Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Shri Varsh Prabodh

Pandit,.kishan Lal · 2012/08

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- श्री महाशय ! पाठकगणोंसे ग्रंथ प्रसिद्धकर्ताकी प्रार्थना, । 'विदजन ! यह ग्रंथ (गुप्त था सो) अति कठिनतासे मेरेको प्राप्त हुआ है, और सर्वोपयोगी है, केवल हिजवरही इस्का उपयोग करेंगे सो नहीं किंतु मनुष्यमात्रको लाभकारी है इस्के बांचनेसे वर्पका शुभाशुभ समझेंगे. दिजवर फल कहके सिद्ध कहलायेंगे, और व्यापारी सस्ती मैहगी वस्तुओं का फल समझके 4 लाभ उठावेंगे. प्रथम मैने 'अर्घप्रकाश, नामकी एक छोटीसी पुस्तक छापी थी उस्में भी ऐसाही विषय किंचित २ लिया था सो पुस्तकें बहुत बिकी, जबसे मेरी इच्छा यही थी कि इस विषयका कोई बडा ग्रंथ मिले तो छापूं सो नारायणकपासे इच्छानुसार प्राप्ति होगया. 'ग्रंथ पाके मनमें विचार किया कि यह तो संस्कृत में है इस्पेंभी जैनीभाषा मिश्रित, और अनेक शब्द कठिन, और समझमें न आव ऐसा है तो इस्की टीका हिंदीभापामें होजानी चाहिये, क्योंकि यह अलभ्य ग्रंथ सर्वोपयोगी है, सो बिना हिंदी टीकाके अर्थ साधारणमनु प्योंके उपयोगमें नहिं आके केवल पंडितवरोंके ही कामका होगा. * ऐसे विचार १ विनयपत्र (साथही ग्रंथ ) मेरे परमकृपालु श्रीयुत पंडितजी श्रीज्वालाम सादजी महाराजकी सेवामें मुरादाबाद भेजा तो. उन कृपासागरने मेरी प्रार्थनाको पत्रद्वारा स्वीकार कर इस ग्रंथकी टीका अति श्रमसें सरल हिंदी भापामें बनाय मेरेपास भेजदी! अव ग्राहकजन यापाठकगणोंसे प्रार्थना है कि आपलोग अवश्य आश्रय देके मेरा अम सफल करेंगे ऐसी आशा है- आपका किसनलाल श्रीधर,. पुस्तक मिलनेका ठिकाना, पंडित श्रीधर शिवलालजी ज्ञानसागर छापखाना मुंबई. . .

वर्षप्रवोधस्थ विपयाणां अनुक्रमणिका १,४. . ४.४५ ८ ८ भनमा विपय. पृष्ठ. मनुका विपय. एष्ठ. १ १ मंगराचरणम् गशिग्रहपारिचारः २ १उत्पातप्रररपाम् ७ नक्षघ्रग्रहपापिचारः ३ १ देशाविकारः ८कपिचारः ४ १ मृगृमुतोदयनोदेशेषुपर्पज्ञानम् ६ भयनमासादिपदानिरूपणाधिकारः" २ शुकास्तविचार २.४४ अधिकमामनिर्णयः ६ ३ मंटर विचारः ७ अगम्नउदय सप्तमीधिशारः ४ भाग्नेयमंडलम् ४४६ १ वर्षाविपफ्लम् ५.यायुमंडलम् ४४७ २ वर्षमंत्रीफलम् ९ ६ वारुणमंडलम् ५४८ ३ सम्याविपनि फलम् १०.७ माहेन्द्रमंडलम् ५४९ ४ मेघाविपनिफलम् ८ विवेकविलास मतम् ६. ५रसाधिपफलम् १२ रुद्रदेवमनम् ६ नीरसाधिपतिफलम् १३ १० उत्पातमेदा ६.५२ ७ आद्रप्रिमेश ४११ गन्धर्वनगरम् ७:५३ ८ वर्पजन्मलग्नम् २५ १२ विद्युल्लक्षणम् ५४ र सम्रविद्युदादिकयनम् १६ १३ केतूदयः ८गर्मायनोनाममटमोधिकारः ..२ १७.१४ केतूदयफलम् 'मास तिथिफ नवमोधिकार. १४.१५ चंद्रसूर्यग्रहणम् मासनियिफलकथनम्, १९ १६ चंद्रसूर्यग्रहण फलम् ५८ २ द्वादशपूर्णिमाविचार २ वाताधिकार ११९ १० दशमोधिकारः १ यायुचक्रविचार १ सक्रांतिविचार. २२ २ वातविशेषचक्रम् २ सूर्यविचारः २३ ३ स्थापक्वात "एकादशाधिकारः २४ चंद्रविचारः ३ संवत्सरफलकथनाधिकार २५ १ रामविनोदमतसेंपष्टिसंवत्सर फलम् १९ २मगलपिचार ११० २६ ११३ २ साठसंवत्सरोंकाफलविशेपवार्तिक २४६५ ३ बुधविचार. ४ संवत्सराधिकारः ६६ ४ शुक्रविचारः ६७ ५ग्रहयोगः १२० १ गुरुविचारः । ३२ १२ द्वादशाधिकारः १२१ २ बृहस्पतिवकीहोनेकाविचारः नक्षत्रविचारः १२१ ३ बृहस्पतिनक्षनमोगविचारः २ रोहिणीनिर्णयः १२२ १ गुरुदयफलम् ४४/७१ ३ भाद्रीप्रवेशः ३२ ५ गुरुअस्तविचारः ४५/७२ ४ दारचतुष्टयकयनम् ६ मेघविचारः १२५ ५ संपत्सरनिर्णयाधिकारः १३ शकुननिरूपनाम त्रयोद शनिचार शाधिकारः १२८ १ वर्षागानविचारः २ शन्युदयविचारः ३ शन्यस्तावेचार. २ कुसुमलताफलम् ५१७६ ३याकेंगीन ४ शनिस्थिति ३९ ५राहविचारः ४ गौतमग्रन्यमतम् ४३ ५२/७८ ५ गर्वेगिनम् (गयोंकासकुन) 1३४ १६. ११ ६४ - ४२/७० ४५/७३ ४८/७४ GH वर्षप्रबोध भाषाटीकासहित ॥श्रीगणेशाय नमः॥ श्रीतीर्थनाथवृषभं प्रभुमाश्वसेनि संकेश्वरं नतसुरेन्द्रनरेन्द्रचन्द्रम् । ध्याय न्समेघविजयं सुखभावबुद्धये शास्त्रं करोमि किल मेवमहोदयार्थम् ॥ ॥१॥ दीपोत्सवदिने प्रातग्रंथः प्रारभ्यते मया। अस्मिञ्जगद्गुरोर्मक्त्या भूयाद्वाकसिद्धिसनिधिः॥२॥ अथ उत्पातप्रकरणम् । प्रकृतेश्चान्यथाभावउत्पातःसत्वनेकधा। सयत्रतत्रदुर्भिक्षंदेशराज्यमजाक्ष यः ॥१॥ देवानांवकृतंभंगचित्रेष्वायतनेषुच । ध्वजश्चोईमुखोयत्रतत्र "राष्ट्रस्यविप्लवः ॥ २॥ जलस्थलपुरारण्येदृश्यन्तेन्यत्रजन्तवः । शिवा काकादिकाक्रन्दापुरमध्येपुरच्छिदे ।। ३॥ छत्रप्राकारसेनादिदाहायेर्नु पतीन्पुनः । अस्त्राणांज्वलनंकोशनिर्गमश्च पराजये ॥ ४॥अन्यायश्च दुराचार-पाखंडाधिकताजने । सर्वमाकस्मिकंजातंवैकृतंदेशनाशनम् ॥ ॥५॥राजादिःकृषिजीवीचे विधर्म पशुपालकः । देवताप्रतिमाभंगो लिंगविप्रवधस्तथा ॥६॥ सितरक्तंपीतकृष्णंसुरेन्द्रस्यशरासनम् । भवे द्विपादिवर्णानांचतुर्णानाशनंक्रमात् ॥ ७॥ अकालेपुष्पितावृक्षाःफलि ताश्चान्यभूभुजे। अल्पेल्पंमहतिप्राज्यदुनिमित्तैःफलंवदेत् ॥ ८॥ श्वत्थोदुम्बरवदप्लक्षाःपुनरकालतः । विप्रक्षत्रियविदशवर्णानांनाशनंक मात् ॥९॥ वृक्षेपत्रेफलेपुष्पवृक्षपुष्पफलेंदलम् । जायतेचेत्तदालोकेदुर्मि क्षादिमहाभयम् ॥१०॥ गोधनिर्निशिसर्वत्रकलिर्वाद१रा शिखी। श्वेत काकश्चराधादिभ्रमणंदेशनाशनम् ॥ ११॥ एवमुत्पातसंयोगाज्ज्ञात्वाशा खान्तरादपि । वर्षेशुभाशुभंदेशेज्ञेयंवर्षपरीक्षकैः ॥ १२ ॥ नमस्कृत्यजगन्नाथपार्वतीवल्लभहरम् ।वर्षबोधस्यग्रन्थस्यभापाटीकाविरच्यते अर्थ-जो स्वामाविक वस्तु अन्यथाभावको धारण कर उनको उत्पात कहते हैं वह अनेक हैं और जिस देशमें होते हैं वहीं दुर्भिक्ष देश राज्य और प्रजाका क्षय होता है ॥ ९॥देव- -- २ वर्षप्रबोध। ताओंकी प्रतिमा हंसे रोवै वा दूटजाय गिरपडे ध्वजा कर्ध्वमुख होजाय तो देशोपद्रव जा- नना ॥ २॥ जलके जीव स्थलमें स्थलके जलमें पुरके वनमें वनके पुरमें दीसें, गीदड और कोए पुरमे रोवें तो विध्वंस हो ॥३॥ छत्र परकोट सेना और अत्रोंका जलना तथा म्या- नसे खड्गका निकल पडना, पराजयका सूचक है ॥४॥ अन्याय दुराचार मनुयोमें अधिक पाखण्डता होनी यह सब अकस्मात् होजाय तो देशका नाश कहना ॥५॥ जो राजा क. पिजीवी हो, विधर्मी पशु पालक हो, देवताको प्रतिमाका भंग ब्राह्मणका वध यहमी उपद्र- बके कारण हैं ॥ ६ ॥ वर्षाकालको छोडकर यदि अन्य समय इन्द्र धनुप निकले और वह सूर्यके सन्मुख न हो तो सफेद लाल पीला काला होनेसे क्रमसें ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्रोंका नाश करता हैं ॥ ७॥ जो वृक्ष अकालमें फूलै फले कभीभी अत्यन्त थोडे फल हो कभी महा अधिक हो तौभी दुनिमित्त हैं ॥ ८ ॥ पीपल वृक्ष उदुबर (गूलर) बड पिलखन यह, अ- कालमें फलै तौ क्रमसे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्रका नाश करें ।। ९ ।। वृक्षके पत्र फल फू- लमें वृक्षका पत्ता फल फूल उत्पन्न हो तो दुर्भिक्ष होता हे और महा भय होता है ॥१०॥ गोधा कलि मेडक मोर यह रात्रिमें भ्रमण करें श्वेतकाक और गृध्र घरोंमे, भ्रमण करें तो देशका नाश हो॥ ११॥जो सदिको छोड़ अन्य जीव अपने सन्तानोंका भक्षण करै वा अन्य जातिके जीव अन्य जातिसे मैथुन करें यह सब उत्पात सुचक है इस प्रकार और शास्त्रोंसेभी उत्पातोंको जानकर वर्पका शुभाशुभ और वर्षाकी परीक्षा करनी उचित है ॥१२॥ अथ भृगुसुतोदयतो देशेषु वर्षज्ञानम् ॥ मृगुसुतःकुरुतेऽभ्युदयंयदासुरगणकंगतःखलसिंधुषु । सकलगुर्जरकर्वट मंडलेभवतिशस्यविनाशमहारुजे ॥ १३ ॥ जालंधरेपिदुर्भिक्षविग्रहोरण संभवः । मनुष्यगुणमेशुक्रोदयेसौराष्ट्रविग्रहः ॥ १४ ॥ कलिंगदेशेस्त्री राज्येमध्यगंवर्षमुच्यते । मरुस्थलेचदुर्भिक्षंघृतधान्यमहर्घता ॥ १५ ॥ स्वर्णरूप्यमहर्वस्यात्पीडागोमहिपनजे । कासितूलसूत्रादेमहर्घत्वंमजा यते ॥१६॥ नक्षत्रेराक्षसगणेशकस्याभ्युदयेसति । गुजरेपुद्गलमयंदुर्भि क्षद्रव्यहीनता ॥ १७ ॥ पंचवर्णपसूत्रंमूल्येनापिचदुर्लभम् । श्रीफलंदुर्ल भमृत्युःश्रेष्ठःपुंसश्चकस्यचित् ।। १८ ॥ उत्पातादिषुदेशेषुसिंधुदेशेतिवि अहः । दिनत्रयमवाणिज्यंविग्रहेमालवादिके ॥१९॥ अथशुक्रास्ततो देशेषुवर्पज्ञानम् । सुरगणेभृगुजास्तगतिर्यदादिवसगुर्जरमालवमण्डले । भवतिदेशभयंठपविग्रहःप्रथमतोपिचधान्यमहर्षता ॥ २०॥ पश्चात्सम धताकिंचिन्मासमेकंमवर्तते । खुरसानेमहोत्पातोद्रव्यनाशोतिदंडता, ॥ ॥ २१॥ प्रवलाजलवृष्टिश्चमासपदकात्परंभवेत् । हेमरूप्यमहर्घत्वंनिद्रा मापाटीकासहित । , लुःसकलोजनः ॥ २२ ॥ मरुस्थलेषुदुर्भिक्षदिल्ल्यांराज्यविवर्तनम् । गो पालगिरिदेओस्यान्मरकोनरकोपमः ॥ २३ ॥ रोगबाहुल्यमथवापरच ऋपराभवः । व्यापारेखहुलालक्ष्मी सुभिक्षमुत्तरापथे ॥२४॥ अर्थ-जो शुक्रका देवतांगणके नक्षत्रमें उदय होय तो सिंधु गुर्जर कट देशोंमें खेतीका नाश और महारोग हो ॥ १३ ॥ जालंधरमें दुर्भिक्ष विग्रह और लडाई हो और जो शुक्रका उदय मनुष्यगणके नक्षत्रमें हो तो सौराष्ट्र देशमें विग्रह हो ॥ १४ ॥ कलिंग देश और स्त्री- राज्यमें यह वर्ष मध्यम रहे, मरुदेशमें दुर्भिक्ष, घी और धान्य अकरे हों ।। १५॥ सोना चांदी अकरी हो, गौ भैसकी गोठमें पीडा हो, कपास सुई सूतादि अकरे विकै ॥१६॥ सैक्षसगणके नक्षत्रमें यदि शुक्रका उदय हो तो गुर्जर देशमें पुद्गलका भय, दुर्भिक्ष और द्रव्यहीनता हो। ॥ १७॥ पंचवर्णपट सूत्र मौलसैंभी न मिलैं, श्रीफलका अभाव हो. किसी श्रेष्ठ पुरुषकी मृत्यु हो ॥१८॥ देशोंमें उत्पात सिंधु देशम विग्रह तीन दिन व्यवहार बंद और मालवेमें विग्रह हो॥ १७ ॥ अथ शुक्रास्तविचारः। जो देवतागणके नक्षत्रमें शुक्र अस्त हो तो दिवस.गुर्जर मालव देशमें भय., राजोंमें युद्ध हो. पहले धान्य अकरा हो पीछे ॥२० ॥ एक महिनेतक सस्ता विकै खुरासानमें उत्पात द्रव्यका नाश और दंडकी प्राप्ति हो ॥२१॥ इसके उपरान्त छः महीनेतक बहुत वर्षा हो सोना चादी अकरे और मनुष्योंमें भालस्य बहुत हो ॥ २२ ॥ मरुस्थलमें दुर्भिक्ष दिल्लीके राज्यमें परिवर्तन गोपाल गिरिदेशोंमें मरी पडै ॥२३॥ बहुत रोग हो अथवा शत्रकी पराभव हो व्यापारमें बहुत लक्ष्मी और सुभिक्ष यह उत्तर दिशामें हौंस२४॥ मनुष्यगणशुक्रास्तेवन्हिभीरोमपत्तने । देशत्रासाकोंकणेचलाटेसिंधो, श्वशन्यता ॥ २५ ॥ दुर्भिक्षमुत्तरादेशेविग्रहोद्रविडाश्रये । गुर्जरेचसु मिक्षस्यादनस्पतिफलोदयः ॥ २६ ॥ मासमेकमहर्घस्यात्ततोधान्यो समर्षता । घृतंतैलाननिष्पत्तिःपटसूत्राणिसर्वतः॥ २७॥राजानःसु खिनःसर्वाःप्रजारोगविवर्जिताः । सर्वत्रवसतिर्देशेदुर्गेष्वानंदनंदिता ॥ ॥ २८ ॥ शुक्रास्तेराक्षसगणेहीदुदेशेषुविग्रहः । खप्परेराजयुद्धानिमिश्र देशेऽन्नविग्रहः ॥२९॥ मरुस्थलेसिंधुदेशेदुर्भिक्षमध्यमभवेत् । यानपात्र विनाशोऽधोफिरंगाणांचविग्रहः॥३०॥ विराटढुंढपांचालसौराष्ट्रपुच रौरवम् । तथाराज्यपरावर्तोमालवेधुजनक्षयः ॥ ३१ ॥ 'जीर्णदुर्गे भयंमंग पर्तनेन्नमहर्षता ।' नव्यमुद्राप्रकाशःस्यादक्षिणेसुखसंपदः ।। १ देवतागण अश्विनी मृगशिर रेवती हस्त पुप्य पुनर्वस अनुराधा श्रवण स्वाती, २ मनुष्यगण-तीनों पूर्वा तीनी उत्तरा आदि रोहिणी भरणी. ३ राक्षसगण कृत्तिका मघा आश्चैपा विशाखा शतभिषा चित्रा ज्यष्टा धनिष्ठा मूल ।

वर्षप्रबोध। ॥३२॥ इतिश्रीशुकास्तगणे नवेशवर्पज्ञानम् । अथ मण्डलविचारः॥ कृत्तिकाभरणीपुष्यंद्विदेवंपूर्वफल्गुनी। पूर्वाभाद्रपदंपैत्र्यंस्मृतमग्नेियमंड लम् ॥ ३३ ॥ यद्यस्मिन्धूलिवर्षादेविकारकोपिजायते । भूमिकंपोश ने पातउल्कापातोंधकारिता ॥ ३४ ॥ दर्शनंधूमकेतोश्चग्रहणंचंद्रसूर्य यो। रक्तवृष्टिजलवृष्टिरन्यदाकिंचिदद्भुतम् ॥ ३५ ॥ तदाग्निमंडलात् प्राज्ञोजानीयानाविलक्षणम् । नेत्ररोगमतीसारंदेशेग्निप्रबलोदयः॥३६॥ 'गादुग्धंघृताल्पत्वंगुमेपुप्पफलाल्पता। अर्थनाशंचचौरेभ्यःस्वल्पांवृष्टिंस मादिशेत् ॥ ३७॥ अर्थ-मनुष्यगण नक्षत्रपर शुक्र अस्त हो तो रोम देशमें अग्निका भय हो देशमें त्रास को- कण तथा लाट और सिन्यु देशमें शून्यता हो ॥१५॥ उत्तर देशमें दुर्भिक्ष द्रविड देशमें वि. ग्रह हो गुर्जर देशमें सुमित ओर वनस्पतियोंमें फल आवे ॥ २६ ॥ एक महिना अन अकरा विकै फिर धान्य समभाव विकै घी तेल अन्न पटसूत्र यह सस्ते हो ॥२७॥ सब राजा सुखी प्रजा रोगरहित हो देश और दुर्गामें आनंद हो ॥२८॥ जो राक्षसगण नक्षत्रमें शुक्रास्त हो तो हिन्दूदेशोमें विग्रह हो सपर राज्यमें युद्ध और मिश्र देशमें अन्नका विग्रह हो।।२।। मरुस्थल और सिंधुदशमें सामान्य दुर्भिक्ष हो विमान और पात्रौंका अथवा जिहाजोका वि- नाश फिरंगीयोंमें विग्रह हो॥३०॥ विराट दुंदु पांचाल सौराष्ट्र देशोंमें कष्ट हो राज्यका - दल और मालव देशके मनुष्योंका क्षय हो ॥ ३१॥ जीर्ण दुगोके टूटनेका डर पहनमें "अ- त्रकी महंगी हो नयासिका चले दक्षिणमें सुख संपदा हो ॥ ३२॥ इति शुक्रास्तविचारः । भय मंडलविचारः । कृत्तिका भरणी पुप्य विशाखा पूर्वाफल्गुनी यह आग्नेयमंडलके नक्षत्र है।॥ ३३ ॥ जो इनमें धूलि वर्षादि कोई विकार भूमिका बज्रपात उल्कापात अंधकार आदि धूमकेतूका दर्शन चंद्र सूर्यका ग्रहण रक्तवृष्टि जलपृष्टिका और कोई अद्भूत वार्ता हो ॥२७॥ तो अमिर्मडलसे बुद्धिमान होनहारको जाने नेत्रौंका रोग अतिसार देशमें आम्रिका लगनां ॥ ॥ ३५॥ गायोंमें दुग्धकी अल्पता धी योडा वृक्षोंमें पुष्प फल योडा अर्थ नाश,चोरका भय तथा थोडी वृष्टि जाननी ।। ३९॥ क्षुधयांपीडितालोकाभिक्षाखपरधारिणः। सेंधवायमुनातीरेघृताटंकज़ बाल्हिकाः॥४०॥ जालंधराश्चकाश्मीरासमंत्रचोत्तरापथः। एतेदेशा विनश्यतितस्मिन्नुत्पातदर्शने ॥४१॥ (इतिआग्नेयमंडलम् ) मृगादि त्याश्विनीहस्ताश्चित्रास्वातिसमन्विताः । उत्तराफाल्गुनीवायोरिदमंडल मुच्यते ॥ ४२ ॥ यद्येषुजायतेंकिंचित्पूर्वोक्तोत्पातलक्षणम् । महावाता स्तदावांतिमहाभयमुपस्थितम् ॥ ४३ ॥ उन्नीताअपिपर्जन्यानमञ्चंति भापाटीकासहिन । तंदाजलम् । विनाशोदेवविप्राणांनृपाणांविन्ध्यवासिनाम् ॥४४॥ माकारगिरिशृंगाणितोरणस्थलभूमिका । वायुवेगंविधूतानिवनानिनि पंतंतिहि । ॥ ४५ ॥ (इति वायुमंडलम् ) आश्लेिषोत्तराभाद्रपदंपु प्पचवारुणम् । पूर्वापाढामूलमेतद्वारुणमंडलस्मृतम् ॥ ४६ ॥ एषत्पातो दयेपूर्वगदितेस्यात्प्रजासुखम् । बहुक्षीरघृतागावोवहुपुष्पफलाहमाः ।। ४७ ॥ बहुधान्यमहीलोकेनैरुज्यंबहुमंगलम् । धान्यांनिचसमर्या, णिसुमिक्षपवलंभवेत् ॥४८॥ कीटकामूपका सःशलमामृगकर्कटोः मारि पिपीलिकाकामस्थलदेशेषजायते ॥ ४९।। ज्येष्ठानुराधारोहिण्यो धनिष्ठाश्रवणस्तथा । अभिजितोत्तराषाढाशुभंमाहेन्द्रमंडलम् ॥५०॥ एषत्पातोदयेलोका सर्वेमुदितमानसाः । संधिंकुर्वतिभूमीशा मुंभिक्षम गलोदयः ॥५१॥ उल्कापातादयःसर्वेमीपुस्वस्वफलपदाः । वर्षाका लेविनाज्ञेयावर्षाकालेतुवृष्टिदाः॥५२ ॥ माहेंद्रसप्तरात्रेणसद्योवारुणमं डलम् । आग्नेयमर्द्धमासेनफलंमासेनवायवम् ॥ ५३॥- अर्थ-सयासे पीडित प्राणी भिक्षा और खपर-(खप्पड) धारण करने वाले हों सिंधु देश यमुनाके तटके देश घृताटंक बाल्हीक ॥ ४० ॥ जालंधर काश्मीर और उत्तरदेश इस उत्पातके देखनेसैं इतने देश नाशको माप्त हो ॥४१॥ इति अमिमंडलविचारः भृगशिर पुनर्वसु अश्विनी हस्त चित्रा स्वाति उत्तराफल्गुनी यह वायुका मंडल हैं ॥ ४२॥ यदि इन में- सत्रोंमें पूर्वोक्त कोई उत्पात हो तौं महावायु चले महामय उपस्थित हो ॥ ४३॥ प्राप्त हुए भरे वादलभी जल न छोड़ें देव ब्राह्मणोंका विनाश हो विंध्यवासी राजोंमें विग्रह हो।४४ ॥ परकोट पर्वतोके शृंग तोरणकै स्थान यह सब वायुसे भग्न हो जाय ॥ ४५ ॥ इति वायुमंडल- विचारः। मादा आश्लेषा उत्तराभाद्रपदा रेवती शतभिषा पूर्वापाढा मूल यह ' वारुणमंडल हैं ॥ ४६॥ जो इनमें पूर्वोक्त उत्पात हो तौं प्रजाको सुख हो गायोंमे घी दूध बहुत हो पेडोंपर फल फूलं बहुत हौं।॥ ४७॥ पृथ्वी बहुत धान्य उपजे निरोगता और मंगल है' धान्य सस्ते और सर्वत्रं सभिक्ष हों ॥४८॥ कीडे सूपे सर्प शलभ मृग कर्कट मारी चोटी यह स्थलं देशों में बहुत ही ॥ ४९ ॥ त्येष्टा अनुराधा रोहिणी घनिष्टा श्रवण अभिजित् उत्तरापाढा यह माहे न्द्रमंडल है ॥ ५० ॥ -इनमें पूर्वोक्त उत्पात हो तो सब लोग आनंदसे रहैं रोजा परस्पर संधि कर सुभिक्ष और मंगल हो ॥ ५१ ॥ उल्कापातादिकभी इनमें अपने २ फलको वर्षाकालेके विना देते हैं और वर्षाकालमें तो वृष्टि करतेही हैं ॥ ५२ ॥ माहेन्द्र मंडलका फलं सात दिनमें वारुणमंडलका फल शीघ्रही, अग्निमंडएका आथे महीनेमें, और वायुमंडलको एक भासमें फल होता है ।। ५३ ॥ ..

वर्षप्रबोध। समिक्षक्षेममारोग्यंराज्ञांसंधिःपरस्परम्। अंत्यमंडलयो यंतद्विपर्ययमाद्य योः॥५४॥ माहेंद्रेवारुणेचेवहष्टाभवंतिधेनवः। उत्पाताप्रलयंयांतिध रणीवर्द्धतेशिवः ॥ ५५॥, त्रिमासिकंतुआग्नेयवायव्यंचद्विमासिकम् । मासमेकंचवारुण्यंमाहेंद्रसप्तरात्रिकम् ॥५६॥ (विवेकविलासे पुनः) मंडलेग्रष्टमासैाम्यांवायव्यकेपुनः । मासेनवारुणेसप्तरात्रान्माहेंद्रके फलम् ॥ ५७॥ (रुद्रदेवः प्राह) वायव्यंमासयुग्मेनमाहेंद्रसप्तरात्रिक्रम् । आग्नेयमईमासेनवारुणंशीघ्रयारिदम् ॥ ५८॥ वारुणानेययोर्मोमानि लयोःफलमंदता । अन्योन्यमभिधातेनतद्विमृश्यवदेत्फलम् ॥५९ ॥ भूगिकंपरजोवर्षदिग्दाहाकालवर्षणम् । इत्याद्याकस्मिकंसर्वमुत्पातइ तिकीर्त्यते ॥६०॥ ईत्यनीतिप्रजारोगरणाद्युत्पातजंफलम् । मंडला ख्यासमंप्रायोवन्हिबाष्पादितथा ॥६१॥ आग्नेयेपीड्यतयाम्यांवाय व्येपुनरुत्तराम् । वारणेपश्चिमानावपूर्णमाहेंद्रमंडले ॥६२॥ (इति में डलोपरि उत्पातेन देशे वर्षज्ञानमतःप्रसंग उत्पातभेदों यथा) भूमिक प्रजापीडा निर्यातेतुनृपक्षयः । अनावृष्टिस्तुदिग्दाहे दुर्भिक्षपांसुवर्षणे॥ ॥ ६३ ॥ क्षयकृत्पांसुवृष्टिश्चनीहारशमयंकरः। दिग्दाहोनिमयंकुर्या निर्वातेनृपभीतिदः ॥ ६४ ॥ झंझावायुश्चंडशब्दश्चौरभोतिप्रदायकः। भूकंपोदुःखदायीचपरिवेषश्चरोनसत् ।। ६५ ॥ ग्रहयुद्धराजयुद्धंकेतौदृष्टे तथैवच । ग्रहणांतेमहावृष्टिःसर्वदोपविनाशिनी ॥ ६६ ॥ उक्लापातेश्रेष्ठ नाशोद्रुमच्छिन्नेधनिक्षयः । पापाणवर्पणेज्ञेयासर्वधान्यमहर्घता।। ६७॥ अर्य-शभिक्ष क्षेम आरोग्य राजोंकी परस्पर सधि यह थोडे मंडलमेभी जाना, उसके विप- रीत दूसरोंकर ॥५४॥ माहेन्द्र और वारुणमंडलमें गौ प्रसन्न होती हैं, उत्पात नष्ट होते है, धरतीपर मंगल होते हैं ॥५५॥ तीन महीने में आग्नेय, दो महीनेमें वायु, एक महीनेमें वरुण, सात रात्रिमें महेन्द्रका फल रहता है ॥५६॥ विवेकविलासमें लिखा है कि, अमिका,मंडल भाठ महीने, वायुका दो महीने वरुणका एक महीने महेन्द्रका सात दिनतक फल रहता है ।। ५७॥ रुद्रदेवने कहा है कि वायूका दो महीने माहेन्द्रका सात दिन, अग्निका आधे महीने, और वरुणमंडल शीघ्र जल देनेवाला हें ॥५८) वरुण अनिका पृथ्वी संबंधी फल वायव मंडलमें फलकी मदता और एक दूसरेके मिल जानेसे विचारकर इनका फल करे ॥ ५९ ॥ भूमिकप धूलिको वर्षा दिग्दाह अकालवर्पण यदि यह अथवा और उत्पात हो तो यह सब आ कस्मिक कहलाते हैं। ६० ॥ इस प्रकार अन्याय रोग वडाई यह सब उत्पातके फल कहाते हैं ७ भापाटीकासहित । और मंडलकेभी ऐसेही होते हैं जो अग्नि और वायु आदिके उत्पात हो ॥ ६१ ॥ आग्रेयमड लसे दक्षिण दिशा वायुमंडलसे उत्तरदिशा वारुणमडलसे पश्चिमदिशा माहेन्द्रसै पूर्वदिशामें पीडा हो ॥६२ ।। इति मडलविचारः । अथ उत्पातभेद । भूमिकपसें प्रजापीडा वज्र गिरनेसे राजाका क्षय दिग्दाहसे अनावृष्टि धूल वरसनेसैं दुर्भिक्ष ॥६३ ॥ पासु अर्थात् धूलिकी वी सय करती है कुहर भयदाई है दिग्दाह अनिका भय करता है वन गिरनेसें राजाको भय होता है ॥६४॥वर्षावाली हवा और तीक्ष्ण शब्द चोरोंका भय करता है भूकप दुस देनेहारा और सूर्य चंद्रका घेरा दूतको भय देता है । ६५ ॥ ग्रहोंमें युद्ध होनेसे रानानोमे युद्ध हो- केतुके दर्शनमें भी यही हो जो ग्रहणके अंतमें अधिक वर्षा हो तो सब दोष नाश हो ॥६६॥ उ- ल्कापातसे श्रेष्ठ पुरुषका नाश और वृक्षके टूटने से धनीका क्षय और पापाण पत्थरकी वर्षा होनेसे सब अन्न अकरे हौं ॥ ६७॥ विद्युत्पातेजलाभावःमजानाशोधकारिते । ऋतूनांव्यत्ययरोगःसर्वजंतु पुजायते ॥६८॥जंतूनांविकृतोत्पत्तीराजंविघ्नकरीमता। विग्रहोजाय तेघोरश्चंद्रसूर्यविपर्यये ।। ६९ ॥ ग्रहयुद्धेभवेद्युद्धंयुतोचैवमहर्षता । सूर्ये न्दुपरिवेषाणांफलंवक्ष्येस्वयंयतः ॥७० ॥ श्वेतवर्णेभवेद्रव्यंपीतवर्णेरुजा करः। रक्तवर्णेमवेद्युद्धकृष्णवर्णेनृपक्षयः ॥ ७१॥ नीलवर्णेमहावृष्टिधूम वर्णेवधूमरी । स्वल्पेस्वल्पफलंसर्वबहूनांतुफलंमहत् ।। ७२ ॥ जलाद्रावे महावृष्टिविनाशेनृपक्षयम् । अकालेफलपुष्पाणिसस्यनाशकराणिच॥ ॥७३॥यस्यराज्येचराष्टेचदेवध्वंसःप्रजायते॥ सूर्येवो सर्वथापासेसर्वस्या पिमहर्वता ॥७४ ॥ भौमादिग्रहवक्रस्यचक्रेचप्राक्तनंफलम् ॥ ७५ ॥इ तिउत्पातभेदः॥ कपिलंसस्यवातायमांजिष्ठाहरणंगवि। अव्यक्तवर्णकुरु तेबलक्षोभनसंशयः ॥ ७६॥ गन्धर्वनगरंस्निग्धंसप्राकारंसतोरणम् । सो म्यांदिशंसमाश्रित्यराज्ञस्तद्विजयंकुरु ॥७७॥ इति गन्धर्वनगरम् । क पिलाविद्युदनिलंकुर्यात्पीतातवृष्टये। लोहिताआतपायस्यात्सितादुर्मिक्ष हेतवे ॥७८ ॥ इतिविद्युलक्षणम् । श्रावणेभाद्रमासेचकेतवोवारुणादश । जलवृष्टिकरालोकेतदाधान्यसमर्पता ॥७९॥ आधिनेकार्तिकेतैस्फाः सूर्यपुत्राश्चतुर्दश । कुर्युश्चतुष्पदेमृत्युंदुर्भिक्षेचैवनाशनम् ॥ ८॥ वन्हि पुत्राश्चतुस्त्रिंशत्केतवोमार्गपोपयोः । अग्निदाहंचौरभयमनावृष्टिंदिशंत्य मी॥८॥केतवोयमपुत्राःस्युर्माधफाल्गुनयोर्नव। धान्यमहर्घदुर्भिक्षकुर्यु

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वर्षमबोध।
—पमहारणम् ॥८२॥ केतवोऽशादशसुताधनदस्यवसंतकोलोकेसुखमंग
लानिसुभिक्षकुर्युद्यताः॥ ८३॥
अर्थ-विधुत्के उत्पातमें जलका अभाव हो अधकारसे प्रजाका नाश ऋतुओंकी विपरी-
ततामें सब प्राणियोंको रोग हो ॥ ६८ ॥ जंतुओंकी विकृत उत्पत्तिसे राजाको वित होता है
घद्र सूर्यकी विपरीततामें घोर विग्रह हो । ६९ ॥ ग्रहयुहसे युद्ध और धान्यका अकरांपन
होता है और सूर्य चद्रमाका मडल हो तो उसका फल यों कहना ॥ ७० ॥ श्वेतवर्ण इन्यके
निमित्त, पीतवर्ण रोगकारी, रक्तवर्ण युद्ध करनेवाला, कृष्णवर्णमें राजाका क्षय ॥१॥ नि-
लवर्ण हो तो महावा, धून वर्णसे धूम्रता थोडा होनेसे थोडा फल, अधिक होनेसे अधिक
फल कहना ॥७२॥ और उसमेसें जलके फणका साव हो तो अत्यन्त वृष्टि हो और
विम्वके नाशमें राजाको मृत्यु होवे और अकालमें फल पुष्पोंका होना खेतीका नाश
करता है ॥ ७३ ॥ जिसके राज्यमें देवताका ध्वस हो सूर्य चंद्रमाका पूर्ण ग्रास हो तो संव
चीज अकरी हो ।। ७४ ।। मगलादि ग्रहके वक्री होनेमें और मडल बंधनेमें पूर्वोक्तही फल
कहा है ॥ ७५ ॥ गधर्वनगर कपिश यानी भूरा दीखे तो खेतीका नाश करै, मजीठ रंगका
गायोंको पीडा देता है, अप्रकट रंगका बलका क्षोम करता है ॥७६॥ गंधर्वनगर यदि स्निग्ध
परिकोटे ध्वजासहित पूर्वदिशामे दीखे तो राजाकी जय हो ||७७॥ इति गधर्वनगरविचारः ।
भूरी विजली चमकै तो पवन चले, पीली चम तो बहुत वर्षा हो, रक्त गर्मी अधिक
करे, श्वेत चमकै तौ काल पडे ॥ ७८ ॥ इति विद्युदिचारः । श्रावण और भादौ महीनेमें
दश केतु वारुण नाम वाले होते हैं यह लोकमें जलकी वर्षा करते हैं तब नाज
सस्ता रहे ॥ ७९ ॥ क्वार कार्तिकमें तेस्फ नामवाले चौदह सूर्यके पुत्र है यह चौपायोंमें
मृत्यु और दुर्भिक्ष तथा नाश करते हैं ॥ ८० ॥ अगहन पृसमें चौतीस अभिके पुत्र केतु
हैं यह अमिदाह चोरका भय अनावृष्टि उदय होनेसे करते हैं ॥ ८१॥ माघ फाल्गुनमें
नों केतू यमराजके पुत्र रहते हैं यह उदय होकर धान्यका अकरापन दुर्भिक्ष राजामोंमे वि-
ग्रह कराते हैं ।। ८२॥ अठारह केतु कुवेरके पुत्र चैत्र वैशासके दिनोंमें रहते हैं यह उदय
होनेपर सुख मंगल और समिक्ष करते हैं ।। ८३॥
ज्येष्ठापाढोदितावायोःपुत्राविंशतिकेतवः। सवातजलवर्षायैतस्मासाद
भंगदाः ॥ ८४ ॥ एवंपंचोत्तरशतंकचिदष्टोत्तरंशतम् । केचिदेकोत्तरश
तंकेतूनांस्थानकत्रयात् ॥ ८५॥ दशेवरविजागणाःशतमेकोत्तरंततः।
त्रयोविंशावायुजाता शतमष्टोत्तरंतदा । अथकेतूदयफलम् ॥ ८६॥ ए
षांकदाफलमितिज्ञेयमक्षविलोकयेत्।महोत्पातहतेत्रक्षेदेशेनावृष्टिसंभवः
पायदुक्तम् । उक्लापातोदिशांदाहोभूकंपोब्रह्मवर्चसम् । दृष्ट्वाऋक्षम
वेद्यत्रतक्षपीडितंभवेत् ॥ ८८॥

. भापाटीकासहित। अर्थ-जेठ और आपादमें वायुके पुत्र चास केतु उदय होते हैं, उनके तय होने से बात जलवर्षा होती है, प्रचण्ड परनसे वृक्ष और महल टूटते हैं.....८४॥ इस प्रकार कोई एकसो पांच. और कोई एकसो आठ कोई एकसे एक केतूओंको संख्या करते हैं ॥५॥ जो सूर्यके उत्पन्न किये दशकेत मिलाव तो एकसौ एक, वायुके तेईस मिला तो एकसौ आद होते हैं ।। ८६॥ इनका फल देखने के लिये नक्षत्र देखे.नक्षेत्रके हत होनेमें महोत्पति और अनावृष्ट्रिकी प्राप्ति होती है ॥८७॥ उल्कापात दिग्दाह भूकंपको देखकर विद्वान् वि- चारै,जो नक्षत्र उसदिन हो वही पीडित होता है। ॥ ८८॥ TET अथ चंद्रसूर्यग्रहणम् । सूर्याचंद्रमसोयह शुभकरोमार्गेतथाकार्तिकेपोषेधान्यमहर्घताजनभयंव पपुरोमध्यमम् ॥ माघेवांछितवृष्टिरन्नविगमन्स्यात्काल्गुनेदुःखकच्चैत्रेचिं रुगादिलेखकमहापीडासभामध्यमा ।। ८९ ॥ वैशाखेतिलतैलमुद्र तेकासिकनाशयेज्ज्येष्ठेऽवर्षणधान्यनाशनकरस्याद्भाविवर्षशुभम् । आ पाटेकचिदेववर्षतिघनोरोगोऽन्नलाभःकंचिदक्षेमूलफलानिहतिसहसाव शुभशंभवेत् ॥ ९० ॥ गर्भाश्रावणकेऽश्वगर्दममवास्तूचतत्फल्गुन खींग विनिहंतिभाद्रपदकेसोख्यसुभिक्षंजने। कुर्यादाश्विनके थसूर्य, शशिनोरेकत्रमासेग्रहंदवंचेन्नरनायकाबहुवलायुद्धयंतिकोपोत्कटा ९१ अथ चंद्रसूर्यग्रहणफलम्। अर्थ-मूर्य चंद्रमाका ग्रहण कार्तिक और अघहनमें शुभ करता है पूपमें धान्यका अकरा पन मनुष्योंमे भय पुरमें भय मावसे मनके अनुसार वृष्टि अनकी प्राप्ति फाल्गुनमें दुस- में चित्रकार और लेखकोंको महापीडा ॥८९ ॥ वैशाखमें तिलतेल मूंग कपासका. नाश हो ज्याप्टमें ग्रहण हो तो अवर्पण धान्यका नाश और अगला वर्ष शुभ हो आपादमें ग्रहण होतो कहीं वर्षे कहीं रोग कहीं अन्नका लाभ हो घृक्षाके मूल फल टूटप, रोप वर्ष शुभ रहे। ॥ श्रावणमें घोड़ियों और गर्दभिओंके गर्भ पतित हो त्रियोंके गर्भ पतित हों भाद्र- पदमें ग्रहण हो तो सुख हो कारमें सुभिक्ष हो और एकही मासमें सूर्य-चंद्रमाका ग्रहण होनेसें -राजा लोग परस्पर महा क्रोध करके युद्ध करते है ॥११॥ कदाचिद्धिकमासेग्रहणंचंद्रसूर्ययोः। सर्वराष्ट्रभयभंगाक्षयंयांतिमहीभु जः॥१२॥ ग्रहाचपक्षांतेयदिचंद्रग्रहोभवेत्। तदादर्शनिनांपूजाधर्म "द्धिमहोदयः ॥ १३ ॥रसंयुक्तसूर्येन्द्रोहणेनुपतिक्षयः । राष्ट्रभंगइति प्राहुर्मप्राज्ञावैमुनीश्वराः ॥९४ ॥ रविवारेनहेवर्षमध्यमंधान्यसंग्रहा।

वर्षभबोय राजयुद्धचंदुर्भिक्षवृतायस्तैलविक्रयाःगाए । सोमेऽग्रहणेराजग्रहोन्न स्यमहर्घतो । लामस्तैलेघृतादिभ्योभीमेवन्हियभवेत् ॥ ९६ भौमवा ग्रहमानोरन्योन्यनुपतिक्षयः । इन्द्रोहेचकाससूतसूत्रमहर्घती..., -९७ ।। बुधेपूर्णरक्तवस्त्रसंग्रहोलाभदायकः । गुरोरीतिरक्तवस्तुतैलगं: धादिलीभदम् ।।९।।शुक्रेसभिक्षमांगल्यंसर्वलोकशुभंकरम् । शनो युगंधरीलाम-श्यामवस्तुमहर्षता ॥ ९९ ॥ पीतरतवस्त्रतामवृषभादिक संग्रहे । मासद्धयेतस्यलाभइत्युक्तंज्ञानिभिःपुरा ॥१०० ॥ अझैमासि केलाभस्त्रिभागेचत्रिमासिकः चतुर्भागश्चतुर्मासेऽस्तमितेवर्षसमवः॥ ॥ १०१॥ ग्रहणाद्येचसर्वस्मिन्नुत्पातेप्रबलोयदा- पश्चात्संज्ञाततेवोररि टमंगतदादिशेत-॥ १०२ ता,एवमुत्पातरहितेअस्मिन्नुदकयोनिका, जीवा पुगलकादृश्यास्तद्देशेवृष्टिरुत्तमा ॥ १०३॥ एतेनगर्माःसर्वेपिसू चितावातवर्जितामा स्थानांगसूत्रकारेणतेषांनी रात्समुद्भवात् ॥१० ॥ इतिश्रीमेघमहोदयेदेशाधिकारः। Omging कमी आधिकमासमें पढ़ सूर्यका ग्रहण हो तो राष्ट्रमंग भय और राजाभोंका भय हो .९२ ॥ सूर्यके ग्रहणसे पक्षान्तमही यदि चंद्रग्रहण हो तो शाषकारोंकी पूजा धर्म वृद्धि घडे पुरुषोंका उदय हो ॥१९३॥ कूर ग्रह संयुक्त मूर्य चंद्रमांका ग्रहण राजॉका क्षय करता है और मुनिजन कहते है कि वह राज्यकाभी भंग करता है ।।१४॥ जो रविवार के दिन ग्र- हण हो तो यर्प,मध्यम रदै, धान्यका संग्रह करना उचित है राजयह दुर्भिक्ष और घृत तेल अरे हो । ५ ॥ चद्रवार के दिन ग्रहण होनेसे अन्न अकरा तेल घी सग्रह करनेपालको लाभ हो मंगलके दिन सूर्यग्रहण हो तो अग्निभय हो ॥ ९६ ॥ तथा राजामें येई हो चद्रमाका - हण हो तो सूत कपास अकरें विक बुधके दिन ग्रहंग हो तो सुपारी लाल पस्तुके संग्रह करं- नेसे लाम होगा वृहस्पति के दिन होनेसे 'पीत रक्त वस्तु तथा तेल गधादिक संग्रह करनेवा- सेको लाभ होगा 11 १८॥ शुत्र के दिन ग्रहण हो तो सुभिक्ष हो सबको लम हो शनिक दिन अहण हाँ तो युगधरीका लाम और काली वस्तु अकरी हो ॥ १९॥ पीले लाल वस्त्र हानी 'पमादिक इनका संग्रह करना यह दोही महिनेम लाभ देगे ऐसा ज्ञानियों ने कहा है |१००}} या आधेके संग्रहम प्राधेके मासमें लाभ तीन भागमै तीन मासमें लाभ चार भाग ग्रहण क- रमेसे, चार महीनेमें ॥१०१ ग्रहणके प्रारम्भमें,जो संपूर्ण उत्पात यदि मवलं ही और पीछे मेष वर्ष तो अरिष्टभंग होगाय ॥ १०२ ॥ और जो कोई उत्पात यदि न हो तो जल्के जीव बहुत ही भरको वृष्टि हो ॥ १०३ ॥ येते विकार न हो तो जलजन्तुओंके गर्भ वृद्धिको प्राप्त हो ऐसा मंत्रकाराने स्थानका निर्णय किया है। १०४॥ इति श्रीमयमहोदये व प्रयो- अनानि महोपाध्याय श्रीमेपपिजयगणिरुने देशाधिकार। + है भाषाटीकासदिन । 'पूर्वस्याअथवादीच्या पवन शीघ्रवृष्टये । दक्षिणस्यावृष्टिनाशीपश्चिमाया विलंबकः ॥ १॥ आग्नेय्याविग्रहंवन्हेर्भयदृष्टिर्विवाधनम् नत पवनों यावत्तावत्कृर्यान्महातपम् ॥ ॥वायव्यवायुःकुस्तेदृष्टिपवनसंयुताम्, ततःपीडामत्कुणाघाईतयोजीववर्षणम् ॥ ३॥ ऐशानःपवनोविश्वहिता यजलवृष्टये आनंदनंदयेल्लोकेवायुचक्रमिदंमतम् ॥ ४॥ रुद्रोपिखक तमेघमालायामाह वायुधारणमेवेदंश्रृणुतत्वेनसुंदरित सुभिक्षपूर्वयाते जायतेतात्रसंशयः॥५॥ आग्नेयांखंडवृष्टिश्शजायतेगिरिजात्मजे । दक्षि णेईतिविज्ञेयानेत्यांकुलदात्वहे ॥६॥ वारुणेदिव्यधान्यंचवायव्यांतप्ति संभवः।। उत्तराद्याशुभंज्ञेयमीशान्यांसर्वसंपदः ॥ ॥ इतिसामान्यतो वीयुचक्रविचार:। हेमंतेदक्षिणेवायु-शिशिरेनैर्ऋतःशुमः, वसंतेचोष शाश्रेष्ठफलदायीशरत्सुसः॥८॥शरत्कालेतुपूर्वस्या:समीर फलनाश नः विसंतेचोत्तरावायुःफलपुष्पाणिनाशयेत् ।।,९ ॥ आग्नेयानकदा पीष्टऐशान सर्वदाशुभः । नतोविग्रहरोगंदुर्भिक्षंकरतेभयम् ॥ १॥ इतिवातविशेषचक्रमा झंझावातविनाकश्चिद्यदापाच्यादिकोऽनिला स्प भावेनचेदातितदावृष्टिःस्थिराभवेत् ॥ ११ ॥ श्रावणेमुख्यतःमाच्यात भस्येचोत्तरोऽनिलः । वृष्टिंदृढतरांकुर्याच्छेषमासेषुवारुणः ॥ १४ ॥ इति स्थापकतिः॥ अर्थ-पूर्व उचरफी वायुसे शीघ वर्षा होती हैं, पश्चिमकी पवनसे विलम्बमें वर्षा होती है ।। ॥आग्नेयीदिशापी पवनसे अमिका भA वृष्टिकी याचा नीतकी पवनसे महा-ताप ॥२॥ वायत्यकी पवनसे वायु सहित वो छोटे जीवासटमलादिकी उत्पत्ति होती है। मोरइति होती है ॥ ४ ईशानकी पवनसै जगतका मगल होता है; जलकी वृष्टि होती है, लोक मानद होता है, यह वायुचक्र है ॥४॥ रुद्रदेवन,मेघमालामें कहा है सुदरी ! वायुका धारण तत्व विचार से सुन पूर्वकी पवन चले तो सुभिक्ष हो ॥ ५ ॥ अग्नि कोणकी पवन संडवृष्टि करे दक्षिणा और नैऋतकी संतान वृद्धि करे ॥ ६ ॥ पश्चिम दिशाकी पवन दिव्य अन्न उत्पन्न किरै धायु कोणकी तपन करे उत्तरको शुभ और ईशान दिशाकी सब मम्पत्ति कर ॥ ७॥ । यह सामान्यसै वायुचनका विचार कहा ।। हेमत में दक्षिणकी पवन शिशिर ऋतु, नेतकी शुभ हे वसन्तमे उष्ण वायु श्रेष्ठ है वह शरदमें फल देती है,॥ ८॥शरत्कालमें पूर्वकी हवा चले तो फलका नाश कर वसन्तमें उत्तरकी प्रवन फल पुष्पोंको नाश करे आग्नेयी पवन 1 प्रतिवर्षी वाकान होना शलभामुषे स्पीकी अधिकता होनी ईतिहास Im + -पप्रबोधे । कमी मली नहीं ईशानकी पवन सर्वदा सुख करे नेतकी विग्रह और रोग करें दुर्मिी भय हो ॥ १०॥ इति विशेष पवनविचारः। वर्षावाली पवनके विना कभी पूर्वी पवन प्रगट न चलें तो स्थिर वर्षा हो ॥ १२॥ श्रावणमें उ०पा० पूर्वकी, भादोंमें उत्तरकी हवा वर्ग अच्छी करे, शेप महीने में पश्चिमकी अच्छी है ॥ १२ ॥ इति स्थापकवातः।। वत्रासितद्वितीयायांसर्व दिग्भ्रामकोऽनिलः विनामेघतदाभाद्रपदेवृष्टि स्तुयसी॥ १३ ॥ पूर्वस्याउत्तरस्याश्रयायु क्षेत्रसितेतरे । तृतीयायांतदा लोकसमिक्षं प्रचुरंजलम् ॥ १४ ॥.चतुर्थ्यावृष्टियुग्वातस्तदादुर्भिक्षमादि शेत् । चैत्रसितेपिपचम्यांताहगेवफलंभवेत् ॥ १५ ॥ चैत्रद्वितीयादिच तुर्दिनेपुकृष्णेथेपक्षेयांदपूर्ववातः । वर्षायुतोनेवशुंभासितेतुपूर्वोत्तरांवा युरतीवशिष्टः ॥ १६ ॥ चैत्रस्यशुक्लपंचम्यांवायुदक्षिणपूर्वयोवृष्ट्या सहतदावधान्येत्रिगुणमुल्यता ।।.१७॥ एवंच.। चेत्रोर्यबहुरूपस्तुदक्षि णानिलसंयुतः । सर्वोविद्युत्समायुक्तोवृष्टेगर्भहितावहः ॥१८॥ मूलमा रम्ययाम्यांतंक्रमांचैत्रविलोकयेत यावदक्षिणतोवायुस्तावदृष्टिप्रदा यकः ॥ १९ ॥ शुक्लाकृष्णापिवैशाखेऽटमीयदाचतुर्दशी। एषुचेदक्षि गोवातस्तदामेघमहोदयः ।। २०॥ राधेशुक्लतृतीयायांचिन्हैनिधीयते इनिलः। पूर्वस्यायदिवोदीच्योधनाधनस्तदाधनः ॥ २१॥दक्षिणोने तोवायुवृष्टे: स्यात्सतिघातकः ।- वारुणावृष्टिरधिकापरधान्यस्यरो धनम् ॥२२॥ वैशाखशुकतुयेहिसंध्यायामुत्तरानिलः । सुभिक्षायाथपं चम्यामेंद्रोधान्यमहर्षकृत् ॥२३॥ HEMicia;1 । अर्थ-क्षेत्रके महीने दोयजको कृष्णपक्ष में यदि सब औरको वाया चले और मेघन हो तो लादोंमें बहुत वर्षा हो ॥ १३॥ अपवा पूर्व उत्तरको पवन चैत्र कृष्ण पक्षमें पले तीजका 'दिन हो तो मुभिक्ष और जलकी वर्षा अधिक हो ॥१४॥ चौथ के दिन यदि वर्षायुक्त हवा बहे तो दुभित पडे चैत्र शुल्क पंचमीकोभी यदि ऐसेही पवन चले तो यही फल जानना ११५॥ चैत्रकृष्ण पक्ष को हितीया से चार दिन कृष्ण पक्ष में यदि पूर्वकी पपन चलाऔर गाभहो तो शुभ हे शुल्कपक्षमे पूर्व उत्सरं को वायू अधिक श्रेष्ठ है :१६ । चैत्रशुल्क पंचमी- में यदि दक्षिण पूर्व की पवन चले और वर्षा भी हो तो भादों में वाय तिगुने मोल-विक ॥ १७ ॥ यदि चैत्रमें अनेकविध दक्षिण की पवन चले तो मोर विजली चमके तो श्रेष्ठ वर्षा हो ।॥ १८ ॥ मूल से लेकर भरणी नक्षत्रतक चैत्रको देसे अब तक रक्षिणाकी वायु चले तब तक वर्षा हो ॥ १९॥ वेशास्त्र के शुक्ल या कृष्ण पक्षको भश्मी या चौदस में दक्षिणको पवन चले तो मेघका उदय हो। २०॥ वैशास की शुक्लाती- . 4 भाषाटीकासहित । जको चिन्होंसे पवनको जाने यदि पूर्व या उत्तर की पवन चले तो मेघ आवे वा हो ॥ ३१ ॥ जो दक्षिण या नैऋत की पवन चले तो वृष्टि नहो पश्चिम की पवन में वर्षा अधिक और पर- धान्यका निरोध हो ॥ २२॥ वैशाख शुदि ४ को जो उत्तर की पवन चले तो सभिक्ष हो और पंचमी को जो पूर्व दिशा ५ की पवन चले तो अकरा हो ॥२३॥ उदयास्तंगतोयावत्पूर्वावायुर्यदाभवेत्।संगृण्यिाचधान्यानिप्रचुराण्यसु लमान्यथ ॥ २४ ॥ एवंशुद्धदशम्यांचेत्तदापिधान्यसंग्रहः । तथादेशे षुपूर्णायांवायुसम्यगविचारयेत् ॥ २५ ॥ प्रातश्चतुर्घटीमध्येपूर्वावायुर्य दाभवेत् । सूर्या संगमेवाद्यदिनेमेघमहोदयः ॥ २६ ॥ वृष्टिद्धितीयेपि वायुर्घटिकेपूर्वयायुतः॥ ज्ञेयाद्वितीयेदिवसेआर्दीतपनसंगमे ॥ २७॥ पूर्णिमातःसमारभ्ययावज्ज्येष्टासिताष्टमी । एवमादिसूर्यःनवकेत्र टिरुच्यते॥२८॥ सूर्यसौम्यअमायोगेवायुर्वारुणदिग्भवः यदासरत्सुविज्ञे योवायुर्धान्यमहाफलम् ॥२९ ॥ नवमासान्यदापूर्वावायुश्चरतिभूतलें। स्वातौमौक्तिकनिष्पत्तिबहुधान्यादिमंगलम् ॥ ३०॥ ज्येष्ठमासेरविकरा स्तपतिप्रचुरोनिलः । लुकासमन्वितोवातिवनगर्भस्तदाशुभः॥३१॥ ज्येष्ठमासेऽष्टमीकृष्णातथाकृष्णचतुर्दशी । दक्षिणानिलसंयुक्तापरतोत्र टिहेतवे॥३२॥ज्येष्ठस्ययदिपंचम्यांदक्षिणापवनश्चरेत् । तदातिलांस्तथा तैलंघृतकेयंतदाश्विने ॥ ३३ ॥ यदुक्तंमेघमालायांगर्जितंश्रुयतेयदि। दक्षिणस्याभवेद्वायुरवच्छन्नंयदाततः॥३४॥ अर्थ-उदय और अस्तके समय जो पूर्वकी वायु हो तो धान्यका संचय करना उचित है।॥ २४॥ और जो इसी प्रकार शुक्ल पक्षकी दशमी को पवन चले तोभी धान्यका संग्रह करना उचित है इसी प्रकार देशों में वायुका विचार करै ॥२५॥ जो प्रातःकाल चारपडी तक पूर्वकी पयन चले और मूर्यके साय आदीनक्षत्र का संग हो तो-दिनमें मेधफा उदय हो ॥ २६ ॥ आदी और सूर्यके संगम होनसे दूसरे दिन वर्षा हो-जो प्रातःकाल में चार- 'घही भी हो ॥ २७ ॥ पूर्णमासी से लेकर जबतक ज्येष्टकृष्णा अष्टमी हो जो आद्रादि नौ नक्षत्र में सूर्यका योग हो तो अवश्य वपी हो ॥ २८ ॥ जो अमावास्या के दिन सूर्य, चंद्र- मा एकराशीपर स्थित हो और उसदिन पश्चिम की पवन चले तो धान्य अधिक हो ॥२९॥ जो नौ, महीनेतक बराबर पूर्वको पवन चले तो सीपी में स्वातिनक्षत्र में बहुत मोती, हो '३० ॥ जो ज्येष्ठ महीने में सूर्यके किरण बहोत तपे और बहोत पवन तथा मूबलू चले तो भी अच्छी वर्षा हो ॥३१॥ ज्येष्ठ मासमें कृष्णप्रष्टमी और चौदसको दक्षिण की पवन घले तो आगे जाकर वर्षा हो ॥१२॥ येष्ठकी.पंचमी को यदि दक्षिण की पवन M । 'वर्षश्योध। चले तो तिल तेल घृत इनको आश्विन में खरीदना चाहिये ॥३३॥ जो मेवमाला का दक्षि- पकी और गर्जना सुना जाय और उधर हो को चले तो मेयो से माकाग छन रहे ॥३४॥ 'धान्यानांतिलतेलानांसंग्रहः क्रियतेतदा दिगुणत्रिगुणोलाममा मासश्चतुष्टये ॥ ३५ ॥ सिताऽष्टम्यांज्येष्ठमासेचतस्रोवायुधारणाः ।। मृदुवायु १ शुनोवातः २ स्निग्धाम्रः ई स्थगिताम्रकामा ६॥ यादें ताएकरूपास्युःसुभिक्षमुखकारिकाः सांतरालाःशिवातास्तस्कराँग्नि भयप्रदाः ।। ३७ ॥' ज्येष्ठस्य शुक्लोकादश्यांपूजाकृत्वांसुशोभनाम् । शुभमंगलकंकृत्वापुप्पधूपैरलकृतम् ॥ ३८ ॥ उच्चस्थानप्रतिछाप्योदीर्व महाँध्वजः एवंकृत्वाप्रयत्नेनशोधयेत्कालनिर्णयम् ॥ ३९ ॥ एकोवातोयदावातियानिचिन्हानिवापुनः । तदात्रिचतुरोमासान्धर्वव पंतिधारिदः॥ ४०॥ प्रथमपश्रिमोवातश्चतुर्दिनानिवातिचेत् । अनी ष्टिविजानीयादुर्भिक्षरोवंतदा॥४१॥' उत्तरोहयमार्गेणचंतस्रोइतिव दिशः । चत्वारोवापिकामासामेधावपतिभूतले ॥ ४२ ॥ विपरीतोर्यदा वातश्चतस्रोहतिवादिशः रविमार्गेपरिभ्रष्टोजानीयात्तस्यलक्षणम्॥४३॥ शीतकालेतदावृष्टि कालेन विद्यते। अनयोर्वेपरीत्येचंवृष्टिवसनिर्दि शेत् ॥ ४४ वायव्योपश्चिमायांचनेत्यांकातिचक्रमात् । आषाढ़े श्रावणेक्षिमंदोमासोवृष्टिरुत्तमा पूर्वस्यांचतर्थशान्यांमाग्नेय्या वातिचक्रमात् । भाद्रपादाविनोच्छिद्रादातिवृष्टिरुतमा ॥ ४६॥ अर्थ-यदि इस समय घान्य तिल और तेलोंका संग्रह किया जाय तो चार महीनेमे दूना लाम हो ॥ ३५ ॥ ज्येउके शुक्लपक्षकी अष्टमीमें यह चारों वायु मृदुवायु शुनोवात स्निग्धान स्थगिताधक ।। ३६ ।। जो यह सब मिलेहुए चले तो सुभिक्ष और सुख हो और पृथक् होनेसे भली नहीं उनमें तस्कर और अमिका भय होता है ॥३७॥ ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष एकादशी अच्छी प्रकार पूजा करके शुभ मंगल करके धूप दोष कर मगल करे ॥ ३८॥ और दीद- डेको ऊंचे स्थान में स्थापन करके ध्वजा लगावे, यह यत्न पूर्वक करके कालका निर्णय करे जो चार दिनतक एकही उचर की पवन चले तो तीन चार महीने को अवश्य वर्षे ॥ ४०॥ और जो पहले चारदिन पश्चिम की पवन चले तो अनादृधि दुर्मिक्ष और दुःख हो ४५ ॥ और जो चारदिन उत्तर की पवन चले तो चोमासेमें चारों महीने में वर्षा हो ॥४२॥ और जो इससे विपरीत सब औरको पवन चले तो कुलक्षण जानना ॥४३॥ तब शीतकाल. में होगी और चौमासेमें खेंच होगी इस्से विपरीत वर्षा अच्छी जानना ॥४४॥ वायन्य पश्चिम के कोण और नैऋत्य की पवन चले तो आपाठ और श्रावण में अच्छी वर्षा हो।४५॥

१५ भापाटीकासहित । और: पूर्व-ईशान्य और ममिकोण की क्रमसे पवन चले तो भादों और कारक -अन्तमें अच्छि वर्षा हो.।।१४६ ॥.... अमावास्यांचपूर्णीयांज्येष्ठमासदिवानिशमा मेघेराच्छादितव्योग्निवातावं. हतिवारुणः॥.४.॥ अनावृष्टिस्तदादेश्याकविष्टिस्तुभाग्यतः मा. सोदोश्रावणापाढीपूर्णभाद्रपदाधिनी ॥४८ ।, आषाढशुक्लपंचम्यांप: श्चिमोयदिमारुतः। वर्षागर्जितंसंयुक्तःशकचापेनभूषितः॥४९॥ तदा संगृह्यतेधान्यंकार्तिकेतन्महता। लाभायजायतेनूननान्यथाऋषिमापि तम् ॥१०॥ आषाढशुक्लपक्षस्यद्वितीयायांनवर्षति। यदिमेघस्तंदावृष्टिः श्रावणेजायतेष्टुवम् ॥ ५१॥ तृतीयायांपूर्ववायुःपूर्वागामाचवारिदः।। 'घनामेधास्तदाभद्रेवर्षेतिविपुलंजलम् ॥५२॥ चतुर्थ्यांदक्षिणोवायुर्मेधः पूर्वेचगच्छति । आश्विनेचतदामासेदृष्टिर्भवतिनिश्चितम् ॥ ५३॥ वृष्टे दिनचतुष्केऽस्मिन्वातेपूर्वोत्तरागते । अतिवृष्टिमुभिक्षचंदुर्भिक्षचतदन्य यां॥५४॥ सर्वरीयदाभ्राणिवातोपूर्वोत्तरोयदि । तस्मिन्वपकणाः घुटाभवति विमंगलम् ॥ ५५ ॥ यदिवांनाभ्रलेशं स्याद्वातीपूर्वोत्तरी नहिं नवपतियदादेवोदुष्टकालतदादिशेत् ॥५६॥ यंत्रानेस्वल्पकेजी तेमध्येवातेल्पवर्षणम् । यत्रमास विभागेचनिर्मदृश्यतेनमः ॥५७) तनहानिश्चवृष्टेश्विज्ञेयंगर्भपातनम् । यत्राद्मपंचनाडीपुवातीपूर्वोत्तरीय दि॥ ५८ ॥ तत्रमासेमवेदृष्टिरित्येवसर्वनिर्णयः । आषाढ्यारात्रिका लेपिपवनःसर्व दिग्गतः ॥ ५९॥ अर्थ-जो ज्येष्ठ महीने की अमावास्या और पूर्णमासी के दिनरात प्रकाश बौदलासे आच्छादित रहें और पश्चिम की पवन चले तो ॥४७॥ अनावृष्टि जॉननी कदी माग्यं सेही वर्षा होगी श्रावण आषाढ भादों और कार ऐसे ही विना चवीत जाय ॥४८॥ और यदि -आपाद शुक्ल पंचमी के दिन पश्मि की पवन चले तो गर्जन शब्द सहित वर्षा हो और इन्द्रका अनुष्य उदय हौं ॥ ४९ ॥. उस समय भी पान्य संचय करना श्रेष्ट है कारण कि कार्तिक में अफरा होने से काम होगा-ऋपियों का भाषण अन्यथा नहीं है.॥५०॥ जो आपाद शुक्र पक्षकी दोयज को न पै और मेघ हो तो श्रावण में अवश्य वर्णहोः ॥५१॥ जोतिीजके दिन पूर्वको पवन और पूर्वको मेघ जाता हो तो मादी में अधिक वर्षा हो ।। ५२॥ और चायके दिन दक्षिण की पवन चले पूर्व में मेघ चले तो कारमें अवश्य वा हो ॥५३ ।। इन-वी के चारों दिनमें यदि पूर्व की पवन चले नो अनि वृष्टि और मुभित हो. अन्यथा' हु. .. .

