Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Grhalaghav
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श्रीयुतगणकवर्यगणेशदैवज्ञकतकरणयन्थ ।
ग्रहलाघव।
लीलावती-वृहत्संहिताआदिग्रन्थोंके अतु-
वादक मुरादावादनिवासी-
भारद्वांजपण्डित रामस्वरूपशर्मकत
अन्वय-भापाटीका-और उदाहरण सहित।
Sa5aa
GAN RASA
तिसको
श्रीयुत खेमराज श्रीकृष्णदासने अपने
मुम्बयीस्थ
"श्रीपेङ्कटेश्वर"छापाखानेमें छापकर प्रकाशित किया
प्रथमावृत्ति.
संवद १९५२ शके १८१७.
इस पुस्तकका रजिष्टरी सब हम यन्त्राधिकारीने साधीन रसखाह।
धन्यवादः। 'सन्त्वसंख्याता धन्यवादाः श्रीयुतविगुणग्राहकाय वेदशास्त्रादिन- न्योहारकाय तोषितभूसुराय श्रीवेङ्कटेशचरणकचालये वेष्ठिश्रीकृष्णा- दासात्मजखेमराजगुप्ताय येन लीलावत्यादिग्रन्यानां भापाव्याख्यान- काशनान्तरं दानमानादिना सन्तोप्याहमस्य वर्य्यस्य श्रीगणेश देव- ज्ञकृतग्रहलाघवास्यकरणग्रन्थस्य सान्वयभापाव्याख्यायै प्रेरितो ग्र- न्यमेनमन्वयसनायितभाषाब्यास्यालङ्कृतं कर्तुं प्राभूवम्।ईदृक्परोप- कारकरणचणान मनुजाभरणान् सपरिवारश्चिरायुपः कुर्याद्यज्ञेश्वरः। स एव पण्डितो रामस्वरूपः। ॐोगोशाय नमः ॥ अभी य य दोपरि भूगोलय लय तूरीय भासूखत्यवियोपरिलचि भामा निरे को भुगउसमुशादिनामका घटिया M (S 23 अनामना AB . " . PRINEERESTINASEE भूमिका। aicar " अचिन्त्याव्यक्तरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने । समस्तजगदाधारमूर्तये ब्रह्मणे नमः ॥ ज्योतिषशास्त्र आप्यविर्तनिवासी हिन्दुओंका सर्वस्वधन है, ज्योतिपके न होनेसें हिन्दुओंका एकक्षणभी कार्य नहीं चल सक्ता, जिस समय जीव गर्भम आताई उस समय से लेकर मृत्युकालपर्यन्त क्या मृत्युकालके अनन्त- रभी ज्योतिपशाखसे हिन्दूसन्तातको सम्बन्ध रहताहै, हिन्दुओंको प्रत्येक काप्यमें ज्योतिपकी सहायता लेनी पड़ती है, इसकारण प्रत्येक हिन्दूको पानी निकाल "सिद्धान्तसंहिताहोरारूपस्कन्धत्रयात्मकम् । वेदस्यं निर्मलं चक्षुयोति शास्त्रमकल्मपम् ।। विनतदपिलं श्रौतस्मात कर्म न सिद्धचंति । तस्माजगद्धितायेदं ब्रह्मणा निम्मितं पुरा ॥ भत एप दिनरतदध्यतव्यं प्रयव्रतः । " अयांत-सिद्धान्त, संहिता और होरा-रूप ज्योतिशास येदवार निर्मल Amanari जिला- . . . .
(२). भूमिका। षशास्त्रके अनुसार वर्ताव करनेसे अनेक प्रकारकी सम्पदा प्राप्त होतीहै। इस ज्योतिषशास्त्रको जाननेवाला जन्म-मृत्य-सुख-दुःख-रोग-शोक और वृष्टि आदिका यथावत् वृत्तान्त-कहसता है, इसकारणही ज्योतिषशास्त्र अह- ङ्कार करके कहताहै कि- "विफलान्यन्यशास्त्राणि विवादस्तेषु केवलम् : सफल ज्योतिष शास्त्रे चन्द्राों यत्र साक्षिणौ ॥" अर्थात, ज्योतिषशास्त्रके सिवाय अन्य शास्त्रोंमें विवादके सिवाय कोई फल नहीं मानोगौलिए कामटी जिगने मामी मर्य और चन्द्र माह, गय करना विडा कि हीय बुद्धिः मानो टिकसो- सायटाक एक सभासद वन्टल (Joum benuey) न हदमांक अनेक ज्यौतिप ग्रन्य और ग्रन्थकर्ताओंका तथा प्रसङ्गले पौराणिक अनेक विष- याँका वृत्तान्त निरूपण करने के लिये अपने अमूल्य समयको व्यय करकै जो ( Historical Vier of the Hindu astronomy ) पुस्तक लिखाहै, उसके प्रारम्भमेंही ज्योतिषशास्त्र के उत्पत्तिसमयका निर्णय करने में असमर्थ होकर लिखाहै- ( The early part of astronomy among the Hindus like . हुना होगा . 4...+Aaih.............. -perly so called ) किन्तु रिचई ए प्रक्टर ( Richard and Proctor ) ऐलण्डीय विद्वानों में कुछ साधारण मनुष्य नहीं है, उन्होंने प्राचीन ज्योति- षका इतिहास लिखते समय ( Encyclopedia Britannia.) अपने पुस्त- कंमें लिसाहै-The claims_of the Indians rest.ona.more solid foun dation. We are in possession of the tables from which they conznuta tha onlinear and nlonas of the mount and the rienthanh - है lestial phenomena with considerable exactness and which there fore could only be produced by a people for adranced in sceirce.) ..
झमजान कर Heipino ter preparing गणेशदेवज्ञ. . इस ग्रन्थकें कता गणेशदेवज्ञके पिताका नाम कैगंव था और इन्होंने पि वास विद्या पट्टीथी, इनकी माताका नाम लक्ष्मी था, यह गणेशदैवज्ञ भारत- वर्ष में गणेशका अवतार थे ऐसी जनश्रुतिह, इन्होंने तेरह वर्षको अवस्थामें 'ग्रंहलायब' नामक इस ग्रन्थकी रचना करीथी, ऐसी चिरकालसे जनश्रुतिहै, 'ग्रहलाघव' के बनानेका समय ग्रहलायवीय अहर्गणके लानेले १५४२ गकहै, तिसकारण गणेशदेवज्ञके जन्मका समय १४२९ शकेके . और धोरहै, यह गणेशदेवज्ञ गणिवविद्यामें अत्यन्त प्रवीणय । इन महारायने जितने ग्रन्थोंकी रचना करीहे उनका परिचय नृसिंहदेव- ज्ञने स्वरचितं ग्रहलाघवकी टीका लिसाहै, जैसे- "कृरवादी ग्रहलाघवं रघुवृत्तिप्यादिचिन्तामणि ससिद्धान्तशिरोमणेश्च विवृति लीलावतीन्याकृतिम् । श्रीवृन्दावनटीकिकां व विवृति मौहूर्त्ततत्त्वस्य वै सच्चालादिविनिर्णयं सुविवृति छन्दोऽर्णवारस्यस्य वै ॥ सुधीरञ्जन उर्जनीयन्त्रक च सुकृष्णाष्टमी निर्णय होलिकायाः। लघूपाययातांस्तथान्यानपूर्वागणेयो गुरुर्ब्रह्मनिर्वाणमापत् ॥" इस लिखनेसे मालूम होताहै कि गणेशदेवाने ग्रहलायव १ लघुतिथि- चिन्तामणि २ वृहत्तिथिचिन्तामणि ३ सिद्धान्तशिरोमणिकी टीका ४ लीला- वतीकी टीका ५ विवाहवृन्दावनकी टीका ६ मुहूर्ततत्त्वकी टीका ७ श्रा- द्धादिनिर्णय ८ छन्दोर्णवकी टीका ९ सुधीरञ्जनी १० तर्जनीयन्त्र ११ कृष्ण- जन्माष्टमीनिर्णय १२ होलिकानिर्णय १३ भादिग्रन्यांकी रचना करी उनमंते प्रहलाघव-लघुविधिचिन्तामणि-घृहतिथिचिन्तामणि-लीलावती- विवाह- वृन्दावन और मुहर्ततखटीका-इतने अन्य प्रसिद्धह तिनम ग्रहलाघवका विद्वान बहुत भादर करतेह, भार ग्रहलायव प्रायः सर्वत्र छपाहुमा भार लिखा हुआ मिलताहै, और इसके ऊपर टीकेभी बहुत पण्डितान कियह, भन्यग्रन्थोके मिलनेम कठिनता पड़तीहै, इनकी रचीहुई लीलावतीकी काका नाम 'छुद्धिपिलातिनी है, इनके बनाएहुए पाके देखनेते काच्य- .साहित्यादिके विषयमभी यह अतिप्रवीण प्रतीत होतेहैं, इन्होंने अपने पिता केशवसे साटवपके अनन्तर ग्रहोंका भन्तर देखकर शाके १४४२ में नवीन रोतिसे गणना करके इसप्रन्यको रचाहै ।। काशीस्यराजकीयप्रधानपाउझालापरी- क्षोतीर्णः पण्डितरामस्वरूपशमा मुरादाबाद. X. T. P.
श्रीः। अथ ग्रहलाघवकी अनुक्रमणिका मा . .... ......... .... ८-८ . .... .... विषय.. पृष्ठ...] रिपये. पृष्ठ. लो. अथ मध्यमग्रहसाधनाधिकारः। दिनमान रात्रिमान और.अ- इष्टदेवताको नमस्काररूप मङ्ग- क्षांशकी राति स्पष्ट चन्द्रकी रीति लाचरण .... • २५-२३ ग्रन्थरचना करनेकी आव- रवि और चंद्रकी गतिके स- श्यकता प्टीकरण महर्गण जाननेकी रीति तिथि, करण, नक्षत्र और सूर्यादि ग्रहोके ध्रुवाई योगकी रीति •२८-२५ सूर्यादिकोंके क्षेपंक.... अय पञ्चतारास्पष्टी- अहर्गणस मध्यमग्रहकी रीति ९-२ करणाधिकारः। मध्यम रविकी रीति १०-२० मङ्गलादि पंचग्रहोंके शीयांक ३२-२ मध्यमचंद्रकी रीति ११-१० शीग्रफल साधनेकी रीति....३५-६ चंद्रौञ्चकी रीति १२-११ भौमादि पंच ग्रहोंके मन्दांक ३६-७ मध्यम राहुकी रीति १३-११ भौमादि ग्रहोंके मन्दपलंकी .मध्यम मङ्गलकी रीति ....१३-१२ रीति युधकेन्द्रकी रीति १४-१२ शीघ्र फल और मन्द फलका मध्यगुरकी रीति संस्कारविचार ३९-१०. केन्द्रशुक्रकी रीति १५:१३ मन्दस्पष्ट गति साधनको मध्यम शानिकी रीति १६-१४ रीति सूर्यादिकाकी मध्यम गति.... १७-१८) भीसादि नहीको स्पष्ट गति-. कोनमहफिस ग्रन्थ अनुसार की रीति. ........४७-१२ वेधसे मिलताई यह पिपप १८-१६ शुक और मङ्गलका विशेष अथ रविचंद्रस्पष्टीकरण स्पष्टीकरण ४९-१३ पञ्चाङ्गानयनाधिकारः। भीम, युध भीर शुमके गतिः का विशेष संस्कार ५०-१४ भुन, फाटि, पद, सूर्यमन्दो- ध, चन्द्र भार रविन्द भीमादिकोका वक्री और मा- ५०-१५ फाटकी रीति १९-१० महल गुरु और शनिक उद- पलभा और परपंट्या रीति २१-१९ यस्तये शोरेन्द्रोश.... ५१-२ पर पागा भुगराष्टसं पुध और शकरे उदयास्तके मगारभार सपनांगीरीति २२-२०ीनकन्द्रांश .... .... ... ... .... . र्गी होना ... .... .... ....
धन.... .... .... .... ... ... अनुक्रमणिका। विषय. पृष्ठ. ला. विषय. पृष्ट. सो. भौमादिकोंकी वक्र गति उद दिनमानसे स्यूल क्रान्ति सा- य अस्त सरल गतिके दि- .७१-१५ . नकी रीति ५२-१८)नतांश, उन्नतांश और पराख्य बुध और शुक्रकी बक्रगति की रीतिः... ७२-१६ उदय अस्त और मार्गी हो- उन्नत कालसे भभीष्ट कर्णकी नेके दिन .... ५२-१९ रीति ७२-१७ मङ्गल,गुरु और शनिकै वक्री इष्टकर्णसे उन्नतकालीरीति ७३-२८ भवन, उदय, अस्त और उन्नतकालसे यंत्रजोन्नतांश- मार्गी होनेके दिन ५३-२० की रीति .... ७८-१९ 'अथ त्रिप्रनाधिकारः। यंत्रजोन्नतांशसे उन्नत- लकोदयका निरूपण कालकी रीति .७४-२० लग्नसाधनकी रीति.... ५६-२ यंत्रजोन्नतांशंसे इटकर्णकी, भोग्यकाल से कम इष्ट काल- के लग्न साधनकी रीति-५८-४ इष्टकर्णसे यंत्रजोन्नतांश सा- लग्नसे इष्टकालसाधन ...: ५९-४ धन.... •७६-२१ लग्न और सूर्य एक राशिम दिक्साधनकीरीति... ७६-२२ होतोलग्नसे इष्टकाल सा- दिक्साधनकी दूसरी रीति धन और रात्रि लग्न साध- और भुजसाधनकी रीति.७७-२३, नकी रीति दिगंशसाधनकी रीति 'गोलसंज्ञा, अयनसंज्ञा दिनार्ध दिगंशोले दिक्साधनकी रीति ७९-२५ ज्ञान राज्यध ज्ञान तथा भुज और कोटीकी रीति ....७९-२६ नलिकावन्धकी रीति ..... ८२-२७ नतकाल और उन्नतकालकी : अथ चन्द्रग्रहणाधिकारः। रीति ६२-७ ग्रहोंके चालनकी रीति ....८३-१. मक्षकर्णकी रीति ६३-१ ग्रहणसम्भव और चन्द्रशरकी हार साधनकीरीति.... रीति. इष्टकर्ण और इष्ट च्छायाकी सूर्यविम्ब चन्द्रविम्ब तया' रीति ....६४-९ भूमाविश्वसाधन.... इष्टच्छायासे कर्ण और नत | मानक्यखंड और प्राससा- · कालकी रीति क्रान्तिसाधनकी रीति • ६७-११ ग्रहणमस्थिति तथा खग्रा- • क्रान्तिसाधनकी दूसरी रीति ६८-१२/- समदस्थिति स्यूलकान्तिसाधनको रीति. ६९-१३ स्पर्श मोक्ष स्पर्शमर्द मोक्षमर्द- स्थूलक्रान्विसे भुजांश साधन ७०-१४) कीरीति • ८८-६ .७८-२४ भंशज्ञान .... .... .... .... .... .... .... .... ....
अनुक्रमणिका। क्षेपका कथन .... .... .... .... .... .... • ९२-२०/ वृत्तसायको ति .. ... ११२-७ . २१३-१ .... • विषय विषय पृटली, भष्पग्रहणके स्पर्श मोक्ष सं- सुर्यादि ग्रहोंके ध्रुवा १०७-२ 'मीलन तथा उन्मीलन वा- १०८-३ की रीति.... ....९९-७ | रविका धुवोनक्षेपक व्यगु इष्टकालीन ग्रास साधमकी वृत्त. और वापदिके ध्रुव रीति ९१-८ युककी रीति १०८-४ अयनवलनसाधनकीरीति.....९१-५ मध्यम रविसाधनेकी रौति ११०-५ ग्रस्तोट्य अथवा ग्रस्तास्तहोने व्यगु साधनको रीति 'परमध्यनतसाधन अक्षवलनसाधनकी रीति .... ९३-२० बारादि साधनकी रीति ग्रासांनि और खग्रासोनि- | पक्षचालनको रोति को रीति पाण्मासिफ चालन ११३८ ग्रहणमध्यको दिशश जानने वादि रवि और वृत्तसा- कीरीति .... धनकीरीति स्पर्श और मोक्षकी दिशाका वृतफल और रविमन्दके- न्द्रफलको रीति शान हारसाधनको रीति अथ सूर्यग्रहणाधिकारः। स्पष्टतिथि साधन हार लम्वन और लम्वनसंस्कृत रीति. तिथिकोरीति ...९७-१ रवि और व्यगु इनके स्पष्ट एम्पन संस्कृत व्यग्वर्क और करनेकीरोति चन्द्रनारकी रीति .९९-३ चन्द्रविन्धसाधनको त्रिभोन लग्न और मतांशकी • ११८-१३ १००-३ सूर्ययिम्य और भूभाबिम्ब नति और स्पष्टशरकी रीति १००-४ कोरीति स्पदालम्बन मोक्षलम्पन स्पर्श ग्रहणसम्भवकथन १२०-१५ और मोक्षकी रीति चन्द्रग्रासकी रीति १०२-५ १२१-१६ संमीलन उन्मीलन तथा धर्णः सूर्यग्रासकी रीति १२१-१७ ग्रहणके स्वामी जानने जाननेवी रीति... १०४-६ की रीति इएकालीन माउसाधनकी १२२-१८ स्पष्ट चन्द्र और चन्द्रकी ....१०५-१ सष्टगति १२३-११ अथ मासगणाग्रहण अय पञ्चांगाइहणदय- उपसाधनाधिकारः। साधनाधिकार मरवारिक मारगण पदणी पनामे ग्रहणक गणितकी रीवि १०७-२ . .. .... ... .... .... .... .... ...... . ... ....
अनुक्रमणिका! विषय. .. ... .... .... ... .... . ... .... .... .... षिय, पृष्ठ, श्लो. पृछ. लो. चन्द्रग्रासलानेकी रीति १२७-२ ग्रहका उदयास्त दिननिमित्त . चन्द्रविम्ब और भूभावि- गतगम्य लक्षण -१५२-१८ म्वकी रीति .... १२८-३ दिन लानेकीरीति.... भूभाके संस्कारको रीति.... १२९-४ शुक और चन्द्रमाके कालां- .नक्षत्रकी घटिकाओले चन्द्र-. शांका संस्कार.... १५५-२० ग्रासकी रीति १९-५ अगस्त्यके उदय और अस्त- नक्षत्रसे चन्द्रविम्व और भूभा- की रीति विम्बसाधन ग्रहका नित्यटदयास्तकी १३०-६ रीति वियि और नक्षत्रकी घटिका- रात्रिके समय ग्रहके उदय और . औले सुर्यग्राससाधन १३१-७ मस्तकी गतपटिकाकी. सूर्यविम्सवाधन १३२-८ १५७-२३ अथास्तोदयाधिकारः। चन्द्रमाके स्पष्टोदयास्तका- शुक्ल प्रतिपदाके चन्द्रोदयकी लकी रीति रीति अथ ग्रहच्छायाधिकारः। मासगणसे गुरुका अस्त' अभीष्ट ग्रहके दिनगतकाल उदयकी रीति.... २३६-४ साधनकीरीति १५९-१ शुक्रके अस्तउदयकी रीति १२८-५ ग्रहका दिनमान जाननेकी शुक्र और गुरुका उदयास्तके रीति सामान्य नियम १४०-७१ वैधसे ग्रहच्छायासाधन ग्रहके उदयास्तके ज्ञान .... १४१-८ की रीति चन्द्रशर साधनकी रीति १४२-९ ग्रहकी छायासे दिनगतका- चन्द्रका सूक्ष्मशरकी रीति १४२-१० लसाधनकी रीति १६३-४ ग्रहोंके उदयास्तका कालांश१४-११) ग्रहके उदयमे दिनोषरात्रि- भीम भादिग्रहोंके पातांश- गतकालं साधन कीरीति १४४-१२/ सूर्यास्तसे रात्रिगतकाल- भीमादि ग्रहांके शीत्रक- की रीति र६४-६ णकीरीति १९५-१३ अय नक्षत्रच्छायाधिकारः। भौमादिग्रहाँके शर और स्पष्टक्रांतिकी रीति नक्षवाके उदयध्रुव और १५६-१४ पञ्चांग स्थित स्पष्ट ग्रह और अस्तध्रुव दो साधनकी रीति १६५-१ वक्रास्तादि दिनोले इष्टदि- नक्षत्रोकेशरभाग." १६७-३ नक विषमन्दस्पष्ट ग्रहकी प्रजापति आदिके ध्रुवांश.... १६९-४ रीति १४९-२५/प्रजापति आदिके शरभाग १६९-५. दृकर्म साधनके निमित नक्षवच्छापादि साधनकी नतांग १५०-१६ रीति १७०-६ .... .... .... .... .... .... .... .... ....
, अनुक्रमणिका। .... .... १९५-१६ ... .... पिण्डफल :.. ... विषय. पठ.ली. विषय, पृष्ठ.. ग्रहांका रोहिणीशकटभेद कान्त्यक कहतेह १९०-८ और उसका फल १७१-७ कानपङ्क और शरांकका चन्द्रमाका रोहिणीशकट- संस्कार.... १९१-९ को भेदनकाकाल १७१-८ पातमध्यकाल साधनकी यान्योत्तरवृत्तस्थ नक्षवते रीति १९३-११ तरकार लग्न और गत पातस्थितिकालसाधन- रात्रिकीरीति १७२-९ कीरीति.... नक्षत्रकी उदयलग्न और अस्त सूर्यले चन्द्रज्ञानकी रीति १९५-१६ लग्न तथा तिन दोनोंसे रा- विगतकालकी रीति..... १७३-१० तिथिसाधन पश्चाद्चन्द्रग्रहणानयनाधिकार। स्वदेशीय नक्षत्रोदयोंके स्थिरलग्न .... १७१-१२ पिण्डसाधनको रीति नक्षत्रध्रुधकके साधनकीरीति"-२ १९८-३ अथ श्रृंगोन्नत्यधिकारः। सूर्यनक्षत्रसे फरापटिकाकी चन्द्रमाका शृङ्गोन्नतिका काल१७५-१ रीति १९९-४ गतएप्प सावयव तिथि औ. सूर्यनक्षत्र साधनकी रीति १९९-५ र पञ्चांगस्थ रविसे चन्द्र २००-६' साधनेकी रीति १७६-२ तिथि स्पष्ट करनेकी रीति २०१-७ वलन और सित इन दोनों नक्षप्रसाधनकी रीति २०२-८ १७६-२ योगसाधनकी रीति चन्द्रका अंगीञ्चकी रीति १४७-४ पुर्णान्तकालमें राहसाधन- अय महयुत्यधिकारः।. की रीति.... ग्रहविम्बसाधनकी रीति. १५८-१ सूर्यसाधन और ग्रहणसं- युतिके गतगम्यकी रीति १८०-२ ..२०४-२१ प्रहयुतिके दिन जानने की रीति१८२-३ चन्द्रविय और भूभासाधन २०५-१३ ग्रासमान जाननेकी रीति २०५-१२ .ग्रहीका दक्षिणोत्तर दिशा में संस्थान और उनके अन्तर १०१-४ प्रतिमासमें वारादिका चालन २०६-१४ अथ पातांधिकारः। अथ पूर्वशकादहर्गणाद्यानयना- पात पाटका अनुमान फर- नेकी रीति १८३-१ धिकारः। सपातक संभवलक्षण और भसंभवलक्षण १८५-२ | यदिशाक १४४२ वाँसे पहिलेका होय तब भह- पात संकायको भेदन करने गंण लानेकीरीति कीरीति २०७-१. पातके गतगम्पक्षणको रीति-५ ग्रहसाधनको रीति ....२०४-३ शरगण्ट भार शरसाधन पूर्य आपायाका ग भोर ग्रन्थ- पीरीति पतांकी नम्रता २०८-५ पारयों पष्ट पारनेकी रीति - 'ग्रन्थकर्ताक नामादि फयन २०९-५ इत्यनुरमणिका समाप्ता, भवकी रीति. .... . .... .... ...
श्रीः। श्रीगणेशदेवनकृत- ग्रहलाघव। पण्डितरामस्वरूपकृत- सावय-और-सोदाहरणभापाटीका- सहित। श्रीगणेशं नमस्कृत्य पार्वतीनन्दनं परम् ॥ श्रीगणेशकृतौ कुर्व भाषां तत्वप्रकाशिकान् ॥१॥ इष्टदेवताको नमस्काररूप मङ्गलाचरणं "घसन्ततिलका" छन्दमें लिखते हैं- ज्योतिःप्रबोधजननी परिशोध्य चित्तं तत्सूक्तकH- चरणैर्गहनार्थपूर्णा । स्वल्पाक्षरापि च तदंशकृतै- रुपायेळक्तीकृता जयति केशववाक्छुतिश्च ॥ ३ ॥ अन्वयः-तमुक्तकर्मचरणः चित्तम् परिशोध्य ज्योति प्रवी- धजननी, स्वल्पासरा अपि गहनार्यपूर्णा, व तदंशकृतैः उपायैः व्यक्तीकृता, केशववाक श्रुतिः च जयति ॥ १॥ अर्थ:-वैदकवि भलीप्रकार वर्णनकरेहुए स्नान, दान, जप, होमादि सुन्दर कौके द्वारा वित्तको निर्मलकरके मुमुक्षपुरपाक अर्थ ज्योतिःस्वरूपत्र- मका ज्ञान करानेवाली, तथा थोड़े अक्षर और गम्भीरअर्थयुक्त, रावण मा- दिकाँकरके रचनाकिये हुए भाप्यास स्पष्टकरीहुई जोभगवतके मुससे उत्पन्न होनेवाली वेदवाणी है सो सर्वोत्कर्षकरकै युक्तहै । अथवा-वेदोंको प्रमाण- माननेवाले केशवनामकपिताके रचनाकियेहुए ग्रहकोकभादि ग्रंथोंमें कहे हुए ग्रहसाधनादि कम्मोके द्वारा चित्तको निम्मलकरके नक्षत्रादिकांके ज्ञानको उत्पन्न करनेवाली, तया थोडेअक्षर और बहुत अर्थवाली, और केश- ग्रहलायव । [मध्यमग्रहसायना- बके पुत्र तथा शिष्यादिकोंके बनायेहुए अनेकटीकाओंसे स्पष्ट करीहुई के- शवनामवाले पिताके मुखसे उत्पन्नहुई वाणी सर्वोत्कर्षयक्तहै ॥ १ ॥ अब अपने करणग्रन्थ और रामावतार. विष्णुभगवानकी समताको द्योत नकरतेहुए "औपच्छन्दसिक" छन्दम मङ्गलाचरण लिखतेहैं- परिभग्नसमौविकेशचापं दृढगुणहारलसत्सुवृत्तवाहुम्॥ सुफलप्रदमात्तप्रभंतत्स्मररामं करणं च विष्णुरूपम् २ अन्वयः-परिभमसमौविकेशचापम्, दृढगुणहारलसत्सुवृत्तवाहुम्, सुफलप्रदम्,आत्तनृप्रभम् तत् विष्णुरूपम् रामम्;करणम् च स्मर।२॥ अर्थः-(देशिप्य! ग्रन्थक भारम्भकरनेके समय ) प्रत्यश्चासहित शिवजीका धनुष तोड़नेवाले, मोतियोंके हारसे शोभायमान, सुन्दरभुजावाले, मुक्ति- आदि शुभफल देनेवाले, मनुष्यशरीर धारणकरनेवाले, उन सर्वजनप्रसिद्ध विष्णुभगवान्के अवतार श्रीरामचन्द्रजी महाराजको स्मरणकर ॥ अथवा- (हेगणक!) जिसमें ज्या और चाप इनको रयागदियाहै, जिसमें अपव- नित अर्थात् संक्षिप्त गुणक और भाजक हैं, जिसमें चन्द्रमाका मन्द केन्द्र और भुनरूपवृत्त भली प्रकार वर्णितहै, मन्दफलशीघ्रफलआदिको देनेवाले अथवा चन्द्रग्रहणादिका ज्ञान देनेवाले, जिसमें गङ्गकी छाया ग्रहणकरीहै मे नानायकारक छन्दास शोभायमान वक्ष्यमाण करणग्रन्थको स्मरणकर॥ अब गगाचार्यभास्कराचार्यादिकोंक रचनाकरेहुए करणकुतूहलादि- अन्योंक होनेपरभी इसग्रन्थके रचना करने की आवश्यकता "वसन्ततिलका" सन्दमें कहतेह- यद्यप्यकापुरुरवः करणानि धीरास्तेषु ज्यकाधनु- रपास्य न सिद्धिरस्मात् । ज्याचापकर्मरहित सु- लघुप्रकारं कत्तु ग्रहप्रकरणं स्फुटमुद्यतोऽस्मि ॥३॥ अन्वयः-यद्यपि, उरवः, धीराः, करणानि, अकार्पः,(तथापि)तेपु. ज्यकाधनः, अपास्य सिद्धिः, न, अस्मात्, (अहम्), ज्यांचापकर्मर हितम्, मुलपुमकारम, रफुटम्, ग्रहह्मकरणम्, फर्नुम, उद्यतः अस्मिा३ अर्थ:-यपि, युद्ध, पप्पंगान गर्गऋषि और भाम्कराचार्य आदिकान, करणप्रन्य, रचना विपद, ( तथापि,) उनग्रन्याम पाचापको त्यागकर, प्रहमादिको मिद्धि नहीं होती है, इसकारण (मैं गणेशदया ) ज्याचाप- धिकारः] सान्वयभापाठीकासमेत। क्रिया रहित, वहुत अर्थको देनेवाले संक्षिप्त और स्पष्ट अर्थवाले ग्रहस- म्बन्धी ग्रहण-उदय-अस्तादि क्रियाओक साधनेवाले अन्यको, करनेको टद्यत हुआहूँ ॥३॥ अब ग्रहस्पष्ट आदि कार्य करनेके निमित्त महर्गण जाननेकी रीति दो- श्लोकोसे कहतेह- दूधीन्द्रोनितशक ईशहत्फलं स्याचक्राख्यं रविहतशेपकं तु युक्तम् । चैत्राद्यैः पृथगमुतः सह- गुन्नचक्रादिग्युक्तादमरफलाधिमासयुक्तम् ॥ ४ ॥ खत्रिघ्नं गततिथियुनियचक्रांगांशाढ्यं पृथगसु- तोऽन्धुिपवलब्धैः । ऊनाहैवियुतमहर्गणोभवेद्वै वारः स्याच्छरहतचक्रयुग्गणोजात् ॥ ६॥ अन्वयः व्यब्धीन्द्रोनितशकः, ईशहत, (कार्यः); फलम्, चका ख्यम्, स्यात्, । रविहतशेपकम्, तु, चैत्राद्यैः, युक्तम्, पृथक् (स्था- प्यम् ), सदृग्नचकात, दिग्युक्तात- अमुतः, अमरफलाधिमासयुक्तम्, खत्रिनम्, गततिथियुक्, निरपचक्रांगांशाव्यम्, पृथक् (स्थाप्यम् ) अमुतः: अब्धिपट्कलब्धैः, ऊनाहैः, विद्युतम्, अहर्गणः, भयेत् । वै, गणः शरहतचक्रयुक्: अब्जात्. वार: स्यात् ॥ 2 ॥५॥ अर्थ:-वर्तमान शाकाम १४ एक सहस्र चारसी वयालीस घटावे जो गैप रहे, उसमें ११ ग्यारहका भाग देय जो लन्धि मिले वह चक्र कहाता है, भाग देनेसे जो शेष बचे टसको ५ वारहसे गुणा करै जो गुणन फल होय टसमें चैत्रादि मास अर्थात् चैबाक्ल प्रतिपदासे लेकर इष्टकालपथ्यंन्त जो गत मास हो दनको जोड़ देय (यह मध्यम मासुगण कहलाताहै.) इसको दो स्थानमें लिखे एक स्थानमें द्विगुणित चक्र और दहा १० से युक्त. करदेय तब जो भङ्कहीं उनमें ३३ तेतीसका भाग देय जोसधिमिले उसको (अधि- मास कहते हैं) द्वितीय स्थानमें लिखे हुए मध्यममासगणमें युक्तकर देय तप जो भङ्ग हो टनको तीस से गुणाकरदेय जो गुणन फल हो उसमें गततिधि अर्थात् शुक्लपतिपदासे लेकर इट दिनपर्यन्तकी गतविपि युक्त- करक, जिनमें छः ६ का भाग देय जो शेष व उसको छोड़देय जो लब्धि " (४) ग्रहलाघव। [मध्यमग्रहसाधना- 4 हो वहभी गततिथि युक्तकरहुप भोम युक्त करदेय (यह मध्यम अहर्गण कहाताहै ) इसको दो स्थानमें लिखे एक स्थानमें ६४ चौसठका भाग देय जो सन्धिहो वह क्षय दिवस होते हैं इन क्षय दिवसीको द्वितीय स्थानमें घटा देय जो शेष रहै वह अहर्गण (दिनोंकी संख्या) होगाहै. ॥ प्रोक्त चक्रको ५ पाँचसे गुणाकरके जो गुणन फल मिले उसमें अहंगंण युक्त- करके ७ सातका भाग देय जो शेप वचं उससे चन्द्रवार आदि दिनोंका वोध कर अर्थात् यदि० शून्य शेष होय तो सोमबार जाने १ एक गेप होय तो भौमवार जाने २ दो शेप होय तो बुधवार इत्यादि. जाने ॥ ४॥५॥ विशेपरीति-इसरीतिसे इष्टवार मिलताह कदाचित इसमकार इष्टवार नहीं मिले तो अहर्गणमें १ एफ युक्त करदेय या १ एक घटा देय तव अहर्ग- णोत्पन्नवार और इष्टवार परांवर मिलेगा। इसप्रकार महर्गण स्पष्ट होताहै । उदाहरण. शाके १५३४ वैशाख शुक्ल १५ सोमवार घड़ी ५४ पल १० विशाखानक्षत्र पड़ी ३९ पल ५५ वरीयान् योग घड़ी० पल. ९ उस दिन चन्द्रग्रहणका पंचं कितना होगा यह बात जानने के निमित्तं अहर्गण सिद्ध करते हैं- यहाँ शाके १५३४ में १५५२ को घटाया तब ९२ चानचे शेपरहे इसमें २१ ग्यारहका भाग दिया तय ८ आठ लब्धि हुए इसका नाम चक्रहे, शेष बचे चारको १३ चारहसे गुणा कराती १८ अड़तालीस हुए इस चैत्रादि गतमास १ एक जोड़ा तव १९ उनचास हुए यह मध्यममासगण कदाताहै इनको दो स्थानमें द्विगुणित चक १६ सोलह और १० दश युक्त करा तौ ७५पिछह- तर हुए इसमें ३: तैतीसका भाग दिया तब २ दो लब्धि हुए यह - • अधिक मास कहाताह इसको द्वितीय स्थानके अङ्क ४९ में युक्त किया तब ५१ इक्या- घन हुए पद मासगण कहाताहै इसको ३० तीससे गुणा किया तब १५३० एक सहस्र पाँचसो तीस हुए इसमें गततिथि १४ चौदहको युक्त किया और, छाका भाग दियेहुए चक्रको लब्धि १ को युक्त किया तब १५४५ एकस. मलं यह क्षयादवर पाहलात है इसका द्वितीय स्थानमें लिखे हुए मध्यम भदगंणमें पटाया तय १५३.१ पकसहन पाँचसी इछीस यचे यही अहर्गणहै १५.१४म अहर्गणम पाँचस गुणाकरेगुप चक ४० चालीसको युक्त करहिया तब १५६१ पदनार पाँचसो इकसठ हुए इसमें सात का भाग दिया तय दान्य दोष पाइमकारण शहगंणोत्पन्न वार मापा यही इष्टयारदै ।
१ एक और ग्रहलायय। [ मध्यमग्रहसाधना- ३६ मध्यममासगण ६४) ११११ मध्यममहर्गण १ अधिकमास १७ क्षयदिवस ३७ मासगण १०९४ अभीरवारलानेयोनि मित्तइसमें '-~~-१०९४ १११० ० गततिथि मिलाया तो १०९५ स्पष्ट महर्गण १०च०-६-१ हुआ. ११११ मध्यमअहर्गण उदाहरण २ द्वितीय. शाके १५३० इसवर्षमै भाद्रपद अधिकमास है तहाँ कार्तिक शुक्ल प्रति पदा शनिवारमे अहर्गण साधते है ॥ १५३० शाके ७म०मा०ग० १५४२ च०८४२-१६ ११)८(८० ८८ शेष १ अधिकमास- ० ० ७ग०मा० यहाँ अधिक मास लब्ध नहीं होताह तथापि ग्रहण किया तब अधिमास हुए २॥ ७म०मा०ग० २अधिकमास ९ मा०ग० ६४) २७१ म० अहर्गण ४क्षय दिवस २६७ अहर्गण, २७० ०गतिक च०८-६-१ २७१म० अदगण . अभीष्टपारलाने के निमित्त इसमें एक घटापा तय शनिवार मिला अत एच ०६६ ही ठीक अहर्गण है। यही वात श्रीभास्कराचार्यने अपने सिद्धान्तशिरोमणिमे लिखी है धिकारः ?] सान्वयभाषाटीकासमेत । अब सूर्य और चद्रमाआदि ग्रहांके ध्रुवाङ्क लिखते हैं। खविधुतानभवोस्तरणैर्धवः खमनला. रसवॉईय ईश्वरोः । सितरुचो भमुखोथ खगायमौ शरकृता गदितो विधुतुङ्गजः ॥६॥ शैला द्वौ खरा अगोः क्षितिभुवो भृतत्वदन्ताविदः केन्द्रस्याधिगुणोडवः सुरगुरोः खं. पयमा वस्विलाः । द्राकेन्द्रस्य भृगोः कुंशयमलों राश्यादिकोऽथो शनेः शैलीः पञ्च भुवो यमब्धिय इमेऽथ क्षेपकः कथ्यते ॥७॥ अन्वयः-खविधुतानभवाः, तरणेः, भमुखः, ध्रुवः, ( भवति ); । सम्, अनलाः, रसवाईयः, ईश्वराः, सितरुचः, (ध्रुवः, भवति)। अय, खगाः, यमौ, शरकृताः, विधुतुंगनंः, (ध्रुवः ): गदितः ॥ ६ ॥ शैलाः, दौ, खशराः, अंगोः (ध्रुवः, भवति ), भूतत्वदन्ताः क्षिति- भुवः (ध्रुवः, भवति ) | अब्धिगुणोडवः, केन्द्रस्य, विदः (ध्रुवः, भवति)। सम्, पध्यमाः, वत्विलाः; सुरगुरोः (ध्रुवः, भवति)। कुशक्रयमला: द्राकेन्द्रस्य, भृगोः, (ध्रुवः, भवति ) । अय शैलाः, पञ्चभुवः, यमाब्धयः, इमे, शनैः; राश्यादिकः; (ध्रुवः भवति)। अय: क्षेपकः, कथ्यते ॥ ६॥७॥ अर्थः-ख कहिपे शून्य० विधु कहिये एक ? तान कहिये १९ भव कहिये ग्यारह १? यह सूर्यका राज्यादि ध्रुव होता है । ख कहिये० भनट कहिये ३ रसवादि कहिये ४६ ईश्वर कहिये ग्यारहायह चन्द्रमाका ध्रुव होताहै। खग कहिये ९ यम कहिये २ गरकृता कहिये ४५ यह चन्द्रमाके मन्दोच्चका ध्रुव होताहै । कुलाचल कहिये ७ और दो२ खगर कहिये ५० यह राहुका ध्रुव होताहै । भू कहिये ? तत्व कहिये २५ दन्त कहिये ३२ यह महसका ध्रुव होता है । अन्धि कहिये ४ गुण कहिये । उ कहिये २७ यह केन्द्रबुधका ध्रुव है । रा कहिये० पड्यम कहिये २६ वखिल कहिये १८ यह गुरुका ध्रुव है । फु कहिये ? गक कहिये. १४ यमल कहिये । यह शुभकेन्द्रका ध्रुव होता है। और और कहिये सात ७ पंचभू कहिये १५ पमान्धि कहिये ४२ यह शनि- का भय होताह। , - - ग्रहलाघव । [ मध्यमग्रहसाधना- १ एक और .३६ मध्यममासगण ६४) ११११ मध्यमअहर्गण १ अधिकमास १७ क्षयदिवस ३७मासगण १०९४ अभीष्टवारलानकनि- ३० मित्तइसमें--१०९४ १११० गततिथि मिलाया तो १०९५ स्पष्ट अहर्गण १०च०:६-१ हुआ. ११११ मध्यमअहगण उदाहरण २ द्वितीय. शाके १५३० इसवर्ष भाद्रपद अधिकमास है तहाँ कार्तिक शुक्ल प्रति- पदा शनिवारमें अहर्गण साधते हैं। १५३० शाके ७म०मा०ग० १४४२ 'च०८४२१६ -११) ८८(८च० १० ८८ शेप १२ १ अधिकमास- ७ग०मा० यहाँ अधिक मास लब्ध नहीं होताह, तथापि ग्रहण किया तय अधिमास हुए २॥ ७म०मा०ग० २अधिकमास ९माग० ६४) २७१ म० महर्गण '४क्षय दिवस २६७ महर्गण, २७० ०गति च०८:६-१ २७१म० अर्गण अभीष्टवागटानेके निमित्त इसमें एक घटाया तय शानिवार मिला अत पर २६६ ही ठीक महंगण है॥ यही बातोश्रीभास्कराचायने अपने सिद्धान्तशिरोमगिमें लिखी है धिकारः] सान्वयभाषाटीकासमेत । अब सूर्य और चदमाआदि ग्रहोंके धुवाङ्क लिखते हैं। खविधुतानभवास्तरणैर्भुवः खमनला. रसवार्द्धय ईश्वरीः । सितरुचो भमुखोथ खगायमौ शरकृता । गदितो विधुतुङ्गजः ।।६।। शैला द्वौ खशरा अगोः क्षितिभुवो भूतत्वदन्ताविदः केन्द्रस्याधिगुणोडवः सुरगुरोः खं, पयमा वस्विलाः । द्राकेन्द्रस्य भृगोः कुंशक्रयमुला राश्यादिकोऽयो शनेः शैलाः पञ्च भुवो यमाब्धय इमेऽथ क्षेपकः कथ्यते ॥७॥ अन्वयः-खविधुतानभवाः, तरणः, भमुखः, ध्रुवः, (भवति )। खम्, अनलाः, रसवाईयः, ईश्वराः, सितरुचः, (ध्रुवः, भवति अय, खगाः, यमी, शरकृताः, विधुतुंगजः, (ध्रुवः ), गदितः ॥ ६ ॥ शैलाः, दौ, खशराः, अगोः: (ध्रुवः, भवति ), भूतत्वदन्ताः, क्षिति- भुवः, (ध्रुवः, भवति), । अधिगुणोडवः, केन्द्रस्य, विदः (ध्रुवः, भवति)। खम्, पछ्यमाः, वस्विलाः; सुरगुरोः (ध्रुवः, भवति)। कुशक्रयमलाः, द्राक्केन्द्रस्य, भृगोः, (ध्रुवः, भवति)। अय शैलाः, पञ्चभुवः, यमाब्धयः, इमे, शने: राश्यादिकः, (ध्रुवः, भवति)। अथ, क्षेपकः कथ्यते ॥ ६ ॥ ७ ॥ अर्थः-ख कहिपे शून्य विधु कहिये एक. १ तान कहिये ४९ भव कहिये ग्यारह ११ यह सूर्य्यका राज्यादि ध्रुव होता है । ख कहिये० अनल कहिये ३ रसवाद्धि कहिये ४६ ईश्वर कहिये ग्यारहर१यह चन्द्रमाका ध्रुव होताहै। खग कहिये ९ यम कहिये २ शरकृता कहिये ४५ यह चन्द्रमाके मन्दोचका ध्रुव होताहै । कुलाचर कहिये ७ और दो खशर कहिये ५० यह राहुका ध्रुव होताह । भू कहिये ? तत्व कहिये २५ दन्त कहिये ३१ यह मङ्गलका ध्रुव होता है । अन्धि कहिये ४ गुण कहिये ३ उटु कहिये २७ यह केन्द्रबुधका ध्रुव है । स कहिये० पद्यम कहिये २६ बस्विस कहिये १८ यह गुरुका ध्रुव है । कु कहिये १ शक कहिये, १४ यमल कहिये २ यह शुक्रकेन्द्रका ध्रुव होता है। और और कहिये सात ७ पंचभू कहिये १५ यमाधि कहिये ४२ यह शनि- - बरधव होताहै।
० १ or ११ ५० . १३ ० ० ० ० ० ० (८) ग्रहलाघव । [ मध्यमग्रहसाधना- यह सब यन्त्र के द्वारा स्पष्ट करके दिगते हैं । नाम रवि चन्द्र मन्दाच्चिा र मङ्गल बुध गुरु शुक्रकाशन राशि . १ अश २६ १५ कला ४९। ४६, ४५ ३२ । ३७ विरला ११ । ११ इसके अनन्तर क्षेपक कहते है ॥ ६ ॥७॥ ११. रुद्रागोजा कुवेदास्तपन इह विधौ शुलिनो गोभुवः पट् तुङ्गेक्षात्यष्टिदेवास्तमसिसमुड़वोऽष्टांगयोऽयो महीजे । दिक्छेलायोज्ञकेन्द्रविभकलनवभं पूजितेऽ व्याश्चभूपाः शौके केन्द्र ग्रहोद्योऽदिनखनवेशनों गोतिथिस्वर्गतुल्यः॥८॥ अन्वयः-रुद्राः गोजाः, कुवेदाः तपने ग्रहाद्यः (क्षेपका, स्यात्)। शूलिनः, गोभुवः, पद, इह; विधी, (क्षेपका, भवति । अक्षात्यष्टिदेवाः, तुंगे, (क्षेपफ, भवति)। खम्, उडवः, अप्टामयः, तमसि, (क्षेपकः, भवति ) । अयो. दिक्छैलाष्टी, महीजे, (क्षेपका. भवति) । भविकलनवमम्, ज्ञकेन्द्र, (क्षेपका भवति ) । अद्य- विभूपाः पृजिते, (क्षेपकः, भवति )। अदिनखनव, शोक, केन्द्र, (सपका, भवति)। गांतिथिस्वर्गतुल्यः, शनी, (क्षेपकः भवति) ॥८॥ अर्थ:-रद्र फदिप ११ गोज कहिये १९ कुवदा कहिये ४१ यह सूर्यमें (क्षेपका होताह । ) दिनः वाहिये १२ गोभुवः कहिये १९ और ६ यह चन्द्र- मामक्षपक होता है । क्ष वाहिय ५ अत्यध्यः पहिये १७ देव काहिये ३३ यह चन्द्रमा मन्दाधम शेपफ होताह । रा कहिये उड कहिये २७ भष्टामयः यहि ८ यह राम क्षेपक होता है। और दिक फाहिये १०ौल कहिये ७ गट वाहिये ८ यह महलम क्षेपक होता है । कम ह भाटा कहिये २७ कला जिनमें पी जानी राशि अर्थात आठराशि ८ उन्तीस कला २०. तैतीस पिपला महन्द युधम क्षेपक दाता। भादि कहिये ७ अभिनी कहिये भुपरदिप ? पद गुरमें क्षपर ताद । भरि यदिप ७ नए कहि २० धिकारः१]. सान्वयभापाटीकासमेतं । और ९ यह केन्द्र शुक्रमें क्षेपक होताहै । गो कहिये.९ तिथि कहिये १५ स्वर्ग कहिये २१ यह शनिमें रायादिक्षेपक होताहै ॥ ८॥ यह संय यन्त्रक द्वारा स्पष्टंकरकै दिखातेहैं ।क्षेप नाम | रवि चन्द्र चन्द्रोच राहु मङ्गल बुधकेन्द्र। गुरु शुक्र शनि १० ८ ९ राशि १२ अंश १९ २७ ३० ६ ८ ३३ ९ किला। ११ विकला ०. . ० ० 10 " अब अहंगंणसे मध्यमग्रहलानेकी रीति लिखतेहैं- दिनगणभवखेटश्चक्रनिन्नध्रुवोनो दिवसकृदुदयेस्वक्षे पयुङ्मध्यमः स्यात् । निजनिजपुररेखान्तस्थिता- द्योजनौषाद्रुसलवमितंलिप्ताः स्वर्णमिन्दौ परे प्राक्॥९॥ अन्वयः-चक्रनिनववोनः, स्वक्षेपयुक, दिनगणभवखेटः, दिवस- कृदुदये, मध्यमः स्यात् ॥..निजनिजपुररेखान्तःस्थितात्, योजनौ- घा, रसलवमितलिप्ताः, पर, प्राक्, इन्दौ, स्वर्णम् (भवति ) ॥ ९॥ अर्थः-आगे कहीहुई रीतिके अनुसार अहर्गणसे लायेहुए ग्रहमें चक्रसे. गुणाकियेहुए ध्रुवको घटादेय जो शेपरहै उसमें अपना क्षेपक युक्तकरदेय तब जो अङ्क होय वह सूर्यके उदयकालमें मध्यमग्रह होताहै ॥ अपने अपने, नगरसे दक्षिणोत्तररेखा जितनी योजनहोय उस योजनसं- ख्या ६छाका भागदेय जो लब्धिहोय सोकलाविकलादि होतीहै,वह अपना नगर दक्षिणोत्तर रेखासे पश्चिम होय तौ धन और पूर्व होय तो ऋण जानना। इसको रेखान्तरसंस्कार और प्रथमफलसंस्कार कहतेहैं ॥९॥ मध्यम ग्रहलानेकी रीतिमें यह ध्यान रखना चाहिये कि ग्यारह वर्षपर्यन्त चक्र एकही रहताहै । और क्षेपकाङ्कमें चक्रसे गुणाकियाहुआ ध्रुवक घटावै जो शेप रहै उसको अहर्गणोत्पन्न ग्रहमें मिलादेय । इस शेपको ध्रुवानक्षेपक कहते हैं । इस विषयका उदाहरणं लिखतेहैं- ., उदाहरण. सूर्यका ध्रुवा ० राशि अंश ४९ कला और ११ विकलाहैं, इसको ४ ८ से गुणाकरा तो राशि १५ अंश ३३ कला और २८ विकलाहुआ, .
रा० ११ ४ १ ० ० ७ १ . . ० ० ० ० ० (१०) ग्रहलायव । [ मध्यमग्रहसाधना-: इसको क्षेपकांक ११ राशि १९ अंश ११ काला विकलाम घटाया तो ११ राशि ५ अंश ७ कला ३२ विकला यह सूर्यका ध्रुवोनक्षेपक हुआ, इसीरी- विसे सम्पूर्ण ग्रहांका ध्रुवोनक्षेपक जानना चाहिये, सोई हम स्पष्टरीतिसे कोष्टकमें लिखत- बोगक्षेपक नाम सूर्य चन्द्र चन्द्रोच राहु मङ्गल, बुध गुरु शुक्रकेंद्र शानि २० अंग १८ २५ ६ १२ २७ कर वि०:३२१ ३२. अव मध्यमरवि जाननेकी रीति लिखते हैं- स्वनगलवहीनो धुव्रजोर्कज्ञशुकाः खतिथिहृतग- णोनो लिप्तिकास्वंशकाद्याः॥5॥ अन्वयः स्वसनगलवहीनः युवजः लिप्तिकासु,खतिथिहतगणोनः, ( कार्यः, तदा ), अंशकाद्याः, अर्कज्ञशुकाः, (स्युः) ॥ 5 ॥ अर्थः-अहर्गणम खनगलव कहिये ७० सत्तरका भागदेय तब जो लब्धि होय सी अंदादि होतीहै । इस लब्धिको अंशात्मक मातेहुए अहर्गणम घटाचे, जो शेपरदै उसकी कलादिमं । अहर्गणसे १५० का भागदेकर जो लब्धिहोय उ- सको करामादि मानकर घटादेयं तब जो शेपरहै सो अहर्गणोत्पन्न रवि युध और शुक्र होतेहैं इनको "दिनगणभवेत्यादि " रीतिसे अथवा अपना अपना भुवोनदोपक मिलाकर मध्यम रवि-मध्यम दुध-और मध्यम शुक्र चनालय ॥5॥ उदाहरण. महगंण १५२१.में ७० को भागदिया तय सन्धि-२१ हुए इनको अंशमा- नना चाहिये, शेप यचे ५१ इनको ६० गुणाकिया तब ३०६० हुए इसमें ७० फा भागदिया तव ४३ लन्धि हुए इनको फलामानना चाहिये शेषपचे ५५ इनको ६० से गुणाकिया तब ३००० हुए इसमें ७० का भागदिया सय ४२ सन्धि हुए इनको विकला मान इसमकार अहर्गणमें सत्तरका भाग देनेग २१ अंश ५३ याला ४३ वि० सब्धि हुए इनको अंशात्मक अर्गण (१५२१ भंश ) में पटाया तय १४९० अंश १६ कलर १८ पिफमा पचे । इनमी करादि १६ क. १८ वि० में। (भदर्गण १५३१) धिकारः१] सान्वयभापाटीकासमेत । (११) में १५० का भाग दिया तो लब्धि हुए १० इनको कलात्मक मानै टोप रहे२१ इनको ६० से गुणा करा तौ१२६० हुए इनमें१५०का भागदिया तो लब्धि हुए ८ इनको विकलात्मक माना इसप्रकार लन्धि हुए १० कला ८ विकला इन- को ऊपरके अंशांको छोड़कर कलादिम घटाया तव शेप रहे १४१९ अंश ६ कला १० विकला । (ऐसी रीतिहै कि अंगामें ३० का भाग देकर जो शेष वचै वह अश होतेहै और जो लब्धि मिले वह राशि होती हैं यदि वारहसे अधिक लन्धि आवै तो लन्धमें बारहका भाग देकर जो शेष रहै उसको राशि मान और लब्धिको त्याग देय ) इसकारण यहाँ १४९९ अंगाम ३० का भाग दिया तव शेप रहे २९ यह अग हुए और लब्धि मिले ४९ यह बारहसे अधिक है इस कारण बारह १२ का भाग दिया तो शेष रहा १ यह राशि हुई और लब्धिको त्याग दिया इसप्रकार कर- नेसे १ रा ०२९ २०६क० १० वि० यह अहर्गणोत्पन्न सूर्य हुआ इसमें ऊपर कही हुई "दिनगणभवेत्यादि" रीतिके अनुसार १२ । ११ । ११४८ 01 १४ । ३३ । २८ चक्रसे गुणाकरे हुए ध्रुवाको घटाया111३ तव शेष रहे १ । १४।३२।४. इसमें सूर्यके ११ ॥ १९॥ ४१६ ० क्षेपकाङ्कको जोड़ दिया तौ १।४।३।१ हुए यह मध्यम रवि हुआ । अथवा अहर्गणोत्पन्न रवि १।२९।६1 १० में रविका ध्रुवोनक्षेपक ११1 101 ३२ जोड़ दिया तव ३1४1१।१२ हुए यहाँ राशि वारहसे अधिक है इस कारण राशि- या में वारहका भाग देकर शेप एकको राशि माना तव वही १।। १३।४२ मध्यम रचि होगया ॥ अव मध्यमचन्द्र लानेकी रीति लिखते है- गणमनुहतिरिन्दुः स्वाद्रिभूभागहीनः खमनुहृतग- णोनोलितिकास्वंशपूर्वः ॥ १०॥ अन्वयः-स्वादिभूभागहीनः, गणमनुहतिः, लिप्तिकासु, खमनुहत- गणोन:, ( कार्यः), (तदा ). अंशपूर्वः इन्दुः, (भवति) ॥ १० ॥ भर्यः-अहगंणकोट से गुणा कर जो गुणनफल हो उसको अंशादि जाने उसमें महगणमें १७ का भाग देकर जो भंशादि मिले सो घटादेय तब जो टोप रहे उसकी कटार्दिम अहर्गणसे १४० का भाग देकर जो सब्धि होय उसको कद आदि मानकर घटादेय तय अहंगंणोत्पन्न चन्द्र होता है तदनन्तर उक्त क्रिया करनेसे मध्यम चन्द्र होताहै ॥ १०॥ . .
(१२) ग्रहलायव । [मध्यमग्रहसाधना- ७.. ४४, उदाहरण. अहण १५३१ को रट से गुणाफरा तौ २१२९४ अंशात्मक हुए इनमें भह- गंण १५२१ में १७ भाग देनेसे प्राप्त हुई लब्धि १२५२ अंश ३५ काला १७ वि- कलाको घटाया २१३६३ । ३५॥ १७॥ तच २००४१ अंश २४ कला ४३ विकली शेष रहा तब अहर्गण १५२१ में १४० भाग देकर लब्धि हुए कलादि १० कला ५१ विकला इनको ऊपरके शेषके कलादिम घटाया २००४१ १३४।४३ । तब शेष रहे २००४१ । १३ । ५२ । अंशीम तीसका भाग देकर पूर्वोक्तरीतिके अनुसार राशि करी तो ८०१ अं० १३ का० ५३ वि० यह अहर्गोत्पत्र, चन्द्र हुआ इसमें ऊपर “दिनगणभवेत्यादि " कही हुई रीतिके अनुसार चन्द्रके ध्रुव । ३।४६११ को चंक ८से गुणाकरा तब १1०1९।२८। हुआ इसको अहर्गणोत्पन्न चन्द्र ८। १ । १३ । ५२ में घटाया तब ७११।४।२४ शेष रहे इसमें चन्द्रका क्षेपक ११ ११९१६१० जोड़ा तव ६ । २०११०१२४ यह मध्यम चन्द्र हुआ { अहर्गणोत्पन्न चन्द्रमें चन्द्रमाका वोनक्षेपक युक्त करनेसेभी यही मध्यमचन्द्र होताहै ॥ अब चन्द्रोचसाधनेकी रति लिखते हैं- नवहतंदिनसंघश्चन्द्रतुङ्ग लवाद्यं भवति खनग-. भक्तधुव्रजोपेतलिप्तम् । 55। अन्वयः-नवहतदिनसंपः, खनगर्भक्तावनोपेतलिप्सम्; लवाद्यम्, चन्दतुगम् (भवति)। अर्थः-अहर्गणमें का भाग देकर जो अंशादि लब्धि होय उस । अहर्ग- णम ७० का भागदेकर जो कलादि लब्धि मिले सो जोड़ देय तब अहणोप- न चन्द्रोच होताद । तप उपरोक्त रीतिके अनुसार चन्द्रोच्च साधै ।। ६ ॥ उदाहरण... भहण १५२१ में नौ ९ का भाग दिया तब लब्धि हुए भंशादि १६९ अंश .०कला • विकला इसमें । भदगण १५२१ में ७० का भाग देकर सब्धि हुए फलादि २१ कला ४३ विकलाको जोड़ दिया तब १६९ अं० २१ २०१३ वि० दुए । इसमय मंशाम तीस ३० का भाग देवर पूर्वोक्त रीतिके अनुसार राशि पनाई तप ५गदिश १९भंग २१ फला ४३ विकला यह महर्गणोत्पन्न चन्द्रोच्च दुभा तर ऊपरीत "दिनगणभवत्यादि " रीतिके अनुसार चन्द्रोचक ध्रुव ३४५ को चम ८ से गुणाकरा तय ॥२३॥ 0101हुभा इसका ।
धिकारः१]
सान्वयभापाटीकासमेत ।
महर्गणोत्पन्नचन्द्रोच्च ५। १९१२१ १४३,में घटाया तब ४।२७१२१॥ ४३ हुआ
इसमें क्षेपकाङ्क ५। १७ । ३३.! • जोड़े वब १० । १४ । ४।४७यह
चन्द्रोच्च हुआ ॥
अब मध्यम राहुके लानेकी रीति लिखते हैं-
नवकुभिरिपुवेदैर्घस्रसंघाविधाप्तात्फललवकलिकैक्य
स्यादगुश्चक्रशुद्धः॥ ११॥
अन्वयः-नवयुभिः, इपुर्वेदैः, द्विधा, घससंघात, आप्तात्. फललव-
कलिकैश्यम्, चक्रशुद्धः; अगुः; स्यात् ।। ११ ॥
अर्थः-अहर्गणको दो स्थानमें लिखै, एक स्थानमें उन्नीसका भाग देय जो
लब्धि होय उसको अंशादि माने । फिर दूसरे स्थानमें लिखे हुए अहर्ग-
णमें १५. पंतालीसका भाग देय जो लब्धिहो -उसको कलादि मान. इन दोनों
लब्धियों को जोड़ लेय तय जो अङ्क हो उनको चक्र कहिये १२ बारह राशि-
में घटाये जो शेष रहै उसको महगंगोत्पन्न राहु जाने । तदनन्तर ऊपरोक्त
रीतिके अनुसार राहु साथै ॥ ११ ॥
उदाहरण.
भहर्गणको १५२१ । १५२१ दो स्थानमें लिखा एक स्थानमें १९ का भागदि-
या तो ८० अ० ३ ०९विकला यह अंदादिलब्धि हुई । फिर दूसरे स्थानमें
दिखे हुए अहर्गणमें ४५ का भाग दिया तब ३३ कला.४८ विकन्दा यह
कलादि लब्धिहुई । इनदोनों टन्धियों ।।31 को जोड़ा तब ८०
अं. ३६ क.५७ यि. हुआ इसको १२ रागिने घटाया तब शेपरहे९।९।२३।३
यही अहगंणोत्पन्न गहु हुआ। इसमें पूर्वोत्तरीतिसे राहुके ध्रुव २।५०१०
को चक्र ८ से गुणाकरा तय ८१२२१४०1०हुए इसको घटाया तब ०.१६
४३।३गेपरहे इसमें राहुके क्षेपका१०।२७। ३८1० को जोड़ा तब १ ॥
१४ ॥ २१ ॥ ३ यह राहु हुआ महर्गणोत्पन्न राहु, गहुका ध्रुवोनक्षेपक मि-
लानेसेभी यह राहु आताहै ॥
अब मध्यम मगनललानेकी रीति लिखतेहैं-
दिग्नो द्विधादिनगणोंककुभिस्त्रिशैलेभक्त फलांश-
ककलाविवर कुजः स्यात् ॥5॥
अन्वयः-दिग्नः, दिनगणः, द्विधा, अंककुभिः त्रिशैलः, भक्ता,
(कार्य), ततः, फलांशककलाविवरम् कुजः: (स्यात् ) ॥5॥
(१४) ग्रहलाघव। [ मध्यमग्रहसाधना- अर्थ:-अहर्गणको दिक कहिये दशसे गुणा करके दोस्थानमें लिखे एक स्थानमें उन्नीसका भागदेय जो लब्धि मिले उसको अंशादि मान, फिर दूसरे स्थानके गुणाकरेहुए अहर्गणमें ७३ का भागदेय जो लब्धि मिले उसको कला आदि जानै । इसप्रकार अंशादि और कला दोनों लब्धियांका जो अन्तर होय उसको अहर्गणोत्पन्न मङ्गल जाने फिर पूर्वोत्तरीति के अनुसार मध्यम मङ्गल लावै ॥5॥ उदाहरण. अहर्गण १५२१ की १० से गुणाकरा तय १५२१० हुए इनको दो स्थानमें लिखा १५२१०१ १५२१०।फिर एकस्थानमें १९ का भागदिया तब अंशादि लब्धि हुई ८०० अं. ३१ क.३४ वि. फिर दूसरे स्थानमै ७३ का भागदिया तब कलादि लब्धि हुई २०८ क.२१ वि. इन दोनों लब्धियोंका अन्तर किया ८००।३.१।३१ तव ७९७ अं. ३ क. १३ । वि. शेपरहे यहाँ ३० का भागदेकर पूर्वोत्तरीतिसे अंशोंकी राशि करी तय २ रा.१७२.२ कला १३ वि. यह महर्ग- पोत्पन्न मङ्गल हुआ।तय ऊपरकहीहुई रीति "दिनगणभवेत्यादि" के अनुसार मगरके ध्रुव ११२५ । ३२. को चक्र ८ से गुणाकरा तब २॥ २४॥ १६ हुए इसको अहर्गणोत्पन्न मङ्गल २ । १७।३।१३ में घटाया तब ११ । २२ । ४७५१३ शेपरहे इनमें मलके क्षेपकाङ्क जोडदिये ११ । २९।४।३ तब ९।२९ । ५.। १३ यह मध्यम मङ्गल हुआ। 3 अय बुधकेन्द्रक लानेकी रीति लिखतेहैं- बिनो गणः स्ववसुदृग्लवंयुग्नशीघ्रकेन्द्रं लवाद्माहिगु- प्तिगणोनलिप्तम् ॥ १२ ॥ अन्वयः-त्रिमः, गणः, स्ववसुदृग्लवयुक्, अहि गुणातगणीनलि- सम्, लवादि, शशीघकेन्द्रम् (स्यात् ) ॥ १२ ॥ अर्थ: भगंणको ३ तीनसे गुणाकरके जो गुणन फलहो उसको अंशात्म- यमाने, उममें १८ का भागदिया तर जो लब्धिमिले उसको अंशादिमान, वह उस पृक्ति गुणनफल में युक्तकरदेय और उसमें । अहगंणमें ३८ का भार्गदकर जो कलादि लम्धिमिले उसको घटादेय जो शेपरहै सो अदर्गणो- रपत्र बुधकन्ट होताई, तदनन्तर पूर्वोत्तरीति अनुसार पेन्द्र एधसाधै॥१२॥ उदाहरण. भद्दगण १५.१ को से गुणाविया तब ४५६३ अंशात्मक हुये इनमें २८ फा भागदिपा तप भंगादि सब्धिहुई १६२।५७१५१ इसमें तीनसे गुणोफर 7 धिकारः १] सान्वयभापाटीकासमेत । (१५) अंशात्मक अहर्गण ४५६३ में जोडदिया तब ४७२५1५७१५१ हुए इनमें महगंण १५२१ में १८ का भागदेकर जो कलादि लन्धि हुई ४० क. १ वि. इसको कलामामें घटाया ४०२५1१।१ तब ४७२५ । १७१५०। यहाँ ३० का भागदेकर पूर्वोत्तरतिसे अंशांकी राशि करी तब १ रा.१५ अं.१७ क.५० वि. यह महर्गणोत्पन्न बुधकेन्द्र हुभाइसमें पूर्वोक्त "दिनगणेत्यादि" रीतिके अनुसार बुधकेन्द्रक ध्रुव ४।३।२७।० को चक्र ८ से गुणाकिया तब ८। २७ । ३६ हुभा इसको घटाया1३1३४तव ४॥ १७ ॥ ४१ ॥ ५० ॥ हुआ इसमें बुधकेन्द्र के क्षेपक ८।२९ । ३३ को जोड़ा तब ? | १७१ १४ । ५० यह बुधकेन्द्र हुआ। भय मध्यम गुरुकै साधन करनेकी रीति लिखतह- युपिण्डोकभक्तो लवाद्यो गुरुः स्यादयु पिण्डात्ख- शैलाप्तलिप्ताविहीनः ।,55...... अन्वयः-अर्कभक्तः, धुपिण्डः, युपिण्डात: खशैलाप्तलिप्ताविहीनः, .लवाद्यः, गुरुः, स्यात् ॥ 5 ॥ अर्थ:-अहर्गणमें बारहका भागदेकर जो अंशादिलब्धिहां उनमें अहर्गणम ७० का भागदेकर जो फन्दादिः लब्धि होय उसको घटादेय जो गैपरहे, मी अहर्गणोत्पन्न गुरु होताह इससे पूर्वोत्तरीतिके अनुसार मध्यम गुरु साधनकर ।।5॥ उदाहरण. अहर्गण १५२१ में बारह १२ का भागदिया तब अंशादि लम्बहुप १२६ अं- ४५का..चि.. महगंण १५२१ में७० का भागदिया तब कलादिलब्धि २१ क.. ४. वि. हुए इनको भंठादि टन्धि घटाया तव १२६ अं.२३ क. १७ वि. यह शेप रहा यही महर्गणोत्पत्र गुरु हुमा। तव पृवाक्त रीतिक अनुमार अंशाम का भाग देकर राशि बनाई तच ४ रा०६मं० २३ क०१७ वि० यह अहर्गणी- त्पन्न गुग हुभा । तव गुरुके ध्रुव ०१२६ । २८।०को चक्र ८ से गुणा करनेसे ७।०१२४ हुए इसको अदर्गणोत्पन्न गुरुमं घटापा तय ९॥५॥५९।१७ शेप रहा इसे गुरुका क्षेपक.७१२१६० जोड़ा तय ४।८।१५ । १७.यह मध्यम गर हुआ। भव केन्द्र शुक्रलानकी रीति लिराते हैं- विनिम्नघुपिण्डावियास किभान्जेरवाप्तांशयोगोभृ- गोराशुकेन्द्रम् ॥ १३॥ अन्ययः-विनिमपिण्डात्- अक्षः, फिभाग्नः दिधा: अवाप्तांश- यांगः: भूगो.. आशुकन्दम् (भवति ॥ .
(१६) ग्रहलाघव। [ मध्यमग्रसाधना- अर्थ-अहर्गणको तीनसे गुणाकरके जो गुणन फल मिले उसको दो स्था- नमें लिखकर एक स्थान पाँचका भाग देय तब जो लब्धि होय इसको अंशादि जाने । फिर दूसरे स्थानमें लिखेहुए गुणित महर्गणमें एक सौ इक्यासीका भाग देय जो लब्धि मिलै उसको अंशादि माने । तदनन्तर दोनो सन्धियोंका योग करे तव अहर्गणोत्पन्न केन्द्र शुक्र होताहै । तदनन्तर ऊपरोक्तरीतिके' अनुसार शुक्रकेन्द्र लावै ॥१३॥ उदाहरण.. अहर्गण १५२१ को ३ तीनसे गुणा करा तो ४५६३ हुए इनको दो स्थानमें लिसा ४५६३ । ४५६३ फिर एक स्थानमें-५ पाँचका भाग दिया तब लब्धि हुए अंगादि ९२ अ० ३६ क ०वि०हुए।फिर दूसरे स्थानमें १८१ का भाग दिया तय अंशादिलन्धि मिले २५ अं०१२ क० ३५वि० इन दोनों लब्धियों ३६३६३५ को जोड़ा तव ९३७ । १८ । ३५ हुए । यहाँ अंशोंमें तीस ३० का भाग देकर राशि बनाई तब ७ राशि ७ अंश ४८ कला ३५ विकला यह अहर्गणोत्पन्न केन्द्र शुक्र हुए। तदनन्तर पूर्वोक्त दिनगणभवेत्यादि" रीतिके अनुसार केन्द्र शुक्र ध्रुव १.१४।२१० को चक्र ८से गुणा करा सब-११॥२२॥ १६॥ ० हुए इसको अर्गणोत्पन्न केन्द्र शुक्र ७१७।१८ । ३५ में घटाया तब ७१५॥३२॥३५ शेपरहे इसमें शुक्रकेन्द्र के क्षेपक ७।२०।९।० को जोड़ा तव ३॥५॥४१॥३५ यह केन्द्रशुक हुआ । महर्गणोत्पन्न केन्द्रशुक्रमें केन्द्रशुरुका ध्रुवोनक्षेपक मिलान भी यही केन्द्रशुक्र होताहै। अव मध्यम शनि लानेकी रीति लिखते है- खान्युट्टतोदिनगणोशंमुखः शनिः स्यात्पट्प- ञ्चभूतगणात्फललिप्तिकाव्यः ॥5॥ अन्वयः-खाग्न्युकृतः, दिनगणः, पट्पञ्चभूहतगणात्, फललिप्ति- कान्यः, अंशमुसः, शनिः, स्यात् ॥ ॥. अर्थ-अदर्गणमें ३० का भागदेकर जो लब्धि मिले उसको अंशादि जान उसमें। मदर्गणम फिर १५६ एक सौ छप्पनका भाग देकर जो कलादि लम्धि निलंउसको जोड़ देय तब अर्गणोत्पन्न शनि होताहै उससे पूर्वोत्तरीतिसे मध्यन जानिए उदाहरण. अहगंण में३० का भाग दिया तो लब्धि हुप अंशादि ५० अ० १२ का० हुए तदनन्तर भदगण १५२१ में १५६ का भाग दिया तय लन्धि हुपर का० ७० - धिकारः] सान्वयभाषाटीकासमेत । (२७) ४५ वि० इन दोनों लब्धियांको जोड़ा तो ५०.५१ ॥ ४५ हुए यहाँ अंशी ५० में तीसका भाना देकर राशि वनाई तब १।२०।५११४५ यह अहर्गणोत्पत्र शनि हुआ । तदनन्तर पूर्व. कही हुई "दिनगणेत्यादि" रीतिके अनुसार शनिके ध्रुव ७।१५॥ ४२ ॥ ० को चक्र ८ से गुणा करा तवं ०१५।३६१० इसको महगणोत्पन्न शनि ११२०१५१ ॥ १५ में घटाया तब ? ॥२५॥ १५॥ ४॥ रहे इनमें शनिका क्षेपक९॥ १५॥ २१० जोडातब ११०॥३६ । ४५यह मध्यम शनि हुआ । अदर्गणोत्पन्न शनिमें शनिका ध्रुवोनक्षेपक युक्त करनेसेभी मध्यम शनि बनता है। इसप्रकार मध्यम प्रहांको साधकर डेढ़ लोकमें मध्यम ग्रहों की कलादि दिनगति लिखते हैं- 34 गोक्षागजारविंगतिः शशिनोऽभ्रगोश्वाः पञ्चायोऽथ पडिलाधेय उच्चभुक्तिः ॥ १४॥ राहोस्त्रयकुशशि- नोऽसृज इन्दुरामास्तकोश्चिनौज्ञचलकेन्द्रजवोऽर्य: हिक्ष्माः। लिप्ताजिनों विकलिकाश्च गुरोः शराः 'खं शुक्राशुकेन्द्रगतिरद्रिगुणाः शनेढे ॥ १६ ॥ अन्वयः-गोक्षाः,गजाः रविगतिः, (अस्ति)अभ्रगोश्वाः,पञ्चामयः, शशिनः, (गतिः अस्ति) अथ, पद, इलाब्धयः उच्चभातीः, (अस्ति)। त्रयम्, कुशशिनः, राहोः, (गतिः, अस्ति), इन्दुरामाः, तौश्विनः, असृजः, (गतिः, अस्ति)। अर्यहिश्माः, लिताः, जिनाः, विकलिकाः, ज्ञचलकेन्द्रजवः, (अस्ति) । शराः-सम्, गुरोः, (गतिः, अस्ति)। इन्द्रियगुणाः, शुक्राशुकेन्द्रगतिः, (अस्ति)-1 दे, शनेः, (गतिः, अस्ति) ॥ १९ ॥ १५ ॥ भर्थ-गोकहिये नौ९अक्षकहिये ५ पाँच अर्थात् ५९ कला और गंज कहिये ८आठ विकला यह सूर्य मध्यम गति है । अध.कहिये शून्य गो कहिये नौ ९भव कहिये ७ अर्यात् ७९० कला और पाँच ५अग्नि कहिये तीन अर्थात् ३५विकला चन्द्रमाकी मध्यम गतिहै। और षट् कहिये ६छः कला तथा इला कहिये ? एक मन्धि कहिये चार मयांत् ५१ विकला यह चन्द्रोच्चको मध्यम गतिह। तीन कलाकु कहिये १ एक शशि कहिये १ पक,भर्यात् १? विकला यह राहुकी मध्यम गतिहै। इन्दु कहिये १ पक राम कहिये : तीन भयांदकला और तर्क कहिये ६छ भचिन् कहिये २ दो अर्थात् विकला ८ ३
ग्रहदाचव।
३
३५
०
.
.
(26)
[मध्यमग्रहसाधना-
यह मंगलकी मध्यमगति है । भरिकहिये ६छः अहि कहिये ८ आठ क्षमाकहिये
१ एक अर्थात् १८६ कला और जिन कहिये २४ चौवीस विकला यह बुधके-
न्द्रकी मध्यम गतिहै । शरकहिये ५ पाँच कला और खकहिये ० शून्य वि.
कला गुरुकी मध्यमगतिहै । अद्रि, कहिये ७ सात गुणकहिये ३ तीन अ-
र्थात् ३७ कला शुक्रकेन्द्रकी मध्यम गतिहै । २ दो कला शनिकी मध्यम
गतिहै ॥ १४ ॥ १५॥ यह सब नीचे कोठामें स्पष्ट रीतिसे लिखतेहैं-
नाम | रवि चन्द्र चन्द्रोच्च राह मङ्गल बुधकेन्द्र गुरु शुक्रके. शनि
६
१८६
३
विकला ८
कौनग्रह किस ग्रन्थके अनुसार लानेसे वेधसे, मिलताह यह विषय
लिखतह-
Aishe
सोरोकोपि, विधूचसंकलिकोनाजोगुरुस्त्वा-
य॑जोऽसृग्राहू च' कजजकेन्द्रकमथायें सेपुभागः
शनिः । शो केन्द्रमजाय॑मध्यगमितीमे यान्ति
हक्तुल्यतां सिद्धेस्तैरिहपर्वधर्मनयसत्कार्यादि-
कं त्यादिशेत् ॥१६॥
'अन्वयः-अर्कः, सौरः, (घटते) विधूचंम् (सौरपक्षीयम, घटते)।
अकलिकोनान्नः अपि, ( सौरः, घटते)। गुरुः, तु, आर्यनः, (घ-
टते)। अमृक-राह, च, ( आर्यपक्षीयौ, घटेत) । फजज्ञकेन्द्रम,
(पटते)। अथ. संपुभागः, शनिः, आय, (घटते)। शोकम, केन्द्रम्,
अगाम्यंमध्यगम; (पटत) इति इमेक्तुल्यताम, यान्ति इह तु.
