Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

The Hitopadesa

Pandit, Narayan · 2010

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THE
HITOPADESA
OF
NĀRĀYAN PANDIT
A PROTEGE OF WING DHAVALACHANDRA
WITH HINDI TRANSLATION
01
The late PANDIT RAMESHVAR BHATT
JILID I IDI1, VLTIDII SCHIUDI, 111
Ninth Edition
RE-EDITED WITH INDICES, TOOT-101ES ETC,
BY
NĀRĀYAN RĀM ACHARYA "KĀVYATIRTH"
PUBLISHED BY
SATYABHĀMĀBELINDURANG,
FOR THE 'NilvaIA SÕGAR PRESS,
BOMBA
1941

॥श्रीः॥
श्रीनारायणपण्डितसंगृहीतः
हितोपदेशः
आगरापत्तनस्थराजकीयमुख्यपाठशालीयप्रधानसंस्कृता-
ध्यापकज्योतिर्विद्वालमुकुन्दभट्टसू नु-
पण्डितरामेश्वरभट्टकृतया
भापाटीकया समलङ्कृतः
तस्पेट
नवम संस्करणम्
श्रीमदिन्दिराकान्तचरणान्तेवासिना
नारायण राम आचार्य "काव्यतीर्थ"
इत्यनेन परिशिष्टादिभिः समलङ्कृत्य संशोधितम्
मुम्बय्या
सत्यभामाबाई पाण्डुरङ्ग इत्यताभि ,
निर्णयसागरमुद्रणयन्त्रालयकृते तत्रैवाइयित्वा प्रकाशितम् ।
सवत् २००० सन १९४४.

श्रीः। हितोपदेशः। भाषाटीकासमलंकृतः । प्रस्ताविका। सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादात्तस्य धूर्जटेः। जाह्नवीफेनलेखेव यन्मूर्ध्नि शशिनः कला ॥१॥ जिन्होंके ललाटपर चन्द्रमाकी कला गगाजीके फेनकी रेखाके समान शोभाय- मान है उन चन्द्रशेखर महादेवजीकी कृपासे साधुजनोंका मनोरथ सिद्ध होय ॥१॥ श्रुतो हितोपदेशोऽयं पाटवं संस्कृतोकिपु । वाचां सर्वत्र वैचित्र्यं नीतिविद्यां ददाति च ॥२॥ यह हितोपदेश नामक प्रथ सुना हुआ सस्कृतके बोलने-चालनेमे चतुरताको, सब विषयों में वाक्योंकी विचित्रताको और नीति विद्याको देता है ॥ २॥ अजरामरवत्प्राशो विद्यामर्थ च चिन्तयेत् । गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥ ३॥ बुद्धिमान् मनुष्य अपनेको कमी बूढा न होऊँगा और कमी न मरूँगा ऐसा जानकर विद्या और धनका सचय करे, मृत्युने चोटीको आ पकड़ा है ऐसा सोच धर्म करे ॥३॥ सर्वगव्येपु विद्यैव द्रव्यमाहुरनुत्तमम् । अहार्यत्वादनर्घत्वादक्षयत्वाच्च सर्वदा ॥४॥ पण्डित लोग सव कालमें चौरादिकोंसे नहीं चुराये जानेसे, अनमोल होनेसे और कमी क्षय न होनेसे, सब पदाथामसे उत्तम पदार्थ विद्याहीको कहते हैं ॥४॥ संयोजयति विद्यैव नीचगापि नरं सरित् । समुद्रमिव दुर्ध नृपं भाग्यमतः परम् ॥ ५॥ जैसे नीच अर्थात् तुच्छ तृणादिसे मिलनेवाली नदी उस तृणादिकको अथाह समुद्रते जा मिलाती है, उसी प्रकार विद्यामी नीच पुरुपको प्राप्त होकर राजासे जा मिलाती है, फिर सौभाग्य उदय कराती है ॥ ५ ॥ १ यहा मनुष्य और तृणकी, विषा और नदीकी, समुद्र और राजासी समानता है.

हितोपदेश। [ प्रस्ताविका ६-११ विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् । पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनार्म ततः सुखम् ॥ ६ ॥ विद्या मनुष्यको नम्रता देती है और वह नम्रताने योग्यता, योग्यतासे धन, घनसे धर्म, फिर धसे सुख पाता है ॥ ६ ॥ विद्या शस्त्रस्य शास्त्रस्य द्वे विद्ये प्रतिपत्तये । आद्या हास्याय वृद्धत्वे द्वितीयाद्रियते सदा ॥७॥ शस्त्र विद्या और शास्तविद्या ये दोनों आदर करानेवाली हैं परंतु पहली अर्यार शस्त्रविद्या वुढापेमें "पुरुषार्थ न होनेसे' हंसी कराती है और दूसरी अर्थात् भात विद्या सबकालमें आदर कराती है ॥ ७ ॥ यनवे भाजने लग्न संस्कारो नान्यथा भवेत् । कथाच्छलेन बालानां नीतिस्तदिह कथ्यते ॥ ८॥ जमे मृतिकाके कोरे वर्तनमें जिस वस्तुका सस्कार पहिले होगाता है और पीछे वह उममें नहीं जाता है उसी प्रकार में इस हितोपदेश अन्यमें कया मटानेने पालको के लिये नीति रहता ॥ ८ ॥ मिनालाम' सुहद्दो निग्रहः संधिरेव च । पश्चानशान्यस्मामृन्यादाप्य हिरयते ॥९॥ पचमा पा और और नीति के प्रन्यासे आग लेकर, १ मित्रलाभ, २ गुरोल, रिपार और ४ गाँध, ये चार भाग बनाता हूँ॥९॥ अति मागधीतीरे पाटलिपुयनामधेय नगरम् । नत्र रार्य मामिगुणोपेतः गुस्नो नाम नरपतिरामीत् । रा भूपतिरेकदा वैनापिपरामानं टोकदरं शुथाव--- । प्रस्ताविका १२-१७] भापाटीकासमलंकृत । न , -इत्याकात्मनः पुत्राणामनधिगतशास्त्राणां नित्यमुन्मार्गगा- मिनां शास्त्राननुष्ठानेनोद्विग्नमनाः स राजा चिन्तयामास- इन दोनो श्लोकोंको सुनकर, वह राजा, शास्त्रको नहीं पढ़नेवाले, तथा प्रतिदिन कुमार्गमें चलने वाले, अपने लडकोके, शास न पढनेसे मन व्याकुल होकर सोचने लगा- 'कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न धार्मिकः। काणेन चक्षुषा किं वा चक्षुःपीडैव केवलम् ॥ १२ ॥ जो न पण्डित है और न धर्मशील है, ऐसा पुत्र उत्पन्न हुआ किस कामका? जैसे काणी आखसे क्या सरता है, केवल आँखकोही पीडा है ।। १२ ।। अजातमृतमूर्खाणां वरमाद्यौ न चान्तिमः। सकहु.खकरावाद्यावन्तिमस्तु पदे पदे ॥ १३ ॥ उत्पन्न नहीं हुआ, तधा होकर मर गया और मूर्ख, इन तीनोंमेंसे पहले 'दो अच्छे हैं और अन्तिम(मूर्ख)का अच्छा नहीं, क्योंकि मादिके दोनो एकही वार दु खके करने वाले है अतिम क्षणक्षणमें (हमेशा) टु ख देता है ॥१३॥ किंच,- वरं गर्भस्रावो वरमपि च नैवाभिगमनं वरं जातः प्रेतो वरमपि च कन्यैव जनिता। वरं वंध्या भार्या वरमपि च गर्भेषु वसति-x ने चाऽविद्वान् रूपद्रविणगुणयुक्तोऽपि तनयः ॥ १४ ॥ और गर्भका गिर पढना, स्त्रीका ससर्ग न करना, उत्पन्न होकर मर जाना, कन्याका होना स्त्रीका वॉश रहना, अथवा उसके गर्भही रहना अच्छा है, परन्तु सुन्दरता तथा सुवर्णके आभूपणोसे युक्त मूर्ख पुत्र होना अच्छा नहीं ॥ १४ ॥ किच,- स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम् । परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ॥१५॥ और जिस पुनके उत्पन्न होनेसे वशकी वडाई हो, वह जानों उत्पन्न हुआ, नहीं तो इस असार ससारमें भरकर कौन मनुप्य उत्पन्न नहीं होता है अर्थात् बहुत-से होते है और बहुत से मरते है ॥ १५ ॥ गुणिगणगणनारम्भे न पतति कटिनी सुसंभ्रमाद्यस्य । तेनाम्या यदि सुतिनी वद वन्ध्या कीदृशी नाम ॥ १६ ॥ गुणियोंकी गिनतीके आरभमें जिसका नाम गौरवपूर्वक खटियासे नहीं लिखा जाय, ऐसे पुत्रमे जो माता पुत्रवती कलावे तो क्हो बाँझ कैसी होती है ? अर्थात् जिसका पुत्र निर्गुणी है वही बाँझ है ॥ १६ ॥ अपि च,- दाने तपसि शौर्ये च यस्य न प्रधितं मनः। विद्यायामर्थलामे च मातुरुवार एव सः॥ १७ ॥ १ उत्पन्न नहीं हुआ और होकर मर गया २ भूख.

४
हितोपदेश। [प्रस्ताविका १८-२'
और भी कहा है कि-दानमें, तपमें, शरतामें, विद्याके पड़नेमें और पन
लाभने जितना मन नहीं लगा वह पुत्र अपनी माताके मरमाके समा
वृण है ॥१७॥
अपर च,-
वरमेको गुणी पुत्रो न च मूर्खशतान्यपि ।
एक्श्चन्द्रस्तमो हन्ति न च तारागणोऽपि च ॥१८॥
र सरे-गुणी एकही पुत्र अच्छा परंतु मूर्ग सौ अहे ना, योक्ति ए
नन्दना अधेरेको दूर कर देता है और अनेक तारे नहीं कर गफे है ॥ १८
पुण्यतीय कृतं येन तपः काप्यतिदुप्फरम् ।
तन्य पुनो भवेश्यः समृदो धार्मिकः सुभी ॥ १९ ॥
जिस मनु बने किती पुल ती अति कठिन तप किया है, उसका गु
पारी, पान, शीत और पडित होता है ॥ १९॥
अर्यागमो नित्यमरोगिता न
शिया भावी प्रियागादिनी ।।
नयर पुगेऽर्थक विद्या
पनीरयोगम्य रापानि राजन् ! ॥ २० ॥
मिााभ, भाग्या, गिगतमा और गपुरभाषिणी ग्वी
27TT पाराने नाली विता, गे गगाम, गुरा।।
को प्रयोगभिः पुष युगलापरणाटकः ।
गरीय शिधयते पिता ॥ २१ ॥

। प्रस्ताविका २५-३०] भाषाटीकासमलंकृत । ५ किसीसेभी उत्पन्न हुआ हो, किन्तु गुणवान् होनेसे प्रतिष्ठा पाता है, जैसे - अच्छे वासका बना हुआभी धनुष्य गुण अर्थात् डोरीके विना क्या कर सस्ता है ? ॥ २४ ॥ तत्कथमिदानीमेते मम पुत्रा गुणवन्तः क्रियन्ताम् । आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेपामधिको विशेपो धर्मण हीनाः पशुभिः समानाः ॥२५॥ इसलिये अब किसी प्रकारसे, इन मेरे पुत्रोंको गुणवान् कीजिये आहार, निद्रा भय, और मैथुन, ये पशुओं और ननुप्यों में समान हैं, केवल मनुष्योंमें । धर्मही अधिक है और धर्महीन मनुष्य पशुके समान है ॥ २५ ॥ यत,- 'धर्मार्थकाममोक्षाणां यस्यैकोऽपि न विद्यते । अजागलस्तनस्येव तस्य जन्म निरर्थकम् ॥२६॥ क्योंकि-'जिस मनुष्यमें धर्म, अर्थ, सम, मोक्ष इनमेंसे एक भी न हो, उसका जन्म बकरीके गलेके धनके समान वृधा है' ॥२६॥ यच्चोच्यते,- 'आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च । पञ्चैतान्यपि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः ॥ २७ ॥ जैसा कहा जाता है कि 'आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु, ये पाच वातें मनुप्यकी गर्भहीमें उत्पन्न होती है' ॥ २७ ॥ किंच,- 'अवश्यंभाविनो भावा भवन्ति महतामपि । नग्नत्वं नीलकण्ठस्य महाहिशयन हरेः ॥२८॥ और-'अवश्य होनहार विपय वडोकोभी होते हैं जैसे महादेवजीको नमता और विष्णुका शेषनागपर लोटना' ॥ २८ ॥ न अपि च,- 'यदभावि न तद्भावि भावि चेन तदन्यथा । V इति चिन्ताविपन्नोऽयमगदः किं न पीयते ॥ २९ ॥ और-नो होनहार नहीं है सो कभी न होगा और जो होनहार है उससे विपरीत न होगा अर्थात् अवश्य होना-इस चिन्तारूपी विपको नाश करने वाली औषधको क्यों नहीं पीते? ॥ २९ ॥ एतत्कार्याक्षमाणां केपांचिदालस्यवचनम् । न दैवमपि संचिन्त्य त्यजेदुद्योगमात्मनः । अनुद्योगेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्नुमर्हति ॥ ३०॥ यह तो कितनेही, कार्य करने में असमयोंका आलस्ययुक्त वचन है। भाग्यको ६ हितोपदेश । [पस्ताविका ३१-३ विचार कर भी मनु को अपना उद्योग नहीं छोडना चाहिये, कोंकि बोगरे निगमले देले कौन निकाल सका है ? ॥ ३० ॥ मन्त्र- उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी 'देवेन देय मिति कापुरुषा वदन्ति । देवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽज दोपः ॥ ३१ ॥ मी-योगी तथा पुरुषों में सिंह के समान पराकमी भर्थात् बाट मागे "मी निती? और 'भाग्यमें होगा सो मिलेगा' यह पुरुषाभहीन गगुर ने भारतको छोर, यथाशक्ति राम सा चाहिये गोर गन न हो तो जगानमा मोष है ॥ ३१॥ होन नोण न रशरा गतिभोत् । 17 पुरुषकारेण विना देयं न सिध्यति ॥ ३२ ॥ 7 CT TM मा वगेरी उद्योग के बिना पार - 13 ॥ - प्रस्ताविका ३८-४२] भापाटीकासमलंकृत । माता शत्रुः पिता वैरी येन वालो न पाठितः। न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये चको यथा.॥ ३८॥ जिन माता-पिताने अपने बालकको नहीं पढाया है, वे उसके वरी ह और वह वालक सभामें, हसोमें बगुलेकी तरह शोभा नहीं देता है ॥ ३८ ॥ रूपयौवनसंपन्ना विशालकुलसंभवाः । विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥ ३९ ॥ सुन्दरता तथा यौवनसे युक्त और बडे कुलमें उत्पन हुए मनुप्य विद्याहीन होनेसे सुगन्धरहित टेसूके पुप्पोंके समान शोभा नहीं पाते हैं ॥ ३९ ॥ मूर्योऽपि शोभते तावत्सभायां वस्त्रवेष्टितः ॥ तावञ्च शोभते मूर्यो यावत्किंचिन्न भाषते' ॥४०॥ मूर्ख भी सुन्दर कपडे पहिरे हुए सभामें तभीतक अच्छा लगता है कि जबतक वह कुछ न वोले ॥ ४० ॥ एतञ्चिन्तयित्वा स राजा पण्डितसभा कारितवान् । राजो- वाच-'भो भोः पण्डिताः! श्रूयताम् । अस्ति कश्चिदेवंभूतो विद्वान् यो मम पुत्राणां नित्यमुन्मार्गगामिनामनधिगतशास्त्राणामिदार्नी नीतिशास्त्रोपदेशेन पुनर्जन्म कारयितुं समर्थः । यह सोच विचार करके उम राजाने पण्डितोंकी सभा कराई. राजा बोला, पण्डितमहाशयो । सुनिये कोई ऐमाभी पण्डित है जो मेरे नित्य कुमार्गी तथा शास्त्रको नहीं पढे हुए वेटोंका अव नीतिशास्त्रके उपदेशसे नया जन्म करानेको समर्थ हो? यतः,- काचः काञ्चनसंसर्गादत्ते मारकती द्युतिम् । तथा सत्संनिधानेन मूर्यो याति प्रवीणताम् ॥ ११ ॥ क्योंकि-सुवर्णके सग होनेसे जैसे काचकी मरकतमणिकी-सी शोभा हो जाती है, वैसेही अच्छे सगसे मूर्खमी चतुर हो जाता है ॥ ४१ ॥ उकं च,- हीयते हि मतिस्तात ! हीनः सह समागमात् । समैश्च समतामेति विशिष्टैश्च विशिष्टताम्' ॥ ४२ ॥ और कहा है कि-नीचोंके साथ रहनेसे बुद्धि घट जाती है,समा पुरुषोंके साथ रह से समान रहती है और अधिक बुद्धिमानोंके साथ रहनेसे बढ जाती है ॥४२॥ अत्रान्तरे विष्णुशर्मनामा महापण्डितःसकलनीतिशास्त्रतत्त्वज्ञो बृहस्पतिरिवाब्रवीत्-'देव ! महाकुलसंभूता एते राजपुत्राः । तन्मया नीतिं ग्राहयितुं शक्यन्ते। उस समय सम्पूर्ण नीतिशास्त्रके सारको जाननेवाले, वृहस्पतिजीके समान एक बटे धुरंधर पण्डित विष्णुशर्माजी बोले-'श्री महाराज ! ये बड़े सत्कुलमें उत्पन्न हुए राजपुत्र है. इसलिये मैं इनको नीति सिखा सकता हूं क्योंकि- है -

८
हितोपदेश । [प्रस्ताविका ४३-४७
नाहन्ने निहिता काचिक्रिया फलवती भवेत् ।
नव्यागारशतेनापि शुकवत्पाठ्यते वकः॥४३॥
यस्तुमें लिया हुभा
परिश्रम सफल नहीं होता है. जैसे अनेक उपा
का भी ते समान तुला नहीं पाया जा सकता हे ॥ ४३ ॥
अग्निस्तु निगुणं गोत्रे नापत्यमुपजारते ।
गकरे पत्ररागाणां जन्म काचमणेः कुतः॥४४॥
र रे--में गुणहीन सन्तान उपम नहीं होगाती है, और
मोतीगान मानीका जन्म तो होता है ॥४४॥
लोकमामापसरे ना पुगनीतिशासाभिशान्फरिप्यामि'।
गजा गरिनयं पुनरचान-
४... मीगो मोर सापके पुलों को नीति पायमें निपुण कर
'मियो-
दोऽणि समनाममागेहति मतां शिरः ।
आमापि गति देय मानिः सातिहित:॥४५॥

स हितोपदेशः। मित्रलाभः। अथ प्रासादपृष्ठे सुखोपविष्टानां राजपुत्राणां पुरस्तात्प्रस्ताव क्रमेण स पण्डितोऽब्रवीत्- फिर राजभवनके ऊपर आनन्दसे बैठे हुए, राजकुमारोंके सामने प्रसगकी रीतिसे पडितजी यों बोले- 'काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् । व्यसनेन च मूर्खाणां नित्या कलहेन वा' ॥१॥ 'काव्यशास्त्रके मानदसे बुद्धिमानोंका और द्यूत आदि दुर्व्यसन, नीद अथवा कलहसे मूखोंका समय क्टता है' ॥१॥ 'तद्भवतां विनोदाय काककूर्मादीनां विचित्रां कथां कथयामि ।' राजपुत्रैरुक्तम्-'यार्य! कथ्यताम् ।' विष्णुशर्मोवाच-शृणुत । संप्रति मित्रलाभः प्रस्तूयते । यस्यायमाद्यः श्लोकः- 'इसलिये आपकी प्रसन्नताके लिये काग, कछुआ आदिकी विचित्र कथा कहताह' । राजपुत्र बोले-'हे गुरुजी ! कहिये। विष्णुशर्मा बोले-'सुनिये । मैं अव मित्रलाम कहता हु कि जिसका प्रथम वाक्य यह है- असाधना वित्तहीना वुद्धिमन्तः सुहृत्तमाः । साधयन्त्याशु कार्याणि काकर्ममृगाखुवत् ॥ २ ॥ अस्त्र शस्त्र आदि उपायरहित, तथा धनहीन किन्तु बुद्धिमान् और आपसमें बड़े परम मित्र (लोग), काक, कूर्म, मृग और चूहेके समान शीघ्र कार्योंको विद कर लेते है ॥२॥ राजपुत्रा ऊचुः कथमेतत् ?' विष्णुशर्मा कथयति, राजपुत्र वोले-'यह कहानी केसी है ?” विष्णुशर्मा कहने लगे- 'अस्ति गोदावरीतीरे विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र नानादिग्दे- शादागत्य रात्री पक्षिणो निवसन्ति । अथ कदाचिवसन्नायां रात्रावस्ताचलचूडावलम्बिनि भगवति कुमुदिनीनायके चन्द्रमसि लघुपतनकनामा वायसः प्रबुद्धः कृतान्तमिव द्वितीयमायान्तं व्याघमपश्यत् । तमवलोक्याचिन्तयत्-'यद्य प्रातरेवानिष्टदर्शन जातम् । न जाने किमनभिमतं दर्शयिप्यति । इत्युक्त्वा तदनुसर- णक्रमेण व्याकुलश्चलित। 'गोदावरीके तीरपर एक वटा सेमरका पेड है। वहां अनेक दिशाओंके देशोंसे आकर रातमें पक्षी बसेरा करते हैं । एक दिन जब योटी रात रह गई और भगवान् कुमुदिनीके नायक चन्द्रमाने अस्ताचलकी चोटीकी शरण ली तब मित्रलाभः ६-७] : भाषाटीकासमलंकृत । ११ - ॥ कथा १॥ 'अहमेकदा दक्षिणारण्ये चरन्नपश्यम् । एको वृद्धव्याघ्रः स्नातः कुशहस्तः सरस्तीरे ब्रूते-'भो भोः पान्था.! इदं सुवर्णकङ्कणं गृह्य- ताम् ।' ततो लोभाकृष्टेन केनचित्पान्थेनालोचितम्-भाग्येनैत. संभवति । किंत्वस्मिन्नात्मसंदेहे प्रवृत्तिन विधेया। 'एक समय मैंने दक्षिणके वनमें चलते हुए देखा कि एक बूढा वाघ न्हा धोकर कुशा हाथमें लिये सरोवरके किनारेपर बोला-'ओ बटोहियो। यह सुवर्णका ककन लो'. तव लोभके मारे किसी बटोहीने जीमें विचारा कि-'यह वात भाग्यसे होती है ? परतु इस आन्माके सदेहमें (अर्थात् कहीं मर न जाऊ इस सोचमें) प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिये । यतः अनिष्टादिष्टलाभेऽपि न गतिर्जायते शुभा। यत्रास्ते विपसंसर्गोऽमृतं तदपि मृत्यवे ॥६॥ क्यों कि-दुर्जनसे मनोरथ पूरा भी हो जाय परन्तु परिणाम अच्छा नहीं होता है, जैसे अमृतमें विपके मिलनेसे वह अमृत भी मार डालता है ॥ ६ ॥ किंतु सर्वत्रार्थार्जने प्रवृत्ति. संदेह एव । परन्तु सर्वदा धनके उत्पन्न करनेमें तो सदेह होताही है । जैसा कहा है- तथा चोकम्- न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति। संशयं यदि जीवति पश्यति ॥ ७ ॥ मनुष्य सन्देहोंमें पढे विना कल्याण नहीं देखता है, परन्तु सन्देहोंमें पडकर जो जीता रहता है तो देखता है ॥ ७ ॥ तन्निरूपयामि तावत् ।' प्रकाशं ब्रूते-'कुत्र तव कङ्कणम् ? व्याम्रो हस्तं प्रसार्य दर्शयति । पान्थोऽवदत्-'कथं मारात्मके त्वयि विश्वास.?' व्याघ्र उवाच-शृणु रे पान्थ! प्रागेव यौवन- दशायामतिदुर्वृत्त सम् । अनेकगोमानुपाणां वधान्मे पुत्रा सृतादाराश्च। वंशहीनश्चाहम् । तत केनचिद्धार्मिकेणाहमादिष्टः- "दानधर्मादिकं चरतु भवान् ।" तदुपदेशादिदानीमहं स्नानशीलो दाता वृद्धो गलितनखदन्तो क्थं न विश्वासभूमिः? इसलिये प्रथम इस वातका निश्चय करू' प्रकट वोला-'अरे! तेरा कंकन कहा है " वाघने हाथ पसार कर दिखा दिया ! वटोहीने कहा-'मैं तुझ हत्यारेमें कैसे विश्वास करू?' वाघ वोला-'सुनरे बटोही! पहिले मैं युवावस्थामें वड़ा दुरा- चारी था। अनेक गौओं और मनुष्यों के मारनेसे मेरे स्त्री-पुत्र मरगये. और मैं वशहीन होगया तव किती धर्मात्माने मुझे उपदेश किया कि-"आप दान, धर्म मादि करिये". उसके उपदेशने अब में स्नान करता हू, दानी तथा वृद्ध हूं, नख और दात भी मेरे गल गये हैं, मैं विश्वासके योग्य क्यों नहीं हु ? पुनरारुह्य मित्रलाभः १३-१४] भाषाटीकासमलंकृत। १३ है - दु खमें, शुभमें और अशुभमें, पुरुष अपनी आत्माके समान प्रमाण करता है ॥ १३॥ अन्यच्च, मातृवत्परदारेषु परद्रव्येपु लोप्टवत् । आत्मवत्सर्वभूतेपु यः पश्यति स पण्डितः॥ १४ ॥ और दूसरे-जो पराई स्त्रीको माताके समान, पराये धनको ककडके समान, और सब प्राणियोंको अपनी आत्माके समान समझता है,वही सच्चा पण्डित है। त्वं चातीव दुर्गतस्तेन तत्तुभ्यं दातुं सयनोऽहम् । चोक्तम्- तू अत्यत निर्धन है इसलिये मैं तुझे देनेका उपाय करता है, जैसा कहा है- दरिद्रान्भर कौन्तेय ! मा प्रयच्छेश्वरे धनम् । व्याधितस्यौषधं पथ्यं नीरुजस्य किमौषधैः ॥ १५॥ हे युधिष्टिर ! दरिद्रियों का पालन और पोपण कर तथा धनवानको धन मत दे, क्यों कि रोगी औषध गुणदायक होती है और नीरोगको औषधियाँ वृथा हैं ॥ १५ ॥ अन्यच, दातव्यमिति यदानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं विदुः॥ १६ ॥ और-'यह देना है' इस नि स्पृह वुद्धिसे जो दान अनुपकारीको देश काल और २ सुपात्र विचार कर दिया जाता है वह दान सात्त्विक कहलाता है ॥ १६ ॥ । तत्र सरसि स्नात्वा सुवर्णकङ्कणं गृहाण ।' ततो यावदसौ तद्वचः- प्रतीतो लोभात्सरः स्नातुं प्रविशति तावन्महापङ्के निमग्नः पला- यितुमक्षमः । पके पतितं दृष्ट्वा व्याघ्रोऽवदत्-'अहह ! महापङ्के पतितोऽसि । अतस्त्वामहमुत्थापयामि ।' इत्युक्त्वा शनैः शनै- स्पगम्य तेन व्याघ्रण धृतः; स पान्योऽचिन्तयत्- इसलिये इस सरोवरमें न्हाकर सोनेका क्कण ले। तव ज्योंही वह उसकी नीठी २ वातें सुन कर लोभसे सरोवर में स्नान करनेके लिये उतरा त्योही धनी कीचडमें फंस गया और भाग न सका । उसको कीचटमे फँसा देखकर व्याघ्रने क्हा-'ओहो! तू वटी भारी कीचडमे फँस गया है, इसलिये मैं तुझे बाहर निकालता हू यह कह कर और होले होले पास जाकर उस वाघने उसे पकड़ लिया, तव वह बटोही सोचने लगा- 'न धर्मशास्त्रं पठतीति कारणं न चापि वेदाध्ययनं दुरात्मनः। दर स्वभाव एवात्र तथातिरिच्यते यथा प्रकृत्या मधुर गवां पयः॥ १७ ॥ 'जो दुष्ट है उसे धर्मशास्त्र और वेद पटनेसे क्या होता है ? क्योंकि, खभाव ही सबसे प्रवल होता है, जैसे गायोंका दृध खभावसेही नीठा होता है' ॥ १७ ॥ १ जिसके साथ प्रत्युपकार या कोई अन्य तरह स्वार्थका संवध न होय ऐमे पुरुषको. २ हितो. ह

मित्रलाभः २२-२७] भापाटीकासमलंकृत ।
१५
-
यह बात वह सोचही रहा था कि जिसे वायने मार डाला और सा गया।
इसीसे मैं कहता हू कि, "कंकणके लोभसे" इत्यादि. इस लिये विना विचारे काम
कभी नहीं करना चाहिये-
यतः,-
'सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः
सुशासिता स्त्री नृपतिः सुसेवितः।
सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं
सुदीर्घकालेऽपि न याति विक्रियाम् ॥ २२ ॥
क्योंकि-'अच्छी रीतिसे पका हुआ भोजन, विद्यावान् पुत्र, सुशिक्षित अर्थात्
आज्ञाकारिणी स्त्री,अच्छे प्रकारसे सेवा किया हुआ राजा, सोच कर कहा हुआ वचन,
और विचार कर किया हुआ काम ये वहुत काल तकमी नहीं विघढ़ते हैं' ॥२२॥
एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित्कपोतः सदर्पमाह-'आः किमेवमुच्यते ?
यह सुनकर एक कबूतर घमडसे वोला, 'अजी ! तुम क्या कहते हो ?
वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले झुपस्थिते ।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् ॥ २३ ॥
जव आपत्काल आवे तब वृद्धोंकी वात माननी चाहिये और सर्वदा माननेमें
तो भोजन मी न मिले ॥ २३ ॥
यता,-
शङ्काभिः सर्वमाक्रान्तमन्नं पानं च भूतले ।
प्रवृत्तिः कुत्र कर्तव्या जीवितव्यं कथं नु वा ? ॥ २४ ॥
क्योंकि-इस पृथ्वीतल पर अन्न और पान सन्देहोंसे भरा है, किस वस्तुमें
खाने-पीनेकी इच्छा करे अथवा कैसे जिए॥ २४ ॥
ईर्षी घृणी त्वसंतुष्टः क्रोधनो नित्यशङ्कितः ।
परभाग्योपजीवी च पडेते दुःखभागिनः ॥ २५॥
ईर्षा करने वाला, घिन करने वाला, असतोषी, क्रोधी,सदा सदेह करने वाला
और पराये आसरे जीने वाला ये छ. प्रकारके मनुप्य हमेशा दुखी होते हैं।
एतच्छुत्वा सर्वे कपोतास्तत्रोपविष्टाः।
यह सुन कर-सव कबूतर (वहेलियेने चावलके कण जहां छीटे थे ) वहा
वैठ गये।
यता
सुमहान्त्यपि शास्त्राणि धारयन्तो बहुश्रुताः ।
छेत्तार. संशयानां च क्लिश्यन्ते लोभमोहिताः ॥ २६ ॥
क्योंकि-अच्छे बडे बडे शास्त्रोंको पढने तथा सुनने वाले और सदेहोंको दूर
करने वाले भी लोभके वश हो कर दुख भोगते है ॥ २६ ॥
अन्यथा
लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभाकामः प्रजायते ।
लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम् ॥ २७ ॥

१, मित्रलाभः ३२-३७] भाषाटीकासमलंकृत ।
7 आपत्तिकालमे घवराजाना तो कायर पुरुपका चिन्ह है, इसलिये, इस कामने
in धीरज धर कर उपाय सोचना चाहिये,
यतः,-
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुती
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ ३२ ॥
क्योंकि-आपदामें धीरज, बढतीमें क्षमा, सभामें वाणीकी चतुरता, युद्धमें
पराक्रम, यशमें रुचि, और शास्त्र में अनुराग ये वाते महात्माओंमें स्वभावसेही
होती हैं ॥ ३२॥
संपदि यस्य न हों विपदि विपादो रणे च धीरत्वम् ।
तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम् ॥ ३३ ॥
जिसे सम्पत्तिमें हर्प, और आपत्तिमे खेद न हो, और सग्राममे धीरता होय
ऐते-तीनों लोकके तिलक विरलेही पुत्रको माता जनती है ।। ३३ ।।
अन्यच्च,-
पड् दोपाः पुरुपेणेह हातव्या भूतिमिच्छता । ---
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ ३४ ॥
और इन समारमे अपना क्ल्याण चाहने वाले पुरुपको निद्रा, तन्द्रा, भय,
कोष, आलस्य और दीर्घसूत्रता ये छ अवगुण छोट देने चाहिये ॥ ३४ ॥
इदानीमप्येवं क्रियताम् । सर्वेरेकचित्तीभूय जालमादायोड्डीय-
ताम् ।
अव भी ऐना करो, सब एक मत होकर जालको लेकर उडो,
यतः,--
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्वध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥ ३५ ॥
क्योंकि-छोटी छोटी वस्तुओंके समूहसे भी कार्य सिद्ध हो जाता है, जैसे
घासकी वटी हुई रस्सियोंसे मत वाले हाथी बँध सकते है ॥ ३५ ॥
संहतिः श्रेयसी पुंसां स्वकुलैरल्पकैरपि ।
तुपेणापि परित्यक्ता न प्ररोहन्ति तण्डुलाः ॥ ३६ ॥
अपने कुलके योडे मनुष्योंका समूह भी कल्याणका करने वाला होता है, क्योंकि
तुस (छिलके ) से अलग हुए चावल फिर नहीं उगते है ॥ ३६ ॥
इति विचिन्त्य पक्षिणः सर्वे जालमादायोत्पतिताः। अनन्तरं स
व्याधः सुदूराजालापहारकांस्तानवलोक्य पश्चाद्धावन्नचिन्तयत्-
यह विचार कर सब क्वूतर जालको लेकर उडे। फिर वह बहेलिया, जालको
लेकर उदने वाले क्बूतरोंको दूरसे देख कर पीछे दौडा और चिंता करने लगा.
'सहतास्तु हरन्त्येते मम जालं विहंगमाः।
यदा तु निपतिप्यन्ति चशमेप्यन्ति मे तदा' ॥३७ ॥

"मित्रलाभः ४०-४२] भाषाटीकासमलंकृत ।
--
T
- इन्हैं जालमें फँसा देख कर आश्चर्यसे क्षणभर ठहर कर बोला-'मित्र ! यह
क्या है ?' चित्रग्रीव वोला-'मित्र ! यह हमारे पूर्वजन्मके काका फल है ।
यस्साच्च येन च यथा च यदा च यच्च
यावञ्च यत्र च शुभाशुभमात्मकर्म ।
तस्साच तेन च तथा च तदा च तच्च
तावञ्च तत्र च विधातृवशादुपैति ॥ ४०॥
जिस कारणसे, जिसके करनेसे, जिस प्रकारसे, जिस समयमें, जिस काल तक
और जिस स्थानमें जो कुछ भला और बुरा अपना कर्म है उसी कारणसे,
उसीके द्वारा, उसी प्रकारसे, उसी समयमे, वही कर्म, उसी काल तक, उसी
स्थानमें, प्रारब्धके वशसे पाता है ॥ ४० ॥
रोगशोकपरीतापवन्धनव्यसनानि च ।
आत्मापराधवृक्षाणां फलान्येतानि देहिनाम् ॥४१॥
रोग, शोक, पछतावा, बन्धन और आपत्ति, ये देहधारियोंके लिये अपने
अपराधरूपी वृक्षके फल हैं' ॥ ४१ ॥
रतच्छ्रुत्वा हिरण्यकश्चित्रत्रीवस्य वन्धनं छेत्तुं सत्वरमुपसर्पति ।
चित्रग्रोव उवाच-'मित्र! मा मैवम् । अस्मदाश्रितानामेपां ताव-
त्पाशाश्छिन्धि, तदा मम पाशं पश्चाच्छेत्स्यसि ।' हिरण्यकोऽ.
प्याह-'अहमल्पशक्तिः।
दन्ताश्च
मे कोमलाः । तदेतेषां पाशां-
श्छेत्तुं कथं समर्थ.? तद्यावन्मे दन्ता न त्रुट्यन्ति तावत्तव पाशं
छिननि । तदनन्तरमेपामपि वन्धनं यावच्छक्यं छेत्स्यामि' ।
चित्रग्रीव उवाच-'अस्त्वेवम् । तथापि यथाशक्त्येतेषां वन्धनं
खण्डय' । हिरण्यकेनोक्तम्-'आत्मपरित्यागेन यदाश्रितानां परि-
रक्षणं तन्न नीतिविदां संमतम् ।
यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीवके बंधन काटनेके लिये शीघ्र पास आया.
चित्रग्रीव वोला-मित्र ! ऐसा मत करो, पहिले मेरे इन आश्रितोंके वन्धन काटो,
मेरा वन्धन पीछे काटना' । हिरण्यकने भी कहा-'मित्र ! में निर्वल हू । और
मेरे दातभी कोमल हैं, इमलिये इन सवोंके बंधन काटने के लिये कैसे समर्थ हू ?
इसलिये जब तक मेरे दात नहीं टूटेंगे तब तक तुमारा फंदा काटता हू। पीछे
इनकेमी वधन जहा तक क्ट सकेंगे तब तक कागा' चित्रग्रीव बोला-'यह ठीक
है, तोभी यथाशक्ति पहिले इनके काटो' । हिरण्यकने कहा-'अपनेको छोड़ कर
अपने आश्रितोंकी रक्षा करना यह नीति जानने वालोंकी समति नहीं है,
यतः-
आपदर्थे धनं रनेदारान्रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ ४२ ॥
क्योंकि मनुष्यको आपत्तिके लिये धनकी, धन देकर स्त्रीकी, और धन तथा
स्त्री देकर अपनी रक्षा सर्वदा करनी चाहिये ॥ ४२ ॥

मेत्रलाभः ४९-५२] भापाटीकासमलंकृत। २१ १ औरभी देखो-जो, अनित्य और मलमूत्रसे भरे हुए शरीरसे निर्मल और नेत्य यश मिले तो क्या नहीं मिला ? अर्थात् सब कुछ मिला ॥ ४८ ॥ - शरीरस्य गुणानां च दूरमत्यन्तमन्तरम् । शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः ॥ ४९ ॥ क्योंकि-शरीर तथा दयादि गुणोंमे बड़ा अन्तर है शरीर तो क्षणभंगुर है, और गुण कल्पके अन्त तक रहने वाले है' ॥४९॥ इत्याकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमना. पुलकितः सन्नब्रवीत्-'साधु मित्र ! साधु । अनेनाश्रितवात्सल्येन त्रैलोक्यस्यापि प्रभुत्वं त्वयि युज्यते । एवमुक्त्वा तेन सर्वेषां वन्धनानि छिन्नानि । ततो हिर- ण्यकः सर्वान्सादर संपूज्याह-'सखे चित्रग्रीव ! सर्वथात्र जाल- चन्धनविधौ दोषमाशङ्कयात्मन्यवना न कर्तव्या। यह सुनकर हिरण्यक प्रसन्नचित्त तथा पुलकायमान होकर बोला-'धन्य है, मित्र ! धन्य है । इन आश्रितों पर दया विचारनेसे तो तुम तीनों लोकलीही प्रभुताके चोग्य हो। ऐसे कह कर उसने सबके बंधन काट डाले। पीछे हिरण्यक सवका आदर-सत्कार कर बोला-'मित्र चित्रग्रीव ! इस जालवधनके विषयमें दोषकी शका कर अपनी अवज्ञा नहीं करनी चाहिये । यतः- योऽधिकाद्योजनशतात्पश्यतीहामिपं खगः। स एव प्राप्तकालस्तु पाशवन्धं न पश्यति ॥ ५० ॥ क्योंकि जो पक्षी सेंकडों योजनसे भी अधिक दूरसे अन्नके दानेको या मासको देखता है वही बुरा समय आनेसे जालकी गाठको नहीं देखता है ॥५०॥ 7 # अपरं च,- शशिदिवाकरयोग्रहपीडन गजभुजंगमयोरपि वन्धनम् । मतिमतां च विलोक्य दरिद्रतां विधिरहो वलवानिति मे मतिः! ॥ ५१ ॥ और दूसरे-चद्रमा तथा सूर्यको ग्रहणकी पीडा, हाथी और सर्पका बंधन, और पण्डितोंकी दरिद्रता, देख कर मेरी तो समझमे यह आता है कि प्रारब्ध बलवान् है ! ॥ ५१ ॥ अन्यच्चन व्योमैकान्तविहारिणोऽपि विहगाः संप्रामुवन्त्यापदं वध्यन्ते निपुणैरगाधसलिलान्मत्स्या. समुद्रादपि । दुर्नीतं किमिहास्ति किं सुचरितं का स्थानलाभे गुणः कालो हि व्यसनप्रसारितकरो गृह्णाति दृरादपि !' ॥५२॥ और आकाशके एकान्त स्थानम विहार करने वाले पक्षीभी विपत्तिम पड जाते हैं, १ योजन-चार कोश याने ८ या ९ मीर - - - पत्रलाभः ५६] भाषाटीकासमलंकृत। २३ यसोऽब्रवीत्-'कथमेतत् ?' । हिरण्यकः कथयति- -- कौवा बोला-'यह कथा कैसे है ?' हिरण्यक कहने लगा- ॥ कथा २॥ || "अस्ति मगधदेशे चम्पकवती नामारण्यानी । तस्यां चिरान्म- पिता स्नेहन मृगकाको निवसतः। स च मृगः खेच्छया भ्राम्यन्हष्ट- Fटाइः केनचिच्छृगालेनावलोकितः । गालोऽचिन्त- निमित्-'आः, कथमेतन्मांसं सुललितं भक्षयामि ? भवतु, विश्वास हावदुत्पादयामि ।' इत्यालोच्योपसृत्याब्रवीत्-'मित्र! कुशलं है?' मृगेणोकम्-'कस्त्वम् ?' स ब्रूते-'क्षुद्रवुद्धिनामा जम्बुको- ६। हम् । अत्रारण्ये वन्धुहीनो मृतवन्निवसामि । इदानीं त्वां मित्र- मासाद्य पुनः सवन्धुर्जीवलोकं प्रविष्टोऽस्मि । अधुना तवानुचरेण या सर्वथा भवितव्यम्' । मृगेणोक्तम्-एवमस्तु' । ततः पश्चा- दस्तंगते सवितरि भगवति मरीचिमालिनि तो मृगस्य वासभूमि साक्षागतौ । तत्र चम्पकवृक्षशाखायां सुबुद्धिनामा काको मृगस्य चिर- वामित्रं निवसति । तौ दृष्ट्वा काकोऽवदत्-'सखे चित्राग ! कोऽयं एतद्वितीयः?' मृगो ब्रूते-'जम्बूकोऽयम् । अस्मत्सख्यमिच्छन्नागतः। -काको ब्रूते-'मित्र! अकस्मादागन्तुना सह मैत्री न युक्ता । का मगघदेशमें चम्पकवती नाम एक महान् अरण्य था उसमे बहुत दिनोंसे मृग और कौवा वडे स्नेहसे रहते थे। किसी गीदढ़ने उस मृगको हट्टाका और 'अपनी इच्छासे इधर उधर घूमना हुवा देखा इसको देख कर गीदड चिन्ता करने चहा, 'लगा-अरे, कैसे इस सुन्दर (मीठा) मासको खाऊ ? जो हो, पहिले इसे विश्वास 5 उत्पन्न कराऊ । यह विचार कर उसके पास जाकर बोला-'हे मित्र ! तुम यंदकुशल हो ' मृगने कहा-'तू कौन है ?' वह बोला-'मैं क्षुद्बुद्धि नाम गीदड़ हू, सगा-इन वनमें वन्धुहीन मरेके समान रहता हु, और अब तुमसे मित्रको पाकर फिर इस ससारमें वन्धुसहित जी उठा हु और मव प्रकारसे तुमारा सेवक वन कर रहूंगा'। मृगने कहा-'ऐसाही हो, अर्थात् रहा कर । इसके अनन्तर किरणोंकी मालासे गोभित भगवान् सूर्यके अस्त हो जानेपर वे दोनों मृगके घरको गये और वहां चपाके वृक्षकी डाल पर मृगका परम मित्र सुवुद्धि नाम कौवा रहता था। कोएने इन दोनोंको देखकर व्हा-'मित्र ! यह चितकवरा दूसरा कौन है ?' मृगने कहा-'यह गीदड है। हमारे साथ मित्रता करनेकी इच्छासे आया है। कौवा वोला-मित्र ! अनायास आए हुएके साथ मित्रता नहीं करनी चाहिये, -तथा चोक्तम् - अज्ञातकुलगीलस्य वासो देयो न कस्यचित् । मार्जारस्य हि दोपेण हतो गृध्रो जरदकः ॥ ५६ ॥ कहाभी है कि जिसका कुल और स्वभाव नहीं जाना है उसको घरमे कभी न ठहराना चाहिये। क्योंकि बिलावके अपराधसे एक बूढा गिद्ध मारा गया ॥५६॥ १४॥ 144/ : मेत्रलाभः ५८-६१] भाषाटीकासमलंकृत। २५ । यतः,- जातिमात्रेण किं कश्चिद्धन्यते पूज्यते क्वचित् । व्यवहारं परिज्ञाय वध्यः पूज्योऽथवा भवेत् ॥ ५८ ॥ क्योंकि केवल जातीसे क्या कभी कोई मारने अथवा सत्कार करने लायक होता है ? परतु व्यवहारको जान कर मारने अथवा पूजनेके योग्य होता है ॥५०॥ : गृध्रो ब्रूते-'ब्रूहि, किमर्थमागतोऽसि ?' सोऽवदत्-'अहमन गगातीरे नित्यस्नायी निरामिषाशी ब्रह्मचारी चान्द्रायणव्रतमा- चरंस्तिष्ठामि । यूयं धर्मज्ञानरता विश्वासभूमय इति पक्षिणः सर्वे -सर्वदा ममाग्रे प्रस्तुवन्ति । अतो भवद्भ्यो विद्यावयोवृद्धेभ्यो धर्म श्रोतुमिहागतः । भवन्तश्चैतादृशा धर्मज्ञा यन्मामतिथिं हन्तु- मुद्यता.! - - गिद्ध वोला-'कह, किमलिये आया है ?' वह वोला-'म यहा पर गगाजीके किनारे नित्य स्नान करता हू । फलाहारी केवल तथा ब्रह्मचारी हु और चान्द्रायण व्रत करता हू । तुम्हारी धर्म तथा ज्ञानमें प्रीति है और विश्वासपात्र हो, इस प्रकार सब पक्षी सदा मेरे सामने तुम्हारी प्रशसा किया करते हैं। तुम विद्या और अवस्थामें बडे हो, इमलिये आपसे धर्म सुनने के लिये यहा आया हूं। और आप ऐसे धर्मी है कि मुझ अतिथिको मारनेके लिये तैयार हैं ! । गृहस्थधर्मश्चैप.- अरावप्युचितं कार्यमातिथ्यं गृहमागते । छेत्तुः पार्श्वगतां छायां नोपसंहरते द्रुमः ॥ ५९ ॥ परन्तु गृहस्थधर्म तो यह है कि-अपने घर पर वैरीभी आवे तो उसका यथोचित आदर करना चाहिये, जैसे वृक्ष अपने काटने वालेके पास गई छायाको समेट नहीं लेता है ॥ ५९ ॥ यदि वा धनं नास्ति तदा प्रीतिवचसाप्यतिथिः पूज्य एव । जो धन न हो तो भीठे २ वचनोंसेही अतिथिका सत्कार करना चाहिये। यतः,- तृणानि भूमिरदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता । एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ ६० ॥ क्यों कि-कुशाका आसन, वैठनेकी भूमि, जल, और चौथी सत्य और मीठी वाणी इनका सज्जनोंके घरमें कमी टोटा नहीं होता है ॥ ६०॥ । ५ .. । अपरं च, . निर्गुणेप्वपि सत्त्वेपु दयां कुर्वन्ति साधवः । न हि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनः॥ ६१ ॥ जोर दूसरे-सजन लोग, गुणहीन प्राणियों परभी दया करते है । जैसे चन्द्रमा चाण्डालके घर पर पडी चादनीको नहीं समेट लेता है ॥ ६१ ॥ १ सावधान और जितेन्द्री होकर कृष्णपक्षमें एक २ ग्रास कम करे और शुक्लपक्षमें एक • ग्राम बढावे तथा त्रिकाल लान करे इसीको मनुने 'चान्द्रायण-व्रत' कहा है. । ३ हितो.

मित्रलाभः ६८-७०] भापाटीकासमलंकृत । २७ "मुझे अवश्य मरना होगा" ऐसी चिन्तासे मनुष्यको जो दु ख होता है वह दुःख अनुमानसे दूसरा मनुष्य वर्णन नहीं कर सकता है ॥ ६ ॥ का शृणु पुनः- स्वच्छन्दवनजातेन शाकेनापि प्रपूर्यते । अस्य दग्धोदरस्यार्थे कः कुर्यात्पातकं महत् ॥ ६८॥ फिर सुनो-जो पेट अपने आप उगी हुई साग-भाजीसे भरा जा सकता है उस जले पेटके लिये ऐसा वड़ा (भयकर) पाप कौन करे ? ॥ ६८ ॥ एवं विश्वास्य स मार्जारस्तरुकोटरे स्थितः। इस प्रकार विश्वास जना कर वह विलाव वृक्षके खोहड़मे बैठ गया। ततो दिनेपु गच्छत्सु पक्षिशावकानाक्रम्य कोटरमानीय प्रत्यहं खादति । येषामपत्यानि खादितानि तैः शोकातेविलपद्धिरितस्ततो जिज्ञासा समारब्धा । तत्परिज्ञाय मार्जारः कोटरानिःसृत्य वहिः पलायितः। पश्चात्पक्षिभिरितस्ततो निरूपयद्भिस्तत्र तरुकोटरे शा- वकास्थीनि प्राप्तानि । अनन्तर त ऊचुः-"अनेनैव जरगवेनास्माकं शावकाः खादिता." इति सर्वैः पक्षिभिनिश्चित्य गृध्रो व्यापा- दितः। अतोऽहं ब्रवीमि-"अज्ञातकुलशीलस्य-" इत्यादि' ॥ इत्या- कर्ण्य स जम्बुकः सकोपमाह-'मृगस्य प्रथमदर्शनदिने भवान- प्यज्ञातकुलशील एव, तत्कथं भवता सहैतस्य स्नेहानुवृत्तिरुत्त- रोत्तर वर्धते? और थोडे दिन बीत जाने पर वह पक्षियोंके बच्चोंको पकड खोहड़में लाकर नित्ल खाने लगा। जिन पक्षियोंके बच्चे खाये गये थे वे शोकसे व्याकुल विलाप करते हुए इधर उधर हृढने लगे । विलाव यह जान कर खोहड़से निकल कर वाहर भाग गया। उसके पीछे इधर उधर ढूढते हुए पक्षियोंने उस पेड़की खोह- दमें बच्चोंकी हड़िया पाई। फिर उन्होंने कहा की-"इस लरद्वने हमारे बच्चे खाये है"। यह वात सव पक्षियोंने निश्चय करके उस गिद्धको मार डाला। इसीलिये कहता हू कि-"जिसका कुल और खभाव" इत्यादि' यह सुन वह सियार सुझल कर बोला-'मृगसे पहिलेही मिलनेके दिन तुम्हाराभी तो जात और कुल नहीं जाना गया था, फिर किस प्रकार तुम्हारे साथ इसकी गाढी मित्रता क्रम क्रमसे वदती जाती है। यत्र विद्वजनो नास्ति श्लाघ्यस्तत्राल्पधीरपि । निरस्तपादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते ॥ ६९ ॥ जहा पडित नहीं होता है वहा थोडे पटेकीभी वटाई होती है। जैसे कि जिस देशमें पेड़ नहीं होता है वहा अडीएका वृक्षही पेड गिना जाता है ॥ ६९ ॥ अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥ ७० ॥ और दूसरे यह अपना है या पराया है, यह अल्पबुद्धियोंकी गिनती है। उदारचरित वालोंको तो सव पृथ्वीही कुटुब है ॥ ७० ॥ में नामित्रलाभः ७३-७६] भापाटीकासमलंकृत । २९ अपरं च,- . उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे । राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स वान्धवः ॥ ७३ ।। और दूसरे-विवाहादि उत्सवमे, आपत्तिमें, अकालमें, राज्यके पलटनेमे, राज- द्वारमें तथा समानमें, जो साथ रहता है वह बान्धव है ॥ ७३ ॥ जम्बुको मुहुर्मुहुः पाशं विलोक्याचिन्तयत्-'दृढस्तावयं बन्धः।' ब्रूते च-'सखे! स्नायुनिर्मिता एते पाशाः । तदद्य भट्टारकवारे 'कथमेतान्दन्तः स्पृशामि? मित्र! यदि चित्ते नान्यथा मन्यले तदा प्रभाते यत्त्वया वक्तव्यं तत्कर्तव्यम् ।' इत्युक्त्वा तत्समीप आत्मान- भाच्छाद्य स्थितः सः । अनन्तरं स काकः प्रदोषकाले मृगमनाग- तमवलोक्येतस्ततोऽन्विष्य तथाविधं दृष्ट्वोवाच-सखे! किमे- 'तत् ?' मृगेणोक्तम्-'अवधीरितसुहृद्वाक्यस्य फलमेतत्, तियार जालको वार दार देख सोचने लगा-'यह बड़ा कड़ा बंधा है'. और वोला-मित्र ! ये फदे तातके वने हुए हैं, इसलिये आज ऐतवारके दिन इन्हें दातोंसे कैसे छुॐ मित्र ! जो बुरा न मानो तो प्रात काल जो कहोगे सो करूंगा'। ऐसा कह कर उसके पासही वह अपनेको छिपा कर बैठ गया । पीछे वह कौवा साझको मृगको नहीं आया देख कर इधर उधर हृढने लगा और इस प्रकार उसे (वधनमें ) देख कर बोला-'मित्र ! यह क्या है ?' मृगने कहा-"मित्रका कहा नहीं माननेका यह फल है, तथा चोक्तम् - सुहृदां हितकामानां यः शृणोति न भाषितम् । विपत्संनिहिता तस्य स नरः शत्रुनन्दनः ॥ ७४॥ जैसा कहा है कि-जो मनुष्य अपने हितकारी मित्रोंका वचन नहीं सुनता है ६ उसके पासही विपत्ति है, और वह अपने शत्रुओंको प्रसन्न करने वाला है' ॥४॥ {काको ब्रूते-'स वञ्चकः कास्ते?' मृगेणोक्तम्-'मन्मालार्थी तिष्ठ- । त्यत्रैव' । काको ब्रूते-'उक्कमेव मया पूर्वम् । कोवा चोला-वह ठगिया कहा है ?' मृगने कहा-'मेरे मासका लोभी यहाही बैठा है। कौवा बोला-'मैंने पहिलेही कहा था,- अपराधो न मेऽस्तीति नैतद्विश्वासकारणम् । विद्यते हि नृशंतेभ्यो भयं गुणवतामपि ॥ ७५ ॥ 'मेरा कुछ अपराध नहीं है' अर्थात् मैने इसका कुछ नहीं बिगाड़ा है, अत एव यहमी मेरे सग विश्वासघात न करेगा यह बात कुछ विश्वासका कारण नहीं है। क्योंकि गुण और दोपको विनाविचारे शत्रुता करने वाले नीचोंसे सजनोंको अवश्य भय होताही है । ७५ ॥ दीपनिर्वाणगन्धं च सुहृद्वाक्यमरुन्धतीम् । न जिघ्रन्ति न शृण्वन्ति न पश्यन्ति गतायुपः ॥ ७६ ॥ - .. - ।

मित्रलाभः ८२-८३] भापाटीकासमलंकृत । ३१ है वैसेही यहमी गिरता है । जैसे दुष्ट पीठ पीछे बुराई करता है वैसेही यह - भी पीठमें काटता है। जैसे दुष्ट कानके पास मीठी २ वात करता है वैसेही यह भी कानके पास मधुर विचित्र शब्द करता है। और जैसे दुष्ट आपत्तिको देख कर निडर हो चुराई करता है वैसेही मच्छर भी छिद्र अर्थात् रोमके छेदमें प्रवेश कर काटता है ॥ ८१ ॥ दुर्जनः प्रियवादी च नैतद्विश्वासकारणम् । मधु तिष्ठति जिह्वाग्रे हृदि हालाहलं विपम् ॥ ८२॥ और दृष्ट मनुष्यका प्रियवादी होना यह विश्वासका कारण नहीं है। उसकी जीभके आगे मिठान और हृदयमें हालाहल विष भरा है' ॥ ८२ ॥ अथ प्रभाते क्षेत्रपतिलगुडहस्तस्तं प्रदेशमागच्छन्काकेनाव- लोकितः। तमालोक्य काकेनोक्तम्-'सखे मृग! त्वमात्मानं मृत- वत्संदर्य वातेनोदर पूरयित्वा पादान्स्तब्धीकृत्य तिष्ठ । यदाह शब्दं करोमि तदा त्वमुत्थाय सत्वर पलायिष्यसि ।' मृगस्तथैव काकवचनेन स्थितः। ततः क्षेत्रपतिना होत्फुल्ललोचनेन तथा- विधो मृग आलोकित. । 'आः! स्वयं मृतोऽसि' इत्युक्त्वा मृगं वन्धनान्मोचयित्वा पाशान्ग्रहीतुं सयनो वभूव । ततः काकशब्द श्रुत्वा मृगः सत्वरमुत्थाय पलायितः । तमुद्दिश्य तेन क्षेत्रपतिना क्षिप्तेन लगुडेन शृगालो हतः। पीछे प्रात काल कौवेने उस खेत वालेको लकढी हाथमें लिये उस स्थान पर # आता हुआ देखा उसे देख कर कोवेने मृगसे कहा-'मित्र हरिण ! तू अपने शरीरको मरेके समान दिखा कर पेटको हवासे फुला कर और पैरोंको ठिठिया कर १ वैठ जा। जव मैं शब्द करू तव तूझट उठ कर जल्दी भाग जाओ' मृग उसी प्रकार कौवेके वचनसे पट गया। फिर खेत वालेने प्रसन्नतासे आख खोल कर उस मृगको इस प्रकार देखा 'आदा। यह तो आपही मर गया' ऐसा कह कर मृगकी फासीको खोल कर जालको समेटनेका यन्न करने लगा. पीछे कौवेका शब्द सुन कर मृग शीघ्र टठ कर भाग गया. इसको देख उस खेत वालेने ऐसी फेंक कर लकटी भारी कि उससे सियार मारा गया; तथा चोकम्,- त्रिभिर्वत्रिभिर्मासैस्त्रिभिः पक्षैत्रिमिर्दिनः । अत्युत्कटे. पापपुण्यैरिहैव फलमश्नुते ॥ ८३ ॥ जैसा कहा है-प्राणी तीन वर्ष, तीन मास, तीन पक्ष, और तीन दिन में, अधिक पाप और पुण्यों का फल यहाही भोगता है ॥ ८३ ॥ १ अतोऽहं ब्रवीमि-"भक्ष्यभक्षकयोःप्रीतिः" इत्यादि' ॥ इसी लिये मैं कहता हूं-"भोजन और भोजन करने वालेकी प्रीति" इत्यादि। ।

मित्रलाभः ९०-९५] भापाटीकासमलंकृत ।
यदशक्यं न तच्छक्यं यच्छक्यं शक्यमेव तत् ।
नोदके शकटं याति न च नोर्गच्छति स्थले ॥ ९० ।।
का जो बात नहीं हो सकती है वह कदापि नहीं हो सकती है, और जो हो
र सकती है वह होही सकती है, जैसे पानी पर गाड़ी नहीं चलती और जमीन
पर नाव नहीं चल सकती है ॥ १० ॥
अपरंच,
-
महताप्यर्थसारेण यो विश्वसिति शत्रुपु ।
भार्यासु च विरकासु तदन्तं तस्य जीवनम् ॥ ९१ ॥
और दूसरे-जो मनुष्य अधिक प्रयोजनसे शत्रुओं और व्यभिचारिणी त्रियों
र विश्वास करता है उसके जीनेका मत आपहुँचा है ॥ ९१ ॥
लघुपतनको ब्रूते-'श्रुतं मया सर्वम् । तथापि मम चैतावान्संक-
पस्त्वया सह सौहद्यमवश्यं करणीयमिति । नो चेदनाहारेणा-
मानं व्यापादयिष्यामि ।
लघुपतनक कौवा वोला-'मैंने सब सुन लिया-तोभी मेरा इतना सकल्प
है कि तेरे संग मित्रता अवश्य करनी चाहिये. नहीं तो भूखा मर अपघात
करुगा.
तथा हि,
मृद्धटवत्सुखभेद्यो दुःसंघानश्च दुर्जनो भवति ।
सुजनस्तु कनकघटबहुर्भेद्यश्चाशु संधेयः॥ ९२ ॥
और देख-दुर्जन मनुष्य मट्टीके घडेके समान सहज टूट जा सकता
और फिर उसका जुड़ना कठिन है और सजन सोनेके घडेके समान है कि कमी
टूट नहीं सकता और जो टे भी तो शीघ्र जुड़ सकता है ॥ ९२ ॥
किंच,-
द्रवत्वात्सर्वलोहानां निमित्तान्मृगपक्षिणाम् ।
भयाल्लोभाञ्च मूर्खाणां संगतं दर्शनात्सताम् ॥ २३ ॥
और सोना, चांदी आदि वातुओंका गलानेसे, पशुपक्षियोंका पूर्वजन्म के
सस्कारते, मूखाँका भय और लोभसे, और सज्जनोंका केवल दर्शनसेही
मेल होता है ॥ ९३ ॥
किंच,
नारिकेलसमाकारा दृश्यन्ते हि सुहजनाः।
अन्ये चदरिकाकारा बहिरेव मनोहराः॥९४ ॥
और सबन पुरुष नारियल के समान वाहरसे दीखते हैं अर्थात् ऊपरसे सख्त
और भीतरसे मीठे, और दुर्जन वेरफलके आकारके समान वाहहीसे मनोहर
होते हैं ॥ ९४॥
स्नेहच्छेदेऽपि साधूनां गुणा नायान्ति विक्रियाम् ।
भनेऽपि हि मृणालानामनुवनन्ति तन्तवः ॥ ९५ ॥

मित्रलाभः ९०-९५] भाषाटीकासमलंकृत ।
यदशक्यं न तच्छक्यं यच्छक्यं शक्यमेव तत् ।
नोदके शकटं याति न च नौगच्छति स्थले ॥ ९० ॥
" जो बात नहीं हो सकती है वह कदापि नहीं हो सकती है, और जो हो
सकती है वह होही सकती है, जैसे पानी पर गाड़ी नहीं चलती और जमीन
। पर नाव नहीं चल सकती है ॥ १० ॥
अपरं च,-
महताप्यर्थसारेण यो विश्वसिति शत्रुपु।
भार्यासु च विरकासु तदन्तं तस्य जीवनम् ॥ ११ ॥
और दूसरे-जो मनुष्य अधिक प्रयोजनसे शत्रुओं और व्यभिचारिणी त्रियों
पर विश्वास करता है उसके जीनेका अत आपहुँचा है ॥ ९१ ॥
लघुपतनको ब्रूते-'श्रुतं मया सर्वम् । तथापि मम चैतावान्संक-
ल्पस्त्वया सह सौहद्यमवश्यं करणीयमिति । नो चेदनाहारेणा
त्मानं व्यापादयिष्यामि।
लघुपतनक कौवा बोला-'मैंने सव सुन लिया-तोभी मेरा इतना सकल्प
है कि तेरे संग मित्रता अवश्य करनी चाहिये. नहीं तो भूखा मर अपघात
क्रूगा.
तथा हि,-
मृद्धटवत्सुखभेद्यो दुःसंघानश्च दुर्जनो भवति ।
सुजनस्तु कनकघटबहु द्यश्चाशु संधेयः ॥ ९२ ॥
और देख-दुर्जन मनुष्य मट्टीके घड़ेके समान सहज टूट जा सकता है
और फिर उसका जुड़ना कठिन है. और सजन सोनेके घटेके समान है कि कमी
टूट नहीं सक्ता और जो टूटे भी तो शीघ्र जुड़ सकता है ॥ ९२ ॥
ह
--
मा किंच,
रति
.
द्रवत्वात्सर्घलोहानां निमित्तान्मृगपक्षिणाम् ।
भयाल्लोभाच्च मूर्खाणां संगतं दर्शनात्सताम् ॥ २३ ॥
और सोना, चादी आदि धातुओंका गलानेसे, पशुपक्षियोंका पूर्वजन्मके
सस्कारसे, मूखोंका भय और लोभने, और सजनोंका केवल दर्शनसेही
मेल होता है ॥ ९३ ॥
किंच,-
1
नारिकेलसमाकारा दृश्यन्ते हि सुहजनाः।
अन्ये बदरिकाकारा बहिरेव मनोहराः॥ ९४ ॥
और सज्जन पुरुष नारियल के समान वाहरसे दीखते हैं अर्थात् ऊपरसे सख्त
और भीतरते मीठे, और दुर्जन बेरफलके आकारके समान वाहहीसे मनोहर
होते है ॥ १४ ॥
स्नेहच्छेदेऽपि साधूनां गुणा नायान्ति विक्रियाम् ।
भनेऽपि हि मृणालानामनुवघ्नन्ति तन्तवः ॥ ९५॥

पत्रलाभः१००-१०२] भाषाटीकासमलंकृत । ३५ परं च- अन्यथैव हि सौहार्द भवेत्स्वच्छान्तरात्मनः । प्रवर्ततेऽन्यथा वाणी शाट्योपहतचेतसः ॥ १०० ॥ और दूसरे-निष्कपट चित्त वालेकी मित्रता औरही भातिकी होती है और जेसका हृदय शठताले विगढ़ रहा है उसकी वाणी औरही प्रकारकी होती है । मनस्यन्यहचस्यन्यत्कार्यमन्यहुरात्मनाम् । मनस्येकं वचस्यकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ॥ १०१ ॥ दुर्जनोंके मनमें कुछ, वचनमें और काममे कुछ, और सजनोंके जीम, वच- में और काममें एक वात होती है ॥ १०१ ॥ उद्भवतु भवतोऽभिमतमेव ।' इत्युक्त्वा हिरण्यको मैत्र्यं विधाय मोजनविशेषैर्वायसं संतोष्य विवरं प्रविष्टः। वायसोऽपि स्वस्थान गतः । ततः प्रभृति तयोरन्योन्याहारप्रदानेन कुशलप्रश्नैर्विधम्मा- लापैश्च कालोऽतिवर्तते । इसलिये तेराही मनोरथ हो।' यह कह कर हिरण्यक मित्रता करके भाति भातिके भोजनसे कौवेको संतुष्ट करके विल्में घुस गया। और कौवाभी अपने स्थानको चला गया। उस दिनले उन दोनोंका आपसमें भोजनके देने लेनेसे, कुशल पूछनेसे और विश्वासयुक्त वातचीतसे समय कटने लगा। एकदा लघुपतनको हिरण्यकमाह-'सखे ! कष्टतरलभ्याहार- मिदं स्थानं परित्यज्य स्थानान्तरं गन्तुमिच्छामि ।' हिरण्यको ब्रूते-'मित्र ! क गन्तव्यम् ? एक दिन लघुपतनक्ने हिरण्यक्ते पहा-'मित्र ! इस स्थानमें बडी कष्टकल्प- 'नासे भोजन मिलता है, इस लिये इस स्थानको छोड़ कर दूसरे स्थानमें जाया चाह- ता हु। हिरण्यकने कहा-'मित्र ! कहा जाओगे ? तथा चोक्तम् - चलत्येकेन पादेन तिष्टत्येकेन बुद्धिमान् । नाऽसमीक्ष्य पर स्थानं पूर्वमायतनं त्यजेत् ॥ १०२ ॥ ऐसा कहा है कि-बुद्धिमान् एक परसे चलता है और दूसरेसे ठहरता है। इसलिये दूसरे स्थान निश्चय किये विना पहिला स्थान नहीं छोड़ना चाहिये ॥ १०२॥ वायसो ब्रूते-'अस्ति सुनिरूपितस्थानम् ।' हिरण्यकोऽवदत्-'किं तत् ?' वायसोवृते--'अस्ति दण्डकारण्ये कर्पूरगौराभिधानं सरः तत्र चिरकालोपार्जितः प्रियसुहन्मे मन्थराभिधानः कच्छपो धार्मिकः प्रतिवसति। कोवा बोला-'एक अच्छी माति देखा भारा स्थान है। हिरण्यक बोला- - कोनसा है ?" दौआ कहने लमा कि-'दण्डकवनमें कर्पूरगौर नाम एक सरोवर है, उसने मन्परनान एक धर्मशील कठुआ मेरा बड़ा पुराना प्यारा मित्र रहता है. ला .