१६ प्रयोग। मिक्ष जाननों ॥ ५४॥ जो इनमें सारी रात वादल रहे उत्तर और पूर्वको पवन चले तोभी पृथ्वी में मगल हो वा तथा धान्यको उत्पत्ति हो॥१५॥ और जो वादलोंका लेशभी नहीं पूर्व उचर की पचन मी नचले वर्षा नहो तो बुरा समय जानना वर्षा नहोगी ॥५६॥ जो थोडे वादल कुछ हवा चले तो थोडी वर्षा मध्यमें जाननी और मासके विभाग ( अन्न ) में मा- काश निर्मल हो तो॥ ५७ ॥ वर्षा की हानि और वर्षाका गर्भपात हो और पांचो नाडी में मेघ तथा पूर्वतिर को पवेन चले ॥५८॥ तो पोप मेंदीनेमें अवश्य वर्षा जाननी और आपाठी पूर्णिमा को रात्रिके समय जो सब ओर की पवन चले तो ।। ५९ ॥ अभैरवृष्टेरपिचपूर्णिमासुखदायिनी । आद्ययामेयदाभ्राणिवातीपूर्वोत्त रोयदि ॥६०॥ आधेमासेतदावृष्टिांछितादधिकाक्षितौ । आषाढयां चविनटायांनूनंभवतिनिःकणम् ॥ ६१ ॥ ग्रहणवृक्षपाताद्यैर्मत्यंनश्यति पूर्णिमा । प्रथमाघटिका:पंचआषाढापंचश्रावणः ।। ६२ ॥ पंचभाद्रपदो मासस्तथापंचाग्नितःपुनः यत्रामाकुलनाडीषुवातीपूर्वोत्तरौस्फुटम्॥६॥ तत्रमासेभवेदृष्टितिरैपिशुभेःशुभः1 ये मासेषुयेदग्धागांम्पोषादि संभवा ॥ ६४॥ तन्मासपंचभागेपुरात्रौचंद्रोतिनिर्मलः । पौषादिसंभ वेगमेंटुवमुत्पातसंवः ।। ६५ ॥ तेनाषाढीदिवारात्रौद्रष्टव्यावृष्टिहेतवे। यापाढ्यामहोरात्रमग्रेर्वातैःशुमैर्युतम् ॥ ६६ ॥ तदागर्भाःशुमाझेयाः शीतकालेपिधीमता । एकमेवदिनप्रेक्ष्यवर्पज्ञानायधीधनैः॥ ६७॥चे दष्टम्यांशुभ्रमभ्रंवातैवर्षभवेच्छुभम् । आषाढयांनिर्मलश्चंद्र-परिवेषयुतोध वा॥ ६८ ॥ तदाजगत्समुद्धत्तुंशक्रेणापिनशक्यते । कुहूतःपोडशेचा न्हिलक्षणंचिंतयेदिदम् ॥ ६९ ॥ अस्तंगच्छतितिग्मांशोतस्मादपशु भाशुभम् । आपाड्यांपूर्वदातेचसर्वधान्यामहीभवेत् ॥ ७० ॥ आग्नेय वातेलोका स्युरुद्धिनाश्चातिरोगत दक्षिणेपवनेराज्ञांमहायुद्धंपरस्परम् ७१ अर्थ अथवा पूर्णिमाके दिन धादल तथा वर्षा हो तो बहुत अच्छी है यदि प्रथम पहरमें वाटल हों पूर्व उत्तरको पवन चले ॥ ६० ॥ तो प्रथम मासमें इच्छासेभी अधिक वर्षा हो और पूर्णिमाके क्षय होने वा नहो ॥६॥ ग्रहण वृक्षपातादि उत्पात पूर्णिमाके नष्ट होनेसे होते है पहली पांच पडीमें आपाद ।। ६२॥ श्रापण भादों और आश्विनमे जो मेघ हो और पूर्व या उत्तरकी पवन चले ।। ६३ ।। तो पॉप मासमें घृष्टि हो पवनभी अच्छी चले जिन मही- 'नो जो पौपादिके उत्पन्न हुए गर्म नष्ट हुए हैं ।। ६४ ।। इन महीनोंमे पांच रात्रिमें यदि - न्द्रमा निर्मल हो तो पोपादिके हुए गर्भम निधय उत्पातकी प्राप्ति हो ॥६५ । इससे वीके निमित्त भाषादी पूर्णिमा पूजन करना चाहिये यदि आपाढी पूर्णिमामै दिन रात शुभ पवन " भापाटीकासहित । १७ चले ॥६६॥ तो शीतकालमें अच्छे गर्भ हो बुद्धिमानोंने ,एकदिन वर्षांके निमित्त देखना चाहिये ॥ ६७॥ जो आपाढकी अष्टमीको अच्छे बादल हों और पवन चलकर वर्षा हो तो वर्ष अच्छा हो और जो आपाढी पूर्णिमाको चंद्रमा निर्मल और (पोसर) मडल सहित हो॥८॥ तो जगतके उद्धार करनेको इन्द्रकोमी सामथ्र्य नहीं इसका लक्षण बुद्धिमानको विचार करना चाहिये ।।६९॥ जो सूर्यके असे होनेपर आपाढी पूर्णिमाकै दिन पूर्वकी पवन चले तो पृथ्वी धान्ययुक्त हो ॥ ॥ अग्निकोणकी चले तो रोग हो दक्षिणकी पवन चले तो राजोंमें घोर युद्ध हो ॥७१।। नैर्ऋतनिर्जलाभूमिर्धान्यसंग्रहकारणम् । वारुणेप्रबलावृष्टिर्धान्यनिष्प त्तिहेतवे ॥७२॥ वायव्येमत्कुणात्पीडामशकाद्यास्तथेतयः । उत्तरापवने लोकागीतिमंगलपूरिताः ॥ ७३ ॥ धान्यंधनंतथैशानेसुखंधान्यसम घेता। इत्यापाठीवातचक्रमापाठेघनशेखरम् ॥७४ ॥ गर्जतियदिवामे घोवातिचोत्तरःपवनः । दशमेतदानीं विमेघमहोदयंकुर्यात् ॥ ७५ ॥ अर्धविनापाढपूर्णावातीपूर्वोत्तरोयदि । यत्रयामार्द्धकेतत्रमासेवृष्टिहिवा भवेत् ॥ ७६ ॥ भवेत्पूर्वोत्तरोवातौनचान्ननापिवर्षणम् । आषाढ्यां तर्हिर्विज्ञेयंदुर्भिक्षलोकदुःखदम् ॥ ७७ ॥ मार्गमाससिताष्टम्यांपूर्वा 'वातःसुभिक्षकृत । अन्यतःपवनःकुर्याददुर्भिसंभाविवत्सरे ॥ ७८ ॥ एकादश्यांपोपकृष्णदक्षिणु-पवनोयदा । विद्युद्वादलसंयुक्तस्तदादुर्भिः -क्षकारकः ७९ ॥ पौपस्यशुक्लपंचम्यांतुषारःपवनोयदि । तदाग र्भस्यपीडास्याद्भाविवहितावहः ॥ ८० ॥ । अर्थ-नैरतकी पैवन चले तो पृथ्वीपे जल न वर्षे उसमें धान्य संग्रह अवश्य करना और पश्चिमकी पवन चले तो बहुत वर्षा हो धान्य उत्पन्न हौं ॥७२॥ वायव्यकी पवन चले तो खटमल डाँस आदि बहुत उत्पन्न ही उत्तरकी पवन संसारमें गीत-और मगलकी फरने हारी है ॥७३॥ ईशानकी पवन चले तो सुख हो धान्य सस्ता हो इस प्रकार आपाढी पूर्णिमाके पातचक्रका विचार है ॥ ७४ ॥ जो आपाढी पूर्णिमाको बादल भाजाय और गर्ने तथा उत्त- रंकी पवन चले तो शुभ हो ॥७५ ।। और जो इस पूर्णिमाको बादल न हो तथा पूर्व उत्त- रकी पवन चले और आधे पहर ऐसा हो तो पोप मासमें वर्षा हो ॥५६॥ और जो बादल नहो कभी पूर्व कभी उत्तरकी पचन चले तो इस पूर्णिमाके फल्सै लोकमें भयदाई"दुर्मिक्ष हो ॥७७ ॥ मार्गशीर्षकी शुमा अष्टमीमें पूर्वकी पवन मुभिक्ष करती है दूसरी ओरकी दुर्भिक्ष करती है ॥ ७८ ॥ पौष कृष्ण एकादशीके दिन यदि दक्षिणकी पवन हो और बिजली बा- दल सयुक्त हो तो दुर्भिक्ष करे ॥ ७९ ॥ पोप शुरू पचीको यदि महाशीत युक्त पान चले तो गर्मपीडा और अगला वर्प शुभ हो॥ ८० ॥ ज ३ वर्षप्रबोध ।। .. " 'पंचम्यांव्योमखंडेपियदावशीतलोनिलः । विद्युन्मेघसमायुक्तस्तदागों दयोध्रुवम् ॥ ८१ ॥ माघेशुक्लप्रतिपादिवायुर्दिलसंयुतः । तैलादिसर्व सुरभिमहर्घजायतेभुवि । ८२ माघस्यशक्तपंचम्यविष्टियुक्तोत्तरानि । लः अनावृष्टिर्भाद्रपदेकुर्याद्धान्यमहर्षता, ।।.८३ ॥ शक्लेमावस्यसप्त म्यांवारुण्यांविद्युदभ्रयुक । ऐन्द्रोवातोथकौवेरोदिवाविंशसभिक्षकृत् ॥ १४ ॥ माघस्यनवमीकृष्णादशम्येकादशीतथा । सवातावियतायु तात्कथयन्तिजलंबहु ॥ ८५ ॥ अमावास्यामहोरात्रंहिमोवातस्तुष्टिक त्। पूर्णमास्यांभाद्रपदेकुर्यान्मेघमहोदयम् ।। ८६ ॥ फाल्गुनेविखरोवा गुर्वातिपत्राणिपातयन् । दक्षिणोतिमृदुश्चैत्रेमेघगर्भहितायसःeir हुताशन्यादीप्तिकालेऐन्द्रःस्यादतिवृष्टये । औदीच्योधान्यनिष्पत्त्यैदुर्भि क्षदक्षिणोनिलः॥८८॥ वारुणोमध्यमवर्षमुच्चैातोभयंकर चतुर्दि क्षुमहद्वाराज्ञायुद्धप्रजाक्षयः ।टि९॥ चैत्रस्यशक्लपक्षेचेचतुर्थीपंचमीदि ने । वर्षणमाक्छु किंचित्क्रमादुत्तरतोनिलंः ॥ ९ ॥ अर्ध-और पंचमीके दिन शीतल पवन बिजली मेघ सहित हो तो. मेघके गर्भकी वृद्धि हो ॥ ८१॥ जो माघ शुम प्रतिपदाके दिन वायु सहित बादल घिरे हो तो तेल और सुर्गन्धित वस्तु अकरी विक ॥ ८२॥ माघ शुक्ल पंचमीको वृष्टि युक्त पवन चले तो मादीमें बपी न हो धान्यं भाव तेज हो ॥ ८३ ॥ जो माघशुदि सप्तमीके दिन पश्चिममें बिजली और बादल हौं तथा पूर्व और उत्तरको पवन चले तो वीस दिन महा समिक्ष हो ॥८४॥ माघ- कृष्ण नोमो दशमी और एकादशीको विजली-चमक तथा पवन-चते तो भधिक वर्षा हो ।। ८५ ॥ जो अमावास्याके दिन दिनरात शीतल पवन चले तो वर्षा होकर मादौंकी पू- र्णिमाको महावृष्टि हो ।। ८६ ॥ जो फाल्गुनमे तीक्ष्ण पवन चलकर वृक्षोंके पत्ते गिरावे और दक्षिणकी मृदु पवन चले तो मेघोंसे शुभ वृष्टि होती है ।। ८७ ॥ जो होली जलानको समय पूर्वको पवन चले तो अच्छी वर्षा हो उत्तरकी चले तो धान्यकी वृद्धि और दक्षिणको दु- भिक्ष करै ।। ८८ ॥ पश्चिमकी पवनसे वर्ष मध्यम र तीक्ष्ण पवनसै भप, चारौंओरकी पवन चलनेसे राजामें यह और प्रजाक्षय होती है।।1,८९ ॥ चैतसुदि चौथ और पंचमीके दिन कुछ-वर्षा हो तो शुभ है और जो,क्रमसे उत्तरादिशाकी पवन चले ॥ ९॥ वादलाच्छांदितव्योमएतलक्षणदर्शने 'गोधूमःश्रावणेमातेत्रिगुणलाम मादिशेत् ॥ ९१ ॥ इत्येवंज्ञापकोवांतःसंक्षेपेणसमीरितः । ग्रंथोन्तरादि शेपोपिविज्ञेयःमानपुंगवेः॥१२॥ न , मापाटीकासहित। इतिश्रीमेघमहोदये वर्षप्रबोधेश्नीमेघग़ाणि विरविते द्वितीयो याताचिकार) मर्थतया आकाश बादलोंसे आच्छादित हो यह लक्षणा होती गेहसे श्रावण में तिगुना लाभ ही ५-११इस मुकार बातचक्रका वर्णन सोपस किया। पण्डित, जन दूसरे प्रेयोंसे विशेष जान सक्ने हुँना ॥ इतिश्री मेवमहोदये वर्ष प्रबोधे देव, गणि, विरचिते मापाटीकायांद्विती योधिकारः ५ शकेन्द्रकालेर्फयुतेकृतेशून्येरसैहते । शेपाःसम्वत्सराज्ञेयामभवाद्यावुधैः क्रमात ॥१॥सएवपंचाग्निकुमियुक्तःस्यादिक्रमस्यहि वाया Pिउत्तरेतीरसम्वन्नामोतिविश्रुतः ॥ २ ॥ संवत्कालोहयुतःकृत्वाशन्य' सेहताः। शेषा सम्वत्सराज्ञेया प्रभवाद्याबुधैःक्रमात ॥ ३॥ प्रभवोवि भवःशुक्ल प्रमोदोथप्रजापतिः अंगिराश्रीमुखोभावोयुवाधातातथैवच- ॥४॥ईश्वरोबदुधान्याप्रमाधीविक्रमोवृषः । चित्रभानुसुभानुश्चतारणः " पार्थिवाव्ययः॥ ५ ॥ सर्वजित्सर्वधारीचविरोधीविकृति खरानिंदनो,. विजयश्चैवजयोमन्मथदुर्मुखी ॥ ६॥ हेमलम्बीविलम्बीचविकारीशार्व, रीप्लवः शुभकच्छोमन क्रोधीविश्वावसुपराभवो ॥७॥.. अर्थ-शालिवाहन शाकमें जिस सम्वत्सरका नाम जानना होय उसकी यह रीति है कि शाकको संख्या लिखकर उसमें बारह मिलावे और ६०का माग दे जो शेप बचे सोहि सम्ब- त्सरका नाम जानेगा जो शालिवाहन शो में १३५ मिलावे तो वही विक्रमका सम्वत्सर होनायाजो रेवानदीके उत्तर तटमें माना जाता है ॥ २॥ सम्वत्सरके अकमें नौ मिलाकर ६०-फा माग दे, जो शेप रहै सो प्रमादि सम्वत्सर जानना ॥ ३ ॥ प्रभव विभव शुक्ल प्रमोद प्रजापति अगिरा श्रीमुखा भाव युवा धाता ॥ ४॥ ईश्वर बहुधान्य प्रमाथी विक्रम वृप चि- वमान सभानु सारण पार्थिव व्यय॥ सर्वजित् सर्वधारी विरोधी विकृति सर नदन वि- जय जय गन्मय सुमुख गा६ ॥ हेमलम्पी विलेची विकारी शायरी प्लव शुभकत गोभन प्रोपी विधावसापराभव ॥ ७ITTन । 'प्लवंगाकीलकासोम्यासाधारणविरोधकृत् । परिधावीप्रमादीचआनंदो राक्षसोनल व पिंगलःकालयुक्तश्चसिद्धार्थीरोद्रदुर्मतिम टुंदुभीर धिरोदारीरक्ताक्षकोचन क्षयः शानिरीतिसकलोदेशासस्यनिष्प त्तिवनत खिस्थिताभूभुजी सर्वेप्रभवेमुखिनोजना| दिंडनी तिपराभूपाःबहुशस्यार्पवृष्टयः । विभवान्दखिलालोका मुखिनोनिरवैरि - २० । वर्षप्रबोध । ण|११|शुक्लाब्देनिखिलालोका:सुखिनःस्वजनेःसंह राजानोंयुद्ध। निरतापरस्परजयैपिणः ॥१२॥ प्रमोदाब्देममोदन्तराजानोनिखिलीज नागवीतरोगावीतभयाईतिशत्रुविनाशकाः॥ १३॥ नचलन्त्यखिला लोकःस्वस्वमार्गात्कथंचन । अब्दप्रजापतेनूनंबहुसस्यार्घवृष्टयः ॥१४॥ अन्नाद्यभुज्यतेशश्वजनैरतिथिभिःसह । अगिर्राब्दखिलालोकाभूपाच कलहोत्सुकाः ॥१५॥ अर्थ: प्लवंग कीलक सौम्य साधारण विरोधत परिधाची प्रेमादी आनंद राक्षस मल ॥ ॥४॥ पिंगल कालयुक्त सिद्धार्थी रोद्र.दुर्मती दुभी रुधिरोदारी रक्काक्ष कोधी क्षमता यह साठ सम्वत्सर हैं सचदेवा ईति रहित खेतीकी उपज अच्छी सव. राजा प्रसन्न माणी सुखी यह 'प्रभव सम्वत्सरका फल है ॥ १०॥ राजा दंडनीतिमें तत्पर बहुत खेती और वर्षा अच्छी हो विभवसम्वतमें सब लोक सुखी और निर्देर हो । ११ शुक्ल सम्वतम संजनासहित सबलोक प्रसन्न हों राजा परस्पर जीतनेकी इच्छासे युद्ध करें ॥१२॥प्रमोद सम्वनमें सब राजा और मनुष्य प्रसन्न हो रोग और भय रहित हों इति और शत्रुका नाश हो। १३ ॥ प्रजापतिवर्ष में मनुष्य अपनी मर्यादाको रेखा मात्रभी न त्यागें खेती और वर्षा अच्छी हो । ॥१४॥ अगिरावपमें मनुष्य निरन्तर अतिथियोंके साथ अन्नादि भोगकरें सब लोक और राजा कलहोत्सुक हो ॥२९. • EFFERENNET श्रीमुखाब्देखिलाधात्रीबहुसस्यार्घसंयुता। अध्वरेनिरताविप्रावीतरोगा विवैरिणः ॥१६॥ भावान्देप्रचुरारोगामध्यांसस्यार्घवृष्टया राजानोयु. दनिरताः तथापिमुखिनोजनाः॥१७-1) प्रभूतपयसोगावःमुखिनासा. - वजन्तवः । सर्वकामक्रियासक्ता युवाब्दयुवतीजनः ॥१८॥धातृवर्षे "खिलाक्ष्मेशाःसंग्रामेसक्तमानसाः। संपूर्णधरणीभातियहुशस्या_ष्टिमिः ॥ १९ ॥ ईश्वराब्देखिलान्जन्तून्धात्रीधात्रीवसर्वदा । पोपयत्यखिलान्- लोकाननात्र कार्याविचारणा ॥२०॥ बहुविधाजायतेवृष्टिर्बहुधाख्यस्य वत्सरे। विविधैर्धान्यनिचयैःसंपूर्णीचाखिलाधरा - ॥ २१॥ नमुंचति पयोवाहा कुत्रचित्मधुरंजलं। मध्यमांवृष्टिरर्थश्चनूनमब्देप्रमाथिनि।।२९॥ विक्रमाब्देधराधीशाविक्रमाक्रान्तमूर्तयः । सर्वत्रसर्वदामेघासुचन्तिमचु रंजलें ॥२३॥ धृषभाब्देखिलाक्ष्मेशा युद्धयन्तेवृषमाइवा मत्ता प्रसक्ती विप्रेन्द्रासततंयजतान्मरान् ॥ २४॥ चित्रार्थवृष्टिसस्याये विवित्रानि खिलाधरा, निराकुलाखिलालोकाःचित्रभानोश्रवत्सरे ॥ २ सुमा -TI २१ भापाटीकासहित । नुवत्सरेभूमोभूमिपानांचविग्रहः जायतेघोररूपणसर्वभूतभयंकरः॥२६॥ कथंचिन्निखिलालोकान्तरंतिप्रतिपत्तनं । रोगशोकसमावेगात्रेतारण काब्दकारणापार्थिवाव्देचराजानःसुखिनःस्युर्मुशंजनाः।बहुभिःफल पुष्पायैःविविधैश्वपयोधरैः ॥२८॥व्ययाब्देनिखिलालोकाबहुव्ययपरा मृशं। उद्विग्नादुःखभारेणभूमिभितिश्वसर्वदा ॥२९॥ सर्वजित्वत्सरेसर्वेज ना त्रिदशसन्निभाःराजानोविलयंयांतिवीरसंग्राभशूमिपु॥३०॥सर्वधा र्यब्दके पाजापालनतत्पराः। प्रशान्तवैराःसर्वत्रबहुसस्यार्पवृष्टयः३१ अर्थ श्रीमुखवमपृथ्वी धन धान्यसै पूर्ण हो ब्राह्मण यज्ञकरें रोग और वेर रहित हो । ॥१६॥भाम वर्षमें,बहुतरोग हो वा मध्यम हो राजा युद्ध करें तथापि मनुष्य सुखी हों। ॥१७॥ गो बहुत दूध दे सव प्राणी प्रसन्न हो युवावत्सरमें स्त्रीजन कामक्रिया प्रासक्त हो ॥ १८ ॥ पाता वर्षमें सबराजा संग्राममें मन लगावें सब पृथ्वी वर्पाहारा धन धान्यसे पूर्ण हो१९॥ ईश्वर वर्षमें पृथ्वी संब प्राणियोंको माताको समान पालन करे इसमें संदेह नहि ॥ २०॥ बहुधान्य वर्षमें बहुत वर्षा हो पृत्वी अनेक प्रकारके अन्नसे पूर्ण हो ॥२१॥ प्र- माथी वर्ष में कहीभी अच्छी वर्षा नहो मध्यम वर्षा हो ॥ २२ ॥ विक्रम वृपवर्षमें राजा युद्ध करनेमें मन,लगा,और वर्मा, सब स्थानमें अधिक हो ॥ २३ ॥ वृषवपमें सब राजा मत्त वृष- भकी समान युद्ध करें और ब्राह्मण निरन्तर देवताओंका पूजन करें ॥ २४॥ वर्षा विचित्र हो सब पृथ्वी धनसे-पूर्ण हो चित्रभानु सम्वत्सरमें सवलोक प्रसन्न हो ॥ २५ ॥ सुभान स- वित्तरमे राजोमें विग्रह हो जिसमें सबमाणी डरें ॥ २६ ॥ तारण संवत्सरमें प्राणी कठिन- -तासे रोग शोक और संकटसे पार हौं ॥ २७ ॥ पार्थिव सम्वत्सरमें सब राजा प्रसन्न हो मनुष्य प्रसन्नहो पृथ्वी, धनधान्यसे पूर्ण हो वर्षा हो ॥ २८ ॥ व्यय सम्वत्सरमें सब मनुष्य बहुत व्यय करें और पृथ्वीपै दुःख हो भय हो ॥ २९ ॥ सर्वजित्सम्बत्सरमें देवताओंकी समान मनुष्य हो राजा समरभूमिमें प्राण त्या- ॥ ३० ॥ सर्वधारीवर्षमें राजा प्रजा पाते, सब बररहित हो पृथ्वीमें बहुत वर्षा हो ॥ ३१॥ । शीतलादिविकारस्यात्बलानांतस्कराजनाः। अल्पक्षीरास्तथागावोवि रोधश्चविरोधिनि ॥३२॥ मुष्णन्तितस्करालोकविकृतिप्रकृतिस्तथा । विकाराअल्पवृष्टिश्चविकृतेन्देमजारुजः॥३३॥ स्वल्पादृष्टिं स्वल्पधान्य IF खण्डवृष्टिनृपक्षयः। छत्रभंगःप्रजापीडाखरेब्देखरताजने ॥ ३४ ॥ सुमिः क्षमुखिनोलोकाःव्याधिशोकविवर्जिताः। नन्दनंचधान्य नन्दनेव. त्सरेभवेत्।। या युध्यन्तेभूभृतोन्योन्यंलोगानांचधनक्षयं । दुर्मिकंव कचितस्वस्थबहुसस्यार्घवृष्टयः ॥३६॥ जयमंगलघोषाधै धरणीमाति -- म سر - वर्पप्रबाध। सर्वदा । जयाब्देधरणीनायःसंग्रामेजयकांक्षिणाः॥ ३७॥ मन्मथाब्द जना शर्वेतस्कराअतिलोलुपः । शालीचयवेगोधूमैर्नयनामिनवाधरा।। ॥३८॥ दुर्मुखाब्दभध्यवृष्टिरीतिचौराकुलाधरा ।, महावैरामहीनाथावी वारणवाजिभिः ॥३९॥ हेमलम्बेत्वीतिभीतिमध्यसस्यार्धवृष्टयः। मा तिभूर्भूपतिक्षोमखड्गविद्युल्लतादिभिः॥४०॥ विलंबिवत्सरेभूपाः परस्प रविरोधिनः। प्रजापीडात्वनर्थत्वंतथापिमुखिभोजनामा ४१॥ विका र्थब्देखिलालोका सरोगावृष्टिपीडिताः। पूर्वसस्यफलस्वल्पंबहुलंचापरफ लम् ॥ ४२ ॥ शर्वरीवत्सरेपूर्णाधरासस्यार्थवृष्टमिः। जनाश्चसुखिनःस राजानःस्युर्विवैरिणः॥४३॥ प्लवादेनिखिलाधात्रीवृधिमिम्प्रवसति भाः। रोगांकुलात्वीतिमीर्तिसम्पूर्णवत्सरेफलम् ॥४४॥ शुभकृत्वत्सरे पृथ्वीराजतेविविधोत्सवैः। आतंकचौरा भयदायजान समरोत्सुकाः४५, अर्थ-विरोधि सम्वत्सरमें शीतलादिका विकार हो, तस्करोंका बल हो 'गायें थोडा दूध दें और मनुष्योमें विरोध हो ॥३२॥ चोर बहुत चोरी करैपीडाहो धान्य'कमतीहोन- "नीको पीडा मध्यम जलवृष्टि यह विकृत सम्वत्सरका फल है ॥ ३३॥ स्वर सम्वत्सरमें घोडी वर्षा थोडाही धान्य खण्डवृष्टि राजाका क्षय क्षत्रभग प्रैजामें पीडा मनुष्योधिरता हो॥३४॥ नन्दन वर्षमें मुभिक्ष लोकसुखी व्याधि शोकसे रहित धन धान्यकी अधिकता होगा३५॥ विजय सम्वत्सरमें राजा परस्पर संग्राम करें लोगोंका धनक्षय होदुर्भिक्ष पडे 'कहीं स्वस्थता होवो अच्छी हो ॥ ३७॥ जय सम्वत्सरमें जय मगलके शब्द हों पृथ्वी प्रसन्न हो राजास- ग्रोममें जयकी इच्छा करें।॥ ३७॥ मन्मथ वर्पम चोर और दूसरे लोक महालोभी होजाय 'धान्य ऊस यवं गोधूमसे पृथ्वी पूर्ण हो ॥ ३८॥ दुर्मुख वर्षमें मध्यम वर्षा हो ईति और चो- सकी अधिकता हो और राजा वीरगण तथा हाथी घोडोमें विरोध हो ॥ १९॥ हेमलम्ब - म्यतमे इति भीति हो थोडी वर्षा हो पृथ्वी शोभित और राजोंको क्षोम हो बिजली अधिक चमकै ४० ॥ विलम्बी सम्वत्सरमें राजा परस्पर विरोध करें प्रजामें रोग-और अनर्थ हो प- रन्नुअन्त में मनुष्य सखी हो ॥ ४१ ॥ विकारी चर्पमें सर्वप्राणी रोग और वर्षासे पीडित हो प- हलफल थोर्ड और अधिक हो ॥ ४२ ॥ शार्वरी वर्षमे पृथ्वी धान्यसे पूर्ण हो सब मनुष्य प्र- सभ राजा धेररहित हो । ४३ िलय वर्षमें बहुत वर्षा हो रोग अधिक और सम्पूर्ण वम इति भौति जया रोग रहे। ॥४४॥शुमहत्वपमें पृथ्वी अनेक उत्सवोंसे पूर्ण हो चोर हरे राजा युद्धकी इन्करें".४५ ॥ Ans शोभेनेवत्सरेधात्रीप्रजानांरोंगशोदा। तथापिसुखिमोलोकाम्बहुसंस्था र्घष्टयः॥४६॥ोध्यब्देत्वखिलालोका क्रोधलोभपरायणः । ईतिदोषण २३ T भापाटीकासहित । -सततंमध्यसस्यार्धवृष्टयः॥४७॥अब्देविश्वावसोशश्वदद्योररोगाकुलाध. रा शिस्यार्घवृष्टयोमध्याभूपालानातिभूतयः॥४८॥पराभवाब्दरीज्ञास्या तर्समर सहशत्रुभिः।आमयक्षुद्रसस्यानिप्रभूतान्यल्पवृष्टयः॥४९॥प्लवंगा... ब्देसध्यवृष्टिरोगचौराकुलाधरा । अन्योन्यसमरेभूपाःशत्रुभिःहत मयः - ॥५०॥कीलाब्दत्वीतिरभीतिश्चप्रजाक्षोभनृपाव्हयौ। तथापिवर्धतेलोकः समधान्यावृष्टिभिः ॥५१॥ सौभ्याब्देनिखिलालोकाबहुसस्यार्पवृष्टि भिः। विवैरिणोधना(शाविपाश्चाध्वरतत्पराः॥५२॥ साधारणाब्दै वृष्टयर्द्धमयसाधारणस्मृत । विवैरिणोपराधीशा प्रजास्युःस्वच्छचेतसः ॥५३॥विरोधकृतवत्सरेतुपरस्परविरोधिनः सर्वेजनानृपाश्चैवमध्यसस्या धवृष्टयः॥५४॥भूपाहवोमहारोगोमध्यसस्यार्पवृष्टयागोदुःखिनोजन्तवः सर्ववत्सरेंपरिधाविनः ।। ५६ ॥ प्रमाथीवत्सरेतत्रमध्यसंस्यार्घवृष्टयों पंजाकथंचिंजीवन्तिसमात्सर्या क्षितीश्वराः॥५६॥ आनन्दाब्दखिलालो काःसर्वदानंदचेतसः। राजानःसुखिनःसर्वबहुसस्याघवृष्टिभिः॥५७॥ स्वस्वकार्येरतास्सर्वेमध्यसस्यार्घवृष्टयः । राक्षसान्दखिलालोका राक्षसा इवनिष्क्रियाः॥५८ ॥ नलाब्देमध्यसस्यार्घवृष्टिमिःमवाधरा । नृप संक्षोभसंजाताभूरितस्करभीतयः॥ ५९॥ पिंगलादेत्वीतिभीतिमध्य संस्यार्पवृपयः । राजानोविक्रमाक्रांताभुंजंतेशत्रुमेदिनीम् ॥ ६ ॥ वत्सरेकालयुक्ताख्येमुखिनःसर्वजंतवः । सन्त्यथापिचसस्यानिप्रचुराणि- तथागदाः॥६१॥ मर्थ-शोभन वर्पने पृथ्वी प्रजाको रोग शोक दे तथापि लोक सुखी रहें और अधिक वर्षा हो ॥ ४६॥-त्रोधी सम्बतमें सवलोक क्रोध और लोभ परायणही इसी दोपसे थोडी या हो ॥ ४७ ॥ विश्वावस वर्षमें पृथ्वी घोर रोगसे व्याकुल हो मध्यम वर्षा होनेसे खेती। मध्यम हो राजा नीति व ॥४८॥ पराभव वर्षमें राजोंका शत्रुओंके साथ युद्द हो रोग थोडा भय, प्रजाको अधिक और थोडी वर्षा हो । ४९ ॥ प्लवग वर्षमें थोड़ी वर्षा और पृथ्वी रोग तथा चोरोंसे व्याकुल हो राजा परस्पर युद्ध में प्रवृत्त हों ॥ ५० ॥ कीलक वर्षमें इति भीति प्रजामें सोम और राजोंमें सग्राम हो तिसपरभी लोकमें धान्यभाव अच्छा रहे वर्षा हो ॥५१॥ सौम्य वर्ष सब लोक प्रसन्न वर्षा अधिक राजा वैरहीन ब्राह्मण यज्ञ करनेमें तत्पर हो ॥ ५२ ॥ साधारण वर्ष वर्षाका युछ मय हो राजा परहीन प्रजा प्रसन्नचित्त हों ॥ ५३ ॥ विरोधी स- म्वत्सरमें शर परस्पर वैर करें राजामों में क्रोप और वर्षा मभ्यम हो ॥५४ ॥ परिधावी वm 7 " - पिंप्रबोध। . में राजोंमें युह महारोग मध्यम वर्षा और सब प्राणी दुखो हो ॥ ५५ ॥ प्रभाधी, वर्षमें म- ध्यम वर्षा प्रजापीडा और राजौमें ईपी हो ॥ ५६ ॥ आनन्द वर्षमें प्रजा सदा आनन्द रहे राजामी सुखी हों वर्षा अधिक हो ॥ ५७ ॥ सब अपने २ कार्यमें रत हो मध्यम वर्षा हो सक्षस वपमें सब लोग राक्षसोकी समान क्रियारहित हो ॥ ॥ ५८ ॥ नल सम्बत्सरमें धान्यके निमिच मच्छी वर्षा हो राजोमें क्षोभ और चोरोंका भय हो ॥ ५९॥ पिंगल वर्ष में इति भीति मध्यम वर्षा हो राजा विक्रमर्स पूर्ण हो शत्रु पृथ्वी मोग करें। ६०॥ काल वर्षमें सब प्राणी प्र- सन्न हो खेती अच्छी हो परन्तु रोग अधिक फैले ॥ ६१॥ सिद्धार्थवत्सरेभूयोज्ञानवैराग्ययुक्सजाः । सकलावसुधाभातिबहुसस्या र्घवृष्टिभिः ॥६२॥ रौद्राब्देनृपसंभूतक्षोभक्केशसमानिने । सततंत्वखि लालोकामध्यसस्यार्घवृष्टयः ॥ ६३ ॥ दूर्मत्यब्देखिलालोकाभूपादुर्मत यस्सदा । तथापिमुखिनःसर्वेसंग्रामाःसन्तिचेदपि ॥ ६४ ॥ सर्वसस्पयु ताधात्रीपालिताधरणीधरे । पूर्वदेशविनाश स्यात्तत्रदुंदुभिवत्सरे ॥ ॥६५॥ आहवेनिहिताःसर्वेभूपारोगैस्तथाजनाः । यथाकथंचिजीव तिरुधिरोद्गारिवत्सरे॥६६॥ रक्ताक्षिवत्सरेसस्यवृद्धिवृष्टिरनुत्तमा, प्रेक्ष. तेसर्वदान्न्योन्यराजानोरक्तलोचनाः॥६॥ कोधाब्देमध्यवृष्टिस्यातपू वंदेशेचवृष्टयः सम्पूर्णमितरत्सर्वेभूपाःक्रोधपरायणाः ॥६॥कार्यासगंध तैलेक्षुमधुसस्यविनाशनं । क्षयमाणशापिनराजीवन्तिक्षयवत्सरे ॥६॥ अर्थ-सिद्धार्थ वर्षमे प्रजा ज्ञान और वैराग्ययुक्त हो और धान्यकी वृद्धि और वसे सब पृथ्वी शोभित हो ॥ ६२॥ रौद्रवत्सरमें सब राजा क्षोभ और क्लेश मानें और सर्व प्राणियोंको भी क्लेश हो और थोडी वर्षा हो॥६३॥दुर्मति सम्वत्में सन लोक और राजा दुर्मति हो तथापि सब सुखी हों और संग्रामभी हो ॥ ६४ ॥ दुंदुभीवर्पमें पृथ्वी धान्यसे पूर्ण हो सब राजा भ- लीमकार पृथ्वी पालन करे और पूर्वदेशका विनाश हो । ६५ । रुधिरोगारी वर्षमें राजा युद्ध में और लोक रोगमें मरें और बडे कष्टसे प्रजा प्राणधारण करें॥६६॥ रक्ताक्षि सम्वत्म खेतीकी वृद्धि और वर्षा अच्छी हो और राजाभी लाल नेत्र कर सदा एक दूसरेको देखें ॥६७ ॥ क्रोधी वर्षमे मध्यम वर्षा पूर्वदेशकी खेतीका नाश और सव राजा परस्पर क्रोध करें ॥६८॥क्षयेवर्षमे कंपास, गंध, तेल, ईस, मध खेनीकी हानि हो और मनुष्यभी क्षय होकर किसी प्रकार मरणधारण करें। ६१॥ इतिश्री रामविनोदे पष्टिसंम्वत्सरफलम् । साठ सम्वत्सरोंका-फल विशेषवार्तिक । प्रभवनाम सम्वत्सरके स्वामी ब्रह्मा वैशाखमें मंदा ज्येष्ठादि तीनमहीनों में पान्यकी . भापाटीकासहित । २५, महर्षता गेहूं मूंग,आदिकी महर्घता आश्विनमेभी कुछ महर्षता रोगपीडा और सब क्रय वस्तु, ओंका भाव अकरा १ विभव वर्पके विष्णुस्वामी रोगव्याप्ति तिलंग मगधं चीन देशमें नाज अकरा और स्थानोंमें समान चन्नादि तीन महीनों में अकरा आपाढादि तीन महीनोंमें दृष्टि आश्विनमें सब रस तेज, मेषु बहुत व कार्तिकादि पांच महीनों में सब वस्तु तेज गेहूंका भाव समान २EM शुक्लके रुद्रस्वामी छत्रभंग हो म्लेच्छदेशमें मंत्रियोंका राज्य,हो- चैत्रादि तीनमहीनों में भाव समान आपाढादि तीनमहीनोंमें महावी आधिनमें मनुष्योंको रोग अन्न और घृत समान ओर सब वस्तु तेज़ कार्तिकादि चार महीनों में धान्यभाव समान फाल्गुन मासमें विग्रह गा- योंमें पीड़ा देशमें व्याकुलता ३.- HTTण प्रमोदवर्षके सूर्य स्वामी मध्यम वर्ष थोडी वर्षा -म्लेच्छवर्णका सय छत्रमंग, पर्वत में थोड़ी, वसती चैत्रवैशाखमें तेजी ज्येष्टमें रोगपीड़ा आपाहादि तीन मासोंमें थोडी वा आश्विन मासमें कुछ, वर्षा कार्तिकादि पांचमहीनोमें-तेजी वायु बहुत , चले ,व्यापारियोंको पीड़ा हो खंडवी हो ऊनी -रेशमी वस्त्र अकरे विकै कार्तिकादि पांच महीनोमें सब रस तेज फा; ल्गुन मध्यम ४ प्रजापतिवर्पका चन्द्रमा स्वामी बारहों महीने श्रेष्ठ थोड़ी वर्षा आश्विनमें रोग अघि कार्तिकादि दोमहीने मंद पोपादि तीन महीने अरिष्ट लोकपीडा ५ अंगिरावर्षका स्वामी.मंगल चैत्रवैशाख मंदा ज्येष्टमें पवनका वेग आपाढमें मेघ अधिक श्रावणादि तीन महीनेमें रोगपीडा कार्तिकादिमासमें अन्न उत्पति पौपादि तीनमहीनेमें मेघका अभाव ६. श्रीमुखर्पका बुध स्वामी चैत्रमें सब अन्न तेज आपाढेकृष्णपक्षमें अधिक मेघ श्रावणम गेहूं भाव तेज धृत घान्यमें दूना लाभ वणियोंको पीड़ा पश्रिममें पीडा पूर्वमें शत्रका भय भाद्र और आश्विनमें सर्व धान्य प्राप्ति कार्तिकादि पांच मासमें सब धान्य और रसतेज भाववर्पका स्वामी गुरु गाय अधिक दूध दें. वर्षा अधिक हो सबवस्तु समानभाव बिके अयोध्या में सुख लोकपीड़ा घी अफीम मिरचका भाव तेज चैत्रमें समता वैशाखमें तेजी, धान्यमें दूना लाभ आपाठ श्रावणमें कुछ वर्षा भाद्रपदमें,तेजी वर्षा हो आश्विनमें अधिक रोग कार्तिक उत्तम मार्गशीर्षादि चार मासमें मंदा, युवावर्पका शुक्र, स्वामी भूकम्प और.,जलका,भय चैत्र वैशाखमें उत्पात, ज्येष्टमें रोग आपाटशुक्लपक्षमें महामेव श्रावणमें पवन अन्न भाव तेज भादोंमें १४ दिन महावी व्याकु, लता राजविग्रह उचर देशमें दुर्भिक्ष दुःख पूर्वमें निष्फल खेती दक्षिण में बैर विरोध मार्गमें विषमता पश्चिममें लोफपीड़ा पीछे दुर्भिक्ष रसभाव, समान कार्तिकादि दो मास उत्तम पौष माय मध्यम फाल्गुनमें किंचित् क्लेश.९ पावर्षका स्वामी शनि चैत्र वैशासमें धान्यमाव, तेन ज्येष्ठमासमें समता आपादमें कुछ वर्षा धो तेल मजीठ मिरच सुपारी तेज श्रावणमें सब धान्य तेज भादमें पुरुषों में कार्य- IRE . 1-4 -F सब - 2. TETTE M -- -- २६ प्रबोध । रता पश्चिम महावी सर्व धान्य सम उत्तर दक्षिणमें महामेव लोकपीड़ा आश्विनमें रेसा घात प्रकरे कार्तिकादि चार महीनोमें सब देशमें अन्नभाव तेज १० इश्वरवपका स्वामी राहु उत्तरमें दुर्भिक्ष पूर्वमें समिक्ष पश्चिममें विरोध चैत्र वंशाखमें अन्न भाव तेज ज्येष्ठ आषाढमें कुछ वर्षा पीछे सर्व धान्य तेज कार्तिक रोग और दुर्मिने मजीठ मिर्च लौंग इलायची सुपारी यह सब वस्तु तेज मांगशीपादिचार मौसम महा दुर्भिक्ष घा न्यभाव तेज पृथ्वीमें घोरयुद्ध मनुष्योकि एंड वीपै लो, ११ मारा बहुधान्यसम्वतका केतु स्वामी पुरुप हीनपराक्रमी पश्चिममें समिक्ष आर देशाम मुख दक्षिणमें विग्रह पीछे महाभय उत्तरके मांगे और देशीम पीड़ा पूर्वम दुभिक्षे अन्नको संग्रह उचित है चैत्र वैशाखमें अन्नभाव कुछ तेज ज्येष्ठमें चौगुना लाम आपाढ श्रावणम अन्न सर्वत्र अकरा व्यॊपारियोंकों गुना लाभ भाद्रपदमें अत्यन्त मे सर्व धान्य समे आश्विनमें मेघ कार्तिकादि चार महीनोमें संमती १२ । प्रमाथीवर्षका स्वामी सूर्य प्राषाढ श्रावणमें थोड़ा मेघ भाद्रपदको पंचमीमें थोड़ा मेघ चेत्रमें गै भाव तेज वैशाख ज्येष्टमें सर्वत्र धान्याभाव तेज कृष्ण सप्तमी आमावास्याको महामेय आगे. अरिष्ट अधिक कार्तिकादि,पांच मासमें सर्व रस तेज मजीठ सुपारी हींग, नारिकलादि वस्तु तेज FFICLEARINEETimes -विक्रमसम्वतका स्वामी चन्द्रमा राजा प्रजाको सुख चत्र वैशाखमैं अन्नमावं तेन व्या पारियोंको दुना लाभ वैशाखमें म्लेच्छोंसे भय वेशासमें दस दिन पवनका महावेग भूमिकंप प्रजापीड़ा ज्येष्टमासमें दुर्मिस आपाढमें महाउत्पात् श्रावण भादोंमें महामेघ प्रजाम सुख व धान्यभाव सम, सर्ववस्तु सम आश्विनमें रोग सब वस्तुमें समता कार्तिकांदिपांचमहीनों में वृपभसम्बतका स्वामी मंगल.पी अधिक दूसरे रोजौकों पीड़ा उभंग ज्येष्ट बैशाखमें अन्नभाव सम धान्य तिगुना लाभ आपाढमें अन्यभाव तेज श्रावण मादीम महामेघ आन्धि नमें धान्यभाव सम कार्तिकमें कुछ अरिष्ट मार्गशीर्ष अस्वस्थताः पापादि तीन मासीमें अन्नमा तेज मध्यम सम meeti चित्रभानु सम्बतको स्वापी दुध लोक मुंखी पहले थोडी वो. पीछे बहुत सर्व धान्य भार घृत भाव समान वैशाखमै अन्नभाव सम ज्येष्ठादि तीन मास, महामेव सर्व धान्य तेज भाद्र- पद प्राधिनमें रोग कार्तिको महामारीको भय मार्गशीपादिदो महीनोम रिष्ट माघ फा- ल्गुनमें प्रजापीडा अन्न रस भाव समर Topra समानुसम्वतका स्वामी गुरु पूर्वमें दुर्भिक्ष और लोक सुखी चैत्र में अन्न तेज वैशाख ज्ये- में रोगपीडी आपाटमें अनभाव तेज श्रावणमें पी अन्नभाव सम भाद्र, महामेघ आश्वि- नमें रोग पीडा गोधूमभाव सम धातुभाव तेज घृतभाव सम कार्तिकादि दोमहीनीमै राजपीडी पीपादि तीन मासमें प्रजापीडा क्षयकारी रोग परस्पर विरोध हो । तारण सम्वत्का स्वामी शुक्र वायुवेग अधिक परस्पर युद्धकी अधिकता चैत्र में रोग है - मलभाव सम.१४ -- भाषादीकासहित । २७ शाखमें, सब वस्तु तेज़, ज्येष्ठ में महापवन, आपादमें थोड़ी वर्षा श्रावणकी सप्तमीमें और भा- द्रपदकी एकादशीसे अधिक वर्षा आश्विनमें अन्नभाव तेज सब वस्तुका संग्रह करना उचितहे कार्तिकमें,तेज़ माशीपमें विग्रह धान्य तेन योगिनीपुरमें महाभय राजाओंमें विरोध म्लेच्छ- भय पोपमें युद्ध पश्चिममें धान्य उत्तरपथमें, महादर्भिक्ष फाल्गुनमास मध्यम-चोरोंका भय अन्न तेज-विग्रह होराजाके विरोधसै सातक हो पूर्वदक्षिणके लोग बहुत वनवासी ही पश्चिमी महायुद्ध दूसरे देशका धान्य और बस्त-तेज १५ ::msine 1. पार्थिवसम्वतूका स्वामी शनि बहुत उत्पात हों अन्नसंग्रह करना उचित है चैत्र वैशाखमें तेज ज्येष्टमें रोगपीडा अथवा राजोंमें युद्ध, आपादमें अल्पमेघ धान्यभाव तेज वायु अधिक श्रावणमें खण्डवर्षा भादोंमें नेत्यकी पवन अन्नभाव तेज आश्विनमें वृष्टि गई मंगादि तेल कार्तिकादि दो महीनों में रोगपीडा पोप माघमें तेजी फाल्गुनमें समानं ॥ १९ ॥ व्यय वर्षका स्वामी राहु अनावृष्टि दुर्भिक्ष हो चैत्र मध्यम वैशाख ज्येष्टमें तेजी देशमें विग्रह आपादमें थोडा मेष श्रावणमें दुर्भिक्ष दक्षिणमें प्रजापीडा भादोंमें खएडवृष्टि अन्नभाव आधिनमें रोगपीडा,पूर्वमें विग्रह दक्षिणमें प्रजापीडा भादोंमें खण्डवृष्टि अन्नभावलेज आ श्विनमें रोग पूर्वमें विग्रहं गेहूं तेज़हौं व्यापारियों को चौगुना लाभ सब रसभाव। काति कमें रोगपाडी:अथवा विग्रहकी शान्ती मार्गशीर्पमें अन्न तेज पोपमाघमें कुछ अधिक तेज फाल्गुनमें समान ॥ इति उचमविंशतिः ॥२०॥ सर्वजितके स्वामी विष्णु सर्व धान्य रस वस्तु सस्ती नवीन मुद्रा ,चले राजविग्रह मादों में पांचदिन-पश्चिमसे महावी हो प्राचिनमें रोग धान्यभाव तेज कार्तिकमें राजा राज्य प्रजाः . सुखी अन्न सस्ता मार्गशीर्ष पोपमें लोकमें मुख माघमें तीन दिन वर्षे मजीठ मिर्च सौह सोमन ल तेज-फाल्गुनमें सब वस्तु और रस समान उत्तम समय ॥२१॥ सर्वधारी वर्पका स्वामी विष्णु राजा प्रजामें सुख अन्न सस्ता-मार्गशीर्ष पोप-श्रेष्ठ संव.लो. कमें सुख शास्त्रका आदर सब देशमें पूजा-पाठ चैत्रमें सब धान्यभाव सम- उत्तरमें दुकाल वैशास्त्र ज्येष्टमें अकरापन ज्येष्टमें महाभय अरिष्ट आपाढमें मेघ श्रावणमें थोड़ी वर्षा :मादा दुर्भिक्ष आश्विनमें रोग अन्नभाव समान राजोंमें विरोध अन्न तेज 1:२२ । विरोधीवर्पके स्वामी रुद्र चैत्रादि तीन महीनेमें अन्नभाव तेज:पापाह श्रावणमें बहन वर्षा भादो सपडवृष्टि तीन महीनेमें कुछ मय और उत्पात राजा सुखी मनामें-प्रसन्नना, कहीं. राजाम युद्ध सर्व धान्य तेज-आश्विनमें सर्व धान्य सामान्य कार्तिक, महामारी आदि मनक- रोग मार्गशीर्षादि चार महीनामें गुर्जरदेशमें अन्न तेज ॥२३॥ विकृतिका स्वामी सूर्य अकालमें वर्षा राजोंमें विरोध मदेशमै दुर्मिक त्रादि चार मही; नौमें अन्नमाव तेज श्रावण मादीमें वांका अभार दुर्भिक्ष प्राश्विनमें उत्पात् मूमिकाप-का- तिको उमंग सोना रूपा तांवा कांसी आदि सब.धातु सस्ती.॥ २४ ॥.... सिर मर्पका स्वामी चंद्रमा नेत्रादि पांच महीनामें वो अधिक समिम, प्रजामुख मुरुतं. नौका मन्मान पश्चिममें मुभिक्ष आश्विनमें भन्नमाव ममानामजीद मुंडा में विगृता लामन्दः .

* वर्षप्रवोध । उक्षय अन्तमें रोगपीडॉ सर्व धान्यकी उत्पत्ति प्रजामें सुख कार्तिकादि पांच महीनेमें मनभाव समान ॥ २५ ॥ Trevie ruary नंदन वर्षको स्वामी मंगल प्रजामें सुख धान्यभाव सम चैत्रमासमें धूलि वर्षी वैशाखमें धान्यमाव तेज प्रचण्डवायु इसी प्रकार ज्येष्ठ आपादमें महामेघ श्रावणमें थोडी वी भादौमें महावी आश्विनमें सुभिक्ष राज्यमें स्वस्थता प्रजामें सुख कार्तिकमें सुमिदं अन्नाव सम मार्गशीर्षादि चार मासमें अन्नभाव तेज मजीठ मिर्च लवंग अकरी ॥ २६॥ 11. TURE "विजय वर्षका स्वामी बुध संबदेशमें महापीडा राजोंमें विरोध अन्न अकरा जले घोडा ब्राह्मण गो महिप अञ्च होथियौंको पीडां चत्रमें सण्डयपी वेशास ज्येष्ठमें अन तेज आपार्ट प्रविणम घोडी वो भादोंमें वर्षाका अभाव आसौजमें वैश्योंको पीडा अन्नभाव तेज:फा- गुनमें समता ॥ २७ ॥ .....!::r IFEO FERIES जयसम्वत्सरको स्वामी गुरु चैत्रमें तेजी वैशाख ज्येष्टमें अन्न सस्तों"आपादमें मेघवी अन्न तेज श्रावण में २४ दिन महामेघ भादोंमें ७ दिन वो आश्विनमें अन्न सस्ता सुवर्णोदि चौत समता कार्तिकादि पाँचौ महीने में आम अन्नभाव सम 'मोती मंगा अकरा मार्गशीपमें रौंगपीडा व्यापारियोंको पोडा छनभंग लोक दुस। २मा WPFFER मन्मथसम्वत्सरका स्वामी शुक्र राजीमें विरोध पूर्वमें 'पीडा अन्तम घो रोगको प्राप्ति धान्यसंग्रह करना उचित है चैत्रमें वर्षा भूमिकंप वैशासंमें अन्न संस्ता ज्येष्ट आपाढमें अन्न अकरा श्रावणमें थोडी व भादोंमै १४ दिन वडी वर्षा माश्विनमें रोंगो पीडा अन्नभाव तेज सबै यातु सस्ती कार्तिकमें अन्नभाव सम मांगशीदि तीने मांसमें मजाको सुख सर्व धातु संस्तो पत्र सस्ता ॥ २९॥ दुर्मुखका स्वामी शनि सो अशुभ हे थोडा मेच लोकीको महापीडा उरमें दुकाल पश्चिम में महापाडा चैत्रादि तीनमासमें सस्ता आपढिमें थोडा मेघ श्रावणमें प्रचण्डवायु सर्व धान्य अरे भादीमें खण्ड वेर्पा आश्विनमें रोगपीडा सर्व घाट सस्ती कार्तिकादि चारमहीनोंमें मिस गो ब्राणमें पीडा माता पिता स्नेहशून्य हो पुत्र विक्रय कर अन्न मासिकी इज्याक ₹.फाल्गुनमें रोगपीडा राजौमें परस्पर विरोध लोकपीडा ॥३०॥ हेमलम्बका स्वामी राहं महादुःख लोकोंमें रोग भूकंपादि उत्पात व्यापारियोंको पीडा चैत वैशांसमें घान्यादि भाव मंदो शत्रुका आगमन ज्येष्ठादि तीनमासमें धान्यभाव तेज तुगुणा लाभ भाद्रपदमें महामेघ मंजीठ मिरच लौंग आदि वस्तु तेज अन्नभाव सम कार्तिक छत्रभंग लोकपीडा सर्व धातु सस्ती चौपायोंमें पीडा मार्गशीर्षादि चारमहीनों में राजस्वस्थ लोक सुसी ॥३॥imire. It विलम्बावत्सरको स्वामी रवि चैत्र पैशाखमै धान्यभाव तेज आपादमें मेघथोडा श्रीवामें महामेघ समिक्ष माद्रपदमें ग्यारहदिन वर्षा अधिक गेहूं चनेका भाव पीछे तेज होजाय पनि ममें सुमित राज्यविग्रह सर्व देशमें अन्नकी प्राप्ति कठिणतास हो सर्व व्यापारकी वस्तु तेज कार्तिकादि पांचमहीनीमें अन्नमामि ॥ ३२ ॥ : * . .

