Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Kwasi

Balkrishan Sharma · 2011/03

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

क्वासि

No text on this page.

शपतिला
गिरा हार ...
दीकानेर
क्वासि
बालकृष्ण शर्मा 'नवीन
राजकमल प्रकाशन
दिल्ली बम्बई नई दिल्ली

मूल्य तीन रुपये 'पाठ याने
प्रकाशक
रामकमल पब्लिकेशन्स लिमिटड, बम्बई
मुद्रक
गोपीनाथ सेठ, नवीन प्रेस, दिरली

'क्वासि' की यह टेर मेरी यह मेरा तीसरा गीत सग्रह पाठकों के सम्मुख उपस्थित है। मेरे एक सम्मान्य मित्र ने अपने हृदय की करणा और दया की भावना मेरे प्रति व्यक्त करते हुए एक यार कहा था कि प्रगतिशील 'नवीन' तो मर गए, अब बच रहे हैं केवल दाशनिक नवीन । प्रगतिशील नवीन, सम्भव है, या तो मर चुके हों, या कदाचित् वे कभी, उनके अर्थ में, प्रगतिशील रहे ही न हों। हमारी भाषा में इस 'प्रगतिशील', या 'प्रगतिवादी' शब्द की इतनी मल्लिनाथी टीकाएं हुई हैं कि वास्तविक रूप से इस शब्द के अर्थ का समझना भी दूभर हो गया है । कभी कोई कवि प्रगतिशील हो जाता है, कभी वही परम्परावादी, प्रति गति युक्त और प्रतिक्रिया निरत बन जाता है। दो सम्मान्य मित्रों के सम्बन्ध में एक (अपने श्राप को मार्क्स सिद्धान्त शास्त्री समझने वाले) पालोधक बन्धु में कहा था कि उनके सग्रहों की "बहुत मी कविताओं में विषय और भाषा का जो सामजस्य दिसाई देता है, उसके श्रागे 'कामायनी' को यह (नप से शिस तक मौलिक्तापूर्ण) स्थान देना उचित नहीं मालूम देता।" बात यह थी कि डॉ० हजारोप्रसाद द्विवेदी ने कामायनी के सम्बन्ध में यह लिख दिया था कि कामायनी नस शिम तर मौलिक है और यह भी लिख दिया था कि विषय और भाषा का प्रौद सामञ्जस्य जैसा कामायनी में है पैसा वर्त- मान हिन्दी कविता में दुर्लभ है। बस इतने पर वे मित्र बिगडे यदाचित् इसलिए कि वे स्वर्गीय प्रसाद जी को प्रगतिशील नहीं मानते और उन्होंने अपनी यह व्यवस्था दे डाली कि डॉक्टर हजारीप्रसाद जी द्वारा की गई कामा यनी की प्रशसा उचित नहीं मालूम देतो । इन मित्रों का यों रष्ट होना-प्रसाद जैसे (उनकी दृष्टि में कदाचित् परम्परावादी) की यह प्रशसा सुनकर विचलित होना-समझ में आता है । जिन दो मित्रों का उन्होंने पक्ष लिया है उन्हें वे कभी प्रगतिशील मानते थे।

wr - भय तो उन पर भी एडे यरसने लगे हैं। अस्तु । सो उन दिनों ये गति युक्त समझे जाते थे और उनको सर्वश्रेष्ठस्य के नीचे का मासा यदि कोई दे तो उनका पक्ष लिया जाता था। पर, समय पड़ा यलयान है। कुछ दिनों के अन तर उन धालोचक बन्धु को यह लगा कि जिनको ये प्रय वम धाकाश में घदाते पाये उनके शुद्ध लत्ते लेने चाहिए । कदाचित् वे कधि मिग्र द्वय, शालोचक की प्रगतिवादी दृष्टि से, उतर चुके थे। इस कारण उनमें से एक महानुभाव की जिस प्रकार मिही पलीत की गई है, उसका एक उदाहरण बाजिए । स्मरण रखिये कि ये शब्द उन्हीं थालोचक क हैं जिन्होंने इन कवि मित्र की प्रशंसा का सेतुबन्ध, नल नील से भी अधिक परिश्रम से, यिा था। इन कवि श्रेष्ठ की धज्जियाँ उदात हुए पालोचक महोदय कहते हैं- "धन्य है वह कवि जो जन्मते ही उत्थान पतनों को देखने लगा था। उन्हें देखने के बाद जो 'प्रोफेटिक' चेतना जागी, उसमे भारत मही भी कृतार्थ हो गई। तभी तो दुसरे महायुद्ध के पहले की एक रचना में उसका तुमुल घोष भी सुन लिया। में जागरण का कवि हूँ। भारत की जनता मूर्य है। जागरण का सन्देश देकर मैंने उसे घिर उपकृत किया है की हर पक्ति से यही ध्यनि निकलती है। किमी को विश्वास न हो तो ध्वी की तरफ कान न लगाकर, शब्दों से मूर्त रूप को ही देप ले। वे लिये लिसा है कि जनता के मन में जो अन्धविश्वास और मृत श्रादर्शों के प्रति मोह है उसे छुड़ाने का प्रयत्न कर उन्होंने नवीन जागरण का सदेश दिया है। हिन्दुस्तान की जनता कितनी भी पिछड़ी हुइ हो, वह किसी दूसरे की रोटी के सहारे नहीं जोगी। हिदुस्तान का पिछडा मे पिछड़ा किसान अमुक नी से ज्यादा दशन समझता है । वह इमानदार है, इसलिए रामनामी के नीचे कामशास्त्र नहीं छिपाता थोर, सजीव भाषा का प्रयोग तो यह इन्हें युगों तक सिसा सकता है।" देखा न आपने ? कहीं कुछ हो गया और लगा कलम कुल्हारा चलन । और उन अन्य कवि की भी, जिनकी उन्होंने प्रशसा की, अन्त में छीछालेदर कर दी। उन्होंने उन कवि को व्यक्तिवादी कहा पोर अन्त में उन्हें व्यक्तिवाद के स्यार की उपाधि स विभूपित कर उनका श्राद्ध कर दिया। इसी प्रकार एक और बालोचक मित्र की बात है । जव चे पालोचक इन प्रगतिवादी एकाधिपति अालोचा के गुह में सम्मिलित थे तब तो ये उन्ह एक प्रतिभाशाली भालोचक मानते थे, पर, जब इनसे उनका मतभेद हो गया तो इहोंने तुरन्त उन्हें निकृष्ट लेखक की उपाधि से विभूषित कर दिया ।

, एफ और मित्र है-लेखनी के धनी, सुन्दर वर्णन सामर्थ्यशील, प्रतिभा- युक्त, जीवन देसे हुए, सुपठित, यहुश्रुत और मौलिक । जय थे इन पालोचक के मिन्न थे तब इन महाशय ने उनके सम्बन्ध में लिया था कि वे प्रतिभाशाली करि चौर थालोचर है। पर, अय उनकी इनसे नहीं पट रही है, इस कारण इन धुरन्धर भालोधा की दृष्टि में ये उपहास के विषय हो गए हैं। एक और मिन है-हिन्दी के उच्च कोटि के कवि, विचारक, उपन्यास कार, कहानीकार और नियन्ध लेग्यक । उनका समस्त जीवन साधनामय रहा है-यड़े पैने, कुशाग्रबुद्धि, मौलिक, कल्पनाशील, सहृदय और प्राणवान् । ये ख्यातनामा प्रगति-ध्वजाधारी थालोचक उनसे ऐमे रष्ट हुए कि उनके सम्बन्ध में कहते-कहते बिलकुल नीचे उतर आये और कहने लगे जिससे प्राप यह न भूल जायें कि यह मिस मेयो की मानसिक सन्तान हैं। मेरा निवेदन है कि प्रगतिशीलता के नाम पर जहाँ इस प्रकार का नग्न मृत्य-अपने राग द्वेषादि मनोविकारों का ऐसा अचल प्रदर्शन हो रहा हो, वहाँ साहित्य का वास्तविक मूल्याकन कैसे हो सकता है ? भोर, इस कारण, मेरे उ7 मिन के शब्दों में यदि बेचारे प्रगतिशील 'नवीन' मर चुके हों तो किम् प्राश्चर्यम्-श्रत परम स्थापनायों का मूल्य मान-दण्ड ही जहाँ इतना विकृत, अस्थिर एच ढगमग हो वहाँ उसकी कसौटी पर किसी कवि या साहि स्यिक कृति का मूल्याकन कैसे किया जाय ? उग्रतापूर्वक लिखना मैं भी जाता हूँ। पर, इन नालोचक यन्धु के विचारों की श्रालोचना मैं उस रीति से नहीं करूंगा। में इन महाशय के अध्ययन का प्रशसक हूँ। ये पढ़ते हैं, विचार करते हैं, भाषा पर उनका प्रभुत्व है। वे परिश्रमशील है। मैं यह भी मान सस्ता हूँ कि उनकी उम्रता, व्यग उत्रियाँ, क्टुवादिता एव असन्तुलित सम्मति उनके सिद्धान्त माह के कारण है। किन्तु भाई, इस प्रकार यह जान से तो 'काम नहीं चलेगा। स्वय को यदि हम स्थिर न रस सकें और किसी सण, यह समझकर कि अमुक व्यक्ति प्रगति स्तर से भटक गया है, हम उसे परी खोटी सुनाने लगे, तो क्या हमारा वह कर्म सत् साहित्यालोचन होगा? जब तक हम तात्विक सिद्धान्त को नहीं समझेंगे तब तर काम न चलेगा। हमारे प्रगतिवादी वन्धुत्रों के विचार पदाथवादी दर्शन की भित्ति पर श्राधारित हैं। इसलिए यदि हिन्दी के वर्तमान साहित्यकार उस पदार्थ चादी दर्शन को स्वीकृत नहीं करते तो उनकी कृतियों और पदार्थवादी थालो चकों के बीच इस प्रकार का झगड़ा चलता ही रहेगा। पदार्थवाद निश्चय ही ऐसा दर्शन है जिसे कुछ लोग सदाशयतापूर्वक स्वीकार करते हैं। हमारी - ६ भाषा के प्रगतिवादी थालोचक यन्धुनों को पद तथाकथित वैज्ञानिक पदार्य घादी दर्शन मान्य है। ज्ञात नहीं इन थालोचकों ने किस सीमा तक उस दर्शन का अध्ययन किया है । सम्भव है वे उसके तानों को पूर्णरूप मे हृदयगम फर चुके हों। यह भी सम्भव है कि उन्होंने ऊपरी रूप से उसे पढ़ा गुना मुना हो और स्वीकार कर लिया हो। हमें देखना यह है कि क्या वह तथाकथित बैनानिक पदार्थवादी दर्शन ऐसा है जिसे, सय लोगों को, बौद्धिक सदाशयता के साथ, स्वीकृत कसा ही चाहिए? मैं समझता हूँ कि पदाथवादी दर्शन के लिए इतना बड़ा दावा करना अनुचित ही नहीं, सस्यान्वेपण की भावना के भी विरुद्ध है। मायर्स ने "फ्योरयाज सम्य धी स्थापनाएँ" (Theses on Feuerbach) शीर्षक अपने तत्व निरूपण में पदार्थवादी दर्शन पर सूत्र रूप में अपने विचार व्यक्त किये हैं। उन्हे हम "क्योरयान सूर" कह सस्ते हैं। फ्योरयाग एक प्रख्यात पदार्थवादी दाशनिक जर्मनी में हो गया है । उसी के दर्शन पर मार्स ने ये सूत्र लिखे हैं। उनमें से पहला सूत्र इस प्रकार हे The chief defect of all materialism upto now (socludiog Feuerbach's) 1s, that the object, reality, what we apprehend through our seases is understood only through the form of the object or contemplation, but not as sensuous hunan activity, as practice not subjectively (Prof Pascal's translation of the Theses on Feuerbach appended to his edition of "The German Ideology', London, 1938 p 197) अर्थात् मार्स के अनुसार, "अब तक के सपूण पदार्थवाद की (निसमें फ्योरवाल का पदार्थवाद भी मम्मिलित है) न्यूनता यह रही है कि वस्तु विषय, यथार्थ, जिसे हम इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण करते हैं वह इन्द्रियाथ केवल मात्र उस इन्द्रियार्थ के ( याह्य) रूप के अर्थ में अथवा उसके मानसिर ध्यान के अर्थ में ग्रहण किया गया है, किन्तु (उस इन्द्रियाथ को) सेन्द्रिय मानवीय क्रिया के रूप म हृदयगम नहीं पिया, (उसे) व्यावहारिकता के रूप में स्वीकृत नहीं किया (वह इन्द्रियाथ ) स्वनिया रूप में मान्य नहीं किया गया।" इस सूत्र पर पाठक विचार करें और दसें कि पदाथवाद के सम्बन्ध में मार्स की जो मान्यता है वह कहाँ तक युक्ति सगत एव तक्पूण तथा ग्राह्य है। स्मरण रखिये कि यह सूत्र अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इमी सून से आगे चलकर समूचे पदाथवादी सौन्दर्य कला साहित्य शास्त्र की उत्पत्ति होती है।