मिन, पर्यवर्मनयमकाादिषम, आदिशेत् ॥ १६ ॥
धिकारः?] सान्वयभापाटीकासमेत । (१९) आधाकरदेय । इसमकार पूर्वोक्त अन्योंके अनुसार साथैहुए यह ग्रह वेधसे मिलजातेहैं । इसंग्रन्यमें पूर्वोत्तरीतियोंके अनुसार ग्रह साधकर ग्रहणादि- पर्व, व्रतादि धर्मकार्य, नीतिकार्य, भार विवाहादि मङ्गलकार्य आदिको कहै ॥ १६ ॥ इति श्रीगणकार्याण्डितगणेशदेवकृती ग्रहलाघवारयकरणग्रन्ये पश्चिमोत्तर- देशीयमुगदागदपत्तनवास्तव्यगोट्रवशावतंसश्रीयुतभोलानायतनूजपण्डित- रामस्वस्पशर्मणा पिरचितया पिस्टनोदाहरणसनायीकृतान्वयस- मन्वितया भाषायाख्यया सहितो मध्यमप्रहसारनाधिकारः समाप्तिमितः ॥ १॥ अथ रविचन्द्रस्पष्टीकरणपञ्चाङ्गानय- नाधिकारो व्याख्यायते। तहाँ प्रथम भुज-कोटि-पद-सूर्यमन्दोच्च-केन्द्र-और रविमन्द फल साधने- की रीति लिखतेहैं- दोस्त्रिभोनं विभोर्ध्व विशेप्यं रसैश्चक्रतोङ्काधिक स्याटुजोन त्रिभम् । कोटिरेकैककं त्रित्रिभैः स्या- त्पदं सूर्य्यमन्दोचमष्टॉद्रयोंशा भवेत् ॥ १७॥ मं- न्दोचं ग्रहवर्जितं निगदितं केन्द्रं तदाख्यं बुधेः केन्द्र स्यात्स्वमृणं फलं क्रियतुलाद्यथो विधेयरवेः। केन्द्रे- तद्भुजभौगखेचरलेवोनना नखास्ते पृथक् तद्गोंशो- ननगेपुभिः परिहृतास्तेंशादिकं स्यात्फलम् ॥१८॥ अन्ययः-विभीनम्, (केन्द्रम् ), दोः (भवति) त्रिभोर्ध्वम्, रमैः, विशेष्यम्. (तदा, दोः स्यात्)। अङ्काधिकम्, चक्रतः, (विशोध्यम्, तदा. दोः) स्यात् । भुजोनम् त्रिभम्, कोटिः, (स्यात् )। त्रित्रिभैः, एकैरुमा पदम, स्यात् । अष्टादयः, अंशाः, सूर्य्यमन्दोचमा भवेत् । ग्रहबार्जितम् मन्दोंचम्. बुधैः, तदास्यम्, केन्द्रम्, निगदितम् । कि- यतुलाय, केन्द्र, सम, ऋणम्, फलम्, स्यात् । अथ, रवः, फेन्द्रम्, (२०) ग्रहलाधव! [रविचंद्रस्पष्टीकरणा- विधेयम् । तद्धजभागखेचरलवोननाः, नखाः, (कार्याः) ते पृथक, (स्थाप्याः ) तद्गोंशोननगेपुभिः, परिहताः, ते, अंशादिकम् फलम्, स्यात् ॥ १७॥ १८ ॥ सा अर्थः-केन्द्र किंवा ग्रहादिक तीनराशिको अपेक्षा कम हो तो भुज होता है। और तीन राशिकी अपेक्षा अधिक होय तो छःराशिमें घटाकर जो परहै वह भुज होताहै ।। नौसे अधिक होय ती वारह राशिम घटाकर जो शेपरहै वह भुन होताहै । तीन राशिम भुज घटाकर जो-शेपरदै सो कोटि होतीहै। तीन तीन राशिका एक एक पद होताहै । २.रा. १८ अं. ०: वि. कला यह रविका मन्दोच्च होताहै । मन्दोच्चमै ग्रह घटादेय जो शेपरहे सो मन्दकन्द होताहै-( और शीघ्रोच्चम ग्रह . घटाकर जो शेपरहे सो शीघ्रकेन्द्र होताहै ) । मेप आदि छः केन्द्रमें धन मन्द फल होताहै ( अथवा शीघ्रफल होताहै ) । तुला आदि छः केन्द्रमें ऋण मन्द फर होताहै । रविका मन्दकेन्द्र उक्तरीतिसे लावै । रविका केन्द्र लाकर उसके : भुजकर, और उन भुजोंके अंशकर, उनमें नौ ९ का भाग देय जो लब्धि मिलै उसको वीस अंशमै पटावै जो शेपरहे टसको ऊपरोक्त नवमांशसे गुणा करदेय जो गुणन फल होय उसको अलग एकान्त स्थानम लिखे। फिर नौ ९ का भाग देय जो लब्धि होय टसको ५७ अंडामें घटावै जो शेपरहै उसका अलंग एकान्तमें लिखे हुए पूर्वोक्त अंशादिमें भाग देय जो लब्धि होय उसको अंशादि मन्दफल जाने । यह मन्दफल केन्द्र, मेष राशिसे तुलराशिपर्यन्तफे भीतर होय तो धन, और तुलरागिसे लेकर मेपपर्यन्त राशिके भीतर होय तो ऋण जाने । तदनन्तर यदि यह मन्दपद मध्यम रविमं धन होय ती युक्त करदेय और ऋण होप तो घटादेय तव मन्द स्पष्ट रवि होताहे ॥१७॥ १८॥ । उदाहरण. रपिक मन्दोचर रा०१८०० फ००वि० है, इसमें मध्यमरवि रा०४ अं०१३०४२ वि० घटाया ताशेप रहा १ रा०१३ २०४६ क०१८ वि० यह रविका केन्द्र हुआ,यह केन्द्र तीन राशिसे कमहे,इसकारण भुजहै। इसमें जो राशि उसके भंग करय भशाम जोड़े तय ४३ २०४६ क०१८वि० हुप इनमें नी या भागदिया तय लब्धि हुए ४०५१.३०४८ वि० दनको २० अंश पटाया गपशेपरद्दे १५०८० १३पि०इनको भुजक मयमांशाअं०५५का० १८ वि० सं गुणा करा तय ७३ ० ३६ २०५३ वि० हुए इनको दो स्थानमें लिया एका स्थानमनीका भागं दिया तब ८०००४५घि लब्धि हुए, इनया ५७ भंडामें घटापा तेष शेपरहे ४८ ० ४९क० १५ विकला इसका धिकारः1 सान्वयभाषाटीसमेत । (२१). दूसरे स्थानमे लिखे हुए ७३ भं०३६ का ५२ वि० में भाग देनेके लिये भाग्य 1 भाजक १७३० ३६ क०५१ वि०१८ अं० १९ २० १५ वि० इन दोनोंकी कला करी तव भाग्य | भाजक २६५०१२ | २७५७५५ हुए । फिर भाज्य २६५०२२ में १७४५५ का भाग दिया . तब अंशादि लब्धि हुई ?.*०.३० क०२८वि० यह रविका मन्द फल हुभा। यह धन है क्यों कि केन्द्र मैपादिछः राशिस कमहै ॥ इसकारण इस ? अं० ३० का २८ चि० मन्दफलको मध्यमरवि ? रा०४ अं० १२ का ४३ वि० में युक्त किया तब ? रा०५०४४ कं० १० वि० यह मन्दस्पष्ट रवि हुआ। अव पटभा और चरखण्डलानकी रीति लिखते हैं- मेपादिगेसायनभागसूर्ये दिनार्द्धजाभापलभाभवे- -त्सा । त्रिस्थाहता स्युर्दशभिर्भुजङ्गैर्दिग्भिश्चरा- निगुणोद्धृतान्त्या ॥ १९॥ अन्वयः-सायनभागसूयें, मेपादिगे, (सति ), या दिनाईजा, भा; सा, पलभा, भवेत् । (सा.): विस्था, दशभिः भुजङ्गैः दिग्भिः, हता, (ततः) अन्त्या गुणोद्धृता (कार्या)(तदा),चरा नि,स्युः॥१९॥ भय: जिस दिन अपनांशसहित सूर्य राशि अंश कटा विकलासे शुन्य होय टसदिन मध्यान्हके समय समान भूमिपर बारह अंगुलका शङ्करस्खे जो छाया पड़े उसको पलभा कहते हैं । तिस पलभाको तीन स्थानमें लिखकर क्रमस १०1८1१० से गुणाकरे, अन्तक तीसरे गुणन फलमें तीनका भाग देय तय क्रममें तीन चरखण्ड होतेह ।।१९।। कुछ प्रसिद्ध स्थानों की पलभा ग्रन्थक भन्तमें लिखेंगे। उदाहरण: समीकी पलभा अटुट ४: प्रदिरटुन है इसका एहट १० से गुपण करा, तर ५७ अंगुल १० प्रतिभाल यह प्रथम चरखण्ड हुआ। फिर पलमा ५ अंगुल ४५प्रतिभंगुलको ८से गुणा करा तव ४६ अंगुल ० प्रतिभंगुल यह द्वितीय चरखण्ड हुआ।फिर पलभा ५अंगुल ४५अंगुलंको १० ददास गुणा करा तब ५ अंगुल ३० प्रतिभंगुट हुभा इसमें ३ का भागदिया तब १९ अंगुल १० प्रति, अंगुट तीसरा चरखण्ट हुमा। इसप्रकार प्रथम चरखण्ड ५७०३०प्र०हुआ, दूसरा चरखण्ड ४६२० हुभा, तीसरा चरखण्ड १९३०१०प्र० हुआ। . " - - ग्रहलाघ। [सूर्यचन्द्रस्पष्टीकरणा- अब चर, चरसंस्कार, भुजफलसंस्कार और अयनांश लिपत हैं- स्यात्सायनोप्णांशु जर्भसंख्यचराईयोगो लवभो- ग्यवांतात् । खग्न्यिाप्तियुक्तस्तु चरं धनणे तुलाज- पड्भे तपनेऽन्यथास्ते ॥ २० ॥ देयं तच्चरमरुणे विलिप्तिकासु मध्येन्दौ द्विगुणनवोद्भुतं कलासु। भा' संतामणिफलं लवेऽथ वेदाध्यब्यूनःखरंसहृतः शकोऽयनांशाः॥२१॥ अन्वयः-सायनोप्णांशुभुजःसंख्यचरादयोगः, लवभोग्यघातात. खाग्न्याप्तियुक्तः, चरम, स्यात् । (तत्), तु, तपने, तुलाजपदके, धन- र्णम्, (स्यात्) । अस्ते, अन्यथा ॥ २०॥ तत्, चरम्, अरुपो, विलि- 'तिकासु, देयम् । (तत्-पव), द्विगुणनवोद्धृतम्, मध्येन्दौ, कलासु, (देयम्)।भातम्, (यत्), घुमणिफलम्, तत् (अपि), लवे, (देयम्) अथाशकः,बैदाम्ध्यरध्यूनः, (ततः),खरसहतः,अयनांशाः,स्युः॥२१॥ अर्थ:-सायनरविकी पूर्वोक्तकेन्द्रसे अवलानेकी रीसिके अनुसार भुन लाधे, वह भुन यदि राशि शून्य होय तव को छोड़कर केवल अंगादिमात्रको प्रथम चरसण्डसे गुणा करै । और यदि भुजमें एक राशि होय तो राशिको. छोड़कर अंशादिको द्वितीय चरराण्डसे गुणा करे । और यदि भुजमें दो राशि होय तौ राशि छोड़कर केवल अंशादि मात्रको तृतीय चरखण्डसे गुणाकरे जो गुणनफल हो उसमे ३० तीसफा, भाग देय जी लन्धि मिले उसमें जिस चरराण्डसे गुणा कराहो उससे पहला चरखण्ड जोड़देय तर चर होता ॥ यह सायन मेपादिं छः राशिसे कम होय तो ऋण होताहै। भोर छ राशिसे अधिक तुलादि छः राशिके भीतर होय तो धन होता है। यदि सायंकालीन ग्रह करना होय तो चरको विपरीत ग्रहणकर अर्थात् सा- यनरवि मेपादिछः राशियोंके भीतर होय तो धन, और तुलादि छः रागि भीतर दोय तो ऋण,जाने ॥२०॥ यह चर यदि धन होय ती मन्दस्पष्ट रविकी विमलामि युक्तकरदे और ऋणहोय तो घंटादेय । तब स्पष्ट रधि होताह । चरको ' से गुणाकरक लोका भागदेय जो सब्धि होय उसको घरकी समान धनऋण सम भीर मेन्दस्पष्ट रविको पालामाम युक्त करदेय (इसको चरसंस्कार और द्वितीयफलसंस्कार कहते हैं ।) रविके मन्दफल में सत्ताई- - . धिकारः२] सान्वयभाषाटीकासमेतं । (२३) सका भागदेकर जो लब्धि होय उसकोभी चरकी समान धनणमान और मन्दस्पष्ट रविके अंशाम युक्तकरदेय (इसकी मन्दफलसंस्कार और तृ- तीयफलसंस्कारभी कहतेहैं। इनदोनों रीतियांका चन्द्रस्पष्ट करने काम प- इताहै)। शालिवाहनशकमें चारती चौवालीसंट घटादेय जो शेपरहै वह कलाहोतीहैं उनमें साठका भागदेय जो लब्धिमिल सो अयनांश होताहै । अयनांशको मन्दस्पष्टरविमें मिलादेय तब सायनरवि होताहै ॥ २१ ॥ उदाहरण. शाके १५३४ में १४४ घटाये तब शेपरहे१०९०यह कलाहै, इनमें६०का भाग दिया तौलब्धिहुई १८ अं. १० कला यह अयनांशहै, इसको मन्दस्पष्ट रवि १. रा.५ अं. ४४ क. २० वि. में युक्त किया तब १ रा. २३ अं..५४ क. १०.वि. . यह सायनरवि हुआ। यह सायन रवि तीन राशिके भीतरहै इसकारण यह भुज है । अब इस १ रा. २३ ५४ क. १० वि. भुजमें एकराशि है इसकारण अंशादिकों ( २३ अं. ५४ क. १० वि.) को द्वितीय चरखण्ड ४६ से गुणा- करा तव गुणनफल १०९९ अं. ३१ कु.१० वि. हुआ इसमें ३० का भागदिया, तब लब्धिहुई ३६ विकला ३९ प्रतिविकला प्रथम चरखण्डसे गुणाकराया। इसकारण द्वितीय चरखण्ड ५७ को लब्धि ३६ वि. ३९ प्रतिविकलामें युक्त. किया तव९३विकला३९प्रतिविकला यह चर हुआ। यह ऋणहै क्योंकि साय- नरविमेपादि छ.के भीतरहै । इसकारण मन्द स्पष्टरवि १ राशि ५ अंश ४४ कला १० विकलाम चर ९३ वि. अर्थात् १ क. ३३,विकलाको घटाया तब शेषरहा १ रा.५ अं. ४२ क. ३७ वि. यह स्पष्टरवि हुआ। अब दिनमान रात्रिमान और अक्षांश लानेकी रीति लिखतेहैं- तुल गोलौ स्तः सौम्ययाम्यौ कियटरसभेखेचरेऽथाय- नेते नकोत्कचिपइभेऽथचरपलयुतोनास्तु पञ्चे- न्दुनाड्यः । घस्राई गोलयोः स्यात्तदयुतखगुणाः स्यानिशाईन्त्वथाक्षच्छायेपुध्यक्षभायाः कृतिदशम- लवोने यमाशापलांशाः ॥२२॥ अन्वयः-खेचरे, क्रियधटरसभे, सौम्ययाम्यौ, गोलौ, स्तः । अथ, नकात, कर्कात्, च, षड्भे, ते, अयने, (स्तः )।अय, तु, पञ्चेन्दुनाड्या, चरपलयुतोनाः, (कार्याः)। (तदा), घस्राईम्, स्यात् । तदयुत- ग्रहलाघव । [रविचन्द्रस्पष्टीकरणा- . । . खगुणाः, निशाईम्, स्यात् । अय, तु, इपुग्नी, अक्षच्छाया, अक्षभायाः, कृतिदशमलवोना, (कार्या), इयम्, आशापलांशाः (स्युः) ॥२२॥ र अर्थः यदि सायनरवि मेपादि छ। राशिके अन्तर्गत होय तो उसको उत्तर गोलीय कहतेहैं, और यदि सायनरवि तुलादि छः राशिके अन्तर्गत होयती उसको दक्षिणगोलीय कहतेहैं । तिसीप्रकार यदि सायनरवि मकरादि छः राशिके अन्तर्गत होय तो उसको उत्तरायण कहतेहैं, और यदि कादि छः . राशिके भीतर होय तो दक्षिणायन कहतेहैं, पीछे लायेहुए पलात्मक चरको. भदि सायनरवि उत्तरगोलीय होय तो १५ पन्द्रह घड़ीमें युक्त कर, और साय- निरवि दक्षिगगोलीय होय तो पलात्मकचर १५ पन्द्रह घडीमें घटादेय । जो शेपरहे सो दिनार्द्ध होताहै। उसदिनार्द्धको ३० तीस घडीमें घटादेय तब जो शेप रहे सो राज्यर्द्ध होताहै । तदनन्तर दिनार्द्धको द्विगुणित करनेसे दिन- मान होताहै, और राज्य को द्विगुणित करनेसे रात्रिमान होताहै । और दिन मान तथा राविमानको जोड़नेसे अहोरात्रमान होताहै। पलभाको पाँचसे गुणाकरकै जो गुणनफल मिले उसको अंशात्मक मानै उसमें पलभाके वर्गका दशयाँ भाग अंशात्मक, घटादेय जो शेपरहै वह अक्षांश होताहै । (अक्षांश सर्वदा दक्षिण होताहै, क्योंकि हिन्दुस्थानके द- क्षिण विषुववृत्तरेखाहै ) ॥२२॥ उदाहरण. पलात्मकचर ९३ यह सायनरवि उत्तरगोलीय है क्योंकि मेपादि छः राशिके अन्तर्गतहै इसकारण चर ९३ को १५ घड़ीमें युक्तकिया तब १६. घडी ३३ पल यह दिनाई हुआ। इसदिनाई १६ घ. ३३ प. को ३० पड़ीमें घटाया तय शेपरहा३३ ५.२७पल यह रायर्द्ध हुआ । दिनाद्धं १६ घ.३३प.को द्विगुणित किया तब ३१ घ.६ पल यह दिनमान हुआ। और राज्यर्द्ध १३ घ. -२७ का दिगुणित किपातव २६ घड़ी ५४ पल यह रात्रिमान हुआ । दिनमान और रात्रिमानको जोड़ा तब ६० घड़ी अहोरात्रमान हुभा ॥ पलमा ५भंगुल ४५ प्रतिभंगुलको ५ से गुणाकरा तय २८ अं. ४५ कला हुआ। तब पल्लभा ५।४५ या वर्गकिया तो ३३१३हुभा इसमें दशका भाग- दिया तप ३ अं. १८ मा.वि. लब्धि हुए इनको पाँचसे गुणाकरीहुई प- सभा २८ मं. ४५ क. में कग तय २५ २.२६ क, ४२ वि. यह काशीका 'दक्षिण भांग हुआ। भय त्रिफट चन्द्र करनेका विषय लिखते हैं। परिकद दुग. श्लोकका द्वाराई-अपने अपने नगरसे दक्षिणोत्तर रेखा भितनी योगन दर हाय उसयोजनसंख्याम का भागदेयं तव जो कक्षा .
धिकारः२) सान्वयभाषाटीकासमेत । दिलब्धि होय वह अपना नगर दक्षिणोत्तर रेखासे पश्चिमहोय तोधन और पूर्व होय तौऋणहोतीहै, इसको रेखान्तरसंस्कार और प्रथम फल संस्कार कहते हैं श्लोक २१ द्वितीयचरण-चरको दोसे गुणाकरक नाका भागदेय जो.ल, ब्धिहोय उसको कलादि जान उसको चरंका धन या ऋणं जाने इसको चर- संस्कार और द्वितीयफलसंस्कार कहतेहैं। श्लोक २२ तृतीयचरण-रविके मन्दफलम ३७ का भाग देकर जो लब्धि होय उसको भंगादि जाने इसको रविके मन्दफलका धन अथवा ऋणजान, इसको मन्दकलसंस्कार और तृतीयफलसंस्कार कहतेहैं ।। इनतीनों फलोंको जोड़कर जो धन अथवा ऋण हो उसको मायम चन्द्रमें धन अथवा ऋणकर तब विफलसंस्कृत चन्द्र होताहै ॥ उदाहरण. काशीपुरी दक्षिणोत्तर रेखाके पूर्व ६४ योजनहै इसकारण ६४ योजनमें ६ का भागदिया तव १० कला १० विकला यह प्रथम फलसंस्कार ऋणहै ॥ चर ९३ १ ३९ को २ से गुणाकस तव १८७११८ यह हुआ. इसमें ९ का भागदिया तव २० कला ४८ विकला यह चरका ऋणहै ।। रविके मन्दफल १ अंग ३० कला २८ विकला इसमें २७ सत्ताईसका भा- गदिया तव लन्धिहुई ० अं.३ क. २१ विकला यह तृतीयफलसंस्कार और मन्दफल धन है। ऋण (१)-20 क. ४० वि. रा. सं. क. वि. (२)-२० क. ४८ वि. मध्यमचन्द्र-६ २०१०२४ जोड़-३१ क.२८ वि. इनको मध्यमचन्द्रमें ऋणकरा-ऋण टोपह. १९:३८.५६ ६ रा.१९ अं. ३८ क. ५६ चि. इस गेपमें धन क. २१ वि. को युक्तकरा तव हुए ६ रा. १९ अं.४२ क. १७ वि. यह विफल संस्कृत चन्द्र हुआ । अबू मष्ट चन्द्र लानेकी रीति लिखतेहैं- विधो केन्द्रदोभागपष्टोननिनाः खैरोमाः पृथक् तन्न सीशोनितेश्च । रसहितास्ते लवाद्यं फलं स्याद्रवी- न्दू स्फुटौ संस्कृतौ स्तश्च ताभ्याम् ॥२३॥ अन्वयः-वियोः, केन्द्रदोर्भागपष्टोननिनाः,खरामाः, पृथक्, (स्था- प्याः), तन्नखांशोनितैः, रसातः, हृताः, ते,च, लवाद्यम्, फलम, स्यात् । ताभ्याम्, च, संस्कृती, स्फुटौ, रवीन्दू, स्तः ॥ २३ ।। भच ३१२८ ग्रहलाघव । [रविचन्द्स्पष्टीकरणा- + अर्थ:-चन्द्रोच्चम त्रिफलसंस्कृत चन्द्र घटाये जो शेष बचे यह चाद्रमाका केन्द्र होताहै, तब केन्द्रके भुनकरके उसके अंशकर और उनमें छाका भाग देय जो लब्धि होय उसको अंशादि माने और ३० तीस अंगमें उसको घटादेय तब जो शेपरहै वह और आईहुई लब्धिको गुणाकर जो गुणनफल होय उसमें वीसका भागदेय जो शेष बचे उसको अंशादि माने और उसको ५६ में घटाये जो शेपरहै उसमें पूर्वोक्त गुणनफलका भागदेय तब जो लब्धि हो सो अं- शादिरूप चन्द्रमाका मन्द फल होताहै । वह केन्द्र मैपादि छः राशिके भीतर होय तो धन जाने, और तुलादि छः राशिके भीतर होय तो ऋण जाने । तदनन्तर यदि मन्दफल ऋण होय तो त्रिफल चन्द्रमं घटा देय, और धन होय ती युक्त करदेय तब स्पष्ट चन्द्र होताहै ॥ २३ ॥ उदाहरण. चन्द्रोच्च १० रा० १४ अं० ५४ क०४३ वि० में त्रिफलसंस्कृतचन्द्र ६ रा० २९ अं०४२ क० १७ वि० को घटाया तव शेषरहे ३ रा० २५ अं० १२ क००६ वि० यह केन्द्र हुआ इसको छः ६ राशिमें घटाया तव शेपरहे २ रा०४० ४७ क० ३४ वि० यह भुज हुआ अर्थात् ६४ अं०४७ क० ३४ विकला यह अंगादि भुज हुआ इसमें ६ का भागदिया तब लब्धि हुई २० अ०४७ क०५५ वि० इसको ३० अंशमें घटाया तब शेपरहे १९ अं०१९क०५वि० इसको ऊपर छः६ का भाग दैनेसे आई हुई लब्धि १० अं०४७ कर ५५ वि० से गुणाकरा तव गुणनफल २०७ अं० २० क० ५४ वि० हुआ इसमें २० का भागदिया तब लब्धि हुई १० अं० २२ क०३ वि० इसको ५६ में घटाया तब दोपरहा ४५ अं० ३७ क०५७ वि० इसका ऊपरोक्त गुणनफल २०७ अं० २० क० ५४ वि० में भागदैना चाहाँ तब भाजक हुआ १६५२७७ वि०) भाज्य हुआ.७९६४५४ । भागदिया तय लब्धि हुई-४ अंश ३२ कला ३७,विकला यह मन्दफल है, और केन्द्र मेंपादि ६ राशिके भीतर है इसकारण धन है अत एव इसको त्रिफल संस्कृत चन्द्र ६ रा० १९ ० ४२ क० १७ वि० में युक्तकिया तब ६ रा०२४ अं०१४ क०५४ विकला यह स्पष्ट चन्द्र हुआ। भय रवि और चन्द्रका गतिस्पष्टीकरण लिखते हैं- केन्द्रस्य कोटिलवखाविलवोन निना रुद्रावेस्त्रिकु- हृताः शशिनो द्विनिनाः । स्वांगांशकेन सहिताश्च गतो धनर्ण केन्द्र कुलीरमृगपगते स्फुटा सा ॥२४॥ अन्ययः-रदाः, केन्द्रस्य, कोटिलयसाविलवोननिनाः, (कार्या) धिकारः] सान्वयभापाटीकासमेत । (२७) (ते), रवैः, (चैत, तर्हि), त्रिकुहताः, कार्याः, (तदा, रखेः, कलाधम्, गतिफलम्, स्थात,)। (चेत् ), शशिनः (तर्हि,), द्विनिनाः, (कार्याः, ततः), स्वाहांशकन, सहिताः, च, (कार्याः, तदा, चन्द्रगते, कला- द्यम्, फलम्, स्यात् )। कुलीरमृगपगते, केन्द्र, गती, धनर्णम्, (भव- तः), सा, स्फुटा, (गतिः, भवति) ॥ २४ ॥ अर्थः-रविका केन्द्र लेकर उसके भुजकर, और भुजले कोटि लावै, उस कोटिके अंगकरें, फिर उन अगाम २० का भांगदेय, जो लब्धि आच उसको अंगआदि जान । उस लस्थिको१२ अंशमं घटावै जो शेपरहै वह और लब्धि- को परस्पर गुणा करै, तब जोगुणनफलं होय उसमें१३ का भागदेय जो लब्धि आवै उसको कलादि जाने, वह कलादि रविका गतिफल होताहै, वह केन्द्र कादि छः राधिके अन्तर्गत होय तो धन और मकर आदिछः राशिके अन्त- र्गत होय तो ऋण जान । तदनन्तर उस गतिफलको रविकी मध्यम गतिम धन ऋण कर तब रविकी स्पष्टगति होतीहै । चन्द्रमाका केन्द्र लाकर उसके भुजकर और तिसभुजासे कोटि लाकर उसके अंदा कर. फिर उन अंगाम बीनक० का भागटेय जो लन्धि मिल. उसको कलादि माने और ग्यारह ११ कलामें घटादेय जो शेप रहे उसको लब्धिसे गुपाकर जो गुणनफल होय उसको दो से गुणाकर तब जो गुणन- फल होय उसमें छाका भागदेय जो लब्धि होय उसको उसमें युक्तकरदेय तव कलादि गतिफल होताहै. वह केन्द्र कादि छः राशिके भीतर होय ती धन और मकर आदिछः रामिक भीतर होय तो ऋण होताहै ऐसाजानै फिर इस गतिफलको चन्द्रमाकी मध्यम गतिमें धन या ऋण कर तव चन्द्रमाकी स्पष्टगति होतीहै ।। २४ ॥ उदाहरण. रविकेन्द्र ? राशि : अंश ४६ कला १८ विकला यह तीन राशिके अ- न्तर्गतह, इसकारण यह भुजहुआ इसको तीन : राशिमं घटाया तब शेष- रहा १ राशि १६ अंग : कला ४२ विकला यह कोटि हुई, कोटिक अंठा ४६ अंग १३ कला ५२ विकला हुए इसमें २० का भागदिया तब लब्धिमिले २ अंग १८ कला ११ विकला, इसको ग्यारह ११ अशमं घटाया तव शेपरहे।८ अंटा ४१ कला १९ विकला इसको ऊपरकी लन्धि अंग १८ कला ४१ वि- करासे गुणाकरा तब २० अंश ४ कला ५७ विकला हुआ, इसमें तरह ११ का भागदिया तब लब्धिमिली १ कला २२ विकला यह रविका गतिफल हुआ, यह केन्द्र मकर आदिछः राशिके अन्तर्गहै इसकारण ऋणहै. इसको ग्रहलाघव। (२८) [रविचन्द्र स्पष्टीकरणा- रविकी मध्यमगति ५९ कला ८ विकलाम घटाया तब ५७ कला ३६ विकला यह रविकी स्पष्टगति हुई ।। चन्द्रमाका केन्द्र ३ राशि २५ अंश १२ फला २६ विकला हे इसको ६ छ.. राशिम घटाया तब २ राशि अश ४७ कला ३४ विकला यई भुज हुआ, इ- सको.तीन ३ राशिम उठाया तय शेषरहा ० राशि २५ अंश १ कला २६ विकला यह कोदि और यही कोट्यंग हुए इसमें २० वीसका भागदिया तब लब्धि ? कला १५ विकला हुई, इसको ग्यारह११कलामें घटाया तय९ कला ४५ विकला रही इसको ऊपरकोलन्धि १ कला १५ विकलासे गुणाकर तब १२ कला ११ विकला हुआ इसको दो २ से गुणाकरा तब २४ कला २२ वि- कला इसमें छः ६ का भागदिया तव ४ कला ३.धिकला सब्धिहुए इसमें ऊपरोक्त गुणनफलका युक्त करा तब २८ कला २५ विकला यह गतिफल हुआ। यह केन्द्र कर्कादि छराशिके अन्तर्गत होनेके कारण धन है इसकारण इसको चन्द्रमाकी मध्यमगति ७९० कला ३५ विकलामें युक्त करा तब ८१९ कला ० विकला हुआ यही चन्द्रमाकी स्पष्टगति हुई । • अब तिथि करण नक्षत्र और योग साधनेकी रीति दो श्लोकोंम कहतेहैं-- भक्ताव्यकविधोलवायमकुभिर्यातातिथिः स्यात्फलं शेपं यातमिदं हरात्प्रपतितं भोग्य विलिप्तास्तयोः। भुत्त्योरन्तरभाजिताश्च घटिकायातैष्यिकाः स्युः क्रमात्पूर्वार्दैकरणं बवादगततिथिघ्निाद्रितटा भवे- त् ॥ २६॥ तत्सकंत्वपरेदलेऽथ शकुनेः स्युः कृष्ण. भूतोत्तरादर्धाचाथ विधाश्च सार्कसितगोर्लिप्ताः सखा टोद्धृताः । यातेस्तोभयुती क्रमाद्गनपनिनेगते- प्येतयोरिन्दोर्मुक्तिहते जवैक्यविहृते यातेप्यना-.. ट्याक्रमात ॥२६॥ अन्वयः-व्यफविधाः, लवाः, ( कार्याः, ते,) यमकुभिः, भक्ताः, (कार्याः), फलम्, यातातिथिः, स्यात्, । शेपमः (अपि) यातम् । इदम, हरात, मपतितम्, भोग्यम्, स्यात् । तयोः, विलिशान्यो:- अन्तरभाजिताः, ( फार्याः, तदा, लब्धिः), कमात, यातैयिकाः, 1 धिकारः२] सान्वयभाषार्टीकासमेत। (२९) घटिकाः स्युः। दिन्नी, (ततः), अद्वितष्टा, गततिथिः, बवात, तिथेः, पूर्वा, करणम्, भवेत् । सैकम्, तु, तत्,अपरे,दले, करणम्, (स्यात्)। अथ, कृष्णभूतोत्तरार्द्धात्, च, शकुन, स्युः । अथ, विधीः, सार्कसि- तगोः, च, लिताः, खखाष्टोद्धृताः, (कार्याः), (फलम् ), कमात्, याते, भयुती, स्तः । तयोः, गौप्य, गगनपनिने, इन्दोः, अक्तिहते, (ततः),जवैक्यविहते,(तदा)कमात् गतेप्यनाड्यः, स्युः)॥२५॥२६॥ अर्थः-स्पष्टचन्द्रमें स्पष्टरविको घटादेय जो शेषरहै उसके अंश करलेय, अंशाम बारह १२ का भागदेय, जो लब्धिमिले सो गततिथि होतीहै । और. जो शेष अंशात्मक रहे बह.भुक्ततिथि अर्थात् तिथिका व्यतीत भाग होताहै । इस भुक्ततिथिको पूर्वोक्त भाजक अङ्कभयांत् वारह १२ अंशमं घटावै .जो शेषरहै सोभोयतिथि अर्थात् तिथिका आगामी भाग होताहै, तदनन्तर भुक्त- तिथि और भोग्यतिथि दोनोंकी अलग २ विकला करलेय उन विकलाओंमें दोनों स्थानमें अलग अलग साठ ६० से गुणाकर जो गुणनफल होय उसमें क्रमसे रवि और चन्द्रमाकी स्पष्टगतिके अन्तरकी विकलाओंका भागदेय जो लब्धिमिले उसको घटीआदि जाने अर्थात् यह क्रमसे भुक्ततिथि और भोग्य तिथिकी घटिका होतीहै । गततिधिकी संख्याको दोसे गुणांकरकै सातका भाग देय जो लब्धि मिल . उसको छोड़देय और भाग देनेसे जो शेषवचरहै उसको ग्रहणकर वह.बव- करणसे गणना करके तिथिके पूर्वार्द्ध में करण होताहै, और उस शेषमें एक युक्तकरदेय तो वह बव करणसे गणना करकै तिथिके उत्तरार्द्ध में करण होताहै । (तदनन्तर तिथिको भुक्त और भोग्य घटिकाआदिका योगकरे उसका आधाकर और उस आधेम भुक्त घटिका घटादेय जो शेषरहै सो. करणकी घटिको आदि होती है। यदि तिथिकी भुक्त घटिका ३० तीस घटि- कासे अधिक होय तो तिथिके भुक्तं भोग्यकी घटिकाओमसे भुक्तघटिका घटाकर जो शेपरहै सो करणकी घटिका होता है ) प्रतिमास कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके उत्तरार्द्धमें शकुनि करण और अमावास्याके पूर्वार्द्ध में चतुप्प- दकरण और उत्तरार्द्ध में नाग करण तथा शुक्प्रतिपदाके पूर्वार्द्ध में किंस्तुघ्न ही करण होता। स्पष्टचन्द्रकी कला करके उनमें भाठसौका भागदेय जो लब्धि मिलै वह गत नक्षत्र होताहै और भागदेकर जो कलादि शेष रहै वह गतनक्षत्रमें आ-. १ एतिथिमें दोफरण होते है. पञ्चाद्गमें तिथि तीस ३० घडोसे कम होय तो उत्तरार्द्धके करणको भोग्य घोटका लियै, और यदि ३० घड़ीसे अधिक होय ती पूर्वार्द्ध करणकी. भोग्य घटिका लिखे ॥ . .
(३०) ग्रहलाघय। [रविचन्द्रम्पष्टीकरणा- गैके नक्षत्रका गतभाग अर्थात् मुक्त होताहै उसको माठसी कलाम घटावै जो शेष रहै सो भोग्य नक्षत्र अर्थात् नक्षत्रका गत भाग होताद तदनन्तर भुक्त नक्षत्र और भोग्य नक्षत्र इन दोनोंकी विकला करके मत्येकको साउसे. गुणाकर जो गुणनफल मिले उसमें चन्द्र स्पष्ट गतिकी विकलाआंका भागदेय जो घटिकादि लब्धि होय वह क्रमले भुक्त नक्षत्र और भौग्य नक्ष- वकी घटिका होताह ॥ स्पष्ट रवि और चन्द्रमा दोनोंक योगकी कला करके आठसौका भाग- देय जो लब्धि मिलै वह गतयोग होताहै और जो शेष कलादि बचे वह भुक्त योग अर्थात् आगैके योगका गतभाग होताहै. उसकी आसौ कलाम यटावै जो शेप रहै यह भोग्ययोग होताहै, तदनन्तर भुक्तयोग और भोग्य- योग दोनोंकी विकलाकरके प्रत्येकको साठसे गुणाकरै जो गुणनफल होय उसमें रवि और चन्द्रको स्पष्ट गतिके योगकी विकलाओचा भागदेयं तव जी लब्धि होप यह क्रमसे भुक्तयोग और भोग्ययोगकी घटिका होतीहैं ॥ २५॥ २६ ॥ उदाहरण. म्पष्टचन्द्र ६ राशि २४ अंग १४,कला ५४ विकला हैं इसमें स्पष्टरविर गशि ५ अंश ४२ कला ३७ विकलाको घटाया तब शेषरहा ५राशि १८ अंग ३२ कला १७ विकला इसके अंश कर लिये तब हुये १६८ अंग ३२ कला १७ विकला अंशाम १२ का भागदिया तय सब्धिहुई १५ यही गतति- थि हुई टोप बचा० अंश ३२ कला १७ विकला यह भुक्त पूर्णिमा हुई इस- को १२ अंशमें घटाया तव शेपरहे ११ अंश २७ कला ४३ विकला यह भी- ग्य पूर्णिमा । अंब भुक्त तिथि ('पूर्णिमा)३२ कला १७ विकलाकी विक- ला करी तर १९३७ विकरा हुई इंनको ६० से गुणाकरा तब ११६२२० दुप इनमें चन्द्रमाकी स्पष्टगति ८१९ कटा ० विकला और रधिकी सटगति ५७ कला ३६ विकला इन दोनों स्पष्टगतियोंका अन्तर करा तव ७६. कला ४ विकला मधात् ५६८४ विकला इनका भाग दिया तबल- न्धि हुई घटिका ३२ पल यह पूर्णिमाकी भुक्त घटिका हुई। फिर भोग्य तिथि ११ मंदा २७ कला ४३ किला इसकी विकलाकार तब ४१२६३ दुई इनको ६० से गुणा करा तय २४७५७८० हुए इसमें चन्द्र सूर्यकी स्पष्टगतिक अन्ती विकलामा ४५६८४ का भागदिया तय लब्धि हुई५४टिका ११ पर पद पूर्णिमारी भाग्य घटित हुई। गततिथिवार से गुणा करा तब ८ हुए इसमें ७ का भागदिया तब शेप रहा इपकारण पूर्णिमा पालुम भद्राकरण और उत्तराईम बघ कर- नई फिर तिधिषी भत्ता घटिका घ०१२५० और भाग्य घांटमा ५४५० धिकारः२] सान्वयंभाषाटीकासमेत। ११प०का योग करा तव ५६५० ४३.५० हुआ इसका आधा करा तव २८५० २१५० इसमें भुक्त तिथि २५०३२ १० घटाया तब शेपरहा५५०४२ प० यह भद्रा करणकी घटिका हुई। स्पष्ट चन्द्र राशि २४ अंश १८ कला ५४ विकला अर्थात् १२२५४ कला ५४ विकलाम ८०० का भाग दिया तब लब्धि मिले १५ यह गत नक्षत्र अर्थात स्वाती हुआ और शेष बचे २५४ कला ५५ विकला यह आंगैके नक्षत्र अर्थात् : विशाखा नक्षत्रका गत भागहै इसको ८०० कलाम घटाया तव शेष बच५ कला ६ विकला यह विशाखा नक्षत्रका भोग्य भागहै । अब मुक्त विशाखा नक्षत्र २५४ कला ५४ विकलाकी विकला १५२९४ को ६० से गुणाकरा तव ९१७६४० इसमें चन्द्रं स्पष्टं गति ८१९ कला ०० विकला की विकला ४९११० का भाग दिया तब लब्धि हुई १८ घ० ४० ५० यह विशाखा नक्षत्रकी भुक्त प्रटी हुई । फिर भोग्य विशाखा नक्षत्र ५४५ कलां ६ विकला की विकला ३२७०६ को ६० से गुणाकरा तब १९६२३६० हुए इसमें चान्द्र स्पष्ट गतिकी वि कलाओं १९१४० का भाग दिया तब लब्धि हुई ३९५०५६ ५० यह विशाखा नक्षत्रकी भौग्य घटिका हुई। स्पष्ट रवि १ राशि५अंश ४२ कला ३७ विकला और सट चन्द्र ६ राशि २४ अंश २४ कला५४ विकला इनका योग करा तव ७ राशि-३९ अंश ५७ का- ला ३१ विकला हुआ इस योगकी कला करी तब १४३९७ कला ३१ विकला हुई इनमें ८०० का.भाग दिया तब लन्धि हुई १७ यह गत योग अर्थात् न्य- तीपात योग आया और शेप वचा ७९७ कला ३१ विकला यह आगैके योग अर्थात् वरीयान् योगका भुक्त भागहै इसको ८०० कलामं घटाया तब शेपव- ..'चा २ कला २९ विकला यह वरीयान् योगका भाग्य भागहै । फिर भुक्त योग७९७ क० ३१ वि० की विकला करी ४७८५१ इनको ६० से गुणा करा तब २८७१०६० हुए इसमें रवि और चन्द्रकी स्पष्टगतिक योगको विकलाओं ५२५९६ का भाग दिया तब लन्धि हुई ५४ २०६५५० यह वरीयान् योगके भुक्त कालकी घटी हुई। फिर वरीयान् योगके भाग्य २ क० १९ वि० को १४९ विकलाओंको ६० से गुणा करा तब ८९४० हुए इसमें चन्द्र और रविकी स्पष्ट गतिके योगकी विकलाओं५.५९६ का भाग दिया तब टन्धि मिली ० घटी १० पल यह वरीयान् योगको भाग्य घटिकादि हुई। इति श्रीगगकार्यपण्डितंगणेशदेवतकृती ग्रहलायरकरणप्रत्ये पश्चिमोतरदेशीयमुरादाबाद- वास्तव्यगोड़वंशावतंसीयुतभोलानाथतन्जपण्डितरामस्वरूपशर्मणा चितया विस्तृतोदाहरणसनायीकृतयान्वयसमन्वितया भाव्याख्यया सहितः सटाधिकार समाप्तिमितः ॥२॥ 4. .
- 1 ... . (३२) ग्रहलाधव । [ पश्चतारास्पष्टीकरणा- अथ पञ्चतारास्पष्टीकरणाधिकारो व्याख्यायते । तहाँ प्रथम पश्चताराअर्थात्मङ्गलं बुध गुरु शुक्र और शनिके शीना कहते है- खमप्टमरुतोऽद्रिभू व उदयगोव्ोप्टदृग्दृशो नव- नगाश्विनोऽक्षदशनाः शराङ्गोमयः । गुणाङ्कदहनाः खखाब्धय' इभांगरामाः क्रमानवाम्बुधिदृशो नभः क्षितिभुवश्चलाङ्का इमे ॥१॥ अन्वयः-खगू, अष्टमरुतः, अद्विभूभुवः, उध्यगोwः, अष्टदृग्द- शः, नवनगाश्विन:,अक्षदशनाः, शराङ्गामयः, गुणाकदहनाः,सखा- ब्धयः, इभागरामाः, नवाम्बुधिशा, नभः, इमे, कमात्, क्षितिभुवः, चलाइकाः, ( सन्ति ) ॥ १॥ अर्थः-राम् कहिये शून्य ०, अष्ट कहिये आठ और मरुत कहिये पाँच अर्थात् अगवन ५८ , भौर अदिकहिये सात भूकहिये एक और भूकहिये एक अर्थात् परसीसतरह ११७, और उदधिकहिये चार अगकहिये सात ऊर्थी कहिये एक भधांत एकसी चौहत्तर १७४ , और अष्ट कहिये आठ दृक् कहिये दो और दृक् काहिये दो अर्थात् दोसौ अट्ठाईस २२८, और नव कहिये नौ नग कदिये सात अश्चिन् कहिये दो अांद दोसौउन्नासी२७५, और अक्ष कहिये पाँच दशन कहिये वत्तीस अर्थात् तीनसौ पच्चीस ३२५ , और शर कहिये पाँच मद कहिये छः अग्नि कहिये तीन अर्थात् तीनसोपसठ ३६५,और गुण यदिये तीन अङ्क कहिये नौ दहन पहिये तीन अर्थात् तीनसीतिरानव ३९३, और सवाहिये शन्य पुनः सकहिये शून्य अन्धि कहिये चार अर्थात् चारसी ४००, और इभ पहिये भाउ अझ कहिये छः राम कहिये तीन अर्थात् तीनसी अहसट,और नव कहिये नौ अम्युधि कहिये चार हरु कहिये दो अर्थात् दोलाउननवास२४९,और नभ यहिपेशन्प यह कमसे भीमफे शीघ्राङ्क है॥१॥ खं भृकृताः कुर्वसवोऽद्रिभवाः खतिथ्योऽष्टाद्रीन्दवो नवनवाक्षित्तयोऽकपक्षाः । अर्काविनः शरसंग भितयोऽक्षतिथ्यो गोप्टो खमाशुफलंजाः स्युरिमे विदोऽङ्काः ॥२॥ , , धिकारः३]. सान्वयभाषाटीकासमेत। अन्वयः-खम्, भूकृता, कुर्वसवः, अद्विभवाः, खतिथ्यः, अष्टाद्री न्दवः, नवनवक्षितयः, अर्कपक्षाः, अर्काश्विनः, शरखगक्षितयः, अक्ष- तिथ्यः, गोप्टौ, खम्, इमे, विदः, आशुफलजाः, अङ्काः, स्युः ॥ २॥ अर्थः-खकहिये शून्य०, और भूकहिये एक कृत कहिये चार अर्थात् एक- तालीस ११ , और कुकहिये एक वसुकहिये आठ अर्थात् इक्यासी ८१, और अदि कहिये सात भव कहिये ग्यारह अर्थात् एकसौसतरह ११७,और खकहिये शून्य तिथि कहिये पन्दरहं अर्थात् एकसौपश्चास १५०, और अष्ट कहिये आठ अद्रि कहिये सात इन्दु कहिये एक अर्यात् एकसौअठत्तर १७८, और नव कहिये नौ नव कहिये नौ क्षिति कहिये एक अर्थात् एकसौनिन्यानवे १९९, और अकं कहिये वारह पक्ष कहिये दो अर्थात् दोसौबारह २२२ , और अर्क कहिये वारह अश्विन कहिये दो अर्थात् दोसौ २१२, और शर कहिये पाँच खग कहिये नी क्षिति कहिये एक अर्थात् एकसीपिचानवे १९५, और अक्ष कहिये पाँच तिथि कहिये पन्दरह अर्थात् एकसौपचपन १५५ , और गोष्ट कहिये नौवासी८९ ,औरखकहिये शून्य, यह (क्रमस )दुधके शीप्राङ्क हैं॥२॥ खं तत्त्वानि नगान्धयोऽष्टपंट्का पञ्चेभा गजखेचरा रसाशीनानागाशा द्विदिशो नवाहयः पट्पष्टिः पट्स- गुणा नभो गुरोः स्युः॥३॥ अन्वयः-सम्, तत्वानि, नगान्धयः, अष्टपकाः, पञ्चेभाः, ग़जखे. चराः, रसाशाः नागाशाः, विदिशा, नवाहयः, पद्पष्टिः, पदगुणाः, नमः, (इमे), गुरोः, (आशुफलजाः, अङ्काः,) स्युः, ॥ ३॥ अर्थः-संम् कहिये शून्य, और तत्व कहिये पञ्चीस २५,और नग कहिये सात भन्धि चार अर्थात् संतालीस४७,और अष्टपटक कहिये अड़सठ६८,और पश्च कहिये पाँच इभ कहिये आठ अर्थात् पिचासीटर, और गज कहिये आठ खेचर कहिये नौ अर्थात् अठानवे ९८, और रस कहिये छः आशा कहिये दश अर्थात् एकसौ छः १०६ , और भाग कहिये आठ आशा कहिये दश अर्थात् एकसोआठ१०८, और द्वि कहिये दो दिश कहिये दश अर्थात् एकासोदो १०२, और नव कहिये नौ अहि कहिये आठ अर्थात् नौवासी ८९, और पक्षष्टि कहिये छासठ ६६, और पट्क कहिये छः गुण कहिये तीन अर्थात् उनीस३६, और नभ कहिये शून्य०, यह क्रमसे गुरुके शीघ्रा हैं ॥३॥ . ३ ग्रहलाघव। (३४) [पञ्चतारास्पष्टीकरणा- 11 समग्न्यङ्गैस्तुल्या रसयमभुवः पदधृतयोऽरिसिद्धाः पक्षाधामय उदधिनाराचदहनाः। द्विशून्यौदन्वन्तः खर्जलधिकृता भूरसंकृतास्त्रिवेदोदन्वन्तो रसयम: गुणाः खंभृगुजनेः॥४॥ अन्वयः-सम्, अग्न्यः, तुल्याः,(अकाः), रसयमभुवः, पवधू- तयः,अरिसिद्धाः, पक्षाधामयः, उद्धिनाराचदहनाः द्विशून्योदन्वन्तः, सजलधिकृताः,भूरसकृताः,त्रिवेदोदन्वन्तः रसयमगुणाः,सम्, (इमे) भृगुजनेः, (अङ्काः, स्युः,)॥ ४ ॥ अर्थः-खकहिये शून्य०, और अग्नि कहिये तीन अङ्ग कहिये छः इनकी तुल्य जो अङ्क अर्थात् तिरेसठ ६३, और रस कहिये छः यम कहिये दो भूकहिये एक अर्थात् एकसौलम्चीस १२६ , और षट्क कहिये छः धृति कहिये अठारह अर्थात एकसौछियासी १८६ , और अरि कहिये छ: सिद्ध कहिये चौवीस अर्थात् दोसौछियालीस २४६ , और पक्ष कहिये दो अभ्र काहिये शून्य अग्नि कहिये तीन अर्थात तीनसौदो ३०२, और उदधेि कहिये चार नाराच कहिये पाँच दहन कहिये तीन अर्थात् तीनसी चीअन ३५४, और दो शून्य तथा उदन्धन कहिये चार भ- र्थात् चारसी दो ४०३, और राकहिये शुन्य जलधि कहिये चार कृत कहिये चार अर्थात् चारसी चालीस ४४०, और भूकहिये एक रस कहिये छः कृत कहिये चार अर्थात् चारसौ इकसठ ५६१, और विकहिये तीन वेद कहिये चार उदन्वत कहिये चार अर्थात् चारसौ तेतालीस ४४३, और रसकहि- ये छः सम पाहिये दो गुण कहिये तीन अर्थात् तीनसो छब्बीस ३२६, और एकदिये शन्य , यह क्रमसे, शुक्रके शीघ्राङ्क हैं॥४॥ संमिपुक्षितयोगजोश्विनो गोदना नागकृताः पयो- धिवाणाः। द्विरगेषुमिता हुताशवाणाः शरवेदास्त्रि- गुणा धृतिः समाः॥५॥ अन्ययः-सम्, इपुतितयः, गजाश्विनः, गोदहनाः, नागकृताः, पोधियाणाः, दिः, अगंपुमिता, दुताशवाणाः, शरवेदाः, त्रिगुणा, तिः, गम, (इमे), आफैः, (अफाः, स्युः) ॥५॥ .
:
धिकारः] सान्वपभाषाटीकासमेत।
अर्थः खम् कहिये शून्य ०, और इधुकहिये पाँच क्षिति कहिये एक अ-
योत पन्दरह १५, और गज कहिये आठ अश्विन कहिये दो अर्थात् अठाईस
२८, और गो कहिये नौ दहन कहिये तीन अर्थात् उनतालीस ३९, और नाग-
कहिये भाउ कृत कहिये चार अर्यात अड़तालीस ५८, और पयोधि कहिये
चार वाण कहिये पाँच अर्थात् चौअन ५४, और दोवार भगकहिये सात और
इधुकहिये पाँच अर्थात् सत्तावन ५७, सत्तावन ५७, और हुताश कहिये तीन
वाण कहिये पाँच अर्यात् तरेपन ५३, और शरकहिये पाँच वेद कहिये
चार अर्थात् पंतालीस ४५, और त्रि कहिये तीन गुण कहिये तीन अर्यात
बैंतीस ३३, और धृतिः कहिये अठारह १८, खम् कहिये शन्य ०, यह श-
निके शीनाङ्क हैं ॥ ५॥
उपरोक्त पाँचों श्लोकोंमें कहे हुए पाँचों ग्रहाके श्रीवा म्पष्टरीतिसे नीचे
कोठेमें लिखतेहैं-
नाम । ०६२/२ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९ १० १११ / १२)
मङ्गल ०५८२१७१७४२२८१७२३२५३६५३९३४००३६८२४९१ ०
| बुध ०४१/८२/११७१५० १७८१९९२१२२१२१९५१५५.८९/०
गुरु ०२५४७६८१८५१९८५१०६,१०८१०२।८९ ६६४३६। ।
शुक्र ०६३१२६ १८६१४६३०२३५४,४०२४४०४६२४४३३२६०
गति ०२५२८१३९/४८५४ ५७१५७/५३ / ४५१३।१८१ ०
अत्र शीप्रफल साधनेकी रीति लिखतेहैं -
भौमाज्यिविहीनमध्यमरविः स्यात्स्वाशुक्रन्द्रंतु
विद्रग्वोरुक्तमिदं रसायमिनभाच्छुद्धं तदंशा दि
नैः । भक्ताः खादिफलें क्रमांदिहगताकोऽसौ क्षय-
दर्ता' हताच्छेपाद्वाणकुलेब्धिहीनयुगयं दिग्हल्ल-
वाद्यं फलम् ॥६॥
अन्वयः-भौमार्कीज्यविहीनमध्यमरविः, स्वाशुकेन्द्रम् स्यात्,विद्-
भृग्वोःतु, उक्तम् इदम, रसोर्ध्वम् (चेत् ),इनभात,शुद्धम् (कार्य्यम् ।
तदंशाः, दिनैः, भक्ताः, (सन्तः), इह, कमात्, खादिफलम्गताङ्का,
(भवेत्), असो, क्षया, हतात, शेषात्, वाणकुलब्धियुक्,(कार्यः),
। असो, दिग्वृत्, लवाद्यम्, फलम् (भवति) ॥ ६ ॥
ग्रहलाघव । [पञ्चतारास्पष्टीकरणा- अर्थ:-मध्यम रविमें मध्यमग्रह (मङ्गल, गुरु, अथवा शनि) घटादेय जो शेषरहै वह तिसतिसग्रह (मङ्गल, गुरु, तथा शनि ) का शीघ्र केन्द्र होताहै । . मध्यम बुध और मध्यम शुक्र इनके केन्द्र पहलै मध्यम नहं साधनेके समय कहचुकेहैं । अभीष्टग्रहका यह केन्द्र यदि छः राशिकी अपेक्षा अधिक होय तो उसको वारहराशिम घटादेय जो शेषरहै उसके अंशकरलेय उन अंशाम पन्दरहका भागदेय जो लब्धि होय तत्परिमित ग्रहके पहले कहेहुए शीघ्राङ्क ग्रहणकरे और उस लब्धिमें एकमिलाकर.जो अङ्कहो तत्परिमित ग्रहके शी- प्राङ्क ग्रहण कर, तदनन्तर इन दोनों शीघ्राकोंका अन्तर कर जो शेष बचे उससे ऊपरकी अंशात्मक बाकीको गुणाकरदेय तब जो गुणनफल होय उ- समें पन्दरहका भागदेय जो अंशादि लब्धिमिले उसको यदि प्रथम ग्रहण करे हुए शीमाङ्ककी अपेक्षा दुसरा शीघ्रात अधिक होय तो प्रथम शीघ्रामें युक्त- कर देय और यदि प्रथम शीघ्राङ्ककी अपेक्षा दूसरा शीघ्राङ्क कमती होय तो प्रथम शीघ्राडूमें घटादेय और उसमें दशका भागदेय जो लब्धि मिले यह अशादि शीघ्रफल होताहे वह यदि मेपादि केन्द्र छाराशिके अन्तर्गत होय तो धन होता है और तुलादि केन्द्र छःराशियोंके अन्तर्गत होय तौऋण होताहै॥६॥ अब मन्दफल साधनेके निमित्त भौमादिक मन्दाङ्क कहते हैं- खगोश्विनोऽदिमरुतोऽक्षगंजा नवाशाः सिद्धेन्दवः खदहनॅक्षितयोऽसूजोऽङ्काः॥ मान्दा बुधस्य समिनाः कुटुंशोऽष्टपेक्षा देवाः शनिलमिता रसवह्नयः स्युः ॥७॥ खेन्द्राणि नवागयोऽह्युदधयोशाक्षा नक्षिा गुरोः' शुक्रल्याभ्ररसेशविश्वमवो द्विवणिचन्द्राः, क्रमातू । सङ्गोऽन्जा संकृताः संपनगनंगा गोप्टो विनन्दाः शनेः शुद्धोऽध्यपिडग्गिनागगृहतः . स्यान्मन्दकेन्द्रं कुजात् ॥ ८॥ अन्वयः-गम, गांश्चिनः, अदिमरुतः, अंक्षगजाः, नयाशाः,सिद्ध- न्दयः, गदहनक्षितयः, (एत), असना, मान्दाः, अकाः, स्युः, । खम्, इना, कशः, अष्टपक्षाः, दवाः, शगनलमिताः, संयद्वयः, (एते), भुपस्य, (मान्दा, अड्या, स्युः).। ग-इन्द्र-ऋक्षाणि, नपापयः, - धिकारः३].. सान्वयभाषार्टीकासमेत । (३७) अं दधयः, अक्षाक्षाः, नवासाः, (एते), गुरोः, (मान्दा., अकाः, स्युः) । अभ्र-रस-ईश-विश्व-मनवः, द्विः-चाणचन्द्रा, (एते), क्रमात, गुरोः, (मान्दाः, अकाः, स्युः)। सम् गोन्जाः, खकृताः, सपद्, नगनगाः, गोष्टी, विनन्दाः,(एते )शनेः, (मान्दाः, अङ्काः, स्युः ) । अभ्यदिपडमिनागगृहतः, शुद्धः, कुजात, मन्दकेन्द्रम्, स्यात् ॥ ७॥ ८॥ अर्थः-खम् कहिये शून्य ०, और गो कहिये नौ अश्विन कहिये दो भर्यात् उनतीस २९, और अद्रिकहिये सात मरुत् कहिये पाँच अर्थात् सत्तावन ५७, और भक्ष कहिये पाँच गज कहिये आठ अर्थात् पिचासी८५, और नव कहिये नौ आशा कहिये दश अर्थात् एकसौ.नौ १०९, और सिद्ध कहिये चौवीस इन्दुं कहिये एक अर्थाद एकसौ चौवीस १२४, और खकहिये शून्य दहन कहिये तीन क्षिति कहिये एक अर्थात् एकसौ तीस १३०, यह भौमके मन्दा- हैं । खम् कहिये शून्य ०, और इन कहिये वारह १२, और कुकहिये एक दृश कहिये दो अर्थात् इकीस २१, और अष्ट कहिये आठ पक्षं कहिये दो अ- र्थात् अट्ठाईस २८, भौर देव कहिये तैतीस ३३, और शरकहिये पाँच अनल कहिये तीन अर्थात् पैतीस ३५, और रस कहिये छः वह्नि कहिये वीन अ- थीद छत्तीस ३६, यह बुधके मन्दाङ्कहैं । खकहिये शून्य , और इन्द्रकहिये चौदह १४, और ऋक्ष कहिये सत्ताईस २७, और नव कहिये नौ भग्नि कहिये तीन अर्थात् उनतालीस ३९, और अहिकहिये भाट उदधि कहिये चार अ- यांत अड़तालीस ४८, और अक्ष कहिये पाँच भक्ष कहिये पाँच अर्थात् पचपन ५५, और नग कहिये सात अक्ष कहिये पाँच अर्थात् सत्तावन ५७, यह गुरुके मन्दाङ्क हैं। अभ्रकहिये शून्य , और रस कहिये छः६, और ईश कहिये ग्यारह ११, और विश्व कहिये तेरह १३, और मनुकहिये चौदह ११, और दो- वार वाण कहिये पाँच चन्द्र कहिये एक अथात् पन्दरह १५, और पन्दरह १५, यह शुक्रके मन्दा हैं। खम् कहिये शून्य , और गो कहिये नौ मंज कहिये एक अर्थात् उन्नीस १९, और खकहिये शून्य कृत कहिये चार अ- र्थात् चालीस ४०, और खकहिये शून्य षट् कहिये छःभयांद साठ ६०, और नग कहिये सात नग कहिये सात अर्थात् सवचर ७७, और गो कहिये नौ अष्टौ कहिये आठ अर्यात् नौवासी.८९, और विकहिये तीन नन्द कहिये नौ अर्याद तिरानवे ९३, यह शनिके मन्दा । । “ -
(३८)
ग्रहलापव। [पश्चतारास्पष्टीकरणा-
यह पाँचा ग्रहोंके मन्दाङ्कस्पष्टरीतिसे नीचे कोडेम लिरातह-
३ ३
मङ्गलकेमन्दाङ्क | 0 २९/ ५७
८५१०९/१९४|१३०
बुधकेमन्दाङ्क .
૨૮
३५ ३६
०
१
...
10
30
अब्धि कहिये चार ४ राशि भीमका मन्दोच्च होताहै, अद्रि कहिये सात ७
राशि बुधका मन्दोच्च होताहै, छः ६ राशि गुरुका मन्दोच्च होताहै, अग्नि
कहिये तीन ३ राशि शुक्रका मन्दोच्च होताहै, और नाग कहिये आठ ८ राशि
शनिका मन्दोच्च होता है। इनमसे यथेष्ट किसी ग्रहका मन्दोच्च ग्रहण करके
शीघ्रफलदल स्पष्टग्रहमें घटादेय तप, जो शेपरहै वह उसी ग्रहका मन्द-
केन्द्र होता है ॥७॥ ८॥ मन्दी
अव भौमादि ग्रहोंका मन्दफल साधनको रीति लिसतेहैं-
M
M
मृदुकेन्द्रभुजांशका दिनाप्ताः फलमङ्कः प्रगतस्त
दूनितेप्यः। परिशेपहतो. दिनाप्तियुक्तो दशभक्तः
फलमंशकादि मान्दम् ॥९॥
अन्वयः-मृदुकेन्द्रभुजांशकाः, दिनाप्ताः, (कार्याः, तदा, यव),
फलम्, ( तन्मितः), प्रगतः, अङ्कः, (स्यात् । तदूनितेप्यः, परि--
शेपहतः, (तस्मात् ), दिनाप्तियुक्तः, (ततः), दशभक्तः, ( कार्य:,
तदा), अंशकादि, मान्दम्, फलम्, (भवति ) ॥ ९ ॥
भः-किसी अभीष्ट ग्रहके मन्दकेन्द्रकै भुजकर, और उन भुमोके अंशकर-
के पन्दरहका भागदेय जो टन्धि मिलै तत्परिमित ग्रहके पहले कहे हुए म.
न्दारहण करे और उस लब्धिम एक मिलाकर जो भडू होय तत्परिमित
प्रदक मन्दार ग्रहण करके द्वितीय मन्दामे प्रथम मन्दाइको घटादेय जो
शेपदं दराण उपरकी अंदादि गारो गुणाकर हम जो अपमाल होग
उसमें पन्दरका भागदय जो सन्धि होय उसको प्रथम मन्दाङ्क युक्तकरके
दवाया भागदेय तर जो अंशादि सन्धिहोय सो मन्दुफल होताई । यह म.
न्दल मन्द केन्द्र मेपादि राशि भीतर होय ती धन होताद और.त-
सादिर राशिक भीतर होय ती माण होताहे ॥९॥
. धिकारः३] सान्वयभाषाटीकासमेत। शीघ्रफल और · मन्दफलका ग्रहमें किसप्रकार संस्कार करना चा- हिये सो दिखातेहैं- प्राङ्मध्यमे चलफलस्य दलं विदध्यात्तस्माच्चमान्द मखिलं विदधीत मध्ये । द्राकेन्द्रकेऽपि च विलोम- मतश्च शीघ्र सर्वच तत्र विदधीत भवेत्स्फुटो सौ॥१०॥ अन्वयः-प्राक्, चलफलस्य, दलम्, मध्यमे, विदध्यात्, । तस्माद, मान्दम्, ( फलम, साध्यम् ), (तत्), अखिलम्, मध्ये, विदधीत,! अपिच, (तत्), द्वाकेन्द्रके, विलोमम्, (विध्यात्), अतः, शीत्रम्, (साध्यम्, तत्), सर्वम्, तत्र, विदधीत, असौ, स्फुटः, भवेत् ॥ १ ॥ अर्थः-पहले शीघ्रफलका भाधा करके उसको उक्तरीतिके अनुसार अह- गंणोत्पन्न मध्यमग्रम धन करदेय अथवा ऋण करदेय । तव जो प्रत्यादि आवै उससे मन्दफल साथै उस सम्पूर्ण मन्दफलको अहर्गणोत्पन्न मध्यम अहमें पूर्वोक्त रीतिके अनुसार ऋण करदेय अथवा धन करदेय । और उस मन्द फलको द्राकेन्द्रमें विपरीतरीतिसे धन और ऋणकर अर्थात्धनके स्या- नमें ऋणकर और ऋणके स्थानमें धन कर तब जो मन्दफल संस्कृत द्राकेन्द्र (शीघ्रकेन्द्र) होय उससे शीघ्रफल साथै उस साधे हुए सम्पूर्ण शीघ्रफलको मन्दफल युक्त मध्यम ग्रहमें युक्त करदेय तव वह ग्रह स्पष्ट होताहै ॥ १०॥ उदाहरण. प्रथम भीमको स्पष्ट करते हैं वहाँ पहलै “ भीमाकीज्येत्यादि " छठे श्लोकमें कही हुई गतिके अनुसार मध्यम रवि र राशि भंश १३ कला र विकलामें मध्यम मङ्गल ९ राशि २९ भश ५५ कला १३ विकलाको घटाया तव शेष रहा ३ राशि ४ अंश १८ की २९ विकला यह मङ्गलका शीघ्रकेन्द्र हुआ इसके अंश करे तब ९४ अंश १८ कला २९ विकला हुए इसमें १५ काभागदि- या तंव लन्धिहुए ६ शून्य आदि क्रमसे मङ्गलका छठा शीघ्राङ्क हुमा ३२५ उस लब्धिमें एक और मिलाया तव मङ्गलका सातवां शीघ्राडू हुआ ३६५ इन दोनों शीनाडाका अन्तर हुआ ४० इससे (पन्दरहका भागं देनेसे बाकी बची हुई) लब्धिः अंश १८ कला २९ विकलाको गुणाकरा तव १७२ मंश १९ कला २० विकला इसमें १५ का भागदिया तव लब्धि हुई ११ अंश २९ कला १७विकला इसको द्वितीय शीनाडूके अधिक होनेके कारण प्रथम शी- प्राङ्क ३२५ मे युक्त करा तब ३३६ अंश २९ कला १७ विकला हुमा इसमें १० .
(४०) ग्रहलायव [पञ्चतारास्पष्टीकरणा- का भागदिया तब लब्धिहुई ३३ अंश ३८ कला ५५ विकला इसको आधा करा तव १६ अंश :९ कला २७ विकला हुआ यह मेपादि के अन्तर्गत है इस कारण यंह,धन है सो इसको मध्यम मङ्गल ९राशि २९ अंश ५५ कला १३ विकलाम युक्त करा तव १० राशि १६ भंग ४४ कला ४० विकला यह फलार्द्ध संस्कृत भाम हुआ । अव भन्दफल लानेके निमित्त भौमके मन्दोच्च राशिको फलाई संस्कृत भौम १०.रा० १६० ५४ क० ४० वि० में घटाया तव शेषरहा ५रा० १६ अं० १५ क०२० वि० इसके भुज करकै अंश करै तब हुए ० रा० १६ अं० ४४ क० ४० वि० इसमें१५ का भागदिया तब लब्धि हुई १ और शेष- रही १ अं०१४ क०४०वि० लब्धि १ परिमित मङ्गलफे मन्दाङ्क२९को एकाधि- कमन्दाङ्क ५७ में घटाया तव शेपरहा २८ इससे शेष १ अंश ४४ कला ४० विकलाको गुणाकरा तव ४८ अंश ५० कला १०विकला हुए इसमें१५ का भा- गदिया तब लन्धि हुई ३ अंश १५ कला २२ विकला इसमें प्रथम मन्दाङ्क २९ को युक्त करा तय ३२ अंश १५ कला २२ विकला हुए इसमें १० का भागदिया तब लब्धि हुई ३ अंश १३ कला ३२ विकला यह मन्दफल हुमा यह मेषादि छः राशिके अन्तर्गत है इस कारण धन है इस कारण इसको मध्यम मङ्गल ९ राशि २९ अंश ५५ कला १३ विकलामें युक्त करा तब १० राशि ३ अंश ८ कला ४५ विकला यह मन्द स्पष्ट भौम हुआ। फिर द्वितीय शीघ्रफल लानेक निमित्त पहलै शीघ्रकेन्द्र ३ राशि ४ अंश १८ कला २९ विकला इसमें मन्दफल ३ अं०१३ क० ३२ वि० को(शीघ्रकेन्द्रमै विपरीत रीति होती है अर्थात् मेपादि छःराशिके भीतर होय ती ऋण और तुलादिछः राशिके भीतर होय तो धन होता है इस कारण)घटाया तवश्राशिअंशकला५७विकलाशेपरहा यह छः राशिसे कम है इस कारण इसके अंश करे तब ९१०४ कला ५७ विकला यह दुआइसमें १५ का भागदिया तब लब्धि हुई ६ इंस भागाकार परिमित भीमका या हुआ ३२५ और एक मिलाकर सब्धि ७ परिमित भौमका शीघ्रा हुआ ३६५ इन दोनोंका अन्तर करनेसे शेषयचे १० इससे परके अंदशादि ० ४०० ५७ वि० शेष अदाको गुणाकरा तय ४३ । १८1०। यह अंशादि भा हुप इनमें १५ का भागदिया तव लब्धि हुई २१५३ । १२ इसको प्रथम शीघ्राङ्क ३२५ में युक्त करा तय ३२७ । ५३ । १२ हुए इसमें दशका भाग- दिया तय ३२ ॥ ४०॥ १९ यह द्वितीय शीघ्रफल हुआ यह मेषादि है इसकारण धन है, सो इसको मन्द स्पष्ट मङ्गल १० रा०३ ०८ का० ४५ वि० में युक्त करा तय ११ रा०५२०५६ का०४ वि० यह स्पष्ट मल हुआ। अथ बुधस्पष्टीकरण. तही प्रथम शीफलाटापट पुध खानेके निमिन “भौमाग्येत्यादि " पति भनुसार प्रधान दुधरेन्द्र रा०१७ ० १५ फा० ५० विकला छ:
धिकारः३] सान्वयभाषाटीकासमेत। (४१) राशिसे अल्प है इस वास्तै इसको भंगात्मक करा तवष्ट७ अं०१४क. ५०वि० हुआ इसमें १५का भागदिया तब लब्धि मिली और शेष बचा अं० १४० ५ वि० । लब्धि ३ परिमित बुधका शीघ्रा हुआ ११७ और एकाधिक लब्धि ४ परिमित अर्थात् वुधका चौया शीघ्रा हुआ १५० इन दोनोंका अन्तर हुमा ३: इससे शेष २ ० १४ क०५० वि०को गुणाकरा तवं गुणन- फल हुमा ७४ भं०९क० ३० वि० इसमें १५का भागदिया तब लब्धि हुई ४ अं०५६ का० ३८विकला । भव प्रथम गोनाडू ११७की अपेक्षा द्वितीय शीयाङ्क १५० अधिक है इसकारण प्रथम शीघ्राङ्क ११७ में लब्धि ४ ० ५६ क० ३८ वि० को युक्त करा तव १२१० ५६ क० ३८ वि० हुआ इसमें १०का भा- गदिया तव १२ अं० १९क० ३९ वि० लब्धि हुई यही शीघ्र फल हुआ यह केन्द्रमेषादि छः राशिसे अल्प है इस कारण धनमानकर शीघ्रफलके अर्द्ध ६ अं०५ क० ४९ वि० इसको मध्यम बुध १ रा०४ अं० १२ का ४२ वि० में युक्त करदिया तव १ रा० १० अ० १९ क० ३१ वि० यह शीघ्रफलदल स्पष्ट बुध हुभा॥ अव मन्दफल लानेके निमित्त बुधके मन्दोच्च ७ रा० ० ००क००वि० में शीघफलदल स्पष्ट बुध श्रा० १०२० १९क०३१वि०को घटाया तव शेषरहा ५रा० १९६०४०क०२९वि० यह बुधका मन्द केन्द्र हुभा । इसकेभुज करकै अंश करे तव १० अं० १९क०३१ विकला हुए इसमें १५ का भाग दिया तव लब्धि मिली० शेषरहा १०अं० १९क०३१वि० लब्धि० परिमित बुधका मन्दाङ्क ० और एकाधिक लब्धि १ परिमित बुधका मन्दाङ्क १२.इन दोनो मन्दाडोका अन्तर हुमा १२ इससे शेष १० अं० १९क०३१ को गुणा करा तब गुणनफल हुआ २२३ २०५४ क० १२वि० इसमें १५ का भागदिया तव लब्धि हुई ८ अंश १५ क०३६ वि० इसमें प्रथम मन्दाङ्कको युक्त करा तव ८अं० १५० ३६ वि० हुआ इसमें १० का भाग दिया तब लब्धि हुई ० अं०४९ क०३३ वि० यह भंशादि मन्दफल हुआ यह केन्द्र मेपादिहोने के कारण धन है सो इसको मध्यम बुध १ रा०४ २०१३ क०४२ वि०में युक्त करा तव १ रा०५ अं० ३ क०१५ वि० यह मन्द स्पष्ट बुध हुआ । अव द्वितीय शीघ्रफल लानेके निमित्त पहले साधेहुए शीघ्रकेन्द्र १ रा० १७ अं० १४ क०५०वि० में मन्दफल ० अं० ४९ क०३: वि० को घटा- या तब शेष रहा १ रा०१६ अं० २५ क० १७ वि० यह द्वितीय शीघ्रकेन्द्र हुमा यह मेषादि छः राशिसे भल्पहै इसकारण इसको अंशादि करा तर ४६ २०२५ क० १७ वि० हुआ इसमें १५ का भाग दिया तब लन्धि हुई ३ शेषरदे १ अं० २५ कला १७ वि०॥ अव लब्धि : परिमित बुधका शी- घाङ्क मिला ११७ और एकाधिकलब्धि ४ परिमित शीघ्राङ्क हुभा १५० इन दोनों शीमाका ११७ । १५० का अन्तर हुआ ३३ इससे शेष १ अं०५ . (४२) ग्रहलापर। [पश्चतारास्पष्टीकरणा- १७ वि० को गुणा करा तय ४६ अं०५४ क०२१ वि० हुआ इसमें १५का भाग दिया तब ३०७ क० ३७ वि० लब्धि हुई इसमें प्रथम शीघ्राक्ष ११७ को युक्त करा तव १२० अ०७ क० ३७ वि० हुआ इसमें १० का भाग दिया तब अंशादि फल मिला १२ ०० क० ४५ वि० यह द्वितीय शीघ्र फल्ल हुआ यह फेन्द्रमेपादिहै इसकारण धन सो इस १२०० क०४५ वि० को मन्दस्पष्ट बुधरा०५० ३०१५ वि०में युक्त करातच १रा० १७०४कर वि० यह स्पष्ट बुध हुआ । अथ गुरुस्पष्टीकरण. सहाँ प्रथम शीघ्रफलदल स्पष्ट गुरु लानेके लिये प्रथम " भौमार्कीज्ये- स्पादि" रीतिके अनुसार मध्यमरवि रा०४ अं०१३ क० ४३ वि० में म- ध्यम गुरु रा०८ अं० १५ क० १७ वि० को घटाया तव ८ रा० २५ अं० ५८ फ० २५ वि० यह शीघ्रकेन्द्र हुआ यह छः राशिसे अधिक है इसकारण इसको १२ राशिमें घटाया तुन शेष रहा ३ रा०४ अं०१० ३५ वि० इसको अंशादि करा तव ९४ ० १ क० ३५ वि० हुआ इसमें १५ का भागदिया तब लब्धि हुई ६ शेष रहा ४ अं० १कर ३५ वि० और लब्धि- परिमित गुरुका शीघ्राङ्क हुआ १०६. और एकाधिक लब्धिपरिमित गुरुका शीमाङ्क हुआ १०८ इन दोनोंका भन्तर हुआ२ इससे शेष ४ अं० १ क० ३५ वि० को गुणाकरा तव ८ अं० २०१० वि० हुआ इसमें १५ का भागदिया तब ० लब्धि हुआ ० अं० ३२ क० १२ वि० और प्रथम शीघ्रा- की अपेक्षा अग्रिम शीमाङ्क अधिक है इसकारण प्रथम शीघ्राङ्क १०६ में लब्धि ० अं० ३२ क० १२ वि० को युक्त करा तव २०६०३२ क० १२ वि० हुमा इसमें १० का भाग दिया तब अंशादि लब्धि हुई १० अ० ३९क० १३ वि० यह शीघ्र फल हुआ यह केन्द्र तुलादिछः राशिके अन्तर्गतहै इस का. रण ऋणदै सो इसकारण मध्यमगुरुंधरा०८ अं०१५ क० १७ वि० में शीघ्र फलके मई ५०१९क० ३६ विकलाको घटाया तय ४ रा०२०५५ क० ५१वि० शेप यचा यह शीघ्र फलदल स्पष्ट गुरु हुआ ।। अय मन्दफट लानेके निमित्त गुरुके मन्दोच्च ६ रा०० अ०० क०० वि० में शीप्रफलदल स्पष्ट गुर ४ रा०२ अं०५५ क० ४१ वि० को घटाया तब ? रा० २७ ०४ फ० १९ वि० यह गुरुका मन्दकेन्द्र हुआ। इसके अंशादि सुनकर तय ५७ अं० ४ ० ११ वि० हुए इसमें १५ का भाग दिया तब सन्धि मिली ३ और शेष रहा १२ अं०४ कला १९ वि०और लब्धि परिमि- त गुरुया मन्दार हुभा ३९. और एकाधिक सन्धि ४ परिमित गुरका मन्दा- हुमा ४८ इन दोनों मन्दाका अन्तर हुआ ९ इससे शेप १२०४क० १९पिफटाको गुणा करा सब १०८० ३८५० ५१वि० हुभाइसमें १५का भा.
धिकारः३] सान्वयभाषाटीकासमेत । (४३) ग दिया तव लब्धि हुई ७ ० १४ क० ३५ वि० इसको प्रथम मन्दाङ्क ३९ में युक्त करा तब ५६२०१४क० ३५ वि हुए इसमें१० का भागदिया तब लब्धि हुई १ अं० ३७ क० २७ वि यह मन्दफल हुआ यह मेषादि छः राशिके अन्तर्गतहै इसकारण धनहै इस ४२०३७ २०२७ वि० को मध्यमगुरु ४ रा०८ अं० १५ क० १७ वि० में युक्तकरा तब ४ रा० १२ अं५२ क०४४ वि० यह मन्दस्पष्ट गुरु हुआ ॥ अव द्वितीय शीघ्रफल लानेके निमित्त पहले शीघ्रकेन्द्र ८ रा०२५ ०५८ क० २५ वि० में गुरुके मन्द फल ४ अं० ३७ क०२७ वि० को (यह धनहै परन्तु विपरीत रीतिसे ऋण मानकर ) घटाया तब ८ रा०२१ अं२० क०५८ वि० रहा यह द्वितीय शीवकेन्द्र हुआ यह छः राशिसे अधिक है इस कारण इसको १२ राशिमें घटाया तव शेषरहा ३ रा०८२०३९ क०२ वि० इसके अंश करे तब ९८ अं० ३९क० रवि० हुआ इसमें१५का भागदिया तब लब्धि हुई और शेषरहा अं० ३९क० २वि० फिर लन्धि ६ परिमित गुरुका शीघाडू हुआ १०६ और एकाधिक,लब्धि ७ परिमित गुरुका शीघाङ्क हुआ १०८ इन दोनोंका अन्तर हुआ। इससे शेष ८२०३९ कला २ वि० को गुणाकरा तव १७ अं०१८ क०४ वि० इसमें १५ का भागदिया तब लब्धि- हुई १ अं० ९ कला २२ वि० इसको प्रथम शीवाङ्क १०६ में युक्त करा तब १०७ अं० ९क० १२ वि० हुआ इसमें १० का भागदिया तब ल- ब्धि हुई १० भ० ४२ क० ५५ वि० यह द्वितीय शीघ्रफल हुआ. यह तुलादि छः राशिके अन्तर्गत होनेके कारण ऋणहै इसकारण १० भ० ४२ क०५५ वि०को मन्दस्प० गुरु ४ रा० १२ अं०५२ का ४४ वि०में घटाया तव शेष रहेट . रा०२ अं०९क०४९ वि० यह स्पष्ट गुरु हुआ। अथ शुक्रस्पष्टीकरण. तहाँ प्रथम शीप्रफलदल स्पष्ट शुक्र साधनेके निमित्त "भौमार्कीज्येत्यादि" रीतिके अनुसार पूर्वोक्त शुक्रके शीघ्रकेन्द्र,३रा०५२०४१ क० ३५ विव्यह छःराशिसे अल्प है इसकारण इसके अंश करे ९५ २०४१ क० ३५ वि० हुआ इसमें १५ का भाग दिया तब लब्धि हुई ६शेषरहा ५२०४१ क० ३५ वि० लब्धि परिमित शुक्रका शीनाङ्क हुआ ३५४ एकाधिक लब्धि ७ परिमित शुक्रका शीनाङ्क हुआ ४०२ इन दोनो शीघ्राडोका अन्तर हुआ ४८ इससे शेष ५२०४१ क० ३५ विको गुणा करातव २७३ अ० १६ क०० वि० हुए इसमें १५ का भागदिया तव लब्धि हुई१८ अं०१३ कं० वि० प्रथम शीनाङ्ककी अपे- क्षा द्वितीय शीघ्राङ्क अधिक है इसकारण इस लन्धि १८ अं० १३क०४विको प्रयम शीघ्राङ्क ३५४ में युक्त करा तय ३७२ २०१३क० वि० हुआ इसमें १०का भाग दिया तब लब्धि हुई ३७ अं० १३ क०१८ वि० यह शीघ्रफल हुआ यह के (४४) ग्रहलाघव। [ पश्चतारास्पष्टीकरणा- न्द्र मेपादि छः राशिके अन्तर्गतंह इसकारण धमहे सो इस शीघ्रफलके अद्धं २८२०३६ क०३९विष्को मायमशुकरा. ४० १३० ४३ विम युक्त करा तव १ रा०२२ अं० ५० क०२१ वि० यह शीघ्रफलदलस्पष्ट शुरु हुआ। अब मन्दफल लानेक निमित्त शुक्रके मन्दोच्च ३ रा०० ० ० ० ० वि० में शीघ्रफलदलस्पष्ट शुक्र १ रा०२२ अं०५० क०२१ वि० घटाया तब शेपरहे २००७ अं० ९क० ३९वि० यह शुक्रका मन्दकेन्द्र हुया इसके अंशादि भुजकरे ३७ अं०९क०३९वि० इसमें १५का भागदिया तय लब्धि हुई टोप बचे ७ अं० ९क०३९ वि० लब्धि २ परिमित शुक्रका भन्दाङ्क हुआ ११ एकाधिक लब्धि परिमित मन्दाङ्क हुआ १३ इन दोनो मन्दाकोंका अन्तर फरा तब हुए इससे शेष.७ अं० ९क० ३९ विष्को गुणा करा तव १५ अं० १९क० १८वि० हुए इसमें पन्दरह १५का भागदिया तंव लब्धि हुई ० अं०५७ क० १७ वि० इसमें प्रथम मन्दाङ्क ११को युक्त करा तव ११ २०५७ ०१७ वि० हुए इस १०का भाग दिया तव लब्धि हुई १० ११ क० ४३ वि० यह मन्दफल हुआ, यह मन्द- केन्द्रमपादि छः राशिके अन्तर्गतह इसकारण धनहै सो इस १ ० ११ कर ४६ वि० मन्दफलको मध्यम शुक्र ? रा०४ अं० १३ क० ४२ वि०में युक्त करा तय रा०५अं० २५क० २५ वि० यह मन्दस्पष्ट शुक्र हुआ । अव द्वितीय शीग्रफल लानेके निमित्त प्रथम शीघ्रकेन्द्र ३४०५०४१का० ३५ विमें मन्दफल १ अं० ११ क०५३ वि०को (यद्यपि मेषादि छ: राशिके अन्तर्गत होनेके कारण धनहै परन्तु विपरीतरीतिसे ऋणमानकर ) घटाया तब शेप यचे ३ रा० ४ अं०२९ फ० ५२ वि० यह द्वितीय शीघ्रकेन्द्र हुआ यह छः राशिसे भल्प है इसकारण इसके अश करे तब ९४ २०२९ का ५२वि० हुभा इनमें १५का भागदिया तबलब्धि हुए और शेषरहे ४०२९क० ५२ वि० भौर लब्धि ६ परिमित शुक्रका शीघ्राङ्क हुआ ३५४ और एकाधिक लन्धि ७ परिमित शुक्रका शीमाङ्क हुआ १०२ इन दोनो शीघ्रााका अन्तर हुभा १८ इससे शेष ४ ० ३९ क० ५२ वि०को गुणा करा तब २१५ अं० ५३ क० ३६ वि० हुआ इसमें १५का भागदिया तब लन्धि हुई १४ २०२३ क० ३४ वि० इसको प्रथम शीघ्राङ्क ३५४ में युक्त करा तव ३६८ अ०२३ क० ३४.वि० हुए इसमें १०का भागदिया तब लब्धि हुई ३६ २०५० क०२१विष्यह द्वितीय शीनफल हुभा यह केन्द्रमेपादि छ राशिके अन्तर्गत है इसकारण धनहै सो इस ३६ ०५० २०५१ वि०को मन्दस्पष्ट शुक्र श्रा०५२०२५ का २५विमें मुक्त करा तप २०१२० १५ क०४६ वि० यह स्पष्ट शुक्र हुभा ॥ अथ शनिस्पष्टीकरण. तही प्रथम शीग्रफरदल स्पष्ट शनि साधनेके भय .. 'भीमाकी येत्यादि ननिय मनुसार मध्यम रयि १० ४ अं०१३ फ० ४२ विष्मे मध्यम शनि " + धिकारः सान्वयभाषाटीकासमेत। ११० अं०३६ का ४५ वि०को घटाया तव शेपरहा २ रा० अं०३६क० ९७ वि० यह गनिका शीवकेन्द्र हुआ यह छः राशिसे कम है इसके अंश करे तब ६३ ० ३६ क० ५७ वि० हुए इसमें १५का भागदिया तब लब्धि मिले ४. और शेपरहे : अं०३६ क०५७ वि० लन्धि ४ परिमित गनिका शीघ्राङ्क हुमा ४८और एकाधिक लब्धि ५ परिमित गनिका शीघ्राङ्क हुआ ५४ इन दोनों गीप्राडाका अन्तर हुआ६इससे शेप : अं०३६ क० ५७ वि०को गुणा करा • तव २१ २०४१ कर४२ वि० इसमें १५का भागदिया तव लन्धि हुई १ अं० २६ क०४६ वि० इसको प्रथम शीघ्राङ्क ४८ में युक्त करा तव ४९ अ०२६ क० ४६ वि० हुए इसमें दशका भागदिया तव ४० ५६ क०४०वि० शीघ्रफल हुआ यह केन्द्रमेषादि छः राशिक अन्तर्गतहै इसकारण थन है सो शीघ्रफ- लके भद्र २.० २८ क०२० वि०को मध्यम शनि ११ रा० ० अं० ३६ का ४५ में युक्त करा तव ११ रा० : अं० ५ क० ५ वि० यह शीघ्रफलदल- स्पष्ट ठानि हुआ ॥ अव मन्दफल लानेके निमित्त शनिके मन्दोच्च ८ रा.अं.क.वि.में शीत्रफ- लदल स्पष्टशनि ११ रा. अं.५ क.५ वि. को घटापा तव ८ रा.२६ अं. ५४ क.५५.वि.यह गनिका मन्ढकेन्द्र हुआ। इसके भुज २ रा.२६ अं.५४ क.५५ वि० करके अंगकरे तब ८६ अं.५४ क.५५ वि. हुए इसमें १५ का भागदिया लब्धिहुई ५ शेपरहे ११ अं.५४ क.५५ वि. और लन्धि परिमित गनिका ८९ एकाधिक लब्धि परिमित मन्दा हुआ ९३ इनदोनों मन्दाकोंका अन्तर हुआ इससे शेष ११ अं.५४ क.५५ वि. को गुणा करा तव ४७ अं. ३९ क. ४० वि. इसमें पन्दरह १५ का भागदिया तब टन्धि हुई ३ अं. १० क.३८ वि. इसमें प्रथम मन्दाङ्क ८९ युक्त करदिया तब ९२ अं. १० क. ३८ वि. हुमा इ- समें का भागदिया तब लब्धिहुई ९ अं. १३ क.: वि. यह मन्दफल हुआ, यह मन्दकेन्द्र तुलादिहै इसकारण ऋणहै, इससे इसको मध्यम गनि ? रा....६ क.४५.वि. में घटाया तब १० रा.२१ २.२३ क.४५वि० यह मन्द- स्पष्ट शनिहुआ। अव द्वितीय शीत्रफल लानेके निमित्त पहले शीघ्रकेन्द्र रा. अं.३६ क. ५७ वि. में मन्दफल ९.१३ क.वि.को घटाया तबश्रा.१२ अं.५० क.. वि.यह द्वितीय गोकेन्द्र हुआ इसरा. १२.५० क..वि.के अंश ७५ अं.५० क..वि. करकै १५ का भागदिया तव लब्धिहुई और शेषबचे १२ अं.५० क.. वि. लब्धि परिमित शनिका श्रीमाङ्क हुआ ४८ और एका- धिकलन्धि ५ परिमित शनिका शीनाङ्कहुआ ५४ इनदोनों गीनाशका अन्तर हुआ ६ इससे शेष १२२.५० क...वि. को गुणा करा तब ७७ मं..क.. दि. इसमें पन्दरह १५ का भागदिया तब लब्धिहुई ५ अं.८ क..वि.इसमें प्रथम शीघ्राडू १८ को युक्त करा तब ५३.८ क..वि. हुआ इसमें १० का .