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मापाटीकासहित ।
विकारीवर्पका स्वामी चन्द्रमा सर्व वस्तु तेज ब्राह्मणोको - सुख चैत्रादि तीन महीनों में
धान्यभाव तेज आपाढ'श्रावणमें महामेघ मुभिक्ष भाद्रपदमासमें वर्षा थोडीआश्विनमें सर्व
भय केतुका उदय. पीछे सर्व वस्तु सस्ती कार्तिकादि दो महीनों में धान्यभाव सम पोपमें रो.
गैपीडा लोक सुखी फाल्गुनमें धान्यभाव तेज ॥ ३३ ॥ ।।
शर्वरी वर्षको स्वामी मंगल थोडी वर्षी प्रजामें संकट राजविरोध चैत्रादि तीन महीने में
अन्नभाव सम आपाढ श्रावणमें अधिक मेघ खण्डवृष्टि अन्नतेज भाद्रपदमें वोका आभाव
राजा प्रजामें पीडा आश्विनमें रोगपीडा पश्चिममें दुर्भिक्ष पूर्व में सुभिक्ष कार्तिकादि दो मही-
नेमें अन्नतेज पोपादि तीन मासमें अन्नभाव कुछ तेज ॥ ३४॥
"प्लवसम्वतका स्वामी बुध वर्षा अधिक समय उत्तम चैत्रमें धान्यभाव मंदा वैशाखमै भय
ज्येष्टमें अन्नभाव समं तिलंगमें और पूर्वदेशमें पीडा आपाढमें महावायु उत्पांत लोकोंमें पीडी
श्रावणमें महामेव १७ दिन वर्पा भाद्रपदमें वर्षा श्रेष्ठ अन्न सस्ता आश्विनमें सर्व वस्तु सस्ती
गेहूँ कुछ तेज कार्तिकिम अन्न सस्ता लोक सुखी पोपादि तीन मासमें मुभिक्ष राजा
मजा मुखी ॥ ३५ ॥
शुभकृत्वर्पका स्वामी गुरु वर्षा अच्छी राजा प्रजाको सुख उत्तरमागमें अग्नि भय चत्र -
शाखमें अन्नसस्ता पातुभाव संस्ता श्रावण में नवमीस वर्षा अन्न सस्ता भाद्रपदमें महामेष वृत्त
तेल सस्ते राजीमें विरोध ज्येष्ठादि तीन मासमें सर्व वस्तु सस्ती फाल्गुनमें कुछ उत्पात मरु
देशमें रोग पीछे सुभिक्ष ॥ ३६॥ .
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शोभनका स्वामी शुक्र.राजा प्रजामें सुख अतिवर्षी चैत्रादि तीन मासमें अन्न सस्ता रा-
जविग्रह किंचित् उत्पात आपाढमें मेघन्यून श्रावणमें अतिवर्षा लोकपीडा भाद्रपदमें महामेघ
आश्विनमें सुभिक्ष.पीछे किंचित् विग्रह ॥ ३७॥
• . m.
फ्रोधीवर्षका स्वामी शनि बारहों महीनेमें अन्नंभाव तेज मध्यम. समय राजोंमें, परस्पर
विरोध लोक निर्धन व्यापारहीन चैत्र वैशाखमें धूलिवा महामारीभय ज्येष्ठमें धान्य अकरा
मापाडमें सम् अल्पमेध श्रावणमें दुःख भादोंमें खण्डवा अन्नतेज आश्विनमें वर्षा ,सर्व रसं-
भाव सम अन्नवस्तुभाव सम कार्तिकमें सम ॥ ३८ ॥ - 7::.
विश्वावसुका स्वामी राहु वर्पा सम पीछेकौं अन्नं तेज चैत्रमें राजोंमें विरोध धान्य तेज बैं
शाखमें विग्रह मरुदेशमें दुर्भिक्षपश्चिममें अन्नसस्ता ज्येष्टमें विग्रह आपाढमें अल्पमेघ प्रारम-
भादौ दुर्भिक्ष दूसरे देशमें सुर्भिक्ष आश्विनमें लोकपीहा रोगअधिक गो भैंस घोडे बकरी
सुवर्णादि धातु तेज कार्तिकादि तीन मासमें अन्नभाव सस्ता ॥ ३९॥ - TRESi
परामवसम्वतका स्वामी केतु बारहों महीने में मध्यम वा चत्र वैशाखमें अन्न ने मचकी
गर्जना अधिक विजली कडके वायु- चले ज्येष्टमें धान्यसंग्रह करना नापाटमें मय योहा
अन्नमें दूना लोभ श्रावणमें वर्षा अधिक अन्नभाव सम भाद्रपदमें खण्डवृष्टि आपिन कुछ
सुख धाठमाव सस्ता कार्तिकादि पांच मसिमै धान्यमाव समं पश्चिममें अन्नमावं सम मिपुरे
शमें अन्नका आगमन ।। इति मध्यम विशतिः॥४०॥

पर्पप्रबोध TM गलनगवर्षके स्वामी ब्रह्मा चत्र वैशाखमें अन्न तेज ज्येष्ठम राजपीडा आषाढमें सलमेघ भूमिकम्प हस्तिपीडा घोडे तेज श्रावणमें महामेघ भाद्रपद्रमें अष्टमीको महामेघ आश्विनमें रोग रस अकरे अश्व महिपोपीडा लोक पीडा ॥ ४१ ॥ कीरकर्पके स्वामी विष्णु व मध्यम चैनमें धान्यभाव अकरा वैशाखमें रोग मरुदेश दुर्भिक्ष पश्चिममें सस्ता ज्येष्टमें धान्यसग्रह उचित आपाढ श्रावणमें अल्पमेघ अन्न अकरा अष्टमोतिथिसे मेघ आश्विनमें वर्षा अन्नभाव सस्ता रसभाव सस्ता कार्तिकादि, तीन । मासमें संस्ता माघमें अन्नभाव तेज रोगपीडा अधिक फाल्गुनमें राजा मजा सुखी अन्नभाव सम४२॥ सौम्यवके स्वामी रुद्र अल्पमेव गायोंसे थोडा दूध प्राप्त हो वृक्षोमें फल थोडे, चैनमें अः तेज वैशाखमें तीव्र पवन ज्येष्टमे विग्रह प्रजापोडा आपाढमें अल्पमेघ अन्न अफरा श्रावणमें महामेघ धान्यमें दुगुणा लाभ सर्व धान्यभाव मम रस तेज, भाद्रपदमें खण्डवृष्टि अन्नमें दुर्भिक्ष आश्विनमें राजविरोध लोकपीडा मागकी बिपमती अन्नसंग्रह उचित धाने दुगुणा लाभ सर्व रस और धातु सस्ते कार्तिकादि चार मार्समें समता पीछे विरोध और देशान्तरीय पुरुपोंको पीडा फाल्गुनमै तीक्ष्ण पवन पश्चिममें सुभिक्ष सिंधुदेश, राजविरोध 'अन्नमें समता ॥ ४३ ॥ साधारणसम्बतका स्वामी सूर्य चैत्रमें धान्यको मदता वैशाख ज्येष्टमें उत्पात भूमिक रोगवृद्धि राज्यविरोघ धान्यभाव तेज आषाढमें वाय तीक्षण कमि'थोडा मेघ श्रीविणमें बहुत वर्षी अन्नभाव सम भाद्रपदमें अल्पमेव भाद्रपदमें थोडे धान्यकी प्राप्ति कार्तिकादि दो महीने मध्यम भूमिकम्प अकस्मात राज्यविग्रह अन्नभाव तेज फाल्गुनमें चौपार्योंमें रोग वृक्षोंमें अ- ल्पफल धान्यसग्रहमें तिगुना लाभ सर्व धातु अकरी सबरसका सग्रह उचितहै राजा सुखी ४॥ Fiविरोधकत् वैपका स्वामी चन्द्रमा मध्यदेशमें महादुःख परस्पर राजविरोध चैत्रादि "तीन माप्समें अन्नभाव सम आपाढमें अल्पमेघ श्रावणमें महावी अन्नभाव तेज भाद्रपदमें मेघ अन्नभाव सम फाल्गुनमें देशविरोध मार्ग विपम मजीठ मुपारी आदि बस्तु तेज ॥ ४५ ॥ "परिधाविनिवर्षका स्वामी मंगल दुर्भिक्ष नागपुर भेदपाठ जालधरदेश राजामि विरोध चैत्रादि चार मासमें अन्नभाव सम अन्नका सयह करना उचित है लोपमें रोग और पाडा मरुदेश महामारीका डर चप्पद महिपी तुरग हाथियौंको पीडा श्रावण भाद्रपदमें अल्प मेघ खण्डवृष्टि अन्नभाव समासव रस सस्ते सर्व धात सस्ती कार्तिकादि पाच महीनौमें या- न्यभाव सम राजोंमें विरोध सिन्धुद्रेशमेंसे धान्यकी प्राप्ति ॥ ४६॥ प्रमाथी सम्वत्का स्वामी बुध चैत्रमें धान्य पदा वैशाख ज्येष्टमें धान्यसग्रह थापाढमें - चीन मुद्रा अल्पमेघ श्रावणके आधेमें वर्षा धान्यमें तिगुना लाभ भाद्रपदमें महामेघ अलभाव सस्ता आन्धिनादि मासमें मुभिक्ष लोक सुखो गुरुओं की पूजा और महिमाकी वृद्धि, ॥४॥ आनन्द्रवर्पका स्वामी गुरु चर्पा अधिक सुभिक्ष चैत्र शाखमें अन्नभाव तेज ज्येष्ठ भाषा- में महावृष्टि प्रापणमें महामेघ भाद्रपदमे खण्डवी गेटू तेज आश्विनमें सस्ता-स अन्न वन्त,सम धार अकरी कार्तिकमें अकस्मात् भय लोकपीडा. मार्गशीर्पमे-लोकौंका दक्षिण- दिशामें गमन पोप माघमें मेघपो अन्नसस्ता फाल्गुनमें धान्य-अकरे ॥ ४६ || mir -- T । भापाटीकासहित । राक्षसे सम्बतके स्वामी शुक्र धान्यसग्रह उचित चैत्र में धूलिवर्या वैशाख ज्येष्टमातेल अक. राज्येष्ठ आषाढमें वारी खाड आदि वस्तु अकरी श्रावणमे थोडा मेघ अन्न अकरा भाद्रपद- में महामेघ अन्नभाव सम आश्विनमें समता कार्तिकमे रोगसे व्याकुलता मार्गशीपादि चार मासमें धान्यभाव सम राजा सुखी प्रजा राजाका सन्मान करै फाल्गुनमे अन्ना सस्ता वृक्षों मानये पत्ते मार्ग सुखदायी मुभिक्ष । ४९।। निलसम्वत्सरका स्वामी शनि अल्पमेध पीछे अन्न सस्ता चेत्रमे रोगपीडा पवनका वेग बहुत वैशाखमें रिष्ट अन्नसग्रह उचित है ज्येष्ठम राजोंका परस्पर विग्रह लोक सुखी मार्ग विषम आपाढ श्रावणमें थोडा मेघ धान्यमें छःगुना लाभाभाद्रपदमे खण्डवपी दुर्भिक्ष धाड न्यका सग्रह करना आषाढमें उचित है कार्तिकमे बेचना मार्गशीपदि तीन मासेमें अन्नभाव सम फाल्गुनमें रोग चौरभय उत्तरदेशमें दुकाल पूर्वम सुभिक्ष ॥ ५० ॥ पिगलवर्पका स्वामी राहु नागपुर मरुदेश दिल्लीमडल मथुरामे पूर्व देशमें दुर्भिक्ष अन्नधान सस्ते सर्व स्थानमें विग्रह रोगपीडा राजा सुखी प्रजा सुखी अन्न सम गुर्जरदेशम अन्न सस्ता सिंधुदेशसे-धान्यकी प्राप्ति चैत्रमे धान्य अकरे मजापोडा वैशाखादि तीन महीनमैं अन्न अः करा प्रजाका क्षय घोडोंको पीडा आपाढ श्रावणमें थोडा मेघ धान्यम चौगुना लाभ भादोंमें खण्डवी आश्विनमे समता कार्तिकादि पाच मासमे विग्रह पीडा अन्नादि अकरे चौपायोंमें रोग ॥ ५३॥ कालवर्पका स्वामी केत थोडी वा थोडा व्यापार सजोंमें विग्रह चंत्र-वैशाखम, गरिष्ट उत्तर देशभग धान्यका सग्रह ज्येष्टमे करना उचित है धान्यमें छ.गुणा लाभ आपाढमें यो- ड़ा मेघ लोकमै दुःख मार्ग विषम श्रावणमें महामेघ अन्नभाव सम भाद्रपद्में खण्डवा धा- न्यूका दुर्भिक्ष उत्पात आश्विनमें रोग शीतलादि विकार व रस सस्ते सर्व धातु सस्ती का- तिकादि प्राचमहीनेतक राजविद्रोह चौपायोंमें पीडा वृक्षोमें फल ॥५॥ सिद्दार्यका स्वामी सूर्य सुभिक्ष सबदेशीमें आवादी अन्नकी वित्री अधिक चैत्र वैशाखमें लोक पोडा ज्येष्ठ आषाढमें तीक्ष्णवाय श्रावणमें तीनदिन महापां सब अन्न अकरे भादोंमें खण्डवृष्टि आश्विनमें अन्नभाव सम कार्तिकमें धान्यप्राप्ति अन्न सस्ता धातु सस्ती मार्गशी- पीदि चारमासमें सब स्थानमें अन्नकी प्राप्ति कहीं राजविरोध लोकमै नख ।। ५३ ।। रोदिसम्बत्कास्वामी चन्द्रमा पृथ्वीमें रोग अधिक चौपायों में मरी फैले छभग अल्प मेघ चैत्रादि तीन मासम अन्नभाव तेज आषाढ श्रावणमें अल्प मेघ खण्डवृष्टि भाद्रपदमें महामेघ अन्नसस्ता मजीठ सुपारीआदि सस्ते लोक सुखी चौपाये सस्ते हाथियों को पीड़ा)। 'दुर्मतिर्पका स्वामी मगल चैत्र वैशाखमें धान्य सस्ता ज्येष्टमे अन्नभार सम आपाढमें तीवपवन श्रावणमें अल्प मेघ अन्न सस्ता भादोंम महामेघ गेहू सस्ते सबधातु सस्ती आ- श्विनमें सब रस और अन्न सस्ता कार्तिकादि दोमासमें अन्न सस्ता राजा स्वस्थहीं नये ग्रा- म बसें, सब लोक सुखी घोडे अकरे चौपाये अरे-पोपाटि तीन माम समान, पीछे धातु तेज ।। ५५॥ दुंदुभीवर्गका स्वामी बुध वर्षा अधिक अन्न सस्ता चैत्राटि तीन मासमें अन्न सस्ता आ- में -- .

वर्षप्रबोध। पाढमें व्यापारियोंको दुना लाभ थोडा.मेघ श्रावणमें ११ ग्यारह दिन महावी-भाद्रपदमें नौ दिन व अन्नसस्ता नवीन गांव वसे आश्विनमें रोग,अधिक अन्न सस्ता मजीठ मिर्च सब रस धातु सस्ती कार्तिकमें धान्य सस्ता.भेदपाटदेशवासियौंको पीडा अन्तमें दुर्भिक्ष पत्रिमः में शुभ मार्गशीर्ष संस्ता राजौंमें विरोध पोषादि तीन मास समघोडेअकरे मजीठ तेजा। रुधिरोगारिवर्पका स्वामी गुरु राजोंमें परस्पर विरोध प्राणी देशान्तरमें जाय दुर्भिसंजा झणौंको पीडा म्लेच्छोंके राज्यकी प्रवृत्ति परदेशसै धान्यागमन- आपाठशुरूपक्षमें महामेघ श्रावणमें पन्द्रह दिन-महावा चैत्रादि-तीनामासमें सस्ता धातु सस्ता तिलंग-गौडानौटरादि देशोंमें दुर्भिक्षापश्चिममें दुर्भिक्ष सिंधुदेशसे धान्यनिप्पति भाद्रपद में खण्डवृष्टि धान्यमें तिगु ना लाभ आश्विनमें समता रोगप्राप्ति कार्तिकादि पांच मासमें अन्न सस्ता मेदपाटदेशमें पीडा॥ ५७ ! -: 31 MITTER • रक्ताक्षि सम्बतका स्वामी शुक्र अन्न सस्ता भेदपाटदेशमें पर्वतपर वैसती चैत्रादि तीन मा समें तेजी अन्न धातु सस्ती फालगुनमें अन्न संग्रह उचित है ज्येष्टमें अन्न तेज शुक्लपक्षमें भर हामेघ आपाढमें जलवर्षा अधिक श्रावणमें वर्षा थोडी कुछ विग्रह भाद्रपदमें अल्पवर्षा रोग पीडा आश्विनमें अन्न सस्ता रस वस्तुसस्ती कार्तिकादि पांच मासमें धान्यभाव तेज विवाहों का अभाव अश्वपीडा पश्चिममें सुभिक्ष ॥ ५८॥T: . Fir TETTE क्रोधीवर्षका स्वामी शनि रोग अधिक मंदवी प्रजापीडाउत्तरमें दुर्भिक्ष लोक निर्धन चैत्र वैशाखमें योढामेघ अनभाव सम आपाढ श्रावणमें अल्पवर्षा धान्यमें दूना लाभ भादमि मेघ' अन्न सस्ता 'आश्विनमें रोगपीडा कार्तिकमें विग्रह धान्य तेज मार्गशीर्ष में धान्यमाव सम (अ- कस्मात उत्पात् ) पोपमें तेजी व्योपारियोंको पीडा धान्यमें दुगुणं लाभ अन्नवस्तु सस्ती परी क्षयसम्वत्सरका स्वामी राहु चैत्रमें धूलिवपी वैशाखमें उत्पांत भूमिकम्प ज्येष्ठ आपाटमें रोग नवीन शिका चले अल्प मेघ अन्न सस्ता भाद्रपदमें खण्डवृष्टि चोपायोंकी हानि आधि- नमें रोगपीडा पोछे अन्नभाव सम सर्व धातु सम मध्यम समय राजविरोध पश्चिममें समिक्ष अन्न सस्ता सिंधुदेश वा स्थलदेशसे अन्नका आगमन अन्नभाव सम ।। इति अधमा विशतिः। यह साठ सम्वत्सरका फल पूर्ण हुआ. F FIP Fair इन सम्वत्सरीका फल नहींका बलावल चलाचल.देखकर कहना ऐसा करनेसे कमी फैल भ्यर्थ नहीं होता। इति श्रीमेधमहोदये श्रीमेवगणिविजयविरचिते सम्वत्सरफलकथनों "नाम तृतीयोधिकारः॥ अथ गुरुविचार॥ स्यात् पीडा कार्तिकेवर्षे वहिगावोपजीविनाम् । शस्त्राग्निश्च भयं वृद्धि पुष्पकौसुभजीविनाम् ॥ १॥ सौम्यवर्षे त्वल्पवृष्टिः सस्यहानिरनेकधा। •1 .

भापाटीकासहित । 'राजानो युद्धनिरताः अन्योन्यवैधकांक्षिणः ॥ २॥ पौषेब्दे सुखिन सर्वे गुरुपूजारताजनाः । क्षेत्रं मुभिक्षमारोग्यं वृष्टिः कृषकसम्मता ॥३॥ माघेसम्वत्करोब्दस्यात सर्वभूतहितोदयः । सम्यक वर्पति पर्ज न्यः सुभिक्षं च मजायते॥ ४॥ फाल्गुनाब्दे चौरभीतिः'स्त्रीणां दुर्भग तां भृशम् । कचिदृष्टिः कंचित्सस्य कचिद्भीरीतयः क्वचित् ॥ ९॥ चे त्राब्दे भूभुजाः स्वच्छाः स्त्री चाल्पप्रजा भवेत् । अल्पवृष्टिः सस्यसंपत प्रजानां व्याधितो भयम् ॥ ६ ॥ वैशाखेब्दे तु राजानो धर्ममार्गरताः क्षितो । क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं द्विजाश्चाध्वरतत्पराः॥७॥ज्येष्ठशब्दे धर्म मार्गस्थां पीड्यन्ते सत्क्रियापराः । न च वर्षति वै देवो भवेत्सस्य वि: नाशनम् ॥८॥ आपाढाब्दे तु राजानः सर्वदा कलहोत्सुकाः क्वचिंदी तिः कचिद्भीतिः कचिदृद्धिर्जलं कचित्॥९॥श्रावणाब्देधरा भाति त्रिद शस्पर्द्धिमानवैः । धरा पुष्पफलैर्युक्ता परिपूर्णाध्वरादिमिः ॥१०॥ अब्दे भाद्रपदे वृष्टिः क्षेमारोग्यं क्वचित् क्वचित् । सर्वसस्यसमृद्धिस्यात् नाश: मेत्यपरं फलम् ॥ ११ ॥ अब्दे त्वाश्वयुजेत्यर्थं सुखिनः सर्वजंतवः।। मध्यमं पूर्वसस्यं स्यात् परिपूर्णा विपच्यते ॥ १२ ॥ अर्थः-यदि बृहस्पति कार्तिकमें बदले तो पीडा हो गोसेवकवोंको शस्त्र और अग्नि- कामय हो कुम्भके और फूलोंके उपजीवियौंको वृद्धिहो ॥१॥ अगहनमें बदले तो थोडी वर्षा अनेकप्रकारसे खेतीको हानि राजा एकदूसरेके मारनेकी इच्छासे युद्ध करें. ॥ ॥ पोपवर्षमे सर्व सुखी मनुष्य गुरुओंको पूजा करें क्षेम सुभिक्ष और आरोग्यताही किसानोंके उपयुक्त वर्षा हो ॥ ३ ॥ माघमे बृहस्पति बदले तो सर्व प्राणियोंको सुख हो वर्षा अच्छी हो सुभिक्ष रहे ॥ ४ ॥ फाल्गुनमें बदले तो चोरोंका भय स्त्रियों में दुर्भाग्यता कहीं वर्षा कहाँ खेती कहीं इति भीति हो ॥ ५ ॥ चैत्रमें बदले तो राजा स्वच्छ, स्त्री थोडी सन्तान- बाली हो अर्थात् सन्तान थोड़ी उत्पन्नहो थोडी खेती प्रजाओंको प्याधिसे भय हो ॥६॥ बैशाखमें बदले तो राजा पृथ्वी धर्मराज्य करें क्षेम समिक्ष आरोग्य और ब्राह्मण यज्ञ करनेमें तत्पर हौं ॥ ७ ॥ ज्येष्ठमासमें बदले तो धर्ममार्ग और सक्रिया करनेवाले पीडि- तहों वर्षा न होनेसे सस्यकी हानि हो ॥ ८॥ मापाढमें बदले तो राजा क्लेशकरें कहीं इति भीति कहीं वृद्धि कही जलहो ॥ ९॥ श्रावणमें बदलें तो पृथ्वी ऐसी शोभित हो कि देवताभी इस भूमिकी इच्छाकर पृथ्वी फूल फल और यज्ञसे पूर्ण हो ॥ १० ॥ भाद्र- पदमें बदले तो वर्षा हो कही क्षेम और आरोग्यही सर्व धान्यकी वृद्धि और कुछ फलोंकी . . वर्षप्रबोध ।। हानि हो ॥ ११ ॥ प्राश्विनमें बदले तो सर्व प्राणी, सुखी ही पूर्वकी सेही मध्यमहो। सर्व स्थानमें पूर्णहो ॥ १२ ॥ मेषराशों यदा-जीवः चैत्रसम्वत्सरस्तदा । प्रबुद्धोनामजलदः वर्षा सर्वतोमुखी ॥ १ ॥ सुभिक्षं विग्रहोराज्ञां समघु वनेकपटम् । हेमरूप्यं, तथा तानं कार्पासं च प्रवालकम् ॥ २॥ अखपीडा महारोगो द्विजा, नां कष्टसंभवः । मासत्रये फलमिदं पश्चाद्भाद्रपदे पुनः ॥३॥ गोधूम शालि मापानां आज्यस्याग्रे समर्पता दक्षिणस्यामुत्तरस्यां खण्डवृष्टि पंजायते॥४॥दक्षिणोत्तरयौदैशे छत्रभंगोपि कुत्रचिन् । 'दुर्मिक्षमाप, पण्मासा आश्विने फाल्गुने तथा॥५॥ पश्चात सुभिक्षं द्रौमासी, में घावै स्युर्जलमदाः । कार्तिके मार्गशीर्षे च कार्पासान्नमहर्षता ॥६॥ भेदपाटे राज्यपीडा देशभंगो भवेद्भवम् । लोकाः सरोगा दुर्भिक्ष पोष' रससमर्थता ॥७॥ वाणिज्ये संशयोलाभेवेशाखे गुर्जरे रणः। छत्रभंग स्तथापाढे श्रावणे चाभयं पथि ॥ ८॥ अब्दमध्ये यदा जीवः क्रमाद्रा शीत्रयं स्पृशेत् । तदा सुभटकोटीभिःप्रेतपूर्णा वसुंधरा ॥ ९॥ वृषरा शौ यदा जीवो वैशाखो वत्सरस्तदा । नेदशालो भवेन्मेषः सर्वधान्य समर्वता ॥ १०॥ वैशाखे आश्विने मासे स्त्रीणां रोगाश्च दन्तिनाम् । अश्वानां च महापीडा गृहवैरं परस्परम् ।। ११ ।। गोधूमशालिचणकाः मृदा माषास्तथा तिलाः । महर्षः श्रावणे ज्येष्ठे मेघानां न महाजलम् । ||१२|| श्रृंगालके मालवे च उत्पातो राजविग्रहः । देशभंगाइयं शुन्य घृतधान्यमहर्षता ॥ १३॥ आपाढे श्रावणे वर्षा न वर्षा, भाद्रपादके, . अश्वरोगश्चतुष्पादनाशः पीडागमः कचित् ॥ १४ ॥ अर्थ-मेषराशीमें हस्पति होनेसे चैत्रसम्वत्सर कहता है उसमें प्रवृद्धनाममेघ' वर्पनाह सर्व ओरस वा होतीहै ॥ १॥ मुभिक्ष राजोंमें विरोध वस्त्र कपेट गुइ सस्ते सुवर्ण ताम्बा कपास भूगे सस्ते हों ॥ २॥ घोरीम पीड़ा महारोग ब्राह्मणोंको कष्ट हो यह तीनमहीने फल हो पीछे मादीमासमे ॥ ३ ॥ गेहूं चावल उद घी सस्तहों दक्षिण उत्तरमें खण्डवृष्टिदो ॥४॥ दक्षिण उत्तरके देशाम छत्रभंगी काहीहो आश्विनसे फालगुनतक दुर्भिक्ष रहे ॥५॥ पीछे दोमहिने मुभिक्ष हो अच्छी वर्षा हो कार्तिक मार्गशीर्पमें कपास और अन्न अकराहो ॥ ६ ॥ भेदपाटदेशमै राज्यपीडा क्षत्रभंग हो लोकमि रोग दुर्भिक्ष पोपमें रस सस्ती ॥ ७ व्यापारियोंफो लाममें सन्देह वैशास्त्र में गुर्जरदेशमें युद्ध आपाटमें छाभंग श्रारणमें

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भापाटीकासहित ।
मार्गमें भय ॥ ८ ॥ एकवर्षमें यदि बृहस्पति तीनराशियोंको स्पर्शकरे तो पृथ्वी रुंडमुण्डसें
पूर्णहो ॥९॥ घृपराशीमे बृहस्पति होनेसे वैशाखसे वर्ष कहाताहै इसमें नन्दशालनामक
मेघव और सेब रस सस्ते हो ॥ १०॥ वैशाख और आश्विनमें स्त्री और हाथियौंको
पीड़ा परस्पर घरोमें लड़ाई॥ ११॥ ॥ गेहुं धान चने मूग उरद तिल यह श्रावण ज्येष्टमें
अकरे हों मेघोंसे बहुत जल प्राप्त न हो। १२॥ शृगाल मालवा इनमें उत्पात और रा.
जोनै विग्रह हो देशभग भय थोडा घृत धान्य अकरे विकें ॥ १३ ॥ आपाढ श्रावणमें वर्षा
हो मादोंमें न हो घोडे और चौपायोंमें रोग हो चौपाये मरें पीडा फैले ॥ १४ ॥
मथुने संगते जीवे ज्येष्ठायो वत्सरो भवेत् । बालानां दोपमश्वानां ख
एडवृष्टिस्तदावदेत् ॥१५॥ कर्कोटकस्तथा मेघो वर्पते नात्र संशयः।'
तस्करः पीड्यते लोकः पापोपहतमानसः॥१६॥ पश्चिमायां सिंधु
दिशे वायव्ये चोत्तरादिशि । चित्रा विचित्रा जायन्ते रोगापीडोत्तराप
"थे॥१७॥ श्वेतवस्त्रं तथा कांस्यं कर्पूरं चन्दनादिकम् । मंजिष्ठं नारि
केलं च पूगी स्वर्ण च रूप्यकम् ॥ १८॥ मासा वै पंचकं यावत् समर्थ
चैत्रतो भवेत् । पश्चान्महर्घ पूर्वोक्तधान्यानां च समर्पता ॥ १९ ॥श्राव
णे तु महत्कष्टं महिपीनां च हस्तिनाम् । पूर्वाग्नियाम्यनेऋत्यामीशाने
च सुभिक्षता ॥ २०॥ राजा स्वथः प्रजा वृद्धिः सुभिक्षं मगलं भुवि ।
समर्घ तेलखण्डादि शकंरा धातवोपि च ॥ २१॥ शुंठीमरीचपिप्पल्यो
मंजियो जातिकोशकः । महर्घमेतदस्तु स्यात् फाल्गुने धान्यसंग्रहः ॥
॥२२॥ कर्के गुरुस्तदाऽऽपाढे वासरस्तत्र जायते । पूर्वदक्षिणयोर्मवःम
ध्यमः कंबलाभिधः॥ २३ ॥ महर्व सर्वधान्यानां कार्तिके फाल्गुने
तथा। पश्चिमायां सिंधुदेशे वायव्ये चोत्तरादिशि ॥ २४ ॥ क्षयश्चतु
प्यदानां स्यात् दुर्भिक्ष मृगसैन्यकम् । हेमरूप्यं तथा तानं पसूत्रप्रवाल
कम्॥२५॥मोक्तिक द्रव्यमन्नादि लोकोक्त्या लोकविक्रयः। मंजिष्ठा श्वे
तवखाणां समर्घ स्यान्नसंशयः ॥ २६ ॥ गोधूमशालिलाज्यं लवणं श
केरा पुनः। माषा महर्घा जायन्ते पापकर्मरतो जनः॥२७॥पर सत्र
च वस्राणि जातीफललवंगकम् । मरिचं शीतकालेथ संग्राह्या वे वणि
क्रजनेः॥२८॥वेशाखज्येष्ठयोलोभो द्विगुणं नस्य विक्रयात् । वर्षा
काले महावपी सर्वधान्यसमर्पता ॥२९॥

वर्षप्रबोध। • अर्थ-मिथुनराशीपर वृहस्पतिके प्रानेस ज्येष्टानामक वर्ष होताहै इसमें बालकोकों और घोडौंको रोग और खण्डवी हो ॥ १५ ॥ निसन्देह कर्कोटकमेघ व पापी चोरोस सोक पीडित हौ ॥ १६ ॥ पश्चिम सिंधुदेश वायव्य उत्तरदेशमें अनेकप्रकारके चित्रविचित्र रोम हो ॥ १७॥ श्वेतवस्त्र कांसी कपूर चन्दन मजीठ नरियल सुपारी सोना चांदी । १८ ॥ चैत्रसैं पांचमहीनतक सस्ते विकै पीछे यह सब अकरी हो धान्य सस्ते रहैं । १९ । मावणमें भैंस हाथियौंको महाकष्ट हो पूर्व आग्नेय दक्षिण नैऋत्य दिशामें समिक्ष हो ॥२०॥ राजा स्वस्थ मजामें वृद्धि मुभिक्ष पृथ्वीमें मंगल तेल, खांड सस्ते शकर पातमी सस्ते । ॥ २१ ॥ सौंठ मिरच पीपल मजीठ जायफल कोशल (ककोल) यह वस्तु अकरी फाल्गु- नमें धान्यसंग्रह उचित है ॥ २२ ॥ कर्कके वृहस्पति होनेसे आपाढवर्ष कहताहे कम्बलना- मर्क मेघ पूर्वदक्षिणमें च ॥ २३॥ कार्तिक फाल्गुनमें सबधान्य अकरे पश्चिम सिंधुदेश वायव्य उत्तर दिशामें ॥ २४ ॥ चौपायौँका नाश हो मृगौंको दुःख तथा दुर्भिक्ष सोना चांदी ताम्बा रेशम मृगा ॥ २५॥ मोती द्रव्य अन्न यह चहराईको वातौँसै विके मजीठ-श्वे- तवस्त्र सस्ते हों॥ २६॥ गेहूं चावल तेल घी सवण शकर उर्द अकरे हो मनुष्य पाप करें । ।। २७ ।। रेशम, वस्त्र जायफल लोंग मिर्च यह व्योपारियौंको शीतकालमें संग्रह करनी उ. चित है ॥ २८ ॥ वैशाख ज्येष्ठमे उसके वेचनेसे दूना लाभहो वर्षाकालमें महावर्षा सबधा- न्य सस्ते हौं ॥ २९॥ सिंहे जीवे श्रावणाख्यंवत्सरे वासुकिर्धनः । बहुक्षीरघृतागावो जलपू र्णा च मेदिनी ॥३०॥ देवब्राह्मणपूजा स्यान्नराणां मान्यता सता में। रोगा विवादश्चान्योन्यं चतुष्पदमहर्घता ॥ ३१॥ गोधूमतिलमा पाज्यशालीनां च महर्षता।मुवर्णरूपताम्रादेः भवालानां समर्घता||३२|| मुभिक्ष.सर्पदंशश्च मेघोप्यापाढभाद्रयोः । श्रावणे वृष्टिरल्यैव सुकाल: कार्तिके मतः॥ ३३॥ कन्याभोगे गुरोर्जाते मेघनामतमस्तमः । भाद्र सम्वत्सरस्तत्र सप्तमासाश्चरौरवम् ॥ ३४॥ ततः परं सुभिक्षं स्यात्कार्ति कान्माधवावधि । अद्यसंग्रहणे लाभो द्विगुणो भाद्रमासजः ॥३५॥ चतुष्पदानां पीडापि गोधूमाशालिशर्कराः । तैलं मापामहर्षाणि गुडा दिक्षुरसःस्तथा ॥ ३६ ॥ शूद्राणामंत्यजानां च कष्टं सौराष्ट्रमण्डले। ख ण्डवृष्टिदक्षिणस्यामुत्पातो म्लेच्छमण्डले ॥३७॥ भेदपाटे. शृगाले च परचक्रमयरणः । सर्पदंशो वन्हिमयं मेघोल्पाच रसेल्पता ॥३८॥ म रदेशे छत्रभंग चैत्रे वा माधवे भवेत् । गोधूमा घृततेलानि महर्षाणिस मादिशेत् ॥३९॥ वस्रकम्बलधातनामनादेश्च समर्पता । धान्यसंग्रह *IES माu.inरत आपाढे भाद्रे लाभश्चतुर्गुणः॥४०॥ गुरोस्तुलायां मेघाख्यः तक्षको वत्स रोऽश्विनः। तदातिवृष्टिमंजिष्ठनालिकेरसमर्पता ॥४१॥ अन्योन्यराज्य युद्धानि समर्वताज्यतेलयो। मार्गशीर्ष तथा पोषे द्धये धान्यस्य संग्रहः ॥४२॥ लाभः स्यात्पंचमे मासे मार्गात् प्रारभ्य चैत्रतः ।छत्रभंगस्ततों राजविग्रहः क्वापिमंडले॥४३॥ उत्पातो मरुदेशे स्यान्मार्ग चौरभयंत था। कोटजेसलमेर्वादो परचकागमो मतः॥४४॥रसक्रयाणकादीनां संग्रहेण चतुर्गुणः । लाभश्चतुर्थके मासे धातूनां च समर्पती.॥ ४५ ॥ अर्थ:-सिंहके वृहस्पति होनेपर श्रावणाख्पवत्सर होताहै वासुकिमेव ,वर्पताहै गायें - हुत दूध और घी दें और पृथ्वी जलसै पूर्ण हो ॥ ३०॥ देवब्राह्मणोंकी पूजा सत्पुरुपौंका मान्य हो रोग विवाद और चौपायौंकाभाव तेजहो ॥ ३१॥ गैहूं तिल उद घृत चावल अकरे हो सोना रूपा तांबां मूंगे अकरे हो ॥ ३२ ॥ मुभिक्ष कहीं सर्पबाधा आपाढ और भादौमें मेघ हो श्रावणमें थोडीवर्षा कार्तिकमें सुकाल ॥ ३३ ॥ कन्याके वृहस्पति होनेसे तमनाम मेघ वर्षे भाद्रसम्वत्सरहै इसमें सात महीनै दुःख हो ॥ ३४ ॥ इसके उपरान्त कार्तिकसे मा- घतक सुभिक्षहे इस्समयका संग्रह किया धान्य भादोंमें दूना फायदा दे ॥ ३५ ॥ चौपायोंमें पीडा गेहूं धान्य शर्करा तेल उर्द गनै गुड अकरें हौं ॥ ३६ ॥ शूद्र और अन्त्यजौंको कष्ट सौराष्ट्र मण्डलमें कष्ट दक्षिणमें खण्डवृष्ठि दक्षिणमें म्लेंच्छमण्डलमै उत्पात ॥३७॥ भेद- पाट और शृंगालदेशमें शत्रुसै भय और रणहो सर्पदंश अग्निभय मेघ रस थोडे ॥३८॥चे- प्र वैशाखमें मरुदेशमे छत्रभंग गोधूम घृत तेल अकरे विकै ॥ ३९॥ उनीवस्त्र धातु अन्नादि- क पीछे सस्ते हों आपाढमें सग्रह किया धान्य भादोंमें लाभ चौगुणादे ॥ ४० ॥ तुलाकी बृह- स्पतिमें तक्षक मेघ वर्षे यह आश्विनवहे उससमय वर्षा अधिक मजीठ नारियल अकरे।४१॥ राजा परस्पर युद्द करे घी तेल सस्ते मार्गशीर्ष और पोपमें धान्यसंग्रह करना उचित है।४२। मार्गशीर्पसे लेकर चैत्रतक पांचमें महीनेमें लाभ हो छत्रभंग और किसी स्थानमें विग्रह हो ॥ ४३ ॥ मरुदेशमें उत्पात और मार्गमें चोरसे भय कोट और जैसल मेरु आदिमें शत्रकामा गमन हो ॥४४॥ रससंग्रह करनेवालोंको चौगुना लाभ चौथे मास में हो धानू सस्ती विकै ४५ वृश्चिकस्थे गुरौ सोममेघः कार्तिकमासतः । सम्वत्सरः खण्डवृष्टिः धान्य "मल्पं भयं महत् ॥४६॥ गृहे परस्परं वैरमष्टो मासा न संशयः भाद्राधि नकार्तिकाख्यास्त्रयोमासा महर्घता ॥४७॥ हेमरूप्यं कांस्यताम्रतिला ज्यश्रीफलादिषु । महर्घ गुरुकापासलवणश्वेतवस्त्रकम् ॥४८॥ महिषी वृषभाअवाः समर्घा मध्यमंडले। पीडा स्यात्म्लेच्छलोकानां महोत्पात 'श्च संभवेत् ॥४९॥देशभंगोप्यल्पवृष्टिः सीणामपि च दुःखिता। मरौ . २ ३८ वर्षमबोध । तथा नागपुरे देशे क्लेशाकुला प्रजाः ॥५०॥धनेगुरो हेममालीमेघस म्वत्सरस्तथा। मार्गशीर्ष दिव्यदृष्टिः स्त्रीणां पीडा गृहे गृहे ॥ ५१॥पूर्व काले भवेद्धान्यं गोधूमशालिशर्कराः। कार्पासश्च ,प्रवालानि कांस्यलो हूँ घृतं,त्रपु ।। ५२॥ हेमरूप्यमहर्षाणि तिलास्तैलागुडस्तथा । पूगीफलं श्वेतवस्रेसमधूच कचिद्भवेत् ॥५३॥ मार्गशीर्षात्पुनज्येष्ठं यावत् घृतम हर्षता। महिपीवाजिधेनूनां मंजिष्ठायामहर्षता॥५४॥मार्गशीर्ष तथा पोपे मंजिष्ठा हिंगु मौलिकम् । जाती पूगीफलं चैव प्रवालानां महर्घता -॥५५॥चतुष्पादादि कार्पाससंग्रहो रसमाषकान् । तल्लाभःसप्तमेमासे प्रो क्तिो व्यक्तश्चतुर्गुणः ।। ५६ ॥ गुरौ मकरगे मेवो जलेन्द्र पौपवत्सरः।च तुष्पदक्षयो भूम्यां दुर्भिक्षं निर्जलो जनः॥ ५७ ॥ उत्तरापश्चिमे देशे ख" भण्डवृष्टिःकदापिच। पूर्वस्यां दक्षिणेचैव दुर्भिक्ष राज्यविग्रहम् ॥ ५८॥ पा नयबुद्धिरतालोका हाहाभूता च मेदिनी। जलतैलाज्यदुग्धान्नरक्तवस्त्रेम हर्घता ॥ ५९॥ उत्तमामध्यमा सर्वे सर्वभक्षणतत्पराः।क्षत्रियाणां क्षत्र मंगोम्लेच्छानां च ततः क्षयः॥६० ॥ चैत्राश्विनापाढमासाखयोमहर्ष हेतवः । पश्चाद्धान्यंभिक्षं स्यात्मजापीडादितस्कराः॥६१॥ अर्थः-वृश्चिकको वृहस्पति होनेपर सोमनाम मेघ वर्षे यह कार्तिकमासका सम्वत्सर प्रारम्भ होताहे इसमें खण्डवृष्टि धान्य थोडा भय अधिक हो ॥ ४६॥ घरोमें परस्पर वेर मा ठेमहीनैतक हो और भादों आश्विन कार्तिक तीन महीने अपराहो ॥ ४७ ॥ सोना चादी कोसी तावा तिल घी श्रीफल कपास नोन श्वेतवस्त्र अकरे बिकें ॥४८॥ भैंस बेल घोडे यह सस्ते मयेमटलमें पीडा म्लेटलोकोंमें महाउत्पात हो ॥ ४ ॥ देशभंग थोडी वर्षा खियौंको दुःख मरु और नागपुर देशमें प्रजा क्लेशस व्याकुल हो ॥ ५० ॥ धनकी वृहस्पनिमें हेममा. लोमेघ वर्षे मार्गशीर्पस सम्वतप्रारम्भ टिव्यवर्पा और त्रियोंको घरघरमे पीडादे ॥५१॥ पू. वकालमें गोधूम शालि शकर अधिक हो कपास मूगे कासी लोहा घी नपु (सोसा)॥५२॥ चादी सोना सस्ते हों तिलतेल गुड पूगीफल स्वेत वसभी सस्ते विकै ॥ ५३ ॥ मार्गशीर्पसे ज्ये तक जवतक धी अकरा हो तबतक महिपी घोडे धेनु मजीठ अकरे रहैं ॥ ५४ ॥ मार्गशीर्ष और पोपमें मजीठ हींग मोती जायफल पूगीफल प्रवाल अकरे विकै ॥ ५५॥चौपाये कपास रस उर्द इनका संग्रह करना उचित है इनका लाभ सातम मासमें चौगुना हो ॥५६॥ मकर- की बृहस्पतिमें जलेन्द्र मेघ, और पोपवत्सर होताहै चौपायोका क्षय दुर्भिक्ष और जलकी सच हो। ५७ ॥ उत्तर पश्चिमके देशोंमें खण्डवर्षाहो पूर्वदक्षिणमें दुर्भिक्ष और राज्यविग्रह हो।। ५८ ॥ लोप पापदि पृ पीपे शहापार हो जल तेल घी दूध अन्न लालवस अकरे भाषाटीकासहित । हो ॥ ५९॥ उत्तम मध्यम सब मनुष्य सर्व भक्षणमें तत्परहों क्षत्रियोका क्षत्रमग और म्टेच्छों का क्षय हो । ६० ॥ चैत्र आश्विन आपाढ तीन महीने अन्न तेज रहे पोडे नाज सस्ता म- जामें पीडा चोर अधिक हों॥ ६१॥ Pr हेमरूप्यकताम्रलोहकर्परचन्दनादिकम् । मह नर्मदातीरे अन्यदेशे शु भंभवेत् ॥६२ ॥ मेघमालपदे देशे भगोवर्षा न भूयसी । व्याधयो 'बहु" लारूप्यधातूनां च महर्षता ॥६३ ॥ भेदपाटे च कटके मार्गशीपि पो, षके। महाजनानां पीडापि छत्रभंगोमहाभयम् ॥ ६४ ॥देशग्रामपुरा दीनां विध्वंसो युद्धसंभवः । शालयोयवगोवूमामहर्घाःस्युस्तथा रसा। ॥६५॥ कुंभे गुरौ वज्रर्दशे मेघो माघादिवत्सरः। मुभिक्षं जायते तत्री ऋषिदेवद्विजार्चनम् ॥६६॥ कांस्यं च पित्तलं लोह मजिष्ठात्र का चनम् । एषां मासत्रयं यावत् समर्घत्वं प्रजायते ॥ ६७॥ मावफाल्गुन चैत्रेषु रोगामासत्रयेमता। महर्वं लवणं लोके मरौ धान्यमहर्षकम्।।६४ चैत्रवैशाखयोः सिंधुदेशे कटकचालकः । वस्त्रकंवलहिगूनां महर्घत्वं प्र जायते ॥६९॥ कार्तिके वाश्चिने रोगाश्छत्रभगोमहद्भयम् । रसकास वस्त्राणां सर्वत्र स्यान्महर्घता ॥ ७० ॥श्रावणे वा भाद्रपदे धान्ये संगृह्य ! ते यदा। पौषे स्याद्विगुणोलाभः युगन्धर्याश्च विक्रियात् ॥७१ ॥ मीनें, गुरौ फाल्गुने स्याद्वत्सरः समवोधनः । खण्डवृष्टिमहर्षाणि सर्वधान्या नि भूतले ॥ ७२ ॥ विविधा रोगपीडा च देशान्तरे ब्रजेजनः । मासा नां पंचकं यावद्भयं राजविरोधतः॥७३॥ पश्चात् सुखं सुभिक्षं च शी लिगोधूमशर्करा । तिलतैलगुडानांच महर्घत्व समीरितम् ।।७४ मंजि ठानारिकेलानां श्वेतवस्त्रं च दन्तकाः । कर्पूरलवणाज्यानों महत्वं जायते ।। ७५॥ पोपे लेशसमुत्पत्तिस्तथा फाल्गुनचैत्रयोः । मर्देश महापीडा दुर्भिक्ष तत्र जायते ॥ ७६ ॥ । अर्थ:-सोना रूपा ताबा लोर कपूर चन्दन यह नर्मदा के तटपर मारे और देशी सस्ते विकें ।। ६२॥ मालपददेशमें भगता और वर्षा थोडी व्याधी अनेक और धानू अफेरी ॥ ६३ ॥ भेदपाट और कटकदेशमें मार्गशीर्ष पार पोप इन दोमहीने महाजनोंका पीडाहो भवभग और महाभय हो ॥ ६४॥ देश ग्राम पुरम विध्वस और युदहो धाने जो गेहू रस करे विकें ॥ ६५ ॥ कुभकी वृहस्पतिमें वजट मेव वप मायवत्सर कहाँ इसमें सुभिक्ष और देवता ऋपिका पूजन हो ॥ ६६ ॥ कासी पीतल लोहा त्रषु (सीमा) मुवर्ण यह तीन माने वर्षप्रबोध। सस्ते रहें ॥ १७॥ माघ फाल्गुन चैत्र तीनमहीने रोगहों नून तेज मदेशमें अन्नभाव तेज। ॥ ६८॥ चैनवेशासमें सिंधुदेशमें सेनाजाय वन ऊन हिंगु भार तेज हो ॥ ,६९:१ कार्तिक आश्विनमें रोग छरमग और महाभय हो रस कपास वन्न सब जगह तेज हों ।। ७० ॥ यदि श्रावणाभादोंमें धान्यसंग्रह कियाजाय तो पोपमे वेचनसे दूना लाम हो ॥ ७१ ॥ मीनको धु- हस्पतिमें फाल्गुनसम्वत्सर संमवमेघ वर्षे जिसमें सण्डवृष्टि और सववस्त पृथ्वीमें तेज विके ॥७२॥ अनेकप्रकारको रोगपीडा और प्राणी देशान्तरोंमें जाय.और प्रांचमहीनेतक रोज- विरोध होनेसे भय हो ।। ७३ ।। पीछे सुख और सुभिक्ष हो शाली गोधूम शक्कर तिल तेल गुडे अकरे विकें ।। ७४ ।। मजीठ नारियल श्वेतवस्त्र हाथीदांत कपूर लवण घृत तेजें हो।७५॥ पोपमें क्लेश इसीप्रकार फाल्गन और चैनका महीना रहै मरुदेशमें महापीडी और दुर्भिक्ष हो॥७६॥ चतुष्पदानां मरणं वैशाखज्येष्ठयोर्भवेत् । आपाढे श्रावणे धान्यं घृततै लमहर्षता ॥७७॥श्रावणस्योत्तरे पक्षे महावर्षा प्रजायते । घृतं समर्घ भाद्रपदे शुभावाश्विनकार्तिको ॥ ७८॥ समर्घास्तिलकार्पास छत्रभंग स्ततोर्बुदे । मार्गशीर्ष तथा पोषे उत्पातो मरुमण्डले ॥७९॥ । 'अर्थ:-शास ज्येष्टमें चौपायोंका मरण हो आपाढ श्रावणमें धान्य घी तेलका भाव तेज ॥ ७७ ॥ प्रावण शुक्लपक्षमें वर्षा अधिक हो घृत सस्ता भाद्रपद माश्चिन कार्तिकमास श्रेष्ठ ॥ ७८ ॥ तिल कपास सस्ते रहैं अर्बुद देशमें छत्रभग मार्गशीर्ष पोपमें मरुमण्डलमें उ- स्पात हो ॥७९॥ अथ वक्रीविचारः। मेपराशिगतो जीवो यदा स्यान्मीनसंगतः। तदापाढश्रावणयोर्गोमहि प्यः खरोष्ट्रकाः॥१॥ एते महर्घतां यांति मासद्धये न संशयः। पश्चाद्धा द्रपदे मासे आश्विने हे महेश्वरि ॥२॥चंदनं कुसुमं वापि ये चान्येपि सुगंधयः। तैलपण्यानि सर्वाणि मासद्धयमहर्घता ॥३॥ वृपराशिगते जीवे वक्रीस्यान्मासपंचके। वृपभादिचतुष्पादेः स्तुलाभाण्डे महर्षता॥ ॥४॥संग्रहःसर्वधान्यानां मासाष्टके महर्घता। श्रीश्रावणे भाद्रपदे आ श्विने कार्तिके तथा॥५॥ तत्परं सर्वधान्यानां चतुष्पदा विशेषतः। विक्रयाद्विगुणो लामः त्रिगुणस्तुचतुष्पदे ॥ ६ ॥ मिथुनस्थः सुरगुरुः विकारं कुरुते यदा । अष्टमासी भवेत्कूरा चतुष्पदमहर्वता ।। ७॥मार्ग शीर्षादयो मासाः सुमिक्षं वसनं भुवि । लोकः सर्वोभवेत्स्वस्थो दुर्भिक्ष . hya M . भापाटीकासहित। कचिदादिशेत् ॥८॥ कर्कराशिगतो जीवो यदा वक्री भवेत्तदा दुर्मिक्ष जायते घोरं राजानो युद्धतत्पराः॥९॥राष्ट्रभंगं विजानीयाद्वैरोपद्रव संकुलम् | रसादिसर्वसंयोगो घृततैलादिखंडकम् ॥१०॥कापांसादीनिव स्तूनि लाभं दद्युन संशयः मार्गादिमासाः सप्तैव सर्वधान्यमहर्घता॥११॥ हस्पतिके वक्री होनेका विचार। अर्थः, मेप राशिका वृहस्पति वक्री होकर मीनका हो जाय तो आपाढ श्रावणमें गो. म- हिपी गधे ऊठ॥१॥ यह निःसन्देह दो महीनेको अकरे हो जाय पीछे भादों और आश्विन मासमें ॥२॥ चदन फूल तथा जो सुगन्धिके द्रव्य हे तेल तथा वेचनेकी सब वस्तु दो मास तेज रहे ॥ ३ ॥ जो वृपराशिको वृहस्पति पाच महीनै वक्री हो जाय तो वृपभादि चौपाये और मानद्रव्य वर्तन तेज हौं ॥ ४॥ सव धान्यका सग्रह करना उचित है. आठ मासतक तेजी रहे श्रावण भादी आश्विन कार्तिक ॥ ५॥ के उपरान्त सब धान्य और विषेपकर-चौ- पाये वेचनेसे दुना और तिगुना लाभ हो ॥ ६ ॥ मिथुनको वृहस्पति यदि बनी हो जाय तो आठ महीनेतक चौपाये तेज रहें ॥ ७॥ मार्गशीर्षादि महीनोंमें मुभिक्ष सब लोक स्वस्थ हौं कहीं दुर्भिक्ष हो ॥ ८॥ कर्कराशीके गुरु यदि वनी हों तो घोर दुर्भिक्ष और राजा युद्ध कर- नेमें तत्पर हों ॥९॥ राष्ट्रभग वैर और महा उपद्रव हो रसादि सब वस्तु घी तेल खाड और ॥१०॥ कपासादि वस्तुओंमें निःसन्देह लाभ हो मार्गशीर्पको आदि ले सात महीनेतक धा- न्य भाव तेज रहै ॥ ११॥ सिंहराशिगतो जीवो विकारं कुरुते यदा । सुभिक्ष क्षेममारोग्यं सर्वलोके प्रसन्नता ॥ १२॥ सर्वधान्यं च संगृह्य तुलाभभाण्डानि यानि च । गते पुनवमासेपुपश्चाद्विक्रयमादिशेत् ॥ १३॥ कन्याराशिगतो जीवो वि कारं कुरुते यदा। सूक्ष्मश्चतु भवेल्लाभो पुण्यकर्मवशात्पुनः॥ १४॥तु लाराशिगतो जीवो विकार कुरुते यदा । बहुभाण्डसुगन्धीनि कार्पास लवणानिच ॥ १५ ॥ समर्धाणि भवन्त्येव मार्गशीर्षव्यतिक्रमे। दशमा सात्यये लाभो द्विगुणस्तत्र संभवेत् ॥ १६ ॥ वृश्चिकं यदि संप्राप्य वक्रं. याति बृहस्पतिः। अन्नस्य संग्रहस्तत्र धान्यादेस्तु विशेषतः॥१७॥का पासस्य घृतादेर्वा मार्गशीर्षे च विक्रये। द्विगुणो जायते लाभस्तदा सं ग्रहकारिणः ॥१८॥ धनराशिगतो जीवः करोति वक्रतां यदा। अनि रेणैव कालेन सर्व धान्यसमर्पता ॥ १९ ॥ गोधूमचणकादीनि धान्या नि क्रय्यकाणिच । समर्घाण्यन्यवस्तूनि गुडश्च लवणादिकम् ॥ २० ॥ - ६ Im वर्षप्रबोध। चैत्रादिसंग्रहस्तेषां मार्गशीर्पादिविक्रयः। सर्वाणि,लाभ लभते मासेका दशकात्यये ॥ २१॥ मकरस्थो यदा जीवः करोति वैक्रगामिता। आ. रोग्यं कुरुते धान्यं समर्ष नात्रसंशयः ॥ २२ ॥ कुंभराशिगते जीवः क रोति यदि वक्रता। आरोग्यं सर्व स्वस्थत्वं राज्ञां श्रीर्जयसंभवः ॥२३॥ सर्वधान्येषु निष्पत्तिः सर्वधान्यस्यविक्रयः । घृतं तेलतुलाभांडं मासाष्ट के च संग्रहः ॥२४॥ पश्चातविक्रयतो लाभः सुभिक्षं निर्भया जनाः। पूजा गोद्विजदेवानां भवति नात्र संशयः॥२५॥ मीनराशिगतोजी वो वक्रतामुपयातिचेत् । धनक्षयस्तदा लोकेचोराद्राजापि रोषितः २६ निराधारा प्रजापीडा ग्रहभूतादिदोषतः। तुलाभांड गुरुः खण्डा अद दति वांछितम् ॥ २७॥ लवणं घृततैलादि सर्वधान्यमहर्षता । कार्यासः स्यार्धसम्माप्तिाभस्तेषां चतुर्गुणः ॥ २८ ॥ अर्थः-यदि सिंहराशीकी बृहस्पति वनी होय तो मुभिक्ष क्षेमआरोग्य और सब लोकोंमें प्रसन्नता हो ॥ १२॥ सब धान्य भाण्डादिक सग्रह करकै नीमहीने पीछे बेचना चाहिये ।। ॥१३॥ यदि कन्याराशिका बृहस्पति वत्री हो तो पुण्यकर्मके वशसै सूक्षमलाभ हो ॥ १४ ॥ तुलाराशीका वृहस्पति यदि वत्री होयतो बहुत वर्तन सुगंधीवस्तु कपास लवण ॥ १५ ॥ अ- करे हों और मार्गशीर्पके बेचनेपर पीछे दशमहीनेमें दूना लाभ हो ॥१६॥ यदिवृश्चिकको बृहस्पति वत्री हो तो अन्न और धान्यका सग्रह करना उचित है ॥ १७ ॥ कपास और धी मार्गशीर्पमें बेचनेसे दशमासके उपरान्त दूना लाभदायक हो इस्सै सग्रह करना उचित है ।। ॥ १८ ॥ धनराशीका वृहस्पति यदि वनी हो थोडेही दिनों मे सब धान्य सस्ते हो॥१९॥ गो- धूम, चना, धान्यादि बेचनेकी वस्तु और गुड एवणादि सस्ते हों ॥ २० ॥ चैत्रादिमें इनका संग्रहकरके मार्गशीर्षम चेचना ग्यारहमहीनेमें यह सब वस्तु लाभदायक हो ॥२१॥ यदि म- पारका वृहस्पति पत्री हो तो धान्य सस्ता आरोग्यता निसन्देह हो ॥ २२ ॥ यदि कुंभराशि- का वृहस्पति वत्री हो तो आरोग्य स्वस्थता राजोंको जय प्राप्त हो ॥ २३॥ सर्वधान्यकी प्राप्ति धान्यका विक्रय घी तेल तुलाभाण्ड पाठ मासमें सग्रह करना चाहिये ॥ २४ ॥ पीछे वेचनसे लाभ सुभिक्ष मनुष्य निर्भय गो दिन देवताओंकी पूजा हो ॥२५॥ मोनराशिको बृ- हस्पति यदि वत्री हो तो धनक्षय चोरोसे भय और राजौंको प्रोध हो ॥ २६॥ प्रजाको अधि- पीडा ग्रह भूतादिदोपसे हो तुलाभाण्ड खाड यह वांछित लाभ दें।।२७ ॥ लवणाधी तेल सब धान्य अकरे हों कपास अकरी इनमें चौगुना लाभ हो ॥२८॥ इति गुरु वक्री विचारः। अथ नक्षत्रभोगविचारः। कृत्तिकाराहिणीऋक्षे यदा तिष्टेट्टहस्पतिः । मध्यमात्रभवेदृष्टिः सत्यं में भाषाटीपासहित । पति मध्यमम्॥१॥मृगशीर्ष तथाीयां यदि तिष्ठेबृहस्यतिनसुभिक्षल 'भते सौख्यं वृष्टिजात संदाजनः॥२॥ आदित्यपुष्याश्लेषासु गुरुभोगे मसंगिनी अनावृष्टिभयं घोरं दुर्भिक्षं सर्वमण्डले ॥३॥मघा च पूर्वा फाल्गुन्यां यदा तिष्ठेदृहस्पतिः। सुभिक्षं क्षेममारोग्यं देशयोगबहूदकम् " ॥४॥ उत्तराफाल्गुनीहस्ते गुरौ वर्षासुख जने। चित्रायों च तथा स्वा तो विचित्राधान्यसंपदाः॥५॥ विशाखायां च राधायां सस्यं भवति मध्यमम् । मध्यमेव भवेद्वा वर्षी सापि च मध्यमा ॥६॥गुरुज्येष्ठामूलें चारे मांसहयेन वर्षणम् ।परतःखण्डवृष्टि स्यात्नृपाणां दारुणोरणः॥७॥ जीवे पूर्वोत्तराषाढयुक्त लोकमुखं मतम् । त्रिमासान्जायते वर्षा मासमे कंन वर्षति ॥८॥ श्रवणे वा धनिष्ठायां वारुणे गुरुसंगमे । सुभिक्षं क्षे ममारोग्यं बहुसस्या व मेदिनी॥९॥ पूर्वोत्तराभाद्रपदयोरनावृष्टिभया दिको पोष्याश्विनीभरणिषु सुभिक्ष धान्यसंपदा ॥१०॥ मृगादिपंचक चित्रादयमेवाष्टकं तथा। नक्षत्रेषु शुभं जीवो शेषेषु शुभमादिशेत्॥११॥ स्वातिर्मुख्याष्टके जीवे त्वश्विन्यादित्रिकेपि च । शनिराहुकुजेश्चैव प्रत्ये के सहितो भवेत् ॥१२॥ संचरते यदा काले सुभिक्षं जायते तदा। मृ गादिदशके जीवे धनिष्ठापंचकेथवा ॥१३॥ भौमादि सहितोगच्छेत् दुर्भिक्षं तत्र जायते । एकराशिगते चैव एकः तु महद्भयं ॥१४॥ अति चारगते जीवे वक्रीभूते शनैश्चरे । हाहाभूत जगत्सर्व रुण्डमाला मही तले॥१५॥ अर्थ-जिस समय वृहस्पति कृत्तिका रोहिणी नक्षन हो उस समयू मध्यम वृष्टि हो म; ध्यम धान्य हो॥१॥ मृगशीप और आदीमें वृहसति हो तो मुभिक्ष सुखार या अच्छी हो॥२॥ पुनर्वसु पुष्य आश्लेपामें बृहस्पति हो तो अनावृष्टि घोर भय और सब स्पानमें दु- मिक्ष हो ॥ ३ ॥ जो मया और पूर्वाफाल्गुनीमें बृहस्पति हो तो मुभिक्ष क्षेम आरोग्य और वर्षा अच्छी हो ॥ ४॥ उत्तराफाल्गुनी हस्तमें जो वृहस्पति स्थित हो तो वर्षा अच्छी मनुष्यों- में सुख हो चित्रा स्वातिम श्रेष्ठ धान्यकी प्राप्ति हो ॥५॥ विशाखा और अनुराधा मध्यम वर्षा हो, और मध्यमही धान्य हो ।॥ ६॥ ज्येष्ठा और मरमें वृहस्पति हो तो दो मासत- माया न हो पीछे खण्डवृधि और राजौंमे युद्ध हो ॥ ७॥ पूर्वी उत्तरापाटामें वृहस्पति हो तो लोकमें सुख तीन महीने वपी और एकमहीने नहीं हो ॥ ८॥ श्राण धनिष्टामें शतभिषामें गुम हो तो सभिक्ष क्षेम आरोग्य और पृथ्वीमें बहुत धान्य हो ॥ ९॥ पूर्वा और उत्तराभाद्र- पंप्रबोध ।। है . में बृहस्पति हो तो अनावृष्टि हो रेवती अश्विनी भरणीमें मुभिक्ष और धान्य संपदा हो॥१०॥ मृगशिरकू आदिलेकर पांच चित्रादि आठ, नक्षत्रीमें वृहस्पति शुभ होतीहै ॥ ११ ॥ स्वातिको आदिलेकर पाठ और अश्विनी आदि तीन नक्षत्र में जो शनैश्चर राहु केतु मंगल सहित वृह- स्पति हो ॥१२॥ और इनके सहित गमन करे तो सुभिक्ष हो, और मृगशिर आदि देश नक्षत्र और घनिष्ठादि पांच नक्षत्रमें ॥ १३॥ मंगलके सहित प्राप्त हो तो दुर्भिक्ष हो एकराशि- में प्राप्त होकर जो वृहस्पति एक नक्षत्र में वर्तेतो महा भय हो॥१४॥बृहस्पतिके तीव्रगति हो- ने और शनैश्चरके वक्री होनेमें सब जगतमें हाहाकार हो और रुण्डमाला पृथ्वी में गिरे ॥ १५॥ मेपे गुरूदयस्त्वतिवृष्टिरेव दुर्भिक्षमुत्तममृतिपमे सुभिक्षम् । पाषाणशा लिमणिरत्नमहर्घभावः स्वावस्थया मिथुनके गणिकासु पीडा ॥ १॥ स्यात्कटे जनमृतिर्जलवृष्टिरल्पा सिंहे तथैव कथितं बहुधान्यलामः- कन्यास्थितस्य गुरोरुदये शिशूनां पीडा तथैव गणिकासु च वृद्धलोके ॥२॥काश्मीरचंदनफलादि महर्षता स्याल्लाभो महान्व्यवहतो च-तु लीवलंबे । दुर्भिक्षतालिनि धनुष्यपि चाल्प वर्षा लोके रुजो मकरके ब हुधान्यवृष्टिः ॥३॥ कुंभे गुरोरुदयता सकलेपि देशे वृष्टिर्घनेपि च धने ति महर्घमन्नं । मीनेल्पवृष्टिरवनीश्वरयुद्धंयोगः पीडा जनस्य मरकान्नर कानुरूपा॥ ४॥ जीवोभ्युदेति यदि कार्तिकमासि वन्हिोंके न वृष्टि रपि रोगनिपीडनं च । मार्गेपि धान्यविगमं सुखमेव पोषे नीरोग्यतोस कलधान्यसमुद्भवश्च ॥ ५॥ माघे तथैव परतो भुवि खण्डवृष्टिः चैत्रे वि चित्रजलवृष्टिरतोपि राधे । सर्व सुखं जलनिरोधनमेवशुक्रेप्याषाढके नृ परणोन्नमहर्षता च॥६॥आरोग्यं श्रावणे वीबहुली मुखिनो जनः भाद्रमासे धान्यनाशःआश्विनः सुखदः स्मृतः॥७॥इति गुरोदयमासफल।। अर्थः-मेपराशिका गुरु उदय होय तो दुर्भिक्ष मरण हो वृपमें उदय हो तो सुभिक्ष हो पापाणशालिमणिरत्न अकरे विकैं, और मिथुनमें अपनी अवस्थासे गणिका वेश्या- में पीड़ा हो ॥९॥ कर्कमे उदय हो तो मनुष्योंमें मृत्यु जलवृष्टि योड़ी सिंहमें उदय हो तो बहुत धान्यका लाभ हो और कन्यामें गुरुका उदय हो तो बालक गणिका तथा वृ. दौंको पीड़ा हो ॥२॥ नुलाके उदयमें कश्मीरी चंदन फलका भाव तेज हो लाभ व्यवहा- रमें अधिक दो वृश्चिकमे दुर्भिक्ष धनमें थोड़ी वा मोर मकरके गुरुउदय हों तो लोकमें रोग और धान्य अधिक वर्षा श्रेष्ठ हो ॥ ३॥ कुंभके वृहस्पति उदय हों तो सब देशमें धनी वर्षा हो अन्न अकरा रहे मीनके उदय हों तो राजोंमें युद्धका योग और मनुष्योंको नरकको समान पीड़ा हो ॥ ४॥ यदि कार्तिकमासमें वृहस्पति उदय हों तो लोकमें वर्षा Gre 7 मापाटीकासहित । थोडी रोगपीडा मार्गशीर्ष धान्य दूसरे स्थानों में जाय सुख हो पॉपमें नीरोगता और धा- न्यकी प्राप्ति हो॥५॥ माधफाल्गुनमें उदय हो तो बण्डवा चैत्रमें हो तो विचित्र जल- दृष्टि वैशाखमें सर्व सुख ज्येष्टमे जलका निरोध आपाढमें उदय हो तो राजोंमै युद्ध अन्न माव तेज हो ॥ ६॥ श्रावणमें उदय होतो आरोग्य और वर्षा हो मनुष्य सुखी भाद्रमासमें उदय हो तौ धान्यनाश आश्विनमें सुख हो ॥७॥ इति गुरुयफलम् ॥ यद्यस्तमेत्य जगतो गुरुरल्पवृष्टिदुर्भिक्षमेव कुरुते वृषमे गुरुस्यात् । तैलं घृतंच लवणं प्रभवेन्महर्घ मृत्युस्तथाल्पजलदो मिथुनस्तमास्ते ॥१॥ कर्केस्ततो नृपमयं कुशलं सुभिक्षं सिंहे नृनाधरणलोकधनादिनाशः । कन्यास्ततः सकलधान्य समर्घतास्यात् क्षेमं मुभिक्षमतुलं जनलोकना शः॥ पीडा द्विजेषु बहुधान्यसमर्घता च जाते तुलास्तमयने नयनेषु रोगः राज्ञां भयान्यलिनितस्करलुंठनानि मापास्तिलाश्च बहवो धनुषा:- स्तमास्ते । कुंभेगुरोरस्तमयात्मजायाः पीडापरं गर्भवतीच जाया मीनं सुमिक्षं कुशलं समर्घ धान्य घनस्याल्पतयापि पृष्ठे ॥१२॥ अर्थ:-जो मेपकी बृहस्पति अस्त हो तो थोडी वर्षा वृपकी दुर्भिक्ष करे मिथुनमें घी तेल लवण अकरे मनुष्योंमें मृत्यु थोडी वर्षा हो ॥ १ ॥ कर्कमें अस्त हो तो राजोंमें भय कुश- ल और सुभिक्ष हो सिंहमें गुरु अस्त हो तो राजौमें युद्ध लोगोंके धनका नाश हो कन्यामें अस्त हो तो क्षेम मुभिक्ष हो तुलामें मनुष्योमें पीडा हो ब्राह्मणोंमें पीडा अन्न तेज वृश्चिकमें नेत्रोंमें रोग धनमें राजोंका भय चौ की लूट हो मकरमें अस्त हो तो उर्द तिल अधिक कुममें अस्त हो तो प्रजा और गर्भवती स्त्रियोंको पीडा हो मीनमें अस्त हो तो सुभिक्ष कुश- ल धान्यभाव सस्ता हो यद्यपि वर्षा थोडी पर धान्य अधिक हौं ॥ १२॥ इतिअस्तविचारः॥ अथ मेघविचारः। सुबुद्धो नंदिसारी च कर्कोटकः पृथुश्रवः। वासुकिस्तक्षकश्चैव कंबल चतरावुभौ ॥१॥ हेममालीजलेन्द्रश्च वज्रदंष्ट्रो वृषस्तथा। सुबुद्धोबुद्धि कर्ता च कटवृद्धिशुभावहः॥२॥ नंदिसारी महावृष्टिः नदन्ति च महा जनाः। कर्कोटके जलं नास्ति मरणं च महीपतेः॥३॥ पृथुश्रवो जलं सूक्ष्मं सस्यहानिः प्रजायते । वासुकिः सस्यकर्ता च बहुवृष्टिकरः शुमा ॥४॥ तक्षके मध्यमा वृष्टिः सस्यं भवति शोभनं जायतेश्वतरे स्वल्पः जलं सस्य विनश्यति ॥५॥ हेममाली महावृष्टिःजलेन्द्रः प्लावयेन्महीं। वज्रदष्टे त्वनावृष्टिः वृषे स्यादीतितो भयम् ॥ ६॥ इति हादशधानागाः, ततश्चावर्तसंवर्तपुष्कराद्रोणकारकाः।नीलश्च वरुणो वायुस्तमोमेघःस ।