. । इसलिए हमें इस पर गहनतापूर्वक विचार करना है। इस सून से मुख्यरूप में दो यातें निप्पम होती है प्रथम तो यह कि मार्क्स पुराकालीन पदाथवाद की धारणा जड़ थी, माक्स के अनुसार यह गतिशून्य थी, केवल मात्र बाय जगत् के इन्द्रियार्थी अर्थात् इन्द्रियों द्वारा गृहीत याह्य पदार्थों, को यथार्थ समझ लेना मात्र हो, उनको यथार्थ मान लेना भर ही, उस मासं पुराकालीन पदार्थवाद का उद्देश्य था, पदार्थों के हृदयगम होने की प्रिया में जी "सेन्द्रिय मानवीय सरियता" है, उसकी भोर उस पुराने पदार्थवादी दर्शन का ध्यान नहीं था और, दूसरे यह कि जो कुछ यथार्थ ( Reality ) है वह केवल मान वह पदार्थ, वह वस्तु है, जो इदियों द्वारा ग्राह्य है। उक्त सूत्र की ये दो मुख्य पाते हैं। निश्चय ही, मार्स ने पुराकालीन पदार्थनाद और उनके स्वय के द्वारा प्रतिपादित तथाकथित वैज्ञानिक पदाथवाद में जो अन्तर दिखलाया है वह बड़ा विचारपूर्ण, मौलिक एव तात्विक है। मास की दृष्टि में दर्शन का काम सामाजिक चेतना को जागृत, प्रभावित और चालित करना है। अत इतना कह देना भर ही अलम् नहीं है कि इन्द्रिय ग्राह्य यहिजगत् के अतिरिक जो कुछ है वह अयथार्थ (Unreality) है । उन्होंने अपनी प्रखर प्रतिभा, गम्भीर विचार शक्ति एवं गहन मौलिकता के बल पर यह सिद्ध किया कि अरे भाइ, इन्द्रियार्थ के ग्रहण करने मात्र की क्रिया मे सन्द्रिय माननीय क्तुं व निहित है। यह बात मनोवैज्ञानिक आधार पर स्वय सिद्ध है। इस कारण उन्होंने यह परिणाम निकाला और शास्त्रीय दृष्टि से उचित तथा मानवीय दृष्टि से नितात उदात्त यह परिणाम निकाला-कि बास जगत् के हृदयगम करने मात्र में जय मानवीय क्तृत्व है, उस जगत् से प्रति कृत होने तथा उसके उपर प्रतिक्रिया करने का जय यह मानवीय कर्तृत्व (मानव मनोविज्ञान द्वारा सम्मत कर्तृत्व) निहित है, तब निश्चय ही पदार्थ- वादी दर्शन का यह कर्तव्य है, यही उसकी इतिकर्तव्यता है, यही उसकी विनान सम्मत, तर्कसम्मत सार्थकता है, कि वह प्रत्येक दिशा में मानव जीवन को शुभ की ओर परिवर्तित करने की प्रेरणा प्रदान करता रहे। कितना अद्भुत कितना भव्य निष्पप है। मैं जय, फ्यारवान सम्बन्धा, ऋपि मार्स के ये सून पढ़ता हूँ तो उनको स्मृति में मेरा मस्तक मुक जाता है। कितनो प्रखर मेधा। कितना महान उनका स्पष्ट दर्शन सामर्थ्य ॥ कितनी गहर गम्भोर मौलिकता निस देह मार्क्स के पूर्व का पदार्थवादी दर्शन गति शून्य था। मार्स ने उस दर्शन को गति दी, उसे समाज उपयोगी बनाया और उस दर्शन को इस युग को एक महतो शनि में परिणत कर दिया। मार्ग का यह प्रथम मूल पदार्थ यादी दरान ५ निभाग मत मन्द६ प उ भूमि-गीमा पिद है। अपन भौतियवादी दर्शा र प्रतिपादन में मारसं 1 यस महा मेपानी, यान् क महामााय य प म प्रकरण मार्ग र हम प्रथम गस में मरी मान्पण है यह गुम प्राय दी है। और इमो कारण प्रथम मायता की गारमोमिक मरपता भी मैं म्योहत नहीं पर सस्या । प्रथम सूय भी दमरी मान्यता पया? यह यह है कि पार्य, सत्य (Reahuy), यही निस हम इत्रियों द्वारा समझत, प्रण परस, हदय अमरते में अपने प्रानियादी मधोम पूसा शिपया यह मा यता १ शन्द्रियोपकरण द्वारा जो कुछ भी हमें उपलब्ध होता है, क्या केवल माय पहा सत्य है ? यही पयाय है। मैं यह नहीं कहता कि यह अयथार्य है। पर, यथार्य को, साय को, इद्रिय योघ द्वारा सीमित करना-उसके परे मय पुछ थसत्, अययाय है, पसा मा बना, मेरी सम्मति में तशून्य प्राग्रह है। ज्ञानोपलब्धि-साधन शास्त्र को दसने से पता चलता है कि इन्दियों का कुछ भी ग्रहण करती है यह एक माई के रूप में होता है । पास्तविक, यथार्य, -प्रथात् याह्य जगत् का इन्द्रिय-गृहीत स्वरूप क्या वैसा ही है जैसा हम उसका अपनी इन्दियों द्वारा योध करते है। इस प्रश्न का तकपूर्ण उत्तर 'हा' में अाज तक देने का साहस, माक्सवादियों के अतिरिक्त, अन्य पात कम लोगों को हुआ है। क्या यह सत्य नहीं है कि हमारे ग्रापके लिए जो यह रगबिरगा जगत् है, यह एक रग अन्ध माना के लिए नहीं है तय क्या उस विचारे रग अन्ध जन का इन्द्रियों के द्वारा गृहीत यह जगत् अयथार्थ है। विकार किसमें है ? उस रग अन्ध में, क्योंकि उसको सख्या कम है ? सब क्या हम यहुसरया के बल पर तय निरूपण करेंगे? क्या याश्चर्य कि विकार हम बहुसरयकों में ही हो? और क्या आश्चर्य कि यह सतरंगी जगत् वास्तव में रगरहित, अरगी हो? हम लोग उस माना को, जो रग नहीं देसता, रंग अन्ध कहते हैं। पर, यदि यह हमें भ्रमा-ध कहे तो मेरे कथन का पेयल मात्र अर्थ यह है कि केवल इद्विय सवेदन को ही यथार्थ का एक मात्र साक्षी मान लेना मुझे भ्रामक प्रतीत होता है । यह वास्तव में भ्रामक है। यदि इन्द्रिय सवेदन वास्तव में यथार्थ का बोधक है, यदि वह वास्तव में हमें, जो भी वास्तविक जगत् स्वरूप है, उसको छाया मात्र का योध नहीं कराता है, तो स्वम जगत् का क्या होगा ? स्वप्न जगत् की छाया, जो हमारे मस्तिष्क पर अस्ति हे, स्वप्न में यथाथ जगत् के रूप में प्रा जाती है। तय, + क्या हम उस स्वाम विहार को भी यथार्थ मान लें ? इन प्रश्नों का उत्तर पदार्थवादी दर्शन, जो इन्द्रिय योध को ही यथार्थ का मापक मानता है, अाज तक देने में असमर्थ हुश्रा हे, भविष्य में भी वह उसका उत्तर न दे सकेगा। मानव समाज के श्रव तक के अद्भुत अनुभव हमें यह यताते है कि इन्द्रिय योध के अतिरिक्त भा यथार्थ का अस्तित्व है। नि सन्देह पदार्थवादी दाशनिक इस यात को नहीं मानेंगे। उनकी इस अस्वीकृति में अनुचित प्राग्रह का पुट है। वे सम्पूर्ण मानव समाज के अद्यावधि के अनुभवों से लाभ उठाना नहीं चाहते । उन्होंने अपने को अपनो मान्यता की, अपने श्राग्रह की, सीमा में याँध लिया है। उनके द्वार मुफ नहीं है। इस कारण, उनकी विचारधारा अवैज्ञानिक है। एक सीमा तक प्रगतिवाद क घोड़े पर बढ़कर ये जाते हैं, पर, अन्ततोगत्या उनके घोड़े का मुख, निर्गतिवाद और प्रतिक्रियावाद की भोर मुड़ जाता है। यह बात चिन्ताजनक है। तुडगि फ्योरयाख्न के सम्बन्ध में लिसते हुए फ्रेडरिक एंगल्स ने एक स्थान पर अपो विचार यों प्रकट किये हैं- The great basic question of all philosophy, especially of more recent pbilosopby, is that concerning the relation of thinking and being from the very carly times when men, still completely ignorant of the structure of their bodies under the stimulus of dream apparitions, came to believe that their thinking and sensations were not activities of their bodies, but of a distinct soul which obabits the body and leaves it at death from this time meo have been driven to reflect about the relation between this soul and, the outside world Thus the question of relation of thinking and belog, the relation of spirit to nature-the paramount question of the whole of philosophy-has, eo less than all religion, its roots in the narrow minded and ignorant notions of savagery (Feue- Ibach and end of Classical German Philosophy Fredric Engels, Marx Engels Selected works, vol u P 334 Foreign Language Publishing House, Moscow, 1951) ऐंगल्स कहते हैं कि "सम्पूर्ण दर्शन का, विशेषकर आधुनिक दर्शन का, मूल प्रश्न है विचार और अस्तित्व के सम्पन्ध का। बहुत प्रारम्भिक काल से, जबकि मनुष्य अपने शारीरिक ढांचे के सम्बन्ध में नितात अज्ञानी थे, अपनी स्वमन्छाया के उत्तेजन के कारण, यह विश्वास करने लगे कि उनके विचार और इन्द्रिय सवेदन उनके शरीर की क्रियाएँ नहीं है, परन् घे उनकी उस हे श्रास्मा की प्रियाएँ हैं जो उनके शरीर के भीतर निवास करती है और मरण के समय उसे छोड़ जाती है। उस श्रारम्भिक काल स मनुष्य यह विचार करने पर याध्य हो गए हैं कि इस प्रारमा और याहा जगत् के बीच किस प्रकार का सम्बन्ध है। इस प्रकार विचार और अस्तित्व के पारस्परिक सम्बन्ध क प्रश्न, 'चेतस् और प्रकृति के सम्बन्ध क प्रश्न-सम्पूर्ण दर्शन के इस महत्तम प्रश्न और इसी प्रकार सम्पूण धर्म-की जड़ें जमी हुई दिखाई देती है श्रादि वर्वरता के समुचित और श्रज्ञान तिमिरान्ध सकल्पों म ।" पदार्थवानी दार्शनिकों की यह मा यता नितान्त अनैतिहासिक, थोधी, नि सार और मानव समाज के सचित अनुभव के विपरीत है। प्रारमा के विचार के श्राविभाव को स्वप्नों के उत्तेजन का परिणाम कहना जड़वादिता की सीमा है। कोनसा इतिहास देसकर यह परिणाम निकाला गया ? उत्तर मिलेगा कि वर्तमान काल में जो भी यवर समाज बच रहे हैं उनके विचारों का अध्ययन करने के पश्चात् इस परिणाम तक पहुचा गया है। ठीक है, पर प्रश्न यह कि उन वर्वर समाजों में जो टोने टोटके, यन्त्र तन्त्र प्रादि के प्रयोग होते हैं, उनका भी अध्ययन किया गया है ? यदि नहीं, तो क्या नहीं ? यदि हाँ, तो क्या कोई ऐसे अद्भुत दृग्निपय दीस पड़े हैं जिनका भाष्य वैज्ञानिक भौतिकवाद करने में हिचकता है ? यर समान में जो भी पैठ पाये हैं उन्हें सहस्रों बार इस प्रकार के महदाश्चर्यपूर्ण दृग्विषयों से पाला पडा है । पदायवादी दार्शनिकों ने उनका कोई समीचीन स्पष्टीकरण किया या केवल उन यातों को कपोल कल्पना कहकर हा उन्होंन टाल दिया ? बबर समाज की स्वमनोदित छायानों को श्रारमा विषयक विचार की जननी मानने मनवाने का उपहासास्पद प्रयत्न करने वाले जन क्या स्पष्टीकरण करते हैं उन विज्ञानोपरि घटनाओं का जो चन्द्रशेखर वेंकटरमण जैसे वैनानिकों को भी प्राश्चर्य में डाल देती हैं ? पोटे शियम साइनाइड नामक विप के श्रगुमान से क्षण भर में मृत्यु हो जाती है, कलकत्ता साइन्स इन्स्टीट्य ट म डा. रमण के सम्मुख एक हठयोगी ने इतना साइनाइड विष खा लिया जिससे सैकड़ों मनुष्य मर सकते थे, और वह खड़ा व्यारयान देता रहा । जब रमण महोदय से पूछा गया कि यह क्या बात है ? तो वे योले-It is a challenge to science, यह विज्ञान को एक चुनोती है, प्रगतिवादी भौतिक दर्शन शास्त्री अथवा उनके अनुयायी यह पढ़कर हँसेंगे। पर अनुचित प्राग्रहपूण हँसी में वास्तविक घटना निमज्जित नहीं होगी। भौतिक प्रतिक्रिया को-मानव शरीर पर हलाहल विष की प्राणघातक प्रतिक्रिया को-जो शक्ति अतिक्रमित कर दे, वह क्या है १ आधिभौतिर, १३ या अभौतिक, प्रत प्राध्यारिमा १ इतना ही क्यों ? हम अपने समाज में, पाये दिन पुनर्जन्म के प्राश्चयजनक उदाहरण देस से सुनते रहते हैं। क्या यह सय पाटे छोटे पालरों के मन पर अजान रूप से पुनर्जन्म विषयक विचारों को थोपने का परिणाम मात्र ही है। ऐसा कहना साहस का काम होगा-विशेष पर उस अरस्था में जयकि उसयालक पालिकामा द्वारा दूर के ग्राम नगर का भूगोल यता दिया जाता है, यहीं के एक विशिष्ट घर और उटुम्य का हाल यता दिया जाता है और उस घर तथा मुटुम्प के जनों के नाम भी यता दिये जाते है। इस देश में ऐसी एक नहीं सहखों घटनाएं घटती रहती हैं। इनको पोत कल्पना कहकर रालमा अवैज्ञानिक यच प्रतिमियागदी, मनोवृत्ति का परिचय दे॥ धर्म को, शरीर से प्रारमा के पृथक्रय को "श्रादि यर्यरता के सकुचित और अनान तिमिरान्ध साल्पों" से सम्भूत मानना प्रति गति पूर्ण प्रतिक्रिया वादी सिद्धान्त है। हमें दुख है कि प्रापि कार्ल मार्म और प्रमाण्ड विद्वान् शिरोमणि फ्रेडरिक एंगल्स ने इस प्रकार की सड्तापूर्ण स्थापना को स्वीकृत करके अपने दर्शन तत्व को गति शून्य एव प्रतिनियागादा बना दिया है। इस प्रकार उन्होंने माय प्रगति को रोक दिया है। इस दर्शन सिद्धान्त पर जो भी साहित्य कला सौन्दय शास्त्र अाधारित होगा, यह पूर्ण रूप से माह नहीं हो सकता। इस प्रकार का शास्त्र, उस अश तक शिम तक यह अपने को पदार्थवादी दर्शन का धनुगामी पना लेता है, मानव प्रगति को रोकने वाला, श्रत मानवोन्नति बाधक, गति अवरोधक, अचल तथा प्रतिक्रियादी सिद्ध होगा। इस प्रकार के साहित्य कला-सौ दर्य शास्त्र में कवल उसी सीमा तक गति होगी जिस सीमा तक यह जीवन के तथ्य को स्पश, विकसित और प्रस्फुटित करेगा। किन्तु जिम समय यह शास्त्र जीरन के तथ्य को केवल भौतिकता में याँधने का दुरामह करने लगेगा, उसी समय यह विचार विकास विरोधी के रूप में प्रकट हो जायगा। हिन्दी के पालोचना इतिहास में इसी प्रकार की प्रवणता, इसी प्रकार के मुकाघ, का याविर्भाव हो गया है। यह सेद को बात है। अाज का पदार्थवादी पालोचक मानो कहता साहित्य को, देखो, जिसे मैं यथार्थ, सत् मानता हूँ उसे तुम यदि चित्रित या परिघड़ित करोगे तय तक तो ठीक हे; तुम्हें मेरी प्रशसा मिलेगी, तुम्हें मैं प्रासमान पर चढ़ाऊँगा, पर, याद रखो, यदि तुमने कहीं ममाग्रह के विपरीत कोइ अभियक्ति की तो तुम्हें और तुम्हारी सात पीढ़ी तक को मैं है - कलम-कुल्हाड़े के घाट उतार दूंगा। हाँ, देवू, तुमने क्या लिसा है? यह कविता देखने दो हल । चलानो, हल हुमक धरित्री की छाती म तुम पैदा कर दो हल चल । हल। चलायो, हल। हल। हल। हल। रात सरेरा फेरा १ क्या मेरा क्या सध्या क्या क्या म याह्न सूर्य का श्रम मे क्या तेरा १ सर मिल आज लगायो बल, हल । हल हल । चलायो, हल ।। (२) निज तन मन का पालस झाडो, भूमि सुधारो, कॉस उसाडो, श्रान पिजय का झण्डा गाड़ो, रहे न दारिद का दल दल, हल । हल । हल ! चलानो हल । पकडो हल तुम मुट्ठी भीच, चैल ले चलें उसको पीच, हुलसानो भू, श्रम-कण सींच, कृपा अडिग तुम, तुम निश्चल, हल । हल ! हल । चलायो हल ।। (४) फाड़ो धरती और मुनकर तर तिस्राल दहाड़,- काँपे शोषम सीस उबर भने भूमि प्रति पल, हल । हल। इला चलानो हल !! पहाड़, काद। तुम हो भारी सिरजनगरी, अति श्रमाप है शक्ति तुम्हारी, 11 तुम हो श्राशा को चिनगारी, मानवता के सम्बल, हल। इल। हल! चलायो हल (६) तुम जगल के मगल-यता, तुम जन-गण पोपर, मता, तुम हो क्षधा व्यथा के हता, श्रन तुम्हारे श्रम का फल, हल ! हल । हल । चलायो इल (७) योग्रो, सींचो, और निराश्रो, पर, जब कौवे, पीर उड़ानो- तर तुम प्रगति-गीत मिल गायो, सामूहिक कृषि ध्येय अटल ! हल । हल । हल | चलायो हल ।। हू। थच्छा ? यह तुम्हारी कविता है ? तुम तो वास्तव में प्रगतिशील कवि हो। कृपक के हल चलाने के सम पर यह तुम्हारा छोटा सा गीत भी बढ़ चलता है। लेकिन घाटे छोट पदम रखकर चलने वाले वामन जैसे इस छन्द में तुमने कृपक जीवन का अनोसा ठाठ रच दिया है। नई हिन्दी कविता निमाण में जो अनेक प्रतिभाशाली करि लगे हुए हैं, उनमें तुम्हारा महत्व पूर्ण स्थान है। तुम जनता की भावनाओं और उनकी भाव व्यजना के प्रकारों को बहुत निकट से पहचानते हो। इसलिए तुम्हारा उत्तरदायित्व भी विशेष है । पर, तुम ग्युष निसर पाये हो। मानव प्रगति के तत्व को तुम हृदयगम कर चुके हो। तुमने सामूहिक कृषि की ओर जो ध्येय के रूप में सकेत किया है, वह तो तुम्हारे क्रान्तिशील व्यक्तित्व एव चिन्तन का बहुत सुन्दर प्रमाण पर, ऐं?? यह क्या ??? तुमने यह क्या लिखा है? एक निदु, इदु मथित सिधु लहर छोड़ चली, लग ससीम नौ' असीम बीच लगी होड़ भली । निज विराट रूप त्याग, बिदु हुई तवगी, अपरिमेय, अमित मापराशि हुई अण्वगी, १ है अगमा गतिगम्य हुइ अनिलानल रँग रगी, नाना विधि रूप धरे पिचर रही गली गली, पिदु, सिधु छोड़ चली। (२) हर हर कहते गतियुत, द्रुत मारुत रथारूट, अम्बर मे विचरण की हिय म भर व्यथा गूढ,- लेने टिक काल थाह निक्ली यह विदु मूढ, निज असीम, अगम, गहन गृह से मुंह मोड चली, निदु, सिधु छोड चली। (३) क्षण में वह वाष्प वनी, क्षण मे वह अोस विदु, क्षण मे धन वारि उपल, फिर, चातक तोष, विदु, कितु ग्राम तुष्टि कहाँ यदि न प्राय गहर सिधु ? तमयता शल्य पिलग रहनि इसे पान सली, विदु, सिधु छोड चली। (४) अम्नर का भ्रमण किया, वैठी भू गर्भ बीच, सरसाया नव जीवन पादप, तृण सींच सींच, देखा चिरकाल-क्लन, अपलोका ऊँच नीच, सितु न क्षण भर को भी गृह की सुधि रच टली, पिदु, सिधु छोड चली। (५) श्रो गभीर स्नेह सि धु, प्रो सुदूर इदु पूर्ण, इस चौरी पिन्दी का हुआ साल गर्व चूर्ण, पिलग रूप अब असह्य, असहनीय चक्र पूर्ण, घहर उठो सम्मुप अन, चीत चुकी युगावली, पिदु, सियु छोड चली। यह भी नुम्हारी करिता है ? तो, मैंने जो तुम्हें प्रगतिशीलता प्रमाणपत्र दिये थे उन्हें मैं वापिस लेता हूँ। तुम कवि नहीं, तुम तुम्ह, मोर, पलायनवादी, रहस्य-रोड दुवक, दो कौडी के यादमी हो। तुम मिपावादी हो। सुम, मैं इस समय निमका नाम भूल रहा हूँ, उसकी, उस प्रति - पलायनवादी, तनिषापादी पायी की मानम सवान। ममता पादी हो। उपनिगरा जपन्य सादी दरान-पा मगर, मग मोर सास को गिरा देने वाला भी कापा दशम-टगा गुम अनुयायी हो। र पापी मt गम्गुण मे। गीत) मगर अभी सपने प्रगतिवादी पक पक्ष में भाम कर दंगा। इस प्रकार की मानोपा पति दिपी में पल रही है। मरा पयल इतना नियदा दिइस प्रकार के रामद हिन्दी में इन बातों को मापाही মানিয়ায়া ফা বিমাৰ গালা। গান্ধিী যুগ ও মৰি शीलता, जैमा में बह पुश हैं। पारमय में प्रतिगामिता है। इस प्रकार प जदयाद को हिम्दा मार नहीं अपनाये। मानय का सतधन मुक परा, मानय ममा का भेरियों में समाज R भिन्न स्पिति प्रदान करता, यह सब पासप है। पर, यदि कोई यह कहे चिराग, द्वेप, गृणा और हिंसा गृति दो उमारन यही उस प्रकार के समतारादो ममाम का निर्माण हो सगा, सो मरा निकन रिप्रेमी मान्यता प्रतिहामिए और यतमान मानर समाजक घटना क्रम में विस्द। मार चोर गरम ने यह मिदास प्रतिपादित किया था कि श्रेणीयद ममाज में कोई कला ऐमी हो ही नहीं मरतो गो प्रयत या गौण स्प स किया, श्रेणी पिक हितों को प्रतिविम्बित न परती हो। इम मिदात को लेनिन । चौर मागे परिवदित किया। लनिन । पद सिद्ध किया कि चूं कि वर्ग ममाग को मम्पूय कला स्यमापस पायलम्पी (Parusan) होती है, इसलिए श्रमिक समाज की कला को भी पपालम्बी होना चाहिए। उन्होंने इस प्रकार क पक्षपात का यदा गम्भीर विवेचन किया। सन् १९०१ में उन्होंने एक लेप लिया था जिसका शीपा था "दल सगटा और दल साहित्य" (Party Organisation and Party Literature)। लेनिन ने बताया कि पहार लम्या (Partianship) का अर्थ क्या है। पर यग भेद घीयतापूरक यागे पढ़ रहा हो सय प्रत्येक क्लाफार का अपनी यग मैत्री या वर्ग लगार को सप्टत प्रकट पता होगा और उम (वर्ग) सघर्ष में अपना निश्चित स्थान ग्रहण करना होगा। लाप्रागे रहते है "To offset Bourgeois custom, to offset the commercial Bourgeois press, to offset Bourgeois literary cerccrism and profit sccking, the Socialist Proletariat must put forward the principle of Partisan Literature, must develop this principle and carry it out in the १८ completest and most integral form" इसका श्रथ है कि "पूजीवादी प्रया, यानी सामाजिक परिपाटी, का कुण्ठित करने के लिए, पूंजीवादी जीवन यापन याद और व्यक्तिवाद को कुण्ठित करने के लिए, 'बैलाशाही' अराजस्वाद और धन लाभ प्राप्ति को कुण्ठित करने के लिए यह आवश्यक है कि समाजवादी श्रमिक वर्ग पहायलम्यो साहित्य के सिद्धान्त को सम्मुस रसे, उसका प्रतिपादन करे, उस सिद्धान्त को विकसित करे, और उस सिद्धान्त को सम्पूर्ण एर अत्यन्त अनिभक्त रूप से कार्य रूप में परिणत करे। जो धारणाएँ, जो सैद्धान्तिक मान्यताएँ मावर्स, ऐंगल्स थोर लेनिन की हैं उनके अनुसार तो यही निष्कर्ष निकलेगा जो महामानर लेनिन ने निकाला है। परन्तु जो यात विचारणीय है वह यह कि क्या उनकी वे मान्यताएँ ऐतिहासिक रूप से सत्य है १ भारतीय साहित्य की ओर दृक्पात कीजिए और देखिये कि क्या मार्स एंगल्स लेनिन की यात ठीक है ? उनका यह कथन, श्रेणीबद्ध समाज में साहित्य कला तथा अन्य क्लाएँ श्रेणी विशेप के हितों को प्रतिविम्बित करती हैं, भारतीय दर्शन साहित्य, उपनिषत् साहित्य, श्रादि काय साहित्य पर घटित होता है ? भारतीय दर्शनों का साहित्य किस श्रेणी के हित को दरसाता है ? क्या ब्राह्मण श्रेणी के ? कदापि नहीं। ईश, केन, कठ, थादि उपनिषत् ग्रन्थों का साहित्य फिस श्रेणी के हित का प्रतिनिम्यक या समर्थक है ? रामायण क्या क्षत्रिय श्रेणी हितों का उन्नायक ग्रन्थ है ? जिसका मस्तिष्क यथास्थान है वह तुरन्त देस लेगा कि मार्क्स ऐंगल्स लेनिन का वह पक्षावलम्बी सिद्वान्त भारतीय साहित्य की इन धाराओं पर लागू नहीं होता। और चलिये । अजन्ता के गुहा चित्र स्मि श्रेणी के हित प्रतिविम्बक हैं ? यों मारूं तीर, लगे तो तीर, नहीं तो तुक्का हे ही-इस प्रकार से काम नहीं चलेगा। मैं यह मान लेता हूँ कि कुछ देशों में, कुछ काल में, साहित्य मोर कला श्रेणी हित प्रतिबिम्बक बनकर रह गए हों। पर, यूरोप के चार छ छोटे मोटे देशों में प्रवाहित तत्कालीन धारा को शाश्वत सैद्धान्तिक सस्य का स्वरूप दे देना भूल है। मैं पक्षावलम्बी साहित्य का विरोधी थोड़े ही हूँ! हिन्दी में जनसमूह की इच्छाओं, थाकाक्षानों, प्राशाओं, विकास इच्छाथों, नवनिमाण भावनाओं को लेकर ऊँचे स्तर का साहित्य-सृजन हो- यह मेरी हार्दिक अभिलाषा है। पर, एक शब्द को लेकर जो किच किच किट किट आये दिन होती रहती है यह । मुझे निनाम पता पालापी माहिरप में पदिगन्तुमा, मपम, पमा दरन का प्रभाय हुमाछो यह साहित्य साहिरप न होकर गोंधों का मुष्यापन जापगा। और, परिवही उसमें चपात विशारों का पुरा गपा वो हिन्दी मापी मार सदापिए दानप नकर रह जापगा। पा ঘী মাৰিব নিম ৪ মে বিশ্ব সাধনানী থায়ী ব্যক্তি। रिमी मी मादिग्प प्रदा की हतिया, पक्षि पेमाप उठा। पानी है, तो पर होगी । अम्पया ये एप थापा होगा। साहित्य गगा रन पाने में हिन किन गुणों का होना पारप इस प्रश्न का उार निशित पनि भिनभिन्न रूप में विपार करो पाले गाइसा र भिर मिरा रूप से दंगे। मरे गत में साहिरपटा के लिए इन गुणों को प्राप्त परना निवारत भावश्यक है . स्वाभ्याप, C २ पएपना शषि, ३ सम्म सामय, ५ मान-स्वमारमध्ययन, ५ पयातप्प प्राप (Gnp on rundamentals) ६ कला-सोप्य, . स्थिति सुजन शक्ति (Power to create situation) न जीया चित्रण सामध्य, है समाधि सामथ्य ( Power of meditation) १० माजर इमानदरी ( Honesty) जिस साहित्यकार में ये गुपए होंगे उसकी कृतियों में ये स्वभावत हो मानक उठेंगे। निवेदन यह है कि साहियिक कृतियों को पालोचना करते समय हमें इन मानदण्ढों ये प्राश्रय से चलना चाहिए। साथ ही हम यह भी न भूलना चाहिए कि प्रत्येक देश की कुछ विचार विशेषता होती है। उनको ध्यान में रखे बिना, उस देश के साहित्य, उस दश की कला, भादि के सम्गन्ध में यदि मत प्रदशन किया जाय तो यह एक अशुद्ध पात होगी। किसी देश के साहित्य की थालोचना उस देश के गुण विशेष की घोर इक्पात किये बिना को हो नहीं जा सकती। एक देश की साहित्यिक कृतियों पर मनमाने, अधाचरे, उच्छिष्ट मालोचना सिद्धान्तों को पारोपित करना उपहासास्पद है। स्वय माक्र्सवादी दार्शनिक देश विशेष की राष्ट्रीय विशेषताओं को स्वीकार कर २० । महामहिम स्तालिन ने भापा शास्त्र समस्या और राष्ट्रीय प्रश्न पर अपने विचार व्यक्त करते हुए एक स्थान पर कहा है- Every nation, whether large or small, has its oro qualita tive peculiarities, its specific features which belong to it alone and are not found in other nations These peculiarities are the contri bution wbich every pation makes to the common treasury of world Culture, supplementing and enriching 11 इसका अर्थ है प्रत्येक छोटे या यड़े राष्ट्र को अपनी निन की गुणात्मक विशेषताएँ होती है। उसके अपने विशिष्ट लक्षण होते है। ये विशेषता उसी राष्ट्र को अपनी स्वय की होती है और अन्य देशों में ये नहीं पाई जातीं । ये विशेषताएँ यह प्रशदान है जो प्रत्येक राष्ट्र विश्व मस्कृति के सार्वलौकिक कोप में (अपने भाग के रूप में) देता है और इस प्रकार प्रत्येक राष्ट्र, उस सस्कृति कोप को परिवद्धित एव समृद्ध करता है।" इसका स्पष्ट मत इस बात की और है कि किसी देश की सास्कृतिक साहित्यिक कृतियों का मूयाकन, बिना उस देश की विशेषताओं को ध्यान में रखे, किया नहीं जाना चाहिए। और भारतीय साहित्यिक कृतियों के मूल्याकन के समय यदि हम अपने देश की-स्तालिन के शब्दों में -गुणात्मक विशेषताया को सम्मुस नहीं रखेंगे तो हमारा पालोचना प्रयास एकागी अथवा अनानिक ण्व अमत् होगा। हमें देखना यह है कि हमारे देश की गुणात्मर विशेषता क्या है ? मैं स्तालिन महोदय को 'गुणात्मक' विशेषता की शब्दावली के पीछे नहीं पड़ना चाहता। इसलिए मैं इसी प्रश्न को यों रखू गा कि हमारे राष्ट्र की प्रात्मा क्या है ' किस ओर उसरा मुकाव रहा है, और हे ? हमारे राष्ट्र का लक्ष्य क्या है ? कहाँ उसकी दृष्टि है ? स्मि और वह अपने ध्यान, अपनी कल्पना, अपने विचार का शर सन्धान करता है ? उसन क्सि विचार या वस्तु को अपने जीवन की परम प्राप्तव्य(Summun Bonum)और परम पुस्पार्थ माना है ? यदि इन प्रश्नों की ओर हम देखें और उन पर विचार करें तो हमें अपने राष्ट्र की गुणात्मक क्या, गुणातीत विशेषता का पता चलेगा। आइए, हम इस ओर अपना ध्यान केन्द्रित करें। भारत की जो प्रात्मा है वही भारतीय साहित्य की प्रामा है- आर्थिक सामाजिक विषमता, साने पीने विषयक अनेक्ता, राजनीतिक एकाधि पत्य अभाव, श्रादि के रहते हुए भी हमारा यह भारतवर्ष जो 'शुभ्र तुपार ? N किरीटी" और 'नील सिन्यु जल धौत-चरण तल' है-सदा से, प्राक् ऐतिहासिक काल से, एक राष्ट्र रहा है। इस सिद्धान्त के मएडन में अधिक पहना व्यर्थ है। इस बात को समी इतिहास पण्डित एर मास्कृतिक धारा में अपगाहन करने वाले विद्वान स्वीकार कर चुके है। सय देखना यह है कि यह क्या एग्विषय है, यह कौनसा सत्य है, जो इस विभिस देश प्रदेश वाले राष्ट्र में एक राष्ट्रीयता का द्योतक है। जो यहाँ की पिभिग्नताओं को 'मूने मणिगयाइव' प्रन्यिा करके इस भिन्न देशों वाले महान् देश को एक सम्पूण राष्ट्र धना धुका है, यह कौनमा घमस्कार है ? यह प्रात्मकता कहाँ से श्राद? यदि हम इस पर विचार पर तो पैसा प्रतीत होगा कि इस देश को धारकता प्रदान करने वाली यह प्रणोदना है जिसमे प्रेरित होकर नाम- दीय सूक्त के प्रापि की वाणी मुखर हो उठी थी-कुत पायाता इय विस यह शाश्वत टोह भान, यह पुकार, यह टेर- क्याहि की यह टेर मेरी यह चटपटा, यह लागा, यह उन्मन पाकाक्षा-यही है जो भारत की प्राशा को अनुसन्धानरत किये हुए है। इसी प्रेरणा ने हमारे देश के धाग्मय को गुजार प्रदान किया है। श्राम दशन, सत् परण, यन्धन मोक्ष-यही इस देश की विशेपता हे। उपनिपत् काल, धादि काय काल, महाकाव्य-काल, पुराण-काल, सन्तकाल, वर्तमान कान-सय बालों के वाग्मय में यह प्रेरणा दृग्गोचर होती है। उपनिषत् का प्रापि कह उठता है- नायमात्मा प्रपचनेन लभ्य न मेधया, न बहुनाश्रुतेन, यम् एप वृणुते, तेन लभ्य । पोर कठोपनिषत्कार का नचिकेता भी इसी थामोपलधि, यात्मा के अस्तित्व की गुत्थी, सुलझाना चाहता है। वह अपने गुर यम से पूछता है येय प्रेते विचिरित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्नीतिचेके, एतद्विद्याम् अनुशिष्ट त्याह वरणामेष वरस्तृतीय । "मनुष्य के मरने पर (मनुष्य प्रेते) यह जो शका (या इय विविक्सिा) है कि कुछ कहते हैं कि वह है (एके अस्तिइति) और कुछ कहते हैं कि वह नहीं है [च एके (पाहु ) अयम् न अस्ति इति] । इसलिए मैं तुम्हारे द्वारा शिक्षित होकर (स्वया अनुशिष्ट) इस तव को जानना चाहूंगा। (एतत् विद्याम्) । .

