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Rachna Kyun Aur Kin Ke Beech

Aghe · 2011/03

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रचना : क्यों और किन के बीच

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रचनाःक्यों और किनके बीच
'अज्ञेय' से कुछ सवाद)
प्रश्नकर्ता
शरतकुमार
गीतिसेन
रमेशचन्द्र शाह
राजी सेठ
नन्दकिशोर आचार्य
भारतीय साहितय प्रकाशन, पेरठ

प्रकाशक
भारतीय साहित्य प्रकाशन
२८६, चाणक्य पुरी, सदर,
मेरठ १
प्रथम सस्करण
१९८८
मूल्य ६०००
मुद्र
भारती प्रिण्टस
के १६, नवीन शाहदरा,
दिल्ली ३२

हमे दुख है कि 'अज्ञेय' जी की इस पुस्तक का प्राशन उन वे जीवन-चाल म पूरा न हा सका । कतिपय अपरिहाय कारणा से पुस्तक के मुद्रण म विलम्ब होता चला गया। माच १९८७ मे ही पुस्तक की छपाई शुरू हो पायी। अज्ञेय' जी इस के कुछ ही पृष्ठो के प्रूफ देख पाये थे कि ४ अप्रत १९८७ का अकस्मात उन का देहावसान हा गया। इस वनाघात से पुस्तक वे प्रकाशन म व्यवधान पडना स्वाभाविव था। शुभ के दा धृष्ठ 'अनेय' जी ने अपनी भूमिका के लिए छुडवाये थे, परतु दुर्भाग्यवश उस के लिखे जान से पूर्व ही वह चिर निद्रा म लीन हो गये और उन्ही के साथ ही मौन हो गय चे शब्द भी जिह वह भूमिका के माध्यम से व्यक्त करना चाहत इस पुस्तर म सकलित सवाद १९८५ के अत तक सम्पन हुए थे। अत इन में व्यक्त विचारो को साहित्य और रचना कम के विविध पहलुआ पर जज्ञेय जी के नवीनतम चि तन की प्रस्तुति ही समयना चाहिए। थे - -प्रकाशक

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क्रम-सूची
६
रचना-कम के कुछ पहलू
भेंट वार्ताकार शरतकुमार, गीति सेन
साहित्य को चिता
रमेशचन्द्र शाह के साथ सवाद
व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन
राजी सेठ से दो सवाद
पहला सवाद
दूसरा सवाद
रचना पया, क्यों, किन के लिए, किन के बीच
नदकिशोर आचाय के साथ एक सवाद
१६
७१
१०८
१२५

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रचना-कर्म के
कुछ पहलू
भेट-वार्ताकार
शरत्कुमार, गीति सेन

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शरतकुमार कवि और साहित्यकार के नाते आप को भारत के मुख्य साहित्यिक पुरस्कार मिल चुके हैं। ऐसा भी समाचार आया है कि आप का नाम एक विदेशी पुरस्कार के लिए भी प्रस्तावित हुआ है। आपने लेखक बनने का निश्चय कसे क्यिा आपने तरह- तरह के काम किये हैं, लेकिन आप निरतर एक सजा साहित्य कार ही बने रहे हैं। अज्ञेय पुरस्कारो की बात छोड़ ही दी जाय तो क्सा हो? उन स केवल ध्यान वटता है। कभी कभी वह चर्चा सुखद भी होती है, लेकिन काम से तो ध्यान हटाती ही है। मैंन लेखक वनने का निश्चय वचपन म ही कर लिया था, बल्वि चेतन भाव से 'निणय नही किया, जान लिया कि मैं लेखक ही बनूगा । बाल्यावस्था म ही शब्दा के जादू से और एक साथ ही कई स्तरो पर सवाद या सम्प्रेषण करने की सम्भावना से मैं परिचित हो गया और वह जादू तव से मेरे साथ ही है । इस म कुछ योग इस बात का भी था कि मैं आरम्भ से ही हिंदीभाषी क्षेन के बाहर रहता रहा। मेरे पिता पुरातत्त्वविद थे और उत्पनन के सिलसिले मे एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते थे--प्राय सुनसान जगहा म। मैं यह सकता हूँ कि मैं हिंदी क्षेत्र के बाहर ही नहीं, अधिकतर सभ्य' प्रदेशा के बाहर ही रहता रहा। इस स एक लाभ मुझे यह हुआ कि आरम्भ से ही मेरा परिचय एक लिखी पढी जाने वाली भाषा से हो गया- उस समय की 'मानक' हिन्दी से। निश्चय ही यह एक सीमा भी थी जिसे मैंन धीरे धारे ही पहचाना। एक तरह से मेरी लेखन यात्रा पुस्तक की भापा से आज की बाल चाल की भाषा तक की याना है । यह याना काफी लम्बी थी-कई वर्षों की- लेकिन अन्तत मै हिदीभाषी समाज में कही पहुँच तो गया। इसका अर्थ यह हुआ कि आप दूसरी बहुत-सी चीजों के साथ प्रयोग करते रहे, लेकिन हमेशा इसी परिणाम पर पहुंचते रहे कि अकेले लेखन का आक्षण हो सब से अधिक है । अच्छा, आप का 'शेखर एक जीवनी' तो उपयास है इसे आपने आरम्भ से ही एक बड़ी साहित्यिक रचना के रूप मे आयोजित किया था कि बहुत-सी कहानियां लिख चुकने के बाद उप यास की ओर आकृष्ट हुए - . रचना-कम के कुछ पहलू ११ शेखर एक जीवनी के बार म एक विशेष वात है। यो तो उस से पहले मैं कुछ कहानियां और कुछ कविताएं भी लिय चुका था। लेकिन शेखर एक जीवनी के साथ विशेष बात यह है कि उस या पहला मसविदा मैंन जेल मे लिखा और उस समय वह एक उपयारा की अपेक्षा मरे जीवन की आत्मवथा ही अधिक था, या कह लीजिए कि यह एक उपयस्त आत्मकथा ही थी। उस परिस्थिति म सच्ची आत्मकथा ता वह हा ही नही सक्ता था। हुआ यह था कि एक भूमिगत जातिवारी दल के सदस्य के रूप म मैं गिरफ्तार हुआ था और उस समय की जो परिस्थितियां थी उन म यह सम्भावना भी सामने थी कि मृत्यु दड मिल मयता है। मै तर उनीस वष का था । यह सवाल था कि उनीस वप के युवर का जीवन अगर एकाएक उस वि दु पर समाप्त कर दिया जाय तो जीवन का क्या अर्थ है ? उपयास एक तरह से इस प्रश्न का जवाब खाजने या प्रयत्न था। इस प्रकार उस उम्र में जीवन समाप्त कर दिया जाय तो अपने जीवन की अथवत्ता कहा होगी? पहला मसविदा पुलिस हवालात से जेल ले जाये जान के पौग्न बाद बडे तनाव की स्थिति म तीन चार दिन म लिख डाला गया था। जेल पहुँचते ही मुझे लेखन सामग्री रखने की अनुमति मिली थी और सब से पहला काम मैंने यही किया था कि दिन रात एक कर के तीन वापिया भर दी थी। यह मसविदा अभी मेर पास है । वह उपयास कहलान याग्य नहीं है न ही वह आत्मकथा हा सक्ता था क्यो वि मेरे जीवन मे ऐसे बहुत से तथ्य थे जिन का उस समय उल्लेख तक नहीं किया जा सकता था। लेकिन इस अथ मे उस निश्चय ही आत्मकथात्मक लखन माना जा सकता है कि मैंने यह कोशिश जरूर की थी कि एक प्राप्तिकारी के बनने की एक भावनात्मक जीवन गाथा प्रस्तुत की जा सके । फिर जेल मे ही एक दूसरा मसविदा तैयार हुआ। फिर एक तीसरा। फिर पूरी तरह मुक्त हो जाने के बाद चौथा मसविदा तयार हुआ और यही थोडे-बहुत सशाधन के बाद प्रकाशित हुआ। हर बार मसविद का रूप काफी बदलता गया और उसकी आत्मकथात्मक्ता भी पहले मसविदे से कम होती गयी। शुरू मे ता केवल एक क्राति-कर्मी लिख रहा था, अनन्तर मसविदे पर एक सजग साहित्यकार भी काम कर रहा था। पहली प्रकाशित कहानियां-या या कहे कि साहित्यिक सदभ में आ गयी पहली कहानिया, क्या कि कुछ कहानियां उस से पहले कालेज की पत्रिका म या इधर उधर छप चुकी थी जिन की ओर ध्यान देना अना वश्यक है-~-पहली प्रकाशित कहानियाँ भी जेल से ही चोरी से बाहर भेजी । १२ रचना क्या और क्नि के बीच गयी थी। इन को पाडुलिपि अन्तत एक बधु के माध्यम स प्रेमचन्द तक पहुंची, उह कुछ कहानिया पस द आयो। यह तो स्पष्ट था कि उस युग की परिस्थितिया म वह उन सब कहानिया को नही छाप सकते थे- राजनीति की दष्टि स कहानियां ज्यादा 'गरम' थी लेकिन दो के बारे में उन की यह राय बनी कि उह प्रकाशित किया जा सकता है, एक मे थोडा-सा जोखम हो सकता था लेकिन दूसरी के साथ काई कठिनाई नही थी। मेरे वधु से उन्होंने जानना चाहा कि कहानिया का लेखक कौन है, बधु ने उह यही उत्तर दिया कि यह तो वह नही बता सक्ते---लेखक तो अज्ञेय है'। इस पर प्रेमच द जी ने कहा कि वह लेखक का यही नाम दे कर कहानिया छाप देंग और ऐमा ही हुआ भी। मैन अपने लिए तो यह नाम न चुना हाता । अब भी उस से कभी कभी असमजस होता है। नाम भारी जान पड़ता है लेकिन फिर सोचता हूँ कि पिता न जो नाम दिया वह भी कुछ कम भारी नही है इस लिए सह लेता हूँ। आपने 'अकलक' शीपक कहानी उहीं दिनो लिखो ? हाँ, वह भी जेल में लिखी गयी। उन दिनो कई एक कहानिया ने लिए घटना-सामग्री मैंने जलग-अलग देशो के श्रान्ति-आन्दोलना से ली थी- रूस से, चीन स, क्यूबा स, मक्सिको स, ग्रीस । सभी कहानिया अच्छी बन गयी हो एसा ता नहीं था-- आइन्स्टाइन बड़े साहित्य प्रेमी थे, यह तो आप जानते हैं। सुनते हैं कि उहोने भी कहा था कि अपने सारे शोध-काय से ज्यादा खुशी उहे 'दि अदश कारामाजोव' लिख कर हुई होती। आप के 'नदी के द्वीप' मे सकेत मिलता है कि भौतिक विज्ञान मे आप की रुचि रही। धज्ञानिको मे अपने पयवेक्षण के प्रति एक विषय निर पेक्षता, एक तटस्थता रहती है। आप क्या सोचते हैं कि लेखक मे भी यह गुण होता है जो वह देखता है उस के प्रति ऐसी तटस्थता? नहीं, मेर ख्याल मे तो आइस्टाइन को उक्ति उन के अपन काम के बारे मे उतनी नहीं है जितनी दस्तोएवस्की के उपन्यास के बार म। मुझे और एक सेना-नायक की उक्ति याद आती है जिस एक कविता इतनी पसन्द आयी थी कि उस पर वह अपनी युद्धा म पायी हुई सारी सफलताएँ निछावर कर सकता था। यहा भी मैं सोचता हूँ कि बात अपने काम के मूल्याक्न की उतनी नहीं है जितनी कविता के रागात्मक प्रभाव की। विषयी निरपेक्ष मूल्याकन और विषयी की रागात्मक प्रतिक्रिया मे भेद करना चाहिए रचना-बम में कुछ पहलू १३ जहा तब मेरे उपयास का सवाल है. हाँ, मैं भौतिक विज्ञानीया प्रशसक हूँ। मैंने जितना भौतिक विज्ञान पढा उस से मैंने बहुत कुछ सीसा-मैं विज्ञान का विद्यार्थी था और विशेष रूप में मैं भौतिक विनान के अपने गुरु का प्रशसय था। वह अमरिकी थे । वह बडे धमप्राण व्यक्ति थे~~या शायद मुझ कहना चाहिए कि वह बहुत गहरे नैतिन सरोकारो वाले व्यक्ति थे। अपने विद्यार्थी-काल म उन के साथ एक सखा भाव पर सौभाग्य मुझे मिला था। उसके बाद प्राय पचास वर्षों तक यही मम्बध बना रहा--नीन एक वर्ष पहले उन की मत्यु हो गयी। विज्ञान से मुझे व्यवस्थिन ढग से सोचने की शिक्षा मिली, मेरा ख्याल है कि मेरे लेखन पर भी उस की छाप है, इसी लिए शायद वह गरे हिली लेखको के लेखन से कुछ भिन्न है। कुछ लोग इसी लिए उसे अधिक विदेशी मानते हैं। मैं ता नहीं समझता कि इस लिए वह विदेशी हा जाता है। इतना ही है कि उस मे सीधा और सिलसिलेवार चिन्तन और अपने विचार की प्रक्रिया या उस के परिणामा को नपे-तुले शब्दो म रखने का प्रयल होता है । विचार का ही नहीं, अपन चिन्तन जौर अपन भावो के सम्बधो का भी मही विवेचन और निरूपण करना चाहना रहा गीति सेन मेरा प्रश्न लेखक के वास्तविक स्वभाव के बारे मे है । आपने जेल मे लिखी गयो पुस्तक की आत्मकथामूलक वस्तु को चर्चा की। अभी आपने अपनी रचना के 'विदेशोपन' का भी उल्लेख किया । आप के ख्याल में यथाय को कहा तक कल्पना या 'फतासी' के साथ जोडा जा सकता है ? यथाथवादी रचना और फतासीमूलक रचनाये औचित्य के बारे मे आप कुछ कहना चाहेगे? जहाँ तक कला-सजना का सवाल है, मुझे यथाथ और फतासी को दूसर के विरुद्ध खड़ा करने में सकाच होगा। दोनो ही एक बहत्तर यथाथ वो पकड़ने के प्रयत्ल का अग होत है। फतामी भी उसके लिए उपयोगी है पन्तासी या कल्पना से हम म स कोई भी मुक्त नहीं होना । हम सभी हमेशा जान रहते हैं कि यथाथ काण्व स्तर है जो कल्पना म बिल्कुल अलग है। लेकिन हम यह भी लगातार जाने रहते हैं कि करपना हमारे ययाय जीवन का एक अग है---या स्वय एक यथाथ है । वह सक्ते हैं कि एक वृहत्तर ममग्र यथाथ ये दो पहलू हैं और सजक व सामार इन दोनो के बीच की दीवार ताड देता है या रूपक बदल कर कह लीजिए कि उनके बीच एक मतु बना रहता है । साहित्य पाठक का सजग कर देता है वि वह एक बाहरी जीवन के साथ-साथ एक आभ्यन्तर जीवन भी जी रहा है और १४ रचना क्या और दिन के बीच दोनो को साथ जोड कर ही जीवन की अर्थवत्ता पकड मे आती है । गीति सेन मेरा सवाल विशेष रूप से भारतीय सदभ मे है। मुझे लगता है कि यहाँ हमेशा जीवन के सारे ताने-बाने मे यथाथ और मिथक का एक अपूर्व मिश्रण रहता है। शायद भारतीय फिल्मे और उन फिल्मो को लोकप्रियता इस का अच्छा उदाहरण है। यह विशेष रूप से भारतीय प्रवृत्ति हो, ऐसा तो मुझे नहीं लगता। सभी जगह ऐसा है। अमेरिका मे ऐस उपन्यास लिखे गये हैं जिन के किशोर नायक काल्पनिक चरित्र गढते हैं-~-एक काल्पनिक सखा गढ कर फन्तासी के जगत् में उस के साथ अपन दिन काटते हैं--अपने अकेलेपन का भरते है। ऐसे बालको के जीवन को यथाथता को समझन के लिए फन्तासी की रचना प्रक्रिया को समझना जरूरी हाता है। किशार जीवन की यथाथता तो हम समझ ही नही सकते जब तक यह न जाने कि किशोर का एक कल्पना-जीवन होता है-कल्पना-जीवन उस के अपने यथाथ को समझने की और आत्मसात् करने की प्रक्रिया का अग है। मिथक-मिथक तो दूसरी बात है और अलग से विचार मांगती शरतकुमार आप क्या सोचते हैं कि उपन्यास या कहानी मे किसी न किसी तरह यह जरूरी हो जाता है कि किसी जीवित व्यक्ति के या अपने ही किसो अनुभव के विश्व का सहारा लिया जाये-चाहे उसे रचना को प्रक्रिया मे कल्पना के सहारे रूपान्तरित कर दिया जाये ? और आप क्या सोचते हैं कि लेखक का दृष्टिकोण साधारण रूप से करुणा का होना चाहिए--यानो वैज्ञानिक के विश्लेषण या निदान से अलग लेखक को क्या होना चाहिए इस चाहिए' का काई नुसखा तो मैं कभी नही दूगा। लेखक घटनाओ का वज्ञानिक को विश्लेपण या निदान करने वाली दष्टि से भी देख सकता है और दूसरी ओर उन से बहुत गहरे सम्पृक्त भी हो सकता है । ऐसा भी हो सकता है कि वह अपने निजी अनुभवा से काम ले-यानी निजी अनुभव सजारम्भ परे और क्रमश अपने को उस से अलग करता चले, और यह बिल्कुल सम्भव है कि जो साहित्यिक कृति उस के सामने आये वह इस अलग होने की प्रक्रिया का ही वृत्तान्त हो । यह भी हा सकता है कि वह इस अलग होन की प्रक्रिया में पूरे हो जान तक रुका रह और उसके बाद ही कोई असम्पृक्त रचना करे । एसा भी हो सकता है कि उस की यात्रा इस से उलटी दिशा म हो--एक नि सग ब्यौरे से आरम्भ कर मे उस को धीरे धीरे अनुभव की भट्टी के पूरे ताप रचना-कम के कुछ पहल १५ 7 - तक ले जाये। रचना की सफलता या उस के गुणात्मक मूल्य का निर्णय हम सिर्फ प्रक्रिया के आधार पर नही करते बल्कि अतिम परिणाम के आधार पर करते है। आपने चार उप यास लिखे और बहुत-सी कहानिया लिखी, लेकिन इधर बीस वर्षों से आपने कोई कहानी नहीं लिखो और आपने अपने को कविता तक सीमित कर लिया है। ऐसा क्यो और कसे हुआ? क्या इस का कोई विशेष कारण रहा शायद यह कहना सच हो-शायद इस लिए कह रहा हूँ कि मै कोई वादा नहीं कर रहा हूँ-कि मैं कहानी के पार निकल आया । लेकिन ऐसा नही है कि मैंन उपयास या जाय्यान यानी फिक्शन छोड दिया हो। इतना ही है कि एक उप यास और दूसरे उपयास के बीच का अतराल लम्बा होता गया है। कविता काफी लिखता रहा हूँ-वह भी अब अपेक्षया कम लिखता हूँ, फिर भी लिखता ही रहा हूँ। शायद मैंने अततोगत्वा जो जात्म बिम्ब स्वीकार कर लिया है वह मुझे उप यासकार की अपेक्षा कवि ही बनाता है। चीजो का देखने की मेरी दष्टि कवि की दष्टि है। अभी पहले मैन फन्तासी के बारे मे जो कुछ कहा वह भी इस से जुडा हुआ होगा । निश्चय ही कवि कहानिया भी लिख सकता है । औरो न भी ऐसा किया है और ससार की कुछ श्रेष्ठ कहानिया कविया की लिखी हुई है या वास्तविक्ता को देखन की कवि की दृष्टि सकेतित करती हैं। लेकिन मेरा ख्याल नहीं है कि कोई कवि-अगर वह कवि बना रहे तो-~-उतने से सतुष्ट हो जाता है जहाँ तक उपन्यास का सवाल है अपने काम को ध्यान में रखते हुए या उप यासकार के रूप में अपनी जाच करते हुए मैंने जाना कि मरा सरोकार हमेशा शुद्ध बाहरी घटना को अपेक्षा भीतरी जीवन से अधिक रहा है। भीतरी जगत् के उपयास रोज रोज नही लिखे जा सकत । भीतरी जगत् की यात्राएं बाहरी जगत की यात्राआ की अपेक्षा धीमी गति से चलती है। बाहरी जगत् के बारे मे उप यास का बहुत सी घटनाओ से भर दिया जा सकता है जिन मे कि एक घटना और दूसरी घटना के बीच कोई आभ्यन्तर विकास न हुआ हो। लेकिन अगर भीतरी जगत के बारे मे लिखना हा ता एक उप यास स अगले उपयास के बीच कार को विकसित होना होता है। और उस विकास की अपनी धीमी गति है। वह यात्रा कठिनतर भी है इतना ही कह सकता हूँ। पिछने कुछ वर्षों में दा और उप यासो पर काम करता रहा हूँ। आशा करता हूँ कि एक शायद अगले वप प्रकाशित हो जाये। खुद उप यास रचना क्या और क्नि के बीच 'अपने-अपने अजनबी' के बाद यह पहला उप यास होगा? . - बुद्ध का एक वाक्य है, 'तुम जो कुछ हो वह जो तुमने सोचा उसे का. परिणाम है। इस का अय यह हुआ कि जो भी प्रेनिया हमारे विचारो के गुण निर्धारित करेगी वह हमारे सम्पूर्ण जीवन को भी निर्धारित करेगी। अगर पलाओ की प्रक्रिया ऐसी है तब तो वे एक अत्यत प्रासगिक माध्यम हैं जिस का समाज को पूरा समर्थन करना चाहिए, जिस की समाज को चिता करनी चाहिए। अंन्हा क्या मैं बुद्ध की उक्ति के साथ एक और उक्ति की जोर ध्यान दिला सकता हूँ 'तुम वही बन सक्त हो जा कि तुम हो । जहाँ तक सज- नात्मक लेखन का सवाल है, मैं समझता हूँ कि यह ज्यादा प्रासगिक है। आप के चिलन म आप की अस्ति अधिक महत्त्व की है। तो बुद्ध की बात का विरोध किये बिना मैं कहूंगा कि कलाकार का नाता उस से है जो कि आप है, क्यो दि वही आप वन रहे हैं। अस्ति' 'भवति' की शत है। क्लाकार यही करता है कि पाठक को या कि पूरे समाज का सचेत कर देता है कि वह क्या है--उस की अस्ति क्या है और उस की सम्भूति क्या है । दूसरे शब्दा मे वह चिन्तन के विकास मे उतना नही जितना सवेदन के विकास मे याग दे रहा हाता है। मेरी बात का यह अथ नही है कि दानो म सम्बध नही है, लेकिन सवाल बुनियादी सरोकार का है। किसी इकाई का, कलाकार का और समाज का, दूसरो से क्या सम्बध बनता है यह इस पर निभर है कि वे विस सवेदन से आरम्भ करते हैं और फिर क्लाकृति स-यहा पर साहित्यिक रचना से परिचय होने के बाद क्या परिवतन सवेदन में घटित होते हैं। मैं समझता हूँ कि समाज पर कलाकार का प्रभाव भी इसी माध्यम से होता है। कलाकार समाज को बदलने के इरादे से आरम्भ नही करता। वह उस का प्रयोजन नहीं है। लेकिन कलाकार जो करता है उस का परिणाम यह अवश्य होता है कि सवेदन मे कुछ परिवतन आता है वृद्धि होती हैं या विकास होता है । और परिणामत लोगो का जपन आस पास ये जगत से नाता बदलता है, सरोकार बदलता है। बदले हुए सम्बवो से समाज को बदलने की प्रेरणा भी मिल सकती है मैं नही जानता कि यह जाप के प्रश्न का उत्तर हुआ या नहीं। हम मान लें कि रचना का सवेदन पर, जैसा आपने बताया है, एक व्यापक और अनेकायामी प्रभाव पड़ता है। यह भी मान लें कि इस बात का भी महत्त्व है कि हम शुरू कहां से करते हैं हालांकि यह । रचना-कम के कुछ पहलू १७ भी सच होगा कि हम उसी चीज को समझ सकते हैं जिस का हमने किसी न किसी प्रकार अनुभव किया हो। जिसे बिल्कुल जाना हो न हो उसे हम समझ कसे सकते हैं ? लेकिन अच्छी कलाकृति का यह प्रभाव भी तो होता होगा कि वह अनुभव को और विस्तार दे दे, और विशद कर दे और इस प्रकार वह अधिक सारमय, अधिक यथाथ हो जाये ? क्या इस से आप सहमत होगे? आप एक महत्त्वपूर्ण कडी भूल रहे हैं । आपने अनुभव किया इस लिए आपन समझ भी लिया, ऐसा नहीं है । बिल्कुल जरूरी नहीं है कि आप अपने अनुभव को समझ भी जायें | आप के लिए यह जरूरी है कि पहले आप अपने अनुभव को पहचानें तभी आप उस समझ सकते है । इस का अथ है कि आपने अनुभव के प्रति एक आलोचनात्मक, विवेकमूलक रवया अपना लिया है । ऐसा बहुत कुछ है जिस का हम अनुभव करते हैं लेकिन जिसे हमने समझा बिल्कुल नही हाता। और यह तो है ही, जैसा मैंन पहले भी कहा, कि अनुभव का विस्तार भी बढे हुए सवेदन का परिणाम होता है। अक्सर कहा जाता है कि बहुत सी चीजो की समझ निजी अनुभव से ही प्राप्त होती है। लेकिन क्या यह कहना सही होगा कि महान कला प्रत्यक्ष निजी अनुभव का स्थान ले सकती है-उस की पहुंच बढा सकती है या उस की कालावधि को छोटा कर सकती है-- उस को गति बढा सकती है ? नहीं । यह मानना ठीक नही होगा कि क्ला प्रत्यक्ष अनुभव की जगह ले सकती है या लेना चाहेगी । कला स्वय एक प्रत्यक्ष अनुभव है इस से अलग वह किसी चीज़ का स्थानापन न है, न हो सकती है न होना चाहती है। वह सवेदन उत्पन कर सकती है, उस का विस्तार और संस्कार कर सकती है और ऐसा करके वह आप की इस म भी सहायता कर सकती है कि आप दूसरा के अनुभव मे प्रवेश कर सकें, बहुत बड़े अनुभव मे बहुत गहराई तक प्रवेश कर सकें और, हा अधिक शीघ्रता से प्रवश कर सकें। लेकिन ये सब अनुभव के एवजी नहीं हैं, ये अनुभव की एक दूसरी कोटि हैं। मेरा मतलब था-उदाहरण के लिए, आप 'अना कारेनिना' को लोजिए। आप उप यास पढ़ते हैं और रोमानोव परिवार के अनुभव से, अना के विवाह से, अपने पति, अपने प्रेमी और अपने बच्चे के लिए उसके प्रेम से और इन सब के परिणामो से गुजर लेते हैं १८ रचना क्यों और दिन के बीच आपने कुछ ही दिनो मे उप यास पढ लिया तो वह पूरे अनुभव के जीवन से कही कम समय मे हो गया। और यह सवाल तो अलग हे कि वास्तव मे वसा जीवन अनुभव करने की सम्भावना आप के लिए स्तिनी थी। तो क्या इस प्रकार पढने के अनुभव से आप अधिक समृद्ध हुए? आप जो कह रहे हैं वह असल म रतना ही है कि उप यास पढने मे जितना समय लगता है उप यास को क्या की कालावधि उस से कही लम्बी हो सकती है। उपयास के वाचन का अनुभव और उप यास के चरित्रो का जीवनानुभव अनिवायत अलग अलग चीजें हैं अरि पाठक कारा इन दाना जायामा म से गुजरता है । लेकिन जाप जब उपयास पढते है उस के सहारे दूसरे चरिमा के जीवनानुभव म प्रवेश करते है तो आप हमेशा जानते रहते हैं कि वह किसी दूसरे का अनुभव है। अना कारेनिना के जीवन का मझना या उस का अनुभव करना, और स्वय अना कारेनिना होना, दो अलग अलग चीजे है। दाना जनुभव एक नहीं है- यानी अना न जीवन को जसे जिया और भोगा और उप यास पढते हुए हम जैसे उस के जीवन को जीते और भोगते हैं, दोना जात्यतिक रूप से अलग रहते हैं। हम अनुभव को बात कर रहे हैं--क्या आप सोचते हैं कि साहित्य सजक यत्नपूर्वक अनुभव को खोज करता है ? और अगर करता है तो क्या उस का अनुभव आयास सिद्ध और तरली होता है, या कि ऐसा होता है कि जो भी अनुभव उसे प्राप्त हो उसे वह आत्म सात कर सकता है और उसे कलात्मक रूप दे सकता है? यह तो मैं जानता हूँ कि कुछ लेखक यत्नपूवक अनुभवा की खाज करन निकलते हैं। जिस हद तक अनुभव की उन की खोज का लक्ष्य यह होता है कि उहे पुस्तक के लिए मसाला मिल जाये, उस हद तक वे अपने सम्बधो का दोहन कर रहे हाते हैं। और मेरा ख्याल है कि एसे अनुभव उस हद तक पाठक पे लिए कम प्रामाणिक हो जाते हैं। निश्चय ही इस के बावजूद एक रोचक और पठनीय पुस्तर बन सकती है। लेकिन जहाँ इस चेतना का कोई सम्बध क्था के लिए दुहा गया वहाँ अनुभव को वैसी गहराई का बोध नही होता, सवेदन म वैसा उ मैप नहीं होता। अनुभव के प्रति पुते तो रहना चाहिए। अनुभव प्राप्त हो तो उस भोगना चाहिए, आत्मसात् करना चाहिए, उस का विवेचन भी करना चाहिए-मैं हूँ कि उस का साधारणीकरण भी करना चाहिए उसे मावजनीन आयाम दे कर उस से कुछ असम्पृक्त भी हो जाना चाहिए। रचना-कम में कुछ पहलू १६ इस प्रकार आपा हुआ और उन पर पुन प्रस्तुत किया हुआ अनुभव एक प्रामाणिकना या स्पदन रयता है जो पाठक को छूता है। मरा विश्वास है कि महान साहित्य इसी बाटि के अनुभव म से निरलता है। पहली काटि मचत रूप मे खाजे गये अनुभव में, साद्देश्य भाग सम्बधा से जो अनुभव प्राप्त होता है वह वडा दिलचम्प भी हो सकता है लेकिन इस स महान् और टिकाऊ साहित्य नहीं बनता। महान् साहित्य पाठक का जसा रूपातरण कर देता है वसा उस से नहीं होता। पथा साहित्य को सरचना की बात करें। ऐसी हर रचना मे और खास तौर से कहानियो उप यासो मे क्या का तत्व होता है। अगर उप यास या कहानी को किसी अमूत सरचना के लिए इस कथा-तत्व को बिल्कुल निकाल बाहर कर दिया जाये या उसे साहित्यिक-बौद्धिा व्यायाम मे परिवर्तित कर दिया जाये तो क्या यह इस बात का सकेत होगा कि साहित्य अथवा कथा-साहित्य का हास-युग चल रहा है। आप तो मवाल का निरूपण ही एसे कर रहे है कि वही उत्तर मिल जाय । मरी स्पष्ट राय यह है कि कथा म क्या तत्त्व होना जरूरी है। यह आप के सवान के एक हिस्स का जवाब है। लेकिन कथा-तत्त्व है क्या, इस का स्पष्टीकरण अब भी अपक्षित है । कहानी अथवा कथा साहिय के विकास के साथ माय फ्था तत्व की, घटना की हमारी अवधारणा भी बदलती गयी है । एमा हाता है कि कुछ घटित हुए होने से किसी बाहरी विना भी बहुत कुछ घटित हुआ हो। वह भी कहानी है। आप दो मिनट निश्चल बैठ-बैठे-बिना जरा भी हिले-डुले अनुभवको एक पूरी दुनिया से गुजर जा सकते हैं। अब यदि आप को पता है कि ऐसा हुआ है और उस अनुभव को आप सम्प्रपित कर मक्त हैं तो वह कहानी है। यह भी हो सकता है कि विना विभी घटना वाली यह कहानी बहुत अच्छी और समय कहानी हो। इस विशपीकरण माथ दोहरा वि क्या-नत्व जरूरी है और अगर उम की निगति होती है या वह रिल्युत लुप्त ही हो जाता है तो उस हद तक कहानी-उप यास की भी निगति हाती है और मैं समझता हूँ हि एसा हुआ भी है। ऐसा अनुभव होता है कि यात्रिकी के आगमन और इतने तेज विकास के साथ अब तोल्स्तोय या दस्तोएवस्की जसे उपयास लिसे ही नहीं जा सकते। सी० पी० स्नो ने इस विषय पर एक पुस्तष भी लिखी है. इन उपयासों को वह यथायवाद के महान रचना भयो और मिन बीच लक्षण के २० उपयास कहता है। हाँ, एक नयी जाति का उपयास सामने आया है जिसे अखवारी उपन्यास (जनलिस्टिक नॉवेल) कहा जा सकता है । यथाथ की हमारी पकड बदलती है, यथाय के तत्त्व भी बदलते है तो कोई कारण नहीं है कि उप यास भी न बदले। यह हम क्या मान लें कि उप यास के लिए बहुत बडा सामाजिक विस्तार जरूरी ही है जब कि समाज के साथ हमारा सम्बध बदल रहा है ? यह विल्कुल सम्भव है कि आज पूरे समाज की अपेक्षा कोई एक मशीन ही मेरे जीवन का अधिक महत्त्वपूण, अधिक तात्कालिक अग हो । यदि ऐसा है तो इस बात का महत्त्व है कि पूरे समाज के साथ मेरे रिश्ते की अपेक्षा उस यज के साथ मेरे रिश्ते की खरी और प्रामाणिक अभियक्ति हो। इस बात का मतलब असल म यह है कि हम समाज की दूसरी परिभाषा कर रहे हैं । हम जब उपन्यास और उस के सदभ की चर्चा करते है तो जैसे मान लेते हैं कि समाज तो पहले से मौजूद है, "दिया हुआ है और यह भूल जाते हैं कि समाज वह है जिस से हमारा रिश्ता है । अगर कोई रिश्ता नहीं है तो कोई समाज नही है। और आधुनिक सभ्यताओ में यह बात लगातार अधिक सत्य होती जा रही है। ऐसा माना जाता है कि कलाकारों और साहित्यकारो के साथ जीवन बिताना बडा मुश्किल होता है। कई महान कलाकारों के व्यक्तिगत जीवन आदश जीवन बिल्कुल नहीं होते। फॉकनर ने कभी कहा था 'एक अच्छो कविता अनेक बूढी महिलाओ और माताओं से ज्यादा मूल्यवान् होती है। अक्सर देखा गया है कि बड़े से बड़े साहित्यकार बडा सिद्धातहीन व्यवहार करते हैं । आप क्या सोचते हैं कि कलाकार क्यो कि समाज को बडे ऊंचे दर्जे का योगदान देता है इसलिए उस को ऐसी आजादी मिलनी चाहिए जो दूसरो को नहीं मिलती या कि उस के काम के लिए इस तरह की आजादी जरूरी है। आपने कई प्रश्नो की लडी बना दी । मैं बीच वाले प्रश्न से शुरू करता हूँ। मान लीजिए कि मैं फाक्नर की उक्ति का उलट देता हूँ 'एक अच्छी माता एक दयालु बूढी महिला ढेर सारी कविताओं से अधिक मूत्यवान् होती है। मैं समझता हूँ कि यह बात भी उतनी ही सच हागी। इतना ही नही, मैं समझता हूं कि स्वय फॉकनर भी इस बात को मान लेते । वह इतन भाग्यवान् नही हुए कि एक अच्छी माता को जान सके हाते । जहाँ तक लेखको वा सवाल है, यह सच है कि उन के साथ जीना रचना-क्म के कुछ पहलू २१ वहुत मुश्किल होता है, लेकिन लेखक के साथ जीना कोई क्यो चाहे ? बात यह है कि लेखक-सभी कलाकार~बडे सवेदनशील प्राणी हात हैं वडा सघन जीवन जीन वाले, और सघन सवेदनशील लोगो के साथ जाना हमशा कठिन होता है, वे चाहे लेखक और कलाकार न भी हो । यह सघनता एक तरह की एका मुखता, एक धुन पैदा करती है जिस के कारण व्यक्ति जसहिष्णु दूसरे का ख्याल न करन वाला, बल्कि निदयी हो जा सकता है। लेकिन जैसा मैंने कहा इस तरह की आत्म वेद्रित निदयता पेवल कलाकारा मे हाती हो एसा नही । ऐसे बडे सेनानायक भी हुए हैं राजनीतिक भी है जो अपने निजी सम्बधो में इतने ही निदय रह । कई विचारव भी काफी हृदयहीन पाये गये हैं । सवाल इस एकनिष्ठ लक्ष्यो मुखता का, धुन का है। और असल में हम अपना निणय उस के परिणामा के जाधार पर ही करते हैं । अगर कलाकार ऐसी निममता के बाद ऐसा कुछ पस्तुत करता है जिस समाज मूल्यवान् मानता है तो समाज उस के जावरण को क्षमा कर देता है आप यह है कि कलाकार को जाज जितना अकेला छोडा जाता है उस से कही अधिक अकेला छोड दिया जाना चाहिए। ऐमे अकेलेपन से उस को जरूर बहुत लाभ हागा और शायद समाज का भी बहुत लाभ होगा। लेकिन समाज से उन का सम्बध नहीं रहेगा तो कला के लिए उन के पास सामग्री ही नहीं रहेगी। जो नहीं। सम्बध का मतलब हस्तक्षेप नहीं होता। आप कलाकार को अक्ता छोड दीजिए और उसी को तय धरन दीजिए कि उस का आप से कितना सम्बध और क्सा सरोकार है --आपका-उसका सम्बध नहीं, भाप के माथ उस का सम्बध-जो कुछ अलग चीज है । हिदी लेखन को स्थिति के बारे में पूछना चाहता हूँ। दूसरी भारतीय भाषाओ मे जो लिखा जा रहा है और ससार के दूसरे देशों में जो कुछ लिखा जा रहा है उस को तुलना में हि दो को पया स्थिति है, विरोप रप से प्रेमच द के बाद और स्नातभ्योतर युग सवाल का जवाब पहने ता यह बनाइय कि 'स्पात त्र्योत्तर' युग पया हाता है ? मैं तो म्याय य युग में जीता हूँ। जाप उस मे नही है तो--तो मेरी आप वे मागहमन्दा है । 'स्वानन्यापार' या यान परनाम्यात यावीत युग का एक परना यादा है। मर घ्याल म यह उग स युनियादा तौर पर नागम्बध। दूगरी मागीप मापात्राम या विदेगा गहिनी सेना की गुलना रपना का ओरतिरोप की जा सकती है। जहां तक भारतीय भाषाओ का सवाल है, मैं समझता हूं कि हिदी का कृतित्व काफी ऊँचा पाया जायेगा। यह भी कहा जा सकता है कि अलग-अलग भाषाओ ने अलग-अलग विधाओ मे विशेष प्रवृत्ति दिखायी है या विशेष अवदान दिया है। स्वत त्रता के युग मे हि दी मे काव्य के क्षेत्र में विशेष प्रगति हुई है और कहानी के क्षेत्र मे भी, आलाचना या विचार-साहित्य मे उतनी नहीं हुई। मराठी की प्रवत्ति आलोचना और विचार-साहित्य मे विशेष रही है लेकिन कान्य म हिन्दी से उस की तुलना नहीं हो सकती। इसी तरह दूसरी भाषाआ में भी है। कुल मिला कर कह सकते हैं कि हिदी की उपलब्धि असन्तोषजनक नही है-या यह अलग बात है कि साहित्य सजक हमेशा अपने समय के साहित्यिक उत्पादन से असन्तुष्ट रहता है। जहाँ तक दूसरे देशो का सवाल है, मैं हिदी के लिए काई बडे दावे नही करूँगा। लेकिन काव्य के क्षेत्र म ज़रूर हिदी मे ऐसा सजन हुआ है जिसे ससार वे सामने आना चाहिए । मैं किसी एक लेखक की बात नही सोच रहा हूँ। समूचे काव्य-कृतित्व की बात सोच रहा हूँ। और यह बडे खेद की बात है कि हिदी स इतने कम अनुवाद हुए है। आजादी मिलने के समय हिदी से सम्बद्ध बहुत-से लोगो को सरकारी स्तर पर प्रोत्साहन और सरक्षण मिला था। एक समय था जब फलकता हिदी रचना का प्रमुख केद्र था, फिर हिदी की धुरी वहां से हट कर इलाहाबाद आयी और फिर दिल्ली-अब वह दिल्ली मे ही टिकी है। पता नहीं आप सहमत होगे कि नहीं, लेकिन ऐसा लगता है कि इस सरकारी सरक्षण से हिदी के और दूसरी भारतीय भाषाओ के विकास को काफी नुकसान पहुँचा है । आप इस बारे मे कुछ कहना चाहेंगे। दा प्रक्रियाएँ हैं जिहे जलग कर वे देखना उपयोगी होगा। क्लक्त्ता जब हिदी का मुख्य केद्र था तब वह भारतीय राष्ट्रीयता का भी मुख्य केद्र था उस समय की दाना प्रवत्तियो म घनिष्ठ सम्बध था। यह हिदी के लिए शुभ था कि उसे एक सम्भाव्य राष्ट्रभाषा के रूप म हिदीतर भाषा भाषिया न ही प्रस्तावित किया। यह आदोलन बगाल से शुरू हुआ क्लयत्ता तब भारतीय राष्ट्रीयता का पेद्र था जसा मैंन अभी कहा, और वह ब्रिटिश भारत की पहली राजधानी भी था। फिर आदालन का के द्र अशत बम्बई चला गया जो दूसरो महा नगर या अन्तर्राष्ट्रीय नगर था--जिर्स का सम्पक पश्चिम से अधिक था और जो पश्चिम की चुनौतियो के प्रति सब म अधिक सजग था जिस मे रचता-यम के कुछ पहलू.२३ राष्ट्रीय दृष्टिकोण सब से अधिक विकसित था। तब राष्ट्रीय आन्दोलन के साथ हिदी आदोलन के भी दो मुख्य केद्र हो गय-कलकत्ता और बम्बई । भारत के स्वाधीन हा जान पर ही तीमरा और नया के द्र सामने आया-अर्थात् स्वाधीन भारत की राजधानी नयी दिल्ली। एक प्रमिया राजधानी के विकास के साथ मवत्र लक्षित हाती है। सारे सास्कृतिक त्रिया-क्लाप पहले एक केंद्र की ओर आकृष्ट होते हैं और वह केद्र राष्ट्र की राजधानी होता है । अपवाद भी होते हैं, जस वाशिंगटन की तुलना मे यूयाक, लेकिन साधारणतया राष्ट्रीय राजनगरी सास्कृतिक राजनगरी भी होती है और सब कुछ सहज ही वहा वेद्रित होने लगता है। यही प्रक्रिया यहा भी हुई लेखक भी दिल्ली आ वसे, प्रकाशक दिल्ली आ बसे, और उसी तरह और भी लेकिन यह केवल एक प्रक्रिया है जो राष्ट्रीय राजधानी के विकास के साथ अनिवायतया होती है। दिल्ली अभी उस अथ म महानगर नही है जिस जथ म कलकत्ता और वम्बई महानगरीय केद्र थे । दिल्ली एका एक एक विराट् नौकरशाही गाव के रूप म फैल गयी और एक शहर के स्प मे जव धीरे धीरे विकसित हो रही है। जब वह सच्चे अथ मे एक वास्तविक नगर और राजधानी बन जायेगी तब वह राष्ट्रीय सास्कृतिक जीवन की मुकुर मी भी दीखेगी-अभी यह स्थिति नही है जिस का एक कारण तरह-तरह के राजनीतिक दबाव भी हैं। अभी तक दिल्ली कई एक भारतीय सस्कृतिया का प्रतिनिधित्व करने की कोशिश कर रही है जो सभी एक्-मरे के बराबर हैं-किसी एक राष्ट्रीय सस्कृति का प्रतिनिधित्व वह नहीं करती। जहाँ तक सरकारी सरक्षण का सवाल है, जब आजादी मिली तव वई राष्ट्रीय नेताओ की सच्ची इच्छा थी कि साहित्य और क्ला के लिए ऐमी सुविधाए उपलब्ध की जायें जा पहले सुलभ नही थी, लेकिन सरक्षण दाधारा अस्त्र होता है और हम धीरे धीरे समयने लगे हैं कि राजकीय सरक्षण से पलाआ यो क्या खतरे हा सक्त हैं । कुछ कलाएं अथवा कुछ क्षम ऐम हैं जिन को सरक्षण की अधिक आवश्यकता होती है। मैं नहीं मममता वि साहित्य उन म स एक है। साहित्य को कुल मिला कर राजकीय सरक्षण से हानि ही हुई है क्या पि राजदीय मराण धीरे धीरे राजनीतिक दलोमा हस्तक्षेप बन गया है। ऐसा क्यों है कि हिदीभाषी क्षेत्र में अपनी भाषा का कोई अभिमान नहीं है ? प्रगाल या महाराष्ट्र या दक्षिणी प्रदेशा की तुलना में हिदीभाषी प्रदेशों का उच्च वा अपने घरों मे हिदी का मित्पुल २४ रचना क्या और पिन के बीच उपयोग नहीं करता। कहा जाता है कि सन '४७ से पहले भारत मे अग्रेज का राज था और '४७ के बाद अग्रेजी का राज हो गया। घरो मे अब बच्चे भी अधिकाधिक अग्रेजी बोलते हैं और अधिकतर घरों मे, खास कर समाज के उच्चतर वर्गों मे, हिन्दी की कोई पुस्तकें ही नहीं होती। उच्च वग की बात ता अभी जलग से करूंगा। लेकिन जब आप बाग्ला भाषी या मराठीभापी प्रदेश की तुलना म हिदीभापी प्रदेश की बात करते हैं तव आप एक महत्त्वपूण वात भूल जात हैं। दूसरे सभी प्रदेश सुगठित एक भाषाभाषी प्रदेश है, उन का समाज एक भाषा का समाज है। दूसरी ओर तथाकथित हिदी प्रदेश ऐसा प्रदेश है जिस मे हिदी के भी कई स्तर हैं । एक हिदी वह है जिस के लिए आदोलन कलकत्ता से शुरू हुआ था और बम्बई म आगे बढा-वह स्तर जो राष्ट्रीय सम्पक भाषा का स्तर है। फिर दूसरा स्तर उस हिन्दी का है जो लोगो के सामान्य जीवन की भापा है--और जा उस मानक राष्ट्रभाषा से अलग है और कई बोलिया के रूप म व्यवहृत होती है। हिंदीभापी प्रदेश में लोग जा भापा वास्तव म बोलते है उस में उन का भी वसा ही अभिमान है जैसा बगाली का वाग्ला मे या महाराष्ट्री वा मराठी मे, लेकिन यह भाषा उस भाषा से भिन्न है जिस की हम दिल्ली मे बैठ कर (अंग्रेजी म) चर्चा करत है या जिसे राष्ट्रीय सदभ मे रखते हैं। यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि इस भापा के साथ हमारा लगाव बिल्कुल भिन प्रकार का हो, बल्कि कह सकते है कि हम प्रयल ही इस बात का कर रहे हैं कि जिन भापाआ के साथ लोगा का लगाव है उन से अलग एक ऐसी भाषा विकसित की जा सके जिस के साथ वैसा लगाव नहीं है वैसा मघन राग-बधन नहीं है। यानी यह शिकायत एक तरह से अथहीन हो जाती है कि इस सम्पक मुक्त भाषा से हमारा वसा सम्पक नहीं है । यह ता स्पष्ट ही है कि वैसा नही है । एक ओर वे भापाएँ हैं जिन के साथ हमारा बडा गहरा रागात्मक सम्बध है दूसरी ओर यह भाषा है जो कि हमारे रागात्मक पूर्वग्रहो से परे हैं। । लेकिन क्या जिस भाषा के साथ रागात्मक सम्बधन हो या एक बहुत बडे समुदाय का सम्बध न हो, वह पनप सकती है। यह तो इस पर निभर है कि पनपना आप किसे कहते हैं । हम जिम राष्ट्र भाषा की जरूरत है यानी सारे देश के लिए एक व्यवहार की, सम्पद की एक भाषा-उस के लिए चाहिए शायद दो हजार शब्द की बुनियादी शब्दावली, यानी दो हजार शब्दा की बुनियादी भाषा और उसके साथ रचनान्बम कुछ पहलू २५ एर सम्बी चोष्टी पारिभापिर शायसी। ऐस दावार पद पा लना योई यहा यदिन वाम नहीं है, बचि शायद इस पे लिए दो हजार भा नही गोह सा शाही शापीहा। हम एसा पर गवत हैं कि एम शर उन पर या जायश्यर' हा ता गढ़ पर उग मानप राष्ट्रभाषा का नाम दे में, उम ये ाथ एप पारिभापिय शम्दावली भी प्रकाशित बर दें जा राष्ट्रीय स्तर पर मवम लिए एप हा । इस भाषा का प्रश्न उग भाषा में प्रश्न म पित्तुल लग है जिग मे हम अपनी सजनात्मक अभिव्यक्ति परत है--जिरा भापा म हम जीत हैं। उम भापा का स्वतत्र विकास होगा। भी जा हो रहा है वह यह है पिदा दप्टिया में यीच, इन दा प्रचार पी भाषामा के बीच गहवडी पलायी जा रही है। राजनीतिक या गरापार वेवन उादा हजार या सोलह सो शब्दारे साप हा चाहिए वपिन यह उग में बदल बरावर सजनारमर अभिव्यक्ति की भाषा मांग डाता है जापि उम या अधिपार-क्षेत्र विस्वुल नहीं है। आप को भाषा के मामले में एक आरपतिक्तावादी या पपशनिस्ट माना जाता है। क्या आपका ख्याल है कि हिदी के लिए भी फ्रेंच अकादमी जसो कोई सस्या होती तो हिन्दी को लाभ होता ? हिली मे नये शब्द अधिफ्तर सस्कृत से हो लाये गये हैं, अगर दूसरी भाषाओ से-फारसी से या अप्रेजी से भी ले कर हिंदी मे स्वीकार किये जाते तो पया उस से लाभ होता? नहीं-~इस तरह की अकादमी के बारे में आप ये सवाल का बडा स्पष्ट उत्तर है नहीं। हम उस स कोई लाभ न हुआ होता। क्या कि ऐसा नही है कि पहले अचादमी बनती है और फिर अच्छी भापा पर बल दिया जाता है। पहले एक समाज हाता है जो अच्छी भापा की कद्र करता है और फिर वह समाज अकादमी बनाता है। हो सकता है कि मैं पर्फेक्शनिस्ट हूँ। कुछ लोग व्यग्य स यह बान कहत हैं । उस से मुझ वास क्लेश नही हाना। और स्तरीयता मैं क्वल भापा म नही चाहता। पूरे हिंदीभाषी समाज मे अगर भाषा के प्रति उस तरह का सम्मान का भाव होता तो शायद अकादमी जैसा काई मस्थान उस का बन गया होता। लेकिन, जसा आप के हा इस स पहले प्रश्न से स्पष्ट था वह स्थिति आज नही है, इस लिए उस तरह की जवादमी से काइ लाभ नहीं होगा बल्कि सम्भव है कि बसी सस्था गलत चीज़ा पर ही जार दे और इस तरह भला करन की बजाय नुक्मान ही अधिक पहुँचाय। जापने उच्च वग की और भाषा के प्रति उसके रवैये की बात रचना क्या और विन के बीच की थी। जिस को जाप उच्च वा या एलीट कहत ह मुझ जान पडता ह प्रकट या अप्रक्ट पूर्वग्रह से हम एलीट या उच्च चग मी परिभाषा ही यह करते हैं कि उच्च वग भारतीय समाज का वह जश है जो अपने को अग्रेजी में अभिव्यक्त करता है। इस प्रकार आप के प्रश्न मे ही उस का उत्तर हों जाता है। अगर एलोट वह है जो शुरू से ही अग्रेजी माध्यम से शिक्षा दीक्षा पाता है ता यह कोई अचम्भे की बात नहीं है कि उस म हिदी या क्सिी भारतीय भाषा के लिए कोई लगाव नही पाया जाता। लेकिन ऐसा भी एक एतीट या उच्च वग है अगर आप का आशय ऐस लोगो से है जो समाज म सम्मानित हैं--ऐसा एक उच्च वग है जो अपन का अप्रेजी म अभिव्यक्त नहीं करता, आप पायेंगे कि सभी भाषा प्रदेशो में ऐसे लोग अभी हैं । बल्कि शायद ऐसे लोग बीस वर्ष पहले की अपक्षा अधिक होगे-इस के बावजूद कि इस अवधि म विकृत अग्रेजी का विस्तार काफी बढा है । सवन आज ऐसे लोग अधिक है जा अपनी भाषा से सम्पृक्त हैं और उस के लिए चितित है जोर जिन की यह चिता भी उन की अपनी भाषा म व्यक्त होती है । यानी एक ऐसा भारतीय उच्च वग है जिस की ओर से सरकारी क्षेत्र अभी उदासीन है। भारतीयो के अग्रेजी मे लिखने के बारे मे आप को क्या राय है ? कोई मूलत हिदीभाषी हो तो क्या वह सजनात्मक लेखन के लिए अग्रेजी माध्यम चुन सकता है, उस मे अपने को अभिव्यक्त कर सकता है ? या कि शब्दो का पूरा भावात्मक अभिप्राय अपनी मातभाषा मे ही समझा जा सकता है ? ऐसा कोई आत्यन्तिक कारण तो नहीं है कि एक भाषा प्रदेश का लेखक रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए दूसरी भाषा न चुन सके । लेकिन जा भी चुनाव वह करे उस के स्पष्ट और पिहित अथ समझ लेना जरूरी है। जाजेफ कोनराड जसा व्यक्ति लीजिए-वह पोलिश मूल का था, पर उसन अग्रेजी को चुना और आजीवन अग्रेजी म ही लिखता रहा । पालिश भाषा में उस का सम्पक टूट गया। यह बिल्कुल सम्भव है कि कोई अपनी भापा के बदले एक विदेशी भाषा चुन और उसी म रचना करे, यदि वह ऐसा करता है तो उस के चुनाव का मूल्याक्न म रचना कम व परिणामा के आधार पर ही करते है। हम यह नही पूछते कि उस ने विदेशी भाषा क्या चुनी यही पूछते हैं कि उस चुनाव के बाद उस 7 क्यिा क्या। अनन्तर हम इस की पडताल तो कर सकते हैं कि उसका वह चुनाव अनि- वाय क्या हो गया था। यह पडताल केवल लेखक की जीवनी की दष्टि से रोचक नहीं होगी बल्कि और भी बहुत-से पहलुओ का विचार उस म रचना-बम के कुछ पहलू २७ होगा-जैसे साम्मृतिक अस्मिता का गवाल, वगैरह । लेकिन हम उस की कृतियो का पहले कृतिया वे स्पम ही आगे और भाषा के विकास का सवाल उस के बाद ही उठायेंग । किसी भारतीय के लिए-अनक भारतीया के लिए अग्रेजी में या फ्रेंच म या स्वाहिली मे या बाटू म लिखना बिल्कुल सम्भव है लेकिन अगर वे एमा करत हैं तो हम उन की रचनाओ को पढ कर उन का गुण दाप विवेचन उन्ही की प्रतिज्ञाओ के जनुसार रेगे, यह प्रश्न वाद म ही उठायेंगे कि उन का उस भाषा का चुनाव कहा तक उचित हुआ। मेरा प्याल है कि एक और पहलू भी हम हमेशा ध्यान में रखना चाहिए । लेखक काई भी भापा चुन, एक बार चुनाव कर लेन पर उस की वही एक भाषा रचनात्मक अभिव्यक्ति की भाषा होगी। इधर के वर्षों में इने गिन लेखक एसे हुए है जो सच्चे अथ मे द्विभापी है-नोबोकोव अथवा वेक्ट जसे लेखक-जच्चे और महत्त्वपूण लेखक, लेकिन महान लेखक शायद नही। महान लेखक रचना की दप्टि से एक भापी लेखव ही रहे जापने जपनी कई एक रचनाओं का अग्रेजी अनुवाद किया है। आप क्या ऐसा नहीं सोचते कि हिदी से दूसरी भारतीय भाषाओ मे, अग्रेजी मे और फ्रेंच जसी अतर्राष्ट्रीय भाषाओ मे जनुवाद के लिए कोई सुसगठित व्यवस्था होनी चाहिए? आप मोचिए, मेरी रचना के अग्रेजी या किसी दूसरी विदेशी भाषा में अनुवाद के लिए मैंन चालीस वष से अधिक तो प्रतीक्षा की-उस के बाद ही स्वय वह काम उठाया। इन चालीस वर्षों में मैंन दूसरे लेखको के जनुवाद ता क्येि, अपनी रचना का अनुवाद करना कभी अच्छा नहीं लगा। यह केवल परिश्रम की बात नही थी। मुझे यह भी अखरता था कि जनुवाद काय मे मैं वह समय लगा रहा हूँ जा रचना काय के लिए लगा सक्ता। बल्कि अपने अनुवाद का काम मैन एसी ही अवधि म किया जब रचनात्मक लेखन के लिए अधिक समय मै न पा सकता। तब मैं एक दनिक पत्र का सम्पादक था और इस लिए साहित्य सजना मे ध्यान केंद्रित करन के लिए न आवश्यक समय पा सकता था न अपक्षित एकान्त । इस लिए मैंने यही निश्चय किया कि रोज दो घटे अनुवाद का ही काम करूँगा और एक शीघ्रलिपिक सहायक के साथ वही करता रहा। दो वर्षों के बाद मैंने पाया कि एक पूरी पुस्तक वल्कि दा पुस्तकें, अनुवाद में तयार हो गयी हैं । मैं नही समयता कि किसी दूसरी परिस्थिति म मैंने स्वेच्छा से यह काम क्यिा हाता-यानी अपना समय रचना कम में २८ रचना क्योजौर दिन के बीच न्या मूत लगाने की मुविधा होती तो। मरे अपने अनुवाद या संयोगवश ही हो गये। अनुवाद अच्छे नही, यह तो मैं नहीं कह सकता, राम चलाक जहर है। यह तो है हो। मूल के साथ जो मनमानी मैं कर सकता था यह कोई निष्ठावान अनुवाद केवल अनुवादव हाने के कारण न कर सकता यह तो मैं निश्चय ही चाहता हूँ कि हिन्दी से यहीं अधिक अनुवाद हा-अग्रेजी म, दूसरी भारतीय भाषाओ मे, अय विदशी भापाआ मे भी । अनुवाद वाय मे मैं इस बात को बहुत महत्त्वपूर्ण समझता हूँ कि अनुवादक ग्रहण करन वाली भाषा वा मूल भापी होना चाहिए- भापी नहीं तो ग्रहण करन वाली भापा मे उसे पूरी तरह निष्णात होना चाहिए। जिस भापा से वह अनुवाद घरे उस भाषा का ज्ञान और सही समझ तो उसे होनी चाहिए, लेकिन वह समझ उस कोटि की नही भी हा सकती है जो ग्रहण करन वाली भाषा के लिए अनिवाय होगी-उस भापा के मुहावरे और व्यजना की समझ, शब्दा के सस्कार सास्कृतिक सदर्भो की गूज-अनुगूज की समझ, उन के सस्कार का ज्ञान, इत्यादि । भारत में हमारे पास ऐसे लोगो की कमी है यद्यपि हम यह मान लते हैं कि भारत ने अग्रेजी को पूरी तरह अगीकार कर लिया है। ऐसे बहुत से लोग है जिन की शिक्षा-दीक्षा अग्रेजी म और अग्रेजी के द्वाग हुई है। असल में होता यह है कि जहा ऐसे लोग होते है जिन का अंग्रेजी का जान इतना हाता है कि वे अग्रेजी में अनुवाद कर सकें, वे इसी दौरान उस भाषा स सम्पक गंवा चुके होत है जिस से वे अनुवाद करना चाह सकते। जरूरत दम वात की है कि ऐसे लोग हो जिन का जग्रेजी का ज्ञान इतना अच्छा हो और जो साथ ही भारतीय भाषा के साथ सम्पक बनाये हुए हा, उस म पठ सकें। एसे लोगा की हमारे पास कमी है और यह दुख की बात है। मैं हिंदी के अतर्राष्ट्रीय पद को बात फिर उठाना चाहता हूँ--- यानी हिदी मे रचित और प्रकाशित साहित्यिक कृति के आधार पर । क्या आप सोचते हैं कि ऐसी किसी रचना पर नोबेल पुरस्कार अथवा किसी दूसरे बड़े अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए शिकार हो सक्ने को समुचित सम्भावना है ? या कि सम्भावना इस लिए कम है कि उस की पहुंच अग्रेजी या फ्रेंच को तुलना मे कम होगी, उस का पाठक समाज छोटा होगा? अगर सम्भावना कम है तो इस मे नुक्सान पुरस्कार का है। यो आप देखिए कि फिनी अथवा जाइसलैंडी भाषा के साहित्य के रचनान्कम के कुछ पहल २६ लिए भी पुरस्सार दिये जा चुके हैं और इन मापामा की पाठक-सच्या किसी भी भारतीय भाया की पाठर मस्या से कम है। यह साहित्य स्वैडिनवियाई भाषा परिवार की एक भाषा मथा, इस लिए जाना गया। पदि एमाहा सकता है तो कोई आत्यतिक कारण तो नहीं है कि दूसरी भाषाआ की रचना तक पहुच न हो सके। म समझता हूँ कि कुछ ऐसा प्रयत्न हो भी रहा है कि अग्रता केंच, इस्पानी, जमन, रूसी और डिवियाई भाषाआ समार के बाहर की भाषाओम रचे गय माहित्य तक भी पहुंचा जा सके । निश्चय ही इस म काफी समय लगगा क्या कि अनुवाद नहीं मिलत। अनुवादक बडी कठिनाई से मिलते हैं फिर भी काई आत्यन्तिक कारण तो नही है कि भारतीय भाषाओ मे रचा गया साहित्य अन्तर्राष्टीय जगत् तक न पहुँच सके। क्या आप इस बात से सहमत होगे कि आलोचनात्मक लेखन बहुत कम हो रहा है ? मेरा मतलब है हम लोगो ने अनुवाद को बात की-उस क्षेत्र में माना जा सकता है कि बहुत कुछ अभी करने को है, लेकिन हि दो की उन्नति के लिए एक और क्षेत्र मे भी तो काम करना जरूरी है हिदी रचनाओं की अच्छी समालोचना भी तो होनी चाहिए, और ऐसा लेखन नी बहुत कम है। इसे क्या आप आवश्यक मानते हैं या कि केवल वास्तविक समस्या का एक परिणाम समझते हैं। सामा यतया तो मैं मानता हूँ कि समालोचना की कमी है । आगोचना में भी दो तरह का लेखन ज़रूरी होता है इन म से एक तो द्वतीयिन परिणामगत होता है-वह सजनात्मक साहित्य का अनुवर्ती होता है। लेकिन मा जानोचनात्मा लेखन भी हाना है जा द्वतीयिक या उपपन नहीं होना। किसी भी भाषा म एमा आलोचनात्मक चिनन हाता ह जा माहित्य-सजन पर निमर नही है उस या उपजीवी नहीं है बल्कि उसका ममा तर है-~~स्थत व विवचनात्मय कम है। उदाहरण के लिए मैं पूछू-अगर आप से यहो वात-चीत हिदी में होतो ता क्या मह उतने ही लोगा तक पहुँच सक्ती-ऐसे लोगो तक गिन मे उस मे लाभ उठाने के लाय सवदनशीलता है ? मैं पूर निश्चय स यह सपना हूँ कि वह यही उधिर नागो तर पहुँच सनी हाना ! और जहाँ तर उम म लाभ हाने की बात है अगर आपन प्रश्न ही पर अपजामापा समाज को ध्यान म रम पर बनाय हैं ना सम्भव है कि उस नागा पोन्म वान चीत से अधिर साम सलिए हानि भारतीय भाषामा गाहित्य नगरे म डावा अमान मायद अधिव हागा। मैं रपना गया और दिन के बीच समझता हूँ कि भारतीय भाषाओं का सामाय प्रबुद्ध पाठय शायद मेरे दिय हुए उत्तरो को पहले से जानता होगा, उस अथ म उसे इस बात चीत से अपेक्षया कम लाभ होगा। लेकिन इस मे मुझे जरा भी सदेह नही कि जो कुछ मैं कह रहा हूँ वह अग्रेजी की अपक्षा हिदी मे कही अधिक पढा और समझा और पसद दिया जायेगा। एक उन्चवर्गीय 'एलोट' की बात पहले भी हुई। 'एलीट' की मेरी परिभाषा यो है कुछ लोगो को जमको परिस्थितियो के कारण कुछ सुविधाएं मिलती हैं, फिर लगातार अवसर मिलते रहते हैं, और इन कारणों से उन की स्थिति ऐसी बन जाती है कि वे समाज को अधिक प्रभावित कर सकते हैं। जिन मूल्यों को समाज मानता है और जसा कम वह समाज कर सकता है उस का रूप वे निर्धारित कर सकते हैं। मेरा सवाल यह है कि क्या ऐसे लोगो को हिंदी के द्वारा प्रभावित पिया जा सकता है ? क्यो कि मेरी परि- भापा के इस 'एलीट' या अभिजात वर्ग के लोग अधिकतर हिदी नहीं पढ़ते अगर मै आप का कथन मान भी लू--जो मैं नही मानतातो अग्रेजी म जा उपलब्ध है उस तक पहुंचने वाला को सख्या हमारी जनसय्या का अधिय स अधिक दो प्रतिशत होगी। जो वास्तव म पद मक्त हागे उन की मरया एक प्रतिशत ही होगी, और जो उस तरह की बातें पढत होगे जो हम कर रहे हैं उन की सख्या तो एक प्रतिशत का भी एक अश ही होगी। इन पर कुछ प्रभाव पडे तो उस प्रभाव के जन-साधारण तक पहुंचन में सौ वष नगेंग-और उन सौ वर्षों में वह सब फालतू हो चुका होगा। आप की परिभाषा मैं मान भी लूं तो यह स्पष्ट है कि हिंदी के माध्यम से प्रभाव कही अधिक गहरा और दूरव्यापी होगा। आपने ज्ञानपीठ पुरस्कार से मिली हुई रकम मे उतनी ही रकम अपनी रायल्टी की आय से जोड कर एक यास की स्थापना की है। इस यास के उद्देश्यो और नोतियो के बारे मे कुछ कहना चाहेगे? उस के द्वारा क्या आप कोई विशेष लक्ष्य पूरा करना चाहते हैं या साहित्य को कोई विशेष दिशा देना चाहते है ? याम के लक्ष्य और उद्देश्य तो न्यासपत्र मे दिये हुए हैं जो कि एक साव- जनिक दस्तावेज है । हाँ एक बात जरूर है जो उस म दज नही है- म सम्मिलित हो भी नहीं सकती थी और उस शायद मेरी जसली प्रेरणा कहा जा सकता है। मैं चाहता हूँ कि भारतीय लेखक-भारतीय क्लावार---जहा रचना कम से कुछ पहलू तक हा सके राजकीय सरक्षण से स्वतत्र और आत्म निभर रहे वह जा करना चाहता हे और उस के लिए उस की जा आवश्यकताएँ है उन के लिए वह शासन पर कम से कम निभर करे। मैं चाहता हूँ कि लेखक समाज, कलाकार समाज मे विरादरी का, सामाजिक्ता का भाव जधिक प्रबल हो । मुझे ऐसा जान पडता है कि भारत मे आर विशेषतया स्वाधीन भारत म लेखक धीर-धीरे अधिक परमुखापेक्षी हो गये हैं और हर बात मे सरकार का मुह जोहने की प्रवत्ति अधिक बढी है। इस निभरता के कारण ऐसी जिम्मेदारिया भी, जिन का वहन लेखक या कलाकार समाज को स्वय करना चाहिए धीरे धीरे सरकार को सौप दी जा रही है। यास की स्थापना करते समय मेरे मन मे एक आशा यह थी कि उस के कार्यों से शायद आत्म निभरता की भावना का फिर कुछ चेताया जा सके। यह तो शायद सच है कि कुछ क्षेत्र ऐसे है जिन म सरकारी सहायता की आवश्यक्ता रहगी, लेकिन यहा भी यह सम्भव होना चाहिए कि ऐसी परिस्थिति लायी जा सके जिस मे सहायता लेखको कलाकारो की शर्तों पर ही मिल सके, सरकार की शर्तों पर नही, जैस कि अब होता है। यास की स्थापना करते समय मेरे मन मे गहराई मे ऐमा ही कुछ विचार था। यास के काम की वात। हमन अभी तक दो व्याय्यान मालाएँ स्थापित की ह जिन के द्वारा हम एक भारतीय अस्मिता की खाज और स्थापना का प्रयत्न कर सकें, साहित्य और क्लाजो मे रुचि और विवेक का स्तर उठाने मे योग दे सके। फिर यास की ओर से लेखक शिविर भी जायाजित होते हैं जिन मे एक आर नयी प्रतिभाला और दूसरी ओर परिपक्व अनुभव का मिलाने का यत्न होता है दाना वर्गों के साहित्यकार मिनते है और कुछ समय तक-हपत दस दिन तक-साथ रहते हैं एक्-टूमरे की रचनाएं सुनते हैं और उन पर विचार करते हैं। साहित्य बारवी रुचि के अथवा साहित्य-कम के लिए उपयोगी जौर आवश्यक किसी भी विषय पर पुला विचार विनिमय करते है। इस की भी सुविधा रहती है कि युवतर लेखक अपनी रचनाआ और अपनी समस्याआ पर अनुभवी साहित्यवारा से अलग निजी चर्चा कर सकें। शिविराम कुछ परचे भी पढ़े जाते हैं। प्रत्यर शिविर के लिए हम ण्य मामाय विषय भी चुन लेते हैं जिस का विस्तार से विवेचन हाना है। पाजना इन परचा और विवेचना को मम्मानित भरखे प्रकाशित परन को है एमा प्रमाणन केवन शिविर की रपट नहीं हागी बल्कि विषय या मागासग विवेचन प्रस्तुत करेगा जो लेखका को अगली पीढ़ी के रपना क्यो और क्निके बीच काम आ सके । पहले शिविर की पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है और तीसरे की इस समय छप रही है, जल्दी ही आ जानी चाहिए। दूसरे शिविर की पुस्तक तयार हाने में कुछ देर हुई, लेकिन वह भी अब प्राय तयार है। इसी तरह अय शिविरो के साथ भी होता रहेगा। इस वप से हम एक नयी योजना भी शुरू कग्न की जाशा रयते हैं--अनुवादो की एक पुस्तक-माला में प्रकाशन की । य अनुवाद विश्व के श्रेष्ठ काव्य साहित्य रे अनुवाद होंगे और यथासम्भव मूल भाषा से हिदी मे किये गये हाँगे । हम यत्न करेंगे कि अनुवादक भी कवि ही हो । हमाग यह भी यल है कि लेखका को सहायता के लिए एक कोप भी हो। यास तो बहुत छोटा-सा है और यह कोप भी छोटा ही होगा। लेकिन आवेदनपत्रो की ज़रूरत नहीं होगी, न हाकिमा स तसदीक कराने की। दूसरे भी काम होंगे, लेकिन हम काम उतना ही उठायेंग जिमे जागे चलाते रह सकें। कुछ दिन पहले प्रेस मे समाचार था कि आपने अपना पिछला लेखक शिविर बोधगया मे किया। यह भी समाचार था कि आपने तीसरे विश्व हिंदी सम्मेलन को 'एक बडा सरकस' कहा, यह भी कि पहले दोनो विश्व सम्मेलनो मे आप प्रमुख सयोजकों मे से थे। इन पहले सम्मेलनों के उद्देश्य क्या थे और प्रेस को रपट के बारे मे आप कुछ कहना चाहेंगे? अनिच्छापूवक ही। किसी भी सम्मलन वे सयोजन से मेरा बाई सम्बध नहीं था। पहले सम्मलन मे म पयवेक्षक बन कर गया था-वह भी इस लिए कि उन दिनो मैं एक हि दी दैनिक समाचारपत्र का सम्पादक था और उसी नाते मामश्रित भी किया गया था। प्रतिनिधि मैं नही था और सगठन- कर्ताआ मे से एक तो कदापि नही था । दूसरा सम्मेलन मारिशस में हुआ था । उस म मैं आमत्रित भी नही था, न उस वे बारे मे कभी मुझ से सलाह भी ली गमी थी। तीसरा सम्मेलन दिल्ली म हुआ। आप को याद होगा कि यह वसन्त और ग्रोप्म मे एकाधिन बार स्थगित किया जा कर अत मे अक्टूबर '८३ मे हुआ। हमने जब बोधगया में शिविर की तारीखें निश्चित की तब विश्व हिंदी सम्मेलन मई के लिए आयोजित था और तारीखा की कोई टक- राहट नही थी। उहाँने जब तारीखें बदल बर अक्टूबर की तारीख चुनी तब हमने अपनी तिथियां न बदनना ही ठीक ममझा, इस लिए नहीं कि रचना-वम के कुछ पहलू ३३ उन स कोई प्रतिवद्धता थी वाला इसलिए कि हमारे माहित्य सर्जना में काम म सम्मैना की वाई प्रामगिकता ही थी-~~-जस कि हमागे उन ने लिए काई प्रामगिरता नही थी। उसका सरामार राजभाषा म, प्रशासन और अतर्राष्ट्रीय सम्मान की भाषा मे था। में तो विश्व हिंदी मम्मलन काकाई उल्लेख ही न विया हाता अगर बिहार के एक समाचारपत्र न सम्पादकीय लिख कर हमारी इस बात के लिए आलोचना न की होनी कि जब दिल्ली में विश्व हिदी सम्मेलन हो रहा है तो हम गया क्या करन आये हैं। मुझे जान पडा कि इम का उत्तर होना चाहिए और मैंने यह स्पष्ट कर दिया वि सम्मेलन स हम लोगों का कोई सम्बध नहीं था। मैंन उसे मेला अवश्य पहा था, सरकस नहीं, और मता रहने म काई अवज्ञा भी नहीं है। हिदी मेल का सपोजन और सगठन सवथा उचित हा सकता है यदि सयोजका के सामने उद्देश्य स्पष्ट हो। मैंने यह भी कहा था वि सम्मेलन हिदी के विद्वाना और अध्यापको का सम्मेलन है---और अध्यापक सब उच्च स्तर के शिक्षा देन वाले हा ऐसा भी नहीं है और उन का हिंदी साहित्य से अथवा साहित्य की भाषा मे विशेष प्रयोजन नहीं है । ऐसी स्थिति में यह क्या जरूरी है कि साहित्य-सजक वहां हाजिरी बजामें जिन लोगाका भाषा से सराकार है उन्हे अपना काम करना है, साहित्य-सजका को अपना । ये सब बातें मैंने वहां कही थी। और मैं अब भी समझता हूँ कि सम्मेलन के प्रति हमारा दष्टिकोण सही था। हाँ, एक बात और कहूँ। जो रपट प्रकाशित हुई उसे मेरे साथ वार्ता पाप दिया गया था लेकिन सवाददाता न कभी मुझ म मिला था, न उस म मेरी कोई बात हुई थी। बल्कि वह बोधगया की हमारी किसी भी बैठर म उपस्थित नही था-सारी रपट फर्जी थी। लेकिन जो हा, ऐसा जार पड़ता है कि मैंने जो बात कही थी वे ठीक थी। काश दिवे गलत मावित हुई होती। सचमुच विश्व हिदी सम्मेलन बहुत ही अव्यवस्थित था-कोई कारण नहीं था कि एमा अव्यवस्थित हुआ होता। और वह बडा दिग्भ्रमित सम्मेलन भी था, क्यो किमानो कोई जानना ही नहीं था कि सम्मेलन आखिर किस लिए बुलाया गया है। अनेक 'अतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधियो का भी यह पता नहीं था कि वे बया करने के लिए आमंत्रित किय गये हैं। या इस म मुझे सन्देह नहीं कि एक अतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्म नन पद एष काम कर सकता है। मैं व्यक्तिगत स्प मे उस से सम्बद्ध न होऊ यह अलग बात है। माहित्य सजव दे नात वैसे सयाजन-बाय की दीक्षा -- - ४ रखना क्या और दिन के बीच ? मुझे नहीं मिली, दूसरी आर एक अय प्रकार के काम की शिक्षा दीक्षा मुझे मिली है आर वह काम मै कर भी रहा हूँ। हिदी सम्मलन स मरा कोई विराध नही है न हागा, लेकिन मेल मे मेरी व्यक्तिगत रुचि नहीं है। और अव्यवस्था मुझे नापस द है । और चिन्तन के क्षेत्र म दिशाहीनता तो मुझे और भी बुरी लगती है। कलाकार लोग मताग्रही भी होते हैं और सवेदनशील भी, क्या ऐसे लोगो को राजनीतिक विचार रखने चाहिए या राजनीति में हिस्सा लेना चाहिए? क्या उहे राजनीतिक मतवाद को किसी धारा से भी सम्बद्ध होना चाहिए। इस का उन के रचना कम पर कसा प्रभाव पड़ता है पहली बात तो यह कि काई क्लाकार कना सजक हान वे नाते ऐसा नहीं है कि नागरिक नही रहता। क्ला-सजब वह अपनी स्वच्छा से है, नागरिक वह अपनी स्थिति की अनिवायता के कारण है । और नागरिक है तो राजनीति से उस का सरोकार है ही। दूसरे आज दुनिया का जैसा विकास हा रहा है उस म हमारे जीवन के पहले स कही अधिक क्षेत्रा म राजनीति का दखल बढ़ता जा रहा है। राजनीति कही अधिक व्यापक रूप लेती जा रही है इस लिए हम राज नीति के प्रति उदासीन नहीं रह सकते और उदासीनता की मुद्रा भी अपन आप मे एक राजनीतिक कम हा जाती है। मैं राजनीति से असम्पृक्त या उदासीन नही हूँ और नहीं मानता कि वैसा होना चाहिए। लेक्नि सक्रिय राजनीति की बात दूसरी है । म समझता हूँ कि कम से कम मेरे काम म इस से बाधा होगी कि मैं दनदिन राजनीतिक कम मे सक्रिय रूप स उलझ जाऊँ, जैस मै यह भी मान लेन को तैयार हूँ कि राजनीतिक वग के लोग साहित्य रचना से बहुत गहराई से जुडेगे तो उन की राजनीति का भी नुक्सान होगा। एक समय था जब वहुत-स राज नीतिक लोग साहित्य रचना भी करत थे लेकिन अन्ततोगत्वा उह दाना के बीच चुनाव करना पड़ा और उहान धीरे धीरे साहित्य से हाथ खीच लिया, पूरी तरह राजनीति म लग गये। वृछ साहित्यकार भी एस रह जिन की राजनीति में क्षेत्र म महत्वाकाक्षाएं रही और उह भी दोना के बीच चुनाव करना पड़ा-एक चीज छोडनी पडी। नि सन्देह ऐमे भूतपूर्व साहित्यकारा म, जो राजनीतिक बन गय हैं साहित्य की कुछ समझ बनी रह सकती है-उन का राजनीतिक जीवन पूरा होने के बाद भी बची रह सकती है। माहित्यकार के प्रति उन की सहानुभूति भी हो सकती है और हा तो अच्छा ही है। लेकिन आज मायद रचना-यम के कुछ पहलू ३५ ही कोई गजनीतिक होगा जिस को साहित्य म तनिक भी पैठ हो। कुछ समय पहले से लाग अधिर थे। नयी स्थिति या पारण शायद यह है कि राजनीति आज पहले मे पयादा 'पशेवर' कम हा गयी है। साहित्य रचना म भी ऐसा हुआ है, नेयन भी आज अधिकाधिप प्रतियागी याम हाता जा रहा है। अपने हर कम म एक राजनीतिक इकाई बन रहन पर भी माहित्यकार के लिए यह सम्भव है कि दैनदिन राजनीति से और वैसी राजनीति स बनने वाले जीवन स अपन को पीच पर अलग पर ले। अवश्य ही यह भी एक राजनीतिक फैसला होगा गजनीतिक कम हागा और इसका असर व्यक्ति के आसपास के राजनीतिक जीवन पर पड़ेगा और पडता रहेगा। इस अथ मे मैं कहूँ कि यही ठीक है वि साहित्यवार अपने काम पर जपने को केद्रित करे और अपने आस पास को राजनीति पर उस का प्रभाव पडन दे जो वह है। यानी उस का प्रभाव दैनदिन राज- नीतिक क्म मे उस की सीधे सीधे भागीदारी का नहीं बल्कि उस से उस की स्वाधीनता का प्रभाव हो। आप को कुछ पहले कहो गयी एक बात को ओर लौटना चाहता हूँ। आपने कहा कि हम वही बन सकते हैं जो कि हम हैं । क्या इस का यह मतलब हुआ कि हम सिफ एक सम्भावना के साथ आरम्भ करते हैं और हमारे पास वही एकमात्र सम्भावना बनी रहती है ? क्या ऐसा नहीं होता कि जीवन में आगे बढते हुए नयी सम्भावनाएँ भी पदा होती जाती हैं ? इस तरह के प्रश्नो से हम बाल की खाल उतारने की स्थिति मे हो पहुँचते है । मैं बिल्कुल मान लेता हूँ कि मनुष्य एक अपूर्वानुमेय प्राणी है कि उस की सम्भावनाएँ जितनी वह जानता है उस मे कही अधिक है लेकिन यह कह कर भी मैं अपनी बात का खडन नही कर रहा हूँ क्या कि फिर भी यह कहा जा सकता है कि सम्भावनाओ का विकास भी इस से निर्धारित होता चलता है कि हम कहा स आरम्भ करत है। व्यक्ति को सहज और सहजात अहताएं है परिवेश द्वारा लायी गयी या पैदा की गयो अपूर्वसम्भावित घटनाएँ है। फिर एक तरफ किसी एक समय में समग्र मानव जाति की सीमाओ और सम्भावनाओ के और दूसरी ओर उसी समय में किमी एक मानवीय इकाई की सीमाओ और सम्भावनाआ के बीच का अतर भी ध्यान में रखना है। यदि एक इकाई में कोई विकास या परिवतन होना है। उम की सम्भावना उस मथी--यानी वह जा था वह बन गया है। तना ही है कि उस समय वह नहीं जानता है कि वह रचना क्या और दिन के बीच क्या है न ही हम जानते थे। एक अतिम प्रश्न और पूछ लू । आप के रचनात्मक जीवन को अवधि काफी लम्बो रही-पूरे युग की रचनाओ को ओर देख कर आप को कसा लगता है ? में इस बारे म अधिक नही साचता-शायद प्रत्यवलोकन करते रहन का मेरा स्वभाव नहीं है । नये सस्करण के लिए काई पुरानी पुस्तक तैयार वरनी पडती है तभी उस की पुन समीक्षा करता हूं, नहीं तो रचना हो जाती है और पीछे छट जाती है वस । लिख डाला और उस से मुक्ति हो गयी---उस के बाद रचनाओ का अपना स्वत र अस्तित्व है और उह जपन पाठका के बीच जीना और अपने को प्रमाणित करना कभी-कभी-बडे दुलभ जवसरो पर कभी कभी-जरूर ऐसा होता है कि अपनी कोई पुरानी कविता या छद या पक्ति पढ कर उस के अपने होन की पहचान के साथ साथ एक स्फूत्ति का अनुभव भी हाता है पढन मे वह अच्छी लगती है और यह विचार सुखद हाता है कि 'यह मेरी ही लिखी हुई है' और वह भी इतन समय पहले। अधिक सम्भावना तो इसी की रहती है कि पुरानी कोई रचना पढ कर इच्छा हो कि क्मिी तरह उस मिटा दिया जा सकता | कुछ कहानिया और कविताएँ ता इतनी भावुक्ता भरी जान पडती हैं कि कही मुह छिपान को मन करता है। कुछ कहानिया म काति कर डालने की बचकाना आशावादिता भी है। उस मे लज्जित हाने की कोई बात नहीं है, यह उचित ही हे कि नौजवाना मे जादशवादी मनावत्ति हा, बलि दुख की बात तो यह है कि आज की नौजवान पीढी इतनी निरादश और अतीत के वार मे ऊब और श्रद्धा से भरी मै क्रान्तिकारी के विश्वासा की बात नहीं कर रहा हूँ, रचनाआ में कलात्मक नियंत्रण की कमी की बात कर रहा हूँ। जहाँ तर क्रान्तिकारी विश्वासो को बात है, मैं अब भी परिस्थितियों का जोर सस्थान का विरोधी हूँ और मैं समयता हूँ कि यह साहित्यकार के 'रोल' का एक अग है कि वह स्थायी रूप से 'अस तुष्ट' हो--कि जो जसा है उस के बारे म लगातार एक प्रश्नाकुल भाव जगाता रहे। बाकी अपने अतीत में पश्चाताप के लिए बहुत कुछ है, लेकिन रचना-बम के कुछ पहलू