- । पर्षप्रबोध। नातनः ॥७॥ आवर्ते मंदतोयं स्यात्संवर्त वायुपीडनं । पुष्करे बहुलं तोयं द्रोणे वृष्टिसुखं भवेत् ॥८॥अल्पवृष्टिः कालमेवे नीलः क्षिम प्रव पति । वारुणेत्वर्णवाकारा वायुवर्षाविनाशनः ॥ ९॥ तमामेवेन वृष्टिः- स्यान्मेवान फलमीदृशम् ॥१०॥ E":"। । अथ मेघविचारः अर्थः-सुबद्ध, नंदिसारी, कर्कोटक पृथुश्रवा वासुकि तक्षक कंवल अश्वतर ॥ १ ॥रेम- माली जलेन्द्र बज्रदंष्ट्र वृप यह नाग हैं सुबद्धि बुद्धिका कती कष्टदायक और वृद्धि कर्ता सुखदायक है। आनन्दितारीमें महावर्पा महाजन प्रसन्नहीं कर्कोटक नागके समय जल न वर्षे राजाका मरण हो ॥३॥ पृथअवामें योडा जल वर्षे सेतीको हानि हो बांसुकीके समय घटे शुभमे अच्छी वर्षा हो ॥ ४ ॥ तक्षकमें मध्यम वृष्टि खेती अच्छी हो, अश्वतरमें थोडी वर्षा वर्षासें खेती नाश हो ॥ ५ ॥ हेममालीमें महावर्षा जलेन्द्र पृथ्वीको जलसे पूर्णकर, वज्रदं- ट्रमें अनावृष्टि और वृपमे ईति भय हो ॥६॥ इति द्वादशनागाः ॥'आवर्त सम्वत पुष्कर द्रोण कालक नीलवरुण वायु तम मेध सनानत, यह मेघ हैं आवर्तमेघमें मंदजल सम्वर्तमें वायु- पीडा पुष्करमें बहुन वर्षा द्रोण भी अच्छी वर्षा हो ॥८॥ कालमेघमें थोड़ी वर्षा नीलमें शीन वर्षाहो वारुणमें महावी सागरको समान हो । वायुमें वर्षाका नाश हो ॥ ९॥ तममे- घम वर्षा नहीं होती यह मेघोंका फलहै ॥ १०॥ ईश्वरउवाच-शुणु देवि यथातथ्यं वर्णरूपं तु यादृशं'। मदरोपरिभेपास्ते सजानोदश कीर्तिताः ॥१॥कैलांसदेशविक्षेपा प्राकारे कोटजे देश । । उत्तरे दश राजानः शृंगवेरे तथा दश ॥२॥ पर्यन्ते दश राजानो दशे व हिमवन्नगे। गंधमादनशैले च रोजानो दशवारिदाः॥ ॥ अशी तिमेवा,विख्याता कथितास्तव पार्वति । दिग्भागे च विदिग्भागे प्रत्ये के दर्शनीरदाः॥४॥उन्नमय्य प्लावयन्ति मर्त्यलोके जलैर्महीं-कम लेटदले घृष्टये प्रतिष्ठाप्य पयोधरान् ॥५॥ धूपदीपैश्च कुसुमैः नैवेद्यः परिपूजयेत् । सिंहको विजयश्चैवलंबलोथ जयद्रथः ॥६॥ धूम्रश्च शिख रोभद्रा मातंगो वरुणस्तथा। त्रिलोचनपतिश्चैव मेघामाच्या अमीदश ॥७॥ आनंदः कालदंष्ट्रश्च सूकरो वृषमस्तथा । मृगो नीलो भवः कुमो निकुमो महिपस्तथो॥८॥दशमेघादक्षिणस्यां प्रायोमी वृष्टिका रिणा कुंज कालमेघश्च पुनर्व कालकालको ॥ ९॥ दुंदुभिर्मेखला सिंधुः मकरश्त्रकस्तथा । पश्चिमायाममीमेघा दश वर्षाविधायिनः भापाटीकामहित । ॥१०॥ मेघनादोय नृपतिः त्रिलोचनसुधाकरो। दंडिनश्च तितालश्चः त्रैकालिकजलस्तथा ॥११॥ वृपभोपि च गन्धर्वो वियूमा सिकथः पर 1गकरो दशमेघाः स्युरुत्तरस्यां प्रवर्पिणः ॥१२॥ओंकारो नान्मि मूर्ति श्च मयूरः कैदिकस्तथा। बिंदुकांतिश्च करणः हेमकांतिश्च पर्वतः॥१३॥ गैरिकश्चाव्हया मेघाः स्वर्गलोके व्यवस्थिताः । दिव्यमेघाश्च सप्तेते सर्वांगसुखदायिनः॥१४॥ " अर्थ:-सुनो देवि में इनका वर्ण और रूप कहाताहू मन्दरपर्वतपर मेवोंके दश राजा निवास करते हैं ॥१॥ दश फैलास और दश शुगवेरपुरके राजा हें ॥ २ ॥ दश पर्यन्तदे- शके राजा दश हिमवान पर्वतके दश गधमादन पर्वतके राजा हे ॥ ३॥ हे पार्वती सब अस्सी मेव विख्यात हैं दिशा विदिशा सब स्थानोमें दश दश मेघ रहते हे ॥ ४ ॥ उदय होकर पृथ्वीको तरकर देते हे वाके निमित्त यादोको अष्टदल कमलके बीच स्थापन करे ॥ ५ ॥ धूप दीप फूल और नैदेद्यस पूजा कर सिंहक विजय कबल जयद्रथ ॥ ६ ॥धून शिख भद्र मातंग वरुण निलोचनपति यह दश मेध पूर्वदिशामे रहते हैं ॥७॥ आनद का- लदंए शूकर वृपभ मृगनील भव कुभ विभ महिप ।। ८ ॥ यह दश मेघ दक्षिणमे रहकर वर्षा करते हैं कुजर कालमेघ काल कान्त ॥ ९ ॥ दुदुभी मेखलासिधु मकर छक यह दश मेघ पश्चिममे वर्षा करते हैं ॥ १०॥ मेघनाद नृपति त्रिलोचन सुधाकर दडी सिताल कालिक जल ॥ ११ ॥ वृफ्भ गन्धर्व विभूमासि कथा, पर, गकर यह दश मेघ उत्तरदिशामें वास कर- तेहै. ओंकारयुक्तमूर्ति मयूरकदिक विंदुकाति करण हेमकान्ति पर्वत ॥ १३ ॥ गैरिक यह मेघ स्वर्गमें रहतेहैं और यह सातौं मेघ दिव्य होनेसे सर्वांग सुस देतेहैं ॥ १४ ॥ दशमेघाः श्वेतवर्णाः दशैव लोहितास्तथा। दश पीता स्वर्णवर्णा दश धूम्राः प्रकीर्तिताः ॥१५॥ अथ मंत्रं प्रवक्ष्यामि येन मंत्रेण आहिताः । आगच्छन्ति धरा देवा कुर्वन्त्येकार्णवामहीं ॥१६॥ ओं न्हीं मेवदूत्यै नमः आगच्छ २ स्वाहा ॥ ओ मेघदूतीकमलोद्भवाय नमःआमच्छ र स्वाहा। ओं न्हीं महानीलराज हिमवन्निवासिने आगच्छ २ स्वाहा।। - ओन्हीं नंदिकेश्वराय जठरनिवासिने मेघराजाय आगच्छ २ स्वाहा।। ओं न्हीं कुबरराजाय शृंगवेरनिवासिने आगच्छ २ स्वाहा ॥ जपोस्य दशसाहस्रो दशांशो होम एव च । पुष्पेश्च धवल रक्त करवीर समुद्भवः॥१७॥ ततः पुष्पैः सुगन्धादयः अर्चयेन्मेवतप्तकम् । दद्या चैववने गत्वा मेघानावाहयेहुधः ॥१८॥ शिवालये तडागे वा पुनर्मेवा - na र " M ? ४८ वर्पप्रबोध। विसर्जयेत् । दिव्यमेवाश्च सप्तेते कुलपर्वतवामिनः ॥१९॥ सर्वथामीषु मेषेषु राजानोद्वादशास्मृताः प्रबुद्धनंदशालाद्यागुरुणैव प्रयोजितीः२० इति श्रीमेवमहोदये वर्षप्रवोधे श्रीमेवविजयगणिविरचिते : 1 सम्वत्सराधिकारश्चतुर्थः पूर्णः ।। अर्थः-दश मेघ श्वेत दश लाल दश पीले देश धूम्रवर्णके हे॥ १५ ॥ अब वह मंत्र क- इत्ताहू जिनकेद्वारा मेघ आकर पृथ्वीको जलसे पूर्णकर देतेहैं।॥ १६ ॥ यह ऊपर लिखे हैं इन मत्रोंका दश सहस्र जप और दशाश हवन करना घोले और लाल कनेरके, फूलोंसे, हव- न करे ॥ १७ ॥ फिर मुगधियुक्त पुप्पोसै सातों मेघोंको पूजे नदी या वनमे जाकर पण्डित मेघोंको आवाहन करै ।। १८॥ शिवालय और सरोवरमें फिर मेघोंको विसर्जन करे यह दिव्य सात मेघ कुलपर्वतके निवासी ॥ १९ ॥ सब प्रकार इन मेघोंमें बारह राजा हे वे प्रबुद्ध नदशालादि नामवाले हैं॥ २० ॥ इति श्रीमेघमहोदये०व० सम्बत्सराधिकारश्वतर्थः ।। अथ शनिचारः। । मेषस्थे भानुपुत्रे त्रिभुवनविदिते याति धान्यं विनाशं नूनं तैलंगवंगेह यमुरदलितं विग्रहस्तीन एव । पाताले नागलोके दिशिविदिशगताः भीतभीताः नरेन्द्राः सर्वे लोका विलीनाः प्रथमगतधुना याचमाना जन्ति॥१॥वैरावर्तीजनानां धनसुखहरणां सर्वदेशे महर्घ दुःखं वैराग्ययो' गः सकलजनमनस्यान्ननाशः पशनधान्यं सेवार्द्धनाशे रसकसंसहितं सर्वशून्यं जनानामित्येते सर्वदेशाः परिजनविकलाः सूर्यपुत्रवृपस्थे॥२॥ अर्थ -शनिश्चरके मेपराशिपर होनेसे धान्यनाश तैलग और वगदेशमें विग्रह पाताल नागलोक दिशा विदिशामें राजा मयसै भागते फिरें सम्पूर्ण लोकमें क्लेश हो मनुष्य जहां तहा याचना करते फिरें ॥१॥ मनुष्योंमें पैर धन और सुखका नाश सब देशमें अन्नकी तेजी दुःख वैराग्य सब मनुष्योंके मनमें ताप पशुओंका नाश धान्यका नाश रेस तेज शून्य- ता इस प्रकार अनेक देशोंमें व्याकुलता वृपके शनिश्वरमें होती है ॥२॥ । आद्य कार्यासलोहलवणतिलगुडाः सर्वदेशे महर्घाः मंजिष्ठा हेमतारे वृष भहयगजं सर्वधान्यं समधू । सप्तद्वीपे समुद्रे सुखिजनसहिते सर्वसौख्यं नरेन्द्राः सर्वत्रो यान्ति मेघाः सकलमुनिमतं मेथुने सूर्यपुत्रे ॥ ३॥रो गा नित्यं ग्रसन्ति प्रचुरपरिभवो वित्तनाशस्तथैव कार्ये हानिर्विरुद्धः स कलमयजने देशचिन्ताविपादः। आरावोऽम्बुपातष्टलटलपृथ्वी सर्वलो । Ary भापाटीकासहित । कादिनाशः सर्वस्मिन्राजयुद्धे पशुधनहरण कर्कटे सूर्यपुत्र ॥४॥y म्यां नाशश्चतुष्पाद्गणहयवृपभैयुद्धदुर्भिक्षरोगैः पीड्यन्ते सर्वदेशाउदधि पुरपथे दुर्गदेशेषु मैगः। म्लेच्छांन्तो धान्यभावोधनसुखमवनीशेन्द्रचन्द्र प्रतापः सर्वे ते योन्ति काले भ्रमति युगमिदं सिंहगे सूर्यपुत्रगाशा का श्मीर याति नाश हेयरवदलित विग्रहं तत्र कुर्याद्रनस्थं धातुरूप्यं गजह यवृषभ छागलं माहिषांची मांजिष्ठाकुंकुमाधं रसकॅससहित यान्ति सर्वे समचं कन्यायां सूर्यपुत्रे सकलजनसुखं संग्रहे सर्वधान्यम्।।दाधान्यानां महर्षता गरंगरलधरां क्लेशपूर्णाश्चदेशाः पृथिव्यांकम्पमाप्तासकलमुनि वरे देहपीडापिनित्यं । सर्वे ते यान्ति नाशं नरपुरनगराण्यम्बुदोप्यल्पाए वचक्रावर्तोजनानां सुखधनरहितः सूर्यपुत्रे तुलायां ॥७॥---- अर्थः-कपास लोहा लवण तिल गुड सब देशमें अकरे, मजीठ सुवर्ण वृषमे हाथी घोडे सस्ते, सप्तदीप सागरपर्यन्तके वासी प्रसन्न, राजोंको सर्व सुख सर्व स्थानमें श्रेष्ठ वो यह मिथुनके शनिका फल हैं ॥३॥ कर्कके शनि होय तो रोग अधिक तिरस्कार धननाश का यमें हानि मनुष्यों में विरोध देशमें चिन्ता और विपाद शब्दयुक्त जलको वेग हो जिससे पृथ्वी दुःखी लोकविनाश राजोंमें युद्ध पशु और धनका हरण हो ॥ ४ ॥ सिंहके शनिमें चर तुप्पद हाथी घोडे आदिका नाश हो युद्द दुर्भिक्ष और रोग फैले सब देशोमें पीडा सागरत, टके देशोंमें क्लेश हो म्लेच्छोंसें प्रजा दुःखपाचे धान्यभाव अच्छा राजोंको धनसुर्ख और उनका प्रताप फैले और पीछे सब दुःख पावे दुःखी हो प्राणी भ्रमण करे ॥५॥ कन्याके शनि हो तो कश्मीरदेशका नाश हाथी घोडौंमें लेश विग्रह रत्न घात चांदी हाथी घोडे बेल छाग भैंसे मजीट कुंकुम यह सस्ते हों सब जनोंको सुख धान्यसंग्रह करना उचित है ॥ ६॥ तुलाके शनि हो तो धान्यमार तेज पृथ्वी व्याकुल देशोंमें भरपूर क्लेवर पृथ्वी का पनि योंको देहपीडा, नगर गाय कहीं उज. वनौंका नाश हो जल थोडा व पवन चले मनुष्य सख और धन रहित हो॥७॥ भूमीशाः क्रोधपूर्णा विषधरमुदिताः पक्षिणां सन्निपातः सप्तद्वीपप्रकम्पा नरपतिमरणं यांति मेघा विनाशं । वैकल्पान्याप्यमानः सकलजनरि पुः सर्वकार्य निहन्ति सर्वे ते यान्ति नाशं सकलगुणविधेदृश्चिके सूर्य पुत्रे॥८॥ सप्तद्वीपाः समुद्राः सकलमुनिवनं वायुपूर्णा धरित्री विमा वेदांगलीना जगति जनसुखं सर्वतो यातिसस्य धान्यं चारु प्रभूतं रस कसबहुलं याति धान्यं प्रसारं सर्वेषां वा जनानां प्रहसति वदनं सूर्यपु धनस्थे ॥९॥ रूप्यं तानं सुवर्ण हयगजवृषभं स्त्रकार्पासमूल्यं सर्व .

५०
• वर्षप्रबोध ।
स्मिन्धान्यमानं भवति भुवितले सर्वनाशश्च सस्ये। पृथ्वीशाः कोधपूर्णा
भवति पथि भयं सर्वरोगाद्विनाशःचिन्तानस्था नृपाणां भवति सति व
ले सूर्यपुत्रे मृगस्थे॥१॥ लक्ष्मीनाकार सौख्यं धनकण सहितं देशसौ
स्यं नृपाणां धर्माधर्मो विधत्ते,सुखनिरतजनो मेघपूर्णा धरित्री । मांग
ल्यं सर्वलोके भवति बहुशः सस्यनिष्पत्तिहर्षा भूमी रम्या विवाहर्जनसु
खसमयः कुंभगेसूर्यपुत्रे ॥११॥ पृथिव्यां कंपमात्रं प्रचलति पवनः कम्प
ते नागलोकः सप्तदीपेषु सिन्धोगिरिवरगहने सर्ववृक्षादिहानिःसनाशः
पृथिवीपतीनां जनयदविलयो यान्ति मेघाः प्रणाशं चक्रावर्तेः समस्तंभ्र
मति जगदिदं मीनगे सूर्यपुत्रे॥१२॥
अर्थः-वृश्चिकके शनि हो तो राजा क्रोधकरे सर्प प्रसन्न पतियोंमें युद्ध सातहीपकी पृ.
रवीमें भूचाल हो राजाका मरण मेघोंका नाश मनुष्योंमें कलह विकल्पशनुता फैले कार्यों-
का नाश और गुणियोंको क्लेश हो ॥८॥ धनके शनि हो तो सातदीप समुद्र सकल मुनि-
यो योंके वन और पृथ्वी वायुसे पूर्ण हो ब्राह्मणवेदागों में प्रीति करे ससारके मनुष्योंको सस
धान्यकी सब प्रकार उत्पत्ति रस अधिक धान्य बहुत हो सब मनुष्य प्रसन्नमुख हों ॥९॥
मकरके शनि हों तो चादी ताम्बा सोना हाथी घोडे बैल सूत कपास इनका भाव बहुत तेज
हो धान्य बहुत न्यून खेतीका नाश राजा क्रोधपूर्ण मार्गमें भय रोगसै प्रजाका नाश राजोंमें
चिन्ता अधिक हो ॥१०॥ कुमके शनि हों तो लक्ष्मीकी प्राप्ति देशमें सुख धन अधिक रा.
जोका प्रसन्नचित्त धर्माधर्मयुक्त मनुष्य, पृी मेघोंसे पूर्ण सब लोकमें मगल धान्यकी प्राप्ति
प्रसन्नता पृथ्वी मनोहर मनुष्य विवाहादि मगलसै पूर्ण हो ॥ ११॥ मीनके शनि हो तो
पृथ्वी हलै पवन तीव चलै नागलोक कापैं समुद्र उछले पर्यंत और वृक्षादिकोंकी हानि
राजोंका विनाश मेंघोंका अभाव और प्रचण्ड पपनसे सारा जगत् भ्रमे ॥ १२ ॥
मेषेशनेरुदयने जलवृष्टिरुचैः सौख्यं जनं च वृषभगे तृणकाष्ठकष्टम् । अ,
श्वेषु रोगकरणं च महर्घभिक्षुजन्यं गुडादिमिथुनेति सुमिक्षमेव ॥१॥
वृष्टिर्न कर्कगृहगे सरसां च शोपः सर्वत्रमारिभयमाशुजनेषुपीडा पीडा
गम कचन सिंहगते शिशूनां नाशप्रकाशनमधार्मिकशासनस्य ॥२॥
कन्याशने रुदयता किल धान्यनाशः पृथिवी ससंधिरतुलस्तुलयानव
। गोधूमवर्जितमही तदसौ फलं स्यात् अस्वस्थताधनुषिमानुपजाति
रोगं ॥३॥ स्त्रीणां शिशोश्च विपदोखिलधान्यनाशः शौरमंगेभ्युदयने
नृपयुद्धबुद्धिः। नाशश्चतुष्पदकुले कलशेष मीने दीनेजने ननु शनेरुद
यानधान्यम् ॥ ४॥

भापाटीकासहित । अथ अस्तविचारः। मेपेस्तंगमने शने विर्जने धान्यं महर्घ वृषे सर्वत्रापि गवादिपीडनम हो पण्यांगना मैथुने । दुःखातों पथि ककटे रिपुभयं कार्पासधान्यादि षु दौलम्यं जलदेष्ववर्पणविधिः सिंहे तु प्रचुर व्यथा ॥१॥धातूनां च महर्वतानविगमः कन्यास्थितावग्रतो लोकेन्यपि तुलावलेन सततं नि प्पत्तिरानंदतः स्वल्पं 'धान्यमलो जने नृपभय पीडापि शलभादिजा चापे लोकसुखं मृगेपि पवनेनावृष्टिनारीमृतिः ॥ २ ॥ कुंभे शीतभयं चतुष्पदंपरिग्लानिश्च हानिर्गवां मोनेहीनतया धनस्य न जलं कापीह वापीस्थले। संतापी नृपतिः स्वधर्मविमुखः पापी जनः पीडया मंदम दसमंसभूपतिरणौ मन्देस्तमप्याश्रिते ॥३॥ अर्थः-मेपका शनि उदय होय तो जलवृष्टि मनुष्योंमें सुख वृपमें तृणकाष्टका कष्ट भ- श्वोंमें रोग ईश्वरसे उत्पन्नहुए पदार्थ अकरे हों, और मिथुनमें उदय होय तो सुभिक्ष हो ॥१॥ कर्कमें उदय होय तो वर्पाका अभाव रसोंमें शुष्कता सर्वत्र मरीका भय जनोमें पीडा सिंहके होनेमें पीडा बालकोंको और राजाका अधर्मशासन प्रगट हो ॥ २॥ कन्याके शनि उदय हो तो धान्यनाश लाकै उदयमें पृथ्वीमें सघि और महावी हो पृथ्वी गेहू रहित हो यही फल वृश्चिककें उदयमें जानना ॥ ३॥ धनमें शनि उदय हों तो भनुष्यों में अस्वस्थता मनुष्यजातिमें रोग स्त्री और बालकोंमें विपद धान्यका नाश हो मकरमें उदय हो तो रा. जौंमें युद्ध बुद्धि नाश चौपायोंमें कष्ट कुभमीनमें शनिउदय हों तो मनुष्य दीन, धान्य कमती हो ॥ ४॥ अब अस्तका विचार ॥ मेपमें शनि अस्त हों तो धान्य भाव तेज हो वृए- में गो आदिमें सर्वत्र पीडा हो वेश्याओंको पीडा मियनमें दुःख कर्कमें शत्रुका भय कपास घान्यादि दुर्लभ हो वादलोंसे जल न वर्षे सिंहमें अधिक व्यथा हो ॥१॥ कन्या अस्त हो तो.धातुभाव तेज अन्नभाव तेज तुलामें अस्त हो तो लोकोंमें आनन्द हो स्वल्पधान्य उपजे वृश्निको प्राणियों में भय ओर पीडा राजोंहारा हो टीडीशलभादिको पीडा हो धनमें लोकौं- को सुख मकरमें पवनप्रचण्ड वर्षाका अभाव स्त्रियोंकी मृत्यु अधिक हो ॥२॥ कुंभमें शीतका भय चौपायोंमें ग्लानि गौओंकी हानिहो मीनमें वर्षा थोडी कहीं कहीं जलकी प्राप्ति हो राजा अपनेधर्मसे विमुख दुःखदेनेवाले हों पापीजनोंको थोडी पीडा राजोंमें युद्ध हो ॥ ३॥ कन्यायां मिथुने मीने पे धनुपि वास्थितः शनिः करोति दुर्भिक्षं राज्ञां युद्धं परस्परम् ॥१॥ यस्मिन्सम्वत्सरे राहुर्मीनराशो प्रजायते । तस्मि न्मासे भयं विधदुःखकष्टसमागतः ॥२॥ एवं ज्ञात्वा च कर्तव्यो यावन्ना याति संग्रहः। संग्रहः सर्वधान्यानां लाभो द्वित्रिचतुर्गुणः॥३॥वर्षमेकं ५२. . १ .वर्षप्रबोध। तु दुर्भिक्षं रौरवं परिकीर्तितम् । प्राप्ते त्रयोदशे मासे मुभिक्षमतुलं भवेत् ॥४॥ कुंभे राशौ यदा राहुर्दैवाद्भोगोपि संगता । तदालोक्य विधाता व्यः शंणसूत्राणि-संग्रहः ॥५॥ भांडानि च समस्तानि कास्यादीनि वि शेषतः ॥ संगृह्यते मासपटक विक्रेतव्यानि सप्तमे ॥६॥ लामश्चतुर्गुणो ज्ञे यो भोमराहुदयस्थितो। नान्यथेति च वक्तव्यं यावद्भुक्तिस्थिताविमौ ॥ ॥७॥ सैहिकेयो यदा याति राशीमकरनामकम् । तदा संवीक्ष्य कर्त व्य पसूत्रस्य संग्रहः॥८॥धृत्वा मासत्रयं यावत्पसूत्रं यथातथा । प्राप्ते चतुर्थके मासलाभः स्यांत्रिकपंचकः ॥९॥ सैंहिकेयो-यदा-यांति धनराशौ कमात्ततः । महिष्याहेस्तदा कार्यः संग्रहो वसुंधातले ॥१०॥ हयानां च गजानाच गर्दभानां विशेषतः। लाभश्चतुर्गुणः प्रोक्तो मासे द्वितीय पंचमे॥११॥वृश्चिकस्थो यदा राहुदैवाझौमस्यसंगमः । तदा ज्ञात्वा च कर्तव्यःसंग्रहो धृतवाससाम् ॥१२॥ पंचमासान्व्यतिक्रम्यषा: कार्योस्य विक्रयः।लाभश्च द्विगुणोज्ञेयो निश्चितं शास्त्रभाषितम्१३. तुलाराशिं यदाराहुः संस्थितः 'संक्रमेखेः । तैदाभवतिदुर्मिक्षं पितुः पुत्र स्य विक्रयः ॥१४॥ वार्षिकं संग्रहं कुर्याद्रीहीणां च विशेषतः । गण कानां तथा लोके लाभः कंवलकांस्यतः॥१५॥: ...is. अर्थः-शनि कन्यां मिथुन मीन वृपमें स्थित होकर दुर्भिक्ष और राजौंमें युद्ध करता है। १॥ अथराइविचार । जिस सम्वत्सरमें राहु मीन राशिका हो उस महीनेमें विजलीका मय और दुःख कष्टका समागम हो ऐसा विचार कर अन्नका संग्रह करना चाहिये इसमें दू- मा तिगुना लाभ हो ॥३॥ एक वर्षतक मेहा दुर्भिक्ष पड़े और दुःख हो तेरहवें महीने में सुर्भि- हो ॥४॥ कुमराशीमें यदि राहुं मंगलके साथ आवे तो सन मूत्रका संग्रह अवश्य करना । सम्पूर्ण कांसीके वर्तन छ: महीनेतक संग्रह कर सातवें मासमें वेचें ॥ ६॥ इन राह में- गलकी स्थिति में चौगुना लाभ हो इसमें कुछ अन्यथा नहीं है ॥७॥राहके मकरराशीमें हो- नेपर रेशमी वस्त्र और सूतका संग्रह करना उचित है ॥ ८॥ और यह वस्त्रादि तीन महिने रख- कर चौथे मासमें वेचनसे तिगुना पांचगुना लाभ हो॥ ॥ पनराशीमें राहु हो तो. महिपी. घोडे हाथी गर्दभौंका संग्रह करनेसे दूसरे पांचवें महीनमें पंचगुना लाभ हो॥ १० ॥ ११ ॥ और वृश्चिकके राह होकर यदि मंगलके साथ हो तो यह जानकर घी और कपडेका संग्रह करना उचित है ॥ १२ ॥ पांच महीनेके उपरान्त छठे महीनमें वेचना उचित हैं अवश्य दुना साभ होगा H.१३॥ तुला राशिमें यदि.संक्रान्तके दिन राहु हो तो महा दुर्भिक्ष पडे पिता पु- -- भापाटीकासहित । कोभी वेचदें ॥ १४ ॥ ऐसे समय जोयवका फसलमें, संग्रह करना उचित है ज्योतिषी महाशयौंकों लाभ हो ऊनीवस्त्र और कांसीके वनोंमें लाभ हो ॥ १५॥ । 'कन्यागतो यदा राहुः संभवेन्मासपंचके । तदा विज्ञाय संग्राह्य धातकी पिप्पलीद्वयम् ॥ १६ ॥ मासमेकं च संग्राह्य धातकीपुष्पविक्रये । मास दयेन पिप्पल्यालाभो भवति वांछितः ॥१७॥ सिंहराशौ क्रमादको यु दा राहो प्रवर्तते । अवश्यं संग्रहः कार्यस्तदा-चोष्येषु वस्तुषु ॥ १८ ॥ आदौ धान्यकमादाय शुठीमरिचपिप्पली । जीरकं लवणं सौवर्चलसेंध वखादिरः॥१९॥ त्वा संवत्सरं यावत्पण्मासान्तस्य विक्रयः, लाभ शर्तुगुणं तस्य यदिसोम्येन वेध्यते ॥ २० ॥ कर्कटे तु यदा राहुस्तिष्ठत्ये व महाबलः । अवश्यं तस्कराः सर्वे लोकपीडां प्रकुर्वते ॥, २१ ॥ सूक्ष्म ता स्यात्वीहीणां समष स्वर्णरूप्यकम्। कांस्यं तानं च संग्राह्य षण्मासे, लाभदायकः ॥ २२॥ मिथुने च यदा राहुः स्वोचस्थानवशात्तदा । तधान्यं समर्घ स्यान्माणिक्यानां समर्पता ॥ २३ ॥ सैहिकेयो यदा या ति,भौमग्रहनिरीक्षितः । वृपराशौ क्रमेणैव निधानं लभते जनः॥२४॥ संग्रहस्सर्वधान्यानां घृतं तैलं विशेषतः ।कुंकुमं गंधद्रव्यं च कार्पासश्चगुं डस्तथा ॥२५॥मासपट्कं च धृत्वैवं विक्रेयं सप्तमे पुनः। ज्ञेयश्चतुर्गुणो लाभः सत्यमेव हि नान्यथा ॥२६॥ कांस्यं च लाक्षा मंजिष्ठा शुंठीम रिचहिंगवः । एषां संग्रहण कार्य पण्मासश्चाधिनिश्चितम् ॥ २७ ॥ मेष राशौ यदा राहुः संस्थितश्चन्द्रसूर्ययोः। देवादग्रहणसंयोगे दुर्भिक्षं भवति .. ध्रुवम् ॥२८॥ । -अर्यः-जो कन्याके राहु हो तो पाच महीनेतक पवई और दोनों पीपलका संग्रह करना उचित है ॥१॥ एक महीनेतक उसे रस छोड़े धायके फूल और पीपल दो महीने पीछे वेपनेमें मनवांछित लाभ हो ॥ १६ ॥ यदि राहु सिंहराशिमें वक्री हो जाय तो चोप्यवस्तु- ओंका संग्रह करना उचित है ॥ १७ ॥ धनिया सोंट मिर्च पीपल जीरा लवण सौवर्चल (कालानून) सँघा खदिर ॥१९॥ यह सम्वत्सरमें ग्रहण करे पीउ छः महीने में बेचें यदि पंद्रमासे राहुका वेष हो तो चौगुना लाभ हो ॥ २० ॥ कर्कका राहु हो तो तम्कर प्रजाको महा पीडा दें ॥ २१ ॥ जो थोड़े सोना चांदी कांसी तांबा यह सस्ता हो छः महीनेमें लाभ- दायक है ॥ २२ ॥ जो मिथुनके राहु अपने उच्चस्थानमें प्राप्त हों तो धान्य मोती माणिक मूंग सस्ते हों ।। २३ ॥ और जो राहु भौमकी दृष्टियुक्त वृपराशिको प्राप्त हो तो मनुष्योयो m विप्रबोध! उचित है कि ॥ २४ ॥ नमसे सब धान्योंका संग्रह करे विशेषकर घी तेल कुमकुम गैर- द्रव्य कपास गुडका संग्रह करना ॥ २५ ॥ छ:मास इनको रखकर सातम बेचे तो सातवें महीनेमें चौगुना लाम अवश्य होगा ॥ २६ ॥ कासी लाख मजीठ सोंठ मिर्च हॉग इनका छः महीनेतक अवश्य संग्रह करै ॥ २७ ॥ मेपराशिमें राहु हो और देवसे चन्द्रमा सूर्यका ग्रहण हो तो अवश्य दुर्मिक्ष हो ॥२९॥ इति राहुविचारः ।। उपरागो यदा मेपे पीड्यन्ते यं तदाजनः । काम्बोजांधिकिरातार्थ पां चालोश्चेतितेलड्गकाः ॥१॥ वृपेच ग्रहणे गोपाःपशवः पथिका जनाः महान्तो मनुजा ये च तेषां पीडा गरीयसी ॥२॥ सूर्याचन्द्रमसौ ग्रासो मिथुने च वरांगनापीड्यन्ते बाल्हिका लोका यमुनातटवासिनः॥३॥ कर्कटे ग्रहणे पीडा गर्दभानां च जायते । आभीरवर्वराणां च पीडा व महती मता॥ ४॥ सिंहे च ग्रहणे पीडा सर्वपां वनवासिनां । नृपाणां नृपतुल्यानां मनुजानां धनक्षयः ॥५॥ कन्यायां ग्रहणे पीडा त्रिपुटा शालिजातिषु । कवीनां लेखकानां च गायकानां धनक्षयः ॥६॥ तु लायामुपरागे च दशार्णबककाहवः। मस्तश्चापरान्त्याश्च पीडयन्ते य तिसाधवः ॥७॥ वृश्चिके ग्रहणे दुःखं सर्वजातेः प्रजायते।यदुवरस्य में द्रस्य चौलयौधेयकस्य वायदोपरागश्चापे स्यात्तदात्याश्च वाजि तः। विदेहमल्लपांचालः पीड्यन्ते भिषजो विशः॥ ९॥ मकरे ग्रहणे पीडा नीचानां मंत्रवादिनां । स्थविराणानोटानां च चित्रकूटस्यसंक्षयः ॥१०॥ कुंभोपरागे पीड्यन्ते गिरिजाः पश्चिमाजनाः। तस्कराद्विरदा भीराः प्रजानां दुःखदायकाः ॥ ११॥ मीनोपरागे पीड्यन्ते जलद्रव्या णि सागराः। जलोपजीविनोलोकाभविद्यां ये च पण्डिताः॥१३॥ अर्थः मेषराशीके ग्रहण मनुष्योंको पीडा कम्बोज अध्र किरात पांचाल तैलंग देशमें पीडा हो॥१॥ पराशीके ग्रहणमें गोप पशु पथिक और बडेलोगौंको पीडाहो ॥२॥ मिथुनमें सूर्य और चन्द्रमावा ग्रहण हो तो वेश्या बाल्हीकदेशवासी और यमुनाके किनारे रहनेवालोंको पीडा हो ॥ ३ ॥ कर्कौ ग्रहण हो तो गर्दभौंको तथा आभीर और वर्ष को महापीडा हों॥४॥ सिंहराशीके ग्रहणमें सब वनवासी दुःखी हौं राजा और साहूकारीका धनक्षय हो ॥ ५ ॥ कन्याके ग्रहण में त्रिपुट और गालिजाति कवि लेखक और गानेवालोंके धनका क्षय हो ॥ ६॥ तुलामें दशाणी वल काहब मरु और अपरान्तदेशवासी तथा साधु- ओंको पीडा हो॥७॥ वृश्चिकके ग्रहणमें सबजातियोंको पीडा हो, यदुवर मन्द्र चौल यो- घेप जाति दुःखी हौं ॥ ८॥ धनके ग्रहणमें अपन्तीदेशके घोडे विदेह मल्ल पांचालदेशवासी imahend 18 T । । भाषाटीकासहित । वैद्य और वैश्य पीडा पावें ॥९॥ मकरके ग्रहणमें नीच और मंत्रवादियोंको पीडा हो स्थवि- र-वृद्ध और नठ दुःखी हों चित्रकूटका क्षय हो॥ १० ॥ कुंभराशीके ,प्रहणमें पश्चिमदे- शके पर्वतवासी पीडिन हों तस्कर दिरद आभीर प्रजाको दुःख दें ॥११॥ मीनराशीका ग्रहण हो तो जलद्रव्यमें पीडा जलजीविका करनेवाले मल्लाह आदि और नक्षत्रविद्या वाले ज्योतिपी पण्डितादिकों पीडा हो॥ १२ ॥ इति राशिग्रहविचारः॥ अंश्चिन्यां पीडितायां स्यात् मुद्गादीनां महर्वता । भरण्यांश्वेतवस्त्रेभ्यो लाभ मासत्रये भवेत् ॥ १॥ कृत्तिकायां हेमरूपाप्रवालमणिमौक्तिकं । संग्रहीतं लाभदायी मासे च नवगे स्मृतं ॥२॥रोहिण्यां सूत्रकाससं ग्रहो लाभदायकः । दशमासान्तरेप्रोक्तः सोमवेधो न चेदिह ॥ ३॥ मृ' गशीर्षेपिं मंजिष्ठा लाक्षा क्षारः कुसुम्भकं । महर्घ दशमासान्ते लाभद 'चं यथोचितं ॥ ४ ॥ घृतं महर्घमायां लाभदं मासपंचके ।तैलालामः पुनर्वस्वोः मास पंचकतः परं॥५॥पुष्येमासैस्त्रिभिलामोभवेद्गोधूमसंय है। आश्लेषायां तु मुद्रेभ्यः प्राप्तिः स्यान्मासपंचके॥६॥ मघाचतुष्टये चोलाचणकः खलुतुष्टये। चित्रायां च युगन्धर्याः मासोलाभद्धयात्यये। ॥७॥ निपंचनवभिर्मासैः स्वातौ लामस्तथा तथा । विशाखायां कुलि स्थेभ्यः षण्मासे लाभसंभवः ॥८॥राधायां कोद्रवाल्लामो मासैनवमिरा प्यते, ज्येष्ठायां गुडखण्डादेः पंचमासेधनोदयः ॥ ९॥तंदूलोन्यस्तथा मूले पूषायां श्वेतवखतः। ऊषायां श्रीफलात्वा सर्वत्रमासपंचकं॥१०॥ श्रवणे तुवरीलामः धनिष्ठायां तु माषतः । चणकेभ्योतिवारुण्यां तेभ्यः पूभानिपीडने ॥११॥ लाभस्त्रिमासि निर्दिष्ट उमाभ्यां लवणादितः । मासषदकालामदृष्टो खेत्यां मुद्माषतः ॥१२॥ अथ केतुविचारः। खेरस्ताचलप्राप्तौ पश्चिमायां निरीक्षते। यदावन्हिशिखाकारास्तदा के तूदयोवदेत् ॥ १३॥ अश्विन्यामुदितः केतुर्हन्यादश्मकपालकं । भरण्यां च किरातेशं कृत्तिकायां कलिङ्गपं ।। १४॥ रोहिण्यां सूरसेनेशं मृगे चो शीनराधिपः । आयांजालणाधीशमश्मकेशं पुनर्वसो॥१५॥ अर्थः-अश्विनीमें ग्रहण हो तो मूंगादि महंगी, भरणीमें होती श्वेतवाँस तीनमासमें लाभ ॥ १ ॥ कृतिकामें हो तो सुवर्ण चाटी प्रवाल मणि माणिक ग्रहण करनेसे लाभदायक , - चर्पप्रबोध । हैं. २॥रोहिणीमें मूत कपासका संग्रह करनेसे लाभ हो दश महीने पीछे, और चन्द्रग्रहण होतो यह फल न हो ॥ ३॥ मृगशिरमे मजीठ लाख क्षार कुसुम यह संग्रह करे देश में मही नेमें लाभदायक है ।। ४ । आर्द्रा ग्रहण हो तो धी अकरा हो, पांचवें महीनमें लाभ हो पुन समें पांचवें मातम तेल में लाभ हो॥५॥ पुप्यमें हो तो गेहके संग्रहसे तीनमासमें लाभ हो आश्लेपामें पांच महीने मूंगसें लाम हो ॥ ६ ॥ मघादिचारनक्षेत्रोंमें हो तो चर्णकादि चार वस्तुओंसे लाभ हो चित्रामें युगन्धेरीसे दोमासमें लाभ हो ॥ ७॥स्वोतिमें हो तो तीसरे पांचवें नौवें मासमें ,अन्नसे लाभ.हो विशाखामें छठे महीने कुलथीसे लाभ हो ॥८॥ अनुराधामें हो तो नौ मासमें कोदोंसे लाभ हो ज्यष्टोंमे गुडर पांडसे पांच में मासमें लाभ हो ॥९मू- लमें चावलोंसे पूर्वापाढामें श्वेत वस्त्रोंसे उत्तरापाढमें श्रीफल पुगीफलसे पांचमें मासमें लाभ- हो॥१०॥ श्रवणमें शतावरीसे लाभ हों धनिष्ठामें उदोसे शतमिखामें चनौस साम पूर्वाफा- ल्गुनीमें पीडा ॥ ११॥ उत्तराफाल्गुनी में तीनमासमें लवणसे लाभ हो रेवती में हो तो मुंग उसे छठे मासमें-लाम हो ॥१२॥ अथ केठविचार ।। रविके छिपनेपर जो अमि-पूंछको समान दीखे उसे केतु कहते हैं ॥ १३ ॥ अश्विनीमें केतुका उदय हो तो अश्मदेशके राजा- का नाश भरणीमें किरातदेशका कृत्तिकामे कलिंग देशका पति नष्ट हो ॥१४॥ रोहि- णीम सूरसेन देशका पति मृगशिरमें उशीनरदेशका स्वामी आदी जालणदेशका स्वामी पुनर्वसमें अश्मकका स्वामी नष्ट हो ।। १५ ।। पुष्ये च मगधाधीशं सापे केरलयाधिपम् । मघायामंगनाथं च धूपायां पांड्यनायकम् ॥ १६ ॥ उज्जयिन्या नृपं हन्यादुत्तराफाल्गुनी गतः दं डकाधिपति हस्ते चित्रायां कुरुभूपतिम् ॥१७॥खात्यां काश्मीरकम्बो जभूपतीनां विनाशकः । इक्ष्वाकुकुलेशानां विशाखायां च घातक ॥१८॥मैत्रे पोंड्रमहीनाथं सार्वभौमं तथैद्रभे । अंध्रमद्रकनाथं च मूल स्थो हन्ति निश्चितम् ॥१९॥ पूर्वाषाढाकाशिराजमुत्तराहन्ति केकतम् । बोधे शिविवेदीशं श्रवणे केकयेश्वरम् ॥ २०॥ वामपंचजन्येशं वारणे सिंहलेश्वरम् । पूर्वजायामंगनाथं नैमिशेषेमुखागतौ ॥ २१ ॥ वत्यामु दितः केतुः किराताधिपघातकः धूम्राकारसपुच्छश्च केतुर्विश्वस्य पी डकः ॥ २२॥ आपाढयोयोर्मध्ये यदा पर्वत्रयं भवेत् । क्षितौ भवेन्म हायुद्धं नृपमृत्युसमादिशेत् ।। २३ ।। यत्र राशौ भवेरपर्व तस्यवाच्यं के याणकम् । अत्यर्च लभते मूल्यं पीड्यमानं च राहुणा ॥ २४॥ इति श्रीमेवमहोदये महामहोपाध्याय मेघविजयगणिविरचिते सम्वत्सरनिर्णयाधिकारः पंचमः समाप्तः ।

भाषाटीकासहित । अर्धा-पुष्पमें उदय होतो मंगाधिपत्ति आश्लेपामेलकेकृयाधिपति मघामे अंगनाथपू- चाफाल्गुनीमें पांण्डयदेशका स्वामी ॥१६ में उत्तराफाल्गुनीमें उज्जयनीके राजाका हस्तमें दंडकदेशके राजाका चित्रा में कुरुदेशाधिपतिका ॥ १७॥ स्वातिम उदय हो तो काश्मीर काम्बोजदेशके स्वामियोंका विशाखाम हो तो इक्ष्वाकुके कुलवालीका नाशक है ॥ २८॥ अनुराधा पौंड्रदेशके स्वामीका ज्येष्ठामें सार्वभौम् ( राजाधिराज ) का, मूलमें अंध्र और मद्रदेशके अधिपतिका ॥ १९॥ पूर्वापाटामें कांशीरांजका उत्तरामें केतकदेशोधिपतिका, अभिजितमें शिवियेदीशका, श्रवणमें केकयदेशके राजाका ॥२९॥ धनिष्टामै पांचालदेशा धिपतिका शतभिषामें सिंहलदेशके, राजाका पूर्वाभाद्रपदा, अंगदेशके राजाका उत्तरामा- द्रपदाम नैमिपदेशाधिपतिका.॥ २१॥ रेवतीमें उदय होकर केतु किरातदेशके राजाका नाश- क है, और जो केतु धूम्राकार और बडी पूंछका हो वह विश्वको पीडा देता है । आ- पादादि दो मासमें जो तीन.पर्व हो तो पृथ्वीमें महायुद्ध और राजौको मृत्यु हो रिशाजिस राशीमें ग्रहण हो-उस-राशीको बेचनेकी वस्तु बहुत महंगी हो यह चन्द्रग्रहणम जानना ॥२४॥ इति-श्रीमेघमहोदय वर्षप्रबोधै सम्बत्सरनिर्णयाधिकारः पंचम, समाप्तः । : यदि कर्किसंक्रान्ती कुजार्कशनिसोमजाः । अल्पनीर रणं घोर स्या तदानीचबुद्धिदः॥१॥मेषकर्कमकरसंक्रमे दूरखारसंहिते जल नहि। धान्यमल्पतरमेव वत्सरे विग्रहों विपुलरोगतस्कराः॥३॥चत्रे च श्राव णे मासे पच जीवो यदा भवेता दुर्भिक्ष रौरवं घोरं छत्रभंगं न संशयः।। ॥३॥ पंचार्कवासरे रोगाःपंचभौमे भयं महत् । दुर्मिक्ष पंचमदेषु शेषा वारा: शुभप्रदाः॥४॥ अर्थ:-जो कर्ककी संक्रान्ति मंगल रवि शनि बधवार हो तो थोड़ी वर्षा , घोर युद्द-नीच बुद्धि प्राणी हौं, या नीचौंको बुद्धिहो ॥ १ ॥ जो मेप मुकर कर्ककी संक्रान्ति फर-बार होतो वर्षा थोडी वर्षे धान्य थोडे उपजें, रोग-विग्रह-चोर अधिक हो ॥२॥ क्षेत्र और श्रावणमासमें जो पांच बृहस्पति हों तो दुर्भिक्ष घोर दुःस छत्रभंग हो ॥३॥पांच-रविवार होनेसे, रोग पांच मंगल होनेसे महाभय पांच शनिसे दुर्भिक्ष शेपवार शुभ है ॥ ४ ॥ -एकमासे रवेाराः पंच न स्युः शुभावहाः.. अमावास्यार्कवारेण महर्वः विविधायिनी॥५॥ मंगले म्रियते राजा मजा वृद्धिस्तु-भार्गवेधे रिसक्षयों भूम्यांदुर्भिक्षस्तु-शनैश्चरे। दामासोचंदिवसे सोमसतवारों यंदा मवेत् । धान्य. महर्ष त्रीमासान माविवर्षेपि दुःखकृत् ।। 'पंचायोगे वैशाख वृष्टिगर्भविनाशनीं। पंचनामे मय वन्हे! वृष्टिरोधाः यि कुर्वचित् ॥ ८ प्रतिपत् सर्वमासेपुबुधे दुर्भिक्षकॉरिणी । ज्येष्ठमासे विशेपेण वर्षमंगायजायते ॥९॥ चित्रास्वातिविशाखासु यस्मिन्मासे ..- " " वर्षप्रबोध। वर्तमान शॉकके अंकमें,९२५ घटावै शेष अंकोंमें १९ का माग दे. जो तीन शेष हैं तो श्रमास अधिक जाना ११ रहें तो वैशाख और ००,८ बचें तो 'ज्येष्ठमास अधिकाजामा सोलह रहैं तो आपाढा अधिक हो, पांच बचें तौ श्रावण, २३ रहें तौमाद्रपद, दो शेष है तो आश्विनकी वृद्धि और अन्य गोप रहै तो कोई मास अधिक नहीं होगा ॥१॥ो शे अमावास्योके बीचमें संक्रान्ति न हो तो वह अधिकमास होताह और जो दो अमावास्यके बीचमें कदाचिद दो.संकान्ति हों तो सयमास जाना कार्तिकादि तीन मास क्षयमासको और जिस सम्वत्सरमें क्षयमास होगा उसी सम्वतमें अधिक मास दो होंगे ॥ ३METY हुर्मिक्षश्रावणयुगे पृथ्वीनाशः प्रजाक्षयः भाद्रपाइद्वितये धान्यनिष्पति स्पाद्यथेहितं ॥ ४॥ आश्विनद्वितये भूम्यां सैन्यचौरज-भयं । मुभिव के च नाप्याहुर्दुर्भिक्षं दाक्षिणादिशि ॥५॥ सुभिक्षं कार्तिक्युगे क्वचि दुःख रणानृणां । मार्गशीर्षयुगे देशे जायते. परमं सुखं ॥ ६ ॥.पोषयु रमे सुभिक्षं च मंगलं नृपतेर्जयः । राज्यदण्डपरो लोको लोके मतिविए येयः॥७॥ मावदयेशुविक्षेमं राज्यानां च मयं तथा । मुभिक्षाफाला :नयुगे क्षत्रियाणां शिवं भवेत् ॥ ८॥चैत्रद्वयेशुभ धान्ये वैश्यानामुद यो महान् । वैशाखयुग्मे धान्यानां निष्पत्तिरशुभः कचिंत ॥९॥ज्ये -राद्धये नपध्वंसो धान्यानि क्षितिसत्तम। द्वयाषाढे व्यथा, किंचित् खण्डे वृष्टिः कचित्पुनः ॥११॥ कचिद्धिकार्तिके दुःखं द्विमाघेप्यशुभं मतली, द्विफाल्गुन वन्दिमयमशुभं माधवद्धये ॥ ११॥ अनेकयुगसाहस्यांदवा योगात्मजायते । त्रयोदशदिनः पक्षस्तदा संहरते जगत् ॥ १२॥पंच' मी श्रावणे हीना सप्तमी भाद्रपादके । आश्विने नवमी नेष्टा पौर्णमासी च' कार्तिकें ॥ १३॥ भाद्रपंदे पोषयुगे सितपक्षे पतति तिथिस्तस्याः । द्विगुणदिन पमरण यदि वा दुर्भिक्षमतिरौद्र ।।१४॥ यस्य मासे शुक्ल पक्षे तृतीया वा चतुर्थिकापतेतं तदा मुद्घृत महत्वं भवेद्धवि॥१५॥भा पोष तथा मासे विशेषेण महर्घता । यन्मासे दशमीछेदस्तदोघृतमह घेता॥१६॥ श्वेतपक्षे प्रतिपदा पंचमी वा चतुर्दशी । वर्द्धिता चेत्समि क्षाय छिन्नादुर्भिक्षकारिकांनी १७ ॥ अर्थः-दो श्रावण हों तो पृथ्वीका नारा प्रजाका क्षय हो दी भाद्रपदमें धान्यको प्राप्ति हो ॥ ४॥ दो आश्विन हों तो पृथ्वीमें सैन्यारोग और चोरका मय हो कोई कहते हैं कि समिक्ष हो परन्तु दक्षिण दिशा दुर्भिक्ष हो ॥ ५॥ दो कार्तिक ही तो सुभिक्षा यही मनु स P ।

भापाटीकासहित । प्यौंको युद्दसै संकट, हो मार्गशीर्ष दो हों तो परम सुख हो॥६॥ दो पौष हों तो समिक्ष मंगल और राजोंका जय हो, लोकोंको राज्यदण्ड हो तथा मति विपरीत हो ॥ ७॥ दो मा- घ हों तो पृथ्वी में मंगल और राजौंको भय हो दो फाल्गुन हों तो सुभिक्ष और राजौंको म. गल हो॥८॥दो चैत्र ही तो शुभ हे धान्यकी प्राप्ति हो वैश्योंकी वृद्धि हो दो वैशाखहीं तो धान्यकी निष्पत्ति हो ॥९॥ दो ज्येष्ठ हों तो राज्यध्वस धान्यकी प्राप्ति हो दोआपाढ हौं तो कुछ व्यथा और खण्डवृष्टि हो ॥१०॥ कहीं दो कार्तिकमें दुःख और दो माघ होनेभी अशुभ फल,लिखा है दो फाल्गुनमै अग्निका भय दो वैशाखमें अशुम फल है ॥ ११॥ अने, क सहस्रों युगोंमें दैवयोगसे १३ तेरह दिनका पक्ष होता है इसमें जगतका नाश होताहे ॥शो श्रावणमें पचमी और भादीमें सप्तमी आश्विनमें नवमी कार्तिकमें पूर्णिमाकी हानि हो तो नेष्ट है ॥१३ ॥ भाद्रपद और पोप दोनोमें यदि शुक्लपक्षको तिथि चढे तो उससे दुगुने दिनोमें राजाका मरण अथवा महादुर्भिक्ष हो ॥ १४॥ जिस महीनेके शुक्लपक्षमें तीज या चोथको वृद्धि हो तो मूग, और घी अकरे हों ॥१५॥ भादों पोषमे उपरोक्त तिथि बढे तो अन्नादिको तेजी हो और जिसमासमें दशमीको हानि हो तो घृन तेज़ हो ॥ १६ ॥ शुक्लपक्षमें प्रतिपदा पंचमी वा चतुर्दशो बढ़े तो सुभिक्ष कर और घटै तो दुर्भिक्ष हो॥१७॥ · चैत्राभाद्रपदं यावत्च्छुक्लपक्षे यदा त्रुटिः । तदा कचिचोप्पत्तिरल्पा, 'न्योदयः क्वचित् ॥१८ ॥ आर्द्रा ज्येठे नष्टचन्द्रे प्रथमाया पुनर्वसु । द्विा -तीया पुष्पसंयुक्ता जलं धान्यं तृणं न च ॥ १९॥ कृष्णपक्षे श्रावणस्ये कांदश्या. रोहिणी च भम् । यावघटीप्रमाणस्यादानेतावदिशोपका ॥२१॥आदित्याद्वारगणानात्मतिपत्ममुखातिथिः । अविन्यादि ज नक्षत्र संमील्यदिगुणीकृतं ॥ २१॥ त्रिभिर्भागैर्द्रयं शेपं.तदासभिक्षमा दिशेत । शून्ये भवति दुर्भिक्षं शेषे वेजायते शुभं ॥ २२ ॥ आपदमासे प्रथम च पक्षे दृष्टे निरभ्रेरविमंडले च । नेवाशनिर्गर्जरवो न भवेचन पं मांसद्धयं वर्पति वासवस्तु, ॥ २३ ॥ आश्विने च सिते पक्षे दशम्यादि दिनत्रये । गर्जितं विद्युतं कुर्यात्तद्गोधूमविनाशकः॥ २४॥ज्येष्ठे मूलं पूर्णिमायां शुभं वर्ष हिताय तत् । अवृष्टया चातिवृष्टया वा इत्येवं मुनि रब्रवीत् ॥ २५॥ यदि भवति कदाचित्कार्तिके नष्टचन्द्रेशनिकजरविवा रेः स्वातिनक्षत्रयोगः। इति मवति तथायुष्मान योगस्तृतीयः क्षयविला यविपत्तिः क्षत्रभंगविपक्षे ॥ २६ ॥ श्रावणे प्रथमे पक्षे यद्योविन्यांज लं भवेत् । तदातीव सुभिक्षं स्यादव्योपगेषु च सत्स्वपि ॥ २७ ॥ श्राव णे शुक्लपक्षे स्यात्स्वातिऋक्षेण सप्तमी । तत्र वर्पति पर्जन्यः सत्यमेतदरा " ६२ विपनबोध ।। नने ॥२८॥ द्विपंचाशद्युते वर्षे-दिवसानांशतत्रये । सुभिक्ष केचिदप्पा पर देशेषु विग्रहः ॥ २९॥ वाणषु त्रिदिने ३५५ कालो मध्यमोदि शरत्रिभिः । वप च पत्रिभिः ३५७.श्रेष्ठं मुभिक्ष तत्र निश्चित ।। ३०॥ अर्थः चैत्रसे भाद्रपंदपर्यन्त यदि शुक्लपक्षमें तिथिकी हानि हो तब कहाँ उत्पति और शोदा धान्य हो ॥ १८॥ज्येष्टको अमावस के दिन आंद्रों और पड़वाके दिन, पुनर्वसु दिती याके दिन पुप्य हो तो तृण धान्य जलका प्रभाव हो ॥ १९ ॥ श्रावणकृष्ण एकादशी दिन रोहिणी नक्षत्र जितनी घड़ी हो उतनेही प्रमाण धान्य विकै ॥ २०॥ रविवारसे वार और प्रतिपदासे जितनी तिथि गई हों वे गिने और अश्विनी नक्षत्रपर्यन्त गिर्ने इन्हें जोड़- करना करें ।। २१ ॥ तीनसें भाग दे दो बुचे तो समिक्ष शून्यमें दुर्भिक्ष शेष अंक बचे तोभी शुभ जाना ॥ २२ ॥ आपादमासके प्रथम पक्षमें आकाशमंडल यदि बादलहित हो न गर्न ना ने वर्षा हो तो आगे दो महीने वर्षा हो ॥ २३ ॥ आश्विनमासके शुक्लपक्षमें दशमी भादि तीन दिन जो बिजली चमके तो गेहूंओंका नांश हो ॥ २४ ॥ ज्येष्ठ पूर्णिमाके. दिन मूल हो तौ वर्षका हित कर कोई मुनि कहते हैं वर्षाहोभी और भी हो ॥ २५ ॥ यदि कार्तिकको अमावस कदाचित् शनि मंगल रविवारको हो उसमें स्वाति नक्षत्रभी हो नया आयुष्मान योग होतो क्षय विपत्ति और तीन पक्षमें देशविध्वंसहो ॥ २६ ॥ श्रावणके कृष्णपक्ष अ- श्विनी नक्षत्र के दिन जलावर्षे तो अत्यन्त मुभिक्ष हो जलका योगभी हो ॥ २७ ॥ और श्रा- वर्णशमपक्षको सममी के दिन स्वाति नक्षत्र हो तो अवश्य वर्षा हो ॥ २८ ॥ जो, ३५२ नका वर्ष हो तो सुभिक्ष हो और आगे देशमें विग्रह हो ॥ २९ ॥ ३५५ दिनका वर्ष होतो मध्यम ३५७ दिनकी और ३६४ दिनका श्रेष्ठ तथा सुभिक्ष करनेवाला है ।। ३० सितपक्षादिक चैत्रे मीने सूर्यसमागमे । मूलादिनवनक्षत्रे नेमल्ये वत्स सशुभनाइ॥ वैशाखमासे प्रतिपदिनाचेन्मेवोदयः सप्तदिनानिया वम अभेषु गं धनविधुदादित्तदा सुभिक्षं मुनयो वदन्ति॥३२॥ माघमासस्य सप्तम्यां पंचम्यां फाल्गुनस्य च चैत्रस्यापि.तृतीयायां वे शाखे प्रथमेहनिः॥ ३३॥ मेघस्य गर्जितं श्रुत्वा जलदस्य तुदर्शने। चतुरो वार्षिकान् मासान् जलं वृष्टिं तदा वदेत् ॥ ३४॥ इति श्रीमेघमहोदय वर्षप्रबोधे मेघविजयगणिविरचिते अयन- मासाद्विपक्षनिरूपणं नामःषष्ठो अधिकारः॥६॥ चैत्र शुक्लपक्षमे मीनके सूर्यमें, मूलसे नो नक्षत्रतक आकाश-निर्मल रहे तो शुभ है ॥ ३१ ॥ वैशाखमासकी प्रतिपदाके दिनसे पका उदय सात दिनंतक हो और वादल गर्ने बिजली चमके तो सभित हो यह मुनिजन कहतेह ॥ ३२ ॥ माघमासको सप्तमी और फाल्गुनकी पंचमी चत्रकी तृतीया और बैशाखके पहले दिनमें मेघ गर्ने और बादलका दर्शन हो तो चोमासेम वषी होगा ३४ ॥.. ।

