Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Sanskrati Ka Vyakaran

Nand Kishore · 2011/03

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संस्कृति का व्याकरण वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर

सरस्थ
Mawan
नन्दकिशोर आचार्य

नदरिगोर आदाय
प्रथम सस्करण 1988
मूल्य पचास पय मात्र
आवरण हरिपाल त्यागी
प्रकार वाडेवी प्रकाशन
मुणन निवारा धदन सागर
बोशानेर 334001
मुग गायला घिटस
पन्न सागर बोरानेर
ISBN 81 85127 107
SAMSKRITI NA VYAKARANA by Nand Kishore Acharya
(The Grammer of Culture Philosohleal Topics)
Rs5000

अनुक्रम 13 मनुप्य हान का जथ मनुप्य और जीवन चेतना की दिशा जहिंसा सस्कृति सावभौमिक्ता की दिशा इतिहास की मानवीय प्रक्रिया 'वज्ञानिकता का आतक 17 21 25 29 33 स्वत नता सुविधा नही दायित्व व्यवस्था की क्सौटी राजनतिक आचरण की क्सौटी राजनीतिक रिश्त की आधार भूमि वास्तविक लोक्तन के लिए सत्ता का विकेन्द्रीकरण असहयोग और राज्य स्वतनता से पलायन 38 41 45 48 51 54 57 60 आर्थिक प्रक्रिया मानवीय आधार तीसरे रास्त की तलाश कस्मै देवाय ? प्रौद्योगिकी का खतरा स्वामित्व का सवाल 63 66 70 73 76 घम चेतना बनाम सगठन धार्मिक्ता और शास्त्रानुकूलता 79 82

86
यौन जीवन का नैतिक आधार
विवाह, विवाहतर सम्बध और नतिक्ता
89
शिक्षा का बुनियादी प्रयोजन
शिक्षा की साथक्ता
सामाजिक आचरण और शिक्षा
92
95
98
सस्कृति का केन्द्रीकरण क्यो? 101
सस्कृति के अतविरोध भारतीय सदम
104
आधुनिक्ता सामाजिक सदम 118
भारतीय परम्परा सामाजिक प्रासगिक्ता 127

भूमिका आधुनिक्ता स्वयसिद्धा को भाँति आज हमारे चितन एव क्रिया प्रणाली दोनो को ही अभिभूत कर रही है । हमारी पुरातन धरती नयी आकाक्षाओ, नयी योजनाओ, नये आह्वानो के सतत आरोहित धोप से कम्पमान है। पता नही यह कम्पन नवसजन के उद्दीपन के कारण है या अज्ञात, शायद अक्मनीय अस्पष्ट एव अनिश्चित भविष्य के आगमन की आशका से उद्रिक्त है । कुछ भी हो परिवतन विवाद और मूलभूत परिवतन की आवश्यक्ता को पापणा आय दिन होती ही रहती है। औद्योगीकरण और इसकी सहवर्ती प्रक्रिया आधुनिकता के निरतर बढते चरण जनजीवन म धीरे धीरे परतु अनिवाय रूप से परिवतन ला भी रह हैं। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि परिवतन की आवश्यक्ता के पीछे भारतीय चितन परम्परा एवं सामाजिक सरचना के प्रति गहरा अस ताप और जाक्षोभ परिलक्षित है। पिछती कुछ शताब्दिया में उपनिवेशवादी युग के शोषण और दमन की प्रतिक्रिया मे भारतीय चितन परम्परा और सामाजिक सरचना की अमगतियाँ अनुभूत हुइ । यह माना गया कि भारतीय समाज के पिछड़ेपन का मुग्य कारण यह २ है कि समाज म उन सभी तत्त्वा का अभाव है जा आर्थिव विनाम का प्रोत्माहित करते और औद्योगीकरण का पथ प्रास्त करते हैं और यह भी माना गया कि उद्याग धधा की बडोत्तरी पिना न ता आर्थिक समृद्धि सम्भव है और न ही सवल राष्ट्रपा गठन। इसीलिए आज यात्रिकी समर्थित औद्योगीकरण की सहवर्ती प्रक्रिया आधुनिकीकरण पर इतना बल दिया जा रहा है । परतु आधुनिकता की खोज म यह भी निश्चित है कि आधुनिकता की सकल्पना म जो तत्व निहित है जिस जीवन दशन की झलक इसम मिलती है, और जो सस्थाएं इसको अवलम्बन प्रदान करती है उनको भारतीय जीवन और सामाजिक सम्ब घो मे चरिताथ किया जाय । इसस शायद किमी को इनकार नही कि चितन और वायप्रणाली दोना म ऐस परिवतन किये जायें जो व्यक्ति को सुदृढ वनात हैं और समाज को सबल । परतु अहम प्रश्न तो यह है कि क्सा व्यक्ति और क्सा समाज इस सम्बन्ध म यह कहना आवश्यक है कि हम परिवतन को आवश्यकता का अनुभव करते है और यथा तथा इसकी प्रक्रिया को सुदृढ भी कर रहे हैं । परतु यह परिवतन हम और हमार समाज को कहाँ ले जायगा इस पर बहुत कम ही विचार किया जा रहा है। हम उदारवादी चितन परम्परा की कुछ मूलभूत सकल्पना की जोर इस तरह आवपित हो गये है कि हम न इन के सारतत्त्व पर विचार करना छोड दिया है। ऐसा लगता है कि हम एर विशेप मतवाद के जिस हम पाश्चात्य जीवन दशन का वाहक मान सक्त हैं भीपण प्लावन म बह जा रह है और भविष्य के जो सपन है सजन सुख की अनुभूति है और गतिमान हान का जो स्वाद है उस म वहन म ही हम सुस मिलता है। शायद यह बहुता के लिए सच हा । परतु कुछ ऐसे भी है जो टस जीवन दान की चमक को सिफ बाहरी मुलम्मा मानत है । इसक पीछे व्यक्ति, और व्यक्ति के समाज और प्रकृति के साथ के सम्बधो की सक्ल्पनाओ का व गहराई सदसन परखन वा प्रयास करत हैं और इन सक्ल्पनाआ के पीछे जो घ्रामा तक और अनुभव की विचारधारा है उस का पर्दाफा कर लागा की चेतना का जागृत करत है। श्री नपिगार नाचाय एम ही एक वौद्धिक है जिहान इम सम्बध मे ।

काफी मनन और अनुशीलन दिया है। मानव सस्कृति, स्वत प्रता, व्यवस्था, यायिकी आदि मूलभूत सवल्पनाओ का उहांने विश्लेषण किया है और इन का उचित अभ खोजन का प्रयास किया है। इस प्रयास का एक विशेष पक्ष यह है कि श्री आचाय इन सक्ल्पनाओ के शाब्दिक अथ से अधिक महत्त्व तात्त्विक अथ यो देते हैं और सुस्पष्ट एव सरल शली म इस की विवेचना करते हैं। इसलिए इन के सारे निवध सारगर्भित और विचारोत्तेजर हैं । इस अनुवर्तिता के युग मे लीप से अलग थलग होकर मौलिक रूप से विचार मथन की प्रक्रिया को आरम्भ करना एक साहस की बात है । यह हष की बात है कि श्री आचाय म साहस का अभाव नहीं है। साथ ही, इन की विशेषता यह है कि साहस, विवेक और ज्ञान, तीना का सम्मिश्रण इन निबधा में प्रचुर मात्रा म मिलता है । आशा है यह पुस्तक पाठको की जिज्ञासा तो शात करेगी ही, उन्हे सोचने को भी बाध्य करेगी। --रामाधयराय सेटर फॉर दि स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज, दिल्ली-110054

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प विद्यानिवास मिथ
को
निवेदित

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मनुष्य होने का अर्थ किसी समय, जन जीवन धम या शास्त्र द्वारा ही मुख्यत निर्देशित रहता था, यह मानकर चला जाता था कि मनुष्य का आचरण नतिकता की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए क्यादि धार्मिक होने में नतिक होना अनिहित था और धम पूरे जीवन की केद्रीय धुरी माना जाता था। इसलिए यह सवार तो फिर भी उठाया जा सकता था, उठाया जाता भी था कि किस तरह के आचरण को वास्तव मे नतिक आचरण कहा जा सकता है और उसके उत्तर कभी कभी अलग भी होते थ और शायद इसीलिए फिर यह मान लिया जाता था कि देश काल परिस्थितिया के अनुसार नतिकता के स्वरूप में परिवतन होते रहते है, किनतिकता समाजगत है अत विभिन समाजो म नतिक जाचरण की कसोटी भिन्न हो सकती है और इसीलिए यह भी हो सकता है कि एक समाज मे पिस आचरण को अनुचित समझा जाय दूसरे समाज मे उसी को उचित मान लिया जाय । लेकिन यह प्रश्न नतिक्ता वी धारणा को लेकर ही हो सकता था। यह सवाल नहीं उठाया जाता था कि मनुष्य नतिक आचरण करे ही क्यो और टसका कारण पायद यह था रि नैतिक हुए गिना वास्तविक अर्थों मे धार्मिक होना सम्भव नही था। इमीलिए जाधुनिक समये जाने वाले समाजा म नतिमता की चर्चा को यदि एक खब्त माना जाता है तो उसके पीछे एक मूल कारण यह भी है पि धार्मिय होना मनुष्य के लिए आवश्यक नहीं समझा जा रहा है। इसीलिए अब मूत सवाल यह नहीं रह गया है कि किस तरह के आचरण को नतिम यहा जाय बल्पि असली प्रश्न यह है कि मनुष्य नतिर हा ही क्यो ? मनुष्य के लिए नतिक आचरण की अनिवायता क्यो हा? वहुन से लोगो की राय में मनुष्य के आचरण के सदभ म नतिकता की बात उठाना ही जवनानिक। क्योकि उनकी राय म धम का स्थान जव विनान लेता जा रहा है और विज्ञान नीति निरपक्ष है । इम वग के अनुसार मनुष्य के आचरण का मूल प्रेख तत्त्व उसपी जविर अधिक से अधिर उसनी मनावनानिय वत्ति होती हैं। इन वत्तियो वे स्वरूप निर्धारण मे मनुष्य के अपने स्वतत्र और समेत निणय का महत्त्व बुनियादी नहीं है अत उसके आचरण वी नतिर पदमा भी वाई बुनियादी महत्त्व नहीं है क्यापि नतिय होना उसकी बुनियादी जावश्यरता नहीं है। एक यग और है जो यह मानता है कि मानवीय आचरण विभिन सामाजिक आर्थिक गतियों के आपसी सधप का एक ऐमा प्रतिफलन है जिसम नतिक्ता या मूल्यवोध का कोई अनियाय स्थान नहीं है। इा लोगा का तक भी कुल मिला कर नतिकता को एक हठे स्थान पर रखता है क्यावि यदि सामाजिक आर्थिक शक्तिया के मघप की वजह से वाई व्यक्ति नतिक आचरण नहीं करता है तो इसका दापी वह नहीं है-चत्वि उमसे नतिक हाने की माग करने के औचित्य को ही सही नहीं माना जा गवता। इन दाना ही वर्गों के तर्कों का अलग अलग खण्डन किया जा सकता है लेकिन जाग जो कुछ कहा जा रहा है उसके बाद शायद इस तरह गण्डन की फिलहाल कोई आवश्यकता नहीं रहेगी। एक वग ऐसे लोगों का है जो यह मानते है कि धामिर न रहते हुए तथा जविक मनोवज्ञानिक वत्तियोया सामाजिव आर्थिक परिस्थितियो की विवशता के बावजूद मनुष्य का नतिक होना चाहिए। इनका तर यह है कि मनुष्य बुनियादी रूप से एक सामाजिव प्राणी है उसे मदव एक समाज म रहना है अत समाज के दूसरे मदस्यो के साथ उमका व्यवहार किस प्रकार का हो इसका स्पष्ट निर्धारण हो जाना चाहिए ताकि उसके और समाज की दूसरी इकाइयो के बीच एक सामजस्य बना रहे। ऐसे लोगा की राय में इस प्रकार निर्धारित व्यवहार का अच्छी तरह पालन ही नतिकता । इसलिए कुछ लोग कानूनसम्मत जीवनयापन वो भी एक नतिक्तापूण जीवन मान सक्त हैं । इस तक की गहराई म जाकर देखा जाय तो लगेगा कि नतिकता एव काम चलाऊ व्यवस्था हो जाती है। इसके अनुसार नतिर होना मनुष्य की मजबूरी हो जाती है-स्पष्ट है कि एसी हालत मनतिक आचरण एक ऐसा आचरण हो जाता है जिसे करना पड़ता है वह मनुष्य का महज स्वभाव नहीं रहता । यदि उसके बिना काम चल मक्ता हा-जो कि बहुत से लोगो का चर सकता है-तो नतिय होन की माग का वास्तविक औचित्य तभी हो सकता है जव ऐसा हाना मनुष्य के अस्तित्व यो एप साधारभूत त हो । दरअर मनुष्य नतिन इमलिग नहीं हाता है कि वह सामाजिर या समाज में रहने यो विवश है और समाज की यवस्था को मानने के लिए विवश पनि गावि नतिर हान म ही उमया मनुष्य हाना या मानयत्व वी गिद्धि सम्भय ---दूगर गम नतिर हा विना गही जयों म उमवा मनुष्य हाराही गम्भव नहीं है। यहाँ यह ध्यान रमना जरुरी है नि मा लिए उगमा धामिर हाना या शास्त्रसम्मत या विधिसम्मत जागरण परना 14 मी कायाारण अनिवाय नहीं है बलि इस तरह भी कह सक्त हैं वि धार्मिक हुए विना भी नतिक होना तो सम्भव है कि तु नैतिक हुए विना धार्मिक होना तो क्या मनुष्य होना ही सम्भव नहीं लगता। इमलिए मनुष्य इसलिए नतिक नही है वि नतिकता कोई मामाजिक मजबूरी है बल्कि वह इसलिए नैतिक है कि नतिकता उसके अस्तित्व का बुनियादी धम है जमे कुछ जविर वृत्तिया उसवा जविन धम होती है। इस प्रकार बात मनुप्यत्व की अपनी अवधारणा पर जा कर ठहर जाती है- अलग अग दप्टिकोणो से इसका अलग अलग उत्तर दिया जा सकता है। लेकिन इतना सभी स्वीकार करते हैं कि वह जय जीव या प्राणीजगत् से बुनियादी अथ मे अलग है। यह अलगाव क्सि बात मे है ? मनुष्य की स्वत । चेतना और सृजनशीलता एसे तत्त्व है जा उस अय प्राणियो से अलग परते है। स्वतनचेता होने का तात्पय ही उत्तरदायी होना है-किमी बाह्य सत्ता के प्रति नहीं बलि अपने, अपनी चेतना के प्रति उत्तरदायी। इन तो गुणों के विकास म हो मानव के भावी विराम की सम्भावनाए निहित है । यदि मनुष्य के रूप मे किसी के आचरण म इन गुणा का प्रतिविम्ब नहीं दिखाई देता है तो यही मानना होगा कि मिफ जविक पहचान के रूप म ही उस मनुष्य कहा जा सकता है लेकिन तब मनुप्य और अय जीवो का यह फक उसी प्रकार का होगा जिस प्रकार का पक हम दो भिन्न जातियो के जीवो मे परत है। मनुष्य ऐमी स्थिति मे जय जीवा से बुनियादी जर्थों म भिन नहीं हो सकेगा। इस प्रकार मानवीय आचरण का औचित्य उसकी स्वतन चेतना से उद्भत उत्तरदायी और मजनशील जाचरण में है-यही नतिकता है जिसका उत्स मनुष्य स्वय है-जीवित यथाथ काई मनुष्य । सजनगीलता कोई क्ला या साहित्य मे ही अभिव्यक्त होने वाला गुण नही है-यह मनुष्य के दनदिन आचरण में प्रकट होने की अपेक्षा रखता है । अपने साथ जोर जपने से इतर मव कुछ के साथ-इस सब कुछ म केवल मानवीय समाज ही नही सम्पूर्ण प्राणी जगत् वनस्पति जगत् और जिसे जड जगत् कहा जाता है वह भी सम्मिरित है-एक सजनात्मक रिश्ता मानवीय आचरण की नतिर क्सौटी है। सजनात्मकता मनुष्य का स्वयम्भू गुण है उसकी प्रकृति है । स्वत चेतना "म सजना मरता गुण म अतनिहित है । इसलिए मनुष्य की सजनात्मकता को जिस हद तक पुष्ट और विर मित किया जा सकता है उसी हद तक हम मनुष्यत्व को मिद्धि करते रहते हैं । जविक स्तर पर मनुष्यत्व स्वय प्राप्य है लेकिन उसके बाद के मनुष्यत्व को अजित करना होता है-इस अजन की सारी मम्भावनाएं मनुष्य मनुष्य होने का अथ 15 मे ही है। जिम सीमा तक कोई यह अजन कर पाता है वास्तविक अर्थो मे उसी सीमा तक वह मनुष्य हो पाता है । इस सृजनात्मक्ता को कुण्ठित करने वाली प्रवृत्तियो और शक्तियो को ही हम वास्तविक अर्थो म अमानवीय कह सकते है और इसलिए इस तरह की अमानवीयता के खिलाफ सघप भी मनुष्य होने की बुनियादी शत बन गयी है। इसीलिए मनुष्य के मनुष्य बने रहने के लिए यह आवश्यक है कि उसका जाचरण उत्तरदायी हा, सजनशील हो और विभिन स्तरो पर जमानवीयता का विरोधी हो-यही नतिक्ता है और इसलिए मनुष्य अनिवायत नतिक है क्योकि उसके विना उमके मनुष्यत्व का कोई जथ नही है। 16 सम्मृति या प्याररण मनुष्य और जीवन मनुष्य स श्रेष्ठ कुछ भी नही है, मनुष्य सब चीजा का मापदण्ड है मनुष्य ही एक मात्र सत्य है-इम तरह की बातें हर विचारधारा को मानने वारे लागा से अवमर सुनने को मिल जाती हैं । वैज्ञानिक मनुष्य को जीवो म सवश्रेष्ठ मानते हैं । दाशनिक उसम चेतना की चरम अभिव्यक्ति सोजते हैं और सृष्टि या वेद्रीय स्थान उसी को देते है-यहाँ तर कि मनुष्य की चेतना को एक यानिक प्रक्रिया के रूप म देखने और मनुप्य की नियति को यानिय स्तर पर निर्यानत पर सक्ने की आशा करा वाले लोग भी अपने प्रयत्ना का प्रयोजन मनुष्य का कल्याण ही मानते हैं। इसमे पाई सदेह नहीं है कि किसी भी सामाजिक व्यवस्था की कसौटी यही है कि उसके अतगत मनुष्य के बहुआयामी विकास का क्सि सीमा तक एक उचित वातावरण और सुविधाएं मिलती हैं । जा व्यवस्था मनुष्य के विकास को सम्भावनाआ को मानसिक आध्यात्मिक अथवा सामाजिक आर्थिक किसी भी स्तर पर गवती है, उस हम उचित व्यवस्था नहीं कह सकत । इसी प्रकार यह स्वीकार करने म भी कोई आपत्ति नही हो सकती कि मनुष्य जविक विवास का सवश्रेष्ठ स्तर है, कि उमम जीवन और चेतना की अद्यतन सवश्रेष्ठ अभिव्यक्ति हुई है और भविष्य म इसके और गुणात्मक विकास को अपक्षा भी उसी से की जा सकती है। इसलिए यह मान रेन म कोई एतिराज नहीं हो सकता कि वह अय जीवो से श्रेष्ठ है । तव फिर समस्या क्या है ? इस सवाल पर यहां पर विचार करने की आवश्यक्ता ही क्या है-वल्कि फिर सवाल ही कहाँ वच रहता है ? लेकिन सवाल उठता है और बडा महत्त्वपूण मवाल उठता है । सवाल यह उठता है मि जव हम मनुष्य को सब जीवा से श्रेष्ठ मान लेते हैं या उसे ही किसी व्यवस्था की कमौटी मान लेते है तव हमारे इस क्थन या मा यता का घ्वयाथ क्या हाता है । क्या हमारा तात्पय यह हाता है कि मनुष्य अय जीवा से अधिक समथ, सचेत और श्रेष्ठ है अत शेप जीवन और जगत् के सरक्षण और सम्पोपण का दायित्व उमका है जथवा यह वि वही मवमे श्रेष्ठ है इसलिए अय सत्र कुछ उमदे अवाघ उपयोग के लिए है जिसे वह

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आचरण की कसौटी उपर्युक्त मा यता है तब ता अधिर विवासित चेतना और जीवन शक्ति वाले मनुप्या, समाजा या राष्ट्रा का यह सवमा य अधिकार हाना चाहिए कि वे अपने से क्मोर और हीनतर मनुप्या, समाजा या राष्ट्रा का उपयोग अपने लिए कर सकें। क्या हम ऐसा मानने के लिए सहमत है। कुछ लोग हैं जो इस तक की टांग पीचना कह सकते हैं। उनकी आपत्ति यही होती है कि मनुष्य वा मनुप्य के प्रति व्यवहार और मनुष्य या मनुप्येतर जीवन के प्रति व्यवहार दो जलग बात ह और उनके लिए एक ही क्सौटी नहीं बनायी जा सक्ती । मनुष्य और पशु म पक है, अत मनुष्य और पशु के प्रति विय जा रह आचरण म फर होना स्वाभाविक और सगत है। यदि हम इस तव का मान लेत ह तो उससे भी क्या यही ध्वनित नहीं होता कि मनुप्य और पशु द्वारा किये जा रहे आवरण म भी फक होना चाहिए। मनुप्य विमके प्रति आचरण कर रहा है, इससे पहले यह बात समझ लेना आवश्यक है कि जाचरण करने वाला मनुष्य है-जो चेतनासम्पन मूल्यसृष्टा उत्तरदायी प्राणी है-इसलिए उसने आचरण म हर स्तर पर मानवत्व प्रतिविम्बित होना अधिक सगत और साथ है । ऐसा नहीं है कि वह मनुप्यो के बीच ही मनुष्य रहता है और जड प्रकृति के बीच जान पर जड तथा पशुआ के वीच जात ही पशु हो जाता है । ऐसी स्थिति में उसके लिए जहा यह जरूरी है कि मनुष्य और मनुष्येतर जीवन के साथ आचरण करत हुए वह इन दोना के फन का समझे और तदनुकूल जाचरण करे, वही यह भी उतना ही बल्कि शायद ज्यादा आवश्यक है कि वह इस तथ्य का न भूले कि उसके आचरण में वह मूत्यवाध और चेतना प्रतिविम्वित होनी चाहिए जो उसे मनुष्य बनाती है । कुछ लोग समझ सकते है कि मैं जीवदया जसी क्मिी वार्मिक या मानवतावादी भावना अथवा पारिस्थितिक सतुलन और पर्यावरण की शुद्धता के लिए चलाय जा रहे आदोलना के समथन मे इतना सब तक जाल फ्ला रहा हूँ। इन दोना को मै गल्त तो नहीं मानता पर मेरा आग्रह उन पर एक अलग दृष्टि से विचार करने का है। जब हम जीवदया की बात करत है तव अपने को एक दाता के भाव से गरिमामडित कर लेत है-उसमे यह भावना नहीं रहती वि हम पर जीवो या मनुप्यतर जीवन का कोई अधिकार है बल्कि यह भावना अधिक प्रवल हा जाती है कि हम उनसे श्रेष्ठ है । तब यह तक कुछ भ्रामक हो जाता है क्योकि इसमे जीवन मान के प्रति कृतज्ञता का भाव नहीं रहता । मनुष्य जीवन की सवश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है, अत जीवन मात्र से जुडना उसका मरक्षण और सवधन उसके मनुष्य हान की अनिवाय नतिक और भावात्मक शत है। जब मनुष्यतर जीवन के साथ मनुष्य का रिश्ता मनुष्य और जीवन 19 अस्तित्वगत स्तर पर अनुभव किया जाता है तभी वह वास्तविक अर्थों म मानवत्व का अजन करन वालाजाचरण हा पाता है। पयावरण जार पारिस्थितिक सतुलन के लिए चलाये जा रह आदालना के पीछ भी अभी तक केद्रीय दृष्टि मनुष्य के लिए उनकी उपयागिता है । यह महसूस किया जा रहा है कि अभी तक जिस तरह स प्रकृति या दाहन किया जाता रहा है यदि उसी गति और पद्धति से यह प्रक्रिया जारी रही ता मानव जाति के लिए उसके परिणाम वडे भयकर हाग। इसलिए वास्तविक चिता पहा भी मनुष्य की ही है। मनुष्य की चिता करना आवश्यक है लेकिन जीवन की चिता करना भी उतना ही आवश्यक है क्यामि मनुष्य जीवन की ही सवश्रेष्ठ और उत्तरदायी अभिव्यक्ति है। जिस तरह समाज में मनुष्य का के प्रीय महत्त्व है उसी तरह पूर ब्रह्माण्ड म जीवन का केन्द्रीय महत्त्व है। अत मनुप्यतर जीवन वे प्रति मनुप्य का रवया उपयागिनावाटी ही नहीं हो सरता-उसके आचरण म जीवन मात्र के प्रति लगाव और कृतज्ञता उसी बोध की झलक सगत और स्वाभाविर ह जो मनुष्य के प्रति उसवे आचरण म दिखायी दनी चाहिए। एक उदाहरण से यात सम्भवत अधिक स्पष्ट हो सकेगी। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रथो म कुछ एस माना का उल्लेख मिलताह जिह वानस्पतिक औषधिया का पौधा से तोडन के पूर्व पढा जाता था। इन मनो मे औपधि म देवता का वास मानत हुए इस बात के प्रति क्षमा मागी जाती तथा कृतनता नापित की जाती थी कि मनुष्य जपन लिए उनका उपयाग कर रहा है। इसी प्रकार बहुन स भारतीय परिवारो-विशेषतया ग्रामीण परिवारो म भाजन से पूर परोस गय भोजन को प्रणाम करने या उसके लिए निश्चित मानो को पढन की परम्परा देसी जा सकती है। सभी प्रकार के कार्यों के लिए जीवन के विभिन्न रूपा म देवता । वास मानत हुए उन प्रति इसी प्रकार के कृतनतापूण मतो की रचना की गयी थी। मरा यह तात्पय कदापि नहीं है कि जाज हम भी प्रत्या काय से पूर्व उन या उसी तरह के मोका उच्चारण कर । वह ना एर रद्धि है और मनो का उच्चारण करत हुए भी हमारा व्यवहार उसी प्रकार गर-जिम्मदार और अमानवीय हो मक्ता है जिस प्रकार वडे बडे जादा की बाते करन वे वावजूद सामाजिा आर्थिक जीवन मे होता जा रहा है। जसली बात यह है कि हम यह पहबान कि वह देवता वास्तव में यह समग्र अस्तित्व ही है। उस वे प्रति अस्तित्वगत लगाव कृतनता तथा उत्तरदायित्व की भावना और तनुबूल आचरण में ही हमार मानवत्व की सिद्धि और साथरता है। -- 20 सस्कृति का व्याकरण चेतना की दिशा . अहिसा जब हम कहते है कि मनुष्य विकास प्रक्रिया का एक स्तर है तब उसका एक मानी यह भी हाता है कि वह विकासशील चेतना है क्याकि चेतना जीवन का ही गुणोत्वप है और इसलिए जीवन की विकास प्रक्रिया का एक अथ चेतना का विकास हो जाता है-खाम तौर पर मनुप्य के सदभ म । आत्मरक्षा जीवन की सहज प्रवृत्ति है लेकिन चेतना का विकास होने पर जात्म का दायरा विस्तत होता जाता है। क्याकि अपने और शेष जीवन के बीच एक तात्विव ऐक्य का भाव विकसित हो जाता है। स तान, परिवार, जाति, धम वग, राष्ट्र आदि इसो आत्म के विस्तार के दायर है । और दायरे है इसलिए इनके द्वारा हान वाली आत्म की पहचान और इनके माध्यम से सम्पूण जीवन से जुडने की एक सीमा है जिसे न समय सबने पर आत्म का विस्तार और उसकी पहचान बाधित होती है । तब वह न केवल निर्दोप सत्य नहीं हो सक्ती बल्कि कई वार उसी का अतिम मान लेने पर एक आत्मप्रवचना भी हा जाती है और इस प्रकार जीवन और चेतना के विकास मे बाधक भी हो जाती है। नस्लवाद, राष्ट्रवाद, साम्राज्यवाद आदि के कारण इतिहास मे जो कुछ मानवीय घटित होता है वह इसी दृष्टिभम वा परिणाम है । यह दप्टिनम जब मनुप्य के भीतर छिमै पशु के साथ मिल जाता है तो इतिहास के मच पर हिंसाकाण्ड घटित होने लगता है जो अनिवायरूपेण विनाशकारी और इसलिए विकास विरोधी है। पशु में हिंसा इसलिए है कि वह शेष जीवन के साथ उस तरह के अस्तित्वगत ऐक्य का अनुभव नही कर सकता जा कि मनुष्य कर सकता है । इमलिय हिंसा की वृत्ति को पाशविक वृत्ति कहा गया है । जा लोग मानव जीवन में हिंसा के अनिवाय प्रयाग पर बल देते है वे भी यह तो मानते हैं कि यह एक पाशविक वृत्ति है लेकिन उनकी राय मे इसके विना काम चल नही सक्ता है। ब्राति के प्रसग मे जव हिंसा के औचित्य पर बात की जाती है तब भी यही कहा जाता है कि साध्य के आधार पर साधन की पवित्रता को आफ्ना चाहिये। इसी म क्या यह भाव नहीं निहित है कि हिंसा है ता अनुचित पर यदि किसी अच्छे उद्देश्य के लिये उसका उपयोग करना पड़े ता वसा दिया जा ? सकता है ? इसका सीधा मतलब यही हाता है वि हिंमा अपने जाप म कोई अच्छी प्रवृत्ति नही होती यद्यपि कभी आवश्यक्ता पडन पर उमका उपयोग किसी अच्छे उद्देश्य के लिए भी किया जा सकता है। इससे भी यह तो तय हा हो जाता है कि हिंसा की प्रवृत्ति जपन आप म एप अमानवीय प्रवृत्ति है जो जीवन और चेतना की विरोधी बल्कि उनके विनाश की आर उमुस प्रवृत्ति है और यदि कभी हिंसा को स्वीकार किया भी जाता है तो एक प्रवृत्ति के रूप म नही बवि क्सिी हिंसा का ही विराध करने के तिम जस्त्र के रूप म-यद्यपि इस पर विचार की गुजा श फिर भी बनी रहती है कि किस स्थिति मे हम इस अस्त्र वा उपयाग करें। कुछ लोग ता फिर भी यह जापत्ति उठा सकते है कि किसी भी स्थिति में इसका उपयाग उचित नहीं रहा जा सकता लेकिन इन सवाला पर बहस को फिर कभी ये लिये छाड कर पहले हम मूल वात पर विचार परें। हिंसा अमानवीय और जीवन तथा चेतना की विराधी प्रवृति है इसी से यह स्वयमव सिद्ध हा जाता है कि मूल्त जहिंसा एक ऐमी मानवीय प्रवृत्ति है जो न केवल मनुष्य को पाशविक्ता के स्तर से ऊपर उठाती है बल्कि उस पूरे जीवन के साथ अस्तित्वगत ऐक्य वा अनुभव करवाती हे । यही भाव हिंसा का मूल भाव है और चेतना के विकास का मतलब इस मूल भाव का गुणात्कप हाते जाना है। इसलिय अहिंसा काई निषेधात्मक विचार नही बल्कि यह मनुष्य हान की मूल शत है । जो लाग यह कहते है कि हिंसा मनुष्य के स्वभाव मे है वे यह भूल जात हैं कि मनुष्य जभी भी विकास की प्रक्रिया का एक स्तर है और आगे का विकाम हिंसा पर नहीं हिंसा के भाव पर जाधारित है। मनुष्य नाम का जीव जितना अधिक अहिंसर होता जायगा उतना ही वह जार्थी सदभ में मनुष्य हाता जायेगा और उसी में से उसक भावी विकास की दिगा भी खुरेगी। हिंसा विकासगील मनुष्य मे छिप पशु का स्वभाव हा सक्ती है, पर मनुष्य का मूल स्वभाव नहीं हो सकती। मनुष्य या मूल स्वभाव ता अहिंसा हो रही है। इस वा तात्पय यह हुआ कि चेतना के विकास का जथ है मनुष्य का निरतर अहिंसर हाते जाना-निषेधात्मव नही विधायी अर्थों में जीवन मात्र के अस्तित्व मात्र के प्रति लगाव प्रेम, वरणा अनुकम्पा का भाव और उसका मूक्ष्मतर योघ अहिंमा के भाव की ही गुणाभिव्यक्तियां है। जहिंसक हाना ही वास्तविर जर्थों में मनुष्य हाना और जीवन के विकास की गति म माथव भूमिरा निभाना है। 22 सस्कृति वा व्याकरण लेकिन जब हम हिंमा या अहिंमा की बात करते हैं तो अमर उसका सदभ बहुत स्थूल और दहिक हाता है । हिमव मनुष्य भी पेवल हिंसक नहीं है-वह मनुष्य भी है इसलिए बुद्धि का उपयाग भी करता है और यदि उसके उपयोग की प्रेरणा हिंसा की प्रवति हो तो उसके लिए बहुत सूक्ष्म और वौद्धिव तरीके भी ईजाद करता है। इसलिए हिंसा सिफ व्यक्तिगत प्रवति ही नही रहती बलि अश्मर पूरे समाज के आचरण में भी प्रतिविम्बित होती है। जाति नर, वग, राष्ट्र, धम आदि के जावार पर अपन का श्रेष्ठ समझना और दूसरे पक्ष से सम्बधित व्यक्ति का अपने से ओछा या नीचा समझना हिंसा का ही मूक्ष्म रूप हे । इसलिए दहिक बल प्रयोग नहीं, राजनतिक दमन, आर्थिक शोषण और सामाजिक उत्पीडन भी हिंसा की विभिन अभिव्यक्तियां है । इम तक के आधार पर जाति नस्ल, सम्प्रदाय, राष्ट्र आदि की अ य से श्रेष्ठता की भावना भी कहीं गहरे मे हिंसा की वृत्ति से प्रेरित और उसे ही पुष्ट करन वाली भावना है। जाधुनिव स दर्भो मे तो राजनीतिक सगठना तर को लेकर भी अपनो श्रेष्ठता और दूसरा के ओछेपन की भावना तीव्रतर हाती जा रही है और आय दिन सडका पर विभिन्न राजनीतिक दला वे वायकर्नाओ म मुठभेडा और दला के नताआ द्वारा दूसरा के प्रति घृणापूण भाषा के प्रयाग के द्वारा ऐसी घटनाआ को और प्रोत्साहित किया जाना इसी प्रवत्ति के बहुत सामाय परिणाम हैं । हम उसी सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक व्यवस्था को उचित कह सकते है जो मनुष्य के अथात चेतना के विकास के लिए उपयुक्त वातावरण की भूमिका निभा सके। दूसर शब्दा म, इस पूरी व्यवस्था का भी आधार विधायी अर्थो में हिंसा का ही होना चाहिए। तभी विकास की प्रक्रिया में मनुष्य एक चेतन प्राणी हाने के नाते अपने उत्तरदायित्व को निभा पायेगा। यदि वह इस उत्तरदायित्व का नहीं निभाता है तो जविक स्तर पर तो मनुष्य कहला सक्ता ह लेकिन सास्कृतिक और मू यगत स्तर पर नही । विकास की प्रक्रिया बडी धीमी, जटिल और भटकावा से भरी है। यदि आज हमारी व्यवस्था या हमारी प्रवत्ति इस दिशा की ओर उमुख नही है नो यही मानना होगा कि वह मानवीय इतिहास की एक और भटक्न है। स्वतत्रता, समानता आर व धुत्व ये तीना प्रेरस मिद्धात मूलत अहिंसा के सिद्धा तक ही विभिन रूप है चाह फासोसी जाति में इनके स्फोट या सदभ हिंसापूण ही रहा हो । यही कारण है वि लाकत न, समाजवाद और अतर्राष्ट्रीयता या वश्विक्ता की धारणाएं बुनियादी रूप में एक दूसर स जुडी धारणाएँ हैं क्यापि उन सबका मूल उत्स अहिंसा की वह विधायी प्रवृत्ति है . 11/291 चेतना की दिशा अहिंसा 2300 प जो मनुष्य ये वास्तविक अयो म मनुष्य हो सयन या मूल आधार है। यह ठीक है कि अभी इन सब पे रूप पूण ता क्या स तापजनक भी नही है और दुनिया को अधिकाश आयादी जपन अस्तित्व की जविय आवश्यक्ताआ के सघप म ही इस तरह उलझी है कि अय वाता की आर या ता ध्यान ही नहीं जाता या उह बौद्धिक विलास मान लिया जा सकता है। लेकिन जविव' जाव'यक्ताआ वे पूरा न हो सक्ने का भी एव मूल पारण क्या यही नहीं है वि चेता का अपना देह और स तान परिवार से लेकर सम्प्रदाय और राष्ट्र तक के छाटे बडे दायरा म ही बाधा जाता रहा है। उसका सही जथों म वश्विक वरिक सम्पूण अस्तित्व तक विस्तार नहीं हो पा रहा जो कि उसकी सही दिशा है । यह ठीर है कि यह सव तुरत नही हो सकता। लेकिन आवश्यक यह है कि हम अपनी वतमान दिशा को पहचान और यदि वह हम मनुष्य होन और उससे आगे के विकास की ओर नहीं ले जा रही हो तो उस बदल देने के लिय सचेष्ट हा। चेतनासम्प न होत जान के साथ ही यह जिम्मेदारी स्वय मनुष्य पर ही आ जाती है कि वह अपने भावी विकास की दिशा का निर्धारित और उसकी प्रनिया को नियन्त्रित कर। 24 गस्थति का व्यावरण सस्कृति सार्वभौमिकता की दिशा सस्कृति को चर्चा म इस बात की अनदयी की जाती रही है कि हम अधिकाशत सस्कृति के नाम पर उन उपकरणो की चर्चा ही करते रह जाते हैं जिनके माध्यम से उमके वाह्य स्वरूप की भी औपचारिक पहचान ही हो पाती है और मूल तत्त्व अक्सर अनछुआ ही रह जाता है । उस मूल तत्त्व की खोज और फिर उसके महारे सास्कृतिक उपकरणो को वनावट की पहचान अर्थात् तात्त्विक और अभिव्यक्त स्तर पर मस्कृति के मूल आधार या नान ही सस्कृति का वास्तविक ज्ञान है-चाकी सारी चर्चा तो वही है जिसे अंग्रेजी मुहावरे में 'बीटिंग अबाउट युग' कहा जाता यही कारण है कि आधुनिक कहा जाने वाला समाज अधिकाशत सम्वृति को एक ऐतिहासिक वस्तु मानता है-और आश्चय नहीं कि इमीलिए विश्वविद्यालया म 'प्राचीन इतिहास और सस्कृति' के विभाग एप ही होते है और क्यापि इतिहास कभी वतमान नहीं होता जत वतमान सस्कृति का कोई विभाग भी क्यो हा -जोर इसीलिए रास्कृति जाधुनिक समाज के लिए सजावट ना समान हो जाती है। कुछ अय रोग होते हैं और वे पहले वग से तो कुछ बेहतर ही होते हैं जो मस्कृति को एक जीवित वस्तु तो मानते हैं पर उनका तात्पय एव सम्बध कला साहित्य आदि के प्रति एव उदार सरक्षय भाव से ही अधिव हाता है। उनकी समय म यह आना मुश्किल होता है कि यदि किसी समाज म पला और साहित्य को पर्याप्त माथिा मरक्षण प्राप्त है लेकिन अपने व्यापर लाचरण म वह समाज एर शोषय, आततायी और हिंसव समाज है तो उसे सास्कृतिक दृष्टि से भी अविरमित क्या कर कहा जा सकता है जबपि क्ला और साहित्य को यहाँ श्लाघनीय सुविधाए और सम्मान प्राप्त हैं। इस वग के लोगा की नजर मे तो वला और माहित्य यो पुरस्कृत करने वाला वह व्यक्ति भी एव सास्कृतिक व्यक्ति है जिमकी सारी मम्पनता अपन से इतर के गोपण और दमन पर टिसी है। यही कारण है कि रतिहास मे दा चार इमारतें बनवा देने या रिसी हेयर विद्वान को अपने दरवार मे आश्रय दे देने के कारण ऐगे धर्माध और अत्याचारी शामका और अन्य व्यक्तिया काभी मस्कृति का सरक्षर कहा गया है जिनवेलय सारे कार्यो को निदनीय आर मानवविरोधी ही पहा जायेगा। Mero जाहिर है कि क्ला और साहित्य सास्कृतिक चेतना की अभिव्यक्ति के उपकरण हैं और उपकरणा का सम्मान तव तक सस्कृति का सम्मान नहीं माना जा सकता जब तक कला और साहित्य मे अभिव्यक्त हो रही मूल्यचेतना का भी व्यावहारिव स्तर पर सम्मान न हो। इसके बिना भी यदि समाज मे क्ला या साहित्य के प्रति सम्मान का भाव प्रदर्शित किया जाता है-जमा वि आजकल बहुधा दिया जाता है तो यही मानना होगा कि वह समाज एक सास्कृतिक पाखण्ड का शिकार है। स्पष्ट है कि सस्कृति का आधार किमी समाज का मूल्य बोध और उसकी वसौटी उस समाज का आचरण है। यदि एसा है तो सस्कृति की चर्चा में हम उसे सदव कालबद्ध या देशबद्ध कर क्यो देखते है ? अध्ययन वी सुविधा के लिए हम यदि उसवा वर्गीकरण करें भी तो उसे आत्यति नहीं बना दिया जाना चाहिए जवकि होता यही है कि हम उसे न केवल अलग अलग यांचा म वाट देत है बल्कि इस विभाजन को ही वास्तविक सस्कृति मान लेते है और अय यांचा से उसकी एकमूत्रता बनाने की बजाय उसका अलगाव बताने और उस बनाये रखने म ही सारी शक्ति श्रम व्यय करते है । मेरे मन को यह बात निर तर मथती रही है रि यदि सस्कृति मूत्य दृष्टि है तो वह सावभौम है तव उसे देश प्रदेश की सीमानो म वाट पर देखना बुनियादी रूप से गलत है। यदि मस्कृति एक मू यगत प्रक्रिया है तो वह एक सावभौम और मनातन प्रक्रिया है। उस प्रक्रिया का बुनियादी प्रयाजन और लक्ष्य एक ही है उसकी भूल प्रवृत्ति और आकाक्षा एक ही होनी चाहिए। यदि उसके वाह्य स्वरूप में कोई परिवतन दियायी भी देते हैं तो वे मदभगत परिवतन है जिनसे मूल आधार पर कोई असर नहीं पडना चाहिए। ऐसी स्थिति म सस्कृति के देशवद्ध रूप पर अधिक जोर देना या उमी को पिसी के लिए अनिवाय मान लेना क्या प्रकारातर से सम्वृति की मूल अवधारणा वा ही विराध करना नहीं है युछ लोग यह सकते हैं कि देशकाल के अनुसार मूत्य यदलत रहते हैं अत विभिन्न देश प्रदेगा की सस्कृति यदि एक दूसरे स अलग है तो अलगाव स्वाभाविप है। लेकिन एमा वह्न वाले यह भूल जाते हैं कि समय और सदभ अनुगार मूल्या ये स्वरुप म तो परिवतन हा सकता है हाता है लेरिन मू प्रति नही वरलती। भौगोलिय और पर्यावरण वारणा मे गनुप्यगत अनिवायताओ ये कारण कुछ परिवतन हान भा हैं ता उह जापतिा मान एना क्या एक प्रकार का दुराग्रह ही नहीं है ? मध्यमा" तर तो मम्मृति रो दावद धारणा या कुछ आधार पिर भी हो गरता था । जव ता सति या मूल्य रेतना का मुग्य आधार जाति या धम 7 - मन्यायी 26 गरानिमा पारण रहा तब तक विभिन्न धमव्यवस्थामा को मानने वाले देशा और विभिन जातियो मे यदि कुछ मूलभूत अतर दिखाई भी दिये तो यह अस्वाभाविक नही था। लेकिन जाज जव विभिन्न जातिया आपस मे घुलमिल चुकी है तथा अग से उनकी पहचान कर पाना सम्भव नहीं रह गया है और धम कामास तौर से उपासना पद्धति का जीवन और व्यवस्था पर वैसा नियत्रण और येद्रीय प्रभाव नहीं रह गया है जो प्राचीन और म ययुग तक था तो सस्कृति को देशबद्ध रूप म देखने या विक मित करने की क्या साथवता हो सकती है ? विभिन्न धर्मों के विश्वासा और आचार म कुछ बुनियादी एकता थी तो कुछ युनियादी भिनताएँ भी थी और इसलिए उनके आधार पर विकसित मूल्या म कुछ भिनताएँ हो सकती थी जिससे किसी धम विशेप के अनुयायी समाज या क्षेत्र के लिए एक भिन सस्कृति का विकास सम्भव था। लेकिन आधुनिक समाज में धम प्रभुतासम्पत स्थान खोता जा रहा है और धम के रूढिगत स्वरूप और विश्वामो को मानव अपने विवेक की कसौटी पर कसने लगा है। दूसरे शब्दा मे, इसका तात्पय यह हुमा वि मूत्य दष्टि को निर्देशित करने वाला तत्त्व अब शास्त्र या धम नहीं बल्कि मनुष्य का अपना विवेक हो गया है। यह विवेक सापभौम है, किसी भौगोलिक सीमा या राजनीतिक नागरिक्ता स बद्ध नहीं। ऐसी स्थिति म एक मनातन प्रक्रिया के रूप मे मस्कृति की देश वद्धता पी जात्यत्तिक्ता का आग्रह क्या दुराग्रह या कुछ उदार हारर सोचे तो पूवगह नहीं है ? जापत्ति उठाई जा सकती है वि धम अभी भी केद्रीय प्रेरक तत्त्व बना रह सकता है, कि विज्ञान धम को कभी भी पूणतया पदच्युत नहीं कर सका कि विज्ञान भी धम की बहुत सी वाता को स्वीकार करता जा रहा है कि अव धम कोई सम्प्रदाय नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है और उमी के जाधार पर भावी मस्कृति का विकास होगा आदि आदि । लेकिन इन मभी आपत्तियो को सही मान लेने पर भी सस्कृति की देवद्धता की जनिवायता पर तो प्रश्नचिह्न लगा ही रहता है और तब क्या देश भी एक सास्कृतिक स्वाभाविकता से अधिक एक भौगोरिव अनिवायता और राजनतिक आवश्यक्ता ही नहीं रह जाता? मस्कृति को अक्सर किसी भाषा या धम मम्प्रदाय या देश के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है-यथा बगला सस्कृति हिदू सस्कृति, मुस्मि सम्वृति, ईसाई मस्कृति भारतीय मगृति, फच मस्कृति आदि । लविन एमा विभाजन यदि एक मूलभूा मस्कृति के सदभगत और परिवेशगत विभिन्न स्वरूपोका समयने ये ग्यि किया जाय तो कुछ सीमा तर उमकी अपनी उपादेयता भी है रिन ग विभाजन वा आत्यन्तिर मानरर से ही विभिन्न समाजो या व्यतिपाय सारऋतिर आचरण को एक मात्र कसोटी बता लेना क्या माग पारखण्ड गो विरमित हाने देना नहीं है ? मस्कृति मापनौमिाना पी गि 27 क्सिी जमाने मै मस्कृति की चचा अधिकारात धम के साथ जोडकर की जाती थी। फिर यह चर्चा राष्ट्र के साथ जोडकर की जाने लगी। अव लगता है कि यदि सस्कृति की बात पूरी मानव जाति के सदम में नहीं की जाती है और हमारा ध्यान स्वरूपगत भिनताआ के कारण अलगाव को पुष्ट करत रहने की बजाय प्रकृतिगत बुनियादी एकता को पुष्ट करने की ओर नहीं जाता हे तो यह सास्कृतिक विकास की प्रक्रिया मे एक ऐतिहासिक विसगति की जोर से आखे मूदना होगा जिसके परिणाम पूरीमानव जाति का, और इसलिए हम भी, भुगतने होगे। 28 मरगतिपाभ्यारण