एर तरह या पश्चाताप मुझ नहीं हैपरि मुझ यही प्रग ाता है कि मैंन
खा यम चुना । यह मर लिए गौरव की बात है कि मैं लेयक बना और
इस अपन युग म लपप बना।
• मल प्रश्नोत्तर अपजी में निकली मे हुए और दो वठको म मम्पन हुए-दिल्ली अक्टबर
१९८३
३८ रचना क्यो और किन के बीच

साहित्य की चिन्ता रमेशचन्द्र शाह के साथ सवाद

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शाह 'चौथा सप्तर' की भूमिका मे आपने कवि के लिए एक 'मास्क' अथवा 'पर्सेना' की जरूरत पर बल दिया है, बल्कि सच्चाई को प्रस्तुत करने के लिए उसे (मुखौटे को) अनिवाम माना है । जहा तक मेरी जानकारी है, यह आग्रह इस तरह आप के पहले से काव्य चितन मे नहीं मिलता। तो समसामयिक रचना से आप के असतोप का वह कौन-सा जाधार था स्पष्ट करें जिस से इस पर ज्यादा बल देने की या इस रूप मे बल देने की जरूरत पडी? अनेय में समयता हूँ कि एक ता वाव्य के बार म जा चितन हुआ उस का सहल विकाम था यह । यह बात यहा त ल जा कर मन नही कही पर कम यहां तक पहुँचती है यह ता पहले जो कुछ कहा है उस पर विचार परन हो जायगा। घायावाद के बारे म मरी जा धारणा थी उस म यही बात मैंन कही थी कि उम से पहले का गुप्त जी के ममय तक का काव्य एक विशष अथ म निर्वैयक्तिक था और उम म व्यक्ति के स्वर के लिए, कवि के न्यक्तित्व के लिए कोई गुजाश ही नहीं थी। छायावाद के कविया ने पहले पहल कविता म वि क व्यक्तित्व के लिए जगह बनायी। उन की कविता म कवि की आत्मा भी व्यक्त हो सकती है जब कि उस स पहले यही था कि कवि का जहा तर हा सरे अदश्य किया जाये और कविता म रीति बोले या क्था वस्तु अगर हा तो वह वाले--कवि भरसव उस मे न प्रकट हो । पन्त जी न तो इमी लिए स्पष्ट शब्गम इस बात की शिकायत की थी कि 'कविता के लिए उम स पहले भाषा ही कहा थी।" उन का आशय यह नहीं था कि पहले कविता नही थी, लेकिन जिस तरह की कविता वह कहना चाहते थे जिम म कवि का व्यक्तित्व वोले, उम के भाव भी व्यक्ति की भावनाआ के रूप म ही प्रस्ट हो सर उस के लिए भाषा नही रही थी। भापा का सस्वार ऐसा हो गया था कि उम तरह की वात कुछ अटपटी या अनकहनी लगती थी। उहाने भाषा म व्यक्ति के स्वर के लिए जगह बना दी और वही उम का सहज स्वर हो गया-इस हद तक कि यह प्रश्न उठन लगा कि इम म मैं कुछ जरूरत स ज्यादा बोलता है। कविता का जा कुछ छायावाद से मिल गया था उस को छोडे बिना अगर फिर म एमी सम्भावना बनानी है कि इम 'मैं' में बड़ा और भिन्न भी कुछ बाल सके, ता क्या उपाय करना हागा कवि न केवल स्वय . साहित्य को चिन्ता ४१