. भाषाटीकासहित । इति श्रीमेघमहोदये अयनमासर्पक्षनिरूपणं-नाम पष्ठाऽधिकारः॥६॥ यादेति दिने प्रातः पीताब्धिर्मुनिपुंगवः । दुर्भिक्षं रौरवं घोरं राष्ट्रभंग तदा-दिशेत् ॥ २॥ वो वा-पूर्वफाल्गुन्यां प्राप्ते चैवाऽष्टमेहनि । अगस्ते रुदयो लोके न शुभाय क्वचिन्मते ॥२॥ कृत्तिकायां खो जाते सश्मे वाष्टमेहनि-ऋपेरस्तंगतिः श्रेष्ठादिवसे यदि जायते-॥.३-॥ रात्रावृदय नं श्रेष्ठं नेष्टश्चास्तंग़मो मुने ।-दिवसेस्तंगमः श्रेष्ठो नेष्टश्चाभ्युदयस्तदा ॥४॥यचैत्रशुक्ल प्रतिपदिनस्य भुंक्ते-कलां वे प्रथमो से वारः । वर्षस्य "राजा"खल मेषेसूर्ये दिनस्थवारा सहितोत्र मंत्री ।। ५ ॥ मिथुनेर्केन्हिा यो वारः 'सस्यात्सर्वरसाधिपः । कर्के खो च यो वार धान्याधीशो वि चारयेत् ॥६॥ आर्किदिनवारो यः स मेघानामधीश्वरः । दिनवारों, । वृपे सूर्ये कोपालः प्रकीर्तितः॥५॥.--.-.. अर्थ:-जो अगस्त्यका उदय प्रातःकाल हो तो दुर्भिक्ष और राज्यभंग हो ॥१॥ और सूर्यके पूर्वाफाल्गुनीमें प्राप्त होनेपर आठमें दिन अगस्त्यका उदय होतो यह भी शुभ नहीं। ऐसा किसीका मत है:1:२॥ सूर्यके कृत्तिका नक्षत्रमें होनेसे सातवें आठवें दिनमें अगस्त्य. फा,अस्त श्रेष्ठ है - ॥ ३ ॥ रात्रिमें उदय होना श्रेष्ठ है अस्त होना ठीक नही दिनमें अस्त होना श्रेष्ठ हैं,उदय अच्छा नहीं ॥ ४॥ चैत्र शुक्लप्रतिपदाके दिन जो दिन हो वोही वर्षका म. धिपति हो और मेपके सूर्य जिस दिन हौं वही वार मंत्री हो॥५॥ मिथुनकी संक्रान्तिके दिन जो,वार हो वही रसाधिप कर्ककी संक्रान्तिके दिन जो वार हो वही धान्याधिपति होताहे॥६॥ आीके, दिनका वार मेघाधीश होताहै वृपके सूर्य जिस दिन हौं वही बार कोटपाल होताहेशा स्वयं राजा स्वयं मंत्री स्वयं सस्याधिपो यदा। तदातोयं न पश्यामि वर्जयित्वा महोदधिः यत्र वर्षे नृपो मंत्री धान्यपश्चैक एव हि। तद्ध युद्धदुर्भिक्षं प्रजामार्यादिजायते॥९॥ सूर्ये नृपेरल्पजलाः पयो दा धान्यं तथाल्पं फलंमल्पवृक्षाः । अल्पप्रयोगेपु जनेषु पीडा चोरामि शंका च भयं नृपाणाम् ॥१०॥ सोमे नृपे शोभनमंगलानि प्रभूतवारि प्रचुरंचधान्ये । प्रशाम्यति व्याधितरो नराणां सुखं प्रजानामुदयोन पाणाम् ॥ ११ ॥ मोमेनृपे वन्हिमयं जनेस्याचाराकुलत्वं नृपविग्रहश्च । दुस्था'प्रजा व्याधिवियोगपीडा क्षिप्रं जलं वर्षति भूमिखण्डे ॥ १२॥ बुधस्य राज्ये सजलं महीतलं गृहे गृहे तूर्यविवाहमंगलम् । सौख्यं मा मिक्षं धनधान्यसंकुलं वसुंधरायां नृपनंदगोकुलम् ॥१३॥ युरो नृपे का बादल थोडा वर्षप्रबोध। पति सर्वभूतले पयोधराः कामदुधाश्च धेनवः । सर्वत्र लोका वधान्यत त्पराः पराभयो नैव सदैव नंदनम् ।। १४ । शुक्रायं राज्ये बहुधान्यसंप वृक्षाः फलाट्या बहुगोप्रसूतयः। प्रभूततोयं मधुराम्रपाचनं प्रसन्नदे न्य सजलं भुवस्तलम् ॥ १५ ॥ शनौ घने वर्षति खण्डशः क्षितौ जना सरोगा उदिताः प्रभञ्जनाः। करा नृपाणां विषमाश्च तस्करा भ्रमन्ति लोका बहुधा क्षुधातुराः ॥१६॥ इति वर्षाधिपफलम् ॥ अर्थ:-जिस समय वही ग्रह राजा वही मत्रों वही सस्याधिपति हो उस समय समुद्रको छोड़कर और कहीं जल नहीं देखताम् ॥ ८॥ जिस वर्षमें राजी मंत्री और धान्यपति एकही हो उस वर्षमें युद्ध दुर्भिक्ष और प्रजामें मरों फैले ॥ ९॥ सूर्य- राजा हो तो जल पावे धान्य थोडे वृक्षोमें थोडे फैल ही मनुष्यों में किंचित्पीड़ा चोर अनिको शंका और राजौंको भय हो॥ १०॥ चंन्द्रमा राजा हो तो सुन्दर मगल हौं अधिक जल और अधिक धान्य हो मनुष्योंको व्याधि शान्त प्रजाको सुख और राजोंका उदय हो ॥ ११ ॥ मंगल राजा होती अमिभय चौरभयं राजोंमें विग्रह प्रजामें दुःस्थता व्याधि वियोग और पीडा हो पृथ्वीमें जल शीघ्र वर्षे ॥ १२ ॥ बुध राजा हो तो वर्षा श्रेष्ट घरमें बाजे बजे विवाह मंगल हौं सुख सुभिक्ष धन धान्यकी प्राप्ति पृथ्वीके राजा प्रसन्न नदके गोकुलकी समान ऑनंद पूर्ण हों ॥ १३ ॥ वृहस्पति राजा हो तो सब पृथ्वीमें वर्षा हो मेघ और गो इच्छानु- सार दूध और जल दें सर्वत्र लोकौंको धान्यकी प्राप्ति हो पराभव न होकर सदा आनद रहै ॥ १४॥ शुक्र राजा हो तो वहत धान्य सपत्ति हो वृक्ष फैलोंसे पूर्ण गो बहुत दूध दें जल अधिक वर्षे आम्र अच्छे मोठे हों प्रसन्नता हो पृथ्वीतलमें जल अच्छा पै ॥ १५ ॥ शनि राजा हो तो खण्ड ाष्ट्र मनुष्य रोग और वातर्से पीडित हो राजाम विग्रह चोरोंमें विग्रह और लोक क्षुधासे व्याकुल होभ्रिमण करते फिरे ॥ १६ - स्वावमात्ये वि रोगपीडा देशेषु सर्वत्र चरन्ति पीडा । रसेषु धान्येषु महर्घता स्यात्कष्टानि लोके च सुरां विनाश्याः ॥ १७ ॥ सुधाकरे भूस चिंवेनपूर्वफलेरसाट्यास्तरवश्व गावः । पुत्रप्रसूतीर्बहुला वधूनां जनेषु वाणी जयिनी मधूनाम् ॥१०॥ तदा मही स्वागुरुदेवनिन्दाभूमावती सागरदस्युभूमा। धूमाकुला भूर्वहुनेत्ररोगा कुजे भवेन्मंत्रिणि युद्धयोगः ॥ १९॥राज्ञां सुदृष्टिबहुलान्नवृष्टिः सच्छतिवृद्धिनिनां समृद्धिः। त्योमति साकुरुते च नारी बुधे पुनमन्त्रिणि रागसिद्धिः ॥ २०॥ मंत्रि त्वमाप्ते सुरमंत्रिणि स्यात्मजासु सौख्यं धनधान्यवृद्धि । विवाहमांगल्य कलाजनानां नानारसैसर्वमहोदयः स्यात् ।। २१॥ जाते कवो मंत्रि PANA ६५ भापाटीकासहित । णि गोषु दुग्धं बहु क्षितौ धान्यसमर्घता च । वृक्षाः फलाठ्या-जनतासु रोगोभिपक्प्रयोगः क्वचिदीतिभीतिः॥२२॥ मांधं जनानां व्यवहार नाशः क्रूरा नृपास्तस्करवन्हिदुःखम्। गवां विनाशोतिमहर्षधान्यं शनि श्वरे मंत्रिणि राजयुद्धम् ॥ २३ ॥ इति वर्षमंत्रीफलम् ॥ क्वचित्पचंति सस्यानि क्वचिन्नश्यन्तिभूतले । व्याधि दुःखमहायुद्धं धान्यानामधि खो॥२४॥ समर्घ जायते धान्यं सर्वत्र जलवर्पणम् । सर्वधान्यानि जा यन्ते यत्र सस्याधिपः शशी॥ २५॥ ईति भूतं जगत्सर्वं व्याधिरोंगन प्रीडितम् । मह(सर्वधान्यानां सस्यानामधिपे कुजे॥२६॥ अर्थः-सूर्य मत्री हो तो पृथ्वीमें रोग और पीडा देशमें सर्वत्र दु ख रस धान्य अकरें लो. कमें कष्ट-देवताओंको दुःख हो ॥ १७ ॥ चन्द्रमा मंत्री हो तो वृक्ष फल और रसोंसे पूर्णहौं गो अधिक दूध दें स्त्री सतान अधिक प्रसब कर मनुष्य प्रियवाणी बोलें ॥ १८ ॥ मगर मनो होतो देव गुरुकी निन्दा सागरपर्यन्त पृथ्वीमें चोरोंकी अधिकता हो धूमस आकुल नेत्ररोग और युद्द हो ॥ १९ ॥ बुध मनी हो तो राजा प्रसन्नदृष्टिवाले हों अन्नवृष्टि अधिक शास्त्र और धनियौंको वृद्धि हो खी पतिसें प्रेम करनेवाली हो ॥ २० ॥ शुरु मनी हो तो प्रजामें सुत्र -धन धान्यकी वृद्धि मनुष्योंमें विवाह मगल अनेक सुख महोदय हो ॥ २१ ॥ शुत्र मनी हो -तो गौ मधिक दूध दें पृथ्वीमें धान्य अधिक उपजे सस्ते रहैं वृक्षौमें फल अच्छे आवे किंचित रोग हो वैद्य प्रयोग करें यही ईतिभीति हो ॥ २२ ॥ शनि मत्री हो तो मनुष्योंके व्यवहारका नाश राजा पूर चोर और अमिका दुःख हो गोजातिका नाश धान्यभाव तेज हो राजीमें शुद्ध हो ॥ २३ ॥ इति मत्रीफलम् ॥ रवि धान्यपति हो तो कहीं खेती पके कहीं नाश होड्या- घि दुःख और महा दुःख हो ॥ २४॥ चद्रमा सस्याधिप हो तो धान्यभाव सस्ता सब स्थानमें या धान्यकी प्राप्ति हो ॥२५॥ मगल सस्याधिपति हो तो सब जगत व्याधिरोगसे पीडित हो और सब धान्य अकरे विकै ॥ २६ ॥ सजला वसुधा सर्वा भयनाशः सुखी जनः। चणकादीनिधान्यानि धा त्यानामधिपे बुधे ॥२७॥ आनदः सर्वलोकानां सुवृष्टिस्तु प्रजायते। निप्पनिर्बहुधान्यानां यत्र सस्याधिपो गुरुः ॥ २८॥ रोगमुक्त जगत्सर्व मयमुक्ता भवेन्मही । पच्यन्ते सर्वधान्यानि यत्र सस्याधिपः कविः। "॥२९॥ अग्निचोराकुला पृथ्वी महाव्याधिपपीडिता । मृत्युरोगमये युद्ध वर्षे सस्याधिपेशनो॥३०॥ वर्पश्वरश्रभूपो वा सस्येशो वा दिनेश्वरः। तस्मिन्नब्दे नृपाः क्रूराः स्वल्पसस्याल्पवृष्टयः॥ ३१॥ अब्दपो चा चमू पो वा सस्येपो वा क्षपाफरः । तस्मिन्वर्षे कगेति ष्मां पूर्णधान्यार्यवृष्टि - ६६ । वर्षप्रबोध. भिः॥३२॥ अब्देश्वरश्च भूपो वासस्येशो वा धरांसृतः। अवृष्टिवैन्हि चौरेम्यो भयमुत्पादयन्ति हि ॥ ३३॥ अब्दाधिपश्च भूपो वा सस्यशों वा शशांकजा न करोति यंदा कष्टमवृष्टिमतिमारुतं ॥३४॥चभूपो वाथसस्येशो वर्षेशो वांगिरांपतिः। करोत्यतुलित भूमिबहुयेज्ञार्थव टिभिः॥३५॥ वर्षेशोप्यथसस्येशश्चमूपोवाथा भार्गवः मिहीं करोति संपूर्णी बहुधान्यफलादिमिः॥३६॥ अब्देश्वरश्चमूपो वा सस्येशो वा नंदनः। तस्मिन्वर्षे बुधो राजा धान्यभूपंभयप्रदः ॥ ३७॥ यदाढ़े शश्चमूनाथः सस्यपानां बलाबलं । तत्कालग्रहचारश्च सम्यज्ञात्वा फलें वदेत् ॥ ३८॥ अर्थ:-बुध धान्याधीश हो तो सुंब पृथ्वीपर जलव भयका नाश और मनुष्य सुखी हो चने आदि सस्ते विकै ॥ २७ ॥ गुरु ही तो सब लोकोंमें आनंद अच्छी वर्षा बहुत धान्यको 'उत्पत्ति हो ।॥२८॥ शुक्र धान्याधिपति हो सर्व लोक रोगरहित और पृथ्वी भयहीन हो सर्व घान्य अच्छी प्रकार पके ॥ २९॥ शनि सस्याधिपं हों तो पृथ्वी अग्नि चौरसे व्याकुल महा- ध्याधीस पीडित हो मृत्यु रोगभयं युद्ध होगा ३०॥जो सूर्य बाधिपति मंत्री और सस्यी- धिपाते हो तो उसे वर्षमें राजा दूरस्वभाव और धान्य तथा वो थोडी हो ॥ ३१ ॥ वर्षपति मंत्री और सस्यपति जो चंद्रमा हो तो उस वम पृथ्वी धान्यजलसे परिपूर्ण हो ॥ ३२॥ यदि मंगल वर्षपति चम्पति घान्यपति हो तो वका अभाव अग्नि और चोरसै मय होताहशा. जो बुध तीनोका अधिपति हो तो कष्टका अभाव हो वर्षों हो पवन चले ॥ ३४ ॥ यदि वह- स्पति वश चमूपति सस्याधिप हो तो पृथ्वीचे यज्ञ और वो हो ॥ ३५ ॥ जो शुक्र हो तो सम्पूर्ण पृथ्वीधन धान्यसें सम्पूर्ण हो ॥ ३६॥ जो वर्षपति मंत्री और सस्याधिप शनिवर हो तो उस वर्ष धान्य और राजाको भय हो ॥ ३७॥ यह इस प्रकार वर्षपति मंत्री भार स- स्यापिपतिका बलावल विचार कर फल कहना ॥ ३८॥ इति सस्याधिपतिफलम् । अथ मेंघाधिपतिफलम मूर्य मेघाधिपति हो तो थोडा जल वर्षे राजोंको क्षोभ चोरोंका भय हो चंद्रमा हो तो धान्यवृद्धि ब्राह्मणोंको सुख हो वृद्धि हो पृथ्वीमें जल अधिक वर्षे मंगल 'अधिपति हो तो अनिमय जल थोडा चोर अग्नि सर्पको पीडा दुर्भिक्ष उपद्रव हो बघ हो तो वृष्टि, अधिक मा. नंदुकी प्राप्ति-लेखक काव्यकर्ता ज्योतिपियोंको सुख हो गुरु मेघपति हो तो वर्षा श्रेष्ठ घा- न्यकी वृद्धि कुशलता यज्ञकरनेवालोंको संपचि साम्राज्य घनकी समृद्धि हो । शुक्र मेघाधिप- ति हो तौ कामिजनोंको सुख गो बहुत दूध दें क्षेत्र धान्यसें पूर्ण हों शनि मेघपति होजो पब- न अधिक चले कहीं वपी और कहींही कुशल हो खेतीका नाश हो इति मेघाधिपतिः । अंथ साधिपफलम् । सूर्य रसाधिप हो तो चंदन कमकुम गूगल तिल तेल अकरे बिक चंद्रमा - न . ६८ वर्षप्रवोध । "आरिवर्भावारे प्रवेशः पंशुनाशनः। सौम्ये मुभिक्षदः प्रोक्तो मोमेनि धनमाप्नुयात् ॥ १२॥ बुधे क्षेमं सुभिक्षं च गुरोचार्थसमृद्धये । शुके शा. तिकरः प्रोक्तो मंदे मंदफलं भवेत् ॥ १३ ॥ पूर्वाहकाले जगतो विपत्ति... मध्यान्हिके त्वल्पफला च पृथ्वी । अस्तंगतार्दा बहुसस्यसंपत् क्षेमं सुमि क्षस्थिमर्द्धरात्रे ॥१४॥ आ प्रवेशो यदि भास्करस्य चन्द्रनिकोणेयदि केन्द्रगों वा ॥ जलाश्रये सौम्यनिरीक्षिते. च सम्पूर्णसस्या वसुधातदा स्यात् ॥१५॥ दिवार्दा सस्यनाशाय रात्रौ सस्यविवृद्धये। अस्तगई. राने वा सम बहुवृष्टयः ॥ १६॥ चैत्रमासे पुनः प्राप्ते लोकानां हितहें तवे । मेषसंक्रान्तिवेलायां लग्नं शोध्य शुभाशुभम् ॥१७॥ यदो शुभ अहेर्दृष्टं लग्ने स्यात्तु तदा शुभम् । धनधान्यादिसंपूर्णसर्ववर्षशुभावहम् ॥१८॥ भावाद्वादश ते.मासाः सौम्याः करा.ग्रहाः पुनः। तेषु मासेषु देवेशि फलं ज्ञेयं शुभाशुभम् ॥ १९॥ मेषप्रवेशलग्नेवा' यदि स्याद्रज न्मनि । सप्तमस्थो यदा पापोधान्यजातं विनाशयेत् ॥२०॥धने व्यये च सौम्यश्चकेन्द्रे वा मेपसंक्रमे । स्वः शुभमुहदृष्टः सुभिक्षं व्यत्ययो 'न्यथा॥ २१ ॥ गणयेचैत्रमासस्य शुक्लपक्षस्य मूलतः । प्रतिपल्लगवेला यां.लग्नं शोध्यं शुभाशुभम् ॥ २२॥ मेपलग्ने तु पूर्वस्यां दुर्भिक्ष राजवि ग्रहः। दक्षिणस्यां सुभिक्षं स्याबहुधान्यरसा च भूः॥२३॥धान्यानां विं क्रये लाभः पूर्णमेघमहोदयः। धृत तैलादिवस्तूनां पण्यानांच महर्घता ॥ २५॥ उत्तरस्यां मुभिक्षं स्याद्राज्ञामुढेगकारणम् । मध्यदेशे महावृष्टि निष्पत्तिर्धान्यसन्ततः॥२५॥ अर्थ:-मामें रविका रविवारके दिन प्रवेश हो तो पशुनाश करें चन्द्रवार के दिन सुमिन मंगलके दिन निर्धन हो ॥१२॥ उपके दिन क्षेम और सभिक्ष है गुरुवारके दिन अर्थात शुक्रके दिन शान्ति शनि मंद फलदाता है ॥ १३ ॥ पूर्वान्हमें प्रवेश हो तो जगत्में विपत्ति मध्यान्हकालमें पृथ्वीमें थोडा अन्न हो और प्रस्तसमयमें सस्यसंपतिकी प्राप्ती हो आधी- रातमें प्रवेश करे तो क्षेम और सुभिक्ष हो ॥१४॥ जव सुर्यका आमें प्रवेश हो तो,उस.स- मय चन्द्रमा त्रिकोण या केन्द्र में प्रवेश करे अथवा चंद्रमाको दृष्टि हो तो पृथ्वी धान्यसे पूर्ण हो ॥ १५ ॥ दिनमें आदीमें प्रवेश धान्यनाशके निमित्त रात्रिमें धान्यकी वृद्धि और मस्त- समय वा आधीरातमें हो तो अन्न सस्ता और वृष्टिं अच्छी हो ॥१६॥ चेत्रका महीना प्राप्त होनेमें लोकोंके मंगलके निमित्त मेपकी संक्रान्तिके समय लम विचारे । ॥ १७ ॥ जोशम P- भापार्टीकासहित । ग्रहकी लममें दृष्टि हो तो शुभ हो धनधान्यादियुक्त सपूर्ण वर्ष शुभ हो ॥ १८ ॥ सौम्य ग्रह हो तो सब मास श्रेष्ठ हों क्रूर हों तो उन उन महीनोंमे उनके अनुसार शुभाशुभ फल जा- नना ॥ १७ ॥ जो वर्षप्रवेशमें मेष लग्न हो सप्तम स्थानमें पापग्रह हो तौ धान्यका नाश करें ॥२०॥ अथवा मेपकी समातिके प्रवेशमें धनस्थान ग्यारहवें स्थान वा केन्द्रस्थानमें शुमन- क्षत्रयुक्त शुभग्रहको दृष्टि हो तो मुभिक्ष हो अन्यथा दुर्भिक्ष ।। २१॥ चैत्रमासके शुक्लपक्षसे प्रतिपदाके दिन वर्षप्रवेशका लग्न विचारे ॥ २२ ॥ मेप-लग्न हो तो पूर्वम दुर्मिक्ष और रा- ज्यनिग्रह हो दक्षिण में सुभिक्ष पृथ्वीमें बहुत धान्य और रस हो ॥ २३ ॥ धान्यके वेचमें लाभ पूर्ण मेघ वर्षे घृत तैल व्यापारी वस्तु अकरी ॥ २४ ॥ उत्तरम सुभिक्ष राजोंमें उद्देग मध्यदेशमें महा वर्षा धान्यकी प्राप्ति हो ॥ २५ ॥ वृषेपि पश्चिमे कालः पूर्वस्यां राजविग्रहः । उदग्धान्याईनिप्पत्तिर्दक्षि णस्यां विकालतः॥ २६ ॥ मिथुने बहुलं युद्धं 'पूर्वस्यां धान्यनष्टता। उदग्दक्षिणयोर्मेघा बहवो धान्यसंग्रहाः ॥ २७॥ पश्चिमायां स्वल्पमेवा श्छत्रमंगश्चविग्रहः । मध्यदेशेर्द्धनिष्पत्तिश्चतुष्पदसरोगता ॥ २८॥ कर्के सुखं तु पूर्वस्यामुत्तरस्यांतु विग्रहः । स्याचासनवकं यावदुर्मिक्ष पश्चिमे दिशि ॥ २९॥ सिंहलग्ने दक्षिणस्यां दंष्ट्रामयमुदीर्यते। धान्ये समर्पता मासपट्कं यावद्धनो महान् ॥३०॥ पश्चिमायां धातुवस्तुफ लादीनां महर्घता। उत्तरस्यां महावृष्टिः सुखं राज्ये प्रजासु च ॥३१॥ पूर्वस्यामर्द्धनिष्पतिः श्रेयोग्रे मासपंचकात् । मध्यदेशे राजयुद्धं मासपं चकमुद्धतं ॥३२॥ कन्यायां सुस्थिरा प्राच्यांघृते महर्घतामता। मंजि धादिसमर्घत्वं यावन्मासयत्रं भवेत् ॥ ३३॥ मारिर्दक्षिणदेशे स्यात्तथा वंगेप्युपद्रवः। लोकदुःखं पश्चिमायां विग्रहोनसमर्थता ॥ ३४॥ चतु प्पदसुखपाच्यामुदीच्यां राजविग्रहः । मध्यदेशे प्रजामंगः समर्पत्वं घृते पुनः ॥३५॥ तुलालग्ने मध्यदेशे छत्रभंगश्च विग्रहः । धान्यस्य विक्रयः प्राच्यांछत्रभंगमुपद्रवः ॥३६॥दुर्भिक्षं बहुलो वायुः स्वल्पमेघप्रवर्षणम् । पश्चिमायां महायुद्धं दंष्ट्राभयमहर्षता ॥३७॥ दक्षिणस्यां सुखं लोके दुर्भिक्षं चोत्तरापथे। मासद्यपश्चिमायां किंचिदुत्पात्संभवः ॥३८॥ अर्थ:-पमें प्रारम हो तो पश्चिममें काल पूर्वमें राजविग्रर जल और धान्यकी प्राप्ति दक्षिणमें किंचित सुकाल हो ॥ २६ ॥ मिथुनमें हो तो युद्ध पूर्वमें धान्य नष्ट दक्षिणमें 3 और धान्यप्राप्ति धान्यसग्रह करना उचित है ॥ २७ ॥ पश्चिममें थोडा मेघ छत्रमंग और विग्रह हो मध्यदेश में अप्राप्ति चौपायोंमें रोग ॥ २८ ॥ पर्वमें पूर्वम मुख उत्तरमें विग्रह वर्षप्रबोध । आसन बल और पश्चिममे दुर्भिक्ष हो ॥२९ । सिंहलग्नमें हो तो दक्षिणमें सर्पभय छामासत क धान्य सस्ते रहे ॥ ३० ॥ पश्चिममें धातु वस्तु और फलादिक अकरे विके उत्तर महावृष्टि रोजापजामे सुख हो ।॥ ३१ ॥ पूर्वमे अदमाप्ति आगे पचमहीने श्रेष्ठ मध्यदेशमें पांचमहीने रानोंमें युद्ध हो ॥ ३२ ॥ कन्यामें प्रवेश हो तो प्राचीदेशवासी प्रसन्नहों वृतमाव तेज तीनमहीने मजीटादि सस्ते रहैं ॥ ३३ ॥ दक्षिणदेशमें मरी बगदेशमें उपद्रव लोकमें दुःख अन्न सस्ता ॥ ३४ ॥ प्राचीमें चौपायोंको मुख हो उदीची,दिशामें राजविग्रह मध्यदेशमें :- जाभंग घीको समर्थता ॥ ३५ ॥ तुलालनमें वर्षप्रवेश हो तो छत्रभग और विग्रह हो प्राचीदि- शामें धान्यका विक्रय उत्तमग तथा उपद्रव हो ॥३६॥ दुर्भिक्ष तीक्ष्ण, पवन मेघ योटा वर्षे पश्चिममें महायर सर्पभय अन्न भाव तेज हो ॥ ३७॥ दक्षिणमें सुख उत्तरमें दुर्भिक्ष दो महीने पश्चिममें कुछ उत्पात हो ॥ ३८॥ वृश्चिके पश्चिमे देशे दुर्मिक्षं नवमासिकं । उदीच्यामर्द्धनिप्पत्तिः, सम Cघातवस्तदा ॥३९॥ पूर्वस्यां विग्रहो राज्ञां दुःखं मासत्रयं जने। पश्चात्सुखं धान्यनाशो मध्यदेशे मजायते ॥४०॥ दक्षिणस्यां देशभंगो भावी चर्षे मजायतेोधातूनां विक्रयः कार्यः परतो मासपंचकात्॥४॥ध नुर्लग्ने उत्तरस्यां पूर्वस्यां च सुखं नृणां दुर्भिक्ष मेवलावृष्टिमध्यदेशे सरोग ता॥४२॥ पश्चिमायां वृतं धान्यं समर्प मासपंचकात् । दक्षिणत्यां सुखं लोके किंचित्पीडा चतुष्पदे ॥४३॥मकरेच महोत्पात उत्तरस्यां नृपक्षयः । वर्षमेकं सुनिष्पतिः पश्चिमायां महामुखं ॥४४॥ मध्यदेशे ईनिप्पतिः किंचिद्धान्यमहर्घता । अकाले मेववृष्टिःस्याल्लामी धान्य स्य विक्रयात् ॥ ४५॥ कुंभे सुखानि पूर्वस्यामुदग्दुर्भिक्षसंभवः । हाहा कारः पश्चिमायां भवेद्धान्यमहर्घता।। ४६ दक्षिणे विग्रहश्चैव मध्यदे शे महासुखं । मीनलग्ने दक्षिणस्यां सुखी लोकोन्नसंग्रहः॥ ४७॥म ध्यदेशे धान्यनाशछत्रभंगः क्वचिद्भवेत । एवं द्वादशधा लग्नं ज्ञेयं वत्स रंजन्मनि ॥४८॥ इति वर्पजन्मलग्नम् । अर्थः-वृश्चिकमें वर्षप्रवेश रो तो नौमहीने पश्चिममें दुर्भिक्ष हो उत्तरमें 'अर्धप्राप्ति घा- तुभाव तेज रहे ॥ ३९ ॥ पुर्वके राजोंमें भय तीन महीनै दुःख पीछे मुख धान्यनाश मध्य- देशमें हो॥४०॥ आगेके वर्षमें दक्षिणमें देशभग हो पांच महीने पाछे धातुओंका विनय क- रना ॥ ४१ ॥ धनुर्लग्नमें उत्तरपूर्वके मनुष्यौंको सुख हो दुर्भिक्ष प्रवल वृष्टि और मध्यदेशमें रोग हो ॥ ४२ ॥ पश्चिममें घृत धान्य पांचमहीने सस्ते विके दक्षिणदेशवासियौंको सस चौपायाम किंचित्पीडा ॥ ४३ ॥ मकरमें महा उत्पात उत्तरके राजौंका सय एक वर्ष सुख ७१' AN T दः । वपेत्तदा सर्ववर्षे धान्यस्यार्थो न जायते ॥६.०॥ वैशाखकृष्णप्रति विधायका॥६२॥ वैशाखकृष्णेकादश्यां मेवो वे प्रवलो मवेत । तदा शुक्लकृष्णे च वैशाखे चतुर्दश्याष्टमीदिने । गर्जविद्युत्पयोवर्षा वर्षानंद. धान्यानां विक्रय कर्तव्यः कृपिकर्मणि ॥६३॥ वैशाखशलपतिपदहिती भापाटीकासहित। और पश्चिममें भी महासुख हो ॥४४॥ मध्यदेशमें अईप्राप्ति कुछ धान्यभाव तेज अकाल में मेघवृष्टि धान्य वेचनमें लाभ ।। ४५॥ कुंभमें हो तो पूर्वमें मुख उत्तरमे दुर्भिक्ष पश्चिममें हाहा- कार घान्यभाव तेज ।। ४६ ॥ दक्षिणमें विग्रह मध्मदेशमें महामुख मानलंग्नमें दक्षिणमें सुख लोकमें अंन्त्रसंग्रह करना उचित है ॥ ४७ - मध्यदेशमें घान्यनाश कहाँ छत्रभंग इसप्रकार बारहे. लग्नोमें सम्बत्की प्राप्ति जाननी ।। IST चित्रे कृष्णद्वितीयायां निरभ्र चेन्नमो भवेत् । तदा भाद्रपदे मासे ज्ञेयो मेघमहोदयः । ४९ ॥ चत्रकृष्णद्वितीयायों मेघों वे प्रबलो यदा.,जलं पतति चैत्रे च तदा वृष्टिस्तु कार्तिके। ५०॥ चतुर्थी कृष्णपक्षस्य वर्षा दुर्भिक्ष कारिणी यंचम्यामसिते चेत्रे नृणां तत् दुर्दिनः शुभः॥५१॥ अर्थः-जो चैत्रकणदितीयाकै दिन आकाश बादलरहित हो तो भाद्रमासमें मेघमहोदय जानना। ४ चैत्र कृष्णवितीयाके दिन जो मेध प्रबल हो और वोमी हो तो कार्तिक, अच्छी वर्षा हो ॥ ५० ॥चत्रकृष्णपक्षकी चौथको वा होतो दुर्भिक्षं करें और कृष्णपक्षकी पंचमीको बादल ही तो.शुभ है ॥५१॥ चैत्रस्य कृष्णपंचम्या हस्तनक्षत्रसंगमे । न विद्युद्गजितांभ्राणि तदा स्या, द्वत्सरः शुभः॥५२॥ त्रयोदशी च नवमी पंचमीकृष्णचैत्रगा। एता स्तु विद्युतोगर्भसंभवो वृष्टिहानिकृतः॥ ५३ ॥ चैत्रस्यकृष्णसप्तम्यांमधी च्छन्नं यदा नमः। रक्तवस्तुसमर्थत्वे भवत्येव नसंशयः ॥१४ा प्रतिप चैत्रशुक्लायाः द्वितीयायास्तृतीयको । चतुर्थी वृष्टियुक्ता चेचातुर्मास्यते दाचनमा ५॥ चैत्राद्यप्रतिपन्मेघः गर्जित वर्षणं तथा। श्रावण मा द्रमासे च तदा वृष्टिनजायते ॥५६॥ पंचमी सप्तमी शुक्लाग चैत्रीयांच त्रयोदशी। एतासु वादले श्रेष्ठं तत्र वर्षी तुं दुःखकृत् ॥ ५७॥ चैत्रमासे कृष्णपक्षे चतुर्दशी तथाष्टमी। तत्राप्रमुत्तरांवायुः शुभाय वत्सरेभवेत्। ॥३८॥.चैत्रस्य शुक्लपक्षे तुत्रयोदश्यां रजोनिलः । अथवा धूमरी पा तो मेघस्तत्र न वर्षति ॥ ५९॥ चैत्रेदशम्यां शनिना मघायोगे यदाम्बु पादच्छेन्नभभास्करः । मेघैराच्छाद्यतेःच्योम्निसम्वत्सरहिताय सनादशा ७२ वपप्रबोध। "यादिनद्वयेवादलकशुभाय । तदा तृतीयादिवसेपि चाभ्रं दृष्टिविशिष्टा परमंगरोगः॥ ६४॥ अर्थः-जो चैत्र कृष्ण पचमीको हस्त नक्षत्र हो और उस दिन विजली वादल गर्जना न हो तो वर्षश्रेष्ठ है ॥५२॥ जो कृष्णपक्षको त्रयोदशी नवमी पंचपीके दिन बिजली वादल हो तो वीकी हानि हो ॥ ५३॥ चैनक्रष्णसप्तमीके दिन जो आकाश मेघसे आच्छादित हो तो लालबस्तु निःसन्देह सस्ती हो ॥५४॥ चैत्रशुममतिपदा द्वितीया तृतीया और चौथको वर्षा हो तो चौमासेमर व ॥ ५५ ॥ चैत्रकी कृष्णपड़वाके दिन मेघ गर्जे अथवा व तो श्रावण और भादौम वर्मा न हो ॥५६॥ चरमपंचमी सप्तमी त्रयोदशी इनमें बादल होना अच्छा है वपी दुःखकारक है ।। ५७ ॥ चैत्रमासके कृष्णपक्षमें चतुर्थी अष्टमीके दिन बादल और उ- सरकी पवन चले तो वर्ष शुभ है ॥ ५८ ॥ चवशुनत्रयोदशीके दिन धूरियुक्त पवन चले प्रथ- वा धूमरीपात हो तो मेघ'न वर्षे ॥ ५९ ॥ चैनशुक्ल दशमी शनिवार हो और मघा नक्षत्र हो और वर्षा हो तो उस वर्षमें धान्यकी उपज अच्छी न हो ॥ ६०॥ जो वैशासकृष्णप्रतिपदा- कै दिन सूर्य मेघाच्छादित उदय हो तो सम्वत्सर अच्छा हो ॥ ६१ ॥ वैशाखशुक्ल और कु- प्णकी चौदश या अष्टमीके दिन गर्जना बादल और बिजली चमके तो सम्वत्सर शुभ ही ॥ २ ॥ वैशाखकृष्ण एकादशीकै दिन प्रबल मेघ हो तो धान्यविश्य कृषिकर्ममें करना चाहियें ॥६३॥ वैशाखशुक्ल प्रतिपदा द्वितीयाको दो दिन बादल होना श्रेष्ठ है और तीनके दिनभी पादल हो तो वर्षा हो और पीछे रोग हो ॥ ६४ ॥ वैशाखशुक्लदशमी दिनेच बादलं शुभं राधेश्विनीदिने पष्ठ्या रकवस्तु महर्घता ॥६५॥ वैशाखसितपंचम्यां मेघवादलसंभवः । संग्रहस्सर्वधा न्यानां लाभो भाद्रपदे भवेत् ॥ ६६ ॥ राधे शुक्लप्रतिपदि सप्तम्यादिदि नत्रये। वादलानां समुदये शीघ्र वृष्टिविनिर्दिशेत ।। ६७॥ एकादशी त्रयेशुले दुर्भिक्षं वृष्टिवादलात् । राधे च पूर्णिमावृष्टिभाद्रे धान्यमहर्घक त्॥ ६८॥ पंचम्यामथसप्तम्यां नवम्यैकादशीदिने त्रयोदश्यां च वैशा खे वृष्टौ लोके सुखं भवेत् ॥ ६९॥ अष्टम्यां च चतुर्दश्यां ज्येठे शुक्ले त थासिता कृष्ण दशम्या वृष्टिः स्याद्भाद्रमासेतिवृष्टये ॥ ७० ॥ ज्येष्ठस्य दशमीरात्रौ यदि चन्द्रोन-दृश्यते । वर्षणं जायते श्रेष्ठं स्वस्था सर्वमही भवेत् ॥ ७॥ज्येष्ठस्य कृष्णकादश्यांदादश्यांबाब्दगर्जितं- विद्युत्प योदवृष्टिश्चेत् यत्सरः स्यात्तदा शुभं ॥ ७२ ॥ ज्येष्ठाषाढसमुद्भूते रोहिणी दिवसे नमः सानं दृष्टिविनाशाय समेघ दृष्टिवर्द्धनं ॥७३॥ ज्येष्टे मू लदिने दृष्टियेष्ठान्ते दिवसहये । दुर्भिक्षं कुरुते श्रेष्ठा विद्युत्पांसुयुतानि भापाटीकासहित । ७३ ला॥७४ ॥ ज्येष्ठमासे तथाषाढे यत्रतत्राब्दवर्षणं । श्रावणेभाद्रमासेवा तदिने वृष्टिनिर्णयः ॥ ७५ ॥ ज्येष्टे शुक्लद्वितीयायां गर्भपाताय गर्जि तं । शुक्ले तृतीयायोगे वृष्टिर्दुर्भिक्षदर्शनी ॥७६ ॥ यदि ज्येष्ठस्य पंच म्यां वृषार्के वृष्टिरुद्भवेत् । पूर्वाषाढादिना वा स्यान्मूलं दृष्टं न दोषकृत।। ॥७७ ॥ ज्येष्टस्य पूर्णिमायां तु मूलप्रस्रवते यदा । दिनषष्टिव्यतिक्रम्य ज्ञेयो मेघमहोदयः ॥७८॥ यदाश्रुतिधनिष्ठाहे न भवेज्जलवर्पणं ज्येष्ठा नुज्ज्वलपक्षे तु नक्षत्रश्रवणादिके ॥७९॥अवर्षणे न वर्षा स्यादृष्टो तुः विपुलं जलं। चित्रास्वातिविशाखासु वादलं च तदा शुभं॥८॥ अर्थ:-वैशाखशुक्ल दशमीके दिन मेघ श्रेष्ठ है विशाखा अश्विनी छठके दिन हों तो लाल वस्तु अकरी हौं ॥ ६५ ॥ वैशाख शुक्ल पंचमीको मेघ वादलयुक्त हो तो सब धान्यका संग्रह करना भादोंमें लाभदायक है ।। ६६ ॥ शुक्लप्रतिपदि विशाखायुक्त हो वा सप्तमीआंदि तीन दिनमें मेघ उदय हो तो शीघ्र वर्षा हो ॥६७॥ शुक्लएकादशी आदि तीन तिथियोंमें वर्षा हो तौ दुर्भिक्ष हो विशाखापूर्णिमाके दिन हो और वर्षा हो तो भादोंमें धान्यभाव तेज रहें ॥६६॥ पंचमी सप्तमी नौमी एकादशी और वैशाखकी त्रयोदशीकों वर्षे तौ लोकमें सुस्त हो। ६९ ॥ ज्येष्ठशुक कृष्ण दोनो पक्षको चौदश और अष्टमी और कृष्णदशमीको वर्षा हो तौ भादोंमें अधिक वर्षा हो॥७०॥ज्येष्ठदशमीकोरात्रीमें यदि चंद्रमा न दीखै तो वो अच्छी और पृथ्वी स्वस्थ हो ॥७१॥ ज्येष्ठ आपाढमें रोहिणी नक्षत्रके दिन वादल हो तो वृष्टिका नाग मेघ वर्षे तो अ- च्छा है ॥७३ ॥ ज्येष्ठकृष्ण एकादशी हादशीके दिन विजली चमके वादल गर्जे वपी हो तो वर्ष श्रेष्ठहै ॥ ७२ ॥ ज्येष्टमें मूल नक्षत्रके दिन वर्षा हो और अन्तके दो दिन वर्षा हो तो दुर्भिक्ष करै और केवल विजली चमके धूरियुक्त पवन चले तो श्रेष्ठ है ॥ ७४ ॥ ज्येष्ठ और आपादमें जिस दिन वर्षा हो श्रावण भादोंमें उसी दिन वर्षा होगी ॥७५ ॥ ज्येष्ठशक्लदिती- याको गर्जनाभी वीके निमित्त है शुक्लपक्षकी तीज आयुक्त हो तो दुर्भिक्ष कर ॥७६ ॥ यदि ज्येष्ठपंचमी वृपके सूर्यमें वर्षा हो वा पूर्वापाडके दिन मूलके दिन वर्षा हो तो दोष नहीं करती ॥७७॥ ज्येष्ठपूर्णिमामें जो मूल हो और वर्षा हो तो साठ दिनके उपरान्त मेघ व ॥७८ ॥ जो श्रवणधनिष्टाके दिन जल न वर्षे ज्येष्ठा शुक्लपक्ष और श्रवणके दिन ॥ ७९ ॥ न वर्षे तो आगे वर्षाका अभाव और वर्षे तो वर्षा जाननी चित्रा स्वाति विशाखाके दिन मेघ होते शुम है ॥८॥ कृष्णापाढचतुर्थ्यां च मेघराच्छादितो रविः। मासत्रयव्यतीते च तदा मेघमहोदयः ॥ ८१॥ आषाढकृष्णतुर्यायामास्ते भास्करमंडले । न वर्ष ति यदा मेघस्तदा कष्टतरं जलं ॥४२॥ आपाढे कृष्णपक्षस्याष्टम्यां च न्द्रोदयक्षणे । मेधैरान्छादितं व्योम नीरपूर्णा तदा मही ।। ८३॥ आपा ७४ वर्षप्रबोध। ढे नवमी कृष्णा विद्युदम्भोदशेखरे । विक्रयः सर्वधान्यानां कपणे वे हि ताय च ॥ ८४॥ आपाटकष्णपक्षे च धनिष्ठाश्रवणं तथा । गर्जेविद्युद्धि हीनं स्यादेशभंग तदा दिशेतः॥ ८५ ।। आपाढमासे रोहिण्यां विद्युद्ध पी.शुमाय सा । स्वातियोगेपि चापादे तथैव फलमिप्यते ॥८६॥ आषा दशक्लप्रतिपत्रये वर्षा यदा भवेत् । एको द्वादश चद्रोण पोडशापि क्रमा जलं॥ ८७॥ आपाढे शुक्लपंचम्यादिके तिथिचतुष्टये । यावत्यभ्राणि वर्षासु तावन्मेघमहोदयः॥८८॥ शुक्लापाटनवम्यां च दशम्यां वर्षण शुभं । दुर्भिक्षं जायवे नूनं वाते वृष्टिविनाः कृते ॥ ८९॥ आपाढस्याप्य मावस्यां नवम्यांशुक्लक्केष्णयोः। उद्गच्छेचसहस्रांशुर्निर्मलो यदि दृश्यते ॥९० ॥ मध्यान्हे पृष्टिरूपं स्यात्सूर्यस्यास्तंगमे वथा । अग्रे तोयं ने पश्यामि वर्जयित्वा महानंदी॥५१॥ चतुर्थी तु सितापाढे विद्युद्धा श्व गर्जितं । तदा जलं समुद्रे स्यात्पुस्तके वा प्रदृश्यते ॥ ९२॥आषा । ढयां प्रथमे यामे वादलेन सुभिक्षता । मासमेके जले धान्यं स्तोकं लो' “कमहाशयं ।। ९३ ॥श्रावणस्यादिमेपक्षेअश्विन्या मेवष्टितः । सर्वान्दो 'पानिहत्येव सुभिक्षं भुवि जायते ॥ ९४॥श्रावणे विपुलाविशुद्रर्जितं. चापुनर्वने । वृष्टिस्तदा मनोभीष्टाः कुस्ते वत्सरे शुभं ॥ ९५ ॥ १. अर्थः-जो आपादकृष्ण चतुर्थीके दिन सूर्य मेघसे ढका होनी तीन मासके उपरान्त मेघ अधिक वर्षे ॥ ८१ ॥ जो आपाढरुण चौथके दिन सूर्यके अस्त होनेमें जल न व तो मेघ फठिनतास व ॥ ८२ ॥ आपाढकृष्ण अष्टमीको चन्द्रोदय मेघोंसे आच्छादित हो तो पृथ्वी 'जलसे पूर्ण हो ।।८३ ॥ आपाकृष्ण नवमीको रिजलीयुक्त वादल हों तो सब धान्यको बेचे किसानोको हितकारक है ॥ ८४ ॥ आपादक गमें धनिष्ठा श्रवणके दिन बिजलीके विना गर्जना हो तो देशभंग हो ॥ ८५ ॥आपाठमासमें रोहिणीके दिन विजली चमकनी और वर्षा होनी लोकफे हितकारी है और यही फल आपादमें स्वातियोग होनेपर ह॥ २६॥ "आपाढशल प्रतिपदादि तीन तिथियों में जो वर्षा हो तो एक बारह तथा सोलह द्रोण जल वर्षे ॥ ८७ ॥ आपाढशुक्ल पचमीआदि चार तिथिमे जितनी वर्षा होगी उतनेंही मेघौंका उदय होगा ।। ८८; आपाढशुदि नवमी दशमीको वर्षा होनी अच्छी है और केवल पवनही चले तो दुर्भिक्ष हो । ८९ ॥ आपाडकी अमावास्या और शुक्ल कृष्णपक्षकी नवमीके दिन यदि सूर्य निर्मल उदय हो ॥ ९० ॥ मध्यान्हमे कुछ वर्पाकी प्राप्तिसे और अस्तमें वर्षा हो तो नदीको छोड और स्थानोमें जल न 'मिरे ॥ ९१ ॥ आपाढशुम चौथके दिन बिजलीयुक्त वर्षा हो तो जल समुद्र या पुस्तकामही दीखे ॥ ९२ ॥ आपाठ पूर्णिमाके पहले पहरमें पदिल हो .

११ पुत् ॥ भाषाटीपासहित । तो सुभिक्ष-न हो केवल एक महीना जल व धान्या थोडे और राजौंको नाम श्रावणकृष्ण अश्विनीमें मेघ वर्षे तो सब दोप दूर होकर सभिक्ष हो ॥९४॥ श्रारणमें बहुत विजली चमके और वा हो तो मनवाछित वर्षा हो॥९५॥ "श्रावणे कृष्णपक्षे चेचतुर्थ्यामरुणोदये । वादल वृष्टिरनिशं सर्वत्र सुखबू टिकृत् ॥ ९६ ॥ श्रावणे कृष्णपंचम्यां निर्मलं गगनं शुभम् । तदाप्टाद शयामान्तघनस्तोयं व्यपोहति ॥ ९७ ॥ अमावास्यां श्रावणस्य यदि वृष्टिर्घनाधनः । चराचर तदा विश्वं मुखभाक्चचलाचलम् ॥९८॥ चि "त्रास्वातिविशाखासु श्रावणे न जलं यदा। तदा कुल्यादिकं कृत्वा नदी तीरे गृहं कुरु ॥ १९॥ नभःप्रथमपंचम्यां यदि वृष्टिः पयोधरः । तदा.. भूश्चतरो मासान्भवेद्वारिसमाकुलम् ॥१०० ॥ श्रावणे शुक्कसप्तम्यामस्तं याते दिवाकरे।'न वर्षति यदि पर्जन्यो जलाशा मुंच सर्वथा ॥ ११ ॥ अष्टस्यों, श्रावणे शुक्के प्रांतर्वादलहम्बरम् । रविराच्छादितस्तेन पृथि व्येकार्णवा भवेत् ॥१०२ ॥ मेघेराच्छादितश्चन्द्रः पूर्णीयां समुदीरते। तदा स्वस्थं जगत्सर्वं राज्यसौख्यघनो महान् ॥१०३॥ श्रावणे कृष्णपक्षे वा पूर्वाभाद्रपदामु च। चतुर्थ्या मेववृष्टिश्च तदा मेघमहोदयः ॥१५॥ शुक्ला चतुर्दशी पूर्णा चतुर्थी पंचमी तथा । सप्तमीचेच्छावणस्य वृष्टियु का शुभं तदा ॥ १९५ ॥ श्रावणे शुक्कसप्तम्यां स्वातियोगे जंलं यदा । प्रजानंदः सुखं राज्ये बहुभोगान्विता मही ॥१०६ ॥ एकादश्यां नमः कृष्ण यदि वर्षा मनागपि । तदा वर्षशुभं भावि जायते नात्र संशयः॥ ।१०७॥ नभश्चतुर्दशी राका चतुर्थी पंचमी तथा । सप्तमी वृष्टियुक्ता चेहर्ष शुभ न चोन्यथा ॥१८॥ भाद्रमासे द्वितीयायों यदि चन्द्रो न दृश्यते । तदा संपूर्णवर्षास्यादन्ननिष्पत्तिरुत्तमा॥१०९ ॥ भाद्रे च शुक्ल पंचम्यां जलं दत्ते नचेवन देवकोपात्तदाज्ञेयोसज्जनोपि च दुर्जनः ११० 'अर्थ श्रावणकृष्ण चतुर्थीको अरुणोदय होनेपर यदि बादल वर्पा निसदिन हो तो सर्वत्र सुख और वर्षा हो ॥ ९६ ॥ श्रावणकृष्ण पचमीयो आकाश निर्मल रहे तो शुभ हे और अठारह दिनपोछे वर्षा जाननी ॥-९७-॥ श्रावणको अमावास्याको जो दृष्टि हो तो चराचर विश्व सुखभागी हो९८ ॥ जो श्रावण में चित्रा:स्वाती विशाखाके दिन जलन वर्षे तौ कूप खोदकर नदीके किनारे घर बनाना उचित है ॥ ९ ॥ श्रावणकृष्ण पंचमी.जो वर्षा हो तो चार महीने पूरा वर्षे ॥ २०० ॥ श्राणशुळ सप्तमीको सूर्यास्त होने में जो वोन ।

वर्षप्रवोध। हो तो सर्वथा जलकी आशा त्यागनी उचित है॥१०१॥ श्रावणगुल्ल अष्टमीको जो बादर हो और सूर्य छिपा रहे तो महावां हो ॥ १०२॥ पूर्णमासीके दिन जो चन्द्रमा मेघाच्छादित उदय हो तो सब जगत स्वस्थ राज्य और सुखकी वृद्धि हो ॥ १०३ ॥ श्रावणकृष्णपक्षमें चौथके दिन पूर्वाभाद्रपदा नक्षत्र में मेघ वर्षे तो अच्छी वर्षा हो ॥ १०४ ॥ श्रावण शुक्ल पौष पूर्णिमा पंचमी चतुर्दशी सप्तमीकैदिन वर्षा हो तो शुभ है ॥ १०५ ॥ श्रावणशुक्ल सप्तमी स्वातियोगमें जल व तो प्रजामें आनंद राज्यमें सुख पृथ्वीमें महाभानदहो । १०६ ॥ आवर्णकृष्ण एकादशीके दिन यदि थोड़ीभी वर्षा हो तो अगला वर्ष अच्छा हो ॥ १०७ ॥ श्रावणकी चोदश पूर्णिमा चौथ पंचमी सप्तमीको वर्षा हो तो निःसन्देह वर्ष अच्छा है अ- न्यथा नहीं॥१०८ भादौमासकी बीजद्वितियाके दिन जो चन्द्रमा न दीखै तौ सम्पूर्ण प्रकारस अच्छी वर्षा हो अन्नको उत्तम प्राप्ति हो ॥ १०९ ॥ भाद्रपदशुक्ल पंचमीकेदिन जो बादल न यो तो देवकोपसे जानिये कि सन्जनभी दुर्जन हो जायगे ।। ११० ॥ यद्यगस्तेख्दयने वर्षा हर्षाय जायते । सर्वधान्यस्य निष्पत्तिर्नचेद्भिक्षा पि दुर्लभा ।। १११ ॥ सप्तभ्यां भाद्रमासस्य नवर्षा नच गर्जितम् । विद्यु द्विद्योतने नैव देवकालस्य नाशकः ॥ ११२ ॥ नवम्यां भाद्रमासस्य वृ टिर्दुष्कालमादिशेत् । एकादश्यां तु तस्यैव धनोधान्यसमर्षदः॥११३॥ सिंहेर्कदिवसे वृष्टिर्न शुभाय नृणां स्मृता।देवाजाते धने पश्चादृष्टिर्दिन दयान्तरे ॥ ११४ ॥ तदातदूषणं नास्ति मासमेकं प्रवर्षति । भाद्रे चतुर्द शो वृष्टिर्जने रोगाय जायते ॥ ११५ ॥ आश्विनस्य चतुर्थी चेदादला न्यरुणोदये। तदा क्षेमाय लोकानां वृष्टिः संजायते शुभा ॥११६॥ आ धिनस्य सिते पक्षे दशम्यां यदि वादलम्। विद्युद्वीथवा माषतिलानां वैमहतो ।,११७ ।। सप्तम्याधयुजि मासे सितेऽष्टमी जलान्विता । सु भिक्षं तत्र चादेश्यं राजानः शांतविग्रहः ॥ १९८ ॥ एकादश्यां कार्तिक स्य यदि मेघसमीक्ष्यते ।आपादेव तदा वृष्टिर्जायते नात्र संशयः॥११९॥ द्वितीयायां तृतीयायां कार्तिके वृष्टिलक्षणं । भावि वर्षे बहुजलं न चेत्त स्मिन्नवर्पणम् ॥१२०॥ द्वादश्यां कार्तिके रात्रौ मार्गस्य दशमी दिने । पंचम्यां योपमासस्य सप्तम्यां माघमासके ॥ १२१ ।। धाराधरो यदा प्टिः कुरुते वा सुगर्जितम् । तदा च श्रावणे मासे सलिलं नैव दृश्यते॥ ॥१२२ ॥ कार्तिके च द्वितीयायां तृतीया नवमीदिने । एकादश्यांत्र योदश्यामभ्राहृष्टिनो महान् ॥१२३ ।। कार्तिके यदि संक्रान्तः पर्यन्ते " m ७८ 'यमबोध । प्रदीपप्रच्छाद्य गर्जेदेरावतान्वितः। विद्युत्कुमारिसंयोगाद्देवेन्द्रोगर्भकार कमा १३५॥ उत्तरस्यों यदा विद्युत्स्वर्णवर्णा प्रदीप्यते ।सा विद्युजल दाज्ञेया शीघ्रं मेवमहोदयः॥१३६ ॥ ऐंद्री च जलदा विद्यदायी ज लनाशिनी. याम्यां चाल्पजला प्रोक्ता वातकृदायवी तथा ॥ १३७॥ प्रभूतजलदा ज्ञेया वारुणी सस्यसंपदे । नीतिनिर्मला प्रोक्ता कोबेरी क्षिप्रवर्षिणी॥१३॥ ऐशानी लोकशुभदा विद्यु दाइति स्मृताः । यत्र, देशे मुभिक्षं स्याद्विात्तत्रैव गच्छति।।१३९॥दिक्षुभूता स्थितिगुप्ता मेघा नां मार्गदर्शनी । विद्युद्रीना न गर्जेति नवर्षन्ति जलं विना ॥१४०॥ "अर्थः-मार्गशीर्षकी चौथ पचमीको वादल होतो जंगले वप पूर्णपी हो ॥ १२६ ॥ मार्ग शोपसप्तमीको दिनरात निर्मल हो तो वैशाखमें मेरछाये रहें घान्यभाव तेज हो। १२७ ।। मागमहादशी वा अमावसके दिन वर्षे तो अगला वर्ष शुभ हो ॥ १२४ ॥ पापकृष्ण दशमी के दिन रानीको वादल' तो मादोंमें बड़ी वपी हो ॥१२९ । पौपमें विजलीका चमत्कार हो और बादल गजें तो अवश्य मेधका गर्भ रह जानना ॥ १३०॥ पोप उठके दिन मेध वर्षे तो भाद्रणमें मेधे व पोपशुममें वर्षे तो श्रावणम वर्षा हो ॥१३२॥ पोपशक्ल सप्तमी आदि तीन तिथिम विजली गजें तो सुखके निमित्त मेध य ॥ १३२ ॥ एकादशी उठ पूर्णिमा अ- मावस के दिन पीपम वर्षा न हो तो आपाटमें अच्छी वर्षा हो. ॥१३३ ॥ पोपशुमचर्देशीको विजलीका देखना अच्छा है ऐसा होनेसे श्रीपादकृष्णमें मेघकी प्राप्ति हो ॥ १३४॥ आकाश में वादल मूर्यको छिपाकर गर्ने चिजली चमकै तो मेघका उदय होगा ॥ १३५॥ उत्तरदिशा में संवणारंगकी विजली चार्क तो वह जलदायक है शीव मेधउदय होगा ।। १३६। ऐन्द्री पूर्वमा चमक तो जलदायक है बामेये दिशामें चमकें तो जलको नाश करें दक्षिणमें चमके तोपोडा जल यर्षे वायव्य दिशाको चमकै तो पवन घरे॥१३७॥पश्चिमम चमके तो बहुत जल व धनसम्मति हो नैऋत्यदिशामे चमके तो निर्मल आकाश हो कुबेरकी दिशा उत्तर में च- मके तो शघि जल व॥१३८ ईशान दिशाको लोपसुखदायक ह जिस देशोंम सुभिक्ष हो वि जली वहाही जाती है । १३९ ॥ यह दिशाभीमें स्थित हो मेघाँको मार्ग दिखाती हैं बादल बिजली के बिना नहीं गर्जते और जलके विना नहीं वर्षते ॥१४॥ अतिवातवनिर्वातअति उष्णमनुणता। अल्पभ्रं चनिरनं च षडेते वृष्टि लक्षणा १४१ । अश्वप्लुतं नीरदगर्जितं च वीणांचरित्रं भवितव्यता अवर्षणं चाप्यतिवर्षणं च देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ॥१४२n पोपमा श्वेतपक्षे ऋक्ष शतभिपग् यदा वाताभ्रविद्युत्पॅचम्यां गर्मशेवं प्रजायते ॥१४३॥ सचीपाढे कृष्णपंक्षे चतुयॊ वर्पति ध्रुवम् द्रोणसंज्ञ स्तत्रमेघः सप्तरात्र प्रवर्षति ॥ १४४ ॥ सप्तम्यादित्रये पोपे शुक्लपोष्णदि ७९ - भाषाटीकासहित । नत्रयम् । विद्युचुपारवालाभूः हिमेमसमुद्भवः ॥१४५॥ एकादशीपो । पशुक्ले सहिमाविधुता'युता। सजला रोहिणी योगाच्छुमादेश्या विर्च क्षणैः ॥ १४६ ॥ पोर्णमासी द्वितीया च विधता वा हिमान्विता वर्षा निष्पत्तिरादेश्या मेधैश्छन्नैस्तथाम्बरे ॥ १४७ ॥ आपाढस्य त्वमावास्या प्रबलं जलमादिशेतानिष्पत्तिः सर्वधान्यांना प्रजानां निरुपदव॥१४॥ पूर्णमास्यां यदा पोपे चन्द्रमा नैव दृश्यते । उत्तरस्यां दक्षिणस्यायदा विद्युत्प्रदर्शनम् ॥१४९ ॥ अभ्रच्छन्न नभो वापि महाठिंतदा दिशेत। अमावास्यां श्रावणस्य नूनं भाविनि वत्सरे-॥-१५०॥ पोपस्य कृष्णसप्त म्यां स्वातियोगे जलं यदा । सुभिक्षं क्षेममारोग्यं जायते नात्र संशयः ॥ १५१-॥ अभ्रच्छन्नेजलं स्वल्पं.जलपाते महाजलम् । त्रयोदशीत्रये-कृ ष्णे पोपे विद्युचगर्भदा ॥ १५२ ॥ ऐन्द्रीविद्युदमावस्यां दर्शनं वा. हिम स्य चेत् । अभ्रच्छन्नं नभो वापि सुभिक्षं जायते तदा ॥१४३॥ सप्त- ग्यादित्रये माघे शुक्रे वादलयोगतः। धनधान्यसमृद्धिः स्याँद्धिवांहा द्युत्सवो जने ॥१५४॥ अर्थः पवनका अधिक चलना नहीं चलना प्रतिगरमी तथा अनुप्णता थोडे. मे अयवा मेघौंका अधिक होना यह छः वर्षाके लक्षण हैं ॥ १४१ ॥ घोडेका कूदना और मेघका गर्ज- नास्त्रियोंके चरित्र होनहार वपाका होना न होना यह देवी नहीं जानता मनुष्य तो क्या हैन। १४२ ॥ पोपशुक्लपक्षमे जो शतभिषा नक्षेत्र पंचमीके दिन हो और उस दिन पर बादले विजली चमक तो गर्भ (वी) के निमिच है ॥ १४३ ॥ वह गर्भ आपाढकृष्णपक्षको चतुर्थी के दिन अवश्य उस समयःसात दिनतक द्रोणसंज्ञावाला मेघ वर्षगा १४४ ॥ 'पोपशुक्ल सप्तमी आदि तीन दिन खेती आदि तीन नक्षत्रोंमे विजली पार और पंवन ही ती सरदीभी हो तो वर्षाके निमित्त गर्भ रहै.॥ १४५ ॥ पौषशुक्ल एकादेशी हिम और विजलीसे -युक्त हो रोहिणीका योंग और कुछ वर्षा हो तो अच्छा है ।।१४६॥ पौर्णमासी और दो- यके दिन जल वर्षे वा पाला पडै वा आकाश मेघौसे आच्छादित रहे तो वर्षा हो १४७ -आषाढको अमावसको महा वृष्टि हो सर्व धान्यकी उत्पचि और प्रजा उपद्रव रहिनहीं T१४८ ॥ पूपकी पूर्णिमाको मेघोंसे चन्द्रमा न दीखै और उत्तरदक्षिणमें विजेली चमकेगा -॥ १४९ ॥ वा आकाश मेघाउन रहे तो महावी हो वह वर्षाप्रावणको अमावासको होगी ॥ १५० ॥ पोपकृष्णासप्तमीको स्वातिनक्षत्रके दिन जल व तो सुमित क्षेमामारोग्यहो। -१५१ ॥ मेघ छाये रहैं तो योडा जल वर्षे जल वर्षे तो महावर्षा और पोपंकृष्ण त्रयोदशी आदितीम तिथिमे विजली चमके सौ गर्मके निमित्त है ॥ १५२॥ अमावसको बिजली पूर्व पवन ८. । वर्षप्रबोध- चमके और बर्फ पडे वा.आकाश मेघाच्छन्न रहे तो मुभिक्ष हो ॥१५३ ॥ माघशुक्ल सप्तमी आदि तीन तिथिमें शुक्रके दिन मेघ हो तौधनधान्यकी वृद्धि प्रजामें विवाह उत्सव हौं।१५४॥ माय नवम्यांशुक्ले परिवपः शशिनि दृश्यतेऽवश्यम् । आपाढे वर्षति तदा मेघमहोदयो भवति ॥ १५५॥ मावे दशम्यां हि शुभाय वर्षा तद्वन्नंव म्यां यदिचेदवर्षा । हर्षाय तातिशयो न कश्चिद्वांगमे मेवमहोदयेनं ॥९५६माघमासे चतुर्दश्यां प्रहरे यत्र वादलम् । वर्षाकाले तत्र मासे ने वर्षति पयोधरः॥१५॥महासुभिक्षमादेश्यं राजानोनिरुपद्रवाः। सप्तमी निर्मला नेष्टा श्रेष्ठावृष्टिबलान्ननु ॥१५८॥ माघस्य शुक्लसप्तम्यांयदानं जायतेभितः। तदा वृष्टिर्घना लोके भविष्यति न संशयः ॥१५९॥ मावे च कृष्णसप्तम्यां स्वातियोगेभ्रगर्जितम् । हिमपाते च संजाते सर्वधान्य प्रजासुखम् ॥ १६० ।। तथैव फाल्गुने चैत्रे वैशाखे स्वातियोगजम् । वि धुदभ्रादिकं श्रेष्ठमापाटेपि सुमिक्षकृत् ॥१६॥ स्वातौ निशांशे प्रथमेभि वृष्टे सस्यानि सर्वाण्युपयान्ति वृद्धिम् । भागे द्वितीये तिलमुद्गमाषा में मं तृतीयेस्ति न शारदानि ॥१६२ ।। वृष्टेन्हिमागे प्रयमे सुवृष्टिस्तह ट्वितीये तुषकीटसर्पाः । वृष्टिस्तु मध्या परभागवृष्टेनिश्छिद्रवृष्टिर्युनिशं प्र विष्ठे ॥१६३॥ समुत्तरेण ताराचित्रायाः कीर्त्यतेहपां वत्सः। तस्या सन्ने चन्द्रे स्वातियोगः शिवो भवति ॥१६४॥माघे कृष्णनवम्यां च मूल क्षदिनेथवा विद्युन्मेघधनुर्योगे चाभ्रेनभसि संवृते॥१६५॥ए तस्माद् तो वृष्टि विवर्षे भिजायतोआषाढे वा भाद्रपदे दशमीदिवसे शुभा ॥१६६॥ अर्थ:-माघशुक्लनवमीके दिन जो चन्द्रमाका परिवेप मंडल हो तो आषाढमें मेघ वर्षे ।। ॥१५५॥ माघकी नौमी दशमीके दिन वर्षा हो तो शुभ हो प्रसन्नता और मेघकी महामाप्ति हो॥१५६॥ माघमासकी चोदशके प्रथमपहरमें वादल हो तो वर्षाकालमें उसी तिथिको वर्षा हो ॥१५७ ॥ अत्यन्त सुभिक्ष और राजा उपद्रवरहित हों सप्तमीका निर्मल होना अ- घा नहीं वर्षना भच्छा है ।। १५८ ॥ माघशुक्लसप्तमीको जो वर्षा हो तो अवश्य वर्षा हो । ॥१५९ । माघकृष्ण सप्तमीको स्वातियोगमें जो वादल गर्ने बर्फ गिरै तो सब प्रजाको सु- सहो॥१६०॥ इसीप्रकार फाल्गुन चैत्र वैशाखमें स्वाति योगमें विजली वादलका होना अच्छा है आपाढमें सुभिक्षकारक है ॥ १६१ ॥ जिस रात्रिको चंद्रमा स्वातिसे मिले उसरा- त्रिके तीन भाग करके फल देखें पहले भागकी वर्षासे सेतीकी वृद्धि दूसरेमे वर्षा हो तो तित मूंग,उडदकी वृद्धि तीसरेमें वर्षा हो तो ग्रीष्मऋतुके गन्न जो(यव)गेहूं आदि हों और शरद तुका मन वार बाजरा आदि न हो ॥१६२ ॥ और दिनके पहले मागमें वर्षा होय तो आगे १८१ AN भापाटीकासहित । वर्षा श्रेष्ठ हो परन्तु कीडे सपासहित हो तीसरेमें वर्षा हो तो आगे मध्यम वर्मा जाननी और जो दिनरात वर्षे तो आगे उपद्रवरहित वर्षा जाननी ॥ १६३ ॥ चित्रानक्षत्रके समसूत्र ठीक उत्तरमें अपांवत्स नामक एक ताराह चद्रमा उस तारेके समीप स्थित हो तो स्वातिसे चंद्रमाका योग शुभ होताहे ॥ १६४॥ माघकृष्णा नवमीके दिन मूल नक्षत्रके दिन विजली चमके मेघ वर्षे वा आकाश मेघौसे आच्छादित हो तो ॥ १६५ ॥ इस गर्भसे अगले वर्षमें अच्छी वर्षा आपाढ वा भादों मासकी दशमीके दिन अवश्य होगी ॥ ६६ माघमासे च सप्तम्यां कृष्णे त्रयोदशीद्धये। पूर्वस्यामुन्नते मेघे वादलेः सं . कुलेपि खे ॥१६७॥ बहुदककरा वृष्टिरापाढेसप्तरात्रकी । अमावस्याम भ्रंयोगाभाद्रे वै पूर्णिमादिने ॥१६८॥ न वृष्टिर्नगर्जाखो वादलेषु च तुझं च गोधूमका दुर्लभास्युः। तदा पंचमी वृष्टिहीनापि साम्रा तदा भाद्रमासे महान्वृष्टियोगः ॥ १६९॥ कार्पासस्य महर्घता भुविभवेत्प टी यंदा निर्मला सप्तम्यामपि चन्द्रनिर्मलतया राज्ञां महाविग्रहः । अं ऐम्यां यदि भास्करस्समुदितः प्रातःपरं निर्मले रौद्रे वृष्टिनिरोधकृन्नभास च प्रायोल्पवर्षाकरः॥१७० ॥ सप्तम्यादित्रये कृष्णे फाल्गुने घनगर्जि तम् । संग्रामाद्यप्रतिग्रामं धान्यानां च समर्पता ॥ १७१ ।। फाल्गुनेमा सि वर्षा वैजायते चाष्टमी दिने । तदा सुभिक्षमादेश्यं देशे क्षेमं सुखं बहु ।। १७२ ॥ सप्तम्यादित्रये साभ्रे गर्ने कुशलनिश्चयः। अमावस्यां भा द्रपदे जलं सुलभमन्दतः ॥ १७३ ॥ फाल्गुने शुक्लसप्तम्यां,पोर्णमा ष्यां तथा दिने । निर्वातं गगनं मेघा विजला विद्युदन्विता ॥ १७४॥ भविष्यद्वत्सरे तत्र सुभिक्षं क्षेममादिशेत् । भादसौ कृष्णसप्तम्यां दर्श गर्भः 'फलं जलम् ॥ १७॥ समये चेडुताशन्या ज्वलनस्यास्ति वाद, लम् । गोधूमकुंकुमापातान्महर्वं प्रोच्यते तदा ॥१७६॥ दशम्यैकादशी शुक्ले फाल्गुनेम्रादिगर्भयुक् । तदा चतुर्थपंचम्यामाश्विने वृष्टिदायनी१७७ इति श्रीमेघहोदयसाधने श्रीमेघविजयगणिविरचिते अभ्रविद्युदादिकथने सप्तमोधिकारः ॥७॥ अर्थ:-माघकृष्ण सप्तमी त्रयोदशीके दिन पूर्वसें मेघउदय हो और आकाशमे वादल छाये रहैं ॥ १६७ ॥ तो आपाढमें सात दिनतक बहुत वर्षा हो और अमावास्याके दिन और भादौकी पूर्णिमाके दिन मेघ वर्षे जो माघमें वादल छाये हैं ॥ १६८ ॥ जो चौथ के दिन वर्षा .

