Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Kurukshetr (sanskratik Aur Atihasik Sihavlokan)
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कुरुक्षेत्र
[सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक सिंहावलोकन
कुंवर घासकृष्ण 'मुनसर'
विश्वविद्यालय प्रकाशन गृह
नवीन शाहदरा-दिल्ली-३२
प्रकाएक
विश्व विपासय प्रकाशन गृह
पिल्सी ३२
रामकष्ण 'मुगतर'
प्रथम सस्करण
प्रगस्त सन् १९६२
मूस्य १२१०
रामाकृष्णा प्रेरा
पटरा मीस, दिस्सी
समर्पणा
अपने मदेय पिता
पं० राजाराम मारताण
को
नामकृष्ण
मात फष्टमहो महान्स नृपति सामन्त पाई र तप्त
पाद उस्प प सापि रामपरिपत्तापपाष्ट्र विम्यानना ।
उद्रित स प रामपुष मिवहस्ते यन्दिनस्ता सपा
संव मस्प वधादयात् स्मृति पद कामायत म्मनमः ||
-मत हरि
पहले यहाँ कैसी सुन्दर नगरी पी, उसका राजा पैसा उत्तम पा,
उसका राग्य गितनी दूर तक पा, उसके निपट रामा पसी
होती पी पौर पदमुनी स्त्रियों कसी सोमायमान
पी राजपुों का समूह कैसा प्रथम पा,
पैसे यह पन्दोगरग पे मोर मी पपा
पहत थे। प्रब वह सय प्रिय
पास यम होकर मृत हो
गए उस काल फो
ममसार है।
अपनी बात - कुरुक्षेत्र का सम्बध प्राम के युग से नहीं अपितु इसका सम्यन्य सृष्टि के जम के साथ-साय चलता है। कुरक्षेप पार्मिक ऐतिहासिक पौराणिक, मथवा समितिक दृष्टि से क्या महत्व रखता है, इस पर पूर्ण रूप से प्रकाश डालने का यत्न किया गया है और यदि सेनक इस प्रयास में सफल हो गया है, जिसका निणय पाठकगण ही फर सबसे है सो यह अपने को घय समझेगा। पुस्तक के निर्माण की कहानी भी मनोसी और ऐतिहासिक वस्तु बन गई। पुस्तक की रचना पंचाव के भूतपूर्व राज्यपास यो परेश्वरप्रसाद नारायणसिंह के पादेशानुसार की गई क्योंकि इस प्रकार को पुस्ता बाजार में उपलब्ध न पी। पुस्तक लिसी गई और यह माम प्रमाणित भी हो गई है। इस पुस्तक के निर्माण तमा प्रकाशित करने में श्री परतारसिंह दसाल पुस्तकालपाप्पम कुरक्षेत्र विश्व विधानय पुस्तकासम का विप योग है। उनकी प्रमूल्य सहायसा से ही यह पुस्तन पापके सम्मुख है। प्रस्तुत पुस्ता प्रापके सम्मुम्न है। कमी है, इसका निणय विद्वान नन हो पर सपते हैं। प्रत्येक नेतक को अपनी प्रति पम्दो सगतो है, पस इसका मूल्यांकन मर द्वारा समुविस रूप से न हो सकेगा। पन्म में मैं पुन उन सभी साथियों सहयोगियों एवं पट रक्षेत्र मासियों मा हृदय से सत्ता हूँ जिनके सहयोग एवं पराम के द्वारा ग पुम्वा का निर्माण हो सका है। महन कुम्भेश १जनवरी सन् १९९५ बिनीव मेमक
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पृष्ठ
8
२०
५१
विषय-सूची
कमांक
विषय
१ सनातन सत्य
२ कुरक्षेत्र में प्रसिद्ध बन पौर नदियां
३ कुरुक्षेत्र का सांस्कृतिक महत्व
४ कुरक्षेत्र एक विवाद
। ५ महाभारत का कुरक्षेत्र
६ कुरक्षेत्र मा ऐतिहासिक महत्व
७. यवन मोर पुरक्षेत्र
८. पिसा पानेसर
१ रामरंग में सूबा हुमा कुरक्षेत्र
१. कुरक्षेत्र रक्षार्प ग्रेिजों द्वारा दिए गए फर्मान
११ पुरमेन एक सामान्य परिचय
६५
१०४
११३
१२२
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सनातन सत्य पह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि यूनान और मिन को प्राचीन सम्पताओं की उन्नति हिमा की रिवारों में मार की एसीप सम्पता ने बी परपरों मोरों के सस गुर दो पौरपर बातावरण में मेक बोले पोर पुजा हुई। डार समस्त पानिकों का पत किमातापएप की गहरी पार प्रमिट छाप प्राणिपो पर पपपय पाती है। प्रत यूनान, मिन पोर पुरसीप सम्यता पर पौर रस सम्यता में जन्म मेने पपया पमने बामों के पादार दिपार, पहन सहन मन और बुद्धि पर मन पस्त रिवारों और पपरीमी फिमा बन्दियों का गहरा प्रमाप प म ल सभ्यतामों पार इनका अनुसरण पने पासों पिन्द्रम का पवार म एकर संकीर्ण गया। गिस प्रकार क्तिों में दिवार होती है, उसी प्रकार पुष्प सोपों में भी प्रतिमाव की प्रकृति है । एक पर से दूसरे राष्ट्र को एक गान से दूसरे मान को पौर पक्ति से प्राति को प्रथम देखने के ये लोग पम्यासी हो गए हैं। सोचने की यह प्रणानी हमारे चारों और एक ऐमी मुब पोर मभेष दिवार बना देती है कि रिसको पोकर प्रत्येक सत्य को हरमों तक पहुंच पाने में पोर पोर विकट सर्प करना पड़ता है। पापों मे इस देश में पमनाती पुनपुनावी नदियां हरे हरे पूरित सी मबममी पाटियो विधान मैराम हिम को व पार मो हिमानप के पगममी शिखर, फम नों से नई पृल मार-मपुर मा हाते पपीते। मुगमता से इस बातावरण में पुनमित्त गए । मूर्य को तीची पूप से बचने के लिए हरे-हरे पत्तों बासी टहनियों न उनको अपनी पोर स्थान दिया और तब मामी प्रोपियों से उनकी रमा करके अपने कोमाम पिकने पोर नर्म भारत में पर री। एनो पपुों को सस्प, सामना परापाहें पौर म-मून कहे करले मिले। पर्मों की प्रमिको प्रगतित रखने के लिए सपिबा पौर मड़ियां मिमी रहने वास्तै हुटिपामों को बनाने का सामान मिला। इन पनेक मुरितामों कारण पार्य निर्मय होकर प्राम-पाम में अपने बमपर बना कर एने भने । इस प्रकार हमारी भारतीय सम्यता पौर ससति का उश्य पौर विकास मुमे यनों में प्रा। विस्तृत में सम्म बिकास पाने के कारण हमारी सम्पदा भोर संसति का पण निवरा पोर उपमें एक महामठा पोर रिपेवता मा गई । प्रारी पनि से हमें बीपन मिसा प्रतिमा माता बनी रसकी पोर में ही हमें प्रेरणा मिमी और हम पसे । हमारी सम्मका पार ससहति पर प्राति की महरी साप स्पष्ट दिखाई देती है। प्राति मा से हमने सोचा है कि सरप की कोई सीमाएँ नही समस्त ससार सस्प की सीमा भार।
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सनातन सत्य यह एक ऐतिहासिक तम है कि पूनान पौर मिन को प्राचीन सम्पार्थों की समावि किमोदी पिा में हुई। पारसी यूपीप सम्पदा ने भो परपरी भौर ईटों के सस नुर- परे पौर बदमातावरण में और दोने और युवा हुई। संसार के समस्त रापनि कामत है कि बातावरण को पहरी पार भमिट पाप मारिणयों पर प्रपत्य पाती है । मत मनान, मिस मोर मुगपीय सम्यता परपोर उस सभ्यता में यम्म मेने अपना पनने वार्मा के पाचार विचार, एन सहन मन पौर युधि पर उन सस सिरों और पपरीसी बिमा बन्दियों का महरा प्रभार पहा । पर इस सम्पदामों पार इनका अनुकरण करने वालों क चिन्तन का अंग नरम रहबर संकीर्ण हो गया । जिस प्रकार विहीं में दिगार होती है ससो प्रकार पूसरे लोगों में मी प्रमपार की प्रति। एक पर सरे राष्ट्र को एक मान से दूसरे शाम को पारम्पत्ति में प्रकृति को पनप रेसने रेमोम प्रम्यासी हो गए हैं। मोरने को यह प्रणानी हमारे पार एक ऐमी मुरु पौर प्रमेश रिकार बना देती है जिसको पोरकर प्रत्येक सरप को हरयों तक पहुंच पाने में पोर पोर विकट संपर्प करना पड़ा। पायों ने इस रेस में बतलाठी पुनगुनावी नदियाँ हरे हरे पूरन से रडी मखमली पाटिया निपात मरान हिम की रेत पार पोरे हिमालय के गनमी छिपर, फत- गों से मरे म मपुर-पपुर पाठे हाहावे परी देवे। ये सुगमता से इस बातावरण में पुनमित पए । मूर्य की तीखी धूप से पपने लिए हरे-हरे पापामी टहनियों ने उनको अपनी पोर में स्थान दिया पार तीच तुफानी पापियों से उनकी रक्षा पर मरने कोमत पिन पौर कर्म पाचन में परम । उनले पशुओं को सस्प, पापमा परापा और स-मन से परने मिने। यशों की प्रति को प्रममित रहने के लिए समिमा पोर मीया मिती पने के वास्ते दुटिमामाको नाने का सामान मिसा । इन भनेक मुविधाओं केपारण पार्य निमय होकर ग्राम पाम में अपने गमपर बना कर पने नए। इस प्रकार हमारी भारतीय सम्पदा और समाधि का व पोर रिससुरेनों में हमा । विस्तृत क्षेत्र में पम्म विकास पाने के कारण हमारी सन्नवा मोर मसतिका बाप निवप मोर उसमें एक महानता पार विपना मा पई। प्राति मे हुए बापत से हमें पौरन मिसा प्राति हमारी पाठा बनी उसरी मोर में ही हमें प्रेज मिमी और हम पते। हमारी सम्पता पौर संसति पर प्रकृति की पारी धर सर रिवाई की है। मत मां में हमने सोचा है कि सरस की कोई बीमाएं नहीं समा पार सभी सीमा मीवर समय बीवता पमा गया युस पलटवे पमे गए, इतिहास रपटें मेवा सा गया पौर गगा का मासों मम पन बहकर समुद्र के पर्भ में मीम हो गया। यह माया पती पहनहाते पेत बन पई पोर उपम पनों । मैदानों का स पार दिया। सामाग्य चमे पौर विमरे सम्राट् पाए और समय भर में गिनीम हो मए । तर प्रासाप बने पौर रेत के पदों की भांति बैठ गए, परन्तु परमहलों में रहने बामे काका पापमेष पार पर मुप यज्ञ करने माने महा प्रतापी पौर पत्तियासी समार भी मास-फस की कुटियामों में रहने पामे पौर ममम मात्र भरवा मृग धर्म धारण करमे पामे, मूसी हरियों मार देब गै 'इए निर्मन मैचों मामे अपियों के सामने नतमस्तक होकर समकी परण भूमि मपने माम पर भरापूर्वक मयावे थे। उनके उपदेसामृत को पीकर अपना मोर प्रमाकाकस्पाय करते थे । अपिरों ने प्राति मोर पोर को एक पिम्पु पर मित करणे अमरत्व प्राप्त कर सिया पा। उनके मतानुसार प्रति पौर बीप एक पिप के पास है। रोनों ही एक महान् सत्य के प्रग है। बीव पौर प्रकृति में पास मेख की भावना पाही करना मातीम दार्गनिकों का प्प हा है। भारत में महारमा विकी पौर बीर सभी प्रकार के पति हए पो-बड़े राजनीतिम महाराज और समाद भी हुए है। परन्तु इन सब बा २ प्रतिनिधि सरंप इपि ही हए । "सप्राप्येनं स्पयो शाम तृप्ता कतारमनो वीतरामा प्रशान्ता स्वर्ग सर्वत प्राप्य पोरा युक्तमना सर्वमेवावियन्ति ।' यह शानी बिहे मान रा मात्मा की अनुभूति हई बी पोर इस प्रकार यह तत्व पी बन गए थे। प्रारमा में उसकी सम्भावना बानकर अपने पम्त स्प 'स्म" में मिनि पूर्ण समता स्थिर करमी पी । उपपिपरों की शिक्षा का मही इस्प है कि विपारमा को पाने के लिए समतों में पारमवत् एष्टि रखो। संसार की प्रत्येक पस्तु म रिप भावना से ही उपनियर मारन हो। ईशावास्यमिदं सब यस्किचित् गगरा जगत् । सेन त्यकेन भुखीषा मा गृपा कस्य स्पियनम् ।।' इस पमापमान बंगार में पोपुष बनता हमा है यह सर पर से पामारित है। पसमिए स्पाम मार ये पोप करो और सिपी मी पन का नासप मा करो। पराग कहकर पुको नमस्कार करमा कि मैं समता को प्रणाम करवायो पम्मि मोर बम में है जिससे सब परापर बिलम्पाटो पोपपियों पर बमस्पतियों में है। यो देबोनी मोम्मु पो विश्वम्मुरममा मिय। यो प्रौपपीपु यो पनस्पति तस्मै देवाय ममो नमः ॥ हमारे निको भारत के रिणाम पम मीमाम्बरमाचे रारे होर समात संसार पाडेमाभिमोर हाप हे स्वागत किया। उन्होंने मानव की पाया को प्रतिमा 1-सोनार-1 पौर मनुष्य को सकीर्ण सीमामों से कमा ठकर विष को प्रारम भार से देखने का प्रमर संदेश रिमा। सारे विश्व से प्रेम करने की इस भावना ने इसलिए उनके मन में जन्म सिया क्योंकि इस महान देष की सस्कृति मे विधाम प्रकृति की पोद में मेरमोन पे। इस महाम् रेप में पहा-यहाँ पती अपियों ने प्रामम बनाए, महा-यहाँ प्रकृति मे सौरम बडेरा यहाँ यहाँ किसी पुप्पारमा ने परम दिया, महा-रही वीर्ष बनते पसे मए । भारत के पूर्वनों की महानता का एक प्रमाण उनके तीयों से मिलता है यो समस्त भारतवर्ष में सम मे हुए है । मनुष्य अपने मोगन वस्त्र की मात्रायता से भी मषिक प्रपनी मारिमक मुखको पान्त करने के लिए पीप पापा कता है। पीपों पर बाफर उसे मारमशान्ति का बह बन प्राप्त होता है जिसके सामने सांसारिक पन पौर रायों का कोई मूस्य नहीं। "मपि प्राग्यम् रान्यम् तृणमिव परिस्यन्य सहसा" एक पास के दिन की मांति राय का परित्याग करने बामे स्सामी इस देश में अनेकानेक हो गए हैं। जिस देश में सरस्वती बहती है प्रार्य पर्वतों की उबर-हारबरती को माप कर सतमुम को पार करके पर सरस्वती नदी के तट पर पनि यो पार्यों में पो मिटान और पारमी में नम्होंने ऐसा कि यह सरस्वती तट का स्थान रमणीक एवं मुन्दर है मनी बाया बाये फों से मरे मूल समूह मपुर पाल सुसे मैरान पोर पाम्त बातावरण । पुष्पों से की परवी नमते दिन की पाया में सरस्वती वट से टकराकर पाता हुपा उमाप माया हमा दमनों का मारक स्पर, रमते सूर्य का कोमम सुनहमा स्वप्निल मसार हरे मरे पूरित पर परतेए माँ की गरें सरस्वती के पास-मास पो भने वृक्षों की सीतप पाह में विमाम मेठी उनकी पाए माँ परतीको पिपने स्नेहरम से गीमी कर पाने कितिष पर मारावे मारतों के टुकरे। उपस्त्रियों के रहने के लिए यह स्थान उपयुक्त है ऐसा सोचकर मामार्य वापि सरस्वती वट पर दुरोष प्रदेस में प्रायम बनाकर सेमो पिष्यों के साप पहा एने नये पौर मीन तपा प्रकृति को एक संगम पर माने का प्रपल होने सपा । मेर-पत्रों की पनि पौर मों की सुपरष से सारा वायुमण मुबारित हो उठा ! को पार्य पुरस्मा में प्रवीण पेये बोबो साम्राम्पों की नींव रखने के लिए मिलकी पोरमा गए । परन्तु सामाग्य बनाकर भी मा पप्रार इन ऋपियों के पास मतों की रख देने के लिए प्रति वर्ष पुरोष भावे पे इसी प्रकार महसम्मा में बनसमुदाम सनके पास उपरेशामृत पान करने मावा पा पोर पीरे पीरे सरस्वती दर का यह देख पायम पुनीत पौर सति सपा सम्पता का प्रकाप केन्द्र बम गया । विश्व की सरमापनाों का मार्मिक स्थान होने के कारण इस प्रदेश का पारि माम सटिनियम्ता झा के नाम पर झापते पा" बनिमित नामापत प्रथमते" १२ कुरक्षेत्र उत्तरी भारत में रिक संस्कृति का कम मौर सहस्रों वर्ष तक भारत के पार्मिक पौर ससितिक सितिय पर चरम नमत्र पहा है। इस रेब भूमि प्रारम में प्रार्यसम्पता मे मेवबोमे पमी पौर परपान परि। मनुमहाम् में कहा है कि ससार समस्त मानव अपने परमाणार्य पुरक्षेत्र के नागरिकों के पद चिन्हों पर पौ। एतद्देशप्रसूतस्य सकासावन जमन । स्व स्वं चरित्र विशेरन्पृथिव्या सर्वमानवा ॥' कुरक्षेत्र की पवित्रता तपा महामना पनेक कारणों है। भोर पतपय बामण पारामि पनिपद, पुराण, धीममागमय, गीता महाभारत पोर मम्य धर्मशास्त्रों में इस भूमि को बमपरामस कहा है। प्रति सम्मृति अनुसार गुरमेन पापियों तथा बवाढे का निवास स्थान है । कुरक्षेत्र की वो प्राचीनता तथा पवित्रता मिन-मग्न गुगों में भिन्न ही ऐसी पाय पार्मिक स्थानों की मही रही । सहि के एपना काम से ही सर्व भतारो मपिर्यों पौर मुनियों का सम्माप पुरुष से रहा है। पुरुक्षेत्र में महपि पास मे पुराणों थीमागवत् तपा महामारत की रचना की पौर नापि पारिसमी ने मष्टाम्पायी मिती । दुरक्षेत्र के मेनों कितनी ही क्रान्तियां मार मितने ही परिवतन से हारक्षेत्र के कानों मे पियों का देखापम पमवान् पौरपण मुब से पीतामृत पौर भीष्म पितामह के पन्तिम उपदेश को उनके शान पोर यनुभव का नियोगका पान किया है। महारपी द्रोणाचार्य प्रन पार कर्ण सरीसे पोरामों के पनुप की टकार भोर गर्गना मुमी है। इसने सपाट कोहम अभिमन्यु को पस बमा निहाए और पाए भट्ट बसे प्रमर फपियों की भोरम पापा मुनी। पुम्सेत्र की भावी पर महाभारत युटमा भौर इसकी पोर में माप प्रदौहिणी सेमा-गोई। यहाँ का प्राधा महार प्रभाकर पर्पन के पदों पुए से कामा हमा पौर सम्राट हर्प पय पोपों से गूगा। बसीबसी नमाया पिम्हनि भारतीय हास का माग्प परम गवा मही पर सभी गई। यह मा प्रदेस है यह भारतवर्ष की प्रम्मता का पतन हुपा। हपणे कुशाणों पौर मुस्लमानों की तो उनकारों के पार पाग भी इसके भार परीर पर बने हैं। यहाँ इस पुनीत भूमि पर महारमा मुर पगदा एकाचार्य पोर पापरप के पर मरोर पा बही रिम्मीपति पृथ्वीपम चौहान की परागम भी। तेमूर से सहर पहपाशाह मगरातो वर पर पाक्रमणकारियों में रक्त से सनी उनकार इस पवित्र तीर्पोपम में पोई। पस में से सिप गुप इस सांसारिक तपा पार्मिक स्थान पर पपारे । यो धर्मनिहारिवानिया 'पर्म मेरे सपणे पा से पीता पाठ भास्म करते है। रोग का नाम मात्र ही एक समनिहरे हय में प्रसा, प्रेम तमा,पोरम का संचार करता है। इसी पुष्प स्पस पर देवासुर संग्राम के समय माप प्रयाहार्य महपि पीषिने अपनी परिष मानकारी दुपत्र मानब समार को ही सीमामों से पा सठाकर सिमे पारममावा प्रपर सरेस रिमा । प्रापिमन से पूर्व मराठी तर इ प्रदेश पर पारिवासियों की बस्तियों की। 1-मनुमतोय.1 पारो का इस परेम पर पा वाना पान्तिपूर्वक मही हुमा। माया मार मम निवासियों के संघर्ष का परिचय जमेर में देवों और मसुरों के पुत्र की प्रतिपनि के रूप में मिमता है। (म मादि वासियों को मार्य प्रापिy irua स कामे प्रमुए, पसि, पास मौर स्पु कहते थे। यह मोम की, पान, विम और मटर की खेती करते थे। दास के रामा पर पम्बर, पुप्प पिम् पंप, रग, पलंग पर बीमारों की बोवातिया सई प्रथम महा पाई पनि कहते ईप पु म, तुम मम मौर.माम और मै पुर में हार इमों (कामे प्रमु) मारे जाने का सलेबन्यिापारि बासी पारी से संबई के पाठ पूर्व पार दक्षिस में भार पर, यो पपए रहें विजेतामों मे दम मा राम या मार बना सिया । पार्म एका दिवोरास मे कृषि मयाब की सहा यता से पत परा पम्बर के साथ ४. पर्षों तक मुर किरा मौर विजयी हुमा । दिवोरास हस्सों का रागा रस्रे मारपी पुरो पौर तुरखों के साप भी पुर किया । रस समय पर पहले से निवास करने माने मार्यों के साथ पार्यो का समर्प पर हावा मिले कितिहासकार कतहकाम को है पारित में रिसा माम ममी गुरमेर नहीं पा पा, पति पाबमी सरस्वती के किनारे परख नाम की पार्य पाति का प्रदेस मा । भरता मवापी मावि या विसरप में देनों की सपा में श्रपि परमात करके विश्वामित्र नाम पारण किया। पि निवाभिम ने रार पर घोरकर समस्ती के वीर पर मामम स्थापित मिा बहा दीरे-धीरे सम्पूर्ण भागिर्व की विधा, वप पोर पार्य केनीभूत हो पए । पर पुष पनुविधा पार पररविधा सोच पे मार इस भाप्रम में प्रार्प तपा स्यु राणा और भूवार एकर हमा करणे पि रिमापित * पामो अमुपों में यह अपि नमामि भी महाँ भापम स्थापित किया। अपि पमणि मण मौर.ए.पाति के पुरोहिये। वापिस पम्प का समर्थन करने पामे मत मागिएषामित्रपपिप्रापि पनि पारपर्य में प्हकर पनेक मनों के दर्शन किए पार समोने अपनी औरणा से ही भरत कृत्यू पौर स्मों की सेनाओं को पूर्ण निरय शत भावामिन अपि होने के परवात पर सूर्य देवता सबर पार कर पति में कांति पर पुरे वर गरा रिपोरस समतोगविमारे। सुदास एक प्रवापी पगा के परमात सराका पुष एसटे भी प्ररिक प्रतापी हो ऐसा इतिहास में कमरेला पया है । दिवोदास पक्षाव सुपास उसका पक्षपषिकामा । सुवास न मम भोका था परम्पा विधान मी वा पौर उसने बहुत से बैंकों की टि भी की। बस में प्रतिष राणा मुरास नेतृत्सुमों के प्रतापी सिंहासन पर पासीन होते ही अपि विश्वामित्र को सपना पुरोहित बनाया। इपि विसापित्र मुरास को भी विजय प्रास (१) मा १८(0.00 करपाई । सोने भरत और तृत्सुपों का बम पड़ा। इसी काम में विश्वामित्र और गणित में दो विभारपायों की मार हा अपि विश्वामित्र पार्य पौर रस्सु र को दूर करने के लिए प्रयानधाम पे पार ऋषि इपिष्ठ मार्यों की पनाउन पुजि पौर पिया के प्रतिनिधि थे। इस समस्या को मेकर सरस्मती हट के इस प्ररेस में सम्मा समर्प पत्ता । मुरास ने इस संपर्प में ऋपि पिठ मत को यहस किया और बर ऋषि विस्वामिक राबा हरिचमा का पमकरवाने के लिए पए तो उसमे पपिठ को अपना पुरोहित बनाकर बस्सु रावा मेव के विश्व पुर पारम्भ कर रिया । द्वापर युग पारम्भ में ही प्रापिर्ती एग्य चपिठयों की सत्ताए गांगत होने लगी थी। किसी प्ररेप पर यहां के पना का प्रापिपरप एसके जप की मर्यादा पर म निर्भर कर पूणतया उसके अपने सामर्प पर ही निर्भर करता था। इसलिए किसी सामान पति के लिए इस काम में अपना सम्म विस्तार कर मेना मपेशाग्य पासान हो गया पा । इस मुसोय का भी समुचित माप सरस्वती वर पग सम्बय के पोर पोर विमोपास के पुत्र सुवास में सठामा । सुदास पाक्रमस करके कीमत की सीमा परे प्रदेश पर भरिकार पमा मिया । हस्तिनापुर के परिव राम्प पर भी उसने माक्रमण किया । उस समय यहाँ का राणा संबरस बा। मुदास ने इस पमोहिणी सेमा मेकर हस्तिनापुर पर माक्रमण किया पा'। संवरण को हस्तिनापुर बोहर माप पाना पड़ा । मुदास ने उसे यमुना के किनारे रोगरा परास्त किया । तब संपरस सिनी की भोर भाप गया । संवरण पुर पाति का राणा पा। पुरमों का वर्णन भी भामेर में ममों, पुरषो मोर पारों के साप पाया है। पुराणों का वृष्ण पौर परत बों के पाप निष्ट का सम्मान पा। यह भी धरस्वती पट पर पहवे सारे भारत में पुरा पया । एक पोर वरिष्ठ आए प्रेरित सुरास और दूसरी पोर विपनामिन ए प्रेरित रस एगामों में परस्पर पुर पिा मावा निसे पराम पुर कहा जाता है । स प्रगार्मों के के विकार एमा माधुनिक उत्तर प्रदेश पंगाम तपा परिचमोठा सीमा प्रवेप, परमामीन घासक पे । सुरास न इन सब रारापों को पम्प्णी (प्रपी) मरी तट पर एक्ट री । इस रिश्य से सुराम समृधि शिखर पर पहेगनमा और समस्त प्रायो पत में हापि अधिष्ठका पपरमार होने नपा । मुदास + पचात उसके उत्तराधिकारी उसका पुष ग्रहदेव और उसका पौर सोम पे । मुपास पर प्रपर परण में हमा है। इसलिए उसका काम ईसा से पूर्व पोरीसनी पताम्दी होना बान पाया है। पायर के इतिहास में रामायण काल परमार की दोपवामियों णसामने पपीरि पमपाएँ मे पाने वाली बी । उस काल में पप्ट्रीय बीवन कात की पति बनाए रखने के लिए कई प्रकार के महान् कार्य पूरे करने की प्रापरयता भी । हमारे लिए रम सुप में सरस्वती वट पुराण में वास करते पाना मरवर ही सब प्रामे माना। ण महामन्ट एमप मरठप सन्दे पर प्रकाशियामानिए १-नराम्पर भारतमा मों की कीति मी महान् बन पा । धाप ब्राह्मण में कहा गमा है कि भारत पंप बसी महानवा न तो पहले और न ही उन पवादही पोगों ने मास की है। ब्रह्मावत से कुरुक्षेत्र भब तक सरस्वती हर का यह प्रदेश यहाँ भारतवप का राम्य पा बहरत कहमाता पा ! परस्तु नापस का नाम परषा में कुरुक्षेत्र से हुपा। इसी कपा वामन पुराण पर मामाख में विचित्र प्रकार से पाती है। जैसा कि पीधे मिवा गा गुहा कि सुरामने पुरुषों के राससंगरण को पति मिया पा और बह मिग्मु की भोर भाग गया पा। प समय के परषाद रामा समरण ने माने सोए हुए राम्प को रोवारा प्राप्त किया। रामा संवरण की रानी तपती के पर्ने ऐ रामा पुरुका बग्म हुमा । पुराने पुराणों के माम को बहुत उम्मस किया । पर इतना तेजस्वी या कि उसके पापात् उसके पुर पंग का नाम कौरव पड़ गया। इसी कारण बस में प्राये पत्तकर कौरप भौर पास हुए। उस समय मृत्युपों से पुरुषों का नाम इस देश में प्रपिक मना । पुरमों के राजा सर्पदमन मे बिसका माम मरत भी पा सरस्वती तट पर यम दिए पे पौर प्ररने पम्प को सरस्वती से मंगा तट तक विस्तृत कर लिया था । महाभारत युद्ध से पूर्व पौर उसके पपवाद पुरस के रामा हो इस देश पर राग्य करते ये । पर रामा कुर वृस हुए तो उनके मन में विचार मामा कि इस नर संसार में सर्वश्रेष्ठ वस्तु कीवि है क्योंकि शास्त्रकारों में कहा है कि "दीतिर्यस्य स बीयति" गिसकी संसार में पद्यमापा होती है वह ही बीमित है। यह पोष कर मार ने समस्त पृथ्वी का प्रमण किया । उसके मन में केवल एक ही धम्न पी कि बह किस प्रकार ीति प्राप्त करे । भ्रमण करते-कणे ससमे रेत बन में प्रवेश किया । यहाँ पहुंचकर उसके दु:सिव हरय को धाति पिसी । उसने देखा कि पुम्प सधिमा पापमोचमी हरिपिता बम पुषी सरस्वती प्रपने प्रमाह से पापों का माध करती हुई पुष्प संचय कर रही है। उसके पुनीत तट पर करोड़ों पुष्प दी बने हैं। माहुर ने सरस्वती में स्नान को सिरोपासना की। यह यह स्थान पा वहाँ पुष्टि रचना के निमित बझा मे उत्तर सी में उपस्मा की पी पौर बिसे समम्त पय भी कह ।। इस बेदी का विस्तार पारों रिमामों में पांच-पार कोस मा । महाराव कुर ने निश्पय किया कि मैं इस पुप्प स्मद पर अपनी अभिसाप पूर्णर सकता कीति प्राप्त करने के लिए ऐसा मोम्प स्पान मार नहीं मिनेपा । राणा दुव महादेव का पम तपा वर्मपण का पाठक महिपा हन में पोत कर पृषी को बोतने सपा । राणा दुका यह सुकार्य रेष कर रेपयर इन्ट मे उससे पूछा कि 'पबम् यहाँ पर या पोत हे हो" गुरु मे उत्तर विमा कि 'आप सत्य ममा क्या १-रावाय बाप १५ ४१ महापरत रात पर्ष अप्पान ५५ लोप माल पुरापात अपेर मास तोह, मनुलवि मनावर सोष १५ मीममानता र ४ प्रभाव १५ स्योक।
खोर दान मोग मौर ब्रह्मचर्य पोत रहा है। इस मे पुन पूछा कि 'हे पगन् । यह बीच कहाँ से पाया ?" । पमा पुरमा । प्रताप योग संत नामक पीर प्रहण किया है।' इस बने पाने के पापात पा र प्रतिदिन सात-सात कोस इम पतामे ममे । उसका कर्म बार भयनान् विष्णु पहा माए और रामा कुर से पूषा कि "हे राजन् ! यह क्या करता है ? तर रामा हर मे पाप महापर्म प्राणायाम्, प्रत्याहार, पारणा म्यान और समाधि का वर्णन किया । भगवान् ने पूछा कि पप पीर कहाँ है? पार ने उत्तर दिया कि वह पीर मेरे परीर में स्थित है । भगवान् मे हा 'राजन् पीर तो हमें हम बोगे और पार हम घमामी। रामा गुदरी प्रपनी रक्षिस भुगा पसार दी । भगवान् मे अपने पक के बेम उस युग के सहल दुकने पर दिए। पुन राम ने बाम पुमा पसार री। भपमान मे पक्राह भी दुको एक कररी। फमा रायपुर के पंचाए पापे करमे पर, मगवान् , में भी काट दिया। पन्त में बन राणा ने अपना विर मी मर्पण कर दिया तो भगवान् विष्णु ने उसके मन को स्थिर पौर बुरिको निविकार रेवार मत्पम्त प्रसन्न होकर गया पुरुको वर मांगने के लिए कहा । पगाह में प्रार्थना की कि- यावदेव मया कृष्ट घमक्षेत्र तस्तु ब। स्नावा व मृदाना व महापुण्यफरिवह ।। उपवासघ दाम प स्नान गाप्प प मापन । होपयज्ञादिक चा पदुम वाम्पमं विमो । स्वरप्रसादारपिकेश प्रखपटगदापर। प्रक्षय प्रवरे क्षेने भवत्पर महाफलम् ।। तपा भवान् सुरे पाद समं दया भूमिना । पसाप पुण्डरीकादा मन्नामम्मलप्युत ॥' है मापी बिवनी दूर IF इस येर में मने हस पनाया है उतनी दूर तक यह पमोग हो पाए । यही मान करने वालों को महापुष्प फा मिने। पापकी पारो यहाँ उपपास ब दान, पप स्माम होम मोर पा से मुभ कार्य पौर भगुभ कर्म की माय हाँ । है पुगभाय ! पाप सर्व पापों परिव इस स्पाम में निवास करें। अपवान में उत्तर रिया पुरा ऐसा ही होगा । पन रागा की तपस्या के परषाद यह परेप समापन के स्थान पर रोष नाम से प्रतिपा। म दो और दृष्टिकोण पापन पुराग की इस सपा में पर्माप्रपोपमा हिमालीम पार्मिक साहित्य कापीती दी है पिर मारपीपा को समापने काबा भी हो सकता मन पुराण पाप समोसे.
कि महाराज कुन मे सरस्वती वट पर मोर तपस्या की । वपस्पा के समप पर भगवान ने र से पूछा कि यह तपस्या क्यों कर रहे हो ? यो कुह नै रत्तर दिया कि पोप के पाठ भों पर बर पाने के लिए । भगवान् मे पर यह पूछा कि यह कहाँ है ? हममे रप्तर दिया कि मेरे पीर में पार नसने विकट तपस्या करके अपनी राहिली, बाई मुगाएं मोर पपाएं मुबारी । पम्त में महारारा मे सिर कर मोरा प्राप्त किया। पोंकि पुराने इसी येष में तपस्पा की पी इसलिए उसके नाम पर इस प्रदेश का माम कुरुक्षेत्र हो गया। एकपात पौर भी हो सकती है कि महामारत और पुराणों के अनुसार कुरुको प्रतापी तमा तपस्वी पणा पे । ग्न प्रपने तप से पुत्र को पवित्र बनापा, दूसरे पों में उन्होंने ही पूर्व प्रथम पुत्र प्रदेश को पि पोम्प बनापा पा । पहले यहाँ मारी पयत पाकुर पर मे हम पखाकर इसे प्रश्न पैदा करने योग्य बनाया और इसीमिए इस प्रदेश का नाम बझारर्त से कुरुक्षेत्र हमामा गाने मया । मोपोनिक इष्टि से मौ कुरक्षेत्र पार्यावर्त का सबसे प्रति महत्वपूर्ण नाका है। यहाँ पर ही हमारे देश के भनेक माग्य निर्णायक पुरम गर । पश्चिम में सिंधु प्रणामी पूष में मपा प्रणामी तपा दक्षिण पप इन तीनों का अपम पुरुक्षेत्र में ही होता है। सारा इस मेष रुपि योग्य बना पिए पाने पर हमारे देश के एक किनारे से दूसरे छोर के बीच का यातायात माग रात मुरिमारना हो मया । भर या मार्म परम पोहे से साहसी मोगों के ही नहीं बलिया सामारण के लिए मी सुमम बन गए । इससे पारित के विभिन्न प्ररेणों के विभिन्न प्राति पाने मोगों का एकत्रित हो पाना मुगम हो गपा । पही भार्याम के बन समा एकीकरण पा उस समा उरकप की पोर पप्रसर होने की पुनिपार बमी रामाराका मा महान् कार्य एक ऐसे काम में हमा पर इसकी हमारे देश की तम्मति के लिए नितान्त पारस्पषता पी। हमके इस कार्य में हम पराक्रम मा तपस्या का वास्तव में ही प्रमुख रंग का समावेश हो गया देखो। उस तपस्या तपा पराक्रम केही परिणाम स्वम सरस्वती से पश्चिम से कर पौषात तपा प्रयास के परे वा बेगम प्रदेस ही एक प्रारम में नही पापए, बस्कि उन मार सीमामों के निपाधी अपनी प्रापस की गहरी एकता पनुमब करने मग गए । पुष । महान कार्य पाएम्म किया, समके परिणाम हमें प्रपति की रिमा में बहुत दूर कीच मे पाने बामे हए । इसी कारण इस सरस्वती पौर सपश्वी के बीच के देश का नाम पुरु- मेरमा । महामाख में दिए गए स्मोकों से मर की बात पर स्पष्ट हो जाती महाँ इस प्रवेश को कुरक्षेपकाकर कुम्परागत प्रदेश कहा पया है। प्राजमीठो महायमहुमिमूरिदक्षिण। तठ संवरणाद सौरी तपती सुपुर्व कुषम् ।। राजस्पे प्रमा सर्वा मर्मज्ञ इति यदिरे। सस्म माम्नार्भािवस्पाते पिम्पो कुरुवाजसम् ।।
- पीप, रान, मोग मौर बापय योत पहा हूँ।मने पुन पूषा कि हे परम् ! यह बीग पहा से पाया " | राणा कुरु ने कहा प्रपि योर संभक नामक पीर पहप पिया पाने के पपाद रारा र प्रविधिन सात-सात होस हस बनाने मने। उसका कर्म रेपर ममपान् विष्णु यहाँ माए पोर रागा पुरा से पूषा कि 'हे रामन् । यह क्या रखा है ? तर रागापुर में प्रवृमि महापम प्राणायाम् प्रत्याहार, धारणा प्पान मोर समापि का वर्णन किया । मपपान में पूछा कि मप बह पीय कहाँ है ! एमा ने उपर दिया किपरबीन मेरे घर में स्पित है। भगवान ने कहा 'एमन् वीर तो हमें से हम बोयरे पोर माप इस पसायो ।" पगा पुर में अपनी पिए भुगा पसार वी। मगवान् से पाने पक के बेग रस मुगा रे सहम एकोपर रिए । पुरा रागाने बार मुग पसार । पपवान् ने पर वारा यह भी एनोकर। क्रमा राम पुरा पाए भागे करने पर, भगवान् + रहें भी कार दिया। पम्त में या राना में पपना सिर भी मर्पण कर दिया तो भगवान् विष्णु मे रसके मन को स्पिर पौर दुधि को निरिकार रेसा, मत्पर प्रसन्न होकर परा परमो पर मापने के लिए कहा। रागार प्रार्थना की- यापदेठ मया प्टि पर्मक्षेत्र सदस्तु । स्नातानो प मृतानां च महापुण्यफलरिवह ।। उपवासएष दान स्नान गाप्प प माषष । होमयमादिकं पाम्यम्सुम पाऽप्यम विमो ।। स्परप्रसादाबपिफेश शंखचक्रगदापर। मक्षयं प्रबरे क्षेत्रे भवत्वा महाफलम् ॥ सपा भवान् सुर. सादं सम देवेन भूमिना । वसात्र पुगरीकाक्ष मम्मामम्पक्षरेऽच्युत।।' हे मापन 1 सिवनी दरक इस वेष में मैंने हम पमाया है उनी दूर तक या पर्मक्षेत्र हो पाए । यहाँ स्नान करने पानीको महापुण्य फम मिले। मापकी पा से यहाँ उपमास प्रत पान बप नाम होम पोर मासे पुम कार्य पार पाम कर भी प्रथम हो। पुरीकास ! प्राप सर्व देववामों सहित इस स्थान में निवास करें। भगवान ने उत्तर दिया कि हेर । ऐसा ही होगा । प्रत एबा गुरु की तपस्या के पश्चात या प्ररेप बझाप के स्थान पर रौत्र के माम से प्रसिटमा। . दो और दृष्टिकोण वामन पुराण को इस कमा में पर्मकारों का प्रयोग सा शिप्राचीन पार्मिक साहिक कास्की पनी पी पिक है। पर की कथा को समझने का यह भी हो पाया -अमन स्पसप्रबार १५सोन!