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'सब्जेक्टिविटी, उस के अपने व्यक्तित्व कहित सरचा है। 'मास्क' की अवधारणा से उस को यह बात नह नहीं करती, चार एलियट का स्पष्टतया निर्वयक्तिक आदर्श है, तो महान चाह रहा था कि जब आपने आज के कवियो को रचना को देख हुए और उन के प्रति एक आलोचनात्मक रचया अख्तियार करत हुए उन को कविता से या उन के रचना दशन से अस तोप अनुभव करते हुए अब इस प्रतिमान को सुझाया तो इस मे किस तरह की मुक्ति या किस तरह से बदलाव फी घया उम्मीदें, क्या अपेक्षाएं आप को थों-कि रचना इस तरफ जानी चाहिए। देखिए आपने जो नाम निय दोना ही अपनी-अपनी जगह ठीक हैं दोनो उपयागी भी हो मक्ते हैं। अगर आप का आग्रह ऐतिहासिक वस्तु पर है या आप की दष्टि इतिहास को महत्त्व दती है--जैमा कि मैं समयताहूँ कि एलियट ने निया-ता आप वस्तु जगत् म ऐसा सम्बधवारक खाजत हैं जो कि आब्जेक्टिव फोरिलेटिव है, उस निमित्त से आप अपने ऐति- हामिक रूप का सामन नाते हैं, ऐतिहामिव निर्वैयक्तिक रूपको। इस लिए आपथावस्तु जगत म एमे मम्व धो की खोज उपयोगी जान पडती है आव- श्यक भी जान पड़ती है, उम के माध्यम से आप अपनी बात कहते हैं । दूमरी तरफ जहा तक दष्टि म मम्वृति पर ज्यादा जार है-ऐतिहासिक अस्मिता पर नही सास्कृतिक अस्मिता पर-वहा उस आम्जेक्टिव या वि वस्तुगत छोरिलेटिव का महत्त्व नही है, वहा पर मास्य ज्याना उपयागी है । क्या कि मास्कृतिक वस्तु ता बाही हानी ही नहीं, वह आभ्यन्तर ही रहनी है इम लिए वह तो चेहग मागती है । जा बाहरी वस्तु है उस के लिए एक बाहरी मम्बधकारक भी खाजना पड सकता है या उपयागी हा सकता है वही आब्जेक्टिव कोरिलेटिव है। और मैं समझता हूँ कि एलियट और येटस की दष्टि म यह बुनियादी भेद है भी। यटम म कही ज्यादा मस्कृति की चेतना है, सास्कृतिक अस्मिता की चिता है और इतिहास की नहीं है, जव कि एलियट को उतनी ही ज्यादा इतिहास की चिन्ता है। मैं समझता हूँ कि आप की यह बात काफी विचारोत्तेजक है और मुझे सही भी लग रही है। लेक्नि यहा पर फिर मेरे मन मे यह सवाल पदा होता है कि, जसा आपने देखा होगा, इधर साहित्य के विचारको मे एक प्रवत्ति लक्षित की जा रही है। आधुनिक रचना के इस पूरे दौर से ही उन को सत्तोप नहीं मिलता, उस के कारण चाहे कुछ भी हों, जायज या नाजायज्ञ कारण । उनका यह कहना है कि रचना के पिछले चालीस वप जो हैं यह एक तरह का साहित्य की चिन्ता ४३ बाले वकि दूसर का भी बुलवा मय-यह कैस सम्भव हागा? यह साचें ता फिर नय मिरे से पुरान माहित्य की भी एक पहचान बनती है, क्या कि उस म भी एक चहरा' बालता रहा उस पाध्य म जो चरित्र आत थे उन म बहुत स ऐसे थे कि डावी माफत रवि अपनी ही बात पहता था। राधा और कृष्ण तक के बहान मे उन के निमित्त म कवि अपनी भावनाएँ भी प्रकट करता था। यानी जा शुद्ध धार्मिक काव्य है उम म नग, भक्ति और रीति याव्य म बटुत मा एमा था जिम म पवि अपनी भावनाएँ, अपने भाव अपने अनुभव प्रकट करता था किन गधा कृष्ण को या किसी और चरित्र वानिमित्त बना कर ! तो उम में मेरे सामन यह बात स्पष्ट हुई कि बडी वात-अपने में बड़ी बात कह्न के लिए अपने से अलग एक चेहरे की भी जावश्यकता हो सकती है। फिर मैंने यह भी पढ़वाना कि नाटक में भी ना वरापर यहां होता है । और यहाँ तम पि नाटक मे यदि कभी कोइ महच्छक्ति मच पर गाती है तो वह चेहरा पहन कर आती है, जब विमाधारण मानवीय चरिव जपन मावीय रूप म भी आ सकते हैं। एक ही नारक मे आप देखगे कि कोई बडो शक्ति जानी है तो वह चेहरा पहन कर आती है जोर वाकी लाग साधारण मानवीय चहग ले पर ही अभिनय म प्रवत्त हाते है। ता इस में यह बात और स्पष्ट हो गयी कि चेहरे को उपयागिता होती है। इस सदभ मे एक विदेशी रचना का, आधुनिक रचना का विदेशी प्रसग भी मेरे मन मे उभर रहा है। इसलिए मैं जानना चाहता हू कि आप का विचार क्या है। जसे निवैयक्तिकता का आदश कि कवि को स्वय बहुत नहीं बोलना चाहिए और अच्छी आत्माभि व्यक्ति भो--और एक तरह से काथ्य को वस्तुपरकता और आत्मपरक्ता का द्वत भी हल करने की दिशा मे दो विचार इस शताब्दी के अग्रेजी काय मे आये। एक तो एलियट का 'आम्जेक्टिव कोरिलेटिव' वाला सिद्धात था-कि अपने से बाहर, अपनी जीवनी मे बाहर, अपने जीवनगत अनुभव से बाहर या क्सिी स्थिति की, क्सिी नाटकीय परिस्थिति की, किसी कहानी को कल्पना करें और उस के जरिये आप अभियक्ति करें। और दूसरा जा है एक तरह से एलियट से बहुत ही भिन किस्म के आधुनिक कवि थे~पेट्स-उन का उहोंने 'मास्क' को अवधारणा की। लेकिन इन दोना मे दाशनिक दूरी बहुत है-एलियट के और पेटस के बीच मे, 'मास्क' और 'आम्जेक्टिव कोरिलेटिव' के बीच मे। येटस मे तो 'फोर बायोग्राफी' का बड़ा महत्त्व है, उस को अपनी ४२ रचना क्या और दिन के बीच . 'सन्जेक्टिविटो', उस के अपने व्यक्तित्व पाहत सहल है।तो. 'मास्क' को अवधारणा से उस को यह बात नहीं कटलो जन कि एलियट का स्पष्टतया निवैयक्तिक आदर्श मानधी चाह रहा था कि जन आपने आज ये वयियों को रचना को देखत हुए और उन के प्रति एक आलोचनात्मक रवैया अस्तियार करते हुए उन को पयिता से या उन के रचना-दशन से असतोष अनुभव भरते हुए अव इस प्रतिमान को सुनाया तो इस मे किस तरह को मुक्ति या किस तरह से बदलाव को क्या उम्मीदें, क्या अपेक्षाएं आप की थीं-दि रचना इस सरफ जानी चाहिए। देखिए, आपन जा नाम पिय दोनो ही अपनी अपनी जगह ठीक हैं, दोनो उपयोगी भी हो सकते हैं। अगर आप या आग्रह ऐतिहामिद वस्तु पर है या आप की दृष्टि :तिहाम को महत्व दती है-जैसा कि मैं समझता हूँ कि एलियट ने दिया-ता आप वस्तु जगत् म एसा सम्बधवारक खोजत हैं जो कि आब्जेक्टिव कोरिलेटिव नै, उम ये निमित्त से आप अपने एति- हासिक रूप का सामन लात हैं, एतिहामिव निर्वैयक्तिक रूप को। इस लिए आपका वस्तु जगत्म ऐमे मम्वधो को खोज उपयोगी जान पड़ती है आव- श्यक भी जान पाती है, उस के माध्यम से आप अपनी बात कहते हैं। दूसरी तरफ जहाँ तक प्टि म सम्वृति पर ज्याराजार है-ऐतिहामिक अस्मिता पर नहीं, सास्कृतिक अस्मिता पर-वहा उस आब्जेक्टिच या कि वस्तुगत कोरिलेटिव का महत्त्व नहीं है वहां पर मास्क ज्यादा उपयोगी है। क्या कि सास्कृतिक वस्तु ता बाही हाती ही नही वह आभ्य तर ही रहती है इस लिए वह तो चहरा मागती है। जो बाहरी वस्तु है उम के लिए एक बाहरी सम्बधकारक भी याजना पड सकता है या उपयागी हो सकता है वही जाब्जेक्टिव कोरिलेटिव है । और मैं समझता हूँ कि एलियट और येट्स की दृष्टि म यह बुनियादी भेट है भी। यटम म कही ज्यादा मस्कृति की चेतना है सास्कृतिक अस्मिता की चिता है और इतिहास की नहीं है, जब कि एलियट का उतनी ही ज्यादा इतिहास की चिता है। मै समझता हूँ कि जाप को यह बात काफी विचारोत्तेजक है और मुझे सही भी लग रही है। लेकिन यहा पर फिर मेरे मन में यह सवाल पदा होता है कि, जसा आपने देखा होगा, इधर साहित्य के विचारका मे एक प्रवृत्ति लक्षित की जा रही है। आधुनिक रचना के इस पूरे दौर से हो उन को सतोष नहीं मिलता, उस के कारण चाहे कुछ भी हो, जायज या नाजायज्ञ कारण । उन का यह कहना है कि रचना के पिछले चालीस वप जो हैं यह एक तरह का साहित्य की चिन्ता ४३ विचलन, मुख्य धारा मे विवतन है और उस से पहले नयी कविता, प्रयोगवादी कविता से पहले हिंदी रविता मही दिशा मे चर रहो यो । उनके मत से वह बडा मही काव्य था, लेकिन इस को जो बौद्धिक दिशा दो गयो था आधुनिर दिशा दी गयी वह सही नहीं थी। और उम या जो आतप हुआ था जो प्रभाव पा वह एक तरह से एर विचलन ही है, सविता का स्वाभाविक विकास नहीं हुआ, वह उस मेटिन हुआ! अव सतुलन फिर से सही करने की बात की जा रही है। और मजे की बात यह है कि इस नय आग्रह मे, इस ये चितन मे एक तो आप क द्वारा अभी प्रस्थापित दोना चौता के इतिहास और मस्कृति किसी के पक्ष या विपक्ष में तक नहीं है ~~न तो सास्कृतिर अस्मिता पस मे कोई ठोस तक सामने आ रहा है और न उस तरह से इतिहास विद्ध रचना दष्टि जो एलियट को चिन्ता थो। एलियट वाली तो उन के लिए और भी उपक्षणीय है, और भी गलत है, क्यों कि इतिहास की चिता तो उन को है, लेकिन वसी नहीं है जसो एलियट की है । तो इस प्रसग मे, इस आरोप या नये आग्रह के सामने आप कुछ कहना चाहेंगे? पता नही इस बारे में क्या कहा जा सकता है क्या कि इस तरह का चि तन बहुत पसगत या प्रासंगिक नहीं है। एलियट और यटस ता दानो कार है आर कविता म उन का बहुत गहा सरोकार है वविता को उनका चिता है। जिन लोगा की बात आप बन रहे है उन एतिहासिक चिन्तन म कविता की चिता उन का रहुत कम है । एक बचारिक तारतम्य को चिन्ता ता उन का है नकिन उम म कविता कहा तक बचती है इस की चिना उन का नही है। वरि यह भी कह सकते हैं कि उस की बहुत ज्यादा समझ भी उन को नहीं है । और बहुत-भी चीजे जिन वी य लोग प्रशसा भी करत है उन म बहुत बम ऐमो चीजें हैं जिन की कविता माना जा सकता है। यहा तक कि कुछ अच्छे कविया वो चीजे भी वे चुनत हैं तो जो उन का वास्तविक पाय है उस को एक तरफ कर देते हैं और केवन जो स्वयं उन विचार या मत वाद से मन खाता है उमीकी प्रशमा करते हैं। पह तो खर है। अभी आपनें रोति-काव्य की बात कही। मुझे याद आता है बहुत शुरू मे भी जापने यह जो एक तरह में प्राप्ति की समस्या है, रचने की समस्या है इसो के प्रसग मे, रवि-कम की दष्टि से, यावहारिक पक्ष की दृष्टि से ऐसा महसूस किया था कि रोति-काव्य स ना कुछ सीखा जा सकता है। लेकिन अगर कम्य के रचना क्या और किन कबीच पक्ष को निया जाये, सवेदन के पक्ष को लिया जाये तो रीति हम से बहुत दूर जान पडती है । उसको मानसिकता से, मनोभूमि से रिसी तरह की सहानुभूति स्थापित करना बडा कठिन है। इस से जो प्रश्न का स्प मेरे मन मे बनता है यह है कि क्या विगत युग को किसी ऐसी कविता या साहित्यिकता से आज का रचनाकार कुछ सोख सकता है जिससे कि उस का मानसिक तादात्म्य बिल्कुल भी न हो, जिस से वचारिक शिल्पो के रूप मे ही सही, कुछ सीख सकता है ? सहानुभूति न हो सके ? अगर आप तादात्म्य के लिए मानसिक पक्ष पर जोर द रह है तब तो उस स हा सकता है जिस स सहानुभूति तो नहीं है लेकिन जो तक की दृष्टि से सम्माय जान पडता है। बात यह है कि हम जब 'रीति युग' की बात करते हैं तो एक बात भूल जात है या एक ही पक्ष पर हमारा आग्रह रहता है। रीनिया में से केवल एक रीति पर-जिस का यहाँ पर बात स्पष्ट करने के लिए दरवारी रीति भी कह सकता हूं-- दरबारी रीति पर हमारा सारा जोर रहता है । लक्नि रीति तो लोक साहित्य में भी काम करती है-इसके बावजूद कि लाक साहित्य का उस तरह कोई व्यक्तिगत रचयिता नही माना जाता। क्सिी सीमा तक रीति परम्परा का एक अग भी है-उस का साधन भी है। हाँ उस रीति से निश्चय ही सीखा जा सकता है, उस पी पहचान भी बनी रहनी चाहिए । बत्कि हर नया जादालन भी आरम्भ म चाहे जितना विद्रोही भाव ले, जितना रीति विराधी मुद्राएँ अपनाय धीरे धीर वह एक रीति गढता है, फिर वह रीति ऐसी हो जाती है कि उस म जडता आ जाती है, फिर उस के विरुद्ध जादोलन होता है । आज भी जो लिया जा रहा है उस म बहुत सा ऐसा है कि या तो नयी रीति गढने म योग ट रहा है या रीति के अनुकूल चलन का प्रयत्न कर रहा है । वहा भी अपने निजी अनुभव भी या कि वैम गहर तादात्म्य की कमी उस म है, लेकिन रीति का निर्वाह करन का प्रयत्न है क्या कि उस स सामाजिक स्वीकृति मिलन की जाशा उस का होती है। एक यह भी मेरे मन मे प्रश्न उठता है कि साहित्य को जो भी रचनात्मक विधाएँ आज के युग में सक्रिय हैं, क्या ऐसा कहा जा सकता है--या ऐसा कहा जा सकता था—कि उप यास और निबध ज्यादा सामाजिक विधाएँ हैं और कविता और कहानी ज्यादा आतरिक, ज्यादा निजी विधाएँ हैं, कि इस लिए उन से अपेक्षाआ का धरातल भी एक जसा नहीं हो सकता है। पहली साहित्य की चिन्ता ४५ .7 बात तो यही कि क्या आप ऐसा मानते हैं ? आप को यहां टोवू जरा। आप कहानी का वविता म जाड रह है और उप यास मे अलग कर रह है यह किस आधार पर 'फाम' के आधार पर । मुझे लगता है कि पहानी अधिक फ्लात्मक विधा है और उस की यह बड़ी भारी सीमा भी है। या तो आप तीना का जलग-अलग मान लें-उप याम मे कहानी का ता अलग करें, लेकिन फिर कविता के साथ उस का बसे जाहते है ? कविता के साथ इस लिए जोडता हूँ क्यों कि पहानी को एक प्रसग विशेष, क्षण विशेष पर बहुत एकाप करना होता है। एक काँध सरीखी लपट-सी उस मे लेक्नि पर्व यह है कि कहानी मे जस्र कुछ घटित होना चाहिए जब कि कविना मे कुछ घटित नहीं होता, कविता स्वयं घटित हाती है। हा, इतना अतर तो है हो । सिफ रचना प्रक्रिया को दष्टि से मुझे ऐसा लगा कि शायद 'पसनल एसे, कहानी और कविता ज्यादा निक्ट की चीजें हैं और उपयास, नाटक शायद ज्यादा पसनल एसे तो जरूर कविता के निक्ट हाता है। कहानी उधर भी हो सक्ती है और दूसरे घार पर उपयास के निक्ट भी जा सकती है। चलिए, यह मैं मान लेता हूँ। तो मैं यह पूछ रहा था कि जैसे कविता को या कि साहित्य मात्र को दो प्रकार की अपेक्षाएं हैं- जितनी भी परिभाषाएँ हैं उन को मिला कर देखें तो दो प्रकार की अपेक्षाएं सामने आती हैं। सारी परिभाषाओ का सार जो निकलेगा यह निकलेगा कि साहित्य जीवन को आलोचना है । एक तो यह निकलता है, दूसरे यह निकलता है कि नहीं, साहित्य एक छिपे हुए जीवन का, जीवन के उस मम का जो कि जीवन जोते हुए नहीं देखा जा सकता न अनुभव किया जा सकता है कि साहित्य उस मम का उदघाटन करता है, जीवन के हाद मे जो जोवन प्रक्रिया है, उस का जो स्वरूप है उस को उदघाटित करता है। तो ऐसा माना गया, जसा मैने कहा, कि ये दो ज्यादा सामाजिक विधाएं हैं, ज्यादा समाज निभर विधाएँ हैं, उपचास और कहानी । और कविता जो है वह जीवन के छिपे हुए मम को उदघाटित करने वाली या अज्ञात का पता देने वाली है। क्या आप ऐसा मानते हैं ? और इस के साथ जुडा हुआ छोटा-सा प्रश्न यह कि क्या आप ऐसा समझते हैं कि आधुनिक रचना मे यह बात काफी दूर रचना क्यो और दिन के बीच तक अप्रासगिक हो गयी है और एक तरह से उलट कर कविता वह धम निभाने लगी है और उप यास यह धम निभाने लगा है ? लेकिन क्या आप ऐसा नहीं सोचते कि इस तरह का विभाजन तक की सुविधा के लिए किया जाता है? क्या कि वास्तव म तो 'जीवन की जालोचना' और 'जीवन के किसी गहरे मम का उदघाटन या प्रकाशन', ऐसा तो नही है वि एक से दूसरा बिल्कुल बहिष्कृत हो जाता है। दोना माथ चलते है । असल म मानव की चेतना क्तिन स्तरापर एक साथ काम करती है इस की हम उपेक्षा करे तभी इस तरह का विभाजन आत्यन्तिक जान पडता है नही ता लगातार हम गहराई में देखते हुए आलोचना भी कर रहे होते हैं और आलोचना कर रहे हाते समय भी गहराई म देख रहे होते है । एक समय हमारा ध्यान एक तरफ केद्रित होता है या दूसरी तरफ केद्रित होता है लेकिन प्रक्रिया म तो मभी चीजें साथ चलती रहती है । म जीते भी है, और जिय हुए का याद भी करत है और अथ भी खोजते है जो अर्थ हम मिलता है उस की आलोचना भी करत है- आलोचना के आधार पर अथ खाजत है और खाज के आधार पर आलोचना करते हैं । य इतनी ज्यादा साथ साथ चलन वाली क्रियाएँ है कि विचार करने के लिए सुविधा के लिए हम उन को अलग करते हैं लेकिन वास्तव म तो वे उतनी जलग नहीं होती। यह बात मैं आप की मानता हूँ कि इस प्रकार की विचार की दो धाराएँ रही-एक जिस म एक पक्ष पर बल दिया गया दूसरी जिस में दूसर पक्ष पर बल दिया गया लेकिन आत्यतिक रूप स ये अलग है नही । एक हद तक उन को उपयागिता है, बस । इतना ही मुझे लगता है। यह ता मै नही मान सकता कि एसा उप यास नहीं हो सकता या नहीं होता या नही होना चाहिए, जो कि गहराई से जीवन के ऐस क्मिी मम का उदघाटन करना चाह रहा हो जा माधारणतया हमार सामन नही जाता, या कि दूसरे पक्ष मे काव्य जीवन की आलोचना न कर रहा हो। क्या दो-टूक ऐसा सवाल सायक होगा कि आज आप को सब से ज्यादा सम्भावनाएँ या सबसे ज्यादा जीवतता किस विधा मे दिखाई देती है--हिदी मे हो? एक तो इस का सामाय उत्तर है--वि सम्भावना सिद्धातत हमेशा काव्य मे ज्यादा जान पडती है । दूसर यह होता है कि समय समय पर समाज की जैसी अवस्था होती है या कि समाज के सवेदन का जो स्तर हाता है या कि किसी समय के जो रचनाकार होते है उन की प्रवत्ति जिधर हाती है उस से अतर पडता है । इस दष्टि से मुझे लगता है कि इस समय साहित्य की चिता ४७ नाटक म कुछ नया काम भी हो रहा है और कुछ यह अनुभव भी सभी कर रहे है कि नाटक की सम्भावनाआ का पूरा उपयोग नहीं किया जाता रहा। पिछली दो-तीन पोढिया में तो उधर ज्यादा जोर है, उस म विकास की भी ज्यादा मम्भावना है। लेकिन अभी थोडी देर पहले पिछले प्रश्न में, आपन नाटक को भी शायद उपन्यास के साथ रख दिया था। जब कि मैं ता सोचता हूँ कि अगर नाटक वो दूसरी तरफ रख कर-काव्य के साथ जाड कर विचार करता मुझे लगता है कि उस में बहुत अधिक सम्भावनाएँ है जिन का उपयोग लगभग नही किया गया। यहीं प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यो नहीं हुआ। नाटक तो लिखे गये बहुत सारे नाटक लिखे गये। लेक्निक्सिी ने भी--जब कि यह सही है कि 'अधा युग' चाहे जिस कोटि का पद्य नाटक हो, वह मचित हो कर सफल तो हुआ लेकिन तब से क्या नहीं जहरत समझो गयो 'पोएटिक ड्रामा' को ? जो कि निश्चित रूप से कविता मे भी, नाटक मे भी, एक गुणात्मक अतर उपस्थित करता- अगर पद्य-नाटक या गोति नाटक मे रचना होती तो। इस का कोई कारण आप के ध्यान मे आता है कि ऐसा पयो नहीं हुआ होगा? पहली बात तो यह कि हिदी मे शुरुआत में नाटक का जितना आक्षण था- -शुरू-शुरू मे नाटक बड़े आक्षण का केन्द्र था, भारते दु का सब से पयादा उत्साह, सबसे ज्यादा सजनात्मक ऊर्जा उसी मे झलकती है. नाटक को शुरुआत तो बडो उत्साहपूण थी, लेकिन उसके बाद ता विल्कुल चौपट हो गया नाटक हो। देखिए अगर आप भारत दु के समय के नाटक की बात कर रहे हैं ता उस को सस्कृत की नाटय परम्पग चे सदभ म देखना चाहिए या रि पारम्परिक नाटक वे माय दखना चाहिए। भारतीय नाटय परम्परा म यथायवाटा नाटक वा कभी महत्त्व नहीं रहा । एक-आध नाटक एसा ही सकता है जिम म वि नाटककार दस तरफ गया हा-मुद्राराक्षस जसा या एक हद तक मच्छकटिक जमा भी लेकिन यथाथ जा दोयता है उसके पीछ जो ज्यादा गहरा पाई जाशय छिपा हुआ रहता है उसको प्रक्ट वरन या उस का उमप करन की आर नाटककार का ध्यान रहा । मैं समझता हूँ कि समकालीन नाटक---और शाय' पूर्वो परम्पराआ से प्रभावित पश्चिमी परम्परा म वापम प्रभावित हाना हुआ नाटक-फिर इस आर पाहा आरप्ट हुआ है कि यथाय की ययायवत प्रस्तुनि का आग्रह घाट पर भीग जा गवता है । वचि नाटय म कभी यह प्रयत्न हाता ही नहीं YS रचना गया और दिन रवीच विचीज़ो को विश्वसनीय रूप से यथाश्वत प्रस्तुत किया। भौर ब्रेष्ट ने ही शायद इस बात पर पश्चिम में पहल पहलाबाजार से आग्रह किया कि हम तो यह बोध मिटन ही नही आप देख रहे हैं वास्तव म घटित नही हा रहारह पहचान पश्चिम म यथाथवादी नाटक की प्रतित्रिया करू लेकिन उन को प्रेरणा पूर्वी परम्परा से मिली थी-चीन की, या जापान की या भारत की परम्परा से । और क्या कि उह इधर मे प्रेरणा मिली, इसलिए यहा का जो उस समय यथाथवादी नाटव पर आग्रह करने वाला भारतीय नाटककार था, उसन एक बार फिर उस अपनी परम्परा की ओर देखना भी गवारा क्यिा । और अभी व्यवहार म यह बात नहीं उतरी है कि जाप नाटक को 'दश्य काव्य' मान कर कविता के निक्ट ला सक्त है, लेकिन सिद्धान्तत यह बात मानी जाती है, और लोग इस का कुछ अनुभव भी करने लगे हैं । शायद यही कारण है वि भी वास्तव में काव्य-नाटक फिर से प्रक्ट नही हुआ है, होना चाहिए । अधा युग भी मफल तो हुना, लेकिन उस मे भी जो उस की वस्तु है--महाभारत स ली गयी-उस में इतनी शक्ति है कि वहा नाटक के काव्य रूप का भी उपयोग हो रहा है इस वात की आर कम ध्यान था, उस से आग क्या सम्भावनाएँ बनती है इसकी ओर भी बहुत कम ध्यान था। धमवीर भारती ने भी उम से आगे फिर नाटक नहीं लिखा और सर लोगान भी नहीं। बत्कि पुराण वस्तु स भी-जिस मे इस तरह का शक्ति-सचय होता है जिस का उपयोग किया जा सकता है-ले कर कम ही लिखा । उस स पहले तो कुछ लोगो ने लिखे थे-खडकाव्य लिखे थे या छोटी नाटिकाएं लिखी थी, ऐस खडका य जिन का मचीय रूपातर बड़ी आसानी से हो सकता था लेकिन उसके बाद यह नही हुआ । शायद कठिनाइया मे एक कारण भापा से सम्बद्ध भी है। प्रसाद की भाषा हम लोग अब स्वीकार नही करत क्या कि वह साहित्यिक भाषा है बोल चाल की भाषा नहीं है । यह जरूरी नहीं है कि मच की भाषा आज की बोल-चाल की भाषा ही हो, लेकिन अगर आप वस्तु की दष्टि से भी वित्कुल नया कुछ कर रहे है तो फिर यह प्रयत्न हाता है । एक चीज नयी कर रह हैं तो उसके लिए जो चीज़ उतनी नयी नहीं है, परिचित है, उस को आधार बनाया जाये-सभी कुछ अपरिचित हो जायेगा तो और अधिक कठिनाई होगी। इस लिए भाषा म तो आग्रह यह रहता है कि आज की बाल चाल के निकट रह और वस्तु म कुछ उडान भी भरते है । जब कि अगर वैसी वस्तु है तो वह माग करती है कि भाषा भी उस के अनुकूल होनी चाहिए । इम से थाडा डरते है लोग साहित्य की चिन्ता ४६ हालांदिवाई कारण नहीं है । मरा ता जैसे पाठा म विश्वास है बम ही रगमच १ दशम भी विश्वास है घिउम या आप माथ चल मक्त हैं और वह टम मारम-यामा म आप र माथ चान का तैया हागा, आपम इतना मामय्य हाना चाहिए पि उसका साथ ल चल मर। लेकिन एक बात तो है। जैसा आपने रहा, इयर नाटक में काफी नपी रचना हो रही है, लेकिन जो भी नयी रचना हो रही है नाटक मे, उस मे जिसे आप ययापपादो कह रह हैं यही प्रवृत्ति प्रमुख है। इस लिए इस नाटकबहुलता स नाटक या या यथाय का भी कोई सास भला नहीं हो रहा है। इसी के साथ एक बात यह भी पूछना चाहूंगा कि क्या आप समझते हैं कि नाटक को अब भी सस्त को नाटय-परम्परा की दृष्टि से देखना चाहिए ययाय के प्रति जिप्स प्रकार का दृष्टिकोण यहा था--गरन्ययायवादी ढग स ययाय को उजागर परना-पया आप मानते हैं कि भारतीय मानस या साहित्य के साथ अब भी उसका सम्बध वसा ही है ? या कि हिंदी मे सस्कृत को परम्परा से भिन एक दूसरे प्रकार का मानस हो गया है, अधिक ययायवादो मानस-~-उस को यथाथ को देखने की या साहित्य में ययाय को ग्रहण करने को दष्टि ही बदल गयी है? ऐसा तो मै नहीं मानता हूँ । मानव स्वभाव इतना नहीं यदर गया है इस के - रावजूर कि मानव स्वभाव नही, सास्कृतिक स्वभाव । नहीं, में नहीं समझत्ता नि वह इता बनला है । वात सदभ म ही रखिए । यह तो मान लेता हूँ और यह देखना भी हूँ कि बहुत सी चीज़ो पर तो यथाथवादी आग्रह है क्या कि सास्कृतिक मूल्या म उस तरह का बदलाव आया है। लेकिन प्रक्ट या अप्रकाशित ही सही, इस तरह की मांग व्यक्ति म हैं...और दव पर उन मे शायद एव शक्ति वा समय कुछ अधिक हा गया है-~~-जो अधूरा रह जाती है और जिन को इस तरह का नाटक पूरी पर सकता है । आपने कहा कि इधर जा नाटन लिख जा रहे हैं वे भव यथाथवादी जाग्रह के शुरूप ही है । एक ना यह बात ध्यान म रखिए कि नाटप की परम्परा विशप प स हिदी म लगभग मिट ही गयी थी। एर ता पहने नाटर को फिर मे समाज मे कोई स्थान दिलाना है, जो अव फिल्म और टी० बी० की प्रतियागिता म आसान काम नहीं है। यह नहीं है वि फिल्म या टी० बी० नाटक की आवश्यता का विकुल मिरा द मरने हैं लेकिन इस काम को कठिन ना जरूर बना दत है । फिर यह भी रचना क्या और किन बीच है कि उस को फिर से स्थापित करन वे लिए आपकाशायद ऐसा भी करना हो -~या कम से कम यह ता आवपक जान पड---कि पहले जो सामाय फिल्म देखन वाला है और जो सम्भाव्य नाटक देखने वाला हो सकता है पहले उस की रुचि को ध्यान म रख कर आप वास्तविक्ता बाया कि जीवन के बहिरग को प्रस्तुत करे जिस के सहारे वह जाग बढ सकता है, और जिस दूसरे प्रकार के नाटक की बात हो रही है (जा या भी अल्पसख्यक और ज्यादा सस्वारी दशक के काम का हो सकता है) उस पर बाद मे ध्यान देगे। लेकिन मैं समझता हूँ कि ऐसा सोचना ठीक नही है दोना साथ ही साथ चलने चाहिए। यह मान कर भी कि उस तरह के समारा वाला व्यक्ति समाज म अल्पसख्यक होगा लेकिन समाज को मूल्य दष्टि की स्थापना म उम का महत्त्वपूण याग हाता है और कुछ साह्म कर के आगे बढने की प्रवृत्ति भी उम मे ज्यादा हो सकती है । इस लिए उम की सख्या कम होने के कारण ही उस का इतना हेय नही मान लेना चाहिए । ती काव्य नाटव के लिए जगह है और वह लिखा जाना चाहिए लिखा ही नहीं प्रस्तुत किया जाना चाहिए एसा में मानता हूँ। अब इस बात को थोडा सा एक दृष्टात की मदद से देखें। उन दो चार नाटकों मे जिन मे यह महसूस किया जा सकता है कि यथाथ से उस तरह का सम्बध बना, सर यथाथवादी नजरिये से जो सिफ सतही यथायवादी नाटक नहीं हैं-जसे 'हयवदन'-उन से भी एक दूसरी तरह का असतोष मन मे होता है। आप को ऐसा लगता है कि यहा 'बताल पच्चीसी' को उस कहानी के साथ वसा सोधा सम्बध नहीं है, बल्कि एक अप्रत्यक्ष सम्बध है। यों तो कहा जा सकता है कि यह स्वाभाविक ही है, कि हम बहुत सी अपनी चोजा को अगर ज्यादा प्राणवान् सभ्यता से परावर्तित हो गये रूप में ग्रहण करते हैं तो इसमे युरा क्या है ? उस तरह से उस मे बुरा कुछ नहीं है। लेकिन एक रचनाकार के लिए, एक नाटककार के लिए आखिर 'हयबदन' नाटक देखने वाला भी उस के प्रति किस तरह से प्रतिक्रिया करेगा? वह शायद एकाएक दोनो का सम्बध ही न देखे--जरूरी नहीं है कि उस को अतीत को उस कहानी को याद उस सदभ मे आये हो । क्या आप नहीं समझते कि 'हयवदन' को समस्या मनोवज्ञानिक स्तर पर 'रेडयूस' हो गयी है, जब कि मल कहानी की टकार ज्यादा है। मूल कहानी की बात आप कहते है तो उस के और हयवदन के बीच एक सीही तो और है और वह भी पश्चिमी सीढी है। साहित्य की चिन्ता ५१ वही मै कह रहा था। 'ट्रासपोरड हेडस' के जरिये ही मैं बात कह लेकिन उस से क्या होता है ? जिस को आप सीधा सम्बध कहते हैं, साहित्य मे तो वैसे सीधे सम्बध कभी वनते नहीं है। अगर कभी सीधा सम्बध बनता भी है तो उस से परे उस वे जो अकल्पित, अप्रत्याशित और शायद अपूवानुमेय प्रभाव होते हैं वही तो ज्यादा महत्त्व रखते है। काई प्रभाव पिस किस तरह काम करेगा, यह बहुत कुछ तो ग्रहीता पर निभर करता है उस वे समाज पर निभर करता है। तो इस की इतनी अधिक चिता क्या होनी चाहिए कि सीधा प्रभाव हो या कि मीधा सम्बध - वन देखिए, यह तो दो स्तरो पर 'डेरिवेशन हो जाता है। जिस प्रकार का सम्बध किसी भी 'मिथ' से आप जोडते हैं तो वह क्यो जुडता है ? आप का अपनी आत्म स्थिति को कोई परिभाषा या कोई स्पष्टतर व्याख्या या कोई उजाला मिल सकता है इसी लिए तो न, न, यह कारण नाकाफी है। जुडता इस लिए है कि एक 'आपका सीधा सम्बध दीखता है । दूसरे, उस के माथ-साथ बहुत-से स्वयं अपने म अलक्षित या कम स कम अनभिव्यक्त प्रश्ना के साथ उत्तने ही अनभि यक्त उत्तर या कि अलक्षित आयाम जा कि कथा मे या पुराण वस्तु मे हैं वे भी जुडत जान पडत हैं। तो एक स्तर पर जो प्रक्ट है उस का प्रक्ट वस्तु से सम्बध होता है। दूसरे स्तर पर एक पहचान उभरती है कि इस के नीचे मुझ म कुछ छिपा हुआ था जो कि इस क्था के पीछे छिपे हुए के साथ अपना सम्बध बना रहा है। वह सम्बध ठीक ठीक क्या है उस को हम सीधे सीधे शब्दो मे नहीं कह सक्त, लेकिन जानत है कि एक और स्तर पर सम्बध बन रहा है। और उस की शक्ति असल म वही है और वही क्या आप को ऐसा नहीं लगता कि लिखे हुए शब्द की बजाय बोले हुए शब्द के प्रति हो आज भी हमारी जनता, साधारण पढ़े लिखे लोग भी ज्यादा सवेदनशील है ? क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि जिसे कहते हैं 'लिटरेरो कल्चर', साहित्यिक संस्कृति, साहित्य के प्रति श्यादा रुझान, ज्यादा व्यसन-वसा आज भी नहीं हो पाया एक हद तक तो हमेशा ऐसी स्थिति रही है। मेरा ख्याल है कि कोई नयी बात अगर है तो यही है कि हम एक बार फिर से पहनान रहे हैं इस बात रचना क्या और दिन के बीच को। नही ता पढे लिखे व्यक्तिया म भी हमेशा वाचिक अभिव्यक्ति का महत्व रहा है। आप की नजर मे क्या यह सम्भव है कि कोई आदमी समाजवादी भी हो और जीवन-जगत् के प्रति अत्यत धार्मिक दृष्टिकोण रखना भी उतना ही अनिवाय पाये? क्या इस मे परस्पर विसगति नहीं विसंगति तो हो सकती है । लेकिन विसगति तो हमेशा सम्भव है न । एसा होना सम्भव है यह तो हम प्रत्यक्ष ही देख रह हैं--क्या कि अधिकतर समाजवादी ता एसे ही हैं । और उतनी गहरी विसगति भी तो नहीं है-- कुछ एक विशेष प्रकार के ममाजवादा को छाड कर। समाजवादी होना जरूरी तौर पर धम से कटे हुए होना है, यह तो सिद्ध नही होता। लेकिन समाजवाद के मूल म अगर भौतिकवाद हो और उस भौतिकवाद के मूल मजनीश्वरवाद हो, तब तो यह सवाल उठ सकता है। मैं इसी सवाल को दूसरे रूप में रखू। क्या समाजवादी होना एक 'नो म स लड' मेहोना नहीं है ? अगर समाजवाद को उस फीताविक परिणति पर जाते हैं तो वह माक्सवाद या कि कम्युनिश्म हो जाता है । उस का एक धम जसा तन है और उसी अनिवायता के साथ वह उस को लागू करता है। तो मुझे लगता है कि जो कम्यु- निस्ट होता है उस को एक प्रकार के धार्मिक भावावेग का और 'कमिटमेट' का भी लाभ मिल जाता है और उस कोशायद धामिक वृत्ति भी कुछ सतुष्ट हो जाती होगी। अव आप उस का उस था लाभ कहिए था वहिए कि उम वे जिम तरह के पूर्वग्रह हाते हैं, या कि असल म ता उम की कमजारी है इस तरह का धार्मिक मनाग्रह, वह भी उम के काम ना जाता है । इस अथ म तो उसको 'लाभ' मिल जाता है। या वि वह उस का उपयोग कर लेता है इस वे लिए एक बहाना या रास्ता पा लेता है कि उतना ही वट्टर मताग्रह भी बना रह जा वि मावाद के साथ होता है और साथ ही साथ बुद्धि का, तब पा आग्रह भी निभ जाय । लेकिन समाजवादी ये जो मूल्य हैं उन के लिए जरूरी तो नहीं है कि आप ईश्वर को या आत्मा का अमान्य वरें। क्या जरूरी है। यह भी जरूरी नहीं है कि उस की माविसम्ट परिणति हो हो । साहित्य में भी जितना समाजवाद प्रतिफलित हुआ है उसका दृष्टात अगर आप लें तो बर्नाड शॉ मे, या कि १९८४' के लेपर तर को लें-ऐसा एकाएक नहीं कह सकते मि यह धार्मिक दृष्टि साहित्य को चिन्ता ५३ 7 हाँ, इधर जितना राजनीति समाजवाद इतिहास का आधार लकर प्रति फलित हुआ है, वह एक है। लेकिन अगर आप देखें कि किन लागो न वमा जीवन जिया और समता के आदर्श निवाहे तो आप पायेंगे कि उन में सात लाग बहुत थे। हा, यह बात तो है। लेकिन अब यहीं पर बुनियादी सवाल पडा होता है कि क्या समाजवाद को भून प्रेरणा इतिहासबाद से ही नहीं निकलती है ? अगर नहीं निकलती है तो फिर आप यह कह रहे हैं कि इतिहास को बहुत महत्त्व न देने वाली जो परम्पराएँ हैं उन में भी समाजवाद का एक नया चिन्तन, एक मिन प्रस्थान प्रकट हो सस्ता है। हा, यही कह रहा हूँ कि एसा हा मक्ता है। और समाजवाद में जितने भी मूल्य है वे सब यहा में भी सिद्ध हो सकत हैं उस आधार पर भी एक ममतावाटी ममाज मिद्ध किया जा सकता है और जिया जा सकता है एमा ममाज जिस म कि मरवार की पीठिका नगण्य हो या कि प्रमश अधिकाधिक नगण्य हाती जाय । इस पर फिर मेरे दिमाग में यह सवाल, प्रतिप्रश्न पदा होता है कि क्या यह समाजवाद की नयी कल्पना या नया आधार, दशन जो प्रस्तुत होगा, यह कहीं पश्चिम मे जसे समाजवाद के शुरू के जो चितक थे, जिन को 'यूटोपियन' कहते थे, यह क्या उधर जायेगा' या उस से किस तरह मे मिन होगा? आप कह लीजिए। आज हम जिस दुनिया म जी रहे हैं उस म समता पर आधारित समाज तो एक यूटोपियन कल्पना ही है। ऐसा कोई समाजवादी देश नहीं है जहा पर कि वास्तव म वैसी समता होती हो, वसी स्वाधीनता हाती हा जिस को उन नागान व पनाको थी । सिद्धान्तत समाजवाटी भी उस की बात तो परत है लकिन ऐसे ही भविष्य म करत हैं । ता भविष्य म एमा हा जायगा जव कि हमारी सारी प्रवत्तियां उसके विरुद्ध हैं ---यह ता एक तरह का यूटोपियन चिन्तन है हो। उन नागा को आप यूटोपियन बत हैं क्या दि उन को कल्पना का देश कही नही है। दश तो आप की कल्पना का भी कही नही है, पर आप का दावा है कि एक काल्पनिक बाल म वह उग्र वास्तविक होगा। स्वप्न-बाल वनानिक है स्वप्न-नेश काल्प नि यह पहन का क्या आधार है। लेकिन अपने देश म गाधी जी ने जिस तरह वा चितन किया था और उन के बाद उसी दिशा म थोडा यहुन विचार हुआ और पश्चिम म इधर परिवेश यो ते बरया इकालाजी दी ममम्याएँ उठा कर जिस तरह का चिन्तन हुआ है यह भी एक हद तक ५४ रचना क्या और दिन बीच एक तो वह जोकि आप वह सक्त है कि यूटोपियन है। पर मूत्या की अवधारणा करने वाला मानव जादश क्या नहीं गड सक्ता' लेकिन पहले वाले 'यटोपियनिस्म' से तो यह भिन होगा ही। तो क्या इस मे वास्तविक परिस्थितियों को चुनौती है ? उस से ता भिन है । आर उसो साथ यह नाशा भी है यह वोध भी है कि यद्यपि अभी तक यह एक परपना है लेकिन अगर हम इस कत्पना को साकार परन की तरफ अपना प्रयत्न नही बढात ता प्रमश हमारी अवस्था और हीनतर ही हाती जायगी। क्या कि आखिर गाधी जी की जा रामराज्य पाली कल्पना थी वह खाली एक धार्मिक 'सेंटिमेट' नहीं था। उनके शेष कम से मिला कर देखने के लिए एक प्रेरणाप्रद विचार तो था हो । यह तो दूसरे चितका का, जो अपने को चितक समझते हैं उन का दायित्व है कि वे अपने को विकसित करें। तो आप को समाजवादी चितर ऐमे लगते हैं वि उहोने गाधी जी के विचार को या गाधी जी की दिशा के विचार को भारतीय परिस्थितियो के मुताबिक, सामाजिक समता के विचार को विकसित किया हो आज की बौद्धिक जटिल ताओ के बीच मे-सास्कृतिक जटिलताओं के बीच में? मुये तो यह लगता ह कि नापन जिन यूटोपियनों की बात की उन समय के यूटोपियन और उस ममय के अनाकिस्ट, जा बरारकनावारी य, अद जाज फिर स व ता नहीं जायेंगे। लेकिन आन चिन्तन की नीति है वह भी कुछ अनाकिस्ट नहीं ता कम मे कम राय-वाम ताहै हो और उस हद तक यूटोपियन भी है। एक ता दात यह है किवादिय की कल्पना कर के उस के आधार पर वनमान गदत है तायद यूटोपियन माग ही है । और वतमान या मन्द देवक कारक भविष्य की क्रपना करते है और हमशा वनमान पर करते हुए ही यह सोचते है कि हम एमा भदिप्य नहीं गई गवाहिए-नो हमारा वतमान म कुछ दूसरी तरह का प्रनता है। मैं मममना है कि आज इकालाश्री वा रे गोपिनारदमान स्थिति में मै ही निकती हुई चिन्ता है। इस के अलावा मा नारागिनों उगता है कि यह जो 'यूटो- पियनिस्म है या किदिय की कल्पना करने की यादमी की मूल किस्म की प्रवृत्ति है, महामने है- इनिहान दो गन्द दाद है और दूसरा वह जो अनेक हानिक माटाका निगमित्र दृष्टि का मो यूटोपित हो सफ्ता है, यानी हेनरी मूर जसा 'यूटोपियन' या प्लेटो जसा 'यूटोपियन' । उस मे भीतर दूसरी चितनात्मक या कार्मिक सम्भा बनाएँ हो सकती हैं, और रामराज्य जसा जो का सेप्ट' है उस की दूसरी प्रवत्ति भी हो सकती है। अब यातचीत तो साहित्य से ही शुर हुई थी और साहिरिपक समस्याना को ही चर्चा हम लोग कर रह थे। फिर एकाएक हम लोग बचारिक समस्या मे सास तौर पर राजनीति मे चले गये। तो इन दोनो को मिलाते हुए इस का समापन किया जाये। इस परिस्थिति पापया पारण है कि राजनीति मे जो दल या जो दशन सत्र से कम फ्यान सिद्ध हुआ या सब मे कम जिस की जड बन पायी, साहित्य मे उस का एक घटाटोप-सा दिखाई देता है कमे? जसे यही कि आज जो भी पत्रिकाएं-पहली यात तो पही कि बुरे सेंस मे विवे द्रोकरण हो गया है, बाई पत्रिकाएं नहीं हैं, कोई के लीय रचि को या ऐसी पत्रिका जिस मे छप कर आदमी को यह लगे कि विहीं साहित्यिक मानको के आधार पर उस की रचना को स्वीकार किया गया है या कि जिस मे उपना युवा लेखक के लिए उस तरह का सतोष दे सके । लेकिन जो भी पत्रिकाएँ आपके पास हैं, आज कोई भी पनिका उठा कर देखिए तो उस मे जिस प्रकार के पथाथवादी आग्रह काम कर रहे हैं हर लेखक कहीं न कहीं माक्सवाद के जातक मे है या उस के प्रभाव मे लिख रहा है। अब यह वास्तविकता है कि नहीं पता नहीं, लेकिन ऐसा भ्रम तो आखिर खडा हो ही जाता है। लेखको के ही सगठन भी- (पहले हुए भी हागे, लेकिन एक प्रकार से यह रिसर्जेस' ही है) प्रगतिशील सगठन, जनवादी सगठन, लेखको के और सगठन भी- एक तरह से राजनीतिक पार्टी के विग' की तरह ही बन रहे हैं। तो एक ऐसी स्थिति सामने है कि लगता है इस को अगर साहित्य का प्रमाण माना जाये तो क्सिो बाहर के आदमी को ऐसा भ्रम हो सकता है कि जसे कि देश मे सब से प्रचलित, लोकप्रिय और प्रभावी राजनीति दशन 'कम्युनिस्म' ही है। देखिए उन का ता चितन यही है कि सघप के अनक मोर्चे है जिन म एक मोर्चा लेखन वाला है उस को भी मार्चे की तरह में सचालित करना है। इस का भी उपयाग उन के उही उद्देश्या के लिए करना है जो कि साहित्यिक उद्देश्य नहीं है । ता व जाकर रहे हैं वह उन के दशन के भीतर तो समझ में रचना क्या और दिन के बीच आता है। आप नये लेखक की वात साचें जो उस दशन से परिचित नहीं है या उस का मानने वाला नहीं है, तो वह भी कुछ उधर युक्ता है तो इस लिए नहीं कि उस की वास्तविय सहानुभूति उधर होती है। उमे कोई रास्ता नहीं मिलता और इस तरफ दीखता है कि 'अगर मैं इम के साथ जुड़ जाऊँ तो सफलता का या लोगा के सामन आ जान का एक उपाय यहां से मिल सकता है और यहां से मुये अभिव्यक्ति का एक माध्यम भी मिल जायेगा और पाडी-बहुत प्रशमा भी मिल जायेगी', तब इस समय तो यही हा रहा है । सम्भव है विवाद मे यह प्रभाव उस वे चितन पर भी पडे-या इस म उलटा भी हो लेकिन पहले मफलता पाने के लिए या कि लोगा या ध्यान आकृष्ट परन के लिए एक उपयोगी और तात्कालिक रास्ता उस को धर दीखता है । यह मक्ते हैं कि यह तो उस के द्वारा एक परिस्थिति का उपयाग है और इस मगठन व द्वारा उस की प्रतिभा का उपयाग है । यह दा-तरफादाह्न ता हो रहा है। साहित्य के लिए यह कोई बहुत स्वस्थ स्थिति नहीं है, यह ता स्पष्ट है । स्वस्थ स्थिति वह होती है जिस म कुछ एक पपिकाएं नहीं तो कम से कम एक पत्रिका ऐसी हो जिम का यह दावा हा कि माहित्य वे अमुक मानदण्ड हैं-इस तरह का पत्र बहुत अधिक ता नहीं, लेकिन थाडा सा अनुदार तो होगा ही क्यो कि उस का प्रतिष्ठित परम्पगआ पर आग्रह करना है-एक ऐसी पत्रिका हो जोर लाग मानत हा वि यह प्रतिष्ठित पत्रिका है, और दूसरी तरफ अनेक छोटी छाटी पत्रिकाएँ एमी हा जो इम के विरुद्ध आग्रह कर रही हा कि नही, ये प्रतिमान अब पुरान पड गय हैं और हम उन वा वदलना चाहिए और लगातार उस पर सब तरफ म छाटे मोटे आक्रमण भी करती रह और एमी नयी रचनाएँ प्रस्तुत करती रह जो उन के विद्रोह का समथन करें। साहित्य के लिए यह स्वस्थ स्थिति होती है कि एक तरफ प्रतिमान हो, प्रतिमाना का एक आग्रह हो, और उस के विरुद्ध अधय भी हो । बह तनाव सजनात्मक हाता है। जब वैस प्रतिमान कोई रह ही नहीं और विरोध का हल्ला हा तव ता एक तरह की अराजक्ता हाती है जा कि स्वस्थ नहीं है । वैसी अराजक्ता की स्थिति म म आ गये थे। और उस मे यह एक दूसरा जनुशासन आया है जो कि बाहर का अनुशासन है, राज नीति का अनुशासन है, जा इस परिस्थिति का उपयोग अपने राज- नीतिक हित के लिए कर रहा है । यह ता स्वस्थ स्थिति नही है, वास्तविक स्थिति जरूर है। और अगर लोग समझ सक्त है कि एसा हो रहा है ता नया लेखक भी शायद यह ममझ सकता है कि उस का इस्तेमाल दूसरा के माहित्येतर उद्देश्या के लिए क्यिा जा रहा है और उस के प्रति सतक हा साहित्य की चिता ५७ सकता है। लेविन आज लाग जल्लीम तो रहत हो हैं और उनका जन्दा कुछ न कुछ परिणाम चाहिए। यह स्थिति ता है ही। स्वालिप्त समाजशास्त्रीय कारण ज्यादा प्रमुप है बनिस्बत इस शुद्ध राजनीतिक कारण के ? आप के उत्तर से हो इसो से लगा प्रश्न मेरे मन मे बन रहा है। यह यह कि क्या आप ऐसा नहीं समझते कि ज्यादा फलदायक या स्वस्थ जीवन दशन यह होगा जिस मे कि सामाजिर और राजनीतिक क्षेत्रो मे तो विकेन्द्रीकरण को स्वा भाविम मान लिया जाये, उस पर बल दिया जाये, लेकिन धम में और साहित्य मे क्सिी सोमा तक केन्द्रीकृत होना सब से ज्यादा अच्छा हो ? विवे द्रीकरण को भी स्वाभाविक मानना रठिन है और वे द्रीकरण भी एक सीमा तक ही है। दाना ही प्रवत्तिया ममाज म काम करती रहनी चाहिए। एक केद्र का वादा भी होना चाहिए और विद्रित वाम ने लिए गुजाइश भी हानी चाहिए उम के लिए सघप की भी गुजा श हानी चाहिए, सपप भी होत रहना चाहिए। जैसा मैंन कहा, एक एसा पत्र हा या कहिए कि एसा प्रतिष्ठान भी हो जा प्रतिष्टित मूरया पर आग्रह करे और दूसरी तरफ उस के विरुद्ध नादालन भी हा जधय भी हो। यानी एक के द्रीय प्रवत्ति भा हा आर एक विद्रीकरण का आग्रह भी हो। यह तो स्वस्थ स्थिति है। समाज म इस तनाव का रचनात्मक परिणाम होता है । हा, ये दोना प्रवत्तिया साथ साथ चलनी ही चाहिए। क्या आप ऐसा नहीं सोचते कि जो आप साहित्य के बारे मे कह रहे ह वही कहीं भारत की राजनीतिक परिस्थिति पर, उस के आदश या यथाय पर लागू होता है ? हाँ यह भी है। हमारे समूचे रतिहास में यह चीज़ रही है । आर एन में बीच माजा तनाव रहा है उस की रचनात्मक सम्भावनाएँ रही हैं। उदाहरण के लिए जो कुछ स्वातव्य पूर्व युग मे घटित हुआ, सत्याग्रह युग मे या उस से पहले भी, धया ऐसा नहीं लगता कि देश के मन में ही बहुत वास्तविक और स्वाभाविक कारणों से एक विभाजन था, बहुत ही सत्य, बहुत ही सच्चा-एक विविधता थी या कह लीजिए एक आत्म विभान था। जीवन को नयो सम्भाव नाएं, रचनाशीलता, रिसोको पश्चिम के नये चितन की तरफ जाने में दिखाई तो यो-सिफ पश्चिम के ता से नहीं बल्कि रायूचे समारता से, प्रगति र तक सेऔर उसी मानस के अस महीं अपनी जड को पकड़ने की और यह न जाने को, अपने रमना पा और पिन द बीच सास्कृतिक और आध्यात्मिक और धार्मिक मूल्यो पर जोर देने को जरूरत भी महसूस हो रही थी। तो क्या राजनीति में इस प्रकार वाघ वीकरण सम्भव था कि जसे एम नेहरुई पार्टी होती, एक गाघी वाली पार्टी होती जिन का स्पष्ट ध्रुवीकरण हो सकता- और इस प्र वोरण से हो एक ऐसी राजनीतिक उथल-पुथल होतो, हमारे मास की जो वास्तविस्ता थी उसी पे मुताबिक हमारी राजनीतिक गतिविधिया भी चलती और दलो का इतना बिखराव नहीं होता? मेरे कहने का मतलब यह है कि जो पालियामेटरी डेमोगे सो पाएर 'माडल' हमने उठाया और सही कारणा से उठाया, इस के व्यवहार को भी तो नश्ल की जा सकती थी--कि दो पाटियो से क्से बढ़िया चलता है। ता वसा क्यो नहीं हुआ होगा [-या कि अब ऐसी कोई सम्भावना आप को दीखती है-इस नये सबर पे बाद १ मम्भावना ताजव नय मवकबाद दीखती है लेकिन इसका सवर अभी कस कह जब तक कि "म का प्रमाण नहीं है कि वह मीष लिया गया है । लेकिन सवेत ता उममा यही है कि यह चीज़ मीखनी होगी। तो अगर मीखे-जव जनता पार्टी का शासन हुआ तव भी एप अवमर था कि यह शिक्षा ग्रहण की जाती, लेपिन वह मम नही मीखा गया-ता अब भी जाशा की जा सकती है। आप को ऐसा नहीं लगता कि गाधी जी के अलावा या गाधी जी के साथ-साथ और भी जो पुछ चितन राजनीति में सक्रिय लोगो ने किया पिछले पचास वर्षों मे-लोहिया, अच्युत पटवधन, आचाय नरेद्र देव, जयप्रकाश नारायण या एम० एन० राय भी, तो उन के विचारों का एक पुनमूल्याक्न जसा करने की जरूरत है ? पुनमूल्याकन करन की जरूरत है। उन का सत्भ म रख कर देखन की भी जरूरत है । और विशेष प स यह जा के द्रीकरण का या केद्रामुखता का आग्रह था और जा के द्रविमुख या विद्रित स्वायत्त जीवन का आग्रह था, रन दाना कवीच जिस तरह का सतुलन बना रहा- महा भारत के समय स ही दवे ता वही स्थिति रही कि एक तरफ आग्रह था कि एक शक्तिशाली कद्र हाना चाहिए और दूसरी तरफ यह था वि जा विवेद्रित जार स्वायत्त समाज हैं उन की स्वायत्तता भी बनी रहती चाहिए। कृष्ण का अगर एक राजनीतिक कटनीतिक “यक्ति के रूप म दखे ता भी यह स्पष्ट हाता है कि वह भी यही कर रह थे--एक तरफ समाज म के द्रीकरण भी कर रहे थ जार टूमरी तरफ एसा स्थितिया स साहित्य की चिन्ता ५६ बच भी रह थ जिन म पि टबराहट हो । भारत के इतिहाम म सबस रचनात्मक प्रभाव इमी चीज़ का रहा है कि इन नावे बीच जा तनाव है उस का सही उपयाग दिया जाय और दम तनाव को मिटा पर विमी एव पक्ष की सम्पूण विजय न हान दी जाय । मेरा ख्याल है यह सही बात है। तो आपको इस बात से में यह अय ग्रहण कहें कि न केवल हमारे निकट इतिहास के अनुभव का ग्रहण और मूल्याक्न बल्कि इतिहास या साहित्य का भी बहुत तात्कालिक सदर्भो मे और वडो निपट सास्कृतिक आवश्यक्ता की प्रेरणा से अध्ययन होना चाहिए? -न केवल निक्ट इतिहास का चकि जिसे हम 'मिय' कहते ह उसका भी हा उस स्तर तक हा मरता है। और उम म यही पायेंगे कि तरफ इम म अनेक पद्रीय ममाज और मसार को वरपना है और उम वा सफल व्यवहार है और नमरी तरफ यह जाग्रह है कि सब कुछ एक है और एक ही के द्र है। और इन दाता का महज सतुलन यहा निभता चला गया है। इसी को मैं समझता हूँ कि हमारी प्रतिभा को विशेष देन भी मानना चाहिए। क्या कभी-कभी एक बात विचित्र-सी नहीं लगती? कभी भारत न जहा से शुरू किया और आगे बढा, और उधर पश्चिम ने जहां से शुरू किया और आगे बढा- -ये दो बिल्कुल विपरीत दिशाएं और गतियाँ थीं। आज का सब से बच्चा 'सायस', सबसे हाल का 'सायस' यह पर्यावरण विज्ञान है, इसे देखें, या 'एग्रोपालाजो (नतत्व) को देखें-विज्ञान अपने निष्क्षों से हमे उस किस्म के बोध या सवेदन की ओर ले जाते हुए प्रतीत होता है जिस को और भारत का "मिथिर माइड शुरू से हो सकेत करता रहा जहाँ से हमन आरम्भ दिया था ऐसा कह लीजिए। एक यापक पररपर निभरता का वोध फिर हा रहा है--बिल्कुल दूसरे कारणा मे। तो कहीं इस का भयकर परिणाम यह तो नहीं निकलता कि अगर ऐसा है तो यह ऐतिहासिक नियम है, अनिवायता है, कि अब वे तो इधर रह आवे, स्वस्थ हो, और हमे उन को पूरी इतिहास प्रक्रिया मे से गुजरना पड़े, जो उहोने भोगा है वह हम भुगते' नही यह परिणाम ता नहीं निकलता। लेकिन जो समस्या या निशका हा मरती है वह यह कि अगर उनको सस्कृति अभी तर प्राणवान सस्कृति ह तब वह इम नयी स्थिति का देय कर, इस जोखम का उठा कर अपने . ६० रचना क्या और दिन के बीच FFreow लिए नया रास्ता बनायगी जो कि उसो सस्कृति का नया रास्ता होगा लेकिन अगर उस म एसी प्राणवत्ता नही रही है जार नाम विश्वास खो कर वह एक पराया रास्ता अपनाती है, चाहे हमाग ही रास्ता जैसा कि हम भो कर रहे है, जात्म विश्वास खो कर उन के रास्त पर चल रहे है--तव जरूर एक खतरनाक स्थिति होगी। लेकिन अगर हम म भी यह पहचान जागती है कि हमारा रास्ता गलत नही था, कि कोई कारण नहीं है कि हम आत्म विश्वास खो वैठ और एमा रास्ता अपनाये जिस की गवाही हमारा अनुभव नही दता, या अगर हम रास्ता बदलें भी तो इसी कारण बदलें कि वह हमारा नया रास्ता है तब तो इस म कोई जाखम नहीं है । इस की सम्भावनाएँ तो एक ऐसे साक्षात्कार की भी है जिस मे दाना के लिए नयी दष्टि मिल सकती है। लेकिन फिर जो विश्व सस्कृति का स्वप्न दिखाया जाता है उस मे तो यह एक तरह से अनिवाय मान लिया जाता है कि अत्यात विरोधी स्वभाव की सस्कृतियो मे भी, अत्यत भिन प्रस्थान विन्दुओ से परस्पर प्रेरित सस्कृतिया का भी परस्पर पास आना और अतत एक हो जाना अनिवाय है, और विश्व सभ्यता', 'विश्व सस्कृति' जसी कोई एक चीज इसी तरह निर्मित होगी। तो आप यह मानते हैं कि ऐसा भी तभी होगा जब कि ये दोनो सस्कृतिया अपने-अपने तक और अपने भीतरी तक से ही अपना माग दूढ़ेगी हाँ । अपन अनुभव का जीत हुए और अनुभव के सहार जीते हुए व इस तरह के एकीकरण की आर वढती है तो ठीक है। यह सारा जितना जसा विकास हो रहा है, उस से कई समाज एक दूसरे के निकटतर जा रहे है, प्रभावो का एक दबाव भी पड़ रहा है, उस की तजी भी बढती जा रही है। और इन सभ्यताआ म जा प्राणवान् है वे प्रभावा का बड़ी आसानी से ग्रहण कर व जपना बना लेती है। और जिन मप्राण कम है, जो कि वम ही मुरझा रही थी, लगभग मर रही थी, वे बिल्कुल आत्म समपण कर ये दूसरे म डूब जाती है खा जाती है। एक दृष्टि से, बडे विचलित करने वाले ययाय की दृष्टि से, यह लगता है और इस की अनदेखी करना सम्भव नहीं है, कि किहीं मानों में अमेरिका का जसे भारतीयकरण हो रहा है योग वगरह के जरिये, उसी तरह से भारत का अमेरिकीकरण हो रहा है। एक सबसे जवान देश जिस को सभ्यता सब से ताजो या कि हाल की है, और एक सब से बूढाया कि पुराना देश? तो यह मूल्योकोया प्रभाव को अदला-बदली है, यह एक तरह का 'सिम्प्टोमटिक' कलि बड़ा 7 माहित्य की चिन्ता साफ-सा दिखाई देता है। तो 'सिम्प्टम्स'~-क्या माप नहीं मानते वि भारतीय समाज में पे बरे इस्टमिंग सिम्प्टम्स हैं, जिस तरह को नय धनाढयता है और यह टी० यो० यारर प्रति जो पिछले पांच एर यों में आपषण यह जा हमार समाज म है वह पयादा डिस्टबिग है । आपा जातुलना था, उग मजा अतर है उस का भी ध्याउ म रविणा वहाँ पर जिा लक्षणा की आर आपन ध्याा दिलाया वे गय तरह-तरह की टटोर हैं। समाज म छाटे छाट अग हैं जामि अमन्नाप के यारण युछ टटाल रह हैं। मस्पति की मुम्ब धारा उधर जा रही है, एसा नहीं है। यानी यह नहीं कह सरते कि अमरिकी मम्मता एप अनुपरण यो ओर बढ रही है। यही है कि उसमें भीतर चिता परन वाल कई पक्ष हैं। यहां पर भारत म जा मुख्य धारा है और यह भी वह मक्त हैं मिजिसका सरकार का भी अनुमादन प्राप्त है वही अनुसरण की आर प्रवृत्त है जब यि जा छोट हार टाह लेने वाले दल हैं व इस ये प्रतिकूल हैं। ता इस समय स्थिति यह है कि मुख्य सभ्यता ता अनुप रण यी है और उम में भातर छाट छाटल हैं जा अपनी पहचान करन का प्रयास करना चाहत हैं। मैं समझता हूँ कि आप का यह विश्लेपण बहुत सही है। पर तब तो यह और भी विचलित करने वाला है। हाँ। चिता की बात यही है । तव इस या मतलब यह हुआ कि इस चिता का स्प तो इतना भयावह बनता है, जसा कि हम देख रहे हैं। एक बहुत छोटा-सा उदाहरण अभी दो-तीन साल के अदर यह टेलीविजन नेटवक इतनी तेजी से फता है. लेकिन अभी से इस के परिणाम जो हम अपने सामने सामाय अनुभव से, निरीक्षण से देख रहे हैं, तो एसा लगता है कि जिसे 'रजिस्टेंस', प्रतिरोध कहते हैं वह तो है ही नहा। बरिक जो प्रभाव सास्कृतिक दष्टि से जितना ही खराब होता हे हम उस व प्रति शायद उतने हा यध्य हैं ! हाँ देखिए टलीविज़ा का नटवक जितनी तजी सपना है जिस तरह से फैलाया गया है उम म यह ता स्पष्ट था कि नेद्र को एक आवाज ज्यादा से ज्यादा दूर तक पहुँचायी जा सके, इसी का प्रयन था। और उस में जवाब म ढमरी तरफ स आन वाला जावाजमा वम सा मौका मिले। ता यह तो एक तरह म देश की आवाज को बाद कर दन का एक साधन बन जाता है टी० वी०टूसरी तरफ इस बात की ओर तो बिल्कुल ध्यान नहीं था कि यह एक नयी कला है इस' का विकास होना चाहिए। और । ६२ रचना क्यों और विन वोच अब क्यो कि यह रास्ता इतना खुल गया है, एसा प्रशस्त हो गया है--सिर्फ एक तरफ की आवाज़ दूमरी नरफ पहुँचान का-इस लिए भीतर से उस का सुधारन या क्ला का विकास परन, जनमान के जीवन को एक नयी अभिव्यक्ति देने और जन की आवाज़ दूसरे जन तक पहुँचान की जा सम्भावनाएँ इम से सुलती व तो और भी उपक्षित हो गयी है । यह ता हुआ ही है। सही बात है। फिर इस का मतलब यह हुआ कि हमे सास्कृतिक दृष्टि से भी, राजनीतिक दृष्टि से भी, बिगडने का, आत्महीन हो जाने का खतरा कोई बाहर से नहीं है, अपने ही भीतर से है। और उद्धारक तत्त्व या कि प्रतिरोध पदा करने सकने वाला तत्त्व जो है उस के लिए तो फिर सबसे बड़ा उपाय विपक्ष का या कि वकल्पिक राजनीति का ही जागरण है वही है। विकल्प तो वही है। बाहर स जो प्रभाव है वे तो होते ही है। ममथ का प्रभाव कम समर्थ पर हा यह तो स्वाभाविक प्रक्रिया है ही। लेकिन भीतर से तो विकल्प की सम्भावना है। ता जहा विकल्प है वही गलत चीज न चुनी जाय सही चीज चुनी जाय इस मी सम्भावना भी है और इस की जरूरत भी है। क्यो कि जब सत्ता के लोग-रो० वी० का ही आपने उदाहरण दिया, बडा शिक्षाप्रद और तात्कालिक प्रत्यक्ष उदाहरण है यह- सता के लोगो के द्वारा सत्ता का ऐसा दुरुपयोग किया जा सकता है और समाज मे कोई नही समझता कि यह सत्ता का दुरुपयोग है और इस से क्या उस को सास्कृतिक-आध्यात्मिक हानि हो रही है, उस का व्यक्तित्व स्तिना दुबल बनाया जा रहा है या उस का इस्तेमाल, शोषण जसा किया जा रहा है-आध्यात्मिक शोषण । तो आखिर यह उस को कौन बतायेगा, इस 'वल्लरेबुल' समाज को, कि उस का शोषण हो रहा है जो कि महज आर्थिक शोषण से भी ज्यादा भयकर चीज है और जो अगर चलता रहा तो अपने आर्थिक शोपण की भी उस को समझ कुद हो जायेगी। इस का तो निश्चय हो जवाब जो है वह सास्कृतिक, साहित्यिक उपायों के साथ-साथ और उन से कहीं ज्यादा भीतर से इस को राजनीतिक जागति के द्वारा ही दिया जा सकता है। राजनीतिक ही नहीं, एक सामाजिक चेतना भी वढनी चाहिए, हानी चाहिए। मुश्क्लि यही है कि पहले हमारे समाज मे धम का जो प्रभाव पा साहित्य वी चिन्ता एक नयी वह आज राजनीतिक का हो गया है । इस लिए सामाजिक जागति के लिए भी एक तरह को राजनीतिक जागति को पहल आवश्यक हो गयी है । आपने देखा होगा कि धम और अध्यात्म के क्षेत्र में भी आज हिन्दुस्तान मे ही जो जसली है उसके प्रति सवेदनशीलता या श्रद्धा नहीं रह गयो है जितनी कि उस को जो कि नकली है या जिस का प्रदशन-मूल्य ज्यादा है। अब एक भयानक बात यह तो हुई हो है पिछले वर्षों मे, कि समाज को जगाने का जो एक मुख्य माध्यम था धार्मिक या आध्यात्मिक व्यक्तित्व या बोध, वह स्वय भीतो दुवल हो रहा है । या क्या आप ऐसा नहीं मानते हैं ? वह दुवल है और यह तो जो बात आपने कही है वह ठीक ही है उता हरण के तिए जितन वडे से बडे धार्मिक सम्मलन हाते हैं सब के उदघाटन के लिए जयवा वहाँ मूल्यो की चर्चा के लिए राजनीतिक व्यक्ति का बुलाया जाता है और जिन से धार्मिक प्रेरणा मिल सकती वे वहा पर उपे क्षित हो जाते है। यह तो है। लेकिन यह तो जो स्थिति म है उस पा केवल एक प्रक्टीकरण है, इम म वैसी स्थिति पैदा हो जायगी यह नही है। क्या कि स्थिति ऐसी है, उम या यह लक्षण हम दिख रहा है। राजनीति क्या कि प्रदशनमूलक है और धम बिल्कुन जरूरी नहीं है कि प्रदशनमूलक हा, इस लिए पहल तो इस प्रदशन को ही अभाय कर सके यह सम्भावना हमे पैदा करनी चाहिए। धम ता यह बात नहीं मानता कि काई चीज क्या कि दीखती है इस लिए सच है। इसी बात को पहले ता काटना चाहिए। जाप के चितन मे एकाधिक बार यह तथ्य या यह सकेत उभर कर आया है कि यहा भारत मे बुद्धिजीवी को वह भूमिका या वह परि भाषा अभी माय नहीं हुई है जिसे कि पश्चिम में 'इलिजेंशिया' कहा गया है और जिस का वास्तव मे कुछ दबाव, कुछ प्रभाव समाज पर, राजनीति पर, साहित्य पर पड़ता है। वह एक शक्ति है । तो उस तरह की बात जब आपने लिखी थी तब से आज तक आप क्या समझते है कि भारत मे बुद्धिजीवी वर का वसा कुछ विकास या कि मूल्य उभरना शुरू हुआ है ? या क्या उम्मीद की जा सक्ती है इस 'इटेलिजेंशिया' से भारत मे' अभी ता एमा हुआ नहीं लगता है। अभी ता उस की पराधीनता या पर निभरता ही कुछ बढी है । इस लिए उस का स्वर स्वाधीन चेतना का स्वर हा ऐसा ता नही है। और इस तरफ अभी कुछ विशेष उन्नति भी नहीं हुई है। ६४ रचना क्या और दिन के बीच तब तो यह और भी निराशाजनक स्थिति है जब धार्मिक 'अयारिटी' के स्रोत पहले की अपेक्षा सूख गये हैं या विकृत हो रहे हैं, और राजनीतिक 'अथारिटी के स्रोत तो अप्रामाणिक या विकृत हैं हो। तब जो एक तीसरी चीज़ प्रेरणादायक हो सकती या जो इस भ्रश को प्रतिरोध दे सकती वह तो फिर अनिवाय रूप से एक बुद्धिजीवी वग का उदय ही हो सकती थी। वही एक विकल्प हो सकता था। जनता को हम किस लिए जिम्मेदार ठहरायेंगे ? मान लीजिए कि यूरोप की तुलना मे हि दुस्तान का मध्यम वग अगर ज्यादा प्रलो भनग्रस्त है या प्रलोभनो के सामने कमजोर है, उस मे आतरिक प्रतिरोध कम दिखाई देता है, तो उसके इस भ्रश के लिए जिम्मेदारी फिर कहीं न कहीं बुद्धिजीवी वग पर ही आती है। तीसरी सम्भावना तो यही है । अगर यहा धम सस्थान का वह स्थान नहीं है--और यहा इस देश में उस तरह का धम-सगठन रहा भी नही है जैसा कि पश्चिम मे हुआ क्या कि धम भी मतवाद वेद्रित धम नही था यह तो मैं उसकी प्रशसा ही कर रहा हूँ, लेकिन तथ्य यही है कि यहा ऐसा नही है--तो यह ठीक है कि तीसरी सम्भावना फिर एक विवक्वान् वग से यानी बुद्धिजीवी वग से हो सकती है। लेकिन मुश्किल यह है कि ऐसी परम्परा मे जसो भारत को परम्परा है, जो कि यूरोप से स्पष्टत अलग परिभाषित की जा सकती है, उस मे ऐसा सीधा प्रभाव डाल सकने वाला, हस्तक्षेप कर सकने वाला बुद्धिजीवी वग तो उस तरह से मान्य नहीं होता-यानी उस अय मे 'इटेलिजेंशिया' ही नहीं होता, क्यो कि मा यता प्राप्त होने पर ही किसी का अस्तित्व एक तरह से जायज और सगत होता है। तब फिर मान लीजिए हमारो जनता मे कोई सच्चे बुद्धिजीवी हैं भी, आप को परिभाषा से निकलते भी हैं, तो समाज से उन को मान्यता प्राप्त नहीं होगी। फिर क्या यह भी एक जटिल परि- स्थिति नहीं है कि किसो समाज को क्सिी हद तक बुद्धिजीवी को जहरत ही महसूस न हो ? आप देखिए कि कवि भी एक तरह का बुद्धिजीवी है पश्चिम के मुताबिक, लेकिन जो अपने युग के सब से समय, सबसे सवेदनशील कवि कहे जा सस्ते हैं, या जिहें आज के भी समय कवि कहा जा सकता है, उन को कविता के प्रति एकाएक वसी दिलचस्पी या ऐसो जिज्ञासा अमूमन अब पढ़े लिखे लोगो को नहीं होती। अभी कल मैं रेडियो पर कवि-सम्मेलन मे वठा हुआ था, सभी खासे पढ़े लिखे लोग वहा थे, और मुझे ऐसा लगा कि साहित्य की चिन्ता ६५ उन मे मुश्किल से पाच प्रतिशत भी ऐसे होगे जो कि उस कविता को पढते हो जिस मे वह बौद्धिक कर्जा है, जो भारत के जन मानस का प्रतिनिधित्व करनी हो-और जो कविता के स्तर पर भी यानो 'एस्थेटिक' मानदडो पर भी खरो हो। यह नो फिर आपने जो उदाहरण लिया है वही गलत जगह से लिया है, गलत चुनाव पर आधारित है। रडिया कवि सम्मेलन से आप एसी आशा करें क्यो? लेकिन मैंने तो देखा है कि इस देश मे अभी तक कवि के प्रति एक तरह की आस्था है । इस लिए मैं सोचता हूँ कि यह सम्भावना तो जभी है कि कवि प्रबुद्ध धग का प्रतिनिधि बन सके । अभी यह सम्भावना मिटी नहीं है। हा जाज की वास्तविक स्थिति एसी नही है । यह तो मैं कहना चाहता था कि कवि के प्रति, कवि रूपी 'इटेलि जेंशिया के प्रति, आज भी समाज सवेदनशील है। हालाकि यह भी है कि पिछले चालीस पचास वर्षों मे हमारी कविता मे अनिवाय कारणो से जो बौद्धिक सस्कार आया है उस के प्रति अभी 'रजिस्टेंस' है, यह मै कहना चाहता था। जभी उस कविता को स्वाभाविक तौर पर स्वीकार लिया गया हो, उस का स देश पढ लिया गया हो, सुन लिया गया हो-ऐमा अभी नहीं लगता है। हा लेकिन यह मान भी ले कि एसा अभी नहीं हुआ तो भी यह ता है कि कवि के प्रति एक उमुखता है। उस का कारण तो सस्कार में है। वही सही । लेकिन वह भाशा का एक के द्र तो है। षया कि जन मानस को धामिर-आध्यात्मिक चातें भी, उपलब्धियाँ भी काव्य के जरिये ही रिसीव' करने का ही अभ्यास रहा है। इस लिए यह 'पाजिटिव' बात तो है । लेकिन जाधुनिक शास्त्रों के भीतर से आने वाले बुद्धिजीवी मे और साहित्यिक बुद्धिजीवियों मे भी कुछ आमना-सामना हो लेकिन वह तो है ही नहीं। शमशेर को गलत जगह पर रख कर यह नही कहूँगा कि 'जा नहीं है उस का गम क्या" पर साहित्यिक बुद्धिजीवी' और शास्त्रीय बुद्धिजीवी जसा प्रामक विभाजन हम क्या स्वीकार करें यदि किसी भी विद्यानुशासन से आ सकता है हां कुछ उम स बाहर के भी हागे । (हिंदी म साहित्य पाराम दूसरी विद्याआ म दीक्षित नागा का अनुपात कुछ कम है, पर बुल मिला बर ना एस लाग वढ रह है जा दूसरे क्षमा म निष्णात हा वर साहित्य रवा म आत है।) पर फिर सभी को बौद्धिकता को हम एक स्तर पर तो नहीं रयत । पश्चिम म ता पशेवर सभी लाग इंटेलिजेंशिमा ६६ रचना क्या और दिन के बीच मे आ जाते हैं। यहां, उदाहरण के लिए वकील के बारे मे हम थोडे सतर्क रहत हैं । मैं जो कभी कभी 'बुद्धिजीवी' और 'बौद्धिक' म भेद करता हूँ बह इसी लिए । जिस सस्कारिता की बात आपन कही, उसमे भी बुद्धि से आजीविका कमाने वाले आदमी की वह प्रतिष्ठा नही थी जा कवि की या अध्यापक की--पुरानी परिपाटो वा अध्यापक विद्या दान की बात करता था, वेतन या फीस नहीं लेता था। मैं इस बात को यो कहना चाहता हूँ कि बौद्धिक या प्रबुद्धचेता व्यक्तिपी प्रतिष्ठा का उस मे और निरे बुद्धिजीवी म अन्तर का-एक आधार यह भी रहा कि बुद्धिजीवी' वह जो बुद्धि के सहार समाज का दुहे (चाह मर्यादाओ का निवाहत हुए ही दुह), और 'बौद्धिक' वह जा समाज का कुछ द, समाज के लिए कुछ छोडे । वौद्धिकता की कसौटिया मे इस निस्पृहता को भी जोडना, जोडे रखना मेरी समझ मे गलत ता नही था। यदि आज का पढ़ा लिखा समाज यही मानता है कि 'बिना स्वाथ के काई कुछ नहीं करता, और अगर किसी कास्वाथ दोख नही रहा तो उस से और अधिर चौकन्ने रहो', ता यह समाज का दुर्भाग्य ही है, यथाथवादिता नही है। यथाथ यह है कि जाज भी मानव को जादर्श ललकारते है भाव विगलित भी करते हैं और प्रेरणा भी देत है-समूह को भी और इकाइया को भी। ऐसे लोग बहुत थोडे दीखते है, और कम भी हात जा रहे हैं इस लक्ष्य कीजिए और दुखी हाइये, जरूर होइये ---पर वह जो छोटी सी ज्योति है उस भी अनदेखा क्यो कीजिए ? बल्कि जब तक वह है तभी तक तो बौद्धिक के लिए भी करने को कुछ है, तभी तो बौद्धिक भो नाप वो दीखेगा-नही तो टोटल अधकार में वह भी कहाँ है ?* * डॉ. रमेशचन्द्र शाह और अजय के बीच यह सवार मार १९८५ मे दिल्ली महा। टैपकी प्रतिलिपिमा प्रकाशनीय रूप देन के लिए उस का यसिचित समादन अजय द्वारा किया गया। साहित्य की चिन्ता ६७