ग्रहलाघव। [पश्चतारास्पष्टीकरणा- भागदिया तब ५ अं.१८ क.१८ वि. यह द्वितीय शीघ्रफल हुआ यह द्वितीय केन्द्रमैपादिह इसकारण धनहै सो इस ५अं. १८ क. १८ वि. को मन्द स्पष्ट- शनि १० रा. २१.२३ क. ४२ वि. में युक्त करा तव १० रा.२६ अं.५२ क ३० वि. यह स्पष्टशनि हुआ । अव मन्दस्पष्टगतिसाधनकी रीति लिखतेहैं- मान्दाकान्तरमाक्यमग्गःणां भक्तं वाणनगैः शरैः खैरामेः । विग्मोदिहतपु भाजितं तदद्यात्प्राग्व- दितौ मुंदुस्फुटा सा ॥ अन्वयः-आपसग्गुरूणाम्,मान्दाकान्तरम्, (क्रमण), वाणनगैः, शरैः खरामैः, भक्तम्, विद्भग्वीः, (मान्दान्तरम,) दिहतेपुभा नितम्, (कलायम् ), तत्, प्राग्वत, इतौ, दद्यात, (तदा), सा, मृदुः स्फुटा, (गतिः, भवति)॥ ११ ॥ अर्थ:-शनि भीम तथा गुरुके मन्दफल साधनेके समय जो मन्दांकॉके अन्तरं आपथे उनमेसे शनिके मन्दाडोके अन्तरमें बाणनग कहिये ७५ का भाग देय और भीमके भान्दावान्तरमै ५ का भाग देय तथा गुरुके मान्दाहा- न्तरमै सरोम कहिये तीसका भागदे और बुध तथा शुक्रके मान्दाझान्तरको २से गुणाकरकै ५का भागदेय तब जो लब्धि होय उसको कलादि जाने और वह मन्दपेन्द्र कादि छः रागिक अन्तर्गतं होय तो धन और मकरादिछः रानिक अन्तर्गत होय तो ऋण जाने, और तदनन्तर उस कलादि लब्धिको कमसे शनिआदि ग्रहोंकी मध्यगतिमधन ऋणकर तय मन्दस्पष्टगति होती है। मगल बुध गुरु शुक्र शनि। यह मान्दाान्तरी पाया के भाजका। उदाहरण. सानिमन्दफंट साधनेके समय दोनो मन्दाशंका अन्तर जो ४ आयाया इसमें या भागदिया तष एन्धिदुई ० क. ३ पि. यह एधि मन्दवेन्द्र गादिदै सवारण धनाद सोशानिकी मायम गति २ याला पि. में इस सन्धिय..पि.पो पुक्क परातपरया.वि. पद शनिकी मन्द स्पटगतिदुई। मद्रयः मन्दफन्ट माधनये. समप दोनों मन्दाहरुका मन्तर मो२८६समें अगेन. भागवार ५या भागदिया वष ५.ए. १६ पि. एन्धिदई पाह सन्धि मादयन्द्र पापांदिदगपारण धन सो गया मंगरटयी मम्पमगतिक. पि. में पुल परातरफ.वि. पद भौमपी मन्दम्पष्ट गतिद्वई ।। .
धिकारः३] सान्वयभाषाटीकासमेत। (४७) गुरुके मन्दफल साधनेके समय दोनोमन्दाडोका भन्तर जो ९ आया था उसमें ३० का भागदिया तव कलादि लन्धि हुई ० क.१८ वि. यह लब्धि मन्दकेन्द्र मकरादि होनेसे ऋणहै इसकारण इसको गुरुंमध्यमगति ५क.. वि०में ऋण करा तब ४ क.४. वि. यह गुरुकी मन्दस्पष्टं गति हुई । बुधक मन्दफल साधने के समय दोनों मन्दाडौका अन्तर जो १२ टसको ऊपर-कहीहुई सैविके अनुसार २ से गुणा करा तब २४ हुए इनमें ५का भा. गर्दनेसे कलादिलब्धिहुई ४ क. १८ वि. यह लन्धिककादि होनेसे धन है इस कारण इसको बुधको मध्यम गति ५९ क.वि. में युक्त करा तब ६३ क.५६ वि.बुधको मन्दसष्ट गति हुई। शुक्र मन्दफल साधते समय मान्दावान्दर जोर आयाया उसको उप- रोक्त रीतिके अनुसारर से गुणांकरा तव ४ हुए इसमें ५ का भागदिया तब कलादि लब्धिहुई ०.४८वि.यह मन्दकेन्द्र मकरादि होनेसे ऋणहै इसका- रण इसको शुक्रकी मध्यमगति ५९ क.८ वि. में पाया तब ५८ क.२० वि. यह शुक्रकी मन्दस्पष्ट गति हुई ॥ ११ ॥ अव भीमादि पाँचाग्रहांको स्पष्ट गति-साधनेकी गति लिखते हैं- "HinAYO ३ भाग ओमानलाङ्कविवरः शरहत्त्ववाणांशाव्यं त्रिहत्कृ- तहत द्विगुणासंभक्तम्।।तहीनयुक्क्षयचयेतु मृदुस्फु टास्यास्पष्टाऽथ चेद्वहु ऋणात्पतितां तु वक्रा॥१२॥ अन्वयः-भौमात्, चलाकविवरम् (कमेण ), शरत्, स्ववाणां- शाध्यम्, त्रिहत्, कृतहतम, द्विगुणातभक्तम् (कार्यम् ), (लब्धिः, गतेः, शोषफलम्, स्यात् ) क्षयचये, तंद्धीनयुक्, मृदुस्फुटा, स्पष्टा, स्यात्: जय, चेत: ( ऋणफलम् ) बहु, (तदा) ऋणात: पतिता, (कार्या); (शेषम् ), वका (स्यात् ) । अर्थ:-मगर आदि शनिपय्यंन्त पाँचों ग्रहोंके द्वितीय शीघ्रफल साधनेके समय जो दोनों शीवाहाका अन्तरमायाया टनमें क्रमसे महलके शीनाशक 'अन्तरमें शर कहिये ५का भागदेय और बुधके शीनांफाक अन्तरमें उसको पश्चम भागयुक्त करदेय, गुरुके शीघ्राडोके अन्तरमें का भाग देय, शुक्रके वाझंक भन्तरमें ४का भागदेय, और शनिके शीनाट्टाक अन्तरको दोसे गुणाकरके एका भागदेय तव जो फल मिल मर्याद मङ्क लब्ध हो टसको कहादि जान और प्रथम शीवाह द्वितीय शीनासे अधिक होय तो उस " (५८) ग्रहलायव । [पश्चतायस्पष्टीकरणा- लब्धिको ऋण माने और यदिप्रथम शीघ्राद्वितीय शीघ्राइसे अल्प होय तो धन माने तदनन्तर उस लब्धिको ऊपर साधीहुई मन्द स्पष्टगतिमें धन अथवा ऋण करे तब स्पष्टगति होतीहै यदिवह लब्धिऋण होकर मन्दस्पष्टगतिमें न घटसकै, अर्थात् मन्दस्पष्ट गतिसभी अधिक होय तो विपरीत रीतिकर अर्थात् ऋण लब्धि, मन्दस्पष्टगतिको घटावै और जो शेपरहै उसको उसग्रहको चक्रगति जान ॥ मङ्गलका बुधका गुरुका शुक्रकाशनिका यह शीनाशक अ- । न्तरके भाजका ४ उदाहरण.. मङ्गलका. .द्वितीय शीघ्रफल साधते समय दोनों शोपाटीका जो अन्तर आयाया ४० उसमें ५का भागदिया सब कलादि लब्धिहुई ८ क० ० वि० यहाँ प्रथम शीघ्राङ्क द्वितीय शीघ्राङ्कको अपेक्षा कमथाइसकारण यह धनहै सो इस लब्धि ८ क० ०वि०को मङ्गलकी मन्दस्पष्टगति ३७ क० २ विमें युक्त करा तब ४५ क०२ वि० यह मङ्गलकी स्पष्टगति हुई। बुधको द्वितीय शीघ्रफल साधते समय दोनों शोनाकोका जो अन्तर आयाथा ३३ इसमें इसका पाँचवाँ भाग ६०० ३६ वि० युक्त करा तब ३९५० ३६ वि० यह हुआ अथवा शीघ्राद्वान्तर ३३को ६से गुणा करा तब १९८ हुए इसमें ५का भागदिया तब ३९ क० ३६ वि. यह लब्धिहुई प्रथम शीघ्राङ्क द्वितीय शीघ्राडूकी अपेक्षा कम है इसकारण धनहै सो इसलब्धि ३९क० ३६ वि०को बुधकी मन्दस्पष्टगति ६४ क० ५६ वि०में युक्त करा तब १०३ क० ३२ वि० यह बुधकी स्पष्टगति हुई ।। गुरुका द्वितीय शीघ्रफल साधतेसमय जो दोनों शीघ्राड्डोंका अन्तर २ आयाथा उसमें ३का भागदिया तव कलादि लब्धि हुई ० ० ४० वि० यहाँ प्रथम सीमाङ्क द्वितीय शीग्राको अपेक्षा कम था इसकारण यह लब्धि धन है सो इस ० क०.४० वि०में गुरुकी मन्दस्पष्टगतिक०४२ वि०को युक्त करा वय ५ क० २२ यह गुरुफी स्पष्टगति हुई ॥ शुरुका द्वितीय श्रीप्रफल साधते समय दोनों शीनाडाका जो अन्तर ५८ आपाया इसमें ५ का भाग दिया तय १२ ० ० वि० लब्धि हुई यहभी +7 ऐसा लिखने का प्रयोजन यह है कि बुधके शाशाहों के अन्तरमें उसकाही पचम भागयुक्त फरनेसे जो अन होताहे वही अङ्क अन्तरको ६ से गुणाकरकै ५ का भाग देनमे होता है ।
शुक्रायोश्चलभूयोऽन्त्यगतो यदाङ्कः शेषांशकाच साग धिकार३] सान्वयभाषाटीकासमेत । उक्तरीतिके अनुसार धन है इसकारण इस लधिक०००वि०में शुक्रकी मन्दस्पष्टगति ५८ क०२ विको युक्त करा तव ७० करवि० यह शुक्रकी स्पष्टगति हुई ॥ शनिका द्वितीय शीघ्रफल साधतेसमय दोनों शीनाकोंका जो अन्तर ६ आयाथा उसको २से गुणा करा तव १२ हुए इसमें ५का भागढिया तव रक० २५ वि० लब्धि हुई यहभी उपरोक्तरीति के अनुसार धनहै इसकारण इस लब्धि ३ क०२४ वि०को शनिकी मन्दस्पष्टगति २ क०३ वि०में युक्त करा तव ४ क० २७ वि० यह शनिकी स्पष्टगति हुई ॥ १२ ॥ शुक्र और मङ्गलके द्वितीय शीघ्रफल लानेके समय शीघ्राङ्क अन्तका । आवै तब स्पष्टकरे हुए ग्रहमें अन्तर पड़ताहै इसकारण तहाँ स्पष्ट करनेकी विशेषरीति कहते हैं- सुम हितो पतिताः पृथगर्भभूभ्यः । येऽल्पा भृगोत्रिविहता असृजोऽसंभक्ता देयाः स्वशीघ्रफलवत्स्फुटयोः स्फुटौ तौ ॥१३॥ अन्वयः-यदा, शुक्रारयोः, चलभवः, अङ्कः, अन्त्यगतः, (स्यात्, तदा) शेपांशकाः, पृथक्, स्थाप्याः, (एकत्र ), अक्षभूभ्यः, पतिताः, च, ( कार्याः)। ('तयोः), ये, अल्पाः, (ते), भृगौः, त्रिविहताः, असृजः, अक्षभक्ताः, स्वशीयफलवत्, स्फुटयोः, देयाः, (तदा), तौ, स्फुटौ, (स्तः) ॥ १३ ॥ अर्थ:-द्वितीय शीघ्रफल लाने के समय यदि शुक्र और मङ्गलका शीग्रांडू अन्तका आवै अर्थात् एकादशके नीचेका आवै तौ द्वितीय शीघ्रकेन्द्रमें १५का भागदेकर जो अंशादि शेषवंच उनको अलग अलग दो स्था- नोमे. लिसे एक स्थानके अशादिको १५ अंशमें घटावै जो शेषरहै वह भंशादि और पहले दूसरे स्थान रक्खे हुए शेपभूत अंगादिम जो कम हो उसको ग्रहण करै वह यदि शुक्रका होतो तीनका भागदेय और मगलका होय ती ५का भागदेय जो अंशादिलब्धि होय उसको क्रमसे स्पष्ट शुक्र और स्पष्ट मङ्गलमे शीघ्रफलको समान धन तथा ऋण करे तव शुक्र और मङ्गल स्पष्ट होते है ॥ १३ ॥ ४ . (५०) ग्रहलाषय। [पश्चतारास्पष्टीकरणा- और जो द्वितीय शीघ्रफल लानेके समय अन्तफा शीघा आवै तो भीम बुध और शुकु इनकी गतिका विशेष संस्कार कहते हैं 94 कुजबुधभृगुजानां चेचलाकोऽन्तिमः स्याद्दशहतप- रिशपांशानुगादयग्निभक्ताः । फलमिदहनेर्युक्स- तगोभिस्त्रिवाणैर्भवति गतिफलं तत्स्यात्तदा नैव पूर्वम् ॥ १४॥ अन्वयः चेत् कुजबुधभृगुजानाम् चलाका अन्तिमः स्यात् तदा , दंशहतपरिशेषांशाः, (क्रमेण), नगाद्यमिभक्ताः फलम् (क्रमेण ) इपुदहनैः, सप्तगोभिः, त्रिवाणैः, युक्, (कार्य्यम् ), तत्, गतिफलम्। स्यात, पूर्वम्, नैव ॥ १४ ॥ अर्थः-द्वितीय शीघ्रफल लानेके समय यदि मङ्गल-बुध और शुक्रका शीमाङ्क पदि अन्तकाअर्थात् एकादशके नीचेका आवैतौ द्वितीय शीघ्रकेन्द्र में १५ का भागदेकर जो अंशादि शेषव, उनको दशसे गुणा करके क्रमसे सात ५ और सात तथा तीन ३ का भागद्वेकर जो कलादि लब्धि मिल उसमें क्रमसे पैतीस और सत्तानवे तथा तिरेपन मिला देय तब क्रमसे गति फल होता है पूर्वोक्त यथार्थ नहीं है इस गतिफलको, शीघ्रफलको समान मन्द स्पष्ट गतिमें धन ऋण कर तब भङ्गल-युध और शुक्रकी स्पष्ट गति होती है ॥१४॥ भव भौमादि ग्रहांका वक्री होना और मागी होना लिखतेहैं- विनृपः शरजिष्णुभिः शरार्नगभूपैत्रिभवः क- मात्कुजाद्याः। चलकेन्द्रलवैःप्रयान्ति वक्र भगणात्तैः पतितेर्बजन्ति मार्गम् ॥ १५॥ अन्वयः-कुनायाः, कमात्, त्रिनृपः, शरनिष्णुभिः, शराः नग- भूपैः त्रिभवः, चलफेन्द्रलवैः चक्रम्: प्रयान्ति, (तथा ) भगणात पतिते ते, मार्गम्, प्रगन्ति ॥ १५॥ अपं:-मगलभादि ग्रहाक द्वितीय शीघ्रयेन्द्र के अंश ममसे चिपकहिये १६३ शरनिष्णु कहिये १४५ दाराक फाहिये १२५ नगभूप.१६७ और विभय 131 : . धिकारः सान्वयभाषाटीकासमेत । (५१) कहिये ११४ होय तो क्रमसे वक्री होते हैं अर्यात् उनको गति उलटी होजाती है, और ऊपरोक्त अंगांको क्रमसे भगण कहिये ३६० में पटानेसे जो शेष रहे उतने अंग हों तो महलआदिमागी होतेहैं अर्याद मङ्गलके द्वितीय शीघ्रके- न्द्रके १९७ अंश बुधक २५ गुरुके २६५ शुक्रके १९३ भौर शनिक २४७ अंश होय तो भौमादि मागी होतेहैं भर्यात् भागेको चलने लगते हैं ॥ १५ ॥ अब मङ्गल गुरु और शनि इनके उदय और अस्तके शीप्रवेन्द्रांश लिखतेहैं- क्षितिजोऽष्टयमेरुदति पूर्वे गुरुरिन्द्र विजस्तु सप्त- चन्द्रेः । स्वस्वोदयभागसंविहीन गणांशेरपरत्र यान्ति चास्तम् ॥१६॥ अन्वयः-क्षितिजः, अष्टयमैः; गुरुः इन्द्रः, रविनः, तु, सप्तचन्दैः, र्वे, उदेति । च, स्वस्वोदयभागसंविहीनः, भगणांशः, अपरत्र - स्तम्, प्रयान्ति ॥ १६॥ भय:-द्वितीय शीघ्रकेन्द्रके अष्टयम२८अंटा होय ती महल और इन्द्र कहिये १४ अंश होय तो गुरु तथा सप्तचन्द्र कहिये १७ होय ती शनि पूर्वदिशाम अस्त होता है और अपने अपने उदयक अंग भगण कहिये ३६० में घटानेसे जोशेष अंगरउतने शीघ्रकेन्द्रके भी हो तो कमसे मङ्गल-गुरु और गनि पश्चिममें अम्तहोते हैं भयाद द्वितीय भीमकेन्द्रके ३३२ हो तो मङ्गल, और २४८ होती गुरु तथा ३४. हो तो शनि पश्चिममें अस्त होताहै ॥१६॥ भव उध और शुमके उदय और अस्तके शीघ्रकेन्द्रांप लियते हैं- खरेश्च जिनः परेज वोरुद्रयोऽस्तोऽचदिनेगा- विभूभिः। इदयोऽझनोख्यहीन्दुभिः प्रगिस्तो दि- ग्दहनेश्च पसुरेः स्यात् ॥ १७॥ अन्वयः-खशरैः निनैः, परे. भृग्वोः, रदयः, च, अक्षदिनैः, नगादिभूमिः, (पर), अस्तः, स्यात् । (तया), अक्षनखैः, व्यही- न्दुभिः, प्राक, टदयः (व). दिग्दहनैः, पदसुरैः (प्राक), अस्तः, (स्यात् ) ॥ १७॥ भयं:-दितीय मानक सगर कहिये ५० और जिन वहिये २४ भंश हो तो पश्चिमदिशामें प्रमसे दुध भौर शुक्रका उदय होताहै, और दितीय गायके- (५३) ग्रहलायव ! [पश्चतारास्पष्टीकरणा- न्द्र के अंश कमसे अक्षदिन कहिये १५५ और नगाद्रिभू कहिये १७७ हो तो बुध और शुक्रका.पश्चिममें अस्त होता है । और द्वितीय शीतकेन्द्र के अंश क्रमसे अक्षनख कहिये २०५ और व्यहीन्दु कहिये १८३होता बुधका और शुक्रका पूर्व दिशामें उदय होता है । और द्वितीय शीघ्रकेन्द्र के अंश क्रमसे दिग्दहन 'कहिये ३१० और पट्सुर कहिये ३३६ हो तो बुध और शुक्रका पूर्व दिशा में अस्त होता है ॥ १७ ॥ अव भीमादि ग्रहोंकी वक्रगति उदय-अस्त और सरल गतिके दिन जा- ननेकी रीति लिखते हैं- वक्रोदयादिगुदितांशकतोऽधिकाल्पाः केन्द्रांशकाः क्षितिसुताद्विगुणास्त्रिभक्ताः सांकांशकादशहतांग-- . . हृताःकुभक्ता वक्राद्यमाप्तदिवसे क्रमशो गौप्यम्।१८ अन्वयः वक्रोदयादिगदितांशकतः, (यदि ), केन्द्रांशकाः, अधि- काल्पाः, (स्युः,तदा,) क्षितिसुतात, द्विगुणाः, त्रिभक्ताः, सांकांशकाः दशहताहताः, कुभक्ताः, (कार्याः, आतदिवसः, क्रमशः, वका- अदन- -द्यम्, गौप्यम्, (स्यात् ) ॥ १८ ॥ अर्थ:-भीमादि ग्रहोंके वक्रगति-उदय-अस्त और मार्गगति इनके जो द्वितीय शीघ्र केन्द्र के अंश कहहैं उनसे यदि अभीष्ट शीघ्रकेन्द्र के अंश अधिक या कम हो तो उन दोनोंका भन्तर करके उसमें क्रमसे मङ्गलकम २ से गुणाकरे, बुधकौ ३ का भागदेय, गुरुको उस अन्तरका ही नवम भाग युक्त करदेय शुक्रकम दशसे गुणा करके छ: का भागदेय, और दानिक १ का भागदेय तय जो क्रमसे सबके अङ्क लब्धहीं उनको दिन जाने और पूर्वोक्त दीनन्द्रचे अंगासे अभीष्ट शीघ्रकेन्द्र भंग यदि अधिक हो ती चक्र-- दुप-अम्त और मार्ग इनको होकर लब्धि परिमित दिन व्यतीत हुए जाने, और यदि उक्तली केन्द्रक भंगास अभीष्टशाकेन्द्र के वंश कम हों तो वक्र-उ- दप-धम्त और मार्ग इनके होने आजस सन्धि परिमित दिनहरसा जान१८ भप बुध और शुक्रकी पक्रगति-उदय-अस्त-और मार्गगति होनेके दिगांशा क्रम दिगते हैं- पूर्वास्तादयः परेऽन्जुगतिस्तोयास्तमैन्द्रयुगमो मागोऽस्तोऽनं च दैन्तदन्तेदहनाचान्याशदन्तदि- dia me : पद -
सान्वयभापाटीकासमेत
नैः॥ चान्द्रेस्तत्परतत्परं त्वथभृगोस्तहिमाः स्या-
त्ततोऽटाभिव्यंत्रिभुवांघ्रिणा . विचरणैकेनाप्टमासैः
क्रमात् ॥ १९॥
अन्वयः-दन्तदन्तदहनाष्टयाज्याशदन्तैः, दिनैः, चान्देः, क्रमात्,
पर्यास्तात, परे, उदयः, अनृजुगतिः, तोयास्तम्, ऐन्दयुद्गमः,
मार्गः, अस्तः, स्यात, तत्परम्, तत्परम्, अय, (क्रमात), दिमाः,
ततः, अष्टाभिः, व्यंत्रिभुवा, अंत्रिणा, विचरणैकेन, च, अष्टमासैः,
भृगोः, तद्वत, (स्यात् ) ॥ १९ ॥
अर्थ:-बुधका पूर्वदिशाम अस्त होनेसे दन्त कहिये ३२ दिनके अनन्तर
पश्चिममें उदय होताहै, भीर उदय होनेसे ३२ दिनके अनन्तर वक्रगति
होतीहै । और वक्रगति होनेसे दहन कहिये तीन दिनके अनन्तर पश्चिममें
अस्त होता है । और पश्चिमम अस्त होनेके अष्टि कहिये १६ दिनके अनन्तर
पूर्वम उदय होताहै । और उदय होनेसे आज्याश (अग्नि) कहिये टिनके
मनन्तर मार्गी होताहै । और मार्गी होनेसे ३० दिनके अनन्तर पूर्वमें अस्त
होताहै इसीप्रकार वारंवार होता रहताहै ।
शुक्रका पूर्व दिशाम अस्त होनसे • महीनेके अनन्तर पश्चिमदिगामें ठ-
दय होताहै। और पश्चिम दिशाम उदय होनेसे ४० दिन कहिये ८ महीनेके
अनन्तर यकी होताहै । और वक्री होनेसे पौनमहीना कहिये २२ दिनके अ-
नन्तर पश्चिम दिशाम अस्त होताहै। और अस्त होनेसे ८ दिन अर्थात्मा-
सके भनन्तर पूर्व दिशामें उदय होताहै । और उदय होनेसे २० दिन अथांत
+ महीनेक अनन्तर मार्गी होताह और मागी होनेके दिन कहिये ८मही-
नके मनन्तर पूर्वदिशाम भम्तहोताहै इमीमशार वारम्वार होताहै ॥ १९ ॥
अब मगल-गुरु और गनि इन तीनों ग्रहांके वक्रीभरन-उदय-अस्त और
मागंगतिके दिनांमा क्रम लिखतेह-
भोमस्यास्तादुदयकुटिलर्जुत्त्वमौव्यंक्रमात्स्यान्मा-
सर्वदेरथ दशमितैलोचनाभ्यांच दिग्भिः। जीवस्यो
ा सचरणयुगैः सागरैः साइनिवेदैः सायेकेन
त्रियुगदहनरर्धयुक्तस्तथाः॥२०॥
" अन्वयः-भौमस्य, अस्तात, वेदैः, अथ, दशमितः, लोचनाभ्याम् दिग्भिः, च, मासैः कमात्, उदयकुटिलर्जुत्वमौट्यम्, स्यात् । जीवस्य, (अस्तात् ), ऊर्ध्या, सचरणयुगैः, सागरैः, सांग्रिदैः (मासैः, क्रमा- व, उदयकुटिलर्जुत्वमौट्यम्,' स्यात् ) । तथा, आः, ( अस्तात् ).. सांध्येकेन, अर्द्धयुक्तैः, त्रियुगदहनैः, (मासैः, क्रमात, उदयकुंटिलर्जु- त्वमौट्यम्, स्यात् ) ॥ २० ॥ अर्थ:-मगलके पश्चिमदिशामें अस्त होनेसे ४ मास अर्थात् १२० दिनके अ- नन्तर पूर्वमै उदय होताहै, और उदय होनेसे दशमास अर्थात ३०० दिनके अनन्तर वक्री होताहै, और वक्री होनेसे लोचन कहिये दो मास अर्थात् ६० दिनके अनन्तर मार्गी होताहै, और मागी. होनेसे दिक् कहिये दशमास अ- थात् ३०० दिनके अनन्तर पश्चिममें अस्तहोताहै, इसीप्रकार वारम्बार होता रहता है। गुरुके पश्चिमदिशामें अस्त होनेसे एकमास अर्थात् ३० दिनके अनन्तर पूर्वमें उदय होताहै, और पूर्वमें उदय होनेसे सचरणयुग कहिये ४१ मास अर्थात् १२८ दिनकै अनन्तर वक्री होताहै, और वक्री होनेसे सागर कहिये ४ मास अर्थात् १२० दिनके अनन्तर मार्गी होनेसे साधि वेद कहिये , मास अर्थात् १२८ दिनके अनन्तर पश्चिममें अस्त होताहै शनिका पश्चिममें अस्त होनेसे सांध्येक कहिये १३ माल अर्थात् ३८ दिनके अनन्तर पूर्व दिशामें उदय होताहै, उदय होनेसे सार्द्धघि कहिये ३३ मास अर्थात १०५ दिनमें वक्री होताहै, वक्री होनेसे सार्द्धयुग कहिये । ४ मास अयांत १३५ दिनके मनन्तर मार्गी होताहै,और मार्गी होनेसे साई- दहन कहिये ३ मास अर्थात् .१०५ दिनके अनन्तर पश्चिम दिशाम अस्त होता, इसीप्रकार वारम्बार करना चाहिये ॥२०॥ इति श्रीगणकवर्य्यपण्डितगणेशदेवतहतो महलाघवकरणप्रन्ये पश्चिमोत्तरदेशीय- ". मुरादाग्दवास्तव्यगोवंशावतंसश्रीयुतभोलानायतनुजपण्डितराम-' स्विरूपशम्मंगा रचितया पिएसोदाहरणसनाधीकृतया- मयसमशितया भापाट्याएयया सहितः पश्चतारा. स्पष्टीकरणाधिकारः समाप्तिमितः ॥३॥ "
धिकारः४]
सान्वयभाषाटीकासमेत ।
अथ त्रिप्रश्नाधिकारो व्याख्यायते ।
अर्थात् ।
इस अध्यायमें दिशा-देश-कालका ज्ञानरुप तीन भरन कहे जायेंगे।
दिशा-देश और कालसे इष्ट समयादि ज्ञात होतेहैं सोई कहते हैं-
तिसमें भी प्रथम लग्नोपयोगि होनेके कारण लग्नोदय और इष्टस्थलमै राशिका
उदय निरूपण करते हैं। २.
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लकोदया विघटिका गजभानि गोङ्कदनास्त्रिपक्षदह-
नाः क्रमगोत्क्रमस्थाः। हीनान्विताश्चरदलैःक्रमगो-
क्रमस्थैर्मपादितोधटत उत्तमतस्त्विमे स्युः॥१॥
अन्वयः-गजभानि, गोदनाः, त्रिपक्षदहनाः (एते, क्रमस्थाः,'
मेषादिबयाणाम्,) विपटिकाः, लङ्कोदयाः, स्युः, ( एते, एंव, उत्क.
मस्थाः, कर्कादित्रयाणाम, लवोदयाः, स्युः), इमे, मगोत्क्रमस्थाः
क्रमगोत्क्रमस्थैः, चरदलैः, हीनान्विताः, (क्रमतः), मेपादितः, उत्क-
मतः धटतः, (लोदयाः, स्युः)॥ १ ॥
अर्थः-लङ्कामें मेपराशिका उदय गजभा कहिये २७८ पलपर होताहै,
वृपराशिका उदय गोदस्र कहिये २९९ पलूपर होताहै, मिथुन राशिका
उदय विपक्षदहनं. कहिये ३२३ पलपर होताहै (इनही तीनों भड्रोको उल-
टेरखनेसे कर्कआदि तीनों राशियोंके लुडोदय पल होतेहैं ) अर्थात
लङ्काम कराशिका उदय ३२३ पल और सिंहराशिका उदय २९९
पल, कन्याराशिका उदय २७८ पल होताहै । और लङ्काम तुलासे
लेकर मीनपर्यन्त राशियोंके उदयके पल, कन्याराशिसे लेकर उलटे
मेषराशिपथ्यंन्त जो उदयके पल कहेहैं सो होतेहैं, अर्थात्-रङ्काम तुलरा-
शिका उदय २७८ पलारमक होताहै, वृश्चिक राशिका उदय २९९ पलात्मक
होताहै, धनराशिका उदय ३२३ पलात्मक होताहै, मकर राशिका उदय ३२३
पलात्मक होताहै, कुम्भ राशिका उदय २९९ पलात्मक होताहै, और मीन
राशिका उदय २७८ पलात्मक होताहै ।।
जिस ग्रामकी राशिका उदयकाल लानाहो उस ग्रामक चरखण्ड लेकर
उनको क्रमसे मेष-वृप और मिथुन इनके पलात्मक लढोदाम घटावे,
और उलंट कमले कक-सिंह तथा कन्या इनके पलात्मक लोदयमें युक्त-
करदेय तव म्वदेशीय मेपराशिसे कन्याराशिपर्यन्त उदयकाल क्रमसे
होताहै, और उटटकमसे तुलाराशिसे लेकर मीनराशिपयंन्तका उदय-
काल होताहे ॥१॥
ग्रहलाघव। [विप्रना- 1. उदाहरण. अवक" उदाहरण लिखतेहैं- मेपराशिव खण्ड ५७ को घटाया तब २११ 'हुमा । वृषके पला- रमक उदप २९९ में काशीका द्वितीय चरखण्ड ४६ घटाया तब २५३ यह प- लात्मक वृपका उदय हुआ, मिथुनके पलात्मक उदय ३२३ में तृतीय चर- खण्ड १९ घटाया तय ३०४ यह मिथुनका, पलात्मक उदय हुआ, कर्कराशिके पलात्मक उदय ३२३ में तृतीय चरखण्ड १९ को युक्तकरा तब ३४२ यह कर्क- राशिका पलात्मक उदय हुआ, सिंहराशि पलात्मक उदय २९९ में द्वितीय चरखण्ड ४६ को युक्त कण तब ३४५ यह सिंहका पलात्मक उदय हुआ, क- न्याराशि पलात्मकं उदय २७८ में प्रथम चरखण्ड ५७ को युक्तफरा तव३३५ यह कन्याराशिका पलात्मक उदय हुमा, तुलाराशिके पलात्मक उदय २७८ में प्रथम चरखण्ड ५७ को युक्तकरा तव ३३५ यह तुलौराशिको प्रलात्मक उदय हुमा, वृश्चिकराशिके पलात्मक उदय २९९ में द्वितीय चरखण्ड ४६ को युक्त फरा तय ३४५ यह वृश्चिकराशिका पलात्मक उदय हुआ, धनराशिके पला- स्मक उदय ३२१ में तृतीय चरखण्ड १९ को युक्त करा तब ३४२ यह धनरा- : शिका पलात्मक उदय हुआ मकरराशि पलात्मक उदय ३२३ में तृतीय चरखण्ड१९ को घटापा तय ३०४ यह मकरराशिका पलात्मक उदय हुआ,कु:- म्भराशिक पढात्मक उदय २९९ मंद्वितीय चरखण्ड ४६ को घटाया तव ३५३ यह भगशिका पलात्मक उदय हुभा, और मीनराशिके पलात्मक उदय , २७८ में प्रथम घराण्ड ५७ को घटाया तय २२१ यह भीनराशिका पलात्मक रदय हुआ। भय रामसाधनकी रीति लिखते- तत्कालार्कः सायनः स्वोदयमा भोग्यांशाः खन्यु द्धृता भोग्यकालः। एवं याताशेर्भवेद्यातकालो भो ग्यः शोध्योऽभीष्टनाडीपलेभ्यः ॥२॥ तदनु जहीहि गृहोदयाँश्च शेपं गगनगुणनमशुद्धहछवाद्यम् । स- हितमजादिगृहेरशुद्धपूर्वर्भवति विलनमदोयनांश- हीनम् ॥३॥ अन्ययः (पग्मिन, फाल, समग, माध्यते ) तफालाफः, सायना, . धिकारः४] सान्वयभाषाटीकासमेत । (५७) (कार्य), भोग्यांशाः, स्वोदयन्नाः, सन्युट्टताः भोग्यकालः (स्यात्), एवम्, यातांशः, यातकालः, भवेत् । भोग्यः, अभीष्टनाडीपलेभ्यः, शोध्यः । तदनु, (तस्मात् ), गृहोदयान, च, जहीहि, शेपम्, गगन- गुणनम्, अशुद्धहत, (फलम् ), लवाद्यम्, ( स्यात, तत्) अजादि- गृह अशुद्धपूर्वः,सहितम् अदः,अयनांशहीनम्,विलयम्,भवति॥३॥ अर्थ:-जिस समय लग्नसाधनी हो उस समयका सूयस्पष्ट करके उसमें अ- यनांश युक्तकरदेय तव जो अङ्कहीं उसमंकी राशि दूरकरकै जो अंशादिभ- तरह वह भुक्तराशि. होताहै, और उस भुक्तराशिको ३० तीस अंगम घटावै तब जो शेष रहे वह अंशादि भोग्यराशि होताह, तदनन्तर तो राशि दृरकर- दीथी उसमें एक मिलाकर तत्परिमित राशिफ उदयसे मुक्त और भाग्यको गुणाकर तीसका भागदेय तय क्रमसे: भुक्तकाल और भोग्यकालके पल होते हैं, तदनन्तर अभीष्ट घड़ियोंके पलकरके उसमें भोग्यकालंक पल घटाव जो शेपरहै उसमें जिस उदयसे गुणा कराया उससे भागके जितने पलात्मक उदय घटसर्फ उतने घटाव पीछेसे जो पलादिक शेपर हैं उनको तीससे गुणा- कर तब जो गुणन फरहो उसमें जो उदय घटनहीं सकाहो उसका भागदेय तय जो अंशादि लब्धि होय उसमें मेपराशिसे लेकर जिवनी राशिका उदय घटाहो टतनीराशि युक्तकर तव जो अङ्क आवै उनमें अयनांश घटाचे तब जो शेपरहै वह अभीष्ट कालका राज्यादि लग्नहोतीहै ॥२॥ . उदाहरण. आक १५३४ वैशारा शुक्ल १५ सूर्योदयसे गतघटी अर्थात् इष्टघटी १० घ, ३० पर इस समयकी लमसाधनीहै इसकारण सूय्योदयसे इष्टपटी हुई १० प.०१. मध्यम सूर्य,१।४।१३ १४२ गति ५९।८है यहाँ आगे कही हुई ! "गतगम्यदिनाहिताभुक्तरित्यादि" रीतिसे पालन हुआ २०.क.२० वि. सको मध्यम रवि १।४।१३।४२ में युक्तकरा तव ॥१॥२४॥२ यह तारका- लिबरमध्यम रवि हुआ इसको मन्दोच २।१८1010 में घटाया तव ? रा. १. अं. ३५ क.५८ वि. यह मन्दकन्द्र हुभा, भार १ मं.३० क. ११ वि. यह मन्द फल धनहुभा. इसको तालकालिक मध्यम सायं १२.५.२४.२.वि. में युक्तकरा तब ? रा.५ २.५४ क. वि. यह मन्दफलसंस्कृत रवि हुमा इसमें चरण ९. पि. को घटाया तय ! रा.५.५२.क.४०वि.यह ता. त्कालिक स्पष्ट रवि हुआ इस तात्कालिय स्य्यं १ रा.५६.५२ २.४०वि. में भयनांश १८।१०को युक्तकरा तब ? रा. २४ भं.२ क.४०वि. यह साय- न रवि हुभा, इसकी राशिको दूरकरके २४ अं.२ क.४० वि. यह वृषभ रा. निता भुक्ता दुभा इस भुक्तको ३० राशिम घटाया तव टोप५.५७ क..२० .
ग्रहलायय। [विमना- + वि. यह भोग्य हुमा यहाँ पकराशि दूरकरीथी इस कारण एकसे आगेकी दू- सरी राशि वृपभके उदय ३९३ से भोग्यांश ५२.५७ क.२ वि.को गुणा करा, तष १५०६ भं.४५ क. २० वि. हुए इनमें ३० का भागदिया तब ५० ॥ १३॥३० यह पलात्मक भौग्यकाल हुआ-इसी प्रकार भुक्त भंशादिके द्वारा पलात्मक. भुक्तकाल सिद्ध होताहै । भोग्यकाल ५०।१३।३० को इंटपटी १०५.३० अर्थात् ६३० पलमैं घटाया तब शेषरहा ५७९ ॥ ४६।३० यहाँ ५५९ में मियु- मोदय ३०४ को घटाया तब ३७५ शेपरदे इसमें कोदय ३५२ घटनहीं सक्ते इस कारण शेषरहा २७५ पल ४६ विपल ३० प्रतिविपल इसको ३० से गुणाकरा तब २७३ पल १५ विपल मतिविपल हुए इनमें जो कर्कराशिका उदय ३४२ पहले नहीं घटसकाथा इसका भागदिया तब अंशादि लन्धि हुई २४ अं. ११ क. २६.बि. इसमें मेषराशिसे लेकर जो राशि शुद्ध नहीं हुईथी अर्थात् घटनहीं सकीथी तहाँपर्यन्तकी राशि ३ युक्तकरी तब ३ रा. २४ अं. ११ क.२६वि. हुभा इसमें अयनांश १८ । १० को घटाया तब ३ रा. ६ अं.१ क.२६.वि.यह लग्न हुई। अव भोग्यकालसे इष्टकाल कम होय तो लग्नसाधनेकी रीति लिखेतेहैं- भोग्यतोऽल्पेष्टकालात्खरामाहतात्स्वोदयाप्तांशयु ग्भास्करः स्यात्तनुः॥5॥ अन्वयः-भोग्यतः, अल्पेष्टकालात्, खरामाहतात, स्वोदयाप्तांशयु- क, भास्करः, तनुः, स्यात् ॥ॐ॥ अर्थः-पूर्वोत्तरीतिसे लाया हुआ राशिका भोग्यकाल यदि इष्टकालसे अ- धिक होय तो पलात्मक इप्टकालको ३० से गुणाकरकै उसमें सायन रवि जिस राशिका होय उस राशिके उदयका भागदेकर जो अंशादि मिलै उ:. सको इष्ट रबिमें संयुक्तकरदेय तव इष्टकालीन लग्न होतीहै ।। उदाहरण. शक १५३४ वैशाख शुक्ल-१५ सूर्योदयाद्गत घटी ० पल ४० है उस समय- लग्न साधतेहैं यहाँ सूर्योदयसे इष्टघटी घ० ४० ५० “गतगम्यत्यादि 'रीतिसे .चालित सूर्य हुआ १।५।४३1 १५ पूर्वोत्तरीतिसे इस चालि- तस्पर सूर्यम भयनांश १८।१०। को युक्तकरा तय १ रा०२३ अं० ५३ क. १५वि० यह सापमरवि हुमा इससे पलारमक- भोग्य काल भाया ५१ यद्द इष्ट यालस अधिक है, इसकारण पलात्मक न्यून इष्ट काल | ४० को ३० से गुणा फरा तय १२०० यहाँ सायन सूर्य वृषभ राशिका है सकारण वृषभ राशिके पलात्मक २५३ का १२०० में भागदिया तय .
- धिकारः१] सान्वयभाषाटीकासमेत। अंशादि लन्धि हुई ४ अं०४४ क० ३५ वि० इसको सष्ट रवि ? रा० ५ अं० ४३.३० १५वि० में युक्त करा तब १ रा० १० अ०२७ क०५० वि० यह तत्कालीन लमहुई॥ भव लग्नसे इष्टकाल लानेकी रीति लिखते हैं- अर्कभोग्यस्तनोभुक्तकालान्वितो युक्तमध्योदयोऽ भीष्टकालो भवेत् ॥४॥ अन्वयः-अर्कभाग्यः तनोः, भुक्तकालान्वितः, (ततः), युक्तम- ध्योदयः, अभीष्टकालः, भवेत् ॥ ४ ॥ भयंः-टग्नमें भयनांश मिलाकर जो भड्योग होय, उससे भुक्तकाल लावे और स्पष्ट सायन रविर्स भोग्यकाल लावै तदनन्तर सायन .लम और सायन रवि इन दोनोंके मध्यमें जिस राशिका उदय हो उसके मङ्क ग्रहण करके उसमें भुक्तकाल और भोग्यकाल इनके भट्ठोंको युक्तकरै तब पलात्मक मभीष्ट काल होताहै ॥४॥ उदाहरण. लग्न रा०६० २०३७ वि० इसमें अयनांश १८ २०१० क० को युक्त करा तव ३ रा०२४ मं० १२ क०३७ वि० हुमा इससे भुक्तकाल सा- धा ती २१ । १२ । ३७ हुए इसको सायन लग्नकी राशि कर्कके उदय ३४२ से गुणा करा तब २७॥ ५५॥५४ हुए इनमें ३० का भागदिपा तब २७६ पह लमका भुक्तकाल हुमा इस लमके भुक्तकाल २७६ में रविका भोग्य काल ५. को युक्त करा तर ३२६ हुए इनमें सापन सूर्य और सा- पन लग्नके मध्यकी मियुन राशिके उदय ३०४ को युक्त करा तव ६३० पल दुप इसमें ६० का भाग दिया तव१०५०३०प० यह काल हुभा॥ अव सापन लम भोर सापन सुर्य यह दोनों एक राशि पर हों तव लमसे इट काल साधन और रावि लग्न साधनकी रीति लिसतेह-. यादि । तनुदिननाथावेकराशौ तदंशांतरहत उदयः स्यात्सानिहत्विष्टकालाइनत उदयं उनश्चेत्सशो- ध्यो धुराचानिशि तु सरसभाकात्स्यात्तरिटकाल॥२॥ अन्वयः-यदि, तनुदिननाथी, एकराशीः (तदा), तदंशान्तर- हतः उदयः, सामिहत, इष्टकालः, स्पान, चैत, उदयः, इनतः, ऊनः (६०) ग्रहलायव । [निमश्रा- (तदा), सः, धुराबात, शोध्यः, निशि, तु, सरसभाकात, इष्ट- काले, तनूः, स्यात् ॥ ५॥ अर्थ:-सायन लग्न और सायन सूर्य यह दोनों एक राशिपर स्थित हो तो उनके अंशांके अन्तरको विके उदयसे गुणाकर और ३० का भागदय तक पलात्मक लब्धि अभीष्ट काल होताहै । यदि सूर्यकी अपेक्षा सायन लग्न कम होय तो इस ऊपरकी रीतसे साधेहुए कालको ६० घटीम घटाये जो शेप रहे वह अभीष्ट काल होताहै। स्पष्ट सूर्यमें छाराशि मिलाकर उससे लग्न साथै, परन्तु जो इष्ट काल कहाहै उसमें दिनमान घटादेय जो शेष रहै उसको इष्ट काल माने ॥५॥ उदाहरण. सायन लग्न १ रा० २८.०३७ क० ५० वि और सायन सूर्य १ रा० २३ अं०.५ क० १५ वि० इन दोनोंकी राशि छोड़ अंशका अन्तर करा तब ४ अं०१५ क० ३५ वि० हुआ इसको वृषभ राशिके उदयं २५३ गुणा करा तब १२०० अं० ० क३५ वि० हुये इसमें ३० का भाग दिया तव पलात्मक लब्धि हुई ४० पल इसमें ६० का भाग दिया तब घटी आदि इष्ट काल हुआ०१०१०प०॥ -द्वितीय २ उदाहरण. सायन सूर्य १रा०२४ अं०.४९ क०७वि० और सायन लग्न १ रा०१७ २० ५७ क० ११ वि० यहां एकराशीपरही लग्न रविसे कम है इस कारण इन दोनों का जो अन्तर हुआ७०१० ५६ वि० इसको वृषभ राशिका उदय २५३ से गुणा करकै तीस ३० का भाग दिया तव ५९ पलात्मकलब्धि हुई इसको ६० घटीम घटाया तब ५९ ५०१५० यह अभीष्टं काल हुआ। तृतीय उदाहरण. हारः १५३४ वैशाख शुक्ल १५ के , दिन सूर्योदयसे ५९ गत होने- पर दम साधन है तहाँ इष्ट घटी ५९ मध्यम सूर्य हुआ १ रा०४ २०१० ४१ वि० गति हुई ५८ । ८ यहाँ ५९ घटी' चालित सूर्य हुभा रा० ५ ० ११ क० ५० वि० मन्दकेन्द्र हुआ ? रा० १२ अं०१८ क०२०वि० मन्दफल १ भं०२८ का० ५६ वि० यह धन है इसकारण इस मन्दफल १ ॥२८॥ ५२ को चालितस्पष्ट सूर्य १५ । ११ ! ५० में पुक्त करा तय ! रा०६ अं०४० २० ४३ वि० यह हुआ इसमें चर ऋण ९५ विकासाको घटाया तव ? १०६ अं०३९ या० ७ वि० यह .
धिकारः४] सान्वयभाषाटीकासमेत । तात्कालिक स्पष्ट सूर्य हुआ इसमें अयनांश १८ अं. १० क.को. युक्तकरा तव १ रा. २४ २.४९ क.७ वि.हुआ इसमें राशि युक्तकरीतव ७ रा.२४ अं. ४९ क. ७ वि.हुआ, इससे भोग्यकाल साधा तब भोग्यकाल हुआ ५९ पल तदनन्तर इष्टघटी ५९ को दिनमान३३५. १० पलमें घटाया तव २५५.५० प. यह सूर्यास्तसे घटिकादि इष्टकाल हुआ इस २५५.५० के पलकरकै १५५० में पलात्मक भाग्यकाल ५९ को घटाया तव शेष बचे १५९१ पल इनमें ध- 'न ३४२+ मकर ३०४+ कुम्भ २५३+ मीन २२१+ मेप २२१% इनके योग १३४१ को पटाया तवे १५० शेपरहे इनको ३० से गुणाकरा तब ४५०० हुए इनमें वृषराशिके उदय २५३ का भागदिया तव भंशादि लब्धिहुई १७ अं. • ४७ क. ११ वि. इसमें गतराशि (१.) मेप युक्तकरा तव परो. १७२.४७ क. ११ बि. 'हुए इसमें अयनांश १८ अं.१० क.को घटाया तब २९ नं. ३७ क. ११ वि. यह लग्नहुई। भव गोलसंज्ञा-अयनसंज्ञा-दिनार्धज्ञान-रात्र्यद्धज्ञान-तयांशज्ञान । गोलौ स्तः सौम्ययाम्यौ क्रियघटरसभे खेचरेऽथाय- नेते नक्रात्कांच पड्भेऽथचरपलयुतोनास्तु पञ्चे- न्दुनाब्यः । घस्रादै गोलयोः स्यात्तदयुतखगुणाः स्यान्निशार्द्ध त्वथाक्षच्छायेपुन्यक्षभायाः कृतिदश- मलवोनेयमाशापलांशाः॥६॥ अन्ययः-खेचरे, क्रियघटरसभे, सौम्ययाम्यो, गोली, स्तः । अथ, नकात, कर्कात, च, पश्मे, अयने, स्तः, अथ, तु, पञ्चेन्दुनायः, गो- लयोः, चरपलयुतीना, घसार्द्धम्, स्यात् । तदयुतखगुणाः, निशार्द्धम्। स्यात् । अथ, तु, अक्षच्छायपुग्नी, अक्षभायाः, कृतिदशमलवाना, इयम्, आशापलांशाः, स्युः ॥ ६॥. अर्थ:-जब सायन रवि मेपादि छः राशिम होता है तब उसको टनर गो- लीय फतह और जव सायन रवि. तुलादि छः राशिमं होताह तर उसको दक्षिण गोलीय कहतेहैं, तिसी प्रकार जब सायन रवि कादि छः रागिने होताह तब उसको दक्षिणायन कहतेहैं, और मकरादि छः राभिम होताह तब १ यह शोक दूसरे गीचंद्रस्पष्टीकरणाधिकाग्में १२ मा लिसाहे-यसका उदाहरणभी सवि- स्तर लिस्तारयाहै परंतु यहाँ विमनाधिकारमेंदी प्रासंगिक है-वहाँ फेयल आनुषंगिक है सो जान लेना.
(६२) ग्रहलाघव। [विमश्रा- उत्तरायण कहतेहैं, पीछे लाएहुए घरको पलात्मक समझकर उनको यदि सायन रवि उत्तर गोलीय होय तौ १५ घटिकाम युक्त फरदेय, और यदि सा. यन रवि दक्षिणगोलीय होय तौ १५ घटिकामं घटादेय जो शेपरहै वह दिना द्ध होताहै, इस दिनार्द्धको३०घटीम घटाव तय जो शेपरहै वह राज्य होताहै। -तदनन्तर दिनाई और राज्यर्द्धको द्विगुणित करनेसे दिनमान और रात्रिमान होताहै ।। तदनन्तर छाया (पलभा) को ५ से गुणा करनेपर जो अंशादि लब्धि होय उसमें पलभाके वर्गमें १० का भागदेकर जो अंशादि.लब्धि मिले. 'उसको घटाव तब जो शेषरहै वह दक्षिण दिशाके अक्षांश होतेहैं ।।६।। उदाहरण. चर ९३ है, सायनरवि उत्तरगोलीय है इसकारण १५ घटीमें चर ९३ पल अर्थात् १ घटी ३३ पलको युक्तकरा तब १६ घ.३३५. यह दिनार्द्ध हुआ इस दिनार्द्धको ३० घटीमें घटाया तय १३ घ.२७ पल यह राज्यर्द्ध हुआ, दिना- र्द्ध १६ घ. प.को द्विगुणित करा तव ३३ घ.६ पल दिनमान हुआ, और राज्यर्द्ध १३ घ.२७ प. को द्विगुणित करा तव २६ घ.५४ प.रात्रिमान हुआ॥. शमान निसे गुणा करा तब २८ अं. ५ क. का वर्ग करा तब ३३ अङ्कगुल ३ लब्धि हुई ३ अं. १८ क. १८ वि. इसको पञ्चगुणित पलभा २८ अं.४५क.में घटाया तब २५ अं.२६ ल. ४२ वि. यह काशीका दक्षिण अक्षांश हुआ। अब नतकाल और उन्नतकाल साधनेकी रीति लिखते हैं- यातःशेपः प्राक्परचोन्नतं.स्यात्कालस्तेनोनं धुख- 'ण्डं नतं स्यात् ॥5॥ अन्वयः-भाक, यातः, उन्नतम्, स्यात्, परत्र, शेपः, काल, (उन्न तम्, स्यात् ), तेन, ऊनम्, ग्रुखण्डम्, नतम्, स्यात् ॥5॥ अर्थः-सूर्योदयकालसे लेकर मध्यान्हकालपर्यन्त जो कालहे उसको पूर्पकपाल कहते हैं, मोर मध्यान्हसे लेकर सूर्यास्तपर्यन्त जो कालहै - सको पश्चिमकपाट कहतेहैं, सय्योदयसे लेकर पूर्वकपालका जो गतकाल हो यह पृयाग्नतकाल कहलाताहै, और पश्चिकपालका जो सूर्यास्तपः स्पंन्त शेषकाल हो यह पश्चिमोन्नतकाल कहलाताई, उन्नतकालको दिनों में पटादनसे जो शेपरहै टसको नतकाल कहतेहैं ॥ ७ ॥ . " " - धिकारः४] सान्वयभाषाटीकासमेत। (६६) उदाहरण. सूर्योदयसे गतकाल १० घ. ३० प.यह पूर्वोत्रत कालहै,इस उन्नतकालको दिनार्द्ध १६ घ.३३५. में घटाया तब शेषरहाघ, ३ प. यह पूर्वनतकाल हुआ। अव भक्षकर्ण साधनेकी रीति लिखते हैं- अक्षच्छायावर्गतत्त्वांशयुक्तोमार्तण्डः स्यादग्रु- लायोऽक्षकर्णः ॥७॥ अन्वयः-अक्षच्छायांवर्गतत्वांशंयुक्तः, मार्तण्डः, अङ्घलाया, अक्षकर्णः, स्यात् ॥ ७॥ अर्थः-पलभाका वंग करके उसमें २५ का भागदेय जो लब्धि होय उसको मार्तण्ड कहिये १२ अगुलमें युक्तकरदेय तब भगुलादि अक्षकर्ण होताहै ।।७।। उदाहरण. पलभा ५० ४५ प्रतिअंकावर्गकरा तव ३३ अं० ३ प्रतिभं० हुए इसमें २५का भागदिया तव भं० १९ प्रतिभ० लब्धिहुए. तदनन्तर १२ अंगु- लम लब्धि १ अगु० १९ प्रतिमहलको युक्त करा तव १३ अट्ठल १९ प्रति- अंगुल यह अक्षकर्ण हुआ। भव हारसाधनकी रीति लिखते हैं- वेदेशाः शूरहेंचराव्यरहिताः सौम्यांनुदग्गोलयोहा- रोऽयो पटिकाईयुङ्नतंकृतेद्यशः समाख्यः स्मृतः तः। चेत्साईत्रिकुतोनतं यदधिकं वेदाहतं तद्वियु क्स्पष्टोऽसौतदयुग्घरस्त्वभिमतःस्यादक्षकर्णोद्धृतः८॥ अन्वयः वेदेशाः, सौम्यानुदग्गोलयोः, शरहचराट्यरहिताः, हारः, (स्पा), अयो, पटिकाईयुक, जतकृतः, चंशः, समाख्यः, स्मृतः। चैत्, नतम्, यत्, साईत्रिकुतः, अधिकम् (स्यात्, तदा सार्द्धवयो- दशहीनम्, कृत्वा ) वेदाहतम्, तद्वियुक्, असो, स्फुटः, (स्यात्,)। तदयुक, हरः, अक्षकोंद्धतः, अभिमतः, स्यात् ॥ ८ ॥ भधः-चरम ५का भागदेकर जो लब्धिहो वह यदि उत्तरगोलमें होय तो ११८में युक्त करदेय, और यदि पश्चिमगोलमें होय तो ११धम घटादेय तव जो मह मिलें वह मध्यम हार होताहै । और नतकालमें ३० पलयुक्त करदेय तब जो भहों उनका वर्ग करके दोका भागदेनेसे जो सन्धिहो वह समारस्य होतीहै, यदि नतकाल १३५० ३० ए०से अधिक होय तो पूर्वरीतिक अनु- म
।
ग्रहलाघव
[विमना-
सार समाख्य लाकर तदनन्तर नतकालम ३२०३० प०घटावे जो टोपरह
उसको चार गुणाकर तप जो गुणनफल हो उसको पहले लायहुए समा.
ख्यमें युक्त करदेय । और यदि नतकाल १३५० ३०५० न्यून हो तो समाख्य
यथावत् रहनेदेय । और मध्यम हारमें समाख्यको घटाकर जो शेपरह उसमें
अक्षकर्णका भागदेय तय जो लब्धि हो वह अभीष्टहार होताई ॥ ८॥
उदाहरण.
चर ९३में ५का भागदिया तब लब्धि हुई १८१३६ यह सायन सूर्यके
उत्तर गोलमें है इसकारण इस लब्धि २८ । ३६को ११क्ष्मं युक्त करा तव-
१३२ । ३६ यह हार हुआ। नतकाल ६ घपमै घटिका ३० पल युक्तकरे
तब ६५०३३ ५० हुए इसका वर्ग करा तब ४२१ ५४ हुए इनमें रका भाग-
दिया तब लब्धि हुई २१ । २७ यह समाख्य हुआ, अब मध्यम हार १३२ । ३६
में समाख्य २१ १२७ घटाया तब १११।९ रहे इसमें अक्षकर्ण १३ । १९का
भागदिया तब लब्धि हुई ८।२० यह अंभीष्ट हार हुभा ॥
अव इष्टकर्ण और ईष्ट
छाया साधनेको राति लिखतेहैं-
दिग्नाक्षभाहतचरं स्वगुणं द्विनिघ्नं स्वप्वंशयुग्युग-
भवान्वितमत्र भाज्यः । कर्णोगुलादिक इहेटहरा-
प्तभाज्यः कार्कवर्गविवरात्पदमिष्टभा स्यात् ॥९॥
अन्वयः-दिग्नासभाहतचरम्, स्वगुणम्, (ततः ), द्विनिम्नम्।
(ततः ), स्वेप्वंशयुक्, ( ततः), युगभवान्वितम्, अत्र, भाज्या
( स्याउ ) । इष्टहरातभाज्यः, इह, अमुलादिका, कर्णः, (स्यात् )
कर्णार्कवर्गविवरात्, पदम्, इष्टभा, स्यात् ॥ ९ ॥
अधः-पलभाको १०से गुणाकर तब जो गुणनफल होय उसका चरम
भागदेय तब जो लब्धिही उसका वर्गकर और उस वर्गको दोसे गुणा करें
तब जो गुणनफल हो उसमें पाँचका भागदेय तब जो लब्धिही उसको उ.
सही गुणनफरमें युक्त करकं जो अङ्कयोग हो उसमें ११४ युक्त करदेय तव
जो अयोग हो यह भाग्य कहलाताहै । उस भाज्यमें अभीष्टहारका भागदेय
तव जो लब्धिहो वह भगुलादि इष्टकर्ण होताहै। इष्टकर्णका वर्ग करके
इसमें १२का धर्म भयांत १४४ पटाये जो शेपरहै उसका वर्गमूल निकालै वह
पर्गमल भगुलादि इष्टच्छाया होती है,॥ ९ ॥
धिकारः] सान्वयभाषाटीकासमेत । उदाहरण. पलभा ५अगुल ४५ प्रतिभट्ठलको १०से गुणा करा तव ५७अट्ठल ३०प्रति- भट्ठल हुए इसका चर ९३में भागदिया तव लब्धि हुई १ ॥३७ इसका वर्ग करा तब २१३६ हुए इनको २से गुणा करा तव ५। १२ हुए इसमें इसकाही पश्चमांश १२ युक्त करा तव ६ । १८ हुए इसमें ११४ युक्तंकरे तब १२० ११४ यह भाज्य हुमा इस भाज्यमें अभीष्टहार ८।२०का भागदिया तब लब्धि हुई १४.२५ यह अगुलादि इष्टकर्ण हुआ.। इस इष्टकर्ण १४१३५का वर्ग करा तव २०७।५० हुए और अर्क कहिये १२का वर्ग करा तव १५४ हुए, इन दोनों २०७१५०-१४५का अन्तर करा तब ६३ १५० हुए. इसका वर्गमूल लिया तव ६ अट्ठल ४६ प्रतिभट्ठल ५८ तत्प्रतिभकुल यह इष्टच्छाया हुई ॥९॥ अब इष्टच्छायाले कर्ण और नतक्वल साधनेकी रीति लिखते हैं- कर्णः स्यात्पंदमर्कभाकृतियुतेस्तद्भक्तभाज्योहरोड भीष्टस्तत्पलकर्णपातरहितो मध्यो हरोव्याहतः। चेद्वेदाधराधिकः पृथगतो वेदाङ्गभूतागणाप्ताट्य- स्तस्य पदं घटीमुखनतं स्यादर्द्धनाडीवियुक्॥१०॥ अन्वयः-अर्कभाकृतियुतेः, पदम्, कर्णः, स्यात् । तद्भक्तभाज्या, अभीष्टः, हरः; स्यात् । तत्पलकर्णपातरहितः, गहतः, मध्यः, हरः चेत्, वेदांकधराधिकः, ( स्यात्, तंदा), पृथक् (स्थाप्यः ), अतः, वंदांकभूतात्, गुणाप्तान्यः, ( कार्यः ), तस्प, पदम्, अर्द्धनाडीवि- युक, घटीमुख़नतम्, स्यात् ।। १० ।। अर्थ:-वारहके वर्ग और इष्टछायाके वर्गका योग करके उसका वर्ग- मूल निकाले तब वह वर्गमूल इष्टकर्ण कहलाताहै तिस इष्टकर्णका भाग्यमें भागदेय तय जो लब्धि मिल वह अभीष्ट हार होताहै । तदनन्तर तिस भभीट हारको भक्षकर्णसे गुणाकर और जो गुणन फल हो उस- को मध्यम दार घटावै जो शेष रहै उसको दोसे गुणाकर तब जो गुणन फल हो वहं यदि १९४ से अधिक होय तो ऐसा करें कि उस गुणन फल- को दो स्थानमें लिरी एक स्थानमें उस गुणन फलमें १९६ घटादेय जो दोपरहै उसमें तीनका भाग देय जो लब्धि हो उसको दूसरे स्थानमें लिपे हुए गुणन फरमें युक्त करदेय तब जो अङ्कयोग हो उसका वर्ग- मूल निकालकर उसमें ३० पल पटादेय तब जो शेष रहै टसको नत- .
.ग्रहलाघव । [विमश्रा- काल जाने, और यदि गुणन फल १९४ से अधिक नहीं तो उस गुणन फलकाही वर्गमूल निकालकर उसमें ३० पल घटावै तय जो शेष रहे. टसं- को नत काल जाने ॥१०॥ उदाहरण. बारह १२ का वर्ग हुमा १४४ और इष्टच्छाया । ५९ । २२ का वर्ग हुमा ६३ । ५० इन दोनोंका. योग हुआ २०७ । ५० ईसका घर्गमूल मिला १४ । २५ यह इष्ट कर्ण हुआ इसका भाज्य १२० । १४ में भाग दिया तब लब्धि हुई ८१२०१२३ यह अभीष्ट हर , हुभा इस हरको अक्षकर्ण १३ ॥ १९ से गुणाकरा तव गुणनफल हुआ १११ । ३ इस गुणनफलको मध्यहर १३२ । ३६ में घटाया तब शेप रहे २१1३३ इसको २ से गुणाकरा तब ४३ । ६ हुए इसका वर्गमूल लिया तब ६ । ३३ मिला इसमें आधी घडी अर्थात ३० पल घटाए तब ६५१३५० यह नत काल हुआ ॥१०॥ साईत्रयोदशाधिकनतका-उदाहरणे. कल्पित नत १५ । १० में घटिकाई ३० पलको युक्त करा तब १५.५० ५० प० हुए इसका वर्ग करा तव २४५। २६ हुआ इसमें २ का भाग दिया तय १२२ । ४३ यह समाख्यं हुआ ॥ तदनन्तर नत १५ । १० सार्धत्रयोदझसे अधिकहै इस कारण नतम १३ । ३० घटाए तब शेपरहा १ । ४० इसको से गुणाकरा चब ६।१० यह गुणनफल हुआ इस गुणन फलको समाख्य १२३ । ४३ में घटाया तब शेप रहा ११६ । ३ यह स्पष्ट समाख्य हुआ इस स्पष्ट समाख्य ११६ । ३ को हार १३२ । ३६ में घटाया तप १६ । ३६ हुआ इसमें भक्षकर्ण १३ । १९ का भाग दिया तब लब्धि हुई १ । १४ यह अभीष्ट हार हुआ इस अभीष्ट हार १ । १४ का भाज्य १२० । १४ में भाग दिया तव एन्धि हुई ९७ १ २९ यह इष्ट कर्ण हुआ इसका वर्ग करा तर ९५०३० हुआ और बारहका वर्ग १४ हुभा इन दोनों चाँका अन्तर हुआ ९३५९० इसको ६० से सवर्णित करा तव ३३६९२४००० हुए इनका मूल लिया तब ९६ । ४४ यह इष्ट छायाहुई । इसका वर्ग करा तब ९३५८ । ५७ हुमा इसमें पारहके वर्ग १४४ को युक्त करा तब ९५०२ १ ५७ हुआ. इसका मूल मिला ९७ १२९ यह कर्ण हुआ इसका भाग्य १२० । १४ में भाग दिया तय लब्धि हुई १११४ यह अभीष्ट हर हुआ इसको अक्षकर्ण १३ । १९ से गुणाकरा तय १६ ! २५ हुआ, इसको मध्य दर १३२ १ ३६ में घटाया तब १ वर्गमूल निकालनेकी रीति हमने "सोसास्ती " को मापारीका परीतिसे लिखी है, ओपन " श्रीगेटेर" छापाखाने में एपगई।
धिकारः] सान्वयभाषाटीकासमेत । । . (६७) ११६ १ ११ रहे इनको दोरसे गुणा करा तव २३२ १२२ हुए यह. १९६ से अधिक हैं इस कारण दो स्थानमें २३२ । २२१-२३२ । २२ लिखा. एक स्थान १९४ घटाए तब शेपरहे ३८ | २२ इसमें ३ का भाग दिया तब लब्धि हुई १२ । ४७ इसको दूसरे स्थानमें रक्खे हुए गुणन फल २३२ १ २२ में युक्त करा तव २४५।९ हुए इसका मूल लिया तव १५ । ४० यह हुमा इस-१५३० में ३० पल घटाए तब १५ । १० रहे यह कल्पित नतकाल हुआ। भव क्रान्ति साधनेकी रीति लिखते हैं- चत्वारिंशदशीतिरद्रिकुभवः क्वक्षेन्दवोभूधृती पटू- खाक्षीणि जिनाश्विनोऽङ्गविकृती खाध्यश्विनःसा- . यनात् । खेटादोर्लवदिग्लवप्रमगतोंकोऽसौ तदूंना- गताच्छेपन्नादशलब्धियुग्दशहतोंशायोऽपमःस्या स्वदिक् ॥ ११॥ अन्वयः-सायनात खेटात, दोर्लवदिग्लवप्रमगत, अंकः, (स्यात्), असौ, तदूनागतात्, शेषनात्, दशलब्धियुक्, (ततः), दशहतः, अं- शाद्यः, स्वदिक, अपमः, स्यात् । (अथ ), चत्वारिंशत्, अशीतिः, अद्रिकुभवः, कक्षेन्दवः, भूधृती, पदस्वाक्षीणि, जिनाश्विनः, अरवि- कृती, खाध्यश्विनः, (एते, नव, अङ्गाः स्युः) ॥ ११॥ अर्थ:-सायन सूर्यके भुजकर और उन भुजोंके अंश करकै उनमें १० का भागदेय जो लब्धि होय तत्परिमित नीचें लिखे हुए अंक ग्रहण करे और उस लब्धि एक मिलाकर जो अङ्क होय तत्परिमित नीचे लिखे हुए अङ्क फिर ग्रहण करें । तदनन्तर इस.द्वितीयवार ग्रहण करे हुए भङ्कम प्रथमवार ग्रहण करे हुए अङ्कघटादेय तव जो शेषरहै उससे पहली मंशादियाकीको गुणाकरे तब जो गुणनफल हो उसमें दशका भागदेय तब जो लब्धि हो उसको प्रथम ग्रहणकरे हुए अङ्कमें युक्तकरदेय तव जो अन्योग हो उसमें दशका भागदेय तब जो लन्धि मिले उसको अंशादि क्रान्ति जाने, उसको सायनरवि उत्तर गोलमें होय तो उत्तर और दक्षिण गोलम होय, तो दक्षिण जाने । (जो अङ्क सन्धिपरिमित ग्रहण करना कहे हैं उन अडाको लिखते हैं ० चालीस भोर ८० अस्सी-और भद्रि कहिये ७ कुकहिये १ भूकहिये १ अयांव ११७ एक सोसतरह-और कुकहिये १ अक्षकहिये ५ इन्दु कहिये १ अर्थात् १५१ एकसौ ३ ४ ६ ७ ८ ९ ५० ८० (६८) ग्रहलापव। [विमश्ना- इफपाचन-और भकहिये १ धृति कहिये १८ अर्थात् १८१ एकसौइक्पारसी- और षट् ६ खकाहिये० अक्षिकहिये २ अर्थात् २०६ दोसौछ:-और जिनकहिये २५ अश्विन कहिये २ अर्थात् २२५ दोसीचौवीस-और भङ्ग कहिये ६ विकृति कहिये २३ अर्थात् २३६ दोसौछत्तीस-और ख ० अब्धि अश्विनं २ अर्थात् '२४० दोसौचालीस, यह नो अङ्क है ॥ ११ ॥ १ २ ११७ | १५१ १८१ १२०६ १२२४ २३६/२४० उदाहरण. स्पष्टरवि १ रा. ५ अं.५३ क. ४१ वि. में अयनांश १८ अं. १० कलाको युक्त करा तव १ रा. २४ अ. २ क. ४१ वि. यह सायन रवि हुआ इसके भुजकरके अंश करे तव ५४ अं. २ क.४१ वि. हुए, इसमें दशका भागदिया तब लब्धि हुई ५ शेषवचे ४ अं.२ क. ४ वि.और लब्धि परिमित भडू मिला १८१ और एकधिक लब्धि परिमित अङ्क मिला२०६इन दोनों अङ्काका अन्तर करा तब २५ हुआ इस अन्तरसे शेष ४ अं.२ क.४१ वि. को गुणाकरा तय १०१ अ. ७ क.५ वि. हुआ इसमे १० कर भागदिया तब लब्धि हुई १० अं. ६ क. ४२वि. इस लब्धिमें प्रथम ग्रहण करे हुए अङ्क १८१ को युक्त फरा तब१९१ अ. ६ क. ४२ वि. हुआ इसमें १० का भागदिया तब लब्धि हुई१९ अं.६ क. ४० वि. यह क्रान्ति हुई और यह सायनरवि उत्तर गोलमें है इसकारण उत्तर है ॥ ११ ॥ अब और प्रकारसे कान्ति साधनेकी रीति लिखते है- स्युः खण्डानि खवाईयोऽम्बरकृताः शैलाग्मयोऽन्ध्य नयस्त्रिंशत्तत्त्वकृतीनवारिनिधयस्तैः सायनांशग्रहा- त् । वाहंशाभकुंभागसंख्यकयुतिः शेपैश्च पाताद- शात्याव्या दिग्विहता लवादिरपमस्तद्दिवस्थगो- लाद्भवेत् ॥ १२॥ अन्वयः-खवार्द्धयः, अम्बरकृताः, शैलामयः, अन्ध्यमयः, निशत तत्त्वकृती, इनवारिनिधयः, (एतानि), खण्डानि, स्युः, तैः, साय- नांशग्रहात, वाहंशाभ्रकुभागसंख्यंकयुतिः, च, शेपैः, धात्तात्, दशा- त्याच्या, (ततः), दिग्विहता, स्वगोलात, तद्दिक, लवादिः, अपमा, रयात् ।। १२॥
२
६
धिकारः] सान्वयभापाटीकासमेत !
अर्थः-खवार्द्धय ४ अर्यात् ४० चालीस, और भम्बर० कृत ४ अर्थात् १०
बालीसा और दौल ७ अग्नि अर्थात ३७ सतीस, और भन्धि ४ अग्नि३
अर्थात् ३४ चौतीस-और विंशत् ३० तीस-और तत्व अर्थात् २५, और धृति
अर्यात् १८ अटारह, और इन अर्थात् १२ वारह, और वारिनिधि अर्याद
१ चार । यह नौ अङ्क हैं ।।
३
९
४० १ ३७] ३४ । ३० રપ ! ૨૮ / ૨૨ |
सायनरविके भुज करके अंशकर और उन अंशाम १० का भागदेय तब जो
लन्धि मिल तत्परिमित ऊपर लिखेहुए अङ्कपर्यन्त पहले सम्पूर्ण अङ्कोंका
योग ग्रहण कर और उस सन्धिम एक युक्त करकै तत्परिमित अङ्क ग्रहण
करके उससे पहले शेपभूत अंशादिको गुणाकर तब जो गुणनफल हो उसमें
१० का भागदेय तव जो लब्धि हो उसमें ऊपरोक्त भयोग मिलावै तव जो
इकट्टा भङ्क योग हो उसमें दशका भागर्दैनेसे जो लब्धि हो वह फ्रान्ति होती है
उसको सायनंरवि उत्तर गोलके अन्तर्गत हो तो उत्तर और दक्षिण गोलमें
होय तो दक्षिण जाने ।। १२ ।।.
उदाहरण.
स्पष्टरवि रा.५२.५२ क.४१ वि.में भयनांश १८ ० १० क.को युक्त
करा तंब १ रा.२४ २.२.४१ वि. यह सापनरवि हुमा इसके भुज करके
अंश करे तव ५४ अं.२ क.वि.हुए इनमें दार०का भागदिया तव लब्धिहुई
५ शेषव ४२.२ क.४१ वि. और टन्धि ५ परिमित ऊपर लिखे हुए भडू-
पर्यंत पहले सम्पूर्ण महाँ १०-१०-३७-२४-३०का योग१८१हुमा,फिर एका-
धिक लन्धि ६ परिमित अङ्क २५से उपरोक्त मंशादि शेप १२.२ क.४१ वि.
को गुणाकरा तय १०१ अं.७ क.५वि. हुए इनमें १० का भागेदिया तव१०,
६ क. ४२ वि. टन्धि हुई इसमें ऊपरक अट्योग १८१को युक्त कर तब १९१
अं.६ क. १२ वि. हुए इनमें १० का भागदिया तब १९ अं. ६क ४० वि. यह
क्रान्ति सायनरवि उत्तर गोलमें होनेके कारण टत्तरदै ॥ १२ ॥
अव प्रकारान्तरसे स्यूसक्रान्ति साधनेकी रीति लिखतह-
पट्पडिपूदधिहक्कभिरः खेटभुजांशदिनांशमिते-,
क्यम् । शेपहतप्यंदिनांशयुतंवांशायपमः सुखसं-
व्यवहृत्ये ॥ १३॥
(७०) ग्रलायव। [त्रिप्रभा- अन्वयः-वा, पद्पडिदपिछुभिः, अईः, सैटभुजांशदिनांश- मितैक्यम्, शेपहतप्यदिनांशयुतम्, अंशायपमः, सुखसंव्यवहत्यै, (स्यात् ) ॥ १३ ॥ अर्थः-सायनस्पष्ट रविके भुजकरके अंशकर, उन अंशोम १५का भागदेय जो लब्धि मिलै तत्परिमित नीचे लिखे हुए खण्डीका योग करलेय, और लब्धिमे एक मिलाकर तत्परिमित अंक ग्रहणकरके उससे पहली बाकीको गुणाकरे तव जो गुणनफलहो उसमें १५का भागदेकर जो लब्धिहो उसको ऊपरोक्त अनयोग मिटादेय तव अंशादि स्थूलकान्ति राश५.६ होतीहै,क्रांतिकी दिशाजामनेकी रीति पहले कहचुकेह।६।६।५] १२१ उदाहरण. सायनस्पष्टरवि १ रा० २४ ० २ ० ४१ वि० इसके भुगकरके अंशकरें तब ५४ अं०२ का ४२ वि० हुए इसमें १५का भागदिया तब लब्धि हुई ३ शेष रहा ९०२ क०४० वि० लन्धि ३ परिमित तीन क्रान्ति ६-६-५का योग हुमा १७ और एकाधिक लन्धि ४ परिमित क्रान्तिके अङ्क ४ से शेप ९० २ क०५१ वि०को गुणाकरा तय ३६ अ० १० क० ४४ वि० हुआ इसमें १५का भागदिया वव २०२४ क० ५३ वि० सन्धि हुई इसको ऊपरोक्त भयोग १७ में युक्त करा तय १९ ०२४३०४३ वि० यह क्रान्ति हुई, यह सायन- रवि उत्तर गोलमें है इसकारण उतरह ॥ १३ ॥ भय स्थूलफ्रान्तिसे भुनांश साधनेकी रीति लिराते हैं- ततो दलानि शोधयेत्तिथिनशेपमेष्यतातिथिन- शुद्धसंख्यया युतं भवन्ति दोर्लेवाः ॥१४॥ अंन्यपः-तता दलानि,शोधयेत् तिथिनशेपम्,एप्पहत, (कार्यम्), (ततः ) तिथिनयुद्धमंस्पया, युतम् दोलवाः भवन्ति ॥ १४ ॥ भः-तिम मान्तिम समर पहले यहुप. मानपद नितन पटसबै उतने घटाय गन्तम जो दोपदै उसयो १५ गुणापर य जो गुणनफलदो टप मराद्ध पदिय नोनही पटरयाया इस मारपस्या भागदेय तय गाँ धिक्षी उसयो भगादि जान उन भाम गिरान सेण्यक मानयर ऊपर पाप दस सार गुणापरंप जो गुणनफल हो पद भशीम युक्तः परदप तव भांग होस । १५ ॥
धिकारः] सान्वयभाषाटीकासमेत ! (७) उदाहरण. पूर्व साधनकरी हुई क्रान्ति १९ २० २४ क० ४४ विके अंशामें प्रथम क्रा- न्त्यको घटाया तब दोपरदे १३ अं०२४ २०४३ वि० इस शैपके मंशाम दि- तीय कान्त्यङ्कको घटाया तद ७२०२४ २०४३ वि० शेपरहे इस शेषक अंशाने तृतीय क्रान्त्यको घटाया तव टोपरहे२०२४ क०४३ वि० भव इस शेपमें मार्गका मान्य नहीं घटतका इसकारण इस अन्तिम शेष २॥२४॥२३ को १५७ गुणा करा तब १६० १० क.० ४५वि० हुए इसमें जो कान्त्यर्लंट नहीं घटसकाया उसका भाग़दिया तव लन्धि हुई ९० २० ४१ वि०सभव जितने संख्यक क्रान्त्यक घटाएये टसं ३ संख्याको १५से गुणा करा तवटपहुए इनकी टस लधि ९०२क०वि०में युक्त करा व ५४० २क०४१ वि० यह सायनरविके भुजांश हुए। अब यदि रविका ज्ञान न होय तो केवल दिनमानसेही स्युलक्रान्ति साध- नेकी रीति लिखते हैं- धुदलतिथिवियोगस्तद्विनाञ्चश्चरं स्यादथ निजग- जभागोपेतमक्षप्रभाप्तम् । दिनकृदपमभागास्तत्व- लिप्तायुताः स्युचूदलकृशपृथुत्वे ते क्रमाद्या- म्यसाम्याः ॥ १५॥ अंन्वयः-युदलतिथिवियोगः, विनाश्या, चरम, स्यात्, अय, तन, निजगनभागोपेतम्, (ततः), अक्षमभातम्: (ते), दिनकृदपम- भागाः, स्युः ते; तत्वलिप्तायुता, युदलकृशयुत्वे, क्रमात. याम्य- सौम्पाः, स्युः ॥ १५॥ भर्यः-दिनाई और पन्दरह घटिकाका जो अन्तर हो टसको साटसे गुणा कर तब पलात्मक चर होताद, हंसमें अपने अष्टमांशको युन करदय तप जो मंकदी दस पलभाका भांगदेय तव जो अंगादि लब्धिहो उसमें २५कलायुक्त कर तब रविको क्रान्तिके भंगादि होते है यह अंगादि यदि १५घडाँसे अधिक हों तो टत्तर भार कम ही दी दक्षिण होते ॥ १५॥ उदाहरण. दिनाद्धंद १६ २०३३५० इसमें १५५० पाई तर गॅपरहे ! प० १५० इसको ६० से गुणा करा तय ९३ पल, यह पलात्मक चर हुमा इनर .
ग्रहलायय।
[निमना-
.
९३काही अष्टमांश ११ ॥ ३७।३० युक्त करे तब १०४ ! ३७।३०.हुए ।
• इसमें
पलभा ५। ४१ का भाग देनेके निमित्त भाजक ५।११और भाज्य १०४४३७
३० दोनोंको सवर्णित करा तब भाजक हुआ २०७०० और भाग्य हुआ
३७६६५० तदनन्तर भाज्य ३७६६५ मे भानक २०७००का भागदिया तब अं.
शादि लब्धि १८६० ११० ४४ वि० हुई इसमें २५ कला युक्तकरी
तव १८ २०३६ क १४ वि० यह क्रान्ति हुई यह दिनार्ध १५ घ०से अधिक है
इसकारण उत्तर है।
अब नतांश उन्नतांश और पराख्यक साधनेकी रीति लिखते हैं-
कान्त्यक्षजसंस्कृतिर्नतांशास्तद्धीना नवतिः स्युरु-
नतांशाः। दिनमध्यभवास्ततोऽपि ये स्युःकान्त्यं-
शालघुखण्डकैः पराख्यः ॥१६॥
अन्वयः-ऋान्त्यक्षजसंस्कृतिः, नतांशाः, स्पः, तद्धीना, नवतिः,
दिनमध्यभवाः, उन्नतांशाः, (स्युः), ततः, अपि, लघुखण्डकै ये,
कान्त्यशाः, स्युः, (ते), पराख्यः ॥ १६ ॥
अर्थः-शान्ति दक्षिण होष तो उसको अक्षांश युक्तकरदेय और क्रान्ति
उत्तर होय तो उसको अक्षांशमें घटादेय तब दक्षिण नतांश होते हैं,
यदि क्रान्ति उत्तर होय और अक्षांशको अपेक्षा अधिक होय तय क्रान्तिमें
अक्षांश घटानेसे उत्तरनतांश होते हैं, और नतांशको ९० में पटादेय तय.उ.
प्रतांश होते हैं, परन्तु वह दिनके मध्यकाल अर्थात् मध्यान्हकालके होतेहैं
इष्टकालय नहीं होतेहैं । उन्नतांगांको भजमानकर उनसे कानपट्टोंके
द्वारा स्थल फ्रान्ति लावै तप पराज्य होताह ॥ १६ ॥
उदाहरण.
उनकान्ति १९ भं.६ क. १० वि. को अक्षांश ३५ अं. २६ क. ४२ वि. में
पटाया तय ६ भं.२० २.२ पि.यह दक्षिणनतांश हुए इन नतांशों ६।२०।२ को.
९० में पटापा तय शेपरहे ८३ भं. ३९.५८ वि. यह उनतांश हुए । इससे
सादुई म्यूल फ्रान्ति २. अं. ३१ क. ३९ बि.हुई इसको पराख्य कहते हैं।
अय भन्य मयारी उनतकालसे अभीष्टकणंसाधन लिरातेहैं-
नवतिगुणितमिष्टमुन्नतं धुदलद्धतं फलभागतो.
