः (अभयम्) भीत्यभावं कुरु । [ यजु० ३९।२२ ] ॥ २२ ॥ भाषार्य-हे भगवन् । आप निम जिस रूसे चेष्टा करते हो अथवा जिप्स जिस दुश्चरित्रसे हम को बचाने की इच्छा करतेहो, अश्वा जिस समय हमको सब प्रकार सुख करनेके निमित्त इच्छा करतहो उस उस रूपसे वा दुश्चरित्रसे या चेष्टासे हमको भयरहित करो' हमारी प्रजाओंके निमित्त सुख करो, हमारे पशुओंके निमित्त सुख कीजिय, अर्थात हमारी प्रजा और पशभय; -रहित होकर आपके दिये हुए सुखभोगमें समर्थ हो ॥ २२ ॥ मन्त्रः। सुमित्रियानुऽआपुऽओषधयत्सन्तु दुभि .
[ नवमो- (१४८) रुद्राष्टाध्यायो- त्रुियास्तम्मैसन्तुषोमान्द्रोष्ट्रयञ्च वयं द्विष्मः॥२३॥ ॐ सुमिंत्रियान इत्यस्य दीर्घतमा ऋपिः । निच्यूत्प्राजापत्या गायत्री छन्दः । आपो देवताः । जलाभिमंत्रणे वि० ॥२३॥ भाष्यम्-( आपः) जलानि ( मोषधयः) भोपधयः (न:) अस्माकम् (मुमि त्रियाः) साधुमित्रत्वेनावस्थिताः ( सन्तु ) अवन्तु ( यः ) शत्रः ( अस्मान् ) (दृष्टि) वैरै करोति (वयं च ) वयमपि ( यम् ) शत्रुम् (द्विष्मः ) हेप कुर्मः (तस्मै ) उम. यात्मकाय शत्रवे माप ओपधयश्च (सुर्मित्रियाः) अमित्रसेनावस्थिताः सन्तु । [2- जु० ३६।२३ ] ॥ २३ ॥ भाषार्थ-हे परमेश्वर ! जल वा मोपधि हमारे निमित्त सुखदायक हो, और जो हममे द्रुप करता है वा हम जिससे वेप करते हैं, उसके लिये दुःखदायक हो माशय यह कि हम तो कि- सोसे द्रोह करना नहीं चाहते पर जो हमसे द्वेप करते हैं तब हमारे मन में हेप होताह मा- पकी कृपासे द्वेषी शत्रुको ओषधि जल दुःखरूप हौं ॥ २३ ॥ तचक्षुर्दैवहितम्पुरस्तांच्छुक्काचरत्॥प- श्यम शरद शतबीयमशरद शत:शृण यामशुरद शुतंभब्बवामशुरद शुतमदीना स्यामशुरद शुतम्भू यश्चशुरद शुतात् ॥२४॥ इतिसहितायांपाठेशान्त्यध्यायः॥ मैं तचक्षरित्यस्य दधीच ऋषिः वाली त्रिष्टुप छन्दः । सूर्यों देवता । वि० पू० ॥२४॥ भाष्यम्-एतैर्मन्त्रों महावीरोऽस्माभिः स्तुतः ( तत् ) तत् ( देवाहितम् ) देवहितं स्थापितम् । यद्वा-देवानां हितं प्रियम् (शुक्रम ) शुक् पापासंसृष्टं शोचिष्मदा तत् (चक्षुः) जगतां नेत्रभूतमादित्यरूपम् ( पुरस्तात् ) पूस्यां दिशि (उच्चरत् ) उच्च- रति उदेति तस्य प्रसादात् ( शतम् ) ( शरदः ) वर्षाणि ( पश्येम अव्याहत- - ऽध्यायः १०.] माष्यसहिता । चक्षुरिन्द्रिया भवेम (शतं शरदः) (जीवेम ) अपराधीनजीवना भवम ( शतं शरदः ) शतं समाः (शृणुयाम )सष्टश्रोत्रेन्द्रिया भवेम (शतं शरदः) (प्रब्रवाम) अस्खलितवागिन्द्रिया भवेम (शतं शरदः) (मदीना:) ( स्याम् ) न कस्याप्पने दैन्यं कुर्याम (शतात् शरदः ) शतवर्षापर्यपि ( भूयः च ) बहुकालं पश्येमेत्यादि योज्यम् । [ यजुः ३६ । २४ ] ॥ २४ ॥ भाषार्थ-वह देवतामोदारा स्थापित अथवा देवता के हितकारी जगत्के नेत्रभूत शुक्ल- मलसे रहित शुद्ध वा प्रकाशरूप पूर्व दिशामें उदय होताहै, परमात्माके प्रसादसे सौ शरद पर्यन्त देखें, अर्थात् शतवर्षपर्यन्त हमारे नेत्रेन्द्रियकी गति निर्बल न हो, सो शाट् मातु भौतक अपराधीन होकर जियें, सौ शरद पर्यन्त स्पष्ट श्रोत्रइन्द्रियवाले हो, सौ शरा पर्यन्त मस्खलितवाणी युक्त हो, सौ शरद् पर्यन्त दोनतारहित हो, सौ शरदेसेि अधिक काळपर्यन्त भी देख, सुनें और जीवित रहें ॥ २४ ॥ विशेष-इसका सूर्योपस्थानमें भी पाठ होता है, यह सब. परमात्माको प्रार्थना उपासनाके मंत्र हैं ॥ २४॥ इति श्रीरुद्राष्टके पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतसंस्कृतार्यभाषाभाष्यसमान्वितःशान्स्यध्य यः ॥ अथ रुदे स्वस्तिप्रार्थनामन्त्राऽध्यायः। मन्त्रः। हरिः ॐ ॥स्वस्तिनुऽइन्द्रोवृद्धश्वेवास्वस्ति नम्पपाविश्ववेदाः ॥स्वस्तिमुस्ताक्ष्योऽम रिष्टनेमिल्खुस्तिनोबहुप्पतिर्दधातु ॥१॥ ॐ स्वस्तीत्यस्य गोतम ऋषिः । विराष्ट्र स्थाना त्रिष्टुप् छन्दः । विश्वेदेवा देवताः। पाठे विनियोगः ॥ १ ॥ भाष्यम्-(वृद्धश्रवाः) वृद्धं प्रभृतं श्रवः श्रवणं स्तोत्रं हविलक्षणमन्नं वा यस्य तादृशः (इन्द्रः) इन्द्रः (ना) अस्माकं स्वस्तीत्यविनाशनाम (स्वस्ति ) अविनाश (दधातु) विदधातु (विश्ववेदाः) विश्वानि वेत्तीति विश्ववेदाः । यदा-विश्वानि सर्व- वेदवेदांसि ज्ञानानि धनानि वा यस्य तादृशः (पूषा) पोपको देवः (ना) अस्माकम् (स्वस्ति ) स्वस्ति विदधातु (अरिष्टनेमिः) नेमिरित्यायुधनाम [ निपं०२।२० ] परिष्टोऽहिसितो नेमिर्यस्य वा यत्सम्वन्धिनो रथनेमिन हिंस्यते सोऽरिष्टनेमिरेवम्भूतः तायः वृक्षस्य पुत्रः गरुत्मान् (ना) अस्माकम् (स्वस्ति ) अविनाशं विदधातु
(१५०)
रुद्राष्टाध्यायी-
[ दशमो-
तथा (वृहस्पतिः) देवानां पतिः पालयिता (नः) अस्माकम् (स्वस्ति) अविनाश
विदधातु । [यजु० २५.१९ ] ॥१॥
भावार्थ-वृद्धश्रवा (बड़ी कीर्तिघाले ) इन हमारे निमित्त स्वस्ति विधान करें, सर्वज्ञपूपा
हमारे निमित्त स्वस्ति विधान करें, अरिष्टनेमि ताय (तादर्थ-रथ अर्यात् जो स्थकी नेमिकी
अर्थात् चक्रधारीकी गति कोई भी रोकनेमें समर्थ नहीं है, जिसको ही अरिष्टनेमि तार्थ
कहते है, यहाँपर स्थरूपसे वर्णन हुआ) हमारे निमित्त स्वस विधान करें, वृहस्पति
हमारे निमित्त स्वस्ति विधान कर ॥ १ ॥
मन्त्रः।
ॐपर्य-पृथिव्याम्पयुऽओषधीषुपयोंदिव्यु-
न्तरिक्षेपयोधात्पर्यस्वतीलाप्पदिश सन्तुम
ह्यम् ॥२॥
ॐ पय इत्यस्य लुशोधानाक ऋषिः । विराट् छन्दः । अनिदेवता ।
वि० पू० ॥२॥
भाष्यम्-हे अग्ने हे देव त्वम् ( पृथिव्याम् ) भृम्याग ( पयः ) रसम् (धा.)