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विरमित 'हान म मनुष्य ही मवाधिर प्रमुग पारण रहा है वाई दयी या भूनातीत मत्ता उमपा वारण नहीं रही ह-यानी मिमी भी मानवीय परिस्थिति या विराम मानव व्यवहार के माध्यम मे हाता है अत मानव निर्मित ही है। व्यावहारिष प्टि ग तो यह वात टीवरग मानी हरिन तात्विर प्टि म इमम एप बडो गामी यह है रि यदि मानव विमी परिस्थिति विशेष के विवसित हान वा माध्यम ही नही है ता वह उमा निमाता नही है । एमी स्थिति में हम विमो नी मानवीय परिस्ति को मानवनिर्मित नहीं वह मक्ते-पूणतया मानवनिर्मित परिस्थिति ता यह ही नही मक्त । जब किमी वस्तु का माध्यम की तरह स्तमाल करते हुए हम कोई चित्र मूति आदि वनात हैं ता उमरे बनन यो प्रतिया म वस्तु विशेष पी जपनी प्रवृत्ति भी एव हद तर प्रभावी हानी ह लेविन अतत जो क्लाति हमारे सम्मुख आती है उसे हम मानवनिर्मित क्लायति यह है वस्तुनिर्मित कलाकृति नहीं। इसीलिए यह हाता है मि एक ही वस्तु के माध्यम से बिल्कुल भिन आगया या प्रेपित करन वाली और भिन रूपा वाली कलाकृतिया की रचना मम्भव हो पाती है अर्थात् उमरी रचना म रचनाकार मानव का निय र प्रभाव रहता है और इमोलिए उसे मानवनिर्मित मलाकृति कहा जाता है। देखना होगा वि मानवीय परिस्थितिया के विकाम म भी मनुष्य क्या इसी तरह का निय तक प्रभाव रम सकता है यानी रिसी तरह की सामाजिक पाथिर राजनीतिक परिस्थितिया का निर्माण मनुष्य अपने अनुकूल कर सक्ने मे समथ है या नहीं ? बहुत से लोगा का लग सकता है कि यह एक वैवार प्रश्न है क्यापि मनुष्य का यह सामथ्य तो बिल्कुल स्पष्ट है, उसके सारे वैज्ञानिक आविष्कार और उनके आधार पर सभी प्रकार की परिस्थितिया का अपने अनुकूल करने की काशिराम मिलती जा रही सफलता ही क्या उसके इम सामथ्य का परिणाम नही है लेकिन मेरी राय म यह प्रश्न वडा महत्त्वपूर्ण है यदि हम यह मान लेते हैं कि मनुष्य परिस्थितियां वे विकास म नियात्रा प्रभाव नहीं रख सकता। यहां यह भी स्पष्ट कर देना जरूरी है कि मनुष्य पर जार देन का तात्पय मनुष्य की चेतना और विचार क्ति पर जोर देना है क्यानि यही चीज़ उसे अय जीवा से बुनियादी स्प से अलग करती है-नहीं तो यही मानना होगा कि मानवीय परिस्थितिया का विकास एव ऐमी अचेतन प्रत्रिया है जिसमे कोई परिवतन सम्भव नहीं है अत अधिक म जधिर म यही कर सकते हैं कि उम प्रक्रिया को दिशा का पहचान हैं-यद्यपि वह पहबान भी चेतना निरपेक्ष नही हो सकेगी और उसके साथ हो 30 सस्कृति वा व्याकरण

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होगा कि वह क्या है जो मनुष्य के अनुकूल है-पिसी एक मनुष्य के नहीं बल्कि पूरी मानव जाति के अनुकूल । और मनुष्य क्यो कि जीवन का ही एक गुणात्मक रूपातर है इसलिए यह भी देखना होगा कि यह अनुकूलता सिफ मनुष्य के लिए ही नहीं ममग्र जीवन के लिए हो। अभी तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार मनुष्य को जीवन का सर्वश्रेष्ठ गुणात्मक विकास माना गया है और इसका निर्धारित तत्त्व उसकी चेतना है- यानी चेतना न केवल मनुष्य को विशिष्ट बनाती है बल्लि जीवन का सवधेष्ठ गुणात्मक विकास है। मनुष्य चेतनासम्पन्न है अत उत्तरदायी भी है-अपनी ही चेतना के प्रति उत्तरदायी क्योकि उसके मानवत्व की सिद्धि इमी मे है कि उसके प्रत्येक निणय व क्म में मानवीय चेतना प्रतिबिम्बित हो । उसया हर कम चेतना से प्रसूत है अत वह उस कम के लिए उत्तरदायी भी है क्योकि वह कम विचारपूर्वक और सक्त्पपूर किया हुआ कम है । इस उत्तरदायित्व का सहज बोध ही वह मुल्यबाध है जिसकी अपेक्षा हर मानव प्राणी से की जाती है। इसलिए परिस्थितियो वा-भौतिक और मानवीय दोना प्रकार की परिस्थितियो को मनुष्य के अनुकूल विकसित करन का तात्पय उहे इस तरह विकसित करना है कि वे चेतना के सरक्षण, सवधन और गुणात्मक विकास के लिए अधिकाधिक अनुकूल हो सके । चेतना का यह विकास प्रत्येक मनुष्य मे होता है यदि हम मानव देह म ही उसका अस्तिव मान । 32 सस्कृति पाथ्यावरण

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विगावाही विज्ञान की बाटि म स्वीगार पर रह हात है । इमरा मतल्य स्पप्टतया यही है कि विज्ञान या पनानिरता था आग्रह सिप तामिकता या बुद्धिवान्तिा का आग्रह नही ह वल्लि वह तर या बुद्धि वी प्रपिया के प्रमुख मात मे स्प में भी प्राकृतिक विनान यो हो मानने और उम प्रत्रिया के परिणामा की परम भी उस मूल योत के आधार पर ही करन का आग्रह है। दूगर शब्दा म, यह एक स्पष्ट आग्रह है कि मनुष्य यो चेतना और व्यवहार पोप्रप्रिया भी भौतिय या प्रायतिर विनान के नियमा से मचालित एव याधित है, अत उनका अध्ययन भी इसी आधार पर रिया जाना सगत यानी विनमगत है । इस मानन का मतलब यह मान लेना है कि मनुष्य सम्पूर्णत एक भौतिय अस्तित्व है-देह नही चेतना के स्तर पर भी एव भौतिक अस्तित्व है-और इसीलिए उसका अध्ययन और उसके व्यवहार का सचालन भी भौतिक विनान के नियमा के आधार पर ही होना चाहिए । यही कारण है वि एवं आर साहित्य और क्ला जसी मानवीय चेतना की ललित अभिव्यक्तियो मे ता दूसरी ओर इतिहास की प्रक्रियाम-जा मानवीय व्यवहार मी सागोपाग अभिव्यक्ति ह-उही नियमा का आरोपण किया जाता है जो भौतिक विनान के अपने निवप होत हैं। इसीलिए कभी इतिहास का भौतिकीय द्वद्वात्मक्ता के नाधार पर समयने की कोशिश की जाती है तो पभी डाविनीय विकासवाद के आधार पर । इस तरह के प्रयत्ना की अपनी साथक्ता है और उससे भी इतिहास की हमारी समझ बढती ही है, लेकिन समस्या वहाँ उठती है जब हम बेवल भौतिरीय नियमा या प्राकृतिक विज्ञान वे अद्यतन निष्पों को ही न केवल सारे इतिहास पर लागू कर देते हैं बल्कि मानवीय आचरण का औचित्य भी उही के आधार पर जाचन परखन लगत हैं । यानी जब हम यह मान लेत है कि मनुप्य समग्रत एक भौतिक अस्तित्व है अत उसके सभी प्रकार के आचरण का स्रोत भौतिकीय नियम ही है। क्या यह अपने आप में एक विज्ञानसगत धारणा है ? क्या मनुष्य ठीक उसी प्रकार से एक भौतिक अस्तित्व है जिस प्रकार पत्थर, लोहा प्रकाश या पड़ पौध आदि भी है ? क्या मनुष्य और सृष्टि के अस्तित्व की पृष्ठभूमि म सचमुच कोई चतय तत्त्व नही है ? क्या इस चतय तत्त्व का न होना स्वय भौतिक विनान द्वारा सवत प्रमाणित है? क्या मनुप्य की चेतना सिफ भौतिक तत्वा का ही समवाय है ? क्या विनान द्वारा इस सम्बध म क्सिी अन्तिम निष्कप पर पहुंचा जा चुका है ? क्या विनान द्वारा भी अव कुछ जानना बारी नही रह गया है ? क्या विनान द्वारा जो कुछ पहले जाना गया वह काफी हद तर अधा या एकागी सिद्ध नहीं हुआ है। इन सब प्रश्ना का स्पष्ट उत्तर पाय विना सम्पूण मनुष्य जाति के भविष्य को वेवल भौतिकीय नियमा द्वारा 34 सस्कृति का व्याकरण सचालित करन की कोशिश न केवल अमानवीय वल्कि अवज्ञानिक वाशिश ही कही जा सकती है। जाधुनिक युग के बहुत से वैज्ञानिक भी अब यह स्वीकार करन लग हैं कि भौतिक अस्तित्व की पृष्ठभूमि म किसी चेतना के अस्तित्व में स्वीकार व बिना भौतिक जगत की सही एव पूण व्याख्या सम्भव नहीं है। नोबल पुरस्कार विजेता जीववनानिर डा जाजवाड का मानना है कि चेतना के जीवन के उद्गम के मूल में हान की सम्भावना को मानकर हम अनेर वैज्ञानिव गुत्थियो का हल कर सकते हैं । भौतिक विनानी प्रोफेसर यूजेन विगनर यह मानते हैं कि चेतना के सिद्धात का सहारा लिए बिना बवा टम यावी का नहीं समझा जा सकता। इसी प्रकार भौतिक विज्ञानी चौकी जीवन के भौतिक उद्गम की सम्भावना को सही नहीं मानत । मासीसी वज्ञानिक ज्यां करन ब्रह्माण्ड का आद्य प्रारम्भ चेतना से ही मानते हैं। धीर- धीरे एक बड़ी संख्या म वैनानिन भौतिक प्रक्रिया मे निहिन चेतना के अस्तित्व को स्वीकार करन की ओर उमुख हो रहे हैं । काप्रा जसे विज्ञानवेत्ता रहस्यवादी और आध्यात्मिक अनुभूतिया तथा विज्ञान द्वारा प्रमाणित अणु- परमाणु व्यापार म एक साम्य देखते हैं । लेकिन यह मानना चाहिए कि इस दिशा म भी अभी तक विनान न कोई स्पष्ट निष्कप नहीं दिया है । उलिखित सभी विज्ञानवेत्ता चेतना की सम्भावना के बारे में ही बात कर रह है, उसके आद्य अस्तित्व को प्रमाणित कर सक्न का कोई वज्ञानिक जाधार वे नहीं दे सके है, अत उनके विचार भी अभी तक विज्ञानसिद्ध विचार नहीं है बल्कि इस मम्भावना की भी पूणतया अनदेखी नहीं की जा सकती कि अनवरत शाध की थकान और उसके वावजूद क्सिी जतिम निष्कप तक न पहुँच पाने की हताशा ने उह इस तरह की सम्भावनाआ पर विचार करने के लिए वाध्य किया हो। इसलिए बेहतर है कि हम एक बार जीवन और इसलिए मनुष्य के भौतिक उद्गम का ही स्वीकार कर जागे का रास्ता पहचानने की काशिश कर देवे । यदि हम यह मान भी ले कि जीवन जार मनुष्य-और इसलिए चेतना भी- भौतिक तत्वा सयोग से हुना एक गुणात्मक विकास है तो भी क्या हम मानवीय चेतना और उसके व्यवहार को भौतिकीय नियमा द्वारा संचालित मान सकते हैं। यहां यह प्रश्न भी तो उठता है कि जो 'मूल म नही है वह 'परिणाम में कसे आ सकता है, क्योकि काय का कारण से अलग नहीं किया जा सकता। अर्थात् भौतिक तत्व में भी चेतना का बीज स्प म होना ता स्वीकार करना ही होगा। लेकिन फिलहाल इस सवाल का यही पर छाडत हुए वहम की "वज्ञानिकता आता २९ गुजाइश के लिए हम थोड़ी देर के लिए यह मान लेत हैं कि चेतना भौतिक तत्वो ये आपसी मघात का गुणात्मय विकास है अत वह ब्रह्माण्ड के आद्य प्रारम्भ मे नही बल्लि विकास प्रक्रिया का परिणाम है। यदि ऐसा है भी तो क्या वह अपने गुणात्मक अतर के बावजूद उही नियमा स प्रभावित और मचालित है जो चेतनाहीन भौतिक तत्त्वा पर लागू होते है ? भौतिक तत्वो म चेतना का विकास एक युगा तरकारा और बुनियादी गुणात्मक विकास है क्याकि भौतिक तत्वो की प्रक्रिया एक जधी प्रक्रिया है प्राकृतिक शक्तिया सचेत नही है, वे सकल्प विल्पहीन शक्तिया है-जबकि मनुष्य को एम भौतिक अस्तित्व मान लेन पर भी वह एक ऐसा चेतनासम्पन्न भौतिक अस्तित्व होता है जिसकी भौतिक प्रक्रिया पर भी चेतना का नियंत्रण रहता है बल्कि यह नियनण जितना अधिक विकसित होता है उतना ही वह अपने गुणात्मक विकास का और अधिक सरक्षण मवघन करता हुआ उस दिशा में आगे के गुणात्मक विका को आर उमुख होता जाता । यदि चेता भौतिक तत्त्वा वा ही गुणात्मक विकास है तो चेतनापूण भौतिक तत्वों की प्रक्रिया मे एक बुनियादी गुणात्मक अतर होना स्वाभाविक है खास तौर से तव जव कि चेतनाका तात्पय हो विचार, सकल्प विवरप और वरण करने तथा अपने वरण क्यि हुए रास्त पर कुछ चल पर पुनर्विचार करन और तदनुसार रास्ते वा नये सिरे से निधारण करने के गुणो स भी है क्यापि चेतना नान और कम की स्वतत्र प्रक्रिया की दिशा मे ल जाने वाला गुण है । इस दष्टि स विचार करो पर भी चेतना और उमरे द्वारा संचालित मानवीय व्यवहार वा पूर्णतया भौतिक जियमा के आधीन मानन का आग्रह, यानी मानवीय चेतना और व्यवहार को विनानमिद्ध नियमो, भातिक या प्राकृतिक विनान पे नियमो से प्रेरित और नियमित करने का नाग्रह क्या अपन आप म एक अघ आग्रह नहीं है? क्या यह मानवीय विचार पर एक तरह की वनानिवता या आतब नहीं है। मरे पास भी इसाई स्पष्ट उत्तर या विज्ञान सम्मत उत्तर नहीं है । लरिन इस प्रश्न पर विचार रन की आवश्यकता है और इसके स्पष्ट उत्तर के बिना मानवीय नियति वो इसी के आधार पर निर्देशित करन को चेप्टा वा जाग्रह एक सही और मानवीय आग्रह नहीं कहा जा मक्ता। मम बाई मदह रही कि भौतिव या प्राकृतिय विनान ने भौतिया प्रातिर क्तियांबा पहचानन म हमारी यापो मद की है। मानवीय आचरण के अध्यपन म भी कई यार छ भौतिर तथ्या का समाने ही उम्रत पड़ती है। निश्चय ही एगो स्थिति म भौति दिनान तथ्य जगत की 36 गराति नाम्पारण सही पहचान करवाने में हमारी मदद करता है और उसकी इम उपयोगिता की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए । मनुष्य एक चेतनामय भौतिय अस्तित्व है, अत उसकी भौतिक यानी जविक प्रक्रिया को समझने म भी भौतिय' विज्ञान का उपयोग सगत है, लेकिन उसकी चेतना के व्यवहार को भौतिकीय नियमो से शासित मानकर वज्ञानिस्ता के नाम पर उसे निर्देशित या निर्यात करना कहा तक विज्ञान सम्मत है, इस पर विचार करने की ज़रूरत अवश्य महसूस होती है। वनानिकता' का आतर 37 स्वतन्त्रता सुविधा नही दायित्व स्यत पता या क्या अर्थ है ? इसी के साथ जुड़ा है 'स्वत अता रिसस' या सवाल भी। 'पीडम' और 'फ्रीडम फ्रॉम यो एक दूसर से अलग करने नही देगा जा सकता, यत्ति 'फीडम फार' भी इसी सवार का एक पहलू है, क्यानि स्वतता पाई निष्प्रयाजन धारणा नहीं है। दरअस्ल, स्वतत्र हा सरने म ही हमारे मनुष्य हो सकने की सारी सम्भावनाएं निहित है, क्यावि स्वतत्र हुए विना सजनशील होना सम्भव नही और मनुष्य होने का अनिवाय रक्षण सजनगील होना है-यही वह प्रवृत्ति है जो मनुष्य को अय प्राणिया स अलग बरती है । इसका मतलब हुआ वि स्वतनता एक ऐमी गतिशील स्थिति है जो मनुष्य मे निहित सजनात्मकता को प्रेरित करती है और इसीलिए वे सभी प्रवृत्तिया तथा स्थितिया स्वत नता विरोधी अत मानव विराधी हैं जा मानवीय सजनात्मक्ता की अभिव्यक्ति के रास्ते में बाधाएं पदा करती हैं। उनके विग्द्ध किया गया हर सघष इसीलिए स्वत नता के लिए दिया जाने वाला मघप है। इस धारणा कालाधार वना पर हो इसके राजनीतिक आर्थिक सामाजिक प्रनिफ्लन का समझा जाना चाहिए क्यामि वही इसका व्यावहारिक रूप है। राजनतिक सामाजिक स्तर पर लाक्तत्र तथा आर्थिक स्तर पर समाजवाद के लिए किया जाने वाला हर सघप इसीलिए स्वतत्रता के लिए किया जाने वाला सघप है । राजनतिक दमन सामासिव उत्पीडन तथा आर्थिक शोपण मूल रूप में एक ही स्वतत्रता विरोधी प्रवृत्ति के जलग दोखन वाले रूप हैं पर बुनियाद एक ही है-स्वतन्त्रता विरोध अथात् मानव विराध । लेकिन इन प्रवृत्तियो व सिलाफ किये जाने वाले सघप म इस बात का खतरा भी निरतर बना रहता है कि लाक्तात्रिक या समाजवादी व्यवस्था को ही स्वत पत्ता मान लिया जाय-तभी यह होता है कि सिप बाट देने के अधिकार या रोटी-कपडे के अधिकार का ही अतिम कसोटी मान लिया जाय और यह नही देखा जाय कि जिस परम उद्दश्य स्वत त्रता अर्थात् स्वतत्र सजनशील मानवीय चतना के लिए समय दिया गया था उस का दमन वोट के अधिकार या रोटी कपडा दन के लिए दिया जा रहा है।

इमलिए यह देसत रहना निर तर आवश्यक है कि कही लारत या समाजवाद के नाम पर स्थापित की गयी व्यवस्था न स्वय वा उस मूल्य से अधिर महत्त्वपूण ता नहीं बना लिया है जिमव लिए उसे विकसित मिया गया था क्यारि अक्सर यह देखा गया है कि संगठन और व्यवस्थाएं बहुत शीन उपन मूल्यगत उद्देश्या या भूल पर अपना अस्तित्व बनाये रखन या ही-चाहे कभी भली नीयत से भी-प्रमुग उद्देश्य समझ लेती है तथा येन- प्रकारण अपने औपचारिष स्वरूप का बनाये रखने के लिए उन मूत्यो ये विराध म ही काम करने लग जाती हैं, जिनके लिए उनका जन्म हुआ था। राजनतिक दलो और विभिन्न मरपारा या इतिहास इस कथन की पुष्टि वरता है । इसीलिए न तो पूजीवादी-साम तवादी समाजा को स्वतत्र पहा जा सकता है और न समाजवादी कहे जान वाले सर्वाधिकारवादी समाजा या हो, क्यादि पहले प्रकार के लिए स्वत अता कोई मूल्य नही, कुछ लोगा की सुविधा बन जाती है और शायद इसी को प्रतिनिया स्वरूप दूसर प्रकार के लिए एक प्रतिक्रियावादी धारणा और विलासिता। यह आश्वयजनक है कि सामाजिक आर्थिक सदर्भो म जिन दो भारतीयाने हमार युग में स्वत नता की धारणा का इस परिप्रेक्ष्य में सर्वाधिक मही रूप में देया, उन दोनो मे आपस म कोई तालमेल नहीं हो सका, वत्यि एव दूसरे को काफी गलत भी समझा गया-उसके वारणा पर चर्चा फिर भी। महात्मा गाधी की अहिंसा और विवे द्रीकरण तथा एम एन राय या बुनियादी सोपत न एक दूसर से जुड़े है-चाह राय भौतिकवादी रह हा और गाधी अध्यात्मवादी । लेकिन राय मनुप्य मी सजनात्मक सम्भावनाओ म आध्यात्मिकता को भी एक मानते थे तथा गाधी की अहिंसा की धारणा म यह स्पष्ट था कि मनुष्य को उस सारे शापण उत्पीडन से मुक्त किया जाय जो उसकी सम्भावनाओ का कुण्ठित करता है । स्वतनता वा मघष इसीलिए गाधी के लिए एक आध्यात्मिक साधना थी हमारे यहा अहिंसा का वहुत एकागी अथ मे लिया जाता रहा है-शायद इसलिए कि यही अर्थ उन लगा के अनुकूल पड़ता ह जा शासन त न, अथ यवस्था तथा समाज पर हावी होते रह है। यह वग हिंसा का सिफ दहिक अर्थों मे ही ग्रहण करता है जो कि उसकी स्थूलतम अभिव्यक्ति है। बुनियादी अथ भै तो वह हर भावना और चेष्टा हिंसा है जो मनुष्य मात्र अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति सहित पूरी मानवता की सजनात्मक सम्भावनाओ की अभिव्यक्ति व पल्लवन का दमन करती है। सजना मवत्ता का दमन हिंसा की सूक्ष्मतर आर इसीलिए गुरुतर अभि यक्ति है। स्वतन्त्रता सुविधा नही दायित्व 39 मीति हम गग रिसी भी समयानतिर स्तर पर उचित नहीं यह सक्त जास्वत प्रतामा पुटित करता हा चाह वह रिसी के द्वारा म्पन्छा रा ही क्या लिया गया हा, पयामि इस प्रकार या पाई भी वम या निणय मूल्यगत स्तर पर स्वतता विराधी है। इसी प्रकार पिसी भी समाज म-चार उसन लोपतन या औपचारिक रुप बना रया हो-रिमी प्रकार के शापण और पूरी मानवता ये साधना और यम यो विसी एक व्यक्ति, व्यक्ति समूह, वग, जाति मा देश द्वारा दोहन व उसरे फ्ला को अपने उत्तराधिकारिया के लिए गुरक्षित पर देन यो चेप्टा भी स्वत प्रताविरोधी व अलोकतान्त्रिक है। रयत पता इसीलिए सुविधा नहीं उत्तरदायित्व है । जब हम उस एव एरो मूल्य में रूप स स्वीकार करत हैं जिसस अय मानवीय मूल्य एक पापण व सरक्षण पात हैं ता निरतर यह देखत चलन का उत्तरदायित्व भी हमी पर आता है कि यही हमारा काई कदम दूसरो की स्वत त्रता का और इस प्रकार निज की सजनशीलता का भी बुठित करन वाला तो नही है । पूजीवादी- सामतवादी समाज यदि सही अर्थो म स्वतन समाज नहीं हैं ता इसीलिए कि उस व्यवस्था म सारा जार अपनी स्वतत्रता पर केन्द्रित है जो स्वतनता का अवमूल्यन कर उसे व्यक्तिगत सुविधा के स्तर पर गिरा देता है । इसी प्रकार समाजवाद के नाम पर राजनतिय तानाशाही कायम करने वाले समाजो म भी इस बात की उपेक्षा की जाती है कि समाजवाद भी स्वतत्रता की चरम धारणा की ही सामाजिक आर्थिक अभिव्यक्ति है और इसलिए किसी भी समाजवादी व्यवस्था की एक परब यह भी है कि वह एक समग्र धारणा के रूप म स्वत यता को पुष्ट करती है या नही । स्वतत्र हान का अथ सजनशील हाना ह त जो व्यवस्था मानवीय सजनशीलता को कुठित करती है वह उतनी ही स्वत प्रताविराधी व अनतिक भी है । गहराई से देखा जाय ता पूजीवादी सामतवादी तथा समाजवादी कही जाने वाली सवाधिकारवादी व्यवस्थाएं दानो ही स्वतत्रता का अवमूल्यन कर उसे एक ही स्तर पर ला पटक्ती है-एक उसे कुछ लोगो की वास्तविक सुविधा व अन्य सबके लिए एक औपचारिखता बना देती है ता दूसरी उसे सिप पूर्वा विलासिता समझकर उसका दमन करती है। दोना ही उसे मूल्यगत स्तर पर ग्रहण नहीं करती इसीलिए दोनो म उसके लिए दायित्व का वाघ नहीं है। इसीलिए जिस समाज मे किसी भी प्रकार का शापण उत्पीडन है वह समाज न केवल राजनतिक सामाजिक स्तर पर स्वतत्र नहीं है बलि अनतिक समाज है- क्याकि वह स्वतत्रता को एक समग्र मूल्य नही मानता अत उसके प्रति किसी प्रकार का नतिक दायित्व भी नही स्वीकार करता। 40 सस्कृति का व्याकरण व्यवस्था की कसौटी मनुष्य के विवाम की सही दिशा क्या है इस प्रश्न पर किसी भी प्रकार के विचार विमा से पूर्व यह स्पष्टतया समय लेना जरूरी है कि मनुष्य की हमारी अवधारणा क्या है। आखिर वह क्या बात है जो मनुष्य को पृथ्वी पर पाये जान वाले अय प्राणियों से अलग करती है ? यदि हम यह समझ लेते हैं कि मनुष्य क्यो मनुष्य है तो फिर यह समझ लेना भी मुश्किल नहीं रहता कि मनुष्य जीवन के विकास की सही दिशा क्या हो सकती है और यह भी कि किस तरह का आचरण हम अच्छा और सही मनुष्य बनाता है-वल्कि अच्छा और सही विशेषण भी यहा अतिरिक्त है, क्योकि मनुष्य होने का मतलब ही उन याग्यताआ से सम्पन हाना है जो उसे अय जीवो मे, पशुआ मे अवग करती हैं और उसे मानवत्व के अजन की दिशा में प्रेरित करती है । जीवविनान की क्षष्टि से देखें तो मनुष्य और पशु मे उसी प्रकार या अतर है जैसा एक पशुजाति और दूसरी पशुजाति मे होता है। वह 'होमोसपियन' जाति का पशु है, यानी एक अलग विस्म वा मानवपशु । इस परिभापा मे भी रहता वह पशु ही है। तब ऐसा क्यो है कि हम उससे एक अलग तरह के आचरण की अपेक्षा करते हैं ? जर वह पशुवत् आचरण करता है तो हमे क्यो क्षोभ होता है ? इससे स्पष्ट है कि जविव विशेषताओ से अलग कुछ ऐसी आचरणगत विशेषताएँ और है जो उसे पशुत्व से बुनियादी तौर पर अलग वरती और मानव बनाती है । ये विशेषताएँ क्या है ? मानवीय समयी जाने वाली मभी आचरणगत विशेपताओ का गहराई से जाकर देखें तो जो बाते मनुष्य को बुनियादी तौर पर दूसर प्राणिया से अलग करती दीखती है वे है उसकी विचारशीलता और उसम निहित सजनशीलता । ये दोना गुण विसी पशु मे नही पाये जाते-क्मिी अय जीव में भी नहीं। पक्षिया द्वारा घोसला बनाना अथवा पशुआ द्वारा माँद आदि बना लेना एक सहज जविक वृत्ति वे अतगत आते है सुविचारित सजन के अतगत नहीं। पशु और अय मनुष्येतर प्राणियो में इसीलिए जो प्रियाएं सहज होती हैं वे भी मानवीय जीवा मे एक प्रकार के मूल्यबोध से अनुप्राणित और अनुशासित होने लगती है क्योकि विचारशीलता और सजाशीलता मिल्वर मानव जीवन के सभी पक्षा-उसके प्राकृतिक याय व्यापार से रेकर सामाजिय व्यवहार तर म-एक उत्तरदायित्व या बाध चिरसित परती है । यह उत्तरदायित्व उन मूत्या में प्रति हाता है जिह स्वय मनुप्य की चेतना न सिरजा है, अत यह उत्तरदायित्व उसकी अपनी चेतना के प्रति उत्तरदायित्व ही है और यही बात है जो उसके आचरण को अथवता या माथरता देती है उसे मानव बनाती है। इस प्रकार मानव हाने का अर्थ है चेतना सम्पन्न, सजनशील और उत्तरदायी होना। दूसरे शब्ता म यह भी कह सयत है कि मनुष्य एव सजनशील नेतना सम्पन्न उत्तरदायी प्राणी है। स्पष्ट है कि मनुष्य नामय जयिय प्राणी म इन गुणा का विकास ही उसे वास्तविक अर्थों में मानव का दर्जा देता है। यह भी कह सक्त हैं कि मनुष्य म ये गुण जितने विकसित होते जाते है उतना ही वह पूण मानव होता जाता है । इसलिये मनुष्य जीवन या लक्ष्य रन गुणा का अधियाधिक विकास है। स्पष्ट है कि हम इन दानो गुणा को मानवीय मूल्यो का दर्जा देना होगा। मूल्य पा सीधा सादा अथ है मनुष्य के नाचरण की मूल प्रेरणा और कसोटी यानी वे आदश जिनस वयक्तिक और सामूहिक मानवीय आचरण अनुप्राणित हाता है और जिनके आधार पर ही उसका औचित्य निर्धारित होता है। आचरण मा क्षेत्र आर्थिक, राजनीतिक सामाजिक कुछ भी हो सकता है, लेकिन यदि उससे इन मूल्यो की पुष्टि नहीं होती है या इन पर आघात होता है तो उसे उचित नहीं कहा जा सस्ता। भेतना और सजनशीलता के साथ ही दो अय बाते भी अनिवायत जुडी हैं वल्लि वे अ योयाधित है और वे हैं स्वतनता और सामाजिक्ता जो जपन से इतर के साथ सम्बधविधान का स्थूल रूप है। कुछ लोगो को स्वत रता और सामाजिक्ता एक दूसरे का विपयय लग सकती है लेकिन वस्तुत ऐमा नही है। यदि स्वतनता को हम मूल्य का दर्जा दते है तो फिर वह कोई सुविधा या अधिकार न रहकर एक दायित्व हो जाती है क्यामि तब सिफ अपनी स्वतत्रता नहीं, मानव मात्र को स्वत नता हमारा इप्ट हो जाती है और इतर की स्वत नता के लिए सधप धरना कही अधिक वाछनीय हो जाता है । इसी प्रकार दूसरे के स्वतन चेतनासम्पन्न व्यक्तित्व का सम्मा। सामाजिकता का ही स्प है। इस प्रकार मनुष्य का सामूहिक जीवा पशुजा म पाये जाने वाले सामूहिक जीवन से भिन्न एक सामाजिकता म विकसित होने लगता है क्याकि उसका आधार एवं मूल्यवाघ या दायित्व बोध हा जाता है। तभी स्वतत्रता निजी लाभ के लिए निरकुश आचरण में स्पम नहीं बदर पाती और सामाजियता विसी जविय मजदी के तहत 42 मम्मृति वाव्यावरण साथ जीवन पिताने की विवशता नही, अपने और इतर के बीच एक सजनात्मक सम्बधविधान हो जाती है। इस प्रकार चेतना, स्वत नता सजनशीलता और सामाजिक्ता ऐमे चार आधार-स्तम्भ हो जाते हैं जिन पर मानव जीवन की इमारत पडी होती है। इन मूल्यो वे आधार पर विकसित मानवीय आचरण का औचित्य स्वय प्रमाण है । इन प्रवृत्तिया के पुष्ट और विकसित होने वा तात्पय जीवन और अस्तित्व मात्र का पुष्ट और विकसित होना है क्योकि जीवन, जो स्वय सबसे वडा मूल्य है इ ही मूत्यगत प्रवृत्तियो म विवसित होता है। अपने विभिन पक्षा म मानवीय जीवन वहा तक सही दिशा की ओर उमुस है, इमपी एक मात्र क्सोटी यही हो सस्ती है कि मानवीय स्वत नता, चेतना, मजनात्मकता और सामाजिकता की भावनाएं वहा तर पोपित होती है। इन प्रवृत्तिया वा पोषण जितना अधिर होता जाता है, हम मानव मे निहित सम्भावनाआ को भी उतना ही अधिक उजागर करते हैं। सभी मानवीय रिश्ता और सस्थाओ का अतिम उद्देश्य इन मूल्यो का पोपण करना ही है और यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो वे ममाज के सही विकास म सहायर होने को यजाय वाधा बन जाते हैं। कई बार उनका वास्तविक उद्देश्य तो विकास मे महायक होना ही होता है लेकिन ऐतिहासिक विवृतियो की वजह से वे मनुष्य के दमन शोपण जोर अवमानना का कारण बन जाते है। हमारी गजनीति और सामाजिक आर्थिक व्यवस्था को, जिसका उद्देश्य मानव जीवन की बेहतरी है, तभी वाछनीय समझा जा सकता है जब वे इन मुल्यो से अनुप्राणित हो और अपने आचरण द्वारा इहे पुष्ट करें-अयथा एक यवस्था तो हम चीटियो और मधुमक्खियो म भी मिल जाती है पर उसे मानवीय नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक या सामाजिक आर्थिक प्राणी होने से पहले मनुष्य एक नतिक प्राणी है । पाई राजनीति या सामाजिक आर्थिव शक्ति यदि समाज मे बेहतर बदलाव के लिए प्रयत्नशील है तो वह एक नतिक यानिश है-एक ऐसी नतिक योगिा जिसकी प्रेरणा मनुष्य के अस्तित्व म ही निहित है। इसलिए निर तर यह ध्यान रसने यो आवश्यकता है पि हम अपनी मूल्यप्रेरणा और सामाजिक आथिर राजनीतिक आचरण म मगति रख पायें। नतिवताविहीन आचरण या मूल्याकन सफलता के आधार पर होता है, साथकता के आधार पर नहीं। जीवन एक समग्र प्रक्रिया है-उस का कोई पक्ष दूसरे गा म जुदा या वटा हुआ नहीं है। यदि हम मानव का उद्देश्य यह मानत है कि पिभिन्न क्षेत्रो म और सभी स्तग पर वह उन मू यो यो प्रतिष्ठा परेगा जो म्यय उगी । 47 व्यवस्था घी कसोटी

गापरताता हम अपनी राजनीति, अथव्यवग्या और ममाजरचनाका
साल विगित पसगा। यति पाई ममाज, सरसार या सगठन
एमा पगार सा यह सही अर्थो म मायीय और नतिर ममाज नहीं
है।माम दगेंग मिग सीमा तामािम गोप हैं?
44
सस्कृति वा ध्यावरण

राजनीतिक आचरण की कसौटी क एक सभ्य समाज से मामा य तौर पर यह अपथा वो जाती है कि उसका राजनीतिक व्यवहार भी मन्य अयान् वैधानिक और लोक्ताप्रिय हो। सम्यना के विकास का एक तात्पय मनुष्य ममाज में अहिमामय वाचरण पा विवास भी है, इसलिए यह अपथा सगन और स्वाभाविक है। जब कभी भी जनसामा य या विमो विप वर्ग द्वारा किन्हीं मांगा को मनवाने के लिए दवाव डाला जाता या यादोलन किये जाने हैं तब मत्ता दाग चाह उमया रूप राजनतिक आर्थिक या धामित्र कुछ भी हो मदव यानिाता पायाग्रह किया जाता है और अक्मर रमवानिवतावातान्पय मत्ता पीरियन या इच्छा हो जाा है, क्यापि तत सत्ता का ममयन दी रिमी रात को वधानिकता प्रदान करने के मायनरीके के गप में वीर मित्रा जाना इसलिए राजनीतिक आचरण के क्षेत्र मदेशानियता मार मातापिता या अहिंसक आचरण का भेद ममय लेना जबरी है क्यानि अगिा और गायत्र तो सदव एक ही मिक्के के दा पहा है लेकिन वधानिकता कई बार गगन वी विराधी भी हो मक्ती है। क्मिी भी तात्रि आरन या प्रन को अवध घोपित परना विमी मरसारमा वैधानिस धिमारनगरना है लेकिन एसा कदम अनिवायत परतात्रि नहीं बना पा गाना- मूत्यगत स्तर पर देवा जाए ता भरसर वह नत्र विरोधी हो जाता है क्यापि वहमत की ही ही पिसी एप भी व्यक्ति की आवाज को दबान का कोई भी प्रयत्न अनिवायत एव रोक्त विरोधी प्रयल है। जगहमति या अधिकार रोक्त का एक बुनियादी गुण है लेगिन विमी का अपनी गय व्यक्त वरन से रोग्ना या विसी की रात कोदमशिन मुननामि यह मागे मा अनुदूर नहीं है, नत्र का बमम्मान है। जब हम मन्य ममाज को वात करें, तव यह ममय रेना जरूरी है नि ममाज ममिप शामिन और मामा य जन ही नहीं वह वग भी गम्मिरित होता है जिम म गामा या मुविधा सम्पन विशिष्ट वग कहत हैं। इसरि समाज से सभ्य आचरण को अब ममय यहना भी निहायत आवश्यक हो जाता है frम सर मत्ता गमन या सुविधाजीधी विशिष्ट वर्ग ।