पमः। कथितपरगुणस्तदुद्धृता रविनवपट्च्छ्वणोऽ
थवा भवेत् ॥१७॥
(७३). धिकार ४] सान्वयभाषाटीकासमेत। अन्वयः-इष्टम्, उन्नतम्, नवतिगुणितम्, (ततः) द्युदलहतम्, (कार्यम्, तदा,) फलभागतः, अपमः, कथितपरगुणः, ( कार्यः), तदुद्धृताः, रविनवषट्, अथवा, श्रवणः, भवेत् ॥ १७ ॥ अर्थः-अभीष्ट उन्नतकालको ९० से गुणाकर तब जो गुणनफल हो उसमें दिनाईका भागदेय तब जो अंशादि लब्धि होय उससे स्थूल क्रान्ति लाकर उसको पूर्वोक्त परायसे गुणाकर तब जो गुणनफल होय उसका "रविन- वपट्" कहिये६१२में भागदेय तब जो लब्धिहो वह अगुलादिकर्ण होताहै।।१७ उदाहरण. उन्नतकाल १० घ.३०५, को ९० से गुणाकरा तब९४५ घटीहुई इसमें दि- नाई १३ घ.३३ प. का भागदिया तय लब्धिहुई ५७ अं.५ क.५८ वि. इससे लाईहुई क्रान्ति २० मे. १३ क. ३५.वि. को पराख्य २३ अं.३४ क. ३९ वि. से गुणाकरा तव ४७६ अं. ५३ क.१५ वि. हुई इस गुणनफलका ६९१२ में भाग: दिया तब लब्धि मिली १४ भद्गुल २९ प्रतिअगुल यह इष्टकर्ण हुआ ॥ १७ ॥ अव इष्टकर्णसे उन्नतकाल साधनेकी रीति लिखतेहैं- तरणिनवरसाः श्रवोद्धृताः परविहृता अपमो भवे. त्ततः । दिनदलगुणिता भुजांशका नवतिहृता अ- थवेएमुन्नतम् ॥ १८॥ अन्धयः-अथवा, तरणिनवरसाः, श्रवोद्धताः, (ततः), परविहता, (कार्याः, फलम् ); अपमः, भवेत् । ततः, भुजांशकोः, दिनदल- गुणिताः, (ततः), नवतिहताः, इष्टम्, उन्नतम्, (स्यात् ) ॥ १८॥ अर्थ:-"तरणिनवरस" कहिये ६९१२ में इष्टकर्णका भागदेय तव जो ल- ब्धि होय उसमें फिर पराख्यका भागदेय तब जो लब्धि होय वह स्थूल क्रान्ति होतीहै, तदनन्तर उस फ्रान्तिसे पूर्वोत्तरीतिके अनुसार भुजांश ला- कर उनको दिनाद्धंसे गुणाकर तब जो गुणनफल हो उसमें ९० का भाग- देय सब जो लब्धि हो वह पटिकादि उन्नतकाल होताहै ॥ १८॥ उदाहरण. . . . ६९१२ में इष्टकर्ण १४ भट्ठल २९ प्रतिअद्गुलका भाग दिया तब लन्धि हुई ४७६ अं. ५३ कं. १५ वि. इसमें पराख्य २३ भं. ३४ का. ३९ वि. का भागदिया " , .(७४) ग्रहलाचव। [त्रिप्रभा- तब लब्धि हुई २० अं. १३ क. ३५ वि. यह स्थूल क्रान्ति हुई इससे पूर्वोक्त रीतिके अनुसार भुजांश आये ५७ अं.५ क.५८ वि इसको दिनार्द्ध १६ घ, ३३ प. से गुणाकरा तब ९४५ हुए इनमें ९० का भागदिया तब लब्धि हुई १० घ.३० प. यह उन्नतकाल हुआ ॥ अब उन्नतकालसे यन्त्रजोन्नतांश साधनेकी रीति लिखतेहैं- खाङ्कनोन्नतपटिकादिनाईभक्ताभागाः स्युस्तदंप- मजांशकाः परनामसिद्धाप्तानिगदितवत्ततों भुजां- शास्तत्काले स्युरिति च यन्त्रजोन्नतांशाः॥ १९॥ अन्वयः-खाङ्कनोन्नतपटिकाः, दिनाईभक्ताः, भागाः, स्युः,। तद-: पमंजांशकाः, परमाः, (ततः), सिद्धाप्ताः, ततः, निगदितवत, भुजा- शाः, तत्काले, यंत्रजोनतांशाः, स्युः ॥ १९ ॥ अर्थ:-उन्नतकालकी घटिकाओंको ९० से गुणाकर तव जो गुणनफल हो उसमें दिनार्द्धको भागदेय तव जो भंशादिलब्धि हो उससे स्थूल क्रान्ति लाकर उसको पराख्यसे गुणाकार और जो गुणनफल मिले उसमें २४ का भाग देय तय जो लब्धि हो उसको स्थूल क्रान्ति मानकर उससे भुजांश लावे बद्दी यन्वजोन्नतांश होतेहैं ॥ १९ ॥ उदाहरण. उन्नतझालं १० १० ३० ५० को ९० से गुणाकरा तब ९४५ हुई इनमें दिनाई १६ घ०३३ ५० का भाग दिया तब भंशादि लन्धि हुई ५७ ७.५ घ.०५८ विकता इससे लाईहुई क्रान्ति २० २० १३ करदा ३५ पिक हुई इस- घो पराज्य २३ अंश ३४ कला ३९ चि०से गुणा फरा तप ४७६ २०५३ पा० १५ वि० हुए इनमें २४ का भाग दिया तव सब्धि हुई १९ २० ५१ क० १३ वि० इसमे लापटुप भुनांश ५५.०४५ क.० ४८ वि० यही यंत्रजोन्नतांश हुए । भय इएपंचमीनतांदार टन फाल साधनेकी रीति लिरातेहैं- अभिमतयन्त्रलवास्ततोऽपमोऽसी जिननिम्नः परह- ततो भुजांशाधुदलनाः सनवोद्धृताः कपाले प्रा- पश्चाद्वटिकाः क्रमादतप्याः ॥२०॥ पत्र पीये भी पत्र भी स्त्रको मत परिप मुरीय पत्रसे मध्य प्रणाली का- सnिा हो।
धिकारः] सान्वयभापाटीकासमेत । अन्वयः-अभिमतयन्त्रलवाः, ततः, (यः), अपमः असी, जिन- निनः, परहत, ततः, भुजांशाः, (स्युः, ते), ग्रुदलनाः, खनवोद्धृताः, पश्चात्कपाले, कमात, गतेप्याः, पटिकाः (स्युः ) ॥२०॥ अभीष्ट यंत्रजोन्नतांशसे स्थूल शान्ति लाकर उसको चौवीससे र तव जो गुणन फल हो उसमें पराख्यका भाग देय तव जो लब्धि रेसको अंशादि स्यूल क्रान्ति जाने और उससे भुनांश लाये फिर तदिनाद्धंसे गुणा कर तब जो गुणनफल हो टसमें ९० भाग देय जो लब्धि होय वह घटिकांआदि उन्नतकाल पृवंकपालमें होय तो और उत्तर कपालमें होय तो एण्य होता है ॥ २० ॥ उदाहरण. अभीष्टयंत्रजोन्नतांश ५५ २० १५ क० ४८ वि० इससे लाईहुई क्रान्ति १९ २०५३ कला १ वि० को २४ से गुणाकरा तव ४५६ २०५३ क०१२ वि० हुए इसमें पराख्य २३ अं० २४ का० १९ वि० का भाग दिया तय २० भं०१३ कला ३५ विकलो लब्धि हुई इसको क्रान्ति मानकर लाये हुंग भुजां- श ५७१५1५८ को दिनार्द्ध १६ ५० ३३ ५० से गुणा करा तर ९४५ ५० हुए इसमें ९० का भाग दिया तब १० घ०३०५० यह पूर्व कपाटमें होने के कारण गत उन्नत काल हुआ ॥२०॥ अब यंत्रजोन्नताशसे इष्टकर्ण साधनेकी रीति लिखते है- यन्त्रलवोत्यक्रान्तिलवाप्ता वस्तिभदस्राः स्यादिह कर्णः ॥5॥ अन्वयः-यन्त्रलचोत्यकान्तिलबाप्ताः, पस्तिभदसाः, इह, कर्णा, स्पात् ॥5॥ अध:-पंवोनतांगले झान्ति, लाकर टप्सका पस्तिभदन्न कहिप २८८ में भाग देयं तय जो सन्धि हो वह भटुंलादि कर्ण होता है | उदाहरण. पंजानतां ५५० ४५ क० ४८ विकलान लाईहुई शान्ति १९० ५२ क०१ वि० का २८८ में भाग दिया तब भट्ठलादि सन्धि हुई १४ अट्ठल • २९प्रतिभट्ठल ३८ वरमतिमहल यह इष्ट कणं हुआ। :.
ग्रहलाघव।
(७६)
[विप्रथा-
अब इष्ट कर्णसे यम्जोन्नताश साधनेकी रीति रिसते है-
कर्णहृतास्तेस्यादपमोऽतोवाहुलवा स्युर्यन्त्रलवावा२१
अन्वयः-ते, कर्णहताः, अपमः, स्यात्, अतः, बाहुलवाः, वा यन्त्र
लवा, स्युः ॥२१॥
अर्थ -तिन वस्विभदन २८८ मे कर्णका भाग देय तब जो लब्धि
हो वह क्रान्नि होती है, तदनन्तर इसी क्रान्तिसे भुजाश लावै वह भुजाशही
यत्रजोन्नताश होते है ॥२१॥
उदाहरण.
२८८ मे इष्ट वर्ण १४ अहुल ३९ प्रतिभट्ठल ३८ तत्प्रतिभद्गुरका भाग
दिया तब लब्धि हुई १९ अ० ५२ क० १३ वि० यह क्रान्ति हुई इससे लाए
हुए भुजाश हुए ५५ १९४५ २०४८ वि० यही यत्रजोत्रताश है ॥ २१॥
सर्वत्र नालिकावन्धादि और बुण्डमण्डपादि विधिम दिक्साधनका
कार्य पडता है इस कारण अब दिक्साधनकी रीति लिखते है-
वृत्तेसमभूगते तु केन्द्रस्थितशको क्रमशो विशत्य-
पैति । छायाग्रमिहापरा च पूर्वा ताभ्यां सिद्धति
मेरुदक्चयाम्या ॥२२॥
अन्वयः-समभूगते, वृत्ते, केन्द्रस्थितशङ्कोः, छायानम्, क्रमशः,
विशति, इह, अपरा, (स्यात् ), (यर), च, अपति, (तत्र ), पूर्वा,
(स्यात् ), ताभ्याम, सिद्धतिमेः उदक, याम्या, च, (स्यात्)॥२२॥
अर्य जरी समान इरसार परी हुई भूमिमे इष्ट निग्या परिमित
सूचस प पर्नुए पादे, और उस यर्नुएके माध्यमे दादश अगएका शद्ध
गाढ़े, पृयोहम सभापी छापाया भग्न पर्नुएकी जद्दा स्पा करे, तो
पधिम दिशाया चिन्ह पर और अपरादम सिस शटुकी छायावा अनः
भाग जहाँ गर्नुएसे याहर पदै सदा पूर्व दिशापा चिन्द परै, तदनन्तर पूर्व
पभिमन्दिावी सधिपर प रंगा रोचे पद पृापर रेपा होती. तिस
पर्यापर गापर पर्नुपये मध्यसे पर एम्प रोचे घह एम्परे ऊपर भोर
नीच गहाँ पर्नुएम मिएं पह दक्षिणोत्तर रोग होती है। जिस दिन ३०
पड़ीरा दिनमान होता है उस दिनही इस प्रकार दिपसाधा हाता है ॥२२॥
" भिकारः ४] सान्वयभाषाटीकासमेव । (७७) अव दूसरी रीतिसे दिक्साधन और भुजसाधन कहते हैं- वार्कक्रान्तिलवाक्षकनिहति कर्णनिनीनभोक्षा • ग्न्याप्ता रविदिग्भुजोयमदिशद्विप्नातभासंस्कृतः॥ केन्द्रेभोत्यवृतो सपूर्णगुणवद्भायात्प्रदेयो भवेद्या- म्योदक्सभुजार्धकेंद्रनिहितारज्जुस्तुपूर्वापरा ॥२३॥ अन्वयः-वा, अर्फक्रान्तिलवाक्षकर्णनिहतिः, भाकर्णनिधी, नभी- क्षान्याप्ता, रविदिग्भुजः, स्यात् । (सः), यमदिशदिनाक्षमासं- स्कृतः, (शेपदिग्भुजः, स्यात् ), सः, केन्द्रभोत्यवृतौ, पूर्णवत, अग्रात, प्रदेयः, सः, याम्पोदक, भवेत, भुजाई केन्द्रनिहता, रज्जा, तु, पूर्वा- परा, (स्यात् ) ॥२३॥ अर्थः-सूर्यकी क्रान्तिको कर्णसे गुणा करे तय जो गुणनफल होय उसको फिर छायाकर्णले गुणाकर तव जो गुणनफल हो उसमें नमोक्षाग्नि क- हिये ३५० का भागदेय तब जो लब्धि हो वह मध्यम भुज होताहै, यह सायन सूर्य उत्तर गोलमें होय ती उत्तर होताहै, और सापनसूयं दक्षिण गोलमें होय तो दक्षिण होताहै, तदनन्तर पलमाको २से गुणाकरके जो गुण- नफल मिले उसको दक्षिण मान और टसमें मध्यम भुज दक्षिण होय ती युक्त कर देय और मध्यम भुज उत्तर होय तो घटादेय तब जो अङ्कहीं वह दक्षिण भुज होता, और यदि मध्यम भुज उत्तर होय और द्विगुणित परभास भ- धिक होय तो द्विगुणित पलभाको मध्यम भुजा घटादेय जो गेप रहै सो भ- गुलादि उत्तर भुज होताहै । अभीष्ट छाया परिमित सूत्रसे समभूमिपर एकवतुल यनाकर टस वर्तुरके मध्यमें एक दादा मदुलका शङ्कगाढ़े टस डाकी प्रवेटाकालकी और निगम कालकी छायाके अग्रभागसे भुनांगुल परिमित गलाका लेकर वह भुज दक्षिण होय ती दक्षिणकी और उत्तर होय ती उनरकी और पूर्णज्याको समान बाद वर्तुलके दूसरे और लगनाय इस मकार रेगा सेंचे यह दक्षिणोतर रोपा होतीद तदनन्तर दक्षिणोत्तर रंगाको आधा करके उस बिन्दु और पर्नुलके मध्यका विन्दु इन दोनोंकी सीध बाँधकर एक रेसा रांचं वह पूर्वापररणा होती है ॥२३॥ उदाहरण. इष्टकाट १० घ.०५. है तत्कालीन स्पष्ट सूर्यरा.५.५.क.४.वि. है इससे लाई हुई क्रान्ति १९ मंश६क०४० वि. को अक्षकर्ण १३ मट्ठल-१९ . . (७८) ग्रहलाषय । [विप्रश्ना- प्रतिभद्गुलसे गुणाकरा तय २५४१२९ ४६ हुए इनको सायाकर्ण १४ भदुल २४ प्रतिभट्ठलसे गुणाकरा तय ३६६९ भद्गुल ३० प्रतिभडल हुए इसमें नभोक्षाग्नि कहिये ३५० का भागदिया तव लब्धिहुई १० अतुल २८ प्रति- अद्भुल यह मध्यम भुज सूर्यके उत्तर गोलमें होनेके कारण उत्तरहै, अब पलभा ५ अगुल ४५ प्रतिअडुलको २ से गुणाकरा तव ११ अट्ठल ३० प्रति अद्गुल गुणनफल दक्षिण हुआ, इसमें मध्यम भुज १० अहुल २८पति- अडुलको घटाया तय शेषरहारभद्गुलर प्रतिअट्ठल यह दक्षिण भुज हुभा ॥२३॥ अप भन्यरीतिसे दिक्साधनके निमित्त दिगंशसाधनको रीति लिखते हैं- घुमानखगुणान्तरं शिवगुणं दिनेऽल्पाधिके ह्यपागु- दगथानुदग्भवति यन्त्रभागापमः । वसुध्न्युभयसं-. स्कृतिर्नवतियन्त्रभागान्तरोद्भवापमहतास्ततो भु- जलवा दिगंशाः स्मृताः॥२४॥ अन्वयः-शिवगुणम्, घुमानखगुणान्तरम्, दिने, अल्पाधिके, अ- पाक्, उदक, भवति, अथ, हि, यन्त्रभागापमः, (सदा), अनुदक, (भवति )। उभयसंस्कृतिः, वसुन्नी, ततः, नवतियन्त्रभागान्तरो. द्भवापमहता, (ततः), (ये), भुजलवाः, (ते),दिगंशाः,स्मृताः॥२४॥ अर्थ:-दिनमान और ३० पटीके अन्तरको ११ से गुणाकर तब जो गुणन- फल अंशादि होय वह यदि दिनमान, ३० घटीसे अधिक होय तो उत्तर और कम होय तो दक्षिण होताहै । तदनन्तर यन्त्रजोन्नतांशसे क्रान्ति साधे उस फ्रान्तिको सदा दक्षिण समझे । और इस क्रान्ति तथा ऊपरोक्त अंशादि गु- णनफल इन दोनोंकी दिशा एकही होय तो दोनोंका योग करलेय, और यदि भिन्न दिशा होय तौ अन्तर करलेय तर जो भडू लब्ध हो उनको भाउसे गु- णाकर तब जो गुणनफल होय उसमें ९० और यन्त्रमोन्नतांशके अन्तरसे लाईहुई मान्तिका भाग देय तय जो सब्धि होय उसको क्रान्ति समझे, इस शान्तिसे भुजांश लायै, वह भुजांशही दिगंश पहलातेहैं ॥२४॥ 'उदाहरण. दिनमान ३५.६५, और ३० पटीका अन्तरफरा तय ३ घ. ६ प. हुभाइ सको ११ से गुणाकरा तय ३४ अं. ६२. हुमा, यह गुणनफल "तीस ३० घ. टोरी अपेक्षा दिनमान भधिक था" इसकारण उत्तर हुआ। भए यवनों- धिकारः४] सान्वयभाषाटीकासमेत । (७९) व्रतांश ५५ अं.४५ क.४८ वि. है इस लाईहुई स्यूलकान्ति दक्षिण १९ अं. ५२ क.१३वि. इसकी और ऊपरोक्त गुणाकारकी भिन्नदिशाहै इसकारण ऊपरोक्त अंशादि गुणनफल ३४ नं. ६ क. और स्थल क्रान्ति १९ अं.५३ क. १३ वि. का अन्तर करा तव १४ . १३ क. ४० विहुआ इसको ८से गुणाकरा तव ११३ अं.५० क, १६ वि. हुए इसमें ९० अं.और यन्त्रजोन्नतांश ५५.४५ क. ४८ वि. के अन्तर ३४ अं. १४ क.१२ वि. से लाईहुई क्रान्ति १३ अं.२४ क. ४४ वि. का भागदिया तव लब्धिहुई ८ भं.२९ क.१५ वि. इससे लाए हुए भुजांश २१ अं. १३ क.२४ वि. यह दिगंश हुए ॥२४॥ अब दिगंशांसे दिक्साधनकी रीति लिखते हैं- समभुविनिहिते तुरीययन्त्रे स्पृशति यथा च दिगं- शकाग्रकेन्द्र। अवलम्बविभोत्थकेन्द्रसंस्थेपीकाभा- थ दिशोऽत्र यन्त्रगाः स्युः॥२६॥ अन्वयः-समभुवि, तुरीययन्त्रे, निहिते, (सति), दिगंशकाग्रे, अवलम्वविभोत्यकेन्द्रसंस्थेपीकामा, यथा, स्पृशति, (तथा, यन्त्र, साधिते ), अत्र, यन्त्रगाः, दिशः, स्युः ॥ २५ ॥ अर्थः-इष्टकालमें जलकी समान इक सार करी हुई भूमिपर तुरीय यन्त्र रखकर टसपर दिगंश देय अर्यात् यन्त्रकी परिधा पर जितने दिगंदाहों उतने ही भंशॉपर चिन्हकरे और तुरीय यन्त्रके मध्यविन्दु पर एकसींक सड़ी करे टसकी छाया परिखापरके चिन्हसे लग जाय इस प्रकार साध कर तुरीय यन्त्रको फिरावे, तदनन्तर चिन्ह और तुरीय यन्त्रका मध्यविन्दु इन दोनोंको साधकर एक रेखा खेच. तो यह पूर्वापररेखा होतीहै, उस पूंचांपररेखाके दोभाग करके उस विभाग चिन्हके समीपसे एक लम्ब उतारे वह दक्षिणोत्तर रेखा होतीहै ॥२५॥ अव नलिकापन्धनकै अर्थ भुज कोटि लिखते हैं- कान्तिः स्फुटाऽभिमतकर्णगुणाक्षकर्णनिनीसखा- ब्रिहृदपक्रमदिग्भुजः स्यात् ॥ संस्कारितोयमदि- शाक्षभया. स्फुटोऽसो तद्वर्गभाकृतिवियोगपदंच कोटिः॥२६॥ ।
. (८०) ग्रहलाघय। [त्रिमन्ना- अन्वयः-स्फुटा, क्रान्तिः, अभिमतकर्णगुणाक्षकर्णनिनी, (ततः), . खखादित, .( कार्या, तदा), अपक्रमदिग्भुजः, स्यात् । असो, यमदिशा, अक्षभया, संस्कारित, स्फुटः, (भवति ), तद्वर्गभाकृति- वियोगपदम्, च, कोटिः, (स्यात् ) ॥२६॥ अर्थ:-जिस ग्रहका नलिकापन्ध कर उस ग्रहकी क्रान्तिका अपने शरसे संस्कार कर तब मान्ति स्पष्ट होतीहै, तदनन्तर इस स्पष्ट क्रान्तिको इष्ट कर्णसे गुणा कर तब जो गुणनफल होप उसको अक्षकर्णसे गुणाकर तव जो गुणनफल होय उसमें खखाद्रि ७०० का भाग देय तब जो लन्धि होय वह अद्भुलादि मध्यम भुज होताहै, उसको स्पष्ट क्रान्तिकी समान उत्तर अथवा दक्षिण समझे, तदनन्तर पलभाको दक्षिण मानकर उसमें मध्य . भुज दक्षिण होय तो मिलादेय और उत्तर होय तो घटादेय तब जो अङ्क ल- ब्धहीं. वह भट्ठलादि दक्षिण भुज होताहै, और यदि मध्यम भुज उत्तर होकर पलभाकी अपेक्षा अधिक होय तो उसमें पलभाको घटावै तब जो शेष बचै.वह अद्गुलादि उत्तर भुज होताहै और छायाका वर्ग करके उसमें भुजा- का वर्ग घंटाव तब जो शेषरहै उसका वर्गमूल निकालै वह कोटि होतीहै२६॥ 'उंदाहरण. सम्बत् १६६९ शके १५३४ पैशाख शुक्ल पौर्णिमा १५ सोमवारके दिन सूर्योदयसे गतघटी ५७ पर मङ्गलका नलिकावन्ध करते हैं तहाँ प्रातः कालीन मध्यम रवि १ रा० ४ अं० १३ ० ४५ वि० और उसकी मध्यम गति ५९ ० ८ वि० है। और मध्यभीम ९ रा०२९ अं० ५५ क० १३ वि० तथा उसकी मध्यम गति ३१ क० ३६ वि० है इष्ट घटी ५७ से चालित रवि हुआ १ रा०५ अं० ९क० ५२ वि० और इष्ट घटीसे चालित मङ्गल हुआ १० रा ०२० २५ क०४ वि० । अब स्पष्टीकरण दिखलातेहैं, रविका मन्दकेन्द्र १ रा० १२ अं ५० २०८ वि० है. मन्द फल धन १२० २८ क० ५५ वि० है इस मन्द फल- को चारित रधिौ धन करा तय १ रा०६ अं३८ क० ४७वि० हुआ यह मन्द स्पष्ट रवि हुमा, चर ऋण९५ विकलाहै इसको मन्द स्पष्ट रविमें घटाया तय १०६ अं० ३७ १.० १२वि० यह संस्कृत स्पष्ट रवि हुआ । भीमका शीघ्र केन्द्र ३ रा.४ अं०४४ का १८ वि० है, और शीघ्र फला दं धन १६ अं०५३ य०५८ वि०को चालित भीम १०-०० ०२५३० ४ घि० युक्त फरा तय १० स० १७ २०१८ क०२ पि यह दलस्पष्ट भौम हुमा, भय महहया मन्दयेन्द्र ५ रा० १२० ४१ क०५८ पि० भोर मन्द धिकारः४] सान्वयभाषाटीकासमेत । (८) फल धन ३ भं० १९ क० ४५ वि० है इसको चालित, भौम-१० रा००० २५ क० ४ वि० में युक्त करा तब १० रा०३ अं० ४४ क० ४१ वि० यह मन्दफलसंस्कृतभौम हुभा । द्वितीय शीघ्रकेन्द्र ३ रा० अ० २५, क० ३वि० है, शीघ्र फल धन ३२ २०५३: क० ४० वि० हुआ इसको मन्द फल संस्कृत भीम १०रा०३ २०४४ क०४८वि०में युक्त करा तवश्रा०६०३७ क०२९ वि० यह स्पष्ट भौम हुआ। भव दृकर्मसाधन कहिये मङ्गलके दृष्टि पड़नेके निमित्त जो गणित तिसके साधनकी रीति-तहाँ “ कुद्रिश्यन्धीत्यादि " रीतिके भनुसार शीघ्रकर्ण हुआ ११ २०४८ क०४० वि० और “ मन्दस्पष्टखमात्" इत्यादि रीतिके अनुसार दक्षिण क्रान्ति हुई २३ अं० ४४ क०५९ वि० और भंगुलादि दक्षिण शर हुआ २४ अगुल ३१ प्र० । और “प्राविभेणेत्यादि । रीतिके अनुसार तीन राशि रहित मङ्गल हुभा ८ रा०६३० ३७ क० २९ वि० इससे लाईहुई दक्षिण क्रान्ति हुई २३ २०४७ क० २९ वि० और दक्षिण अक्षांश हुए २५ अं० २६ क० ४२ वि० । इन दोनोंका संस्कार करनेसे दक्षिण नतांश हुए ४१ अं०१४ क० ११ वि०। फिर" पशैलाटेत्यादि " रीतिके अनुसार दृक र्म ११८ क० ४४ वि० धन हुभा इसको स्पष्ट रवि ११ रा०६ अं० ३७ क०३९ वि० में युक्त करा तब २१ रा०८अं० ३६ क० १३ वि० यह संस्कृत भीम हुई, इससे दक्षिण कान्ति आई १ अ० १७ क० ३१ वि० और शर संस्कृत स्पष्ट क्रान्ति दक्षिण हुई ३ अं० १ क दे वि० । इष्टपटी ५७ । दिनमान ३३ घटी १० पल । रविका भोग्य काल ५९ लग्न ० रा. १५ अं० ३३ क० २७ वि० लग्न भुक्त ३० कर्म देत मङ्गलका भोग्य काल १८ पल । मङ्गलका दिन गत दृधर्मदत्तभौमाञ्चरमित्यादि के अनुसार चर दक्षिण ६ फल दक्षिण ८ स्पष्ट चर दक्षिण १४ दिनमान २९ घ० ३२पल । स्पष्ट क्रान्ति और अक्षांश इन दोनोंके संस्कारसे लाए हुए नता. श २८ ०.२८ क० १५ वि० भऔर उन्नतांश हुए ६१ ३१ क० ४५ वि० इससे लाया हुआ पराख्य हुभा २१ । १२ । १४ मङ्गलका दिनगत काल ४५० २९ ५० यही उन्नत काल हुआ इससे लायाहुमा इष्ट कर्ण ३० महल २६ प्रति महल हुआ, इसको स्पष्टक्रान्ति ३।१०३३ से गुणा करा तव ९२१५॥१० हुए, इनको अक्षकर्ण १३ भट्ठल १९ प्रतिभद्गुलसे गुणा करा तव १२२६११६४८ हुए, इनमें ७००का भागदिया तब ११४५ यह मध्यम भन हुभा, यह क्रान्तिके दक्षिण होनेके कारण दक्षिण है, इसमें दक्षिणपलभा ५भंगुल ४५ प्रतिभद्गलको मिलाया तब ७ अट्ठल ३० प्रतिमगुल यह स्पष्ट भुज हुआ । अव इष्टकर्णसे "कार्कवर्गविवरात्पदमित्यादि रीतिसे इष्टछाया साध- नेके निमित्त इटकर्ण ३० १२६का वर्ग करा तय ९२६ । ११ हुए इसमें अक काल ४५० प० और ५ " रीति- (८२) ग्रहलायन। [विमना- कहिये १२का वर्ग १४४ घटाया तब ७८२ । ११ यह कर्णवर्ग और अर्कवर्गका अन्तर हुआ, इसका वर्गमूल लिया तब २७ । ५८ यह इटछाया हुई, इसका वर्ग करा तब ७८३1८ यह हुआ, और स्पष्टभुज ७।३० का वर्ग करा तर ५६।१५ हुआ. इन दोनों वर्गों ७८३ । ८-५६ । १५का अन्तर करा तब ५३५ । ५३ हुआ, इसका वर्गमूलं लिया तब २६ भंगुल .९६ प्रतिअंगुल यह कोटि हुई॥ अब नलिकावन्धनकी रीति लिखते हैं- ज्ञात्वाशाः परखेचरे परमुखी प्राक्खेचरे प्रामुखी विन्दोः कोटिमतोभुज स्वदिशितन्मध्यप्रभा विन्य सेत् । विन्दोर्भाग्रगशङ्खमस्तकगतेसूत्रे नले खेस्वर्ग केविन्दुस्थनरायभायगगते सूत्रे नले लोकयेत्॥२७॥ अन्वयः-आशाः, ज्ञावा, विन्दोः, परखेचरे, परमुखीम्, माक्खे. चरै, प्रामुखीम्, कोटिम्, विन्यसेत् । अतः, स्वदिशि भुजम्, (वि. न्यसेत् ) । तन्मध्य, प्रभाम्, (विन्यसेत् )। विन्दोः, भानगशंकुम- स्तफगते, सूत्र, नले, खे, खगम, लोकयेत् । बिन्दुस्थनराग्रगगते, सूत्रे, नले, फे, (सगम्, लोकयेत् ) ॥ २७ ॥ अर्थ:-समानकरी हुई भूमिपर अभीष्टछाया परिमित सूनसे एक पतुल कादकर उसमें दिशाओंके चिन्ह देय, फिर चर्तुलके मध्यसे ग्रह पश्चिमकपा- महोप ती पश्चिमकी ओर. और पूर्वकपालम होय ती पूर्वकी भोर भट्ठला- दि कोटि देय, तदनन्तर कोटिके भमभागसे लम्ब रेखापर भुजाद्गुलाको यदि भुग दक्षिण होय तो दक्षिणकी भोर उत्तर होप तो उत्तरको और देय भार सुनय अग्रभागसे पलक मापपर्यन्त एक कर्णरेरा चे, यह छापा होती ६.तदनन्तर सापाया अग्रभागमें दादशाहलया शकसकर उरा बांध अग्रभाग और पर्नुल्या मध्य इन दोनोपर पयः सूत्र हाये. उससूच रेरापर सचे अग्रभागमें एक नलिया. रयी, उस नलिफासे भाफाशी और देखें तो ग्रह दापताद। पदि जय मध्यम ग्रह देराना होप तो पर्नुपया मायम दादशाहल शा रामगर भनभागग सापानपर्यन्त पफ एम रोगाप मार उस राध रेणाराभप्रभाग एका नटिका रखरी, भोर सापायामभागमें एक. पलपूर्णकार परीभार टस पार गलियास देगतप जलम दमददीलतादि धिकार५] सान्वयभाषार्टीकासमेत । (८३) जिससमयकी गणित करीहो उस समयसे पहिलेही लाकर रक्खी हुई नलिकासे ग्रह दीखताहै, और यदि न दीखे तो गणित करनमें किसीमका- रकी भूल या जिसरीविसे गणित करीही इस रीतिमें किसीप्रकारका दोप है ऐसा जान ॥२७॥ इति श्रीगणकार्यपण्डितगणेशदेवतकृती ग्रहलायवकरणग्रन्थे पविमोत्तरदेशीयमुरादाबाद- वास्तव्य काशीराजकीयविद्यालये पण्डितस्वाभिराममिश्रशाविसान्निध्याधिगतविध- मारद्वाजगोत्रोत्सनगोड़वंशावतंसश्रीयुतभोलानायतनजपण्डितराम-- स्वरूपशर्मणा कृतया सान्वयमाव्याख्ययासहित- विप्रश्नाधिकारः समाप्तिमितः । अथ चन्द्रग्रहणाधिकारो व्याख्यायते । तहाँ प्रथम ग्रहांका वाटन लिखते हैं- गतगम्यदिनाहतद्युभुक्तः खरसाप्तांशवियुग्युतोग्रहः स्यात् । तत्कालभवस्तथावटीच्या खरसर्लन्धक- लोनसंयुतः स्यात् ॥ १॥ अन्वयः-गतगम्पदिनाहतद्युभुक्तः, खरसाप्तांशवियुक, युतः, ग्रहः, (कार्यः, । सः) तत्कालभवः, प्रहः, स्यात् । तथा, पटीन्याः, सरसैः, लब्धकलोन-संयुतः(ग्रहः, कार्यः,सः, तत्कालभव: ग्रहः स्यात्।।१॥ अर्थ:-गतकहिये व्यतीत या गम्य कहिये आगामि दिनासे ग्रहकी गतिको गुणाकर तब जो गुणनफल होप टसमें सरस कहिये ६०का भागदेय तव जो लब्धि होय अंशादि जाने, उसको गतदिवस हों तो ग्रहम घटादेय भीर गम्य दिन हो तो ग्रहमें युक्त करदेय तब इष्टकालीनग्रह होताहै । तिसीमकार गत भयवा गम्प घटियोंसे ग्रहकी गतिको गुणाकर तब जो गुणनफल होय टसमें ६०का भागदेय तव जो लब्धि होय उसको कलादि जाने उसको गत- घटीहों तो ग्रहमें घटादेय, और गम्यघटी हो तो ग्रहम युक्त करदेय, तब इष्टकालीन ग्रह होताहै। इस सन्धिको चालन कहते हैं॥१॥ इसरीति इतना विटोपध्यान रखना चाहिये कि चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणके विष भागमं पौर्णमासी भऔर अमावास्यां जितनी घटी हों उन पटिकामासे मायमरवि-चन्द्रोच-और रादुका चालन कर टेय .. (८) ग्रहलाघव। [चन्द्रग्रहणा- तदनन्तर स्पष्टीकरण कर, । तदनन्तर सूर्य और चन्द्रमासे तिथिकी घटी साथै, और तिन साधी हुई घटियोंको पञ्चाङ्गकी घटियाम युक्त करदेय, अथवा घटादेय, अर्थात् यदि.१४ या २९ गततिथि आये तो वर्तमान अमावा. स्या या पौर्णमासीसे जितनी गतघटी साधे उनको पञ्चाङ्गकी पर्वघटियों में युक्त करदेय, और यदि १५ या ३० गततिथिं आवै तो वर्तमान प्रतिपदासे गतघटी साधकर उनको पञ्चाङ्गकी घटियों में घटादेय तव पर्वान्तकालं होता हैं। इस प्रकार जो गतगम्य घटी आफैं उनसे ग्रहोंका चालन देय तब पर्वान्त कालीन ग्रह होते हैं ॥१॥ उदाहरण. सम्वत् १६७७ शाके १५४२ मार्गशीर्ष शुक्ल पौर्णिमासी बुधवार घटी ३८ पला ११ रोहिणी नक्षत्र घटी ९ पल ८ साध्ययोग घटी १० पल ३६ इसदिन चन्द्रग्रहणका पर्वकाल जाननेके निमित्त गणित करते हैं. • " दयधीन्दोनितेत्यादि " रीतिके अनुसार महर्गण हुआ ६३६ चक्र हुआ ९इस साधन करा हुआ प्रातःकालीन मध्यम सूर्य ८ रा०००८ क. ५९ वि० और मध्यम चन्द्र १ रा०२५ अं० १९क० ५७. वि० । भोर चन्द्रोच्च १०रा० ३ ० ३७ क०५ वि० और राहु दुआरा०२८ अं० २५ २०२७वि०। और तिथिकी घटी ३८i ११ पटसे चालित इष्टकालीन मध्यम रवि,८ रा० ० ० ४६ कर ३६ वि० और चन्द २ रा० ३ ० ४३ क० ४ वि० और चन्द्रोद्ध १०रा० ३ ०४१ २०२० वि० और राहु ७ रा०२८ २०२३ क० ३६ वि० । भप स्पष्टीकरण लिपते रविका मन्दयन्द्र हुभारी० १७ ० १३ क .२४ विकला । और मन्द्रमट ऋणे. *० ३९ का ५ विक मन्द स्पष्ट रवि ८रा०००७ २०३२वि० धन ११अपनाशरभं०१८ का। चर धन संगृत स्पष्ट रवि०८ रा०० को०-२८ विकली। प्रतिफलधन काला विकला । स्पष्टगंति ६१ २०.११ वि० विफल संम्मतचन्द्र रा०३० ५६ प.०१८ विफलामन्दकन्द्र ७ रा०२९ ०४५ कपि० । मन्दफल प्राण मंशा २० पारा १२ विकला। पटचन्द्र १ रा०३९ भ६. कला ६ पिकला । गतिफटधन ३३ फसा पिकला । सष्टगति २३ य० ५० वि- गटा । रयियन्द्ररी हा भोप पूर्णिमा ३ पटी ३७ पलाइनको पभागकी पी:८५०१ १० युक्ता फरा तप पर्षान्त फाख हुमा १०५० ४८ ५०। एप्पपटी ५०१५ पट चाटन करे?ए पयांन्तकारटीन तात्कारिक रवि ८० १.या०८ यि० । चन्द्ररा० ० ० १२ मा०६ पिकासा। राहु ८.८.४११८ पि०॥
धिकारः५] सान्वयभापाटीकासमेत । भव ग्रहणसम्भव और चन्द्रशर साधन लिखते हैं- एवं पूर्वान्ते विराह्ववाहोरिन्द्राल्पांशाः सम्भवश्वे- गृहस्य। तेंशानिन्नाः शहरे शैलभक्ता व्यग्वकोशः स्यात्पत्कोऽगुलादिः॥२॥ अन्वयः-एवम्, पर्वान्ते, विराव्हर्कबाहोः, चैत्, इन्द्राल्पांशाः, (तदा), ग्रहस्य, सम्भवः ।ते, अंशाः, शङ्करैः, निनाः, शैलभक्ता, (कार्याः, तदा) अहलादिः, पत्ता, व्यग्वांशः, स्यात् ॥ २ ॥ अर्थ:-पर्वान्तकालीन स्पष्ट रवि, राहुको घटाव जो शेप रहै वह व्यग्वर्क होताह । तदनन्तर व्यग्वर्वके भुज करके उसके अंग कर, वह अंदा यदि चादह अंशसे कम हो तो ग्रहणका सम्भव होताहै ! व्यग्यकै दिन भुजको ग्यारहसे गुणाकरके जो गुणनफल होय उसमें सातका भाग देय तय जो लन्धि मिले वह अंगुलादिगार होताहै, वह व्यन्वर्क मेषादि होप तो टत्तर भार तुलादि होय तो दक्षिण होताहै ॥२॥ उदाहरण. सष्टरवि ८राशि अंश २ का ६ विकलाम राहु ७ राशि २८ अंटा २३ कला १८ विकलाको घटाया तंब राशि अंश५८ कला ४८.विकल्ला.यह व्यग्वर्य (विराइक-हुआ। इसके भूनांश भंग १८ कला ४८ विकला हुप, यह १४ अंगको अपेक्षा यान है इसकारण ग्रहण सम्भव है। भुजांग ,भंग ८ कला १८ विकलाकों से गुणाकरा तय १९ अंग ५६ का ८ विकला हम इसमें ७ का भाग दिया तब मदुलादि लब्धि हुई २ मट्ठल ५० प्रतिभल यह चन्दार हुआ, व्यपर्क मेपादि है इस कारण उत्तर है : भय मुंव्यविम्य और चन्द्रविम्ब तया भभाविम्बसाधन लिगते हैं- गतिदिन्नौशाप्ताइलमुखतनुः स्यात्खररुचो. वि; थोमुक्तिवदादिभिरपद्धता बिम्बमुदितम्। तपाश्चा- ना. चान्द्री गतिरपहता,लोचनकर रदाढ्या भूभा स्यानिंगतिनगाशेन रहिता ॥३॥ ..
(८६) ग्रहलाघव। [चंद्रग्रहणा- अन्वयः-खररुवः, गतिः, दिनी, ईशाप्ता, अहलमुखतनुः, स्यात् । विधोः, भुक्तिः, वेदादिभिः, अपहता, बिम्बम्, उदितम्, । चान्द्री, गतिः, नृपारवाना, लोचनकरः, अपहृता, रदाव्या, दिनगतिनगा- शेन रहिता, भूभा, स्यात् ॥ ३ ॥ अर्थः-सूर्यको स्पष्टगतिको दोसे गुणाकर तब जो गुणनफल होप उसमें ग्यारहका भागदेय तव जो अड्डलादि लब्धि होय यह सूर्यविम्ब होता है । चन्द्रमाकी स्पष्टगति चौहत्तरका भागदेय तव जो लब्धि होय वह अगुला- दि चन्द्रबिम्ब होता है। और चन्द्रमाको स्पष्टगतिमें सातसी सोलह कला घटाकर जो शेष रहै उसमें बाईसका भागदेयतब जो लब्धि होय उसमें वत्तीस युक्तकर देय सब जो अङ्कयोग होय उसमें सूर्यको स्पष्ट गतिका सप्तमांश घटा देय तब जो शेष रहै वह अकुलादि भूभाविम्ब होता है, इसकोही राहुविम्ब कहते हैं ॥३॥ उदाहरण. सूर्यको स्पष्ट गति ६१ कला ११ विकलाको २ से गुणा करा तव १२३ कला २२ विकला हुई इसमें ११ का भाग दिया तव ११ अब्दुल ७ प्रतिअगुल यह सूर्यविम्ब हुआ। और चन्द्रमाकी स्पष्ट गति ८२३ कला ५० विकला में ४ का भाग दिया तय लब्धि हुई ११ अद्गुल ७ प्रतिभट्ठल यह चन्द्र विम्य हुआ। और चन्द्रमाको स्पष्ट गति ८२३ कला ५० विकलाम ७१६ घटाये तय शेष रहे १०७ कला ५० विकला इसमें २२ का भाग दिया तय लब्धि हुई ४ कला ५४ विकला इसमें ३२ कला युक्त करी तय ३६ कला ५४ विकला हुए, इसमें सूर्यको स्पष्ट गति ६१ कला ११ विकलाके सप्तमांश ८ कला ४५ विफटाको घटाया तव शेप रहे २८ अङ्कल १० प्रतिअट्ठल यह भूभा- विम्य अधांत राहुविम्ब हुआ ॥ अव मानक्यराण्ड और ग्राससाधन लिखते है। Ram छादयत्यर्कमिन्दुर्विधू भूमिभाछादकच्छाद्यमानैक्य- खण्डं कुरु।तच्छरोनं भवेच्छन्नमेतद्यदाग्राह्यहीनाव- शिष्टं तु खच्छन्नकम्॥४॥ अन्ययः-इन्दुः अर्फम, डादयति, भमिभा, विधुम्, (छादपति) (दंगणक) छादफच्छाधमानक्यसण्डम्, कुरु । तत्, शरीतम्। छ.
धिकार:५]
सान्वयभाषाटीकासमेत।
(८७)
त्रम्, भवेत्, । यदा, तु, एतत् ग्राह्यहीनावशिष्टम्, (तदा ), सच्छ-
नकम्, ( भवेत् ) ॥ ४॥
अर्थः सूर्यग्रहण होनेके समय चन्द्रमा सुर्यको आच्छादन करता है,
इस कारण सूर्यग्रहणमें चन्द्रमाको छादक और सूर्यको छाद्य कहते हैं।
और चन्द्रग्रहण होने के समय भूभा कहिये पृथ्वीकी छाया चन्द्रमाको
आच्छादन करती है, इस कारण चन्द्रग्रहणमें भूभाको छादक और चन्द्र-
माको छाद्य कहते हैं । छाद्य और छादक इन दोनोंके बिम्बोंका योग करके
दोका भाग देय तव जो लब्धि होय वह मानश्य खण्ड होता है। उस
मानस्य सण्टमें गरको घटावे तव जो शेष रहै यहं ग्रासविम्ब होता है।
परन्तु यदि मानस्य सण्डकी अपेक्षा शर अधिक होय तो ग्रहण नहीं होता
हैं। छाद्यके विम्वौ ग्रासविम्म घटावे तव जो शेष बचे वह विम्ब होता है।
यदि छाद्यविम्बकी अपेक्षा ग्रास विम्व अधिक होय तो ग्रासविम्बमसे छाद्य-
विम्बको घटा देय तव जो शेष रहे सोखग्रास होता है ॥४॥
उदाहरण. .
चन्द्र ग्रहणके वि छादक भूभा २८ अट्ठल १० प्रतिभद्गुल, छाद्य चन्द्र-
विम्ब ११ अद्गुल ७ प्रतिभहल, इन दोनों छाद्य छादकका योग करा तब ३९
अद्गुल १७ प्रतिअगुल हुआ, इसमें २ का भाग दिया तब मानस्यसण्ड
हुआ १९ अट्ठल ३८ प्रति भट्ठल इसमें शर २ महल ५० प्रतिभद्लकोघटाया
तव शेप रहा १६ अगुल ४८ मतिअद्भुल यह ग्रास हुआ, इसमें चन्द्रविम्व
२१ अहल ७ प्रतिभलको घटाया तव शेष रहा ५ अगुल ११ मतिअट्ठल.
यह समास बिम्ब हुआ।
अब ग्रहण मध्यस्थिति तथा सग्रासमर्द स्थिति लिखते हैं-
मानक्यखण्डमिणो सहितं दशनं छवाहतं पदम-
तः स्वरसांशहीनम्।।लोविम्बद्धस्थितिरिय घटिका-
दिकास्यान्मदै तथा तनुदलान्तरखग्रहांभ्याम्।।९।।
अन्वयः-इपुणा, सहितम्, मानक्यखण्डम, 'दशनम्, छन्नाहतम्,
(कार्यम् ), अतः, पदम्, स्वरसांशहीनम्, ग्लाविम्बहत (कार्यम्),
इयम्, घटिकादिका, स्थितिः, स्यात् । तथा, तनुदलान्तरसग्रहा.
भ्याम्, मर्दम्, (स्यात् ) ॥५॥
ग्रहलायय।
(८८)
[चन्द्रग्रहणा-
अर्थः-मानक्यसण्डमें शर 'युक्तकरके जो अद्योग हो उसको दशसे
गुणाकरके जो गुणनफल होय उसको फिर प्राससे गुणाकर तप जो गुण.
मफल होय उसका वर्गमूल निकालकर उसकी पाँचसे गुणा करक छका
भाग देय तय जो लंब्धि होय उसमें चन्द्रयिम्बके ममाणका भाग देय तव
जो लब्धि होय वह घटिकादिमध्यस्थिति होती है ।
और छाद्य तथा छादक इन दोनोंक विम्बके अन्तरका अर्ध और गग्रास
अहण करकै पूर्वोक्त रीतिसे मध्यस्थिति लायें वह मदस्थिति कहलाती है॥५॥
उदाहरण.
मानक्यखण्ड १९ अंगुल ३८ प्रतिभद्गुल में शर २ अगुल ५० प्रतिअगुल
को जोड़ा तब २२ अडुल २८ प्रतिअंगुल हुआ, इसको १० से गुणा करा तब
२२४ भट्ठल ४० प्रतिअदुल हुआ,, इस गुणनफलको ग्रास १६ भद्दल १८
प्रतिअगुलसे गुणा करा तव ३७७४ अट्ठल २४ प्रतिभट्ठल हुए, इसका वर्ग-
मूल निकाला तव ६१ अडल २४ प्रतिअट्ठल मिला, इसको ५ से गुणा करा
तर ३०७ अट्टल ० मतिअगुल हुआ, इसमें ६ का भाग दिया तप ५१ अतुल
१० प्रतिभडल मिला, इसमें 'चन्द्रविम्व ११ अद्गुल ७ प्रतिभदुलका भाग
द्यिा तय लब्धि हुई ४ घटी ३६ पलं यह मध्यस्थिति हुई।
चन्द्रपिम्ब ११ अगुल ७ प्रतिअड्डल और भूभाविम्ब २८ अट्ठल १० प्रति
अद्गुल इन दोनोंका अन्तर करा तव १७ भट्ठल ३ प्रतिअट्ठल हुआ, इसमें २
का भागदिया तव ८ अगुल ३२ प्रतिअट्ठल लब्धिहुई इसमें शर २ अङ्गुल ५०
प्रतिअडलको युक्त करा तब ११ अतुल २२ प्रतिभहल हुऐं, इसको १० से
गुणाकरा तब ११३ भद्गुल ४० मतिअट्टल हुए, इसको खग्रास ५ अगुल ४१
प्रतिभट्ठलसे गुणाकरा तव ६४६ अगुल • प्रतिअद्गुल हुआ, इसका वर्ग-
मूल निकाला तब २५ अगुल २४ प्रतिअडल मिले इसको ५से गुणाकरा तब
२२७ अट्टल ० प्रतिअडल हुए इसमें ६ का भागदिया तब लब्धि हुई २१ अ.
• दूल १० प्रतिभट्ठल, इसमें चन्द्रबिम्ब ११ भद्गुल ७ प्रतिशद्दलका भाग-
दिया तब लब्धिहुई १ घटी ५४ पल यह मर्दस्थिति हुई ॥ ५॥
स्पर्श स्थिति और मोक्षस्थिति तथा स्पर्शम और मोक्षमदं साधनेकी
रीति लियत है- यस)
युग्माहतैय॑गृभुजांशसमैः पलैः सा द्विष्ठा स्थितिर्वि-
रहिता सहितार्कपड्भात।उने व्यगावितरथाभ्यंधि-
'केस्थिती स्तः स्पशान्तिम क्रमगते च तथैव मर्दै॥६॥
. धिकारः५] सान्धसभापाटीकासमेत । (८९) .. अन्वयः-सा, विष्ठा, स्थितिः, व्यगौ, अर्कपड्भात्, ऊने, (सति), युग्माहतः, व्यगुभुजांशसमैः, पलैः, विरहिता, (ब), सहिता, (का: ा), अभ्यधिके, (सति), इतरथा, विरहिता, सहिता, (कार्या)। (तदा), क्रमगते, स्पर्शान्तिमे, स्थिती, स्तः । तथा, एष, मदें, च, (साध्ये) ॥ ६॥ अर्थः-व्यग्वर्कके भुजांशीको दोसे गुणाकरकै जो गुणनफल होय उसको पलात्मक मानकर मध्यस्थितिम मुक्तकरे और घटावै, परन्तु यदि व्यग्वर्क ५ राशि १६ अंश.६ राशिपर्यन्त होय या ११ राशि १६ अंशसे १२ राशि पर्यन्त होय तो युक्त करनेसे मक्षिस्थिति होतीहै,और घटानेसे शेष बचे सो स्पर्शस्थिति होतीहै । और यदि व्यग्वर्क ६ राशिसे ६ राशि १४ अंशपय्यंत होय अथवा ० राशिसे १० राशिं १४ अंशपर्यन्त होय तो मध्यस्थितिमें युक्त करनेसे स्पर्शस्थिति और घटादेनसे. जो शेपरहै सो मोक्षस्थिति होतीहै । तया मर्दस्थितिके. पलात्मक गुणनफलको पूर्ववत् युक्त कर और घटावे तो स्पर्शमद और मोक्षम होताहै ॥ ६॥ मा ५१११ १२ ६८00. 100 5१५ vife. ४ उदाहरण. स्या घटिकादि मध्यस्थिति ५ घ, ३६ ५. को दोस्थानमें लिखा । ३६।- ४ । ३६ और व्यग्यक राशि ? अंग १८ कला ४८ विकलाके भुजांश करे तब १ अंश ४८ काला ४८ विकला हुआ, इसको २ से गुणाकरा तच ३ अंश ३७ कला ३६ विकला हुए, इस गुणनफलके अंशांकी समान पलों ३ को एक स्थानकी मध्यस्थिति ४२.३६ प. में घटाया तय ४ ५.३३ प. यह मोक्ष स्थिति- हुई । क्योंकि व्यग्वर्क ० राशिसे लेकर १८ अंशक अन्तर्गत था। इस कारण ही दूसरे स्थानम..लिखी हुई मध्यस्थिति ५ घ. ३६ प. में ऊपरोक्त गुणनफ- लके भंगांकी तुल्यपलों को युक्त करा तय घ.३९५.यह स्पर्श स्थिति हुई- इसीप्रकार मर्दस्थितिको १ घ.५४ प. मर्दस्थितिको दो स्थानमें १।५४ -- २१५४ । एक स्थानमें ऊपरोक्तं गुणनफलके अंशोकी समान पलों को य- टाया तय १ घ.५१ प. यह मोक्षमई हुआ, और दूसरे स्थानमें लिखीहुई मर्द- स्थिति ? । ५४ में गुणनफलके अंडोंकी समानपस्टौं ३ को युक्त करा तय १ घ. ५७ प. यह म्पशंमद हुभा ॥ अब मायग्रहणके स्पर्शकाल, मोक्षकार, और संमीटनकार कहिये राप्राप्त स्पर्शकाल. तथा उन्मीलनकाल कहिये यग्रासमोक्षकालक साधनेकी रीति- यत * . (९०) ग्रहलापव। [चंद्रग्रहणा- तिथिविरतिरयं ग्रहस्य मध्यः स च रहितः सहितो निजस्थितिभ्याम् । ग्रहणमुखविरामयोस्तु काला- विति पिहितापिहिते स्वमदकाभ्याम् ॥७॥ अन्वयः-तिथिविरतिः, अयम्, ग्रहस्य, मध्यः, (भवति)। स च, निजस्थितिभ्याम्, ( एकत्र ), रहितः, ( अन्यत्र), सहितः, ग्रहमुख विरामयोः, कालौ, ( स्तः ) । इति, स्वमर्दकाभ्याम्, पिहिता- पिहिते, ( स्तः) ॥ ७॥ अर्थ:-पौर्णिमा तिथिका जो अन्त सो ग्रहणका मध्यकाल होताहै । उस म- ध्यकालको दोस्थानमें लिखकर एक स्थानमें स्पर्शस्थितिको घटादेय तब जो शेपरहै सो स्पर्शकाल होताहै । और दूसरे स्थान में लिखेहुए मध्यकालमें मोक्षस्थितिको युक्तकर, तब जो अङ्कयोग हो वह मोक्षकाल होताहै मोक्ष- "कालमे स्पर्शकालको घटादेय तव पर्वकाल होताहै । इस प्रकार तिथ्यन्तरूप ग्रहणके मध्यकालमें स्पर्शमर्दको घटावै तब जो शेपरहै सो संमीलनकाल होताहै,और मध्यकालमें मोक्षमर्दको युक्तकर तवजो अतयोग हो सो उन्मीलन काल होताहै उन्मीलन कालमें संमीलनं कालको घटादेय तब जो शेषरहै सो समास पर्वकाल होताहै ॥ ७ ॥ उदाहरण. तिथ्यन्त ४०घटी४८पल है यह ग्रहणका मध्यकाल हुआ, इसे दोस्थानमें लि- सा१०।४८१-४० । ४८ एकस्थानमें स्पर्शस्थिति घटी ३९ प.को घटा- यो तब ३६ घटी ९ पल शेषरहा यह स्पर्शकाल हुआ, दूसरे स्थानमें लिखे- हुए मध्यकालमें मोक्षस्थिति ४ घटी ३३ पलको युक्त करा तब४५ घटी २१ पल यह मोदाकाल हुआ। मोक्षकार ४५ घ० २१ प०में स्पर्शकाल ३६ २० ९५० को घटाया तय शेषरहा ९घ० १२ १० यह संपिाल हुआ ॥ तिसीप्रकार मध्यकाल ४० घटी ४८ पलमें स्पर्शमर्दको घटाया तय शेष- रहा ३८ घ०५१ प० यह संमीलनकाल हुआ, भीर मध्यकाल ४० घटी ४८पल में मौसमदं । ५० ५१ ५०को युक्त करा तय अवयोग हुमा ४२ घटी ३९ पल यह दम्मीलनकाल हुआ। उन्मीलनकाल ४२ ५०३९५० में समीलनकाल ३८५०५११०को घटाया तब शेपरदे ३५०४८ ५५ यह राग्रास पर्वकाल हुए।
धिकारः५] सान्वयभाषाटीकासमेत । (९) भव इष्टकालीन ग्राससाधनकी रीति लिखते पिहितहतेष्टं स्थितिविहृतं तत्ासचरण युग्यसन- मभीष्टम् ॥ ८॥ अन्वयः-पिहितहतेष्टम्, स्थितिविहतम्, तत्, अभीष्टम्, सवर- णभूयुन्, ग्रसनम्, (भवति)॥ ८ ॥ अर्थः-पासको इष्टयटिकाओंसे गुणा करके जो गुणनफल होय उसमें यदि इष्टटिया स्पर्शकालीन हो तो पो स्थितिका और मोक्षकालीन हो तो. मोक्षस्थितिका भागदेय तव जो लब्धिहोय उसको अगुलादि जाने, और उसमें १ अद्गुल १५ प्रतिभट्ठल युक्त करदेय तय इष्टकालीन ग्रास होताहै।८॥ उदाहरण. स्पांक अनन्तर फलित घटी २ से ग्रास १६ भद्गुल १८ प्रतिमहलको गुणा करा तव ३३ अट्ठल ३६ प्रतिभद्गुल हुआ, इयटिका स्पर्शकालीन है इसकारण गुणनफल ३३ भदुल २६ प्रतिअगुल्में स्पर्गस्थिति ४ पटी ९ पल- का भागदिया तव लन्धि हुई ७ भट्ठल १३ प्रतिअट्ठल, इसमें अट्ठल १५प्रति- अद्गुल युक्तकरं तर ८ अट्ठल २८ प्रतिअट्ठल, यह इष्टकालीन ग्रास हुमा ।। हर, अब भयनयटनसाधनकी रीति लिखते हैं- विभयुतोनरविः स्वविधुग्रहेऽयनलवाश्य इतश्वरबद्द- ले। नगशरेन्दुमितेर्वलनं भवेत्स्वरविदिक्- अन्वयः-स्वविधुग्रहे, त्रिभयुतोनरविः, अयनलवाट्यः, ( कार्यः) इतः, नगशरेन्दुमितैः, दलैः, चरवत, स्वरविदिक, वलनम्, भवेत् ।। अर्थ:-सूर्यग्रहणक विपं स्पष्ट रविमें राशि मिलाव, और चन्द्रग्रहणके, 'विप मटरविमं : राशि घटाप, तदनन्तर टस रधिमं अयनांटा मिलादेय, तदनन्तर तिससे प्रथम द्वितीय तृतीय १ इन राण्डाको ग्रहण करके घरमाधनको समान साधनकर तय भद्गलादि चलन होताई । अयनांश- पुक्त रवि मैपादि होय तो उत्तर और तुलादि होय ती दक्षिण होताई इसको . अपनयटन कदन है। उदाहरण. मटरनिराशि ० अंश १२ कला ६ विकलाम,चन्द्रग्रहण होने के कारण ।
(९१) ग्रहलाघवा [चन्द्रग्रहणा- ३राशि घटाई तब शेपरहा ५राशि अंश १५ कला ६ विकला, इसम अय- नांश १८भंश कलाको युक्तकरा तय ५राशि १८ अंश २० कला ६ विक हुआ, यह सायनरवि हुआ इसके भजकरे ० राशि ११ अंश २९ कला ५४ वि० इसमें शून्य राशिह इसकारण प्रथम खण्ड ७ से ११ अंश २९ कला ५४ विकर को गुणा करा तब ८० अंश २९ कला १८ विकला हुए, इसमें ३० का भाग दिया तब लब्धि हुई २ संश४० कला इसमें ० सण्टको युक्तकरा तब २ अंश ४० कला यह अयनघलन हुभा, यह सायनरवि मेपादिहै इसकारण उत्तरहै । मध्यनतसाधन लिखतेहैं--- 'यातः शेपः प्राक्परत्रोन्नतमित्यादि (विप्रमाधिकार ७मा श्लोक चन्द्रग्रहणके मध्यकालमें दिनमानको घटाकर जो शेषरहै उसका भी गन्यद्धका अन्तर करै तब मध्यनत होताहै वह, यदि ग्रहण मध्यकाल पूर्वरा त्रिके विप होय तो पूर्व, और उत्तरराबिमें होय तो पश्चिम होताहै, । इसी प्रकार सूर्यग्रहणके मध्यकाल और दिनाका अन्तर करै तब सूर्यग्रहणके वि मध्यनत होताहै, इसकी दिशा पूर्वोक्तरीतिके अनुसार जाननी । उदाहरण. १५ घटी-चर १ घटी ५४ पल, दिनार्द्ध १३घटी ६ पल, दिनमान २६ घटी १२ पल, भौर १५ घटीचर । घटी ५४ पल, रायद्ध १६ घटी ५४ पल, रात्रि- मान ३३घटी ४८ पल । चन्द्रग्रहणके मध्यकाल ४० घटी ४८ पलमें दिनमान २६ घटी १२ पलको घटाया तव शेपरहा १४ घटी ३६पल यह रात्रि में ग्रहणका मध्यकालहै इसका और रायर्द्ध १६ घटी ५४ पलका अन्तर करा तब २ घटी १८पल यह मध्यनतकाल हुआग्रहण मध्यकाल पूर्वरात्रिम है, इसकारण पूर्वहै। ग्रस्तोदित अथवा ग्रस्तास्त होनेपर मध्यनतसाधन लिखते हैं--- (स्पेशादिकं यदि विधोदिवसस्य शेपे यातेऽथवाधु- दलतद्विवरं रवेस्तु । रात्रेस्तदूनितनिशाशकलं क्र- मात्स्यात्प्राक्पश्चिमंनतमिदं वलनस्य सिद्धये ॥ ३ ॥ अन्ययः अथवा, यदि, विधाः, स्पादिकम्, दिवसस्य, शेपे याते (तदा), शुदलतदिवरम्, (मध्यनतम, स्यात् ), रच; तु, (यदि) १परोक क्षेपर है- यांतरसे हाराहे- पारण, नयमोकका चर्य घरका सबै आमय, शेकमें जमा है इससे न- १ .
धिकारः५] सान्वयभापाटीकासमेत । (९३) रात्रः, (शेपे, याते, तदा, ), तंदूनितनिशाशकलम्, (कार्यम् ), इदम् वलनस्य, सिद्धयै, कमात्, प्राक, पश्चिमम्, नतम: स्यात् ॥१॥ अर्थ:-चन्द्रग्रहणकास्पर्श सूर्यास्तसे पहिले जितनी घटीही, उतनीघटीको दिनार्द्ध में घटावै तब जो शेष रह सो पूर्व मध्यनत होता है, और चन्द्र ग्रहणका मोक्ष सूर्योदयके.अनन्तर जितनी घटीपर हो उतनी घटी दिनार्द्धमें घटा देय, तव जो शेप रहे तो पश्चिम मध्यनत है ।। सूर्यग्रहणका स्पर्श सूर्योदयसे पहिले जितनी घटीपर हो उतनी घटी राज्यर्द्धम घटावै तब जो शेष रहै सो पूर्व मध्यनत होताहै और सूर्य- ग्रहणका मोक्ष सुर्यास्त होनेके अनन्तर जितनी घटीपर हो, उतनी घटी राज्य में घटादेय तब जो शेष रहै सो पश्चिम मध्यनत होता है ॥१॥ अव अक्षवलन साधनकी रीति लिखते हैं- त्वथमध्यनताच यत् ॥९॥ विपयलुब्धग्रहादित उक्तवद्वलनमसंहृतं पलभाह- तम् । उदगपांगिह पूर्वपरे क्रमाद्रसंहतोभयंसंस्कृ- तिरछ्यः॥ १०॥ अन्वयः-अथ, तु, यत, मध्यनतात्, (ततः), विपयलब्धग्रहादितः, उक्तवत्, वलनम्, (साध्यम्, ततः), पलभाहतम्, (ततः) अक्ष- हृतम्, (अक्षवलनम्, स्यातु), इह, पूर्वपरे, कमात्, उदक, अपाक्, (स्यात् ) उभयसंस्कृतिः, रसहता, (सती), अंग्रयः, स्युः ॥९॥१०॥ अर्थः-मध्यनतमें पाँचका भाग देकर जो राश्यादि लब्धि होय. उसमें भय- नांश न मिलाकर तिससे (७,५, १,) इन तीन खण्डोंको मानकर बल- न सांधे, भऔर उसको पलभासे गुणा करके जो गुणनफल होय उसमें पाँचका भाग देय तव जो लब्धि होय वह भगुलादि अक्षवलन होता है, यदि मम्पनत पूर्व होय तो उत्तर और मध्यनत पश्चिम होप ती दक्षिण होता है। अयनवलन और भक्षवलन इन दोनोंकी एक दिशा होय तो दोनोंका योग कर लेय, और दोनोंकी भिन्न दिशा होप ती अन्तरकर लेय, तदनन्तर .
. (९४) ग्रहलायव । [चंद्रग्रहणा- उसमें छाका भाग देय तप जो अहलादि लब्धि होय यह पलनानि होते हैं, उनकी दिशा भङ्क योग अथवा अन्तरकी जो दिशा हो सोई होती है।९।॥१०॥ उदाहरणं. मध्यनत पूर्व २ घटी १८ पलको ५ से गुणाकरा तव • राशि ३७ अंश ३६ कला विकला इससे वलन लाए तव ३ अंश ३८ काला २४ विकला आया इसको पलमा ५ अद्गुल ४५ प्रतिभगुल से गुणाकरा तय २० अंश ५५ कला हुमा, इसमें ५ का भाग दिया तब अट्ठलादि लब्धि हुई ४ भट्ठल ।। प्रतिअडुल यह अक्षयटन हुआ, यह मध्यनतके पूर्व होनेके कारण उत्तर है। अपनवलन २ । ४० उत्तर है, और अक्षवलन से 1.११ उत्तर है, इन दोनोंकी एक दिशा होनेका कारण दोनोंका योग करा तव ६ अगुल ५२ प्रति- अट्ठल हुए इसमें ६ का भाग दिया तब लब्धि हुई अगुल ८ प्रतिअगुल, यह उत्तर वलनांघ्रि हुए। अव ग्रासाइग्नि और खनासाइघि साधनकी रीति लिखते हैं- 11 मानक्याईहतात्खपनापिहितान्मूलंतदाशाङ्मयः खच्छन्नं सदलेकयुक्च गदिताःखच्छन्नजाशाङ्मयः usin अन्वयः-मानैक्याईहतात, वपन्नपिहितात, मूलम्, (ग्राह्यम), (तत्), तदाशांप्रयः, (स्युः)। सदलैकयुक्खच्छन्नम्, च,सच्छन्न- जाशांश्रयः, गदिताः ॥5॥ अर्थः ग्रासको साउसे गुणाकरके जो गुणनफल होय उसमें मानक्य- खण्डका"भाग देय, तब जो लब्धि होय उसका वर्गमूल निकालै वह भलादि ग्रासाद्धि होते हैं । समासमें १ अगुल ३० प्रतिबद्धल युक्तकर देय सब खग्रासाद्धि होते हैं । ॥ उदाहरण. ग्रास १६ भद्ल ४८ प्रतिभडलको ६० से गुणा करा तय १००८ भद्गुल हुए, इसमें मानक्पसण्ड १९ भट्ठल ३८ प्रतिअगुलका भाग दिया तब सन्धि हुई ५१ अहल २० प्रसिअहल, इसका धर्गमूल निकाला तय ७ अ- ल ९ प्रतिभट्ठल यह प्रासाइमि हुए। पग्राम ५ भद्गुल ४१ प्रतिभद्रुटमें १ अद्गुल ३० प्रतिभट्ठलको युक्त करा तप ७ भद्गुल ११ प्रतिभहुल यह समासान हुए ॥3॥ .
. अधिकार सान्वयभापाठीकासमेत । अव ग्रहणके मध्यकी दिशा जाननेकी रीति लिखते हैं- सव्यासव्यमपागुदग्वलनजाशांनीन्प्रदद्याच्छराशा- याः स्याद्हमध्यमन्यदिशि खग्रासोऽथवा शेपकम्११ अन्वयः-शराशायाः,अपागुदग्वलनजाशांप्रीन्, सन्यासव्यम्, प्रद यात् । (तत्र ), ग्रहमध्यम्, स्यात् । अन्यदिशि खग्रासः अथया, शेषकम, (स्यात् ) ॥ ११ ॥ छाध विम्बके अपरिमित सूत्रसे एक वर्तुल कादकर, और दस वर्नु- लके विपं दिशाओंकी रेखा काढ़कर उसका एकसे बत्तीस भाग कर, तदन- न्तर शारकी जो दिशा हो टस दिगाके उत्तर भयत्रा दक्षिण दिशाके बिन्दुसे यदि वलनाधि उत्तर हो तो टलट क्रमसे शरकी दिशा देय अर्थात् वाम हाथकी ओरसे दाहिने हायकी औरको देय । और यदि वलनाति दक्षिण होती क्रमसे अर्थात् दक्षिण हस्तकी और वाम हस्तकी ओरको देय । टस दिशामही मध्य ग्रहण होता है । और उससे अन्य दिशाम खग्रासका अथवा शेप विम्बका मध्य होता है।॥ ११ ॥ अब सशंदिया और मोक्षदिया जाननेकी रीति लिखते हैं- मध्याच्छन्नाशाइनिभिः प्राक्च पश्चादिन्दोय॑स्तं तृप्णगो स्पर्शमोक्षो । सग्रस्तात्तच्छन्नपादेः परे पारदत्तेरिन्दोलिनोन्मीलने स्तः ॥ १२ ॥ अन्वयः-मध्यात्, पाक,, पश्चात, च, (दत्तैः ), छन्नाशांप्रिभिः, इन्दोः, स्पर्शमोती, स्तः। उष्णगोः, तु, व्यस्तम् । समासात, परे, माफ, दत्तः, खच्छन्नपादैः, इन्दोः, मीलनोन्मीलने, स्तः, (खेः, तु, व्यस्तम्, नेयम् ) ॥ १२ ॥ अप:-महगके माप चिन्ह पानसे प्रासांनिपूर्वकी और देय, वहाँ चन्द्र- ग्रहगका सहा दोताद और पश्चिमकी और देप ती तहाँ चन्द्रग्रहणका मोक्ष होताहै। सम्यग्रहणका इसमें विपरीतह भयाद मध्य चिन्दके पाससे ग्रा- सामि पश्चिमकी भोर दिये हों तो वहाँ सूर्यग्रहणका सा होताहै, भोर 1 उन्मील नस्पर्श आ. खग्रास (९६) ग्रहलाघव। [चन्द्रग्रहणा- पूर्वकी ओर दिये हों तो तहाँ सूर्यग्रहणका मोक्ष होता है। इसी प्रकार खग्रा- सके मध्य चिह्नके पाससे खग्रासांघ्रि पश्चिमकी ओर दिये हो तो तहाँ खग्रा- सस्पर्श होताहै, और पूर्वकी ओर दिये हो तो तहाँ खग्रासका मोक्ष होताहै। और सूर्यग्रहणके वि विपरीत होताहै अर्थात् खग्रासके चिन्हकेसे पूर्वकी ओर खग्रासांनि दिये हों तौ तहाँ खग्रासका स्पर्श होताहै और पश्चिमकी और दिये हों तौ तहाँ खग्रासका मोक्ष होताहै ॥ १२ ॥ जिस प्रकार इसलिखी हुई। पूर्व आकृतिके विडं चन्द्रबिम्ब | ११ अडल ७ प्रतिअट्ठल, यहाँ त्रिज्यासे वर्तुल काढ़- कर उसमें दिशाओंके विन्दु |२१५ ३२ दिखाएहैं और शर २ | शर अकुल ५० मति अं० उत्तर है, उ. और वलनांनि १ 'अल ८ प्रतिअठ्ठल उत्तरहै अर्थात् उत्तरकी विन्दुसे विपरीत रीतिसे अर्थात् पश्चिमकी और F देकर तहाँ ग्रहणमध्य दिख लाया है, और उसके अनन्तर खग्रास बिम्ब दिखलाया है: ग्रहणके माय बिन्दुसे पूर्वको और पश्चिमकी भोर प्रासांनि ७ अतुल ९ प्रतिभगुल देकर तहाँ स्पर्श और मोक्षके चिन्ह दिखलाएहैं, तिसी प्रकार खग्रासके मध्य चिन्हसे पश्चिम या पूर्व दिशाकी ओर खग्रासांघ्रि ७अदुल १९मति अगुल देकर तहाँ संमिलन भऔर उन्मीलन दिखायाहै ॥.१२ ॥ .' इति श्रीगणकमर्यपण्डितगणेशदैवज्ञकृती ग्रहलाघवकरणप्रन्ये पश्चिमोत्तरदेशीय- मुरादाबादवास्तव्य-काशीस्थराजकीयसंस्कृतविद्यालयप्रधानाध्यापक- पण्डितस्वामिराममिथशास्त्रिप्तान्निध्याधिगतविद्यभारद्वाज- गोत्रौत्सन्नगौरवंशावतंसश्रीयुतभोलानाथतमजपण्डि- तरामरपहपशर्मणा कृतया सान्वयमाषान्याख्यया सहितचन्द्रग्रहणाधिकारः समाप्तिमितः ॥ ५॥ मध्य वा. सम्मीलन धिकारः ६ सान्वयभाषाटीकासमेत । (९७) अथ सूर्यग्रहणाधिकारो व्याख्यायते । भवहार लम्बन और लम्बनसंस्कृत तिथिसाधन लिखतेहैं- लग्नं दर्शान्ते त्रिभोनं पृथक्स्थं तत्कान्त्यशैः संस्कृ तोऽक्षोनतांशाः । तद्दिद्वयंशोवर्गितश्चेद्धिकोोंड धोऽसौद्यूनः खण्डितस्तद्युतः सः॥ १॥ सार्कोहारः स्यात्रिभोनोदयार्कविश्लपाशाशांशहोननशकाः । हाराप्ताः स्याल्लम्बनं नाडिकाचं तिथ्यां स्वर्ण वि- विभेकाधिकोने ॥२॥ अन्वयः-दर्शान्ते, लमम्, विभीनम्, पृथक्स्थम्, ( कार्य्यम् ), तत्कान्त्यशैः संस्कृतः, अक्षः, नतांशाः, स्युः । तद्विद्वयंशः, वर्गितः, सन, चेत्, द्विकोर्ध्वः, ( स्यात, तदा), असौ, अधः, (स्थाप्यः)। (ततः ), यूनः, सन्, सण्डितः, (कार्यः, यत, फलम्, स्यात् ), तद्युतः, सः, सार्की, हारः, स्यात् । त्रिभोनोदयार्कविश्लेषांशांशांशही- नाशकाः) हाराप्ताः, नाडिकाद्यम्, लम्बनम्, स्यात् । वित्रिभे, अर्का- धिकोने, (सति), तिथ्याम्, स्वर्णम्, ( कार्यम् ) ॥ १ ॥ २ ॥ अर्थः-अमावास्याके भन्तकी लग्न करके, उस लग्नमें तीन राशि घटादेय तब विभीनलग्न होतीहै, तिस विभोन लग्नसे क्रान्ति लाकर, तिस विभोन- का भीर अक्षांशोक संस्कार करके नतांश लाचे तदनन्तर नतांशोंमें बाईस- का भागदेय तब जो लब्धि होय उसका वर्ग करे तव जो वर्गफल होय वह यदि दोसे अधिक होय तो उसको नीचे अलग एक स्थानमें स्थापन करदेय तदनन्तर टसमें दो घटाकर जो शेष रहै उसका भाधाकरके जो भी उनको मलग स्थानमें लिखेहुए अटोंमें युक्त करदेय तय जो अङ्कयोग होय उसमें चारह भंश युक्त करदेय तव हार होताहै । स्पष्ट रवि भौर विभोन लप इन दोनोंका अन्तर करके जो अंश आवं उनमें दशका भागदेय तर जो सन्धि होय उसको चौदहमें घटाव तर जो शेषरहै उसको पूर्वोक्त लब्धिसे गुणाकर तब जो गुणन फल होय उसमें पूर्वोक्त हारका भाग देय तर जो । सन्धि हो वह घटिकादिलम्बन होताह, यह लम्बन यदि रिभोन लप स्पष्ट ० धिकारः ६] सान्वयभाषाटीकासमेत । (९९) अंश ३८ कला १० विकला, इसका और अक्षांश दक्षिण २५ अंश २६ कला ४२ विकलाका एकदिशा होनेके कारण योगकरा तव ४९ अंश कला ५२ वि- कला, यह दक्षिणनतांश हुआ, इसमें २३ का भागदिया तव लब्धिहुई ३ अंश १: कला ५१ विकला, इसका वर्गकरा तव ४ अंश ५८ कला ३५ विकला हुआ, यह वर्ग देशकी अपेक्षा अधिकहै इसकारण इसमें २ अंश घटाए तब शेषरहा २ अंश ५८ कला ३५ विकला, इसमें २ का भागदिया तव लब्धिहुई १ अंश २९ कला १७ विकला, इस लब्धिको वर्गा५८ । ३५ मेंयुक्तकरा तब ६ अंश २७ कला ५२ विकला हुआ, इसमें १२ अंश युक्तकरे तब १८ अंश २७ कला ५२ विकला यह हार हुमा । फिर स्पष्ट रवि ८ राशि ५भंश २६ कला २५ विकला, त्रिभोन लग्न ८ राशि २ अंश ४६ कला १७ विकला, इन दोनोंका अन्तर करा तब राशि २ अंश १० कला ८ विकला, इसमें १० का भागदिया तब लब्धिहुई ० अंशं १६ कला विकला, इसको १४ अंशम पटाया तवं.शेषरहा १३ अंश ४ कलावि-. कला, इसको दशमांश लब्धि भंश १६ कला विकलासे.गुणाकरा वव ३अंश ३९ कला ४४ विकला हुआ इसमें हार १८ अंश २७ कला ५३ विकला- का भागदिया तव घटिकादि लम्बन हुमा ऋण घटी १३ पल, त्रिभोन लग्न सूर्यकी अपेक्षा कमह इसकारण यह ऋण है । दशान्त १३ घटी १ पलमें लम्बन घटी ११ पलको ऋणकरा तब १२ घटी ५. पर यह एम्बनसंस्कृत दन्ति हुमा ॥२॥ अब लम्वनसंस्कृत व्यग्यकं मोर चन्द्रशरसाधन लिखतेहैं- विकुनिन्नविलम्बनं कलास्तत्सहितोनस्थितिवद्वय गुः शरोऽतः॥5॥ . अन्वयः-त्रिकुनिनविलम्बनम्, कला, (स्युः ) तिथिवा, न्यगुः, तत्सहितोनः, ( कार्यः), अतः, शरः, ( साध्यः).!! अर्थ:-लम्बनको तेरहसे गुणा करके जो गुणनफल हो वह कटा होती है। टन कलाओंको लम्बनकी समान व्यग्वको धन अथवा ऋण करदेय, तर लम्बनसंस्कृत व्यग्वकं होताहै, तदनन्तर विस लम्बनसंस्कृत व्यग्वकते. शरको साधनकर ॥७॥ उदाहरण. 'लम्बन घटीपल इसको १३ से गुणाकरा तव कलादि गुणनफल .
. १ (९८) ग्रहलायय। [सूर्यग्रहणा- सूर्यकी अपेक्षा अधिक होय तो धन और कम होय तौऋण होताह । दर्शा- न्तकी घटिकाओंमें लम्बनको धन या ऋणकरै तब लम्पन संस्कृतदर्शान्त होताहै, यह सूर्यग्रहणका मध्य काल होताहै ॥ १॥२॥ उदाहरण. संचद १६६७ शाके १५३२ मार्गशीर्ष कृष्ण अमावास्या ३० बुधवार घटी १२ । प्र०३६ मूल नक्षत्र ५५ घंटी ५२ पल गण्डयोग २३ घटी।५ पल इसदिन सूर्यग्रहणका पर्वकाल साधनेके निमित्त गणित करतेहैं। चक्र अहर्गण १००५, अधिमास १० अवम १५, प्रातःकालीन मध्यम रवि ८ राशि ५ अंश ३९ कला २५ विकला । मध्यमचन्द्र ८ राशि १ अंश १० कला ३३ विकला । चन्द्रोच्च ८ राशि १७ अंश २७ कला २१ विकला। राहु २ राशि ११ अंश ४१ कला १९ विकला। इष्टकालीन मध्यम रवि ८ राशि५ अंश ५१ कला ५० विकला । मध्यम चन्द्र ८ राशि ३ अंश ५६ करा ३४ विकला। चन्द्रोच्च ८ राशि १७ अंश २८ कला ५ विकला। राहु २ राशि ११ अंश ४१ कला १९ विकला। स्पष्टीकरण-रविका मन्दकेन्द्र ६ राशि १२ अंश ८कला.१० विकला । मन्दफल ऋण ० अंश २७ कला ५० विकंला । मन्दस्पष्ट रवि ८ राशि ५अंश २४ कला विकला । भयनांश १८ अंश ८ कला चरखण्ड ५७ । ४६ । १९ । चरधन ११७॥ चरसे संस्कार किया हुआ रवि ८ राशि ५भंश २५ कला ५७ विकला । गतिफल धन २ कला ७ विकला । स्पष्टगति ६१ कला १५ बिकला। विफलसंस्कृत चन्द्र ८ राशि ४ अंश १० कलां ५३ विकला । मन्दकेन्द्र १३ भंश १७ कला ५० विकला । मन्दफल धन १ अंश ९कला ४८ विकला । स्पष्ट चन्द्र ८ राशि ५अंश २० कला ४१ विकला गतिफल ऋण ६४ कला५वि- कला। स्पष्टगति ७२६ कला ३० विकला । भप रविचन्द्रसे गततिथि २९ आई । और अमावास्याकी एप्य घटी ०३० २८ पल आई इनकी पञ्चास्य घटिका १२ । ३६ भीम युक्तकरा तव १३ घटी ४पल यह दशान्त घटिका हुई, अर्थात् दर्शान्तकालीन ग्रहलाने के निमित घ:२८ सल इसका चालनदेकर लाए हुए ग्रह-स्परवि ८ राशि५अंश २६ कला २५पिकलास्पष्टचन्द्रराशि ५२६ कलापविकला। राहु राशि २१ मंश ४१ कला १८ विकलाविरादर्फ ५ राशि २३ भंश५५ कला विकला। मप, सप्टरपि ८ राशि ५ भंश २६ काला २५ विकला लग्नभोग्यकाल ७३ पळ । दर्शान्त १३ घटी। पर, इससे सायादुमा लम ११ राशि २ अंश कला १७ पिकाला, इसमें ३ राशिको घटाया तसं शेपरदा ८ राशि २ अंश । कमा १७ पिफला पद्द विभीन हमहुमा, इससे लाहुई शान्ति दक्षिण . धिकारः६] सान्वयभाषाटीकासमेत ! अंश ३८ कला १० विकला, इसका और भक्षांश दक्षिण २५ अंग २६ कला ४२ विकलाका एकदिशा होनेके कारण योगकरा तब ४९ अंश ४ कला ५२ वि- कला, यह दक्षिणनतांश हुमा, इसमें २२ का भागदिया तव लब्धिहुई ३ अंश १३ कला ५१ विकला, इसका वर्गकरा तव भंश ५८ कला ३५ विकला हुमा, यह वर्ग देशकी अपेक्षा अधिकहै इसकारण इसमें २ अंश घटाए तब शेषरहा २ अंश ५८ कला ३५ विकला, इसमें २ का भागदिया तव लब्धिहुई १ अंश २९ कला १७ विकला, इस लब्धिको वर्ग४।५८१३५ में युक्तकरा तब ६ अंश २७ कला ५२ विकला हुभा, इसमें १२ अंश युक्तकरे तब १८ अंश २७ कला ५२ विकला यह हार हुभा ॥ फिर स्पष्ट रवि ८ राशि ५अंश २६ कला २५विकला, विभोन लग्न ८ राशि २ अंश ४६ कला १७ विकला, इन दोनोंका भन्तर करा तव राशि २ अश ४० कला ८ विकला, इसमें १० का भागदिया तब लब्धिहुई ० अंग १६ कला विकला, इसको १४ अंशमें घटाया तवं शेषरहा १३ अंश कलावि- कला, इसको दशमांश लन्धि अंश १६ कला विकलासे गुणाकरा तव ३ अंश ३९ कला ४४ विकला हुआ इसमें हार १८ अंश २७ कला ५२ विकला- का भागदिया तव घटिकादि लम्बन हुआ ऋण घटी १३ पल, त्रिभोन लग्न सूर्यकी अपेक्षा कमहै इसकारण यह ऋण है। दर्शान्त १३ घटी ४ पलमें लम्वन ० घटी ११ पलको ऋणकरा तव १२ घटी ५४ पल यह लम्बनसंस्कृत दन्ति हुभा॥२॥ भव लम्बनसंस्कृत व्यग्वक मौर चन्द्रशरसाधन लिखतेहैं- त्रिकुनिनविलम्बनं कलास्तत्सहितोनास्थितिवद्य गुः शरोऽतः॥5॥ अन्वयः-विकुनिनविलम्बनम्, कला, (स्युः )।तिथिवत्, व्यगुः, तत्सहितीनः, ( कार्यः), अतः, शरः, (साध्यः ।। अर्थः-लम्बनको तेरहसे गुणा करके जो गुणनफल हो वह वला होती, टन कलाको लम्बनकी समान व्यग्दर्कमें धन अथवा ऋण करदेय, तब लम्पनसंस्कृत व्यग्वकं होताहै, तदनन्तर तिस लंम्वनसंस्कृत व्या वर्कसे गरको साधनकर॥5॥ उदाहरण. लम्बन घटी २१ पल इसको १३ से गुणाकरा तव कलादि गुणनफर
(१००)
ग्रहलायष ।
[मपंग्रहणा-
1
.
हुभा २ कला २३ विकला इसको व्यगु ५ राशि२३ अंश ४५ कला.७ विक-
लामें लम्पनको दर्शान्तमें ऋण कराया' इसकारण ऋण करा तब ५ राशि.