१० है कि महारार पुराने सरस्वती वट पर मोर तपस्या की । वपस्या के समय पर भगवान ने कुर पूषा कि मह तपस्पा क्यों कर रहे हो ? तो कुराले उत्तर दिया कि योग के पाठ मयों पर पय पाने के लिए । मगवान् ने पर यह पूषा कि यह कहाँ है ? पुराने रत्तर रिया कि मेरे परीर में और ससने विकट तपस्या करणे मपनी पाहिमी, भाई मुबाएं पार पाएं मुखापरी । अन्त में महारार हुद मे सिर देकर मोक्ष प्राप्त किया। पोंकि कुरु मे इसी क्षेत्र में तपस्या की पी इसलिए उसके नाम पर इस प्रदेश का माम कुरक्षेत्र हो पपा । एक बात मौर मी हो सकती है कि महाभारत पार पुगी के अनुसार कुरुको प्रतापी तपा तपस्वी या पे । नम्होंने अपने तप से फुरक्षेत्र को पवित्र बनाया, पूसरे सदों में उन्हेंनि ही सर्व प्रपम कुरक्षेत्र प्रदेश को पि योग्य बनाया पा । पहले यही मारी पक्ष पा । पुरमा मे इस पसाकर इसे पम्न पंदा करने योग्य बनाया और इसीलिए इस प्ररेध का नाम समावर्त से पुरुक्षेत्र कामाया बाने लगा । भौगोलिक दृष्टि से भी कुरुक्षेत्र भार्यावर्त का सबसे पषिक महत्वपूर्ण मात्र है। यहां पर से हमारे देश के अनेक भाग्य निर्णायक पुरमा गए । पश्चिम में सिंधु प्रणाप्ती पूर्व में ममा प्रणाली सपा दक्षिण पप इन तीनों का सपम कुरुक्षेत्र में ही होता है। कुर द्वारा इस क्षेत्र के कपि मोम्म बना दिए जाने पर हमारे देस के एक किनारे से दूसरे छोर के बीच का यातायात मा बहुत मुरिषावना हो मया । पर यह मार्ग केबस पोड़े से साहसी सोों ही नहीं रसिया साधारण लिए भी सुपम बन मए । इससे पार्यावविभिन्न प्रदेशों के विभिन्न प्रकृति पाने सोमों का एकषित हो पाना सुपम हो पया । यही पारिबन समूह एकीकरण पा उस धमा के पतर्प की पोर प्रप्रसर होने की पुनिपार पनी । रामा पुरका मा महान् कार्य एक ऐसे पास में हुमा पर इसकी हमारे देश की रणति के लिए मितात मावस्यकता पी। उनके इस कार्य में हम पराक्रम मा तपस्या का वास्तव में ही परमत रंग का समावेस हो गया प। उस तपस्या तपा पराक्रम केही परिणाम सम्म सरस्मती से परिचम से मेकर पाशाम पा प्रयास में परेवा मम प्रवेप ही एक पापा 4 महीं पानए, गरिक उम मार सामानों के निवासी पपनी पापस की पारी एक्सा अनुभव करने चग पए । कुर ने बो महान कार्य प्रारम्भ किया उसके परिणाम हमें प्रगति की रिसा में बहुत दूर तक बीच बामे पामे हुए । इसी कारण इस सरस्वती पौर पाती के बीच रेस का नाम पर भेग मा । महामाय में दिए गए स्नो पे मर को मात मोर सप्ट हो जाती है यहाँ इस प्ररेट को दुम्मेलन काकर कुरमाङ्गत प्ररेप कहा गया है। पायमीठो महापमहुभिमूरिदक्षिण। तत संपरणार सौरी पठी सुपुवे कुरुम् ।। राजले प्रमा सर्वा भमेश इति यतिरे। तस्य नाम्नामिविस्पातं पृषि पुरुमागसम् ।।
कुरो स तपसा पुर्य पके महातपाः । अश्वपतममिप्यन्तं तपा पत्रर मुमिम् ।' इसके पनन्तर मगवान् मूर्येरेव की काया वपती ने राजा संवरण के वीर्य से एस पुरा को रसम्म लिया। परन् ! पुगको पर्मग एममार सब उनका पापय मे पे दी के नाम से पृप्पी में कुम्माजन वेप प्रसिइमा पौर इसी महा तपस्वी रागा ने अपनी कठोर तपस्या से पुरावे को पुष्प व पुनीत बनाया। महाराणा कुरु मे पुरुमों के माम को मार रायस किया पर इतना तेजस्वी पाकि उसके पापाद इस ए का नाम कौरप पर गया इसी कारर में प्रामे पाकर कौरव पौर पापबहए। समन्तक पंठचक और परशुराम प्रेताद्वापरयो सम्पी राम शस्त्रमूखो वर.। प्रसकर यापिर्व दार्म मपानामर्षमोदितः ।। स सर्व क्षत्रमुत्साच स्ववीर्येणानलपति। समन्वपके पख पकार रीषिरान् रुपान् ॥ स पेप रुपिराम्मसु हवेपु कोपमून्धित । पितृन सन्तर्पयामास रुधिरेणेति म घुप्तम् ।। अप कादयोऽम्मेत्य पितरो राममा पन्। राम राम महामागा प्रीताः स्म तव मार्गय ।। ममया पितृमस्तया प बिहमेण तव प्रभो। वर पणीष्व भन ते ममिग्धसि यशः महायुते ॥ एवमुक्तस्तु पितृमी राम प्रभवो पर ।' मेवा मोर वापर के विकास में पस्त्रपारियों में पेठ भी परम्प प्रम मै अपने पिता कृषि समरनिय होने पर शोव में पाकर पृथ्वी पासी अनियों का बार-बार पहार किया और पाच गावाब उनके रक्त से भरकर पसी पत से अपने पितरों का पस किया । ऐसा हमने परम्परा से मुना है। वर्ष के पमप मए कपक पौर प्रमाणि पारि एनके पितरों में पम पास प्राकर पाई पम महापाम हम तुम से प्रसम्न है और तुम्हारी पियू भक्ति से पतुष्टम पर मापो परतुण्म पी में सत्तर रिया- यदि मे पितरः प्रीता पचमुप्राइसा मपि । पम्प रोपामिभूवेन समुत्सादित मया ।। (१) माम..म बोष () महापामाथि बोक -
प्रताप पापा मुध्येऽहमेप मे प्रापियो ।
हदारक तीर्प भूता मे भवेयुमुवि विश्रुता ॥
भविप्पतीत्येव पितरस्तमपान वन।
व क्षमस्येति निपि पिधुस्तत स विरराम ह॥
तेपो समीपे यो देयो हदाना रुभियम्भसाम् ।
समन्सपत्रक मिति पुण्य तत् परिकोर्तितम् ॥
पेन सिङ्गने यो देशो मुक्त समुपसक्ष्यते ।
वेनैव नाम्ना त देश पाध्यमाहर्मनोपिण' ॥'
परि मेरे पिदमण मुझ पर प्रसन्न हो मुझे मह पर कि कोमय मन यो मत्रियों
काहार किया है इस पाप से म मुक्त हो पाई मौर इन परिहामारों में स्नान
रान पूजनादि से प्राणियों के समस्त पाप नप्ट हो । पिव मे का ऐसा ही हो।"पुरक्षेत्र
के नहीं पिर पूर्ण परिवारों को समम्त पंक कहते है।
पुपों के परा दुप्पत के प्रवापी पुत्र पदमन ने सरस्वती तट पर यह किए।
सामनपात या पिनेता और सम्राट पारिसको भरत भी कहा जाता है। सर्वदमन
मरत मे अपने राज्यको सरस्वती पौर पंपापी प्रदेश में स्पापित किया पा ।
१५ कुरुक्षेत्र स उपसा पुर्य चक्रे महातपा। अश्वपतममिष्यन्त तथा पैर मुनिम्।' इसके मनम्तर मपवान् सूर्यदेव को कम्पा तपती ने पपा पवरण के वीर्य से पमा कर को सत्पन्न किया। परन् । कुराको पर्म सममार पर उनका प्राभय मेते थे, के नाम से पृप्पी में गुस्साजन देश प्रसित हुमा पौर इसी महा तपस्वी परा मे प्रपनी कठोर तपस्या से पुररोज को पुष्प व पुनीत पनामा । महाराणा कुप मे पुस्मों के माम को बहुत सरबत किया पासना वेगस्ती पाक उसके पापात गरेस का नाम कौर पर पपा इसी दौरख ग में पाये बनकर कौरव पौर पापा हुए। समन्तक पंचक और परशुराम प्रेताद्वापरयो सम्पी राम' वस्त्रमा वरः। मसकत यापिर्व क्ष पानामपंपोदितः ।। स सर्व क्षप्रमुत्साग्र स्ववीणानसपुतिः । समन्तपनके पक्ष पकार रोपिरान् वान् । स सेषु रुषिराम्म सु हदेपु कोषमुन्धिसः । पितृन् सन्तर्पयामास रधिरेणेति नः श्रुतम् ।। पप कादयोऽभ्येत्य पितरो राममा वम् । राम राम महामागा प्रीताः स्म सब भार्गव ।। मनया पितृमक्तया च विझमेण तब प्रभो। पर वणीप्य भद्र के पमिग्यसि यशः महायुते ॥ एवमुक्तस्तु पितृमी राम' प्रभवता परः ।' वा पौरापर के पंपिकास में स्पारियों में श्रेष्ठ भी मरम्य राम मेमपने पिता ऋपि बमरम्नि बप होने पर कोष में प्राकर पृप्पी बासी दात्रियों का बार-बार संहार किया पार पाच वासाय न रक्त परकर एसी रफ्त से पपने पिता का तर्पण किया । ऐसा हमने परम्परा से सुना है। वर्पण के समन गुपचीन पार नमामि प्रालि सन पिवर ने एम पाए पाकर माहे राम महामाप्प म तुम से प्रसन्न है पार तुमा पित पति से संतुष्ट तुम पर मांगो परनुपम श्री तर रिया- यदि मे पितर प्रीता पचनुग्रामता मपि । यन रोपामिभूवेन सपमुस्सावितं मया ।। (१) मापण .. म खोज से । (९) महायर प्राविक वोन
मतच पापामुग्यहमेप मे प्रापितो पर।
हदा सीप भूता मे भवेयुभु वि विश्रुता ॥
एवं भविष्यतीरयेव पितरस्समपान वन।
व क्षमस्वेठि निपि पिघुस्ततः स विरराम ह॥
तेपी समीपे यो देशो हदाना रथिराम्भसाम् ।
समन्तपना मिति पुष्प तत् परिकीर्तितम् ।।
पेन सिजन भो देयो मुक्त समुपसक्ष्यते ।
वेनैव माम्ना त दे बापमाहुर्मनोपिण ॥'
परि मेरे पितृगण मुझ पर प्रसम्न तो मुझे यह पर कि कोषषस मैंने बो क्षपियों
का संहार किया है इस पाप से में मुक्त हो पा पोर इन पार नामानों में स्मान,
गन, पूजनादि से प्रालियों के समस्त पाप मप्ट हो । पितरों ने कहा, ऐसा हो हो । कुरक्षेत्र
केसन्ही रपिर पूर्ण पाचवीपों को समम्त पंम्पक का है।
पुरमों के रामा दुप्पात प्रतापी पुष सर्वदमन ने सरस्वती वट पर पर किए।
परमन बात का विवा पौर सम्राट पा जिसको भरत भी कहा पाता है। पर्यवमन
परत मे पपने प्रग्य को सरस्वती और मंगारेममा प्रदेस में स्पापित किया पा ।
कुरुक्षेत्र में प्रसिद्ध वन और नदियाँ वामन पुराण के अनुसार पुरुष प्रदेश में सात बन पार मो नदियों का पर्सन- पय यु॥ पमानि सप्त मो ब्रूहि सप्त नपश्प का । तीर्थानि प समपाणि तीर्घस्मानफस तपा॥ सोमहर्पण उवार घृणु सप्त पनानीह कुरुक्षेत्रस्प मभ्यत । येपो नामानि पुष्पानि सब पाप हराणि ॥ काम्पर्क पवनं पुण्यं सपाऽदिति पनं महद । प्यासस्प पनं पुष्प फसकी वन मेग ॥ तपा सूर्य वम स्पाम सपा मभूपर्न महर । पुण्यशील पन माम सर्व करूमप माधनम् ॥ बनान्ये तामि वै सप्त मदीः मुगुत मे विण । सरस्वती मवी पुण्या तमा वैतरणी मरी ।। पापगा प महा पुण्या गंगा मम्दाकिनी मदी। मधुभवा पम्मु नदी कौशिकी पाप नापिनी।। हपढ़ती महापुण्या क्या हिरणपती मवी। वर्षाकाल पहा सर्वा पर्गमिस्वा सरस्वतीम् ।। एतासामुदई पुण्य प्रापट्काले प्रमीवितम् । रजस्वमास्वमेवासी वियते कदाचन ॥ वीर्यस्य च प्रभारेण पुष्पा टेवा पगिया ।' सात पम यह है। (१) पाम्पक पन (२) परिति धन, (१) प्यार पर (४) फार्म बन (५) सूर्प बन (१) मधुगन, (.) पीत बन । मी परियां या है। (१) सरस्वती (२) तरणी (१) पापपा (१) मन्दागिनी (३) मगुपया (१) अनुमती (1) कौशिकी (5) पाती (१) हिरप्पाती। इन मी नदियों में बन सरस्वती पभर बहती है।प पाठरियां पांच में पाने पानी।। (अमन पुण्य.सोसे।।
- सरस्वती नदी भनेवरे मनुसार सरस्पती अमर वीवपति मै पहले पाती मरी पौ। भमेरो भनेकानेक मानों में सरस्वती का सप्ट उम्मेष है। इसके तर पर पियों ही या मोर दूर हए । मनेक मंत्रों में सरस्वती की बड़ी ही दिम्य स्तुति की गई। हजेर २१६ में सरस्वती को मापस गरियों पौर रेस्तामों में महा पमा है। इससे मात्र होता है कि पार्यो की हष्टि में पंवा से भीगकर सरस्वती मरी दी। विय-संहिता ॥२४ अपर स्लिा met सत्तिरीय बाल Amers, मात्र अपास २१११ सापय महा बामण २१ मार १५ मिनीय बामण २२१. पोर ॥२.. ऐतरेय बापस ११ बापम बामस १२॥ पौर शतपय सामण १।११।१४ सादि में मी सरस्वती की बड़ी महिमा माईम मोप हवे है कि मावों में सि के लिए ही सरस्वती पम पाया है परन्तु इस विषय में कोई ठोस प्रमाण नहीं है। मैगनस पोर कोबरे मन से भी भोर में सरस्वती पन सर्वत्र इक में बहने वाली सरस्वती मिएही पाया है। "इपमदाद दिवोदास व यवाय सरस्वती"" इस परमती के सम्मान लिए रिमोबास को दिया। सति की सबसे पूर्व की अप्रिय नवी सरस्वती पपमी ममम बहिर्मों, मन्नुस, विपाप (म्पाय) पम्मी (पी) पसक्निी (अनार), वितता (बहनम) पौर सिन्प की उप हिमपमित स्रोत पानी सरानीरा नहीं पीपाड़ों और पर्मियों में परी बारा पत्यम्त कीण हो बाठी पी। पर प्रवामियों का मार्यों को अपने सीमान्त र स्थान पर स्टे पर्म का पसने पवसर दिया था, इसलिए पगाके प्रति ऐप क महिनों से भी किसे । पम्पो रसविनु' के पप्प में पी। पार्य मामतेरे इसको समरे पर महती रूपा है तो श्री सरस्वती का पिप्प पारने पे । सरप्लवी पूर्ण मोगन पर पमुमा एक विधान नदी पी पर मार्म उसे पानी नही कर एक रे। तुरंत रस्सु रसके तट पर परिकार र पे परि सरस्वती ने मन पौर घरण कर सहायता की होती वो पस्तुओं के सामने पापों और गरपावे। सरस्वती दट का प्रवेश पत्यन्त समृटमा। इसी भूमि की पाए पपिकापरेवो भी, महासमा मसि बसिष्ठ होते थे। परस्पती वट की भूमि हमारे परमों #. पापच परिर, विभीरत, हगि, पमापारि दो मोर संपु काप्ठ, एलो पारि ठूलों से सही भी हमारे स्वाभाविक मौर कृषिम पाणपों में पुस्बर पनियों में असते परिधाए सुपम्बित पौर सौरभर पाती थी। सरसठी बट निवासी भरत होगा अमित इम पोर पनि की रा में सरा सनम रहो रे। परन्तर मि पर यमा पणी, विसी प्राव सा परिषद में प्रवेश पाताया। प्रातः पपरा साकाम को पवि स पामों में कोर पहुंच पाठा तो प्रत्येक पर से हवा का पुम पाकार में रिपाई पावा उसकी तुमन्य मन को तृप्त करती, कानों में पावत्री रपन्चर या दूसरे साप कमपुर सर मुनाई देते। महो पर्ण सरस्वती प्रपेठ पति के तुना थियो विश्वा विराति । सरस्वती बमस पत्पम्त देन युक्त पाप नापिका । मपने प्रवाह से पुप्पों के रस में चेतना पति का पार करती है। इससे सर्व प्रकार की यम युरियों का सर्वतोगामी विकास होता। मम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वती। प्रप्रसस्ता इवस्मसि प्रयस्तिम्ब म रुपि।' मावामों ने पेठ, भरियों में पेड रेवियों में म सरसस्ती हम दो पमपर्म के कमुपित पापों के प्रति पौर होनीन हो गए है। हे मात हम सब को पुष्प प्रपन से निप्पाप ला रो मौर बन सम्पत्ति पीकरवीनता होमवा चामो। हमें दीपिका पापन बना दो। पञ्षे मप सरस्वतीमपि यन्ति सस्मीतस। सरस्वती तु पम्मषासो देशेऽभवत्सरित् ॥' पांच माविमा भरस्वती में प्रनीष हो पाती ।योंकि परा प्रवाह सरस्वती के समान हो पुष्प पुमीत और रमहीम है। परमवी ही सर्व पाों नदिया होगा। पपमा उन समी का नाम ही सरस्वती है। घा भागीरथी गंगा पिंगता यमुना मदी। तयोर्मध्यगता माली सुपुमणास्मा सरस्वती।' रशिए माम में एक नाड़ी पंना है । वाम भाग में पिपना नाही यमुना मानी है। इस सोनों प्रशान नादियों के मप्प सम्मान पममा नाडी मुपुम्णा ही पेवना माहिती मी सरस्वती है। मक्षवृक्षारसमुन्नता सरिष्ठा सनातनी । सर्वपापक्षयकरी स्मरणादपि नित्यश्च ॥ प्रतीव सृष्णमा मुक्तः सरस्वत्यो ममग्रह । सन सप्मुख देहस्तु विमुक्तः सर्व पातक॥ सरस्वती समासाच पत्पि सारस्म पु मोकेषु मोरते नात्र संशया ॥ पूर्वप्रवाहे या स्नातिगङ्गा स्नानफस समेत् । प्रबाहे दक्षिणे तस्मा मर्म सरिता परा॥ देवता । । (मेर परिणाम ... स. ६॥ रचना सविध 01 (२) बमोरिया IRI ( ORA (को-पोष प्रत्र ।
२३ स्नात्वा पुदिमवाप्नोति पत्र प्राची सरस्वती। देव मार्ग प्रतिष्ठाय देव मार्गेण निःसृताः ' सिवन के भूम से निम्मी हुई नित्य पण्य सरस्वती के स्मरस करमे से सर्व पाप पाए हो बाते हैं। दो तृप्सा ममा प्यास में परस्पती में स्नान करे, उसके समस्त पाप पूर हो पाते हैं। सरस्वती पर देववारों और पितरों को स्वाहा स्वपा से तृप्त करने मासा ममुप्प मृत्यु परषाद सरस्वती मोर को प्राण होगा। इसमें सम्मोह नहीं है । परस्त्री के पूर्व प्रवाह में स्नान करने वाला मनुष्य मेगा स्माय का फल पाता है। मो ममुप्प सरस्वती रमित प्रवाह में स्नान करता है उसे नर्मदा नाम का प्रा मिलता है। पो प्राणी पुर मन पापी सरसठी में समान कामह रेश्मा को प्राप्त होता है। हरापती मदी तात्सर्व दीपांधिवासिनी । यमुना देविका काप्ती बद्रमाणा सरस्पती॥' दरारती यमुना, कापी, माणा पौर सरस्वती मदिया सम्पूर्ण ठीपों में रहने मामी है। मेव माव करिप्पन्ति प्राभी माधिस्य मानवा। म वेपो दुर्मम किदिह मोके परम छ । मरमाणपणो देवी ब्रह्मा स्माणु सदा रपि । प्रापी देवा निपेवन्ते स ब्रह्मपि सवा सवा॥ वस्मात्प्रापी सदा सेम्पा पम्पम्यो तु विशेषत । पञ्चम्या सेवमानस्तु सक्ष्मीवान् भनिता म॥ प्रियन मे करिप्पम्ति शीं प्राप्य सरस्वतीम् । न सेपो दुपात किश्चिदेहमा यिस्य तिष्ठति ॥ देवमार्ग प्रतिष्ठा पदेन मार्गेण निर्गमता । प्रापी सरस्वती पुण्या मपि दुफ्त कर्मिणाम् ।' बोअनुप्प प्राची सरस्रतीके वर पर भार करणे, सनोमिए हनोइ मौर पर मोर मच मी दुर्मम नहीं होना नर नारायण मा, मि, सूर्य प्रारपियों के साथ इमारिया श्री प्राची परवती की सेवा करते है। प्रत प्रारी सरस्वती भरा सबनीया है। पम्पमी तिथि में दो उसकी सेवा का महारम्प पर भी उत्तम है । पम्पमी को सम्पती की पा करने माता लवान होता है। जो मनुष्य शापी सी में निर्माण अपना कब पापमप हो पाए । प्राची सरसती देवमार्ग से निकलती है पौर रेश्माई में ही प्रतिपिठ है। तौर पसबीर सरस्वत्यास्सटे स्पित । तस्य मान ब्रह्ममर्म भविष्पवि न संशय ।। बो मनुष्य सरसती तर पर निररता है उसको बझहार प्राप्त हो पाता है सम्बरमहा है। पापस्योग मे १९१ (कमाल रुप () महामारस। (४) समन व मासोर ११ २२ सायंकाम को यदि ल पामों में कोर पर पाया यो प्ररपेड़ पर से हार का पूम भाकाम में दिखाई पावा, उसकी मुपम्प मन को दस करती कानों में गायत्री रपम्बर मा दुखरे साम मपुर सर सुनाई। महो मण सरस्वती प्रवेत यति के सुना मिपो विश्वा वि राति। सरसती पसम्म प्रत्यन्त देग मुक्त पाप नारिका । भपने प्रकार से पुरुषों के इस में वना पति का पार करती है। इससे सर्व प्रकार की तम एसियों परवामी विकास होता है। मम्बिठमे मवोठमे देवितमे सरस्पती। मप्रसस्ता इयस्मसि प्रशस्तिपम रुपि॥' मातापी - मेष्ठ नदियों में भेट रियों में 48 परस्पती, हम मो समपर्म से कनुपित पापों पूरित मार हीन दीन हो गए है। माग हम सब को पुष्प प्रमान से निमाप बना से पार पन सम्पत्ति भी कर रीनवा होनता से पचामो। हमे पति का मानन पना रो। पन्चे नय सरस्वतीमपि यन्ति सस्त्रोतसः । सरस्पती तु पञ्चपासो देशेऽभवत्सरिद ।' पाचनरियां सरस्वती में प्रवीन हो पाती है क्योंकि उनका प्रवाह सरस्पती पमान ही पुम्प पुनीत पौर रमणीय है। सरस्वती ही स्वयं पानों मरिया हो गई है अपना रन सभी का नाम ही सरस्वती है। घड़ा भामीरपी गगा पिंगसा यमुना नदी। तयोर्मध्यगता माड़ी सुपुम्णास्मा सरस्वती।" वमिस भाग में नाड़ी पेना है।वाम भाग में पिपना नाही यमुना मझ मरी है। रोनों प्रधान माहिमों के मम्प पयस नमना नाड़ी सुपुम्सा ही वना पाहिनी देवी सरस्वती है। प्मवृक्षारसमुद्रता सरिपृष्ठा समातमी। सर्वपापक्षयकरी स्मरणादपि नित्य ॥ पवीप तृष्णया युक्तः सरस्वत्यो ममबह । वर संप्मुत वहस्तु विमुक्त. सर्व पातक॥ सरस्वती समासाप सर्पपेत्यूि पेवता । सारस वेषु तोकेषु मोदते नात्र संशया ॥ पूर्वप्रवाहे या स्नातिगङ्गा स्मानफर्म मभेत् । प्रवाहे पक्षिणे तस्या मर्मदा परिता परा ॥ (१) परसराम ११.६१बर सविध ५० (२) र खोज un (परिण II (Mमोम-मोष व्रत।
२२ स्मास्वा पुदिमवाप्नोति यत्र प्रापी सरस्वती। देव माग प्रतिष्ठाय देव मार्गरण नि मृताः ।।' दिनवन के मूत से निकली हुई नित्य परीरा सरस्वती के स्मरण करने से सर्व पाप माए हो बावे ।। यो तृप्सा भरमा प्यास में सरस्वती में स्नान करे उसके समस्त पाप दूर हो पाते हैं। परस्वती पर देवताओं और पितरों को स्वाहा, सपा से तृप्त करने वासा मनुप्य मृत्यु पापात् सरस्वती मोड को प्राप्त होता है। इसमें सम्मेह नहीं है। सरसवोके पूष प्रवाह में स्नान करने माता मनुष्य गंगा स्नान का फल पाता है। मो मनुष्य सरस्वती के दक्षिण-प्रवाह में स्नान करता है उसे नर्मदा स्नान का पत मिकता है। यो प्राणी पुर मन मापी सरस्वती में स्नान करता है पहलमा को प्राप्त होती है। इरावती नदी तत्सर्व तीर्याषिवासिनी । यमुना देविका कासी पद्रभागा सरस्वती ।' रामती, यमुना काती, ममापा पौर सरस्वती नदियां सम्पूर्ण पीपों में रहने वाली है। येतु पार करिष्यन्ति प्रापी माथित्य माना। म सेर्पा दुर्मम कियादिह मोके परन । नरनारायणो देवी ब्रह्मा स्पाणु सदा रवि । प्राची देवा निपेवन्ते स ब्रह्मपि सवा सवा ।। सस्मात्प्राची सदा सेय्या पम्पम्या तु पिचेपत । पञ्चम्या सेवमानस्तु मक्ष्मीवान् भरिसा नर.॥ नियत्रं ये करिप्पन्ति प्रार्थी प्राप्प सरस्वतीम् । न वेपो दुफा निश्चिदेहमा थिप विप्ठति ॥ देवमार्ग प्रतिष्ठा प देव मार्गरण मिर्गमता । प्रापी सरस्वती पुप्या पपि युक्त कर्मिणाम् ॥' यो मनुप्प प्रापी सरस्वती के तट पर पार करपे उनो मिए हमोक पौर पर मो में पुष भी धर्मग नहीं होगा। नर माण्पण, पा, पिन सूर्य पार बदपियों के साप हमार सहित रेखा मी प्रापी परस्पती को घेवा करते हैं। मत प्रापी सरस्वती सदा सेबनीया है। पम्पमी तिपि में तो इसकी सेना का महारम्प पोर मी उत्तम है। पम्पमीको परस्वती की सैना करने माता बनवान होता है। पो मनुष्य प्रापी मराठी में पिर उपमाप्त कर उनके पाप नष्ट हो पाए पै । प्राची परस्पती रेखमा से मिलती है मौर समार्ग में ही प्रतिष्ठित है। तव प सबीर सरस्वत्यास्तटे स्पित। ठस्य शान ब्रह्ममयं भविष्यति न संघय ।' जो मनुष्य सरसती पर पर निवास करता है उसको ब्रह्मान पाप्त हो पाता है इसमें (१) वामन पुष्पमस्सो से १५1 (6) मत पुण्या (पारस ! (1) समस भूपपमप्रकाश सोक ११ ।
सायंकासको मविल प्रामों में कोर पहुँच पाता तो प्रत्येक पर है हरन का पूम पाकाय में रिपाई परता, उसकी पम्प मन को तृप्त करती, कानों में पापी रपम्तर का इसरे साम मपुर सर सुनाई। महो पर्ण सरस्वती प्रपेत यति के तुना भियो विश्वा पि रागति। सरस्पती पपप प्रत्यम्त तेज पुस्त पाप नापिका है। अपने प्रमाह से पुस्पा के एस में बतना पति का संचार करती है। इससे सर्व प्रकार की सत्तम युरियो सवोगामी विकास होता है। पम्पितमे नदीतमे देवितमे सरस्वती। पप्रयस्ता इवस्मसि प्रशस्विम्ब मरुषि॥' मातामों मे पेठ, मारियों में पेट रेगियों में माह सरस्वती हम मोपमधर्म से कमुपित, पापों से परित पौर हीन दीन हो गए हैं। है या हम सब को पुष्प प्रगाम निप्पाप बना दो पौर पन सम्पत्ति, मी करनवा हीनता से सामो। हमें कीति का माउन बना । पम्पे मय सरस्वतीमपि पम्ति सस्त्रीवस। सरस्वधी तु पश्चपासो देशेऽभवत्सरित् ।।' पार नदियां सरस्वती में प्रनीन हो पाती है क्योंकि एस प्रवाह सरस्वती समान ही पुष्प पुनीत पार रमणीय है। सरस्वती ही स्वप पारों नदिया होगा। ममा उन सत्री का नाम ही सरस्वती। घड़ा भागीरपी गंगा पिंगमा यमुना नदी । तयोर्मभ्यगता माड़ी सुपुम्गास्मा सरस्वती मिण पाप में ला नाही पंपा है । बाम भाव में सिंपना नाही यमुना महा मरी है। इस पोनों प्रपान नादियों के पप्प पम्पस पमना मारी नुपुम्पा ही पेतमा पाहिनी देवी सरस्वती। मक्षवृक्षात्समुह वा सरियष्ठा समावनी। सर्वपापक्षयकरी स्मरणावपि नित्य ॥ मतीव सृष्णया युक्तः सरस्वरया ममयह । तम सप्मुत देहस्तु विमुक्तः सर्व पातक । सरस्वती समासाच तर्पयेत्यू देवता । सारस्व तेषु मोकेषु मोदते मात्र संशयः ॥ पूर्वप्रवाहे या स्मातियङ्गा स्नानफर्म समेत् । प्रवाहे दक्षिणे तस्या नर्मदा सरिता गए ।। (१)मेर मिया म १.१. सरिया रवा (२) बमेर संरिण RARIRI (समर महल IMमो पोष पात्र ।
२३ - स्नास्वा मुदिमवाप्नोति पत्र प्राधी सरस्वती। देव माग प्रतिष्ठाय देव मार्गेण निसृताः ॥' मिम भूस से निम्मी नित्य परीप सरसरती के स्मरण करने से सर्व पाप मए ही मादे है । को वृष्णा पयमा प्यास में सरस्वती में मान करे, उसके समस्त पाप र हो पाई है। सरस्मती पर वापों और पितरों को साहा, स्वपा से तृप्त करो पाला मनुष्य मृत्यु पश्चात् सरस्वती तोह को प्राप्त होता है। इसमें सदर वहीं है । सती है पूर्व प्रमा में स्नान करने वाला मनुष्य कमा स्नान का फम पाता है। दो मनुष्य परस्वती कमिस-प्रवाह में स्नान करता है उसे मर्य। सान का पम मिलता है। मोमाणी पुर मन प्राणी सरस्वती में स्नान करता है यह देवमार्य को प्राप्त होता है। इरावती नदी तबस्सर्व तीपाधिमासिमो। यमुना देविका कासी पन्द्रभागा सरस्वती ॥" इराक्वी ममुना, काली पथपा मोर परस्पती नरिया सम्पूर्ण वीपों में रहने वाली है। येतु भालं करिष्यन्धि प्राची माश्रित्य मानवा! म पो पुसम किपदिइ सोने परम च ॥ मरमारापरणो देवी ब्रह्मा स्मारगुः सदा रवि । प्राची देवा निपेवन्ते स ब्रह्मपि सवा सपा। तस्मास्त्राची सदा सेम्या पश्यम्यो तु विशेपत । पध्यभ्या सेवमानस्तु मम्मीवान भविता मरः ।। विपर ये करिप्यन्ति प्रापी शप्प सरस्वतीम् । ना दुप्पत किम्पिरेहमा प्रिय तिष्ठति ॥ देवमार्ग प्रतिष्ठा प देव मार्गेण निर्गमता । प्रापी सरस्वती पुण्या मपि दुफत कर्मिणाम् ॥' पो मनुष्य प्रापी सरस्वती के तट पर मार कर उमो लिए इतोष पौर पर मो में एक भी दुरंग नहीं होपा करमापपस, बझा विष पूर्व पारदसियों के पाप सादि सहित पवा श्री प्रापी भरपती को मैश करते है। प्रत प्रावी सरसती पवा मेवनीय है। पम्पमी तिषि वौसकी षा का महरम्म और भी पप है । पममीको सरस्वती की पेक्षा करने मावा बगान होता है। जो मनुष्य मापी सरस्वती मैं निरामि उपवास पर गोपाल मप्र हो पाएं। प्रारी परसती रेपमार्स शिकायती पार रेखमा में ही प्रतिष्पित है। तवर बसम्भीर सरस्पत्यास्तटे स्थित वस्य मान पामयं भविष्यति म संशयः ॥' होममुप्प सरसठी दर पर निवास करता रक्षको प्रमान प्राप्त हो पाता है इसमें सम्पही। (१) पालन पुप्रय मरोष-१५1 (1) मा राप! (0 महापरत। (४) बमन प प्रापास्क ११।
२४ एवं विज्ञाप्रवाहेण हातिपुपया सरस्वती । तस्पा स्नात सर्व तीर्थ स्नातो भवति मानव ॥' दिपा प्रवाह के समय परस्पटी बहुत पपित , उस समय बो इरानान कर सेतामह सर्व टीमों में स्नान पद को प्राप्त होता है। "गर्गा कनसमे पुप्पा, मुस्होने सरस्वती"" पंपाका महारम्प जखम में प्रभिक और सरस्वती का म्येष में। एकापिविधामूरमा गा रेषा सरस्वती । एवासो सु पृपग् मावं ये कुपंम्ति विमोहिता। तेषां सिट कुत' कर्म वापसे पाप कर्मिणाम् ।' पंया रेषा पार सरस्वती तीनों मरिलों का मूल तत्व एक ही है पोइनको प्रमम- मातम समझते हैं। प्रम में ।। ऐसे लोग सिधि को प्राप्त नहीं होते। यस्तु संवत्सर मरया पिवेरसार स्वत पलम् । गय पपममी पाणी तस्य वारप्रयायते ॥ पोमा पहित वर्ष भर सरस्वती का बमपान करता है। मच पार पप मिखने का मामी हो पाता है। 'पत्रे पुण्या सरस्वती" *च मास में सरस्वती परिक पुष्प ने बानी हो पाती है। उकाम प्रिया प्रियासु सप्त स्वसा सुमुपा। सरस्वती स्तोम्या हम तोनों की प्रिया में भी शिया बी परस्पी है मिसको पास पहने।। सरस्वती की ही हम स्तुति करो। पयो सरस्वत्यो सत्रमासत" . सरस्पती तट पर पापियों में मन किए। तो विनसम गच्छन्नियवो नियताशन । गम्यस्यम्तहिता पत्र मेरुपृष्ठे सरस्वती ।। घम सेण्या शिवोद्भवे मागोद्भदे प दुष्यते । स्वास्वा तु बमसोनवे पग्निप्टोमफस सभेत् ।। सिंगो मर स्नात्वा गोसहस्त्र फल समेत् । नागोदे मः स्नात्वा नापमोकमवाप्नुयात् ।। हे पनन् ! तपासात नियवारमा पौर निवाहार हो यहाँ से बिनसन (हुम्पेत्र) मा वहाँ सरस्वती मम्तान होकर मे पृष्ठ मुमेह पर पी पाती है। यह पमती सिपोरा (पानब बालो (२) मा पुण्ण (1) सण व माला (1) मन सात । (0 सामोरम १५ ४प्रपा (एम् । मस(प्ररेष प्राप.म (0) महाभारतमाम रोते १११ से १५५ । मूता।
पौर मापक वीरों में ही सरस्वती पन हो सम्वा है। पम वीर्य में स्नान से मष्टोम मा का कय सिपोरा तीर्य में स्मान हे पहस्थ पोदान का फम भोर मायरी में साल से माय सोहकी प्राप्ति होती है। सरसता तर पर मनेकानेक या इए, कारयामन पौव सूत्र १२२. तपा २१४२२, मादमापन मौत सूत्र १११ १८१३ १४ पास्त पौसूत्र १२॥१॥२३, पावामन पोत मूत्र ११॥२९, जिमेद ॥ १।१६ से प्रारम्भ 1.15, १२१८, ११ ॥४२२१२ ॥४॥११, १४v ६०.१२ ६५०१, GIRIL सभा, BY11 ८२॥१०, ८१४, १०1१०1० १०१३०११२, १०11३१॥ १.१८१२ मध ४६ र १२ १३ १६१ १४२, १२. १६४४ १९१२ ततिरोय.११११११ पारषनेपी ० १९९५ ४११, छतपण बाम ॥६, २४ ११ १२१०१२ मा रा१सहारम्पकोरनिषा ८ पेरों में सरस्वतीको प्रथम नदी (नदीतमा) कहा पपा है। प्रमेर २०४१।१९ सरस्वती तर पर बहुत से पापों का राम्प था पोर रसके किनारे पाप पाति एवी ची। शम्मेड भार१४१२, ६।११।१२, रिसर मम सिमेन ॥१. प्रिक्ष हिम्म माफ रिमेर ११६२१. गुरमिक अन्धमेघन माउरिग्वेद ॥२.१ २.२ सेफर दुम्स प्रालि स्टि ९.1 "पूर्व परिषम की पोर पहले पानी भरियों की हग्षेत्र १०७५ की सूची में गमा, यमुना सरस्वती पौर सुनु । बिसमें सरम्मती यमुमा पपा नुरवीर में पानी है भो कि वर्तमान पुरपुती (सरस्वती) का स्थान है भोक पानेश्वर नगर के पश्चिम से मादी हर पटियामा मात में सम्पर परिचम पाहिनी नदी में मिलती मा सिरसा जिला हिसार से होकर अपनी पार भटमेरो स्थान पर बात में मुरा हो पाती है। परन्तु एक मूवी हुई (हारा या पम्मर) रस स्पान से सिंधु नदी तक प्राप्त की जा सकती है। भासन द्वमा मैक्समूलर मत से सरस्वती हुक्षेत्र की ही सरस्वती है। 'सरस्वती नरी हिमामय पेशी के पियामिक पर्वत भेली की शिरमौर पहाड़ी में निकल कर प्रम्बाधा में पारियो के पास रखती है। यह दिनों की परिध मरियों में से है। पत्र में एक मरला मा बिससे यह परी निमावी हो पा पाम प को मारे पास ही था, इसलिए हमामापवरण मा मल प्रसाहाबाता है और वीर्म स्थान है।" महाभारत प्रादि पर्व प. १५२, परम पुराण में प. १४और प्लमेर १.७५ में भी सरस्वतीको पास इस की पर से निकाली कहा है। "या समोर पाम के पास बालू में मिमीन हो पाती है और बरपेरा के पास घिर प्रहर होता है। पोगा के निकट रलाय में मारपण मी में मिल पाती है। पर संपुरु पारा सरस्वती ही माती यो पार में पम्पर में मोहोर पर मिल पाती है। १परिका मारिर मात्र परिवारफेर १५ () भोप्पम पम पसिनाशिक सत्रस्य १५, ६0 (6) अपाविस मिमी.10 पर गतिमा मात्र २४ . एवं विद्याप्रयाण सतिपुम्या सरस्वती । तस्या स्तात सर्वती स्नातो भवति मानव ।' रिपा प्रवाह के समय परस्पती बहुत पपिए है पह समय यो इसमें स्नान कर देता हैप सर्व तीपों में समान फल को प्राप्त होता है। "गगो कनसमे पुण्या, कुष्योने सरस्वती" मंपा का महारम्प कनकम में मपिक है भार परसती का कुरुपौष में । एकापित्रिषामूरमा गगो रेवा सरस्पटी। एवासा तु पृयग् भाव ये कुर्वन्ति विमोहिताः॥ सेपो सिय पुप्त कर्म पायसे पाप कर्मिणाम् ।। पंगा रेषा मार सरस्वती दीनों मरियों का मून तत्प एक ही है बो इनको पानम ममम ममम । प्रम में है। ऐसे मोन सिटि को प्राप्त मही होते। यस्तु संवत्सरं मत्या पियेरसार स्वत सम् । गच पद्यमयी वाणी वस्प वधारप्रजायते ॥ पो पया सहित भर सरस्वती का बमपान रखा है यह मच पार पच मियने का स्वामी हो पाता है। "पत्रे पुप्या सरस्वतो" * मास में सरस्वती पनिक पुम्य रेमे वानी हो जाती है। उकतम प्रिया प्रियासु सप्त स्वसा सुमुपा । सरस्वती स्तोम्या हम लोगों की प्रिया से भी पिया बही सरस्वती । विसही सात बहने । । सरस्वती की ही हम स्तुति करते है। "ऋषयो सरस्वत्यो सत्रमासत"। सरस्वती तट परपियों में यह किए। तसो बिमधन गम्येन्निमठो नियवासम । गच्यत्पन्तहिता यत्र मेयपृष्ठे सरस्वती ।। बम सेऽपा शिवोद्भवे मागोड़वे व दुष्यते । स्नात्वा तु पमसोम प्रग्निष्टोमफर्म समेत् ।। धियोहरे मर स्नात्वा गोसहस्त्र फल समेत् । नागोन दे मरः स्नात्वा नागमोकमवाप्नुयात् ।। है पवन् ! वल्पागात नियतारमा पौर निवाहार हो वहाँ से पिनपन (पुरुष) पा यहाँ सरस्वती पम्तयार होकर मैन पृष्ठ सुमेर पर पची पाती है। बस धमतीर्य पियोग। () पामय पुरावा लोक ।। (१) मा पुरावा (1) रम्य पुण्य सान्या (1) मन शारद । ( सामनेर मानकर पल ४ मा (0) १ १ म प्लेस प्राप.(0) महामाराम ११ से ११५। मूवा।
पौर मायद वीयों में ही सरस्वती दर्शन हो पाता है। पम ही में स्नान से प्रम्निष्टोम पा का पम पिरोकरवीर्य में स्नान से सहस्त्र मोदाम का फम भोर मामरठी में स्नान से माम सोड़ की प्राप्ति होती है। सरस्वती तट पर पनेकानेक यम एकवायन पौत मूत्र १२१०२. वा २१६१२२ साट्यापन पौव मूत्र १११ १८१३ १४, माश्व मौ० मूत्र राहा पापान मौत मूग १५३२९, शो AUR, १६११६, ४५१ से प्रारम्भ 14, २श ११११५ ।।१२, Ivat I४७१२ २१५७, सासरा,४०५ ९२१११० ४४, १011010, 11.१२.१1१५१५ ११२, पिपरा २१ ॥२ १८९७१ १४१२ १२. १ तिरीय .१८१३१, पारसनेपी स. १९५१ म बामण १।६, २४ १२ १२२१२ पा रहारयकोरनिपर ३० देदी में सरस्वती को सर्व प्रथम नदी (मलीवमा) मा पपा है। छापे २४ सरस्वती के व पर पहन से रामार्यों का राम्प पा पोर उसके किनारे पर नाहिया पतीको पेय ८१२१११२, १५६११२ रिमर प्रस्टेन रिपेजमेरेन - विफर हिम्म पाफ दिद ११९०२११. दुरविक ट्राम्समेनन मा रिमेर १२.१,२०२ सेपर दुल्स पारि 112 11.1 "पूर्व से परिचम की पोर हो पायी मरियों की वेद १.१०५०५ की सूची में गया, यमुना, परसाती पौर पृदि। जिसमें सरस्वती बमुना वा मनमुरा के मीर में पानी मोकिमान सुरमुती (परस्वती) र स्पान है. योरि पानेश्वर मपर के पश्चिम से पदवी पटिपाना प्रान्त में घग्गर परिषम वाहिनी नदी से मिमीरा सिरसा निसा हिसार से होकर पुरती और भटनर के स्थान पर बानू में भूख हो पाती है। परण एक सूखी हुई (हारा या भापर) उस स्थान से सिंधु नदी का प्राप्त की जा सकती है।' मासन सपा मम्ममूसर मत से सरसती कुरुक्षेत्र की ही सरस्वती है। "सरस्पती मरी हिमामय पणी के विवामिक पर्गत प्रेणी की सिरमौर पहाड़ी से लियत कर मम्मामा में भादिशी के पास उतरती है। यह हिन्पो की पवित्र नदियों में से है। पत्र में एक भरमा मा निवसे मामी निसठी दी यह पान वृक्ष की पारे पास हीरा (तलिए एप्सामा पाका प्रमाण महापाता है और ठीर्ष स्थान है।"" महामात पारि पर प. १७२ पप पुराण सर्ग वएम. १४ मार सम्मेष १. मी सरस्वती को पल ध कीपर से निकली हुई रहा है। "महार ग्राम पाट भालू सिमीर हो पाती है और परापास फिर पर होती है। पहेगा के निकट पलाय में पारकरी में मिल पाती है। यह संयुक्त पाय सरस्वती की कहनाती हैकोबार में पागर में मोदी पर मिल बावी' १एरितगम्मिर मारिला एका १५() गम्मर HER शिपारिक मोखमी.. । (१) बामनियम.. Oमर परविर प्रमा प्रिया २१ "सरस्वती अमेर में एक बहती हुई मरी केस में बखित है मनुस्मृति पौर महा भारत में एक बाभू में विसीन होना गणित है, बो डिपिरसा के समीप विनसम वीर्य पहा पाता है। कि काम में सरस्वती एकवी नदी पी पो समुद्र में गिरतो पीर में प्रयाग की विरेणी में इसका प्रार होना हो पर पोड़ा भी सिव नहीं है। कुतोष की सरस्पती प्राची या पूर्वी सरस्वती है। यह वह मरी है जो कि सूनी मी साप पूपर मोम से निकलती है। पुराणों में सरस्वती का वर्णन पारा प्रमबए से समुमतक। पिनपन में इसके नुप्त हो पाने का पुष्पारि में पुन प्रकट होने का पुन लुप्त होते हुए पौराष्ट्र में सोमनाप के मन्दिर के पास समुद्र में निरसे का मसन है" (महामाया मारप्प । ६।२५, ६।१६) । यह मरी स्मेष में है (पखापन प्रा• १२।३) । यही (पमिपान पिम्तामणि १४९) यह नदी बझावर्त की एक सीमा पर है १.८५ । यह मरी बामपी है (काम्प मीमांसा १०॥३)। यह नरी पश्चिम देश में है । १०॥१. यह मरी ग्त्तरा पप में है। महाभारत पमा पर्ष २८८ यह मरी परिषम देश में है और इसके पद पर मुद्रा भीरगण रहते है-यो ममती से निर्वाह कर है। महामारत पारम्प. (प.) यह मरी कुरक्षेत्र में है और उत्तर की भोर है। महाभारत हरि. वि. १.१॥२२, मामी उत्तरापप गामी है। पद्म पुरस सष्टि पम १८।२१५ पहमी प्रमास पुष्कर पर पुस- दौत्र में दुर्भमा है पार पम्पत्र सुतमा है। कर4. मार्म. १. पामदी पुरुक्षेत्र में है। मापह. ८0.1 मत्स्य ११४२, झ• २०२५ यह नदी हिमामय के पार से निक- नती है और भारत में . २२ मामी पुरुबागम की सीमा पर ।। २२१५५ यह नदी पुरोम में सन्निहित सर की सीमा पर है। ५२।४ यह नदी पर्वतों को फाड़ती हवन में पुरा गई यहाँ ममा म में स्थित पार उससे पेश होकर प्रथम प्रवाह रोग में पाई। यहाँ परन्तुक के धमीप पे पुरुष को हुवाती हुई परिणम को पमो गई । ॥ मह नदी प्रहावर्त की एक सीमा है। यह मरी सर्वकाम हा पौर कुरक्षेत्र में है। मारी. २०६४१८पा से पैरा यह नवी माईपाय पसान में माई और सन्नि हित सर को दुबा कर परिचम रिक्षाको पनी पई । मनि.१.१५ यह मवी क्षेत्र में ही है। मनि.पा.१. मह नरी पावत की सीमा पर है। वायु पुराण उपाय - पर मरी मिनपम में समागम.. १३१६९ यह मरी बिनम्न में है। मीराम. १६८ यह नदी पुरुक्षेत्र में है। पप• मारि० १.41 पर मरी पुरोष पौर रिनपन में है। २०१५ या मेर पृष्ठ में भिपती । पन पुराण धष्टि पण १॥२- यह देव माता रेषी है माझाप. म. पो. ३४ वह मरी पुकार में महा पीनों प्रणि होष गुपोको पूरा करने को गई। इस पर पर प्रपस्या यम है। तिरीप वा. ए सरस्वतो ने पर मप्र में स्थित पुस्प प्रनायास से कमल की पा को उखाड़ मेता है उसी प्रकार अपनी तरंगों से पर्वतों के पिपर मौर मूल पोरग। कर. प्रमा• मयुर १.२ प - (१) मर एपस १५.१1 (२) मैसनर बना दिया । (पिस रामम(म पराब सरियम १८ ।
