Sanmati Library, Jaipur
Shrawak Pratikraman
Front matter
भूमिका। प्रतिक्रमण पाठके रचयिता कौनसे महानुभाव हैं ? इसके निश्चयका हमारे पास कुछ साधन नहीं है, तो भी श्रुतसागराचा र्यने कई जगह गौतम महर्षिका उल्लेख किया है। सहस्रनामकी टीका प्रतिक्रमणके पाठका विवरण 'उक्तं च महर्षि गौतमत्वा. मिना' इत्यादि प्रकारसे स्पष्ट किया है। ये गौतम महर्षि कौनसे ? और इस वसुंधराको किस समय पवित्र किया इस विषयका इतिहासज्ञ प्रकाश करेंगे। प्रतिक्रमणकी हस्त लिखित ( संवत् १६०५ की लिखी) प्रति ईडरके प्रसिद्ध भंडारमें है। और भी ईडरके भंडारमें अनेक प्रतिक्रमणकी प्रति मिलती हैं। मुनियों के प्रतिक्रमण पाठकी भिन्नर प्रति है परन्तु सब प्रतियोंमें कर्ताका नाम देखने में नहीं माया । अतएव इस प्रतिक्रमण पाठके कर्ताका निश्चय विचाराधीन है। प्रतिक्रमण पाठसे यह प्रतीत होता है कि यह संग्रह किया हो, क्योंकि इसमें भगवान वसुनंदी सिद्धान्त चक्रवर्तीके रचित श्रावकाचारकी गाथा मिलती है, परंतु यह बात नही है । क्योंकि प्राचीन प्रतियोंमें यह पाठ नहीं है। किसी विहानने व्रत और प्रतिमाओंका स्वरूप समझानेके लिये यह पाठ निवेसित किया हो। अस्तु जो कुछ हो । प्राचीन प्रतियोंसे यह किसी खास महर्षिका बनाया हुमा प्रतीत होता है । संभव है कि गौतम महर्षिका ही बनाया हो।
(३) प्रतिक्रमण पाठ प्रथम भावनगरसे प्रसिद्ध हुआ, फिर सठ हीराचद नेमचंद शोलापुरवालोंने मराठीमें प्रसिद्ध किया व गुर्जर भाषामें प्रसिद्ध हो चुका है इस प्रकार इसका प्रचार सर्वत्र देख नेमें आता है परतु संयुक्त प्रांत और मध्य प्रातमें इसका प्रचार नहीं है इस लिये हिंदी भाषामें प्रसिद्ध किया जाता है माशा है समस्त बन्धुगण इससे लाभ लेगें । यदि इससे कुछ लाभ हुआ तो सामायिक पाठ भी जो गौतम महर्पित संग्रहीत है प्रकाशित किया जायगा। इसमे मेरो अज्ञतासे जो कुछ भागमविरुद्धता हुई हो विहजन क्षमाकर एक पत्रसे सूचित करें नो द्वितीय सस्करणमें सुधार दी जाय। भवदीय- नंदनलाल जैन वैद्य, ईडर । - प्रस्तावना। पाठकगण ! यह प्रतिक्रमण आपके करकमलों में उपस्थित है । प्रतिक्रमण किसको कहने है ? और वह क्यों करना चाहिये यह बतला देनेसे इम पुस्तककी उपयोगता अधिक बढ जायगी। प्रतिकारका "अपने भले बुरे किये हुए ( रुतकर्म) कर्मों का आत्मनिदा पूर्वक त्याग करनेका भाव-आत्माका ऐसा विशुद्ध परिणाम कि जिसमें अशुम क्रियाओं निवृत्ति हो" यह वाच्यार्थ है । इस प्रकारके भाव भेद विज्ञानको उत्पन्न करते है । प्रतिक्रमण पट् मावश्यकोंके अंतर्गत एक भेद है । पट् भावश्यकोंका पालन करना गृहस्थ और मुनियों के लिये नितान्त आवश्यक है । इतना ही नहीं, किन्तु प्रतिक्रमण करनेसे आत्मो नतिके साथ २ भावोंकी विशुद्धि और कर्मोकी निरा सातिशय होती है। जीवमात्र सुख और शांतिका मार्ग अन्वेषण करते है । सुख और शातिका प्रधान मार्ग वीतरागता-कपार्योंकी निवृत्ति है । कषायोंकी विनय पापाचरणोंमे भय, विषयोंसे निवृत्ति, ममत्वत्याग, स्वात्मनोध और स्वात्मगुण चिन्तवन करनेसे होती है । प्रतिक. मण करनेसे उक्त पाचों कार्य स्वयमेव सिद्ध होते है । प्रतिक- मण आत्मसाधनका और निर्वाणपदका मुख्य अंग माना गया है। अनादि कालसे यह जीव हिसा, झूठ, चोरी,कुशील और परिग्रह इन पंच पापोंमें निमग्न हो रहा है। और इनसे ही जन्म मरणके भयंकर दारुण दुःखोंको उठा रहा है । प्रतिक्रमण (५) करनेसे हिंसादि व्यापारीसे ग्लानि, पापाकमासे भय और अशुभ क्रियाओं ने विरक्त बुद्धि उत्पन्न होती है। प्रतिक्रमण करने वाला भव्य जीव अपने प्रत्येक कार्यको विचारता है कि यह कार्य करनेने मेरे पापाचरणोंकी वृद्धि होगी इस लिये में इसका त्याग धरू । मानसिक व्यापार व सकर विकल्पोंसे भी वह भयभीत होता है । प्रतिक्रमण करने वाला जीव पंचेन्द्रियोंके विषयोंसे विरक्त होता है और ऐसे काग्णालापाका परित्याग करता है जो विषयों के बहानेवाले है। पापाचरण और विषयोंके सेवन करने से व्यामोह बढना है इसलिये आत्मबोध नागृत नहीं होता है । प्रतिक्रमण करनेमे पर पढार्थीये मोहका नाश होता है, इमलिये स्वात्मबोधकी प्राप्ति होती है जिससे श्री अरहत परमात्माकी भक्ति, रत्नत्रयकी पवित्र मावना पौर स्वात्म-धर्ममें दृढता प्राप्त होती है, देह भोगादिकांसे विरक्तता, कपायोंको विनय, सुख और शातिका मार्ग विकाश होता है। मन वचन और शरीर के व्यापारीका पुल परमाणुओं पर गहरा अमर पडता है । आत्मामें पायाँकी मकिगता होनेसे उन पहल परमाणुओंका मात्माके साथ घनिष्ट मबन्ध हो जाता है और वही संबंध भात्म गुणोंका सुख और मानि घात करता है। इम लिये कपायोंकी विजय काना और मन वचन कायके व्यापारोंसे रोकना ही यथार्थ सुख और शांतिका मार्ग है । प्रतिक्रमण करने से कपायोंकी विजय होती है, सुख और मार्ग विकाशको प्राप्त होता है इस लिये प्रतिक्रमण करना परमावश्यक कार्य है।
(६) प्रतिक्रमण-स्वात्म शिक्षक है इससे अपने माप अपने दुष्कृत्योंकी शिक्षा लीजासक्ती है । स्व त्म गुणों के विकाश- की शिक्षा भी मिलती है। प्रतिक्रमण करने के लिये सबसे प्रथम बाह्यशुद्धिपर पूर्ण ध्यान देना चाहिये। क्योंकि शुभाशुभ निमित्त ही मात्माको भले बुरे मार्गमे ले जानेवाले होते हैं। बाह्य शुद्धि-आत्मभावोंको विशुद्ध रखती है । इसलिये शरीर शुद्धि वचन शुद्धि और मन शुद्धि जिस प्रकार सर्वोत्तम रहे उस प्रकार वाह्यशुद्धिको करना चाहिये । भोजन शुद्धि- मनशुद्धिका कारण है इस लिये आहारपानशुद्धि, स्नानशुद्धि, वस्त्रशुद्धि, स्थानशुद्धि, निनागमकी आज्ञानुसार विचार शुद्धि और वचन शुद्धि रखनी चाहिये । अपने भावोंको विशुद्ध करनेके लिये जो कुछ भले बुरे काम किये हों उनका विचार ( स्मरण ) करना चाहिये । भविष्य में ऐसे बुरे कार्य न हों ऐसी दृढ प्रतिज्ञा करनी चाहिये । इस प्रतिज्ञाको दृहतर बनानेके लिये स्वात्म विश्वास पूर्वक वीतराग प्रभुके गुणोंकी भावना निरतर विचारना चाहिये। अपने दुष्कृत्योंको निवेदन करना चाहिये, मनन करना चाहिये और परित्यागके लिये तत्पर रहना चाहिये । प्रतिक्रमण करनेके प्रथम लघु सामायिक पाठ अवश्य करना चाहिये । नैष्ठिक श्रावक और मुनियोंके व्रत नियमसे होते हैं उनके व्रतोंमें अतीचारादि दोषोंका उद्भवाव होना सभव है इसलिये उनको अपने ब्रोंकी विशुद्धिके लिये प्रतिक्रमण करना चाहिये । परन्तु पाक्षिक श्रावकोंके व्रतमें अभ्यास मात्र ही होता है मतएक (७) व्रतोंको दृढ बनाने के लिये तथा दोपोंके विचार के लिये प्रतिक्रमण करना नितान्त आवश्यक है एवं व्रतोंकी भाना भी व्रतका एक- देश पालन करना है | प्रतिक्रमण वरनेसे व्रतोंकी (अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और परिग्रहत्याग) भावना पुष्ट होती है । प्रतिक्रमण दैनिक, रात्रिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक और माव- त्सरिक भेदोंसे अनेक प्रकार है | चातुर्मासिक और सावत्मरिक परिक्रमणमें पूरी जाप्य १०८ देना चाहिये, अवगेपमें १८-२७- ३६ भी देते हैं। प्रतिक्रमण करने में "णमोकार मत्र"को स्पष्ट बोलना चाहिये और जहांतक हो पच परमेप्टीके गुणोंका चितवन विशेष ध्यान- पूर्वक करना चाहिये । कितने ही स्थलों पर "णमो अरहंताणं" से प्रारमकर यावंति जिनचत्यानि विद्यन्ते भुवनत्रये। तावति सततं भक्त्या त्रिःपरीत्य नमाम्यह" यहां पर्यन्त पाटको पढना चाहिये। प्रतिक्रमणका समय कमसे कम दो घड़ी है । इससे कम समयमें प्रतिक्रमण नहीं होता है। ये दो घडी प्रातःकाल मध्याहकार और सायंकाल के समयकी लेना चाहिये । प्रतिक्रमण करते समय इन बातोंका विशेष ध्यान रखना चाहिये- (१) व्यापार, गृह और इष्ट वियोग अनिष्ट सयोग मंबधी आकुलताको छोड देनी चाहिये । (२) पुत्र, मित्र, भाई, बंधु, और कुटंब परिवारों की निता छोड़कर प्रतिक्रमण करना चाहिये । - (८) (३) मनको वशकर सावधानीसे प्रतिक्रमण करना चाहिये। (४) उत्साह और प्रेमसे प्रतिक्रमण करना चाहिये । मा लस्य और अनादर प्रतिक्रमणके घातक हैं। (४) आसन ठीक रखना चाहिये। परीप्रहका परिमाण करना चाहिये। (५) कायोत्सर्ग-शरीरसे ममत्व त्याग करनेके लिये उपसर्गोको जीतनेका प्रयत्न और अभ्यास डालना चाहिये । (६) णमोकारमत्र, २७ श्वासोश्वासमें जपना चाहिये । शीघता, अस्थिरता और कायरताको दूरकर प्रतिक्रमण करना चाहिये। (७) प्रतिक्रमणके लिये जिनमुद्रा (नासिकाग्र दृष्टि) का धारण करना और शांतिसे विषयकपायोंको जीतनेका विशेष उद्योग करते रहना चाहिये । (८) प्रतिक्रमण पाठको और उसके अर्थको मनन करते हुए प्रतिक्रमण करना चाहिये । (९)समस्त जीवों में प्रेमभावना, गुणीजनोंमें भक्ति भावना, दुःखी (अज्ञान और कुचारित्रसे दुःखी) जीवोंमें करुणा भावना और मात्सर्य जीवोंसे साम्य भावना रखकर प्रतिक्रमण करना चाहिये। (१०) अपने दोषोंका वार २ विचार करना चाहिये । (११) जहांपर कायोत्सर्ग आवे वहापर णमोकार मंत्रकी जाप्य ९ वार देना चाहिये परन्तु वीर भक्तिमें १८-२७- ३६-१०८ मादिका क्रम जैसा प्रतिकरण करना हो देनी चाहिये। भवदीय-मुमुक्षु जनोंका दास- नन्दनलाल जैन वद्म-ईडर ।
॥ वंदे जिनवरं ।। श्रावक प्रतिक्रम। निःसाहं जिनानां सदनमनुपमं त्रिः परीसन्य भत्त्या स्थित्वा गत्वा निपिद्धशुचरणपरिणताऽन्तःशनैईस्तयुग्मम ।। भाले संस्थाप्य बुद्धया मम दुरितहरं कीर्तिये शक्रया । निंदा दूर समाप्त क्षयरहितम ज्ञानभानुं जिनेन्द्रम् ।। १ ॥ अर्थ-परिग्रहका परिमाणकर भव्य जीव अनुपम श्री जिनेंद्र देवके मदिरमें जाकर प्रथम तीन प्रदक्षिणा करे, और भक्तिसे भगवान्के दक्षिण हाथ तरफ बिन होकर ' जय जय जय,' निम्सही निस्सही निस्सही, इस प्रकार उच्चारणकर अति विनय अपने दोनों हार्थोको मस्तक पर रखकर पाप नाग करनेवाले, निदाने रहित, अविनाशीम, पापवित्र और ज्ञानले मृय ऐसे श्री मिनराजको वारम्बार नमकारकर, उनके गुणोंका अनन्य भावसे चिंतवन करे। भावार्थ-प्रतिक्रमण ( लगे हुए दोपोंकी विशुद्धि पूर्वक म्याग भाव ) स्वात्मज्ञान विना नहीं होता है । म्बात्मनान उत्पन्न होनेके लिये, मोहा त्याग करना नितांत आवश्यक है । महका त्याग-पर वस्तुओंत परिमाण अथवा पर वन्तुमार त्याग करने होता है । इस लिये प्रतिक्रमण करने के प्रथन ममन्न प्रकारके परिग्रहका परिमापा जाना चाहिये । इसका कारण एक यह भी है कि दोपोंकी निति राग हषके अभावले होती है। रग और पदोनों पर वस्तुओं [२] संबंधसे ही होते हैं । इस लिये परिग्रहका परिमाण करना अति भावश्यक है मोह रहित, परम विशुद्ध, परमगांत, अनंत सुख सहित, सर्वज्ञ और त्रिलोक पूज्य अरहंत भगवान् अमूर्तीक (आत्मा-अमूर्तीक होनेसे अतीन्द्रिय है ) आत्माका प्रत्यक्ष अनुभव करा रहे हैं। इस लिये प्रतिक्रमण करनेवाले भव्य जीवोंको स्वात्म-बोध प्राप्त होने के लिये अरहंत प्रभुके गुणोंका चितवन करना चाहिये, जिससे स्वात्म-बोधकी प्राप्ति हो और दोपोंसे ग्लानि उत्पन्न हो, यद्यपि बद्धकर्म दोषोकी ग्लानिसे नियरित नहीं होते, त्यापि पापाचरणसे भय, और आत्मोन्नतिकी विशुद्ध भावना स्वयमेव प्रकट होती है। पडिकमामि भंते, इरियावहियाए, विराहणाए अणागुते अइगमणे, णिग्गमणे ठाणेगमणे, चकमणे, पाणुग्गमणे विज्जुग्गमणे, हरिदुग्गमणे उच्चारपस्त- चण खेलसिंहाणयवियडिपईठावणियाए जे जीवा ए- इंदियावा, इंदिया वा, तेइंदिया वा, चारिदियावा, पंचेंदिया वा, पण्णोल्लिदावा, पेल्लिदावा संघदिदावा. संघादिदावा, उद्दादिदावा, परिदाविदावा, किरिच्छि- दावा,लेसिदावा, छिदिदावा, भिदिदावा,ठाण दोवा ठाणचंकमणदोवा,तस्युत्तरगुण तस्लपायच्छित्तिकरणं तस्स विसोहिकरणं जाव अरहंताणं भयवंताणं णमो- प्रारं पज्जुवासं करेमि तावकायं पावकम्मं दुचरियं वोस्सरामि॥