२३ अंश ४२ कला ४४ विकला, यह लम्बनसंस्कृत व्यग्यकं हुआ, इसके
भुजांशकरै ६ अंश १७ कला १६ विकला हुभा इसको ११ से गुणाकरा तब
६९ अंश ९ कला ५६ विकला यह गुणनफल हुमा, इसमें ७ का भागदिया
तैव लब्धिहुई.९ भगुल ५३ प्रतिभद्गुल, यह चन्द्रशर हुआ, लम्बन संस्कृत
व्यग्वर्कके मेपादि होनेके कारण उत्तरहै ।
अब लम्बनसंस्कृतं विभीन लग्न और नतांशसाधनरीति लिखते हैं-
अथपड्डणलम्बनं लवास्तैर्युगयुग्वित्रिभतः
पुनर्नतांशाः ॥३॥
अन्वयः-अंथ, पगुणलम्बनम्, लवाः, ( स्युः)।तैः, युगयुग्वि-
त्रिभतः, नतांशाः; (साध्याः) ॥३॥
अर्थः-लम्बनको ६ से गुणा करकै जो गुणनफल होय उसको अंशादि
जाने, और उन अंशांको सम्बनकी समान त्रिभोन लग्नमें धन अथवा ऋण
कर तप लम्बनसंस्कृत त्रिभोन लग्न होताहै, तदनन्तर उससे क्रान्ति लाकर
। उस क्रान्तिका और अक्षांशीका संस्कार करै तव लम्वनसंस्कृत विभीन
लग्नोत्पन्न नतांश होतेहैं ॥३॥
उदाहरण.
एम्बन० पटी ११ पलको ६ से गुणाकरा तव अंशादि गुणनफल हुभा
१ भंश ६ कला इसको त्रिभोन लग्न ८ राशि अंश ६ कला १७ विकलाम
"लम्बनको दन्तिमें ऋण कराया' इसको ऋण करा तव शेषरहा ८ राशि
१ अंश ४० कला १७ विकला, यह लम्चनसंस्कृत. विभोन लग्न हुआ, इससे
लाईहुई कान्ति दक्षिण २३ अंशं ३४ कला ३५ विकला इनका भौर अक्षांश
दक्षिण २५ अंश २६ कला ४२ विकलाका एक दिशा होनेके कारण योग
करा तय ४९ अंश १ फला १७ विकला यह लम्बनसंस्कृत विभौन लनोत्पन्न
दक्षिण नतांश हुए ॥
भय नति और स्पष्ट शर लानकी गति लिखते हैं-
दशहतनतभागोनाहताप्टेन्दवस्तद्रहितसधृतिलिप्तः
पद्भिराप्तास्त एवास्वदिगितिनतिरेतत्संस्कृतः सोह-
लादिः स्फुट इपुरमुतोऽत्रस्यात्स्थितिच्छन्नपूर्वम्॥४॥
धिकारः६] सान्दयभाषाटीकासमेत । ISIS (१०१) . -- अन्वयः-दशहतनतभागोनाहताष्टेन्दवः, (पृथक्, स्थाप्याः), ते, एव, तदहितसधृतिलिः, पतिः, आताः, इति, स्वदिक, नतिः, (स्यात् ), एतत्संस्कृतः, सः, अत्र, स्फुटः, अहलादिः, इपुः, ( स्यात्), अमुतः, स्थितिच्छन्नपूर्वम्, स्यात, ॥४॥ अर्थः-लम्बन संस्कृतत्रिभोन लग्नोत्पन्न नतांशमें दशका भागदेय, तव जो कला आदि लब्धि होय उसको अठारह कलामें घटावै, तव जो शेषरहै, उसै पूर्वोक्त लब्धिसे गुणा करे, तव जो गुणनफल हो उसको ६ २०१८ कलाम घटावै, जो शेषरहै उसे कलात्मक मानकर उसका तिस कलादि गुणाकारमें भागदेय, तव जो लब्धि होय यह भट्ठलआदि नति होतीहै. भऔर उस नताशके अनु- सार दक्षिण अथवा उत्तर होतीहै । तदनन्तर नतिका और शरका संस्कार करे, तब स्पष्ट शर होता है, इस स्पष्ट शरसेही चन्द्रग्रहणाधिकारमें कही हुई रीतिसे सूर्य-चन्द्र-सूर्यचन्द्र के विश्व-मानैक्यखण्ड-मास-मध्यस्थिति और शेषविम्ब साधे ॥ ४ ॥ उदाहरण. लम्सनसंस्कृत त्रिभोनलग्नोत्पन्न नतांश १९ मं० १ ० १७ वि० में १० का भागदिया तब लब्धि हुँई ४ ०५४ वि० इस लब्धिको १८ कलामें घटाया तव शेषरहे १३ क ६ वि० इसको पूर्वोक्त लब्धिक०५४ वि० से गुणा करा तब ६४ क. १८ वि० हुए इसको ६ भं० १८ क० में घटाया तब कलादि शेषरहे ५ क० १३ वि०४९ म०वि० इसका पूर्वोक्त गुणनफल ६४ क० ११ वि० म भागदिया तव लब्धि हुई १२ अं० १६ प्र० भ० यहीं भट्ठलादि नति हुई । लम्चनसंस्कृत विभोन लग्नोत्पन्न नतांश दक्षिण है, इसकारण नतिभी दक्षिण हुई भव दक्षिण नति १२ २०१६म० अ० भऔर उनर शर ९२०५३ प्र० ० इन दोनोंका संस्कार ( अन्तरं करा तर २० २३ प्र० ० पह स्पष्ट कार हुआ। "गतिदिनीत्यादि " रीतिके अनुसार सूर्यगति ६१ कला १५ विकरा 'को २ से गुणाकरा तब १२२ क० ३० विकला हुआ इसमें ११ का भागदिया तर लन्धि हुई११ भट्ठल.८ प्रतिमहल यही सुप्यविम्ब हुआ। और ७७६ कहा ३० विकलाम७४ का भागदिया तब लब्धि हुई ९ भदुल ४९ प्रतिभडल यह चन्द्रविम्च हुभा। चिक्य २० भकुल ५७ प्रतिमहलमें २ मा भागदिया तब लब हुई १० भट्ठल २८०भाल यह मानक्यखण्ड हुमा इस मानायलण्ड १० भ०२८ म० भ० में शर स्पष्ट २ ० २३ ६० भ० को घटाया तर ८ भद्रल ५ प्रति- (१०२) ग्रहलाघव। [सूर्यग्रहगा- अद्गुल यह ग्रास हुवा । सूर्यविम्ब हुमा ११ अद्गुल ८ प्रतिअदल इसमें प्रास८ अं०५३० अंको घटाया तब शेप रहा ३ भं० ३ ० ० यह शेप विम्ब हुआ। मानक्यखण्ड १० भ०२८ प्र० अं० और स्पष्ट शर २ अं० २३ प्र० अ० इन दोनोंका योग करा तब १२ अंक ५१ प्र०अ० हुआ, इसको ११ से गुणा करा तव १२८ अगुल ३० प्र० अ० हुए इसको ग्रास ८२०५म० अ० से गुणाकरा सव १०३८ अगुल ४२ प्रतिभठ्ठल हुए, इसका वर्गमूल लिया तब ३२ २० १४ म० अ० मिला इसको ५ से गुणाकरा तब १६१ अं १०म० भ० हुए इसमें ६ का भागदिया तब लब्धि हुई २६ अं० ५२ ० ० इसमें चन्द्रविम्ब ९० ४९० ० का भागदिया तब लन्धि हुई ३ ० ४४ ५० यही मध्यस्थिति हुई ॥ भव स्पर्शलम्बन-मोक्षलम्बन-स्पर्शकाल और मोक्षकाल जाननेकी रीति लिखते हैं- स्थितिरसहतिरंशा वित्रिभं तैः पृथक्स्थ रहितसहि- तमाभ्यां लम्बने येतु ताभ्याम् । स्थितिविरहितयु- तः संस्कृतो मध्यदर्शः क्रमशइति भवतां स्पर्शमु- त्तयोस्तु कालो॥५॥ अन्वयः-स्थितिरसहतिः, अंशाः, (स्युः)। पृथक्स्थम, वित्रिभम, तैः, रहितसहितम्, ( कार्यम् )। आभ्याम्, तु, ये, लम्बने, (ते, साध्ये )। ताभ्याम्, स्थितिविरहितयुक्तः, मध्यदर्शः, संस्कृतः, (का Nः) । इति, तु, क्रमशः, स्पर्शमुत्तयों, फालौ, भवेताम् ॥ ५ ॥ अर्थ:-मध्यस्थितिको छः से गुणा करके जो अंशादि सन्धि होय उसको त्रिभौन लपमें पटाव तय स्पर्श विभीन लग्न होता है, फिर उससे नतांश साथै, तदनन्तर तिन नतांशोसे पूर्वोक्त पतिफे अनुसार हार साथै, और दशां- न्तकालीन सूर्यकी मायस्थिति पटिकाओंका चालन कर तब वह स्पर्णकालीन सयं होताहै, फिर स्पर्शकालीन सम्प, स्पर्शविभीनतम भार दार इनसे पूषाक्तरतिके अनुसार लम्पन साधे, वह स्पर्शकालीन सम्पन होताहै, सिमकार मध्यस्थितिको ६ से.गुणाफरक जो अंशादि सन्धि भाये उस विभौम सनम पुक्त करदय, तब यह मोक्षत्रिभोन ला ... भोर तिस पर्यात रीतिके भनुसार हार लाय, भार दर्शान्त का. ..
धिकारः६] सान्वयभापाटीकासमेत । (१०३) लीन सूर्यको मध्य स्थितिकी घटिकाओंका चालन मिलावै, तब वह मोक्षकालीन होताहै, फिर मोक्षकालीन सूर्य, मोक्ष त्रिभोनलस, और हार इनसे लम्बन साथै, तो वह मोक्षकालीन लम्बन होताहै । दर्शान्त घटिका- भौमसे मध्यस्थितिकी घटिकाओको घटावे. जो शेष रहै उसमें स्पर्शका- लीन लम्वन धन होय तो मिलादेय, और ऋण होय तो घटादेय. तव स्पर्श- काल होताहै,। इसी प्रकार दर्शान्त घटिकाओंमें मध्य स्थितिको मिलादेय तब जो अङ्कहीं उनसे मोक्षकालीन लम्बनका संस्कार करे, तव मोक्ष: काल होताहै ॥५॥ उदाहरण.. मध्यस्थिति २ । १४ को ६ से गुणाकरा तव १६ अंश २४ कला हुए, इसकों विभीन लम ८रा.२ भं.४६ क.७ वि. में घटाया तव शेषरहे ७ रा १६६० २२ कला १७ विकला, यह स्पर्शविभोन लग्न हुभा, इससे साधी हुई क्रान्ति दक्षिण २१ अंश २४ कला ३९ विकला, इसका अक्षांश दक्षिण २५ भं० २६ क०४० वि० से. संस्कार करा तव ४६ अं.५१ क. १९ वि. यह दक्षिण नतांश हुए, इसमें २२ का भागदिया तब लब्धि हुई २७.७. इसका वर्ग ४. २८ क. हुआ इसमें २ अंश घटाए तब २ मं. २८ कला रहा। इसका आधार भं. १४ कला हुभा. इसमें पूर्वोक्तवर्ग ४ २०२८क० को युक्तकरा तब ५२.४२ क. हुभा, इसमें १२ भंश जोड़े तव १७ अंश ४२ कला यह हार हुआ, दर्शान्त- कालीन सूर्य ८ रा.५२.२६ क.२५ वि. सूर्य स्पष्ट गति ६१ क. १५ वि. को २१४४ मापस्थितिले गुणाकरा तब १६७ क. २५ वि. हुए, इसमें ६० का भाग दिया तब २ क.४७ वि.लब्धि हुई, इस लब्धिको दन्ति कालीन सूर्य ८1५।२६।२५ में घटाया तब ८ रा.५भंश २३ क. ३८ वि.स्पर्श- कालीन सूर्य हुआ, इससे स्पर्शकालीन विभीन लग्न ७ रा. १६ अं. २२ क. १७ वि. को घटाया तव शेषरहे ० रा.१९ अं.१ क.२१ वि. इसमें १० का भाग दिया तब लन्धि हुई १ नं.५४ कला, इसको १४ अंगमें घटाया तम शंपरदे १९भं. ६.क. इसको सन्धि १२ ५४ कलासे गुणा फरा-तम २२ भंटा ५९ कला हुए इसमें हार १७ भं. १२ का. का भाग दिपा तन १५० १९पर यद स्पर्शकालीन लम्बन त्रिभान रामकी भपेक्षा सूर्य भधि- क है इस कारण ऋण ॥ भर मोक्षकालीन लम्बन साधतेह-यहाँ मपस्थिति २५.४४ पलको ६ से गुणा करा तब १६ अंश २४ कला हुए, इसमें विभीनाटन ८रा.२ अं. ४६ क. १७वि. को युन करा तर ८ राशि १९.भंश १० कला १७ विकला यह मोक्ष- विभीन लग्न हुभा, इससे साधी दुई क्रान्ति दक्षिण २३ मं०४२ क०२८ वि० इससे भक्षांशी २५ भं.३६ क.५३ विक. का संस्कार करनेसे १.९ क.१०
.
(१०४).
ग्रहलायव ।
[सूर्यग्रहणा-
वि. यह नतांश दक्षिण हुए, इसमें २२ का भाग दिया तब लब्धि हुई २ .
१४ क. इसका वर्ग ४ . ५९ कला हुआ, इसमें २ अंश घटाए तब शेष ३.
५९ कला रहा. इसका आधा १ अ.२९ क. हुआ. इसमें पूर्वोक्त वर्ग ४.५९
क. कोयुक्त करा तव ६अं.२८ कला हुआ, इसमें १२ अं. युक्त करे तर १८
मं.२८ क. यह हार हुभा ॥
सूर्य स्पष्टगति ६१ क.१५ वि.को मध्य स्थिति २ घ.४४ प. से गुणा करा
वय १६७ क.२५ वि हुआ इसमें ६० का भागदिया तवं लब्धि हुई .२ क,
५७ वि. इसमें दर्शान्तकालीन सूर्य ८रा. ५ अं.२६ क.२५ वि. को युक्त
करा तब ८ रा.५६.२९ क. १२ वि..यह मोक्षकालीन सय हुआ इसको भी-
क्षकालीन विभोन लग्न ८ रा. १९ अं. १० क. १७ वि. में घटाया तब ० रा.
१३ अं. ११ क.५वि. शेपरहे, इसमें १० का भाग दिया तब अं. २२ क.ल.
ब्धि हुई. इसको १४ अंशोंमें घटाया तव शेपरहे १३ अं. ३८ क. इसकों ऊपर-
की लब्धि सं. २२ क,से गुणाकरा तब १५ . १५ क.हुए, इसमें हार १८
में० २८ क० का भाग दिया तव लब्धि हुई १ घ.५६ ५० यह मोक्षका-
लीन लम्वन मोक्षकालीन सूर्यको अपेक्षा मोक्षत्रिभौनलग्न अधिक है,
इसकारण धनहै।
दन्ति १३ ५०४५०. में मध्यस्थिति २५.४४ प. को घटाया तर १० -
२० प.हुमा, इसमें स्पर्शकालीन लम्बन १५०२९५० को घटाया तब ९५०
१५० यह स्पर्शकाल हुआ।
दान्त १३५०४५० में मध्य स्थिति ५०४४५० को युक्त करा तब
१५ ५० ४८ ५० हुआ, इसमें ५० ५६ १० को युक्त करा तय १६३०.
५४ ५० मोक्ष काल दुभा ॥
भप सम्मोसन, भौर उन्मीलन,तथा ग्रहणका घर्ण जाननेकी रीति लिखतह-
मदादेवं मीलनोन्मीलने स्तो ग्रासोनादेश्यागुला-
पोरवीन्द्रोः॥धूम्रः कृष्णः पिङ्गलोल्पाईसर्वग्रस्त
श्चन्द्रोस्तु कृष्णः सदैव ॥६॥
अन्यया-एवम, मदात, मीलनीन्मीलने, स्त:, हलाल्पा, रवी.
ग्दोः, यासः, न, आदेश्यः; अल्पाईसर्वग्रस्तः, चन्दः, (क्रमाव )
प्रा, कृष्णा, पिलः, (भवति ), अर्फः, तु, सदा, एव, कृष्णा
(भपति)॥६॥
धिकार६]. सांन्वयभापाटीकासमेत (१०५) भर्यः-यदि सूर्यग्रहण खग्रास होय तो खग्रास और विम्बान्तर इनसे मर्दस्थिति साधे, तदनन्तर मर्दस्थितिको से गुणा करके जो अंशादि लब्धि होय उसको त्रिभोनलग्नमें रहित और युक्तकरे, तव खस्पर्श त्रिभोन लग्न और समीक्षत्रिभोनलग्न होतेहैं, फिर तिनसे खस्पर्शकालीन लम्बन भौर खमोक्षकालीन लम्वन यह दोनों साथै, तदनन्तर दन्तघटिकाओम .मदस्थितिको रहित और युक्तकरे, और उसमें खस्पर्शकालीन लम्बन और खमोक्षकालीन लम्बन इन दोनोंको धन और ऋण करे, तव सम्मीटनकाल भोर.उन्मीलनकाल होतेहैं, । यदि सूर्यका अथवा चन्द्रमाका ग्रास मह- लसे कम होय तो ग्रहण न कहै । यदि चन्द्र अल्पग्रस्त होय तो धूम्रवर्ण पदि अर्द्धग्रस्त होय तो कृष्णवर्ण, और यदि सर्वग्रस्त होप.तो पिङ्गलवर्ण होताहै, और सूर्यग्रहणमें सूर्य ती निरन्तर कृष्णवर्ण होताहै ॥ ६ ॥ अव इटकालीन ग्रास साधनेकी रीति लिखते हैं, प्रालय इष्टं द्विघ्नं, छन्नक्षुण्ण स्पर्शान्त्यान्तर्नाडीभक्तम् । रूपानोपेतं विद्यादिष्टे कालेऽकस्य ग्रासम् ॥७॥ अन्वयः-दिनम् उन्नक्षुण्णम्, स्पर्शान्त्यान्तनांडीभक्तम्, रूपान, उपेतम्, इष्टम्, इष्टे, काले, अर्कस्य, ग्रासम्, विद्यात् ।। ७ ॥ अर्यः-इटघटिकाको दोसे गुणाकरे, तव जो गुणनफल हो उसे ग्राससे गुणाकर, तर जो गुणनफल होय उसमें सर्शकाल और मोक्षकालके शेष अधात् पर्वकालको घटिकाओंका भागदेय तव जो लब्धि होय वह भलादि होती है, उसमें महुल ३०प्र०अ० मिलादेय तव इष्टकालीन ग्रास होताहाल mammu- उदाहरण. इटपटी १ इसको से गुणा करा तब हुए, इसको ग्रास अहल ६ प्रति- मदुलसे गुणा करा तव १६ भद्गलप्रतिभट्ठल हुए। फिर मोक्षकाट १६५० ४४५०और स्पर्शकाल. ९घ० ३५० इन दोनोंका अन्तर करनेसे .गंपरहा पर्वकाल ७५०११५० इसका १६ ० १२ प्रतिम भागदिया. वय सन्धि हुईरभट्ठल ६ प्रतिभं० इसमें ३० प्रतिभदुल मिलाए तर महल ३६ प्रतिम- इल यह इटकालीन प्रास हुआ। चन्द्रग्रहणक विष कहीदुई रीतिके भनुसार भपन-वलन-मप्यनत-अ.
ग्रहलांपय । [मयंग्रहणा क्षजवलन-वलनाइद्धि-प्रासादि-और रामासानि यह साधकर तिसर ग्रहणका माय स्पर्श और मोक्ष किस भारखे होगा, इसका परिलेख भयो आकृति निकालै ॥ उदाहरण. लम्पनसस्कृततिथि १२५० ५३ प० लम्बनसस्कृततिथिकालीनरवि रा० ५०२६ का० १४ वि० इसमे ३२० युक्तकरी वय ११ रा०५५० २६० १४ वि० इसमें अयनाश १८ अं० ८ क० युक्तकरे वय ११ रा०२३ अं० ३४ क० १५ वि० हुआ, इससे मिले भयनवलनदक्षिण १ अंगुल ३० प्रतिभंगुल, भव १५ घटीमें चर १५० ५७ पलको पटाया तब शेषरहा १३५०३ प० यह दिनाई। और ग्रहणमध्यकाल १२ ५० ५३ ५० इनसे लाया हुआ पूर्वनत ० ५० १० १० हुआ, इसमे ५ का भाग दिया तव रा०२००० ० वि० इससे “अत्मा नगशरेन्दुमितैरित्पादि"रोसिके अनुसार वलनहा० अं० १४ प्रअ० इसको पलभा ५४० ४५ म०अ०से गुणा करा तव १.१०.२० प्र०अ० हुए, इसमे पका भागढिया तब लब्धि हुई ० ० १६ प्र०म० यह अक्षजवलन पूर्वनत है, इसका रण उत्तर और अपनवलनदक्षिण १ भदुल ३० प्रतिअट्ठल इन दोनोका स. स्कार करनेसे दक्षिण १ अट्ठल १४ प्रतिभट्ठल हुए इसमे ६ का भागदिया तब ० भ० १२ प्रतिभ० यह दक्षिण घलनाइनि हुए, । ग्रास ८० ६ प्र०अ०को ६०से गुणा करा तव ४८६ हुए, इसमे मानक्यखण्ड १० अड्डल २८ प्र०अ०का भागदिया तब लब्धि हुई ४६ अट्ठल ३५ प्रतिअदुल, इसका वर्गमल हुभा ६४० ४८ प्र०० यह ग्रासाद्धि हुए ধরি শীতজসিতাহাবহানী মতামত देशीयमुरादायादवास्तव्यकारिस्थराजकीयसस्कृतरिद्यालयप्रधानाध्यापक पण्डिततामिराममिश्रशाषितान्निध्याधिगतविद्यभारदाजगोबोत्पन्न गोडवशावताश्रीयुतमोलानाथतनूजपण्डितरामस्वरूपश- म्भणा कृतथा सान्ययभापाटीक्या सहित. .. सूर्यग्रहणाधिकार. समाप्तिमित ॥ ६ ॥ करणप्रन्ये पश्चिमोत्तर- -धिकारः ७]. सान्वयभाषाटीकासमेत। ( १०७) अथ मासगणांद्रहणद्वयंसाधनाधिकारोव्याख्यायते। अथ मासगणात्सुलघुक्रियया ग्रहणद्वयसिद्धिकृतेऽ भिदधे । स्फुटसूर्यविपाततिथींश्च वपुर्यसनादिवि- शेपचमत्कृतये ॥१॥ अन्वयः-अय, विशेपचमत्कृतये, लघुक्रियया, मासगणात, ग्रह- गदयसिद्धिकृते, स्फुटसूर्यविपाततिथीन, वपुः, असनादि, च, अभिदधै ॥ १॥ अर्थः-पुरुषोंका अत्यन्त चमत्कार होय और सरलरीतिसे मासगणसे दोनों ग्रहण सिद्ध हों इसकारण स्पष्टरवि, व्यग्वतियि, विम्व और ग्रास आदिका वर्णन करते हैं ॥१॥ भव भुवाकांको कहते हैं- भानोःखम्भूः खान्धयोऽयं ध्रुवःस्याच्छैला वारा- शिपूर्वो व्यगोः स्यात् । वृत्तस्याङ्का भूरसाश्चाथ तिथ्या वाराद्यस्याक्षाः खगास्तर्करामाः॥२॥ अन्वयः-खम, भूः, साब्धयः, लयम्, भानोः, भुवः, स्यात् । शैलाः, कर्काः, राशिपूर्वः; व्यगोः, (ध्रुवः), स्यात् । अङ्काः, भूः, रसाः, च, वृत्तस्य, (ध्रुवः स्यात् ) । अय, अक्षाः, खगाः, तर्करामाः, तिथ्याः, वाराद्यस्य, (सुवः, स्यात् ) ॥२॥ भः-खकहिये शून्य-भूकहियेएकन खान्धि कहिये चालीस, यह रविका- भुवायोप्टक. धुवाहहै। शैल कहिये सात-कुकहिये, नाम् । रवि व्यगु वृत्त वारादि एक अंक कहियारह यह व्यगु कहि राशि ये व्यग्रवकका राज्यादि धुवाद । भोर मंदा । । अहवाहिये ना-भूकहिये एक-रसकहिय कला का यह वृत्तकहिये चन्द्रमाके मन्द विकला। विप० केन्द्रका भुवाइ । भौर भक्ष कहिये पाँच-सग कहिये नो-तकराम कहिये छत्तीस पह तिथिवारादि कहिये शाकक भारम्भमें जो पार हो उससे भाएटुए वारादिका भुवार ॥२॥ . । , २. ६ २६पट ० . .
. ११ ० (१०८) ग्रहहाधव। [मासगणाहणद्वयसाधना अब क्षेपकास कहते हैं- क्षेपो भाद्यः खंकृताभूदृशोके रुद्राःशैला नागचन्द्रा विपाते । वृत्ते शून्यं वत्रिणश्चन्द्रवाणा वाराद्य द्वौ व्यघिनन्दाब्धयः स्यात् ॥३॥ अन्वयः-खम्, कृताः, भूदृशः, अङ, रुदाः, शैलाः, नागचन्दा, विपाते, शून्यम्, वत्रिणः, चन्द्रवाणाः, वृत्ते, दौ, व्यद्दप्रिनन्दाब्धयः वाराये, भाद्यः, क्षेपः, स्यात् ॥ ३ ॥ अर्थः-खकहिये शून्य-कृत कहिये क्षेपकाइकोप्टक. चार-भूदृश कहिये इकीस यह सूर्यका- नाम राज्यादि क्षेपकाङ्क है । और रुद्र कहिये रवि | व्यगु वृत्त | वारादि] ग्यारह-शैल कहिये सात-नागचन्द्र राशि कहिये अठारह यह व्यगुका रास्यादि, अश क्षेपकाङ्कदै । और शून्य-जिन कहिये कला २१ चौदह-चन्द्रवाण कहिये इक्यावन-यह (विकला ७ बृत्तका क्षेपकाङ्क है । और द्वौकहिये दो-व्यग्निनन्दाब्धि कहिये भड़तालीस और पैतालीस-यह वारादिका क्षेपकाडू होताहै ॥३॥ भव रविका भुवानक्षेपक, व्यगु, वृत्त और धारादि इनके ध्रुवयुक्त क्षेपक जानकी रीति लिखतेहै- मासगणाजनितोरविरूनश्चक्रहतध्रुवकेन निजेन । सङ्कलिता इतरेऽथ च ते स्युःक्षेपयुता निजमासि सितेन ॥४॥ अन्वयः-मासगणात्, जनितः, रविः, निजैन, चक्रहतध्रुवकेन ऊनः, (कार्यः).इतरे, (तेन ), सङ्कलिताः, (कार्याः ), अथ, च ते, क्षेपयुताः, (सन्तः ), निजमासि, सितान्ते, स्युः ॥ ४ ॥ अर्थः-रपिया ध्रुवाई कर टौ चक्रसे गुणाकर तय जो गुणनफल होय टसको रयिक क्षेपवार घटाये तप जो शेपर यह रविका भुवोनोपकही ताई. उसपो मासगणोपन रविम मिलाय तप भटमासकी पूर्णिमाके - तयारपि होता ॥४॥ २वार १४/४८. १८ ५१/४५५ विप ० . - . धेकारः७] सान्वयभाषार्टीकासमेत । (१०९) व्यगु, वृत्त और वारादि इनके ध्रुवयुक्त क्षेपक करने हों तो उनके ध्रुवा-- रोको चक्रसे गुणाकरक जो रायादि गुणनफल होय वह उसके क्षेपकाङ्क में मिलावै, तद टनका अनुक्रमसे ध्रुवयुक्त क्षेपक होताहै, उसको क्रमसे रासगणोरपन्न व्यगु, 'वृत्त और वारादिम युक्तकरदेय तव अभीष्टमासकी पी- गमासीके.अन्तका हौदाह उदाहरण. । 'सम्बत् १६६९ शकाः १५३४ कात्तिक शुक्ल पूर्णिमा १५ गुरावटी ३२ ३३ भरणीनक्षत्रे ,यटी २३ । १४ वयोगे घटी ४४ । ४५ इसदिन पश्चाइमें चन्द्र- ग्रहण लिंखाहै. इसकारण पर्वकाल साधनेके अर्थ गणित करतेहैं- : क ५३४ में १४४२ को घटाया तव शेषरहे १२ वर्ष इसमें ११ का भाग- दिया तब लन्धि हुभा चक्र ८हुआ, भौर शेषरहे ४दनको १२ से गुणाकरा सब ४८ हुए, इसमें गतमास ७ और युक्तकरे तब ५५ मध्यमे मास हुआ। इसमें द्विगुणित चक्र १६ भोर १० को युक्तकरा तव ८१ हुए इसमें ३३ का भागदिया व लब्धिहुप इसमें मध्यम मासगण ५५ को युक्तकरा. तब ५७ यह मास- 'गण हुला॥ अब रविक ध्रुवा ० रा.१२. ५० क.. वि. को चक्र ८से गुणा करा तब रा. १३ में.२० क. वि. यह गुणनफल हुमा, इसको रविक क्षेप- 'काइरा. ४ अं.२१ क.. वि. में घटाया तब शेषरहे ११ य.२१ अं.१ क. वि. यह रविका ध्रुवोनक्षेपक हुभा ॥ । व्यगुके भुवाइ७ रा. मं. १२ क..वि.को चक्र ८ से गुणाकरा तब य,. ६ क..वि. हुमा, इस गुणनफलको व्यगुके क्षेपकाओं १ रा.७ भं.१८ क..वि. में युक्तकरा तव ७ रा. १६ नं.५४ क. पि. यह व्यगुका ध्रुव- पुक्तक्षेपक हुभा ॥ तके भुवाहू९ रा.पं.६ क.वि.को चक्र ८से गुणाकरा तव रा.अ. ४० वि० हुमा, इस गुणनफलको वृनके क्षेपकाडूरा० १४०५.००वि० में मुक्त करा तब०रा०२:०३९क००वि० यह वृत्तका ध्रुव युक्तक्षेपक हुन वारादिक ध्रुवार५ वार ९ घरी ६ पलको चक्र ८ से गुणा करा तव १६ यार १६ घरी ४८ पल हुमा, इस गुणनफल की धारादिक संपकाई पार । ५८ पटी ४५ पट में युक्त करातब चार ५ पटरी १३ पल यह वारादिका । भुषयुक्त क्षेरक हुमा । .
(११०) ग्रहलाघव [मासराणाहणद्रयसाधना अव मध्यम रवि साधनेकी रीति लिखते हैं- मासौधतो द्विगुणितानगपशिराप्तराश्यादिना रहि- तमासगणो रविः स्यात् ॥5॥ अन्वयः-दिगुणितान, मासौषतः, नगपद्भिः, आप्तराश्यादिना रहितमासगणः, रविः स्यात् ॥ 5 ॥ अर्थः-मासगणको दोसे गुणा करके जो गुणनफल होय उसमें ६५ सड़ सठका भागदेय तब जो राश्यादि लन्धि होय उसको मासगणमें घटा तर मासगणोत्पन्न रवि होताहै, उसमें रविका ध्रुवोनक्षेपक युक्त करदेय तर मध्यम रवि होताहै ॥3॥ उदाहरण. मासगण ५७ को २ से गुणा करा तव ११४ हुए इसमें ६७ का भागदिया तर राज्यादि सन्धि हुई १२० २१ अं० २०११ वि० इस लन्धिको मास- गण ५७ राशिम घटाया तय ७ रा० ८ अंश ५७ क० १९ विकला यह मास गणोत्पन्न रवि हुमा, इसमें रविका भुवोनक्षेपक १२० २१ ० ३ क००वि० पुक्त करा तय ६२०३९०५८ २०१९ वि० यह मध्यमरवि हुभा ॥ भय व्यगुसाधनकी रीति लिखते हैं- मासा गृहाणि विनिजत्रिलवाश्च तेशामासाइनितु: ल्यकलिकाः स्युरयं विपातः॥६॥ अन्ययः-मांसाः, गृहाणि, विनिजविलवाः, ते, अंशाः, थ, मासा इमिनुल्पफलिफाः, स्युः, अयम, विपातः, (स्यात् ) ॥५॥ भयः-जीमासगण है यही राशि हैं, भोर मासगणमें तीनका भागदेकर जो एभिमा यद भंशाधिोते हैं टमयो मागम पास जो शेरो पद भा होतद । तपा मापगणमें ४का भागदेकर जो एन्धिदी या करा होती हैं. इन गयो पाप.य. मासगणोपन राज्यादि ध्यगु होता है। सामं पापा भुपपुतः शेपय पुत्त फरदेव तपस्या होतादे॥५॥ उदाहरण. मागणी५७पहीम, गौर मागगण में दिया नीना भाग .
धिकारः७)
सान्वयभाषाकाटीसमेत ।
(१११)
तब लब्धि हुई १९ इसको मासगण ५७में घटाया तव ३८ यह अंश हुए, और
मासगण ५७में दिया का भाग तव लब्धि हुई १४ क० १५ वि० इसप्रकार
१० राशि ८ अंश १४ कला १५ विकला यह मासगणोत्पन्न व्यगु हुमा, इसमें
व्यगुका ध्रुवयुक्त क्षेपक रा०१६ अंश ५४ क० ०वि०को युक्त करा तब
५ राशि २५ अंश ८ कला १५.विकल्या यह राम्यादि व्यग हुआ ।
अब वृत्त साधनेकीरीति लिसतेहैं-
स्वाचंशकेन रहिता मनुतटमासा वृत्तं गणाभ्रंकु-
लवाव्यलवं गृहादि.॥5॥
अन्वयः-मनुत्तष्टमासाः, स्वादयंशकेन, रहिताः, गणाभ्रकुलवाड्य
लवम्, गृहादि, वृत्तम्, (स्यात् ) 1.55
अर्यः-मासगणमं चौदहका भागदेय तव जो लब्धि होय उससे जो शेष
रहै उसमें सातका भागदेय तंव राज्यादि लब्धि मिले उसको राग्यात्मक
शेष समझे, और पहिली लब्धिम घटादेय तव जोशेषरहै, उसमें मासगणमें
दशका भागदेकरं जो अंशादि लब्धि होपसोयुक्त कारदेय तय मातगणोत्पन्न
वृत्त होताहै, उसमें वृत्तका ध्रुवयुक्त क्षेपक मिलादेय तब जो रात्यादि अङ्क
योग हो वह वृत्त होताहै ॥ 5 ॥
. उदाहरण.
मासगण ५७में १५का भागदिया तव लब्धि हुई शेपरहे इसके अंश
करके ३०अंश का भागदिया तय लब्धि हुई अंश, शेपरहा इसकी कला
करके १३० इसमें का भागदिया तब लन्धि हुई १७ कला, और शेषरहा
१ इसकी विकला करके ६० इसमे ७का भागदिया तब लब्धि हुई ८ विकला
इसप्रकार अंश १७ कला ८ विकला इसको शेप १ में घटाया तब शेषरहा
०रा०२५ ० ४२ क० ५२ वि० इसमें, मासगण ५७में १०का भाग देनेसे प्राप्त
हुई लब्धि ५ अंश ४३ क० ०वि०को युक्त करा तब १ रा० १ अंश २४ कला
५५ विकला यह मासगणोत्पन्न वृत्त हुआ, इसमें वृत्तका ध्रुवयुक्त क्षेपक, रा०
२३ ० ३९क० ०वि०को युक्तकरा तव श्रा० २५ भ० ३ का ५३ वि०
यह वृत्त हुभा ॥
भव वारादिसाधनका रीति लिखते है-
स्वार्धान्त्रिता दिनमुखं मनुतप्टमासा मासोपतो द-
शगुणाझंगुणाप्तियुक्तम् ॥६॥
(१२) ग्रहलाघव! [मासगणादहणदयसाधना- . अन्वयः-मनुतष्टमासाः, स्वान्विताः, ( सन्तः), दशगुणात, मासौषतः, भगुणातियुक्तम्, दिनमुखम्, (स्यात् ) ॥ ६ ॥ भर्थः-मासगणमें चौदहका भागदेय वव.जो शेषरहे उसको तीनसे गुणा करनेसे जो गुणनफल होय उसमें दोका भागदेय तब जो लब्धिहोय, और मासगणको दशसे गुणाकरके तीनसो सत्ताईसका भागदेनेसे जो लब्धिहोय इन दोनोंको योग करलेय तर मासगोत्पन्न वारादि होता है, इसमें बायदि भुवयुक्त क्षेपक मिलादेय तो वारादि होताहै ॥६॥ उदाहरण. मासगण ५७ में १४का भागदिया तव लन्धि हुए ४ और शेष बचा १४ शेप १को इसे गुणा करा तब तीन हुए इसमें २का भागदिया तब लन्धि हु वार ३० घटी०प० और मासगण ५७ को १०से गुणा करा तब ५७० हुए इसमें ३२७का भागदिया वव लब्धि हुई वार ४४ घटी ३५ पल इसमें ऊपरकी सन्धि १ वार ३०पटी०प०को युक्तकरा तवं देवार १४घटी ३५ पल यह मासगणोत्पन्न वारादि हुआ, इसमें वारादिक ध्रुवयुक्त क्षेपक २वार २५ घ. ३३ पलको युक्तकरा तब ५ वार २० घटी ८ पल यह वारादि हुआ। अव पक्षचालन लिखते हैं- रवी पाक्षिकं चालन खेन्द्रदेवा विपाते नभोवाणच न्द्रानखाश्च। पडो युगाक्षागृहायं च वृत्ते दिनाये . नभोक्षान्धयोवाणवाणाः॥७॥ अन्वयः-सैन्ददेवाः, रखो, नमः, वाणचन्दाः, नखाः, च, विपाते, पद, अर्काः, युगाक्षाः, वृत्ते, ग्रेहायम्, पाक्षिकम्, चालनम् (स्यात् ) नमः, अक्षान्धयः, वाणवाणाः, दिनाये, (चालनम, भवति) !! मयः एकहिये शुन्य इन्द्र कहिये चौदह-देय कहिये तैतीस यह रविम, पाक्षिकचालन. भौर नभ याहिये शुन्य पाणचन्द्र का नाम रवि ध्यगु वृत्त धादि दिये पन्द्रह-जरा कहिये वीस यह ध्य- गुम, भौर पर कहिये छ:-अर्व फाहिये भारद-युगादा फाहिये. चोभन यह घृ. भमें पाक्षिपंचाटन होताह, और विकला। नभ पदिय न्य-भक्षाधि कहिप पैतालीस-चाणमाण कहिये पचपन यंह यारादि पाक्षिय चाटन होगा ॥७॥ . ६ . . যদি अश १५ धार कला ३० o . ५५प.
0 ५ ४।४ ।२चार २१ धिकारः७ सान्वयभापार्टीकासमेत। '(१९३) अब पाण्मासिक चालन लिरातेहैं- शरावेदपक्षाभुजङ्गामयोकै व्यगो पट् कृताः कुश्च पा- मासिकं स्यात् । शरावायत्रीपवो भादवृत्ते दिनाये तिथेः भवा भूदिनाघम् ॥ ८॥ अन्वयः-शराः, वेदपक्षाः, भुजङ्गामयः, अ, पद, कृताः, कु, च, व्यगी, शराः, वाईयः, त्रीपयः, वृत्ते, भादि, पाण्मासिकम, (चालनम),स्यात दौ,भवामः,तिये,दिनाये,दिनायम्,(स्यात्)॥८॥ अर्थ:-गर कहिये पांच-वेदपक्षा पापमासिकचालन. साहिये चोवीस-भुजहामि कहिये भ- नाम रवि व्यगु वृत्त । चारादि इतीस यह रधिम, भारपटकहिये छ:- राशि कृत कहिये चार-कुकहिये एक यह अंश व्यगुम, और कार पाहिये पाँच-चाद्धि- १।५३ १९घटी कदिये चार-तथा त्रीपु कहिये तिरपन कन्दा १८ यह वृत्त राज्यादि पाण्मामिक चा--- विकला.. स्टन होताहै, और दी कड़िये दो-भन कहिये ग्यारह-भकहिये एक यह ति- थिके वारादिका पारादिचालन होताहै ॥ ९॥ यदि पाक्षिक कहिये १५ दिनका चारन देना होय ती उममें इतना ध्यान सपना चाहिएं फिरवि, पशु, पृत्त भार वारादि पद राव अभीट भासय दान्तिक करने होप तो दन ममें पाक्षिक चालन युक्तकरदेय. और यह मर भभीष्ट मानसे पहिले दान्त करने होय तो इन सबमें पाक्षिक बालन घटादेय तप पाण्मासिक चालनका यद उपयोग होताह॥ अब तिच्यन्तम चारादिवि और इनके माधनेकी रीति लियतह- अभिमततिथिसिद्धये प्रापरे यास्तु तिथ्यःस्वयु- गरसलवोनाश्चालनं स्यादिनाये। स्वयुगगुणलयो- नाः स्याल्लवाद्य दिनेशे स्वगुणनवलवोना विश्व निनाश्व वृत्ते ॥ ९॥ अन्वयः याः, माक, परे, तिव्यः, (सुः), (ता.), अभिमत- ० ० ग्रहलायव । मिासगणाहणद्वयसाधना- तिथिसिद्धये, स्वयुगरसलवोनाः, दिनाये, चालनम, स्यात् । स्वयु- गगुणलवानाः, (ताः), दिनशे, लवाद्यम्, (चालनम्,स्यात्) स्वगुण, नवलवोनाः, विश्वनिघ्नाः, च, (ताः), वृत्त, (चालनम् स्यात् ।।९।। अर्थः-इष्टतिथि और पौर्णिमा इनके मध्यकी जो अन्तरित तिथि हो उसमें चौसठका भागदकर जो लब्धि हो उसको अन्तरित तिथिमं घटादेय तव जो शेषरहै उसको वारादिशेष पौर्णिमाके वारादिमें धन अथवा ऋण कर, तक इष्टतिथिका वारादि होताहै । और उस अन्तरित तिथि चौतीसका भागदेकर जो लब्धि हो उसको अन्तरिततिथिमें घटादेय तब जो शेषरहै उसको अंशादि शेष मध्यमरविमं धन अथवा ऋणकर, तब इष्टतिथिका रवि होताहै । और भ- न्तरित तिथिको तेरहसे गुणाकर तब जोगुणनफल हो उसमें तिरानवेका भाग देय तब जो लब्धि हो उसको उपरोक्त गुणनफलमें घटादेय तय जो शेपरहेउ सको वृत्तमं धन अथवा ऋणकर तब इष्टतिथिका वृत्त होताहै । यदि लाईहुई इष्टतिथि शुक्लपक्षकी होय तो ऋणकर और कृष्णपक्षकी होय तो धनकर ॥९॥ अब तिथिसाधनके निमित्त वृत्तफल और रविमन्दकेन्द्रफल. साधने:- की रीति लिखते हैं- अत्यष्टयधिवृपार्कगोशरदृशः खण्डानि तैर्वृत्तदोर्भा- गीन्दुलवप्रमैक्यमगतघ्नोच्छिएविश्वाशयुक् ।प्रा- ग्वत्स्यात्स्वमृणं फलं वितिखेः केन्द्रायदन्यच्च त: व्याप्तं स्वाङ्गलवोनितं कुरु तयोः कार्या पुनः संस्कृतिः॥१०॥ अन्वयः-अत्यष्टयष्टिपार्कगोशरदृशः, खण्डानि, स्युः तः, वृत्त- दोर्भागवीन्दुलवप्रमैक्यम्, ( कृत्वा), अगतनोच्छिष्टविश्वाशयुफ, माग्वत, स्वम्, ऋणम्, फलम्, स्यात्। इति, तु, अन्यत्, च, कन्द्रात खे, यत्, फलम्, (तत्), (साध्यम् )। तव्याप्तम्, स्वाङ्गलवी- नितम्, कुरु । पुनः, तयोः, संस्कृतिः, कार्या ॥ १० ॥ अर्थः-भस्पष्टि कहिये सतरह अष्टि कहिये सोलहा रारासपा ष वहिप चौदह, अर्व काहिय पारह, शर पहिया नाँचमार शफाहिये । यह सण्ड हैं। वृत्त भुजांशाम तेरहका भागदेकर ।
। धिकारः७] सान्वयभाषाटीकासमेत। जो लब्धि होय तत्परिमित भड़के नीचे लिखेहुप अकि योगको लेय और अपको अलग लिव फिर लब्धि एक और मिलाकर जो अङ्कहोय तत्परिमित अक्क नाके अङ्गको लेकर उससे अंगादि गेपको गुणाकर तब जो गुणन फल होय उसमें तेरहका भागदेय तव जो टन्धिहोय उसकी पूर्वोक्त योगमें मिलादेप, तच भंशादि वृत्तफल होताहै, वह वृत्त मेपादि छः राशिके भीतर होय तो धन और तुलआदि छःराशिके भीतर होय तो ऋण जाने, तिसी- प्रकार रविमन्दकेन्द्र भुजांगास वृतफलके अनुसार फल लाकर उसको पाँ- बसे गुणा कर तब जो गुणनफल होय उसमें वारहका भाग देय तव जो लब्धि होय वह अंशादि रविका मन्दफल होताहै, वह रविमन्दकन्द्र मेपादि छः राशि होय तो धन और तुलादि छ. रागिम होय तो ऋण होताह, तदनन्तर वृत्तफल और रविमन्दफल इन दोनोंका संस्कार कर ॥१०॥ उदाहरण. वृत्त ? रा० २५ २० १०५. वि० इसके भुजांग ५५० ३ ० ५१ वि० हुए, इसमें १३का भागदिया तव लब्धि हुई ४ और पव:०३०५.वि० लन्धि जो चार ४ तत्परिमित भले नाचेके फलाङ्क १२तकके भो १७॥ १६ १४११२ क योग५९को ग्रहणकरा और सन्धि जो ४ उसमें और मिला- कर पकनीक फलाडू से शेप ३० ३ क०५. विको गुणा करा तय २७ अंश ३४ क० ४८ वि० हुप, इसमें १३का भागदिया तब सन्धि हुई २० ७क. १७ वि० इसमें चार फलाके योग ५९कोयुक्त करा तब ६१ अं०७० १७ वि० यह वृतफल, वृनके मैपादि होनेके कारण धन है॥ रविमन्दोच २०१८२० ० ० ० विम मध्यमरवि ६रा० २९० ५८ क. १९ वि०को घटाया तर परदा ७ रा० १८०१ ० ४१ वि० यद रविभन्दकेन्द्र हुभा, इसके भुतांश १८ अं० १ क० ४१ वि० हुए, उसमें का भागदिया तर लब्धि हुई ३ भार शेषरहा ० १ क०४१ वि० । लन्धिपरि- मित फलाओं १७ । १६ । १४ । का योग हुभा १७ भार लन्धिौ ? मिलाकर कनीक फलाद से गकी ९ अं० १क० ४. विश्को गुणाकरा तय १०८०२० क० १३.पि.हुए, इसमें १३का भागदिया तब लब्धि हुई ८ में. २०क. वि.इसमें तीन फलाशंका योग ४७ मिलाया तब ५५ मं. २०२.. .वि.हुए, इसको ५से गुणा करा तर २७६ मं. १० क..वि. दुप, इसमें २२का भागदिया तर पन्धि हुई भ. क.२०विं. यह रविमन्दाफल, रवि- मन्दकेन्द्र तुलादि होने के कारण ऋण है ॥ नान, धन .७ क. विष्मरधिमन्दफर ऋणभं. क.२.वि. ओवयपा तर गैरहा ३८.३ क.५०वि. यह फलदपमस्कार हुभा।
(११६) ग्रहलायय। [मासगणाहणदयसाधना- अब हारसाधनकीरीति लिखते हैं- वृत्तैष्यदलादसाप्तियुक्ता रहिताः कर्किमृगादिके च वृत्ते । सगुणांशखवह्नयो हरः स्यादथ सूर्याचर- मुक्तपूर्ववत्स्यात् ॥११॥ अन्वयः-सगुणांशखवह्नयः, ककिंमृगादिके, वृत्ते, वृत्तप्यदलाव, रसाप्तियुक्ताः, रहिताः, च, हरः, स्यात्, अथ, सूर्य्यात, उत्तपूर्ववत्, चरम्, स्यात् ॥ ११॥ अर्थ:-प्रथम जो एकाधिक वृत्तफलाङ्क ग्रहण कराहै उसमें छःका भाग देनसे जो अंशादि लब्धि होय वह, यदि वृत्त कर्कादि कहिये तीन राशिस लेकर नौ राशिपय॑न्त होय तो ३० अं० २० कमें युक्त करदेय, र यदि वह वृत्त मकरादि कहिये नौ राशिसे तीन राशिपर्यन्त होय तो वह राभि ३० अ० २० कम घटादेय तब हार होताहै । और सायन मध्यम रविसे पूर्वोत्तरीति के अनुसार चर साधै ॥ ११ ॥ उदाहरण. एकाधिक वृत्तफलाङ्क ९में ६ का भागदिया तव अंगादि लब्धि हुई १६. ३० क. इस लब्धिको वृत्त मकरादि होनेके कारण ३०, २० क.में घटाया तब शेपरहा २८ अं.५० क. यह हार हुआ। मध्यम रवि ६ रा. २९ अं.५८क. १९वि. इसमें अयनांश १८ अं. १० कको युक्त करा तब ७ रा.१८ अं०८क० १९ वि. यह सायन रवि हुआ, इससे सायाहुभा चर ८४ सायन रवि तुलादि होनेसे धन है ॥ अय स्पष्टतिथिसाधनकी रीति लिखते हैं- नाव्यः स्युः फलसंस्कृतिर्दशहता हारोद्धृताथो चरं सायंलक्षणकं त्वथो विघटिकाः पश्चाहणं प्राग्धनम् । स्वांघ्यूनान्तरयोजनान्यथ तिथिः स्पष्टा त्रिभिः सं- स्कृता तत्संस्कारपटीसमाश्च कलिका देया व्यगौ चोप्णगो॥ १२॥ अन्वयः-फलसंस्कृतिः, दशहता, (ततः), हारोवृता, (सती), नाध्या, स्युः । अयो, चरम, सायंलक्षणफम्, (स्यात् ), अधो, तु, धिकार:७] सान्वयभाषाटीकासमेत । -- स्वाध्पूनान्तरपोजनानि, विघटिकाः, पश्चात्, ऋणम्, प्राक, धनम्, (स्यात् ); अथ, च, त्रिभिः, संस्कृता, तिथिः, स्पष्टा, (स्यात् ), तत्संस्कारघटीतमाः, कलिकाः, व्यगौ, उप्णगो, च, देयाः॥ १२ ॥ अर्थ:-फलद्रयसंस्कृतिको दशसे गुणाकर तब जो गुणनफल होय उसमें हारका भागदेय तब जो कलादि लब्धि होय वह फलद्रयसंस्कृतकी समान धन ऋण होतीहै, यह प्रथमफल कहाताहै । पूर्वोक्तरीतिके अनुसार लाएहुए चरमें साठका भागदेय तब जो लब्धिहोय उसको कलादि जान, इसको यदि चरण होय तो धन और चर धन होय तो ऋण जान,यह द्वितीयफल कहा- ताहै।- अपने नगरसे दक्षिणोत्तर रेखा जितनी योजन होय उसको तीनसे गुण करके चारका भागदेय तब जो विकला आदि लव्धि होय उसको यदि अपने नगरसे दक्षिणोत्तरेखा पश्चिम होय तीऋण और पूर्व होय तो धन जाने यह तृतीयफल होताहै । फिर इन तीनों फलोंको इकट्ठा करके जो धन अ- थवा ऋण होय उसको मध्यतिथिके वारादिको घटिकाओम धन ऋण करी, तब स्पष्ट तिथिकी घटिका होती हैं, तिन घटिकाओं की तुल्य कलाओंको मध्यम रवि और व्यगुमेधन ऋण करतब मध्यम रवि और व्यगुसटतिथ्यन्त के होते हैं। उदाहरण. फलद्रयसंस्कृति धन ३८ अं. ३ क. ५७ वि. को १० से गुणाकरा तय ३८० अंश ३९ क.३० वि. गुणनफल हुआ, इसमें हार २८ अंश ५० कलाका भागदिया तवं कलादि लब्धिहुई १३ कला १२ विकला यह प्रथमफल फल द्वय संस्कृति के धन होने के कारणले धनहै ।। चराधन विकला ८५ में ६० का भागदिया तव कलादि लब्धिहुई १ कला २४ विकला, यह द्वितीयफल चरकै धन होनेके कारणसे ऋणहै ।। देशान्तरयोजन ६४ को उसे गुणाकरातव १९२ हुम इसमें ४ का भागदिया तब लब्धिहुई ४८ विकला यह तृतीयफल अपना नगर दक्षिणोत्तर रेखासे पूर्व होने के कारण धन है। अव प्रथमफल धन १३ काला १२ विकला और तृतीयफल धन क.१८ वि. इन दोनोंका योग दुभा १४ कला विकला इसमें द्वितीयफल ऋण ? करला २४ विकलाको घटाया तय १२ कला ३६ विकला यह एकीकरण धनह इस कारण तिधिक वारादि५वार २० पटी ८ पलम युक्तकरा तब ५वार ३२ पटी ४४ पल अधांत गुरुवारमं पाणिमा ३२ पटी ५४ पल है, एकीकरणकी स- मान कलाभोंको अधांत २.६ विकलाको मध्यम रचि ६ राशि २९ भंश ५८ कला १९ विकलाम युक्तकराव ७ रा.० अंश १० कला५५विकला यह • (११८) ग्रहदायय। [मासगणाहणद्रयसायना- स्पष्टतिप्यन्तका मध्यम रवि हुआ, और एकीकरणकी घटिकाभऑकी तुल्य कलाओंकों अर्थात् १३ कला ३६ विकलाआको व्यगु५राशि२५अंश ८कला १५ विकलामें युक्तकरा तय५राशि२५ अंश २० कला ५. विकला यह स्पष्ट तिण्यन्तका व्यगु हुआ। अब रवि और व्यगु इन दोनोंक स्पष्ट करनेकी रीति लिखतेहैं- स्वस्वाहल्लवामिनजं फलं युगघ्नं लिप्तास्ताः कुरु च तयोः स्फुटौ च ती स्तः॥5॥ अन्वयः-इननम्, फलम्, स्वस्वाहल्लवम्, युगन्नम्, लिताः (स्युः), ताः, च, तयोः, कुरु; ( तदा), च: तो, स्फुटी, स्तः ॥ ॥ अर्थ:-मन्दफलको चारसे गुणाकर तब जो गुणनफल होय उसमें चौवी- सका भागदेय, तब जो लब्धि होय उसे गुणनफलमें युक्तकरदेय, तव कला दिफल होताहै, उसको मन्दफलके अनुसार मध्यम रवि और व्यगुमें धन अणकर, तब रवि और व्यगु स्पष्ट होतेहैं ॥5॥ उदाहरण. रवि मन्दफल ऋण २३ भंश ३ कला २० विकला इसको ४ से गुणाकरा सय ९३ ॥ १३ ॥२० हुए इसमें २५ का भागदिया तब लब्धिहुई ३।५०३३ इसमें गुणनफल ९१ ॥ १३१२० को युक्तकरा तव ९६ कला ३ विकला हुई इ. सको मन्दफलक ऋण होनेके कारण ९६ कला ३ विकलाको मध्यम रवि ५ राशि ० अं. १० कला ५५ विकलाम ऋणकरा अर्थात् घटाया तब ६ रा.२८ भंश ३४ कला ५३ विकला यह स्पष्ट रवि हुमा । और ९६ कला ३ विकला अर्थात् १ अंठा ३६ कला ३ विकलाको व्यगु ५राशि २५ अंश २० कला विकलामं ऋण करा तव ५रामि २३ अंश ४ कला १८ विकला यह सष्ट स्पगु हुभा॥5॥ अव चन्द्रबिच साधनेकी रीति लिखते हैं- वित्र्यंशद्धियुतहरः कृशानुभक्तश्चन्द्रस्य प्रभवति बि बममुलायम् ॥ १३॥ अन्वयः-वित्र्यंशदियुतहरः, कृशानुभक्त चन्द्रस्य, अहलाधम्। चिम्बम, प्रभवति ॥ १३ ॥ "वेदमा ताशिफल ससिदमागम् "दरमपि पाटः।
थिकारः ७] सान्वयभाषाटीकासमेत । (११९) अर्थः-हारमें एक अंश चालीसकरला मिलाकर तीनका भागदेय तब जो लब्धिहोय वह अट्टलादि चन्द्रविम्ब होताहै ॥ १३ ॥ उदाहरण.. हार २८ अंश ५० कलामें १ भंग १० कलाको युक्तकरा तव ३० अंश ३० कल्न हुआ, इसमें ३ का भागदिया तव लब्धिहुई १० अंगुल १० प्र. अद्गुल यह चन्द्रविम्ब हुभा ॥ अव सूर्यबिम्ब भीर भूभाविम्ब साधनेकी रीति लिखते हैं- साध्याप्ताकागतदलयुतोनाः स्वकेन्द्रे कुलीरनकाये स्यावयारेलरभवा अङ्गुलायर्कविम्बम् । हारोवीषुः स्वतिथिलवयुक्स्यात्कुभास्यां धनणे साक्षाप्तार्का- गतदलमथो नक्रकादिकेन्द्रे ॥१४॥ अन्वयः-स्वकेन्द्र, कुलीरनकाय, (सति), व्यरिलवभवाः, सा- ध्यातार्कागतदलयुतोनाः, (सन्तः), अहलादि, अर्कबिम्बम्, स्यात् । अयो, वीपुः, हारः, स्वतिथिलवयुक्, कुभा, स्यात् । अस्याम्, खा- क्षातार्कागतदलम्, नककर्कादिकेन्द्रे, धनर्णम्, (कार्यम्, तत, भूभा- विम्बम्, भवति ) ॥ १४ ॥ भर्थ:-रविका मन्दफल साधनेके समय जो एकाधिक मन्दफलाइमा- याथा उसमें चालीसका भागदेय तव जो लब्धिहोय उसको अट्ठलादि जाने और इसको रविमन्दकेन्द्र कार्कादि होय ती दामट्ठल पत्रास प्रतिभठ्ठलमें मिलादेय, और यदि रविभन्दकेन्द्र मकरादि होय तो दश भट्ठल पचास प्रतिभट्ठलभ घटादेय, तब भगुलादि सूर्यविम्ब होताहै। हारमै पाँच अंश घटाकर जो शेषरहै उसमें उसका पन्द्रहवाँ भाग युक्तकर, फिर उसमें यदि रवि भन्दफलांकका पचासवाँ भाग, रविमन्दकेन्द्र कादि होप ती पटादेय भीर रविमन्दकेन्द्र मकगदि होय तो मुक्त करदेप, तब अगलादि भूभा- रिम्न होताहै ॥ १॥ उदाहरण. एकाधिक मन्दफलाइन में ४० का भागदैनाई इसकारण १२ को ६० से गुणाकरा तर २० हुए इसमें ४० का भागदिया वर सन्धिहुई० भहुल १८ प्र.महल इमको रविमन्दकेन्द्र के कांदि होने के कारण धन होनेसे १० अ- (१२०) प्रहलायय। [मासगणाहणदयसाधना छल ५० प्र.मगुलमें युक्तकरा तय ११ अट्ठल ८ प्रतिभट्ठल यह सूर्यविम हुआ, इसीप्रकार हार २८ अंश ५० कलामें ५ अंश पठाए तब २३ अंग ५ कला शेषरहा, इसमें २३ अंश ५० कलाका पन्द्रहवाँ भाग १ अंश ३५ कला युक्तकरा तर २५ अगुल २५ प्रतिअगुल हुए, 1 अब एकाधिक रविमन्दफला. १२५ का भागदिया तब अगुल १५०० सब्धिहुई इसको रधिमन्दकेन्द्र कर्कादि है इसकारण ऋण होनेसे २५ अट्ठल २५ प्रतिभट्ठलमें घटाया तब शेषरहा २५ अडल ११ प्र.मं. यह भूभाविम्ब हुभा ॥ . अव ग्रहणसम्भवं कहतेहैं- ज्ञात्वैवं तिथिपूर्वक ग्रहणज शेपं भवेत्पूर्ववत्पण्मा सैरुत पक्षवर्जितयुतैः पक्षेऽथवा लोकयेत् । अर्केन्दु ग्रहणं व्यगोर्भुजलवैस्तिथ्यल्पकैरुष्णगोर्याम्यवस्व धेरैर्युरात्रिगतिथौ चाहर्निशामाश्रिते ॥ १५ ॥ अन्वयः-एवम्, तिथिपूर्वकम, ज्ञात्वा, शेपम्, ग्रहणजम्, पूर्ववत भवेत् । अन्दुग्रहणम्, पण्मासैः, उत, पक्षवर्जितयुतः, अथवा, पक्ष, आलोकयेत् । व्यगो, भुजलवैः, तिथ्यल्पकैः, ( सद्भिः, अकॅन्दुम- हणम्, स्यात् ) । उष्णगोः, याम्यैः, ( व्यगुभुजोशः), वस्वधर, (सद्भिः), (अग्रहणम्, स्यात् । युरात्रिगतिथौ, (अर्थात् दिन- मातात्तियो, न्यूने, सति, सूर्यग्रहणम्, स्यात्, अधिके, सति चन्द्र हणम्, स्यात् ) । अहर्निशाम्, आश्रित, ( सति), च, (ग्रहणमा प्रस्तोदित, अस्तास्ते, वा, स्यात् ) ॥ १५ ॥ अर्थः-सूर्य और चन्द्रमा इन दोनीका ग्रहण होनेसे५३ साड़े पाँच मही ने अनन्तर भथवा ६ छः महीने के अनन्तर, अथवा ६साई छः महीनेक अनन्तर, अथवा १५ पन्द्रह दिन अनन्तर ग्रहणका सम्भवह था नहीं यह देरी। घ्यायक भुनांदश पन्द्रह अंगकी अपेक्षा कम होती सूर्य अथवा न्द्रमाके ग्रहणका सम्भव होता है । परन्तु ध्याय दक्षिण गोलम होय और उसके भांश चौदह अंगसे कम और आद अंगस अधिक हो तो मर्यन- दणका सम्भव नहीं होता है, यदि व्यापक भुनांश भाट अंशकी अपेक्षा फम दो सादी गप्पग्रहणका सम्भव होता । ग्रहणका मम्भव होकरभी यति भमापास्पादिनमें होय तो गप्प ग्रहण दीरी, और यदि पौणिमा राधिमें हीय ती धिकारः ७] सान्वयभाषाटीकासमेत। (१९१) चन्द्रग्रहण दीखे, और किश्चिन्मात्र रात्रिका सां करनेवाली भयवाकि- श्चिमात्र दिनस्पर्श करनेवाली तिथि होयता प्रस्तास्त अथवा ग्रस्तोदित ग्र- हण होताह ॥ १५॥ अब चन्द्रग्रास साधनेकी रीति लिखतेहै- • सत्र्यंशगुणोनितोहरोऽयं वेदनोङ्कस्तो व्यगोर्भुजां शे। हीनो भवताडितोऽद्रिहृत्स्याच्छन्नं शीतरुचों गुलादिकं वा ॥ १६॥ अन्वयः-सव्यंशगुणोनितः,अयम, हरः, वेदनः, अङ्कहतः, व्यगोः। भजांशैः, हीनः, भवताडितः, अद्विहृत, शीतरुवः, अहलादिकम्, छन्नम, स्यात् ।। १६ ॥ भर्थ:-हारमं तीन अंश वास कला-घटाकर जीशेपर उसको चारसे गुणा करके जो गुणनफल होय उसमें नौका भागदेय तव जो लब्धि होय उसमें व्यगुके भुजांग घटाये तब जो शेष रहे उसको ग्यारहसे गुणाकर तय जो गुणनफल होय उसमें सातका.भाग देय तय जो लब्धि होय यह भट्ठलादि. चन्द्रमास होता'।। १६॥ उदाहरण. हार २८ २५० कलाम ३ अंश २० कला घटाए तव टोपरहा २५ भंग ३० करा इसको चार से गुण.करा तय १०२ भंग कला पह गुणनफल हुमा, इसमें का भाग दिया तब अंग २० कला यह लब्धि हुई इसमें व्यगुके भुजांदा ६ अंश १५ कला १२ विकलाको घटाया तव परहे ५ अंग कला १८ विकला, इसको ग्यारह ११ से गुणाकरा तब ५५भंग ५२ कला ४८ विकला, यह गुणनफल हुमा इसमें ७ का भागदिया तब लब्धि हुई ७ भट्ठल ५८ प्रतिअद्गल यह चन्द्रग्रान हुआ ॥ भव सूर्यग्रास साधनेकी रीति लिखतेह- अमान्तनतनाडिकांनिरहिताधुतात्माक्परे गृहादि- करवेनंतांशकरसांशसंस्कारिताः। व्यगो जलवाः स्फुटाः स्युरथ सप्त शुद्धाश्च ते निजाईसहिता खेः स्थगितमहलायं स्फुटम् ।। १७ ॥ राध मान पटी मनमानी होता।
.(१२५) ग्रंहलापय । [ मासगणाट्हणद्रयसाधना अन्वयः-अमान्तनतनाडिकांविरहितात्, प्राक्, गृहादिकरवैः, परे, युतात, नतांशकरसांशसंस्कारिताः, व्यगोः, मुजलवाः, स्फुटार। अय, ते, सप्तशुद्धाः, निजाईसहिताः, रखे, स्फुटम्, अट्ठलायम, स्थगितम्, (स्यात् ) ॥ १७ ॥ अर्थः-पर्वान्तकालमें जो नत घटिका हो उनमें चारका भागदेय तब जो रात्यादि लब्ध होय उसको यदि नत पूर्व होय तो स्पष्ट सूर्यमें घटादेय,और यदि नत पश्चिम होय तो स्पष्ट सूर्यम युक्त करदेय, तदनन्तर उससे क्रान्ति साधकर उस क्रान्तिका और अक्षांशका संस्कार करके नतांश साथै, और 'तिन नतांमि छाका भाग देकर जो लब्धि होय उसको नताशकी दिशाको जाने, फिर स्पष्ट व्यगुकी भुजकरके उनके अंश करै वह, व्यगु जिस गोल में होप उस गोलकी दिशाके होतेहैं, तदनन्तर भागाकारका और ज्या अनांगोंका संस्कार करें, तव स्पष्ट नताश होतेहैं उनको सात अंशाम घटा कर जो शेपरहै उसको तीनसे गुणा करकै दोका भागदेय तब जो भद्गुदादि सन्धि होप वह सूर्यका अगुलादि ग्रास होताहै ॥ १७ ॥ उदाहरण. आगै सूर्यग्रहणका पर्व लानेके समय दिखावेंगे । भव ग्रहणके स्वामी जाननेकी रीति लिखते हैं- व्यगुमध्यपर्ययगणो द्विगुणो वणिगादिगे व्ययुगृहे कुयुतः । स्मृतचक्रसंज्ञकयुतो विधितो गतपर्वपो मुनिहतोर्वरितः॥ १८॥ अन्ययः-व्यगुमध्यपर्ययगणः, दिगुणः, (कार्यः) व्यगुगृहे, गादिंग, (सति), कुयुतः, (फार्यः), (ततः), स्मृतचक्रसंज्ञक युतः, (ततः.), मुनिहतोवरितः, (सन् ), विपितः, गतपर्वः (भ्यान्)॥१८॥ मम संस्कारो मान-एकादशगंगा ग्रिदिशन्तरम् । पदिका नाश सात शासे अधिक होय की जानटंय कि मन नहीं लगा।
धिकारः ७] सान्वयभाषाटीकासमेत । (१२३) , अर्थ:-मध्यम व्यगु लाने के समय जो भगण लाएथे उसको दोसे गुणाकर दब जो गुणन फल होय, उसमें यदि व्यगु तुलादि होय तो एक मिलादेय, और यदि व्यगु मेषादि होय तो चक्रसंख्याको युक्त करदेय तब जो अङ्कहीं दिसमें सातका भाग देय, तव यदि शून्य शेष रहै तौ ब्रह्मा,एक शेष रहे तो च- न्द्रमा, दो शेष रहै तो इन्द्र, तीन शेष रहे तोकुवेर, चार शेष रहै तो वरुण, पाँच शेष रहें तो अग्नि, भौर छः शेष रह तौ यम ग्रहणका स्वामी होताहै।सोई बृहत्संहिताके विप वराहमिहिरने कहाहै- " षण्मासोत्तरवृद्धया पर्वेशाः सप्त देवताः क्रमशः।. ब्रह्माशीन्द्रकुवेरा वरुणाग्नियमाश्व विज्ञयाः ॥" उत्तरोत्तर छः छः मासकी वृद्धि करकै क्रमसे ब्रह्मा, चन्द्रमा, इन्द्र, फुर, वरुण, अग्नि और पम यह सात देवता ग्रहणके स्वामी है। ज्योतिषी लोग इन ग्रहण के स्वामियाले संसारका शुभाशुभ फल कहतेहैं ॥ १८ ॥ उदाहरण. मासंगणोत्पन्न व्यगु ५ राशि अंश १२ कला ४५ विकला, भौर चक्रसे गुणाकराहुमा ध्रुव ५६ राशि ९ अंश ३६ कला विकला, तथा क्षेपक ११ राशि ७ अंश १८ कला विकला इन सवका योग करा तव १९ राशि २१ भंठा २ कला ४५ विकला हुआ, इसमें १२ का भाग दिया तब लब्धि हुई १० यह भगण हुभा इसको २ से गुणाकरा तव २० व्यगु मेषादि है इस कारण द्विगुणित भगण २० में चक्र ८को युक्त करा तर २८ हुए इसमें ७ का भाग दिपा तव शून्य शेष रहा इस कारण ग्रह- णका स्वामी ब्रह्मा हुभा ॥ अब स्पष्ट चन्द्र और चन्द्रस्पष्टगति लानेकी रीति लिखतेहैं- तिथिरविहतिरंशास्तद्युतोकों विधुः स्यादथ जिन- गुणहारोव्यङ्गयुक्तद्गतिः स्यात् । खचरशरकलाः स्यात्सूर्याभुक्तिस्ततः स्युभयुतिजगतगम्या नाडि- कास्तिथ्यपायात् ।। १९॥ अन्वयः-तिथिरविहतिः, अंशाः, (स्युः); तद्युतः, अर्कः, विधुः, १ यह " संहिता " सरलमापाटीकासहित, इस ग्रहलापत्रके समनन्तरही श्रीवेटे- . स्वर प्रेसमें छपेगी। .
हुधा, इसमें द्विगुणित चक्र १६ का एक्तकरा तय ६५ हुए इसमें १० युक्तकरें (१२४) ग्रहलाघव । .[मासगणादणद्रयसाधना स्यात् । अथ, जिनगुणहारः, यङ्गयुक, तद्गतिः, स्यात् । खबर शरकला, सूर्यभुक्तिः, स्यात् । ततः, भयुतिजगतगम्याः, नाडिका तिथ्यपायात, स्युः ॥ १९ ॥ अर्थ:-तिथिको वारहसे गुणा करके जो गुणनफल होय वह अंश होते हैं। उन अंशीको स्पष्ट सूर्यमें मिलावै तय स्पष्ट चन्द्र होता है । तिसी प्रकार हारको चौबीससे गुणा करके जो गुणनफल होय उसको कलादि मानकर उसमें वासठ कला युक्त करै, तब चन्द्रस्पष्टगति होती है । और उनसठ कला सूर्यस्पष्टगति होतीहै । तदनन्तर सटसूर्य-स्पष्टचन्द्र-स्पष्टचन्द गति-और स्पष्टसूर्यगति इनसे नक्षत्र और योग इनकी गत गम्य घड़ी लावै वह स्पष्ट तिथिके अन्तसे होती है ॥ १९ ॥ उदाहरण. तिथि १५ को १२ से गुणाकरा तब १८० हुए, इन अंशोको स्पष्ट सूर्य । राशि २८ अंश ३५ कला ५२ विकलामें युक्त करा तब ० राशि २८ अंश ३ कला ५२ विकला यह स्पष्ट चन्द्र हुआ। फिर हार २८ अंश ५० कलाको २६से गुणाकरा तब ६९२ कला ० विकला हुआ, इसमें ६२ कला युक्तकरी तब ७५४ कला • विकला यह चन्द्रमाको सष्ट गति हुई, इससे लाईहुई कृत्तिकानक्षत्र- की गत पटिका हुई४६ घटिका २८पल और गम्य घटिका हुई१२ घटिका ३६पल। सूर्यग्रहणका उदाहरण. संवत् १६६९ शाके १५३४ वैशाख कृष्ण ३० अमावास्या बुधवार घट्यादि २६ घटी २८ पल, रोहिणी नक्षत्र घट्यादि ३४ घटी ५७ पल, धृतियोग घट्या- दि.१९ घटी १९ पल, इसदिन पश्चाङ्गमें ग्रहण लिखाद, इस कारण मासगण पर्वकाल साधते हैं- शाके १५३४ में १५४२ को घटायां तव शेप रहे ९१ इसमें ११ का भाग: दिया तय लब्धि हुई ८ यह चक्र हुआ, और शेषयचे ४ इसको १२ से गुण करा तय ४८ हुण इसमें गतमास १ को युक्तकरा तय ४९ यह मध्यम मासगण तय ७५ हुए इसमें ३३ घा भागदिया तय लान्य हुई। यह अधिक मास हुभा इसमें माध्यम मासगण को युक्तक तप यह मासगण हुभा, इसको "मानापती द्विगुणितादित्यादि " गैतिक अनुसार २ से गुणाकराता १०२ दुप, इसमें ६७ का भागदिया तब राज्यादिलन्धि हुई १ राशि १५ अंश ५० या १७ पिपलामको माग पerinशेष हा राज्यादि । तिलाला इसमें चक्रमे गुणाकरे हुए भुयक राशि धेकार:] सान्वयभाषाटीकासमेत । (१२५) . ३ अंग २० कला विकलाको घटाया तब शेष रहे १ राशि अंश ५९ कला ३ विकला इसमें क्षेपक ४ अंश २१ कलाको युक्तकरा तब १ राशि५ अंश कला ४३ विकला यह पौर्णिमाके अन्त में सूर्य हुआ, इसमें पक्षचालन । राशि १४ अंश ३३ कला • विकलाको युक्तकरा तव १ राशि १९ अंश १३ कला ४३ विकला यह अमावास्या अन्तम सूर्य हुआ, पूर्वोक्त रीतिके अनुसार पीणिमान्त व्यगु हुआ ११ राशि २१ अंश ६ कला ४५ विकला इसमें गक्षिक चालन राशि १५ अंश २० कला० विकलाको युक्तकरा तब० राशि अंश २६ कला ४५ विकला यह अमान्त व्यगु हुभा । अव वृत्त हुआ पूर्णि- सान्तम ८ राशि २० अंश १० कला ४३ विकला इसमें पाक्षिक चालन ६ शि १२ अंश ५४ कला • विकलाको युक्तकरा तय ३ राशि ३ अंश ४ कला ३ विकला यह अमान्त वृत्त हुआ। अब पूर्वोक्त रीतिके अनुसार वारादि हुआ ३ वार ९ घटी ७ पल इसमें पाक्षिक चालन वार ४५ घटी ५५ पलको पुक्तकरा तब ३ बार ५५ घटी २ पल यह अमान्त वारादि हुआ। अब सष्टो- करण दिखते हैं- वृत्तफलधन ५४ अंग २२ कला २१ विकला और मन्दफल धन १५ अंश ४१ कलाट० विकल्ला इन दोनोंका संस्कार (योग) करा तव ८९ अंश कला १ विकला यह फलद्रयसंस्कार धन हुआ । अब रविमन्दोच्च २ राशि २८ 'अंश कला विकलाम मध्यभरवि राशि १९ अंग ५. कला ४३ विकलाको घटाया तव ० राशि २८ अंडा ६ कला १७ विकला यह रविकेन्द्र हुआ। एकाधिक वृत्त फलाङ्क २१ और हार ३० अंश ४० कला । तथा चरऋण १०८ विकला है परन्तु " सायंलक्षणकमित्यादि " पूर्वोक्त रीतिक अनुसार इसकोभी धन माना। और " नाड्यास्युः फलसंस्कृतिर्दाहता हार 'इत्यादि "रीतिके अनुसार फरदयसंस्कृति ८९ अंश ४ कला ? विकला को१० से गुणाकरा तच८९० अंश १०का०१० विकला यह गुणनफल हुआ इसमें हार ३० अंश ४० कलाका भागदिया तब लब्धि हुई फारद्धयसंस्कृतिके धन होनेके कारण धन २९ कला ३ विकला यह प्रथम फर हुआ और द्वितीय फलधन ? कला ४८विकला हुभा और तृतीय फलधन ० कला ४८ विकला हुआ, और इन तीनों फलोंका योगकरा तय फलवयस्य धन ३१ कला.३८ विकला हुई इसमें पारादि ३ वार ५५पी २ परको युक्तकरा तय ४ घार २६ पटी २० पल यह स्पष्ट धारादि अर्थात् युधवारके दिन अमावास्या २६ घटी ४० पल है ऐसा सिद्ध हुआ। अव फलवपतस्कृति तुल्य घटिया हुई ३१ घटी ३८ पल इसमें मध्यमरवि राशि १९ मा ५३ कला ४३ विकलाने युक्तकरा तब राशि २० अंश २५ कला २१ विकला यह दशान्तकालीन स्पष्ट मध्यमरवि हुआ, और व्यगु i और (२२६) ग्रहलायव । [मासगणाहणद्यसाधना राशि ६ अंश २६ कला ४५ विकलामें फलवयैक्य धन ३१ कला ३८ विक लाको युक्तकरा तव ० राशि ६ अंश ५८ कला २३ विकला यह दर्शा न्तकालीन स्पष्ट व्यगु हुआ । अब रविमन्दफल धन १४ अंश ४१ कला ४० विकलाको ४ से गुणाकरा तब ५८ अंश ४६ कला ४० विकला हुआ इसमें इसके चौवीसवे भाग २३ अंश २६ कला ५७ विकलाको युक्त करा तव कलादि हुआ ६१ कला १३ विकला यह मन्द- फलकै धन होने के कारण धनहै, इसकारण ६१ कला १३ विकलाको मध्यम रवि १ राशि २० अंश २५ कला २१ विकलाम युक्त करा तव १ राशि २१ - २६ कला ३४ वि. यह सष्ट सूर्य हुआ इसमें तिथि ३०को १२से गुणा करके ३६० अंश युक्त करे तव राशि २१ अं.२६ क.३४ वि. यह स्पष्ट चन्द्र हुआ। दन्तिकाटीन स्पष्ट व्यगु राशि६ अंश ५८ कला २३ विकलामें ६१क. १३ विकलाको युक्तंकरा तव राशि ७ अं. ५९ कला ३६ विकला यह स्पष्ट व्यगु हुआ। हार 20 अंश ४० कलाको २४से गुणा करा तय ७३६ हुए इसमें ६२को युक्त करा तय ७९८ कला यह चन्द्रपटगति हुई। और ५९ करता यह सूर्यगति है। स्पष्टरवि-स्पष्टचन्द्र-और इन दोनोंकी गतिसे दर्शान्तकालीन नक्षत्र योग साधते हैं-गहिणी नक्षत्रकी गतघटिया हुई ५१ घटी ५७ पल भीर गम्य घटिका हुई घटी पल । तिसीमकार प्रतियोगको गतघटी हुई ४० घटीपल और गम्य घटी हुई १५ घटी ५२ पल । चन्द्रपिम्य अहल ४६मतिअद्गुल हुआ, मूर्पविम्य १० अहला ३९प्र..॥ भव सूर्यग्रास साधते हैं-अमान्त २६ पटी ४० पलमें दिनाई १६ घटी ४८ पलको घटाया तय ९घटी ५२ पल ओपरहा इसम का भाग दिया ता सन्धि हुई २ राशि भंश कला विकला इनमें स्पष्टरपि राशि . २६ कला ३४यिकलाको युत्ता करा तय ४राशि ५ अंश २६ करता ३४ मि. दुभा, इसकी झान्ति हुई उनर १३ अंग कला पिकला। भोर भक्षा- दा दक्षिण हुए २५ भंटा २६ करता ५ विकमा, मान्ति और अक्षांश दोनोंका संस्कार करना नाग हुए दक्षिण ११ भंग ३४ कला २१ विकला इसका उरा भाग हुभा दक्षिण अंग ५ याला ४३ विकल्या । स्पष्टायगफ उत्तर: अम हुए अंग ५.गरा :६ पिकला इसमें ध्यायः उत्तरणोदमें होनेके मारण उपरोक्त पष्टांग दक्षिण अंश५माग्दा १३ पिकसाको पटापा तर शेष रदला पियरहा इसमादाम पटापा सरदोष रहे अंश ५६ का ७पिफमा इसमें इसका भाप १८ ! ४को पुत्तकर हर भारत २४ प्रतिभा पद गप्पंपाम हुभा ॥ TO RIGITTARAVARTE समातिभि: ॥
धिकारः८] सान्वयभापाटीकासमेत । (१२७)
अथ पञ्चाङ्गाग्रहणद्वयसाधनं व्याख्यायते ।
अथवायं तिथिपत्रतोऽवगम्यः पर्वान्तश्च रविस्तम-
स्तिथे । भल्येतेष्यपटीयुतिघुमानं तेभ्योऽथग्रह-
णद्वयं प्रवच्मि ॥१॥
अन्वयः-अथवा, तिथिपत्रतः अयम्, पर्वान्तः, रविः, तमः, च..
अवगम्यः, तिथेः, वा, भस्य, इतेप्यघटीयुतिः, ( अवगम्या) घुमा-
नम्, (अवगम्यम् ), अय, तेभ्यः, ग्रहणद्वयम्, प्रवच्मि ॥ १ ॥
अर्थ:-अथवा तिथिपत्र ( पश्चाङ्ग ) पर्वन्तिकालीन घटिका, सूर्य, राहु,
तिथिका गतयम्य घटिकाओका योग, तथा नक्षत्रका गवगम्य घटिकाओंका
योग, भोर दिनमान जान, अब इन सबसेही चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण
दोनोंकी गणित करनेकी रीति कहताहूँ ॥ १॥
उदाहरण.