धेहि स्थापय (च) (भोपधीषु ) वनस्पतिषु ( पयः ) रसम् ( धाः ) स्थापय
(दिवि ) स्वर्ग व ( अन्तरिक्षे) अन्तरिक्ष व ( पयः) रसम् (धा) स्थापय किञ्च
(मह्यम् ) मदर्थे ( प्रदिशः ) दिशो विदिशश्च (पयस्वती) पयस्वत्यो रसयुताः सन्तु ।
माहुतिपरिणामेन पृथिज्यादयो ममामीटदा भवन्तित्यर्थः । यजु०१८६३६ ] ॥२॥
भाषार्थ-पृथिवी देवी हमारे निमित्त (अर्यात् हमको देनेके लिये) रस धारण करे,
औषधिय भी हमारे निमित्त रस धारण करें, स्वर्मलोक और अन्तरिक्षलोकभी हमार निामत्त
रस धारण करें अर्थात् आहुतिके परिणामसे पृथिवी भादि हमको भगाकृपासे अभीष्ट
देनेवाले हों ।२॥
मन्नः।
विष्ष्णोररामसिविष्णोनवेस्थीवि-
प्णोत्स्यरंसिविष्णोध्यवासि ॥वैष्णुव-
मंसिविष्णवेत्वा ॥३॥
| ध्यायः १०.] भाष्यसहिता। (१५१) ॐ विष्णोरराटमित्यस्यौतथ्यो दीर्घतमा ऋषिः। याजुषी उष्णिक छंदः । विष्णुदेवता । हविधीनोपरिमण्डपकरणे वि० ॥३॥ माध्यम-हषिर्धानाख्ये हे शकटे दक्षिणोत्तरभागयोः स्थापयित्वा तदावरकत्वेन परितो हविधीनाख्यं मण्डपं कुर्यात् । स च मण्डपो विष्णुदेवताकत्वाद्विष्णुरित्युपचर्यते विष्णोश्च मूर्तिधरस्य सर्वावयवसद्भावाल्ललाटाख्योऽवयवोस्ति, तद्धविर्धानमण्डपस्यापि पूर्वदारवर्तिस्तम्भयोर्मध्ये काचिद्दर्भमाला प्रथ्यते, तां मालां तद्वन्धनाधारतिर्यग्वंश वा सम्वोध्यं पुरुष सम्बोध्य ललाटत्वेनोपचर्यते, हे दर्भमयमालाधारवंश । त्वं (विष्णोः) विष्णुमूर्तित्वनोपचारितस्य हविर्धानमण्डपस्य (राटम् ) ललाटस्थानीयः (असि ) असि है रराट्यन्तौ युवाम् (विष्णोः) विष्णुनामकस्य हविर्धानमण्डपस्य ( इनले स्था ) मोष्ठसन्धिरूपे भवथ [ द्यायोः परिषीव्यति लस्यू जनि प्रतिहतया रज्ज्या विष्णोः स्थरसीति कात्यायनः ] हे लस्यूजनि त्वम् (विष्णोः ) इविधानस्य ( स्यूरसि ) सीव्यन्तेऽनेनेति स्यू: सूचिरास [ विष्णोः धुवोसीति ग्रन्थीकरोति ] हे रज्जुग्रन्थे त्वम् (विष्णोः) हविर्धानस्य (ध्रुवः) ग्रन्थिः ( असि ) भवसि [ प्राग्वंशं हविर्धानं निष्ठाप्य षैष्णवमसीत्यालभत इति का०] हे हविर्धानत्वम् (वैष्णवम् ) विष्णुदेवताक- त्वेन तत्सम्बन्धि ( असि ) भवसि तस्मात् (विष्णवे ) विष्णुप्रीत्यर्थम् (त्वा ) त्यां स्पृशामिति शेषः । [यजु०५।२१] ॥३॥ भाषार्थ-हे तिर्यग्वंशचीर । तुम इस यज्ञियमंडपके रराटी (द्वारके दो खंभोंपर नीचेको मुख्याला अईवृत्ताकार जो तिरछा वंशचीर होताहै, उसको राटी कहते हैं, यही इस मंडपका माथारूप है) होतेहो हे रराटीप्रान्तद्वय ! तुम दोनों इस यज्ञिपमडपकी मोष्ठसं- धिरूप होतीहो हे लस्यूजनि ! (बडी सुई वा सूना) तुमही इस यज्ञियमंडपंकी सूची हो, हे रस्सीकी गांठ । तुम इस यज्ञियमंडपकी गांठ हो, इससे दृढ होवो हे प्राग्वंश ! पूर्वपश्चि- मको लम्बा करके स्थापित बांस ! इस मंडपकी छतका प्रधान अवलबन नडावांस (आडा) तुम इस यज्ञियभंडपकी छत्तके मध्यभाले प्रधान वांस हो, इस मंडपकी दृढताकी परीक्षा करनेके लिये तुमको स्पर्श करताहूँ इस मंत्रमें वंशादिमें स्थित सर्वज्ञदेवर्क मार्थना उस उस रूपसे वर्णन की है ॥ ३ ॥ मन्त्रः। ॐअग्निदेवतावातौदेवतासथ्यौदेवताचुन्द्रमा देवताबसवीदेवतादवितादित्यादेवतानुरु: तौदेवताविश्वेद्बादेवताबृहस्पतिवतेन्द्रो देवतावरुणोदेवता ॥४॥ ma
-
(१५२)
रुद्राष्टाध्यायी-
[दशमा-
ॐ अग्निरित्यस्य विश्वेदेव ऋषिः । भुरिग्ब्राह्मी त्रिष्टुप् छ ।
अग्न्यादयो देवताः इटकोपधाने वि० ॥ ४ ॥
भाष्यम्-इष्टके स्वमग्न्यादिदेवतारूपाऽसि तां त्वामुपदधामीति सर्वत्र शेषः। अग्न्या:
दीनां देवतात्वं प्रसिद्धम् । अग्निदेवता वातो देवतेत्येता वै देवताश्छन्दासि तान्य
तदुपदधातीति श्रुतेः । सर्व सुगमम् । [ यजु० १४१२० ] ॥ ४ ॥
भाषार्थ-अग्निदेवताकी प्रार्थना करताहुमा, यह इष्टकास्यापन करताहूँ १ वायुदेवताका
ध्यान करताहुआ यह इष्टका स्थापन करताहूँ २ सूर्पदेवताका ध्यान करता हुआ यह इटका
स्थापन करताहूँ ३, चन्द्रदेवताका ध्यान करता हुआ यह इप्रका स्थापन करताहूँ ४, वसु-
देवताओंका ध्यान करता हुआ यह इष्टका स्थापन करता हूँ ५, रुद्र देवताओंका ध्यान
करता हुमा यह इष्टका स्थापन करताहूं ६, मादित्य देवताओंका ध्यान करता हुआ यह
इष्टका स्थापन करताहूं ७, मस्त देवताओंका ध्यान करताहुमा यह इष्टका स्थापन करता
हूं ८, विश्वेदेवादेवताओंका ध्यान करता हुमा यह इष्टका स्थापन करताहूं २, बृहस्पतिदेव-
ताका ध्यान करताहुआ यह इटला स्थापन करताहू १०, इन्द्रदेवताका ध्यान करता हुआ
यह इष्टका स्थापन करताहूं ११, वरुण देवताका ध्यान करता हुमा यह हटका स्थापन
करताहूं ॥ १२ ॥ ४॥
ॐसुयोजातंप्रपद्यामिसुद्योजातायुवैनमो
नमः ॥मुनमधुनातिभवेमवत्खुमाभुवोद्भ