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व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन राजी सेठ से दो सवाद

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१ राजी सठ अज्ञेय इतने समय से आप लेखन मे हैं। ऐसे साक्षात्कार की स्थिति बार- बार आती है तो इस के बारे मे आप को क्या प्रतिक्रिया है ? क्या उपयोगिता आप समझते हैं इस फो? उपयागिता ता हा मक्ती है । लेखन के साथ उपयागिता लेखन सम्बधी प्रश्ना की हो सकती है। वाकी ता प्रश्न पर निभर करता है कि क्या उपयागी होगा। पर यह भी तो है न कि प्रश्नकर्ता की जो मूल मशा है वह उधेडने की है या जोडने की या सवाल को निकलवाने की या रखने की। उस से भी ये सारी चीजें ज्यादा प्रभावित होती हैं। उस स भी होती है । उस को एक उपयागिता यह है कि अगर लेखक के वार म कुछ नही मिलता ता प्रश्नकर्ता के बारे म कुछ मिल जाता है प्रश्नफर्ता तो साक्षात्कार मे 'इम्पाटेंट' नहीं है । मूल तो यह है कि आप के बारे मे जाना या सुना जाये। वह है तव तो उपयोगी होगा। नहीं तो नहीं होगा ? अच्छा, यह नहीं लगता कि बार-बार यह स्थिति जाती है, अपने बारे मे इतना ज्यादा कहना पडता है, तो उस मे अपने ही कयनो के विरुद्ध जाने का खतरा ज्यादा रहता 7 वह खतरा है और अगर है ता उस खतरे का सामना करना चाहिए। यह भी तो है कि बहुत-मै प्रश्न सामन जात है जा हा सक्ता है लेखक ने पहले टाल दिय हा या जिन पर विचार न किया हो। अगर विचार करने कायाध्य होता है तो उस म कोई दोप भी नहीं है। उस का एक रूप यह भी तो हो सकता है कि आज हम जो सोचते हैं कल न सोचते हों उस बारे मे ! इस तरह का विरोध यह तो कोई विरोध नही है । यह तो आशा करनी चाहिए कि आज जा सोचते है उस में से बहुत सा कल नही सोचेंगे । मतलब उस को आप एक विकास की क्रिया के तहत रखेंगे? जस जो खतरा उस मे हो सकता है वह बिल्कुल दूसरा है। मेरे जसे व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन ७१ आदमी के लिए शायद ज्यादा है। जाया भी अपन बारे में और अपन लेखन के बारे में बहुत मोचता है उस के लिए एक खतरा यह है कि उमम अपने सोचने के बारे में ही एक पात्म चेतन भाव आ जाप जा लेखक के लिए आवश्यक नहीं है। अच्छा, इस सवाल को हम दूसरी तरह से देखें तो यह जो 'सिस्टेंसी' है मूत्यां पे बारे मे, आदर्शों के बारे मे, विचारों के बारे मे, उस का जो स्तर है वह एक तरह से काफी सधा हुआ है, यानी उन प्रश्नो का जमाव हमे हर रचना मे, हर रप मे, उस मे गढ हुए हर पान मे, हर स्थिति में बार-बार मिल जाता है । मैं साचता हूँ कि यह जाशा करनी चाहिए कि मूल्य-सम्बधी बहुत से प्रश्नो का जवाब तो सधा हुआ होना चाहिए काफी पहले से, लेकिन उस म जार सशोधन कुछ होता है ता वह भी हा सरना चाहिए । लेकिन थुनियादी तौर पर कुछ चीजो के वारे म ता पहले से एक स्पष्ट सक्त मिलना चाहिए। उस को मैं अच्छा ही समझूगा । अगर नहीं मिलता है तो दोप है। पर यह जो मूल्यो की चर्चा बार-बार जायो है आप के लेखन मे हर तरह से उस को आपने हमेशा इस रूप मे प्रस्तुत किया है जसे हमारा जो इस वक्त का जीवन ययाय है उस से ऊपर कहीं उस की जगह है । तो इस को अनिवायता को आप क्यो महसूस करते हैं कि हमेशा मूल्य जो हैं वे जीवन के ययाय से आगे की चीज हैं ? नहीं। मैं यथाय के जथ को भी विकसित करता हूँ जब मूल्या की चर्चा भरता हूँ, क्या कि उस को ययाय से बाहर या उस के प्रतिपक्ष में नहीं रखता। अगर हम कहते है कि यह सत्राति का युग है या कि परि स्थितिया बनल रही हैं और मूल्य बदल रहे हैं तो इस बात का ठीक-ठीक अथ समयने लिए भी जानना जरूरी हो जाता है कि क्या थे और उन के बदले म कौन से नये मूल्य आ रहे हैं उन का आधार क्या है। और अगर कोई नही आ रहे है तो भी कौन से पुराने मूल्य थे जो कि नष्ट हो रहे हैं और उस का क्या कारण है । इम लिए जसे ही हम यह कहते हैं कि सक्रमण हो रहा है या चीजे बदल रही है वसे ही यह सवाल ज़रूरी हो जाता है कि क्या है जो बदल रहा है। तो उस का कोई ऐसा परिभाषित रग-रूप तो नहीं देखा जा सफ्ता। समाज और व्यक्ति के 'इटर एक्शन के रूप मे ही कुछ मूल्यो को घटित होते देखा जा सकता है। मतलब हम किसी घोड कोले पर यह नहीं कह सकते कि हम इस निश्चित मूल्य की तरफ ७२ रचना क्या और दिन के बीच जायें। अतत उस को जीवन सत्य से मूल्य पहले से दिये हुए है या अलग रखे हुए हैं ऐसा तो नहीं। लेकिन एक अथ मे दिये हुए है, क्यो कि पूरा एक जो समाज का सस्कार है, उस का जो इतिहास और उस की जो जात्म चेतना है उस मे तो मूत्या को एक चेतना है । यह हो सकता है कि हम उस के बारे म सजग न हा, लेकिन अगर चेतन रूप से उस पर विचार करते है तो दिखेगा कि हमारे समाज म ये मूल्य रह । काई भी समाज कोई न कोई मूल्य मान कर जीता है। अगर वह यही मान लेता है कि सब कुछ बदल रहा है इस लिए टिकाऊ मूल्य कोई नहीहै, तो यह भी एक पूरी जीवन-दष्टि है जिस को मूल्य कह सकते हैं। पर आप को यह नहीं लगता कि पश्चिम मे एक तरह का कलात्मक समाज होता है या जिन को मानसिकता कुछ ज्यादा विकसित होती है। जादर्शों और मूल्यो को बात या उस की चर्चा से उन का ज्यादा नजदीको सरोकार होता है बजाय इसके कि सामाय जन के बीच हम इस तरह की किसो चेतना को समझ सकें या देख सकें। और यह उस का भी परिणाम हो सकता है। यह तो एक तरह से स्वयसिद्ध वान है । जीवन के बाहरी प्रयोजन ही जिन के लिए प्रधान है वे भीतर जड मे जा कर नही देखते हैं, और भीतर जिन का ध्यान है या जिन का सवदन एसा है कि उस की तरफ ध्यान दिये विना नही रह सक्त, वे यह भी सोचते है कि हमारे जा ये प्रयोजन हैं उन के औचित्य को हम किसी क्सौटी पर परखते रहे। कहीं आपने यह बात लिखी है कि मूल्यो मे निष्ठा तो पहले भी थी और अब भी है, लेकिन मूल्यो के विघटन का ऐसा तोखा बोध पहले नहीं था, अब है। यह बात आपने बार-बार 'पाइट आउट' को है। जब यह अहसास मन में हो जाता है तो क्या आप को यह लगता है कि इस के साथ रचनाकार की भूमिका कुछ बदल जाती है या रचनाकार की भूमिका बदल जानी चाहिए? नही। जहाँ तक इन वे प्रति सजग रहन का प्रश्न है, वहा तर ता नहीं बदलती। अगर वह सवेदनशील या ग्रहणशील यत्रता वह ग्रहण करता है, यही है कि उस का ज्यादा तज परिवतना की ओर ध्यान देना पड़ता है। पहले वे समाज काफी स्थायी थे, जो सस्थान या पयादा टिकाऊ था, चीजें बदलती ता थी, पर अपेक्षया धीरे बदलती थी और लगातार ऐसा नहीं लगता था कि हम सकटग्रस्त हैं। आज-क्त चीजें प्यारा तेजी से बदलती हैं और यह भी लगता है कि जव तर हम एक चीज को पहचान व्यक्ति दुप, आस्था, आत्मालापन पर अपनायेंग पि यह मूय है सर तप उमय आधार बदल गय होंगे। इस लिए एम मगे तरह पे राक्ट या बाध हा है। यह ता परिवतन यो गति पर जाधारित है। यह नहीं है यि मून्य नहीं हैं, यही है कि जिस मस्थान वे गाथ जुटत है यह इतनी तजी स टूटता और बरलता है कि एक नयी तरह पी मनकता की आवश्यकता होती है। अच्छा, अव ययिता ये बारे में यह यताइपे कि जो पयिता के क्षेत्र हैं या जो पविता को एक मुख्य विधा के एप मे रसते हैं उन मे एक स तरह का श्रेष्ठता-बोध होता है जसे नरेश मेहता तो यहाँ तक लिखते हैं कि यह कहानी या इस प्रकार ये 'रिफ्लेस्टिव' साहित्य को पढ़ना भी पस द नहीं करते। इस का या कारण है ? क्या यह समझा जाये कि कविता सब से ज्यादा पर्याप्त विधा है अपने आप को व्यक्त करने की? श्रेष्ठता-बाध की बात मैं तो नहीं मानता। आप नहीं मानते, पर यह बात मानी तो जाती है। क्यो कि आपन लगभग हर विधा मे लिखा है,~यात्रा विवरण से ले पर- यह भी कारण नहीं है कि मैंन ऐसा किया है, न भी किया हाता ता भी यह न समझता। लेकिन यह जरूर साचता हूँ कि काव्य म बहुत-सा जो जनावश्यप है जग्रामगिर है उम का छोड़ कर जो मतलर की बात है उसी तक सीमित रहा जा सकता है, उसी पर ध्यान केन्द्रित किया जा मक्ता है-अपक्षया अधिक गहगई से और कुछ कम विस्तार म । ता इम लिए सच के निकटतर जाने की या अनावश्यक वाताम न बहकन की सम्भावना कविता के साथ अधिक है। यह तो किसी भी विधा मे हो सकती है अगर उस के 'फ्रेमवक' मे काम किया जाये इम को या मी कह सकता हूँ कि कविता म कोई वात दस पन्द्रह पक्तिया मे कही जा सकती है जो-यह नहीं कि उप यास म कही नही जा सकती है लेकिन सम्भव है कि- नहीं कही जा सकती वसे तो। और उस के साथ बहुत कुछ ऐसा भी कहना पडता है जो कि वास्तव म जनावश्यक है लेकिन उसी मदभ में रख कर वही दस पक्तियो वाली सच्चाई सामने लायी जा सकती है । यह भी कह सक्त है कि ज्यादा सधन रूप म बात काव्य म कही जा सकती है। क्या कभी आप को ऐसा लगा है, किसी कविता के बारे मे ऐसा लगा है, कि इस को किसी दूसरी विधा मे कहना था या किसी ७४ रचना क्या और किन के बीच दूसरी विधा मे जो कहा है उसी को कविता मे कहा गया है ? इस तरह की कोई 'इटर रिलेशनशिप' महलस को है आपने ? इस तरह की बात दूसरे दर्जे की कविता के बारे म हो वही जा सकती है जिस म कि आप जा 'कविता में कहा गया है। उस को आप जा 'कविता है' उस से अलग कर सकें, नहीं तो जो कहा गया है जैसे कहा गया है, जो भी आकार प्रकार है, वह सब एक इकाई होता है। यह आप को शुद्ध कविता की 'स्टेटमेट' हुई । शुद्ध कवि ऐसा कहता है, दूसरा आदमी ऐसा नहीं कह सरता। एष यह कि फरिता मे 'वयक्तिक में' और 'निर्वैयक्तिक में इन मे क्या भेद करेंगे आप-'पसनल आई' और 'इम्पसनल आई। ? इस का जवाब देने की कोशिश भी करने से पहले कहूं कि समाज भी एक तो वह समाज है जिस का मैं पहचानता हूं यानी जिसे व्यक्ति रूपी इकाई पहचानती है इस लिए वह उस का समाज है । और एक समाज वह है जिस का काई ऐसी इकाई पहचाने या न पहचाने फिर भी है, यानी समाज भी एक विषयो पर आश्रित है और एक विषयी निरपेक्ष समाज है । उसी तरह व्यक्ति के भी दो रूप हैं । जिस के बीच से निकलता है यह ये दोना बातें जुड़ी हुई है, एक से अलग कर के दूसरी बात कुछ विकृत भी हो जा सकती है । और व्यक्ति विषयी तो है ही। विपय अलग होता है। बाहर से देखने पर तो हम उस को एक इकाई मान सकते है । लेकिन कोई भी अपने बारे म या जपने जनुभव के आधार पर या अपनी जमीन पर खडे हुए जो कुछ भी कहता है, उस मे से विपयी यानी सब्जेक्ट को ता अलग नहीं किया जा सकता। लेकिन इस के बावजूद वह जानता है कि इस समाज में मेरी एक स्थिति है जा मेरे अपने जाप के पक्ष से अलग भी है, और जितना वह इस दूसरे पक्ष का भी जानता है, यानी अपने ही निर्वैयक्तिक पक्ष का, मैं समझता हूँ कि उतना ही वह अपने पहले के यानी विषयी पक्ष को भी पुष्ट ही करता है। और ऐसे लोग हात है, लेखको मे भी कुछ एमे हैं जिन का 'मैं सिफ वही यानी विषयी 'मैं' है, और उसके बाहर कुछ नही है। हो, वही कहते हैं न, आप के इस मे विषयो 'मे' तो नहीं दिखता। इस से आगे नहीं दिखता यह कसे कह सक्त है ? वह भी है लेकिन लगातार वह भी है, केद्र मे है, लेकिन वहीं तक सीमित नहीं है। वहा से व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन ७५ फिर निवैयक्तिक मैं की धारणा निकलती है क्योंकि वह वहां सीमित नहीं दिखता, ऐसा नहीं लगता कि जो कुछ हो रहा है हव खाली उस विषयी मैं और मै को ही हो रहा है यानी उस के अलावा भी हो सकता है। मैं सिद्धान्नत भी मानता हूं और जीवन म कोशिश भी यह करता रहा हूँ कि व्यक्ति का जा दूसरा पल होता है उस पी पहचान बनी रह और विस्तृत होती रह और जो विषयी है वह उस मे लय होता रह। तो एक 'लाजर पसपेक्टिव हो जाता है । एक जगह आपने लिखा है कि काव्य रचना की प्रक्रिया में सामाजिक का, 'आडिएस' का एक स्थान होता है, जसे-जसे 'ऑडिएस' बदलती है, काव्य-रूप बदलता जाता है । इस क्थन के रहते कवि के अपने अनुभव वृत्तों की प्रासगिकता को क्से स्थिर किया जाये? यह ता इस पर निभर है कि अपने' का क्या मतलब है । अपने का मतलब काई समाजातीत ता है नही, मैं जो भी हूँ, मेरे समाज का जो बोध मुझ में है वह भी मेरे उम अपनेपन का अग है । और अगर मैं मानता हूँ, जसा कि मानता हूँ, वि काव्य या कि कोई भी कलाकृति ज़रूरी तौर पर सम्प्रेषण की एक किया है तो उस मे एक दूसरा पक्ष जरूरी तौर पर होता है वह सामाजिक है । कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं या मानते है कि सिफ अपनी अभिव्यक्ति होती है। यह तो मुझे आत्म प्रवचना मालूम होती है क्या कि जभियक्ति भी किसी दूसरे पर होती है। यह जानना चाहिए कि कही न कहो क्सिी दूसरे पर होती है तभी अभिव्यक्ति कहते हैं ? इस का ज्ञान है कि दूसरा है, अगर अभिव्यक्ति होती है । उस रूप म नहीं होतो। दूसरा बन कर सम्प्रेषण के 'लेवल' को बात कर रहे हैं आप? तो फिर इस मे क्या आप कविता को इस अथ मे नहीं मानेंगे कि कविता को किसी आतरिक दबाव मे लिखा जाता है, किसी बाहरी दायित्व से नहीं लिखा जाता? बाहरी दायित्व तो नहीं है। लेकिन अगर दाता मैं हूँ ता दायित्व भी जरूरी नही है कि बाहर से हो। यानी बाहर से किसी को मुझ से कुछ वमूल करना है और उस को मे अदा कर रहा हूँ, यह भाव नहीं है। मेरे पास कुछ न का है मैं माचता हूँ कि मुझे यह देना चाहिए यह दायित्व दूसरे प्रकार का है। इस मे ऐसा भी तो बहुत कुछ हो सकता है जो आप को लगता हो, ७६ रचना क्या और विन के बीच ? देना चाहिए या दे सकते हैं, जिस का सम्बध एक आतरिक 'एनरिचमेट' से है, लेकिन फिर भी उस को आप किसी भी कारण से कुछ सकोच से सोचते हो क्यो? इस सवाल का जवाब आप दें कि क्यो आप ऐसा सोचते हैं। कहीं 'अतरा' मे आपने लिखा है कि मै ऐसा सोचता हूँ कि बहुत-सी चीजें हैं जो भावात्मक या वचारिक स्थितियो को 'एनरिच' कर सकती हैं, लेकिन इस के बावजूद मै उन के बारे मे नहीं कहता हूँ। आप उस को जिस सदभ मे भी रखें, जसा भी सोचें। मुझे याद नही, कहा कहा है। १८ पेज पर है। अपन को एनरिच करती है या कि दूसरे को एनरिच करती है ? दूसरे को 'एनरिच' करती है। 'मै इस मे से हो कर गुजरा हूँ, पर उस से दूसरा 'एनरिच' होता है क्यो कि उस सारी सघनता को मैंने जस्र जिया है पर मै कहता हूँ दूसरे को इस तरह का भाव तुरत तो याद नही आ रहा है, लेकिन अगर उस का अथ यह है कि उस को देय मानने से पहले उस का मूल्याकन करें कि सचमुच ऐसा है तव तो ठीक है । मुझे नही मालूम मैंने क्या लिखा है । आप को एक आतरिक रिजर्वेशन' हो सकता है उस के बारे मे अगर इस को दूसरी दृष्टि से देखें, जैसे कहा जाता है कि तथ्य और सत्य के बीच मे भेद आप करते हैं, या कुछ अनुभवो को पहने लायक समझते हैं, कुछ अनुभवो को छोड़ देते हैं । क्या यह उस के तहत तो नहीं है। छोडते हैं तो क्या छोडते है यह सवाल उठता है । तथ्य और सत्य के बीच म तो कुछ के साथ रागात्मक सम्बध की वात मैंन वही है । वे तथ्य मेर लिए क्तिने मूल्यवान् हैं, और यह वात क्तिना महत्त्व रखती है कि वे मेरे माध्यम से दूसरे तक पहुंचें? नही ता तथ्य तो ससार मे भरे पडे हैं । वाकी वाई ननुभव क्यो राक लेता हूँ दूसरे तक पहुंचाने से, वही न कही तो इस बात का मूल्याकन होना चाहिए। मेरे लिए सत्य हो कर भी। यह सवाल तब उठता है अगर उस के साथ यह बात मान ली जाये कि यह किसी न किसी तरह से एक 'एनरिचमेट' का साधन है। तभी यह प्रश्न उठता है । नहीं तो बहुत कुछ होता है जो कहना तो उरुरी नहीं है । यह बात तभी उठती है कि हम उस को क्यों छोड व्यक्ति, दुख, आस्या, आत्मालोचन ७७ 7 ? देते हैं और मैं फिर देखूगा कि मेंन ऐसा कहा है। अच्छा, इधर को जो कविता है उसमे जो इतनी जानामकता है या 'डायरेक्टनेस' है उस के इस रग रूप या तेवर को आप कहते हैं कि कविता ज्यादा बोलती है या आप को लगता है उसके मूल श्रम से कोई 'डेविएशन' हो गया है, कविता का जो मौलिक क्म है, जिस तरह से कविता 'कसीद' को जानी चाहिए। डायरेक्टनेस तो अलग चीज है और आनामक स्वर अलग चीज है । बात डायरेक्ट हो सकती है बिना नाकामकता के । और आक्रामक होते हुए भी बहुत सम्भव * कि वह डायरेक्ट न हो। यानी जो कहा जा रहा है वास्तव म उस से कुछ बिल्कुल दूमरी बात कही जा रही हा आनामक रूप में। तो भाषा आमामक हो इस को मैं बि कुल आवश्यक नही मानता । और न सिफ आवश्यक नही मानना बत्कि कवि कम से स्खलन मानता हूँ। स्खलन मानते हैं । इस रूप मे आप उस को 'डेविएशन' समझते हैं । आप कहते है कि बात स्पष्ट कही जा सकती है, लेकिन जरूरी नहीं है कि जाकाम हो आगामक नहीं होनी चाहिए। 'चौथा सप्तक' मे आपने जो चुनाव किया है क्या उस को यह समझें कि आप उस को ऐसा मानते हैं कि कविता इस तरह की होनी चाहिए? नहीं, ऐसा काई विधान मेरी तरफ से नही है। पहले भी कभी नही रहा और इस समय भी नहीं है। तो फिर इस के बारे मे जितना शोर है, पता तो है ही आप का अपना क्या दष्टिकोण है इस बारे मे, 'चौथा सप्तक' के बारे में? चौथा सप्तक का कम स क्म इतना मान लीजिए कि एक सम्पादक जा कि कविता भी लिखता रहा है उस की दष्टि में इस सक्लन म जो चीजें हैं वे अच्छी हैं। और उस को एक परम्परा है । यह नहीं है कि उस के बाहर और अच्छे कवि नही हुए । यह भी नहीं है कि इसी तरह लिखना चाहिए । इमस भिन ढग भी हा सकता है। फिर और वहुत सा वाते हैं । और भी कवि उस अवधि के अच्छे रह और मैं जानता भी हूँ वि अच्छ रह, लेकिन वे इतन प्रसिद्ध हा चुके हैं कि इस तरह के सक्लन म उह लान की ज़रूरत नहीं थी। उन के बहुत-से सग्रह भी छप जाप को। रचना क्या और किन के बीच चुके, उन को स्वीकृति भी मिल चुकी है। इस लिए वे इस म न भी हा तो यह नहीं है कि उन पर मेरी तरफ स वाई जजमेट है या गि उन का काई अहित है। वे तो आ गये काव्य माता चाह जिस कारण, चाहे मुविधान मिलने स, चाह जम भी, जितनी उन की कविता की पात्रता थी उतना ये यवि प्रयाश में नहीं आये थे तो उह प्रकाश में लाया गया। और शुरू से यह रहा है । कभी कभी ऐसा भी हुआ है इस सग्रह मे तो नहीं, इस से पहने कुछ एक-आध पवि जिस में अपनी तरफ से चाहता कि सप्तक म शामिल करूं और उस कवि की इच्छा नहीं थी, या कि तोगो ने उस को राप दिया, जो भी कारण हो। और कभी कभी यह भी हुआ कि कुछ लागा न और कुछ सवलित पवियो न यह भी चाहा कि अमुक का भी जरुर हमारे साथ रखा जाये और मैंने वह स्वीकार नही किया। यह सब हुआ। पहला जो सप्तक था उस मे और इस के बीच जो प्रभाव का भेद है, जिस तरह से वह परिसीव किया गया इस के बीच मे इस 'फेज' को जाप कसे देखते हैं? तार सप्तक और चौथा सप्तक म, या और आगे कोई आये उस के बीच मे कुछ भेद तो रहगे ही और वे बढते ही जायेंगे। एक तो समय की दूरी के कारण है । तार सप्तक जव निक्ता तब इस तरह की कविता सामाजिक का माधारणतया स्वीकाय नही थी । ता उस को समयाने की जरूरत थी, उस पी व्याख्या करने की ज़रूरत थी उस के लिए पाठक को दीक्षित करने की जरूरत थी। वह सब काम तार सप्तको किया। पिछले सप्तव तर आते-आते वह पक्ष अनावश्यक हो गया था । और यह भी था वि आदमी आगे कुछ करे या न करे उन तो उस की बढती जाती है, तो नये कविया के बीच म मैं धीरे धीरे पुराना कवि माना जाने लगू यह हाना ही था, होता भी गया । और फिर जब लोग दशका की दष्टि से साचन लग तो यह बात और भी फ्यादा बढ गयी। तो उम्र में उन कधियो से बडा हूँ, पहले स लिखता आया हूँ, ये सब तो परिवतन हैं जो मेरे वश के नहीं है। लेकिन फिर भी जो अपक्षया नय रहे उन को रचनाएँ पढता रहा हूं उन के बारे मे सोचता रहा हूँ, कभी-कभी किसी ने कुछ राय भी मांगी है तो उसे राय भी दी है पाडुलिपि देख कर और उस मे जो मुझे अच्छा लगा है उस की प्रशसा की है । और अगर यह भी देखा है कि उस को प्रकाशक नहीं मिल रहा है तो उम को प्रकाश मे लाने मे कुछ याग भी दिया है मैंने । तार सप्तक के समय यह मेरे लिए ज्यादा कठिन था, अब कुछ कम कठिन है । उस समय वह मेरा काम भी नहीं था। इस लिए व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन ७६ नये कवि को कुछ इस तरह की अपेक्षा भी अब मुझ से ज्यादा होती है, पहले इतनी नही थी। और उस के साथ साथ यह भी है कि मैं ऐसा कोई भी काम करूं तो उस की निराधार आलाचना भी पहले से कहीं ज्यादा होती है। हाँ, यही कहते ह कि यह चीज हताश भी तो करती है कि इतने उदात्त भाव से जो काम किया गया है यह तो स्थिति है, अगर और जो पाठक लाग हैं उन को दीखता है कि इस मे क्या सही है, क्या गलत है तो ठीक है। मुझे उस के बारे मे और कुछ कहने की जरूरत नहीं है। 'अच्छा कवि' और 'वडा कवि', इन मे कुछ भेद करेंगे आप? होना तो चाहिए। पहली बात तो यह पहूं कि अच्छा कवि जरूरी तौर पर बडा कवि नहीं भी हो सकता है लेकिन यह कहते अभी थोडा सकोच होता है कि यह भी सम्भव है कि वडा कवि अच्छा न भी हो-सिद्धातत तो मानता हूँ कि यह बात भी कह सकना चाहिए लेकिन उतने ज्यादा विश्वास के साथ नहीं कह सकता । अच्छे कवि मे पहले तो उस का निर्दोष होना आवश्यक है। निर्दोष क्सि दृष्टि से यह तो सम्भव है कि कोई दोष हमे उस मे न दिखे फिर भी उस को बडा कवि हम न मानें। इस लिए अच्छा तो कह दें, या कि थोडा सा विशेषण और जोड कर कहे कि 'अच्छा खासा है, साफ-सुथरी कविता लिखता है, वगैरह वगैरह-बहुत कुछ कह सक्त हैं लेकिन बडा कवि न भी माने । बडे कवि की कविता मे कभी कभी दोष तो दीख सकते है लेकिन उस के आधार पर यहा तक जा सक कि कह सक कि अच्छा कवि नही है यह मुझे ठीक मालूम नही पडता । इस लिए यह कहूँ कि अच्छे कवियो मे जिस कवि के बारे मे हमे यह भी लगता है कि इस की मानव के बारे मे समग्र दष्टि है जिस से कि हम उस को पहचान कर इस कवि की सहायता से अपन से कुछ बडे हो जाये तब मैं कहूंगा कि वह बडा कवि है। और जिस में ऐसा नहीं है लेकिन जिस की कविता सुख देती है तप्ति देती है थोडा-सा हमारे सवेदन का विस्तार भी कर सकती है वह हम कहेगे कि जच्छा कवि है। एक बात बताइये। आप की कृतियों मे दुख की एक बहुत गहरी पहचान ह सब जगह और दुख के सारे शेडस भी उस मे चित्रित किये हुए है, लेकिन यह ह कि उस मे एक चीज जो उस का निगेटिव पक्ष ह विष्वसकारी, घृणा ह, निराशा है, जितनी ८० रचना क्या और किन के बीच 'निगेटिव साइड' है, वे सब छूट गयी ह । क्यो? विल्कुल छूट गयी है ऐसा ता नहीं है। बिलपुल तो छूट नहीं सकती, फिर भी प्रमुख नहीं है, कहीं भी "निगेटिव' पक्ष प्रमुख नहीं है । उस पर आप चुप रहे ह । चुप ता नहीं रहा हूँ, पर बल नहीं दिया है यह मान लेता हूँ। पर उस के पीछे कोई जीवन-सम्बधी कारण है या आप का विश्वास है ? आप इसे देखते हैं उस को क्यो कि यह स्थिति तो बार-बार आयी है जब कि आज-कल तो सारा जो तोडने वाला 'डैस्ट्रक्टिव' पक्ष है उस को हो उजागर किया जा रहा है, 'अगेन एड अगेन'। एसा अगर है तो एक हद तक तो आपन ही अपने सवाल का जवाब दे दिया । सारा समाज ही अगर एक बात कह रहा है तो जहाँ पर जा कर वह बात गलत हा जाती है, वह बात कहना भी किसी के लिए जरूरी हो जाता है । ता एक जवान ता यही हो सकता है कि जो काम लाग नहीं कर रह हैं या जो काम करने का है, लेकिन वतमान स्थिति में उपक्षित हुआ जा रहा है उस पर जोर दे रहा हूँ। पर आप इस चीज को शुरू से ही संभालते आये हैं, एक उस तरह या 'सब्लीमेशन' जो सारी चीजो के सुख-दुख के छन जाने के बाद दूसरी बात । अगर मैं यह कहता हूँ, सम्प्रेषण का आधार बनाये रखते हुए-यानी कविता मे जो कहता हूँ वह दूसरे तक पहुंचता है और उस मे उन चीजो की ओर इशारा करता हूँ जा दूसरे जीवन को या मेरे ही जीवन को सम्पनतर बना सकती है और उम से इतर जो भी बातें हैं जो कि ह हमारे यथाथ जीवन काल म, उन को भी उतन ही जोर से नहीं कहता, तो उस में क्या बुराई है? नही, बुराई भलाई की बात नहीं है, 'एटीटयूड' की बात है। क्यों कि या तो आप उस जीवन-यथाथ को 'ट्रीट' करने लायक नहीं समझते या यह है कि जो एकदम फिनिश्ड 'फाम' मे चीज आ पाती है उस के बीच वह सारी उथल-पुथल गायब होती है। यानी किस 'प्रासेस' से आप इस 'प्रासेस' तक पहुंचे, जिस तकलीफ मे से गुजरे हैं वह उस रास्ते को पहचान नहीं है, उस मजिल की पहचान होती है बार-बार। कवि जिस रास्ते पर चलता है उस रास्ते पर कोई दूसरा चल नही सकता। प्रत्येक के लिए रास्ता तो अपना अपना होता है। लेकिन जिस व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन ८१ मंजिल पर बह पहुंचता है उस तब वह दूसरा पा भी पहुंचा सकता है या उसे दूसरा को दिवा भी सकता है। तो इस लिए में किस रास्ते से यहा तक पहुँचा उस का बहुत महत्व नहीं है । मैंन हमशा यह वहा है कि मुझ यहा तक पहुंचन म जितना वप्ट हुआ यह मर लिए तो बडे महत्त्व की बात है, लेकिन दूसरों के लिए नहीं यह भी तो हो सकता है कि कोई ऐसी तक्तीफ में से बहुत कुछ 'सस्टेन' कर सका है, उस सारी प्रक्रिया को जानना, अपने-आप उन चीजो की सृष्टि पर सफ्ना जिन को स्थापित करने के लिए आपने इतना श्रम किया है, इस फी भी इच्छा हो ? रचना के अदर या रचना के बाहर भी किसी भी तरह से~क्यो कि कभी-कभी आत्मक्या पढने से ऐसी अनुभूति होती है-- वह बात व्यक्तिगत स्तर पर होती है । आत्मकथा म हो सकती है। लेकिन जो जात्मकथा म हो मरता है वह कविता में भी जरूरी तौर पर हो यह मैं नहीं मानता। इस लिए यह कि अगर कोई व्यक्तिगत रूप स मुझ से पूछना चाहेगा कि तुम इस परिणाम तक मे पहुंचे या मेरे जावन वे जो निजी जनुभव रहे उन की चर्चा करना चाहेगा-और मुझ को एसा लगेगा कि इस आदमी से यह चर्चा कर सकता हूँ करनी चाहिए, तो वह कर भी सक्ता हूँ लेविन कविता म करूं यह जरूरी नहीं समझता। हाँ, उस मे एकदम 'फिनिश्ड फाम' मे आती हैं सब चीजें, जसे पकी हुई अनुभूति ठहरी हुई हर चीज में दिखाई देती है, और तलछट भी ऐसा लगता है हर चीज मे 'प्योरोफाई' हो गयी है । तो कभी कभी उस मे यह अनुभूति हमे दिखती है, खास तौर पर उपयासों मे यह अनुभूति होती है, कि 'पेन' है लेकिन 'पेन' के 'सलीमेट' हो जाने की वजह से वह कभी-कभी उपलब्धि की 'फीलिग देने लगता है, 'सेंस आफ लास' उतना तोखा नहीं रहता एसा ता नहीं है कि पेन या नि सरिंग भोगता हुआ व्यक्ति उप यास में दिखता नही है दिखता है। दिखता है। लेकिन वह हमेशा उस परिणाम तक माता है जो उस का अतिम परिणाम है जसा आपने उस मे युद ही लिखा है 'दुख माजता है' मह परिष्कार की जो भावना है वह इतनी परेलल चलती है कि उस का तीखापन, 'संसआफ तास' यही न कहीं नरम पड़ जाता है, और यह लगता है कि हमे उस 'पेन' मे से इतना कुछ मिल रहा है चाहे परिष्कार के रूप मे चाहे अपने को - ८२ रचना पया और किन के बीच - - 'सब्लोमेट' करने के रप मे। तो वह 'सेरा आफ लॉस' की तरफ जर ध्यान पहुंचाता है। नुकसान के अय मे न भी कहें तो मतलब यह चीज पहीं न कहीं इस से जरूर जुडी लगती है सारी चीजो को पढ़ने के बाद, कि जो जीवन-यथाथ है वह वह सेंस माफ लॉस अगर एम्फेसाइज नहीं होता और उस ये बदले जो मुक्ति है, सेंस आफ लिबरेशन है वह होता है, ता मैं समझता हूँ कि ठीक ही होता है। वह अलग बात है, यह तो बहुत आगे की बात है, जो जाप के सारे रचना-कम को वसे भी परिभाषित करती है। क्यो कि यह चीज ऐसो नहीं कि एक जगह पर हो, जगह-जगह पर है, उस को पहचाना जा सकता है। मान लीजिए कि भारतीय होतया एक परिणाम यह है कि सेंस आफ लास को एम्फेसाइज नहीं करता और सेंस आफ लिबरेशन को करता हूँ हालांकि इस से इनकार नहीं करता कि वह भी है । वह है, लेकिन फिर भी उन स्थितिया में नहीं आता। लेकिन जसे यही है 'नदी के द्वीप' मे भी यह लगता है वि गौरा या रेखा जिस तरफ जा रही हैं या जिस चीज के लिए तड रही हैं वह मान भुवन नहीं है, मतलब वह कितना भी व्यक्तिपरक हो, पर फिर भी उस मे एक व्यक्तिपरकता का बोध नहीं होता, बार-बार यही लगता है कि वह फिर उस से आगे की बडी चीज है जिस के लिए वे वहीं तक सीमित नहीं हैं । ऐसा लगता तो यह तो ठीक ही है। चाहे नावैल मे रिलाइज हुआ हो या न हो तो फिर इस लिए वह छोटा प्रतीक बन जाता है भुवन । गौरा का भुग्न को पा सकना एक बहुत छोटा प्रतीक हो जाता है बजाय उस अनुभूति के जो उपयास मे से पाठक पाता है । वह ज्यादा बडी चीज है। यह बात मैं कहना भी चाहता हूँ कि एसा ही है। ऐसा है तो फिर उस तोखेपन से कहीं न कहीं वह छूट गया है मेरी समझ मे । अगर यह बात है, जो पढ़ने वाले को उस मे महसूस तो होती है, कि 'दिस इज ए लाजर स्ट्रगिल पार सथिग बिगर एड बेटर' । यह उस के अदर अहसास होता है गौरा को देख कर या सारे चरितो का वणन जिस तरह से हुआ है, उन की जो नतिकता है उस मे जो चीज निक्लती है वह बार-बार दिखाती है कि भुवन से बडा कुछ है। व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन २३ मैं ता समझता हूँ कि उपयास म यह बात स्पष्ट है और अगर नहीं है ता उस की असफलता है । साधारण सामाजिक अथ म भुवन का पाना काई बहुत कठिन नहीं था, लेकिन रेखा न नही चाहा पि एस भुवन का पाया जाये क्या कि पाने लायक जा चीज़ थी वह उस से कही वडी थी। इसके बारे म जरा भी दुविधा उस के मन मे नही है । उस चीज़ को स्वीकार पर लेना उस महत्तर चीज़ का नकारना या विकृत करना ही हागा, उस की कोशिश म चाहे असफलता मिले । वह अलग बात है। यह तो मैं मानता हूँ कि यह बात कहने की थी और मेरी कोशिश थी कि वह स्पष्ट हा कर आये । और अगर नही आयी है तो पर इस मे वह खतरा तो है ही क्यो कि वह पानो से बंधी हुई सप्टि है। उस मे यह खतरा तो रहता ही है कि हम जिन के माध्यम से सारा खेल चला रहे ह उन को हम वहीं तक सीमित कर लें, अगर कोई आप को मानसिक्ता से परिचित नहीं है । यह बात तो उस मे रहती है कि उस के सुख-दुख, 'पेस' और 'प्लेजस' उस के 'टेक्स्ट' से आगे चले जाते है। हो सकता है कि खतरा हा । मैं समझता तो नही कि सवदनशील पाठा के लिए यह खतरा होगा। और जो नही है वह कहानी के उस पक्ष को देखना या पढना ही नही चाहेगा। क्या आप अपनी किहीं रचनाओ के बारे मे यह कह सकते ह कि उसे कभी एक्दम 'कम्प्लीट' देख लिया हो, लिखा चाहे कभी हो, विसी भी समय पर लिखा हो? मरा ख्याल है इस का जवाव 'हा तो दे सकता हूँ, लेकिन उस को थोडा सीमित भी करना पडेगा। ऐसा लगा है कि एक विजन पूरा देख लिया, लेकिन वास्तव मे काई उसी समय पूछे कि क्या देखा ता उस का उत्तर बहुत स्पष्ट नहीं होगा। लेकिन भीतर एक दढ विश्वास हा जाता है । ऐसा भी होता है मसलन अपने-अपने अजनबी-कई वर्षों तक उस कथा को सोचता रहा बल्कि जेल में था यानी ३१ ३२ म, पहली बार उसे लिखने की कोशिश की थी नाटक के रूप मे और उस का डढ जब लिखा भी था—उस म भी तीन अक की योजना थी। उस के जागे लगा कि स्पष्ट नही दीख रहा है। कुछ यह भी या कि जा स्थूल जानकारी हानी चाहिए वह भी उतनी तरह की नही थी। बरफ के नीचे दब कर या बाढ म कटने की बात हा वहा तक तो सोच सक्ता हूँ। सोचा था कि लाग कही कोयले की खान में दब जाते है तो उस स्थिति तब यह भी ४ रचना क्यो और दिन के बीच को स्थूल जानकारी भी मुझे नहीं थी। बाद म मैं गया भी था. कोयले की खान दयने कि नीचे से क्या होता है ताकि अगर उस का वणा कही,' पता वह सही जान पडे। लेकिन उसके बाद भी हमेशा यह लगा कि पूरी बात मुपे नही दीय रही है । फिर स्वीडेन मे कुछ लोगी होगा हुई. थी, पुछ आर अपने अनुभव हुए थे, उन से बात कुछ-मौर पर हुई फिर भी यह नहीं लगा। और मैंने शायद यही लिखा भी है कि रघुवीरमहाय एक बार लखनऊ की वाढ की कहानी सुना रहे थे तो सुनते-सुनते एराएक मुझे लगा कि हाँ अब वह पूरी चीज मुझे दीख गयी। हालांकि क्या दोष गया यह बताने को तत्काल कोई कहता तो नही वता पाता, लेकिन एकाएक यह लगा कि हां, जवाब मिल गया । और मैं सुनने- सुनते थाडा अ यमनस्क भी हुआ, रघुवीरसहाय न देखा भी और कहा भी कि मैं आप को इतनी रोचव बात सुना रहा हूँ आप का ध्यान कही और ह। मैंन कहा कि हाँ कहीं और तो है, लेकिन उस मे जो आप सुना रहे हैं उस वी अवज्ञा नही है, उसे ग्रहण कर रहा हूँ, खूब सुन रहा हूँ। उम के बाद दो-तीन दिन में उपयास लिखा गया। तो कई वप तक टटोलता रहा और फिर एकाएर लगा कि जवाब है, लेकिन लिखने से पहले नहीं जान पडता था कि वह जवाब क्या होगा, लिखा गया तभी पहचाना कि यही है। यह बात सब से पयादा आप 'अपने-अपने अजनबी' के बारे मे कह सकते ह या कि कुछ और रचनाओ को भी इस मे रखेंगे? एसा और भा हाता है। कविता मे ज्यादा होता होगा? यह स्पष्ट उस का उदाहरण इस कहानी म है। और कहानियो मे भी ऐसा हुआ। कभी आप के मन में यह आया कि लेखन के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प आप को उतना ही सायक्ता-बोध देने वाला हो सकता था? मै ता सोचता हूँ कि कोई भी कला हो सकती है। मेरा ज्यादा युवाव इधर रहा लेकिन पहले चित्रकारी की ओर भी थोडा सा रहा था जब कि दामा म से स्पष्ट रूप से लेखन नहीं चुना था। फिर उस के बाद लिखते रहने के बाद, मूर्तिकला मे भी कुछ टांग अडायी थी और उस का आक्षण रतना प्रबल था कि दिखने लगा कि जब मैं और सब छोड कर इसी मे जुट जा सकता हूँ। तब बल्कि सकट भी रहा, कई दिन तक साचता रहा कि अव लिखना विखना सब छोड कर इस मे लग जाऊँ। फिर यह लगा कि व्यक्ति, दुख, आस्था आत्मालोचन मैं ता समझता हूँ कि उपयास म यह बात स्पष्ट है और अगर नहीं है ता उस की असफलता है । साधारण सामाजिक अथ म भुवन का पाना कई बहुत कठिन नहीं था, लेकिन रेखा ने नहीं चाहा कि ऐसे भुवन को पाया जाय क्यो कि पान लायक जो चीज थी वह उस स कही बडी थी । इस के बारे में जरा भी दुविधा उस वे मन म नही है। उस चीज़ को स्वीकार कर लेना उस महत्तर चीज़ का नकारना या विकृत करना ही होगा, उस की कोशिश म चाहे असफलता मिले। वह अलग बात है। यह तो मैं मानता हूँ कि यह बात कहने की थी और मरी काशिश था कि यह स्पष्ट हा कर आये । और अगर नहीं आयी है तो पर इस मे वह खतरा ता है हो क्यो कि वह पानी से बँधी हुई सष्टि है । उस मे यह खतरा तो रहता ही है कि हम जिन के माध्यम से सारा खेल चला रहे है उन को हम वहीं तक सीमित कर लें, अगर फोई आप को मानसिकता से परिचित नहीं है। यह बात तो उस मे रहती है कि उस के सुख-दुख, 'पस' और 'प्लेजस' उस के 'टेक्स्ट' से आगे चले जाते है । हो सकता है कि खतरा हो । मैं समझता तो नही कि सवेदनशील पाठक ये लिए यह सतरा हागा । और जो नहीं है वह कहानी के उस पक्ष को देखना या पढना ही नहीं चाहगा । क्या आप अपनी विही रचनाओ के बारे मे यह कह सक्ते हैं कि उसे कभी एकदम 'कम्प्लोट' देख लिया हो, लिखा चाह कभी हो, किसी भी समय पर लिखा हो मेरा ख्याल है इस का जवाब 'हां ता दे सकता है, लेकिन उस का पाडा सोमित भी करना पडेगा। ऐसा लगा है कि एक विजन पूरा देख लिया लेकिन वास्तव मे कोई उसी समय मथे किया देखा तो उस का उत्तर बहुत स्पष्ट नहीं होगा। लेकिन भीतर एक दढ विश्वास हा जाता है। ऐसा भी होता है, मसलन अपने-अपने अजनबी-कई वर्षों तक उस वया को सोचता रहा बल्कि जेल मया यानी ३१ ३२ म महली बार उस लिखन की कोशिश की थी नाटक के रूप में और उस वादे अब लिखा भी था उस म भी तीन अन की योजना थी। उस वे आगे लगा कि स्पष्ट नहीं दीय रहा है। कुछ यह भी था कि जो स्थूल जानकारी हानी चाहिए वह भी उतनी तरह की नहीं थी। रफ ये नीचे दब पर या बाढ म रटने की बात हा वहाँ तक्ता साच साता हूँ। साधा पापि नाग नही कायन की खान में दब जाते हैं-~ता उस स्थिति १ तव यह भी रचना गया और दिन के बीच की स्थूल जानकारी भी मुये नही थी। बाद म मैं गया भी था कोयले की खान देखने, पि नीचे क्स क्या होता है ताकि अगर उस का वणा वही कहें तो वह सही जान पडे। लेकिन उसके बाद भी हमेशा यह नगा कि पूरी बात मुये नही दीप रही है। फिर स्वीडेन मे कुछ महीना हुई, थी, युछ और अपन अनुभव हुए थे, उन से बात कुछ मोस्स्सस्ट हुई, फिर भी यह नही लगा। और मैंने शायद कही लिखा भी है कि रघुवीरमहाय एक बार लखनऊ को घाढ की कहानी सुना रहे थे तो सुनते-सुनत एकाएक मुझे लगा कि हाँ अब वह पूरी चीज मुये दीस गयी। हालांकि क्या दीख गया यह बताने को तत्काल कोई कहता तो नहीं बता पाता, लेकिन एकाएक यह लगा वि हो, जवाब मिल गया । और मैं सुनते- सुनत थाडा अयमनस्व भी हुआ, रघुवीरसहाय न देखा भी और कहा भी कि मैं आप को इतनी रोचव वात सुना रहा हूँ, आप का ध्यान कही और है। मैंन वहा कि हां कही और तो है, लेकिन उस मे जो आप सुना रहे हैं उस वी अवज्ञा नहीं है, उसे ग्रहण कर रहा हूं, खूब सुन रहा हूँ। उसके बाद दो-तीन दिन म उपयास लिया गया। ता कई वप तक टटोलता रहा और फिर एकाएक लगा कि जवाब है, लेकिन लिखो से पहले नही जान पडता था कि वह जवाब क्या होगा, लिखा गया तभी पहचाना कि यही है। यह बात सब से ज्यादा आप अपने-अपने अजनबी' के बारे मे यह सकते ह या कि कुछ और रचनाओ को भी इस मे रखेंगे? एसा और भी होता है। कवितामे ज्यादा होता होगा? यह स्पष्ट उस का उदाहरण इस कहानी मे है। और कहानियो मे भी ऐसा हुआ। कभी आप के मन मे यह आया कि लेखन के अतिरिक्त कोई दूसरा विकल्प आप को उतना ही सायकता-बोध देने वाला हो सकता था? मैं ता साचता हूँ कि कोई भी कला हा सकती है । मेरा ज्यादा झुकाव इधर रहा, लेकिन पहले चित्रकारी की ओर भी थोडा सा रहा था जबकि दोना म से स्पष्ट रूप से लेपन नही चुना था। फिर उस ये वाद लिखते रहन के वाद, मूर्तिकला मे भी कुछ टांग अडायी थी और उस का आक्षण इतना प्रवल था कि दिखने लगा कि अब मैं और मब छोड कर इसी में जुट जा सकता हूँ। तव बल्कि सक्ट भी रहा कई दिन तक सोचता रहा कि अब लिखना विखना सब छोड पर इम मे लग जाऊँ। फिर यह लगा कि व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन ८५ इस मे परुंगा भी तो मुझ का तो मतोप मिलेगा लेकिन शायद इस नये माध्यम पर प्ता अधिवार नही पा सकूगा जितना लेखन पर है। इस लिए उस को पन से अलग कर शोर या स्थान दे दिया और लेपन पर हो ध्यान दिया। ता कोई सान भर इस विधा म रहा। फय की बात है? हा गया उस कोअरसा। यानी काफी लिख चुके थे तब भी सोचते रहे ? हा। कोई ऐसो चीज दे सकते हैं, या चित्र या बाहरी स्थितियों, जिन के रहते हुए आप को लगा हो कि इहोंने आप के लेखक बनने को प्रवृत्ति को 'डिफाइन' पर दिया हो? उस समय एक बात समझ मे आयी थी- -कि हाथा का उपयोग लेखक के लिए अच्छी चीज है। एक तरफ शारीरिक श्रम और दूसरी तरफ़ वास्तव में हाथा स कुछ बनाना, चाहे वढई का काम हो, चाहे मोची का काम, लेखक हाथ से कुछ बनाता है तो लेखन मे भी थाडा और सिद्धहस्त हो जाता है। ऐसा सोचते ह आप वह शब्दश 'सिद्धहस्त' होता है क्या कि लिखन म लेखन की इकानामी शब्द की क्लात्मक मितव्ययिता होती है उस मे यह जो लिखन का श्रम है बताता है कि कम लिखा, कसा हुआ लिखो, एक भी शब्द फालतू मत लिखा । इस लिए प्राय लिखाने वाले, जिन मे मैं अपने को भी अब शामिल कर लता हूँ वात बड़ी आसानी से ज्यादा विस्तार से कहने लगते है। वहीं बात अपने हाथ स लिखते ता उस का और कसते। इस लिए हमेशा सोचता रहा है कि अपने हाथो से कुछ करना लेखक के लिए अच्छा है। इस चीज को आप हो जोड रहे ह, शायद और कोई इस को इतनी समग्रता से न देखता हो। कभी आप का लगा है—वसे तो ठीक ही है, आप कहते भी रहे ह कि साथक्ता लेखन कम से मिली है--पर कभी आप को इसी मे रहने की वजह से बडी व्यथता या हताशा ने भी विचलित किया है इस के रहत नहीं, ऐसा तो नहीं । जभी तक तो जानता हूँ कि जब चाहूँ इसे छोड भी दे सक्ता हूँ। छोड दे सकते है ? लेखन को? 