[] भावार्थ-प्रतिक्रमण करनेका मुग्न्य कारण यह है कि मात्मामें साम्यभाव, आत्म विशुद्ध भावना और समस्त नीव मात्रमें मंत्री भावनाकी नाप्रति | और यह इसी लिये पालिक, नैष्टिक, साधक और पूज्य मुनीश्वर निरंतर करते हैं। प्रतिक्रम- णकी दृढताके लिये अणुव्रत, महाव्रत और समितियोंका पालन किया जाता है। अम्यामके लिये समितिया श्रावकलोक भी न्यूनाधिकतासे पालन करते हैं। समितियोंका पालन करनेपर भी सूक्ष्म जीवोंकी बाधा होना संभव है । इस लिये प्रतिक्रमण करते समय यह विचार करना चाहिये कि यत्नाचार पूर्वक गमन करने पर मुझसे जिन जीवोंकी विराधना हुई हो यह मेरी कायरता है, मैं अपनी इस मशक्तिसे उत्पन्न हुऐ दोषोंकी आत्मग्लानि पूर्वक (मिच्छामि दोकण) छोडना चाहता हूं। प्रमाद और अनानतासे गमन करनेमें, विना प्रयोजन इयर उधर भटकनेमें, व्यापारार्थ सचित्त भृमिपर गमन करनेमें, मोहसे समस्त प्रकारके भारंभ करनेमें, कुन्सित स्थान (जिम स्थानपर अनायास ही जीव वाधा हो) पर विहार करनेमें, विमत्म (कद फाद आदि) गमन करनेमें, प्राणियोंसे परिपूर्ण मुनिपर गमन करनेमें, हरित वनस्पति शैवाल, कीचड, और अनंतकाय मिस भूमिमें निवास करते हों ऐसे स्थानपर गमन करनेमें, अनंत जीव वाली भूमिपर मलमूत्रका क्षेपण करनेमें, लार, कफ और यक वाली भूमिपर कूदने में और आर्दित भूमिपर कार्य करने में नो पद्रिय दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवोंको मैंने पीडा दी हो, पेलिकर दुख दिया हो, एकत्रितकर त्राप्त दिया । [१] हो, संघट्टितकर नाश किये हों, उपद्रवकर आघात पहुंचाया हो, संतापित किये हों, क्लेशित किये हों, लेसिढिये हों, लीपदिये- हो, (पाद) पावसे कुचलदिये हों, घसीटकर हानि पहुंचाई हो, लकडीसे पीटे हों, अस्त्रशस्त्रसे छेदे हों, अंगोपांगोंको काटा हो, स्थानांतरकर दुखित किये हों, मानसिक पीडा दी हो, अपहरणकर दुख दिया हो, बचनसे मम छेदन किया हो । कुमार्गमें लगाकर पतित किये हों और मिय्या मार्गका उपदेशकर अनत दु.खोंके समुद्र में गिराये हों, इत्यादि अनेक प्रकार जीवोंको कष्ट दिया हो उन समस्त कर्मोका मै इस समय विशोधन करता है। अपनी अज्ञान और प्रमाद दशासे क्षोभित होता हूं । अत्मग्लानिसे भय. भीत हू । हिसाके कार्योसे डरता हूं। मेरी आत्मासे अब किसी जीवको बाधा न हो ऐसी दृढ भावना "सत्वेपु मेत्री"का वार २ चिन्तवन करता हूं। आत्मशक्तिका ऐसा विकाश चाहता हूं कि जिससे मै सब जीवोके साथ साम्यमाव प्रगट कर सकू और सबका उत्कर्ष धारण कर सक। मैं अपने कत कर्मो (किये हुए कर्मों)का पश्चात्ताप करता हूं मेरेसे जिन जीवोंको दुख प्राप्त हुआ है उसके लिये मैं समवेदना प्रकट करता हूं। और मेरे मनने इतनी विशुद्धि हो कि अव मुझसे भविष्यमें ऐसा अनिष्ट किसी जीवका न हो । जब तक भगवान् अरहंत प्रभुका प्रतिपादित णमोकार मंत्र नववार स्पष्ट उच्चारण न कर लू तवतक समस्त पापर्म, दुष्टस्त्य और शरीरसे ममत्व भावको छोडता हू। (नोट-९ वार णमोकार मंत्रकी जाप २७ श्वासोश्वासमें देनी) [५] इपिथे प्रचलताद्य मया प्रमादा- देकेन्द्रियप्रमुखजीवनिकायवाधा ।। निर्वतिता यदि भवेदयुगांतरे वा मिथ्या तदस्तु दुरितं गुरुभक्तितो मे ॥१॥ अर्थ-ईपिय पूर्वक गमन करनेपर भी आन मुझसे प्रमाद और अज्ञानके वश एकेन्द्रिय प्रभृति जीवोंकी जो विराधना हुई हो, वह अरहंत परमात्माकी भक्तिमे मिथ्या हो। करचरणतनुविधाताद्दतो निहितः प्रमादतः प्राणी। ईर्यापथमिति भीत्या मुश्चेत्तदोष हान्यर्थम् ॥ २ ॥ अर्थ-शरीर और हाथ पाव आदि अवयवोंकि इधर उधर हिलानेसे, प्रमादवश जिन जीवोंको कष्ट हुआ है, वह मैं अपनी ईयोपथकी विशेष सुन्हिके लिये प्रतिक्रमण कन्ता ई । और उसमे उत्पन्न हुए पापोंको मिथ्या चाहता हूं। इच्छामि भंते इरियावहियस्स आलोचेर्ड पुवुत्तर दक्षिण पच्छिम चदिसु विदिसासु विरह- याण जुगंतर दिहिणा वा उवडवचरियाए पमादोसेण पाणभूदजीवसनाण उवघादी कदो वा कारिदो वा, कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥३॥ अर्थ-हे प्रभो : अत्र में पाप कमांसे अत्यंत भयभीत हो गया हूं। इस लिये चारों दिशा और विदिशाओंमें ईर्यापय पूर्वक गमन करते हुए जो पापकर्म मुझसे हुआ है उसकी मैं बार २ आलोचना करता हूं। प्रमाद तथा दृष्टिदोपसे जीवोंका पान [१] स्वयं किया हो, दूसरेसे कराया हो, अन्यके करनेमें मला माना हो इत्यादि सब कार्योसे उत्पन्न हुए मेरे दोप मिथ्या हों। प्रतिक्रमणकी महिमा । जीवे प्रमादजनिताः प्रचुराःप्रदोषाः। यस्मात्प्रतिक्रमणतः प्रलयं प्रयांति ॥ तस्मात्तदर्थममलं गृहियोधनार्थ । वक्ष्ये विचित्रभवकर्मविशोधनार्थम् ॥१॥ अर्थ-जीव प्रमाद और अज्ञानतासे अनंत (दोप) पाप कर्म करते हैं। प्रतिक्रमण करनेसे उन दोषोंकी शांति हो जाती है इस लिये कत कर्मोकी शुद्धिके लिये यह प्रतिक्रमणका स्वरूप गृह- के लिये प्रतिपादन किया जाता है। भावार्थ-प्रतिक्रमण करनेसे मनकी शुद्धि, किये हुए कर्मोकी निनरा, और दोपोंसे भय उत्पन्न होता है। पापिष्ठेन दुरात्मना जडधिया मायाविना लोभिना। रागद्वेषमलीमसेन मनसा दुष्कर्म यन्निर्मितम् ॥ त्रैलोक्याधिपतेजिनेन्द्र भवतः श्रीपादमूलेऽधुना। निंदापूर्वमहं जहामि सततं वर्वर्तिपुः सत्पथे ॥२॥ अर्थ-हे त्रैलोक्य प्रभो ! हे जिनेन्द्र ! मैं बड़ा पापी, दुष्ट, अज्ञानी (जडबुद्धि), मायाचारी और लोभी हूं। मैंने अपने मनको रागद्वेषसे मलिनकर अनंत दुष्कर्म किये हैं। हे जिनराज ! भब मैं आपके चरण कमलोंकी शरण लेकर आपके समक्ष उपस्थित [७] हुमा हूं। और सन्मार्गमें चलनेके लिये वाध्य होता है तथा भविष्यमें मुझसे कृत्सित कम न हों, ऐसी मेरी इच्छा है। खम्मामि सव्वजीवाणं सब्वे जीवा खमंतु मे। मैत्ती मे सव्वभूदेसु वैरं मझ ण केणवि ॥3॥ अर्थ-में समस्त जीवापर क्षमा करता है । और मुझे भी सब जीव क्षमा करो। मेरी समस्त जीव मात्रमें मित्रता हो । मेरे साथ किसीका भी वर नही है। भावार्थ-साम्यभाव धारण करनेके लिये सबसे प्रथम यह भाव- श्यक है कि अपने मनकी अत्यंत विशुन्द्रि करे और वह इस प्रकार- किमनको विकारित करनेवाले क्रोध, मान, माया, लोभ, ईपी आदि दुगुणोंको हृदयसे निकाल डाले, किसीने भी अपना अनिष्ट निया हो तो भी उसके ऊपर क्षमा धारण करे । इतना ही नहीं किन्तु उसके साथ बंधुत्व भाव रहे । कदाचित अपनेसे किसीका अनिष्ट होता हो तो उससे अपने अपराधको क्षमा चाहे और भविष्य जीवमात्रको अपना बंधु समझकर किसीसे विरोध न कर साम्यमाद धारण करना चाहिये। रागबंध य दोषं च हरिस्सं दीणभावयं । उस्सुगत्तं भयं सोगं रदि मरिदं च वोस्सरे ॥४॥ अर्थ-मै रागसे किया हुआ फर्मबंध, अनिष्ट संयोग और इष्ट वियोग होनेसे उत्पन्न हुआ द्वेष, विषय प्राप्तिसे उत्पन्न हुमा और दीनता, अभिमानसे उत्पन्न हुआ मदोन्मत्तता, इस लोक और परलोक सम्बन्धी भय, इप्ट वियोगसे उत्पन्न हुमा शोक, परवस्तुकी नाकांक्षा रूप मनोविज्ञारसे उत्पन्न हुमा रतिभाव, [८] और भरतिभाव मादि समस्त विकार भावोंको छोडता है। इस प्रकार समस्त,पर द्रव्यसे राग-द्वेष, हर्प-विषाद, आदि व्यामो- हताका परित्याग करे । और आत्माकी परम विशुद्ध अवस्थाका विचार करे। हा दुकयं हा दुट्ट चिंतियं भामियं च हा दुह । अंतो अंतो उनमामि पच्छुत्तावेण यंतो ॥६॥ अर्थ-हाय ! हाय ! मैंने दुष्ट कर्म किये, हाय ! हाय !! दुष्टे कर्मोका वारवार चितवन किया। हाय ' हाय !! मैंने दुष्ट मर्मभेदक वचन कहे । इस प्रकार मनवत्रन और कायकी दुष्टतामे मेंने अनंत कुत्सित कर्म किये । इन कार्योंके बदले अब मुझे अत्यंत पश्चताप होता है और इस अजान दगामे मंग अंत.करण अत्यंत क्लेशित हो रहा है। मैं कन कर्मोका जैसे स्मरण करता हूं वैसे मुझे मेरी आत्मापर अतिशय ग्लानि उत्पन्न होती है और पश्चाताप होता है। नोट-परम पवित्र भरहंत भगवान्के समक्ष इस प्रकार अपने मन वचन कायसे किये हुए दोपोंको कहे, आलोचना करे, गर्दा करे, और आत्मनिंदा पूर्वक प्रतिक्रमण को । दव्ये खेत्ते काले भावे य कदा वराहसोहणयं । जिंदणगरहणजुत्तो मणवचिकायेण पडिकमणं ६ अर्थ-द्रव्य क्षेत्र काल और भावके निमित्तसे किसी जीवकी विराधना अथवा प्राणपीडा हुई हो, वह मैं आत्मनिदा और गहीं (दोषोंको चितवन पूर्वक ग्लानिका होना ) पूर्वक मन वचन कायकी शुद्धिसे परित्याग करता हूँ ।
ये [९] एइंदिय वैदिय तेइंदिय चरदिय पचेंदिय पुढ- विकाइय, आउकाइय, नेउकाइय, वाउकाइय, वण- फदिकाइय, तस्सकाइय पर्देसि उद्दावणं परिदावणं चिराहणं उवधादो कदो वा कारिदो वा कीरंती वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुकहं । अर्थ-एकेन्द्रिय जीव (जिनके एक स्पर्ग ही इन्द्रिय होती है) दो इंद्रिय जीव (जिनके स्पर्श और रसना ये टो इद्रिय हों) तीन इन्द्रिय नीव (जिनके स्पर्ग, रसना और घाण ये तीन इन्द्रिय हों) चार इन्द्रिय जीव (जिनके म्पर्श, रसना, घाण और चक्षु चार इन्द्रिय हों) पाच इन्द्रिय जीव (जिनके म्पर्ग, रसना, घाण, चक्षु, और श्रोत ये पांच इन्द्रिय हो ), पृथ्वीकाय, नलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और ब्रस (दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पचेन्द्रिय जीवोंको त्रम कहने है । ) कायके जीवोंको मैंने स्वतः मारे हों, दुसरेसे मगये हों, अन्यके मारने पर अनुमोढना की हो, अथवा रक्त प्रकार के जीवोंको सताप दिया हो, दूसरेसे संताप दिलाया हो, अन्यके संतापित करनेमें सहमत हुआ हो। अथवा प्राणियोंके अंगोपांगका वियोग किया हो, कराया हो, करतेको भला माना हो इत्यादि अनेक प्रकार मुझसे जिन जीवोंको पीडा हुई है, उससे उत्पन्न हुए पाप कर्माका परित्याग करता है । मन वचन काय और न कारित अनुमोदनासे जिन जीवोंका घात मुझसे हुआ है वह निरर्थक हो।
- [१०] दसण वयसामाइय पोसह सचित्त रायभत्तीय। बन्भारंभ परिग्गह अणुमणमुद्दिठ देसविरदो य॥ एयासु यथा कहिद पडिमासु पमादाइकया। इच्चारं सोहणहं छेदोव्वट्ठावणं होउ मझ्झं ॥ अर्थ-दर्शन १ व्रत २ सामायिक ३ प्रोषधोपवास ? सचित्तत्याग ५ रात्रिभुक्तत्याग १ ब्रह्मचर्य ७ भारंभत्याग । परिग्रहत्याग ९ अनुमतित्याग १० और उद्दिष्टत्याग ११ इस- प्रकार श्रावककी ग्यारह प्रतिमा होती है। इन प्रतिमाओंका व्यक्त रूप अथवा समस्तरूप अभ्यासरूप अथवा व्रतरूप पालन पाक्षिक, नैष्ठिक श्रावक करते है । प्रतिमा धारणा चाहे किसी प्रकार हो परंतु संभव है कि प्रमाद और अज्ञानसे अतीचार-अनाचार अथवा व्रतमंगरूप दोष लगे हों, उसकी मैं उपस्थापना करता हूं। अरहंत सिद्ध आयरिव उवज्झाय सव्वसाहु सस्कियं सम्मत पुव्वगंसव्वदं दिढव्वदं समारोहियं मे भवदु मे भवदु मे भवदु । -अर्थ-अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधु इन पंच परमेष्ठीकी साक्षीपूर्वक सम्यक्त सहित उत्तम व्रतोंकी दृढता मेरे हो । सम्यग्दर्शन सहित सदाचारकी प्राप्ति मेरे हो। देवसिय पडिक्कमणाए सव्वाइचार सोहिणि- नोट-१ प्रतिक्रमण चार प्रकार होता है। देवसिक (दि- वस संबंधी), रात्रिक (रात्रि संबधी), पाक्षिक (१५ दिन संबंधी), (मासिक-चातुर्मासिक और सावत्सरिक) यदि दिवसका करना है तो देवसिय शब्द लगाओ। यदि रात्रिका प्रतिक्रमण करना है तो - ५ - मित्तं पुव्वापरियकमेण आलोयण सिरी सिन्ह भत्ति काउस्सगं करेमि । राइय शब्द लगाओ। जैसा प्रतिक्रमण करना हो वैसे शलकी योजना यहां पर करनी चाहिये। २ मतीचार-व्रतादिकोंका पालन करनेमें बाह्याभ्यंतर कार- गोंके लिये व्रतोंकी दृढता रखते हुए भी कुछ भंगरूप दोषोंका उत्पन्न करना अतीचार है। मंगामंगवृत्तिको अतीचार कहते हैं। अनाचार-मनमें कुछ विकार होना । और ऐसे प्रमादसे व्रतमें शिथिलताका होना अनाचार है। व्रतभंग-व्रतका एक देश छेद करना व्रत भंगता है। और अनर्गल ( स्वेच्छाचार पूर्वक ) प्रवृत्ति होकर स्वच्छंद रहना व्रत नाशता है। व्रतका पालन-मन वचन काय और रुत कारित अनुमोदनासे होता है। ब्रोंके पालन करनेके लिये बाह्याभ्यंतर शुद्धिकी विशेष आवश्यकता होती है। माम्यंतर शुन्हिके लिये मनकी पवित्रता प्रधान कारण है । मानसिक ग्लानिसे ही प्रायः व्रतोंमें मतीचार लगते हैं। इस लिये मनको सदेव शुद्ध रखना चाहिये । बाह्य शुद्धि भी व्रतोंको स्थिर करने में प्रधान कारण है। चंचल बुद्धि कुछ सहन निमित्तके मिलने पर ही चलित हो जाती है। और मन तथा आत्माके ऊपर अपना अधिकार नमा लेती है। यह सब जानते हैं कि संगतिका असर तत्काल होता है "चित- नाभ्यासनिबंधने रेता गुणेषु दोपेषु च जायते मति. " इसलिये बाह्यशुद्धि पर ध्यान रखना चाहिये ।