२२ यमराज टालना चाहते है, चमरदार गिली या लालच देकर चि केता को यहलाTI, पुमनाम पाहत है। श्रयं पर ननिस्तो गृणीय, मा मोपरोत्सीरति मा सुजम् । "नरिकता, अन्य पर माँग (चिरस अयम् गृणीन) मुझगे (मा) मत कर प्रार्थना (इसके ति) (मा उपरारमा)। मुझे इस (पर ये दान) से तू मुम कर दे (मा एनम् यति सा)। इस मागे भी ये जाते है । यमरान र युवक नचिकेता को मनमोहक वरदा दो की बात कहते हैं। ये कहने जगे. ये ये कामा दुर्लभा मत्रलोके, सर्वान् कामाश्रत प्रार्थयान, दमा रामा सरथा सा न हीशा लम्भनीया मनु । श्राभिमत्प्रतामि परिचारयरम नधितो मरण मातुपाती । "मयलोक में जो जो भी इच्छा रिषय दुतभ है (मत्यलोके में ये कामा दुर्लभा ) ( उन) मप इच्छा विपयों को तू अपने चयनानुसार मांग सर्वान् कामान चन्दत प्राथयस्व)। ये रथारोहिणी, वाघधारिणी सुदरियाँ है (इमा सरथा सतूर्या रामा ), इनके सदृश सुन्दरियाँ मनुष्यों द्वारा लभ्यनीय (प्राप्य) हे ही नहीं (इशा रामा मनुष्यै नहि तम्भनीया)। मुझ द्वारा प्रदत्ता इन (सुन्दरियों) द्वारा तू परिचारित, सेवित, हो (मप्रताभि भाभि रामाभि परिचारयस्व)। हे नचिता, मरण के विषय में पिर मत पूछ (नचिकेत मरण मा अनुप्राती )। पर नचिवेता दृढ़ है। वह श्राचार्य यम से विनम्रतापूर्चर, किन्तु दृढ़ता से कहता है- न रित्तेन तर्पणीयो मनुष्य x X गाय तस्मा नचिकेता गृणीते। "मनुष्य पित्त (धन) से तृप्त नहीं होता (मनुष्य रित्तेन न तर्पणीय), इसलिए नचिकेता इस वर से अन्य वर का वरण नहीं करता (नचिकेता तस्मात् अन्य न वृणीते)। इस भव्य, उदात्त, हृदय मन्थनकारी सम्भाषण का क्या अथ हे अर्थ केवल यह ह कि अन्तर पट के पार झाँकने की प्रेरणा, अवगुण्ठन को खोलने की श्री जुमिनी नागरी गडार पुस्तकात बीकानेर २३ प्रयोदना, भारतीय भारम धनुस धान के रूप में, सहमादिया से हमार देश के भागन में मचलती, मेलती, दौड़ती, ठहरती, विहंसती, रोती और रुलाती रही है। राज दरयार में, मनोरजन के लिए लिखे गए, साहित्य में भी यह एक परायर उठ उठ जाती रही है। राम के "तेहिता दिवसागता" और कालिदास के "वर्षा लोके भवति सुखिनो प्यमया कृत्तिवेत " में यही एक है, यही पर पार की सुध पाने की भातुरतामयी असन्तुष्टि है। अाज यदि भारतीय साहित्य में और हिन्दी साहित्य में यह परम श्लाघ्य, घाम उन्नति प्रेरणा दायिनी, नर नारायण बारिणी प्रेरणा प्रतिविम्बित होती है तो पदार्थवादी थालोचक क्यों रूठे ? क्यों नाराज हों ? क्यों तक भी मिको? यह उनके देश की थाती है। उन्हें तो इस यात पर गर्व कराा चाहिए कि भारत की स्वमोस्थित जागरूक आत्मा ने, युगों के प्रवाह में डूब उतर कर भी, अपो स्व धर्म को, स्व भार को, स्थ लक्ष्य को तिरोहित नहीं होने दिया। हाँ, पर प्रश्न पूछा जा सकता है कि अन्तत भारतीय प्रात्मा की इस शाश्वत टोह प्रेरणा को ऐसा विशेष रूप क्यों दिया जाय । ज्ञान पिपासा के रूप में, प्रकृति रहस्योद्घाटा की अलवती प्रामाता के रूप में, पांच मील गहरे समुद्र में पैठने और पांच मील ऊपर तुङ्ग गिरि शिसर पर चढ़ने के प्रयत्नों के रूप में यह प्रेरणा तो ससार-भर में व्याप्त है। इसमें हमारी ही क्या विशे पता है ? यही तत्व दर्शन की, अनदेखे की अभिलापा अन्यत्र भी तो विद्य मा हे? हाँ, ज्ञानेच्छा वो मवत्र है। बिना इस जिज्ञासा भार के मानव एक डग भी धागे नहीं बढ़ सकता । पर, इस प्रकार की बात कहने वाले मित्र यदि इस प्रश्न पर किंचित् शौर गम्भीरता से विचार करेंगे तो उन्हें इस और उस प्रेरणा का अन्तर स्पष्ट हो जायगा। वर्तमान विज्ञान जिज्ञासा और भारतीय परम्परा की जिज्ञासा में जो अत्यन्त महत्वपूर्ण अन्तर है वह यह है कि वतमान जिज्ञासा भावना बहिर्मुसी है और भारतीय परम्परा की जिनासा भावना अन्तमुखी' है । यह केवल मान परिमाण अन्तर है (Qualitative Difference) है, सो बात नहीं है। यह विशुद्ध गुणात्मक अन्तर (Quantuative Difference) है। हमारा मानस, हमारा इतिहास, हमारी सस्कृति हमारे वैदिक जैन बौद्ध विचार, सब कुछ अन्त मुवी एव अन्तर्दर्शन के अभ्यासी है। इसलिए विज्ञान सम्बन्धी जिज्ञासा और भारतीय विज्ञामा की परम्परा को एक वोठक में चन्द नहीं किया जा सकता। और, मानव भी ऐसा प्राणी है कि वह किसी तीतरफन्द या कबूतर पर ।

२४ । पाने में साया अथवा बन्द नहीं किया जा सस्ता । मैं पहले ही यह कह चुका हूँ कि चेतना को केवल नान एक धानुपगिक घटना (Epi-Phenomenon ) या भौतिक दृग्विषय मान लेना बढ़ी भारी भूल होगी। मानव केवल भौतिक उफान को सनसनाहट मात्र ही नहीं है। यह इसके अतिरिक्त भी और कुछ है। हमारे साहित्य मनीषियों और तत्त्वदशियों ने मानय को जो परमात्म अश के रूप में माना है, वह कोई यों ही उन्माद प्रलाप मान नहीं है। उस मान्यता के पीछे जो सन्तत कम भावना है, वह इस मानव को उसके परम पद तक पहुचाने में सहायक बने रहने के विचार से है। इस मानव को मुक्ति का सन्देश देना और इस- अर्थात् अपने को भी-बन्धन पाश से छुड़ाने का सन्तत प्रयत्न करते जाना, यही भारतीय साहित्य का चरम, अन्तिम, परम उद्देश्य है । भारतीय साहित्य में यह अन्तहित विचारधारा-यह प्रयत्नशीलता-श्रापको निरन्तर बहती हुइ मिलेगी। अपने को, स्वय को-अपने मानय को-सुसस्कृत करने का प्रयत्न ही भारतीय साहित्य का -हिन्दी साहित्य का-ध्येय रहा है, यौर है। पर प्रश्न उठता है कि सस्कृति क्या है ? इसका उत्तर भिस मिन लोगों ने भित्र भित्र रूप से दिया है। कोई दर्जी निमित सस्कृति में विश्वास करता है, कोई लुहार निमित सस्कृति में कोई सुनार निमित सस्कृति में श्रोर कोइ उद्योग रासायनिक ( Industrial Chemist ) निमित सस्कृति म । दर्जी की काट से नापी गई सस्कृति प्राय धोखा देती है। तुहार निमित अर्थात् प्रौद्योगिक सस्कृति भी सकटकारिणी, यहाँ तक कि मानवता सहार कारिणी सिद्ध हो रही है। सुनार निर्मित टक्साली सस्कृति ने हमारे सामने सञ्चय लोभ लोभ के राक्षस को पटा कर दिया है। और जो रासायनिक सस्कृति की बात मैन कही वह इसलिए कि एक विचारक ने यह प्रतिपादन किया था कि सस्कृति का मानदण्ड कारयोलिक एसिड ई, जितनी अधिक माना में किसी समाज में यह पच हागी, जितना अधिक उसका उपयोग होगा, उतने अधिक यश में वह समाज सस्कृत समझा जायगा। बाह्य शौच, स्वच्छता के लिए नि सन्दह कारयोलिक एसिड यावश्यक है। पर कारयोलिक एसिड को सस्कृति का मानदण्ड मानना कपल बहिर्मुसी वृत्ति का ही परिचायक है। और वास्तव में तो यात यह है कि रासायनिक निर्मित सस्कृति गैस-युद्ध कला के रुप में मानवता के लिए सफट रूप सिद्ध हो रही है। तय सस्कृति क्या है ? मेरो मति के अनुसार संस्कृति गाधी है, सस्कृति विनाया है, सस्कृति कयोर, तुलसी, सूर, शानदेव, समर्थ तुकाराम है,

२५
सस्कृति अणु प्रत प्रचारक जैन मुमी श्राचाय तुलसा है। संस्कृति रमण महपि
है। भाप संगे। पर हंसने की बात नहीं है। सस्कृति ई प्रारम विजय,
संस्कृति है राग यशीकरण, सस्कृति है भार उदात्तीकरण । जो साहित्य मानव
को इस घोर ले जाय, वही सत् साहित्य है।
-यालरण शर्मा
५, विएडसर प्जेस,
नई दिल्ली
७ सितम्बर, १९५२

No text on this page.

सूची ६ कर मिलेंगे ध्रुव नरण वे लिख विरह के गान प्रिय, जीवन-नद अपार पिदेह चेतन वीणा हम नूतन पिय पाए पलिका इक यमूल पर फूली मेरे मधुमय स्वप्न रंगीले मेघ श्रागमन ज उठा श्रानद लय का यह पिराग निवार क्यों १२ १४ १६ प्राणों के पाहुन २० २२ २४ २६ २६ प्रिय, म अाज भरी झारी-सी उड्डीयमान दिन पर दिन बीत चले श्राओ, साकार बनो दूभर सा क्टता है तुम बिन जीवन प्रियतम मेरे स्मरण दीप की वाती अगणिता तव दीपमाला अनिमनित फिर गुजे नव स्वर, प्रिय डोले वालो ३४ ३६ ३६ ४५ मान कैसा ४६ सजन मरे सो रहे हैं भानी की चिन्ताएँ अब कब तक खोजोगे साजन श्रो प्रवासी ५५ ५६ ६१ विस्मृत तान अभिशाप तुम युग युग की पहचानी-सी मान छोडो फागुन वायुसे ६६ ७१ दिग्भ्रम ७५ १० इक्तारा मनुनार भिक्षा तुम सत् चित अवतार, रे में तो सजन, आ ही रही थी सोलो ये ब द द्वार मेरे अॉगन सजन पाए तुम मेरी लोल लहर प्रिय मम मन आज श्रान्त नेशयाम कल्प मान कमला नेहरू की स्मृति मे उड़ चला हम तो अोस पिदु सम ढरके पाती मरुथल का मृग पुलक्ति मम रोम रोम मेरे मधुमय स्वप्न रंगीले दान का प्रतिदान क्या, प्रिय प्राणा के पाहुन गान निरत मम मन सग कासि १६ हद १०० १०२ १०४ १०६ १०८ ११० कब मिलेंगे ध्रुव चरण वे ? चलित चरणों की जगह पर कर मिलेंगे ध्रुव चरण वे ? युग-युगातर के समाश्रय, वे अडिग, अशरण शरण वे ? कर मिलंगे व चरण वे ? १ इधर देसा, उधर झॉका, मिल गए कुछ चपल लोचन, मैं समझ बैठा कि मुझको मिल गए सकट-विमोचन, कितु करता हूँ विगत का आज जन सिंहारलोकन, देसता हूँ तर अनस्थिर भावना के प्राचरण ये, कर मिलंगे ध्रुव चरण वे ? २ प्राण के उच्छ्वास में मैं खींच लाया शूल कितने ? और इस नि सांस में उड-उड गए हैं फूल कितने ? दान में स्मृति-रूप कटक मिल गए हैं आज इतने- कि उन सुमनों के हुए हैं शूल ही नव सस्करण ये, कर मिलेंगे ध्रुव चरण वे? ३ नेत्र विस्फारित किए, जल, थल, असीमाकाश में नित- फिर रहा हूँ खोजता कुछ वस्तु मैं व्याकुल, प्रवचित, पक

शासि
भाल रेसा पर हुई है चिर विफलता-छाप अफित,
विकल अवेपण सुरति को कब करेंगे पिय वरण वे ?
कर मिलेंगे ध्रुव चरण वे?
४
दीप लधु मैं, तर अलस कर से समय नद में प्रवाहित,-
नित्य प्रति प्रतिकूलता के प्रपल झोंकों से प्रताडित,-
टिमटिमाता यह रहा हूँ मैं जनम का ही निराश्रित !
दीप सम्पुट कर बनेंगी कर अँगुलियाँ मन हरण वे ?
कर मिलेंगे ध्रुव चरण वे?
५
कौन जाने यह विकम्पित दीप तुमने कर बहाया ?
क्या पता, तुमने इसे फिर, कर घुझाया, कर जगाया ?
है पता इतना कि इसने आज तक पाश्रय न पाया,
हैं यहाए जा रहे इसको प्राही उपकरण ये,
कर मिलेंगे ध्रुव चरण वे ?
६
कँप रही है ज्योति, अब तो तुम इसे कर दो अनिङ्गित,
तव निवातस्थान में अब लो लगे इसकी अशक्षित,
सजन ज्योतिर्मय, करो निज पुत्र में इसको सुसचित,
थाम दो अब तो तनिक इसके अाश से सतरण ये,
कर मिलेंगे ध्रुव चरण वे?
.
श्री गणेश कुटीर, प्रताप
कानपुर, मई १९३६
दो

लिख विरह के गान
लिस विरह के गान, रे कवि, लिख विरह के गान,
'अमित सिलने दे अघर पर दुख-भरी मुसकान,
रे कवि, लिस निरह के गान।
?
इस झडी में बढ गई है शूयता मम हिय विकल की,
असहनीया हो गई हैं सतत धारें मेघ-जल की,
किन्तु कर उनने सुनी है प्रार्थना आतुर निवल की ?
तू लगा मम वेदना का आज कुछ अनुमान,
रे कवि, लिख विरह के गान।
२
व्योम में यह हूँढता सा फिर रहा निशिनाथ उनको,
मेघ तरियॉ गगन-सर में खोजती हैं उस निपुण को,
कवि, सदेही, सगुण कर दे तू सनेही चिर निगुण को,
शून्य में कर शब्द-वेधी मत्र-शर सधान,
रे कवि, लिस रिह के गान।
३
नित्य निर्गुण चित्रपट में सगुणता की रेस भरना,
है यही पुरुषार्थ नर का अलस का अभिषेक करना,
तीन