2 रचना क्यो और दिन के बीच ? इस लिए इम को बधन नहीं मानता । तो फिर बधन क्या है ? लेखन बधन नहीं है अगर यह लगे कि इस को छोड नहीं सकते तो वधन लगे। जैसे और नशे हैं, आदतें है, उसी तरह यह है । एक तरफ इस के साथ एक अनिवायता है कि लिखना जरूरी है, लेकिन दूसरी तरफ यह भी है कि जव चाहूँ छोड भी सकता हूँ, लिखना ही छोड दे सक्ता हूँ। खर, यह विवाद की बात है। विवाद की, या कि जभी बाद की? जसे भी कहिए! अच्छा, आप फी आलोचना की इतनी उग्रता जो है, चाहे वह किसी भी कारण से हो, आप को कहा तक प्रभावित करती है दूसरो को राय को आप कितना महत्त्व देते ह अपनी रचनाओं को लिखते समय ? पहली रचना पर हुई आलोचना आप की दूसरी रचना को कडीशन करती है ? इस का जवाब बहुत मुश्किल है, और कुछ भी जवाब हो, सदेह होगा कि सच है या नहीं। यह नहीं कह सकता कि गलत आलोचना से या कि जो मेरी समझ मे खरी आलोचना नही है उस से दु ख नहीं होता। यह भी नहीं कह सकता कि जो आलोचना होती है जगर वह प्रतिकूल भी है लेकिन ऐसा लगता है कि यह ईमानदारी से मतभेद के आधार पर है तो उस से कुछ सीखता नही हूं। लेकिन इस से ज्यादा नही मालूम कि क्या कहूँ। यह मानता भी नहीं कि आलोचना का कोई असर नहीं होना चाहिए लेखक परक्यो नही होना चाहिए? अगर इस रूप में भी होता है कि जालोचक एक समाज का जो पूरा निणय है उस को घोषित करता है ता उस का भी लेखक के लिए महत्त्व है। और अगर आलोचना समाज का मन्तव्य नहीं प्रकट कर रही है, यल्यि एक सवेदनशील व्यक्ति की ओर से उस से भिन कुछ कर रही है, तो उस का भी महत्त्व होना चाहिए। साहित्य से, लेखन-कम से, आप का भावात्मक सम्बध कृतज्ञता का है या अतरगता का? अब मैं इन दानो मे कोई विरोध तो नहीं देखता। इन दोनो के अलावा और भी चीजें है उस सम्बध मे । कृतज्ञता का इस अप मे है कि उस से तृप्ति मिलती है, अपनी पहचान बढती है, अपने विकास मे योग मिलता है, और अन्तरग सम्बघ तो वह हमेशा है ही। इसके अलावा और भी बातें हो सकती है । आविष्कार या उमेप का जाश्चय । चुनोती और उस व्यक्ति, दुष, आस्था, आत्मालोचन ८७ का सामना पर सरने या रातोप । दूसर तक पहुँचना। आप कह दिय भी वृतमता के रूप हैं—ाम कर यह कि दूसरे तक पहुंच ममें, अरे नपन से उबर स, उरा अकेलेपन रा भी जा लेपर को एक तरह मे नियति है-ये मय चीज भी हैं। लेकिन महत्त्व की बात यह है रि इस म विराध कोई नहीं है। कभी ऐसी स्थितियों से साक्षात्कार हुआ है जब लगा हो कि जीयन पहले है साहित्य याद मे? यह ता हमेशा है ही, एसी स्थिति । जीवन है, इमी लिए तो साहित्य है । नहीं, मतलब जीवन इतना घेर ले कि नही, इस बात को अगर साहित्य और जीवन की बात यह तब तो यह कहना होगा कि जीवन तो हमेशा पहले है ही। लेकिन यह जीवन के बारे मे है न ! अगर यह सवाल है कि प्राण रक्षा के लिए कुछ समझौत करने पड़ें और दूसरी तरफ कुछ मूल्य हा जिन स वि साहित्य जोपम म पडता हा तब कौन पहले है, तो कहूंगा कि ऐसे अवसर हुए और मानता हूँ कि वहां पर अगर कोई साहित्यकार है तो उस को यह तय कर सकना चाहिए कि जोखम उठा कर भी मूल्यो को प्राथमिकता देनी चाहिए क्या कि मैं समझता हूँ कि सभ्यता का भी, सस्कृति का भी और मनुष्य रूप जीवन का भी आधार एक मूल्य दष्टि है । लेकिन वैसी स्थिति में वे मूल्य जीवन में प्रतिपक्ष मे नही रहत बल्कि वही जीवन होते है। जैविक स्तर पर प्राण रक्षा और जीवन मूल्यो के स्तर पर प्राण रक्षा दोनो ही जीवन की रक्षा है। और उस स्तर पर जीवन पहले है-जीवन नही तो साहित्य नही है । आप का सवाल अगर यह है कि ऐसे कभी अवसर आये, तो आये कभी कभी। तो आप को नहीं लगता कि उन का जो विवरण है वह किसी एक सामा य पाठक के लिए या किसी भी पाठक के लिए बहुत मूल्य वान उपलब्धि हो सकती है जिस को जात्मक्या मे कहा जा सकता है, कभी सोचा है आपने हो सकता है। तो आत्मकथा के बारे मे विचार कभी मन मे नहीं आया नहीं। या कि यो कह कि मेरी क्था के रूप मे आत्मकथा का कुछ महत्त्व नहीं है। लेक्नि अगर किसी साहित्यकार ही सही-साहित्यकार के जीवन में एसी परिस्थिति आती है और उस म वह कोई ऐसा निणय लेता है जो कि मेरी दृष्टि में उसे लेना चाहिए-या कि लगातार बहुत 7 F5 रचना क्यो और क्निके बीच क्लेश पा कर भागता भी है-ता वह सघप भी सामन आना चाहिए। यह बात तो मैं मानता हूं, लेकिन वह बात आत्मकथा म भी आनी चाहिए, यह नही सिद्ध होता है इस से । और आत्मकथा के प म आ सकती है इस मे मुझे सदेह है । क्यो कि वहां पर अपने को सामने लाने की जा प्रवृत्ति हो जाती है उस से वास्तविक परिस्थिति का थोडा झूठा कर के भी प्रस्तुत किया जा सकता है। मैं ता इसी लिए कहता हूँ वि इस कोटि का सच अगर लिखना चाहे वाई ता उप यास उस के लिए सही विधा है और आत्मक्या नहीं। आत्मकथा म झूठ लिखना ज्यादा आसान है, उप यास म सच लिखना ज्यादा आसान है। कोई दूसरा लिसना चाहे आप के बारे मे तो आप इस की सच्चाई मे कितना सहयोग देंगे? जो मैंने कहा उस से जहाँ तक वह सीमित हो जाता है उस सीमा को मानते हुए अगर पूछने वाले की नीयत और योग्यता पर पूरा भरोसा है तो भरसक सहयोग दूगा। लेकिन सहयोग देने से ही वह पूरी बात यह पाऊँगा, अपनी इच्छा के बावजूद, यह कैसे कह सकता हूँ? आप से अच्छी तो कोई भी बात नहीं यह पायेगा, यानी कोई भी दूसरा व्यक्ति आप के बारे मे उतनी अच्छी बात नहीं कह पायेगा, यह तय है। हो सकता है वह पाये । क्या नही कह पायेगा? पर उस के बारे मे आप का विचार बदलता नहीं । 'नहीं ही रहता अभी तक तो है। दूसरी बात यह कि सास्कृतिक चेतना का जो सवाल है, बार- बार यह सरोकार आप के इस वक्त के वचारिक धरातल मे तो बहुत ही तेजी से लक्षित हो रहा है। पहले भी यह था, लेकिन उस मे इस तरह की गहरी सास्कृतिक चेतना से जो एक प्रकार की विशिष्टता मिलती है आदमी को वह मानव धम के अविच्छिन होने मे बाधक होती है। मानव धम के प्रति मारा एक 'टोटल' जो 'एटीटयूड है उस मे कहीं हमारी सास्कृतिक चेतना जो हम अपने देश या परिवेश के बीच मे रखते हैं वह थोडा बाधा नहीं पहुंचातो? अगर सिद्धात रूप मे यह सम्भव होता कि हम उस से बाहर जा कर उस सारी स्थिति को देख सकें, तो मैं मान लेता कि बाधा पहुंचा सकती है। लेकिन अगर उस से बाहर जाना सम्भव ही नहीं है, तब मैं इस प्रश्न को व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन ८६ अयथाय प्रश्न मानता हूँ। हम जा है, हमारी चेतना जो है, वह अम्री तौर पर सम्पारवान् है सस्वारा स बंधी है इस तिए उस परिस्थिति को दयन के लिए हमारी जाष्टि होती है उस मे एक सास रगत ता होतो है। दूगर व्यक्ति को दूसरी रगत भी हो सकती है, लेकिन रगत है, इमो लिए गच्चाई नहीं दीय रही है। इस बात का बहुत ज्यादा महत्त्व यही नहीं है यया कि सास्कृतिय सच्चाई तो जरूरी तौर पर रंगो हुई राप्चाई ही हाती है। मतलब उस को आप अवरोध नहीं मानते बडे सत्यो के पय मे। वे यसे भी देखे जा सकते ह मानव जीवन के बारे मे। जय हमा पहल ही पर मान लिया कि बडे सत्य राग रजित सरस हात हैं मावर राग एर मरहनिया है या दूसरी सरलिया है यह सवाल तो या रहा है, लेकिन हमन उस पा रजित हाना ता मान ही लिया। यहागिर तम्य ता है हमारे जीवन में सय व नही हा मरत पयामि उनमा जोया ये गाष पोई सम्बध ही जुह सरना सम्बध जुलाही गग ग बंधना है। नो, महतोलोग एरोह प्यास तौर से इस पौड़ी में सो एer मावा मिल जापणा जो पिरस बारित है, जिन । बोध, शायनि-योमा डोनों शातियों के प्रभार या उतरे अपने पति गोगों पर गाभा-या पोरोग पर नर लिए गया रामापाnt? माग: शिवार जीया-गात मरिया टूट गया है या Fr? ना या है माम माग मा fri और दूसरे मिाग हा उपाय माती गरarm मानौर में गmirinीरपुर TRPIT लागि गरम गामिन भार- मान Ramnt मन भानाmaran पग बनाई armire, frit ग Trairermumt परमर त 7 तव आस्था का कोई अथ नहीं रह जाता जिस तरह की आस्था आप प्रकाशित करते रहे हैं अपनी रचनाओ में, अपने विश्वासो में। तेवर ही तो है । तेवर तो बदलते रहते हैं। उस मे से कोई सास सायक अथ नहीं निकलता। नहीं, यह अपने आप म कोई एसी बुनियादी चीज़ नही है। इस आस्था पर आयें तो आप का ईश्वर नाम के प्रति कितना सम्बध है यह प्रश्न है या अतिप्रश्न ? इस का क्या जवाब मिल सकता है आप ईश्वर नाम मानते ह या नहीं, या उस को आस्था से जुड़ा हुआ मानते ह या आस्था उस के बिना भी हो सकती है या आध्यात्मिकता नास्तिक भी हो सकती है ? हाँ, आस्था उस ये बिना भी हो सकती है। किसी के सास्कृतिक या आध्यात्मिक होने को कितना हम आस्था से जोड सक्ते ह इस तरह की बात से आप के विचार में ? हो, जोड भी सक्त हैं, लेकिन ज़रूरी तौर पर तभी उस को आस्था माने, यह हालत तो नही। जररत पड रही है कि नहीं पड रही है ? किस बात की? कि भगवान की धारणा हम मानते है, चाहे किसी जस्रत की वजह से ही हो-उस को 'सस्टेन' करने वाला तत्व कह लीजिए या जिस का नहीं, जहा तक जरूरत का सवाल है, कुछ लोगो का इस बात की जरूरत भी महसूस होती है कि ईश्वर को हम न मानें और ठीक आस्था के स्तर पर वह पहुँचती भी नही । लेकिन एक अनीश्वरवादी आग्रह ता हाता है, बहुत प्रवल आग्रह होता है । है भी आज-कल । ऐसा भी हो सकता है कि अनीश्वरवादी हो भी तब भी आदमी आध्यात्मिक हो, तब भी आस्थावान् हो, सास्कृतिक चेतना से ओतप्रोत हो। हा। इन चीजो में कोई आवश्यक सम्बध होना जरूरी तो नहीं है। आस्थावान् होने के लिए यह जरूरी है कि ईश्वर को वह माने या न माने या बहुत से देवताओ को माने या न माने इन से अलग कोई न कोई एक स्रोत वह पहचानता हो या स्वीकार करता हो जहा से कि अन्तिम रूप से व्यक्ति, दुख, आस्था आत्मालोचन ११ पाम पामिन मा पापग्न सापर है याममा पना पाहिए, या ही एगगा पाण। अगर मा पाई माा यह मारता है, ताईपर है या नही गया महत्त्व है, फिर साम्या उगम है। अगा मग आग यह मर भी मा मिनी पहपात में अपन भीतर ग पा सराहूँ सरपिर यह प्राप्यारिमर भी है। माप्यास्मिर सोहए। आस्तिक हो या न हो, ईग्यर में भय में आस्तिरो। हाँ, यह जो आपका सरपारो सरगासारे प्रति अगरयोग गरयमा है उसका क्या कारण है? ओह । एप ता य मी स्वाधीनता की परिभाषा स ही यह बात जुही हुई है । सगर सोम्वाधीनता ये लिए यह जरूरी है कि मरमारी तरस वह इस तरह न जुड़े कि उस मी जो पम को या निणय पीपा विचार की स्वत अता है वह पिसी तरह परिसीमित हो जाय या अवाट हा जाये। दूमर तिहासिर दष्टि यह भी है रि योग एवं वप पहले एक से अधिक जगह लगाये समाजान मिल पर निपय विमा या मि हम सरवारी तत्र के साथ सहयोग नही मरेंगे और इस निणय म मैं भी शामिल था। यह दूसरी बात है कि बहुत-स लोग जो उस निणय म शामिल थे व उम व विरद नाचरण पर रहे हैं और कुछ भूल भी गये हैं कि ऐसा निश्चय उन्होंने पिया भी था। लेकिन निश्चय हम लोगो ने दिया और अभी तक तो यह लगता है कि वह निश्चय सही था, सरकारी तत्र में जुड़ जाना और साहित्य वा मानदड सरकारी सस्था को सौंप देना या कि उस की कमोटियामा स्वीकार कर लेना बहुत ही खतरनाक होता है। किसी एव समय मे ऐसा न भी लगे चाहे इस कारण कि उस समय जो लोग सरकार की ओर से फैसले कर रहे है वे अपने आप म बहुत गलत लाग नहीं हैं या कि उन का विवेक अतिजानत है। ऐसा किसी एक अवधि मे तो हो सकता है लेनिन इस के बावजूद उस तत्र की आत्यन्तिक रूप से जा प्रवृत्ति होगी, वह लेखक के हित में नहीं हो सकती। इस लिए सरकारी तत्र से अलग रहना चाहिए। तो वह उस की प्रतिक्रिया से बाहर नहीं जाता, मतलब मानना यह हुआ कि बुद्धिजीवी जो है वह कभी भी अपना समयन सरकार को नोतिया को नहीं देता या सरकार को उस के मोप नहीं समक्षता क्या कि यह विद्रोह तो एक 'जनरल' नोति ६२ रचना क्या और दिन के बीच २ बुद्धिजीवी सरखार की विमी नीति या किसी निणय को ठीक समझता है तो उठीय कहने का अधिकार ता नहीं छोडता और इसी लिए अगर वह उम का गलत समझता है तो उसे गलत कहने का, घोषित करने का अधिकार भी अपना नहीं छोडता। मगर वह उस के अधीन नहीं है किसी भी तरह से। क्या आप को लगता है कि जो काम आपने किया है उस से आप को तृप्ति है पूरी, आप कर सके है जो करना था पूरी तो नहीं है, नहीं हो सकती, लेकिन काम जो किया उस मे से बहुत-सा उपयागी हुआ है, ऐसा ता लगता है। उपयोगी तो है, पर आप को उस से कितना सतोप है ? उस के अलावा और भी काम कर सकता था, यह भी लगता है। आज-यल क्या कर रहे है ? क्या कर रहा हूँ। कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ क्या लिख रहे हैं? सोचता भी रहता हूँ। एक अधूरा उपयास पडा है, उस को पूरा करना है। दुभाग्य से इम बीच एक नया भी शुरू कर दिया। यह तो बहुत ही अच्छा है। इस म पहले मै वाधा होती है। क्या कि पहला तो एक बार पूरा किया जा चुका था। उस को थोडा सा बदलना चाहता हूँ। तो काम जल्दी हो सर्व यह 'शेखर-तीसरे भाग' के बारे मे कह रहे ह नहीं, उस स जलग । जिस उपयास के कुछ अश नया प्रतीक मे छपे भी थे उसके। अपनी रचनाओ के सामने यदि आप को एक जालोचक को हैसियत से खडा किया जाये तो आप कुछ कहना चाहेगे। अपने सामन ता कुछ जरूर कहना चाहूँगा और वह सब का सब दूसरे के काम का हागा या नही यह भी आलोचक के नाते सोचूगा । यो तो जो कुछ लिखता हूँ उस मे एन जपना जातोचक पक्ष तो लगातार सजग रहता है। ऐसा साचता हूँ चाहता भी हूँ। लेकिन रचना हा जान के बाद भी साचता हूँ। कभी तत्काल स ताप हाता है और कभी जब नहीं होता तो उस रचना को प्रकाश म नही लाता। एसा हो सकता है कि उस समय तो रचना सतापजनक जान पडे और कुछ समय बाद न लगे। तब अगर उसे वापस ले लेना सम्भव हो तो वह भी करता हूँ। लेकिन आलोचक हो कर रचना को देखन म ता और भी बाते हैं। उस म एक पक्ष यह भी होता 7 व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन ९३ है कि अपने को जितना भी पहचानता हूँ उस दष्टि से भी देखू कि जो कुछ मने लिखा वह जा मेरो सम्भावना थी उस को ध्यान में रखते हुए श्रष्ठ काम हे या कि इस से अच्छा भी कर सकता था। इस स्थल पर तो मैं सोचता हूँ कि आत्मालोचक सब से अधिक निमम हो सकता है अगर होना चाहे । दूसरे आलोचको को तो जरूरी नहीं है कि इस की पूरी जानकारी हो कि मैं क्या कर सकता था। और मैं जानता हूँ कि मेरे समकालीनो म कुछ लेखक ऐसे हैं जो लिखने के बाद जानते तो हैं कि हम इस से अच्छा काम भी कर सकते थे, फिर भी सोचते हैं कि जो हो गया इस को छपने भेज दे। मुझे यह ठीक नही मालूम हाता और मैं यही कोशिश करता हू कि जब तक मन मे यह न हो कि इस समय मैं इम से अच्छा नही कर मकता था तव तक उस रचना को छपने न दू। फिर यह भी है कि अपनी पहचान का एक अग यह भी है कि कुछ सुविधाएँ मुझे मिली जो वहुत-से दूमरे लेखको का नहीं मिली और कुछ नहीं भी मिली जो लोगो को साधारणतया मिलती हैं—मसलन् किसी एक सुयवस्थित समग्र समाज म रहने की सम्भावना मेरे लिए कम हुई क्यो कि अकेला बहुत रहता रहा या ऐसी जगहा मे रहता रहा जहा समाज के साथ एक्प्राण होने की सम्भावना अभी बनी नही थी कि दूसरी जगह तबादला हो गया। इस दष्टि से मैं समझता हूँ कि कुछ काम जो करने लायक तो है लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं नहीं कर सकता हूँ क्यो कि मरा जीवन वैसा नही रहा । सुना है आपने प्रकाशक के यहा से कम्पलीट किताब वापस ली है। तो उस के क्या कारण होगे? उस का कारण भी कुछ इस स जुडा हुआ है । वह उप यास पूरा कर लेने के बाद मुझ को लगा कि वह कुछ क्यानक प्रधान उप यास हा गया है । यह नही वि वम उपयास गलत हात हैं, लेकिन मुझे लगा कि यह मेरे करन का काम नहीं है। मैं क्थानक को बहुत-मा छाड कर भी थोडे से पाया के अन्तजगत् म प्रवेश सक्ता था पाठक को ले जा सकता था और वह काम मैं शायद अपेक्षया अच्छा कर सकता हूँ और अधिकतर लाग नहीं करते हैं । तो इस लिए मैंन साचा कि इस नावेल का वापस ले पर इस म स्थानब घटना वा अश जितना वाट दिया जा सकता है उस वा वाट कर फिर कुछ चरिया पर अपना ध्यान केन्द्रित किया जाये तो मेर द्वारा यह काम ज्यादा अच्छी तरह दिया जा सयेगा। नहीं जानता वि यह माचना राही हुआ या नहीं। प्रकाशक का यह भी कहना था कि अगर मा हा भी गया यह क्यानर प्रधान उपयास हा गया ता क्या हा है उस का छपन दा, और अगर उसी उप यारा वा दुयारा भी लियते १४ रचना क्या और विनरे बीप ? हो तो दूसरा रूप भी हम आप देंगे, उस मे कोई दोष नहीं है। यह नही कह सकता कि उन का सोचना गलत था। कविता के लिए तो अच्छा भी है कि उस के दो-तीन रूप सामने आयें तो लेखक के मानस मे प्रवेश की एक और खिडकी खुलती है । उपयास मे यह करना चाहिए या नहीं, मैं नही जानता। लेकिन मुझे यह लगा कि यह काम मेरे करने का नही है, जो मेरे करने का काम था वह कुछ उस मे नही हुआ। इस लिए मैंने वापस ले लिया। आप प्रक्रिया बताना चाहते ह या प्रभाव बताना चाहते हैं ? उस के पीछे आप घटना पर बल नहीं देते तो यह पाठक से बहुत कुछ मागना नहीं हुआ पाठक से तो कुछ मागने का हमारा उतना ही अधिकार है जितना पाठक का हम से कुछ मागने का अधिकार है। और उस के प्रति हमारा यह क्तव्य भी है कि हम उस को एक रचना देते है, उस की प्रक्रिया का हम क्यो दिखाये, वह उस मे गुजर कर कुछ पा सके तो यह उस की प्रतिभा पर है, लेकिन हम प्रक्रिया भी उस को बतायें, यह तो वैसा ही है कि कोई एक चीज़ दूसरा को दिखाये और फिर साथ-साथ यह भी बताना अपना पतय समये कि देखो मैंने इस तरह यह काम पूरा किया। यह तो अना वश्यक है। तो फिर इस से यह धारणा तो गलत हो जाती है जो बहुत से लोगों को और विशेष तौर से आज-कल है--कि जो कुछ हम लिखते ह वह सब एक आम आदमी की सवेदना है और उस के चचारिक धरातल के बराबर का होना चाहिए, कि पाठक आज के लिखे हुए साहित्य से जुड सके । इस में ता निहित रूप से यह मान लेना है कि हम तो आम आदमी से ऊपर कही है । और फिर यह माना के साथ साथ उस से यह कतव्य भी निक- लना चाहिए कि अगर ऐसा भी है तो हम आम आदमी को उस जगह लायें जहाँ हम है। उस क्तव्य से कठिनाई भी है। मैं तो इस आम आदमी की वात का ही एक धोखा समयता हूँ। सभी आम आदमी हैं और कोई भी नादमी आम आदमी नहीं है। यह सम्भावना तो हर किसी म है वि जहाँ तक कोई पहुँचता है वहा तक पहुंच सके। तो क्या न हम इस विश्वास को अपनी रचना म क्रिया रूप दें? रचना को मानसिक तयारी और काम के समय के बारे मे कुछ कहेंगे? काम के समय के बार मे तो सोचता ही रहा हूँ कि सभी समय काम का व्यक्ति, दुःख, आस्था, आत्मालोचन ६५ समय होना है ~~~याम के लिए जर प्रवृत्ति हो और रहन लिखने के निश कुछ हा नर बट सकता है। परता भी यह रहा है। वस धीर धोरे अब साधारण प्रवृत्ति यह हा गयी है मि सवर काम करता हूँ, दापहर के भाजन तक दिन भर का काम कर लेना चाहता हूं और अगर तब तक काम कर सा तो फिर इस भी चिन्ता नहीं मरता दिवासी दिन भी काम करू फिर बावी दिन म पढना भी काम है, लोगा से मिलना, उसकी बात सुनना भी या वि साहित्यिर या कि दूसरे विपया पर पचा वरना, कि सब लेखन-कम म मन्द हो करते हैं। ऐम सब काम के लिए वाकी दिन दिया जा सकता है। यह भी है कि जाडा में ज्यादा लिखता है गमिया म म लिखन का मन होता है। तो बहुत-सा पढना और घूमना गमियाम करता हूँ। जाडा म ज्यादा लिखता हूँ। यह ता हुई समय की जो बात। मासिक तयारी के लिए कुछ खास करना होता है यह ता मैं नहा जानता। लेकिन तब तक लिखने नही बैठता जब तक ऐसा लगा कि उन के लिए तैयारी है। जब ठीक उस का आशय क्या है यह समझाना बहन वठिन है । कविताओ के साथ, छोटी चीज के साथ तो जब भी ऐमा लगा वि हम यह कर सकते हैं तब वह एक बैठर म कर डाला-~और उसमें बाद ही पता लगा कि वैसा सोचना सही था या नहीं। लेकिन उपन्यास के साथ भी होता है-~~यह कहना गलत होगा कि पूरा का पूरा चित्र, पटनाओ का क्रम या सभी घटनाएं अथ से इति तक दीख जाती हैं। लेकिन कही मन में ऐसा लगता है कि जो पूरा चिा है मेरे काबू में है, मैं जानता हूँ कि यह समग्र रूप क्या है। यद्यपि कोई पूछे कि यहाँ से जा कहानी शुरू हुई थी अत म क्या होगा तो सम्भव है कि मैं न बता सकू या जाता भी । हा। दूसरी तरफ यह भी है कि कभी कभी लिखन बठने पर लगा है कि नही अभी पूरी चीज़ मेरे सामने स्पष्ट नहीं है, तो फिर छोड भी देना है। एमा भी हुआ है वर्षो तक जिसे प्लाट कहते हैं या घटना कहते हैं वैसी एक चीज मामने है कि यह मुझ को लिखना है लेकिन वर्षों तक यह भाव नहीं आया कि यह पक कर तयार है, पूरी तरह मेर वाव में है । ता बार वार उम का माचता रहता हूँ उस पे बारे में प्रश्न उठाना रहता हूँ लेकिन लिख नहीं पाता। ता आप के मूल 'ड्राफ्ट' और 'फिनिश्ड ड्राफ्ट' मे क्या काफी फक होता है। मन हा मता कई ड्राफ्ट बनत है एक डापट च लिस जान से पहले। पिर जब लिखने वठता हूँ ता उस के बाद काशिश यही हानी है कि इस को ६६ रचना क्यो और दिन के बीच ड्राफ्ट न माना जाये, इसी को फिनिश्ड चीज़ माना जाये। और अगर लिखते हुए बीच में वही लग कि यह ता एक मसविदा है, इस का काट छाँट कर वाद मे रूप देंग, तो फिर उस कावही छाड देता हूँ और फिर मन ही मजा भी उस मे काट-छोट या परिवतन करना हो करता रहता हूँ। अब चाहे समझ लीजिए कि यह परिश्रम का मितव्यय है या वागज का मितव्यय है । यही चाहता हूँ कि जो लिखी हुई चीज़ है वह तभी लिखी जाये जव सम्पूण हा और इसी लिए जो कुछ लिखा है उस में प्राय काट छोट बहुत कम हुई है। कविता में ता कभी-कभी हाता है कि एक-आध शब्द बदल सकता हूँ, लेकिन इस से अधिक नही, या कोई पक्ति या एक पद आगे या पीछे कर दिया वाक्य के अदर क्रम मे। इस से पयादा परि- वतन नहीं करता और अगर इस से ज्यादा आवश्यक जान पडे तो उसे एक तरफ रख कर फिर पूरी की पूरी चीज दुवारा लिखता हूँ। 'शेखर' के बारे में? उदाहरण के लिए शेखर (पहले भाग) के तीन चार ड्रापट हुए, प्राय अधूरे भी रहे क्या कि जहां यह लगा कि यह मसविदा है, सशाधन मागता है उसे रख दिया और फिर शुरू से लिखना आरम्भ किया। और अन्त मे जो लिखा गया उस के बारे में तो एक रोचक बात यह भी हो सकती है कि पहला भाग मैंन नकल करने के लिए एक विद्यार्थी को दिया था जिस इस का अनुभव नहीं था, तो उस ने जो नकल तैयार की उस मे ज्यादा काट छाट थी और मेरी मूल लिपि मे काट छांट लगभग नही थी । मूल लिपि तो पड़ी हुई है । उस प्रतिलिपि मे काट छार इस लिए थी कि बीच वीच मे शायद उस का ध्यान बंट जाता होगा-इतना एकाग्र हो कर वह नकल नहीं कर रहा था जितना एकाग्र हो कर मैंने लिखा था। आप कितने घटे एकाग्रता से काम कर पाते ह' यह ता काम पर निभर है, कोई पूरी चीज तैयार हो तो अव भी १२१५ घटे तो लगातार काम करता रह सकता हूँ। पहते तो इस से ज्यादा भी किया है २०-२२ घटे तक एक बैठक मे खाना पीना सब छोड़ कर लिखा है। पचास-पचास फूलस्केप पन्न एक बैठक मे भी लिखे हैं । अब न ता इतनी लम्बी चीज़ लिखता हूँ, न इस की जरूरत पड़ती है, लेकिन दस बारह घटे लगातार तो अब भी काम कर सकता हूँ और करता रहता हूँ और बीच में बाधा नही अच्छी लगती मुथ को। विसी तरह को? । किसी भी तरह की। और उन दिना जिन दिनों लिखते ह उन दिनो मिलते ह लोगों से? व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन १७ कोशिश यही करता हूँ कि लिखने के बीच, काई चीज लिखी जा रही हो उस के बीच व्यवधान न पड़े। और जो काम मैं नही शुरू करता वह सब का सव फिर व्यवधान ही है--चिटिठया पढना भी व्यवधान है, जखबार पढना भी व्यवधा है। सब कुछ रुक जाता है । लोगों से मिलना भी। और अगर इस बात की सुविधा न हो तो आप उस को कसे लेंगे? ऐसा तो होता है, बाधा ता होती है। वह अच्छा नहीं लगता ता नहीं लगता। कभी कभी उस से फिर काम की क्वालिटी मे फक पड़ता है। ध्यान टूट जाता है। फिर मेह्नत करनी पड़ती है । अब एक दिन के काम के लिए ऐसा भी होता है कि काम तो वास्तव में एक दिन हागा, लेकिन उस + लिए अपना ध्यान केन्द्रित करन के लिए, एकाग्र होने के लिए तीन दिन पहले परिश्रम करना पडे। तो इस तरह की बाधा जाने पर फिर यह होता है कि पहले तीन दिन तो उस स्थिति म लान मे लगाओ कि यहा पर एक दिन वैठ कर लिखना होगा । तो इसी दष्टि स नहीं चाहना कि इस तरह का व्यवधान हो । लेकिन यह व्यवधान हाता नही ऐसा तो नहीं है । जरूर होता है । पर ऐसा नहीं लगता कि तब लिखा होता तो कुछ और लिखा होता, जाज लिख रहे हैं तो कुछ और लिख रहे ह ? या उतनी स्पष्ट रूप रेखा होती है मन मे? कभी-कभी एसा लगता है कि ऐसा हुआ होता। पर यह तो फिर उसी कोटि की चीजें हैं जसे यह सोचना कि नगर जमुक बात हा गयी होती या न हुई होती ता कुछ और होता । उस का वास्तव म काई महत्त्व नही नतिक दष्टि से कमजोर पानो को रचना आपने नहीं की। नतिक से मेरा मतलब है जीवन-सघष मे जो 'वेस्ट' हो जाते हैं या उन मे जीवन-सघष का सामना करने का नतिक बल नहीं होता, उस दृष्टि से नतिक, कोई सामाय अर्थ मे नहीं। ऐमा ता नहीं सोचता हूँ कि ऐस पात्रा की रचना बिल्कुल नहीं की। लेकिन उस पर जोर नही है यह ता मान लेता हूँ। कमजोर पात्र तो है पर सघप करत हैं, लगातार करत रहत हैं हारना नहीं चाहते, इस पक्ष पर जार देना चाहता हूँ। उस का ठीक भी समझता हूँ। पर इस का सम्बध आप की जीवन दृष्टि से है या आपने पात्रों को यसे ही 'सीय क्यिा है ? क्या कारण मानें इस का? रचना क्यो और दिन दे बोच हा, यह कहा जा सक्ता है कि जीवन दृष्टि में रस का सम्ध ध है, जरा 4 पर ऐसा तो नहीं रि वसे पात्र होते नही, बहुत होते है । और जाप उन्हीं पात्रो को चुनते हैं जो जीवन सघस्मान होता तो दुनिया म बहुत कुछ है । लेकिन सब का सब सिफ इस लिए कि वह हाता है कहने लायक या कि दोहरा कर रहने लायक तो नही हा जाता। और जो कुछ होता है उस मे स कुछ चीजों को भोर हमारा ध्यान जाता है, यह नहीं वि वाकी चीज़ा का हम दखत नही या देख नहीं सक्त, कुछ चीजो को ध्यान देन लायक महत्त्व हम दत है जार हम फिर कुछ चीज़ा को ध्यान दिलाने लायक महत्त्व देते हैं। यह ता अपने विवेक की बात है। तो फिर यह बात मान ली जाये, जो अक्सर आप के बारे मे कही जाती है, कि आप को सवेदना चयाधर्मों है, कुछ चीजा को आप उठाना चाहते हैं. कुछ को छोड देना चाहते ह ? चयन तो चेतना का धम है । सवेदन सब कुछ ग्रहण कर सकता है पर एक मूल्याक्न की प्रक्रिया साथ-साथ चलती है। अगर कोई कहता है कि उस का विवेक चयनधर्मा नही है तो वह विवेक ही नहीं है और फिर वह मनुष्य ही नहीं है। विवेक है किस लिए जगर हम चयन न करें। क्या कभी आप को ऐसा लिखने की प्रेरणा हुई है जिसे आप को साहित्यिक 'इमेज' के कारण या जीवा दष्टि के कारण रोक लेना पडा हो कि ऐसा चिरण नहीं होना चाहिए, या हितकर नहीं, कल्याणकारीनहीं। यह वैसा सवाल है जसा वकील पूछता है-यानी खतरनाक सवाल है, इस का जा भी जवाब हा । क्या कि अगर सीधे इस का जवाब देने लगू तो यह बात मान लेनी होगी कि अपनी एक साहित्यिक इमेज होती है, कि वह अपने लिए हाती है । साहित्यिक इमेज दूसरा के सामन होती है। जपन सामने उस से मिलती जुलती जो चीज हाती है वह अपनी एक पहचान होती है, या कि वह कि पहचान के दो हिस्से हैं एवं जो अपने मामन अपनी पहचान है और एक अपनी वह पहचान जो लागो को कराना चाहते है । इस दूसरी को ही उस अथ मे साहित्यिक इमेज कहा जा सकता है । मैं तो नही समयता कि इस दृष्टि से मैंने इमेज का कुछ बहुत महत्त्व दिया है । लेनिन अपने सामने क्या हूँ इस की पडतान करना चाहता रहा हूँ। और यह सवाल उस के बाद उठता है कि उस म से क्तिना दूसरा सामने लान लायक है। बाकी तो मैं अपनी इमेज का कोई महत्त्व नहीं व्यक्ति, दुःख, आस्था, आत्मालोचन ६६ दता । कई एक बातें सूझती है जा फिर बाद में पहन लायर नही जान पडती। एसा ता हमेशा वहा जा सकता है कि जा पहन लायक नहीं जान पहा वह वैसा इस लिए नही जान पहा कि उस म इमेज वा पाइ आघात पहुंचेगा। पर यह भी कहा जा सकता है कि वैसा इस लिए नही जान पडा वि क्ला की दष्टि से उस का मैने महत्त्व नहीं समझा। और यह भी कहा जा सकता है कि वास्तव में इन दोनो म विरोध नहीं है । जगर मैं साहित्यकार हूँ, रचयिता या सजक हूँ, तो यह ता अपन-बाप एक सत्प इमेज' है कि मैं रचता हूँ और जो मैंने रचा है वह दूमरा के सामने लाता हूँ। जहाँ मैं दावा नहीं करता कि 'यह मैंन रचा' वहां वह मेरी सफ इमेज' से मेल नहीं खाता, इस लिए मेरे लायक नहीं है। आपने फहीं माना है, शायद 'अतरा मे लिखा है, कि सम्बधो के जगत मे बहुत कुछ ऐसा है जो मानव-सवेदन को समद्धतर बना सकता है, फिर भी आपने उन्हें कहने से छोड दिया है । तो स्वय ही निरीक्षण कोमन मे रखा भी है, फिर भी उस का उतर नहीं दिया है। क्यो? नही, ऐसा नहीं है। जो मैंने कहा है वह अपने सस्मरण के सदभ म कहा है कि बहुत-सी चीजें याद आती है तब लगता है कि उन म कुछ ऐसा था जिस अनुभव म से हम गुज़र हैं उस म कुछ ऐसा था, जो दूसरे के भी काम का हो सकता उस को सम्पनतर बना सकता। साधारणतया इस ये बावजूद मैंने उसे सामने लाना जरूरी नही समझा तो वह इस लिए कि मैं विचारा का तो महत्त्व देता है लेकिन जिस निजी अनुभव के नाधार पर हम वहा तक पहुँचे उस को भी सामने लाना जरूरी नही मानता। उस को तभी महत्त्व दूगा जगर एसा लगे कि सिफ जिस विचार तक हम पहुँच वह नही परिस्थिति बदल गये होने के बावजूद और इस अनुभव के पुराने हो गये हाने के बावजूद उम प्रक्रिया में से कुछ मिल सकता है। जहां एसा लग कि इसके बावजूद कि अनुभव आज का नहीं है आर नाज वे जीवन म यह अनुभव नही होगा, उम को इस लिए दूसरे के सामन लाने लायक समझ सकता हूँ कि उस के द्वारा जो विचार आज भी महत्त्व के हैं उन का मूल्याक्न करने में मुझ को कुछ सहायता मिल सकती है। ता आत्मक्थन म, या आत्मक्था मे सस्मरण म, इस तरह की जो चीज़ है उस तो महत्त्व दे सकता हूँ नही तो बाकी चीजें साहित्य की दष्टि म कोई महत्त्व नहीं रखती, निजी जीवन म या अपन बधुवाधवा कवीच ता उस का महत्त्व हा सकता है। लेखन मे सम्प्रेषण और आत्मीयता मे फ्क है। जो सम्प्रेपित हो १०० रचना क्यो और किन के बीच सकता है वह जरूरी नहीं कि आत्मीय भी हो। आप का हर शब्द के बारे मे, उस पा सम्प्रेषण योग्य होना, इस मे आप का बड़ा ध्यान रहा है। पर ऐसा भी हो सकता है कि वह ऐसी आत्मीयता न उपजाता हो जसी बहुत-से उप यास पढ़ते समय पाठक को महसूस होती है, जसे मुद्राराक्षस के कुछ उपयास है-'भगोडा' उदाहरण के लिए, जो एक 'पार्टिसिपेशन' नहीं, पर एक आत्मी यता का सम्बघ स्थापित कर के वह आगे चलता है। यह तो क्या सिफ क्या कहने का एक ढग नही है ? आप बाकी समाज से खास तरह का सम्बध स्थापित कर व उस का निर्वाह करते हुए क्था वहते हैं। वह दूसरे ढग स भी कही जा सकती है। लेखक के स्वभाव में भी यह बात हो सकती है। लेखकीय परम्परा भी हो सकती है। टक्नीक की एक युक्ति भी हो सकती है और पूरे समाज की एक परि- स्थिति भी हा सकती है। क्या कि जब किस्मागाई का युग था, वाचिक परम्परा थी, क्था~-जैसा उस का नाम भी बताता है-कही भी जाती थी और सुनी भी जाती थी, तब एक आत्मीयता का सम्बध स्थापित कर के बात आग बढती थी। जाज के समाज में शायद वह बाधक भी हो सकता है और इस खास दूरी की स्थापना आवश्यक हो सकती है उस वस्तु का सही सन्दभ म सम्प्रेपित करन के लिए। जिस समाज मे पडोसियो म भी जात्मीयता का रिश्ता नही होता, उस मक्था को आत्मीय ढग से कहना उस को झूठा करना भी हो सकता है। शायद समाज की पहचान इस में ज्यादा होगी कि जिस ढग से हम लोग जीते हैं जिस तरह का एक खास निर्वयक्तिक सम्बध रखत हुए, उसी म ढाल कर बात कही जाये। तब उस की सच्चाई ज्यादा ग्राह्य होगी। ऐसा भी हो सकता है। थोडा 'आर्जेक्टिव भी हो जाता है या उस से चीजो के वस्तुगत होने का अहसास, एक शिल्प को दष्टि से भी ऐसा आभास पदा किया जा सकता है। तथ्य जोर सत्य का भेद आप के काव्य मे बहुत प्रखर हो पर आया है। इसे आप का पूर्वाग्रह कह तो? यथाय-बोध तो ऐसे किसी भेद को स्वीकार नहीं करता। पूवग्रह तो इस बहुत-से लागा ने कहा ही है। और मैंने बार-बार इस भेद की चर्चा की है। लेकिन यह बात गलत है कि यथाथ बोध इस को स्वीकार नहीं करता। यह तो यथाथ-बाध का अग है--तथ्यो मे से बहुत से ऐसे हैं, हम जानते हैं कि ये बातें है, यह भी जानते हैं कि ये सही हैं, लेकिन व्यक्ति, दुःख, आस्था, आत्मालोचन १०१ उन से अपना कोई सरोकार अनुभव नहीं करते । जव तक वैसा सरोकार नहीं होता तब तक उस का हम सत्य का दर्जा नहीं देते । अब रोज या कि हर घटे में लाखो लोग मरते है, सकडा बच्चे जमत है, लेकिन ऐसे वहुत स लोग हैं जिन के लिए जानकारी मे तो इस का स्थान है, लेकिन जो एसा नही जनुभव करते कि इस से उन का अपना भी काई सम्बध है, कि इस का बदलना चाहिए या कि कही इस मे ऐसा सरोकार उन का हाना चाहिए कि वे चिना करें अपने को वदले इस तरह की चीजें सत्य का दर्जा नहीं पाती। आप परिभाषा बदल कर कहना चाहे कि हम इसी काटि के त य को ही सत्य कहते है ऐसा ता कह सकते हैं। लेकिन फिर भी जो भेद मैंने किया है इस तरह की सच्चाई के और उस दूसरी काटि के सत्य के बाच जिस से हमारा ऐसा सरोकार होता है कि उस से हम अपन को या अपने जीवन को या अपने समाज या ससार को बदलना चाहते है या कही भीतर हम को लगा है कि इस जानकारी के साथ हमारा ऐसा सम्बध है कि हम इस की उपेक्षा नहीं कर सकते है- वह भेद तो बना रहता है। दो अलग काटिया के सत्य हैं। जाप चाह तो परिभाषाएँ दूसरी बदल लीजिए। एक के बदले दूसरे को सत्य कहिए। लेकिन जिस को मैंन सत्य और जिस को तथ्य कहा ह उन दोनो के बीच एक अन्तर है जो यथाथ बोध का अनिवाय जग है। उस के बिना हमाग यथाय-बोध ही जघूरा है। आप के बारे मे कहा गया है कि आप का बुनियादी सरोकार सायक्ता और स्वायत्तता की खोज है। जाप कुछ कहना चाहेगे? भरा या कि मनुष्य का कहने को तो और भी बहुत सी बात कही गयी है । लेकिन अगर ऐसा है भी तो स्वायत्तता की खोज एक बुनियादी सराकार मेरा भी है। और मैं समयता हूँ मनुष्य मात्र का है या हाना चाहिए। उस स्वायत्तता मे बहुत-सी चीजें आती हैं जिस म माथिक स्वतन्त्रता या आत्म निर्भरता से ले कर मानव प्राणी के रूप में अपनी जिम्मेदारी का निवाह करन की स्वन त्रता तव मभी तरह की बातें आती । तो इस का मतलब है कि ऐसा करने मे आप एक ऐसे घटक की फ्ल्पना करते ह कि व्यक्ति एप मे व्यक्ति ऐसा हो जिस से एक विशिष्ट प्रकार के समाज का निर्माण हो, जो व्यक्ति स्वायत्त हो, स्थतन हो या सायक जीवन जी रहा हो। व्यक्ति के रूप मे समाज के ऐसे घटक को आप कल्पना करते हर इस दृष्टि स मनुष्य ये विधाम की पशु मे मनुष्य तप में विकास की और १०२ रचना क्या और दिन के बीच ? मनुष्य की मनुष्य के रूप म विकास की, एक बहुत बडी प्रवृत्ति मैं इस स्वतत्रता की पहचान और याज मानता हूँ। मनुष्य ही पहला ऐसा जीव है जिस के लिए स्वत सता सम्भव है और जो यह पहचानता है कि मैं स्वतन हो सकता हूँ। जो गहरी सास्कृतिक चेतना आप के सारे लेखन मे दिखाई देती है-और यह भी लगता है कि कोई यहुत गहरी सास्कृतिक चेतना होना एक विशेष प्रकार को विशिष्टता पदा कर देता है लेकिन यह कहीं न कहीं अवरोध भी हो सकता है जब हम मानव धम को उसकी अविच्छिनता और समग्रता में देखना चाहते हैं। इस विशेष प्रकार को सास्कृतिक चेतना व्यक्तिगत, व्यक्ति के अय मे नहीं, देश के अथ मे विशिष्ट या जातीय या देशीय हो जाती है, ऐसा तो नहीं लगता यह खतरा उस म है यह तो मैं मान सकता हूँ। जसे साक्षरता म यह खतरा है कि हम निरक्षर का अपन स छोटा समझने लगें-उस से अपने का काट ले। लेकिन इस लिए साक्षरता एक वाधा है, यह ता मैं नही मानता । इसी तरह सास्कृतिक चेतना है । ता उस चेतना के हाने मे सवेदन के किसी तरह भी सम्पन्न होन म यह खतरा है कि जिन मे वसा सवदन नहीं है उन से ऐसी इकाई कट सकती है, लेकिन उसी में यह पहचान भी है कि मरे सामने यह खतरा है जार उस से बचना चाहिए वह एक नयी सहानुभूति भी दे सकती है। तो सस्कृति मे इस तरह की सम्पन्नता भी उस का अग है। यह तो मैं नहीं समझता कि यह एक अग जरूरी है, लेकिन उस के साथ यह भी है कि जिन का यह सस्कृति या यह सास्कृतिक दष्टि या मूल्या का यह ममूह नहीं मिला है, जो इस दष्टि से मेरी अपेक्षा कम सम्पन है उन के प्रति मेरा एक दायित्व भी है। यह भी सास्कृतिक बोध का ही एक अग है। फिराक गोरखपुरी सास्कृतिक चेतना से जडे रहे, देश में रहे, लेकिन फिर भी यह इस की प्रमुख भाषा हिन्दी को एक 'डटिएस्ट लेंग्वेज' कहते हैं, फसा लगता है। वह सास्कृतिक चेतना से जुड़े रहे, इस बात का फिर बहुत कुछ सीमित करता पडेगा । वह उस को एक धारा से जुड़े रहे। यह सिफ एक सीमा हो तर भी कह सकते हैं कि 'सीमा है लेकिन अपन जाप मे दोष नहीं है। लेकिन उस के साथ साथ उन म दूसरी धारामा के प्रति एक अवना का, घृणा का भाव भी रहा । अब निश्चय ही उस के बहुत से कारण उन के व्यक्तिगत जीवन म भी रहे हागे । उन म जाने की जरूरत नहीं । लेकिन व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन १०३ मैं तो समझता हूँ कि एक दृष्टि से उहोंने अपने को पगु ही बनाया और यह बात उस पगुता को एक अभिव्यक्ति है। बल्कि यह कवि को दष्टि स बहुत बडी पगुता इस लिए है कि किसी भी कवि का किसी भी भाषा के बारे मे यह कहना कि वह भाषा पटिया है यह इगित करता है कि भाषा क्या होती है इस की पहचान ही उस को नहीं है। कोई भी भाषा घटिया या वढिया नहीं होती। उस से जो हम काम लेते है वह घटिया या बढिया होता है। फिराक साहब को समझना चाहिए था कि हिदी न होती तो वह उदू वह लिख ही न सकते जो उन्होंने लिखी। आपने नियति-बोध की आवश्यकता और उस के अभाव के खतरो को बात की है। उसे समझायेंगे? नियति-बोध सिफ सस्कृति की दृष्टि से। सस्कृति का एक अप यह भी है कि एक समग्र मूर्ति उस पूरे समाज को या समूह की जिस को वह सस्कृति है उस के सामने हाती है । वैसा अगर है, एक समग्र चित्र सामन है तो उस का एक लक्ष्य भी सामन है, इस सस्कृति के भीतर रहन वाले लोग इस दिशा में बढ़ रहे हैं, इस दिशा म बढ कर वे अपने आप को पूरी तरह अभिव्यक्त कर सकेंगे, पूरी तरह पहचान सकेंगे, अपने को मनुष्य के रूप मे निष्पा कर सकेगे यह उस सास्कृतिक दृष्टि से मिलने वाला एक तरह का नियति-बोध होता है। जिस सस्कृति म यह दष्टि नहीं है इस का कोई ज्ञान नही है कि हम एक सास्कृतिक समूह के रूप में क्या है विधर जाना चाहते हैं यह सस्कृति हमे विधर ले जा कर निप्पन हागी, उस मे सास्कृतिक नियति वोध नही है । मैं जो चर्चा की है, इसी मदभ म की है। उस दष्टि का न होना एक विशेष प्रकार का अधापन है। वही मैंन इस बात का भी उल्लेख किया है कि नियति वोध एक खतरनाक चीज भी हो सकती है । अगर ऐसा हो जाये कि समाज म कुछ थोडे से लोग हो जिन के पास सत्ता हो और जो कह कि हम देखते हैं और हम निणय करेंगे कि इस पूर समाज की नियति क्या हो-जहा ऐसा है वहा खतरा है। लेकिन जहां पूरा समाज इस चीज से नियत्रित होता है कि इस पूरी सस्कृति के लिए यह लक्ष्य है और उस लक्ष्य में लोगो को साथ लेते हुए चलता है वहा तो खतरा नहीं है । आपने यह भी तो साथ ही कहा है कि नतिक्ता-बोध का न होना जोवन-लक्ष्य का न होना है और जो बच रहने में सहायक है वही नतिक है। ये दो बातें हैं। दूसरी बात पहली के साथ जुड़ सकती है लेकिन फिर एक विशेष जय मे-जहा पर इस का महत्त्व है कि 'वच रहना म विस को १०४ रचना क्या और दिन के बीच - कह रहे हैं । एक बच रहना है जो कहता है कि बचे रहना ही अगर सब से श्रेष्ठ नीति है तो और किसी तरह का नैतिक बोध हमे नही चाहिए- बाकी सारे नैतिक विचार इस म बाधक होत है। उस तरह के बच रह्ने का समथन मैं नही करता। लेकिन मनुष्य-रूप मे बच रहना नैतिक दृष्टि से सही कर्म करत हुए बच रहना है। यानी मनुष्य का बच रहना और पशु का बच रहना दो अलग-अलग कोटि के बच रहन है एक शुद्ध जैविक स्तर की बात है, एक मानवीय स्तर की-नैतिक स्तर की। यह भेद ता मैं करता हूँ । नैतिक बोध मनुष्य की सम्पत्ति है और मनुप्य के रूप मे बच रहने का अथ नतिक व्यक्ति होते हुए बचे रहना ही है । अगर नैतिक बोध नहीं है तब काई लक्ष्य नहीं है। यह नैतिक बोध ही है कि अमुक हमारा लक्ष्य है, उस की आर जाने के लिए हमे अमुक प्रकार का कम चाहिए, अमुक प्रकार से जीना चाहिए। बहुत हद तक अकेले खडे रह सकने के सामथ्य के पोछे कुछ विशिष्ट घटना क्रम का उल्लेख करना चाहेगे' नहीं जानता कि इस का क्या जवाब दू । मेरी शिक्षा दीक्षा और जीवन की परिस्थितिया ही बहुत हद तक इस के लिए उत्तरदायी रही, शुरू से ही अकेले रहना पडा और वसे रहने का सामथ्य बढाना पडा या उस के लिए दीक्षा प्राप्त करनी पडी। नि स देह पिता जी भी अपने बचपन से ही बहुत काफी अकेले रहते आये थे और उन मे भी इस तरह का सामथ्य था, इस लिए इस की ओर एक आकषण को उन्होंने कुछ बढावा भी दिया। लेकिन यह भी कहना चाहता हूं कि यह अकेले होना क्या होता है । मैं कोई मौलिक बात नहीं कह रहा हूँ और बहुत-से लोगों ने यह बात जानी है और कही है--अकेले मे हर किसी को अकेलापन ही लगेगा ऐसा तो नहीं है । मैं तो जब अकेला होता हूँ तब इतन काम करने को हाते हैं कि यह साचने की फुरसत कहा होती है कि मैं ला हूं या नहीं। पर अकेलेपन को उपलब्धि जो है वह आप को सुलभ है, और यह चीज सुलभ नहीं है, इस का ज्ञान तो है | मतलब एक लेखक होने मे तो आप को यह सहायता करता रहा है अब तक । ऐसा कह लीजिए कि यह एक तरह की कम-कुशलता ही है--और आप चाहे तो इस का योग कर्मसु कौशलम के साथ भी जाड दीजिए। अकेले काम कर सकता हूँ और काम करने म दूसरे पर निभरता अनिवाय नहीं है, यह सीख लिया। ममझता हूँ कि इस सामर्थ्य का अगर कोई घटक या कि स्रोत है ता यही है कि बहुत कुछ अवेले भी किया जा सकता है वह करते रहो । उस से अगर फुरसत होगी तव सोच लेना कि ऐसे भी काम व्यक्ति, दुःख, आस्था, आत्मालाचन हात हैं जा दूसर के साथ ही पिय जा सकते हैं । तर अबेलापन पटक भी सरता है, लेविन ऐरो अवसर मम आम है। यह भी लेसकीय दायित्व का भाग नहीं है पि लेखक अपने सम भालोना के बारे मे कुछ पहे, अपने विचार प्रपट परे, क्यों कि वह अपने समय का भी साक्षी है और अपने सामने जो रचनात्मक त्रिया हो रही है उस का भी साक्षी है ? अपन समालीनारे बारे म साच और जानायव भाव स साच, यह ता भावश्यर है। अपन लयन में लिए भी यह आवश्यक है । लेकिन उस बाद घुछ कह ही यह ता नहीं जानता दि जरूरी है। या मैं मुद तावना भी रहा हूँ और यह भी कह सकता हूं कि अगर न यहता रहता ता वम स यम मुझे बहुत सी दृष्टिया सबुछ सुविधा भी मिल गयी हाती । दूसरा बारे म सापना, रिसी परिणाम पर पहुंचना, आलाचना के आधार पर अपने गमय वे पूरे साहित्य के बारे म साचना, उस वा मूल्याक्न करना है और वह इस लिए उपयोगी है कि उसी के सदभ म व्यक्ति खुद भी लिखता है उस म अपन पूरे पाटरममाज की पहचान भी स्पप्रतर होती है। ऐमा वुछ सपना न मुझ स कहा भी है और यह मान लूगा कि यह तक-मगत है-~-महत हैं कि अगर सोचें भी ता उस को बहने म जो प्रति क्रिया होती है-यह ता है नहीं कि आप आलोचना कर देंगे और उसके बाद जवाब म दम आलोचनाएँ नही होगी, और इस की कोई गारटी नही है पि उन दस म स नो या दसा भो बिल्कुल पूधमह-दूपित या मि पारी नही हागी | तो उस सब म बहुत-सा समय नष्ट हागा-~वह क्या नष्ट विया जाय तो बहुत से लखप बहते हैं कि अपने समकालीन साहित्य पारा मे या उन की रचना के बारे मे व पढ वर पुछ राय ता बनाते है लेकिन उस का प्रकाशन र के यह जोखम क्या माल लिया जाने कि हमारा सारा समय या कि बहुत सा समय इस चर्चा म निक्ल जाय? हम अलग बैठकर अपना नाम करें। तो जो कुछ उस के बाद में कहा जायेगा, इस समय के गुजर