[.१२] अर्थ-दिवस सवधी शारीरिक, मानसिक और वाचनिक कार्य करने में जो दोष मैंने किये हों, उनका प्रतिक्रमण करता हूं । और अपने मनकी विशुद्धिके लिये अपने किये हुए दोर्पोकी वार २ आलोचना करता हूं। दोपोंसे सर्वथा मुक्त श्री सिद्ध परमात्माका स्वरूप चिन्तवन कर सिद्ध भक्तिमें लीन होता हूं । नोट-सिद्ध भक्तिके लिये ९ वार णमोकार मंत्रकी जाए देना चाहिये। और-णमो अरहताण, णमो सिदाण, णमो आयरीयाण, णमो उवन्आयाणं णमो, लोए सव्वसाहूणं । चत्तारि मंगलं, अरहत मंगलं, सिद्धमंगलं, साहूमंगलं, केवलिपण्णतोघम्मोमंगलं । चत्तारि लोगोत्तमा, अरहंत लोगोत्तमा, सिद्ध लोगोत्तमा, साहुलोगोत्तमा केवलिपण्णतोषम्मोलोगोत्तमा । चत्तारिसरणं पम्बन्जामि, अरहंत सरणं पव्वज्जामि, सिद्धसरणं पव्वजामि, साहुसरण पव्वजामि, केवलि पण्णत्तो धम्मो सरणं पव्वजामि । अढाईदीवदो समुद्देसु पण्णारस कम्मभूमीसु जाव अरहताणं भयवंताणं आदियराणं तिथ्थयराणं जिणाणं जिणोत्तमाणं केवलियाण सिद्धाणं युद्धाणं परिणिब्बुदाणं अंतयडाणं पारयडाणं धम्मायरियाणं १ अढाई दीप और पढ़ह कर्मभूमिमें होनेवाले सयोग केवली, (अरहत) संसारके भयको नाश करनेवाले तीर्थकर, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, और सर्व साधु ये पाच परमेष्ठी है । ये सत्य मार्गका प्रत्यक्ष अनुभव कराते है। इसलिये इनकी साक्षी पूर्वक सम्पग्दर्शन ज्ञान चारित्रको धारण करता हू। दूसरोंको इस सत्यमार्ग पर चलनेका उपदेश करूगा । मुझसे इस मार्गमे चलते हुए अतीचार आदि शेष लगे हों उनकी शुद्धिके लिये मन पचनकायकी विशुद्ध भावनासे आत्मनिंदा पूर्वक त्याग करता है। - [१३] धम्मदेसयाणं धम्मणायगाणं धम्मवरचावरंगचाव. होणं देवादिदेवाणं णाणाणं, दसणाणं चरित्ताणं सदा करोमि किरियम्मं करेमिभंते पडिकमणं साय- जोगं पच्चकामि जावनियम निविहेण मणसा वचिया कायेण ण करोमि ण कारमि अण्णपि। करंतण समणुमणामि तस्स भत्ते अड्चारं पडिक- मामि जिंदामि गरहामि अप्पाणं जाय अरहताणं भयवंताण पामोछारं पज्जुवासं करेमि तावकार्य पावकाम हुचरिय वोस्सरामि । थोत्साम्यह जिणवरे तिध्ययरे केवली अणंत जिणे। परपवर लोयमहिए विहुयरयमले महप्पणे ॥ लोयम्मु जोययर धम्मं तित्थंकरे जिणे बंदे । अरहते कित्तिस्से चउदीसं चेव कवलिणा ।। 1 कर्म नल रहित, त्रिलोक पूज्य और जानमे परिपूर्ण तीर, पेचली भगवान और फेवली प्रणीत जिन धर्म पुन पुनः निरज का वदना करता है । मरमादि योगन्त यनुमिति टेपको मा गतिर पहना करता है। ये चौवीस भगवान् जन्म मरणादि समस्त टोप गदित, परन शाति, अनत सुसपन, मगलमय, सोकोत्तम, और मात है। हिन्द परमात्मा नी सनम्न धर्म मल रहिव, पाम मिद, शुद्ध वन्य रय, नतगुणों विंड है। शुभमाका प्रत्यक्ष र दी भक्ति से प्राप्त होता है। तीया पली, पाम -गानी मृति होने योगी है। जिन चत्यालय यह धर्मका आयतन है। इसलिय में प्रनि- क्रमण करते समय तीधर, रेवली, सिद्ध जिन वर्म, जिन यान्यो पदना करता है। ।
[१४]
उसहमजियं च वंदे संभवमभिणंदणं च ।
सुमईच पोमप्पहं सुपास जिणं च चंदप्प चंदे ॥
सुविहिं च पुष्फयंत सीयलसेयं च वासुपूजं च ।
विमलमणंतं भयवं धम्म संतिं च वंदामि ।
कुंथु च जिणवरिदं अरं च मल्लिं च मुणिसुब्वयं च।
णमि चंदे अरिढणेमि तपासं वदमाणं च ।
एवमए अभिच्छुपा चिहुयरयमला पहीणजरमरणा॥
चवीसपि जिणवरा तित्थयरा मे पसीयतु ।
कित्तिय वंदिय महिया ऐदे लोगोत्तमाजिणा सिद्धा।
आरोगाणाणलाहं दितु समाहिं च मे बोहिं ।
चंदेहिं णिम्मलयरा आईचा उहियं पयासंता।
सायरमिव गंभीरा सिडासिङ मम दिशंतु।
यावंति जिन चैत्यानि विद्यन्ते भुवनत्रये ।
तावंति सततं भक्त्या त्रिः परीत्य नमाम्यहं ॥
नोट-'णमो भरहताणं . यहासे प्रारंभ कर
नमाम्यहं " पर्यन्त मूल पाठको पढ़कर नव वार नमस्कार मत्रकी
जाप्य देना चाहिये। और यह भी स्मरण रखना चाहिये कि
जिस २ स्थान इस पाठका उल्लेख किया हो वहा पर यह पाठ पढ
कर जाप देकर कायोत्सर्ग करना चाहिये ।
श्रीमते वर्द्धमानाय नमो नमितविहिष।
भूत्वा
त्रैलोक्यं गोप्पदायते॥
अर्थ-मोहादि भयंकर शत्रुओंका नाश करनेवाले, और
लोकको जाननेवाले ऐसे श्री वर्धमान भगवान के लिये नमस्कार है।
॥ विपरीत्य
यद् ज्ञानान्तर्गतं
[१५] तवसिहे गयासिन्डे संजममिन्हे चरित्तसिद्धेय। णाणम्मि दंसणम्मिय सिडे सिरमा णमंसामि॥ अर्थ-तप, नय ज्ञान, संयम, चारित्र, ज्ञान और दाना- दिसे सिद्ध पदको प्राप्त हुए मिह परमात्माको नमस्कार है । इच्छामि भने मिन्हभात्ति काउस्सगो कर तस्सा लोचे सम्मणाण सम्मदसण सम्मचरित्त जुत्ताणं अठ विहकम्म विप्प मुकाणं अट्ट गुणविह कम्मविप्पमुक्काणं, अगुण संपण्णाणं उद्दलीय- म्मिधयन्मि । पयट्टियाणं तव मिहाणं णसिहाणं संजमसिन्हाणं चरित्तसिन्हाणं मम्मणाण मम्म- दसण सम्मचरित्त सिडाणं अतीदाणागद वह- म्माणकाल तय सिम्हाणं मध्य सिम्हाण सयाणिच कालं अंचेमि पूज्जेमि वदामि णममामि दुवक्खर कम्मक्खउ वोहिलाहो सुगह गमण ननाहिमरणं जिणगुण सपत्ति होउ मज्झ । इच्छामि भंते देवसिय आलोक मिशभक्ति कायोत्सरग कमि। अर्थ-हे भगवन् : मै सिद्धमकि धारण करनेके लिये दिवस संबंधी कृत कामी आलोचना करता है। सम्यग्दर्शन मन्यग्नान सम्यक्वारित्रमयी, आट कम रहिन, आठ गुण महित, लोकके अंत मागमें विराजमान तप ज्ञान संयम सम्यकचारित्र दर्शन और परमव्या- नादि उत्तम गुणोंसे सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हुए भून, भविष्य और [१६] वर्तमान काल संबंधी समस्त सिद्ध भगवानकी मैं अभ्यर्थना करता ह, पूना करता हूं, गुणोंका चितवन करता हूं, वदना करता हूं, नमस्कार करता है। सिद्ध भक्तिसे मेरे दुःखोंका नाश, सम्यग्दर्श- नज्ञान चारित्रकी प्राप्ति, सुगति गमन, समाधिमरण और मिनगुण प्राप्ति हो। भावार्थ-मेरी आत्मा सिद्धात्माके समान शुद्ध अनंत गुणमय, सम्यग्दर्शन ज्ञानचारित्रमयी निष्कलक और अक्षय है । परंतु कर्ममल विकृत रूप हो रहा है । " मेरो आत्मा परम शांत और सुखी हो" इस भावनाकी सिद्धिके लिये सिद्धभक्ति धारण करता हूं । इस प्रकार सिद्धोंके गुणोंका चिन्तवन कर आत्मस्व- रूपका विचार करते हुए अपने दोपोंकी आलोचना करे । (९ वार नमस्कार मंत्रकी जाप्य देकर सिद्ध भक्तिका कायोत्सर्ग धारण करे। श्रावककी ग्यारह प्रतिमाओंका स्वरूप । पचुपर सहियाई सत्तवि वसणाई जो विवजह । सम्मत विशुद्धमइलो दलण सावट भणिओ ॥१॥ अर्थ-पाक्षिक, नेटिक और साधक इस प्रकार श्रावको तीन भेद हैं। पाक्षिक श्रावक-वह हो सक्ता है जो सबसे प्रथम श्री जिनंद्र देवके प्रतिपादित सात तत्वोंका यथार्थ श्रद्धान करे । क्योंकि धर्मकी मूल भीति श्रद्धा है-विश्वास है। विना इसके धर्म- पथका अनुयायी हो नहीं सकता। इसका कारण एक यह भी है कि सुख-शांति और प्रेम ये तीनो धर्मके अग है और ये विना [१७] विश्वासके यथार्य नहीं हो सकते है । इस लिये जिन आज्ञाको हृदयसे धारण करता हुआ कषायोंके घटानेके लिये ( कपाये ही 'आत्मस्वरूपके प्रकट होने में बाधक है ) सदाचारका पालन करे। पाक्षिक श्रावक "जिनदर्शन १, जलगालन २, रात्रिभोजन त्याग ३, पांच उदवर (वडफल-पीपलफल-फलमर-पाकरफल-उदंबर) त्याग ४, मद्यत्याग ५, मधुत्याग ६, मासत्याग ७ और जीव दया प्रतिपालन ८ ये आठ मूल गुणोंका पालन करता है । अभ्यासके लिये पाच अणुव्रत ( हिंसा-यूट-चोरी-कृशीलका त्याग और परित्रहका परिणाम ), तीन गुणवत, चार शिक्षावत आदि व्रतोंका पालन करता है । सप्त व्यसनों (जुआ खेलना, मांस भक्षण, मद्य पान, शिकार खेलना, चोरी करना, वेश्यागमन करना और पर स्त्री सेवन करना ) को उभय लोक दुखदायक समझकर सेवन नहीं करता है । अभक्ष मेवन भी नहीं करता है । पाह्य और आभ्यतर शुद्धिके लिये पूण प्रयत्नशील होता है । पट् आवश्यक ( देव पूजा १ गुरु उपासना २ स्वाध्याय करना ३ संयम पालन करना ४ तप धारण करना ५ और सुपात्रको दान देना ६ ) कर्मो को नियमित करता है। ये सब कर्तव्य पाक्षिक श्रावकके है। इन कर्तव्यके साथ धार्मिक नीति और व्यवहार नीति भी पालन करना चाहिये । सबसे प्रथम पाक्षिक श्रावकको २५ दोष रहित सम्यक् दर्शन निर्दोष पालन करना चाहिये । नैष्ठिक श्रावक उक्त समस्त कर्तव्योंको पूर्ण रूपसे पालन करता है तथा सम्यग्दर्शनकी विशुद्धि विशेष रखता है। ग्यारह प्रतिमायें नैष्ठिक तथा साधक श्रावककी होती है । दर्शन प्रतिमा
[१८]
धारण करनेवालोंके भी उक्त कर्तव्य हैं।
पंच अणुव्वयाइं गुणव्वयाई हवंति तह तिणि ।
सिक्खाव्वयाईचत्तारिविजाणि विदियम्मिवाणम्मि
अर्थ-पांच अणुव्रत, तीन गुणवत, और चार शिक्षाव्रतोंको
जो नियमसे पालन करता है वह व्रत प्रतिमा धारक है।
पाणादिवादि विरदि सच्च मदत्तस्स वज्जणं चेव ।
थुलयड बंभचेरं इच्छाये गंथपरिमाण ॥शा
अर्थ-स्थूल हिंसा-झूठ-चोरी कुशीलका त्याग और परिग्रहका
परिमाण ये पांच अणुव्रत है।
जे तसकाइय जीवा पुव्व णिदिठाण हिंसि दव्वा ।
ए इंदिय विणुकारण तं पढ़मं वदं थूलं ॥४॥
अर्थ-जो आखोंसे दीख सकें, ऐसे उस जीवोंको नही मारना
तथा विना प्रयोजन एकेन्द्रिय जीवोंकी हिंसा नहीं करना सो
प्रथम अहिसाणुव्रत है।
अलियण जंपणीयं पाणिवह करंतु सच्चवयणपि ।
रोयेण य दोलेण य य विदिय वयं थूल ॥५॥
अर्थ-राग द्वेषसे अनीति वचन नहीं कहना, और ग्नि
वचनोंवे कहनेसे किसी जीवकी हिसा होती हो रेमा सत्य वचन
भी नही बोल्ना सो सत्याणुव्रत है।
पुरगामि पट्टणाइ पडियं णच णिहियवीमरीयं।
परव्यमगिण्ह तरह होग थूल वय लिहिए ॥६॥
[१९] अर्थ-नगर, ग्राम और चोडाया आदिमें पडा हुआ, मूला हुआ, गिराहुआ, पराया ( अन्यका) द्रव्य नहीं लेना सो मचौ- र्याणुव्रत है। पव्वेसु इत्धि सेवा अणंगकीडा सयाविवज्जंतो। यूलयड वंभचारी जिणहिं भणिओ पवयणम्मि ७॥ अर्थ-पर्वके दिवसोंमें सर्वथा स्त्री मात्रका त्याग करना, पर- स्त्रीका सेवन नहीं करना, और अनग क्रीडा नहीं करना सो ब्रह्म- चर्याणुव्रत है। जं परिमाणं कीरह धण धापण हिरण्ण कंचणाईणं । ते जाण पंचमवयं णिहिट मुवासयाज्जयणे ८॥ अर्थ-धन, धान्य, रत्न, सुवर्ण आदि परिग्रहका परिमाण करना सो पस्ग्रिह परिमाण नामका अणुव्रत है। इस प्रकार ये पाच अणुव्रत हैं। पुव्वुत्तरदक्षिण पच्छिमासु काजण जोयण पमाणं । परदो गमणणियत्ती दिसि गुणव्वयं पढमं ॥९॥ अर्थ-पूर्वोत्तरादि चारों दिशामें परिमाणकर उसके बाहर नहीं जाना सो प्रथम गुणव्रत दिव्रत है। वयभंगकारणं होई जन्मि देसम्मि तत्व णियमेण । कीरइ गमणणियत्ती तं जाण गुणव्वय विदियं ॥१०॥ अर्थ-दिग्वतके आभ्यंतर दिशाओंकी मर्यादाकर बाहर नहीं जाना तथा जिस देशमें व्रतके भंग होनेकी संभावना हो ऐसे देशमें नहीं जाना सो द्वितीय देशव्रत नामक गुणव्रत है।
[२०]
अयदंड पास विक्किय कूडतुला माणकूड परिमाणं।
जं संग हो ण कीरइ तं जाण गुणव्वयं तिदिय ॥१२॥
अर्थ-अनर्थदण्ड पापोपदेश, हिंसादान, दुःश्रुति, अपध्यान
और प्रमादचर्या भेदसे पाच प्रकार है । तथापि इसके मनत भेद
होते हैं, इन सवका यही अभिप्राय है कि जिन कार्योंसे कुछ
प्रयोजन विशेष सिद्ध न होता हो और हिंसा तथा क्लेश परिणाम
अधिक होते हों ऐसे लोहेके शस्त्र, लाठी मादि हिसाका व्यापार,
झूठी तराजू, खोटे वाट आदिसे व्यापार आदिका त्याग करना सो
तृतीय गुणव्रत है।
जं परिमाणं कीरइ मंडण तवुल गंध पुफ्फाणं ।
तं भोयविरइ भणिय पढम सिक्खावयं सुत्ते ॥१२॥
अर्थ-भोग और उपभोगसे विषयोंका सेवन होता है ।
भोग उसे कहते हैं जो एकवार भोगनेमें आवे । शरीरको श्रृंगार
करनेवाली चीजें, पान, सुगधित पदार्थ तेल इत्र पुष्पादिका परि-
माण करना सो भोगविरति शिक्षाव्रत है।
सगसत्तीए महिला वत्थाभरणाण जंतु परिमाणं ।
तं परिभोय णिव्वुत्ती विदियं सिक्खावयं जाणे १३