मदी रिमामय के बीपि पायम के पिमा म से निकलकर मिणमिमुखी हो पश्चिम सापर को नौ । मा में भूमि में प्रविष्ट पौर प्रकट होती हुई प्रभार में पांच बारावासी हो भवरलोमि में प्रवृष्टि धन पायमों के माय यह (१) हरिणी (२) पशिसी (१) मा (४) कपिमा (५) सरस्वती । कास्पायन यौव सून १५६ मह बरी है। बामन० ४१०५. पहनी एम्मेष में है पर स्थापिङ्ग उत्तर में है । २२।५ यह मदीरामन में सम्मि हित सर की सीमा पर। गोपुर विन्दगि भारतीय इतिहास का भाग्य बदस गमा सरस्वती के प्रापस मेंही मोपए। समय के बारमार्यों के साथ-साप कभी सरस्वती मारतीय पश्य की सीमा बमी पोर कमी भारतीय राज्य इसकी सीमामों को नाप पपासूर से मेकर महमद साह पराली प्रत्येक पाकमएकारी अपनी भून से सनी तमगारे सरस्वती के बम में दृपढ़ती नदी पाठी मी हरवेगकी परिणी सीमा का निर्माण करती है। पाती का पर्व है पत्त वामी । मह एक मी का नाम है पोध दर हा सरस्वती ममी के समानान्तर रहती हर उसमें पिरखी है। प्रमेर २४ में इसका सस्य सरस्वती नदी और पाप मा नदी के साथ परत एमाओं कामे घेघ में भामा है। पश्मि बापण २१ मा बाप कात्यापन पौष पूत्र २४५८ मादमापन श्रौत Itemपारि साहित्य में पाती पा सरस्वती गम करने का प्रमुख स्थान हो पर। पमु में ये दोनों नदिमा मम्मदेश की परिषम सीमा निर्माण करती है (मनु शा- तुमना करो सिमर प्रास्टेमगिरमेन १८, पेयर पिस्टगया १४ डियम लिट्रेचर 10१.२ मेगनमरिक मारपामोषी पृ. ८०) विमर, और पोर मैकमानस सरस्वती पोर पाती मै पो महिला सम्परेप की परिषम वीमा का निर्माण करती है। भारतीय इतिहास की परेवा पृ. 10 में सका माम पर लिया है। पापपत्रिम सिनरी पृ० १७, मह पम्मर मरी प्रम्बामा पौर मरीन के बीच माती पी। इस समय रास्माम रेतीस्तान में समाप्त हो जाती है (ए. बी. किचन मोर टाग के. ए. एस.बी.पृ.११) बनएन निपहम इसको राखी परी पाम है पो पानेखर मिस पूर्व ही है (पार्षी घ• रि० पासूम १४) यह रिक्षेत्र को रविस सीमा नाती है। पानी प्रसिर पिसम ना चिवपदो सरस्वती बाटी (मीरियत परटिपर माफ भिगा . २, रेप्सम एम्सेम्ट ग्मिा पृ. ५) यही बात और पासूम पाती है (२. एम.बी. 1. पृ.५८) यह नदी पसको पन में है (भासन पुरास प.१६) ए.मी. फिश्वन पौर र रसको पामर मानने (पामाफियमरो)। रेप्सन इसे पिय पर या चित्रप मामले है । (पा..) नंगाम से प्मी मानते हैं। (पा.की.) पस्तुत: एन्सेंट पारफी में पानी का कोई माम वहीं सिखा है। पाती नाम है ही म्हारा परियर में रक्षी नाम लिखा है। इससे मदनापरे कारन दिपस्तुत महापुरष की एक परी का नाम यो सालती - २८ की सहायक है । प्रायफम यह रसी" नाम से ही पाती है ऐसा गरटिमर में मिला है। या सरस्वती से दक्षिणीमरी मो सोम यग्पर का है, उनमा मय ठीक नहीं क्योंकि बगर सरस्वती से उत्तर में है भोर पाती दक्षिण में होना मिला है। मार्स की दक्षिण सीमा की मबी है और मम्यदेप में है। मनुस्मृति २।१७ का २१ में इसका नाम माया है। इसका माम मामग्बती भी है।जमेर २२ में एक मात्र पनि स्तुति में पापा पौर भरत पुन रेषमा पौर बात इस मक्तपि है। मर्प यह हे माने । इमा=गो म पारिणी पृषी मठ स्थान में दिनों के बीच में सुन्दर रिम (जिस रिम इम्मावि देव य । देवतामों का पूजन होता है वहीं 48 दिन है) में हम पाएका स्थापन करते है। उत्तम स्वान कौन है-पावी मरी मानुप वीर्ष भापमा परी पोर सरस्वती नदी । वायु पुपण URL यह मरी हिमाचम के घर से निकलती है । पप पुपण पारि. १।१२।२५ से २०० यह नही भारतवर्ष में है। बह्म• २७।२६ मह मरी भारत में है पौर हिमामय के पास से निकलती है। मत्स्य पुराण २२।२० मा मी पितृ मसनमा मोर पाव में करो मुना फल देने वाली है। ५०१० या नदी कुरुक्षेत्र में है ११२१ गरी हिमासप के पाप से निकमवी । पराह .. यह नरी भाप्प में मोर हिमामय के पाप से निकलती है। पार समीप बामे पर्वत को कहा है। पामन पुराण १२२ मा मी कुमारीप (मारण) में है पौर हिमालत के पार से निकलती है । २२ पहनरी कुर की सीमा पर है रामहरी प्रमापर्व की सीमा पर है और भारत में।। शप मह नवी गुम्योग में है पौर व कात में बहती है। धर्म माझी पु. ४२६ मा. १. यह नरी मारत में है और हिमबद पार से निकलती है। मवि. बा. ६. यह मी हावर्त की सीमा पर है। देवी भागवत ११।१७ मह नदी भारत में है । भीमदमारबत ५।१६।१८ मा मरी मारत में है । मझभारत भीष्म १५ यह मपी भारत में है। मा. म. १५२६ मह मदी हिमनद पार से निकमती ।। ब्रह्मा• उपो• १६५ यह नदी पुस- मेत्र में है। इस पर किया मार भणय होता है। बामन10४ महसी पुरोग फरकी मन में है। मीममापन १ ७१।२२ यह नरी सरस्मती से पक्षिस में । भगवान् पीकपण बारका से पिस्ती पाते हुए इसको पार करके सरस्वती वट पर पहुंचे। पासिका पुराण १२ पहनदी ठपौर स्वच्या पत वामी है मौर सुरन्त तो ए मुरमे, समान पाची पोर पाप नापिनी term. पारपतुपर्प... यह मरी पुपा है। महा भारत सान्ति पर्व (पि.) १८. महमदी पुरोत्र में है और हस्तिनापुर से भीष्म पर पम्मा के स्थान तक पाने पर मीच में पाती है। महामारत पार (क) (म ) १।१५ मा नारी पुरमेन पक्षिस पाप में है। विष्णु धर्मोत्तर १११११ यह नरी भारत में पौर हिमवत् पार निकमती २५पा १५ पहनी बहावत की एक सीमा पर है। मेरिनी कोपत. २ मा एक मरी है। अभियान चिन्तामणि मारी पशावर्त की एक सीमा पर है। पौर२००५ या नही है। मीनगद पु. १११ यह मवी पुरमण में है। कारपावन मौत भूल २४१२।। बादावन मौत सूत्र । ११ वापर पासप २०१।१५ कास्पायम पो सू. २११९९ महा इसका प्रयोप साधारण हो पापा पार मारण्यकोपनिपारा सांबावन मौत सूत्र , कारयारन मौत सूत्र १०. प्रापि । सिए रेसीप मिसेपण (पृमी सम्पर) कात्यायन पौत पूम २ २२॥२२. नामापन पांच सूत्र ८२८, ऐतरेय ब्राह्मण १० बहुत बार का मबतरण ११ मागायन मौ• सू० १.१४ में सरस्वती के संगम पर माकपात माग्नेय पुरो- गर से पा का प्रारम्म शिक्षा है में अपनी पक्षिस तीर से गामा सिता है और हमें पाती सत्तत्ति मान भर्म 6 माना मिपा। कात्यायन भोत सूत्र २११८ में "पास्पप्पय" पम पाया है, 'पावती सगम" पर्व है २१२३. में पात्री पट का वर्णन है। धौनकर गोवा रारा१७ यह एक मदी है। वाय बापस २०१1१४ में "हपातीवर पर" सिवा है। ताट्यायन माप सूत्र १७१ में "यदि सौदहास्वाद २ में 'मप्यमुरकामा" में सोरका अनुरस दोनों रिग्रेषण इसे बारहा गरीबतासा पर्सम पुरसों में भी है। पानी के उत्पत्ति स्थान का नाम स्पपदी प्रभम्म प्रथमा पर्म है । यह यमुना घमीप है मौर हिमापत प्रत्यन्त पर्वत पर है । मामायन पीव भून १९it, दीर्थक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे वीर्ष सत्रन्स इमिरे । मधास्तीरे परस्मा पुष्पापा भुपिरोष स ॥' हपती नीट पर कुम्भेष देश में सात मन कर रहे थे। आपया नदी पुराणों में इस नरी का माम प्रापगा मिला है। सरस्वती पौर पद्धती की भांति मानवी मी कुस्मैत्र की प्रसिद्ध मदी रही है। परन्तु पानी के जनहिगाव इस नरी पौर कोई मिगुरुक्षेत्र में नहीं है। पाती वो भारत की चौवग मा राधीनरी कोस मी सकते है पररातु पापना मरो का तो कोई पिम्ह ही महीं मिलता। पापमा नाम से केवल एक पुराना ती कुरुमेष विश्वविधालय के दक्षिण में है, परन्तु कभी यह तार्थ गरी रहा होगा। ऐसा स्पम पर राफर बने से बात नहीं होता। परन्तु धात्रकाएँ, गिनों मोर पुराणों में मापया नरी को पुराने में परिपट दिया है। प्रापमा परी के विषय में मेरी यह सोग किविमर इसको सरस्वती के समीप उसकी पाबा मदीपो पायेपर पास होकर गती मी मानता है। पिपेत अपनी पुस्तक पा दीया। में पापपा करमेन कीनरी मानता है। महाभारत में इसको एक सिर नदी मिया है। पप पुराण २५ में गमानुप टीम से पूर्व एक कोस पर है और मांडात की गयी है वो मस्भिपुर के पास महेश्वरोप के समीप है। ए• २०१२० में इसको हिमालय से निकली हुई मी माना है। मापन पुण्ण im को पशेष की मां-कात की गने बामी नदी कहना है पानुप ती से पूर्व एक कोस पर मामा है। नारदीय पुपस रपर १८ में इसको महल मोर भानुप टीम के पूर्व एक कोस पर रमेष में माना है। वायु पुपण . कार में इसको पवित्र नसरी मिरा है। पप पुण्ण पारि २१४ में मानुप पी से पूर्व एक कोष परिथपुर बाम स्पान में बहावरण के समीर माना। महामाख पारम्पप १९ में मानुष तीर से पूर्व एक कोस पर माना है। मु.पूना CIR में भी ऐसा ही पाठ 1. में पायता ऐसा पाठ है। (१०१०२ में प्रापमा पाठ पर यहां पर पहलर रेव का वर्णन है। रिप्णु बर्मोपर में २२२२।१८३ में इसको नरी मावा है। () पामय इस पद MALI । में मम्यष तपापा ये पमपातक दूपिता' । प्रस्मिस्तो मरा स्नाता मुस्ता यान्तु पर गतिम् ।।' बिसने कही पोर पाप लिए मोर पञ्च पापों से भी इपित सती में स्नान करके ना मुक्त हो पाता है और परमगति से मिलती है। प्रहनक्षत्र वाया पासेन पतमाद्यम् । पुरुसत्रमृताना च पसन नव वियते ॥' समय बीत जाने पर पह मम तारों का भी पतन हो जाता है परन्तु कुपोष में मरने वाले मनुष्य का कमी पवन नहीं होता। केदारे च महाक्षेत्रे प्रयागे व विवेपत । कुरक्षेत्र प य प्राणान् स्पयेत् यातिस नि तिम् ।।' राय, महादोष, प्रयाग पोर पुरुषेत्र में गो प्राण त्यागता है पर मोम को प्राप्त होता है। बह ये पुरुषा केपि मरिष्यन्ति पातहतो। पास्यन्ति सुस्ता मोकाम्पुनरावृत्ति दुसमान् ॥ मानव मे निराहारा देह त्यक्ष्यन्य। युधिया निहसा सम्यगपि वै धीमा नृप । हे स्पर्म भागे राजेन्द्र भविष्यन्ति म संक्षय । शिव महापुष्पमिदं चिौकां सु संमत सर्व गुण समागतम् । प्रतक्षम सर्वेऽहता मुपा रणे यास्यन्ति पुम्पो गतिमक्षयां सदा ॥ महामारत पुख के परपात देवर्षि नोमय के मनुण सिम्पष्टि पाए हुए र खेमी महायम पुपिष्ठिर ने प्रभावयु राजा पृतराष्ट्र से कहा कि 'हे पिता इस धर्म दोष गुरुदोष म मिनी ने सस्मास के साप पुर में सामा पत्रों को मारा रम सत्य पराफम उत्तम पुस्पों को पराममा प्रमान मोक्ष प्राप्त हुए। बिमले मम में पुरसकर सम्मास नही हुमा पौर उनके मन में केवल यह विचार बा कि पुरा करना मेरा कम है क्योकि म बारियर बह पीर पो यहाँ मारे पए का धमापम गन्पो साप हमा। पोपाहमण कसे हुए संसाम से विमुष पुर में मारे गमे हमको यस मोक मित्ता। विनोंने यमों के सामने को होकर देव परमों से प्राप दिए उनको ममोर प्राप्त हुआ। इसमें मुझे कोई सहनही है। हे पवन् ! इस पर्म पुर में चिन मोयों को किसी भी कारण मृत्यु हई महत्तर हुए में बामणी पौर उपनिपरा में पुस्मेष का बार-बार सम्मेव है । यह रेव पूरा की पुप्प भूमि पीर सारे प्राणियों का रसत्ति स्थान है। "मदनुदेवा देव यजन तवनु स्पा भूतानां ब्रह्म सवनम्" इसलिए अनेक मिशानों में कुरक्षेत्र को मार्यों मार प्रालियों का मावि रत्पति पान भा। कुरक्षेत्रको सफलती नही पापी पारिव मार्म निवास बा । इस सिवान्त (१) मामन पराप मबागायो।। (१) एम पवमा सोक १५ () सिंग पुण्षा () मधमारत।
: विस्य कोई प्रसगनीय युक्ति भी नहीं है । पं.दी. हालेन के मन में भी मानोसति का स्पान यही है। तीर्थराज कुरुक्षेत्र वीर्य पम त पातु से बना है। जिस पवित्र पन, महात्मा अपि प्रपषा पुष्पभूमि के सेवन से धन मानब सुब शान्ति प्रपया मोक्ष प्राप्त कर सके उन्हीं को शास्त्रकार तीर्प . । 'निपानागमयोस्तीर्यमृपियुष्टयमे गुरौं"' तीर्म पम वेदादि पवित्र सत् धास्त्र पताराम, कृषि सेवित पुष्प बनाशय पोर पुरु का बोषक है। "तीप शास्त्राप्यरक्षेत्रोपायोपाध्याय मत्रिपु" तोय पणा येव पास प्रश्नमेमादि विधिपून किए गए पत्रों का स्वान पुष्पक्षेत्र प्रताप सिय ऋषि और पवित्र बम । पोर्ष शास्त्रापरफेत्रोपाप मवतारपिंगुष्टामुपात्रोपाध्याय मन्त्रिपु ।' पुराणों में पीप की परिमापा इस प्रकार है। "न तीर्पता बलस्याहुनस्थसस्य वनस्य था। मध्यासित महभिर्यत्तत्तीर्यविबिदुतुषा ।" यापारण मम स्पनर बन को तो नहीं करते बरम् यह स्माम वीर्ष कमाता है यहाँ सेवा पौर तपादि से महीप पौर रेवादि में सिदि प्राप्त की है। वीर्ष तीन प्रकार के होते है- स्यापर तीर्थ नदी वाम, येत्र बन पर्वत इत्यादि स्पाम बिनम महारमा हपियों मुनियों ने महान मोर पस्सा है ऐसा वातावरण बनाया है कि विषम प्रदा मक्ति, प्रेम से सास मेने एन-गान करले स्नान धन प अप करने से मनुष्य की मारमा पवित्र होती है। मामस तीर्थ सप वीर्ष क्षमा सीप तीमिन्द्रियनिग्रह। सवमूत पया ती ठीर्षमार्चवमेव च ।। दानं तोर्प दमस्तीपं सन्तोपस्सीपमुष्पठे। ब्रह्मचर्य पर ती ती प प्रियवादिता ।। (७) मा मोर पूल पारा तोड़ पा(१) मोरिन् | (0) मेदिनी १) (0) पूर्म पुरापा शाम वीर्य तिस्तीर्थ तपस्तीर्घमुदाहृतम् । वीर्पानामपि पत्तीयं गिदिममस परा॥' सत्य समा इन्द्रिय निग्रह, प्राणीमात्र पर सा बना रान मनोनिग्रह पंतोष बरपर्य प्रिम मापण, विवेक, भूति मौर तपस्या इन सबसे बड़ी मन की पुरि। वीपी कारा इस रसम परंप प्ठ गुणों को मन और जीवन में सम्मान करने का परसर मिमता है। निगृहीवेन्द्रियशमो मप्रेव प पसेन्नरः । तस तस्य कुलो नैमिपं पुणराणि ॥ मगो द्वार पकेदार सम्मिहत्य तपैव च । एतानि सर्व वीर्यानि स्वा पापै प्रमुच्यते ॥' इमिमों को पप में करने वाले मुगारमा को पुरा नमिपारम्प, पुपर हपिार केदार सनिहाप सब वीर्ष पर में ही मिसकर पसके पाप हर मेवे है। सस्मं तो दया ठीप तोमिन्द्रिय निग्रह । पर्णधमीणा प्रेहेपि तीप शम्यमुदहितम् ।।" पर्णा पमियों के लिए प्रत्य पमा इविप निपारि प्रतापीठी घर में ही निवास मारमा सीमिति स्पा सेवितं ब्रह्मवादिभिः । मम मुद्धिकरं पुसा निर्म तस्नाम माचरेत् । मारमा पी लिस्याय ती मारियों से सेमिव । मिस लिस्प स्नान करने से मन पुर हो पाता है। भारमा मदी संयमपुम्पती सरपोदका शोम समापियुक्ता। वस्या स्नाय पुण्यकर्मा पुनाति न वारिणा सुरुयति पान्तरात्मा ।। एवत् प्रधान पुरुपस्प नर्म, यदारमसमोष सुसे प्रविष्टम् । मेय तदेव प्रवदति सन्सस्वरप्राप्य देही विम हाति कामाम् ।। नेवार प्राह्मणस्यास्ति वित्तं य पैकता समता सस्स्ता च । शीर्म स्पिति दापिभानमा तत्तत एकोपरमा क्रियासु पारमा नरी पीर संयम पुग्म तीर्थ रनमें सीन समाभियुक्त सत्मम्मी बम प्रस्तुत है । इस पा में स्नान करने वाले संयमारमा पुस्प प्रकाध में पारमा के समान दिराममान होता है। मारम शाम पी मुप में प्रविष्ट होना ही पुस्प का प्रधान कर्मी ममी को जप करते। पिसके मान को प्राप्त होकर मनुष्य सब कामनापों को स्माष देता है। बाह्मण के निय एका धमता पार सस्वता ही परम पनसीप में स्थित होना रान मार्यन सस पिपान भार पकोष रसकी परम किया। (Om मारा रम 1(१)बललिम ४(१) मत पराNI (स FIRI (Oपमन पर. १, २८१.।
१७ . विप्राणो मरणो तीयं गर्वा पृष्ठं तथा मतम् । एवे यत्र हि तिष्ठन्ति तच्च तीर्घमुदाहृतम् ।। दासानां प शिरस्तीपं स्वं तीर्ष चारुच्चयते । तपैव दक्षिण' करण्स्तीयं स्वं परिगण्यते ॥ सत्य वाक्यं तु वाक वीर्ष पुराणपठन सथा । देवलिङ्गपरं पित्त तोर्पमिरपुम्पते दुषे । प्रसनिम्ताविरहित मानस तीर्थमुभ्यते। दाता च करौ तोपं देवपूजाकरौ दया ।। पन्तस्तीथं भूतशुरपा प्राणायामाच नासिके । मन्त्रित चासनं ती पैतृको वसतिस्त पा ॥ सत्रापाड पार्तिकरच माघो वैशास एष च । वीर्यान्युतानि मासा वै पत्यारोऽमीपदायकाः ।। पुराणपठनं यत्र यत्र पद्मवनानि । तञ्च तीपं समारस्पातं मुरुदेवगृहं सया॥ पामग्रामसिला यत्र ती तत् कोशयुग्मकम् ।' पाह्मणों के रोनों परण ती ६ वपा पार्यों की पीठ दीपं मानी गयी है। यहाँ ये रहते हो से भी तो कहा गया है । बातों का सिर वीर होता है या अपनी मांब वीर्ष होती है। पपना राहिना कान भी तीर्प माना गया है । सस्प बन पाणी का तीर्प है, पुराणों का पठन मी वार्म बता का प्लान करने वामा पिस मी द्विानों द्वारा ती कहा माता है । प्रस-मम्तन से मुक्त मन भी तीर्य है है। रावाों के दोनों हाथ भी तीर्प ।। तथा रेव पूजा करने बामे रोनों हाय मी ती होते है। मृत पुदि से पस्त करण ती रूप हो पाता है पोर प्राणायाम से नासिका वीर्य बन पाती है अभिमन्त्रित पासन भी तीर्थ ही होता है ता पिता पितामहों का पर भी तीहै। महीनों में मापा गार्तिक मार पौर देवास बार महीने पी।पौर पमीप्ट फलको रेने पामे ।। पहाँ पुराणों का पठन पपना मन बन हो यह स्वान सपा मुम्मा पौर रेवामय भी तीर्य कहे मए है । भगवान पामग्राम यहाँ विरार ये वहाँ पो कोस र तीर्थ होता है। नगम तीर्य यह महारया पौर सम्म दो तीर्थ स्पानों पर पास का धर्मराज युधिष्ठिर में महारमा पिपुर से कझ पा- भवद् विधा भागवतास्तीर्यो भूता स्वयं विमो। तीपों कुर्वन्सि तीनि स्वान्त स्पेन गदा मृता। सापवो यासिन शान्ता ग्रहह्मनिष्ठा मोक पावना । हरन्स्पर्प सेझ सङ्गातेप्यासवेश्पमिव हरि.॥' (१) मा पूर्वमा ११ (1) महा ऐसे सामुगिन्होंने इस मोर पोर परमोक की सारी मारनामों को त्वाम रिया को प्रान्त पित, मनिष्ठ और स्वाभाविकता से ही सोनों को पवित्र करते पते । वह अपने सस्सन से ही दूसरों के पापो को पो रे ! क्योंकि पनके भीतर पपनामा भगवान् सग निवास करते। मत ममुप्प यदि अपना बीवन सफम करना चाहता है वो सबके लिए वीप पात्रा प्रति मायक है। यह संसार मौर इस संसार में बसमे पाने सब माबर।। ममिनी दसगठ पसवस् तरस पवम्त्रीवनमतिशय चपनम् । क्षणमपि सम्मम संगति रेका, भवति भवार्णव तरणे मौका ।। ममुप्प बीवन पवम् पत्र पर ठहरे हुए बस की मांति पत है इसका कोई भरोसा नहीं कर समाप्त हो पाए । हा परि मनुष्य क्षण पर भी महात्मापों का सत्सम कर मे तो यह पण मात्र का प्रामप ही प्रसार संसार सागर ताले दिए मोपका काम दे बाता है। म्हपीण परमं गुमिदं भरतसत्तम् । तीभिगमन पुर्ण यमेरपि विशिष्यते ।' है मरत अप्ठ भीष्म पिर्मों का यह परम पोपनीय सिद्धान्त कि नियम से तीरों में पाना मवि पुष्परायक है मौर यों से भी बाहर है। मित्रानो मतानुसार- मेपासननमन यं वे तीर्मवयानु कीर्तनु कीवनम् । प्रपूत्रो मभते पुत्रम पनोपनमामुयात् ।। मही विनमते रागा वैश्यो धममाप्नुयात् । शूमो यातीप्निवान् कामान् माहाण पारम पठन् ।। यश्मेद घृणुयाम् नित्यं पीपं पुष्प सवा शुभिः मावि स्मरणत्वा माप्नोति माक पृष्ठे प मोदते ।। तीनो का कीर्तन करना ना सुनना बुरिको पाता है। सम्मति पप पर पप्रचार करता है। पुषहीन पुष को पौर पनहीन भन को पाता है पा र मनोमनामों की प्राप्ति करता है। पास दो एघार से पार ही हो पाता है क्योंकि मान को प्राप्त हो पाता है और यो मोप तीनों के महत्व को पा सहित सुनतेमका अन्तरात्मा ऐसा परिष हो बाता है कि उनको पूर्वयम्म का मान हो जाता है पौरपा सर्व का सुख पाते। महाभारत में पीप्प दो कहा- ममा धरीरस्य वेशा के चिन्मेप्यतमा' स्मृता । तमा पृषिम्याम वेद्या चित् पुण्यात्मनः स्मृताः ।। (१) महासागर लोक ३१ स पसे गरीरकविपर माम पवित्र माने गए हैं, उसी प्रकार पृषी विपप माप तीपादि पर पवित्र माने पर। प्रमावादमुवात् भूमे सनिसस्य व तेमस । परिग्रहान्मुनीना तीर्याना पुण्यता स्मृता ।' भूमि, पत पौरन पर प्रभाव के कारण क्या मुनियों, महपियों सों पोर महारमार्मों के निरन्तर निवास के कारण तीर्थों में पपिपता होती है। तीर्प पापिलेपण इस पर में बहुत सुन्दर रंग से दिया पया है। यस्प हस्सी प पादौ प मनश्चैव सुसयतम् । विचा सपर कौतिपय स वीयफममनुते॥ प्रतिप्रहापामा सन्तुष्टो येन केनचित् । महकारमिवृत्तव वीर्षफसमानुते ॥ प्रहरूको निरारम्मो मध्या हारो जिसेन्द्रिय । विमुक्तः सर्व पापेभ्य स तीपफलमश्नुते ।। मझोपनश्च राजेन्द्र सत्य घोलो अवठ । पारमोपमश्र भूतेषु स तोर्यफलमश्नुते ॥' जियो हाप पर मोर मन अपने पत्र में हो तमा यो विश प मोर कीवि से सम्पन्न से, पही ती सेवन का फल पाता है । यो प्रतिप्रह पर रहें सपा को पुप अपने पास हो रसी में मंतर हे पोर मिस महकार का प्रमार शेपही ती फम पाता है। वो रम्भादि पोर्पो से दूर, पम्प महकार से पम्प मलाहारी पोर विनिय हो पा पापों से रिमुक होती के मास्तरित सा मागी होता है। राजन् । जिसमें कोषम हो यो सत्यपारी पौरलता पूर्वक पत का पालन करने वाला हो तपा को सब प्राणियों, प्रति मारममाव रखता हो पही ती फस का भागी होता है। प्रथदान पारमा नास्तिकोन्छिन्म मतमः। हेतुनिष्ठपण पनवे न तोषफस भागिनः ।। दो पापान मही पापी मास्तिक पौर का यठाने पामा ६, यो निष्ठावान नहीं है ऐसे तोम ती फर नहीं पाते। क्योंकि पारप निर्मत होगा पर हो रस पर सदमेप का प्रभाव हो सच्चा है।शान बिना संसार और पापन भषार है पोर मठ पुस्पों के पास बाए बिना शाम प्राप्त नहीं होता। उतिष्ठ जाग्रत प्राप्य बरामि बोपत् । पुरस्म भारा निशिता दुरत्यया, दुर्ग पपस्तस्य वयो बदन्ति ॥' उठो बागो मेंष्ठ पुस्पा पार पाकरमान प्राप्त करो। सानी पुरो में बताया कि पपा पर मारा कठिन पंसा परेपी पार पर बममा कटिन है। यह पायामक नही किबोधी टीपा पर पाएपा उसे ही प्रसय पुष्प मौर मसयान (७) मामाला (6) प्रामा...योनिर -१ ४. मिलेगा। यदि ऐसा हो पाए तो तीपों पर जाने पाते मायों सोप महारमा बन गए हासे यस्मवाशन सी शुखे हस्तौ पादौ घ संयो। मसोमुपो ब्रह्मचारी स तीषफत मश्नुते ।। यस्म तीये देवा यस्य तो ये द्विवा । पूजनीया प्रयलेन स सीर्यफसमपनुते ।।' गिसकी वाणी पौर मन पुर।झप पार पाच संपठ है मोमी महीं। दो ब्रह्मचारी पोर बो परन रोती की पूजा करता है उसे ही वीर्षफम मिलता है। सोनुपसरम्परि यवधानों जितेन्द्रियः। कत पापम्प सुम्मेत कि पुन तुम बर्मात् ।। तिर्पग्योनि म गरऐन कुदेशेन च गायते । स्वर्गो भवति वैविप्रो मोसो पाप प विन्दति।। घया मोर भक्ति से निवेमिय एकर ती मात्रा करने वाता चाहे वा पापी भी गर्यो न हो निष्पाप हो पाता है मोर को पहले से ही गुमकर्म करता है उसकी वो बात ही रया है। तीर्थ पी पा, पदी पारि वियोनि में पम्म नहीं मेवे । कुरेष्ठ में उसका पम्म महीं होता पौर मह स्वर्ग पाने पामा बाह्मण हो पाता है। यह मोत सापनों मनानाविका भी मा कप्ता। मेनकादश सहजयानि परिमवानीम्द्रि याणि । ससीपफममाप्नाति नरो म बलेशभाग्भवेत् ।। अनुपोप्य चिरावाणि तीर्पा यमभिगम्य च। भदरवा पाञ्चन गारप पखिो माभिषामेव ।। मातृवस्पर वाश्चि पर दम्याणि मोष्ठगत् । पारमवत्सव भूतानि स तीर्षफममश्नुते ।। सर्वपामेम वर्णामी सर्वाधम निवासिमाम् । ती तु फसवय मात्र कार्या विचारण ।' निस बस में प्याए पगिया माती पस पाता है। तीर्थ स्मान करने से मनुष्य पाया गमन के पक से मुकहो पाता है इसमें कोई सन्द नहीं। पोवीन रात्रिों तक निर्यात नहीं करता तीर्थयामा नहीं करता सर्ण मार गाय का राम नहीं करता यह मनुष्प प्रगमे बरम में पखि बनेपा । वो दूसरों की स्त्री को मावा दूसरों के बा को मिट्टी पौर सबको अपने तुम्म समझता है उसे वीर्ष फल मिनेया। पर पगबामे सब पापो सोपों को पीई फम मिलता है। मषम्दना पाप्माना प नास्तिका स्थित संप्रया। हेतु दुष्टाएप पम्पैनो वीर्षफसमश्नुते ॥' पी भवा हीन पापी पौर नास्तिकामो दस संसार ही हो सब एप मानता है पर पर ( पुराप । (राप | (1) अमर मरा) प्रयतम।
क मौक पर पिकास नहीं रखा मोह मोर गगन को पार रहता है उसे तीवफा नहीं मिमता। पुराणेष्वपवादस्वं ये बदन्ति मराषमा । सरमितानि पुष्पानि तदतानि मवन्ति । पो पुराणों में सि को पर्पबार पर प्रतियोक्ति कहते है उन मोष प्यक्तियों का पित पुष्प मी मुठी प्रपंसा के समान नष्ट हो जाता है। परतु पार्य यात्रा प्रत्येक बप की बात नहीं वास्तव में माम्प से ही ती पाया होती है। नावटी मा कतारमा पना सुपिनपतसर। स्नाति जीप कौरम्प न प पापमहिनर ॥ है पारिसका सकस मुर नहीं यो रिखनीय महीं मपवित्र पोर इट इरस बाता हैमानतो वीपी में स्नान करता है और न ही उठे ती पिनवे है। नु पाप Fat तीयसपि दामन भवेत् । अपूर्व पुष्य प्राप्तिध भवेन्शुटारमानो नृणाम् ।। पापो के पाप वी मन कर देते हैं मार को मुसहप पौर निष्पाप हैरती पर वार मपूर फम मिलता। तीर्थ स्नान फल और तीर्थ फल सीप नाम पर पोर ती फात में गा पन्तर है। ठो फल पार पात है और ती स्नान फल पार बात है। यह कोई पारम्पक मही कि वीर्य पर गार प्रत्या प्राणी को दीर्ष फम मिम पाए । यदि कोई ठीपं पर पड़ा मारमा से पही पाता इति सैरा मुन्दर रस्य देखने पाता है तो वीर्य में स्नान करने पर से बम स्नान कम ही मिपमा राम ती फस मही मिसेमा। कार्यान्वरेण यो गत्वा स्नान ती समापरे । वीर्य यामा फम सम्यनास्ति स्नान फर्स मरेत् ॥ वीर्यानुगमन पर्मा तप' परमि होच्यते । तदेव कस्या यानेन स्नान मात्र फर्स भवत् ।। खोर्यानुगमन कुस्वा मिक्षापारी रिठेन्द्रियः । अपूम्पा यत्र पूज्यन्ते पूज्य बाप्पति कमान् ॥ वन स्पाने भयोत्पसिमिक्षा मरणं भयम् । प्राप्नुवन्ति महादेवि ती दध गुणं फलम् ॥ (१) मारपा(महायव महामा ४२ कता। स्वये भूते महासोपं प्रभासे र महतरे। तस्मिस्तीपें प्रति गृह्म मत सब प्रतिग्रह ॥ प्रतिग्रह निदासस्य यामा दशगुणी भवेत् । तेन दत्तानि दानानि योग मुतपिता ॥ येन क्षेष समासापनिवृत्तिः परमा यस्तु माझ्यालिम क्षेत्र प्रसिग्रहरुपिमवेत् ॥ पो मनुष्य किसी पार कार्य समापार राग्य प्रबन्प अभियोग कारण वीर्ष पर पाता पोर रिपार करखा चिमो स्नान कर पुम्प भी प्राप्त करते तो उसे दी स्नान फम तो मिमता है परन्तु वीर्ष फम नहीं मिमता । वीपों पर परम बाधा करनी चाहिए, परि कोई पमपर्व में या अप्प भय से पाही पौड़ा या किसी पम्प समारी पर बैठकर वीर्ष यात्रा करता है तो उसे मी गस नाम फम मिमेरा पछे नै फम मही मिमा मत मिवापरण करके दमियों को बस में रखते हुए वीर्ष यात्रा करनी चाहिए । जिस स्थान पर पपूग्ण पापणी मीच पीर मास्तिकों की तो पूजा होती है पर पता गुरु सिरों पौर विर का निरादर होता है, हो पाय मुभिध मप और मरम का प्रोप होता है। महादेवी । वीपों में स्नान पान पोर मा करने से रस पुझा फम मिलता है। परन्तु को तीपों पर पाकर भी संवोप करता है वह सर एयपा मेता है। को वीर्ष पर पाकर दान नही नेता उसकी तीर्थ यात्रा पE Tणा फल देती है। तीर्थ यात्रा पैदल क्यों ? पंवम यात्रा करने पर साराका मे इसलिए विप पोर रिया क्योंकि पी यात्रा विचार सोपन लिए की बादी है। मोटर पाड़ी हमाई पहाण पोड़ा पालकी इत्यादि सवारी साधन समय सापक होममें यात्रा करने पाने का समय तो पोड़ा समेगा परन्तु यह साधन रिचार सोपक नहीं है। यहाँ विचार मना है। यही सास्तिका सापन चाहिए । साहित्यकार का मापन गत मुन्दर पर मामा पापा का सर्वोत्तम प्रकार 1 मादुर शास्त्र में पर यात्रा की महिमा परी पड़ी है। मारोय पास्म में पर मामा की प्रसास्त मरी पड़ी। मनुमा शास्त्र में पर बाबा प्रधा भरी पड़ी। प्रत प्रकृति का मानन्द सूटमा है तो पर पाबा श्रीविए। सारप्प ठीक बनानो पर मामा कीथिए । शान प्राप्त करना वो पर यात्रा कीगिए । सभी प्रसनी तस्वीर सनी है वो पर मामा कोमिए । बनता पार समरस होता है तो पायात्रा कीगिए । प्राचीन पुष में मोटर, पाली मारितो नहीं पी परतुर गोरे पारिपे। मोप उनका प्रयोग धी करते और रात भर में सौ सौ मीन तक निकम वादे परम्त प्यान बोम पौर विचार करने की बात लिहमारे साधु संन्यासी बर्मोपदेषक, वीर्ष पानी पर्म पुर, पुष (1) A1 i He travel best, who inrelt op foot प्रचतों ऋषिों और महारमाों संकराचार्य महागीर, बुट पोर रामानुन तम्य महाप्रभु नामदेव पीर मामा से सन्त समस्त भारत में मे पोर पल ही मे । परि यह पाहते तो पोड़ पर मी म सकते थे परन्तु उन्होंने सति सापों का सहारा नहीं मिया पोकि परिवारों का पोवन करना चाहते पे मार विचार सोषमा सर्वोत्तम साधन पैदस मना हो है। दूर गाने की प्रावस्यकता नहीं यही पैचिए किया रेप पर सन् १९४६ में हिन्दु मुस्ममान दंगों के संकट के पापम पाए तो महारमा गांधीजी ने मौपावामी पौर बिहार प्रान्त का पैदस और यह भी इस मावस्या में प्रमण किया और इससे भी पामे १६५. ईसी में गांधीगी मे साबरमती के भापप से निकल कर गप्पी पाष पपस ही किया पा पार पार वो मत पाप वर्षों से रेस का सबसे बरा सेव विनोगा पाये, सब यात्रा के सामन होते हुए मी समस्त देश में हजारों मील पैरत पूम बूमकर मानमण का सन्देपरे है। फिर सबसे गौ एक बात और मीकि पर यात्रा से देश मोर नसमें बसने बामे होर्मों का पम्पयन प्रच्छा होता है। उनकी शिकार भारा रीति रिवान मापा मोर रहन-सहन सब को समीप से देखने भोर समझने का अवसर मिलता है। इसलिए पाम्ति पूर्वक विचार करने से पता बमेया हि पद यात्रा बिना चारा नही। नरयाने चावयाने हयादि सहितो रप । सीर्थ यात्रा स्व प्रस्तानो यान दोपोनृ न हि ।' मरि कोई पाठ और स्वस्थ प्पक्ति पीठ, पामकी रप पोर पोो पर पाकर दीपाभा करे तो कोई रोप नहीं। एसे समुप्प को प्रा होने पर भी किसी कारण स्प वीर्ष पाना नहीं कर सकते हो पौर प्रन्य पछि उनके स्थान पर यात्रा करें वो कोई रोप नहीं। देवानाञ्च कुरूणाम् प माता पियोश्च कामत । पुण्यद समवाप्नोति तदेवाट गुण फसम् ।। पितर मातरम् तीर्ष भासर सुहूर्व गुरुम् । यमुहित्य निमजेत व 8 ममेत्तु स ॥ समते पोरया श सपराप मनु गमयति । कुर्य प्रतिमा करवा सीर्ष वारिणि मधयेत् ।। यमुहित्य महादेषि पाप्मा समेत स।' यो प्रपने पुष्प में से बता गुप माता-पिता को माप देता है पसका पुष्प पाठ गुणा हो बाग है। दो माता-पिता प्रावा मित्र पुर पौर प्राचार्य के लिए वीस्नान करे तो उसे पुष्प का पाप मिलता है। यो दूसरों के लिए तीर्थ यात्रा करता से सोमवा अंग्र याला पुष्य में से पिसता है। परि को पपने किसी मित्र या पारमर के नाम से बोली परमहोशी में स्नान करना चाहे तो अपने उस मित्र की रिस माम से स्नान करना गुण की मूत्ति रमाकर उसे सान पाए, इस प्रकार यहाँ रस पति को पुप्प बाम (साप । प्राप कुरक्षेत्र-सूयग्रहण चन्द्रग्रहण में वान यघदाति यस्तदं पुरोने ररिग्रहे। तत्सदेव सवाप्नोसि मरो भमनि मनि ।' रामहरे कुरदोत्रे राहुप्रस्ते विवस्वति । यस्फर्स स्पर्ण दानेन ज्ञानोदे दिने दिने । कुरक्षेत्र रामतीचे स्वर्ण दरवा स्व शक्तिस । सूर्पो परागे विषिवत्स नरो मुक्ति माग्भवेठ ।' पूर्य ग्रहण के समय कुपोष रामहर तीर्ष पर स्वर्ण राम करने से प्रतिदिन मान धि होती फुपोष में रामतीर्ष पर पपनी सक्ति पनुसार पूर्व पहण के समय विधि पूर्वक सदान करने से मनुष्य मोसमा मामी होता है। सर्पस्प प हि दानस्य सम्पा के प्रोच्यते दुपै। चन्द्र सूर्यो परागे तु दान संख्या न विद्यते ।' विमान इपियों मे पम्पूर्ण राम की सम्या नही है परन्तु पम पर पूर्व पल के पमप मोबान गिन्या बातामा सपा परि को प्रात होता है इसकी संस्था प्रनम्त है। सूर्य ग्रहेतुय स्नायादपा दान यथा विपि । स्वर्ण रमतं वापि ब्राह्मणेम्पो ददाति य ॥ को सूर्य ग्रहण पर स्नान करके विधिपूर्वक दान करता है। सुपात्र ब्राह्मण को सौ मोर जादी का रान देता है, इसका दान सुफल होता है। कुरुक्षेत्र और सूर्यग्रहण पर गिामी का मत है कि कब पृषी पर मानव सृष्टि की रचना ई एस सय सर्वप्रथम पुरदोष में सूर्य रन हुए पप दुख्योग में सूर्य ग्रहण का बड़ा महात्म्य है।' कुरुक्षेमं महापुर्घ्य राह प्रस्ते दिवाकरे पूर्व प्रहल में पुम्लेष सेवम का महा पुष्प है। प्रमापास्या सु सत्रैव राहमस्ते दिवाकरे गमावस्या को पर सूर्य पाण हो । यदा सूयस्यग्रहणं कामेम भविता क्वचित् । सरस्वत्या तदा स्मास्वा पूता स्वर्ग गमिष्यसि ।। वर्ष पहण के समय सरस्वती में स्नान करने वाला सर्प पाता है। सन्निहित्या पिशेपेण राहुप्रस्ते दिवाकरे' ( प्रहण पर सन्निहित वीर्य में स्नान का रिशेप महारम्प है। (१) मादाय पुरावतो. १५। (२) मासयार प्य! (पाबु पुस । (रेशम (0 मारोबार वो बि पुष | ५ | (O मल पुष १११ पप पुस ११ । (०) महापारत मा. पो. १५९ (८) मामम पुण्य मो.५ को मन पापि मारमा राष! रिपोछ।
फुरुक्षेत्र में भाव पाटस्य पूचितो देशो गया गगा सरस्वती। कुरक्षेत्र प्रयाग प मैमिप पुपर सपा ।' पार के लिए पया मंगा सरस्वती कुस्सा प्रमाप नैमिप पार पुष्कर पूपित है। पुष्करे पासर्य पाद गपहोमवासि प। महोदमो प्रयागे प कादयो प पुरुजांगले।' पुपर वीर्ष में मिया हुमा पार कर होम मोर तप प्रमय कर देने वाले होते है। ऐसे ही महोदपि प्रपाप कापी पौर गुरमेज में भी भाल करने से मलय फम मिलता है। कासरे दधार्ण यो ममिप कुरुमांगते। वाराणस्या नगर्या वै देयं याद प्रयत्नस ।। गरबा घेतानि य कुर्यात्फसमक्षयमेव प। जप होम तपोम्यान पतिपित् सुरुत भवेत् ।' कानगर देश दयनरी ममिपारप्प कुरसेष पौर कापी में प्रथम पूर्वक पवाय घाट करें।इन तीयों में पो स्नान प्मान बप होम राम भोजनादि ब्राह्मणों को कराता है और समस्त एम्ोप में पार करता है उसका प्रक्षम फम होता है । पिवर फिर पारामा महीं करने पर्योकि यह फिर सर्म में पते बाते है। पुनः सनिहित्या में कुरक्षेत्र विशेपत । पम्येन्म पितृस्तत्र स पुत्रस्व मुणो मवेत् । पराणा प्रमासे व मुरुक्षेत्र समत त । संनिहियो विधेोण राह प्रस्ते दिवा करे । यो कुरक्षेत्र के सन्निहित ती में पाउ तर्पण मन से करता है वह पुत्र पिवृ से उरुण हो पाता है। काशी पी प्रभास मेष रक्षेत्र सपा सनिहित वीर्य में मूय ग्रहण के समय विप फस है। पाद वा समाप्नोति राजसूय यस मरः । भावमेष सहस्रस्य सम्पगिपृस्य यत्फतम् ॥ स्नात्वा एव सदाप्नोति करवा पाव च मानवः । सर्व देव लोकेषु नामधारी विराजते ॥ मार पण पौर देवता का पूरन करके पो पितरों को समतुष्ट करता है यह सौ रामसूप पौर हवाएँ मसमेष यम का फल पाता है। वीपों में स्नान पार पाद करने मता मनुप्म विमान में बैठकर सम्पूर्ण रोगों के पानन को मोपवा है। पद्मपर्णेन यामेन कि फिर्णायाममामिना। गपर्वादिमणादयेन स बेणुमुरमा विना ॥ विपश्वेताश्ययुक्तेन कामगेन पपासुसम्। प्रमूक्सप्सब यावत् क्रीत्यप्मरसो गए ॥ १) मत पप () अमन पुण्य । (0 मत्स्य पुराप ! (0) Aणु पोछ। (OAणु में।