जाने के बाद कहा जायेगा वह उस का 'पोस्ट थॉट' है, उस समय का 'थाट' नहीं है, जसे बहुत-सी चीजें व्यक्तित्व से जुडी होती है जो बाद वाले समय का पता नहीं रहती। यह तो ठीक है। पर बाद मे भी वह क्यो कहेगा । वह कहेगा ही क्या? मालोचर यह तो कहे- तो इस को आप जरूरी नहीं मानते उस वह ही ऐसा जरूरी नहीं मानता। अगर कहने का जाखम उठार १०६ रचना क्यो और किन के बीच भी तो यह तो मारा सस्ता हूँ कि नगर बहुत सा समय नष्ट होगा तो उस मे बुछ लाभ भी हागा, बल भी मिलेगा क्यो मि आलाचना सह सक्ना भी एक वाम की चीज़ है। वसे क्या आप को यह जरूरी नहीं लगता कि जो आप का आगे कालेरान है उस मे यह बात जरूरी होनी चाहिए? अभी तक आप के मूल सरोकार जोह काफी स्पष्ट हो गये ह पाठकों को भी या एक साहित्यिक परम्परा के रूप मे भी। स्वय भी आप की अपनी के द्रीय दृष्टि को रेखाकित करते हुए आप का आगे का लेखन उस से सम्बन्धित होना चाहिए, ऐसी कोई जरूरत आप को महसूस होती है? यानी? सेंट्रेलिटी आफ विजन। आप यह कहना चाह रही हैं कि अभी जो लिख रहा हूँ उस मे यह नही यह नहीं । एक वह होता है जो उन चीजा से उदभूत होता है, जो आप लिख रहे हैं उस से हम नतीजा निकालते ह, एफ यह है कि जो उस चीज का अहसास है, उस के सरोकार आप के मन मे स्पष्ट हो गये है। बाकी जो क्रिया प्रतिक्रिया से या "डिस्क्शन' से चीजें आप तक पहुंच गयी अपने आप, या दूसरों द्वारा पहुंचा दी गयौं, उन को स्पष्टता के लिए-जसे डॉ. देवराज की लेटेस्ट' किताव निकती है- कुछ परिवतन इस आधार पर हो भी रहा है मरे लेखन मे। इस दिशा को छू रहे ह, जसे साप्ताहिक 'हिंदुस्तान' मे जो लेख आप लिख रहे हैं वे काफी कुछ आप के वैचारिक या केद्रीय, मूल सरोकारो को स्पष्ट कर रहे ह । इस समय उन को लिखने को क्या मूल प्रेरणा रही ? क्या वे अलग-अलग समयों पर लिखे गये- अलग-अलग समय पर लिखे गये या लिखे जाते हैं । पर जब छपते हैं उस से बहुत पहले के नहीं होते। उस से कुछ पहले के-यानी माटे तौर पर आज का ही लिखा है जो छपता है। आप ये ख्याल से जो कहा जा रहा है वह काम कर रहे ह आप? हाँ, यह कहा जा सकता है कि ऐसा है। दूसर क्यो लिख रहा हूँ उस का कारण यह भी है, अब फिर अकेले रहने से बात जुड जायेगी, कि जो अकेला रहता है--चाहे लाचारी से, चाहे पस द से, चाहे जैसे भी--उस के लिए समाज से जुड़े रहने का एक तरीका यह भी है कि जब-तब अपने यक्ति, दुष, आस्था, आत्मालोचन १०७ विचार दूसरा के सामने रख दे और उन की कसौटी होने दे। उस के लिए बुछ मार भी पड जाये ता उस म भी कुछ बुराई नहीं है वह भी समाज से जुडने का एक तरीका है। २. लेखक को 'प्रोथ की बात विचाराधीन रखते हुए लेखन के साथ अपने बदलते रिश्ते को आप कसे स्पष्ट करेंगे? क्या उस का अपने मतव्यो के विरुद्ध जाने का खतरा आप निहित मानते हैं ? उस खतरे के प्रति आप का क्या रुख है ? पहले तो ग्रोथ शब्द का ले लीजिए। वह एक तो शरीर धम है-स्वस्थ शरीर निरतर विकसित होता है और इस लिए हर प्राणवान् इकाई अपने अतीत के साथ अपना रिश्ता बदलती है। दूसरे, लेखक सदभ में ग्रोय वा मतलब है मानसिक विकास, प्रौढता, भाषा और शिल्प पर बदलता हुआ अधिव आश्वस्त अधिकार, सामाजिक चेतना और सक्दन का विकास, विचार-क्षेत्र का विस्तार इत्यादि। इस सब को खतरा वहीं मानगा जो यह प्रतिज्ञा ले कर चलेगा इन सब दष्टिया स काल के अमुव बिदु पर भैरी जो स्थिति थी वही प्रामाणिक है और उस से इधर-उधर हटना 'अपने मन्तव्या के विरुद्ध जाना' है और इस लिए खतरा' है । यहा यह भी कहूँ कि विकासमान सजक प्रतिभा वाला लेखन अपने को रद्दी करते चलने का स्वयसिद्ध अधिकार ले कर चलता है। बल्कि जहाँ यह सतरा चुद गया वहाँ यह शका हानी चाहिए वि सजन का साहम भी चुक गया। वाल्ट बिटमन न निरी गर्वोविन नहीं की थी जब उसने कहा था I contradict myself? Very well then, I contradict myself I am vast, I contain multitudes (मैं अपनी बात का पडन करता हूँ ठीक है अपनी बात कायडन करता हूँ। मैं विराट् हूँ, मुझ म बडे-बड समूह समा जात हैं ) • यह दूसरा सवा' अगस्त १९८५ में सम्पन हमा। १०० रचना क्या और दिन के बीच , लेखन के क्षेत्र मे भीतरी ससार की प्रासगिक्ता बाहरी ससार से तय होती है, इस बारे मे आप का क्या रुख है ? इस किस्म के दबाव को आप कसे झेलना चाहते रहे? आप का सवाल जिस प्रतिज्ञा पर खडा है वह एक अथ सत्य है । आकर्षक अथ-सत्य है, लेकिन उतना ही आक्षक इस से ठीक उनटा अथ सत्य भी होगा-कि बाहरी ससार की प्रासगिक्ता भीतरी मसार से तय होती है। पहली बात तो यह है कि 'भीतरी और 'बाहरी', ये विशेषण ही एक छद्म हैं -इन की साथकता इस पर निभर है कि हम कहा खडे हो कर देख रहे हैं। जब मैं बाहर खडे हो कर और बाहर से एकात्म हो कर भीतर झाक्ता हूँ तो वह 'भीतर' ही अज्ञात, अपरिचित गैर है—अथात वही 'बाहरी ससार' है । मैं लगातार नये बिदु पर खड़ा हो कर भीतर और बाहर झांकने के अपने अधिकार को छोड़ना नही चाहता। यह अधिकार सजनात्मकता का एक बुनियादी अधिकार है। इसी के द्वारा लेखक एक भूमि पर खडा हा कर दूसरे ससार की रचना करता है और फिर दूसरे मे पर टिका कर पहले ससार को रूपान्तरित करता है। और यही प्रास- गिकता है, क्या कि इस सदभ मे प्रासगिक्ता एक गत्यात्मक सम्बध ही हा सकती है। किसी एक बिदु पर खडे हा जाना और उसी को चरम पिदु मान कर वही से सब कुछ की प्रासगिक्ता की क्सौटी करना निरी वादिता होगी। वसी कसौटिया तभी काम देती है. तभी 'प्रासगिक' होती है-जब वे आग्रहपूवक एक मूल्याकन प्रस्तुत करती हैं, उसे अन्तिम निणय मान कर नहीं बल्कि कुछ तथ्या पर बल देन के लिए। मैं स्वयं भी बार बार, जगह जगह रुक कर एसे मूल्याकन करता हूँ। उस से जो तनाव पदा होता है वह इस आवश्यक काम में मेरी मदद करता है-कि भीतरी और बाहरी ससारा की परस्पर-पोषक प्रणालियो को मैं और मजबूती के साथ जोड दू–ससार का रास्ता और साफ कर और इस म यह भी निहित है कि कोई मेरे एम सभी मूल्याकना को रद्दी घोपित कर दे सकता है क्यो कि उस के 'भीतरी' और 'बाहरी' ससार दूसरे हागे। इस समय की विचारधाराओ-विशेषतया जनवाद या सामा- जिर ययायवाद को ले कर आप का क्या मतव्य है ? वह जिन सरोकारो को रेखाक्ति करता है, साहित्यिक दृष्टिकोण से ये भी कुछ कम गम्भीर तो नहीं हैं। उन चुनौतियो का सामना आप अपने लेखन मे क्सि स्तर पर करना चाहते हैं ? । व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन १०६ मैं तो इस स्वयसिद्ध मान लेता हूं कि जनवाद या सामाजिक यथार्थवाद जिन सरोवारा को रेखाकित करता है व भी गम्भीर है यानी सामा- जिक सरोकारा को। लेकिन सचमुच क्या इस समय का तथाकथित जनवाद या तथाकथित सामाजिक यथाथवाद, सामाजिक सरोकारो पर ही बल दे रहा है ? क्या सच्चाई यह नहीं है कि सामाजिक स्थितियो और समाज म क्रियाशील शक्तियो का ये विचार धाराएँ अपन-अपने राज नीतिम स्वाथ के अधीन ऐसे रूप म प्रस्तुत करना चाहती हैं, उन स वसे ही भावनात्मक उद्वेग जगाना चाहती हैं, जा उन के दलगत उद्देश्या को पूरा करने म सहायक हायानी उन के दल के हाथ में सत्ता की बागडोर थमा देने म सहायक हा ऐसा न होता तो इन दाना पक्षो के बीच इतना आपसी तनाव भी क्या होता जब कि जिन सामाजिक सरोकारों की बात वे करते हैं व एक ही है और जिस विचार धारा अथवा जिस शास्त्र के अधीन वे उन सरोकारा को रेखाक्ति करते हैं वह भी एक ही है? ऐसा नहीं है कि मरे अपने राजनीतिक विश्वास या आग्रह नहीं हैं। एक लोक्त त्र का नागरिक हूँ और नागरिकता के अधिकारा और क्तव्यो मे मेरी आस्था है। लावत त्र प्रणाली या भी अव तन विकसित की गयी प्रणालियो म सब से अच्छी यानी सब से कम दायपूण मानता हूँ। लेकिन अपने कम को भी केवल नागरिक की दृष्टि से नही बल्कि साहित्य-सजक की दष्टि से दखता हू तो आग्रह मे थोडा परिवतन हो जाता है। और मैं मानता हूँ कि वैसा होना उचित भी है। साहित्य समय के सरोकारो का जाधार समग्र मानव की बल्कि प्राणिमात्र के विकास की परिकल्पना से जुड़ा होना चाहिए। मैं इस बात की ओर सकेत कर रहा हूँ कि सत्ता अधिकृत करन के तत्कालीन सरावारा के अथवा देशा ये युगीन स्वार्थों के विरद्ध भी ये बृहत्तर सरोवार हा सक्त हैं। एस विरोध की स्थिति मे इन उच्चतर मूल्या अथवा व्यापकतर हिता की यात साहित्य-सजव ही कर सकता है दलगत स्वार्थो म फंसा हुआ राजनीतिक व्यक्ति नहीं। कह लीजिए वि साहित्य-सजक देवल एक दश वा नागरिक बन कर चुप नही जाता। वह मानवतावादी भी है तथा प्राचीनतर अब म प्राणिवादी भा। कविता का आदि सस्कार अपने 'स्व' से शुर हुआ माना जा सकता है। इस अय मे विकास के दौर से गुजरती आज की कविता बाहर के रासार को पूरी तरह उ मुख है-याहरी सपों की वकालत करती है। इस अय मे उसे साया कविता माना जा सकता है। आपके विचार? रचना क्या और दिन के बीच ? क्या आप का ख्याल है कि मुक्तिबोध का ग्रह्म राक्षस अथवा अधेरे में या धूमिल का ससद से सडर तक बाहर के ससार पी तरफ अधिक उमुख है महाभारत की अपेक्षा कविता संघर्षों की वकालत नहीं करती। वकालत करना ही अपन को एव पक्ष के साथ बांध लेना है और निणय का अधिकार किसी दूसरे -~या रूपक का निर्वाह करते चलें तो किसी तीसरेको सौप देना है। कविता यह स्थिति कैसे स्वीकार कर सकती है ? कभी कभी वह ऐसा करे भी तो केवल जापातिक स्थिति समयते हुए करेगी- उपेक्षित पक्ष को भी सामने ले आने के लिए। यानी एसे काम की 'साथक्ता' है तो इसी सदभ मे और इसी सीमा के भीतर। और मानव मात्र इस बात को बहुत अच्छी तरह जानता है। सारे ससार के काव्य के उपलब्ध इतिहास का साक्ष्य देख लीजिए। जिन कवियो को कालजित् मानते है उन मे कौन ऐसा था जो 'वकील' था? मानव के दुख का उल्लेख सभी ने किया, एक गहरा और व्यापक कारुण्य सभी मे रहा, लेकिन वकालत और दूसरे देशो में भी, दूसरे युगो मे भी, जिन्होंने समय समय पर 'सधों की वकालत की, उहे हम भाट और चारण की कोटि मे रखते है। भाटो और चारणा ने भी अपन-अपने समय मे महत्त्व का काम किया और उस काम के प्रति मैं अवज्ञा नही दर्शाना चाहता। आज भी लडाई के लिए उकसाने वाले-सघों की वकालत करने वाले कवियों की जरूरत है और उन की कविता को भी तथा युगीन अथवा आपातिक साथक्ता है । लेकिन कविता की साथक्ता कुल जमा उतनी होती है यह मैं नहीं मानता। कोई भी कवि नही मानता। क्या आप कविता को ले कर उपयोगिता का प्रश्न उठाना चाहेंगे? बिल्कुल नहीं चाहूँगा । स्वयसिद्धा को ले कर प्रश्न मैं नहीं उठाता। यो ऐसे समय आते होगे जव ऐसा प्रश्न मा म उठता होगा। कविता से फायदा? साहित्य रचना से फायदा? कुछ भी परन से फायदा जीने से फायदा --और ऐसे प्रश्नोत्तरी से फायदा लेकिन कविता की वात छाड वर उपयोगिता की बात पर ही थोडा विचार कर लिया जाये तो अनुप यागी न होगा । उपयोगिता क्सि ये लिए?--यह भी सोचा जा सकता । और मही उत्तर के लिए ऋणात्मक प्रतिमा से भी शुरू किया जा सकता है। वविता न हो तो क्या विगड जायगा ? सजनात्मक प्रतिज्ञान हो तो क्या बिगड जायगा? क्या कभी ऐसा हुआ है कि बाहरी विभीपिकाको दारणता को - व्यक्ति, दुःख, आस्था, आत्मालोचन ११ ? देखते लेखन-कम को व्यथता का अहसास हुआ हो और उस मे एक पलायन मे उतारने की अनुभूति भी हो? यह प्रश्न आप के पिछले प्रश्न का विस्तार ही है। अगर क्सिी स्थिति म लेखन कम व्यथ दीखता है तो उसे छोड कर जो कम साथ दीखता है उस मे क्यो नही प्रवृत्त होना चाहिए। अगर विभीपिका के समक्ष उपाय के रूप मे लेखन-क्म जपर्याप्त दीखता है-जो हा सक्ता है-तब स्वाभाविक प्रक्रिया का एक अग यह भी होगा कि 'मैं दुसर क्या उपाय कर सकता हूँ" लेखक के लिए भी लेखन ही एकमात्र कम नहीं है । एक सामाजिक व्यक्ति और एक नागरिक के नाते और भी बहुत से कम उस से अपक्षित भी है और उस के लिए सम्भव भी हैं। सोचना यह चाहिए कि जैसी विभीपिका है, जिस क्षेत्र का आपात है, आप जो कम कर रहे है वह कहा तक उस के अनुरूप है ? जहाँ इस अनुरूपता को चुनौती की उपेक्षा है अथवा उस से बचते हुए कम किया गया है वहा कमच्युति है या पलायन है। आप यह न भूलिए कि अनुरूप कम से बचन का एक रूप लेखन भी हो सकता है यानी लेखन मात्र पलायन हा सकता है। आज ऐसा बहुत सा साहित्य लिखा भी जा रहा है जो अपन सामाजिक कम से पलायन का एक तरीका है-सामाजिक कम का एवज्री है । एसे लेखक कम नहीं हैं जा विभीपिकाओ का प्रतिकार करन के लिए छन्दबद्ध हो हल्ला मचा रहे हैं लेकिन सामाजिक स्तर पर या कि यथाथ स्तर पर कुछ नही कर रहे हैं । जुझारू लेखन, और समाज म आराम की जगह की खोज या सरकारी सस्तुति और सुविधा की मांग-इस विरोध का न देखना भी एक पलायन है। जहा तक आप प्रश्न का अतिम अश है मैं समझता हूं कि अपने लेखन कम मता पलायन की प्रवत्ति मेरी नही रही है । या यह सवाल लेखक से पूछन का इस लिए नही है कि इस का उत्तर उस की रचना मे हो खोजना चाहिए-वही उत्तर विश्वसनीय होता है। अपनी उत्तराधिकारी पीढ़ी से आप की क्या अपक्षा है ? ऐसे कुछ महत्त्वपूर्ण तत्त्वो की आप व्याख्या करना चाहेंगे' परवर्ती पीढी का जब उत्तराधिकारी पीढ़ी के रूप म देगा तव स्वभावत चाहूंगा कि वह अधिकारी हा और उत्तरदायी हा । और तब वह उत्तराधिकार केवल मुश तक सीमित नहीं रहगा। एक बहुन लम्बी प्राणवान् परम्परा है जिस स वह जुड सक्गा और जिस म जुडना उम में लिए आवश्यक होगा। यह परम्परा साहित्य का भी है ममाज की भी है, दश और मस्कृति की भी है। सभी मनिरन्तर नाविकाम हुआ है ११२ रचना क्या और दिन के बीच अस्वीकार, सुधार, परिवतन और विस्तार की जा प्रक्रियाएं क्रियाशील होती रही है और है, मूल्यवान पुरान की रक्षा के साथ आवश्यक नये की रचना के लिए साहसिक प्रयोग करन और जोखम उठाने की जो प्रवृत्ति रही है-उन सब का निवहन भी उत्तराधिकारी से जपक्षित होगा। यह स्पष्ट कर दू कि ये अपेक्षाएं मेरी नहीं होगी क्या कि अपेक्षा करन को वहाँ मैं नही हूँगा। चुनौती समकालीनता की चुनौती है और होती है। क्या आप समझते ह कि सचमुच कभी ऐसा समय आ सकता है कि जब हम जिस बदले हुए समाज को कल्पना करते ह वह आ जाये-या यह महज हमारी आदर्शोमुखी कल्पना है ? हम आज मे भिन्न समाज की सिफ कल्पना ही नही करत आज के समाज को बदल कर उसे नये समाज के निकटतर लाने का वरावर प्रयत्न करते है । अगर नहीं करते तो हम केवल कल्पनाजीवी हैं वह स्वस्थ अवस्था नहीं है। अगर हम समाज को बदलन के लिए यत्नशील हैं तो बराबर अपने आदश नये समाज की ओर बढ रह है । एक दिन वह आयगा ही। लेकिन यह मानना या पहचानना भी उचित हागा- और अगर आप का वैज्ञानिक चिन्तन का आग्रह है ता वज्ञानिक दष्टि से उचित होगा कि जब वह समाज आयेगा ता वह वास्तव मे वह नही हागा जिस की आज हम कल्पना करते है, क्या कि तब हम भी वास्तव म वे नही होगे जो आज क्ल्पना कर रहे हैं । एक परिवतन हाता है तो सैकडा और परिवतन हो जाते हैं जो न हमारे नियोजित थे, न हमारी कल्पना की परिधि मे थे। न ही ये सारे अनियाजित अनपेक्षित और अकल्पित परि- वतन उसी क्षेत्र या आयाम तक सीमित रहते हैं जिस म पहला परिवतन हुआ होता है। दो-एक अलग-अलग क्षेत्रो से उदाहरण ले लीजिए । जिन गांवा म बिजली नही थी उन के घरो मे विजली की रोशनी आती है ता इतना ही नही हाता कि रेडिया भी आ सकता है या बिजली का चूल्हा भी जल सकता है या कुएं की घिरौं डोरी के बदले पम्प लग सकता है। बात केवल ऊर्जा के एक रूप की मुलभता अथवा विजली चालित यात्र की सुलभता तक नहीं रहती। घर में बिजली आन म दूमरो चेहरे भी अधिक स्पष्ट दीखने लगत हैं और हमारे सारे सामाजिक रिश्ते बदलने लगत हैं । बिजली से दीवारो का उखडा हुआ पलस्तर अधिन साफ दीखन लगता है, मकडी के जाले भी, और पर भी और छाटा हा जाता है। एक बार फिर हमारा समाज बदलता है और मानवेतर प्राणिया व व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन साथ हमारे सम्बध बदलते हैं। गली म या वेवल चौपाल पर भी बिजली पी बत्ती लग जान से हम गली की गदगी साफ दीपन लगती है और आकाश म तारे दीपना यद हो जाता है। रेडिया सुनने के अभ्यस्त कान पशु-पक्षिया की वाली गुनना भूल जात हैं बल्कि उन की पहचान भी खो देते हैं । उदाहरण का इतना विस्तार काफी है, यद्यपि प्रभाव यही तक समाप्त नहीं हो जाता है। सक्षेप म कहूँ कि घर म बिजली आते ही एक तरफ टफ्नोलाजी से मिलने वाली सुख सुविधाओ का विस्तार होता है और हमारे जीवन को समृद्धि बढती है ता दूसरी तरफ हमारे निजी जीवन के वयिक और दिगन्त व्यापी नाते टूट जाते हैं और हमारा जीवन मनुचित हा जाता है । सव से दुखद परिणाम यह होता है-या हो सकता है कि हमारे सवदनो का और सहानुभूति का ससार छोटा हाता जाता है। विना सचेतन कम के इस स्थिति म सशोधन सम्भव नहीं है और यह सशोधन साहित्य के द्वारा होता रह सकता है। इसे आप चाहे तो एक उपयोगी विषयातर मान ले। एक और उदाहरण जिन घरा मे लोग फश पर बैठत थे उन मे मेज और कुर्सी का प्रवेश । टेक्नोलॉजी की दृष्टि से लक्डी की मेज और कुर्सी (जिा के जोडा की सिलाई भी लक्डी की खूटिया से ही हो सकती है, लोहे के कील-पेंच भी आवश्यक नहीं हैं) कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। लेकिन मेज कुर्मी के आते ही फश की सफाई के साथ हमारा रिश्ता बदलता है घर-आगन की लिपाई पुताई के साथ रिश्ता बदलला है जूता पहने हुए भीतर आने या न आने के अभ्यास बदलत है उठन बैठने का ढग बदलता है, रीढ और स्नायुआ की सहज स्थितिया बदलती हैं और यहा तक कि हमारा सास लेन का ढग भी बदल जाता है। फिर मेज़ कुर्सी के साथ या पीछे-पीछे अगर थाली स्टोरी के बदले प्लट और तश्तरी जाती है तो परिवतन के और भी कई चक्र आरम्भ हो गय होते हैं जिन सब का हमारी जीवन परिपाटी पर इतना और एमा प्रभाव पड़ता है कि उस की पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। सूत्र प म कहूँ कि ऐसा नहीं है कि कल्पनाशील प्राणी हो गये होन के नाते मानव भविष्य की सारी सम्भावनाओ की कल्पना कर ले सकता है। मनुष्य एक अपूर्वानुमेय प्राणी है या कि पूरी वात कहनी हा तो या कह सकते है कि एक ओर मनुष्य की घुद्धि उसे पूर्वानुमय बनाती है और उसे यह सामथ्य देती है कि अपने भविष्य का न केवल अनुमान कर सवे बल्कि उसे बहुत दूर तक नियोजित और नियनित भी कर सके उसे बदलन का उपक्रम भी करता रह सके, दूसरी ओर उस की चेतना ११४ रचना क्यो और किन के बीच उसे अपूवानुमेय भी बनाती है बल्लि लगातार उस की अपूर्वानुमय सम्भावनाआ का विस्तार भी करती जाती है। हम लगातार वह हाते जायेंग जो हम होना चाहते है । हम कभी वह नही हो गये होंगे जो हमने होना चाहा। एक विशेष प्रकार के लेखन को परम्परा का प्रवतक मान लिये जाने के बारे मे आप को निजी प्रतिक्रिया क्या है ? प्रश्न शायद प्रयोगशील या नयी कविता के बारे मे है । यदि एसा है तो मैं कहूँ कि क्सिी आदोलन या रचना की धारा या शैली का प्रवतन करने में मेरी जरा भी दिलचस्पी नहीं थी, न है। प्रवतन का उत्तरदायित्व थोप दिया जाना एक अप्रासंगिक उलझाव है, रचना कम मे एक बाधा है । उस बाधा का काफी अनुभव मुझे है, उस राह से हटान म मुझे कम प्रयास नही करना पड़ा है। जो लोग सामाजिक स्थिति की दुहाई देते हैं और अज्ञेय को असामाजिक घोपित करते है वे स्वय नही समझत कि रचना-कर्मी की सामाजिक स्थिति क्या होती है और पिछले ५०-६० वर्षों मे हिदी भाषा में रचना करने वाले की सामाजिक स्थिति क्या रही है। एक हद तक यह बात सभी भारतीय भाषाआ के रचना-कमिया के लिए कही जा सकती है, लेकिन हिन्दी लेखन के लिए उस का अतिरिक्त महत्त्व है क्यो कि एक ऐसा भी क्षेत्र है जिस मे हिदी को कुछ दूसरी भारतीय भापाआ का भी विरोध सहना पडता है। हिदी का रचना-कर्मी केवल रचना नहीं करता बल्कि लगातार उस रचना का ग्रहीता पक्ष बनाने के लिए भी बाध्य है। वह कविता ही नही रचता बल्कि कविता के लिए एक समाज भी रचता है। समाज-रचना का यह पक्ष उन कवियो के लिए महत्त्वपूण नही था जो राष्ट्रीय आदोलन का अग थे। उह पूरे समाज की जनुकूलता बनी-बनायी मिलती थी क्यो वि वहा बवि और काव्य का सामाजिव (पाठक या श्रोता) सब एक ही लक्ष्य से जुडे हा वर सहानुभूति के बधन में बंधे होत थे। अप्रेजी उस सहसवेदन के घेरे से बाहर थी, बल्कि दूसरी भारतीय भाषाएं भी हिदी को अपना अनुमादन दती थी। काव्य-रचना के साथ-साथ समाज की भी रचना करन की आव श्यकता छायावाद के साथ आरम्भ हुई उस धारा के कविया का पहले- पहल भीतर से भी विरोध मिला था और उह हिन्दी भापी समाज के भीतर एक और सहृदय समाज बनान की आवश्यकता पड़ी जिस के साथ समान सवेदन की प्रणालिया रची जा सकी। मेरो प्रारम्भिक रचनाओ मे छायावाद की अनुगूज अवश्य व्यक्ति, दुख, आस्था, मात्मालोचन ११५ मिलेगी, लेकिन मरी सारी रचना प्रवृत्ति, मेरी चिन्तन-पद्धति, मेरी वैज्ञानिक चेतना और मरा भापा-सस्वार सव छायावाद विरद्ध जात थे। या या यह लीजिए कि मैं जानता था कि मेर समय में समाज पावाव्य-सवदन और सस्तार उस सब ये विरत था जो मरी रचना ये साप अनिवायत जुडा । क्या कि मैं इस बात को जानता था और मुझ यो भनेव वार सामाजिक विरोध का तीया अनुभव भी कराया गया, इस लिए जम काव्य और जैस साहित्य का रचा जाना मैं एक समकालीन अनिवायना मानता या वस वाव्य और साहित्य के लिए एक समाज की रचना भी मुझे जावश्यक जान पड़ी। एक बार फिर स्पष्ट कर दू कि समाज बनान ना यह काम रचना-बम से बिल्कुल अलग प्रकार का काम है और अलग प्रकार की क्षमता भी मानता है-जरूरी नहीं है कि रचना वर्मी यह नाम बरे ही । वह अपनी शक्ति को देवल अपने रचना कम के लिए सँजोय रख सकता है और सवेदन के निर्माण के लिए आलोचना, व्याख्या शास्त्र विवेचन, मूल्याकन, साहित्यिक दीक्षा आदि को अपने क्षेत्र स बाहर मान सकता है। पडित आलोचका से लोहा लेने की कोशिश को वह एक अनावश्यक जुझारू भगिमा मान ले सकता है। जो ऐसा करता है उसे मै दोप भी नहीं देता। अपनी शक्ति को पहचान कर उस का श्रेष्ठ और सही उपयोग करना उस के लिए सवया वान्छनीय है । आप देखिए कि प्रमुख छायावादिया मे 'निराला' रचना भी करते रहे और समाज से लडते भी रहे-आलोचक समाज और पडित समाज से भी। दूसरी ओर सुमित्रान दन पत ने एसा कोई प्रयल नहीं किया। निराला' ने लडन का दण्ड भी पाया लेकिन नये प्रकार की काव्य रचना के लिए एक समाज भी वह बना गये। यह कहना तो एक राजनीतिक फरब है कि 'निराला' जन भाषा लिखत थे अथवा जनता की बोली के निक्ट थे। सच्चाई यह है कि जसा वह लिखते थे उस के लिए एन समाज भी उहोने ठोक पीट कर तयार क्यिा-और फिर 'मार- मार कर हकीम बनाने वाले नुसखे से पडित आलोचव भी पाये। उनके लडन स दूसरो को भी लाभ मिला लाभ का ऐसा समाजीकरण हमेशा होता ही है । परवर्ती साहित्यवारो को भी छायावादी वाव्य वे सघप के लाभ मिले- उनके लिए उहपिर से नहीं लड़ना पडा और वे मा को आगे ले जा सके। परवर्ती काल मे भी आप देख लीजिए कि शमशेरबहादुर सिंह कभी लडाई मे नहीं पढे अपनी रचना में रहे और उस के लिए सामाजिक बनाने का काम उहोंने बिलुत नही क्यिा । इसे आप रचना क्या और दिन के बीच प्रयोजन की शुद्धता भी कह सकते हैं, अन्तरमुखीनता भी कह सकते हैं, शान्तिप्रियता भी कह सकते है, अपनी शक्ति की सही पहचान और उस का श्रेष्ठ उपयोग भी कह सकत हैं । दूसरो ने ही भाषा, सवेदन, वस्तु, दप्टि आदि के स्तर पर लडाइया लडी-कवियो ने भी और आलोचको ने भी-और एक नये समाज का निर्माण किया। वह समाज शमशेर को भी मिला और वह उन की कविता का सम्मान करता है। दूसरी ओर मैं शुरू से ही इस ओर भी सजग और क्रियाशील रहा। आप देख लीजिए कि यह बात रचना-कम के बारे में नहीं है, समाज की दीक्षा के बारे मे है । यानी यह काम करने वाला इस काम से कवि के रूप में न छोटा हो जाता है, न बडा यह काम ही दूसरे प्रकार का है । मैं समझता हूँ कि यह काम मैंने सजग रूप से किया और इस मे मुझे सफलता भी मिली । मुझे उस सफलता का दण्ड भी मिला और उस के लाभ भी मिले । मेरे समय के दूसरे अधिसस्य कविया का उस के लाभ तो मिले लेकिन दण्ड नहीं क्यो कि वे लडाई मे उस हद तर शामिल नहीं थे। (मुक्तिबोध को लाभ भी मिले और कुछ दण्ड भी मिला लेकिन वह दण्ड ठीक इस लडाई के कारण नहीं था बल्लि एक दूसरी लडाई के कारण था, वह दूसरी लडाई अपने भाषा समाज अथवा साहित्य समाज के भीतर की लडाई उतनी नहीं थी जितनी राजनीतिक सत्ता के क्षेत्र म1) आप के प्रश्न के अनुपात मे उत्तर शायद लम्बा हो गया है। लेकिन ये बातें कहने की जरूरत थी और शायद आप के प्रश्न के पीछे विचार धाराओ की जिस टकराहट का वोध रहा होगा वह इह प्रासगिकता भी देती है। आज की पीढी के गुण दोषो को व्याख्या आप कसे करेंगे? वह एक अथ मे पिछली पीढ़ी के गुण दोषो का परिणाम मानी जा सकती ह-इस सम्बधात्मक स्तर पर अपना विचार स्पष्ट करें? पीढियो की दष्टि से सोचने लगें तो काव्य की हर पीढी का अपना व्याख्याता होता है और होना चाहिए । पहले की पीढी बाद की पीढी की रचना की व्याख्या करे तो यह ठीक नहीं है । बल्कि इस से उलटा एक हद तक उपयोगी भी होता है क्यो कि नयी पीढी की रचना पिछली पीढी वी रचना को जमीन बना कर ही खड़ी होती है। लेकिन इधर की रचना मे भाषा के प्रति एक गहरी उदासीनता, बल्कि भाषा के सम्बध मे एक व्यापक अज्ञान मुझे बहुत क्लेश देता है । जन भाषा नाम की एक कल्पित और सस्कार रहित भापा के नाम पर एक प्रकार का अघेर है तो 'सम- कालीन सवदन' के नाम पर अग्रेजी की खिचडी दूसरे प्रकार का अधेर व्यक्ति, दुख,आस्था आत्मालोचन ११७ 7 मना रही है। ऐसे में हिंदी की बात करना ही जोधम का पाम है। 'अच्छी हिन्दी' या नाम लेने वाला तो तुरत आभिजात्म के अपराध म मारा जायेगा। लेविन समाज म ऊंचा दीयन की पाशिश म जापाई हिनी भाषा और व्यावरण को अंग्रेजी शब्द और मुहावरे स भ्रष्ट करेगा उस पर आभिजात्य वा लाहन नहीं लगगा। दूसरी बात जो मुझे कष्ट देती है छद और लय मा अज्ञान है। अततोगत्वा ता यह बात भी भाषा मी ही बात है। लेकिन रचना के स्तर पर भाषा केवल कथ्य की पापक या वाहर भर नहीं है, वह सामाजिक्ता को आधार भूमि है। मुझे उस आधार भूमि की चिता है। जिस स्तर पर में क्थ्य की रचना मे जलग भर सकता हूं उस स्तर पर तो अपनी बात चाहे जिस भाषा म हो, कह दी जा सकती है। 'वत्सल निधि' को मौलिक प्रेरणा पर कुछ प्रकाश डालें क्या वह आप को किया वयन के स्तर पर सफत लग रही है इस प्रश्न का उत्तर में एकाधिक बार दे चुका हूँ। वल्लि अब ता वह प्रश मुझ स पूछा भी नही जाना चाहिए-~~-उस के पूरे यासधारी मण्डन मे पूछा जाना चाहिए-मैं उन म से एक है। त्रिया वयन के स्तर पर अभी तक जितना काम हुआ है मुझे तो उस से स ताप है मात्रा म भी और गुणात्मकता म भी, वह यथेष्ट है। या यह फैसला भी उही को करना चाहिए जिह वह वाम निवेदित है। ऐसा क्यो है कि उन व्याख्यान मालाओ मे जिन चर्चाओ या सरोकारों को उठाया जाता है वे किसी भी रूप मे आज को लेखक मानसिकता मे तादात्म्य की स्फुरणा नहीं जगाते ? उस तादात्म्य से परे भी आप के मन मे साहित्य की कोई सद्धातिक स्थिति है ? आप का प्रश्न जिस मा यता पर आधारित है वह यदि सही होती तो मुझे कहना पडता कि यह उस लेखक का दुभाग्य है जिस मे व्याख्यान मालाआ मे उठाये हुए प्रश्न काई म्पुरणा नही जगात । लेकिन वास्तव म एमा नही है। वत्सल निधि' के लेय शिविराम जो सामाय विषय रखे गये हैं या सामा य विषया के अलावा जिन प्रश्ना पर चर्चा हाती रही है वे सभी साहित्य रचनाकार के लिए जीवत प्रश्न हैं - देश म ही नहीं, सारे ससार म । ऐसा तो हुआ है कि कुछ युवा लेखक शिविर में आने से पहले कुछ प्रश्नो के प्रति उदासीन रहे हैं, लेकिन शिविर की चचाआ बाद इन प्रश्ना के पारे में उन वा मनोभाव बिल्कुल बदल गया है---उहान इमे स्वीकार करते हुए स्क्य कहा है कि वे अनुभव करते हैं कि इन निहायत जरूरी प्रश्ना की तरफ उन का ध्यान पहले नही गया था न किसी न ११८ रचना क्या और दिन के बीच इधर उन का ध्यान दिलाया था। ऐसी प्रतिक्रियाओ से मुझे आश्चय नहीं होता क्या कि सच्चाई यह है कि इस समय के सभी साहित्यिक आदालन --नही, उहे 'साहित्यिक' कहना गलत है उन का सही वणन है 'साहित्यिक क्षेत्र मे उठाये जा रह राजनीतिक मतवादी आदोलन'- एक ऐसी वैचारिक एकरूपता लाने की कोशिश कर रहे है जिस के परिणाम साहित्य के लिए भयानक ही हो सकते है। ऐसे राजनीतिक मतवादो का क्या कि एक ही लक्ष्य है, सत्ता का अधिग्रहण इस लिए दूसरे लक्ष्या या सरोकारो को वे महत्त्व नही देत और उन से मिलने वाली प्रेरणा को प्रेरणा नही समझते । यह स्वाभाविक भी है । रचना के क्षेत्र मे जो स्फुरण होता है या जो प्रेरणाए मिलती है वे उस कोटि की प्रेरणा से बिल्कुल अलग होती है जिन से लोग नारे लगाते है । शिविरो मे जिन विषयो की चर्चा होती है या रचना कम सम्बधी जिन प्रश्ना पर अनुभव का आदान प्रदान होता है उन का उद्देश्य यह कदापि नहीं है कि सब लोग एक ही परिणाम पर पहुचें या एक ही तरह से साचें । हा, अगर मेधा और चेतना की स्वत नता मे ही विश्वास बनाये रखन को ही आप ऐसी कोशिश कह तो अलग बात है। अब तक के शिविरो से जो पुस्तकें निकली है और जा अव प्रेस म है वे स्वय अपनी बात कहती है। 'वत्सल निधि' के तहत हुए शिविरों, व्याख्यान मालाआ, यानाओ और अय साहित्यिक कायक्लापों मे, भागीदारी में अपने चयन के बिन्दुओ पर क्या कुछ प्रकाश डालेंगे चुनाव और परिणाम के स्तर पर क्या बात मन मे मुख्य रहती है ? व्याख्यान मालाए सावजनिक हैं। वक्ताआ ये नाम प्रकाशित हात है। प्रेस भी आमन्त्रित होता है। अनतर व्याख्यान छपत भी है। शिविरो से निपली हुई पुस्तको मे उस मे भाग लेने वालो की सूची भी दे दी जाती है । शिविरा की चर्चाए सावजनिक नहीं होती लेविन आरम्भ मे और जन्त मे हम एक एक खुली सभा मे शिविर के उद्देश्या प्रस्तावित विपया की तथा चर्चा के परिणामो और शिविर की उपलधियो का ब्योरा प्रस्तुत कर देते हैं । अन तर पुस्तक तो छपती ही है। चयन के लिए सभी यास- धारी नाम प्रस्तावित कर सकते हैं शिविरा म पहले आत्रित सभी गय पुराने साहित्यकारो से भी अनुरोध किया जाता है कि वे भविष्यत् शिविगे के लिए उपयुक्त विषय, वरिष्ठ लेखका के नाम तथा नवोदित प्रतिभाआ के नाम सुपाते रह । व्याख्यान हिदी म हात हैं। शिविरो का काम भी हिदी मे होता है यद्यपि हिदीतर भाषाआ के माहित्यकार भी व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन 2 उन मे साधनो की सीमा ध्यान म रखते हुए आमन्त्रित होत हैं । 'मुख्य बात शिविरो के लिए यह होती है कि आमन्त्रित व्यक्ति एसा हा जो शिविरा का लाभ दे सके या उस से लाभ पा सके। व्याख्यान मालाआ के लिए 'मुख्य बात यह हाती है कि वक्ता अधिकारी विद्वान् हो, हिदी म व्यास्यान दे सके, ज्ञान वद्धन मे और रुचिया विस्तार और सस्कारम योग दे सके। ऐसा भी होता है कि प्रथम वरीयता के विद्वान् नही आ पाते और फिर दूसरे आमनित होते हैं । एर लेखक की हैसियत से आप की 'हेविट आफ रिकार्डिंग' को जानना उत्सुकता का विषय है । फिन चीजों को आप नोट करते है, किन को छोड़ देते हैं ? उस चयन का आधार क्या है ? क्या जीवनानुभव का साराश रचना-अनुभव मे तबदील किया जा सकता है ? बसा सतोष क्या इस लम्बे रचना-काल के अनतर आप के मन मे है आप के प्रश्न के तीन भाग हैं। पहले भाग का उत्तर तो रचनाआ को ही दना चाहिए क्या कि वास्तव में तो प्रश्न का उत्तर य रचनाए ही हैं- यानी प्रासगिक उत्तर। अपनी मनारचना के बारे में कोई लेखक और क्या कह सकता है ? नि स देह मानव मस्तिष्क एक बडा दक्ष यत्र है-उस की विलक्षण दक्षता मे आत्म चतना और आत्म-मशोधन की क्षमता भी शामिल है। इस लिए एक हद तक ता वह पहचान सक्ता है और पहचानता रह सकता है कि वह दिन चीजो को नाट करता है किन को छाडता है किन को स्मृति में अक्ति कर लेता है और किन या स्मृति पटल से मिटाता चलता है। लेकिन इस सारी प्रक्रिया की एक सहज सीमा तो है ही। इस के अलावा यह प्रश्न भी सगत है कि रचना-बम म सहज स्फुरण का योग कहाँ तक होता है। वह बना रहने देना चाहिए। मेरा विश्वास है कि आत्म चेतना यद्यपि सम्भव है वान्छनीय है, वढायी जा सकती है और निरतर बढ़ती रहनी चाहिए, फिर भी सजन-कम में एक ऐसी भूमि तक पहुचा जाता है या जा सकता है जहाँ अपूर्वानुमेय और अलौकिक सस्पश मिले। सभी रचनाएं उस भूमि पर नहीं होती, लक्नि जा होती हैं वे किसी एक भापा को ही नहीं मानव मात्र को समृद्धतर बनाने वाली होती हैं। लेकिन कौन सी रचना ऐसी हुई इस का उत्तर तो लेखक नही देता, रचनाए ही द सकती हैं। प्रश्न का दूसरा अनुभाग हो, मरा विश्वास है कि रचना अनुभव में लगातार जीवनानुभव वा योग हाता रहता है । सीधा एक और एक १२० रचना क्या और क्निबीच दा' जैसा समीकरण उस क्षेत्र में नही बनता और याग-पल बिल्कुल जपूर्वानुमय भी हो सकता है अवश्य । लेक्नि दाना पक्षो मे अनिवाय सम्बध भी होता है। इस लिए 'तबदील किया जा सकना में प्रश्न का आशय यदि यह है कि क्या याजना बना कर कोई परिणाम पाये जा सकते हैं तो मैं कहूगा कि नहीं, लेकिन अगर प्रश्न का आशय यह है कि एक क्षेत्र के अनुभव का ऐसा रूपान्तरण होता रहता है या नही जो दूसरे क्षत्र को प्रभावित करे तो मैं कहूगा कि यह एक सहज और अनिवाय प्रक्रिया है। रही सतरप की वात । रचना-कम से सन्ताप लेखक को तब होता है जब वह कम से अवकाश ले लेता है--पीछे देखने की फुरसत पा लेता है । वहा भी नहीं पहुचा हू और सन्तोप भी मुझे नहीं है। हा, जो पूरा कर के पीछे फर चुका हू उस की स्मृति मुझे है, और अनुभव तथा कम का जनुक्षण मूल्याकन स्मृति का एक धम है । उस क्षेत्र का भी बाध मुझे है-ऐतिहासिक वोध भी और आनुर्भावक वोध भो-जिस पीछे छोड जाया हूँ या छोडता जा रहा हूँ। रचना के मामले मे सन्तुष्ट न होते हुए भी कह सकता हूँ कि अभी तक तो परिपक्वता की दिशा में बढता आया हूँ। या अभी और भी सीखने को है और सीख सक्ने का सामथ्य भी और उस की प्रवत्ति अभी मुझ मे है। जीवन के विधान मे व्यक्ति का क्या स्थान है ? तुच्छता, साथक्ता, निरथकता इन 'एम्पोरिक्ल' स्तर पर आप उस भाव को मुख्यत कहाँ जोडेंगे? व्यक्ति रूपी यह इकाई क्या है, और जीवन के विधान में उस का क्या स्थान है, न केवल यह बहुत बड़ा प्रश्न है बल्कि इस का कोई एक-स्तरीय उत्तर हो ही नहीं सकता। नासान-सा या इकहरा दीखने वाला उत्तर ऐसे शब्दों के सहारे ही दिया जा सकता है जो स्वय जनक स्तरीय अथ रख सकते है। मामान्य मनावानि दष्टि से मानवीय इकाई का व्यक्तित्व तीन वपस ले कर सात वर्ष की उम्र मे बन जाता है । यह व्यक्तित्व के एक स्तर का विकास है। फिर समाज की नियामक सत्ता की पहचान, सामाजिक मूल्यो की चेतना और परस्पर निभरता की स्वीकृति स्वास्थ्य के लिए भी सामाजिक संस्तुति की अपेक्षा और लोकापवाद का भय, सामाजिक लक्ष्यों की पूर्ति में योगदान की आवश्यकता, इत्यादि-ये सब एक सामाजिक व्यक्तित्व के विकास का अग हैं। फिर अपने समाज मे परे वृहत्तर मानव समाज के माय एकात्म्य, फिर मानवेतर प्राणिया के व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन १२१ साथ सम्ब ध की पहचान के आधार पर विवसित हान वाली एक प्राणि धर्मिता और फिर पूरे परिवेश म परम्पर उपजीचिता की समय के आधार पर विकसित हान याना एक वैश्विक अथवा जैविय व्यक्तित्व-~- यसब भी निजी व्यक्तित्व की पहचान के आयाम हैं । अगर ममता को दिशा म बढत हुए चलें तो यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे वे पूरा मिदात तक भी पहुंच रावत है । जिम हम मानवीय इकाई बहन हैं वह हजारा जातिया ये जीवाणुआ म उपनिविष्ट र ब्रह्मा है मनुष्य का मुह लाबा-रोहा जीवाणुआ या निवश है उम का पाचन-यत्र बरोडा जीवाणुआ की अनुक्षण महाया र बिना काम ही नहीं कर सकता इत्यादि । तब इवाई' कोन है, व्यक्तित्व विस का है? इसी लिए मैंन पहा वि जीवन के विधान म व्यक्ति के स्थान के प्रश्न या उत्तर एक स्तरीय नही हो सक्तास्थान, व्यक्ति विधान और जीवन सभी की अनेक स्तरीय परिभाषा की आवश्यकता होती है। और यदि माट तौर पर' व्यक्ति को साथक्ता अथवा सपनता की बात करनी हो ना शायद जीवन के विधान की बात ही नहीं की जा सकेगी बल्कि जिन बाता की चर्चा अपक्षित होगी उन का उल्लेख ही जापने नही दिया-जमे परिवार समाज, इत्यादि अथवा वे लक्ष्य जिह 'पुरुषाथ कहत थे-~-धम अथ काम-मोक्ष को इस सदभ म छोड भी दें तो। तुच्छता, साथक्ता निरथकता~मूल्याकन सम्बधी य प्रश्न ही छोटे से छोटे कर्म के बारे मे भी उठते है। शायद चतन स्तर पर हमेशा हम इहे नही उठाते, लेकिन हमारी चेतना मे एक चिर-सजग विचारक वैठा ही रहता है। कभी हम चेतन स्तर पर प्रत्यवतोक्न करते हुए बडे पैमाने पर भी साथकता, निरवक्ता के प्रश्न उठात हैं। तव उस का विचार जीवन की और विधान की परिभाषाआ स जुड़ जाता है। प्रेरणा, एकाग्रता और श्रम इन तीतो तत्वो मे से रचना के लिए किस को आप प्राथमिकता देते हैं। धम थोडा-बहुत हर रचना म होता है। या या मह लीजिए कि ऊर्जा का व्यय हर रचना मे हाता है। जहां उसे व्यय करने म या उम उपरान्त थकावट हो वही तो श्रम मानेंगे-अगर वैवल तनाव से मुक्ति हो तो क्या उसे भी श्रम कहगे। यो वास्तव में केवल एसी स्थिति रचना म होती नहीं है, मुक्ति की स्फूति भी होती है और श्रम का भार भी। लकिन प्रभ करने से ही रचना नहीं हो जाती, इस लिए उस प्राथमिकता तो कसे दी जाये लगातार थम कर सकने का सामथ्य अवश्य रचनाकार मे होना चाहिए-कभी-कभी एक प्रकार की आविष्ट अवस्था म रचना १२२ रचना क्यों और किन नेवीच । की जाती है और आवेश घटो वरिक दिना तक बना रह सकता है। मैंन कहा 'आविष्ट अवस्था'-चालू मुहावर मे कह लीजिए कि भूत सवार होता है फिर जब छोड कर जाता है तो मानो सारी ऊर्जा निचोड कर ले गया हाता है। लेकिन यह ऊर्जा का सचय और यो निचुड गये हान का बोध शरीर के या मास पेशिया के या स्नायु-यन के स्तर पर नहीं होता। कुछ मानसिक स्तर पर हाता है लेकिन उस से भी अधिक जिस स्तर पर होता है उस के सही नाम से आप को ड न लगे तो वहूँ कि आध्यात्मिक स्तर पर होता है। प्रेरणा 1-हा, प्रेरणा का भी महत्त्व है । लेकिन प्रेरणा तो अपने वश की बात नहीं है, उस को प्राथमिकता दे देन का मतलब है पूरी तरह किसी बाहरी शक्ति या शक्तियो के आश्रित हो कर बैठ रहना जब प्रेरणा होगी तब लिखेंगे, नही तो बैठे है। रह गयी एकाग्रता । वह अपने वश की बात है । और वह भी देती है और वहा एक समीकरण भी बनता है जो न प्रेरणा के बारे में बन सकता है न श्रम के । इस लिए शायद एकाग्रता का ही प्राथमिकता देनी चाहिए। वही पूरी तरह वश्य है और वही शायद साधना का लक्ष्य है । शायद यह भी कह सकते है कि सधा हुआ यत्र ही प्रेरणा भी अच्छी तरह ग्रहण कर सकता है और ऐसा श्रम भी कर सकता है जिसे दक्ष श्रम कहा जा सके-यानी जिस मे उत्पादनशीलता का अनुपात सर्वोच्च है। रचना मे 'स्पोटनियटी' अथवा सौष्ठव-क्सि को अजित अथवा सचित रखना श्रेयस्कर है ? इस का उत्तर बहुत कुछ आप के पिछले प्रश्न के उत्तर म निहित स्प से दे दिया गया है। ऐसी कोई स्पोटेनियटी नही होती जिस के इतिहास मे वही तपस्या यानी लम्बा और गहरा श्रम न रहा हो । दूसरी ओर सधी हुई वीणा वेसुरा नही बोलती-यानी सौष्ठव का विचार स्पाटेनियटी' के विचार का प्रतिमुखी नही होता । 'यह या वह' वाले प्रतिपक्ष वहा नहीं बनत, यह' में 'वह' निहित रूप से व्याप्त रहता है। निश्चय ही यह आदश स्थिति है और ऐसा नही है कि रचनाकार हमेशा नाश को पा चुका होता है। इस समय की आप को मानसिक्ता का मुख्य स्वर क्या है ? उसे कह सक्ने योग्य पारदर्शिता क्या व्यक्तित्व मे सम्भव है ? उत्तर देने के लिए पहले प्रश्न की पूछ पक्डता हूँ। जैसी पारदर्शिता की वात आपने की है यानी अपन ही को पारदर्शी हान की वात । हो सकता है कि वह चरम साध्य हो । लेकिन जव सिद्ध हो जाये तो रचना व्यक्ति, दुख, आस्था, आत्मालोचन १२३ कार बना रहेगा इसमे सदेह है । रचनाकार अथवा कला सजक है तो उस म वही पतृत्व भाव शेष है । यानी उस चरम कोटि की पारदशिता नहीं है। शायद निरलर उस आर बढने की व्याकुलता के अतराल में ही सारी रचना हाती है । उम पारदशिता म देखन वाली आंख और दीखने वाली स्फटिक शिला म नभेद हो जाता है-हो जाता है' मान 'सैद्धान्तिक परिमापा म अभेद हा गया होगा । मैंने वही 'आप को देखन वाली और नीबात कही है। सजा का सथप वही है। इतनी ता हुई पूछ पाडने की बात । जहाँ तक 'मानसिकता के मुख्य स्पर' की बात है वह स्वर अगर उच्चारित है तो थोता का हो गया है जो रचना सामने आती है उसी म दिखना चाहिए और उसी स पूछना चाहिए। और अगर वह अभी उच्चारित नहीं हुआ है तो मान लेना चाहिए कि अभी वहाँ रचना नही है, उस से पहले का आत्म-सघप है। उस अवस्था मे रचनाकार को अपने निजी अकेलेपन मे अपनी अक्ली लडाई लड लेने दना चाहिए-~लनावश्यक सवाला से उस का अवधान तोडना नही चाहिए उसे ऊर्जा का दुव्यय करने को बाध्य नहीं करना चाहिए। आप के 'सटिसफेक्शन' और आप के "रिप्रेट'। मेरे सटिसफेक्शन? मेरा सारा जीवन । मेरे रिप्रेट? मेरा सारा जीवन । अच्छा ही है कि अभी भी मुझे लगता है कि बही खाता फैला कर रोकड जाचने का न वक्त है न फुरसत । जीवन अभी अनाविष्कृत है ।* • इस दूसरे खद के प्रश्न लिख कर पूछे गये पे और उत्तर भी लिखित दिये गये थे- अगस्त 15५ में। १२४ रचना क्यो और किन के बीच