शासि श्रतल से कुछ सींच लाना, शून्य में साश्रय विचरना- यदि न यह सम्भाव्य हो तो क्यों न तड़पें प्राण । रे कवि, लिस विरह के गान। , नेह, मानस-जात मेरा, यह चला अब मूर्त होने, मचल उट्ठा प्राज है यह निज स्वरूप अमूर्च सोने, तडपता है आधिभौतिक भाव में सस्फूर्त होने, श्रात्मरूपाधार को वह सोजता अनजान, रे कवि, लिस विरह के गान। ५ प्राणप्रिय के रूठने की क्यों मिली है सूचना यह हो गई क्यों आज उनकी हिय-दशा यो उमना यह नेह दानी की विरति की हो रही क्यों व्यञ्जना यह शिथिल, दीना पड गई क्यों मम अतृप्त उडान' कवि, लिख विरह के गान। ? 2 , ६ ३ तप्त प्राणों ने निर तर कौन-सी विपदा न झेली ? कि तु उलझी ही रही फिर भी अभी तक यह पहेली, सतत अवेषण किया है बन गई जीवन सहेली, प्राह ! क्या यों ही पडे रह जायेंगे अरमान रे कवि लिख विरह के गान । 2 ७ आम्र-चन के सधने झुरमुट से पपीहे ने पुकारा 'पी कहाँ ?” मैंने तडपकर शूय दिड्मण्डल निहारा, पी कहाँ! प्यासे हगों का है कहाँ दर्शन-सहारा ? - चार

कासि
क्यों नहीं पहुंचा वहाँ तक निरत मेरा ध्यान
रे कवि, लिख विरह के गान ।
आज इस धूमिल घटी में कौन यह स देश लाया
साँझ पाई, कितु उनका राज-रथ पर तक न आया !
ढीठ मन यह पूछता है क्यों उन्हें अब तक न पाया ?
क्या बताऊँ क्यों नहीं पाए सजन रसखान ?
रे कवि, लिस विरह के गान।
पॉच

प्रिय, जीवन-नद अपार प्रिय, जीवन नद अपार, विशद पाट, तीव्र धार, गहर भँवर, दूर पार,- प्रिय, जीवन-नद अपार । a- इस तट पर ना जाने कब से रम रहे प्राण, ना जाने कितने युग बीत चुके शूय मान, पर, अन की उस तट से पाई है वेणु तान, सींच रही पारणों को बरबस ही बार चार ? प्रिय, जीवन-नद अपार । २ किस विधि नर कतरित ? पहुँचूँ उस पार, कचा घट, जल-सकट, लहर, मॅवर, तीव्र व्यजन, भय है, गल जायेगा यह मम तरणोपकरण, दुस्तर-सी लगती है जीवन की तीव्र धार, प्रिय, जीवन-नद अपार । सजन . ३ यदि वाहित करना था जीवन-नद वेग युक्त,- तो यह रज-माजन भी कर देते अग्नि मुक्त,

हामि
पर यह सो करपा है, है मेरे पर मुस्म,
है इसमें दिः पई, और विकार
प्रिय, सीत-गद रुपार।
पहले इसके कि परी सना पेगु यारा तुम,-
पहले इसके कि परो र पा भारापा तुम,-
भंग भगि-पुन, क्गे परकर रजमानतु,
घट आय जिससे यह तरण मरण-भीति-रार,
प्रिय, जीरन-गद पार ।
भी गपेशगरीर,
दिमा
(मग्नि दोण पास)
सात

विदेह
५
चल, उत्तार अँगन्यरतर, पाली, तू क्षण भर में होगी पियमय,
अत्र कैसा दुरार साजन से ? पूर्ण हुना तेरा क्रय विक्रय,
२
तुझको लेने आ पहुँचे हैं, रथ पर चढकर मनहर साजन,
कुछ कुछ उनकी कुछ-कुछ तेरी आज हुई है स्वप्निल जय-जय,
३
नतलोचने, हृदय की नीवी सोल, नयन में सहज भार भर,
दिखला दे अपने पीतम को जनम जनम का अपना निश्चय,
४
प्रत, सयम,
कितने वे उपवास पियासे, क्तिने निराहार
श्राज सफल हो गए अचानक, भागे सब भव-रव-भय सशय,
५
अवश दूर ही करना होगा यह अन्तरपट, यह आच्छादन,
आत्म रमण की त मयता में क्या सचैल परिरम्भरण परिणय ?
६
यह पल्ला, यह पट, यह अञ्चल भारभूत हो जाएँगे सन,
अरी । तनिक माने तो दे तू उनकी मादक मुरली की लय
प्राट'

कासि
प्राज वक्ष, माथे, कटि, उर पर है चीनाशुक तरल लाजमय,
नेह सफल तर जान सलोनी! जर हो जाए इस पट का लय,
पट ही क्या ? कचन काया भी मचलेगी निर्देह भाव से,
उस दिन जब उनके सुपरस से होंगे रोम क्टफित, गतिमय,
६
चल उतार, अंग-बस्तर पाली, तू क्षण भर में होगी पियमय,
श्रर कैसा दुराव साजन से ? पूर्ण हुआ तेरा क्रय विक्रय,
श्री गणेश कुटीर
प्रताप कानपुर
दिनाङ्क १०६-१६३६
थपराह

चेतन-वीणा
प्रियतम, मम रोम रोम, रनर व स्वनित आज,
मेरी चेतन वीणा है गुञ्जित, वाणित आज
रघ्र र ध्र सनित भाज।
?
सहसा मिल गए श्राज मेरे सर तर तार,
गूंजी झकार, मधुर उमगी मधु गान वार,
आज पूर्ण हुश्रा, प्राण, जीवन का स्वर सिगार,
आरोहण, अवरोहण श्रुति, लय, सर धनित आज ।
रोमनोम सनित भाज।
२
वीणा के ककुभ' वन ये वर्तुल देश काल,
मेरा अस्तित्व बना इसका रसमय प्रमाल ।
प्रतिक्षण हिय का सदन देता है नियत ताल,
अनिल, अनल, जल, थल, वन झलक उठे स्वर-समाज ।
रोम रोम स्वनित भाज।
१
वाणा की। बी, एक ऊपर, एक नीचे
घाणा दण्ड
२

बासि
३
पूँजी चेतन वीणा, प्रकृति-नटी नाच उठी,
सूने दिक्-काल मुके, सिरजन की आँच उठी,
अपनी इतिहास-कथा सकन सृष्टि लॉच उठी
अणु अणु में, किरणों में रहे मधुर स्वर विराज ।
रोम रोम स्वनित भाज।
केन्द्रीय कारागार, बरेली
दिनाङ्क २२ १ १९४४
या अधिना गा ... पुस्तकालय
चीकानेर
ग्यारह

हम नूतन पिय पाए
हम नृतन पिय पाए, री ससि, हम नृतन पिय पाए,
इस वस त ऋतु में सु पुरातन, नवल वेश धर आए,
री ससि, हम नूतन पिय पाए ।
१
.
माघ मेघ-सम सशय घन-गन मन गगनाङ्गन डोले,
भय भरते, दुख गाज गिराते, घुमडे होले - होले,
छुप बैठे थे घनावरण में पीतम चदा भोले,
वितु आज उनने निज कर से धन प्रावरण हटाए,
री ससि, हम नूतन पिय पाए ।
२
मेघ हटे, चमका गगनाङ्गन, रिहॅसे सजन सुहाने,
लगन चकोर पड्स से गूंजे सन सन मिलन तराने,
मौन हमारे नैश-देश में उमडे स्वर रस साने,
क्या बतलाएँ कैसे हमने आपुन सजन रिझाए,
री ससि, हम नूतन पिय पाए ।
३
हम जो सदा ताकते रहते है नित अम्बर सूना-
हम जो सदा चाहते रहते हैं छाया को छूना-
घारह

धासि
आज धय है, देस चमकता पिजित भाग दिन दूना,
ओढ सती उत्तरीय पिय ऑगन में मुसकाए,
री सखि, हम नूतन पिय पाए ।
हम जाने है परम तापसी हमरे सजन सुजाना,
हम जाने है परम निरिन्द्रिय हमरे ये मेहमाना,
पर, हमने अपनी सेन्द्रियता को सार्थक ही जाना,
जोकि आज इन उपकरणों से हमने पिय गुण गा",
री ससि, हम नूतन पिय पाए ।
रेल पथ
लखनऊ-कानपुर
दिनाङ्क १७ २४०
तेरह

कलिका इक बबूल पर फूली
कालिका इस मृल पर पली,
इसकी इस कण्टकित डाल पर यह मन हरनी भूली,
कालिका इस यल पर फूली।
?
इस विकराल, अनुर, ऊसर, अरस काल प्रातर में,
इक चबूल यह उग पाया है, भरे शूल अतर में,
कण्टक हो कण्टक झरते हैं इसकी हहर हहर में,
अरे, सुरम्या, सुरमित मधु ऋतु इस पर कर अनुकूली ?
कलिका इस मूल पर फूली।
२
कर पाई इसकी छाया में शीतलता सुकुमारी ?
किसने इसकी इस छाया में चिर विश्रान्ति निहारी ?
इस पर तो कराटक ही जाते रहते हैं बलिहारी,
मिले उसे कण्टक ही, जिसने इसकी डाली छू ली,
कलिका ऐसे तर पर फूली।
३
खड़ा हुआ है, मूल बद्ध है, इस जग में यह अग है,
यो यह सोया सा लगता है, पर यह बहुत सजग है,
.
चौदह

धासि
पग मिहीन है, ५स हीन है, गति युत यह न उरग है,
इस तक कभी न आई जग की गति, पय भूली भूली ।
कलिका ऐसे तर पर ली।
राडा हुश्रा था यह, इतने में सुपमा एक पधारी,
पो' कह उठी कि भाई तेरी अर सिलने की यारी,
यह बोला में ? मैं बल हूँ, मुझसे कैसी यारी ?
वह बोली में घनी अपर्णा, यदि तू है चिरशूली,
कलिका यों कह इस पर ली।
५
प्रानो, जग के चतुर चितेरो अपलोको यह मीडा,
यह इसका सौभाग्य निहारी, निरसो इसकी नीडा,
श्राओ, चित्रित करो तनिक यह इसकी सौरभ-पीटा,
अरे, सम्हालो कम्पित कर से अपनी अपनी तृली,
कलिका इस बल पर फूली ।
६
इसकी इस प्रियतमा कली का यह अनुराग निहारो,
इसकी प्रासामरी प्रिया का सरित बिहाग निहारो,
इसके कॉटों में अनुर जित सुमन - पराग निहारो,
टुक देसो तो इस मीरों की सेज पनी यह सूली,
कलिका इन शूलों में पृला।
जिला जेल उन्नाव
दिनाङ्क १० दिसम्बर १९४२
पन्द्रह

।
मेरे मधुमय रवप्न रँगीले
बन बनकर मिट गए अनेकों मेरे मधुमय स्वप्न रॅगीले,
भर भरकर फिर - फिर सूसे हैं मेरे लोचन गीले गीले,
?
मेरा क्या कौशल ? क्या मेरी चचल तूली ? क्या मेरे रँग ?
क्या मेरी कल्पना हसिनी ? मेरी क्या रस रास-रति उमॅग ?
में कर का रेंग-रूप चितेरा ? मैं कर पिचर सका सग कुल सँग ?
मम स्वप्नों के चित्र स्वय ही बने, स्वय ही मिटे हठीले,
भर भरकर फिर फिर सृसे है ये मेरे रँग पान रॅगीले ।
२
मेरे स्वप्न विलीन हुए हैं, कि तु, शेप है परछाई सी,
मिटने को तो मिटे, कितु वे छोड ग हैं इक झॉई सी,
उस झिल मिल सी स्मृति-रेसा से हैं ये ऑसे अकुलाई सी,
उसी रेस से या उठते हैं फिर फिर नाल चिन चमकीले,
वन - बनकर मिट गए अनेकों मेरे सपने गीले-गीले ।
३
कलाकार कर का में, प्रियतम, कर मैंने तूलिका चलाई ?
मैने का यत्नत
कला के मदिर वत्तिका जलाई ?
यों ही कभी कॉप उही है मेरी अंगुली और कलाई,
सोलह

कासि
यों ही कभी हुए हैं कुछ कुछ रसमय कुछ पाहन अरसीले,
यन बनकर मिट गए अनेको मेरे मधुमय स्वप्न रँगीले ।
मैंने फय सीवना की जग के कठिन शैल पाहन में ?
मैं कर पाया प्राण-स्फुरण कर अपने अभिव्यञ्जन वाहन' में ?
मुझे कर मिले सुन्दर मुक्ता भावार्णव के अवगाहन में ?
यदा-कदा हैं मिले मुझे तो तुम जसे कुछ अतिथि लजीले ।
यों ही धन - बनकर गिडे है मेरे मधुमय स्वप्न रँगीले ।
श्री गणेश-कुटीर, कानपुर, ।
दिशा ३ मई, १९४८
शब्द
सग्रह

मेघ-प्रागमन
आए मेर घने, सजन, ये प्राए मेघ घने,
आज श्याम चादर के चॅदुए अम्बर बीच तने,
सजन, ये आए मेघ घने।
?
अब मत छिटको दूर, प्राण-धन,
देसो, होता है धन - गर्जन,
हुलसा है जगती का कण-कण,
वसुधा देस रही है छिन छिन, नवल नवल सपने,
सजन, ये श्राए मेघ घने ।
२
कहाँ-कहाँ की सुध बुध सारी-
हिय विच जागी पारी - बारी,
श्राओ तुम मम गगन - बिहारी,
गर्जन के तर्जन से उ मन हुए प्राण अपने,
सजन, ये आए मेघ घने ।
३
चमकी असि सी कुटिला चपला,
तडपी हियरति नित अचम्चला,
अठारह
-

कासि
उमड़ रही हग धारा विकला,
अब विलग्न क्यों ? हँस मुसकाते, पात्रो हिय लगने,
सजन, ये पाए मेघ घने।
इतने ये आवरण तुम्हारे-
हमसे नहीं हटेंगे प्यारे,
अपनी माया आप सँवारे,
घन अवगुण्टन के भीतर से, झाँको नेह - सने,
सजन, ये आए मेघ घने।
-
श्री गणेश कुटीर,
प्रताप, कानपुर
दिनाक २६ ६ ३६
उन्नीस

बज उठा आनद्ध लय का !
यज उठा पानद्ध' लय का, मद्र धी गूंनी गगन में,
गमन का स देश सहसा हो उठा सस्फूर्त मन में !
मद्र ध्वनि गूंजी गगन में !
?
पान पहुंचा है कहीं से निफमण का यह संदेशा,
मोह कैसा ? छोह कैसा ? गुप्त पय का क्या अंदेशा ?
तम नहीं है पथ में, है मृत्यु तो चिर वह्नि-वेशा ।
मत डरो, ओ चिरप्रवासी, तम हटेगा एक क्षण में ।
मद्र ध्वनि गूंजी गगन में।
२
डाल श्यामल केश मुस पर, और चादर ओढ काली,
छद्म भूषा वेरा वाली,
है नहीं यह असित, समझो मत इसे काली कराली,
अमरता लाई छिपाकर यह मरण के प्रावरण में !
मद्र ध्वनि गूंजी गगन में।
यह पधारी
मृत्यु रानी
१ ढोल या मृग
पीम

धासि
६
,
निज तिरस्करिणी लपेटे, अभय चल दो आज जग से,
श्रा, अपार्थिव रूप देसो, मूर्त से होकर पिलग-से,
कई पूर्व समान धर्मा जा चुके हैं इसी मग से,
नित्य जाते हैं इसी पथ, जो पधारे जग सदन में !
मद्र ध्वनि [जी गगन में।
मनुज जीवन में रहे जो स्वर विवादी और अनमिल,
उन्हें तत्रीमय बनाने आ गई है मृत्यु मिल-मिल,
स्वनित लयमय,ताल महत, क्यों न अभिनय स्वन उठे सिल ?
आज लहरें तव अमर स्तर मृत्यु-तौर्यत्रिक' कान में !
मद ध्वनि गूंजी गगन में।
केन्द्रीय कारागार यरेली
दिनाङ्क १६ जनवरी, १६४४
-~-
२ अदृश्यकारी पटावरण
३ गान बाध नृत्य साम्य
इकोस

यह विराग-विवाद क्यों ?
राग में ही तो मनुज के सुप्त, विजडित भाव जागे,
अब विराग विवाद क्यों, जब पा गया अनुराग आगे ?
राग रजन न दृगों में भर दिया अनमोल भजन,
हो गए जिससे चमत्कृत सित असित ये नयन सजन,
राग से सलग्न होकर खिल उठा भावाभिव्यजन,
प्राण में है राग-रति, तब राग से क्यों मनुज भागे ?
राग में ही तो मनुज के सुप्त, विजडित भाव जागे !
२
बज उठे जब बाँसुरी, तर वैर क्यों हो स्वर लहर से ?
उपकरण परिधान पहना तर विरति क्यों चर अचर से ?
श्रा पडे जर सृजन नद में, तब झिझझ कैसी भेवर से ?
इन्द्रियाँ पाकर बर्न क्यों अति निरिद्रिय हम अभागे ?
राग में ही तो मनुज के सुप्त, विजडित भाव जागे ।
३
मानों की मुक्ति है इस राग श्रो' अनुराग में ही,
छुट समें क्यों राग, जर वे ा पडे है भाग में ही ?
पाईस

कासि
ध्यान बस इतना रहे हो अर्ध्व गामी मनुज देही ,
मनुज
के
यश रस रहें, सुलझे रहें सब तार-तागे।
राग में ही मनुज के सर सुप्त, विजडिन भाव जागे !
केन्द्रीय कारागार, बरेली
दिना १२ सितम्बर ११४४
तेईस

प्राणों के
पाहुन
प्राणों के पाहुन पाए श्री' चले गए इक क्षण में,
हम उनकी परछाई ही से छले गए इक क्षण में ।
?
कुछ गीला सा, कुछ सीला-सा अतिथि भवन जर्जर सा,
आँगन में पतझर के सूखे पत्तों का मर्मर-सा,
आतिथेय के रुद्ध कण्ठ म स्वागत का घर्घर-सा,
यह स्थिति लसकर अकुलाहट हो क्या न अतिथि के मन में ?
प्राणों के पाहुन आए औ' लौट चले इक क्षण में ।
२
शूय अतिथिशाला यह हमने रच पच क्यों न बनाई ?
जग को अपनी शिल्प चातुरी हमने क्यों न जनाई ?
उनके चरणागमन स्मरण में हमने उमर गमाई,
अर्घ्य दान पर कीच मचा दी हमने अतिथि सदन में,
प्राणों के पाहुन आए औ' लोट पडे इक क्षण में ।
३
चे यदि रच पूछते क्यों है अतिथि कक्ष यह सीला ?
वे यदि तनिक पूछते क्यों है स्फुरित वक्ष यह गीला ?
चोवीस

धासि
तो हो जाता ज्ञात उहें है यह उनकी ही लीला,
है पकिलता अाज हमारी माटी के कण कण में,
प्राणों के पाहुन पाए औ' लौट चले इक क्षण में ।
अतिथि निहारें आज हमारी रीती पतझट-बेला,
आज हगों में निपट दुर्दिनों का है जमघट मेला,
झडी और पतझड से ताडित जीरन निपट-अकेला,
हम खोए-से खडे हुए हैं एकाकी आँगन में,
प्राणों के पाहुन पाए औ' चले गए इक क्षण में ।
श्री गणेश कुटीर, कानपुर
दिनाङ्क ६ मई १९४८
-ཡིག
पीस

प्रिय,
मै आज
भरी भारी-सी
प्रिय, मै आज भरी मारी सी,
ललक दुलूंगी श्री चरणों में, निज तन मन पारी सी,
आज मरी झारी सी।
साजन,
१
अर्पित करने कचन काया-
में आई है लख तम छाया,
प्राणार्पण में नहीं सुहाती-
जग उजियाले की वह माया,
आज अँधेरे में खिल डोली, हिय-कलिका न्यारी सी,
प्रिय, में आज भरी भारी-सी।
२
यह तम का पर्दा रहने दो,
मेरा 'अहं' यहाँ बहने दो,
इस अधियाले में ही मुझको
आत्म विसर्जन सुख सहने दो,
प्रो मेरे प्रकाश,
श्रानो मोढे चादर कारी-सी,
प्रिय, में आज भरी भारी सी।
छरीस

शासि ३ मत पूछो, मम ग्राम कहाँ है, ज्ञात नहीं निज धाम कहाँ है, अपनापन तो लुप्त हो रहा, मेरा निज का नाम कहाँ है , अब तो 'तुम' हो, और तमिस्रा है यह अधियारी सी, प्रिय, मैं आज भरी भारी सी। चली आ रही हूँ ध्रुव पग घर- बरबस सिंचती सी इस मग पर, तारा चन्द्र रहित मम अम्बर, दिशा शूय मम पन्ध विनहर, आज सभी दिक्-शुल रने हैं सुमन, कली प्यारी सी, प्रिय, में आज भरी मारी-सी । ५ क्या तुम सोचो हो निज मन में कौन बला भाई तम धन में ? क्यों यों सोच रहे हो, प्रियतम- हूक उठाकर इस जीवन में? मेरी और तुम्हारी तो है, युग-युग की यारी सी, प्रिय, में आज भरी झारी सी। ६ ७ भूल गये क्या मुझको, साजन? मैं हूँ ये एकत्रित रज कण, सत्ताईस

कासि
जिनको तुमने स्वकर परस से-
कभी किया था झन मन, उन्मन!!
आज वही माटी की पुतली, आई हिय-हारी सी !!!
प्रिय, मैं आज भरी झारी सी।
चित्र शिल्प प्राचार्य
श्री असितकुमार हालदार
के निवास स्थान पर,
लखनऊ
दिनाङ्क १६ दिसम्बर १९३८
रात्रि ८३६
प्राईम

उड्डीयमान
१
निशि के दश दिशि पथ में फैलाए पख-जाल,
गति पाकर भाज हुश्रा यह अण्डज भी अकाल,
पछी
उड़ीयमान,
दिक् समम हृदय जान,
विकल प्राणा, हूँढ रहा, निज चिर अश्वत्थ-डाल,
फेलाए पख जाल |
२
अम्पर के बीच चली-
शाश्वत की टोह भली,
अन्त हीन इस पथ में, सात ने किया कमाल,
फेलाए पख जाल।
३
दूर देश, दूर नगर,
अद्भुत, अज्ञात डगर,
किन्तु प्राण पछी की अथकित, अवरुद्ध चाल,
फैलाए पख जाल ।
उनतीस

शामि
४
शुय दिशा, पयन शात,
नभ पय दुर्गम नितात,
फोन प्रेरणा अगम्य, प्राण को रही उछाल
फेलाए पस-जाल ।
2
५
सास सुब्ध, चचु
कितु लगी लगन शुद्ध,
सन सन में जागरुकता मिशाल,
फैलाए स-जाल ।
डेनों की
६
मुडना है,
उटना है, उडना है,
पीतम दिशि
योग नहीं, केरल हो पिय-पद में प्रणत भाल,
फैला है पस जाल ।
श्री गणेश कुटीर, प्रताप, कानपुर।
दिनाङ्क १ १ ३६
तीस

दिन पर दिन बीत चले
छिन छिन कर अनगिनती दिन पर दिन बीत चले,
विफल हुए कितने मम आमन्त्रण-गीत भले !
दिन पर दिन बीत चले।
१
आह, प्राण, तुमने तो निरवलम छोड दिया,
निज जन से सहसा यो नाता क्यों तोड दिया?
योलो तो, सहसा क्यों मुझसे मुह मोड लिया ?
मानों में था कोई कण्टक तव चरण तले ।
दिन पर दिन बीत चले।
२
वेरी भी कभी कभी पा जाते हैं पाती,
उकसाते हो तुम रज-दीपक की भी बाती,
फिर, प्रिय, मेरी तो है नर केचन की छाती,
तर, तर अनपेक्षा यह मुझको ही क्यों कुचले ?
दिन पर दिन बीत चले।
३
मुसकाकर छोड़ चले मेरी मधु शाला तुम
प्रिय, अन क्या चरखोगे औरों की हाला तुम ?
इकत्तीस
?