अर्थ-बार२ भोगने में आवे उसे उपभोग कहते हैं। उपभो-
गरूप स्त्री, वस्त्र, आभरण आदिके सेवन करनेका नियम करना
सो दूसरा शिक्षाप्रत है।
अतिहिस्ल सविभागो तिदियं सिक्खाक्यं सुणेथव्व।
तत्थ वि पंचाहियारा या सुत्ताण मग्गेण ॥१४॥
[२१] अर्थ --उत्तम मध्यम और जघन्य भेदसे पात्र तीन प्रकार हैं। पात्रमें च्यार प्रकारका दान देना तथा चैत्य, चैत्यालय, सिद्ध- क्षेत्र, शास्त्र, स्वाध्यायालय, विद्यालय, औषधालयमें दान देना सो तृतीय शिक्षाक्त है। घरिऊण वत्थमेत परिग्गह छडिऊण अवसेसं । सगिहे जिणालये वा तिविहाहारस्स दोस्सरणं ।। जंकुणदि गुरुपयासे सम्ममालो इऊण तिविहेण । सल्लेहणं चउत्थं सुत्ते सिक्खावय भणियं ॥ अर्थ-वस्त्रमात्र परिग्रहको रखकर अवशेष समस्त परिग्रहका त्यागकर अपने घरमें अथवा जिनालयमें सरलेखना धारण करे । फल सिद्धि समाधि मरणसे ही होती है इतना ही नहीं किंतु समाधि मरण आत्म सिद्धिका अंतिम उपाय है- सुगतिका बीज है । समाधि मरण विधि-प्रतिकार रहित मरणके कारण उपस्थित होने पर साम्यभाव और शातिसे धैर्यपूर्वक, क्रोधादि विकार रहित शरीरका विसर्जन करना समाधि मरण है। और उसकी सिद्धि के लिये क्रमसे तीन प्रकारके आहारोंका त्याग कर गर्म जल अथवा तक (छाछ-मट्ठा ) का सेवन करे, और मनावश्यक्ता होने पर उसका भी त्याग करे । अपनी पर्यायमें किये हुए भले बुरे कर्मोकी आलोचना पूर्वक प्रतिक्रमण करे, पश्चात्ताप करे, और सबसे क्रोधादि विकार भावोंकी क्षमा मांगकर शातिसे णमोकार मंत्रका ध्यान घरता हुआ शरीरको छोडे । यह चोथा सल्लेखना नामका शिक्षावत है । इस प्रकार दूसरी प्रतिमा धारण करनेवाला श्रावक इस वारह व्रतोंको पालन करता है।
[२१] । तीसरी सामायिक प्रतिमा। जिणवयण धम्म चेइय परमेडिजिणालयणं णिच्चंपि। जं वंदणं तिआलं करेइ सामाइयं तंखु ॥ अर्थ-बाह्य और आभ्यंतर शुद्धिको धारणकर, पूर्व अथवा उत्तर दिशाकी तरफ मुखकर, एकान्त निर्भय स्थानमें, १२ आव- तको करता हुआ ४ प्रणाम (दिशावर्ती चैत्य चैत्यालय मुनि मादिको ) चारों दिशामें करे और स्थिर मन वचन कायसे समता पूर्वक सामायिक करे । सामायिकमें कुत्सित ध्यन और चिंतना छोड देनी चाहिये । जिनदेव, निनबचन, जिन धर्म, जिनालय और पंच परमेष्टीके गुणोंका चिन्तवन, ध्यान, वंदना स्तुति आदि त्रिकाल करना सो सामायक है । समतासे राग द्वेष और उसके उत्पादक कारणों का परित्याग करना सामायिक प्रतिमा है ! उत्तम मझ्झ जहण्णं तिविहं पोसहविहाण मुद्दिष्ट । सगसत्तीएमासम्मि चउसु पव्वेसु इकायव्वं ।। अर्थ-प्रोषधोपवास उत्तम मध्यम और जघन्यके भेदसे तीन प्रकार है। उत्तम वह है जिसमें धारणा और पारणाके दिवस एकासन पूर्वक उपवास करना, इसमें समस्त प्रकारके आरंभका त्याग करदेना चाहिये । निर्भय होकर निःशल्यता पूर्वक पंच परमेष्ठीका व्यान धरना चाहिये । मध्यम समस्त हिंसक आरंभको छोड़कर उपवास करनेसे होता है । जघन्य आम्ल अथवा एक अन्नको ग्रहण कर स्वाध्यायादिसे शांति लाभ करता हुमा धर्मसेवन करनेसे होता है। पर्वके दिन प्रोषधोपवास करना चौथी प्रतिमा है।
[२३] जंवजी जदि हरियं तय पत्त पचाल कंद फल वीय। अप्फासुगं च सलिलं सचित्तणिवित्तिमं ठाणं । अर्थ-सचित्त वस्तु-हरित अंकुरपत्र, फल, कंद, बीज और अप्रासुक जलादि सेवन नहीं करना सो पंचम प्रतिमा है। मण वयण काय कदकारिदाणुमोदहिं मेहुणंणवधा। दिवसम्मि जो विवजदि गुणम्मि सी सावउ छेदो।। अर्थ-मन वचन काय और कृतकारित अनुमोदनासे दिव- समें मैयुन सेवन नहीं करना सो छट्ठी प्रतिमा है। पुवुत्तण विवहाणंपि मेऊणं सव्वदा विवजंतो। इथिकहादि णियत्ती सत्तमया गुण वभचारी सो। अर्थ-नव प्रकारसे स्त्री मात्रा त्याग तथा स्त्रो कथादिका भी त्याग करना सो सातमी प्रतिमा है। जं कि पि गिहारंभं व उथो वा सया विवजेदि। आरंभ णिवित्तमदि सो अट्ठम सावओ भाणिओ। अर्थ-थोडा बहुत गृह संबंधी आरंभ छोडना सो आठमी प्रतिमा है। मुत्रूण वत्यमेत्तं परिग्गह दंडिऊण अवसेसं। तथवि मुच्छण करेदि जाणिसो सावओ णवमो॥ अर्थ-वस्त्र मात्रको रखकर अवशेष परिग्रहका त्याग करना सो नवमी प्रतिमा है। पुठोवा पुच्छे वा णिय गेहि परेहि सगिहकजे । अणुमणणं जोणकरेदि वियाण सो सावओ दसमो
[२४]
अर्थ-जो अपने अथवा अन्यके गृहकार्य सबंधी आरंभमें
अनुमति नहीं देता है, सो दशमी प्रतिमा धारक है।
एयारसम्मि ठाणे उक्किठो सावओ हवई दुविहो ।
वत्येक धरो पढमो कोवाण परिग्गहो विदिओ॥
अर्थ-उत्कृष्ट श्रावकके क्षुल्लक ऐल्लक ऐसे दो भेद है।
प्रथम वस्त्रका रखनेवाला और दूसरा कौपीन मात्र रखनेवाला है।
तव वय नियमावासय लोचं कारेदि पिच्छगिण्हेदि।
अणुवेहा धम्मझाणं करपत्ते एक ठाणाम्म ||
अर्थ-उभय प्रकारके उत्कृष्ट श्रावक तप, व्रत, नियम, संयम
ध्यान, और प्रथमकी समस्त प्रतिमाएं सदाचार नियमसे पालन
करता है। निर्दोष आहार एक समय पाणिपात्रमें लेता है । कषा-
योंका विजयी एकादश प्रतिमा धारक है।
इस प्रकार संक्षेपसे पाक्षिक नैष्ठिक श्रावकका सदाचार है।
इस सदाचारके पालन करनेसे उभय लोककी सिद्धि होती है।
इतना ही नहीं किन्तु यह सदाचार नीतिमय होनेसे राजभयादि
रहित पूर्ण सुखका सत्य मार्ग है ।
इच्छमे जो कोइ दिवसिओ अइयारो अणा-
पारो तस्स भंते पडिकमामि पडिक्कम तस्स में
सम्मतमरणं समाहिमरणं पंडितमरणं वीरियमरण
दुक्खक्खड कम्मखउ दोहिलाही सुगइगमण समा-
हिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मझ्झं ।
अर्थ-इस प्रकार उक्त व्रतोंमें मुझसे दिवस संबंधी अती-
----
[२५]
हू
मे
चार लगे हों उसका प्रतिक्रमण करता हूं। इससे यह भी चाहता
कि समाधिमरण आदि उत्तम गुण प्राप्त हों।
दसण वय सामाइय पोसह सचित्त रायभत्तय ।
वंभारंभ परिग्गह अणुमण उद्दिढ देस विरदोय ॥
एयासु यथा कहिद पडिमासु पमादाइ कया-
इ चार सोहणटुं छेदोवट्ठाणं अरहंत सिह आयरीय
उपज्झाय सव्वसाहु सक्खियं सम्मत पुव्वगं सु.
व्वद दिढव्वद समारोहियं में भव भवदु
भवदु।
अथ देवसिय पडिक्कमणाए सव्वाइचार विसो-
हिणिमित्तं पुवायरियकमेण पडिकमण भत्ति
कायोत्सरगं करोमि ॥
(णमोकार मत्रकी जाप्य ९ वार )
इस प्रकार कायोत्सर्ग (णमोकार मत्रकी नाप्य ९ वार )
देकर पुन 'णमो अरहताण, यहासे प्रारंभकर यावंत मिन चैत्यानि
इस श्लोक पर्यन्त मूल पाठ पढ़कर पुन: कायोत्सर्ग धारण करे ।
णमो अरहंताणं णमो सिहाणं णमो आयरीयाणं ।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोएसव्वसाहणं ॥
णमोजिणाणं ३ णमो णिसीहीए ३ णमोथुए
मममंगलं अरहंत सिड बुद्ध णिरय णिम्मल सममण
शुभमण सुसमत्थ समजोगसमभाव सल्लघटाणं २
णि भय णिराय णिहोस णिम्मोहणिम्मम णिस्संग
[२ti णिसल्लमाणमायमोसमृरणे तवपहावण गुणरयण सीलसायर अणंत अप्पमेय महदि महावीर वट्टमाण बुद्धिरिसिवेदि। णमो युद्दे मममंगल अरहंताय सिडाय युद्धाय जिणाय केवलिणो ओहिणाणिणो मणपजयणाणिणो चउदसपुवगामिणो सुदसमिदिसमिडाय तवोय वारस विहो तवसी गुणाय गुणवंतोय महारिसितित्य तित्थंकराय पवयणं पवयणीयं णाणं णाणायं इंस दसणीयं संजमो संजदाय विणओ विणीयदय वंभ- चेरवासो बंभचारयि गुत्तीओचेव गुत्तिमंताय मुत्ति- योचेर मुत्तिमंतोय समिदीञ्चेव समिदियंतोय सुसमय परसमय परसमय विदूखंति खवगाय खंति- मंतोय खीणमोहाय स्खीणवंतोय योहिय युद्धाय बुद्धिमंतोय चेयरूक्खाय चेड्याणि उदृमहतिरियलोए सिडायदणाणि णमसामि सिद्धणितीही याउ अहा- वय पच्वदे सम्म णिचंते चंपाएं पावाए मझिमाए इत्यिवालियस्सहाय जाड अणा काउदि सिड णिसिहीयाउ जीवलोचम्मि इसिपच भरतलगयाणं सिद्धाणं वुडाणं कम्मचक्क मुक्काणं णीरयाणं णिम्म- लाणं गुरु आइरिय उवझायाणं पुब्बतित्थेर कुलय- राण चाचणेय सवण संघोय भरहेरावएसु दसस पंचसु महाविदेहसु लोग संति साहुओ संज तवसी एदे मम मंगलं पवित्तं एदेहं मंगलं कर [२७] भावदो विशुद्धोसिरसा अहिवंदिऊण सिद्धकाउणं अंजलि मच्छयमि पडिलेहिय अठकत्तरिउ तिविह तियरयण सुद्धोत्थ ॥ अर्थ-हे जिनराज ! आपके लिये नमस्कार है। स्तुत्य-वंद- नीय, मंगलमय अरहंत भगवान् मेरा मंगल (कल्याण) कीजिये। हे महावीर ! आपका स्तवन करता हूं। आप...राग, दोष । मोह, ममत्व-परिग्रह, शल्य,-( माया मिथ्या निदान ) और कपाय रहित हो । आपने साम्यभाव धारणकर समस्त कर्मोका नाश किया है । शुभ भावोंको धारणकर निर्भय हो गये हो। आपके तप ही प्रधान योग है, इस लिये आप गुण-रत्न हो, शीलके सागर हो, अप्रमेय हो, महान् हो, मुनि महर्षि और ज्ञानीजनोंसे पून्य लोक शिरोमणि सर्वज्ञ हो । कर्ममल रहित सिद्ध हो ( भविष्यमें ) शुद्ध हो, अनंतगुणोंके पुंज हो, प्रभो मुझे मंगल करो। केवली, अरहंत, तीर्थकर, अवधिज्ञानी,मन.पर्ययज्ञानी, श्रुत- केवली, शास्त्रज्ञानी, पवित्रतप और तपके धारक यतीश्वर, गुणी (ऋद्धिधारी मुनीश्वरको गुणी कहते हैं ),गुणवान् , महर्षि, सिद्धा- न्त, सिद्धान्तज्ञानी, ज्ञानी सम्यग्दृष्टि, सयमी, विनय करने योग्य, ब्रह्मचारी, गुप्तिधारक, समिति पालक स्वसमयके ज्ञाता, क्षीणमोह ज्ञानी, ऋपि, महर्षि और ऋद्विधारक, मुनीश्वर मेरा कल्याण करो। तीन लोकमें जितनी जिन प्रतिमा, जिन चैत्यालय, सिद्धक्षेत्र और तीर्थक्षेत्र है उनको मैं नमस्कार करता हू। अष्टापद, संमेदाचल, गिरनार, चपापुर, पावापुर, हस्तनापुर मादि तीर्थोसे और विदेह " [२८] क्षेत्र तथा समस्त कर्मभूमिसे जितने जीव कमलरहित सिद्ध, वुद्ध, और निर्मल हो गये हैं वे चारों प्रकारके संघको मंगल करो, नोट-मूल प्रतिक्रमण पाठमें अष्ट मूलगुणोंका पडिक्कमण नहीं लिखा है। पाक्षिक श्रावकके मूलगुणमें मतीचार अना- चार अवश्य ही लगते हैं। अतएव पाक्षिकोंको नीचे लिखा पाठ प्रतिक्रमण करते समय अवश्य ही पढना चाहिये। (१) हे भगवान् ! मैंने मूलगुणोंको पालन करते समय मद्य (दारु)के त्यागमें अचार (अथाणा), चलित दही, छाछ, कांनी और आसवों (मर्क)का सेवन किया कराया और सेवन करने अनुमति दी इस सम्बंधी अतीचार अनाचार जो मुझसे दिवस संबंधी लगा हो उसका मैं प्रतिक्रमण करता हूं। (२) हे भगवान् ! मैंने मूलगुणोंका दूसरा भेद मांप त्याग व्रतमें चाममें रखा हुआ घी, तेल, पानी सेवन किया हो, सडा हुआ अन्न, चलित आटा, आदि पदार्थ हींग (चांममें रखकर आती है।) तथा मांस मिश्रित औषधी सेवन की हो उस संबंधी अतीचार अनाचार मुझसे हुआ हो उसका में प्रतिक्रमण करता हूं। (३) हे भगवान् ! मैंने मूलगुणोंका तीसरा भेद म त्यागमें हरे (लीले) फूल ( ऐसे फूल निनमें मिठासके लिये बहुतसे त्रस जीव माकर निवास करने हों) आदि सेवन किये हों इत्यादि । तत्संबंधी में प्रतिक्रमण करता हूं। (४) हे भगवान् ! पंचोदुंवर त्यागमें अज्ञात फल, चलित फल, विना शोधे देखे कच्ची फली, तथा क्षुद्रफल (निसमें हिंसा [२९] पवित्र करो, शांति करो । विशुद्ध भावनासे मैं अष्टाग ( हाथ पैर मस्तक और छाती ) नमस्कार करता हूं। मेरे कर्मोका नाश करो। अधिक हो और फल अल्प हो जैसे-वेर ) आदि सेवन किये हों तत्सम्बधी मतीचार इत्यादि० मै प्रतिक्रमण करता हूँ । (५) हे भगवान् ! मैने मूलगुणका पाचवा रात्रिभोजन नामक गुणके पालन करने में दो घडो ( सूर्योदयास्त ) के अनतर पदार्थीका सेवन किया हों, अथवा औषधि निमित्त बनाकर रसादि सेवन किये हों तत्सबधी अतीचार मुझसे लगा हो उसका मै प्रतिक्रमण करता है। (६) हे भगवन् ! मैने मूलगुणका छट्ठा भेद जल गालन नामक गुणके पालन करने में दो मुहर्त व्यतीत हो जानेपर भी विना छने (गले) पानीका उपयोग किया, जीवाणी ( विनछन ) जहासे पानी लाया गया वहा पर नहीं पहुंचाया, मलिन और सछिद्र वस्त्रसे जल छाना, जीवाणी ( विनछन ) का विचार नहीं किया तत्संबंधी अतीचार इत्यादि, उसका में प्रतिक्रमण करता हूँ । (७) हे भगवान् ! मैंने मूलगुणका सातवा भेद जिनदर्शनके पालन करनेमें प्रमाद किया, अविनयसे कार्य किया, मन, वचन और कायकी शुद्धि नहीं रखी इत्यादि अतीचार अनाचार मुझसे लगे हों उसका मैं प्रतिक्रमण करता हूं। (८) हे भगवान् ! मैने मूलगुणका आठवां भेद जीवदयाके पालन करने में प्रमाद और अज्ञान रखा, विना प्रयोजन जीवोंको सताया, अंगोपाग छेदे इत्यादि अतीचार मुझसे लगा हो । तत्स- बंधी में प्रतिक्रमण करता हूँ। १ [३०] इस प्रकार सात व्यसनोंमें जो जो दोप लगाये हों उनका भी विचारकर आलोचना पूर्वक प्रतिक्रमण करे । पडिकमामि भने दंसण पडिमाए संकाए कं- ग्वाए विदिगिच्छाए परपासंडपसंसणाए पसंचए जो मए देवसिओ अचारो अणाचारो मणसा व- चिया काएण कदो वा कारिदो दा कीरंतो दा सम- णुमणिंदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं । है भगवान् त कौका पश्चात्ताप पूर्वक प्रतिक्रमण करता है । दर्शन प्रतिमाके पालन करनेमें जिनमार्गमें शंका की हो, शुभाचरण पालनकर संसार सुखकी आकांक्षा (निदान) की हो, धर्मात्माओंके मलिन शरीरको देखकर ग्लानि की हो, मिथ्या मार्ग और उसके सेवनेवालोंकी प्रशसा की हो, इत्यादि को मैंने दिवस संबधी अतोचार मन वचन कायसे किये हों, कराये हों, अन्यके करनेमें अनुमति प्रदान की हो तत्संबंधी समन्त कार्योंकी आलोचना करता हूं, धात्ताप करता हूं और वे कर्म निरर्थक हों, ऐसी इच्छा करता है। पडिकमामि भते वद् पडिमाए पढसे यूलयडे हिंसाविरदिवदे वहेण वा बंधेण वा, छएण वा इ. भारारोपणेण वा, अणपाणगिरोहेण वा जो मए देवसिड अइचारो अणाचारोमणसा,वचिया,कारण कदो वा कारिदो वा कीरतो या समुणुमाणदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥
[३१] अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने कृतकर्मों की आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता है । दूसरी व्रत प्रतिमाके अंतर्गत प्रथम महिंसाणुव्रतके पालन करनेमें जीवोंको बांधे हों, मारे हों, अंगोपांग छेदे हों, शक्तिसे अधिक बोझ लादा हो और भन्न पानका निरोध किया हो, इत्यादि अनेक मतीचार अनाचार दिवस संबधी मुझसे मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनु- मोदनसे लगे हों वे निरर्थक हों, ऐमी मेरी भावना है। पडिकमामि भंते वद पडिमाप विदिये थूलयडे असचविरदिवदे मिच्छोपदेग्मेण वारहे अभखाणण वा कूडलेह करणेण वा णासावहारेण वा सायार- मंतभेषण वा जो मए देवसिउ अइचारो अणाचारो मणसा वचिया कापण को वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमगिंदो तस्स मिच्छामि दुकह ।। हे भगवान् । अपने रुत कर्माकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूं। दूसरी प्रतिमाके अतर्गत स्थूल सत्यव्रतमें मिथ्या उपदेश देनेसे, एकातमें कही हुई वातको प्रकट कर देनेसे, झूठा लेख लिखनेसे, धरोहर हरण करनेसे, किसीके इंगित चेन्टासे अभिप्राय समझकर मे प्रकट कर देनेसे इत्यादि अनेक प्रकार अतीचार मनाचार मन, वचन, काय और छत, कारित, अनुमोदनासे हुऐ हों वे निरर्थक हों । पडिकमामि भंते चद पडिमाए तिदिये थूलयडे थेणविरदिवदे थेगपओगेण वा, थेणहरियादाणेण [३२] वा, विरूद्धरजाइक्कमणेण वा, हीणाहियम्माणुमाणेण वा पडिख्वय बवहारेण वा जो भए देवसिउ अइ. चारो अणाचारो मणसा वचिया कायेण कदो वा कारिदो वा कीरतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छा. मि दुक्कड॥ अर्थ-हे भगवन् ! मै अपने कृत कर्मोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुमा प्रतिक्रमण करता है। दूसरी प्रतिमाके अतर्गत स्थूल अचौर्याणुव्रतके पालन करनेमें दिवस सबन्धी मन, वचन, काय, और कृत, कारित, अनुमोदनासे चोरीका प्रयोग बतलाया हो ( स्वयं तो चोरी न की हो परंतु दूसरोंको ऐसा व्यापार वत- लाना जिससे वह चोरी करे) चोरसे अपहरण की हुई द्रव्य ग्रहण की हो, राज्यके विरुद्ध कार्य किया हो (वस्तुओंका कर चुराया हो,रेलकी टिकिट आदिमें चोरी की हो,राजाकी आज्ञा भग की हो) तोलनेके वांट कमती बढती राखे हों, और अधिक कीमती वस्तु में अल्प कीमती मिलाकर बदले दी हों, इस प्रकार अनेक दोष किये हों वे सब निरर्थक हों। पडिकमामि भते वद पांडेमाए चउथे थूलपडे अवंभचिरादिवदे परविवाहकरणेण वा इत्तरियागम- गेण वा परिग्गहिदा परिग्गहिदागमणेण वा अणंग- कीडणेण वा कामत्तिव्वामिणिवेसेण वा जो मए देवासिउ अइचारो अणाचारोमणसा वचिया काएण कदो वा कारिदो कीरंतो वा समणुमणिंदो तस्स मिच्छामि दुकडं ॥
[३३]
अर्थ-हे भगवान् ' मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोपोंकी आलो-
चना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुमा प्रतिक्रमण करता हूं । दूसरी
त्रत प्रतिमाके अतर्गत स्थूल ब्रह्मचर्याणुव्रतके पालन करनेमें
दिवस संबधी मन, वचन, काय और रुत, कारित, अनुमोदनासे
अन्यके पुत्र पुत्रियोंका विवाह ( कन्यादानके करने में महान् धर्म
होता है ऐपा अन्य धर्मवाले मानते है ) किया हो, व्यभिचारिणी
स्त्रोके घरके माथ व्यवहार आना जाना आदि रखा हो, वेश्या
कुमारिका और विधा इत्यादिक परिग्रहीत और अपरिग्रहीत
स्त्रियों के साथ ज्ञामवासनासे व्यवहार ( बोलना हसना आदि )
किया हो, काम मेवन के अग सिवाय अन्य अगसे काम चेष्टा की
हो, काम तीव्र विज्ञान विभत्स विचारा हो इत्यादि अनेक
प्रकार के दोप दिवम सबधी मुझमे बने हों, दुपसे कगये हों,
अन्यक कानेमें हां म ना हो सो मम मिया ह।।
पडिलमामि भते वद पडियार पंचने कृयडे
परिन्गहररिमाणनंद खतरण परिमाणाइक्ष्मण
वा धणधण्माण परिमाणाइमण वा हि ग्णसु.
वण्णाण परिमाणाटकमणेत दादालीदामाण परि-
माणाहमण कुप्यपरिमाणाइकमणेण वा जो
मए देवसिउ अइचारो मणता वचिया कारण
कदा या कारिदो वा कीरंतो वा सलणुमणिदो
तस्स मिच्छामि दुकई॥
अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने ब्रोंमें लगे
हुए
दोषोंको
आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिकरण करता है । दू-
[३४] सरी प्रतिमाके अतर्गत स्थूल परिग्रह त्यागव्रतमें जमीन (क्षेत्र) घर, गाय बैल प्रभृति धन और गेहू आदि धान्य, सुवर्ण, चारी, दासी, दास, वस्त्र, और भांड (वर्तनादि ) इत्यादि समस्त परि- अहके परिमाणका मैने मन वचनकाय और कृतकारित अनुमोट- नासे उल्लंघन किया हो, अन्यसे कराया हों, अन्यके करने में अनुमति दी हो तो, उस संबंधी समस्त दोष मिथ्या हों। पडिकमामि भंते वदपडिमाए पढमे गुणव्यदे उडवईकमणेण वा अहोवईकमणेण वा, तिरियवई- कमणेण वा खेत्तवद्धिएण वा सदि अंतराधाणेण वा जो मए देवसिउ अइचारो मणसा बचिया काएण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समगुम- णिदो तस्स मिच्छामि दुकड ॥ अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने ब्रतोंमें लगे हुए दोपोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हू । मैने ब्रत प्रतिमाके अतर्गत गुणव्रतका प्रथम भेट दिग्नत नामक व्रतके पालन करनेमें ऊर्ध्व दिशाका अतिक्रमण किया हो, नीचे की दिशाका अतिक्रमण किया हो, तिर्यदिशाका अतिक्रमण किया हो, क्षेत्रकी मर्यादा वहाई हो, अथवा मर्यादाका विस्मरण किया हो, इत्यादि अनेक प्रकारके दोष दिवस सवधी मैने किये हों, और अन्यके करनेमें अनुमति दी हो तो वे सब मिथ्या हों। पडिक्कमामि भंते वद पडिमाए विदिए गुणव्वद आणयाणेण वा विणिजोगेण वा सद्दाणुवाएण वा स्वाणुवाएण वा पुग्गलखेवेण वा जो मए देनमिर [३५] अइचारो मणसा पचिया काएण कदो वा कारिदो वा करंतो वा समणुमाणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं । अर्थ-हे भगवन् ! मैं अपने व्रतमें लगे हुए दोपोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूं। दूसरी प्रतिमा के अंतगर्न गुणवतका दूसराभेद देशव्रतके पालन करने में, मर्यादा किये हुए क्षेत्रके बाहरसे बस्तु मगाई (किसी प्रयो- जनसे कहीपर गमन होता है मर्यादाके नाहर यदि किसी वस्तुको लानेका हमारा अभिप्राय है और वह वस्तु स्वय न जाकर अन्यसे मगवाई तो मर्यादाके बाहर जानेका प्रयोजन सिद्ध हुमा परंतु प्रत्यक्ष व्रत भंगके भयसे स्वयं गमन नहीं किया इस लिये यह भगामंग वृत्तिरूप अतिचार है। ) हो । मर्यादाके वाहर वस्तु भेजी हो, ककर पत्थर फेंककर अन्य मनुष्यसे मर्यादाके बाहरका कार्य किया हो, शन्द आदिकी समस्या दिखलाकर कार्य किया हो, अपना रूप दिखलाकर मर्यादा वाह्यका कार्य सिद्ध किया हो, इत्यादि अनेक दोष मन, वचन, कायसे दिवसमें मैंने किये हों, अन्यसे कराये हों अथवा अन्यके करनेमें अनु- मति प्रदान की हो तो वे सब मिथ्या हों। पडिकमामि भंते वदपडिमाए तिदिए गुणव्वदे कंदप्पेण वा कुक्कुचिएण मोक्खरिएण वा असम- किवयाहिकरणेण वा भोगोपभोगाणत्यकेण जो मए देवसिउ अइचारो मणसा पचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुकाई॥
अर्थ-हे भगवन् ! मैं अपने ब्रतोंमें लगे हुए दोपोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूं। दुसरी व्रत प्रतिमाके अंतर्गत गुणवतका तीसरा भेद अनर्थदण्डविरति व्रतमें रागके उदयसे स्मित हास्यसे थट्टा की हो, कुत्सित भाषण किया हो, शरीरकी खोटी चेष्टा की हो, विना प्रयोजन स्वाद किया हो, व्यर्थके कार्य किये हो (प्रयोजन विना हिंसा जनक व्यापार क्यिा हो) भोगोपभोगकी सामग्री अपेक्षासे बहुत ही अधिक निष्काम संग्रह की हो । इत्यादि अनेक प्रकारके दोष मन वचन कायसे दिवसमें मैने किये हों, अन्यसे कराये हों अथवा किसीके करनेपर हर्ष प्रदर्शित किया हो तो वे सब दोष मिथ्या हो। पडिकमामि भंते वदापाडिमाप पढमे सिवावा- बदे फासिदिय भोगपरियापाइपणेण या रसणि- दिय भोजपरिमाणाइकमण वा घाणिदिन भोग- परिमाणाइजनज वा अविवादिव भोगपरिमाणा- इकामण या लवणिदिय भोगपरिनाणाइसरगण वा सोभए देवपि अइचारो मणला पचिया कारण कदो वा जारिदो वा कीरंतो वा तमणुम- णिदो तरह मिच्छानि दुकाडे । अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोपोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूं। व्रत प्रलिमाके अंतागत प्रथम शिक्षाव्रत भोगपरिमाण व्रतमें स्पर्श इद्रिय, (चर्म-इसका गर्म, शीत, हलका, भारी, रूक्ष, निग्ध, कोमल, कठिन )विषय है और इस विषय संबंधी भोग-(मो एकबार [३७] भोगनेमें नावे ऐसे पदार्थोके परिमाणमें ) रसना इद्रिय (जीम- इसका मिष्ट, कटु, तिक्त, कपायला और खट्टा विषय है इस विषय संबंधी भोग पदार्थोके परिमाणमें ) घाणेन्द्रिय ( नाश- इसका विषय सुगंध तथा दुगंध इस विषय संबंधी भोग पदार्थोके परिमाण ) तुरिन्द्रिय ( आंख-इसका काला, पीला, लाल, सफेद हरित पदार्थ, इस विषय संवधी भोग पदार्थोके परिमाण ) श्रोत्रे- न्द्रिय ( कान-इसका विषय अवानका ज्ञान इस विषय सबधी भोग पदाकि परिमाण ) इस प्रकार पांच इन्द्रियोके विषय संबंधी भोग पदार्थोके परिमाणका अतिक्रमण मन वचन काय द्वारा दिद- समें स्वय क्रिया हो अन्यसे कराया हो, किसीके करनेमें भला माना हो इत्यादि दोष मैने किये हों तो वे सब मिथ्या हों। पडियानामि भते वदपडिमाए विदियसिस्का- दे फासिंदिय परिभोगपरिमाणाइकमर्णण वा रसणिदिय परिभोगपरिमाणाइकमणेण वा घाणे- दिय परिभोगपरिमाणाइकमणण वा चम्किादिय परिभोगपरिमाणाइक्कमणेण चा सवणिदिघ परि- भांगपरिमाणाहकमणेण जो मए देवसिड अइचारो मणसा वचिया काएण कठो दा कारिदोवा कीरतो वा समणुमणिदो तस्त मिच्छामि दुक्कई ।। अर्थ-हे भगवान ! मैं अपने व्रतोंमे लगे हुए दोनो आलोचना पूर्वक प्रतिक्रमण करता हूं। व्रत प्रतिमाके अंतर्गत शिक्षात्रतका तीसरा भेद उपभोग (जो वार २ भोगनेमें आवे ) परिमाण व्रतमें स्पर्शन्द्रिय उपभोग परिमाण, रसनेन्द्रिय उपभोग [३८] परिमाण, घाणेन्द्रिय उपभोग परिमाण, चक्षुरिन्द्रिय उपभोग परि- माण और श्रोत्रेन्द्रिय उपभोग परिमाण इस प्रकार पांचाइन्द्रियोंके उपभोग संबंधी पदार्थोका अतिक्रमण मन वच कायसे किया हो, कराया हो, करनेको भला माना हो इत्यादि अनेक दोष दिवसमें मुझसे बने हों तो वे सब मिथ्या हों। पडिकमामि भंते वदपढिमाए तिदिए सिख्का- वदे सचित्तणिक्खेवेण वा सचित्तपिहाणेण वा परउवएसेण वा कालाइक्कमणेण वा मच्छरिएण वा जो मए देवसिउ अइचारो मणसा चचिया काएण कदो वा कारिदो कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने लगे हुए टोपोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूं। व्रत प्रतिमाके अंतर्गत शिक्षाव्रतका तीसरा भेद अतिथिसंविभाग नामक व्रतमें सचित्त-(जीवयोनि जीवोत्पत्ति होनेका स्थान ) वस्तुमें प्रासुक अचित्त पदार्थको रखा हो, सचित्त वस्तुसे ढका हो, अन्य किसी प्रतिपादित करनेसे दिया अथवा अन्यका द्रव्य अपना द्रव्य कह- कर दिया हो, दान देनेमें समयका विच्छेद ( लोभ और कलुपित परिणामोंके कारण यह भावना करी हो कि यह समय व्यापारा. दिका है इस लिये कौन इस समय आहारादि दान देने जाता है। ) किया हो; दान देनेमें अन्य भव्यात्माओंके साथ द्वेष (प्रति ष्ठादिके कारण अर्थात जो अन्य कोई धर्मात्मा दान करे तो उसके साथ यह विचार कर द्वेष करे कि इसकी प्रतिष्ठा सर्वत्र होगी [३९] और बड़ा अमीर होकर चुप रह गया इस लिये मेरी निंदा होगी इस लिये द्वेप ) किया हो इत्यादि अनेक प्रकारके दोष, मन, वचन, कायसे दिवसमें मैने स्वय किये हो, अन्यसे कराये हों, किसी करने में संमत्ति प्रदान की हो तो वे सब दोष निरर्थक हों। पडिकमामि भंतेवदपडिमाए चउत्थे सिक्खा- वदे जीविदासंसणेण वा मरणासंसणेण वा मित्ता- शुराएण वा सुहाणुबंधेण वा णिदाणेण वा जो मए देवसिउ अइचारो मणसा वचिया काएण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ अर्थ-हे भगवन् ! मैं अपने व्रतमें लगे हुए दोषोंकी आलो- चना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूं। व्रत प्रति- माके अंतर्गत शिक्षाव्रतका चोथा भेद समाधिमरण व्रत पालन करनेमे जीवित रहनेकी (मै अभी अधिक जीवित रहा तो अच्छा है ? अथवा जीनेकी आशासे समाधिमरणमें शिथिलता करना) आशा रखना, मरणका भय करना, हाय ! मै मरनाऊंगा क्या ? ऐसे परिणामोंसे सक्लेशित होना अथवा शीघतासे मरण होनेकी इच्छा रखना । इष्ट मित्रजनोंसे प्रेम (राग) करना, पूर्व में भोगे हुए भोगोंका स्मरण करना, और व्रतादिक पालन कर संसारिक सुखकी इच्छा करना इत्यादिक अनेक दोप दिवसमें मैने मन वचन कायसे किये हों, अन्यसे कराये हो, किसीके करनेमें अनुमति प्रदान की हो, तो वे सब दोष निरर्थक हो ।
[४०] पडिकमामि भंते सामाइयपडिमाए मणदुप्प णिधाणेण वा वाकदुप्पणिधाण वा, कायप्पणि धाणेण वा अणादरेण वा सदिअणुव्वठाणेण वा जो मए देवसिड अइचारो, सणसा वचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतोवा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ अर्थ-हे भगवान् ! में अपने व्रतो में लगे हुए दोपोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करनेका इन्छुक इ। तीसरी सामायिक प्रतिमाके पालन करनेमें मनकी स्थिरता न रस्सी ( आर्त और रौद्रध्यान पूर्वक मनको अन्य प्रकार चलाय- मान किया ) वचनकी स्थिरता ( सामायिक पठा शुन्ह उच्चारण न कर बकवाद आदि करनेसे बचनकी दुष्टता धारण की । न रखी, शरीरकी स्थिरता ( एक आसनसे स्वस्थता पूर्वक निर्विकार सामायिक नहीं किया किन्तु शरीरकी दुष्टतासे अगोपागको इधर उधर जलायमान किया ) नहीं रखी, सामायिक करनेमें अनादर प्रकट किया अथवा सामायिकके पाठका विस्मरण क्यिा इत्यादि अनेक प्रकारके दोष दिवसमें मैने वन वचन कायसे किये हों, अन्यसे कराये हों, किसी अन्यके करनेमें अनुमति प्रदान को हो तो वे सब दोप-मिथ्या हों। पडिक्कमामि भंते पोसहपडिमाए अप्पडिदे- क्खियापमजियासग्गेण वा अप्पडिक्खियाएम- जिदाणेण वा अप्पडिवेक्खियापमजियासंघारोवा- मणेण वाआवस्सयाणरेण वा सदिअणुव्बाठाणेण [११] वा जो मए देवसिउ अइचारो मणसा वचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुम- णिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं । अर्थ-हे भगवान् ! अपने व्रतों में लगे हुए दोपोंकी आलो- चना पूर्दक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूँ। चौथी प्रोषधोपवास नामक प्रतिमाके पालन करने में दृष्टिसे जीवजंतु- ऑको न देखकर और प्रमादसे जीवजंतुओका गोन किये बिना मल मूत्रका क्षेपन कया हो अथवा पूजापकरण आदि वस्तुओको विना देखे बिना शोध ऐसे ही जीव जंतवाली जमीनमें रखी हों। विना देखे और विना सोधे उपकरण पुस्तक आदि संयमोपयोगी वस्तुओंको ग्रहण किया हो, विना देवे बिना शोधे विस्तर ( पथारी ) आदि बिछाये हों, पेट यावश्यक पालन करने में अनादर किया हो, अथवा सामायिक, पूजन, स्तवन आदिका पाठ विस्मरण वि.या हो इत्यादि अनेक दोप दिवसमें मैंने मन वचन कायसे स्वयं किये हों, अन्यसे कराये हों, अन्य किसीके करनेमें अनुमति प्रदान की हो तो वे सब टोप मिथ्या हों। १ गृहस्थोके लिये पट आवश्यक दोनों प्रकारके पालन करने वा- हिये । समता, वदना, स्तुति, प्रतिक्रमण, स्था.याय, और कायोत्सर्ग इनको आवश्यक कहते हैं । अथवा देवपूजा, गुरुकी उपासना स्वा याय, सयम, वप, और दान ये भी छह आवश्यक है । दोनों प्रकारके आव- व्यकोका अभिप्राय परिणामको सरल और पवित्र रखनेका है इनलिये आवश्यक कर्ममें अनादर करना तमें शिथिलता है ।
[१२] पडिकमामि भंते सचित्तविरदि पडिमाए पुढ- चिकाइआ जीवा संखजासंखेज्जा आउकाइआ जीवा संज्जासंखेज्जा तेउकाइआ जीवा संखेज्जा- संखेज्जा वाउ काइआ जीवा संखेजा सेखना वण- प्फदिकाइआ जीवा अर्णताणंता हरिया विया अंकुरा छिण्णाभिण्णा एदेसिं उद्दावणं परिदावणं विराहणं उवघादो कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोषोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करनेका इच्छुक हूं। पांचवी सचित्तत्याग प्रतिमाके पालन करनेमें जलकायके संख्यात अथवा असंख्यात जीव, तेजकायके संख्यात असंख्यात जीव, वाउकायके संख्यात असंख्यातनीव, पृथ्वीकायके संख्यात असंख्यातजीव, और वनस्पतिकायके अनंतानंत जीव, हरितकायके जीव, हरित अंकुर, बीज कदमूल आदिके जीव, और साधारण वनस्पतिके जीवोंका छेदन किया हो, भेदन किया हो, प्राणोंका घात किया हो, पांव (पग) आदिसे कुचल दिये हों, त्रास दिया हो, पीडा करी हो, और उनकी विराधना की हो इत्यादि अनेक दोष मैंने मन वचन कायसे स्वयं किये हों, अन्यसे कराये हों, किसी अन्यके करने में सहमत हुआ हुआ हों तो वे सब दोष मिथ्या हों। पडिकमामि भंते राइभत्तपडिमाए णव विह- बंभचरियस्स दिवा जो मए देवसिउ अइचारो [१३] मणमा वचिया काएण कदो वा कारिदोवा कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।। अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोषोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करनेकी इच्छा करता हू । षष्ठी दिवा-मैथुन त्याग नामक प्रतिमाके पालन करनेमें नव प्रकार-स्त्रियोंके विषयकी अभिलाषा, लिग विकार, घृत दुग्धादि पुष्टरस त्याग, स्त्री-पशु-नपुसक-विट, और सप्त विषयोंके लोलुप मनुप्योंके आश्रित वस्तिका त्याग, स्त्रियोंके मनोहर अग निरीक्षण त्याग, स्त्रियोंका बुरी वासना मादर सत्कारका त्याग, अपनी पूजा प्रतिष्ठाके श्रवणका त्याग, अग शृंगारकात्याग, संगीत नृत्य वादित्र आदिका श्रवण किया हो इत्यादि अनेक दोष दिवसमें मैने मन वचन कायसे स्वय किये हों, अन्यसे कराये हों, किसी भन्यके करने में भला माना हो तो वे सब दोष मिथ्या हों। पडिक्कमामि भंते इत्थिकहायत्तणेण वा इत्थि- मणोहरांग निरिक्खिणेण वा पुव्वरयाणुस्मरण वा मुक्कोपणरसा सेवणेण वा सरीरमंडणण वा जो मए देवसिउ अइचारोमणसा वचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुकडं ।। १ इस प्रतिमाका नाम रात्रिभुक्त त्याग भी है इसलिये चारों प्रकारके आहारमै मोह किया हो, पूर्व भोग हुए रसोंका स्मरण किया हो, निदान किया हो, और रसोंको न भोगते हुए भी भे रसभोग रहा हू ऐसा स्मरण किया हो इत्यादि दोप मैने स्वय किया हो अन्यसे कराये हो, किसीके करनेपर समति दी हो तो वे सब मिथ्या हो।
[४४] अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोपोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूं। सातवीं ब्रह्मचर्य प्रतिमाके पालन करने में स्त्रियोंकी मनोहर कामो- त्पादक कथा की हो, काम दृष्टिसे स्त्रियोंके गुह्य मनोहर अंगोंका निरीक्षण किया हो, पूर्वकालमें भोगे हुए विषयोंका स्मरण कर मनको विकारित किया हो, कामोत्पादक पुष्ट रसोंका सेवन किया हो, स्त्रियोको आसक्त करनेवाला शरीरका श्रृंगार किया हो इत्यादि अनेक प्रकारका दोष मैने दिवसमें मन, वचन, कायने किया हो, अन्यसे कराया हो, किसी अन्यके करने में सहमति प्रदान की हो तो वे सब दोष मिथ्या हों। पडिकमामि भंते आरंभविरदि पडिमाए कलायवसंगएण जो मए देवसिड आरंभो मणमा चचिया काएण कदो वा कारिदो वा कीरतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडे ॥ अर्थ-हे भगवान् । मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोपोंकी आलो- चना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हु । आठमी आरंभत्याग प्रतिमाके पालन करनेमे क्रोध, मान, भाया, लोभ और मोह आदि कषायोंके वश पापकर्मों का आरभ दिवसमें मैंने मन, वचन, कायसे किया हो, अन्यसे कराया हो, अन्य किसीके करने में अनुमति प्रदान की हो तो वे सब दोष मेरे मिथ्या हों। पडिकमामि मंते परिग्गहविरदिपडिसाए वत्थमेत परिग्गहादो अवरम्नि परिग्गहे मुच्छाप- [१५] रिणामो जो मए देवसिउ अइचारोमणसावचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुम- णिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ अर्थ-हे भगवान् ! मै अपने व्रतोंमें लगे हुए दोपोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूँ। नवी परिग्रह त्याग प्रतिमाके पालन करने में वस्त्र मात्र परिग्रह सिवाय अन्य परिग्रहमें मूर्छा की हो तो उस सवधी दिवसमे मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदनासे किये हुए दोपोंको मिथ्या चाहता हूँ। पडिझमानि भंते अणुमणविरदिपाडसाए जकिपि अणुमणणं पुठापुढेण कद वा कारिद वा करितो वा सुमणुमणिदो तस्म मिच्छामि दुबडं ।। अर्थ-हे भगवान् । मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोषोकी आलोचना पूर्वक प्रतिक्रमण करता है । ढगमी अनुमति विरति प्रतिमा के पालन करनेमे अन्यके पूछने पर अथवा विना पछनेपर भी जो कुछ अनुमति दी हो ततपययो मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदनासे दिवसमें किये हुए समस्त दो मिथ्या हों। पडिकमामि संते उदिविरदिपडिमाए उद्दि- दोसबहुलं आहारियं दा आहारावियं वा आहा- रिजंत समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं । अर्थ-हे भगवान् ! मै अपने व्रतोंमें लगे हुए दोषोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूं।
[४] ग्यारहवीं उद्दिष्ट त्याग प्रतिमाके पालन करने में उद्दिष्ट ढोषसे दृषित आहार स्वयं सेवन किया हो, अन्यको उद्दिष्ट दोष सहित आहार कराया हो, उद्दिष्ट दोष दूपित आहारके करनेमें समति प्रदान की हो, तत् सवधी जो दोप मन वचन कायसे मुझसे हुए हों वे सब मिथ्या हों। निग्रन्थ पदकी वांछा। इच्छामि भते इमं णिग्गंथ्यं पावयणं अणुत्तरं केवलियं णेग्गइयं सामाइयं संसुद्ध सल्लघत्ताणं सिद्धिमग्गं सेढिमग्ग खतिमरगं मोत्तिमग्गं मोक्ख- मरगं पमोक्वमग्गं णिजाणमग्गं णिव्वाणमग्गं सव्वदुःखपरिहाणिमग्गं सुचरियपरिणिव्वाणमग्गं अविहत्तमविसंत पव्वयणमुत्तमं तं सद्दहामि तं पत्तियामि तं रोचेमि तं फासेमि इदो उत्तरं अण्णं मच्छि ण भूदं ण भव भविस्सदि जाणेण वा दंस- णेण वा चरित्तेण वा सुत्तेण वा इदो जीवा सिझ्. झंति मुचंति परिणिव्वाणयंति सव्वदुःखाणमंतं करति परिवियाणंति समणोमि संजदोमि उवर- दोमि उवसंतोमि अवधिणि पडिमाणमायामोसमृ- रण मिच्छणाण मिच्छदसण मिच्छरितं च पडिवि. रदोमि सम्मण्णाण सम्मदसण समचरित्तं च रोचेमि जं जिणवरोहिं पणत्तो इत्थ मे जो कोई देवसिउ राईड अइचारी अणाचारो तस्स मिच्छा- मि दुक्कडं ॥