. मासि मासि समायान्ति पुण्येन महतारिखता । सनिहत्यामुपस्पृश्य राहप्रस्ते दिवापरे ॥ प्रश्वमेघपाप्तं तेन तत्रट पायत भवेत् । पृपिम्पा यानि तीनि प्रसरिक्षापराणि ॥ मयो हदाम्तमागाच सर्वप्रस्रवणानि । उदपानानि पाप्याप तीन्यायतनानि । नि संयममावस्या समप्यन्ति मराधिप। मासि-मासि मरग्याघ्र संनिहा न संघय ॥ सीसनिहवा देव समिहत्येति विश्रुता। तत्र स्नास्वा पपीत्वा स्वर्गमोके महीपते ।। प्रमावस्या तत्रैव राहग्रस्ते विषाफरे । य धाद कुरुते मर्यस्तस्य पुग्म फलं शृणु ॥ मश्वमेघसहस्रस्य सम्पगिपस्य यत् फसम् । स्नात एव समाप्नोति कस्वा पावश्ष मानव ।। यत् किंचिद् दुष्काम कर्म स्त्रिया मा पुस्से वा। स्नाममात्रस्य तत् सर्व नश्यते नात्र संशयः ।। है पम विपक्ष ! यहाँ से पग्निहित वीर्य को बावे यहाँ प्रमादि देवता तपस्या के पनी इपि मापि महापुष्प मुक्त होने पर भी प्रतिमास पाते हैं। पूर्व के रातम से प्राचादित होने पर सन्निहित वीर्य में स्नानाचमन करमे बाप्मा पुस्प महापुम्प सौ मरयमेष पा कर पुकता है। पृप्पी पौर स्वर्ग में गिवने ती १ महीने महीने प्रमावस्मा को सनिहित में पाते है । ममा पस्या को पनिहित में स्नान करके पुस्प वर्ग में पूरित होता है । ममावस्या में तमोम्प राह से सूर्य भगवान् के मान्धारित होने पर पनिहित वीर्य में भार करने मामे मनुष्य को पिणि पम्पम्न एक हगार प्रायमेन पत्र करने का फम मिमता है सनिहित में स्नान करने प्रारखी सर्व पाप मष्ट हो जाते है। ब्रह्मवेदि कुरक्षेत्र पुम्य सम्निहित सर । सेवमाना नरा नित्य प्राप्नुवन्ति परं परम् ।' ब्राह्मरेवि होग में सन्निहित सरोपरी पो मनुष्य उसमें प्रतिदिन स्नान करता है उसे परम पर प्राप्त होता है। चारइश्वर कुरक्षेत्र में पार पर है । कानेपर, ज्योतिषर, स्वाणुस्मर मौर सर्वेसर। चार रूप पुम्सेज में पार पोप पड्रप बन पौर पिम्पुस । (1) मामारण मन पर्ष मात्र २५ोष ११..। () आमम पुराव-पावसो कुरुक्षेत्र : एक विवाद कहीं और कव? -- पापुनिक युप होग पार पानबीन का मुम है। भाका स्थान 6 मौर मुद्धि में * मिमा बनवावारण की वो बात ही या तिान भी ऐसा सोर सकठे कि गया यह धर्मधेष एम्येन रिसर्च महिमा और महात्म्य का वर्णन मर्मयों और साथ का ने इतना पागारामही स्थान है वहाँ मानिकपुरमा मया यह स्थान यह महोटर कोई और स्वता? म.पा का समाधान पाया है। हामा मोहलगोदाको पीर पर सामों को सोदार भार वहाँ पर पाए पर मणाबो गारों की पीईटी पह-निर्माण नी पोर पम्प सामपियों से उनकी प्राचीनता का अनुमान कर मेला पुरातल पिमान गानों के लिए इतना कठिन कार्य नही गिना कि यह मिति रमा nिt of t? क्योंकि प्रथम तो पुस्ती मगर, पामी पपा किले का माम मही है। दूसरे किसी एक स्थान को दोष नहीं कहवे सिने नाम एक प्ररेप का यो सरस्पती पोर इपावी योनों नदियों के पौष ४८ कोसा मा पा है। पुरत में पियों के पनेक भापम रे, पोन तो पकीय सेनने से न पत्परों द्वारा निर्मित पे मोरगी रनमें कोई निर्माण की कमा पी भक्ति पास-की पारप सी टिपाएं माप वा । म पनि नकोस की भूमि को यहा बोरा भी पाए दो मिट्टी पर रेत के पतिरिक्त पार ममा मिल सकता है? कुरक्षेत्रमा पन रस नायामिक कसौटी पर पाप ती पूरा नहीं सरा प चिन्ह ईमो मिलने वो। परन्तु पलाए हए । मौर परम परितो पूर्णतया मिट ही पए से सरस्वती नदीको सी सी है पी, परन्तु पाती मी कोई भी पित इस समय भी मिलता। फिर भी हो रहा पिम्ह दिनका पर्सम पारे नमार कागा उसी प्रदेश में पाए पाते निसे कि मात्र का पुरक कहते । परम्पपएँ पीर पनुमान पूर्णवमा यो ठीक नहीं होते परस्तुसिौ निर्मप पर पहले लिए परमरापों और अनुमान पा सहारा मेने में कोई शेप महो। मन परम्परामों पौर मनुमान के दृष्टिकोण से भी नही सम्मर कि पहा पार दिन पुरष है,गही वह प्राचीन दुम्सोध भी पा होगा। इसके पक्षिरित पमी भारत के किती पम्प प्रध में सर राही माहिये साल पुरा नहीं। इपिए पर विमार रिस परेर को कुतोष रोया ही पमदात्र पुस्तोत्र विसका वर्णन पास्त्रों में है। कुण्येन का भूगोम यह है कि- सरस्वतीपदरयोदेवनार्यदन्तरम् स देवनिर्मित देश ब्रह्मापत प्रषपाते ।। सस्मिन्देो म पापार परिपयक्रमागतः । पानी सान्सरामानो स सदाचार सभ्यते॥ एवरेश प्रसूतस्प सकाशादायमनः । स्वंस परिवं शिक्षेरन्पषिम्पा सपमानवा ॥' सरस्वती पोर पाती दोनों नरियों के बीच भूमि को पुष्परेस महापर्व पाते हैं। इस बझाब च में पो प्रापार विचार माधों के मोप म्यवहार करते नही सापार है। इन देशों में पैराइए प्रामणों के सरेस से समस्त पृषी के ममुप्प अपने-अपने परिणों को सुपार पौर रामसे विषा। विनशन तु तरक्षेत्रं यत्र नष्टा सरस्वती।' बिनसन (माप) रस क्षेत्र का माम है यहाँ सरस्वती नष्ट भवरा मावान हो पाती है। पक्षिणेन सरस्पत्या दुपारयुन्तरेण प। ये वसन्ति कुरुक्षेत्र ते पसम्ति प्रिविष्टपे॥" सरस्वती के पिण पार पाती के उत्तर में कुरो । बो मोग हुम्सोर में बसवेरा मानो स्वर में बघते है। सरस्तुकारन्तुकर्योयदन्तरं मरन्तरं रामवस्य पश्चात् । एतस्कुरक्षेत्रसमम्त पञ्च पितामहस्मोत्तरपेदिरुच्यते ॥ समन्त पञ्चक नाम धर्मस्थान मनुत्तमम् । मासमन्तधो बनानि पचपच च सर्वस ॥ गते शुकऽपि नृपति रहम्पहनि सरि पक । कपयिते यत्समन्तारसप्तकोशा मही पतिः॥ परन्तु परन्तुक दोनों द्वारपाम माँ की मम्मभूपि पामरम्प राम के पाचाहों मोर भषक पब के ममी भूमि को पुस्प्रेष पमन्य पमा और प्रजापति बझा भी उत्तरपेयी कहा बावा है। यस्म क्षेपस्य रक्षापं ददौ ४ पुरुषोत्तमः । पक्षबमनामान वासुकिं चापि पलगम् ॥ विधापरं सुके राक्षसेपरम् । ममायम पनपति महादेव पपायकम् ।। एतानि सबसोऽन्येश्य रमन्ति कुम्माङ्गमम् । अमीषा बसिनोमयेच मृत्मावानुयापिम ॥ (१) मनुसभिपापसोड १०१२ । (२) महामन (4) महामानामा सबोध (लमान-मामास ।
प्रष्टी सहस्त्राणि धनुषराणो निवारमन्तीह सुदुमतान्दै । स्मातुन सम्बन्ति महोग्रस्मास्त्वम्पस्वते वीर परापराणाम् ॥' दुवशेष के ईमान (पूर्व स्तर) कोण पर तन्तु यस है। कुमोत्र पनिहोरा (पूर्व पक्षिण) मीमा पर परन्तु यम कुमक्षेत्र नं कोण (परिषम रक्षिण) पर एम व है। परन्तु यस से सरस्वती दट पर पाकर पानीस कोस पर बापुकोण (उपर परिरम) पर द्वितीय परम्पर है। सत्तर सीमा में परन्तुक यम से पुष ही कम पापीस कोस पर रामहर है। सिप बीमा रामार से उत्तर माप में पासीस कोस से कुम पकिरी पर भरन्तुक पक्ष । प्रत्येक दिशा में क्षेत्र की रहार्य भगवान् विष्णु ने चन्दन मण, पम्नवराव भामुहि विपापर, पर कर्ण पक्षषराम सुकेपी महाराष परावति मौर महादेव नाम की पग्नि को नियुक किया है। यह सब सपने प्रेरकों सहित स्त्र की रक्षा करते हैं। महाभोर स पाठ सास्त्र पर रमेष में तुषर्मा पापिर्यों को भिर महीं होने देते पौर उमें इस क्षेत्र से मार निकाम । परम्सुमारन्तुकयोर्यदन्तर रामहदानो ष मकस्य च ॥ एसत् कुरोपसमन्सपम्पर्क । पितामहस्पोत्तरवेदिस्यते ॥ परम्तुक पोर मरम्नुको तपा रामहर और मरवा के बीच का बो भूभाग है वही होत एवं समम्वपम्पक है पसे प्रसा पी की उत्तरसेवी कहते हैं। (१) समान प.११ स. 1 ( महाभारत माताग्राममाय सोच महाभारत का कुरुक्षेत्र पर्मरोग मोष सरसट समरक्षेष स में परिणत हो गया। वो मुपवित्र भूमि प्राचीन काल में प्रापि पौर परपियों की पलस्वमी के रूप में पाव होती पी। बहा 'मात्मनो मोसाप बनता हिताय " समस्त पापिय सम्मति को विष प्राण विपु की सेवा में उरसर्म करके मार्य सन्तान अपने मानवस्व की पूर्णता सम्पादन का बत पाहण करणे रे। यो पुम्पभूमि में उमी के घर सोम प्रारोप स्मार्पपरवा पौर पर पो कायरता सामाग्म मिप्मा पोर मोगपासना की प्रणा से बारम विस्मृत होकर बम स्पम पोर मन्नरिम को भस्मीभूत र गमने बामे समराना पें पारमाति देने + लिए रेर मरेर चिम-विषिष विपर्स मरणास्मों को मेकर (ए। विपास भाप्त की मबम साप सक्ति पासुरी मारों से मारित पीर सम्म मोह मर से युक्त होकर मानों पार ही प्रपना बिनाप्त करने को संबार ।। पापों की सात प्रसौहिणी मैना के प्रधान सेनापति पुटपुम्न हए । सात सेनामय पर विराट सिरी पृष्टपुम्न पास्पकि भियान पीर भीमसेन । फोरमकी प्यारह मधोहिणी सेना के प्रधान सेनापति पितामह भीष्म हुए। ग्याप नाप्पम मामार्य द्रोणाचार्य पम बाप सरविण ज्या मसरनामा कर्ण पनि मरिमपा मोर पालीक हुए I पुरधेष के पिपट योर में पोरयों ने पश्चिमी कोण पर पड़ाव गमा उनका मुख पूर्व की मोर पा मोर कौरवों ने पूर्वी कोण पर पड़ाष गमा उनका मुख परिचम की पोरना। मुर के प्रपम रिन मनपाम् इम्ण ने भयुम को पीतोपदेश दिया। इसमें नि विवर्ग: पामीरपारी प्रधुन के सहारे पापों से भीष्म को पास किया । पनन्तर गोणाचार्य कारणों के सेनापति हुए पोर बा बनी मी प्रमौहिणी सेना से मुक्त हो मुख करने मगे । पाचार्य पौर मुस्स मषियगण उनको रक्षा नियुक्त हए । पांच रिन प्रोणा- चार्य पुरा करके इष्टपुम्न के हाप से मारे पए। तब सोसरे दिन कारणों की बची गई पांच सौहिली सेना के मापति बने । परियों की तीन ममोहिणी सेना के मन सेनापति हुए । पूसरे दिन पधुन मे कर्ण को मार गवा। तब कौरवों मे मापक पल को तीन प्रमोहिणी सेना का सेनापति बनाया। प्रथा मुषिविर में प्राचे रिन तक शाम करके उस्म को मार दिया । सम्पूर्ण कौरव सेना नष्ट हो जाने पर दुर्योधन मे मापकर पावन तानार में निवास किया । योग नपने पर परिव-पण मे पायन वामान पर पाकर दुर्योधन है भरा पुरकरणे उसे भीम ने मारगमा । मनम्तर पायतामा पनि समप परियों की सेना का विनाप किया।
पायों की घोर से अपम सारयहि मौर पौष परिर मही सात मतिरे। कोरमों की प्रोर भस्मानामा पामार्य मोर वर्मा यही दोन पपे। इघ प्रहार यह महाभारत मुर महारह दिनों में समाप्त हुपा। भूतराए पापा जी मोर मुस्कुस की स्त्रियां रोती रोष पपी और मृतकों का प्रत किया । तीसरे दिन पाय पार पादप कुरक्षत्र में भीम बी के पास पाए । भीष्म की युमिहिर को पान्तिपर्व में अंकित सम्पूर्ण पगारा मुनाया। पर सूय सरायण में मन हमा जब मुधिष्ठिर युवराष्ट्र पावारी हुम्ती पम मीम, मकुल सहपर कृष्ण विदुर पुसुस्सु, सारसहि इत्पादिपुरक्षेत्र में भीष्म जी के पास फिर पाए उस समय भीम बीको पोषण ती मानाप पर पवन करते हुए ५८ पषियो वीत पई पी मास का गुस्स पएका मासटीम माग ऐप पे पोंकि मास का पतिम दिमस ममावस्या पास प्रकार माग सुरी महमो के दिम मास का वीन माय शेप पा। मीप्म बी मे युपिष्ठिर को धर्मउपदेश देकर हष्ण पी की स्तुति की पौर प्राण स्पाम दिए। कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध क्यों हुआ ? कुम्न में ही महाभारत पुर पयों हमा? यह पुर भारत देश के किसी पौर भाग में को नही हो मया ? मरि मुख के लिए चुने गम्म को मराम की मापसाता पीठो ऐसे मैवान ए भारत देय में पनेक थे, फिर वही मुड न होकर ऐमी पपा विषेप गाव रोष भूमि में पी कि यहां पुरन होकर यहाँ सागमा ? रहर यह वर मि कुमले का मेराम हस्तिनापुर और स्वास्थ के समीप पामिए यहाँ मुम्हा तो मैदान यो प्रमापरार मार मम्म प्ररेप की पोर मी पापौर हस्तिनापुरम एपम्प की पा में ही मा परन्तु मर न वाकर पुरकीरा मन में मिए और पीर परिणाम में ही क्यों पाए ? इस प्रप्त के दो उत्तर है। एवोगा गो पारणों से मनभिन मोम दे रिक्षम की भूमि ऐसी है कि महा विर्स को किसी से प्रेम नहीं है मपया मा ममि मरदा । यहाँ पठोर इन लोन बसतेस सोपों का कहना है कि महामारठ पृट होमा निविषय से पया सो बमपान रुपण पार मिया कि भाइयों से भाइयों का पुर है मत मुदस्यम कोई ऐसा स्पान होना पाहिए यहाँ माई को ना प्रेम प्यान न पाए । सोरडे बोते कामास माए को होने वा एक हिसान प्राने पेड़ की दरी मेको रिसहित निकल कर गहा पा ही करने का प्रयल पर रहा है। परम्पय बहत प्रपरन के पापा भी मेह ठीक म ही हुई और बम का बहना बम नहीं हुमा व उसमे पास प पपरे पुत्र का सिर काटकर मे ग्रेड र दी पौर प्राराम से पेटकर पोरन हरले बगा। मह रेवार यपान इस मे निवि दिया रिपही म्भार सार्प रपयुक पोंकि पहा पिता को पुष भी स्तर महीं। इसीलिए अपक्षेत्र में महामाण पुरमामा माहामी किसी पार लेप नहीं बस्कि कमिव पर मन माम्ब है। परिहास साक्षी हि मन मिसने डोरी सपार पर पण पार Sोषमादि से संग्राम बिमा रिस रिसर की कार्यों के हरण होने पर पपमे गोरो पापों - हारा कौरव रत को पेर गमा वा नही पर्युम पुर की इन्पा मिए गागीय काखा हमा फुलोम प्राया और इस पुर-भूमि की व को प्रार प्रतिमा की किन वो मुर से भागू पा मोर न ही हीनदा रिसापा । वह बानता पा कि से अपने समाम्पियों से पुर करना है। फिर भी उसने मपवान् पण से प्रार्पना री- हुपीकेपा तदा गारपमिश्माह महीपते । सेनयोरुभयोर्मध्ये रपे स्थापयमेच्युतं ।' हैण ! मेरे रप को दोनों सेनामों के बीच पड़ा करिये । परम्नु पब उपरे सामने एसके सम्मारियों के मुन पाए तो इस फोन में उसके मन में निरं पता नहीं माई, रमाप उत्सम्म होने की अपेक्षा रो मोह हो गया और वह पिस्ता ठा- गुरुमहरषा हि महानुमान घ यो मोक्तु मैक्ष्मपीह मोके । हस्वापकामास्तु गुनिह व, मुम्जीय भोगाधिरप्रदिग्पान् ।' महानुभाष पुम्मनों को म मार कर इस मोड में भिधाम्त पोगन भोगना कल्याण कारक है। पोकि गुरुगों को मारकर भी नोक में पिर से राने हुए पर्प पीर काम रूप नोनों को ही वो भोमू मा। इस पर भगवान् रुपण ने प्रयुम को पीतोपदेस देकर उसका मोह मार दिया । म कमी पपु म मुर के मिए ठसार हुपा और उसने भगवान् मण से कहा- मष्टो मोह स्मृतिर्सग्मा स्वरप्रसादा मयाथ्युत । स्मितोऽस्मि गतसम्देह फरिप्पेबषनंतव ॥' है पम्पुव ! पापी सपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे स्मृति प्राप्त हुई है इसलिए म संसप रहित हुमा स्थित पार पापडी मामापातम करना । पर परि किसान की कहानी सरप होती तो न तो मनको कुष्येष में मोह होता और न ही मीतोपरेश की पावश्यकता होती । पनुन इप्रस्म से नाने की इमा थिए, मन में रमाय संगोए कुमरोज में पारा परन्तु कुम्मेत्र में उसकारमान नष्ट हो गया और उसे प्रपने सम्बन्धियों से मोर हो गया । इसलिए किसान की कहानी मिप्या पौर निराधार है । सरप इससे समा ही दूरपितमा पृप्पी पाहाच । इसमेन में महाभारत पुर होने का कारण महाभारत में बहुत सुन्दर गरिया पमा है- समस्त पञ्चर्क क्षेत्रमितो यामों विशांपते। प्रपितोप्तर देविस्तु लोक कत्तु प्रषापते ॥ सस्मिम्देशे पुण्यत्मे मोये च सनातने । समामे निपने प्राप्य ध्रुब स्वर्मो भविष्यति ॥ (१)सम रहो। (५) जाम सोला) गोद मागतोष (४) महापख।
रामन युरिहिर ! हम मौय पर सीमाविमीय प्रमम्त पया (म्मेष) को प्रस्थान करें परिमेर संसार के पाकिास सप्टिका मगवान ब्रह्मा की सत्तरी भाम से प्रतित । पुपाठि पुष्प समस्त भूमि पावाम और सब से भी पुति | सनातन क्षेत्र समत पम्पक में पुर में मरे मोम मरण ही सम प्राप्त गरे । पासपोऽपि कुरुक्षेत्र वायुना समुदीरिता ! महादुप्पसमर्माण प्रापयन्ति पर परम् ।।' एम्शेत्र में वायु के येय से नयी हुई म भी पदि धरीर से स्पर्म कर पाये वो पुरे कर्मों के पाप नष्ट होकर मनुम्य को मोय मिल पाता है। दूरस्पोऽपि कुम्वोत्रं गमिष्यामि वसाम्यहम् । एव य सतसे यात्सापि पापै प्रमुध्यते ॥ बोरों में रंग हमा पोप पाकर ग्रस कलेके लिए वापस पापों से सूट पाता है। मरा ये मुधि मामश्ष सिवायमपरायण } सेम्य पासु प्रयस्लेन प्रयाता परम पदम् ॥ पो प्राणी मुकि वाहने रामे वह पान से मात्र को पुति का सेवन से परम गति को प्राप्त हो पृपिया नमिपं धीमन्वरिने प पुष्पकरम् । अपाणामपि सोकानां कुरुक्षेत्र विधिप्यते ।। पोसवोऽपि कुरक्षेत्राद् वायुना समुदीरिख । प्रपि दुष्कत कर्माण मयन्ति परमाजविम् ॥ कुरुक्षेत्र गमिष्यामि कुरुक्षेत्र बसाम्यहम् । मएको पापमुस्मृम्प सर्व पापै प्रमुग्यो । भूमगत निपासियों के लिए ती ममिप पौर परिम निमामिपों लिए उद्यम तो पुखर है परन सम्मेष तीनों सोको निवासियों बिए रिपिट ली है। इसमेन में वा मारा गाई हुई इस मी पापियों को परपति देती है। पुरण पापा पड़ा निभाए पर बस इतना ही करने से मनुप्म पापों से फूटकारा पा पाता है। क्षेत्र पर में महपि पुसप्तप मे वर्पयन पिष्ठिर विस सीमा वर्णन माह महाभारत में प्रचार है। ततो पश्येत राजेन्द्र कुरुक्षेत्रममिष्टतम् । पापेम्पो पत्र मुख्याते धनाद सर्पगम्तमः । परेमा स्वर षियों पर प्रपंसिव समदी मापा पिस पर्सनमा ही पारे पाप मुहहो बाते है। (१) अमन भाव समास (३) माना। (1) महास)मारा समायोक०५१. मघवरा परमप्या १८ महामसम् । तत्र मास यसेद् घोर सरस्वत्यो युधिष्ठिर। या प्रमादयो देखा भूपय सिट पारणा ॥ गम्भर्याप्सरसो यक्षा पन्मगाश्म महोपसे । ब्रह्मक्षेत्र महापुष्पमभिगम्यन्ति भारत् ॥' है सुपिष्ठिर! यहाँ सरस्वती के तट पर पीर पुष्प एक माम तक निवास करे, क्योंकि महापर इस महा पुष्पहायक प्रकार में बझारि देव ऋपि, सिपारण पन्दर पप्परा पक्ष पोर माय निवास करो। मनसाप्पभिरामस्प कुरुक्षेत्रं युधिष्ठिर। पापानि विप्रणश्यन्ति ब्रह्मसोझप गन्धति ।' हे पुपिष्ठिर को पाणी पुरक्षेत्र में पाने की मन से भी अभिमापा करता है उसके पाप मप्ट हो पाते और यह बझमोक को बाता है। गत्वा हि यया युक्तः पुस्तोत्रं पुरुदह । फस प्राप्नोति प तदा राजसूयाश्वमेपयो ।' हे गुम्बंध थप्ठ | बो फुरुक्षेत्र में प्रया सहित यात्रा करता है पारामूप पोर परसमेप पौका फल प्राय करवाई। सतो मप माम द्वारपास पक्ष समभिगाय मोसहयफर्म सभेत ।। पपतर यहाँ मना पाम महापसी यसबारपाम को नमस्कार करने मात्र से एक बार गौएँ पान करने का फल प्राप्त होता है। ततो गच्छेत् धर्मश विप्लो स्थानमनुत्तमम् । सवसं नाम राबेन या निहियो हरि धर्मम पमेन्द्र ! उत्तरभाव पिप्पु पतत नाम सन्निहित तीर्य को पा यहाँ स्वयं हरि नित्य विधमान रहते है। सत्र स्नास्या प नस्सा प त्रिसोग प्रभवं हरिम् । प्रश्वमेपमवाप्नोति विष्णुसोक पगन्छति ।' पन्निहित वीर्य में स्नान करने पौर निनोकी के पत्पाल का भगवान् हरि को नमसार करने से प्रस्समेष या का फल प्राप्त होता है मोर प्रासी विप्सुमोफ को पाता है। सतो रामहवाम् मोर तीर्पसेबी समाहित । ते-तेषु य स्नास्वा पिसन् सन्तर्प पिप्यति । पितरस्तस्प वै प्रीवादास्पम्ति भुपि दुर्ममम् । इप्सितम्य मन' पाम स्वर्ग मोकन भासतम् ॥' इसके पाबाद तीर्प सेमी प्रमार गुमौन वीर्ष को बारे, इसमें स्नान करबो मिठको (१) महामाय नम सर्पस रेला रस पितर दृस होरर भूमि पर दुर्मम मनोगादित कामनार्मों को पूर्ण करने रापासरा पिए स्पर्म में से! कुरुक्षेत्र सम वीय न भूई म मरिष्यति। उन दादा यामास्तु क्या भूयो न बग्ममा ।' गुरक्षेत्र तीर्ष समान को उत्तम ती महोपोर महीपापो इस विवाए पार पाकर मैता है रसा पुनरंम्प नहीं होगा। ठे तु मैमिपं तीर्थ सार्या पुकर परम् । दापरे सु कुरक्षेत्र नमो गया विशिष्यते ॥' सत्यपुर में मजिप वीर्य महा पुण्य है अंठा पुस में पुष्पार, पर भूप में गुरमेर पार कमि युग मेगा पिपेप वीर्ष है। माय बासरं पुर्घ ससो नागहरं स्मृठम् । कृष्णा पिणाट कुरुक्षेत्र तम स्मृतम् ॥' पर कामादि नाम बहाबई पाकिर नामई और उत्पापाय पर होगा। मपैकदा वारसला पसतो रामकृष्णमो । मूर्योपराग सुमहानासोद रस्साये यथा ॥ हमारवा मनुवा रामन् पुरस्ता देव सर्वत । समम्सपमा क्षेप ययुः योविधिसमा ।। नि भत्रियां मही पूर्वन राम परामर्ता गरः। मुपाणां पिरोपेण पत्र पाई महाहदान् ।। ईने र भपराम् रामो यमास्पृप्टोपि कर्मणा ॥ मोकस्य ग्राहबानीसो ममा योऽपापनुसये ।। महरयो सीर्यपात्रापात पापन् भारठी प्रगा। वृष्णपश्य पा परेवाहकादय ॥' थो पुतीने पमा पीमिद में या किसी प्रमर एपमाद पस पोर गमरावती परका में निवास करणे थे। एक सराब पूर्णपाल नपा साकि प्रसव कप समारखा। मनुष्यों को पोतिपिरो राम पहसनपा पाने ही पम पमा पारिदिए पर लोग अपने अपने स्मास गेम से पुण्यादि पाम का पिए उमरममा दीप प्रज्वेष में पाए । समनपा मेहरमो प्रमीयामप्ठ पएम से पार पृषी को क्षवियहीन 5 रायी पार मोसोम मारिए । पीसोई साधारण मनुष्य अपने पार की निति लिए प्राषित करता है ही सर्व पधिमा भाम् परमपम पपने सापकर्म का कुछ समय पर मी बोरमोद को स्वामी पर पर किया पा। महान वीर्य सामारे प्रवर मानव बोजाब रा.रवार Marawatsar मरहेका . भारतवर्ष सभी प्रान्तों की बनता पुरुधेर पाई थी। उनमें प्रकार, सुरेश, सपन मावि परेरे भी अपने-अपने पार्कों का मान करने के लिए पुरुसोग मापे पे । इस सूर्पकरण के पर्व पर भगवान् सप्ण पुरुषेण में नन्द बाया पसोरा पोर पोपियों की भेंट हुई पी। महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक महाभारत पुर के पावाद म्पास पी पौर भगवान् सपा के सममाने पर परा पुधिष्ठिर हस्तिनापुर पाए मोर भगवान गण ने पाम्पसम्य पंस में वन मर कर पमपर युधिष्ठिर का परयाभिषेक किया । पान्धारी एवराष्ट्र पोर पुम्ती तपस्या के लिए पुस्मेष में पायए । पृतराष्ट्र से पुरोग में मिखने के लिए पापय परिवार सहित कुस्सेष पाए। बमराम और भगवान गण ने पारयों के संहार हो जाने के पश्चात् परम पाम को बमन किया । भगवान गण के परमधाम पसन के पासात पापों का पर कार्य से मनापाट हो गया महाराण युधिष्ठिर मे पुयुत्सु को सम्पूर्ण पम्प की मास का भार सौंप दिया पौर प्रपने पयसिंहासन पर प्रश्रिमायु पुत्र परीक्षित का मभिपेक करके हिमामय पमे मए । राजा परीक्षित ने बहुकाम तक पम्प म्यिा पास्मानुसार कमिपुत्र रामा पमिद के पम्प कान में पाया। यदा परीक्षित् कुरुलाङ्गगणोत् कमि प्रविष्ट निरपवर्तिते। नियम्म वामिनतिप्रिया तत' सरासने संयुग शौणिरावदे ॥' घिस समय राजा परीचिमाजम रेप में समा म म निवास कर सस समय सम्मान सुना कि मेरी सेना बारा मुरमित सामाग्म में कवियुग का प्रवेश हो गया है। इस समाचार से उन्हें रो पबाम हुमा परन्तु यह सोचकरकिर करमे का भरसर मिमा पतने मी नहीं हए । तत्पश्चात् पुरवीर परीधिद मे पनुप हाप में से लिया । पमा परीभिद का राप सरस्वती से मंगा तक फैमा पापानि रिनों भाभार में मापों का पम्प का। ऐसा पान पाया कि महाभारत पुरस्कारस पुस्मों की शक्ति बीस ही मईयो माया राणा पी इस कमजोरीका माम मार हस्तिनापुर पर प्राणमण कर दिया । पोर पुर में रामा परीचित हस्तिनापुर को पाते ए मारे गए। अपने पिता परीसिद का प्रतियोष मेरे लिए एम पुष बनमेजय में महिला पर मार- मण कर मानों को मार रिया। प्रस्ती बीच में परकर माया का बस रोका मार इस प्रकार वनीक नामपण प्राणों मेरमा हुई। परमेयम के पश्चात् उसके पुत्र सवानीक मै पम्प पिया। पगा सतानीको पत्ताद उसका पुत्र प्रसमेष राग्य पदो पर बैठन एका प्रारमेपल देवाणे होने पर हम पुत्र पसीमाण सम्पती पोरया रेबीच (१) मीमरमान प्रम नेम्शोग्यावरचोक । -
प्रदेश के रामा हुए। राया प्रमीमाण की मृत्यु के पाचार उसका पुष नेमिषक राणा
बना। एमा नेमिषा के एग्म कान में कुएराग्य पर भोर संष्ट पाए और उनकी रामपानी
हस्तिनापुर गपापस बह गई। इस प्रकार पुराणों में रामा मुरमका परपाव
पमा क्षेमका को इस संघका प्रन्तिम पगा पा सकतेईस पगापों का पर्सन पाया है।'
पद परमाद यह पौषमी मगध राग महा पप वापसती है।
स एपन्यत्री पृथिवीमनुल्मलित शासन ।
धासिप्यति महापमो वितीय व भार्गव ।।
सस्प पाप्टौ भविष्यन्ति सुमास्यप्रमुसा सुता।
य इमो मोक्ष्यन्ति महीं राजाम स्म पतं समा ॥
मव मन्दान दिन कश्चित् प्रपन्नानुवरिष्यति ।
हेपाममाये बगती मौर्या मोक्ष्य म्ति कसौ।।
स एव चन्द्रगुप्त नै दियो राम्पेभिपेक्ष्यति ।
तरसुतो वारिसारस्तु ततपमा शोक वषन ।'
पृथ्वी का एक पत्र पासक होगा। उसके पासन का उल्लंघन कोई भी नहीं कर
सोमा । मनियों के बिनाशार्म बह दूसरा परनुपम होगा । उसके सुमास्प मारि पाठ पुष
होमि। ये सभी राजा हमि पौर सौ वर्ष वा एग्य करपे । कोटाम पारस्यापन वमा पाएप
के नाम से प्रसिर एक आपण विवपिम्पात नन्द पौर सुमास्य पारि पाठ पूों का नाप
कर रासेया । उनका नाम हो पाने पर कनिमुप में मौरंगपो पर पति पृषी पर राग्य
करपे । वही बाह्मण पाने पाहन पम्ममुप्त मौर्य को पनाके पर पर पभिपित करेमा ।
या मविप्य पाणी थी पापबद की है। इस प्रकार पुरुष का इतिहास माने
पाता है।
महा पप
(१) बायोग गनिार और ममापात। (6)ीमानामात प. २१ यो से५ ।
()ोमरमरा समतोल से १५।
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कुरुक्षेत्र का ऐतिहासिक महत्व महाभारत से हर्ष तक महाभारत के महामूर पानात भारतवर्ष को एक मन्चकारमम युग से गुगला पासपुर ने इस विधाम रेस के सगठम हो ममोर दिया और इसके पबर पर रोमेरो सपिए । महाभारत पर संहार के पापा शेन का पुम प्रदेश चार हो गया। यह सपोभूमि मेमामों ने रावर रतरमित करो। कोरेिन्द्रीय पासन म पने से भरारमता का ताग पुरयामा और देम शिवोमर घोटे छोटे राज्यों में पट गया। छोटे छोटे एमापों सदी माठी रसकी मेम के सहारे पापरारम्ता बाई जिसम चितिहास मा सत्यापित पना सम्म म पा पार यदि इस सरस पुरत के युन में विहात बीपित भी पता को महान् पारगना बात होती ! कुराखेर रिक मनमा बामण पर्म का मुस्म केन्द्रमा। ईसा से पांच सौ वर्ष पूर्ण भाखब में रन की दो रिपार पायमों में बहुत पोर पाल दोनों विधार पापों का मुस्प दोष उत्तर मारत पा । बाइस पर्म के पहले से रो दर्सन न गर्म पीर पर पर्प निकल रोगों को मापक परिम राजकुमार से राहत पापोवन की समस्यामों से मुलम्मान देकर इन रोबर्मो का शामगि हुमा । ग पोर पोर पी का विषय एकही काम में पोर एक ही क्षेत्र में हुमा पोर एक ही क्षेत्र में पाप मयिक पसे। किवी न वोहर रोष माने प्रमाण को नहीं मिमता परन्तु भएमा पुर पुरमेर पनारे और रहोंने परम में प्राण पो दिमा पा। पाणिनी ने अप्टाम्पापी में मिता है। भटमास पुरलेन सोसह बस परों में से एक पा"" एक पौरमौर पन्य में सिया हिममीप सोलह पर परों में अपनी एक या परमा। महारमा पुर में एक पार क्षेत्र का प्रपत्र मिा ।' पिर भी स्वमाररत और मोर मुख पर्म का दररोष से राम धर्म का १) पदिनी मयाराम,१९९५.१(१) शिवतिर पसा, १४ भनाय सम्म वा कोई समाव नपा। इस मुम में गुरुशेत्र का कोई विशेप इविदास मही मिथा। मौर्यकाल और कुरक्षेत्र फ्टी घतानी में चमगुप्त मौर्य के उत्थान के साथ-साप पुरुष का भी उत्पान हुपा मह प्रदेश एक बार फिर प्राय में माया मोर इसकी महत्ता की। मौर्य कात में हुक्षेत्र संस्कृतिमा मापारिमा पिणा का सर्पोटबग पा । पूनानी विद्वान मेपास्पनीर सिम्पुम्स का पयत पगार मारत वर्ष में वर्ष पा। "सरस्वती तट का यह प्रदेश पिसे कुरुक्षेत्र कहते है रमणीक मोर चाम्सि मय है । कसा पौर विधा राग्य की पन छाया में फल फूल रहे हैं। मौर्य काम में और प्रभाव का सूर्य प्रस्त हो हा पा और उस समय बामए भर्म के सुरिन फिर मोट पाए । पर उत्तर भाप्त लोगों के लिए बाह्मण धर्म का पक्तिस्वाती केन्द्र बन गया। गिगानों और धर्मों का निवास स्मार होने के कारण विचा कहा पीर संस्कृति का प्रकाप समस्त पतयसप सम्मकार कोर करने मपा। . गुप्त पश और कुरुक्षेत्र गुप्त बस के राणा भी मौयों के पर चिन्हों पर बने पोर पोत्र प्रदेश पर उनकी स्पा भी बनी हो । गुप्त के काम में भी कुम्मेष प्रसिर पा इसका अनुमान इससे नगवा है कपि मठ कानिवास मे पपनी ममररुति मेमात काम्पम् में पुरोग का पर्णन किया है। ब्रह्मापर्व मनपदमपन्यायपा गाहमान' क्षेत्र मात्र प्रघनपिशुने गौरव तपा। रारम्यानो सितधरमर्यप मामीवपावा पारापातस्त्वमिव फममाप्यायवर्पग्मुसानि ।' इसोपपत बहाय रेप में पाया म्प प्ररेप करने पाने तुम वहां पर कोरम पापमों का पुखमा पत पुग्धेष में जाना 1 ते पुप कमों पर घसस्प बसपारा बरसावे हो से हो पागम बनुपपारी पन, सम्मुख पड़े हो रामा को यों पर घम' वीरए पाल बरसाए पीर एनके सिर कपनों कोबारापा। हिस्सा हासामधिमतरसा रेमठी लोपनासो बन्धुप्रीत्या समर पिमुसी भागती याः सिपेये। कत्वा तासामभिगममपी सौम्य सारस्वतीना- मन पुरस्त्वमपि भविता वर्णमात्रेण कष्ण ॥' सापो चिन कारण पार पापों पर बराबर स्नेह होने से मम्मस्पर स्वीकार (१) मेगास्नी मा ४ सानो XXCIIF1 () मेवाक, मेष रस्तो (Oौरासमेत पूर्व मेष रमे कर किसी पर में पुर करने के लिए न मिलने वाले पसदेवी ने अपनी पत्यन्त प्रिय व पिससे रेवती की मावों का चिन्ह निकतता है ऐसी मुराको स्याप मिस सरस्वती नदीका सेरन किया उसी सरस्वती के बन का तुम सेवन करो। ऐसा करने से कामे रंग के भी तुम भीतर से मुट हो जामोपे। परन्तु गुप्त रंग के प्रन्तिम वर्षों में भारत के उत्तर-पश्चिमी द्वारों को बंमती हूण पोर-जोर से पटपटाने ममे । समस्त भारत देश भयमीत हो उठा। ईसा की मृत्यु के ४.. वर्ष पश्चात एणों की सेना भारतवप पर टूटी। द्रों के प्राक्रमण को एक र प्राधी पाईपौर स मर्यकर पानी में मुप्त पय का हा सहा पग्म मूडे पत्तों के समान सा पया । सम्म मुप्त के राग्य काल में उत्तर भारत पर खेत हूणों का प्रषिकार हो गया पार पुरोष प्रचों के सामाग्य का एक प्रान्त बर मया। इण मरेप मारगुप्त मौर मात्र पर पसम्प और हिंसक प्रवृत्ति के परा पे । उनकी भयानक पोर मिनाली मापाए भाग भी रोग बरे कर देती है। सूत्र पिसम पाणक्य पौर परपुष्प ने मारतवर्ष के मोटे चोटे पणयों को पिरोकर सारं भौम सामाम्य बनाया पा, हों के टीके झटों से दूर गया । रेच फिर पोटे-छोटे पम्पों में बट गया। भयबस्ता पुर समप, महापयाँ ममरे पौर रकात प्रतिदिन को साधारण सौ पटनाएं बन गई। उस समय न तो कोई एक पत्र शासन पा पोर न कोई विमान । इस कान में उत्तर मारत में अनेक परिवर्तन हुए और समूचे उत्तर भारत का साप ही बात पया ! इन परिवर्तनों का कुरुक्षेत्र पर भी प्रभाग पड़ना मावएपक पा । ससति की या म्पोति या प्रकाश बो मौर्य कास में फैसा पा मोर गुप्त पंप के रामाों ने रिस पर चा पाया की पी टिमटिमाने समा। कमा पार संसति पम्प पर पाबारित होती है या ना को मामित्र होकर उम्नति करती है। पर उत्तर भारत में तो पम्प के माम पर इसकी पमुता का नाम वापर नृत्य था, फिर कमा पार सस्कृति विसका किम पुरमेश वा किस पार किसकी मोर में फूलती फसती ? यौपेय गणसत्र में कुरुक्षेत्र सन् ३५.-... में जब मुप्त पर प्रवासी सम्राट समुद्र मुख का पग्य पा। कुम्टन प्ररेम प्रपरा सतमुग पार यमुना नदियों के मम्प पिता हिसार रोहतक को पपने पौषम में लिए महान् मोरेय पाति का पणवा प्रसामी बाप सवामित पग्य पा। प्रपम मी पहुस मस्रियायन ने पौषों पर एक उपम्पास मिया है जिसमें कासना का सहारा पिक सिया परा है। परन्तु इसमें प्रम कोई सन्देह नहीं कि इस प्ररेण में योग्य मादि का प्रबल पणतंत्र पा। यह मस्तक पीपी सी में फना पूला पोर पापी सकेपन्तिम परए में सम्राट बयत विक्रमादित्य ने पापों का स किया। इस समय पराम प्रसानीपचामिक पम्प समात हो ऐ पे पर एएन केन्द्रित पम्पों कीमार परको होदी की। यौमेय पणतंत्र भारतवर्ष का प्रन्तिम परवाना। इनाहावार कविने में गाली सेनाया गया एक पापाण स्तम्म है उसमें समुद्र गुह मे मिला है।
प्रकार स्तम्ल या कोई सनाव नपा। इस पुन में गुस्साब का कोई विशेष इविदास मही मितता। मौर्यकाल और फुरक्षेत्र फ्टी पवामी में चम्मगुप्त मौर्य के उत्पान के साथ-साप पुरुष का भी उत्पान हपा यह प्रदेगा एक बार फिर प्रकार में पाया और इसकी महत्ता पड़ी। मौर्य काम में कुम्भ संस्कृति वा पाप्यारिमक शिया का पठिबकेगा । यूनानी मिशान मेनारपमीर सिक्स का रापत बमार भारत वर्ष में कई वर्ष या। "सरस्वती तट का यह प्रदेश रिसे कुरुयोन कहते है रमणीक पौर शान्ति मम है। कमा पौर पिया राग्य की पत्र धाया में फल फूस रहे हैं। मौर्य काम में और प्रभाव का सूर्य पस्त हो पापा और उस समय बाह्मण भर्म के मुरिन फिर मौट पाए थे। कुरक्षेत्र उत्तर भारत के मोपों के लिए प्रामण पर्म का पतिपातीमा गया। विद्वानों और धर्मों का निवास स्नान होने के कारण पिया कचा और खेसति का प्रकाप समस्त रत्तयसप प्रबकार कोर करने का। गुप्त वश मौर कुक्षेत्र प्रत बस के पना भी मौर्यों के पर पिनों पर बसे मोर पुरोष प्रदेप पर उनकी पा भी बनी पड़ी । नत रंग के काम में मी मुम्सेष प्रसिर पा इसका अनुमान इससे समना है करि पठानिरास मे अपनी प्रमरकृति मेवात काम्पम् में रोष का बर्थन किया है। ब्रह्मावर्स पनपदमपन्यायमा गाहमान' क्षेत्र क्षर प्रपनपिशुन कौरवं तया । राजम्यानो सिवसरपातैर्यत्र माणीवमम्बा भारापास्वमिष कमसान्पश्यवर्पग्मुसानि ।' बस स्पयन्त सहाग रेप में छाया कप से प्रमेय करने बामे तुम यहाँ पर कौरव पापों का मुरहमा अध पुष्पेन में बाना । से तुम कमों पर पम्प बमपारा परसा हो जैसे से गापौष धनुषधारी भर्नुन मे सम्मुख बरे हो पा लोगों के प्रमों पर पराम' तीस बाप बरसाए पर उमरे सिर कमलों को काटा था। हित्वा हासामभिमतरसा रेमठी मोपमासी मन्मुप्रीस्या समर विमुसो मागमी माः सिपेरे। करवा तासामभिमममा सौम्य सारस्वतीमा- मम्म शुखस्स्वमपि अविसा वर्णमात्रेण कम्ण ।' है सानो ! कारण पार पामों पर बराबर माह के होने के मम्मस्वपन स्वीकार (१) मवाली प्राय समोXX,CIIFI (२) मेघाट मेव स्तोत्र ।। (जीरास का मेला पूर्व मेष रतो : कर किसी पर में मुरकरने लिए म मिहने वाले बमदेवको मे अपनी प्रत्यन्त प्रियम बिससे रेती की पाखों का चिन्ह निकलता है ऐसो मुराहोत्याग मिस सरस्वती नदी का सरम किमा, पसी सरस्वती के मन का तुम सेवा करो। ऐसा करने से काले रंग के भी तुम भीतर से पुरहो मामोगे। परन्तु गुप्त बम के मन्तिम वर्षों में भारत के उत्तर-परिचमी बा को यमनीहून पोस्लोर से पटपटाने मगे। समस्त भारत देश भपपीत हो रहा। ईसा की मृत्यु के ४.. पापात इयों की सेना भारत परीण माहमण की एक ठेर पामी पाई पोर इस नकर मारपी में मुख मंच का पा सहा राग्य पूरे पत्तों के धमान ay पया । समग मुसरे एग्य कान में रतर मारत परतणों का परिकार हो गया और पुरमेन प्रदेशों के सामाग्प का एक प्रान्त का पया इस मोष महापुन और साफ फर मसम्म मार हिसक प्रवृत्ति के पराप । उमड़ी मयामक पौर पिमानी पापाए पाग मौ रोग बरे कर देती है। सूत्र जिसमें पाएप मार बमपुर में भायर के छोटे पोटे पएपग्मों को पिरोकर साई भीम साभाम्प बनाया था, णों के तीरे मरकों दूर पमा पकिर छोटे-छोटे राम्पों में बह गया। पपरवा पुत्र संभ, माया मारे पौर रकात प्रविरिल की शरण मी पटनाएं बन गई। उस समपम वो कोई एक मत्र पावर पा पार न कोई विमान । इस काल में उत्तर भाषण में प्रवेक परिवर्तन हुए पौर समूचे उत्तर भारत का सप ही परम पया। इन परिवर्तनों का पुरक्षेत्र पर भी प्रभाव पड़ना पावापा पा । सावि की बहन्योति, बहु प्रकरण यो मौर्य काल में संता पा मोर गुरासरे रामों में घिर पर साया की पी, टिमटिमाने लगा। कमा मौर संसाति पप र पापारित होती. एएमा की पापित होकर रामति करती है। पर सघर भारत में वो पम्प माप परणको पपुवा का नम सागर एप पाफिर कमा मोर सेतति, विसका कि केन पुस्खेर पा किस ते पार किसकी गोर में फूमती फबती ? योग्य गणतन्त्र में कुरक्षेत्र पन १५.-... मेरा गुप्त र प्रतापी रामाद समुर सभा एप पा। पर प्ररेण पपा रतनुस पोर यमुना नदियों के मम्प पिता हिसार म रोहतकको अपने पापान में लिए पहा पोश्य बाति का गस्तष प्रणाली माप संपासित प्रग्य पा! सर्व प्रपन मी बहुत सारहत्यामन ने पौधों पर एक उपन्यास नि निमें परफ्ना का सहारा पिक दिपा पया है। परन्तु इस पर कोई परमही कि इस प्रोप में बायपातिप्राम पर पा! यह पता चोपी सदी में फमा पूमा और मी समन्तिम चरण में समाए पनपुप्त विक्रमारिरव ने पोषेपों का सम्मिा । उस समय मात्र प्रयातोरा साधिक पम्प समाव हो पेरे पोर एप्प तिव यग्यों सीमाव पाटी हो दोनो। यौनेय गसर्वत्र भारतवर्ष का मन्तिम यणा । माहाकार दिने में कौशांबी से भामा पपा एक पापाय स्तम्भ है समय समा गुस ने लिया।