लाभः १०८ ] भाषाटीकासमलंकृत । ३७ - । गुरुरनिर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः । पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः ॥ १०८ ॥ ब्राह्मणोंको अग्नि, चारों वर्गोको ब्राह्मण, त्रियोंको पति और सबोंको अभ्यागत दा पूजनीय है ॥ १०८ ॥ यसोऽवदत्-'सखे मन्थर! सविशेषपूजामस्सै विधेहि । यतो. पुण्यकर्मणा धुरीणः कारुण्यरत्नाकरो हिरण्यकनामा मूषिक- जः । एतस्य गुणस्तुर्ति जिह्वासहस्रद्वयेनापि सर्पराजो न दाचित्कथयितुं समर्थः स्यात् ।' इत्युक्त्वा चित्रग्रीवोपाख्यानं र्गतवान् । मन्थरः सादरं हिरण्यकं संपूज्याह-'भद्र! आत्मनो जनवनागमनकारणमाख्यातुमर्हसि ।' हिरण्यकोऽवदत्-'कथ- मि । श्रूयताम्,- कौआ बोला-'मित्र मन्यर। इसका अधिक सत्कार कर. क्योंकि यह पुण्या- ओंका मुखिया और करुणाका समुद्र हिरण्यक नाम चूहोंका राजा है । इसके गोंकी वटाई दो सहस्र जीभोले शेष नागभी कभी नहीं कर सकता है। यह ह कर चित्रग्रीवका वृत्तान्त क्ह सुनाया । मन्थर बड़े आदरसे हिरण्यकका त्कार करके पूछने लगा-'हे मित्र ! इस निर्जन वनमें अपने आनेका भेद तो "हो' । हिरण्यक बोला-'मैं कहता हू, सुनो- ॥ कथा ४॥ अस्ति चम्पकाभिधानायां नगर्या परिव्राजकावसथः । तत्र डाको नाम परिव्राट् प्रतिवसति । स च भोजनावशिष्टभिक्षा- सहितं भिक्षापात्रं नागदन्तकेऽवस्थाप्य स्खपिति । अहं च तद- मुलुत्य प्रत्यहं भक्षयामि । अनन्तरं तस्य प्रियसुहद्वीणाको नाम विधि परिव्राजकासमायातः। तेन सह कथाप्रसगावस्थितो मम त्रासार्थ परिवंशखण्टेन चूडाकर्णो भूमिमताडयत् । वीणाकर्ण उवाच-- सखे! किमिति मम कथाविरकोऽन्यासको भवान् ?' चूडाकर्णे- तोक्तम्-'मित्र! नाहं विरक्तः। किंतु पश्यायं भूपिको ममापकारी मसिदा पात्र भिक्षानमुत्सृत्य भक्षयति ।' वीणाकर्णो नागदन्तकं शविलोक्याह-कथं सूपिकः स्वल्पवलोऽप्येतावदरमुत्पतति ? तत्र केनापि कारणेन भवितव्यम् । चम्पका नाम नगरीमें सन्यासियोंकी एक वस्ती है । वहा चूडावर्ण नाम सन्यासी रहता था । और वह भोजनसे बचेखुचे भिक्षाके अन्नसहित भिक्षा- पात्रको एटीपर टाग वर मोजाया करता था। और मैं उस भोजनके पदार्थको उछल उछल कर नित्य साया करता था । उसके उपरान्त उसका प्रिय मिन वीणारर्ण नाम सन्याची आया । चूडाकर्णने उसके साथ नानाभातिकी ४ हितो. I

३९
त्रलामः११२-११७] भाषाटीकासमलंकृत ।
च वृद्धपतिस्तस्थामतीवानुरागवान् ।
'और वह वूदा पति उस पर अत्यत आसक था.
धनाशा जीविताशा च गुर्वी प्राणभृतां सदा ।
वृद्धस्य तरुणी भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ ११२ ।।
क्योंकि-प्राणधारियोंको धन और जीवनकी वडी भाशा होती है, लेकिन बूढे
को तरुण स्त्री प्राणोंसेभी अधिक प्यारी होती है ॥ ११२ ॥
नोपभोक्तुं न च त्यक्तुं शक्नोति विषयाअरी।
अस्थि निर्दशनः श्वेव जिह्वया लेढि केवलम् ॥ ११३ ॥
बूढा मनुष्य न तो विषयोंको भोग सकता है और न त्यागभी कर सकता
। जैसे दतहीन कुत्ता हहीको चवा नहीं सकता है, केवल जीभसे चाटता
॥ ११३ ॥
'अथ सा लीलावती यौवनदादतिक्रान्तकुलमर्यादा केनापि
'णिक्पुत्रेण सहानुरागवती वभूव ।
फिर उस लीलावतीने यौवनके मदसे अपनी कुलकी मर्यादाको छोड़ किसी
नियेके पुत्रसे प्रेमवश हुई.
स्वातन्यं पितृमन्दिरे निवसतिर्यात्रोत्सवे संगति-
गर्गोष्ठी पूरुषसंनिधावनियमो वासो विदेशे तथा ।
संसर्गः सह पुंश्चलीभिरसकृढत्तेर्निजाया. क्षतिः
पत्युर्वार्धकमीर्पितं प्रवसनं नाशस्य हेतुः स्त्रियः ॥ ११४ ॥
क्योंकि-खतन्त्रता, पिताके घरमें रहना, यात्रा आदि उत्सव में किसीका सग
हल-मिलना, पुरुषके साथ गप लडाना, नियममें न रहना, परदेशमें रहना,
पमिचारिणी स्त्रियोंका सहवानमे रहना, वार वार अपने सचरित्रका खोना,
तिका बूढा होना, ईर्षा करना, और खामीका परदेशमें रहना ये स्त्रियोंके
श(विगटने के कारण हैं ॥ ११४ ।।
नपरंच,-
पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् ।
स्वप्नश्चान्यगृहे वासो नारीणां दूपणानि पट् ॥ ११५ ॥
और दूसरे-मद्यपान, दुष्ट रोगोंका सहवास, पतिका विरह, इधर उधर
चूमते रहना, दूसरेके घर में सोना अगर रहना, ये छ त्रियोंके दूपण हैं ॥११५॥
स्थानं नास्ति क्षणं नास्ति नास्ति प्रार्थयिता नरः।।
तेन नारद! नारीणां सतीत्वमुपजायते ॥ ११६ ।।
रे नारद ! (व्यभिचारके लिये) एकात स्थान, मोका और प्रार्थना करने वाला
रनुप्य इनके न होनेने स्त्रियों का पतिव्रतधर्म रहता है॥ ११६ ॥
न स्त्रीणामप्रियः कश्चित्प्रियो वापि न विद्यते ।
गावस्तृणमिवारण्ये प्रार्थयन्ति नवं नवम् ॥ ११७ ॥

- त्रलाभः१२३-१२५] भाषाटीकासमलंकृत । देयमेनमुपगूढवती' इति ततस्तया कुटन्या तत्कारणं परिज्ञाय सा कलावती गुप्तेन दण्डिता, अतोऽहं ब्रवीमि-बकरमायुवती द्धम्' इत्यादि । भूपिकवलोपटरभेन केनापि कारणेनात्र वितव्यम् ।' बूढे पतिका अनायास आलिंगन देख कर पास बैठने वाली कुटनी चिंता करने १४."गी कि, 'यह जवान औरत इस बूढेको क्यों भला लिपट गई ?” फिर उस कुटनीने 'सका कारण जान कर उस लीलावतीको अकेलेमें डाटा, इसलिये मैं कहता "अचानक युवा स्त्रीने वृद्धको" इत्यादि ॥ चूहेको बलका अहंकार यहा शारभी किसी न किसी कारणसेही है ॥ रणं विचिन्त्य परिव्राजकेनोक्तम्-'कारणं चात्र धनवाहुल्यमेव विष्यति । थोडी देर विचार कर सन्यासीने कहा-'इसमें धनकी अधिकताका कारण गा, CO । . ति, : धनवान्वलवांल्लोके सर्वः सर्वत्र सर्वदा । प्रभुत्वं धनमूलं हि राज्ञामप्युपजायते' ॥ १२३ ॥ क्योंकि सर्वत्र, ससारमें सव मनुप्य धनसेही सदा बलवान् होते हैं और राजाओंकी प्रभुताकी जड़ धनही होता है ॥ १२३ ॥ ततः खनित्रमादाय तेन विवरं खनित्वा चिरसंचितं मम धनं १"गृहीतम् । ततः प्रभृति निजशक्तिहीनःसत्त्वोत्साहरहितः स्वाहार- र मप्युत्पादयितुमक्षमः सत्रासं मन्दं मन्दमुपसर्पश्चूडाकर्णेनावलो- कितः। तेन फिर कुदाली ला कर उसने विलेको खोद कर मेरा बहुत दिनका इकट्ठा किया स्थतहुआ धन ले लिया। उसी दिनसे अपनी सामर्थ्य हीन, वल और उत्साहसे वरहित अपना आहारभी हृदनेके अयोग्य मुझे डरके मारे धीरे धीरे चलते हुएको चूढार्णने देखा ॥ ततस्तेनोकम्- 'धनेत वलवांल्लोके धनाद्भवति पण्डितः। पश्यैनं मूपिकं पापं स्वजातिसमतां गतम् ॥ १२४ ॥ फिर उसने कहा कि, दुनियामें आदनी धनसे वलवान् और धनसेही पण्डित क होता है । इस पापी चूहेको देखो (धनहीन होनेसे) अपनी जातिके समान हो गया ॥ १२४ ॥ किंच,- . र अर्थेन तु विहीनस्य पुस्पस्याल्पमेधसः। क्रियाः सर्वा विनश्यन्ति ग्रीप्मे कुसरितो यथा ॥ १२५ ॥ और धनते रहित बुद्धिहीन मनुप्यके तो सब काम विगढ़ जाते हैं, जैसे गरनीकी तुम छोटी छोटी नदिया (सूब जा कर विगढ़ जाती हैं)॥ १२५ ॥ th "त्रलाभः१३२-१३६] भाषाटीकासमलंकृत । 20 । औरमी-आयु: धन, घरका भेद, गुप्त वात, मैथुन, औषधि, तप, दान और -! मान, इन नौ वातोंको यत्नसे गुप्त रखना चाहिये ॥ १३१ ॥ था चोक्तम्,- अत्यन्तविमुखे दैवे व्यर्थे यत्ने च पौरुषे । मनस्विनो दरिद्रस्य वनादन्यत्कुतः सुखम् ॥ १३२॥ जैसा कहा है कि-प्रारब्धके विमुख होने पर और पुरुषार्थ और यत्न के [प्फल होने पर धैर्यवान् दरिद्री मनुष्यको वनको छोड़ और कहां सुख धरा है ? 'पाने उसको स्वदेश छोड कर कहाही वनमे जाना यही उचित है)॥ १३२ ॥ पन्यच्च, मनस्वी म्रियते कामं कार्पण्यं न तु गच्छति । अपि निर्वाणमायाति नानलो याति शीतताम् ॥ १३३ ॥ और दूसरे-उदार पुरुष मर जाय पर कृपणता नहीं करता है (लाचारी हीं बताता है ) जैसे अग्नि भले वुझ जाय, पर ठडी नहीं होती है ॥ १३३ ॥ के च,- - कुसुमस्तवकस्येव द्वे वृत्ती तु मनस्विनः। सर्वेषां मूर्ध्नि वा तिष्ठेद्विशीर्येत वनेऽथवा ॥ १३४ ॥ और पुप्पोंका गुच्छेके समान उदार मनुप्यकी दो तरहकी प्रकृति होती है. कि या तो सबके गिर पर रहे या वनमें कुझला जाय ॥ १३४ ॥ यात्रैव याच्या जीवनं तदतीव गर्हितम् । और जो यहा याचना कर जीना है वहमी अच्छा नहीं है, यत:- वरं विभवहीनेन प्राणैः संतर्पितोऽनलः । नोपचारपरिभ्रष्टः कृपणःप्रार्थितो जनः ॥ १३५ ॥ क्योंकि-धनहीन मनुष्य प्राणोंको अग्निमें झोंक दे सो अच्छा, परन्तु अपने मानको छोड़ कर कृपण मनुष्यसे याचना करना अच्छा नहीं है ॥ १३५ ॥ १ दारिद्याद्भियमेति हीपरिगतः सत्त्वात्परिभ्रश्यते निःसत्त्वः परिभूयते परिभवानिर्वेदमापद्यते । निर्विण्ण. शुचमेति शोकनिहतो वुद्ध्या परित्यज्यते निवुद्धिः क्षयमेत्यहो निधनता सर्वापदामास्पदम् ॥ १३६ ॥ और निर्धनतासे मनुष्यको लजा होती है, लज्जासे पराक्रम नष्ट हो जाता है, पराक्रम न होनेसे अपमान होता है, अपमान होनेसे दुख पाता है, दु खसे शोक करता है, शोकसे बुद्धिहीन हो जाता है, और बुद्धि न होनेसे नाश हो जाता है। अहो ! निर्धनता सब आपत्तियोंका स्थान है ॥ १३६ ॥ किंच,- वर मौन कार्य न च वचनमुक्तं यदनृतं वर क्लैव्यं पुंसां न च परकलत्राभिगमनम् ।

मेत्रलाभः१४२-१४७] भापाटीकासमलंकृत ।
४५
-
t-
यह सोच कर भी लोभसे फिर उसका धन लेनेकी हठ करी।
था चोक्तम्,-
लोभेन बुद्धिश्चलति लोभो जनयते तृषाम् ।
तृषार्तो दुःखमाप्नोति परत्रेह च मानवः ॥ १४२ ॥
जैसा कहा है लोभसे वुद्धि चलं जाती है, लोभही तृष्णाको बढाता है,
और तृष्णासे दुखी मनुष्य इस लोक और परलोकमें कष्ट पाता है ॥ १४२ ॥
नतोऽहं मन्दं मन्दमुपसर्पस्तेन वीणाकर्णेन जर्जरवंशखण्डेन
नाडितश्चाचिन्तयम्-
फिर उस वीणाकर्णने धीरे धीरे मुझ चल्ते हुएको एक सडे वासका टटोंगा
मारा, और मैं चिंता करने लगा-
धनलुब्धो हसंतुष्टोऽनियतात्माऽजितेन्द्रियः।
सर्वा एवापदस्तस्य यस्य तुष्टं न मानसम् ॥ १४३॥
जिसको सतोष नहीं है उसको सब आपत्तिया ही हैं, क्योंकि वह धनका
लोभी अप्रसन्न, दुचित्ता और अजितेन्द्री हो जाता है ॥ १४३ ॥
तथा च,-
सर्वाः संपत्तयस्तस्य संतुष्टं यस्य मानसम् ।
उपानढपादस्य ननु चर्मावृतेव भूः ॥ १४४ ॥
और-जिसका मन सतोप है उसको सव सपत्तिया हैं जैसे पैरमें
जूता पहरे
हुयेको सब पृथ्वी चर्ममयी दीखती है ॥ १४४ ॥
1-
न
अपरं च,-
का
संतोपामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम् ।
कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम् ॥ १४५॥
1 और दूसरे-सतोपरूपी अमृतसे अघाये हुए शातचित्त वालोंको जो सुख है,
वह सुख इधर उधर फिरने वाले धनके लोभियोंको कहा धरा है ॥ १४५ ॥
किंच,
.
तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुप्टितम् ।
येनाशाः पृष्टत कृत्वा नैराश्यमवलम्बितम् ॥ १४६॥
और-जिसने आशाको पीछे कर निराशाका सहारा लिया है, उसीने पढ़ा,
उत्तीने सुना, और उसीने सब कुछ कर लिया ॥ १४६ ॥
अपि च,-
सा
겠
असेवितेश्वरद्वारमदृष्टविरव्यथाम् ।
अनुक्कतल्लीववचनं धन्यं कस्यापि जीवनम् ॥ १७ ॥
औरभी-जिनने धनवान्के द्वारकी सेवा नहीं की, विरहके दुख नहीं
देखा, और कभी दीन वचन मुखसे नहीं कहे, ऐसे किसी मनुष्यका जीना
वन्य रे॥ १४७ ॥

त्रिलाभः १५४-१५८] भापाटीकासमलंकृत। - ४७ । . - - हेरना अच्छा है पर भाई बन्धुओंके बीचमे धनहीन जीना अच्छा नहीं ॥ १५३ ॥ । तोऽसत्पुण्योदयादनेन मित्रेणाहं स्नेहानुवृत्त्यानुगृहीतः। अधुना T1 पुण्यपरम्परया भवदाश्रयः स्वर्ग एव मया प्राप्तः । । फिर मेरे पुण्यके उदयसे इस मित्रने परम स्नेहसे मेरा आदर किया और अब ण्यकी रीतिसे तुम्हारा आश्रय मुझे स्वर्गके समान मिल गया. - यतः,- संसारविषवृक्षस्य द्वे एव रसवत्फले । काव्यामृतरसास्वादः संगमः सुजनैः सह ॥ १५४ ॥ क्योंकि--ससाररूपी विषवृक्षके दोही रसीले फल हैं अर्थात् एक तो व्यरूपी अमृतके रसका स्वाद और दूसरा सज्जनोंका सग ॥ १५४ ॥ न्थर उवाच- अर्थाः पादरजोपमा गिरिनदीवेगोपमं यौवन- मायुष्यं जललोलविन्दुचपलं फेनोपमं जीवितम् । धर्म यो न करोति निन्दितमतिः स्वर्गार्गलोद्घाटन पश्चात्तापयुतो जरापरिगतः शोकाग्निना दहा ते ॥ १५५ ॥ मधर वोला-वन तो चरणोंकी धूलिके समान है, यौवन पहाड़की नदी के वेगके पमान है, आयु चचल जलकी विन्दुके समान चपल है और जीवन फेन (साग)के पुमान है, इसलिये जो निर्बुद्धि स्वर्गकी आगलको खोलने वाले धर्मको नहीं करता हे वह पीछे बुढापेमें पछता कर शोककी अग्निसे जलाया जाता है ॥ १५५ ॥ युप्माभिरतिसंचयः कृतः । तस्यायं दोषः, शृणु,- तुमने वहुतसा सचय किया था उसका यह दोष है ॥ सुनो,- उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम् । तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम् ॥ १५६ ॥ गमीर सरोवरमें भरे हुए जलके चारों ओर निकलनेके (वारवार जल निकाल देना जसा सरोवरकी शुद्धिका कारण है, उसीके) समान कमाये हुए वनका सत्पात्रमे दान करनाही रक्षा है ॥ १५६ ॥ अन्यञ्च,- यद्योऽधः क्षितौ वित्तं निचखान मितंपचः। तद्धोनिलयं गन्तुं चके पन्थानमग्रतः॥ १५७ ॥ और दूसरे लोनी जिस धनको धरतीमें अधिक नीचे गाता है वह धन पातालमे जाने के लिये पहिलेसेही मार्ग कर लेता है ॥ १५७ ॥ अन्यच,- निजसौरयं निरन्यानो यो धनार्जनमिच्छति । परार्थभारवाहीव क्लेशस्येव हि भाजनम् ॥ १५८ ॥ और जो मनुष्य अपने सुरवो रोक कर धनरुचय करनेकी इच्छा करता है 'त्रलाभः १६५-१६७] भाषाटीकासमलंकृत । गमन्विष्यमाणो विन्ध्याटवीं गतवान् । ततस्तेन व्यापादितं मृग- दाय गच्छता घोराकृतिः शूकरो दृष्टः । तेन व्याघेन मृगं भूमौ घाय शूकरः शरेणाहतः। शूकरेणापि घनघोरगर्जनं कृत्वा स घो मुष्कदेशे हतः संश्छिन्न द्रुम इव भूमौ निपपात । कल्याणकटक वस्तीमें एक भैरव नाम व्याध (बहलिया) रहता था। वह एक न मृगको हृढता हृढता विंध्याचलकी वनीमें गया। फिर मारे हुए मृगको कर जाते हुए उसने एक भयकर शूकरको देखा । तव उस व्याधने मृगको भूमि रख कर शूकरको वाणसे मारा । शूकरनेमी भयकर गर्जना करके उस धके मुष्कदेशमें ऐसी ठकर मारी कि, वह कटे हुए पेड़के समान जमीन पर - र पड़ा। - ना- जलमग्निर्विपं शस्त्रं क्षुयाधिः पतनं गिरेः। निमित्तं किंचिदासाद्य देही प्राणैर्विमुच्यते ॥ १६५ ॥ क्योंकि-जल, अग्नि, विष, शस्त्र, भूख, रोग और पहाड़से गिरना इनमेंसे सी न किसी वहानेको पा कर प्राणी प्राणोंसे छूटता है ॥ १६५ ॥ अथ तयोः पादास्फालनेन सर्पोऽपि मृतः। अथानन्तरं दीर्घरावो म जम्बुकः परिभ्रमन्नाहारार्थी तान्मृतान्मृगव्याधसर्पशूकरान- श्यत् । अचिन्तयच्च-'अहो ! अद्य महद्भोज्यं मे समुपस्थितम् । उन दोनोंके परोंकी रगडसे एक सर्पमी मर गया। इसके पीछे आहारको हने वाले दीर्घराव नाम गीदडने घूमते २ उन मृग, व्याध, सर्प, और शूकरको रे पडे हुए देखा और विचारा कि 'आहा ! आज तो मेरे लिये वड़ा भोजन यार है। रथवा,- अचिन्तितानि दुःखानि यथैवायान्ति देहिनाम् । सुखान्यपि तथा मन्ये दैवमत्रातिरिच्यते ॥ १६६ ॥ अथवा-जैसे देहधारियोंको अनायास दु ख मिलते हैं वैसेही सुखमी मिलते है, परन्तु इसमें प्रारब्ध बलवान् है ऐसा मानता हू ॥ १६६ ॥ तद्भवतु । एपां मांसैर्मासत्रयं मे सुखेन गमिष्यति । जो कुछ हो, इसके मासोंसे मेरे तीन महीने सुखसे कटेंगे। मासमेकं नरो याति द्वौ मासौ मृगशूकरौ। अहिरेक दिनं याति अद्य भक्ष्यो धनुर्गुणः ॥१६७ ॥ एक महीनेको मनुप्य (बलिया) होगा, दो महिनेको हरिण और सूकर होंगे और एक दिनको सर्प होगा, और आज धनुपकी डोरी चावनी चाहिये ॥ १६ ॥ ततः प्रथमवुभुक्षायामिदं निःस्वादु कोदण्डलग्नं नायुवन्धनं खादामि ।' इत्युक्त्वा तथा कृते सति छिन्ने स्नायुवन्धनं उत्पति- ५ हितो० -- - मैत्रलाभः १७३-१७६] भापाटीकासमलंकृत । ५१ १ ܝܝܝܐ और दूसरे-शास्त्रकी विधि, उद्योग(पराक्रम)से डरे हुए मनुष्यको कुछ गुण कायदा) नहीं करती है, जैसे इस संसार में हाथ पर धरा हुआभी दीपक, न्धेको वस्तु नहीं दिखाता है ॥ १७२ ॥ दत्र सखे! दशाविशेपे शान्तिः करणीया । एतदप्यतिकप्टं त्वया मन्तव्यम्। इसलिये हे मित्र ! इस शेष दशामें शान्ति करनी चाहिये । और इसेभी धिक क्लेश तुमको नहीं मानना चाहिये। ! तः,- राजा कुलवधूर्विप्रा मन्त्रिणश्च पयोधराः। स्थानभ्रष्टा न शोभन्ते दन्ताः केशा नखा नराः॥ १७३॥ क्योंकि-राजा, कुलकी वधू, ब्राह्मण, मंत्री, स्तन, दत, केश, नस और नुप्य ये स्थानसे अलग हुए शोभा नहीं देते हैं ॥ १७३ ॥ ति विज्ञाय मतिमान्वस्थानं न परित्यजेत् । कापुरुषवचनमेतत् । यह जान कर वुद्धिमानको अपना स्थान नहीं छोड़ना चाहिये । यह कायर रुषका वचन है। ति:- स्थानमुत्सृज्य गच्छन्ति सिंहाः सत्पुरुपा गजाः। तत्रैव निधनं यान्ति काकाः कापुरुपा मृगाः॥ १७४॥ क्योंकि-सिंह, सज्जन पुरुप, और हाथी, ये स्थानको छोड कर जाते हैं और हाक, कायर पुरुष, और मृग, ये वहाही नाश होते हैं ॥ १७४ ॥ को वीरस्य मनस्विनः स्वविपयः को वा विदेशस्तथा यं देशं श्रयते तमेव कुरुते वाहुप्रतापार्जितम् । यइंष्ट्रानखलागलपहरणः सिंहो वनं गाहते तस्मिन्नेव हतद्विपेन्द्ररुधिरैस्तृष्णां छिनत्यात्मनः ॥ १७५॥ वीर और उद्योगी पुरुषोंको देश और विदेश क्या है ? अर्थात् जैसा देश वैसाही विदेश । वह तो जिस देशमें रहते हैं उसीको अपने वाहुके प्रतापसे जीत लेते है जैसे सिंह जिस वनमें दात, नख, पूछसे प्रहार करता हुआ फिरता है उसी वनमें मारे हुए हाथियोंके रुधिरसे अपनी प्यास बुझाता है ॥ १७५ ॥ अपरं च,- निपानमिव मण्डूकाः सरः पूर्णमिवाण्डजाः। सोद्योगं नरमायान्ति विवशाः सर्वसंपद. ॥ १७६॥ और जैसे मैटक कूपके पासके पानीके गढेमें और पक्षी भरे हुए सरोवरको आते हैं, वैसेही सय सम्पत्तिया अपने आप उद्योगी पुरुपके पास आती है ॥ १७६ ॥ 1 - .. 1.- 5 'त्रलाभः १८३-१८८] भाषाटीकासमलंकृत । ५३." आजीविकाके लिये वहुत उद्योग नहीं करना चाहिये, वह तो विघाताने श्वय कर दी है, क्योंकि प्राणीके गर्भसे निकलतेही माताके वनोंसे दूध कलने लगता है ॥ १८२ ॥ पे च सखे!,- येन शुक्लीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृताः। मयूराश्चित्रिता येन स ते वृत्तिं विधास्यति ॥ १८३ ॥ और भी हे मित्र ! जिसने हसोंको सफेद, तोतोको हरा और मोरोंको विचित्र नाया है वही तेरी आजीविकाको देगा ॥ १८३ ॥ पर च, सतां रहस्यं शृणु, मित्र! और दूसरे-हे मित्र ! सज्जनोंका गुप्त मत्र सुन । जस्यन्यजने दुःखं तापयन्ति विपत्तिपु। मोहयन्ति च संपत्तौ कथमर्थाः सुखावहाः ॥ १८४ ॥ जो क्मानेने दुख जोर आपत्तियोंमें सताप करते हैं, और अधिक वढनेसे दाध कर देते ह ऐसे वन केसे सुखदायक हो सस्ते है ? ॥ १८४ ॥ पिरच,- धर्मार्थ वन्य वित्तहा वरं तस्य निरीहता। प्रक्षालनाद्धि पकत्य दूरादस्पर्शनं वरम् ॥ १८५ ॥ और वर्मके लिये जिसको धनकी इच्छा है, उनको वनकी लालसा न होना अच्छा है, क्योंकि कीचडको (छू कर) धोनेसेभी, उनका दूरसे स्पर्श न करनाही पच्छा है ॥ १८५ ॥ तः,- यथा शामिपमाकाशे पक्षिभिः श्वापदैर्भुवि । भक्ष्यते सलिले नस्तथा सर्वत्र वित्तवान् ।। १८६ ॥ वयोकि-जैसे आकाशमें पक्षी, पृथ्वी पर सिंह आदि, और जलमें मगर आदि मासको खाते हैं, वैसेही सर्वत्र धनवान् (ज्वारी चोर इत्यादिका भोजन) है, अर्थात् ये उसे टूटते ठगते हें ॥ १८६ ॥ राजतः सलिलादग्नेश्चोरतः स्वजनादपि।/ भयमर्थवतां नित्यं मृत्यो. प्राणभृतामिव ॥ १८७ ।। धनवानोंको राजा, जल, अमि, चोर, और अपने जनोंसे, हमेशा ऐसा (भय रहता कि जैमा प्राणियोंको मृत्युसे ।। १८७ ॥ तथा हि,- जन्मनि लेशबहुले किं नु दुःखमतः परम् । इच्छासंपद्यतो नास्ति यञ्चेच्छा न निवर्तते ॥ १८८ ॥ + of ह --- - हितोपदेश । [मित्रलाभः १८९-१३ और ( मनुष्यको ) जन्म लेने ही बहुत क्लेश है, इनसे अधिक दुख होगा कि जिसमें इच्छाके अनुसार सपत्ति नहीं है और जिसमें हर दूर होती है ॥ १८८॥ अन्यच्च भ्रातः! शृणु, धनं तावदसुलभं लब्धं कृच्छ्रेण रक्ष्यते । लब्धनाशो यथा मृत्युस्तस्मादेतन चिन्तयेत् ॥ १८२ 1 और दूसरे-हे भाई ! सुनो-पहिले तो धनका मितना कठिग, ओर में जाय तो फिर उसकी रखवाली कप्टसे होती है। और मिले हुए HER मन्युके समान है, इसलिये इरा(धनलाभ)की चिन्ता न करनी चाहिये । तृष्णां चेत् परित्यज्य को दरिदः क ईश्वरः । तस्याश्चत्मसरो दत्तो दास्यं च शिररी स्थितम् ॥ १९॥ और एम नगारमें तृष्णाको त्याग देनेसे तीन परिती और सीन धन और जो उसको भामाश दिया सोही रोगमाई शिर पर ही ॥१०॥ अपरं नान - गपहिचारोग ततो वाग्छा प्रवर्तते । मातार्थनः गोगा यतो याममा विर्तते ॥ २०१५ Tम होती है त लागीमाशा र पर वी3TT जाणतानिran 30t कि वरना पक्षपानेन? मयेर राहार कालोनीयताम। गरे पानी मेरी गाथा TIER, 1 N त्रलाभः १९४-१९५] भापाटीकासमलंकृत । ५५ 'FTE- श्लाघ्यः स एको भुवि भानवानां स उत्तमः सत्पुरुषः स धन्यः । यस्यार्थिनो वा शरणागता वा नाशाभिभङ्गाद्विमुखाः प्रयान्ति ॥ १९४ ॥ पृथ्वी पर पुरुषोंमें वही एक प्रशसा पानेके योग्य है, वही उत्तम सज्जन पुरुष और वही वन्य है कि जिसके पाससे याचक अथवा शरणागत लोक निराश कर विमुख नहीं फिर जाते हैं ॥ १९४ ॥ देवं ते खेच्छाहारविहारं कुर्वाणाः संतुष्टाः सुखं निवसन्ति' । तव वे इस प्रकार अपने इच्छानुसार खाते-पीते खेलते-कूदते सतोष कर | बसे रहने लगे। । अथ कदाचिच्चित्राङ्गनामा मृगः केनापि त्रासितस्तत्रागत्य मि- तः। ततः पश्चादायान्तं मृगमवलोक्य भयं संचिन्त्य मन्थरो 'लं प्रविष्टः, मूषिकश्च विवरं गतः। काकोऽप्युड्डीय वृक्षमारूढः। तो लघुपतनकेन सुदूरं निरूप्य भयहेतुर्न कोऽप्यायातीत्यालोचि- म् । पश्चात्तद्वचनादागत्य पुनः सर्वे मिलित्वा तत्रैवोपविष्टाः । न्थरेणोक्तम्-'भद्रम् , मृग! स्वागतम् । स्वेच्छयोदकाद्याहारो- नुभूयताम् । अत्रावस्थानेन वनमिदं सनाथीक्रियताम्।' चित्रागो ते-'लुब्धकत्रासितोऽहं भवतां शरणागतः । भवद्भिः सह स्यिमिच्छामि ।' हिरण्यकोऽवदत्-'मित्रत्वं तावदस्माभिः सह विताऽयत्नेन मिलितम् । ६ फिर एक दिन चित्रांग नाम मृग किसीके डरके मारे उनसे आ कर मिला. के पीछे मृगको आता हुआ देख भयको सोच मन्थर तो पानीमें घुस गया, हा विलेमें चला गया और काकभी उढ़ कर पेड़ पर जा बैठा। फिर लघुपतनकने रसे निर्णय करके कि, भयका कोईभी कारण नहीं है यह विचारा । पीछे सके वचनसे आकर सब मिल कर वहाही वैठ गये। मन्थरने कहा-'कुशल हो। मृग ! तुम्हारा आना अच्छा हुआ। अपनी इच्छानुसार जल आहार आदि पोग करो अर्थात् खाओ, पीओ और यहा रह कर इस वनको सनाथ करो' । चित्राग वोला-'व्याधके डरसे मैं तुम्हारी शरण आया हूँ और तुम्हारे साथ मेघता किया चाहता हू। हिरण्यक बोला-'मित्रता तो हमारे साथ तुम्हारी अनायाम हो गई है, रतः औरसं कृतसंवन्धं तथा वंशक्रमागतम् ! रक्षितं व्यसनेभ्यश्च मित्रं ज्ञेयं चतुर्विधम् ।। १९५ ॥ क्योंकि-मित्र चार प्रकारके होते हैं, एक तो औरस अर्थात् जन्मसेही हों जैसे पुत्रादि, और दूसरे विवाहादि सवन्धसे हो गये हों और तीसरे कुल-पर- म्परा से आए हुए हों, और चौघे वे जो आपत्तियोंसे वचावें ॥ १९५ ॥ -- हितोपदेश । [मित्रलाभः १८९-१ और ( मनुष्यको ) जन्म लेने ही बहुत क्लेश है, इससे अधिक और दुख होगा कि जिसमे इच्छाके अनुसार सपत्ति नहीं है और जिसमें इच्छा दूर होती है ॥ १८८॥ अन्यच्च भ्रातः! श्णु, धनं तावदसुलभं लब्धं कृच्छ्रेण रक्ष्यते । लव्धनाशो यथा मृत्युस्तस्मादेतन चिन्तयेत् ॥ १८९ और दूसरे हे भाई ! सुनो-पहिले तो वनका मिलना कठिन, और मि जाय तो फिर उसकी रखवाली कष्टसे होती है । और मिले हुए घनश्य मृत्युके समान है, इसलिये इस(धनलाभ)की चिन्ता न करनी चाहिये ॥१ तृष्णां चेह परित्यज्य को दरिद्रः क ईश्वरः। तस्याश्चेत्प्रसरो दत्तो दास्यं च शिरसि स्थितम् ॥ १९ और इस ससारमें तृष्णाको त्याग देनेसे कौन दरिद्री और कौन वनवान् और जो उसको अवकाश दिया सोही सेवकाई शिर पर बैठी है ॥ १९० ! अपर च,- यद्यदेव हि वाञ्छेत ततो वाञ्छा प्रवर्तते । प्राप्त एवार्थतः सोऽर्थो यतो वाञ्छा निवर्तते ॥ १९१ और जब जिस वस्तुमें इच्छा होती है तब उसके लाभकी आशा होत और जब वह वस्तु किसी उपायसे मिल जाय तव इच्छा निवृत्त होती है ॥११ कि बहुना पक्षपातेन ? मयैव सहात्र कालो नीयताम् । और मेरे अधिक पक्षपातसे क्या है ? मेरेही साथ यहां समय विताओ, यतः,- आमरणान्ताः प्रणयाः कोपास्तत्क्षणभङ्गुराः। परित्यागाश्च निःसङ्गा भवन्ति हि महात्मनाम् ॥ १९ क्योंकि-महात्माओंका नेह मरने तक, क्रोध क्षणमात्र तक और पारेर केवल सगरहित होता है अर्थात् कुछ बुराई नहीं करते हैं ॥ १९२ ॥ इति श्रुत्वा लघुपतनको ब्रूते-'धन्योऽसि मन्थर! सर्वथा श्ला गुणोऽसि । यह सुन कर लघुपतनक वोला-'हे मन्थर ! तुम धन्य प्रशसनीय गुणवाले हो! यतः,- सन्त एव सतां नित्यमापदुद्धरणक्षमाः। गजानां पदमनानां गजा एव धुरंधराः॥ २९३॥ क्योंकि-वजनही सजनोंकी आपत्तिको सर्वदा दूर करनेके योग्य होते हैं। कीचड़ने पसे हुए हाथियोंके निकालनेके लिये हाथीही समर्थ होते है ॥ १९ और

चलाभः १९४-१९५] भापाटीकासमलंकृत ।
श्लाघ्यः स एको भुवि मानवानां
स उत्तमः सत्पुरुषः स धन्यः ।
यस्यार्थिनो वा शरणागता वा
नाशाभिभङ्गाद्विमुखाःप्रयान्ति ॥ १९४ ॥
पृथ्वी पर पुरुषोंमें वही एक प्रशसा पानेके योग्य है, वही उत्तम सज्जन पुरुप
और वही वन्य है कि जिसके पाससे याचक अथवा शरणागत लोक निराश
कर विमुख नहीं फिर जाते हैं ॥ १९४ ॥
देवं ते स्वेच्छाहारविहारं कुर्वाणाः संतुष्टाः सुखं निवसन्ति' ।
तव वे इस प्रकार अपने इच्छानुसार खाते-पीते खेलते-कूदते सतोप कर
बसे रहने लगे।
अथ कदाचिच्चित्राङ्गनामा मृगः केनापि त्रासितस्तत्रागत्य मि-
तः। ततः पश्चादायान्तं मृगमवलोक्य भयं संचिन्त्य मन्थरो
लं प्रविष्टः, मूपिकश्च विवरं गतः। काकोऽप्युट्टीय वृक्षमारूढः।
तो लघुपतनकेन सुदूरं निरूप्य भयहेतुर्न कोऽप्यायातीत्यालोचि-
म् । पश्चात्तद्वचनादागत्य पुनः सर्वे मिलित्वा तत्रैवोपविष्टाः।
न्थरेणोक्तम्-'भद्रम् , मृग! स्वागतम् । स्वेच्छयोदकाद्याहारो-
नुभूयताम् । अत्रावस्थानेन वनमिदं सनाथीक्रियताम्।' चित्राङ्गो
ते-'लुब्धकत्रासितोऽहं भवतां शरणागतः । भवद्भिः सह
ख्यिमिच्छामि।' हिरण्यकोऽवदत्-'मित्रत्वं तावदस्माभिः सह
वताऽयत्नेन मिलितम् ।
फिर एक दिन चित्राग नाम मृग किसीके डरके मारे उनसे आ कर मिला.
उके पीछे मृगको आता हुआ देख भयको सोच मन्थर तो पानीमें घुस गया,
हा विटेमें चला गया और काकभी उढ़ कर पेड़ पर जा बैठा। फिर लघुपतनकने
से निर्णय करके कि, भयका कोईभी कारण नहीं है यह विचारा। पीछे
सके वचनसे आकर सब मिल कर वहाही वैठ गये। मन्थरने कहा-'कुशल हो।
: मृग ! तुम्हारा आना अच्छा हुआ। अपनी इच्छानुसार जल आहार आदि
ग करो अर्थात् खाओ, पीजो और यहा रह कर इस वनको सनाथ करो' ।
वत्राग वोला-'व्याधके डरसे में तुम्हारी शरण आया हू और तुम्हारे साथ
त्रिता किया चाहता हूं। हिरण्यक बोला-'मित्रता तो हमारे साथ तुम्हारी
तनायास हो गई है,
औरसं कृतसंवन्धं तथा वंशक्रमागतम् !
रक्षितं व्यसनेभ्यश्च मित्रं ज्ञेयं चतुर्विधम् ॥ १९५ ॥
क्योंकि-मित्र चार प्रकारके होते है, एक तो औरस अर्थात् जन्मसेही हों
से पुत्रादि, और दूसरे विवाहादि सवन्धते हो गये हों और तीसरे कुल-पर-
परा से आए हुए हों, और चौथे वे जो आपत्तियोंसे वचावे ॥ १९५ ॥

हितोपदेश । [ मित्रलाभः १९६-१९४/
तत्रभवता स्वगृहनिर्विशेषं स्थीयताम्' । तच्छ्रुत्वा मृगः सानन्दो
भूत्वा खेच्छाहारं कृत्वा पानीयं पीत्वा जलासनतरुच्छायाया
मुपविष्टः। अथ मन्थरेणोक्तम्-'सखे मृग! एतस्मिन्निर्जने वने
केन नासितोऽसि? कदाचित्किं व्याधाः संचरन्ति ?' मृगेणो
कम्-'अस्ति कलिगविपये रुक्माङ्गदो नाम नरपतिः । सत्र
दिग्विजयव्यापारक्रमेणागत्य चन्द्रभागानदीतीरे समावासित
कटको वर्तते । प्रातश्च तेनानागत्य कर्पूरसर.समीपे भवितव्य
मिति व्याधानां मुखात्किंवदन्ती श्रूयते । तदापि प्रातरवस्थान
भयहेतुकमित्यालोच्य यथावसरकार्यमारभ्यताम्' । तच्छुत्या कूर्म
समयमाह-'जलाशयान्तर गच्छामि। काकमृगावायुक्तवन्तौ-
'एवमस्तु' । ततो हिरण्यको विहस्याह-'जलाशयान्तरे प्राते
मन्थरस्य कुशलम् । स्थले गच्छतः कः प्रतीकार.?
इसलिये यहा तुम अपने घरसेभी अधिक आनन्दसे रहो। यह सुन कर मृग
प्रसन्न हो अपनी इच्छानुसार भोजन करके तथा जल पी कर जल्के पास वृक्षने
छायामे बैठ गया ॥ मन्थरने कहा कि-'हे मित्र मृग! इस निर्जन वनमें तुम्हे
किसने डराया है ? क्या कभी कभी व्याध आ फिरते हैं ?' । मृगने कहा-'कटिन
देशमें रुक्मागद नाम राजा है। और वह दिग्विजय करनेके लिये आ जर
चन्द्रभागा नदीके तीर पर अपनी सेनाको टिका कर ठहरा है। और प्रात काल
वह यहा आ कर कर्पूरसरोवरके पास ठहरेगा यह उडती हुई वात वहेलियार
मुखसे सुनी जाती है। इसलिये प्रात काल यहा रहनाभी भयका कारण है।
यह सोच कर समयके अनुसार काम करना चाहिये । यह सुन कर कछुआ र
कर वोला-मैं तो और सरोवरको जाता है। काग और मृगनेभी कहा-'ऐसाहा
होय अर्थात् चलो'। फिर हिरण्यक हँस कर बोला-'दूमरे सरोवर में पहुचने पर
मयर जीता बचेगा। परतु इसके पटपड़मे चल्नेका कौनसा उपाय है।
।
2
यतः,-
अम्भांसि जलजन्तूनां दुर्ग दुर्गनिवासिनाम् ।
स्वभूमिः श्वापदादीनां राक्षा मन्त्री पर बलम् ॥ १९६॥
क्योंकि-जलके जन्तुओंको जलका, गढमे रहने वालोंको गढका, सिंहादि वन
चरोंको अपनी भूमिका, और राजाओंको मत्रीका, परम बल होता है ॥१९॥
सखे लघुपतनक ! अनेनोपदेशेन तथा भवितव्यम् ,
हे सखे लघुपतनक ! इस उपदेशसे वह गति होगी,
स्वयं वीक्ष्य यथा वध्वाः पीडितं कुचकुडालम् ।
वणिक्पुत्रोऽभवहुःखी त्वं तयैव भविष्यसि' ॥ १९७ ॥
जैसे कि एक बनियका पुत्र आपही अपनी स्त्रीके कमलकी क्लीके समान
कुच (दूसरेको) नसते हुए देख कर दुखी हुआ, वैसेही तुम भी होगे ॥१९॥

त्रलाभः १९८-१९९] भापाटीकासमलंकृत । ५७ - . ऊचुः। 'कथमेतत् ?' हिरण्यकः कथयति- वे दोनो पूछने लगे-'यह कथा कैसी है ' हिरण्यक कहने लगा- ॥ कथा ७॥ अस्ति कान्यकुजविपये वीरसेनो नाम राजा। तेन वीरपुर- नि नगरे तुगवलो नाम राजपुत्रो भोगपतिः कृतः। स च हाधनस्तरुण एकदा खनगरे भ्राम्यन्नतिप्रौढयौवनां लावण्य- तीं नाम वणिक्पुत्रवधूमालोकयामास । ततः स्वहर्म्य गत्वा मराकुलमतिस्तस्याः कृते दूतीं प्रेषितवान् । कान्यकुब्ज देशमें एक वीरसेन नाम राजा था। उसने वीरपुर नाम नगरमें गवल नाम राजपुत्रको युवराज कर दिया था। उस ब धनवान् तरुणने एक इन नगरमे फिरते हुए एक नव-यौवनवती लावण्यवती नाम वनियेकी पुत्र- धूको देखा। फिर अपने राजभवन में जा कर कामान्ध हो उसके लिये दूती जी. यतः,- सन्मार्गे तावदास्ते प्रभवति पुरुपस्तावदेवेन्द्रियाणां लज्जा तावद्विधत्ते विनयमपि समालम्वते तावदेव । भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथगता नीलपक्ष्माण एते यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुपो दृष्टिवाणाः पतन्ति ॥ क्योंकि-पुरुष तभी तक अच्छे मार्गमें रहता है, तभी तक इन्द्रियों को वशमै रखता है, तभी तक लजा रखता है, और तभी तक नम्रताका सहारा करता है, कि, जव तक सुन्दर सुन्दर स्त्रियोंको भौंहरूपी धनुपसे खींच कर छोड़े गये और कानके मार्ग तक खींचे गये, वैर्यको तोडने वाले ये नीले पलकवाले नेत्ररूपी वाण हृदयमें नहीं लगते हैं ॥ १९८ ॥ सापि लावण्यवती तवलोकनक्षणात्प्रभृति स्मरशरमहारजर्ज- रितहृद्या तदेकचित्ताभवत् । उस लीलावतीनेभी जिम समयसे उसे देखा था उसी क्षणसे कामदेवके वाणोंके प्रहारसे जिसका हृदय छिद गया था ऐसी वह उसीके ध्यानमें लौलीन हो गई। तथा झुकम्, असत्य साहसं माया मात्सर्य चातिलुब्धता। निर्गुणत्वमशौचत्वं स्त्रीणां दोपाः स्वभावजाः ॥ १९९ ॥ जैसा वहा भी है-झूठ, साहस, छल, ईर्पा, अत्यन्त लोभ, निर्गुणता और अशुद्धता, ये दोष त्रियोंके खभावहीसे होते हैं। १९९ ॥ १ यह शोक दो पक्षमें लगता है अर्थात् धनुप और स्त्रीपक्षमें । धनुप और भोएकी, नीलपलक और नीले पखकी, और नेत्र और वाणकी समता है.

५८ हितोपदेश । [ मित्रलाभः २००-२० अथ दूतीवचनं श्रुत्वा लावण्यवत्युवाच-'अहं पतिव्रता का मेतस्मिन्नधर्म पतिलचन्ने प्रवर्ते ? फिर दूतीकी बात सुन कर लावण्यवती बोली-'में पतिनता हू, पतिके अन्य करने वाले इस अधर्ममें कैसे प्रवृत्त होऊ 2 यतः,- सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रजावती। सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता ॥ २०॥ क्योंकि-जो गृहस्थाश्रमके कार्यमें कुशल, पुत्रवती, पतिको प्राणों के सम्म समझने वाली, तथा पतिव्रता है वह 'भार्या' कहाती है ॥ २०० ॥ न सा भार्येति वक्तव्या यस्या भर्ता न तुष्यति । तुष्टे भर्तरि नारीणां संतुष्टाः सर्वदेवताः ॥ २०१ ॥ जिससे पति सतुष्ट न हो वह भार्या नहीं कहाती है, क्योंकि त्रियोंके पर सतुष्ट होनेसे सब देवता सतुष्ट होते हैं ॥ २०१॥ ततो यद्यदादिशति मे प्राणेश्वरस्तदेवाहमविचारितं करोमि । दूस्योक्तम्-'सत्यतममेतत् ।' लावण्यवत्युवाच-ध्रुवं सत्यमेतत्। ततो दूतिकया गत्वा तत्तत्सर्व तुगवलस्याने निवेदितम् । तच्चुला तुङ्गवलोऽब्रवीत्-'विषमेषुणा ब्रणितहृदयस्तां विना कथमा जीविष्यामि ?' कुट्टन्याह-वामिनानीय समर्पयितव्येति । प्राह-कथमेतच्छक्यम् ?' कुट्टन्याह--उपायः क्रियताम् । इसलिये जो जो मेरा पति मुझे आज्ञा देता है उसे विना विचार करतो दूती बोली-'यह वात बहुत सम्धी है ॥' लावण्यवतीने कहा-'वास्तवमें सच्ची है। फिर दूतीने जा कर यह सव समाचार तुगवलके आगे जताया ॥ वह सुन । तुगवलने कहा-'तीक्ष्ण वाणसे टुकडे टुकड़े हुए हृदय वाला मै उसके विना ।। जिऊंगा' दूतीने कहा-'उसका पति लाकर सौंप देगा.' उसने कहा-'यह हो सकता है' कुटनी बोली-'उपाय कीजिये, तथा चोक्तम्,- उपायेन हि यच्छक्यं न तच्छक्यं पराक्रमैः। शृगालेन हतो हस्ती गच्छता पङ्कवर्मना' ॥ २०२॥ जैसा कहा भी है जो वात उपायसे हो सकती है वह पराकमसे नहीं सकती है, जैसे कीचडके मार्गसे जाते हुए हाथीको सियारने मार डाला' ॥२. राजपुत्रः पृच्छति'कथमेतत् ?' सा कथयति- राजपुत्र पूछने लगा-'यह कथा कैसी है ?' वह कहने लगी- || कथा ८॥ अस्ति ब्रह्मारण्ये कर्पूरतिलको नाम हत्ती । तमवलोम सर्वे शृगालाश्चिन्तयन्ति स्म-'यद्ययं केनाप्युपायेन नियत तदासाकमेतदेहेन मासचतुष्टयस्य भोजनं भविष्यति । तत्रै वृदगालेन प्रतिशातम्-'मया बुद्धिमभावादस्य मरणं साय २ - न - लाभः २०३-२०६] भाषाटीकासमलंकृत। ५९ ? व्यम् ।' अनन्तरं स वञ्चकः कर्पूरतिलकसमीपं गत्वा रागपातं प्रणम्योवाच-'देव! दृष्टिप्रसादं कुरु' । हस्ती -~-'कस्त्वम् ? कुतः समायातः ?' सोऽवदत्-'जम्बुकोऽहम् । विनवासिभिः पशुभिर्मिलित्वा भवत्सकाशं प्रस्थापितः यद्विना वस्थातुं न युक्तम्, तदात्राटवीराज्येऽभिपेक्तुं भवान् सर्व- मिगुणोपेतो निरूपितः। ब्रह्मवनमें कर्पूरतिलक नाम हाथी या । उसको देख कर सब गीदडोंने सोचा यह किसी उपायसे मारा जाय तो उसकी देहसे हमारा चार महीनेका भोजन ।' उनमेंसे एक बूढ़े गीदड्ने इस वातकी प्रतिज्ञा करी-'मैं इसे बुद्धिके वलसे गा। फिर उस चूर्तने कर्पूरतिलक हाथीके पास जा कर साष्टांग प्रणाम करके -'महाराज ! कृपादृष्टि कीजिये।' हाथी वोला-'तू कौन है ? कहासे पा है । वह बोला-'मैं गीदड़ हूं, सव वनके रहने वाले पशुओंने पचायत के आपके पास भेजा है, कि विना राजाके यहा रहना योग्य नहीं है लिये इस वनके राज्य पर राजाके सब गुणोंसे शोमायमान आपको राजतिलक नेका निश्चय किया है. यः कुलाभिजनाचारैरतिशुद्धः प्रतापवान् । धार्मिको नीतिकुशलः स स्वामी युज्यते भुवि ॥ २०३॥ क्योंकि जो कुलाचार और लोकाचारमें निपुण होय तथा प्रतापी, धर्मशील, र नीतिमें कुशल हो वह पृथ्वी पर राजा होनेके योग्य होता है ॥ २०३ ॥ पर च पश्य,- राजानं प्रथम विन्देत्ततो भार्या ततो धनम् । राजन्यसति लोकेऽसिन्कुतो भार्या कुतो धनम् ? ॥२०४॥ और देखो-पहिले राजाको हृहना चाहिये, फिर स्त्री और उसके बाद वनको इ, क्योंकि राजाके नहीं होनेसे इस दुनियामें कहासे स्त्री और कहासे धन ल सकता है । ॥ २०४॥ न्यच,- पर्जन्य इव भूतानामाधारः पृथिवीपतिः। विकलेऽपि हि पर्जन्ये जीव्यते न तु भूपती ॥ २०५॥ और दूसरे-राजा, प्राणियोंको मेघके समान जीवनका सहारा है और मेधके ही बरसनेसे तो लोक जीता रहता है, परन्तु राजाके न होनेसे जी नहीं हता ह॥२०५॥ नियतविपयवर्ती प्रायशो दण्डयोगा- जगति परवशेऽस्मिन्दुर्लभः साधुवृत्तः। कृशमपि विकलं वा व्याधितं वाऽधन वा पतिमपि कुलनारी दण्डभीत्याभ्युपैति । २०६॥ .

६० हितोपदेश । [मित्रलाभः २० इस परवश (अर्थात् राजाके आधीन ) इस संसारम बहुधा दडके भर लोग अपने नियत कार्योंमें लगे रहते है और नहीं तो अच्छे आचरणमें न ध्योंका रहना कठिन है। क्योंकि दडकेही मयसे कुलकी स्त्री दुवले, विका (अर्थात् लगड़े लूले ) रोगी या निर्धनभी पतिको खीकार करती है ॥ २०, तद्यथा लग्नवेला न विचलति तथा कृत्वा सत्वरमागम्यतां देवेन इत्युक्त्वोत्थाय चलितः। ततोऽसौ राज्यलोभाकृष्टः कर्पूरतिला शृगालवर्मना धावन्महापड़े निमग्न । ततस्तेन हस्तिनोकम् । 'सखे शृगाल! किमधुना विधेयम् ? पङ्के निपतितोऽहं निये परावृत्य पश्य गालेन विहस्योक्तम्-'देव! मम पुच्छकावलम्म कृत्वोत्तिष्ठ । यन्मद्विधस्य वचसि त्वया प्रत्ययः कृतस्तदनुभूयद मशरणं दुःखम् । इस लिये, जिसमें लमकी घी न टल जाय शीघ्र आप पधारिये । यह उठ कर चला फिर यह कर्पूरतिलक राज्यके लोभमें फँस कर शृगालके पीछे ८ दौड़ता हुआ गाडी कीचडमें फँस गया। फिर उस हाथीने कहा-'मित्र गीदा अव क्या करना चाहिये ? कीचड़में गिर कर मैं मरता हू। लौट कर देख।' गीदार हस कर कहा-'महाराज ! मेरी पूंछका सहारा पकड़ कर उठो, जैसा मुझ सरीख बात पर विश्वास किया तैसा शरणरहित दुख भुगतो । तथा चोक्तम्,- यदाऽसत्सगरहितो भविष्यसि भविष्यसि । तदाऽसजनतोष्ठीषु पतिष्यसि पतिष्यसि ॥ २०७॥ जैसा कहा है-जव बुरे सगसे बचोगे तब जानो जिओगे, और जो दुग। सगतमें पडोगे तो मरोगे ॥ २०७॥ ततो महापङ्के निमग्नो हस्ती गालभैक्षितः । अतोऽहं ब्रवीमि- "उपायेन हि यच्छक्यम्" इत्यादि । ततः कुट्टिन्युपदेशेन तं चार दत्तनामानं वणिक्पुत्रं स राजपुत्रः सेवकं चकार । ततोऽसौ तेत्र सर्वविश्वासकार्येषु नियोजितः। फिर वडी कीचडमें फंसे हुए हाथीको गीदडोंने खा लिया ! इसलिये मैं म ता हू-कि "उपायसे जो हो सकता है" इत्यादि फिर उस राजपुत्रने कुटना उपदेशसे चारुदत्त नाम वनियेके पुत्रको सेवक बनाया। पीछे इसको उसने सर विश्वासके कार्योंमें नियुक्त कर दिया. एकदा तेन राजपुत्रेण खातानुलिप्तेन कनकरत्नालंकार धारिणा प्रोक्तम्-'अद्यारभ्य मासमेकं गौरीव्रतं कर्तव्यम् । तदा प्रतिरात्रमेकां कुलीनां युवतीमानीय समर्पय । सा मया यथो चितेन विधिना पूजयितव्या ।' ततः स चारुदचस्तथाविध नवयुवतीमानीय समर्पयति । पश्चात्प्रच्छन्नः सन्किमयं करो वीति निरूपयति । स च तुझ्वलस्तां युवतीमस्पृशन्नेव दूर - । "त्रलाभः ] भाषाटीकासमलंकृत। नालंकारगन्धचन्दनः संपूज्य रक्षकं दत्त्वा प्रस्थापयति । य वणिकपुत्रेण तद्दष्ट्रोपजातविश्वासेन लोभाकृष्टमनसा खवधू- वण्यवती समानीय समर्पिता। स च तुङ्गवलस्तां हृदयप्रियां वण्यवतीं विज्ञाय ससंभ्रममुत्थाय निर्भरमालिङ्गय निमीलि- क्षः पर्यङ्के तया सह विललास । तदालोक्य वणिक्पुत्रश्चित्र- खित इवेतिकर्तव्यतामूढः परं विपादमुपगतः । अतोऽहं वीमि-"स्वयं वीक्ष्य" इत्यादि । तथा त्वयापि भवितव्यम्' ते । तद्धितवचनमवधीर्य महता भयेन विमुग्ध इव तं लाशयमुत्सृज्य मन्थरश्चलितः । तेऽपि हिरण्यकादयः हादनिष्टं शङ्कमाना मन्थरमनुगच्छन्ति । ततः स्थले गच्छन्के- पि व्याधेन काननं पर्यटता मन्थरः प्राप्तः । प्राप्य तं गृहीत्वो- गप्य धनुपि ववा भ्रमन्क्लेशात्क्षुत्पिपासाकुलः स्वगृहाभिमुखं लितः। अथ मृगवायसमूपकाः परं विपादं गच्छन्तस्तमनुजग्मुः। एक दिन कुट्टनीके उपदेशसे उस राजपुत्रने न्हा धो कर और देहमे चन्दन दि सुगन्ध द्रव्य लगा कर और सुवर्णके रत्नजटित आभूपणोंको पहिर कर हा-'चारुदत्त! आजसे लेकर एक मास तक मुझे पार्वतीजीका व्रत करना है। पलिये आजसे यहां निल रातको एक कुलीन जवान स्त्री मुझे ला दिया कर, उसकी यथोचित रीति पूजा करूगा' ॥ फिर वह चारुदत्त वैसीही नव- वान स्त्री ला कर दिया करता था। पीछे आप छुप कर देखता रहता था, कि ह क्या करता है और वह तुगवल उस जवान स्त्रीको विनाही छुए दूरसे वस्त्र, भूपण, गन्ध चन्दनादिसे पूजा करके और रखवाला साथ दे कर विदा कर या करता था। फिर उस वनियेके पुत्रने यह देख विश्वाससे और चित्तमें भके मारे अपनी स्त्री लावण्यवती ला कर दे दिया। और उस तुगवलने उसे गणप्यारी लावण्यवती जान कर शीघ्रताले उठ गाढा आलिंगन कर आनन्दसे 'त्रोंको कुछ वन्द-सा वर पलग पर उसके साथ विलास किया। यह देख कर नियेका वेटा चित्र लिखेके समान हो कर इस मार्यमें मूर्ख वन अधिक दुखी आ। इसलिये मैं कहता हू कि, "आप देख कर" इत्यादि । और तुम भी वैसेही खी होगे। उसके हितकारक वचनको न मान कर बड़े भयले मूर्खकी भाति वह पन्थर उस सरोवरको छोड़ कर चला। वे हिरण्यक आदिमी नेहसे विपत्तिकी मन्थरके पीछे पीछे चले। फिर पटपड़में जाते हुए मन्थरको, इनमें घूमते हुए किसी व्याधसे पाया। वह उसे पा कर और उठा कर धनुपमें राध घूमता हुआ देशते उत्पन्न हुई क्षुधा और प्याससे व्याकुल, अपने घरकी ओर चला। पीछे मृग, वाक और चूहा, ये वटा विपाद करते हुए उसके पीछे जीछे चले. । वा करते ६ हितो.