सम्वत् १६६९ शाक १५३४ वैशाख शुक्ल पौर्णिमा १५ सोमवार गतपटीर
पल ३३ सूर्योदयसे गम्य घटी ५४ पल १० गतगम्यघटीयोग ५६ घी ४३
प०अनुराधा नक्षत्र गतवटी२० पल ४ गम्य घटी ३८ पल ३ गत और गम्य
घटिकाओका योग ५८ घटी ३७ पल दिनमान ३३ घटी ६ पल । पर्वान्त-
कालीन रवि १ राशि ६ भंश ३४ कला ३७ विकला पर्वान्तकालीन राह:
राशि १४ अंश १८ कला ११ विकला । विराहकं ११.राशि २२ अंश १६
कला २६ विकला ॥
अव चन्द्रग्नास लानेकी रीति लिखते हैं-
तारापड्व्यगतिथियातगम्यनाड़ीयोगाप्ताव्यगुरवि-
दोर्लवोनितास्ते । संयुक्ता निजदलभूपभागकाभ्यां
छनं वाङ्गुलवदनं भवेत्सुधांशोः॥२॥
अन्वयः-वातारापव्यगतिथियातगम्यनाड़ीयोगाप्ताः, व्यगुरवि-
दोर्लवोनिताः, ते, निनदलभूपभागकाभ्याम, संयुक्ताः, (सन्तः),
सुधांशो: लवदनम्, उनम्, भवेत् ॥ २ ॥
(१२८) ग्रहलांघव । [पमाङ्गादहणदपसाधना- अर्थ:-पर्वको गतगम्य घटिकामाक योगी सात घटाकर जो शेष रहे, उसका छासौ सत्ताईसम भागदेय तय जो अंशादि लब्धि होय उसमें विग- हके भुजांशोंको घटाकर जो शेष रहे उसको पचीससे गुणाकर तब जो गुणनफल होय उसमें सोलहका भागदेय भथया उस शेपमें उसका आधा और सोलहवाँ भागायुक्तकर तप अद्भुलादि चन्द्रनास होताहे ॥२॥ उदाहरण. पर्वकीगतगम्य घटिकाओंके योग ५६ घटी ४३ पलमें सातको घटायातब शेष रहे ४९ घटी ४३ पल इसका ६२७ में भागदिया तय अंशादि लब्धि हुई १२ अंश ३६ कला ४१ विकला इसमें विराहक (व्यगु ) के भुजांशी- ७ अंश ४३ कला ३४ विकलाको घटाया तब शेष रहे ४ अंश ५३ कला ७ विकला इसको २५ से गुणाकरा तब १२२ अंश ७ कला ३५ विकला हुए इसमें १६ का भाग दिया तब अट्टलादि लब्धि हुई ७ अङ्कल ३८ प्रति- अद्भुल यही चन्द्रग्रास हुआ । अथवा शेष ४ अंश ५३ कला विकलामें अपना आधा २ अंश २६ कला ३३ विकला और सोलहवाँ भाग १८ कला १९ विकलाको युक्त करा तब भी ७ अट्ठल ३८ प्रतिभहुल यही चन्द्रग्रास हुआ॥ अब चन्द्रविम्ब और भूभाविम्ब लानेकी रीति लिखतेहैं- अङ्गयुक्तिथिघटीहृतवाणाङ्कर्त्तवोङ्गुलमुखं विधुवि । म्बम् । दिग्वियुक्तिथिघटीहतग्वोन्दवोङ्गुलमु- खाक्षितिभा स्यात् ॥३॥ . . अन्वयः-अङ्गम्युक्तिविघटीहृतवाणाङ्कर्तवः, अट्ठलमुखम, विधु- बिम्बम्, ( स्यात् ) । दिग्वियुक्तिविघटीहतग्क्रीन्दवः, अहल मुखा, क्षितिभा, स्यात् ॥ ३ ॥ अर्थः-तिथि( पर्व )की गतगम्य घटिकाओके योग छः मिलाकर जो अङ्कयोग ही उसका छःसा पिचाणवमें भागदेय तब जो अगुलादि 'लब्धि होप यह चन्द्रविम्प होताह । और तिथिपर्वकी गतगम्य टिकाभोंके योगमें ग घटाकर जो शेपरहै उसका एक हजार तीन सौ बाईसमें भागदेय तब जो अद्गुलादि लब्धि होय वह भूभाविम्ब होताहै ॥३॥ उदाहरण. पथकी गतगम्य घटिकाकि पोग ५६ घटी ४३ पलमें घटीको युक्त सन्धि व्यगुके भांश न घटसके सहज जाने कि चन्द्रग्रहण नहीं होगा।
" - ‘धिकार८] सान्वयभाषाटीकासमेत। • (१२९) करा तब ६२ घडी ५३ पल हुभा इसका ६९५ में भाग दिया तंव अखंलादि लब्धि हुई ११ अहल ४ प्रतिभट्ठल यह चन्द्रविम्ब हुआ। और पर्वको गतगम्य घटिकाओंके योग ५६ घटी ४३ पलमें १० घटाए तब शेप रहे ४६ घटी ४३ पल इसका १३२२ में भाग दिया तब अट्ठलादि लब्धि हुई २८ अदुल १७ प्रतिअद्गुल यह मध्यम भूभाविम्ब हुआ । अब भूभाकें संस्कारको रीति कहतेहैं-. रुद्रभूपनखभूपरुद्रखव्यङ्गुलविरहिता युता क्रमात् । पगृहे सति रखो धंद्याक्रियान्नाडिकोद्भवकुभा. स्फुटा भवेत् ॥४॥ अन्वयः-खो, घटात, क्रियात्, पगृहे,सति, जमात, रुद्रभूपनख भूपरुद्रखपहलैः, विरहिता,युता, नाडिकोद्भवकुभा,स्फुटा भवेत्॥४॥ अर्थ:-फिर तिस ऊपरोक्त भूभाविम्बके प्रतिभट्ठलाम यदि सूर्य में- पराशिसे तुलाराशिपय॑न्त होय तो जिस राशिमें होय तिस राशिके नीचे लिखे हुम " राष्ट्र काहिये ग्यारह, भूप काहये सोलह, नख पहिये चीस, भूप कहिये सोलह, रुद्र काहिये ग्यारह, ख कहिये शून्य" इनमके अङ्कको युक्त करदेय, और यदि सूर्य तुलराशिसे मेष राशि पर्यन्त होय तो जिस राशिका हो टस राशिके नीचे लिखे हुए अङ्कको भूभाबिम्बके प्रतिभहल्लीम घटादेय तव भूभाविम्ब स्पष्ट होताहै ॥४॥ मप वृप मियु.कर्कसिह कन्या तुल वृश्चि धनु मकर कुम्भ मीन २१६/२०११६/१110 १६२०१६/११/प्रतिअगला उदाहरण. उपरोक्त भूभाविम्ब २८ अहल १७ प्रतिभगुल है, और सूर्य वृषभ राशिका है, इस कारण वृपभ राशिके नीचे लिहुम अङ्क १६ को भूभा.. विम्बके प्रतिभट्ठला १७ में युक्न करातब २८ अट्ठल ३३ प्रतिअगुल यह स्पष्ट भूभारिम्ब हुभा ॥ अब नक्षत्रकी घटिकामास चन्द्रग्रास साधनेकी रीति लिखते हैं- विदेशोडुपटीयुता सभूपव्यगुभास्वद्भुनभागव- जितास्ते । शितिकण्ठहतास्तुरङ्गभक्ताः स्थगितं चाइलपूर्वकं विथो: स्यात् ॥५॥ .
(१३०)
नहलाघव । [पाहाहणदयसाधना-
अन्वयः-खभूपद, विदशोडघटाहताः, (ततः) न्यगुभास्वद्भुजंभा-
गवर्जिताः, च, (कार्याः), ते, शितिकण्ठहताः, (ततः), तुरङ्ग
भक्ताः, (सन्तः), अहलपूर्वकम्, विधोः, स्थगितम्, स्यात् ॥ ५ ॥
अर्थ:-नक्षत्रकी गत गम्य घटिकाओंके योगदग घदादेय तव जो शेष
रहै उसका छःसौ दशम भाग देय तय जो अंशादि लब्धि होप उसमें व्यगुके
अजांशोंको घटावै तब ‘जो शेप रहै उसको ग्यारहसे गुणाकर तब जो गुण-
नफल होय उसमें सातका भाग देय तर जो अगुलादिलन्धि होय वह त्र-
न्द्रमाका ग्रास होताहै ॥५॥ .
उदाहरणं.
नक्षत्रकी गत गम्य घटिकाओंके योग ५८ घटी ३६ पलमें १० घटाए तब
शेष रहे ४८ पटी ३६ पल इसका ६१० में भाग दिया तव लब्धि हुई १२
अंश ३३ कला ५ विकला इसमें न्यगुके भुजांश ७ अंश ४३ कला ३४ विक-
लाको घटाया तब शेष रहे ४ अंश ४९ कला ३१ विकला इसको ११ से
गुणाकरा तब ५३ अंश ४ कला ४१ विकला हुए इसमें ७ का भाग
दिया तव भगुलादि लब्धि हुई ७ अगुल ३४ प्रतिअगुल यह चन्द्रमा-
का ग्रास हुआ।
अब नक्षत्रसे चन्द्रबिम्ब और भूभाविम्ब साधन लिसतेहै-
भगतागतनाडिकैक्यभक्ता मववेदर्त्तव इन्दुबिम्बमु-
तम्। विमनूडुपटीहताःशराक्षद्विभुवः स्याक्षिति
'भामुलादिका वा ॥६॥
अन्वयः-वा, भगतागतनाडिकैक्यभक्ताः, नववेदर्तवः इन्दुविम्ब-
म्, उक्तम्; विमन्डघटीहताः, शराक्षदिभवः, · अहलादिका
क्षितिभा, स्यात् ॥ ६ ॥
भः-छासी उननचाममें नक्षत्रको गत मम्य घटिकाओंके योगका भाग
देष, तब जी अहलादि लब्धि होप यह चन्द्रपिन्ब होता है। और नक्षत्र-
की गतगम्य घटिकाकि योगी चौदह घटाकर जो शेपार्ह उसका एक है.
जार दौसा पचपनमें भागदेय तप जो भद्लादि लब्धि हाय यह मध्यम भूः
भाषिय होताह इसम पर्वस भूभाविम्य साधते समय जो संस्कार कहा है
यह करें तय भृभाविम्ब होताह ॥ ६ ॥
धिकारः८] सान्वयभाषाठीकासमेत। (१३१) उदाहरण. नक्षत्रकी गतगम्य घटिकाओंके योग ५८ घठी ३६ पलका छःसो उनन- चास ६४९ में भाग़दिया तव अगुलादि लब्धिहुई ११ अकुल ४ प्रतिअद्भुल यह चन्द्रबिम्ब हुआ। तिसी प्रकार नक्षत्रकी गतगम्य घटिकाओंके योग ५८ घटी ३४ पलमें १४ वटाए तब शेषरहे घटी ३६ पल इसका १२५५ में भाग- दिया तब अगुलादि लब्धिहुई २८ अट्ठल ८ प्रतिभद्गुल यह मध्यम भूभाबिम्ब हुआ। इसमें सूर्य वृषभराशिका है इसकारण १६ प्रतिअड्डुल युक्तकरे तब २८ अट्ठल २४ प्रतिअगुल यह भूभाविम्ब हुआ ॥ अव तिथि और नक्षत्रकी घटिकाओस सूर्यग्राससाधन लिखतेहैं- खात्यष्टयस्तिथिवटीविहताः सवेदा वाथोडुनार्डि- हतदेवयमाः सरामाः। हीना व्यगुस्फुटलवैर्भवसङ्गु- णास्ते शैलोद्धृताः खररुचः स्थगितामुलानि ॥७॥ अन्वया-तिथिघटीविहृताः, खात्यष्टयः, सवेदाः, (कार्याः); (ते,) व्यगुस्फुटलवैः, हीनाः, (ततः), भवसगुणाः, त, शैलो- दृताः, ( सन्तः ), खररुचः, स्थगितामुलानि, (स्युः ); । अथवा, उडुनाड़िहतदेवयमाः,सरामाः, (कार्याः, ते, व्यगुस्फुटलवैः, हीनाः, ततः, भवसगुणाः ते, शैलोवृताः, सन्तः, खररुवः स्थगिता- लानि, स्युः ) ॥ ७॥ अर्थ:-पर्वकी गतगम्य घठिकाओंका एकसा सत्तरमें भागदेय तब जो अ- शादि सब्धि होय उसमें चार अंश युक्तकरदेय तब जो अयोग होय उसमें स्पष्टंनतांश घटोदेय तव जो शेषरहै उसको ग्यारहसे गुणाकर तव जो गुण- नफल होय उसमें सातका भागदेय तव जो महलादि लब्धि होय वह सूर्य- ग्रास होताहै । अथवा नक्षत्रकी गतगम्य घटिकाओक योगका दोसा तैतीसमें भागदेय तर जो अंशादि सन्धि होय उसमें तीन अंठा युक्तकारदेयतच जो अ- योग होय उसमें स्पष्टनतांश घटादेय तव जोशेपरहै उसको ग्यारहसे गु- णाकर तब जो गुणनफल होय उसमें मातका भागदेय तब जो लब्धि होय वह अहलादि सय्यका ग्रास होताह ॥ ७ ॥ मासगणालिकारमें पटनाश साधई तिसीमकार यहाँभी स्पष्टनाश लाये । सधनताशा- कोही व्याभोंके सष्टांश करते हैं ।
ग्रहलांघय।
[पथागाहणढयसाधना..
उदाहरण..
तिथिकी गतगम्य घटिकाओके योग ६४ घटी ४९पलका १७० में भागदिया
तव अंशादि लब्धिहुई २ अंश ३७ कला २३ विकला इसमें.४ अंशयुक्त 'करे
तव ६ अंश ३७ कला २२ विकला हुभा, इसमें स्पष्टनतांश १ अंश ५६ कला
४५ विकलाको घटाया तब शेषरहे ४ अंश ४० कला ३७ विकला इसको ११ से
गुणाकरा तब ५१ अंश २६ कला ४७ विकला हुभा, इसमें ७ का.
.भागदिया
तब अद्भुलादि लब्धिहुई ७ अगुल ३०प्र० यह सूर्यग्रास हुआ।
अथवा
नक्षत्रकी गतगम्य घटिकाओंके योग६५ वटी ५६पलका २३३ में भाग दिया
तब अंशादि लब्धिहुई ३ अंश ३२ कला १ विकला इसमें ३ अंश युक्तकरे तब
६ अंश ३२ कला १ विकला हुआ, इसमें स्पष्टनतांश १ अंश ५६ कला ४५ वि-
कलाको घटाया तब शेपरहे ४ अंश ३५ कला १६ विकला इसको ११ से गुणा:-
करा तब ५० अंश २७ कला ५६ विकला यह गुणनफल हुआ, इसमें ७ का
भागदिया तब अगुलादि लन्धिहुई ७ अट्ठल १४ प्रतिअगुल यह सूर्यका-
ग्रास हुआ।
अब सूर्यबिम्बसाधन लिखतेहैं-
रविलवयुतभानोदोर्लवत्र्यंशतुल्यैर्विरसलवमहेशा
व्यङ्गुलैहीनयुक्ताः । अजधटरसभेके विम्बमस्यागु-
लायं स्थितिमुखमवशिष्टं पूर्ववच्छेपमत्र ॥८॥
अन्वयः-अर्के, अजधटरसभे, (सति), विरसलवमहेशाः, रवि-
लवयुतभानोः, दोर्लयभ्यंशतुल्यैः, व्यङ्गुलैः, हीनयुक्ताः, (कार्याः);
(तत्), अस्य, अगुलाद्यम्, विम्बम्, ( स्यात् ); । अत्र, स्थिति-
मुखम्, अपशिष्टम, शेपम्, पूर्ववत्, ज्ञेयम् ॥८॥
अर्थ:-स्पष्ट रविमं यारह अंश मिलाकर उसके भुनांश कर और उनभुजांगी
में तीनका भागदेय तय जो सब्धि होय यह प्रतिअल होते, रवि मेपादि
छ: गाभिन अन्तर्गत होय तो दा भट्ठल पचास प्रतिमहलमें पूर्वोक्त प्रति-
अगुलोको पटादेय और यदि रवि तुलादि छः राशिके अन्तर्गत होय तो दश
भदुल पचास प्रतिभद्लम पूर्वोक्त प्रतिभट्टलोंको युक्तकरय तय अगुलादि
: सप्पपिम्प होता ॥८॥
धिकार:९)
सान्वयभापाटीकासमेत ।
(११)
उदाहरण.
स्पष्ट रवि ८राशि५अंग २६ कला २० विकलाम १२ अंश युक्तकरे तव ८
राशि १७ अंग २६ कला २० विकला हुआ, इसके भुजांश ७७ ७.२६ कला
२० विकला हुए इसम का भागदिया तव लब्धिहुई प्रतिभट्ठल २५ सय्यं
तुलादि छः राशिमह इसकारण १० अगुल ५० प्रतिअहलमें २५ प्रतिभहल
युक्तकरे तब ११ अगुल १५ प्रति अगुल यह सूर्यबिम्ब हुआ।
इति श्रीगणकार्यगणेशदेवरती ग्रहलाघरात्यकरणग्रन्ये पश्चिमोत्तरदेशीयनुरादा-
वादगस्तव्यकाशीस्थराजकीयसंस्कृतविद्यालयमधानाध्यापकपण्डितस्वामि-
राममि प्रशाखिसानिध्याधिगतपियभारद्वानगोत्रोत्रनगौडरशारतर-
श्रीयुतभोलानाथात्मजपण्डितरामस्वर शर्मणा कृतश
सान्ययभाषार्टीकया सहितः पञ्चांगादहगवयसा-
धनाधिकारः समाप्त. ॥ ८ ॥
अथास्तोदयाधिकारो व्याख्यायते ।
तहाँ प्रथम तीन लोकांकर शुक्ल प्रतिपदाके दिन चन्द्रोदय होगा या
नहीं यह जाननेकी रीति लिखते हैं-
साकौशाविह कुरु पक्षतिक्षयर्कव्यग्वर्को चरमथ
केवलाद्यगोर्यत् । पवाणेविहृतमिदंक्रमाल्लवाद्यं
स्वर्ण स्याद्यगुरविगोलयोः पृथक्तत् ॥ १॥
विभायनलवान्वितारुणचराहतं यक्षभाहतेः कृति
हृतं धनर्णमसमैकगोले व्यगोः। खखानलविशेपितः
सरसभायनाकोंदयः शरद्रिकहतो धनाधनमनल्प-
काल्पोदये ॥२॥ द्युमितिप्रतिपद्मान्तरं यच्छ-
रभक्तं स्वमृणं दिनधिकोने। धनमत्र चतुप्कसंस्कृ-
तिश्चेत्तपनास्ते विधुरीक्ष्यतेन्यथा न ॥३॥
(१३४) ग्रहलाघव। भिस्तोदया- , अन्वयः-इह, पक्षतिक्षये, अर्कव्यग्वी, साकांशी, कुरु । अथ, केवलात, व्यगोः, यत्, चरम, (साधितम् ), इंदम्, पड्वाणः, विह- तम्, (कार्यम, तदा ), लवाद्यम्, (फलम् ), क्रमात, व्यगुरवि. गॉलयोः, स्वर्णम्, स्यात्, तत्, पृथक्, (स्थाप्यम्; तत्), विभा- यनलयान्वितारुणचराहतम्, ( ततः ), यक्षभाहतेः, कृतिहतम्, (कार्यम्, ततः ), व्यगोः, असमैकगोले, धनर्णम्, (कार्य्यम् । (तत्, फलम्, पृथक, स्थाप्यम् ), ॥ सरसभायनार्कोदयः, खखा- नलविशेपितः, शरद्विकहतः, (तदा, यत्, फलम्, तत् ), अनल्पका- ल्पोदये, धनाधनम्, ( कार्यम् ) । यत्, द्युमितिप्रतिपद्मान्तरम्, (तत् ), शरभक्तम्, अधिकोने, दिन, स्वम, ऋणम्,.(कार्यम् )। अत्र, चनुष्कसंस्कृतिः, धनम्, चेत्, (तदा), तपनास्ते, विधुः, ईक्ष्य- ते, अन्यथा, न ॥ १॥ २ ॥ ३ ॥ अर्थ:-अभीष्ट मासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदाके अन्तमें स्पष्ट सूर्य और म्पष्ट व्यग्वर्क करके दोनों में बारह अंश युक्त कर, तदनन्तर व्यग्वर्कमे अय- नांग न मिलाकर केवल व्यग्वर्कसेही चर लावे, और उस चरमें छप्पनका भाग देय तब जो अंशादि लब्धि होय वह प्रथम फल होताहै, व्यगु उत्तर गोलमें होय तो धन और दक्षिण गोलमें होय तो ऋण जानै, और प्रथम फलको अलग स्थापन करै ॥ स्पष्ट सूर्यमें अयनांश और तीन राशियुक्त करें, तब जो अङ्कयोग होय उससे चर लावै, और तिस चरको प्रथम फलसे गुणाकर तब जो गुणनफल होय उसमें द्विगुणित पलभाके वर्गका भाग देय तब जो अंगादि लब्धि होप यह द्वितीय फल होताहै, उसको यदि त्रिभाय- नरवान्वित सूर्य और व्यगु यदि एक गोलमें होय तो ऋण और भिन्नगी- में दोय तो धन जान, और द्वितीयफलको अलग स्थापन करै ॥ स्पष्ट सूर्यमें अयतांश और छःराशि मिलाकर जो अंशयोग होय उसका पला- त्मक उदय ग्रहण करके उसका और तीनसौ पलीका अन्तर कर, और उस भन्तर में पचीसका भाग देय तव जो अंशादि लब्धि होप यह तृतीय फलं होता है, उस तृतीय फलको यदि पलात्मक उदय तीनसौकी अपेक्षा अधिक यती धन और पलात्मक उदय तीनसौकी अपेक्षा कम होय'ती ऋण जाने भार भग म्यापन पर ॥ प्रतिपदाका भन्त और दिनमान इन दोनोंका अन्तर फरक पाँचका भाग देय तय जो अंशादिलब्धि होय यह चतुर्थ फर होताद, उग चतुर्थ फलमो यदि दिनमान प्रतिपदाकी अपेक्षा अधिक होप माधन र दिनमान प्रतिपदाकी अपेक्षा कम होय ती मरण जाने, और इस धिकारः] सान्वयभाषाटीकासमेत । चतुर्थ फलकोभी अलग स्थापन करै । फिर इन चारों फलोंका एकी- करण करके वह एकीकरण धन होय तो प्रतिपदाम चन्द्रदर्शन होयगा, और यदि एकीकरण ऋण आवै तो प्रविपदाम चन्द्रदर्शन नहीं होगा ऐसा जान ॥ १॥२॥३॥ उदाहरण. संवत् १६६७ शाके १५३२ माघ शुक्ल प्रतिपदा ? शनिवार घंटी ७ श्रव- ण नक्षत्र घटी २८ पल २५सिद्धियोग घटी ४० चक्र ८ महर्गण २०३६ प्रातः- कालीन मध्यमरवि ९ राशि६ अंश १३ कला १८ विकला ! प्रातःकालीन मध्यम चन्द्र ९ राशि १९ अंग ३८ कला ३ विकला । चन्द्रोच्च ८ राशि २० अंश ५५ कला१४ विकला। प्रातःकालीनराहु राशि १० अंश : कला २५ विकला । इन ग्रहोम पञ्चाङ्गस्थित ७घटीका चालनदिया तव मध्यम रवि हुआ ९पशि६ अंश १९ कला ३१ विकला । मध्यम चन्द्र हुआ ९ राशि २१ अंश १० कला १० विकला। चन्द्रोच्च हुआ८राशि २० अंश ५५ कला १४ विकला । राह हुआराशि १० अंश ३ कला ३ विकला । अव सष्टी- करण लिखते हैं-रविका मन्दकेन्द्र हुआ ५राशि ११ अंग ४० कला २९ वि- कदा । मन्दफल,धन हुआ ० अंश ४१ कला २७विकला । मन्द स्पष्टर- वि हुआं राशि ७ अंश ० कला ५८ विकला । अयनांश हुए १८ क. ८ विकला । चरधन १०६ विकला। चरसंस्कृतस्पष्टरवि ९-राशि ७ भंश २ कला ५४ विकला । स्पष्टगति ६. कला १०विकला । और विफलसंस्कृतच- न्द्र ९ राशि २९ अंश २५ कला १२.विकला । मन्दकेन्द्र१० राशि २९ अंश३० कला २ विकला । मन्दफल ऋण २ भंटा ३३ कला विकला । संस्कृतस- टचन्द्र ९ राशि १८ भंटा ५२ करला १२ विकला । चन्द्रपटगति ७३५ कला १ विकला। स्पष्ट रवि और चन्द्रसे लाईहुई तियि ० घटी ५६ पल है, इसकारण ५६ पलका चाटनदेकर म्पष्टरवि ९ राशि ७ भंग ३ कला ४१ विकला। राहु २ गगि १० अंटाकला १ विकला। विरादर्क राशि २७ भंग कला १० विकला दुमा स्पष्टरवि ९ राशि ७ भंग कला ४१ विकलामें १२ अंगयुक्त- करे तप रवि हुआ राशि १०. भंग : कला ४१ विकला । व्यगु ६ राशि २७ अंश कला १०विकलाम १२ अंश युक्तकरे तब व्यगु हुआ ७ गानिरअंडा. कला ४० विकल्या । इस भयनांगरहित केवल व्यगुसे चरमिले. ७० इसमें ५६ काभागदिया तव अंगादिलब्धि मिली १ भंग १५ कला विकला यह प्रयम फल पाक दक्षिणगोलीय होनेक कारण ऋणहै । भव सूर्य गगि अंदा ३ कलाशविकलाम अपनांग १८ भंग ८ कलायुनसरे तव ? राशि मंग कला ११ विकला दुमा इसमें राशि युक्त करीतष ! राशि ७ अंश ए . ( १३६) ग्रहलाघवा [अस्तोदया- कला ४१ वि. हुआ इससे लाया हुआ चर ६८ हुभा इससे प्रथम फल १ अंश १५कलाको गुणाकरा तव ८५अंश०कलां विकला हुआ इसमें पलभां५अट्ठल ४५प्रतिभगुलको द्विगुणित करकै १९अतुल ३० प्रतिअद्गुल इसके वर्ग:१३२अट्ठल, १५प्रतिअडलका भाग दिया तब अंशादि लब्धि हुई अंश३८कला ३३विकला यह द्वितीय फल व्यगु और सूर्यके भिन्न गोलीय होनेके कारण धनहै । अब स्पष्टरवि ९ राशि १९ अंश ३ कला ४१ विकलामें अपनांश १८ अंश ८ कला- को युक्त करा तव'१० राशि ५ अंश ११ कला ४१ विकला हुआ इसमें ६ राशि युक्त करीं तब ४ राशि ७ अंश ११ कला ४१ विकला हुआ इस पञ्चम राशि अर्थात् सिंह राशिके ३४५ में ३०० को घटाया तय शेष रहे ४५ इसमें २५ का भाग दिया तब लब्धि हुई अंश ४८ कला यह तृतीय फल पलात्मक उदयके तीनसौकी अपेक्षा अधिक होने के कारण धन है ॥ अब दिनमान २६ पटी २८ पर और प्रतिपदन्त ७पटी ५८पलका अन्तर करा तय १८ घटी ३२ पल हुआ इसमें ५ का भाग दिया तब अंशादिलब्धि हुई ३ अंश:४२ कला २४ वि. यह चतुर्थ फल दिन मानके प्रतिपदन्तकी अपेक्षा अधिक होनेके कारण धन है ॥ द्वितीय फल धन० अंश ३८ कदा ३३ विकला और तृतीय फल धन १ अंश ४८ कला विकला तथा चतुर्थ फल धन ३ अंश ४२ कला २४ विकला इन तीनोंका योग करा तव ६ अंश कला ५७ विकला. हुआ इसमें प्रथम फल ऋण १ अंश १५ कलाको घटाया तव शेप रहा ४ अंश ५३ कला ५७ विरला यह चारों फलोका एकीकरण धनहै इसकारण सूर्या- मत समयमें चन्द्रदर्गन होगा। भय भासगणसे गुरुके अस्त और उदंप साधनेकी रीति लिखते है- चक्राम्यो मधुवक्रमासनिचयो विश्वाप्तचक्रोनितो द्विघ्नो युग्दशमासधूर्जटिदिनैः शेपितो भच्युतः । व्याप्तः स्याद्रमुखः पृथक्तिथिलवेरूनोऽस्य वा- हंशकाप्तिांशोनयुतो घटाजरसभे मासाधिकः स्यान्मयोः ॥ ४॥ तिथिदिनरहितान्योऽसो द्विधा तैश्वमासे क्रमश इह भवतां मंत्रिणोस्तोदयो च ॥5॥ अन्नपः-मधुपत्रमामनिरपः, चकारयः, (कार्य), (ततः), पेश्यागानितः, (फाय्यः), (ततः), दिसा, (कार्यः) (ततः), समागागंटिदिनः, गफ, मो, शेपितः, (ततः), भप्युतः, (ततः.), .
धिकारः ९]. सान्वयभाषाटीकासमेत । (१३७) व्याप्तः, भमुखः, स्यात्, (सः ), पृथक, (स्थाप्यः), तिथिलवैः, ऊनः, ( कार्यः), अस्य, वाहंशकाप्तिांशोनयुतः, घटाजरसभे, मधा, मासाधिकः, स्यात् । असो, च, द्विधा, तिथिदिनरहितान्यः, तै, मासैः, इह, मन्त्रिणः, क्रमशः, अस्तोदयौ, च, भवेताम् ।४।। अर्थ:-अभीष्ट वर्षकी चैत्र शुक्ल प्रतिपदाका मासगण डाकर उसमें चक्र युक्तकर, तव जो अंकयोग होय उसमें चक्रमें तेरहका भाग देकर जो मासा- दिलब्धि होय उसे घटादेय तब जो शेष रहै उसको दोसे गुणा करे, तवजो गुणनफल होय उसमें दामास ग्यारह दिन युक्त करदेय, तब जो अयोग होय उसके फेवर मासा में सत्ताईसका भाग देय तब जो मासादि शेपरहे उसको सत्ताईस मातम घटाव, तय जो शेपरहै, उसमें दोका भाग देय, तय जोराग्यादि लब्धि होय उसमें पन्द्रह अंश घटावै, तव जो शेषरहै उसके भुज करें, और उन भुजोंके अंशाम बारहका भाग देय, तब जो अंशादि लब्धि होप वह, यदि पूर्वोक्त राज्यादि लब्धि मेपादि होय तो उसमें युक्त करदय, और यदि पूर्वोक्त गत्यादि लब्धि तुलादि होय तो उसमें घटादेय, तर मासादिक होताद । तदनन्तर उस मासादिकमें पन्द्रह दिन घटाकर जो शेपरहे तिसमा- सादि करके चैत्र माससे गुरुका पश्चिममें अस्त होगा और तिसमासादिमें पन्द्रह दिन युक्त करके जो अयोग होय उसमासादि करकै चैत्र माससे गुरुका पूर्वदिशामें उदय होताह ।। ।
ग्रहलाघच । . (१३८) [भस्तोड्या तब शेपरहे। राशि १२ अंश ५७ कला ४१ विकला इसके भुजांग ७२ ५७ कला ४१ विकला हुए, इनमें १२ का भागदिया तब ६ अंश ४ कला विकला इसको पूर्वोक्त राज्यादि लब्धि मेपादि है इसकारण पूर्वोक्त राज्यादि लब्धि २ राशि २७ अंश ५७ कला ४१ विकलामें युक्तकरा तब ३ मास ४ दिन २ घटी २९ पल यह मासादिक हुआ, इसमें १५ दिनं घटाए तव शेषरहे। म.स १९ दिन २.घटी २९ पलं इतने कोलकरके चैत्रमाससे अर्थात चैत्र: माससे २ मास १९ दिन २ घटी २९पलपर पश्चिमदिशामें गुरुफा भस्त होगा। और मासादिक ३ मास ४ दिन २ घटी २९ पलम.१५ दिन युक्तकरे तव ३ मास ४ दिन २ घटी २९ पल हुए इतने कालकरकै पूर्वमें गुरुका उदय होयगा। अब शुक्रके अस्त और उदयके साधनकी रीति लिखतेहैं- अथ मधुमुखमासाः सप्तभूनिघ्नचक्रः स्वशरयुगलवा व्यैः संयुता मार्गणनाः1 उदधिरससमेताश्छिद्रखेगा मितटा नव नव परिशुद्धाः पञ्चभक्ताः पृथक्स्थाः। रसगुणदिनहीनाव्या द्विधा चैत्रतस्तै गुजहरिदिग- स्ताम्बूदयो स्तः क्रमेण ॥ ६॥ नवमासभातोड ल्पपुष्टाः पृथगास्थाः क्रमशस्ततेयुतोनाः । द्वेधा युगवासरोनयुक्तास्तोयास्तेन्द्रयुदयो क्रमाद्भगोः . स्तः ॥ ६ ॥ अन्वयः-अथ, मधुमुसमासाः, स्वशरयुगलयावैः, सप्तभूनिवचः संयुताः, (ततः) मार्गणमाः, (ततः), उदधिरससमेताः, (ततः) छिमेगामितष्टाः, (शेपाः ), नयनयपरिशुद्धाः, (ततः, शेषाः) पचभनाः, पृथपस्थाः, (फायाः) । (ते, अन ), द्विधा, रसगुण दिनहीनायाः, (फायाः), तः, चैत्रतः, कर्मण, हरिदिगस्ताम्यूदया, रतः ॥ (ते), पृथगास्था:, (यदि), नयमासपसतः, अल्पपुष्टा (रसुः, तदा ) नु. तैः, युतीनाः, (फायाः), (ततः, ते), द्वधा, गुगपासरीनयुक्ताः, मात, भृगी, तायारतन्द्रपदया, रतः ॥५॥६॥ मर्थ-मभीर पीपा प्रतिपदाका गम भार मारागण काय, तर .
(१५०)
ग्रहलापव।
• पल, इससे मालूम हुआ कि चैत्रसे ० मास५ दिन २० घटीपलपर पश्चि-
मदिशामें शुक्रास्त होगा दूसरे स्थानमे लिखे हुएं १ मांस ११ दिन २० घरी
० पलमें ३६ दिन युक्त करेतबं२ मास २७ दिन २० घटी ० पल हुए, इससे
मालूम हुआ कि चैत्रमाससे २ मास १७दिन २० घटी पलके अनन्तर पूर्व
दिशामें शुक्रोदय होयगा ॥
पूर्वोक्तमासादिक अर्थात् १ मास ११दिन २० घटी ० पल, ९ मास २७ दिन
नकी अपेक्षा कमहें इसकारण १ मास ११ दिन २०घटी ० पलमें ९ मास २७.
दिनको युक्त करा तब ११ मास ८ दिन २० घटी ०.पल हुआ, इसको दो।
स्थानमें लिखकर एक स्थानमें चार दिन घटादिये तब ११ मास ४ दिन
२० घटी० पल हुआ, इससे. मालूम हुआ कि चैत्रमाससे ११ भास दिन
२० पटी पलपर फिर पश्चिमदिशामें शुक्रास्त होयगा, और दूसरे स्थानमें
लिखेहुए ११ मास ८दिन २० घटी० पलमें ४ दिन युक्त करदिये तय ११मास
१२ दिन २० घटी ० पलहुआ, इससे प्रतीत हुआ कि चैत्रमाससे ११ मास
१२ दिन २०घटी शन्यतलपर फिर पूर्वदिशामें शुक्रोदय होयगा ॥५॥६॥
अव शुक्र और गुरु इन दोनोंक उदय और अस्तके विषयमें सामान्य
नियम लिखते हैं-
मासे खेयरिदिनैरुदयास्तकालः शुक्रस्य शुद्धय-
ति गुरोर्यदि साविश्वैः। सोऽन्यो भवेन्मधुमुखादा
तेर्युतश्चेत्स्यात्तत्परोऽथ पुरतोऽपि विलोमशुद्धया॥७॥
अन्ययः-नः मासैः,न्यरिदिनः शुक्ररय उदयास्तकालः, शुद्धयः
ति; यदि, गुरोः, (तदा), साईविशः, (शुद्धयति ); अथ, यदि
मधुमुसात, तैः, युतः, चंठ, (तदा ), स:: अन्पः, भवेत अथ, पि.
लोमशुदग, तत्परः, अय, परतः, अपि, स्पात् ॥ ७ ॥
• (१५३) 'ग्रहलाघव। [ अस्तोदया- अब चन्द्रशरसाधनकी रीति लिखते हैं- प्रथमे व्यगुचन्द्रदोंहेशाःस्वदलान्यास्त्वपरेनगा- ब्धियुक्ताः । चरमे दलिता नगाद्रियुक्ता व्यगुविधु- दिग्विशिखोमुलादिकः स्यात् ॥ ९॥ अन्वयः-व्यंगुचन्द्रदोमुहे, प्रथमे, अंशाः, स्वदलाव्याः, (कार्याः); अपरे, तु, नगाधियुक्ताः, (कार्याः); चरम (च, प्रथमम् ), द- लिताः, (ततः ), नगादियुक्ताः, (कार्याः, सः), अशलादिका, व्यगुविधुदिग्विशिखः, स्यात् ॥ ९ ॥ अर्थः-स्पष्ट चन्द्रमं राहुको घटावै तव जो शेपरहै वह 'व्यगुविधु' होताहै, तदनन्तर उस व्यगुविधुके भुज करके वह भुज मेषराशिके हो अर्थात् उसमे शून्य राशि होय तो भुजाके अंशोंकी ड्यौदाकर लेय, अथवा उनको तीनसे गुणाकरके दोका भाग देलेय, तब जो लब्धि होय घह अद्लादि चन्द्रशर होताहै, यदि भुज वृष राशिके होय तो उन भुजोंकी राशियोंको स्यागकर केवलमात्र अंशादिमें संतालीस अंश युक्त करै, तब अंगुलादि शर होताहै, और यदि भुज मिथुन राशिका हों तो भुजो राशियोंकी त्यागकर के. वल अंशादिकोंमे दोका भाग देकर जो लब्धि होय उसमें सतत्तर अंश और युक्त करदेय, तव जो अङ्क योग होय वह चन्द्रमाका अंगुलादिक शर होता. है, फिर पहिला व्यगु विध उत्तरगोलम होय तो शर भी उत्तर और व्यगु- विधु दक्षिणगालमें होय तो दक्षिणहोताहै ॥ ९ ॥ उदाहरण. शाक१५३२मार्गशीर्ष कृष्ण३० युधवार१२घटी५९पल, दर्शान्तकालीन चन्द्र ८ राशि ५ भंग २६ कला २०विकला, इसमें राहु २ राशि ११ अंश ४१ कला १८ विकला पटाया तय शेषरदा ५ राशि२३ अंशापका २ विकला, यह ध्यविधु दुआ, इस पगुविधुके ६श -१४ याला ५८ विकला यह भुज हुए यह भुज मेष राशि है इसकारण इसको आधाकरा तब ३ अंश ७ पला १० विकल्ला हुमा, इसको भुनाम थुत्तः करदिया तब ड्याडे भुनः भंगुण २२ मतिभंगुरद हुए, यह चन्द्रशर, पशुविधुरे उत्तरगोलीय दोनेके कारण उत्तर ६॥ भय पन्द्रका सुदमदार लोनेफी रीति लिगते हैं- नृपतिथिमनुविश्वरुद्रगोऽद्रिश्रुतिवसुधाः शरखण्ड- . .
धिकारी सान्वयभाषाटीकासमेत । (१४३). कानि तैर्यत् । व्यगुविधुभुजतोऽपमोक्तिवद्वा. व्यगु-- विधुदिग्विशिखोऽङ्गुलादिकः स्यात् ॥ १० ॥ अन्वयः-नृपतिथिमनुविश्वरुद्धगोविश्रुतिवसुधाः,शरखण्डकानि, (भवन्ति); तैः व्यगुविधुभुजतः, यत्, अपमोक्तिवत, ( भवति, तत्); अङ्गुलादिका, व्यगुविधुदिग्विशिखः, भवति वा ॥ १० ॥ अर्थः ज्यगु विधुके भुजांश करके तिन भुजोंसे नीचे लिखे हुए गराडोंके द्वारा क्रान्ति लाव, परन्तु क्रान्तिलाते समय अन्तमें दशका भाग देना पड़ता है, सो यहाँ दशकाभाग नदेय, तव वह अंगुलादि गर होता है, वह व्यगुविधु उत्तरगोलमें होय तो उत्तर और दक्षिण गोलमें होय तो दक्षिण होता है। नृप कहिये १६, तिथि कहिये १५, मनु कहिये १४,विश्व कहिये १३, रुद्र कहिये, ११, गा कहिये ९, भद्रि कहिये ७, श्रुति कहिये ४, और वसुधा क- हिये ? यह शारखण्ड (शराङ्क) हैं ।।१०॥ अङ्गसंख्या | १ ३।५ डाराङ्क २५/ १४।१३।११ . २ ७ ८ .२ ६ ९ ७ ४ M १६ उदाहरण. . व्यगुविधु ५ राशि २४ अंश ४ काला २ विकलांक भुजांश करे, तब ६ भंश ११ कला ५८ विकला हुए इसमें १० का भाग दिया तब लब्धि हुई • शून्प, शेष रहे ६ अंश १४ कला ५८ विकला, इसको एकाधिक शरा- (एप्यखण्ड) १६ से गुणा करा तब ९९ अंग ५९ कला २८विकला हुए इसमें १० का भाग दिया तब लब्धि हुई ९ भद्गल, ५०प्र० अं० इसमें सब्धि ० संख्यक शराङ्ग को युक्त करा तय ९भट्ठल ५९ प्रतिभट्ठल यह चन्द्र- शर उत्तर हुआ ॥ और अस्त कालके जानने के लिये ग्रहोंके उदयास्तके कालां- श लिखते हैं- भास्करा नगभुवो गुणचन्द्रा भूभुवो दिविसदस्ति- थयोऽन्जात् । प्राक्तनैनिगदिताःसंमयांशा वक्रिणो- भृगुविदोः क्षितिहीनाः ।। ११ ॥ अब (१४४) ग्रहलावय। [असमंदया- -- १७१३ १२ १२ । अन्वयः भास्कराः, नगभुवः, गुणचन्द्राः, भूभुवः, दिविसदः, तिथयः, (एते ), प्राक्तनैः, अन्जात्, समयांशाः, निगदिताः, पाकि- णोः, भृगुविदोः क्षितिहीनाः (भवन्ति ) ॥ ११ ॥ अर्थः-भास्करकहिये १२ कालांशांकरकै चन्द्रमाका उदयास्त होता है, नगभू कहिये, १७ कालांशांकरके मङ्गलका उदयास्त होताहै, गुणचन्द्र कहिये १३ कालांशीकरकै बुधका उदयास्त होताहै, भूभू कहिये११कालांशों- करकै गुरुका उदयास्त होताहै, दिविसद कहिये ९ कालांशीकरके शुक्रका उदयास्त होताहै, और तिथि कहिये १५ कालांशोकरके शनिका उदयास्त होताहै, परन्तु यदि बुध और शुक्र यह यकी हो तो इनके कालांशी एक अंश घटाकर जो बाकी कालांश रहैं तिन कालांशोकरकै उनका उदय और भस्त होताहै ॥ ११ ॥ | ग्रहकिनाम चन्द्रमंगल | बुध गुरु | शुक शनि | वक्रीवुध वक्रीशुक्र कालांश १५ अब भीम आदि नहीं पाताङ्क लानेकी रीति लिखतेहैं- खाम्बुधयः खयमाः खभुजङ्गाः खाङ्गमिताः खदश क्रमशः स्युः । पातलंवाः कुसुतांदुधभृग्वोर्मध्यमच ञ्चलकेन्द्रविहीनाः ॥ १२॥ अन्वयः-खाम्धुधयः, खपमा, सभुजङ्गाः, खाङ्गामिताः, सदशा (एते), क्रमशः, कुसुतात्, पातलवाः, (स्युः); बुधभृग्योः, मध्यम चञ्चलकेन्द्रविहीनाः, (स्युः) ॥ १२ ॥ अर्थ-पाम्बुधि कहिये ४० मङ्गलके पातांश होतेहैं, खयम कहिये २० यु- धकै पातांना होते हैं, सभुजङ्ग कहिये ८० गुरुके पातांश होतेहैं, खानमित कहिये ६० शुक्र पातांग होतेहैं, और खदश कहिये १०० शनिके पातांश होतं, और गुध तथा शुक्र इनके जो पातांश कहाँ वह शीघ्र प्रतिमण्ड म्य हैं, इस कारण ममसे उनके जो भर्गणीत्पन्नशीप्रवेन्द्रह वह ऊप- रोक्त पातशामसे घटाकर जो शेपरहें यह युध भार शुम इन दोनोंके पातांदा होते हैं ॥ १२ ॥ प्रहायनाम मंगल | बुध गुरुशुम शनि पातांदा,या संपातांश . ५० ३० ८० ६० धिकार:९] सान्वयभापाटीकासमेत। " अव भीमादि ग्रहांक शीघ्रकर्ण लानेकी रीति लिखतेहैं- कुदिन्यब्धियुगाश्विनो दलचयश्चेत्पङ्गपुष्टं चलं केन्द्रं चक्रविशुद्धमस्य भमिताक्यं लवन्नागतात् । त्रिंशल्लब्धयुतं कुजात्कुयमलान्धीद्वद्रिभक्त क्रमा- तद्धीना धृतिरिप्विलागुणभुवो गोजा इना द्रा- क्छुतिः॥१३॥ अन्वयः-कुद्विभ्यब्धियुगाश्विनः, दलचयः, ( स्यात् ); चलम्, केन्द्रम्, पपुष्टम, चेत, (तदा), चक्रविशुद्धम्, (कार्यम् ); अस्य, भमिताईक्यम्, लवनागतात, विशल्लब्धयुतम्, (कार्यम्); (ततः), कुजात्, कुयमलान्धीन्द्रविभक्तम, ( कार्य्यम् ); (तदा, यत्, फलम, तदीनाः ), धृतिः, इप्पिलाः, गुणभुवः, गोजाः, इनाः, द्राक्तिः, (स्यात् ), ॥ १३ ॥ अर्थः-कु-कहिये ?, दि-कहिये २ त्रि-कहिये ३, भन्धि कहिये , युग- कहिये , अखिन्-कहिये दिलचय (गीमाङ्क समुदाय ) है । अभीष्ट ग्रह- का द्वितीय शीमकेन्द्र लेकर वह राशिकी अपेक्षा अधिक होय तो उस- को १२ राशिम घटाचे, और उस पभाल्प (छ: राशिकी अपेक्षा अल्प) केन्द्रकी राशिप्रमाण संग्ग्याके नीचे लिखेहुप सीमाङ्कीका योग लेय और एकाधिक केन्द्रको गमिपरिमित शीघ्राङ्कस केन्द्रको राशिको छोड़कर के- वल अंशादिकोंको.गुणाकरै, और इस गुणनफलमें.तीमका: भाग देकर जो लब्धिसे भंगादि हो उसमें शौनाङ्कसंख्याका योग युक्त करके भीष्ट ग्रहके नीचे लिखेहुम भाग्याझ्या भाग देय तर जो अंगादि लब्धि होय उसको अभीष्ट ग्रहके गीप्रकर्णाम घटायें तंव जो शेपर, वह भंगादि गीचकणं होता॥१॥ संख्या ।२।३।४ शीघ्राक्ष । । मगल बुध गुरु शुक्र शनि ग्रहोकभाग्याङ्क 17 ग्रहोकगीरकणा. १८५ H ६ - . ४ ४ . m ग्रदाफनाम (१५६) ग्रहलाघव। [अस्तौदया- उदाहरण. शाके १५३४ वैशाख शुक्ल १५ को भंगलादि ग्रहीका शीघ्र कर्ण लातेहैं- मंगलका द्वितीय शीघ्रकेन्द्र ३ राशि १ अंश ४ कला ५७ विकला, यह छ: राशिकी अपेक्षा अल्पहै, इसकी राशि ३ परिमित संख्याके नीचके शीघ्राङ्को- का योग हुमा ६, और एकाधिक शीघ्राङ्क हुआ ४, भव राशिरहित केन्द्रके केवल अंशादिको १ अंश कला ५७ विकलाको गुणाकरा तव ४ अंश १९ कला १८ विकला हुआ, इसमें ३० का भाग दिया तब लब्धि हुई भंश ८ कला ३८ विकला हुआ, इसमें शीनाडांकी संख्याके योग.६ को युक्त करा तब ६ अंश ८ कला ३९ विकला हुआ इसमें भौम भाग्यांक १ का भाग दिया तव लब्धि हुई ६ अंदा ८ कला ३९ विकला, इसको मंगलके शोधकर्णाङ्क १८ ते घटाया तब शेष रहे ११ अंश ५१ कला २१ विकला. यह मंगलका शाकर्ण हुआ। इसी प्रकार अन्य ग्रहोंके शीघ्र कर्ण लावै सोयहाँ ग्रहोंके द्वितीय शीघ्रकेन्द्र और.शीचकर्ग दिखते हैं- १.रा० अ० क० वि० अं० के वि० युधका द्वितीय शीघ्रकेन्द्र -१६--२५-२७- शीघ्रकर्ण १३-५७-१० गुरुका द्वितीय शीतकेन्द्र"८-२१- ११-१२-४२ शुक्रका द्वितीय शीघ्रकेन्द्र ३-४- शनिका द्वितीय शीघ्रकेन्द्र २-२२- ११-२३-१८ भौमादि ग्रहोंके शर और स्पष्ट क्रान्ति लानेकी रीति लिखतेहैं- मन्दस्पष्टखगात्स्वपातरहितात्कान्त्यंशकाः केवला "त्कर्णाप्तास्त्रियमाहता अथ गुरोचेल्लोचनाप्ताः पुनः। स्वायूना असृजोडलांदिकशरः पातोनदिवस्या- दसी विघ्नः स्यात्कलिकादिकः स्फुटतरस्तत्सं- स्कृतश्चापमः॥१४॥ अन्वयः-स्वपातरहिता, मन्दस्पष्टसगाव, केपलात, कान्त्यश. काः, (साध्याः) (त), वियमाहताः, (ततः), कर्णाता,(कार्याः); अय, गुरोः, चेत, ( तहि ), लोचनाप्पाः, ( कार्याः); असना, (चव), तदि, दगमाः), पुनः, म्याइम्यूनाः, (सन्तः), पातीनदिक, अगु- " " . ..
. धिकारः९] सान्वयभाषाटीकासमेत । (१४७) लादिकशरः, स्यात, असौ, त्रिनः, कलिकादिकः, ( स्यात् ), तत्सं- स्कृतः, च, अपमः, स्फुटतरः, (भवति)॥ १४ ॥ अर्थः-मन्द स्पष्ट ग्रहमसे अभीष्ट ग्रहके पातांश घटावै, तब पातीन- ग्रह होताह, तदनन्तर पातोन ग्रहमें भयनांश न देकर उससे क्रान्तिके अंश साथै, और उसको तेईससे गुणाकरके शीघ्र कर्णका भागदय, तब अभीष्ट ग्रहका अंगुलादि शर होता है वह पातोनग्रह उत्तरगोलीय होय तो उत्तर और दक्षिणगोलीय होय तो दक्षिण होताहै; परन्तु गुरुका शर साधते समय पूर्वोक्त रीतिसे लापहुए शरमें दोका भागदेय, और मंगलका शर लाते समय पूर्वोक्त रीति लाएहुए शरको तीनसे गुणाकरकै चारका भागदेय, (परन्तु जब मंगलका शीघ्रकर्ण ग्यारह अंडाको अपेक्षा होय तो टीक गर लानेके निमिन उस शरमभी फिर दोका भागदेय )। अभीष्ट ग्रहकी कान्ति लाकर उसको, और अभीष्ट ग्रहके भट्ठलादिक विगुणित शरको कलादि मानकर उसका संस्कार करे, तब अभीष्ट ग्रहको स्पष्ट क्रान्ति होती है ॥ १४ ॥ उदाहरण. मन्द स्पष्ट भीम ? राशि अंग ८ कला ४५ विकलाम भीम पातांश १० मंदा अर्थात् १ राशि १० अंशको घटाया तव शेपरहे ८राशि २३ अंश ८कला ४५ विकला, यह पातोन संगल हुआ, इससे लाईहुई क्रान्ति २३ अंश ४३ कला ३३ विकलाको २३ से गुणाकरा तब ५४५ अंग ४१ कला ३९ विकला हुआ, इसमें भीम गीतकर्ण १२ अंश ५. कला २२ विकलाका भागदिया तब लब्धि हुई ४६ अंग ? कला ३८ विकला, यह भीमका भंगुलीदिवार हुआ इस कारण ४६ अंडा १ कला ३८ विक टा, इसको ३ से गुणाकरा तब १३८ अंश ४ कला ५४ विकला हुआ इसमें ४ का भागदिया तब लब्धि हुई ३४ अंगुळ :१ प्रति- अगुल यह मंगलको शर हुआ, यह पातीन भंगलके दक्षिणगोलीय होने के कारण दक्षिण है। मन्दस्पष्ट वुध १ राशि५ अंश ३ कला १५ विकला, रात्यादि पातांश . राशि २० अंश कला विकला इसमें अहर्गणोत्पन्न शीवकेन्द्र १ राशि १७ अंग १४ कला ५० विकलाको घटाया तव शेपरहा ११ राशि २ अंश ५५ कला २० विकला, इसको मन्दस्पष्ट बुध १ राशि ५ अंश ३ कला १५ विकलामें घटाया तव २ राशि २ अंश १८ कला ५ विकला यह शेपरहा यही पातोन. बुध हुमा, इससे लाईहुई क्रान्ति २१ भंश ० कला ५१ विकलाको २३ से- गुणाकरा तब १८३ अंग १९ कला विकला हुमा, इसमें बुध शोधकर्ण १३ अंश ५७ कला १० विकलाकाभागदिया तब लन्धि हुई ३ अहुल ३८ प्रति- अदुल यह बुधका अगुलादि शर हुआ, यह, पातोन बुधके उत्तरगोलीय होनेके कारण उत्तर है।
(१४८) ग्रहलाघय [ अस्तोदया- मन्दस्पष्टं गुरु ४ राशि १२ अंश ५२ कला ४४ विकलामं गुरुपातांग ८० अंश, अर्थात् २राशि २० अंशको घटाया तव शेपर १ राशि २२ अंश ५२ कला ४४ विकला, यह पातोन.गुरु हुआ, इससे लाईहुई क्रान्ति १८ अंश ४९ कला ११ विकलाको २३ से गुणाकरा तब ४३२ अंश ५१ कला १३ विकला हुआ, इसमें गुरुके शीघ्रकर्ण ११ अंश १२ कला ४२ विकलाका भागदिया तव ३८ अट्ठल ३६ प्रतिभद्गुल लब्धि हुई इसकारण ३८ अगुल ३६ प्रतिअलमें २ का भागदिया तब लन्धिहुई १९ भद्दल १८ प्रतिअड्डल यह गुरु अट्ठलादि शर हुआ, यह शर पातोन गुरुके उत्तर गोलीय होने के कारण उत्तर है॥ मन्दस्पष्ट शुक्र १ राशि ५ अंश ३५ कला २५ विकला, राम्यादि पात ३ राशि अंश कला विकलामें अहर्गणोत्पन्न शीघ्रकेन्द्र ३ राशि ५अंश ४१ कला ३५ विकलाको घटाया तय शेपरहा १० राशि २४ अंश १८ कला २५ विकला, यह शुक्रपातांश हुआ, इसको मन्दस्पष्ट शुक्र १ राशि ५ अंश २५ कला २५ विकलाम घटाया तब शेषरहा २ राशि ११ अंश ७ कला 0 विकला, यह पातोन शुक्र हुआ, इससे लाईहुई क्रान्ति २३ अंठा ३२ कला .२ विकलाको २३ से गुणाकरा तव ५१८ अंश १६ कला ४६ विकला हुआ, इसमें शुक्रके शीघ्रकर्ण १२ अंश २४ कला २ विकलाका भागदिया तब लब्धि हुई ४१ अद्भुल ४७ प्रतिअद्गुल यह शुक्रका शर, पातोन शुक्रके उत्तर. गोलीय होनेक कारण उत्तर है । मन्दस्पष्ट शनि १० राशि २१ अंश २३ कला ४२ विकलामें शनिके पातांश १०० अंश अर्थात् ३ राशि १० अंशको घटाया तब. शेषरहे ७ राशि ११ अंश २२ कला ४२ विकला, यह पातोन शनि हुआ इससे लाईहुई क्रान्ति १५ अंश ३१ कला ६ विकलाको २३ से गुणाकरा तब ३५६ अंश ५५ कला १८ विकला हुआ, इसमें शनिक शीघ्रकर्ण ११ अंग २३ कला १८ विकलाका भागदिया तव भगुलादि लब्धिहुई ३१ अगुल २० प्रतिअट्ठल यह शनिका गर, पातोन शनिक दक्षिणगोलीय होने के कारण दक्षिण है ॥ भव स्पष्ट क्रान्तिसाधन लिखते हैं- स्पष्ट महल : राशि ५ अंश ५६ कला विकलाम अयनांश १८ अंश १० कलाको युक्ताकरा तय ११ राशि २४ अंश ६ कला ४ विकला, यह सायन- मंगल हुमा, इससे सायन मंगलसे लाईहुई क्रान्ति दक्षिण २ अंश २१ कला ३५ विकलामं शर दक्षिण ३५ अगुल ३१ प्रतिभलको से गुणाकरकै १ अंश ५३ काला ३३ विकला युक्तकग तय ४ अंश ५ कला ७धिकला, यह मंग- सपी दक्षिण स्पष्ट क्रान्ति हुई। स्पष्ट दुध १ राशि १७ अंश ४ कला ० विकला भयनांश १८ अंश १० कला पुक्तयो तब २ राशि५मंश १४ कला पिकला यह सायन बुध हुभा, .
धिकारः९] . सान्वयभाषाटीकासमेत । (१४९) इस सायन बुधसे लाईहुई क्रान्ति उत्तर २१ अंश ३२ कला ३१ विकलामें शर उत्तर ३४ अंगुल ३८ प्रतिभंगुलको ३से गुणाकरकै १ अंश ४३ कला ५४ विकलाको युक्तकरा तब २६ अंश १६ कला २६ विकला यह बुधकी स्पष्ट क्रान्ति उत्तर हुई। स्पष्ट गुरु ४ राशि अंश ९ कला ४९ विकलाम अयनांश १८ अंश १०क- लाको युक्तकरा तब ४ राशि २० अंश १९ कला ४९ विकला, यह सायन गुरु 'हुआ, इस सायन गुरुसे लाईहुई क्रान्ति उत्तर १४ अंश ५९ कला १९ विक- लाम शर उत्तर १९ अंगुल १८ प्रतिअंगुलको ३ से गुणाकरकै ५७ कला ५४ विकला युक्तकरा तव १५ अंश ५७ कला १३ विकला, यह गुरुकी स्पष्ट क्रान्ति उत्तरहुई॥ स्पष्ट शुक्र र राशि १२ अंश १५ कला ४६ विकलामें भयनांश १८ अंश २० कलाको युक्तकरा तव ३ राशि ० अंश२५ कला ४६ विकला यह सायन शुक्र हुआ, इस सायन शुक्रसे लाईहुई क्रान्ति उत्तर २३ अंश ५८ कला ५८ विकलाम शर उत्तर ४१ अंगुल ४७ प्रतिअंगुलको ३ से गुणाकरकै २ अंश५ कला २१ विकला, युक्तकरा तब २६ भंग कला १९ विकला यह शुक्रकी म्पष्टक्रान्ति उत्तरहुई॥ स्पष्ट शनि १० राशि २६ अंश ४२ कला ३० विकलामें अयनांश १८ अंश १० कलाको युक्त करा तव ११ राशि १४ अंश ५२ कला ३० विकला यह सा- यन शनि हुआ, इस सायन शनिसे लाईहुई क्रान्ति दक्षिण ६ अंश ३ कला विकलाम शर दक्षिण ३१ अंगुल २० प्रतिअंगुलको ३ से गुणाकरकै १ अंश ३४ कला विकला युक्तकरा तब ७ अंग ३७ कला • विकला यह शनिकी स्पष्ट कान्ति दक्षिण हुई। भव पञ्चाङ्गमें स्थित स्पष्टग्रह और वक्रास्तादि दिनोंसे इष्टदिनके विर्ष मन्दस्पष्ट ग्रहसाधनकी रीति लिखतेहैं- वक्रास्ताय तिथिपटगतं तदिनेऽस्योक्तकेन्द्र स्यात्त- चाल्पं त्वभिमतदिने स्वाशुकेन्द्रोक्तगत्या । तस्मा- त्प्राग्वञ्चलफलमिदं चालितस्पटखेटे व्यस्त देयं मृदुजफलभाक्स्यात्ततो वा शराद्यम् ॥ १५ ॥ अन्वयः-तिथिपटगतम्, वक्रास्तायम, तद्दिने, अस्य, उक्तकेन्द्रम्, स्यात्; तत्, तु, अभिमतदिने, स्वाशुकेन्द्रोक्तगत्या, चाल्यम्; तस्मात प्राग्वत, चलफलम्, साध्यम् इदम्, चालितस्पष्टखेटे, व्यस्तम्, (१५०) ग्रहलापध। भिस्तोदया- देयम्; (स.), मृदुजफलभाक्, ( भवति ); ततः या, शराद्यम् (साध्यम्)॥ १५॥ अर्थ:-तिथिपट कहिपे पश्चाङ्गके विप जिस दिन अभीष्ट ग्रहका वक्रास्ता दिक लिखाहो तिसदिन अभीष्ट ग्रहोंक वक्रास्तादिकके पश्चतारास्पटाधि: कारमें कहेहुए द्वितीय शीतकेन्द्रांशको लेकर उनमें शीघ्रकन्द्रांकी गति करकै, अभीष्ट दिन और वक्रास्तादिकका दिन इन दोनोंके मध्यमजो दिनहीं उन दिनोंका चालन देय, तव अभीष्ट दिनके विर्षे द्वितीय शीघ्रकन्द्रांश होतेहैं, तदनन्तर तिस द्वितीय शीघ्रकेन्द्रांशसे द्वितीय शीघ्रफल लावै, फिर पञ्चाङ्गमके अभीष्ट ग्रहको उसकीही गतिकरकै लाएहुए अन्तरित दिनांका चालनदेय तब इष्टदिनमका स्पष्ट ग्रह होताहै, (परन्तु यदि इष्टदिन पश्चा- गस्थदिनके पहिले होय तो चालन ऋणकर, और पञ्चाङ्गस्थ दिनके अनन्तर इष्टदिन होय तो चालन ऋणकरे ) तिस स्पष्टग्रहमें द्वितीय शीघ्रफल धन होयतो ऋणकर, और ऋण होप ती धनकर तब मन्दस्पष्ट ग्रह होताहै, फिर तिस मन्दस्पष्ट ग्रहसे शरादि लावै ॥ १५ ॥ अब हकर्म साधनके निमित्त नतांशसाधन लिखते हैं- प्राक्रिमेणवर्जितात्संयुत्तात्तु पश्चिमे । खेटतोपमा- क्षयोः संस्कृति तालवाः॥१६॥ पटौलाएनवा- कधृत्यदितिजाः खण्डानि कार्य नतांशांशांशप्रम- खण्डकैक्यमगतोच्छिांशघाताद्युतम्।आशाप्त्यार- विच्छरागुलहतं लिप्ताग्रहता नताशेप्वोः स्व- णमभिन्नाभिन्नदिशि सव्यस्तं परे दृग्ग्रहः ॥ १७॥ अन्वयः-पाक, त्रिीण, वर्जितात्, पश्चिमे, तु, संयुतात, खेटतः, कान्तिः, (साध्या); अपमाक्षयोः, संस्कृतिः, नता, लयाः, (स्युः); ॥१६॥ पदशैलाष्टनपार्कधृत्यदितिनाः (एतानि ), खण्डानि, नतां- शांशांशममखण्डफैक्यम्, कार्यम्; अगनोच्छिष्टांशपातात, आशा- स्या, युतम् शराहलहतम्, रविहत, लिप्ताः, (भवंति); तानता- शेवाः, अभिन्नभिन्नदिशि, ग्रह, स्वर्णम्, ( देयाः, परे, व्यस्तमा (दयाः) स., दृग्ग्रहः, (भपति) ॥ १७ ॥ - धिकारः९] . सान्वयभाषाटीकासमेत । (१५१) अर्थः-ग्रहोंका उदयास्त पूर्वदिशाके विप होयतौ तिस स्पष्ट ग्रहमसे तीन राशि घटादेय, और यदि उदयास्त पश्चिम दिशाके विप होय तो तिस ग्रहमें तीनराशि युक्तकरदेय, फिर तिससे क्रान्ति लाकर उस क्रान्तिका और अ- क्षांशांका संस्कारकरै, तव नतांश होतेहैं ॥ १६ ॥ तदनन्तर तिन नतांशीमें दशका भागदेकर जो लब्धि होय तिस लब्धिपरिमित नीचे लिखेहुए "घट्-कहिये ६, शैल-कहिये ७, अष्ट-कहिये ८, नव-कहिये ९, अर्क-क- हिये १२, धृति-कहिये १८, और अदितिज-कहिये ३३," इनमके अंकोंका योगलेय, और आगैके अङ्कसे अंशादि शेपको गुणाकरकै दशका भागदेकर जो अंगादि लब्धि होय उसको अंकोंके योगमें युक्त करदेय, तब जो अङ्गयोग होय उसको शराडलोंसे गुणा करकै यारहका भाग देय, तव दृकर्म कला होती हैं, तदनन्तर नतांश और शर यह एक दिशाके होय तो तिन दृकर्मकलाओंको स्पष्ट ग्रहम युक्त करदेय और नतांश तथा शर भिन्न दिशाके होय तो तिन दृकर्मकलाओंको स्पष्ट ग्रहमसे घटादेव तब दृकर्मदत्त ग्रह होता है । परन्तु वेध सुर्यास्तके अनन्तर होयतौ नतां- श भोर भर इन दोनोंके एक दिशाके होनेपर दृकर्मकलाओंको स्पष्ट ग्रह- मसे घटावै, और भिन्न दिशाके होनेपर स्पष्ट ग्रहमें युक्त करदेय तब दृकर्म- दत्त ग्रह होताहै ।। १७॥ अंकसंख्या दृकाङ्क १ २ ३ ४ ६ ५ १२ १८ उदाहरण. शाके १५३२ चैत्र शुक्ला ५ गुरुवारके दिन शुक्रके पूर्वास्तका गणित-चक्र ८ महर्ग ७४७ मध्यम रवि ११ राशि २१ अंशं २२ कला १७ विकला, रविकेन्द्र २ राशि २६ अंश ३७ कला ४३ विकला,मन्द फल धन २ अंश १० कला ३१वि- कला, मन्द स्पष्ट रवि ११ राशि २३ अंश ३२ कला ४८ विकला, चर ऋण २२ विकला, स्पष्टं रवि ११ राशि २३ अंश ३३ कला २६ विकला, रवि स्पष्ट गति ५९ कला ० विकला, शुक्रका शीवकेन्द्र ११ राशि ८ अंश ३१ कला ५.विकला, शीघ्र फलाई ऋण ० अंश ४ कला ३० विकला, शीघ्र फलदल स्पष्ट शुक्र ११ राशि १६ अंश ५७ कला ४५ विकला, मन्दकेन्द्र३राशि १३अंश ८ कटा १३ विकला, मन्द फल धन १ अंश ३० कटा विकला, मन्द स्पष्ट शुक्र ११ राशि २२ भंग ५. कला १७ विकला, द्वितीय शीघ्रकेन्द्र ११ राशि ७ अंश १ कला ५३ विकला, शीघ्र फल ऋण ९ अंश ७ कला ४८ विकला, स्पष्ट शुक्र ११ राशि १३ अंश १५ कला २९ विकला, स्पष्ट गति ७४ कला ५५विकला शुक्र शीघ्र कर्ण १८ अंश १४ कला विकला, क्रान्ति उत्तर २३ अंश ५६ कला (१५२) प्रहलाश्य। [अस्तोदया- १८ विकला, गरदक्षिण 20 अगर. १२ प्रतिमहल, अब दृधाम कला साधन हैं- शुक्रका पूर्यास्त है इस कारण म्पष्ट शुक्र १ राशि १३ अंग १४ कला २९ विकला ३ राशि घटाई तोप रहे ८ राशि? अंडा १४ कला २९वि- कला, इससे लाई हुई क्रान्ति दक्षिण २३अंग ५६कला विकला इसमें अक्षां: गों २५ अंग २६ कला ४२ विकलाको युक्त करा तय नतांश दक्षिण ४९ अंश २३ कला २४ विकला हुए फिर नतांगा ४. अंश २३ कला २४ विकलाम १० का भाग दिया तव लब्धि हुई और शेष रहे: अंग २३ कला २४ विकला इसकारण पहिले चार दृशम्मावाका योग १० और पाँचवे अंक १२ से शेष ९ अंश २३ कला २४ विकलाको गुणा करा तय १.२ अंश ४० कला ४८ वि- कला हुआ इसमें १० का भाग दिया तब लब्धि हुई ११ अंग १६ कला ४ विक- का इसमें पहिले दृका योग ३० को युक्त करा तव ४१ अंश १६ कला ४ विकला हुआ इसको दाराला ३० अट्ठल १२ प्रतिअगुलसे गुणा करा तब १२४६ अंश २० कला ३९ विकला हुआ इसमें १२ का भाग दिया तव लब्धि हुई कलादि दृधर्म १०३ कला ५१ विकला यह दृशम्र्म कला हुई अद नतांश और ठार दोनोंकी एक दिशा है इसकारण दृकर्म कला १०३ कला ५१ विकला अर्थात् १ अंश ५ कला ५१ विकलाको स्पष्ट शुक्र ११ राशि १३ अंश १४ कला २९ विकलाम युक्त करा तब ११ राशि १४ अंश ५८ कला २० विकला यह दृकर्मदत्त शुक्र हुआ अंच ग्रहका उदयास्त दिन जाननेके निमित्त गतगम्यलक्षण कहते हैं- कल्प्योऽल्पोरविरकहक्खचरयोरन्यश्च लग्नं तयो- मध्येस्युटिकाश्च पूर्ववदिमाः पश्चात्स चक्राईयोः। पना काललवा अमीभिरधिकैर्गम्योऽस्त उनैर्ग- तः प्रोक्तेभ्योऽभ्यधिकैर्गतः समुदयो न्यूनेस्तु गम्यो भवेत् ॥१८॥ अन्वयः-रविः अर्कहक्खचरपी, अल्पः, करप्या (यः,) अन्यः, च, (तस्य,) लमम, (फरप्पम् ) तयोः, मध्ये, च, (अयनांशान्, दखा, ) पूर्ववत् ( कालः, साध्या, ) पश्चात, चकाईयोः, सः, (साध्यः,) इमाः, पटिकाः च, पन्नाः, काललयाः, स्युः, अमी- मिः अधिकः, अस्तः, गम्पः, ऊन, गतः, ( भंवत् ) समुदयः, (तु.) प्रतिभ्यः, अभ्यधिकः, गतः, न्यूनः, गम्यः भवेत् ॥ १८ ॥ .
धिकारः१]
सान्वयभाषाटीकासमेत।
(१५३)
अर्थः-स्पष्ट सूर्य और दृकर्मदत्त ग्रह इन दोनाम जो कम होय उसको
रवि और जो अधिक होय उसको लग्न समझकर तिस सूर्य लग्नसे विप्र-
प्राधिकारमै कहीहुई रीतिके अनुसार अभीष्ट काल साधे, परन्तु पश्चिमोद-
यास्त साधनम लग्न और रवि इन दोनॉमछः राशि मिलाकर तदनन्तरअभीष्ट
काल साथै, फिर तिस घटिकारमक कालको छःसे गुणा करैतव इष्ट कालांश.
होताहै, यह अभीष्ट ग्रहके पहिले कहेहुए कलांशांकी अपेक्षा अधिक होय तो
अभीष्ट ग्रहका अस्त होयगा, और वह पूर्वोक्त कालांशांकी अपेक्षा कम होय
तो अस्त होगयाहै ऐसा जाने, उदयके विषयमें विपरीत होताहै. अर्थात
यदि इष्ट कालांगप्रोक्त कालांशोंकी अपेक्षा कम होय तो उदय होयगा, और
अधिक होय तो उदय होगया ऐसा जॉन ।। १८ ॥
उदाहरण.
स्पष्ट सूर्य ११ राशि २३ अंश ३२ कला २६ विकला, और दृकर्मदत्त शुक्र
११ राशि १४ अंश ५८ कला २० विकला, इन दोनोम सूर्य अधिक है इस.
कारण ११ राशि २३ भंग ३२ कला २६ विकला, यह लग्न है, और ११ राशि
१४ अंश ५८ कला २० विकला यह सूर्य है, इन दोनोंमें अयनांश
१८ अंश १० कला मिलाकर ० राशि ३ अंश ६ कला २० विकला
यह सायन रवि हुआ, और राशि ११ अंश ४० कला २६ विकला यह सायन
लग्न हुआ,अब सायन रनि और सायन लग्न यह दोनों एकराशिक हैं इस
कारणं इन दोनोंका अन्तर ८ भंग ३४ कला ६ विकला हुमा इससे
मेपोदय २२१ को गुणाकरा तब १८९३ अंश ३६ कला ६ विकला हुआ,
इसमें ३० का भाग.दिया तब लब्धि हुई ६३ पल अर्थात् १ घटी ३ पल यह
अभीष्ट काल हुआ इस कारण इसको ६ से गुणाकरा तब ६ अंश २८ कला
यह इष्ट कालांश हुए।
अब दिन लानेकी रीति लिखवेह-
खाभ्राग्निभिर्विनिहिताः कथितेप्टकालभागान्तरस्य
कलिका रविभोदयाताः । तत्सप्तमेन परतोऽथ ज-
वान्तरांप्तायोगेन वक्रिणि दिनान्युदयास्तयोः स्युः।१९।
अन्वयः-कथितेष्टकालभागान्तरस्य, कलिकाः, खाभ्रामिभिः,
विनिहिताः, (ततः ), रविभोदयाताः, अथ, परतः, तत्सप्तमेन,
(भक्ताः, ततः), जवान्तरेण, (भक्ताः), वक्रिणि, (ग्रहे ), योगेन,
(भक्ताः ), उदयास्तयोः, दिनानि, स्युः ॥ १९ ॥
ग्रहलाघव। " (१५४) [भस्तोदया- अर्ध-अभीष्ट प्रहके कहेहुए कालांश भौर इष्ट कालांश इन दोनोंका जो अन्तर होय उसकी कला करके तीनसाँसे गुणाकर और तिस गुणनफलमें 'सायन रविकै पलात्मक उदयका भागदेय. परन्तु पश्चिमोदयास्त साधनके विर्षे सायन सूर्यमें छः राशि मिलाकर उसके पलात्मक उदयका भाग देय तब जो लब्धि होय उसमें फिर रवि और ग्रह इन दोनोंकी गति के अन्तर- 'का भाग देय, परन्तु ग्रह वक्री होय तौ लब्धिम रवि,और ग्रह इन दोनोंकी गतिके योगका भाग देय, तब उदयके अथवा अस्तके दिन होतेहैं ॥ १९ ॥ उदाहरण. शुक्रके कहेहुए स्पष्ट कालांश ६ अंश ४६ कला और इष्ट कालांश ६अंश १८ कला, इन दोनोंके अन्तर करनेसे कालांश रहे २८ कला, इनको ३०० से. गुणाकरा तय ८४०० हुए. इसमें सायन सूर्यके उदय २२१ का भाग दिया तब लब्धि हुई ३८ कला विकला ३२ प्रतिविकला इसमें शुक्रगति ७४कला ५४ विकला और रविगति ५९ कला इन दोनोंके अन्तर १५ कला ५४ विकला का भाग दिया तब लब्धि हुई २ दिन २३ घटी ३४ पल इतने दिन होगये तब शुक्रका अस्तहो चुका ॥ अब ग्रन्थकारने शुक्र और चन्द्रमाके कालांशोंका संस्कार कहाहै सो लिखते हैं- स्यात्खाभाग्न्युदयान्तरं भविहृतं स्वर्ण पृथूनोदये यत्तत्संस्कृतदृष्टिकर्मलवतःप्राणांशसंस्कारिताः। पूर्वोक्ताभृगुचन्द्रयोः क्षणलवाः स्पष्टा भृगोश्चोनिता द्वाभ्यां तैरुदयास्तहटिसमतास्याल्लक्षितैपामया२०॥ अन्वयः-खाधान्युदयान्तरम्। भविहतम्, (सत्), यत् (फलम् ), स्यात, (तत्), पृथूनोदये, स्वर्णम्, ( कार्यम् ); तत्संस्कृतदृष्टिक- मलवतः, प्राणांशसंस्कारिताः, भूगुचन्द्रयोः, पूर्वोक्ताः, क्षणलवा, स्पष्टाः, ( स्युः), भृगो, च, दाभ्याम, अनिताः, ( कार्याः), तः, (शुक्रचन्द्रयोः), उदयास्तदृष्टिसमता, स्यात्, एपा, मया, लक्षिता२०॥ भर्थ:- चन्द्रमा और शुफ इन दानांके पूर्व कहेहुए कालांशांका एक वि- वोप संस्कार किया जातादे, पह यह है कि-प्रदीका पलात्मक उदय और तीनसी पल इन दोनोंका भन्तरं करवा सनाईसका भागदप, तव भंशादि धिकारः९] सान्वयभाषाटीकासमेत । (१५५) . लब्धि मिलै वह यदि पलात्मक उदय (तीनसौ पल )की अपेक्षा अधिक होय तो धन और कम होय तो ऋण जानै, तदनन्तर अंशादि लब्धि और दृकर्मकलाओंका संस्कार कर (अर्थात् दृकर्मकला ग्रहमें मिली हो तो धन और घटाई हुई हो तो ऋण जानै ) और जो धन ऋणात्मक भावै उसमें पाँचका भागदेय, और अंशादि धनऋणात्मक लब्धिको पूर्वोक्त कालांशों- में धन ऋणकर, तब चन्द्रमाके स्पष्ट कालांश होतेहैं, इस रीतिसे लाए हुए स्पष्ट कालांशामसे दो अंश घटादेनेसे शुक्रके स्पष्ट कालांश होतेहैं यह कालांश और इष्ट कालांश इनसे पूर्वोक्त रीतिसे अस्तोदयके गत. गम्य लक्षण जाने ॥२०॥ उदाहरण. अब शुक्रके विषयमें गणित करनाहै इस कारण शुक्रके (मेषोदय) उदय २२१ और ३०० का अन्तर करा तव ७९ हुए, इसमें २७ का भाग दिया तब लब्धि हुई २ अंश ५५ कला ३३ विकला, यह लब्धि उदय ३०० की अ- पेक्षा कम है इस कारण ऋण है, अव दृकर्मकला १०३ कला ५१ विकला अर्थात् १ अंश ४३ कला ५१ विकलामें लब्धि २ अंश ५५ कला ३३ विकला- को ऋण करा तय (ऋण) १ अंश ११ कला ४२ विकला रहा, इसमें ५ का भाग दैनेसे लब्धि हुई ऋण ० अंश ४४ कला, इसको शुक्रके पूर्वोक्त कालांशी ९ में घटाकर शेषरहे ८ अंश ४६ कला इसमें २ अंश घटाए तव शेष रहे ६ अं४६ कला यह शुक्रके स्पष्ट कालांश हुए इसकी अपेक्षा इष्ट कालांश ६ अंश १८ कला कम, इस कारण अस्त होगया ॥ अब अगस्त्यके उदय और अस्तको जाननेकी रीति लिखतेहैं- पलभाटवधोनसंयुता.गजशैला वसुखेचरा लवाः । इह तावति भास्करे क्रमावटजोऽस्तं ह्युदयं च गच्छति ॥२७॥ अन्वयः-गजशैलाः, वसुखेचराः, लवाः, पलभाष्टवधोनसंयुताः। (कार्याः), तावति, भास्करे (सति ), इह, क्रमात, घटना, हि अस्तम्, उदयम्, च, गच्छति ॥ २१॥ अर्थ-पलभाको आठसे गुणाकरकै जो अंशादि गुणन फल होय उसको अठत्तर अंशोंमें घटाव तब जो शेष रहै उतनेही अंशॉपर रवि जिससमय आ- वैगा उससमय अगस्त्यका अस्त होयगा, और उस अंशादि गुणनफलको अ- " ग्रहलावद। [अस्तोदया- . वणवे अशाम युक्तकरदेय तब जो अङ्कयोग होप उतनेही अंशांपर रवि जिस समय भाय तवही अगस्त्यका उदय होयगा ॥२१॥ उदाहरण. पलभा ५ अंगुल ४५ प्रतिअंगुलको ८से गुणाकरा तव १६ अंगुल हुए इस गुणनफल ४६ को ७८ अंशमें घटाया तब शेपरहे ३२ अंश अर्थात् १ राशि २ अंगपर रवि आवैगा तब अगम्त्यका अस्त होपगा, और पलभा५ अंगुल ४५ प्रनिअंगुलको ८ से गुणाकरकै १६ भंगुल ९८ अंशम युक्तकरा तय १४४ अंशा अर्थात् राशि २४ अंगपर रवि आवैगा तव अगस्त्यका उदय होयगा । (इ. तना ध्यान रखना चाहिये कि १ राशि२ अंशपर रवि, मेमहीनेकी १५ ता. सवको होताहै इसकारण उसदिनही अगस्त्यका अस्त होताहै । और ? राशि ३४ अंगपर रवि सितम्बर महीनेकी ८ तारीखको होताहै इसकारण उसदिनही अगस्त्यका उदप होताहै, यह उदाहरण श्रीकाशी क्षेत्रका है इस कारण ऐसा तहाँही दृष्टिगोचर होगा अन्यत्र फुछ अन्तर पड़ेगा)। अय ग्रहका नित्य उदयास्त जाननेकी रीति लिखतेहैं- खेचरोऽस्तिकाले सपनार्कतो योऽधिकोऽल्पोऽर्क- तो निश्युदेतीह सः । अस्तमेत्यन्यथाथो विधेयः क्रमात्पूर्वपश्चात्स्थहकर्मभाक्स ग्रहः ॥२२॥ अन्वयः-अर्कास्तकाले, या, खेवर, सपड़भार्कता,अधिका, (वा, यः, कंवलात, ), अर्कतः, अल्पा, सः, इह, निशि, उदेति, अन्यथा, अस्तम, पति, अर्थी, सः, ग्रहः, क्रमात, पूर्वपश्चात्स्थफर्मभाक, विधेयः।। २२॥ अयः-सायंकालके समय स्पष्ट सूर्य और स्पष्ट ग्रहकर, फिर यदि वह स्पष्टप्रद छगशिकरक युक्त स्पष्ट सूर्यमें अधिक दोप, अयवा केवल म्पष्ट सय्यंग कमदीप तोउस ग्रहका राधिक समय उदय होता है । और यदि यह साष्टाह पड़ागिपुन सरपंसे कम और स्पष्ट सूर्यसे अधिक होय तो गरिम भन्न दाताह। फिर गधिमं उसग्रहका.उदय होय ती उसको पूर्ष :- परमंडन कार ( पूर्वहमामंदन यह पाहाताद जो फम्मंदन पादपास्त सा. धनकी गतिर लाया भाताई.) भार गमि उम ग्रहया अस्त होय तो उसको पभिम पाम्मन पर पभिमफामंदन यह फदाताहे जो पार्मदत्त ग्रह पधिमादपाग्न साधनयी गति हापागाताह ॥२३॥ .
धिकारः९] सान्वयभाषाटीकासमेत । (१५७) उदाहरण. शाके १४३४ वैशाख शुक्ला १५ के दिनरात्रिके समय गुरुके अस्तका ग- णित करतेहैं-प्रातःकालीन ग्रह स्पष्ट रवि १ राशि ५ अंश ४२ कला ३७ विकला, स्पष्टगति ५७ कला २६ विकला, स्पष्टगुरु ४ राशि २ अंश ९ कला ४९ विकला, स्पष्टगति ५ कला २२ विकला, मन्दस्पष्ट गुरु ४ राशि १४ अंश ५२ कला ४४ विकला, मन्दस्पष्टगति ४ कला ४२ विकला, दिनमान ३३ घटी ६ पल, भव सायंकालीन रवि १ राशि ६ अंश १४ कला ३३ विकला, गुरु ४ राशि २ अंश १२ कला ४६ विकला, मन्दस्पष्ट गुरु ४ राशि १२ अंश ५५ कला १९ विकलामें गुरुपात २ राशि २० अंशको घटाया तब शेपरहा १ राशि २२ अंश ५५ कला १९ विकला, इससे लाईहुई क्रान्ति १८१४९।४९ शीघ्रकर्ण ११ अंश १२ कला ४२ विकला, अंगुलादि गुरुशर उत्तर १९ अंगुल १८ प्रति- अंगुल ५३ तत्प्रतिभंगुल, अब गुरु ४ राशि २ अंश १२ कला ४६ विकला प- ड्राशियुक्त रवि ७ राशि ६ अंश १५ कला ३३ विकलाकी अपेक्षा कम है, और पष्ट रवि १ राशि ६ अंश १४ कला ३३ विकलाकी अपेक्षा अधिक है, इसका- रण रात्रिमें गुरुका अस्त होयगा, । गुरु ४ राशि अंश १२ कला ४६विकला- में ३ राशि युक्तकरी तब ७ राशि २ अंश २२ कला ४६ विकला हुआ, इस- से लाईहुई क्रान्ति दक्षिण १८ अंश ११ कला ४१ विकला, नतांश दक्षिण ४३ अंश ३८ कला २३ विकला. दृकर्मकला धन ५५ कला १८ विकला, - कर्मदत्त गुरु ४ राशि ३ अंश ८ कला ४ विकला ॥ भव रात्रिके समय ग्रहके उदय और अस्तकी गतटिका जाननेकी रीति लिखते हैं- उद्गमे यातकालः खगात्त्वस्तके पड़युक्तात्सपद्धार्क- भोग्यान्वितः । युक्तमध्योदयोऽस्योद्मास्ते भवेद्रा- त्रियातोऽथ तत्कालखेंटात्स्फुटः ॥ २३ ॥ • अन्वयः-उद्गमे, ( सति), खगात, यातकालः, (साध्यः), अ- स्तके, तु, पड्भयुक्तात, -(यातकालः, साध्यः), सपड्भार्कभोग्या- न्वितः, युक्तमध्योदयः, अस्य, उद्गमास्ते, रात्रियातः, भवेत, अय, तत्कालखेटात, स्फुटः, (स्यात् ), ॥ २३ ॥ अर्यः-ग्रहका उदयकाल लाना होय ती कर्मदत्त ग्रहको लग्न मानकर तिससे भुक्तकाल लावै, परन्तु अस्तकाल लाना होय तो पट्टाशियुक्त दृकर्म " . .