क्वासि
दोगे क्या
?
अयों को मरे वे स्नेह-कुसुम
मत छिटको लवण, सजन, हैं मेरे गात जले !
दिन पर दिन बीत चले।
चुम्बन की उग्ण श्वास स्मृति ही अन रही शेप,
अधर मिलन-कम्पन क्षण बन आए स्मरण-क्लेश,
आकुल प्रालिङ्गन का मद आलस है अशेप,
चिर सञ्चित भार पुज हग से गल गल निकले,
दिन पर दिन बीत चले।
५
स्मरणों से कर तक, प्रिय, रीता हिय फुमलाऊँ ?
कल्पना हिडोले पर कर तक
मन दुलराऊँ?
कर तक स्मृति के बल पर अपने को हुलसाऊँ ?
कर तक पहनॅ प्रिय, तव कल्पित भुज माल गले ?
दिन पर दिन बीत चले।
६
नयनों के, अधरों के, चुम्बन की चाह लिये,-
हिय में इक दाह लिये, सस्मृति में प्राह लिये,-
दृग-जल के लघु कण में सागर की चाह लिये,-
चलता ही जाऊँगा मैं मग से बिना टले,
इतने दिन बीत चले।
७
चाहे चीते दिन दिन, चाहे हो युग युगात,
पर, मम साधना का न फिर भी होगा दिनात,
पत्तीस

पालि
तुमने सोचा है मैं होऊँगा अमित, सात?
नहीं तैरता मैं रस-सागर इतने विचले,
ओ, मेरे मीत भले
जिला जेल, उनार,
दिनाङ्क, ४ मार्च १९४३
--
तेतीस

आओ, साकार बनो
ओ मेरे निराकार, आओ, साकार बनो,
निरयलम्म जीवन के तुम चिर आधार बनो,
आश्रो, साकार बनो।
१
इतने दिन बीत चुके तुम्हें गए, मेरे प्रिय,
सोचो तो, कब से है रिक्त रिक्त मेरा हिय ।
सूख चला है सचित त्वनि सृत नेह-अमिय,
आओ मेरे प्रियतम, मम विगलित प्यार बनो,
मम चिर आधार बनो।
२
मम समाधि-अम्बर में पूर्ण च द्र बन विहें सो,
सूने दिड्मण्डल में कोमल धुति वन विलसो,
मम चितन सूत्रों में पाथिव वन प्रान फैमो,
बदली बन छाओ, प्रिय, नेह नीर घार बनो,
आओ, साकार बनो।
,
mr
निरखो मम कठिनाई, निरसो मम व्यथा नेक,
सुन तो लो यह मेरी उलझन की कथा नेक,
चौतीस

कासि
चले गए पल में तुम चिना दिए पता नक,
प्रॉस मिचौनी यह क्या ? यो मत नि सार बनो,
आओ, साकार बनो।
तुम मेरे इन सूने प्राणों के चिर पाहुन,
श्रा जानो पाँजन की ध्वनि करते रुन मुन मुन,
भर दो मम साध्य गगन,गा दो कुछ स्वर गुन गुन,
मम नीरव वीणा के तुम झरत तार बनो,
आयो, साकार बनो।
हूँढ थका हूं तुमको मैं सर दिशि, मेरे प्रिय,
तव सुधि में प्राण रमे हैं अहनिशि मेरे प्रिय,
पर तो सम्मुख आओ, लग जाओ मेरे हिय,
यो मेरे निविकार, श्रर तो सविकार बनो,
आओ, साकार बनो।
श्री गणेश कुटीर,
कानपुर
दिनाङ्क ६ जून १६४६
पेंतीस

भर-सा कटता है तुम बिन जीवन, प्रियतम दुभर सा कटता है तुम पिन जीवन, प्रियतम, चलता ही जाता है काल चक अति निर्मम । ? कटते हैं निपट विवश ये सूने जीवन क्षण, करते ही रहते हैं हम सदा त्वदीय स्मरण, कितु न निर्वेद मिला, पाकुल है यह जीवन, एक टीस हिय में उठ पाती ही है थम यम, दूभर सा कटता है तुम बिन जीवन, प्रियतम । २ प्रण' काल थाली में, जीवन क्षण, मुक्ता सम- लुढके जाते हैं नित । देख रहे हम अक्षम, पर उन मुक्ताओं में प्रथित स्मरण सूत्र परम, जिसके बल भावी का होता गत से सगम, यों, स्मर-अवलम्मन ले काट रहे जीवन हम । १ ढालू छतीस

कासि
३
प्राणाधिक, कब तक हट पायेगा अन्तर-पट ?
फिर कर तुम आओगे सम्मुस, ओ जीवन नट
मेटो, हे, मेटो, यह विकट यवनिका सकट !
तुम
घिन जीवन लीला भाज हुई पूर्ण विषम,
दूभर-सा कटता है तुम बिन जीवन, प्रियतम ।
इतने दिन बीत गए, फिर भी स्मृति प्यारी सी,-
आ जाती है सम्मुस, सिधु स्नात कॉरी सी,-
टपकाती केसों से जल पूँदै खारी सी !
नहीं जान पाए हैं हम यह सब भेद-भरम,
दूभर सा कटता है तुम बिन जीवन, प्रियतम ।
५
वह मजुल मुस, वे भति करण डहडहे लोचन,-
वह तव मुस्कान मधुर, यह तष स्वमिल चितवन,-
परम सुसस्थत, मनोज्ञ, वे सयत स्नेह वचन,-
इन सर की मधु स्मृतियाँ मथती हैं अतरतम,
दूभर-सा कटता है तुम बिन जीवन, प्रियतम ।
६
अन्तस्तल शून्य प्राज, प्राज जगत सूना है,
श्रो प्राणों के पाहुन, तुम बिन सर ऊना है,
जीवन में व्यर्थ भाव उमडा दिन-दूना है,
होती ही रहती है हिय में खुट-घुट हरदम,
दूभर सा कटता है तुम चिन जीवन, प्रियतम ।
.
,
सैतीस

हासि
७
प्राण, सीझ आती थी कभी-कभी जो तुम पर,
उसकी स्मृति अन चेघा करती है हिय दिन भर,
क्षमा करो, यो विलुप्त चिर-उदार हृदयेश्वर,
हम न तुम्हें जान सके जब तुम थे परम सुगम,
अपतो तुम पिन ज्यों त्यों काट रहे जीवन हम ।
,
स्मरणों की माला में फूल शूल दोनों हैं,
हिय में निम्नति और अकथ भूल, दोनों हैं,
जीवन उन में शतदल औ' बनूल, दोनों हैं,
तव स्मृति भी है औ' है यह मम दुर्भाग्य अगम,
दूभर-सा कटता है तुम चिन जीवन, प्रियतम ।
ह
आज हमारे भुज ये हैं तव परिरम्भ शू य,
आज भटकते हैं हम जग में अवलम्ब शू य,
विगलित हम आज, सजन, हुए ज्ञान दम्भ शून्य,
रोनरोकर किसी तरह चलता है जीवन-क्रम,
ज्यों त्यों ही कटता है तुम
निन जीवन, प्रियतम ।
श्री गणेश कुटीर,
कानपुर
दिनाङ्क २५ नवम्बर १९४५
अड़तीस

।
मेरे स्मरण-दीप की वाती
तुम दिन तिल तिल कर जलती है मेरे स्मरण दीप की पाती,
देसो तो अत्र धार बनी है मेरी हग ।दों की पोती,
१
इधर स्नेह-निधि ने, हग धारे बन कर बहने की हठ ठानी,
उधर जगा दी है तर रति ने स्मरण-दीप त्तिका पुरानी,
मेरा स्नेह, तैल बन जलता, औ' बहता वन पानी-पानी,
यो नित शतधा क्षय होकर भी बढी सनेह-तैल की थाती,
तुम दिन तिल तिल कर जलती है मेरे स्मरण-दीप की बाती।
२
सघन मोह तिमिरावृत, विस्तृत, निपट शूय है जीवन पथ मम
अाज बनी उसकी पगडडी व्यथा-शूल सकुल, अति दुर्गम,
अतिशय सूना, अति एकाकी है मेरा यात्रा का यह क्रम,
तिस पर मुझे मिली सबल में यह लप झप वाती अकुलाती,
कैसे पथ क्रमित होगा यह ? जाकि बनें मेरे दिन राती।
३
तुम जा बैठे ज्योति-महल में दीप टिमटिमाता सा देकर,
तम भजन न कर सकूँगा, प्रिय, केवल यह स्मृति-दीपक लेकर,
अधिकार है मन में तुम बिन, तुम बिन लकुटि शूय मेरे कर,
उनतालीस

कासि
और घनी हो गई तमित्रा लस यह दीप-शिसा रलवाती,
तुम पिन तिल-तिल कर जलती है मेरे स्मरण दीप की याती।
४
बन कर हूक अचूक रमे हो, प्रियतम, तुम मेरे जीवन में,
ना जाने किम दूर देस से झाँको हो मन-यातायन में !
ओ मेरे निर्मोही,
प्रायो, मेरे इस सूने सारन में,
भूल गए क्या ? जल धाराएँ तुम पिन मुझको नहीं सुहाती ?
अहनिशि तिल तिल कर जलती है मेरे स्मरण दीप की पाती।
५
तुम क्या गा कि इस जीवन की सत्य प्रेरणा लुप्त हुई है,
तुम क्या गए कि इस जीवन की मधुर भावना सुप्त हुई है,
तुम क्या गए कि मेरी कविता अाज बन गई छुई-मुई है,
तुम क्या गए कि इस जीवन में रहा न कोई सहज सँगाती,
तुम दिन तिल-तिल कर अलती है मेरे स्मरण-दीप की पाती।
६
अपनी पत्थर की आँखों से मैंने सर कुछ देता है, प्रिय, ,
महा प्रयाण-यान पर उमन तुमको चढते पेसा है, प्रिय,
है कितनी कठोर ये आँसे, इसका क्या कुछ लेसा है,
प्रिय,
तुम्हें अग्नि-अर्पण करके भी फटी नहीं यह निष्ठुर छाती ।
तुम बिन तिल तिल कर जलती है मेरे स्मरण दीप की वाती ।
श्री गणेश कुटीर,
कानपुर
दिना । जुलाई, १९४६
चालीस

अगणिता तव दीपमाला
क्या जगाई है तुम्हीने, सजन, झिल मिल दीपमाला ?
इस महद् ब्रह्माण्ड भर में खून फैला है उजाला।
?
परम अणु अणु में रमे हो, दीप्ति की सुपमा जगाते,
श्री मुदित आलोक-दानी । फिर रहे तुम लौ लगाते ,
भूमिमण्डल ओ' समण्डल थिरकते हे जगमगाते,
तर कहो मम सदन अब तक क्यों रहा श्रीहीन, काला?
क्यों न याँ फैला उजाला ?
२
,
घर अंधेरा छोड, प्राया देसने मैं तर दिवाली,
मुग्ध हूँ, प्रिय, लुब्ध हूँ, में निरस कर यह ज्योति जाली,
किरण-त तु अनत फेले, तुम अलस चख अशु माली,
स्तब्ध हू, मुझ पर कहो यह कौन मोहन मात्र डाला ?
यो दिसाकर यह उजाला ।
३
हूँ सदा से ही गणित में मैं बड़ा असमथ, प्रियतम,
कितु इच्छा है कि गिन लु ये तुम्हारे दीप इक्दम,
इकतालीस

कासि
हैं अनेकों दीप, मैं हूँ एक, चिन्तित, भमित, अक्षम,
चलन कलन-हिसार मुझसे तो न जायेगा सँभाला,
अगणिता तव दीपमाला।
४
यदि तुम्हारी ज्योति छिटके, इस अधेरी कोठरी में,
यदि मुझे भी बॉध लो तुम दीपमाला की लडी में,
तो हृदय की कलन लिप्सा शात होगी इस घडी में,
क्योंकि मैं भी उस निमिप में हो उठेगा ज्योति वाला।
यदि इधर फैने उजाला।
५
मन मगन होना, सजन, उस छिन कि जर नव दीप बन कर,
में लुटाऊँगा जगत को तब रुचिर आलोक मन हर,
ज्योति का सदेश लेकर में फिरूंगा नित्य
मृत्तिका के पात्र में तुम अब भरो निन रूप-ज्वाला,
इधर फैला दो उजाला।
घर घर,
श्री गणेश कुटीर
कानपुर
दिनाक १.१२३८
यपाजीस

अनिमन्त्रित
कुछ क्षणों को तुम, कहो तो, द्वार मेरे पा गए क्यों ?
विगत चितन से, स्मरण में आज सहसा छा गए क्यों ?
द्वार मेरे पा गए क्यों ?
१
धीर पद धरते अटल से, झूमते, झुकते विनय से-
निपट सयमशील से तुम अाज मम मन मा गए क्यों ?
दार मेरे पा गए क्यों ?
२
त म वशीकरणीय, पीतम, तुम रुचिर वरणीय साजन
लाजनत तर नयन में श्रर विरति के रेंग राग ये क्यों ?
दार मेरे पा गए क्यों?
३
अाज गुञ्जन हो रहा है स्मरण में, मन में, श्रवण में,
प्राण वशी में अचानक मौन स्वर भर गा गए क्यों ?
द्वार मेरे पा गए क्यों ?
यह दिवाली की अमावस, घुल रहा नभ में तिमिर-रस,
तेतालीस

।
कासि
सॉझ तक, रुक, दीप बनने से कहो, शरमा गए क्यों ?
द्वार मेरे आ गए क्यों ?
इस अमावस के तिमिर में बुझ गए हैं दीप मेरे,
निविड धन तम में, हृदय को हृदय से बिलगा गए क्यों ?
द्वार मेरे आ गए क्यों?
चालीस

फिर गूंजे नव स्वर,
प्रिय
अाज रोम-रों से फिर गूंजे स्वर, प्रिय,
कूक उठी हिय मुरली फिर से स्वर भर भर, प्रिय ।
?
सिहर उठा यह धूमिल धूमिल-सा ग्रीष्म गगन,
झझा के झूले में झूल लहर उठा व्यजन,
धुमडे दल के दल ये मेघ भरे बादल गन,
अम्बर का वक्षस्थल घहर उठा घर घर, प्रिय,
फिर [जे नव स्वर, प्रिय
२
पूँदे टप टिपिर टिपिर टपकी दल सादल से,
धाराएँ घिर घहरी नम के वक्षस्थल से,-
सिहर उठा मलयानिल, हम सिंहरे बेकल से,
कॉपा मन, उमडा हिय, नयन मरे झर झर, प्रिय,
फिर गूंजे नर स्वर, प्रिय।
थल जल मय, भासावित, कल्लोलित, हुप्रास्वरित,
हुए चपल, समल, तरल अगणित ये स्रोत सरित,
पैतालीस

परमि
जन्न युर युर या बिगड़े, हदय हुमारोह भरित,
प्यास आस पाणों की पोल उठी सर-गर, प्रिय,
किर गूंजे नर सर, प्रिय।
४
,
पुनक्ति हो झूम उठे पट, पीपल, नीम, आम,
या र महक उटी कोयलिया पूर्ण-याम,
हम अपूर्ण, घूरिणत मा, मी रहे हदय थाम,
डोल रहे आम तले हम आहे मर भर, प्रिय,
फिर गूजे परसर प्रिय।
श्री गणेश कुटोर
प्रताप, कापुर
दिनार ४८४०
छियालीस

डोले वालो
डोला लिये चलो तुम झटपट, छोडो अटपट चाल, रे,
सजन भरन पहुंचा दो हमको, मन का हाल रिहाल, रे,
?
घरसा ऋतु में सर सहेलियाँ मैके पहुंचीं प्राय, रे,
वानुल घर से बाज चली हम, पिय घर, लाज निहाय, रे,
उनके पिन, वरसाती रातें कैसे स्टे अचूक, रे?
पिय की बॉह उसीस न हो तो मिटे न मन की हूक, रे,
डोले वालो, वढे चलो तुम आया सध्या काल, रे,
सजन भवन पहुँचा दो हमको छोडो अटपट चाल,
रे।
२
अभी
ढली दुपहरी, किरनें तिरछी हुई, साँझ नजदीक रे,
दूर तक दीस पडे है, पथ की लम्बी लीक, रे,
आज साँझ के पहले ही तुम, पहुंचा दो पिय गेह, रे,
हम कह आई हैं इदर मे, रात पडेगा मेह, रे,
घन गरजेंगे, रस बरसेगा होगी सृष्टि निहाल, रे,
डोला लिये चलो तुम जल्दी, छोडो अटपट चाल,
३
वाबुल घर में नेह भरा है, पर वॉ द्वैत रिचार, रे,
सैंतालीस
७

छासि
५
साजन के नर नेह सलिल में है अद्वेत विहार, रे,
हृदय हृदय से, प्राण प्राण से, आज मिले भरपूर, रे,
पिय मय तिय, तिय-पय पिय हों जन,तर हो सभम दूर,रे,
दूर करो पथ के सतर का यह अटपट जंजाल, रे,
डोले वालो, वढे चलो तुम आया सध्या काल,
घन गरजे, तर हो न सजन प्रालिंगन का सयोग, रे,
तो फिर कैसे मिट सकता है, हिय का अतुल पियोग, रे ?
जन झनकारें अमित झिल्लियों, हो दादुर का शोर, रे,
तर हम हुलस कहेंगी उन से तुम्हरा ओर न छोर, रे,
डोले पालो, कोयल कुहकी हरित श्राम की डाल, रे,
सजन भवन पहुँचा दो हमको भाया संध्या काल, रे।
७
श्री गणेश जुटीर
प्रताप कानपुर
दिनाङ्क २६ ६३६
अडतालीस

मान कैसा
चरण चुम्मन दान में श्रर मान कैसा ? प्राण मेरे,
मिझक कैसी १ सीझ क्यों ? यह विरति क्यों ? अभिमान मेरे ।
?
मान मत ठानो, न तानो भृकुटियों की चाप, वल्लभ,
पहुँचने दो चरण तल तक ये अधर मम शुष्क, निष्प्रभ,
मत हटायो, मत हटाओ, मत हटाओ, पद-कमल भन,
कर रहे चीत्कार हैं यों पाए ये नादान मेरे,
मान कैसा प्राण मेरे।
,
२
श्रो सलौने, हो गया है कोनसा अपराध भारी,
जो चरण आराधना यों तडपती है यह विचारी ?
हो गया है विश्व सूना, देखकर यह हठ तुम्हारी,
कल्पना सूनी हुई है, भाय हैं सुनसान मेरे,
मान कैसा ? प्राण मेरे।
2
३
जगत प्रागण, एक डग में, हो गया है पूर्ण सुविजित,
हुलसती है यह घरा मृदु चरण तल के परस से नित,
तप्त प्यासे, शुष्क रज कण हो रहे हैं सरस-से नित,
उनचास

कासि
आह ! फिर भी, यया रहेंगे ये अधर नियमाए मेरे ?
मान कैसा ? प्राण मेरे।
बरजते हो क्यों हगों से चरण-गत आराधना को ?
फलवती होने न दोगे क्या निरन्तर साधना को ?
निठुर, ठुकराओ न मेरी इस अदीना याचना को,
पद परस से सिल उठेंगे निपट मुरझे गान मेरे,
मान कैसा ? पारण मेरे।
,
श्री गणेश कुटीर, कानपुर,
दिनाङ्क
}
पचास