६२ हितोपदेश । [ मित्रलाभः २०८-२ - ततो हिरण्यको विलपति- 'एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य । तावद्वितीयं समुपस्थितं मे छिद्रेष्वनर्थी बहुलीभवन्ति ॥ २०८ ॥ फिर हिरण्यक विलाप करने लगा-'समुद्रके पारके समान नि सीन दु खके पार जब तक मैं नहीं जाता हू तव तक मेरे लिये दूसरा दुख । कर उपस्थित हो जाता है, क्योंकि अनर्थ (आपत्ति)के साथ बहुत-से अनव पडते है ॥ २०८॥ स्वाभाविकं तु यन्मित्रं भाग्येनैवाभिजायते । तदकृत्रिमसौहार्दमापत्स्वपि न मुञ्चति ॥ २०९ ॥ खभावसे नेह करने वाला (अकृत्रिम) मित्र तो प्रारब्यसेही मिलता है जो सच्ची मित्रताको आपत्तियोंमेंभी नहीं छोड़ता है ॥ २०९ ॥ न मातरि न दारेषु न सोदर्ये न चात्मजे । विश्वासस्तादृशः पुंसां यादृडिमने स्वभावजे' ॥ २१०३ न मातामें, न स्त्रीमें, न सगे भाईमें, और न पुत्रमें ऐसा विश्वास होता है। जैसा खाभाविक मित्रमें होता है ॥२१०॥ इति मुहुर्विचिन्त्य 'अहो दुर्दैवम् ! ये वारवार सोच कर (बोला)-'अहो दुर्भाग्य है ! यतः,- खकर्मसंतानविचेष्टितानि कालान्तरावर्तिशुभाशुभानि । इहैव दृष्टानि मयैव तानि जन्मान्तराणीव दशान्तराणि ॥ २११ ॥ क्योंकि इस संसारमें अपने पापपुण्योंसे किये गये और समयके उस पलटसे बदलने वाले सुखदु ख, पूर्वजन्मके किये हुये पापपुण्यके फलके सना । मैंने यहाही देख लिये ॥ २११॥ अथवेत्थमेवैतत्, कायः संनिहितापायः संपदः पदमापदाम् । समागमाः सापगमाः सर्वमुत्पादि भगुरम् ॥ २१२ ॥ अथवा यह ऐसेही है-शरीरके पासही उसका नाश है और सपत्तिया मा त्तियोंका मुख्य स्थान हैं और सयोगके साथ वियोग है, अर्थात् अस्थिर है और उत्पन्न हुआ सब नाश होने वाला है ॥ २१२ ॥ पुनर्विमृश्याह- 'शोकारातिभयवाणं प्रीतिविधम्भभाजनम् । केन रत्तमिदं सृष्टं 'मित्र'मित्यक्षरद्वयम् ॥ २१३ ॥ और विचार कर बोला-'शोक, और शत्रुके भयसे बचाने वाला, तथा : और विश्वासका पात्र, यह दो अक्षरका 'मिन रूपी रन किसने रचा ॥२१॥ - सत्रलाभः २१४ ] भाषाटीकासमलंकृत। 17 देने वाला मित्रं प्रीतिरसायनं नयनयोरानन्दनं चेतसः पात्रं यत्सुखदुःखयोः सह भवेन्मित्रेण तदुर्लभम् । ये चान्ये सुहृदः समृद्धिसमये द्रव्याभिलापाकुला- स्ते सर्वत्र मिलन्ति तत्त्वनिकपनावा तु तेषां विपत् ॥२१॥ और अजनके समान नेत्रोंको प्रसन्न करने वाला, चित्तको आनन्द र मित्रके साथ सुखदु खमें साथ देने वाला, अर्थात् दु खमें दु खी, सुखमें सुखी ऐसा मित्र होना दुर्लभ है, और सपत्ति(चलती)के समयमै धन हरने वाले नहर जगह मिलते है, परन्तु विपत्कालही उनके परखनेकी कसौटी है ॥२१४॥ इति बहु विलप्य हिरण्यकश्चित्राङ्गलघुपतनकावाह-'यावयं साधो वनान्न निःसरति तावन्मन्थरं मोचयितुं यत्नः क्रियताम् ।' चतुः-सत्वरं कार्यमुच्यताम् ।' हिरण्यको ब्रूते-'चित्राङ्गो लसमीपं गत्वा मृतमिवात्मानं दर्शयतु । काकश्च तस्योपरि थत्वा चश्वा किमपि विलिखतु । नूनमनेन लुब्धकेन तव च्छपं परित्यज्य मृगमांसार्थिना सत्वरं गन्तव्यम् । ततोऽहं न्थरस्य वन्धनं छेत्स्यामि । संनिहिते लुब्धके भवद्भयां लायितव्यम् ।' चित्राङ्गलघुपतनकाभ्यां शीघ्रं गत्वा तथानुष्ठिते ति स व्याधः श्रान्तः पानीयं पीत्वा तरोरधस्तादुपविष्टस्तथा- धिं मृगमपश्यत् । ततः कर्तरिकामादाय प्रहृष्टमना मृगान्तिकं लितः। तत्रान्तरे हिरण्यकेनागत्य मन्थरस्य वन्धनं छिन्नम् । | कूर्मः सत्वर जलाशयं प्रविवेश । स मृग आसन्नं तं व्याधं लोक्योत्थाय पलायितः। प्रत्यावृत्य लुब्धको यावत्तरुतलमा- जाति तावत्कूर्ममपश्यन्नचिन्तयत्-'उचितमेवैतन्ममासमीक्ष्य- कारिण। इस प्रकार वहुत-सा विलाप करके हिरण्यकने चित्राग और लघुपतनकसे हा-'जव तक यह व्याध वनसे न निकल जाय तव तक मन्यरको छुड़ानेका यन रो।' वे दोनों वोटे-'शीघ्र कार्यको कहिये। हिरण्यक वोला-'चित्राग जलके पास जा कर मरेके समान अपना शरीर दिखावे और काक उस पर वैठके चोंचसे हछ कुछ खोदें, यह व्याध कछुएको अवश्य वहा छोड़ कर मृगके मासका लोभसे "शीघ्र जायगा। फिर में मन्थरके वचन काट डालूगा । और सव व्याध तुम्हारे पास आवे तव भाग जाना। जव चित्राग और लघुपतनकने शीघ्र जा कर वसाही किया तब उस व्यावने पानी पी कर एक पेड़के नीचे बैठ कर मृगको उस प्रकार देखा । फिर छुरी लेकर आनदित होकर मृगके पास गया। इतनेहीने हिरण्यकने आ कर क्लुएका बंधन काट डाला। तव वह कछुआ सीघ्र सरोवरने घुस गया । वह मृग उस व्याधको पास देख उठ कर भाग गया। -- हितोपदेश । [मित्रलाभः २१५-६ जव व्याध लौट कर पेड़के नीचे आया, तब कछुएको न देख कर चिंता लगा-'मेरे समान विना विचार करने वालेके लिये यही उचित था। यतः- यो ध्रुवाणि परित्यज्य अधुवाणि निपेवते । ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति अध्रुवं नष्टमेव हि ॥ २१५ ॥ क्योंकि जो निश्चितको छोड़ अनिश्चित पदार्थका आसरा करता है निश्चित पदार्थ नष्ट हो जाते हैं, और अनिश्चितमी जाता रहता है' ॥ २' ततोऽसौ स्वकर्मवशानिराशः कटकं प्रविष्टः । मन्थरायः त्यक्तापदः स्वस्थानं गत्वा तथा सुखमास्थिताः॥ फिर वह अपने प्रारब्धको दोष लगाता हुआ निराश होकर अपने घर मंथर आदिमी सव आपत्तिसे निकल अपने अपने स्थान पर जा कर सुखले लगे। “अथ राजपुत्रैः सानन्दमुक्तम्-'सर्व श्रुतवन्तः सुखिनो वय सिद्धं नः समीहितम् ।' विष्णुशर्मोवाच-एतावता भवतान लषितं संपन्नम्। पीछे राजपुत्र प्रसन्न होकर कहने लगे-'हमने सव सुना और सुती हमारा कार्य सिद्ध हुआ। विष्णुशर्मा वोले-'इतना आपका मनोरथ पूरा हुआ अपरमपीदमस्तु- मित्रं प्रामुत सजना जनपदैर्लक्ष्मीः समालम्व्यतां भूपालाः परिपालयन्तु वसुधां शश्वत्स्वधर्मे स्थिताः। आस्तां मानसतुष्टये सुकृतिनां नीतिनवोढेव वः कल्याणं कुरुतां जनस्य भगवाश्चन्द्रार्धचूडामणिः ॥२२ इति हितोपदेशे मित्रलाभो नाम प्रथमः कथासंग्रहः समाप्त यह औरमी होय-सज्जन लोग मित्रको पावे, नगरनिवासी लक्ष्मीको राजा लोग सदा अपने धर्ममे रह कर पृथ्वीको रक्षण करें, आपकी नीति नवा स्त्रीके समान पण्डितोंके चित्तको प्रसन्न करें और भगवान् महादेवजी आ कल्याण करें ।। २१६ ॥ प० रामेश्वरभट्टका किया हुआ हितोपदेश ग्रंथके मित्रलाभ नामक पहि अध्यायका भाषा अनुवाद समाप्त हुआ शुभम्

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हितोपदेशः।
॥ सुहृद्भेदः २॥
अथ राजपुत्रा ऊचुः-'आर्य! मित्रलाभः श्रुतस्तावदसाभिः ।
पनी सुहृद्भेदं श्रोतुमिच्छामः ।' विष्णुशावाच-'सुहृद्भेद
वच्छृणुत,
फिर राजपुत्र बोले कि-'गुरुजी ! मित्रलाभ तो हम सुन चुके, अब सुहृद्भेद
I चाहते हैं।' विष्णुशर्मा वोले-'सुहृद्भेद सुनिये,
स्यायमाद्यः श्लोकः-
वर्धमानो महास्नेहो मृगेन्द्रवृपयोर्वने ।
पिशुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः' ॥१॥
उसका पहिला वाक्य यह है-वनमें सिंह और वैलका वडा स्नेह वढ गया
उसे धूर्त और अति लोभी गीढने छुड़वा दिया' ॥१॥
जपुत्रैरुक्तम्-'कथमेतत् ?' विष्णुशर्मा कथयति-
राजपुत्र वोले-'यह कथा कैसे है ?' विष्णुशर्मा कहने लगे.
॥ कथा १॥
अस्ति दक्षिणापथे सुवर्णवती नाम नगरी । तत्र वर्धमानो नाम
णिग्निवसति । तस्य प्रचुरेऽपि वित्तेऽपरान्वन्धूनतिसमृद्धान्स-
क्ष्य पुनरर्थवृद्धिः करणीयेति मतिर्वभूव ।
दक्षिण दिशामे सुवर्णवती नाम नगरी है, उसमे वर्वमान नाम एक वनिया
हता था। उसके पास वहुत-सा धनमी था, परन्तु अपने दूसरे भाईवन्धुओंको
धिक धनवान् देख कर उसकी यह लालसा हुई कि और अधिक धन इकट्ठा
रना चाहिये
तः,-
अधोऽधः पश्यतः कस्य महिमा नोपचीयते ?।
उपर्युपरि पश्यन्तः सर्व एव दरिद्रति ॥२॥
; क्योंकि अपनेसे नीचे नीचे अर्थात् दरिद्रियोंको देख कर किसकी महिमा
ही बदती है अर्थात् सबको अभिमान वढ जाता है, और अपनेसे ऊपर ऊपर
अर्थात् अधिक धनवानोंको देख कर सब लोग अपनेको दरिद्री समझते हैं ॥२॥
।
।
परंच,-
ब्रह्महापि नरः पूज्यो यस्यास्ति विपुलं धनम् ।
शशिनस्तुल्यवंशोऽपि निर्धनः परिभूयते ॥३॥
और दूसरे-जिसके पास बहुत-सा धन है उस ब्रह्मघातक मनुप्यकाभी
त्कार होता है और चन्द्रमाके समान अतिनिर्मल वशमें उत्पन्न हुएभी निर्धन
उनुप्यका अपमान किया जाता है ॥ ३ ॥

हितोपदेश । [सुहद्भेदः - अन्यच्च- अव्यवसायिनमलसं देवपरं साहसाच्च परिहीनम् । प्रमदेव हि वृद्धपति नेच्छत्युपगृहितुं लक्ष्मीः ॥ ४॥ और जैसे नवजवान स्त्री बूढे पतिको नहीं चाहती है वैसेही लक निरुद्योगी, आलसी, 'प्रारब्धमें जो लिखा है सो होगा' ऐसा भरोसा । चुपचाप बैठने वाले, तथा साहसहीन मनुष्यको नहीं चाहती है ॥ ४ ॥ यपि च,- आलस्यं स्त्रीसेवा सरोगता जन्मभूमिवात्सल्यम् । संतोपो भीरुत्वं पड़ व्याघाता महत्त्वस्य ॥५॥ औरनी आलस्य, स्त्रीकी सेवा, रोगी रहना, जन्मभूमिका नेह, सतोप में डरपोकपन ये छ. वाते उन्नतिकी विघ्न करने वाली हैं ॥५॥ यतः- संपदा सुस्थितंमन्यो भवति खल्पयापि यः। कृतकृत्यो विधिर्मन्ये न वर्धयति तस्य ताम् ॥ ६॥ क्योंकि-जो मनुष्य थोड़ीही सपत्तिसे अपनेको सुखी मानता है, विधः । कृतकृत्य होकर उस मनुष्यकी उस सपत्तिको नहीं बढ़ाता है ॥ ६॥ अपरं च,- निरुत्साहं निरानन्दं निर्वीर्यमरिनन्दनम् । मा स्म सीमन्तिनी काचिजनयेत्पुत्रमीदृशम् ॥ ७॥ और निरुत्साही, आनन्दरहित, पराक्रमहीन तथा शत्रुको प्रसन्न करने का ऐसे पुत्रको कोई स्त्री न जने अर्थात ऐसे पुत्रका जन्म न होनाही अच्छा है। तथा चोकम्,- अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेदवक्षयात् । रक्षितं वर्धयेत्सम्यग्वृद्धं तीर्थेपु निक्षिपेत् ॥ ८॥ जैसा कहा है नहीं पाये धनके पानेकी इच्छा करना, पाये हुए धनकी के आदि नाशसे रक्षा करना, रक्षा किये हुए धनको व्यापार आदिसे बढ़ाना मैं अच्छी तरह बढ़ाए धनको सत्पात्रम दान करना चाहिये ॥ ८॥ यतो लन्धमिच्छतोऽर्थयोगादर्थस्य प्राप्तिरेव । लन्धस्याप्यरा तस्य निधेरपि स्वयं विनाशः। अपि च । अवर्धमानश्वार्थः स्वल्पव्ययोऽप्यानवत्क्षयमेति । अनुपभुज्यमानश्च निष्प्रयोजन एव सः। क्योंकि लाभकी इच्छा करने वालेको धन मिलताही है, एवं प्राह हुए पर्द रक्षा नहीं किये गये खजाने भी अपने आप नाश हो जाता है, औरभी यह कि-चढ़ाया नहीं गया धन कुछ कालमें थोड़ा थोडा व्यय हो कर कानलके समान नाश हो जाता है और नहीं भोगा गया मी वह वृधा है ३

बहनेदः ९-१३] भाषाटीकासमलंकृत ।
६७
'था चोक्तम्,-
धनेन कि यो न ददाति नाचते
वलेन किं यश्च रिपून वाधते ।
श्रुतेन कि यो न च धर्ममाचरे-
त्किमात्मना यो न जितेन्द्रियो भवेत् ॥९॥
जैसा कहा है-धनसे क्या है ? जो न देता है और न खाता है, वलसे
। है ? जो वैरियोंको नहीं सताता है, शास्रसे क्या है ? जो धर्मका आचरण
करता है, और आत्मासे क्या है ? जो जितेंद्रिय नहीं है ॥ ९ ॥
तः-
जलविन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च ॥ १०॥
क्योंकि जैसे जलकी एक एक वूदके गिरनेसे धीरे २ घड़ा भर जाता है वही
रण सब प्रकारकी विद्याओंका, धनका और धर्मकाभी है ॥ १० ॥
दानोपभोगरहिता दिवसा यस्य यान्ति वै।
स कर्मकारभनव श्वसन्नपि न जीवति' ॥११॥
दान और भोगके विना जिसके दिन जाते हैं वह लुहारकी धोंकनीके समान
सि लेता हुआभी मरेके समान है ॥ ११ ॥
इति संचिन्त्य नन्दकसंजीवकनामानौ वृपभौ धुरि नियोज्य
कटं नानाविधद्रव्यपूर्ण कृत्वा वाणिज्येन गतः कश्मीरं प्रति ।
यह सोच कर नन्दक और सजीवक नाम दो वैलोंको जुएमें जोत कर और
इकडेको नाना प्रकारकी वस्तुओंसे लाद कर व्यापारके लिये काश्मीरकी ओर गया।
मन्यश्च-
अञ्जनस्य क्षयं दृष्ट्वा वल्मीकस्य च संवयम् ।
अवन्ध्यं दिवसं कुर्यादानाध्ययनकर्मसु ॥ १२ ॥
और दूसरे-काजल्के क्रम क्रमसे घटनेको और वल्मीक नाम चींटीके सच-
यको देख कर, दान, पढ़ना और कामधधोंमें दिनको सफल करना चाहिये ॥१२॥
पत-
कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ? ॥१३॥
क्योंकि-बलवानोंवो अधिक वोझ क्या है? और उद्योग करने वालोंको क्या
सूर है ? और विद्यावानोंको विदेश क्या है ? और मीठे बोलने वालोंका
যন্ত
कौन है ? ॥ १३ ॥

. ६८ हितोपदेश । [ सुहृद्भेदः १४-१८ अथ गच्छतस्तस्य सुदुर्गनाम्नि महारण्ये संजीवको भग्नजानु निपतितः। फिर उस जाते हुएका, सुदुर्ग नाम गहरे वनमे, सजीवक घुटना टनेसे गिर गया। - तमालोक्य वर्धमानोऽचिन्तयत्- 'करोतु नाम नीतिज्ञो व्यवसायमितस्ततः। फलं पुनस्तदेवास्य यद्विधेर्मनसि स्थितम् ॥ १४॥ उसे देस कर वर्धमान चिंता करने लगा-'नीति जानने वाला इधर उपर भले ही व्यापार करे परंतु उसको लाभ वही होता है कि जितना विघनाक जीमें है।॥ १४॥ किन्तु,- विस्मयः सर्वथा हेयः प्रत्यूहः सर्वकर्मणाम् । तस्माद्विस्मयमुत्सृज्य साध्य सिद्धिर्विधीयताम् ॥ १५॥ परनु सव कार्योका रोकने वाला सदेह त्यागनेके योग्य है, इसीलिये सदेहये छोड़ कर, अपना कार्य सिद्ध करना चाहिये ॥ १५ ॥ इति संचिन्त्य संजीवकं तत्र परित्यज्य वर्धमानः पुनः स्वय धर्मपुरं नाम नगरं गत्वा महाकायमन्यं वृपभमेकं समानीय धुरि नियोज्य चलितः। ततः संजीवकोऽपि कथंकथमपि खुरत्रये भर कृत्वोत्थितः। यह विचार कर सजीवकको वहा छोड़ कर-फिर वर्धमान आप धर्मपुर नान नगरमे जा कर एक दूसरे बड़े शरीर वाले वैलफो ला कर जुएम जोत कर चन दिया। फिर सजीवकभी बड़े कष्टसे तीन सुरोंके सहारे उठ सडा हुआ। यतः- निमग्नस्य पयोराशौ पर्वतात्पतितस्य च । तक्षकेणापि दुष्टस्य आयुर्मर्माणि रक्षति ॥ १६ ॥ क्योंकि-समुद्रमें डूबे हुएकी, पर्वतसे गिरे हुएकी और तक्षक नाम उसे हुएकी आयुही रक्षा करती है ॥ १६ ॥ नाकाले म्रियते जन्तुर्विद्धः शरशतैरपि । कुशाग्रेणैव संस्पृष्टः प्राप्तकालो न जीवति ॥ १७ ॥ जो काल न होय तो सैकडों वाणोंके विधनेसेभी प्राणी नहीं मरता है और नो काल आ जाय तो कुशाकी नोंकसे छूतेही मर जाता है ॥ १७ ॥ अरक्षितं तिष्ठति देवरक्षितं सुरक्षितं दैवहतं विनश्यति । जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जितः कृतप्रयतोऽपि गृहे न जीवति ॥ २८॥ देवसे रक्षा किया हुआ, विना रक्षाके भी ठहरता (पच जाता) है, और अन्य सर्पले द्वेदः १९] भाषाटीकासमलंकृत। ६९ रक्षा किया हुआ, दैवका मारा नहीं वचता है, जैसे वनमें छोड़ा हुआ यहीनभी जीता रहता है, घर पर उपाय करनेसेभी नहीं जीता है ॥१८॥ ततो दिनेषु गच्छत्सु संजीवकः स्वेच्छाहारविहारं कृत्वारण्यं म्यन्हृष्टपुष्टाङ्गो बलवन्ननाद । तस्मिन्वने पिझलकनामा सिंहः मुजोपार्जितराज्यसुखमनुभवन्निवसति । फिर कितनेही दिनोंके वाद सजीवक अपनी इच्छानुसार सा पी कर वनमें रता फिरता हृष्ट पुष्ट हो कर ऊचे खरसे डकराने लगा, उसी वनमे पिंगलक 1 एक सिंह अपनी भुजाओंसे पाये हुए राज्यका सुख भोग रहा था. या चोक्तम्- नाभिपेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते मृगैः। विक्रमार्जितराज्यस्य खयमेव मृगेन्द्रता ॥ १९ ॥ जैसा कहा है-मृगोंने सिंहका न तो राज्यतिलक किया और न सस्कार किया तु सिंह अपने आपही पराक्रमसे राज्यको पा कर मृगोंका राजा होना दिखलाता ॥ १९ ॥ स चैकदा पिपासाकुलितः पानीयं पातुं यमुनाकच्छमगच्छत् । न च तत्र सिंहेनाननुभूतपूर्वकमकालघनगर्जितमिव संजीवक- तिमथावि । तच्छुत्वा पानीयमपीत्वा स चकितः परिवृत्य वस्थानमागत्य किमिदमित्यालोचयंस्तूप्णी स्थितः। स च तथा- वेधः करटकदमनकाभ्यामस्य मन्त्रिपुत्राभ्यां शृगालाभ्यां दृष्टः। । तथाविधं दृष्ट्वा दमनकः करटकमाह-'सखे करटक! किमित्य- पमुद्कार्थी स्वामी पानीयमपीत्वा सचकितो मन्दं मन्दमवतिष्ठते?' करटको ब्रूते-'मित्र दमनक! अस्मन्मतेनास्य सेवैव न क्रियते । यदि तथा भवति तर्हि किमनेन स्वामिचेप्टानिरूपणेनास्माकम् ? यतोऽनेन राशा विनापराधेन चिरमवधीरिताभ्यामावाभ्यां महदुःखमनुभूतम्। और वह एक दिन प्याससे व्याकुल होकर पानी पीने के लिये यमुनाके किनारे पर गया । और वहा उस सिंहने नवीन कुऋतुकालके मेघकी गर्जनाके समान सजीवकका डकराना सुना। यह सुन कर पानीके विना पिये वह धवराया सा लौट कर अपने स्थान पर आ कर और यह क्या है यह सोचता हुआ चुपका बैठ गया। और उसके मत्रीके वेटे दमनक और करटक दो गीदटोंने उसे वैसा बैठा देखा। उसको इस दशाम देस कर दमनकने करटकसे कहा-'भाई करटक! यह क्या बात है कि, प्यासा खामी पानीको विना पिये डरसे धीरे धीरे आ बैठा है ?' करटक बोला-'भाई दमनक ! हमारी समझसे तो इसकी सेवाही नहीं की जाती है। जो ऐसे बैठा भी है तो हमें खानीकी चेष्टाका निर्णय करनेसे हितोपदेश। [ सुहृद्भेदः २०-२५ क्या प्रयोजन है ? क्योंकि इस राजासे विना अपराध बहुत काल तक विरस्या किये गये हम दोनोंने बड़ा दुख सहा है। सेवया धन मिच्छद्धिः सेवकैः पश्य यत्कृतम् । स्वातव्यं यच्छरीरस्य मूढेस्तदपि हारितम् ॥ २० ॥ सेवासे धनको चाहने वाले सेवकोंने जो किया सो देख कि शरीरकी खवर ताभी मूोंने हार दी है ॥२०॥ अपरं च,- - शीतवातातपक्लेशान्सहन्ते यान्पराश्रिताः। तदंशेनापि मेधावी तपस्तत्वा सुखी भवेत् ॥ २१ ॥ और दूसरे-जो पराये आसरतू हो कर जाड़ा, हवा और धूपमे दु खोंने सहते हैं उस दु खके छोटेसे छोटे भागसे तप (खल्पही दु ख सहन ) करने बुद्धिमान सुखी हो सकता है ॥ २१॥ अन्यच्च- एतावजन्मसाफल्यं यदनायचवृत्तिता। ये पराधीनतां यातास्ते वै जीवन्ति के मृताः ॥ २२॥ और-खाधीनताका होनाही जन्मकी सफलता है, और जो पराधीन होने परभो जीते ( कहलाते ) है तो मरे कौनसे हैं ? अर्थात् बेही मरेके समान हैं जो पराधीन हो कर रहते है ॥ २२ ॥ अपरंच,- एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ वद मौनं समाचर। एवमाशाग्रहग्रस्तः क्रीडन्ति धनिनोऽर्थिभिः ॥ २३ ॥ और दूसरे-धनवान् पुरुष, आशारूपी ग्रहसे भरमाये गये हुए याचकाई साथ, इधर आ, चला जा, बैठ जा, सड़ा हो, वोल, चुपका रह इस तरह खेत किया करते है ॥ २३ ॥ किंच,- अवुधैरर्थलाभाय पण्यस्त्रीभिरिव स्वयम् । आत्मा संस्कृत्य संस्कृत्य परोपफरणीकृत. ॥ २४ ॥ और जैसे वेश्या औरोंके लिये सिंगार करती है वैसेही गूगेनिभी धन लाभके लिये अपनी आत्माको गुणवान् करके पराये उपकार के लिये कर रक्ता है॥ २४ ॥ किच,- या प्रकृत्यैव चपला निपतत्यशुचावपि । स्वामिनो वहु मन्यन्ते दाएं तामपि सेवका. ॥२५॥ और जो घटि खभावहीसे चपल है और मल, मूत्र आदि नीची वस्तुपरभी ।

हृद्भेदः २६-३०] भाषाटीकासमलंकृत। गेरती है ऐसी स्वामीकी दृष्टिको सेवकलोग बहुत बडी करके मानते हैं ॥२५॥ मपरंच, मौनान्मूर्खः प्रवचनपटुतुलो जल्पको वा क्षान्त्या भीर्यदि न सहते प्रायशो नाभिजातः। धृष्टः पार्श्व वसति नियतं दूरतश्चाप्रगल्भः सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः॥२६॥ और चुपचाप रहनेसे मूर्ख, वहुत बातें करनेमे चतुर होनेसे उन्मत्त अथवा आतून, क्षमाशील होनेसे डरपोक, न सह सकनेसे नीतिरहित (अकुलीन) सर्वदा स रहनेते ढीठ, और दूर रहनेसे धमडी कहलाता है इसलिये सेवाका धर्म बड़ा कठिन है, जो (सव क्लेश सहन करनेवाले) योगियोंसेभी नहीं हो सकता है २६ वेशेपतश्च,- प्रणमत्युन्नतिहेतोर्जीवितहेतोर्विमुञ्चति प्राणान् । दुःखीयति सुखहेतोः को मूढः सेवकादन्यः? ॥ २७॥ और विशेष बात यह है कि जो उन्नति के लिये झुकता है, जीनेके लिये प्राणोंको गलाता है, और सुखके लिये दुखी होता है, ऐसा सेवकको छोड़ और कौन भला मूर्ख हो सकता है ?' ॥ २७ ॥ दमनको ब्रूते-'मित्र! सर्वथा मनसापि नैतत्कर्तव्यम् । यतः,- कथं नाम न सेव्यन्ते यत्नतः परमेश्वराः। अचिरेणैव ये तुष्टाः पूरयन्ति मनोरथान् ॥ २८ ॥ दमनक वोला-'मित्र ! कभी यह वात मनसेभी नहीं करनी चाहिये, क्योंकि खामियोंकी सेवा यनसे क्यों नहीं करनी चाहिये, जो सेवासे प्रसन्न हो कर शीघ्र (सेवक्के) मनोरथ पूरे कर देते हैं ॥ २८ ॥ अन्यच्च पश्य,- कुतः सेवाविहीनानां चामरोद्भूतसंपदः । उद्दण्डधवलच्छवं वाजिवारणवाहिनी' ॥ २९ ॥ और दूसरे देखो-खामीकी सेवा नहीं करने वालोंको चमरके दुलावसे युक्त ऐश्वर्य तथा ऊचे दढ वाले श्वेत छत्र और घोडे हाथियोंकी सेना कहा धरी है ? ॥ २९ ॥ करटको ब्रूते-'तथापि किमनेनास्माकं व्यापारेण? यतोऽव्यापा- रेपु व्यापारः सर्वथा परिहरणीयः। करटक बोला-'तोभी ह्मको इस कामसे क्या प्रयोजन है ? क्योंकि अयोग्य कामोंमें (पडना ) व्यापार करना सर्वथा लागनेके योग्य है ॥ पदय,- अव्यापारेषु व्यापार यो नरः कर्तुमिच्छति । स भूमौ निहतः शेते फीलोत्पाटीव वानर.' ॥३०॥ - हितोपदेश । ७२ [सुहृदः ३१ देख-जो मनुष्य नहीं करनेके कामों में (पडना) व्यापार करना चाहता है । कीलके उखाड़ने वाले बदरकी तरह मर कर धरती पर सोता है ॥ ३० ॥ दमनकः पृच्छति-'कथमेतत् ?' करटकः कथयति- दमनक पूलने लगा-'यह कथा कैसे है " तव करटक कहने लगा।- ॥ कथा २॥ अस्ति मगधदेशे धर्मारण्यसंनिहितवसुधायां शुभदत्तनामा कायस्थन विहारः कर्तुमारब्धः। तत्र करपत्रदार्यमाणैकस्तम्भस कियदरस्फाटितस्य काष्ठखण्डद्वयमध्ये कीलकः सूत्रधारेण नि हितः । तत्र बलवान्वानरयूथः क्रीडन्नागतः । एको वानर कालप्रेरित इव तं कीलकं हस्ताभ्यां धृत्वोपविष्टः। तत्र तस मुष्कद्वयं लम्वमानं काष्ठखण्डद्वयाभ्यन्तरे प्रविष्टम् । अनन्तर स च सहजचपलतया महता प्रयत्नेन तं कीलकमाकृष्टवान् । आकृष्टे च कीलके चूर्णिताण्डद्वयः पञ्चत्वं गतः। अतोऽह : वीमि-"अव्यापारेषु व्यापारम्" इत्यादि' ॥ दमनको ब्रूते-- 'तथापि स्वाप्निचेष्टानिरूपणं सेवकेनावश्यं करणीयम् ।- करटको ब्रूते-'सर्वस्मिन्नधिकारे य एव नियुक्तः प्रधानमन्त्री स करोतु । यतोऽनुजीविना पराधिकारचर्चा सर्वथा न कर्तव्या। मगध देशमे धर्मारण्यके पास किसी भूमिमे शुभदत्त नामक कायस्थने एक मन्दिर बनवाना आरंभ किया था। वहां आरेसे चीरा हुआ ल्छा जो कितनीहा दूर तक फट रहा था, उस काटके दोनों भागोंके बीचमे वढईने कील टोर दी थी । वहा बलवान् वन्दरों का झुड खेलता हुआ आया । एक बन्दर मृत्युसे प्रेरित हुएके समान उस लकढीकी सूटीको दोनो हाथोंसे पकड़कर बैठ गया। वहा उसके लटकते हुए दोनो अडकोश, उस काटके दोनों भागों सदमे लटक पड़े और फिर उसने खभावकी चचलतासे बडे बडे उपाय | खूटीको खींच लिया, और एटीको सीचतेही उसके दोनों अडकोश पिच गये आर वह मर गया । इसलिये मैं कहता हूं-"विना कामके कामांमें पड़ना" इत्यादि । दमनकने कहा-'तोभी सेवकको स्वामीके काममा विचार अवश्य करना चाहिये। काटक बोला-'जो सव काम पर अधिकारी प्रधान मत्री होय वही करे। क्यों सेवकको पराये कामकी चर्चा कभी नहीं करनी चाहिये । पश्य,- पराधिकारचा यः कुर्यात्स्वामिहितेच्छया। स विपीदति चीत्कारागर्दमस्ताडितो यथा ॥ ३१ ॥ देस,-जो खामीके हितकी इच्छासे पराये अधिकारकी चर्चा करता है। रेंकनेसे मारे गये गवकी तरह मारा जाता है ॥ ३॥ दमनकः पृच्छति-'कथमेतत् ?' करटको ब्रूने- दमनक मूटने लगा-'यह कथा केमे है करटा कहने लगा।

हद्भेदः ३२-३३] भापाटीकासमलंकृत। ७ ॥ कथा २॥ अस्ति वाराणस्यां कर्पूरपटको नाम रजकः । स चाभिनववय- कया वध्वा सह चिर निधुवनं कृत्वा निर्भरमालिङ्गय प्रसुप्तः । दिनन्तर तहहद्रव्याणि हर्तु चौरः प्रविष्टः । तस्य प्राङ्गणे गर्दभो द्धिस्तिष्ठति, कुकुरश्चोपविष्टोऽस्ति । अथ गर्दभः श्वानमाह- सखे! भवतस्तावदयं व्यापारः। तत्किमिति त्वमुच्चैः शब्दं कृत्वा 'वामिनं न जागरयसि ?' कुकुरो ब्रूते-'भद्र! मम नियोगस्य वर्चा त्वया न कर्तव्या । त्वमेव किं न जानासि यथा तस्याहर्निशं गृहरक्षां करोमि । यतोऽयं चिरानिवृतो ममोपयोगं न जानाति । तेनाधुनापि ममाहारदाने मन्दादरः । यतो विना विधुरदर्शनं स्वामिन उपजीविपु मन्दादरा भवन्ति ।' । वनारसमे एक कर्पूरपट नामक चोवी रहता था। वह नवजवान अपनीनोके 'माय बहुत काल तक विलास करके, और अत्यन्त छातीसे चिपटा कर सो गया। इसके बाद उसके घरके द्रव्यको चुरानेके लिये चोर अदर घुसा । उसके आग- नने एक गधा व वा था और एक कुत्ता भी बैठा था। इतनेमे गवेने उत्तेते रहा-'मित्र । यह तेरी पर्ज है, इनलिये क्यों नहीं ऊचे शब्दने भोंक र वानीको जगाता है 2' कुत्ता वोला-'भाई। मेरे कामकी चर्चा तुझे नहीं करनी चाहिये, और क्या तू सचमुच नहीं जानता है कि जैसी मै उनके घरकी रन्व- 'वाली रातदिन करता हू, कि जिस कारण यह बहुत कालसे निश्चिंत होकर मेरे उपयोग नहीं मानता है ? इमलिये आजकल वह मेरे आहार देनेमे भी आदर (फिक )कम करता है। क्योंकि विना आपत्तिके देखें स्वामी सेवको पर थोडा करते ह। गर्दभो ब्रूते-'शृणु रे वर्वर! याचते कार्यकाले य स किनृत्यः स किंसुहृत् ।' गवा बोला-'सुन रे मूर्ख । जो कानके समय पर माँगे वह निन्दित तेवक और निन्दित मित्र है कुकरो वृने- 'भृत्यान्संभापयेद्यत्तु कार्यकाले ल किप्रभुः ॥ ३२ ॥ उन्ना बोला-'जो काम अटम्ने पर सेवकोसे ( केवल अपने खार्थके खातर) नीठी नीठी वाते करे वह तो निन्दिन स्वामी है ॥ ३२ ॥ यत.,- आश्रितानां भृतो स्वामिसेवायां धर्मसेवने । पुत्रस्योत्पादने चैव न सन्ति प्रतिहस्तका.' ॥ ३३ ॥ क्योकि आश्रितोंके पालन-पोपणने, स्वामीकी लेवाने, वर्मकी सेवा (आचरण) परनेमे, और पुत्र के उत्पज परनेने, प्रतिनिधि (एवजी) नहीं होते हैं, अर्थात् ये पान अपने आपही करनेके है, दूसरेसे करानेके योग्य नहीं ह' ॥ ३३ ॥ ततो गर्दभः सकोपमाह-'अरे दुष्टमते! पापीयास्त्वं यद्विपत्तो सादर 1- । , ७ हितो ७४ हितोपदेश । [ सुहृद्भेदः ३४-३ स्वामिकार्य उपेक्षां करोपि । भवतु तावत्, यथा स्वामी जार रिप्यति तन्मया कर्तव्यम् । फिर गधा झुझला कर बोला-'अरे दुय्युद्धि ! तू बड़ा पापी है, कि विपन खामीके काममे अनादर करता है। जो हो मो हो, जसे स्वामी जागेगाने अवश्य करूगा॥ यतः,- पृष्टतः सेवयेदर्क जठरेण हुताशनम् । खामिनं सर्वभावेन परलोकममायया ॥ ३४॥ क्योंकि-पीठके वल धूप खाय, पेटके बल अग्निसे तापे, खामीको । प्रकारसे (वफादारीसे) और परलोककी विना कपटसे सेवा करनी चाहिये ॥३॥ इत्युक्त्वातीव चीत्कारशब्दं कृतवान् । ततः स रजकस्तेन ची कारेण प्रबुद्धो निद्राभलकोपादुत्थाय गर्दभं लगुडेन ताडया मास । तेनासौ पञ्चत्वमगमत् । अतोऽहं ब्रवीमि-"पराति कारचर्चाम्" इत्यादि ॥ पश्य । पशूनामन्वेषणमेवारसन्नियोगः खनियोगचर्चा क्रियताम् । (विमृश्य ) कित्वद्य तया चर्चा न प्रयोजनम् । यत आवयोर्भक्षितशेपाहारः प्रचुरोऽस्ति । दमनकः सकोपमाह-कथमाहारार्थी भवान्केचलं राजान सेपने एतदयुक्तमुक्कं त्वया। यह कह कर उसने अत्यत रेकनेका शब्द किया। तब वह धोनी उम विन जाग उठा और नींद टूटने के कोक्के मारे उट कर लकड़ीसे गधेको मारा। जिससे वह मर गया। इसलिये मैं कहता हू-"पराये अविकारकी च । इत्यादि ॥ देस-पशुओंफा हृढना हमारा काम है । अपने कामको चर्चाको (विचार कर ) परन्तु आज उस चर्चासे कुछ प्रयोजन नहीं ॥ क्योंकि नाम दोनोंके भोजनसे बचा हुआ आहार बहुत धरा है।' दमनक क्रोधसे कम 'क्या तुम केवल भोजनकेही अर्थी हो कर राजाकी सेवा करते हो ? यह तुमन अयोग्य कहा। यत',- सुहृदामुपकारकारणा- द्विपतामप्यपकारकारणात् । नृपसंश्रय इष्यते बुधै- जठरं को न विभर्ति केवलम् ॥ ३५ ॥ क्योंकि-मित्रोंके उपकारके लिये, और शत्रुओंके अपचार के लिये चतुर मनु । गजामा आश्रय करते है (याने अपने मित्र या जाप्ता हित के लिये और पूर्व नाशके लियेही राजाश्रय किया जाता है) और क्वल पेट सीन नही नर है। अर्थात् ममी भरते है ॥ ३५ ॥ जीविते यस्य जीवन्ति विना मित्राणि वान्धवाः । सफलं जीवितं तय आत्मायें कोन जीवति?।। ३६.

हृद्भेदः ३७-४१] भाषाटीकासमलंकृत । ' जिसके जीनेसे ब्राह्मण, मित्र और भाई जीते हैं उसीका जीवन सफल है और केवल अपने (खार्थके) लिये कौन नहीं जीता है 2 ॥ ३६ ॥ पिच,- .. न . यस्मिजीवति जीवन्ति वहवः स तु जीवतु । - काकोऽपि कि न कुरुते चञ्चवा स्वोदरपूरणम् ? ॥ ३७॥ औरभी-जिसके जीनेसे वहुतसे लोग जिये वह तो सचमुच जिया, और यो । काकभी क्या चोंचसे अपना पेट नहीं भर लेता है ? ॥ ३७ ॥ श्य, पञ्चभिर्याति दासत्वं पुराणै. कोऽपि मानवः। कोऽपि लक्षः कृती कोऽपि लक्षैरपि न लभ्यते ॥ ३८॥ देख-कोई मनुष्य पाच पुराण मे दासपनेको करने लगता है, कोई राख मे 'रता है और कोई एक लखमेंभी नहीं मिलता है ॥ ३८ ॥ अन्यच्च,- मनुष्यजातो तुल्यायां भृत्यत्वमतिगर्हितम् । प्रथमो यो न तत्रापि स कि जीवत्सु गण्यते ? ॥ ३९ ॥ और दूसरे-मनुष्योंको समान जाति होने पर सेवकाई अति निन्दित है और सेवकोनभी जो प्रथम अर्थात् सवका मुखिया नहीं है क्या वह जीते हुओमे गिना जाता है ? अर्थात् उसकी मरोमही गिनती है ॥ ३९ ॥ तथा चोक्तम्,- वाजिवारणलोहाना काप्ठपापाणवाससाम् । नारीपुरुपतोयानामन्तर महदन्तरम् ॥ ४० ॥ जैमा क्हा हे-घोड़ा, हाथी, लोहा, काट, पत्थर, वत्र, स्त्री, पुरुष और जल इस प्रश्न वड़ा अन्तर है ॥ ४० ॥ तथाहि । स्वल्पमप्यतिरिच्यते । और उसी प्रकार-योडाभी वहुत गिना जाता स्वल्पस्नायुवसावशेपमलिनं निर्मासमप्यस्थिक श्वा लव्व्वा परितोपमेति न भवेत्तस्य क्षुध. शान्तये । सिंहो जम्बुकमकमागतमपि त्यक्त्वा निहन्ति द्विपं सर्वः कुच्छ्रगतोऽपि वाञ्छति जन सत्त्वानुरूपं फलम् ॥३१॥ कुत्ता थोडी नस तथा चरवीसे मलिन विना मासकी हडीको पा कर उसीमे । सतोष कर लेता है, कुछ उससे उसकी भूख दूर नहीं होती है, और सिंह गोदमें है आय हुएमी तियारको छोड कर हायीको मारता है इसलिये सब प्राणी क्लेशको सह कर भी अपने पराकनके अनुसार फलको चाहा करते है॥४१॥ १ पुराण-८० कोडी याने एक पसा, ६४ काडीकानी एक पैसा माना जाता है. 1 ७ हितोपदेश। [ सुहृद्भेदः ४२-१० अपरं च । सेव्यसेवकयोरन्तरं पश्य,- लालचालनमधश्चरणावपातं भूमौ निपत्य वदनोदरदर्शनं च । श्या पिण्डदस्य कुरुते गजपुंगवस्तु धीर विलोकयति चाटुशतैश्च भुते ॥४२॥ और दूसरे-खामी और सेवकका भेद देखो-कुत्ता, टुकड़ा देने वालों म पूछको हिलाता है, उनके चरणोम गिरता है, वरती पर लेट कर अपना और पेट दिखाया करता है और श्रेष्ठ हाथी तो खामी को धीरजसे देखता और सौ सौ उपाय करनेसे खाता है ॥ ४२ ॥ किच,- यजीव्यते क्षणमपि प्रथितं मनुष्य- विज्ञान विक्रमयशोभिरभज्यमानम् । तन्नाम जीवितमिह प्रवदन्ति तज्ज्ञाः काकोऽपि जीवति चिराय वलि च भुते ॥४३॥ और शास्त्रज्ञान, पराक्रम, तथा यशसे विख्यात होकर जो मनुष्य क्षगभर जीते हैं, उसी जीनेको इस दुनियाम पण्डित लोग सफल कहते है, और यो काकभी बहुत दिन तक जीता है और वलिको खाता है ॥ ४३ ॥ अपरं च,- ॥४४॥ यो नात्मजे न च गुरौ न च भृत्यवर्ग दीने दयां न कुरुते न च वन्धुवर्गे। कि तस्य जीवितफलेन मनुष्यलोके काकोऽपि जीवति चिराय वलिं च भुते ॥४४॥ और जो न पुत्र पर, न गुरु पर, न सेवको पर, और न दीन वाधवा परद करता है उसके जीने के फ्लसे मनुष्यलोकमे क्या है, और यों तो का. बहुत माल तक जीता है और चलि साता है अर्थात् केनल पेट भरनाही न नरा फल नहीं अपरमपि,- अहितहितविचारशून्यबुद्धः श्रुतिसमयैर्वहुभिस्तिरस्कृतस्य । उदरभरणमात्रकेवलेच्छोः पुरूपपशोश्च पशोच को विशेषः? ॥ ४५ ॥ औरभी-हित और अहितके विचारमें मून, बहुसे शायक शानने से और जिसकी इच्छा केवल पेट भरनाही है ऐसे पुस्परूप पशुम और मुनः पशुन क्या अतर है नर्यात् ज्ञानसे हीन और भोगना जी मनुष्य यः समान है।॥ १५॥ करटको ते-'आरा तावदप्रधानौ । तदप्याययोः किमनर 4- हनेदः ४६-४८] भाषाटीकासमलंकृत । चारणया" दमनको वृते-'कियता कालेनामात्याः प्रधानता- धानता वा लभन्ते। करटक बोला-'हम दोनो मत्री नहीं है फिर हमे इस विचारसे क्या" दमनक ला-'कुछ कालम मत्री प्रधानता वा अप्रधानताको पाते है। T .- न कस्यचित्कश्चिदिह स्वभावा- द्भवत्युदारोऽभिमत. खलो वा। लोके गुरुत्वं विपरीतता वा स्वचेष्टितान्येव नर नयन्ति ॥ ४६॥ क्योकि-इन दुनियामे कोई किसीको स्वभावसे अर्थात् जन्मसे मुशील यका दुष्ट नहीं होता है, परन्तु मनुष्यको अपने कर्मही वडप्पन अथवा चपनको पहुचाते ह ।। ४६ ॥ च,- आरोप्यते शिला शैले यत्नेन महता यथा । निपात्यते क्षणेनाधस्तथात्मा गुणदोपयोः ॥ १७ ॥ और जैसे पर्वत पर वडे यत्नसे पापाणकी सिला चढाई जाती है और उनभरमें दुल्का दी जाती है तेही मनुष्यके चित्तकी वृत्तिभी गुण और दोपने गाई और हटा ली जाती है अर्थात् मनुप्यकी उन्नति कठिनतासे और अवनति हजमें हो सकती है ॥ ४७ ॥ यात्यधोऽधो बजत्युच्चैनरः खैरेव कर्मभिः। कूपस्य खनिता यद्वत्याकारस्येव कारक. ॥४८॥ • मनुष्य अपनेही कर्मोंसे कुएके खोदने वालेके समान नीचे और राजभवनके बनाने वालेके समान ऊपर जाता है, अर्थात् मनुष्य अपना उच्च (अच्छे) कमाते उन्नतिको और हीन (खराब) मोसे अवनतिरो पाता है ॥ ४८ ॥ नभद्रम् । स्वयत्नायतो ह्यात्मा सर्वस्य ।' करटको ब्रूते-'श्रय भवान्किं ब्रवीति ?' स आह–'अयं तावत्स्वामी पिगलकः फुतोऽपि कारणात्सचकितः परिवृत्योपविष्टः ।' करटको बृने- 'कि तत्त्वं जानासि ?' दमनको ते–'किमत्राविदितमस्ति ? दनलिये यह ठीक है कि सबकी आत्मा अपनेही यत्नके आवीन रहती है।' परटक दोला-'तुम अब क्या कहते हो ।" वह वोला-'यह स्वामी पिंगलक किसी न किसी कारणसे घवराया-सा लौट करके आ बैठा है।' करटकने कहा-'क्या तुम इसका भेद जानते हो दमनक वोला-'इसमें नहीं जानने की क्या बात है? उक्तं उदीरितोऽर्थ. पशुनापि गृह्यते हयाश्च नागाश्च वहन्ति देशिता.। -- च,- - ७८ हितोपदेश । [सुहृद्भेदः ४९-२ अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः परेगितज्ञानफला हि वुद्धयः॥४९॥ और कहा है-जताए हुए अभिप्रायको पशुभी समझ लेता है और हाके घोड़े और हाथीभी बोझा ढोते है। पण्डित विनाही कहे मन की बात तर्कने ३ लेता है, क्योंकि पराये चित्तका भेद जान लेनाही बुद्धियोंका फल है ॥ ४९ आकारैरिदितैर्गत्या चेष्टया भापणेन च । नेत्रवऋविकारेण लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ ५० ॥ आकारसे, हृदयके भावसे, चालसे, कामसे, वोलनेसे और नेत्र और नुर विकारसे, औरोंके मनकी वात जान ली जाती है ॥ ५० ॥ अत्र भयप्रस्तावे प्रज्ञावलेनाहमेनं खामिनमात्मीयं करिष्यानि इस भयके समय पर बुद्धिके वलसे में इस खामीको अपना कर लगा । यतः, - प्रस्तावसदृशं वाक्यं सद्भावसदृशं प्रियम् । आत्मशक्तिसम कोपं यो जानाति स पण्डितः' ॥ ५१ क्योंकि जो प्रसगके समान वचनको, नेहके सदृश मित्रको और 1 सामर्थ्यके सदृश क्रोधको समझता है वह बुद्धिमान है' ॥ ५१ ॥ करटको व्रते-'सखे। त्वं सेवानभिशः। करटक बोला-मित्र ! तुम सेवा करना नहीं जानते हो। पश्य,- । अनाहूतो विशेद्यस्तु अपृष्टो बहु भापते । आत्मानं मन्यते प्रीतं भूपालस्य स दुर्मतिः ॥५२॥ देतो-जो मनुष्य विना बुलाये घुसे, और विना पूछे बहुत बोलता है, अपने राजामा मित्र समझता है वह मूर्स है' ॥ ५२ ।। दमनको ब्रूते-'भद्र! कथमहं सेवानभिशः? दमनक बोला-'भाई ! मैं सेवा करना क्यों नहीं जानता ह पश्य,- किमप्यस्ति स्वभावेन सुन्दर वाप्यसुन्दरम् । यदेव रोचते यस्मै भवेत्तत्तस्य मुन्दरम् ॥ ५३॥ देखो-कोई वस्तु खभावसे अच्छी और बुरी होती है, जो जिम दर हे वही उसको मुन्दर लगती है ॥ ५३ ॥ यत.,- यस यस हि यो भावस्तेन तेन हि तं नरम् । अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत् ॥ ५४॥ क्योंकि-मुद्विमान्छे चाहिये कि जिम मप्यमामा मनोरम । उदी नानप्रापसे निचय करके उस पुरूपके पेटन युग र उसी ने ६३ कर ट्रे॥५४॥ ?

हृद्भेदः ५५-५८] भापाटीकासमलंकृत । -- न्यच्च,- कोऽत्रेत्यहमिति ब्रूयात्सम्यगादेशयेति च । आज्ञामवितथा कुर्याद्यथाशक्ति महीपतेः॥ ५५ ॥ और दूसरे-यहा कौन है ? मैं हू, कृपा कर आज्ञा कीजिये, ऐसा कहना हिये और जहा तक हो सके राजाकी आज्ञाको सफल करनी चाहिये ॥ ५५ ॥ पर च,- अल्पेच्छुकृतिमान् प्राज्ञश्छायेवानुगतः सदा । आदिष्टो न विकल्पेत स राजवसतौ वसेत् ॥५६॥ और थोड़ा चाहने वाला, वर्यवान् , पण्डित तथा सदा छायाके समान पीछे ठने वाला और जो आज्ञा पाने पर कुछ विचार न करे, अर्थात् यथार्थरूपसे ज्ञाका पालन करे ऐसा मनुष्य राजाके घरमें रहना चाहिये' ॥ ५६ ॥ करटको व्रते-'कदाचित्त्वामनवसरप्रवेशावमन्यते स्वामी' । आह-'अस्त्वेवम् । तथाप्यनुजीविना स्वामिसानिध्यमवश्यं रणीयम् । करटक वोला-'जो नमी कुसमय पर घुस जानेसे स्वामी तुमारा अनादर रे' ॥ वह बोला-'ऐना होय तो नी सेवकको खामीके पास अवश्य जाना tr हिये। ता, दोपभीतेरनारम्भस्तत्कापुरुषलक्षणम् । कैरजीर्णभयानातर्भोजनं परिहीयते ? ॥ ५७ ॥ क्योंकि-दोपके टरसे किसी कामका आरंभ न करना यह कायर पुरुपका 'विन्ह है, हे भाई । अजीर्णके डरसे कौन भोजनको छोडते हैं ? ॥ ५७ ॥ द श्य- बासनमेव नृपतिर्भजते मनुप्यं विद्याविहीनमकुलीनमसंगतं वा । प्रायेण भूमिपतयः प्रमदा लताश्च यःपार्श्वतो वसति तं परिवेष्टयन्ति' ॥५८॥ देसो-पास रहने वाला साही विद्याहीन, मलिन, तथा कुल हीन मनुष्य क्यों ३॥ न हो राजा उसीसे हित करने लगता है, क्योंकि राजा, स्त्री और वेल ये बहुधा पाम रहता है, उसीका आश्रय कर लेते हैं' ॥ ५८ ॥ करटको व्रते-'अथ तत्र गत्वा किं वक्ष्यति भवान् ?' स आह- गृणु । किमनुरको विरको वा मयि स्वामीति ज्ञास्यामि'। करटको ब्रूते-'कि तज्ज्ञानलक्षणम् ?' gi करटक बोला-'वहा जा कर क्या कहोगे वह वोला-'मुनो। पहिले यह जानूगा कि खानी मेरे ऊपर प्रसन है अपवा उदास है' करटक बोला-'इस पातको जाननेका क्या चिन्ह है?' - हितोपदेश। [ सुहृद्भेदः ५९- दमनको ब्रूते-शृणु,- दूरादवेक्षणं हासः संप्रश्नेष्वादरो भृशम् । परोक्षेऽपि गुणश्लाघा स्मरणं प्रियवस्तुपु ॥ ५९॥ दमनक बोला-'सुनो, दूरसे वडी अभिलाषासे देख लेना, मुसक्याना, चार आदि पूछनेमें अधिक आदर करना, पीठ पीछेमी गुणोंकी वड़ाई का प्रिय वस्तुओंमे स्मरण रखना ॥ ५९ ॥ असेवके चानुरक्तिर्दानं सप्रियभापणम् । अनुरक्तस्य चिह्नानि दोपेऽपि गुणसंग्रह. ॥ ६० ॥ जो सेवक न हो उसमेंभी नेह दिखाना, सुन्दर सुन्दर वचनों के साथ आदिका देना और दोषमेंभी गुणोंका ग्रहण करना ये नेहयुक्तके लक्षण ह ॥ अन्यच्च,- कालयापनमाशातां वर्धनं फलखण्डनम् । विरक्तेभ्वरचिह्नानि जानीयान्मतिमान्नर. ॥ ६ ॥ और दूसरे-आज कल कह करके, कृपा आदिके करने में समय टालना । आशाओंका बढाना और जब फलफा समय आवे तर उसका राइन करना उदास खामीके लक्षण मनुष्य को जानने चाहिये ॥ ६१॥ एतज्ज्ञात्वा यथा चायं ममायत्तो भविष्यति तथा करिष्यामि यह जान कर जैसे यह मेरे वशमें हो जायगा तैसे करूगा, यतः,- अपायसंदर्शनजां विपत्ति- मुपायसंदर्शनजां च सिद्धिम् । मेधाविनो नीतिविधिप्रयुक्तां पुर. स्फुरन्तीमिव दर्शयन्ति' ॥ १२॥ क्योंकि-पाण्डत लोग नीतिशास्त्र में कही हुई बुराईके होनेसे उत्प विपत्तिमो, और उपायसे उत्पन्न हुई तिद्धिको नेत्रोंके सामने साक्षात् TES हुईसी देखते है' ॥ ६२ ॥ करटको व्रते-'तथाप्यमाते प्रस्तावे न वक्तुमर्हसि । करट बोला-'तो मी विना जसरके नहीं रह सकते हो, यतः,- अप्रातकालवचनं वृहस्पतिरपि ब्रुवन् । प्रामुयादुद्ध्यवज्ञानमपमानं च शाश्वतम् ॥ ६३ ॥ क्यों क-चना अवसरी बात को कहते हुए जुहम्मति यानी ६.'' जौर जनादरको सर्वदा पा सकते है' ॥ १३ ॥ दमनको ने-'मित्र! मा भपी. । नादमतातावसर वा वदिष्यामि। दना बोला-मित्र! दोनत, न निना भरपरनान, भाषाटीकासमलंकृत। ८१ - आपद्युन्मार्गगमने कार्यकालात्ययेपु च । अपृष्टेनापि वक्तव्यं भृत्येन हितमिच्छता ॥ ६४ ॥ क्योंकि-आपत्तिमे, कुमार्ग पर चलनेमे और कार्यमा समय टले जानेमे, | चाहने वाले सेवकको विना पूछेभी कहना चाहिये ॥ ६४ ॥ दे च प्राप्तावसरेणापि मया मन्त्रो न वक्तव्यस्तदा मन्त्रित्वमेव मानुपपन्नम्। और जो अवसर पा कर भी मैं परामर्श(राच) नहीं कहूगा तो मुझे मत्रीप- भी अयोग्य है। - कल्पयति येन वृत्तिं येन च लोके प्रशस्यते सद्भिः। स गुणस्तेन च गुणिना रक्ष्य. संवर्धनीयश्च ॥ ६५॥ क्योंकि मनुष्य जिम गुणसे आजीविका पाता है और जिस गुणके कारण दुनियाम सज्जन उसकी वडाई करते है, गुणीको ऐसे गुणकी रक्षा करना र वडे यन्नसे वढाना चाहिये ॥६५॥ इद्र ! अनुजानीहि माम् । गच्छामि' । करटको ब्रूते-'शुभ- स्तु। शिवास्ते पन्थानः । यथाभिलपितमनुष्ठीयताम्' इति । ततो मनको विस्मित इव पिझलकसमीपं गतः । इसलिये हे शुभचिन्तक ! मुझे जाना दीजिये । मै जाता हु।' करटक्ने हा-'कल्याण होय । और तुम्हारे मार्ग विनरहित अर्थात् शुभ होय। अपना नारय पूरा करो!' तव दमनक घरराया-सा पिगल्क्के पास गया ॥ अथ दूरादेव सादर राज्ञा प्रवेशित. साष्टाङ्गप्रणिपातं प्रणि- त्योपविष्ट । राजाह-'चिरादृष्टोऽसि । दमनको वृते-'यद्यपि या सेवकेन श्रीमद्देवपादानां न किचित्प्रयोजनमस्ति, तथापि गप्तकालमनुजीविना सानिध्यमवश्यं कर्तव्यमित्यागतोऽस्मि । त्व दूरसेही बड़े आदरले राजाने भीतर आने दिया और वह साष्टाग दडवत घर बैठ गया। राजा बोला-'बहुत दिनमें दीसे।' दमनक बोला-'यद्यपि मुझ उक्ने श्रीमहाराजको कुछ प्रयोजन नहीं है तोभी समय आने पर मेवकको -ग्वदय पास आना चाहिये, इसलिये आया हू, किच,- दन्तस्य निर्घर्पणकेन राजन् । कर्णस्य कण्डूयनकेन वापि । तृणेन कार्य भवतीश्वराणा किमड़वाक्पाणिमता नरेण ॥ ६६ ।। । और-हे राजा! दातके कुरेदनेके लिये तपा कान खुजानेके लिये राजाओंगे १ पाद अचात् चरणाका शब्द केवल प्रतिष्ठाके लिये ह।

. ८२ हितोपदेश। [सुहृद्भेदः ६७. तुनकेसेभी काम पड़ता है फिर देह, वाणी तथा हाथ वाले मनुष्यसे क्यों अर्थात् अवश्य पडताही है ॥६६॥ यद्यपि चिरेणावधीरितस्य देवपार्मे बुद्धिनाशः सदयते, त न शङ्कनीयम् । यद्यपि बहुत कालसे मुझ अनादर किये गयेकी बुद्धिके नाशकी श्रानः शंका करते हो सोभी शका न करनी चाहिये, यतः, कदार्थतस्यापि च धैर्यवृत्त वुद्धविनाशो न हि शकनीयः। अध कृतस्यापि तनूनपातो नाधः शिखा याति कदाचिदेव ॥ १७ ॥ क्योकि अनादरभी किये गये धैर्यवानकी बुद्धिके नाशकी शका नहीं चाहिये, जैसे नीचे की ओर की गईभी अग्निकी ज्वाला कभीभी नीचे नहीं है, अर्थात् हमेशा ऊचीही रहती है ॥ ६ ॥ देव! तत्सर्वथा विशेषज्ञेन स्वामिना भवितव्यम् । हे महाराज ! इस लिये सदा स्वामीको विवेकी होना चाहिये, यतः,- मणिल्ठति पादेषु काचः शिरसि धार्यते । यथैवास्ते तथैवास्तां काचः काचो मणिर्मणिः ॥ ८ ॥ क्योंकि-मणि चरणामें कराता है और काच शिर पर धारण किया । है सो जैसा है वैसा भलेही रहे. काच काचही है और मणि मणिही है। अन्यच्च, निर्विशेषो यदा राजा समं सर्वेषु वर्तते । तदोद्यमसमर्थानामुत्साहः परिहीयते ॥ ६९ ॥ जौर दूसरे-जन राजा मर (लायक और नालायक)के विषयमं रामान करता है तब वडे बडे कार्य करने वालोका उत्साह नष्ट हो जाता है। 1 कि च, विविधाः पुरुपा राजनुत्तमायममव्यमाः। नियोजयेत्तथैवैतास्त्रिविधेष्वेव कर्मसु ॥ ७० ॥ जोर हे राजा! उत्तम, मध्यम और अवम तीन प्रकारके मनुष्य प्रकार इन तीन प्रकारके पुत्याको तीन प्रकारके ही कामों निगुनार चाहिये ॥५०॥ यतः,- स्थान एव नियोज्यन्ते मृल्याश्चाभरणानि च । न हि चूडामणि पादे नुपुर शिरमा कृतम् ॥ १॥ क्योंक सेवा और आनर नहा के मानन सायद नुस्ट परने और पानी पर नहा परी जाता।

द्भेदः ७२-७७] भापाटीकासमलंकृत ।
८३
पेच,-
कनकभूषणसंग्रहणोचितो
यदि मणिस्त्रपुणि प्रणिधीयते ।
न च विरोति न चापि स शोभते
भवति योजयितुर्वचनीयता ॥ ७२ ॥
और भी-सुवर्णके आभूपणमें जड़नेके योग्य मणि, जो सीसा आदि धातुके
भूपणमें जड़ दिया जाय तो, वह मणि न तो झनकारता है और न शोभाही
। है किन्तु जडियेकी बुराई होती है ॥ ७२ ॥
न्यच्च,
मुकुटे रोपितः काचश्चरणाभरणे मणिः ।
न हि दोपो मणेरस्ति किंतु साधोरविज्ञता ॥ ७३ ॥
और दूसरे-जो मुकुटमें काच जड दिया जाय, और चरणके आभूपणमें
णे जड दिया जाय तो कुछ मणिकी निन्दा नहीं है पर जडियेकी मूर्यता
नी जाती है । ७३ ॥
-
-
बुद्धिमाननुरकोऽयमयं
शूर इतो
भयम्।
इति भृत्यविचारज्ञो भृत्यैरापूर्यते नृपः॥ ७४ ॥
देखो यह बुद्धिवान् है, यह राजभक्त है, यह शूर है, इससे भय है, इस प्रकार
वकोंके विचारको जानने वाला राजा सेवकोंसे भरा पूरा रहता है ॥ ७४ ।।
था हि,-
अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्च नारी च ।
पुरुपविशेषं प्राप्य हि भवन्ति योग्या अयोग्याश्च ॥ ७५ ॥
और भी कहा है-घोड़ा, शस्त्र, शास्त्र, वीणा, वाणी, मनुष्य और स्त्री ये गुणी
पयवा गुणहीनके पास पहुचते ही योग्य और अयोग्य हो जाते है ॥ ७५ ॥
तन्यच,-
कि भक्केनासमर्थन कि शक्तनापकारिणा?।
भकं शतं च मा राजन्नावनातुं त्वमर्हसि ॥ ७६ ॥
और दूसरे-असमर्थ भकते अथवा अपकारी समर्यसे क्या प्रयोजन निकलता
12 नो हे राजा! मेरे समान भक और काम करनेमें समर्थका अपमान आपको
नहीं करना चाहिये ॥ ७६ ॥
-
पत.,-
अवशानाद्राक्षो भवति मतिहीनः परिजन-
स्ततस्तत्प्रामाण्याद्भवति न समीपे वुधजनः ।
वुधैस्त्यके राज्ये न हि भवति नीतिगुणवती
विपन्नायां नीतो सकलमवशं सीदति जगत् ॥ ७७ ॥

८४ हितोपदेश । [सुहृद्भेदः ७८ क्योंकि राजाके अपमान करनेसे आपसके (परिवारी) लोग उद्धिहीन हो हैं, पीछे उसके प्रमाणसे ( अर्थात् मेराभी यह अपमान करेगा यह सोच पण्डितजन उसके पास नहीं आते हैं । पण्डितोंसे छोड़े हुए राज्यमें नीति रहित नहीं होती है, और नीतिके विगढ़नेसे सव ससार बेवश होकर जाता है ॥ ७७॥ - अपरं च,- जनं जनपदा नित्यमर्चयन्ति नृपार्चितम् । नृपेणावमतो यस्तु स सर्वैरवमन्यते ॥ ७८ ॥ और दूसरे-राजासे सन्मान किये हुए मनुष्यकी प्रजा सर्वदा आदर है और राजासे अपमान किये गये (पुरुष) का सब अपमान करते हैं | कि च,- 2 वालादपि ग्रहीतव्यं युक्तमुक्तं मनीषिभिः । रवेरविपये कि न प्रदीपस्य प्रकाशनम् ॥ ७९ ॥ और पण्डितोको बालकसेभी योग्य बात ग्रहण करनी चाहिये, जने : नहीं निकलने पर क्या दीपकमा उजाला नहीं होता है ? ॥ ७९ ॥ पिङ्गलकोऽवदत्-'भद्र दमनक! किमेतत् ? त्वमस्मदीयप्रभात मात्यपुत्र इयन्त कालं यावत्कुतोऽपि खलवाक्यानागतोऽति इदानी यथाभिमतं ब्रूहि ।' दमनको व्रते-'देव! पृच्छामि मिचित उच्यताम् । उदकार्थी स्वामी पानीयमपीत्वा किमिति विस्मिा ! तिष्टति?" पिगलकोऽवदत्-'भद्रमुक्त त्वया । कित्वेतद्रहा? काचिद्विश्वासभूमिनास्ति । तथापि निभृतं कृत्वा ययामि णु । संप्रति वनमिदमपूर्वसत्त्वाधिष्ठितमतोऽस्माक त्यायन अनेन हेतुना विस्मितोऽस्मि । तथा च श्रुतो मयापि महान शब्दः। शब्दानुरूपेणान्य प्राणिनो महता वलेन भवितव्यम दमनको ने- देव! अलितावदयं महान्मयदेतु स शब्दो भिरप्याकर्णितः । कितु म निमन्त्री य. प्रथम भूमित्याग पवार चोपदिशति । गरिमन्कार्यसदेहे भृत्यानामुपयोग पय माता हृद्भेदः ८०-८१ ] भापाटीकासमलंकृत । ८५ गरण में घवराया हुआ-सा हु और मैंने वडा भारी एक अपूर्व शब्दभी सुना है। र शब्दके अनुसार इस प्राणीका बड़ा बल होगा।' दमनक वोला-'महाराज! ह तो वडे भयका कारण है। वह शब्द तो मैंनेभी सुना है परन्तु वह बुरा त्री है कि जो पहिले धरती छोडनेका और पीछे लडनेका उपदेश देता है। इस मके सदेहमेंही सेवकोंके कार्य करने की चतुरता जाननी चाहिये ॥ 'तः- बंधुस्त्रीभृत्यवर्गस्य बुद्धः सत्त्वस्य चात्मनः। आपनिकपपापाणे नरो जानाति सारताम् ॥ ८० ॥ क्योंकि-वाचव, स्त्री, सेवक, अपनी बुद्धि और अपना वल इनकी उत्कर्षताको नुष्य आपत्तिरूपी कसौटी पर जान लेता है' ॥ ८० ॥ सिंहो ब्रूते-'भद्र ! महती शङ्का मां वाधते ।' दमनकः पुनराह वगतम्-'अन्यथा राज्यसुखं परित्यज्य स्थानान्तर गन्तुं कथं मां भापसे १" प्रकाशं ब्रूते-'देव! यावदहं जीवामि तावद्भयं न कर्तव्यम् । किंतु करटकादयोऽप्याश्वास्यन्तां यस्मादापत्प्रतीकार- काले दुर्लभः पुरुपसमवायः।' सिंह वोला-'हे शुभचिंतक ! मुझे वडी शंका दुख दे रही है। फिर दमनक अपने जीमें कहने लगा-'जो यह न होता तो राज्यका सुख छोड कर दूसरे थानमें जाने के लिये मुझसे क्यों कहते हो' प्रकट वोला-'महाराज ! जब तक मैं नीता हू तव तक भय नहीं करना चाहिये, परन्तु करटक आदिकोभी भरोसा दे जिये, क्योंकि विपत्तिके प्रतिकार (उपाय)के समय पुरुषोंका इक्ट्ठा होना दुर्लभ है।' * ततस्तौ दमनककरटको राशा सर्वखेनापि पूजितौ भयप्रती- कार प्रतिज्ञाय चलितो। करटको गच्छन् दमनकमाह-'सखे! कि शक्यप्रतीकारो भयहेतुरशक्यप्रतीकारो वेति न ज्ञात्वा भयोपशमं प्रतिज्ञाय कथमयं महाप्रसादो गृहीतः १ यतोऽनुप- कुर्वाणो न कस्याप्युपायनं गृह्णीयाद्विशेपतो राज्ञः । तब राजाने तन, मन, जौर वनसे उन दोनोंका सत्कार किया और वे दोनों । दननक, करटक नयके उपायकी प्रतिज्ञा करके चले । चलते चलते करटकने दमनक्से कहा-'मित्र! नयके कारणका उपाय होनेके योग्य है अथवा उपाय न होने के योग्य है यह विनाही जाने भयके दूर करनकी प्रतिज्ञा करके कैसे यह महाप्रसाद (वस्त्र, आभूपण इत्यादि) लेलिया क्योंकि अनुपकारी ( पिना उपाय किये किसी)नी भी नेट नहीं रेनो चाहिये और विशेष करके राजाकी।' पश्य- यस्य प्रसादे पद्मास्ते विजयश्च पराक्रमे । मृत्युश्च वसति कोये सर्वतेजोमयो हि स. ॥ ८१ ॥ देसो-जिसकी प्रसजतामे लश्नी रहती है, पराक्रमने जय रहता है, और नोधने मृत्यु रहती है, वह सचमुच तेजस्वी होता है ॥ ८१ ॥ हितो. 11 सा हितोपदेश। [ सुहृद्भेदः ८२- तथा हि,- वालोऽपि नावमन्तव्यो मनुष्य इति भूमिपः । महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति' ॥ ८२॥ और चालकभी राजाका, मनुष्यके धोखेसे अपमान नहीं करना चाइ क्योंकि यह मनुष्य के रूपसे बडी देवता है' ॥ ८२ ॥ दमनको विहस्याह-'मित्र! तूष्णीमास्यताम् । ज्ञातं मया , कारणम् । वलीवर्दनर्दितं तत् । वृपभाश्चास्माकमपि भक्ष्या.।। पुनः सिंहस्य ।' करटको ब्रूते-'यद्येवं तदा कि स्वामित्रा स्तत्रैव किमिति नापनीतः ?' दमनको ब्रूते-'यदि स्वामित्रा स्तत्रैवमुच्यते तदा कथमयं महाप्रसादलाभः स्यात् ? दमनक हस कर बोला-'मिन ! तुम चुप बैठे रहो, मैंने भयका कारण : लिया है । वह वैलका नाद था । और बैल तो हमाराभी भोजन है, . सिंहका क्या कहना है!' क्रटक बोला-'जो ऐसा ही है तो फिर साग भय वहाही क्यों नहीं दूर कर दिया" दमनकने कहा-'जो खामीका भव ऐसे कह देता तो यह मुदर पत्र आभूषणोंका लाभ कैसे होता? अपरं च,- - निरपेक्षो न कर्तव्यो भृत्यैः स्वामी कदाचन । निरपेक्षं प्रभुं कृत्वा भृत्यः स्यादविकर्णवत्' ॥ ८३ ॥ और दूसरे सेवकों को चाहिये कि खामीको कभी निचला न घेटन', अर्थात् कुछ न कुछ झगड़ा लगातेही रह, क्योंकि सेवक स्वामीको अपे सार । करके दधिर्ण पिलाके ममान मारा जाता है' ॥ ८३ ॥ करटकः पृच्छति-कथमेतत् ?' दमनकः कथयति- परकट पूलने लगा-'यह कथा कसे हे ?" दमनक कहने लगा।- ॥ कथा४॥ अस्त्युत्तरापथेऽर्बुद शिखरनानि पर्वते दुर्दान्तो नाम म विक्रमः सिंह । तस्य पर्वतमन्दरमविशयानस्य केसराम पनि पिकः प्रत्यहं छिनत्ति । तत. केसरा सूनं दृष्ट्वा कुपितो दिया न्तर्गतं मूपिकमलभमानोऽचिन्तयत्- उत्तर दिशाके नार्गन अदगिर नाम पर्वत पर दुन नाTE 43 परावनी हि रहना था. उस पदवी पदराने सोते हुवे विदा ला..." एक चूहा निउ काट जाया चला था, तर लदानीकटोरा या द.। । पिट गीतर से हरे चोको नही पा कर (१४) मोगा- 'शत्रुनवेद्यन्तु विनमानव लयते । तनाइन्तुं पुरम्बाय: सहशालरा सैनिक ८४ ५. T 1 हरेदः] भाषाटीकासमलंकृत। 'जो छोटा शत्रु होय और पराक्रमसेभी न मिले तो उसके मारनेके लिये की वरावरीका घातक आगे कर देना चाहिये ॥ ८४ ॥ यालोच्य तेन ग्रामं गत्वा विश्वासं कृत्वा दधिकर्णनामा विडा- । यत्नेनानीय मांसाहार दत्त्वा स्वकन्दरे स्थापितः। अनन्तरं द्यान्मूपिकोऽपि विलान निःसरति । तेनासौ सिंहोऽक्षत- सरः सुखं स्वपिति । मूपिकशब्दं यदा यदा शृणोति तदा तदा साहारदानेन तं विडालं संवर्धयति । यह विचार कर उसने गावमें जा और भरोसा दे कर दधिकर्ण नाम विलावको से ला मासका आहार दे कर अपनी कन्दरामें रख लिया। पीछे उसके भयसे हाभी विलेसे नहीं निकलने लगा-कि जिससे यह सिंह वालोंके नहीं करने के रण सुखसे सोने लगा । जव जव चूहेका शब्द सुनता था तव तव मासके हारसे उस विलावको तृप्त करता था। अथैकदा स मूपिकः क्षुधापीडितो वहिःसंचरन्विडालेन प्राप्तो पापादितश्च । अनन्तर स सिंहोऽनेककालं यावन्मूपिकं न श्यति तत्कृतरावमपि न शृणोति तदा तस्यानुपयोगाद्विडाल- पाप्याहारदाने मन्दादरो बभूव । ततोऽसावाहारविहारविरहा- वलो दधिकर्णोऽवसन्नो वभूव । अतोऽहं ब्रवीमि-"निरपेक्षीन र्तिव्यः" इत्यादि' ॥ ततो दमनककरटको संजीवकसमीपं गतौ । त्रि करटकस्तरुतले साटोपमुपविष्टः। फिर एक दिन भूसके मारे बाहर फिरते हुए उस चूहेको विलावने पकड़ लेया और मार डाला । पीछे उस सिंहने बहुत काल तक जव चूहेको न देखा और उसत किया हुआ शब्दभी न सुना तव उसके उपयोगी न होनेसे विलावके भोजन देनेभी कम आदर करने लगा । फिर, वह दधिकर्ण आहारविहारसे दुर्वल हो कर दुखी हुआ। इसलिये मे कहता हु-"अपेक्षा रहित नहीं करना चाहिये" इत्यादि' इसके अनन्तर दमनक करटक दोनों सजीवकके पास गये। वहा क्रटक पेडके नीचे वडे अहकारसे वेठ गया। दमनकः संजीवकसमीपं गत्वाब्रवीत्-'थरे वृपभ! एपोऽहं राशा पिद्दल नारण्यरक्षार्थ नियुक्तः। सेनापतिः करटकः समा. सापयति-"सत्वरमागच्छ । न चेदरमादरण्याद्दरमपसर । अ- न्यथा ते विरुद्धं फल भविष्यति ।" न जाने क्रुद्धः स्वामी किं विधास्यति ।' तच्छुत्वा संजीवकचायात् । दमनक सजीवक्के पास जा कर बोला-'अरे वैल। ये में वह हु कि जिसको राजा पिंगल्फने वनकी रसवालोके लिये नियुक्त किया है और वेनापति करटक आज्ञा करता है कि "शीघ्र आ, जो न आवे तो हमारे बनसे दूर चला जा।