(१५८) ग्रहलाघव । [ अस्तोदया- 1 दत्त ग्रहको लग्न मानकर तिससे भुक्तकाल लावै, और पड़ाशियुक्त सूर्यको रवि मानकर तिससे भोग्यकाल लावै, तदनन्तर भुक्तकाले और भोग्यकाल इन दोनोंके योगमै लग्न और रवि इन दोनोंके मध्यके पलात्मक उदयोंके योगको युक्तकर, तय जो अङ्कयोग होय उतनीही घड़ीपर रात्रिमें ग्रहका उ- दय अथवा अस्त होयगा, तदनन्तर उदयास्तकालीन दृकर्मदत्त ग्रह और सूर्य इनको तात्कालिक करकै इनसे पूर्वोत्तरीतिके द्वारा उदयास्तकालफी घोटका फिर लावै तब वह स्पष्ट उदयास्त काल होताहै ॥ २३ ॥ उदाहरण. पदाशियुक्त दृहम्मदत्त गुरु १० राशि ३ अंश ० कला ४ विकलाको लग्न मानकर इससे लायाहुमा पलात्मक भुक्तकाल : १७९ पलमें पट्टाशियुक्त सूर्य ७ राशि ६ अंग १४ कला ३३ विकलाको रविमानकर इससे लायेहुए भोग्यकाल ६४ पलको युक्त करा तव भुक्त और भोग्य दोनोंका योग हुभा २४३इसमें लग्न और रवि इनके मध्यमके पलात्मक उदय अर्थात् धनोदय ३४२ पल भोर मकरोदय ३०४ पलको युक्त करा तब ८८९ पल अर्थात् १५ घटी ४९पल हुआ, इसकारण सूर्यास्त कालसे इतनी घटी पलपर गुरुका अस्त होपगा । अब १५ घटी ४९ पल इनका चालन देकर लायाहुमा कर्मदत- गुरु राशि ३ अंश ९ कला २४ विकला, और स्पष्ट सूर्य १ राशि ६ अंश२८ कला ३६ विकला, इनमें ६ राशि युक्त करके और पहिलेको लग्न तथा दूसरे- को रविमानकर तिनसे लाएहुए भक्त और भोग्य कालका योग हुभा २४०पल इसमें ला और रवि इन दोनांक मध्यके उदयोंके योग ६५६ पलको युक्त करा तय ८८६ पल अर्थात् १४ घडी ४६ पल, यह गुरुका स्पष्ट अस्त- काल दुआ ॥ भय चन्द्रमा मष्टोदयाम्तकालसाधनकी रीति लिखते हैं- इन्दोस्तु गोपलान्योनः कार्योऽथ प्रतिनाड़िकम् । युतोद्विद्विपले स्पष्टः किं स्यात्तात्कालिकेन्दुना ॥२४॥ अन्वयः-इन्दोः, (उदयास्तफाला ), गोपलान्योनः, कार्य, अध, नु, प्रतिनाडिफम, दिदिपलः, युक्तः, स्पष्टः, (भवति); (पुनः), ताकालिन्दुना, पिम्, स्यात् ॥ २४ ॥ भ:-गन्द्रमा उदय पाटमें नौ पण मिलाये, भार भरत कालमें नी पल पंटा व शो पटिगादि दोपदारयमसे टपकालयी भोर भस्तकालयी धिकारः१०] सान्वयभाषाटीकासमेत । (१५९) पटिकाओंको दोसे गुणाकरके जो गुणनफल होय तत्तुल्य पल मिलावै तव तात्कालिक चन्द्रमाके करे विनाही चन्द्रमाका स्पष्ट उदयास्तकाल होताहै ॥२४॥ इति श्रीगणकचर्य्यगणेशदेवतकृत ग्रहलाघवाख्यकरणग्रन्ये पश्चिमोत्तरदेशीयमुगदा- वादवास्तव्यकाशीस्थराजकीयसंस्कृतविद्यालयप्रधानाध्यापकपांगहतस्वामि- राममिश्रशास्त्रिप्सान्निध्याधिगतविद्यभारद्वाजगोत्रोत्पन्नगोड़वंशावतंस- श्रीयुतभोलानाथात्मजपण्डितरामस्वरूपशर्मणा कृतया सान्ययभाषाटीकया सहितः अस्तोदयाधिकारः समाप्तिमितः ॥ ९ ॥ अथ ग्रहच्छायाधिकारः। तहाँ प्रथम अभीष्टग्रहके दिनगतकालके साधनकी रीति लिखते हैं- प्राग्दृष्टिकर्मखचरस्तनुतोऽल्पकोऽस्तात्पुष्टश्च दृ- . श्य इह खेचरभोग्यकालः। लग्नेन युक्च विवरोद- ययुग्धुयातः स्यात्खेचरस्य सितगोर्यदिगोपलोनः॥१॥ अन्वयः-प्रारदृष्टिकर्मखचरः, (यदा), तनुतः, अल्पकः, अस्तात, 'च, पुष्टः, (स्यात;) तदा), दृश्यः, इह, खेचरभोग्यकालः, (स्यात्); । लमेनयुक्, विवरोदययुक्, च, खेचरस्य, ग्रुपातः, स्यात्, यदि, सितगोः, (तर्हि ), गोपलोनः, ( कार्यः ); ॥ १॥ भयः-रात्रिमं जब अभीष्ट ग्रहका दिनगत (ग्रहके उदयको प्राप्त होनेसे राविमें जब उसका वेधलेना होय तवतक व्यतीत हुआ) काल लाना होय तो पूर्वकर्मदत्त अभीष्टग्रह और तात्कालिक लग्न यह दोनों लावै, तदनन्तर पूर्व कर्मदत्त अभीष्टग्रह यदि तात्कालिक लग्नकी अपेक्षा कम और पाशियुक्त तात्कालिक लग्नकी अपेक्षा अधिक होय तो रात्रिमं वह ग्रह उस समय दृश्य होयगा, तदनन्तर दृकर्मदत्त ग्रहसे लायाहुमा भोग्यकाल, तात्कालिक लमका भुक्तकाल, और तात्कालिक लग्न तथा दृकम्मंदत्त ग्रह इनके मध्यके पलात्मक उदयाका योग कर, तब अभीष्टग्रहका घटिकादि दिनगत काल . (१६०) नहलायव । [ग्रहच्छाया- आताहै; परन्तु यदि चन्द्रमाका दिनगतकाल लाना होय तो पूर्वोक्त रीति- .से लाईहुई कलाओमसे नौ पल घटादेय ॥ १ ॥ उदाहरण. शके १५३२ वैशाख शुक्ल नवमी ९ अनिवारके दिन १० घटी रात्रिको चन्द्र- माकी छाया साधतह-तहाँ अहर्गण ७७७, प्रातःकालीन मध्यमग्रह रवि० राशि २० अंश ५६ कला २२ विकला, चन्द्र ३ राशि २६ अंश ५८ कला ३ विकला उच्च राशि २२ अंग कला ६ विकला, राहुराशि २६ अंश ४७ कला ३ विकला, स्पष्टी करण-रविमन्दकेन्द्र १ राशि २७ अंश ३ कला ३८ विकला, मन्दफलधन १ अंश ४९ कला ४० विकला, मन्दस्पष्ट रवि २२ अंश ४६ कला विकला, अयनांग १८ अंश ८ कला, चरऋण ७३ विकला, चर संस्कृतस्पष्टरविराशि २२ अंश ४४ कला ४९ विकला, स्पष्टगति ५७ कला ५८ विकला, विफलसंस्कृत चन्द्र ३ राशि २६ अंश ३५.कला १३ विकन्टा, मन्दरेन्द्र ३ राशि २५ अंग २८ कला ५३ विकला. मन्दफल धन ४ अंग ३२ कला . पिकला, संस्कृत स्पष्टचन्द्र ४ राशि १ भंश ७ कला १३ विकला, स्पष्टगति ८१९ कला १९ विकला, दिनमान ३२ यटी २६ पल,. सूर्योदयसै गतघटियों ४२ घटी २६ पटसे चालित सूर्य राशि २३ भंग २५ कला ४८ विकला, चालितचन्द्र ४ राशि- १० अंश ४६ कला ३९, विकला, चालितराहु २ राशि २६अंश कला १८वि- कला उपवियु १ राशि १७ भंग कला ५१ विकला, चन्द्रशर उसर ६५ अं- गुस ४४ प्रतिभंगुल ॥ चन्द्रमा ४ राशि १० अंश ४६ कला ३९ विकलाम ३ राशि घटाई तर परहा १राशि १० अंश ४६ याला ३९ विकला, इससे साईहुई क्रान्ति उत्तर २० अंश-१०. कला ३९ विकला, अक्षांशदक्षिण २५ अंश. २६याला पिकला, मतांदक्षिण ५ राशि०१३ कला विकला, पूर्वपर- ग्मफलादि ऋण १६ का ४ विकन्दा, मम्मंदत्तचन्द्र ४ राशि १० अंश २०. फला ५० विकला, १० पटी राधिका स्टन ८रागि १६ अंश २४ फला "पिकला, भप हणमंदनवादलाफी अपेक्षा गंमती है, और पयाशिपुर ग्दा पनि १६ भंटा ३४ याला पिकलायी अपेक्षा अधिक है, इसकारण गन्द्रमा एप है, पम्मंदनचन्द्रमे छापाहुमा भाग्पकाल १५ पल, मासे सापामा भत्ताकाट ५६ पार्टी मापन धाग्मंदत्त चन्द्रमाके भाग्यफाल १५ परयो मापन एप्र. भुनगाण्टम युनाकरा सप ६.दुप दमको पद भार पान दानाक माम मा सिम ऐयर मपारपप्पंन्स गशियाक उदय तिनंद पंग १९५७ में गुम पारा तब ११८ पाल अमांत २२पर्टी ३८ पाल हुए, में पन्द्रमाका दिमगतका पानाई. सफारण पट घटाए तर शेप गह पर्यापट, पद चन्द्रमाया म्पए दिनगतकालमा ।
धिकारः १०] सान्वयभाषाटीकासमेत । अब ग्रहका दिनमान जाननेकी रीति लिखते हैं- जिनाप्तोऽक्षाभानोऽङ्गुलमयशरोऽनेन तु चरं स्फुट संस्कृत्यातो दिनमथ खगस्य द्युविगतात् ।प्रभावं संसिद्धयेदथ खचरभादेनिशिगतं ब्रुवेऽथारादीनां द्युतिपरिगम यन्त्रवशतः॥२॥ अन्वयः-अहलमयशरः, अक्षाभानः, (ततः), जिनाप्तः, (कार्य:); अनेन, तु, चरम्, संस्कृत्य, स्फुटम्, ( कार्यम् ); अतः, दिनम्, (साभ्यम् ); अय, सगस्य, द्युविगतात, प्रमाद्यम्, संसिध्येदः अय, खचरभादेः, निशिगतम्, अथ, आरादीनाम्, द्युतिपरिंगमम्, यन्ववशतः, ब्रुवे ॥२॥ भर्पः-अंगुलादि गरको पलभासे गुणाकरकै चौवीसका भागदेय, तब जो पलामक लन्धि मिले वह शर उत्तर होय ती उत्तर और वारदक्षिण होप चौ दक्षिण होती है, और दृकर्मदत्त ग्रहसे चर लाकर वह ग्रह उत्तरगोलीय होय तो उत्तर और दक्षिणगोलीय होय तो दक्षिण जान, तदनन्तर पलात्मक लब्धिका भौर चरका संस्कार करे तव वह स्पष्टचर होताहै, फिर तिस चरसे दिनमान साधे, यह भभीष्ट ग्रहका दिनमान होता, तदनन्तर भभीष्ट ग्रहका दिनमान और दिनगतकाल इनसे त्रिमशाधिकारमें कदीहुई रीतिक दारा अभीष्ट ग्रहकी इष्ट च्छाया लाये ॥२॥ उदाहरण. शरउत्तर ६५ भंगुल ४४ प्रतिभंगुलको पलभा :भंगुल ४५ प्रतिभंगुलसे गुणाकरा तर ३७७ भंगुल ५८ प्रतिभंगुल हुए इसमें २४ का भाग दिया तब सन्धि हुई १५पल ४४वि०! यह लन्धिारक उत्तर होने के कारणसे उत्तर है. इससे कम्मदन चन्द्रसे लापहुए चर उत्तर ५९ पलका संस्कार करा तर ७३।४४यह सट चर हुआ, यह दृशम्मंदन चन्द्र के उत्तरगोलीय होनेक कारण धन है.इसकारण ४ पलमें १५ घटीको युक्त करा तब १६ पटी पर यह दिनार्द्ध हुभा, इसकारण ११ पटी २८ पल पह चन्द्रमाका दिनमान दुमा, इससे दिनगत काल २३पर्य २९पलको घटाया तर शेपरहे ८पटी ५९ पल यह पविमोबत काल हम इसको दिनादं १० पटी १४ पलमें घटापा तर पटी पर पह पभिम नतकाल हुमा, इससे लाहुपक्षकर्ण - ग्रहलाघव । [ग्रहच्छाया- । १६ भंगुल २९ प्रतिभंगुल, स्पष्ट चर७४ । ४४ा हार १२८१५६ । समाख्य ३० 1१। इष्टहार २७१५। भाग्य १११७१५५ भंगुलादि कर्ण १५ भंगुल, ५३ प्रतिभंगुल, इष्टच्छाया १० अंगुल ३४ प्रतिअंगुल ।। अब वेधसे ग्रहच्छायासाधनकी रीति लिखते हैं- पश्येजलादो प्रतिविम्बितं वा खेटे हगौच्यं गणये- च लम्बम् । तलम्बपातप्रतिविम्बमध्यं दृगौच्यह- सूर्याहतं प्रभा स्यात् ॥३॥ अन्वयः-जलादी, खेटम्, प्रतिविम्बितम्, पश्यत, वा, दृगौच्यम्, लम्बम्, च, गणयेत् तम्, लम्बपातपतिविम्बमध्यम्, (गणयेत् ), सूर्यहतम्, दृगौच्च्यहत्, प्रभा, स्यात् ॥ ३ ॥ भर्यः-जलम भथया दर्पणादिमें अभीट ग्रहका प्रतिविम्ब देखकर भूत- लस अपनी दृष्टिपथ्यंत अंगुलादि ऊँचाईको गिने और दम्पपात और मतिषि- म्बके मध्यके अन्तरकीभी अंगुलादि गणना करे, फिर उसको बारहसे गुणा करके भीर भंगुलादि गौच्च्पका भागदेय तब ग्रहकी छापा होती है ॥ ३॥ आय प्रहकी छायासे दिनगत कालसाधनकी रीति लिखते हैं- ज्ञात्वानुमानानिशियातनाड़ीस्तत्कालखेटात्काथ- तैश्चरायेदृष्टप्रभादेर्युगतो ग्रहत्य साध्यस्त्विहेन्दो यदि गोपलान्यः॥४॥ अन्वयः-अनुमानाव, निशि, यातनाड़ी, ज्ञात्वा, तत्कालखेटात, कथितः, चरायः, दृष्टप्रभादः, ग्रहस्य, युगतः, ( कालः ), साध्या, यदि, इन्दोः, (तहि ), तु, इद, गोपलाटयः, (कार्यः) ॥४॥ अधः-भिमसमप प्रहका अध फरा हो उस समय जितनी पटी गरि पीती होय, दमको अनुमानसे जानकर उरा समपका प्रद, स्पष्टचर भार दिनमान पाप तदनन्तर इनसे भोरग्रहपी इष्टापारी विमानाधिकारमंपदी हुरीति अनुसार मभीष्ट प्रक्ष्या दिनगतपाल एाप, पद दिनगत काल पाद्रमापा दोष नाशाम गौ पर पुन:परदेय ॥४॥ . -4
धिकार १०]
सान्वयभाषाटीकासमेत ।
उदाहरण.
पत्रिमें चन्द्रमाको भीर देखकर अनुमान करनेसे १० घटी रात्रि व्यतीत
हुई मालूम पड़ी इसकारण विस समपके चन्द्रसे लायाहृमा स्पष्ट चर ७४
पल हुमा, भीर दिनमान ३३. घटी २८ पट हुआ, और वैधसे लाईहुई इष्ट छाया
१० अट्ठल ३४ प्रतिभट्ठल हुई इसकारण इनस टापाहुआ कर्ण ? अगुल ५३
प्रतिमट्ठन्ट, भाग्य १११७१५५, इष्टहार ७१५,भकर्ण १३ मंगुन्द्र १९प्रति-
अट्ठल, हार १२८1५८, भोर पश्चिमनन ७ घटी १५ पल, इमकारण दिनाई
१६पटी १४ पलमें पश्चिमनत ७ परी १५ पलको युक्तकरा तब २१ घरी २९
पल हुए, इसमें ९पल युक्त करे तव २३ घटी ३८ पल यह चन्द्रमाका दिनगद
काल हुआ।
भव प्रहके उदयमै दिनोपरात्रिगत कालसाधन लिखते हैं-
प्राग्हक्सचराङ्गभाट्यभान्वोरल्पोऽस्त्वपरस्तनु
स्तदन्तः। कालः सखगोदये धुशेपो रात्रीतः क्रम-
शो ग्रहेल्पपुष्टे ॥५॥
अन्वयः-प्राण्डक्सचराङ्गभाग्यमान्वोः अल्पा, अर्कः, अपरः, तु,
तनुः, तदन्तः, (यः), कालः, सः, खगोदये, ग्रह, अल्पपुष्टे, क्रमशः,
धुशेषः, रात्रीता, स्यात् ॥५॥
अधः-पूर्व मम्मदन ग्रह भार पदाशियुक्त रवि इन दोनाम जो कम हो
यह रवि और जो अधिक हो उसकोलनमानकर इन दोनाम अभीष्ट काल
न्याय-तच पदि पूर्वमम्मंदन ग्रह पदाशियन सय्यंकी अपेक्षा कम होय
ती ग्रहोदय होनमें मीट काटकी नुन्य दिन रदंगा मेमा जान, और यदि
पूर्व हम्मंदन ग्रह पट्टाभियुक्त सूर्यकी अपेक्षा अधिक होप तौ ग्रहोदय होनमें
मीट कालकी नुन्य रात्रि व्यतीत होनेपर चन्द्रोदय होयगा ऐसा जाने ॥५॥
ग्रहलायव । [ग्रहच्छाया- . और लग्न इन दोनोंक मध्यके उदय पल कन्योदय ३३५ और तुलोदय ३३५ पल, इन सवका योग करा ८१८ पल अर्थात् १३ घटी ३८पल यह इष्ट काल हुआ, अब चन्द्रमा पट्टाशियुक्त रविकी अपेक्षा कम है इसकारण १३ घटी ३८ पल दिन शेष रहनेपर चन्द्रोदय होयगा । अव सूर्यास्तसे रात्रिगतकाल जाननेकी रीति लिखते हैं- तेनोनोऽथ च सहितो ग्रहद्युयातः स्यादस्तिसम- यतो निशिप्रयातः । चेद्ग्लावोऽनुमितपटीप्वतोऽ ल्पपुष्टं द्विघ्नंतत्समपलयुग्वियुक्स्फुटः सः ॥ ६॥ अन्वयः-तेन, ऊनः, अथ, च, (रात्रिगतेन) सहितः, ग्रहायातः, अर्कास्तसमयतः, निशि, प्रयातः, स्पात, लावः, चेत्, (तदा), अनु- मितघटीपु, अतः, ( यावत् ), अल्पपुष्टम्, (तावत्, एव), विनम्, (पलात्मकम्, स्यातः) तत्समपलयुग्वियुक्, सःस्फुटः,(स्यात्); अर्थः-ग्रहकै दिनगतकालमें दिनशेष काल घटावै, और रात्रिगतकाल आया होय तब तो मिला दैनेसे सूर्यास्तसमयसे ग्रहवेधपर्यन्त काल होता है, परन्तु यदि यह काल चन्द्रमाके विषयका होकर अनुमान करी हुई घटिकाओकी अपेक्षा अधिक अथवा कम होय तो तिन दोनोंकालोंके अन्तर- को दोसे गुणाकरकै जो पलात्मक गुणनफल होय उसको वैधीय कालमें घटानेसे अथवा युक्त करनेसे चन्द्रमाका बंधीय काल स्पष्ट होता है ॥६॥ उदाहरण. चन्द्रमाकै दिनगतकाल २३ घटी ३८ पलमेंसे दिनशेषकाल १३ पटी ३८ पलको पटाया तय शेपरहे १० घटी, यह सूर्यास्तसे चन्द्रवेधपयंन्तका काल हुआ, यह और अनुमित घटी १० बराबर है इस कारण यहही स्पष्ट काल हुआ। इति श्रीगणकार्यण्डितगणेशदेवज्ञहत्ती महटाधान्यकरणप्रन्ये पश्चिमोत्तर- देशीयमुगदापादत्रास्तव्यकाशीस्यराजकीयसंस्कृतविद्यालयमधानाध्यापक- पश्रितस्वामिरामपिशासिसान्निध्याधिगतविद्यभारद्वाजगोत्रोद्भव- गोड़वंशाइसीयुतभोलानापारमनगण्डतरामस्वरूपश- ग्मंणा पतया सान्वपमापाटीकया सहित- छापाधिकारः समाप्तिमितः 11.1 धिकारः ११] सान्वयभाषाटीकासमेत । अथ नक्षत्रच्छायाधिकारः। तहाँ प्रथम नक्षत्रोंके स्वदेशीय उदयध्रुव भौर अस्तववरसाधनको रीति लिखते हैं- दास्रादष्ट च मूर्छना गजगुणा नन्दान्धयोहग्रसाः पट् तर्कायुगखेचरारसदिशोऽध्याशा नवार्काःक्रमात्। भाग्यादष्ट-युगेन्दवोऽक्षतिथयः खात्यष्टयोंशा धुवा- स्यष्टान्जा गजगोभुवो रविदृशः सिद्धाश्विनः खत्रि- दृक् ॥ १ ॥ मूलात्स्युदिजिनाः शराशुगदृशःक- गाश्विनोऽऐपुदृग्वाणाणि रसाएदृइनखगुणा- स्तत्त्वानयोऽश्वामराः। खं दत्तायनहक्क्रियाः स्यु- रिह च क्षेपोऽक्षभानोऽकहत्स्वर्ण प्राक्परतोऽन्यथो- त्तरशरेते स्युः स्वदेशे ध्रुवाः॥२॥ " अन्क्या-दास्रात्, अष्ट, मूर्छना, गजगुणाः नन्दाब्धयः, दृग्रसाः, पदतर्काः, युगखेचराः, रसदिशः, अद्याशाः, नवार्काः, भाग्यात्, अष्टयुगेन्दवः, अक्षतिथयः, सात्यष्टयः, श्यष्टान्जा, गजगोभुवः, रवि- दृशः, सिद्धाश्विनः, खत्रिहक, मूलाव, द्विनिनाः, शराशुगदृशः, शश्विनः, अष्टेपुटकु, वाणाणि, रसाष्टा, नखगुणा, तखामयः, अश्वामराः, सम्, ( पते), कमात, अंशाः, ध्रुवाः, स्युः; (इमे); दत्तायनदृक्रियाः, स्युः, इह, क्षेपः, अक्षभानः, (ततः), अर्कहत, प्राक्परतः स्वर्णम्, ( कार्यम् ), उत्तरशरे, अन्यथा, ( कार्यम् ), ते, स्वदेशे सुवाः स्युः ॥ १ ॥२॥ अप:-अश्विनीनक्षत्रसे लेकर रेवतीनक्षत्रपध्यन्त सम्पूर्ण नक्षत्रोंके क्र- मसे भाठ आदि अंशात्मक ध्रुव होतेहैं. भात् मश्विनीका भाठ अंश, ध्रुव होताहे, भरणीकामच्छंना कहिये इक्कीस अंश ध्रुव होताह, कृतिकाका 'गज गुण कहिये भड़वीश अंश भयाद एकराशि भाउ अंश ध्रुव होताहै,पेहिणीका
(१६६)
ग्रहलापव।
निक्षवच्छाया-
.
-
.
.
नन्दाधि 'कहिये उननचास अंश अर्यात् एकराशि उन्नीस अंश ध्रुवं
होताहै, मृगशिराका 'दृग्रस कहिये वासठ अंश अर्यात दो राशि दो अंश
ध्रुव होताहै, आर्द्राका 'पट्तर्क' कहिये ,सट अंश अर्याद दो राशि छः
अंश ध्रुव होताहै, पुनर्वस्का 'युगखेचर' कहिये चौरानवे अंश अर्यात
तीनराशि चार अंश ध्रुवहोताहै, पुप्यका 'रसदिश' कहिये एकसाँछः अंश
अर्थात् तीन राशि १६ अंश ध्रुव होताहै, भारलेषाका 'भद्रवाशा' कहिये एक.
सौ सात अंश अर्थात् तीन राशि सतरह भंश भुव होताहै, मघाका 'नवाक'
कहिये एकसौ उनतीस अंश अर्थात् चार राशि नौ अंश ध्रुव होताद पूर्वा-
फाल्गुनीका 'अष्टयुगेन्दु' कहिये एकसौ अडतालीस अंश अर्थात् चारराशि
अट्ठाईश अंश ध्रुव होताहै, उत्तरा फाल्गुनीका 'भक्षतिथि' कहिये एकसी
पचपन अंश अर्थात् पाँच राशि पाँच अंश ध्रुव होताहै, हस्तका खात्यष्टि'
कहिये एकसौ सत्तर भंश अर्थात् पाँचराशि वीस अंश ध्रुव होता है, चित्रा-
का व्यष्टान्ज' कहिये एकसौ तिरासी अंश अर्थात् छःराशि तीन अंश ध्रुव
होताहै, स्वातीका 'गजगोभू' कहिये एकलौ अठानवे अंश अर्थात् छ राशि
अठारह अंश ध्रुव होताहै, विशाखाका रविदृश' कहिये दोसौ बारह अंश
अर्थात् सात राशि दो अंश ध्रुव होताहै. अनुराधाका सिद्धाविन्' कहिये दोसौ
चौवीस अंश अर्यात सात राशि-चौदह भंश ध्रुव होताहै. ज्येष्ठाका 'खत्रि-
दृक् ' कहिये दोसौ तीस अंश अर्थात् सात राशि वीस अंश भुव होताहै
मूलका द्विजिन' कहिये दोसा बयालीस अंश अर्थात माठराशि दो अंश,
ध्रुव होताहै, पूर्वापाढाका 'शराशुगदृश ' कहिये दोसौ पचपन अंश अर्थात
आठ राशि पन्द्रह अंश ध्रुव होताहै. उत्तराषाढ़ाका छङ्गाखिन् । कहिये
दोसी इकसठ अंश अर्थात आठराशि इक्कीस अंश ध्रुव होताहै, अभिजित
का 'भप्टेषुदृक् ' दोसौ भट्ठावन अंश अर्थात आठराशि अठारह अंश ध्रुव हो-
तादे, श्रवणको वाणक्ष' कहिये दोसौ पिछत्तर अंश अर्थात् नौराशि पाँच
अंश ध्रुव होताहै, धनिष्ठाका 'रसाष्टहर' काहिपे दोसौ छियासी भंश में-
यांत नौराशि सोलह अंश ध्रुव होताहै, शततारकांका 'नखगुण ' तीनसी
वीस भंश अर्थात् दशराशि वीस अंश भुव होताहै पूर्वाभाद्रपदाका 'तत्त्वा-
नि कहिये तीनसौ पचीस अंश अर्थात् दशराशि पचीस अंश ध्रुव होताहै,
उतराभाद्रपदाका 'भयामरा कहिये तीन सौ सतीस अंश अर्थात् ग्यारह
राशि सात अंग धुव होताहै, और रेवतीका 'खम् ' फाहिये शन्य अंश भुव
होताहै, इन नामिसे मिस नक्षत्रका ध्रुव लानाहो उसके शरको पलभाते
गुणाकर तय जो गुणनफल होप उसमें चारहका भाग देय तब जो भंशा-
दिएन्धि होप उसको नक्षत्रके राग्पादिभुयाइमं घटावपायुक्त कर तव क्रमस
उदयभुव भौर अस्ताय होताहै परन्तु यदि नक्षत्रका र दक्षिण होय तो
विपरीत होताद अर्थात् घटानेसे जो शेष रह यह भस्तभुय, भार युक्त करनेसे
जमा झोप यद उदयधुप होताहै. यह निन देशमं नक्षत्रधुष होतेहैं ॥१॥२॥
धिकार ११] सान्वयभाषाटीकासमेत। (१६७). भब नक्षत्रोंके शरभाग कहते हैं- दिक्सूर्येष्विदिक्छिवाङ्गखनगाभार्काश्च विश्वे भवास्त्वादाद्दौ नगवह्नयः कुयमलानीभाक्षवाणा द्विपट् । कर्णात्रिंशदरित्रयः सजिनभानं त्वाष्ट्रह- स्ताहिभे द्वीशात्पट्सुकभात्रयं शरलवा याम्या उदक्छेपभे ॥३॥ अन्वयः-दिक्सूप्यप्विपुदिक्छिवाङ्गन्सनगाभार्काः, विश्वे, भवाः, त्वाष्ट्रात, च, दौ,नगवह्वयंः, कुयमलामीभाक्षवाणाः, दिपट , कर्णात्, त्रिशद, अरित्रयः, खजिनभाभ्रम्, (एते ) शरलवाः, (सन्ति ), वाष्ट्रहस्ताहिभे, दीशात पसु, कभाव, त्रयम्, याम्या, शेषभे, उदक ॥३॥ अर्थ:-दिक कहिये १० सूर्य कहिये १२, इषु कहिये ५. इपु कहिये ५,दिक कहिये १०, शिव कहिये १२ अङ्क कहिये ६, व कहिये , नग कहिये ७, अ- भ्र कहिये, अर्क कहिये १२. विश्व कहिये १३, भव कहिये १२,दी कहिये २, नगवनि कहिये ३७, कु कहिये ?, यमल कहिये २, अग्नि कहिये ३इभ कहिये ८, भक्ष कहिये ५, वाण कहिये ५,द्विपट् कहिये ६२. त्रिंशत् कहिपे:०, भरिचयः कहिये ३६, ख कहिये , जिन कहिये २४, भकहिये २७, और भन कहिये , यह शर भाग है. जिसमें त्वाष्ट्र कहिये चिन्ना और हस्त तया भहि कहिये आश्लेषा इनके गर, तथा विशाखासे लेकर छ: नक्षत्र, और रोहिणीसे लेकर तीन नक्षत्र इनके गर दक्षिण हैं, और टोप नक्ष- त्रांक शर उत्तर हैं ।।३।। उदाहरण. भश्विनीका शर १० अं. है इसको पलभा५ भंगुल ४५ प्रतिभंगुलसे गुणा- कर तव५७ अंगुल ३० प्रतिभंगुल हुए, इसमें १२ का भाग दिया तब अं- गादि लब्धि हुई ४ अंश ४७ कला ३० विकला इसको अश्विनीके गरके उत्तर होने के कारण भश्विनीके ध्रुव ८ अंशमें घटाया तव शेपरहे : अंश २२ कला ३० विकला, यह श्रीकाशीक्षेत्रमें अश्विनी नक्षत्रका उदय ध्रुव हुना, और लन्धि ४ अंश ४७ कला ३०विकलाको मधिनीके ध्रुव ८अंशम युक्त करा तर (१६८) ग्रहलाधव। [ नक्षयच्छाया- १२ अंश ४७ कला ३० विकला यह श्रीकाशीक्षेत्र में अश्विनी नक्षत्रका अस्त ध्रुव हुभा, इसी प्रकार शेष सम्पूर्ण नक्षत्रोंके उदयास्त ध्रुव आगे लिखेहुए कोष्टकके अनुसार जानना ॥ नक्षत्रकिनामा धव সো उदयव अस्तधुव ४७१३० । . मार्दा . ० ० 0 ० ० ० . १२३४५ रोहिणी ११९ ५दक्षिण, १।२१२३४५११६३६११५ मृगशिर २ २ १०दक्षिण | २ ६४७३० ११२७११२।३० ६ ११दक्षिण | २|११|१६/१५/२ ०१४३१४५ पुनर्वसु ४६ उत्तर । ३ । १.७/३० ३ ६५२१३० पुण्य १६.० उत्तर।३.१६ आलषा ३/१७/दक्षिण ३२०/२१ । १५/ ३ । १३ । ३८४५ मया ४९० उत्तर/४ ९ ९ पूर्वाफाल्गुनी ४२८१२उत्तर ४१२२ १५ ५ . उत्तराफाल्गु. ५ ५१३ उत्तर|४/२८/४६ १५/ ५१११११३ | ४५ हस्त ५२०११६क्षण | ५/२५/१६/ १५/ ५।१४ ४३४५ चित्रा ६ ३१२दक्षिण ६ ३ २ २.३० स्वाती ६१८३७उत्तर ६ ५४३/१५ विशाखा २१दक्षिण ७ ३१२८४५७ अनुराधा ७/१४२दक्षिण ७ १४/५७ ३०/७११३१२१३० ज्येष्ठा ७१२०३दक्षिण ७ (२०२६.१५। ७/१८/३३१४५ ८दक्षिण ५५० ७/२८/१० पूर्वापाड़ा ८.१५/५दक्षिण | ८ उत्तरापाढा ८२१५दक्षिण|८/२३/२३ | ४५/८/२८/३६१५ भभिजित ८1१८.६२ उत्तर।७।१८१७१३०९ १७१४२१३० श्रवण ९ ५३०उत्तर।८।२०३७३०९।२९।२२३० धनिष्ठा ९.१६३६उत्तर ८२९/१३१४५१०१२४६१५ शततारका १०/२०/०उत्तर।१०९२० १०/२० पूर्वाभाद्रपदा १०/२५.२४उत्तर।१०।१३1३० १२।६।३०१० उत्तराभाद्रप.११ ७.३७उत्तर।१०।२४ ०उत्तर। .. . . . . . ० ० ० रेवती। 0 . . . 0 . .
धिकार..]
सान्वयभाषाटीकासमेत ।
(१६९)
अव प्रजापति भादिके ध्रुवांश कहतेहैं-
प्रजापतिब्रह्मदग्न्यगस्त्याऽपांवत्सलुन्धध्रुवकांश-
कास्युः। कुपट्पडक्षास्त्रिशरा नभोऽटो त्र्यप्रोन्दवो
भूफणिनःक्रमेण ॥४॥
अन्वयः-कुपद, पडक्षाः, त्रिशरां, नभौष्टिौ, त्र्यप्टैन्दवः, भूफाणिनः
कमेण,प्रजापतित्रह्मदग्न्यगस्त्यापांवत्सलुब्धयुवकांशकाः,स्युः।।
अर्थः-'कुषट् कहिये इकसठ भंग भर्यात् दोराशि एकअंश, भौर 'प:
इक्षाः' कहिये उप्पन भंश भर्यात् एकराशि छब्बीस भंग, और त्रिशराः'
कहिये तरेपन अंश अर्थात् एकराशि तेईस अंश, भौर. 'नभोष्टी' कहिये
अस्सी अंग अर्थात् दौराशि वीसभंग, और 'ध्यप्टेन्दवः' कहिये एकसौ ति-
राशी भंश भा छः राशि तीन भंग, तथा भूफणिनः कहिपे इक्यासी
भंग भयांत दोराशि एकरंश, यह क्रमसे प्रजापति, ब्रह्मदय, भग्निभगस्त्य,
अपांवास, और लुब्धक इनके ध्रुवांश हैं ॥४॥
अब प्रजापति आदिके गरभाग कहतेहैं.-
तेपां मारोशिखिनः खरामा अष्टौ रसाश्वाः
शिखिनः खवेदाः। शरांशकाः स्युर्मुनिलुब्धयोस्तु
याम्यास्तु सीम्याः परिशेपकाणाम् ॥५॥
अन्वयः-गाशिसिनः, खरामाः, अष्टी, रसाश्वाः, शिखिनः, स-
वेदाः, (इमे), क्रमाद, तपान, शरांशकाः स्युः, मुनिलुब्धयोः तु,
याम्याः परिशेपकाणाम् तु: सौम्याः॥५॥
भयं:-'गाशिसिनः' कहिये ३९: 'खरामाः' कहिये ३० मष्टो 'रसाया'
कहिये ७६, 'गिनिनः' कहिये ३. और 'ग्ववेदाः' कहिये १०, यह क्रमसे
तिन प्रजापतिभादिके गरभाग हैं, तिनमें मुनि भार लुब्धकके दक्षिण, मार
शेन उतरहें। (इनके उदयास्त ध्रुव भगिन्यादि नक्षत्रांनी विसे लाने
चाहियं सोमागे कोष्टकम लिसह)॥५॥
(१७०) . ग्रहलाया [नदात्रच्छाया- ० ० ० ४ . ध्रुव शरभाग उदयवव अस्तव्य प्रजापति २ १९३९उत्तर! श्रा. १२. १८या पवि.स.१९७.५१क.पाय. ब्राहदय १२६/३०उत्तर ? ८ अग्नि २२३८ उत्तर ? १० अगस्य २२०/७६दक्षिण २५ १ १३ अपांवत्स ६/३/३ उत्तर ३३ २६ । १५ लुब्धक।२२१०दक्षिण ३ १० १० २ १ अवं नक्षवच्छायादि साधनकी रीति लिखते हैं- निजदेशभवाड्याच वाणाच्छाया यंत्रलवादिखेट- वत्स्यात् । छायादेरपि चेह रांत्रियातं नक्षत्रग्रहयो- ग उक्तवच्च ॥६॥ अन्वयः-निजदेशभवात, ध्रुवात, बाणात्, च, छाया, यन्त्रलवादि, खेटवत, स्यात् । अपि,-च, इह, छायादः, रात्रियातम्, (तद्धदेव स्यात् ); नक्षत्रग्रहयोगः च, उक्तवत, (ज्ञेयः) ॥ ६ ॥ अर्थः-अपने देशके ध्रुव और शरसे ग्रहच्छायाधिकारमें कहीहुई रीतिक अनुसार छाया- यन्त्र भाग आदि साथै; और छायाआदिसे रात्रिगत जाने, सथा नत्रक्षग्रेहयोग ग्रहयुतिके तुल्य जाने ॥६॥ नक्षत्रपदयोग गणेशदेवाचायने इस अपने महलाघव ग्रन्थमें नहीं कहाहे पर- न्तु इनके भाताके पुत्र नृसिदैवजनें अपने करणअन्यमें कहाहै सो यहाँ टिप्पणीरूप- से लिखते हैं- "धुचरभ वकान्तरलिप्तिका झुगतिभुक्तिवाहि गतागतेः । फलादिन{चरे ऽधिकहीनके युतिरिहेतरथा खलु वक्रिणि ।" भन्वयः-हि, यु- चरमरकान्तरलिप्तिकाः, युगतिभुक्तिहताः, (फार्थाः), (तदा), द्युचो, अधिक होनफे, फलानः, गतागतः, युतिः, (जया); यक्रिणि, खलु, इतरया, ( युतिः पा) ।। अर्थः-मह और नक्षत्रका ध्रुव इन दोनोंका अन्तर करके, उसकी कलाकरे, और तिन फलाओमें ग्रहको गतिका भागदेफर जो लाभ होय वह दिनादि होती है, तदनन्तर यदि नक्षत्र ध्रुवको अपेक्षा ग्रह अधिक होय तो तिस प्रहको विस नक्षत्रमें आएहुए लन्धिपरिमितदिन भ्यतीत हुए जाने, और यदि मह नक्षत्रभूरकी भपेक्षा कम होय तो लब्धिपरिमितदिनोंमें वह प्राविस नक्षत्रके पि भारंगा ऐसा जान; परन्तु माद मह घडी होकर गक्षय भुरको अपेक्षा अधिस या पम होतो फल उपरोक्त फल वित होता है, अर्थात् यदि भधिक होय सो एपिपरिमित दिलोंके व्यतीत होनेपर मह नक्षत्रके विध भागा, और कम होय तामाको न- समें आएप सम्मिगारमितादन व्यतीत होगर ऐसा जाने। .
धिकारः१] सान्वयभाषाटीकासमेत । (१७१) - भव ग्रहोंका रोहिणीशकटभेद और उसका फल कहते हैं- गवि नगकुलवे खगोऽस्य चेद्यमदिगिषुः खशराड- लाधिकः । कभशकटमसौ भिनत्त्यसक्छनिरुडुपो यदि चेजनक्षयः॥७॥ अन्वयः-( यः ), खगः, गवि, नगकुलवे, (वर्तमानः ), चेत्, अस्य, इपुः, (च), यमदिक्, खशराडलाधिकः, (चेत, तदा), असो, कभशकटम्, भिनत्ति, यदि, असृक्, शनिः, उडुपः, ( भेदयति ), चैत्, (तदा), जनक्षयः, (भवति)॥ ७ ॥ अर्थः-कोईसाभी ग्रह वृषराशिके सतरह अंशपरिमित हो और उसका शर दक्षिण और पचास अडुलकी अपेक्षा अधिक होय तो वह ग्रह रोहिणी शकटको भेदता है (अर्थात् रोहिणीनक्षत्रका भाकार गाडीकी भाकृतिका है उसमेंको होकर ग्रह पार जाताहै ) यदि मंगल, शनि, और चन्द्रमा इनमते कोईसाभी ग्रह रोहिणीशकटका भेद करै तो लोकोंका नाश होताहै ॥७॥ अब चन्द्रमाका रोहिणीशकटको भेदनेका काल लिखते हैं- स्वर्भानावदितिभतोऽटऋक्षसंस्थे शीतांशुः कभ- शकटंसदा भिनत्ति।भौमायोः शकटभिदा युगा- न्तरे स्यात्सेदानी नहि भवतीशि स्वपाते॥८॥ अन्वयः-स्वर्भानौ, अदितिमतः, अष्टमक्षसंस्थे, (सति), सदा, शीतांशुः, कभशकटम्, भिनत्ति भौमायोः, शकटभिदा, युगान्तरे, स्यात्, सा, हि, इदानीम्, ईशि, स्वपाते, न भवति ॥ ८॥ अर्थ:-पदि राहु पुनर्वसू नक्षत्रसे लेकर भागके भाठ नाम स्थित होय तो चन्द्रमा भवत्यही रोहिणीगकटका भेद करताहै, परन्तु मंगल और शनि इनक पात (अस्तोदयाधिकारमें १२ श्लोक देखो ) पुनर्वसु नक्षत्रसे । लेकर भागके भाठनक्षत्रों में हो तौभी यह दोनों रोहिणी शकटका भेद नहीं करते हैं। इनका शकटभेद युगान्तरमं होताहे ॥ ८॥ " " (१७२) ग्रहलाघव। [.नक्षत्रच्छाया भर याम्योत्तर वृत्तस्थ नक्षवदर्शनसे तत्काल लग्न और गतरात्रि जानने की रीति लिखते हैं- खमध्यगर्भधुवतोऽस्फुटं चरं ततो दिनानिजभो- दयैस्तनुः। भवेत्तदा लग्नमथो तदङ्गभान्वितार्क- मध्ये घटिका निशागताः॥९॥ अन्वयः-समध्यगर्भवतः, अस्फुटम्, चरम् (साध्यम् ), ततः (साधितात), दिनार्दात, निजभोदयः, (साधितः), तनु, तदा, लमम्, भवेत; अथो, तदङ्गभान्वितार्फमध्ये, निशागताः, घटिका, (स्युः)॥९॥ अर्थः-याम्योत्तर वृत्तस्थ नक्षत्रका ध्रुव लेकर उसका शरसंस्कार कर विनाही तिससे चर लावै, तिस चरसे दिनार्द्ध साथै, वह इष्टकाल होताहै, तदनन्तर नक्षत्र भुवांकोंको रवि मानकर तिसते स्वदेशीय उदयों- के द्वारा इष्टकालकी लग्न लावै, वही खमध्यस्थ लग्न होतीहै, वह लग्न और पहाशियुक्त सूर्य इन दोनोंसे विमनाधिकारमै कहीदई रीतिके अनुसार इष्टकाल साधे, तब तितने कालकी तुल्यही रात्रि . बीती जाने ॥९॥ उदाहरण. याम्योत्तर वृत्तस्थ अश्विनी नक्षत्रका ध्रुव ० राशि ८अंश है इसमें अपनांश १८ अंश १० कलाको युक्त करा तब राशि२६ अंश १० कला हुआ, इससे लायाहुमा चर ४९ पल हुभा, इसमें १५ घटी युक्त करी तय १५ घंटी ४९ पल यह दिनगद हुमा भय अश्विनी नक्षत्रके भुव राशि ८ अंशम भयनांशी १८ भं- श १० पलको युक्त कर २६ अंश १० कलाको रवि मान कर और दिनार्द्ध १५पटी ४९ पलको इष्ट काल मान कर इनसे लायाहुमा भोग्य काल २८ पल और सापन लग्न राशि १ अंश ५४ कला विकला हुभा, इस रीतिसे प्रत्येक नक्षत्रका दिनाद्धं भार खमध्यस्य निरयण लग्न साधकर लिखते हैं, सो भाग लिगाए फोटकके अनुसार जानना । १ धिकारः१] सान्वयभाषाटीकासमेत। (१७३) नाम दिनार्द्ध लग्न दिनार्द्ध | लग्न घ.प.रा.अं.क.व. नाम |घ,प.रा.अं.क.वि. अश्विनी १५४९३/१३४४४६, ज्येष्ठा १३:२२१०/१०/१७३० भरणी १६/११.३/४,५३३६ मूल १३/५/२०२७३४४७ कृत्तिका १६३७,४/९३४२० पूर्वाषा. १३ १ ११/६४३१२ रोहिणी-१६४७४/१९४८१२/ उत्तराषा१३ १ ११२५/१६२० मृगशिरा १६५५ ५२२०२६ अभिजित १३२ ११,२०५५४१ आर्द्रा १६५८५६/११ १९/ श्रवण १३३ ५/१५१६१९ पुनवस १६४७६३८४८ धनिष्ठ १३२४/० २९. १३७ पुण्य १६३६ ६१४२११८५ शततारका १३१९/२/११४) आश्लेषा |१६३६६१५२८४१ पर्वाभादप.१४२९२८'३४३६ मया (१६३१७४२११८ उत्तराभा १४५१२/१८४०३१ पूर्वाफा. १५२६/७ १९५४ १२/ रेवती १५३४३।७.१६१८ उत्तराफा १५१३१७२५३१३ प्रजापति १६५५ ५/१२६४२ हस्त (१४४५८७५३ ९ ब्रह्मदय १६५२/४ २६३१११ चित्रा १९२०, ८१९१४४ अग्नि १६५०/४२३४४३७ स्वाती १३/४/९/५/१९१२ अगस्त्य १६५६५२९४२ विशाखा १३/३३ ९ १८१५१ अपांवत्स १४२०८१९१४४ अनुराधा १३/१६१०२३५३ लुब्धक १६५६/५/२०४१५६ फिर अश्विनीनक्षत्र याम्योत्तर वृत्तम है सो, निरयण लग्न ३ राशि १३ अंश ४४ कला ४६ विकलामें भयनांश १८ अंश १० कला युक्तकरा तय ४ राशि १ अंश ५४ कला १६ विकला और तिस दिनके स्पष्ट सूर्य ६ राशि २५ अंश -५० कला ३ विकलामें अपनांश १८ अंश २० कला युक्तकरा तव हुभा७ राशि १५ अंश ० कला ३० विकलामें राशि युक्त करी तब हुभार राशि १४ अंश कला ३० विकला, इनसे लायाहुमा भोग्य काल १३४ पल, इसमें लमभुक्तकाल २२ पल (भोर दोनोंके मध्य उदय ) मिथुनोदय ३०४ पल, कादय ३४२ पल, इनसबका योग हुमा ८०२ पल अर्थात् १३ घटी-२२ पल यह राविगतकाल हुआ । भर नक्षत्रकी उदय लग्न और मस्तलन तया तिन दोनोंसे राविगतकाल लानेकी रीति लिखते हैं- उद्यद्भध्रुवकः स्वदेशजोऽस्तं वा प्रामुवतः सपङ्- (१७४) ग्रहलाघव। निक्षत्रच्छाया- -" ग्रहः। स्यात्तत्कालविलग्नकं ततः प्राग्वत्स्युटिका निशागताः॥ १०॥ अन्वयः-स्वदेशजः, उद्यद्भवका, वा, अस्तम्, प्रामुवतः, सपडू- ग्रहः, (ध्रुवकः), तत्कालविलमकम्, स्पात, ततः, प्राग्यता निशा- गताः, घटिकाः, स्युः, ॥१०॥ अर्थ:-उदयको प्राप्त होनेवाले नक्षत्रका जो स्वदेशीय उदय ध्रुव हो वह उसका उदय लग्न होताहै, और अस्तको प्राप्त होनेवाले नक्षत्रके स्वदेशीय म. स्तधुवमें छः राशि युक्त करदेय तय तिस नक्षत्रका अस्तलग्न होताहै । तिससे पूर्वोक्त रीतिके अनुसार रात्रिगत घटिका होतीहैं ॥ १० ॥ उदाहरण. अश्विनीका उदय ध्रुव जो ० राशि ३ अंश १२ कला ३० विकला यहही अश्विनीका उदय लग्न हुभा,और अश्विनीका अस्वध्रुव जो राशि १२ अंश ४७ कला ३० विकला इसमें ६ राशि युक्त करीं तब हुआ ६ राशि १२ अंश १७ कला ३० विकला, यह अश्विनीका अस्तलग्न है, इनही उदय लग्न और भस्त- लमसे पूर्वोक्त रीतिके अनुसार रात्रिगत घटिका जाननी ।। अब यह वार्ता कहते हैं-कि स्वदेशीय नक्षत्रोदयोंको स्थिरलग्नै करै- इति नैजदेशपलभावशतो ह्युदयं खमध्यमथवास्त- मयम् । ब्रजदश्विंभादिषु सुखार्थमिह स्थिरल- नकानि विदधीत सुधीः ॥ ११ ॥ अन्वयः-इति, नेजदेशपलभावशतः, हि, मजदश्विभादिपु,उदयम्, अथवा, खमध्यम्, अस्तम्,(गच्छतः) नक्षत्रस्य, सुधी, इहै,सुखार्थम् स्थिरलमकानि, विदधीत ॥ ११ ॥ अर्थ: गणितज्ञ विद्धान इसमकार स्वदेशीय पलभासे गणितकी सुलभताके निमित्त अश्विनीआदि नक्षत्रफि उदय-मध्य-और अस्त इन कालोंकी स्थिर रमें लाकर रवरी॥११॥ इति योगगकवर्यगणेशदेवाकृती महलाघवाख्यकरणमन्धे पचिमोत्तरदेशीयमुरादाबाद- वास्तम्पेन फाशीस्पाजकीय सरहतविद्यालयप्रधानाध्यापकपण्डितस्वामि- राममिश्रमाविसानिध्याधिगतरियन भादाजगोत्रोत्पन्नगोडावतं. सनीयुक्तभोलानापात्मजेन पण्डितरामसरूपशम्र्मणा कृतथा सान्यपभाटीया सहितो नक्षत्रयायाधिकार समाप्त:११॥.
धिकारः१५] सान्वयभाषाटीकासमेत । अथ शृङ्गोन्नत्यधिकारःप्रारभ्यते। तहाँ प्रथम चन्द्रमाकी शृङ्गोन्नतिका काल कहते हैं- मासस्य प्रथमेऽन्तिमेऽथवाऽनौ विधुशृङ्गोन्नतिरी. क्ष्यते यदह्नि । तपनास्तमयोदयेऽवगम्यास्तिथयः सावयवाः क्रमाद्गतैष्याः॥१॥ अन्वयः-मासस्य, प्रथमे, अथवा, अन्तिमे, अंग्रौ, यदहि, विधु- शृङ्गोन्नतिः, ईश्पत, (तद्दिवसे), तपनास्तमयोदये, कमात्, गप्या, तिथयः, सावयवाः, अवगम्याः ॥ १ ॥ अर्थः प्रत्येक महीने के प्रथम चरणमें (शुक्लपक्षको प्रतिपदासे शुक भटमी- पर्यन्त) अथवा चतुर्थ चरणमें (कृष्णपक्षकी अष्टमीसे अमावास्यापर्यन्त) शृङ्गोन्नति देखी जाती है, शुक्ल पक्षमें जिस दिन नोन्नति देखनी होय उस दिन सायंकाल के समय रवि चन्द्र-राहु, और शुक्ल प्रतिपदासे गततिथि लावे, और कृष्ण पक्ष शृङ्गोन्नति देखनी होप तो अभीष्ट दिवसमें सूयॉ- दयके समय रवि-चन्द्र-राहु-और पप्य तिथि लावै ॥१॥ उदाहरण. शाके १५३२ ज्येष्ठ शुक्ल पञ्चमी ५ गुरुवारके दिन भूगोन्नति देखनेके लिये गणित करतेहैं-तहाँ महर्गण ८०२३, प्रातकालीनमध्यम रवि १ राशि १६ अंश ३३ कला ५४ विकला, चन्द्र राशि९ भंटा ३३ कला ११ विकला, उच्च ७ राशि २४ अंश ५७ कला ४८ विकला, राहु २ राशि २२ अंश २४ कला २३ विकला, रधिमन्दकेन्द्र राशि ! भंग २६ कला ६ विकला, मन्दफल धन भंग ८ काटा २३ विकला, मन्दस्पष्ट रवि १ राशि १७ भंश ४२ कला १६ विकला, भयनांश १८ मंदा ८ कला, चरऋण १०६ विकला, स्पटरवि १राशि १७ अंश ४० कला ३७ विकला, स्पष्टगति ५७ कला २० विकला, विफलसंस्कृतचन्द्र ३ राशि ९ अंग १ कला २८ विकला, मन्दकेन्द्र राशि २५ अंश ५६ कला २०विकला, मन्दफलधन ३ अंश २९ कला २. विकला, स्पष्टचन्द्र ३ राशि १२ अंश ३० कला ४९ विकला, म्पष्टगति ८७ कला १ विकला दिनमान ३३ पटी ३२ पल, इनपटिकामका चालन देकर लाहुए ग्रहं रवि १ राशि १८ अंश १५ कला ३. विकला, चन्द्र ३ राशि १९ अंशर कसा२विकला, राहु राशि २२ मंग २५ कला ३७ विकला, सायंकालके समय गतविपि पक्षमी७घटी२० पल ॥ .
"
(१७६)
ग्रहलाप।
[शृड्रोन्नत्य-
अब गतएण्य साययवतिथि और पश्चाङ्गस्थरविसे चन्द्रसाधनकी रीति
लिखते हैं-
रविहततिथयोंशास्तद्वियुग्युक्क्रमण धुमणिरप-
रपूर्व मासपादे विधुः स्यात् ॥ ७ ॥
अन्वयः-रविहततिथयः, अंशाः, तदिग्युग्युक्, द्युमणिः, क्रमेण.
अपरपूर्वे, मासपाद, विधुः, स्यात् ॥5॥
अर्थ:-तिथियोंको बारहसे गुणाकर तब जो गुणनफल होप वह अंशा-
स्मक होताहै, तिसको यदि शृङ्गोनति कृष्णपक्षमें होय तो रविमें घटादेय,
और शृङ्गोन्नति शुक्लपक्षमें होय तो रविमें युक्त कर देय तव चन्द्र होताहै ॥5॥
उदाहरण.
सावयवतिथि पञ्चमी ७ घटी २० पलको १२ से गुणाकरा तब ६१ अंश
२८ कला विकला शृङ्गोन्नति शुक्लपक्षमें है इस कारणरवि राशि २८ अंश
१२ कला ३२ विकलामें ६१ अंश २८ कला विकलाको युक्त करातव ३ राशि
१९ अंश ४० कला ३२ विकला, यह चन्द्र हुआ।
वलन और सित इन दोनों के साधनको रीति लिखते हैं-
नृपगुणतिथिरूना स्वप्नतिथ्याक्षभानी शरकुहृदु-
दगाशा संस्कृतार्कापमांशैः॥२॥चन्द्रस्य चव्य-
स्तशरापमांशैविनिम्नतिथ्या विदृताङ्गुलायम् । सं-
स्कारदिकं वलनं स्फुटं स्यात्स्वप्वंशहीनास्ति-
थयः सितं स्यात् ॥३॥
अन्वयः-नृपगुणतिथिः, स्वन्नतिथ्या, ऊना, अक्षभाभी, (ततः),
शरकुहत, उदगाशा, (स्यातसा), अर्कापमाशेः, चन्द्रस्य, व्यस्त-
शरापमांशः, च, संस्कृता, (ततः), दिनिप्रतिथ्या, विद्दता, संस्का-
रदिधाम, वलनम्, स्फुटम्; स्यात् । स्ववंशहीनाः, तिथयः, सितम्,
स्यात् ॥ २ ॥ ३॥
धिकारः १२] . सान्वयभापाटीकासमेत । (१७७) अर्थ:-तिथियोंको सोलहसे गुणाकरनेपर जो गुणन फल होय, उसमेंसे तियिका वर्ग घटा देय तव जो शेप रहै उसको पलभासे गुणाकरै तव जो गुणन फल होय उसमें पन्द्रहका भाग देय तव जो अंशादि लब्धि होय ठसको उत्तर समझकर उस लब्धिका और सूर्यको क्रान्तिका संस्कार कर वह संस्कारकी दिशाकी स्पष्ट लब्धि होतीहै, तदनन्तर चन्द्रमाकी स्पष्ट क्रान्ति करके वह दक्षिण होय तो उत्तर और उत्तर होयती दक्षिण मानकर उसका और स्पष्टलब्धिका संस्कार कर उससंस्कारमें तिथिको दोसे गुणाकरकै जो गुणनफल होय उसका भाग. देय तय जो लब्धि होय वह भगुलादि वलन होताहे वह संस्कार दक्षिण होय तो दक्षिण और उत्तर होय तो उत्तर होताहै । तिथिको चारसे गुणा करकै पाँचका भाग देय तब जो लब्धि होय वह अद्गुलादि सित होताहै ॥२॥३॥ उदाहरण. ५तिथि ७ घटी २० पलको १६से गुणा करा तवं ८२ तिथि ५७घटी२०पल हुआ, इसमें ५ तिथि ७ घटी २० पलके वर्ग २६ तिथि १४ घटी १३ पलको घटाया तच शेप रहे ५५ तिथि ४७ घटी ७ पल इसको पलभा ५ अंगुल १५ प्रतिभंगुलसे गुणाकरा तव गुणनफल हुआ ३२० तिथि २२ घटी ५५ पल, इसमें १५ का भाग दिया तब लब्धि हुई २१ अंश २१ कला ३१ विकला इसलब्धि उत्तर और सूर्यक्रान्ति उत्तर २१ अंश ४४ कला २९ विकला. इन दोनोंका संस्कार करा तव ( एकदिशाके होनेके कारण योग करनेसे) ५३ अंग ६ कला विकला हुआ, चन्द्रकी स्पष्टक्रान्ति उत्तर २० अंश ११ क- ला९विकला है इस कारण इसको स्पष्टलब्धि ४३ अंश६ कला विकलामें घटाया तव शेपरहा उत्तर २२ अंश २४ कला ५१ विकला, इसमें तिथि ५ घटी ७पल २० को २ से गुणाकरनेसे जो गुणनफल हुआ १० तिथि १४ घटी १० पल, इसका भागदिया तब अंगुलादि लब्धिहुई २ भंगुल ११ प्रति- अंगुल यह उत्तर वलन स्पष्ट हुए,। ५ तिथि घटी २० पलको ४ से गुणा करा तव २० तिथि २९ घटी २० पल हुआ, इसमें ५ का भागदिया तव लब्धि- हुई ४ अंगुल ५ प्रतिअंगुल यह चन्द्रके सितहुए ॥ किस दिशामें चन्द्रका गौच्च्य होयगा यह जाननेकी रीति लिखते हैं- उन्नतं बलनाशायामन्यस्यां स्यानतं विधोः। वलनस्याङ्गुलैः शृङ्गकिमत्र परिलेखतः॥४॥ अन्वयः-रिधोः शृङ्गम्, वलनाशायाम्, उन्नतम्, अन्यस्याम, .
(१७८)
ग्रहलाघव 1
[ग्रहयुत्य-
.
नतम्, वलनस्य, अशुलैः, ( तुल्यम् ), स्याव; अत्र, परिलेखतः,
किम् ? ॥४॥
अर्थः चलनकी जो दिशा हो उसही दिशाकी भोर चन्द्रमाके ऋड़की ऊँ-
चाई होतीहै, और अन्य दिशाम शृङ्गको नति (नीचाई ) होगी, और बल-
नके जितने अंगुल होंगे उतनाही प्रमाण शृङ्गौच्च्यका होगा, फिर यहाँ पृथा
मयास करनेसे क्या प्रयोजनहै? ॥४॥
उदाहरण.
चन्द्रका वलन उत्तर २ अंगुल ११ प्रतिअदुलहै, इसकारण शृङ्गोन्नति उ-
जरकी ओर होयगी. और ऋद्भनति दक्षिणकी ओर होयगी, तथा ऋङ्गका
मान २ अगुल ११ प्रतिभट्ठल होयगा।
इति श्रीगणकवर्यगणेशदेवज्ञकृती महलाघवकरणमन्य पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादाबाद-
वारतव्येन वाशस्थराजकीयसस्कृतविद्यालयप्रधानाध्यापकपण्डित-
सापिराममिश्रशास्त्रिां सन्निधावधिगतन्यायादिशास्त्रेण-
भारद्वाजगोत्रोत्पनगोड़वंशावतंसश्रीयुतभोलानाथा-
मजेन पण्डितगमस्वरूपशर्मणा कृतपा
सान्वयमापाटीकया सहितः इको-
प्रत्यधिकारः समाप्तः ॥ १२॥
अथ ग्रहयुत्यधिकारो व्याख्यायते ॥
तहाँ प्रथम ग्रहविध साधनकी रीति लिखते हैं-
पञ्चवंगाङ्कविशिखाः पृथगीशंकर्णायोगाहताःप्रकृ-
तिभान्वरिसिद्धरामैः। भक्ताः फलोनसहिताः श्रव-
णेऽधिकोने ते त्र्युद्धृताः स्युरसृजो वपुरडलानि ॥१॥
अन्वयः-पञ्चवंगाङ्कविशिखाः, ( अङ्काः ), पृथकू, ईशकायो-
गाहताः, (ततः), प्रकृतिभावरिसिद्धरामैः, भक्ताः, श्रवणे, अधि.
फोने, फलोनसहिताः ते, ज्युद्धता, असजः, वपुर हलानि, स्युः॥१॥
धिकारः १३] 4 सान्वयभाषाटीकासमेत । (१७९) अर्थः-मंगलआदि पाँचों ग्रहांमसे जिसका बिम्ब लाना होय उसके शीघ्र- कर्ण और ग्यारह अंश इन दोनोंका अन्तर करके, तिस अन्तरको इष्टग्रहके नीचे लिखेहुए विम्याङ्कले गुणाकर तय जो गुणनफल होय उसमें भाज्या- ङ्कका भाग देय, फिर यदि शीघ्रकर्ण ग्यारह अंशांकी अपेक्षा अधिक होय तब तो भाज्याङ्कका भागनेसे प्राप्तहुई लब्धिको विम्याङ्कमेसे घटादेय और यदि गीतकर्ण ग्यारह अंशांकी अपेक्षा कम होय तो उस लब्धिको विम्याङ्कमें युक्तकर तब जो होय उसमें तीनका भागदैनेसे जो लब्धिहोय वह अहलादि विम्ब मंगल आदि ग्रहोंके होतेहैं; । पञ्च कहिये ५,ऋतु कहिये ६, अग कहिये ७, अङ्क कहिये ९, और विशिख कहिये ५ यह क्रमसे मंगल आदि पाँचों ग्र- होके विम्वाङ्क हैं और प्रकृति कहिये ग्रहाकनाम मंगल बुध/गुरु शुक्राशनि २२, भानु कहिये १२, अरि कहिये ६, सिद्ध कहिये २४, और राम कहिये३, विम्वाङ्क | ५ • यह क्रमसे मंगलआदिकेभाज्याङ्कह॥१॥ भाग्याङ्क | २१ / १२१ १६/२४ उदाहरण संवत् १६६७शाके १७३५ वैशाख शुक्लरविवारके दिन ग्रहयुतिदिन साधनके निमित ग्रहविम्बसाधेनको गणित लिखतेहैं अहर्गण ७७८ चक्र ८, मध्यम रवि राशि२१ अंश५५कला३०विकला, भौम९राशि०संश३३कला५ विकला, शनि १०राशि ५ अंश ४५ कला ५९ विकला, सूर्यका मन्दकेन्द्र १ राशि २६ अंश ४कला ३० विकला, मन्दफल धन १ अंश ४८ कला २६ विकला, संस्कृत रवि ० राशि २३ अंश १३ कला ५६ विकला. अयनांश १८ अंश ८ कला, चर- ऋण ७५, स्पष्ट रवि० राशि २३ अंश ४२ कला ४१ विकला, स्पष्टगति ५७क- 'ला ५६ विकला. अव भौम स्पष्टीकरण लिखतेहैं-शीवकेन्द्र राशि २१ भं- श२१ कला ३९ विकला, शीघ्रफलार्द्धधन १८ अंश ५० कला ३७ विकला, संस्कृत भौम ९ राशि १९ अंश २४ कला २८ विकला, मन्दकेन्द्र ६ राशि १० अंश ३५ कला ३२ विकला. मन्दफल ऋण २ अंश २ कला ५२ विकला, । मन्दस्पष्ट भौम ८ राशि २८ अंश ३० कला ५९ विकला, शीघ्रकेन्द्र ३ राशि २३ भंग २४ कला ३१ विकला, शीघ्रफल धन ३८।४।१०, स्पष्ट भौम- १० राशि ६ अंश ३५ कला ९विकला, स्पष्टगत्ति ४२ कला ५० विकला, अव शनिस्पष्टीकरण लिखतेहैं-गीप्रकेन्द्र २ । १६ । ३१ शीवफलार्द्ध धन.२ अंश ५२ कला ४१ विकला, संस्कृत शनि १० राशि ८ अंश २टक- ला ४० विकला, मन्दकेन्द्र ९ राशि २१ अंश ३१ कला २० विकला. मन्द- फल ऋण ८।२२ । ४१, मन्दस्पष्ट शनि ९ राशि २७ अंश३३कला१८विकला शीवकेन्द्र ३ राशि २४ अंश ३३ कला १६ विकला, शीघ्रफल ५अंश ३८कला ३६ विकला, स्पष्टशनि १० राशि २ अंश ५८ कला ४ विकला, स्पष्ट गति ३ कला ३ विकला, दिनमान ३२ घटी ३० पल, मंगलका शीघ्रकर्ण ८ अंश ५५ कला शनिका शीघ्रकर्ग ११ अंश १३ कला, । अव भीमविम्बसाधन (१८०) ग्रहलाघव। [ग्रहयुत्य- ० बिम्ब हुआ ॥ लिखतह- मंगलक विम्याङ्क ५ कलाको ११ अंश और शीघ्रकर्ण ८ अंश ५२ कलाक अन्तर २ अंश ८ कालासे गुणाकरा तय १० अंश ४० काला हुआ इसमें मंगल के भाग्याङ्क २१ कलाका भाग दिया तब लब्धि हुई अंश ३० कला इसको 'कर्णके ग्यारह से कम होने के कारण विम्वाङ्क ५ में युक्त करातब ५ अंश ३० कला हुमा, इसमें ३ का भाग दिया तब अगुलादि लब्धि हुई १ अट्ठल ५ प्रतिअगुल, यह मंगलका स्पष्ट बिम्ब हुआ; अव गनिविम्बसाधन लिखते हैं- शनिक विम्याङ्क ५ कलाको ११अंश और शनिशीप्रकर्ण ११ अंश १३ कला इनके अन्तर १३ कलासे गुणा करा तक १ अंश ५ कला हुआ इसमें शनिके भाज्यांक ३ का भाग दिया तब लब्धि हुई ० अंश २१ कला इसको, कर्णके ग्यारह अंदशसे अधिक होनेकै कारण शनिक विम्बाङ्क ५ में घटाया तब शेष रहे ४ अंश ३९ कला. इसमें ३ का भाग दिया तब अगुलादि लब्धि हुई ? अगुल ३३ प्रतिअगुल, यह शनिका स्पष्ट अव यतिके गतगम्यको जाननेकी रीति लिखते हैं- अधिकजवखगेऽधिकेऽल्पभुक्तस्थ कुटिलेऽल्पतरेऽनु- लोमतो वा । अनृजुगखगयोस्तु शीघ्रगेल्पे युतिर- नयोः प्रगतान्यथा तु गम्या ॥२॥ अन्वयः-अनयोः, अधिकजयखगे, अल्पभुक्तः, अधिक, अथवा, कुटिले, अनुलोमतः, अल्पतरे, अनुजुगखगयोः, तु, शीघ्रगे, अल्पे, (सति ), युतिः, प्रगता, अन्यथा, गम्या, (वाच्या) ॥ २ ॥ अर्थ:-जिन दो ग्रहांकी युति लानी है उनमें यदि अधिकगति ग्रह अल्पगति ग्रहकी अपेक्षा भंशादि अवयवाकरकै अधिक होय, अथवा मार्गगति ग्रहकी अपेक्षा चक्रगति ग्रह अंशादिभवयवांकरकै कम होय, या अधिकवक्रगति ग्रह अन्पचक्रगति ग्रहकी अपेक्षा अंशादि अवपाकरकै कम होय तो युति- को गत ( बीतीहुई ) जान, और यदि इस लक्षणमं विपरीतता होय तो ग्रह-. युतिको प्राय ( होनेवाली है ऐसा) जाने ॥२॥ उदाहरण.. भल्पगति ग्रह शनि १० राशि अंश ५८ कला ४४ विकला, अधिकगति प्रदमंगल १० राशि६ अंश ३५ कला पिकलाकी अपेक्षा कम है इसकारण मंगट भारतानि इनकी युति गत (होगई) है। " धिकारः १३] सान्वयभाषाटीकासमेत । ( १८१) अव ग्रहयुतिके दिन जाननेकी रीति लिखते हैं- ऋजुगतिखगयोस्तु वक्रयो विवरकलागतिजान्त- रेण भक्ताः । गतिजयुतिहता यदैकवक्री युतिरग- ता प्रगताप्तवासरैः स्यात् ॥३॥ अन्वयः ऋजुगतिखगयोः, वा, वक्योः विवरकला, गतिजा- न्तरेण, भक्ताः, यदा, एकवकी, (तंदा), गतिजयुतिहता, आप्तवा- सरैः, अगता, प्रगता, युतिः, स्यात् ॥ ३ ॥ अर्थः-यदि दोनों ग्रह मार्गी अथवा वक्री हों तौउन दोनों ग्रहोंके अन्तरकी कलाओमें गतिके अन्तरका भागदेय, और यदि एक ग्रह वक्री होय और दूसरा ग्रह मार्गी होय तो इन दोनों ग्रहोंके अन्तरकी कलाओंमें गतिके योगका भाग देय, तव जो लब्धि होय उस लब्धिके तुल्य दिनोंमें तिन दोनों ग्रहोंकी युति होयगी अथवा होगई ऐसा जाने ॥३॥ उदाहरण. मार्गी ग्रह जो भौम १० राशि ६ अंश ३५ कला ९ विकला, और शनि १० राशि २ अंश ५८ कला ४४ विकला इन दोनोंके अन्तर ३ अंश ३६ कला २५ विकलाकी कला हुई २१६ कला २५ विकला इसमें मंगलकी गति ५२ कला ५०विकला, और शनिकी गति कला ३ विकला इन दोनोंके अन्तर ४९ कला ४७ का भाग दिया तव दिनादि लब्धि हुई ५ दिन ३६ घर्टी २३ पल इतने दिन युति हुए होगप, अर्थात् इस दिनादि ५ दिन ३६ पर्टी २३ पलको वैशाख शुक दशमी १० में घटाया तब शेष रहा वैशाख शुक्ल ४ चतुर्थी ३३ घटी ३७ पल, अर्थात वैशाख शुक्ल चतुर्थीको सूर्योदयसे ३३ घटी ३७ पलपर अर्थात २ घटी ७ पल रात्रि व्यतीत होनेपर शनि और भौमकी युति (युद्ध) हुआ । भब ग्रहांका दक्षिणोत्तर दिशामें संस्थान और उनके अन्तरको जाननेकी रीति लिखते हैं- चाल्यौ खेटो समौस्तो ग्रहयुतिदिवसेश्चन्द्रवाणः स्वनत्या संस्कार्योऽत्र ग्रहौ स्वेपुदिशि समदि- शोस्त्वल्पवाणः परस्याम्॥एकान्याशौ यदेपू वि- (१८२) ग्रहलायय! [ग्रहयुत्य- रहितसहितौ खेटमध्येऽन्तरं स्यादेदो मानक्यख- ण्डादह लघुनि तदाऽल्पं हि कि लम्बनायम् ॥४॥ अन्वयः-ग्रहयुतिदिवसः, खेटौ, चाल्यौ, (तौ ), समो, स्तः, (तयोः, शरः, साध्यः) चन्द्रवाणः, (चेत, तदा ), स्वनत्या, सं- स्कार्य अत्र, ग्रही, स्वेपुदिशि, (भवतः ), समदिशीः, तु, अल्प- बाणः, परस्याम, (स्यात् ), यदा, इपू, एकान्याशी, (तदा), वि- रहितसहितो, ( कायौं), (तदा) खेटमध्ये, (अंगुलायम् ), अ- न्तरम्, स्यात्, इह, मानक्यखण्डात, लघुनि, भेदः, (स्यात् ), तदा, हि, अल्पम्, लम्बनायम्, (अत्र ), किम्, ( कर्त्तव्यम् ), ॥ ४ ॥ अर्थः-ग्रहयुतिके जो गत अथवा एप्य दिन ही चैसे ही तिन-युतिके दिनों- का ऋण अथवा धन चालन ग्रहाम देय तव वह ग्रह राशि आदि अवयवों- करके तुल्य होंगे, तदनन्तर तिन ग्रहोंके शर लावै,(परन्तु जब चन्द्रमाकी युति अन्यग्रहीकरके होप तयं चन्द्रमाका नतिसंस्कृत शर लेय केवल शरन लेय) और वह शर जिस दिशाका होय उस दिशाकाही उस ग्रहको जानै अर्थात् जिस ग्रहके शरकी दिशा उत्तर हो तो वह ग्रह उत्तर दिशाका,और शरदक्षिण दिशाका होय तो वह ग्रह दक्षिण दिशाका है ऐसा जाने, परन्तु यदि दोनों ग्रहाँकी दिशा एकही आवै तौ जिस ग्रहका शर अल्प होय वह ग्रह अधिक शरवाले ग्रहकी-दिशाले अन्य दिशाका जाने यदि ग्रहोंके शर एकही दि- शाके हो तो तिन शरीफा अन्तर कर और ग्रहोंके द्वार भिन्न दिशाओंक हों तो तिन शरीका योग करलेय तब उन ग्रहोंके मध्य में दक्षिणोत्तर अंगुला- रमका अन्तर होताहै, तदनन्तर यदि ग्रहोंके बिम्बोंके योगके अर्द्धकी अपेक्षा दक्षिणोत्तर अन्तर कम होय तो ग्रहोंक विम्यांका ऐक्य होयगा और यदि दक्षिणोत्तर भन्तर अधिक होय तो ग्रहोंके बिम्बोंका ऐक्य नहीं होयगा ऐसा जाने, फिर यह समझनेके लिये लम्बनादि गणित करनेकी क्या भावग्यकता ॥४॥ उदाहरण. मंगट १० राति अंग ३५ कला विकला, गत युति दिनों ५ दिन २६ घटी २३ पलका ऋण चालन ३ अंश ५३ पाला विकला, शनि १० राशि २अंदा ५८ याला ४ विकला, गति युतिदिनांका ऋण चालन ० अंश १६ गत ५ विकला घालित मंगल १० राशि भंश ४२ कला विकला, धिकारः १४] सान्वयभापार्यकासमेत । (१८३) बालित शनि १० राशि२ अंश ४२ कला ९ विकला. यह दोनों चालित ग्रह अंशादि अवयवांकरकै तुल्य हैं. अब अस्तोदयाधिकारमें कहीहुई रीतिक अनुसार लाण्हुए शर-मंगलका शर दक्षिण १६ अंगुल ११ प्रतिअद्गुल है, और गनिका र दक्षिण १४ अंगुल ७ प्रतिमहलहै, अब इन दोनों शरीकी दिशा एकहै और मंगलका शर अधिक है. इसकारण अरान्तर २ अंगुल प्रतिभंगुल हुआ, मंगलके विम्ब १ अंगुल ५० प्रतिअंगुलमें शनिके विम्ब १ अंगुल ३३ प्रतिअंगुलको युक्त करा तव ३ अंगुल २३ प्रतिभंगुल यह विम्ब मानक्य हुआ, और इसको आधा करनेसे ? अंगुल ४१ प्रतिअंगुल मानक्य खण्ड हुआ, इसकी अपेक्षा शरान्तर अधिकहै इस कारण विश्वैश्य नहीं होय- गा, अर्थात् मंगल और शनि एक एकके नीचे ऊपर होकर नहीं जायंगे किन्तु दाएँ वाएँ होकर जायँगे ॥ इति श्रीगणकव-गणेशदैवज्ञकृतौ प्रहलाघवास्यकरणग्रन्ये पश्चिमोत्तरदेशीयनुरादा- वादबास्तव्येन काशीस्यराजकीयसंस्कृतविद्यालयमधानाध्यापकसत्सम्प्रदायाचा- याण्डितस्वामिरामनिशाविणा सान्निध्याधिगतरियन भारद्वाजगो- बोलनगौडबंशावततयीयुतभोलानाथात्मजेन पण्डितरामस्वर- पशर्मणा कृतया सान्वयमापार्टीकया सहितो यझ्युत्प- धिकारः समसिमितः ॥ १३ ॥ . अथ पाताधिकारो व्याख्यायते । तहाँ प्रथम पातकाल( रवि और चन्द्रकी क्रान्तियाँको साम्य )का अनु- मान करनेकी रीति लिखतेहैं- नन्दनायनभागतुल्यपटिकोनाः साईविश्वे तथा तारास्तावति साग्रयोगविगमे पातो व्यतीपातकः । ज्ञेयो वैधृतिरत्र यातयटिकाः सर्वक्षनाडीहताः स्प- टोः स्युः शरपइहृता इह तमोकौं सायनांशौ कुरु॥१॥ १ या क्रान्तिसाम्य शाके १४९७ के विौं वृद्धिपात योगकै चर्य चरणने और ब्रह्मयोग- के द्वितीय चरणमें हुएथे, यह वाता आगे लिखे हुए मार्तडके श्लोरसे मालूमहोतीहै " प्रेभ्यः सम्प्रति वृद्धितुर्यवरणे ब्रह्माद्वितीयेऽअमः" ।
" ( १८४) ग्रहलायय। [पाठा- अन्वयः-साई विश्व, तथा, तारा, नन्दनायनभागतुल्यपटिकोनाः (कार्याः ), तापति, साग्रयोगविगमे, व्यतीपातकः वैधृतिः, (च), पातः, ज्ञेयः, अत्र, यातघटिकाः, सर्वक्षनाड़ीहताशरपङ्हता, स्पष्टाः, स्युः इह, तमोर्की, सायनांशी, कुरु ॥ १/M.N अर्थः-अपनाशीको नौसे गुणाकारकै जो घटिकादि गुणन फला होय उस- को १३ योग और ३० घटी घटावे, सब जो बाकी रहै तिसकी तुल्य योगा- दि जय होयगा तब व्यतीपात योग होयगा, और पहिले गुणनफलको सत्ताईस योगाम घटाये तब जो शेषरदै उसको तुल्य योगादि जय होयगा तब वैधृतिपातयोग होयगा, ऐसा अनुमान कर तदनन्तर अभीष्ट पातयोग- की घटी और पल इतने मात्रको इष्ट दिनमैके नक्षत्रकी गतप्य घटिकाओंसे. गुणाकर जो गुणनफल होय उसमें पैसठका भाग देय तव जो लब्धि होय वह तिस अभीष्ट पावयोगकी घटी होतीहै, फिर स्पष्ट घटिकाओमकार स्पष्ट रवि और राहु करकै उसमें अयनांश युक्त करदेय ॥ १॥ उदाहरण. संवत् १६७० शाके १५३५ वैशाख कृष्णासप्तमी ७ शनिवार घटी ११ पल ३०, धनिष्ठा नक्षत्र ५९ घटी ६ पला ब्रह्मयोग २८ घटी ४६ पल, इस दिन पात जानने के लिये गणित करतेहैं-चक्र ८, भहर्गण १८८३, प्रातःकालीन मध्यम रवि १ राशि १ अंशकाला ५९ विकला, चन्द्र ९ राशि २० अंश ० कलांट विकला, उच्च ११ राशि २५ अंश १३ कला १५ विकला, राहु ० राशि २५अंश ९ कला ५२ विकला, रविमन्दकेन्द्र १ राशि १६ अंश ५९ कला १ विकला, मन्द फल धन ? अंग ३५ कला ३५ विकला, संस्कृतरवि १ राशि २ अंश ३६ कला ३४ विकला, अयनांश १८ अंश .११ कला, सायन रवि १ राशि २० अंश ४७ करता ३४ विकला, चर ऋण ८८ विकला, स्पष्ट रचि १ राशि २ अंश ३५ कला ६ विकला स्पष्टगति ५७ कला ३३ विकला, प्रातःकालीन मध्यम चन्द्र ९ राशि २० अंश कला ४ विकला, उच्च ११ राशि २५ अंश १३ कला १५ विकला, राहु ० राशि २५ अंश ९ कला ५२. पिकला, त्रिफलसंस्कृतचन्द्र राशि २९ अंश ३ कला विकला, मन्दकेन्द्र राशि ५ अंश ३९ कला ११ विकला, मन्दफल धन ४ अंश ३४ काटा ३२ पिकला, स्पष्टचन्द्र ९ राशि मेश ८ कला ३५ विकला, स्पष्टगति ७६२ कला ४८ विकन्दा, धनिष्टा नक्षयी गतघटी ३ घटी ४९ पल, एप्य ५९ घटी ६ पल, गतप्प घटिकाका योग ६२ घटी ५५ पल, अय प्रथम मध्यम पात जानने के लिये गणित लिखते हैं-अयनांशी १८ अंश ११ कलाको ९से गुणा पारा तम १६३ घटी ३९ पर हुए इसमें ६० या भागदिया तय योगादि दधि
धिकारः११]
सान्वयभाषाटोकासमेत !