सजन मेरे सो रहे है
सजन मेरे सो रहे हैं,
अाज ददातीत से वे योग-निद्रित हो रहे है,
सजन मेरे सो रहे हैं।
?
सुख शयन के भार से हैं युग हग-च्छद अति थकित वे,
ध्यान-भीगा नाद में हैं रम गए लोचन चकित चे
नयन तारा पलक काराबद्ध हैं, अति गति चलित वे,
शास दोलाचलन में प्रिय भार तद्रिल ढो रहे हैं,
सजन मेरे सो रहे हैं।
२
नींद में घुल मिल गई है जागरण की सर व्यथाएँ,
स्वम के सकेत
की हैं अटपटी सी सर कथाएँ,
शून्य निद्रा लोक-शोभा
सजन
जागें तो बताएँ,
इस समय तोचित की चिर चेतना ये खो रहे हैं,
सजन मेरे सो रहे हैं।
३
सुप्ति सरिता धार में अस्तित्त्व तरणी पड गई है,
पूर्ण सजा शून्यता के मॅवर लौं वह बढ गई है,
इक्यावन

कासि
शान्ति के पतनार की शोभा अनोसी नित नई है,
नाव में, विश्रान्नि-जल से, मुख कमल प्रिय धो रहे हैं,
सजन मेरे सो रहे हैं।
४
ले चलो कुछ देर को तो शयन-अपगा कल तक, प्रिय,
हग निमीलित मम करो, अर थक गए हैं ये पलक, प्रिय,
नित्य जाग्रति वेदना से है, शिथिल मन,
बुद्धि, इन्द्रिय,
आज टुक विश्राप्ति के हित मम युगल हग रो रहे हैं,
सजन मेरे सो रहे हैं।
श्री गणेश कुटीर,
प्रताप कानपुर,
श्रगस्त १९३६
वाचन

भावी की चिन्ताएँ
भावी की चिन्ताएँ सम्मुख भर आई हैं,
विषम समस्याओं को घेर घेर लाई हैं,
?
प्रश्नों को उलझी-सी मालाएँ गले डाल,-
बन न मुण्ड-माली सा, आया है विकट काल !
सर्वनाश का श्मशान आग उठा है कराल,
सुट्टहास करती सर जोगिनियों धाई है।
विकट समस्याएँ चन, घिर-घिर, ये आई हैं !!
२
मानन की छाती पर मण्डित हैं अस्प-चिह्न,
माना की वाणी का अर्थ भेद भिन्न-भिन,
मानर का जीवन है अश्रु स्वेद रक्त क्लिन ।
मानर ने ही अपनी गाँठे उलझाई है,
भावी की चिताएँ सम्मुख अन आई हैं
३
आज बना है मानव निरवलम्ब, अनिकेतन,
आज निराश्रित से हैं सन जग जन गण के मन,
अरप् अर्थात् घार, श्राप चिह्न अर्थात् घारों के निशान ।
तिरपन

धासि
विजय मच जडता है, पराभूत है चेतन,
परवशता की, मानन हग में, परचाई है।
विपम समस्याएँ ये घिर-घिर कर आई हैं।
?
उलझा है वैयक्तिक, सामाजिक तारतम्य,
भावी क्षण नहीं रहे कल्पना-विचार-गम्य,
हिय में कैसे आए कोई मनुहार रम्य
आज अनिश्चितताएँ सभी ओर छाई हैं,
भावी की चिताएं
सम्मुख अन आई हैं !!
केन्द्रीय कारागार,
बरेली
दिनाङ्क, १६ जून १६४४
}
चौवन

अब कब तक खोजोगे साजन ?
अप कर तक खोजोगे साजा?
अर सोजा तो जगत हंसेगा औ' तुम मर जानोगे लाजन,
पर कर तक खोजोगे साजन ?
?
हुआ पराया यह पीतम भी जिसको तुम सममे थे अपना,
उसने ही यदि त्याग दिया तर पर क्या नाम किसी का जपना ?
अब न देसना सपने, यह था अन्तिम मधुर तुम्हारा सपना !
अब क्या नर स्वर ? जब कि स्तध हैं उन चरणों की पायल, पाँजन,
श्रर कर तक सोजोगे साजन ?
२
तुमने दिये अर्घ्य ऑसू के, पर, उनमें था मटमेलापन,
तुमने हृदय प्रसून चढाया, पर, उसमें था पार्थिव पदन,
यदि न ग्रहण कर सके सजन यह तर उपहार, प्यार अभिव्यजन,-
तो यह भाग्य तुम्हारा, कोई क्यों ले टूटा फूटा भाजन ?
अब कर तक खोजोगे साजन ?
-
३
तुम कैसे हो, यह तो सोचो, तुममें क्या है, अरे हठीले ?
कोई क्यों आकर के पोंछे ये तव लोचन गीले गीले ?
पचपन

बासि
कट जाने दो जीवन यों ही, भूलो वे क्षण रज रँगीले !
यदि होता है तो होने दो जीवन का सम्पूर्ण विभाजन,
अन कर तक सोजोगे साजन?
एक तार, इक स्वर, इक ती,एक नाद, इक राग, एक रस,-
इसी तरह अब तक का जीवन तुमने रिता दिया है घरवस,
कितु हुआ रनर भङ्ग सदा ही, ताने दिये जगत ने हँस हँस,
अब मत स्वर साधो, बैरागी, अर तुम करो मौन भाराधन,
भर कर तक सोजो
साजन?
श्री गणेश कुटीर
दिनाङ्क १३ जनवरी १६४२
1
छपन

ओ प्रवासी?
श्रो प्रवासी, घूमकर यों देखते हो कौनसा यल ?
कौनसी स्मृति जग उठी ? हिय में मची क्यों आज हलचल ?
१
झूलता है नाम जिसका श्वास के हिण्डोल में नित,
गूंजता जो प्राण वशी के अयोले योल में नित,
याद जिसकी है नयन-यमुना लहर कल्लोल में नित,
आज क्या उसका स्मरण आया तुम्हें, ओ पथिक चचल ?
श्री प्रवासी, घूमकर यों देखते हो कौनसा थल ?
२
कौन बैठा है तुम्हें यों याद करने, श्री प्रवासी ?
क्यों समझते हो कि तुम भी हो किसी के हिय निवासी ?
याद है जब सीझकर उनने तुम्हें दी थी विदा सी ?
बने क्यों दिसुध, बेकल ।
कौनसी स्मृति जग उठी है ? आज क्यों है हृदय चञ्चल ?
नेह के भूसे पियासे,
३
क्या सजन की खिडकियों की याद तुमको आज आई ?
या कि उनकी भिडकियों की याद ने स्मृति रति सताई ?
सत्तापन

पासि
ओ प्रवासी, चरण गति में शिथिलता फैसी समाई ?
धीर पग धरते बढ़ो तुम पथ पर, यो पथिक, अविकल ।
ललककर, यों घूमकर, क्यों देसते हो मिलन का यल ?
रेल पथ,
चिरगाव कानपुर,
दिनाजून १९३६
अट्ठावन

विस्मृत तान
है मेरी विस्मृत मृदुल तान, दे छेड वही प्राचीन गान,
हे मेरी विस्मृत मृदुल तान !
१
आहत हिय की कर शुश्रूषा,
दे सोल आज स्वर-मजूपा,
नीरवता निशा हटा सजनी,
छिटका दे निवएता-ऊपा,
तु आ जा, छिड जा,री अजान, है मेरी विस्मृत मृदुल तान !
२
-
मेरे मानस-नभ-मण्डल में,-
मेरी आँखों के जल-थल में,-
इन श्रवण युगल में लहरा दे-
अपनी लय लहरी पल पल में,
मत कर लिम्ब अब मान, मान,-ऐ मेरी विस्मृत मृदुल तान !
३
स्वर लिपटे हैं विस्मृत पट में,
ज्यो हग छिप जाते घूघट में,
उनसठ

पामि
रस-गार गठ का मृरा गला,
सर ज्यो मष्टि के राकट में,
कर थान मृचना सुरसदार, मेरी रिमृत मृदुल ता!
अटपटी सलोनी सर लहरी-
है ठिठकी सी सहसा ठहरी,
यह कालि दी की लहरों सी
बहती है ही यहाँ गहरी,
रह श्रा, रहमा, अर हट न ठा1,-ऐ मेरी पिरमृत मृदुल तान !
५
छिन छिन में कर देतु निहाल,
भर दे जीवन में सरित ताल,
गुम्फित कर दे धीरे धीरे-
सातो स्वर की पालम्प माल,
पूरा कर दे गायन विधान,- हे मेरी रिमृत मृदुल तान !
-
६
है मेरी हृदय • तरङ्ग दीन
यह बनी, सजनि, स्वर-सङ्ग हीन,
भर दे सुस्वन कम्पन जग
कर द हिय को रस रङ्ग लीन,
करने दे मुझको अमिय पान,-हे मेरी विस्मृत मृदुल तान !
डिस्ट्रिक्ट जेल
गाजीपुर
दिनाङ्क १० जनवरी १६३१
साठ

अभिशाप
+
एक चुम्मन ही हुमा यह शाप जीवन का भयकर,
अधर-सम्मेलन बना अनुताप जीवन का भयंकर ।
१
५
आज सोचूँ हू अरे, क्यों राग की समूति चाही ?
क्यों न अव्यभिचार की चिर रीति जीवन में निवाही ?
क्यों तडप कर, एक क्षण को, शृङ्खला टूटी वृथा ही ?
उन रहा अब तो सुन्दर वह चिर तन स्वप्न सुदर,
एक चुम्बन बन गया अभिशाप जीवन का भयकर ।
२
आज सूखी पत्तियों-सा जल उठा है शुष्क जीवन,
और, अलसा जा रहा है फूस-सा सम्पूर्ण तन मन,
झर रहे निश्वास में चिनगारियों के प्रचलित कन,
आज, सहसा फूट निकली अग्नि घारा तीव्र,
दुस्तर,
एक चुम्मन बन गया अभिशाप जीवन का भयकर ।
श्री गणेश कुटीर
कानपुर
दिनाङ्क १८३६
इकसठ

तुम युग-युग की पहचानी-सी तुम युग युग की पहचानी सी, हो कौन, सुमुखि । अनजानी सी ? ? मुझको तो कुछ भी नहीं स्मरण-- उस प्राण मिलन क वे गत क्षण, उन घड़ियों पर है पडा हुआ- अति काला तर का युगावरणे, फिर भी तुमको जो अब देसा, तो, सजनि, लगी तुम जानी सी, तुम कौन अहो, पहचानी सी ? २ लम्बा रिश्ता है क्या कोई, जो देख तुम्हें आँसें रोई ? क्या पर्दा सा हट गया, जो कि,- लगती जगती घोई घोई ? जग नया लग रहा, पर तुम तो लगती हो वहुत पुरानी सी, तुम कौन सुमुखि अनजानी सी ? यासठ

पासि
३
नयनों में भरी सुमारी
पलकें कुछ भारी-भारी थी,
तुमने देखा था, य, गोया,
कुछ बहुत पुरानी यारी थी,
उस दिन ही में हो गई हमारी आँसे तनिक गिरानी-सी,
जर तुम आई पहचानी सी ?
थी रही चाँदनी छिटक यहाँ,
जर तुम आई थीं निकट वहाँ,
यूं लगा कि, तुमको देस जरा,
रह गया चाँद भी ठिठक वहाँ,
हम थे स्तम्भित, थी प्रति स्तब्ध, जर आई तुम मुसकानी सी ?
ओ, युग-युग की पहचानी सी।
श्री गणेश कुटीर
प्रताप, कानपुर
राति १२ बजे
दिनाक १२ ३६
तिरसठ

मान छोडो
मान छोटो, मानिनी, भर
नयन में सपना भरे तुम विहँस दो अभिमानिनी भन,
मान छोटो, मानिनी, श्रा
१
अाज उत्फुल्लित निशा है
विहँसती-सी प्रतिदिशा है,
यह घहरती सुरधुनी भी-
इस शरत् में अति इशा है,
अमन रूठो प्राण, 'आई यह विठुरती यामिनी, श्रम,
मान छोटो, मानिनी, अम।
२
देव-सरि में श्राज तिरने-
आ गई हैं चद किरणे,
नील अम्मर में लगे हैं
शुभ्र बादल पुन घिरने,
मद भरी है प्रकृति, तुम हो क्यों विरत सयासिनी अन ?
मान छोडो, मानिनी, अब
चौसठ

कासि
३
कौन सुस है मान में, सखि १
टीस उठती प्राण में, सखि,
हहरने लगता है हृदय यह,
जान में, अनजान में, सखि,
पन्थ है यह लघु हमारा, बन चलो सहगामिनी श्रा,
मान छोडो, मानिनी, अना
,
बाट जीवन की न जाने,-
लुप्त होने किस
ठिकाने!
कितु फिर भी वन रहे हैं-
आज अपने ही बिगाने,
क्यों न इस मग में बहे चिर प्रेम की मदाकिनी अर?
मान छोडो, मानिनी, अना
रेल पथ, हरदोई-कानपुर
दिना १२३८
पैसठ

फागुन
१
अरे ओ निरगुन फागुन मास ।
मेरे कारागृह के शूय अजिर में मत कर वास,
अरे श्रो निरगुन फागुन मास !
२
यहाँ राग
रस रङ्ग कहाँ है?
झाँझ न मदिर मृदङ्ग यहाँ है,
अरे चतुदिक फैल रही यह
मौन भावना जहाँ तहाँ है।
इस देश में मत आ तू रस-वश हॅसता सोल्लास,
अरे, ओ भोले फागुन मास
३
कोल्हू में जीवन के कण कण,-
तेल तैल हो जाते क्षण क्षण ।
प्रतिदिन चकी के धर्मर में-
पिस जाता गायन का निश्वण,
दियासट

कामि
फाग सुहाग भरी होली का यहाँ कहाँ रस रास ?
अरे ओ, मुसरित फागुन मास !
में,
रामास की कटिन गॉस में,
मज जान की प्रसर फॉस
अटकी हे जीवन की घडिया,
यहाँ परिश्रम-रुद्ध सॉस
यहाँ न फैला तू वह अपना लाल गुलाल-विलास,
अरे, अरुणारे फागुन मास ।
में।
५
५
डडा
छाई जजीरों की झन-झन,
बेडी की यह
घन घन,
गर' अर्राटा फैला,
यहाँ कहाँ पनघट की सन-सन ?
कैसे तुझको यहाँ मिलेगा होली का आभास,
अरे, हुरियारे
,
फागुन मास!
६
यह निर्गन्ध भावना ही फी,-
चपल तर अपने जी की,-
१ गर्रा-धन्दी गण बैल के सदृश जुतकर जिस यन्त्र से कुएँ से पानी
पींचते हैं, उसे गरा कहते हैं। कारागार की भाषा म इस प्रकार जल पींचने
वाली टोली को 'गकिमान' कहा जाता है।
सडसट

छासि इन तालों जंगलों के भीतर- घुट घुट सतत हो गई फीकी, अब तू क्यों मदमाता ताण्डर करता, रे, सायास ? अरे, मतवाले फागुन मास ! जिला जेल गाजीपुर दिनाङ्क २६ फरव १९३१) अड़सठ

वायु
से-
न वह, तू री, अटपटी चयार !
जर्जर मेरे वातायन हैं, टूटा मेरा द्वार ।
न बह, तू री, अटपटी बयार ।
?
अाज सॉझ के समय न कर री, तू ऐसा उत्पात,
छप्पर के तिनकों के प्रति यह कैसा अत्याचार ?
न बह, तू री, अटपटी यार ।
२
मेरे तन के चिथडों से क्यों तुझको इतना पैर ?
मत झामोर उहे,री चपले, विसर जायेंगे तार,
न बह, तू री, अटपटी बयार |
.
सूसे पात उडाकर, लाकर, ऑगन में मत डाल,
इस पतझड की दुसह वेदना का मत कर विस्तार,
न बह, तूरी, अटपटी बयार ।
सर सर हहर हहर करती मत पाकुटिया के बीच ।
उनहत्तर

कासि
री नागरी, जग उठेगा यह सोया मम ससार ।
न यह, री, तू अटपटी बयार।
,
झपट-लिपट मत मुझ दुसिया से, सुन नास ती,नैंक,
मेरे शू य अजिर में आकर कर मत हाहाकार,
न यह, री, अटपटी घयार।
जिला जेल
गाजापुर
दिनाङ्क ८ फरवरी १६३१
पत्तर

दिग्-भ्रम
गाफिल, किस बीहड में भटका ? रे, गाफिल , किस बीहड में भटका ?
इस प्रदेश में फिर न हठीले, यहाँ बडा है सटका ।
गाफिल, किस बीहड में भटका ?
कितनी मंजिल से कर आया ? कितनी दूर ठिकाना ?
औरों कहाँ छोड आया तू? किम दुविधा में अटका ?
गाफिन, किस बीहड में भटका ?
बौराना ,
पगडडी खोज
महाकाल ने पदचिह्नों को
अकुलाया,
विकट गले में
गटका।
गाफिल, किम बीहड में भटका ?
चियापान, सुनसान,
कान दे, मान, मान जा, बेरी,
अभी लौट जा, बढ मत भागे,-है यह पथ सक्ट का।
गाफिल, किस घोहड में भटका ?
सूसे ओठ, गला चिटका, मुस लटका, प्राण पियासे,
आँसें सोज रहीं जल, मिलता कहीं न पथ पनघट का।
गाफिल, क्सि बीहड में भटका ?
-
इकहत्तर

छासि
ऊँचे झाड,
ने
छाया,
कॅटीले भसाटों बन मग
किस सभ्रम ने लाकर तुझको इस अरण्य में पटका
गाफिल, किस बीहड में भटका
2
जिला जेल गाजीपुर
दिनाङ्क १२ दिसम्बर १६३०
}

इकतारा मेरी वीणा में एक तार-गायक तू भी यह छनि निहार । ? एकाकी स्वर का मृदु निकरण- होता है स्वनित यहाँ प्रतिक्षण, गाऊँ कैसे शङ्कराभरण ? दरसा कैसे स्वर लक्षण है सात स्वरों का कठिन भार, मेरी वीणा में एक तार । 2 २ मेरी तो बस है एक टेक, धुन एक, एक लय, ताल एक, मूर्छना मुरज सर काल एक, गाऊँ मैं कैसे स्वर अनेक ? क्या जानू करना स्वर-सिंगार ? मेरी वीणा में एक तार । ३ प्रिय के वातायन के नगीच, सूनी रातों के ऐन चीच,- लोचन से वीणा सींच सींच- तिहत्तर धासि कोमल सूटी को रंच सीच- करता हु अँगुली का प्रहार-उस जगह जहाँ है एक तार । भीनी-भीनी- सी सर • लहरी- कुछ धीमी-सी, कुछ कुछ ठहरी,- कुछ अमृतमयी, कुछ कुछ ज़हरी, कुछ झिल मिलती, कुछ कुछ गहरी, वह आती, ज्यो नम गगधार-मेरी वीणा में एक तार । - जिला जेल गाजीपुर दिनाङ्क १२ १२ चौत्तहर

मनुहार
टुक रो लेने दो तनिक देर, पयों छेड रहे हो घेरन्बेर ?
१
छेड़ो न, रच रो लेने दा,
मेरे मनरी हो लेने दो,
हिचकियाँ उठे, रोको न इहे,
जल से लोचन घो लेने दो,
यह तारतम्य मत दो रिसर, टुक रो लेने दो तनिक देर ।
?
मैं रो लूगा चुपके चुपके,
हग धो लूगा चुपके-चुपके,
कोई न कभी सुन पायेगा,
बैठा कोने में छुपके,
कुछ मत पूछो तुम घेर घेर, टुक रो लेने दो तनिक देर ।
३
वहती हैं बूंदें गोल गोल,
भीगे हैं ये दोनों कपोल,
सचित सुमनोरथ भाग चले,
हग के वातायन खोल-खोल,
-
पिचहत्तर

कासि
रोको न, करो मत इहे जेर, टुक रो लेने दो तनिक देर।
क्या बतलाऊँ क्या होता है ?
पागल दुसिया क्यों रोता है ?
यह भी विडम्बना है, सजनी,
जग हॅसता, जब वह रोता है,
है इस दुनिया का यही फेर, टुक रो लेने दो तनिक देर ।
५
मेरी वेदना सहेली है,
चचपन से वह सँग सेली है,
जल करण से
यह जीवन जोकि पहेली है,
टुक सुलझाने दो, सुनो टेर,-क्यों छेड रहे हो वेर र ?
बुझ रहा हूँ में-
६
धाराएँ उमडी श्राती हैं,
छिन भर में फिर वह जाती हैं,
अभिलापात्रों के पुज, सखी,-
ये वरनस आन लुटाती हैं,
लुटने दो इनको ढेर-ढेर, टुक से लेने दो तनिक देर ।
-
७
कँकरीले नयन करकते हैं,
भीगे हिय हार सरकते हैं,
चिर दुस के द्रवीभूत क्षण ये-
मोती • से दुलक ढरकते हैं,
दिहत्तर

कासि मत देसो गू ऑसे तरेर, टुक रो लेने दो तनिक देर । ८ यहती है यह अखण्ड धारा, सिंचता है सुरति क्षेत्र प्यारा, दो धाराओं का एक स्रोत,- पथ कितु बना “यारा यारा, दाएँ नाएँ का हेर फेर, टुक रो लेने दो तनिक देर । ६ - कैसे देखू जग की झाँकी ? लीलामय की लीला बॉकी ? ऑखों के जल में तैर रही- छपि निठुर तुम्हारी प्रतिमा की, लोचन-करण से क्यों तुम्हें बैर ? टुक रो लेने दो तनिक देर । १० यौवन यों बीता जाता है, हिय पल-पल में अकुलाता है, मुझको रह रह के इधर-उधर- उन्मत्त भाव भटकाता है, टुक रो लेने दो तनिक देर, क्यों छेड रहे हो घेर र ? - , मार्ग-च्युत हूँ, हूँ लक्ष्य हीन, तन चीन, बना हूँ मन मलीन,, मतिहीन, लीन मादकता में मारा फिरता हूँ मैं नवीन, ५ सतहत्तर