"मिर्माप्तबा रामन यौधेयमादका सर्वकरदानासाकरण प्रणामा गमन पोपयों ने कर दान माज्ञा स्वीकार पार प्रणाम द्वारा मुमे परितुष्ट पिया है। इससे स्पष्ट है कि समुरगुरु ने मायेय पण का उन्श नही किया। हिम स्विविधालय कासी के इतिहास विभाग के पम्पप ग. प्रसवेकर के मतानुमार पाणों कपासन को समाप्त करने का मेय गुतों मारपियों को नहीं बस्ति पोपों को है। योगों के सिपके ईसा पूर्व इसरी सदी से पोषी सदी तक मिमते हैं। प्रपम सिनों पर तिष्ठा है 'सौपेयानो बहषाग्यकाा" प्रयना 'भगवस्वामी ग्रह्मण्य देवाय" पापा के सिहों पर यौयेय गणस्प ययः", योयेयानां जयमत्र पसिना"। भखपुर राग्य में एक नुदे सत पर है यौधेयगणपुरस्कृतस्य महाराम महासेनापते पू ब्राह्मण पुरोग पापिष्ठाम पारीरादि मुशस पृष्ट्वा सिसत्यस्तिरस्मा। एही मौभेपों के प्रवारी पए का कुरक्षण मध्य प्रदेशबा। . वर्धन काल में कुरुक्षेत्र ऐसे समय में परस्पर पापा ब सतिपाती रोगस्वी समाट प्रमार वन इस भोर ममावस्या पावापरण में पूर्णिमा का पन बनकर इस्ले माकाध से निकता उत्तर भारत उसके प्रकार से पामोकित हो पया । यह सातवी धावामी का प्रारम्भिक काम पा। सम्राट प्रभाकर पवन ने अपनी मीरता से को दुषे पयती को पराजित करके पीसकर परिवा पोर कुम्यग प्रदेश में एक मुस पग्य की नीम गती । सम्राट प्रमाकर वन सिब के पास। यही कारण है कि उन्होंने अपनी राबवानी का माम स्थाणेम्पर पौर राम का माम पीकम्ठ बनपद रखा। सम्राट प्रमावर मनपा प्रतापी रागाहमा है। उसने सिन्द गाम्बा, पूर्वर, साल मामर देणों पर विजय प्राप्त की बीपी हिरनी *मिए बह कसरी स्थापना । इस प्रकार यह स्पाप्पीवर पोटे से पम्प को पाकर पारामापिरार की परमी से विभूपित हुआ। इधी कारण उसका दूसरा नाम प्रणापपीम पा। प्रभाकर पर्मन प्रत्यम्त पराकमी होते हए भी रमापा पा । उसने मामा के पगा के मारे जाने पर उसके मनाप मारों के साथ स्नेह म्पबहार किया । बह सूर्य का उपासक पा। उसकी पनी मघोषठी परिष का चित्रण एक भारतीय पतिव्रता केस में हमा है। पनी पोवती के उपर से ही पल्यार्पन हर्पन पोर पग्यघी मे पन्म मिया । मपाकर गर्वन ने राम्पपी का विवाह पड़ी गुमनाम से मौवरि यमन प्रतिवर्मा के पेष्ठ पुष बाहवर्मा के साथ किया। सम्राट प्रभाकर कई के सुधार और सक्ति सहित पाए पम्प प्रपत्र कारण कुरक्षा प्रदेश में पुन पान्ति स्थापित हुई। सान्ति के साथ साथ उसकी सहमरी बहनों कमा संरकृति मौर खिा का मुभारमन शिर कुम्मेष प्रोण में हमा। समार प्रभाकर गर्मम साहसी पोगा पार बीर रागा। उन्होंने कुम्पेत्र प्रदेश का मब निर्माण देसी सेकरला पारम्म किया। भाग्यमा सम्राट प्रभाकर पर्षनके पासन काल में संसाठका सुप्रसिर कपि पौर भारससार बाणभट्ट इपा है। बासमट राम्म करि पौर हर्ष वर्षन का मिष पा। पामट्ट 7 । में मनापर न पार इप पम पम्प कास का पिए अपनी ममर रवि ' हरित' में पत सुमरन से किया है। हर्प परित एक ऐतिहासिक पापा है। गएमट मे हर्प पति के प्रारम्भ में पपती पारम रूपा भी दी है और इस पपन को नापक बनाकर उसके सम्मकाम की प्रमुग्न पटनाओं का साना दामा उसने पा मोर बुना है। बाम इर्प पछि में उस कान की मनीति सामाशिक या सांसानिमाम्दोमन शिानों को गोष्ठियों पौर विरोपत पुरके बन सापारण से लेकर राजमहल की गतिविपियों पर प्रकाश रामा है। हर्प परिक्ष में उसने कोप इतिहास ही नहीं मिया कि उस समय के सारी और दाम्प नोरना ऐसी सुन्दर बी में वर्णन किया है कि ऐसा आता है मानो उस समय का पुरोष पण मेकर परमुख मा पपा ममता है, "स्यापीयर में मुनियों के तपोवन सामों की गीतालाएँ रिवादियों के पुरस वियों को पिट मोष्ठियां पारणों के महोत्सव समाव पे । धामो पीपी माप, पिपी म्पापा बी गोर मिषु प्रादि समी प्रकार के मोम पे। स्पानीपर के पास पास का देश इतिहास तपा प्रति परमरा मे पाप प्रापीमकाम से भसिर । महाकवि दाम के पनानुहार धौरा नाम का महा नपर विसका स्पानीपवर एक पतनुक्ति प्रदेश पा व समृविशाची पा । उसमें हरे भरे उपवन और मुम्बर र अन्न से सम्पन्न देत और फलों से मरे दाम पे। देश के निवासी मुव पौर पाति के साप अपना वीरम पठीत से थे। सभी प्रकार की पावायक बस्तुएं प्रार परिमाण में अपनी मोगों का पापरमिकमा पा पुष्पारमा पे मोर रनमें पतिमि सत्कार का भार पायरयता से पविक मात्रा में वर्तमान पा। उनके बीच महापुर्यों का पमार महीपा पधर्म पर्णसंम्प, विपत्ति पा स्थापि काही माम नही पा । सरप के रिमामुमो दरा सांसारिक मुष की कामना कसे पामों को समान मुभिमार प्राप्त की। अपियों व्यापारियों तपा प्रमियों सभी के लिए या ए प्रिय । विद्यानो और पोशामा से रह रेप परा पड़ा पा रामसित कसा के प्रमियों की पम्पा मी कम नहीं थी। गुण तमा पामिर पापरणारा सम्मान किया पाठापा।' नोविषय में महापाता कि यहाँ तो रीतिरिवार और इन सहन पित तपा पनुशरपे । समम एम पम्पमिता में एक दूसरे प्रविसर्ग करये ऐ । मर मिया में मोर्मों का एवं विकास पा। मत प्रापबा यमलारपूर्ण कार्यों भाव मृत्य पाठे महाकवि मायने भीम रन पर के विषय में अपने भाई पुणे पेरे में बैठहजिक हुए पारम्भ रिया- युयताम् अस्ति पुष्पावामभिवासी वासवावास इस पसुपामवतीए सप्तमसंकीर्णवरणम्यबहास्पिति तयुगम्पस्प , स्पप्तकममबहमतया पोत्रो. ग्मूस्पमानमृणासहदोवमेरिनोसारगुगरिए समधुकरकोसाहसंहसेस्सिस्पमाम "मामी गापा परताय दाम! १०॥ (२) परम 1ि01 ६५ क्षेत्र धोरोपर पापिपयोदसिकामिरिव पुरेसवाटसततिमिनिरन्तर', प्रतिनिश मपूर्वपवतकरिम खममानपामभिविमग्यमान सस्पकूट सकटसरमसीमान्त', समन्सादुदातपटीसिम्यमानमोरसयूटटिमित भूमिः, उर्वगवरीयोभि धासेयर सकृत, मुनिए-पीरष्ठ नाम का एनपर । बह मार्मों पृषी पर सतरा हुप्रा पुष्पणासी लोगों का निवास स्वा पा । यहाँ बामण मारिणो की मारा परस्पर एक पुतीमिमी न पी मानों यहाँ सतयुग की मबस्था हो गई हो । इल से यहाँ पेत मोते वा हे पे ससम्मतों के अधिक होने के कारण हम के फार से मुशास उबा गाते थे और कमसी में 48 ए मौरे पर मुशारने मपते तो मपता कि पृथ्वी के पत्तप्ट मुणों का वर्णन कर ऐ हो । पाऐं पोर वि से हुए पेरि मानों क्षीर के समाको पोकर पाए मेपों बार कर सीमा पा। सर मोर पणा-समा पर समिहानों में पिम पर्वत की नाति मान की रिपो सगती। एटकारा पीर की फसम सेहरी मरी बमीन सीची पाती । बनहरों में पान मापसे । बम-बगाही कृषिम भूमियों में पके हुए गरी पीनी पौर पकहर पटक ए मूप पोर पर त सब पोर पर हुए थे। परवाहे पाएँ प्रोर संगों में मैस की पीठ पर बैठकर पीत मा ऐप मौर परती हुई गायों की ऐपमान करने से । मार्यों में गरमभिधा नपट कर उन्हें परेशान करती और गठी हुई चिदिपा भी उनके पीपे पर पाती। पार्यो की पैर में भी हुई बटियां मार मोटे-मोटे गुमर बहन मार भागार करते थे। मा चारों पोर पत्त में रम्भावी। प्रवीण होने की प्राक से पिपी के सो महापपिए ए धीर समा को मानों पुष भनेक बार के रूप में उत्पन्न करती थी। मादी वाटी पास की अट्टी बार मना पाती थी । पनेक मनों के होम धर्मो से भरे होने के कारण इनारा सोरी पांचों के स्म में हगारों मून रस स्थान को पिप पिषित करते । केरा पचामोंग-उपर पते पराप पस प्रकार मर कर सोमा उत्पन्न करो पे से प्रथम पणों मस्म रमाने से भगवान पिक नपर-पार्न खोमिन हो पाये हैं। पर पापड़े में साम के सामने मसुरमय ये । निर्णय के मार्गों में बंट बजे पावरोट के पत्ते तोड़ कर घट कर बाते । हातों पकाकर गुमाए हुए मातुमु पौ फोमन फो के रस से मिपे, सेम से बोरे मए पुणों के पब से परे तवामपप पे यहाँ पाये फलों को पपिक मोग मुस पूर्वक सोते मामों बन देताओं में प्रमूवरस के पनसामे कम में उन्हें मपित किया हो। पौर भी, यहाँ बिनके पास-माम बीमों में मानों सुम्मे पर बाती सप यई हो ऐसे मनार के फल मये । इन पर बैठे हुए पान माम मान पानों को देखकर पूनों का प्रय होने समता पा । यहाँ उपवनों में मानी मारिपन मौका पानी पौठे थे। पवते मोप शिवार पपा मेते थे। मंगर ममुर पंच से भरी तारीको बाट पाये। कोर पास नाम: फों को सर गनते। मम्मे मम्मे कम बों की मालियों है यहाँ बनायस गिरे हुए पे । पममें पशुओं के वर कर बम पीने से किनारे का पानी मटमैना पतापा। सैकड़ों यही पहा पाकर टिकाये। डों के पामने वाले बटों के सा पीती हो पाव-साप भेड़ों को भी पारों पोर युटावे ।कही-कहीं दिखामों में पोदिया मानों सूर्य के परे पोड़ों को गुमाने के लिए बरती बीडम की भूमि में इसेट करने से कम का रस सनो घरीर में ना पाता था। मुहम्ठाहर पुवुन को परोगबारे मया कि अपने पेट को को हवा की पवि सिखाने का प्रपल करती। बावरियों के समान समरिण करती दी । निरन्तर मन-भूम के पापकार आए प्रेसवे इए मुख ईसमूष की भांति समते थे। यह पनपर मीत में मृग की प्राचार पर मत होकर नाचते एप मरों के समाम मपने वैभव से सारे बीपमोड को मुखरित कर हाथमा की हिरणों के समान पदरात परिख पाने मुक्ता समुणिपनों से यह सुपोमित था। संकरों यही से मिसो महान् म फों को मपम्पकार ने ननवे है उसी प्रकार सब पतिभि पाठर हप्त होने से पूरी की मुपच में बछे हए मुबरोप निमित पण को पालने पासे हिमामय के समीप के पर्दों के समान गा मात्वसाधी बोम पते थे। विष्णु नाभि-मपद के माम पहाँ पनेक माय । बिममै हिमे कमों पर पत्तम पथी मुशोभित होते । मप से रम हुपा महा दोपहर की पृषी को पोवा हुमा रिधानों में परसे अगवा पा तब ऐसा मत किशोर पामर के मंचन का प्रारम्भ हो पया बहा निविप पनियों से उत्पम्म पु मगने के कारण निकले हुए मयबम से पुषार पामों प्रसव टिपा (निबार) समाप्त हो पई पी। पसन- पाटको मनियों से मानों पर पारिवाई नहीं देने मपे। पतिी हुई मकड़ी में पार फरसे काटे पए पशु की प्राति मामों पपर्म विरोर्ण हो गया। पाकी मम्मि से वठेहए येन की पुर कीबनबार पुनकर मानो पलों की पिपपठा मिट पईन में री पाटीई हजारों की संया में पापों में पीपों से मानो कोर होकर कमि भाप पपा । विपत्तियां पानो देव मन्दिर के पत्तरों को पाटने पाती कियों से बपित होकर पूर्ण होगा। पर माम महारानों के समय में होने वाले कोलास से मसारमाप पए । पापियाँ मानो समोर रसोइयार में प्रपाठी ई पनि पाप धन्य होकर पिसीन हो गई। पो सर्प पर पराए गए मगायों की पनि से रर मानों अपमृत्यु पाठ में नहीं परमवीपी।ति भाषाएं मानों निरन्तर रम्पनि होने देगहरी होकर पनी पर। पुर्वाप्प मानों धर्म के पविकार घे परिभूव होतर मलान नहीं हमा।' पीठ बमपरकी पमपानी स्वामीसामार कार्सन महापरि राणा प्रकार थिमा। "पैविधे मानारायाभिरामसुमपम्पपरिमससुभगो योपनारम्भ इस भुवनस्य, राममममपिपरितबह-महिपोसहस्रशोभिसोत पुरनियेय व पमस्प, मनुस्यमामबमरीबासम्पयन शतपपलित प्रान्त एकदेपा व मुरराग्यस्म, (१) महारण सीमान... (मरा बाबा पनि समस्या 114 . ज्वस मतशिसिसहस्रदीप्यमामददिगन्त शिविर सनिवेश सतयुगस्य पमा सनस्थितनापिप्पानापीयमान समतायुसमप्रम प्रथमोऽयतार इव प्रहमोकस्य, पसकसमुसरमहावाहिनी शत संकुसो विपक्ष इवोत्तरगुरणाम, ईश्वरमागरणसवा पामभिन सकसनो विजिगीपुरिय त्रिपुरस्य, सुपारससिक्तपरमगृहपत्तिपापुर. प्रतिनिपिरिय पद्रमोरस्प मधुमदमप्तमाशिमीभूपणरवरितभुवनो नामाभिहार इव पुरनगरस्य स्याग्वीश्वरास्यो पनपदविशेष । इस प्रकार के उस बनपर में स्पानीपर माम की पगबानी पी। मनकस्बों में मुमर फूलों की फेमतो हुई गम से ऐसा लगता पा मालों सार यौवन का प्रारम्भ होने बना हो । तुम भी नबटन से हमारो सुम्परियां अपने परीर की भी किसी की मानों मा पर्म का पन्त पुर हो । वायु से पम्पित पमरी गाय के दामों से उसके समीप का सू मान सफेद पा मामा शवर्ग का एक देय हो। गमतीहई हगा पनियों के समस्त रिए प्रकासित भी मानों बह सतयुष का सेनानियेम हो। पपासम तमाकर 8 हए प्रापि तारे पापरामों का समन करते थे मानों यह गानोड़ का प्रपम प्रमवार हो । बड़ी-बड़ी समाँ मरिया प्रपती कम-कत से उसे मर देवी बी मानो उतर रही हो पा पए हो। पगा के धम-पूर्वक कर मेने की बात तो यहाँ के नोप मानते ही नहीं पे मानों मा पिपुर पीतने का मुहै। मुपा रस से पुते हुए समे-बमे माँ भवन पे मानों मह वाममोकका प्रतिनिधि हो । ममुपान से मतवामी कामनिर्यो के महनों की पावास सारे सुपन में पास हो पाती थी मानों बह कुरेर की नगरी मनका का ही बरसा हुमा कम हो। मुनि मोम उसे पोषम कहते पैश्याएं उसे कामायतन समझती मासक भवनक सोम समभते कि यह पगीतशाता है। प समझते कि पमनपर है याप समझो कि चिन्तामणि की मूमि है सस्त्रों की जीविका बामे नोग से पीर भूमि पर्व भिवानी उसे मुगुम कहो पाने पामे से मवर्गमगर सम मते शापिक से विस्वकर्मा का मन्दिर सममले बलिक मोम कहते कि पाप की बगह है, बबी घोगों का निर्णय मा कि भोग्य स्थान है अरमन उसे सामु समागम कहते सरमा पोप उसे पचनिमित पिवळा एमझते पतुर मोग निरनोष्ठी की कामना करते परिकतोप उसे अपने पुष्पों का परिमाप सम्म मानते पाविक मोग सापना के लिए उसे पसुर-मियर सममते मिनोग पसे पोस बिहार मानते कामी मोग उसे पप्परागों का मगर कहते पारणों के अनुसार या महोत्सयों का समारपा पर उसे बम का प्रवाह ही समझते । यह की स्त्रियां मातमामिनी पर्वाद एपीके समान अपने नामी पौर सीवरती की। पौरी पमा मौरपर्ण पानी पी। पौर ऐमर्म में अनुपम करती थी। सारसी श्री पी पीर माम मणियों के पाभूपस पहनती थी। उस से उनका मुख परिष पा पौर परिपकी पर बाली सांस मेठी की। पत्रमा के समान सुन्दर र बासीवी पिप केस के समान पन पंप कोमध में पुणे उन्हें प्राप्त नहीं कर सकते का पारस करती नी मोर बमनों से सुसोभित की पमा टिपाप पचचा मा ।
०१ रे मारम्प यामी मौर मपुर मापसी पी। प्रमाणुम्पी पौर समा गएं प्रसन्न एवं उरमास पा पिपसमामम के लिए मुकम पी मोर पूर्व पोवन परमा पानी पी। गौ मुम्हरियों की मां ही रिटी सहन फूम-मामा म पाती गुवनय मों से माला मार प्रतीत होती । म गामों पर पिराए इए पासोक प्रतिबिम्ब ही रसेप नरेने पाने कवितम बम बाते फिर कान में पवितसकेप में क्यास पर काममामा पुमरठिमार हो गवा मागे प्रिय की पाझे उनक लिए मुन्दर कान का प्राभूपण बन पापी, फिर भी उनका म सपाना पारमर पाप पा । म पोम हो निरन्तर पासोक सत्पन्न करते पे मणियों रे दीपक तो देवच वैयर के पित होने के कारण से पाते थे। सनकी सुपम्पित मासो पर हमले हुए मोर ही उनके मुख पर सुन्दर पर पट का काम करणे पे फिर भी प्रपा मावे के अपने मुह पर पर की नामी राम सेती यो। रनकी पाणी अत्यन्त मधुर भी गाए पता के रूप में ये शारों को घेरकर मीणा बनाती। चनकी मुस्कान ही भरपन्य मुगन्धित पटवास का काम देती फरपुर को पूम निरपं प्रतीत होती दी । सके पर की नती हुई मम्ती ही उनके मंगराप का स पारण कर मेवी, फिर बिना किसी माम गुम मनाना उनके मावम्य का कर्मकरन बावा पा । चमकी कीमम मुगएँ ही परिहास के प्रबसर में ठोड़ने की ममता पी फिर मूणामों का यहाँ प्रयोगनी या ! पोषन श्री मारता से उनके स्तनों पर फूटने इए पसीने ही मुम्बर हार के मान सगते फिर उनके घर पर हार बोम मात्र प्रतीत होते थे। उनले नितम ही प्रेमी जनों ९ दियाम के लिए स्थटिकमणि के रिमान सोहए गिमातम की पती भवन रिका समान । उनके परणों को फमन समसार बैठे हुए भौरे ही उनके परणामरण पे यहां मनाम मणियों के भूपुर निप्पल थे। नूपुर की मार से हिए भवन कम ही उनके अपने के लिए पोप्प मापो बनते बस ऐश्वर्य के मान लिए उनके पाप परिजन हा करते थे।' समार प्रमार पनकी परम्परा के विषय में पाए भिवता कि तत्र सासारसहस्राक्ष इस सवर्णपर पनुदपान , मेरुमय व कल्याणप्रतिस्पे, मन्दर- मम इव सक्षमीसमाकपणे, पतनिधिमय इन मर्यादायाम् पाकाधमय इव घरद प्रादुभवि धधिमय इव नमासंग्रहे वेदपय बात्रिमामापस्मे, परणिमय इव मोरभूविकरणे, पवममप इस सवपापिपरनोविकारहरणे गुस्खसि, पृपुरसि, विद्यासोमनसि, अनयास्तपसि, सुपारस्तेबसि, सुमन्त्रो हसि, दुप. सदमि, अजु मो मसि, भोप्मो पपि, निपपो यपुषि, परम समरे, पूर पूरसेनाक्रमेण, दक्ष प्रभाकमणि, सर्वादिरार तेवः पुष्यनिर्मित इस रामा पुप्यविरिति माम्ना बभूव ।। स्थानीयर में पुप्पभूति नामक एफ एमा हुमा । बस इन विधिय प्रकार के पक्ष जाना पनुप धारण का वधी पार पपने समस्त वामन पारिसोरेनियमार . - (१) मापन व मापा (७) श्रीपासपरिवरपर .११५५ ७२ के समान धमुप पारण किया । स्पात प्राति के कारण यह मानों स्याण + मुमैक से निर्मित पा। मम्मी के मार्पण करने में मनरापत के समान मर्यारा में समुद्र पर स पप को उत्तम करने में प्राकाप के समाम सारे मोके पारण करने में पृषिषी के समान पोर पापिय रागामों का गोविकार र करने में वायु के समान मापों के संग्रह में पन्द्र के समान स्वाभारिक बात चीत करने में वेद के समान पाम पापी में पृहस्पति पा सके सम्बम्ब में पुरावा के समान पा पन में विपापा तपस्या करने से बनकमा वेर में मुबार मामक पना के पमान पा पस्य के सम्बन्ध में मुमान का समा म जिम मध में पईन, पनुप में भीष्म, परीर में पपर्वसीम समर में प्रमुन पुणे की मा पर पाक्रमण करने वालों में सुर पौर प्रना के कार्य करने में रम प्रयापति समान । इस प्रकार का मानों पूर्वकाम के समस्त पगाों की देवराति से निर्मित हपापा। परा पुप्पभूति पैर मत सामने वाले रे। स्वप में भी पा बिना पिए की पुग लिए सभी साता पीता न पा। वह मानता पा लिपि पतिरित इस संसार में कोई पम्प देवता नहीं 'पशुपतिपलोयरेषता गुम्पसमापठ रेनोरयम्" उसकी प्रगा भी पिन की उपासना करती थी "बहे हे भगवानपुम्पत पपरम" राणा पुष्यभूति रसिस से माप एक पैर महात्मा के प्रमार में मा पमा पा। उन महारमा का माम भैरवाचार्य वा । पणा पुष्यभूति को भैरवाचार्य मारामत से पानी या एक पट्टहास नामक पायरी और प्रार्थना की किवान सापना में मम्म सितिमिए रसकी सहायता करें। महाकरि बाण भैरवाचार्य पार धन मिप्प परिणामक सम्यासी का बड़ी मुरामता से निषण किया है। ममाविकपमु प्राप्तार तस्मामेव रुम्पपरयो मन विधिमा रीभित शितिपो नियमबानमूत् । करिमा के परपावाप्प चतुर्दशी के दिन एगा और निधि से षित होकर पत को परेसा नंगी वनमार मकर सरस्वती पर पर यह पा पाहा भैरपापा बेतात सिधि कर पा पा । परा मे रेखा कि साधना भूमि में कुमर के पराप समान भस्म से पुरे गए महामपत में पैराचार्य स्वान परे हुए घर की बाती पर बैठकर सो मुख में मग्नि बमाकर हवन कर पातामा कामी पपड़ी काचा प्र पराम पानी राणी, काता परम पहने हुए पा मार कार्य नियों की पाहुति हावा । रामा रे पितरिया में बड़े होकर पारामा गुरु किया । पानी रात को पती प्रा कर एक पयोम पर्स का पुस्प बाहर मावा । वाम बर्ष पुरष नेहा कि पीठ नाम है और उसी मार से मारे मोठ कहनाता । म रिना उसको बधि दिए भरपाचार्य सिरि प्राप्त नहीं कर सकता। मोठ माप + पीन पहरेदाd पाताम स्वामी पसंतान पौर टिम को मार भपापा परन्तु पमा पुप्पमूति ने उसको परास्त कर दिया। तभी एक स्त्री प्रपट हो वो मम्मी बी। मम्मी राणा प्रार्पमा पर भैरवाचार्य श्री सिरिका पर पिया पौर रामा कोपरगान रिया उसके संपष प्रतापी और विस्ती हगि । सम्राट प्रभाकर वन पगा पुप्पभूति सच ही पे। मार हर्ष पर्मन पूरी पबामा और सनी पनियों में म इस प्रकार भर पर्षन बयणी देवी मप्सरी देवी राम्म बर्षम । मादिस्य वन महासेन पुप्ता देवी प्रमाकर वर्षन 1 । पगोमती रेपी राबबपन हर्प दर्दन' रस्तु समस्त वर्मन छुस में सम्राट प्रमाकर वर्मन मे प्रणिक साति प्राप्त की। उन्होंने 'परम पट्टारक महारावामिराम की उपामियां पारण की पो। उनि पड़ोसी रागामों के राव बहन मुसलिए । बार में उसका वर्णन प्रसंफार पूर्ण मापा में यू किया है । हूण हरिण मेसरी सिगुराम मरो पुगर प्रमागरः गोपारापि पमन दीपफूट हस्ति मारो साट राटबपाटबरो मामयसम्मी पर प्रभाकर बात मे बहुत से या किए, पवसमषिकामा एमविसर पूसरित नामक यसमि' ।' सम्राट हर्षवर्धन और कुरुक्षेत्र सा की मृत्यु ६.१ पर्प पापात् सम्राट प्रभाकर मन का स्वर्गवास हो गया । उस समय पर पर्षन २२ बर्ष की प्रायु का वा पौर हर्ष वर्षन की भायु सोमह वर्ष की पी। सम्राट की मृत्यु र समय पर वर्मन नवर से हमों से युट करने गया [पा पा । सम्राट की मृत्यु का घमाचार पाते हो वह स्वामेरकर वापिस पाटर हर्प वन से मिला। राम वन स्पानेसर के रागमिहासन पर बैठा परम्तु उसी समय यह सूचना मिलने पर कि पसके गानोई को मामब मरेप कर सुवर्ण मे मार दिया है यह पम्नीबसी पोर सेना मेकर गया परन्तु पोरे में मारा पया। राम पनकी मृत्यु के पापात् हर्प वर्षन ने राम-काप संपामा । क. बों तक स्पानेश्वर की सेनाए सम्राट हर्ष वर्पन के सेनापविश्व में पूर्व से पश्चिम तक दूसरे रागों को परागित करती हुई और स्थानेश्वर राग्य की सीमाओं को बापी हुई सदी थी। उस समय के सम्वर्गदो हाथियों के हारे उतारे गए पौरन सैनिों के पप रतरे । सम्राट हप पन में भी रिमाम नहीं किया। हर्ष विषम प्रमि पान में उसके पास ... हापी २....सवार २० ..परत सेना पी।प. बरे पापात् रपने पी स्पानेश्वर में राममूप या पिया मोर सम्राट की परवी प्रहण की। (१) समोसार पपिपारिवारिका विर पर संपत ५के मान पसेका रहिम रिमपि २० माता से प्राय मार-वर्नन विदार गोला सोपाटी १२ तथा ११२. पर १५१ १११। (२) करिव मम imI() सपरिवारबारेशरप।
०२ धनुष धारण पिया। पस्माण प्राति के भरण यह मानों स्माण के सुमेर से निर्मित पा। वह मामी पार्षण कसे में ममरापम के समान मारा में समुर समान एम रम पम को उत्पन्न करने में पाका के समान सारे मोजके धारण करने में पुषिरी समान मोर पापिय रामाों का मोविकार दूर करने में पापु के समान, कमानों के संग्रह में पम समान सामारिक बात-चीत करने में और सपाम पा। यह वाणी में वृहस्पति पा पक्ष समाप में पृथु राणा घमाम पा मन में विमान पा तपस्या करने से बना पा पैर में सुपात्र मामा एमा के समान वा पस्य के सम्माप में मुमत्र पा सभा में विज्ञान पस में पम पनुप में भीम, परीर में पार्पणीय, समर में पान मुऐं की सेना पर पाक्रमण करने नामों में मुर पोर प्रना के काम करने में इस प्रयापति के समान । इस प्रकार पर मामों पूर्वका समस्त एवामों की बरापि निमित हमापा। पणा पुप्पमूर्ति पर मत के मानने वाले थे। सप्प में भी बह बिना भिम की पूरा किए ष भी पावा पीता न पा! बह मामता पाहि पियरे पतिरित इस संसार में कोई पम्प पता नहीं 'पशुपतिप्रपम्वोऽपरेवता सम्पममम्पत मोरपम्' रसकी प्रगा भी पिय की उपासना करती पी रहे परे भववानपुष्पत परम" पणा पुप्पभूति एभिप से पाए एकर महात्मा के प्रभाव में मा बापा। सन महारमा का नाम भैरवाचार्य का । पमा पुप्पभूति को भैरवाचार्य मस से छमी ना एक महास मामक रूपाणी पौर प्रार्थना की पिबेतान सापना में मान सिधिमिए इसकी सहायता करें। महाकरि बाण ने भैरवाचार्य और उनके सिप्प परिणामक सम्पासी का बड़ी मूषमता से पित्रण किया है। मभाविकतेप्पम प्राप्ताको तस्यामेव काणचतुरपा न पिपिमा रीभित बितिपो नियमबानमूत् । करिना पवाद हम्प पछी रिल एका अंग विधि से पितर रात को पकेमा ममी तमगार मेकर सरस्पती तट पर ही पहुँचा यहाँ भैरवाचार्य देवास सिपि कर हा मा । एमा वा हि सापना भूमि में अमर के पराप के समान मस्म से पुरे पए महामपत में पैरवापार्य वान पड़े हए पप की पाती पर बैठकर उसके में पम्नि बमाकर हम पर पापा । पाकामी पपड़ी माता पपराम बाबी राखी कामा परम पहने हुए मा प्रौर कावे तिमों की पाति पापा । एमा रखिए रिसा मेरे होकर पारामा मुकिया । पापी पत को पती प्रा कर एक सोम पर्ण म पुष्प बाहर माया । प्रयास बर्स पुरुप मा कियापीठ नाम है पोर पसीनाम से पारेप पीट करवाता है पत बिना इसको बहिरिए मेरवापर्व सिरि प्राप्त नहीं कर सम्मा। मोठ माम वीर पारेगारों पावाम स्वामी वाम पौर टीटिम को पार भषामा परन्त पगा पुप्पमूति मेसको परास्त कर दिया। पमी एक स्त्री प्रगट हो मम्मी थी। मक्ष्मी राजा की प्रार्थना पर भैरवाचार्य की सिरिका पर रिवा पौर पया को पसान रिया नसके पण प्रतापी पौर वस्ती पि । सम्राट प्रमाकर वर्ष सपा पुप्पभूतिपय हीमारर्प पन के पूर्वी प्रचामा मौरी पनियों के मुरा माम इस प्रकार। मर वन बयणी देवी । अप्सरोदेवी पम्प पर्पम महासेन पुप्ता देवी पारिप पर्पन । प्रमाकर बाईन यगोमती देवी । । परपर्यन हर्प पर्पन परतु समस्त पर्पन त में सम्राट प्रभाकर वर्षन ने प्रषिक राति प्राप्त की। उन्होंने "परम भट्टाएक महागराभिराम की उपापियो पारण भी दी। उहनि पड़ोसी पगामों के साप बहुत पुर किए। वाण ने उसका वर्णन प्रकार पूर्ण मापा में यू किया है । हुण हरिस मेसरी सिपुर ज्वरो पुगर प्रमागर, पोभाराभि पंगम द्वीपट हस्ति मरो मार पाटपाटबरो मामबसमी परषु ।' प्रभाकर बर्षन मै बहुत से या डिए, पतसमनिकापर धुमविसर गुमारित वासप बमि' ।' पया पण सम्राट हर्षवर्धन और कुरुक्षेत्र ईसा मी मृतु १.५ मर्प पश्चात् समाट प्रभाकर मपन का स्वर्गवास हो गया। रस समय रामवन २२ पर्ष की प्रामु का पा पार हर्ष वर्षन की पापु सोहर पर्प की पी। समार की मृत्यु के समप राग वर्मन उत्तर से हूणों से युट करने गया हुपा पा। सम्राट की मृत्यु का समाचार पावे ही यह स्पानेश्वर मापिस पाकर हप पर्पत से मिमा । पर बबन स्मायेसर के रामसिंहासन पर बैठा परन्तु उसी समय यह मूपमा मिमने पर कि उसके बहनोई को माता मरेश कर मुपएं में मार दिया। यह कम्नीर की मोर सेना मेकर बोरे में मारा पया। रार बम की मृत्यु के पश्चात् हर्प पर्यन ने राबमाप उमाना । छ वर्षों तक स्पानेसर की सेनाए सम्राट हर्प वर्मन के सेनापतिल में पूर्व से पपिएम उर दूसरे सपने को परावित करती हुई और स्मानेपर पम्प की धीमार्मों को माधी हुई पूमती पी। उस समय के पन्नगड मतो हापियों के हारे उतारे गए और म ही मैनिकों के पास उसरे । सम्राट हर्ष वर्णन ने पी पियाम नहीं मिया । हप गिय अमि पान में रमपास २... हापी २....पुसबार. परस सेना पी।पके पवार सने भी स्माने पर में राममूप पन पिया मोर सम्राट की पदवी पाण की। (१) समोरात्र पपिठमा रिका मित्र ४ प १०. सन २५ मलन पो कसा पपिपतिमा दीया मित! पृ . माहवा से प्राय मशा बना विधार गति र मोसाध्यै १२० १९९ पप १५११४१1 (९) सपरित प्रथम माम पर 1 (ON परिव सेवा गारे रामप।
बन एकी पनपानी रहने के कारण कुरक्षेत्र प्ररेन पोर उसके मागरिकों में जीवन विविध क्षेत्रों में उम्नति की सेवारिणग्य, पपसाय, उपोपभर चिस, निर्माण कता कोसत पणनीति समाजनीति, पामन म्यगामा साहित्मकता, पिसा भौर पौसातिक प्रगति मिवनी वन राज्य पाम में स्पावर में हुई फिर कभी नहीं हो पाई। समस्त पुम्सग प्रदेश पर्दिक उम्नति की पराकाष्ठा पर पहुंच पया । राम्प का विराम विस्तार होने के कारण स्पामेश्वर हर्ष वर्षन के राज्य के एक कोमे में हो गया । इसमे विद्यारा सामाग्य पा मुचारु रूप से प्रबम्प करने के लिए हर्ष पर्यन ने स्मानेर से राममानी हटा रनौर को यो राग्य के पेट में पा, रामपानी बमा मिया । प्रपिस पीनी यात्री मन प्रबना पान चाग पिसे कि इतिहासकार प्रमएफार्मों का पकुमार कहते है प वपन के पायन कात में भारतवर्ष में मापा। उसने १२६ ईस्वी से (४५स्पी तक भारत का प्रमण किया । स्थानेसर के विषय में रसने मिसा कि स्वामेश्वर गम्य की परिमि ... मी पौर रामपानी की परिपि २.नी पी। यहां की भूमि उपजाऊ है और पग्न पात पैदा होगा । जसमा गरम होवे हए भी सुधार है । मोर्गों का म्पहार अत्यन्त पवार मौर उनमें एक दूसरे के प्रति कोई मगाव पवा अपनापन मही है। परिवार ममी है और प्रत्यधिक पिसासिता का बीमन म्यतीत कराये है। बा-टोनों के बहुत प्रम्मत और घाशरणमा सन चोगों का सम्मान करते । यो किसी भी मम्प दोष में प्रयापारण योग्यता रखते हैं। परिकाष मोम मोह-माया में कसे ठे। केरम बाट पोखे तोम लेतीपातीका कार्य करते है । यहाँ देखक कोने-कोने से पनम्म तमा बहुमूल्य पम्पुए बड़ी मात्रा में पिने पाती । इस प्रदेश में तीन पुर विहार । गिममें ... धगमम भिषु हो। सब धर्मग्रन्थों का सम्मान करते । मौर उनका प्रयोग भी करते हैं । यहाँ सो स-मन्दिर (जिनमें कई प्रकार के सानुगसम्या में राते । राममानी के चारों पोर २..मी के बापरे को यहाँ मोग पार्मिक स्थान कहते हैं।' ऐसा जान पड़ता है कि मानसांग को महाभारत पुरकी पा गात नहीं की और म ही उसने किसी से सुनी एवं नमी । महामारत पुरका को वर्णन उसने मिला है बिमकुम ही ये सिर पर का है। महामारत मुरके विषय में यह विधवा है कि-"पुपने समय में पांच नदियों के पेट में से रागा पे । पहोंने इस प्रदेश को दो भार्चा में बोट निया मामा निरन्तर एक दूसरे की सीमामों पर मालमण करते पो रे। मनका पुरी बत्व नहीं होगा पा । मन्व में पोनों रागानों का महसममाया हो गया कि सैनिक छांट में दो मरकर निर्णय कर पिसमे कि प्रमाको पाराम मिमे । परम पवित्र बम संस्था इस सुपर गिराय पी रहनि निर्सया यह नहीं माना । पप इस देश के एगा मे सोपा कि प्रणा को प्रसन्न करना बहुत कठिन है । कोई पिरीय प्रति प्रथा की विचारणारा मोर सकती है। सम्भवतः कोई और युक्ति प्रयाको ठीक मार्य पर मे पाए। पस समय वहाँ एक मिशान प्रौर पराह्मण पा । उसको अपाप पमा मे कई रेसम पान इस प्रार्थना के साथ मेंट किए कि वह रागा निगी मरम में बैठकर एक १पासन मनुप्रास तर मीन । 1 पार्मिक पुस्तक मिले यो पर्वत की मुश्य में प्रारी पाएमी। इस समय रे पापात पर पुमा पर पुष्प ग पाए वोएमा ने पसिहासन पर बैठकर पाने मन्त्रियों को सुनाकर कहा कि मैं अपने पस पान परममित होता हुमा कि मैंने स्थान पर बैठा कहना है कि सिर मै मसम्म होकर स्वप्न में यह भेद मुझे बताया है कि एक पिरीय मान की पुस्तक समुह पर्वत पर प्रमुफ पुभ में रसोरामा ने मामा रोक पोषी पाए और गुफा में मप्रदियों के नीचे पुस्तक सिम मई । मम्मियों मे पर होगमाई दी मौर प्रगाने मुधिया ममाई । राजा ने दर-दूर तक पुस्तक के मिमने की सूचना । पना में माना दी कि पुस्तक में बो मिला से समझाया पाए । बंधेर में पुस्तक की बात इस प्रकार है-मृत्यु पार वीरन असीमित पावागमन का मन्त्र नहीं मान के बिना निस्तार नहीं परन्तु एक विप पावना से मनुष्य न ओं से बच सकता है । इस पर पारों पोर २०० बीड़ी परिमि को मानिस स्थान कहा है। पुराने समय राजामों से भी इस बात को माना है। यह वर्ष बीत जाने पर यह पि मिट गए। पार्मिट मापन प्पतीत म करने से मनुष्य मापार होहर दुषों के समा में रम गया। यह गान पर नाम में छिपाप में से कोप-सेना पर माक्रमण करेमा पोर मुर में मर जाएगा बह फिर मनुप्प हा में बम्म भेगा । यो गाव से पत्रों को मारेषा ससे स्पम पिपा । वह माना कारी पूर्व पात्र को अपने परमाता पिता की सहायता इस भूमि में यात्रा करने में करेमा यह पसीम सुख पाएना को मइ सुपरसर खोरसे में मृत्यु के पासाद पन्चकार में गने पार ये । पर प्रत्येक पति पुमकार्य करने को तैयार रहे। पा मुनकर मार मृत्यु को निर्माण मार्य समझार मोग पुरको तैयार हो गए। एमाले पपने योगों को बुमामा । दोनों देशों में पुर पारम्भ हो गया। मृत कर लियों की मांति मग पए । उस समय से अब तक यह मैदान हदियों से काहमा है। पह इस देश का पुराना इविशाध है । प्रा बह भूमि धर्म-भूमि कमाती है। 1 । इसके परमात हानथाप ने मानेपर का या बर्णत किमा-गर सत्तर परिषम कोण पर पपवार मी पूर ३.. फीट पा स्तूप बिसे पाट पोक में बनवाया था। यह स्तूप मस्ती हुई पीमी पौर माह टों से बना हुपा है। पकी बोये पर महात्मा पुरो पबपेप रवे मशकरा स्तूप से माता मा प्रकाश विपक्षवा है पौर मामा पन रे । ममाक्षिण में १..मी रहम एक मापम में रिसका माम पीठ पाने । पहा पहर से ही स्तूप मिन, मध्य महान है सनो पौष में भूमने-फिरने के स्थान है। पूनारी कोप मुही। मका म्पबहार मुवा पौर मौररपूर्ण है। पहा से सतर-पूर्व में ४..मी दूर पाने पर म मुसहना रेस में पाते हैं।' १ सरकारमा रेमन में उतार से पक, रसम हम श्री पीली TETuht समुत्तोल हाय मनुपर हिरा मोगा मा पोष परिजबाबीमतपस्या !
१ हर्ष वर्धन के पश्चात् का कुरुक्षेत्र सम्राट हर्ष वर्षन के को पुत्र पैदा नहीं हमा, मत उसकी मृत्यु के पाचार भारतवप पर एक बार फिर प्रम्पकार पा गया 1 कुस्मा प्रदेश पर इस भरपकार का मकर प्रमान पसारमा साहित्य सभ्यता पौर संसति मग्यकार में महीं पनवे । पर इस पत्रकार का फामा पर्दा उठा तो भारत का विन पिसम बदम गया था | बोट धर्म मम रेषा सा बन का पा। समस्त उत्तर भारत छोटे छोटे एग्मों में बंट पा पा पार इन रायों पर विपिन प्रकार रामा राम करते थे। इन पगामो पौर भारत की परम्परा पोर संस्कृति का घर का मी माता नहीं पा। हर्प पर्पन के पासन काम के मागरिकों पर इस कात के मापरिकों पौर राणामों में रखी पार पाकास का प्रस्तर पा। इस कामे पर्दे पुग में मप्प एसिया से हुए पुर्वर पौर पम्य महाक मातियों में पाकर उत्तर भारत पर पपना अधिकार कर लिया । इन पंपमी मोगा मागमन से पुग्नेश का सामाजिक, पषीनितक पार्मिक और पिता-पीया का चा हवा में तृण के समान उपपया। भारतवर्ष में चारों पोर पुर ही मुर हो रहे पे । पोर प्रसान्ति पौर ममानक परा सकता का पुग पा बह । कमा पौर संसति के मंकुर पाम्तिमय मातावरण में फूटो । रक्तसिषित परातल पर कमा मोर संसविपुण मुरमन कर पूस पाये । इसलिए कुरुक्षेष का गौरव पिस फमा पार संकठि से पा बह इस पुम में प्राण पोर मया और उराने ऐसे प्राण घोडेकि फिर साचा प्रयत्न भी इसमें बीवन-संचार नहीं कर सके। पुस्खा की उन्नति में मौर्य गुम पार न पणामों का बड़ा हाप पा और ऐघे प्रतापी समाटी का पापय फिर कभी भविष्य में कुरक्षेत्र को नहीं मिमा । पूरी एक पवागी वा गुप्त पौर वर्णन पंस के रागानों की पा पार पामय पर गुम्क्षेत्र का पौरव पुरा होता था। इसकी स्याति इस काम में रेप रेसान्तरों में फैली पौर यहाँ हुए अनेकानेक यों के पुए को मुबम्प से सारा उत्तर भारत सुगन्धित प्रा । इन राज्यों के मिटने के साप-सार कमा और साहित्य कुम्पेन से सरैय के मिए विदा हो पए । कुमारिल भट्ट और शंकराचाय का आगमन इस मपरक काम में भी पुरक्षेत्र का पार्मिक महाप कम मही हप्रा । पानी सवामी के पारम्भिक काम में कुमारित भट्ट विनोंने मीमांसा-रन का प्रभार देश भर में फैमार बोट धर्म की पोंको भारतवर्ष से मुबाद फेंका पा ऐसाटन करते हुए करण पबारे थे। एक सवामी पश्चात् नी सवामी में बया पुमपामीराचाय बी में भारत यामा गन्तवर्मन के प्रभाराप की और अमरनाप बाते हुए यह भी कुरलेष पाए में और प्रपन दिया था। उस स्थान पर उनकी स्मृति में पापाप प्रतिमा स्थापित है। सुलतान महमूद गज़नवी और कुरुक्षेत्र रसी पानी प्रतिम चरण में उत्तर भारत प्रोटे-छोटे एम्प मो प्रय तक विरेपी प्राफमों से पनाभि में मुसलमानों के तपर्व-पश्चिमी पार्टियों से होने वाले पारमणों से पराको। १.१४ ईसी में सुमतान महमूर गगनदी में कुरक्षेत्र प्रदेश के पापिक मार पनवान मपर सामेपर पर प्राकमस किया । मुचतान की पा से समस्त मन्दिर पार मपर की रात पार पग्नि से पसार भूमिसात कर दिया । बहगारों मी पुश्यों को पाकर मस्ती में गरा पार गर्ने दो-दो ररम में देष दिया । मन्दिरों को उसने मसगिरों में परिणव कर दिरा । महमा बो हामि स्थानेसर को पहचाई उसका वर्णन विस्तार से परिश्ता और वस्वी ने मियाममवस्नी भो कि गणिताचार्य, म्योतिपघाम में प्रवीण और मिहान पा मार के साथ भारत में पाया था। पानी + स्मार को पार्मिक केन कहा है । महमूर पानी में भारत पर १७ माळमण किए । रसने यह माझमाए पुरुभे। परेप सिए भरसम्त पातक पौर यमदूत रे क्योंकि उसके परिकाप पाकम गुम्सपर्क मार्ग से ही हए, इसलिए दक्ष प्ररेप को मार्य हानि उठानी पड़ी। महमूर भारतीय ससहति का सबसे बस पापा । स्थानेश्वर दिनों का काया है।" हर पनीत से ही बाह्मण धर्म का क्षेत्र रहा है। बामण धर्मशालों ने पार बनने से रोष के इतिहास को यात मति पापी स्पामेषा की माहमा गगनमी के हों परबारी की घटना मुहम्माधिप फारसा इस प्रकार निपवा है-".२ हिर १.१४सी में मुसवान मामूर के दिन में फिर बहार (धर्ममुरा) की मार ठी। क्योकि पाम सुन काबा कि पानेसर हिमाँ का है पौर हा एक प्राचीन मन्दिर विसमें बहुत सी भूतियां रखी और बड़ी मूर्ति का नाम पासोम है । इस बड़ी मूर्ति विपम में हिन्दुओं का विस्वास है कि इसका अस्तित्व संसारोलति के साप सार ही हमारे मिए मामूप में प्रमस प्पिा कि इस बार पानेछर पर पाकमा करे। पब इछ माक्रमण के लिए पासूर मे पंजाब में प्ररेप किया वो रम इस रिचार से कि यो सम्मि महमुद मार पानम्रपामरे दोपहारसा न हो। सुमतान में एक प्रारम्पास के पास मेबार उस पर अपना रिचार प्रस्ट विभा पर बहमा भेगा कि परकी बार हमारा संप पानेसर पर पाक्रमण करने का है पोर पोंकि पगार से पानेसर मान को सब ठिनाइपो दर करणी सलिए तुम मरने व विसनीय पादमी हमारे पार कर दो मिससे कि मो परखना (पाम) तुम्हारा हो यह हमारी सेना के विषम और सूटमार पामम्दपात में इस पात्रा को अपने पम की रक्षा का कारण समसार सुमतान बार-पान पर पाठिपकी समस्ठ सामडीका प्रबम्प पीमाविधीन कर शि और अपने परम पापारियों पारपनियों को मामा दीपनार पी, हेम पौर प्रत्पेष्ट प्रकार की मुविधा दी सापपी सुमतानी शिविर में पहुँमा दीपाए प्रौर मुमवान की मैना को किसी प्रपरका कटान होने पाए । रारा पामरपाम ने अपने भाई को एक प्रारंना-पत्र देकर दो गर पवारोहियों नेतृत्व में मुमतान की सेवा में मेरा । माया-पत्र र सार यह पा महर प्रकार पारी प्रामा बामने के लिए प्रस्ता, पौर मास सपा मेरस परन्तु १ मम्मीर शिया कलासी गुप.!