अपना व्यवहार वास्तविक अर्थो म क्तिना सम्य और सुसंस्कृत है और वह अपने आचरण मे विस सीमा तक लोकतान्त्रिक और अहिंसक है। हिंसा का दायरा यदि सिफ दहिक सीमा तक ही व्याप्त है तव तो इस वग के आचरण को अहिंमत ही मानना हागा क्याषि आधुनिक समाजो म यह वग अपने स्वार्थों का पोपण बहुत मूक्ष्म तरीको से करता है और यदि कभी हिंसा का प्रयोग आवश्यक होता भी है तो वह राज्य अथवा कानून के माध्यम से किया जाता है। इस प्रकार इस वग की हिंसा वधानिक या कानूनी हिंसा होती है और इसलिए सामा यतया सभ्य आचरण के जतगत ही स्वीकार की जाती है। सामा यतया अहिंसा का अथ बहुत एकागी समझा जाता है-शायद इसलिए कि वही उस वग के अनुकूल पडता है जो शासन अथतन और समाज पर हावी है । यह वह वग है जो हिंसा को केवल स्थूल अर्थों म ग्रहण करता है लेकिन हिसा सिफ दहिव नही होती-वह तो उसकी सर्वाधिक स्थूल अभिव्यक्ति है । बुनियादी अथ म तो वह हर भावना और चेप्टा हिंसा है जो व्यक्ति मानव और इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति सहित सम्पूण मानवीय चेतना की सजनात्मक सम्भावनाआ की अभिव्यक्ति और विकास का दमन वरती या उसमे बाधा पहुंचाती है। सजनात्मकता का दमन या उसके प्रति उदासीनता भी हिंसा की सूक्ष्मतर और इसीलिए गुरूतर अभिव्यक्ति है। इसीलिए अहिंसा की धारणा के समथक किसी भी प्रकार के उत्पीडन, दमन और शोषण को हिंसा की सना देत है। इसलिए यदि कानून और सत्ता के विभिन्न प्रकार कथित अहिंसक आचरण की आड मे किसी भी प्रकार के शोषण, दमन और उत्पीडन का बनाय रखना चाहत हैं तो निश्चय ही उस क्सिी भी अवस्था मे सम्य आचरण नहीं कहा जा सकता। अपने स्वार्थों या शोषणमूलक व्यवस्था पर आघात होत ही यह वग जिस प्रकार राज्य और कानून को हिंसक रूप ग्रहण करने के लिए बाध्य करता है उसी से इस सभ्य आचरण की असलियत सुलकर सामने आ जाती है। इसलिए सवाल उठता है कि सामाजिक उत्पीडन आर्थिव शोपण और राजनीतिय दमन स ग्रस्त समाज यदि अपने बचाव में हिंसा का सहारा रेता है ता उस सभ्य जाचरण क्या नहीं माना जाय? यह बहुत उलझा हुआ सवाल है और इगवा कोई भी आसान उत्तर नहीं दिया जा सरता-वलि गायद हर परिस्थिति म टसका कोई एक उत्तर हो भी नहीं सकता और विभिन्न परिस्थितिया में विश्नेषण और आवश्यक्ता पर ही इसरा उत्तर निभर परता है। इमम कोई मदद नहीं मिहिमा गय दुप्चा है ययारि उमकी भित्ति पृणा पर गही है और "गठिाएक दपा उम दुप्चत म पम जा। पर आसानी स 46 मतियाध्यापरण गग्नीनिर आचरी उसमे निस्तार सम्भव नहीं है, इसलिए जहां तव सम्भव हो शोपित बग पा राजनीतिक आचरण भी अहिंसक प्रणालियो पर ही आधारित होना उचित है। लेकिन कई बार ऐसा अवसर भी उपस्थित हो सकता है जव अहिंसा कारगर नहीं होती क्याकि अहिंसा भी तभी कारगर होती है जव प्रतिपक्ष मे भी नैतिक और मानवीय मूत्यो में प्रति क्सिी स्तर पर कोई आवपण बना हो। पूण बदरता के सम्मुख या लोक्त तात्मा विरोध के सारे रास्ते एक्दम बद कर देने पर आवश्यक सीमा तर अहिंमक तरीको का परित्याग बचाव की प्रिया ही माना जायेगा-उसे हिंसा नहीं माना जाना चाहिए क्योकि हिसा मूलत एक आनामक मनोवृति है । हम एम शल्य चिकित्मक ने चाकू और कातिल के चावू को एक ही थेणी म नहीं रख सकते क्यापि दोनो के मनोभावा मे बुनियादी फक है। एक का मनोभाव दूसरे पक्ष को जीवन देन वाला है और उमम काणा प्रमुख है जबकि दूसरे वा मनामाव आश्रामर और गोघ व घृणा से भरा है। कुछ आधुनिक विचारख मानत हैं जिगोपित की धुणा उसे सगठिन करती और हिला उमम आत्मविश्वाम पंदा परतो है । लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि घृणा और आगामकना मनाभाव अपने को पहचानने और मानवत्व ये अजन म वाधा हाने हैं । एमे मनाभायो ये आधार पर क्सिी स्वस्थ ममाज की नीव नहीं रखी जा मरती। इसलिए जरूरी यह है कि यदि कभी हिंमा पा महारा लेना भी पड जाये- यद्यपि अपवाद रूप मे ही और वह भी अहिंसर और लोक्तानि गम्ता के पूर्णतया बद कर दिये जान पर-ता उसरी पृष्ठभूमि में पृणा की वृत्ति नहीं हानी चाहिए। वह हिंसा गल्य चिरित्सव की हिमा ही हा, कातिट की नहीं। गातार पद्धति से कानून का महारा रैकर भी शाषण-उत्पीडन यो मिटाया जा सरता है और कानून या राजमत्ता दराव को भी हिंसा माना ॥ साता है लेखिन यदि यात्रामवता के भाव के माय नहीं बस्ति वचाय के साधन को तरह इम्तमार दिया जाय तो टम हिमा पहना अनुचित होगा। हिमाभूत एर मनावृत्ति है उन य िवम म मनाति से प्रेरित न होार सुधार या काणा की भावना में प्रेग्नि है ताटम मभ्य आचरण की परियिम हो स्वीकार करना होगा। गजनीतिर वाचरणम भी मिा अहिमा से सवाल कामी कमौरी पर पग्मना उचित होगा। तभी राग्नीतिर भावरण मानयोय चेतना के सिर में गौ माया भूमिरा मरता है।

राजनीतिक रिश्ते की आधारभूमि भावश्यक राजीति के सम्बध म विचार विमश करते हुए अक्सर यह मान लिया जाता है कि उसका सम्कृति से कोई मम्बध नही होना चाहिए । अधिकाशत राज्य को या तो एक आवश्यक बुराई कहर स्वीकार किया जाता है या उसकी इतनी प्रशसा की जाती है जसे वह इम लोक मे ईश्वर का साक्षात् रूप हो। आधुनिक कहे जाने वाले बहुत से राजनीतिवेता सासतौर से व्यवहारवादी विश्लेपर न केवल राज्य के आचरण का अध्ययन उसकी दनिन काय प्रणालियो और मत्ता-राजनीति के आधार पर करते हैं बल्कि इहाँ आधारों पर राज्य के कार्यों और राजनीति की मूल्यहीनता का औचित्य भी सिद्ध करते हैं । अक्सर यह कहा जाता रहा है कि सत्ता में आने, बने रहने और सत्ता का प्रबंध कर सकन के लिए कुछ व्यावहारिक सीमाओ का मानना लेकिन यह भुला दिया जाता है कि व्यावहारिक सीमाशा रे नाम पर यदि उन बुनियादी माराव मूल्या की ही अवहेलना या दमन हो रहा है जिसके पापण के लिए राज्य का एक अनिवाय बुराई हाते हुए भी स्वीकार पिया गया है तो इस तरह की व्यावहारिकता क्यानि अपना वास्तविर प्रयोजन पूरा करने म पूर्णतया असपर रहती है इसलिए उसे स्वीकार नहीं दिया जाना चाहिए। किसी यात का घटित होना या होते रहना उसके हाने की वाछनीयता प्रमाणित नहीं करता। हम उसवे धारणा वा विश्लेपण कर उस समपने को योनियरत हैं ता सलिए नहीं कि उसवे औचित्य की आधारभूमि तला करें वल्लि इन वारणो की समय हमे उसमे रा अवाछिन पो मिटाने और उसे अपनी याछित दिशा म मोह दे सक्न का युनिपात गामध्य देती है। भारतीय परम्परा म राज्य को अनिवाथ बुराई मानर उसमी अवहेलना नही यी गयी । यह माना जाता रहा कि राज्य यानी सत्तासम्पन एप म्यम्पा माभाजित मुरता और किम के लिए एपनियाय सस्था है और पर परतुत एक अनिवाय पुराई नही बलि एए अनिवाय हिपी सस्था है। गोगिए वोटिल्य यशास्त्र या जाति परम राज्य या अस्तित्य भौतिक और मतिर आकरिमा विमति आवश्यक स्वीकार पिया गया है। PirnamaAमा यहा उद्देश्य यो नि यो प्यायहागि जिम्मेदारी राज्य पर छोडत हुए भी तत्सम्बची दिशा निर्धारण का काय राज्य पर नही छोडा गया है । यह काय धम का है-यहा धम क्सिी सम्प्रदाय विशेप के अथ में नहीं बल्कि एक जीवन पद्धति और एक नियमसहिता यानी सविधान के अथ मे है । राज्य को धम के शासन से ऊपर नहीं माना गया है। दूसरे शब्दो मे, यह स्वीकार किया गया है कि राज्य का ऐसा वातावरण तैयार करना है जिसमे नागरिको का भौतिक नतिक विकास हो सके लेकिन उसे इसमे सीधे हस्तक्षेप नही करना है । आधुनिक काल मे राज्य के अधिक शक्तिशाली होते चले जाने के कई कारण हैं-रेक्नि एक महत्त्वपूर्ण कारण राज्य को नागरिको की स्वीकृति भी है। अधिनायकवादी व्यवस्था की बात फिलहाल छोड दे क्याकि वह गुडई का ही एक विकसित और सूक्ष्म रूप है-उसका नतिक आधार भौतिक शक्ति है, नागरिखा की सहमति नहीं । प्राचीन राजतनीय व्यवस्था को भी नागरिका की एक प्रकार की पराक्ष स्वीकृति रहती थी क्योकि तब उसकी शक्ति का, उसके प्रति श्रद्धा का स्रोत घम था और उस घम व्यवस्था को समाज की स्वीकृति रहती थी। लेकिन आधुनिक काल मे अधिनायकवाद का कोई भी प्रकार इस तरह का नतिक जौचित्य प्रमाणित नहीं कर सक्ता क्योकि सेना के अधै बल के अतिरिक्त उसका कोई स्रोत नहीं है, इसलिए अधिनायकवादी राज्य का कोई नतिक औचित्य प्रमाणित नहीं होता। समाजवादी उद्देश्यो का दावा करने वाली आर कुछ हद तक उसे अय व्यवस्थाओ की जपक्षा व्यावहारिक रूप देने में अग्रणी व्यवस्था का अधिनायकत्व भी नतिक दृष्टि से सदिग्ध ही रहता है क्यापि उसको नीति और काय प्रणाली को भी कोई स्पष्ट सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती। यह मान लिया जाता है कि राज्य उनके लाभ के लिए काम करता है, इसलिए वह नागरिको को स्वीकार होगा ही। लेकिन इस विकास की और समाज का विकास भौतिक सुविधाओ का ही नही, चेतना का विकास है, बल्कि भौतिक सुविधाएं भी तभी वाछनीय है जब वे चेतना के विकास में सहायक हो-वास्तविक नीति और प्रक्रिया के निधारण म नागरिता का खुल रूप से भाग लेने का अवसर देना वाछनीय नही समया जाता । इस कारण अतत राज्य और नागरिक का रिश्ता क्सिी मूल्यगत और नैतिर स्तर पर नहीं बल्कि सत्ता के समक्ष विवशता के स्तर पर ही बना रहता है । लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि स्वय को लोक्तात्रिक कहने वाली व्यवस्था का आधार सदव सामाजिक स्वीकृति ही होता है। निस्स देह इस सामाजिक स्वीकृति का एक वधानिर या औपचारिख रूप ता उनम बना रहता हैं लेकिन इस स्वीकृति को वास्तविक अर्यो म नतिर स्वीकृति कहाँ सर कहा जा सकता है ? इसे लेकर सदिग्धता राजनीतिर रिश्ते को आधारभूमि 49 बनी रहती है पि यतमान लास्ता र पद्धतिया म क्या वस्तुत लान्छा व्यका हुई है ? क्या एक निश्चित अवधि के लिए चुनी गयी सरवार वे प्रत्यय माय को उसके चुना वाला कानतिय समथन प्राप्त है ? यदि नहीं है तो उस सरवार का सदव एव नतिक व्यवस्था के रूप म विस तरह स्वीकार किया जा सकता है ? और यदि व्यवस्था का अपना स्वरूप नतिक नहीं है ता नागरिव से यह अपक्षा यहां तव सगत है पि वह राज्य को प्रत्यर नीति को स्वीकार कर लेगा और अपने आचरण का उसके अनुमार ढालने का प्रयत्न परेगा? और यदि इम नतिर आश्वस्ति के बिना भी राज्य समाज पर अपनी आरामा लादता है तो क्या वह ऐसा सिप सनिर शक्ति के आधार पर ही नही करता दूमर शब्दा म, ऐसी परिस्थिति म वास्तविक सामाजिक स्वीकृति के अभाव म लोक्तात्रिक औपचारिपताआ के बावजूद राज्य और समाज के रिश्ते की वास्तविक आधारभूमि अनतिय या अधिक स अधिक नतिक्ता निरपेक्ष ही रहती है। इसी के साथ जुड़ा हुआ एक प्रश्न यह भी है कि यनि राज्य मानवीय चेतना के विकास का ही एक उपकरण है और इसीलिए उसकी नीति और प्रत्रिया का निर्धारण सामाजिक स्वीकृति के ही आधार पर होना चाहिए तो यह भी देखना होगा कि इस प्रक्रिया पर सामाजिक नियत्रण केवल औपचारिप नही यल्कि वास्तविक हो। यह भी देखना होगा कि मानवीय विकास के लिए बनायी गयी व्यवस्था के समक्ष वही मनुष्य अपने को बौना या तुच्छ न महसूस करने लग जाय जिसका विकास ही इम व्यवस्था के अस्तित्व का प्रयोजन है। अक्सर होता यह है कि राज्य में शक्ति और सत्ता का अधिकाधिक केद्रीकरण नागरिक को राजकीय सस्थानाम मजार बनाता और अपमानित करता है। यदि एक सामा य नागरिक पुलिस और कचहरी को ता वात दूर अस्पताल और याना आरक्षण जसे दफ्तरा मे भी स्वय को बौना उपक्षित और अपमानित महसूस करने लगे, तो सोचना होगा कि उस व्यवस्था को कहाँ तक वास्तविक और नतिक आधार पर लोकतत्र कहा जा सकता है क्यो कि सत्ता का वास्तविक सात लोक है और वही वहाँ उपेक्षित और अपमानित है । यह सिफ क्मचारिया के व्यवहार का ही नहीं लोक्त को एक महाकाय पत्र बना देने का परिणाम है। लोक्त मानवीय विकास के लिए वाछनीय होने के कारण स्वीकाय समझा जाता है लेकिन यदि उसका व्यावहा रिकरुप गरिमा का दमन करता हो और मनुष्य को एक चेतनासम्पन्न स्वतन व्यक्तित्व समझने की बजाय उसके माय सदनाहीन व्यवहार करता और उसे एक यत्र वा पुर्जा बना डालने पर जोर देता हा तो उसके कारणा को समझना और उसके निराकरण की दिशा म सचेष्ट होना हमारी राजनीति वी एक वाचनीय अनिवायता होनी चाहिए। 50 सस्कृति वा व्याकरण वास्तविक लोकतन्त्र के लिए आधुनिक काल म राजसत्ता का मूल स्रोत नागरिका का विश्वास आर स्वीकृति है इसलिए यह आवश्यक है कि राजसत्ता इस मूल आधार से विच्छिन न हो अयथा इसका तात्पय सत्ता का निर तर उत्तरदायित्वहीन और धीरे धीरे मानवीय मूल्यो से उदासीन और आततायी होते जाना होगा। लोकप्रतिनिधिया के सावधि चुनाव और ससदीय लोक्तन इसी मूल आधार को बनाये रखने की दिशा में किये जाने वाले प्रयत्न हैं । लेकिन इन सस्थाओ का सारा इतिहास इस बात का आश्वामन नहीं दे सकता कि ये नागरिका के अधिकारा की रक्षा करने मे पूण समथ है बल्कि अक्सर ऐसा हुआ है कि इन सस्थाआ का स्वरूप और प्रकृति सारी वधानिक औपचारिकताओ के बावजूद निरकुशता के करीब आते गये है। इसीलिए यह आवश्यक समझा जाने लगा है कि ग्राम स्तर तक सत्ता का विकेन्द्रीकरण किया जाय ताकि राज्य से नागरिक का अधिकाधिक प्रत्यक्ष सम्बध स्थापित हो सके और राजनतिक निणया को वह अधिकाधिक प्रभावित कर सके । लेकिन यह विवे द्रीकरण भी तभी साथर हो सकता है, जब इसकी सवधानिक गारटी हो और देश की सर्वोच्च सस्था को भी इसके बुनियादी ढाचे और अधिकारो मे किसी प्रकार का परिवतन करने का अधिकार न हो । इसस सम्बन्धित व्यवस्थाएँ विचार विमश के द्वारा तय की जा समती है । लेकिन इसकी सफलता भी इस बात पर अधिक निभर करती है कि सावधि चुनाव के आधार पर निर्वाचित प्रतिनिधिया को भी एक निश्चित जवधि के लिए अबाध अधिकार न द दिये जाये और काई ऐसी विधि विकसित की जाये जिसके द्वारा उन पर निरतर प्रभावी नियंत्रण कायम रखा जा सके। स्थानीय स्तर से लेकर प्रादेशिव और राष्ट्रीय स्तर तक ऐसी नागरिक समितिया का गठन किया जा सकता है जो स्वय विधिनिर्माण नौर कायपालिका सम्बधी वाय न करती हा लेकिन क्येि गये कार्यों की समीक्षा कर सके और आवश्यकता पड़ने पर अपने इलाके के निवाचित प्रतिनिधिया को उचित निर्देश भी दे सके। इस तरह की समितियो या गठन वेवल भौगोलिक ही नहीं बल्कि आर्थिक और सास्कृतिक आधार पर भी हाना चाहिए तारि सभी भी बहुत से मामले आते हैं जिनका कोई उल्लेख चुनाव घोषणा पत्र में नहीं दिया गया होता है बल्कि सभी मामलों का उल्लेख किया जाना सम्भव भी नहीं है-तो ऐसी स्थिति म यदि सरकार कोई निणय लेती है तो उस वहाँ तर प्रकार के हिता का वास्तविष प्रतिनिधित्व हा सके । इन समितिया को अपने इलाके के प्रतिनिधि यो वापस बुलान का अधिकार भी दिया जा सकता है- इस शत के साथ वि यदि पुा उसी प्रतिनिधि म जनता द्वारा विश्वास प्रकट किया गया तो सम्बधित समिति स्वयमेव भग समझी जायगी और इसका गठन दुवारा किया जायेगा । इस तरह की व्यवस्था से जहां निवाचित मस्थाआ पर लोक नियत्रण बना रह सकेगा, वही इस व्यवस्था मा दुरपयोग भी कम से कम हो सकेगा। इस समिति के सदस्या के लिए यह आवश्यक होना चाहिए कि व किसी दल विशेप सक्रिय रूप से न जुडे हा । इस समिति के चुनावा के समय काई दल पोई निर्देश जारी नहीं कर सकेगा, इसका भी सवैधानिक व्यवस्था की जानी जरूरी होगी। दरजस्ल लोक्त न ठीक तरह से काम कर सके, इसके लिए नागरिका और उनक प्रतिनिधिया का राजनतिक दला मे मुक्त होना आवश्यक है । किसी युग मे राजनैतिक दला ने लोातात्रिक प्रणाली के विकास मे रचनात्मक भूमिका निनायी भी तव भी अब वे धीर धीरे ही सही उसके क्रिया वयन म बाधा हो अधिक होते जा रहे है । आधुनिक समाजो का विकास जिस तरह स हो रहा है उसमे किसी भी राजनीतिक दल के लिए यह सम्भव नही रह गया है कि वह एक छोटी सी अवधि म पूरे समाज के लिए सही राजनीतिक निणय ले सके । प्रत्येक सरकार एक निश्चित अवधि के लिए चुनी जाती है-इसका एक सीधा मतलब क्या यह नहीं है कि लोक्तात्रिक नतियता के अनुसार किसी भी सरकार को ऐस निर्णय लेन का अधिकार नहीं होना चाहिए जिसमा प्रभाव उस निश्चित अवधि से आगे भी पडता हो ? लेपित क्या पवहारत ऐसा सम्भव है ? इसी तरह प्रत्येक राजनीतिक दल को चुनाव घोषणा पत्र के आधार पर चुना जाता है लेकिन उसके शासन की अवधि के दौरान ऐस माथ पह भी ध्यान रसना जरूरी है कि कई दफा बहुत सी सरकारी द्वारा 2 बुछ एस निणय ल लिए जात है और कुछ योजना पर इतना अधिक व्यय पर पा जाता है कि उ ह वदना या राम देना विसी एस दर के लिए भी गम्भव नहीं रहता जो सम्बायत निणय या याजना से पूरी तौर पर अगहमत हा। "गरे निगा आवश्यक है कि महत्वपूण और नीति सम्मपी युनियादी ममरी परममय-समय पर जनमत गहमारा आम राय जानी जाय और निर्वाचित 52 मारातियापाररण सरकार उसी के आधार पर अपन निणय ले । एक निश्चित अवधि के लिए निर्वाचित सरकार को ऐसे निणय लेने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए जिनके आधार पर उस सरकार के हटने के बाद भी उसकी नीतिया जारी रह सकें । कुछ बुनियादी और जरूरी बाता के लिए नीति सम्बधी निणयो का उल्लेस सविधान मे ही कर दिया जाना उचित है ताकि उन पर अपने शासन के दौरान कोई भी राजनैतिक सगठन अलग अलग निणय न लें-बल्कि सभी सविधान में निहित नीति का ही सम्मान करें। इस सम्मध में कोई भी परिवतन जनमत संग्रह के आधार पर ही किया जाना उचित है। सवाल उठाया जा सकता है कि इस प्रकार बार बार जनमत-सग्रह करवाना बहुत व्यवसाध्य है । लेकिन यहाँ यह भूला जा रहा है कि ऐसी व्यवस्था सत्ता के विकेंद्रीकरण के साथ साथ ही लागू की जा सकती है क्योकि तब बहुत से स्थानीय मसला पर आम राय प्राप्ति करना महगा नही पडेगा और न हर आम राय का गोपनीय होना ही जरूरी होगा। वतमान व्यवस्था म राजनीतिक दलो की काई विशेष साथक्ता नहीं रह गयी है क्याकि उनका प्रधान लक्ष्य मानवीय चेतना के विकास म कोई साथक राजनीतिक भूमिका अदा कर सकने की वजाय सत्ता पर अधिकार करना अधिक हो गया है । सत्ताकाक्षा के इस खेल के सभी नियमा को मानना प्रत्येक राजनतिक दल की मजबूरी बनता जा रहा है और उसी का एक परिणाम यह हो रहा है कि प्रत्येक राजनीतिक दल की सस्कृति करीव करीब एक जसी होती जा रही है। सभी के साधन एक जसे हैं, अत साध्य पर भी उनका असर पडना स्वाभाविक है। इसलिए ऐसा लगने लगा है कि राजनीतिक दल किसी मानवीय मूल्य की राजनीतिक स्वीकृति के लिए प्रयत्नरत सगठन होन की बजाय सत्ताकाक्षी लोगो के गिरोह अधिक हो गए है । शायद यही कारण है कि अपने समय की प्रतिभा राजनीति की बजाय विज्ञान, साहित्य और अय क्षेनो को और अधिक उमुख है क्योकि वतमान राजनीतिर मरहति या उसके साथ कोई रचनात्मक सम्बध नहीं बनने पाता। इसलिए जहाँ एप ओर लोकतान्त्रिक विवे द्रीकरण और निर्वाचित प्रतिनिधिया पर रिसर नियत्रण आवश्यक है, वही साथ ही यह भी जरूरी है IT Timire पी इस पतनशील स्थिति का पहचाना जाये और उगया गिया ग समय राजनतिक व्यवस्था विकसित करन वी आर AREA TI धानविन पाठरिए 53 सत्ता का विकेन्द्रीकरण राग्य समाज में विभिन्न गत्ता गम्याना मगेर है सपिन आधुनिए बाल म घर सवाधिर शक्तिशाली गत्ता-पंद्र हा गया है-यदि अय सता मस्थाना और उगरे बीच इतना पर हो गया है जिप्रत्यग गत्ता गस्यान ये रूप म येवर राज्य याही स्वीकार रिया जान रगा और यह अपशा की जान लगी पि राज्य अय सता रास्या यो भी निमित अथवा नियमित पर साता है। यह ठीय है कि राज्य प व्यावहाराि रूप गरवार पर अय धार्मिक या आथिर सामाजिक सस्थागोमा प्रभाव पड़ता रहा है लेकिन मिदा तत यही स्वीकार किया गया कि राज्य ही सर्वोच्च सत्ता गम्यान है और इसीलिए दूसरे मस्थाना द्वारा उसमे अपन पावूल परन ये प्रयत्न पिय जात रहे हैं । आधुनिय जटिल प्रौद्योगिकी पर आश्रित जौद्योगीकरण और लापतानि प्रणालियो वे आवपण ये साथ साथ राज्य में सर्वाधिक शक्तिशाली होत चले जाने का एक कारण आधुनिक अस्प तस्या का विकास भी है । मध्यकाल तक धम राज्य स वडा सत्ता सस्थान था और सनिव विद्या की अजटिलता के कारण राज्य की शक्ति नागरिका के लिए अपराजेय नहीं थी। लेकिन एक आर राज्य में शक्ति के सभी प्रकार का दीकरण होता गया और दूसरी ओर आधुनिक सनिक विद्या और व्यवस्था ने राज्य और नागरिव के योच एक दुर्भद्य दीवार खडी कर दी। आधुनिर राज्य जनता के लिए अपराजेय हो गया। इसलिए सरकार के गठन को लाक्तान्त्रिक प्रक्रिया ही नागरिका के लिए राज्य को प्रभावित कर सक्न वा एक मात्र माध्यम बच रही है । लरिन इस लोकतात्रिक प्रक्रिया ने राज्य को एक नतिक औचित्य भी प्रदान कर दिया है और धीरे धीरे लोक्ताविक स्वीकृति ने राजनीतिक मामलो म जसे धम का स्थान ग्रहण कर लिया है। लेकिन आर्थिक वे द्रीकरण की तरह राजनीतिक केद्रीकरण ने भी राज्य के सम्मुग सामा य नागरिक की स्थिति जत्य त दयनीय कर दी है। जिस प्रकार सम्पूण आर्थिक व्यवस्था सावजनिक ससाधनो के दाहन पर टिकी होत हुए भी पाहाता है। नागरिक मारमानव निरागमें चारनविर औरषदमदददाश शनि कान म तदनी अमनदीहै। मानादिरागम्बर कुछ व्यक्तिया या विशेष वा लिए ही लाभदायक प्रमाणित हुई है, उसी प्रकारलाक्तानिक कहीं जाने वाली राजनीतिक व्यवस्था भी सभी नागरिका के लिए न होकर केवल एक विशेप वग के हितो का हथियार बन गयी है। राज्य की विशाल काया के सम्मुस सामान्य नागरिक या स्थानीय छोटे नागरिक संगठन स्वय को बौना और असमथ महसूस करते है । यह आश्चयजनक है कि लोक्तानिय राज्य भी अपने नागरिया से जो रिस्तुत उसके स्वामी है-आदेश की भाषा में बात करता है। इसी के साथ यह धारणा भी घर परती गयी है कि ममाज म कोई भी कारगर परिवतन राज्य की इच्छा के विना नहीं हो सकता और इसलिए राजनैतिक सगठनो का एक मात्र उद्देश्य चेतना का विकास नहीं बल्कि राज्यसत्ता पर अधिकार स्थापित बरला हा गया है। इस अधिकार को प्राप्त करने और उसे बनाये रमन की प्रक्रिया इतनी पचोदो, जटिर और व्ययसाध्य है कि विभित उद्देश्यो बाले राजनीतिक सगठना को कायप्रणारी और साधना में कोई फर नहीं रहता। माधन माथ्य का प्रभावित करता है, अत घोपित उद्देश्यो की भिवता ये बावजूद मनो प्रकार के राजनतिर मगठना का व्यवहार एगभग एप सरीया हा जाता है। इम िए राजनीतिक व्यवस्था म ग्मिी भी तरह का नियादी आर रास्तापिर परिवनन चाह्न दात व्यक्तिया और मगठनो यो म्पष्टतया ममय रेना जारी है कि राज्य वा मता का एक मात्र वेन्द्रन हान दिया जाय। इस तरोरा मही हा मरता है कि राज्य में तीना परपरागत अगा-विधायिरा, कायपााि और चारपारिका-पर निरनर तार- पियरमदी कोई नकाई एमी व्यवस्था विवामित्र की जाय आम्वय गना पारन्दन हा पर मना पर जाका काम र मो। माम्यवादी दाम साम्पवान पार्टी -म दाह की अमिता मा कानी में परिन पार्टी की काय प्रारी कदीन नेतृत्व की होती है और उगम भी मी नागरिकों को ना कर पारी के मामही महमागिता-बार वह भी औपचारित रहता है, मरिमोयाम पार्टी ग्वय दी गला का बरहा जाता है जोधपर्गिरिमामबार नी घातर हामकतार याति पारी शाम नगरिकति गादेगानिक दापित नही हा माना। इन तरह गोएकीय व्यवस्था में यमुना नागरिक स्वत नामा दमन लक्नि वतमान परिस्थितिया म लोक्ताविर प्रक्रिया के अतगत सना यातायात और मुद्राप्रणाली को छोडवर जय सभी क्षेत्रो में मत्ता का ग्राम- स्तर तक विवेद्रीकरण करने में कोई कठिनाई नही है। आथिर और राजनीतिक विनेद्रीकरण एक दूसरे से अभिन है इसलिए किसी एक को स्थीनार और दूसरे वा नकार या तो राजनीतिक चाल होगी या नासमया। का विरोध परत है तो राजनीतिक केद्रीकरण के समथक राजनीतिक चेतना के विकास की अनिवाय शत है और काई राजनीतिक व्यवस्था जिस सीमा तक मानवीम चेतना के विकास में सहायक हो सकती है उसी सीमा तव अपने नैतिक औचित्य को प्रमाणित करती है। वास्तविक अर्थों म आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था वही हो सकती है जिमम मत्ता का केद्र नागरिक स्वय हो और राज्य तथा उसके प्रतिनिधियों का सत्ता का हस्तातरण एक सीमा तय ही किया जाय-साथ ही उस हस्तातरित सत्तर पर भी निर तर नियतण की व्यवस्था हो सके । इस के लिए आवश्यक है कि राज्यसस्था का यथासम्भव विवे द्रीकरण क्यिा जाय। राज्य और नागरिव का जितना अधिक प्रत्यक्ष सम्बध विकसित हागा, राज्य का लोक्तानिक स्वरूप और नागरिक की राजनीतिक सहभागिता और अधिकार उतने ही अधिक पुष्ट हो सकेंगे। जतर्राष्ट्रीय परिस्थितिया को जटिलता का हवाला देकर अक्मर वि के दीकरण के विचार का विरोध किया जाता है । स्पष्ट है वि विभिन्न गष्ट्रीय राज्य ही इस विचार का विरोध करते है । वाम्नव म राष्ट्रीय राज्य स्वय ही एक ता जतर्राष्ट्रीयता के विकास में सबसे बड़ी बाधा हैं और दूसरे सत्ता के विवे द्रीकरण को अतर्राष्ट्रीय परिस्थितिया की वजह से अव्यावहारिक बताते है । सत्ता का विकेद्रीकरण और अतराष्टीयतावाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दोना के लिए राष्ट्रीय राज्य मसत्ता के के दोरण या विराध करना पहली अनिवायता है। आपिर द्रारण ये समथर आर्थिक मारणा जातिय विवेजीकरण आवश्यक्तामा की वजह स आथिव विक्ट्रीकरण को अयावहारिप बतात हैं। जब ता दाना वा साथ और अभि न मानकर नहीं देखा जायगा तब ता दाना पायो आपत्तिया धीरण यो कृत्रिम आवश्यकता यो वास्तविक प्रमाणित परती रहेंगी। 56 गमति गामापरण असहयोग और राज्य राज्य के सम्बध मे अक्सर यह कहा जाता रहा है कि वह सगठित हिंसा है और यह कहना पूणत गलत भी नहीं है और इसीलिए अहिंसक राजनीति के बहुत से समर्थक इस निष्कर्ष तक पहुंच जाते है कि सामाजिक, आर्थिक परिवतन के उद्देश्य से राज्य शक्ति का प्रयोग करना अहिंसा की दृष्टि से वाछनीय नहीं है। इसका सीधा सा तात्पय यह होता है कि सामाजिक-आर्थिक परिवतन के लिए हृदय परिवतन ही एकमात्र समुचित उपाय है और राज्य या कानून के आधार पर किसी भी प्रकार का परिवतन हिंसा का सहारा लेकर किया गया परिवतन समझा जाना चाहिए। इस तक प्रणाली को स्वीकार कर लेने पर तो राज्य अथवा कानून ही नहीं ऐसी किसी भी सस्था वो सगठित हिंसा का ही एक प्रकार मानना होगा जो अपने सभी सदस्यो के लिए कोई भी एक सा नियम बनाती है। यही नहीं अपने सिद्धातो या मागा को स्वीकार करवाने के लिए किया गया कोई भी पातिपूण और अहिंसव आदोलन भी तब प्रचारातर से हिंमा ही माना जायगा क्योकि वह भी दूसरे पक्ष को किसी न किसी स्तर पर अपनी मागे- पाहे वे कितनी भी उचित क्यो न हा स्वीकार परने के लिए बाध्य करना है। सविन देखा जाये तो यह तक प्रणाली पूणत निर्दोष नहीं है। राज्य एक सगठित हिंसा है, यह सिद्धात स्वीकार करन से पहले राज्य के स्वरूप और प्रकृति यो भी समयना होगा । एक राजत त्रीय या अधिनायकवादी राज्य तथा रापतान्त्रिक विवे द्रीकरण को स्वीकार करन वाले राज्य को एय ही स्तर पर नहीं रखा जा सकना और न किसी भी गिद्धात या धारणा यो उन पर एक-सा राग किया जा सकता है । वास्तविन अर्थों मे लोस्तापिर होन पर कोई भी सस्था वह राज्य हो या कुछ और लोमेच्छा की वास्तयिय प्रतिनिधि हानी है और उसकी मतावानाधार मनिम घर नहीं लोपस्योति हाती लापस्वीकृति को सिप बहुमत की स्वीकृति नही मभपना पाहिए ययारि ऐग राज्य से यह अपर पी जाती है कि वह किमी भी अल्पराग्या वग-वनि विसी एक व्यक्ति-ये युनियादी मानव अधिरा का सम्मान परेगा और उग सीमा ता उनकी रक्षा करेगा जब सर ये मिमी अस वग या पति दगा उत्पी और पापण पर आधारित नहीं होता है। यदि इग रटियाग मा आधारभूमि म रमाए लाफ्नाजिर राज्य से माध्यम म और सामी परियाागी सहाया ग गामाजिर आथिर परिवान बरन की दिया ग गोप्ट हुआ IIT त उमे हिमा गहना दुराग्रह ही माना जाएगा। गिगी भी तरह औद्योगीकरण गापा माधा पर ही निभर करता है- य साधा प्रातिरा हा या मौद्रिा । गार स्वामित्व वार इन गाथा माइम्तमार यदि पिगी यग या व्यक्ति के हित म दिया जाता हैावर पाना महिमा रा या गू"म रितु गतराम रूप है और एगा नहा दो में गिरानून या राय लिया इस्तमाल हिमा नहीं वत्ति पूर्णतया अहिंगा याय है और यदि याई राज्य इस यचाय म सप्रिय परी होता तभी उग वास्तविर अर्यो म मगठित हिंमा या एर प्रसार पहा जागा पाहिए यानि तप पर मुविधाही वग के विरद्ध य आग्रामर मस्या ये रूप म अपान्तमार परन यी टूट उम यग यो दे रहा होता है जिसन मावानिय सम्पति पर अपना निजी रियण स्थापित कर लिया होता है। दरअस्ल, जय राज्य या मगठित हिंगा कहा जाता है तो एप के द्रीकृत सत्ताभिमुग राज्य का ही विचार मन म रहता है। यदि राज्य का ग्राम स्तर तय विवे द्रोपरण हो और बुनियादी सामाजिक आर्थिप परिवतन के उद्देश्य में बनाये जाने वाले यानूना यो पहल पेन्द्र स्तर को यमाय स्थानीय स्तर से हो ता उसे हिंगा कहना पिसी भी प्रकार उचित नहीं माना जायेगा। इस सम्बध म यह तथ्य भी विचारणीय है कि निजी लाभ के लिए सावजनिक साधना वे इस्तमाल म किसी भी प्रकार का सहयोग करना भी प्रकारातर से हिंसा के साथ सहयोग करना है। इसलिए जहाँ गोपित या दलित वग और उसके प्रति सहानुभूति रखने वालो से यह मांग की जाती है कि वे इस तरह यो जाणिक प्रणाली से असहयोग करें, वही राज्य से भी यह माग दी जानी चाहिए कि वह इस तरह की आर्थिक प्रत्रिया में कोई सहयोग न दे। महात्मा गांधी जसे अहिंसावादी विचार का भी कहना था कि मजदूरो को पूजीपतिया के हृदय परिवतन की प्रतीक्षा करते रहने की आवश्यकता नहीं है उहे तुरत इस व्यवस्था से असहयोग शुरू कर देना चाहिए। लेकिन यही माँग क्या हम राज्य से भी नही कर सकते है ? राज्य यदि लोकेच्छा और लोकहित का वास्तविर सरक्षक है और स्वय को सगठित हिमा वा ही एक प्रकार नहीं बनाये रखना चाहता हो तो उसे अपनी वायप्रणाली और तरीका म बुनियादी परिवतन करना होगा। सावजनिक साधनो पर ममाज की ओर से राज्य या मरक्षण रहता है और उसकी सहमति 58 रास्कृति का व्याकरण के बिना कोई व्यक्ति या वग निजी लाभ के लिए उनका इस्तेमाल मनमाने तरीके से नहीं कर सकता। यदि हम यह मानते हैं कि सावजनिक साधना पर निजी अधिकार और मानवीय श्रम को शोपित होते रहने के लिए विवश कर देना हिंसा है तो राज्य द्वारा इस हिंसा को अनुमति देना और उसका प्रतिरोध न करना उसे भी हिंसा का सहयोगी बना देता है। इसलिए राज्य के लिए भी सही रास्ता यही रहता है कि वह न केवल शोपित वग को अपने अधिकारो के प्रति जागरूक करे बल्कि स्वय भी पूजीपति वग के साथ पूण असहयोग करे। इस असहयोग के कई रूप हो सकते हैं। पूजीपति की व्यक्तिगत सुरक्षा और तोड फोड की प्रवृत्तियो को रोकने के अतिरिक्त हर मसले पर राज्य द्वारा उसके साथ असहयोग करना ही उचित है। सावजनिक धन द्वारा जुटाये गए साधना की सस्ती दरो पर कारखानेदारो को उपलब्धि विदेशो से बच्चा माल मगाने की छूट व अय ऐसी सुविधाएँ वद की जा सपती है क्यापि ये सब सुविधाएं देना प्रसारातर से शोषण मे सहयोगी होना है। यदि स्वय राज्य द्वारा असहयोग के अस्त्र का प्रयोग किया जाता है तो राजसत्ता की प्रवृति व स्वरूप पर इसके बुनियादी और दूरगामी प्रभाव पडेंगे और समस्याआ के समाधान मे सनियता आयेगी। यदि कोई राज्य पूजीवादी और हिंसक आर्थिक प्रक्रिया के साथ सहयोग करता है तो उस अहिंसर और लोरतात्रिक राज्य मानने या कोई आधार नही रहता। ऐसी स्थिति म हिंसा वो अवित मानने वाले नागरिप वग पर यह दोहरा उत्तरदायित्व आ जाता है कि वह नवल उस आर्थिव प्रक्रिया को बदलने के लिए सचेष्ट हो जो शोपण और असमानता को बढाती है बल्पि उस आर्थिक प्रक्रिया के साथ सहयोग करने वाली या उसमा प्रतिरोध न कर रापने वाली राजनीतिक प्रक्रिया को भी सही लीक पर डालने की दिशा मे प्रयत्नरत हो। यदि यह ऐसा नही मरता है तो वह न वेवल अयाय यो पदग्ति ही करता है बल्कि उसम सहभागी भी हो रहा होता है। .. अमरोग और राग्य पोप मानती है और उस विचारधारा की व्यारया और अपने काय व्यापार या व्यक्ति समूह म सोजे । ऐसी कोई भी कोशिश उस विचारधारा को मानव मरथाआ और व्यक्तियों से जुड़ जाते हैं जो स्वयं को उस विचारधारा का कसौटी नेपम स्वीकार कर लेते हैं। यहां यह भी समझ लिया जाना चाहिए कि कोई विचारधारा यह नहीं चाह सकती कि मनुष्य अपने जाचरण स्वतन्त्रता से पलायन यह अक्सर देया गया है कि मनुष्य के कल्याण और सही विकास को अपना प्रयोजन मानने वालरी विचारधाराएं और उनसे प्रेरित मस्थाएं एक-दूसरे के इतना विरोध म हो जाती हैं कि वे एक दूसरे को अपना शनु घोषित कर देती हैं और उनका समय और श्रम अधिकाशत एक दूसरे की निदा करने और उसे समाप्त परने की काशिश म ही लगा रहता है। आधुनिक काल में राजनीतिप और मध्यकाल में धामिव सम्प्रदाय इस प्रवृत्ति का स्पष्ट उदाहरण है। मेरे सम्मुप यह सवाल अक्सर खडा होता है कि लक्ष्य एक होने पर एक दूसरे के प्रति यह भाव क्या रोगी म हो जो राजनीतिक या धार्मिक या अय किसी प्रकार के सत्ता मस्थान पर आसीन हैं या होना चाहते हैं तो उसका कारण समझ म आता है। लेकिन इस तरह की प्रवृत्ति उन रोगो म अधिक दिखायी पड़ती है जो अपने बाकी दनदिन जीवन मे सरल और सादा है तथा जिहे वे ठीक मानते हैं उन विचारों के लिए कष्ट उठाने को भी तयार रहते है-वे सामाय जन जो सती पर आसीन होता नहीं चाहते। ऐमा क्या है ? कही ऐसा ता नही है कि हम विचारधारा स अघि उन 7 यह भाव यदि सिफ उन के औचित्य से सम्बन्ध में ऐसी क्सिी सस्था या व्यक्तियों से निणय का ही शो- प्राणी है अत उसको हर स्तार विचासोलता पर या कोई अय वात व स्थायी बाधा हो जाती है चाह उममे उस व्यक्ति की सहमति भी क्या न हो-तो उस सार रूप म मानवविरोधी ही कहा होगा। पई दया एसा भी हो सकता है कि हम विचारधारा को भी ज़रूरत से अधिक महत्त्व दे देते हैं। विचारधारा का महत्त्व मवात से निर्धारित होता है कि - वह किन बुनियादी मानवमूत्यो से अनुप्राणित है और विस हद तक उहे पुष्ट करती है । यदि विचारधारा की विस्तत योजना म कोई ऐसी बात आ जाती है जो उन बुनियादी मानवमूल्या को कही आघात पहुंचाती है तो उममा विरोध करना होगा क्याकि ऐसा न करना उस विचारधारा की वायी साथरता को भी आघात पहुंचाना होगा। निर तर बदलती हुई परिस्थितिया में विचारधारा को निरतर व्यारया करते रहना हाता है। इस व्याख्या के सही या गलत हान का निणय तत्कालीन परिस्थितिया में उसकी कामचलाऊ उप- योगिता पर नहीं निभर करता। यह टम पर निभरह कि इस नई व्याख्या की मगति उन बुनियादी मानवमूल्यो से वठती है या नहीं जो उम विचारधारा का प्राण है । इस मूल्यबोध को खो देन पर कोई भी पद्धति, विचार या सस्था एक ऐतिहासिक विकृति बनकर रह जाती है। कई दफा इस तरह की विकृति तलालीन परिदृश्य पर अधिक प्रभावी हो जाती है-जसा कुछ सीमा तक आज है भी-लेकिन इस तरह प्रभावी हो जाने मात्र से उसे या साथक रहा माना जा सकता बल्कि ऐमी परिस्थितिया मे उन युनियादी मूल्या ये लिए हर स्तर पर प्राणपण से सघप करना और भी ज्यादा जरूरी और मायर हो जाता है। परिवागत प्रवृत्तिया से परिचित होना, उह पहचानना एक जरग बात है लकिन उन्हें अपने पर, अपने निणय पर हावी पर लेना या उनम रसलिए वह जाना नि अधिराशत वमा ही हो रहा है, अपने वो एक स्वतत्र मानव व्यक्तित्व की हैमियत स एा दजा नीचे उतार देना है। कई दफा ऐसा भी हाना है कि मनुष्य अपने स्वन न निणय और विधर में प्रयोग के अधिकार कोऔर यह अधिकार मनुष्य का सबसे बडा अधिकार है जिमवा समपण उसे सिप जविर स्तर पर ही मनुष्य रपता है इसलिए छाड देना मजूर कर लेता है कि वाह्य दवाव इतने अधिक शक्तिशाली हो जात हैं । उनका मुरावला अस्तित्व तर यो समाप्त कर सकता है। कुछ लोग क रूप म इस आचरण का जौचित्य स्वीकार कर लेते है-मपि इम पर भी राणी मतभे- पी गुमाइश है पर यह तर समय में आता है वि अस्तित्व भी एक भूय है अ उमपी रक्षा होनी चाहिए । लेकिन यह भी होता है और यह ज्यादा खतरनार है कि मनुष्य कद दफा अपनी स्वत ता की सिद्धि से भागता है-वह अपनी स्वत पताका विभिन्न बहाना से किसी न किसी इतर मत्ता को इगरिए सौप देता हपि स्वतत्रता अपन मूल्यगत स्तर पर एक उत्तरदायित्व है और उस उत्तरदायित्व का बोध इतना दुवह है कि वह उसे सहन बरन स पतराता है । अपन म्चन अविवेव की बजाय जाति, वग, दर धम-सम्प्रगाय या राष्ट्र के निणय को सलिए स्वीकार करना कि वे उससे किमो सही पता निणय है या शाम लिए निणय का भार उही पर छोड - - स्वतनता से पलायन 61 देना स्वतनता से पलायन है-एक गहरे और बुनियादी अर्थो मे यह मानवत्व से भी पलायन है-लेकिन किसी भी भाति यह पलायन स्वाभाविक नहीं है, एक विकृति है और इसलिए इस तरह के पलायन का प्रयास करने वाले व्यक्तियो या समाजा मे विभिन्न प्रकार की विकृतिया दिखाई देने लग जाती हैं। इस विकृति की विभिन सामाजिक मनोवज्ञानिक अभिव्यक्तियां हो सकती हैं । लेकिन एक बात जो इन सभी जगहा पर सामा य नजर आती है वह है मनुप्य का अवमूल्यन । इस तरह के सदर्भो मे मनुष्य को-एक यथाथ इकाई के रूप मे व्यक्ति मनुष्य को-क्सिी न किसी इतर सत्ता से ओछा बताया जाता है। यह इतर सत्ता सम्प्रदाय हो सकती है, जाति हो सकती है राजनैतिक दल भी हो सक्ता है आर्थिक प्रक्रिया हो सकती है, ऐतिहासिक नियतिवाद हो सकता है- यहा तक कि राष्ट्र भी हो सकता है। इसलिए विचारधाराआ या मगठनो से जुडते हुए-यह जुडना भी स्वाभाविक है लेकिन यह जुडना है अपना टूटना नही -क्या निर तर यह ध्यान में रखना जरूरी नहीं है कि हमारा और सम्बधित सस्था या विचारधारा का जाचरण भी उन बुनियादी मानवमूल्यो की कसौटी पर कसा जाता रहे जा उसका वास्तविक प्राण है और जिनके बिना उमकी कोई सायक्ता नही है । लेकिन क्या ऐसा होता है ? क्या हम इस ओर सजग हैं ? ऐसा नहीं होने पर ही तो लोकतत्र अधिनायकवाद म धम एक अमानवीय सत्ता के रूप मे और क्रातियाँ प्रतिकातियो मे परिवर्तित हो जाती है। 62 सस्कृति का व्यावरण आर्थिक प्रक्रिया मानवीय आधार आधुनिक अथशास्त्री-और इसलिए आधुनिक राजनीतिक विचारक और वायकर्ता भी आर्थिक समस्या को मूलत उत्पादन की समस्या मानते हैं । यदि क्सिी समाज या राज्य में उत्पादन की समस्या हल हो जाती है और इस हल मे कारखानो और रोजगार के अवसरों की संख्या मे तदनुकूल बढोत्तरी अर्थात् समाज की विक्रय शक्ति मे वृद्धि भी शामिल है-तो यह समझना चाहिए कि उसकी आर्थिक समस्याएं भी हल हो रही हैं । इसलिए आर्थिक विकास का तात्पय उत्पादन मे विकास माना जाता है । लेकिन कुछ अथशास्त्री ऐसे भी है जो केवल उत्पादन के आधार पर ही नही बल्कि मुनाफे के वितरण के आधार पर आर्थिक प्रक्रिया के औचित्य का निर्धारण करते हैं । इन लोगो के विचार में उत्पादन में वृद्धि की प्रक्रिया जव तक शोषण रहित नहीं हो जाती --और ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया म ऐसा होना अनिवाय है-तब तर अथव्यवस्था अपने सही वज्ञानिक स्वरूप को ग्रहण नही कर सकती। 'अतिरिक्त मूल्य श्रमिक के श्रम का प्रतिपल है अत उस पर किसी कारखानेदार का व्यक्तिगत स्वामित्व नहीं हाना चाहिए। इसमे कोई स देह नहीं कि यह दृष्टि पहले वाली दृष्टि की तुलना में आर्थिक सिद्धातो की दृष्टि से अधिक उचित है और अपेक्षाकृत मानवीय भी-अपेक्षाकृत इसलिए कि यह दृष्टि भी अपने अतिम निष्कप मे मनुष्य को अपने जीवन का- और इसलिए आर्थिक जीवन का भी नियता नही मानती वल्लि उमे भी यत्रो और कच्चे माल की तरह आर्थिक प्रक्रिया का एक उपकरण बना लेती है । इसलिए यह पूणत मानववादी दृष्टि नहीं है । इस दृष्टि में भी दूसरी प्रमुख कमजोरी यह लगती है कि यह भी उत्पादन मे अधिकाधिक विकास को ही प्रमुख प्रक्रिया मानती है और इस प्रकार प्रकृति और उसकी सम्पदा के माथ वसा ही हिंसक रवया अरितयार करती है जमावि प्रथम दृष्टि करती है। इस प्रकार पूजीवाद और माक्मवादी समाजवाद जि हे वल्पिक दृष्टिया के रूप मे प्रस्तुत किया जाता है दोना ही अतत मनुष्य को हिंसक प्रवृति की ओर उ मुख परते हैं यद्यपि दोनो के घोषित लक्ष्य एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत हैं। इसका कारण शायद यही है वि माक्सवादी समाजवाद का ज म एव यातिर प्रक्रिया के तहत पूजीवाद के अतविराधा से होता है । अत स्वय उसका भी इन अतविरोधा से ग्रस्त होना स्वाभाविक है। इन अतर्विरोधो से तभी बचा जा सकता है जब यह माना जाय कि ममतामूलक समाज के विकास की प्रक्रिया याधिक नहीं बवि मानवीय चेतना द्वारा निर्देशित है, अत उस प्रक्रिया का एक नतिक पहलू भी है और वह कम महत्त्वपूर्ण नहीं है । यदि चेतना के विकास का तात्पय अहिंसा की प्रवृत्ति का विकास है तो सामाजिक आर्थिक विकास की प्रक्रिया में ही नही प्रकृति के प्रति भी अहिंसक रूग्व को विकसित होना होगा क्योकि अहिंमा की प्रवृत्ति का सम्बध हमारे मन से है- इसमे दूसरे पक्ष की स्थिति के द्रीय नही है । माक्सवादी समाज की प्रनिया भी अ तत श्रमिक से एक नतिक मांग तो करती ही है। जब यह कहा जाता है कि प्रत्येक से उसकी योग्यता के अनुसार लो, और प्रत्येक को उसकी जरूरत के मुताबिक दो तो यह बुनियादी रूप से एक नतिक सिद्धात है। 'अतिरिक्त मूल्य के सिद्धात को यानिक तरीके से लागू करने पर तो अतिरिक्त मूत्य भी मीधा श्रमिक को ही मिल पा चाहिए । तव सिद्धात होना चाहिए कि 'प्रत्येक से योग्यता के अनुसार ला और उसी आधार पर उसे दो भा' जो निश्चय ही नतिक दष्टि मे एक पूजीवाद माग होगी। उपयुक्त दोनो ही दप्टिया एक बुनियादी भ्रम की शिकार भी हैं। दोनो ही यह मानती है कि प्राकृतिक सम्पदा पर मनुष्य का स्वामित्व है जबकि इस मा यता का का नतिक आधार उनके पास नही है-वल्कि कह सकते हैं कि इसका काई जाथिक आधार भी नही है । अपने श्रम स उत्पादित वस्तु पर ना मनुष्य अपना अधिकार मान सकता है लेकिन प्राकृतिक सम्पदा के उत्पादन या सचयन मे उसकी कोई भागीदारी नहीं है। हम कह सक्त है कि इस सम्पदा के बिना उसका अस्तित्व ही सम्भव नही है इसलिए उसे प्रकृति का दोहन करना ही होगा। इसका तात्पय यही हुआ कि मनुष्य समाज नतिक दष्टि से प्रकृति पर अबाध अधिकार नही रखता बल्कि अपने अस्तित्व के लिए उस पर निभर करता है और इसीलिए उसका उपयोग करता है। लेकिन मनुष्य के मनुष्य हाने मे ही यह तय है कि वह एक उत्तरदायी प्राणी है अत प्रकृति पे साथ अपने इम रिश्ते मे भी इस उत्तरदायित्व का प्रतिफलन होना स्वाभाविक हो एक अनिवाय नतिक माग है। यह निष्कप निकलता है कि मनुष्य द्वारा प्रकृति का दोहन उस सीमा तर ही उचित माना जा सकता है जिस सीमा तक उसकी बुनियादी जविक आवश्यक ताआ की पूर्ति के लिए ऐसा करना अनिवाय हो । साथ ही यह देखते चलना भी जरूरी होगा कि वह प्रकृति के प्रति अपने दायित्व का पालन भी करता है या -- 64 रास्कृति का व्याकरण नही-अर्थात प्रवृति का हो रही हानि की यथासम्भव क्षतिपूर्ति करने की दिशा मे भी उस सचेप्ट रहना होगा। इमो का आधुनिक भाषा मे पारिस्थतिक सन्तुलन-इकॉलॉजिकल बलेंस-कहा जाता है । यह दृष्टिकोण आर्थिक कसौटी पर भी उतना ही खरा उतरता है जितना नतिक क्सौटी पर। यदि यह मान भी ले कि प्रकृति पर मनुष्य का अधिकार है तो भी मानना हागा कि वह क्सिो एक मनुष्य जाति, राष्ट्र या वग जथवा एक कालखण्ड के मनुष्य का नहीं बल्कि सावभौमिक और सवकालिक मानवता का अधिकार है। अत किसी भी एक मनुष्य राष्ट्र या वग को यह अधिकार नही दिया जा सकता कि वह अपनी तात्कालिक आवश्यक्ताओ और सुविधाआ की पूर्ति के लिए इस सम्पदा का अस तुलित दोहन कर सके। अत आर्थिक विकास का तात्पय सिफ उत्पादन का विकास या मुनाफे के वितरण का सतुलन ही नहीं है। उसम यह ध्यान रसना भी उतना ही आवश्यक है कि यह प्रक्रिया स्वय म कितनी मानवीय है। उत्पादन का निर्धारण बाजार की मांग पर नही बल्कि इस आधार पर हाना लाजिमी है कि मनुष्य की वास्तविक आवश्यकताएँ क्या है और उसकी चेतता के विकास मे किस हद तक प्रकृति का दोहन आवश्यक है । जीवन स्तर को ऊँचा उठाने नाम पर मनुष्य को श्रमविमुख और सुविधाजीवी बना देना और उसकी सुरसा की तरह मुह फ्लाती हुई सुविधाआ की मागा की पूर्ति के लिए प्रकृति का और मानवीय प्रतिभा और श्रम का भी शोषण आर्थिक विकास की ही नही मानवीय चेतना के नतिक विकास की प्रक्रिया की एक विकृति के रूप में ही समझा जा सकता है। यदि मनुष्य मान समान है ता सिफ वतमान म जीवित मनुष्य ही नहीं भविष्य में आने वाला मनुष्य भी उतना ही समान है। अत उसकी उपक्षा या अधिकारो का हनन उतना ही स्वाथ केन्द्रित और हिंसक और उस हद तक अमानवीय भी बनाता है जितना आज से मनुष्य का शोषण और अवमानना । आर्थिक विकास की सही और मानवीय दिशा म हमे न केवल उत्पादन और वितरण के फ्लो को सब तक समान स्तर पर पहुँचाना हागा बल्कि उसकी प्रक्रिया में प्रकृति और भावी मानवता के प्रति भी एक उत्तरदायित्व का बोध विकसित करना हागा। आर्थिक प्रक्रिया मानवीय आधार 65 तीसरे रास्ते की तलाश अथशास्त्र का अध्ययन करने वाले लोगो मे अधिकांश सन्या उन लोगा की है जो आर्थिक जीवन को अपने ही स्वायत्त नियमो द्वारा सचालित मानत हैं और विसी प्रकार के तत्त्वचितन या मूल्यदशन के साथ उसका कोई अनिवाय अत सम्बध नहीं मानते-बल्कि उनमे भी एक बडी सरया तो यह मानने वाला की रही है कि आर्थिक जीवन और नतिकता या मूल्यबोध तो अनिवायत एक दूसरे के विरोधी हैं। एडमस्मिथ जसे अथशास्त्री यह मानते थे कि मनुष्य का आर्थिक जीवन और विकास उसकी बुनियादी स्वाथ वृत्ति से प्रेरित और निर्यातत निर्देशित है, इसलिए नतिकता से उसका अनिवायत विरोध का ही सम्ब व हो सकता है । दूसरे शब्दा मे, इसका तात्पय यही हुआ कि सस्कृति या मानवीय चेतना आर्थिक जीवन की केद्रीय धुरी नहीं है बल्कि आर्थिक जगत के अपने स्वायत्त नियम हैं और उनका पालन करने पर ही आर्थिक जीवन का सुचारू सचाउन सम्भव हो सकता है। यही कारण है कि बहुत से एसे अथशास्त्री भी मिल जायेगे जो यह मानते हैं कि बाजार मे वाले धन की एक सीमा तक उपस्थिति आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है। इस तरह के विद्वान यह भूल जाते हैं कि आर्थिक जीवन मनुष्य के समग्र कल्याण के लिए किये जा रह मानवीय प्रयत्नो का एक अश है इसलिए उसे शेप जीवन से काट कर नहीं समझा जा सकता और यदि हम ऐसा करते भी है तो मानव जीवन मे एक अनिवाय अतविरोध को ही विकसित कर रहे होते हैं। बाजार के नियम नतिक बोध से परे है यह मानना बाजार को एक अमानवीय सत्ता मान लेना है। आधुनिक समझे जाने वाले या वज्ञानिक अध्ययन का दावा करने वाले अथशास्त्र के कई पण्डित यही मानते हैं और उनके प्रभाव म आधुनिक सरकारें भी अधिकाशत इसी मत को स्वीकार करती हैं। यही कारण है कि जाथिक सवालो को हल करते समय मानवीय या नतिक प्रेरणालो की अवहेगना की जाती रहती है । आर्थिक जीवन की यह नीति निरपेक्षता शन शन हमारे सामाय जीवन मे एक वज्ञानिक दृष्टि के रूप में विकसित और स्वीकृत हो गयी है। कहना न होगा कि हमारे सामाजिक जीवन के बहुत से तनाव और अतविरोध इसी भ्रामक दृष्टि के परिणाम हैं।