कासि
पथ पर तुम लाश्रो मुझे घेर, टुक रो लेने दो तनिक देर ।
१२
प्रादर्श सुमरनी के मनके,-
स्मृति-साधन ये जीवन धन के,
•बिखरे हैं एक एक कर के,
हैं भग्नतार इस जीवन के,
टूटा है माला का सुमेर, टुक रो लेने दो तनिक देर ।
होली सी जल उठती क्षण में,
मॅडराता धुओं कभी मन में,
फिर कभी कभी लगती झडिया,
लुटती निधियॉ जल कण कण में,
आँधी पानी का यही फेर, टुक रो लेने दो तनिक देर ।
१४
सुइयाँ सी चुभ चुभ जाती हैं,
यह हूक कूक उठ आती है,
ऑखों के कुहरे में छुपके-
घेदना, विपाद लुटाती हे,
टुक रो लेने दो तनिक देर, क्यों छेड रहे हो घेर बेर ?
१५
जीवन-यथ टेढ़ा-मेढा है,
सजनी, यह एक बखेडा है,
यह मुसाफिरी का दीवाना-
यात्री भी ऐंडा-बेंडा है,
प्रदहत्तर

कासि
लो, इधर उधर पड़ रहे पैर, टुक रो लेने दो तनिक देर ।
कुछ आए स्मरण विपाद भरे,
कुछ गये उधर की ओर, अरे,
कुछ ढरक गये वक्षस्थल पे-
कुछ उन चरणों में जा पिखरे,
घिर आती बदली बेर पेर, टुक रो लेने दो तनिक देर ।
जिला जेल
गाजीपुर
दिना २२ दिसम्बर १९३०
उनासी

भिक्षा भर दो, प्रिय, भर दो अत्तरतर, विश्व वेदना के कल जल से प्राप्लाषित कर दो नभ्यतर, भर दो, प्रिय, भर दो अतरतर । a- छलका दो मेरी वाणी में अचर सचर की विगलित करुणा, समवेदना भावना से तुम कम्पित कर दो यह हिय थर थर, भर दो, प्रिय, भर दो अतरतर । २ नभ जल थल में अनिल-अनल में करुण मोहिनी छवि दिसला दो, पुलक पुलक वह आने दो, प्रिय, मेरे नयनों का लघु निर्भर, भर दो, प्रिय, भर दो अतरतर । ३ इठलाते कुसुमों का मादक परिमल मन नभ में फैला है, अपनी निर्गुण गध किरण से चिर निधूम करो मम अमर, भर दो, प्रिय, भर दो अतरतर । -- अस्सी

कासि
मेरी मुग्धा व्यथा परिधि गत हुई-उसे नि सीम बना दो,
मुक्त करो, प्रिय, मुक्त करो मम करुणा-वीणा के ये सुस्वर,
भर दो, प्रिय, भर दो अतर तर
प्रताप प्रेस
दिनाङ्क २४ ११३१
इक्यासी

तुम सत्-चित्-अवतार, रे
हमरे बलम को कोउ न जगइयो कोउ जनि गाइयो मलार, रे,
कॅगनन की सन सन जनि करियो, ना पायल मनकार, रे ।
१
हम अनगिनत वलैयों लै के भाई हैं पौढ़ाय, रे,
तनक सनक सों सजन जग हैं, हैं सुकुमार सुमाय, रे,
सोर हैं पिय गहन तिमिर
की कारी चादर ओढ, रे,
रगमहल के दीप घुझे हैं, पलम रहे हैं पौढ, रे,
कोउ न फकियौ इते हँसी की मृदु किरणे व चार, रे,
हमरे पिया को कोउ न जगइयो, कोउ जनि गाइयो मलार, रे ।
२
चल जागृति, तू दुयकि टिजा जहाँ द्रुमन की भीर, रे,
अरी, सेल के ये क्षण नॉहीं, छायो तिमिर गंभीर,
रे,
कु जन कुजन, रोस-राम पै अन तू नैकु न डोल, रे,
मेरे साजन के ये मीलित लोचन पुट जनि खोल, रे,
हमरे रंगमहल में छाई है विश्रान्ति अपार, रे,
हमरे बलम कौं कोउ न जगइयो, जनि कोउ गाइयो मलार,
३
राग भरी कारी कोयलिया, तू क्यों कूकी, आय,
श्यासी

कासि
कैसे के तोहि मूक करें हम ? याकौ कौन उपाय, रे ?
तू जागति की दूती पनि के आई है उशन, रे,
श्ररी कलमुंही अभी निशा है, अपहिं न भयो बिहान, रे,
कच्ची नींद, अबहिं पीढे है हमरे
तू क्यों उ हे जगायन पाई ? तू क्यों उठी पुकार, रे ?
,
प्राणाधार, रे,
हम चाहत हैं नीरवता, पे, प्रशति बडी है ढीठ, रे,
कोयल और पपीहा के मिस पठात रहत वसीठ, रे,
आज अदी है होड प्रति ने, हमरे सँग, करि डाह, रे !
पै, हम जीतेंगी निह ही, पिय के हाथ निबाह, रे।।
तुम मति जगियो, वालम जोगी, सोरहु पाँच पसार, रे,
गणिका प्रकृति कहा करि लैंगी? तुम सत् चित्-प्रतार,
केन्द्रीय कारागार,
बरेली
दिनाङ्क १ दिसम्बर १९४३
तिरानी

मै तो सजन, आ ही रही थी
क्यों बजाई बाँसुरी ? में तो, सजन, आ ही रही थी,
अयुत जमों की तृपा नर नयन में ला ही रही थी।
१
क्या पताऊँ कर सुने ये तर सुरति-आहान के स्वन ?
युग भनेको हो चुके हैं जब सुना था वह निमारण !
किन्तु झरत हैं अभी तक उन स्वरों से प्राण, तन, मन,
नरल स्वर शर क्यों ? पुरानी कसक अस्थायी नहीं थी।
सजन, मैं था ही रही थी।
२
क्या कहूँ है पथ कैसा, क्या दशा है चरण तल की ?
क्या कहानी मैं सुनाऊँ आज निज यात्रा निकल की?
खेद झलका माल पर, पद तले शोणित धार झलकी,
फितु मैं तव निटुरता पर, सतत मुसका ही रही थी,
सजन,
मैं आ ही रही थी।
३
क्या कहू, कर श्याम घन वन तुम पिरोगे मम गगन में?
क्या रताऊँ, मधु पवन चन कर लगोगे तस तन में?
कुछ कहो तो, शरद-शशि वन क्र खिलागे सूय मन में ?
चौरासी

कामि
क्यों बजाई वेणु ? मैं ये प्रश सुलमा ही रही थी,
सतन, म भा हो रही थी।
मत बजाओ येणु, यो दिक्-काल-पट प्रावरण में दुर,
सु7 तुम्हारे मुरलि का स्वर सिहरते हैं प्राण पातुर,
मुरझ जाता है, सजन, यों हृदय का निष्काम शकुर,
स्वर प्रणोदन क्यों ? जब कि म माग पर जा ही रही थी,
सजन, में आ ही रही थी।
५
उतर आए भूमि पर सन
गगन चारी,
अाज चल चर हो गए हैं मम मनोरथ नभ-विहारी,
रज-कणों में ही तुम्हें नित सोजती हूँ मै विचारी,
सेद्रिया में, अगुणता से नित्य उक्ता ही रही थी,
सजन, में भा ही रही थी।
भाव
६
है
याद मैंने तुम्हारे हैं कभी पद-गम चूमे,
तय कमल-मुस पर कभी हैं मच मम हग-भृङ्ग झूमे,
पूर्ण अंगीकार में था लुप्त द्विविधा - रूप-तू - मैं !
विलग होकर भी मिलन के गीत में गा ही रही थी,
सजन, में आ ही रही थी।
केन्द्रीय कारागार, बरेली
दिनाइ ४ अगस्त १६४४
रक्षा बन्धन पूणिमा
--
पिचासी

खोलो ये बन्द द्वार
खोलो तुम प्रारुर पर ये मेरे बद द्वार,
मेरे घर छाया है गहा, सघन अधिकार,
हैं मेरे बद द्वार।
१
चन्द पड़े हैं मेरे सब गवाक्ष वातायन,
कहो किधर से आवें घनतम हर ज्योतिष्करण ?
ऊस उठा हूँ अब मैं लस लस यह तिमिर सघन,
पात्रो, भाघात करो, खुल जाएँ ये किंमार,
खोलो मम बद्ध द्वार।
२
यह स्यभार मानव का कर लेता बन्द द्वार,
यो ही वह लेता है निज शिर पर तिमिर भार,
यों करता विवश उसे श्रात्म-सुरक्षण विचार
पाकर मेटो तो, प्रिय, मेरा यह हिय रिकार !
दूर करो अधकार।
३
आज तुम्हें माना को कुछ उन्नत करना है,
उसका यह अहंकार तुम्हें नित करना है,
छियासी

शासि
उसका अज्ञान मोह आज तुम्हें हरना है,
अन्यथा न होगा यह मानन सचिदाकार।
सोलो ये याद द्वार!
मेरे प्रिय, आ जाओ, दूर करो तम कराल,
मेरे पाली दह का नाथो यह तिमिर-व्याल !
मेरी कालिदी का दूर करो मोह काल,
मेरा गृह चमका दो, सुन लो मेरी पुकार ।
हैं मेरे पद द्वार।
केन्द्रीय कारागार, यरेली
दिनाइ २६ दिसम्बर १६४३
--
ৰনাৰী

मेरे ऑगन खजन आए
मेरे गाँगा राजन सा,
चटुल, चपल, पनि पल ल चलते ये चचल गरंजा पाए,
मेरे आँगन संजन आप!
?
,
अति सुकुमार सुपड, अति आतुर, स्वेत, श्याम, अगिराम, मनोहर,
ये अति दूर देश के वासी, सतत प्रपासी, शरद गगा घर,
सतत कम्पित, सतत चकित अति, सन्तत टोह निरत, फर फर फर,
जन गण मन की चचलता के ये चपलक' अभिव्यतन पाए,
मेरे आँगन राजन पाए ।
,
२
श्रा दोलित करते रहते हैं निमिप निमिप में गित लघु लागल,
तनु चरणों पर बैठे मानों झूला झूल रहे हैं डुल डुल,
क्षण क्षण, रज कण कण में जीवन सोज रहे ये मजुल वजुल,
अलस भारना गजन करते ये
पारस दुस भजन श्राए,
२
मेरे माँगन खजन पाए
.
१
ध्यस्थिर
पनी का नाम
अटासी

कासि
३
कौन सँदेसा लार है ये लाए स्निकी स्मृति दीवानी ?
मेरे आँगन आर है क्या ये करने अपनी मनमानी ?
आन, किही नयनों की सुधि क्या कर देगी हिय पानी-पानी ?
इसीलिये क्या इस निर्जन में राजन वन स्मृति अनन पाए ?
मेरे आँगन सेजन पाए !
४
देस संजनों को क्यों प्रिय के लोचन की सुधि हिय में जागे ?
ये चंचल क्या टिक पाएँगे उनके उन नयनों के आगे ?
कहाँ सजन के नित गभीर हग ! और कहाँ ये चपल अभागे !
चलित संजनों ने पीतम के वे लोचन-गुण रंच न पाए !!
मेरे आँगन सजन पाए!
मैं जानू हूँ मेरे प्रिय के नयनों में सपने सोते हैं,
चितन भार नमित पलों में मरतर विलीन होते हैं,
मेरे प्रियतम के हग अपनी स्थिर गभीरता कर सोते हैं ?
हे सजन, मैने तो सतत अपने सजन निरजन पाए ।
मेरे ऑगन सजन आए !
केन्द्रीय कारागार, बरेली,
दिनाक २३ फरवरी १६४४
नवासी

तुम मेरी लोल लहर
+
तुम मेरी निभरिणी, तुम मेरी लोल लहर,
तुम मेरे गहर मॅनर, तुम मेरे कल कल स्वर ।
१
तुम मेरी मृदु श्रुति, लय, तुम मेरे सजल गान,
तुम मेरी ताल तरल, तुम मेरी नवल तान,
तुम मेरी अस्य वीण, तुम मेरे वीण काण,
तुम हो मम वे स्वर जो गमके हैं ठहर ठहर
तुम मेरी लोल लहर !
२
तुम मेरी रस कविता, तुम मेरे स्नेह छद,
तुम मम अव्यभिचारी भाव, चिर, श्रमद,
तुम मेरे अभिव्यजन, तुम मम आन द कद,
तम मम शृङ्गार करुण गहन शात-रस सागर ।
सहज,
तुम मम कल्लोल लहर !
३
तुम मेरी ज्योतिकिरण, तुम मेरे नील गगन,
सजन, नयन तारा तुम, तुम मेरे ध्यान मगन,
.

धासि गगन बिहारी मरे, तुम मेरी नेह लगन, तम मम दिनकर, निशिपति, तुम मम उड्डुराजि अजर ! तुम मम कल्लोल लहर। ४ हे अनूप मेरा अस्तित्त्व प्रहर 2 तुम मेरी परिसीमा, तुम मम दिक् काल रूप, तुम ही घर आए हो यह जग जंजाल रूप ! पर, तुम हो चिर प्रकाल, नित्य अदिक्, तम को कमे चाँधे श्रो मेरी लोल लहर। ५ सदा तुम्ही तुम हो, प्रिय, इस जीवन की गति में, जीवन ही क्यों ? तुम हो जड भी सहति में, चेतनमय उनति में, औ' जडमय अवनति में,- मेरे प्रिय, फैल रही तर अामा छहर छहर तुम मेरी लोल लहर ! ६ भाया हूँ लेकर मैं यह शाश्वत टोह भार ! हिय पर घर लाया हूँ यह प्रभाव छोह-मार !! कौन ? कहाँ ? क्यों ?-~का है यह ऊहापोह-भार !!! तुम विन, हो रही, प्राण, दूभर अस्तित्व-डगर । श्रो मेरी ज्योति लहर ! ७ तुम मम जीयन-विकास, तुम मेरी चलित श्यास, तुम मेरे रक्त-रास, तुम मम चेतन विलास, इम्यान

धासि
तुम मम
सयोग हास, तुम मेरे विरह त्रास,
तुम मेरे चिर प्रवास, तुम मेरी साध अमर ,
ओ, मेरी लोल लहर!
८
,
तुम हो मानो अनग, पर, तुम मम अग अग,
यद्यपि तुम नित असग, पर, तुम मम सग सग,
तुम मम कल्पना चग, तुम मेरे राग रग,
तुम मेरी हिय उमग, मन तरंग तुम, प्रियवर,
तुम मेरी लोल लहर !
६
गुथे हुए हो तुम मम पच तत्त्व कण-कण में,
बसे हुए हो तुम इस मेरे आकुल मन में,
तुम हृदय सदन में, तुम मेरे लोचन में,
जीवन के क्षण क्षण में तुम फैले निसर निसर,
श्रो मम कल्लोल लहर !
तन पट से बद्ध हुई मेरी यह प्राण डोर,
तव मुख शशि पर अटके मेरे लोचन चकोर,
तर घन वेणी लस लस, नाच रहा चित्त मोर,
अगीस्त करने का
आया है अब असर,
श्रो, मेरी लोल लहर!
केन्द्रीय कारागार, बरेली,
दिनाङ्क ६ फरवरी ११४४
यानवे

प्रिय मम मन आज भान्त
श्रात नयन, श्ररण श्रात, श्रात वचन, चरण श्रात,
आज श्रात मम मन, प्रिय, इन्द्रिय-उपकरण श्रात।
१
-
यह घूणित गति प्रवाह, यह चकित काल कनन,
यह चिर मण्डलाकार सन्तत नक्षत्र चलन,
पेस पेस हूँ अवाक्, प्राकुल मम प्राण, ललन,
में न कात दी, मैं क्षीण शक्ति, लान्त, भ्रान्त,
प्रिय मम मन आज श्रात।
२
शिर पर मच तर का वर्तुल गति भार लिये,-
जमों की हार लिये, स्मृति का अम्बार लिये,-
मेरे प्रिय,
आया हूँ मे
लिये।
इतना दिक् काल क्रमण कर आया हूँ नितात,
प्रिय, मम मन आज श्रात।
प्रपच क्षार
३
कैसे मैं सम. इस जीवन से मिन मरण ?
पर मरता हूँ मैं अति
निर्विरण चरण !
पग-पग
तिरान
-

कासि तव मुख स्मयमान' विना, लगन सिन खिन्न स्मरण, चिता-अञ्जन गुण से दृग-सजन बद्ध, कात, यह मम मन आज श्रात । , कपाट तब अलखित राज भवन, परम अगम सिंह द्वार, जिसमें दिक् काल-रूप दो सुछवि-सार, इनको तुम बद किये बैठे हो, निविकार, सोलो निज सौध समुद, हुआ अमित युग युगात, प्रिय, मम मन श्राज श्रात । ५ प्रिय, तुमको पाने की उमडी हिय बीच लहर, कहाँ कहाँ हूँढ फिरा, बीत गए अयुत प्रहर, देसा तभी मिले आवृत दिक् काल भरर' टेर हुई निष्फल मम, कण्ठ हुआ भग्न, लात, प्रिय, मम मन श्राज श्रात। ६ हार देहली - मगलमय, खोलो तो निज मदिर के कपाट, पर है नत मम चिनित ललाट, उभरा है उस पर मम जीवन इतिहास ठाट,- वह पुराण, जिससे है अकित मम भाल प्रात! प्रिय, मम मन श्राज श्रात । ५ सस्मित, मुसकान से खिला हुश्रा। २ फिवाई-दिक काल श्ररर = दिक् और काल रूपी दा विवाड़े। चौगनवे

कासि
७
सोलो मित्र दार, प्राओ,
मुसकाते से,
नयनों में सिहर उठने मधु रस बरसाते से,
श्रवणों में जो
गुन-गुन-गुन गाते से,
हो जाऊँ में अन त, जो हूँ गुण-बद्ध, सात,
प्रिय, मम मन श्राज श्रात ।
.
यह शाश्वत टोह-मार, यह सतत लगन लिये,-
सोज रहा हूँ तुमको मैं उमङ्ग मगन लिये,
गहन असतोप
बने बैठे हो, सजन, हिये,
आजाओ सम्मुस प्रर, हों आकुल प्राण शान्त,
प्रिय, मम मन अाज श्रात ।
जिला जेल, उन्नान,
दिनाङ्क ३० जनवरी १९४३
}
पिचानवे

नैशयाम कल्प-मान
मिशि का अति क्षुद्र याम, आज हुआ कल्प-मान,
अस्थिर, चल, चपल निमिप भान हुआ युग समान,
नैशयाम, कल्प मान ।
१
अस्थिर में होता है जब शाश्वत समावेश,-
समय हो जाते हैं जर अनित्य काल, देश,
तर होते हैं विलुप्त अचिर चलन कलन क्लेश,
सुन्दर, शिव, सत् अकाल रहता है एक शेष,
पाता है परिवर्तन तर चिरता का प्रमाण,
चपल निमिष युग समान ।
२
निशि के चचल क्षण को तुम देते स्थिर स्वरूप,
छिटकाते स्मित किरणें, हरते घन तम कुरूप,
भरे हुए पूर्णार्पण निज नयनों में, अनूप,
आए साकार बने, तुम मेरे चिर अरूप
उस क्षण अक्ति होता क्यों न अमरता विधान ?
नेशयाम, कल्प मान।
छियान

धासि
३
जात,
जन पाएँ देह घरे सपने मम मनसि
तर, यह निशि क्यों न बने मेरी सौभाग्य रात ?
तव पद रति अपित मम पनीयत शिथिल गात,
निशि का तम तोम हुन्ना मम नव जीवन प्रभात !
प्रिय, त्यम्मय मेरा मन, सम्मय मम विजित प्राण,
ओ, मेरे भासमान !
एक निमिप-सम्पुट
में भरकर
आनत्य प्रहर,
नयनों से कौतुक कर, मुसकाए तुम, प्रियवर !
मृण्मय यह कात-राण्ड,जिसको चल क्षण कहकर,
हँसते हैं जग-जन-गण, यही हुआ अजर, अमर !
खूब दिया तुमने इस क्षर को अमरत्व-दान,
नेशयाम करप-मान।
५
श्रमणों में, नयनों में, प्राण-व्यजन में, मन में,-
अकित है अमर छाप रोम रोम, कण-कण में,
गॅजा अनहद निनाद तव ककरण झन मन में,
व्योम गान-सान उठी, मेरे प्रिय, तब स्वन में,
आए दिन काल तुम्हें व दन करने, सुजान,
ओ मेरे रुचिर पाए।
श्री गणेश कुटोर
कानपुर
दिना०९ ४२
सतानवे