हर्ष वर्धन के पश्चात् का कुरुक्षेत्र समाद् हर्ष वर्षन के कोई पुत्र पैदा नहीं हमा, मव उसकी मृत्यु के पाचाद मारतवर्ष पर एक बार फिर प्रम्बार पा गया । पुरोष प्रदेश पर इस मन्त्रकार का मर्पकर प्रमाण पत्र । फमा साहित्य गम्मता पोर संस्कृति परमकार में नहीं पमते । इस प्रम्बकार का कामा पर्दा उठा दो भारतवर्ष का पिप निमास बदम पपा पा । बोर पर्म बम रेषा सा बन पुका पा। समस्त उत्तर भारत पो धोरे राग्यों में बंट गया पापोर न रायों पर विचित प्रकार के पग राम करते थे। इन पलामो पौर भारताप की परम्परा और सस्कृति का परका मी माता नहीं पा। हप पर्पन के पासन पास के नागरिकों पर इस कात नागरिकों और राजामों में परवी पार पाशा पन्तर पा । इस कामे परें युग में मम्म एठिमा से इस पुर्वर पार पम्प महाः बावियों में पाकर सत्तर भारत पर अपना अधिकार कर मिया । इम ममी मोगों के प्रागमन से पुरुष का सामारिक पजीनितक पार्मिक और निपाषा का पाखा में के समान सा गया। भारतवर्ष में चारों पोर मुख ही सुख हो रहे थे । पोर प्रचाम्ति पौर भयानक मरा पकता का पुग पा मह । कमा पार संस्कृति के प्रकुर सान्तिमय वातावरण में पटवे । रक्तसिषित परातम पर कमा पार संसति के पुष्प मुरमा कर सून पावे है। इसलिए कुष्येष का पौरव मिस कसा भौर संस्कृति से पापा इस युग में प्राण धोड़ गया पौर उपने ऐसे प्राण पोहे कि फिर मावों प्रपल भी इसमें बीवन-सपार नहीं कर सके । कुम्भेष की उन्नति में मौर्य दुस भौर पर्षन एमापों का ना हाप पा और ऐसे प्रतापी समारों का पापय फिर कमी मरिम्प में पुरुष को नहीं मिला । पूरी एक पवागी तक गुप्त मौर पर्मन गप रे पगापों की सपा मार पायप पर एम्वत्र का गौरव पुना होता हा । इसकी म्याति इकास में देख रेणान्तरों में फैमी पौर यही हए अनेकानेक पो पुएं की मुगप से सारा सत्तर भारत सुगन्धित हुमा । इन राम्पों के मिटने साप-चाप कमा पार साहित्य पुरोष में सर्वर के लिए बिरा हो गए। कुमारिल मट्ट और शकराचाय का आगमन इस पराणा काम में भी पुरमा का पार्मिक महत्व कम नहीं हमा । पानी पवानी के प्रारम्निक काम में पुमारिन मट्ट गिहोंने मौमासा-दर्पन का प्रचार रेस पर में फैलाकर पौस धर्म की बों को मारतवर्ष से चार फेज वा शटन करते ए परमेष पपारे । एक पताम्मी पापाव भी भवानी में नगर पुमलामी पहराचाय पी ने भारत पाषा पेरान्त-रसन के प्रचारार्थ की पौर प्रमरमान पाते हुए यह भी एलोन पाए ये पौर प्रगमन विया पा । उस स्थान पर नमकी स्मृति में पापाण-प्रतिमा स्थापित है। सुलतान महमूद गज़नवी और कुरुक्षेत्र बसपी पताम्मी पन्तिम चरण में उत्तर भारत के बह पो-पोरे राग्य बो प्रब तक गिरेगी पाकमों से मनाना मुसममानों के उत्तरी-पश्चिमी पारियों से होने वाने 00 पाकमों से पारा उठे। १०१०मी ये सुमतान महमूर गपापी मे रोष प्रदेश के पार्मिक और पान मसर समानेपर पर मालमस मिया | सुनवान ही मामा से समस्त मन्दिरों पौर मरर को राम और भग्नि से पसार भूमिसात कर रिमा । यह बाएँ स्त्री पुस्पों को पार कर गजनी में पमा पौर उन्हें रो- दोरम में और रिया । मन्दिरों को उसने मसगियों में परिणत कर दिया। मामूर मे बो हामि स्वामेस्वर को पहुंचाई उसका मन विस्तार से रिश्ता और वस्त्री ने किया है। प्रसस्ती को कि परिणतापाय, म्योतिपसारम में प्रवीण पौर विद्वान पा महमूर साब भारत में पाया । समवस्ती है मानेर को पार्मिक केन्द्र कहा है । महमूर पानी में मार पर १० माक्रमण किए। उसके यह माझमण पुरोग प्रवेप लिए पस्यम्त पाठक पार यमदूध मे, श्योंकि उसके विकास पारमण कुम्मेरो मार्म से ही हए, इसलिए इस्त्र प्रदेश को मारी हानि उठानी पड़ी। महमूर भारतीय एस्कृति का सबसे बड़ा पापा स्रानरमा हिनुरों का कागा है।" हरर मतीय से ही मामण पम का कम या है। मण मधास्त्रोकने पौरभवने से रोग के इतिहास की बात पति परपी मानेसर की महमूद परनमी के हामों परगावी को पटना मुहम्मा कासिम रिता इस कार निजता है- ४०२ हिलरी १.१४ स्थिी में मुमतान मामूर के दिन में फिर बहाद (धर्मपुर) की महर उठी।योकि महसुन पुल पा कि पानेसर ज़िों का काया है और यहाँ एक प्राचीन मन्दिर है निमम बड्य सी मूतिमा सीहोर गो मूति नाम अपसोम है। इसी मूतिर विपन में हिन्वों का विश्वास है कि इसका पस्तिस्व संसात्पत्ति के साप सार ही हमा है इसलिए मामूर ने किस किया कि इस बार पानेसर पर प्राइमण करे। पर इस पामरा के लिए महसूप मे भाव में प्रदेस मिया हो केवम दस विकार हिना महमूद पौर पानगपाम बीच हुई है उस संडन न हो। सुमहान मे एक व माननापास के पास भेकर उस पर अपना रिकार प्रयर लिया और कामा भैगा कि परकी मार हमारा संकर पारेपर पर पाक्रमण करने का है और बाकि पंजाब से पानेसरहामाको मा महिमामा र करती है इसलिए तुम परने दूध विसनीय प्राथमी हमारे सार कर रोरिसमे कि यो परपरा (धाम) तुम्हारा हो हमारी पेमा के रिस पोर पूरमार पाए। पानमपाम ने इस मात्रा को पपने मन की रमा का कारण समसार मुमतान बाम-पान और प्रातिप्य की सपस्त सामग्री का प्रयाब पीमाविसीम कर दिया और अपने राम म्यापारियो पौरपनियों को पाला दीलिप्रमान श्री प्रेस और प्रत्येक प्रारी नुविधा की वामपी सुनवानी पिपिर में पोगा री बाए और मुमताम भी ऐनाको रिसी प्रपरका बटन होने पाए । पमा पामरसास ने अपने भाई को एक प्रार्थना-पत्र पर दो पार पाबारोहियों मेतृत्व में तुमतान की पेषा में मेगा । मामा-मनसायम पहा कि मैं हर प्रकार मापने मामा मानमे के लिए प्रस्तुत हूँ पौर प्रासपा हे पात्र माना गया है. पारो Bg प्रोस । - इस सेगकाई मोर पसा के भरोसे मो मुझे सुमवान से है यह प्रार्पना करने का साहस करता है कि पामेसर का मन्दिर बहुत पूजनीय है, यह सत्य है कि प्रापरे पम में मूतियां तोड़ना पार्यों से प्रकारा पाने का सारन मोर पुमकम है परन्तु यह बात वो मिसा नपर कोट की मूर्ति तोड़ने से पापको प्राप्त हो गई है। पानेगर मन्दिर के विषय में मेरी यह प्रार्थमा है कि परिमाप इसके विपस की अपेक्षा कोई बहुपची पन मे में पोर पानेसर की पनवा को पापिकाता बनाकर पपमै म मोट पाने की पा करें तो पापका यह सैयक इस प्रार्थना के मानने के फमसम्म धन्यवाद सहित प्रतिषप पपास हामी पौर मम्म बामस्प मेंट सुनतान की सेवा में भेगवा पेगा। मुमतान में रत्तर दिया मिहम मुसममानों का यह पटूट निस्वास है कि स्माम पर्म को फैमाने पौर रिन्दों के ममिरों को पिराने में हम यहाँ निवमा प्रयत्न करमे जाना ही परमो में हमें उराका पुण्य मिमेया। बब हमारा वरूप यही है किहम मूर्तिपूजा हिन्दुस्तान से मिटा में तो यह कैसे सम्भव है कि हम मानेवर से मूर्तिपूमा केन्द्र महाम को पवार म करें पोर मन्दिरों को तोड़ने का सुविचार घोरावर रागा देहमी मे यह पमापार सुना तो वह भी अपनी पूरी पति सहित मुसलमानों का सामना करने को तैयार हुमा पौर हिन्दुस्तान के कोने कोने में पीमातिधीत पह समाचार फैमाया कि मामूर मजनबी प्रसम्म सेना मेकर मेरे राग्य के प्रसिर मस्बिर पर पाकमा करने वाला है। यदि हम पहले से इस भयानक बार को रोकने का प्रसस्त नहीं परम दो मह विपत्ति के प्रत्येक कोने में फैसकर घोटे पौर या सबको बरबाद कर देगी। मेरी या सम्मठि हिम सब मिस पुम कर इस संकट को दूर करें। परन्तु इससे प्रथम कि हिन्दुओं की घेनाए एक स्पान पर एकत्रित हो सुमतान महमूद पानेसर पहुंष पया। नमर को प्ररचित बार मुसममानों में दिम जोमहर भूटमार, परवादी पौर विमस छिया । महमूर मे समस्त मूवियों को तोर गमा पौर बड़ी मूर्ति बमसोम को परनी मेय दिया पोर पाशा दी कि यह मूर्ति पनपन पर सपीबाए जिससे कि पसने मानों के पापों के पीचे पिसकर बितकुम पूम बन पाए । इतिहासकार पारि के कपनानुसार पानेसर के एक मन्दिर से एक टुप्पा बारपात काभी मामूर हार ममा पिसका परम धारे चार सौ मिसकात पा । इतिहासकार मियते कि इस प्रकार का मार मार दिन समरेखने मपया सुममे में नहीं माया । इस विजय पापात् मामूर मे दरावा किया कि मेदनी को भी विषय कर मिया पाए । परन्तु मंत्रियों में प्रापना की किहमी पर उस एमय तक बिषम प्राप्त नहीं हो सकती पप तक कि समस्त पंचार मुसममानों के पषिकार में नहीं पा बाता मोर मानम्रपाम की पोर कोई भय पेप नये । महमूर ने मंभिर्मों के पपमई को मानार इसी के बिबप करने का विचार प्रोग पिमा मौर गबनी मापिस पा मया । महमूर नमय दो लाख भारतीय स्त्री और पुष्पों को राम बनाकर अपने साप में पया । इतिहासकार मिसरी किन भारतीय बासौ की ग संस्पा से यहाँ इतनी हिन्दुस्तानी पामें रिखाई देती थी कि उस पर्व पनी भी हिंदुस्तान का एक मगर समझा जाता था। मुमतानी सेना प्रत्येक पनि काना स्त्रियों और पुस्प गराधों का स्वामी हो गया"।' १पारिरिस्ता पर पप।
प्रोफसरसीमगोली पनुसार महमूद मानवी में इस कारस पानेसर पर माक्रमण घ्यिा कि उसे परमपना मिली थी कि पानेसर में संकर की मस्त हामी हो मैनिक मास के मिए लाभदायक मामूर अपनी मामेपर मालमस पापा के मीप एक मदी पर पहुंचा जहाँ रेरा के ग्राम में उसका सामना किया। रामापम भी पार्मिक मपर पानेसर को परसादी से रवाना पाहता पा । घ मार्यों का यह मत है कि सतमुन नदी पर रागाराम मे महमूद से मुठभेड़ की पी। नदी का बहाव पाटिरों के बीच बहुत तप पा। मरी के निारे ठनपा पार वसा परपर्से से भरा हुमा का। एगाराम अपने हापियों पासमारों पौर पंप निकास नदी के पाठ मोगा कर पुर के लिए पार हो पमा । मुमवान की कमान के नीचे मुसलमानों की दो सैनिक साड़ियों ने भी पार की और घर पर रोनों पोर से पापमण कर रिया । पर मुर मर्म पा तो महमूर की तीसरी से निक हुड़ी ने बहाल की मोर पापे मार मरो को पार किया और पत्रों पर टूट पर। पार्यात व पोर पुर पसा या पपामक हिस रणक्षेत्र भोडहर माम निको पार बनो हामी मगन में एमए । स वियर के परमात् महसूर पानेसर की पौर प्रप्रसर हमा रस्सी में मामूर के पानेसर पर पाक्रमण का विवरण पहर पपूरा दिया है। मामूर के ननोमा पर पाकमस के परमाद नो कि ४.४ हिवरी १.१सी में हमा पामेसर के भाक्रमण का रिवरस नवी ने किया। ईग्नुत पवार मामूर पामेसर पर दिए पए पाश्मणो ..ये १.१४ स्विी में लिखा है। परन्तु पाररिवी बो चही समय का इतिहासकार पा पानेसर के पाळमण को ४.२ हिरणे 1.11स्पिी में हपाकरण है। गारदिप पनुमार पानेसर पर महमुरका पाहमण नमोनारे प्राकमण से तीन वर्षे पहले हुपा । इस बात का समर्थन करिमा और नरामुहीम पहमर भी करते परन्तु ईसीयट सम्पू. इस पोर एम. माजीम या तीन विहाकार रस्सी के विपरण को टोकबहाग हेप का रूपन है कि पम वस्ती के पानेसर पर महमूर के पाक्रमण के वितरण में इस हि भवास है। ऐसा पास परवा हि मन नस्ती में किसी पौर स्पान पर किए गए पाक्रमणको बानेसर पाकमस से मिमा दिया है। पत उनी के रममे हुए पन का इस बात से भी पता पक्षता प्रपने विवरण को मानक रस समय समास कर देतामा पानेसर के पाकमए से पाहते मार्च में महमूद का परा यम से पुरमा । प्रत पानेसर पर मामूर के माझमण की मोतिमि पारबिरी फरिश्ता भौर नगमुरीन महसर मेरी नाही माननीय है। War हिपmत्री में एमी और समस्त हिन्दुस्तान के सि पार्यो में संपन्न करानेसर पर फिर पापकार कर मिपा मोन महर के नारे मार राप मियुरूपानेवर के पपर्नर पर गबनी रे मुखडमान सेम को ममर से बाहर निगम रिया। पती का वोपर पगा इस सैनिक संबन का मेवा बा । गया परमार १.सी. गोली मार सो सेसी मोरया मेमोरिया दाताप्रपा काय सोसिप मार सो ममशः..।
८. मोज माधुरीण पोर पापा माना मनाहिमा भी इस संगठन में सम्मिमित थे। हिमो मे पानेसर ममर को फिर मूरि-भूगा का वीर्य बनाया और नगर में पान-स्पान पर मूर्तियाँ स्थापित करके मूर्ति-पूना मारम्म करी।' पृथ्वीराज चौहान, मुहम्मद गौरी और कुरुक्षेत्र सरस्वती मरी रिस्ती यम्य की सीमा बन पई पौर मुस्त्र प्रवेश दिस्मी राग्य का सीमावर्ती प्राप्त पन मया। स्थी में कुमोत्र प्ररेस रिस्ती के पग पनपपाय पोपरमधीन हो गया। सरस्वती नदी के उत्तर का पंगार प्रान्त मिल-मिन्न मुखममान भवन के पपीन बा । इतिहास में सीमावर्ती प्रवेस सदैव प्रशान्ति का प्रदेश होता है और पोंकि पुरक्षेष महेषम दिस्ती राम्य की सीमा पर बा, पति स्पर्म सीमा था इसलिए पहाँ कमा संहति और धर्म का विकास होमा प्रसम्भव हो पया । रामा अनंगपाम के कोई पुष न होने के कारण उनकी मृत्यु के पाचात् दिल्ली का राम्म समिर पार पगमेरो चौहानों हाप पाया । प्रसिद पप्पीयब पौहान विवे कि इतिहासकार गए पिथौरा भी कहो । राणा पर्नपपास का पोहित पा को मनापाम के पश्चात रिम्मीपति इमा। पृषीराज चौहान के शासनकाम में कुम्मा में पति रही। रम्तमाओं के अनुसार मुहम्मद मौरी रिस्मी पग्य पर पनेक पार भाक्रमण किए, परन्तु प्रत्येक भारति पगाों ने पृप्पीराग के पेनापतित्व में पुसान परेप में सरस्वती तट पर मुहम्मद पोरी को परामित किया। ५८० हिवरी ११२१ स्त्रिो में यहादुरीन मुहम्मद गौरी । बहिरे पर पाक्रमास करके बसे मजमेर के राजा से धीन मिया और वहाँ राम्प मक्षिक महागहीन होगी संरक्षण में घोड़कर पातीस हजार मुसलमान निको साप पापिस पोर पाने के लिए तैयार [पा । पमी उपने पोरे की रडाय में पार हो रहा था कि उसे सूबमा मिली कि पप पिपीरा (पृमीराब) भपमे मा रिटी के पमा गिराए से पित पया है और इन पोर्मों मेदिनुस्तान के प्रम्य हिन माों को भी अपने मात्र पामत कर दिया है । मरम्मर पोरी का सामना किया पाए । सब हिम रामो को साप मेकर पिपारा पार पाए सेमारी पुरस्कारों और तीन सौ हामियों की भारी मास की निगे पर पपि कार करने के लिए पा रहे है। यह सूचना मिलने पर माम्मर गौरी पपने बान का रारा घोर दिया और सेना मेकर वोप से मड़ने के लिए भाये बम । परस्पतीची के तट पर परापन मामलान पर पो पारका के वामथी नबर पास-पास ही कही पा रिम्मी से चामीस मौन मन्तर पर दोनों सेनामों में मुठभेडाबर गुर पर्म होकर अपनी पराकाष्टा पर पहुँचा दो दिन सेना के पाक्षमण बोर मापे मुराध मान सैनिकों के पौष मसर गये । पहारीन की सेना के बाएं और बाएँ बार ममात हो पए, केवम बीच में सैनिक प प गए। मुसलमान सैनिकों की प्रस्त-व्यस्त बना १ बराले परिता १५-१० म मा । दिपी भारवर मावलि देवर महापुरीम के एक अमीर ने उससे कहा कि हमारी पेना के पाएँ और बाए बार जिसमें गौर के समिकर परराकर युर स्पस से भाप यए। राम की प्रस्वाती पौर शिवजी ना बोसम पियम प्राप्त करवी पी रसायन में परि महीपमा पा रही है। मे सम्मति में समाट भी पब युर-भूमि में किनारा कर साहौर की भोर करें। बहादुरीन को इस ममीर की राय पसर महीं पाई मौर उसमे हिम्मत से काम मिया । पीर सनिकीको धाप मेर हदीन में जोरदार प्राकमध पिया । इस मुठ में पहारीन ऐसी हिम्मत रियावा यहा कि मिन पार पत्र गोलो रसको प्रपंता कर रहे । पहारीन पुर में पनाहमा ही था कि पचानक रिस्सी रागामेराय की रष्टि यस पर पोबाराय में मपना हापी पहनदीन की भोर गाया। चहापुरीन मे भी पपना मेगा (माता) संमामा पौर बामेय की पोर मपरा । बामेराए केपी * निस्ट पार पारीन में पूरी पाक से हाबी के मुह पर बोट सपाई । भाता हापी के पुर में पुस या मोर पोर एपी के तट पए । सापराय पूरे साहस से काम मिमा पार दापी पर बैठे ही बैठे यहागुरीम के हार पर तमगार का मसूर एप मारकर पार कर रिया । इस पार से पहारीन कारा पा पोर मत होकर पो से पिरने ही सया मा कि एक सिम निकबारमाह की या दपा देबबर उसके दोहे के पीछे बैठ पया पौर हाहीन को अपनी गोद में बिठाहर पुरसत से भामा सेनिक पहारीम को कर भापता हुमा सम मापे हुए मुससमाम सैनिकों के पास पपा को पुत्र भूमि से भापकरबीर को पररा रा पोपासना में पानब मोर बारमाह की पहारिरी बै पो कोसाहस पापापा हम्म हो पपा । पहारीन में हिन्दुस्तान का पग्य पपने शियसनीय पमी को खापा पोर स्वयं गौरमा या"।" पेन पनपातर में पहारीन के मुर भूमि से बीवित पर निकलने की पटना इस प्रकार नियोकि "बापेराम , हाम से पायम होकर पहारीन पृथ्वी पर गिरा। पोंकि हिन्दू मैनिक महापुरीन को मसी प्रकार नहीं पहनते थे समिए बोरिस्तान का पर पुरनगम पर दिन मा मापन पहा हा पोर किसी ने उसकी पोर माम मही दिया। ससूर्यास्त हो गया तो घोड़ी यत पतीत हो जाने पर पहारीन के मुनाम रणोपरम में पपणे स्मामी को हुए उस स्थान से निकले पर गौर नरेश पायम पापा । रस समय पहावरीम कोष होर पा गया था। गुमामो की पारार पहरान कर रखने उनको अपने पास बुझापा पौर अपनो रण उनसे भी। पुषिम्तक गुमाम अपने स्वामी के पर पाने में बहुत प्रसन्न हुए और पहारीन को अपने कपी पर नठाकर मामे हए मुसबमार हैनिकों की मोर पसे । मुताम को बरसते हए चमे पापे से पार पासव पहारीन पकानों पर सवारपार इस मामें समस्त पत बीत पई और प्रासावयाह अपने भाने एनिमें से पा मिला।" “घरे ही एक नाव साव हमार गुर्ग विसयी पौर प्रफलानी सैनिकों की बड़ी राणि.. २१२वाम नि। रोल ममारत परप्रय मित।
६२ सेना मेकर महापुरीन हिन्दुस्तान की पोर आमा । पिप तीन मास रामपूर्वो की सेना लेकर पहायरीम का सामना करने के लिए भाये पड़ा। १८८ वरी ११९२ ईस्वी में रोनों सेनाएँ घरस्वती मी निजारे परापम के पुर-सव में पहुंच गई। पहारीन का मुकाबला होते ही १० परत पगाों मे वीरवा का विना अपने मस्तक पर पड़ाया भौर पर के मुकाबले में साहस से कार्य मने और मुसलमानों को परमार करने की प्रपन उठाई । इन हिम् राजापों ने मापस मे मह प्रविशा को किया तक पत्र को परामित नही करवर तक तमगार म्यान में नहीं गर्भये । क्योरिति सेना एक बार बिजप प्रात कर पुत्री पी इसलिए उनके होसमे मोहए पे । सोने एक समेष बहादुरीन के पास भेगा बिसमें लिखा था कि हम हिम्न पचामों की पनपिनत सेना का समाचार तो तुई मातही होमा । विवनो रोना इस समय हमारे पास है यह ही पत्र को घरबार करने के लिए पर्याप्त है परतु इस पर मी मा सेनाए प्रतिदिन पा ही है बिन पानमन से पुरमेज कॉप पा है। मत यदि तुम्हें अपने प्राण प्पारे महीनो म सहीती मपने परीब सेनिकों पर, पा करो। हमने अपने इष्ट देवतामों के सम्मुख प्रतीक्षा की है कि परि तुम अपने विचारों पर सोक प्रकट करके पापिस पार नौट नामो को हम तुमारे मार्य में पापा नहीं गमे । हम तुम पर पया करके तुम्हें पपने रेस पापिस धमे बाने की पम्मति देते है। नहीं तो स्मरण रखो कि कम प्राय पीन हजार हषियों पोर पसाप सेना के साथ हम सुराको प्रमम सेम बना रे पोर तुम परावित होकर अपमान सहित पुर भूमि " मापना पापा। महापुरीन ने हिन पनामों पर परफर उत्तर में उन दिसा कि मुझे पूर्ण विस्वास । कि प्रापशा पर पहानुभूति और प्रेम भएमा है। मैं या पर पर पापिस मौर मीट पाने को तैयार हो पाता परन्तु मुझे सिवा में अपने भाई का राम है पौर पसकी ही मामाघे ममे यह प्राक्रमस किया है। इसलिए परि मुझे पाप इवना मग काम कि मैं किधी विश्वसनीय पूव को अपने भाई के पास भेगार पापकी पक्ति पार पपनी कममोरी का पूरा सिरण उस प?रा स तो मुझे विश्वास किस बात पर इमारी सम्मि हो जाएगी हि सरीन पंगाम पौर मुमतान पर पारी का प्रतिकार रहे पर पेप हिन्दुस्तानी नमर पापके प्रषिकार में कर दिए जाएंगे। लि पणा पहारीन के उत्तर को इस्लामी सेना की पुर्वमता सपकर पौर अपनी शक्ति की मस्ती मारकवा में प्रसार माफिम हो गये । या बहारीन ने समम मिया कि हिल गया बाधित पौर माग में प्पस्त हो उसने रात ही रात में अपनी सेना मुसार्द पार कर सी पौर माठ की पर रायपूठ निकबीच दरवारिदिए मर्मों बाहर निकले तो पहारीन में रणक्षेष में पार कर सेमा कड़ी कर दी। हिन पया इस पपामा संकट से मगर परेशान हुए, परम्तु मिस प्रकार भी उनसे सम्भव हपा बस्वी पी पार होकर पुरातनम में मा टे। महागौन को बिगुपों की पीरता मात दी। उसमे पपनी सेना को भार मानों में बांटा और सबको पामारी कि पर हिनु हानी पोर परत सेना मुसलमानों पर मारुमण करें ये पुर से विमुख होडर मापने का प्रयास करें। इस मुक्ति से पर हिन वैनिक पीचा भए पपनी सीमा से बाहर माना ठो पनाम पमट कर हिन्दुओं पर चोरपार पाश्मण कर सहानुन की सेना ने सनी मानानुसार प्रात' से तीसरे पहर रूपमकर युद्ध किया जा सिर तोर प्रमल करने पर भी रिम्दुमा के पांच मुरस्मन से नहीं उबा पौर पहादुरीन मे देवा नि पर्ष माता को उमन भगवान् पर परोसा करके वापहार समिों के साप पम् परमात्मण प्पिा । सहारीन पर उसके परमेत इत्यादि पमीरी सगातार मामलों से पर रावण ने भये और हिन्दू सेमा विचर गिर होने हमी । देवते ही रेगते सापेराम भोर मम्म पसव समारों की मेंट हो गए। पिभोरा प्रपली पप सेना मेकर मागा, परन्तु पोड़ी दूर ही था पामा शकि सरस्वती नदी के किनारे सहापों पमा पपा । पान मे रामा पिपाप को मार दिया।" उस समय के दूसरे मेतकों-पामुम हिजामत बारम्स मासिर, वनका नामरी प्रपर चिन्तामणि, हमीर महासम्म मोर पकाते भरवरी में भी मोरहव परिवर्तन सहित इस सुटका यही वर्णन किया है। चिन्तामणि में मिला है-"पृथ्वीराज चौहान का सनापति सम्द गिसने कि १११ सिसी के पुत्र में बहानुहीम को पपरित दिया पा, जी और स्थान परम्परत हाल के कारण दूसरे मन्तिम पुर में सम्मिलित नहीं हो सका पा। पृप्पीरार का एक और सेनापति उपसरार भी पानी में पने के कारण पुर में सम्मिमित नहीं था। पर पुम्पीयर सेनाएं मेकर सहायुरीन का सामना करने के लिए सरस्पती तर दी पोर या पापा तो पिभोप के पी सोमेश्वर ने पृप्पीएम को पपई रिपा और प्रमल किया कि वह मुरम पाए । पोमेसर कस परमय से पृथ्वीराज को सन्देह हमा कि सोमेश्वर सम्मका मुसलमानों से मिम ममा है। पीयर ने कोप में मार सोमेपर राम ररया १२ को पारा और कार पर जाने के पाए उ अपनी मा निमाम रियारपस में पर दोनों सेनाए एक परे के सम्मुख मुरकी मवीमा में पड़ी तो पृमीराम पुर की पारी की अपेक्षा राप रप में गा रहा इस प्रकार मन्तिम दिन सपाट पृषीरार चौहान की मृत्यु के पापाय असम परेप पर से दिमुपों का पग्म उठ गया और यह पुष्प प्रदेय मुसलमानों के अधीन हो गया । सरमामय मुसलमानों का मतो गुरमेष में विरास वा मौरमही तीर्य-सानों में महोती प्रकार की मंशा पमना पास्मा पोषिके रिनों का मोमणेष हो या मार पद भूबा इमा उगित प्रदेश का पया। १बरम-परिव प१४ सेकम मित। १.सम्म बिवापि।
यवन और कुरुक्षेत्र वास वश के समय कुरुक्षेत्र रास पंच के समाट पस्तमय के पास काम में वायुरीन यमरोर ने पावसर पर पाहमण किया। ११२ हिरप में वायुरीन पनदोर + पाठमस करके मार पौर पानेसर पर प्रमिकार कर लिया। हिमुस्तान के इस धीमाच प्रदेश पर मशिकार कर मेने के पश्चात् पनदोर ने अपने पूत सम्राट सम्वमर के पास मेरे । प्रस्तमय यमर के सन्देस से कोष में मा गगा पार पीघ्र सेना लेकर पामेसर की पोर बा सरस्वती परी के किनारे दोनों सेनामों में पुरा हुमा। भयंकर रसात के पाषाद पनोर की पपवय हई। ' सपाट प्रस्तमच की मृत्यु के पश्चात उसकी पुरी लिमा मुमताना रिवी के सम्म सिंहासन पर बसे । परन्तु भामेपर में रजिया सुल्ताना का गुरु उसके भाई गापम सार पाप मा। ६. हिवरी १२११ ईस्वी में पानेसर के निकट बहराम शाह की सेना के सेनापति समापनहीन पौर रजिया सुलतामा पौर प्रस्तोनिपा की नार्मों में पुरमा। इस युग में पहराम विपित हुपा । चिया सुमताना रसामण से माप निम्मी । भागती हुई रविमा पौर प्रस्तोनिया को बीगरों में पकाकर मार रिया ।" तुग्रसक दश और कुरुक्षेत्र तुममा पंप के राग्प-काम में भी उस्मेष प्ररेस ऐतिहासिक पटनामों का फेम हा। "१ हियरी में सपाट रोरसा तुम समाने से सौटवा कृपा पम्यामा पौर माहगाव होडर बानेसर पाया। यह परिस पानेसर बा पौर उसके पापाद सहारनपुर पमा पया।"" मावत 8 विपत्ति कमी मनी नहीं पाती। १९ ईसी में मप्प एलिसा का चार और भयानक सरसर मूर नंब शिली पर मामल कर पाते हुए पुम्मेण प्रदेश से गुगप। यह बानेसर का समस्त मौरस और पभिमान भूम में मिला पया पौर यहाँ की दी-सही सप्तति भी ना हो गई। १ बजेमिस्त पूmम मान २ बरीपEिR.म मान- कीरता पाला।
2 मोषी वा में कुरुक्षेत्र मुम्वान सिकन्दर मोपी के राग्य कास में पुलोष ने य समामा मे लिया था। एक बार सूपं पाइप रेप पर सिर सोपी ने पानियों को मूटमै पौर मारने की योजना बमाई दी। "एक बार उसमे (सिकन्दर मोधी ने) कुरक्षेत्र पर माक्रमण करमा मिश्रित किया। इस विषय पर भाधिों का मन मात करने के लिए उसने उमें एक धिमा । रस युम के पर गोपामिम मिमा प्रमुस्साह भगोगनी भी उपरिमा भे। मी में उनकी मोर सस्त या किनकी उपस्थिति में हम कुछ भी नहीं कर सकते । मिया लिगाम (सिकमर मोभी) मे मिया पदुस्साह से इस विषय में। पूछा उन्होंने पूछा यही क्या होता है । सुम्तान ने कहा कि उस स्पाम पर प्रत्येक प्रदेस से हिल एक होकर मान कर है। मिमी ममुम्लाह ने पूषा कि यह प्रकार से पास ही है। सुस्तान में कहा कि महागही प्राचीन प्रपा है। मिर्ग मास्वाह मै पूधा कि भापके पूर्व मुसबमान बारमाहों ने इस सम्मम्म में स्था हिरा ! सुस्ताम ने कहा कि इसके पूर्व किसी बादसाह मे कुम मी महीं किया । मुस्मा ने कहा किसका रतरदामिल न सोपों पर है। प्राचीन मदिर को मष्ट करमा नमित नहीं। मुस्ताम मे कष्ट होरर निकास ती भौर कहा कि सर्व प्रथम मैं तुम्हारी हल्या गा परात यहाँ माफमण करमा। मिमा प्रमुस्मार मे हा कि सभी के लिए भरमा पनियाम है। बिमा सिरके पादेश के कोई भी नहीं मरता । बब भीमति किती परमापारी के पास पाता है तो पपने सिए मृत्यु निषित करके पाता है। को तुम होना यह होगा, किन्तु मापने मुझसे कुण्ण के विपन में प्रत किया जो मने उसका रत्तर रिया बरि पापड़ो परान को चिन्ता नहीं है वो पूछने की कोई पाबरमता नहीं । मुस्तान मे पो कोप को रोका और कहा कि यदि अनुमति प्रदान कर देते तो कसार हितों को न पचाता पौर परिकाप मुसममान उससे पामाबित होठे । मिमा पमुल्लाह ने कहा कि मुझे जो कुछ कहना मा मैने कह दिया पर पाप माने। यह परमार मे सामन्य भामिन बोपास साव पर दिमे । मुस्तान में किसी मोर पान ररिया और कहा मियां ममुम्साह पाप कमीकमी मुझसे भेंट करते रहे। सरकाले पारी में पटना का पसेन इस प्रकार किमा ममा । “उम्रने (निकमर मोपी में) सुना मानेर में एक हुए है यहाँ हिन्दू एकम होकर मान पखे। उसने प्रानियों से पूछा कि इसके विपम में पपासा पादेय है। उन्होंने पर दिया कि प्राचीन मंदिरों को नष्ट करने की अनुमति नहीं कि स ग में प्राचीन काल से स्नान करने की प्रथा पनी प्रायो। रसमें स्मान का निप्प पापके लिए भारत नई तुस्वार में प्यार विहान भी पार सम पातिय की हत्या का सेक्स करते हुए १ मरिपात पापरबारयिमा पेशा नाम प्रथम । बारीमा मदुला। कोणते मुरुमगी सेकस रोमरमसलार मुस्खही।
पस कहा कि तुहिनों का पक्षपाती है। परा हुमुर्म में उत्तर रिया कि वो कुध परा में मिता है उसे में रहता हूँ पीर सस्प बात कहने में कोई भय नहीं । मुस्तान संतुष्ट हो गया ।' मुगल काल में फुरुक्षेत्र प्रथम मुपस सम्राट वावर पम्प झाप्त १५२६ ईस्वी में पानेमर के मजार परपूठा ने प्राने नायक मोहन के मैटर में रिह किया । पहने पहले तो पिरोह का इतना प्रर पंप पापियानों ने मुगम सेना को पचा रिया । बाबर चामेसर रायपूर्वो से बहुप परेपाम पा । १५३८ इसी में या परा मूरी पौर मुपम सम्राट हुमा में संपर्प पारम्म हुमा तो पानेमर रायपूर्ण ने एक बार फिर पिदोह किया पौर रमिण में पानीपत तक नगर का प्रदेव पीरट कर दिया । पेरशाह सूरी सासन काम में पुरक प्रदेश में फिर मुस पौर धान्ति स्थापित हए । रमाहारा निर्मित ही साफ मो रोहवास से पेशावर व बनगाई पाबी पानेसर नगर बोनों बीच होकर पई पी। पर की महत्ता को हट में रहकर उसने बानेसर में यात्रियों की मुविधा के लिए रोगी सराए बनवाई थी। एक सराप पानेसर नपरो दक्षिण में सम्निहित तीर्य के पूर्वी किनारे पर भौर दूसरी उत्तर में बनवाई परमी । बानेसर मगर रविण में बनमाई मां सराप का चिहपो वित मिट गया केवम एष पहर ऐप है परन्तु उत्तर में बनवाई गई पपप बगहरके म में पमी पेप को दिन प्रति दिन पिरती चा पी। पहाँ एक विधान पराए जिसके दोष एक मस्बिर पोर कुर्मा पा को १९४० ईस्वी में रेप-विमागम के समय परिगर्वन में समास हो गया। एक पुन पिसको ऐरणाहने पर पर बनाया था पर भी पानेसर उत्तर में अपहरमा बड़ा है। इ पुन उना मुसा कि उसकी महरायों पर गोबरे इस मुगल सम्राट हमामू की मृत्यु के पापाव १८ मगर १५स्त्री को प्रकार जबकि यह बहमी के पण्य के लिए ही बाझाम पुर करने पसामौर से पानीपत की मोर पा रहा पा पानेसर में सेनापों का पगार मना पा। १९९०मी में सूर्यप्राण महापर्व पर मुगल सम्राट प्रकार गुरमेय भाया पासमार पानेसर पातोहा बोपियों पर सम्मासियों की एक जमात रेषी। इनमें किसी विषय पर कुम माहोपा बा । बहस सब सम्राट के पास पाए पौर प्रार्थना की कि उनका मरमा समाप्त या पाए । सम्राट की पासा से कृष सैनिने में अपने घर पर भभूत रमानी और संम्पासियों की सहायता के मिए उनमें पामिम हो बमे कोकि उनकी पमात कमपोर पी। एक पार पस्त मनाई शुरू हो गई पौर का पारमी मारे पए । सम्पासियों को बीत सम्राट बहन प्रसन्न हुए 1. सपाट प्रसार के पम्म काम में बामेसर पणन महत का पाप था। १जाने जातेका मिशन मारमा यो । जमाते मनमीतविशामुन मरमा रमताको वियोमा रिया।
७ "पानेसर में एक टों से बना किप्ता है। परखी २२८१८८ पीपे १७ विस्से है। राम्प कर ७८१०८०३। किले में पपास पुरसबार मौर १५.. सैनिक है। प्रषिक बनमस्या पंगों पार पूरी की है।"' प्रानि प्रकवरी में महाभारत युद्ध का भी विस्तारपूण वणन है। प्रकार ने महामात को फारसी में मिबवाया पा। सम्राट पकार ने हामी मुनवान बिसने कि नीव बान के पाप मिलकर महाभारत का अनुवाद किया था को पानेसर में मी हत्या करने पर कड़ी सरा दी।' सम्राट जहांगीर के राग्य कात के दस वर्ष में पामेसर में मकर लेप श पड़ी। तुमके यहाँगीरी के अनुसार इससे पूर्व भारतवर्ष में कभी प्ग नहीं पड़ी थी । यह पेम पश्चात् में विस्ती पौर मीर तक फैम मई । १५७३ ईस्वी में पुरात के नाम प्रामर ने गोश के मुबेशर हसन मिर्गा को पुर में हरा दिया । इसम मिर्गा परास्त होगर पंसार की भोर मागा । उसने समस्त कुरभेष प्रवेध में सपनर मचाकर मानेसर को तूटा । सम्राट नहाँगीर के सिंहासन भाम होने क बस पाप मास पश्चात् मई ११.६सी में रह बरे पुत्र पहवारे सुसरो मे पाने पिता महापीर के विश्व विद्रोह कर दिया। उसने पहची भावे हुए मार्ग में पानेसर को मूटा। बनमुति कि पहावीर और सम्राट शाहमहाँ दोनों सूर्य-ग्रहणों क प्रबतर पर कान माये पे पौर रम्होंने टी-सानों की रक्षार्प रागनाएँ भी पारी की पी । साहयहाँ नेपानेसर नगर में उत्तर-पश्चिमी कोने पर संगमरमर का एक मुखम-निर्माया ममा केरग का मकबरा बनवाया । इसे घेख हसी का मकारा कहते है । वेव पेहमी ईरान का एक फकीरा। पौरपोग ने रोष वीर्ष के मप्प का एक मन्दिर गिरवा कर वहा एक मिता बनवाया था बड़ाँ से उसके सैनिक स्नान करने के प्रयल करने वाले यात्रियों पर मोनी पमाते थे।""एस वीर्य के बीर बहाँ पौरपर गिमा निर्मित किया था उस स्पान को पार मी मुगमपुरा कहते है। मौरंगरेप के घासनकाल में सम्बत् १०९७ में गोमपुर मरेप रामा प्रत्रीतसिंह ने अपनी नवविवाहित भमपली मुररानी क पाप कुरुक्षेत्र भाषा की। मुगम घासन-काम में कुरमेन एक विस्मृठ प्रदेश हा। समय के चार-मारों ने इस प्रदेश का पापार समाप्त कर दिया। कमा पार सम्पता के रेय मिट पए, फिर भी पामा स्थान होने के कारण पुरुक्षेत्र का महत्व बना पा । पोम्मुखान के पुत्र सम्राट खसिपर के पासन काल में पाये पर्प १७१० स्थिी में कुरुक्षेत्र प्रदेश सम्राट के निमी पप (सरफे खास} + लिए पामीर पा। सनहीं एतामी के पन्त में मुगल सम्राों की पति क्षोस हो रही पी पौर मा में मिल पोर पकड़ने वा पे । १०१. स्त्रिी मैं गुष पोधिर सिंह की मात्रा मे वीर रारापी मे पानेसर के मुसप्त फगवार को मारफर मगर भूरनिया पार भावरिकों को मार दिया था। सम्राट पावसियर में पानेसर पर फिर परिकार पर निया पार पानेसर मपर का नाम इस्लामाबाद रह दिया। प्राचीन सरकारी पाने प्रकार २. मुक्सान पारस खा ममुन मदिर मापी मासूम । २1 परीष गरीर मारिया पंपा प्रम माया ८८ । कापात में वो इस्लामाबाद का नाम कुछ दिनों पत्ता परम्तु पम साधारण में यह नाम अपमित नहीं हो सका । १७२९ ईस्वी मुहम्मरसाह के शासन काल में कुपार प्रदेस रिनावर सो पौरपाबारीको पामीर में 2 दिया गया। इस विषय पर मारिर मामके मेबह पौर एक फ्रांसीसी पात्री सर पिमियम मोन मे पूरा प्रहार गमा है।' कुम्क्षेत्र प्रदेश को दो पहते ही मृत प्राप हो रहा का एक पौर राम्ण कट का सामना करना पड़ा । समाट मुहम्मरमाह के राग्य प्राप्त में १४ जनवरी २०१८ ईस्पी को फारस का पारणाहनादिरगाह कुरले प्रदेशकोपरबाप करता हुमा करनात की पोर मया । पासूबर १७१ वी में मराठा राग्य के सुप्रसिद्ध पेण्णा मागी पर की मात्रा 'पपागाई ने कुपोत्र यात्रा की। मुगल सम्राट साह पातमपीर सानी ने २५ प्रातूबर १५४. में एक फरमान (पम्प-प्रामा) द्वारा मराठा ऐप पी हिमस को गपा पोर पोर के वीर्य स्थानों पर पामा पाने गामे पारियों पर मनाया गया गरिमा (कर) एटा करने की माझा दी । इसमें पूर्व गरिमा कर मुसममान पफसर सट्ठा करते थे।" १७१५ ईस्वी में दिल्ली के मुपप सम्राट पाह पाममबीर मामी ने पागीर पीन कर मराठों को दी। इस पर मुखबपान नायर होकर शिनी सम्राट पे मुकारमा करने का विचार किया। १७५५ स्त्री में सुधपचान मे परहित्य के प्रवेश में पूटमार पारम्म करी। करमान में बारमाही सेना को परागित करके अपमान मे ११ मा १०५५ में पानेसर ११ पप्रेस १७५२ स्विी में भरना बेप ने कुपवान को पेपा के स्थान पर पराजित करके पानेसर तक प्रदेश पर अपना अधिकार कर लिया। परना बैग में रिस्मी समाटपरीर को मिस भेगा कि 'इस प्ररेसो पमीदार मुस्ताब है और इनको पषितार में करने के लिए पक्ति की प्रामापता है। परि मारकी इस पोर पाने कीया है तो अपने पार की सेमा पौर प्रतुम पुर-धामग्री पामो नहीं तो मापका यहाँ प्रामा बेकार होमा। पाप इस प्रदेश का प्रसाद मुझ पर घोड़। बजीर ने अपनी सेना की निर्बनता पौर निर्धनता पोए पवाब माना स्थगित कर रिया। बय प्रकार पानेसर का प्रदेस परनाय के अधिकार में भा गया। इसी सपाट मै परना बैग को पहरबर बहादुरकी उपापिनी।" 'प्रपना बैग वान पोर पुनियों को गोरा ने 'मिए शिकार का बहाना बनाकर पादपारा मनीगौहर रिस्सी से सरहिन बाता मा १ बम १७६ी को बामेसर से गुपण। पानेसर का प्ररेप १५१० ईस्वी में प्रवना बैंगवान हापों से निकलकर पदिर पामा । रबिम बोन संस्मरण । रिसी नाम मगर पात्म १ पृष्ठ १५ पाई गी पन मरेस। म् पियो मार मण्यापासून १, पृष्ठ १४बी एम सरदेस । ४ परीलमनार सनी १ मे मुगपरिरमा खम्मा मालाब इनसासि भापते काना देग ९वी. तारा लामा ८८ ५१ परेशर मालम साबी। पारपवे शाह मातम सनी १५ ताकरे तामस मसकिन , ११४ दर दुनियों के परिवार में पा गया। पुरानियों ने प्रगस समदसान को सरहिन्द का परर्नर बना दिया।"' मराठा सरदार मनहार राब होमहर की स्त्रियां बनवरी १७५८ इस्ती कोबर कुम्लेर नाम करने के लिए पाई तो प्रबदुम उमर खान की सेना की एक टुड़ी से पराठों को मुठभेड़ हो गई। मराठे पीरता से सहे पार उहनि भफगामों को मारकर समरे पोरे धन मिए। मराठों का पंवार पर पास्तविक माक्रमण मन्तिम फरवरी १०५० सी को पारम्म इपा । मराठे और कुरुक्षेत्र दोन माघ १७५८ स्विी को पचार विषय यात्रा पर पाते हुए मराठा सरदार एनाव पर प्रपनी बड़ी सेना हित रक्षा में पढ़ार समा।' माहौर से देहनी वापिस नाटते इए माप पर मे फिर पांच पुन १७५८ ईसवी को मोमानती प्रमावस्या के पुष्प पर कुम्ल वी4 में स्नान किया । ७५ मास मए वापिक के बदमे पुनाम पर * पपमे निमित पगाय को रिस्मी वापिस मौटते हुए प्रस्नाय के हवाले कर दिया । प्रबना म मराठों की पोर से पंगाब का गवर्नर नियुक्त हपा । पप्रेस १७१८ स्त्रिी से सिटमर ११८ स्थिी तक पाना स सान रपुनाप राम बिरित प्रदेश सिग्य मदो से बमना नदी हकका प्रविनायक पन गया।" १५ सितम्बर १७१८ सिसी में मराठों द्वारा नियुक्त पंग के मपर्नर पदमा बेग पान की मृत्यु हो गई । पैसामा मे मराठा सरदार दाता मी सिधिमा को पचाय का राम काम मामने के लिए सेना सहित भेगा । अन्तिम मार्च १.५ ईसवी को मराठा सरदार दातागी मिपिया परनी सेना सहित पाव की मोर बाता मा पुस्लम पाया । १५६ स्विी में मराठों से वंग पार मगीरोना रोमे, हिम् रामा समाई भाषोसिंह महाराणा अयपुर और पी विजयसिंह महारामा मारला ने अहमदयाइ भमानी के पास सन्देश मेवा कि वह हिमुस्तान प्राकर मराठों से पनकी रक्षा करे। पातूबर १७५१. में प्रामदयाह प्रमासी ने मारी पफयान ना मेकर हिनुस्वान पर अपना . (१) पर भुभाती। (२) मराराम चा इशिम लेखा वीरे रामपारे पु५ मित १ (0) भागमा मात र परममि में• २५ से २५० तक (1) तारी बयर खनी । १९५ सयानाए सम्प १.१४ करे इम्मानुस मुन्स प Y समानामा १ ४ प पारी मुशार . मनाचे ! १७ मरम्पनी विस्ती निभा RR म पग मा सानी एव प १-१। (0 मायावे यार बम सी .मगोबा सेवा सम्मान बन प २१ वी पाना मय समय बाम प्रयी मार १Uमनामीनपर गुमाम हुसेन समाजाते परनाय पान किन परीने पंचम पसरत प. मुबारसले समाती दुर्रानी ऐसा अनुन मौन.पा मी ११ भरातुम मुसलीम समन म्याक प. २१५ देसम परमार परारं मारन पार्टस हुन प २१५-१ (म एन. रामभराम इतिहास ।
१२ . गमीत सिंह सवनम नदी पार करके बामेसर रिसे पर अधिकार कर सिया । २५ मप्रेम, १८.स्त्री की साहौर सपि मौर ३ मा १५. ईस्वी की पोपणानुसार पानेसर फिर भंपकों के पाठ मा पपा ।। १५२७ ईस्वी में प्रार्थर मिसता है कि कुछ वर्ष बीते हि या प्रदेश पंगमी पन्तुपों से भरा पड़ा था। १८२७ ईस्वी में पामेसरस्वतम्या पिकार धीम सिए गए पोर इसे एक पागीर बना दिया गया । १८५. ईस्वी में पन्तिम सिब सरदार फाइसिंह की रानी की मृत्यु के पश्चात् पामेसर प्रदेस पर पूर्णतया अपने का अधिकार हो गया। १८५७ ईस्वी तर पुरुषेण प्रदेश मूगा देहमी में सम्मिमित पा। पंजाब से इसका कोई समाप माही पा। पानेसर मिप सरसरों का मुखिया मिसिंह पा। टम बारहिन ने १८५. ईस्वी में पानेसर पी पेटममेंट रिसोर्ट में सिमा है कि 'मिसिंह पवनामे का पने पाता मीमरा रागपूत बा।' परस्तुरप्टन ऐबट मे मिला है कि मिपसिंह पाट सिख पार पपने भतीनों मंगामि और मागसिंह के साप पामेरार पाया था। मंगामिण और मानसिंह वो पानेसर मास-पात पात में ये मोर मिसिंह सिहों के एक पाये के साथ मेरठ मा गया पहा कि यह सुर में माग पपा। ममासिंह भोर मागसिंह शाहबार के सरपार दरमसिंह निर्मन भौर मागे के सरकार की सहायता से एकगार पराजित होकर इसरी बार रात्रि को प्रहार कर पानेसर पर पविकार कर मिया। दोनों भाइयों में पानेसर मरेप को प्रापस में बाँट मिया । ममासिंह मे २/५ और भावसिंह ने पेप २/३ भार पर अधिकारकर मिया।' पंगाप सिम इतिहास के सेसप्टन निगाम मे ममासिह के पिपप में निवाth 'बानेसर का प्रमा' बो१८.सी में प्रमेरों के साप मिम नपा पा सिख सरसरों में सबसे पहा पातकी बा । महारामा रसगीतसिंहपस मंगासिंह से रता पा।१८ स्त्रिी में प्रोजों मोगा पौर विमोई मांग भंगासिकोरे पिए। समम ति कि मंगासिंह ने सबा मारमाम वृष पानेसर प्रदेश में मयमाए ।हम पाम पाणमाम भान भी कम्पनी बाग मंमासिंह का बाप पौर घोटी सरकार का बाम।। पासिंह की सेना में गेगर सामिन ये बिमक पाप पर दर-दर के प्रदेशों को पूटता पा । मंगासिंह के एक नाका प्रवसिंह पौर एक मामी करमहौर श्री । एक पौर साफा साहसिक रखेस है पा। करमकोर का विवाह पटिपामारे राबा करमसिंह के सापमा भा। ममामिह मे करमकोर के बार में प. पांच रिए । १८१५ स्मिी में मनासिंह की मृतु हो गई। उसकी पकी समाधि पान भी सरस्वती तट पर बीविस्था में बनी रखेम पुत्र साहसिंह को मारमा पाप मागीविका के लिए रेफर प रियासत ()सिनिास पनिाम | (२) Rपोर्ट पार्षीमित गौर मिना कणा । (यामेन रिसोर्ट भार बारेमा कुन बारमिन ११ । - (मिम मममीम मिया बाबाच इम्य संस्करण ।