- एक दूसरा वग ऐसा है जो आर्थिक जीवन को शेप जीवन से काट कर तो नही देखता लेकिन वह उपयुक्त दृष्टि के विपरीत सारे जीवन की केन्द्रीय प्रेरणा के रूप में आर्थिक प्रेरणा को ही स्वीकार करता है । यह दृष्टि सारे ऐतिहासिक सास्कृतिक परिवतनो का वास्तविक कारण आर्थिक परिवतन को ही मानती है। इस प्रकार प्रकारातर से यह दृष्टि भी आर्थिव जीवन कोही वास्तविक जीवन मानती है क्योकि बाकी का सारा जीवन तो उसी मूल प्रेरणा का प्रतिफलन है। यह दृष्टि भी मूलत मनुष्य को आर्थिक प्राणी मानती है और नैतिकता अगर कुछ हो सकती है तो यही आर्थिक परिवतन की दिशा को समझ कर उसके साथ हो लिया जाय । यह आश्चयजनक है कि मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोपण का विरोध कर एक समतामूलक और सामाजिक अयाय से रहित समाज की स्थापना का स्वप्न देखने वाली विचारधाराएँ और सगठन अपने प्रयत्नो के नतिक आधार की अवहेलना करते हैं और एक नतिक्तानिरपेक्ष ऐतिहासिक दृष्टि को अपने प्रयत्नो की मूल प्रेरणा स्वीकार करते है क्योकि उनकी राय मे वही वज्ञानिक है। यह बात दीगर है कि इस दृष्टि के राजनीतिक प्रतिफलन मे वे मनुष्य की नैतिक चेतना को जागृत कर उसका लाभ उठाने की कोशिश भी करते है। स्पष्ट है कि ये दोनो ही दृष्टिकोण भ्रामक ही नही मानवविरोधी भी है क्योकि दोनो ही मनुष्य को जीवन की केद्रीय प्रेरणा के रूप मे स्वीकार नहीं करते । दोनो ही जगह मनुष्य बाजार के नियमो द्वारा अनुशासित है-बल्कि सही होगा यह कहना कि दोना ही जगहो पर वह आर्थिक सत्ता का उपकरण है। एक जगह आर्थिक सत्ता अप्रत्यक्ष नियमा द्वारा सचालन करती है और दूसरी जगह उसका राजनीतिक प्रतिफ्लन उसे नियमित निर्देशित करता है। अपनी इस कोशिश मे दोनो ही दृष्टिकोण और उनसे प्रेरित राजनीतिक- सामाजिक व्यवस्थाएं मनुष्य का विमानवीकरण करती और अपनी प्रक्रिया मे हिंसक तथा प्रकृति मे आततायी हो जाती है। पूजीवादी लोक्तान और सवसत्तावादी समाजवाद दोनो ही व्यवस्थाएँ इसीलिए मूलत मानव विरोधी हैं क्योंकि वे आर्थिक प्रक्रिया का उद्देश्य मनुष्य का-मनुष्य मान का-वल्याण नहीं मानती बल्कि मनुष्य को आर्थिक नियमो का उपकरण बना देती हैं। मनुष्य का केवल या मूलत आर्थिक प्राणी मान लेने का मतलब उसके विकास की बहुआयामी सम्भावनाओ को नकार देना और उसे एक सजीव मशीन की हैसियत दे देना है। क्ह्ना न होगा कि उससे मानवीय श्रम के प्रति भी एक हेयता की भावना विकसित होती है क्योकि श्रम मानवीय जिजीविषा और सजनशीलता की अभिव्यक्ति का माध्यम न रहकर एक लाभकारी गतिविधि रह जाता है और यदि यह लाभ उस श्रम की तुलना म एक यत्र द्वारा अधिक तीसरे रास्ते की तलाश 67 हा सकता है तो मनुष्य पर यन का वरीयता देना आर्थिक दृष्टि से अनुचित नहीं समझा जा सकता। श्रम या कम वह प्रक्रिया नही रहती जिसमे मनुष्य अपनी पहचान और अभिव्यक्ति ढूढता है बल्कि वह एक बाजारू जिस हो जाता है। श्रमिक का गौरव गान करन वाली दृष्टि अतत श्रम को ही मितना हय मान लेती है, इस अतविरोध की पहचान भी बहुत कम विकसित हो पाती है। आर्थिक जीवन समग्र मानवीय जीवन का एक ऐसा पक्ष है जिसका सम्बध मनुष्य की बुनियादी आवश्यक्तानो से है-यानी उन नावश्यक्ताजा से जिनके बिना मनुष्य के जविक अस्तित्व का बना रहना भी सम्भव नही रहता । अत उसके महत्त्व की अनदेखी नही की जा सक्ती-लेकिन इसीलिए उसे मानवीय भावनाजो और नतिक बोध के दायरे से बाहर भी नहीं माना जा सकता। मनुष्य यदि एक स्वतन सजनशील चेतना सम्प न उत्तरदायी प्राणी है तो उसकी हर निया मे इसी चेतना की अनुप्रेरणा प्रतिविम्वित हानी चाहिए उसके आर्थिक जीवन को न केवल शेप जीवन से काट कर नहीं देसा जा सकता बल्कि उसकी मूल प्रेरणा मे भी वही संस्कृति चेतना या नतिक बाध रहना चाहिय जो उस पशु स जलग करता और उसके मनुष्य होने को सिद्ध करता है । सामाजिक अयाय के विरुद्ध तथा मानवीय स्वत नता और समानता के लिए किया जा रहा सघप मूलत एव नतिक सधप है क्यापि याय अथवा अयाय पी धारणाएँ मूलत नतिक धारणाएँ हैं । आर्थिव जीवन के विकास यी पथित वनानिक दृष्टि शापण और दमन को भी उतना ही वज्ञानिक मानने का विवश है जितना शापणमुक्ति को। लेपिन मानववादी दृष्टि शापण और दमन को हर हालत म अन तिव ही मानती है। यह एक स्पष्ट तथ्य है कि सामाजिर याय के लिए सघप की तीव्रता जोर विस्तार इसी नतिन पुवार का असर है, किसी धनानिक दृष्टि या नहीं। इगरिए उन ममाजा का जा अपन वो मानववादी, लोकतात्रिय आर सामाजिक न्याय का पशधर मानत हैं अपनी अथ व्यवस्था का भी इस तरह विगमित करना होगा जिसम मानवीय स्वतता यानी मनुष्य माग की म्यत ता और गरिमा की रक्षा हा सर । यह मिप आपिर जीवन के सामने वितरण वा ही प्रश्न नहीं है। यह प्रश्न मिप इताही नहीं है कि 'अतिरिक्त मूल्य' या उपयाग या उपभाग रिस के द्वारा और किस तरह पिया जाय । यह मयार मनुष्य एि अघियापित भौतिय मुविधाएँ जुटा देन का भी नहीं । यह गवार ममग्र मानवचेतना विशाम या गस्थतियाप को चरितायता पा गया है। आथिर जीवन का उद्देश्य या ममग्र मानवीय कल्याण में 68 मपति पा पाररत , सहयोगी होना है तो उसे केवल अपने स्थूल परिणामो म ही नहीं, अपनी पूरी प्रक्रिया और स्वरूप मे भी मानवीय हाना होगा । कभी धम से अनुप्राणित होन पर ही अथ और काम को सुख का मूल ही नही, मोक्ष की ओर उमुर होना भी माना जाता था। रूढिगत अथ म तो नहीं, लेकिन एक नयी धम- दृष्टि, एक नयी मानवीय दृष्टि के विना जय अव भी अनथ का ही विकास करेगा। तीसरे रास्त की तलाश 69 कस्म देवाय ? यदि आर्थिक प्रनिया को भी एक समान सांस्कृतिक प्रक्रिया का ही एक अनिवाय अग मान लिया जाये तो इसका एक निहिताथ यही होगा कि किसी भी आर्थिक प्रक्रिया की वास्तविक साथक्ता और सफलता को आने में इस बात पर भी गौर करना अनिवाय हो जायेगा कि मनुष्य की चेतना के समग्र सश्लिष्ट विकास पर उसका प्रभाव क्सा होता है । इसका मतलब यही हुआ कि एक सस्कृत समाज या जाति मे आर्थिक प्रक्रिया का वास्तविक लक्ष्य या प्रयोजन मानवीय चेतना का विकास ही होगा यद्यपि उसका माध्यम और कायक्षेत्र आर्थिक जीवन तक ही सीमित माना जायेगा। जीवन एक सश्लिष्ट प्रक्रिया है, अत आर्थिक पक्ष का असर शेप दूसरे जीवन के पक्षा पर पडना स्वाभाविक ही है, लेकिन इसीलिए अथशास्त्र के लिए भी यह देखते रहना आवश्यक हो जाता है कि वह जीवन की इस सश्लिष्ट प्रक्रिया में कोई सृजनात्मक योगदान दे रहा है या नहीं बल्कि कही ऐसा तो नहीं है कि अनजाने ही आर्थिक पक्ष का असर समग्र मानवीय विकास की दृष्टि से निपेधात्मक ही अधिक हा रहा हो। लेकिन यह तभी सम्भव है जब हम यह स्पष्टतया समझ लें कि विकास का जथ सिफ आर्थिक विकास नही है जसा कि कथित आधुनिक अथशास्त्री समयते हैं बल्कि मानवीय चेतना का विकास ही वास्तविक विवास है और उसका लक्षण सिफ विचार का विकास नहीं बल्कि सभी प्रकार के मानवीय रिश्ता और काय व्यापारो म उसी भावना का प्रतिफलन होना है। लेकिन ऐसा मानने का मतलव आधुनिक कही जाने वाली जाथिक पद्धति, प्रक्रिया और व्यवस्था के बुनियादी लक्ष्य और प्रयोजना को यदलना हागा। आधुनिक आर्थिक प्रक्रिया मूल्त उत्पादन म वृद्धि को ही अपना लक्ष्य मानती है और उसका प्रयोजन अधिकाधिक आर्थिक लाभ प्राप्त करना है। सामा यत यह कहा जाता रहा है कि आर्थिक प्रक्रिया का प्रयोजन उपभोक्ता की आवश्यक्ताआ की पूर्ति करना है। लेकिन यह उपभोक्ता भी अथशास्त्र की दृष्टि में एक वस्तु की ही हैसियत रखता है। आर्थिक प्रक्रिया इस उपभाक्ता को उपभाग के लिए कुछ वस्तुएं उपलब्ध कराना चाहती है तो इसीलिए कि इसके बिना उसकी उत्पादन प्रत्रिया लाभकारी नहीं होगी। अयथा उस 'उपभोक्ता' पर उसके द्वारा उत्पादित वस्तुओ के उपभोग के कारण पडने वाले अय प्रभावो से उसका कोई वास्तविक सरोकार नही है। कई वार लगता है यदि आत्महत्या की कानूनी छूट दे दी जाये तो दुनिया भर में कई कारखाने सिफ इसीलिए स्थापित हो जायेंग कि वे अपने 'उपभोक्ता के लिए आत्महत्या के अधिक आसान, क्प्टहीन और गौरवपूण तरीके खोजकर आत्महत्या को प्रोत्साहन दे सकें। मादक द्रव्यो और ऐसी ही हानिप्रद या स्वास्थ्य पर निश्चित प्रतिकूल असर डालने वाली वस्तुओ का उत्पादन क्या आधुनिक आर्थिक प्रक्रिया के मानव निरपेक्ष किन्तु लाभपरक प्रयोजन की ही एक अभिव्यक्ति नहीं है। देसना होगा कि ऐसा कही इसलिए तो नहीं है कि वतमान आर्थिक प्रक्रिया की दृष्टि एक कल्पित 'उपभोक्ता' पर केन्द्रित है-कल्पित इसलिए कि यदि कोई वस्तु उपभोक्ता की आवश्यकता नही भी है तो उसे कुछ ही दिनो मे एक आवश्यक्ता बनाया जा सकता है-जोर इस उपभोक्ता के प्रति उसका कोई नतिक दायित्व नहीं है ? अधिक से अधिक वह एप आर्थिक दायित्व का आभास मात्र है ताकि उपभोक्ता यह समझता रहे कि उसके द्वारा दी गई कीमत का पूरा उपभाग वह कर पा रहा है। उपभोक्ता केद्रित दृष्टिकोण का ही एक असर यह हुआ है कि मानवीय श्रम-ससाधना और आर्थिव प्रक्रिया वा एक बड़ा हिस्सा ऐसी वस्तुओ के उत्पादन म खच होता है जो मूलत पल्पित या कृत्रिम आवश्यक्ताएं हैं और उनका न केवल मानवीय चेतना के विकास मे कोई रचनात्मय योगदान नही रहता बल्पि' उनम से बहुत सी वस्तुएँ तो अनिवायत प्रतिकूल अमर हो पदा करती हैं। यह एक नतिक ही नही बल्कि आर्थिक अपराध भी है कि हम मानवीय श्रम और सावजनिक ससाधना का उपयोग पूरी मानवता के विकास और कल्याण के लिए न पर वेवल एव अल्पसख्या के लिए अधिकाधिक सुविधाएं जुटान के लिए ही परते जायें-यह जानते हुए भी वि उस अल्पसस्या पर भी इसका असर मानवीय चेतना के समग्र विवास की दृष्टि से अतत सहायर तो नही ही होगा। लेकिन ऐसा शायद इसलिए है कि आर्थिक प्रक्रिया के लक्ष्य और प्रयोजन का निर्धारण करते समय समग्र मानवीय विकास के परिप्रेक्ष्य म विचार नहीं किया जाता और यह आर्थिव प्रक्रिया बिसी निश्चित मनुष्य या मनुष्य-समूह ये प्रति नहीं बल्लि एक अमूत उपभाक्ता के प्रति सम्बोधित होती है। इमा एक परिणाम यह भी होता है कि यह आथिर प्रक्रिया सिवाय अपने यानी उत्पादन और सपत म वृद्धि के परिणामस्वरुप हुए मुनाफे में मिया अय पिसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होती और न विसी भांति उपभाक्ना या किसी यस्मै देवाय ? 71 प्रकार का कोई नियण इस प्रक्रिया पर कायम रह पाता है । इस व्यवस्था मे कई बार उपभोक्ता की भी यह विवशता हो जाती है कि वह अपनी वास्तविक आवश्यक्ता और प्रवृत्ति के अनुसार उपभोग्य वस्तु का चुनाव नहीं करता बल्कि कुछ दी गयी उपभोग्य वस्तुआ के अनुसार ही उसे अपनी आवश्यकता को सशोधित करना होता है । उत्पादक और उपभोक्ता के बीच कोई प्रत्यक्ष मानवीय सम्बन्ध तो दूर इस प्रक्रिया म उत्पादक और उत्पादित वस्तु के बीच भी कोई सीधा रिश्ता नही कायम हो पाता बल्कि एक अमूत उत्पादक व्यवस्था एक अमूत उपभोक्ता समाज के लिए कुछ निर्जीव वस्तुओं का उत्तरदायित्वहीन उत्पादन करती रहती है। यदि आर्थिक प्रनिया से यह उम्मीद वाजिब है कि उसका उद्देश्य व्यक्ति और समाज के आर्थिक जीवन का इस तरह विकसित करना है कि उसम न केवल हमारी सांस्कृतिक दृष्टि प्रतिबिम्बित होती रहे बल्कि जीवन के गुणात्मक उत्क्प म उसका अपेक्षित रचनात्मक योगदान हो तो हम उसके तदनुस्प स्वरूप के निर्माण की ओर सचेप्ट होना होगा। इसके लिए यह आवश्यक है कि आर्थिक प्रक्रिया का वास्तविक लक्ष्य केवल आर्थिव जीवन का विकास ही नहीं बल्कि समग्र मानवीय जीवन का विकास हो और साथ ही अपने उपभाक्ता के प्रति एव नतिक दायित्व भी वह महसूस करे। स्पष्ट है कि ऐसा तभी हो सकता है जबकि उपभाक्ता और उत्पादक के बीच किसी न किसी प्रकार वा प्रत्यक्ष सम्बन्ध हो-तभी उपभोक्ता भी उत्पादक व्यवस्था पर एक प्रभावी नियनण रप पायेगा और पूरी प्रक्रिया वो अपने उद्देश्य के अनुसार इस्तमाल पर सक्न म सफर हो सकेगा। भारतीय परम्परा म समग्र जीवन का ही एक यज्ञ प्रक्रिया माना गया है । आर्थिक जीवन भी एक प्रकार का यज्ञ है, अत यज्ञ के पुरोहिता को यह पता हाना चाहिए कि वे जिस देवता के नाम हवि दे रहे है वह आर्थिव मुनापा नही बल्कि समग्र मानवीय चेतना है। गलत देवता के नाम पर हवि देकर उस यन से इच्छित फल की प्राप्ति जिस प्रकार जसम्भव है उसी प्रकार मिप मुनाफे के लिए विकसित आर्थिक प्रक्रिया के माघ्यम स मानवीय सम्बघा वा विकास भी मुमकिन नहीं है । लेकिन पेन्द्रीकृत स्वामित्व पर आधारित आधुनिक जटिल प्रौद्योगिकी-आथित उपभागपरव मुनाफावादी आर्थिक प्रपिया से रिसी तरह वे मानवीय आशया को अपना भी एक मरीचिरा ही है। एक विकेन्द्रीकृत और श्रमपरव प्रादागिनी पर आश्रित आवश्यक्तापरर मानवीय आर्थिक प्रक्रिया ही एम मही विकल्प दे सकता है, रेरिन उस ओर मचष्ट न हार इतिहास यी यात्रिय प्रतिया पर ही नरासा कर वट रहा जाय ता वह और भी अधिव वही मरीचिगाम जीना हागा । इस 72 गपति वा प्याररण प्रौद्योगिकी का खतरा यदि चेतना के विकास का एक निहिताथ मनुष्य म अहिंसा का निरतर विकास है तो यह भी देगना होगा वि मानवीय आचरण म हर स्तर पर यह अहिंसा प्रतिविम्बित हाती रहे। सामा यत हमारे यहा अहिंसा का बहुत ही स्थूल अथ लिया जाता है। अहिंसा का तात्पय समझा जाता है हिंझा का निषेध और हिमा का तात्पय है किसी पर बल प्रयोग तथा बल को भी साधारणतया दैहिक अर्थों तक ही मीमित कर समया जाता है। इस प्रकार अहिंसा मूलत एक निषेधात्मक धारणा रह जाती है और उसकी परिधि शस्त्र अथवा शारीरिक बल के क्षेत्र तक ही सीमित रहती है। अहिंसा वस्तुत एक विधायी धारणा है और उसका उत्स पूरे जीवन के प्रति तात्त्विक आक्पण करूणा और लगाव की भावना मे है तथा इमीलिए उसका क्षेत्र केवल दहित ही नहीं है वह मानसिक आध्यात्मिक क्षेत्र को भी अपनी व्यापक परिधि मे ले लेती है। इस दृष्टि से देसा जाये तो आर्थिक जीवन और उत्पादन की प्रक्रिया को भी अहिंसा की परिधि के अतगत ही समझना चाहिए। इस बात का एक पहलू तो कुछ लोगो को समझ में आने लगा है और व विसी भी प्रकार के आर्थिक शोषण को एन सूक्ष्म प्रकार की हिंसा मानकर उसका विरोध करने लगे हैं। लेकिन यह पहलू उत्पादन की प्रक्रिया से नहीं बल्कि लाभ के वितरण मे मम्ब ध रखता है। अधिकाश लोग अभी भी इस गम्भीर तथ्य की अनदेखी करते रहे है कि उत्पादन की आधुनिक प्ररिया किस तरह हिंसा का विस्तार करती रही है। यही नहीं, बहुत से जथशास्त्री ऐसे भी मिल जायेगे जो उत्पादन प्रक्रिया के औचित्य को इस प्रकार की सूक्ष्म हिंसा हिंसा की क्सोटी पर परखने के औचित्य को भी एक प्रकार वा भावनात्मक अनिरेक ही वहगे। आधुनिक उत्पादन प्रतिया और आर्थिक विकास एक भारी और जटिल प्रौद्योगिकी पर निभर करता है। टेक्नालाजी या प्रोद्योगिकी का विकास आथिर विकास की अनिवाय शत माना जाता है क्योकि उत्पादन म वृद्धि आर्थिक विकास की कसौटी है। उत्पादन में अधिकाधिन वृद्धि और उसके लिए अधिक से अधिक कुशल और शक्तिशाली प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होती है। लेकिन आर्थिक विकास को पूर्णतया भारी प्रौद्योगिकी पर निमर कर देने का अथ उत्पादन प्रक्रिया और आर्थिक जीवन को जमानवीय नियत्रण म कर देना है । मनुष्य तो सामा यत यही सोचता है कि यजाद्याग उसके नियत्रण में हैं और वह अपनी इच्छा के अनुसार अपने कल्याण के लिए उनका प्रयोग कर सकता है। लेकिन भारी यनो और प्रौद्योगिकी की अपनी वृत्ति और प्रक्रिया हाती है और वह एक ऐसा दुश्चम होता है जिससे वचना सम्भव नही रहता । इस प्रौद्योगिकी का सबसे बड़ा नुक्सान तो यही होता है कि मनुष्य के सामाजिक आर्थिक जीवा की वास्तविक आवश्यकताएँ उपेक्षित रह जाती है और अधिकाश मशीनो का उपयोग युद्ध अथवा गौण आवश्यक्ताआ या अनावश्यक विलासिता के उपकरणो के उत्पादन में होने लगता है जिसका एक दूरगामी परिणाम होता है मनुष्य का प्रकृति से अलगाव! इम प्रकार प्रकृति और मनुष्य के बीच एक दीवार-पारदर्शी ही सही-पदा हो जानी है जवकि मनुष्य प्रकृति का ही पुन है आज भी प्रकृति ही मनुप्य का प्राण है। आधुनिक प्रौद्योगिकी भी प्रकृति के साथ एक अनिवाय वमनस्य या हिंसा का भाव ही रखती है। आधुनिक प्रौद्योगिकी अनिवायतया हिंसक है क्याकि मनुष्य जाति और पूरे परिवेश के साथ उसका कोई लगाव का रिश्ता नहीं विकसित होता । उसका पेट भरने के लिए अधिकाधिक प्राकृतिक साधनो की आवश्यक्ता हाती है जो निरतर बढती ही जा रही है तथा उनके भण्डार मे इतनी तेजी से आ रही कमी को पूरा करन का कोई उपाय नहीं है । यदि इन साधनो का प्रयोग कम कर दिया जाता है तो यह प्रौद्योगिकी आर्थिक दृष्टि से घाटा देने लगता है या अत्यल्प लाभ ही दे पाती है और तब उस वाछित आर्थिक विकास की दृष्टि से अनुपयोगी हो जाती है जिसके लिए उसका विकास और स्थापन किया गया है। यही नहीं, इस प्रौद्योगिकी के ही परिणामस्वरूप पर्यावरण म जिम तरह का रासायनिक प्रदूषण फ्ल रहा है, वह धीरे धीरे केवल मनुष्य जाति को ही नहीं पूरे जीवन को नष्ट कर देने की आशा पदा करता जा रहा है । यह तो फिर भी हो सकता है कि इस तरह की प्रौद्योगिकी पर आथित उत्पादन व्यवस्था में व्यस्त समाजा को मशा मानवीय श्रम के आथिर शोपण वी न हो और चे एक समतामूलव ममाज के विवास या सपना भी देस रह हा लेकिन वे भी यह भूल रह होते हैं कि जिस प्रौद्योगियीआधिन उत्पादन-प्रत्रिया को उहाने अपनाया है वह उनके मानवीय आशयो वा अपनी प्रतिया मही नष्ट कर देगी। यह भलीभांति प्रमाणित है वि पिसी भी तरह का केद्रीकरण अनिवायत मानवीय स्वतत्रता का हनन करता और पिसी न किमी प्रकार के 74 मम्वृति का प्यारण अधिनायकवाद या सवसत्तावाद का जन्म देता है। दूसरी ओर, यह भी उतना... ही मही है कि वतमान प्रौद्योगिकीआश्रित उत्पादनमुनिया आरमाथिका व्यवस्था मे आर्थिक और राजनीतिक सत्ता का के द्रीकरण स्यम्भावी हरिदा इस प्रोद्योगिकी के लिए व्यापक पमाने पर जिस तरह के नीतिनिर्देशों और आर्थिक स्रोतो पर एकाधिकार की ही नहीं बल्कि बाजार पर भी अधिकाधिक नियत्रण की आवश्यक्ता होती है वह सत्ता के केद्रीकरण की ओर उमुख है जिस का परिणाम यह होता है कि मनुष्य राजनीतिक स्तर पर सवसत्तावादी होते जा रहे राज्य के सम्मुख और आर्थिक स्तर पर एकाधिकारवादी पूजी सस्थानो के सम्मुख अपने को हीन और असहाय अनुभव करने लगता है । एक श्रमिक के रूप मे भी यत्रोद्योग के सम्मुख वह अपने को बौना और अनुपयोगी महसूस करता है, जिसका सीधा मनोवज्ञानिक परिणाम यह होता है कि पहल ले सक्ने की मनोवृत्ति निर तर क्षीण होती चली जाती है और उसमे अतर्निहित विकाम की मारी मम्भावनाएँ कुण्ठित होने लग जाती है । इस प्रकार प्रौद्योगिकी मनोज्ञानिक स्तर पर मनुष्य के लिए एक हिंसक प्रक्रिया ही प्रमाणित होती है। कार्ल फ्रेडरिक और ब्रजेजेस्की जसे समाजवज्ञानियो का अध्ययन यह प्रमाणित करता है कि अधिनायक्तनीय और निरकुश शासन व्यवस्था के लिए सचार व्यवस्था, अस्त्र-शस्त्र तथा आर्थिक जीवन पर एकाधिपत्य आवश्यक है और वह किसी न किसी प्रकार के औद्योगिक आधार के विना सम्भव नहीं है। दूसरी ओर, ऐरिक फ्रॉम जसे मनोवज्ञानिकों की राय मे इस प्रौद्योगिकीआश्रित उत्पादन व्यवस्था मे मनुष्य स्वय एक वस्तु हो जाता है, मानव नहीं रहता, और अपने को असमथ अवेला और उद्विग्न अनुभव करता है। इसलिए जब हम आर्थिक जीवन म अहिंमा के प्रतिफ्लन और मानवीय आशयो की बात करते हैं तो हमे यह भी बरावर देवत रहना होगा कि इन उद्देश्या की पूर्ति के लिए जो प्रक्रिया हम अपना रहे हैं कही वह स्वय ही हिंसक या अमानवीय तो नही है। वतमान प्रौद्योगिकीआधारित उद्योग निश्चित रूप में अहिंसा और मानववादी आधारो की उपेक्षा करते हैं - और तीसरी दुनिया के सदभ म तावे आर्थिव अस तुलन का कारण भी बनते हैं। उत्पादन- प्रक्रिया मे मानवीय आवश्यक्ताओ और सत्रिय भावात्मक मानवीय भागीदारी पर आधारित तकनी ही एक अहिंसक और मानवीय आथिर व्यवस्था का आधार बन सकती है । इस तरह की आर्थिक व्यवस्था न केवल मानवीय चेतना के विकास मा साक्ष्य होगी वल्कि वह उसके भावी विधाम का एक उपकरण भी सिद्ध होगी। प्रोद्योगियी वा रातरा 75 स्वामित्व का सवाल आथिप प्रक्रिया अपनी प्रेरणा और परिणाम मे वस्तुत एक किस्म की मास्कृतिक प्रत्रिया है । अधिकाश लोग अथनीति और मस्कृति को एक दूसरे से पूर्णतया विलग मानते हैं, लेकिन गहराई म जाकर देखा जाये तो यही समझ मे आयगा कि भौतिक उत्पादन के मूल्यो के शास्त्र और मानवीय जीवनमूल्यो के शास्त्र मे अत सूनात्मक सम्बध है। किसी भी आर्थिक प्रक्रिया का औचित्य इसी कसौटी पर परमा जाता है कि उसमे किसी समाज के साम्कृतिक आदर्शों का प्रतिविम्बन हो रहा है या नही । सस्कृति समग्र जीवन के गुणात्मक उत्कप की प्रक्रिया है, अत आथिक जीवन का भी उसके विस्तार की परिधि मे होना स्वाभाविक है और इसीलिए माथिक प्रक्रिया और व्यवस्था के लिए भी यह आवश्यक है कि वे समग्र जीवन के गुणात्मक विकास की प्रक्रिया में अपना अपेक्षित यागदान करें। यदि ऐसा नही होता तो उस आर्थिक प्रक्रिया और व्यवस्था को मानवीय विकास की दृष्टि स जनुपयोगी या बाधक मानकर बदलना होगा। कोई समाज अपनी आर्थिक प्रक्यिा मे क्या लक्ष्य निर्धारित करता तथा उहे से पूरा करने की कोशिश करता है इसी मे उसकी सास्कृतिक दृष्टि प्रतिभासित होती है। प्रौद्योगिकी, उत्पादन के उद्देश्य और लक्ष्य तथा प्रकृति के साथ उमका रिश्ता जो नार्थिक प्रक्रिया का निधारण करते हैं मूलत किमी ममाज की मूल्यदृष्टि अर्थात् सास्कृतिक इप्ति पर निमर करते है। विभिन ममाज अपनी अपनी आवश्यकता के अनुसार अलग अलग प्रकार थी प्रौद्यागिकी को अपना सक्ते है। लेकिन यह जावश्याता केवल आर्थिक आवश्यकता नही है क्योकि सिप आथिक लाभ या उत्पादन वृद्धि की दृष्टि से देखने पर तो एक ही प्रकार की प्रौद्योगिकी सभी के लिए वरेण्य होनी चाहिए। लेक्नि सिफ उत्पान में वृद्धि ही नही बल्कि समाज की अय आवश्यकताएँ और उद्देश्य आर्थिक प्रक्रिया का स्वरूप निर्धारण करते हैं । लेकिन प्रौद्योगिकी ही नही, स्वामित्व वा सवाल भी आर्थिक प्रक्रिया को सास्कृतिक प्रक्रिया से मलग्न कर देने वाला सवाल है। प्राकृतिक संसाधन समस्त मानवता की पूजी है अन उनका इस्तेमाल व्यक्निगन लाभ के लिए किस सीमा तक रिया जा सकता है? यह सवाल मूलत आर्थिक नहीं है, यह एक सास्कृतिक सवाल है। इसी प्रकार मूल पूजी मानवीय श्रम है या सचित 'अतिरिक्त मूत्य' यह भी एक उत्तझा हुआ सवाल है जिसका समाधान आर्थिय नियमो के ही आधार पर नहीं बल्कि मानववादी आधार पर देना होगा क्यापि आर्थिक प्रक्रिया की आवश्यक्ता मानवीय कल्याण जौर विकास के उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही तो होती है । कुछ लोग स्वामित्व के सवाल पर विचार करते समय काय कुशलता और उनकी प्रेरणा के रूप म निजी लाभ को ही स्वीकार करते हैं और इस आधार पर पूजी पर निजी स्वामित्व के सिद्धात का औचित्य सिद्ध करत है। निजी स्वामित्व के समथन म वे सावजनिक स्वामित्व वाली व्यवस्था की गामियो को भी गिनाते हैं। रेरिन ऐसा करते समय में यह भूल जाते है कि अगाध सम्पत्ति पर निजी स्वामित्व की छूट देने वाली व्यवस्था म कुछ लोगो से मावजनिक स्वामित्व के नाम पर अधिक श्रम और वायकुशलता की अपेक्षा करना भ्रातिपूण है । उत्पादन म साधना और सामाजिक पूजी पर निजी स्वामित्व या निजी लाभ के लिए उसके अधिकाधिक दोहन की इट बुनियादी रूप से एव अमानवीय छूट है जो जाथिर प्रक्रिया को मानवीय विकास का माध्यम नहीं बनाती बल्लि मनुष्य को आर्थिक प्रक्रिया का एक पुर्जा मान बनाकर छोड़ देती है । पूजीवाद की मारी बुराइया अतत पूजी और उद्योगो पर निजी स्वामित्व की धारणा को स्वीकार कर लेने से उत्पन बुराइया है। लेरिन सावजनिक स्वामित्व के नाम पर जिस तरह का सरकारीकरण किया जाता है उसकी जपनी सामियां भी कम सतरनार नहीं है । बार बार यह कहा जाता रहा है कि किसी भी प्रकार का केन्द्रीकरण किसी न किसी प्रकार के अधिनायकवाद या सवसत्तावाद वो जम देता है । जथ या पूजी भी सत्ता का एक प्रमुग प्रकार है और उसका केद्रीकरण-चाह उस पर मरवार का अधिकार ही क्या न हो- अनिवायत समाज म अलोक्तान्त्रिक प्रवृत्तियो का बढावा देता है । कुछ समाजशास्त्रीय अध्ययन हम इम निप्प तप पहुंचात है कि अधिनायकवादी समाजा म जिन मस्थाना पर राज्य वा एकाधिकार आवश्यर होता है उनमे अथ व्यवस्था मवप्रमुग है । उस पर पूण नियंत्रण वे विना माई राज्य अधिनायरवादी नहीं हो सकता । इसका मीधा तात्पय यही हुआ वि मावजनिर स्वामित्व के नाम पर आथिर प्रविया पर पूण सरकारी अधिकार एक सीमा तर सवमत्तावादी प्रवृत्ति बानिमत्रण देना है। एसी स्थिति म नाधिप सता और प्रक्रिया का वर विद्रोवरण ही एमाण चिाप रहता है जिमम स्थानीय स्तर पर वस्तिर पहा मी स्वतत्रता हो स्वामित्व का सवाल 77 रेवि यह पल एपापिसार या सामाजिर साधना के अस तुलित निजी म्वामित्व के स्प म पिरामित 7 होन पाए। साथ ही आर्थिक सत्ता का पेन्द्रीकरण मरकार म न हापर समाज और शमिया वे अपन नियत्रण वाली विवेदीयत खादया महा। इसके लिशा जटिल प्रौद्यागिकी और केदौरत स्वामित्व-क्यापि दोना स्वभावत एक दूजे स जुड़े हैं-वी व्यवस्था यो बदलना होगा | गुमावर न पहा था कि हमे वानिको जोर शिल्प विनानिया से ऐमी पद्धतियां और उपस्पर चाहिय जो छोटे पमान पर काम करने के लिए उपयुक्त व इता सस्त हा वि लगभग प्रत्यय व्यक्ति की पहुंच के भीतर हा, माथ ही ये मनुष्य को सजनात्मक वृत्ति के अनुकूर हा । इस प्रकार की प्रौद्योगिकी के बिना मनुप्य वा आथिर यम उसकी जविर आवश्यक्ताआ और सुविधाआ की पूर्ति के लिए उपयोगी हो भी तो उसकी चेतना के सजनात्मय विकास के लिए यतई उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। स्वामित्व की समस्या का समाधान भी इस प्रौद्योगिकी के बिना सम्भव नहीं है। आधिर गत्ता का विकेद्रीकरण आर्थिक प्रक्रिया के विवे द्रीकरण के विना मुमकिन नही हो सकता। विवेद्रीकृत स्वामित्व के कई स्वरूप हो सक्त है । ट्रस्टीशिप फा मिद्धात वारयानो पर श्रमिक नियत्रण जथवा सहवारी उद्योग आदि ऐसी ही पद्धतिया है जिनके नाधार पर विभिन्न समाजा की परिस्थितियो के जनुकूल तरीके खोजे जा सकते है। लेकिन यह तय है कि विमी भी प्रकार का पेन्द्रीकृत स्वामित्व-चाहे उसका स्वरूप निजी हो या सावजनिक-केवल आर्थिर सवाल ही नहीं है बल्कि हमारे पूरे जीवन की प्रक्रिया के साथ जुड़ा हुआ सवाल है अत वह भी मूलत एक सास्कृतिक सवाल है । हम सि तरह पी आर्थिक व्यवस्था और प्रश्रिया वो वरीयता देत है इसी से यह भी तय हा जाता है कि मनुष्य और जीवन की हमारी चिता की मूल प्रेरणा और स्वरूप क्या है यानी हमारी सास्कृतिक दृष्टि क्या है। 78 सरति वा व्याकरण धर्म चेतना बनाम सगठन धम पर किसी भी तरह का विचार विमश परन से पूर्व यह समझ लेना जरूरी है कि वह सवप्रथम एक निजी अनुभूति है । जव हम अपनी निजी अनुभूति को अय लोगो ता सम्प्रेपित करते आर उह वह रास्ता बतात है जिससे वे भी उस प्रकार की अनुभूति तक पहुंच सकते है, तव ही विसी धार्मिक सम्प्रदाय का ज म होता है। अत धम अपने मूर प म अपन अस्तित्व की ही जान दानुभूति है जिसे किमी एक ही प्रकार मे बद्ध नहीं किया जा सकता। कुछ लोगो के लिए यह आन दानुभूति ईश्वर जसो पिसी सावार सत्ता की कल्पना के माध्यम से ही सम्भव हो पाती है तो अय कुछ के लिए किसी निराकार निर्वैयक्तिक परमचेतना से जुडकर। धर्मों के विकास का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि साकार या वैयक्तिक ईश्वर जसी कोई धारणा धर्मानुभय पे लिए आवश्यक नही है । जपने मूल रूप में वेदात, ताजो या प्रारम्भिक बौद्ध धम म ईश्वर जसी विसी सत्ता को आवश्यक्ता या जनुभव नहीं किया गया है और उसके बिना ही अपने अस्तित्व की चरम आन दानुभूति यो सम्भव माना गया है । अथ धर्मो मे भी ऐमे बहुत से रहस्यवादी गम्प्रदाय है जो ध्यान प्रप्रिया के माध्यम से अपने अस्तित्व की आन दानुभूति को ही चरम धार्मिय अनुभव मानत है । इसलिए धम पर विचार करते समय किसी उपासना पद्धति-यद्यपि वह किसी भी धम या अग हो सकती है-और धम को एक ही मानने पर आग्रह नहीं होना चाहिए तथा किसी भी उपासना पद्धति पर एयागी और अगदिष्णु आग्रह नही दिया जाना चाहिए । धर्मानुभव या जाध्यात्मिक अनुभूति यदि मानवीय चेतना का ही एक विशिष्ट अनुभव और विकास है तो उसकी प्रामाणिकता की परस इमी बात से हो सस्ती हरि उसस स्वय मानवीय चेतना की स्वत प्रता और गजनगीलता को मिसनी पुष्टि मिरती है। इसलिए किमी एवं धार्मिक मम्प्रदाय की पति का हो एवमात्र पति मानना या मानवीय चेतना के सम्पूर्ण विकाम का मिमी एर ही उपामना पद्धति में धेरै म बन्द कर देन की असहिष्णु वागिश भूलत एर चेतना विरोधी बोगिश हो जाती है अत वह प्रकारान्तर स एक धम- पिराधी याति भी हो जाती है। ईश्वर यदि यह है तो इतना निन्य नहीं गाताfrom प्ररमो माग परति म अन्यायपतरी ग पागमायामायाम गिनी माता मतपणा पग गम IT भाग सम्मयादी गा मा पर पपन अपिल गरी अग अगदमपिभिप्रमार और भिन frमार मी याठिमाहामा Tirन जरय जरा तो हम यही प्रशर मोनोर प्रगति दरअर गिर गाना आधार पर frगी बिगदरी पपना और अयमा अपराग गामामि तर पर जरा गाना वी धारणा अगात ही हो यदि अघागिय भी। धम गमूगी गृष्टि मगात्य देगा है अत पनि PIम मे आधार पर रोगी राजनीति या सामाजिप बिरादरी बनात हैं जिग अपरागे अग और श्रेष्ठ माना जाए तो निश्चय ही यह धम पी मूल भाषा में ही विपरीत है क्यानि "मरा तो माायता य एकत्व पी धारणा भी पण्डित हो जाती है-पूर जीया या गृष्टि ये एकर पी यात ता तब और भी दूर ली जाती है । घम अतत एक निजी अनुभव है अत दो समान अशुभया वारे व्यक्ति धार्मिक अनुभव वे क्षेत्र म एक दूसर वे अधिप निकट हा सरत हैं-यद्यपि गभी धामिर अनुभया या वणन ए हो प्रचार में किया गया है- रविन इमाघार पर राजनीतिा या आथिर मामा मे व अनिवायतया दूरार अधिकारीच नहीं हा पान । धम एक साधना पद्धति है वह पाई गामाजिक जाणिव रागठन नहीं है और एमा सगठन तो बतई नही जिग हित या स्वाय बागी मानव ममाज के हिता से अलग या विपरीत हा। धर्मानुभूति बरतत अपन या जानन की आन दानुभूति है । यह जानना अपने को दूसरी में अर्थात् ममेतर में अपन को जानना भी हो मयता है और ममेतर को अपने में जानना भी और इमरिए धामिक व्यक्ति ही वस्तुत कह सकता है कि जो मेरा है यही ममेतर है। इन दोनो ही प्रकागे से अपने को जानना अपने वा विस्तार देना भी है और सृष्टि मात्र के साथ एक अन्तित्वगत रहस्यात्मक रिश्ते का अनुभव परना भी । यही पारण है कि दुनिया के सभी रहस्यवादिया में एक बात समान मिरती है और वह है सभी प्राणिया बल्कि गृष्टि मात्र में एवत्व की अनुमति । यह अनुभूति हो धम का वास्तविक मूल तत्त्व है। इसलिए धम के पारन के नाम पर बाह्य आचरण के कुछ नियमो का पालन, प्रतीका की पूजा और कुछ शास्त्रो का जनुकरण करन का आग्रह पिया जाता है तो उसका महत्त्व एव सीमा तक ही है। इनमें से किसी की भी जात्यतिक माथरता नही है इनके विना भी धार्मिक अनुभूति सम्भव है अत इन चीजों को ही धम मान लेना पूणत गगन नहीं है। इनमें से प्रत्यक चीज 80 सस्कृति का व्याकरण का कुछ लगा के लिए कुछ व्यावहारिक महत्त्व हो गवना है और उर अपनी साधना प्रक्रिया म इनसे मदद भी मिल सकती है और इस प्रकार सम्बधित व्यक्तिया के लिए एक सीमा तर इन सबको साथक्ता भी हो सकती है। लेकिन जो लोग इस सारी प्रतिया मे से गुजरे विना ही धार्मिक लक्ष्य तक पहुंच मक्त हैं, उह क्सिी वाह्य धार्मिक शियम, प्रतीक या शास्त्र से बाधित करना आवश्यक और सगत नहीं कहा जा मक्ता। इसी तरह यह भी शिवाय नहीं कहा जा सकता कि धार्मिक आचरण के लिए विमी विशेप धम मे जास्था हो ही बत्वि क्मिी भी तरह की विशिष्ट चेतना का अलग से हाना भी आवश्यक नहीं समझा जाना चाहिए। यदि हम दूसरा म अपनी अनुभूति पर सक्त हैं या अपने म ममतर को अनुभव कर पाते हैं और हमारा आचरण इस बाध से अनुप्राणित है तो हमारा आचरण सहजरूप से धार्मिक आचरण ही है-उसमे इस बात से कोई पा नहीं पड़ता कि हम किसी विशेष उपासना पद्धति म आस्था रखते है या नही अथवा हम अपा धार्मिक आचरण के प्रति वितन सजग है । जीवन वा प्रत्येर कम एक धार्मिक आचरण हा सकता है यदि हम उमके माध्यम से अपन अह की झूठी सीमा या अतिक्रमण कर ममतर के साथ एक अस्तित्वगत सजनात्मक रिश्ता अनुभव कर सर्वे । इही अर्थों में गांधीजी सत थे और वह कहते भी थे कि राजनीति मेरे लिए एक प्रकार की आध्यात्मिक माधना है । इस दृष्टि से भौतिववादी ग्रान्तिकारिया यो भी धार्मिक ही रवीवार करना चाहिए-चाहे उनका किसी धार्मिक मतवाद या घम वी धारणा म विश्वास भी न रहा हो-क्योकि वे अपन बम + माध्यम से अपने अपन अह की परिधि के बाहर आकर पूर मानव ममाज के साथ अपन एक्त्व का अनुभव कर रह थे । इतिहास की प्रक्रिया का एक निर्वैयक्तिक मत्य पीतरह जनुभव कर अपन यो उसम मिला देना एवत्व यी विसी गहरी अनुभूति के बिना सम्भव नहीं है, और जिन महापुरुषान अपने जीवन को एकनिष्ठ होरर वि ही बडे उद्देश्या के लिए अपित कर दिया हो उह धार्मिक ही मानना हागा, चाह व स्वय उम स्वीकार न भी परें-बल्वि मानना चाहिए कि यदि पाई व्यक्ति ईश्वर या विसो ऐमी ही अदृश्य शक्ति म विश्वास रपे गिना भी पूरी मानव जाति के प्रति अस्तित्वगत र गाय का अनुभव करता है ता उमया यह लगाव अधिय महज और गहरा है क्योपि वह उमपे वदरे किसी तरह की कृपा प्राप्त कर पा इन्दुर भी नहीं है । इम दृष्टि से देखा जाए ता धम और ममाजवाद एव-दूमर पे विन्द नहीं होने-बलिद की अनुभूति एक ही दिशा की आर रे जा सवती है। व एक दूसरे व विरोधी तभी हाल हैं जब वे अनुभूति का बाध न रहार अपने मगठन हाने का अधिक महत्त्व दन -गें। घम चेतना बनाम मगठन 81 धार्मिकता और शास्त्रानुकूलता एस यदि गृष्टि मात्र वे माथ एप अस्तित्वगत रहस्यात्मव रिश्त का अनुभव ही धमानुभव है ता धार्मिक आचरण और धार्मिक या ये मम्बध म भी इसी प्टि मे विचार करना यांछनीय हागा। सामा यतया धार्मिष आचरण निर्धारण म दो प्रकार के कार्यों पर विचार किया जाता है-मामा य नतिक आर मावीय वाय तथा उपासना पद्धति से सम्बन्धित नियम एवं उपासना प्रक्रिया। पहरी कोटि म साधारणतया वे सभी धारणाएँ ना जाती है जिह हम नतिय या मानवतावादी धारणाएं कहते है। सचाई क्या करूणा दान जादि सभी सी कोटि के अतगत गिने जा सकते ह-ये आचरण के आदश है जिन पर सभी धम महमत होत है और जलग अलग उपाया स मनुष्य मे इन प्रवृत्तियों के विकास वो प्रेरणा देने का उपनम करते रहते है। इसलिए इन आदेश का किसी एक विशेष धम या पथ के अतगत न मानकर मानव बम का नाम भी दे दिया जाता है। इस तरह के आचरण की एक सामाजिक प्रतिष्ठा भी रहती है और कई दफा यह सामाजिक प्रतिष्ठा या परलोक मे सुया की कामना भी इस प्रकार के व्यवहार का मूल कारण बन जाती है दूसरी काटि विभिन धार्मिक सम्प्रताया द्वारा निधारित उपासना पद्धति और उसके लिए निर्धारित कर्मों का पालन है । इम सम्बध म प्रत्येक सम्प्रदाय अपनी विशिष्टता रखता है और एक जलग ही प्रकार की उपासना पद्धति निश्चित कर उसी के पालन पर जात्य तक जोर देता है। ये उपासना पद्धतिया चाहे एक ही लक्ष्य तक पहुंचाने का दावा करती हो लेकिन प्रत्यक सम्प्रदाय वा जाग्रह अपनी ही पद्धति पर रहता है और वास्तव मे वह सम्प्रदाय किसी भी व्यक्ति के धार्मिक जाचरण को तभी वध मानता है जब सम्बधित "यक्ति उसी सम्प्रदाय की उपासना पद्धति म विश्वास करता हो जऔर उसके जनुकूल जाचरण करने के लिए प्रस्तुत हो। यही कारण है कि जहा एक सम्प्रदाय मूर्ति पूजा का कुम मानता है वहीं दूसरा सम्प्रदाय मूर्तिपूजा को धार्मिक भावना को मव स सरल और प्रभावी अभियक्ति के रूप में स्वीकार करता है। कोई सम्प्रदाय परम सत्ता को वयक्तिक मानता है तो गाई नियक्तिक और इसी तरह के मतभेदा के आधार पर उपासना पद्धति में भी पर पाये जाते है। यही कारण है कि प्रत्यय धामिव मम्प्रदाय अपन सिद्धाता मा धारणाआवे अनुमार धार्मिक आचरण के कुछ निश्चित नियम भी निर्धारित करता है। प्रत्येक सम्प्रदाय म इसीलिए अपने अलग धमशास्त्रो का विराम हाता आया है और उस सम्प्रदाय के अनुयायो के धार्मिय आचरण वी परम उन धमशास्त्रो के आधार पर ही की जाती है। व्यक्ति वे पूर जीवन को इन धमशास्त्रो से बाधने की कोशिश की जाती है तापि उसका प्रत्यय वाय धामिर कम हो जाय । इसलिए प्रत्येक मम्प्रदाय म एक ऐमा सस्थान भी विकसित हो जाता है जिसका मूल काय इन धामिय नियमा धा पालन परवाना, उपासना पद्धति को सिसाना या उसका प्रचार करना और वदलती हुई परिस्थितिया म माचरण के शाश्वत नियमा वी शास्त्रापर नयी व्याम्या करना होता है। दूसरे शब्दा म, प्रत्येव धामिर सम्प्रदाय कुछ घमशास्त्रा और उनके रिसी सरक्षक रास्थान पर निमर शरता है और उस सम्प्रदाय म वही वम धार्मिक आचरण की वाटि मे आता है जिग शास्त्र या उसके सरक्षा संस्थान की स्वीकृति प्राप्त हो। लेकिन यह अनिवाय नहीं है वलि अक्सर इसके विपरीत अनुभव ही अधिय हुए हवि शास्त्रानुकूल या सस्थानुकूल आचरण करन पर किसी व्यक्ति को धार्मिक अनुभूति भी हो सके--क्याबि धम मूलत अनुभूति या बाध है। किसी भी प्रकार के भय सामाजिक, वैयत्तिक अथवा साम्प्रदायिक या लोभ-लाविष या पारलौमित्र-स प्रेरित आचरण अनिवायतया धामिर आचरण नहीं है। यदि हम दुग्नी पर इसलिए दया करते है कि दया करना धार्मिक हाना है तो हम चाह कितना ही उच्च आचरण पर रह हा वह वास्तविक अथों म धामिय आचरण नहीं है। वह धार्मिक जाचरण तभी है जब हममे दया करन या उसकी अच्छाई का अलग से बाई वोध नहीं है बलि पिसी का दुस हमारा अपना दुस है क्यापि उसम हमारा सहजसिद्ध अस्तित्वगत रिश्ता है ~ चाह उस दुखी व्यक्ति को हम उतनी सहायता न भी कर पायें जितनो वह दूसरा व्यक्ति करता है जिसका आचरण विमी महज वाध से नहीं वरन् घमशास्न से प्रेरित है । एक व्यक्ति नियमित उपासना परता आर उसकी सारी प्रतिमा का बिना पिसी बाघ के यत्रवत् पालन करता है ता भी उपका आचरण वास्तविक अर्थो म धामिय नहीं है क्योकि वह आचरण उसवी चेतना का विस्तार नहीं करता उसे अपने अह के छाट दायरे से बाहर निकालने म सहायक नहीं होता। दूसरी ओर, यदि विना रिमी उपासना पद्धति के धार्मिकता और शास्त्रानुवूलता 83 नियमा उपशियमा या पालयि पाई व्यक्ति अपन नहर घर का ताडार ममतर के साथ एपत्व या अशुभव करता है ता वह पिसी गम्प्रदाय विशेप के नियमा स ब न हात हुए भी पूणतया धार्मिक है । इसलिए कई बार हमारा आचरण पमसम्मत ता हा मरता है पर धार्मिक नहीं होता क्यापि उसकी मूर प्रेरणा सहज बोध न रहार गास्य या गम्थान का भय और उसक अनुकूल हान की इच्छा होती है। इसलिए धम पर विचार परत ममय हम धार्मिक आचरण और धमसम्मत घरिप गास्त्रसम्मत आचरण म पर भरना होगा। शास्त्रमम्मत आचरण वारिही विशप परिस्थितिया म एक व्यवस्था या बनाए रयन में महत्त्वपूर्ण योगदान हो सकता है लेकिन इसके बावद उसे तर तर धार्मिक जाचरण नहीं माना जा सकता-जोर इसलिए उस आचरण से काई धार्मिक उपलधि भी नहीं हो सकती-जब तक उसकी मूल प्रेरणा महज वोध नहीं है। दूसरी जोर, यदि मूर अर्थो म धमानुभव म प्रेरित आचरण शास्त्रसम्मत नहीं है या व्यवस्था पर आघात करता है तब भी धार्मिक आचरण ही माना जायगा क्याकि वह सहज बोध है अर्थात् उमके माध्यम से हमारे अपन जर का घेरा टूटता है और हम सम्पूण मृष्टि के साथ एक्त्व के वोध की ओर सहज उमुख हा रह हात है । सारी धामिय साधना इस एक्त्व के सहज वोव का प्राप्त होने की साधना है। चमगास्ना म निहित आचरण के नियमो का मूल उद्देश्य भी यही है लेकिन सस्थान मूल प्रेरणा की बजाय औपचारिक जाचरण को अधिक महत्त्व देने लगते हैं और उसका नतीजा यह होता है कि धम स नही शास्त्र और सस्थान से जुड़ जाते हैं और तव हमारा जाचरण शास्यसम्मत हाते हुए भी धार्मिक नहीं रह पाता। इसलिए धार्मिक नाचरण के प्रशिक्षण म शास्त्रानुशासन की नही आत्मानुशासन की जावश्यक्ता होती है। उसके लिए सस्थान के घराम अधिक से अधिक लोगा को समेटने की बजाय घेरा को ताड देने की आवश्यक्ता हाती है। सस्थान निवायतया कुछ औपचारिक्तानो की मांग करते है और ये औपचारिकताएँ ही एक साम्प्रदायिक संस्थान को दूसरे साम्प्रदायिक संस्थान से अलग करती है। इसलिए अपने अलग अस्तित्व को बनाय रखने के लिए प्रत्येक सस्थान लपन का दूसरा से अलग करन वाले आचरण पर अधिक जाग्रह करता है । मूल प्रेरणा पर उसका वर कम हो जाता है क्यादि सभी धार्मिक सम्प्रदाया का भेद वहाँ मिट जाता है। प्रत्येक सस्थान सत्ता का एक प्रकार होता है और इमी कारण वह धम की नही सत्ता की प्रेरणा स निर्देशित हान लगता है। सभी धर्मों का इतिहाम इस बात का माक्ष्य देता है कि समय । 84 रास्वति पा व्यापरण समय पर ऐस धार्मिक व्यक्तित्व हुए हैं जि हनि रास्थान की नापारिक्ता, सत्ताप्रियता और रूढिबद्धता का ताडा ह क्यावि इगये रिना गही धागिर आचरण सम्भव नही रह गया था। यह और वात हपि पालातर म उनी के व्यक्तित्व और उपदेशा ये जौपचारिप म्परप के आधार पर नये गम्था निर्मित कर लिये गये। यह नाश्चयजनक है कि जाधुनिक काल म भी धम या संस्थाना या शासना से जोडमर देखा जाता है। दुनिया म अभी नी एम देश और समाज है जिसमें शास्त्रानुकूल जावरण को ही धामिर आचरण माना जाता है और सगित प्रत्येक सम्प्रदाय या तो लपन का तग घेर में मोमिन यर रेना है या दूमर सम्प्रदायो के प्रति आक्रामक रस अग्नियार कर लेता है। कभी कभी ता लगता है कि पार्मिक हान का एव आयाम अनिवायनया मस्याननर हाना भी है।