८८ हितोपदेश। [सुहन्दः ८५-८ नहीं तो तेरेलिये बुरा फल होगा", न जाने क्रोधी खामी क्या कर डारे सुन कर सजीवकभी साथ आया आज्ञाभङ्गो नरेन्द्राणां ब्राह्मणानामनादरः। पृथक्शय्या च नारीणामशस्त्रविहितो वधः॥ ८५॥ राजाकी आज्ञाका भग, ब्राह्मणोंका अनादर, स्त्रियोंकी अलग शय्या रस इनको विना शस्त्रका वध ( मरना) कहते हैं ॥ ८५ ॥ ततो देशव्यवहारानभिज्ञः संजीवकः सभयमुपसृत्य साष्टाङ्गमा करटकं प्रणतवान् । फिर, देशकी रीतिको नहीं जानने वाले सजीवकने डरते डरते पास ज्य करटकको साष्टाग प्रणाम किया, तथा चोकम्,- मतिरेव बलाद्रीयसी यदभावे करिणामियं दशा। इति घोपयतीव डिण्डिमः करिणो हस्तिपकाहतः क्वणन् ॥ ८६॥ जैसा कहा है-वलसे, बुद्धि अधिक बडी है कि जिस युद्धिके न हाथियोकी ऐसी दशा होती है, अर्थात् वली होने पर भी मतिहीन होनेसे य हो जाते है, यही बात मानों हाथीपानसे वजाया गया हागीका नगाड़ा करके कहता है ॥ ८६॥ अथ संजीवकः साशकुमार-'सेनापते ! कि मया कर्त तदभिधीयताम् ।' करटको ब्रूते-'वृपभ ! अत्र कानने ति अस्माद्देवपादारविन्दं प्रणम ।' संजीवको ब्रूते-'तदभयनान यच्छ, गच्छामि ।' करटको ब्रूते-2णु रे वलीवर्द ! अला शदया। फिर सनीव शमाने बोला-हे चेनापति ! मुझे क्या करना चाहिय रहिये ।' करटर ने कहा-'देल! इस बनने ठहरो, जोर हमारे ना! चरणकमलोंको प्रगान करो' सजीव पोला-'मुझे अभय पनि चल।' यह मुा घरटक बोग-'मुन रे चल ! एनी दुनिया मत कर, पन प्रतिवाचमदत्त केशवः शपमानाय न चेदि भुने। ननुहुंकुल्ने बनध्वनि न हिमायत्तानि केसरी॥८॥ ।

हझेदः ८८-८९] भाषाटीकासमलंकृत । ८९ H न्यच्च,- तृणानि नोन्मूलयति प्रभजनो मृदूनि नीचैः प्रणतानि सर्वतः। समुच्छ्रितानेव तरून्प्रवाधते महान्महत्येव करोति विक्रमम् ॥ ८८॥ और भी देख-आधी चारों ओरसे झुके हुए, तथा कोमल और छोटे छोटे दोको नहीं उसाड़ती है, पर बड़े बड़े जुग्गादी पेडोंको जडसे गिरा देती है, योंकि बड़ा बडेही पर विक्रम करता है' ॥ ८८ ॥ तत्तौ संजीवकं कियहरे संस्थाप्य पिङ्गलकसमीपं गतौ। फिर वे दोनों सजीवकको गोडी दूर पर ठहरा कर पिंगलकके पास गये ॥ ततो राज्ञा सादरमवलोकितौ प्रणम्योपविष्टौ । राजाह-त्वया 1 दृष्टः ?' दमनको ब्रूते-'देव ! दृष्टः। कितु यईवज्ञातं तत्तथा । हानेवासौ देवं इष्टुमिच्छति । किंतु महावलोऽसौ, ततः सजी- पूयोपविश्य दृश्यताम् । शब्दमात्रादेव न भेतव्यम् । राजाने उन दोनोंको आदरसे देखा और वे दोनों प्रणाम करके बैठ गये । कर राजा वोला-'तुमने उसे देखा?' दमनकने कहा-'हे महाराज! देखा, परन्तु वा महाराजने समझा या वैसाही है । वड़ा है, महाराजके दर्शन करना चाहता है। परन्तु वह वड़ा बलवान् है। इसलिये सावधान हो वैठ कर देखिये । केवल ब्दही नहीं डरना चाहिये। तथा चोकम्,- शब्दमावान भेतव्यमशात्वा शब्दकारणम् । शब्दहेतुं परिज्ञाय कुट्टनी गौरवं गता' ॥ ८९॥ जैसा कहा है-शब्दका कारण विना जाने केवल शब्दसेही नहीं डरना चाहिये. जसे शब्दका कारण जान कर कुटनीने आदर पाया ॥ ८९ ॥ राजाह-~-'कथमेतत् ?' दमनकः कथयति- राजा बोला-'यह कथा कैसे है " दमनक कहने लगा।- ॥ कथा ५॥ अस्ति श्रीपर्वतमध्ये ब्रह्मपुराख्यं नगरम् । तच्छिखरप्रदेशे घण्टाकर्णो नाम राक्षसः प्रतिवसतीति जनप्रवादः श्रूयते । एकदा घण्टामादाय पलायमानः कश्चिचौरो व्याघ्रण व्यापादितः । तत्पाणिपतिता घण्टा वानरै. प्राता। वानरास्तां घण्टामनुक्षणं वादयन्ति । ततो नगरजनैः स मनुप्यः खादितो दृष्टः प्रतिक्षणं घण्टारवश्व श्रूयते । अनन्तर घण्टाकर्णः कुपितो मनुप्यान्खादति घण्टा च वादयतीत्युक्त्वा सर्वे जना नगरात्पलायिताः। ततः करालया नाम कुट्टन्या विमृश्यानवसरोऽयं घण्टानादः। तत्कि मर्कटा घण्टा वादयन्तीति खयं विज्ञाय राजा विज्ञापितः-'देव! - ह ९० हितोपदेश । [सुट यदि कियद्धनोपक्षयः क्रियते तदाहमेनं घण्टाकर्ण साध्या ततो राज्ञा तस्यै धनं दत्तम् । कुट्टन्या च मण्डलं तत्र गणेशादिपूजागौरवं दर्शयित्वा स्वयं वानरप्रियफलान्य वनं प्रविश्य फलान्याकीर्णानि । ततो घण्टां परित्यज्य व फलासक्ता वभूवुः । कुट्टनी च घण्टां गृहीत्वा नगरम सर्वजनपूज्याऽभवत् । अतोऽहं ब्रवीमि-"शब्दमानान भेत इत्यादि ॥ ततः संजीवक आनीय दर्शनं कारितः। पश्चा परमप्रीत्या निवसति । श्रीपर्वतके वीचमे एक ब्रह्मपुर नाम नगर था। उसके शिरार पर एक नाम राक्षस रहता या, यह मनुष्योंसे उड़ती हुई खवर सुनी जाती है दिन घटेको ले कर भागते हुये किसी चोरको व्याघ्रने मार डाला. और हाथसे गिरा हुआ घटा वदरोंको मिला। वदर उस घटेको चार बार बजावे नगरवासियोंने देखा कि वह मनुष्य सा लिया गया और प्रतिक्षणमे पटेय सुनाई देता है। तर राव नागरिक लोग “घटाकर्ण क्रोधसे मनुष्यों को साता घटेरो बजाता है-" यह कह कर नगरसे भाग चले। बाद कराला नाम विचार किया कि यह घटेका शब्द विना अवसरका है, इसलिये क्या घटेको बजाते हैइस बात को अपने आप जान कर राजासे कहा-'जोर सर्च कगे तो मै इस घटाकर्ण राक्षसको वश कर ल ।' फिर रागाने उ. दिया. और कुटनीने महल बना कर उसमे गणेश आदि की पूजा का दिराला कर और आपने बन्दरीको अच्छे लगने वाले फलोंको ला कर वनम फल फेला दिया। फिर घटेको छोड़ कर वन्दर फलोंके खाने लग गये। कुटनी घटेको ले कर नगरमे आई और मन जनोंने उस आदर किया। में कहता :-"केवल शब्दही नहीं उरना चाहिये" इत्यादि। फिर सं. सा कर दर्शन कराया। पीछे वह वहादी वदी प्रीतिमे रहने लगा। भय कदाचित्तस्य सिंदस्य भ्राता स्तब्धकर्णनामा सिंह। गतः। तस्यातिथ्यं कृत्वा समुपवेदय पिङ्गल कस्तदाहाराय हन्तुं चलित. । अत्रान्तरे संजीवको वदति-'देव! अब मृगाणा मासानि क?' राजाह-'दमन करटतो जानीर संजीवको ने-'शायता किमस्ति नास्ति वा ।' सिंदो विमुच्या 'नास्त्येव तत्'। संजीवको ने-'कथमेतावन्माम नायो दितम् ?' राजाद-मादितं व्ययितावधारित च । प्रत्या कमः।' संजीवकोने-'मयंधीमदवणादानामगोचरणय किर राजाह-मडीयागोचरणव कियते ।' अब मीका -- दुचितम् । इस अनन्तर पत्र दान नियमोन । ।

हृद्भेदः ९०-९४] भाषाटीकासमलंकृत। ९१ - का आदर-सत्कार करके और अच्छी भांति बैठा कर पिंगलक उसके भोजनके पशु मारने चला। इतनेमे सजीवक बोला कि-'महाराज ! आज मारे हुए का मास कहा है ? राजाने कहा-'दमनक करटक जाने ।' सजीवक्ने कहा- जान लीजिये कि है या नहीं है ।' सिंहने विचार कर कहा-'अव वह नहीं सजीवक बोला-'इतना सारा मास उन दोनोंने कैसे सा लिया ?' राजा वोला- या, वाटा और फेंक फाक दिया ! नित्य यही डौल रहता है। तव सजीवक्ने -'महाराजके पीठ पीछे इस प्रकार क्यों करते हैं ?' राजा बोला-'मेरे पीठ ऐसाही किया करते हैं।' फिर सजीवक्ने कहा-'यह वात उचित नहीं है। । चोक्तम्,- नानिवेद्य प्रकुर्वीत भर्तु. किंचिदपि खयम् । कार्यमापत्प्रतीकारादन्यत्र जगतीपते ! ॥९० ॥ जैसा कहा है-हे राजा। स्वामीके विना जताये आपत्तिके उपायको छोड़ र कुछ काम अपने आप नहीं करना चाहिये ॥ १० ॥ न्यच्च कमण्डलूपमोऽमात्यस्तनुत्यागो वहुग्रहः । नृपते! किक्षणो मूल् दरिद्रः किंवराटकः ॥ ९१ ॥ और हे राजा ! मत्री कमटलुके समान है, क्योंकि थोड़ा खर्च करता है र बहुत संग्रह करता है, और मूर्ख समयको अनमोल नहीं समझता है, र्थात् इस थोडेसे समयमें क्या होगा? और दरिद्री कौडीको अनमोल नहीं नता है॥९१ ॥ स ह्यमात्यः सदा श्रेयान् काकिनी यः प्रवर्धयेत् । कोशः कोशवतः प्राणाः प्राणाःप्राणा न भूपतेः ॥ ९२ ॥ निश्चय करके वही नत्री श्रेष्ट है जो दमडी दमडी करके कोषको वढावे, क्यों- क कोपयुक्त राजाका कोपही प्राण है, केवल जीवनही प्राण नहीं है, अत एव रोपको प्राणोंतेभी अधिक रक्खे ॥ ९२॥ किं चान्यैर्न कुलाचारैः सेव्यतामेति पूरुपः । धनहीनः स्वपत्यापि त्यज्यते किं पुनः परैः ॥ ९३ ॥ और धन आदिके विना अन्य अच्छे कुल और आचारसे पुरुप आदर नहीं गता है, क्यों कि वनहीन मनुष्यको उसकी स्त्री तक छोड देती है फिर दूसरोंकी स्या कहें ।। ९३ ॥ एतच राज्ञः प्रधानं दूपणम् और यह राजाका मुरय दोप है- अतिव्ययोऽनपेक्षा च तथार्जनमधर्मतः। मोपणं दूरसंस्थान कोशव्यसनमुच्यते ॥ ९४ ॥ सर्च धनकी इच्छा न रसना, अन्यायसे धन इकट्ठा करना। करना, धनकी ९२ हितोपदेश । [सुहृद्भेदः ९५- अन्यायसे किसीका धन छीन लेना, और वनको दूर ले जा कर रख कोषका व्यसन याने दोष कहा गया है ॥ ९४ ॥ यतः- क्षिप्रमायमनालोच्य व्ययमानः खवाञ्छया । परिक्षीयत एवासौ धनी वैश्रवणोपमः ॥ ९५ ॥ क्योंकि धनके लाभको विना विचारे अपनी इच्छासे शीघ्र व्यय कुबेरके समान धनवान् होने पर भी वह धनी अवश्य दरिद्री हो जात स्तब्धकर्णो ब्रूते-'शृणु भ्रातः! चिराश्रितावेतो दमनक संधिविग्रहकार्याधिकारिणौ च कदाचिदर्थाधिकारेन नियो स्तब्धकर्ण बोला-'सुनो भाई। ये दमनक करटक बहुत दिनोंसे अप पड़े हुये हैं और लडाई तथा मेल करानेके अधिकारी ह, धनके आ ये कभी नहीं लगाने चाहिये अपरं च नियोगप्रस्तावे यन्मया श्रुतं तत्कथ्यते । और दूसरे, ऐसे कामके विषयगे जो भेने सुना है सो कहा जाता ब्राह्मणः क्षत्रियो बन्धुर्नाधिकारे प्रशस्यते । वात्मणः सिद्धमप्यर्थ कृच्छ्रेणापि न यच्छति ॥ ९६ ब्राह्मण, क्षत्रिय, और भाईचन्धु इनको अधिकार पर लगाना अE क्योकि ब्राह्मण शीत सिद्ध होने वाले प्रयोजनको राजाके आग्रह को जान कठिनताते नहीं करता है ॥ ९६ ॥ नियुक्तः क्षत्रियो द्रव्ये खड्ग दर्शयते ध्रुवम् । सर्वस्वं ग्रसते बन्धुराक्रम्य शातिभावतः ॥ ९७ ॥ जो क्षत्रिय को बनके नाम पर रस नो निश्चय करके राज्य दिनाने तरपार दिनटाने लगता है, और गन्दव शाति के कारण धेर र गम लेता है॥२७॥ अपरावेऽपि नि:शको नियोगी चिरसेवकः । स स्वामिनमवनाय चरेच निरग्रहः ॥१८॥ पुराना सेवा जारा करने पर भी निनय रहता हजार मामा र विना रोम्टोफ काम करना ॥ १८ ॥ उपकताविकारस्य वापरायन मन्यते । उपकार बजाळत्य सर्वमेवावलुगति ॥ २० ॥ उपकर घरने वागमदिर पर टोjati और सबर कोर: या॥ उपांशु कीडितोऽमाल्य, मयं गजायते यत । पत्रमा क्रिया नेन सदा परिचयाचम् ॥ १५ ॥ नारा : मानने 1.1.1 0 । - द्भेदः १०१-१०६] भापाटीकासमलंकृत । ९३ , आचरण करता है और वह पास रहनेसे निश्चय खामीका अनादर करता ॥ १००॥ अन्तर्दुष्टः क्षमायुक्तः सर्वानर्थकरः किल । शकुनिः शकटारश्च दृष्टान्तावत्र भूपते ! ॥ १०१॥ हे राजा ! भीतरका दुष्ट अर्थात् पीठ पीछे काम विगाडू और सहनशील त् सामने हित दिखाने वाला मत्री निश्चय करके सब अनर्थोंका करने वाला हा है. इस विपयमें शकुनि और शंकटार ये दो दृष्टान्त हैं ॥ १०१ ॥ सदामात्यो न साध्यः स्यात्समृद्धः सर्व एव हि । सिद्धानामयमादेश ऋद्धिश्चित्तविकारिणी ॥ १०२॥ वनसे वढे हुए सव मत्री लोग निश्चय करके अतमे असाध्य अर्थात् खतत्र जाते हैं, क्योंकि ऐश्वर्य चित्तको विकृत करने वाला (दानतको विगाडने वाला) यह महात्माओंका वाक्य है ॥ १०२ ॥ प्राप्तार्थग्रहणं द्रव्यपरीवर्तोऽनुरोधनम् । उपेक्षा बुद्धिहीनत्वं भोगोऽमात्यस्य दूपणम् ॥ १०३ ॥ मिले हुए धन का मार लेना, द्रव्यका अदल बदल करना, अनुरोध ( वार २ य मागना ), सव कामोंमे आलकस, वुद्धिहीन होना और परस्त्रियोंके साथ गने लगा रहना यह मत्रीके दूपण है ॥ १०३ ॥ नियोग्यर्थग्रहापायो राक्षां नित्यपरीक्षणम् । प्रतिपत्तिप्रदानं च तथा कर्मविपर्ययः ॥ १०४ ॥ और राजाके सचय किये हुए वनका नाश, राजाओंकी नित्य परीक्षा, अर्थात् सन्न है या अप्रसन्न है, यह जानना और प्रिय वस्तुका दे देना, और करनेके निग्य कानने आरक्स करना येभी मत्रीके दूपण है ॥ १०४ ॥ निपीडिता वमन्त्युच्चैरन्त सार महीपतेः। दुष्टव्रणा इव प्रायो भवन्ति हि नियोगिनः॥ १०५॥ अविकारी लोग अधिक दवानेते राजाके भीतरे भेदको सर्वत्र ऐसे उगलते करते ह कि जैसे फोड़ा जविक दवानेसे भीतरकी राद इत्यादि उगल देता ॥ १०५॥ मुटुर्नियोगिनो वाध्या वसुधारा महीपते । सकल्कि पीडितं स्नानवस्त्रं मुञ्चेद्रुतं पयः॥ १०६॥ और हे राजा ! अधिकारीके जोडे हुए धनकी वार वार परीक्षा करनी चाहिये 'क्योंकि एकवार निचोदा हुआ न्हानेका वन क्या शीघ्र जलमो छोड़ देता है ? अर्थात् कभी नहीं छोड़ता है ॥ १०६ ॥ एतत्सर्व यथावसर ज्ञात्वा व्यवहर्तव्यम् ।' सिंहो ब्रूते-'अस्ति । 1 १ दुयोधनवा नामा जो नत्री के पद पर काम करता पा २ राजा महानदका मत्री -- ९४ हितोपदेश। [सुहृद्भेदः १०७-२ । तावदेवम् , कित्वेतो सर्वथा न मम वचनकारिणौ।' स्तम्प ब्रूते-'एतत्सर्वमनुचितं सर्वथा। यह सव जैसा अवसर हो वैसा जान कर काम करना चाइये। बोला-'यह तो है ही, पर ये सर्वथा मेरी वातको नहीं करने वाले हैं।' हा बोला-'यह सब प्रकारसे अनुचित है। यता, आज्ञाभङ्गकरान् राजा न क्षमेत्स्वसुतानपि । विशेषः को नु राशश्च राशचित्रगतस्य च ॥ १०७ ॥ क्योकि-राजा आज्ञाभग करने वाले अपने पुत्रोकोभी क्षमा न करे, ऐसा न करनेसे जीते हुए राजामे और चित्रमे लिखे हुए रागामें क्या में अर्थात् ऐसा राजा किसी कामका नहीं होता है ॥ १०७ ॥ स्तब्धस्य नश्यति यशो विषमस्य मैत्री नटेन्द्रियस्य कुलमर्थपरस्य धर्मः। विद्याफलं व्यसनिनः कृपणस्य सौरयं राज्यं प्रमत्तसचिवस्य नराधिपस्य ॥ १०८॥ अहकारी मनुष्य च यश, चचल चित्त पालेकी मित्रता, दुष्ट इन्दियो । कुल, धनके लोभी का धर्म, द्यूत आदि व्यसनमे आसक्तका वियाफर, 31 मुन्ध, और विवाहीन मनी वाले राजाका राज्य, नष्ट हो जाता है ॥ १५ अपरंच,- तस्करेभ्यो नियुक्तेभ्यः शत्रुभ्यो नृपालभात् । नृपतिर्निजलोभाच प्रजा रक्षेत्पितेव हि ॥ १०९ ॥ और दूसरे-राजाको पोरोमे, सेरकोगे, शत्रुओसे अपने प्रिय है। और जो लोभम, पिता के समान प्रजाका रता करनी चाहिये ॥ १.२ भ्रातः। मवेवासाचन क्रियताम् । व्यवहारोऽप्यस्मानित एव । अयं संजीवकः मस्यभक्षकोऽयविकारे नियुज्यनाम एतद्वचनात्तथानुष्टिने सति तदारभ्य पिलाजीरयो । बन्धुपरित्यागेन मदता मोहेन कालो तिवर्नन । नतो मायाहारदाने शेयिन्यदर्शनादमनकरटानन्यायं चिन्तन तदाह दमनक काटकम्-'मित्र!कितव्यम् ? आहात दोषः। वयं नेपि दो परिदेवनमायनुचितम् । । -- -- - द्भेदः ११०] भाषाटीकासमलंकृत। '-मित्र ! अव क्या करना चाहिये 2 यह अपनाही किया दोप है, आपही करने पर पछताना भी उचित नहीं है। मा चोकम- वर्णरेखामहं स्पृष्ट्वा वद्धात्मानं च दूतिका । आदित्सुश्च मणि साधुः खदोषादुःखिता इमे ॥ ११० ॥ जैसा कहा है-मैं वर्णरेखाको छू कर, और कुटनी अपनेको वाध कर तथा मणि लेनेकी इच्छाते-ये तीनों अपने दोपसे दुखी हुए' ॥ ११० ॥ करटको ब्रूते-'कथमेतत् ?' दमनकः कथयति- करटक पूछने लगा-'यह कथा कैसे है ? दमनक कहनेलाग। - ॥ कथा ६॥ अस्ति काञ्चनपुरनाम्नि नगरे वीरविक्रमो राजा। तस्य धर्मा- कारिणा कश्चिन्नापितो वध्यभूमि नीयमानः कंदर्पकेतुनाना रेबाजकेन साधुद्वितीयकेन नायं हन्तव्य इत्युक्त्वा वस्त्राञ्चले तः। राजपुरुपा ऊचुः-'किमिति नायं वध्यः?' स आह-'श्रू. ताम् ।' "स्वर्णरेखामहं स्पृष्टवा" इत्यादि पठति। त आहुः-'कथ- तत् ?' परिव्राजकः कथयति-'अहं सिंहलद्वीपे भूपतेर्जीमूत. तो. पुत्रः कंदर्पकेतुर्नाम । एकदा केलिकाननावस्थितेन मया तवणिमुखाच्छ्रुतं यत्र समुद्रमध्ये चतुर्दश्यामाविर्भूतकल्प- रुतले रत्नावलीकिरणकरपर्यवे स्थिता सर्वालंकारभूपिता क्ष्मीरिव वीणां वादयन्ती कन्या काचिदृश्यत इति। ततोऽहं तवणिजमादाय पोतमारुह्य तत्र गतः। अनन्तरं तत्र गत्वा यद्धेऽर्धमग्ना तथैव सावलोकिता । ततस्तल्लावण्यगुणाकृष्टेन यापि तत्पश्चाज्झम्पो दत्तः । तदनन्तर कनकपत्तनं प्राप्य वर्णप्रासादे तथैव पर्यङ्के स्थिता विद्याधरीभिरुपास्यमाना मया- जोकिता। तयाप्यहं दूरादेव दृष्ट्वा सखी प्रस्थाप्य सादर संभा- पेतः । तत्सख्या च मया पृष्टया समाख्यातम्-'एपा कंदर्प- लिनानो विद्याधरचक्रवर्तिनः पुत्री रत्नमसरी नाम प्रति- प्रापिता विद्यते । “यः कनकपत्तनं खचक्षुपागत्य पश्यति स एव पेतुरगोचरोऽपि मा परिणेप्यती"ति मनस. संकल्पः । तदेनां 'गन्धर्षविवाहेन परिणयतु भवान् ।' अथ तत्र वृत्ते गान्धर्ववि- हे तया सह रममाणस्तत्राहं तिष्टामि। तत एकदा रहसि नियोक्तम्-'स्वामिन् ! स्वेच्छया सर्वमिदमुपभोक्तव्यम् । एपा चित्रगता स्वर्णरेया नाम विद्याधरी न कदाचित् स्प्रष्टव्या । पश्चा- "दुपजातकौतुकेन मया वर्णरेखा खहस्तेन स्पृष्टा तया चित्र- गतयाप्यहं चरणपझेन ताडित आगत्य खराष्ट्रे पतितः। अथ TE IN " ९६ हितोपदेश । [न दुःखार्तोऽहं परिव्राजितः पृथिवीं परिभ्राम्यनिमां नगरीमनुष अत्र चातिकान्ते दिवसे गोपगृहे सुप्तः सनपश्यम् ।' प्रदोर सुहृदां पालनं कृत्वा खगेहमागतो गोप. सवधू दूत्या सह कि मन्त्रयन्तीमपश्यत् । ततस्तां गोपी ताडयित्वा स्तम्भे या ततोऽर्धरात्र एतस्य नापितस्य वधू ती पुनस्तां गोपीमुपेत्यार तव विरहानलदग्धोऽसौ सरशरजर्जरितो मुमूर्षुरिव वर्तते। काचनपुर नाम नगरमे वीरविक्कम नाम एक राजा था। उसका धत किसी नाईको वधस्थानमे लाया था, उस समय दर्पकेतु नाम कोई जिसका साथी एक बनिया या उसने 'यह मारनेके योग्य नहीं है कर अपने वनके पल्हेसे उसे छिपा लिया राजाके सेवर पोटे-पद.. योग्य क्यों नहीं है ?' वह वोला-'सुनिये, “मे स्वर्णरेशाको रहर', पदता है । वे बोले-'यह कथा से है । सन्यासी कहने - सिंहलद्वीपके जीमूतकेतु नाम राजाका पुन कन्दर्पकेतु नाम हु । एक समय भने आनन्द भोगने के उपवनमे नैठे बैठे एक नावके व्यापारी यह मुना फि यहा समुद्र के बीचोधीचमे चौदस के दिन । निकलता है, उसके नीचे रजॉकी किरणोता यादही सो हुए रंगविरंगे पलग पर बैठी हुई ओर राव आभूषणोरो भूगित गरी समान चीन को बनाती हुई कोई कन्या दिखाई दिगा करती म 1 .. - हृदः १११] भापाटीकासमलंकृत। वालाके घरमे सोते सोते देखा कि सन्ध्याके समय ग्वाला मित्रोंका सत्कार के अपने घर आया और अपनी स्त्रीको एक कुट्टनीके साथ कुछ कानाफूसी ते हुए देख लिया। फिर उस ग्वालिनको मारपीट कर और सभेमे बाध कर रहा पीछे आधी रातको इसी नाईकी बहू कुट्टनी फिर उस घोसिनके पास कर कहने लगी-'तेरे विरहकी अग्निसे जला हुआ कामदेवके वाणोंसे घायल मरासू-सा हो रहा है। या चोकम् ,- रजनीचरनाथेन खण्डिते तिमिरे निशि। यूनां मनांसि विव्याथ दृष्ट्वा दृष्ट्वा मनोभवः ॥ १११ ॥ जैसा कहा है-चन्द्रमासे रातमें अधकार दूर होने पर कामदेवने देख देख र युवाओंके चित्तोंको व्याकुल किया ॥ १११ ॥ : तस्य तादृशीमवस्थामवलोक्य परिक्लिष्टमनास्त्वामनुवर्तितुमा- ता। तदहमनात्मानं वद्धा तिष्ठामि । त्वं तत्र गत्वा तं संतोप्य त्वरमागमिष्यसि । तथाऽनुष्ठिते सति स गोपः प्रवुद्धोऽवदत् । दानीं त्वां पापिष्टां जारान्तिकं नयामि । ततो यदासौ न किंचि- पि ब्रूते तदा कुद्धो गोपः । दर्पान्मम वचसि प्रत्युत्तरमपि न दासि' इत्युक्त्वा कोपेन तेन कर्तिकामादायास्या नासिका छिन्ना। पथा कृत्वा पुनः सुप्तो गोपो निद्रामुपगतः । अथागत्य गोपी तीमपृच्छत्-'का वार्ता ?' दूत्योक्तम्-'पश्य माम् । मुखमेव पार्ता कथयति।' अनन्तर सागोपी तथा कृत्वात्मानं वडा स्थिता। यं च दूती तां छिन्ननासिकां गृहीत्वा स्वगृहं प्रविश्य स्थिता।ततः रातरेवानेन नापितेन ववधूः भुरभाण्डं याचिता सती क्षुरमेकं नादात् । ततोऽसमग्रभाण्डे माते समुपजातकोपोऽयं नापितस्तं पुर दूरादेव गृहे क्षिप्तवान् ॥ अथ कृतार्तरावेयं विनापराधेन में नासिकाऽनेन छिन्नेत्युक्त्वा धर्माधिकारिसमीपमेनमानीतवती । सा च गोपी तेन गोपेन पुनः पृष्टोवाच-'अरे पाप! को मां महा- सती निरूपयितुं समर्थः ? मम व्यवदारमकल्मपमष्टौ लोकपाला एव जानन्ति। उसकी वैसी दशा देख कर ननमें घवराई हुई तेरी अनुवर्तिनी ( एवजी) करने आई ह । इसलिये मै यहा अपनेको वाव कर रहती है। तू वहा जा कर उसको सतुष्ट कर-शीघ्र लौट आइयो' ऐसा कहने पर वह ग्वाला जाग र कहने लगा-जव तुज्ञ पापिनको वेरे यारके पास ले चल् । फिर जव यह कुछ न वोरी तय ग्वाला झुसलाया। एमडते मेरी वातका उत्तरभी नहीं देती है यह रह कर क्रोधते उमने छुरी निकाल, उसकी नाक काट डाली । वैसा करके ग्वाला फिर सो गया, और उसे निद्रा आ गई फिर ग्वालिनने आ कर दूतीते पूछा- 'क्या बात है?' दूतीने कहा-'मुझे देस दे, मुसही वात कह देता है। फिर वह ९ हितो. ...

हितोपदेश । [सु दुःखार्तोऽहं परिवाजितः पृथिवीं परिभ्राम्यन्निमां नगरीमनुमान अत्र चातिकान्ते दिवसे गोपगृहे सुप्तः सन्नपश्यम् ।' प्रदोपसय सुहृदां पालनं कृत्वा स्वगेहमागतो गोपः स्ववधू दूत्या सह रिन मन्त्रयन्तीमपश्यत् । ततस्तां गोपी ताडयित्वा स्तम्भे यड्या न ततोऽर्धरात्र एतस्य नापितस्य वधूर्दूती पुनस्तां गोपीमुपेत्यापदद तव विरहानलदग्धोऽसौ स्मरशरजर्जरितो मुमूर्षुरिव वर्तते। काचनपुर नाम नगरम वीरविक्रम नाम एक राजा था। उसका घ किसी नाईको वधस्थानमें लाया था, उस समय दर्पकेतु नान को जिसका साथी एक वनिया या उसने 'यह मारनेके योग्य नहीं है कर अपने वत्रके पल्लेसे उसे छिपा लिया राजाके सेवक वोले-'य योग्य क्यों नहीं है ?' वह बोला-'सुनिये, “मैं स्वर्णरेखाको कू कर पढता है ।' वे वोले-'यह कथा कैसे है 2' । सन्यासी कहने सिंहलद्वीपके जीमूतकेतु नाम राजाका पुत्र कन्दर्पकेतु नाम हू एक समय मैंने आनन्द भोगनेके उपवनमे बैठे बैठे एक नावके व्यापारी यह सुना कि यहा समुद्र के बीचोबीचमे चौदसके दिन निकलता है, उसके नीचे रत्नोंकी किरणोंका वाढकी झलक हुए रगविरगे पलग पर बैठी हुई और सत्र आभूषणोंसे भूपित दूस समान बीनको वजाती हुई कोई कन्या दिखाई दिया करती है फि व्यापारीको ला कर और नाव पर चढ कर वहा गया। पीछे वहा जा क आधी डूबी हुई ज्योकी त्यों मेने उसे देखा । फिर उसके सुन्दर लुभाया गया, मैं भी उसके पीछे झट कूद पगा । इसके अनन्तर पहुच कर सुवर्णके भवनमे वैसेही पलग पर बैठी हुई और विद्याधरियो गईको मैने देखी, उसने भी मुझे दूरसे देस कर और सहेलीको मेज "मुझे बुलानेका" सदेसा कहला भेजा। और जब मैंने सखीसे "उसने पूछा, तब उसने सब अच्छे प्रारसे कह सुनाया कि यह दर्पकेलि ना ओंके चक्रवर्ती राजाकी रत्नमजरी नाम बेटी यह प्रतिज्ञा कर बैठी है कि कनपुरको अपने नेत्रसे देखेगा वह मेरे पितामा अपरिचितगी मुझं यह मनका सम्त्य है। इसलिये आप इसके माप गाविवाह फिर वहा गर्वविवाह होने के बाद उसके साथ रमण करता हुआ लगा । रि एक दिन उसने मुझसे एनतने रहा-हे साभी ! अपनी यह सर पदार्य भोगो । परतु दस चित्रलिखित मुवर्णरेखा नाम फनी मत इना पीठे कुठ कोतुक होने पर मने वर्णरतासे अपने और उस चित्रने लिखी हुई(मुवगरेता)ने अपने चरणकम दुकराया कि अपने राज्यमं आ पड़ा। पीछे म दुगमे सीमा पृथ्वी पर बनता पूनता इस नगरी में जा पहुंचा है और वह दिनई । .

हद्भेदः १११] भाषाटीकासमलंकृत। ar - १ ग्वालाके घरमें सोते सोते देखा कि सन्ध्याके समय ग्वाला मित्रोंका सत्कार के अपने घर भाया और अपनी त्रीको एक कुट्टनीके साथ कुछ कानाफूसी देख लिया। फिर उस ग्वालिनको मारपीट कर और खभेमे वाध कर रहा. पीछे आधी रातको इसी नाईकी बहू कुट्टनी फिर उस घोतिनके पास कर कहने लगी-'तेरे विरहकी अग्निसे जला हुआ कामदेवके वाणोंसे घायल मरासू-सा हो रहा है। गचोकम्,- रजनीचरनाथेन खण्डिते तिमिरे निशि। यूनां मनांसि विव्याथ दृष्ट्वा दृष्वा मनोभवः ॥ १११ ॥ जैसा कहा है-चन्द्रमासे रातमें अधकार दूर होने पर कामदेवने देख देख * युवाओंके चित्तोंको व्याकुल किया ॥ १११॥ तस्य तादृशीमवस्थामवलोक्य परिक्लिष्टमनास्त्वामनुवर्तितुमा- ना। तदहमत्रात्मानं वदा तिष्ठामि । त्वं तत्र गत्वा तं संतोष्य त्वरमागमिष्यसि । तथाऽनुष्ठिते सति स गोपः प्रवुद्धोऽवदत् । मानी त्वां पापिष्टां जारान्तिकं नयामि । ततो यदासौ न किंचि- 'पि ब्रूते तदा कुद्धो गोपः। दर्पान्मम वचसि प्रत्युत्तरमपि न दासि' इत्युक्त्वा कोपेन तेन कर्तिकामादायास्या नासिका छिन्ना। था कृत्वा पुनः सुप्तो गोपो निद्रामुपगतः । अथागत्य गोपी तीमपृच्छत्-'का वार्ता ?' दूत्योकम्-'पश्य माम् । मुखमेव कथयति ।' अनन्तर सागोपी तथा कृत्वात्मानं वद्धा स्थिता। यं च दृती तां छिन्ननासिकां गृहीत्वा स्वगृह प्रविश्य स्थिता।ततः तरेवानेन नापितेन स्ववधूः भुरभाण्डं याचिता सती क्षुरमेकं नादात् । ततोऽसमग्रभाण्डे प्राहे समुपजातकोपोऽयं नापितस्तं जुर दूरादेव गृहे क्षितवान् ॥ अथ कृतार्तरावेयं विनापराधेन मे शासिकाऽनेन छिन्नेत्युक्त्वा धर्माधिकारिसमीपमेनमानीतवती ॥ ला च गोपी तेन गोपेन पुनः पृष्टोवाच-'अरे पाप! को मां महा- सती निरूपयितुं समर्थः? मम व्यवहारमकल्मपमष्टो लोकपाला वजानन्ति। उसकी वैसी दशा देख कर मनमें घवराई हुई तेरी अनुवर्तिनी ( एवजी) करने आई हू । इसलिये में यहा अपनेको वाव कर रहती हु । तू वहा जा कर उसको संतुष्ट कर-शीघ्र लौट आइयो'. ऐसा कहने पर वह ग्वाला जाग कर कहने लगा-अव तुज पापिनको तेरे यारके पास ले चलू । फिर जव यह कुट न पोली तब ग्वाला सुजलाया। पमदसे मेरी बातका उत्तरभी नहीं देती है यह पह कर कोधते उसने छुरी निगाल, उसकी नाक काट डाली । वैसा करके ग्वाला फिर सो गया, और उसे निद्रा आ गई फिर ग्वालिनने आ कर दूतीसे पूछा- 'क्या बात है?' दूतीने पहा-'मुझे देस ले, मुसही बात कह देता है। फिर वह ९हितो.

- हितोपदेश। [सुदृझेदः । ग्वालिन वैसेही करके आप अपनेको बाध कर ठहरी रही, और वह दूटी कटी हुई नाकको ले कर अपने घरमै घुस कर बैठी रही। फिर प्रात काल हो- इस नाईने अपनी बहूसे पेटी माँगी । उसने एक उस्तरा दे दिया। फिर पेटीको पा कर इसे बड़ा कोव आया और इस नाईने उस छुरेको दूरसेही फेंक दिया. पीछे इसने बड़ा हुर्रा मचाया कि विना अपराध इसने मेरो काट डाली है, यह कह कर इसे धर्माधिकारीके पास ले आई। और उधर न्यून उस ग्वालिनसे फिर पूछा और वह बोली-'अरे पापी ! कोन मुझसी महापतित्रः निरूपण कर सकता है ? मेरे पापरहित व्यवहारको आठों लोकपालभी जानते यतः,- आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च । अहश्च रात्रिश्च उभेच संध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् ॥ ११२॥ क्योंकि-सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अमि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, दिन, रात, दोनों सध्या और धर्म ये मनुष्य के आचरणको जानते हैं ॥११॥ यद्यहं परमसती स्याम् , त्वां विहायान्यं न जाने, पुरुषान्त स्वप्नेऽपि न हि भजे, तेन धर्मेण छिन्नापि मम नासिकाउन्ति नास्तु । मया त्वं भस्म कर्तु शक्यसे । कितु स्वामी त्यम् लोकभयादुपेक्षे । पश्य मन्मुखम् । ततो यावदसौ गोपो दी प्रज्वाल्य तन्मुखमवलोकते तावदुन्नसं मुखमवलोक्य तथरणाने पतितः–'धन्योऽयं यस्येदृशी भार्या परमसाध्वी' इति । यो मास्ते साधुरेतद्वृत्तान्तमपि कथयामि । अयं स्वगृहानिर्गो द्वादशवमलयोपकण्ठादिमां नगरीमनुप्राप्तः । अत्र वेशागृहे सुप्तः । तस्याः कुट्टन्या गृहद्वारि स्थापितकाष्ठवटितवेतालय मूर्धनि रतमेकमुत्कृष्टमास्ते तत्र लुब्धेनानेन साधुना राबाद त्थाय रतं ग्रहीतुं यतः कृतः। तदा तेन वेतालेन सूत्रसंचार तवाहुभ्यां पीडितः सन्नार्तनादमयं चकार । पञ्चादुरयाय कुहन्या कम्-'पुत्र! मलयोपकण्ठादागतोऽसि । तत्सर्वरतानि पर च्छामै ।नो चेदनेन न त्यक्तव्योऽसि ।' इत्थमेवायं चेटः ततोऽनेन सर्वरत्नानि समर्पितानि यथायमपहतसर्वस्खोऽम्मा समागत्य मिलितः। एतत्सर्वं श्रुत्वा राजपुस्पैन्याये धर्माधिका प्रवर्तितः। अनन्तरं तेन सा दूती गोपी च ग्रामावहिनि सारिने नापितश्च गृहं गत.। अतोऽहं ब्रवीमि-"स्वर्णरेखामहं या इत्यादि । अब खयंकृतोऽयं दोपः । अत्र विलपनं नोचितम् । (क्षणं विमृदय ।) मित्र ! यथाऽनयोः सौदाद मया कारितं नया मित्रभेदोऽपि मया कार्यः।

हृद्भेदः ११३-११४ ] भाषाटीकासमलंकृत । ९९ म - जो मै सच्ची पतिव्रता होऊ, तुझे छोड़ दूसरेको न जानती होऊ, दूसरे रुषको खप्नमेंमी न भजती होऊ तो उस धर्मसे मेरी कटी हुई नाकभी बिना ; टी हो जाय. मैं तुझे भस्म कर सकती है, परन्तु तू पति है, ससारके भयसे भरती हूं। मेरा मुख देख । 'फिर ज्योंही उस ग्वालेने दिया जला कर उसका सख देखा त्योंही उसका नाकसमेत मुख देख कर उसके चरणोंमे गिर पड़ा-'मुझे न्य है कि जिसकी ऐसी पतिव्रता स्त्री है। और यह दूसरा जो वनिया है सका वृत्तान्तमी कहता हू। यह अपने घरसे निकल कर वारह वरसमे मलया- हलके पास इस नगरीमें आया, यहां वेश्याके घरमें सोया, उस कुट्टनीके घरके र पर वैठाये गये काठके बने हुए वेतालके सिरमें एक अनमोल रत्न था. वहा स लोभी वनियेने रातको उठ कर रन लेनेका यत्न किया. तव उस पिशाचने तसे चलाई गई भुजाओंसे उसे खींचा और वह रो कर चिल्लाया. पीछे उठ कर हनीने कहा-'हे पुत्र ! तू मलयके पाससे आया है। इसलिये सब रत्न इसे दे दे. ही तो तू इससे नहीं छुटेंगा; यह सेवक ऐसाही है'. तव इसने सब रन दे दिये. और इस प्रकार यह सर्वख खो कर हमारे साथ आ कर मिल गया। यह सब हुन कर राजपुरुषोंने न्याय करनेके लिये धर्माधिकारीको प्रवृत्त कर दिया, फिर सने उस दूती और ग्वालिनको देसनिकाला दे दिया ॥ और नाईभी घर गया। सलिये मैं कहता हू-"वर्णरेखाको मैने छू कर" इत्यादि । और यह अपनाही लिंगकया दोष है। इसमें विलाप करना उचित नहीं है । (क्षणभर जीमे विचार कर ) हे मित्र ! जसे मैंने इन दोनोंकी मित्रता कराई थी वैसेही मित्रोंमे फूट भी किराऊगा यतः- अतथ्यान्यपि तथ्यानि दर्शयन्त्यतिपेशलाः। समे निन्नोन्नतानीव चित्रकर्मविदो जनाः ॥ ११३ ॥ क्योंकि-अति चतुर मनुष्य झूठी वातोंकोभी सची कर दिखाते है, जैसे चित्रके कामको जानने वाले मनुप्य, एकसे स्थान पर पहाड, घर इत्यादि खींच कर नीचा ऊचा दिखाते है ॥ ११३ ॥ अपरंच,- उत्पनेप्वपि कार्येपु मतिर्यस्य न हीयते । स निस्तरति दुर्गाणि गोपी जारद्वयं यथा ॥ ११४॥ और दूसरे-जिसकी बुद्धि कार्योंके उपस्थित होने परभी नहीं घटती है वह मनुष्य सक्टोंसे ऐसे वच जाता है, जैसे एक ग्वालिनने दो यारोंका निस्वारा किया ॥ ११४ ॥ करटक. पृच्छति-'कथमेतत् ?' दमनकः कथयति- करटक पूटने लगा-'यह कथा केते है " दमनक कहने लगा।- ॥ कथा ७॥ अस्ति द्वारवत्यां पुर्या कस्यचिद्गोपस्य ववूर्वन्धकी। सा ग्रामस्य दण्डनायकेन तत्पुरेण च समं रमते । न . H 만 १०० हितोपदेश । [सुहृद्भेदः ११५-११ - द्वारावती नाम नगरीम किसी ग्वालेकी बहु छिनाल थी। वह गाकेर नायक और उसके पुत्र के साथ रमण किया करती थी. तथा चोक्तम्,- नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः। नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥ ११५ ॥ और वैसा कहा भी है कि-अग्नि इधनसे, समुद्र नदियोंसे, मृत्यु सब योसे, और स्त्री पुरुषोंसे तृप्त नहीं होती है ॥ ११५ ॥ अन्यच्च,- न दानेन न मानेन नार्जवेन न सेवया। न शस्त्रेण न शास्त्रेण सर्वथा विपमाः स्त्रियः॥ १६ ॥ और त्रियोंका (धन आदिके) दानसे, सन्मानसे, (मिष्ट भाषण आदि) है। पनसे, सेवासे, शस्त्रसे और शास्त्रसे "वशमे होना" सब प्रकारसे कठिन है ॥११॥ यतः,- गुणाश्रयं कीर्तियुतं च कान्तं पति रतिशं सधनं युवानम् । विहाय शीघ्रं वनिता व्रजन्ति नरान्तर शीलगुणादिहीनम् ॥ ११७ ॥ मोति-निया सर गुणोसे युक्त, यशस्वी, सुन्दर, कामशील, धनगर नपा ऐने पति को छोड़ कर शील और गुणसे हीन दूसरे मनुष्यके पास के पाती॥११७॥ नारच,- न तादशी प्रीतिमुपैति नारी विचित्रशय्यां शयितापि कामम् । यथा हि दूर्वादिविकीर्ण भूमी प्रयाति सौख्यं परकान्तसङ्गात् ॥ १२८ ॥ र दूसरे-त्री मी कि तृण आदि विधी हुई भूमि पर यारफे साथ जान है वैमा व विनित्र शपया पर पति के सामनी सोकर नहीं पाती है । 14 कदाचित्सा दण्डनायकपुत्रेण सह रममाणा तिष्ठति नय दण्डनायकोऽपि रन्तुं तयागत. । तमायान्त दृष्ट्वा तत्त काले निक्षिप्य दण्डनायकन मह तय कीडति । अनन्तरं तर मनी गोरो गोटात्ममागत. तमालोक्य गोप्योक्तम्-'दण्डनाया उगु गृहोना को दीयन्मन्बर का नया नाडि गृहमागत्य नायी गृया--'केन कार्यण दण्डनायक. समा ग्रन्थिनः?' मा नून-यं कनापि कार्यण पुरायोपा इन्दः । स व पलावतानाऽागत्य प्रविधया कुशल - हृद्भेदः ११९-१२०] भाषाटीकासमलंकृत । - प्य रक्षितः । तत्पित्रा चान्विष्यान न दृष्टः । अत एवायं दण्ड- [यकः कुद्ध एव गच्छति । ततः सा तत्पुत्रं कुशूलावहिप्कृत्य र्शितवती। फिर वह किसी दिन दंडनायकके पुत्रके साथ रमण कर रही थी इतनेमे इनायकभी रमण करनेके लिये वहा आ गया। तब उसको आता हुआ देख कर सके पुत्रको कुठीलेमे घुसा कर दडनायकके साथ वैसेही क्रीडा करने लगी इसके परात उसका भर्ता ग्वाला पौहारते आया. उसको देख कर गोपीने कहा-'हे इनायक ! तू लकड़ी ले कर क्रोधको दिखाता हुआ शीघ्र जा उसके वैसा करने ( ग्वालाने घरमें आ कर स्त्रीसे पूछा- किस कामसे दडनायक आ कर यहा बैठा 129 वह बोली यह किसी कामके कारणसे पुत्रके ऊपर क्रोधित हुवा या वह मग कर यहा आ घुमा था और मैंने उसको कुठीलेमे घुसा कर वचालिया. और सके पिताने यहा दृढ कर न देखा इसलिये यह दडनायक कोधित-सा जा हा है फिर वह उसके पुत्र को कुठीलेसे वाहर निकाल कर दिखाने लगी. था चोक्तम्, आहारो द्विगुणः स्त्रीणां बुद्धिस्तासां चतुर्गुणा। पहुणो व्यवसायश्च कामश्चाप्टगुणः स्मृतः॥ ११९ ॥ जैसा कहा है-स्त्रियोंका आहार दुगुना, बुद्धि चौगुनी, साहस छ गुणा और नका काम आठगुणा कहा है ॥ ११९ ॥ अतोऽहं ब्रवीमि-"उत्पन्नेष्वपि कार्येपु” इत्यादि ।' करटको जूते-'अस्त्वेवम् । किंत्वनयोमहानन्योन्यनिसर्गोपजातस्नेहः कथं पदयितुं शक्यः ?' इसलिये मैं कहता हू-"कार्यके उत्पन्न होनेमेंभी" इत्यादि ।' करटक वोला- ऐसाही होय, परन्तु इन दोनोंका आपसमें खभावसे वढा हुआ वडा स्नेह कैसे छुड़ाया जा सकता है। दमनको ब्रूते-'उपायः क्रियताम् । तथा चोकम्,- उपायेन हि यच्छक्यं न तच्छक्यं पराक्रमैः। काक्या कनकसूत्रेण कृष्णसर्पो निपातितः ॥ १२० ॥ तु दमनक बोला-'उपाय करो। जैसा कहा है कि जो उपायसे हो सकता वह पराक्रमसे नहीं हो सकता है जैसे कागलीने सोनेके हारसे काले सापको मार डाला' ॥ १२० ।। करटकः पृच्छति-'कथमेतत् ?' दमनकः कथयति- रटक पूछने लगा-'यह कथा कैसे है ?' दमनक कहने लगा ।- ।। कथा८॥ कलिंश्चित्तरी वायसदंपती निवसतः । तयोश्चापत्यानि तत्को. टरावस्थितेन कृष्णसर्पण खादितानि । ततः पुनर्गर्भवती वायसी वायसमाह-'नाथ! त्यजतामयं तरुः। अत्रावस्थितकृष्णसर्पणा- वयो. संततिः सततं भक्ष्यते । । । स 1 ง चार .. ॥ १०२ हितोपदेश । [सुहृद्भेदः १२१-२२ किसी वृक्ष पर काग और कागली रहा करते थे उनके बच्चे उसके रहने वाला काला साप खाता था। पीछे फिर गर्भवती कागली कागते । लगी-हे खामी ! इस पेड़को छोडो, इसमें रहने वाला सर्प हमारे बच्चे . खा जाया करता है, यतः,- दुष्टा भार्या शठं मिनं भृत्यश्चोत्तरदायकः। ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः॥ १२१ ॥ क्योंकि-दुष्ट स्त्री, धूर्त मित्र, उत्तर देने वाला सेवक, सर्प वाले रहना, मानो साक्षात् मृत्युही है, इसमें सदेह नहीं है ॥ १२१ ॥ वायसो ब्रूते-'प्रिये !न भेतव्यम्। वारंवारं मयैतस्य : ५। सोढ । इदानीं पुनर्न क्षन्तव्यः।' वायस्याह-'कथमेतेन ल५ सार्ध भवान्विग्रहीतुं समर्थः ?' वायसो ब्रूते-'अलमनया शया काग बोला-'प्यारी ! उरना नहीं चाहिये, वार वार मैंने इसका अपराध अब फिर क्षमा नहीं करूगा।' कागली बोली-'किस प्रकार ऐसे पल ॥ साथ तुम ला सकते हो" काग बोला-'यह शका मत करो। यत.,- बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धस्तु कुतो वलम् । पश्य सिंहो मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥ १२२ । मोति-निग को बुद्धि है उसको बल है और जो निर्बुद्धि है उसको सदाने नारे। देव, मदसे उन्मत्त मिहको शशकने मार डाला' ॥ १२२ ॥ बायसी विहस्याह-'कथमेतत् ?' वायसः कथयति- कागलोर पोली-'यह कथा कसे है ?' तब काग कहने लगा। ॥ कथा ९॥ जस्ति मन्दानानि पर्वते दुर्दान्तो नाम सिंहः । स च पाना वयं कुर्वन्नात्ते । ततः सर्वः पशुभिर्मिलित्वा स मित विनत-मृगेन्द्र ! किमयमकदा यहाशुधातः क्रियते ? या प्रसादो मवति तदा वयमेव भवदादाराय प्रत्यहमेकै पशुम दौरयामः ।' ततः सिंहेनोक्तम्-'योतदभिमतं भवतां ता मातु तत् । ततः प्रभृत्ये के पशुमुगकरिगतं भक्षयनास्ते । । कदाचितदादा का तार: WITH -- - सांस ..

पुहन्दः १२३] भाषाटीकासमलंकृत। १०३ ये हुए एक एक पशुको खाया करता था। फिर एक दिन एक बूढे शशक खरगोश-) की वारी आई. सोऽचिन्तयत्- 'त्रासहेतोर्विनीतिस्तु क्रियते जीविताशया। पञ्चत्वं चेद्गमिष्यामि कि सिंहानुनयेन मे? ॥ १२३ ॥ वह सोचने लगा-'जीनेकी आशासे भयके कारणकी अर्थात् मारने वालेकी निय की जाती है और जब मरनाही ठहरा, फिर मुझे सिंहकी विनतीसे क्या म म है 2 ॥ १२३ ॥ तन्मन्दं मन्दं गच्छामि।' ततः सिंहोऽपि क्षुधापीडितः कोपा. जमुवाच–'कुतस्त्वं विलम्न्य समागतोऽसि ?' शशकोऽब्रवीत्- देव! नाहमपराधी । आगच्छन्पथि सिंहान्तरेण वलाद्धृतः । स्याये पुनरागमनाय शपथं कृत्वा स्वामिनं निवेदयितुम- शागतोऽस्मि ।' सिंहः सकोपमाह-सत्वरं गत्वा दुरात्मानं शय व स दुरात्मा तिष्ठति ।' ततः शशकस्तं गृहीत्वा भीरकूपं दर्शयितुं गतः । तत्रागत्य 'स्वयमेव पश्यतु खामी' त्युक्त्वा तस्मिन्कूपजले तस्य सिंहस्यैव प्रतिविम्वं दर्शितवान् । तोऽसौ क्रोधाध्मातो दर्पात्तस्योपर्यात्मानं निक्षिप्य पञ्चत्वं तिः । अतोऽहं ब्रवीमि-"वुद्धिर्यस्य" इत्यादि' ॥ वायस्याह- । श्रुतं मया सर्वम् । संप्रति यथा कर्तव्यं तद्रूहि ।' वायसोऽ- वदत्-'अत्रासन्ने सरसि राजपुत्रः प्रत्यहमागत्य नाति । मानसमये तवाद्वतारितं तीर्थशिलानिहितं कनकसूत्रं चश्वा विधृत्यानीयास्मिन्कोटरे घ धारयिष्यसि ।' अथ कदाचित्नातुं जलं प्रविष्टे राजपुत्रे वायस्या तदनुष्ठितम् । अथ कनक- सूत्रानुसरणप्रवृत्तै राजपुरुपैस्तत्र तरुकोटरे कृष्णसर्पो दृष्टो व्यापादितश्च । अतोऽहं ब्रवीमि-"उपायेन हि यच्छक्यम्" इत्यादि ।' कर्टको बृते- यद्येवं तर्हि गच्छ । शिवास्ते सन्तु पन्थानः। ततो दमनकः पिगलकसमीपं गत्वा प्रणम्योवाच- "देव! आत्ययिकं किमपि महाभयकारि कार्य मन्यमानः समा- गतोऽस्मि। ६ इसलिये धीरे धीरे चलता है पीछे सिंहभी भूखका मारा झुझला कर उससे बोला-'तू किसलिये देर करके आया है ? शशक वोला-'महाराज! मैं अपराधी नहीं तेस्, मार्गमें आते हुए मुझको दूसरे सिंहने वलसे पकड लिया था। उसके सामने फिर लौट जानेकी सौगन्द खा कर खानीको जतानेके लिये यहा आया हु. हसिंह कोपयुक्त हो कर बोला-'शीघ्र चल कर दुष्टको दिखला कि वह दुष्ट कहा बैठा है. फिर शशक उसे साथ ले कर एक गहरा कुआ दिखलानेको ले गया। वहा पहुच पर “सानी ! आपही देख लिजिये" यह कह कर उस कुएके जलमें उसी सिंदवी परचाही दिसला दी फिर वह मोघले दहाट कर घमटते उसके ऊपर अपनेपो गिरा कर मर गया। इसलिये मैं कहता हूं-"जिसकी बुद्धि है” इत्यादि ।' E मैं た १०४ हितोपदेश। [सुहृद्भेदः १२४- कागली वोली-'मैंने सब सुन लिया. अब जो करना है सो कहो ।' फिर चोला-'यहा पासही सरोवरमे राजपुत्र नित्य आ कर न्हाता है। नानके र उसके अगसे उतारे हुए और घाट पर धरे हुए सोनेके हारको चोंचसे पड़ विलेमें ला कर घर दीजियो।' पीछे एक दिन राजपुत्रके न्हानेके लिये उट उतरने पर कागलीने वही किया. फिर सोनेके हारके पीछे दूढ सखोल करने । राजाके पुस्पोंने उस वृक्ष विलेमें काले सापको देसा और मार डाला इसी कहता हू-"उपायसे जो हो सकता है" इत्यादि' करटक बोला-'जो ऐसा है चले जाओ, तुमारे मार्ग कल्याणकारी होय।' पीछे दमनक पिंगलको जा कर प्रणाम करके वोला-'महाराज! नाशकारी और बडे भयके करने से किसी कामको जान कर आया हूं यतः,- आपद्युन्मार्गगमने कार्यकालात्ययेपु च । कल्याणवचनं ज्यादपृष्टोऽपि हितो नरः॥ १२४ ॥ क्योंकि-आपत्तिमें, कुमार्गसे जाने पर, कामका समय बीतने में हितयार मनुष्य बिना पूछेभी कल्याणकारी बात कह दे ॥ १२४ ॥ भन्यय भोगस्य भाजनं राजा न राजा कार्यभाजनम् । राजार्यपरिध्वंसी मन्त्री दोपेण लिप्यते ॥ १२५ ॥ और दूसरे-रामा भोग का पाय है अर्थात् सुरा भोगने के लिये है, कुछ मन घरने के दवे नहा है, राजा के कार्यको नाश करने (विघाउने) वाला मा होनागी होता है।। १२५॥ तयादि पश्य । अमात्यानामेप क्रमः,- भारो मत्रियों की यह रीति है,- परमाणपरित्यागः शिरसो वापि कर्तनम् । ननु म्यामिपमायातिपातकेच्छोरपेक्षणम् ॥ १२६ ॥ traft और निकट गानाभी अच्छा है परन्तु राजाको र ही दरो पालेको नदेना अदा नही है ॥ १२५ मिल मादरमाह-प्रथ भवान् शिवकुमिच्छति" ३१ नशे ते-देव! संजीवकत्तवोपयंसरशन्यवहारीय लक्ष्यते । नया चालनसंनिधाने श्रीमद्देवपादाना शक्तिययनिन्दा न गन्यनवाभिलपति ।' पनच्या पिालकः ममयं साधय मार्ग मां स्थित । दमनक. पुनराह-देव! सामात्यपरित्या कक पवावं यत्वया साधिकारी हतः स पय दोपः। 47 नादानेसाना चाहता है।" दमन En- परमार रहम ने जार मरमा १५ निन्दा र यदी दाना 10 , अ म ना -- .

हद्भेदः १२७-१३०] भाषाटीकासमलंकृत । १०५ 1 का म -- :, कर पिंगलक भय और आश्चर्य से मान कर चुप हो गया ॥ दमनक फिर |ग-'महाराज! सव मत्रियोंको छोड़ कर एक इसीको जो तुमने सब कामका 'चकारी बना रक्खा है वही दोष है। Tri- अत्युच्छ्रिते मन्त्रिणि पार्थिवे च विष्टभ्य पादावुपतिष्ठते श्रीः। सा स्त्रीखभावादसहा भरस्य तयोर्द्वयोरेकतर जहाति ॥ १२७ ॥ क्योंकि-राजलक्ष्मी राजाके तथा मन्त्रीके अधिक उन्नति पाने पर चरणों में र कर (दोनोंकी) सेवा करती है और फिर स्त्रीके खभावसे उन दोनों के भारको हो सह कर दोनोंमेंसे एकको छोड़ देती है ॥ १२७ ॥ परच,- एकं भूमिपतिः करोति सचिवं राज्ये प्रमाणं यदा तं मोहाच्छ्रयते मदः स च मदालस्येन निर्भिद्यते । निर्मिनस्य पदं करोति हृदये तस्य स्वतन्त्रस्पृहा खातन्यस्पृहया ततः स नृपतेः प्राणान्तिकं द्रुह्यति ॥१२८॥ और दूसरे-जव राजा राज्य पर एक मत्रीको (सव कामका) मुखिया कर ता है तब उसे अभिमानसे मद हो जाता है और मदान्धताके आलस्यसे तापसमे फूट हो जाती है और फिर फूट होनेसे उसके हृदयमे खाधीनताका रभिलाप होता है, अर्थात् खाधीन होना चाहता है, और फिर खाधीनताके भकी इच्छासे वह मत्री राजाके प्राण लेने तक की शत्रुता करता है ॥१२८॥ मन्यच्च,- विपदिग्धस्य भक्तस्य दन्तस्य चलितस्य च । अमात्यस्य च दुष्टस्य मूलादुद्धरणं सुखम् ॥ १२९ ॥ और-विषयुक्त अन्नको, हिलते हुए दातको, और दुष्ट मत्रीको जड़से उखाड डालना सुखही है ॥ १२९ ॥ किच,- यः कुर्यात्सचिवायत्तां लियं तद्यसने सति । सोऽन्धवजगतीपालः लीदेत्संचारकैर्चिना ॥ १३०॥ : और जो राजा, लक्ष्मीको मत्रीके आधीन कर देता है वह राजा उस मन्त्राके नरण आदि विपत्तिमे गिरने पर चलाने वालेके विना, अधेके समान दुख पाता ॥ १३० सर्वकार्येषु खेच्छात. प्रवर्तते । तदत्र प्रमाणं स्वामी । एतच्च जानाति । और सब वायोंने अपनी इच्छापूर्वक करता है, इसलिये इसमें खानी प्रमाण र अर्थात् रुचे सो फीजिये, और आप यह जानते हैं- -1 ar.- १०६ . हितोपदेश । [सुहृद्भेदः १३१- न सोऽस्ति पुरुपो लोके यो न कामयते श्रियम् । परस्य युवती रम्यां सादरं नेक्षतेऽत्र कः? ॥ १३१ ससारमे ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो लक्ष्मीको न चाहता हो, पर। और सुन्दर स्त्रीको चावसे, कौन नहीं देखता है ? अर्थात् सब देखते हैं। सिहो विमृश्याह-'भद्र ! यद्यप्येवं तथापि संजीवकेन मम महान् स्नेहः। सिहने विचार कर कहा-'हे शुभचिंतक ! जो ऐसाभी है तोभी सन साथ मेरा अत्यन्त स्नेह है। पश्य- कुर्वनपि व्यलीकानि यः प्रियः प्रिय एव सः। अशेषदोषदुष्टोऽपि कायः कस्य न वल्लभः ॥ १३२ ॥ देस-बुराइया करता हुआभी जो प्यारा है सो तो प्याराही है, जैसे तसे दोपोंसे दूषित भी शरीर किसको प्यारा नहीं है ॥ १३२ ॥ अन्यच. अप्रियाण्यपि कुर्वाणो यः प्रियः प्रिय एव सः। दग्धमन्दिरसारेऽपि कस्य वदावनादरः? ॥ १३३ ।। और इमरे-अप्रिय करने वाला भी जो प्यारा है सो तो प्याराही है, सुन्दर मन्दिरको जलाने वाली भी अग्निम किसका आदर नहीं होता है।" दमनकः पुनरेवाह-'देव! स एवातिदोपः। दमन रमी कदने लगा--'हे महाराज ! वही अधिक दोप है, यतः,- यस्मिोवाधिक चक्षुरारोहयति पार्थिवः । मुतेऽमायेऽप्युदासीने स लक्ष्म्याश्रीयते जनः ॥ १३॥ पा---गुन, मत्री तथा साधारण मनुष्य इनमेस जिनके कार का लमी उसी पुरुषकी सेवा करती है ॥ १३४ ।। मृणु देव!- महानिदे- - - झेदः १३६-१४१1 भापाटीकासमलंकृत । मूलभृत्यान्परित्यज्य नागन्तून्प्रति मानवेत् । नातः परतरो दोपो राज्यभेदकरो यतः ॥ १३६ ॥ क्योंकि-पुराने सेवकोंको छोड़ कर नये आये हुओंका सत्कार नहीं करना हेये, क्योंकि इससे बढ़ कर कोई दोष राज्यमें फूट करने वाला नहीं है ' १३६ सिंहो चूते-'महदाश्चर्यम् । मया यद्भयवाचं दत्त्वानीतः संव- तश्च । तत्कथं मह्यं द्रुह्यति । सिंह बोला-'वदा आश्चर्य है ! मैं जिसे अभय वाचा दे कर लाया और उसको या सो मुझसे क्यों वैर करता है ? रनको ब्रूते-'देव! दुर्जनो नार्जवं याति सेव्यमानोऽपि नित्यशः। खेदनाभ्यजनोपायैः पुच्छमिव नामितम् ॥ १३७ ॥ दमनक बोला-'महाराज ! जैसे मली गई और तैल आदि लगानेसे सीधी हि गई कुत्तेकी पूंछ सीधी नहीं होती है वैसेही दुर्जन नित्य आदर करनेसेमी धा नहीं होता है ।। १३७ ।। परंच- - -1 - खेदितो मर्दितश्चैव रज्जुभिः परिवेष्टितः। मुक्तो द्वादशभिः स्वपुच्छः प्रकृतिं गतः ॥ १३८ ॥ । और दूसरे-तपाई गई, मली गई, डोरीसे लपेटी गई और बारह बरसके छि खोली गई कुत्तेकी पूछ टेढीही रहती है ॥ १३८ ॥ पन्यञ्च,- वर्धनं वाथ सन्मानं खलानां प्रीतये कुतः। फलन्त्यमृतसेकेऽपि न पथ्यानि विपद्रुमाः ॥ १३९ ॥ (और वन आदि दे कर ) वढाना अथवा सन्मान करना दुष्टोकी प्रसन्नताके लेये कहा हो सकता है ? अर्थात् उपकार करने पर भी वे वुराईही करेंगे । जैसे विपके रक्ष अमृतसे सोचनेवेभी मीठे फल नहीं देते हैं । १३९ ॥ अतोऽहं ब्रवीमि- अपृष्टोऽपि हितं ब्रूयाधस्य नेच्छेत्पराभवम् । एप एव सतां धर्मो विपरीतमतोऽन्यथा ॥ १४०॥ इस लिये मैं कहता हू कि-जिसके पराजयकी इच्छा न करे उसके विना पूछेभी हितकारक वचन कहना चाहिये, क्योंकि यही सजनोंका वर्म है और इसके विपरीत अवर्म है ॥ १४० ॥ तथा चोक्तम्,- स खिग्धोऽकुशलान्निवारयति यस्तकर्म यनिमलं साखी यानुविधायिनी स मतिमान् यः सद्भिरभ्यर्च्यते । सा धीर्या न भदं करोति स सुखी यस्तृप्णया मुच्यते तन्मित्रं यदन्निमं स पुरुपो यः खिद्यते नेन्द्रियैः ॥ १४१ ॥ - - १०८ हितोपदेश । [सुहृद्भेदः १४२-१४॥ जमा कहा है कि जो विपत्तिसे बचाता है वहीं नेही है, जो निर्मल भार दोपरहित है वहीं कर्म है, जो (पतिकी) आशामें चले वही स्त्री है, जिसत्ता सजन आदर करे वही गुदिनान् है, जो बहकारको उत्पन्न न करे वही संपत्ति है, को तृगाके रहित है वही मुखी है, जो निष्कपट है वही मित्र है और जो इदिनोंडे वरने नहीं है वहीं पुरुप है ॥ १४१ ॥ यदि संजीवकव्यसनादितो विज्ञापितोऽपि स्वामीन निवर्तते तदीडशि भृत्ये न दोपः। और जो सजीवके मेहमें फंसे हुए खामी जताने पर भी न मानें तो मुझसे से पर दोष नहीं है। तथाच, नृपः कामासक्तो गणयति न कार्य न च हितं ययेष्टं सरधन्दः प्रविनरति मत्तो गज इच। ततो मानमातः स पतति या शोकगहने तमा मोशेषाधिपति न निज पेस्यविनयम्' ।। १७२।। करना E. मोगा मान राजा कार्यको ओर हितकारी वनको गई और:ो भाति अपनी इच्छानुसार जो । है र है और फिर महा मारा जन शोमात भारी fi. Har IEEE {. पर हो ! मार मपने 3रे आचरण 1. IT ॥५४.॥ मातम ).- - - .