पर फतहसिह का परिकार हो गया । फतहसिह को मृत्यु १८१६ ईस्मो में हो गई । फलहसिंह की मृत्यु के पापा उसकी माता मंगासिह की रानी माई मियाँ मे १८१० स्पिी तक राम्प किया। १८३. सिमो में मा पिया की मृत्यु के पापाव फरहसिंह की विपना रानी रलकौर मे १४ ईसी का राग्य किया । १८४ ईस्वी में रखनकौर भी मर पई तो फाहसिंह की एक पौर विणा पनी चमकोर ने १५५. स्पिी तक राम्य किया। १८१० ईस्वी में बापकीर की मृत्यु हो जाने पर पानेसर पंचों के भपिकार में मा गया । १९५० ईस्वी में कैप्टन सारफिन में पानेसर की रियासत का सैटसमेन्ट दिया। मंगाणिका सामीदार मागसिह १०१स्सी में पार पुष घोड़कर मर गया। उसके तीन पुत्र सन्तानहीन मर गए। रियासत का प्रथम भामसिंह के कनिष्ठ भाई बामसिंह के पुष बम्पतसिंह हाल में पाया। बम्पसिह १८३२ ईसी में मिस्सम्तान मर गया। कैप्टन मपूरे ने रियासत का सैटेममेन्ट करके अपनी पग्य में मिमा निया।' इस प्रकार पूरे ३१ वर्षों तक पानेसर का रारम प्रदाय स्त्रियों के हाप में रहा। स्त्रियों के राग्य का परिणाम भयानक पोर पोपट नहोकर मौर क्या हो सकता पा? सन् १८५५. में प्टिन ऐक्ट मे वो गुस्से मोरा में सैटसमेन्ट माफियर थे उस समय का वर्णन इस प्रकार किया है "कुम्मन में विस्कुम परायकता है। कोई पक्कि पुरमित नहीं है । पानेसर को निर्दयता से मूटा गया है । पशुओं को पराते समय सस्पमारी परवाहे रखने पाये है। ममके, युर मार-काट मार रक यह नाना प्रतिदिन की साधारण सो गाउँ ।प्राय पार पाने प्रपनी रक्षा पड़ोसी गांव को मूट सेवे है।" महापमा रणगीवसिंह की मृत्यु के परमाद पानेसर साहौर पम्प के विस पश्यन्न कान बन गया था । १५ सितम्बर, १८४५ स्विी को सरदार प्रतरसिंह ने अपने भाई महनासिंह पर माले कारसिंह सिम्बोलासिया की सहायता से महापना शेरसिंह पीर मानसिह पौर महाराणा पेरसिंह पुत्र प्रतापणि की हत्या कर दी। सरपार प्रतामिह में प्रोगी प्रदेश बानेसर में मरण सी पोर पानेसर को माहौर पम्प के विरुव बिगोह का पग बना लिया। प्र पोसिटिकम एनेस्ट की मामा से सरदार प्रतीसह सिक्स राज्य को समात करने के लिए फिर माहौर गया । सरदार प्रत्तरसिंह ने माहौर पर मभिकार करने का प्रयल किया परन्तु प्रत्तरसिंह, भाई वीरसिंह पीर रामकुमार कापीरासिंह परा प्रपल में म.१०४४ स्वीको औरहाबाद के साम पर मारे भए ।' १८५७ का स्वतन्त्रता संग्राम और कुरुक्षेत्र १८५७ ईस्या के प्रथम साता-युग में भी पुसोत्र प्रदेश प्रम्प प्रवेगों में पी मही पा। जब मेरठ मोर रेहमी में स्वतत्रता पुरी बासाए उटी पो उगही पिगणारिता दुरपेत्र प्ररेस में भी परसी।हमी पम्मामा बी.टी. रोर पर मुमीका A fe कोस से बड़ा महत्तमा मात्र में उन दिनों अमाना भगोका प्रयोगमा पा । प्रम्बामा में ही प्रापी सेनामों के मागरमधील पमरम पालगनानार (सीमा पार निरमा THIमण (२) मा 147 सैरतम Rोती मार शिका मरमान । म राम (Ointerm ARTHANA Funायर मेरमा रिन पापा TtureritTAYI पा। पौर्मत नाना साहिब यो १८५० ईसी स्वतन्त्रता संग्राम के मुख्य नायक की नी दृष्टि पानेसर पनिक महत्व पर पड़ी। इसाहबार, परामपी मामी और रिस्सी से होठे हुए भीमंत माना साहिब अपने मुस्प परामवावा प्री मुस्मा सहित वीर्ष पापा का बहाना से १६ पौत १८५० ईस्वीको कुलोम पपारे । बीमत नामा साहिल की योजना पी टिपर रिल्ली में स्वतता पर सहराए पो प्रग्याता से प्रमी सेना रितीयों की सहायतार्प न पा सके। पुरष की पंचायत बामणान् ने भीमंत माला साहिब के सम्मुख सतायता का सन्देश हरिमारणा प्रान्त के गांव-गांव में पचाने का मन दिया । तत्तापाव पानीपत होते हुए माना साहिब पापिस बिदूर पसे गए । पवित्र ती कुरक्षेत्र का माम ममम मतमता-पुत्र का संदेश बनकर हरियाणा प्राम्त के प्रत्येक पर में पहना। १४ मई, १५० स्त्रिी को रिस्मी पर प्रधिकार का समाचार पमाग्नि की मौति जैसवा हमा कुष्पेष पहुंगा । बामेसर मैं उस पमन प्रपत्रों की पारी मेटिव सेना ना पड़ाम पा । इस सेना मे गिोभारम्म कर दिया। देसी सैनिकों ने प्रापफसरों को मार कर नगर पर पपिकार कर दिया और रिस्ती-म्बामा पप को पीपमी पान पर बम्द कर पिया मिससे कि मम्बामा से अंग्रेजी सेना रिस्ती म मा सरे । २० मई १५० ईस्वी तर कुरथम प्रदेश पर विप्मपारियों का पपिकार हा । परन्तु २१ मई, १९५७ स्त्रिी को महाराणा पटिपाता की सेनाए अंगों की सहायता पानेसर पहुँच गई । विडो एपम दिया पमा । कुतोष प्ररेस पर प्रपिकार रहे रिस्मी-अम्बात्ता पर भग्नरों के लिए पोम दिया पमा । हिसार ोिहियों को पानेसर भाकर बस में बम कर रिया गया पा पार सन पर कसा पहप मगा रिमा ममा पा । परन्तु उस समय यह प्रपबार फेम गया कि पम के रामपूत ११ मा १८५७ ईस्मी को पाक्रमण करके गिोहियों को पुा मेये । मत पियोगे को पुपचाप प्रम्बामा प्रेम भेज दिया गया। १ पून १८५८ ईसवी को महारारा पटियाला प्रपनी राबमाती की रक्षा मना सहित बानेसर पे पटियामा बमा गरा। मानेसर पर फिर विगोहियों में प्रपिकार कर लिया। परन्तु महाराणा पटियाना की पनामा - फिर पार पानेसर मसर को अपने परिकार में से घिया । पानेसर महान परापूर्वी ने प्राणों की सहायता की । अंग्रेजों की रक्षा एक प्रत्यारोही सेना बनाई पौर २५.चौकीरार मेगजीन की रक्षा के लिए दिए । परन्तु गुम्वेष प्रोतके मोर्गों का निरास प्रों पर से उठ गया पौर घोर पस दिन की प्रतीक्षा करने मपेपरपिंगी सामाग्प नष्ट होगा । पाखिर एक दिन प्रप्रेजो सेनाएं महाराणा पटियाला को सेनामों को गुम्ने प्रदेश में पाकर मी पर पुन' भधिकार करने के लिए भागे बड़ गई। महाराणा पटियाला की फोगों ने बानमा की बनता पर निरप नपीन पुल्म टोरे। मीरे धीरे सवन्त्रता सुरकी भिनगारिको ठही पड़ गई। फिर भी वायत प्रसत्वान् के सरस्म गांव-पार में स्वतन्त्रता की प्रमाणपाते फिरे । १५१७ स्त्रिी के स्मामा-पुरके समय मानेसर पिसापा । यहाँ का गिप्टी कमीस्मरप्टिम मेकेनिम पा। (१) रवि गमीवर विदा मनात दुसरा संस्मर इसिम्पन यूएनी सा पास पाखर बानिराम निरेमिकल से विलसना देव सिवन म्म्नी। पारमा पशिफेम समीर सरमा गोबरलागी पंप मर भग्नी पर प्रेम ।
ज़िला थानेसर पामेसर का जिमा १४ ईस्वी में अंग्रेजों द्वारा बनाया पया पायो १८५२ ईस्वी मोर दिया गया। १८६२ सो म पीपसी को पानेसर की सासीम पौर मिला प्रमासा बना दिया। सम्मरत सन् १८१६ ईम्सी में बहसोत पानेसर मौर विमा कलात बना दिवा ममा मो माय दिन है। सन् १८५७ ईस्वी से पूर्व या पूरा देहनी के राम्प प्रणम्प में था परन्तु १८९७ मी पपाद सूग पंगावर साप मिसा दिया गया । निसा पानेसर का प्रपम रिटी कमीश्नर टिम सारहिन पा। मगर प्राफिसर निहनि पानेसर में निमा मनमे से पूर्व पानेसर प्रदेश का राम्प प्राप किया या उपके माय इस - १९४३ ईस्वी मेजर सारपसी-यो १८४ी भैगर मीच सी.बी. मगर ए. एस. ऐक्ट १० स्विी बी.म्परत १८४८ त्रिी मगर एस. ए. ऐक्ट १८५. सी में पानेसर सैरममेट के पापाव दिएट परीयर करनासो मनुसार पानेसा के विषय में मिला है कि मानेसर बदर को मीष्टि से देतन पाने के पह बात छुपी हुई नहीं रह पदी कि इसकी पपा कुप वर्ष पूर्व पनी दी । मगर पार पार्मो रेवणहों से सर वीवा है कि मिटने लोप इन पर पवेमी इनसे कहीं प्रकिक बस में। चारों पोर पुओं की बहुतायत दी जिनमें से पापे से प्रमिक पा पर पए और उपमाऊ परती सम समय की स्मृति रिवाती है कि यहाँ पपिक पनसम्मा पौर समृरि निवास करती है। इस प्रदेश की समृद्धि का सबसे पा एमाण मा सिना भूमिार पर हमें पठिनता से मिमता है, उससे से मुणा hिrai पम्प मे पणा होता पाबा मैंने इस प्रदेष के सिर पम्मपन किया तो में इस परिणाम पर पर किस प्रदेश के राम के पास पे है कि पा माई सदहिया प्रभान मंत्री तुमयीयम प्रशानी मष्टि मामा र मनुष्य का । उसने मारी कर भगाकर यहाँ मोमों को पीत विमा कयें बने लिए बहुमस्या में तोप बम से बाहर मानेसर में पा बसेम्पोकि पामेपर मेकर बहुत ही कम थे। १ स्विी में भाई रसिह (TH मार विमा (1) मगर विमानसरा संतरच की मृत्यु के पासा पम मी पोगों के प्रपिकार में भा गया । प्रेगों ने मत करों में भारीपमी कर दी परिणाम सम्प मो मोप बस से पाकर पानसर में बसे पेमें वो मापिस चमे ही गए परन्तु मरे सार पामेसर के मोग भी भारी सरया में बस चमे गए। पानेसर में कई बार ऐसा फूटा सन् १८५५, १८१७ पौर १८९१ ईसवी में तो इतना रंग जैसा कि मगर बिसुम पगार हो गया । मौसम के परिवर्तन में भी सस्प पारण किया सन् १८५१ १८२२ भौर १८५८ ईसवी में तो इतने मोमे परे कि सारा परेप उगा ममा मोर पयानक मुखमरी फैल पर । पुप मा भागम, बगनी पोर पोरी करने पामी मातियों के पातक से पमता या प्रदेस छोड़-घोड़कर चली गई।" 'बामेसर में एक पुराना नष्टप्राय किसा है पो चोटी पर १२.. फीट है। पूर्व में एक पोटी पर मापुनिक नपर पया हमारे और परिरम में एक पर्यन्त भूमि है वो बाहरी कामाती है। टीमों घोटी पहाड़ियाँ मम्बाई में पूरब से पश्चिम तकरीर एक मीस है और चौड़ाई में करीब २ ..हार फीट । सम्बाई चौड़ाई १.. फीट का पेप बनाती ६ मा २मीम से कम पो द्विारसाप के 7 मीन के बराबर है। किन्तु मुसलमानों के माक्रमण से पहले यह निश्चित माधुनिक नमर का माग होगा। इस स्पान को स्टि में रखने पर पूराना नगर प्रत्येक पोर एक वर्ग मीम क्षेगा पो दिपार मीम का मेरा बनायेपा या चीनी यात्री द्वानांग की नाप से इस मपिक। यह कहा जाता है कि इसकी १२ मीनार की गिनम पर भी रुध मबपिष्ट है। मह किया पगा रिलीप ने बनवाया मा बोर का मेष पा पार पाडकी पांच पीड़ी पहने वा। पश्चिम में मिट्टी के किले की पीपार सड़क से • फीट भी है। किन्तु मौतरी पान ४. फीट से चा महीं है । पूर्ण पहाडी टी हुई बड़ी बड़ी ये से की है। किन्तु तीन पुराने मों प्रतिरिक प्राचीनता का को बिल मपिट नहीं है। माना के धमय पाना का मेरा २..मी मा दो भारतीय योगन के अनुसार २० कोस के बराबर पा। किन्तु पकार के समय ये घेराब कर ४. कोस हो गया। मिस्टर भारनिय मे यही माना है । टामेमी के वारा पानेसर को बटमसर के माम से पुकारा पया है। बटन पर लिए पतामेपर या सतत स्पाणेवर का प्रयोग होता है"।' फुस्योग ने मुगमों और सिरसों के पासन काल में किसी भी राष्टिकोण से सन्मति मही की। यह एक ऐतिहासिक गया परन्तु सत्य है कि पतसुर नदी से परे पंगार कसरी महाराजा रसगीतसिंह, सुप्रवन्म के कारण विषय राम्प पंवारमिए परवान पा । परन्तु क्षेत्र प्रदेश के लिए दो सिक्स सरदारों का पम्प पीया पामता प्रभिपाप मा। ममामिद पोर नसकी विषमा पनियों के प्रवत्व प्रौर पयोग्यता मेस्मेन प्रदेश को चौपट करके रख दिया । बानेपर के सिव सरदारों को पर्म कसा, शिक्षा सेसति मपमा निर्माण कार्यों में म तो कोई कपि बी मौरन ही उमकी कोई देन है। यह सिमस परवार ने निकम्मे पे कि तीनों का तो पया प्पान करणे सिव पुर साहिबान एक मुमारे तक न तो बनवा सरे पोर म ही उनकी मरम्मत करवा सके। किस प्रकार मुगों पोर अंग्रयों ने धार्मिक (१) सिरि खिा मापान दूसरा संस्म । (२) र जय सेवा मित्र मसावी ।
दीपा की रक्षा म्यामा निकासी, सिक्न सरवा की कोई ऐमी माझा नही है। बामेसर नगर पौर सुरक्षा प्रदेश भर पर उनके शासनकाल में बाती भोर मुखमरी रही। सिक्यों के पासन-कान में एक भी होसी मा पर नमर भर में ऐसा नहीं बना रिसे मुकरमहा पा सरे । एक सय में, मह पाए, रामेत्रको दया पौर मृत्यु के पास बन पए। उमरेपार मेशिनों का स्थान नहीं पा बस्कि मरासियों का बोलवामा पा। इसकी पपेना कि सिव ससार अपने लिए ममीन मुन्दर मोर जास्मह रंग के किम या महत उसी प्रकार बनाते जिस प्रकार के पौसी रामा पात मरेप माई यसिंह में बम पौर पहेरे में समाए, उन्होंने मुसममानों की पुरानी बगहा तुमय पी होतियों पर पनि कार पर सिया पोर रहीं दी हुई समियों में जीवन पार कर मर मए । एपी होमो रिसे पुराना पाना कहते और यह होती जिसमें मंगासिंह की खेल का पुष साहसिह पौर मरा पुत्र गिन सिंह पवा पा राम सुगर की परिमापा में भी नहीं पाती। कैग नबर मोर राई प्रदेश के साों के पुराने मकाम बहर मनुमान मगामा बा सदा है कि यहां भी रसिंह के पम्प में समृषि का राम्य पा । परन्तु पामेसर पोर रोध के पांग उमाना है। इस वर्ष पहने पानेसर प्रदेश के पोरों में एक मी मकान पर बना हुमा मही बा। मही ताकि पामेसर सित सरकारों में गायों के पो कुमों की ईटें उबामा कर कुए वोग रिए। सममें इसनी सामर्म मा मुम पूम मी नहीं हो किट पापार प्रपने मकान बनाये। पास्तर में पामेटरसित सरकार पेशेवर मुटेरे । मिस्टर सारकिम प्रौर कुरुक्षेत्र समार मारपन पोर हरम पापाद नारकिन पहसा पक्ति पा जिसने पवित्र वीर बीर्णावार के लिए विशेष कार्य किया । पुरष भूमि में पारसमे पाने समस्त तोों को भारहिन साहिब का मामारी होना चाहिए। मिस्टर मारपिन १५० सिी में पर सिखों का पम्प समात होकर प्रोगेका पम्पारम्भ हुमा पानेसरका पाटी कमिश्नर पोर सरतमेर माफिसर या । यो महान् कार्य हिन बनता पनी पौर रामा-महापना नहीं कर सकेगार्य भारनि साहिब ने किया । सान साहिब क्षेत्र के गोवार का पमपाता था । मान से पूर्व पुष्प वीपों में पार्टी की घोपनीय बणा पी। परिक पप तो मातीपों पाट नहीं समान । भारनि धादिल मे पार पनरत राजा महामानों और पनकामों को मन भर निर्मासा करपा देने के लिए प्रोत्साहित मिा मौर समस्त विमे मे भूमिकर *सार एक-एक पपा निरोप स से हटा स्मिा और दोनों के पाट पाहे बनाये । सपाट बमराका ना बाम पाकिसप अपनी पसलीडाप प्रतिदिन कार्य २बने गाया करते पे । मानि पाहिल ने रोष पीई के परिरमी भौर सत्तरी पाट भारने नवपापे पो पार भी भारनि बार हमारे है। पप भेगें भी समय समय पर पारस्पस्वानुसार प्राशापण निशान र परिपतीयों की रक्षा और स पावन भूमि का गौरव बढ़ाने के लिए विशेष प्मान दिया। मारपिन साहिब का सहायक सैटसमेंट प्राफिसर पीपरी पामेपए पा। श्री कामेराए सुसवानपुर मिया सहारनपुर (उत्तर प्रदेस) पौरामम स का पुत्र पा। घी कामेराए मे १८५४ ईस्वी में पुरुष दर्पण नाम की पुस्तक तिसार कोहनर प्रेस नाहौर से घरबाईपी। कुम्ोष वर्पण का पिक रिस्ट्रिपट मरटीयर रिता करनाल में भी पाया है। 'परि पुरुष के विषय में विस्तार से पानना हो तो भी कामेराए पास्ट्रा ऐसीसरेट पेटवमेंट माफिसर पानेसरी कोहमूर प्रेस माहीर से भी पुस्तक पम्दोष रर्पण में पड़ो।"' इस पुस्तक में १८५४ लीकरण पौर उसके प्राचीन पार्मिक इतिहास का वर्णन है। यह पुस्तक भी कामेराए मे मारों संक्रांति कम्पा सम्बत् १९१२ सितम्बर १८५५ ईस्वी को समाप्त की। भी कोमराए सिस-वाम पानेसर में सहायक सैटस मेन्ट माफियर पा तो कुष्य के विपप में कोई प्रमापिठ सिमित पुस्तक नही पी। ममे जोकि पूम समान है एपित हपतगत निवासी, पुरि निपाधी पगित मामलाम पौर सरहर पाम के निवासी बाबा हरिमिर से अवनदार प्रापती का वास्तविक स्पान पानने के निपे पैन्स कम्येष भूमि को यात्रा की। पात्रा के पापात् मने बोकि पास्त्रों से पनभिम इमामों पौर मोगों से सुमकर यह पुस्तक ममता की गामकारो पौर मुनिका के लिये सिमी है। मन मह पुस्तक मार्यो संकाति कम्मा सम्पद १९१२ सितम्बर १८५६ को समाप्त की । सेनों वर्ष पूर्व कापी के एक वी सामी पमपात स्त्र भूमि की यात्रा करने के पश्चात प.हसार मोकों की एक पुस्तक मिबी दी। स्वामीनी मिशान सम्होंने प्रतिमा की पी कि दो तीर्थ उनके सप्न में प्राकर अपना माहात्मय नाम पौर स्वाम बतायेगा वह उसी तीर्प को प्रपती पुस्तक में लिये और उसी में स्नान करेंगे। कहते है कि ऐसा ही हुमा । दमी सामी की पाचाद गोस्वामी हरिमिर मे सम्बत् १५ ५ म कम्योप भूमि की यात्रा करके तीनों का चित्र बनाया । सम्बत् १८९५ में सरदार मंगागि की रानी मागियों ने भी करदोष भूमि की यात्रा की। वो ती मुप्त हो पए में उनको फिर प्रकार में मापा मया । परन्तु दुर्माम्ममप इन मोयों की यात्रा की कोई मिक्षित पुसा नहीं मिलती। एसोच पीके पाएँ पोर पो पाट ये परन्तु मब उत्तर में कम १९ पाट पौर परिषमी किनारे पर पाप बाट पेप। एच की बात है कि हिन मौर सिख पणामों पमा रणजीत सिंह राणा पटियाने इत्मारि मे इस मोर कोई ध्यान नही दिया । पर मिस्टर माफिन रिप्टो पमिश्नर पानेसर माटोमामाने में ही दिलचस्पी ले रहे है। इस रस्म के लिए उन्होंने पुमाई १८५५ ईसी से समा भी अष्ट्ठा करना भारम्भ पर चिपा है। मगर पानरम पाहिब मेरो हजार रूपया दान दिया है। भारफिन साहिब ने प्रम्य पणा महाराणामों और पनवानों को मी मिया । प्रब तक पमहापार रुपया इष्टा हो दुका है। इस कार्य के लिए पमित सरनाम की प्रमानता में और अब मोमों को मिलाकर एक मर्मसभा मी बना दी गई। परि मारहित साहिब का समय यहाँ पोर य पए वो इसमें सम्मेह नहीं किये तीनों के समस्त पायें को पक्का बनवा में। पम्होने मात्र १ मिदा पम्मीवर ता मनावमा सन्सव ।
११ ठोर में पन पाने के लिए एक माना भी लुसाया है। माकन पाहि परिवार बर्मा प्रमी में इस प्रमतर पर एक ममापा कविता कारसी भाषा में मियो है।बिसी अन्तिम पक्षियों से तिमि मी निकत पाठीहै। सारिख वकाल माद मा वेद । वाष भामदय प्राबरवा ।' १२७२ हिररी पुरमा वीर्ष पर भरकम मोपों में पाट बमबाप है। महाराणरमयिह परियाता वृदावन गाह्मण भूना, मोरि बार प्रसार मोठी प्राह्मण पानेसर सामरस बाह्मस पानेसर रानी प्रेम पर ममी मारा पस्सी पुत्र सस्तो रहार पानेसर, महारागरणगीत सिंह, मिथ सोया सामा पुरबमान महान पटिपासा, बिहारीमाम मसनक सिमसा पट्टा बमुशियम बाह्मण पानेसर,रा परण नाप साहबसिंह कानूनगो मानेसर सिस्मनातु महामन मिर्गापुर बसन्त सिंह सरसगी हर पानेसर मनोहर पास र महाराणा पटियामा पीपरपात बामण पामेमा परमानन्द मिम पानेसर पाट माग्नि साहित।' १८१० स्त्रिी पानेसर में म्यूनिधिपत कमेटी बना की मां पाले तो स स स्प मनोनीत होवे थे परम्नु पव निर्वाधिक पानेसर पर की पन संस्थापन पासम काम में एक मार के समय ही होगी। १८५० स्विी में अंग्रेजी पर हुपातो माह हमार पी। १८११ वी सी रवार के समय ७१९ पपई। रेघ के विभाजन १९७tमी में पाट मार दी। १९५५ ईस्वी में बाप मार। १५.स्वी में १५ हमार। १९५१ सती की पनमणमा के अनुसार बाद सोहर पर। और १६१. में कुपोष विपरिणामय के भरण पीस पारबमला है। सिख गुरु और कुरुक्षेत्र रस में से काम सात सिष पुरमा के कुरक्षेत्र पान का प्रमाण निमताप्रपम गुरु भारा नाम मी मूर्य-पदण पर्व पर रखर पारे । रासोर टीम के दधिरतो पर पर गहरे है। बाबा नाना मे गुस्नेत एक विशाल बास पणित भानुराम बी से पापमान पर मेरान्त पर विचार पिम किया था। जिस स्पाम पर बारा नाम मोप बदा एक विसाम र सपा को भी इस पर पा है। उनकी स्मृति में व स्थान पर एक धारा निविसे नामापारण भाषा में मुमारा सिव बटी कहते है। पापा नाना गंध है पहेगा मौर यह होते हुए समाने की पोर गए थे। समर ११५ समार महारशासन काम में तीसरे पुर परासीमा पार से । माट यहाँ पीर राम्प-गाम में गुम हरपोपिनी राह मार्ग से कुरमप्र पाए थे। सिटीने पर पनि रियाम पाहाँ पानेसर पर पार समिति द्वार्षी पाय बना 1) पुत्र पसेपर भी बार प. बरोषास मेला मी भामेराए ।
हुपा है यो सन् १९४७ बी से पूर्व गीविस्था में पा परम्तु पर उसका मा निर्माण हो रहा है। साव महाराए पी पहेरे के मार्ग से मोर पपारे पे। उनकी स्मृति में सिधिया पाप्ती होनी में गुरदारा बना हुमा था। मार्च १७१४ ईसपी विक्रमी १७२१ में पाठ, गुरु हरिकृष्ण वी पं. नामचन्द के पाप पगोसरे ये रेहसी बाते हुए पपारे । नपुर तेगबहार पी मारने के माग से होकर मूर्यग्रहण के पर्व पर कृश्यमाए ।बह पानेसर नगर के उत्तर में सागर ती के तट पर ठहरे थे। उनकी स्मृति में यहाँ मुपारा निमित है। सम्बत् १०५१ में सपाट पौरंगरेप के पासन-काम में इसमें दुर पोविन्द सिंह पी। स्व में पार्पण किया पा । रेशा ती के उत्तर-पश्चिमी तट पर बरे थे। रनो पानमन को स्मृति में यहाँ गुखारा बना हुआ है। योगी रामनाप र पोषिमादिमी से इस में मिमा पा। गुरु पोगिम्दमिद जी एक विद्वान ब्राह्मण पगित मनीराम श्री से मिमने ससरे पर मुस्मा सोशगरान में पए में पौर परिवजी को एक फरमान तामपत्र पर निसार पिया पापो माग भी पंग्ति मनीएमजी संपनों के पास सुरक्षित है। परित मनीराम पीपर में भी मुरु गोविन्दसिंह बी की स्मृति में गुसारा निर्मित है। सरस्वती मवी के पावन तट पर निर्ममे पापुणे २ तीन पाश्रम मे गिनमें शिम यापु निवास करते थे। एक प्राधम प्राचीम तीर्य पर मा गुमानसिह बी का मा। भाई पुनामसिहनी सोमा मर्प की प्रायु में विधाम्पयना पापी गए थे और पूर्ण शिम होकर मोटे थे। उनके मुा का नाम मानसिह पाबो निममा संप्रदाय के पे। माई पुसाय बिहपी को रियासत माया रे महायर की भोर से बन्मान मिमता पा। सरस्वती तटके प्राचीङ्कम तीर्ष पर बैठकर भाई गुमावसिंह बी ने भनेक पंप मिते । पनकी प्रथम सपना 'मावरणामृत पिसका सेवन समय मिकमी अम्बत् १८३४ है। दूसरी रपमा मोरपंच' का भवन समय सम्पद १८५५ है। वीस पप 'मम्यात्म रामामस।सकी रचना संमत के प्राचार पर हुई है। पीवी पि फर्म मिपाई है। माई मुमायसिह बी की पम्तिम रचना 'प्रपोप पदोय माटक' को सम्बत् ११ में लिया गया था। यह भी संस्कृत नाटक का भाव पाम्तर है। रस बेद प्रो वसु पग समत माफ भरित ग्राम, नम मास मिग पुन वासरे दसमी पदी पहिचान । गुरु मानसिह पवाविंद ममम्बना उहठाम, कुरुक्षेत्र प्रापीकप्त सट यहि कौन ग्रंप बहान ।। माई नुनासिंह मी एक पौर च 'यम नाम प्रताप प्रहार' मी निert। इसमें पी पम गुणों का वर्णन है। गच का नमूना इस प्रकार है "मीराम माम में दो पुर्वक कसे है मो नाक बागे। श्री यम माम अमृतको चाम है। बीन पुरष निमा पसे । सो महा पापी है। सोई राय है महा नोष है।"भाई गुमावसिंह जी की रचना के ममूने के लिए यो पर प्रस्तुत करता है बिनमें से प्रथम संसात पप रे भावानुवारस में और दूसरा पापात्म रामायण में मौमिक कम में है।
. - मून ससत पर प्रभवति मर्नास विवेक विदुपामपि शास्त्र सभपस्तापद । निपतन्ति दृष्टि विशिक्षा यावग्मे दीव राक्षीणाम् ।। मापसाम्हर - तर मौ मन माहि विवेक रहे सुम पागम से पवितह पोई। अम लो महिनीस सरोरुह में, द्विग मारि कटास्प लगे सर कोई। विप जीसत मव सर मही, घर नारि भ पर मोर सु दोई। चतुगनन सौ जग माहि पिसे द्विग मारि प्रमीत नहीं भट कोई। पूसरा नमना दूर रहो रघुवीर पर मम नावहिं नाहिं सु पाद सहायो। पापमे भरण को नाव मगाई, मुदीम क्यास न काज गवायो। राजकुमार पसार सयो पद, तो मम नावन की सिंग भावों। पाइन माग पमान उडे, मम माव उसे कहो तुम पायो। इह भात उपार पसार दोउ पद नाव पड़ाई के पार उतारे । रघुनाथ महामुन भास ममे मिषिसा पुर की पुनि मोर सिगरे। पुर की लिंग पार बरे भव ही मिपिमे सहि तन वाफ उमारे । मावत है रिसराग मुनी जुग वामक साष , राम कुमारे। मा पुमानसिंह की प्रभापा पोर संतरे पूर्ण विशाम ये । मापा मोर पर इनका पूर्ण प्रकार प्रतिकार पा। इमाने गुर मारक देम मुफ मोविमसिंह पा राम पोर प्ण सभी की स्तुति की।' पाई संवोपहिबी ने सरस्वती पट पर बैठकर सम्मत् १९७८ में नाम को यो प्रमर कोप का मापा अनुपात समत् १८५० में 'पुर नामक प्राम' पम्पत् १९५९ में पानी गर्व मंगनी टीम "रामावत' को धम्बत् १८८८ में प्रारम्भ करके एम्बत् १८१. में पूर्ण की। पी पु प्राय सूर्य" इसमें रखों मुपों का इहिास बोबन मोर पुरागरिका पर्णन है। इसकी पराका पारम्भ सम्बत् १८९२ में हपा पार सम्बत् ११.. में समाप्त हुई। माई तोप बिपी ने भी कासी में विषा पाई थी। इनकी रचनाओं में संसद पर पारसी और बाबी मापापों के बाद सम्म पाठे । मापानुगार में कितने प्रवीण पे इसका उदाहरण थिए । महरि नीति सवा के पत्तोकका भाषा अनुवाद बिए । मूकमोर समेत सिकलासु वैसमपि यस्ना पीत्यम्, पिदेश्य मृमतृपिणकासु सलिम पिपामादितः । सदाचिदपि पर्यटमय पविपारण मासादमे- न तु प्रति मिषिष्ट मूखंचन पिप्समाराधयेत् ।। (1) मारली सारिन मा सलगुख से 161 मापा मनुवार सिकता महे से चतन पर सेस षु निकसा । कमठ पीठ पर प्रान्त किहु बहु वाम समावै ।। सिस पर रासम ससे के उगवाम विक्षाना । तो दुष्टनि के हृदय में गुन करह महामा ।' १४.सी में पर महाराज बम माई पदयसिंह को मृत्यु के पश्चात् मम बम को हस्तगत कर लिया पार पायें पोर पाक फेम पया तो इसका वर्णन माई सोपसिंह ने इस प्रकार किया है। परी मूट कपम मिसे मिले पोर घटमार। माप पापको भनि पमे तगि पुर सब पवार ।। रामायण से काम्प का नमूना रेखिए वाणी पाक सुवर्ण में विपाद पण समचम्द । वीन मंह मंरित करा वन्दो पद परविन्द ।। पूगा परविन्द की वीनिन्द की परिम्द की। परि दन के इन्द दी सुकमा रामचन्द की ।। पुनि ग्रीष्म ऋतु कीमो पोरा। तप्त भई प्रतिशय महुँ मोरा ।। तपहि हृदय चिमि मस्सर पारी। त्यों तप गई भूमिका सारो। मूचे बल कर्दम विहरानी। जस प्रेमी र ससी सिसानी।। सहत पूरि मह प्रमत पपूरे । ज्यों मति प्रमप्त निमा गुरु पूरे ।' सम्निहित वर्ष के पश्चिमी तट पर सम्बत् १८१५महात्मा सिवपिर बी भी जामीनारापस का एक मुखर मदिर बनवाया बो दक्षिण निर्माण कमा का पति सुम्पर नमूना है। सम्बत् १६५५ में महाराणा फरीरकोट पीरसिंह मे कुम्मेष भूमि का प्रमण करने सरस्वती तट पर पपने प्राण स्याये वहाँ उनकी सुमर ममापि पार पीर कोट पावर पना हुमा है। अंग्रेजी राम्पकाम में सन् १८१२ ईस्वी में या प्रणा पही कि पर प्रथम बार गवर्नर जनरत अस्त्र पधारे तो पंचायत प्रामणान् को पांच सौ रूपये पौर पर्नर पाए तो गाई सौ सये भेंट देते थे। महाराणा या निकर रमनसिह ने रामेन नब निर्मासा एक मार पस हवार समे पान किए थे। मई १९२४ स्त्रिी में कमोम सरकार रेमो बिमाम द्वारा पुरष पाने पाचों पर एक प्रामा पर पार्म टैक्स बगामा पा चिससे (१) पुर प्रया पूर्व । (२) बाप पारिनो सामिल सेगा।
कि इस प्रकार सटा होमे गाये रपये से पवित्र तीरों की मरम्मत हो सके। इस रूपये केम्पप करने के लिए एक सप्ताहकार कमेटी बनी हुई। पिसके सस्य सरकार मनोनीत करती है। रोष की संकों बप प्राचीन पायठ प्राणान् हो एकमात्र बह संस्पा है गो कुरक्षेत्र की रमा प्रयत्न करतो पी है। दीपों की पम भौर प्रमस सम्पत्ति की रक्षा करना यात्रियों पौर सैमानियों की सहायता करना सपा बनता है पारित्रिक सांसतिक मौर सामाविक निर्माण कार्यों में योग देना पंचायत बामणाम् के मुम्प नदस्य है।
राग-रंग में डूबा हुआ कुरुक्षेत्र मन पो का पण्य हो पाने पर पानेसर में पौति सापित हुई मीर पुप समृद्धि पाई । पम् १८९२ सी १९२० ईस्पी तक पानेसर में राप-रंग का साप्राम्प वा । इसमें पम्मेह नहीं कि १५५५पी पीर १९.. स्त्रिी में कुरुक्षेत्र परेप में भयानक मिल पा पा परन्तु भिम परमात भी सांप तमाचे पालते ही थे। उस समय नपरोसी भी माम में पमे पाइये राप रम की महफिम बनी हुई है। उत्तर में स्वासेपर महादेव के मन्दिर और कुबेर ती पर, रक्षिण में उम्मेष तीर्य नारकिन बाट पर, सम्मिहित ती के उत्तर पूर्वी कोण कुणी पर मपर में मोघाखा के पास भौर पुरानी मगे में महारेर मदिर के निकट वित्त स्पाम बम्पोले संगीत मृत्य पर साम की महफिन बमती थी। नपर के पासण मोर पस्य सम्पालका | भारामम सत्री मे प्राची नापित वीर्ष पर समग्राम के मिए प्रसरफिया विधाकर परती मोम मी थी। यहां पर भी पारामन सभी का समापि मन्दिर बना हुपा है। उस समय के कपि मोमीपर बालाराम सोप प्रणामी पच में पूरण मक्त रामायण रागा पोपीचन्द पोनारे पर पड़ी पुस्तके लिली- बिनम से पूरण भक्त पोर मोपीचन पो प्रकाशित हुई मार पाय पी उमें बन सापारण परेपाम से पर। पि हप्ण पोस्वामी मे पप में पोप रितसर, मुषायब विष्णो कापेमभूषम पौर मुनयानी सिरे वो मप्रकाशित है। मिस गोबरमन पारस्पत + पच में साम महामारत सम्बनीमा पोषपुर नरेप मा बसवन्तसिंह माफोनमकाममा पौर मिलेको भकापित ।। कषि परित फिरताम सुक्म में पप में घोर अपनी भूण बारम पमा मोरप्पा मक्त महनार और मक्त माप्त मिरे यो अप्रकाशित कपि समाई नाप मै पच में सोय महाराणा प्रताप पीय चौहान पणा रामलिंद पार सत्यपारी पमा हरिवन मिले दो प्रकासित है। ज्योतिषी पति पुन्नीमार पीने पर में सोग राग हरिएनम मिक्षा बो पप्रकासित है। मौ बारा पमकरण सम्पासी स्थाव प्रणामीकी कविता के समाट। परन्तु मेरी प्टि में कविता पौरमाता की कसोटी पर उस समय कपि समाट एक मुसममान पामर पल बो नाति से चन का पूरा पवना है। कवि प्रहमा की कविता भाग पोर मधिपूर्ण दी। कवि पामर ने पच में पाप रामायण, परमन फवा नुमा बौहान पोरठ पपनी पाकिरण, मयसरे पार कर दीमा - सिके। एक भी पुसा प्रापित नहीं हुई। रामायण लिखत-सिलले साठ वर्ष की प्रायु में परि महमद की मृत्यु हो गई पी । मुसलमान होते हुए भी हिल गर्म पानी और वैवानों में पापा की प्रथा और उसका हिन्दी भाषा पौर मोदिप पाल का मान प्रपूर्व पोर पर्षकी मस्त है। रामापरण में पहमर की पिता का नमूना देखिए । रामायण के पारम्भ में भामर स्तुधिरा- "नमा मऐश नमो शारदा नमो हस वाहनी देव ममो रामचन्द्र जी नमो सिया नमो शक्ति ममो मेव, ममो मक्ष्मण को हनुमत के बत को, नमो भरस नमो धनुषन जी नमो माई पोखस्या पतको नमो सेप मुजग नमो पुरजन ममो महिश्वर, नमो सय रप को, ममो मान्मोद ममो तुमसी दास ममो सर्व कविजन की मस को, मेरि डको मादानी, नमो भादर गुरु मानी, नमन समनको रस रामसीमा मन ठानी। दुसरी सुति इस प्रकार है- एकदन्त दयावन्त गुरु गौरी पुत्र गणेश, तुम रटत मुनीजन गुणी सकस सत मामादेष, गुरु तुम बिन कोई कारण नही पपसा, सत मामादेश मात धारद मिन रुपा भान घट में रापता, सत मामादेश तप सरन को पूरव पश्चिम तक तपता सप्त नामादेश दाससुमसी मुख परनी रामायण जपता, सीना कप गाप्ता परो मिस देव पहाता माररसिंह गा शिष्य मोग महमद प्रभु पाहता ।। यो अममम नाम को परि महमर मे मणि किया है- माग रया के पंपा में दशम के पर वोध, श्री रामपद्रवी प्रगट भए शस्त्र मर्म पा सीप, प्रगट असुरों विघ्न विसारम पृथ्वी का भार उतारन पो भकों का कष्ट निवारनो, ग्रतयुग के वधन सुपारन को कौस्या सामसरन को, सरप पर पाए गान में शा सुमाए मटा देष विमान पान हरि दर्शन पाए ।
कापि महमर बास मी रामपा की बग्म पुगी योनि का मान इस प्रकार रियाणा पन्द्र तृतीय राजन् श्री रामपद्र के पम का हमसे सुर्मों पसान, बृहस्पति, रफ के पड़े मगन मस्पान, घर कम्या माया, फिर पीये पनि तुसा का है सम सुम दायक मारम छाया, फिर पचम मेगस मसर का है पर सप्तम में फेरा पाया है गुरु मीन में सहित पेतू सूर्य मेप का बवसाया, वृप का सुप प्यारे ग्रह उच्च के कहे सारे रामपन्द्र से सास सुफस है जम्म तुम्हारे ॥ कपि पामर को भार प्रकट करने पर या प्रधिकार पा । उनका रचित इतिहास सांप अममम फत्ता वीररस प्रधान है। साम बसमम फत्ता के पारम्भ में कपि महमर स्तुति करता है- मेरि टेग दीन की रातियो सत पठ गत के सग, मप्ट देव गणपति प्रपम कई रजपूती जग, मिन्हों के शीश घों का झमका, मुठ मेड़ा पूर राठौरों का भोगत्ते परबर के दस का, चित्तोर टूट विध्वस हुई कई कारण मुग़मों के यसरा एक प्रपम पावशाह का किस्सा उस नगर बोपपुर के थल का, बिगडेगा खेड़ा गंग हो उसमेड़ा, जयमम मासदे उठा साप वसेग॥ साम पममत पत्ता में भपमान की दूसरी स्तुति कपि प्रहमा इस प्रकार करता है- उस गुस मामा को मे पहमे हा प्रणाम, सम सम में बस मसरों में मसहाम, मेरा मादाब हो उस मपिनासो को वित्तीय प्रणाम श्री रामपम्र पार मोस कण्ठ माशी को, रघुनन्दन स्वामि को पन्वन पनश्याम पम पमवासी को, तुम हे पूर्ण बह्म पार करो महमद परणन के दासो को निर्भय मौकारे हम दास तुम्हारे रमपूतों का सोग समा में सेसे सारे ॥
उस समय पानेसर नगर में सोय करने वालों को प्रसार पे। एक पारेका माम भार का प्रयाा पा । पावर सिंह गाठि बाई । उसके सारे का सोग पुरानी प्रसार माली में अपना पा। प्रारमपी को प्रारफत सम्मी ममी कहलाती है में मन्दिर महादेव और एसएमसी महाभ बनाया हुमा । कपि पड्मर बन्य मार पहारेका ही सिमाही । भावर हे पहारेका विशेष गुण कविता की दूसरे मता का नाम भानका प्रसार या मानक पाय मातिापामो हापी का भी कदमाते थे। माना प्रबार सौग पोपता निष्ट होते पै। माना प्रबारे विक्षेप पूण संपी, सर, पात और धार पे। दोनों पक्षों में मापार की होडपमती को। दानों प्रसाों के सांप एक ही समय में होवे । होली के दिनों में मानेसर का पण प, नस्वी और माता पराठा पर होती थी। मूर्मास्ठ मा प्रपकार मे अपनी कामी पारा संधार पर फतानी मारम्भ की, दस-दुगो तारे मौमे पाकाय पर निकले कि बावा परण मागम बानो कार्यों की इस मन पार पमाघम से मुक्ति हो उठा। मर्ष पनि पर नापने गाने पाटे मार मारले समस्त मगर की गलियों पोर बागारों में महफिमे बसावे पौर सिक योवार्यों को प्रसम्म करते पुसवे एते । मर्म पमि तक मगर पर मारने वालों का भषिकार रदवा पा! प्रात मार महर्व में मानक और मारप्रसार सोम बिताने बम बाहे । प्राम मह धोम पोपहर का पत परन्तु कभी-अभी सार्यकाल पक भी सांप होते हो थे । समस्त नपर सिपट कर माना और मार के प्रयारे में ष्टाहो पाता पा रोमी प्रवाई के खिलाड़ियों में योक मोर भी बनती पती बी माहों के बाप-धार नागरिक भी दो में ट गाते थे। स्वांगी का मी गणेप होने से पूर्व दोनों पक्षाओं के बिमाही पारियों की सरस्वती नदी-उद पर बने पारा मति में बाते फिर पिसाड़ी खान की पेएभूपा ने बाद राते सुमित एपो पर सवार होकर सागर महादेव की मारापना के लिए बारे में। परिव तीरों पर संपीत की महफिर्म प्राय पाप मास तक जमती पीस्थाणेपर महादेव मनिरपर भी महम्ल मपात परि पौर सम्मिहित वीर्य पापी बारा रामकरण संग्मासी योवा को खगीत और मानों से मुग्म कप्पे पारों भोर पोता मामला में बैठे | और माप में तम्बकापौर बंप परम्मान पार करिता शेयो है। पान पान के पोरेपन में भी पानेसर के पापरिक पुप इस नदी में । मोनार (त) प.फ माम व पती मी स्योंकि माय आपण मपने परमामा के भरपूसरे प्राती में नए हुए होते थे बौर पर पारह माते म्पोलार में सम्मलित हात टेप पोनार का भीगणेप होने से पूर्व भार पान की समस्त सामग्री एक कमरे में रख दी जाती पी। उस मरेको मगर कसे ये। पाना परोसने वाले पा मगर में पाये तो साने गाते पावित मोपों में से छुप मोप र रो मैले पे। मा एकप पारम्भ हो जाता था। परोसने पापै मतपूर्व माहर पामे का प्रपल हरसे मार पाने वाले बमपूर्वक परको बाहर नमाने ते पेम संपर्प में पनों याने की सामग्री पूरा हो पाती। मन मा पो पपेधने गामे याने दामों पर विषम प्राप्त कसे बाहर पा माले मना कर मानकर हर पाते। इन पोपावर की भाषा में रहा हो। .
कोई पर ही ऐसा होता होगा नही तो प्राय समस्त परी में पाराम पिस्वा पौर नियमिद्य राम पर इतु-अनुमार खान-पान की सामग्री बनती बी पोर बो बारार में इसमारों की दुकानों पर छापा पाता यह प्रपा । ममर में कई प्रपार मुश्ती पतका पार माठी पमाने भी पे । मेर्मों पर बम कर पिवयों के दाम होते । पुष्प परीके पर्यो पर ताठी वसपार, पटेगारी पौर पद हाप दिखाए जाते थे। यह परप है जिनम दिनों पानेसर नमर पास्तर में पामेसर नपर पा। मपि प्रागस मगर पी बनस्या उस समय की बमसम्मा से कही पपिक है परन्तु पर बात कहाँ गो तब को। उस युग में पानेसर राग रंग में राहुपा नयनऊ के साहमाजियममा पुग से कम मापा ।फिकरीमाने थे पोर पिकारीका साम-गान पा। मोबीपिका की चिन्ता पी पोर न संसार का गम । मिषता ऐमी कि मासु भर निमा री भौर पता ऐसी कि एक बार मर प वो कमी घम् का पर वो प्रमग मुहम्मे की मोर मी मुह न किया । सचा पता पीर सगे मोम । उनकी मित्रता पीर पनुवा रोगों में मर्यात पी। उसी काम में एक और कवि पौर विज्ञान मीर इनायतममी साहिर भी हो पए है । उन्हेनि पाठ पुस्त कविता में मिली है। पुस्तकों के नाम सीनए मी पीरा मायवती (हिन्दी भाषा में), बीबाने मापन बापमासा किस्सा साह म वारीपरमप्राम बानेसर का कमास पास हासात पनामाम पौर पपसप । इन पुस्तकों में बम हामात पपना काम प्राप है धेप नही मिनी । कुरुक्षेत्रा में भयंकर दुर्मिक्ष और वाढ २७ मवमर, १८८५ ईस्सी १९ मुहर्रम ३.३ हिवरी को मुक्रवार की रात्रि में माकाम से पनयिमत सारे टूटे । ऐसा नाम पता पा जैसे पाकास पर पुनम्मी या त रही है । रानि मर यही पवा पी। मानेसर पर महाँ मनुष्यों द्वारा संकट पाए यहाँ मौसम में मी पुरम तोरे । सीमाप से उस समय की रपा पर पानेसर के एक मुमतमान ग कपि मे प्रकास गमा है। इस कमि का माम मा हामी मीर साहिब सईयर इनायतममी पुत्र पईसव मरामप्रमी साहिल दुपारी पीसती डारि पानेसर । इस पुस्तक का नाम है 'तारी रना काम माए हालात पत्तापना काम"। यह पुस्तक कविता में है पो १५ मिमी में सहारा बिमा अम्बाला में पी पी। १८१८ ईस्वी पौर ११. ईस्वी में बामेसर में प्रपम पो भयंकर दुर्मिष पड़ा पौर प्रगते पर्प पार पाई बी विराके परिणाम सरप न बन पानेसर ममर पपितु कुश्मेष प्ररेट बिमाम तिब पर हो गया पा। माम इणिम में बनमान बहीन हो गए । मोटों के मुटापे भर गए । महो गर्म पाबानों की प्रफर बाती रही। मोग सेम-उमाक्षे भूम गए । फम-म भूप नए । कर कम हो गए । बायें और रेसम मूष का राग्य का। (१) सारमाय फार का मार मासमती पानेसरि ए ११ ।
सौ उन्नोम एप्पन सास हमा । व नाउस एप्पना काल हुमा ।। इस साल से पग पामास हमा। संसार का सस्ता हास हमा ॥ यह कोरा काम इस पड़ा । पर जगस सब नर बम पड़ा ॥ दुस सल पे पदों सस पड़ा। ना तो मुंह में पक्ष पहा ॥ यह कहत निहायत समन परा। परसम्म देश पे बन्न पड़ा । वसवन्त सजे बम दोर घटा । फन तो नाटक खेस हटा ॥ सव यति भूले वांग पटा । जब काल ठाट से मान रहा। पान तो पहमे मी पाये परनु पना काम पपिक परा है। इसमें तो मर्मों में पाम समेतों में पनार हुमा पिसे बाहर मनुष्य या बानबर जीवित प सद। बिनम पास में वर्षा बम हार प्राली में समस्त पमार पास मुभा दिए । पृषी की पूरी को महसमा हिनीहरिगामी पा माम-निपाम नही। पिरती ठार पाय गमा करवाया बना दिया है। सावन में बारिश माह हा। यह मोहा कुस ६ माह हुई । इन में जनता दाह हई । पर वतन छोर पर राह हुई। परसात में बारे शिजी पमी । हुई पुरक जरामत फूली फ्लो' इस सम में पनाम और पाम पो भौहारमा पस्तुओं की बारी हो पाग सा पोर परवी सम्मिी में नहीं पूषे। मोर्यो , पारोबार बनोपए । मारवादी पार पापे बाधिक मोप हमारों की परसा में पानेसर प्राकर मूषों मरने वगे क्योंकि यह यो पापी बास पाहुपा पा। मरकार ने पाकिमा पपने गमारे में दिया। मनमा सिसी में तीन मात पर रह कर वीर्य पुरवाई पारम्म हुई धिमे भूयो र पमरे मम । पानेसर में एभिय म गा मया । सरकार ने प्रग्य-का ? रियामासरों के लिए हारों पया दिया। प्रात्र में पानी की 1) पपपपात रेयानर रामजी ....॥
प्रपेक्षा माम रंग की रेत परसती पी। दोगों में महान, परती, महने सहरिया पहने पौर मानिया पेचरी। पृथ्यो पो जनवरी १९.० स्विी में वर्षा हुई। मोर्गों में पेत कोतकर बो दिए । प्रय सस्ता रव मे बसाए दिया । पो माष में मिह बरसाए दिया ।। परती पर रंग लगाए दिया। सबर पाए दिया ॥ इस मिह से साड़ी पार हुई। मह खुशियों पर पर वार हुई ॥ परन्तु र पप्रैल १९.. ईस्वी में पर पेती पक कर तैयार हुई तो पोर से पर्या पोर मोमे परे। एक-एक पोमे गा भार रो सेर का पा। पावन पोर मानों की मांति पर्या हो । पाकी पेती पी प्रनाम बेत में ही परवाप हो गए। जय पक खेती सैयार हुई। सब मारिध मूसमपार हुई ॥ पौर मोर्मो पी वोछार हुई । सब गिर लेती मिस्मार हुई ।। गुण हुमा यह गारिष्ठ पोती का। हमा नारा मुह माई खेती का ।।' इस भयंकर बाणों को देखकर कवि इमायवममी भगवान से प्रार्थना करता है- है तुझ से इमायत की दुमा । मेरा पतन पानेसर बसे सवा ॥ इस प्रकार सम्वत् पपन बीत पया पौर सम्बद सत्तावन का प्रारम्भ प्रा । मम सास सत्तापन चल पाया। महीं मुंह भी मिह में दिसलाया ।। अब दूग्द म बादम मजर प्राया। तव जनता का दिस घबराया ॥ मैसाम, पेठ जप गुखर गए । उठने को रबी के उपर गए । तब हम पेपरम मौलामा हुमा । सम्मत का मषशा विया जमा ।। (१) रोबपना पाल समोर एवम्मी ५१.४ । . M प्राप्तोर साड़ से मिह परसा । दुनिया का दुसरा दर्द गया । फिर मिह हा मिह वह मिह पग। दिन रात वधा वारिदा का करा॥ सर परसी पानी पानी हुई। रो पड़े सूर तृगयानो हुई । हो बस पक्ष पर रवानी हुई। दुनिया को विपद पुरानी हुई।' न.. स्त्री को फिर वर्षा हुई। ती पटा ऐसी कई कि दिन में रात हो १५जीमाई १६.. इसी को फिर सारमा किवा मा पा । बायका बम पानेसर की वस्ती तक पा पपा। पानेसर एक धप बम मया । यो सोप नगर से बाहर गए हुए थे पानी के कारण ममर सकट पए मोर प्रपन प्राणों की रक्षा दिए पूों पर पड़ गए । तीसरे दिन ना पन कम हुमा तो पर पापिस पाए । चार मनुष्यों को, निनमें हमारे पकतो हा नम्बरदार मोहरम भी पा इस सम पानी से निकाम बरसाए। पानी का भोर ना पाकिकाम पड़ी प्रापार सुनाई नहीं देती मी पामेसर में रोका ऐसे पाइपलाय नुदे कि परतीका माग पा। प्रम नरी पोर इसी पपस्त ११.. सीको पुम पोर-पोर से वहबर्षा परिणाम स्वरूप बीमारियां फूट पीको परिवार और पर ऐसा पेप म हासि पर बीमारी का प्रमाल न पा हो । पर पर मौर बामराल के बानदान समाप्त हो गए।' भिक्ष प्रोन वर्मा बीमारिमा पोरगा के कारण पानेसर मगर सर पया। बनारमा ग्विनी पी सका पर्लन इस प्रकार।। हिमायतों के वीस पर पे मा म सामान का एक भी पस्ति पेप नहीं हा। पावों के सौ पर पे पर एक पमुप्प पी वाली नहीं है। विरों के तीस पर पे भर कोई इस मंच से नहीं परोसियों के पातीम पर पब एक मी पाणी पेप नहीं। रमान बामरान के पास पर पे सबके सब साफ हो पए । मोतियों के सत्तर पर ये सिमें वि सम्मति ऐप है । ममुपों के सत्तर पर पे धन मात्र हे पए । पूरा पाठ पर पे पर दो पर पपएमी प्रकार पापमान काठ बोलत, मरे पार मोटे सर पार पन समाप्त हो गए। (PO ANIमर एसपी "