यौन जीवन का नैतिक आधार यद्यपि विवाह अव याई धार्मिक संस्कार नहीं रह गया है और जाधुनिक समाजा म ता स्पष्टत उसे विपरीत यौन वाले दो व्यक्तिया के एक दूसरे के साथ जीवन वितान की जावाक्षा की अभिव्यक्ति माना जाता है तो भी उसे येवल यौन जारपण या सतानात्पत्ति की जावांक्षा पर आधारित मानना भी एक भूल होगी। विवाह वो यौन जावपण पी आवश्यक परिणति तभी माना जा सकता है जब हम यौन क्रिया का एक धार्मिक स्वीकृति देन का आग्रह कर क्याकि उसके बिना विवाहित यौन और अविवाहित यौन कोई बुनियादी आर वास्तविक भेद नहीं रह जाता। इस तरह के सम्बधो पर तब सिफ उपयोगिता की दृष्टि स ही विचार किया जा सकता है, नतिक दृष्टि स नही। लेकिन यह आश्चयजनक है कि पारम्परिक समाजाम ही नही अपने को आधुनिक और धमनिरपेक्ष मानने वाले समाजा में भी यौन आचरण का अधिशत रूढिवद्ध नतिकता-जिसका आधार साम्प्रदायिक मायताएँ ही रही हैं-की ही कसौटी पर परसा जाता है और कही गहरे म यह जाशका अवचेतन तक घर की हुई है कि विवाहतर यौन को मा यता देन या उस निषिद्ध न मानने पर पूरे समाज का ढांचा ही जसे निखर जायगा। यदि विवाह न करना कोई अनतिक वात नहीं है और किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छानुसार जले जीवनयापन का अधिकार है तो विवाहतर यौन को भी प्रचलित नतिर नियमो के आधार पर जाचने-परखने का कोई औचित्य नहीं है । लेकिन इसका तात्पय यह भी नहीं है कि विवाहेतर यौन सम्बधा का वाछनीय ही समया जाय और विवाह को एक अनावश्यक सस्था माना जाय। दरअसल, यह दा व्यक्तियों के आपसी सम्ब धो पर निमर करता है कि वे निर तर एक सहयोगी और भावात्मक लगाव भरा जीवन साथ साथ बिताना चाहते हैं । लेकिन दाना मे से किसी एक का या दोना का यौन सम्पक विही परिस्थितिया म किसी अय से हो गया है इस आधार पर निरतर सहयोग और भावात्मक लगाव की वात वा भुलाकर जलग हो जाना उचित नहीं रहा जा सकता। यदि वेवल यौन सम्पव ही साथ रहन का या भायात्मर रगाव या, प्रेम या बुनियादी आधार नहीं है तो केवल उसी यो आधार बनाव र सम्बध विच्छेद पर सेना विवाह जसी सस्था को बहुत बच्ची नीव पर निर्मित करना है। इस निर तर साहचय के लिए पारम्परिक परा दगी और विश्वास एक अनिवाय शत है। शायद इसीलिए कुछ लोग विवाहतर यौन सम्बधो को पारस्परिक विश्वास या सण्डित हो जाना मानते हैं पयापि वतमान परिस्थितिया म ऐरा सम्य घो को अक्सर गुप्त रखा जाता है-लकिन यह गापनीयता प्रचलित नतिक्ता ये डर की वजह से ही अधिक है। रविन इमरा तात्पय यह कतई नहीं है रि मनुष्य अपने यौन आचरण ये बौचित्य अनौचित्य पर कोई विचार न परे अथवा हर प्रकार के यौन जाचरण काउनित हो समझे । मनुष्य एक चेतनासम्पन प्राणी है, अत उसरे हर आररण म मूत्ययाप और उत्तरदायित्व ये भाव के प्रतिविम्बित हाने पी अपक्षा करना महल व स्वाभाविर है। पशुजीवन और मानवजीवन म एम बुनियादी और गुणात्मय पर यह है और यही उस श्रेष्ट दजा दता और मानन बनाता है नि मानवजीवन वेवर जायगा से राचालित नहीं है बरिच लावगा मागिप स्नायविर और जविन स्तर से उपर उठाता और उरण राजनागोर राना और मूत्यवाघ से अनुप्राणित ारता है। इसी प्रक्रिया या वाम गस्मृति है। जिस प्रकार हम यह मानत है कि गाप्य वा व्यवगाय सिप उग जाधिर मुरमा ही नहीं बल्लि मजनात्मय सुग दे तागि उगम अपन यम ग अगाय पाहा, मका गिप आयाग की आवश्यक्ता याही पूग परी पर उगग एप मागताप भी मिल जार गा पान तथा गई यानिमिा जविर आवश्याता को ही पूर्ति परें यदि गुरुति और गगार-गमा अभिन्या पर उगी प्राार मनुष्य या या भी ना होगा जिउमा यौनाारण भी पिता मा पाजविा आयामरना सी ही पूर्ति पर न भटर जार यदि उगरे पतिर मागृजगारमर विरामी परे। मिनीषि और नगाधारणपम्पिति मनापविर मसराम देशमामा जादा आयामी पा आम पाना महरागरसतिगामाय परिरिमायाम उग माग । रामगोगे पर यांनी मागरण नहीं मारा गा।

यौन जीवन का नैतिक आधार यद्यपि विवाह अर कोई धार्मिर मस्सार नहीं रह गया है और साधुनिक समाजाम का स्पष्टत उस विपरीत यौन वाल दा व्यक्निया के एक दूसरे ये साथ जीवन बिताने की आवराता की जभियस्ति माना जाता है तो भी उसे केवल यौन आवपण या मतानोत्पति की आगाशापर आधारित मानना भी एक भर हागी। विवाह को यौन आपण की आवश्य परिणति तभी माना जा सकता है जब हम यौन प्रिया का एक धार्मिर म्वीकृति देने का जाग्रह करें क्याकि उसने विना विवाहित यौन और अविवाहित योन म काई बुनियादी और वास्तविक भेद नही रह जाता। इस तरह के सम्बधो पर तब सिम उपयोगिता की दृष्टि सही विचार किया जा सकता है, नविष्टि से नहीं। लेषिन यह नाश्चय ननक है कि पारम्परिक गमाजो म ही नहीं अपन या जाधुनिक और धमनिरपेक्ष मानने वाले समाजा म भी यौन आचरण का अधिकांगत हतिवद्ध नत्तिक्ता-जिसका आधार माम्प्रदायिक मा यताएँ ही रही है-पी ही कसौटी पर परप्पा जाता है और कही गहर म यह आशया अवचेतन तर घर की हुई है कि विवाहेतर यौन को मापता देन या उस निषिद्ध न मानन पर पूर समाज रा ढाचा ही जमे बिखर जायेगा। यदि विवाह न करना वाई अनतिर बात नहीं है और किसी भी व्यक्ति का अपनी इच्छानुसार अकेले जीवनयापन का अधिकार है तो विवाहतर योन को भी प्रचलित नतिक नियम के आधार पर जांचने-परखन वा कोई औचित्य नहीं है । रेविन इसका तात्पय यह भी नहीं है वि विवाहतर यौन सम्बधा का वाचनीय ही समया जाय और विवाह का एक अनावश्यक सस्था माना जाय। दरअम्ल यह दो व्यक्तिया आपमी सम्वधा पर निमर करता है शिवनिरतर एक सहयागी और भावात्मर लगाव भरा जीवन साथ साथ विताना चाहत हैं । लक्नि दाना म मे किसी एक का या नाना का यौन सम्पर रिही परिस्थितिया म रिलो जय स हा गया है इस आधार पर निरतर सहयाग और भावारमा लगाव यी बात को भुगार जरग हा जाना उचित नहीं कहा जा सकता। यदि वेवर यान सम्पक ही साथ रहने या या भावात्मक रगाव का, प्रेम का बुनियादी आधार नही है ता वेवल उसी वो आधार बनाएर सम्बध विच्छेद कर लेना विवाह जसी संस्था को बहुत कच्ची नीय पर निर्मित करना है। इस निर तर साहचय के लिए पारस्परिस पस दगी और विश्वास एक अनिवाय शत है। शायद इसीलिए कुछ लोग विवाहेतर यौन सम्व धो को पारस्परिक विश्वास का पण्डित हो जाना मानते है क्याकि वतमान परिस्थितिया म ऐस सम्बधा को अक्सर गुप्त रगा जाता है लेकिन यह गोपनीयता प्रचलित नतिकता के डर की वजह से ही अधिक है। लेकिन इसका तात्पय यह कतई नही है कि मनुष्य अपने यौन आचरण के औचित्य अनौचित्य पर कोई विचार न करे अथवा हर प्रकार के यौन आचरण का उचित ही समये। मनुष्य एक चेतनासम्पन प्राणी है, जत उसरे हर जाचरण मे मूल्यवाध और उत्तरदायित्व के भाव के प्रतिविम्वित होने की अपेक्षा करना सहज व स्वाभाविक है । पशुजीवन और मानवजीवन म एक युनियादी और गुणात्मक पय यह है और यही उसे श्रेष्ठ दजा देता और मानव बनाता है कि मानवजीवन वेवल आवेगा से गचालित नहीं है परिक आवेगा को सिफ स्नायविक और जविक रतर से उपर उठाता और उह एव गजनायोल चेतना और मूल्यवाध से अनुप्राणित करता है। इमी प्रक्रिया का नाम सम्वृति है । जिस प्रकार हम यह मानत है कि मनुष्य या यवसाय सिफ उसे जार्थिक सुरक्षा ही नही बल्कि सजनात्मव सुग्व दे ताकि उसम अपने वाम से अलगाव न पदा हा, मकान सिफ जावास वी जावश्यक्ता पो ही पूरा नहीं करे बल्कि उससे एक कलात्मक स ताप भी मिले, और सान पान तथा कपडे इत्यादि सिप विक आवश्याता की ही पूति न पर वरिव व्यक्ति पी सुरुचि और सस्कार सम्पनता का अभिव्यक्त करें, उसी प्रकार मनुप्य को यह भी देखना होगा कि उसका यौन आचरण भी वेवल स्नायविव सनाव का शमन या जविर आवश्यकता को ही पूर्ति पर न अटक जाय कि उमये व्यक्तित्व या सृजनात्मर वियास भी परे! विही विशेष और जमाधारण परिस्थितिया मे स्नायविक तनाव के शमन या जविक आवश्यक्ता की पूर्ति ना आपद्धम वाला महत्त्व हा सकता है लेविन सामा य परिस्थितियो म उस मानवमूल्या की क्सौटी पर वाछनीय आचरण नहीं माना जा सकता। इसलिए यौन सम्बधो को भी केवल आवेग वे शमन या दहिक जापपण तर सोमित कर देना मानवत्व की अवमानना है। यौन सम्बध दा स्वतन व्यक्तियो वे मिलन की-ऐमे मिलन की जिसमे दोनो व्यक्ति व और भी सम्पन हाते है-प्रदिया और अभिव्यक्ति है । इसलिए यह मूलत सजनात्मन सम्बध है । रिसी भी प्रकार की वश्यावृति और बगतार अनतिक है ता यौन जीवन यानतिर आधार 87 इसलिए कि उनम गर मजनात्मक विवशता, पाशविता और मानयत्व भी अवमानना है। जिस प्रकार आथिर क्षेत्र म किसी की विवशता का लाभ उठाकर अपन स्वाथ की पूर्ति वरना पापण है, उसी प्रकार किसी से नायिर विवशता सामाजिक दीनता या दहिक रमजारी का लाभ उठावर योन तुष्टि प्राप्त करना भी दमन है, शापण है और इसीलिए अन तिव है, अपराध है पशुता है और मानसिक विकृति है। इस प्रकार एक आर जब यौन सम्बया के औचित्य को सिफ विवाह के आधार पर नहीं परखा जा सकता, उसी प्रकार दूसरी आर काम लोलुपता और विकृत काम चेप्टाआ का भी मुक्न योन के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता। कामलालुपता को जवाध स्वीकृति जहा विकृत मनोवृत्ति आर पाशविक्ता की स्वीकृति है वही यौन आक्षण को अनिवायता विवाह की परिधि म व द कर देना भी एक जावश्यक सजनात्मय मानवीय क्रिया की सहज जीवतता का समाप्त कर उस एक ऐसो मारमाहीन विक प्रक्रिया मात्र कर दना है जो मानव व मजनात्मर विकास म कम से कम मोई सकारात्मक भूमिका तो नहीं निभाती । इसलिए दा व्यक्निया वीच यौन सम्बधा का औचित्य विवाह में नहीं बल्कि इस बात म ही दाना चाहिए कि वे किस सीमा तक दानो व्यक्तित्वो के सजनात्मक विकास का गति प्रदान करते हैं। इस तरह के सम्बधा पर विचार करत समय कई बार सतान और उत्तराधिकार आदि मे सम्बधित सवाल भी उठते हैं। आधुनिक काल में अब यौन सम्बध का आवश्यक परिणाम सतानोत्पत्ति नहीं रहा है बल्मि बवाहिक यौन जीवन म भी कई लोग सतानोत्पत्ति की अपनी इच्छा पर निय यण रमना चाहते है इसलिए यह सवाल अब कोई अनिवाय विचारणीय समस्या नहीं रह जाता। लेकिन यदि कभी सतान हो भी जाय तो उसकी पंतवता की समस्या पडी नही होगी- यदि समाज म विवाहतर यौन सम्पधा का महज भाव से स्वीकार किया जाता हा तथा व्यवस्था व्यक्ति की आर्थिक सामाजिक सुरक्षा के अधिकार को व्यावहारिक मा यता देती हो। वतमान परिस्थितियो मवई बार अपनी या बच्चो की आर्थिक सामाजिर असुरक्षा की आशका से भी रोग न चाहत हुए भी साथ जीवन बिताने को बाध्य हात हैं अत वे अपन विवाहतर सम्बधा को गुप्त रमने मजबूर होते हैं-यद्यपि यह असम्भव है कि उनके बीच के तनावपूर्ण सम्बधा का बुरा असर बच्चा र विकास पर न पडै । जीवन एवं समग्र प्रक्रिया है, अत उसम परिवतन और विकासको प्रत्रिया भी सण्डित स्तर पर कामयाब नहीं होसपती। पर भी 88 समतिकाव्यावरण विवाह, विवाहेतर सम्बन्ध और नैतिकता सामाजिर विशाम की प्रत्रिया में जिन सस्थाजो का मर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है उन म परिवार सवप्रमुख है और परिवार का आधार विवाह मस्था रही है। दरअस्ल, विवाह से ही परिवार का विकास है और पारम्परिक समाजो मे परिवार को ही समाज की प्रमुख इवाई माना जाता रहा है । यही कारण है कि पारम्परिक समाजा म विवाह को दो व्यक्तियो के बीच का निजी मसला न मानकर सदव एम सामाजिक संस्था के रूप में देया जाता रहा है और इसीलिए पहले घम और फिर राज्य द्वारा ववाहिक सम्बयो को लेकर समय समय पर कानून बनाय जात रहे हैं। आधुनिक राज्य भी चाहे उसका स्वरूप क्मिी भी प्रकार का हो, इसीलिए विवाह मस्था को अपने कानूनी क्षेनाधिकार के जतगत समझता है। ऐसा लगता है कि विवाह व्यक्ति और समाज टोना की ही आवश्यकताएँ पूरी करने वाली सस्था रहा है। इसमे कोई सदेह नहीं रहना चाहिए कि विवाह का मूल कारण विपरीत यौन के प्रति मानसिक एव दहित आक्षण है। यौनच्छा की पूर्ति इसीलिए विवाह का मुरय आधार है। यत्ति ये सर्वांगीण विकास म यौन का विरोप महत्त्व है और उसके बिना रिसी समग्र व्यक्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन पशुजीवन और मानवजीवन मे एक महत्त्वपूण और बुनियादो अतर यही है कि पशु जहा मदव आवेग द्वारा संचालित है वही मनुष्य उन आवेगा मे भी सौदय बोध और मूत्य बोध तलाश करता है क्याकि यह सजनात्मक चेतना ही है जो उसे पशु से अलग कर मनुष्य का दर्जा देती है। इसलिए उसकी सारी जावेगमूलन नियाजो म भी इस सजनात्मर चेतना या प्रतिविम्बित होना अपेक्षित रहता है । सजनात्मक चेतना मे उत्तरदायित्व का वाध भी सदव समाहित रहता है इसलिए आवेग के स्तर पर यौन आरपण की अपरिहायता को स्वीकार करते हुए भी विवाह सस्था द्वारा यौन क्रिया को एक सास्कृतिक और उत्तरदायी निया बनाने की चेष्टा की जाती रही है। बच्चे यौन त्रिया का सजनात्मक जविक प्रतिफ्लन है। इसलिए विवाह न केवल यौन आपण एव आवश्यक्ता को एव स्थायी आधार और भावनात्मक प्रेरणा व सुरक्षा