वायुनमः॥५॥
भाष्यम्-मेधाविनः पुरुषस्य ज्ञानोत्पादनाय महादेवसम्बन्धिषु पञ्चवक्त्रेषु मध्ये
पश्चिमवत्रप्रतिपादकं मन्त्रमाह-(सद्योजाताय ) एतन्नामकं यत्पश्चिमवकं तद्रूपं परमे
श्वरं (प्रपद्यामि ) प्रामोमि ताशाय (सद्योजाताय) महादेवाय (वै) ( नमः
नमो स्तु हे सद्योजात । (भवेभवे ) तत्तजन्मनिमित्तं ( मां) माम् ( न भवस्व) न मेर
येत्यर्थः । किन्ता ( अतिभवे ) जन्मातिलंघननिमित्तं ( भवस्त्र ) तत्त्वज्ञानाय प्रेरय
(भवोद्भवाय ) भवात्संसारात् उद्धत्रे सद्योजाताय (नमः ) नमोऽस्तु ॥५॥
भाषार्थ-ज्ञानप्राप्तिके निमित्त महादेवसम्बधिपं पमुखोंमें पश्चिममुख प्रतिपादकमत्रका वर्णन
करते हैं। सद्योजातनामक परमेश्वरके रूपको प्राप्त होताहू सद्योजातके निमित्त प्रणाम है,
हे देव ! अनेक जन्मोंमें मुझे मन प्रेरण करो, किन्तु जन्मके दूर करने के निमित्त तत्वज्ञानके
निमित्त मुझे प्रेरण करो। संसारके उद्धारकर्ता सद्योतजातको प्रणाम है ॥५॥
ऽध्यायः ?0.5
भाग्यसहिता।
मन्त्रः।
(१५६
वामुवायुनमोज्येष्ठायनम-श्रेष्ठायुनमों
रुद्रायुनमुः कलविकरणायुनोबलविक
रणायुनमः॥६॥बलायुनमोवलममय-
नायु नमुः सर्वभूतदमनाय नमामुनो-
न्मनायुनमः॥७॥
भाष्यम्-उत्तखकपतिपादकं मन्त्रमाह-(वामदेवाय नमः) उत्तरवकरूपः वाम-
देवः तस्यैव विग्रहविशेषाः ज्येष्ठादिनामकाः एते महादेवपीठशक्तीनां वामादीन । नवाना
पतयः पुरुषाः तभ्यो नवभ्यो नमस्कारः अस्तु ॥ ६ ॥ ७ ॥
भावार्य-उत्तरमुखका प्रतिपादक मंत्र कहतेहै-उत्तरमुखरूप वामदेवको प्रणाम है, उसीके
विग्रह ज्येष्ठादिनाम है, यह महादेवकी पीठशक्तियों के स्वामी है । वामदेव, ज्येष्ठ, श्रेष्ठ:-
रुद्र कालफल, विकरण, वलविकरण, बल, वलप्रमथन, सर्वभूतोंके दमन करनेवाले, मनोन्म-
नके निमित्त नमस्कार है ॥ ६॥ ७ ॥
अघोरेश्योथुधारयोघोरुघोरतरेभ्यः ॥
सर्वेन्युःसर्वशयिोनमस्तेअस्तुरुद्ररूपे-
यः॥६॥
भाष्यम्-दक्षिणवक्रप्रतिपादकमन्त्रमाइ-( अघोरेभ्यः ।) अघोरनामको दक्षिण-
पक्ररूपो देवः तस्य विग्रहाः अघोराः सात्विकत्वेन शान्ताः अन्ये तु (घोराः) राज-
सत्त्वेन उग्राः अपरे तु तामसत्वेन (घोरतराः ) घोगदपि घोरतराः (शर्व) हे शर्ष
परमेश्वर (ते) त्वदीयेभ्यः पूर्वोक्तेभ्यः त्रिविधेभ्यः ( सर्वेभ्यः ) ( रुद्ररूपेभ्यः )
सर्वतः संबंषु देशेषु सर्वेषु च कालेषु ( नमः ) नमः (अस्तु ) भवतु ॥ ८॥