रचना क्या, क्यो,
किन के लिए, किन के बीच
नदकिशोर आचाय के साथ एक सवाद

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आचाय वात्स्यायन जी, पहला सवाल जो मैं करना चाहता हूँ, वसे तो आप के पाठक के नाते मुझे उसे आप की रचनाओ से ही जानना चाहिए। पर कुछ बातें आपने अयन कही हैं उन के साथ जब जोड फर देखता हूँ तो एक सवाल मेरे मन मे उठता है कि एक कलाकार के रूप मे, एक कवि के रूप मे आप का मुख्य सरोकार क्या है ? यह सवाल मै इस लिए पूछना चाहता हूँ कि बोधगया शिविर मे मुझे याद पडता है आपने कहा था कि कलाकार रूप की रचना करता है। बल्कि और सब चीजें तो समाज मे हैं पर यह काम है जो वह करता है। दूसरी ओर कई दफा आपने कहा है कि वह मूल्या वेषण करता है, तो वह मुख्य सरोकार रूप की रचना है या मूल्या वेषण, आप कसे इसे देखते हैं ? अज्ञेय दखिए, पहला जवाब तो आप जानते हैं। वह यह कि कवि की रचनाएँ जा कहती है, और कवि उन के बारे म जो कहता है उस म दोनो में सामजस्य ढूढना आप को जरूरी जान पडे तो कम से कम कवि से उस म कोइ मदद नहीं मिल सकती। यह बिल्कुल सम्भव है कि कविता के वारे म कवि जा कहता है उस मे आपसी अन्तविरोध भी हो, समय- समय पर कही हुई वाता या एक समय में कही हुई बाता मे भी। रचना म और उन म अन्तविरोध भी उतना ही स्वाभाविक है। रचना और दूसरी रचना म वैसा नही होता जब तक कि दोनो का हम रचना के स्तर पर विचार करते हैं। क्यो कि आपने सवाल इस रूप म पूछा है इस लिए भी जवाव रिकाड कर देता हूँ लेकिन आप जानते ही हागे। दूसरी बात यह है कि अगर आप दो ही बातो तक सीमित कर दते हैं तो मुपे लगता है कि जो कुछ मैं कहता या सोचता या करता रहा हूँ उस म आप सिफ दा विकल्प क्यो रख रहे हैं ? रूप की रचना करता है, मूल्य की चिन्ता करता है और इस के अलावा और भी बहुत से काम रवि या कि उस की रचना करती है। लेकिन अगर रूप दो व्यापक अथ म लें तो उस म इन दो शामिल किया जा सकता है। मूल्या की चिन्ता भी आखिर रूप की रचना में योग देती है। रूप वा एक पहलू यह है कि कविता जब एक चीज़ बन कर लिसे हुए या छपे हुए रूप म पृष्ठ पर आती है तो एक रूपता वह है जो आप देख सक्ते रचना क्या, क्या, दिन के लिए, किन के बीच १२७ हैं। एक उम का मानस विम्ब है। एक उस के बाद ऐसा भी विम्ब है जिस म उम वे चाक्षुप विम्बा का एक प्रतिस्प भी होता है और मूल्य दष्टि की भी छाप उस मे होनी है। ए जो बनता है वह मूल्य दृष्टि को छोड कर नहीं है उम का मम्मिलित कर के हो है। पूरा का पूरा समाज ही उस रूप का अश हो जाता है। कविता म उस रूप में माध्यम से रवि का पूरा परिवश भी हाता है और वह पहचाना भी जाता है। आखिर जिस कवि के बारे म हम कुछ नही जानते उस के जीवन की परिस्थितियो को हम उसी रूप की खिडकी म से पहचानत हैं। इस का मतलब है वह वहां पर है। वह रूप की रचना करता है। इस का यह मतलब नही है कि कोई बुनियादी विरोध इस बात का दूसरी बात के साथ है कि वह मूल्य का चिन्तन भी करता है। मवाल का जवाब सापने का एक दूसरा तरीका भी है कि आप यह सवाल उठायें कि कवि क्या-क्या नहीं करता। या पि हम सभी मान लेत है और नाप भी प्रश्नकर्ता के रूप में भी मान लेंगे कि कवि रचना करता है तो किम चीज़ की रचना करता है ? समाज की रचना वह नहीं करता, परिवेश की रचना वह नहीं करता, मूल्यो की रचना वह बहुत आशिक रूप में ही करता है बहुत मी कविताएं ऐसी होती हैं जिन में नहीं करता है या नहीं कर रहा दोपता है। भाषा की भी रचना वह नहीं करता, शब्द की भी रचना वह नहीं करता। एक-आध शब्द या कि जीवन भर मे १०.२० शब्द रच दे तो बहुत बड़ी बात होती है। शाम जप की रचना करता है तो उसी के सहार यह स्प रचता है। ता जब उन मे में कोई भी रचना वह नहीं करता तो आखिर किस चीज की रचना करता है । या तो हम यह कहना छोड द कि वह रचना करता है, उस को सिफारीगर मान ले। जैस बढई कुछ चीजा का जोड कर कुछ बा देता है वस ही कवि भी बना दना है। यह नहीं कि वह यह काम कभी नहीं करता। यह भी उम के काम का एक अश हाता है। हाँ, कापट भी एक अश है। हाँ, रचना वह करता है तो फिर यह सवाल उठता है। उसी के अधीन यह भी है कि वह एक दिव को भी रचना करता है और काल को भी रचना करता है। दिक और काल की रचना करते हुए दोनो से मुक्ति की सम्भावना भी दिखाता है यानी मुक्ति की भी रचना करता है। लेकिन सबकासव रूप के नाते। यह सवाल मैने इस लिए पूछा दरअमल कि कई दफा इस बात को ले कर जब हम कला का मूल्याक्न करते हैं पा उसका - रचना क्यो और दिन के बीच रसास्वाद करते हैं तो उस के साथ भी एक सवात मूल्यों का जुडा रहता है कि सभी कवि, सभी कलाकार रूप को रचना करते हैं लेकिन उन को जो मूल्य चिता अलग-अलग दिशा मे जाती है ऐसा महसूस किया गया देखा गया। तब यह सवाल उठता है अगर हम यह मान लें कि स्म को रचना मे मूल्य की चिता शामिल है या मूल्य की आशिक रचना भी रूप की चिता मे शामिल है तब भी यह सवाल उठता है कि फिर उस की कला को उत्कृष्टता की या उस की क्सौटी क्या हो? यह सवात मै इस लिए पूछ रहा हूँ कि इस बात को ले कर के अच्छे आलोचकों ने और कवियो ने भी अक्सर इस तरह के वक्तव्य दिये हैं, उदाहरण के लिए आप के ही सम्पादन मे 'तीसरा सप्तक' मे विजयदेव नारायण साही ने एक वक्तव्य दिया था जिस मे नीत्शे के बारे मे उहोंने कहा कि उन के विचारो को वह जला देने लायक समझते हैं लेकिन एक काव्य- कृति के रूप मे उन को पुस्तक वह हमेशा अपने साथ रखना चाहते हैं। भगवतशरण उपाध्याय ने ठीक वही बात आप के उप यासो के बारे मे कही है कि वे कला की दृष्टि से बहुत उत्कृष्ट हैं लेकिन वे मूल्य दष्टि से सहमत नहीं । ऐसी स्थिति में उत्कृष्टता का क्या प्रमाण होना चाहिए ? स्थय आप को किसी ऐसे द्वद्व का सामना करना पड़ा है ? आप तो बहुत पढते भी रहे हैं? एक ता बात यह है कि विचार से सहमत या असहमत भी हुआ जा सकता है। और वोई यह कह सकता है कि में इन विचारा से सहमत नहीं हूँ लेकिन रूप से सहमत था कि असहमत नही हुआ जा सकता। या ता आप का दीखता है या विजाप को नहीं दीखता है । आप यह नही कह सकते कि मैं इसे देखन से असहमत हूँ। जो दीखा उस का भी मूल्याकन बरन के बारे में आप की दृष्टियां अलग-अलग हो सकती हैं। मैं समझता हूँ कि इस तरह की बात कोई कह सक्ता है और वह अथहीन नहीं है। कोई कह सकता है कि मैं टस अमुक व्यक्ति के विचारोस सहमत नहीं हूँ। लेकिन विचार रा सहमत नहीं हूँ यह बात वास्तव मे रचना के बार में नही है यह तो उस व्यक्ति के विचारो के बारे में है--जिस की रचना उसने नहीं की है। रचना के माध्यम से विचार भी व्यक्त हुए तो आप हुआ कीजिए विचारो से असहमत। विचारो को एक तरफ रख कर भी रचना पर विचार हो सकता है रचना क्या, क्यो, किन के लिए, किन के बीच १२६