" वर्षप्रबोध । रहैं तो भादोंमें अधिक वर्षा न हो ॥ १६९॥ जो छठा निर्मल हो तो कपास अफरी विक स. प्तमीको चन्द्रमा निर्मल हो तो राजौ महाविग्रह हो जो अष्टमीके दिन सूर्य निर्मल निकई तो यह वर्षाका निरोध करे अर्थात थोड़ी वर्षा हो ॥ १७२ ॥ फाल्गुनकी सप्तमी आदि तीन दिनमें घन गर्जे तो गामगाममें युद्ध धान्यभाव सस्ता हो ॥ १७१ ॥ जो फाल्गुनकी अष्टमीके दिन बी हो तो देशमें सुभिक्ष और सुख कल्याण हो ॥ १७२' जो सप्तमी आदि तीन दिन वादल हैं तो यह गर्भके और आनंदके कर्ता हैं ऐसा होनेसे भादौंकी अमावसको अ. धिक जल वर्षे ।। १७३ ॥ फाल्गुन शुक्ल सप्तमी और पूर्णमासीकै दिन पवनरहित उज्वल विजलीरहित आकाश हो॥१७४ ॥ तो अगले वर्ष सुभिक्ष और मंगल हो यह गर्भ भादों शुदी सप्तमो और अमावसको वै ॥ १७५ ॥ होली जलनेके समय यदि वादल हो तो.गो. धूमा(गेहूं ) और कुमकुम पत्र अकरे हो ॥ १७६॥ फाल्गुनको दशमी एकादशीको वाद- ल हो तो गर्भके निमित्त है इस्से आश्चिनकी चतुर्थी पंचमीकै दिन वर्षा होती है ॥ १७७॥ इति श्रीवर्पप्रबोधे भाषाटीकायां सप्तमोधिकारः ॥७॥ मार्गशिरः सितपक्षे प्रतिपत्प्रभृतिक्षपाकरेपाट्याम् । पूर्वी वा समुपगते गर्भाणां लक्षणं ज्ञेयं ॥ १ ॥ यन्नक्षत्रमुपगते गर्भश्चन्द्रे भवेत्सचन्द्रवशा त्। पञ्चनवते दिनशते तत्रैव प्रसवमायाति ॥ २॥ सितपक्षभवाकृष्ण शुक्के कृष्णाद्यसंभवारात्रो। नक्तं प्रभवाश्चाहनि संव्याजाताश्च संध्या यां॥३॥ कांधूमरिकापातो रजोवृष्टिः सधूमिका । त्रिभिरेतैर्महों, पातेः सद्यो गर्भो विनश्यति ॥ ४ ॥ मृगशीपोद्योग मन्दफलापौषशु. कुजाताश्च । पोषस्य कृष्णपक्षण निदर्शच्छावणस्यसितम् ॥ ५॥ माघ- .: सितोत्या गर्भाः श्रावणकृष्ण प्रसृतिमायान्ति । माघस्य कृष्णपक्षेण वि निर्दिशेद्भाद्रपदशुक्लम् ॥ ६ ॥ फाल्गुनशुक्समुत्थाः भाद्रपदस्यासिते. विनिर्देश्याः । तस्यैव कृष्णपक्षोद्भवास्तु ये तेश्वयुकशुक्ले ॥ ७॥ चैत्र- सितपक्षजाता कृष्णेश्वयुजश्च वारिंदागर्भाः चैत्रासितसंभूताः कार्ति के शुक्लेभिवन्ति ॥४॥ पूर्वस्या यदि संध्यायां मेघराच्छादित नमः। पर्वताः कृत्रिमः कैश्चिकैश्चित्कुंजरमूर्तिभिः ॥९॥ नानाकृतिधरैश्चे व मातंगधवलेधनः। पंचरात्रात्सप्तरांत्रात्संघोष्टिनिगद्यते ॥ १०॥उ तरस्यां च संध्यायां गिरिमालेव विस्तृतः । मेघस्तृतीयंदिवसे वृष्टया तु टिकरो नृणां ॥ ११॥ पश्चिमायान्तु संध्यायः घनाः स्युः पर्वता इव । श्यामाप्रेस्तंगते. भानो सद्यो वाभिलक्षणं ॥१२॥ दक्षिणस्यां यदाः मेवाः: संकोटीनारसंभवाः । त्रिपंचसप्तरात्रान्तः किंचिदृष्टिविधायकाः + भापाटीकासहिन । ८३ ॥ १३ ॥ आग्नेय्यां बहुतापाय मेघास्वल्पजलप्रदाः । नैऋत्यामीतिसंता परोगवर्षाकरीस्मृता ॥ १४॥ अर्थः मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदाके उपरान्त जब चन्द्रमा पूर्वापाढा नक्षत्रपर स्थित हो उसी समयसै गर्भके लक्षण जानने उचित हैं ॥ १॥ चन्द्रमाके जिस नक्षत्रपर स्थित होनेसेः गर्भ हो फिर एकसौपिचानवें दिन अर्थात् सावनमानसे पिचान दिन अर्थात् सावनमानसे साढे छ: महीने बीतनेपर जब उसी नक्षत्रपर चन्द्र आवै तौ प्रसव होताहै ॥ २ ॥ शुक्लपक्षके हुए गर्भ साढेछः महीनेके उपरान्त प्रसव होतेहैं इसीप्रकार कृष्णपक्षके शुक्लपक्षमें प्रवर्पण करतेहैं दिनके गर्भरात्रिमें और रात्रिके दिनमें प्रसव होतेहैं प्रातःसंध्याके मायसध्याम और सायसं- ध्याके प्रातःसंध्यामें प्रसव होतेहैं ॥३॥ कहीं धूम्रापात धूमसहित रज (धूरिकी वर्षा होनी) इन तीन महोत्पातोसे शीघ्र गर्भ नष्ट हो जातेहैं ॥ ४ ॥ मार्गशीर्षके कृष्णपक्षके हुए गर्भ और पीपशुक्लके गर्भ मन्दफल देनेवाले होतेहैं इस लक्षणमें चैनशुक्लादिमहीना गिनना उचित है जैसे चैत्र शुक्ल और वैशाखकृष्ण मिलकर चैत्र हुआ इसी भांति और भी जानना, पोप- कृष्णपक्षके गर्भ श्रावणशुक्लमें वर्पते हैं ॥ ५॥ माघशुक्लके गर्भ श्रावणकृष्णमें और माघक- प्णके भाद्रपदशुक्लमें प्रमव होतेहैं ॥ ६॥ फाल्गुन शक्लके भाद्रपदकृष्णमें फाल्गुनकृष्णके आश्विन शुक्लभे वर्पते हैं ॥ ७ ॥ चैत्र शुक्लके गर्भ आश्विन कृष्णमें वपते है और चैत्र कृष्णक कार्तिक शुक्लमें वपते हैं ॥ ८॥ जो संध्यासमय पूर्वमें आकाश मेघाच्छादित हो और वे - मेघ पर्वत तथा हाथीकी समान हौं ॥ ९ ॥ और अनेकप्रकारके श्वेत हस्तीकी समान दीसै तो पाच तथा सात रातम अवश्य वर्षा हो ॥ १० ॥ सध्यासमय उत्तरमें पर्वत पंक्तिकी स- मान विस्तृत मेघ हों तो तीन दिनमें अच्छी वर्षा हो ॥ ११ ॥ सध्यासमय पश्चिममें मेघ - पूर्वनको समान हो श्याम रंग हो तो सूर्यास्तमें वर्षा हो ॥ १२॥ जो सभ्याको दक्षिण में मेघ हौं तो तीन, पांच वा सातरात्रिमें कुछ वर्षा हो ॥ १३ ॥ आग्नेयदिशामें होनेसे ताप और . थोड़ी वर्षा हो नैऋत्यमे,हो तो ईति सताप और वर्षा रोगदायक हो ॥ १४॥ वातवृष्टिकराः सद्यो वायव्यामुन्नता घनाः। ऐशान्यामशनिव्यक्ताः मेघाः सुखकरा जलात् ॥ १५ ॥ चतुर्थी पंचमी षष्ठी अमावास्या च स प्तमी । आषाढकृष्णतिथयः सद्यो मेवाय लक्षणः ॥१६॥ मार्गशीर्षे क प्णपक्षे मघायां गर्भसंभवे । यद्वा कृष्णचतुर्दश्यां सविद्युन्मेघदर्शने ॥ ॥१७॥ आपाढे शुक्लपक्षे च चतुर्थी वर्षति ध्रुवं । मार्गकृष्णचतुर्थ्या दित्रयेश्लेपात्रयी क्रमात् ॥१८॥ गर्भितेष्वेषु ऋक्षेषु मार्गे कृष्णफल भ वेत् । आपाढे पूर्वफाल्गुन्यां त्रिरात्रं वृष्टिसंभवः ॥१९॥ उत्तराहस्तचि त्रा च सप्तम्यादित्रये यदा । मार्गशीर्षे गर्मिता चेदभ्रतिश्च विद्युतः॥ ॥२०॥ आपाढेश्वेतपक्षे तु अष्टम्यां स्वातिभे तदा । त्रिरात्रं मेश्या ॥ M ८४ . चर्पप्रबोध। स्याजलेरेकार्णवा मही,॥ २१॥ दशम्यादिवये मार्गे कृष्णे चामावसी तिथौ । चित्रास्वातिविशाखासु संजाते गर्भलक्षणे ॥ २२॥ आपाढे शु - क्लपक्षान्तस्तिथौ तस्यां धनोदयः। तस्मिन्नेवच नक्षत्रे जायते नात्रसंश यः॥२३॥ सप्तमी दशमी चैकादशी श्रावणकृष्णगा। मेघचिड्रेन से ध्यायां त्रिरात्रा वृष्टिकारिणी॥ २४ ॥ अमावस्यां श्रावणस्य चित्रादि नेथवा सिते । सद्य उत्पद्यते गर्भः सुदिने दुर्दिनादिना ॥ २५॥ पूर्व स्यां वादलं धूम्र सूर्यास्ते याति कृष्णता । उत्तरस्यां मेघमाला प्रभात विमलादिशः॥ २६ ॥ मध्यकाले जनस्ताप ईदृशं मेघलक्षणं । अर्द्धरा त्रे गते दृष्टिः प्रजातोपाय जायते ॥२७॥ भाद्रशुक्ल चतुर्थेन्हि पंचमेस प्तमे ऽष्टमे । पूर्णिमायांचगर्भेण सद्योमेघमहोदयः॥२८॥ पंचभिः सप्तमि वास्यादिनरेकार्णवा मही।चतुर्थ्यामपि पंचम्यामाश्विनेशीनगर्भता २८ अर्या-वायव्यदिशाके वादल शीघ्र चर्पते हैं ईशान दिशाके जगतको सुख देते हैं ॥ १५॥ घोंथ पचमी छठ अमावस सप्तमी पापाढकृष्णको यह तिथि शीघ्र मेघ वर्षाती हैं।॥ १६ ॥ मार्गशीर्ष कृष्णपक्षमें मघामें गर्भकी प्राप्ति हो अथवा कृष्ण चतुर्दशीको मेघ बिजलीहो॥१७॥ वह आपाढशुक्लपक्षकी चौयको अवश्य व मार्गकृष्णचतुर्थी आदि तीन तिथि और आश्ले- पादि तीन नक्षत्र ॥ १८ ॥ इनमें गर्भको प्राप्ति होनेसे आपाहमें पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में तीन दिन वो हो ॥ १९ ॥ उत्तरा हस्त चित्रा और सप्तमी आदि तीन नक्षत्र जो मार्गशीर्षम में- मित हो तो मेघ और बिजली चमक ॥ २० ॥ तो आपाढशुक्ल अष्टमी स्वाति नक्षत्र में तीन- रात महावृष्टि हो ॥ २१ ॥ मार्गशीपरप्पा दशमी आदि तीन तिथि और अमावसको चित्रा स्वाति विशाखामें गर्भ रहै ॥ २२ ॥ तो आपाढीपूर्णिमाको मेघ वर्षे और उसी नक्षत्रमें वर्षा हो ॥ २३ ॥ श्रावणकृष्णको दशमी सप्तमी एकादशीको संध्याको मेघ हो तौं तीन रातमें वा हो ॥ २४ ॥ श्रावणकी अमावस वा चित्रा नक्षत्रके दिन शुक्लपक्षमें मेघ हो या न हो गर्भ उत्पन्न होताहै ॥ २५ ॥ यदि पूर्वमें धूमला वादल सूर्यास्तमें श्याम होजाय और उत्तरमें मेघ हो दिशा प्रातःकाल निवल्होजाय ॥२६॥ मध्यान्हमें महागर्मी हो ऐसा रक्षण होनेस आधीरातमें अच्छी वर्षा हो ।। २७ । भादौके शुरूपक्षमें चौथे पाचवें सातवें आठवें दिन वा पूर्णिमाको गर्म हो तो शीघ मेघ वर्षे ॥ २८ ॥ अर्थात् पाच सात दिनमेंही पृथ्वी जलसै पूर्ण हो जाय चतुर्थी पचमीको अश्विनमें शीघ्र गर्भता हो ॥२९॥ दक्षिणः प्रबलो वातः सकृदेव प्रजायते। वारुणेश्चैव नक्षत्रैः शीघ्रं वर्ष, ति माधवः॥३०॥ धूनिताः स्युर्दिशः सर्वा पूर्ववाते वहत्यपि । चतु •मान्तरे मेघः सरांसि परिपूरयेत् ॥ ३१॥ उदयशिखरिसंस्थो दुर्नि .

भापाटीकासहित । · रोक्योतिदीप्त्या द्वर्तकनकनिकाशः स्निग्धवैदूर्यकान्तिः । तदहनि कुरुते. म्मस्तोयंकाले विवस्वान्प्रातिपदि यदि वोचः खंगतोतीव तीक्ष्णम् ॥ ॥३२॥ गर्भोपंवातलिंगान्युल्काशनिपातदिग्दाहाः। क्षितिकम्पखए, रकीलककेतुग्रहयुद्धनिर्घाताः ॥३३ ।। रुधिरावृष्टिवैकृतपरिघेन्द्रधनूंपि.. दर्शनं राहोः । इत्युत्पातैरेमिस्त्रिविधैश्चान्यैर्हतोगर्भः॥ ३४ ॥स्वर्तुःस्व भावजनितैः सामान्यैश्चलक्षणैर्वृद्धिः। गर्भाणां विपरीतैस्तैरेव विपर्य यो भवति ॥ ३५ ॥ भाद्रपदाद्वयविश्वाम्बुदैवपैतामहेष्वथर्वेषु । सर्वे तुषु विवृद्धो गर्भो बहुतोयदोभवति ॥३६ ॥ शतभिषग्श्लेपार्दास्वातिमं घासंयुतः शुभो गर्भः । पुष्णाति बहून् दिवसान हन्त्युत्पातैर्हतेत्रिवि धैना ३.७ ॥ मृगमासादिष्वष्टौ षट्शोडशविंशतिश्चतुर्युक्ता। विंशति रथदिवसत्रयमेकतमःण पंचम्यः॥ ३८॥ क्रूरग्रहसंयुक्ते कर्काशनिम त्स्यवर्षदागर्भाः। शशिनि रवौ वा शुभसंयुते क्षिते भूरिदृष्टिकराः॥ ॥३९॥ गर्भसमयेतिवृष्टिर्गर्भाभावाय निमित्तकृता। द्रोणाष्टांशाभ्यधि के वृष्टेगर्भः सुतो भवति ॥४०॥ जो दक्षिणकी प्रबल पवन चले और पश्चिमकी साथही चले तो शीघ्र वर्षे ॥ ३० ॥ जो पूर्वपतन चले और सब दिशा धूम्रवर्ण,हों तो चारपहरके अन्तर मेघ-वर्षे ॥ ३१ ॥जो उदयके समय सूर्य अति प्रचण्ड हो गलाये हुए सुवर्णके समान अथवा उज्वल वैदूर्य मणिके समान होय जिस दिन वर्षाकालमें ऐसा सूर्य हो उसी दिन वर्षा करताहे अथवा जिस दिन मध्यं आकाशमें प्राप्त होकर अति तीक्षण हो तोभी वर्षा करै ॥ ३२ ॥ अब गर्भनाशके चिन्ह कहते हैं जो गर्भकेसमय : उल्कापात पांशुवर्षा दिग्दाह भूकम्प.गन्धर्वनगर नि- चीतशब्द ॥१३३ ॥ रुधिरआदिकी विकृत वर्षा उदयके समय तिरछी मेवरेखाका सूर्यके ऊ- पर-होना-इन्द्रधनुपका दर्शन ग्रहण इत्यादि औरभी भूमि दिव्य अन्तरिक्ष ,तीन प्रकारके उत्पात, होनेसे गर्भ नष्ट हो जाताहै वह मेघ नहीं वर्पते ॥ ३४ ॥ अपनेऋतुस्वभावसे उन त्पन्न हुए गर्भलक्षण (पोपेसमार्गशीर्षे) इत्यादि हैं और, सामान्य लक्षण (हादिमृदक) इत्यादि इनसे गोंकि वृद्धि होतीहै. यही लक्षण विपरीत होनेसे गर्भ में हानि होती ॥३५॥ पूर्वाभाद्रपद उत्तराभाद्रपद पूर्वापाढा उत्तरापाटा रोहिणी इन नक्षत्रोंमें सब ऋतु- ऑसे.धृतिको प्राप्त हुआ गर्भ वर्पता है ॥ ३६ ॥ शतभिषा आश्लेषा आर्द्रा स्वानि मया न नक्षत्रों में गर्भ होय तो शुभ है अच्छे निमित्तोंसे पुष्ट और उपरोक तीन उत्पानोंसे नष्ट हो जाता है ॥३७॥ मार्गशीर्षमें पृद्धिको प्राप्त हुमा गर्भ सादेशः महीने, उपरान्त पाठ दिन वर्पता है पृषका छः दिन माधका सोला दिन फाल्गुनका चौविस वैशासका तीन दिन इसी .

h- चर्पप्रबोध। प्रकार शतभिपादि पाच नक्षत्रोंमे गर्भको वृद्धिसै वर्णनेके दिनोवीसख्या जानो ॥३८यदि गर्भका नक्षत्र रग्रहयुक्त होय तो वाके समय ओले पड़ें विजली गिरे जलके साथ मत्स्य व और जो उस नक्षत्रपर चन्द्रमा सूर्य हो तथा शुभ ग्रहोंसे युक्त हो तो अधिक वर्षा करें ॥३९॥ गर्भके समय विनाकारण अति वृष्टि हो तो गर्भका नाश हो जाता है पचीस पलसे अधिक वर्षा होय तो गर्भस्राव होजाता है ॥ ४०॥ गर्भः पुष्टः प्रसवे ग्रहोपघातादिभिर्यदि न वृष्टः। आत्मीयगर्भसमये का रंकामिश्रं ददात्यंभः ॥४१॥ काठिन्यं याति यथाचिरकालतं पयः प्रयस्विन्याः।कालातीन तद्वत्सलिलं काठिन्यमुपयाति॥४२॥पंचनि मित्तैः । शत योजनतदार्चमेकहान्यतः। वर्षति पंचसमन्ताद्रूपेणकेन यो गर्भः॥४३॥ द्रोणः पंचनिमित्ते गर्भ त्रीण्याढकानि पवनेन । षड विद्युता नवाः स्तनितेन द्वादशप्रसवे ॥४४॥रात्रौ तारागलकारः प्रातश्चात्यरुणो रविः । अवृष्टौ शकचापश्च सद्यो वृष्टिस्तदाभवेत्॥४५॥ धूनिता निविडा शैलाश्चर्मादिपु तथार्द्रता । प्रभाते पश्चिमायां चेदिन्द्र चापः प्रदृश्यते ॥ ४६॥ वारुणेश्चैव नक्षत्रेः शीघ्र वर्षति माधवः । गोम ये उत्कराः कीटाः परितापेतिदारुणः॥४७॥ चातकानां खो वृष्टिः सद्यो वै सूचयेजने । सूर्योदये श्रावणमासि गर्जेद्भमन्तिनीरोपरिवापि मत्स्याः। धनस्तदाष्टादशयाममध्ये करोतिभूमि सलिलेनपूर्णाम॥४८॥ शुककपोतविलोचनसन्निभो मधुनिभश्च यदा हिमदीधितिः। प्रतिश शी च यदा दिवि राजते पतति वारि तदान चिरादिवः॥४९॥ स्तनित निशि विद्युतो दिवा रुधिरनिभा यदि दंडवत् स्थिताः । पव नःपुरतश्च शीतलो यदि सलिलास्यस्तदागमोभवेत् ॥५०॥ अर्थ-गर्भके समय जो गर्भ पुष्ट होय और प्रसवके समय मगगदि ग्रहके रोहिणी श्रव- णादि नक्षत्रपर रहनेसे अथवा और किसी उत्पातसे न पे बह दूसरे गर्भग्रहणके समय ओ. लोसहित जल वर्पता है ॥ ४१ ॥ जैसे गौका दूध बहुतकाल रहनेसे कठिण हो जाता इसीप्रकार जलभी वर्पनके समय न वर्पनेसे कठिन होकर ओले हो जाते है ॥ ४२ ॥ पवन जल बिजली गर्जन मेघ यह पाच निमित्त हैं गर्भके समय यह पाचौ हो तो वर्षके समय वह मेघ सो योजनता वर्पताह चार निमित्तसे पचास तीनसे पचीस दोसे साडे बारह एकनि मित्तसे पाच योजनतक वर्पताहे ॥ ४३ ॥ पाचनिमित्त गर्भमे हों तो एकद्रोण (२०० पल) जल वर्षता है और प्रसवसमय पवन होय तो तीन आडक (१५० पल )वर्पता है गर्भके 1३ तोले २ मासेरची ८७ भापाटीयासहित । समय विजली होय तो छः बाढक, मेघसयुक्त गर्भ होय तो नो आढक, और गर्भसमय मेघ गर्जे तो बारह आढक जल व पचास पलका एक आढक और चार आढकका एक द्रोण होताहै एकहाथ लम्बा एक हाथ चौडा कुण्ड बनाकर वीमें रख दे वर्षा होनेउपरान्त जल तोरकर प्रमाण जाने ।। ४४ ॥ रात्रिमें उलकापात प्रातःकाल सूर्यमें अधिक लाली विनापामें इन्द्रधनुष निकले तो शीघ्र वर्षा हो ॥ ४५ ॥ पर्वत धुमेले हों धने दीखें चमडाआदि मुलायम हो जाय प्रातःकाल पश्चिममें इन्द्रधनुप दीखें ॥४६॥वरुणदिशामें नक्षेत्र हो तो शोर वर्षा हो जो गोवरमे कीडे दारुण उत्पन्न हो ॥ ४७ ॥ और चातक शब्द कर तो शीघ वर्षा हो श्रा. वण मासमें जो सूर्योदयके समय गर्जे जलके ऊपर मछलीघूमैं तो अठारह पहरमें बहुतवी हो ।। ४८॥ चद्रमाका रग तोते और कबूतरकी आखकी समान लाल हो जाय व शहतके समा- न हो जाय वा दूसरा चद्रमा दीखै तो शीव वर्षे ॥ ४९ ॥ रातको वादल गर्जे दिनमें लालव- विजली दडकी तुल्य सीधी दोबै पूर्वदिशाकी पवन चले तो शीघ्र वी होय ॥ ५० ॥ वल्लीनां गगन तलोन्मुखाः प्रवालाः लायन्ते यदि जलपांसुभिर्विहङ्गाः। सेवन्ते यदि च सरिसृपास्तृणाग्राण्यासन्नो भवति तदा जलस्य पातः ॥५२॥ यदा भाद्रपदे मासे प्रतिपदशमी तथा । सप्तमी पूर्णिमा व नवमी च यथाक्रमं ॥५३॥ मेघा यदा न दृश्यन्ते पश्चिमां दिशि मा श्रिताःतदर्पति सततं बहुनीराः पयोधरा।५४।संध्याकाले च ये मेघाः पर्वताकारसन्निभाः । आदित्यास्तंगते तर्हिअहोरात्र प्रवर्षति ॥ ५५ ॥ इति श्रीमेघमहोदये वर्षप्रबोधे श्रीमेघविजयगणिविरचिते गर्भ कथनोनामाष्टमोधिकारः॥८॥ अर्थः-बेलोंके पत्ते आकाशकी ओर ऊचे हो जाय अथवा धूलिसे पखेरू स्नान करें सादि कोडे तृणोंके अग्रभागपर चढकर बैठे चैटी निकले विलाई नखोंसे वारवार पृथ्वी कु- रेदै तो शीघ्र वर्षा हो ॥ ५२ ॥ जो भादोंके महीने में पडवा दशमी सप्तमी पूनो नवमीको ययाम मेघ न दीखें और पश्चिमकी दिशामें न हों तो बहुत वर्षा हो ॥ ५३ ॥५४॥ जो सध्याकालमें मेघ पर्वताकार हों तो सूर्यास्तमें वे एकदिनरात वर्षे ॥ ५५ ॥ इति श्रीमेघमहोदये भापाटीकाया अष्टमोधिकार ॥ ८॥ चैत्रे सितप्रतिपदि खत्यां बहुलं जलं । वैशाखशुद्धप्रतिपद्भरण्यां तृणसं मवः ॥१॥ज्येष्ठ शुक्लप्रतिपदि मृगे वातः शुभो भवेत् । आषाढशुक्लप तिपदादितो धान्यसंभवः॥ २॥ चैत्रशुक्लप्रतिपदि वो वायुविशेषतः। | अल्पवर्षाफलं तुच्छमल्पधान्यं प्रजायते ॥ ३॥ चन्द्रे बहुजलं धान्यं तु णानां बहुलोदयः । ईतयःसप्तधा भौमे पीडादुःखपराभवः ॥ ४॥ बुधे . - ६ - + । वर्षप्रबोध। “च मध्यमे वर्ष सुमिदं तु गुरौ भृगौ। शनौ धान्यतृणरसाः जलशोषः" प्रिजातयः ॥५॥चत्रे च शुक्लपंचम्यामायोगे यथोचितः । त्रिमास्यां धान्यसंक्षेपः श्रावणे जलदोदयः ॥ ६॥ चैत्रे दशम्यां शनिना युक्ता, वारण चेन्मघा । तदाधान्यं समर्प स्याजाते मेघमहोदये॥७॥ अर्थ:-जो चैत्रशुक्लप्रतिपदाके दिन रेवती नक्षत्र हो तो वहुत वर्षा हो वैशाखशुक्लप्रतिप- दाको भरणी हो तो तृणोत्पत्ति ॥ १-॥ ज्येष्ठ शुक्लप्रतिपदाको मृगशिर हो तो शुभ पवन रहे आपादशुक्लप्रतिपदाको रवि हो तो धान्यकी प्राप्ति हो ॥२॥ जो चैत्रशुक्ल प्रतिपदा रविवा- रके दिन हो तो विशेप पवन चलै इसका फल थोड़ी वर्षा थोडेही फल थोडाही धान्य हो। ॥३॥ चंद्रवारके दिन हो तो बहुत जल धान्य हो बहुत तृण हो मंगलके दिन हो तो सात प्र- कारकी ईति पीडादुम्य और पराभव हो ॥ ४॥ बुधवारको हो तो मध्यम वर्पा गुरु शुक्रको हो तो सुभिक्ष शनिको हो तौ तृणधान्य रसकी हानि प्रजाका क्षय हो.॥५॥ चैत्रशुक्लपंचमीको भाद्री नक्षत्र हो तो तीनमास धान्य थोडे और श्रावणमें मेघका उदय हो । ६॥ जो चैत्रकी दशमी शनिवार के दिन मघा नक्षत्रयुक्त हो तो मेघ उदय होनेपर धान्यभाव सस्ता रहै R७॥ चैत्रेवै चाष्टमीमध्ये वुधोथवा भवेत्कुजः । विरूपवर्षे जानीहि नदीतीरें गृहं कुरु ॥ ८॥ चैत्रस्य शुक्लपंचम्यां रोहिण्यां यदि दृश्यते । साभ्रं नर्म स्तदा देश्यागर्भस्य परिपूर्णता ॥ ९॥ द्वितीयदिवसे प्राप्ते चैत्रे वायुश्च सर्वतः । न च मेघाः प्रदृश्यन्ते अनावृष्टिन संशयः ॥१०॥पौर्णमा स्यां यदा स्वातिर्विद्युन्मेवसमन्वितः। निर्दोषमपि पूर्वक्षेर्गर्भो गलितमा दिशेत् ॥ ११ ॥ वैशाखकृष्णपक्षस्य पंचम्यां जायते रविः। आगामिव 'संक्रान्ती तंदिने दृष्टिबाधकः ॥१२॥ वैशाखशुक्लपंचम्यां शानिनार्दी प्रसंगतः । सर्ववस्तुसम स्याद्भाद्रे मेघमहोदयः ॥ १३॥ वैशाखमासे सिंतपंचमी सा सूर्यादिवारेश्चिनुते फलानि । मंदा च वृष्टिस्त्वतिवृष्टि युद्धं वातं सुभिक्षं कलहान्ननाशं ॥ १४ ॥ वैशाखे यदिसप्तम्यां धनिष्ठा वा श्रुतिर्भवेत् । श्यामवस्तुमहर्घ स्यात्समधू धवलं तदा ।। १५ ॥ अक्ष याख्यतृतीयायां सुभिक्षायैव रोहिणी । कृतिका मध्यमं वर्ष दुर्भिक्ष मृगशीर्षतः॥ १६ ॥ वैशाखे पंचमीमाश्चेद्यं सर्वत्र जायते । कचिन्न मे घवस्यादान्यं महर्घमादिशेत् ॥ १७ ॥ वैशाखे धवलाष्टम्यों शनिवा रो भवेद्यदि । जलशोपं प्रजानाशं छत्रमंगस्तदा दिशेत् ॥१८॥रोहि णी चोत्तरातिस्रो मघा वा खेती भवेत् । नवम्यां मण्डले राधे तदाक - भाषाटीकासहित । ८९ प्टमहद्भुवि ॥ १९ ॥ वैशाखस्य चतुर्दश्यां वारो चेगुरुमार्गवो । तदानि पद्यतेधान्यं विपुलं पृथिवीतले ॥२०॥ अमावस्यां च वेशाखे रेवत्यां चसुभिक्षता। रोहिणी लोकदुःखाय मध्यमा चाश्विनी स्मृता.॥ २१.॥ अर्थ:-चत्रकी अष्टमीको मंगल अथवा बुध हो तो जल न वर्षे नदीके किनारेही घर करे ॥८॥ चैत्रशुक्लपंचमीको यदि रोहिणी हो और बादलछाये हो तो गर्भकी पूर्णता जाननी ॥ ९॥ चैत्रको द्वितीयाको वायु चले और मेघ न हो तो अनावृष्टि होगी॥१०॥ पूर्णमासीके दिन जो स्वातिनक्षत्र विजली मेघसहित हो और निर्दोपताभी हो तथापि गर्भपतित हो जाय ॥११॥ वैशाखकृष्णपंचमी रविवारको हो तो अगले वर्ष संक्रान्तिको उस दिन वो न हो ॥ १२ ॥ वैशाखशुरूपंचमीको शनिके दिन आ हो तो सब वस्तु सस्ती ओर भादोंमें मेघ- का उदय जानना।शावेशासमासको शुक्लपक्षकी पंचमी सूर्यादिवारके दिन होय तो उसका क्रमसे मंदवी अतिव युद्ध वात सुभिक्ष कलह अन्ननाश यह फल होताहै ॥ १४ ॥ वैशा- खसप्तमीको धनिष्टा या श्रवण होतो काली वस्तु अकरी ओर सफेद सस्ती हो॥१५॥अक्षय- तीजके दिन रोहिणी हो तो सुभिक्ष कृत्तिका हो तो मध्यम मृगशीर्प हो तो दुर्भिक्ष ॥ १६॥ वैशाखमें पांच मंगल हों तो सर्वत्र भय हो मेघकी वर्षा नहो धान्यभाव तेज हो ॥१७॥ वैशा- खशुद्ध अष्टमीको यदि शनिवार हो तो जलका सूखना मजाका नाश छत्रभंग हो ॥ १८ ॥ रोहिणी तीनो उत्तरा मघा रेवती हो वा नवमीके दिन मंगलको राधा ( विशाखा) हो तो महाकष्ट हो ॥ १९ ॥ वैशाखचतुर्दशीको बृहस्पति शुक्र हो तो श्रेष्ठ है पृथ्वीपर बहुत धान्य हो॥२०॥ वैशाखकी अमावस रेवती युक्त हो तो मुभिक्ष करै रोहिणी हो तो लोकमें दुःख अश्विनी हो तो मध्यम है ॥२१॥ भरण्या व्याधितो लोकः कृत्तिकायां जलेऽल्पता । चौरा लुटन्ति मार्गेपु राज्ञां युद्धं परस्परम् ॥ २२ ॥ तृतीयायामक्षयायां रोहिणी गुरुणा सह । सर्वधान्यस्य निप्पतिर्थवि मंगलकर्मच ॥ २३ ॥ज्येष्ठस्य प्रथमे पक्ष या तिथिः प्रथमा भवेत् । आगता केन वारेण तमन्वेषय यत्नतः॥२४॥ भानुनापवनोवातिकुजोव्याधिकरोमतः। सोमपुत्रेण दुर्भिक्ष खण्डवृष्टिः प्रजायते ॥ २५ ॥ गुरुभार्गवसोमानामेकोपि यदि जायते । वर्षावधि तदा पृथ्वी धनधान्यसमाकुला ॥२६॥ अथवा देवयोगेन शनिवारी मवेदिह । जलशोपा प्रजानाशः छत्रभंगस्तदा भवेत् ॥ २७॥ज्येष्ठश क्लतृतीयायां द्वितीयायां प्रजायते । नक्षत्रमा तदृष्टौ महादुर्भिक्षकार णः ॥२८॥ज्येष्ठकृष्ण दशम्यां च रेवती सुखकारिणी । एकादश्यां खण्डवृष्टिादश्यां सानुकष्टदा ॥ २९॥ शुक्ले ज्येष्ठदशम्यां च शनिवारः वर्पप्रबोध ।। .. प्रजायते । वृष्टिरोधोगवां नाशो महाशोकाकुला प्रजा॥३०॥ यावती शुक्तिरापाढे शुक्लायां प्रतिपदिने । पुनर्वस्वोश्चतुर्मास्यां वृष्टिः स्यात्ताव तीस्फुटम् ॥ ३१ ॥ आपाढे दशमीकृष्णा समिक्षाय च रोहिणी। एका दश्यां मध्यकालं दुर्भिक्षं द्वादशी भवेत् ॥ ३२ ॥ त्रयोदश्यां रोहिणी चेदूत्तमः पवनस्तदा। चतुर्दश्यां राजयुद्धं प्रजाशोकाकुला तदा॥३३॥ आषाढमासेसितपंचमीदिने रव्यादिवारः क्रमशः फलानि । वृष्टिः सु. प्टियतिवृष्टिरूद्ध वातःप्रवातः प्रलयः प्रणाशः॥३||आपाढशुक्लनवी सानुराधा शनौ यदा। क्वचिद्धान्याईनिप्पत्तिः क्वचिदुर्भिक्ष कारका३५ अर्थः-भरणीयुक्त हो तो लोकमें कष्ट कृत्तिकामें जल थोड़ा वर्पे चोर मार्ग लूटे राजा युद्ध परस्पर करे ॥२२॥ अक्षयतीजको वृहस्पति ओर रोहिणी नक्षत्र हो तो सब धान्यकी प्राप्ति और मंगल हो ॥ २३ ॥ ज्येष्टके प्रथमपक्षमें जो तिथि पडवाकी हो वोह कोनसे दिन है यह विचार करना ॥ २४ ॥ रविकी हो तो पवन चले मंगलकी व्याधि करे बुधकी दुर्भिक्ष और खण्डवृष्टि कर ॥ ३५॥ गुरु शुक्र और चंद्रवारको होतो एकवर्पतक पृथ्वी धनधान्यसे युक्त हो ॥२६॥ अथवा देवयोगसें शनिवारकी होतो जलशोप, प्रजाका नाश ओर छत्रभंग हो ॥२७॥ ज्येष्ठशुक्ल तृतीया द्वितीया पार्द्रायुक्त हो तो महा दुर्भिक्ष करें ॥२८ ॥ ज्येष्टकृष्णदशमीको रेवती दुर्भिक्ष करती है एकादशीको हो तो खण्डवृष्टि हादशीको हो तो कष्ट दे ॥ २९ ॥जो ज्येष्टशुक्ला दशमी शनिवारकी हो तो वर्षाका निरोध, गोनाग प्रजामें शोक हो ॥ ३० ॥ श्रा- पाढशुक्लप्रतिपदा जितनी घडी हो और पुनर्वसु हो तो चर्चीमासेमें उतनीही वर्षा हो ॥३१॥ आपाटकृष्णदशमीके दिन रोहिणी हो तो मुभिक्ष करे एकादशीको हो तो मध्यम हादशीको हो तो दुर्भिक्ष करै ॥ ३२॥ त्रयोदशीको रोहिणी हो तो उत्तम पवन चले चतुर्दशीको हो तो राजोंमें युद्ध प्रजामें कष्ट हो॥३३॥भापाढशुद्वपंचमी जोर आदि सात बारोमेसे फिसीदिन हो उसके प्रमसे वर्मा, अच्छी वर्मा, अतिवर्मा, ऊईवात, महापवन, प्रलय और विनाश यह फल होते हैं ।। ३४॥ आपादशुक्ल नवमी अनुराधायुक्त शनिके दिन हो तो कहीं धान्यकी थोड़ी प्राप्ति कहीं दुर्भिक्ष हो ॥ ३५ ॥ आपाढे प्रथमे पक्षे प्रथमादितिथित्रये । श्रवणं वा धनिष्ठा स्यात्तदान्नसं ग्रहः शुभः॥३६ ।। आपाटपष्ठिदिवसे कृष्णपक्षे शनिर्यदा। तदा गो धूमका ग्राह्या द्विगुणा यस्तु कार्तिके ॥ ३७॥ आपाढे शनिरेवत्यामष्ट म्यां संगतो यदा । तदा वृधिनिरोधेन कटमुत्कष्टमादिशेत् ॥ ३८॥ आपाढे कर्कसंक्रान्तौ शनिवारो यदा भवेत् । तदा दुर्भिक्षमादेश्यं धा न्यस्यापि महर्घता ॥३९॥ चतुर्दश्यां तथापाढे सोमवारप्रवर्तनात्। न भापाटाकासाहेत। धान्यं न तृणं लोके किं गवादेः प्रयोजनम् ॥ ४० ॥ आपाढे प्रथमे पक्षे द्वितीया नवमीतियो । दुर्विदुःशुक्रवाराः स्युः श्रेष्ठानेटो बुधः शनिः ।। ॥४१॥आपाढशुद्धकादश्यां शन्यादित्यकुजेः समम् ।संपूर्णस्तिथिमा गश्चेत्तदा दुर्भिक्षमादिशेत् ॥४२॥आपाटपूर्णिमापठीघटीमानायदाभवे त्। मासद्वादशधान्यानां सुभिक्षं च सुखं जने ॥४३॥ त्रिशद्घटीभिः पण्मासात्सुखं दुःखं ततः परम् । चतुर्मास्यं पंचदशवटीमाने सुभिक्षता ॥४४॥न्यूनत्वे तु पंचदशघटीभ्यो दुःखसंभवः। वातवादलसंयोगात् फ लेन्यूनाधिकाश्रयः॥ ४५ ॥ मासाभिधाननक्षत्रं राकायां क्षीयते यदि। महर्घत्वं तदा नूनं वृद्धौ ज्ञेया समर्घता॥ ४६॥ मासनामकनक्षत्रं रा कायां न भवेद्यदा। महर्घ च तदा वश्यं तत्तद्योगविशेपतः॥४७॥ क्षवृद्धौ रसाधिक्य कणाधिक्यं च निश्चितम् ।योगाविषये रसश्छेदो दि नार्धप्रत्यहं स्फुटः॥४८॥ मृगादिपंचके राका धान्ये महर्घतांवदेत् । मघा चतुष्टये पूर्णा कुर्याद्धान्यसमर्वताम् ॥ ४९ ॥राका चित्राष्टके यु ता दुर्भिक्षात्कष्टकारिणी। श्रवणाद्रोहिणी यावन्नक्षत्रै पूर्णिमा शुभा५० अर्थः-आपाढके प्रथमपक्षमें पडवासै आदिले तीन तिथिमे श्रवण वा धनिष्ठा हो तो घा- न्यसग्रह करना शुभ है ॥३६॥ आपाढरुण छटको शनि हो तो गेहू ग्रहण करना कार्तिकमें चूने मोलको विक ॥ ३७॥ आपाढकीअष्टमी शनिवार रेवती नक्षत्रसे युक्त हो तो वृष्टि न हो कष्टपर कष्ट हो॥३८॥आपाढकसतान्ति जो शानिवारको हो तो दुर्भिक्ष और धान्यभाव तेज हो ॥३९॥ पापाढचतुर्दशी सोमवारके दिन हो तो लोप में धान्य और तृण न हो गवादिकका क्या प्रयोजन है ॥ ४० ॥ आपाढकृष्णद्वितीया नवमी शुक्रवारके दिन हो तो श्रेष्ठ बुध शनि- वारकी नेष्ट है ॥ आपाढशुक्ल एकादशी शनि रवि मगलके दिन सम्पूर्णतिथि हो तो दुर्मिक्ष करें ॥ ४२ ॥ आपाढपूर्णिमा यदि साठ घड़ी हो तो बारह महीने धान्यकी सुभिक्षता हो ॥४३॥ तोस घडी हो तो छ. महीने मुस पीछे दु ख पन्द्रह घडी हो तो चार महीने सुभिक्ष रहै ॥ ४४॥ पन्द्रहघडीसेमी न्यून हो तो दु.ख हो आर वायु मेघ हो तो फलमें न्यूनाधिक्ता हो ॥ ४५ ॥ यदि महीनेका नक्षत्र पूर्णिमाके दिन क्षय हो जाय तो अन्नभाव अवश्य तेज हो बढे तो मद्दा हो॥ ४६॥ और जो महीनेका नक्षत्र पूर्णिमाको न हो तो उन औरभी यो- गौसे अन्नभाव तेज हो ॥४७ ।। नक्षत्रवृद्विमें रसकी कणकी अधिकता हो योग वढे तो रसको हानि हो यह प्रगट जानना ॥ ४८ ॥ जो मृगशिरादि पाच नक्षत्रम किसीएक नक्षरके दिन पूर्णिमा हो तो अन्न भारतेज मघादि चार नक्षत्रमे अन्नभाव सस्ता ॥४९॥ चिनादि गाठ नक्षमें दुर्भिक्ष और श्रवणसे रोहिणीतक शुभ ह ॥ ५० ।। आर्द्राचतुष्टये सूर्यवारपूर्णार्थनाशिनी । मवाचतुष्टये सोमेप्येषा धान्य वर्षप्रबोध। महर्घकृत् ॥५१॥ चित्राष्टके भौमवारे पूर्णिमाव्याधिवर्द्धिनी। दुर्भिक्षा य शनौ शेषा वारद्धेषु शुभावहा॥५२॥ आपाढस्याप्यमावस्या यदि सोमवती भवेत् । मुभिक्षं कुरुतेवश्य नक्षत्रे मृगसप्तके ॥ ५३ ॥ श्रावणे कृष्णपक्षे च प्रतिपद्गुरुयोगतः। मुद्रामापास्तिलास्तैलं मह शीघ्रमादि शेत् ॥ ५४॥ श्रावणे नवमीयुक्तः शनिः संतापकारकः । छत्रभंगं वि जानीयादाविनांते न संशयः॥ ५५ ॥ दशम्यां श्रावणे सिंहे रविः सं क्रमते शनौ । महीस्याजलदेः पूर्णा तदा स्याद्धान्यसंपदः॥५६॥ कृ त्तिकाश्रावणे कृष्णैकादश्यां मध्यमा भवेत् । सुभिक्षं रोहिणी कुर्याद्दर्भि क्षं मृगशीर्षतः॥ ५७॥ श्रावणे शुक्लपक्षे चेयदा कश्चितिथिक्षयः। त दा कार्तिकमासे स्याच्छत्रभंगोपि निश्चयः॥ ५८॥श्रावणे कृष्णपक्ष स्य प्रतिपदिवसे कृतौ । योगेधतिः स्याद्धान्यस्य शेषयोगेषु विक्रयः ॥५९॥ द्वादश्यां श्रावणे कृष्णे मघा यद्गोचरावयम्। तत्राभ्रे जलवृष्टी वा जलयोगस्तदा महान् ॥ ६०॥ श्रावणस्य त्रयोदश्यां खत्यांरवियो गतः। बहुधान्यविवस्तूनि जायन्ते बहुधान्यकं ॥६१॥शनौ श्रावण सप्तम्यांजलपूर्णा वसुंधराश्रिावणस्य चतुर्दश्यामाायामन्नसंग्रहः॥६२॥ श्रावणस्य त्वमावस्यां पुष्याश्लेषा मघा यदि । मध्यमं वर्षमादेश्यं वृष्टि न महती यदा॥६३॥ विशाखाधष्टके दर्शे दुर्भिक्षं बहुधा स्मृतं । सु भिक्षमेकादशके वारुणाचे पुरोहितं ॥ ६४ ॥ अमावस्यां मध्यवर्ष भवे पुष्यचतुष्टये । शनिः सूर्यः कुजो दर्शष्वनन्तरमरिष्टकृत् ॥६५॥ अर्थ:-आदि चार नक्षत्रों में रविवारके दिन पूर्णा हो तो अर्थका नाश करै मपादि चार नक्षत्रों में चंद्रवारके दिन हो तो तेजी करें ॥५१॥ चित्रादि आठ नक्षत्रमें मंगलके दिन हो तो व्याधि करें शनिको हो तो दुर्भिक्ष करै शेपवार और नक्षत्रों में शुभ है ।। ५२ ॥ आषाढमें यदि सोमवती अमावस मृगशिरादि सात नक्षत्रसे युक्त हो तो सुभिक्षकारक है ॥५३॥श्रावण कृष्णप्रतिपदा गुरुनारके दिन हो तौ मूंग उरद तिल तेल अकरे होवे॥५४॥श्रावणकी नवमी शनिवारको हो तो संताप करे और आश्विनमें छत्रभंग हो ॥ ५५ ॥ जो भावणशुक्ल दशमी को शनिके दिन सिंहको संक्रान्ति हो तो जल अच्छा वर्ष धान्य संपत्ति हो॥५६॥ श्रावण- कृष्ण एकादशी कृत्तिकाके दिन हो तो मध्यम है रोहिणी होतो सुभिक्ष करै मृगशिर दुर्भिक्ष करे ॥ ५७ ॥ श्रावण शुक्लपक्षमें यदि किसी तिथिका क्षय होय तौ कार्तिकमासमें छत्रभंगहो ॥५८ ॥ श्रावणकृष्णप्रतिपदाको घृतियोग हो तो अच्छाहे और शेपयोगोंमें धान्यविक्रय ' - ।

भापाटीकासहित । ९३ शुभ है ॥ ५९ ॥ श्रापणकृष्ण हादशीको मघा रात्रिमें हो और बादल हों तोजलका महा योग जानना॥ ६०॥ श्रावणत्रयोदशीको रविवारके दिन रेवती हो तो बहुत धान्य और व- स्तुकी प्राप्ति हो ॥ ६१ ॥ श्रावणसप्तमी शनिवारको हो तो पृथ्वी जलसे पूर्ण हो यदि श्रावण चतुर्दशी आयुक्त हो तो धान्यसग्रह करना उचित है॥६॥श्रावणकीअमावसको यदि पुप्य आश्लेषा मघा हो तो मध्यम वर्षा होथोडो वा हो ।। ६३ ।। विशासादि आठ नक्षत्र अमावसके दिन हों तो दुर्भिक्ष हो और शतभिपाआदि ग्यारह नक्षत्र हो तो शुभ है।६४॥ अमावसके दिन पुप्यादि चार नक्षत्र हौं तो मध्यम वर्प जानना शनि सूर्य मगलका हो तो अरिष्ट करे।। ६५ ।। पार्वणी यदि रौद्रा स्यादादित्यं प्रतिपत्तिथी। द्वितीया पुण्यसंयुक्ता ज लं धान्यं तृणं न च॥६६॥अमावस्यादिने योगः पुनर्वस्वादिपंचके। समर्घमथ दुर्भिक्षमुत्तरादिचतुष्ठये ॥ ६७ ॥ विशाखाद्यटके कटं वारुणा दो जने सुखं । उचिरे गेचनाचार्या दर्शानक्षत्रजं फलं ॥ ६८॥ श्रावणे शुक्कसप्तम्यां स्वातियोगसुभिक्षकृत् । श्रवणं पूर्णिमायांस्याधान्यैरानंदि ताः प्रजाः॥६९॥ प्रथमायां तिथौ भाद्रे गुरौ श्रवणसंयुते ।अभंगं जा. यते वर्ष धनधान्यादिसंपदः॥७०॥ भाद्रपदाऽसिताप्टम्यां रोहिणी शु भदायनी। नवमी भाद्रशुक्लस्य रवौ मूले भयंकरी ॥७१॥ एकादशी भाद्रशुक्ले मूले दिनकृता युता । मेधेन वत्सरे सौख्यं लोक व्याधिर्विवा धते ॥७२॥ भाद्र शुक्ल द्वितीयायां द्वितीयवारयोगतः।धान्यनिष्पत्ति रतुला संपदाः स्युः चतुष्पदे ॥७३॥ शनौ भाद्रपदे कृष्णचतुर्थी यदि जायते । देशभंगश्च दुर्भिक्षं स्वस्थयोदरपुरणम् ॥७४॥ नवम्यां स्वाति संयोगे भाद्रमासे सिते यदा । तदा मुखमयीभूमिघृतधान्यसमन्विता ॥७५ ।। भाद्रशुक्लचतुर्थी चेद्वारा जीवेन्दुभार्गवाः । उत्तराहस्तचित्रा भिः मुभिक्षं निश्चयात्तदा॥७६ ॥ भाद्रमासे तृतीयायां भौमे चोत्तरा फाल्गुनी। तदा दृष्टिकरो नैव प्रोन्नतोपि घनाघनः॥ ७७॥ भाद्रमासे स्वमावस्यां खौ घृतमहर्घता। धान्यं महर्वभौमेज्ञेशनौतैलं विनिर्दिशे त्॥७८॥जनानां बहुलो केशः राजा दुःखैः प्रपीड्यते । अमावस्या दिने सूर्यः संतापायार्थनाशनात् ॥७९॥ सुभिक्षंक्षेममारोग्यं वर्षायाः प्रबलोदयः। सस्योत्पत्तिःप्रजासौख्वं सोमवारे प्रवर्तते॥८॥ अर्थः-पूर्णिमा और पड़वा यदि रविवार में हो और दोयज पुप्यसंयुक्त हो जल धा. न्य तृण न हो ॥ ६६ ॥ जो अमावस्या पूनर्वसुआदि पांच नक्षत्रके दिन हो तो अन्नभाव वर्षप्रबोध। सस्ता उत्तरादि चार नक्षत्रमें हो तो दुर्भिक्ष हो ॥ ६७॥ विशाम्यादि आठ नक्षत्री होती कष्ट शतभिपा आदिम हो तो मनुष्योको सुख इस प्रकार नक्षसे अमावसका फल जानना ६८॥श्रारण शुलसममीको स्वातियोग सुभिक्ष करताहे और पूर्णिमाको श्राण हो तो प्रा- नद पोरे ॥ ६९ ॥ भादोंकी पड़वा गुरु और श्रवणनक्षत्रके दिन होती वर्ष अच्छा हो धन- धान्य संपत्ति हो ।। ७० ।। भाद्रपद कृष्णाष्टमीको रोहिणी शुमटायक है और शुक्लपक्षकी नव- मी मूल नक्षत्रयुक्त हो तो भयदायक कहे ॥ ७१ ॥ जो भाद्रशुक्ला एकादशी मूल युक्त हो तो मेघ न वर्षे लोको व्याधी फैले ॥७२॥ भाद्रशुक्ल द्वितीया चंद्रवारकी हो तो धान्य अधिक उत्पन्न हो लोकमे संपत्ति हो चौपाये मुखी हो ।।७३ ॥ भाद्रपदरुण चतुर्थी यदि शनिगर- की हो नौ देशभंग और दुर्भिक्ष हो ॥७४ ॥ जो भादोंकी शुक्लनरमी स्वातियुक्त हो तो पृ. रवी सुखपूर्ण धान्यभाव सस्ता हो।।७५ ॥ भाद्रशुक्ल चतुर्थी वृहस्पति चन्द्रवार शुक्रके दिन उत्तरा हस्त चिना नक्षत्र युक्त हो तो सुभिक्ष करे ॥७६ ॥ भादोंमासकी तीज मंगलवार उ- तराफाल्गुनी युक्त हो तो बहुत मेघ आकरभी न वर्षे ॥ ७७ ॥ मादीकी अमावस रविवारी हो तो घी तेज हो मंगल बुधकी हो तो धान्यभाव तेज हो शनिकी हो तो तेल तेज ॥७८ ॥ रविवारकी हो तो जनीको केश प्रजाको दुःख और सत्ताप हो ॥७९॥ सोमबारको हो तीस- भिक्ष क्षेम आरोग्य पर्याकी अधिकता धान्यउत्पत्ति प्रजामें सुख हो ॥ ८॥ राज्यभ्रंशो राजयुद्धं क्लेशानां च प्रवर्द्धनम् । उपघातोल्पवृष्टिश्च क्षयश्चा र्थस्य भूमिजे ॥ ८१॥ दुर्भिक्षं राज्यनाशश्च प्रजानां दुःखभाजनम् । स्थानत्यागो धान्यमल्पं बुधवारे प्रवर्तते ॥८२॥ सदा वृष्टिः सुभिक्षं च कल्याणं दुःखनाशनम् । आरोग्यं च प्रजाः स्वस्था गुस्वारे समादिशेत् ॥८३॥ भृशंजलोद्धता मेघाः कृषीणां बहुरुपद्रवाः। तस्करोपद्रवा नि त्यं शुक्रेणामावसीदिने ॥ ८४॥ दुर्भिक्ष रोखं घोरं महादुःखमहद्भयम् । पराङ्मुखाः पितुः पुत्रा व्यसनं शनिवासरे ॥ ८५॥भाद्रपदे शुक्लषष्ठया मनुराधा यदा भवेत् । नक्षत्रान्तरदोषेपिहीने हीनत्वमाप्नुयात् ॥८६॥ आश्विने प्रथमायां चेच्छुक्लायां शनिरागते । तदा धान्यं च विक्रेयं पुर स्तस्य महर्घता ।। ८७ । आश्विने हि तृतीयायां यदि भोमःशनिश्चरः। तदाग्निः प्रबलो भूम्यामन्नादीनां महर्षता ॥ ८८॥ चतुर्थ्यामाश्विने सूर्ये विक्रेतव्यं घृतं जनेः। संगृहान्ते च धान्यानि पुरो लाभाय तान्य पि॥ ८९ ॥ आश्विने शुक्कसप्तम्यां सोमे हस्तसमागमे । गन्तव्य माल वस्थाने निर्जला जलदायिनी ॥९० ॥ सप्तम्यां शनियुक्तायां सिते पक्ष यंदाश्विने । श्रवणं वा धनिष्ठा चेजगतो नाशकारणम् ॥ ९१॥ आ भासाटीकासहित । 'श्विने च वुधेष्टम्यां विधेयो घृतसंग्रहः । कार्तिके विक्रयस्तस्य संपदः स्युः पदे पदे ॥९२ ॥ नवम्यामाश्विने शुक्ले कुजवारेण संगतौ । मुहुः कर्पासचपलाः मापादेः संग्रहो मता ॥ ९३ ॥ दिगुणस्तुभवेल्लाभो चैत्र मासेथ विक्रिये । आश्विने दशमी भौमे भूम्यां व्याधिरवाधितः ॥९॥ अर्थः-राज्यनाश राजोंमें युद्ध क्लेशकी वृद्धि उत्पात थोडी वी अर्थनाश मंगलकी अ- मावसमें होता है ॥ ८१ ॥ बुधकी हो तो दुर्भिक्ष राज्यनाश प्रजामें दुःख स्थानत्याग धान्य थोडा हो ॥ ८२ ॥ गुरुवारकी हो तो सदा यो फल्याण दुःखकानाश आरोग्य प्रजामें स्वस्थता हो॥ ८३॥ शुक्रकी हो तो मेयभ्रंश कृषिमें उपद्रव तथातस्करोंके उपद्रव हो ॥४॥ शनिकी हो तो घोर दुर्भिक्ष महादुःख और भय पितापुत्रोंमें क्लेश और व्यसन हो । ८५ ॥ भाद्रशुक्लपष्टीको जो अनुराधा हो तो कोई दोपभी हो तो जाता रहै ॥ ८६ ॥अथ आश्विन।। आश्विन शुक्ल प्रतिपदा शनिवारकी हो तो संचितधान्य वेचना ।। ८७॥ आश्विनको नृतीया यदि मंगल शनिश्चरकी हो तो अग्नि लगे अन्नभाव तेज रहे ॥ ८८ ॥ जो आश्विनकी चौथ रविवारकी हो तो घृत वेचना और धान्य खरीदनैसे लाभ है ॥ ८९ ॥ आश्विन शुक्ल सप्तमी चन्द्रवार हस्त नक्षत्र युक्त हो ती मालवमें जाना चाहिये यह निर्जनस्थानमें भी जल देनेहारी है ॥ ९० ॥माश्विनशुरूसप्तमी शनिवारी हो तो श्रवण या धनिष्ठा युक्त हो तो जगतमें अ- मंगल करे ॥ ९१ ॥ आश्विनकी अष्टमी बधवार हो तो अन्नसग्रह करना उचित है कार्तिकमें वेचनेसे महान लाभ हो ॥ २२ ॥ आश्विनशुक्ल नोमी मगलकी हो तो कपास उरदादिकका संग्रह करना उचित है ॥ ९३॥ चैनमें उसके बेचनेसे दुना लाभ हो और आश्विनको दशमी मंगलवारी हो तो पृथ्वी में प्रतीकाररहित व्याधी हो ॥ ९४ ॥ एकादश्यां शनो तस्मिन्च्छत्रभंगोथवा भुवि । नगरपामभंगं स्याद्वैरि चौराद्युपद्रवः ॥ ९५ ॥ तृतीयारोहिणीयोगे वारयोः शनि भौमयोः। त दा कासिकं ग्राह्य फाल्गुने लाभमादिशेत् ॥ ९६ ॥ आश्विने कृष्णपं चम्यां रविवारः प्रवर्तते । माघमोस ह्यमावस्यां महधैं निश्चयाघृतम् ॥ ८७॥ पाठ्यामघाधिने ज्येष्ठादित्यमूलामिसंगमे । संग्रहस्सर्वधान्या. नां पंचमासिफलं लभेत् ॥ ९८ ॥ आश्विनैकादशी कृष्णावारयाईव सोमयोः । महिषीणां गवां मूल्यं महत्संजायते जने ॥ ९९ ॥ द्वादशी, शनिना युक्ता हस्तचित्रासमन्विता । तदा युगन्धरी ग्राह्या चैत्रेवै त्रिगु णं फलम ।। १०० ॥ आश्विनस्याप्यमावस्यां शनिवारो यदा भवेत् । म ध्यमं वर्षमथवा दुष्कालः खण्डमण्डले ॥१॥ कार्तिके प्रथमेपक्षे प्रथमा वुधसंयुता । जायते मध्यमा वृष्टिरनावृष्टिक्वचिद्भवेत् ॥ २ ॥ कार्तिक 1 वर्षप्रयोग सप्तमी शुक्ला शनी धान्यार्धनाशिनी। श्वेतवस्तु महर्घ स्यात् त्रिमासि द्विगुणं फलं ॥२॥ कार्तिके पंचमीरोद्रयोगे स्यात्तृणसंग्रहः । चतुष्पदे न्यथा दुःखं जायते अल्पवृष्टिजम् ॥ ४ ॥ कार्तिके दशमी कृष्णा शनी 1 रोगकरी जने । रविः कृष्णत्रयोदश्यां यवगोधूममूल्यकृत ॥५॥ कार्ति के कृष्णदशमीशनो मेघसमन्विता । मह घृतपूगादि चतुर्मासातिवि क्रयः॥६॥ कार्तिके चेदमावस्यांशनिश्चासननाशनः । भोमे भूम्यां महावन्हि रविर्युद्धाय भूभुजां ॥७॥ मार्गशीर्षे चतुर्थी चेन्मंगलो खे तीदिने । प्रतिग्राम वन्हिमयं जगत्क्लेशव्यथाभयं ॥ ८॥ द्वादश्यां मार्गशीर्षस्य भौमवारेसंक्रमे । भावि वर्षविनाशाय ग्रहणं शीतगोस्त था॥९॥मार्गे नवम्यां रेवत्यां बुधो दुर्भिक्षकारकः। पंचमी गुरुणा योगात्पंवमासान्मुभिक्षदा ॥१०॥ अर्थ:-जो एकादशी शनिवारी हो तो छत्रभाग हो नगरग्रामभग वैरी और चोरोंका उप- द्रव हो ॥९५ ॥ जो तीज मगल शनिवारी रोहिणी सहित हो तो कपास फाल्गुनमें लाभदाय क होगी जो आश्विनकृष्णपचमी रविवारको हो तो माघमासको अमावसको अवश्य धृत अकरा हो ॥ ९६ ॥ जो आश्विनकी छठ ज्येष्ठायुक्त रविवारकी हो मूल्नक्षत्र हो तो सर्वधान्य- का सग्रह पाचमहीने में लाभदायक होगा ।। ९७ ॥ जो जाश्विनकृष्ण एकादशी बुध और च न्द्रवारकी हो तो महिपी और गोंमोका मूल्य बहुत होगा ॥९८॥ जो शनिवार द्वादशी हस्त वा चिना सयुक्त हो तो युगन्धरी-जवार-खरीदनी चैनमें तिगुना लाभ देगी॥१०॥आश्विनकी अमावस शनिवारी हो तो मध्यम वर्पा हो खण्ड मण्डलमें दुष्काल हो ॥ १ ॥ जो कार्तिकके प्रथम पक्षमें बुधवारी पडवा हो तो मध्यम वृष्टि हो कहीं न भी हो ॥२॥ कार्तिक शुक्ल स- समी शनिवारी हो तो धान्यका नाश करे श्वेतवस्तु अकरी हो तीनमासमें दूना लाभ दे।।३।। जो कार्तिक पचमी पूरयोग हो तो तृणसग्रह करना अथवा चौपायोंको दु.ख हो वर्षा थोडी हो॥ ४॥ कार्तिक कृष्ण दशमी शनिवारी हो तो रोग करें और कृष्ण त्रयोदशी रविवारी हो तो सब गेहू तेज हो॥५॥ कार्तिक कृष्ण दशमी शनिवारको मेधयुक्त हो तो घी और सुपा री तेज हो चौथे महीनेमें वेचे॥६॥ कार्तिकी अमावस शनिवारी अन्नतेज करै मगलवारी अमिदाह रविवारी राजोंमें युद्द करै ॥७॥ जो मार्गशीर्ष चतुर्थी मगलवार रेवतीयुक्त हो तो प्रत्येक ग्राममें अग्निभय और व्यथा हो॥८॥ जो अगहनकी हादशी मगलवारके दिन स- प्रांति हो तो अगला वर्षको विनाशारे यदि उसमासमें चद्रग्रहण हो तो ||९||मार्गशीर्षकी रेख- तीयुक्त नोमी दुर्भिक्ष करे और गुरुवारी पचमी पाचमहीने सुभिक्ष करै ॥ १०॥ मार्गशीर्षप्रतिपदि पुष्ये युक्ते चतुष्पदः। जलवृष्टयापरं वर्ष गर्भस्रावा द्विनश्यति ॥११ ।। पुनर्वस्वोस्तथायां तृतीयायां च संगमे । धान्यं रे भाषांटीकासहित । समर्घमादेश्यं राज्यस्वस्थः प्रजासुखं ॥ १२ ॥ मार्गशीपस्य पंचम्या मा -पाद्य पंचकं यदा। पुरो वर्षविनार्शाय जायते जलरोधतः।।.१३॥ नव- म्यां मार्गचित्रायां धान्यं महर्षमादिशेत् । कृष्णाचतुर्दशी स्वाति श्राव णे जलरोधनी ॥१४॥ मार्गशीर्पस्य दशमी मूले वा रविणायुती । स ग्राह्यश्चतिलास्तैलं ज्येष्ठान्ते लाभदायकाः ॥ १५ ॥ मार्गे यदि स्यादी दित्यएकादश्यां तिथी तदा । कार्पासोदिकसूत्राणां ग्राह्यं वैशाखलाम कृत् ॥१६॥ अथवा दैवयोगेनं शनिवारस्य संगमः। जलशोषः प्रजा नाशश्छंत्रभंगस्तदा भवेत् ॥१७॥ पौषमासे शुक्लपक्षे चतुर्थीदिनवा यदा शनिस्तदा दोस्थं त्रिमासिं स्यान्नसंशयः॥१८॥ सप्तमीसोमवा रेण पोपमासे यदा भवेत् । तदा च महिपीवृदं म्रियते रोगपीडित॥१३॥ यावन्नाद्री व्रजेत्सूर्यस्तावद्धान्यस्य संग्रहः । शनिपोपे नवम्यां चेत्पुरस्ता ल्लाभकारण ॥ ३० ॥ एकादश्यां पौपशुक्ले कृत्तिकाभोगतः स्मृतः । रक्त वस्तुमहाँल्लाभः सधान्यात्पथमाम्बुदे ॥ २१॥ पूर्वाषाढा तथा ज्येष्ठामा वस्यां पोपमासके । वाराः शनिकुजादित्या भाविवर्षविनाशका॥३॥ पोषे मूलममावस्यां दृष्टये लोकतुष्टये । शन्यादित्यकुजास्तस्यां बहुला भाय धान्यतः॥२३॥ पोप कृष्णप्रतिपदि रोहिण्याभोगसंभवे । सप्तमा साधान्यलाभश्छत्रभंगोथवाभवेत् ॥ २४॥ अर्थः-पार्गशीर्षकी प्रतिदा पुष्ययुक्त हो तो चौपायोंको, केश हो और आगेके वर्पका गर्भ जलवृष्टिस नाश हो ॥ १६ ॥ यदि तृतीयाको पुनर्वसु तथा आदी हो तो धान्य सस्ते देश स्वस्थ प्रजाको सुख हो ॥ १२ ॥ मार्गशीर्षपंचमीको यदि मघादि पांच नक्षन हो तो जलन वनेसे अगला वर्ष विनष्ट हो ॥ १३ ॥ मार्गशीर्ष नवमीको चित्रा हो तो धान्य तेज हो और कृष्ण चतुर्दशी स्वातियुक्त हो तो श्रावणमें जल न वर्षे ॥ १४ ॥ मार्गशीर्पदशमी मूल युक्त वा रविवारी हो तो तिलतेल संग्रह करे ज्येष्ठके अन्तमें लाभदायक है ॥१५॥ यदि मार्गसिर्पको ए- कादशी रविवारी हो तो कपाससूत्रका संग्रह करना वैशाखमें लाभदायक है ॥ १६॥ अथवा दैवयोगसै शनिवारी होय तो जलका सूखना प्रजाका नाश और छत्रभंग हो ॥ २७॥ पोप- शुक्ल चतुर्थी यदि शनिवारी हो तो तीन महीने अस्वस्थता रहै ॥१८॥ यदि पोपको सप्तमी सोमवारी हो तो भैंसें रोगसे पीडित हो मरें ॥ १९ ॥ जबतक सूर्य आर्द्रामें न आवै तब तक धान्यसग्रह करना उचित है जो पोपनयमी शनिगरी हो तो आगे लाभदायक है ॥२॥ . १३