कमला नेहरू की
स्मृति मे
देषि, इतने ही दिनों का क्या यहा आवास था यह
क्या त्वरा थी ? लो, अभी तो शेप कुछ मधुमास था यह ।
१
-
तोड कर उस शृङ्खला को जो पड़ी थी मृदुल पग में,-
राजहसिनि, उड चलीं इतनी सुबह अज्ञेय मग में ?
हो गये सम्पूर्ण क्या तव काज सब इस अनित जग में ?
चिर महा अभिनिष्क्रमण का कौन सा उल्लास था वह
देवि, इतने ही दिनों का क्या यहाँ भागास था यह ?
2
२
श्रात्म आहुति के जलित ये खेन तुमने खून सेले,
हन्त ! शुचि आदर्श के हित कौन दुस तुमने न झेले ?
लो, तुम्हारे समद्रष्टा प्राणप्रिय अत्र है अकेले,
सुमुखि, इतने ही दिनों का क्या तुम्हें अप्रकाश था यह
देवि, इतने ही दिनों का क्या यहाँ आवास था यह ?
2
३
देवि, क्या उस पार गूंजी काह की मुरली सलोनी ?
या कि कीटोत्सुक्य मिस सेली जगत से 'हग मिचौनी' ?
पठानवे

कासि
अाज अनहोनी हुई ऐसी, कभी जो थी न होनी,
और कुछ दिन तो रहोगी तुम, हमें विश्वास था यह ,
देवि, इतने ही दिनों का क्या यहाँ श्रावास था यह ?
४
"
कौन थीं तुम एक कोमल कल्पना सी, निठुर जग में ?
कौन थीं तुम सुमन पॅखुरी सी, विषम इस नियति मग में ?
कोन थीं तुम, भक्ति सी, नित नेह के हिय चिर विलग में
कौन थीं ? किस देश की थी ? तब मिचिन निवास था यह ?
देवि, इतने ही दिनों का क्या यहाँ भावास था यह
निराशा सिकता कुपथ में अश्म रेखा सी सुप्रक्रित,
वायु झम्पन में धवल से हिम शिसर-सी तुम अशकित,
निपट अधियारे गगन में ज्योतिकणिका सी प्रकम्पित,-
अाज प्राणायाम का क्या प्रासिरी नि श्वास था यह
देवि, इतने ही दिनों का क्या यहाँ आवास था यह ?
?
नियानो

उड़ चला
उड़ चला इस साध्य नम में,
मन विहग तज निज बसेरा ।
क्यों चला ? किसि दिशि चला ?
किसने उसे यों आज टेरा?
?
क्यों हुए सहसा स्फुरित अति
शिथिल संश्लथ पस उसके ?
क्या हुए हैं उदित नभ में,
चदमा
अकलक उसके?
विकल पातुर सा उडा है,
विहंगम आज मेरा!
उड चला है साध्य नभ में
मन विहग तज निज बसेरा ।
मन
२
शूय की आतुर
निमत्रण,
आज उसको मिल गया है,
क्षितिज की विस्तीर्णता का,
पवन-अञ्चल हिल गया है,
सौ

बासि गगन में, प्राण पती ने ललक कौतूहल बिखेरा। उड चला इस सान्ध्य नभ में, मन विहग तज निज बसेरा । ३ रहा स्वनित उड्डीयन ध्वनित-गति- जनित अनहद नाद से यह- दिगदिगन्ताकाश वक्षस्थल, अहरह। ऊर्ध्व गति ने ध्यान मना गीत यति को भान घेरा। उड चला इस साध्य नम में मन विहग तज निज बसेरा । एक सौ एक

हम तो ओस-विन्दु-सम ढरके
श्रोस वि दु सम ढरके, हम तो श्रोस-पि दु-सम ढरके,
पाए इस जडता में चेतन तरल रूप हम धरके,
हम तो श्रोस विदु-सम ढरके ।
?
ना जाने
बरसाया?
2
तरसाया ?
किसने मनमानी कर हमको
क्या जाने क्यों हमको इस भव मरु थल में सरसाया
किसने यो जडता उधन में बॉध हमें
कौन खिलाडी हमको सीमा बधन दे हरपाया ?
था किसका आदेश कि उतरे हम नभ से झर-झर के ?
हम तो श्रोस निदु-सम ढरके ।
२
पाज वाप बन उड जाने की साध हिये उठ पाई,
मन पछी ने पंस तौलने की रट आज लगाई,
एक सौ दो

घासि
क्या इस अनाहूत ने आमानण की ध्वनि सुन पाई ?
अथवा आज प्रयाण काल की ना-शंख ध्वनि छाई ?
लगता है, मानो जागे हैं स्मरण आज अपर के,
हम तो ओस पिदु-सम ढरके ।
श्री गणेश कुटीर,
प्रताप, कानपुर
दिनाङ्क ५ जुलाई १९४२
एक
सौ तीन

पाती
?
मैं क्या लिखू तुम्हें पाती, प्रिय, श्रर क्या लूं में शद सहारा
जन हिय में तुम बसे हुए हो, तर अभिव्यजन कौन विचारा ?
?
७
,
रोम रोम में, श्वास श्वास में, रक्त कणों में, अतर तर में,-
मेरी ज्ञान ध्यान पूजा में, मेरे इस मानस अम्बर में,
जब तुम रमे हुए हो मेरी हिय-उमग की लहर लहर में,
तब अक्षरों और शब्दों से कौन भेद बतलाऊँ सारा ?
मैं क्या लि। तुम्हें पाती, प्रिय, श्रम क्या तू में शब्द सहारा ?
२
सॉझ हुई, माना तव कृष्णा, घन केसावलियों लहराई,
कमल मुंदे, मानों मद भीनी ता एणी'-असियाँ अलसाई,
आई अपा, मानों तव मृदु म द-मद स्मिति किरणें आई ,
यों त्वम् मय है मेरा अग जग, यों त्वम् मय मम जीवन धारा !
मैं क्या लिखू तुम्हें पाती, प्रिय, अब क्या तू मैं शद सहारा ?
५
३
पर,
मेरी क्या जीवन धारा ? मैं तो एक विदु हूँ केरल,
ऐसा विदु, कि अब धारा हूँ, केवल तव अनुकम्पा के बल,
, मृगी
पक-सौ चार

पासि
दी है मुझे तुम्ही ने तो यह कन कल उन सर लहरी परिरल,
"पर तो परो क मेरा यह भी अपना यह नाग,
मैं क्या लिगू तुम्हें पाती, प्रिय, भप पया ल मैं शन्द-महारा
?
मुझे नहीं सायुज्य पाहिए, में तो सामीप्य भिसारी,
तुम पो हिय के मधु रस से, स, मर दो मेरी लगु मारी,
मोलो, मम मन-गगन-विहारी, कर पाएगी मेरी पारी
तुम टहरे युग युग के विजयी, मैं तो है युग-युग का हारा !
में क्या लिगू तुम्हें पाती, प्रिय, अम या न मैं शद-सहारा ?
केन्द्रीय कारागार, परेली
दिनार दिसम्बर १६५३
}
एक
सौ
पाच

मरुथल का मृग
मैं तो हूँ मरुथल का मृग, प्रिय, हूँ ना जाने कितना प्यासा !
मैंने अपने जीवन-यन में, बोलो कर जाना चौमासा ?
मैं तोर मरुथल का मृग, प्रिय, हूँ ना जाने कितना प्यासा !
?
झिलमिल तरल तरगित जल छल झलक रहा है दिशि दिशि सारा,
प्यों-ज्यों उस दिशि धाया त्यों-त्यों दूर हटा जल कूल किनारा,
निज मरीचिका के भ्रम में मैं दौड रहा हूँ मारा मारा,
अपने लिए न जाने क्या हूँ? पर है अग के लिए तमासा ।
मैं तो हूँ मरुथल का मृग, प्रिय, हूँ ना जाने कितना प्यासा !
२
यों ही दौड दौडकर तोडे कितनी बार प्राण ये अपने ।
ना जाने, कितने युग से मैं देख रहा हूँ वारिट सपने ।।
कितु निहारी नित मरीचिका मम मृग नयनों की लप झप ले ॥
पर्णरहित
क्व हुआ, कहो तो मेरे वन का अर्क जनासा ?
मैं तो हूँ मरुथल का मृग, प्रिय, हूँ ना जाने कितना प्यासा !
,
३
दौड रहा हूँ मरुथल में मैं झिझका सा, अटका-भटका सा,
यह जीवन भी क्या जाग्गा जल पिन ? है अब यह खटका-सा,
एक सौ छ

ছবি
देखो तो, प्रिय, या पहुंचा है यह क्षण जीत संकट का सा,
नदयन यही! कि घन न परसो !! पर तो मेटो प्राण पिपासा !!!
मैं तो हूँ मरुपल का मृग, प्रिय, जो कितना प्यासा !
मेरी नीर-गरी यदली, तुम, हो पर्यो इतनी दूर गगन में ।
तड़प रहा है यह भाकुन हिय, तर सोह पनगारि लगा में !
मेरी रसभीनी श्यामा, तुम, यरसो मम मन न भागा में!
सूसा कराठ, ओठ पर पपदी, अन्तर-तर है पका पका-सा
में तो हूँ मरुथल का मृग, प्रिय, ना जाने कितना प्यासा !
.
केन्द्रीय कारागार, घरेली
दिनाक ६ दिसम्बर १६४३
--
पक सो सात

पुलकित मम रोम-रोम
पुलकित मम रोम रोम, मधुर घणनमय मम तन,
कम्पित मम तार तार गूंज रहे हैं क्षण क्षण ।
मन अम्बर में उमडी स्वनित गान गगन गग,
है उच्छल स्वर-तरग, सिंचित है अंग अग,
मम सेन्द्रियता अनग, उमन मम हिय-उमग,
सजन चरण अरुण
जीवन आँगन,
पुलकित मम रोम रोम, मधुर करणनमय मम तन ।
रंग रजित
२
मम आकुल नयनों की तुम चिर मॉकी, प्रियतम,
तुम मम मनुहारों की हो छवि चाँकी, प्रियतम,
तुम हो मनुल प्रतिमा, कवि उपमा की, प्रियतम,
तव किंकिणि अनुगामी हैं मेरे गायन स्वन।
पुलक्ति मम रोम रोम, मधुर कणनमय मम तन ।
N
३
मृदुल ज्योति किरण सदृश, भेद-स्वप्न अधकार,-
भले पधारे हँसते, ओ मम जीवनाधार,
एक सोपाठ

कासि
धन्य हुमा मेरा वह निद्रा पालस विकार,
घय हुए तुम्हें निरख मम मीलित युगल नयन !!
पुलकित मम रोम रोम, मधुर कएनमय मम तन ।
,
मुझ चिर याचक को यो श्रा औचक दिया दान,
मैं निद्रित, त्वरित बना चिर जागृत के समान,
खम्-मय हो गए, सजन, ये मेरे विकल प्राण,
अब तक भी अधरों पर हैं वे तर मधुरस करा,
पुलकित मम रोम-रोम, मधुर छणनमय मम तन ।
.
घरेली,
केन्द्रीय कारागार,
दिनाङ्क ३ जुलाई १९४४
एक सौनो

मेरे मधुमय स्वप्न रँगीले
बन न कर मिट गए अनेकों मेरे मधुमय स्वप्न रँगीले,
भर मर कर फिर फिर सूसे हैं मेरे लोचन गीले-गीले ।
?
मेरा क्या कौशल ? क्या मेरी चचल तूली ? क्या मेरे रेंग?
क्या मेरी कल्पना हसिनी ? मेरी क्या रस रास रति उमग ?
में कर का रंग रूप चितेरा ? मैं कब विचर सका खग-कुल सँग ?
मम स्वप्नों के चित्र स्वय ही बने, स्वय ही मिटे हठीले ,
भर भर कर फिर फिर सूखे हैं ये मेरे रॅग पान रँगीले ।
२
मेरे स्वप्न रिलीन हुए हैं, कितु, शेष है परछाई सी,
मिटने को तो मिटे, कितु वे छोड गए हैं इक झॉई सी,
उस झिल मिल सी स्मृति-रेखा से हैं ये ऑसे अकुलाई सी,
उसी रेख से वन उठते हैं फिर फिर नरल चिन चमकीले,
बन रन कर मिट गए अनेकों मेरे सपने गीले गीले ।
३
?
कलाकार कर का मैं, प्रियतम, कर मैंने तुलिका चलाई
मैंने कर यलत कला के मदिर में वत्तिका जलाई ?
यों ही कभी कॉप उही है मेरी अँगुली और कलाई,
पक सौ दस

कासि
यों ही कभी हुए है कुछ कुछ रसमय कुछ पाहन रसीले,
वन-चन कर मिट गए अनेकों मेरे मधुमय सप्न रॅगीले ।
मैंने कर सजीवता की जग के कठिन शैल पाहन में ?
मैं कर पाया प्राण स्फुरण कर अपने अभिव्य जन वाहन में ।
मुझे कर मिले सुदर मुक्ता भावार्णव के अवगाहन में ?
यदा कदा है मिले मुझे तो तुम जैसे कुछ अतिथि लचीले ।
यो ही वन पन कर विगडे हैं मेरे मधुमय स्वप्न रँगीले ।
गणेश कुटीर, कानपुर
दिनाङ्ग ३ मई १९४८
}
एक सौ ग्यारह

दान का प्रतिदान क्या, प्रिय ?
दान का प्रतिदान क्या,
प्रिय ?
वय को जब दे चुका, तब, प्रति गृहण का मान क्या प्रिय ?
दान का प्रतिदान क्या, प्रिय?
?
नेह के इस हाट में मैंने न जाना भाव क्या है ?
भाव-तानों में पडे जो, वह सुरति का चार क्या है ?
दाव पर जर प्राण हैं, तर शेष भी कुछ दाव क्या है ?
जबकि दे डाला सभी कुछ, प्राप्ति का फिर व्यान क्या, प्रिय ?
दान का प्रतिदान क्या, प्रिय ?
२
मैं न मॉगूगा कि मुझको, निठुर, तुम निज नेह दे दो,
मैं न मॉगूगा कि मम मरु प्राण को कुछ मेह दे दो,
मैं सतत अनिकेत क्यों मॉगू कि तुम इक गेह दे दो ?
तय उपेक्षा के गरल का कर न लूगा पान क्या प्रिय ?
दान का प्रतिदान क्या, प्रियर
,
३
तुम न मेरे हो सको, तर भी मुझे क्या शोच, प्रियतम ?
स्फटिक हीरक में, कहो, कर पा सका है लोच, प्रियतम ?
एक सौ बारह

धासि
तुम निभानो निज निठुरता नित्य नि सकोच, प्रियतम,
पर, निभाऊँ मैं न अपनी नित समर्पण आन क्या, प्रिय ?
दान का प्रतिदान क्या, प्रिय।
ये लखो, आकाश में चमके नसत अनगिनत, साजन,
यह लसो, मम नयन में चमकी लगन अति विनत, साजन,
और, सिचन कर उठीं तव गमन-उत्सुक चरण पॉजन ।
तुम न रुकार सुन सकोगे गमन के कुछ गान क्या, प्रिय
दान का प्रतिदान क्या, प्रिय
.
श्री गणेश कुटीर,
कानपुर
दिनाङ्क ४५ ४८
एक सौ तेरह

प्राणों के पाहुन
प्राणों के पाहुन पाए श्री' चले गए इक क्षण में,
हम उनकी परछाई ही से छले गए इक क्षण में ।
?
कुछ गीला सा, कुछ सीला सा, प्रतिथि भवन जर्जर-सा,
ऑगन में पतझड के सूखे पत्तों का मर्मर-सा,
आतिथेय के रुद करठ में स्वागत का धर्घर सा,
यह स्थिति लसकर अकुलाहट होक्यों न अतिथि के मन में?
प्राणों के पाहुन पाए प्रो' लौट चले इक क्षण में ।
२
शूय अतिथिशाला यह हमने रच पच क्यों न बनाई ?
जग को अपनी शिल्प चातुरी हमने क्यों न जनाई ?
उनके चरणागमन स्मरण में हमने उमर गॅवाई,
प्रध्य दान कर कीच मचा दी हमने अतिथि सदन में,
प्राणों के पाहुन पाए औ' लौट पडे इक क्षण में ।
३
वे यदि रच पूछते क्यों है अतिथि-कक्ष यह सीला ।
वे यदि तनिक पूछते क्यों है स्फुरित वक्ष यह गीला ।
तो हो जाता ज्ञात उहें है यह उनकी ही लीला,
एक सौ चौदह

हासि
है पकिलता आज हमारी माटी के कण कण में,
प्राणों के पाहुन पाए औ' लौट चले इक क्षण में ।
अतिथि निहारें अाज हमारी रीती पतझड वेला,
भान हगों में निपट दुर्दिनों का है जमघट मेला,
झडी और पतझड से ताडित जीवन निपट अकेला
हम खोए से सडे हुए हैं एकाकी
पाहुन आए औ' चले गए इक क्षण में ।
ऑगन में,
प्राणों के
गणेश कुटीर, कानपुर
दिनाङ्क ६ मई १९४८
}
सो
पन्द्रह

गान-निरत मम मन-खग
किर-किर किर, चिव चिव चिवें बोल रहे शैल विहग,
ध्वनि नदित
तरतर, गान निरत मम मन सग।
१
बाल रश्मि स्नात, मुदित, निखरी
पर्वत रानी,
उमॅग उठी मन्सूरी नवल नेह रस सानी,
परनादोलित शत शत शाखाए अरुझानी,
नृत्य निरत तरु-पल्लव, नाद मगन सर अग जग,
ध्वनि नन्दित वृत वन्त, गान निरत मम मन सग।
२
सघन हरित पल्लवयुत अयुत डाल मुज वाली,
नाच रही यह गति रत गिरि-रानी मतवाली,
डोल उठी ये बाहें बरबस सी दे ताली
पाली री, यह बरि लस आए मन क्यों न उमग?
किर-किर किर, चिव चिवें विवे बोल रहे शैल विहंग।
३
देखो, यह ध्वनि आई, सीटी सी, कानो में,--
किसी प्रभागे खग की। क्या उसके प्राणों में--
तडपन है ? उलझन है क्या उसके गानों में ?
एक सौ सोलह

धासि
सगी विरह न आया क्या उसका काल-उर ?
क्यों यों अकुलाया सा बोल उठा यह नग संग
2
धूप छाँह, सुस-दुस, श्रानाद निरानाद, प्राण!
जीवन के सङ्ग लगे। उलझे हैं रुदन गान,
शूय नीड लख सग को व्यर्थ लगी निज उडान,
रागी निमन्त्रण मिस यह रहा रक्तमय स्वर रंग!
इसीलिये अकुलाकर गोल उठा यह नग संग।
धुंधला सा, नीला सा अम्बर यह काँप रहा,
अपने सकरुण उर से जगती को ढॉप रहा,
किसी गहनता को, सखि, मम लघु मन नाप रहा,
कितने गहरे हो तुम, चोलो, हे प्राण सुभग
भाकर क्यों रोक लिया तुमने मम सूना मग ?
?
६
?
हलका होने को है क्या शाश्वत टोह भार ?
जीवन में आए हो बनकर क्या पूर्ण प्यार
देसो, मम नयनों में है कितना व्यथा द्वार !
युक्त करोगे क्या तुम मेरा यह भान पिलग ?
पनि नन्दित हृदय, प्राण, गान निरत मम मन सग।
५
काश्मीर विधान्ति बुटीर, मन्सूरी
दिनाक मैल १५
}
पक सौ सपद

वासि?
'घासि" की यह टेर मेरी, 'नास्मि' की अनुज आई,
आज श्रमर से उलट कर यह प्रतिधानि दी सुनाई,
'नास्मि' की अनुज आई।
?
निगल, कैसे पा सकोगे वे गगनचारी चरण मम ?
कल्पना के भी थकेंगे पंस कर पद अनुसरण मम,
कणित नूपुर ध्वनि अगम्या, हे अलख चरणाभरण मम,
यो गहन प्रकाश वाणी मन गगन के वीच चाई।
'नास्मि' की अनुगूंज आई!
२
देव, मैं अष्टाङ्गयुत प्रणिपात में ब्रह्माण्ड घेरू,
नाममाला नाप में सब सौर मण्डल-चक फेरू,
गोद में लू सींच तुमको यदि तडपकर आज टेर
है भरोसा यह तभी तो 'क्कासि ?" की यह लौ लगाई।
'नास्मि' की अनुगूंज आई।
३
'नास्मि' कहने से न होगी तनिक भी विचलित प्रतीक्षा,
मुहद आस्तिक भाव की क्यों ले रहे हो तुम परीक्षा,
एक सौ अठारह
भी पिली नागा डिार पुस्तकालय
बीकानेर

कासि
हम नहीं कच्चे सिलाडी, ले चुके हम स्नेह दीक्षा,
यह तुम्हारी टोह, साजन, जागरण स देश लाई
'नास्मि' की अनुगूंज आई।
आज तो है हाथ मेरे ढूंढते से और साली,
पर अवधि इस 'आज' की कर से हुई सीमात वाली ?
हैं अनादि - अनत मेरे 'भाज' की घड़ियाँ निराली,
हूँढ लूँगा सॉझ के पहले अपश अपना कहाई,
'नास्मि' की अनुगूज पाई।
५
अाज, दिन रहते, मिलोगे तुम, मुझे है पूर्ण निश्चय,
क्योंकि तुम कह जो गए हो, तुम हरोगे रात का भय,
अङ्कशायी तुम बनोगे, लुप्त होंगे नैश संशय,
है अचल सौभाग्य मेरा, ह की मेरी सगाई,
'नास्मि' की अनुज पाई।
श्री गणेश कुटीर,
राति ११ बजे
दिनाक २८ नवम्बर १९३६
एक सो उन्नीस

No text on this page.

Kwasi

Author
Balkrishan Sharma
Title
Kwasi
File name
Kwasi
Text
OCR done
Citation
1968
Published
2011/03
Publisher
Rajkamal Prakashan Private Limitad New Dehli
Language
Sanskrit
Pages
149
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Poetry
DLI number
551279
Barcode
4990010032036.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
ArLStXQ5Gqg
Download PDF

Kwasi