[१७] अर्थ-हे भगवान् । मैं निर्गन्थ पदकी इच्छा करता हूं। जबतक मेरा संसारसे संबंध है तब तक भव भव यह त्रिजगत- पूज्य और मगल लोकोत्तम शरणभूत निग्रन्थपद ( समस्त परिग्र- हाटि रहित परम दिगंवर अवस्था ) वार वार मिलो। वाह्य और आभ्यतर समस्त परिग्रह रहित, अनुत्तर-(मोक्ष- मार्गका साक्षात चिन्ह निर्यन्थ लिंग सिवाय अन्य किसी भी लिंगसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती है इस लिये निग्रंथपढ़ लोकोत्तर है ) केवल जानका उत्पादक, रत्नत्रयका वीज, सर्व सावध रहित, परम उदासीनताका कारणभूत, आलोचना-प्रायश्चित्त-निरतीचारता प्रतिक्रमण आदि गुणोंसे परम विशुद्ध, माया मिथ्या निदान इस प्रकार गल्यत्रय रहित, आत्म सिद्धिका प्रधान मार्ग, उपशमक्षयो- पशमादि श्रेणियोंका साक्षात् मार्ग, परिग्रह क्रोध मान माया लोम काम और व्यामोहादि समस्त विकार रहित होनेसे सर्वोत्तम निर्भय परमात्म प्राप्तिका प्रत्यक्ष मार्ग, त्यागका मार्ग, मोक्षमार्ग, उत्कृष्ट- पदका मार्ग, मसारके परिभ्रमणसे रहित निर्दोप मार्ग, निर्वाणका मार्ग, सर्वदु खोंके नाश करनेका मार्ग, उत्तम सदाचारके उत्पन्न करने का मार्ग, अबाधित मार्ग, स्वतन्त्रताका मार्ग, निर्भयताका मार्ग, सर्व सुखोंका मार्ग और सर्वोत्कृष्ट मार्ग ऐसा निग्रन्थ पद है। मैं उक्त सर्वोत्कृष्ट निर्मन्थपदको विशुद्धभावोंसे श्रद्धान करता हूं, और संशयादि समस्त विकार रहित शुद्ध निश्चयसे चाहता हूं, विशुद्ध भावोंसे निश्चयरूप मानता हू, विश्वास करता हूं सहदयसे स्वीकार करता है. अनन्य भावनासे प्रेम [४८] करता हूं, भक्तिभावसे स्पर्श करता हू, पवित्र भावोंसे धारण करना चाहता हू । इस निर्ग्रन्थपद सिवाय और दूसरा कोई भी उत्तम नहीं है । प्रथम कोई नहीं था, और न भविष्यमें कोई इसके समान होगा। सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, सम्यक्चारित्र, और सम्यक् आगमसे यह निग्रंथपद सर्वोत्कृष्ट है, इसके धारण करनेसे ही जीव मोक्षमार्गमे प्राप्त होंगें। सिद्धपदको प्राप्त होगें । सम- स्त कर्म रहित सर्वथा मुक्त होगें अर्थात् फिर कभी संसारके बंध- नमें नहीं प्राप्त होगें । इसी निग्रंथपदसे निर्वाणपदको प्राप्त होग सर्व दुःखोका नाश करेगे। समस्त जीवादि तत्वोंके ज्ञाता होंगें । इस लिये में इस महान् परमपूज्य निग्रंथ पदको धारण करता है । और उसकी प्राप्तिके लिये संयमका आराधन करता है। विषय कपार्योसे उपशात होता दू, विक्त होता हूं। परिग्रह क्रोध, मान, माया. लोभ, मात्सर्य, द्वेष, राग, काम, भय, अपच, और समस्त व्यामोहको छोडता है। हिमा. झूठ, चौरी, कुगील और परिग्रहका त्याग करता हूं । निथ्याज्ञान, मिथ्यादर्शन, मिथ्याचारित्रसे सर्वथा विरक्त होगया है। अब मै सटाके लिये इनका परित्याग करता हूं। और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्रका श्रदान करता हूँ। जो जिनेन्द्र भगवानने कहा है वह सत्य है, प्रमाणित है, निश्चय है, अबाधित है । उसका मै विश्वास करता हू, श्रद्धान करता ई। इस विषयमें मुझसे जो कुछ अतीचार अनाचार हुए हों तो वे सब मिथ्या हों। इच्छामि भंते वीरभात्त काउस्सरगं करोमि जो
[१९]
मए देवसिउँ (राईउ चउमासिउ' सांवच्छरित)
अइचारो अणाचारो आभोगो' अणाभोगो
काईउ चाईउ माणसिउ दुचरिउ दुचारित
दुम्भासिउ दुप्परिणामिउ दुस्समिणिउ णाणे दसणे
चरितं सुत्ते समाइए एयारस पहं पडिमाणं
विराहणाए अविहस्स कम्मस्ल णिग्यादणाए:
अणहा उस्सासिदेण वा णिस्सासिंदण वा उम्मि-
सिदेण वा णिमिसिदेण वा खासिदेण वा छिकि-
दण वा जंभाईदेण वा सुहमेहिं अंगचलाचलेहि
दिहिचलाचलेहिं एदेहि सव्वहिं समाहिं पत्तेहि
आयारेहिं जाव अरहताणं भयवंताणं पजवासं
करेमि तावकायं, पावकम्म दुचरिषं वोस्सरामि।
दसण वय सामाइय पोसह सचित्त राय भक्तीय ।
बंभारंभ परिगह अणुमणमुद्दिष्ट देसविरदेदे ।
एयासु.यथा कहिद पडिमासु देवसिओ पमा-
दाहकया इचार सोहण छेदोवद्रावण होउ माझं।
अरहत सिद्ध आयरिय उवज्झाय सव्यसाहु
सक्खियं सम्मत पुव्वग दिवव्वद समारोहियं में
भवदु मे भवदु, मे भवदुः । देवसिय पडिकमणाए
सव्वाइचार विसोहिणिमित्तं पुवापारियकम्मेण
निष्ठितकरण वीरभत्तिकायोस्सग्गं करेमि ।
, देवसिउ ३६ राउ १८ और चउमासिउ सावच्छरिओ १०८
वार णमोकार मत्र पढकर जाग्य दे।
-
[१०] धामो भरहताणं यहांसे प्रारंमकर "याति जिन त्यनि " इस श्लोपर्यन्त पढ़कर पुनः नश्वार णमोकार मंत्री जाप्य देना चाहिये। है भगवान् ! मैं वीरप्रभुकी भक्ति करनेका इच्छुक ई। और इसके लिये मैं इस विनाशीक शरीरसे ममत्वभाव छोड़ता है। दिवसमें (रात्रिमें इत्यादि) आवश्यक क्रियानोंक करते हुए मैंने आलस किया हो, व्रतादिकोंको मंग किया हो, उनमें अतिवार लगाये, शिथिलता वारण की हो, मनमें ग्लानि उत्पन्न की हो, प्रकटरूप दंभवृत्तिसे व्रत पालन किये हों, लजाके लिये एकदम अपनेको छुपाकर भाचरण किये हों, मन, वचन और मगेरची दुष्टताने जात्रा पालन क्रिया हो, विमत्स उच्चारण र कार्य किया हो, राग, द्वेष,अज्ञान और प्रमादसे विनय रहित उद्दण्डतासे व्रताका पालन क्रिया हो, अपशब्द कहकर महत्वता बतलाई हो, कुतिमत परिणामों (खरे मावों)से कार्य किया हो, दुरे स्वामें दोष उत्पादन किया हो, सम्यग्दर्शन ज्ञान गरित्र और मिनागमती विराधना की हो, प्रतिमाओंकी विराधना की हो, इत्यादि अनेक दोष मुझसे बने हों, वे सब मिथ्या हो। आठ कोनो नाश करनेवाली क्रियाओंके प्रयत्न करने में (सामायिक प्रतिक्रमण-ध्यान-र-पूजा और स्वाध्याय ये मद जसा प्रतिक्रमण व्यिा हो वैसी ही. नमोकार मंत्री गानो जाहिए अर्गत दिवस संदवी प्रविम्मी ३६ वार पमोकारी काम देना उसी प्रकार उक्त लिखित नियमझे रात्रिकी १८ बार नमोबारकी जर इत्यादि।
[५१] कमोके नाश करनेके कारण हैं) श्वासोश्वाससे, नेत्रोंकी टंकारसे, खांसनेसे, छींकनेसे, जंभाई लेनेसे, सुक्ष्म अंगोंके हिलानेसे,आगों- पांगके फेंकनेसे, दृष्टिदोषसे इत्यादि समस्त क्रियाओंसे सुत्रपाठ मादि क्रियाओंका विस्मरण किया हो, अविनय की हो, प्रमाद और अज्ञानसे अन्यथा प्ररूपणा की हो तो मैं इस प्रतिक्रमणके समय चीर भगवान्की भक्तिरूप कायोत्सर्ग धारण करता हूं। और तब- तक पापकर्मोको सर्वथा छोड़कर शरीरसे भी ममत्व त्याग करता है। वीर प्रभुका स्तवन । यः सर्वाणि चराचराणि विधिवव्याणि तेषां गुणान् । पर्यायानपि भूतभावि भवतः सर्वान् सदा सर्वथा ॥ जानीते युगपत्प्रतिक्षणमतः सर्वज्ञ इत्यु- च्यते। सर्वज्ञाय जिनेश्वराय महते वीराय तस्मै नमः ॥१॥ अर्थ-जो समस्त चराचर पदार्थोको तथा समस्त द्रव्य और उनकी कालत्रयवर्ती समस्त पर्यायोंको एक साथ प्रतिक्षण सदैव जानता है उसको सर्वज्ञ कहते है। वीर भगवान सर्वज्ञ हैं, वीत- गग हैं और महान पूज्य जिनेश्वर है इस लिये वीर प्रभुको नमस्कार है। वीरः सर्वसुरासुरेन्द्रमहितो वीरं वुधाः संश्रिताः। वीरेणाभिहितः स्वकर्मनिचयो धीराय भक्त्या नमः॥ चीरातीर्थमिदं प्रवृत्तमतुलं वीरस्य घोरं तपो । वीरे श्रीधृतिकीर्तिकांतिनिचयो हेवीर भद्रं त्वयिार [१२] अर्थ-हे वीर प्रभो ! आपकी समस्त इन्द्र पूजा करते हैं। विज्ञ गणधरादिक आपकी सेवा करते हैं। और आपने समस्त कर्मोको नष्ट कर दिया है इस लिये हे वीर ! आपको नमस्कार है। धर्म तीर्थ आपसे इस कालिकालमें चल रहा है, आप घोर तपको धारण करनेवाले परमयोगी हो । आपमें श्री, काति, कीर्ति आदि सर्व गुणों का वास है अतएव आप कल्याणभागी हों। ये वीरपादौ प्रणति नित्यं, ध्याने स्थिताः संयमयोगयुक्ताः। ते वीतशोका हि भवंति लोके, संसारदुर्ग विषम तरंति ॥ ३॥ अर्थ-जो मनुष्य संयमको धारण कर और व्यानमें लीन होकर वीरप्रभुको नमस्कार करता है वह समस्त शोकको दूरकर संसार समुद्रके पार होजाता है। . , वीर प्रसुका चारित्र। चारित्र सर्व जिनश्चरित्रं प्रोक्तं च सर्वशिष्यभ्यः । प्रणमामि पंचभेदं पंचभचारित्रलाभाय ॥१॥ अर्थ-सदाचार जिनेन्द्र भगवान्ने स्वयं पालन किया है और समस्त जीवोके उपकारके लिये सबको बतलाया है। उत्तम चारित्रकी प्राप्तिके लिये नमस्कार करता हूं। व्रतसमुदयमूलः संयमास्कंधबंधो, यमनियमx सामायिक : दोपस्थापना २ परिहारिविभुद्धि, ३ सुक्ष्मसापराय ४ और यथाख्यात ५। * साक्षात्मोनका कारण यथारात चारित्र है। ma [१३] पयोभिर्जितः शीलशाखः । समितिकलितभारो गुप्तिगुप्तप्रवालो, गुणकुसुमसुगंधिः सत्तपाश्चित्र पत्र । शिवमुखफलदायी यो दयाछाययोढया, शुभजनप- थिकानां खेदनोदे समर्थः। दुरितरविजतापं प्रोप- यानंतभावं,स भवविभवहान्यैर्नोस्तुचारित्रवृक्षा२॥ अर्थ-व्रत, संयम, नियम, यम, शील, समिति, गुप्ति, तप, महाव्रत, और दश धर्म चारित्रका रूप है। चारित्र मोसको देनेवाला दयाका वीज है, समस्त पाप और संसारका नाश करनेवाला है। ' धर्म महिमा । धम्मो मंगलमुक्किट अहिंसा संजमो तवो । देवा वि तस्स पणमंति जस्स धम्मे सयामणो ॥१॥ अर्थ-धर्म समस्त मंगलों में से प्रधान मंगल है, अहिंसा, संयम और तप ये धर्मके रूप हैं। जो मनुष्य धर्मको पवित्र हृदयसे धारण करता है. उसको देवता भी नमस्कार करते हैं। धर्मः सर्वसुखाकरो हितकरो धर्म युधाश्चिन्वते । धर्मेणैव समाप्यते शिवसुखं धर्माय तस्मै नमः ॥ धर्मान्नास्त्यपरः सुहृद्भवभृतां धर्मस्य मूलं दया । धर्म चित्तमहं दधे प्रतिदिनं हे धर्म! मां पालय ॥२॥ अर्थ-धर्मका मूल दया है, धर्मको विद्वान् गणधराटिक मुनीश्वर धारण करते है, धर्मसे सर्व सुखोंकी प्राप्ति और कल्याण होता है । धर्म सेवन करनेसे . मोक्षकी प्राप्ति होती है । धर्म ही [] जगतका बंधु है इस लिये वम सेवन करनेने अपना चित्त लगाता ई। है धर्म ! मेरी रक्षा कर ! तेरे लिये नमस्कार है। इच्छामि भंते पडिकमणा इच्चारमालोचेर तत्थ देसासिआ, असणासिआ आयाणासिआ कालासिआ मुहासिआ काउस्सग्गासिआ पणमा- सिआ आवत्तासिआ पडिक्कमणाए तत्यसु आवा- सपसुपरिहीणदाजोमए अच्चासणा मणसायचिया कारण कदो चा कारिदोचा कीरंतोवासमणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं। दसण वय सामाइय पोसह सचित्तरायभत्तेय । यंभारंभपरिग्गह अणुमण- मुद्दिष्ट देसविरदेदे । एयासु यथा कहिद पडिमासु पमादाकया इन्चार सोहणटुं छेदोवट्टवेणं अरइंत सिद्धआयरीय उवज्झाय सव्वसाहु सक्खियं सम्म- तपुव्वगं दिढव्वदं समारोहियं मे भवंदु ३ अथ देवसियडिकमणाए सव्वाइचारविसोदिणिमित्तं पुवापरिय कम्मेण चउवीसतित्ययरभत्ति काउस्स- गं करोमि ॥ अर्थ-हे भगवन् ! अंतमें मैं अब प्रतिक्रमणमें लगे हुए दोषोंकी आलोचना करता हूं। द्रव्य-क्षेत्र-काल और भावोंकी अनुकूल योग्यता नहीं मिलनेसे, देश, आसन, स्थान, काल, मुद्रा, कायोत्सर्ग, श्वासोश्वास, नमस्कारादि विवि, और स्तुति आदि क्रियामें शीघ्रताके लिये, छह आवश्यक कौश करनेमें कुछ भी हीनता प्राप्त हुई हो, मथवा प्रमाद और अज्ञानसे जिन दोषोंकी [१५] (मथवा मन, वचन, काय और कत कारित अनुमोदना द्वारा) प्राप्ति हुई हो तो वे सब मिथ्या हों। इस प्रकार दोषोंकी शांतिके लिये चौकोस तीर्थकर भक्ति व कायोत्सर्ग धारण करे। णमोकार मंत्र ९ वार पहकर जाप देवे। "णमो अरहताणं से प्रारंभकर "यावंति जिनचैत्यानि" इस श्लोक पर्यन्त पाठ पढ़ना चाहिये और कायोत्सर्ग धारण करना चाहिये। चउवीसं तित्थयरे उसहाई वीर पच्छिमे वंदे। सव्वंसिं गुणगणहरसिद्ध सिरसा णमंसामि ॥१॥ अर्थ-प्रथम ऋभदेवको मादि-लेकर वीरप्रभु पर्यन्त चौवीस तीर्थकर, गणधर, और सिद्ध परमेष्टीको नमस्कार करता है। ये लोकेऽष्टसहस्रलक्षणधरा ज्ञेयार्णवांतर्गताः। ये संपन्नवनालहेतुमथनाश्चंद्रार्कतेजोधिकाः । ये साध्विन्द्रसुराप्सरोगणशतैर्गीतपणुत्यार्चितान तान् देवान ऋषभादिवीरचरमान भक्त्या नमस्याम्यहं ।। अर्थ-समस्त जेय पदार्थोके ज्ञाता, एक हजार आठ शुभ लक्षणोंसे विरानमान, ससारके बंधनको नाश करनेवाले, करोडों सूर्य और चंद्रमासे भी अधिक तेजस्वी, मुनीश्वर नरेन्द्र और देवे- न्द्रसे पूज्य-ऐसे ऋषमादि चौवीस तीर्थंकरोंको नमस्कार करता हूं। नाभेयं देवपूज्यं जिनवरमजितं सर्वलोकप्रदीपं । सर्वज्ञं संभवाख्यं मुनिगणवृषभं नंदनं देवदेवं ॥ कारिघ्नं सुर्हि वरकमलनिभ पद्मपुष्पाभिगंधं । .