९८
विर्यप्रबोध।
पोपशुक्लएकादशीको कृत्तिका हो तो लालवस्तमें लाभ हो-और पहले मेघतक-धान्यस लाभ
हो ॥ २९ ॥ पोपअमावसको पूर्वापाढा और ज्येष्ठा हो और शनि मंगल रविवार हो तो अगला
वर्ष हीन जानना ॥२२॥ पोपको अमावसको मूल हो तो रोक संदृष्ट हों और शनि रेवि म.
गलवार हो तो धान्यसै लाभाहो ॥२३ ॥ पोपकृष्ण प्रतिपदाको रोहिणी हो तो सात महीने
धान्यसै लाभ वा छत्रभग हो ॥ २४॥-
मवाद्यदिवसे वारो वुधो भवति चेत्तदा । मासत्रयं महधैं स्याद्भाविवर्ष
विनश्यति ॥ २५॥ माघासितस्य प्रतिपद्वितीया वा तृतीयका । त्रुटिता
धान्यसंग्रहे लाभाय वणिजां मता ॥ २६ ॥ सप्तम्यां सोमवारः स्यान्मा
घे पक्षे सिते यदि । दुर्भिक्षं जायते रौद्रं विग्रहोपि च भूभुजां ॥ २७॥
माघस्य शुक्कसप्तम्यां रविवारो भवेद्यदि । दुर्भिक्षं हि महाघोरं विग्रहं च
महामयं ॥ २८॥ मांघमासप्रतिपदि शनि गः प्रशस्यते। सर्वत्र धान्य
निष्पत्ति रारोग्यं देशस्वस्थता ॥ २९॥ चतुर्थी माघमासस्य शनिवारण
संयुता । दुर्मिक्षं मृत्युचौराग्निभयं धान्यविनाशनं ॥३०॥ माघेशुक्लेप
'तिपदि वाराजीवेन्दुभार्गवाः । सुभिक्षाय रणायार्कः कुजे स्युर्वहुईतयः
॥३१॥ माघे शुक्ले यदाष्टम्यां कृत्तिका यदि नो भवेत् । फाल्गुने रोलि
कापतिः श्रावणे वा न वर्षणं ॥३२॥ मावे च शुक्लसप्तम्यां सोमवारेच
रोहिणी राज्ञां युद्धं प्रजारोगो ह्यथवा वर्षमुत्तमं ॥३३॥ माघमासे च
सप्तम्या भरणी यदि जायते । रोगनाशस्तदा लोके वसुधा बहुधान्यभृ
तु ॥ ३४॥ फाल्गुने कृष्णषष्ठी चेचित्रानक्षत्रसंयुता । त्रिभिर्मासैः सुभि
साय स्वात्या दुर्भिक्षसाधनं ॥ ३५॥ फाल्गुने च त्रयोदश्यां शुक्लायांय
पादिभार्गवः । ज्येष्ठे रोगाय नूनं स्यानोगो मासत्रयेथवा ॥३६॥ फा
गाल्गुने प्रथमे पक्षे वारुणं प्रतिपदिने। भोगानुसाराद्धर्षस्य स्वरूपं च निरू
पर्यत् ॥ ३७॥ फाल्गुने कृत्तिकायुक्तं सप्तम्यादिकपंचकं । श्वेतपक्षे सु
समिक्षाय नाद्रोजलदवृष्टये ॥३८॥
-T1 अर्थ:-जो माघप्रतिपदाको बुधवार हो तो तीन महीने तेजी और अगला वर्ष नष्ट हो
T11 २५ ॥ माघरुण पडया दोयज तीज यदि कोई क्षय हो जाय तो धान्यसंग्रह करनेमें है-
श्योंको लाभ हो ॥ २६ ॥ माघशुरूसप्तमी सोमवारी हो तो दुर्भिक्ष और राजौम विग्रह हो
॥ २७ ॥ और जो मायशुनसप्तमी रविवारी हो तो महाघोर दुर्भिक्ष और भय हो ॥२८॥

९ . भाषाटीकासहित । माघकी प्रतिपदा शनिवारी हो तो शुभ हो सर्वत्र धान्यकी प्राप्ति कुछ रोग देशमें स्वस्थता हो॥२९॥ जो माघकी चतुर्थी शनिवारी हो तो दुर्भिक्ष मृत्यु चोर अमिभय धान्यनाश हो॥ ॥ ३० ॥ माघशुक्ल प्रतिपदा जो बृहस्पति चंद्र शुक्रवारों हो तो मुभिक्ष रविवारी हो तो युद्ध मंगलवारी हो तो ईति हो ॥ ३१ ॥ माघशुक्ल अष्टमीको यदि कृत्तिका न हो तो फाल्गुनमें रोलिकापात वा श्रावणमें वृष्टि न हो ॥ ३२ ॥'माघशुक्लसप्तमी सोमवारको रोहिणी हो तो राजोंमें युद्ध प्रजामें रोग अथवा उत्तम वर्ष हो॥ ३३ ॥ माघमाससप्तमीको यदि भरणी होती लोकमें रोगका नाश और पृथ्वी धान्यसै पूर्ण हो ॥ ३४ ॥ जो फाल्गुणकृष्ण पष्ठीको चित्राने क्षत्र हो तो तीन महीने मुभिक्ष और स्वाति हो तो दुर्भिक्ष करै ॥३५॥ फाल्गुनशुक्ल यो दशी शुक्रवारी हो तो ज्येष्ठम रोग और तीन महीने भोग हो ॥ ३६॥ फाल्गुणकृष्ण प्रतिपदा को यदि शतभिपा हो तो वर्पका स्वरूप उसके भोगानुसार जानना ॥ ३७ । फाल्गुनमें सप्तमी प्रादि पांच तिथि कृत्तिकासे युक्त हों तो शुक्लपक्षमें सुभिक्ष हो और यदि भाद्री हो तो जलन वर्षे ॥ ३८॥ अथ हादशपूर्णिमाविचार। चैत्रस्य पूर्णमास्यां हि निर्मलं गगनं शुभम् । तदिने ग्रहणं तारापातभू कम्पवृष्टयः ॥३९॥ रजोवृष्टिःपरिवेषः विद्युत्केतूदयादिना। उत्पातेन च संग्राह्य धान्यं धातुव्ययादितः ॥ ४०॥ विक्रये सप्तमे मासे भाडे द्धि गुणलाभदम् । वैशाख्यामीदृशे चिन्हे कर्यासस्य महर्घता ॥ ४१ गोधूम मुद्गमाषादेः संग्रहो लाभकारणम् । विक्रियादिगुणत्वेन मासे भाद्रपदेभ वेत्॥ ४२ ॥ ज्येष्ठस्य पूर्णिमानभ्रा शुभाय कथिता बुधैः। वृष्टया वा प रिवेषेण तस्यां धान्यस्य संग्रहः॥४३॥तुर्ये मासेथवा पौषे लाभस्तस्या नविक्रयात् । आषाढी निर्मला नेष्टा वादलाच्छादिता शुभाः॥४४॥ नैर्मल्याधान्यसंग्रह्यः पंचमे मासि लाभदः । श्रावणीनिर्मला श्रेष्ठा सा, भ्रत्वे धान्यसंग्रहः॥४५॥ विक्रियाघृततैलादेः लामोमासतृतीयके। पू भाद्रपदो शुभाशुभाधान्यस्य विक्रयात् ॥ ४६॥ आश्विनी निर्मला पूर्णा शुभायवादलोदये।धान्यस्य संग्रहं कुर्याचैत्रे वै लाभदामहान् ४७" सोभायां मावपूर्णायां धान्यसंग्रह इप्यते । विक्रेयः सप्तमे मासे तस्य ला. भाय संभवेत् ॥ ४८ ॥ फाल्गुनी पूर्णिमा साम्रा सवृष्टिा सगर्जताधा न्यसंग्रहणान्मासे सप्तमे लाभदायिनी ॥४९॥ .

+ : वर्षप्रबोध। इति मेघमहोदये महामहोपाध्यायमेघगणिविरचिते तिथिफल कथनोनामनवमेधिकार अथ संक्रान्तिविचारः॥ अथ चत्रको पूर्णिमाको निर्मल आकाश हो तो शुभ है और जो उस दिन ग्रहण होतो तारापात भूकस्प और वृष्टि हो ॥३९ ।। वा.चंद्रमाका परिवेप (घेरा हो) विजली चमक के- नूका उद्य आदि हो तो ऐसे उत्पात देखकर धान्यका संग्रह करना उचित है ॥ ४० ॥ सातवें महीनेमें वेचनेसे दूना लाभ होगा और वैशाखमेभी ऐसे चिन्ह हाँ तो कपास अकरी विक ४१॥ गेहू मूंग,उरदका संग्रह लाभदायक है भादोंमें वेचै तो दूना लाभ हो. ॥४२॥ ज्येष्ठकी यू- र्णिमा स्वच्छ अच्छी है और जो वर्षा वा घेरा हो तो धान्यसंग्रह शुभ है ।। ४३ ॥ उसके दे- चनेसै चौथे महीने वा पूपमें लाभ होगा आपाढी पूर्णिमा निर्मल अच्छी नहीं वादल 'हौं तो अच्छे ॥ ४४ ॥ जो निर्मल हो तो धान्यसंग्रह करना पांचवें महीनेमें लाभ होगा श्रावणकी पूर्णिमा निर्मल अच्छी है और वादल हों तो धान्यसंग्रह करना ॥ ४५ ॥ घी ते- लके वचनेसे तीसरे महीनेमें लाभ होगा जो भादौंकी पूर्णिमा निर्मल हो तो अच्छी है धान्य बेचदेना ॥ ४६॥ आन्धिनकी पूर्णिमा निर्मल अच्छी है और वादल हों तो घान्यसंग्रह करना चैत्रमें लाभ देंगे ॥४७॥माघपूर्णिमाको बादल हों तो धान्यसंग्रह करना सातवें महीने वेच- नेसे लाभ होगा। ४८॥ जो फाल्गुनी पूर्णिमाको वादल हो वर्षा हो गर्जना हो तभी धान्य- संग्रह करना सातवें महीनेमें लाभ हो ॥ ४९ ॥ PIES इति श्रीवर्पप्रबोधे भापाटीकायां नवमोधिकारः ॥ अब संक्रान्तिका विचार कहते हैं जिस दिन जिस पहरमें जैसो आवे जो फल हो सो च- में समझलेना- . } . . -- । -- काल चार नक्षत्र नाम दिशा विउग्र घोरा | शूद्रोंकोसुख | पूर्वान्ह 1 विपराजौंकोसुख । 'पूर्वको. चंद्र: क्षिप्रा वाली वैश्योंकोसुस । मध्याह्न चैश्यों कोमुख पश्चिमको मंगल चर-महोदरी चौरीकोसुख अपराह्न शूद्रोंकोसुस दक्षिणको बुध मैत्रमदाकिनी राजाओंकोसुल प्रदोष पिशाचोंकोसुख , दक्षिणिको ध्रुव नदा हिजगणोंकोसुख अईरात्रि राक्षसोंकोसुख उत्तरको शुक्रवामिश्रामिश्रा | पशुओंकोमुस अपररात्रि नटादिकोकोसस्य पूर्वको शनि दारुण | राक्षसी चाण्डालोकोमुख प्रत्युपकाला पशुपालकोंकोसुख पश्चिमको नीचे लिखेकोष्टकमें संक्रान्तिके वाहन फल-ज करण: स्थिति. बैठी त सिंह शादुल फल वस्त्र-- भय "श्वेत श्चतुर्भिर्लाभाय सरेश्चेन्न विद्यते ॥ २॥ कर्को मकरे चन्द्रो दुर्मिक्षं सेनलाभदः ॥ १ ॥ मिथुनेकै धनुश्चन्द्रस्तिलतेलान्नसंग्रहात् । मासे, मेषे रखो तुलाचन्द्रे षण्मासे धान्यलामदः । वृषे वृश्चिके चन्द्रस्तुर्यमा वालव / कौलव । तैतिल, वव. गर, वाणज विष्टि-शकुनि वतृष्ण, नाग! किंस्त. बैठी खडी सूती बैठी खडी । बैठी | मूती' खडीसूती: -खडी फल. मध्यम मध्यम. | महर्घ . समर्घ [ मध्यम "महर्ष. महर्घ महघ समय समघ महघ वाहन सिंह व्यान वराह गर्दभ - हस्ती - महिपी घाटका कुत्ता मेंढा बैल- कुकुट. उपवाहन अश्व | बैल मैंढा | गदर्भ ऊट महिप, -व्यात. वानरः भय पीडा सुभिक्ष लक्ष्मो । लेश स्थैर्य मुभिक्ष-क्लेश - स्थैर्य मृत्यु. पीत हरित पांडुर, रक्त । श्याम काला चित्र कम्बल नग्न घनवण आयुध । भुशुंडी गदा खड्ग धनुप तोमर कुंत । पाशा अंकुश | तलवार बाणा पात्र सुवणे रूपा ताम्ब कांस्य लोह । तीकर 1-पत्र वस्त्रं करः । भूमि काष्ठ भक्ष्य: अन्न पायस. भक्ष्य पकान्न पय । दधि | चित्रान गुडः मधुः । घृत शकरा लेपन कस्तूरी कुंकुम चंदन माटी गोरोचन अवलादलंद सुरमा | सिंदूर | अगर...कपूर वर्णा: देव - भूत पशु मृग विप्र क्षत्री | वैश्य | शूद्र पुष्प पुन्नाग| जाती | बकुल केतकी| वेल. कमल दूर्वा "मल्ली पाटल जपा. भूपणा नूपुर कंकण मोती मणी गुंजा कौड़ी नीलक | पुन्नागे, सुवर्ण । कंचुकी | विचित्र हरित | भुर्जपत्र सीत पाश्वेत नील | कृष्णा अंजन वल्कल| पांडुर" वय । बाल कुमारी गताल युवा पोटा प्रगल्भा वृहा वन्ध्या अतिवंध्या पुत्रवती सेन्या. जिस करणकी संक्रान्ति हो उसके वाहन फल चक्रसै समझ लीजे संक्रान्ति जिस वाहनपर स्थित हो जो वस्तु धारण कर उ. सकी हानि होय. भापाटीकासहित । सर्प मिश्र-- अन्त्यज 81258 अक 25218 मूंगा .1 मुकुट पण १०१ १०२ वर्षप्रबोधः। कुरुते जने । घोरं यावच्चतुर्मासी दासीकृतधनेश्वरः॥३॥षण्मासाद्विगु णोलामः सिंहे कुंभचन्द्रतः। मीने दुर्व्यक्तिकन्या छत्रभंगेन विग्रहे ॥४॥तुलार्के चंद्रमा मेपे पंचमासि च लाभदः। वृश्चिकेके वृषे चन्द्रे तिलतैलान्नसंग्रहः॥५॥ प्रदत्ते द्विगुणं लाभं धान्यं मासद्धयांतरे । मि थुनेन्दुर्धनुष्य पंचमासान्नलाभदः॥६॥ कर्पासघृतसूत्रादेः पंचमे मा सि लाभदः । मृगेकर्कशीतांशुः पांसुलानां विनाशकः॥७॥ सिंह न्दुः कुंभमानौ च तुर्ये मासेन्नलाभदः कन्याचन्द्रोपि मीनेकस्तादृशी.धा न्यसंग्रहात् ॥ ८॥ यदिने यार्कसंक्रान्तिस्तद्राशौ तदिने शशी। जन्म वेधादयं नेष्टः श्रेष्ठः स्वसुहृदोहे ॥९॥ यस्मिन्वारेस्ति संक्रान्तिस्तत्रे वामावसी तिथिः । लोके खप्पारयोगोयं जीवधान्यादिनाशकः ॥१०॥ शनिस्यादाद्यसंक्रान्तौ द्वितीयायां प्रभाकरं । तृतीयायां कुजे योगहुँख पराख्योतिकष्टकृत् ।। ११ ।। स्यात्कार्तिके वृश्चिकसंक्रमाहे सूर्ये महर्षं भुवि शुक्लवस्तु । म्लेच्छेषु रोगान्मरणाय मंदः कुजः परंधान्यरसग्रहाय ॥१२॥लाभस्तु तस्य त्रिगुणस्त्रिमासान् बुधे च पूगादिफलं महर्घ । गुरो चं शुक्रे तिलतैलसूत्रकर्षाससूत्रादि महर्घतास्यात् ।। १३ ॥ अर्थ:-जो मेपकी संत्रान्तिको तुलाके चन्द्रमा हो तो छः महीने धान्यकी अधिकता करे वृपकी संक्रान्तिको वृश्चिकके चन्द्रमा हो तो चार महीने अन्नका लाभ हो॥ १॥ मिथुन- की संक्रान्तिको धनका चद्रमा हो तो तिल तेल तथा अन्नसंग्रह करै चौथे महीनेमें लाभ हो और क्रूरग्रहसहित हो तो न हो ॥२॥ कर्कके संक्रान्ति मकरके चन्द्रमा हौं तो दुर्भिक्ष करें चार महीनेतक यही रहे धनीभी दासभाव स्वीकार करें तो ३ ॥ सिंहको संक्रान्तिको कुंभके चंद्रमा हो तो छः मासमें व्यापारसै गालाम हो मीनकी संत्रान्तिको कन्याका चंद्रमा हो तो छत्रभंग विग्रह हो ॥ ४ ॥ तुलासंक्रान्तिको मेपके चन्द्रमा हो तो पांच महीनेमें व्यापारमें लाभ हो वृश्चिक संत्रान्तिको वृपके चन्द्रमा से तो तिल तेल तथा अनका संग्रह करना उचित है ॥ ५ ॥ दो महीने उपरान्त धान्यमें अधिक लाभ हो धनकान्तिको मिथुनके चन्द्र मा हो तो पांच महीने अन्नमें लाभ हो ॥ ६॥ कपास घी सूतमें पांच मास लाभ होम- करकी संक्रान्तिमें कर्कके चद्रमा हो तो कुलटाओंका विनाश हो ॥७॥ कुंभकी संका- न्तिको सिंहके चंद्रमा हो तो चौथे महीने अन्नमें लाभ हो मीनकी संक्रान्तिमें कन्याके चंद्रमा हो तो धान्यसंग्रह करै ।। ८॥ यदि सूर्य चद्रमा संत्रान्तिको एक राशिपर हौं तो यह जन्मवे घसे नष्ट है सहदगृहमें हों तो श्रेष्ठ है ॥ ९॥ जिस वारकी संत्रान्ति हो यदि उसीकी अमा- वस हो वा उसी दिन हो यह सपरयोगजीव धान्यादिका नाशक है ॥१०॥ संक्रान्तिके दि मापाटीकासहित । १०३ नशनि दूमरीको रवि तीसरीको मगल हो यह सपर योगभी कष्टदायक है ॥ ११ ॥ यदि का- तिकमें वृश्चिककी समान्ति रविवारी हो तो श्वेतवस्तु अकरी हो म्लेछौमें रोगसे मरीफले मिगलकी हो तो रसाऔर धान्यग्रहण करना ॥१२॥ तीनमहीनेमें तिगुना लाभ कर बुधको हो तो पूगीफलादि अकरे विक गुरुशुक्रकी हो तो तिल तेल सूत कपास अकरी हो ॥ १३ ॥ सोमे सर्वजने सौख्यं संधिः सर्वत्र भूभुजां । तद्वारग्रहवेधेल्पमध्योत्कृष्ट फलोदयः॥१४॥ धनुषि तरणिभोगे मार्गशीर्षर्क भौमो शनिरवि यदि वारश्चौडकर्णाटगौडाः । सुरगिरिमलयान्ता मालवास्तेषु राज्ञां रणमरण विशेषाद्विग्रहायंत्रयोभी ॥ १५ ॥ कर्पाससूत्रादितिलाज्यतैलमहर्षता लोभदशामुंवर्णात् । शैल्यप्रवृद्धि वि सोमवारे किंचिद्धिनाशोप्यतएव धान्ये ॥ १६॥बुधे गुरौ वानसमर्थता स्यात् शुके पुनर्लेछजनप्रमोदः पौषे मृगे शनिना भयाय प्रभा कृता क्षत्रकुलक्षयाय ॥ १७ ॥ बुधेमुदा युद्धमुशन्ति श्रेष्ठाः गुरौ विरोध खकुले द्विमास्यां । युगन्धरीमलमसूर धान्ये हिमाद्विनाशचणकेपि सोमे ॥१८॥ देवे गुरौ वादल एव शुके माघेथ कुंभे दिनकृत्प्रसंगे। पृथ्वीमयं विग्रह एव घोरं चतुष्पदानामति शाय कष्टं ॥१९॥ मीनेर्के सति फाल्गुने शनिवशात् सामुद्रिकार्थक्ष यो भोमेहेम्नि सलामतारणभटा सूर्ये भटानिष्ठताः। तेलाज्यादिरसामह घंदिवसाश्चन्द्रे जनानांसुखं शुक्रे चंद्रसुते सुभिक्षमतुलं रोगप्रयोगोगरौ ॥२०॥ चैत्रे मेषरवौ तथा क्षितिसुते मंदे महर्घस्थितिः गोधूमे चणके तथैव शशिना कर्पास तैलादिषु । जीव क्षत्रियजीवनाशनकरः शुक्रो था। चंद्रजःसर्व वस्तुसमर्षमेव कुरुते वैवाहसोत्साहतां ॥२१॥ अर्थः-सोमवारको हो तो मनुष्योंमें सुख सब राजौंमें सन्धि हो और उसी वारको ग्रहवेध हो तो थोडी वर्षा हो ॥ १४॥ जो मार्गशीर्ष धनकी सक्रान्ति रवि मगल शनिवारी हो तो घोड कर्णाटक गौड देवगिरि मलय मालव देशोंमे युद्ध राजौंका मरण हो विग्रह हो ॥१५॥ कपास सूत तिल घी तैल तेज ही सुवर्णसे लामो शीतकी वृद्धि हो सोमवारको हो तो था भ्य थोडा हो ॥ १६ ॥ बुध और गुरुकी हो तो अन्न सस्ता हो शुक्रकी हो तो म्लेच्छोंको सुख हो पूपमै मकरकी सत्रान्ति शनिवारी हो तो क्षत्रियकुलका क्षय हो ॥ १७ ॥ बुधवारी हो तो प्रसन्नता और युद्ध हो गुरुवारी हो तो विरोध और दो महीनै युगन्धरी मल्ल मसूर घा भ्यका हिमसे नाश हो और चद्रवारी हो तो चनेकी हानि हो ॥१८ ॥ गुरु वार और शुक्रके दिन वा रविवार के दिन माघमें कुमकी सत्राति हो तो पृथ्वीमें भय और घोर विग्रह हो चौ- पायोंमें अतिकष्ट हो ॥ १९॥ मीनकी सत्रान्ति शनिवारको हो तो सागरमें आनेजानेवाली - १०४ • वर्षप्रबोध। वस्तुओंमे लाभ न हो मंगलकी हो तो सुवर्णसे लाभ सूर्यवारी हो तो योधाओंमें वीरती तेल घी रस अकरे चद्रवारी हो तो जनोंको सुख हो शुक्र और बुधकी हो तो सुभिक्ष हो गुरुवारों हो तो रोग हो।॥ २० ॥चत्रमें मेपकी समान्ति मगलकी हो वा शनिवारी हो तो अत्रमाव जगेहूं चनेका मात्र 'तेज हो चंद्रवारी हो तो कपास तेल आदि तेज गुरुवारों हो तो क्षत्रियोंका शुक्र और बुधवारी हो तो सब वस्तु सस्ती हो और विवाह मंगल घर घर हो।॥ २१ ॥ वैशाखे वृपसंक्रमे शनिकुजादित्यो हि दुर्भिक्षदा देशे क्लेशसचिर्महर्षविध यः प्राप्यान गोधूमकाः । कर्पासे फलवस्तुनीचरसजे मांजिष्ठकेत्यादरः सोमे धान्यमहर्घता कविगुरु तेषु प्रियाः स्यूरसाः॥३॥ ज्येष्ठे श्रीमिथु नार्कनः शनिकुजादित्येषु पापाशयोरोगेग्निज्वलनादिजं भयमपि प्रायो महर्घाः कणाः । संतुष्टा वसुधासुधाकरसुते वस्तुप्रियं सिंधुजं दुर्भिक्षं श शिजीवभार्गवबलात्सार्वत्रिकं सूत्र्यतां ॥ ३१॥ आषाढे कर्कसंक्रान्तो क्रूखारेतिवर्षणं । क्षत्रियाणां क्षयोन्योन्यं गुरौ तु प्रबलोतिलः ॥३२॥ सोमे सौम्ये तथा शुक्रे जलस्नातं भुवस्तलं धान्यं समर्घमायाति पर देशाजने सुखं ॥ ३३ ॥ सिंहेकै श्रावणे भौमे शनौ वा वाहवृष्टये-तु पधान्यविनाशाय वायुपीडाकरो खौ ॥३४॥ समर्घमाज्यं देवेज्यं गुरु तैलमहर्षता । सोमोशुक्रे बुधे छत्रभंगकृल्लोकतोपदः ॥ ३३॥ कन्यार्क तो भाद्रपदेल्पवृष्टिः शनेर्जने स्याहहुधान्यनाशः। कुजा[जाद्या बहुधे तयो वा वृष्टिस्तदाल्पोतिमहर्घतान्ने ॥३६॥ जीवेन्दुशुक्रज्ञपराक्रमेण क मेण सौख्यं न बहुश्रमण । अमुद्रसामुद्रकभूपयुद्धं किंचिदिनाशोपि च पश्चिमायां ॥३७॥ आश्विने रवितुलाधिरोहणे भास्करो दिजगवाद्रिदुः 'खदः । राज्यविग्रहकरः शनैश्चरः सपिः खलु महर्घता वदेत् ॥ ३८॥ बहुधा बहुधान्यसंभवात् वसुंधापूर्णसुधा बुधाश्रयात् ।'गुरुणातिसमर्ष मन्त्रक शशिना वा भृगुसूनुना तथैव ॥३९॥ र अर्थः वैशाखमै वृपकी समान्ति यदि शनि मंगल अथवा रविवारी हो तो देशमें क्लेश मनभाव तेज गोधूम दुर्लभ कपास फलपस्तु ईसरसके पदार्थ मजीटका भाव तेज रो चंद्रवा री हो तो धान्य सस्ते शुक्र बुधकी हो तो रस समान हों ॥ ३० ॥ ज्येष्टमें मिथुनकी संक्रान्ति शनि मगल रविवारी हो तो पापकारी रोग अग्निभय अन्नभाव तेज बुधकी हो तो पृथ्वी सं- दृष्ट सिंघकी उत्पन्न हुई वस्तुका आदर चद्रमा गुरु शुक्रवारी हो तो दुर्भिक्ष हो सूतभाव तेज रहे ॥३१॥ मापाहमें कर्कसकान्ति अरवार हो तो अधिक वर्षा हो क्षनियों में परस्पर सय हे

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गुरुवारी हो तो तीक्ष्ण पवन चले ॥ ३२॥ चद्र और शुक्रवारी होतो अच्छी, वर्षा हो धान्य
सस्ते परदेशसै जनाको सुख हो ॥ ३३॥ श्रावणमें, मगलबारी सिंहकी सक्रान्ति हो अथवा
शनिवारी हो और वर्षे तो तुप और धान्यका नाश हो रविवारी हो तो वायुकी पीडा हो।
॥ ३४ ॥ गुरुवारी हो तो घृत सस्ता अगर और तेल अकरा सोम शुत्र बुधवारी हो तो छत्र-
भग तथा व्याधि, करै ॥ ३५ ॥ भाद्रपदमें कन्याकी सत्रान्ति रविवारी हो तो थोडी वर्षा करे
शनिवारी हो तो धान्यनाश मगलसै रोग और ईति वर्षा थोडी अन्नतेज ॥ ३६॥ यदि बृह-
स्पति चद्र शुत्र बुधवारी हो तो पराक्रमसे सुख श्रम थोड़ा सब स्थानमें राजौसे युद्ध पश्चिम
में कुछ विनाश यह मसे जानना ॥ ३७॥ आश्विनमें रविवारको तुलाके सूर्य हों तो ब्राह्मण
और गायौंको पीडा,हो शनिवारको हों तो राजीमें विग्रह और सरसोंका भाव तेज हो ॥३८॥
चद्वारी हो तो बहुत धान्यकी प्राप्ति हो गुरुवारी हो तो अन्नमाव तेज चंद्र और सूर्यवारोंकी
तुलाकी संक्रान्ति होता भी यही फल हो ॥ ३९ ॥
संक्रान्तिः स्याद्यदा पोषे-रविवारेण संयुता । द्विगुणं प्रोक्तमाधान्ये मू
ल्यमाहुमहाधियः॥४०॥शनौ त्रिगुणता मूल्ये मंगले च चतुर्गुणासमान:
वुधशुक्राभ्यां मूल्याधं गुरुसोमयोः॥ ४१ ॥ शनिभानुकुजवीरै बहवः।
संक्रमा यदा । महर्घमनिलं रोगं कुर्वते राजविग्रहं ॥४२॥ सूर्योदयपि
विशती जगतो विपत्यै मध्यन्दिने सक्लधान्यविनाशहेतुः । संक्रान्ति
रस्तसमये धनधान्यवृद्धयै क्षेमं सुभिक्षमवनेः कुरुते निशीथे ॥ ४३।।
मावे कृष्णदशम्यां चेन्मकरेर्कः प्रवर्तते । धान्यसंग्रहणालामं तदापाढे
करोत्ययं ॥४४॥ नंदायां मेपसंक्रान्तिरल्पवृष्टिकरी मता। भद्रायरी
ज्ययुद्धाय जयायां व्याधयेनृणां ॥४५॥ रिक्तायां पशुवाताय पूर्णायां
धान्यवर्धिनी । इत्येतहालबोधोक्तं बहुशास्त्रेषु संमतं ॥४६॥ दिनयोगं
च नक्षत्र सक्रान्तेह्यते घटी। चतुर्गुणं सप्तभागं पण्डितस्तद्विचारयेत्
॥४७॥शून्ये भयं क्षयं रोग एकैन्न द्वितयेरसः । त्रयोरोगश्चतुर्पस्याद
स्त्रं महर्घमुज्यलं ॥४८॥ चैत्रे शनौ त्रयोदश्यां यदि. मीनेसंक्रमः
वत्सरी स्यात्तदा निन्द्यः सद्यो धान्यार्थनाशनः ॥ ४९॥ चैत्रमासस्य
संकान्तो यदि,वर्षति, माधवः । तदा धान्यस्य निष्पत्तिों के बहुतरं स
खं॥५०॥ वैशाखज्येष्ठसंक्रान्तिदृष्टिर्मिश्रफलाभवेत् । मध्यमं कुस्ते वर्ष
खण्डमण्डलवर्पणात् ॥ ५१॥ वैशाखकृष्णपक्षान्तर्वपसंक्रमणेरवेः बसे
चन्द्रस्तदा ज्ञेयो सर्वक्लेशक्षयात्सुख ॥५२॥ यदि स्याज्ज्येष्ठपंचस्यां त
पसंक्रमणांदनु । दिनदयान्तर्जलदस्तदा सुभिक्षनिर्णयः॥५३ ॥

१०६ वर्षप्रबोध -यदि पोपको सान्ति रविवारी हो तो धान्य देने मोल विक ४. शनिवारी हो तो तीनगुने मूल्य और मंगलकी हो तो चौगुने मूल्य बुध,शुक्रको होता समभाव, गुरुवा- की हो तो अहमूल्य विक । ४१॥ जो शनि सूर्य मंगलवारको बहुतसी संक्रान्ति हो तो बनभाव तेज पचनको वेग और राजविग्रह हो । ४३ ॥ सूर्यादय में संक्रान्ति हो तो जंग- तेफी विपत्तिकै निमित्त हो मध्यमं दिन में हो तो सर्व धान्यका नाश हाँ अस्तसमयमै हो तो धनधान्यकी वृद्धि हो आधीरात में हो तो क्षेम और समिक्ष करें ॥४३॥ माघकृष्णदशमीकों मकरकी संक्रान्ति हो तौ धान्यसंग्रहसे आपादमें लाभ हो ॥४४॥ नंदातिथिको भेप संक्रान्ति थोडी घी कर भद्रा तिथिम राज्ययुद्ध जयाम व्याधि हो ॥ ४५ ॥ रिकामे पशुपात पूणाम धान्यवृद्धि हो ऐसा बालबोध लिखा है ॥ १॥ दिनयोग नक्षत्र और संक्रान्तिको घड़ी जी रकर चौगुना कर सतिका भाग दे ॥ ४ ॥ शुन्य बचे तो भय क्षय रोग हो एक वचे तो अन्न- प्राप्ति दोमें रस तीनमें रोग चार व. तो वस्त्रं तेज । १८ जो चैत्र शनिवार त्रयोदशीको मीनकी संक्रान्ति हो तो निंद्य वर्प जानना शीघ्र धान्यनाशंक है । ४९॥ चत्रकी संक्रान्तिको यदि,वर्षा हो तो धान्यप्राप्ति और लोकमें महा सुख हो.॥५०॥ वैशाखज्येष्ठको संक्रान्तिमें वर्षे तो मिलाहुवा फल हो,मध्यम वर्ष और सण्डवो, हो ।-५६ ॥ वैशाखशुक्लपक्षमें वृषकी संक्रान्ति वृपका चंद्रमा हो तो सब क्लेश दूर होकर सुख हो ॥५२॥ जो ज्येष्ठ पंचमीको वृप- संक्रान्तिकें दो दिन पीछे मेघ वर्षे तो सुभिक्ष हो ॥ ५३॥ आपाढे चैव संक्रान्तौ यदि-वर्षति माधवः । व्याधिरुत्पद्यते घोरः श्राव : गणे शोभनं तदा ॥ ५४॥ आषाढे कर्कसंक्रान्तो शनिवारो भवेद्यदिः। तदा दुर्भिक्ष्यमादेश्यं धान्यस्यापि.महर्वता॥ ५५ ॥ श्रावणे कर्कसंका न्तिदिने जलधरागमात् । पीडाचमूषकादेव जायते तत्र वत्सरे॥५६॥ दशम्यां शनिना,युक्तः श्रावणे सिंहसंक्रमः। अनन्तधान्यनिष्पत्तिर्भवे । मेघमहोदयः॥ ५७॥भाद्रपदसिंहसंक्रमदिने वीज़लंदबंधनीपुरतः। संक्रान्तेर्दिनयुग्मान्तरे न वृष्टिर्यदावृष्टिः॥५८॥ आश्निस्यापि संक्रा तौ दृष्टे मेघमहोदये। राज्ययुद्धं प्रजाः स्वस्था धान्यैरापूर्यते जगत् ॥ ॥५९ मासे भाद्रपदे प्राप्ते.संक्रान्तो यदि वर्षति-बहुरोगाकुलोलो को आश्विन शोभनं पुनः॥६०॥ कार्तिक मार्गशीर्षे.वा संक्रान्ती यदि वर्षति । मध्यमं कुरुते वर्ष पोपमासे मुंभिक्षका ६१ मार्गशी पंधराशो यदा याति दिवाकरः तदा वर्षे चे निर्दग्धं वृश्चिकेकसुखा वहः॥ ६२॥ द्वादश्यां पश्चिमे पक्षे मार्गशीर्षे च संक्रम। यदि मंगल वारस्याहुःखाय जगतो मतः॥६३॥ पोपमासस्यसंक्रान्तो यदा मेवम . V .

M भाषाटीकासहित । १०७ 'होदयः । बहुक्षीरास्तदा गावो वसुधा बहुधान्यदा ॥६४॥ पौषमासे. यदा भानो रविवारेण संक्रमः । हाहाभूतं जगत्सर्वं दुर्मिक्षं नात्र संशयः ॥६५॥ माघमासे दशम्यां च कुंभसंक्रमणं रवेः। रोहिणी सूर्यबारेण, कार्तिकान्ते महर्षताम् ॥६६॥ फाल्गुने चैत्रसंक्रान्तौयदि वर्षति माध वः। विचित्रं जायते सस्य माधवज्येश्योरपि ॥६७॥ अर्थ:-यदि आपाढको समान्तिको वा हो तो घोर व्याधी हो श्रावणमें शुभ है ॥५४॥ आपाढमें कर्ककी सत्रान्तिको यदि शनि हो तो दुर्भिक्ष और धान्यभाव तेज हो ॥५५॥श्रा- वणमें कर्ककी सत्रान्तिको वपी हो तो मूपोंसे पीडा रहै ।। ५६।। श्रावणदशमी शनिवारके दिन सिंहकी सत्रान्ति हो तो धान्यकी अधिकः प्राप्ति और वी अच्छी हो ॥ ५७ ॥ भादोंमें सिं- इसक्रान्तिको वर्षा हो तो वर्षाको रोके सत्रान्तिके दो दिन अन्तरमें यदि न वर्षा हो तो आगे वर्षे ।। ५८ ॥ आश्विनकी संत्रान्तिको यदि मेघ वर्षे तो राजोंमें युद्ध प्रजामें स्वस्थता जगत् धान्यसै पूर्ण हो ॥ ५९ ॥ भाद्रमासको सत्रान्तिको यदि वपी हो तो लोग अधिक रोगसे व्याकुल हो आश्विनमें अच्छा हो ॥६॥ यदि कार्तिक और मार्गशीर्पको सप्रान्तिको वर्षा हो तो मध्यम वर्ष और पोपमें सुभिक्ष हो ॥ ६१ ॥ मार्गशीपमें धनसनान्तिको वर्षे तो वर्ष नष्ट और वृश्चिकसत्रान्तिको वर्षे तो सुखदायक है । ६२॥ हादशी शुक्लपक्षमें संक्रान्ति म. गलमारी मार्गशार्पमें हो तो जगतमें दुःखके निमित्त है ।। ६३ ॥ पोपकी सक्रान्तिको परें, तो गो आधिक दूध दें और पृथ्वीमें धान्य अधिक उत्पन्न हो ॥ ६४ ॥ पूपकी सक्रान्ति मदिर- विवारी हो तो सब जगतमें हाहाकार नार दुर्भिक्ष हो इसमें सन्देह नहीं ॥६५।। मादशमीको कुभको सक्रान्ति रोहिणी नक्षनयुक्त रविवारी हो तो कार्तिकान्तमें अन्न तेज हो ॥ ६६ ॥ फाल्गुन और चैनमें सत्रान्तिको यदि मेघ वर्षे तो वैशाख ज्येष्ठमें अच्छा अन्न हो । ६० ।। संक्रान्तिनाच्यातिथिवारऋक्षधान्याक्षरं वन्हिहरेत्तुभागम् । संक्रान्तिना --डीनवमिश्रता च सप्ताहता पावकभाजिता च ॥ एके समर्व द्वितयेच. सोम्यं शून्ये समर्घ मुनयोवदन्ति ॥ ६८॥ मीनमेपान्तरेष्टम्यांमंगलेधा- न्यसंग्रहात् । दिखिश्चतुर्गुणोलाभ इत्युक्तंपूर्वसूरिभिः ॥ ६९ ॥ कुंभमी- नान्तरेष्टम्यां नवम्या दशमीदिने,रोहिणी चेत्तदा वृष्टिरल्पमध्यादिका कमात् ॥ ५० ॥ कार्तिके फाल्गुने मार्ग चैत्रे-श्रावणभाद्र्योः। संक्रम प्वशुभः पदस यदि वर्षति वारिदः ॥ ७१॥ पौषे माघे सबैशाखे ज्येष्ठा पाढाधिनेषु च । संकान्तौ वर्पति वनः सर्वदेवसुशोभनः॥७२॥ इति श्रीमेघ देवगणिविः सूर्यचारकथनोनाम दशमोधिकारः ॥१०॥ अर्थ. संत्रान्तियो पड़ी और गईई तिथि यार नक्षत्र और पान्यके नामाभर एकत्र कर - . १

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रमें शुम हो कुंममें उदय हो तो चने उर्द तिलौंका नाश हो॥ १९॥ मीनमें समिक्ष आरोग्य
भाषार्टीकासहित ।
१०९
सरे॥१०॥ पंचतारों ग्रहा यत्रं सोमं कुर्वन्ति दक्षिणे। भौमे च राज
मारीः स्याजनमारिश्च भार्गवे ||११|| बुधे रसक्षयं विद्याद्गुरौं कुर्यान्निरों
दकम् । शनों वर्षक्षयं कुर्यान्मासे मासे विलोकयेत्मा १शा चित्रानुरी
घा ज्येष्ठां च कृत्तिका रोहिणी तथा। मघामृगशिरों मूलं तथापादवि
शाखयोः ॥ १३॥ ऐतेपामुत्तरीमार्गे यदा चरति चन्द्रमा सुभिक्ष क्षे
मवृद्धिश्च-सुवृष्टिर्जायते तदा ॥ १४॥ एतेषां दक्षिणे मार्गे यंदा चरति
चन्द्रमाः । क्षयं गच्छन्ति भूनाथा दुर्भिक्षं च भये पर्थेि ॥ १५॥ चन्द्रो
दयेमेषरोशौ ग्रीष्मे धान्यमहर्घता। वृषे माषस्तिलगुरुतुपधान्यमहर्षता
॥१६॥ कर्पाससूत्रधान्यादि मह मिथुनेस्मृतम् । अनावृष्टिः कर्कराशी
सिंहे धान्यमहर्षता ॥ १७॥ चतुष्पदंविनाशोपि राज्ञामन्योन्यविग्रह।
द्विजादिपिडा कन्यायों तुलाकयणक प्रियम् ॥ १८ ॥ वृश्चिक धा
न्यनिष्पत्तिधनुर्मकरयोः: शुभम् । कुंभेतु चणकापादितिलांना नाश
इष्यते ॥ १९॥ मीने सुभिक्षमारोग्यं फलं द्वादशराशिजम् । एवं ज्ञेयं
द्वितीयायां नियमप्यत्र भावनात् ॥ २० ॥
अर्थ:-यदि गोवर्द्धनके दिन चन्द्रर्मा उदय होय तो प्रजा गौ राजाका नाश होगा
ज्येष्टमासकी शुक्लप्रतिपदाको सूर्यास्तके समय देखे जो द्वितीयामें चंद्रमा उत्तरदक्षिणको उ-
दय हो तो विचारै ॥८॥ उत्तरकी ओरको उदय हो तो मुभिक्ष. दक्षिणकी ओरको दुर्भिक्ष हो
बीचमें हो तो मध्यम वर्प हो ॥ ९ ॥ जो ग्रहों के उत्तरभागमें चन्द्रमा गति करें तो समिक्षक्षेम
और आरोग्य हो॥१०॥ और जो पांच तारा ग्रह चंद्रमाकी प्रदक्षिणा करें मंगलवार हो तो
राजमारी शुक्र हो तौ प्रजामारी हो ॥११॥ बुध हो तो रसक्षय हो गुरुवारकी हो तो जलं न
वर्षे शनि हो तो वर्पक्षय करे इस प्रकार महीने २ विचरे ॥ १२ ॥ कृत्तिका अनुराधा ज्येष्ठा
चित्रा रोहिणी मघा:मृगशिर मूल पूर्वापाढा विशाखा ॥ १३ ॥ इनके उत्तरमार्गमें-जो.चंद्रमा
निकेतो समिक्ष क्षेम वृद्धि अच्छी वर्षा हो ॥१४॥ और जो इनके दक्षिणभागमें चंद्रमा चले
तोराजौंका क्षय और दुर्भिक्ष हो १५ ॥ शुक्ल द्वितीयाके दिन मेष राशिमें चन्द्रोदय होय तो
श्रीप्यमें धान्यभाव तेज यूपमें उर्द तिल अगर तुप धान्य अकरे। हो ॥ १६ ॥ मिथुनमें कपास
सूत्राधान्यादि तेज ही कर्कराशिमें अनावृष्टि और सिंहमें हो तो धान्यभाव तेज ॥ १७ ॥
न्या उदय होनेसे चौपायौंका विनाश राजोंमें परस्पर विरोध हो और ब्राह्मणादिकोंको
पीड़ा हो तलामें व्यापारी वस्तुका आदर हो॥ १८ ॥ पृश्चिकमें धान्यकी उत्पत्ति हो धनमक-
'हो यह द्वादश रोशिका फल दितीयाके दिन विचारना चाहिये ॥ २०॥

वर्षप्ररोध।
चन्द्रास्ते मेपराशिस्थे सर्वधान्यमहर्घता । वृषे च चणिकापीडा मृत्यु
श्चौरमयं जने ॥ २१॥ मिथुनेष्वतिवृष्टिः स्याहीजवापेन पुष्टये। कर्क
टेप्यतिवृष्टिः स्यात सिंहे धान्यमहर्षता ॥२२॥ कन्यायां खण्डवृष्टिश्च
सर्वधान्यसमर्घता । तुलायामल्पवृष्टिः स्यादेशभंगो भयं पथि ॥ २३ ॥
वृश्चिके मध्यम वर्ष ग्रामनाशोप्युपद्रवात् । मुभिक्षं धनुषाधान्यैर्मकरेचा
न्यपीडनम् ॥,२४ ॥ कुंभेल्पवृष्र्धािन्यानि महर्षाणि प्रजाभयम् । मुख
संपत्तयोमीने मासं यावदिदं फलम् ॥ २५ ॥ वैशाखे यदि वा ज्येष्टे,
तरस्यां विधूदये । बहुधा धान्यनिष्पत्तिर्भवेन्मेघमहोदयः॥२६॥
अथ मंगलचारः।
शीतपीडाश्विनीभौमे तुपधान्यमहर्घता। द्विजपीडाभरण्यादेर्नाशः स्या
दतिशीघ्रगे ॥२७॥ सर्वदेशे ग्रामपीड़ा,धान्यानां च महर्घता। कृत्तिका
यां देशभंगोपीड़ा तापसआश्रमे ॥ २८ ॥ वृक्षपीडा-श्वापदानां रोग
स्याद्रोहिणी कुजे । महर्घतापि कार्पासे वस्त्रे.सूत्रे विशेषतः ॥ २१॥ का
पासनांशप्रबलं सुभिक्षं मृगे कुजे भूर्जलपरितैव । दृष्टिश्चरौद्रोदतिजे.
: लानां नाशो विनाशो महिपीकुलस्य ॥३०॥ पुष्ये कुजे चोरभयं विरो
धाच्छुभं न किंचिन्नृपनिर्बलत्वम् । साल्पवृष्टिबहुधान्यनाशो दुर्भिक्षम
बोरगदेशभीतिः॥ ३१ ॥ पैव्येन वृटिस्तिलमापमुद्गविनाशनं दुर्लभता
नधान्ये। स्याद्योनिदे चेतिजेअल्पवृष्टिः प्रजासु पीडा गुरुतैलमूल्यम् ।।
॥३२॥ तथोत्तरायां जलवृष्टिरोधाचतुष्पदे पीडनमश्वमूल्यम् । हस्ते की,
जेल्पांघु च तुच्छधान्यं घृतं गुरो वालवणं महर्षम् ॥ ३३ ॥
अर्थ:-मेंप राशिमें चन्द्रमा स्थित हो तो सबधान्य करे वृषमें हो तो चने सेज मनायोमें
मृत्यु और चोरभय हो ॥२१॥ मिथुनमें हो तो वर्षा अधिक बीजवानेसे पुष्टि हो कमी
अधिक पो हो सिंह धान्य अकरे हौं । २२०॥ कन्यामें हो तो वएडवृष्टि सबघान्य सस्ले
सुलोंमें थोडी वर्षा देशभग और मार्गमें भय हो॥२३ ॥ वृश्चिकमें मध्यम वर्ष हो ग्रानाश
*और उपद्रव हो धनमें धान्य अधिक सुमिक्ष हो मकरमे धान्यपीहा ॥२४॥ कम वोडीवी
पाय अकरे मजामें मय मौनमें सुखसंपत्ति एकमासतक यह फल जानना चंद्रमा अमासकी
रॉशिपर मस्त होता है ॥२५॥ वैशास या ज्येटमें जो उतरकी ओर चन्द्रमा उदय होती
धान्यकी माप्ति अधिक मेधका उदय हो ॥ २६ ॥ अथ मगलविचारमा अश्विनमें मगल होतो
शीतकी पीडा तुप और धान्य अकरे हो भरणीमें ब्राह्मणोंको पीडा और अनिष्ट हो ॥२७॥

१११ मापाटीकासहित । मैं देश और ग्राममें पीडा धान्य तेज कृतिका देशभंग और तपस्वियोंको पीडा हो॥२८॥ रोहिणी में मंगल हो तो वृक्ष और चौपायौंको पीडा और कपास मूत बस्त्र अरे ही ॥२९॥ भृगशिरमें हो तो कपासका नाश शेप सर्वे सुभिक्ष पृथ्वी जलसे पूर्ण हो, तिल और महिपी- मुलका नाश हो ॥३०॥ पुण्यमें मगल हो तो चौरमय विरोध हो शुभ कुछभी नहीं हो राजा निर्बल हौं आश्लेषामें थोडी वर्षा धान्यनाश अधिक दुर्भिक्ष और सर्प भय हो॥ ३१॥ मघामें हो तो वर्षाका अभाव तिल उर्द मूगका नाश घान्य दुर्लभ पूर्वाफाल्गुनी थोडी वर्षा प्रजामें पीडा तेल भाव तेज ॥ ३२ ॥ उत्तराफाल्गुनीमें हो तो वो थोडी चौपायोंका नाश घोडौका मूल्य अधिक हस्तमें हो तो थोडा जल व थोडा धान्य हो घृत सेंघा अकरा हो ॥ ३३ ॥ चित्राकुजे तीव्ररुजोतिपीडा शालीष्टगोधूममहर्वतापि । वातावनावृष्टि स्थद्विदेवे कार्पासगोधूममहर्घभावः ॥३४॥ मैत्रे सुभिक्ष पशुपक्षिपीडा ज्येष्ठी कुजे स्वल्पजलं च रोगाः । मूले द्विजक्षत्रियवर्गपीडा महर्षता वा तुषधान्यराशेः ॥३५॥ पूषाकुजे भूरिजलापयोदा गांवोल्पदुग्धा वसु धीन्नपूर्णा । महर्घताशालितिलाज्यमाषेष्वपि तत्पूर्ववदेवभावें ॥३६॥ श्रुतौ च रोगा बहुधान्ययोगोभूम्यां न पश्चाजलदागमश्च । स्यावास वे चासववत्समृद्धि र्धान्यैः समर्घ गुडशर्करादि ॥३७॥ स्युर्वारुणे की टकमूषकाद्यास्तथापि धान्यानि बहुनि भूम्यां । पूमामहीजे तिलवस्त्र रूतकासपूगादिमहर्घता वा ॥ ३०॥ दुर्भिक्षमेवोत्तरभाद्रिकायां वर्षा नमेघोन्नयनेपि किंचित् । सौख्यं सुभिक्षं क्षितिजे सपौष्टो नरेषु रोगा व हुधान्यलक्षया ॥३९॥ यत्र राशौ कुजो याति वक्र तत्र सुनिश्चितं । तद्वाच्यानि क्रय्यणानि महर्घाणि भवंति हि ॥ ४०॥ सिंहे मीनेथ क ज्यामिथुनधनुषि वा वक्रितो मंदभूमौ पृथ्वीमुद्रास रूपां रिपुदलद लितां विग्रहान्तां च धोरां । दुर्भिक्षं सस्यनाशं भयमपि कुस्तः पापरोगं प्रजानां । पीड्यन्ते,गोमाहिष्यो भुवि नरपतयः पापचित्ता,भवन्तिा४१॥ अर्था-चित्रामें मगल हो तौ रोग और पाड़ा धान गहूका भावतेज हो स्वातिमें अनावृष्टि विशाखामें कपास और गोधूम अकरे हों ॥३४॥ अनुराधामें सुभिक्ष पशुपक्षियौंको पीडा हो व्येष्टामें मगल हो तो थोड़ा जल और रोग हो मूलमें ब्राह्मण क्षत्रियोंको पीडा हो अथवा तुप और धान्य अकरे हो॥ ३५ ॥ पूर्वापाढके मंगल हो तो वादलोंसे अच्छी वर्षा होगी यौडा 'दूध दै पृथ्वी अन्नसे पूर्ण हो धान्य तिल घी उर्द अकरे हाँ उत्तराषाढमें भी पूर्ववत्भाव रहे मा ३६ ॥ श्रावण भी रोग हो धान्यकी प्राप्ति हो पीछे जलकी वर्षा हो घनिष्ठामें इन्द्रवत् स- मृद्धि हो गुड शर्करादि धान्य सस्ते हों ।। ३७ ॥ शतभिषामें कीटमूपकोंकी प्रबलता हो तौभी ११२ । पर्पप्रबोध। पृथ्वीमें धान्य,अधिक हौं पूर्वाभाद्रपदमें मंगल हो तो तिल वस्त्र सुपारी कपास भावतेज हो ॥ ३८॥ उत्तराभाद्रमें मंगल हो तो दुर्भिक्ष करै वर्षा और अन्नकी उत्पत्ति न हो रेवती-- गल हो तो सुख और सुभिक्ष करै मनुष्यो रोग धान्यकी अधिकता हो ॥३९॥ जिम रा- शिमें मंगल होता है उसमें वकी भी निश्चय होता है वह फलसहित करते हैं ॥ ४०॥ सिंह मीन कन्या.मिथुन धनमें मंगल, शनि, वक्री हो तो पृथ्वीमे हेप शट दलसे कष्ट घोर विग्रह मिक्ष खेतीका नाश भय और प्रजाओंको पापरोगसे पीडा गौ महिपी राजाको पीडा हो और चित्तमें पापकी प्राप्ति हो॥४१ ।। कन्यामीनधनुःसिंहे प्यार्किभोमो च वक्रितो । कुर्वन्ति विभ्रमं लोके न पाणां क्षयकारकौ ॥. ४२ ॥ कृत्तिकारोहिणीसौम्यमघाचित्राविशासि का ज्येष्ठांनुराधामूलानि पूर्वाषाढा तथा पुनः ॥४३॥ एतेषां चैव ऋक्षाणां भौमशुक्रस्तथाशनिः । उत्तरस्यां यंदा यातिमास्यापादेविशेष तः ।।४४ ॥ सुभिक्षक्षेममारोग्यं मध्ये च मध्यमःफलं । दक्षिणेन यदा यान्ति ईतिरोगभयं भवेत् ॥४५॥ चलत्यंगारके वृष्टिरुदये च बृहस्पते। शुक्रस्यास्तंगमे वृष्टिविधावृष्टिःशनैश्चरे॥ ४६॥ मेपवृश्चिकयोमध्ये यदा तिष्ठति भूसुतः । तदा धान्यं महर्ष स्यान्मासद्धयेमुदाहृतं ॥४७॥रवि राहुशनिश्चरभूमिसुता उदयन्ति च मध्यमराशिगताःधनधान्यहिर ण्यविनाशकरी विलयन्ति महीपतिछत्रधराः ॥४८॥शनिमीने गुरुः कर्के तुलायामपि मंगलः । यावचरति लोकस्य तावत् कष्टपरंपरा।टि९॥ भौमस्याधों गुरुस्तिष्ठेद्गुर्वधोपि शनैश्चरः । ग्रहाणां मुंशलं ज्ञेयमिदं जग दरिष्कृत् ॥५०॥रविराशे पुरों मोमो दृष्टिसृधिनिरोधकः । भोमाया यामगाचन्द्राचत्वारो बृष्टिनाशकः ॥ ५शा भौमवके अनावृष्टिर्बुधवक्रेध नक्षयः गुरुवक्रे स्थिरौं रोगो शुक्रवक्रे सुखी प्रजा गा २७ ।। शनिवके जने पीडाराहुः स्यादग्निकारक चतुर्ग्रहानवको स्युम्योगोयं कथितो बुधैः ॥ ५३॥ यत्र मासे ग्रहाः सर्वे 'वक्रत्वं यान्ति देवतः । तन्मासेति, महघस्याद्धान्यं वा राजविग्रहः ॥५४॥ अर्थः कन्या मीन धन सिंहमें शनि मंगल. वक्री हों तो लोकमें विभ्रम और राजाका क्षय करें ॥ ४२॥ कृत्तिकारोहिणी मया चिना विशाखा ज्येष्ठा अनुराधा. मूल, पूर्वापाता ।। ॥ ४३ ॥ इन नक्षों में मंगल शुक्र शनि उत्तरकी औरको विशेषकर आपादमासमें भावे. तो ॥४४॥ सुभिक्ष क्षेम आरोग्य हो मध्यमें मध्यम फल दक्षिणकी ओरको आवे तो ईति और , 4 7.