-सुहृद्भेदः १४५-१४९] भापाटीकासमलंकृत । १०९ E Sur तया धुक्तम्, मन्त्रवीजमिदं गुप्तं रक्षणीयं यथा तथा । मनागपि न भिद्यत तद्भिन्नं न प्ररोहति ॥ १४५॥ औरभी कहा है-इस गुप्त मत्ररूपी बीजकी जिस किसी प्रकारसे रक्षा करे और थोडाभी न फूटने दे, क्योंकि वह फूटा हुआ नहीं उगता है, अर्थात् रहस्यको निगुप्त रखे, क्योंकि वह खोलनेसे सफल (कार्य साधक) नहीं होता है ॥१४५॥ किंव, आदेयस्य प्रदेयस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः। क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिवति तद्रसम् ॥ १४६ ॥ और लेना देना और करनेका काम ये शीघ्र नहीं किये जायें तो इनका रस समय पी लेता है, अर्थात् समय पर चूक जानेसे काम विगाड़ जाता है ॥१४६॥ तदवश्यं समारब्धं महता प्रयत्नेन संपादनीयम् । इसलिये अवश्य आरंभ किये हुए कामको वडे यनसे सिद्ध करना चाहिये. किच,- मन्त्री योध इवाधीरः सर्वाङ्गैः संवृतैरपि । चिर न सहते स्थातुं परेभ्यो भेदशकया ॥ १४७ ॥ ।- क्योंकि, जैसे कवच आदिसे ढके हुए अग वाला भी डरपोक योद्धा पराजयके मयसे युद्ध में बहुत देर तक नहीं ठहर सकता है वैसेही उपाय आदि सब अगोंसे गुप्त विचार भी दूसरे शत्रुओंके भेदकी शंकासे बहुत काल तक गुप्त नहीं रहता है, अर्थात् प्रकट हो जाता है, और रहस्यके खुल जाने पर कार्यहानि होती है ॥ १४७॥ । यद्यसौ दृष्टदोषोऽपि दोपानिवर्त्य संघातव्यस्तदतीवानुचितम् । जो इसका दोष देख लेने पर भी दोषको दूर कर फिर मेल करना तो । औरभी अनुचित है, . पर यता, . - सकृद्दष्टं तु यो मित्रं पुनः संघातुमिच्छति । स मृत्युमेव गृलाति गर्भमश्वतरी यथा ॥ १४८ क्योंकि,-जो मनुष्य एक वार दुष्टपना किये हुए मित्रके साथ फिर मेल करना चाहता है वह मृत्युको ऐसे बुलाता है जैसे अश्वतरी गर्भको' ॥ १४८ ।। सिंहो ब्रूते-'ज्ञायतां तावन्किमस्साकमसौ कर्तुं समर्थः ?' दमनक आह-'देव! ( सिंह बोला-'पहिले यह तो समझलो कि वह हमारा क्या कर सकता है।' दमनकने कहा-'महाराज! अगागिभावमज्ञात्वा कथं सामर्थ्य निर्णयः। पश्य टिहिममात्रेण समुद्रो व्याकुलीकृत.' ॥ १४९ ॥ १ जनरी एक प्रकारकी खचर नवी होतो है. उसका बचा पेट फाड़ कर निकलता है और वह मर जाती है. १० हितो. 1

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हितोपदेश । [मुहन्दः १५०-१५१
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शरीरखो और शरीरधारी के कामको विना जाने कैसे सानच निगा
सकता है। देखो, क्वल एक टटीरीने सनुदो व्याकुल कर दिया । १४९ ॥
सिंहः पृच्छति-'कथमेतत् ?' दमनकः कथयति-
सिंह पूछने लगा-'यह कथा केते हे " दमनक कहने लगा।-
॥ कथा १० ॥
दक्षिणसमुद्रतीरे टिटिभदंपती निवसनः । तत्र चासनप्रसपा'
टिहिभी भारमाह-'नाथ! प्रसवयोग्यस्थानं निभूतमनुसंघीय :
नाम् ।' टिटिभोऽवदत्-'भाय! नन्विदमेव स्थानं प्रसूतियोग्यम्।
ना नूते-'समुवेलया व्याप्यते स्थानमेतत् ।' टिहिमोऽवदत्-
'किमहं निर्वतः समुद्रेण निग्रहीतव्य.?' टिटिभी विहस्साह--
'खामिन् ' त्या समुद्रेण च महदन्तरम् ।
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१४- सुदृझेदः १५२ ] भापाटीकासमलंकृत। १११ तत्र गत्वा सकलवृत्तान्तं टिट्टिभेन भगवतो गरुडस्य पुरतो निवेदितम्-~-'देव! समुद्रेणाहं स्वगृहावस्थितो विनापराधेनैव निगृहीतः । ततस्तद्वचनमाकर्ण्य गरुत्मता प्रभुर्भगवन्नारायणः सृष्टिस्थितिप्रलयहेतुर्विज्ञप्तः । स समुद्रमण्डदानायादिदेश । ततो भगवदाज्ञां मौलौ निधाय समुद्रेण तान्यण्डानि टिट्टिभाय समर्पितानि । अतोऽहं ब्रवीमि-"अगाङ्गिभावमज्ञात्वा" इत्यादि । पजाह-कथमसौ ज्ञातव्यो द्रोहवुद्धिरिति ?' दमनको ब्रूते- यदासौ सदर्प. शृङ्गाग्रमहरणाभिमुखश्चकितमिवागच्छति तदा या स्वामी ।' एवमुक्त्वा संजीवकसमीपं गतः । तत्र गतश्च मन्द मन्दमुपसर्पन विस्मितमिवात्मानमदर्शयत् । संजीवकेन सादरमुकम्-'भद्र ! कुशलं ते?' दमनको ब्रूते-'अनुजीविनां हतः कुशलम् ? फिर कटसे खानीके कहनेसे उस टटीरीने वहाँही अडे धरे। यह सब सुन कर समुदभी उसकी सामर्थ्य टटोलने के लिये उसके अडे वहा ले गया तब टटीरी शोकसे देखिन हो कर पतिते कहने लगी-'हे खामी ! बड़ा कष्ट आ पडा, वे मेरे अडे *ट हो गये।' टटीरा बोला-'प्यारी ! डर मत।' ऐसा कह कर और सब पक्षियोंको माय ले कर वह पक्षियोंके खानी गरुड़जीके पास गया । वहाँ-जा कर ; टीरेने सव समाचार भगवान् गरुड़जीके सामने निवेदन कर दिया कि-'हे महाराज ! समुद्रने मुझ अपने घर बैठे हुएको बिना अपराधही सताया है।' तव उसकी बात सुन कर गरुडजीने सृष्टि, स्थिति और प्रलयके कारण प्रभु भगवान् नारायणको जता दिया । उन्होने समुद्रको अडे देने की आज्ञा दे दी। तब भगवान्की नाज्ञाको सिर पर रख कर समुद्रने उन अडोको टटीरेको सोंप दिया। इसलिये मैं कहता हू-“शरीर और शरीरधारीके कामको विना जाने" इत्यादि ।' राजा वोला-'यह कैसे जाना जाय कि वह द्रोह करने लगा है। दमनकने कहा- जन वह घमडसे सीगोंकी नोस्को मारनेके लिये सामने करता हुआ निडर-सा आवे तव स्वामी पापही जान जायगे ।' इस प्रकार कह कर सजीवकके पास गया और वहाँ जा कर वारे वीरे पास खिसकता सिसकता अपनेको मन मलन-सा दिखाया। सजीवाने आदरते कहा-'मित्र ! कुशल तो है ?' दमनस्ने कहा 1-'सेवाको कुशल - -- कहाँ ? इयतः,- - P संपत्तयः पराधीनाः सदा चित्तमनिवृतम् । खजीवितेऽप्यविश्वासस्तेपा ये राजसेवकाः ॥ १५२ ॥ क्योंकि,--जो राजाके सेवक है उनकी संपत्तियाँ परावीन, मन सदा दुखी और तो क्या युद्ध इत्यादिती शकाने वे अपने जीनेकाभी भरोसा नहीं रखते है ॥ १५२ ॥ --

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हितोपदेश । [ सुदृढ़ेदः १५३-१५
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अन्यच
कोऽर्थान्प्राप्य न गर्वितो विपयिणः कस्यापदोऽस्तं गताः?
स्त्रीभिः कस्य न खण्डितं भुवि मनः को वास्ति राजा प्रिय ।।
3 कालस्य भुजान्तरं न च गतः कोऽर्थी गतो गौरवं?
को वा दुर्जनवागुरासु पतितः क्षेमेण यातः पुमान् ? ॥ १५३ ॥
और दूसरे-कौनसा मनुष्य धनको पा कर अहकारी नहीं होता है?
कानीको आपत्तियों नहीं घेरती ह? नियोंने किसका मन नहीं डिगामा!
राजानोंका कोन प्वारा है ? कोनसा मनुष्य कालकी भुजाओके बीच नहीं गया।
मानने यानचा सन्मान हुआ है और कौनसा पुरुष दुर्जनोंके कपटमे 43
सकुशल आग है? ॥ १५३ ॥
मजीवनोकम् -'सखे! नहि किमेतत् ?' दमनक भाव-
नयीनि मन्दभाग्यः?
नमोकने कहा-'मि कहो तो यह क्या रात" नमन को कहा-
मनभागी
ময়ী তারা তা গণহান।
न गुतिन नाइले नया मुग्योऽणि समति ॥ १५५ ॥
- ननसामा मोपमा महारापरतो कोस.
1. 10 मईया ॥ १५ ॥
एपिसोनयन्यन्यन पानावः।
रोक धाम पतितो यहागरे ॥ २५५ ॥

मुहृद्भेदः-१५६-१५९] भापाटीकासमलंकृत । ११३ सुनो, तुमारे ऊपर क्रोधित इस खामीने एकातम कहा है कि सजीवरको । मार कर अपने परिवारको दूगा।' यह सुनतेही सजीवकको वडा विपाद हुआ । फिर दमनक वोला-'विपाद मत करो, अवसरके अनुसार काम करो' सजीवक छिन भर चित्तमे विचार कर कहने लगा-'निश्चय यह ठीक कहता है, अथवा दुर्जनका यह काम है अथवा नहीं है, यह व्यवहारसे निर्णय नहीं हो सकता है. है , दुर्जनगम्या नार्यः प्रायेणापानभृद्भवति राजा। नई कृपणानुसारि च धनं देवो गिरिजलधिवी च ॥ १५६॥ ने क्योंकि-स्त्रिया दुर्जनोंके पास जाती है, बहुधा राजा कुपात्रोका पालन करता धन कृपणके पास जाता है और इन्द्र पहाड और सनुदमे वरसता है ॥१५६ ॥ आ कश्चिदाश्रयसौन्दर्याद्धत्ते शोभामसज्जनः। प्रमदालोचनन्यस्तं मलीमसमिवाञ्जनम् ॥ १५७ ॥ कोई २ दुर्जन (अपना) आश्रयकी सुन्दरतासे, सुन्दर स्त्रियोंके नेत्रोंमे ऑजे र मेला काजल्के समान, शोभा पाता है ॥ १५ ॥ तत्र विचिन्त्योकम्-'कष्टं किमिदमापतितम् ?' उसने विचार कर रहा-'यह क्या कष्ट आ पडा' शत्रुता करती आराध्यमानो नृपतिः प्रयत्ना- न तोपमायाति किमत्र चित्रम् । अयं त्वपूर्वप्रतिमाविशेपो यः लेव्यमानो रिपुतामुपैति ।। १५८ ।। क्योंकि-राजा वटे यत्नसे सेवा करने पर भी प्रसन्न नहीं होता है इसमें या आश्चर्य है, क्योंकि यह एक अनोखीही देवताकी मूर्ति है जो सेवा करने रनी ॥ १५८॥ तदयमशस्यार्थ. प्रमेयः। इस लिये इस बात कुछ भेद नहीं जाना जाता रदय,- निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति । बुव स तस्यापगमे प्रसीदति । कारणद्वेपि मनस्तु यस्य वै कथं जनस्तं परितोपयिप्यति? ॥ १५२ ॥ क्योंकि जो निश्चय करके किसी कारणते क्रोध करता है वह उस कारणके नाश हो जाने पर अवश्य प्रसन्न हो जाता है, पर जिसका मन विनाही कारण वर करने लगा है उसमो मनुष्य से प्रसन्न करेगा? ॥ १५९ ।। कि मयापरतं राश.? अथवा निनिमित्तापकारिणश्च भवन्ति राजानः।' दमनको बृते-'एवमेतत् । शृणु।

- सुहृद्भेदः १६५-१६७ ] भाषाटीकासमलंकृत । ११५ क्योंकि-दूरसे ऊँचे हाथ उठाना, प्रीतिसे रसीले नेत्र करना, आधा आसन पठने के लिये देना, अच्छे प्रकारसे मिलना, प्रिय कथाके पूछनेमे आदर करना, भीतर विपयुक्त अर्थात् कपटयुक और वाहरते मीठी २ बाते करना यह जिसमे हो और अत्यन्त मायासे भरा होना-यह कौनसा अपूर्व नाटकका व्यवहार है जो दुर्जनोंने सीखा है ! ॥ १६४ ॥ तथा हि,- पोतो दुत्तरवारिराशितरणे दीपोऽन्धकारागमे निर्वाते व्यजनं मदान्धकरिणां दोपशान्त्यै सृणिः। इत्यं तद्भुवि नास्ति यस्य विधिना नोपायचिन्ता कृता मन्ये दुर्जनचित्तवृत्तिहरणे धातापि भग्नोद्यमः' ॥ १६५ ॥ और-दुस्तर समुद्र के पार होनेके लिये नाव, अधकारके आने पर दीपक, चापुरहित समयमे पसा, और मद वाले हाथीका घमड दूर करने के लिये अश-इस प्रकार इस ससारमें ब्रह्माने हरएक विषयके उपायकी चिंता नहीं की हो ऐसी वात नहीं है, पर मैं मानता हूं कि दुर्जनोंके चित्तकी वृत्ति दूर करने में विवातामी उद्योगरहित (विफल-प्रयत्न) हो गया ॥ १६५ ॥ संजीवकः पुनर्निःश्वस्य-'कष्ट भो.! कथमहं सस्यभक्षका सिंहेन निपातयितव्यः? सजीवक फिर सॉस भर कर (वोला)-~अरे ! बड़े कष्टकी बात है, कैसे सिंह मुझ घासके चरने वालेको मारेगा? यतः- ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं वलम् । तयोविवादो मन्तव्यो नोत्तमाधमयोः क्वचित् ॥ १६६॥ क्योंकि-जिन दोनोंस समान वित्त और समानही वल होय उन दोनोंका विरोध हो सकता है, किंतु सवल और निर्वलका तो कदापि नहीं होता है ।। १६६ ।। (पुनर्विचिन्त्य ) केनायं राजा ममोपरि विकारितो न जाने । भेदमुपगताद्राक्षः सदा भेतव्यम् । (फिर सोच वर) किसने इस राजाको मुझसे क्रोधित करा दिया नहीं जानता इं। और, स्नेह छूटे राजासे सदा टरना चाहिये । यतः,- मन्त्रिणा पृथिवीपालचित्तं विघटितं क्वचित् । वलयं स्फटिकस्येव को हि संघातुमीश्वरः? ॥ १६७ ॥ क्योंकि-किसी काममे नत्रीले फटे हुये राजाके चित्तको काचकी चूड़ीके समान पौन जोड़नेको समधे हो सकता है? अर्थात् वद्द सर्वथा अशक्य है॥ १ पोरे नमें 'वयोर्विवादो नैत्री च नोत्तमाधमयो धचित्' म्ता पाठ है, पदा पर 'उनही दोनाका वाद और लेह हो तफाता है, उत्तम भार अधमना नहीं' ऐसा नई तना सुहृद्भेदः १७४-१७५] भापाटीकासमलंकृत । ११७ क्योंकि-तेजहीन वलवानको कौनसा मनुष्य पराजय नहीं कर सकता है ? अर्थात् सब कर सकते हैं। देखो, मनुष्य तेजहीन राखके ढेरमे निडर हो कर पैर देते है ॥ १७३ ॥ किंतु सर्वमेतत्लुगुप्तमनुष्ठातव्यम् । नो चेन त्वं नाहम्' इत्युक्त्वा दमनकः करटकसमीपं गतः। करटकेनोक्तम्-'कि निष्पन्नम् ?' दमनकेनोक्तम्-'निप्पन्नोऽसावन्योन्यभेदः ।' करटको ब्रूते- 'कोऽत्र संदेह.? परन्तु यह सब वात गुप्त ही करने योग्य है । नहीं तो न तुम और न मै' यह कह कर दमनक करटकके पास गया ॥ तर करटकने कहा -क्या हुआ 2' दमनकने कहा-'दोनोंके आपसमे फूट फैल गई।' करटक बोला-'इसमे क्या सदेह है? यता,- वन्धुः को नाम दुष्टानां कुप्यते को न याचितः।। को न दृप्यति वित्तेन कुकृत्ये को न पण्डितः? ॥ १७४॥ दुष्टोंका कौन बन्धु है ? माँगनेसे कौन नहीं क्रोधित होता है ? धन(पाने)से कौनसा मनुष्य घमड नहीं करता है ? और बुरा काम करने में कौनसा मनुष्य चतुर नहीं है? ॥ १७४ ।। - अन्यच्च- दुर्वृत्तः क्रियते धूर्तेः श्रीमानात्मविवृद्धये । किं नाम खलसंसर्गः कुरुते नाश्रयाशवत्? ॥ १७५ ॥ और दूसरे-धूर्त मनुष्य अपनी बढतीके लिये धनवान्को दुराचारी कर देते है, इसलिये दुष्टोंका ससर्ग अग्निके समान क्या क्या नहीं करता है ? याने वह सव अनकी जड़ है' ॥ १७५ ॥ ततो दमनकःपिङ्गलकसमीपं गत्वा 'देव! समागतोऽसौ पापा- शयः । ततः सजीभूय स्थीयताम्' इत्युक्त्वा पूर्वोकाकारं कार- यामास । संजीवकोऽप्यागत्य तथाविधं विकृताकारं सिंहं दृष्ट्रा खानुरूपं विक्रमं चकार । ततस्तयोर्युद्धे संजीवकः सिंहेन व्यापादितः। तय दमनक्ने पिंगलकके पास जा कर-हे महाराज ! वह पापी आ पहुंचा है, इसलिये सम्हाल कर बैठ जाइये-यह कह कर पहिले जताए हुए आकारको करा दिया सजीवकने भी आ कर वैसेही वदली हुई चेय वाले सिंहको देख कर अपने योग्य पराक्रम किया । फिर उन दोनोंकी लड़ाईमे सजीवकको सिंहने मार डाला। अथ संजीवक सेवकं पिङ्गलको व्यापाद्य विधान्तः सशोक इव तिष्टति । ते च-'कि मया दारुणं कर्म स्तम् ?

-सुहृद्भेदः १८१-१८३ ] भाषाटीकासमलंकृत । ११९ -- । । अपरं च,- राज्यलोभादहंकारादिच्छतः स्वामिनः पदम् । प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं जीवोत्सर्गो न चापरम् ॥ १८१ ॥ और दूसरे-राज्यके लोभसे अथवा अहकारसे स्वामीके पदको चाहने वाले सेवकका, उस पापको नाश करनेमे प्राणोंका त्यागही एक प्रायश्चित्त है, और दूसरा कोई नहीं है ॥ १८१॥ अन्यच्च,- राजा घृणी ब्राह्मणः सर्वभक्षः स्त्री चावशा दुष्प्रकृतिः सहायः। प्रेप्यः प्रतीपोऽधिकृतःप्रमादी त्याज्या इमे यश्च कृतं न वेत्ति ॥ १८२ ॥ ६ और अत्यन्त दयालु राजा, सर्वभक्षी अर्थात् अत्यत लोभी ब्राह्मण, अवश • नो, बुरी प्रकृति वाला सहायक, उत्तर देने वाला नोकर, असावधान अधिकारी, और पराये उपकारको नहीं मानने वाला ये त्यागनेके योग्य हैं ॥ १८२ ॥ ह. विशेषतच,- सत्यानृता सपरुपा मितवादिनी च हिंसा दयालुरपि चार्थपरा वदान्या। नित्यव्यया प्रचुररत्नधनागमा च वाराङ्गनेव नृपनीतिरनेकरूपा' ॥ १८३ ॥ और विशेष करके-राजाकी नीति, कभी सच्ची, कभी झूठी, कभी क्ड़ी, कभी नरम, कभी हिंसा करने वाली, कभी दयालु, कभी वन लेने वाली, कभी कभी सदा व्यय करने वाली, कभी अनेक रत्न और धनको इकट्ठा करने वाली, वेश्याके समान बहुत प्रकारकी है' ॥ १८३ ॥ इति दमनकेन संतोपित.पिङ्गलक.स्वां प्रकृतिमापन्नःसिंहासने समुपविष्टः । दमनक. प्रहृष्टमनाः 'विजयतां महाराजः, शुभमस्तु सर्वजगताम्' इत्युक्त्वा यथासुखमवस्थितः। इस प्रकार जव दमनकने सतोप दिलाया तव पिंगलकका जीमें जी आया और सिंहासन पर बैठा । दमनक प्रसन चित्त हो कर "जय होय महाराजकी, सब ससारका कल्याण होय" यह कह कर आनन्दसे रहने लगा। विष्णुशर्मादाच-'सुहृद्भेदः श्रुतस्तावद्भवद्भिः ।' राजपुत्रा अचु.-'भवत्प्रसादाच्नुत । सुखिनो भूता वयम्' । विष्णुशर्मा बोले-'आपने सुहृद्द सुन लिया' राजकुमार चोले-आपकी पाले सुना और हम बहुत सुखी हुए। उदार, हितोपदेशः। 1- - है - - ॥ विग्रहः॥ पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रा ऊचुः-आर्य ! राजपुत्रा अयम् । तद्विग्रहं श्रोतुं नः कुतूहलमस्ति ।' विप्णुशर्मणोकम्- यदेव भवद्भयो रोचते कथयामि । विग्रहः श्रूयतां यस्यायमाद्यः -श्लोकः- फिर कयाके आरभके समय राजपुत्रोंने कहा-'गुरुजी ! हम राजकुमार इसलिये विग्रह सुननेकी इच्छा है।' विष्णुशर्माने कहा-'जो आपको अच्छा लगे यही कहता हु । विग्रह सुनिये कि जिसका पहला वाक्य यह है- हंसैः सह मयूराणां विग्रहे तुल्यविक्रमे । विश्वासवञ्चिता हंसाः काकः स्थित्वारिमन्दिरे' ॥१॥ हसोंके साथ मोरोंके तुल्य पराक्रमके युद्धमे कौओंने शत्रुके गढमे रह कर और विश्वास उपजा कर हसोंको ठगा' ॥१॥ राजपुत्रा ऊचुः-~-'कथमेतत् ?' विष्णुशर्मा कथयति- राजपुत्र वोले-'यह कहानी कैसे है ?' विष्णुशर्मा कहने लगे- ।। कथा १॥ अस्ति क'रद्वीपे पद्मकेलिनामधेयं सरः । तत्र हिरण्यगी नाम राजहंस. प्रतिवसति । स च सर्वैर्जलचरपक्षिभिमिलित्वा पक्षिराज्येऽभिपिकः। कर्पूरद्वीपमें पद्मकेलि नाम एक सरोवर है, वहाँ हिरण्यगर्भ नाम एक राजहस रहता था और सब जलचारी पक्षियोंने मिल कर उसे पक्षियोंके राज्य पर राज- तिलक क्रियाया। यतः,- यदि न स्यानरपतिः सम्यनेता ततःप्रजा। अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव ॥२॥ क्योंकि-जो ससारमै अच्छा प्रजापालक राजा न हो तो प्रजा, समुद्रमें कर्णधार(खेवटिये)ते रहित नावके समान इव जाती है ॥ २ ॥ जपर च,- प्रजा संरक्षति नृप. सा वर्धयति पार्थिवम् । वर्धनाद्रक्षणं श्रेयस्तद्भावे सदप्यसत् ॥ ३॥ और दूसरे-राजा प्रजाकी रक्षा करता है और वह (प्रजा) कर आदि देवर राजाको चढाती है, वढानेले रक्षा कल्याणकारी हैं, और रक्षाके विना सुचनुच होनानी नहीं होने के समान है ॥३॥ एकदाऽसौ राजहंसः सुविस्तीर्णकमलपर्यढ़े सुखातीनः परि- ११ हितो.

- ग्रहः ६] भाषाटीकासमलंकृत। १२३ - 11 -- । । और दूसरे-बुद्धिमान्कोही उपदेश करना चाहिये, मूर्सको कभी न करे, पक्षी वन्दरोंको उपदेश करनेसे स्थान छोड कर चले गये ॥५॥ राजोवाच-कथमेतत् ?' दीर्घमुखः कथयति- । राजा वोला-'यह कथा कैसे है ?' दीर्घमुख कहने लगा- ॥ कथा २॥ अस्ति नर्मदातीरे विशालःशाल्मलीतरुः। तत्र निर्मितनीडकोडे पक्षिणो निवसन्ति सुखेन । अथैकदा वर्षासु नीलपटलैरावृते प्रभस्तले धारासारैमहती वृष्टिर्वभूव । ततो वानरांश्च तरुतलेऽव- स्थिताम्शीताकुलान् कम्पमानानवलोक्य कृपया पक्षिभिरुक्तम्- भो भो वानराः! शृणुत,- नर्मदाके तीर पर एक वडा सेमरका वृक्ष है। उस पर पक्षी घोंसला बना कर उसके भीतर, सुखसे रहा करते थे। फिर एक दिने वरसातमे नीले नीले वादलों से आकाशमडलके छा जाने पर बड़ी बड़ी वूदोंसे मूमलधार मेघ बरसने लगा और फिर वृक्षके नीचे बैठे हुए बन्दरोंको ठढके मारे थर थर काँपते हुए देख कर : पक्षियोंने दयासे विचार कहा-'अरे भाई वन्दरो! सुनो,-- अस्माभिर्निर्मिता नीडाश्चञ्चमात्राहृतैस्तृणैः । हस्तपादादिसंयुक्ता यूयं किमिति सीदथ?' ॥ ६ ॥ हमने केवल अपनी चोंचोंसे इकट्ठे किये हुए तिनकोंसे घोंसले बनाये है, और पाँव आदिसे युक्त हो कर फिर ऐसा दु ख क्यो भोगते हो ?' ॥ तच्छुत्वा वानरैर्जातामरालोचितम्-'अहो! निर्वातनीड- गर्भावस्थिताः सुखिनः पक्षिणोऽस्मानिन्दन्ति । भवतु तावदृष्टे- 'रपशमः ।' अनन्तरं शान्ते पानीयवर्षे तैर्वानरैर्वृक्षमारुह्य सर्वे नीडा भग्नास्तेपामण्डानि चाधः पातितानि । अतोऽहं ब्रवीमि- "विद्वानेवोपदेष्टव्यः" इत्यादि ।' राजोवाच-ततस्तैः कि कृतम् ?' वक कथयति-ततस्तैः पक्षिभिः कोपादुक्तम्-'केनासौ राज- हंसो राजा कृतः?' ततो मयोपजातकोपेनोक्तम्-'युप्मदीयमयूरः केन राजा कृतः ?' एतच्छुत्वा ते सर्वे मां हन्तुमुद्यताः । ततो मयापि स्वविक्रमो दर्शितः। यह सुन बन्दरोने झुसला कर विचारा-'अरे! पवनरहित घोंसलोंके भीतर बेटे हुए सुखी पक्षी हमारी निन्दा करते हैं, करने दो। जब तक वर्षा वद हो, वाद जब पानीका परसना वद हो गया तव उन वन्दरोंने पेड़ पर चढ़ कर सब घोंसले तोड़ डाले, और उन्होंके जडे नीचे गिरा दिये, इसलिये मैं कहता हूँ-"बुद्धिमान्- कोही उपदेश करना चाहिये" इत्यादि।' राजा बोला-'तव उन्होंने क्या दिया ?" वगा कहने लगा-फिर उन पक्षियोंने जोधते कहा-'किसने इस राज. तुम तो हाथ, -- १२४ हितोपदेश। [विग्रहः ७- हंसको राजा बनाया है ?' तब मैंने झुंझला कर कहा-'तुम्हारे मोरको किसने राई बनाया है ?' यह सुन कर वे सब मुझे मारनेको तयार हुए। तब मैने भी अपना पराक्रम दिखाया। यतः,- 'अन्यदा भूषणं पुंसां क्षमा लज्जेव योषिताम् । पराक्रमः परिभवे वैयात्यं सुरतेष्विव ॥७॥ क्योंकि-रतिकालको छोड कर स्त्रियों को लजा जैसा अलकार है वेगा। पराजयसे भिन्न समयमें पुरुष को क्षमा आभूषण है, और पराजयके रामर रतिकालमे स्त्रियोंको निर्लज्जताके समान, पराक्रमही प्रशसाके योग्य है ॥७॥ राजा विहस्याह- 'आत्मनश्च परेषां च यः समीक्ष्य वलावलम् अन्तर नैव जानाति स तिरस्क्रियतेऽरिभिः॥ ८॥ राजा हंस कर बोला-'जो अपनी और शत्रुओंकी निर्बलता और सबलता विचार कर, अतर नहीं जानता है उसका शत्रु तिरस्कार (पराजय) करते हैं, अर्थात् अपना और शत्रूला बलावल जानना विद्वान्को अत्यावश्यक है ॥ ८॥ अन्यच,- सुचिर हि चरनित्यं क्षेत्रे सस्यमबुद्धिमान् । दीपिचर्मपरिच्छन्नो वाग्दोपागर्दभो हत.' ॥९॥ भोर दूसरेमे अनाजके खेतमे बहुत दिन तक नित्य नाग चरता हुआ मूग्य गपा वाघम्मर जोरे हुए वाणीके दोषसे अर्थात् रकनेसे मारा गया' ॥ ९ ॥ वकः पृच्छति-'कथमेतत् ?' राजा कथयति- गला पड़ने लगा-'यह कया फैसे है ?' राजा कहने लगा।- ॥ कथा ३ ॥ अलि हस्तिनापुरे विलासो नाम रजकः । तस्य गर्दभी प्रतिवाहनालो मुमू{रिवाभवत् । ततस्तेन रजकेनासा व्यानचमेणा प्रच्छाद्यारण्यसमीपे सस्य क्षेत्र नियुक्तः । तता दूपचमवलोक्य व्याप्रबुद्दया क्षेत्रपतयः सत्वर पलायन्ते । जकिदा केनापि सस्यरक्षकेण सरफम्बल सततनुप्राणेन था। माई सन्नी इत्यानतकायेनकान्ते स्थितम् । तं च दुराश गर्दनः पुष्टाहो यथेष्ट सत्यनक्षणज्ञातवलो गर्दभोऽयमिति मत्वीय शन्दं कुर्वाणलभिमुम्ब घावितः । ससरसफेण चीत्कारवादा निश्चित्य गर्दनाध्यमिति लीलयव व्यापादितः । तोऽ ग्वामि-"मुचिर हि चरनित्यम्" इत्यादि' ॥ दीर्घमुसो नद- वतः पक्षिमित्तम्-'अरे पाप दुष्ट बक! अमाक भूमी नरमाक न्यामिनमधिक्षिपसि? तन्द्र शतव्यमितानीम युन्या मरें मां चञ्चनिया सकोगा -- { - - विग्रहः १०-१२] भाषाटीकासमलंकृत। १२५ मूर्ख! स हंसस्तव राजा सर्वथा मृदुः। तस्य राज्याधिकारी नास्ति । यत एकान्तमृदुः करतलस्थमप्यर्थ रक्षितुमक्षमः स कथं पृथिवीं शास्ति ? राज्यं वा तस्य किम् ? कितु त्वं च कूपमण्डूकः। तेन तदाश्रयमुपदिशसि । हस्तिनापुरमें एक विलास नाम धोवी रहता था। उसका गधा अधिक बोझ ढोनेसे दुवला मरासू-सा हो गया था। फिर उस धोवीने इसे वाघकी खाल उढा कर वनके पास मजके खेतमें रख दिया। फिर दूरसे उसे देख कर और वाघ समझ, खेत वाले शीघ्र भाग जाते थे। इसके अनन्तर एक दिन कोई खेतका रखवाला चूसर रगका कवल ओढे हुए धनुष वाण चढा कर शरीरको नौटा कर एकातमे बैठ गया। उवर मन माना अन्न चरनेसे वलवान् , तथा सड़याया हुआ गवा उसे देख कर और गधा जान कर ढेचू ढंचू खरसे रक्ता हुआ उसके सामने दौड़ा। तव खेतवालेने, रेंकनेके शब्दसे इसको गधा निश्चय करके सहजही मार डाला । इसलिये मैं कहता हूँ-"बहुत काल तक चरता हुआ" इत्यादि ।' दीर्घमुख वोला-फिर पक्षियोंने कहा-'अरे पापी दुष्ट वगले ! तू हमारी भूमिमें चुग कर हमारेही खामीकी निन्दा करता है ? इसलिये अव क्षमा करनेके योग्य नहीं है।' यह कह कर सव मुझे चोंचोंसे मार कर क्रोधसे बोले-'अरे मूर्स ! देख, वह हस तेरा राजा सर प्रकारसे भोला है, उसको राज्यका अधिकार नहीं है। क्योंकि निरा भोला हथेली पर धरे हुए धनकीभी रक्षा नहीं कर सकता है। वह कैसे पृथ्वीका राज्य करता है ? अथवा उसका राज्यही क्या है ? वरन तूभी कुएका मैडक है। इसलिये उसके आश्रयका उपदेश करता है। शृणु, सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः। यदि दैवात्फलं नास्ति च्छाया केन निवार्यते? ॥१०॥ मुन,-फल और छायासे युक्त बड़े वृक्षकी सेवा करनी चाहिये । जो भाग्यसे फल नहीं है तो छायाको कौन भला दूर कर सकता है ? ॥ १० ॥ । अन्यच,- हीनसेवा न कर्तव्या कर्तव्यो महदाथयः। पयोऽपि शौण्डिकीहस्ते वारुणीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥ और दूसरे नीचकी सेवा नहीं करनी चाहिये, बडोंका आश्रय करना चाहिये, जैसे कलारिनके हायमे दूधकोभी लोग वारुणी (शराव) समझते हैं ११ मन्यच,- महानप्यल्पतां याति निर्गुणे गुणविस्तरः। आधाराधेयभावेन गजेन्द्र इव दर्पणे ॥१२॥ और गुणहीनमें वडेमी गुणका कहना लघुताको प्राप्त होता है, जैसे आधार और आधेयभावसे दर्पणमें हाधीका प्रतिबिंव छोटा दीखता है ॥ १२ ॥ १ जिसने वरतु रखी जाय - । , २ वस्तु - १२६ -हितोपदेश। [विग्रहः १३-१४ विशेषतच,- व्यपदेशेऽपि सिद्धिः स्यादतिशत नराधिपे। शशिनो व्यपदेशेन शशकाः सुखमासते' ॥ १३ ॥ और विशेप करके राजाके सवल होने पर उसके छल(मिस)सेभी कार्य सिद्ध हो जाता है। जैसे चन्द्रमाके छल(मिम)से शशक (खरगोश ) सुखसे रहे' ॥१३॥ मयोक्तम्-'कथमेतत् ?' पक्षिणः कथयन्ति- मैंने कहा-'यह कथा कैसी है ।" पक्षी कहने लगे।- ॥ कथा ४॥ कदाचिदपि वर्षासु वृटेरभावात्तपार्तो गजयूथो यूथपतिमाह- 'नाथ! कोऽभ्युपायोऽस्माकं जीवनाय ? नास्ति क्षुद्रजन्तूनां निमजनस्थानम् । वयं च निमजनस्थानाभावान्मृताहीं इव । कि कुर्मः ? क यामः ?' ततो हस्तिराजो नातिदूरं गत्वा नि- मलं इदं दर्शितवान् । ततो दिनेषु गच्छत्सु तत्तीरावस्थिता गजपादाहतिभिशूर्णिताः क्षुद्रशशकाः ।' अनन्तर शिलीमुखो नाम शशकश्चिन्तयामास- अनेन गजयूथेन पिपासाकुलितेन प्रत्यहमनागन्तव्यम् । अतो विनश्यत्यस्मत्कुलम् ।' ततो विजयो नाम तृचशशकोऽवदत्-'मा विपीदत । मयान प्रतीकार: कर्तव्यः। ततोऽसौ प्रतिशाय चलितः । गच्छता च तेनालोशि- तम्-'कथं गजयूथसमीपे स्थित्वा वक्तव्यम् ?

-- -विग्रहः १५] भापाटीकासमलंकृत। १२७ यूथनाथ उवाच-'कस्त्वम् ? कुतः समायातः ?' स ब्रूते-'शश- कोऽहम् । भगवता चन्द्रेण भवदन्तिकं प्रेपितः।' यूथपतिराह- 'कार्यमुच्यताम् । द इसलिये मैं पहाड़की चोटी पर बैठ कर झुटके खामीसे अच्छे प्रकारसे बोलें। - ऐसा करने पर झुडका खामी बोला-'तू कौन है ? कहाँसे आया है " यह बोला-'मै शशक हूँ । भगवान् चन्द्रमाने आपके पास भेजा है।' झुडके खामीने रहा-काम कह।' विजयो ब्रूते- उद्यतेप्वपि शस्त्रेषु दूतो वदति नान्यथा । सदैवावध्यभावेन यथार्थस्य हि वाचकः ॥ १५ ॥ विजय बोला-शस्त्रोंके उठाये जाने पर भी दूत कुछकी कुछ नहीं करता है, क्योंकि सव कालमें नहीं मारे जानेसे वह निश्चय करके यथार्थका कहने वाला होता है ॥ १५ ॥ तदहं तदाशया ब्रवीमि । शृणु । यदेते चन्द्रसरोरक्षकाः शशका- - स्त्वया नि.सारितास्तदनुचितं कृतम् । ते शशकाश्चिरमस्माकं रक्षिताः । अत एव मे शशाङ्क इति प्रसिद्धिः। एवमुक्तवति दूते यूथपतिर्भयादिदमाह-'प्रणिधेहि । इदमज्ञानतः कृतम् । पुनर्न कर्तव्यम् ।' दूत उवाच-'यद्येवं तत्र सरसि कोपात्कम्प- मानं भगवन्तं शशाई प्रणम्य प्रसाद्य गच्छ । ततो रात्री यूथपति नीत्वा जले चञ्चलं चन्द्रविम्बं दयित्वा यूथपतिः प्रणाम कारितः । उक्तं च तेन-देव! अज्ञानादनेनापराघः कृतः, ततः क्षम्यताम् । नैवं वारान्तरं विधास्यते' इत्युक्त्वा प्रस्थापितः । अतोऽहं ब्रवीमि-"व्यपदेशेऽपि सिद्धिः स्यात्" । इति । ततो मयोक्तम्-‘स एवास्सत्प्रभू राजहंसो महाप्रतापो- ' ऽतिसमर्थः। त्रैलोक्यस्यापि प्रभुत्वं तत्रयुज्यते, किं पुना राज्यम्?' : इति । तदाहं तैः पक्षिभिः ‘दुष्ट ! कथमसद्भूमौ चरसि ?' इत्य- भिधाय रायश्चित्रवर्णस्य समीपं नीतः । ततो राज्ञः पुरो मां प्रदर्य तैः प्रणम्योक्तम्-'देव! अवधीयतामेप दुष्टो वको यदस्सद्देशे चरन्नपि देवपादानधिक्षिपति ।' राजाह-'कोऽयम् । { कुतः समायातः?' त ऊचु:-'हिरण्यगर्भनाम्नो राजहंसस्यानुचरः : कर्पूरीपादागतः?' अथाहं गृध्रेण मन्त्रिणा पृष्टः-'कस्तत्र मुख्यो मन्त्री ?' इति । मयोकम्-'सर्वशास्त्रार्थपारगः सर्वशो नाम चक्रवाकः।' गृध्रो ब्रूते-'युज्यते । खदेशजोऽसौ । इसलिये में उनकी आज्ञाते कहता हूँ। सुनिये, जो ये चन्द्रमाके सरोवरके १ 'साधुवा यदि वाऽसाधु परेप समर्पित.। ब्रुवन् पराध परवान् न दूतो वधमईति' (न का ५२-२१) गावाप यह है कि, दून पराया (व दूसरे शब्द पर चलने वाटा) होनेते भला-बुरा होने पर भी अवध्य है

१२८
हितोपदेश ।
[विग्रहः १६-१८
।
रखवाले शशकोंको आपने निकाल दिया है यह अनुचित किया । वेशात
हमारे बहुत दिनसे रक्षित है इसीलिये मेरा नाम "शशार" प्रतित है।
दूतके ऐसा कहवेही हाथियों का खामी भयसे यह बोला-'सोच लो, यह बात
विना जाने की है । फिर नहीं करूगा ।' दूतने कहा-'जो ऐसा है तो इस
सरोवरमें क्रोधसे काँपते हुए भगवान् चन्द्रमाजीको प्रणाम कर, और प्रसव
करके चला जा। फिर रातको झुडके खामीको ले जा कर और जलमे हिलते हुए
चन्द्रमाके गोलेको दिखा कर झुडके खामीसे प्रणाम कराया और इसने कहा-
'हे महाराज ! भूलसे इसने अपराध किया है इसलिये क्षमा कीजिये, फिर ऐता
नहीं करेगा', यह कह कर बिदा किया। इसलिये मैं कहता हूं-"छलमेभी कान
सिद्ध होजाता है। फिर मैंने कहा-'वह हमारा खामी राजहस तो बड़ा प्रतापी
और अत्यन्त समर्थ है। तीनों लोककीभी प्रभुता उसके योग्य है फिर वह
राज्य क्या है? तब वे पक्षी मुझे “हे दुष्ट ! हमारी भूमिमे क्यों घूमता है।'
यह कह कर चितवर्ण राजाके पास ले गये। फिर राजाके सामने मुझे दिखला कर
उन्होंने प्रणाम करके कहा-'महाराज ! ध्यान दे कर मुनिये। यह दुष्ट बगला
हमारे देशम चूमता हुआभी आपफी निन्दा करता है।' राजा बोला-'यह रोग
? कहासे आगा है। वे कहने लगे-'हिरण्यगर्भ नाम राजहराका अनुसार
कपुरधोपसे आया है। फिर गिद्ध मत्रीने मुझसे पूछा-'वहाँ मुख्य मनी कौन
है !' भने म्हा-'गम शाम्रो पढा हुआ सर्वश नाम चकवा है । गिद्ध बोला-
'ठोर है। वह मारेशी है,
यन:-
सदेश कुलाचारं विशुदमुपधाशुचिम् ।
मत्रामव्यसनिनं व्यभिचारविवर्जितम् ॥ १६ ॥
यो-वदेशी, कुल की रीति में निपुण, धर्मशील अर्थात् उस्कोच (रिशत)
भारना देने वाला, विचार करनेमे चतुर, चूत, पान आदि व्यसन तका
व्यांगकारने रक्षा ॥ 1 ॥
पीतव्यवहाराय मौलं ख्यातं विपश्चितम् ।
जयस्योत्पादकं चैव विदव्यान्मन्निणं नृप.' ॥ १७ ॥
दुख रमादि व्यवहारको गानने वाला, लीन, मिष्यात पण्डित, बन उत्तान
करने वागनको या मंत्री बना ॥१७॥
अपान्तरे शुफेनोक्तम्-'देव! कद्वीपादयों लघुदीपा जा
दीपान्तर्गता एव । तत्रापि देवपादानामेवाविपत्यम्' । नता
समन्युम्-'पवमेव ।
दरले नगदेन स-महाराजा काग्दीप आदि ठोट छोटे
मन्ना, मातर और 4जी महाराही राज्यद।' int
शमी
राजा मत शिशुधव प्रसादी बनर्विता।
मायपि पान्दन्ति पुनद यते:पि यत् ॥ २८ ॥

विग्रहः १९-२१] भाषाटीकासमलंकृत। १२९ क्योंकि-राजा, विक्षिप्त, पालक, प्रमादी, धन का अहकारी, ये दुर्लभ वस्तु- कीभी इच्छा किया करते हैं, फिर जो मिल सकती है उसका तो कहनाही क्या ॥ १८॥ ततो मयोक्तम्-'यदि वचनमात्रेणैवाधिपत्यं सिद्ध्यति तदा जम्बुद्वीपेऽप्यस्मत्प्रभोहिरण्यगर्भस्य खाम्यमस्ति ।' शुको ब्रूते 'कथमत्र निर्णयः ?' मयोक्तम्-'संग्राम एव ।' राज्ञा विहस्यो. कम्-'स्वस्वामिनं गत्वा सज्जीकुरु । तदा मयोक्तम्-'स्वदूतोऽपि प्रस्थाप्यताम् ।' राजोवाच-'कः प्रयास्यति दौत्येन ? यत एवंभूतो दूत. कार्यः। - फिर मैने कहा कि, जो केवल कहनेसेभी राज्य सिद्ध हुआ जाता है तो जम्बूद्वीपमेंभी हमारे खामी हिरण्यगर्भका राज्य है।' तोता वोला-'इसमे कैसे निर्णय हो" मैंने कहा-'समामही है।' राजाने हँस कर कहा-'अपने स्वामीको जा कर तयार कर।' तब मैंने कहा-'अपने दूतकोभी भेजिये।' राजाने कहा- 'दूत वन कर कौन जायगा क्योंकि ऐसा दूत करना चाहिये,- भक्तो गुणी शुचिर्दक्षः प्रगल्भोऽव्यसनी क्षमी । ब्राह्मणः परमर्मतो दूतः स्यात्प्रतिभानवान् ॥ १९ ॥ भक्त अर्थात् राजाका हितकारी, गुणवान् , शुद्ध अर्थात् उत्कोच (रिशवत) आदि लाभरहित, कार्यमे चतुर, वोल-चालमें निपुण, द्यूत, पान आदि व्यसनसे रहित,क्षमाशील,ब्राह्मण, शत्रुके भेदको जानने वाला और बुद्धिमान् होवे ॥१९॥ गृध्रो वदति-'सन्त्येव दूता वहवः। कितु ब्राह्मण एव कर्तव्यः। सिद्ध बोला-'दूत तो वहुतसे है परन्तु ब्राह्मणकोही करना चाहिये। यता, । ह प्रसादं कुरुते पत्युः संपत्तिं नाभिवाञ्छति । कालिमा कालकूटस्य नापैतीश्वरसंगमात् ॥ २० ॥ क्योंकि वह स्वामीको प्रसन्न करता है और सपत्तिको नहीं चाहता है, और जसे महादेवजीके सगसे विपकी कालोंच नहीं जाती है वैसेही इसकीभी प्रकृति नहीं बदलती ॥ २०॥ राजाह-ततः शुक एव बजतु । शुक! त्वमेवानेन सह गत्वा- मदमिलपितं बेहि ।' शुको ब्रूते-'यथाज्ञापयति देवः । कित्वयं दुर्जनो वकः । तदनेन सह न गच्छामि ॥ राजा बोला-'फिर तोताही जाय । हे तोते! तूही इसके साथ वहाँ जा कर हमारा सदेसा भुगता दे।' तोता बोला-'जो आज्ञा श्रीमहाराजकी। पर यह साला दुष्ट है। इसलिये इसके साथ नहीं जाऊगा। तथा चोकम्,- सलः करोति दुर्वृत्तं नूनं फलति साधुषु । दशाननोऽहरत्सीतां वन्धनं स्यान्महोदधः ॥ २१ ॥ - - --- ले गया 1 --- १३० हितोपदेश। [विग्रहः २२ जैसा कहा है-दुष्ट जो बुराई करता है वह बुराई सचमुच साधुओं परफ करती है, अर्थात् उन्हें दु ख भुगतना पड़ता है। जैसे रावणने सीताको र और समुद्र वाधा गया ॥ २१ ॥ अपरच,- न स्थातव्यं न गन्तव्यं दुर्जनेन समं कचित् । काकसङ्गाद्धतो हंसस्तिष्ठन्गच्छंश्च वर्तकः ॥ २२॥' और दूसरे-दुष्टके साथ कभी न तो बैठना चाहिये और न जाना चाहिये, जसे कोएके साथ रह कर हस और उड़ता हुआ बटेर मारे गये' ॥ २२ ॥ राजोवाच-'कथमेतत् ?' शुकः कथयति- राजा बोला-'यह कथा कैसे है ? तोता कहने लगा।- ॥ कथा ५॥ अस्त्युजयिनीवमप्रान्तरे प्लक्षतरुः। तत्र हंसकाको निवसतः । कदाचिद्रीष्मसमये परिश्रान्तः कश्चित्पथिकस्तत्र तरुतले धनु:- काण्डं सनिधाय सुप्तः। तत्र क्षणान्तरे तन्मुखादृक्षच्छायापगता। ततः सूर्यतेजसातन्मुखं व्याप्तमवलोक्य तवृक्षस्थितेन हंसेन कृपया पसो प्रसार्य पुनस्तन्मुखे छाया कृता । ततो निर्भरनिद्रासुसिना तेन मुराव्यादान ठतम् । अथ परसुसमसहिष्णुः स्वभावदोर्जन्येन स काकस्तरा मुखे पुरीपोत्सर्ग कृत्वा पलायितः। ततो यानदसो पान्य उत्यायोब निरीक्षतेतावत्तेनावलोकितो हंसः काण्डेन हतो व्यापादित. ॥ वर्तककथामपि कथयामि- उनपिनी के मार्गन ए 5 पाहा । उस पर इस और काग रहते थे। एमान गरणी के मनय या दुभा कोई बटोरी उस पेके नीचे पनुपा घर मा यो देर उसके मुरा परगे की छाया इल गई। फिर स्टेनले उप मुखको दुआ देख र उमपे । पर १० पवार पो पनार nिt उस मुत पर माया र दीनी । फिर l मन नन्दो उमो मुख का दिया । पी, पराये मुमो नहीं सहने पार 4 सापने दम मुर नी. के उड़ गया । हिजो ५f *."7 जार देता मोही उमोनम पा, उन जाणो मार और हमागमा पटेरी भी लिए। વટ दु" हमा परदा भगवती गवस यात्राप्रमोन म पक्षिणः समुद्रातील मना । दद, कान सह वर्तमलित.। अब गोपाल दावन.दाद्वारंवार उन कान दवि खाद्यते । ततो याबदसी विद भूमी निवायोचावलो ते तावना काrint या दरलेन दिन. का. पदायितः । व६. समावनि विग्रहः २३-२४] भाषाटीकासमलंकृत । १३१ । - पराधो मन्दगतिस्तेन प्राप्तो व्यापादितः। अतोऽहं ब्रवीमि-"न स्थातव्यं न गन्तव्यम्" इत्यादि ॥ ततो मयोक्तम्-'भ्रातः शुक! किमेवं ब्रवीपि ? मां प्रति यथा श्रीमद्देवस्तथा भवानपि ।' शुकेनोकम्-'अस्त्वेवम् । एक समय गरुडजीकी यात्राके निमित्तसे सब पक्षी समुद्रके तीर पर गये। फिर कौएके साथ एक बटेरभी चला। पीछे जाते हुए अहीरकी दहीकी हाँटीमेंसे वार चार कौआ दही खाने लगा। फिर ज्योंही इसने दहीकी हाँडीको धरती पर रख कर ऊँचेको देखा लोही उसको कौआ और वटेर दीख पड़े। फिर उससे खदेड़ा हुआ कौआ उड़ गया। और स्वभावसे अपराधहीन हौले हौले जाने वाले बटेरको उसने पकड़ लिया और मार डाला । इसलिये मैं कहताहूँ-"न बैठना चाहिये और न जाना चाहिये" इत्यादि। फिर मैंने कहा-'भाई तोते! क्यों ऐसे कहते हो? मेरे जाने जैसे श्रीमहाराज वैसेही तुम हो।' तोतेने कहा- 'ऐसेही ठीक है। किन्तु,- दुर्जनैरुच्यमानानि संमतानि प्रियाण्यपि । अकालकुसुमानीव भयं संजनयन्ति हि ॥ २३ ॥ परन्तु-दुष्टोसे कहे हुए वचन चाहे जसे अच्छे और प्यारे हों, वे कुम्- तुके पुप्पोंके समान भय उत्पन्न करतेही हैं ॥ २३ ॥ दुर्जनत्वं च भवतो वाक्यादेव शातं यदनयोर्भूपालयोर्विग्रहे भवद्वचनमेव निदानम् । और तेरा दुष्टपणा तो तेरी वातसेही जान लिया गया कि इन राजाओंके युद्धमें तेरा वचनही मूल कारण है । प्रत्यक्षेऽपि कृते दोपे मूर्खः सान्त्वेन तुप्यति । रथकारो निजां भार्या सजारां शिरसाकरोत् ॥ २४ ॥ देखो-मूर्स सामने किये हुए दोषको देख कर भी मीठे मीठे वचनोंसे प्रसन्न हो जाता है, जैसे एक वदईने यारसमेत अपनी स्त्री सिर पर धर लिया ॥ २४ ॥ राज्ञोक्तम्-'कथमेतत् ?' शुकः कथयति- राजा बोला-'यह कया केसे है ? तोता कहने लगा- ||कथा ७॥ अस्ति यौवनश्रीनगरे मन्दमतिर्नाम रथकारः । स च स्वभार्या बन्धकी जानाति । जारेण समं खचक्षुपा नैकस्थानं पश्यति । ततोऽसौ रथकारः 'अहमन्यं ग्रामं गच्छामि' इत्यु- क्त्वा चलित.। कियर गत्वा पुनरागत्य पर्यइतले खगृहे निभृतं स्थितः । अथ रथकारो नामान्तरं गत इत्युपजात- विश्वासः स जारः संध्याताल एवागतः । पश्चात्तेन समं तस्मिन्पर्य, कीडन्ती पर्यदतलस्थितत्य नर्तुः किचिद्गस्पर्शा- - - १३२ हितोपदेश । [विग्रहः २५-२५ स्वामिनं मायाविनमिति विज्ञाय विषण्णाभवत् । ततो जारेपो कम्-'किमिति त्वमद्य मया सह निर्भर न रमसे ? विस्मितेव प्रतिभासि मे त्वम् ?' तयोकम्-'अनभिज्ञोऽसि । मम प्राणेश्वर येन ममाकौमार सत्यं सोऽद्य ग्रामान्तर गतः। तेन विना सकलजनपूर्णाऽपि ग्रामो मां प्रत्यरण्यवद्भाति । कि भावि तत्र परस्याने कि खादितवान् कथं वा प्रसुप्त इत्यस्सद्धृदयं विदीयते। जारो ब्रूते-'तव किमेवं लेहभूमी रथकारः?' चन्धक्यवदत्- 'रे वर्वर ! कि वदसि? यौवनश्रीनगरमे मदमति नाम बढई रहता था, और वह अपनी सो ठिनाल जानता था। पर यारके सग अपनी ऑसोंसे एक स्थानमे नहीं देखत' था। बाद यह बढई "मैं दूसरे गाँवको जाता हूँ" यह कह कर चला गया । योड़ी दूर जा कर और फिर लौट आ कर पलगके नीचे अपने घरमें छुप कर बेठ गया। फिर, सई दूसरे गांव को गया इस विधासका मारा वह मार दिन सतेही आ गया। पीछे उसके साथ उसी पलग पर क्रीडा करती हुई पलगो नीचे बैठे हुए सामी की योगी देहके जानेसे वागीको छलिया जान कर उदास हो गरे। तर थारने कहा-'क्या बात है तू आज मेरे साथ जी सोल कर ही रमण करती है। तू मुझे कुछ रित्ती-सी समझ पाती है। उसने कहा- न है। मेरा प्राणप्यारा कि जिसके साथ मेरी बाल्यावस्थासे प्रीति गोमा दूसरे गा गया है। उसके विना सब जानोसे भरा हुआगी 4 म । मुह मन-मा जान पाता। क्या होनहार है, पहा दूगरे शान ॥ + {, होगा आगे सोया होगा इस कारण मेरा हिरदा फटा जाना। पारन - रापोमा मह करने वाला है " दिनाल बोली- in Hin . पनपायपि या प्रोक्ता या या कोधचक्षुषा । गुमसत्रमुखी म. सा नारी धर्ममागिनी ॥ २५ ॥ न- नाना पचा नास ह और सीधी I - 2715 माना मुक प्रगत र पर श्री पी ill नगरच,- वग्रहः २८-३०] भापाटीकासमलंकृत। १३३ - और स्त्रियों का भूपणोंके विनाही पति परम भूपण है, उससे रहित यह त्री रुपवतीभी कुरूपा है ॥ २७ ॥ त्वं जार. पापमतिः । मनोलोल्यात्पुष्पताम्बूलसदृशः कदाचि- तरसेव्यसे कदाचिन्न सेव्यसे च । स च खामी मां विकेतुं देवेभ्यो माह्मणेभ्योऽपि दातुमीश्वरः । कि बहुना, तमिजीवति जीवामि तन्मरणे चानुमरण करिष्यामीति प्रतिज्ञा वर्तते । पर तू तो पापबुद्धी यार है । चित्तकी चचलतासे पुष्प-तावूलके समान है, कभी सेवा किया जाता है और कभी नहीं किया जाता है। और वह स्वामी कानुझे वेचने के लिये और देवता और ब्राह्मणोंको देनेके लियेभी समर्थ है। अधिक द क्या कहूँ? उसके जीते में जीती हूँ, उसके मरने पर सती हो जाऊँगी यह 5 नेरी प्रतिज्ञा है। 2 । यत- तिनः कोट्योऽर्धकोटी च यानि लोमानि मानवे । तावत्कालं वसेत्स्वर्ग भरि यानुगच्छति ॥ २८ ॥ क्योंकि-जो स्त्री पतिकी आज्ञामें चलती है वह, मनुष्य (शरीर)के ऊपर जो दौन करोड पचास लाख लोम ( रोंगटे ) हैं उतने वर्ष तक वर्गम वसती है । । अन्यच,- - - - व्यालग्राही यथा व्यालं वलादुद्धरते विलात् । तबद्भर्तारमादाय स्वर्गलोके महीयते ॥ २९ ॥ और दूसरे-जेसे मदारी (मन्त्रके प्रभावसे) साँपको विलेसे वलसे खींचता है पही स्त्री (पतिव्रतका प्रभावसे) पतिको स्वर्गलोक्में ले जा कर सुख भोगती है ॥ अपर च,- चितौ परिप्वज्य विचेतनं पति प्रिया हि या मुञ्चति देहमात्मनः। कृत्वापि पापं शतसंख्यमप्यसौ पतिं गृटीत्वा सुरलोकमानुयात् ॥ ३० ॥ और-जो स्त्री चिताम जपने मरे हुए भर्ताको गोदमे ले कर अपने शरीरको अदती ( सती हो जाती) है वह सौ पाप करकेभी पतिको ले कर स्वर्गलोक्यो जाती है ॥३०॥ एतत्सर्वे श्रुत्वा स रथकारोऽवदत्-'धन्योऽहं यस्येदृशी प्रिय- वादिनी स्वामिवत्सला भार्या' इति मनसि निधाय तो खट्वां । खीपुरपसहितां मूर्तिं कृत्वा सानन्दं ननर्त । अतोऽहं - । वीमि-"प्रत्यक्षेऽपि ते दोपे" इत्यादि । ततोऽहं तेन राशा यथाव्यवहार सपूज्य प्रस्थापितः। शुकोऽपि मम पवादागच्छ- मास्ते । एतत्सर्व परिणाय यथाकर्नव्यमनुसंघीयताम् ।' चक्र १२ हितो.

। - ३ १३४ हितोपदेश। [विप्रहः ३१-३३३३ चाको विहस्याह-'देव ! चकेन तावद्देशान्तरमपि गत्वा यया पात्र शक्ति राजकार्यमनुष्ठितम् । किंतु देव! खभाव एष मूर्खाणाम् । त्य यह सब सुन कर वह बढ़ई वोला-'मैं धन्य है जिसकी ऐसी निमारियाना खानीरो प्यार करने वाली स्री है। यह मनमे ठान, उन स्त्रीपुरुषसहित साधने सिर पर रख कर वह आनन्दसे नाचने लगा। इसलिये मैं कहता हूं-"प्रलय दोगा किये जाने परभी" इत्यादि । फिर उस राजाने वहाँकी रीति के अनुसार दिल कर मुझे विदा किया। तोताभी मेरे पीछे पीछे आ रहा है। यह सामा जान कर जो करना है सो करिये। चकवेने हंस कर कहा-'महाराज ! बगलेने प्रदेश जा कर भी शकिके अनुसार राजकार्य किया, परन्तु महाराज ! माय यही खभाव है। यतः- शतं दद्यान विवदेदिति विज्ञस्य संमतम् । विना हेतुमपि इन्द्रमेतन्मूर्खस्य लक्षणम् ॥ ३१ ॥ मोकि-अपनी से कमें हानि करे परन्तु विवाद न करे यह गुद्धिमानों मत है, और विना कारणभी फलह कर वेठे यह मूर्खका लक्षण है' ॥२१॥ राजाद-'किमतीतोपालम्भनेन ? प्रस्तुतमनुसंधीयताम् चस्याको जूते-'देव ! विजने ब्रवीमि। सामो-जो हो गया उसके उलहनेसे क्या ( फायदा ) हे। अब को ॥ है उचे फरो। चाया गोला-'महाराज ! ए हातमे कहूँगा। 1 राणीहारप्रतिव्यानेनत्रवविकारतः। अप्यन्ति मनो धीरास्तस्माद्रदसि मन्त्रयेत् ॥ ३२॥ tiler-रंगला, शम्बर, नेन और मुराइन के बदलनेस चतुर मनु to let { लिग पान- गुप्त वार्ता करनी चाहिये ॥३॥ राजा मत्री च तत्र बिनो। अन्येऽन्यत्र गता।चक्रयाका ने-'देव ! बामे जानामि । कस्याप्यस्मनियोगिनः प्रेरणा नेदमनुष्टितम् । । कार नामा! समसार म्यानको १६ - गजानना : सीमा मेant 34 .। -

विग्रहः ३४-३६] भाषाटीकासमलंकृत ।
१३५
। राजाब्रवीत्-'भवतु । कारणमत्र पश्चानिरूपणीयम् । संप्रति
यत्कर्तव्यं तन्निरूप्यताम् ।' चक्रवाको ब्रूते--'देव! प्रणिधिस्ताव-
लाहीयताम् । ततस्तदनुष्ठानं वलावलं च जानीमः ।
२. राजा बोला-'जो कुछ हो, इसमें जो कारण है उसका पीछे निश्चय कर
7 लिया जायगा, अब जो कुछ करना है उसका निर्णय करो।' चकवा वोला-'हे
- महाराज ! पहले किसी भेदियेको भेजिये, फिर उसका काम और बलावल जाने।
तथा हि-
भवेत्स्वपरराष्ट्राणां कार्याकार्यावलोकने ।
चारचक्षुर्महीभर्तुर्यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥ ३४॥
जैसा कहा है-चाजाओंका अपने, तथा शत्रुके राज्योंके, अच्छे तथा वुरे
कमोंके देखनेके लिये भेदियाही नेत्र (गूढ मन्त्र जानने वाला ) होता है और
जिसके नहीं होता है वह सचमुच अवाही है ॥ ३४ ॥
स च द्वितीयं विश्वासपात्रं गृहीत्वा यातु । तेनासौ स्वयं
तत्रावस्थाय द्वितीयं तत्रत्यमन्त्रकार्य सुनिभृतं निश्चित्य निगद्य
प्रस्थापयति ।
और वह दूसरे विश्वासी पुरुषको साथ ले जाय, जिससे वह आप वहाँ
अपनेको ठहरा कर दूसरेको वहाँका मत्रकार्य गुप्त लगा कर इसको समझा कर
विदा करदे ।
' तथा चोक्तम्,-
तीर्थाश्रमसुरस्याने शास्त्रविज्ञानहेतुना।
तपस्विव्यञ्जनोपेतैः स्वचरैः सह संवदेत् ॥ ३५॥
जैसा कहा है-तीर्थ, आश्रम और देवताके स्थानमे शास्त्र के ज्ञानके छलसे
तपखियोंके रूपको धारण किये हुए अपने भेदियोंके द्वारा राजाको शत्रुके
राज्यका भेद जानना चाहिये ॥ ३५ ॥
गूढचारश्च यो जले स्थले चरति । ततोऽसावेव वको नियुज्य-
ताम् । एतादृश एव कश्चिद्धको द्वितीयत्वेन प्रयातु । तहलोकाश्च
राजद्वारे तिष्ठन्तु, किंतु देव ! एतदपि सुगुप्तमनुष्ठातव्यम् ।
और गुप्त भेदिया वह है जो जल्मे और यलमें जाता है, फिर इस बगले.
कोही नियुक्त कीजिये। ऐसाही कोई दूसरा वगला जाय। और उसके घरके
लोग राजद्वारने रहे। परंतु हे महाराज ! यह कार्यभी अत्यन्त गुप्त करना
--
...
चाहिये।
यता,
पदों भिद्यते मन्त्रस्तथा प्राप्तश्च वार्तया।
इत्यात्मना द्वितीयेन मन्त्रः कार्यों महीभृता ॥३६॥
क्योंकि-छ कानमे गुप्त बात जाने तया औरोंते विदित हुई यात खुल
जाती है, इसलिये राजाको केवल एकहीते अर्थात् अकेले मत्रीतेही (एकातने)
विचार करना चाहिये ॥ ३६ ॥

हितोपदेश । [विग्रहः ३७-१ - मन्त्रभेदेऽपि ये दोषा भवन्ति पृथिवीपतेः। न शम्यास्ते समाधातुमिति नीतिविदा मतम् ॥ ३७ ! देखो, हे राजा! मन्त्रका भेद तुल जाने पर जो बुराइयों होती है मुघर नहीं सकती है यह नीति जानने वालोंका नत है। ॥ ३७॥ राजा विमृश्योवाच-'प्राप्तस्तावन्मयोत्तमः प्रणिधिः।' मो ते-'तदा संग्रामविजयोऽपि प्राप्तः।' राजा विचार कर बोला-'मुझे भेदिया तो उत्तन मिल गया। मतीमो "- 'तो बुद्धन विजगभी मिल गई। अचान्तरे प्रतीहारः प्रविश्य प्रणम्योवाच-'देव! जानु डीपादागतो दारि गुफस्तिष्ठति ।' राजा चक्रवाकमालोते। चक्रवाकेणोक्तम्-'तावदत्वावासे तिष्ठतु पश्चादानीय प्रष्टव्यः प्रतीहारस्तमानासम्थान नीमा गतः। राजाद-विग्रहस्तास. नुपस्ाित.। चको जूते-'देव! मागेव विग्रहो न निधिः।

विग्रहः ४१-४६] भाषाटीकासमलंकृत। १३७ अपरं च,- .- सर्व एव जनः शूरो घनासादितविग्रहः । अदृष्टपरसामर्थ्यः सदर्प. को भवेन हि ॥४१॥ है और विग्रह(युद्ध)में गये विना सभी मनुष्य शूर है,क्योंकि शत्रुकी सामर्थ्यको नहीं जानने वाला ऐसा कौन है जो घमडी न होय ॥४१॥ किंच, न तथोत्थाप्यते ग्रावा प्राणिभिर्दारुणा यथा। अल्पोपायान्महासिद्धिरेतन्मन्त्रफलं महत् ॥ ४२ ॥ और पत्थरकी शिला जैसी कि काठके यत्रसे उठाई जाती है ऐसी प्राणियोंसे नहीं उठाई जाती है, इसलिये छोटे उपायसे वडा लाभ होना यह बड़े मत्रकाही फल है ॥४२॥ कितु विग्रहमुपस्थितं विलोक्य व्यवहियताम् । परतु विग्रहको उपस्थित देख कर उपाय कीजिये, यतः,- यथा कालकृतोद्योगात्कृपिः फलवती भवेत् । तद्वन्नीतिरियं देव ! चिरात्फलति रक्षणात् ॥ ४३ ॥ क्योंकि-जैसे ठीक समय पर उद्योग करनेसे ( अर्थात् हल इत्यादि चलाने त्या वीज बोनेसे) सेती फलती है वैसेही हे राजा! यह नीविभी वहुत काल रक्षा करनेसे फलती है ॥ ४३ ॥ महतो दूरभीरुत्वमासन्ने शूरता गुणः । विपत्तौ च महॉल्लोके धीरतामनुगच्छति ॥ ४४ ॥ और ससारमे बुद्धिमानोंको आपत्तिम, दूरसे डर लगता है, पास आने पर अपनी शूरताका गुण दिसाते है, और महात्मा पुरुष विपत्तिमें धीरज धरते हैं ॥४॥ अन्यच,- प्रत्यूहः सर्वसिद्धीनामुत्ताप. प्रथम. किल । अतिशीतलमप्यम्भः कि भिनत्ति न भूभृतः॥४५॥ और दूसरे-किसी के वचनको न सहना यह सव सिद्धियोंका सचमुच मुख्य विप्न हे, जसे ठडा जलभी क्या पहादको नहीं उखाड डालता है ? अर्थात् पुरुप ठडे दिलते दूसरेका वचन सुन लेना चाहिये, फिर योग्य हो तो कर, एव वद जरर सिद्धि पावेगा ॥४५॥ चिशेपतच महावलोऽसौ चित्रवर्णा राजा। और विशेष करके वह चित्रवर्ण राजा वा पलवान् यतः,- पलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निदर्शनम् । तयुद्ध हस्तिना साध नराणां मृत्युमावहेत् ॥ ४६॥ -- म १३८ हितोपदेश । [विग्रहः ४७-२२ -- . इसलिदे-बल्वान्के साथ लड़ना यह शूरताका चित्र नहीं है, कोई मनुष्यों हाथोके ताप लढ़ना मृत्युको पहुंचाता है ॥ ४६॥ बन्यन्च,- स मूर्खः कालमप्राप्य योऽपकर्तरि वर्तते। कलिवलवता सार्धं कीटपक्षोद्यमो यथा ॥१७॥ और जो अवसरके विना पाये शनुसे भिड़ जाता है वह है, और बलवान् के माय कलह करना चॅटीके पक्ष निकलनेके समान है।॥ ४५ ॥ किच,- कौम संकोचमास्थाय प्रहारमपि मर्षयेत् । प्रातकाले तु नीतिश उत्तिछेत्करसर्पवत् ॥ २८॥ और नीति जानने वाग कएके मुस सकोड़नेके समान प्रहार कोभी सरे और बार मिलने पर तर सर्पके समान उठ बैठे ॥ ४८ ॥ महत्यल्पेऽप्युपायशः सममेव भवेत्क्षमः। समुन्मूलयितु वृक्षास्तुणानी नदीरयः ॥ ४९ ॥ IRTने वाल बडे ओर गेटे श के नाश करनेमे समान समर्थ हो। है, कोमा म ग और तोको जसे उसनेको गमध होता है॥४॥ अनन्ततोऽयाश्वास तावद्रियता यावर्गः सजीक्रियते । 38 पागदेर तप तकसेरा लीजिये कि जन तक गई, .