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? लोग अक्सर इसमे बचन की काशिरा करते हैं और आधुनिक राज्य और विज्ञान भी इसके लिए प्रोत्साहन देने और आवश्यक सुविधाएं जुटाने मे रचि लेत हैं? एक ऐसे व्यक्ति को सहज ही कल्पना की जा सकती है जिसका ववाहित जीवन किसी कारणवश यौनसुन के अलावा सभी प्रकार से सुमपूण है ? यदि ऐसा व्यक्ति अपने ववाहित जीवन या ययावत् रखते हुए विवाहेतर यौन सम्बध के माध्यम से इम आवश्यरता की पूर्ति करता है तो क्या उसे चरित्रहीन समझा जाना चाहिए? यह द्रष्टव्य है कि वह अपन विवाहेतर सम्ब ध को गुप्त रसन पर मजबूर है ता इसलिए कि समाज में इस तरह के आचरण वा नतिर और कानूनी स्वीकृति नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट है जिसिफ यौन आक्षण भी विवाह का एक मात्र आधार नहीं हो सकता। विवाह का अथ दो व्यक्तिया का निरतर साथ है जो तभी सम्भव है जर उनकी रचिया, स्वभाव और जीवन शली म कुछ बुनियादी सहमति हो। इसलिए ववाहिक सम्बध म यौन आपण के अतिरिक्त अय वातो पर भी विचार करना आवश्यक हो जाता है। लेकिन कई बार यह भी हाता है कि रचि के साथ एव स्वभावगत सहमति न होने के बावजूद याई स्नी पुग्प एक दूसरे के प्रति यौन आफ्षण महसूस करें। स्पष्ट है कि इस यौन आपण का प्रतिफलन विवाहेतर यौन सम्बधो मे ही हो सकता है क्यापि रचि एव स्वभाव की सहमति न होने के कारण उनका विवाह सफल विवाह नहीं हो सकता। कुछ समय के लिए विवाह कर फिर विच्छेद कर लेने की बजाय ऐसी स्थिति में विवाहतर यौन सम्बधो पर प्रतिबंध लगाने या उसे सामाजिक नि । की वजह बनाने का क्या नतिष आचित्य हो सकता है-विशेपतया तब जबकि स्वय विवाह भी कोई धार्मिक सस्कार नही रह गया है ? स्पष्ट है कि विवाहेतर यौन सम्ब धो पर विचार करते समय भी हमे नतिक रूढियो वे जाधार पर नहीं बरिक मानवीय चेतना और मजनात्मकता की भावना ये विकास का आधार बनाकर विचार करना चाहिए क्यावि नतिष अनैतिक वी वास्तविक सौटी भी वही है। विवाह विवाहतर सम्बध और नतिकता 91 शिक्षा का बुनियादी प्रयोजन शिक्षा की जितनी भी परिभापाएँ दी जाती रही हैं उन सभी मे तत्त्वत एक बात समान हे और वह यह कि उन सभी मे शिक्षा को सस्कृति के साथ जोर कर देया गया है। शिक्षा सी प्रक्रिया मूठत एक सास्कृतिक प्रक्रिया है क्यानि उसका उद्देश्य मस्कृति का नरतय और उमका परिष्करण एव परिवद्धन है। 'एमाईक्लापीडिया जाफ सोशल सारसज' में शिक्षा की परिभाषा करत हुए उस बालक के मस्कृति में प्रवेश की प्रक्रिया कहा गया है। इसलिए शिपा के के उद्देश्य और उसकी पूर्ति के लिए उचित प्रक्रिया का निर्धारण परत ममय यह ध्यान रखना जरूरी होगा कि उसका अ तस्सून सास्कृतिक विकास की प्रनिया से जुडे । मस्कृति मानवीय चेतना और व्यवहार का गुणात्मक उत्रूप है । जलग अलग युगो या समाजो म उमनी जभियक्ति के रूप जोर वलाधात भिन भिन हो सकते है लेकिन बुनियादी तौर पर वह मानवीय चेतना की सजनशीलता का गुणात्मक विकास है। इसलिए शिक्षा की वही प्रक्रिया सही जऔर साथर मानी जा सकती है जो मानवीय सजनात्मक्ता के विकास में सहायक हो । सामा यत जब मानवीय सजनशीलता की बात की जाती है तो उसका तात्पय ललितक्लाजा या माहित्यरचना की प्रतिभा और कभी कभी विनान की जाविष्कारक प्रतिभा से ही लिया जाता है । लपिन मानवीय सजनशीलता तो इससे कही अधिक व्यापक प्रवृत्ति है। पला साहित्य या विनान निश्चय ही इम सृजनात्मक प्रवृत्ति यी विशिष्ट अभिव्यक्ति हैं लकिन इस प्रकार की विगिप्ट जभियक्ति या अभिरचि न होन पर उस सजनशीलता का भाव मानना एक भूल होगी। मनुप्य यदि एक मजनशीर प्राणी है-नानि वह है-तो उसनीम मजनगीता यी हर स्तर पर अभि यत्ति स्वाभावित है। यदि कोई व्यक्ति पलवार रेपय या धनानिर आदि नहीं है ता भी वह मजनगीर हा मक्ता हैन क्वल यह कि उमरा प्रत्यय कम मजन और प्रत्या मामाजिव रिश्ता-प्रेम, मैत्री रत्त भावनात्मक सम्म ध आदि-एक गजनात्मा रिश्ता हा माता है बलि अपने परिवश-प्रारतिा एवं सामाजिक दाना- माय भी उमा ।

रिश्ता अनिवायत एक सजनात्मक रिश्ता होना चाहिए। किसी भी व्यक्ति, जाति या समाज के सुसस्कृत होने की एक प्रमुख पहचान यही है कि वह अपने सभी रिश्तो और व्यवहार म इस सजनात्मक्ता का कितना उत्कप करता है । अधिकाशत शिक्षा को एक ऐसी प्रक्रिया माना गया है जिसके द्वारा व्यक्ति को परिवेश के अनुकूल होने या उस पर नियत्रण करने के लिए तयार क्यिा जाता है। उसमे आशा की जाती है कि वह सामाजिक परिवेश के अनुकूल हो और प्राकृतिक परिवेश पर नियत्रण रस सके। समाज शिक्षा व्यवस्था से यही अपेक्षा करता है कि वह व्यवित यो इन दोनो उद्देश्या की पूर्ति के लिए आवश्यक योग्यता प्रदान करे। इसी प्रयोजन से शिक्षा की प्रक्रिया व्यावहारिक नान-अपनी विशिष्ट शासाआ महित-और मूत्यचेतना दोना को अपने मे समोन की कोशिश करती है। मामाय दृष्टि से देखने पर इमम काई जापत्ति नहीं दिखायी देती और इसी कारण प्रारम्भ से ही शिक्षा के दो उपर्युक्त प्रयोजन रह हैं। प्राचीन युगा म शिक्षा को लेकर अधिक परेशानी नही थी तो इमका कारण यह था कि शिक्षा प्रक्रिया म निरतर परिवतन की आवश्यकता नहीं थी क्योकि सामाजिक परिवेश मे बदलाव की गति बहुत धीमी और इसलिए अधिकाशत अलक्षित रहती थी तथा प्राकृतिक परिवेश को जानकारी सीमित थी और इसलिए उस पर नियत्रण के उपाय और उसे अपने लिए इस्तेमाल कर सकने के तरीके भी बहुत सीमित थे। लक्नि जाधुनिक समाजा मे न केवल सामाजिक परिवतन की गति काफी तग और तुरत पहचान में आ सक्ने वाली है बल्कि प्राकृतिक परिवेश की जानकारी और उस नियनित व २स्तेमाल पर सबने ये उपाय के नान म भी निरतर वृद्धि हो रही है । इन सब कारणा स उत्पन गतिशीलता के सम्मुस हमारी शिक्षा प्रक्रिया अधिकांशत पिछड जाती है और इस कारण शिक्षा और मानवीय विकास की प्रत्रियाओ म बाई मामास्य नहीं बठता दीयता। लेकिन समस्या को इतना ही देसना अधूरा देखना है। पहले के जमान की तुलना म नान के प्रचार प्रसार के माध्यम भी बढते जा रहे हैं और जय सीवन के लिए विमी के पास निरतर जात रहना अनिवाय नहीं रह गया है। प्रसार और गचार वे जाधुनिरतम साधना के द्वारा किसी भी प्रकार की जानकारी और विचार ग्रहण परन पी गति भी पहर की अपथा अधिर बढी है और सामा य जीवन पर इमरे प्रत्यक्ष अमर वे पई स्पष्ट प्रमाण दिय जा सरते हैं। समय समय पर अल्पाालिाशिभण द्वारा भी जानकारी को निरतर घटाते रहा जा सकता है। पिसा वा बुनियादी प्रयोजन 93 इसलिए शिक्षा की बुनियादी समस्या यह है कि वह यक्ति को अपने परिवेश के प्राकृतिक और सामाजिक दोनो ही रूपा के प्रति क्मि तरह का रिश्ता विकसित करने की प्रेरणा देती और उसके लिए आवश्या मानसिक भूमि तयार करती है। अनुक्लन और नियत्रण दोनो ही किसी न किसी स्तर पर अलोक्तानिक जार इसलिए उस सीमा तक मानवविरोधी प्रवृत्तिया है। किसी सीमा तक अनुकूलन या नियनण यदि जावश्यक हो-यद्यपि इसके सीमा निर्धारण का सवाल बहुत टेढा है-तो भी यह देखते रहना जरूरी होगा कि इनके पीछे कौनसी प्रवृत्ति काम कर रही है । यदि शिक्षा व्यक्ति मे एक प्रवृत्ति के रूप मे जनुकूलन और नियत्रण की भावना का विकास करती है तो निश्चय ही सारे आधुनिक ज्ञान विज्ञान का देने वाली हान पर भी उसे मानवीय सजनशीलता के विकास को कुण्ठित करने वाली ही मानना होगा। यदि सामाजिक मा मताओ और स्थापित रीतियो के प्रति व्यक्ति का अनुकूलन हर परिस्थिति मे सही ही होता तब तो मानवीय चेतना का कोई विकाम सम्भव हो नही हुआ होना और किसी तरह के मौलिक अनुस धान की प्रेरणा समाप्त हो गयी होती। इसी प्रकार प्राकृतिक परिवेश को अपना विरोधी मानकर या उमे अपने इस्तेमाल की एक चीज ममझ कर उस पर नियत्रण स्थापित करने की कोशिश एक प्रकार की जात्मकेन्द्रित और हिंसक प्रवृत्ति है क्याकि यह पूरे जीवन की जीवन के स्रोत की अवमानना और दमन है । इसलिए शिक्षा प्रक्रिया का बुनियादी प्रयोजन यही हा सकता है कि वह व्यक्ति की अनिहित सजनशीलता का अभिव्यक्त हाने की प्रेरणा दे और टमके लिए आवश्यक गुणो का व्यक्ति मे मानसिक और घ्यावहारिक स्तर पर विपास करे। आधुनिक समाजो की एक बडी कमजारी यह है कि प्रत्येक क्षेत्र मे कुछ विशिष्ट सजनशील प्रतिभा के बावजूद सामा य जीवन में मे सजनात्मक सुख का यह भाव मिटता जा रहा है । कम मजा नही, तनाव का स्रोत होता जा रहा है। समाज व्यक्ति के सजनात्मक मतोप का अनिवाय माध्यम नहीं एक विवाता माना जाने लगा है और प्रकृति को मनुष्य अपनी महचरी नही दासी बनाना चाहने लगा है। शिक्षा यदि सामा य मनुष्य की इस सजनात्मकता की भावना को नहीं बचाती है तो वह मनु'य को भी नहीं बचा पायेगी। 94 सस्कृति का व्यावरण शिक्षा की सार्थकता सभी आधुनिक समाजा म इस बात पर जोर दिया जाता है कि शिक्षा ऐसी हानी चाहिए जो व्यक्ति को किसी न क्सिी रोजगार के लिए तयार कर सके । इसीलिए शिक्षा की योजना या पाठयक्रम बनाते समय उसे रोज़गारपरक बनाना आवश्यक समया जाने लगा है। यह धारणा बढ़ती जा रही है कि जिस शिक्षा के आधार पर काई निश्चित व्यवसाय प्राप्त न किया जा मके वह व्यथ है । इमीलिए शिक्षा के क्षेत्र म मानविकी से सम्बधित विषयो को अधिकाशत बेकार समझा जाता है क्योकि अधिकारात भविष्य के व्यावसायिक जीवन में उनकी विशेष उपयोगिता प्रमाणित नहीं होती । शिक्षार्थियो मे बहुत कम लोग ऐसे होते है जिनका व्यवसाय मानविकी के क्षन के विपयो से सम्बधित हो । टसलिए कुछ शिक्षाशास्त्री यह आवश्यक मानने लगे है कि प्रारम्भिक और माध्यमिक स्तर की शिक्षा योजना म ही कुछ व्यवसाया वा व्यावहारिक प्रशिक्षण शामिल कर लिया जाना चाहिए । वतमान शिक्षा प्रणाली में इसलिए विशेष प्रकार की व्यावसायिक और तकनीकी दक्षता विकसित करने वाली शिक्षा का विशेष महत्त्व स्वीकार किया जाता है । विज्ञान, तकनीकी, अभियानिकी और चिकित्सा आदि की शिक्षा समाज मे विशेष महत्त्व प्राप्त करती जा रही है। इसम काई सदेह नही कि उपर्युक्त सारी शिक्षा का सामाजिक उपयोगिता की दृष्टि से भी अपना महत्त्व है और शिक्षार्थी ये भावी आर्थिक जीवन की सुरक्षा भी इसम । लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठ पडा होता ह कि क्या वास्तविक और व्यापक अर्थों में इसे शिक्षा कहा जा सकता है | क्या पिता का प्रयोजन किसी विषय की जानकारी दे देना या किसी तकनीकी अथवा व्यवसाय में दक्षता पदा करने तक ही सीमित है ? शिक्षा यदि मस्कृति में प्रवेग वी-व्यक्ति के सम्वृतिसरण की प्रक्रिया है तो उसका क्षेत्र सिफ उपयोगी जानकारी देने तक ही मीमित नहीं समझा जा सकता। मस्कृति पान के स्तर पर मूल्यवाध और आचरण के स्तर पर मूल्यनिष्ठा की मन प्रमिया है । जीवन मे मूल्यवोध और मूल्यनिष्ठा की यह सहजता विवामित करना ही FTII का प्राथमिक प्रयोजन होना चाहिए । जीवन को जी सपने वे लिए आवश्यय साधन जुटाने की क्षमता के साथ साथ यह भी आवश्यक है कि वह जीवन जीन के याग्य भी हो। मूल्याध से रहित जीवन पगुस्तर का जीवन है अत शिक्षा-जो एक मानवीय प्रक्रिया है-अपना वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा कर सकती है जब वह शिक्षार्थी को मानवीय मूत्यो और सपेटना से अनुप्राणित कर सके । स्पष्ट है कि केवल जानकारी या तकनीकी अथवा व्यावसायिक दक्षता इस प्रयाजन की मिद्धि नही कर सकती। जानकारी और दक्षता भी जीवन के लिए उपयोगी चीजें हैं लेकिन उनका उपयोग समाज के हित में किया जाता है अथवा उसके अहित म, यह भी उपयोग करने वाले व्यक्ति या संस्था की मूत्यष्टि पर निभर करता है । जानकारी या दक्षता मस्कृति का सजन नही करती यद्यपि उसके विकास मे वे सहायक उपकरण जरूर हो सकती है। इसका सीधा तात्पय यही है कि केवल जानकारी या दक्षता देना शिक्षा के वास्तविक प्रयोजन की अवहेलना करना है। लेक्नि मूत्यवोध या मूल्यदृष्टि का सवाल बहुत उलझा हुआ मवाल है। वास्तविक मानवमूल्य क्या है? उनकी सही अभिव्यक्ति किम प्रकार सम्भव है? ये तथा इनस जुड़े सभी सवाल बडे पचीदा सवाल है। यह सवमा य है कि शिक्षा की प्रक्रिया और उसके मा यम से सम्प्रेपित होने वाले मूल्यो का निर्धारण सम्बधित जाति, वग समाज या राष्ट्र वे अपने हितो या प्रवृत्तिया के अनुकूल होता है । इसलिए इस बात का बहुत सतरा रहता है कि मूल्यवाध के नाम पर शिक्षा के माध्यम से काई व्यक्ति सम्था, वग या राष्ट शिक्षार्थी का अनुकूलन करने लगे। इसलिए शिक्षा की सही प्रक्रिया वही हो सकती है जो शिक्षार्थी का किही मूल्यो को सम्प्रेषित करने की बजाय उस इस योग्य बना दे कि वह मूल्यो की परख और तदनुकूल उनका अपो लिए वरण कर स। अधिकाश शिक्षाशास्त्रियो द्वारा जनुशासन को शिक्षा का एक प्रमुख लक्ष्य माना गया है । जनुशासन का वास्तविक जथ ता व्यक्ति के विवर और मूल्यो का अनुशासन ही है लेकिन सामाय व्यावहारिक जीवन में इसका तात्पय दिमी न किमी सत्ता और उसके द्वारा निधारित मर्यादा का अनुशासन होमर रह जाता है । यह देखा गया है कि सत्ता और व्यवस्था का प्रत्येक स्प क्सिी न किसी स्तर पर उही मूल्या की अवलना करता है जिन की पुष्टि ही उमके अस्तित्व की घापित साथक्ता हाती ह और इस गुप्त उद्देश्य की पूर्ति म PिHा की प्रक्रिया का सदव अपन जनुदल बनाने की कोशिश की जाती है । इसलिए गिभा व्यवस्था म गिभार्थी का स्वत अता ता बहुत दूर 96 सस्मृति का व्याकरण की बात है, शिक्षक की म्वत पता या भी अधिकाधिक सीमित करने के कई प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उपाय किये जाते हैं । वतमान शिक्षा प्रणाली म इसीलिए शिक्षार्थी सीखने के लिए स्वतय नहीं हाता । वह सीखने के लिए मजबूर होता है-वह सब कुछ सीखने के लिए जो उस साधत व्यवस्था सिसाना चाहती है । इमीलिए, मरी राय म, शिक्षा की साथक् ता की एक कसोटी यह भी हानी चाहिए-खास तौर पर आधुनिक समाजा म-कि वह किस हद तर शिक्षार्थी को अनुशासित होने के माथ माथ विद्रोही भी बनाती है। यदि पाई वनानिक अपने मान का उपयोग ज्ञान के अपने विवास और पूरी मानवता के कल्याण के लिए करन की वजाय विसी एक वग राष्ट्र या व्यवस्था के लिए दूसरा को नष्ट करने या उह आघात पहुंचान के उद्देश्य से करता है अथवा अपन नान को गुप्त रखता है और नान के विकास मे सरकारी आदेश के पारण अमह्याग करता है तो यही मानना होगा कि विनान यी शिक्षा म कही न कहीं कोई कमी है । अय विपया या क्षेत्रो की शिक्षण प्रक्रिया के बार म भी यही कहा जा सकता है । इसलिए शिक्षा की वास्तविक साथरता इसम है कि वह न केवल शिक्षार्थी के मूल्यवाध और उसके अनुकूल आचरण करने की प्रवृत्ति यो पुष्ट परे पल्लि अयाय और जसत्य विरूद्ध असहयोग और सघप की प्रवृत्ति का विकास भी परे । अयाय और उसके विरूद्ध सघप ही व्यक्ति के मूल्यगत आचरण की वास्तविक सौटी है अत यदि शिक्षाप्रक्रिया इस आचरण का पुष्ट नहीं करती है तो वह अपन वास्तविक उद्देश्य म जसपर ही कही जायेगी। लेकिन इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शिक्षा प्रक्रिया का ही नही शिक्षा व्यवस्था का भी स्वायत्त हाना आवश्यक है। जहां यह आवश्यक है कि शिक्षार्थी की सीलने की स्वत अता का सम्मान किया जाये वही यह भी उतना ही आवश्यक है कि इस प्रक्रिया और इसकी प्रवधक व्यवस्था का राज्य, पूजी सम्प्रदाय आदि सत्ता के विभिन्न प्रकारा भी अलग रसा जाय । निश्चय ही वतमान परिस्थितिया मे यह एक मुशिल बल्कि कुछ लोगा की राय म ता असम्भव काय है लेकिन जिस सीमा तक हम शिक्षा प्रक्रिया को शिक्षार्थी वेद्रित और शिक्षा व्यवस्था वो सत्ता से स्वतत्र रख पायेंग उसी हद तक शिक्षा भी अपने वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति की आर अग्रसर हो सकेगी। गिशा की साथरता 9 सामाजिक आचरण और शिक्षा HिIT प्रयोजन और प्रनिया पालेवर विद्वानाम निरतर विवाद होता रहा है और अय मामला की तरह यहां भी किसी सवमाय निपप तक पहुचना सम्भव नहीं हो सका है। दिन यह विवाद मूरत शिक्षा के प्रयोजन ये नाम पर जीवन प्रयोजन के बार महोता रहा है और उसी मारण गिक्षा की प्रक्रिया वा पर भी काई निश्चित पद्धति विरमित नहीं की जा सकी है। पिता के माध्यम स हम अधिगत अपने पूर्वाग्रहा और मा यताआ का नयी पीढी तक सम्प्रेपित करना चाहत रह है और यही आग्रह रिक्षा के प्रयाजा प्रश्न पर मतक्य नहीं हान देते, क्यापि कई मामला में हमारी मा यताएं एक दूसरे स मल नही साती और कई दफा ता वे बिल्कुल विपरीत वापर स्थित होती है। आध्यात्मिक या आदशवादी और भौतिकवादी दृष्टिकाण दा परस्पर विरोधी ध्रव है इसलिए इनमे प्रेरित शिक्षा की अवधारणा, प्रयोजन और प्रक्रिया का भी एक दूसरे से उतना ही मिन हाना स्वाभाविक है। दिक्कत यह हाती है कि शिक्षा पर विचार करते समय दोना ही दृष्टिया के समथक जीवन की समग्रता पर विचार करने की बजाय अपनी अपनी दृष्टि के औचित्य को सिद्ध करने पर अधिक वर देते हैं और शिक्षाको जीवन के समग्न विकास के उपकरण की तरह ग्रहण करने की बजाय अपनी दृष्टि को समाज पर आरापित करने का उपकरण बनाना चाहने लगत है । दूसरा पर अपने आग्रही को आरोपित करने की प्रवृत्ति-~चाहे उसके लिए बल का प्रयाग किया जाए या बारीक मनोवनानिक पद्धतियो का-सूक्ष्म स्तर पर एक अधिनायकवादी प्रवृत्ति है । अत यह अलोकतान्त्रिक ही नहीं अवज्ञानिक भी है क्याकि यह मानवीय चेतना के विकास की दिगा और विस्तार को अपने अधूर नान की सीमाआम बद्ध कर देना चाहती है। नान का काई भी स्तर चेतना के समय आर सम्पूर्ण विकास की सम्भावनाओ के सम्मुख अधूरा और जोछा ही माना जाना चाहिए । इसीलिए यदि ज्ञान को दिया सही है ता वह विनय की प्रवृत्ति का विकास करती है। विनय मूलत एक वनानिक और लोक्तानिक प्रवृत्ति है क्यापि यह अय पर अपनी धारणाआ को जारापित करन स बचती है और उसम अपनी ही मा यताआ के प्रति अपनाग्रह और दूसरो की धारणालो में प्रति अपेक्षा या अवमानना की भावना नहीं होती-बल्लि मदा दूसरे की राय के सम्मान की प्रवृत्ति होती है। इसलिए शिक्षा को लकर किसी भी तरह वा दुराग्रह अतत एक अलोक्तानिय और इसलिए मानवविराधी दृष्टिकोण स्थापित करने का ही प्रयत्न मिद्ध होता है। बहुत से शिक्षाशास्त्री और सांस्कृतिक विचारक यदि शिक्षा और सस्कृति का किसी एक ही मस्था पर- चाह वह राज्य हो या धम या बाजार-निभर कर देने को अनुचित मानते है तो इसका एक प्रमुख कारण यही होता ह दि वे इनको किसी एक दृप्टिकाण या वग के आग्रहां का माध्यम नहीं बनने देना चाहत क्यापि वे मानवीय चेतना के विकास की सम्भावनाआ के रूपायन पर किसी तरह का एकागी दवाव डालकर उसे विकृत नहीं करना चाहते। शिक्षा के महत्त्व का रेयाक्ति करते हुए अक्सर यह वहा जाता है कि शिक्षा समाज का निमाण करती है, शिभर राष्ट्र निर्माता होता है और शिक्षा पद्धति म परिवतन के द्वारा ही समाज म परिवतन लाया जा सकता है। य सभी नाते गलत नहीं है, लेकिन पूण सत्य नही है-ववि आशिर सत्य के रूप म भी ये प्रभावहीन हैं । जिस शिक्षा स ह्म समाज के पुनर्निर्माण की कामना करते है और वसा न कर सकने पर उसे दापी ठहराते है, उसके प्रयोजन और प्रक्रिया का निधारण स्वय समाज या उसकी विसी प्रतिनिधि मस्था द्वारा किया जाता है । अत यह कहना ज्यादा सही होगा कि शिक्षा समाज का वसा ही निर्माण करती है जसा समाज शिक्षा का निमाण करता है। दूसरे शब्दा म, समाज जसा वीज बोता हे वैसा ही पल उसे प्राप्त होता है । यह भी गौर करने की बात है कि शिक्षा की चर्चा करत समय हमारे मन म अधिकाशत स्कूली या विश्वविद्यालयी शिक्षा अथात् शिक्षा का एक औपचारिक स्वरूप ही रहता है। साथ ही शिक्षा की परिवि को भी हम वालक' या विश्वविद्यालयी नवयुवक तक ही सीमित रखते हैं। कुछ शिक्षा शास्त्री थोडा जागे बढकर परिवार को भी शिक्षा संस्था का एक प्रकार मान लेते हैं । यह सही है, लेकिन यह भी उतना ही सही है कि शिक्षाप्रक्रिया मे अब इन स्कूल या परिवार जसी सस्था वा के द्रीय महत्त्व नहीं रह गया है और वे जिस सीमा तक समाज को प्रभावित करती है उससे कही अधिक स्वय राजनीतिक सामाजिक वातावरण से पभावित हो रही हाती हैं । मुद्रण एव प्रसार माध्यमा के विस्तार और प्रभाव न परिवार या स्कूल को शिक्षा के क्षेत्र मे वास्तविक अर्थों मे निम अब इवाई नही रहने दिया है। स्कूल अधिक स अधिक कुछ मामला म कुछ बुनियादी सूचनाएं देने का माध्यम होते जा रहे हैं और परिवार भी धीरे धीर भावनात्मक और सास्कृतिक सामाजिर आचरण और शिक्षा 99 आवश्यक्ता की सस्था न रहार वही तक अपने अस्तित्व का वचा पाने में सफल हो रहे है जहा ता वे एक जाणिक आवश्यक्ता बन रह पाते हैं। पन पत्रिकाआ, पुस्तका, रेडियो, दूरदशन और फिल्मा पे माध्यम से सभी प्रकार की प्रवृत्तिया बिना किसी वरण प्रक्रिया के परिवार या स्कूल मे भी सीधे प्रवेश करती और पारिवारिक प्रवृत्तिया या स्कूल के वातावरण पर अधिक प्रभावी होती है। दूसरे शब्दा मे आधुनिक समाजा म शिक्षा शिक्षक या सरक्षक से कही अधिक उन अमूत शक्तियो पर निमर करती है जिनकी प्रक्रिया कि ही मानवीय भावनाली में अनुप्रेरित होन की बजाय पूर्णतया यानिव है। मुद्रण और प्रसार माध्यम अधिक व्ययसाध्य होने के कारण व्यावसायिक दृष्टिकाण से निर्देशित एव नियनित होत है। उसका उद्देश्य शिक्षापरक नहीं होता, इसलिए उनमे मानवीय उत्तरदायित्व की भावना का जभाव हाता है-यद्यपि ये माध्यम अय किसी भी मा यम की अपेक्षा शधिक दृष्टि से भी पूरे समाज का सर्वाधिर प्रभावित करत है । यह भी गौरतलब है कि इन माध्यमो म प्रत्यक्ष मानवीय सम्पन का अभाव रहता है क्यापि इनका सम्प्रेषण मूलत यात्रिक सम्प्रपण है। जत इनस प्रभावित हो रहे व्यक्ति की चिता प्रणाली पर भी इस यानिकता का मनावज्ञानिक प्रभाव पडना स्वाभाविक है। बड़ी से बडी भयकर दुघटनाओ की खबर को नाश्त की मज़ पर हमी मजाक के बीच जिस तरह सुना या पढा जाता है वह सवदन प्रनिया पर इस यानिकता प्रभाव का स्पप्त प्रमाण है। दूसरी ओर, विना किसी प्रत्यक्ष खतरे के प्रसार माध्यमा द्वारा प्रचारित खबरो से निर्मित एक आतक साम्प्रदायिकता या वढत हुए अपराधो मा वातावरण किसी भी व्यक्ति का एक निरतर तनाव में जीन के लिए बाध्य कर देता है। परिवार या म्वूल का सुरक्षित ममझा जान वाला वातावरण इन प्रवृत्तिया से सुरक्षित नहीं रह सकता। इस प्रकार सामाजिक वातावरण ही अध्यापक और सरक्षा या स्कूल और परिवार की तुलना म शिक्षा का कही अधिक वास्तविक माध्यम हो जाता है । वटेण्ड रसल न कही कहा है कि अधिकांश बच्चे जनजाने ही अपने माता पिता और अध्यापका के अमली विचारा को ग्रहण कर लेत है लेकिन आम तार पर वे उनकी उन धारणाआ का ग्रहण नही परत जिनका वे प्रचार ता करते है पर वास्तव म जा उनसरी सच्ची धारणाएँ नही हाती। माता पिता और अध्यापक का स्थान सामाजिक वातावरण लता जा रहा है। अत यह स्पष्ट है कि समाज द्वारा आपचारिक स्पस घोपित विचारो की बजाय समाज का वास्तविर जाचरण शिक्षा की प्रत्रिया म केद्रीय महत्त्व प्राप्त कर लता है। 100 सस्कृति या व्यापरण सस्कृति का केन्द्रीकरण क्यो? आधुनिा प्रौद्यागिरी अनियामत येतारण और एमाधिकारवादी प्रवृत्तिया पा जम दती और वर पुष्ट करती है और स्वाभाविक है लिमप्रतियां आपिप पा राजनतिर जीवन यात्रा अपनी गिरपामसती ही है, गापरी जोवन था यह हर पण इनम मिा हो जाता है जिसमा यतिरित् भी सम्य प म प्रायागिरी म हाता है। दूगर स म गरे प्राय गभी सामाजिर रिलता और सांस्कृतिक प्ररिया अपार मानवीय ताप वियाग पर भी स्पष्ट पहन लगन हैं और, जगारि जाहिर है,यप्रभाय हमा योनीय या पाम्प ही नही हात। जीयन ये अय पणा मी तर सामाजिर सम्प्रेषण में माप्यमा और गार प्रसार माधना तथा प्ररिया पर भी ग पपिरा आधुनिर प्रौद्यागिरी गहरा अगर हाला है। इन माधना या एर' या असर ता मिल साप ही है पि सम्प्रेषण एप जीव त मानवीय प्रक्रिया यो वजाय यात्रिय प्रशिया या रेता जा रहा है । सम्प्रेषण प्रक्रिया म निहित आत्मीयता या स्थान व ठण्डी तटस्थता रेती जा रही है जिसका अगर मानवीय चेतना ये सवेदाप पर भी देखा जा मरता है । जटिल प्रोग्रागिनी वारी उपभाता सस्थति म बडी मागवीय ग्रामदी आधुनिव प्रसार साधना के लिए एक पच्चे माल की तरह हो जाती है जिस अधिप स अधिप रोचर तरीके से अपन ग्राह्यो र सम्मुग प्रस्तुत करना सचार प्रसार उद्योग की एक अनिवायता हो जाता है और पाठव भी पिसी करणा या रगाव वी भावना से कम और घटना नमम एय प्रकार की क्या रुचि या अधिय से अधिक अपने यो तथ्यावे वार म 'अपटू- डेट बनाये रणने की इच्छा से इस प्रकार की प्रस्तुतिया म अधिष रूचि लेते हैं। हजारा रागा ये मरन या मार डाले जान और उह असह्य य प्रणाएँ दिय जाने की सबरा पर चिना विसोआरिख पीडावे चर्चा रिय जाना एय आम प्रवृति होती जा रही है। यदि कभी कोई पीडा उभरती भी है तो माथ ही एक अमहायता का भार भी घेर रेता है, क्यापि घटनाआ की दूरी और व्यापाता ये कारण यह पीडा रिसी तरह या सनिय रूप ग्रहण नहीं कर सकती।