मापाटीकामहित । ११५ लेपंक्षिपशूनां चबालपीडा विजायते । धान्यं मंद च पूषायां व्याधि मौष्मेपि वर्षणम।। उषायोसिस्यनिष्पत्तिरष्टवर्षशिशुक्षय श्रुतो गुंडातसीधान्यचणहिमाद्भयम्॥७॥ वासवेत्तु गवा पीडा वारुणे शुद्ररोगताग दुर्भिक्षमय पृफाय िक्षममारोंग्यता स्मृतागा७/1ऊफायर्या नृपतिक्लेश आरोग्यपिशुपक्षिणावत्या नंदन चंन्द्रो महंधै कुकुमाय फिमाणा मेषेचुधस्योदयतोगवादि चतुष्पदानां महतीह पीडा। ती दिना धान्यमहर्घती च वृषेतिवृष्टिमिथुनेन वर्षा कर्के सु खसिंहपदेचतुष्पानियेताकन्या बहुधान्यसोख्यं । भूकंपयुद्धादितुलो दिने तथाष्टमे राजसंयोमुर्भिक्ष।। ८१॥ ND ITE माना अर्थी कृत्तिकामे बुध हो तौबाह्मणों को पीडा मेघ थोड़ा अनाथोड़ा वरवाधा कहीं विग्रह हो । रोहिणीमें बुध हो तो तिल सूत-कपास तेज, मृगशिरमें सुभिक्ष वात वर्मा अधिक हो । ६८ गहूं तिल उरद सस्ते मनुष्य मुखी आद्रा में वपी अधिक ग्रेहपात पवनका वर्ग हो ॥६९ ॥ पुनर्वसुम वालपाड़ा सूत कपास भाव मैदा'जनोमें मैल पुष्यम राजाको मेय और जयाहोना आश्लेपाने महावा तुपधान्यकी उत्पत्तिमधामें बध, हो तो थोड़ी वपी धान्यनाश प्रजाको भय होः॥७१ ॥ पूर्वाफाल्गुनी में राज में संग्राम क्षेत्रवाधा अन्न-मंदा उ- सराफाल्गुनीम उदै मंगादि थोड़े उत्पन्न हो ॥७२॥ इस्तमें बधं हो तो समिक्ष धान्यप्राप्ति हो चित्रामें गणिका कारीगर हिजातिको पाड़ा थोडी वो हो । ४३ ॥ स्वातिम बुध हो तो थोड़ा पी विशाखा में संभिक्ष और कहीं कुछ व्याधिभय और दुर्भिक्ष हो ।।७४ ।' अनुराधामें समिक्ष पक्षियोंकी पौड़ी और मजाको मुख हो ज्येष्ठांमें ईख धान्य घो तेज घोडौंमें रोग हो। नग्छ । मूलमें पक्षियोंके बचे पशु और बालकौंको पीड़ा हो पूर्वापाढमें धान्यकी मंदता और धीममें व्याधि और वो हो ७६ ॥ उत्तरापाढाम खेतीमें धान्य अच्छे उपजे 'आठ वर्षके बालक क्षय ही श्रवणमें गई अलसी धान्य चनेको हिम (ओले वा शीत) भय हो । संगी धनिष्टा गायाको पीडा शतभिषामें शूद्रोंको रोग पूर्वाफाल्गुनीम दुर्भिक्ष पीछे क्षेम और आ- रोग्य होना या उत्तराफाल्गुनी में राजौको क्लेश पशुपक्षियोंको आरोग्य रेवतीम बुध हो तो कुमकुमादि तेज विक ॥ ७९ ॥ मेपमें बुधका उदय हो तो गौ चौपायौंको पीडा टीडी आदि- भार धान्यभाव तेज हो धूपमें हो तो अधिक वर्षा मिथुनमै वर्षा न हो ॥ ॥ कुकर्म सस सिंहम चापायौंको मृत्यु कन्या में बहुत धान्य और सुख तुलामें उदय हो तो भकप और यद्ध हो.पृश्चिकमें उदय हो तो राज्यमय और संभिक्ष हो । iPT: धनुर्बुधस्याम्युदयात् सुखानि मृगे महीधान्यरसादिपूर्णा । कुंभतिवायुः पथिमिश्च मीने दुर्भिक्षपक्षो यदि वातिवृष्टिः॥२॥ आपाटमासे यदि शुक्लपक्षे चन्द्रस्य पुत्रोम्युदयां करोति । शुक्रस्य वेच्छावणमासिचारतम् -

१११
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मापाटीकासहित ।
नाश हो॥९॥शेषानक्षत्रीका फलदारानुसार जाना इसप्रकार गतिके अनुसार मुभिक्ष दु-
मिक्षको फैलजानना नामर्तिपदादि चार तिथियोंमें पृथ्वी में सुख पंचमी आदिवार
निषिमें चोरोंदिकामयानवमी आदि चिारतिथिमें उदय हो तौ राजौम यह शेषमें दुर्भिक्षऔर
वातीदिको सुख ॥ ११॥ ज्येष्ठमें शुक्रका अस्त हो तो महावृष्टि औरामजाका क्षय होभापति
दमेजलको शुष्कता श्रावणमें महाकष्ट हो,१२॥माद्रपदमें धनधान्यकी सम्पत्ति होआ
श्विनमें सुमित कार्तिकमें बडी वर्षा होn१३ ॥ मार्गशीर्षमैरानीका युद्ध प्रनामें मुखापोप
माघमें छवभंग फाल्गुनमें अग्निका भय हो ॥ १४ ॥ चैत्र में हो तो छः महीनेतक दुर्भिक्षयन-
कानाश होवेशाखमें हो तो चौपायौँमें पीडा हो ॥ १५ ॥ जो शुक्लपक्षमें शुक्रउदयोया अस्त।
हो तो पृथ्वी सहस्र राजपुत्रौंकारुधिर पीवै॥ १६॥ मेरमें शुक्रअत हो तोसिवाधान्य तेजी
वृषमें हो तो चौपायौंको पीडा.धान्यकी प्राप्ति हो ॥ १७॥ TT TIFFIF THE
मिथुने वैश्यपीडास्यादल्पवर्षा प्रजाभयं । कर्कटे बहुला वृष्टिर्जायते।
नात्र संशयः ॥ १८॥ सिंहे पीडा भूपवर्ग तथानांवृष्टिज भयं । कन्या,
यविद्यलोकस्य सूत्रधारस्य पीडनं ।। १९ ॥ तुलायां सिंहवत्सर्वदुर्भिक्ष-
वृश्चिकोमतं स्त्रीधान्यनाशोधनुषि मकरे धान्यसंपदः॥२०॥दिजला
पिीडा कुंभैराशौ मीनें मेधमहोदयः।रोगनाशः प्रजासौख्य पृथिव्या
बहुमंगल।।२१॥ग्रहयोग यदि तिष्ठति भौमस्य क्षेत्रे कोपि ग्रहस्तदा ।
पण्मासात्तुषधान्यानो जायते च महर्घता ॥ २२॥ शुक्रक्षेत्रे कुंजे. मांस
ईये नन महर्षता । चंद्रेच दिननाथे च सर्वरोगोऽशुभं तदा ॥ ३
शनों राहो सर्वधान्यं महर्घ राजविग्रहः । बुधे क्षेत्रे रखो चन्द्र विरोधास
भूभुजां ॥ २४॥ उत्पत्तिस्तुषधान्यानां पंचमासात्मजायते । शुक्रक्षेत्रे
बुधे भद्र चन्द्रक्षेत्रे भृगो सुते ॥ २५॥ पाखण्डानां भवेदिः धान्यान
च महर्घता । रविक्षेत्रे भूगोः पुत्र पशूनां चे महर्घता २६ शनिक्षेत्र
शनोदेशे घृतधान्यमहर्षता। चन्द्रभास्करयोः क्षेत्रे सुभिक्षं चंद्रसूर्ययो!
॥२७॥ पशुनाशो धान्यवृद्धिडादीनां महर्षता। गुरुक्षेत्रे शनो राहो
पशुनाशस्तृणक्षयः॥ २८॥ मोमेराज्ञां घिरोधश्च बुधे,वृष्टिस्तु भूयसी।
भोमे क्षेत्रे यदा सन्ति राहो भोमार्कभार्गवाः ॥ २९ ॥ पण्मासान गुड़
कापासघृतक्षारमहर्घतासंदक्षेत्रे यंदा सन्ति गुरुमंदबुधास्तदा।।३।।
चतुष्पदानां नाशश्च शंखस्य-च महर्षता । भोमक्षेत्रे भार्गवे, च धान्या
नां च महर्षता ॥३१॥

भापाटीकासहित । सम्या च शनिमोमै भवेतां वक्रगामिनो। हाहाकारस्तदा लोके विशेषा दक्षिणापथे॥४३॥शनिःकुजो देवगुरुयदि शुक्रगृहेत्रयं । एकत्र गुरु शुक्रो वा तदा वृष्टिरणोथवा ॥४४॥ कार्तिकस्य नवम्यां चेद्ग्रहा-पंचक राशिगाः। अकालेपि महावृष्टया नद्यः पूर्णापयोभरैः ॥४५॥ मार्ग शीर्षे ग्रहाः पंच यदि स्युः एकराशिगाः । तदाजनेति मारीस्यात् नृप स्य मरणं क्वचित् ॥ ४६॥ इति श्रीमेघमहोदये मेवग० ग्रहणविमर्शनोनामेकादशोधिकारः॥११॥ अर्थः-शनिके क्षेत्रमें यदि सूर्य हो तो वस्त्र अकरे विकै और गुरुके क्षेत्रमें शूक्र और मंग- ल हो तो प्रजाको पीडा हो ॥ ३२॥ भौमके क्षेत्रमें चंद्रमा उदय हो तो तुप धान्यकी वृद्धि हो शुक्रके क्षेत्रमें उदय हो तो शुक्लवस्तुका उदय हो ॥ ३३ ॥ रविके क्षेत्रमें शनि चंद्र शुक्र हों तो बहुत वृद्वि हो और चन्द्रमाके क्षेत्रमें शुक्र चन्द्र बुधका उदय होय ॥ ३४ ॥ तो छः महीने दुर्भिक्ष और अतिवर्षा हो और बुधके क्षेत्रमें यदि राहु शनिश्चर हों तो ॥३५॥ पशुओंका क्षय प्रजापीडा धान्यभाव तेज हो और जो शुक्रके क्षेत्रमे चंद्र शनिका उदय हो तो॥३६॥ राजोंमें युद्ध धान्यभाव तेज हो और जो शनिके क्षेत्रमें मंगल सूर्य उदय हो। ॥३७॥ तव घृत और लाल वस्त्रोंकी वृद्धि हो, और शनि क्षेत्रमें शनि उदय हो तो ॥३८॥ तृण काष्ठ और लोहे का भाव तेज हो ॥ ३९ ॥ इति ग्रहयोग जो सौम्यग्रहके सामने क्रूर ग्रह आजाय अथवा क्रूर ग्रहोंसे शुभ ग्रहका वेध हो तो अवश्य दुर्भिक्ष हो ॥ ४० ॥ ग्रहोंमें युद्ध हो तो. राजौमें युद्ध हो वक्री हों तो देशमें विभ्रम हो, ग्रहवेध होती पीडा हो, यह तत्वदर्शियोंने कहाहै ।। ४१ ॥ जौ ज्येष्ठमहीनेमे पांचग्रह सूर्य के साथ एक राशिपर हों तो श्रावणमें वका तिरोध और कहीं छत्र भंग हो ॥ ४२ ॥ सप्तमीफे दिन यदि शनि मंगल वक्री हों तो लोकमें हाहाकार हो विशेप कर दक्षिणमें दुःख हो ॥ ४३ ॥ शनि मंगल बृहस्पति यदि तीनग्रह शुक के घरमें हों अथवा गुरु शुक्र हौं तौ वर्षा अथवा युद्ध हो ४४ ॥ कार्तिकको नवमीको यदि पांच ग्रह एकराशिपर हों तो अकालमें सब नदी जलसे पूर्ण हो ॥ ४५ ॥ यदि मार्गशीर्पमें पांच ग्रह एकराशिपर हों तो मनुष्योमें मरी पड़े वा राजाका मरण हो ॥ ४६॥ इति श्रीमेघमहोदये देवविजयगणिविरचिते ग्रहगणविमर्शनोनामेकादशोधिकारः ॥ १९ मा अथ नक्षत्रविचारः। कृत्तिकादिकनक्षत्रत्रयोदशकमब्दतः। सूर्यभोग्यं भवेद्योगमन्दस्सेहता शुभप्रदम् ॥ १ ॥ अश्विनीधान्यनाशाय जलनाशाय रेवती। भरणी सर्वनाशाय यदि वन्नकृत्तिका ॥ २ ॥ कृत्तिकायां निपतितः पंचशः अपिविंदवः । पूर्वपश्चाद्भवान् दोषान् हत्वाकल्याणकारिणी ॥३॥ अर्थ-वर्ष कृत्तिकादि तेरहनक्षत्र में सूर्यका प्रथमभोग होय तो शुभ है वर्ष अच्छा रहे ॥१॥ अश्वनी हो तो धान्यका नाश रेवती हो तो जलका नाग कर भरणी सर्व नाशी है यदि कोतका ॐ १२२ वर्षप्रबोध। न वर्षे ती ॥२॥ कृत्तिकामें पांच चारभी बूंदै पडे तो आगे पीछेके दोष दूरकर मंगल करें। अथ रोहिणीनिर्णयः। राशिचक्रं लिखित्वादौ मेपसंक्रान्तिमादिकं । अष्टाविंशतिकं तत्र लिखे नक्षत्रसंकुले॥४॥ संधौद्रयं जलं दद्यादन्यत्रैकैकमेव च । चत्वारः साग रास्तत्र संधयश्चाटतंख्यया॥५॥शृंगाणि तत्र चत्वारि तटान्यष्टो स्म तानि च । रोहिणीपतिता यत्र ज्ञेयं तत्र शुभाशुभम्॥६॥जाता जलप्रद स्येषा चन्द्रस्य परमप्रिया । समुद्रेति महावृष्टिस्तटे वृष्टिश्चशोभनाणा पर्वते बिंदुमात्रा च खण्डवृष्टिश्चसंधिषु । संधोवणिकगृहेवासः पर्वते कुंभ कद्गृहमालाकारगृहे सिंधौरजकस्यगृहे तटे। इति रोहिणीनिर्णयः९ अथ रोहिणी निर्णय ॥ हादश कोठेकी कुंडली रोहिणी चक्रमें गर्भित करें. संघि उत्तराभाद्रपदा पूर्वाभाद्रपदा तट सिंधू तट संघि रोहिणी अश्विनी रेव ती "संधि शतभिपा संधि भरणी यादा धनिष्ठा तट तट पुनर्वस 2- १२ सिंधु m सिंधु ४ अभिजित् श्रवण १० पुष्याश्लेपा ७ ८ श. उत्तरापाढा तट संधि | ग. तट मघा संधि तर उ०० 6 तट सिंध पूर्वीपाटा पूर्वाफा ल्गुनी 'स्वाति चि वा संधि संधि रा धा ज्येष्ठ विशाखा १२३ श्लेषायां च मंजिष्टा गोधूमश्चमसूरिकाः। मरिच कोद्रवाशालीमासिक पश्चिमासुखं ॥ २२ ॥ मचायां तिलतेलाज्यप्रवालचणकागुडाः। अत मापाटीकासहित । सूर्योदये रोगकरीस्मृतार्दा घटीद्धये विग्रहरोगयोगः। मध्यान्ह काले कृषिनाशनाय धान्यं महर्च च तृणस्यनाशः ॥ १० ॥ संध्यस्थिता द्रा कुरुते सुभिक्षं रात्रौ स्थिता सर्वसुखाय लोके । भोगंप्रदत्ते खल्लुमध्य रात्रे पूर्व सुखं दुःखमतो परात्रेः॥११॥ इत्यादीप्रवेशः। माघार्कदिवस त्यक्त्वा सर्वनक्षत्रवर्पणं । हर्षणं सर्वलोकानां कर्षणं फलदायकम्॥१२॥ अट्ठाईस नक्षत्र रखिये दो दो समुद्र में एक एक शृंगमें एक एक नक्षत्रसंधिमें एकएक तटमें मेषकी संक्रान्ति जिसनक्षत्रमें हो उस नक्षत्रमें घरै जो रोहिणी समुद्र में पड़े तो अधिक वर्षा शृंगमें पड़े तो थोडी वी संधिमें हो तो कभी न वर्षे तटमें पडे तो अच्छी वर्षा हो अश्विनीके स्थानमें संक्रान्ति नक्षत्र धेरै संधिमें हो तो वैश्यके घर पर्वतमें हो तो कुह्मारके सिंधुमें हो तो मालीके और तटमें हो तो धोबीके घर रोहिणीका वासजानिये ४।५।६।१८।९।इति रो। अय आद्रीप्रवेशः सूर्योदयमें आर्दी हो तो रोग कर दो घडी हो तो विग्रह और रोग करें मध्यान्ह में हो तो खेतीका नाश करै धान्य अकरे और तृणका नाश हो ॥१०॥ संध्यामें आर्द्रा हो तो सुभिक्ष करै रात्रि में हो तो सब लोकोंको सुखी करे मध्यरातमें भोग प्रदान करै पूर्वमें सुख और अपरात्रिमें दुख करे ॥ ११ ॥ इत्याद्रो प्रवेशः मघामें सूर्य आवै उस दिनके छोडकर और सब नक्षत्र वर्षे सब लोकौंको प्रसन्नता और किसानोको फलदायक हैं ॥ १२ ॥ हस्तार्कसंक्रमावर्षासर्वाभीति निवारयेत् । स्वातिवृष्टिौंक्तिकानिनिष्पा दयतिनीरधौ ॥१३॥ सौम्यवारेनक्षत्रे चारः शुभकरः स्मृतः । अर्का रमंदवारेषु नक्षत्रभ्रमणेऽशुभम् ॥१४॥ सौम्यवेधे समर्घत्वं क्रूरवेधे मह र्घता। देशः कालश्च वस्तूनिग्रहवेधेत्रिपु स्मृतः॥१५॥ व्रीहियवाश्चचण का हीरका धातवस्तिलाः॥ कृत्तिकावेधतो मासा नष्टयाम्यादितोसुखं ॥१६॥ रोहिण्यासर्वधान्यानि सर्वे रसाश्च धातवः । जीर्णाकंबलका पाच्यामसुखं दिनसप्तकं ।। १७॥ मृगशीर्षेऽश्वमहिषी गावोलाक्षादिको द्रवाः। विविधानि जलान्नानि पीडापष्ठिवासरान् ॥ १८ ॥आर्द्रायां ते ललवणसर्वक्षाररसादयः । श्रीखंडादिसुगंधीनि मासं स्यात्पश्चिमाऽसु खम् ॥ १९॥ पुनर्वस्वोः स्वर्णसूतकार्पासश्चतथातिलाः । कुसुम्भः श्या मकौशेयं माषयुग्मोत्तरासुखम् ॥ २० ॥ पुष्ये स्वर्णघृतं रूप्यं शालिशो चलसर्पपाः । सर्जिका तेल हिंग्यापि याम्यपीडाप्टमासिकी ॥२१॥ आ -- १२४ वर्षप्रवोध। सीदक्षिणे देशे विग्रहश्चाष्टमासिका ॥ २३ ॥ उफायां कंबलोर्णादियुगं धरी तिलास्तथा । रजतं वस्तुजातानि याम्यां पीडाप्टमासिकी।॥२४॥ उफायां माषमुगाचं तंदुलाः कोद्रवाः पुनः । सैंधवं लशुनं सर्जिमासे यु म्मोत्तरा यथा ॥२५॥ हस्ते श्रीखण्डकपुरदेवकाष्ठागरुस्तथा। रक्तचंद नकंदादिमासयुग्मोत्तराऽसुखं ॥ २६ ॥ अर्थ:-हस्तमें सूर्य हो तो बीहारा ईति निवारण हो स्वाति में वर्षे ती सागरमें सीपियॉमें मोती उपजें ॥ १२ ॥ सौम्यवारके दिन नक्षनमें सूर्यका चार श्रेष्ठ है और मद र वारमें, अ- च्छा नहीं ॥ १४॥ जो सौम्यनक्षत्रमे वेध हो तो सस्ता क्रूररवेध हो तो तेजी देशकाल अनु सार वस्तुओंकी सस्तापन ग्रहवेधसे कहाहै ॥ १५ ॥ आगे नक्षौंके नामपर उनके अन्न और देश कहतेहें वर सौम्य वेधसै शुभाशुभफल जानना धान्य यव चनै हिरण्यादि सात धार तिल यह आठमहीने कृत्तिकाके वेधसे सौम्य र अनुसार समर्घ महर्घ हों पश्चिममें असुख हो॥१६॥ रोहिणीमें सबधान्य सर्वरस सबंधात. पुरानीवस्त, कम्बलवस्त्र, और सात दिन प्राचीदिशामें सुख न हो॥१७॥मृगशिरम घोडे, भेंस, गौ, लाख, कोदों, जल और अन्न और साठ दिन पीडा हो ।। १८ आज्के वेधमें तेल, लवण, सब सार रसादिक चंदन आदि सुगन्धि वस्तु और एकमहीने पश्चिममें दुःख हो॥ १२ ॥ पुप्यमें सुवर्ण, घी, चांदी, धान्य. शोचल, लोन, सरसों, सजी, तेल, हिंग, और आठ महीने दक्खनमें पीदा ॥२०॥ पुनर्वसु सुवर्ण, मूत, कपास, तिल, कुसुम्भ, श्याम, रेशमीवस्त्र, उर्द और दो महीने उत्तरमें असुख हो ॥२१ ॥ आश्लेपामें मजीठ गेहूं मसूर मिर्च कोदों धान्य उर्द और एक महीने प- श्चिममें दुःख ॥२२॥ मघामें तिलतेल घी प्रवाल (मूगा) चने गुड अलसी और दक्षिणमें आठमहीने विग्रह हो ॥ २३ ॥ पूर्वाफाल्गुनीमें रेशमीवस्त्र ऊन युगधरी तिल चादीकी वस्तु और दक्षिणमें आठ महीने पीडा हो ॥ २४ ॥ उत्तराफाल्गुनीमें उर्द मूग चावल कोदौं सैंधव ल्हसन सज्नी ये दो महीने उत्तरमें असुख॥२५॥ हस्तमें चदन कपूर देवदार अगर लाल चद- न कद और दोमहीने उत्तरमें दुःख हो ॥ २६ ॥ चित्रायां स्वर्णरत्नगुडमापप्रवालको अश्वादिवाहनं मासद्वयपीडोत्तरादि शि ॥ २७॥ स्वातौ पुगीमरिचं सर्पपतैलादिराजिका हिंगुः । खर्जुरादि पीडासप्तदिनान्युत्तरेदेशे ॥ २८॥ विशाखायां यवाः शालिगोधूमामुद्ग राजिका । मसूरान्नमकुष्टा च याम्यपीडाष्टमासिकी ॥२९॥ राधायां तु वरी सर्वद्विदलान्नं च तण्डुलाः। मकुष्टकाश्चचणकाः प्राक्पीडादिनस प्तकम् ॥३०॥ ज्येष्ठायां गुग्गुलगुडलाक्षाकर्पूरपारदाः। हिंगुश्च बहुको स्यानि प्रारुपीडादिनसप्तकम्॥३१॥मूले श्वेतानि वरतूनि रसधान्यादि सैंधवं । कार्पासलवणाद्यं च मासिक पश्चिमासुखम् ॥३२॥ पृषायां ज ३ भापाटीकासहित । नतुषधान्यघृतं कंदमूलचूर्णादि । वेद्यं सशालिपश्चिमदिशि मासिकम शुभमन्यदा ॥३३ ॥ उषायामश्ववृषभः गजलोहादिधातवः । सर्व च सारवस्त्वाचं प्राग्व्यथादिनसप्तकं ॥३४॥ द्राक्षाखजूरपूगेला मुद्गाजा तिफलं हयाः । अभिजिवेधतः पूर्वा यथा वा दिनसप्तकं ॥ ३५ ॥ श्र वणे शर्करादीनि पिप्पलीपूगमालिका। तुपधान्यानि वेधानि प्राकशुभं सप्तवासरान् ॥ ३६॥धनिष्ठायां स्वर्णरूप्यधातवश्चविशेषतः। मणिमौ क्तिकमन्नादि सप्ताह पूर्वतः शुभम् ॥३७॥ तैलंकोद्रवमधादिधातकीप त्रमूलकं । वल्लीशतभिषग्वधं वारुण्यां मासिकं शुभम् ॥ ३८॥ प्रियंगु मूलजात्यादिसर्वधान्यानि धातवः । सर्वोपधं देवदारुयाम्यां पीडाष्टमा सिकी ॥३९॥ पूर्वाभाद्रपदे वेध्यमथो भावयमुच्यते । गुडः खण्डाःश केरा च खलं तिलाश्च शालयः॥४०॥ घृतं मणिमोक्तिकानि वारुण्यां मासिक शुभः । पत्रंश्रीफलपूगादि मौक्तिक मणयोऽपि च ॥४१॥अ श्चिन्यां व्रीहयो जूर्णावेसरोष्टघृतादिकं । सर्वाणि धान्यवस्त्राणि मासद्ध योत्तरा तथा ॥४२॥ भरण्यां तुषधान्यानि युगन्धरी च वेध्यते । मरि चाद्यौषधं संवै याम्यां पीडाप्टमासिकी॥४३॥ अर्थ:-चित्रामें सोना रत्न गुड मूंगा उर्द घोडे आदिवाहन और दो महीने उत्तरमें पीडा हो ॥२७॥ स्वातीमें सुपारी मिर्च सरसों तेल राई हींग खजूरादि, तथा उत्तरदेशम सात दिन पीडा हो ॥२८॥ विशाखाके वेधमें जो धान गेहूं मूंग राई ममूरान्न वनमूंग दक्षिणमें आठ महीने पीडा हो ॥ २९॥ अनुराध में शतावरी दलरहित अन्न चावल वनमूंग चने और पूर्वमें सात दिन पीडा हो ॥ ३०॥ ज्येष्ठामें गूगल गुड लाख कपूर पारा हिंगू कांसी पूर्वम सात दिन पीडा हो ॥ ३१॥ मूलमें श्वेतवस्तु रसधान्य सेंधा कपास लवणादिक और एकमहीने पथिम- में सुख न हो ॥ ३२ ॥ पूर्वापाढमें अंजन तपधान्य घृत कंदमूल चूर्णधान और पश्चिममें एक महीना अशुभ हो ॥ ३३ ॥ उत्तरापाटामें अश्व बैल गज (हाथी) लोहादिधातु और सब सा- स्वस्तु तथा पूर्वमें सातदिन कष्ट हो ॥ ३४॥ दास खजूर सुपारी इलायची मूंग जायफल अन्य अभिजितके वेधसे पूर्वमें सातदिन व्यथा ॥ ३५॥ श्रवणमें शर्करादि गजपीपली सुपारीतप- धान्य पूर्वमें सातदिन शुभ जानना॥३६॥धनिष्ठाके वेधमें सोना रूपा घात मणि मोती और सातदिन पूर्वमें शुभ हो ॥ ३७॥ तिल कोदो मय धातकी (पिप्पली) मूलक वल्ली (बल) शतभिषाके येधसे पश्चिममें एकमहीने शुभ हो ॥३८॥ प्रियंगु मूलादि जातीफल स. म्पूर्ण धान्य और घाट सब औपधी देवदार दक्षिणमें आठमासको पीडा हो ॥ ३९॥ पूर्वामा- द्रपदके वेधमें गुड खाड शकर तिल मल धान्य ॥ ४० ॥ उचराभाद्रपदके वेधमें घी माण १२६ यर्पप्रबोध। मोती रेवती पत्र नारियल सुपारी मोती मणि एकमासतक पश्चिममें शुम हो॥४१॥ अन्धि- नीमें जो तृण खचर ऊंट वृतादिक सब धान्य वस्त्रादि दोमहीने उरत्तदिशामें शुभाशुभ रहे। ॥ ४२ ॥ भरणीमे तुप धान्य युगन्धरी मिरच और सब ओषधी तथा दक्षिणमें आठ महीने पीडा रहे ॥ ४३ ॥ रात्रौ संक्रातिरार्दायामप्यगस्तोदयो यदातिदा वर्षे सुभिक्षं स्याद्विपरीतं तथोच्यते॥४४॥अवृष्टोन युतो क्रूरै शुक्रावेकराशिगो। जीवदृष्टो विशे पेण महावृष्टिस्तदा भवेत्॥ ४५ ॥ज्ञजीवाचेकराशिस्थी क्रूरदृष्टिविवर्जि तोशुक्रदृष्टो विशेषेण कुरुते वृष्टिरुत्तमां॥ ४६॥जीवशुको यदा युक्तो रेणापि विलोकिती।बुधदृष्टौ महावृष्टिं कुस्ते जलयोगतः॥४७॥ गुर्बुधो दानवेन्द्रो एकराशिगतात्रयः । अदृष्टाः क्रूरखचरैर्महावृष्टिविधा यकाः॥४८॥ यदा शुक्रश्च भौमश्च मंदश्चैकत्र राशिगः । तदा वर्ष ति पर्जन्यो जीवदृष्टौ न संशयः॥४९॥ शुक्र चंद्रसमायुक्ते भोमे वा चंद्रसंयुते ॥ उहन्धना दिशः सर्वा जलयोगस्तदा महान् ॥५०॥ अग्रतो वा स्थिता सौम्याः क्रूराणां तु परस्पराः । ददते सलिलं भूरिन तोयं स्याद्विपर्यये ॥५१॥ एकराशिगतोजीवः सूर्येण सह वर्षति । यावन्ना स्तमनं याति योगो द्वन्द्वंज्ञजीवयोः ॥५२॥ उन्मार्गगमनं कृत्वा यदा शुक्र त्यजेबुधः। तदा वर्षति पर्जन्यो दिनानि पंच सप्त वा ॥ ५३॥ कर्कटे तु प्रविशते सूर्य पश्येद्यदा गुरुः । पादौनं पूर्णदृष्ट्या वा तत्र का ले महाजलं ॥५४॥ उदयेस्तंगमे चेत्स्याज्जीवदृष्टो यदा गृहः पादोनं पूर्णदृष्ट्या वा तदा वर्षति नान्यदा ॥५५॥शनौ शुक्रल्पवृष्टिः स्या नसस्यानि भवन्ति चावक्रीतीर्णाः शुभाः क्रूरा जीवो वक्रगतः शुभः ॥५६॥ अतिचारगताः क्रूराः स्वल्पवृष्टिविधायकाःसौम्या यदा वक गतास्तदा वृष्टिविधायिनः॥ ५७॥ अर्थ:-रानिको संक्रान्तियुक्त आमें यदि अगस्तिका उदय हो तो वर्षमें सुभिक्ष हो अ. 'न्यथा नहीं ॥ ४४ ॥ बुध शुभ एकराशिपर पूरग्रहसंयुक्त हों तो वर्षा न करें और जो गुरुकी दृष्टि हो तो वर्षा अधिक हो ॥ ४५ ॥ बुध गुरु एकराशिपर स्थित हौं यूरदृष्टि से रहित हों और शुक्रकी दृष्टियुक्त हों तो विशेप वर्षा करें ॥ ४६॥ जो एकराशिपर होकर जीव शुत्र दूरग्रह- युक्त हों और बुधकी दृष्टि युक्त हो तीजलयोग है अधिकवी हो ॥ ४७ ॥ गुरु बुध शुक्र 'यह तीनो एकराशिपर स्थित हों और भ्रूर ग्रहोसै देखे जाय तो महाव करें ।। ४८॥ जो मापाटीकासहित । १२७ शुक्र मंद शनि एकराशिपर स्थित हों और गुरुकी दृष्टि हो तो अवश्य वर्षा हो । ४९ ॥ शुक्र- के चन्द्रमायुक्त होनेपर वा मंगलके चंद्रसंयुक्त होनेपर दिशाओंमें उबंधन और महावर्षा हो ॥५०॥ आगे सौम्यग्रह स्थित हो पीछे कूर हाँ तो जल बहुत वर्षे विपरीतमें वर्षा न हो ॥ ॥५१॥ सूर्यके साथ एकराशिमें स्थित होकर वृहस्पति वर्षा करें जबतक जीव बुध अस्त न हौं यह योग रहै ॥ ५२॥ जो वक्री होकर शुक्र बुधको त्यागै तो पांच या सात दिन वर्षा हो ॥ ५३ ॥ जो सूर्यको कर्क में प्रवेश करते हुए वृहस्पति देखै पोन या पूर्णदृष्टि से देखें तो महा जल वर्षे ॥ ५४॥ उदय अस्त होते हुए कोई ग्रह सूर्यसे देखे जाय पौनया पूर्ण दृष्टिसे देखे तो वर्षा हो अन्यथा नहीं ॥ ५५॥ शनि शुक्र एकराशिपर हों तो थोडी खेती हो धान्य न उप- ज वक्री हो चुकनेपर क्रूरग्रह शुभ होते हैं और शुक्र वक्री होकर शुभ होताहे ॥५३॥ क्रूरग्रह अतिचारको प्राप्त होकर थोडी वर्षा करते हैं और सौम्य वक्री होकर अधिक वर्षा करते हैं ५७ सिंहे कन्यातुलायां च यास्यते च यदा गुरुः। एकादश्यां च योगोयं व पत्येव महाजलं ॥५८॥ शुक्रस्य यदि भौमेन यदि स्यात्सप्तसप्तकम् । वृष्टिर्मासे तदा काले तथैव शनिजीवयोः॥५७ ॥राणां सह सौम्य श्च यदि स्यात्सप्तसप्तकं । अनावृष्टिस्तदा ज्ञेया लोकपीडामहत्यपि ॥ ॥६०॥अश्विन्यादित्रयं चैव आर्द्रादेः पंचकं तथा । पूर्वाषाढादिचत्वा रिचोत्तरा वतीद्धयं ॥ ६१ ॥ उक्तानि शशिभान्यत्र प्रोच्यन्ते सूर्यभान्य थ। रोहिणी च मृगश्चैव पूर्वाफाल्गुनिका तथा ॥ ६२ ॥ सूर्ये सूर्ये भवेद्वायुश्चन्द्रे चन्द्रे न वर्षति । चान्द्रसूर्यो भवेद्योगस्तदा वर्पति मेघरा ट्॥६३॥ आदिदशकं स्त्रीणां विशाखात्रिनपुंसकम् । मूलाचतुर्दशं पुंसां नक्षत्राणि क्रमाईधैः ॥६४॥ वायुर्नपुंसके भे च स्त्रीणां मे चान दर्शनम् । स्त्रीणां पुरुषसंयोगे वृष्टिर्भवति निश्चितम् ॥६५॥ इति श्रीमेघमहोदये वर्षप्रबोधे श्रीमेघविजयगणिविरचिते द्वारचतुष्ट यकथनोनामद्वादशोऽधिकारः॥१२॥ अर्थ:-जो गुरु कन्या या तुला या सिंहमें प्राप्त हो और एकादशीके दिन यह योग होतो मेघ व अथवा गुरुसे ग्यारहवी राशिपरका ग्रह हो तो यर्पा हो ॥ ५८ ॥ शुक्रकापदि मंगलमै राशिसप्तक हो और शनि गुरुका राशिसप्तक हो तो एक महीने वा हो ॥ ५९ ॥ जोश ग्रहोंका सौम्य ग्रहों साथ राशिसप्तक हो तो अनावृष्टि और होममें महापीडा जानना मधिनी भरणी कृतिका गार्दा पुनर्वमु पुप्प आश्लेषा मपा पूर्वापाटा उपाय पनि HIST रेवती ॥ ६१ ॥ यद पंद्र नमन शेष सब सूर्य नक्षत्र हैं रोहिणी प्रगशिर पूर्वाफा- ल्गुनी आदि मूर्यनक्षत्र मानने ॥६२॥ दिपप्त नक्षत्र और ग्रह नक्षत्र दोनो गूपी होप तो, १२८ चर्पप्रबोध। महापान चले दोनो चंद्रके गय तो मेव न वर्षे चन्द्र और सूर्यनक्षत्रका योग होय तो अच्छी चपा हो ॥ २॥ आसे लेकर स्थानितक दश नक्षत्र स्त्रीसंतक हे विशाखासें ज्येष्टातक तीन नपुंसक मूलसे मृगशिरपर्यंत चौदह पुरुषसजक है ॥ ६४ ॥ नपुंसक नक्षनमें स्त्रीनक्षन आवे तो वायुचले दोनों स्त्री नक्षत्र हों तो मेघदर्शन होय स्त्रीपुरुपनक्षत्रोंका योग हो तो अवश्य यो हो ॥६५॥ इति श्रीमेघमहोदये वर्षमबोधे मापाटीकायां हादशोऽधिकारः ॥ १२॥ अथ वर्षाशकुनविचारः। पृच्छालगे चतुर्थस्थो शनिराहयदा पुनः । दुर्भिक्षं च महाघोरं तत्र वर्षे ध्रुवं मवेत् ॥१॥ चतुर्णामपि केन्द्राणां मध्ये यत्र शुभा ग्रहाः। तस्या दिशि च निष्पत्तिः सुक्षिभं च प्रजायते ॥२॥ यस्यां दिशि शनिदृष्टः करशात्र ग्रह स्थितः । दिशि तस्यां बुधैर्वाच्यं दुर्भिक्षं नात्रसंशयः ॥३॥ पंचांगुलिस्पर्शनेपि यचंगुष्ठं जनः स्पृशेत् तदा वृष्टिस्तु महतीसावित्री स्पर्शनेल्पिका ॥४ा अक्षय्यायां तृतीयायां संध्यायां सप्तधान्यकम् । पुं. जीकृत्य स्थापनीयं पृथकृत्वा तरोरधः॥५॥ यदा ततं स्यात्तद्धान्यं तदर्प बहु जायते । यत्पुञ्जरूपं वा तिन्नेव निष्पद्यते पुनः॥६॥ अक्ष व्यायां तृतीयायां प्रपूर्वेगाडणमम्बुना। रविं विलोकयेन्मध्ये तत्स्वरूपं विमृश्यते ॥७॥ रक्ते सूर्ये विग्रहः स्यान्नीले पीते महारुजः । श्वेते सुभिक्षं जायते धूसरे दुःखमूषका ॥८॥ आपाढ्यां समतुलिताधिवा सितानामन्येधुर्यदधिकतामुपैति बीजम् । तदृद्धिर्भवति न जायते यदू नं मंत्रोस्मिन् भवति तुलाभिमंत्रणाय॥ ९॥ स्तोतव्यामंत्रयोगेन सत्या देवी सरस्वती । दर्शयिष्यसि यत्सत्यं सत्ये सत्यव्रताबसि ॥१०॥येन सत्येन चन्द्राको ग्रहाज्योतिर्गणास्तथा । उत्तिष्ठन्तीह पूर्वेण पश्चादस्तं ब्रजन्ति च ॥११॥ यत्सत्यं सर्वदेवेषु यत्सत्यं ब्रह्मवादिषु । यत्सत्यं त्रि पुलोकेषु तत्सत्यमिह दृश्यताम् ॥ १२ ॥ ब्रह्मणो दुहितासित्व मादित्ये ति प्रकीर्तिता। काश्यपीगोत्रतश्चैव नामतो विश्रुतातला ॥१३॥ अर्थ प्रश्न यदि लग्नसे चौथे स्थानमें शनि राहु हो तो उस वर्षमें महापौर दुर्भिक्ष हो॥१॥और चारों केन्द्रके वीचमें जहां शुभ ग्रह हो उसी दिशामें अन्नको उत्पत्ति और सुभिक्ष हो ॥२॥जिस दिशाकू क्रूर ग्रहों सहित शनिश्चर देखें उस दिशामें अवश्य मिक्ष हो ॥३॥पांच अंगुली स्पर्शकरनेपर यदि अंगूठेको प्रच्छक स्पर्श करे तो अधिक वर्षा १२९ समसंप्रवृद्धि वनस्पतीनां विलोक्य विजेयम् । मुलभत्व द्रव्याणां निप भापाटीकासहिन । हो कनिष्ठिका छुए तो थोडी वर्षा हो ॥४॥ अक्षय तीजको सध्याके समय सात धान इकट्ठे करके पेडके नीचे रख देने चाहियें ॥५॥जो वे विखर जाय तो अधिक धान्य उत्पन्न हो और जो वे इकठे रहै तो धान्यकी उत्पत्ति न्यून हो ६॥ अक्षय तीजको थालीमें जल रखकर सूर्यको देखै उसका स्वरूप विचारै ॥७॥ जो सूर्य लाल दीखै तो विग्रह हो नीला पीला दीखे तो महारोग हो श्वेत दोर तो सुभिक्ष धूसर दीखै तौ मूषौंका उपद्रव हो “ओं न्हीं श्रीं क्लीं आ लक्ष्म्यै स्वाहा” इस मनसे अक्षयतीजको धान्य अभिमनितकर गाटमें बाधकर रखदे दू- सरे दिन खोलकर तोल जो घटें तो अकरे और बढे तौ सस्ते हो ॥ ८॥ उत्तरापाढयुक्त आपा- ढकी पूर्णिमाके दिन सब धानोंको बराबर तोलकरले और उनके अभिमत्रितकर, एकरात भर रक्खै पीछे तराजूको आगे लिखे पाचमत्रोंसे अभिमगितकर तोले जो बीज घटें तो उस वर्षमें नहीं उत्पन्न होते जो बढ़े तो उसकी उस वर्षमे वृद्धि होती है ॥ ९॥ मनयोगसै सत्य- स्वरूप देवी सरस्वतीकी स्तुति करै वोह सत्यनत जो सत्य है सो दिखाती है ॥ १०॥ जिस सत्यसें चन्द्र सूर्य ग्रह ज्योतिर्गण पूर्वमें उदय हो पश्चिममें अस्त होतेहे ॥११॥ जो सत्य दे- वता, ब्रह्मवादी और त्रिलोकीमें है वह सत्य इनमें दीखे ॥१२॥तू ब्रह्माकी दुहिता आदित्या करकै विख्यात है काश्यप गोत्रमें उत्पन्न तुला नाम है ॥ १३ ॥ इनमत्रोसै तराजू अभिमंनि- तकर बीज तोले ॥१४॥ क्षौमं चतुःसूत्रकसन्निबद्धं षडगुलं शिक्यकवस्त्रमस्याः। सूत्रप्रमाणेच दशाङ्गुलानिपडेव कक्षोभयशिक्यमध्ये॥१४॥याम्यशक्ये काञ्चनं सन्नि वेश्यं शेषेद्रव्याण्युत्तरेम्बूनि चैवम् । तोयः कोप्यैस्पन्दिभिः सारसैश्च वृ' टि_ना मध्यमा चोत्तमा च ॥ १५॥ दन्तै गा गोहयाद्याश्च लोम्ना हे माभूपाः सिक्थकेन दिजाद्याः । तदद्देशा वर्षमासांदिशश्च शेपद्रव्या ण्यात्मरूपस्थितानि ।। १६ ।। हैमी प्रधाना रजतेन मन्या तयोरलामे खें दिरेण कार्या। विद्धः पुमान् येन शरेण सा वा तुलाप्रमाणेन भवेद्धित स्तिः॥ १७॥ हीनस्य नाशोम्यधिकश्च वृद्धिस्तुल्येन तुल्य तुलिनं तुला यां। एतत्तुलाकोशरहस्यमुक्तं प्रजेशयोगेपि नरो विदध्यात् ॥१॥स्वा तावषादास्वथ रोहिणीपू पापग्रहा योगगता न शस्ताः। ग्राह्य तुयोग दयमप्युपोष्य यदाधिमासो द्विगुणी करोति ॥ १९ ॥ त्रयोपि योगास दृशाः फलेन यदा तदा वाच्यमसंशयेन । विपर्यये यत्विह रोहिणीज फलं तदेवाम्यधिकं निगद्यम् ॥ २०॥ अथ कुसुमलताफलम् ॥ फलक वर्षप्रबोध । त्तिश्चापि सस्यानाम् ॥ २१॥ शालेन कलमशाली रक्ताशोकेन रक्तशा लिश्च । पाण्डूकः क्षीरिकया नीलाशोकेन शूकरकः ॥ २२॥ अर्थः-उस तखडीके दोनी पल्लेछ: अंगुल विस्तारके लालसीरेस्मीके कपडेके चार सूत्रमि वांघे उन सूत्रोंका प्रमाण दश दश अंगुल हो और उनके बीचकी कक्षा अर्थात् जिस डोरीको पकडकर तराजू उठाते हैं छाअंगुलकी बनावै॥१४॥सोना दक्षिणके पल्लेमें तोले और सब वस्त जलादि उत्तरके पल्लेमें तोले कुएका जल तोलमें बढे तो थोडी वर्षा अरनेका जल बढे तो म- प्यम सरोवरका बढे तो उत्तम सब जल वढे तो बहुत वर्षा हो कोईभी न बढ़े तो वर्षा न हो। ॥१५॥ हार्थी दांतकी तोलसे हाथी रोमकी तोलसे गौ घोडे आदि पशु सुवर्णकी तोलसे राजा भौमसे ब्राह्मणादि वर्ण वर्ष महीने आठों दिशा और सब वस्तुकी अपनैर तोलसे घटती वढती जाने ऐसेही सब विचार करें ॥१६॥ सोनेकी तराजू, उत्तम, चांदीकी मध्यम हैं और यह न मिलें तौं खदिर काठकी बनावै अथवा जिस बाणसे कोई मनुष्य विधा हो उसकी बनावै और बारह अंगुलकी दंडी रक्खे ॥१७॥ जो वस्तु तोलमें घठे उसका क्षय जो व उसकी वृद्धि और जो न घटै न बैठे उसकी हानि और वृद्धि नहीं होती यह तलाकोशका रहस्य रोहिणीयोगमेंभी करके देखना चाहिये ॥१८॥ स्वाति उत्तरापाढा.रोहिणी इन नक्षत्रोंसे चन्द्रयोग होनेके समय भौम शनि राहु केतु यह पापग्रहभी इन नक्षत्रौंपर हों तो शुभ नहीं होते बुध शुक्र बृहस्पति शुभ ग्रह हों तो अच्छे हैं जो अधिकमास होनेसे दो भाषाढ हों तो उपवास रखकर दोनो मही- नोंका विचार करें ॥१९॥जो रोहिणी स्वाति और आषाढी योग तीनो फलमें तुल्य हौं तो निःसन्देह शुभ या अशुभ जैसा फल हो कहदैना और जो फलों में भेद हो तो रोहिणीका जो फल हो वही विशेषकर कहना चाहिये ।। २० ॥ अथ कुसुमलता फलम् ।। वृक्षोंके फल और फूलोंकी वृद्धि देखकर सब वस्तुओं की सुलभता ओर खेतीकी उत्पत्ति जानै ॥२१॥ शालवृक्षके फल और फूलोंकी वृद्धि से कलमाशालिकी वृद्धि रक्ताशोकसे रक्तशालि दूधीसे पाण्डूक नील अशोकस शूकरघान्यकी वृद्धि होती है ॥२२॥ न्यग्रोधेन तु यवकस्तिन्दुकवृष्ट्या च षष्ठिको भवति । आश्वत्थेन ज्ञेया निष्पत्तिः सर्वसस्यानाम् ॥ २३॥जम्बूभिस्तिलमाषाः शिरिपवृद्धश्च कं गुनिष्पत्तिः । गोधूमाश्च मधूकैर्यववृद्धिः सप्तपर्णेन ॥२४॥ अतिमुक्तक कुन्दाभ्यां कार्यासः सर्पपाअसनैः। बदरीभिश्च कुलत्थान चिरविल्वेना दिशेन्मुगान् ॥ २५॥ अतसीवेतसपुष्पैः पलाशकुसुमश्चकोद्रवा ज्ञेयाः। तिलकेन शंखमौक्तिकरजतान्यथ चेंगुदेन शणाः ॥ २६ ॥ करिणश्च हस्तिकरणेरादेश्या वाजिनोश्वकर्णेन । गावचपाटलाभिः कदलीमिरजा विकं भवति॥२७॥चम्पककुसुमैः कनकं विद्रुमसंपच बंधुजीवन । कुरब कद्धया वज्रं वैदूर्य नन्दिकावर्तेः॥२८॥ विन्द्याचसिन्दुवारण मौक्तिकं काकस्याण्डानि चत्वारि वारुणं प्रथम स्मृतं । तथा द्वितीयमानेयं वाय भाषाटीकासहित । १३१ कारुकान कुसुम्भेन।। रक्तोत्पलेन राजमंत्रीनीलोत्पलेनोक्तः ॥२९॥ श्रेष्ठी सुवर्णपुष्पेः पद्मविप्राः पुरोहिताः कुमुदैः । सौगन्धिकेन बलपति रर्केण हिरण्यपरिवृद्धिः॥३०॥ आनेः क्षेमं भल्लातकैर्भयं पीलुभीस्तथा रोग्यम् । खदिरशमीभ्यां दुर्भिक्षमर्जुने शोभना वृष्टिः॥३१॥ पिचुमन्द नागकुसुमैः सुभिक्षमथमारुतः कपित्थेन । निचुलेनावृष्टिभयं व्याधिम यं भवति कुटजेन ॥३२॥ दूर्वांकुशकुसुमाभ्यां भिक्षुर्वहनिश्च कोविदा रेण । श्यामालताभिवृद्धया बन्धक्यो वृद्धिमायान्ति ॥३३ ॥ यस्मिन्का ले स्निग्धनिश्छिद्रपत्राः संदृश्यन्ते वृक्षगुल्मालताश्च । तस्मिन् वृष्टिः शो भना संप्रदिष्ठा रूक्षैश्छिट्टैरल्पमंभः प्रदिष्टम् ॥ ३४॥ अर्थ:-बडकी वृद्धिस यवक तेंदूकी वृद्धिसै सही और पीपलकी वृद्धिसे सब खेतीवृद्धि होतीहै ॥ २३ ॥ जामनकीवृद्धिसे तिल और उडद सिरसकी वृद्धिसे कंगनी महुयेसै गैहूं और सप्त पर्णसे जौंकी वृद्धि होतीहै ।। २४ ॥ अतिमुक्त और कुंद इन दोनो पुष्पवृक्षोंसे कपास अ- सन वृक्षकी वृद्धिसै सरसौं वेरीसे कुलथीकी और चिरबिल्ववृक्षकी वृद्धिसै मूंगकी वृद्धि होती- है ।।२५ ॥ वेतके फूलोंकी वृद्धिसै अलसीकी पलासके फूलोंसे कोदो तिलकके वृक्षसे शंख मोती और चांदीकी वृद्धि इंगुदीकी वृद्धिसै सनकी वृद्धि होतीहै ॥ २६ ॥ हस्तिकर्ण वृक्षकी वृद्धिसै हाथियौंकी अश्वकर्णकी वृद्धिसै घोडोंकी पाटलकी वृद्धिसै गोगोंकी केलोंकी वृद्धिसै बकरी और मेढौंकी वृद्धि होतीहै ॥ २७ ॥ चम्पेके फूलों से सौनेकी गुलदुपहरियासे मूंगेकी कु रबकको वृद्धिस हीरेकी और नन्दिकावर्तकी वृद्धिसे वैदुर्यरत्नकी वृद्धि होतीहै ॥ २८ ॥ सिं- घुवारकी वृद्धिसै मोती कुसुम्भकी वृद्धिसे कारीगरौंको लाल कमलसे राजा ओंकी और नील कमलसे राजाओंके मंत्रियोंकी वृद्धि होती ॥२९॥ सुवर्णएप्पकी वृद्धिस सेटीकी कमलौंस ब्राह्मणौंकी कुमुदौसे राजपुरोहितौंकी सौगन्धिक फूलसै सैनापतिकी और आककी वृद्धिसे सोनेकी वृद्धि होतोहे ॥३०॥ आम्रकोवृद्धिसे कल्याण भिलावेकी वृद्धिस आरोग्य शमौकी वृद्धिसे दुर्भिक्ष, और अर्जुनकी वृद्धिसै उत्तम वर्षा होती है ॥ ३१॥ नीम और नागकेसरके फूलोंकी वृद्धिसे सुभिक्ष होता है कैथको वृद्धिसे पवनका वेग, पिचलवृद्धिसै वर्षा न होने से भय कुटजकी वृद्धिसै रोगका भय होता है ॥ ३२ ॥ दूर्वाकशाके फूलीकी वृद्धिसे ईसकी - द्विके विदारकी वृद्धिसे अग्नि अधिक लगै श्यामलताकी वृद्धिस व्यभिचारिणियाँको वृद्धि अधिक होती है ॥ ३३ ॥ जिस समय वृक्ष गुल्म वेल चिकने और छिद्ररहित पत्रौसे युक्त होय उसकालमें उत्तम वृष्टि होती है जो पत्र रूखे और छिद्रयुक्त होय तो थोडी वर्षा होती है। काकेंगित। वीयं तृतीयकं । चतुर्थ भूमिजं प्रोक्तमेपां फलमयोदितम् ॥ ३५ ॥ क्षम । १३२ वर्षप्रबोध। 'सुभिक्ष मुखिताचे धात्री स्यामिजेण्डे महंताचवृष्टिः। पृथ्वी तथानंद ति सस्यमांद्यं वर्षाविशेषेण जलाण्डतः स्यात् ॥३६॥जातानिधान्या नि समीरजाण्डे खादति, कीटः शलभाः शुकाश्च । दुर्भिक्षमण्डेग्निभवे 'निवेद्यं जानीहि मासान् चतुरोपि चाण्डे ॥३७॥.काकालयः प्राग्दि शिं. भूरुहस्य सुभिक्षकृत् स्वल्पर्धनस्तथाग्नौ । मासदयं वृष्टिकरोतिपूर्व तंतो न वृष्टिहिमयात एवं ॥३८॥ मासद्धयेतीव घनः प्रतीच्यां निष्प त्तिरन्नस्य तदोच्चभूम्यां। ततोल्पवृष्टियदि वाल्पवर्षा स वातवृष्टिः पवन 'स्य कोणे ॥ ३९॥पूर्व न वृष्टि निर्ऋतं पयोदाः पश्चाधनो लोकसरो गताचं । स्यादुत्तरस्यां भवनेसुभिक्षमीशानभागपि सुखं सुभिक्ष॥४०॥ वृक्षाग्रे तु महावर्षा वृक्षमध्ये तुमध्यमा।अधःस्थाने नैव वर्षा वृक्षेकाका लयावदेत् ॥ ४१ ॥ वृक्षकोटरके गेहप्रकारे काकमालके । दुर्भिक्षं वि ग्रहोराज्ञां याम्यां छत्रस्य पातनं ॥४२॥ नदीतीरेकाकगृहे मेघप्रश्नेन वर्षणं। पक्षौविधूनयन् काको वृक्षाशीघ्रमघकृत् ॥४३॥ ग्रोमाइहिश्च निर्गत्य स्वस्थाने मंण्डलं लिखेत्। संपूज्यशकुनं वीक्ष्य काकेंगित विनि र्णयः॥४४॥ कपिलानांशतं हत्वा ब्राह्मणानांशतद्धयं । तत्पापं परि गृहासि यदि मिथ्याबलिं हरेः॥४५॥ : : अर्थ:-कार्कके वारुण आमेय वायवी और भूमिज चार प्रकारके अंडे होते हैं, उनका फल कहते हैं ।। ३५ ॥ भूमिक अंडा हो तो क्षेम, सुभिक्ष और पृथ्वी सुखी हो वर्षा अच्छी हो पृथ्वी आनंद और खेती अच्छी हो और जलसंज्ञक अंडे हो तो अधिक वर्षा हो ॥३६॥ वा- यवी अण्डेसे धान्यकी अधिकता हो परन्तु उसे कीट शलभ तोते खाजाय और अमिसंज्ञक अंडेसे दुर्मिक्ष हो इस प्रकार चारमासों में अंडे के अनुसार फल कहै, चार महीनेमें चारसंज्ञा है ॥३७॥ जो कोएका स्थान वृक्षपर पूर्वको होय तो सुभिक्ष करनेवाला है. अग्निकोणमें हो तो थोडी वर्षा हो दक्षिण में हो तो दो महीने वर्षा होकर फिर वर्षा न हो ३८॥ पश्चिममें हो तो दो महीने बहुत बादल रहै ऊंची भूमिमें अधिक अन्न हो और वायव्यकोणमें हो तो थोडी वर्षा हो वा पवनसहित वर्षा हो ॥ ३९ ॥ नैऋत्यमें हो तो पहले वर्षा न हो पीछे वादल वर्षे लोकमें रोग हो उत्तरमें हो तो मुभिक्ष करें ईशानमें हो तो सुभिक्ष करे॥ ४० ॥ वृक्षके अग्नभागमें घौंसला हो तो महावी हो मध्यमें हो तो मध्यम वर्पा हो नीचे हो तो वर्षा न हो इसप्रकार फल स्थानका कहना ॥ ४१ ॥ और जो वृक्षके कोटरमें घर हो तो दुर्भिक्ष राजीमें विग्रह दक्षिणमें छत्रभंग हो ॥ ४२ ॥ नदीके किनारे काकका घर हो तो मेघप्रश्नमें वर्षा ने हो और कोमा यदि पंख कंपाता हुया वृक्षके आगे बैठा हो तो जल्दी मेघ व ॥४२॥ ग्रा. . ।

यह चिन्ह है ॥ ४७ ॥ वर्षा जानने के निमित्त पहले पिण्डपर जल दूसरेपर मृचिकातीसरेपर . अपूर्वक स्थापन करै ॥४६॥ ओं तुडेति इस्से आवाहन करे भो तिरिति इससे अभिमंत्रण करे देशकालकी परीक्षाके निमित्त पहले पिंडपर पम दूसरे पर घोड़ा तिसरेपर हाथी स्थापित करे भापाटीकासहित । मसे बाहर निकलकर अपने स्थानमें मंडल लिखै पूजन कर और गकुन देखकर कौएकी चे- टाको विचारे ॥४४॥ और कहै कि, हे काक, सौ कपिला और दोसे ब्राह्मणौंके मारनेका अपराध लगे जो तू मिथ्या बलिको ग्रहण करें ॥ ४५ ॥ 'शाल्योदनेन साज्येन कृत्वा पिंडचयं बुधः। संमार्जिते शुभे स्थाने स्था पयेन्मंत्रपूर्वकं ॥ ४६॥ मंत्रो यथा ओं तुंडब्रह्मणे सुराय । असुरेन्द्राय हिरण्यपुण्डरीकाय स्वाहा॥१॥आव्हानमंत्र ॥ओं तिरिति मिरिटी का 'कपिंडालये स्वाहा। पिंडाभिमंत्रणम् ॥२॥देशकालपरीक्षार्थ वृषभं चा द्यपिंडके द्वितीये तुरंग न्यस्य तृतीये हस्तिनं क्रमात् ॥ ४७ ॥वर्षाज्ञा 'नाय संस्थाप्यं प्रथमे पिंडके जलं । द्वितीये मृत्तिकास्थाप्या तृतीयेंगार कः पुनः॥४८॥शीघ्रं वर्षति पानीये मृत्तिकायास्तु पिंडके । पक्षान्ते न तु वृष्टिस्यादंगारे नास्ति वर्षणम् ॥४९॥ ग्रंथान्तरे। ओं नमो भगवउगोयमसामिस्मसिद्धत्सबुद्धस्स अरकीणमहासस्था गवन भास्कर श्रीयं आनय आनय पूरय पूरय स्वाहा ॥छ । आश्विन स्य चतुर्दश्यां मंत्रोयं जप्यते निशि । सहनमेकं तपसा धूपोतक्षेवपुरस्स रं॥५०॥ प्रातःपूर्णादिनमुखे लेख्यगोतमपादुके । जपेद्धिसुरभिर्द्रव्यैर र्चनीयो सुभाविना ॥ ५१ ॥ यत्पादुके पात्रे लेख्ये वस्त्रेणाछाद्यते च तत् । मार्जारदर्शनं वयं यावच्च क्रियते विधिः ।। ५२॥ समये पात्रक नीत्वा मिक्षाये गम्यते गृहे । दातुर्महेभ्यः श्राद्धस्य यत्माप्तं तद्विचार्यते॥ सधवा सतनूजा स्त्री भिक्षादात्री शुभाय सा । यहहु प्राप्यते धान्यं त निष्पत्तिः पुरो भवेत् ॥ ५४॥ नास्ति वेलेत्युत्तरेण दुर्भिक्षं भावि वत्स रे। विलम्बदाने मेघोपि विलंम्वेनैव वर्षति ॥ ५५ ॥ तत्र क्लेशदर्शनेन राजविग्रहमादिशेत् । भंगे पात्रस्थ भाण्डस्य छत्रभंगो विचार्यते ॥५६॥ व्यंगवादवती दत्ते तदारोगाद्युपद्रवः । इति गौतमीयज्ञानम् ॥ अर्थः-विद्वानको उचित है कि सहीके आटेमें घी डालकर लिपे हुए स्वच्छ स्थानमें में-

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वर्षप्रवोध।
अंगारा रक्से ॥४८॥ जो जलका पिण्ड काक स्पर्श करें तो शीघ वर्षा हो मृत्तिकाका ग्रहण
करे तो पक्षान्तमें वर्षा हो और अंगारेको स्पर्श करें तो वर्षा न हो॥४९॥ अथ प्राकृतमंत्राओं
नमो इति यह मंत्र आश्विन चतुर्दशी रात्रिके समय एक सहस्र जपै और धूपदेता रहे ॥५०॥
प्रातःकाल गौतम पादुकाके नीचे लिखकर धूप दीप सुगन्धि फूलोंसे उसकी पूजा करें।॥५१॥
और फिर ववस ढकदे बिल्लीको न देखनेदे जबतक यह पूजन करै ।। ५२ ॥ फिर भिक्षाके
समय पात्र लेकर मागने जाय जो और श्रद्धासै देनेवाले महात्मांमाके वाक्योंका विचार
करे ॥५३॥ जो सौभाग्यवती पुत्रवती स्त्री मिक्षा दे तो शुभ है जो धान्य मिलें उसीकी उ."
त्पत्ति अधिक हो ॥५४॥ जो भीतरसे ऐसा उत्तर आवै कि इससमय नहीं फिर लेना तो
भागेकै वर्षमे दुर्भिक्ष जानना देरमें देनेसे मेघभी देरसै वर्षे ॥५५॥ और जो वहां क्लेश होता
देखे तो राजौमें विग्रह हो और पात्र टूट जानेसे छामं जानना ॥ ५६ ॥ और जो वह वह
विवाद करतेहुए कोई भिक्षा दे तो रोगादि उपद्रव हो । इति गौतमीयज्ञानम् ॥
अथगवेंगित।
गावो दीना पार्थिवस्याशिवाय पादे मि कुटयन्तश्च रोगान्। मृत्युं कु
र्वन्त्यश्रुपूर्णायताक्ष्यः पत्युर्मीता तस्करानाहवन्त्यः ॥ ४६ ॥ अकारणं
कोशति चेदनों भयाय रात्रौ वृषभः शिवाय । भृशं निरुद्धो यदि म.
क्षिकाभिस्तदाशु वृष्टिः सरमात्मजेर्वा ॥४७॥ आगच्छंत्यो वेश्महम्बा
खेण संसेवन्त्यो गोप्टवृद्धयै गवां गाः। आग्योया हृष्टरोम्ण्यः प्रहृष्टा
धन्यागावः स्युर्महिष्योपि चैवम् ॥ ४८॥ इत्येवं शकुनं विचार्यसुधिया
वाच्यं फलं वार्षिकं यस्योद्बोधनतो लभेद्वहुधनं सर्वार्थसंसाधनोराजन्यै
रपि मान्यते सनिपुणः प्रोल्लासिमास्वद्गुणः शास्त्रं यन्मनसि स्फुरत्यतिम
यात् श्रीवर्षवोधाव्हयम् ॥ ४९ ॥ श्रीमत्तपागणविभुः प्रसरतप्रभाव प्र
द्योतते विजयतापभनामसूरिः । तत्पादपद्मतरणिविजयादिनः स्वामी
गणस्थ महसा विजितधुरत्नः॥५०॥ तच्छासने जयति विश्वविभासने
ऽभूद्विद्वान् कृपाब्धिविद्वजनसेव्यमानः। शिष्योस्य मेघविजयाव्हय
वाचकोसौग्रंथः कृतः सुकृतलाभकृतेत्र तेन ।। ५१ ।। अनुष्टुभां सहस्रा
णि त्रीणिसा नि मानिता । अथोयं वर्षवोधाख्योयावन्मेरु प्रवर्तता
॥५२॥ यत्पुनरुक्तमयुक्त द्विरुक्तमिह तद्विशोधितुं युक्तं । बद्धांजलिने
ति मयाम्यर्थ सकलगीतार्थः॥५३॥भाविवत्सरबोधाय तस्य बालस्य
शालिनः । कुरुताः गुरुतां ग्रंथो हितावालस्य पालनात् ॥ ५४॥

RS2/8 मापाटीकासहित । १३५ इति श्रीमहामहोपाध्याय श्रीमेघविजयगणिविरचिते वर्षवोधे मेघम- होदये शकुननिरूपणोनाम त्रयोदशोधिकारः ॥१३॥ अर्थ-अब गौकी चेष्टा कहते हैं जो गो उदास होय तो राजाको भय होता है पैरोंसे भूमि- को कूटैं तो रोग होताहै । और नेत्रौंमें आंसू भरे रहैं तो स्वामीकी मृत्यु होती है और भयभीत होकर बहा शब्द करें तो चोर आते हैं ।। ४६ ॥ विनाकारणके गौ वोलें तो अनर्थ होताहै रा- त्रिको बोलें तौ भय होताहै वैल रात्रिको वोलें तो शुभ होताहै जो गौओंको बहुतसी मक्खी वा श्वान् धेरै तौ शीघ्र वर्षा होती है ॥ ४॥ जो गौ हम्बा शब्द बोलती हुई घरमैं आवै और घरका सेवन करतो गौओंके गोष्टकी वृद्धि करतीहैं जो गौओंके अग जलसे भीगरहे होय रो- मांच हौं गो प्रसन्न होय तो शुभ होता है इसीप्रकार महिपियोंकाभी फल जान्नाचाहिये।॥४८॥ इसप्रकार शकुनविचारकर पड़ितोंकों वर्पका शुभाशुभफल कहना चाहिये । इसके जाननेसे सब प्रकारसै अर्थकी प्राप्ति होतीहै जो इस शास्त्रको जानते हैं वे चतुर राज्यमान्य होते हैं मौर उनके सद्गुण प्रकाशित होते हैं जिनके हृदयमें यह वर्षबोधप्रकाशित होताहै ॥ ४९॥ शेष दो श्लोकोंमें ग्रंथकर्ताका वंशवर्णन है ॥५०॥५१॥ इसग्रथमें सब साढेतीनसहस्र श्लोक थे जिसमेसै सक्षेपकरकै उपयोगी विषय ले लिये हैं यह वर्षबोध मेरुकी स्थितितक वर्तमान रहे ॥५२॥ जो कुछ इसमें पुनरुक्त या अशुद्ध हो वह क्षमा करना यह करजोड प्रार्थनाहे॥५३॥ यह ग्रंय भविष्यवर्षके बोधके निमित्त और बालक आदिकौके उपकारके निमित्त कियाई ५४ इति श्रीमेघमहोदये वर्पप्रवोघे पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतमापाटीकार्या त्रयोदशोधिकारः॥ १३ ॥ भूमिवाणाङ्कचन्द्रेब्दे कृष्णाषाढस्यसप्तमी । वर्षबोधस्य ग्रन्थस्य टीका पूर्तिमुपागमत् ॥१॥ 25218

Shri Varsh Prabodh

Author
Pandit,.kishan Lal
Title
Shri Varsh Prabodh
File name
Shri Varsh Prabodh
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2012/08
Publisher
Xxxx
Language
Sanskrit
Pages
126
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312315
Barcode
99999990321115.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
AqPiYrnJBEl
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