नहीं होता है ग्रहण किया हुआ भोजनका पदार्य गोबर सा (खादरहित) लगता है ॥ ५६ ॥ इनसे बुख दिन कथं संग्राहः? ..!: Fi। - ५ विग्रहः ५३-५६] भाषाटीकासमलंकृत । १३९ विस्तीर्णतातिवैषम्यं रसधान्येध्मसंग्रहः । प्रवेशश्चापसारश्च सप्तैता दुर्गसंपदः' ॥ ५३ ॥ लवा, चौडा, ऊँचा, नीचा, जल, अन्न और इवन इनका सग्रह, और जाने तथा आनेका मार्ग, ये गढकी सात सामग्रियाँ हैं' ॥ ५३ ॥ राजाह-'दुर्गानुसंधाने को नियुज्यताम् ?' ननी राजा वोला-'गढ़ वनानेमें किले नियुक्त करना चाहिये ?' । चको ब्रूते- 'यो यत्र कुशलः कार्ये तं तत्र विनियोजयेत् । कर्मखदृष्टकर्मा यः शास्त्रशोऽपि विमुह्यति ॥ ५४ ।। ॥१८॥ चक्वा वोला-'जो जिस काममें चतुर हो उसको उसमे नियत कर देना नहार चाहिये, क्योंकि जिसने कामोंकी क्रिया नहीं देखी है ऐसा बुद्धिमान्भी गडवडा जाता है ॥५४॥ . तदाहयतां सारसः।' तथानुष्ठिते सत्यागतं सारसमालोक्य राजोवाच-भोः सारस ! त्वं सत्वरं दुर्गमनुसंधेहि ।' सारसः प्रणम्योवाच-'देव ! दुर्ग तावदिदमेव चिरात्सुनिरूपितमास्ते लम बना महत्सरः। किंत्वत्र मध्यवर्तिद्वीपे द्रव्यसग्रहः क्रियताम् । । इसलिये सारसको बुलाओ। ऐसा करने पर सारसको आया देख राजा वोला- 'हे सारस ! तू शीघ्र गढको बना।' सारसने प्रणाम करके कहा-'महाराज ! बहुत कालसे देखाभाला यही वड़ा सरोवर ठीक है। परन्तु इस वीचके दीपने सामग्री इकट्टी किया जावे, सजीवित जिश तो यता, dn01 मनुपात हुई 4. धान्यानां संग्रहो राजन्नुत्तमः सर्वसंग्रहात् । निक्षिप्तं हि मुखे रत्नं न कुर्यात्प्राणधारणम् ॥ ५५ ॥ क्योंकि हे राजा। सव सग्रहसे अन्नका सग्रह श्रेष्ठ है, क्योंकि मुखमें भिह सच है । रक्खा हुआ रन अर्थात् धन प्राणों की रक्षा नहीं कर सकता है ॥ ५५ ॥ माना पाई। किंच,- ख्यातः सर्वरसानां हि लवणो रस उत्तमः। गृहीतं च विना तेन व्यञ्जनं गोमयायते ॥५६॥ और-सव रसाम प्रसिद्ध नोन रस सचमुच उत्तम है कि जिसके विना - • सन्न है, इसन पुस्कला राजाह-'सत्वर गत्वा सर्वमनुतिष्ठ।' पुनः प्रविश्य प्रतीहारो नूते-'देव! सिंहलद्वीपादागतो मेघवर्णो नाम वायसः सपरिवारो द्वारि तिष्टति । देवपादं द्रष्टुमिच्छति।' राजाह-'काकाः पुनः सर्पशा पद्रष्टारश्च । तद्गवात संग्राह्य इत्यनुवर्तते।' चको ब्रूते- राजा बोला-'शीघ्र जा कर सब तयारी कर। फिर द्वारपाल भाकर बोला- म -- -विग्रहः ५८-५९ ] भापाटीकासमलंकृत। १४१ 1. ततस्तं शब्दमाकर्ण्य जातिखभावात्तेनापि शब्दः कर्तव्यः ।' वतस्तथानुष्ठिते सति तदृत्तम् । वह प्रसिद्ध है कि वनमें कोई गीदड़ अपनी इच्छासे नगरके पास घूमते मते नीलके होदेमे गिर गया। पीछे उसमेसे निकल नहीं सका, प्रात काल करनेको मरेके समान दिखला कर बैठ गया। फिर नीलके होदेके खामीने इसे मरा हुआ जान कर और उममसे निकाल कर दूर ले जा कर फेक दिया और वहांसे वह भाग गया। तब उसने वनमे जा कर और अपनी देहको नीले रगकी देत कर विचार किया--'मैं अब उत्तम वर्ण हो गया हू तो में अपनी प्रभुता क्यों न करू ? यह विचार सियारोंको बुला कर, उसने कहा-'श्रीभगवती वनकी देवावीने अपने हायसे वनके राज्य पर सव ओपधियोंके रससे मेरा राजतिलक १ किया है इसलिये आजते ले कर मेरी आज्ञासे काम करना चाहिये।' और सियार । उसको अच्छा वर्ण देख कर साष्टाग दडवत प्रणाम करके वोले-'जो महाराजकी जाज्ञा । इसी प्रकारते क्रम क्रमसे सव वनवातियों में उसका राज्य फैल गया। निर उसने अपनी जातते चारों ओर बैठा कर अपना ऐश्वर्य फेलाया, पीछे उसने व्याघ्र सिंह आदि उत्तम मत्रियों को पा कर सभाम सियारों को देख कर बजरे मारे अनादरसे सब अपने जातभाइयोंको दूर कर दिया। फिर सियारोंको विरल देख कर किसी बूढे सियारने यह प्रतिज्ञा की कि 'तुम खेद मत करो। जैसे दन मूर्खने नीति तथा भेदके जानने वाले हम सभीका अपने पाससे अनादर दिया है वैसेही जिस प्रकार यह नष्ट होय सो करना चाहिये। क्योंकि ये वाघ आदि, पेवल रगसे वोखेमें आ गये है और तियार न जान कर इसको राजा मान रहे है । जिसमें इसका भेद खुल जाय सो क्रो। और ऐसा करना चाहिये कि सध्या के समय उसके पास सभी एक सग चिलायो । फिर उस शब्दको सुन कर अपने जाति के स्वभावसे वहभी चिल्लाते उठेगा । फिर वैसा करने पर वही हुआ । -- -~- अर्थात् उसकी पोल खुल गई, यत.,- - । यः स्वभावो हि यस्यास्ति स नित्यं दुरतिकम.। श्वा यदि क्रियते राजा स कि नाश्चात्युपानहम् ॥ ५८॥ क्योंकि जिसमा जैसा खभाव है वह सर्वदा छूटना कठिन है, जैसे यदि उत्ता राजा कर दिया जाय तो क्या वह जूतेको नहीं चवावेगा? ॥ ५८ ॥ तत. शब्दादभिशाय स व्याघ्रण हत.। वर शब्दसे पहिचान कर उसे वाघने मार डाला, • तथा चोकम्,- छिद्र ममं च वीर्य च सर्व वेत्ति निजो रिपुः। ददत्यन्तर्गतश्चैव शुष्कं वृक्षमिवानल. ॥ ५९॥ जेना कदा है-जिस प्रकार भीतर घुसके अगि सूखे पेड़को भल कर देती है वैसे ही अपना टुरमन अर्थात् नेदी, द्रि (कचावट), मर्म (नेद) और - रामन(पल)पो जानता और नाश कर देता है ।। ५९ ॥ - -- विग्रहः ६२-६४] भाषाटीकासमलंकृत । १४३ राबतो धर्मश्चैपः- है क्योंकी (सचा) धर्म यह है- दूतो म्लेच्छोऽप्यवध्यः स्याद्राजा दूतमुखो यतः। उद्यतेप्वपि शस्त्रेपु दूतो वदति नान्यथा ॥ ३२॥ 7 दूत हीन-जाति भी हो पर मारनेके योग्य नहीं होता है, क्योंकि राजाका तही मुख है कि जो शस्त्रोंके उठाने परमी विपरीत नहीं कहता है ॥ ६२ ॥ च,- - ET - स्वापकर्प परोत्कर्प दूतोकैर्मन्यते तु कः? । सदैवावध्यभावेन दूतः सर्व हि जल्पति' ॥ ६३ ॥ और दूतकी बातोंसे अपनी लघुता और शत्रुकी अधिकता कान मानता है ? दृत तो मदा 'मैं नहीं मारा जाऊगा' इस भावनासे सभी कुछ कहता है ॥६३॥ - ततो राजा काकश्च खां प्रकृतिमापन्नौ । शुकोऽप्युत्थाय । चलितः। पश्चाञ्चक्रवाकेणानीय प्रवोध्य कनकालंकारादिकं दत्त्वा - संप्रेपितो ययौ। शुकोऽपि विन्ध्याचलराजानं प्रणतवान् । राजोवाच-'शुक! का वार्ता? कीदृशोऽसौ देशः?' शुको ब्रूते- - 'देव ! संक्षेपादियं वार्ता । संप्रति युक्तोद्योगः क्रियताम् । देश- शासौ कर्पूरद्वीपः खर्गेकदेशी राजा व द्वितीयः खर्गपतिः कथं वर्णयितुं शक्यते ?' ततः सर्वाशिष्टानाहय राजा मन्त्रयितुमुप- विष्टः । आह च-'संप्रति कर्तव्यविग्रहे यथा कर्तव्यमुपदेशं ब्रूत। विग्रहः पुनरवश्यं कर्तव्यः। फिर राजा और काग अपने आपमें आये । तोताभी उठ कर चला। पीछे चरवेने ला कर और समझा कर और सुवर्णके आभूषण आदि देकर विदा किया और वह गया। फिर तोतेने विंध्याचलके राजाको दंटवत किया। राजा वोला-'हे तोते । क्या समाचार है ? वह सा देश है " तोतेने कहा-'महाराज ! सक्षेपसे यह बात है, जव लड़ाईका ठाठ करिये। यह कर्पूरद्वीप देश एक स्वर्गका टुकड़ा है और राजा दूसरा इन्द्र है। क्से वर्णन किया जा सकता है ?' फिर सव शिष्टोंको बुला कर परामर्श (सलाह) करनेके लिये बैठ गया और बोला-'अब जो लदाई करनी है उसमे जो कुछ करना है मो हो। फिर लड़ाई तो अवश्य करनीही है। तथा चोकम्,- असंतुष्टा द्विजा नष्टाः संतुष्टाश्च महीभुजः। सलजा गणिका नष्टा निर्मजाच कुलखियः ॥ ६४॥ जगा कहा है-असतोपी ब्राह्मग, सतोपी राजा, लजावती वेश्या और निरंजा लपी ली ये चारों नष्ट होते हैं, अत एव निन्दा करने के योग्य है। दृरदर्शी नाम गृध्रो नृते-'देव! व्यसनितया विग्रहो न 1 - 21 - । निधिः।

हितोपदेश । [विप्रहः ६५- दूरदशी नान गिद्ध वोल-महाराज! विना अवसरके सम्मान करने नहीं है। यता, मिवामात्यसुद्धगो यदा स्युदृढभक्तयः। शागा विपरीता कर्तव्यो विग्रहस्तदा ॥६५॥ कोक-मित, नको और आफ्नो लोग जब हा शुभचिना हो । रामोंके वारीत में लड़ाई करनी चाहिये ॥ १५ ॥ अन्यथा- भनिमित्र हिरण्यं च विग्रहस्य फलं त्रयम् । यदैतनिखितं भावि कर्तव्यो विग्रहस्तदा ॥६६॥ और नरे-पा, भा और मुराणे यह तीन लगाई पीज है, ' ना IT करनी चाहिये ॥६॥ राजार-'मरल तापदायोकगतु मन्त्री । तीतेपामुगयोगो मागास । TIना मोतिः। निणार शुभवा दार।' मला - दि सरसा यारणमनुवितम् । 1, ६ .-.iti, रो को ।। फिर इनकी all 1 । । । : Hो । ला नि । ntt : ' ! (.irt) Hi Hf करना नित नही है। - - + 1 विग्रहः ६९-७६] भाषाटीकासमलंकृत। १४५ - - नद्यद्रिवनदुर्गेषु यत्र यत्र भयं नृप!। तत्र तत्र च सेनानीर्यायाद्व्यूहीकृतैर्वलैः ॥ ६९ ॥ सुनिये-हे राजा ! नदी, पहाड़ वन तथा कठिन स्थानों में जहाँ जहाँ भय होय हो वहाँ सेनापति व्यूह बॉध कर (परेट वना कर) सेनाके साथ जाय ।।६९॥ वलाध्यक्षः पुरो यायात्मवीरपुरुषान्वितः। मध्ये कलत्रं खामी च कोशः फल्गु च यदलम् ॥ ७०॥ सेनापति बडे बडे योद्धाओंके साथ अगाडी चले, और बीचमें स्त्रियों, खामी, होश (खजाना) और निर्बल सेना जाय ॥ ७० ॥ पार्श्वयोरुभयोरश्वा अश्वानां पार्श्वतो रथाः। स्थानां पार्श्वयोर्नागा नागानां च पदातयः॥ ७१॥ दोनों ओर आसपास घोडे, घोडोंके पार्श्वमे रथ, रोंके आसपास हाथी और हाधियोंके आसपास पैदल ॥ ७१ ।। पश्चात्सेनापतिर्यायात्खिन्नानाश्वासयञ्छनैः । मन्त्रिभिः सुभटैर्युक्तः प्रतिगृह्य वलं नृपः ॥ ७२ ॥ सेनापति पीछे वाले साहसहीन पुरुषोंको धीरे धीरे ढाढस बंधाता हुआ जान नौर राजा मत्रियोंके तथा बड़े शूरवीरोंके साथ सेना ले कर जाय ॥ ७२ ॥ समेयाद्विपमं नागैर्जलाढ्यं समहीधरम् । सममश्वैर्जलं नौभिः सर्वत्रैव पदातिभिः॥७३॥ ऊँची नीची भूमिमें, कीचड़ खाँदेमें, तथा पर्वत पर हाथियों पर जाय, और एक-सी भूमीनें घोडों पर, और पानीमें नावोंके द्वारा, और सब देशोंमें पैदल सेनाको साथ ले कर जाना चाहिये ।। ७३ ।। हस्तिनां गमनं प्रोकं प्रशस्तं जलदागमे । तदन्यत्र तुरगाणां पत्तीनां सर्वदैव हि ॥ ७४ ॥ और बरसातमें हाथियोंका जाना, और ऋतुमें अर्थात् गरमी और जाडेमें पोसेंगो और पैदलोंका जाना दमेशा श्रेष्ठ कहा है ॥ ७४ ।। शैलेषु दुर्गमार्गेपु विधेयं नृप! रक्षणम् । स्वयोधै रक्षितस्यापि शयनं योगनिद्रया ॥ ७५॥ हे राजा ! पर्वतोमें तथा कठिन कठिन मार्गेमि अपनी रक्षा अर्थात् साव- पानता रखनी चाहिये, और अपने योद्धाओने रक्षा किये हुए भी राजाको कपटकी नादसे सोना चाहिये, अर्थात् क्षणक्षणमें अपनी रक्षाकी चिन्ता करनी चाहिये ॥ ७५ ॥ नाशयेत्कर्पयेच्छधून दुर्गकण्टकमर्दनैः। परदेशप्रवेशे च कुर्यादाटविकान्पुरः ।। ७६ ॥ गड़ो टाल कर, टेरेसो तोट कर शनुका नाश करे अधवा पकड़ चाँचे और १३ हितो

इ।विग्रहः ८४-९०] भाषाटीकासमलंकृत ।
१४७
वलमश्वस्य सैन्यानां प्राकारो जगमो यतः।
तस्मादश्वाधिको राजा विजयी स्थलविद्महे ॥ ८४ ॥
और सेनाओंके बीच में घोडेकी सेना चलने वाला परकोटा है इसलिये जिस
जाके पास बहुत घोड़े हैं वह स्थलयुद्ध (पटपड़ भूमिके युद्ध)मे जीतने
आला होता है ॥ ८४॥
स्था चोक्तम्,-
युध्यमाना हयारूढा देवानामपि दुर्जयाः।
अपि दूरस्थितास्तेपां वैरिणो हस्तवर्तिनः ॥ ८५ ॥
वैसा ही कहा है-घोड़ों पर चढ़कर लडने वाले देवताओसे भी नहीं जीते
जा सकते हैं, उन्होंको दूरके वैरी भी अपने हाथके पास दीसते है ॥ ८५ ॥
प्रथमं युद्धकारित्वं समस्तवलपालनम् ।
दिमागणां विशोधित्वं पत्तिकर्म प्रचक्षते ॥ ८६ ॥
हत्ती आदि सब चतुरग सेनाकी रक्षा करना, युद्धकी पहली चतुरता है
और दिशाओंके आने जानेके मानाको काट कर युद्ध कर देना यह पैदल सेनाका
छान कहा है ॥ ८६ ॥
खभावशूरमस्त्रशमविरकं जितश्रमम् ।
प्रसिद्धक्षत्रियप्रायं वलं श्रेष्टतमं विदुः ॥ ८७ ।।
खभावहीते शूर वीर, अस्त्रके चलानेमें चतुर, लडाईमें पीठ नही देने वाले,
परिश्रमको सहने वाले और वीरतामे प्रसिद्ध क्षत्रियोंके समान, ऐसी सेनाको
पण्डित लोग सबसे उत्तम कहते हैं ॥ ८७ ॥
यथा प्रभुकतान्मानायुध्यन्ते भुवि मानवाः ।
न तथा वहुभिर्दविणैरपि भूपते ! ॥ ८८ ॥
हे राजा ! पृथ्वी पर खानीके सन्मान करनेसे जैसे मनुष्य लड़ते है वैसे
बहुत दिये हुए वनसेभी नहीं लड़ते है ।। ८८ ।।
वरमल्पवलं सार न कुर्यान्मुण्डमण्डलीम् ।
कुर्यादसारभङ्गो हि सारभगमपि स्फुटम् ॥ ८९ ॥
बलवान् थोड़ी-सी सेना अच्छी होती है कितु बहुत सी मुटोंकी मडली अर्थात्
बलहीन सेना ट्वट्ठी न करनी चाहिये, क्योंकि दुर्बलोंगा पीठ दे कर सग्रामसे
भागना साक्षात् बलवान् सेनाका भी उत्साहभग कर देता है, याने कायर
सेना भाग जाने पर वीरभी उन्हें देख कर कभी कभी भाग उठते है ।। ८९ ॥
अप्रसादोऽनधिष्टानं देयांशहरणं च यत् ।
कालयापोऽप्रतीकारस्तद्वैराग्यस्य कारणम् ॥ ९०॥
अप्रसन होना, अधिकारी न करना, ल्टे हुए वनको आपही ले लेना, वेतन
मादि देनेमे आज कल पह वर समय विताना, और सेनाके विरोव आदिने
उपाय न करना ये राग्यफे अर्थात् लेह छुटने के कारण है ॥ ९ ॥

१४८ . हितोपदेश । [विग्रहः ९१-२ . आपीडयन्वलं शत्रोर्जिगीपुरतिशोपयेत् । सुखसाध्यं द्विपां सैन्यं दीर्घयानप्रपीडितम् ॥ ११ ॥ विजय पानेकी इच्छा करने वाला राजा अपनी सेनाको विश्राम देता हुए, राबुसे जा भिड़े, क्योंकि लवे मार्ग चल्नेसे यकी थकाई शतुओंकी सेना यह जीती जा सकती है ॥ ९१ ॥ दायादादपरो मन्त्रो नास्ति भेदकरो द्विषाम् । तस्मादुत्थापयेद्यनादायादं तस्य विद्विषः ॥ ९२ ॥ वैरिनोंके भाईबेटोंके छोड़ कर फूट कराने वाला दूसरा मन (उपाय) नहीं, इसलिये उन सके नाते-गोवेके पुरुषको प्रयनसे उकसावे अर्थात् तो फोहर अपनी ओर मिलावे ॥ ९२ ॥ संधाय युवराजेन यदि वा मुख्यमन्त्रिणा। अन्तःप्रकोपनं कार्यमभियोक्तुः स्थिरात्मनः ॥ ९३ ॥ उतरागके साथ अथवा मुख्य मनीके साथ सधि (मेल) करके निदेव डे-ठारे के परम फूट करा देनी चाहिये ॥ ९३ ॥ 'कुर मिां रणे चापि भई दत्वा विघातयेत् । मयमा गोग्रहाफपया तलक्ष्याश्रितबन्धनात् ॥ ९४ ॥ नगर भी हर मिन (राजा) को मार डाले अथवा गो र सब ही उग मुख्य सहाग राजाओंको धनम आत। मारना पाह॥1॥ सराज्य नारायेदाना परदेशावगाहनात् । नगमा निमावास्या यासितं धनदं हि तत् ॥ ९५ ॥ और सा II मायाको 41 ला कर अपने राज्यम REET A नार सादा माया महराजगहीन देने वाला होता. पता-.वनोदितेन ? ( 41 पद पाता क्या है। आत्मोदय. पालानिय नीतिरितीपती। तदात्य छतिविधिपत्य प्रतीयते ॥ १६॥ - H

हः (विग्रहः ९८-९९]
भाषाटीकासमलंकृत।
१४९
?
पर चलने वाला इन दोनों में बडा अन्तर है, जैसे निश्चय करके चोदनी और
अधेरेका एक जगह पर होना कहाँ सभव है ? अर्थात् नहीं हो सकता है,
इसलिये नीतिविरुद्ध नहीं चलना चाहिये ॥ ९७ ॥
तत उत्थाय राजा मोहूर्तिकावेदितलग्ने प्रस्थितः।
तब राजा उठ कर ज्योतिपीके बतलाये लममे लड़ाई के लिये विदा हुआ।
अथ प्रहितप्रणिधिर्हिरण्यगर्भमागत्योवाच-'देव! समागतप्रायो
राजा चित्रवर्णः। संप्रति मलयपर्वताधित्यकायां समावासितकट-
कोऽनुवर्तते । दुर्गशोधन प्रतिक्षणमनुसंधातव्यम् , यतोऽसौ गृतो
महामन्त्री। किंच केनचित्सह तस्य विश्वासकथाप्रसङ्गेनैव तदि-
गितमवगतं मया यदनेन कोऽप्यस्मदुर्गे प्रागेव नियुक्तः।' चको
जूते-'देव! काक एवालौ संभवति।' राजाह-'न कदाचिदेनत्।
यद्येवं तदा कथं तेन शुकस्याभिभवोद्योग. कृतः? अपर च । शुक-
स्यागमनात्तस्य विग्रहोत्साहः । स चिरादत्रास्ते ।' मन्त्री ब्रूते-
'तथाप्यागन्तुः शङ्कनीय.।' राजाह-'आगन्तुका हि कदाचिदुप.
कारका दृश्यन्ते ।
फिर भेजे हुए दूतने हिरण्यगर्भसे आ कर कहा-'महाराज ! राजा चित्रवर्ण
मा पहुँचा है। अब मलय पर्वतकी ऊंची भूमि पर डेरा डाल अपनी सेना
चसा कर ठहरा हुआ है । गटकी देखभाल क्षणक्षणमें करनी चाहिये, क्योंकि
यह गिद्ध महामत्री है । और किसीके साथ उसकी विश्वासकी बातचीतसेही
उसकी चेष्टा मैने जान ली कि हमारे गढमे इसने किसी न किसीको पहलेसेही
लगा रक्खा है।' चकवा वोला-'महाराज! वह कौवाही होना सभव दीख
पटता है।' राजा बोला-'यह बात कभी नहीं है। जो ऐसा होता तो कैसे उसने
तोतेके अनादर करनेका उद्योग किया है ? और दूसरे तोतेके आनेसे उसको
लदाईका उत्साह हुआ है। वह यहाँ बहुत दिनोंसे रहता है।' मत्री बोला-
'तोभी आने वाले पर सदेह करना ही चाहिये।' राजा बोला-'आने वाले सचमुच
कभी कभी उपकारक दीख पड़ते है।
णु
परोऽपि हितवान् वन्धुर्वन्धुरप्यहितः परः।
अहितो देहजो व्याधिर्हितमारण्यमौषधम् ॥ ९८ ॥
सुन,-हित करने वाला शत्रु भी वन्धु है और अहितवारी वन्धु भी शत्रु
होता है जैसे देहसे उत्पन्न हुआ रोग अहितकारी होता है और वनने उत्पन्न
हुई औपच हितकारी होती है ॥९८ ॥
अपरच,-
आसीदीरवरो नाम शुदकस्य महीभृतः।
सेवक. स्वल्पकालेन स दौ सुतमात्मनः॥ ९९ ॥

१५० हितोपदेश । [विनरः और दूसरे-शूद्रक नाम राजाका एक वीरवर नाम सेवक था, उसने कालने अपने पुत्र को दे दिया' ॥ ९९ ॥ चक्रः पृच्छति-'कथमेतत् ?' राजा कथयति- चकवा पूछने लगा-'यह कथा कैसे है " राजा कहने लगा।- ॥ कथा ९॥ अहं पुरा शुद्रकस्य राज्ञः क्रीडासरसि कपूरकेलिनानो राज हंसस्य पुच्या कर्पूरमार्या सहानुरागवानभवम् । तर वीरागे नाम महाराजपुत्र. कुतश्चिद्देशादागत्य राजद्वारमुपगम्य प्रतो हारमुवाच-'अहं तावद्धेतनार्थी राजपुनः । राजदर्शन कारा।' ततस्तेनासौ राजदर्शन कारितो ब्रूते---'देव ! यदि मया सेवोन प्रयोजनमत्ति तदास्मद्वर्तनं क्रियताम् ।' शुद्रक उवाच- ते वर्तनम् ?' वीरवरो व्रते-'प्रत्यहं सुवर्णपश्चशतानि देहि ।' राजाद-'का ते सामग्री ?' रबरो जूते-'दो बार तृतीय ar..' रागाह-तच्छायम्।' तच्छुला वीरवरचलितः । अर मन्निनिमकम् -- दिनचतुष्टयस्य नर्तनं दत्वा शागतामा मुगुकोऽयमतापवर्तन गृमात्यनुपयुक्तो वेति' । तनो माधानायरचय ताबदलापतानि सलणानि विग्रहः ] भापाटीकासमलंकृत। १५१ का काम भी राजाने छुप कर देसा। वीरवरने उस धनका आधा देवताओंको और ब्राह्मणोंको अर्पण कर दिया। बचे हुएका आधा दुखियोंको, उससे बचा हुआ भोजनके तथा विलासादिमें खर्च किया। यह सव नित्य काम करके वह राजाके बार पर रातदिन हाथमे खड्ग ले कर सेना करता था और जब राजा आप आज्ञा देता तव अपने घर जाता था। अथैकदा कृष्णचतुर्दश्यां रात्रौ राजा सकरुणं क्रन्दनध्वनि शुश्राव । शूद्रक उवाच-'कः कोऽत्र द्वारि ?' तेनोक्तम्-- 'देच! अहं वीरवरः।' राजोवाच-'क्रन्दनानुसरणं क्रियताम् ।' *वीरवरो 'यथाज्ञापयति देवः' इत्युक्त्वा चलितः । राज्ञा च # चिन्तितम्-'नैतदुचितम् । अयमेकाकी राजपुत्रो मया सूचि- भेद्य तमसि प्रेरित । तदनु गत्वा किमेतदिति निरूपयामि ।' ' ततो राजापि खड्गमादाय तदनुसरणक्रमेण नगराद्वहिर्निर्जगाम । १ गत्वा च वीरवरेण सा दती रूपयौवनसंपन्ना सर्वालंकारभू- पिता काचित्स्त्री दृष्टा । पृष्टा च-'का त्वम् १ किमर्थ रोदिपि?' स्त्रियोक्तम्-'महमेतस्य शुदकस्य राजलक्ष्मीः । चिरादेतस्य भुजच्छायायां महता सुखेन विधान्ता । इदानीमन्यत्र गमि- ' प्यामि ।' वीरवरो बृते-'यत्रापायः संभवति तत्रोपायोऽप्य- स्ति । तत्कयं स्यात्पुनरिहावलम्वनं भवत्याः ?' लक्ष्मीरुवाच- ? 'यदि त्वमात्मनः पुत्रं शक्तिधर द्वात्रिंशलक्षणोपेतं भगवत्याः । सर्वमद्गलाया उपहारीकरोपि तदाहं पुनरत्र सुचिरं निवसामि' ; इत्युक्त्वाऽदृश्याभवत् । फिर एक समय कृष्णपक्षकी चौदसके दिन, रातको राजाने करुगासहित - रोनेस शब्द सुना । शूदक बोला-'यहाँ द्वार पर कौन कौन है ?' उसने कहा---'महाराज ! मैं वीरवर हू ।' राजाने कहा-'रोनेकी तो टोह लगाओ।' "जो महाराजकी आज्ञा" यह कह कर वीरवर चल दिया । और राजाने विचारा-'यह बात उचित नहीं है कि इस राजकुमारको मेने गुप्प अँधेरेमें जाने की आज्ञा दी। इसलिये उसके पीछे जा कर यह क्या है इसका निधय करें।' फिर राजा भी सप ले कर उसके पीछे नगरसे बाहर गया। और वीरवरने जा कर उस रोती हुई, रूप तया यौवनसे सुन्दर और सव आपण पहिरे + हुए किवी नीयो देसा और पूछा-'तू कौन है ? किसलिये रोती है ?' स्त्रीने पहा-'में इस शूदककी राजलक्ष्मी हूँ। बहुत कालते इसकी भुजालोंकी छायाने दे सुसले विनाम करती थी। अब दूसरे स्थानने जाऊँगी।' वीरवर बोला- 'जिसरे पाय(नाश)का सभव है उसने उपाय भी है। इसलिये वैसे फिर यहाँ जापका रहना होय ' लक्ष्मी पोली-'जो तू बत्तीस लक्षणोंते सपल अपने पुत्र शचिपरसो सर्वनगला देदीनी भेट करे तो फिर यहा बहुत काल तक रहै।' यह कह कर पह जतर्धान हो गई। - । । ,

१५२
हितोपदेश। [विप्रहः १००-१२१
--
।
ततो वीरवरेण खगृहं गत्वा निद्रायमाणा खवधू. प्रयोपित
पुत्रश्च । तो निद्रां परित्यज्योत्यायोपविष्टौ । वीरवरस्तनां
लक्ष्मीवचनमुक्तवान् । तच्छुत्वा सानन्दःशक्तिधरो ब्रूते-'धन्यो
हमेवंभूत. खामिराज्यरक्षार्थ यन्ममोपयोगः लाध्यः । तत्को
ऽधुना विलम्सस्य हेतुः? एवंविधे कर्मणि देहस्य विनियोग.
न्लान्यः।
र वीरवरने अपने घर जा कर मोती भरे अनी स्त्रीको ओर रे
अगाया। वे दोनों नोंदतो छोड़ उठ कर बैठे हो गये। वीरवरने यह सब समोर
बनन का मुना। उसे नुन कर शफिधर आनन्दसे बोला- धन्य जो
जानी राज्यको रता के लिये मेरा उपयोग परासनीप है। इसतिगे अपना
I TITारगोपने काम देहका त्याग प्रशसनीय है।
बनानि जीवितं चे। परार्थ प्राश उत्रजेत् ।
मसिमित वर लागो विनाशे नियते सति ॥ १०० ॥

विग्रहः १०६] भापाटीकासमलंकृत। १५५ महारेण हनिष्यसि।ततःसुवर्णकलशो भविष्यति, तेन त्वया याव- जीवं सुखिना भवितव्यम् ।' ततस्तथानुष्ठिते तहत्तम् । तत्र औरकरणायानीतेन नापितेनालोक्य चिन्तितम्-'अये ! निधि- प्राप्तेरयमुपायः। अहमप्येवं कि न करोमि ?' ततःप्रभृति नापितः प्रत्यहं तथाविधो लगुडहस्तः सुनिभृतं भिक्षोरागमनं प्रतीक्षते । रकदा तेन प्राप्तो भिक्षुर्लगुडेन व्यापादितः। तस्मादपराधात्सोऽपि नापितो राजपुरुषैर्व्यापादितः । अतोऽहं ब्रवीमि-पुण्याल्लब्ध पदेकेन' इत्यादि। अयोध्याम चूडामणि नाम एक क्षत्रिय रहता था। उस धनके अभिलापीने बड़े क्लेशसे भगवान् महादेवजीकी बहुत काल तक आराधना की। फिर जब यह शीणपाप हो गया तव महादेवजीकी आज्ञासे कुबेरने सुपने में दर्शन दे कर आज्ञा दी कि-जो तू आज प्रात काल और क्षौर कराके लाठी हाथमे ले कर घरमे एकातमें दुर कर बैठेगा तो इसी ऑगनमें एक भिखारीको आया हुआ देखेगा । जव तू उसे निर्दय हो कर लाठीकी प्रहारोंसे मारेगा तब वह सुवर्णका कलश हो जायगा। उससे तू जय तक जियेगा सुखसे रहेगा।' फिर वैसा करने पर वही बात हुई। वहाँ क्षौर करनेके लिये बुलाया हुआ नाई सोचने लगा-'अरे ! धन पानेका यही उपाय है, मैं भी ऐमा क्यों न करूँ?' फिर उस दिनसे नाई पैसे ही लाठी हाथों लिये एकातमें भिखारीके आनेकी राह देखा करे । एक दिन उसने भिखारीशे पा लिया और लाठीसे मार डाला। अपराधसे उस नाईको भी राजाके पुरुषोंने मार डाला । इसलिये मैं कहता हूँ, “किसीको पुण्यते मिल गई" इत्यादि।' राजाह- 'पुरावृत्तकथोद्गारैः कथं निर्णीयते परः। स्थानिकारणवन्धुर्वा किं वा विश्वासघातक. ॥१०६ ।। राजा पोला- पहले हो गई कपाओंके कहनेसे नवीन आया हुआ से निश्चय किया जाय कि यह अकृत्रिम पावव है अथवा विश्वासघाती है ॥१०६॥ यातु । प्रस्तुतमनुसंधीयताम् । मलयाधित्यकायां चेचित्रवर्णस्तद- धुना कि विधेयम् ?' मन्त्री वदति-'देव! आगतप्रणिधिमुसान्मया श्रुतं तन्महामन्त्रिणो गृध्रस्योपदेशे, यचित्रवर्षेनानादर. कृतः । दतोऽसो मूढो जेतुं शक्यः। से जाने दो। जव जो उपस्थित है उसका विचार करो। मलय पर्वतके सर जो चित्रवर्ण टदा है इसलिये पर क्या करना चाहिये। नत्री बोला-'हे महाराज ! रोट पर आये हुए दूनके मुंहले नेने यह सुना है कि उस महामन्त्री ध्र के उपदेश पर चित्रवर्णने अनादर विमा है। फिर उस नर्सरो जीत तरते है।

1 महः ११२-११६] भाषाटीकासमलंकृत । १५७ 2 -- ॥ गा प्यारे । किसलिये हमारा अनादर करता है? क्या कभी मैंने तेरा अनादर या है ? या चोकम्,- न राज्यं प्राप्तमित्येवं चर्तितव्यमसांप्रतम् । श्रियं ह्यविनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम् ॥ ११२ ॥ जैसा कहा है-राज्य मिल गया यह जान कर अनुचित व्यवहार नहीं करना सपाहिये । क्योंकि कठोरता निश्चय करके लक्ष्मीको ऐसे नाशमें मिला देती है जैसे न्दर रूप-रंगको बुढापा ॥ ११२ ॥ है । पिक, जा त दक्षः श्रियमधिगच्छति पथ्याशी कल्यतां सुखमरोगी। अभ्यासी विद्यान्तं धर्मार्थयशांसि च विनीतः ॥११३ ॥ और भी-चतुर पुरुष लक्ष्मीको, सुन्दर और हलका भोजन करने वाला रोगताको, रोगहीन सुखको, अभ्यासी विद्याके अतको, और सुशील अर्थात् प्रत्रतादिगुणोंसे युक्त मनुप्य वर्म, वन और यशको पाता है ॥ ११३ ॥ गृध्रोऽवदत्-'देव! ऋणु,- गिद्ध वोला-'महाराज! सुनिये,- अविद्वानपि भूपालो विद्यावृद्धोपसेवया । पराश्रियमवाप्नोति जलासन्नतर्व्यथा ॥ ११४ ॥ । मूर्ख राजा भी पण्डितोंकी सेवासे जलके समीपके वृक्ष(जल और शोभाको पाते हैं उन्हीं के समान उत्तमोत्तम सपत्तिको पाता है ॥ ११४ ॥ ॥ अन्यच्च- . पानं स्त्री मृगया द्यूतमर्थदूपणमेव च । वाग्दण्डयोश्च पारुप्यं व्यसनानि महीभुजाम् ॥ ११५ ॥ और दूसरे-मद्य आदिका पीना, परस्त्रीका सग, आखेट, जुआ, अन्यायसे राया धन लेना, और वचन तथा दमे रुखाई और कठोरता ये राजाओंके अवगुण कहे है, अर्थात् उनका त्याग करना अवश्य है ॥ ११५ ॥ कि च,- T Int- न साहसैकान्तरसानुवर्तिना न चाप्युपायोपहतान्तरात्मना। विभूतयः शक्यमवानुमूर्जिता नये च शौर्ये च वसन्ति संपद. ॥११६॥ और (चुराई मलाईयो विना विचारे) फेवल साहस करने वाला, और उपाय उपदत चित्तपाला, अधिक ऐचर्यको नहीं पा सकता है, क्योंकि जहा पर नाति और गुरता रहती है वहाही सपत्तियाँ रहती है ॥ ११६ ॥ त्वया सवलोत्साहमवलोक्य साहसैकवासिनामयोपन्यत्तेप्वपि १४ हितो. T Fr ग्रहः १२०-१२२] भाषाटीकासमलंकृत । १५९ बारे ! यह मेरा अपराध हुआ। अव जैसे वची हुई सेनाके साथ लौट कर ध्याचल पहुँच जाऊँ वैसा उपाय वता।' गिद्ध अपने जीमे सोचने लगा,- इसका कुछ ना कुछ उपाय करना चाहिये। ता देवतासु गुरौ गोपु राजसु ब्राह्मणेषु च । नियन्तव्यः सदा कोपो वालवृद्धातुरेपु च ॥ १२० ॥ क्योंकि-देवता, गुरु, गाय, राजा, ब्राह्मण, वालक, बूढ़ा, और रोगी न पर कोध रोकना चाहिये ॥ १२० ।। मन्त्री प्रहस्य ब्रूते-'देव! मा भैपीः । समाश्वसिहि शृणु देव ! मत्री (यह अपने जीमे विचार कर) हँस कर बोला-'महाराज ! मत डरिये धीरज धरिये, हे महाराज ! सुनिये, मन्त्रिणा भिन्नसंधाने भिपजां सौनिपातिके । कमणि व्यज्यते प्रज्ञा सुस्थे को वा न पण्डितः? ॥१२१॥ लड़ाईके समय शत्रुसे मेल करानेमे मत्रियोंकी, सन्निपात(ज्वर) रोगमे वैद्योंकी और कार्योंके साधनमें दूसरोंकी बुद्धि जानी जाती है, और यों बैठे ठालें न पण्डित नहीं है ? ॥ १२१ ॥ 2 परच,- आरभन्तेऽल्पमेवाझाः कामं व्यग्रा भवन्ति च । महारम्भाः कृतधियस्तिष्टन्ति च निराकुलाः॥१२२ ॥ और दूसरे-बुद्धिहीन, छोटे ही कामका आरभ करते है और अत्यन्त शकुल हो जाते है । बुद्धिमान् वडे वडे काम करते हैं और कभी विकल नहीं ति है ॥ १२२ ॥ दिन भवत्प्रतापादेव दुर्ग भड्क्त्वा कीर्तिप्रतापसहितं त्वामचि- ण कालेन विन्ध्याचलं नेप्यामि ।' राजाह-'कथमधुना स्वल्प- लेन तत्संपद्यते ?' गृध्रो वदति-'देव! सर्व भविष्यति। यतो जिगीपोरदीर्घसूत्रता विजयसिद्धेरवश्यंभावि लक्षणम् । तत्स- सैव दुर्गावरोधः क्रियताम् ।' इसलिये यहाँ आपके पुण्यप्रतापसेही गढको तोड़ फोड़ यश और पराक्रम- हित आपको शीघ्र विंध्याचलको ले चलूंगा।'राजा वोला-'अव चोडीची सेनासे ह कैसे होगा गिद्धने कहा-'महाराज ! सब कुछ हो जायगा। क्योंकि जय गहने वालेको दीर्घसूत्रता ( कालक्षेप ) न होना जयकी सिद्धिका अवश्य होनहार क्षण है। इसलिये एकाएक ही गढ़ चारों ओरसे घेर लीजिये।' महितप्रणिधिना केनागत्य हिरण्यगर्भस्य तत्कषितम्-'देव! अल्पवल एवायं राजा चित्रवर्णो गृध्रस्य मन्त्रोपस्तम्भेन दुर्गावरोध रिप्यति ।' राजाह-'सर्वत्र, किमधुना विधेयम् ?' चको ब्रूते- १ वात, पित्त और प.फ इन दीन दोषाः सनिपातसे होने वाला जर या + य रोग पर प्राणपातक माने गये.

विग्रहः १२६-१३० ] भापाटीकासमलंकृत ।
१६१
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-~-
मापत्ति कहाँ राजा वोला-'जो लक्ष्मी चली जाय तो?' मंत्री वोला-'सचित
धन भी नष्ट हो जाय तो 2 इसलिये महाराज! कृपणताको छोड़ दान
और मानसे अपने शूर वीरोंका आदर कीजिये।
तथा चोकम्,-
परस्परज्ञाः संहष्टास्त्यक्तुं प्राणान्सुनिश्चिताः।
कुलीनाः पूजिताः सम्यग्विजयन्ते द्विपदलम् ॥ १२६ ॥
। जसा कहा है-आपसमे एक दूसरेकी सहायता करने वाले, प्रसन्नचित्त, प्राणोंको
(खामीके लिये, सग्राममे) झोंकने वाले, ( शत्रुके मारनेका निश्चय सकल्प
करने वाले, श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुए ) और अच्छे प्रकारसे सन्मान किये गये ऐसे
शूरवीर शत्रुकी सेनाको विजय करते हैं ॥ १२६ ॥
अपरच,
सुभटाः शीलसंपन्नाः संहताः कृतनिश्चयाः।
अपि पञ्चशतं शूरा निघ्नन्ति रिपुवाहिनीम् ।। १२७ ।।
और दूसरे-अच्छे खभाव वाले, आपसम मिले हुए, और विना-मरे मारे नहीं
लड़ेंगे ऐसा निश्चय करने वाले, पाँच सौ मी बड़े वडे शूर वीर योधा वैरीकी सेनाका
नारा कर देते हैं ॥ १२७ ॥
किंच
शिष्टैरप्यविशेपज्ञ उग्रश्च कृतनाशकः ।
X
त्यज्यते कि पुनर्नान्यैर्यश्चाप्यात्मम्भरिनरः ॥ १२८ ।।
और महामूर्ख, दुष्ट प्रकृति वाला, कृतघ्न और खार्थी मनुष्यको सजन भी
छोड़ देते है, फिर दूसरों का क्या कहना है ? अर्थात् ऐसेको सब त्याग देते
है। १२८॥
यतः,
सत्यं शौर्य दया त्यागो नृपस्यैते महागुणाः।
पभिर्मुक्तो महीपाल. प्राप्नोति खलु वाच्यताम् ।। १२९ ॥
क्योंकि-सत्य, शूरता, दया और दान याने उदारता ये राजाके वटे गुण
है, और इन गुणों से रहित राजाकी निश्चय करके वाच्यता(निन्दा)को पाता है।
ईदृशि प्रस्तावेऽमात्यास्तावदेव पुरस्कर्तव्याः।
ऐसे समय पर पहले मत्रियोंवा सत्कार होना चाहिये,
तथा चोक्तम्-
यो येन प्रतिवद्धः स्यात्सह तेनोदयी व्ययी।
स विश्वस्तो नियोकव्य. प्राणेषु च धनेषु च ॥ १३० ।।
जैसा वहा है, जो जिससे बंधा हुआ है और उसीके साप जिसका उदय
और रास (शति) है ऐसे भरोसे के मनुष्यको प्राणोती रक्षाके कार्यमें लाना
राहिये ॥ १३०॥

विग्रहः१३६-१३८] भाषाटीकासमलंकृत । १६३ यतः,- पुरस्कृत्य वलं राजा योधयेदवलोकयन् । स्वामिनाधिष्ठितः श्वापि किं न सिंहायते ध्रुवम् ॥ १३६ ॥ क्योंकि-राजा आप देखता हुआ सेनाको आगे करके लड़ावे, क्योंकि खामीते लहकाया हुमा कुत्ता भी क्या सचमुच सिंहकी भाँति बल नहीं दिखाता है? अर्थात् अवश्य ही दिखाता है ॥ १३६ ॥ अथ ते सर्वे दुर्गद्वार गत्वा महाहवं कृतवन्तः । अपरेधुश्चित्र- वर्णो राजा गृध्रमुवाच-'तात ! स्वप्रतिज्ञातमधुना निर्वाहय ।' गृध्रो ब्रूते-'देव! शृणु तावत्, पीछे उन सभीने गढके द्वार पर जा कर वड़ा घोर युद्ध किया। दूसरे दिन चित्रवर्ण राज गिद्धसे वोला-'प्यारे ! अव अपनी प्रतिज्ञाका निर्वाह कर ।' गिद्ध वोला-'महाराज ! पहले सुन लीजिये,- अकालसहमत्यल्पं मूर्खव्यसनिनायकम् । अगुप्तं भीरुयोधं च दुर्गव्यसनमुच्यते ॥ १३७ ।। बहुत काल तक घेरा न सहने वाला अर्थात् कच्चा, अत्यत खल्प सेन्य- युक्त मूर्ख और मद्यपानादि दोषयुक्त जिसका नायक हो, जिसकी अच्छे प्रकारसे रक्षा नहीं की गई हो और जिसमें कायर और डरपोक योद्धा हाँ वह गढकी विपत्ति कही गई है ॥ १३७ ।। तत्तावत्र नास्ति । सो यात तो यहाँ नहीं है। उपजापश्चिरारोधोऽवस्कन्दस्तीव्रपौरुपम् । दुर्गस्य लखनोपायाश्चत्वारः कथिता इमे ॥ १३८ ॥ गढकी भीतरी सेनामे किती भेदियेको भेज कर फूट करा देना, बहुत काल तक चारों ओरसे पेरे पड़े रहना, वार वार शत्रु पर चढाई करना और अत्यन्त साहस दिसलाना ये चार गटके जीतनेके उपाय है ॥ १३८ ॥ अत्र यथाशक्ति क्रियते यतः (कणे कथयति।) एवमेवम् ।' ततो- ऽनुदित एव भास्करे चतुर्वपि दुर्गद्वारेषु वृत्ते युद्धे दुर्गाभ्यन्तर- गृहेप्वेकदा काकैरग्निनिक्षिप्तः । ततः 'गृहीतं गृहीतं दुर्गम्' इति कोलाहलं श्रुत्वा सर्वतः प्रदीप्ताग्निमवलोक्य राजहंससैनिका दुर्ग- वासिनश्च सत्वर हदं प्रविष्टाः। इसने शकिके अनुसार उपाय किया जाता । ( कानने कहने लगा) इस प्रकार इस प्रकार ।' फिर एक दिन सूर्यके विना ही निकले गढ़के चारों द्वारों पर धनपोर युद्ध होने पर गटके भीतरके डेरोंमे कौवोंने आग लगा दी । फिर तो "गदयो ले लिया ले लिया' यह हुर्रा सुन वर चारों ओर आगको वस्ती हुई देख कर राजसकी सेना के शूर वीर और गटके रहने वाले शीघ्र सरोवरने गुस गये, विग्रहः १४२-१४५ ] भापाटीकासमलंकृत । १६५ - चले जाना ठीक है, पर प्राणीका मरण अवश्य ही है इसलिये जा कर क्यो वृथा अपना यश मलीन करना चाहिये? ॥ १४१ ॥ अन्यञ्च,- भवेऽस्मिन्पवनोद्धान्तवीचिभ्रमभङ्गुरे । जायते पुण्ययोगेन परार्थे जीवितव्ययः ॥ १४२ ॥ और दूसरे-वायुसे उठी हुई तरगोंके खेलके समान क्षणभंगुर इस असार ससारमें पराये उपकारके लिये प्राणोंका त्याग बड़े पुण्यसे होता है ॥ १४२ ॥ खाम्यमात्यश्च राष्ट्रं च दुर्ग कोशो वलं सुहृत् । राज्यागानि प्रकृतयः पौराणां श्रेणयोऽपि च ॥ १४३ ॥ और खामी, मंत्री, राज्य, गढ, कोश, सेना, मित्र और पुरवासियोके समूह ये राज्यके अग हैं ॥ १४३ ॥ देव! त्वं च स्वामी सर्वथा रक्षणीयः । और हे महाराज ! आप खामी हैं, आपकी सर्वथा रक्षा करनी चाहिये, यतः,- प्ररुतिः स्वामिनं त्यक्त्वा समृद्धापि न जीवति । अपि धन्वन्तरिर्वद्यः कि करोति गतायुपि? ॥ १४४ ॥ क्योंकि-खामीको त्याग कर प्रजा, सव ऐश्वर्यसे युक्त भी नहीं जीती हे, आयु वीतने पर धन्वन्तरि वैद्य भी क्या कर सकता है ? ॥ १४४ ॥ जैसे अपरं च,- नरेशे जीवलोकोऽयं निमीलति निमीलति। उदेत्युदीयमाने च रवाविव सरोरुहम्' ॥ १४५ ।। और दूसरे-सूर्यके उदय तथा अस्त होनेसे क्मलके समान, राजाके मरने पर यह जीवलोक मरता है और उदय होने (जीने) पर जीता है' ॥ १४५ ॥ अथ कुकुटेनागत्य राजहंसस्य शरीरे खरतरनखाधातः कृतः। तदा सत्वरमुपसृत्य सारसेन वदेहान्तरितो राजा जले क्षिप्तः । अथ कुछटैनखमहारजर्जरीकृतेन सारसेन कुकुटसेना वहुशो हताः । पश्चात्सारसोऽपि चञ्चमहारेण विभिद्य व्यापादितः । जय चित्रवर्णो दुर्ग प्रविश्य दुर्गावस्थितं द्रव्यं ग्राहयित्वा वन्दि- मिर्जयशब्दैरानन्दितः स्वस्कन्धावार जगाम || फिर मुर्गेने आ कर राजनके शरीर पर बड़े तीखे तीखे नोट्टे मारे । तव सारसने तुरन्त पास जा कर और अपनी देहते छिपा कर राजापो जलने फेंक दिया। फिर मुगाके नोटोसे व्याकुल हुए सारनने गुगोकी सेना बहुत मारा। पीरे सारस नी चोंचोंके प्रहारले लिद पर मारा गया। फिर चित्रवर्ण गटमें घुस कर गरमे परे हुए द्रव्यो लिवा कर वदिजनोंके जय जय शब्द प्रसव होता हुआ अपने टेरेने चला गया । 1 हितोपदेशः। ॥ संधिः ४॥ पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रैरुकम्-'आर्य ! विग्रहः श्रुतो- स्माभिः। संधिरधुनाऽभिधीयताम् ।' फिर कयाके आरम्भमे राजपुत्रोंने कहा-'हे गुरुजी ! हम विग्रह सुन चुके । व सन्धि सुनाइये। विष्णुशर्मणोक्तम्-'श्रूयताम् , संधिमपि कथयामि यस्या- माद्यः स्लोकः- वृत्ते महति संग्रामे राज्ञोनिहतसेनयोः । स्थेयाभ्यां गृध्रचक्राभ्यां चाचा संधिः कृतः क्षणात्' ॥१॥ विष्णुशर्माने कहा-'सुनिये, सधि भी कहता हूँ कि जिसके आदिका यह क्यि है-दोनों राजाओंकी सेनाके मरने पर और घनघोर युद्ध होने पर द्ध और चकवेने पच बन कर शीघ्र मेल करा दिया' ॥१॥ राजपुत्रा ऊचुः-'कथमेतत् ?' विष्णुशर्मा कथयति- राजपुत्र बोले-'यह कथा कैसे है ? विष्णुशर्मा कहने लगे।- || कथा १॥ ततस्तेन राजहंसेनोक्तम्-'केनास्मदुर्गे निक्षिप्तोऽग्निः? कि पार- त्येण किंवामदुर्गवासिना केनापि विपक्षप्रयुक्तेन?' चको ब्रूते- देव!भगवतो निष्कारणवन्धुरसौ मेघवर्णः सपरिवारोन दृश्यते। न्मिन्ये तस्यैव विचेष्टितमिदम् ।' राजा क्षणं विचिन्त्याह- मस्ति तावदेव मम दुर्दैवमेतत् । फिर उस राजहसने कहा-'हमारे फिलेम किसने ऑच लगाई है ? शत्रुने चपा शत्रुसे सिखाये हुए किसी हमारे गढके रहने वालेने ? ।' चकवा चोला- हाराज ! जापका अकृत्रिम वन्धु वह मेघवर्ण अपने परिवारसहित नहीं दीखता । इसलिये यह उसीका काम देख पढ़ता है।' राजाने क्षण भर सोच कर उहा-'यह मेरी प्रारब्ध ही फूटी है, था चोकम्,- अपराधः स देवस्य न पुनमन्त्रिणामयम् । कार्य सुचरितं चापि दैवयोगाद्विनश्यति ॥२॥ जता वहा है-वह प्रारब्धवा दोप है कुछ यह मत्रियों नहीं है, क्योकि कहीं अच्छे प्रकार किया हुआ वाम भी नाग्यके वशले विगट जाता है' ॥२॥ मन्त्री नृते-'उक्तमेवैतत्,- मंत्री बोला-ऐसा भी वहा है,- विपमा हि दशा प्राप्य देवं गईयते नरः। आत्मनः कर्मदीपाश्च नैव जानात्यपण्डित. ॥३॥ RE- - . हितोपदेश । [ विग्रहः १४६-१४९ - अथ राजपुत्रैरुकम्-'तस्मिन्राजवले स पुण्यवान्सारस एव येन वदेहत्यागेन स्वामी रक्षितः। फिर राजकुमारोंने कहा-'उस राजाकी सेनामे एक सारस ही पुण्यात्मा या जिसने अपनी देहको त्याग करके खामीकी रक्षा की। उक्तं चैतत् ,- जनयन्ति सुतान्गावः सर्वा एव गवाकृतीन् । विषाणोल्लिखितस्कन्धं काचिदेव गवां पतिम् ॥ १४६ ॥ और ऐसा कहा है कि-सभी गायें गौके आकारके समान बछड़ों जनती है परन्तु दोनों सींगोंसे स्पष्ट दीखते हुए कधे वाले साँइको विरलीही जनती है' ११६ विष्णुशर्मोवाच-'स तावद्विद्याधरीपरिजनः स्वर्गसुखमनुभवतु महासत्त्वः। विष्णुशर्मा बोले-'वह महात्मा सारस विद्याधरियोंके परिवारके साथ वर्गम सुत भोगें। तथा चोक्तम्, आहवेषु च ये शूराः खाम्यर्थे त्यक्तजीविताः। भर्तृभक्काः कृतशाश्च ते नराः वर्गगामिनः॥ १४७ ॥ जैसा कहा है-जिन शूर वीरोने सग्राममे अपने खामीके लिये प्राणत्याग किया है वे स्वामीके भक तथा राजाके उपकारको मानने वाले मनुष्य स्वर्गको पाते हैं । यत्र तत्र हतः शूरः शत्रुभिः परिवेष्टितः। अक्षयॉल्लभते लोकान् यदि क्लैव्यं न गच्छति ॥ १४८ ॥ और जिस किसी स्थानमें शत्रुओसे घिर कर मरा हुआ शूर जो युद्धभूमि छोन भागे तो अमर लोकोंको पाता है॥ १४८ ॥ विग्रहः श्रुतो भवद्भिः' राजपुत्रैरुक्तम्,-'श्रुत्वा सुखिनो भूता 'आपने विग्रह मुन लिया।' राजपुत्रोंने कहा- हम मुन कर बहुत मुखी हुए।' विष्णुशाऽब्रवीत्-'अपरमप्येवमस्तु- विग्रहः करितुरङ्गपत्तिभि- नों कदापि भवतां महीभुजाम् । नीतिमत्रपवनः समाहृताः संश्रयन्तु गिरिगदर द्विपः ॥ १४९ ॥ इति हितोपदेशे विग्रहो नाम तृतीयः कथासंग्रहः समाप्तः । विष्णुधर्ना बोले-'यह और भी होय-आपके समान महाराजा-माना हया घोडे और पैदल आदि सेनासे सग्राम न लेय और नीति के मत्रलपी पवनने उसाचे गरे शत्रु पर्वतकी गुफान आगरा ले' ॥ 1४९ ॥ ५. रामेबरनका किया हुआ हिनोपदेश अबके विग्रह नाम : तोमर नाना नापा मनुनाद मनात हुआ शुभम्. वयम्।'

- हितोपदेशः। पता - ॥ संधिः४॥ पुनः कथारम्भकाले राजपुत्रैरुकम्-'आर्य ! विग्रहः श्रुतो- स्माभिः। संधिरधुनाऽभिधीयताम् ।' फिर कथाके आरम्भमे राजपुत्रोंने कहा-'हे गुरुजी ! हम विग्रह सुन चुके । भव सन्धि सुनाइये। विष्णुशर्मणोक्तम्-'श्रूयताम् , संधिमपि कथयामि यस्या- पमाद्यः श्लोका- वृत्ते महति संग्रामे राज्ञोर्निहतसेनयोः । स्थेयाभ्या गृध्रचक्राभ्यां वाचा संधिः कृतः क्षणात् ॥१॥ विष्णुशर्माने कहा-'सुनिये, सधि भी कहता हूँ कि जिसके आदिका यह वाक्य है-दोनों राजाओंकी सेनाके मरने पर और घनघोर युद्ध होने पर गिद्ध और चकवेने पच वन कर शीघ्र मेल करा दिया ॥१॥ राजपुत्रा ऊचुः-'कथमेतत् ?' विष्णुशर्मा कथयति- राजपुत्र वोले-'यह कथा कैसे है ? विष्णुशर्मा कहने लगे।- ॥ कथा १॥ ततस्तेन राजहंसेनोक्तम्-'केनास्मदुर्गे निक्षिप्तोऽग्निः? कि पार- क्येण किं वामदुर्गवासिना केनापि विपक्षप्रयुक्तन' चक्रो ब्रूते- 'देव!भगवतो निष्कारणवन्धुरसौ मेघवर्णः सपरिवारोन दृश्यते। तन्मन्ये तस्यैव विचेष्टितमिदम् ।' राजा क्षणं विचिन्त्याह- 'अस्ति तावदेव मम दुर्दैवमेतत् । फिर उस राजहसने कहा-'हमारे किलेमे किसने आँच लगाई है ? शत्रुने अपवा शत्रुसे सिखाये हुए किसी हमारे गढके रहने वालेने ? ।' चकवा बोला- महाराज ! आपका अकृत्रिम वन्धु वह मेघवर्ण अपने परिवारसहित नहीं दीखता है इसलिये यह उसीय काम देख पडता है।' राजाने क्षण भर सोच कर कहा-'यह मेरी प्रारव्य ही फूटी है, तथा चोकम्,- अपराध. स देवस्य न पुनर्मविणामयम् । कार्य सुचरितं चापि दैवयोगाद्विनश्यति ॥२॥ जसा कहा है-वह प्रारब्धका दोप है कुछ यह नत्रियों का नहीं है, क्योरि वहीं अच्छे प्रकारसे किया हुआ काम भी भाग्यके वशते विगड जाता हे'॥२॥ मन्त्री नृते-'उक्तमेवैतत्,- मंत्री बोला-ऐसा भी वहा है, विपमा हि दशा प्राप्य दैवं गहयते नरः । मात्मनः कर्मदीपाश्च नैव जानात्यपण्डितः ॥३॥ - १६८ हितोपदेश । [संधिः ४-५ मूर्ख मनुष्य बुरी दशाको पा कर भाग्यकी निन्दा करता है और अपने कमरे दोषोंको नहीं जानता है ॥३॥ अपरं च,- -- सुहृदां हितकामानां यो वाक्यं नाभिनन्दति । स कुर्म इव दुर्बुद्धिः काष्ठाड्रप्टो विनश्यति ॥४॥ और दूसरे-जो मनुष्य हितकारी मित्रोंका कहा नहीं मानता है वह मूर्स काठसे गिरे हुए कछुएके समान मरता है' ॥ ४ ॥ राजाह-कथमेतत् ?' मन्त्री कथयति- राजा बोला-'यह कथा कैसे है ?' मत्री कहने लगा। ॥ कथा २॥ अस्ति मगघदेशे फुल्लोत्पलाभिधानं सर । तत्र चिरं सकट- विकटनामानौ हंसौ निवसत । तयोर्मित्रं कम्बुग्रीवनामा कूर्मच प्रतिवसति। मथैकदा धीवरैरागत्य तत्रोक्तम्-'तदत्रासाभिर द्योपित्वा प्रातमत्स्यकूर्मादयो व्यापादयितव्याः। तदाकर्ण्य कूर्मो हंसावाह-'सुहृदौ! श्रुतोऽयं धीवरालापः। अधुना कि मया कर्त- व्यम् ?' हंसावाहतुः-- शायताम् । पुनस्तावत्प्रातर्यदुचितं तत्कर्त- व्यम् ।' कर्मो ब्रूते-'मैवम् । यतो दृष्टव्यतिकरोऽहमत्र । मगध देशर्म फुलोत्पल नाम एक सरोवर है। वहाँ बहुत कालसे सफ्ट ओर निस्ट नामक दो हस रहा करते थे और उन दोनोंका मित्र एक कम्मुग्रीव नाम उआ रहता था। फिर एक दिन धीवरोने वहाँ आ कर कहा कि आज हम यदा रह कर प्रात काल मठली कदुआ आदि मारेगे' यह सुन कर कछुआ कदने लगा-दे मित्रो! वीवरोंकी यह बात मैने सुनी। अब मुझे क्या करना उचित है । इसोने कहा-'समझलो। फिर प्रात काल जो उचित हो सो करना ।' कलुमा वोला- ऐसा मत कहो, क्योंकि मै यहाँ पर राना देस चुका है। तथा चोक्तम्,- अनागतविधाता च प्रत्युत्पन्नमतिस्तया। द्वावेतो मुखमेधेते यद्भविप्यो विनश्यति ॥ ५॥ जैसा कहा है-अनागतविधाता याने आगे होने वाली वातको प्रयमही सोचने वाला और प्रत्युत्पन्नमति जत् अवसर जान कर कार्य करने वाला इन योगोन जानद गोगा और यद्भविष्य मारा गया ॥५॥ नावाहतुः- कथमेतत् ?' कूर्मः कथयति- दोना नोटे-'यह कथा से है ? दुआ कहने लगा।--- ॥ कथा ३ ॥ पुरालिबेर सरसेवंविवेषु वीपरेपूपस्थितेषु मत्स्यायेणालो- चिनम् । तत्रानागत विधाता नामको मत्सनालोचितम्-- हसीने - धिः ६] भाषाटीकासमलंकृत। १६९ हं तावजलाशयान्तरं गच्छामि' इत्युक्त्वा ह्रदान्तरं गतः । परेण प्रत्युत्पन्नमतिनाम्ना मत्स्येनाभिहितम्-'भविष्यदर्थे प्रमा- भावात्कुत्र मया गन्तव्यम् ? तदुत्पन्ने यथाकार्य तदनुष्ठेयम् । पहिले इसी सरोवर पर जब ऐसे ही धीवर आये थे तव तीन मछलियोंने विचार या। और उनमे अनागत विधाता नाम एक मच्छ पा, उसने विचार किया-'मैं दूसरे सरोवरको जाता हूँ।' यह कह कर यह दूसरे सरोवरको चला गया। फिर उरे प्रत्युत्पन्नमति नाम मच्छने कहा-'होने वाले काममे निश्चय न होनेसे में हो जाऊँ ? इसलिये काम आ पड़ने पर जैसा होगा वैसा करूगा । था चोकम् ,- उत्पन्नामापदं यस्तु समाधत्ते स बुद्धिमान् । वणिजो भार्यया जारः प्रत्यक्षे निद्भुतो यथा' ॥६॥ जैसा कहा है जो उत्पन्न हुई आपत्तिका उपाय करता है वह बुद्धिमान है, से कि वनियेकी स्त्रीने प्रत्यक्षमें जारको छुपा लिया' ॥ ६ ॥ यद्गविप्यः पृच्छति-'कथमेतत् ?' प्रत्युत्पन्नमतिः कथयति- यद्भविप्य पूछने लगा-'यह कथा कैसे है ' प्रत्युत्पन्नमति कहने लगा।- ॥ कथा ४॥ पुरा विक्रमपुरे समुद्रदत्तो नाम वणिगस्ति । तस्य रत्नप्रभा म गृहिणी स्वसेवकेन सह सदा रमते । अथैकदा सा रत्तप्रभा स्य सेवकस्य मुखे चुम्बनं ददती समुद्रदत्तेनावलोकिता । ततः विन्धकी सत्वर भर्तुः समीपं गत्वाह-'नाथ! एतस्य सेवकस्य हती निवृतिः । यतोऽयं चौरिकां कृत्वा कर्पूरं खादतीति यास्य मुखमाघ्राय शातम् । तथा चोकम्-"आहारो द्विगुणः रिणाम्" इत्यादि । तच्छ्रुत्वा सेवकेन प्रकुप्योकम्-'नाथ! यस्य मिनो गृह एतादृशी भार्या तत्र सेवकेन कथं स्थातव्यं यत्र तिक्षणं गृहिणी सेवकस्य मुखं जिनति।' ततोऽसावुत्थाय चलितः धुना यत्नात्प्रबोध्य धृतः । अनोऽहं ब्रवीमि-"उत्पन्नामापदम्" त्यादि। किसी समय विनमपुरने समुदत्त नाम एक चनिया रहतापा। उसकी नप्रमा नाम भी अपने सेवरके सन मदा व्यभिचार किया करती थी। पीडे एम रन उस रसपनाको उस सेवा मुखघुम्मन करते हुए समुद्रदत्तने देख दया। फिर वह व्यभिचारिणी शीघ्र अपने पति के पास जा कर वोली-'हे सानी ! इस सेवरको वा सुख है, क्योकि यह चोरी करके कपूर खाया रता है, यह ने इसका नुख सूप कर जान लिया । जैना कहा है-निनोका १५ हितो.