मानन बनिये
कोरिएमा कम पर धब पमाप्त हो गए । बम हारियों के सात पर पे पर
पोप नहीं। नोर्मों के पाठ पर पे मा कोई मही। मिरणापुरियों के दम परों में से केरल
पार मेप है।
क्षत्री
पषम बलियों के पार सौ पर ये भो सब समाप्त हो गए । मोमहीनों टीम
सौपर ये पब एक भी पेपमही।
रामपूत
राबव परपूतो पो पो परों में से कोई पेप नहीं ।
मन
सौ पर मौके पे गिनों से बम एक परबाकी है।
कायस्थ
कायस्पो.पर पेपर किया है।
इस प्रविरित और भी बहुत कामराम जैसे मंगी प्रोडल्यानि भिनमें से एक
भी प्राणी जीवित महीपौरपहर से जानरान ऐसे है बो गाव बाबर ये पर पब
बहुत ही कम भोप उममें से ऐप ।। पामेसर नगर में एक भी वानरान किसी भी भाति का
ऐसा नहीं है जिसकी बसस्था पर पप्पने काम का प्रमाव म पड़ा हो।'
(३) पस्टिन राजाम भराय र परिस्त संसारासमार पुर मार और
पनि भैरो बाबुरामाने वार पर |
कुरुक्षेत्रा रक्षार्थ अ ग्रेज़ों द्वारा दिए गए फ़रमान
कुस्तीन के बाझों ने गवर्नर परम से प्रार्थना की कि कुम्मे के तोपों से मधमी
म पकड़ी पाए, सीगवार पमु म मारे जाएं और ठीपो के म न काटे पाए । एसी
मेसी मे गुरुक्षेत्र की पवित्रता पौर उस भवा को पो कि हिल पानेसर में रहते है पर विचार
करते हुए प्रसन्न होकर यात्रियों को प्रावेश रिया कि बाह्मणों की इम्या के सम्मान प्रति
सरप कोई ऐसा कार्य न करें जिससे कि इनका मन पुचित हो।
१.बनवरी १९१२ ईस्वी
हस्ताक्षर-बोमई
पोलिटिकल एट अम्बाला
x
बाहिर रामबाहे बानेसर ती हाए बस्मार परस्विछमार
हनुदाम पन्य प ईमाम रौनक
प्रफरोसी नवाब मुस्ताब
मुपम्मी ममकाय पाट मबर्नर बनरत बहादुर रामेहमान
व मुकाम पानेसर र मुनीच मारला ब्राह्मणान् प हमुवान सकना
पानमा बराए मुहाफलात माहियान , बानबराम , हायम
पपुर बगह पर पेसमाह साहिब मातम
पर पासाचि रिपाया पपासे मगर प्रधान ममामत कम्मी पूषा
पुर। के कसे माहि मग तानाब न साहर परिपन परबत न
सादर खरा सीवर बागवरान सपूर व माय राम मारत ।
मिहागा मुताबीक हम साहिब पामीधान मुपपरम प्रतया इस्तदार
बादा मि धमद । के हिस्सुम हुक्म साविक परिपाय प्रहषि पर
साबर पर पानचा पा समाए पानवारे परहमाछे हनुराम
बाद पानी दण रसानी हनुरान र गरिप्रसन माहियान
पर विमान मजहब मानहातमीन प्रधबार मुकामाव तोहाए
म गरिफवन माहियान पर वासानहाए हस्तम भानपरान व
पूरक वमूस पापोकसी वगैराह मुखकब म परदर ।'
एकम प्रम १८१५पी
(१) मोत्रतीके रची पर सर पर मक्ति परमान ।
मसयाब
रहा पोप की कोई पता नहीं हुई और न ही मैंने कभी पहो पो बब होते देखा । मुझे ममी प्रकार पार कि इस बीच मर्मी का मौसम होने के कारण कोई सेना पिपमी में नहीं दी। यह रिपोर्ट गिप्टी कमिानर प्रम्बामा को भेज दी पारे। हस्वासर-सेपर मुहम्मर रमार एतिसंट दिता सुपरिटेगर मितानेहमी x x पाठ रिसमा १८७ स्सिी को भेरे मए परवाने के मनुसार में पपप पूर्वक बयान परता, कि मेने पिपमी में कमी पोप होते नहीं देखा । सार्यकाल की और के समय में गाव बार पिपमी के चारों पोर मता या परन्तु मुझे मौसम के कोई माया मिल नहीं मिमे । हो यह मुझे पार है कि पुरानी हदियो बही पड़ी पती पी। यह पारीवारी देवीरामपुर गांव को पोर ने पोतर के पास पी। पर मैंने यहां पौधा ही होते नहीं देखा तो हा मांस शिसे रेषा । बब अपनी सेना की बरती की तो मानेसर कमहीं बरिफ महाबो सेना के साथ होते ये पाव के कोने में पौरप करते थे। मैं पिपनी में प्रमम फरपरी १५६५ ईस्वी से १५ मई १८७१ स्पीकपा। इसलिए यह बयान अपते पाठ वर्ष अनुभबक बम परोपा। हस्ताक्षर-हार हसन बसोमबार x x मम्मामा पाठ रिसमर १८0 स्त्रिी के परखामे पारा री पई प्रादानुसार वो मुझे परफ परावत बारा प्राप्त हुपा के विषय में में बगान करता है कि मैं दो रिसम्बर १८७१ सी से भारम्म अनुबर १८०५ स्सिी तक पिपसी पा । म पपष पूर्वकपमा यहाँ तक मेरी म्मृति मेरा साप देती। वहाँ का मरे कमी पानेसर रे सायों को पिपली में बरते नहीं देखा । प्राय दो मास प्रमेय सेना प्रयोग कखी पी परम्तु रन माप अपने कमाई हो । सेना माने पर मने म बानबर पारने की सररोषारी देवी मारमा (१) बी पंपाचा मासान् रहियनर । - मपि बिकते ऐका । सप रे नि एक दुकान पो मिस पर कगारे रफरे पार मेरा मास देवा करता पा एमके पतिरिक्त मने कुन नहीं देता। हस्ताक्षर नसबुमाीन मुनसिक x y प्रार्थनापत्र हसम बया, इसाही यश इत्यादि कि पानेसर और पिपली में मामवर मारने की मामा हो जाए पानेसर पहर में हिन्दुओं की हमस्या है पौर पिपमी के पास है। पिपनी में जानवरों को मारने की प्राज्ञा देना विमों के मन को एच पहुंचाना पोर उनके पार्मिक विश्वासों के विरत पाना है। हमा प्रविरिक्त हो प्रारका कोई बपणामा भी मही है। प्रार्मना परमररादित बिया गाए। पाठमा १८ सिपी इस्तार--मेबर ए. बी. पुरम प्टिी कमिश्नर अम्बाला x x कैम्प पिपली जिला अभ्याला- विपपः -प्रापमा पत्र इशाही यश पुष मीर घश, अक्सर पुत्र मम्मी बहश इस्पादि साई पानेसर पिपत्तो के पास गी बधार्य यथ- सासा बनाने की अनुमति दी जाए। प्रबासत टिप्दौकमिश्नर सम्माता पानगर के ब्राह्मणी बार फसाइयों के सामने मैंने बहसान देखा किमहोमिर प्रार्पना की गई है। नासीलदार पानसर की पम्मति से पूर्णतया सहमा पार यहाँ षणमा सोमने पाना नही देवा । प्रार्पना ना मगर पनि प्रापी रिसी और स्थान निए प्रार्थना करें तो कर सकते है। इस्तागर-यो सौ.मान प्टिीमियर प्रमाता कैम्प पिपती (VON सम्मान मिरवर से।
१२. मे भी रोपए है और इसलिए स्थान नहीं प्यिा पा गया कि पवार मुकदमा बिसी धौर से उस बयह पर काबीज पे और दाम पर मूरखे हात पारे फा ४२ ऐपर दागारमी वास माना है पोंकि मुरिपान वापरती यानी करमापा गया कर सकते है। सिवाए इसके मिस्तगत मुहमा बफोप्त मुरामपहम मुगरणा फसमा साहिब रिस्ट्रिाट पर से पाहिर होता । सिए पहमी भरामत की इमारत मुरिख पा • पाम्ता रिमानी सी माती ४०. मुरिपाम बतौर कायम मुकाम पुपमा मुसलमान के रामा इस्वकार म इस्तेमाल रिगाह का नहीं कर सकते । बब हम फैसमा बहाम रखते है और प्रपीम बारिक खे बीनीमे प्रपासाट । पपानारों की प्रसामवनव समाप्रत हुई। पाहबाराराम रिस्पोरा की तरफ से हागिर हुमा । x x x १. रिसम्बर १८८८ सिी को साहिब रिटी कमिश्नर मे पप पिया कि मुसममान पाम पिपती से मोघ माए पोर पाम और पर मानेपर में मांस रोबत करने की मुमामय हुई। x २१ मा १८५१ ईसवी को मुसममामान की तरफ से दोस्त को के लिए राम तर होने पर मिटर कनाटय साहिब रिटी कमिस्नर अम्बामा ने नामपूर फरमाई। x x हिष ऐक्सीमसी पगान के मवर्नर साहिब पपने वर्षा के दौरे पर ५ पपस्त १९२१ स्त्रिी को पानेयर पारे । बह हिमुर्पो मति प्राचीन ऐतिहासिक पवित्र पीपों पौर मन्दिरों को हार पर प्रसन्न हए । उन्होंने बीपाशार समिति की प्रार्पना पर कुरक्षेत्र पुस्तकालय की प्रामारपिमा रखी। इस पुमावसर पर बाप से प्रासप पुरोहित पगित मौर सनातन धर्म महामपन के मेवामों में गमर साहिब का समापन किया। पपने मागमन की स्मृति में सर पेपर मैकमैगन सी एस. पाई. के.पी. पाई. में २५. स्सए बाम पंचायत में उसी प्रकार बांटने को पिए मिस प्रकार गवर्नर बनरत पिया के 1.. सये १८५१ ईस्वी में बांटे के । गवर्नर साहिरकी प्राथा है कि सरकारी अमर को इस (१) मी एका वासान् रमिरा कुमार सैन से।
स्पान परमाएँ इसकी पवित्रता का भली प्रकार प्माम रहे पौर पानसर सपा उसके पास पास के ऐतिहासिक पार प्राचीन मंदिरों इत्यादि की रमा कणे में सहायतारें। परमिट हाउस माहौर १४१११९२१ हस्ताक्षर ० सी. एस.बतेक मेयर प्रापिट सेन्ट्री पवर्मर पनाब x X x रिप्टी पमिश्नर पिसा करनाम की भोर से मा.बेनीप्रसाद उप- प्रधान म्युनिमिपम कमेटी और दूसरे प्रार्भमा-पप पर हस्तामर करने बार्मों के नाम हिम ऐक्सीसैसी गवर्नर पनाम का प्राशा-पत्र नम्बर १५/गी. वारीस करनाम २६ मई १९२५ ईस्त्री। पाप प्रपम मार्च १९२४ स्त्रिी के प्रापना-मत्र पर मुझे माझा पी गई है कि पवर्नर साहिब कोसिस सहित यह पाशा देते है कि रिटी कमिस्नर को पावेध दिया गया है किवि पर पनि दिए गए बकरे का मांस पिपनी से भरा हो जाने के पश्चात एक विशेप माम से नगर में माया पाए, जिससे कि दूसरे मोगों का मन ही न हो । माशा- पत्र की एक प्रति पो मने कमिस्नर मम्मामा विपन की सम्मति से मवर्नर की प्रादेध-पूर्ति के मिए प्रकाषित की है पापको भेषी २४४-२५ हस्ताक्षर-रिप्टी कमिानर x x कुरुक्षेत्र : एक सामान्य परिचय दुरदोष रेनी र उसर में १५ मीस पौर पम्पामादपिम में २४ मीम देहमी-पानी फत प्रम्वामा मये साइन पर कान स्टेधन है । पुम्सेम शन पर पसिंगर ऐसपैस पौर मेस मारी टहनी है। बी. टी. पर मार्म पिपत्ती से कुरदोम तीन मीत पक्की सड़क पर पश्चिम में है। कार और बस बाग भी तुम्क्षेत्र मापा गा सकता है। पुम्दोष से पीर को रेमो माइन पाती है। गुरुक्षेत्र से परकी सहमें पहना झांसा मार पिपली माया यमुना मगर होकर सहारनपुर पौर हरिद्वार जाती है। एम्मोत्र स्टेसन पर तांगा बस और साई किम सिमा मिम जाते है । मुसोष स्थान से निकलते ही पस्ती प्रारम्भ हो जाती है। यात्रियों के ठहरने के स्थान कुम्मेन में माणियों के धरने का कोई मुमबाप नही है। रिस प्रकार प्रम्य धर्मस्पानो पर मुम्बर धर्मधामाएँ पपणा होटम है और उन धर्मघामामों का सूचार रूप से प्रबन्प होता है स प्रकार का कोई प्रबन्य परकार पषमा जनता द्वारा पुरोष में प्राय मही ही ।। ऐसा पान पाता है कि भारतवर्ष के पामियों एवं सरकार का प्यान न तो इस भोर कमी गया है और न किसी ने पापित ही कराया है । पराकया पी पपायत ग्रामसान् रजिस्टई कुरसेन को किम्मेप के मामिझम्बानो एवं तीरों का संरक्षण व प्रबम्म करती है, सरकार पौर ममता का प्पान इस कमी की भोर दिममाती एती है परन्तु अभी वह अपने प्रयास में सफल नहीं हुई। मास्तब म कुमोन म एक मही प्रपितु काफी सुम्वर मिक्षामामों पौर होटमाँ की पानापाता है। गुल्मेत्र में एक बड़ी पनाग मण्डी सुमाप मगी पार गक मोर टेलीफ़ोन-पर स्टेट ग्रंक पीर सेन्ट्रम कोपापरेटिषक पुलिस स्टेशन पहसीम एस० एम. कोर बी.सी मो प्राफिस बर्फ के दो कारखाने पाठ जैमर, एक प्राथमिक स्म पंजाब सरकार द्वारा पौर रा प्रावमिक स्फूम तीन हाई सम एक सिनेमा हाल और कई मागार तमा छुरुक्षेत्र विस्वविधामय है । प्राय पत-रिन बहस-पास रहती है। पुम्शेत्र में ही बसो का प्रहा है। पानेसर शहर कुम्मन रेनब स्टेशन से समा मीम पश्चिम में पामेसर पर है। एक पाही साफ कुरक्षेत्र पार पानेसर को मिमाती है। वास्तव में पानेसर का नाम महादेव के नाम पर स्वामीरवर पा को बिगड़ते-बिबहते पानेसर बन मया । कामगात मात में भार भी पानेसर १२५ - पहर का नाम नहीं है बस्कि मौमा परी का रासुरद और योगा। इन तीनों ररों को मिलाकर पानेसर शहर है। पानेसर पहर की पतामी में समान हवन के पूर्वच रामा पुप्पभूति ने बसाकर मरनी राममानी बनाया था। रामा पुप्यमूति पम्प पे। उन्होंने रामपानी का नाम मयबानाकर के नाम पर स्थाणीस्वर मौर बनपर का नाम मोफष्ठ रखा पा । सम्राट हर्षवर्धन ने भी अपने पुस्तामों की भांति पामेसर को अपनी रामपानी बनाया परन्तु ८ बप के पापार राम्प का विस्तार होने के कारण उसने कम्नाय को अपनी रामपानी बना सिपा । सन् १.१४ ईसपी में महमूद गगनदी मे बामेसर को मुटकर माम मया दी और बहुसंस्पा में मामरिकों को पारकर से गया । पानसर पहर तीन बोटियों पर बसा हमा है । बीच की चोटी पर भी किमा या यहाँ पान सपहर वहमी का मारा पीर परत मुगुब मनामुद्दीन का मगार है। पूर्फ बोरी पर पार बसा हमा है और पश्चिमी मोटी पर कभी मुस्मा पौर प्रब बाहरी प्राम बसा हुमा है । मुगम समार्यो के बार ममासिंह मोर मामसिंह ने पानेसर पहर पर अधिकार कर सिया पौर हर को दो भागों में बांटकर राम्प पिया। घार का पूर्वी भाग मंगासिंह के पितार में या पोर पश्चिमी मागसिंह के अधिकार में पा। सन् १८१६ १० में ममामिह के पुत्र फरहसिंह की मृत्यु के परमाद सन् १८१.१० वा विषमा रानियों ने राम किया। १५५.ई. में प्रविम मिद रानी की मृत्यु के पश्चात पानेसर पर ईस्ट इपिया कम्पनी मे अधिकार कर लिया । भगासिंह मौर मापसिहपानसर के सत्र सरदार नहीं पे पस्किपास इगिया कंपनी का कर देते पं । मुगम ममा फसिपर ने पानेसर का नाम इसमामागार रख दिया पा परम्नु वह प्रमित न हो सका । सन् १८४.६० म १५ पमस्त मन् १९४७६.दर प्रबों का राग्य रहा। कुरक्षेत्रीय रेमम बोच मान पर पानेमर सहर पा स्टेशन है। परन्तु यह स्टेशन भी पहर मे पो पलांग + प्रस्तर पर है। इस ऐपन पर किया और तपि नहीं मिमते । रोष पानेसर सड़क पर दोनों मोर नई इमारत बन रही है। गीता हाई मत की इमारत माय बन पुकी है। इस प्रकार पीरे-पीरे कुम्मेत्र पौर पानसर ए वन वा ऐ है। पानसर की नगरपालिका गगन पुगनी है । नगरपालिका स्वास्थ सफाई पौर प्रकामा प्रबन्ध करती है। मगर पामिका बी मेणी की है जिसमें १३ निर्वामित सदस्य है। नगर पूर्फ भाप में टाउन हाम स्पेिम्मरीमा प्रसवाम पौर बमधामा है। पर्मचाना की शाम धर्मपानापा जैसी तो नहीं है पग्नु यात्रियों के ना प्रबन्य है। तीरमाना लिए पाए इए गत कम पानी पमघाना में याते है। परिवार यह बर्मपाता बारातों के लिए है। मगर में चार म बागार है बिनमें प्रायस्पस्या की प्रत्येक मामग्री मिल जाती है। पहले मगर के प्रत्येक मुहस्ते में पमपासा पी परस्तु पर नहीं है। प-विभारत से पहले मगर की पन-सम्मा पौष हसार " मगमग बी विमानन के पाबाट मुमममानों पर जान पर बननस्मा रम गर हो पा । १९५० में पुरयेप्र विपरिचातर के बनन पर नगर में समृद्धि प्राई पीर पनसंपया १८ हमार हो गई।
सन्निहित तीर्थ पुररोष स्टेपन से एक मौन पदिपम में पाकी पहेना रोड है। वामे बस रिसपा इत्यादि पुस्मन रेन से मिन भात है। पर्मपास्त्रों के अनुमार रन्तुक वे भोरस तक पावन तीर्ष से चतुमु स तक गियर मे हस्तिपुर तक तमा कन्या से प्रापपती मवी तक सम्निहित वीपीसीमा है। प्रत्येक मास की प्रमावस्मा को ब्रह्मारि देव पिपग वा समस्त विश्व के तीर्प यहाँ पर इकट्ठे होते है। मगवान विष्णु यहाँ सब निवास करते है एसी कारण इसका नाम सन्निहित ती है। इसमें स्नाम पर भगवान विष्णु को नमसार करने से प्रत्यमेप यम का फम प्राप्त होता है नपा दुष्ट मोक की प्राप्ति होती है। सूर्य ग्रहण पर-ग्रहण के समय सन्निहित वीर्य में लान पोर वान-पुण्य करने से वान का पुष्प प्रक्षय होता है । सन्निहित तीर्प पाप सो गर सम्मा पौर सौ पर पौड़ा है। पूर्वी पौर पश्चिमी वट मोरे को है पौर रमिणी तट बिस्तुम कम्मा है। तीर्म में पपा का पम माता है। तीर्थ पर सूर्य ग्रहण पग-ग्रहण सोमति प्रमावस्पा बनहरा और बावन बाबपी के मैने ममते । प्रायः कुमोष का पंग सम्प्रदाय इमी सीर्ष पर मिल पाता है । सन्निहित तीर्थ के पश्चिमी तट पर बर्मन योग्य स्थान यह है । मनिर मी प्रपनारायण-पी पंचायत ब्राह्मणन् रबिारा निर्मित है । मन्दिर में प्रा भक्त पौर नारायण की ग सुम्पर मूर्तियां है। मन्दिर का गार पत्तीकिक है। यहाँ माभिमा को प्रत्यक प्रकार की मुषिमा मिम सकती है। धी मदमीनारायण मा मनिर दक्षिय गौम निर्माणकमा मे बाबा सिप मिर बारा सम्बत् १८१३ मे निर्मित हुमा । मात्रियों के टहन पा प्रबरप है। कुछ पर्प से यह मन्दिर उपक्षित वा परस्तु वर्तमान महन्त के परियम से पब मुम्मवस्था है। गुरुद्वारा घेवी पावशाही यह मुबारा मिळके गुरु हरगोविन्दगी की स्मृति में एक टीमे पर निर्मित किया गया है । गहेगा रोग के निमम साप मौर सम्निहित तीन पानेसर नगर के मप्प बना हमा है । गुरु हरगोविन्द राह प्राम होते हुए बग कुक्ष मामा के मिए पपारे तो उन्हाने पहाँ विधाम किया पा । सन् १९४७ से प्रथम इस गुरसारे का छोटा सा स्प या परन्तु सन् १६ में पुरोष में पांच मास घरपापियों का निसाम म पड़ने से मुसारे का पप निसरा और मए भवन निर्मित हुए । मुसारे में मिस पपा और कीर्तन होता है। गुस्सों पर विशेष समारोह होते है । यात्रियों के ठाणे पोर भोजन का प्रबन्ध है। ।
१२५ मा सरोवर-कुरुक्षेत्र तोष कुमोक तौर्य को ही पक्ष सरोवर कहते हैं। यह तीर्य सन्निहित वीर्य से प्रामा फाय पश्चिम-दक्षिणी कारण पर है। एक पक्की साफ दोनों तीयों को मिमावी है । इस वीर्य की मम्बाई पाप गार फूट पोर बोड़ाई दोहार पो सौ पुर है। उत्तर मोर पपिनम के पाट पो वने हुए हैं। पूर्वी मोर पा से प्रपिक पाट पर।क्षेप नम्मे है। दक्षिणी किनारा कच्चा है। यो पंचायत ब्राह्मणन् रजिस्टर पुरोम ने प्यारह सौ फुट सम्मा माट बनवाया है। परिपमी किनारे के भाट मिस्टर मारपेन उत्तरी किनारे के पाट मिस्टर सारन पार कमाते के मारमाड़ियों पूर्वी किनारे के पाट पी रबारी भी मोदी भी नरहरि पिप्पु पाइगिम भूतपूष गार्नर (राग्यपाल) पंगार द्वारा बनाए गए है। तोर्प प्राम मिट्टी से परता गा रहा है और फ मास केवल उत्तरी किनारे पर थोड़ा बम यात्रा प्रोप सप मूस पाता है । वीर्ष में बम बर्पा द्वारा पाता है। मिस्टर मारकेन मे सन् १८५१ में पौतंग मदी से एक माना तीच में बम माने के लिए दवाया पा। परन्तु अब सरकार की योजनानुसार नामा पम्प किया था हा है। इससे भविष्य में गम की समस्या बनी रहेगी। सारा तीर्ष कमल पुष्पों से भरा हुमा है। पुरुक्षेत्र तीर्थ के मध्य में दो पुल है। एक भागा प्राणनाय पी के मन्दिर में जाता है दूसरा पुम मुगम सम्राट पावर का बनवाया हुपा है बोबमास पार बाण गंमा को पाता है। पर्मपास्मो के अनुसार मामी ने महाँ सतयुप के प्रापि में पियों तपा मुनियों सहित उत्तर पेदी नाम का पर किया था। यहां मूर्यग्रहूम पौर सौमती अमावस्या के पर्चा पर मान करने से भक्षय पुण्य प्राप्त होता है। दुराले ती पूर्ण कोण पर बाबा कासी कमसी गाने का मन्दिर, बमचाना पम्न म है यहाँ यानियों के ठहरने और साधु-महारमानों के भौगन पारिका प्रबम्ब है। ती के उसरी तट पर बाबा गुरका मेरा है। मेरे से मिमता हा गोपीय मठ है यहाँ पैतम्य महाप्रभु पारा स्थापित सम्प्रशम में बंगाली साथ रहते हैं। मागे बमकर महाराजा सीमाना द्वारा निर्मित पो पण मन्दिर है। भी प्य मन्दिर के निकट भी एस्क्षेत्र पुस्त डामय पार पर्मपामा है। यह पुस्तकामय रहमी के सेठ पमपान मोहिया मे कुख्यात मीयों गार समिति की प्रेरणा पर पनवाया था। इसरे पाप ही बागा भवग्णनाप की होसी है, जिसके पूर्ण करा में पांच पोर पोर परशय्या पर मेटे हुए मीप्य पिवामह की सगमरमर की मूर्तियां है। बाबा पणनाव सिट पुष्प पे । तीब के मप्प मे टापू है जिसको मुगमपुरा कहते है। इस टापू में फिमा ममार भुपत सैनिकों की एक टुकड़ी रहती पीबो तीर्थ में यात्रियों को स्नान नही पाने रेती भी। पानीपत रे तृतीय पुर के सनानापक मराम परसर मागिद राष माऊ ने रिसे को गिराकर मुगम सैनिरों को भगा दिया। तीर्षक परिचमी कोण पर इस गिस गुरु पारिन्दसिंहगी का गुणारा है। गीता मन्दिर पहेवा रोड़ पर और पुरोष वीर्य के बीच सेठ पुमकिपोरगी रिना नारा निर्मित माता मंदिर है जो रामपूत न नी निर्माण सना में बना हुमा मन्दिर पारों प्रार पपयन है । मनिर मुपागमप में प्रचम्मित है । ममिा मन्दर मार्ग पर हिन मार सिन सन्निहित तीर्थ दुरदोष स्टेधन से एक मीन परिचम में पपी पहेगा रोग है। ताप बस रिपधा दरपावि पुम्नेष समान से मिल जाते है। पर्मपास्मों के प्रमुसार रम्तुक से पोरस तक पारन वीर्य से चतुमुस तर पियेपर से हस्तिपुर तक तपा पन्या से पोपपती मरी तक सन्निहित तीर्षकी सीमा है। प्रत्येक मास की अमावस्या पाब्रह्मादिदेव पिगण तथा समस्त विम्स के तीर्प यहाँ पर सट्ट होते हैं । मर्म भगवान विष्णु यहाँ सदैन निवास करते है। इसी पारण इसका नाम मम्मिहित तीन है। इसमें स्नाम कर भगवान विष्णु मो नमस्कार करने से पस्वमेध यज्ञ का फ्रम प्राप्त होता है सपा छुटमार की प्राप्ति होती है । मूर्य-ग्रहण पचम्म-ग्रहण के समय मन्निहित तीर्य में स्नान और दान-पुण्य करने से रान का पुण्य प्रक्षम होता है । मग्निहित वीर्य पांच सी पर मम्बा पौर सौ मन पौड़ा है। पूर्वी पौर परिचमी वट भोको पौर रक्षिणी तट विस्म कन्चा है। तीर्थ में मां का पस पाता है। वीर्य पर मूर्य-पहरण बन-प्राण सोमति प्रमाणस्या पगहरा और बामन हारपी के मेमे मगत है । प्राय कुमोष का पाग सम्पराम इमी वीर्ष पर मिल पाता है । सन्मिहित तीर्थ के पश्चिमी सर पर दशम मोम्म म्बान यह है । मन्दिर भी घब मारायण-पी पंचायत बाह्मणम् रगिस्टर ारा निर्मित । मन्दिर में मम भक्त प्रौर नारायण की बहुत सुन्दर मूर्तियां हैं। मन्दिर का गार प्रमौकि है। यहाँ यात्रियों को प्रत्यक प्रकार की मुरिया मिल सकती है। पौ मक्ष्मीनारायण का मन्दिर रषि बीम निर्माणकमा मे पापा सिप गिर सारा प्रम्बत् १८६५ में निर्मित हमा। यात्रियों के टहरम का प्रबाप है। कुछ पप से मह मन्दिर उपमित पा पातु वर्तमान महन्त के परिमम से प्रब मुम्पबस्था है। गुरुद्वारा क्षेवी पारशाही पह गुखारा सिन्दों के सुरु हरगोबिम्दगी की स्मृति में एक टीमे पर निर्मित किया गया है । पहेगा रोग के बिनाम माप मौर सग्निहित वीर्य व पामेसर नगर के मप मना हमा। गुरु हरगोगिन करारा ग्राम से होते हुए गा कुम्सेत्र यात्रा के लिए पपारे वो उन्होंने यहाँ विमाम किया था। सन् १९४७ से प्रपम इस गुलारे का भोग मा स्प पा परन्तु सन् १९४७ में कुरक्षेत्र में पाप माब भरणाविरों का विधाम कैम्म पाने से पुमारे कास्प निकाय और नए ममम निमिम इए। गुहारे में निस्य कमा और कीर्तन होता है। गुस्सों पर विप समारोह होते है । यात्रियों के ठहरने पोर भोजन का प्रबन्म है।
१२१ ब्रह्म सरोवर-कुरक्षेत्र सोय कुरक्षेत्र तीर्य को ही ब्रह्म सराबर कहत है। यह वीर्य समिहिन तीर्य से प्रामा फर्माप पश्चिम-दक्षिणी फाण पर है। एक पफी सम दोनों टीमों का मिसाती है। म तीर्ष की लम्बाई पांच हजार फु पार पौगई दो हार वा मौ फु है। उत्तर और पश्चिम रेबाट पको बने हुए हैं। पूर्वी पोर प्राधे से अधिक भार पके हैं, शेप कम्मे है। दक्षिणी किनारा कम्बा है: यो पंचायत बाणन् रजिस्टर कुरुक्षेत्र न स्मारह सौ फुट मम्मा पाट बनवाया है। पश्चिमी किनारे के भाट मिस्टर मारकन उत्तरी किनारे क बाट मिस्टर सारकेन और कमकत्ते के मारबारियों पूर्षी किनारे के पाट थी रबारी मो मोदी न थी नहरि विप्प गामित्त मूतपूर्व गवनर (सम्पपाम) पगार द्वारा बनाए गए हैं। तीम प्राय मिट्टी से भरता पाए है और फ. मास कम उत्तरी किनारे पर पोगा बम रहता है आप सब मूख जाता है। पीर्ष में जम गर्पा द्वारा माता है । मिस्टर मारफेम म सन् १८५१ में चौप नरी से एक मासा तीर्थ में बम नान के लिए सुदवाया था। परन्तु अव सरकार की योगनानुसार नासा बस किया जा रहा है। इससे भपिप्प में राम की समस्या बनी एगी। सारा ती कमम पुणों से मरा हुमा है। पुरषोत्र तीर्प के मम्प में दो पुत्र है। एक गाना मगणनाप बी के मन्दिर में जाता है इमरा पुन मुगल सम्राट मकवर का समाया हुमा है मा बमस पौर माण गंगा को जाता है। पमपास्मों के पनुसार ब्रह्माजी म यहाँ सतयुग के पारि में पियो तपा मुनियों सहित उत्तर मेरी माम का यह किया था। यहाँ मूर्यग्रहण पौर सोमठी प्रमावस्या के पर्चा पर स्नान करने से प्रधय पुष्प माप्त होता है। कुरुक्षेत्र तीर्प के पूर्वी कोण पर मामा कानी कममी पाते का मन्दिर, पमपाता न पन्न क्षेत्र है यहाँ यानियों के ठहरने पौर सामहारमार्यों के मोउन पाविमा प्रवाब है। ती के उत्तरी सट पर बावा मुबर का रेरा है। मेरे से मिलता हुमा गौड़ीय मठ है नहीं पैतन्य महाप्रमुारा संस्थापित सम्प्राय में वगामी सामु रहा है। प्रामे चमकर महाराणा सीमामा द्वारा निर्मित भी ष्ण मन्दिर । मी पुष मदिर के निकट थी कुरुक्षेत्र पुस्त्र कानय पौर पमपाता है। यह पुस्तालय मेहमी के सेठ रामचन्द्र मोहिया ने कुम्लेव पीरें- सार समिति की प्रेरणा पर बनवाया था। इसके साप ही बाबा थपणनाव की बरी होती है बिसरे पूर्वी कक्ष में पांच पर पौर पर शम्मा पर मेटे हुए मीप्म पितामह की संगमरमर की मूर्तियाँ है । बामा प्राणनाप सिर पुश्य पे । तीर्प के मम्म में टापू है जिसको मुग्मपुरा कहत है। इस टापू में किसा बनाकर मुगल सैनिकों की एक टुकड़ी रहती पी पी वीर्य में यात्रियों को स्नान मही करने रखी थी। पानीपत क तृतीय पुर सेनानायक मराठा सरदार मागिप राप भाऊ में हिम को गिराफर मुग्राम सनिकों को ममा पिया। तीर्म के पश्चिमी कोण पर दवणे सिख गुरु मोविन्दसिंहमी का गुल्मप। गीता मन्दिर पहला रोड़ पर और कुत्या वीर्य के बीच मेठ पुसमविचारगी हिरवा बारा निर्मित मीता मन्दिर है जो राजपूत जैन मी निर्माए-कमा में बना हुमा । मन्दिर के चारों पोर पवन । ममिर मुबारस में प्रबग्वित है । मनिरपन्दर दीपा पर दिख और सित सन्तों के सममरमर पर प्रति बिर पोर उनी मागियो है। पीता के प्रारह मप्पाय भी धगमरमर पर प्ररित है। पी पण पोर प्रम की मुगर प्रविमाएँ मन्दिर में स्थापित है। उपयम में परा धममरमर का पार पोहों से युवा हुमा एक रप है। एक सुन्दर पमछाता पौर संस्कृत विद्यालय है । वास्तव में परि मुस्त्र में कोई मरिर है तो यही है। वारण गंगा तोय पुरसत ती दक्षिण में तीन मीत पम्प मार्ग पर बापस मंगा वीर्य है। इसी मार्य पर तीर्थ पुरोष से एक फर्माग की दूरी पर वाया नाना का मुखारा सिपी है। पारा गंमा तीर्य छोटा पा सरोपर है । यहाँ पैतानी का मेमा लगता है। महाभारत युग मैं पपाप को मारने की प्रतिमा किए हए मथुन ने दो पहर को यहाँ गुण वैर पाराम या पौर बाण मार पर पृमी से गंगा निभाती। अजुन के भोगों ने मम पिया और मनवान एप में बाहको पल में स्नान करमाया । मापगा तीप पुराणों में पापण पुम्मे की एकनरी का नाम है । परन्तु इस समम पुम्दोष विश्वविधालय दक्षिन म मह एक छोटा सा सुम्दर पका पौर मापीन पी है। रुप्णपदा चतुर्दशी को भम्पा में गिरा करने से मोम प्राप्त होता है। पुराणों में मिला है कि पान पर पी में बनाए हुए सामान बाह्मण भोगत करामे से पितर पवा के लिए तृप्त हो जाते हैं। मो मोम नवागी मही वा शक्ते में पिवरों को तृप्त करने के लिए इस शीर्ष पर पिगवान करते है। गुरुकुल कुरुक्षेत्र पिक सति के प्रचाराससत के माध्यम से विधार्पिया को पढ़ाने के लिए समर्मीम स्वामी पशानम्वनी ने इस गुष्म की मांग रखी । पर्याप्त भूमि मौर पन बानेसर के रास माला पयोतिप्रसापनी ने दान दिया। इस योग में मापौन संसति पौर संसत मौर हिन्दी मापा के लिए इस संस्था मे सरानीय कार्य किया है। नरकातारी (भीष्म कुण माण गंगा) पक्की पहेमा रोग पर रेतरे स्टेशन कुम्सेम से तीन मील के पन्तर पाएँ । ग्राम मरफागरी में मोम कुम बाण गंगा माम का तीर्य है। ताई मत घोटा है परन्तु इसमे बन वर्ष भर हवा है। महाभारत पुरके पपर्य दिन पाहत होकर पितामह मीप्म ने पारौं को पप्पा पर प. मास तक मृत्यु की प्रतीक्षा पी पी पौर कहते है कि इसी स्थान पर नन्हति धर्मपण मुपिफर को शान्ति पर्व का उपदेश रिमा पा । पोतिसर तीय पहेमा माने मासी पक्की साफ पर रेसने स्टेपन कुरक्षेत्र से पौष मीम पी पूरी पर गती है। यह स्थान पोतिसर महादेव का । परन्तु पुष मोग कहते है कि यहाँ भगवान् मे प्रयुमको मातोप न पिया पा। इस सौर्य में सरम्पती का पत प्राता है । म पोर्ष का जीर्णोदार स्वर्गीय स्वामी सरपानम मरमती में रिया । वह दृध का पतरा पौर एम मन्दिर महाराज दरममा न निर्मित किया। एक मन्दिर महाराणा परियामा और काश्मीर नरेश ने बनवाया था। कमल माम तीर्य मानसर पर पश्चिम में एक प्राचीन मन्दिर पार तीय है। कहते है कि यहां से मृष्टि की उत्पत्ति हुई पी। एम-बन्माष्टमी के गुमायसर पर यहाँ मला सपना है। मक्रवरा शेख चेहलो रेसरे स्टेशन पुरुषत्र से कोई पौन वो मीम पश्चिम में पानसर मपर से उत्तर पश्चिमी कोष पर, अन्तिम हिन्दू पावर्ती सम्राट पर्पन क किम क गुणहरा पूप में सगमरमर का एक मुनर मकबरा है, जोकि इतना ऊँचा है कि पांच-पांच मीस की पूरी से दिखाई देता है। पाप मुत्रियों के मध्य रस एच परती पर यह मारा बीच की पोटी पर निर्मित है । मकबरे की पश्चिम की मार पी चोरी पर ग्राम याहरी और पूर्व की पार की चोटी पर पानमर नगर की पारी का कम दर पर चला गया है। मपरेक वसिप पूर्व में पानेसर नगर है । पचिन में सम्राट हर्षवपन के किले के पहर पौर सुनुव-जमातु- दीन साहब का मायरा पार उत्तर में सम्राट् खेरशाह सूरी की सम्मी-पोती टूटी सराएँ हैं। यह मावरा मुगत निर्माण-सी का सुन्दर प्रतिनिधि है जो कि पटिया सगमरमर के पाठ कोपी टप पर बना हुपा है । कोताई पापर साफ और मध्ये संगमरमर का भी है परन्तु प्रषिक संख्या मटियाते और कापी पारियों बाते सपमरमर की है। मरेर गुम्बर पारों मोर छोटीईये में बनी स्त्रिारी है जिस पर B पमस्तर किया हया है। मझारे के पनर रोहबरें है-एक तो मनबहनी साहब की दूसरा म माने किसकी। मायरे की बनावट खान योग्य है । महारे से पानपीठ पम पर पश्चिम की पोर नरवरे भूरे पत्पर का मारा है जिममें म बान फिन पुरधानों की कबर है। दक्षिण की पोर एक नही चाकोर खानकाह है, जिसकी पा गट की है जो दुध टूट गई है और कुछ ठीर दा में है । वान काह क मप्प में पानी का होर है बिसरे पीच का फवारा समय की मसरता पर ऐ-पा पुपा है। इस होर को पानी से भरने के लिए पानकाह की दक्षिणी सीमा पर बाहर की पोर एक बहुत गहरा कुप्रा है। पानकाह में मप पठी गीर सम पप याहै। माबरे पर पान के लिए जानकाह में से पाना पड़ता है प्रिमो वा द्वार पूर्व और पश्चिम में है। माबरे के भार्गे पोर बनी पुषियों पर मान मिषगरी का काम हुमा है मा पारे पारे मुम हो रहा है और मीरे की काती मृमि उमरन नगी है। सरत गेख हसी की पास्तविक बर मारे भी है जिसमा माप बामकार के एक कमरे से मुरम वारा बाता है।पसी में अमृतसर तर पंजाब भर में इस मारे प्रतिरिक्त प्रौर कोई संगमरमर की मुमत निर्माण का प्रतिनिधित्व करने वाली इमारत नहीं । मझारे का गुमर मी-स्थित सपाट हुमापू के मार गुमर से मुनर है। इम मापरेका उम गेन पेहमी स कोई समग्म महीं पिसी मिना की १२८ कहानियां प्रचमित है। तहराते पोसिमा अनुमार हात घेण पेहसी एक रामी साधु घे यो मुनस समाद पाहयहाँ + मारानाम में भारत में हज़रत मुब मसामुद्दीन स मिप्सने पानेसर बाए थे। कहते है कि हसरत पमासुहरोन अतुम उस समय के मूझी-सम्प्रवास के सापु ये । उनकी तपस्या की स्पाति मातमी सीमाएं पार र मई भी। एस बार समाद् शाहमहाँ ने माहौर गे देहसी पाते हुए बड़ी ऐना के साथ पानेसर में पगर गमा । हसरत तुष-मासुरीन साहब ने समाद् पौर उसकी सेना को भोमन का निमग्नण विमा । पहावत है किसुर साहब ने एक प्यामा पानी पौर प्रापी रोटी से समस्त मुगम सेना को मोमन करवा दिया । सम्राट् इस बमरमार को देखकर बना प्रभा विमा कि उसने पुकुर साहब के लिए या मकबरा बना दिया। उम्ही विनों हरख क्षेत्र चेहमी तुम साहब से मिलने पाए पौर प्राणायाम करते हुए स्पर्म सिमारे। पुष बतामुरीन के परामर्षे सेवासी साहब को इस मामरे में समाधि दे दी गई और तब से यह मकबरा देत पेहमी कहमाने मया । इस मबरे के नाम को परवी नहीं है। हरत कुतुब ममानुरीन का मायरा पो निकट ही बना है के नाम पारपुर तबहेरी इस्मारि मार्मों की परती है। मराळ भौर भगानों के संपर्प पौर सिम सतनुब स्टेटस के दिनों में इस मापरे की कोई मरेख मही। अंग्रेजों ने महबरे की मरम्मत करवाई। देश के विभाजन सन् १९० के दिनों में किसी ने मकबरे के मदर का पत्थर उखार सिमा रिसको फिर किसी मे मही सपवाया। कालेश्वर तोप पामेसर पहर के पश्चिमी उत्तरी कोस पर महती है। यहाँ माप मास में स्नान का माहात्म्य है। सम्राट हर्षवर्धन के किले का सपहर मकबरा मेल हमी के पश्चिम में यह विपात सापपर मम नाम ती से कानावर ती तक फैमा मा है। इस पर की नुवाई होना प्राणायक है। ऐतिहासिक एप्टिकोण सेबने पानों के लिए यह मपहर मठ महत्व रखता है। स्थापीश्वर महादेव मन्दिर व तोय पानेसर पार से उत्तर में दो फाप की पूरी पर यह प्रसिर मन्दिर प दी है। प्रामुनिक मन्दिर पानीपत के तृतीय पुर के सेनामी सदायिराव भाऊ रा मिर्मिठ है। सी मन्दिर के नाम पर पानेसर प्रांत स्पागीलर महर का नाम है। इस वी पर कार्तिक पूरे मास स्नान र पूजा होती है। प्रति सोमवार को मा सभा में मौग मन्दिर के दर्शनार्य पाते हैं। यहां शिवरात्रि का बड़ा मेमा ममता पार एक महा मोवि बनती रहती है । बामन पुराण के अनुसार राणा येण का कुष्ठ इस ठी में स्नान करने से दूर हो गया पा।
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श्री ग मारामम का मंदिर, बो सन्निहित टीर्ष पर बना felis मारामा पटियासाारा निमित पौठा मंदिरम्पोतिसर
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१२५ गुरुवारा नयों पावशाही स्वास वीर्य के उत्तर-पूर्षी कोष पर न सिख गुरु वेसवादुरजी का ऐतिहासिक पुधारा। भद्रकाली-दुर्गाकूप गएपी के प्रसिद्ध स्ानों में है। यहाँ सदी का पाहिला पाम मिग बा। मह मिय पीठ है । मानेसर शहर के उत्तर में पसी सम सा रोड पर है। महाभारत काम में बन मे रमणी के रस में इसका प्राधान किया पाच पति इसी कारण इसे रप पपी का मन्दिर भी कहते हैं। महा पर पहने पोरेको रमि वी बाटी पी। बार मी पुरपायें पोर मिट्टी के शो रसोइए हैं। प्राधी-सरस्वती कहते है कि नानी के पाप भी इस दौर्ष में स्मान करने से दूर होते है। ती बहुत बोटा है, नियमें सरस्वती का वम मावा है। कुबेर तोष परस्पती नदी के घर पर घोग-सा पाती है। इस तीर्थ की मृदाई में बीपी सवादी की मगबाम विष्णु पौर भिन मागवी की मूर्विया मिस्सी की मो वही रती हुई है। महा मपराण और मे तप किया था। महारामा फरीदकोट को समाधि सित निर्माण कमा (पति मुघन पोर रामपूर्व निर्मान कमा का विपदा स्प) में बनी हुई समापि है, पा सुन्दर बनी हुई है और सरस्वती मदी तट पर है । इस भवन की चित्रकारी प्रापीम भातीय चित्रकला का प्रत्यक्ष प्रमान है। इस समाधि की परेत और मवलमब भी महापबा फरीरकोट की मार से होता है । उमापि के पायें और मामले सम्बद १९५५ में महाराणा कोटीरसिंह ने समस्त प्रमोध भूमि का प्रमण करके सरम्मवीट पर अपने प्राण पाये। पंकी पम्पसम में १८१२६. ते यह प्रशश ही कर प्रभम वार पबर्नर बगरम (पारसयर) पुस्सा पधारे तो धौ एबास्तु शाखा रजिस्टर क्षेत्र को पार सौ सए भेर र पौर पर प्रश्म भार प्रान्त के गवर्नर कुरक्षेर पाए तो पड़ा रपए मेंट करें।
श्री कुरुक्षेत्र का परिक्रमा भ्रमण
१ उत्तरपक्ष
१ रनु पा २ कोटी ती ३ सम्मा तीर्ष ४ मंगाहर तीर्थ
२ प्रमोम प्राम
मुम्दरपुर, बड़ी गोवर्पमपुर, पमीन यह सर मनिी बन म है। सूप कुप तीम
२ प्ररिती पण पक्षमूह ती ४ वामन कुपती धौम कुग वीर्य प्रतिमा
मार तीर्थ।
१
३ सगा प्राम
पविती बम स पसार विप्सु स्वान पगा पापात से पोसग प्राम १ एपी
२ बिमम तीर्प ३ बिममेपर तीर्य ।
४ मसोसपुर ग्राम
पारासर पाम १ प्रबन टोर्ष २ ब्रह्मस्पान वीर्ष ।
५ बासू प्राम
१ौसिकी-उगम ताई २ पृथ्वी तीई । बान की।
६.मगोप प्राम
परपती।
७.वापर प्राम
१ पुकर ती २ पागम तीर्य ३ पुरवर तीर्प ।
८ कुरिम्पारणा प्राम
१कोटी तीर्थ
सासवण प्राम
१ पावन तीर्प २ ईस वीर्ष
१० सर्परमन (सफीयों प्राम)
रसास झीर्ष सीमण प्राम पौर फिर सफीदों यहाँ परीयित के पुष जनमेजय मे
मागपत्र दिया पा।
११ सोसग्राम (पापी)
पापी से महादुरपुर इसके प्राग्नेय कोण में पूष रिण में परन्तुक पक्ष है इसको यस
तीर्प कहते हैं । यहाँ वारमू तीर्ष भी है।
१२ परास प्राम १ पंचनद दीप २ कामिक्षता वीर्ष ३ पाटी वीपं ४ कोरेगर महादेव वीर्य पारि स्थित है। १५ सोयया ग्राम पासन ग्राम बाते हुए मार्ग में कौठी कामूग्राम । पासन में १ पमाति कुप ठी २ सूर्य कुरा दीप प वीई, ४ प्रस्बैठी ती । १४ पुलहर प्राम बराह बेड़ी में बराह तीर्ष । १५ रामपुर प्राम यहाँ उत्तर की मोर अपियों के सात कुग है। इसके अतिरिक्त पूर्व में सूर्य कुण और परिपम में पाप दी है। इसी प्राम के निकट मूवेकर महादेव का मन्दिर है। ज्योति ग्राम के निकट याममासेसर वीय है। १६ नीर ग्राम नीर मगर से ईशान कोग में १ प्रसिमारा तीर्थ है। पीर नगर के पूर्व में २ मिषमती ती है। सोम तीर्य ४ मासमामेश्वर तीर्प । १७ पुनपुना प्राम पुनपुना प्राम से एक कोस पर पगड़ी में समान तीर्थ है। १८ पुष्कर को १ मुबपट गई। १२ रामहर प्राम यहाँ चार यम निवास करते हैं। महापधिसी रमाएर कपिम यक्ष उखना पक्षिणी। १ हत्पाहरण वीर्ष २ सूर्य गुण वीर्य । परसुराम तीर्य २० विरसोसा प्राम १ चमूम वीर्ष २१ कर प्राम १ फायसोपन ती २२ सोहापार प्राम १ सोडोसार ती २ फुट वीर्ष सूर्यकुश २३ मऔर पाम १ मीठी २ मिद निप वीर्ष ३ माट ती २४ कलायत प्राम १ कपिलाती २ पिसेसर ती २२ गुहारणा प्राम १ ममामवन वीर्प २ गऐपती २६ सयूमा प्राम १ मय ती २ गूर्य गुण २७ सांगिणी ग्राम १ सांखिनीदेवी तीर्य २ गूर्य तीर्प । ब्रह्म ती ४ दगी तीर्म । २८ पराह प्राम १ वारपाम वागुडी यक्ष २ यक्षतीर्य ३ प्रप फुग ४ मुदीर्य । २९ मारमश प्राम १ प्रामा तीर्थ ३० पौसरी ग्राम १ अति ती २ मवती तीर्ष । २१ सोवन प्राम १ पी पीर्ष २ गती ३ स्मानुमोम तीर्थ ४ मापि तीर्य , म्युभण दीर्थ सायमेष वीर्ष। ३२ मारसस प्राम १ मानुप तीर्य। ३३ गापडी प्राम १ प्रापया नीतीष २ सप्त अपि तीर्ष अपियों के माम ये है-मबार गौतम पमराम्मि काममप विस्वामित्र बसिष्ठ प्राय । ५४ कैपल मपर १ पृखमेवार २ गिगी ती नकुमी टीप ४ कर्मम तीर्थ . ीि ५ पुपरीफ ७ प्रजनी मन्दिर। २५ पयोरा प्राम १ कोटीफ्ट ती। २६ बरौठ प्राम १ टेपर ती २ विघ्या तीर्ष। २७ नागरर घोस प्राम १ पुपरी दी। ३८. स्योठा प्राम १ विषिष्टप २ बैतरणी मदी तीर्थ ३ भूमपापिक्षिय पी। १ सफराप्राम १कावती २ पपमापेक वीर्ष । ४० फरस प्राम १ सोममती वीर्य २ सविस्त वीर्ष , पानिजात वा ४ मूर्म कुग मुफ ती।
१२५ ४१ निसग पाम १पची वीर्य २ मिमकती। ४२परास प्राम १ मनोकामना वीर्य २ कोटि तीर्य ३ पंचा तीर्ष ४ मूर्य कुप, विसोतमा दी। ४२ रसीसा प्राम रामोपन दी। ॥ मोहिणा प्राम मोहिमा इप्पना पौर हाबड़ी न सीन प्रामों में १ इम्प ती २ काम्प वीर्ष । सूर्य कुण तीर्थ ४ मषन तीर्थ । १५ बसतमो ग्राम पसका पुर माप प्यासस्पमी है। यहाँ म्पासम्बनी गम का डीप है। ४१ सीतामठ पाम १ मेरी दी। कोटि प्राम १कोपिकी महारष दी। ४८ रिसर ग्राम १ मुदिन ती २ बर्दन ती ३ हिरम्पमती तीच । ४६ निगन प्राम १ मम्मानिमी वीर्ष, २ रापद तीर्थ , पप तीर्ष। ५० साम प्राम विष्णु वीर्ष २ पेप्ठ्ययम तीर्थ । कोरि ती ४ मूर्य तीर्थ मोतारण १ किरमिष ग्राम १ मोतारण तीर्घ २ पहिण ही गरी वीर्ष । ५२ पबनावा प्राम १ परनरव ती २ ममम तीर्य ३ प्रमृतस्पसी तीर्थ। ५२ परमामा ग्राम पौरपोल प्राम १जमवेयर टीई २ मावातरान! ४कारसा प्राम रणवी ५५ सारसा प्राम १ भानीहोर तीन । ५५ मासगो पाम १ सम्पायन
५७. मसमस पेड़ी प्राम
१ सूर्य वीर।
५८ ककेवर प्राम
१ पीकुम तीर्य।
५६ माऊपप्राम
१ विहार कुरती।
६० पसौती प्राम
१परपती तीर्थ।
६१ भारणा प्राम
१ समस्थानिक वीर्ष।
६२ गुमयला प्राम
१ सोम ती
६३ मगरण प्राम
१ सप्त सारम्बता तीर्प २ मुममा , कारणाधी । रिपा ५ सुमनोहरा
१ मुवेणु ७ प्रोष माम सरस्वती ८ मिमनोरका।
६४ सतोड़ा ग्राम
१ पाममोचन तीर्घ २ पुष तीर्य ।
६५ पहेबा ग्राम
१ समयोनि वीर्य २ पनि वीर्य । उतक तीर्थ ४ पतिसन ती ५ शिशु
वीर्ष मनोवती ती ७ विस्वामित्र तीर्थ ८ सोम-कार्तिकेय मन्दिर ।
५६ उरणाय (हरसाप) प्राम
१ पनिष्ठ प्राची ती २ प्रममाय समम तीर्थ । समुद्र वीर्ष।
६७ कमोरा प्राम
१ कामेश्वर तीर्थ।
7 सन्दभ पुस्तफ-सूची 1 Aspn lodla Patna 1926 by Beperji Sastri 2 Aryan Immigration into Eastern India by Bhandarkar DR 3 Lectures on the Ancient History of India by 4 Some aspects of Ancient Iodian Culturo by 5 Aryans la Eastren lodla la Rigvedro Age by Chakladar H 6 Eastern Indus id Aryerasta by 7 Tho Adcient Geography of India by Cuoningham A 8 Rigvedlo India Calcutta 1921 by Day AC 9 The Geographical Dictionary of socient Medieval India by Dey NL 10 Anthropo Geography of Vedlo Indu by Dikshitar V RR 11 Aryadlution of Eustrea Indla by 12 Aryanisation of India by Dutt, NR. 13 Das parroa Prochalakshaga by Kirfel W 14 Riiers of India by Law B.C 15 Tribe in ancient India by 16 Aac-cut Indian Historical Traditlon by Pargiter F E 17 Dumnasties of Kullago by 18 Chronology of uncleat India by Prahan S. N 19 Pro Muslman India by Rungacharya V 20 lado-Iranian Border lods by SiciA MA 21 On Some Rivets names in Rigveda by 22 The Rigveda & The Punjab by Woolner AC 77 .
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