भाषार्थ-दक्षिणवस्त्रप्रतिपादक मत्र कहते हैं-सवगुपयुक्त होनेसे अघारे, राजस होनेसे,
पोर और तामससम्बन्धसे घोरतर शर्व प्रलयमै जगत्के हरनेवाले हम आपके तीन प्रकारकै
पॉको सब देशकालमें प्रणाम करतहैं आपके रुद्र शर्व सर्व रूपोंको नमस्कार है ॥ ८॥
(१५४) [ दशमो- रुद्राष्टाध्यायी- मन्त्रः। तत्पुरुषायविद्महेमहादेवायधीमहि ॥ त नौरुद्रःप्रचोदयात् ॥९॥ भाष्यम्-प्राग्वऋदेवः तत्पुरुषनामका द्वितीयाय चतुर्थी । (तत्पुरुपाय ) तत्पुरुष देव (विद्महे ) गुरुशास्त्रमुखाजानीमा ज्ञात्वा च (महादेवाय ) तं महादेव ( धीमहि) ध्यायेम (तत्) तस्मात्कारणात् (रुद्रः) देव (न:) अस्मान ( प्रचोदयात ज्ञानध्यानार्थ प्रेरयतु ॥ ९॥ भाषार्थ-पूर्वमुखप्रतिपादक मत्र कहते हैं, तत्पुरुपदेवको गुरु शास्त्र मुखसे जानते हैं, जानकर उन महादेवको ध्यान करतेहैं, इस कारण वह रुद्र हमको ज्ञान ध्यान के लिये प्रेरणा करे९॥ मन्त्रः। ईशानः सर्वविद्यानामश्विरः सर्वभता- शाब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोधिपतिब्रह्मांशि- बोमअस्तुसुदाशिवोम्॥ १०॥ भाष्यम्-ईशानः योऽयमूर्खवको देवः सोयम् ( सर्वविद्यानाम् ) वेदशास्त्रादीनां चतुःषष्टिकलाविद्यानाम् ( ईशानः ) नियामका तथा (सर्वभूतानाम् ) अखिलपाणि- नाम् ( ईश्वरः ) नियामकः (ब्रह्माधिपतिः ) वेदस्याधिकत्वेन पालका तथा (ब्रह्मणः) हिरण्यगर्भस्य ( अधिपतिः) अधिपतिः तादृशः (ब्रह्मा) ब्रह्मा अस्ति भवृद्धः परमात्मा सोऽयम् (मे) ममानुग्रहाय (शिव:) शान्तः (मस्तु ) अस्तु (सदाशिवोम् ) स एव सदाशिवः अहं भवामि ॥ १० ॥ माषार्थ-उर्ध्वमुखदेवका प्रतिपादक मंत्र वेदशास्त्रादि विद्या मीर चौसठ कलामंकि निया- मक समस्तप्राणियोंके नियामक वेदके विशेषरूपसे पालक हिरण्यगर्भके अधिपति प्रारूप सो परमात्मा मुझपर अनुग्रह करने के लिये शान्तरूप हों में सदाशिवरूप हू यह ६ मन्त्र "तत्तरीयारण्यकके है ॥ १०॥ ॐशिवोनामासिस्वधितितापुतानमस्ते अस्तुमामाहिठसीह ॥ निवर्तयाम्म्घायु- ऽन्यायः १०.] माष्यसहिता। (द) पेन्नाधायप्रजननायरायस्पोषायसुप्र- जास्त्वार्यसुवीर्याय ॥११॥ शिवानामासाति व्याख्यातं रुद्राष्टके ६१८ मंत्रव्याख्यायाम्॥११॥ मापार्थ-शिवोनामासि इसकी व्याख्या स्त्रीके ६ । ८ मत्रमें होगई ॥ ११ ॥ मन्त्रः। विश्वानिदेवसवितदुरितानुिपरासुव॥ यद्भुदन्तन्नुऽआसुव॥१२॥ में विश्वानिदेवेत्यस्य नारायण ऋषिः। गायत्री छन्दः । सवित देवता। प्रार्थने वि० ॥ १२ ॥ भाष्यम्-(देवसवितः) हे देवसवितः ( विश्वानि ) सर्वाणि (दुरितानि) पापानि ( परामुब ) दूर गमय ( यत् ) यत् ( भद्रम् ) कल्याणम् ( तत् ) तत् (1) अस्मान्मति (आसुव ) आगमय ॥ १२ ॥ भाषार्थ:-हे सवितादेव हमारे सब पापोंको दूर करो और जो कल्याण है सो हमको प्राप्त करो ॥ १२॥ 4 ५ मन्त्रः। ဦး ॐ धौ शान्तिरन्तरिक्षुठशान्ति पृथिशी शान्तुिरापुःशान्तुिरोधयुत्शान्ति ॥वान स्प्पयुक्शान्तुिश्वेिदेवा शान्तुिबाशा न्तुिल्स ठशान्तुिलशान्तिरेवशान्तुिस्खा मा शान्तिरेधि॥ १३॥ ॐ द्यौः शान्तिरिति व्याख्यातम् रुद्राष्टके शान्त्यध्याये ॥ १३ मापार्थ-द्यौः शान्ति-इसकी व्याख्या शान्त्यध्यायके १७ मत्रमें होगई ॥ १३ (१५६) रुद्राष्टाध्यायी- [दशमोऽध्यायः । १०] मन्त्रः।। ॐ शान्तिः शान्तिः सुशान्तिर्भवतु सर्वा- रिष्टशान्तिर्भवतु॥अनेन रुद्राभिषेककर्म- णा कृतेन श्रीभगवान्भवानीशङ्करमहारुद्रः प्रीयतां न मम ।। ॐ सदाशिवार्पणमस्तु । इति स्वस्तिप्रार्थनामंत्राऽध्यायः ॥ तम् माषार्थ-शान्तिः ३ प्रकारसे शान्ति हो सम्पूर्ण अरिप्टोकी शान्ति हो इस स्द्राभित्रका मसे श्रीभगवान् भवानीशङ्कर महारुद्र प्रसन्न हों, मेरा इसमें कुछ नहीं सब शंकरका है, यह शिनीके अर्पण हो। स्वस्तिप्रार्थना में मन्त्राध्याय पूर्ण हुमा । इति श्रीरुद्राष्टके मुरादावादनिवासि प० मालाप्रसादमिश्रकृतसस्कृतार्य- भापाभाष्यसमन्वितः मत्राध्यायः ॥ दोहा। रीशंकर पदकमल, प्रेपसहित हिय लाय । संस्कृत भाषातिलकसह, कोनो रुद्राध्याय ॥ १ ॥ पडे सुन कर प्रेम जो, हे पदारथ चार । शक्ति होय श्रीशंभुकी, जो जगमे सुखसार ॥२॥ संवत् ऋतु ऋतु अंक विधु, मास आसाढ पुनीत । शुक्लपक्ष तिथि चौथ शुभ, चन्द्रवार शिवप्रीत ॥ ३ ॥ पूर्ण,कियो शुभ ग्रंथ यह, सज्जनक सुखदान । पढहिँ सुनहि कर प्रेम जो, पावहिं मोद महान ।। ४ ॥ || समाप्तोऽय ग्रन्थः ॥ जया पुस्तक मिलनका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, खेमराज श्रीकृष्णदास, लक्ष्मीवटेश्वर " स्टीम् प्रेस. "श्रीवेटेश्वर स्टीम प्रेस, खेतवाडी-मुंवा कल्याण-मुंबई,
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