(१८५)
हुई २ योग ४ घटी ३९ पल इसको १३ योग ३० घटीमल घटाया तब शेप-
रहे १०. योग ४६ घटी २१ पल इसकी तुल्य योग होनेपर व्यतीपात योग
होनेका सम्भव है। और २७ योगमसे ३ योग १३ घटी ३९ पलको घटाया
तव परहे २४ योग १६ घटी २१ पल, इसकी तुल्य योग होनेपर वैधृति-
पात योग होनेका संभव है। भर ब्रह्मपात योगकी घटिका १६ घटी २१ पल-
को तत्कालीन पञ्चाङ्गके नक्षत्रकी गतेप्य घटिकाओं ६२ घटी ५५ से गुणाकरा
तब २०२८ घटी ५१ पर हुए, इसमें ६५ का भागढ़िया तब लब्धिहुई १५ घटी
४९ पल यह ब्रह्मयोगकी सष्ट यटिका हुई। पहिले दिन अर्थात् शुक्रवारके
दिन शुक्ल योग ३० घटी ? पल है इसमें ब्रह्मयोगकी स्पष्ट घटिका १५ घटी
४९ पलको युक्तकरा तब ४५ घटी ५० पल हुए इसको ६० वटीमें घटाया तव
शेषरहे १५ घटी १० पल यह मध्यम क्रान्तिसाम्यकाल हुआ, यह काल
सय्योदयसै पहिलेका है, इसकारण ऋण चालन देकर लाएहुए ग्रह-और
सायन ग्रह-चालित सूर्य ? रागि: अंग २१ कला ३१ विकला, चालित
राहु ० राशि २५भंश १० कला ३७ विकला, सायन सूर्य १ राषि२० अंश
३२. कला ३. विकला, सापनराहु ? राशि १३ भंग २१ कला ३७ विकला, ॥
अब स्पष्ट पातक संभवलक्षण और असंभवलक्षणको कहते हैं-
गोलैक्ये साग्वर्कभान्वोः सदा स्यात्पातोऽन्यत्वे चे-
वे हुभागाः । पञ्चेपुभ्योऽल्पास्तदास्त्येव पातः
पुष्टाश्चेत्तत्संशयस्तंच भिद्मः ॥२॥
अन्वयः-साग्वर्कभान्वीः, गोलक्ये, (सति), सदा, पातः, स्याद;
चैत्, अन्यखे, रखे, याभागाः, (कार्याः), (ते), पञ्चपुभ्यः,अल्पाः,
तदा पातः अस्ति, एवः पुष्टाः, चेत् (तदा), तसंशयः, तम्, च,
(वक्ष्यमाणप्रकारेण, वयम् ), भिन्नः ॥ २ ॥
अर्थ (सायन ) सूर्यमें (सायन ) राहुको चिल्लाकर जो अङ्क योग होय
उसको साम्बक कहते हैं, यदि साग्वर्क और सायन सूर्य एकगोलीय होय,
भयवा सावक और सायन सूर्य दोनों भिन्नगोलीय हो तो रविक भुजांश
कर, वह भुजांग पचपन अंगाकी अपेक्षा कम हों तो पात अवन्य होगा,परन्तु
अदि वह एकगोलीय न हो और सूर्यके भुजांग पचपन अंगकी अपेक्षा
भधिक हो तो पात होने का संगय होता है, उस संायको भेदन करनेकी
तिभी आगेके श्लोकम दिखते हैं ॥२॥
(१८६) ग्रहलाघव। [पाता- उदाहरण. सायन राहु १ राशि १३ अंश २१ कला ३७ पिकलामें सायन सय्यं १ राशि २० अंश ३२ कला ३१ विकलाको युक्तकरा तय ३ राशि ३ अंश ५४ कला ८ विकला यह साग्वर्क हुआ, यह और सायनसूर्य १ राशि २० अंश ३२ कला ३१ विकला यह दोनों एकगोलीयहें इसकारण पात होयगा, अब तुम समझो कि सूर्य १ राशि २७ अंश और राहु ६ राशि १५ अंश है तो इनका योग हुआ ८ राशि १३ अंश यह साग्वर्क और सायन सूर्य १ राशि २७ अंश भिन्नगोलीय हैं, और सायन सूर्यके भुजांश ५७ भी ५५ अंशकी अपेक्षा अधिक हैं इसकारण पात होनेका संशय है ।। अव पातसंशयको भेदन करनेकी रीति लिखते हैं- खाभेन्दुदिरसा धृतिर्नगशराः साम्वर्कभान्वोः पदै- क्येद्धानि त्र्यगरुद्रभूपतिनखास्यशीणि भेदे क्रमा त्।क्षेपः पइदश चार्ककोटिजलवेष्वंशप्रमा,क्यक शेपांशैष्यवधेपुभागसहितं सन्धिर्भवेत्क्षेपयुक्॥३॥ साग्वर्कभुजांशका यदाल्पाः सन्धेः क्रान्तिसमत्व- मस्ति चेत् । अधिकानतदाभुजांशसध्यंतरसादृश्य मिहापमान्तरं स्यात् ॥ ४॥ अन्वयः-साग्वर्कभान्वीः, पदैक्ये, साभेन्दुद्विरसाः, धृतिः, नग- शराः भेद, अगरुगभूपतिनसाः, यक्षीणि, अनि, (स्युः) पर दश, च, ऋमात्, क्षेपः; अर्ककाटिजलवेवंशप्रमाक्यकम्, शेपांशै- प्वधपुभागसहितम्, (.ततः), क्षेपयुक, सन्धिः, भवेत् यदा, सा- ग्वभुनाशकाः, सन्धः, अल्पाः, (तदा), कान्तिसमत्वम्, अस्ति, अधिकाः, चेत, तदा, न; इह; भुजांशसन्ध्यन्तरसादृश्यम्, अप- मान्तरम्, स्पात् ॥ ३॥ ४ ॥ भधा-राशिचक्र चतुयांशको पदभात् चतुर्थ भाग कहते हैं, पहिले और सीसरे पद(मैपये भारम्भस सेंकर मिथुनके भन्तपर्यन्त और मुलाके प्रारम्भ- .
धिकारः १४] सान्वयभाषाटीकासमेत । (१८७) से लेकर धनके अन्तपय॑न्तके भाग)को विषमपद कहते हैं, और दूसरे तथा चौथे पद(कर्कके प्रारम्भसे लेकर कन्याके अन्तपर्यन्तके औरमकरके प्रारम्भसे मीनके अन्तपय॑न्तके भाग)कोसमपद कहते हैं अवसाग्वर्क और सायन सूर्य यह दोनों एकपदमें अर्थात् विषमपदमें अथवा संमपदमें हों तौ सायन सूर्य- के केवल कोत्यंशाम पाँचका भागदेय तव जो लब्धिका अङ्क होय उसके तुल्य नीचे लिखेहुए पदैक्यखण्डोंका योग करै, और यदि साग्वर्क तथा सायन सूर्य यह दोनों भिन्न पदमें हों तो नीचे लिखेहुए पदभेदखण्डोंका योग करे, और लब्धिके अङ्कमें एक युक्त करकै तत्परिमित अंकले अंशादि शेषको गुणा कर तब जो गुणनफल होय उसमें पाँचका भागदेकर जो अंशादि लब्धि होय उसमें पहिला अंशात्मक अङ्कयोग युक्तकर देय तब मध्यम सन्धि होतीहै, इसमें यदि साग्वर्क और सायन सूर्य समपदमें होयो छः अंश- युक्त करदेय,और भिन्न पदमें हों तौ दश अंश युक्त करदेय तव सन्धि होता- है, तदनन्तर यदि साग्वर्कके भुजांशसंधिके अंशोंकी अपेक्षा कम हो तो क्रान्तिसाम्य कहिये पात होताहै, और अधिक होय ती क्रान्तिसाम्य कहिये पात नहीं होताहै, पात न होय तव भुजांश और संध्यंशोंका अन्तर करै तब वह क्रान्त्यन्तर होताहै ॥ खकहिये , अभ्र कहिये०, इन्दु कहिये २, दि.२, रस कहिये ६, धृति कहिये १८, और नगशर कहिये ५७, यह साग्वर्क और सायन सूर्यके पदैक्यखण्ड हैं, और विकहिये ३, अगकहिये, रुद्रकहिये ११, भूपति कहिये१६, नख कहिये२०,और शरा५/६७ व्यक्षिकहिये२३यह सावक औरसा यन सूर्यके पदभेदुखण्डहैं । और६ पदैक्यखण्ड 1010|१/२/६/१८/५५ तथा? यह क्रमस क्षेपकाङ्कह॥३॥शा पद्मेदखण्ड|३/७१२११६/२०/२३/० उदाहरण. यहाँ कल्पित उदाहरण लिखतेहैं-रवि १राशि २७ अंश है, और राहु ६ राशि १५ अंश है इन दोनोंका योग करनेसे साग्वर्क हुआ ८ राशि १२ अंश यह साग्वर्क और सायनार्क १ राशि २७ अंश यह दोनों समान पदमें हैं इसकारण सूर्यके कोटिअंशो ३३ में ५ का भाग दिया तब लब्धि हुई ६ और शेष बचे ३ भव छः पदैक्यखण्डोंका योग २७ हुआ, और एप्प ७ खण्डोंके योग ५७ कोशेष ३ अंशसे गुणा करा तच १७५ हुए, इसका पश्चम भाग जो ३५ अंश १२ कला तिसमें पहिले अङ्कयोग २७ को युक्त करा तब ६१ अंश १२ कला हुआ, यह मध्यम सन्धि हुआ, इसमें क्षे- पकाङ्क ६ को युक्त करा तब ६७ अंश १२ कला यह सन्धि हुआ, इस सन्धि- की अपेक्षा साम्वर्क भुजांश ४२ अधिक है, इस कारण पात अर्थात् क्रान्ति- साम्य नहीं है, किन्तु भुजांश ७२ और सन्धि ६७ । १२ के अन्तर ४ अंश ४८ कलाकी तुल्य क्रान्तिका अन्तर है॥ खण्ड
(१८८)
ग्रहलापच।
[पाता-
"
"
अब पातके गतगम्य लक्षणको जाननेकी रीति लिखते हैं-
पदे युग्मौजेऽकः समविपमगोलः सतमसस्तदायातः
पातस्त्वगत इतरत्वे निगदितात् । विभिन्ने गोलेचे-
दिह कृतशरा लघुतरा खेदो गाः स्यांदिह
रविपदान्यत्वमुचितम् ॥५॥
अन्वयः-सतमसः, अर्कः, (यदि ), युग्मौजे, पदे, समविपम-
गोलः, तदा, पातः, यातः, (स्यात् ); निगदितात, इतरत्वे, तु,
अगतः, ( स्यात् ); इह, विभिन्ने, गोले, चेत्, कृतशराझे, रखें,
दोर्भागाः, लघुतराः,(तदा),इह, रविपदान्यत्वम्, उचितम्, स्यात्॥५॥
अर्थः-साग्वर्क और सायन सूर्य एकगोलीय ही और यदि सायन सूर्य
समपदमें है, अथवा साग्वर्क और सायन सूर्य भिन्नगोलीय ही और यदि
सायन सूर्य विषमपदमें है तो पात होगया और साग्वर्क तथा सायन सूर्य
होकर यदि सापन सूर्य विषमपंदमें है, अथवा वह दोनों भिन्नगोलीय है
और यदि सायन सूर्य समपदी है तो पात (क्रान्तिसाम्य) होनेवाला है
ऐसा जान; इसप्रकारही साग्वर्क और सायन सूर्यके भिन्नगोलीय होनेपर
सायन सूर्यके पद उलटे देय अथवा न लेय; इसका विचार नीचे कही हुई
रीतिसे करने के अनन्तर पातके गत अथवा गम्य होनेका निर्णयकर, आगे-
की रीतिसे शर लाकर उसशरके चतुर्थाशसे यदि सायन सूय्यक भुजांश
कम होती सायन सूर्यके पद उलटे लेय, अर्थात सम होनेपर विपम और
विषम होनेपर सम देय ॥५॥
उदाहरण.
सापन सूर्य १ राशि २० अंश ३२ कला ३१ विकला विषम पदमें है और
सायन सूर्य तथा साग्वर्य ३ राशि अंश ५४ कला ८ विकला एक गोली-
यह, इसकारण वैधृति पात होनेवाला है ।
भय शरवणट और शरसाधनकी रीति लिएते हैं-
पञ्चधा सागराः पञ्चधावह्नयो द्वो चतुर्धा कुभूखा-
भ्रमका इपोः । साग्विनाघोर्लयेप्वंशतुल्येक्यकं शेप-
भोग्याहतीप्वंशयुक्त्याच्छरः॥६॥
धिकार १६]
.
सान्वयभाषाटीकासमेत।
अन्वयः सागराः, पञ्चधा, वहयः पञ्चधा, दौ, चतुर्दा, (ततः),
कुभूस्रात्रम्, इपोः, अङ्काः, (स्युः) साग्विनात, दोलववंशतुल्यै-
क्यकम्, शेपभोग्याहतीप्वंशयुक, शरः, स्यात् ॥ ६ ॥
अर्थः सागर कहिये चार पाँचस्थानमः वन्दि कहिये तीन पाँचस्थानमें
दि कहिये दो चारस्थानमं; वदनन्तर कु कहिये एक, कहिये एक, ख कहिये
शुन्य, और अभ्र कहिये शुन्य यह शराङ्क है। साविकके भुजांशोमात्रमें पाँच-
का भाग देय तव जो लब्धि होय तत्परिमित नीचे लिखेहुए शराडोका योग
करलेय, और एकाधिक लब्धिपरिमित शरासे अंशादि बाकीको गुणा-
करके जो गुणनफल होय उसमें पाँचका भागदेय वव जो लब्धि होय उसमें
पहिले शराझोंका योग युक्त करदेय तव शर होताहै ॥६॥
अकसंख्या ४५६७९/११११/१२/१३१५/१६/१७२८
शराङ्क | ४] ४१४] ४/१२) ३} 2 ] 2 ] B२१२१२२/३/१1010
उदाहरण.
साम्बकं ३ राशि ३ अंश ५४कला विकला है, इसके भुज ८६ अंश५कला
५. विकला हुए, इसमके केवल अंशों ८६ में ५ का भाग दिया तब
लब्धि हुई १७ अंश १७ कला, इसकारण १७ शराङ्कोंका योग हुआ ४५, और
एकाधिक १८ वे शराङ्क ० से शेप १ अंश५कला ५२ विकलाको गुणा करा
तव ० अंदा • कला ० विकला यह गुणनफल हुआ, इसमें ५ का भाग
दिया तब लन्धि हुई ० अंश कला • विकला, इसमें पहिले शराङ्कोंके
योग ४५ को युक्त करा तव ४५ अंश कला विकला, यह शर हुआ।
अब साम्वर्क और सायन सूस्यको भिन्न गोलमें मानकर सायन सूर्यके
पद उलटे लेने चाहिये या नहीं, इस विषयमें शर ४५ अंश ४ का भाग
दिया तब लब्धि हुई ११ अंश १५ कला, इसकी अपेक्षा सायन सूर्य
र राशि:० अंश ३४ कला ३२ विकलाके भुज ५० अंग ३२ कला
३१ विकला अधिक है, इसकारण पद उलटे. हनेकी कोई भाव-य-
कता नहीं है।
अवशरको स्पष्ट करनेकी रीति लिखते हैं-
खैकादिके रविभुजांशदशांशके स्याद्वारोऽविश्व-
मनुधृत्युडचोगरामाः । साश्वा द्विशत्युडुगुणास्तु
शरादराया हीनोऽत्र सापमसंस्कृतये स्फुटः
स्यात् ॥ ७॥
(१९०) ग्रहलाघव । पाता- . अन्वयः-रविभुजांशदशांशके, तु, खैकादिके, (सति), अर्कवि- श्वमनुधृत्युडवः, अङ्करामा, खाश्वाः, द्विशती, उडुगुणाः, (क्रमात्), हारः, स्यात् अत्र, हि, शरात्, हराया, हीनः, सः, अपमसंस्कृतये, स्फुटः स्यात् ॥७॥ अर्थः-सायन सूर्यके भुजांशामें दशका भाग देय तय जो लब्धि होय तत्परिमित आगे लिखेहुए हाराङ्क और एकाधिकलब्धि इन दोनों- के अन्तरसे अंशादि वाकीको गुणाकर तब जो गुणनफल होय उसमें दश- का भाग देय तब जो लब्धि होय उसमें पहिले लियेहुए हाराङ्क युक्त कर तव हार होताहै। तदनन्तर पहिले लाएहुए शरमें हारका भाग देकर जो लन्धि होय उसको शरम घटादेय तय जो शेष रहै वह स्पष्ट शर होताहै । सूर्यके भुजोशीका दशमांश शून्य एक आदिके समान होय तो कमसे भर्क कहिये बारह, विनय कहिये तेरह, मनु कहिये चौदहा धूति कहिये अठारह उडु कहिये सत्ताईस, अगराम कहिये छत्तीस, खारव कहिये सत्तर, लभ्यङ्क ०१२३४५१६७.८९द्विशती कहिये दोसौ और हाराङ्क |१२/१३/१४/१८३७/३६/७०/२००४३२७ । उगुण कहिये तीन सौ स- उदाहरण. 'नाईस, यह हारात होते हैं सायन सूर्य १ राशि २० अंश ३२ कला ३१ विकलाके भुजों ५० भंटा ३२ कला ३१ विकलाके अंशों ५० में १० का भाग दिया तब लब्धि हुई ५इस कारण पाँचये हारा३६और एकाधिक लन्धि परिमित हाग इन दोनोंका भन्तर ३५से शेष अंशक्षकला३१विकलाको गुणाकरा तय १८ अंग २५ कला विकला हुभा इसमें १० का भाग दिया तप लब्धि दुई १ भंश ५० काला ३३ विकला, यह हार हुआ तदनन्तर शर ४५ अंश काला पिकलाम हार २७ भंश ५० कला ३३ यिकलाका भाग दिया तय सन्धि हुई श९यटा, रसको शर ४५ अंश पठापिफलामें पटापा सपशेष रदेश ४९ पटा पद स्पष्ट शरदुभा ॥ भ मानपहलिरते हैं- चतुर्धा नसा गोभुवो द्विगंजाजा नृपाष्टीन्द्रविश्वा- कंदिग्वस्वगाक्षाः। त्रयः मापमाङ्काःक्रमादकंवा- होलंयेप्शतुल्यो गतोऽन्यस्य शेपम् ॥ ८॥ ।
धिकारः१४] सान्वयभापाटीकासमेत । ( १९१) अन्वयः-नखाः, चतुर्धा, गोभुवः, द्विः, गजाजाः, नृपाष्टीन्द्र- विश्वार्कदिग्वस्वगाक्षाः, त्रयः, क्षमा, (एते ), कमात्, अपमाङ्काः, (सन्ति),अर्कचाही,लवेप्शतुल्यः गतः,शेपम्,अन्यस्य, (स्यात्) || अर्थः-नख कहिये वीस चार स्थानम; गोभुवः कहिये उन्नीस, फिर दो स्थानमें गजाब्ज कहिये अठारह, नृप कहिये सोलह, अष्टि कहिये सो- लह, इन्द्र कहिये चौदह विश्व कहिये तैरह, अर्क कहिये वारह, दिक कहिये दश वसु कहिये आठ, अग कहिये सात, अक्ष कहिये पाँच,वि कहिये तीन, और क्षमा कहिये एक, यह कमसे क्रान्त्यङ्क है सायन सूर्यके भुजांगाम पाँचका भाग देनेसे जो लब्धि होय शत्परिमित नीचे दिपहुए कान्त्यंकोंको लेकर उनको गताङ्क कहै, और जो शेष चर्च उसको अन्यका जानकर एका- न्तम स्थापन करदेय ॥ ८॥ उदाहरण. लब्ध्यङ्कादा६७।८/९/२०१२।२२।२३१/१८१६।२५२८ कान्य २०१२०३०२०१९/१८१८१६/१६/११/१३/१२/१०/८/७/५/३/१] सायन सूर्य १ राशि २० अंश ३२ कला ३१ विकलाके भुजों ५० अंश ३२ विकला ३१ विकलांके अंगों ५० में ५ का भाग दिया तब लब्धि हुई १० इसकारण दशवों फ्रान्त्यंक १४ गतांक है, और शेप ० अंश ३२ कला ३१ विकला रहा॥ अब क्रान्त्य और गराङ्क इन दोनोंका संस्कार लिखते हैं- क्रमोत्क्रमादुक्तशरापमाङ्कान्संख्याहि भोग्या क:- मत पडङ्काः । स्थाप्या गतेप्या गतगम्यपाते युग्मेऽन्यथौजे स्युरिमेऽयनांशाः॥९॥अन्त्यादि- लोमा यदि तेऽन्यदिका अथापमाङ्काः क्रमशःश- राङ्कः सुसंस्कृतास्त्रीन्दुहृतापमैप्याङ्केनापि ते स्पष्टतरा भवेयुः॥१०॥ अन्वयः-(हेगणक) उक्तशरापमाङ्कान, क्रमोकमात, संख्याहि, भाग्यात, क्रमता, गतगम्पपाते, गतेप्याः, पद, मकाः, स्याप्याः, ।
(१९२) ग्रहलापव। [पाता- ( एवम् ), युग्मे, ओजे, अन्यथा, इमे, अयनांशाः स्युः, यदि, ते, अन्त्यात्, विलोमाः, (तदा), अन्यदिकाः, (ज्ञेयाः), अय, क्रम- शः, शराद्वैः, अपमांकाः, सुसंस्कृताः, (ततः ), बीन्दुहृतापमैप्या- ड्रेन, अपि, (संस्कृताः), ते स्पष्टतराः, भवेयुः ॥ ९॥ १० ॥ अर्थः-हेगणक! पहिले जो शराङ्क और क्रान्त्यत कहेहैं उनको क्रमसे और उत्क्रमसे गिने, अर्थात् मान्यड्डोंको पहिलेसे अठारह पर्यन्त, और फिर अ- ठारहसे पहिलेपर्य्यन्त. इसप्रकार छत्तीस कान्यक गिने, तिसी प्रकार श- राङ्कोकोभी गिनै, तदनन्तर सायन सूर्य समपदमें होकर यदि गतपात है, अथवा विषमपदमें होकर गम्यपात है, तो पहिले लापहुए फ्रान्त्यकामसे गताङ्क आगैके अङ्कसे अर्थात् एण्य भङ्कसे पहिले छः क्रान्त्यङ्क लेय, और यदि सापन रवि विपमपदमें होकर गतपात है अथवा समपदमें होकर एण्य पात है तो एप्यासे आगेके छःकान्य लेय,परन्तु यदि एप्याङ्क छाके भीत- र हो और पहिले क्रान्त्यङ्क लैने हों तो पदिले अङ्क लेकर छ: अडॉकी पूर्तिक क्रान्त्यक अन्तरसे लेय, यह अङ्क, सायन रविके उत्तरायणमें होनेसे उत्तरा- यण और दक्षिणायन होनेसे दक्षिण होतेहैं, परन्तु पहिले छः कान्त्यङ्काकी पूर्ति करने के लिये कोई अंक उत्क्रमसे गिनेहुए कान्रयङ्का से लिये हों तो उनकोही पहिले अटोंकी विपरीत दिशाका जान; इस प्रकारही साग्वर्क- केभुजांम पाँचका भागदेकर जो लुन्धिहोय तत्परिमित क्रमसे गिनेहुए शरा- इंमिसे अङ्कलेकर उनको गताङ्ककहै,और उससे आगेके अङ्कसे अर्थात् एण्या- से पहिले अथवा आगके छः अङ्क लेय, और साग्वासे उनकी दिशा लावै, तदनन्तर तिन छः कान्त्यड्रॉका और शराष्ट्रोंका संस्कारकर, एप्य का- न्यड्डोंमें तेरहका भागदेकर जो अंशादि लब्धिहोय उसको एप्याङ्ककी दि- शाको जाने, भौर तिस लब्धिका तथा संस्कार करकै लाएहुए प्रत्येक अ- इका फिर संस्कारकरै, तव वह छःअङ्क स्पष्ट होते हैं ॥ ९॥ १० ॥ उदाहरण. क्रमसे स्थापित कायङ्क २०१२०१२०॥२०॥ १९ ॥ १८॥ १८ ॥ १६ ! १६ । १४।१३ । १३ । १०1८1७।५।३।१॥ उरक्रमसे स्थापित मान्यता।३। ५।७।८।१०।१२।१३।१४।१६।१६।१८1८1१९/२०१२०१२०१२०॥ कमर स्थापित गङ्क ५१४४४१३१३१३३३३३३२१३१३१२११।११ 010॥ टरक्रमसे स्थापित शराङ्क | ११० २१२॥२॥ ३ ॥ ३ ॥ ३॥३॥ ३।४।४।१४॥ सायन सूर्य राशि २० अंश ३२ कला ३१ वि- घरा, विपमपदमें होकर एप्प पातह इसकारण पहिले लाएहुए गताइ १४ से भगले १३ महमे पहिले छः मा १३।१४।१६।१६।१८।१८, यह भष्ट्र १ और शराङ्क . धिकारः १४] सान्वयभाषाटीकासमेत। (१९३) सायन रविकं उत्तरायणमें होनेके कारण उत्तरहै, तिसीप्रकार साग्वकं ३ राशि ३ अंश ५४ कला ८ विकला इसके भुजों ८६ अंश ५ कला ५२ विकलाके अंशों ८६ में ५ का भागदिया तब लब्धिहुई १७ इसकारण सत्रयां शराङ्क • यह गताङ्क हुआ, अब साग्वर्क समपदम होकर एण्य पावहै, इसकारण अन्त्य शराङ्कसे आगेके छः अङ्क 10101१1१1३। साग्वर्कके द- क्षिणायन होनेके कारण दक्षिण हैं, 'अन्त्यादिलोमाः' कहाहै इसकारण प- हिले स्थापन करेहुए शराष्ट्रॉम पहिलेको छोड़कर अन्य पाँच अङ्क टरक्रम स्थापित भङ्काम उत्तर होगए, और प्रथम अंक दक्षिणही रहा, इसकारण कान्त्यङ्क १३ उत्तर, १४ उत्तर, १६ उत्तर, १६ उत्तर, १८ उत्तर, १८ उत्तर दक्षिण, ० उत्तर,०उत्तर, १ उत्तर, १ उत्तर.२ उत्तर, इन दोनोंका संस्कार ( एकदिशावालोंका योग और भिन्न दिशावालोंका अ- सर) करा, उत्तर शराङ्क हुए १३ । १४ । १६ । १७ । १९ । २० यहाँ साग्वर्क दक्षिणायनमें है इसकारण विलोम (उलटी) रीतिसे गिनेहुए पहिले शरा- मसे भन्तक पाँच उत्तर है, अब क्रान्त्यकामसे पहिले अङ्क १३ में १३ का भाग दिया तब लब्धिहुई अंश उत्तर इसका पहिले प्रत्येक शराङ्कसे संस्का- रकरा तव आए अंशात्मक छवों स्पष्टांक १४! १५।२७।२८०२०।२१ । यह हुए। अब पात मध्यकालसाधनकी रीति लिखतेहैं- प्राक्स्थापिताः शेपलवाः शराप्ता रूपाद्विशुद्धा ल- घुसंज्ञकः स्यात् । आयः स्फुटाको लघुना हतोय- स्तेनाव्यवाणात्क्रमशोऽथं जह्यात् ॥११॥ तानङ्क- काञ्छेपमशुद्धभक्तं विशुद्धसंख्या सहितं लपूनम् । विघ्नं भनाडीनमिभाप्तमाप्तयातेप्यनाडीप्विह पात- मध्यम् ॥ १२॥. अन्वयः-प्राक्, स्थापिताः, शेपलवाः, शराप्ताः ( ततः) रूपात्, विशुद्धाः, लघुसंज्ञकः, स्यात; यः, आधः, स्फुटाङ्गः, (तः), लघुना, हतः (कार्यः); शेपम्, अशुद्धभतम्, (ततः), विगुसंख्यास- हितम, (ततः), लयूनम, (ततः), त्रिनम्, (ततः), भनाडीन- म्, (ततः ), इभातम्, सत्, यातेप्यनाडीपु, इह, पातमध्यम् (स्पात् ) ॥ ११ ॥ १२ ॥ ..
(१९४) ग्रहलापय। [पाता- अर्थः-पहिले सायन सूर्यके भुजोसे गताङ्क लाकर जो अंशादि बाकी रहीथी, उसमें पाँचका भागदेकर जो अंशादि एन्धि आये, उसको एक अंशमसे घटावै, तब जो शेपरहे उसको 'रघुशेष' कहतेहैं, फिर पहिले स्पष्ट अङ्कसे लघुशेषको गुणाकरे, तब जो गुणनफल होय उसमें स्पष्ट शर युक्त करदेय, और तिस योगमले मथमर्स लेकर जितने स्पष्टाङ्क घटसके उतने घटादेय (जय स्पष्टशर मिलानेसे लाएहुए अङ्कयोगमैसे 'छऑभी स्पष्टाङ्क घटाजायँ, तब पूर्वोत्तरीतिसे औरभी तीन भागक स्प- टाङ्क लाकर उनमेंसे जितने घटसके तितने घटाकर शेष लेलेय) और उस शेपमें, जो स्पष्टाङ्ग घटानही उसका भाग देय तय जो अंशादि लब्धि होप उसमें जितने स्पष्टांक घटेहों उनकी तुल्य अंश मिलाकर जो अङ्कयोग होय उसमें, लघुसंज्ञकको घटादेय तव जो शेपरहे उसको तीनसे गुणाकरे तव जो गुणनफल होय उसको फिर नक्षत्रकी गौप्य घटिकामासे गुणा- कर तब जो गुणनफल होय उसमें भाठका भाग देय तव जी 'लब्धि होयं उसके तुल्य घटिका गत यात होय तो पातमध्य होगया,और एप्पयात होय तो पातमध्य होने लगेगा ऐसा कहै ॥ ११ ॥ १२ ॥ उदाहरण. पूर्व शेप अंश ३२ कला ३१ विकलामं ५ का भाग दिया तब लब्धि हुई ० अंश ६ कला ३० विकला लब्धिके पात एप्य होनेके कारण यहही लघु शेष है, इसको प्रथम स्पष्टाङ्क १४ से गुणाकरा तब १ अंश ३१ कला वि- कला यह गुणन हुआ इसमें स्पष्ट शर ४३ अंश ४९ कलाको युक्त करा तप ४५ अंश २० कला ० विकला हुआ इसमें प्रथम स्पष्टाङ्क १८ और द्वितीय स्पष्टाङ्क १५ को घटाया.तब शेपरहे १६ अंश २० कला इसमें (शेष तृतीय अंश १७ नहीं घटाथा इसकारण) तृतीय स्पष्ट अङ्क १७ का भाग दिया तब लन्धि हुई ० अंश ५७ कला ३८ विकलाइसमें (दो स्पष्टाङ्क घटेथे इस कार- ण) विशुद्धसंख्या २ को युक्त करा तब २ अंश ५७ कला ३८ विकला हुए इसमें लघुशेष ६ कला ३० विकलाको घटाया तव शेपरहे २ अंश ५१ कला ८ विकला इसको ३ से गुणाकरा तय ८ अंश ३३ कला २४ विकला हुआ, . इसको नक्षत्रकी गतेप्य घटी ६२ ॥ ५५ से गुणा करा तय ५३८ घटी ३१ पल हुए इसमें ८ का भाग दिया तब लब्धि हुई ६७ घटी १७ पल इसको गणित- काल पैशास कृष्णपष्टी शुक्रवार ४५ घटी ५५पलम युक्त करा तर पैशाख कृष्ण सप्तमी निधार ५३ पटी ५० पल पातमध्यकाल हुआ। भय पातस्थितिकालसाधनकी रीति लिखते हैं- अविशुद्ध तायमार्कनाड्यः प्राक्पश्चात्स्थितिरत्र .
"धिकारः १४]
सान्वयभाषाटीकासमेत
पातमध्यात् । शुद्धाः कचिदन चेत्पडङ्काः संस्का-
र्याश्चतदनतस्त्रयोऽङ्काः ॥ १३॥
अन्वयः-यमार्कनाइयः, अविशुद्धहृताः,(कार्याः, फलपटिका-
भिः), पातमध्यात, अत्र, प्राक्, पश्चात, स्थितिः (स्यात् ), अत्र,
कचित, पद, अङ्कगः शुद्धाः, चेत्, (तदा), च, तदअतः त्रयः, अङ्काः,
संस्कार्याः ॥ १३॥
अर्थ:-जो स्पष्टाङ्कन पाहो उसका एकसो वाईस घंटीम भागदेय तब जो
लब्धि होय वह घटिकादि पातमध्यकालसे पातस्थितिकाल होताहै, तदन-
न्तर पातमध्यकाल से उस स्थितिकालको घटावै तब जो शेष रहै वह
पातप्रवेश काल.होताहै, और पातमध्य कालमें पातस्थिति कालको युक्त
करदेय तव पातनिर्गम काल होताहै, यदि स्पष्ट शर मिलाकर लायेहुए अ-
योगमें छाओं स्पष्टात घटनामे तो पूर्वोक्त रीतिसे और तीन भागके स्पष्टाङ्क
लाकर उसमसे जितने घटसके उतने और घटाकर दोपको ग्रहणकरलेय१३
उदाहरण.
१२२ घटी पलमें अविशुद्ध तृतीय सष्टांक १७ का भाग दिया तब ल.
ब्धि हुई ७ घटी १० पल यह पातन्थिति काल हुआ, इसको पातमध्य
काट ५३.पटी ७पलमें घटाया तय होप रहा ४. घटी ५७ पल यह पात-
प्रवेश काल हुआ अय पातमभ्य काल ५३ घटी ७ पलमें पातस्थि-
ति काल ७घटी १० पलकों युक्त करा तय ० घटी १७५० यह पातनि-
गंम काल हुआ।
भय सुयंसे चन्द्रज्ञानकी रीति लिखतेह-
पड़ार्कभच्युतरविस्त्विह सावना-जोया पटीस-
मकलाश्चलनं त्वयेन्दोः । भुत्यंशकाभपटिकाप्त-
खखा हयःस्युस्तच्चालितापमसमत्वमिह प्रतीत्ये॥१४॥
अन्वयः-इहा तु, पड्भारंभ-युतरविः, सायनान्जा (स्पात), अय,
अंक, पीसमकलाः, चलनम: (देयम् ), अय, तु, भपटिकाप्तससाः;
हयः, इन्दो, भुत्तयंशकाः, स्यु, तचालितापमसमत्वम्,
प्रतीत्यैः (स्पात् ), ॥ ११ ॥
( १९६) ग्रहटायय। [पांता-' + अर्थः-पात व्यतीपात होय तो सायन सूर्यको छाराशियोंम घटावै, और वैधृतिपात होय तो मारह राशिमसे घटाये, तब जो शेष रहे वह सायन च- न्द्र हाताहै, सूर्यमें घटिकाओंकी तुत्य कलाभोंका चालन देय, और नक्षत्रकी गतेप्य घटिकाओंका आठसा अंशमें भागदेय तब जो लब्धि होय धह चन्द्रमाको अंशादि गति होतीहै, तदनन्तर सायन सूर्य और सायन चन्द्र इन दोनोको पातमध्यकालीन करके उनकी क्रान्ति लावे, और उनका समत्व देखे ॥ १४॥ उदाहरण. वैधृतिपात है इसकारण १२ राशिमसे. सायंन सूर्य १ राशि २० अंश ३२ कला ३१ विकलाको घटाया तव शेष रहे १० राशि ९ अंश २७ कला २९ विकला, यह सायन चन्द्र हुआ, और ८०० अंशोंमें नक्षत्रकी ग- तैप्य घटिकाओं १२ घटी ५५.पलका भाग दिया तब लब्धि हुई १२ अंश ४२ कला ५४ विकला, यह चन्द्रमाको गति हुई; अंब, सायन सूर्य और सायन चन्द्र वैशाख कृष्णपष्ठी शुक्रवारके दिन,४५ घटी ५७ कला इस समयके हैं। और वह पातमध्यकालीन (वैशाखकृष्ण ७ के दिन सूर्योदयसे ५३ घटी ७ पल, इस समयके ) करने हैं इस कारण ६७ घटी २० पलकी तुल्यकलाओंका चालन देकर लायाहुआ रवि १ राशि २१ अंश ३९ कला ४८ विकला, चन्द्रगत्यंशा १२ अंश ५२. कला ५५ विकला करके चालित चन्द्र १० राशि३३ अंश ४३ कला ० विकला, स्वगतिकरकै चालित राहु ० राशि २५ अंश ७ कला ३ विकला रविकी क्रान्ति १८ अंश ३० कला ५७ विकला, चन्द्रक्रान्ति १३ अंश ५० कला. १० विकला, विराहुचन्द्र ९ राशि १० अंश २४ कला ५७ विकला, इससे इसी अधिकारमें कही हुई "पश्चधत्यादि " रीतिके अनुसार लायाहुभा स्पष्टदार दक्षिण ४३॥ ५० १९। इसमें “अस्तोदयाधिकारमें दशव श्लोककै विर्षे कही हुई रीतिके अनु- सार १० का भागदिया तब अंशादि शर दक्षिण ४ अंश २३ कला २ बि. कला हुआ, इसका और चन्द्रक्रान्तिका संस्कार करके चन्द्रस्पष्टक्रान्ति हुई १८ अंश १३ कला १२ विकला भय सूर्य और चन्द्र इन दोनोंकी का- न्तिका अन्तर १७ कला ४५ निकला है, इस थोडेसे अन्तरके होनेसे कोई. दोष नहीं, इसकारण मान्तिसाम्य ऐसा कहनमें कोई हानि नहीं है।॥ १४ ॥ इति श्रीगणकवर्यगणे दिवाळते प्रहलांघपारयकरणग्रन्ये पश्चिमोत्तादेशीपमुरादा- पारवारतध्यकाशीरयराजकीयसंस्कृतविचारपप्रधानाध्यापकसरसम्भदाया- पाण्डितसामिराममिश्रशातिसानिध्यागिताविधभारामगो- योत्पन्नगौरवशारत संधीसभोलानापामजपण्डितरामस्स- रूपदार्मा मृतथा सान्ययभापाटीकया सहितः पाताधिकार:समासः ॥१॥ " धिकारः १५} सान्वयंभापाटीकासमेत । अथ पञ्चाङ्गचन्द्रग्रहणानयनाधिकारः। तहाँ प्रथम तिथिसाधन लिखतेहैं- मासाः स्वाईयुतास्तिथेर्दिनाद्यं तावत्यो घटिकाश्च माससंघात । त्र्यंशान्याः सहितं द्वयत्रयाभ्यां चक्र- प्राक्षनवाङ्गवर्गयुक्तम् ॥१॥ अन्वयः-स्वार्द्धयुताः, मासाः, तिथेः, दिनाद्यम्, (स्यात् ) ता- वत्यः, घटिकाः,.च, माससंघात, त्र्यंशाव्याः, (ततः, तत्), दय- जयाभ्याम्, सहितम्, (ततः ), चक्रमाक्षनवाङ्गवर्गयुक्तम् ॥ १ ॥ अर्पः-(इष्टमासका जो मासगण वह मास होतेहैं) मास अपने अर्द्ध करके पुक्त तिथिके वार भादि होते हैं, और उतनीही घटिका अधोभागमें स्थापन करे, और मासगणका तृतीयांश युक्तकरदेय, फिर क्रमसे ऊपरके भागम और अधोभागमें दो और तीन युक्तकरदेय, फिर उसमें चकसे गुणाकरे हुए मा कहिये पाँच, और नव कहिये नी तथा भगवर्ग कहिये छत्तीसको युक्तकर देय (फिर देशान्तर पलोंको युक्तकर देनेसे) वारादि होता है॥२॥ उदाहरण. शाके १५३४ कार्तिक शुक्ला १५ गुरुवारके दिन मासगण ५७ है, इसमें इसके आधे २८१३० को युक्तकरा तव ५।३० हुए, इसकी तुल्य घटिका इसके अधोभागमें स्थापन करी ः तय ८५ । ११५ । ३० हुए इसमें मासगण ५७ के तृतीयांश १९ को युक्तकरा तय ८५ । १३८ । ३० हुम इसमें क्रमसे २ और ३ को युक्त५।५।३० करा तव ८७ । १३७१ ३० हुए इसमें चक्र ८ से गुणाकरे हुए ५१९३६ = ४१ । १६ १.४८ को युक्तकरा तब १९८।१५४१८ हुए यह धारादि हुमा,यहाँ वारके स्थानमें से और परीके स्थानमें ६० से तष्टा तय : चार ३४ घटी १८ पल यह पारादि दुमा, इसमें देशान्तरीय पल ४८ पुत्ताको तप कानिक शुद्ध प्रतिपदाके दिन ४ चार ३५ पटी ६५० यह पारादि हुभा ॥ भर नक्षत्र भयकके साधनकी रीति लिरातेद- सं संताटयमाश्च चक्रनिना नागाम्भोधिषटीयुता भशुद्धाः। द्वाभ्यां धूर्जटिधिविनिम्नमासेर्युक्तामध्रुव- को भपूर्वकः स्यात् ॥२॥ .
ग्रहस्टायव।" [पश्चाङ्गचन्द्रहप्रणानयना- अन्वयः-चक्रनिनाः, खम्, सप्त, अष्टयमाः, नागाम्भोधिघटीयुतोः, ( कार्याः), (ततः ) भशुद्धाः, (ततः), दाभ्याम्, धूर्जटिभिः विनिनमासैः युक्ताः, भपूर्वकःभवका, स्यात् ॥ २ ॥ अर्थः-'खम्' कहिये शून्प, सप्त कहिये सात, भष्टयम' कहिये भठाईस, इन- को चक्रसे गुणाकर, तब जो गुणनफल होय उसमें " नागाम्भोधि" कहिये अड़तालीस युक्तकर देय, तब जो अड्डयोग होय उसको सताईसमें घटा देय तब जो शेष होय उसमें दोसे और ग्यारहसे गुणाकरे हुए मास युक्तकर देय तब नक्षत्रादि नक्षत्रभुवक होताहै ॥२॥ उदाहरण. ०१७१२८ को चकट से गुणाकरा तब ० १ ५९ ॥४४ हुए इसमें अड़ता- लीस ४८ घटी युक्तकरों संब १ नक्षत्र ४७ घटी ४४ पल हुए, इनको २७ में घटाया तब शेपरहे २५ नक्षत्र १२ घटी १६ पल हुए, इसमें २ से और ११ से मास ५७ को गुणाकरकै १२४ । २७ युक्तकरा तय १४९ । ३९ । १६ हुए, यहाँ सत्ताईस २७ से सटा तर १४ । ३९ । १६ यह नक्षत्रादि नक्षवध्रुवक हुआ । अव पिण्डसाधनकी रीति लिखते हैं- स्वर्गाः शरा नव च चक्रहतां द्विनिघ्नमासान्विता द्विहृतमासयुता घटीषु । पिण्डो भवेयुगकुभिःख-. • चरैः समेतास्तष्टो गजाश्विभिरिदं भवतीह चक्रम्॥३॥ अन्वयः-स्वर्गाः, शराः, नव, च, चक्रहताः, (ततः), द्विनिन- मासान्विताः, घटीपु, द्विहृतमासयुता, युगकुभिः, खचरैः, समेताः, पिण्डः, भवेत, गनाश्विभिः, तष्टः, ( कार्यः ); इदम्, चक्रम्, इह, (अष्टाविंशतिमितम् ) भवंति ॥३॥ अर्थः-स्वर्ग कहिये इकांस, शर कहिये पाँच, नव कहिये नौ, इनको चक्र- से गुणाकरे, तव जो गुणनफल होय उसमें द्विगुणित मासगणको युक्त कर, तदनन्तर पटियाम मासगणमें दोका भाग दैनसे जो लब्धि होय उस- को युक्तः करदेय, फिर क्रमसे 'युगफु' कहिये चौदह और खचर कहिये नो युक्त करदय, फिर भठाईससे तष्टदेय तय पिण्ड होता है यहाँ अठाईसपार- मित चमाना गया है।॥३॥ उदाहरण. २१।५।९ को चम ८ गुणाकय तय १६८ ॥ ४१ ।।हुए इसमें " " . . धिकारः१५] सान्वयभाषाटीकासमेत । मासगण ५७ की २ से गुणा करकै ११४ युक्त करा तन २८२ । ११ । १२ हुए, यहाँ घटियाम मासगण ५७ में २ का भाग देकर २८ । ३० लब्धिको युक्त करा तव २८३ । ९ । ४२ हुए यहां क्रमसे १४ और ९ को युक्त करा तब २९७ ॥ १८ ॥ ४२ हुए, यहाँ आद्य अंकको २८.से तष्टा तब १७ । १८६ ४२ यह पिण्ड हुआ। अव सूर्यनक्षत्रसे फल घटिका लानेकी रीति लिखते हैं-. शिवदशवसुपकाब्ध्यश्विनाज्योऽश्विभात्स्वं खगुणशर नगाङ्काशेशदिग्दिङ्नवाप्टौ ॥ रसगुणखमिनादादिते यादृणं स्युयुिगरसगजाङ्काशेश्वरावैश्वतःस्वम् ॥४॥ अन्वयः-इनात, अश्विभात, शिवदशवसुपट्टाध्यश्विनाया, स्वम्, आदितयात्, खगुणशरंनगाङ्काशेशदिग्दिङ्नवाप्टौ, रसगुण- खम्, ऋणम्, वैश्वतः, द्वियुगरसगजाङ्काशेश्वराः, स्वम्, स्युः ॥ ४ ॥ अर्थ:-सूर्यनक्षत्र भरिखनीसे लेकर भापय॑न्तका होय तो उसमें क्रमसे शिव कहिये ११, दश १०, वसु कहिये ८, षट्क कहिये ६, भन्धि कहिये ४, अधि कहिये २, यह घटी धन होती है; और पुनर्वसुसे लेकर पूर्वापाड़ा पर्यन्तका नक्षत्र होप तो पुनर्वतुसे लेकर उनमें क्रमसे शून्य, तीन, पांच, सात, नौ, दश, ग्यारह दश, दश, नौ, भाट, छः, तीन, शून्य, यह घटी • ऋण करैः तथा उत्तरापादासे लेकर सम्पूर्ण नक्षत्रोम क्रमसे दो, चार, छः, आठ, नौ, दश, और ग्यारह घटी धन करे ॥४॥ अव सूर्यनक्षत्रसाधनकी रीति लिखते हैं- वेदनेटतिथिर्युतार्कभागा योज्याभध्रुवनाडिकासु तत्स्यात् । सूर्यक्ष विगतं ततोऽजास्यनाडी- हीनयुतं स्फुटं भवेत्तत् ॥५॥ अन्वयः-युतार्कभागा, वेदनष्टतिथिः, भध्रुवनाडिकासु, योज्या, तत्, विगतम्, सूर्यक्षम्, स्यात; ततः, तत, अर्कजाख्यनाडीहीन- युतमु, स्फुटम, भवेत् ॥ ५॥ अर्थ:-वर्तमान इष्ट तिधिको चारसे गुणाकर तब जो गुणनफल होप उसमें उसके बारह भागको युक्त करदेय, तय जो अंकयांग होय उसको नक्षत्र भुयफकी पटिकामाम युक्तः करदेय तय जो अंक योग दोप यह गत (२००) ग्रहलापन। [ पश्चानचन्द्रग्रहणानयना- सूर्यनक्षत्र होताहै, तदनन्तर उसमें स्फुट अर्कज घटिका को हीनयुक्त कर तब वह सूर्यनक्षत्र स्फुट होताहै ॥ ५॥ उदाहरण. इष्ट तिथि १५ को.४ से गुणा करा तव ६० हुए, इसमें इसके ही वारहवे भाग ५ को युक्त करा तब ६५ हुए इसमें नक्षत्रध्रुवककी घटिका १४ ! ३९ । १६ । युक्त करा तब १५ । १४ । १६ । हुए, यह गत सावपव सूर्यनक्षत्र हुआ, यहां सूर्य विशाखानक्षत्र में है इसकारण 'शिवदशेत्यादि रीतिके अनुसार 'अर्कजाख्य घटिका ९ ऋण हुई अब अर्कजाख्य घटिकाओंको स्फुट करतेहैं,-विशाखाको घटी ९ और अनुराधाकी घटी ८ इन दोनोंका अन्तर हुआ १ इससे सूर्यनक्षत्रंकी पक्ष्यादि ४८ घटी १६ पलको गुणाकरा तब १४ घटी १६ पल हुए इसमें ६० का भाग दिया तब घटी ४४ पल यह • अग्रिमके क्षय होने के कारण ऋण है, इससे संस्कार करी हुई अर्कज घटी ९ हुई ऋणयटी१६पल इनको सुर्यनक्षत्र १५ । ४४ . १६ में घटाया तव स्पष्ट . सूर्यनक्षव हुआ १५ । ३६ / ०॥ 'अब पिण्डफल कहते हैं- पिण्डे युक्ततिथो तदाद्यमनुषु स्वं पपिण्डेप्वृणं विश्वेन्द्रोश्च शरा दशार्कयमयोः पञ्चेन्दवस्त्रीशयोः।। गोचन्द्रा दशवेदयोर्यमयमाः पञ्चाङ्गयोः स्युर्जिनाः पड़वोश्च नगे तु तत्वषटिकाः शक्रे च खं पिण्डजादा अन्वयः-युक्ततिथी, पिण्डे, विश्वेन्द्रोः, (तुल्पे, सति ), शराः अर्फयमयोः, (तुल्ये, सति ), दश: त्रीशयोः, (तुल्ये, सति ), पञ्चेन्दवः, दशवदयोः, (तुल्ये, सति ), गांचन्द्राः; पश्चाइयो (तुल्यं, सति), यमयमाः; पहस्योः, च, (.तुल्ये, सति), जिनाः, नगे, (तुल्ये, सति ), तत्त्वपटिकाःशक, च ( तुल्ये, सति), खम; पिण्डना:, आचमनुपु, ( चेत् ), तदा, स्वम्, शेषपिण्डेपु, (चेका तदा), ऋणम्, स्पुः ॥ ६ ॥ अर्थः-विधियुक्त पिण्होयांदये तेरद और एकवी तुल्य दोनेपर पाँचपटी, भागद भार दोको तुल्य होनेपर दा पटिया, तीन और पारफी नुस्प हो- अपर पदर घटिका, दश मोर चारणी मुल्प दोनेपर उनीस पटिया, पॉप मोर मांशी सुस्प दोनेपर पाईस पटिका, स और भादपी तुल्प दोनेपर . धिकारः १५] सान्वयभाषाटीकासमेत। 1565- (२०१) चौबीस घटिका, सातकी तुल्य होनेपर पच्चीस घटिका, और चौदहकी तुल्य होनेपर शून्य घटिका, यह पिण्डयटिका होतीहै, परन्तु तिथियुक्त पिण्डोवोत चौदहपर्यन्त होय तो यह घटिका धन होतीहै, और चौदहसे लेकर अट्ठाईसके भीतर होय तो यह घटिका ऋण होतीहैं ।। ६ ।। | तिथियुक्तपिण्डोवीक १३/१/१२/२१३/११/१20५/९/८/७१५ पिण्डजटिका ५ | १० | १५ | १९ । २२ । २४ २५० .उदाहरण. प्रथम और चौदहके मध्यमें स्थितपिण्ड ७ । १८ । ४२ इसमें इष्टतिथि १५ को युक्त करा तव २३॥ १८॥ ४२ हुए, यह चक्रसे अधिक है इसकारण १८से तथा तब ४॥ १८॥ ४ हुए, यह चारके तुल्य है इसकारण इसमें १९ घटी ऊ- हिके प्रथम चतुर्दशके मध्यमें स्थित होनेके कारण धन भव इन पिण्ड पटिकाओंको स्पष्ट करतेहैं-पिण्डघटी १९ और इससे मागेको पिण्डयटिका २२ इन दोनोंका भन्तर करा तव ३ हुए, इससे पिण्डके अधोभागकी घटिका १८१४२ को गुणाकरा तव ५६ ॥ ६ हुए, इसमें ६० का भाग दिया तब ० घटी ५६ पल यह अग्रिमके अधिक होनेके कारण धन हैं,इससे संस्कार करा तब स्पष्ट पिण्डयटिका हुई धन १९ घटी ५६ पल ।। अव विथिके स्पष्ट करनेकी रीति लिखते हैं- वारेषु तिथिदेंया हेया नाड़ीषु जायते मध्या। रवि- जापिण्डफलाभ्यां सुसंस्कृता स्पष्टतां याति ॥७॥ अन्वयः-तिथिः, वारपु देया, नाड़ीपु, हेया, (तदा), मध्या, जायते; ( सा ), रविजापिण्डफलाभ्याम्, सुसंस्कृता, स्पष्टताम्। याति ॥ ७॥ अर्थः-मासगणसे जो तिथिवारांदि पहिले साधाह, तहाँ वारोंमें तिथिको युक्तकरदेय, और घटिकाओम तिथिको घरादेय, तव जो होय वह मध्यतिथि होतीहै, इस मध्यतियिका सूयंज घटिकाओकरके और पिण्डन यटिकामा- करके संस्कार करे तव तिथि स्पष्ट होती ॥७॥ उदाहरण. वारादि ११३५। ६ है यहाँ पारी में तियि १५ को युक्तकरा तव १९॥ ३५, ६ हुए, और यटिकामा ३५में तिथि १५ को घटाया तव १९.२०१६ यहाँ वारोंको ७ से तष्टा तव ५।२० यह मध्यतिधि हुई, इसका रवि घटिका८। १६ मासे संस्कार (हीन ) करा तव५।११। हुप, इसका पिण्डन धन घटिका १९१५६ से संस्कार करा तब ५.३१।६। यह सप्टतिथि हुई ।।
(२०२) ग्रहलाधव। [पश्चागचन्द्रग्रहणानयना- अब नक्षत्रसाधनकी रीति लिरातेह- स्थानं केवलयोस्तिथिधुवभयोयोंगे तिथे डिकायु काव्यङ्गलवद्विनिम्नतिथिना व्यस्तार्कजासंस्कृताः। नाडीभिधुवभस्य चेन्न वियुतास्तद्धीनपटचन्विताः सैकं भं घटिका वियत्पडधिकाः पथ्थूनिता व्येकभम् ॥८॥ अन्वयः-फेवलयोः, तियिध्रुवभयोः, योगे, भम्, स्यात्, तिथे, नाडिकाः, व्यङ्गलवदिनिम्नतिथिना, युक्ताः, व्यस्तार्कजासंस्कृताः, ध्रुवभस्य, नाडीभिः, वियुताः, (कार्याः); न चेत्, तद्दीनपथ्य- न्विताः, ( कार्याः), भम्, सैकम, ( कर्त्तव्यम् ), घटिकाः, वियत्- पडाधिकाः, ( चेत् ), पष्टयूनिताः, ( कार्याः), व्येकभम, (च, कार्यम् ) ॥ ८॥ अर्थः-इष्टनिधि और अवयवरहित नक्षत्रध्रुवक केवल इन दोनोंका योगकर और सताईससे तष्टदेय तव नक्षत्र होताहै, विधिको घटिकाओंमे अपने छठे भागकरकै रहित जो द्विगुणिततिथि तिसको युक्त करदेय, तये जो अङ्कयोग होप उसका विपरीत (धन होतो ऋण फरलेय और ऋण होतोधन करलेय) अर्कज घटिकाओंकरके संस्कार करें, फिर नक्षत्रधुषकी घटिका घटादेय, यदि नक्षत्र ध्रुवकी घटी नही घटसके तो उनकी साटमें घटाकर जो शेष रहे वह युक्तकरदेप, और नक्षत्र में एक युक्तकरदेय, और यदि घटिका साठसे अधिक हो तो उनमें साठ घटादेय, और नक्षत्रमें एक हीन करदय ॥८॥ उदाहरण. केवल ( अवयवरहित ) नक्षत्रभुव १४ केवल इष्टतिथि १५ इन दोनोंका योग करा तब २९ हुए, इसको २७ से राष्टा तव शेपरहे। यह नक्षत्र (भरणी) हुआ, अप तिधि घटिकाओं ३११ १६ में केवल तिथि १५ को दोसे गुणाकरा वप :० हुए इसके छटेभाग ५ को पुक्तकरा तब ५६ घटी ४६ पलहुए, इसमें भवन ऋण ८ पटी १६ पलको विपरीत (ऋणसे धन ) करके युक्तकरा तव ६५ पटी पल हुए, इसमें नक्षत्र भुवी घटिकाओं ३९ | १६ को घटापा तब २५ पटरी ४६ पल हुए, भांत भरणी२५ ५.६६ प. हुभा ॥ . .
विकारः १५] सान्वयभाषाटीकासमेत ! • (२०३) अब योगसाधनकी रीति लिखतेहैं- सूर्य्यभेन्दुभयुतिर्भवेद्युतिस्तद्वीविवरमत्रनाडि- काः॥ चेद्दयुभेऽल्पपटिकास्तदासकुर्योगकोऽस्य घटिकाः स्वपटूच्युताः ॥९॥ 'अन्वयः-सूर्यभेन्दुभयुतिः, युतिः, भवेत् तद्घटीविवरम्, अत्र, नाडिकाः, (स्युः शुभे, अल्पपटिकाः, चेत्, तदा, योगका, सकुर (कार्यः ); अस्य, घटिकाः, खपट्च्युताः, (कार्याः), ॥९॥ अर्थः-सूर्यनक्षत्र और चन्द्रनक्षत्रका योग कर तब योग होताहै, और सू- र्यनक्षत्र तथा चन्द्रनक्षत्रकी घटिकाओंका जो भन्तर वह योगकी घटिका होतीहै। यदि दिननक्षत्रकी घटिका कम हो तो योगमें एक युक्त करदेय, और घटिकाओंको साठमें घटाकर जो शेपरहै वह ले लेय ॥९॥ उदाहरण. सूर्यनक्षत्र १५ और चन्द्रनक्षत्र २ इन दोनोंका योग करातव१७ यह व्यती- पात योग हुभा, भव सूर्यनक्षत्रकी घटिका ३६ घटी० पल और चन्द्रनक्षत्रकी घटिका २५ घटी ४६ पल इन दोनोंका भन्तर करा तय १० घी १४ पल यह व्यतीपात योगकी घटिका हुई, यहाँ दिननक्षत्रकी घटिका सूर्यनक्षत्रकी घटिकाओंसे कम हैं इसकारण योग १७ में १ युक्त करा तब १८ हुए भयात् वरीयान् योग हुआ, और भव पहिलै लाई हुई घटिकामी १० घटी १४ पलको ६० घटीम घटाया तव ४९ घटी ४६ पल हुए। अब पृणांन्तकालमें राहु साधनकी रीति लिखते हैं- चक्राहताः सप्त यमौखवाणा मासांहताः संक्षितिर- ब्धिरामाः। भाद्यानयोः संयुतिरक़शुद्धा भांशैर्युता शुक्लगते तमः स्यात् ॥१०॥ अन्वयः-सप्त, यमी, सवाणाः, चकाहताः (कार्याः), सम्, क्षितिः, अधिरामाः, मासाहताः, ( कार्याः), अनयोः, भाद्या; संयुतिः, अशुद्धा, भांशः, युताशुलगते, तमः, स्यात् ॥ १० ॥ भषः-सात-दो भोर पचासको चकसे गुणाकार, भार शन्य-पक तथा चा. 4 (२०४) ग्रहायचा [पश्चाङ्गचन्द्रग्रहणानयना- तीसको मारतासे गुणाधर, इन दोनोंका रासादि योग फर और उस योगको बारहराशिम घटावै तय जो शेषरहै उसमें सत्ताईस अंश युक्तपर देय तत्र पौ. र्णिमाके भन्तम यह होताहे ॥१०॥ उदाहरण. ७१३। ५० को चक्र ८ से गुणाकरा तब ५६ १२२ । १० हुए, और ०११! ३४ को मासों ५७ से गुणाकरा तप ०।५७ । १९३८॥ यहाँ कलाओम साठ ६० का भागदिया और अंशाम ३०का भाग दिया तब २।२९।१८ हुए, अब दोनांका गुणन फल ५६ ॥२२॥४० और २१२९६१८का राश्यादि योग करा तवयशि २१ अंश ५८ कला हुआ, इसको १२ राशिमसे घटाया तव • राशि ८ अंश २ कला रहा इसमें २७ अंश युक्तकर तय राशि५अंश २ कला यह पौर्णिमा न्तकालीन राहुं हुआ। अब सूर्यसाधनको और ग्रहणसंभव जाननेकी रीति लिखतेहैं- वेदनगोहद्रविभुक्तधिष्ण्यं तिथ्यन्तजोऽर्को गृहपू- र्वकासः। राहूनितः पर्वणि तद्भुजांशामन्वल्पकाश्चे- द्बहसंभवः स्यात् ॥ १३॥ अन्वयः-रविभुक्तधिष्ण्यम, वेदनगोहत, गृहपूर्वकः, तिथ्यन्तजा, अर्कः, ( भवेत् ), सः, पर्वणि, राहूनितः, (कार्यः), तद्भुजांशकाः, मन्वल्पकाः, चेत्, (तदा), महसम्भवः; स्यात् ॥ ११ ॥ अर्थ:-सूर्यका जो सावयव भुक्त नक्षत्रहै उसको चारसे गुणाकरके नौ- कर भागदेय तय जो लब्धि होय यह तिप्यन्तकालीन राज्यादि सूर्य होताहै, उस सूर्यमें राहुको घटादेय तव जो शेपरहै उसके भुनाशयदि चौदहसे कम हो तो ग्रहणसम्भव होताहै ५.११ ॥ उदाहरण. सूर्यका भुक्ता सायंययनदात्र १५। ३६.० है इसको ४ से गुणा करा तवर १२४1०हुआ, इसमें ९ का भागदिया तप सन्धि हुई ६ राशि शेपरहा ८२० दराको ३० से गुणा करा सय ३५३ 1 0 टुप.इसमें९ या भागदिया तब लन्धिं २८ मंग, शेपर। इसको ६० से गुणाकरात 110 हुए, इसमें धिकारः १५] सान्वयभापाटीकासमेत। (२०५) ९ का भागदिया तब लन्धि हुई ० कला, इसीप्रकार • विकला. इसप्रकार तिथ्यन्तकालीन सत्यादि सूर्य ६ राशि २८ अंश कला • विकला, भव तिथ्यन्तकालीन रवि ६ राशि २८ अंश ० कला • विकलामें राहु १ राशि ५ अंश २ कला विकलाको घटाया तब शेषरहे ५राशि २२ अंश ५८ कला . विकला, इसके भुजांश ७ अंश कला ० विकला चौदह अंशसे कम, इस कारण ग्रहणका सम्भव है ॥ भव ग्रासमान जाननेकी रीति लिखतेहैं- पिण्डनाड्यन्तरांघ्यूनयुक्ता इनाः स्वर्गपिण्डाद्रिपि- ण्डान्क्रमाद्वर्जितागाव्यग्विनादोलवैःस्वार्धयुक्ता भवे- च्छन्नमिन्दोरविच्छन्नंकायुक्तवत् ॥ १२॥ अन्वयःक्रमात, स्वर्गपिण्डादिपिण्डात, पिण्डनाड्यन्तरांम्यूनयु- ताः, इना:, . व्याग्विनात् (जातैः), दोलवैः, वर्जिताः, (ततः), स्वार्थयुक्ताः, इन्दोः, छन्नम्, भवेत्। रविच्छन्नकादि, उक्तवत्, (ज्ञेयम् ) ॥ १२॥ अर्थ:-गत और एण्य पिण्डकी जो घटिका उनका जो अन्तर तिसके चतु- थांशको यदि इकोसवे पिण्डसे लेकर छठेपिण्डपथ्यंन्त होय तो बारहमें युक्त करदेप और वीससे लेकर पष्ठ पिण्टपर्यन्त होय तो घटादेय, तय जो रहे उसमें व्यगु रविक भुजांशांको घटादेप तय जो शेपरहे टसमें उसका अर्द्ध यु- क्त करदय, तब भद्गुलादि चन्द्रग्नास होताहै, और सूय्यंका ग्रास आदि पृषी- तरीतिसे साधे ॥ १२ ॥ उदाहरण. पिण्डयटिकाओंका भन्तर ३ है, इसके चतुर्थांश ०। ४५ को सप्तपिण्ड- से विटाति पिण्डके मध्य में होनेके कारण १२ में युक्त करा तर १२.४५ हुए इसमें विराटदक भुजभागी ७१२ को पटापा तव ५। ४३ रद इसमें इसके भाधे २१५१ को युक्त करा तव ८ भंगुल ३४ प्रतिभंगुल, यह चन्द्रग्राम हुमा सूप्यंग्रासको पूर्वानारीतिसेही साधना चाहिये ।। अप चन्द्रपिम्ब भार भूभासापन लिरातेहैं- वित्र्यंशेशाः पिण्डनाड्यन्तरस्य पष्टोनाच्याः स्वर्ग- " धिकारः १६] सान्वयभापार्टीकासमेत। (२०७) - उदाहरण. कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाको वारादि ४१३५६ है यहाँ क्रमसे १।३१।५० को युक्त करा तव मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदाके दिन वारादि हुआ६.६॥५६॥ मासादि पिण्ड १७ ॥ १८॥१८ है इसमें युक्त करे तव अग्रिममासमें पिण्ड १९ । १८ १ १२ हुआ, मासादिनक्षत्र ध्रुवक १४ । ३९ ! १६ है इसमें २ को यु- क्त करा और घटिकाओंमें घटी युक्त करी तव अग्रिममासमें नक्षत्रध्रुवक १६१५० 1 १६ हुमा, राहु १।५।२।० में ९४ कला घटाई तब अग्रिममासमें राहु १।३।२८1० हुमा ।। इति श्रीगणकयंगणेशदेवकृती ग्रहलायवाट्यकरणग्रन्ये पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादाबाद- वास्तव्येन काशीस्थराजकीयममानसंस्कृतविद्यालयप्रधानाध्यापकपन्डितस्वामिरान- मिप्रशाखिशिष्येग पन्डितरामस्वरूपामगा कृतया सान्वयभाषादीक- या सहितः पञ्चागचन्द्रग्रहगानयनाधिकार:समानः ॥ १५ ॥ अथ पूर्वशकादहर्गणाद्यानयनाधिकारः। तहाँ प्रथम यदि शाक १४४२ वाँसे पहिलेका होय तव अहर्गण लानेकी रीति लिखतेहैं- व्यब्धीन्द्राशकरहितास्ततो भवाप्तं चक्राख्यं रवि- हतशेपकंतु हीनम् । चैत्राद्यैः पृथगमुतःसहग्नचंका सिद्धान्यादमरफलाधिमासयुक्तम् ॥१॥ सत्रिघ्नं तिथिरहितं निरग्रचक्राङ्गांशाव्यं पृथगमुतोऽन्धि- पलब्धैः। ऊनाहैवियुतमहर्गणो भवेद्वै वारः प्राक्छ : रहतचक्रयुग्गणोऽन्जात् ॥२॥ अन्वयः-ट्यधीन्द्राः, शकरहिताः, (कार्याः), ततः, भवाप्तम्, चकास्यम्, (स्यात् ), रविहतशेपकम्, तु, चैत्रायः, हीनम्, पृथक (स्थाप्यम् ), सदृग्नचकाद, सिद्धाट्यात्, अमुतः, अमरफलाधिमा.
.. (२०६) ग्रहहावय। (पंचागचन्द्रग्रहणानयना- पिण्डाद्रिपिण्डात् । ग्लौविम्यं स्यात्तद्वदुतिभा स्यात्रिघ्नस्याक्षांशोनयुक्तानि भानि ॥ १३॥ अन्वयः-स्वर्गपिण्डादिपिण्डात, पिण्डनाइयन्तरस्य,पष्टीनाढयाः, विश्यशैशाः, लौविम्बम्, स्यात, तद्वत, त्रिमस्य, अक्षांशोनयुक्तानि, भानि, उर्वीप्रभा, स्यात् ॥ १३ ॥ अर्थ:-गत और एप्य पिण्डकी जो घटिका उनका जो अन्तर तिसके छठे भागको यदि इकीसवे पिण्डसे लेकर छठे पिण्डपर्यन्त होय तो तृतीयांशर- हित ग्यारहमें घटादेय और पष्ठ पिण्डसे लेकर इक्कीस पिण्ड पय॑न्त होयती युक्त करदेय तय चन्द्रषिम्य होताहै, तिसी प्रकार पिण्डपटिकाओंके भन्तर- को तीनसे गुणा करनेसे जो गुणनफल होय उसके पश्चमांशको पूर्वोक्त री- तिसे ससाईसमें घटादेय और युक्त करदेय ॥ १३ ॥ उदाहरण. पिण्डपटिकाओका अन्तर ३ है इसके छठे भाग । ३० को अद्रिपि- ण्ड होनेके कारण तृतीयांशरहित ग्यारह १०१ ४० में युक्त करा तय ११ अंगुल १० प्रतिअंगुल चन्द्रविम्ब हुआ .। अब पिण्डघटिकाओंके अन्तर ३ को ३ से गुणा करा तब ९ हुए, इसके पंचमांश १ । ४८ को अद्रि पिण्ड होने के कारण २७ में युक्त करा तब २८ अंगुल ४८ प्रतिभंगुल भूभाविम्ब हुआ ॥ अंब प्रतिमासमें वारादिका चालन कहतेहैं- वारादिके भूःकुगुणाःखबाणाःपिण्डे द्वयंभेद्वयमी- शनाड्यः । क्षेप्याःक्रमेण प्रतिमासमत्र राहौ युगाङ्काः कलिका वियोज्याः ॥१४॥ अन्वयः-प्रतिमासम्, वारादिके, कमण, भूः, कुगुणाः, खबाणा, क्षेप्या, पिण्डे, दयम्, भै, (च), द्वयम्, (क्षेप्यम् ), (घटिकास) ईशनाडयः,(क्षेप्याः),अत्र, राहो,युगानाः कलिकाः, वियोज्या॥१४॥ अर्थ:-प्ररपेक मासमें पारादिके विक्रमसे एक-इकतीस और पचास युक्त. फर, पिण्डमें दो युक्त करे, और नक्षत्रमभी दो युक्त कर, तथा घटिकाभीम ग्यारह युक्त कर परन्तु राहुमं चौराण कला पटादेप ॥ १४ ॥ " धिकारः१६] सान्वयभापाटीकासमेत । (२०७) उदाहरण. कार्तिक शुक्ल प्रतिपदाको वारादि ४ । ३५६६ है यहाँ क्रमसे १ ॥ ३१ ॥ ५० को युक्त करा तव मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदाके दिन वारादि हुआ ६।६। ५६॥ मासादि पिण्ड १७ । १८।१८ है इसमें २ युक्त करे तब अग्रिममासमें पिण्ड १९ ॥ १८ ॥ १२ हुआ, मासादिनक्षत्र ध्रुवक १४ । ३९. १६ है इसमें २ को यु- क्त करा और घटिकाओम ११ घटी युक्त करी तब अग्रिममासमें नक्षत्रध्रुवक १६१५० । १६ हुआ, राहु १।५।२।० में ९४ कला घटाई तब अग्रिममासमें राहु १।३।२८1० हुआ । इति श्रीगणककर्यगणेशदैवज्ञकृतौ ग्रहलाघवाख्यकरणग्रन्थे पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादाबाद- . वास्तव्येन काशीस्थराजकीयप्रधान संस्कृतविद्यालयप्रधानाध्यापकपण्डितस्यामिराम- मिश्रशास्त्रिशिष्येण पण्डितरामस्वस्पशर्मणा कृतया सान्वयभाषाटीक- या सहितः पञ्चागचन्द्रग्रहगानयनाधिकार समाप्त ॥ १५ ॥ अथ पूर्वशकादहर्गणाद्यानयनाधिकारः। तहाँ प्रथम यदि शाक १४४२ वाँसे पहिलैका होय तव अहर्गण लानेकी रीति लिखतेहैं- यधीन्द्राशकरहितास्ततो भवाप्तं चक्राख्यं रवि- हतशेपकंतु हीनम् ।चैत्रायैः पृथगमुतःसग्नचक्रा सिद्धान्यादमरफलाधिमासयुक्तम् ॥ १॥ खत्रिनं तिथिरहितं निरग्रचक्राङ्गांशाव्यं पृथगमुतोऽन्धि- पलब्धैः।। ऊंनाहर्वियुतमहर्गणो भवेट्टै वारः प्राक्छ : रहतचक्रयुग्गणोऽजात् ॥२॥ अन्वयः-द्वयब्धीन्द्राः, शकरहिताः, (कार्याः), ततः, भयाप्तम्, चकास्यम्, (स्यात् ), रविहतशेपकम्, तु, चैत्रायः, हीनम्, पृथक (स्थाप्यम् ), सदृग्नचकात, सिद्धाट्याव, अमुतः, अमरफलाधिमा- (२०८) ग्रहलायव । [ पृवंशवादहर्गणाधानयना- सयुक्तम्, खत्रिम, तिथिरंहितम्, निरपचकागांशाध्यम्, पृथक, (स्थाप्यम् ), अमुतः,अब्धिपदकलब्धैः, ऊनाहैः, वियुतम्, अहर्गणः, भवेत, शरहतचकयुग्गणः, प्राकू, अब्जात, वारः, (भवेत् ॥१॥२॥ अर्थः-इष्ट शाकेको चौदहसै ज्यालीसमें घटादेय तय जो शेष रहै उसमें ग्यारहका भाग देनेसे जो लब्धि होय यह चक्र होता है, और जो शेष रहै उसको बारहसे गुणा करै, तब जो गुणनफल होय उसमें चैत्रादि ग- त मास हीन करदेय तय जो शेपरहै वह मध्यममासगण होताहै, उसको अलग स्थापन करदेय, और उस मध्यममासगणमें • द्विगुणित च- क और चौवीस युक्त करके तैतीसका भाग देय तब जो लब्धि होय यह अधिक मास होताहै, उसको मध्यम मासगण में युक्त करदेय तव मासगण होताहै, तिस मासगणको तीससे. गुणाकर तब जो गुणनफल होय उसमें गत तिथि घटाकर शेप रहै. उसमें चक्रम छाका भाग देकर जो लब्धि होय उसको युक्त करदय तव मध्यम अहर्गण होताहै, तिसमें चौसठका भाग देनेसे जो लब्धि होय वह क्षयदिवस होते हैं उनको मध्यम • 'अहर्गणमसे घटादेय तय अहर्गण होताहै, चक्रको पांचसे गुणाकरके जो गुणनफल होय उसमें अहर्गण युक्त करदेय, और फिर सातका भाग देय तब जो शून्यादि लब्धि होय उसको त्यागकर जो शेप चचै वह सोमवाय- दिपार होता है॥१॥२॥ उदाहरण. । शाके १४५१ भाषाढ़ शुक्ल १५ बुधवारके दिन अहर्गण साधतेहैं- शाके १४४१ को १४४२ में घटाया तप शेष रहा १ इसमें १२ का भाग दिया तब लब्धि हुई . यह चक्र हुआ, शेप बचा है. इसको २२ से गुणाकरा तय १२ हुए गत मास : वियुक्त करे तव ९ यह मध्यम मासगण हुआ, इसमें द्विगुणित और २५ युक्त करे तय ३३ हुए इसमें३३का भाग दिया तब लब्धि हुई? यह अधिक मास हुआ, इसको मध्यम मासगण ९में युक्त करा तव १० यह मासान डुंगा, इस मास गण १० को ३० से गुणा करा तब ३०० यह गुणन फट दुभा, इसमें गत तिथि १४ पटाई तंब शेष रहे २८६ इसमें चक्र छठे भाग को युक्त फरा तय २८६ हुए, इसमें ६४ का भाग दिया तब लब्धि हुई ? यद क्षपदियस हुए, इसको २८६ में पटाया तय शेष रहे २८२ यह - अहंगंण हुना।
धिकारः १६]
सान्वयभाषाटीकासमेत
(२०९)
भत्र चक्र ० को ५ से गुणा करा तब ० हुआ, इसमें महर्गण२८२को युक्त
करा तव २८२ हुए, इसमें७ का भाग दिया तब लब्धि हुई ४० और शेष रहेर
इसकारण बुधवार हुआ ।
अव ग्रहसाधनकी रीति लिखते हैं-
चक्रनिघ्नध्रुवोपेताः सक्षेपा घुगणोद्भवैः । खेटेरूनाः
स्युरिष्टाहे यधीन्द्राल्पः शको यदा ॥३॥
अन्वयः-यदा, इष्टाहे, शकः, व्यब्धीन्द्राल्पः, (तदा), चक्रनि-
मध्रुवोपताः, सोपाः, शुगणोद्भवैः खेटः, ऊनाः,इष्टखेटाः स्युः ॥ ३ ॥
भर्थः-यदि इष्टदिनके विष शाका चौदहसे वयालीससे कम होय तो चक्र-
को ध्वसे गुणा करके जो गुणनफल होय उसमें क्षेपकांक युक्त करदेय तव
जो अकयोग होय उसमसे पाहले कहीहुई रीतिके अनुसार महर्गणसे लाये
हुए ग्रहको घटादेय तव जो शेष रहै वह अभीष्ट ग्रह होताहै ॥ ३ ॥
उदाहरण.
रविध्रुव ० राशि १ अंश ४९ कला ११ विकला इसमें चक्र से गुणाकरा
तब ० राशि० अंश कला विकला हुए, इसमें रविपक ११राशि १९/-
श१ कला विकलाको मुक्त करा तब ११ राशि १९ अंश ४१ कला .
विकला हुए यही ध्रुवयुक्त रविक्षेपक हुमा अहर्गणोत्पन्न रवि ९ राशि
७ अंश ५६ कला २६ विकलाको ध्रुव युक्त क्षेपक ११ राशि १९ अंश ४१
कला विकलाम घटाया तव शेष रहे ३ राशि ११ अंश ४४ कला ३५ विक-
का, पद रवि हुभा॥
अब पूर्वाचायाका अहसारित्व और अपने विनीतत्वको कहते हैं-
पूर्व प्रौटतराः क्वचित्किमपि यच्चकुर्धनुज्ये विना ते
तेनैव महातिगर्वक मृदुच्छङ्गेऽधिरोहन्ति हि । सिद्धां-
न्तोक्तमिहाखिलं लघुकृतं हित्वा धनुयं मया तद्गों
मयि मात्तु किन यदहं तच्छास्त्रतो वृद्धधीः॥४॥
4 (२१०) ग्रहलाघ। [पूर्वशफादहगंणाद्यानयना- अन्वयः-कचित्, धनुज्ये, विना, यत्, किम्, अपि; पूर्व, प्रौढत- राः, चक्रः, ते, तेन, एवं, हि, महातिगर्वकुमृदुच्छ्रङ्गे, अधिरोहन्ति, इह, मया, धनुज्ये, विना, अखिलम्, सिद्धान्तोक्तम्, लघुकृतमा तद्गवः, मयि, मा, अस्तु, यत, अहम्, किम्, तच्छास्त्रतः, वृद्धधी, न, ( अस्मि)॥४॥ अर्थ:-पहिले भास्कराचार्य भादि बड़े बड़े ग्रन्थकारोंने जो कुछ छाया साधन ज्या और चापको छोडकर कियाहै, उससे यह गर्वरूपी पर्वतके' बड़े ऊंचे शिखरपर चढ़गए, और मैंने तो इस ग्रन्थमें सम्पूर्ण गणित ज्या और सापके विनाही किया है, इसकारण मुझे उनसे भी अधिक गर्व होना चाहिये, परन्तु उनकेही शास्त्रसे मुझे यह ज्ञान प्राप्त हुआहै इसकारण मेरेमें फिश्चिन्मान गर्व नहीं है ॥ ४ ॥ अव अन्यकार अपना नामादि लिखताई- नन्दिग्राम इहापरान्तविपये शिष्यादिगीतस्तुति- योभूत्कौशिकवंशनः सकलसच्छास्त्रार्थविकेशवः । सूनुस्तस्य तदप्रिपद्मभजनालन्ध्याववोषांशक स्पष्टं वृत्तविचिंचमल्पकरणं चैतद्गणेशोऽकरोत्॥५॥ अन्वयः-इह, अपरान्तविपये, नन्दिमामे, यः, शिप्यादिगीतस्तु- तिः, सफलसच्छास्त्रवित्, फौशिकवंशना, केशयः, अभूत, तस्य, सनुः,गणेशातदमिपद्मभजनात,अवोधांशकम, लब्ध्वा, वृत्तविचि- प्रम, स्पष्टम, च, एतत, अल्पकरणम्, अकरोत् ॥ ५ ॥ भधा-धिम समुद्र तटपर नन्दिग्राम विर्ष निवास करनेवाले को. शिप.गोधी, सकल सच्चाधि जाननेया और शिष्यमादिसे प्रशंसाको माम होनेपाले, मेरे पिताजी जो फेशप देयज्ञ तिनो परणयामलोयी सेया.
धिकारः १६] सान्वयभाषाटीकासमेत। (२११) करनेसे जो कुछ ज्ञान मुझ गणेशदेवज्ञको प्राप्त हुआ है, तिसके अवलम्ब- नसे अनेक प्रकार वृत्तासे शोभायमान स्पष्टार्य और वहुत अर्थयुक्त इस करणग्रन्थको मेने रचाहे ॥ ५॥ इति श्रीगणेशदेवकृती ग्रहावयारयकरणग्रन्ये पश्चिमोत्तरदेशीयमुरादाबादवा- स्तयेन काशीस्थराजकीयधानसस्कृतविद्यालयप्रधानाध्यापकाम्हित- सामिपसम्प्रदायाचार्य श्रीममिश्रशास्त्रिगां सानि पाधिगत- विद्यन माद्वाजगोत्रोत्पन्नमोहवशावतंसपोतभोलान यात्म-. जलसीगर्भजपण्डितरामस्वरूपशर्मणा विरचितया- ऽन्वयसनायितया माशीकया सहित.पूर्वश- काग्रहानयनप्रकारः समाप्तः ॥ शुभमस्तु॥ भरियवाणगविन्दन्दे कार्तिकस्यापरे दले । द्वितीयायां तियो मन्दवासरे च निशामुखे ॥ १ ॥ ग्रहलाघवग्रन्थस्य ह्यन्वयेन सनाथिताम् । रामस्वरूपशा भापाटीकामपीपरम् ॥२॥ दोहा-नेत्र याण गो इन्दु मित, वर्ष कार्तिक मास । कृष्णपक्ष तिथि द्वितीया, मन्दवार सुसरास ॥ १ ॥ ता दिन में या ग्रन्थरे, टीकाको विस्तार । मन्यय और भापा विरचि, पूरण कियो विचार ॥२॥ रामगंगतटपर वसत, नगर मुरादायाद । वहाँद्विज रामस्वरूपने, कियो सुभग भनुवाद ॥३॥ ता ग्रहलायव ग्रन्थको, जो करिहै सुविचार । तिनको यहुनिधि होयेंगे, मुलभ पदारय चार ॥४॥ श्रीकृष्णदासात्मज, रोमरान सुराणानि । तिन भाज्ञासौ रची यह, व्याख्या पदु हित जानि ॥५॥ पुस्तक मिलनेकाठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना-मुंबई. .
Eि .... ........ . ०१२ -२ ज्योतिषग्रंथाः। २७२. शीघ्रवोधभापाटीका. b-६ 6-१ २८० संकेतनिधिसटीक पं० रामदत्तजीकृत यह ग्रंथ अत्युत्तम देखने योग्य है २८१ पटपंचाशिका भापार्टीका २८२ भवनदीपक सटीक २८३ जमिनिसूत्रसटीक चार अध्यायका........ -७ २८४ रमलनवरत्न -१ २८५ रमलनवरत्नभाषाटीका ............ ०-१२ -१ २८६ सार्थचिंतामणि. २८७ लघुजातकसटीक.. ......... .-६ ०-२ २४८ सामुद्रिकभापाटीका. २८९ सामुद्रिक शास्त्रबड़ा सान्वय भाषाटीका.... १-४ २९० यवनजातक ............................... २९१ पंचांगतिथिपत्र सन्त् १९५२ का........ २९२ पंचांग १०यपंका (ज्योतिर्विदोंकालाभदायक)२८ २ २९३ हायनरत्न ............ २९४ भर्घप्रकाश ज्योतिष मापाटीका इस्में तेजी मंदी यस्तु देखने का विचार है २९५ प्योतिपकी सारणी २९६ शकुनयसंतराज भापारीकासहित. २९७ रत्नोतभापाटीका १९८ बृहत मुहतीसपु ....................... २-. २९९ मकरंदसारिंगी उदाहरण सहित 1. भावानदासभावारीका (फलादेशउत्तमोसम)१-० ०-२ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- सेमरा "श्रावटे Im DOERame ............ पाAmritern ........ ........................ ०-१०० रमा NELTA Immortaron -- -- rammarum.m..me. ०-२ ........ ..... .... मम्मम्ममRAILE ......... ०.१२ -३ ज्योतिपथाः। २७९. शीघ्रबोधभापाटीका 0-६ ०-१ २८० संकेतनिधिसटीक पं० रामदत्तजीकृत यह मंथ अत्युत्तम देखने योग्य है २८१ षट्पंचाशिका भाषाटीका. २८२ भुवनदीपक सटीक २८३ जैमिनिसूत्रसटीक चार अध्यायका...... २८४ रमलनवरत्न २८५ रमलनवरत्नभाषाटीका ०-१२ -१ २८६ सर्वार्थचिंतामणि. २८७ लघुजातकसटीक... ........ -६ २८८ सामुद्रिकमापाटीका. २८९ सामुद्रिक शास्त्रबड़ा सान्वय मापाटीका.... १-४०-२ २९० यवनजातक (२९१ पंचांगतिथिपत्र संवत् १९५२ का........ १२९२ पंचांग १०वर्षका (ज्योतिर्विदोंकालाभदायक)१-८ -२ २९३ हायनरत्न २९४ अर्घप्रकाश ज्योतिष भाषाटीका इस्में तेजी मंदी वस्तु देखनेका विचार है २९५ ज्योतिपकी लावणी २९६ शकुनवसंतराज भाषाटीकासहित २९७ रलद्योतभाषाटीका .९८ बृहत् मुहर्त्तसिंधु २-० २९९ मकरंदसारिणी उदाहरण सहित ३०० भावकुतूहलभाषाटीका (फलादेशउतमोसमहे)१-० ०-२ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास. "श्रीक्टेश्वर" छापाखाना मुंबई. १-८०-४ ०-१००१ मा