इग प्राार बड़ी घटनामा पे प्रति जहाँ एक रिस्म की उदासीनता और कभी यभी असहायता या भाव व्यक्ति य के स्वाभाविक विकास को बुण्ठित परता है, वही प्रगार माध्यमा यी येद्रीकरण की प्रवृति उस अपन तात्यारिय आर स्थानीय परिपेश सभी राट देती है। ये प्रसार माध्यम अपनी सीमाआ और विवशताआ ये कारण स्थानीय परिवेश और समस्याआ की कोई जानकारी अपन श्रातापाटय को नहीं दे सकता पाठक यायाताने मानसिक जगत को भी बड़ी समस्याएं घरे ही रहती हैं और आथिय राजनतिक जीवन ये वेदीवरण पी वजह से वह यही मानकर चलता है कि स्थानीय समस्याओ का समाधान भी कवल ये द्रीय स्तर पर ही हो सकता है। यही कारण है रि सामाजिक अयाय आर्थिव शापण और राजनतिक प्रशासनिक दमन उत्पीडन के निराकरण के लिए वयक्ति या स्थानीय पहल करने की बजाय केद्रीय स्तर के मगठना और नेताओ की जार देखा जाता है। तय है कि यह प्रवृति वयक्तिव असहायता के भाव का ओर तीसा परती है। यह बडी जासानी से देखा जा सकता है कि जो व्यक्ति या समाज जितने बड़े प्रसार साधन वा उपभोक्ता होता है वह स्थानीय परिवेश और समस्याआ के साथ उतना ही कम जीवत रिश्ता रख पाता है। साथ ही यह भी सही है नि जा व्यक्ति या सगठन प्रसार साधना पर जितना कम प्रभाव रखता है, वह अपन को उतना ही असहाय और विफल अनुभव करता है। सत्ता के सभी प्रकारा पर किसी न किमी प्रकार का लोक नियत्रण आज की महती आवश्यकता है, लेकिन यदि निजी स्तर पर व्यक्ति और सामूहिक स्तर पर स्थानीय सगठन और समाज असमर्थता का अहसास करने लगे तो निश्चय ही इसे मानवीय विकास याना का एक विकार ही मानना होगा। इस प्रौद्योगिकी जाश्रित प्रसार व्यवस्था और सम्प्रेषण प्रतिया का एक और गहरा असर पड़ता है जो किसी भी तरह कम चिताजनक नहीं है । सास्कृतिक विकास का सजनात्मक पक्ष भी इस प्रौद्योगिकी ये दूषित प्रभावा या विकारा से मुक्त नहीं है। कोई भी समाज सही मानो म साँस्कृतिक तभी होता है जब वह अपा सामा य दर्ना दन जीवन में भी अपने सस्कृति से रचनात्मक स्तर पर जुड़ता है-उसके बिना सास्कृतिक आदर्शा की सद्धान्तिक मायता या मम्मान उस समाज की आवाधाओ का तो परिचय देते हैं लेकिन उन आकाक्षाओ और वास्तविक जीवन की दूरी या भेद अनिवायत एक मास्कृतिक द्विभाजन को जम देता है। क्ल और साहित्य सास्कृतिक चेतना का रचनात्मक अनुभूति पक्ष लकिन यह पक्ष पूणरूपेण साथक और विकसित तभी माना जा सकता है जब यह रचनात्मक अनुभूति कुछ व्यक्तिया या विशेषनो तक सीमित न रहकर समग्र समाज म हर स्तर पर व्याप जाय । प्रसार साधनो की प्रौद्योगिआश्रित और केन्द्रीकरण की प्रवृत्ति न इन - 102 सस्कृति का व्याकरण सांस्कृतिक प्रवृत्तिया के साथ हमारा रिश्ता रचनात्मक नही रहन दिया है। क्लाएं और साहित्य धीरे धीरे विशेपज्ञा की सम्पत्ति बनते जा रहे हैं। सामा य स्तर पर उनके साथ समाज का रिश्ता उपभोक्ता वा अधिर होता जा रहा है और रचनात्मक कम। इन क्षेत्रों के समथ व्यक्तिया और विशेषज्ञो ची उपलब्धियो तब इन प्रसार-साधनो के जरिए हर व्यक्ति की पहुँच हो सकती है जो शुभ है । लेकिन इसका एक उपप्रभाव यह भी हुआ है कि हम न केवल स्थानीय प्रतिभाआ की अवलना करने लगे हैं, बत्ति निजी स्तर पर इस प्रकार की सजनात्मक अनुभूति के माग भी हमारे लिए रूद्ध होने लगे हैं। प्रसार-साधनो के माध्यम से बड़ी उपलब्धियो का हम पर छाया हुआ सास्कृतिक जातक इसका कारण है । क्ला और साहित्य सदव विशेषीकृत ही नहीं होते क्याकि वे बुनियादी तौर कोई पेशा नहीं है। इन क्षेत्रो की बडी उपलब्धियां विसी समाज की सास्कृतिक चेतना के विकास की सम्भावनाआ को उजागर करती हैं लेकिन ये सम्भावनाएं पूरे समाज की चेतना तभी बनती है जव इनके साथ समाज का रचनात्मक रिश्ता हा, उपभोक्ता का नहीं । दस वीस अच्छे वैनानिक पदा करी से या आधुनिक उपारणा के प्रयोग से ही पाई समाज वज्ञानिक प्रवृत्ति का समाज नही कहला सक्ता । इसके लिए पूरे समाज के आचरण म अधविश्वासो का निराकरण और विवेक मूलर चिंतन पद्धति का प्रतिविम्बित होना आवश्यक है। वज्ञानिकता के साथ किसी समाज का यही रचनात्मक रिश्ता हो सकता है। इसी प्रकार दस-बीस बड़े कलाकारा या साहित्यकारा की उपस्थिति या इनकी रचनाआ का व्यापक स्तर पर उपलब्ध हाना ही किसी समाज को एक सास्कृतिक समाज नहीं प्रमाणित करता। इसके लिए आवश्यक है कि समाज म हर स्तर पर कला और साहित्य के प्रति एक रचनात्मक सक्रिय लगाव विकसित हो। मैं सिफ सक्रिय लगाव की माग कर रहा हूँ दक्षता या विशेषज्ञता की नहीं। अभी तो हालत यह है कि हम न केवल स्वय गुनगुनाने, नाचने या टूटे फूटे छद रचने और उह अपने निजी परिवेश म सम्प्रेषित करने म सकोच अनुभव करते है, बल्कि विभिन कलात्मक प्रस्तुतियो के बारे में भी अपनी पसंद और अपने निणय की बजाय प्रसार साधनो की राय पर निभर करते है। यह केद्रीकरण, यह विशेषज्ञता सस्कृति को भी एक उपभोग की वस्तु बनाती है उमे हमारी द िदन रचनात्मक अनुभूति नहीं रहने देती और कोई भी समाज इसक बिना निश्चित ही वडी उपलब्धिया के माध्यम से उजागर हो रही सास्कृतिक सम्भावनालो को आत्मसात् नही कर सकता। इसके लिए स्थानीय परिवेश से जुडाव के साथ-साथ सम्प्रेषण तथा प्रसारकी सरल तकनीय और विकेद्रीकृत व्यवस्था ही कारगर उपाय है । F मस्थति याद्रीपरण क्या' सस्कति के अन्तविरोध भारतीय सन्दर्भ मस्कृति की भिन्न भिन्न परिभाषाएं और व्यारयाएँ की जाती रही हैं और इस बात को लेकर भी काफी विवाद हाता रहा है कि उस की प्रक्रिया का निर्धारण किस प्रकार होता है। लेकिन इस सार विचार विमश मे एक बात सामा य तौर पर उभर कर आती रही है कि उसका सम्वच मूलत मनुष्य की चेतना के सस्कार स है और मास्कृतिक विकाम का तात्पय मानवीय चेतना का विकास ही है । सस्कृति का इतिहास से जोडकर इसीलिए देखा जाता रहा है कि उस वा अध्ययन मनुष्य की चेतना के जाज तक के विकास का अध्ययन है और उसी मे से उनके भविष्यत् विकास की सम्भावनाएँ उजागर होती है । लेकिन यह अध्ययन भी तभी सागोपाग माना जा सकता है जब हमे उस लक्ष्य या मजिल का भी ज्ञान हो जिस आर यह विकास याना उमुख है क्याकि यात्रा को मूल प्रेरणा के आधार पर ही यात्रा की प्रक्रिया भी तय होती है । इसका तात्पय यहा हुआ कि किसी भी सस्कृति की प्रकृति और स्वरूप का निर्धारण वे आदश या मूल्य करते है जिनकी सिद्धि में ही कोई समाज जपनी साथक्ता स्वीकार करता है। मस्कृति को इसलिए मूय दृष्टि कहा जाता है क्याकि उन चरम मूल्या के अजन की प्रक्रिया ही सांस्कृतिक प्रक्रिया है। शायर इसी कारण बहुत से विचारक सस्कृति का दायरा मूत्या के धारणात्मक स्तर तक ही सीमित रखत हैं और उनक जन को सामाजिक व्यक्तिगत प्रक्रिया तथा सामा य उपयोगिता की अय वाता को उसस अलग कर दते है। स तरह की उपयोगिता के क्षेत्र का वे सभ्यता के दायरे में रखते हैं और इस प्रकार मस्कृति और सभ्यता के चीच एक विभाजर रखा यीच दत हैं। ऐमी स्थिति म सस्कृति मिप मानसिम वस्तु रह जाती है और अय सारा भौतिक सामाजिक जीवन सभ्यता के क्षेत्र के अतगत समझ लिया जाता है। यह विभाजन विश्लेपण की सुविधा के लिए तो एक हद तक उपयागी हो सकता है लेगिन इसका आयातक और प्रक्रियागत महत्व नहीं है। इस विभाजन को जात्या तक मान लेन के भ्रम की वजह से ही इतिहासकार सस्थति का अध्ययन करत हुए जपा का धम दान, कला और साहित्य तक ही सीमित रखते हैं और अय सारे जीवन को उमके क्षेत्र से बाहर मान लेते है। इस प्रबार मस्कृति का क्षेत्र सिफ मानसिक व्यापार तक ही सीमित रह जाता है और उम वा यथाथ जीवन से कोई रिश्ता नही स्थापित होता। विचार और लाचार मे एक दुनिवार असगति विवसित हो जाती है। इस भ्रामर प्टि वा ही यह परिणाम हुआ है कि दुनिया में आततायी, साम्राज्यवादी और शोप समाज भी अपन को सुमस्कृत और सभ्य मानते रह है। हम केवल अपने को इसलिए सभ्य और सस्कृत नहीं कह सकते कि हमने मनुष्य के दमन और उसके सहार के कुछ ऐसे सूक्ष्म उपाय विकसित कर लिये हैं जो आदिम या जगली समाज के पास नहीं थे। लेकिन ऐसे समाजो का अपने को सुसस्कृत मानना भी बाई सचेत ढोग तो नहीं कहा जा सकता क्योकि उनकी प्टि ही भ्रामक रही है-अधिक मे अधिक यही कहा जा सकता है कि इस भ्रामक दृष्टि से मिलने वाले तात्वालिय भोतिक लाभा ने भ्रम को पहचानने की प्रेरणा नही विकसित हाने दी। इसी कारण जय काई साम्राज्यवादी या सामाजिर अयाय म ग्रस्त ममाज माहित्य और क्ला का अपन यहा विकास होत देखता है और उसके लिए आवश्यक भौतिक सुविधाएं भी जुटाने म रचि लेता है ता अपने को सुमस्त मानन में उसे योई अनौचित्य नहीं दीमता । यत्र कौशल तथा अन्य उपयागितापरष ज्ञान और व्यवस्था वे विकास की वजह से सभ्य ता वह होता ही है। ऐसे समाजा को यह अतविरोध समझ में नहीं आता-यदि आता भी है तो एक उपेक्षित अरपसख्या पोहो-वि गोपण दमन, विस्तारवादी या एकाधिकारवादी प्रवृत्ति और युद्धा के द्वारा उहोने उन बुनियादी मानव मूल्या और आदर्शा को ही आहत दिया है जा उनको सस्कृति की मूत्र निर्धारव प्रेरणाएँ हैं और इसलिए ज्ञान विज्ञान और क्ला माहित्य के सारे विकास और आर्थिव सम्पन्नता के बावजूद उनका आचरण वास्तविक अर्यो म सांस्कृतिक जाचरण नहीं है, पि जिसे वे सस्मृति या सभ्यता मानवर अपनी उपलब्धिया पर गय कर रहे हैं वह कोई जीवित प्रेरणा नही वत्वि वृत्रिम सजावट भर रह गयी है। वे नहीं समझ पाते कि मम्वृति जीव त आचरण है, ड्राइंगरूम, पुस्तकालय या अज्ञायवधरा वो मजावट नहीं कि उनकी मानवीय चेतना मजनात्मा विरामी यात्रा पालचिर भटवावी वी गितार हो रही है। अन मनि वे वार म पिसी भी विचार विमा के पूर यह समय लेना जरूरी है कि गति देवर मूल्य दृष्टि ही नहीं भूयनिष्ठा भी है। यह वेवल विचार ही, विश्वास और आचरण भी है। चेतना ये विशाम का अर्थ विचार पारी नहीं, अनुभूति का विनाम भी है। मनुष्य एक अनुभव गील प्राणी है अत जनता उसये यिपार, उसके जीवन मूल्य उरारा दा िदन अनुभव नहीं बन जाते तब तप गरएति पी प्ररिया अधूरी रह जाती और इसलिए जतविराध पूण भी हो जाती है। इसलिए मस्कृति व्यवहारत मभ्यता या बलि पूरे जीवा या ही अपने दायर म रे देती है। यदि जीया मिही मूल्यो पीआर उ मुग और उनसे अनुप्राणित है तो उसके हर पक्ष म उही मूत्या थी अनुप्रेरणा प्रतिविम्बित होनी चाहिए । सस्कृति सम्पूर्ण जीवन के गुणात्मर उत्पपपी प्रप्रिया है। पिसी भी जाति यी मूल्य प्टि, उमयो आस्थाएं और विश्याम उमपी प्रप्रिया और म्वरूप का निर्धारण करते है। इन आस्थाओ और विश्वासो वा एप परम या माध्य रूप होता है और दूसरा मापेभ और साधना मन स्प। आवश्यय यह है कि इन दोना स्पाम आतसि जोर जहाँ तर मम्भव है वाह्य सगति भी हो और साध्य रूप माधनात्मर प म भी वरावर प्रतिविम्बित हाता रहे । इसलिए मैं सस्कृति और सम्यता म प्रमियागत या आत्यतिर भेद नही करता बलि स्वय का उन विचारखा से सहमत पाता है जो सभ्यता को सस्कृति का साधनात्मक रूप मानते है । हमारी सामाजिक व्यवस्था और आचरण यदि उन चरम मूल्या और विश्वासो को प्रतिविम्वित नहीं करते जो हमारी संस्कृति की ये द्रीय प्रेरणा हैं तो यही मानना होगा कि सस्कृति एव समग्र स्वरूप ग्रहण ही कर सकी है कि वह एक द्विभाजित सस्कृति है जिसरा अथ होता है कि हमारा मन द्विभाजित मन है, अत भग्ण मन है। इस द्विभाजन का ही मैं मस्कृति का अतविराध कहता हूँ। भारतीय वेदात परम्परा में सत्य को तीन कोटिया बतायी गयी हैं- पारमार्थिव सत्य, व्यावहारिक सत्य और प्रातिभासिक सत्य । रेकिन यदि हमारी दृष्टि प्रातिभासिर और यावहारिक प्रकार के सत्यो की पृष्ठभूमि म पारमार्थिक सत्य का नही देख पाती तो वह निश्चय ही अधूरी या द्विभाजित दृष्टि है। द्विभाजित दृष्टि द्विभाजित सस्कृति का ही विकास कर पाती है। सस्कृति मूत्य दृष्टि मूल्यनिष्टा होन के साथ साथ मूल्य को अर्जित करन की प्रक्रिया भी है । अत इस ऐतिहासिक प्रक्रिया म विभिन भौगोलिक मानवीय और जार्थिक कारणो से कई बार ऐसे अतविराध विकसित हा मक्ते हैं, लेकिन मस्कृति की जीवतता या सजनशीलता का एक लक्षण यह भी है कि वह निरतर इन अविरोधो की पहचान करती रहती है । मनुष्य एक चेतन सत्ता है अत उसम यह क्षमता है कि वह इन अविरोधोका समथकर उनके समाहार की दिशा म सचेष्ट हो सकता है। इसके बिना मस्कृति सड़ने लगती है और मर जाती है। सस्कृति जीवत हाती है जीवाश्म नहीं। यदि जाज हम अपनी बीमारी को समझने की कोशिश कर रह हैं तो यह हमारी स्वास्थ्य चेप्टा का हमारी जीवेपणा का एक प्रमाण है। 106 सस्कृति का व्याकरण किसी भी सस्कृति के वेद्रीय प्रेरक तत्त्व या मूलभाव को पहचान का एक स्रोत उमकी सृष्टि परिक्ापना है। आदिम स्तर से लेकर सभ्यतम स्तर तव विभिन्न समाजा मे जगत् को सृष्टि को लेकर अपनी अलग अलग परिवरपनाएँ विकसित हुई हैं आर उन समाजा की जीवन दृष्टि और जीवनयापन पी पद्धति पर इन परिकल्पनाओ का निर्धारक प्रभाव रहता है। सृष्टि किस उद्देश्य से रची गयी है ? इम प्रश्न का उत्तर ही यह तय करता है कि मनुष्य के जीवन का प्रयोजन क्या है और उसे अपना जीवन से जीना चाहिए। सृष्टि रचना का उद्देश्य ही निजी स्तर पर व्यक्ति और मामुदायिक स्तर पर रेसामाजिक जीवन का उद्देश्य बन जाता है क्योकि उसी उद्देश्य जोर प्रक्रिया के साथ अपने को जोड दे कर वह किसी दवी उद्देश्य अथवा बृहत्तर जोवन और उसकी प्रक्रिया से अपने वो जोड देता है। आधुनिक विचारधाराओ मे भी तो इतिहास की प्रत्रिया व दिशा को पहचान कर अपने को उसके साथ कर देना ही वैज्ञानिक जीवन पद्धति और प्रगतिशीलता माना गया है। इसी प्रकार परम्परागत समाजो मे सृष्टि की परिकल्पनाम निहित उद्देश्य के साथ अपने को निष्ठापूर्वक एव आचरणगत स्तर पर जोड दना ही जीवन के वास्तविक उद्देश्य की उपलब्धि की ओर उ मुग्व होना माना जाता था। जब हम यह जान लेत हैं कि यह मसार, यह जीवन क्सि प्रयोजन से अस्तित्व मे आया, तब हम यह भी जान लेते हैं कि क्या करने में हमारे अस्तित्व को मायक्ता है और तब यह आवश्यक हो जाता है कि न केवल हमारा व्यक्तिगत जीवन वल्लि सामाजिक आर्थिक मस्थाआ और प्रक्रियाओ को सगति भी इस मूल के द्रीय भाव या चरम मूल्य से हो । वही व्यवस्था वास्तविर अर्थों में मार्थक कही जा सकती है जो हमारे इस प्रकार निर्दिष्ट मूल उद्देश्य की सिद्धि के लिए उचित वातावरण एव सुविधाएं पलान करे आर विचार एव प्रक्रिया के हर स्तर पर उसमे सहायक हो । यही चरम मूत्य और सापक्ष मूल्य की सगति, सस्कृति और सभ्यता की एकाबिति और व्यावहारिक सत्य म पारमार्थिक सत्य का प्रतिविम्बन है। भारतीय समाज म व्यापक स्तर पर स्वीकृत निर्गुण ब्रह्मवादी और सगुण- ईश्वरवादी दोना ही प्रकार की सृष्टि को परिकल्पनाओ म यह स्पष्ट है कि सृष्टि एक परम चेतना का मजन है और यह सजन उसने अपने को जानने के भानद के प्रयाजन से दिया है। परम चेतना निवैयक्तिक स्प में ब्राह्मण अथवा ब्रह्म कही गयी है और वयक्तिर प म ईश्वर । ईश्वरवादी परिपत्पना में मृप्टि ईयर की लीला है जिसके माध्यम से वह अपने अस्ति व के अनुभव वा आनद लेता है। इस परिवल्पना को मान लेने पर मानवी जीवन का उद्देश्य यही हो जाता है rि वह जीवन को इसी लीलाभाव स ले क्यावि तभी संस्कृति के अतविरोध भारतीय सदम 107 वह ईश्वर के उद्देश्य म सहायक हो सकता है। सब कुछ ईश्वर द्वारा रचा गया है अत मव कुछ बाह्य रूप से भिन्न होन पर भी एक ही ईश्वरीय तत्त्व से अनुप्राणित है। अपने में निहित इस ईश्वरीय तत्त्व की अनुभूति ही जीवन का उद्देश्य है यही अपने को जानने का आनद है जिसपे लिए यह लीला रची गयी है। इसी तरह निर्गुण ब्रह्मवादी विचारधारा म सृष्टि वा अव्यक्त परम चेतना की अभियक्ति माना गया है। इसी परिकल्पना का पूण विकाम वेदात की उद्वतवादी चिता धारा मे हुना। इस मिद्धात के अनुसार परम सत्ता या यह रवभाव हे कि वह अपने को भिन्न भिन रूपाम अभि यक्त करती रहती है। अत मनुष्य और समूची सृष्टि इसी परम चेतना या ब्रह्म की अभिव्यक्ति है। इसलिए सभी आत्मालो और परमात्मा म तात्त्विक एाता है क्यापित आत्मा परमात्मा का ही अश है। इस कारण मृष्टि रचना या जो उद्देश्य परम सत्ता या चेतना का है वही व्यक्ति म निहित जात्मा का हो जाता है। ब्रह्म म्वय के वास्तविर दशन के लिए अपने को जगत् के रूप म भि यक्त करता है। आत्माभिव्यक्ति का उद्देश्य आत्मा वषण और जात्मानुभूति है । यह बह्म का सहज स्वभाव है। इसलिए इन सृष्टि परिकल्प गाजानाधार पर यह नात्मानुभूति ही भारतीय मरवृति का मूल प्रेरण भाव है आत्मा का अवेपण और उसके वोध का अनुभूति का आन द । आत्मा वम प्रवृत्ति के माध्यम से जीवन में प्रवृत्त होती है और अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान न हात पर अनान के अधिकार म भटकती रहती है। आत्मा का वास्तविय वाध अर्थात् जहत की अनुभूति हा माक्ष या मुक्ति की स्थिति है जिरो परम पुग्पाथ जर्थात् जीवा वा चरम मूल्य माना गया है। ऐसा लगता है कि चार पुरपार्यों म अथ और नाम व्यावहाराि मत्य है तथा मोक्ष पारमाथिर मत्य धम इन को जात प्रथित करन नाता मूम या प्रदिया है। उसी व पारण यह सम्भव हो पाता है कि पाथिप रा अस्वीकार न करते हुए उसे ही परम आध्यात्मिर उपलब्धि माधन के रूप में विकमित किया जा मरे । मौलिए रम गयारवाही आध्यात्मिर मुक्ति का म्यान माना है मागायत ममार । स्वय गराचाय या कथन है वि सम्पूण ब्रह्माण्डीय प्रक्रिया का लय आध्यात्मिा अनुभव- अरगति-ही है जगन मर्वाप्रवृत्ति अवगतिनिष्ठा अगत्ययमानय । "गोनिए वशेपित मूत्रा में घम उमा गरहा गया है जिसस अभ्युदय और नियम् दाना की प्राप्ति होती है यना अभ्युटपिथेयमिति म धम । गग प्रसार भारतीय गरवृति म मानवजीवन पा चरम मू य आस्म में याम्नयिर स्वरूप या बोध-आत्मान वितिवीर पिया गया और देगा ये 108 मातिया म्पारण इगिद सस्कृति के स्वरूप, सगठन और प्रक्रिया का विकास हुआ। आत्म की प्राप्ति को चरम मूल्य के रूप में स्वीकार किया गया और सारी समाज व्यवस्था को इस तरह विकसित करने की कोशिश की गयी कि वह इस चरम मूल्य की सिद्धि मे हर स्तर पर सहायक हो सके। इसीलिए भारतीय परम्परा मे व्यवस्था को भी धम कहा गया। जिस प्रकार ऋत सम्पूर्ण सृष्टि का आधार माना गया इसी प्रकार धम सम्पूण समाज रचना का। प्राचीन साहित्य म मूल्य और सस्कृति की चर्चा नहीं है, वहां सदेव धम की बात की गयी है-यद्यपि उम का तात्पय सदा वही है बल्कि उससे भी कुछ वृहत्तर है जो हम आज सस्कृति या मूल्य का मानते है। धम दृष्टि या धम निष्ठा का वही अथ और महत्त्व है जो आज की भापा म मूल्य दृष्टि या मूल्य निष्ठा का है-धम का अथ किसी पप या मम्प्रदाय से नहीं बल्कि एक जीवन-दरान और जीवन प्रक्रिया से है। आप सोच रहे हो सकते है कि यहा तर के विश्लेपण मे तो किसी तरह के सास्कृतिय अतविरोध की बात ही नहीं है, बल्पि इस विवेचन के द्वारा तो एव बुनियादी ऐक्य पर ही अधिक बल दिया गया है। अधिक से अधिष' आपत्ति किसी को हो सकती है तो यही कि वह आत्म के बोध को-और स्मरण रहे कि स्वतत्रता उसी का सामाजिक प्रतिविम्व है-एक चरम मूल्य में रूप म मानने को तैयार न हो । पिसी को भी ऐसा सोचने और उसके अनुरूप आचरण करने का अधिकार है लेकिन इससे यह तथ्य नही झुठलाया जा मवता कि जिस हम भारतीय सस्कृति कहत है उसका मूल प्रेरय भाव यही रहा। यह भाव आज भी प्रासगिव है या नहीं, यह एक अलग चर्चा का विपय हो सकता है। अभी तो हमारे लिये यह देखना जरूरी है कि जिस मूत्य को भारतीय सस्कृति या धम की केन्द्रीय प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया गया, उसके अनुरूप सस्कृति 'समग्र स्वरूप का, उसके विभिन्न उपादानो का, उसके साधनात्मक स्वरुप का विकास हुआ या नही अर्थात् हमे मह देगना होगा कि किम हद तर भारतीय समाज व्यवस्था म वयक्तिा और सामाजिक जीवन इसी मून प्रेरणा के अनुरूप विकसित हो मका अथवा उसमे और मूल प्रेरणा म, साधनात्मक मूत्य और चरम मूल्य मे, व्यावहारिक सत्य और पारमार्थिक मत्य में कोई विपययो मुम द्विभाजन तो नही हो गया। मेरी समस्या यही से शुरू होनी है। 'सत्य सत्य नहीं है, यदि वह अपने ममस्त विधान म विशुद्ध आत्मचेतना वे सक्तो वी अभिव्यक्ति न करे।' भारतीय सस्कृति की इस दे द्रीय प्रेरणा-आत्मान्वेषण, आत्मानुभूति और आत्ममजन से पूण सहमत हात हुए भी मैं उन सामाजिक विश्वामा और व्यवस्थाओ से वह ईश्वर के उद्देश्य मे सहायक हो सकता है। मन कुछ ईश्वर द्वाग रचा गया है अत सब कुछ वाह्य रुप से भिन होने पर भी एक ही ईश्वरीय तत्व मे अनुप्राणित है। अपो मे निहित २म ईश्वरीय तत्त्व की अनुभूति ही जीवन या उद्देश्य है यही सपने को जानने का आनद है जिसके लिए यह नीता रचो गयी है। इसी तरह निगुण ब्रह्मवादी विचारधारा में सृष्टि का अव्यक्त परम चेतना की अभिव्यक्ति माना गया है। इसी परिकल्पना का पूर्ण विकास वेदात की अद्वतवादी चिता धारा मे हुआ। इस मिद्धात के जनुमार परम सत्ता का यह स्वभाव है कि वह अपने को भिन्न भिन रूपो म अभियक्त करतो रहती है। अत मनुष्य और समूची सृष्टि इसी परम चेतना या ब्रह्म की अभिव्यक्ति है। इसलिए सभी आत्माओं और परमात्मा म तात्विक एक्ता है क्यापि आत्मा परमात्मा का ही अश है। इस कारण सृष्टि रचना या जो उद्देश्य परम मता या चेतना वा हे वही व्यक्ति म निहित आत्मा का हो जाता है । ब्रह्म स्वय के वास्तविा दशन के लिए अपने को जगत् के रूप म अभि यक्त करता है । आत्माभिव्यक्ति का उद्देश्य आत्मा वेपण जोर आत्मानुभूति है। यह ब्रह्म का सहज स्वभाव है। इसलिए इन सृष्टि परिकल्पनाओ के आधार पर यह जात्मानुभूति ही भारतीय सस्कृति का मूल प्रेरक भाव है आत्मा का अवेपण और उसक बोध या अनुभूति का आन द ! आत्मा कम प्रवृत्ति के माध्यम से जीवन मे प्रवृत्त होती है और अपने वास्तविर स्वरूप को पहनान न हो पर उनान के अधार मे भटाती रहती है । जात्मा का वास्तविक बाध अर्थात् अद्वत की अनुभूति ही मोक्ष या मुक्ति की स्थिति है जिसे चरम पुरपाथ अर्थात् जीवन वा चरम मूत्य माना गया है। ऐसा लगता है कि चार पुरपार्थों में अथ और काम व्यावहारिव' सत्य है तथा माश पारमाधिप मत्य, धम इन को अत धित परन वाला सून या प्रगिया है । उमी के कारण यह सम्भव हो पाता है नि पार्थिव का स्वीकार न करते हुए उसे ही परम आध्यात्मिर उपलब्धि साधन प म विरमित किया जा सके। इमीलिए म पगार काही आध्यात्मिर मुक्ति का स्थान माना है मो गायन ममार । स्वय गराचाय का कथन है निगम्पूण ब्रह्माण्टीय प्रक्रिया या नाय आध्यात्मिर अनुभव- अवगति-नी है जगत गर्वाप्रवृत्ति अवगति निष्ठा अवगत्यवमानव । गोनि वपि या मधम उमी का रहा गया जिमस युदय और निधेयग दाना यो प्राप्ति होती यतो अभ्युयनियमिद्धि मधम । "म प्रसार भारतीय मराति म मानवजीवन या चरम मूष आमप भारतविर म्बया बोध-आमान विधि स्वासार पिया गया और माये 10९ मरणिकाम्पारण शूद्र, वश्य और क्षत्रिय को मार डालना उपपातर माना है, और उसके लिए जो प्रायश्चित्त एव दण्ड की व्यवस्था बतायी गयी है, उससे स्पष्ट है कि शूद्र जीवन का महत्त्व विल्कुल ही नगण्य सा था। क्षत्रिय को मारने पर प्रायश्चित्त था छ वप का ग्रहाचय, 1000 गायो एव एक वल पा दान | वश्य को मारने पर तीन वप का ब्रह्मचय, 100 गाया एव एप बल या दान वितु शूद्र को मारन पर प्रायश्चित्त था वेवल एप वप या ब्रह्मचय एव 10 गाया और एक बल का दान । यही वात गौतम (22/14-36)मनु(11/126 30) एप यानवल्क्य (3/366 67) मे भी पायी गयी है। आपस्तम्य (1/9/25-14 एव 1/9/26/1) ने तो यहां तक कहा है कि गूद्र को मार डालने पर इतना ही पातक लगता है कि जितना कि एव कोआ, गिरगिट, मोर, चमवाय, मराल, मेढक', नेवला, कुत्ता आदि को मार डालने से होता है। (मनु 11/131) स्तर के अनुसार प्रत्येप रम मे इसी प्रकार वा भेद विया गया है। यह आश्चयजनक लगता है वि शकराचाय एव रामानुजाचाय जसे महान् अद्वतवादी दाशनिको के काल मे वण व्यवस्था एव कठारतम जाति व्यवस्था के रूप में विकसित हो गयी थी। अरव यात्रीअलवरूनी ने तत्कालीन भारतीय समाज की कठोरता और जडता का आसें खोल देने वाला वणन किया है। अधिक दु खपूण यह था कि इन महान् अद्वतवादियो ने भी 'जम' और 'रक्त' पर आधारित वण व्यवस्था को न केवल किसी प्रकार की चुनौती नही दी वल्कि उसे अपना पूरा समयन दिया। ऐसा क्यो है ? सामाजिक स्तर पर इस तरह के विभाजन के द्वारा हम किस तरह वे अद्वत की पुष्टि करते हैं? यदि अद्वत हमारा लक्ष्य है तो इस तरह के भेद पर आत्यतिक ज़ोर क्या है ? यह स्मरणीय है कि यह भेद केवल सामाजिक कम का नहीं बल्कि जात्या तक भेद है क्याकि वणघम उच्चावचक्रम मे ब्राह्मण को सर्वोत्तम और शूद्र को निम्नतम बताया गया है-बल्कि गूद्र का तो एकमात्र कत्तव्य ही यह है कि वह अय तीन वर्गों की सेवा करे। कुछ विद्वानो के अनुसार वण व्यवस्था बाह्य स्तर पर तो समानता या अद्वत की भावना से अलग दीस सक्ती है लेकिन वस्तुत उसकी एव आतरिक सगति है क्योकि वह कमफन और पुनजम के सिद्धातो पर आधारित है। आत्मा नित्य है जो देहा तर के द्वारा पुनजम लेती रहती है और उसके वतमान ज म का निर्धारण उसके पूर्वजम के अनुसार होता है । यह सिद्धात निश्चय ही आध्यात्मिक चितन के क्षेत्र मे मानवीय स्वात य के सिद्धात को गौरव देता है क्योकि यह मनुप्य को कम की स्वतत्रता प्रदान करता और उसे मस्कृति के अतविरोध भारतीय सरम 111 महमत नहीं हो पाता हूँ जिना विकास परिनिदिष्ट उद्देश्य पो मिद्धि के प्रयोजन से किया गया। मुझे भारतीय सम्पति के साध्य स्प और साधनात्मक स्प वीच तय गहा अतविरोध दीयता है जमे दानोएर मे से नही निमृत होते या मिलते बल्पि दो अलग से द्रा से समातर रेसाआ की तरह चलते हैं। यह बहुत विचित्र लगता है कि जिस मति या धम ने पारमाथिर सत्य या चरम मूल्य ये १५ म अहत यी शुभूति को क्यारिवही विशुद्ध आत्मा को वास्तविक अनुभूति है-प्रतिष्ठा दी, उमी ने व्यावहारिम सत्य या साधनात्मक मूल्य के रूप में वप व्यवस्था जसो स्तरभेदवादी व्यवस्था को जन्म दिया। व्यावहारिस सत्य के रूप में घम का एक रूप न केवल वणधम के रूप में रवीवार किया गया बल्यि उमे सनातन व्यवस्था माना गया क्योकि वह व्यावहारिक स्तर पर पारमाथि सत्य की अभिव्यक्ति की तरह माय था। वण का आधार वह तात्त्विक एम नहीं है जो अद्वत का आधार है। वण को सनाता और अनिवाय मानना अनिवायत एक दंत और उच्चाववरम को मान्यता देना है। यदि पहत ममाज का चरम मूल्य है तो मामाजिक व्यवस्था म भी उस का प्रतिविम्वित हाना अनिवाय है। लेकिन वणधम का जोरप समाज मे विकसित हुआ वह इस मूल दृष्टि का सामाजिर स्तर पर प्रत्याग्या करता है। कुछ लोग वण की मनावनानिक समाजवज्ञानिक और आध्यात्मिप व्याग्याएं करते हैं । मैं उन सब मोहक व्यारया से परिचित है लेकिन यह एक ऐतिहासिक तथ्य है और आज के समाज में भी स्वत प्रमाणित है कि वण का निर्धारण अतत विही गुणो या कम के आधार पर नहीं बल्कि जम आधार पर आ टिका । डा राधाकृष्णन् जसे वण व्यवस्था के व्यारयाता भी यह स्वीकार करते हैं कि ब्राह्मण ग्रथो काल से ही वण के निर्धारणा के लिए जम का ही ग्राम्यता माना जाने लगा था। बौद्ध और जनधम द्वारा वण "यवस्था के विरोध का परिणाम यह हुआ कि यह प्रणाली और सा हो गई। मम्मृति मे जहा विनिन वों के वर्मा का रूढि की तरह निश्चित कर दिया गया वही ब्राह्मणा की तुलना में अय वों के प्रति हेयता की भावना व्यक्त की गयी और दो के लिए तो स्पष्ट ही तिरस्कारपूण शब्दावली का प्रयोग किया गया। एक ही अपराध के लिए गाह्मणो का दण्ड मृदु और अन्य वर्गों का प्रमश पठारतर रखा गया। स्वय को अहतवादी बढे वाला और जीवन मात्र के प्रति करणा और प्रेम का भाव पुष्ट करने वाली हिन्दू समाज व्यवस्था म यद वण को उपेक्षा और उनमें जावन को मस्ता समयना बहुत अमानवाय लगता है। यानयरक्य (3/236) एव मनु (11/66) म ब्राह्मण को हत्या को महापातर कहा है जब विस्वी, 110 मम्वृति का व्यारण शूद्र, वश्य और क्षत्रिय को मार डालना उपपात माना है, और उसके लिए जो प्रायश्चित्त एव दण्ड की व्यवस्था बतायी गयी है, उमसे स्पष्ट है कि सूद्र जीवन मा महत्त्व वित्तुल ही नगण्य सा था। क्षत्रिय का मारने पर प्रायश्चित्त था छ वप का ब्रह्मचय, 1000 गाया एव एक बल या दान। वश्य को मारने पर तीन वप का ब्रह्मचय, 100 गाया एव एक पैल या दान वितु द्र को मारने पर प्रायश्चित्त था केवल एक यप या ब्रह्मचय एव 10 गाया और एक बल का दान । यही बात गौतम(22/14 36)मनु (11/126-30) एव याज्ञवल्क्य (3/366 67) म भी पायी गयी है । आपस्तम्ब (1/9/25-14 एवं 1/9/26/1) ने तो यहाँ तर कहा है कि शूद्र मो मार डालने पर इतना ही पातर लगता है कि जितना कि एक मोआ, गिरगिट, मोर, चत्रवाण', मराल, मेढक, नेवला, कुत्ता आदि को मार डालन से होता है। (मा 11/131) स्तर पे अनुसार प्रत्येर कम में इसी प्रकार का भेद किया गया है। यह आश्चयजनक लगता है कि शराचाय एव रामानुजाचाय जसे महान् बदतवादी दाशनियो के काल मे वण व्यवस्था एक कठोरतम जाति व्यवस्था के रूप में विकसित हो गयी थी। अरव यात्री अलवरूनी ने तत्वालीन भारतीय समाज की कठोरता और जडता का आंखें खोल देने वाला वणन किया है। अधिक दु ग्वपूण यह था कि इन महान् अद्वतवादियो ने भी 'जाम' और 'रक्त' पर आधारित वण व्यवस्था का न केवल किसी प्रकार को चुनौती नहीं दी बल्कि उसे अपना पूरा समयन दिया ऐसा क्यो है ? सामाजिक स्तर पर इस तरह के विभाजन के द्वारा हम जिस तरह के अद्वत की पुष्टि करते हैं? यदि अद्वत हमारा लक्ष्य है तो इस तरह के भेद पर आया तक जोर क्यो है। यह स्मरणीय है कि यह भेद केवल सामाजिक यम का नहीं बल्कि आत्यतिर भेद है क्यादि वणधम पे उच्चावचनम मे ब्राह्मण को सर्वोत्तम और शूद्र को निम्नतम बताया गया है-वलि शूद्र का तो एषमान पत्तव्य ही यह है कि वह अय तीन वर्गों की सेवा करे । कुछ विद्वाना के अनुसार व व्यवस्था वाह्य स्तर पर तो समानता का अद्वत दी भावना से अलग दीख सकती है लेकिन वस्तुत उसकी एक आतरिक सगति है क्योकि वह कमपल और पुनज म ये सिद्धाता पर आधारित है। आस्मा नित्य है जो देहातर के द्वारा पुनज म रेती रहती है और उसके वतमान जाम का निर्धारण उसके पूर्वज म के अनुसार होता है। यह सिसात निश्चय ही आध्यात्मिक चितन के क्षेत्र में मानवीय स्वात य के सिद्धा ते को गौरव देता है क्योंकि यह मनुष्य को कम की स्वतत्रता प्रदान करता और उसे संस्कृति के अविरोध भारतीय सदम 111