हितोपदेश। [ सधिः- भोजन दूना होता है' इत्यादि । यह सुन कर सेवकने कोध कर कहा-'हे खानी जिस सामीकी ऐसी स्त्री है वहाँ सेवक कैसे टिक सकता है कि जहाँ क्षणाने घरवाली सेवकका मुख सूंघती है " फिर वह उठ कर जाने लगा तब मानेने जो तो करके समझा कर रख लिया। इसलिये मैं कहता हूँ-"आपत्तिके उस होने पर" आदि। ततो यद्भविष्येणोक्तम्,- यदभावि न तद्भावि भावि चेन तदन्यथा । इति चिन्ताविषन्नोऽयमगदः किं न पीयते ॥ ७ ॥ फिर यद्गविष्यने कहा-'जो होनहार नहीं है वह कभी नहीं होगा, और होनहार है उससे उलटा न होगा अर्थात् अवश्य होगा यह चिंतारूपी विरो नाश करने वाली औषध क्यों नहीं पीते हो? ॥७॥ ततः प्रातर्जालेन बद्धः प्रत्युत्पन्नमतिर्मूतवदात्मानं संदी, स्थितः । ततो जालादपसारितो यथाशक्त्युत्लत्य गभीर नीर प्रविष्टः। यद्भविष्यश्च धीवरैः प्राप्तो व्यापादितः । अतोऽईत ब्रवीमि-"अनागतविधाता" इत्यादि ॥ तद्यथाहमन्यहृदं प्राप्नोकि तथा क्रियताम् ।' हंसावाहतुः-'जलाशयान्तरे प्राप्ते तक कुशलम् । स्थले गच्छतस्ते को विधिः ?' कूर्म आह-'यया भयन्यां सहाफाशवमना यामि तथा विधीयताम् ।' हसी, चूतः-यमुपायः संभवति ?' कच्छपो वदति-'युवाभ्याम् चक्षुधृतं काष्टखण्डमेकं मया मुखेनावलम्ब्य गन्तव्यम् । युग्यो पक्षवलेन मयापि सुखेन गन्तव्यम् ।' फिर प्रात.काल जालसे बँध कर प्रत्युत्पन्नमति अपनेको मरेके समान दिन ला कर बैठा रहा । फिर जालसे बाहर निकाला हुआ अपनी शक्तिके अनुसार उटल र गहरे पानीमें घुस गया और यद्गविष्यको धीवरोंने पकड़ लिया मार डाग । इसलिये में कहता हूं, "अनागतविवाता" इत्यादि-॥ यो यि प्रकार म दूसरे सरोवरको पहुँच जाऊ वैसे करो।' दोनों हस बोले-'दुसरे मना वर के जानेने तुम्हारी कुशल है। परंतु पटपड़मे तुम्हारे जाने का कौनसा है । काला बोला-'जिस प्रकार में तुम्हारे साथ आकाशमार्गसे जा करो।' दसोंने कहा-'उपाय कैसे हो सकता है? कछुएने कहा-'तुम एक माटो मुड को चाचसे पका टेना और में मुमसे पर कर लगा और तुम्हारे के पलने में मुलो पहुँच मी जाऊगा।' हंसी जूनः-संनवत्येप उपाय.। कितु,- इस पोले-'यह उपाय तो दो महता है। परंतु,- उपायं चिन्तयन्माशो पायमपि चिन्तयेत् । पदयतो वकमूखस नकुलभक्षिता. प्रजा.' ॥ ८॥ 'दा ११. पा से दी। - सोधिः ८]] भाषाटीकासमलंकृत। १७१ पण्डितको उपाय सोचना चाहिये और विपत्तिका भी विचार करना दाहिये। जैसे मूर्ख वगलेके देखते २ नौले सव बच्चे सा गये ॥ ८ ॥ कूर्मः पृच्छति-'कथमेतत् ?' तौ कथयतः- कछुआ पूछने लगा-'यह कथा कैसे है ?' वे दोनों कहने लगे ॥ कथां५॥ अस्त्युत्तरापथे गृध्रकूटनान्नि पर्वते महान्पिप्पलवृक्षः। तत्रा- कयका निवसन्ति । तस्य वृक्षस्याधस्ताद्विवरे सर्पो वालाप- यानि खादति । अथ शोकार्तानां वकानां विलापं श्रुत्वा केनचि- केनाभिहितम्-'एवं कुरुत । यूयं मत्स्यानुपादाय नकुलवि. सर्पविवरं यावत्पतिक्रमण विकिरत । ततस्तदाहार- छुन्धैनकुलैरागत्य सर्पो द्रष्टव्यः स्वभावद्वेषायापादयितव्यश्च ।' थानुष्टिते तदृत्तम् । ततस्तत्र वृक्षे न कुलैर्वकशावकरावः श्रुतः। धात्तैर्वृक्षमारुह्य वकशावकाः खादिताः । अत आवां ब्रूवः- "उपायं चिन्तयन्” इत्यादि ॥ आवाभ्यां नीयमानं त्वामवलोक्य घोकैः किंचिद्वक्तव्यमेव । तदाकर्ण्य यदि त्वमुत्तरं दास्यसि तदा बन्मरणम् । तत्सर्वथात्रैव स्थीयताम् ।' कर्मो वदति-'किमहम- राजः ? नाहमुत्तरं दास्यामि किमपि न वक्तव्यम् । तथानुष्ठिते ग्याविधं कूर्ममालोक्य सर्वे गोरवकाः पश्चाद्धावन्ति वदन्ति च । कश्चिद्वदति-'यद्ययं कुर्मः पतति तदात्रैव पक्त्वा खादितव्यः।' कश्चिद्वदति-'अत्रैव दग्ध्वा खादितव्योऽयम् ।' कश्चिद्वदति- गृहं नीत्वा भक्षणीयः' इति । तद्वचनं श्रुत्वा स कूर्मः कोपाविष्टो स्मृतपूर्वसंस्कारःप्राह-'युप्माभिर्भस भक्षितव्यम्।' इति वद. देव पतितस्तैव्यापादितश्च । अतोऽहं ब्रवीमि-"सुहृदां हितका- सनाम्" इत्यादि ॥' अथ प्रणिधिर्वकस्तत्रागत्योवाच-'देव! मागेव ग्या निगदितम् । दुर्गशोधनं हि प्रतिक्षणं कर्तव्यमिति । तच युप्मा- भेन कृतं तद्नवधानस्य फलमनुभूतम् । दुर्गदाहो मेघवर्णेन वाय- सेन गृध्रप्रयुकेन गतः। उत्तर दिशामें गृध्रकूटक नाम पर्वत पर एक बड़ा पीपलका पेड़ है। उस पर बहुतसे वगले रहते थे। उस वृक्षके नीचे विलेमें एक सॉप वगलोंके छोटे छोटे चीको खा लिया करता पा । फिर शोकसे व्याकुल बगलेंके बिलापो सुन कर सिी वगलेने कहा-'ऐसा करो। तुम मछलियोंको ले कर नाटे विलेने लॉपके निटे वर लगातार फैला दो। फिर उनको खानेफे लेभी नाले वहाँ आ कर सापको तो और अपने खभाषके वरते उसे मार डालेंगे। ऐसा करने पर वैसा ही भा। पीडे उस वृक्षके जार नोलाने वालों के वर्षोंका चहचहाट मुना । फिर - १७२ हितोपदेश। [सधिः ९-१ - उन्होंने पेड़ पर चढ़ कर बगलोंके वच्चे खा लिये। इसलिये हम दोनों कहते हैं । "उपायको सोचना चाहिये" इत्यादि। और हम दोनोंसे ले जाते हुए तुमको देखन लोग कुछ कहगेही । वह सुन कर जो तुम उत्तर दोगे तो तुम मरोगे । इजले चाहे जो कुछ हो यहाँ ही रहो।' कछुआ वोला-'क्या मै मूर्ख हूँ? मैं उत्तर नई दूंगा। कुछ न वोलूंगा। और वैसा करने पर कछुएको वैसा देस कर सब बाजे पीछे दौड़े और कहने लगे कोई कहतास्या-जो यह कछुआ गिर पड़े तो यहाँ हा पका कर खा लेना चाहिये। कोई कहता था-यहाँ ही इसे भून कर खा लें। ये कोई कहता था कि घर ले चल कर खाना चाहिये। उन सभीका वचन सुन कर त कछुआ क्रोधयुक्त हो कर पहले उपदेशको भूल कर बोला-'तुम सभाये यू फॉकनी चाहिये।' यह कहतेही गिर पड़ा और उन्होंने मार डाला । इसारे। मैं कहता हूँ-“हितकारी मित्रोंका" इत्यादि ।' फिर दूत बगला वहाँ आ यर बोला-'हे महाराज! मैंने तो पहले ही जता दिया था कि गढका सशोधन क्षमण अवश्य करना चाहिये । और वह आपने नहीं किया इसलिये उस भूल्या फा भुगता। गिद्धके सिखाये भलाये मेघवर्ण कौएने दुर्ग जला दिया। राजा निःश्वस्याह,- 'प्रणयादुपकाराद्वा यो विश्वसिति शत्रुषु स सुप्त इव वृक्षापात्पतितः प्रतिवुध्यते' ॥ ९॥ राजाने सास भर कर कहा-जो मनुष्य नेहसे अथवा उपकारसे शाओं पर विधान करता हे वह सोये हुएके समान रक्षकी फुनगीसे गिर कर जाग परता है, अर्भात आपत्तिमे पर कर उसे जानता है' ॥ ९ ॥ प्रणिविरुवाच-'इतो दुर्गदाहं विधाय यदा गतो मेघवर्णस्तदा चित्रवर्णन प्रसादितेनोक्तम्-'अय मेघवर्णोऽय कर्पूरदीपराज्य ऽभिषिच्यताम् । दुत बोरा-'यहाँसे गढ़ का दाह करके जव मेघवर्ण गया तर चिनार प्रसन दो कर कहा- "इस मेघवर्णको इस कर्पूरदीपके राज्य पर रामति ।। कर दो। तथा चोक्तम्,- स्तम्त्यस्य भृत्यस्य कृतं नव प्रणाशयेत् । फलेन मनसा वाचा दृष्ट्या चनं प्रहर्षयेत् ॥ १० ॥ में कहा है-जिन सेपम्ने कार्य सिद्ध किया है उगफे किया। 'नरल नहीं करना चाहिये नाना पारितोपिम्से, प्रमुन्न घरना चाहिये ॥ १० ॥ चकताको बने–'ततस्ततः।' प्रणिधित्वाच'ततः प्रधानन विना श्रेणानिहितम्-'देव! नेदमुचितम् । प्रसादान्तर किमान क्रियताम् । साइन लगा-'बडे पोट र क्या ना ६ योग- मन, वचन जोर संधिः ११-१२] भापाटीकासमलंकृत। १७३ मनी गिद्धने कहा-'महाराज! यह वात उचित नहीं है, कुछ दूमर प्रसाद कीजिये, पता- -- - अविचारयतो युक्तिकथनं तुपखण्डनम् । नीचेपूपकृतं राजन् ! वालुकाखिव मुदितम् ॥ ११ ॥ क्योंकि हे राजन् ! पूर्वापरको नहीं विचारने वालेको उपाय बतलाना भुसीके पीबनेके समान वेखारय है और नीचोंमे उपकार करना चुलिम चिह करने के समान है, अर्थात् जैसा धुलिका चिह्न थोडीसी देरमे मिट जाता है वैसा नीचाम किया हुआ उपकार और अविचारी पुरुपको उपदेश भी लुप्त हो जाता है ।।११॥ महतामास्पदे नीच. कदापि न कर्तव्यः। वडों के स्थान पर नीचको कभी न करना चाहिये । जैसा कहा है- तथा चोक्तम्, नीचः श्लाध्यपदं प्राप्य खामिनं हन्तुमिच्छति । मूपिको व्याघ्रतां प्राप्य मुनि हन्तुं गतो यथा' ॥ १२ ॥ नीच अच्छे पदको पा कर स्वामीको मारना चाहता है, जैसे चूहा व्याघ्रत्वको पा कर मुनिको मारने चला' ॥ १२ ॥ चित्रवर्णः पृच्छति-'कथमेतत् ?' मन्त्री कथयति- चित्रवर्ण पूछने लगा-'यह कथा कैसे है ?' मत्री कहने लगा।- ॥ कथा ६॥ अस्ति गौतमस्य महत्तपोवने महातपा नाम मुनिः । तत्र तेन मुनिना काकेन नीयमानो मूपिकशावको दृष्टः । ततः खभावदयात्मना तेन मुनिना नीवारकणैः संवर्धितः । ततो विडालस्तं मूपिकं खादितुमुपधावति । तमवलोक्य मूपिक- तत्य मुने. फोडे प्रविवेश । ततो मुनिनोकम्-'मूपिक ! त्वं मार्जारो भव ।' ततः स विडाल. कुकुर दृष्ट्वा पलायते । ततो मुनिनोक्तम्-'कुमुराद्विभेपि । त्वमेव कुमुरो भव ।' स च कुझरो व्याघ्राद्विभेति । ततस्तेन मुनिना कुछरो व्याघ्रः एत । अथ तं व्यानं मुनिर्मूपिकोऽयमिति पश्यति । अय तं मुनि दृष्ट्वा व्याघ्रं च सर्वे वदन्ति 'अनेन मुनिना मूपिको व्याघ्रतां नीत । एतच्छुत्वा स व्याघ्रोऽचिन्तयत्-'यावदनेन मुनिना स्थातव्यं तावदिद मे स्वरूपाख्यानमकीर्तिकर न पलायिप्यते' इत्यालोच्य मूपिकस्तं मुनि हन्तुं गतः । ततो मुनिना तज्ज्ञात्वा 'पुनर्मूपिको भव' इत्युक्त्वा मूपिक एव कृतः । अतोऽहं प्रवीमि-"नीचः ग्लाध्यपदं" इत्यादि । गोतम महापिक तपोवनने महातपा नान एक मुनि ना। वो उस नुनिने १ सा५५पन्न राजन् ' वानुपातिक मूत्रितन्' यह नी पाठ प्रचन्ति ६, जिनका 14-11 पुरपणे उपकार परना नो सचमुच धरिलाने मूतने समान है। नाद हितोपदेश । [संविः १ - . - कौएसे लाये हुए एक चूहेके बचको देखा । फिर खभावसे दयामय उस मुनेने। तृणके धान्यसे उसको वड़ा किया । फिर विलाव उस चूहेको सानेको दोला। उसे देख कर चूहा उस मुनिकी गोदमे चला गया। फिर मुनिने कहा कि- चूहे ! तू विलाव हो जा। फिर वह विलाव कुत्तेको देस कर भागने लगा। फिर, मुनिने कहा-'तू कुत्तेसे डरता है, जा तू भी कुत्ता हो जा। बाद वह कुत्ता बाप डरने लगा। फिर उस मुनिने उस कुत्तेको वाघ कर दिया। यह मुनि, उमा बाघको “यह तो चूहा है" ऐसे (उसे असली स्वरूपसे) देखता था । उग मुनिहो । और व्याघ्रको देख कर सब लोग कहा करते थे कि "इस मुनिने इस नती, वाघ बना दिया है।" यह सुन कर वह वाघ सोचने लगा-'जब तक यह मुनि । रहेगा तब तक यह मेरी अपयश करने वाली खरूपकी कहानी नहीं मिटेगी।' यह विचार कर चूहा उस मुनि को मारने के लिये चला। फिर मुनिने यह जान तर "फिर चूहा हो जा" यह कह कर चूहाही कर दिया। इसलिये म कहता "नीच ऊँचा पद पर" इत्यादि, अपरं च । सुकरमिदमिति न मन्तव्यम् । शृणु,- और दूसरे-यह वात सुलभ है ऐसा नहीं जानना चाहिये । सुनिये,- भक्षयित्वा बहून्मत्स्यानुत्तमायममध्यमान् । अतिलोभादकः पश्चान्मृतः कर्कटकग्रहात्॥ १३ ॥ एक बगला बहुनसे बड़े छोटे, और मध्यम मच्छों को राा कर अधिक लोगसे फरक परदनेसे मारा गया ॥ १३ ॥ चित्रवर्णः पृच्छति-कथमेतत् ?' मन्त्री कथयति- निसर्ग पुढने लगा--'यह कथा से है।' मत्री कहने लगा। ॥ कथा ७॥ जस्ति मालपदेशे पन्नगर्भनामधेयं सरः । तत्रेको वृद्धो क सामथ्र्यहीन उद्विग्नमिवात्मान दर्शयित्वा स्थितः । स च केनानि : कुलीरेण दृष्टः पृष्टश्च-'किमिति भवानराहारत्यागेन तिष्ठति ।' यकेनोक्तम्-'मत्म्या मम जीवनहेतवः ते कैवतरागत्य व्यापादपि तव्या इति वाती नगरोपान्ते मया श्रुता । अतो वर्तनाभावादेना लरामुपस्थितमिति पत्याहारेऽप्यनादरः हतः। ततो मत्स्येरा लोचितम्-'यह समय तावदुगकारक पवाय लक्ष्यते । तदयमेव - - - यथाकर्तव्यं पृच्छयताम् ।

संधिः १४-१५] भाषाटीकासमलंकृत। १७५ समय तो यह उपकार करने वाला ही दीखता है इसलिये इसीसे जो कुछ करना है सो पूछना चाहिये। तथा चोक्तम्, उपकारिणा संधिर्न मित्रेणापकारिणा! उपकारापकारौ हि लक्ष्य लक्षणमेतयोः ॥ १४ ॥ जैसा कहा है कि-उपकारी शत्रुके साथ मेल करना चाहिये और अपकारी -मित्रके साथ न करना चाहिये, क्योंकि निश्चय करके उपकार और अपकार ही मन और शत्रुके लक्षण हैं ॥ १४ ॥ मत्स्या ऊचुः-'भो वक! कोऽत्र रक्षणोपायः?' वको ब्रूते-'अस्ति रक्षणोपायो जलाशयान्तराश्रयणम् । तत्राहमेकैकशो युष्मान- यामि ।' मत्स्या आहुः--'एवमस्तु ।' ततोऽसौ वकस्तान्मत्स्याने- कैकशो नीत्वा खादति।' अनन्तरं कुलीरस्तमुवाच'भो वक! मामपि तत्र नय ।' ततो वकोऽप्यपूर्वकुलीरमांसार्थी सादरं तं नीत्वा स्थले धृतवान् । कुलीरोऽपि मत्स्यकण्टकाकीर्ण तत्स्थल- मालोक्याचिन्तयत्-'हा हतोऽस्मि मन्दभाग्यः । भवतु । इदानीं समयोचितं व्यवहरिप्यामि' इत्यालोच्य कुलीरस्तस्य ग्रीवां चिच्छेद । स वकः पञ्चत्वं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि-"भक्ष- यित्वा 'वहून्मत्स्यान्" इत्यादि ॥' ततश्चित्रवर्णोऽवत्-'शृणु तावन्मबिन ! मयैतदालोचितमस्ति । अत्रावस्थितेन मेघवर्णन राशा यावन्ति वस्तूनि कर्पूरद्वीपस्योत्तमानि तावन्त्य माकमुपने तव्यानि । तेनास्माभिर्मदासुखेन विन्ध्याचले स्थातव्यम् ।' मच्छ योले-'हे बगले ! इसमे रक्षाका कौनसा उपाय है ? तव वगला बोला- दूसरे सरोवरका आश्रय ही रक्षाका उपाय है। वहाँ मैं एक एक करके तुम सबोंको ले कर चलता हूँ।' मच्छ वोले-'अच्छा, ले चलो।' पीछे यह वगला उन मच्छोंको एक एक ले जा कर खाने लगा । इमते पीछे कट उससे वोला-'हे वगले ! मुझे भी वही ले चल।' फिर अपूर्व कर्कटके मासके लोभी बगलेने आदरसे उसे भी वहाँ ले जा कर पटपड़मे धरा । कर्कट भी मच्छोंकी हड़ियोंसे विछे हुए उस पदावयो देख कर चिन्ता करने लगा-'हाय में मन्दभागी मारा गया। जो कुछ हो, अव समयको उचित काम करूंगा।' यह विचार कर कर्कटने उसकी नाइ पाट टाली और वह वगला मर गया । इसलिये मैं कहता हूँ “बहुतले मच्छोंको सा कर" इत्यादि । फिर चित्रवर्ण चोला-'हे मत्री ! सुनो, मैने तो यही सोच रक्सा है। वहा वेठाला हुआ राजा मेघवर्ण जितनी उत्तम वस्तुए कर्पूरद्वीपरी है उतनी हमारे पास भेटन लावेगा । उसले हम विन्ध्याचलमें आनन्दते रहो।' दूरदर्शी विदस्याह-'देव! सूरद- इस पर दोला-'हे महाराज! अनागतवती चिन्तां कृत्वा यन्तु प्रहप्यति । स तिरस्कारमानोति भसभाण्डो दिजो यधा' ।। १५ ।

१७६ हितोपदेश । [संधिः जो नहीं आई हुई चिंताको करके प्रसन्न होता है वह मटीके वर्तन ने वाले ब्राह्मणके समान अपमानको पाता है ॥१५॥ राजाह--'कथमेतत् ?' मन्त्री कथयति- राजा वोला-'यह कथा देते है। मत्रो कहने लगा।- अत्ति देवीकोटनान्नि नगरे देवशमी नाम ब्राह्मणः । तेन महा- विपुवत्संक्रान्त्यां सतपूर्णशराव एकः प्राप्तः । तमादायासौ कुम्न कारस्य भाण्डपूर्णमण्डपैकदेशे रौद्रेणाकुलित. सुप्तः । तत. सक रक्षार्थ हत्ते दण्डमेकमादायाचिन्तयत्-'यद्यहं सक्तुशरार विकीय दश कपर्दकान्प्राप्स्यामि तदाऽत्रैव तैः कपर्दकैर्घटशरापा- दिनुपतीयानेकधा वृद्धस्तद्धनैः पुनः पुनः पूगवस्त्रादिकमुपकीय विसीय लक्षसंख्यानि धनानि कृत्वा विवाहचतुष्टयं करिष्यामि । अनन्तर तासु सपतीपु रूपयौवनवती या तस्यामधिकानुराग करिष्यामि । सपत्यो यदा छन्द करिष्यन्ति तदा कोपाऊलोऽह तालगुडेन ताडयिष्यामि' इत्यभिधाय लगुडः क्षिप्तः । तेन सकु- शरारभर्णितो भाण्डानि च पहनि भगानि । ततस्तेन शन्देनाग- तेन उनकारेण तथाविधानि भाण्डान्यवलोक्य ब्राह्मणस्तिर स्कनो मण्डपाहि तय । अतोऽहं ब्रवीमि-"अनागतवती निलाम्" इटादि ॥' नतो राना रहरि गृध्रमुनाच-'तात! यया कीय योपदिया।'

। [; संधिः १६-१९] भाषाटीकासमलंकृत । १७७ . -- र गृध्रो ब्रूते, 'मदोद्धतस्य नृपतेः संकीर्णस्येव दन्तिनः । गच्छन्त्युन्मार्गयातस्य नेतारः खलु वाच्यताम् ॥ १६ ॥ गिद्ध बोला-'कुमार्गमें जाने वाले अर्थात् अनुचित काम करने वाले अभिमानी राजाके मत्री लोग, कुमार्गमे जाने वाले तथा मत वाले हाथीवानोंके समान, निश्चय करके निन्दाको पाते हैं ॥ १६ ॥ रा शृणु देव! किमस्माभिर्वलदगुर्गे भग्नम् ? न । कितु तव प्रतापाधिष्ठितेनोपायेन।'राजाह-भवतामुपायेन?' गृध्रो ब्रूते- 'यद्यसद्वचनं क्रियते तदा स्वदेशे गम्यताम् । अन्यथा वर्षाकाले प्राप्ते पुनर्विग्रहे सत्यस्माकं परभूमिष्टानां स्वदेशगमनमपि दुर्लभं र भविष्यति । सुखशोभार्थ संधाय गम्यताम् । दुर्ग भग्नं कीर्तिश्च लब्धैव । मम संमतं तावदेतत् । र सुनिये महाराज ! क्या सुनिये महाराज ! क्या हमने वलके घमडसे गढ तोड़ा है ? यह बात नहीं है। परन्तु आपके प्रतापसे निश्चित किये उपायसे तोड़ा है।' राजा चोला-'तुम्हारे | उपायसे टूटा है " गिद्ध वोला-'जो मेरा कहना करो तो अपने देशमे चले चलो। नहीं तो वर्षा आने पर फिर लढाई होनेमे, पराई भूमिमें रहने वाले हम लोगों का अपने देशको जाना भी कठिन होगा। इसलिये सुख और शोभाके लिये मेल करके चलिये, गढ दृट गया और यश भी मिला । मेरी तो यह समति है। यतः,- यो हि धर्म पुरस्कृत्य हित्वा भर्तुः प्रियाप्रिये । अमियाण्याह तथ्यानि तेन राजा सहायवान् ॥ १७॥ क्योंकि-जो मनुष्य वर्मको आगे करके स्वामीके प्रिय और अप्रियको छोड़ कर अप्रिय भी सत्य कहता है उससे राजाको सहारा होता है, अर्थात् क्टु भले होय, सच्चा और योग्य सलाह देने वालाही मत्री राजाका सचमुच सहायकर्ता होता है ॥ १७ ॥ अन्यच्च- सुहृद्धलं तथा राज्यमात्मानं कीर्तिमेव च । युधि संदेहदोलास्थं को हि कुर्यादवालिशः ॥ १८ ॥ दूसरे-और कौनसा बुद्धिमान् मित्रकी सेनाको, राज्यवो, अपनेको, और {" कीतिको संग्राम के सदेहरूपी हिटोलेने झुलावेगा अर्थात् सकटने गिरा देगा ॥१८॥ जपरच,- सधिमिच्छेत्समेनापि संदिग्धो विजयो युधि । सुन्दोपनुन्दावन्योन्यं नष्टौ तुल्यवलौ न किम् ?' ॥ १९ ॥ और समानके साथ भी मेल करने की इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि युद्धने विजयका सदेह है। जैसे समान वल वाले सुन्द और उपतुन्द आपसमें क्या नए नहीं हो गये। ॥ १९॥ राजोवाच-'कथमेतत् ?' मन्त्री कथयति- राजा पोला-'सह कमा सेनानी कहने लगा ।- AN . 1 ... - - । 1- - 1 १७८ हितोपदेश। [सधिः २० ॥ कथा ९॥ पुरा दैत्यौ महोदारौ सुन्दोपसुन्दनामानौ महता क्लेशेन बैलो क्यकामनया चिराचन्द्रशेखरमाराधितवन्तौ । ततस्तयोभंगवा न्परितुष्टः 'वरं वरयतम्' इत्युवाच । अनन्तरं तयोः समाधिष्ठि तया सरखत्या तावन्यद्वक्तुकामावन्यदभिहितवन्तौ । यद्यावयोर्भ वान्परितुष्टस्तदा स्वप्रियां पार्वती परमेश्वरो ददातु । अथ भगवता कुद्धेन वरदानस्यावश्यकतया विचारमूढयोः पार्वती प्रदत्ता। ततस्तस्या रूपलावण्यलुब्धाभ्यां जगद्धातिभ्यां मनसोत्सुकाभ्या पापतिमिराभ्यां ममेत्यन्योन्यकलहाभ्यां प्रमाणपुरुपः कश्चित्त च्छयतामिति मतो कृतायां स एव भट्टारको वृद्धद्विजरूपः समा गत्य तत्रोपस्थितः । अनन्तरम् 'आवाभ्यामियं स्ववललया, कस्येयमावयोर्भवति?' इति ब्राह्मणमपृच्छताम् । पद यो उदार मुन्द और उपसुन्द नाम दो दैत्योने बड़े सशसे तीनों सोती इच्छासे बहुत काल तक महादेवजी की आराधना की। फिर उन दोनों पर भगवाने प्रमन दो कर यह कहा कि “वर मांगो"। फिर हृदयमें स्थित सर- माताको रगाते वे दोनो, कहना तो कुछही चाहते थे और कुछका उ रह जो इन दो पर भगवान् प्रसन्न ह तो परमेश्वर अपनी प्रिया पाति- को द। पी) भगाने कोतमे वरदान देने की आवश्यकतासे उन विचारहीन नु को मात दे दी । तब उन के रूप ओर सुन्दरतासे लुभाये रागार के TEL ले, मनम उत्कटित, कामसे अधे तथा 'यह मेरी है मेरी है' ऐगा पामा करने वाले इन दोनों की किसी निर्णय करने वाले पुरुषले पूछना मादी पुरिने पर वही इश्वर बूढे ब्राह्मणके वेपसे आ कर पहा । 11.3, हम दोनों ने अपने लिसे इन को पाया है, 'हम दोनोमो 'य: बामणगे पूछ। नायो जूते, 'वर्षश्रेष्टो द्वित. पुन्यः क्षत्रियो बलवानपि । बनवान्याधिको वैश्य. शूद्रस्तु द्विासेवया ॥ २० ॥ Hin-न अरदानने नाग, दोन वापस जा । दिनार इन नानी वाकी वाम गुदगुल्य मता ॥ २ युवकर्मानुगा । युद्ध एव युवयोनियमः । इत्यनिहित मति 'ना जननेन' इति कृत्वान्योन्यतुल्यथीयांसमकालमन्योन्य पानिन विनाशनुमती ! नतोद प्रामि-"सधिमिटरसमेनाणि' यदि राजार-मारक नाक माद्वि" मन्त्री नून- चनं रनवसानपर्यन्त गुतं नवन्दि.. नदापि मA REVIE का वादार सगुणयुकंप्य रयामा न विनास । - . । -

संधिः २१-२६]
भाषाटीकासमलंकृत।
१७९
में
1--
गिद्ध बोला-'इसलिये तुम दोनों क्षत्रिधर्म पर चलने वाले हो। तुम दोनोंका
युद्ध ही नियम है । ऐसा कहते ही “यह इसने अच्छा कहा" यह कह कर
समान वल वाले वे दोनों एक ही समय आपसमें लड़ कर मर गये । इसलिये
कहता हूँ-"समान वल वाले के साथ भी सधि करनी चाहिये" इत्यादि।' राजा
बोला-'तुमने पहलेही क्यों नहीं कहा मत्रीने कहा-'क्या मेरी वात आपने
अत तक सुनी थी ? तोभी मेरी समतिसे यह युद्ध आरंभ नहीं हुआ है।
सुन्दर गुणोंसे युक्त यह हिरण्यगर्भ विरोध करनेके योग्य नहीं है।
गृध्रो ब्रूते-
सत्याया धार्मिकोऽनार्यो भ्रातृसंघातवान्चली।
अनेकयुद्धविजयी संघेयाः सप्त कीर्तिताः ॥ २१ ॥
जैसा कहा है-'सत्य बोलने वाला, सज्जन, धर्मशील, दुर्जन, अधिक भाई-
वधु वाला, शूरवीर और भनेक सम्रामोंमें जय पाने वाला ये सात मनुष्य सन्धि
करनेके योग्य कहे गये हैं ॥ २१ ॥
'सत्योऽनुपालयेत्सत्यं संघितो नैति विक्रियाम् ।
प्राणवाघेऽपि सुव्यक्तमार्यो नायात्यनार्यताम् ॥ २२ ॥
सलभापी सत्यके अनुसार सधि करके विश्वासघात नहीं करता है, और सज्जन
प्राण जाने पर भी प्रत्यक्षमें नीचता नहीं करता है ॥ २२ ॥
धार्मिकस्याभियुक्तस्य सर्व एव हि युध्यते ।
प्रजानुरागाधर्माच दुःखोच्छेद्यो हि धार्मिकः ॥ २३ ॥
शत्रुओंसे घिरे हुए धार्मिकके समी अनुकूल होते हैं इसलिये धर्मसे तथा
प्रजाके अनुरागसे धार्मिक राजा दु खसे जीतनेके योग्य होता है ।। २३ ।।
संधिः कार्योऽप्यनार्येण विनाशे समुपस्थिते ।
विना तस्याश्रयेणार्यः कुर्यान कालयापनम् ॥ २४ ॥
विनाश उपस्थित होने पर दुष्टके साथ भी मेल कर लेना चाहिये और उसके
जाश्रयके विना सजनको कालयापन(समय काटना) नहीं करना चाहिये ॥२४॥
संहतत्वाद्यथा वेणुर्निविडैः कण्टकैर्वृतः।
न शक्यते समुच्छेत्तुं भ्रातृसंघातवास्तथा ॥ २५ ॥
और जैसे बहुतसे काँटोंसे लदा हुआ बाँस आपसमें मिले रहनेसे नहीं कट
सकता है वैसे ही भाई-बन्धुओंसे मिला हुआ पुरुप भी नष्ट नहीं हो सकता है ॥२५॥
पलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निदर्शनम् ।
प्रतिवातं न हि धन. कदाचिदुपसर्पति ॥ २६ ॥
चली शत्रुफे साथ युद्ध परना चाहिये ऐसा उदाहरण नहीं है, क्योंकि बादल
पया प्रतिकूल पानी नहीं चलता है, अर्थात् जिधर पवन जाती है उपरको
तरी चलता है॥२६॥

4
१८०,
हितोपदेश । [संधिः २७-३२
जमदग्नेः सुतस्येव सर्वः सर्वत्र सर्वदा।
अनेकयुद्धजयिनः प्रतापादेव भुज्यते ॥ २७ ॥
और जमदग्निके पुत्र अर्थात् परशुरामके समान भनेक बुद्धीमे जीतने से
राजाके प्रतापसे वहुतसे सग्रामोंमें सव मनुष्य सब स्थानमें सब कालमें सो।
राजाको अधिकारमें कर लेते है ॥ २७ ॥
अनेकयुद्धविजयी संघानं यस्य गच्छति ।
तत्प्रतापेन तस्याशु वशमायान्ति शत्रवः ॥ २८ ॥
अनेक सत्रानोंमें जीतने वाला मनुष्य जिस राजासे मेल कर लेता है तो उसके
प्रतापसे (जिसके साथ सधि की है) उसके रानु शीघ्र वशमें आ जाते हैं ॥२८॥
तत्र तावद्वहुभिर्गुणैरुपेतःसंधेयोऽयं राजा।' चक्रवाकोऽवदत
'प्रणिधे! सर्वत्रावबज । सर्वमवगतम् । गत्वा पुनरागमिप्यार
राजा चक्रवाकं पृष्टवान्-'मन्निन् ! असंधेयाः कति ताने
मिच्छामि।
एमतिगे अनेक गुणांसे गुफ यह राजा मेल करनेके योग्य है।' चम्चा
मा-दे दूत ! सत्र स्थानों में जा, तुमने सव समझ लिया है,ओर जा र
जो. आइयो।' रागाने चावेसे पूछा-'हे मंत्री! कितने मनुष्य सपि र
तो नही है, उन्हें मुना चाहता।'
मन्त्री ले-देना! कथयामि।ऋणु,-
गोवा-ममा हता हु गुनिये-
पालोमो दीर्घरोगी तथा शातिवहिष्ठतः।
भीर को जीवनको लुन्धो लुब्धजनस्तथा ॥ २९. ।।
•, का, या दिनाा रोगी ओर जात बाहर किया हुआ, र
• लागेनी ओर जिरा लोनी मनी हो ॥ २५ ॥
विनियति धेच विषयेष्वतिसक्तिमान् ।
चितवस्तु देवब्राह्मणनिन्दकः ॥ ३० ॥

१८४ हितोपदेश। [ सधिः ५१-१२ राजाने 'बहुत अच्छा' ऐसा कह कर विचित्र नाम बगलेको गुप्त चिट्ठो र सिहलद्वीपको भेज दिया। अथ प्रणिधिरागत्योवाच-'देव! श्रूयतां तत्रत्यप्रस्तावः । एव तत्र गृभ्रेणोकम्-'देव! यन्मेघवर्णस्तत्र चिरमुषितः स बोले : कि संघेयगुणयुक्तो हिरण्यगर्भो न वा?' इति । ततोऽसौ राशा खमाह्वय पृष्टः-'वायस! कीदृशोऽसौ हिरण्यगर्भः? चक्रपाको मन्त्री वा कीदृशः?' वायस उवाच-'देव! हिरण्यगर्मो राजा युधिष्ठिरसमो महाशयः । चक्रवाकसमो मन्त्री न काप्यवलो क्यते ।' राजाह–'यद्येवं तदा कथमसौ त्वया वञ्चितः? फिर दूतने आ कर कहा-'महाराज! वहाँका समाचार सुनिये । पर्दा गिदने को कहा है कि हे महाराज ! मेघवर्ण काक जो वहाँ बहुत दिनों तक रहा पा रह जानता है कि हिरण्यगर्भ मिलापके योग्य गुणोंसे युक्त है या नहीं।' फिर रारा उने तुला कर पूछा-'हे कोए ! वह हिरण्यगर्भ कैसा है ?' वा चरुवा मनो ठेगा है। कोदने उत्तर दिया-'महाराज! राजा हिरण्यगर्भ युधिष्ठिरके समान सत्रा नके ममान मी कहीं भी नहीं दीया है।' राजा वोला-जोगमाही गेतूने उसे से ठग लिया। रिदमा मेवनर्णः प्राह-'देव! ने इन तर का-'महाराज! विश्वासप्रतिपद्यानां वञ्चने का विदग्धता। गहमारहा मुतं हि हलाकि नाम पोरुपम् ॥ ५१॥ वामप्या को ठगोग या चतुराई है। जैसे मोदम ६६ ११ मा ER FIT पुरुषार अर्थात् कुछ भी नहीं है ॥ ५१ ॥ गादानेन मनिणार प्रथमदर्शन एव शातमितु महाशयो साता। तन या विमलया। नो माग ' उगनीने पहले देगते ही मुझे जान लिया था, प. RI + II गलिये मेरी टगाईम आ गया, 14 चास- - संधिः ५३] भाषाटीकासमलंकृत। १८५ मतिप्रको भवतीति समालोच्य वृक्षत्रयतले कोशान्तरेण तस्य ब्राह्मणस्यागमनं प्रतीक्ष्य पथि स्थिताः। तत्रैकेन धूर्तेन गच्छन्स प्राह्मणोऽभिहितः-'भो ब्राह्मण! किमिति कुक्कुरः स्कन्धेनोहते?' विप्रेणोक्तम्-'नायं श्वा कितु यज्ञच्छागः।' अथानन्तरस्थितेना- न्येन धूर्तेन तयैवोक्तम् । तदाकर्ण्य ब्राह्मणश्छागं भूमौ निधाय मुहुर्निरीक्ष्य पुनः स्कन्धे कृत्वा दोलायमानमतिश्चलितः। गौतमके वनमें किसी ब्राह्मणने यज्ञ करना आरभ किया था। और उसको यज्ञके लिये दूसरे गाँवसे वकरा मोल ले कर कधे पर रख कर ले जाते हुए तीन ठगोंने देखा । फिर उन ठगोंने “यह बकरा किसी उपायसे मिल जाय तो बुद्धिकी चालाकी वढ़ जाय" यह विचार कर तीनों तीन वृक्षोंके नीचे, एक एक कोसके अन्तरसे, उस ब्राह्मणके आनेकी वाट देख कर मार्गमे बैठ गये। वहाँ एक बर्तने जा कर उस ब्राह्मणसे कहा-'हे ब्राह्मण ! यह क्या बात है कि कुत्ता कंधे पर लिये जाने हो ब्राह्मणने कहा, 'यह कुत्ता नहीं है, यज्ञका वकरा है।' फिर इससे आगे बैठे हुए दूसरे चूतने वैसे ही कहा । यह सुन कर ब्राह्मण वरेको परनी पर रख कर वार वार देख फिर कधे पर रख कर चलायमान चित्त-सा हो कर चलने लगा। । यतः,- मतिःलायते सत्यं सतामपि खलोतिभिः । ताभिर्विश्वासितश्चासौ म्रियते चित्रकर्णवत्' ।। ५३ ॥ क्योंकि सज्जनोंकी भी बुद्धि दुष्टोंके वचनोंसे सचमुच चलायमान हो जाती है-जसे दुष्टोंकी वातोंसे विश्वासमें आ कर यह ब्राह्मण चित्रकर्णनामक ऊँटके समान मरता है' ॥५३॥ राजाह-कथमेतत् ? स कथयति- राजा बोला-'यह कया कैसे है ? वह कहने लगा।-- 1-1 ॥ कथा ११॥ अस्ति कस्मिंश्चिद्धनोद्देशे मदोत्कटो नाम सिंह.। तस्य सेव- कास्त्रयः काको व्याघ्रो जम्बुकश्च । अथ तैभ्रमद्भिः कश्चिदुष्टो दृष्ट. पृष्टश्च-'कुतो मवानागतः सार्थाष्टः ?' स चात्मवृत्तान्त- मकथयत् । ततस्तै त्वा सिंहेऽसौ समर्पितः । तेनाभयवाचं दत्त्वा चित्रकर्ण इति नाम छत्वा स्थापितः। अथ कदाचित्सिहस्य शरीर- वैकल्याभूरिवृष्टिकारणाचाहारमलभमानास्ते व्यग्रा बभूवुः । तत- स्तरालोचितम्-'चित्रकर्णमेव यथा स्वामी व्यापादयति तथानु- सीयताम् । किमनेन कण्टकमुजा?' व्याघ्र उवाच-स्वामिनाऽन- यवाचं दत्वानुगृहीतस्तत्कयमेवं संभवति ?' काको ने-'इह समये परिक्षीण. स्वामी पापमपि करिप्यति । किती पाने नदोवाट नाम तिर रहता पा । उसके काग, पाप और विकार १८६ हितोपदेश। [संविः ५४-५५१३ - तीन तेवक थे। पीछे उन्होंने घूमते घूमते किसी ऊँटको देखा और पूमा-'तुम साथियों ने विछट कर कहाँते आये हो फिर उसने अपना वृत्तान्त कह सुनारा। तव उन्होंने उसे ले जा कर सिंहको सौंप दिया। उसने अभय-वचन दे कर उपाय चित्रकर्ण नन रत कर रख लिया। वाद एक दिन वे सिंहके शरीरके खेद तमा वर्षाके कारा भोजनको न पा कर दुखी होने लगे। फिर उन्होंने विचारा जिनमें दिन ही खामी मारे सो उपाय करो। इस काँटे चरने वालेसे क्या है। वार बोला-'स्वामीने उसे अभय-वचन दे कर पता है इसलिये ऐसा कैसे हो । सकता है !' काग बोला-'इस समय भूतसे घवराया हुभा सामी (सिंह) पाप भी करेगा। यतः,- त्यजेथुधार्ता महिला वपुत्रं खादेभुधार्ता भुजगी स्वमण्डम् । बुभुक्षितः कि न करोति पापं शीणा नरा निष्करुणा भवन्ति ॥५४॥ मोत-भूती श्री अपने पुनको छोड़ देती है, है, ओर भुगा का क्या पाप नहीं करता है। क्योंकि शीण मनुष्य हमान हो, मगर गुग और गुडापेसे पीण यह सिंह दनारहिन । -- भुखी नागन अपने देशो में ।' मन. प्रमन योन्मत्तः भान्तः कुदो तुभुक्षितः। लुगोभीनारायुक्तः कामुकश्च न धर्मवित्' ।। ५५ ॥ ना गर-नाला, असमधं, उन्मत, नफा हुआ, कोधित, भुना, लोगो ६.४, 1 HR EM ला, जोर हामी धर्मो जानने वाले नाम पति मनि समिधान्तिक जग्मु । सिनोकाम्-'महाग "म्यादपि न प्रासंफिबित् ।' सिंहनो म्-- . पुनासा नोपाय: ?' काको वदति-'देव! पानी. नाहगार नागोयाबिन' मिहनीलाम्या : दारः ६. न.?' काययति-विकण.' इति । My : गाति । नयाचं दवा दुनो यम मानिनपति! प्रास .

२८८ हितोपदेश। [ सधिः ५९- कथं शत्रुमध्ये त्वया चिरमुपितम् ? कथं वा तेपामनुनयः कत मेयवर्ण उवाच-'देव! स्वामिकार्यार्थिना 'देव ! स्वामिकार्यार्थिना खप्रयोजनक्शावा नक्रियते? निहने कहा-'मरना भला है पर ऐसे काममे मन चलाना अच्छा न निपारने भी यहीं कहा। फिर सिंहने कहा- 'ऐसा कभी नहीं।' फिर यापने 3 'मेरे शरीरले खानी प्राण-रक्षण करें। सिहने कहा कि-'यह भी कमो उ नहीं है।' पीछे चित्र कर्णने भी विधासके मारे वैसे ही अपने को दान देने । च्हा। फिर उसके कहेते उस वाघने कोखको फाइकर उसे मार गज और स का लिया । इसलिये मैं कहता हूँ कि "बुद्धि सचमुच चलायमान हो । है इसाद । फिर तीसरे धूर्तकी बात सुन कर अपने बुद्धि के प्रमको नि. जरके परेते छोरर मा मण न्हा कर घर गया। उन धूताने उस पारेको हे कर पारिता। इसलिये मैं कहता हूं-"जो अपने समान (ओरोमो) जानता। ।' राजा पोला- मेमवर्ण ! शाओं के बीचमे इतने दिन तक राजा को उन्हीसी विनती करी" भेघवर्णने कहा-'महाराग! सा मारने केले, असा अपने पयोजन के लिये, क्या नहीं करना । जोको वदति किराना मी दग्धुमिन्धनम् । शादयापि शानदीवेगो नियन्तति ॥ ५९ ॥ 21f, . लिये था या शिर पर नहीं उठाते हैं। 1 dai ! {{ग म को होता हुभा भी उIF देता है।॥ ५५ 14t यो,-

६१-६५] भाषाटीकासमलंकृत।
१८९
डन्यः पृथिव्यां लुलोठ । अनन्तरं ब्रह्मपुरवासिनः सर्वे
वास्तत्रागत्योपविशः।
5 पुराने उपवनमें मदविष नाम सर्प रहता था। वह अधिक बूढा होनेसे
[ भी हूँढनेके लिये असमर्थ हो सरोवरके किनारे पर लटक कर बैठा था।
दूसरे किसी मैंडकने देखा, और पूछा-क्या बात है जो तुम भोजनको नहीं
हो। सर्पने कहा-'हे मित्र ! जाओ, मुझ भाग्यहीनका क्या पूछना है "
आश्चर्ययुक्त हो कर उस मैंडकने यह कहा कि 'अवश्य ही कहो।' सर्पने कहा-
त्र! ब्रह्मपुरके निवासी कौडिन्य नाम वेदपाठीके सब गुणोंसे युक्त वीस
पुनको दुर्भाग्य और दुष्ट स्वभावसे मैंने डस लिया। तव उस सुशील
पुनको मरा दुआ देख कर कौडिन्य पछाड खा कर धरतीमे गिर पडा !
सव ब्रह्मपुरवासी वान्धव वहाँ आ कर बैठे।
चोकम्,
उत्सवे व्यसने युद्धे दुर्भिक्षे राष्ट्रविप्लवे ।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स वान्धवः ॥ ६१ ॥
आ कहा है-विवाह आदि उत्सवमें, दु खमें, सग्राममें, अकालमें, राज्यके
में, राजद्वारमें और श्मशान में जो साथ रहता है वह सच्चा वान्धव है' ॥
कपिलो नाम स्नातकोऽवदत्-'अरे कौण्डिन्य! मूढोऽसि ।
विलपसि?
हाँ एक कपिल नाम भिक्षुने कहा-'अरे कौडिन्य । तुम मूर्ख हो इसीसे
[ करते हो ? सुनो-
-
फोडीकरोति प्रथमं यथा जातमनित्यता।
धात्रीव जननी पश्चात्तथा शोकस्य कः क्रमः॥ १२ ॥
से पहले प्राणीके उत्पन्न होते ही, अनित्यता ग्रहण करती है, वैसे ही पीछे
है समान माता गोदमें सिलाती है, इसलिये इसमें शोक्की कोनसी वात
॥ ६२ ॥
क गताः पृथिवीपालाः ससैन्यवलवाहनाः।
वियोगसाक्षिणी येपा भूमिरद्यापि तिष्ठति ॥ ६३ ॥
नाके चतुरग वल तथा हाथी, घोड़े इत्यादिसे युक्त राजा कहाँ गये कि
फी वियोगी साक्षी देने वाली पृथ्वी आज तक वर्तमान हे ॥ १३ ॥
कायः संनिहितापायः संपदः पदमापदाम् ।
समागमाः सापगमा. सर्वमुत्पादि भगुरम् ॥ ६ ॥
और दूसरे-गरीरके सग नाश है, उपत्तियों विपत्तियोका स्थान ह, समागम
नियोग है, और तब उत्पन्न होने वाली वस्तु नाश होने वाली ह॥६॥
प्रतिक्षणमयं काय.क्षीयमाणो न लक्ष्यते ।
आमकुम्भ इवाम्भ स्थो विशीर्णः सन्विनाव्यते ॥६५॥

1-11 - + -- १९२ हितोपदेश। [सधिः ८०-८१ यामेव रात्रि प्रथमामुपैति गमें निवासी नरवीरलोकः। ततः प्रभृत्यस्खलितप्रयाणः स प्रत्यहं मृत्युसमीपमेति ॥ ८० ॥ वोर पुरुष जित पहली रातको गर्भने आता है उसी दिनते निरतर बाहे कह निल मृत्युके पास सरकता जाता है ॥ ८० ॥ जत. संसार विचारयः। शोकोऽयमसानस्य प्रपञ्चः। इसलेचे तसारको विचारो। यह शोक अशान का पारा है। पर- वज्ञानं कारणं न स्याद्वियोगो यदि कारणम् । शोको दिनेषु गच्छत्सु वर्धतामपयाति किम् ॥ ८१ ।। मो-जो लोगही दुनमा तारण होता ओर अशान कारण होता पर शोक नाहिये पा, फिर भता घटता यो जाता ...मोका कारण है ॥ ८॥ मानम तुसंहि। शोकनची परिहर । HE मात्माको स्थिर कगे, शोकीन को दूर करो, है।

धिः ८५-८८] भाषाटीकासमलंकृत। क्योंकि-किसी आश्रममे अनुरक होय, दुखी हो कर भी धर्मका आचरण और सब प्राणियोंमें समान मेह रखे, क्योंकि सिर मुंडा कर गेरुए कपड़े दि धारण वगेरह चिन्हही धर्मका कारण नहीं है ॥ ८४ ॥ वृत्त्यर्थ भोजनं येषां संतानार्थ च मैथुनम् । वाक् सत्यवचनार्थाय दुर्गाण्यपि तरन्ति ते ॥ ८५॥ औरभी कहा है-जिन मनुष्योंका केवल आजीविकाके लियेही भोजन , सतान उत्पन्न करनेके लियेही मैथुन है और सत्य वचन बोलनेके लियेही पा है वे कठिन स्थानोंसेभी पार हो जाते हैं । ८५ ॥ या हि- आत्मा नदी संयमपुण्यतीर्था सत्योदका शीलतटा दयोर्मिः। तत्राभिपेकं कुरु पाण्डुपुत्र! न वारिणा शुध्यति चान्तरात्मा ॥ ८६ ॥ जैसा कहा है कि-हे युधिष्ठिर ! इन्द्रियोंका सयमन (रोकना)ही जिसका यतीर्थ है, सलही जिसका जल है,शील जिसका किनारा है और दयाही जिसमें हारयोंकी माला है, ऐसी आत्मारूपी नदीमें स्नान कर, क्योंकि केवल पानीसेही दरकी आत्मा शुद्ध नहीं होती है ॥ ८६ ॥ शेपतश्च,- जन्ममृत्युजराव्याधिवेदनाभिरुपद्रुतम् । संसारमिममुत्पन्नमसारं त्यजतः सुखम् ॥ ८७ ॥ और विशेष करके जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग और शोक इनसे भरे हुए सन्त असार इस तसारको छोड़ देने वाळे मनुष्यको सुख है ॥ ८७ ॥ तः दु.खमेवास्ति न मुखं यस्माद्यदुपलक्ष्यते । दुःखार्तस्य प्रतीकारे सुखसंज्ञा विधीयते' ॥ ८८ ॥ क्योंकि-इस ससारमे दु खही दु ख है सुख नहीं है कि जिस दु ससे वह सभी अनुभव होता है, क्योंकि दुसते पीडित मनुष्य के दुख दूर होने पर ह दु सही सुख रहाता है' ॥८८ ॥ ण्टिण्यो व्रते-'एवमेव ।' ततोऽहं तेन शोकाकुलेन ब्राह्मणेन गत:-'यदद्यारभ्य मण्डकानां वाहनं भविष्यसि' इति । कपिलो -'संप्रत्युपदेशासहिष्णुर्भवान् । शोकाविष्टं ते दृदयम् । कान्य बोला कि-'ऐतेही है ॥' तव उस सोक्ते व्याकुल बाझाबे मुझे साप दिया-'आज रे कर तू नेट्वों वाहन होगा।' कपिल बोला-'दुन अभी १७ हित भाषाटीकासमलंकृत। : ९१-९३] समुत्रों को खा लो।' फिर “यह महाप्रमाद मैंने ग्रहण किया" यह कह कर उसने मक्रमसे मेढ़कोंको खाने लगा। फिर मेढकोंसे खाली सरोवरको देख कर मेढ- के राजाकोभी खा लिया इसलिये मैं कहता हू, “शत्रुओंकोभी कधे पर चढावे' आदि हे महाराज ! पहले वृत्तान्तके कहनेको अब रहने दीजिए सब प्रकारसे ह हिरण्यगर्भ राजा मन्धि करने योग्य है इसलिए मेरी समझमें तो मन्धि लीजिये ' राजाने कहा-'यह तुम्हारा कैमा विचार है ? क्योकि इसको तो जीत चुके हैं, फिर जो वह हमारी सेवाके लिये रहे तो भलेही रहे नहीं ने युद्ध किया जाय ।। मत्रान्तरे जम्बुद्वीपादागत्य शुकेनोक्तम्-'देव ' सिंहलद्वीपस्य {सारसो राजा संप्रति जम्बुद्वीपमाक्रम्यावतिष्ठते ।' राजा ससभ्रम ते-'कि किम् ?' शुकः पूर्वोक्तं कथयति । गृध्र. स्वगतमुवाच- वा साधु रे चक्रवाक मन्त्रिन् सर्वज्ञ ! साधु साधु ।' राजा सकोप- :-'आस्ता तावदयम् । गत्वा तमेव समूलमुन्मूलयामि । इसी अवसरमे जम्बूद्वीपसे आ कर नोतेने कहा-'महाराज | सिंहलद्वीपका पारस राजा अव जम्बूद्वीपको घेरे हुये टटा हुआ है।' राजा घवरा कर वोला-'क्या ' तोतेने पहिली वात दुहरा कर कही । गिद्धने अपने मनमे सोचा कि वन्य अरे चकवे मत्री सर्वज्ञ ! तुझे वन्य है, धन्य है ।" राजा असला कर भला-'इसे तो रहने दो। मैं जा कर उसीको जड़से नाश करूगा' दूरदर्शी विहस्याह- 'न शरन्मेघवत्कार्य वृथैव धनगर्जितम् । परस्यार्थमनर्थ वा प्रकाशयति नो महान् ॥ ९१ ॥ दूरदर्शी हस कर वोला-'शरद् ऋतु के मेघके समान था गभीर गर्जना नहीं सहिये, बडे पुरुष शत्रुके अर्थको अयवा अनयको प्रकट नहीं करते हैं ॥ ९१ ।। । वार मपर च,- . एकदा न विगृह्णीयाद्वहनराजाभिघातिन । सदर्पोऽप्युरग. कीटवटुभिनाश्यते ध्रुवम् ॥ ९२ ॥ और दूसरे-राजा एकही समय पर वहुनसे शत्रुओस नहीं लेटे, क्यो कि, सहकारी सर्पमोमी निश्चय वरवे बहुतसी (क्षुद्र) चीटिया मार डालती ह ॥१२॥ देव! किमिति विना संधान गमनमस्ति ? यतस्तदासत्पश्चात्य- कोपोऽनेन कर्तव्यः। हे महाराज ! विना मेल किये देते जाते हो । क्योरि फिर हमारे जानेक '५द यह परा पोप करेगा ar SITE नपरच,- योऽर्थतत्त्वमविज्ञाय मोधस्यैव वशं गत । स तथा तप्यते मूढो बाहागो नलाद्यथा' ॥ ९३ ॥ Ftore

संधिः ९५-९८] भापाटीकासमलंकृत ।
१९७
मोला नाह्मणको आता देख लोहसे ल्हिसे हुए मुख तथा पैर किये शीघ्र पास
साकर उसके चरणों पर लोट गया. फिर उस ब्राह्मणने उसे वैसा देख कर "इसने
गारकको खा लिया है" ऐसा समझ कर नौलेको मार डाला. पीछे ब्राह्मणने जो
बालकके पाम आ कर देखा तो वालक अच्छा है और सर्प मरा हुआ पड़ा
। फिर उस उपकारी नौलेको देख कर मनमे घबरा कर बड़ा दु खी
हुआ
इसलिये मैं कहता हू, “जो वातके भेदको न जान कर" इत्यादि.
मपर च,-
कामः क्रोधस्तथा मोहो लोभो मानो मदस्तथा ।
पवर्गमुत्सृजेदेनमसिंस्त्यक्ते सुखी नृपः ॥ ९५ ॥
! और दूसरे-काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहकार, तथा मद इन छ बातोंको
लेह देना चाहिये, और इनके त्यागनेसे राजा सुखी होता है' ॥ ९५ ॥
राजाह-'मन्त्रिन् ! एप ते निश्चयः?' मन्त्री ब्रूते-'एवमेव ।
राजा बोला-'हे मत्री ! यह तेरा निश्चय है ? मत्रीने कहा-'हा, ऐसाही है.
पता
स्मृतिश्च परमार्थपु वितर्को ज्ञाननिश्चयः।
दृढता मन्त्रगुप्तिश्च मन्त्रिणः परमो गुणः ॥ ९६ ॥
क्योकि-धर्मके तत्त्वोंमे सरण, विवेक, बुद्धिकी स्थिरता, दृढ़ता, और मत्रको
उस रखना ये मत्रीके मुख्य गुण हैं ॥ ९६ ॥
तथा च,-
सहसा विधीत न किया.
मविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृश्यकारिणं
गुणलुब्धा. स्वयमेव संपदः ॥९७ ॥
औरभी कहा है-एकाएक विना विचारे कोई काम न करना चाहिये, क्योंकि
विवेक याने विवेकवा न होना आपत्तियोंका मुख्य स्थान है. और गुणको
चाहने वाली सपत्तिया विचार कर करने वाले(सदसद्विवेकी पुरुप)के पास
मापसे आप चली आती है॥ ९७ ॥
तद्देव ! यदिदानीमस्मद्वचनं क्रियते तदा संधाय गम्यताम् ।
इसलिये हे महाराज ! जो अब मेरी बात मानों तो मेल करके चलिये ।
यतः-
यद्यप्युपायाश्चत्वारो निर्दिष्टाः साध्यसाधने ।
सख्यामानं फलं तेपां सिद्धिः सानि व्यवस्थिता ॥९८॥
क्योंकि यद्यपि मनोरयके सिद्ध करनेने चार उपाय ( साम, दाम, दड और
भेट ) हे तपापि उन उपायोंका फल, पेवल गिनतीही है परन्तु कार्यका
सापन नेलमे रहता , अर्थात् नेटसेटी कार्य बन जाता है ॥ ९८ ॥

१९९
- संधिः १०१-१०४ ] भापाटीकासमलंकृत ।
-
वह दूरदशी वडा सज्जन है । अथवा ऐसा मन्दबुद्धियोंका नियम है कि कभी तो
शका नहीं करते हैं, कमी सर्वत्र शका करते हैं।
तथा हि,
सरसि वहुशस्ताराच्छाये क्षणात्परिवञ्चितः
कुमुदविटपान्वेपी हंसो निशास्वविचक्षणः ।
न दशति पुनस्ताराशङ्की दिवापि सितोत्पलं
कुहकचकितो लोकः सत्येऽप्यपायमपेक्षते ॥ १०१॥
पुमुदिनीको दृढने वाला चतुर हस रातको सरोवरमे वहुतसे तारोकी परछा-
इसे क्षणभर ठगा हुआ (अर्थात् तारोंकी परछाईको कुमुदिनी जान कर) दिनमेभी
तारोंची शकासे फिर श्वेतकमलोंको नहीं लेता है, जैसे छलसे छला गया ससार
सत्यमेंभी बुराईकी शका करता है ॥ १०१ ॥
दुर्जनदूपितमनसः सुजनेष्वपि नास्ति विश्वासः ।
वालः पायसदग्धो ध्यपि फूत्कृत्य भक्षयति ॥ १०२ ॥
दुष्टोंसे उले हुए चित्त वाले मनुप्यका सज्जनोंमेभी विश्वास नहीं रहता है.
जैसे क्षीरसे जला हुआ बालक दहीकोभी सचमुच फूक फूक कर खाता है ॥१०२॥
तद्देव ! यथाशक्ति तत्पूजार्थ रत्नोपहारादिसामग्री सुसजीक्रिय-
ताम् ।' तथानुष्टिते सति स गृध्रो मन्त्री दुर्गद्वाराच्चक्रवाकेणोप-
गम्य सत्कृत्यानीय राजदर्शनं कारितो दत्तासने चोपविष्टः । चक्र-
वाक उवाच-'युप्मदायत्तं सर्वम् । स्वेच्छयोपभुज्यतामिदं
राज्यम् ।' राजहंसो ब्रूते-'एवमेव ।' दूरदर्शी कथयति-'एवमे-
वैतत् । कित्विदानी वहुप्रपञ्चवचनं निष्प्रयोजनम् ।
इसलिये महाराज ! शक्तिके अनुसार उसके सत्कारके लिये रत्नोंकी भेट
आदि सामग्री अच्छे प्रकारसे तयार कीजिये। फिर ऐसा करने पर उस गिद्ध
मत्रीको गढके द्वारसे चकवेने पास जा कर आदरपूर्वक लिवाला कर राजाका
दर्शन कराया और वह दिये हुए आसन पर बैठ गया। फिर चकवा वोला-'सप
तुम्हारे आधीन है। अपनी इच्छानुसार इस राज्यको भोगिये।' राजसने कहा-
'हा, ठीक है।' दूरदर्शी वोला-'हा, यह ऐतेही हो । परन्तु अव बहुतसी
प्रपञ्चमी वात वृथा है.
Ic
देव
यत.,-
-
लुब्धमर्थन गृह्णीयात्स्तब्धमजलिकर्मणा।
मूर्य छन्दानुरोधेन याथातव्येन पण्डितम् ॥ १०३ ॥
क्योंकि-लोनीवो वनसे, अभिमानीको हाच जोड़ कर, मूर्सको उसका मनोरथ
पूरा करके और पण्डितको ज्योंकी वो सच सच कह पर वशमें करना
चाहिये ॥ १.३॥
अन्यथा
सद्भावेन हरेन्मित्रं संभ्रमेण तु वान्धवान् ।
स्त्रीनृत्यो दानमाना-या दाक्षिण्येनेतराजनान् ॥ १०४ ॥

भ्यन्तरं चलितः । ततःप्रणिधि केनागत्य राशो हिरण्यगर्भस्यो १९८ हितोपदेश । [संधिः ९९-२००१८ राजाह-'कथमेवं संभवति ?' मन्त्री ब्रूते-'देव! सत्वरं भविता प्यति। यह सुन कर राजा बोला-'ऐसा कैसे हो सकता है ?' मंत्रीने कहा-'महार, राज! शीघ्र हो जायगा। पश्य,- अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः। ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रजयति ॥ ९९ ॥ क्योंकि-मूर्ख सहजमे मिलाने योग्य है, और अधिक बुद्धिमान् औरभी न सहजमें प्रसन्न कर लिया जाता है परन्तु थोड़ेही ज्ञानसे अभिमानी मनुष्यको वन ब्रह्माभी प्रसन्न नहीं कर सकता है ॥ ९९ ॥ विशेषतश्चायं धर्मज्ञो राजा सर्वशो मन्त्री च । शातमेतन्मया पूर्व मेघवर्णवचनात्तकृतकार्यसंदर्शनाच्च । और विशेष करके यह राजा धर्मशील और मत्री सर्वज्ञ है। मैंने यह पहलेही. मेघवर्णकी वातसे और उनके किये हुए कार्योंके देखनेते जान लिया था यतः, । कर्मानुमेयाः सर्वत्र परोक्षगुणवृत्तयः। तस्मात्परोक्षवृत्तीनां फलैः कर्मानुभाव्यते' ॥ १०० ॥ क्योंकि-सर्वत्र परोक्षमें गुणोंसे युक्त अर्थात् अपने गुणोंको नहीं प्रकटार करने वाले पुरुष कर्मसे जाने जाते हैं। इसलिये जिनका आकार और हृदयकान् भाव छुपा हुआ है ऐसे महान् पुरुषोंको कर्मके वलसे निश्चय करे' ॥ १०० ॥ र राजाह-'अलमुत्तरोत्तरेण । यथाभिप्रेतमनुष्ठीयताम्।' एतन्मन्नगद यित्वा गृध्रो महामन्त्री 'तत्र यथाई कर्तव्यम् ।' इत्युक्त्वा दुर्गामा निवेदितम्–'देव! संधि कर्तु महामन्त्री गृधोऽसत्समीपमा न्ह गच्छत् ।' राजहंसो ब्रूते-'मन्निन् ! पुनः संवन्धिना केनचिदत्रा- गन्तव्यम् ।' सर्वशो विहस्याह-'देव ! न शङ्कास्पदमेतत् । यतोऽसौ महाशयो दूरदर्शी । अथवा स्थितिरियं मन्दमतीनाम् । कदाचिच्छदेव न क्रियते कदाचित्सर्वत्र शङ्का । राजा वोला-'इस उत्तर प्रत्युत्तरवो रहने दो। जो करना है सो कीजिये यह परामर्श करके महामत्री गिद्ध "इसमें जो उचित होगा, सो किया जायगा" यह कह कर गढ़के अदर गया। फिर दूत वगलेने आ कर राजा हिरण्यगर्नसे निवेदन किया कि 'महाराज ! महामत्री गिद्ध हमारे पास मेल करने के लिये आया है ' राजहसने कहा-'हे नत्री ! फिर किसी न किसी सबन्धसे यहाआया होगा.' संयंत्र हँस कर बोला-'महाराज ! यह शकाका स्थान नहीं है. क्योंकि मा व M संधिः १०१-१०४ ] भापाटीकासमलंकृत । १९९ - दूरदशी वड़ा सजन है । अथवा ऐसा मन्दबुद्धियोंका नियम है कि कभी तो शका नहीं करते हैं, कमी सर्वत्र शका करते हैं। तथा हि- सरसि बहुशस्ताराच्छाये क्षणात्परिवञ्चित: कुमुद विटपान्वेपी हंसो निशाखविचक्षणः। न दशति पुनस्ताराशकी दिवापि सितोत्पलं कुहकचकितो लोकः सत्येऽप्यपायमपेक्षते ॥ १०१ ॥ कुमुदिनीको इढने वाला चतुर हस रातको सरोवरमे बहुतसे तारोकी परछा- इसे क्षणभर ठगा हुआ (अर्थात् तारोंकी परछाईको कुमुदिनी जान कर) दिनमेभी तारोंकी शकासे फिर चेतकमलोंको नहीं लेता है, जैसे छलसे छला गया ससार सलमभी बुराईकी शका करता है ॥ १०१ ॥ दुर्जनदूपितमनसः सुजनेष्वपि नास्ति विश्वासः। वालः पायसद्ग्धो ध्यपि फूत्कृत्य भक्षयति ॥ १०२॥ दुष्टोंसे छले हुए चित्त वाले मनुप्यका सज्जनोंमभी विश्वास नहीं रहता है. जैसे क्षीरसे जला हुआ वालक दहीकोभी सचमुच फूक फूक कर खाता है ॥१०२॥ तद्देव ! यथाशक्ति तत्पूजार्थ रत्नोपहारादिसामनी सुसजीक्रिय- ताम् ।' तथानुष्टिते सति स गृध्रो मन्त्री दुर्गद्वाराचक्रवाकेणोप- गम्य सत्कृत्यानीय राजदर्शनं कारितो दत्तासने चोपविष्टः । चक्र- वाक उवाच-'युप्मदायत्तं सर्वम् । स्वेच्छयोपभुज्यतामिदं राज्यम् ।' राजहंसो ब्रूते-'एवमेव ।' दूरदर्शी कथयति-'एवमे- वैतत् । कित्विदानी वहुप्रपञ्चवचनं निष्प्रयोजनम् । इसलिये महाराज ! शक्तिके अनुसार उसके सत्कारके लिये रत्नोंकी भेट आदि सामग्री अच्छे प्रकारते तयार कीजिये। फिर ऐसा करने पर उस गिद्ध मनीको गढके द्वारसे चकवेने पास जा कर आदरपूर्वक लिवाला कर राजाका दर्शन कराया और वह दिये हुए आसन पर बैठ गया। फिर चकवा बोला-'सब तुम्हारे आधीन है। अपनी इच्छानुसार इस राज्यको भोगिये।' राजहसने कहा- 'हा, टीक है।' दूरदशी बोला-'हा, यह ऐसेही हो । परन्तु अव बहुतसी प्रपञ्चकी बात पृथा है. यतः,- लुब्धमन गृहीयात्स्तब्धमालिकर्मणा। मूर्ख छन्दानुरोधेन याधातथ्येन पण्डितम् ॥ १०३ ॥ क्योंकि-लोभीको धनसे, अभिमानीको हार जोड़ कर, मूर्सको उसका मनोरय पूरा करके और पण्डितको ज्योंकी लॉ सच सच कह पर पाने करना चाहिये ।। १०३ ॥ जन्यच,- सहावेन हरेन्मित्रं संभ्रमेण तु वान्धवान् । सोमृत्यो दानमानान्यां दाक्षिण्येनेतराजनान् ।। १०४ ॥ - २०० हितोपदेश। [सधिः १०५-११०१ - ३ और दूसरे-विनयसे मित्रको, मीठी बातोंसे वाधवोंको, दान तथा मानसे स्त्री और सेवकोंको तथा चतुरतासे और और लोगोंको वश करना चाहिये ॥१०॥ तदिदानी संघाय गम्यताम् । महाप्रतापश्चित्रवर्णो राजा।' चक्र- वाको ब्रूते-'यथा संधान कार्य तदप्युच्यताम् ।' राजहंसो ब्रूते- 'कति प्रकाराः संधीनां संभवन्ति ?' इसलिये अव मेलके लिये चलिये, चित्रवर्ण राजा वढा प्रतापी है। चकवा वोला-'जैसे मेल करना चाहिये सोभी तो कहिये।' राजहस बोला-'सधियां : कितने प्रकारकी है ? गृध्रो ब्रूते-'कथयामि श्रूयताम्,- गिद्ध वोला'-कहता हूं। सुनिये,- वलीयसाभियुक्तस्तु नृपो नान्यप्रतिक्रियः। आपन्नः संधिमन्विच्छेत्कुर्वाणः कालयापनम् ॥ १०५ ॥ सवल शत्रुके साथ जिसने युद्ध कर रक्खा है और सधिको छोड़ और कोई : जिसका उपाय नहीं, ऐसे आपत्तिमें गिर कर समय व्यतीत करते हुये राजाको सधिकी प्रार्थना करनी चाहिये ॥ १०५ ॥ कपाल उपहारश्च संतान: संगतस्तथा । उपन्यासः प्रतीकारः संयोगः पुरुषान्तरः ॥ १०६॥ और कपाल, उपहार, सतान, सगत, उपन्यास, प्रतीकार, सयोग, पुरुषा- तर, ॥ १०६॥ अदृष्टनर आदिष्ट आत्मादिष्ट उपग्रहः। परिक्रयस्तथोच्छन्नस्तथा च परभूषणः ॥ १०७ ।। अदृष्टनर, आदिष्ट, आत्मादिष्ट, उपग्रह, परिक्रय, उच्छन्न, और पर- भूपण, ॥ १०७॥ स्कन्धोपनेयः संधिश्च पोडशेते प्रकीर्तिताः। इति पोडशकं प्राहुः संधि संधिविचक्षणाः ॥ १०८ ॥ स्कधोपनेय, यह सोलह प्रकारकी सधि कही गई है और सविके जानने वाले इन्हीं सोलह सधि कहते हैं ॥ १०८॥ कपालसंविर्विज्ञेयः केवलं समसंधितः। संप्रदानाद्भवति य उपहारः स उच्यते ॥ १०९ ॥ केवल समान वालेके साथ मेल करनेको “कपालसधि" कहते हैं, और जो चन देनेसे होती है वह "उपहारसधि" कहलाती है ॥ १०९ ॥ संतानसंधिर्विक्षेयो दारिकादानपूर्वकः । सद्भिस्तु संगतः संधिमैत्रीपूर्व उदाहृतः ॥ ११० ।। कन्यादान देनेसे जो हो उसे "सन्तानसवि" जाननी चाहिये और सबनों के साथ मित्रतापूर्वक मेल करने “सगतसवि" कहते हैं ॥ ११०॥ - संधिः १११-११९] भाषाटीकासमलंकृत । २०१ यावदायुःप्रमाणस्तु समानार्थप्रयोजनः। संपत्तौ वा विपत्तौ वा कारणैर्यो न भिद्यते ॥ १११॥ जितना अवस्थाका प्रमाण है तब तक समान धनसे युक्त रहे और सपत्ति या विपत्तिमें अनेक कारणोंसेमी नहीं टूटे ॥ १११ ॥ संगतः संधिरेवायं प्रकृष्टत्वात्सुवर्णवत् । तथान्यैः संधिकुशलैः काञ्चनः स उदाहृतः॥ ११२ ॥ वह संगतसधि परमोत्तम होनेसे सुवर्णके समान है और दूसरे सवि जानने वालोंने इसको "काचनसधि" कही है, अर्थात् सुवर्णके समान, नव भलेही जाय परन्तु टूटती नहीं है ॥ ११२ ॥ आत्मकार्यस्य सिद्धि तु समुद्दिश्य क्रियेत यः। स उपन्यासकुशलैरुपन्यास उदाहृतः ॥ ११३ ॥ अपना काम निकालनेके अभिप्रायसे जो की जाती है उसे नीति जानने वाले "उपन्चाससधि" कहते हैं ॥ ११३ ॥ मयास्योपकृतं पूर्व ममाप्येप करिष्यति । इति यः क्रियते संधिः प्रतीकारः स उच्यते ॥ ११४॥ मैंने पहले इसका उपकार किया है यहभी मेरा करेगा इस हेतुसे जो सधि की जाती है उसे "प्रतीकारसधि" कहते हैं । ११४ ॥ उपकारं करोप्यस्य ममाप्येप करिष्यति । अयं चापि प्रतीकारो रामसुग्रीचयोरिव ॥ १२५ ॥ और मै इसका उपकार करता हूं यहभी मेरा करेगा यहभी दूसरे प्रकारकी राममुग्रीव जैसी प्रतीकारसधि है ॥ ११५ ॥ एकार्थी सम्यगुद्दिश्य क्रियां यत्र हि गच्छति । सुसंहितप्रमाणस्तु स च संयोग उच्यते ॥ ११६ ॥ जहा एकही प्रयोजनके करने के लिये दृढ़ प्रमाणोंसे युक्त सधि होती है उससे "सयोगसवि" कहते है ॥ ११६ ॥ आवयोर्योधमुख्यैस्तु मदर्थः साध्यतामिति । यस्मिन्पणस्तु क्रियते स संधिः पुरुपान्तरः॥ ११७ ॥ हम दोनों के मुख्य योद्धा लोग हमारा कार्यसावन करे ऐसी जिनमे प्रतिज्ञा की जाती है वह "पुल्पातरसधि" है ॥ ९१७ ॥ त्वयकेन मदीयोऽर्थः संप्रसाध्यस्त्वसाविति । यत्र शत्रुः पणं कुर्यात्सोऽहष्टपुरुपः स्मृतः ॥ ११८ ॥ और केवल तुझेही मेरे कामको अच्छी तरह कर देना चाहिये ऐसी प्राविना जिम सपिने शत्रु परे उसे "अपुरुपतरि" कहते ह ॥ ११८ ॥ या भूम्येकदेशेन पणेन रिपुर्जितः। संधीयते सधिविद्भिः स चादिष्ट उदाहत. ॥ ११९ ।।