[१६]
क्षांतं दांत सुपार्श्वसकलशशिनिभं चंद्रनामानमीडे॥
विख्यातं पुष्पदंतं भवभयमथनं शीतलं लोकनाथं ।
श्रेयासं शीलकोशं प्रवरनरगुरू वासुपूज्यं सुपूज्यं ।
मुक्तं दान्तन्द्रियांश्च विमलमृषिपति सिंहसैन्यं
मुनीन्हें।
धर्म सद्धर्मकेतुं शमद्मनिलय स्तौमि शांति शरण्यं।
कुंथु सिद्धालयस्थं श्रमणपतिमर त्यक्तभोगेषु चक्रं ।
मल्लिं विख्यातगोत्रं खचरगुणनुतं सुव्रतं सौख्यराशि
देवेन्द्रायै नमीशं हरिकुलतिलकं नेमिचंद्र भवान्तं ।
पार्श्व नागेन्द्रवंद्यं शरणमहमितो वर्द्धमानं च भक्त्याx
इच्छामि भंते चउवीस तित्ययर भत्ति काउ.
स्सगो कउतस्सालोचेउ पंच महाकल्लाणसंपण्णाणं
अट्ठ महापाडिहेर सहियाणं चउतीस अतिशय
विशेष संजुत्ताणं बत्तीस देवेंद मणि मउड मत्थय
महियाण वलदेव वासुदेव चकहर रिसि मुणि जय
अणागारोव गूढाणं थुइसय सहस्स णिलयाणं
उसहाइ वीर पच्छिम मंगल महापुरिसाण भत्तिए
णिचकालं अञ्चेमि पुजोमिः वंदामि णमंसामि
* १ इन तीनो श्लोकोंका अर्थ बहुत ही सरल है । ऋषभ १
अजित २ सभव 3 अभिनन्दन ४ सुमति ५ पद्मप्रभ ६ सुपार्श्व ७
चद्रप्रभ ८ पुष्पदन्त ९ शीतलनाथ १० श्रेयासनाथ ११ वामपूज्य १२
विमलनाथ १३ अनन्तनाथ १४ वर्मनाथ १५ शातिनाथ १६ कुथनाय
१७ भरहनाथ १८ मल्लिनाथ १९ मुनिसुव्रत २० नमिनाथ २१ नेमिनाय
२२ पार्श्वनाथ २३ महावीर २४ इस प्रकार चौवीस तीर्थकर है।
[५] दुक्खक्वड कम्मचउ बोहिलार सुगहगमणं समा- हिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं। दसण वय सामाड्य पोसह सचित्तरायभत्तीय । चंभारंभ परिग्गह अणुमणमुहिठ देसविरदेदे । एयासु यथा कहिद पडिमासु पमादाकया। इचार सोहणटुं छेदो- वट्ठावणं अरहत सिद्ध आयरीय उवज्झाय सव्वसाहु सक्वियं सम्मत्त पुव्वगं दिढव्वदं समारोहियं में भवद में भवतु मे भवदु । अथ देवसिय पडिकम. णाए सव्वाइचारविसोहिणिमित्तं पुव्वायरीय कमेण आलोयण सिद्धभत्ति पडिकमणभनि णिहिदकरण वीरभत्ति चउवीस तित्थयरभत्ति कृत्वा तडीना- धिकत्वादिदोष परिहारार्थ सकलदोषनिराकर- गार्थ सर्वमलातिचारविशुद्धयर्थ आत्मपवित्रीक- रणार्थं समाधिभक्ति कायोत्सर्ग करोमि ।। णमोकार मंत्र ९ वार २७ श्वासोश्वासमें जाप्य) अर्थ-हे भगवन् ! मैं समम्त दोर्पोको दूर करनेके लिये चौवीस तीर्थकरोंकी मक्ति रूप कायोत्सर्ग धारण करता हुआ अपने कृत:कर्मोकी आलोचना करता हूं। महान् पंच कल्याणकोंसे सुशोभित, अष्ट महा प्रातिहार्य महित, चौतीस अतिशय सहित, बत्तीस प्रकारके देवेन्द्रोंके मस्त. ५ अशोक वृक्ष, पुष्पवृष्टि, दिव्य बनि, चामर, भामहल, छत्रय, सिंहासन और दुन्दुभि वाजोंका बजना ये आट प्रातिहार्य है। २ दश जनम, दश केवलज्ञान और चौदह देवकृत इस प्रकार चौतीस अतिशय अरहत भगवानके होते है।
[५८] कमें लगी हुई मणियोंसे पूज्य, वलभद्र-वासुदेव-चक्रवर्ती-रुद्र- ऋषि-मुनीश्वर-यती-मणगार मादि महान् पुरुषोंके शिरोवंद्य, देवेंद्रोंकर सतत वंदनीय ऋषभदेवसे प्रारंभकर वीर भगवान पर्यंत चौवीस तीर्थकर महामंगलके करनेवाले है, पुण्य पुरुष है, उनकी में त्रिकाल वंदना करता हू, स्तवन करता हूं, पूजा करता हूं, नमस्कार करता हूं, चौवीस भगवानकी भक्तिसे दुःखोंका नाश हो, कोका नाश हो, रत्नत्रयकी प्राप्ति हो, शुभ गति हो, समाधिमरण हो और श्री जिनेन्द्र देवके गुणों की प्राप्ति हो । दर्शनादि प्रतिमा में सर्व दोषोंकी विशुद्धिके लिये पूर्व भाचा- योकी परिपाटीके अनुकूल अपने समस्त कृत कर्मोकी आलोचना पूर्वक श्री सिद्ध प्रतिक्रमणभक्ति-वीरभक्ति और चौवीस तीर्थकर भक्ति करनेपर विशेष दोषोंकी शुद्धिके लिये समाधि भक्ति कायोत्सर्ग धारण करता हूं। मरहंत,सिद्ध,आचार्य, उपाध्याय और सर्वसाधुकी साक्षी पूर्वक सम्यग्दर्शन सहित उत्तमोत्तम व्रतोंका समारोह मेरे हृदयमंदिरमें हो । (९ वार णमोकार मंत्र २७ श्वासमें), शास्त्राभ्यासो जिनपतिनुतिः संगतिः सर्वदा। सवृत्तानां गुणगणकथा दोषवादे च मौनम् ॥ सर्वस्यापि प्रियहितवचो भावना चात्मतत्वे । संपद्यतां मम भव भवे यावदेतेऽपवर्गः॥१॥ अर्थ-जैनागम अथवा जिन सिद्धान्तका अभ्यास, श्री जिनेन्द्रदेव भगवान्की भक्तिपूर्वक वंदना, सदाचार धारी जैन यति,
[५९]
ब्रह्मचारी-ऐच्छक और विद्वान् महात्माओंका संग, श्री जिनेन्द्र
देव प्रभृति पुण्य पुरुषोंकी कथाका श्रवण, दुसरोंकी निंदाका त्याग,
दूसरों के तिरस्कारमें मौन, समस्त जीव मात्रमें प्रेम, हित मित
वचन और आत्मभावना इतनी वस्तुओंका समागम जब तक
मोक्षकी प्राप्ति न हो तब तक नित्य भव भवमें रहो।
तव पादौ मम हृदये मम हृदयं तव पदद्वये लीनं ।
तिष्ठतु जिनेन्द्र तावद्यावनिर्वाणसंप्राप्तिः ॥
अर्थ-हे जिनेन्द्रदेव ! मापके पवित्र चरणकमल
जब तक मुझे मोक्षकी प्राप्ति न हो तब तक मेरे हृदय मदिरमें
विरानमान रहो और मेरा हृदय आपके चरणकमलोंमें लीन रहे।
अक्खरपयत्य होणं मत्ताहीणं च ज मए भणियं ।
नं खमउ णाणदेव य मज्झवि दुक्खक्खयं किंतु ॥
अर्थ-हे जिनशासन (जिनागम) देव ! मैंने अक्षर मात्र
रहित जो कुछ अशुद्ध उच्चारण किया हो, सो क्षमा करो और
मेरे दुःखोंका नाश करो।
दुक्खक्खउ कम्मनउ योहिलाहो सुगइगमणं ।
सम्मं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउमझं।
अर्थ-हे भगवन् ! मेरे दु.खोंका नाश हो, कर्मोका नाश
हो, रत्नत्रयकी प्राप्ति हो, सुगतिगमन हो, सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति
हो, समाधिमरण हो और श्री जिनराजके गुणोंकी प्राप्ति हो
ऐसी मेरी भावना है।
[...] इच्छामि भंते इरियावहियस्ल आलोचे पुव्वुत्तर दक्षिण पच्छिम चउदिसु चिदिसासु विह- रमाणेण जुगुंतर दिट्टिणा दवा उपउवचारयाए पमाददोसेण पाणमूद जीवसत्ताणं उवघादो कदा वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ (९ वार णमोकार मंत्रकी जाप, और आवर्त चारों दिशामें एवं प्रणुत्ति)। ॥ इति शम् ॥
[६] अथ मिच्छामि दुक्काम ते प्रणमु श्री अरिहंतने, भर्छ सरस्वति भावं, जीव अनंता में बहु हण्या, कहेतां पार न आंव । मुज मिच्छामि दुक्कडम् , अरिहंतनी साख ॥१॥ के में जीव विराधीआ, चोर्याशी लाख । सार संभाल नहिं करी, कीधा छे बहु धात, ने मुज० ॥ ईनर नित्य निगोदना, सात सातज लाख । मान लाख पृथ्वी तणा, सान अपज काय; ते मुज० ॥३॥ दा लाख वनस्पति, प्रत्यक्ष साधारण । मान लाख तेज कायना, सात वायुज जाण, ने मुज० ॥४॥ व नी चौ ईन्द्र जीवना, वबे लाख विख्यान, देव, पशु वळी नकना, चार चार उद्याता ने मुज॥५॥ चोद लाख मनुप गतिए, लक्ष चोर्याशी गणीया, कृत कारित अनुमोदना, मनवच कायथी हणीया ने मुजा एणी पेरे परभवे में कर्या, कर्या पाप अनंत, त्रिविध विविध करी हुँ भम्यो, दुरगनि दातार; ने मुज०॥७॥ हिसा करी में जीवनी, बोल्यो जुठा पोल । दोप अदत्ता दानसुं, मैथुन हणमादा मुज० परिग्रह मेळव्यो कारमो, कीघो क्रोध विशेष । मान माया लोभ में कर्या, वळी राग ने द्वेष ते मुज०॥९॥ ते ॥८॥ ,
-
चाडी करी में चोनरे, वेर अर बधायाँ ।
कुगुरु, देव कुधर्मने, करी प्रतीतने पाळ्या ते मुज॥१०॥
क्रोध करी जीव दुखव्या, कौघां कुडां कलंक ।
निदा करी में पारकी, रात दिवस वसंत; ते मुज०॥११॥
खाटकीना भव में कर्या, जीवना वध कीध ।
वाधरीने भव चरकली, मारी कई अगति; ते मुजगा?२॥
माछीने भवे माछलां, प्राली जळ थकी काढयां ।
प्रपंच करी भवे पारधी, मृग मारीन पाडयां ते मुजः ॥१३॥
काजी मुल्लांने भवे, पढी मंत्र कठोर ।
जीव अनंता जे में कर्या, पाप लाग्यां अघोर, ते मुज०॥१४||
कोटवालनो भव में कों, कर्या आकरा दंड ।
वंधीवान मरावीआ, पाड्या कोरडा अंग; ते मुज०॥१५॥
कुंभारनो भव में कयों, मार्या भट्टीने तापे ।
तेली भवे तल पीलीया, पेट भरीयु में पापे ते मुज०॥१६॥
परमाधामीने भवे, दीघां नारकी दुःख ।
छेदन भेदन वेदना, लेश दीधुं न मुख ते मुज० ॥१७॥
खेड्डु भवे हळ खेडीयां, फोड्यां पृश्चिनां पेट ।
आदु सुरण घणां कर्या, खाधां खूब चपेट, ते मुज० ॥१८॥
मालीने भवे रोपीयां, नानाविधि वृक्ष ।
मूळ पात्र फल फूलना, पाप लाग्यां ए लक्ष; ते मुज०॥१९॥
वणझारानो भव में कयों, भों आधिक भार ।
पोथी पुढे कीडा पड्या, नहि दया लगार, ते मुज०॥२०॥
[१३] छीपान भवे छेतो, कीधा रंगना पास । आहे सुरपणे रण झुजतां, मार्या माणस वृंद,। मदिरा, मांस मधु, भख्या खाधां मूळ ने कंदाने मुज०॥२२॥ खाण खोदावी में अति घणी, तेना पाणी उलच्यां । आरंभ कीधा अति घणा,नहीं पापज पेख्यां; ते मुज०॥२३॥ अघोर कर्म कर्या वळी, वनमां दव दीधो, । जीव अनंताने भरथीने, नहि कर्मथी बीघो; ते मुज० ॥२४॥ भाडभुंजानो भव में कयों, मार्या भठ्ठीमां जीव, जुवार चणा बहु सेकीया, पडता अति बंद; ते मुज० ॥२५॥ बिल्ली भवे ऊंदर हण्या, गरोळीए अंतारी, । मनुष्य भवे मूहता थकी, में जु लीख मारी; ते मुज०॥२६॥ सुवावड दूषण घणा, आणी गर्भ गळाव्या, जीव अणी विध्या घणा, भांग्या शीयळ व्रत; ते मुजा२७॥ लुहारनो भव में कों, घडयां शस्त्र अनेक, कोस कुहाडा ने पावडा, मार्या मुकी विवेक; ते मुज० ॥२८॥ सुतारनो भव में कयों, लीला वृक्ष वढाव्यां, आवळ वावळ वोरंडी, झाझा मूळ कपाव्यां ते मुजगा२९।। हाथीना भव में कर्या, जीव पुंछे पछाड्या, । पंखी माला तोडीया, सुंढे कईकने झाडया; ते मुज० ॥३०॥ कडीआना भव में कर्या, कुवा वावं खोदाव्या, । टांका में बंधावीआ. जीव अनंत कपाव्या; ते मुज० ॥३॥ , [१४] . . धोबीना भव में कर्या, जळना जीव मार्या । धूळवते कईक दांकीया, दान देता वार्या; ते मुज० ॥३२॥ गुज्जरना भव में कर्या, लीला भारा वढाव्या,। पाडा पल ने ऊंटना, नाक छेदी वीधान्या; ते मुज० ॥३॥ वणिकना भव में कर्या, कुडां पापज कीयां, । ओछु आपी अदकुं लीधु, तेना दोपज लीधा; ते मुज०॥३४॥ विकथा चोरी करी वळी, सेव्या पंच प्रमाद, ईष्ट वियोग पडावीया, रुदन विखवान ते मुज० ॥३॥ रांधण पीसण गारण, एवा आरंभ अनेक, । रांधण वालण इंधणा, पाप लाग्या विशेषः ते मुज०॥३६|| साधुने श्रावक तणा, व्रत लईने भांग्या, मूळ अने उत्तरतणां, मुझ दोपज लाग्या ने मुज० ॥३७॥ चालु सिह ने चीतरा, गांध स्वाळ ने समडी, । ए हिंसक तणे भवे, हिसा कीधी मे अदकी; ते मुज॥३८॥ एणी पेरे परभवे में कर्या, बांध्यो कर्म अनंत, । विविध त्रिविध करीओचलं, करंजनम पवित्र, ते मुज०||३९॥ राग वेसाडी जे भणे, गाय ढाळ सहित, । 'नरेद्रकीर्ति' कहे तेहनां, छुटे पाप त्वरित; ते मुज० ॥४०॥ इति मिच्छामि दुकंडं संपूर्ण ।
No text on this page.