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यह भी अजीब लगता है कि जहां एक ओर वास्तविक 'आत्म' को पहचान पर सर्वाधिक बल दिया गया, वही दूसरी आर 'आत्मा' को वण से इस तरह घेरा गया कि उसे तोडना एक दुप्पर वाय हो गया । दनन्दिन म मे वण का आग्रह इतना प्रवल किया गया कि व्यक्ति की पहचान का एक प्रमुख रूप वण बन गया। 'स्व' को वण स किस तरह एक कर दिया गया इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि 'स्वधम' भी वणधम ही हो गया। इसी के साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि यदि किसी भी कम-व्याधरम या ऐसे ही शूद्रकम-का पालन करत हुए मोक्ष लाभ हो सकता है तो यह समझ में नहीं आता कि शारीरिक श्रम पर आधारित क्म को निम्न स्तर का क्यो समझा गया है । शारीरिक श्रम या सेवा शूद्र वण का काय है और इसीलिए उसे निम्नतम स्थान दिया गया है। यदि शूद्र कम आध्यात्मिक उपलब्धि माग म वाधव नहीं है और वह भी आत्मज्ञान का एप साधन हो सकता है ता उसे हेय समझने और उसके प्रति तिरस्कार की भावना रसने को सगत नहीं माना जा सकता। वणधम के नाम पर यह सारी व्यवस्था उसी धम ये अतगत की गयी है जो अद्वत मे आस्था प्रकट करता है। यह तो हो सकता है कि वयक्तिक दुवलताओ की वजह से हम आदर्शों का पालन ठीक तरह से न कर पायें लेकिन हमार दानिक विश्वासो और घोपित सामाजिक मान्यताओ के धीच भी यदि कोई सगति न मिले तो उसे दृष्टि का अतविरोध ही रहना होगा। ऐमा क्या हुआ, इसके कारणो की सोज तो आवश्यक है ही पर यह भी आवश्यक है कि इस असगति को दूर करने की ओर सचेष्ट हुआ जाय क्योकि चरम मूल्य और उसकी सिद्धि के लिए विकसित प्रक्रिया मे जय तर सगति नही होगी तब तक समाज का विकास भी द्विभाजित ही रहेगा । चरम मूल्य और साधनात्मर मूल्य के बीच निरतर बढती हुई यह दरार पूरे समाज मे, समाज के प्रत्येक सदस्य के व्यक्तित्व में एक द्विभाजन विकसित कर देगी। ऐसा द्विभाजित व्यक्तित्व-व्यक्ति का हो या ममाज का-विसी अद्वत की साधना नहीं कर सकता-बल्कि व्यक्तित्व का यह द्विभाजन सिफ वण ये स्तर पर ही नहीं सभी स्तरों पर अभिव्यक्ति पाने लगता है। यह वणधर्म का ही प्रभाव मानना चाहिए कि भारतीय समाज म यम या आचरण की स्वत पता जसो मानवीय धारणा या व्यावहारिय स्तर पर प्रयोग नहीं किया जा सका। स्वत अता का आशय वेचल विचार या विश्यारा पी ही स्वत सता रहा। यह भी विचित्र लगता है कि विचारा और विश्वासा ये दगा की कोशिश नहीं की गयी और विरोधी विचार रखने वाला मे प्रति भी पूर्ण सम्मान प्रति किया गया। लेकिन कम या आचरण म पिसी रारा पी स्थत पता को स्वीकार नहीं किया गया। ईश्वर में आस्था राणा याले गा - सस्कृति ये अतविरोध भारतीय स धर्म वदविचार यायचारिक विरोध परा वाले लोग समाज में प्रतिष्ठित सदस्य का रह सक्त थे लेपिन विवाह, सान पान और मस्सारा तथा सामाजिक आचार-व्यवहार म उह भी निदिष्ट विधि का ही पालन करना पडता था। विश्वास पी स्वतन्त्रता पो पर आचार की स्वतनता मामाजिक बहिष्कार या यारण बन सकती थी-बलि यदि असावधानीवा या बलात् आचार च्युति हो गई हो तो वह भी क्षम्य नही पी। महातिक दृष्टि स आज भी वही सही है यद्यपि अय मामाजिक-माथिर जटिलताआ मे कारण इस पार कुछ शिथिल समाधि हान लगी है। अन्यथा आचरण की स्वत ग्रता का तात्पय वणच्युति माना जापर ऐसे व्यक्तियों में सामाजिर बहियार को-जो एक बडा दण्ड था-ही एकमात्र उपाय माना गया । इस बात की ओर पिसी का ध्यान नहीं गया कि इस प्रकार कम या आचरण की उसी स्वत प्रतापोवाधित किया गया है जिसे सदातिय स्वीकृति दी गयी थी। साथ ही इस बात की भी अनदेखी की गयी विविश्वास और आचरण में भेद व्यक्तित्व का सण्डित करता है और खण्डित व्यक्तित्व उस मूल्य को प्राप्त करन के माग मे बाधा है जिसे सस्कृति मे जीवन का चरम उद्देश्य माना गया है । हमे देखना चाहिए कि विश्वास और आचरण के इस द्वध ने भारतीय मानस को किस हद तक द्विभाजित किया है और किस तर बहुत-सी सामाजिक आर्थिक राजनतिक असगतियां इसी द्विभाजन का परिणाम कही जा सरती हैं। वणधम को इस अनमनीयता का एक सर यह भी हुआ कि परम्परागत भारतीय समाजव्यवस्था और इस्लाम के बीच एक अलगाव बना रहा। ऐसा लगता है कि यदि भारतीय समाज ने वण की कटोरता न विकसित की होती तो अद्वत वेदात और सूफी दशन वा समानताएं दोना समाजो के बीच एक साथ और व्यापक स्तर पर प्रभावी समवय स्थापित कर सकती थी और तब कुछ आवश्यक सामाजिक भेद अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं रह जात । किसी ऐसी जाति की कल्पना मुश्किल ह कि सम्पूण जगत् मे तात्विक ऐक्य तथा वेवल अभिव्यक्तिगत भिनता मानते हुए भी दुसरे मनुष्य पौर समाजा को इतना अलग माना जाये कि उनकी छाया अथवा छ्ने मात्रा से खान पान की वस्तुएँ ही नहीं मनुष्य तक भी अपवित्र हो जायें। लेकिन यह दुघटना भारतीय समाज का एक तथ्य रही और काफी हद तक आज भी बनी हुई है । अद्वैत म आस्था रखने वाले समाज ने मध्यकाल तक आते जाते न पेवल अन्य धर्मावलम्बिया के माय खान पान और सामाजिक सम्ब धोका निषेध किया बरिक स्वय अपने में भी ऐसी दरार पदा कर दी जो आज तर समाज की प्रमुग विसगति बनी हुई है ! हिदुत्व और इस्लाम का सम्पक भारत मे एक एतिहासिक अनिवापता हो गया लेकिन इस सम्पक के जितने व्यापक प्रभाव 114 सस्कृति का व्याकरण हो सकते थे वे कम हुए। इस्लाम की उपासना पद्धति से बल्कि किसी भी उपासना पद्धति से भारतीय परम्परा का काई बुनियादी विरोध नहीं था लेकिन अन्य कारणों के साथ साथ जिन मे इस्तामी समाज को अपनी भूमिका भी महत्वपूर्ण थी-वण के आग्रह ने दाना ममाजो को एक करने मे बई वाधाएँ उपस्थित की। ऐसा नहीं है कि मूल प्रवृत्ति के अनुकूल प्रयत्न नहीं हुए। निगुणपाय और वणव सताने वण और सम्प्रदाय के भेद को महत्त्वपूर्ण न मानते हुए मानवी जीवन की तात्त्विक एकता पर बल दिया। लेकिन अल्प समय ही मे वैष्णव सम्प्रदाय ने व्यावहारिक स्तर वणभेद को स्वीकार कर लिया और उसके अनुयायी अपने सामाजिक जीवन में वण और जाति के सभी सामाजिक भेदो को स्वीकार करते रहे। क्वीर आर दादू जसे सन्ता का अमर समाज के निम्न वण पर ही अधिक रहा। इस पृष्ठभूमि में यह आश्चयजनक नही लगता मवण भारतीय समाज ने क्वीर की बजाय तुलसीदाम को क्यो अपने अधिक निक्ट महसूस किया। प्रश्न उठता है कि यह अनमनीय वणधम और इम के साथ जुडा सामाजिक स्तरभेद तथा निम्न वण और उसके लिए निहित क्म के प्रति तिरस्कार और उसे मूल्यहीन समझने की भावना, अय धर्मावलम्बिया को अपने से हीन मानना तथा सैद्धातिक स्तर पर कम की पूर्ण स्वत त्रता स्वीकार करते हुए सभी प्रकार के सामाजिक धार्मिक क्मों को करणीय कतव्यों की तरह नहीं बल्कि सामाजिक व धन को तरह प्रत्येक व्यक्ति पर आरोपित कर देना क्या मूल दृष्टि या चरम मूय वा विपयय नहीं है । कुछ विद्वाना न वषधम की समाज-वज्ञानिक व्याख्या करते हुए उसे मामाजिक श्रम विभाजन की प्रणाली बताया है। लेकिन यदि ऐसा ही होता ता इस श्रम विभाजन को जाम और रक्त आधारित करने की आवश्यकता नही होती वल्लि इस का आधार व्यक्ति की निजी प्रवृत्तियां होती। तव यह श्रम विभाजन सनातन और आत्यन्तिक नहीं होता। धमव्याध ब्राह्मण को कहता है जिस फर्म के लिए सजनक्र्ता । मुये जम दिया है मैं उमम रत हूँ। मैंने अपना जीवन अपने उच्चवर्णों के लोगा के लिए अपित कर दिया है मेरा वतमान पम पूर्वज म ये पापों और कर्मों या परिणाम है महान् गौरव उसे ही मिलता है जो अपने वणघम म रत रहता है।' यह विश्लेषण सुन पर ब्राह्मण यह मोचता है कि अपनी वणधमपरायणता के कारण यह धमव्याध शूद्र नहीं बरिर ब्राह्मण है। लेकिन यह सोचना बिल्कुल भावनात्मक है और देगा बाधार वणधम रा समयन है। ऐसा सोचने से धमध्याय ग्राह्मण नहीं हो सस्तृति वे अविरोध भारतीय सदम जाता वरिक शूद्र के लिए निहित उसी कम का पालन करता रहता है जिसको किमी भी स्थिति म करने पर ब्राह्मण पर सख्त निपध लगाये गए हैं। यदि वण या आधार एक सुनियोजित सामाजिक व्यवस्था के लिए श्रम विभाजन ही होता ता एक वण योनिम्न मानते हुए उस के कम के प्रति तिरस्कार और निदा की भावना नहीं होती बल्कि श्रम की प्रतिष्ठा की जाती और न शूद्र वण को वदिक स्वाध्याय और कर्मों से ही वचित किया जाता जवकि कही- कही तो व्यवस्था की गयी है कि यदि भूल से भी वेदवाक्य शूद्र के भानो म पड जाय तो उसका दण्ड है उसके काना म पिघला हुआ शीशा भरवा देना। विद्वानो का यही वग कभी कभी वण विभाजन का गुणो के आधार पर किये गये अधिकारी भेद का परिणाम मानता है। लेकिन यह मा यता भी तक की क्सौटी पर खरी नहीं उतरती। यदि ऐसा होता तो प्रतिलोम विवाहो को अनुचित नहीं माना गया होता और न वण सक्रता का विचार ही विकसित होता। वणसकरता का विचार ही जाम के आधार पर वणविभाजन के सिद्धात से उपजा है। यदि अधिकारी भेद किसी तरह की आध्यात्मिक उपलब्धि के लिए है तो इसे आत्यतिम नही माना जा सकता। अलग साधनो से ही सही निम्न वण का व्यक्ति भी चरम मूल्य तक पहुंच सकता है और उच्च वण होने का तात्पय मुक्ति के अधिक नजदीप हाना नही है। इसी तरह वदिक कमकाण्ड और तपस्या के विना भी मोक्षलाभ हो सकता है। ऐसी स्थिति में वर्णाश्रित अधिकारी भेद का कोई आत्या तक या सनातन महत्त्व नहीं रह जाता। इसलिए यह एक ऐतिहासिक विसगति ही लगती है कि आध्यात्मिक स्तर पर अद्वत और सामाजिक स्तर पर 'वसुधवकुटुम्बकम्' के प्रति आस्था घापित करने वाली सस्कृति व्यावहारिक सत्य या सामाजिक आचार विश्वास के स्तर पर इतने द्वत, भेद और सीणता रखे। उन प्रवृत्तिया और परिस्थितिया का सागापाग अवषण जरूरी है जिन की वजह से इस तरह के अतविराध विकसित हुए। इसम कोई सदेह नही-कम से कम मुये तो नही-कि चरम मूल्य के रूप में भारतीय सस्कृति न जिस अद्वत के विचार को, वास्तविक आत्म की अनुभूति को वेद्रम रखा उसे आधार बना कर एक एसी समाज व्यवस्था विकसित थी जा सकती थी, की जा सकती है जो व्यावहारिक स्तर पर किसी भी तरह के गोषण, उत्पीडन और सामाजिक अयाय का प्रतिकार करती और पारस्परिक तात्विर आपण का अनुभव करने वाले समतामूलय समाज की स्थापना म सहयोगी होती। पार्थिव और दिय के बुनियादी द्वन्द्व वासमाहार करन म जो 116 सस्कृति का व्याकरण अढतवादी दृष्टि सफल हुई हा उसम सामाजिक दवा के समाहार का रास्ता भी तलाशा जा सकता है ! अद्वत की इस अनुभूति के विना प्रेम, करणा, अहिंसा, समानता और याय अधिक से अधिक केवर नैतिक धारणाएं रह जाते हैं, मनुष्य की सहज प्रवृत्तिया नही बनते । यदि इस मूल दृष्टि को हर सम्भव सीमा तक व्यावहारिक स्तर पर विकसित नहीं किया जाता तो भारतीय समाज काही नहीं बल्कि वश्विक मानव समाज का विभाजन तीव्र होता जायेगा जिसका आवश्यक परिणाम होगा विघटन, हिंसा और विनाश अर्थात् सस्कृति पर विकृति की, मानवीयता पर पाशविकता की विजय । मैं डॉ सवपरली राधाकृष्णन् के इन श दा के साथ अपनी बात पूरी करना चाहता हूँ 'सच्ची प्रगति वृक्ष के विकास की भांति एक सजीव प्रक्रिया है। हमे निष्प्राण लकडी को काट देना होगा और निस्तेज अतीत को भी परे फेंक देना होगा। हम अतीत म इतनी वार बदलते रहे हैं कि केवल परिवतन भर से धम की आत्मा अव्यवस्थित नहीं हो जायगी। हमारी कुछ सस्थाएं सामाजिक न्याय और आर्थिक कल्याण के माग म दुजय बाधाएँ बन गयी हैं और हमे इन वाधाओ यो हटाने के लिए प्रयास करने होग, अधविश्वास को बनाये रसने वाली पाक्तिया के विरुद्ध युद्ध करना होगा और लागो के मनो को नया रूप देना होगा । इन दिना जवकि जीवन की गति तीव्रतर हो रही है, ज्ञान वढ रहा है और यात्राएं विस्तार पा रही हैं, हमे परिवतन करने ही होंगे, अयथा इस वा तात्पय यह हागा कि हम सजन की भावना खा चुके हैं और निष्प्राण अत तर जा पहुंचे है।' - मुस्कृति के अन्तविरोष भारतीय मदम 117 आधुनिकता . सामाजिक सन्दर्भ आधुनिकता का सवाल हमारे समय के उलझे हुए सवालो मे एक है। माधु निक्ता के विही निश्चित लक्षणा का निर्धारण और उनके आधार उसके विसी निश्चित स्वरूप की परिभाषा और पहचान का काम यदि मुश्किल और सायद इमीलिए उतना ही विचारोतेजक है तो उसका एक कारण यह भी है कि उसमे कोई ऐसा पूर्वनिर्धारित तात्विक लक्षण नहीं है जिसमे कोई परिवधन परिवतन या विकास सम्भव न हो। वह प्टि है या मूत्य, इस पर भी इमोलिये विवाद रहा है कि हम वस्तुत उमे क्सिी अवधारणा के रूप म नही एक सदभगत प्रक्रिया के रूप म ही पहचान पाते हैं। एक प्रक्रियागत अभिवृत्ति के रूप मे अर्थात् एक ऐसी प्रवृति जो निर तर प्रक्रिया में है अर्थात् गिरतर विकासशील है । आधुनिरता एक निर तर विक्सनशील पनिया है और इमोलिये हम उस परिभापित करने की कोशिश म देशलाल बद्ध रूप म प्राचीन से अलग करके देखते हैं और दृष्टि के रूप मे रूढिवादिता से। इसने ही से जाहिर है कि वह एक दृष्टि है-वह दृष्टि जो मूल्या की खोज में रत है अत मूल्यो को उममे काटकर नहीं देया जा सकता क्योकि उसकी सही पहचान भी ता उसी के कारण मम्भव है । इमरिये वहतर होगा यह कहना कि वह एक निरतर विक्सनशील दृष्टि प्ररिया है। लेकिन इतना भर वह देने से कुछ स्पष्ट नहीं होता-चाहे सुनने में यह कितना हो अच्छा लग । यदि वह निरतर विकसनशील दृष्टि प्रनिया है तो वह विकास किस दिशा की ओर उन्मुख है ? यह दृष्टि क्या है ? और वह प्रक्रिया पिस तरह की है ? इन सवालो का सवसम्मत जवाव तो मरे पास नहीं है लेकिन सवालो के परिप्रेक्ष्य का थोडा और खुलासा कर देने से पूरी बात को समझन म गायद कुछ मदद मिले। जाधुनिश्ता एर सास तरह की मानमिर अभिवृत्ति या दृष्टि के विकास की प्रक्रिया है अत उमे ऐतिहासिक परिस्थितिया स पाटकर देखना मुनामिय नहीं है। शायद इसोनिय ऐतिहासिक प्रवृति व स्प म उसे पुनर्जागरण या रनमा ये माय मोड पर देखा जाता है। लेकिन इमम भी हम अक्सर एक महत्वपूण यान की अनदेसी पर जात है-और वह यह शि रनसा वा विकासक्रम की दृष्टि से दो भागो म बांट कर देखा जाता है पहला है प्रारम्भिक पुनर्जागरण जिसे हम विचार की सुविधा के लिए एक ऐसा वचारिक पुनर्जागरण कह सक्त है जिसका केद्रीय भाव मानवीय गरिमा की स्थापना रहा । इसी के प्रभाव मे मनुष्य को केद्र म रसबर सारे ब्रह्माण्ड और ईश्वर तक के साथ तक नया रिश्ता कायम करने की प्रवृत्ति विकसित हुई । इतिहास की पुस्तको मे इसी कारण पुनर्जागरण की एक प्रमुख प्रवृत्ति के रूप में मानववाद को स्वीकार किया गया है। सृष्टि में सबसे अधिक महत्त्व मनुष्य को दिया गया, अत उसे समझने की कोशिश में भी आप्त वाक्यो की बजाय मनुष्य की स्वत चेतना और अनुभवशीलता को प्रमाण मानने की प्रवृत्ति का बलवती होना स्वाभाविक था। इसीलिये पुनर्जागरण का अगला चरण वैज्ञानिक जिज्ञासा के विकास के रूप में सामने आया। मनुष्य का विवेक तक और प्रमाणो के आधार पर ही किसी बात को स्वीकार कर सकता था, जत मवसम्मत समझे जाने वाले सत्या और धमशास्त्रा के आप्त वाक्यो को भी उपलब्ध तथ्यात्मक प्रेक्षण के आधार पर परखा जाने लगा और जब शुरू म ही बहुत से आप्त सत्य गलत साबित हुए तो मनुष्य और सृष्टि के रहस्य के अवेपण की प्रक्रिया और तेज हुई । प्राकृतिक विज्ञाना का विकास इसी प्रवृति का परिणाम था। वह युग क्तिनी अधश्रद्धा और रढिप्रियता का युग था इस बात का पता इसी से चल जाता है कि तत्कालीन सत्ताकेन्द्र चच-आज के सत्ताधारियो वी ही भांति-गैलीलियो और उनके समानधर्मा अन्य विचारदो को न केवल किसी प्रकार की वचारिक स्वत त्रता देने के लिए तयार नहीं हुआ बल्पि स्पष्टतया प्रमाणित हो जाने पर भी नवउजागर सत्योपोमानने के लिए राजी नहीं हो सका। जब पीसा की मीनार से गिराय गये दम पौड आर एप पौंड वजन वाले दोना पिंड धरती पर एक साथ आ पर गिरे तब भी पडित लागा ने यही माना कि उनकी आंखें धोखा सा रही होगी, क्यापि यह असम्भव था कि अरस्तू ने कुछ गलत लिख दिया हो । गलीलियो ने दूरबीन से यहस्पति के उपग्रहा को देखने के लिए प्रोफेसर लोगों को बुलाया ता उहाने से एक बेकार श्रम समझकर आने से इनकार पर दिया क्योकि अरस्तू ने इनके बारे में कुछ भी नहीं कह रखा था । सौरमहल का केद्र सूय है और पृथ्वी उसके चारा ओर चक्कर निकालती है, इस सिद्धात का समर्थन करने के लिए चच द्वारा गलीलियो को कारागार म डाल दिया गया क्यापि यह तथ्य धमपथा और धच को राय के प्रतिकूल था। गलीलिया का यह मधष आप्त वाक्या आर अविचारित सत्या के विरद्ध मान वीय विवेव वा सधप या, यह एव अनुदार सत्ता रास्थान ये पिलाफ मानवी आधुनिरता सामाजिर सन्दर्भ 119 स्वतत्रता का सघप था, अधविश्वास के विरुद्ध वैज्ञानिक जिज्ञासा का सघप था। कहा जा सकता है कि इस सधप मे आधुनिक दृष्टि के सारे वीज विद्यमान थे । यही कारण रहा कि आगामी इतिहास म सामाजिक, राजनीतिक स्तर पर व्यक्ति की स्वाधीनता, वरावरी और भाईचारे के सिद्धात विकसित हुए, साहित्य म रोमाटिसिज्म की प्रवृत्ति प्रबल हुई और ज्ञान के क्षेत्र में विज्ञानसम्मत चितन वा जार बढता गया। ऐतिहासिक परिस्थितिया-विशेष तौर पर जार्थिक, राजनतिक परिस्थितिया की वजह से वज्ञानिक शोध का कायक्षेत्र निर तर विस्तार पाता गया-बल्कि विनान को मानवीय अनुभूतियो से भी थेष्ठ स्थान दिया जाने लगा। नान का एक मान आधार या कसोटी विज्ञानसम्मत प्रेक्षण को माना जान लगा। यह भावना विकसित हुई कि यह ब्रह्माण्ड एक सुसचालित व्यवस्था है और और उसके नियमो की खाज के द्वारा ही मनुष्य को भी समझा जा सकता है क्योकि वह इसी ब्रह्माण्ड का एक जग है-वल्कि मनुप्य के कार्यों का औचित्य विज्ञानसम्मत होने में ही समझा जान लगा । इसका सीधा अथ था मनुष्य की स्वाधीनता या स्वतत्र सकल्प शक्ति को कार पर-जा प्रारम्भिक पुनजागरण का एक लक्षण थी-उसके आचरण का यात्रिक प्रक्रिया की तरह समझने की दृष्टि का विकास अथात् मानववादी आधार पर विकसित दृष्टि की उपेक्षा । आधुनिकता का तात्पय हो गया यज्ञानिक दीप्ट जिसका मतलब था विज्ञान की शोधो के निष्कर्षों के अनुकूल जीवनदृष्टि व मूल्यो का विकास । यह भुला दिया गया कि विज्ञान अपनी प्रनिया और निप्पो म नीति निरपेक्ष है अर्थात् मूल्या का जगत उसके क्षेत्र से बाहर है । इसके नतीजे क्या हुए 'यूटन की भौतिकी म बल की केद्रीय धारणा और डार्विन के विकासवाद म 'योग्यतम के अस्तित्व' के सिद्धात ने पूजीवाद उपनिवेशवाद, स्लिवाद पिछडे राष्ट्रो के शोपण और दमन तथा युद्धो के माध्यम से अपनी शक्ति के विस्तार को ऐसा मनावनानिक नतिक समथन दिया जो विज्ञानसम्मत समझा जाता था। यह कहना तो पूर्ण सत्य नहा हागा वि इन वनानिव शोधा के प्रभाव से ही ये प्रवृत्तियाँ विकसित हुइ-क्यावि तत्कालीन आर्थिव राजनतिक परिस्थितिया की भूमिका ही इन प्रवृत्तिया के विवास म सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही। लविन इतना तो स्पष्ट ही है कि वनानिक शोधा ने जिस टेक्नोलाजी वा विकास दिया उसने भी आर्थिक राजनतिक परिवतन म महत्त्वपूर्ण योगदान दिया- यहां तक कि लाक्तत्र जसी मानववादी धारणा और उसस प्रभावित च्यवस्था का विवाम-और उसरी विति भी-प्रौद्योगिकी और औद्योगीकरण 7 120 सस्कृति का व्यावरण के सहजीवी रहे। यदि लोक्त त्र का विरास एक मानवीय मूल्य के रूप मे हुआ होता तो पिछडे राष्ट्रा पर आधिपत्य और साम्राज्यवाद की जो अमानवीय होड विभिन्न पूजीवादी साम्राज्यवादी राष्ट्रो के बीच हुई वह न होती। यह आश्चयजनक है कि इन राष्ट्रो में इस अतविरोध की पीडा का अहसास नगण्य सा रहा । सवाल उठना चाहिये कि ऐमा क्यो हुआ? उपनिवेशवादी- सामाज्यवादी प्रवृत्तिया का युग एक ऐसे समाज में आशा और उत्साह या युग से हो गया जिसके नये विकास की नीव मानववाद के आधार पर रखी गयी थी? क्या जतविरोध की पीड़ा और उसका जपराध बोध उनम विरसित नही हुआ? बाद के यूरोपीय समाज मे भी यदि कोई पीडा उभर र व्यक्त होती है तो वह औद्योगीकरण और युद्धाम यूरोपीय जन के सहार की वजह से उत्पन निराशा और अवमाद की पीडा है। कही कही एक आध्यात्मिक पीडा का स्वर जरूर मुखरित है लेकिन वह गर यूरोपीय जातियो के शापण और दमन से उत्पन्न ग्लानि की पीडा नही है। बहुत से विचारतो और समाजशास्त्रियो को स बात का दुख है कि आधुनिकता का हथ महायुद्धो के नरमहार जाति हत्याओ और अणुबमो मे हुआ। और तब इस सरस उत्पन विक्षोभ, निराशा मनास, कुठा आदि की भावना को भी आधुनिकता माना जान लगा । आधुनिक सामाजिक मन का मतलब हो गया कुठित अनिश्चयी द्विधाग्रस्त, चिरमशयी और तनावग्रस्त मन । वह उत्लास और आनद स्वप्न भी नही रहे जो प्रारम्भिक रेनेसा युग मे मानवीय स्वाधीनता की अनुभूति के परिणाम थे। यह नही समझना होगा कि उपरिनिर्दिष्ट प्रवृत्तियाँ आधुनिक मन का परिचय नहीं देती-वे भी एक अनिवाय ऐतिहासिक परिस्थिति की उपज थी और आधुनिक मन उनकी उपेक्षा नहीं कर सकता था। क्या यह निरूपण सही है ? हमे देखना होगा कि ये सब आधुनिकता की प्रत्रिया के स्वाभाविक परिणाम थे या कि आधुनिकता की प्रक्रिया ही विकृत हो गयी ? क्या आधुनिकता और वनानिकता एक ही चीज है ? थोडा सा विश्लेपण करने पर ही स्पष्ट हो जायेगा कि आधुनिकता वा अथ वैनानिकता नहीं है। हमने शुरू में ही स्पष्ट किया था कि एक ऐतिहासिक प्रवृत्ति के रूप में आधुनिकता मानवीय विवेक की स्वत नता पर बल देती थी अथात् मनुष्य की विचारशीलता और अनुभूति पर। विज्ञान उसका एक स्रोत तो हो सकता था होना चाहिये भी पर एकमात्र स्रोत नहीं। विनान स्वय विवेक नहीं है बल्कि विवेव के बिना विनान का प्रयोग भी गलत उद्देश्यो के लिए किया जा सकता है किया गया है। मनुष्य के व्यवहार को भौतिकीय नियमो से न तो समया जा सकता है और न उसके आधार पर ? आधुनिक्ता सामाजिक सदम 121 उसका औचित्य ही सिद्ध किया जा सकता है । विज्ञान का प्रयोजन था सत्य की शोध लेकिन वह शक्ति प्राप्त करने का साधन बन गया। किसी जमाने म धम सत्य को जानने का एक साधन था लेकिन जिस तरह वह शक्ति का स्रोत वन गया, उसी तरह आधुनिक काल में विज्ञान का भी दुरुपयोग हुआ। आधुनिकता यदि कोई दृष्टि है तो उसे विज्ञान पर आश्रित नहीं किया जा सकता । विनान घटनाओ की, ब्रह्माड की प्रक्रिया का ही विश्लेपण कर सकता है लेकिन उसका उद्देश्य या प्रयोजन नहीं बता सक्ता। मानवीय जाचरण के बारे मे भी वह अधिक से अधिक यही बता सकता है कि उसकी प्रक्रिया क्या है या उसे किस तरह निर्देशित किया जा सकता है ? लेक्नि मानवीय जीवन के प्रयोजन पर उससे कोई प्रकाश नहीं पडता-बल्कि क्या उसे किसी सास तरह से निर्देशित किया जाय, इसका उत्तर भी विनान के क्षेत्र से बाहर की बात है । भौतिकीय नियम ब्रह्माण्ड की प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हैं उसके प्रयोजन पर नहीं । यदि वनानिकता का ही आधुनिकता मान लिया जाय तब तो यही मानना होगा कि मानवीय जीवन का भी कोई प्रयोजन नहीं है। वनानिकता को जाधुनिकता मानने का मतलब है मनुष्य को एक ऐसा प्राणी मानना जिसका किसी प्रकार के मूल्यो या नतिकता से कोई सम्बध नहीं है। दूसरे शब्दो मे, उसका अथ यही हुआ कि आधुनिकता को वज्ञानिकता के साथ एक कर देने का मतलब है मनुष्य को निरथक्ता के असीम गहरे गडढे म घरेल देना । यह बहुत आश्चयजनक लगता है कि इसी वज्ञानिकता के आग्रह के कारण ही मानवीय शोषण और दमन के खिलाफ उग्र संघर्ष का आह्वान करने वाली और मनुष्य को ही सब चीजो की क्सौटी मानने वाली समतामूलक विचारधाराएं भी स्वय मनुष्य को भौतिकी के नियमो की कसौटी पर परसने का प्रयत्न करती रही। इस दृष्टि से एक समतामूलक समाज की आवश्यक्ता इसलिये नही है कि मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोपण और दमन एक अनतिक वात है बल्कि इसलिये है कि इतिहास की विनानसम्मत दिशा ही वही है और तब इतिहास की इस प्रक्रिया म शोपण भी एक बालखड म उतना ही स्वाभाविक-बल्कि अनिवाय हो जाता है जितना किसी दूसरे कालखड म समानता। जो होता है वह स्वाभाविक है अत मानवीय शोपण और दमन को लेकर कोई आत्मग्लानि या अपराध-बोध एव थाधी भावुकता है। स्पष्ट है कि यह विनानाधित इप्टि किहो मानवीय या नतिक आयो को प्रश्रय नहीं देती और मानवीय आचरण और इतिहास का एक यायिक 122 मस्पति या व्यावरण प्रक्रिया की तरह देखती है-वल्कि यत्र की तरह उसे नीति निरपेक्ष भी मानती है । नैतिकता का अधिक से अधिक तात्पय यदि कुछ हो सकता है ता यही कि मनुष्य अपने को उस प्रक्रिया के साथ जोड दे। लेकिन अपने को इस तरह इतिहास या किसी भी वैज्ञानिक प्रनिया के साथ जोड देने का क्या अर्थ है जब मि इतिहास या ब्रह्माण्ड का ही कोई आत्यतिक प्रयोजन नहीं है ? यदि कोई प्रयोजन नही है तो इतिहास या ब्रह्माण्ड की प्रक्रिया क्या व्यथ है ? यह दुनिया तर क्या एक अवहीन सघप है ? और यह समझ जाने पर भी इस संघप मे रहना क्या एक प्रकार की निरथ यणा ही नही है ? पीडा, कुठा, स नाम, तनाव आत्महत्या नादि प्रवृत्तिया क्या इसी व्यथता बोध के विभिन प्रकार नही है लेक्नि जसा मैंने कहा कि मुझे तगता है कि यह सव आधुनिकता को वज्ञानिक्ता मान लेने और उससे अत्यधिक आशा कर लेने का परिणाम है। विनान मनुष्य का सहायक है, उसका स्वामी नही । यदि विनान का ही मनुष्य के आचरण का केंद्रीय निर्धारक तत्त्व मान लिया जाय तब ता मनुष्य का जीवन ही निरथा हो जायेगा। वैक्तिक मत्यु एक वैज्ञानिक तथ्य है तो क्या मनुष्य को जितनी जल्दी हो सके मृत्यु के साथ होकर उसकी गति को तीन करना चाहिये । भौतिकी के अनुसार ब्रह्माण्ड निर तर पतनशील है, तो क्या हम जीवन के सारे विकास को अथहीन मान कर उससे विमुख हो जाना चाहिये । यूटन के जमाने मे तो यह विश्व फिर भी एक प्राकृतिक नियम के अधीन समझा जाता था, लेकिन अब अधुनातन भौतिक विज्ञानी यह स्वीकार करते हैं कि यह विश्व घोर अव्यवस्थित और तबहीन है । व्यवस्था केवल एक जाभास है । विटगेंस्टाइन जसे दनानिव पद्धति मे आस्था रखने वाले दाशनिक भी यह मानत ह कि पदाथ विज्ञान अतिम या सनातन मूल्या का प्रदशन करन मे असमथ । हम अनुभव करते हैं कि सम्पूण सम्भव वज्ञानिर प्रश्नो के उत्तर दे दिये जायें तो भी हमारी जीवत समस्याएँ अस्पृश्य ही रह जाती हैं। जेम्स जीस हाइजेनवग, एडिंगटन जसे भौतिय वनानियो के विचारो के विश्लेषण के बाद वट्रेण्ड रसेल कहते हैं 'पार्मेनाइडोज के जमाने से लार आज तक विद्वान दानिय लोग यह विश्वास करते रहे कि ससार एक है। मेरे बौद्धिक विश्वासो मे से सर्वाधिर आधारभूत विश्वास यह है कि यह मा यता थाथी और अथहीन ह । मेर विचार से यह विश्व विखल ह इसमें कोई एक्ता नहीं ह वोई निरतरता नहीं है कोई सम्बद्धता और व्यवस्था अथवा ऐसा कोई अय गुण नही ह जिस अध्यापिकाएं बहुत पसंद करती हैं । आधुनिाता सामाजिर रा दम 123 गातो यह हम पूरग्रह और मादत का छाडपर और शायद कुछ भी ऐमा नही ह जो इम प्टिकोण ये पत्र में प्रस्तुत पिया जा सक गि समार नाम की पाई चीज है भी। व्यवस्था, एपता और निरतरता तो मनुष्य ये आधिप्पार हैं टीप से ही जरो सूची पत्र और विश्वगोश मनुष्य आविवार हैं। पितु मानव आविष्वार कुछ निश्चित मीमा के भीतर मााव रासार में प्रचलित और प्रभावी रनाय जा सस्ते हैं, और अपन दनिय जीवन ये गजानन महम नितात अव्यवस्थापूण अंधेरी रात को कालिमा को मुला गवते हैं जो शायद चारो लोर मे हम घेरे हुए है और इससे म लाभ ही होगा।' स्पष्ट है कि इस भौतिकीय प्रनिया को और इमलिये ऐतिहासिक प्रक्रिया को भी मनुष्य ही अथवान बनाता ह-य स्वय म अथवान नहीं है । अत मनुष्य स्वय हो मूया और अथ का स्रोत हैं। आधुनिकता वह दृष्टि है जो हम बात को पहचानती है। पारम्परिख धम मे मनुष्य को एव' अथ तो दिया गया पर यह आरोपित था और भौतिय जगत के बारे म उसवे भान की असत्यता ने उमफे दावो मे स देह पदा र दिया-यह जानना असम्भव हो गया कि उसके द्वारा प्रदत्त अलौविक व्याग्याएं सही हैं। वितार ने मनुष्य के सम्मुग्य पातिक जगत के तथ्या पा रहस्य तो पोला, पर उनमे किसी अथ की तलाश नही कर सका। अब मनुष्य के पास अपनी चेतना और अनुभूति के सिवा कोई आश्रय नहीं रहा । यह अनुभूति ही ब्रह्माण्ड की प्रक्रिया को कोई प्रयोजन देती और उसके साथ अपने या जोडती है। लेकिन अनुभूति व्यक्तिआश्रित प्रक्रिया है, विषमीसापेक्ष है। तो क्या इतिहास और ब्रह्माण्ड की प्रत्रिया का अयोजा भी विषयीसापेक्ष है। इससे तो यही सिद्ध होता है कि इतिहास की प्रक्रिया का प्रयाजन भी विषयी है अर्थात् 'आत्मान विद्धि' या अपने को जानने की और उ मुस दृष्टि ही सही मानो मे जाधुनिक दृष्टि है। इससे यह निष्पप नहीं निकाला जाना चाहिये कि आधुनिकता विज्ञानविरोधी रष्टि है - यह 1 वेवल विनान की अविरावी है बल्कि उसे अपना मित्र मारती और आत्मान विद्धि' के उद्देश्य की पूर्ति म इसकी सहायता भी लेती है-वम इतना ही है कि यह वज्ञानिकता द्वारा निर्देशित या बाधित नहीं है। 'आत्मान विद्धि की प्रक्रिया मे यह तथ्यो की, भौतिक जगत की अवहेलना नही करतो बलि उसम से गुजरती हुई आत्म तक पहुंचती है। एर अयवस्था को व्यवस्था देकर उसम 'भात्म को पहनती है। सवाल उठना चाहिये दि इस ट का सामाजिक स्वरूप क्या हो सकता है। यदि ब्रह्माण्ड और विश्व का प्रयोजन विषयीसापेक्ष है तो हम उस पर कोई 124 मस्थति का व्याकरण मवसम्मत प्रयोजन आरोपित नही पर सरत और उसके बिना सामाजिक व्यवस्था को उपादेयता सदिग्ध बनी रहती है। ब्रह्माण्ड, इतिहास अथवा जीवन म आत्मान विद्धि'को प्रप्रिया और स्वरूप सब वे जलग अलग हो सकते हैं इस स्वीकार करते हुए एक ऐसी उदार व्यवस्था वा विकास करना जिमको सभी के प्रयोजनो से सगति बठ सके निश्चय ही एष दु साध्य और वटपर काय है लेपिन आधुनिकता का रास्ता भी तो कोई आसान रास्ता नहीं है। जा समाजव्यवस्था अपने प्रत्यय सदस्य वो अपने प्रयोजन के निर्धारण की स्वतत्रता और उसकी पूर्ति के लिए उचित वातावरण और समान अवसर देती है वही सही माना म एक आधुनिक दृष्टिसम्पन्न समाज व्यवस्था हो रावती । सके लिए मनुष्य की गरिमा-जोर सभी मनुप्य ममार हैं टमलिए मनुष्य मात्र की गरिमा-या ये द्रीय महत्त्व देना होगा-पूरे जीवन के परिवृत्त या घेरत हुए। रम प्रकार मामाजिक मदों मनाधुनिकता मूलत एय मानवतापरख प्टि है जा गृष्टि और मतिये समाज के वेद्र म मनुष्य यो रगती है। मनुष्य को वेद्र म रयन या अय है मनुष्य के विरेप उमसी गरिमा उसपी निणय स्मतता और उगमी मजनगीनता यो वेद्र म रखना । यही कारण है कि मनुप्य मान की समानता जोर वैयवितर स्वत ता जाधुनिवता की सामाजिक अवधारणा का केद्रीय जाधार है। इसलिय व सारी विचारधाराएं आधुनिर वही जा सकती हैं जो पिसी भी व्यक्ति या वग द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति या वग के गोपण दमन और अवमानना की मुसालफत परती और एक ऐमी व्यवस्था या अनिवाय मानती हैं जिसम मनुष्य मान को स्वतन चेतना और सजनशीलता वा बहुआयामी विकास सम्भव हो। इसीलिये वे सारी विचार धाराएँ या व्यवस्थाएं जाधुनिकता की विकृतियाँ ही मानी जा सकती है जो एक उज्ज्वल भविष्य के नाम पर मनुष्य की वयक्तिक स्वत नता और सजनशीलता को किसी भी प्रकार कुठित करती हो। इसनिय समकालीन पूजीवादी लोतन और सवसत्तावादी समाजवाद दोनो ही बुनियानी अर्थों म जानिा नही यह जा सकते क्याकि दोना परोक्ष या प्रत्यक्ष तरीका से स्वत न सजनचेतना का कही न कही दमन या जडीकरण करते है। यह अस्वाभाविव नहीं है वि ममकालीन साहित्य का एक बडा श्रेष्ठ अश पूजीवादी लोकतन, सवसत्तावाद सवग्रासी प्रौद्योगिकी या भौतिकीय प्रप्रिया की निरथरता के वोध स उत्पन्न यत्रणा का अनुभव करता है-यद्यपि इस अनुभव के रूप रतन विविध है कि औसत पाठा के लिए उ है एक ही प्रवृत्ति के रूप में पहचानना मुशिल हो जाता है । यत्रणा, वास और निरागा इस आधुनिक्ता सामाजिक सदभ 125 आधुनिक इष्टि ये चरिताय न हा सान वी पोडावी ही अभिव्यक्ति हैं, वे भी प्रकारातर से दगी प्टि को वांछनीयता प्रपट परती हैं। स्वत प्रता और समानता पाएप गाथ अजित पर लना बहुत से लोगा यो एक पपा लगती है-लेनिन विगत तय्या ये गसार म सारी व्यवस्था भी अनत परल्पता ही तो है। आधुनिक सामाजिक दृष्टि या अथ 'पम्युनिस्ट मेगीपेन्टो वी साब्दावली म 'ए ऐसी सामाजिर व्यवस्था या आता है पिगम प्रत्येक या म्वन व विकास ही मवये म्वत विकासपी अनिवाय दात हा। निश्चय ही इसके लिए अनुदार और अमानवीय शक्तियो के विभिन्न पाने पिनाप विभिन्न स्तरा पर विभिन्न तरोवा से सधप परते रहना होगा लेकिन इस गधप म जारी है उग सुदर यो पहचानते रहना जिमके निए यह माग गधप है । यह ध्यान रपना अत्यत जावश्यर है कि सघपकी प्रतिया हो रही अमानवीय न हो जाये। अयथा आधुनिवता का भटकाव पूरी मानयता यो एक ऐसे अतहीन अधरे जगल म रे जापर छोड दे सकता है जहाँ से वापसी पी वाशिश म वह योटो पत्थरो और पिपले और हिमव जानवरो से टारावर नष्ट होती रहे। 126 गस्थति वा व्याकरण भारतीय परम्परा सामाजिक प्रासगिकता परम्परा या व्यायायित परत हुए एय दाशनिय इतिहासकार ने कहा है कि 'अतीत से जा उत्तराधिकार हम मिला है यह एक साचन की विधि है, न कि एक नियम-महिता । मैं इस 'सोचने की विधि' का व्यापक सदभ म रसकर समयना और उन सवदनाजा का भी इसम शामिल करना चाहता हूँ जिह सस्वार कहा जाता है । सवार क्सिी नाचार-व्यवहार के रूप म नही मूत्य सवेदना के रूप में क्योकि परम्परा अतत एव सनातन मूल्यचेतना है । भारतीय सदम मे तो यह बात और भी मच है क्योकि भारतीय चेतना सदव रूप स अधिक महत्त्व उस अरूप को देती आयी है जो सभी स्पो म खितता है।' जो परम्परा मानवीय दह का भी एव नश्वर अभिव्यक्ति मानती हुई आत्मा का सनातन मानती हो, उसे वण जाति सम्प्रदाय और भूगोल के स्थूल सस्थागत रूपो पर आश्रित कर देखना एक बुनियादी भ्राति है जिसका गिकार परम्परा के अधिकाश व्यास्यावार होते आये है। उनकी यह भ्रात दृष्टि ही परम्परा का एक अतीत की तरह प्रस्तुत करती है और अतीत की कुछ सस्थालो को धतमान म अनुपयोगी या अपभावी पावर या ता परम्परा या वतमान और भी कभी दाना के प्रति सीज से भर उठती है। परम्परा या अथ अतीत के चोखटे म वतमान का जडना नहीं है और न ही वह धतमान की खिडवी स अतीत की आर मुग्य भाव से निहारना है । परम्परा की तलाश बतमान की दृष्टि से अतीत का नवीकरण नहीं है । परम्परा का जथ ह बदलती हुई परिस्थितिया की चुनौती के सम्मुख एक सनातन जीवनदृष्टि के अनभिव्यक्त आयामा का उद्घाटन। एक सनातन मूत्यचेतना के रूप में भारतीय चेतना के समाजदशन का निरूपण क्सि प्रकार होता है। भारतीय चेतना के लिए समाज शब्द का अथ ही विवेकशील मनुप्यो का समुदाय ह । सस्कृत म एक शब्द ह 'समज' और दूसरा ह समाज' । 'समज का एक अथ 'पशुजा का समुदाय' और दूसरा अथ 'भूर्यो का समुदाय ह । समाज को 'विवेकशील मनुष्या का समुदाय माना गया ह । स्पष्ट ह कि भारतीय दृष्टि समाज मरचना का जाधार उस मानवीय विवेक का मानती ह जा एव मनुष्य का दूसर स जाडता ह। यह विवक मनुप्य और मनुष्य के बीच ये अनिवाय रिश्न और उगम उद्भन उत्तरदायित्वो की पहचान ह-बलि इसका दायरा मनुष्य स आगे बढकर मानवेतर सृष्टि तर फैल जाता है क्यामि हिरय ना ये शब्दो मे-जिन प्राणियो म नतिम चेता का अभाव है, उनके चाहे वाई क्त्तव्य न हा पर इमपा अथ यह नहीं है कि उनके प्रति भी विमी का कोई क्त्तव्य नहीं है। व्यक्ति कीरवाथ परायणता वे अतिरिक्त एव ऐसी भी चीज है जिसे जानि की स्वाथ परायणता कहा जा सक्ता है और जो अनिवायन इस विश्वास को ज म देती है कि जवमानवीय सृष्टि का मनुष्य के हित के लिए दोहन किया जा सकता है। यदि मनुष्य को मचमुच मुक्त होना है तो इसका भी त्याग करना हागा भार वह ऐसा केवल तभी कर सकेगा जब वह मानवन्द्रित दृष्टिकोण मे उपर उठ जायेगा तथा गीता के शब्दाम-विद्या और विनय स सम्पन ग्राह्मण, गाय हाथी श्वान तथा एवान का माम वान वाला चाडाल, सबवे प्रति समदर्शी हो सका। इस प्रकार भारतीय सामाजिक्ता देवल मानवकेन्द्रित या मात्र मानवीय एक्ता पर आधारित नहीं बल्कि सम्पूण सृष्टि की एकता पर आधारित है । जब हम मनुष्य को शेप मृष्टि मे पृथा मानने से शुरू करते हैं तो यह पृथकतावाद हमे एक मानवसमाज का दूसरे मानवसमाज स, एक सम्प्रदाय को दूसर मम्प्रदाय से एक प्रदेश या भाषा क मानवा को जय प्रत्यया भाषा के मानवो स, एव जाति का दूसरी जाति रो तथा अतत एक मनुष्य का दूसरे मनु'यो से अलग मानन की आर ले जाता है और पृथरता का यह बाध अतत मानवीय सम्बधा का आधार शवित या हिंसा को बना देता है क्यापि पृथवता के वोध पर आधारित तक पद्धति का मरचना अपन समूह पृथक पहचान और उसके हितो की रक्षा के प्रयोजन से हो जाती है और इस तरह की दो सरचनालो के बीच यदि कभी पाई समन्वय हाता भी है ता उसका आधार समान स्वाय ही होत है वाई तात्त्विक एकता नहीं। इसलिए स्वार्थों की टकराहट या अतिम फ्सला हिंसा के आधार पर ही होता है जो मनुष्य समाज को अतत पशुप्रवृत्ति की आर रे जाती है । लरिन जर सामाजिक्ता की हमागे भावना का आधार सम्पूण मृष्टि की एषता की अनुभूति हा तो हमारी तकप्रणाली और पूत्यचेतना वित्बुल भिन्न हागी। यह दृष्टि मानव की अवमानना नही परती बल्कि उस श्रेष्ठ नतिक चतना से युक्त मानन के कारण उस पर बडा उत्तरदायित्व डालती है । यदि गम्पूण सृष्टि म मनुष्य का कुछ विशेष हैसियत प्राप्त है तो उसस कुछ विशेष नतिक दायित्व भी जुड़े हैं-ययापि भारतीय दृष्टि हैसियत का अधिकारो से नहीं उन पत्तव्या से आरती है जिनका दायित्व विसी व्यक्ति, वग या समाज 128 मम्वृति या व्यापरण पर है । सम्पूण सृष्टि की एक्ता की यह सवत्पना और अनुभव भारतीय जीवनदृष्टि का ही नहीं, उस भावना का भी आधार है जिसे आध्यात्मिकता पहा जाता है । 'स्व' का वाघ जीवन का प्रयाजन है पर यह 'स्व' समष्टि से पृथक नही है, अत इसकी पहचान मे ममप्टि और 'स्व' के अनिवाय रिश्ते या वोध भी शामिल है। यह पहचान केवल विचारगत या मूचनात्मव नही बल्लि सवेदनात्मक और अनुभवगम्य है अत जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में इसका प्रतिफलन हुए विना इसका वास्तविक बाब सम्भव नहीं है। लेकिन यदि हम फिनहाल क्सिी आध्यात्मिक विचार मे न पडे और आत्मा परमात्मा की शब्दावली से परहज करना चाह तो भी भातिकवादी दृष्टि भी सृष्टि की एकता के सिद्धात का ही पुष्ट करती प्रतीत होती है। 'सृष्टि एक्तत्वात्मक है इस धारणा की पुष्टि आधुनिक विज्ञान भी करता है। प्रकृतिवाद, कारण कायजाथित निश्चयवाद जौर एक्तत्त्ववाद वैज्ञानिक दृष्टिकोण के स्वीकृत सिद्धात है । इसी एक्तत्त्ववाद के आधार पर माक्मवाद के बरक्स मानवेन्द्रनाथ राय जसे विचारत वनानिय मानववाद का दशन रचत हैं तथा काय कारणआश्रित प्रकृतिवाद से उपजा होने के कारण मनुप्य वो एक विवेक सम्पन प्राणी मानते और सभी मानवीय सम्वधा म इस विवेक वे प्रतिफलन यो हो नतिकता कहत है। रक्नि सम्पूण सृष्टि की तात्त्विक एकता का यह विचार मानवीय कम की प्रेरणा तभी बनता है जब वह मनुष्य की सवेदना ती एक सहज क्रिया या सस्वार बन जाय । जब यह विज्ञानाधारित तात्त्विक एक्ता मानवीय मवदना की सहज प्रिया या मानवीय सस्वार बन जाती है तो वह वस्तुत एक आध्यात्मिक जायाम ग्रहण कर लेती है चाह उसके लिए हम आत्मा- परमात्मा की शब्दावली का इस्तेमाल न भी परे । दुनिया के सभी रहस्य- वादियो म यदि काई एव वात समान रूप से पायी जाती है तो वह है सम्पूण सृष्टि की एक्त्तात्त्विकता का अनुभव-चाह व पुनजम, जात्मा के अमरत्व या परमात्मा म आत्मा के विलीन होन सिद्धाता पर एक मत न भी रयत हा। इसलिए भौतिकवादी आधार पर देखा जाय या आध्यात्मिक आधार पर भारतीय सामाजियत्ता सृष्टि की एक्तात्त्विक्ता के वोध से उपजती है और सभी मानवीय सम्बधा म इमी बाध के प्रतिफ्लन का ही मामाजिक जीवन या प्रयाजन स्वीकार करती है । यही आध्यात्मियता का सामाजिक पहलू है। जाहिर है दि इस प्रकार स विचार करन पर सम्पूण सामाजिक व्यवस्था, सस्थाआ और रिश्ता वा जाधार अहिंमा हा जाती है-स्थूल नही असा मूश्म भारतीय परम्परा सामाजिा प्रारमियता 129 और गुत्तर अर्थो म । हम जानत हैं कि मनुष्य म पगुत्व भी है और स्वायपरता भी और स्वार्थों की टर राहट भी अवश्यम्भावी है। इसलिए जब ता मनुष्य अहिंसा मोएर युनियादी मानवमूल्य के रूप म म्योवार नहीं कर रेता तर तर विनाशकारी सपप और शोषण दमन से काई बचाव नहीं है। भारतीय परम्परा इस बात को पहचानता है कि गृष्टि की एकता की अनुभूति का प्रतिफ्लन गृष्टि मात्र के प्रति अहिंसा के व्यवहार म ही हो मरता है क्यारि स्वार्थों की टकराहट भी तर घृणा और प्रतिशोध को नहीं विष मिन हान दगी जो हिंसा वे प्रेस कारण हैं। भारतीय परम्परा इस बात को पहचानती है कि अहिंमा ही सर्वोच्च घम, मर्वोच्च तप और सर्वोच्च सत्य है और इसी ग बाकी सब गुणा का जन्म होता है। सामाजिक व्यवस्था व वेद्रीय आधार के उपम अहिमा का स्वीकार करने का अर्थ है एक शोपणविहीन समतामूलक समाज की स्थापना जिसम न वेवल रग, जाति, लिंग, भाषा, मम्प्रदाय और राजनीतिक आर्थिव तारत के आधार पर जय के साथ अपायपूण व्यवहार न किया जा सके बल्लि प्रत्येक मनुष्य की अतनिहित सजनात्मकता को अभिव्यक्ति के तमाम अवगर मिल सकें। अहिंसा के सिद्धात को सामाजिक व्यवस्था आधार पम स्वीकार करना तात्पय सामाजिक अपाय के खिलाफ अप्रनिरोध नहीं है। भारतीय परम्पराम अहिंसा का अथ सबवे प्रति प्रेममय व्यवहार है-शनु के प्रति भी । नविन शनु विरद्ध बलप्रयोग की मनाही नहीं है-यदि हम बिना पृणा के बलप्रयोग कर सकें । जसारि सवपल्ली राधाकृष्णन् कामथन है-कई बार प्रम की भावना के कारण भी बुराई का प्रतिरोध परन की आवश्यकता पड़ती है। हम लड़त है पितु आतरिव शाति से भरे हुए। हमे चिकित्सक और डाकू की हिंसा में अतर करना होगा। अनुष्ठान पव में कहा गया है चिकित्सकश्च दुग्यानि जनयन् हितमाप्नुयात् ।' रेविन इसका तात्पय हिंसा को हर स्थिति म उचित मानना नहीं है । आदश तो पूर्ण अहिंसा ही है-हिंसा का कवल आपद्धम के रूप मे ही स्वीकार किया जा सकता है और वह भी तब जव हमारा हृत्य मातरिक शाति से भरा और प्रेममय हो । पृणा और प्रतिशोर की भावना पर आधारित हिंसा किसी भी तरह म्वीवाय नहीं। अधिकाश प्राप्तियां प्रतिमातियो में इसीलिए बदल जाती है कि वे उत्कृष्टतर परिवतन की भावना से कम और घृणा व प्रतिशोध की भावना से अधिक प्रेरित होता हैं। हिंसा 'स्व' के सकुचन से पदा होती है जबकि अहिंसा का तात्पप है 'स्व' की सावभौमिन व्याप्ति । भारतीय परम्परा म 'स्व की पहचान को ही जीवन का अपाजन माना गया है। लेकिन इम म्व' या अस्मिता के कई वृत्त हैं जिनका 130 सस्कृति का व्याकरण विस्तार अपनी देह से लेकर अन त सृष्टि तक है ! मैं एक नाम से जानी जा रही देह हु मै एक परिवार का सदस्य हूँ मैं एक जाति हूँ, मैं एक अध्यापक, मजदूर, व्यापारी, लेखक या कुछ और हूँ, मैं एक प्रदेशविशेप का निवासी हूँ, मैं एव राष्ट्रविशेष का निवासी हूँ, मैं एक सम्प्रदायविशेष या अनुयायी या टनविशेष का कायकर्ता हूँ आदि मभी मा यताएँ अस्मिता के छोटे बडे घेरे है जो अन त सृष्टि के साथ मेरी एक्ता की धारणा तक फ्लते है । सभी सामाजिक असमानताएँ, विद्वेप और तनाव अपनी अस्मिता को किसी न क्सिी घेरे मे बांधना है । अन त सृष्टि के साथ एकता का अनुभव करते हुए भी मैं देह ता रहता हूँ लेकिन तव देह मेरी अस्मिता के उ नयन या साधन बाती है जबरि वन देह होना मेरी अस्मिता की वास्तविक सम्भावनाओ या दमन करना है । जाति, लिंग सम्प्रदाय और अय ऐसी सभी सामाजिक पहचाने पदि मेरे 'स्व का सकुचन करती है तो उह यायपूण नहीं माना जा सक्ता क्याकि उनसे सामाजिक व्यवस्था विकसित होगी वह अनिवायतया हिंसक होगी और जीवन के एक विकृत दृष्टिकोण का विकास करेगी और हम प्रकृति स सस्कृति की आर बढने की बजाय विकृति की जोर गिर रहे होंगे। आज जिस समान व्यवस्था में हम रह रहे है वह स्पष्टतया एक विकृत व्यवस्था है क्योकि वह हमे किसी न किसी छोटे घेर म बांध देन का प्रयास करती है-वह घेरा जाति उपजाति का भी हो सकता है और रग, सम्प्रदाय, दल प्रदेश या राष्ट्र वा भी । पराशर के हवाले से डा राधाकृष्णन् कहते हैं कि यह ठीक है कि आत्मा के सत्य सनातन हैं पर नियम युग युग मे बदलते रहते हैं। हमारी ललित सस्थाएँ नष्ट हो जाती है । वे अपने समय म घूमधाम से रहती है और उसके बाद समाप्त हो जाती हैं । वे पाल की उपज होती है और काल की ही ग्रास बन जाती है । परतु हम धम को इन सस्थाआ के किसी भी समूह के साथ एक या अभिन्न नहीं समझ सकते । धम इसलिए बना रहता है कि इसकी जडें मानवीय प्रकृति म है और यह अपन किसी भी एतिहासिक मूत रूप से समाप्त हो जाने के बाद भी बचा रहेगा। भारतीय परम्परा मामाजिव प्रासगिरता 131

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Sanskrati Ka Vyakaran

Author
Nand Kishore
Title
Sanskrati Ka Vyakaran
File name
Sanskrati Ka Vyakaran
Text
OCR done
Citation
1954
Published
2011/03
Publisher
Vagdevi Prakashan Bikaner
Language
Sanskrit
Pages
138
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551144
Barcode
4990010031914.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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