२८२
हितोपदेश।
[संधिः १२०-१२६
जहा राज्यका एक भाग देनेके पणसे वलवान् शत्रुके साथ जो सवि की
जाती है उसको सधि जानने वाले "आदिष्टसधि" कहते हैं ॥ ११९ ॥
खसैन्येन तु संघानमात्मादिष्ट उदाहृतः।
क्रियते प्राणरक्षार्थ सर्वदानादुपग्रहः ॥ १२० ॥
अपनी सेनाके साथ जो सधि करता है वह "आत्मादिष्टसधि" है और तो
अपनी रक्षाके लिये सर्वख दे कर की जाती है वह "उपग्रहसधि" है ॥१२०॥
कोशांशेनार्धकोशेन सर्वकोशेन वा पुनः ।
शिष्टस्य प्रतिरक्षार्थ परिक्रय उदाहृतः ॥ १२१ ॥
जो कोशसे कुछ भाग, आधे कोशसे या संपूर्ण कोशसे सज्जन मत्रीकी
रक्षाके लिये की जाती है वह "परिक्रयसधि" कही गई है ॥ १२१ ॥
भुवां सारवतीनां तु दानादुच्छिन्न उच्यते ।
भूम्युत्थफलदानेन सर्वेण परभूषणः ॥ १२२ ।।
सारवती अर्थात् अन्नसे पूर्णा भूमिके देनेसे जो हो उसे "उच्छिन्नसधि" कहते
हैं और भूमिमे उपजे हुए सपूर्ण फलके देनेसे जो हो उसे "परभूपणसधि"
कहते है ॥ १२२ ॥
परिच्छिन्नं फलं यत्र प्रतिस्कन्धेन दीयते ।
स्कन्धोपनेयं तं प्राहुः संधि संधिविचक्षणाः ॥ १२३ ॥
और जिसमे सेतसे लाया हुआ और स्वच्छ किया हुआ अन्न कधोंके ऊपर लिवा
ले जा कर दिया जाता है सधि जानने वाले उसको "स्कन्धोपनेयसधि" कहते
है॥ १२३ ॥
परस्परोपकारस्तु मैत्री संबन्धकस्तथा ।
उपहारश्च विज्ञेयाश्चत्वारश्चैव संधयः॥ १२४ ॥
परस्पर आपसमें उपकार, मित्रता, सवन्ध तथा भेट येभी चार प्रकारको
सवि जाननी चाहिये ॥ १२४ ॥
एक एवोपहारस्तु संधिरेव मतो मम ।
उपहारविभेदास्तु सर्व मैत्रविवर्जिताः ॥ १२५ ॥
केवल उपहार अर्थात् भेटही एक उपहार सधि है यह मेरी समति है ओर
उपहारसे भिन्न और सब प्रकारसी सधिया मित्रता करके रहित ह ॥ १२५ ॥
अभियोक्ता वलीयस्त्वादलवा न निवर्तते ।
उपहाराहते तस्मात्संधिरन्यो न विद्यते ॥ १२६ ॥
और चढाई करके युद्ध के लिये आने वाला शत्रु बलवान् होनेसे थोड़ाभी न
विना लिये नहीं लौटता है इसलिये उपहारको छोड़ दूसरे प्रकारती सवि नहीं
राजाह-भवन्तो महान्तः पण्डिताश्च । तदवास्माकं यथाकार्य-
मुपदिश्यताम् ।' मन्त्री बने-'आः! किमेवमुच्यते ?
राजा बोला-'भाप लोग तो पडे पटित है। इसलिये हमसे जो करना
चाहिये नो उपदेश नीजिये। मत्री बोला-'अजा! आप क्या कहते है।
है' ॥ १२६ ॥

सधिः १२७-१३०] भाषाटीकासमलंकृत । २०३ आधिव्याधिपरीतापादद्य श्यो वा विनाशिने। को हि नाम शरीराय धर्मापेतं समाचरेत् ॥ १२७ ॥ मनका सताप, रोग और पुत्रादिक वियोगसे उत्पन्न हुआ फ्लेश इनसे आज अथवा कल विनाश पाने वाले शरीरके लिये कौनसा मनुष्य धर्मरहित आचरण करेगा॥ १२ ॥ जलान्तश्चन्द्रचपलं जीवितं खलु देहिनाम् । तथाविधमिति ज्ञात्वा शश्वत्कल्याणमाचरेत् ॥ १२८ ।। देहधारियोंका जीवन निश्चय करके पानीके भीतर चन्द्रमाके बिंधके समान चचल है ऐसा इसे जान कर सर्वदा कल्याणका आचरण करना चाहिये १२८ मृगतृष्णासमं वीक्ष्य संसारं क्षणभङ्गुरम् । सज्जनः संगतं कुर्याद्धर्माय च सुखाय च ॥ १२९ ॥ मृगतृष्णाके समान क्षणभगुर संसारको विचार कर धर्म और सुखके लिये उजनोंके संग मेल करना चाहिये ॥ १२९ ॥ तन्मम संमतेन तदेव क्रियताम् । इसलिये मेरी समझसे वही करिये। रतः, अश्वमेधसहस्राणि सत्यं च तुलया कृतम् । अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेवातिरिच्यते ॥ १३० ॥ क्योंकि-सहस्रों अश्वमेध यज्ञ और सत्य, तराजूमें रख कर तोले गये तो सचमुच सहस्र अश्वमेधसे सत्यहीका पलड़ा भारी रहा ॥ १३० ॥ अतः सत्याभिधानदिव्यपुर सरमप्यनयोभूपालयोः काञ्चनाभिधा- नसंधिर्विधीयताम् ।' सवेशो ब्रूते-'एवमस्तु ।' ततो राजहंसेन राशा वस्त्रालंकारोपहारैः स मन्त्री दूरदर्शी पूजितः प्रहष्टमना- चक्रवाक गृहीत्वा राशो मयूरस्य संनिधानं गतः । तत्र चित्रवर्णन राक्षा सर्वशो गृध्रवचनाद्वहुमानदारपुर सर संभापितस्तथाविधं संधि स्वीकृत्य राजहंससमीपं प्रस्थापितः। दूरदर्शी बेते-'देव ! सिद्ध नः समीहितम् । इदानी खस्थानमेव विन्ध्याचलं व्यावृत्त्य प्रतिगम्यताम् । अथ सर्व स्वस्थानं प्राप्य मनोभिलपितं फलं प्रामुवन्निति। इसलिये सय वचनको स्वीकार करके इन दोनों राजाओको काचन नाम सपि करनी चाहिये. सर्वज्ञ बोला-'यही ठीक है.' फिर राजहमराजाने वन और जल कारोंकी नेटसे उस मत्री दूरदर्शीका सत्कार किया और वह प्रसवचित्त से पर चक्रवाकको ले कर राजा मयूरफे पास गया. और वहा गिद्धक वचनसे चित्रवर्ण राजा वटे आदरसत्तारपूर्वक सर्वज्ञसे बोरा और उसी प्रकारको भात् वाचननाम सधिको सौपार करके राजहसके पास विदा हुना। दूरदर्शी पोला-'महाराज ! हमारा मनोरप सिद्ध हुआ, अब अपने स्थान विध्याचलकोही रोट पर चलना चाहिये पिर समाने अपने अपने स्थान पर पहुंच कर - मगोपारित पाल पाया.

२०४ हितोपदेश। [ सधिः १३१-१३ - विष्णुशर्मणोक्तम्-'अपरं किं कथयामि ? कथ्यताम् राजपुत्रा ऊचुः-'तव प्रसादाद्राज्यव्यवहाराझं शातम् । ता सुखिनो भूता वयम् । विष्णुशर्माने कहा- और क्या कहू ? कहिये । राजपुत्र बोले-'आप प्रसादसे राजके व्यवहारका अग (राजनीति) जाना । और उससे । सुखी हुये। विष्णुशर्मोवाच-'यद्यप्येवं तथाप्यपरमपीदमस्तु,- तब विष्णुशर्मा बोले-'यद्यपि ऐसा है तथापि यह और होय,- संधिः सर्वमहीभुजां विजयिनामस्तु प्रमोदः सदा सन्तः सन्तु निरापदः सुकृतिनां कीर्तिश्चिर वर्घताम् । नीतिरिविलासिनीव सततं वक्षःस्थले संस्थिता वक्र चुम्बतु मन्त्रिणामहरहर्भूयान्महानुत्सवः ॥ १३१ ।। विजयशील राजाओंको सधि सदा प्रसन्न करने वाली हो, सज्जन मनु विपत्तिरहित हों, सत्कर्म करने वालोंका यश बहुत काल तक बढे, नीति वेश्या समान सर्वदा मन्त्रियोंके हृदय पर शोभायमान रह कर मुखचुम्बन करती र अर्थात् मुख और हृदयमें निवास करे और प्रतिदिन अधिक आनन्द हो ॥१३१ अन्यच्चास्तु यह और भी होय कि- प्रालेयाद्रेः सुतायाः प्रणयनिवसतिश्चन्द्रमौलिः स याव- द्यावल्लक्ष्मीर्मुरारेजलद इव तडिन्मानसे विस्फुरन्ती । यावत्स्वर्णाचलोऽयं दवदहनसमो यस्य सूर्यः स्फुलिङ्ग- स्तावन्नारायणेन प्रचरतु रचितःसंग्रहोऽयं कथानाम् ॥१३२ जब तक चन्द्रशेसर महादेवजी पार्वतीजी के साथ स्नेहपूर्वक बसें, जय र मेघने विजलीके समान श्रीविष्णु, भगवान्के हृदयमै लक्ष्मी निवास करे, जे जब तक जिसके चिनगारीके सम्रान सूर्य है ऐसा दावानलके समान मेरुपर्द स्थित रहे तर तक नारायणपण्डितका बनाया हुआ यह कथाओं का सम प्रचलित रहे ॥ १३२ ॥ . अपरच,- श्रीमान्धवलचन्द्रोऽसौ जीयान्माण्डलिको रिपून् । येनायं संग्रहो यताल्लेखयित्वा प्रचारितः ॥ १३३ ॥ और यह चक्रवर्ती श्रीमान् राजा धवलचन्द्र शत्रुओंको जीते कि चिन्ह यह सूग्रह यनसे लिसवा कर प्रचार किया ॥ १३३ ॥ इति । ५. रानेवरभट्टका किया हुआ हितोपदेशप्रयके संधिप्रकरण चतुर्व भागस मापा अनुवाद समाप्त हुआ शुभम्, समाप्तोऽयं हितोपदेशः ।

प्रथमं परिशिष्टम् । १ हितोपदेशगतकथासूचीपत्रम् । ९ . . २३ सपना व्याध, मृग, शूकर, मोर मकरटकनाम उपाख्यान ३पास नाम राजकुमार पदरमौर हाधिकी कथा ... २ गोदारा उपाख्यान... 1 दोषी कथा पृष्ठ. पृष्ट. प्रथम भाग-मित्रलाभ. वंदरकी मृत्युकी कथा १ कपूरपट नाम धोबी, उसकी 5, कछुआ, मृग और चूहेका युवा धोवन, गधा और कुत्तेकी कथा ७३ {वाघ और मुसाफिरकी कथा ११ दुर्दान्त नाम सिंह, एक चूहा ., म और गीदड़की और दधिकर्ण नाम विला. वकी कथा ८६ तामिद, बिलाव और चिड़ि- वदर, घटा, और कराला नाम २४ कुटनीकी कथा सारण सन्यासी और एक पनिक हिरण्यक नाम चूहेकी कदर्पकेतु नाम सन्यासी, एक बनिया, ग्वाला और उसकी व्यभिचारिणी स्त्री और दूती दनदास बूटा पनियां और नायनकी कथा रसी युवा स्त्री लीलावतीकी एक ग्वाला, उसकी व्यभि- ३८ चारिणी त्री, कोतवाल और उसके बेटेकी कथा साप और गीदड़की कथा कोएके जोड़े और काळे सर्पकी और १०१ युगा बनियेकी स्त्री लीलावती और उसके पति चारुदत्तकी दुर्दान्तनाम सिंह और एक बूटे गीदड़की कथा १०० ५८ टटिरीके जोड़े और समुद्रकी ११० दूसरा भाग-मुहदि. मान नाम वैश्य, सजीवर नाम तीसरा भाग-विग्रह तम, सिंगलनाम सिंद हिरण्यगर्भ नाम राजहंस, चित्र पण नाम मोर जौर इनके मत्री आदिशा उपास्मान १२१ ... ४८ कया पुन्। 1131 कथा उमर ६५ कथासूचीपत्रम् । ५ ... ... बगळे, . पृष्ठ. पक्षी और यन्दरोंकी कथा ... १२३ | अनागतविधाता, प्रत्युत्पन्नमति वाघवर ओढे हुए धोवीके -गधे और यद्भविष्यनाम तीन और खेतवालेकी कथा १२४ मछलियोंकी कथा हाथियोंके झुंड और विजय समुद्रदत्त नाम वनिया, उसकी नाम बूढे शशककी कथा १२६ रत्नप्रभा नाम बहू और इस, कौआ और एक मुसाफिर- उसके यारकी कथा की कथा १३० साप, और नोलेकी कथा ' पाक, बटेर और एक ग्वालेकी महातप नाम मुनि और एक कथा १३० चूहेकी कथा मदमति नाम बढई, उसकी छिनाल जवान स्त्री और उसके यारकी बूढे बगळे, केकड़े और मर- लीकी कथा कथा १३१ नीलमें रंगे देवशर्मा नाम ब्राह्मण और एक हुए एक गीदड़की १ मृत्युकी कथा कुम्हारकी कथा ... । ... १४० चीरवरनाम राजकुमार और उ. सके बेटेके बलिदानकी कथा १५० कथा चूडामणि नाम क्षत्रिय, एक नाई ब्राह्मण, बकरे और तीन चूताकी और भिखारीकी कथा १५४ कथा चौथा भाग-संघि. मदोत्कट नाम सिंह और उसके हस और मोरके मेलके उपा- सेवक काक, वाघ, सियार और ऊटकी कथा ख्यान सकट विकट नाम दो हंस, मंदविष नाम सर्प और एक में- और उनके मिन कवुग्रीव सक तथा माधव नाम ब्रामण कछुएकी कथा १६८ और सर्पकी कथा ... सुन्द उपसुन्द नाम दो दैत्योंकी १ ... ... १ .... १६७ । .

द्वितीयं परिशिष्टम् । २ हितोपदेशगतश्लोकविषयकसूचीपत्रम् । - श्लोक. पृष्ठ. -० १ २ . २ बगलाचरण तोपदेशकी प्रशंसा नयाकी प्रशंसा १,२ सबकी प्रशसा दोवन, धन, प्रभुता और २ अज्ञानताकी निन्दा उनकी निन्दा ३,४,६,१८,१९,६६. मारके छ सुख - मकी प्रशंसा ११ प्र. १२ - से २४ तक मि. ३८, ३९,४. सु. ७ २० २५,२६ प्र. २८, २९, ३३ मि. २१,५०,५१,५२ ३०, ३१, ३३ से ३५ तक ३२ ४१से ४७ तक परब्धकी मुख्यता - १४,२१ योगकी प्रशंसा प्रारब्धकी प्रशसा ६ उत्सगकी प्रशसा ७८ धर्मके आठ मार्ग १२ दानकी सफलता १२,१३ परमात्माकी रक्षा १२ पण्डितका लक्षण १३,५० सभावकी उत्कर्पता १३,१४१ विसकी अकर्तव्यता १४,३२ सभावकी मुख्य परीक्षा दाक वचनका प्रहण १५ संसारके दुख- १५ १५,१६ भागपपतापी निन्दा १६ कमी RIसा तथा रक्षण १६,१८९ ११,१६ १२ १४,१७० मि. १७ वि. ५८ '१९,८७ - २० २३ २५ सोभवी निन्दा २६,२७,२८ सि.३.स.६१ ४ लोकविषयकसूचीपत्रम् । क. ३२,१९२ मि. ३०, २०९, २१० ४०,४१॥ ४२. पृष्ठ. महात्माओंके ख. १७,५४ भावकी प्रशसा. त्यागनेके योग्य छ. दोष। समूहकी प्रशसा १७ सच्चा मित्रकी प्रशसा १८,६५ पुण्यात्माका लक्षण १८ शुभाशुभ कर्मका फल १९ आत्माकी मुख्य रक्षा- १९ प्राणों की मुख्य रक्षा. २० पराये अर्थ धन-जीवनका साग२०,१५२ यशकी मुख्यता २० शरीर और गुणका अतर । २१ अनेक मिन करनेकी मुख्यता २२ समानके साय समानकी प्रीति, २२ अपरिचितको वास न देना २३ केवल जातिमान जान कर २५ निरादर करनेकी निन्दा अतिथिका सत्कार - २५,२६,३६,३७ खग जानेमें मुख्यता २६ २६ उदरके लिये पातकनिन्दा असगुणीकी प्रशंसा २७ व्यवहारसे मित्र और शत्रुका ज्ञान २८ मि. ४४, वि. १०० ४७,४८ ५४,५५ ५६ ५८ मि ५८ से ६१ तक, १०७,१०८ ६४ धमेकी मुख्यता । मिन, शर, भार्या और २८ ७४,७, ४ वाघवकी परीक्षा वाधवका लक्षण २९ विपत्ति और मृत्युके)। पास होने का लक्षण २९,३३ मुभित्रका साग विश्वासघात ३० विद्यासघातीकी निन्दा दुनको निन्दा ३०,३१,३२,१०७ मि. ८०,८१,८२,८९, मु. १३॥ १९४,११५,१३१ से १३१ तक. १६४,१६५, वि.२३ पापके फटका समय ३१ ५८.१ पदमानके लिये नव गुप्तमत्र लोकविषयकसूचीपत्रम् । श्लोक. मि. ३८,१५ اسم له لس سم س س سه ه ه ه मित्रके दूषण . ३ परोपदेशमें चतुरता ॥ पृष्ठ. मनोंके स्थिर चित्तकी प्रशंसा ३२,३३० ८५,०६९ वार्जार, भैंसा, भेड़, काक और क्षुद्रो ७ ३२ बनुष्य इनके विश्वासकीअकर्तव्यता त्रुसे मेल करनेका त्याग ३२ १२ ३३ दर्जन और सज्जनका अन्तर । ९३ संगतिय कारण - ३३ ९४ सजन और दुर्जनका आकार ३३ श्रेष्ठ मित्रके गुण - ९५ मिट भाषणकी प्रशसा ૨૪ ९८ ३४ महात्मा और दुरात्माका लक्षण ३५ १००,१०१ १०२ बुद्धिमान्की प्रशसा ३५ १०३ रए देशमें निवासकी निन्दा १०४,१०५,१०६ पर पतिकी निन्दा ३८,३९ ११० से ११३ तक. मि. ११४ से १२२ तक, ३९,४०,९९ नयोंके निन्दा आदि दूषण (१००, १०१ सु ११५ से ११९ तक. [४१,४२,६५ मि. १२३ से १२९ तक. 1६६,६७,९१ २,३,८,९,१०,९३ १३०,१३१ मनस्वीकी प्रशसा १३२ से १३५ तक. निर्धनताकी निन्दा ४३,४४,४६,९१ मि १३६ से १३८, १५१ सु. ९३ याचनाको निन्दा १३९ पुरुषविडबना १४० पुरपके जीवनमें मरण १४१ और मरणमें विधाम लोभपी निन्दा १४२ भसतोषकी निन्दा ४५ १४३ सतोपकी निन्दा ४५,४६ १४४,१४५,१४८ नरनिराशावी प्रशसा ४५ मनुष्य के जीवनकी प्रशसा धर्म, जुस, भेद आदिका निर्णय १४९ पदरताकी प्रासा १५० ६. मनुष्य के लिये मुख्य त्याग १५१ राधानताकी निन्दा १५२ धर्मकी प्रशसा ४४ १८७ श्लोकविषयकसूचीपत्रम् । ४८ १॥ सुखदुखका भोग १८ 4 पृष्ठ. सोक धनहीन जीवनकी निन्दा ४६ ससाररूपी वृक्षके दो फल धर्मकी प्रशंसा १५५ दानकी प्रशसा ४७,६६,६७ मि. १५६ सु. ८,१०,११,१२ कृपणकी निन्दा ४७,४८ १५५, से १३२ तक ससारमें दुर्लभ वस्तु मृत्युके निमित्तकारण ४९ धनवान्के घनका निर्णय १६८,१६९ उद्योगी पुरुषकी प्रशंसा ५०,५१ १७१ से १७६ तक स्थानभ्रष्ट होनेकी निन्दा ५२ लक्ष्मीका निवास ५२ वीरपुरुषकी प्रशंसा धनवान् हो कर निर्धनताकी निन्दा ५२ १८. किंचित् काल भोगने योग्य वस्तु ५२ ईश्वरके आधीन जीविका ५२,५३ १८२,१८ धनकी निन्दा ५३,५४ १८४ से १८९ तक तृष्णाके त्यागकी प्रशंसा ५५ सजनकी प्रशंसा दानी मनुष्यकी प्रशसा चार प्रकार के मित्र मग्रीश्री प्रशसा ५६ त्रियोंके ध्रुफुटीरूपी १५ पागोंते धैय का नाश जियोंके दोष पतित्रताका लक्षण ५८ राजाकी प्रशसा. ५९,८५,८६ ६ मि. २०३ से २०६ तक. स. ८ १६५,१८७ ८२ वि. १४४, १४५ ५ दुख दुस्सा होना ६२ उत्पत्तिका अवश्य नाश ૬િ૨ मित्रकी प्रशसा ६२,६३ निश्चित कार्य पर दृढ़ता उमति के बिन । अनिन्दा ६६ बल, मात्र आदिको सफलता ६७ १९. १९ -- १२ १९ २००,३० २१ २१३,२१ २ .

छोकविषयकसूचीपत्रम् । श्लोक. १३,१४,१५ १६,१७,१८ २० से २७ तक. २०,२९,३४,३५ ३२ ३६ से ४४ तक. ४६ से ५०. ५१,६२ ५४,५५ ५६ पृष्ठ उद्यमकी प्रशंसा ६७,६८ आयुकी वलवानता ६८ सेवाकी निन्दा ७०.७१ सेवाकी प्रशसा ७१,७४ खामीसेवककी निन्दा ७३ 'पराये अर्थ जीवनका फल ७४,७५,७६ मूर्खकी निन्दा ७६,७७,७८ कर्मकी प्रशंसा ७७,७८ पण्डितका लक्षण ७८,७९ सेवाकी रीति ७८,७९ राजाके गृहयोग्य मनुष्य ७९ कायर पुरुषका लक्षण ७९ राजा, नी और बेलका निकट आश्रय करना सेहयुक्तके चिह्न विरसके चिल सुअवसरके वचनकी निन्दा राजाके विना आज्ञा ८१ कार्यकी कर्तव्यता गुणकी प्रशसा तथा रक्षा ८१ राजाको तृण आदिकी भावश्यक्ता ८१ मणि और काचका भेद ८२ मनुप्यकी उत्सादहीनता ८२ मृत्य तथा भाभरणके योग्य स्थान आदि ८२,८३ अवज्ञाकी निन्दा ८३,८४ आपत्तिरूपी सीटी पर बांधवादिकी परीक्षा ओटे शत्रुके लिये समानघातक ८६ } ५८ ८० ८० ६१ ६५ ६६ ६९ ७१,७२,७३ ७७,७८ ८८,१०२ सु ८६,१२२ मिना शभ मृत्यु मविप्रसा बारा समान पर बल सेरप्रसा को दूषण भपिक पपपी निन्दा ८८,८९ ८७८८ ९.६१,५२ लोकविषयकसूचीपत्रम्। रोक पृष्ठ । १२ ९८६९ सु. १०० से १०६ तक, १२८ १२९ वि० ३८,१०३,१०१ १०८ ११२ विना मृत्युके मृत्यु १२. १२१ १३२,१३३ १३४ १३५ ब्राह्मण और क्षत्रियको अ- धिकारी करनेसे हानि पुराने सेवककी निन्दा ९२ मत्रीकी निन्दा ९२,९३,१०५ १३६ दंडनीय पुनादिको दंड देना ९४ अहकार आदि कारणसे नष्टता ९४ राजाको कर्तव्यता ९४ मनुष्यके कर्मको सूर्यादिका जानना ९८ चतुरकी प्रशसा उपायकी प्रशसा १०१ १०२ प्रियवस्तुकी प्रशसा १०६ राजाकी दृष्टिकी प्रशंसा १०६ सदुपदेशकी प्रशसा १०६ राज्यभेदका मूल कारण १०७ मित्र, घी आदिकी प्रशसा १०७ राजाकी निन्दा १०८,११३,११४ पिना विचारकी दडकी निन्दा १०८ मनका गुप्त रम्बना १०४,१०९ मृत्युके चार दार ११० राजाके सेवकफी निन्दा १११ धन, विषय,स्त्री आदि पानेसे फल १११ श्री, कृपण, राजा आदिको निन्दा ११३ उपकार उपदेशादिकी नटता ११४ समान-बलमें युद्धकी योग्यता ११५ वज और राजा तेजको निन्दा ११५ गूरोंके दुर्जन गुण ११६ युदर समय ११६ समानमें मरने की प्रशसा ११६,१६६ ठेवहीन बलवानको निन्दा दुः, वाचना, धनादिरी निन्दा ११५ मनुष्यको निन्दा ११७ ११८ १४२,१५८,१५९,१२० १४३,१४४ १२६,१४७,१५५ १५१ १५२ १५३ १५१ १६१,१६२,१६३ वि . मु १५,११ १४३ से १४८ प्रमा लोकविषयकाचीपत्रम्। श्लोक. १७८ से १८१ तक. १८२ १८३ २,३ ४,३१ १०,११,१२ १४ १६,१७,१३३,१३४ १५,१९,२० २१,२२,२३ २५ से ३० तक ३१ ३४,३५ पृष्ठ. . राजाओंका कर्तव्य कार्य ११८,११९ दयालु राजा, लोभी) ११९ ब्राह्मणादिकी निन्दा राजाओंकी नीतिकी प्रशंसा ११९ राजाकी प्रशंसा १२१ मूर्खकी निन्दा तथा लक्षण १२२,१३४ पराक्रमकी प्रशसा १२४ वढोंकी सेवाकी प्रशंसा १२५ हाथी, सर्प, राजा, दुर्जनसे भय १२६ मंत्रीके लक्षण १२८,१६२ दूतके लक्षण १२७,१२९ दुर्जनके सगकी निन्दा१२९,१३०,१३१ । पतिव्रताके लिये १३२,१३३ भर्ताको प्रशसा पण्डित और मूर्खका लक्षण १३४ भेदियेकी प्रशसा १३५ मत्रका गुप्त रखना १३५,१३६,१३७ तथा प्रशसा युदकी असमति १३६ साम, दान,भेदसे शत्रुका वशीकरण १३६ विना युद्ध शूरता १३७ नीतिप्रशसा १३७,१३८,१४८ बुद्धिमान्का रक्षण १३७,१३९ कार्यसिद्धिका विन १३७ उपायज्ञाताकी प्रशसा १३८ बलीके साथ युद्धका त्याग १३७,१३८ दुर्गकी प्रशसा १३८ दुर्गके लक्षण १३८,१३९ टवण रसपी प्रशसा १३९ सभा, वृद्ध, धर्म, सत्यका निर्णय १४२ दूतकी प्रशंसा १३८,१४२,१४३ असतुष्ट प्रामण तथा राजा और गणिका आदिकी निन्दा १४३ विग्रहका समय १४४ युद्ध में जानेपी तथा लदनेकी रीति १४५,१४६ ३६,३५,४२ ३९ ४१ ४३,४८,९७ वि, ४४, स. ६ वि. ४६,४७ ५०,५१ ५२ से ५५ तक. ४६,६०,६२,६३ ६४ ६५ ते ६८ तक. ६९ ते ८२ तक.

" लोकविषयकसूचीपत्रम्। भोक. ८४,८५ । - ९१ से १५ तफ. १०२ वि. १०५ वि. १०८ से ११४ वि. ११५ वि. ११६ से ११९ तक. वि. १२. दि.१२१ . पृष्ठ. सेनाके हाथीकी प्रशंसा १४६ अवप्रशसा युरकी चतुरता तथा सेनाका कार्य १४७ सेनाकी प्रशंसा १४७ . बरहीन सेनाकी निन्दा १४७ राजासे नेह छुटनेका लक्षण १४७ राजाको विजय पानेकी रीति १४८ उदार, शूर तथा दाताका लक्षण १५३ शत्रुकी सहजमें मृत्यु १५६ शत्रुकी सेनाके नाशका १५६,१५७ उपाय तथा उपदेश राजाका दूपण १५७ आवश्यक उपदेश १५७,१५८ देवता गुरु आदि पर कोप न करना १५९ रास्थमें पाडिल्स १५९ बुद्धिमान और बुद्धिहीनमें भेद १५९ बयको प्रशंया १६० शरकी प्रशसा १६१ राजाके महागुण १६१,१६२ दुर्गाश्रयप्रशसा १६२ युद्ध में रानाकी अग्रगण्यता १६३ दुर्ग: दोष १६३ दुर्गके जयके उपाय युद्धमें यथावसर कर्तव्य १६४ मानी मत्रीको आपसमें प्रशसा १६ समरमें उत्साह १६,१६५ राय छ अग १६५ भाग्यी निन्दा करम दोष নায় १६८ उपव दया अपायका चिन्ता शक विशनु निन्दा १७२ गरचरौन मन्तव्यता १७२ राना उपदेश १३ - १२२ १२३,१२४,१२५ १२६,१२७ १२९ से १३२ तक. १३६ १३७ १३८ ११९ १४11.2 २ ३ लोकविषयकसूचीपत्रम् । ११ डोक. १२ १३ १४ १५ १६ २० २१ २२ से २८ तक. -,३४ से ४७ युद्ध न करनेका ३४ से ४७ तक. पृष्ठ नीचको उच्चपद देनेकी निन्दा १७३ अधिक लोभकी निन्दा मित्र और शत्रुका लक्षण १७५ अप्राप्त चिंताकी निन्दा १७५ कुमागी राजाके मत्रीको निन्दा १७७ राजाको मंत्रीका अवलवन १७७ समानके साथभी मेलका उपदेश १७७ ब्राह्मण क्षत्रिय आदिकी पूज्यता १७८ सधि करनेके योग्य ७ मनुप्य सधि (मेल) प्रशसा १७९,१८० सधि करने के लिये । अयोग्य २० पुरुष १८०,१८१ अयोग्य पुरुपोंके साथ १८१,१८२ कारण तथा फल नीतिज्ञानकी प्रशसा १८३ राजाका चक्रवर्ती होनेका उपाय १८३ विश्वास दे कर वचना १८४ अपने समान दुर्जनको भी १८४ सत्यवादी जाननेसे हानि राजनयो दुष्टोंके वचनसे। १८५ बुद्धिवी भ्रष्टता क्षुधापीडितका कर्तव्य १८६ धर्महीन पुरुषमा लक्षण १८६ अभयपदानप्रशसा १८६ शरणामतके रक्षाकी प्रशसा १८७ चार्य पदने पर शत्रुको मित्र मानना१८८ सगारवी अनित्यता आदिका वर्णन १८९,१९२ रागियोंपो पनक्य दोष और विरताका उपदेश १९३ जलसे अन्तरात्माका शुद्ध न रोना १९३ मनुष्य के लिये सुख १९३ सत्सग और रविवा उपदेश प्रपा खननावी निन्दा १९५ ४९ ५१ ५२ पचनसे ५९,६० ६२ से ८२ तफ. ८४,८५ ૮૬ ८८ १२ सोकवियय कसूचीपत्रम् । घोक. 1 ९३ } १४ १५ -- म पृष्ठ एक साथ शत्रुसे युद्धकी निन्दा १९५ वातके भेदको विना जाने १९५ कोषकी अकर्तव्यता शीघ्र नहीं किये कार्यकी नष्टता १९६ राजाको सुखके अर्थ १९७ ६ विषयोंका त्याग नत्रीके मुख्य गुण १९७ कार्य एकाएक करनेसे हानि १९७ कार्यसाधनकी प्रशंसा १९७ अभिमानीकी सर्वदा अप्रसन्नता १९८ पुरुषोंका कर्मके फलसे निश्चय करना१९८ दुर्जनसे वचितका सुजनमें १९९ अविद्यास करना लोभी, अभिमानी, मूर्ख, पण्डित १९९ सोपुत्रादिको वश करनेका उपाय सधित उपदेश २०० १६प्रकारकी राधिया) और उनके लक्षण धर्नकी हाता २०३ सननके संग मेलका उपदेश २०३ सत्यकी प्रशसा २०३ आशीर्वाद १०० नमें १०१,१०२ १०३,१०४ १०५ -- १२००से२०२तक १०६ से १२६ तक. 1 १२५,१२८ १२९ १३० १३१,१३२,१३३ इति हितोपदेशगतमलोकविषयकसूचीपत्रं समाप्तम् ॥

तृतीयं परिशिष्टम् । हितोपदेशगतश्लोकानुक्रमणिका । २ . छो० पृ० श्लोक अनिष्टादिष्टलाभेऽपि ६ १५१ नकसाघुवती वृद्ध ३८ १०९ अनुचितकार्यारम्भ. ११० अकाण्डपातजाताना १९२ ८२ | अनेकचित्रमन्त्रस्तु १८१ भकालसहमत्यल्प २८ १३७ | अनेकयुद्धविजयी अकालसैन्ययुक्तस्तु १८२ ४६ अनेकसशयोच्छेदि अगाङ्गिभावमज्ञात्वा १०९ १४९ अन्तर्दुष्ट क्षमायुक्त भचिन्तितानि दुखानि ४९ १६६ अन्यथैव हि सौहार्द ३५ अजरामरप्राज्ञो ३ भन्यदा भूपण पुंसा १२४ १९८ भज्ञ सुखमाराध्य ९७ ९९ ) अन्यदुच्छृङ्खलं सत्त्वं १४८ अज्ञातकुलशीलस्य २३ अपराधः स देवस्य १६७ २ अज्ञातमृतमूर्खाणा ३ १३ अपराधेऽपि नि शको ९२ ९८ अज्ञान कारण न स्यात् १९२ ८१ अपराधो न मेऽस्तीति २९ मअनस्य क्षय दृष्ट्वा १२ अपायसदर्शनजा विपत्तिं ८० अत एव हि नेच्छन्ति १९१ अपुत्रस्य गृह शून्य ૪૨ १२७ अतध्यान्यपि तध्यानि ९९ ११३ / अपृष्टोऽपि हित ब्रूयात् १०७ १४० अतिविर्यस्य भन्नाशो २५ ६२ अप्रसादोऽनधिष्टान १४७ अतिव्ययोऽनवेक्षा च ८० ९४ भप्राप्तकालवचन अप्रियस्यापि पथ्यस्य १०६ अत्युच्छ्रिते मघ्रिणि पार्थिवेच अप्रियाण्यपि कुर्वाणो १०६ १२७ १३३ अवुधैरथलाभाय २४ अत्यन्तविमुखे देवे १३२ अभियोका बलीय २०२ १२६ अदुर्गो विपय क्स्य १३८ अभेदेन च युध्येत १४६ अष्टनर आदिष्ट २०० जनच्छाया खलनीति. ५२ १८१ जंदशस्यो बहुरिपु. अम्भासि जलजन्तूना ५६ १९६ अदेशस्थो हि रिपुणा १८२ जय निज परो वेति अपीतव्यवहाराय १२८ ११६ अधोऽध पश्यत पस्य ६५ २ अरक्षित तिष्ठति अनभ्यास विप विया २३ | भरावप्युचित कार्य २५ अनागतवता चिन्ता ७५ ४२ जनागतविपाता च १३० १६८ ५ अर्धा पादरजोपमा. अनाहूतो विशेषस्तु ५२ अर्थागमो नित्यमरोगिता है जरित्य यौवन रूप ५९० ६७ भन तु विहीनत्य १२५ 2 ७० १११ | अयुद्धे हि यदा ६८ १५ | अर्धनाश मनस्ताप २ . पृ० ० पृ. सो. १४६ ५४ भला चैव लिप्सेत ६६ आ निस्य प्रदानस्य १९६ अल्पानामपि वस्तूनां ३५ आदित्यचन्द्रावनिलो- 'अल्पेच्छुर्घतिमान्प्राज्ञ, ७९ ऽनलव ९८ ११२ अवज्ञानाद्राज्ञो ७७ भादेयस प्रदेयस्य अवशेन्द्रियचित्ताना १० आधिव्याधिपरीतापात् २०३ १२७ अवश्यभाविनो भावा २८ आपत्सु मित्र जानीयात् २८ ३२ अवस्कन्दभयात् १५६ १११ आपदर्थे धन रक्षेत् अविचारयतो युक्ति १७३ ११ आपदामापतन्तीना १६ ३० भविद्वानपि भूपालो १५७ ११४ आपद्युन्मार्गगमने ८१ अव्यवसायिनमलस ६६ ४. आपथुन्मार्गगमने कार्य १०४ अव्यापारेपु व्यापार ७१ ३० आपातरमणीयानां १९१ अध शस्त्र शास्त्र वीणा ८३ ७५ आपीडयन् बलं शनो. ५८ अश्वमेधसहस्राणि २०३ १३० आमरणान्ता प्रणया १५२ अमतुष्टा द्विजा नष्टा १४३ ६४ | आयु कर्म च वित्त च २७ जसभा हेममृगस्य २८ आयुर्वित्त गृहच्छिन्द्र असभोगेन सामान्य १६२ । आरभन्तेऽल्पमेवाज्ञा. १५९ १२२ असत्य माहम माया १९९ आराध्यमानो नृपति ११३ १५८ असाधना वितहीना २ आरोप्यते शिला शैले ७० असंवके चानुरकि आलस्य स्त्रीसेवा सरोगता६६ जसरितेश्वरद्वार १४७ | आवयोर्योधमुख्यस्तु २०१ अमानिनिर्मिता १२३ ६ आज्ञाभगो नरेन्नाणा ८८ किन्तु निर्गुण गोरे ४४ | आश्रिताना भृतौ म्यामि ७३ २३ अहितदिनविचार- आसनवरतामेति ११० शून्यदे ४५ आसनमेव नृपतिर्भाते ७९ भा आमीवीररो नाम आरिमितर्गया आहवेषु च ये शूरा. १६३ मात्रामरवरान् राजा १०. जाहारनिद्राभयमेथुन च ५ जानो नरेन्द्रागा ८८ ८५ आहारो द्विगुण छीणा १०१ बन्न कारस्य सिद्धिं तु२०१ कानन परेपाच कानप पारयन्त इल्यान्ययनदानानि रिजा नदी सयम- ८३ दायीं घृणी स्वसतुष्ट. अनादर, परन्दान. १८ 3. नामस्थापि वर्णय ९ ४५ 13 ७८ ई परत - t ३ पृ० को पृ० श्लो २०८ ११६ ૨૨ ७० २४ २८ उत्यायोत्थाय बोद्धव्यं १० एकस्य दुःखस्य न उत्पन्नामापद यस्तु १६९ यावदन्त उत्पनेष्वपि कार्येपु ९९ ११४ । एकार्थी सम्यगुद्दिश्य २० उत्सवे व्यसने चैव ७३ | एतावजन्मसाफल्यं उत्सवे व्यसने युद्ध १८९ ६३ एते. सन्धि न कुर्वीत १८१ उत्साहशक्तिहीनत्वात् १८१ ३५ एहि गच्छ पतोत्तिष्ठ उत्साहसपत्रमदीर्घसून ५२ औ. उदीरितोऽर्थ. पशुनापि गृह्यते औरसं कृतसबन्ध ४९ उद्यतेप्वपि शस्त्रेषु क. उद्यमेन हि सिध्यन्ति ६ ३६ कङ्कणस्य तु लोभेन १० उद्योगिनं पुरुषसिंह- कथ नाम न सेव्यन्ते ७१ मुपैति ६ ३३ कर्थितस्यापि च धैर्य- उपकर्ताधिकारस्थ ९२ वृत्ते. ८२ । उपकत्रारिणा सधिन १७५ १४ उपकार करोग्यस्य २०१ कनकभूपणसंग्रहणोचितो८३ ११५ उपकारिणि विधे ३० कपाल उपहारश्च २०० उपजापश्चिरारोधो १६३ कपालसधिविज्ञेय १३८ उपाय चिन्तयन् प्राज्ञो ७० ८ कमण्डलूपमोऽमात्य. उपायेन हि यच्छक्य १०१ १२० करोतु नाम नीतिज्ञो उपायेन हि यच्छक्य कर्तव्य. सचयो नित्य २०२ उपाजिताना वित्ताना ४७ १९८ उपाशु ब्रीडितोऽमात्य ९२ क्ल्पयति येन वृत्ति उशना वेद यच्चान कचिदाभ्रयसौन्दर्यात् ११३ १२२ काकतालीयवत्प्राप्त ऋणकर्ता पिता शत्रु काच कावनससर्गात् २२ काम क्रोधस्नयामोहो १९७ ए. काम सर्वात्मना हेय १९४ एक भूमिपति परोति काय सनिहितापाय ૬૨ सचिव १२८ काय सनिहितापाय १८९ पर शत योषयति १३८ कारयापनमाशाना ॥ एव सुहवाँ २६ ६५ काव्यशाराविनादेन एक पोपहारस्तु १२५ कि चान्यन बुराचार. ९१ ए५३ राजरिचालो १५५ किनकेनासमन ८३ एकदा न चिनीयात् १५५ ५२ कि मन्त्रेणाननुष्टानात् १४५ १०६ १०९ ४८ १६४ १५६ कर्मानुमेया सर्वत्र ६५ १५७ ४ -- २१२ W ९३ ६८ पृ० लो ८ व. ४५ धर्मात न तथा सुशी- २९ तलजलै १३२ घृतकुम्भसमा नारी 714 १३४ च. चन्दनतरुपु भुजना 1१२ १६१ / चलत्येकेन पादेन ३५ १०२ १३ | चितौ परिष्वज्य विचेतन पति १३३ २१ किमप्यति स्वभावेन कीरोऽपि सुमन सगात् कुत सेवाविहीनाना ७१ कुर्वन्द्धपि व्यालीकानि १०६ कुसुमत्तवकलेव कृतकृत्यख मृत्यस्य १७२ कुनरावनसत्सु नष्ट ११४ कोऽतिभार समर्थाना ६७ कोऽत्रेत्यहमिति ब्रूयात् ७९ को बन्यो बहुभि पुत्रै तो वो भूतदया कोऽयं पुत्रेण जातेन ३ को परम्प मनस्विन पविय कोशानाधतोशेन २०२ कोने मकोयगाथाय १३० का विचाहे अमने १६० मितरण चापि १४८ मोठीबरोति प्रयन १८१ ET पृथिवीपाला १८९ ना तीच मित्र ११८ मिनायमनालोज्य ५२ छिद् मर्म च वीयं च १४१ १२ 144 जन जनपदा नित्य ८४ १२१ जनयन्ति सुतान् गाव १६३ ४८ जनयन्त्यजने दुस ५२ १२५ जन्मनि केशबहुले ५३ ९४ जन्ममृत्युजराव्याधि १०३ ६२ जमदग्ने सुतस्पेन १८० ६३ जये च लभते 1१३ १८० जलपिन्दुनिपातेन ०५. जलमग्निनिय शर 18 ! जलान्तवन्द्रचपल २०३ जातिद्रव्यगुणाना च २० जातिमात्रेण शिकचित् २५ जानिच नियन्ते च १५२ ५३ जीवित यस्य नीति उदराभोवस्तु र रोनि दुत १२१ पान सम्माना हि १३० १६ मतानुगति को वाम होगवनिजिन्य माग गगा . त. : तप पूर्वधनुषंगा । तर मित्रानतुल्य तकरेन्यो नियु-न्य नानान्द्रियाण्यांव लानि युव व ३ नगनारन नि " श्लो. ८२ ५४ २३ १३७ ३३ १२३ दुर्वृत्त क्रियते ६२ द . ११४ १६४ ८२ पृ० श्लोक पृ० तिरश्वामपि विश्वासो ३२ ८५ | दुर्जन परिहर्वव्यो ३२ तिन. कोट्योऽधकोटी १३३ २८ दुर्जन प्रियवादी च तीर्थाश्रमसुरस्थाने १३५ ३५ दुर्जनगम्या नार्य ११३ तृणानि नोन्मूलयति ८८ दुर्जनदूपितमनस १९९ तृणानि भूमिरुदित ६० दुर्जनेन सम सख्य ३० तृष्णा चेह परित्यज्य १९० दुर्जनैरुच्यमानानि १३१ तेनाधीत श्रुत तेन १४६ दुर्जनो नार्जव याति १०७ त्यजेत् क्षुधार्ता महिला १८६ ५४ | दुर्भिक्षव्यसनी चैव १८२ त्यजेदेक कुलस्याये ४६ १५१ दुर्मत्रिण किमुपयन्ति १५८ त्रासहेतोर्विनीतिस्तु १०३ ११७ निभिर्वनिभिर्मासे ३१ ८३ । दुष्टा भार्या शठ मित्र १०२ त्रिविधा पुरुषा राजन् । ८२ दूतो म्लेच्छोऽप्यवध्य. १४३ खयकेन मदीयोऽर्थ २०१ ११८ दूरादवेक्षण हासः दूरादुच्छ्रितपाणिराई- दक्ष श्रियमधिगच्छति १५७ नयन दूपयेच्चास्य सतत १३६ देववासु गुरौ गोपु देवोपहतकश्चैव १८० दरिद्रान्भर कौन्तेय। दोपभीतेरनारम्भ. दावव्यमिति यद्दान १३ द्रवत्वात्सर्वलोहाना दाता क्षमी गुणग्राही १६४ दान प्रियवाक्सहित १६३ घ. दान भोगो नाशस्तिस्रो ४८ १६१ धन तावदसुलभ दाने तपसि शौर्य च ३ १५ | धनलुब्धो झसन्तुष्टो दानोपभोगरहिता धनवान्बलवॉल्लोके ४१ दिवसा ११ धनवानिति हि मदो मे ५२ दानोपभोगहीनेन १५९ / धनानि जीवितं चैव दायादादपरो मम्रो १४८ ९२ धनानि जीवित चैव १५२ दारियाद्भियमेति १३६ धनाशा जीविताशा च ३९ दारिम्यान्मरणाद्वापि १२८ धनेन किं यो न ददाति ६० दीपनिर्वाणगन्ध च २९ ७६ | धनेन बलवाल्लोके दीपवर्मपरिमान्त १५६ १०८ धमाध यस्य वित्तेहा दु ८८ धर्मार्थकामतत्त्व ११८ खितोऽपि चरेदमं १९२ ८५ धर्मार्थकाममोक्षाणामाणा२० दुर्ग कुर्यान्महालात ३३० ५२ | धर्मार्थकाममोक्षाणा यस्यै ५ दन्तस्य निर्घर्पणकेन राजन् । १२० १६ ९३ १४० -- ४८ १८९ १४३ १२३ १८० २० २१ ४१ १२४ १८५ खमेवास्ति न सुख १९३ ४३ २६ ur पृ० श्लो राजन् । धान्यानां सग्रहो १३९ धार्मिकस्याभियुक्तस्य १७९ चूत स्त्री वा शिशु- चन्य १६२ ५० . न कचित् कस्यचिन्मित्र २८ न कस्यचिकचिदिह न गणस्याप्रतो गच्छेत् १६ नगरस्पो पनस्पो १३२ न तथोत्याप्यते प्रावा १३० न ताशी प्रीतिमुपेति १०० न दानेन न मानेन नीना रानपाणीना नदेन विनाय नामा मन्तिा नप्रदिपनगंतु नपान पानीति १३ 1. पान चाणाय १४२ न परयागरान पदान न गुण- १४ न स्त्रीणामप्रियः कश्चित् ३९ ११७ न स्वल्पमप्यध्या. २३ सायभीरो. १७२ नाकाले नियते जन्तु १३१ नाग्निस्तृप्यति काठाना १०० ११५ नाद्रव्ये निहिता काचित् ८ ५३ ७१ नानिवेद्य प्रकुर्वीत ११ नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति ५० २९ नाभिपेको न सस्कार २६ नायमत्यन्तसवासो १९० પર ४२ नारिकेलसमाकारा ३३ ११८ नाशयेत् कर्पयेत् शान्१४५ निजसौख्य निरुधानो ४७ १५८ १९ निपानमिव मका. ५० १६० निपीडिता वमनस्युचे ५३ १." ३० निमशस्य पयोराशी निमित्तमुद्दिश्य हि य. ११३ नियतविपयवर्ती प्रायशो५९ २०६ नियुक्त. क्षत्रियो द्रव्ये ५२ १४३ नियोग्यग्रहापायो ९२ निरपेक्षो न कर्तव्यो निरूपाद निरानन्द निर्गुणपपि मरने २५ निर्विशेषो यदा राजा नीच लाध्याद प्राप्य १०३ नृप कामासको गणयति नापनोनय या ९१ ग. २. पराजुदार पनिनिमिद विनियोदिनमा सपादन पहाता मंदागा. 101 १८ ८२ न नरम नरोदामो १४ नमारिन हारे ६२ न जनतर न र प्रामिया १५० नोवो दोनोय न बान बनाना न परन्मेका नवापननाना पान पति व्या , +मानु ।

0 ८८ १५० प्रमत्त भोजन व्यग्रं ७७ प्रालेयाद्रे सुताया. श्लो पृ० छो० पृ० प्रतिक्षणमय काय' १८९ ६५ पय पान भुजगानां १२२ परस्परज्ञा संहृष्टा. १२६ प्रतिवाचमदत्त केशव परस्परोपकारस्तु प्रत्यक्षेऽपि कृते दोपे १३१ २०२ पराधिकारचचा य प्रत्याख्याने च दाने च १२ १३ ४५ पराभव परिच्छेत्तु ११० १५० / प्रत्यूह सर्वसिद्धीना १३७ १४७ परिच्छिन्न फल यन्त्र २०२ १२३ / प्रथम युद्धकारित्व १७६ १०९ परिच्छेदो हि पाण्डित्यं ४६ परुपाण्यपि या प्रोक्ता १३२ करते प्रसाद १२९ पत्यु. २५ २० परै सभुज्यते १७६ प्रस्तावसदृश वाक्य परोक्षे कार्यहन्तार प्राक् पादयो पति ३० ३० परोपदेशे पाण्डित्यं १२ प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा १२ १०३ परोऽपि हितवान् बन्धु १४९ प्राप्तार्थग्रहणं द्रव्य ९८ ९३ १०३ पर्जन्य इव भूतानामा- २०४, १३२ प्रिय ब्रूयादपण ५५३ १०२ धार २०५ व. एलितेपु हि दृष्टेषु ३८ १११ वन्धु को नाम पल्लवग्राहि पाण्डित्य १४० वन्धुस्त्रीभृत्यवर्गस्य ८५ पश्चात्सेनापतिर्यायात् १४५ चलमश्वश्च सैन्याना १४७ ८४ पान दुर्जनससर्ग ११५ वलाध्यक्ष पुरो पान स्त्री मृगया १५७ वलिना सह योदव्य ४६ पानीय वा निरायास ४६ बलिना सह योदव्य १७९ पार्श्वयोरुभयोरश्वाः १४५ पिता रक्षति कौमारे वलीयसाभियुक्तस्तु २०० ४० १२१ बलेपु प्रमुखो हस्ती ८३ पिता वा यदि वा ११८ वहुशत्रुस्तु सत्रस्त १८२ पुण्यतीय कृत येन १९ वालस्याल्पप्रभावत्वाब १८१ पुण्यालब्धं यदेक्न १०५ बालादपि ग्रहीतव्य पुरस्कृत्य बल राजा १३६ बालोऽपि नावमन्तव्यो ८६ ८२ पुरावृत्तकधोहार १०६ / बालो वा यदि वा वृद्धो ३६ पूर्वजन्मकृत र्म ६ ३३ बालो वृद्धो दीर्घरोगी १८० पृष्टत सेवयेदक ३४ | बुद्धिमाननुरकोऽय ७४ पोतो दुस्तरवारिराशि- वुद्धिर्यस्य वल तत्य १०२ १२२ तरणे ११५ १६५ | ब्रह्महापि नर पूज्यो ३ प्रकृति स्वामिन त्यक्त्वा५६५ ६४४ ब्राह्मण, क्षत्रियो वन्धु ९२ ९६ प्रजा सरक्षति नृप १२१ ३ भ प्रणमत्युवतिहेतो प्रणयादुपवारादा ६७९ ९. भक्षितेनापि भवता ३२ ८४ ७० १३७ २६ ७७८ ४ नक्षयित्वा वहुन्मत्त्यान्१७४ मा न । 9 । । ३७ } मित्र M 10 म मदन . पर पदा ४० Pr पृ. ओ. पृ० श्यो भक्ष्यभशकयो प्रीतिः २२ ५५ मातृव परदारेषु १३ भत्तो गुणी शुचि. १२९ १९ मात्रा स्वना दुहिना वा ४० ११३ मता हि परनं १३२ २७ मार्जारो महिषो मेप ३२ भवेत् स्वपरराष्ट्राणां १३५ ३४ मासमूनपुरीषास्थि २० भवेऽलिन् पवनोद्धान्त १६५ १४२ मासमेक नरो याति भीयुद्धपरित्यागात् १८१ प्रामुत सजना भुवा सारवतीना तु २०२ १२२ | मित्र प्रीतिरसायन २१५ भूनिर्मित्र हिरण्य च ६६ | मित्रलाभ सुह दो २ भुम्येकदेशस्य १७७ मिनामात्यसुखद्वर्गा नोगस्य भानन राजा १०४ १२५ मुकुटे रोपित ८३ मुद विपाद शरद १५८ मानपि पयोराशा ११२ १५५ मुहुनियोगिनो बाध्या ९३ १०६ मगि उठति पादपु ૮૨ ६८ मुप स्वत्पन्नयमासात्।३० १२५ मतिरा लारीयसी ८८ ८६ मूगोऽपि शोभते तापत् . मनिलायते सत्य ५३ मूल भुज कुसुमानि 211 ११३ मर प्रमत्तचोन्मत्तः 10 ५५ मुलभृत्यान् परित्यज्य १०७ १३३ मरोदार नुपने. १२ गतृष्णामम २०३ मनपन्यान्यन्या 101 | मृत प्रामोति वा वर्ग ११३ अनमो प्रिपते काम ३२ १३३ मृधटासुममेभ्यो ३२ मनु तुल्याया २० : मीनान्मूर्य प्रवचनपद. ७१ मनमानभिद गुम य. मप्रदापि दोषाः १३६ य काकिनीमध्यप- मप्रिणा निमशने १५५ प्रपत्र १६० मप्रिया विभागाल. य यानिमायनां १०. मी योगमार. १०९ मापन य कुलाभिमाचार. मरसत्या पवाटिर य स्वभावो हि १४ " ! यमित पान यनीयते दाम प्रक्ति नयमारन मनुष्य. मलोमीर यातहत यूर. मिले. युगात. 10 या भूम्यकदेशेन A.Cia it अरना नाकामा 111 निदान 14 बिनो नाति - 1. सदाब दुनिया R T .. 1. A ९ लो० 60 ८८ ८५ यदि न स्यात् २० लोग पृ० यथाकालकृतोद्योगात् १३७ ४३) यानि कानि च मित्राणि २२ ५३ यथा प्रभुकृतान्मानात् १४७ या हि प्राणपरित्याग १८३ यथा मृत्पिडत. कता ६ ३४ | याचते कार्यकाले य. ७३ ૨૨ यात्यधोऽधो बजत्युच्चै ७७ यथा हि पथिक कश्चित् ६९ यानि कानि च मित्राणि २२ २५ यथा होकेन चक्रेण या प्रकृत्यैव चपला ६ ३२ यथा शामिपमाकाशे यामेव रात्रि प्रथमा- १८३ यथोदयगिरेव्य मुपैति १९२ ४६ यदधोऽध. क्षितो वित्त ४७ १५७ यावत कुरुते जन्तु यदभावि न तद्भावि २९ यावदायु प्रमाणस्तु २०१ यदभावि न तद्भावि १७० युध्यमाना हयारुढा १४७ यदशक्यं न वच्छक्य ३३ ९० येन शुक्लीकृता हसा ५३ १८३ यदाऽसत्सङ्गरहितो ६० २०७ येपां राजा सह स्यातां १६२ १२१ २ योऽकार्य कार्यवच्छाखि१५४ १०३ यदि नित्यमनित्येन ४८ योऽत्ति यस्य सदा यदि समरमपास्य नास्ति मासं मृत्यो. १६३ १४१ | योऽधिकाद्योजनशतात् २१ यद्ददाति यदनाति १६८ यो ध्रुवाणि परित्यज्य ६४ यद्ददासि विशिष्टेभ्यो १६९ । यो यत्र कुशलः कार्ये १३९ यद्यदेव हि वाल्छेत ५४ १९१ । यो येन प्रतिवद्धः ययेन युज्यते लोके ૨૨ स्थात् १३० यजवे भाजने लग्न ८ यो नात्मजे न च गुरौ ययोरेव समं वित्त १६६ नच ७६ यद्यप्युपायाश्चत्वारो १९७ ९८ । यो हि धर्म पुरस्कृत्य १७७ यसाच येन च यथा च १९ योऽयतत्त्वमविज्ञाय १९५ ९३ यसिनेवाधिक चक्षु १०६ १३४ / यौवनं धनसपत्ति. ર यस्मिीपति जीवन्ति ७५ ३७ र यस्मिन्देशे न समानो ३६ १०४ रजनीचरनाधन खण्डिते ९७ यस कस्य प्रसूतोऽपि ४ २४ रहस्यभेदो याच्जा च यस्य नास्ति स्वय प्रज्ञा १५८ ११९ राजत सलिलादने. ५३ १८७ यस्य प्रसादे पाते राजा कुरवधूर्विमा १७३ यस्य मित्रेण सभापो ३९ राजा घृणी ब्राह्मण. ११९ १८२ यस्य यस हि यो भाव.७८ राजा मत्त, शिशु १२८ यस्वार्थास्तस्य मित्राणि ४२ राजान प्रथम विन्देत् ५९ २०४ ५० ४४ १११ पृ० ३९ 1 २७ लो० श्रे राज्यलोभादह १८३ वित्त यदा यस्य सम रूपचौवनमपत्रा विभक्त २८२ रोगशोकपरीतापबन्धन १९ १ विद्या ददाति विनय २ ६ रोगी चिरपवासी च. विद्या शस्त्रस्य शास्त्रस्य विद्वानेवोपदेष्टव्यो १२२ लन्ध कोऽलसो १५६ विनाप्यथैवीर. स्पृशति लुपमर्थन गृहीयात् १९९ ३०३ बहुमानो नुज्वलासंविभागि १८१ ३८ | विना वर्तनसेवैते लोकमानाभा लजा ३६ १०५ विपदि धैर्यमथाभ्युदये लोको पनि किरासन् १८८ ५९ जोन तिथलांत १४२ क्षमा तोमारा प्रभाति विरक्तप्रतिधेव १८२ २० विशन्ति सहसा मूडा. १५७ विश्वासप्रतिपमाना १८४ रातोय 11५ १६८ विपदिग्धस्य भक्तरस १०५ १२५ बने.रा.प्रान्ति विषमो हि या नक ११२ १२५ रागिगा विपमा हि दशा प्राप्य १२१ मोशियर विम्तीर्णतातिपय १३५ रीवाग. विगाय साया हेय १०॥ १२३ मायन त महति समामे १२० माहानेन गुपये नातित १३. पित ११ त्या मोहान येगा १२३ घरगुता साहा न। नाना पन प्राप यो गुरुमग्री सा उत्रीन 141 यानामातुर श्रेयान 11 iiirt : मानिनननन्त ।" सम्पतिमान यामाहा या . नानामा 1 निमारमापि ११ तपाय नि । 17.21 : 1-74 नाम 41.न. .

पृ० श्लो. ५० पृ० ग्यो शरीरस्य गुणाना च २१ ४९ | संलापिताना मधुरैर्व- शशिदिवाकरयोग्रहपीडन २१: चोभि. ३२ शशिनीव हिमाानां ३८ ११० संसारविपवृक्षस्य १५४ शास्त्राण्यधीत्यापि संहवत्वाद्यथा वेणु. १७९ ૨૫ भवन्ति १७१ | संहतास्तु हरन्त्येते ३७ शिष्टरप्यविशेषज्ञः १२८ संहति श्रेयसी पुसा शीतवावातपक्केशान् स किभृत्य. स किंमन्त्री १३६' ३८ शुचित्व त्यागिता शौर्य ३४ ९६ सकृद्दुष्ट तु यो मित्र १०९ १४८ शैलेपु दुर्गमार्गेपु १४५ ७५ | सङ्ग.सर्वात्मना त्याज्य १९४ शोकस्थानसहस्राणि स जातो तेन जार्तन ३ शोकारातिभयत्राण ૬૨ २१३ सत्य शौर्य दया त्यागो १६१ १२९ श्रीमान् धवल- सत्यधर्मव्यपेतेन १८२ चन्द्रोऽसौ २०४ १३३ । सत्यान्ता सपरुपा ११९ १८३ श्रुतो हितोपदेशोऽय २ सत्यायों धार्मिको- लाध्य स एको भुवि ऽनार्यो २१ मानवाना १९० | सत्योऽनुपालयेत् सत्य २२ पदों भिद्यते मघ्र १३५ ३६ | सदामात्यो न साध्यः पद् दोपा पुरपेणेह स्यात् ९३ १०२ हातच्या ३८ । सदा धर्मवलीयस्त्वात् १८१ सद्भावेन हरेन्मित्र १९९ १०४ सचिन्त्य सचिन्त्य तमु- सन्त एव लता नित्ये १९३ प्रदण्ड १९१ ७९ | सन्तानसधिविज्ञेयो २०० ११० सगत सधिरेवाय सन्धि कायोऽप्य- २०१ ११२ सतोपामृततृप्ताना नायेंण १४५ २४ सत्यज्यते प्रकृतिभि ५८१ ३९ | सन्धिमिच्छेत् समेनापि१७७ सधाय युवराजेन ९३ | सन्मार्गे तावदाने सधि सर्वमहीभुजा २०४ १३१ प्रनवति १९८ सपत्तय पराधीना 5 5 ។ १५२ | स वन्धुर्यो विपनाना १६ सपत्तेश्च विपत्तेत १८२ ३२ स मूर्ख कालमप्राप्य १३८ सपदा सुस्थितमन्यो ६५ ६ समेयाद्विपम नागे ७३ सपदि यस्य न हो ३३ सरसि वहुशतारा- मयोगो हि वियोगस १९१ छाये १०७ सयोजयति वियर ५ सर्व एव जन. शूरो १३७ १२८ १ १२ पृ० लो ७० १ 1 सर्वज्ञामसमृद्धत्व १८७ नद्रव्येपु वियव नसहि परीक्ष्यन्ते सर्वहिसानिवृत्ता ये २६ न विग्धोऽनुशलाजिवा- रपति सहमा विदधीत न क्रिया सहि गगनविहारी समनार सपा पान्९१ मा समतपसाव माधो. महोषितस्थापि ३२ को भायां पा गुहे ९७ स्थान एवं ५७ / सेवया धन मिच्छनि. ५ सेव मानमसिल २० स्कन्धेनापि वहेछन् १८८ ६० ६४ / स्कन्धोपनेय सधिश्व २०० स्तन्धस्य नश्यति यशो ९५ खीभि. फरसन खण्डित १२ १५३ । स्थान नास्ति क्षण नास्ति ३९ नियोज्यन्ते ८२ २१ स्थानमुत्सृज्य गच्छन्ति ५० ९२ | स्नेहरछेदेऽपि साधूना ३३ १५५ स्यन्दनाधे समे युज्षेत् स्वामसन्तानविचे- २०० प्टितानि १२ स्वच्छन्दमातेन स्वभावशूरमयज्ञ भय पीय यथा बच्चा.५६ म्घराज्य वासयेगा। . १८ माता मोन १३१ भाग समानत 4 hणे १९१ THENT मुवारपणे तु Fitrate 1 मनापासुन धरेवामाई मा २६ स्वागायुगसापशेष- बायन तुमचान नमुकाम | था I मन्दिरे ३५ चापपरोक

The Hitopadesa

Author
Pandit, Narayan
Title
The Hitopadesa
File name
The Hitopadesa
Text
OCR done
Citation
1944
Published
2010
Publisher
Satyabhamabai Randurang Bpmbay
Language
Sanskrit
Pages
193
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
DLI number
325936
Barcode
99999990007808.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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