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सदभ मे वह सवाल इतना महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि किसी कलाकार के विचारो को अनदेखी भी नहीं की जा सक्ती। अगर कभी लगता है कि वे विचार अस्वस्थ हैं तो उसे उत्कृष्ट कलाकार मानने मे या उस कला को मानने में कुछ सकोच-सा होने लगता है। ऐसा नहीं होता? नही, एक तो वान्छनीय आप कहते हैं तो इस शब्द के आशय पर विचार हाना चाहिए। यानी कोई एक परिणाम है जो कि आप का काम्य है । आप के लिए वह चीज वाञ्छनीय है जो आप को आप के चाहे हुए फल देती है। यह जरूरी तो नहीं है कि कवि न भी वही चाहा हो या कि रचना भी वहीं चाहती हो। तो वह प्रभाव आप की दष्टि मे अवाञ्छनीय होगा। लेकिन यह भी बिल्कुल सम्भव है कि समग्र मानव के लिए वह कल्याणकारी भी हो । अस्वस्थता की बात अगर कोई भी एक जो साधारण स्थिति या कि अवस्था या मानसिकता है उस स इधर-उधर जाना, किसी भी हद तर साधारण होना भी अस्वस्थता है, तब तो कभी कोई कवि स्वस्थ नहीं होता, कोई रचना स्वस्थ नही होती। इस अय मे मैं नहीं कह रहा हूँ। मै उसी अथ मे कह रहा हूँ जिस मे विचार आप को अमाय हैं। या इस तरह के और भी लेखक हो सकते हैं जिन के विचारा मे कुछ रुग्णता लगे लेकिन यह लगे कि कलाकार बडे हैं, कलात्मक उत्कृष्टता उन मे है । तो ऐसी स्थिति मे अगर उन को आलोचना-बल्कि मै तो कहूँगा फुछ लोग भत्सना भी करते हैं जो मै ठीक नहीं मानता-पर आलोचना अगर होती है इस आधार पर तो उसे क्यो गलत माना जाये? नीत्शे का ही एक उदाहरण सामने रखें तो उसन पूरी पश्चिमी सभ्यता के ही एक बहुत बडे रोग का पहचाना। वह स्वय भी स्वस्थ नहा था । रागी था-काफी विकट रूप मे रोगी था उस रोग का भी रोगी था जिस को उस ने पहचाना । उस के अलावा ऐसे रोगो का जो कि उस से जुड़े हुए थे उन का भी रोगी या। लेकिन वह पहचान उस ने की जो पहले नहीं थी। तो हम उस को रोगी ता मानते हैं लेकिन उस पहचान का महत्त्व स्वीकार करते है क्या कि वह पहचान मनुष्य के, मानव मात्र के, स्वास्थ्य मे योग दे सकती है। हा, यह कह सकते हैं कि उस रुग्णता को पहचान वह साहित्य मे कराता है। इस दृष्टि से तो वह काम का हो सस्ता है। पर उस रचना क्या, क्यो, किन के लिए, किन के बीच का समाज पर जो असर पड़ता है उसे हम कसे ठीक मानें यह सवाल इस लिए मैं और पूछना चाह रहा था कि आपने ही एक दफा कहा था नीत्यो का प्रभाव समाज पर पडा । जिस तरह की आलाचना का उल्लेख आप कर रहे हैं वह भी उसी समाज मे से आ रही है जिस का नीत्शे एक अग था जिस का उसने प्रभावित किया और समाज का बहुत बडा भाग, आलोचका मे भी अधिसख्य लोग, उस की अन्तदप्टि से प्रभावित हुए-- जो कि अच्छा प्रभाव है नहीं, मै यह सवाल इस लिए भी पूछना चाह रहा था कि एक दफा आप हो ने अपनी एक टिप्पणी मे यह कहा है कि सौदय बोध और शिवत्व-बोध दोनो साय ही रहते हैं। क्यो कि वे एक ही चेतना की उपज हैं। क्यो कि एक कलाकार जब सौ दम को रचना करता है तो शिवत्व का भाव उस मे सन्निहित रहता है क्यो कि वह एक ही चेतना से रचता है। तो ऐसी स्थिति मे अगर सोदय बोध मे और मूल्य-बोध मे हमे कोई दूत दिखाई देता है या ऐसा लगता है कि सोदय-बोध से हम सहमत हैं और मूल्य-बोध से हम सहमत नहीं हैं, तो क्या यह रचने वाली चेतना या ग्रहण करने वाली चेतना दोनों मे से कहीं किसी का कोई त नहीं दीखता? जहा तर युझे याद है उस लेख म भी मैंन यही कहा है कि मैं चाहता हूँ कि इन दोनों में कोई विरोध न हो, और मैं मान सकू किकाई विरोध नही है या विरोध नही होता तो इस का मतलब यह है कि उसका काई प्रमाण मैं नही प्रस्तुत कर सकता। वहाँ भी मुझ यह लगा कि इस को प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि वास्तव म एसा है। चाहता हूँ कि रचना एसीहा कि दोना क्सौटिया पर परी उतर । मैं सोचता हूँ कि अब भी स्थिति ता वही है दोना क्सौटिया कविता पर सागू की जा सकें और दोना पर कविता खरी उतरे तब हम उस का पूरी तरह स्वीकार करें। उस में यह सवा निहित है कि एसा नही भी हा सपता है । तब हम क्या पर इस बाबाई सामाय उत्तर ता पिर में नही द सपता। यह उत्तर जरूर बनता है कि तब पिर उस पर विधार पर कि क्सि दृष्टि में हम उस को महत्व दें और यहां तर इस या मर्यादिन भी परें। कुछ रचना व वार म यह कह सकत है कि यह मुदा ता नहीं है लकिन यह जो बात यह रही है वह टीर बार कर रही है हमार काम की है। क्या यह पहला उस का रचना १३२ रचना क्या और पिनरेधीच वे या क्ला ये क्षेत्र से बाहर कर देना होगा? मुय लगता है कि हां एगा होगा। लेकिन इस को ले कर काई बहुत दावा नहीं करना चाहता हूँ। दूसरी तरफ कमा पिसी राना ने बार म यह कहा जा सकेगा कि 'सुदर है और हमारे सवेदन को छूती है लेकिन शायद कल्याण- यारी नहीं है? निश्चय ही ऐसी रचनाएँ होती है। वलि आज-क्ल अधिकतर जो रचनाएं सामन आती हैं उनके बारे मे यही कहा जा सकता है कि सवेदन यो छूती हैं प्रभावित भी करती हैं, लेकिन शायद शिव नही हैं । तो उन को क्या कहा जाये उन के वारे म भी अतिम रूप से यह निणय दे देना पिये इस लिए कला नहीं हैं, इरा म मुझ थोडा सकोच होगा। इन दोनों में से जब आप को चुनाव करना होता है, आप की प्रायमिक्ता का सवाल होता है, तो मुझे लगता है कि आप उस रचना को अधिक महत्त्व देते हैं जो कि कला है चाहे उस मे उस के विचार आप की दृष्टि से माय न हो। दूसरी ओर ऐसी रचना के विचार जो आप को माय हों और पल्याणकारी लगते हो लेक्नि पला की दृष्टि से जो सुदर न हो उसे आप कम महत्त्व देते हैं। या नहीं देते हैं ? शायद यह वात ठीक है । एक तो मूल्य दष्टि समय सापेक्ष यानी समाज- सापन है। समाज सापेक्ष है, इस का मतलब यह तो है ही कि समय समय पर बदलती है। इस का यह भी मतलव है कि उस को अस्वीकार कर दना हमेशा समाज के बस की बात है। लेकिन इस से अलग जगर कोई सौ दय-बोध है तो वह समाज सापेक्ष नहीं है वह व्यक्ति सापेक्ष है। इस लिए उस को महत्व दना रचना का अग हो जाता है। अगर कोई चीज़ सामाजिक मूल्या से जलग सुदर या असुदर हा सक्ती है ता उस का सौदय जो देखता है उस था वह दखना अद्वितीय दखना है । फिर उसके बाद अगर मूल्यो की दष्टि स वह घटिया है तो समाज उस को अस्वीकार कर सकता है। लेकिन अगर वह देखन स इनकार कर देता है तब वह समाज को एक क्षति है जिस की पूर्ति समाज नहीं कर सबता1 इसी के साथ एक और सवाल जो मुझे लगता है जुडा हुआ है वह परम्परा का सवाल है। क्यो कि जब आप समाज की सौग्य दष्टि की बात करते हैं और उस की सामाजिक सवेदना की बात करते हैं तो वह समाज को एक परम्परा का सवाल है कोई भी समाज एक परम्परा मे जीवित रहता है और उस रचना क्या, क्या, विन के लिए किन के वीच १३३

को पुरनधि मोर मोरप दिनों रे गायन में पा
परराnam मोगरान पता है। मोर मार मानtrit
रवि भी पाणामामहीं होगरमा, गागार
गीगा। गोमागमारतात उगो में
पारो तहगे भी मापोfr
सानिमोनितो मोर लमm
है। पर गगे भो भलो जालों पर यह भी mur
परिने पे, पारि पिनियों में, सामाxिr भो में
पनि mtarrलिxि
RITIो पारmrirner
1yfmmerammaरिमा
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या अनिवाय अग मानता हूँ। अपन या यह दना ही काफी नहीं है। यह विश्वास उस के साथ बनना चाहिए कि अगर अपन यो कहा तो पहल या मतलब ही यह है कि दूसरा तक पहुंचन योग्य उस बनाया। दूसर पर वा लगातार विचार भी ववि से कम के साथ मैं जाड देता 1 तार सप्तव म इतना आग्रह नहीं है । लेकिन महत्त्व इस का दता यह जो सम्प्रेषण को परिस्थितयों पे यदलाव से कविता मे बदलाय माता है उसके बारे मे आपने कई दफा काफी कुछ कहा है। सास तौर से वाचिक परम्परा से पट्य परम्परा तक आने मे कविता का जो परिवतन है उस बारे मे जब आपने कहा कि सम्प्रेषण की परिस्थितियो मे और सम्प्रेषण के साधनो में जो परिवतन हुआ उस को यजह से कविता मे एक सरचनागत परिवतन सम्भव हुआ और यह यडा बुनियादी परिवतन था। अब इस को शरारत भरा सयाल न मानें, लेकिन मुझे कई दफा यह लगताह कि यह ठीक उसी तरह की बातह जो सामाजिक परि- यतन के सदभ मे माक्स ने फहो यो, कि 'मोस एण्ड टूल्स आफ प्रोडक्शन' मे परिवतन होता है तो उस से समाज का सारा ढाँचा बदलता है और उस समाज को सारी सरचना में एक तरह का परिवतन आता है। तो इसी तरह आप जब 'मी स एण्ड टूल्स आफ कम्युनिकेशन' मे परिवर्तन की बात करते ह और उस से पूरी कविता मे परिवतन की बात करते है तो क्या यह नहीं लगता कि काव्य-चेतना को एक बाहरी-आतरिक दवाव के बजाय एक बाहरी प्रभाव के द्वारा परिवर्तित जाप मान रहे नही। यह तुलना, ऐसा तो नही है कि नहीं हो सकती। इस म तक के ढांचे म एक समानता है। लेकिन मैंने वाचिर परम्परा की जा बात कही उस स जो परिणाम मैंने निकाले उन मे एव यह है कि जब हम वाचिक सम्प्रेपण से इस छपी और लिखी कविता की आर आते हैं तब हमारी रूप की परिभाषा बदल जाती है और सरचना का महत्त्व हो जाता है। तो औजार के रूपान्तर से समाज म जो परिवतन आते है उन से आप का तुलना करनी हो तो यह कहना होगा कि जंस यहाँ पर रूपाकार बदला है वहां पर जो चीज बनायी गयी-जगर आप बनाने मे रचना और सिफ कारीगरी का भेद छोड भी दे तो-जो चीज वनायी गयी उस का सामाजिक महत्त्व कुछ दूसरा हो जायेगा। और रचना क्या क्यो, किन के लिए, दिन के बीच १३५ को मूल्य दृष्टि और सौदय दृष्टि दोनों के स्पायन मे उस परम्परा का यहा योगदान रहता है। और आप मानते ह कि एप कवि भी परम्परा से मुक्त नहीं हो सकता, वह लगातार उसी मे रहता है। उसी का नया सजन करता है लेकिन उसो मे रहता है। इस बात को दूसरी तरह से भी आपने कहा है कि फविता कविता मे से निकलती है और स्परप में से निकलता ।। पर दसरी ओर आपने कुछ जगहों पर यह भी कहा है कि स्थितियो मे, सामाजिक स्थितियों मे, सामाजिक सदर्भो मे पो परिवतन होता है वह कविता मे परिवतन करता है। शायद 'तार सप्तर' को-या पूरा नहीं याद आ रहा ह कि किस सप्तक वो-भूमिया मे यह बात उठी है कि इसी परिवतन के कारण कवि नयी प्रणालियो खोजता है सम्प्रेषण की। तो क्या इन दोना मे आप कोई विरोध नहीं देखते या इन दोनों को जाप एक साथ सच मानते हैं? इन म विरोध वहाँ है । इस लिए कि फिर कविता क्यों बदलती है ? कविता मे परिवतन कविता के अपने दबाय को वजह से होता है या सामानिक परिवतन की वजह से होता है। देखिए एक तो कविता कविता में से निकलती है और जव निकलती है ता उस परम्परा में जुड़ जाती है जिस म स और कविताएँ निकलेंगी- यानी वे थोडी सी बदल गयी हैं। परम्परा लगातार बदलती जाती है इस लिए कि वह किसी चीज का मिटा कर उस का स्थान नहीं लेती बल्कि उस म जुड कर उस का रूपार कर देता है। और स्मति म तो वह सारी चीज़ बनी रहती है। लेकिन सिफ परम्परा बदल रही है या कविता म से कविता निकलन के कारण वही बदल रही है एसा ता नही है। ग्रहीता का सवेदन भी ता लगातार बदल रहा है कविता ग्रहण करन के नाते बाल रहा है और वाहर के कारणा से भी बदल रहा है। इस का मतलब यह है कि सम्प्रेषण की शलियां और उस की जरूरते भी बदलती जाती है। ता कविता म से कविता निक्लन के कारण जिस तरह के परिवतन अपभित हात हैं उस के अलावा और भी परि बतन अपेक्षित हात हैं सम्प्रेषण की स्थितियां बदल जान के कारण। तार सप्तक म शायद मैंन दूमरे तक पहुंचन की बात पर इतना बल नहीं दिया था, वाट म अधिक जार उस पक्ष पर दिया है। दूसर तक पहुंचने की इच्छा और उस वे सामथ्य की पहचान का मैं रचना-कम १३४ रचना क्या और दिन के बीच का निवाय अग मानता हूँ। अपने का यह देना ही काफी नही है। यह विश्वास उस के साथ बनना चाहिए कि अगर अपने को कहा तो कहने का मतलव ही यह है कि दूसरो तक पहुंचने योग्य उसे बनाया। दूसर पक्ष का लगातार विचार भी कवि वे कम के साथ मैं जोड देता हूँ। तार सप्तक म इतना आग्रह नहीं है। लेकिन महत्त्व इस को देता यह जो सम्प्रेषण को परिस्थितयो के बदलाव से कविता मे बदलाव आता है उस के बारे मे आपने कई दफा काफी कुछ कहा है। खास तौर से वाचिक परम्परा से पटय परम्परा तक आने में कविता का जो परिवतन है उसके बारे मे जब जापने कहा कि सम्प्रेषण की परिस्थितियो मे और सम्प्रेषण के साधनो में जो परिवतन हुआ उस की वजह से कविता मे एक सरचनागत परिवतन सम्भव हुआ और वह बडा बुनियादी परिवतन था। अब इस को शरारत भरा सवाल न मानें, लेकिन मुझे कई दफा यह लगता ह कि यह ठीक उसी तरह की बात ह जो सामाजिक परि यतन के सदभ मे माक्स ने कही थी, कि 'मोस एण्ड टूल्स आफ प्रोडक्शन' मे परिवतन होता है तो उस से समाज का सारा ढांचा बदलता है और उस समाज सारी सरचना मे एक तरह का परिवतन आता है। तो इसी तरह आप जब मीस एण्ड टूल्स आफ कम्युनिकेशन' मे परिवतन की बात करते ह और उस से पूरी कविता मे परिवतन की बात करते है तो क्या यह नहीं लगता कि काव्य-चेतना को एक बाहरी-आतरिक दबाव के बजाय एक बाहरी प्रभाव के द्वारा परिवर्तित आप मान रहे ह? नहीं। यह तुलना, ऐमा ता नही है कि नही हो सकती। इस म तक के ढांचे म एक समानता है। लेकिन मैंने वाचिक परम्परा की जो बात कही, उस से जो परिणाम मैंने निकाले, उन म एव यह है कि जब हम वाचिक सम्प्रेपण से इस छपी और लिखी करिता की आर आत हैं तब हमारी स्प की परिभाषा बदल जाती है और सरचना का महत्त्व हो जाता है। तो औजार के रूपातर से समाज मे जो परिवतन आते है उन से आप का तुलना करनी हो तो यह कहना होगा कि जसे यहाँ पर रूपाकार बदला है वहा पर जो चीज बनायी गयी--अगर आप 'बनाने में रचना और सिफ कारीगरी का भेद छोड भी दें तो-जो चीज बनायी गयी उस का सामाजिक महत्त्व कुछ दूसरा हा जायगा। और रचना क्या, क्यो, दिन के लिए, विन के बीच १३५ उस यो समाज तक पहुंचाने की प्रक्रिया भी बदल जायेगी। पार यह ठीक है नियत्र के द्वारा या कि बडे पमाने के यत्र से चीजें बनाय जाने से पहले जसा हाता था उस म कारीगरी था, (जव तर वह दस्तकारी के स्तर पर थी) एक क्लात्मक मूल्य था जो कि बाद मे नही रहा । वाद में वह चीज विक्री के लिए हो गयी, जिस हो गयी, उम के पहले उस वा एक कलात्मक महत्त्व बना रहता था। तो तुलना पा जाधार यह हागा वि परिवतन ता हुआ, जो चीज़ श्रम के द्वारा बनायी जाती थी उम का सामाजिक मूल्य उस के उपयोग से जुड़ गया। स आधार पर तुनना आप कर सकते हैं और आज कविता का क्या उपयोग होता है यह भी आप देख सकते हैं । लेकिन दूसर स्तर पर वह बात लागू नहीं होगी। नहीं, पर अगर कविता मे उस की वजह से कोई परिवतन सम्भव होता है तो क्या इस से यह नहीं सिद्ध होता कि चेतना पर औजारों का प्रभाव पड़ता है। चेतना पर जीजारा का प्रभाव भी पडता है इस लिए कि चेतना का एक अग यह पहचान भी है कि इन औजागे से मैं क्या कर सकता है ? या कि जा मैं इन से कर सकता हूँ उस की क्या सीमाएँ हैं जव तक मैं अपने को इन जौजारा तक सीमित रखता हूँ। लेकिन शायद उस की दिशा को वे आजार नियत्रित नहीं करते- नही करत । चेतना तो इस से बड़ी चीज है। और वह औजारों का अपने हित मे इस्तेमाल करती ह बजाय इस के कि औजार उस का इस्तेमाल करें। और वह किसी एक निश्चित दिशा की ओर हमेशा नहीं ले जाती। लेकिन एक फ्क जो मुझे दिखाई देता ह वाचिक परम्परा की कविता मे और अब जो कविता लिखी जा रही है उस मे जसे एक के द्रीय मुहावरा बन गया है, केद्रीय सवेदना तो युगो को रहती ह और यह साहित्य मे यक्त होती है, लेकिन एक केद्रीय मुहावरा सा बन गया है और इस का एक नतीजा यह हुआ ह कि जो अलग-अलग इलाका मे रहने वाले है, जो अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियो मे रहने वाले कवि है, जलग-अलग परिवेश म-(प्राकृतिक परिवेश भी उस मे शामिल करता हू)- रहने वाले कवि ह, उन की कविताओ मे जो विशिष्टता अलग अलग परिवेश में रहने की वजह से दिखाई देनी चाहिए थी वह रचना क्या और दिन के बीच वजह से कुछ भेद नजर आता है। तो क्यामर स्वस्थ बीज, कम दिखाई देती ह और एक सावभीम महावरा सा इन की पविता मे दोखने लगा है। अगर कहीं भेद होता हनो विचारो को कविता के विकास के लिए? देखिए तक का जो रूप आप अभी बहस म लाये उसी का इस्तमाल यहा कर के वहूँ कि अगर आप यत्रोद्योग वाले तक कविता पर लागू करेगे तो अनिवायतया यह परिणाम होगा कि- उसी की ओर मैं सकेत करना चाह रहा था। एक ता आप य न विधिया बाहर से लायेंगे और उह कविता पर लागू करेंगे, जस टेक्नोलाजी इम्पोट की जाती है, तो उस से एक एकरूपता तो आयेगी ही। जहा कविता का ऐसा इस्तमाल हा रहा है-टेक्नो- लॉजी के स्तर पर आप मुहावरा भी ला रहे है, वहा उस में एकरूपता भी आयेगी बल्कि एक केद्रीय समानता तो अपेक्षित ही होगी। जिस तरह का वविध्य और विचित्रता दस्तकारी के स्तर पर सम्भव होती है और काम में भी बनी रहती है, वह इस स्थिति म नहीं रह सकती। तो यहां पर फिर आप को चुनना होगा कि आप क्या चाहते हैं और उस के लिए आप कितना दाम देने को तैयार हैं । मैं उस पक्ष का हूँ जो कि दस्तकारी का फिर भी महत्त्व देगा मैं कहूंगा कि टेक्नोलाजी उतनी ही लानी चाहिए जितनी हमारे काबू मे रहे-यह हम को स्वीकार नहीं है कि वह हम पर हावी हो जाये । और इसी तक को आप चाहे ता कविता के क्षेत्र मे भी ला सकते हैं। क्या कि बडे बडे प्रेस हैं जो कि बहुत बडी ग्राहक-सख्या वाली पत्र पत्रिकाएँ निकालन लगे हैं और उन को एक जिस के रूप म कविता की भी जरूरत है। उन के लिए तत्कालीन लोकप्रिय मुहावरे मे आप कविता, कहानी, उपयाम सब कुछ रच कर देते चलिए। यह तो उस व्यवसाय वा तक है। लेकिन जगर हम इस स्थिति की बात कर रहे हैं तो फिर हमे 'रचना' की बात नही करनी चाहिए। और अगर हम रचना की बात कर रहे हैं तो उस सम्भावना की बात करनी चाहिए जो कि इस परिस्थिति का या परिस्थिति के दबाव का मुकाबला भी कर सकती है और मानवता को इस टेक्नोलॉजी की गुलामी से बचाने की कोई आशा दे सकती है। तो क्या पिछले कुछ अरसे से जो आप फिर वाचिक परम्परा का कुछ आग्रह करने लगे ह और उस के तत्त्व-यह नहीं कि ठीक उसो तरह से वापस उस को पुनर्जीवित किया जाये लेकिन उस को कुछ विशेषताओं को, उस के बुनियादी तत्वो को-आज । रचना क्या, क्या, दिन के लिए दिन के बीच १३७ उम को समाज तक पहुँचाने की प्र ठोर है कि पत्र द्वारा या दि बड़े से पहा जैसा हाता था उगम पारी के स्तर पर थी) एप तात्मक मूल्य बार म वह चीज वित्रो के लिए होग उस का एन बलामक महत्व बना रहे यह होगा कि परिवर्तन तो हुआ, जो चीर थी उस का सामाजिक मूल्य उस के उपय! पर तुलसा जाप कर सकते हैं और आज व यह भी आप देख सकते हैं। लेकिन दूसरे र नहीं, पर अगर कविता मे उस की वजह होता है तोक्या इस से यह नहीं सिद्ध होता का प्रभाव पड़ता है ? चेतना पर औजारा का प्रभाव भी पडता है इस अग यह पहचान भी है किरन औजारों से मैं क्या कर जो मैं इन स कर समता हूँ उम को क्या सीमाएँ हैं जे इन औज़ारा तक सीमित रखता हूँ। लेकिन शायद उसकी निशा को वे औजार करते- नहीं करते। चेतना ता इस से बड़ी चीज है। और वह औजारा का अपने हित मे इस्तमाल करत इस के कि औजार उस का इस्तेमाल करें। और एक निश्चित दिशा की ओर हमेशा नहीं ले जाती। पर जो मुझे दिखाई देता ह वाचिक परम्परा की , और अब जो कविता लिखी जा रही ह उम मे जसे एक मुहावरा बन गया है, केद्रीय सवेदना तो युगो को रहा और यह साहित्य मे व्यक्त होती है, लेक्नि एक के मुहावरा-सा बन गया है और इस का एक नतीजा यह हुआ कि जो अलग-अलग इलाको मे रहने वाले है, जो अलग-अला. सामाजिर परिस्थितियो मे रहने वाले कवि है, अलग-अलग परिवेश मे~~-(प्राकृतिर परिवेश भी उस मे शामिल करता हू)- रहने वाले कवि है, उन को कविताओ मे जो विशिष्टता अलग जलग परिवेश में रहने की वजह से दिखाई देनी चाहिए थी वह V १ १३६ रचना क्या और दिन के बीच कम दिखाई देती है और एक सावभौम मुहावरा-सा इन की पविता मे दीखने लगा है। अगर कहीं भेद होता हनो विचारो की वजह से कुछ भेद नजर आता है। तो क्या मतलस्वस्थ चौज कविता के विकास के लिए? देखिए तक का जो रूप आप अभी बहस मे लायेमी का इस्तमाल यहा कर के कहूँ कि अगर आप यनोद्योग वाले तक कविता पर लागू करेगे तो अनिवायतया यह परिणाम होगा कि- उसी की ओर मै सकेत करना चाह रहा था। एक तो आप य र विधिया बाहर से लायेंगे और उह कविता पर लागू करेंगे, जसे टेक्नोलाजी इम्पोट की जाती है तो उस से एक एकरूपता तो आयगी ही। जहा कविता का ऐसा इस्तेमाल हो रहा है-टेक्नो लाजी के स्तर पर आप मुहावरा भी ला रहे है, वहा उस मे एकरूपता भी आयगी बल्कि केद्रीय समानता अपेक्षित ही होगी। जिस तरह का वविध्य और विचित्रता दस्तकारी के स्तर पर सम्भव होती है और काम में भी बनी रहती है, वह इस स्थिति म नहीं रह सकती। तो यहा पर फिर आप को चुनना होगा कि आप क्या चाहते है और उस के लिए आप कितना दाम देन को तैयार है। मैं उस पक्ष का हूँ जो कि दस्तकारी को फिर भी महत्त्व देगा मैं कहूँगा कि टेक्नालाजी उतनी ही लानी चाहिए जितनी हमारे काबू मे रहे---यह हम को स्वीकार नहीं है कि वह हम पर हावी हो जाये । और इसी तक को आप चाह ता कविता के क्षन म भी ला सकत हैं । क्यो वि बडे बडे प्रेस हैं जा रि बहुत बडी ग्राह-सख्या वाली पत्र-पत्रिकाएँ निकालने लगे है और उन को एक जिंस के रूप में कविता की भी जरूरत है। उन के लिए तत्कालीन लोकप्रिय मुहावरे म आप कविता, कहानी, उपयास सब कुछ रच कर देते चलिए । यह तो उस व्यवसाय का तक है। लेकिन अगर हम इस स्थिति की बात कर रहे है तो फिर हमे 'रचना' की बात नहीं करनी चाहिए। और अगर हम रचना की बात कर रह है तो उस सम्भावना की बात करनी चाहिए जो कि इस परिस्थिति का या परिस्थिति के दबाव का मुकाबला भी कर सकती है और मानवता को इस टेक्नोलाजी की गुलामी मे बचाने की कोई जाशा दे सकती है। तो क्या पिछले कुछ अरसे से जो आप फिर वाचिक परम्परा का कुछ आग्रह करने लगे है और उस के तत्व-यह नहीं कि ठीक उसी तरह से वापस उस को पुनर्जीवित किया जाये लेकिन उस को कुछ विशेषताओ को, उस के बुनियादी तत्वों को-आज रचना क्या, क्या, किन के लिए दिन के बीच १३७ उस को समाज तक पहुंचाने की प्रक्रिया भी बदल जायेगी। और यह ठीक है कि यत्र के द्वारा या कि बड़े पैमाने के यत्र से चीजें बनाय जान मे पहले जैसा हाता था उस म कारीगरी का, (जब तक वह दस्तकारी के स्तर पर थी) एक बलात्मर मूल्य था जो कि बाद म नही रहा। बाद में वह चीज वित्री के लिए हो गयी, जिस हो गयी उस के पहले उस का एक क्लात्मक महत्व बना रहता था। तो तुलना का आधार यह होगा कि परिवतन तो हुआ, जो चीज़ श्रम के द्वारा बनायी जाती थी उस या सामाजिक मूल्य उस के उपयोग से जुड गया। म आधार पर तुलना आप कर सकते हैं और आज कविता का क्या उपयोग होता है यह भी माप देख सकते हैं। लेकिन दूसरे स्तर पर वह बात लागू नहीं होगी। नहीं, पर अगर कविता मे उस की वजह से कोई परिवतन सम्भव होता है तो क्या इस से यह नहीं सिद्ध होता कि चेतना पर औजारो का प्रभाव पड़ता है? चेतना पर औजारा का प्रभाव भी पडता है इस लिए कि चेतना का एक अग यह पहचान भी है कि इन औजारा स मैं क्या कर सकता हूँ? या कि जो मैं इन से कर सकता हूँ उस की क्या सीमाएँ हैं जब तक मैं अपने को इन औजारो तक सीमित रखता हूँ। लेकिन शायद उस की दिशा को वे औजार नियन्त्रित नहीं करते- नहीं करते। चेतना तो इस से बडी चीज है । और वह औजारो का अपने हित मे इस्तेमाल करतो ह बजाय इस के कि औजार उस का इस्तेमाल करें। और वह किसी एक निश्चित दिशा की ओर हमेशा नहीं ले जाती। लेकिन एक फक जो मुझे दिखाई देता ह वाचिक परम्परा की कविता मे और अब जो कविता लिखी जा रही ह उस मे जसे एक केद्रीय मुहावरा बन गया है, के द्रीय सवेदना तो युगा की रहती ह और यह साहित्य मे व्यक्त होती है, लेकिन एक केद्रीय मुहावरा-सा बन गया ह और इस का एक नतीजा यह हुआ ह कि जो अलग अलग इलाको मे रहने वाले ह, जो अलग-अलग सामाजिक परिस्थितिया मे रहने वाले कवि , अलग-अलग परिवेश मे-(प्राकृतिक परिवेश भी उस मे शामिल करता हूँ)- रहने वाले कवि ह, उन को कविताआ मे जो विशिष्टता अलग अलग परिवेश में रहने की वजह से दिखाई देनी चाहिए थी वह १३६ रचना क्या और दिन के बीच कम दिखाई देती है और एक सावभौम मुहावरा सा इन की कविता मे दोखने लगा है। अगर कही भेद होता हतो विचारो की वजह से कुछ भेद नज़र आता है, तो क्या स्वस्थ कविता के विकास के लिए? देखिए, नर का जो म्प आप अभी वहस म लायेसा का इस्तमाल यहा करके कहूँ कि अगर जाप य नोद्योग वाले तक कविता पर लागू करेगे तो अनिवायतमा यह परिणाम होगा कि- उसी की ओर मैं सकेत करना चाह रहा था। एक ता आप यत्र विधिया बाहर मे लायेंगे और उह कविता पर लागू करेंगे, जैस टेक्नोलाजी इम्पोट की जाती है, तो उस से एक एकरूपता तो आयेगी ही। जहा कविता का ऐसा इस्तेमाल हो रहा है--टक्ना लॉजी के स्तर पर आप मुहावरा भी ला रहे है, वहा उस में एकरूपता भी जायेगी बल्कि एक केद्रीय समानता तो जपेक्षित ही होगी। जिस तरह का धविध्य और विचित्रता दस्तकारी के स्तर पर सम्भव होती है और काम में भी बनी रहती है वह इस स्थिति म नहीं रह सकती। तो यहां पर फिर आप को चुनना होगा कि आप क्या चाहते हैं और उस के लिए आप कितना दाम देन को तैयार है । मैं उस पक्ष का हूँ जो कि दम्तकारी को फिर भी महत्त्व देगा मैं कहूँगा कि टेक्नालॉजी उतनी ही लानी चाहिए जितनी हमारे काबू में रहे-यह हम को स्वीकार नहीं है कि वह हम पर हावी हो जाये। और इसी तक को आप चाह ता कविता के क्षेत्र मे भी ला सकते हैं। क्या कि बडे बडे प्रेस हैं जो वि बहुत बड़ी ग्राहक-सच्या वाली पत्र पत्रिकाएं निकालन लगे है और उन का एक जिंस के रूप मे कविता की भी जरूरत है। उन के लिए तत्कालीन लोकप्रिय मुहावरे मे आप कविता, कहानी, उप यास सब कुछ रच घर दत चलिए | यह तो उम व्यवसाय का तक है। लेकिन अगर हम इस स्थिति की बात कर रहे हैं ता फिर हमे 'रचना' को बात नही करनी चाहिए। और अगर हम रचना की बात कर रहे हैं तो उस सम्भावना की बात करनी चाहिए जो कि इस परिस्थिति का या परिस्थिति के दबाव का मुकाबला भी कर सकती है और मानवता को इस टेक्नोलॉजी की गुलामी से बचाने की कोई आशा दे सकती है । तो क्या पिछले कुछ अरसे से जो आप फिर वाचिक परम्परा का कुछ आग्रह करने लगे ह और उस के तत्व-यह नहीं कि ठीक उसी तरह से वापस उस को पुनर्जीवित किया जाये लेक्नि उस को कुछ विशेषताओ को, उस के बुनियादी तत्त्वो को-आज रचना वया, क्या, दिन के लिए दिन वे बीच १३७ । की कविता के लिए महत्त्वपूर्ण मानते है--क्या उस की वजह यही है? यह विचार भी उस के साथ जुड़ जाता है, लेकिन वाचिक परम्परा की बात जो करता हूँ तो एक तो उस का सदभ यह है कि हमारा देश अभी तक दा तिहाई निरक्षर है। दो तिहाई ता बिरकुल निरक्षर है, इम का यह मतलब भी नहीं है कि एक तिहाई पुस्तकें पटता है या पर भी सवता है। साक्षर है वम इतना ही है। जहा पढने वाला की सख्या इतनी कम है लेकिन साहित्य से या रचना स या काव्य से जुडने वाला को सय्या उन लोगा में भी काफी है जा कि निरक्षर है, वहा ध्यान रहना चाहिए कि हमारे पूरे समाज का एक सम्कार जभी बचा हुआ है जिस का उपयोग हा सकता है। इस सास्कृतिक मस्कार के जाधार पर रचना को जन साधारण तक यानी कि निरक्षर समाज तक भी पहुंचान के लिए वाचिक परम्परा का महत्त्व देना चाहिए। सम्प्रेषण की विधिया के बारे मे वहा से बहुत कुछ सीखा जा सकता है~या कि सीखा हुआ, जाना हुआ तो वह है, उस को भुलाये जान से बचाया जा सकता है। दूसरा कारण उस पर बल देने का यह हुआ कि अब जो नये सचार माध्यम जाये है जिन मे श्रव्य की सम्भावनाएं बहुत है ये वाचिक परम्परा का दूसरा और तमापरिस्थिति में कहना चाहिए कि जधेरा पक्ष है । क्या कि वाचिक परम्परा मे श्रुति का सस्कार रहा और सुन कर ही सस्कार ग्रहण किये जाते रह इस लिए अगर आज हम अपने कान को यत्रो का और वह भी सरकारी या कि बडे सगठना के यत्रो का-गुलाम हो जाने देते हैं तो हम उस पूरी वाचिक परम्पग की जा रचनात्मक सम्भावनाएँ थी उन की रचनात्मकता मिटा कर उन को भी गुलामी म परिवर्तित कर देते है। इस से बचने के लिए भी इस चीज पर बल देना चाहिए कि वाचिक परम्परा म रचा- त्मक सस्कार बनाने की बहुत सी मम्भावना है और उस सामर्थ्य की रक्षा इस परिस्थिति से करनी चाहिए। यह जो अभी आप ने नये सचार-साधनों की बात कही, इस से एक और बात मेरे मन में उठती है ( जिस को थोडी चर्चा जम्मू के शिविर मे भी हुई)। यह जो नयो तरह की सम्प्रेपण परिस्थिति दरदशन के जाल ने हमारे देश मे पदा की है, तत्काल ऐसा नहीं लगता कि इसे रोका जा सकेगा, लगता है कि लोगा का यह माक्पण जो है यह इतना अधिक है, जन-साधारण फा भी, कि लेखक अगर उस का सजनात्मक इस्तेमाल नहीं करता १३९ रचना क्या और किन ये बीच 7 है या उस दिशा मे नहीं सोचता है और इस नयी सम्प्रेषण- परिस्थिति को सही पहचान अगर उसके साहित्य में विकसित नहीं होती और उस के अनुरूप वह नयी प्रणालिया नहीं खोजता है तो शायद उस की कविता कुछ पीछे रह जाये। एक सिद्धात के रूप मे अगर हम यह मान लें कि सम्प्रेपण- परिस्थितियो मे और साधनो मे बदलाव से कविता मे भी कुछ बदलाय आता है, तो अब किस तरह का बदलाव आप देखते है क्या चीज उन नयी सम्प्रेषण परिस्थितियो मे आनी चाहिए? अब जो मैं क्तमान परिस्थिति में देखता हूँ- यह ता है कि इन चीजो का एव बडा प्रल आरपण है, एक सम्मोहन सा है टी० बी० का। वेवल इस लिए नहीं कि एक स्टेटस सिम्बल बन गया है टी० बी० सैट, इस लिए भी कि माध्यम का सामथ्य है सीधे सीधे तोगा तक पहुँचने का घर म, थापडी के भीतर भी पहुँचने का। यह आपने देखा होगा कि पिछले वर्ष लगातार वितनी तेजी से दूरदशन का जाल, नेटवक ये अथ में भी और जाल ही के अय मे कहना चाहिए ! जाल के अथ मे भी पित्तनी तेजी से फैलाया गया और इस वात की कितनी प्रशसा की गयी, इस बात का श्रेय लिया गया, कि सारे देश तक आवाज पहुँचान की व्यवस्था हमने कर दी है । लेकिन इस बात यो ता उतना स्पष्ट रूप से सामने नही लाया गया कि यह सारी की सारी एकतरफा व्यापार की व्यवस्था है। एक केद्र स निक्लने वाली आवाज देश के कान-कान तक पहुँच जाये, इस की व्यवस्था तो है, लेकिन देश के कोने-कोने की आवाज़ भी वापस दे द्र तर पहुंचे इस की कोई चि ता नहीं थी। हालाकि इस की सम्भावना भी तो उस म दूसरे पक्ष से निकलती है। जो जाल फ्लाया गया है वह इस लिए है कि एक दिशा में प्रभावा का प्रवाह तजी से और दूर-दूर तक हो सके। दूसरी दिशा म भी वसा हाना चाहिए, इस की कोई खास चिता नहीं है। लेकिन इस बावजूद इस का वडा प्रबल आक्षण है। तो यह स्थिति ताजायगी। इस पहचान म लोगा को समय लगेगा कि जितना इस मे सामथ्य है उस से जितनी सम्भावनाएँ खुलती हैं उतने ही उस के खतरे भी हो गये है। इस समय ता प्रयल यही है-सरकार का भी और समृद्ध संगठना का भी-कि जल्दी से जली इस शक्ति का उपयोग कर के एसी स्थिति ले आयी जाय दिसुनने वाला हमेशा के लिए हमारा रचना क्या, क्या, विन वे लिए, पिन के वीच १३६ गुलाम हो जाये। अव कवि के लिए या साहित्यकार के लिए प्रश्न यह बनता है कि या तो हम इस का विरोध करत हुए परिस्थिति से और इन नयी सम्भावनाआ से कट जायें, एक तरफ डाल दिय जायें यह सम्भावना है और एसा हुआ भी है~या हम भी साथ वहत चलें। हा, पर खतरा आखिर एक सजनात्मक चुनौती होता है। सच्चाई यह है कि पवि काया कि माहित्यकार का जाज के इस समाज म वह स्थान नहीं है जो कि पहले कवि का होता था। न लोगों के बीच वह सम्मान है और न वह शक्ति उम के पास है। दूसरा सवाल यह वनता है कि क्या कवि यह यत्न कर सकता है कि इस चीज म शामिल हा कर उस को यथासम्भव इस परिस्थिति से उबार सके, वहाव में साथ यह कर उस मोड दे सके ? मैं नही जानता इसका क्या जवाब है, कि वास्तव में वह एसा कर सकता है या नहीं। लेकिन अगर बाई ईमानदारी से इस का प्रयत्न करना चाहता है तो मैं उस प्रयत्न का श्रेय उस का दन के लिए तैयार हूँ। कर के देख ले कि क्या हो सकता है। और अगर वह यह नहीं करता पर उस से अलग हो कर चाहता है कि टी० वी० के बिना भी या कि जिस के पास टी० वी० नही है या जो नही देखते उन तक पहुँचे, तो उस के प्रयत्न को भी मैं अमा य नही करना । मेरा ख्याल है दोना तरह की कोशिशें होगी। कम से कम मैं यह नहीं कह सकता कि इन में से एक गलत है और दूसरी सही है। दोना हानी भी चाहिए । उन लागा तन भी पहुंचना चाहिए जो कि यह नहीं मानते कि हम टी० वी० के बिना सभ्य समाज के अग नहीं रहते और उन लागा तक भी पहुँचने की कोशिश करनी चाहिए जो टी० वी० का महत्त्व देत है--विटी० वी० के माध्यम से भी कुछ अच्छे सस्कार लागा तक पहुँचाय जा सर्व-रचनात्मक या सास्कृतिक जीवन के सस्कार । राजनीति की बात में नहीं कह रहा हूँ। में जो बात इगित करना चाह रहा हूँ वह यह भी है कि यह जो एक नयी सम्प्रेषण-परिस्थिति हमारे सामने पदा हुई, इस के कारण से जो चुनौती कवि के सामने आती है जिस का मुकाबला उसे अपने माध्यम से ही करना है, उसी की मदद से करना है, तो उस से कविता मे क्या कोई और रपगत परिवतन को सम्भावना आप देखते ह जसी आपने याचिक परम्परा से पठय परम्परा को कविता के सिलसिले मे देखी? क्यों कि अगर एक समाज मे लम्बे समय तक टी० बी० का प्रयाग होता है तो (चाहे कवि दूसरी तरह से पहुंचना चाहता रहे, मैं नहीं १४० रचना क्या और विन व बीच कहता कि वह न पहुंचे) समाज का जो ग्रहण सस्कार है उस मे एक सरचनागत परिवतन भी लम्बे समय तक होता है । जसे कि अखबार पढने वाला आदमी धोरे धीरे सुनने की बजाय पढना पसद करता है। तो जैसे एक पठय परम्परा ने एक सरचनागत परिवतन कविता मे फिया, क्या उसी तरह का कोई परिवतन अब आप सम्भव देखते ह? कुछ परिवतन तो होगा। कुछ शायद हो भी रहा है-बहुत स्पष्ट तो नही हुआ है। जो हो रहा है वह शायद अच्छा नहीं है। यानी रेडियो और टी० वी० पर, खास कर टी० वी० पर, जिस तरह के कवि सम्मेलन और मुशायरे होने लगे हैं वह तो वाचिक परम्परा या पट्य परम्परा की ही चीजें सामने आती ह वहा से- उस मे नया तो नहीं लगता है कुछ। हो, लेकिन उस परम्परा की जो कमजोरिया थी उन का ज्यादा उपयोग होता है, क्या कि आग्रह तो तोक प्रियता की जोर है। क्यो कि इन की लाकप्रियता का उपयोग फिर दूसरे प्रयोजना के लिए किया जाता है । एम कायम का स्पासर अपनी चीज का विज्ञापन करने के लिए कवि सम्मेलन और मुशायरे का उपयोग करता है। इस लिए इस का बहुत महत्त्व है कि जो चीज़ वहाँ सुनायी जाये कविया का जो रूप, जो छवि दीखे वह लोगा को आवपित कर। फिर उस के बाद तल साबुन वेचना हो, सिगरेट-तम्बाकू बेचना हो, फटफटिया वेचना हा, खाने पीन की चीज़ बेचना हा, कुछ भी वेचना हाउस का इस्तमाल फौरन करे लेकिन यो जो प्रभाव पूरे समाज पर या सम्प्रेषण की पूरी परिपाटी पर पड़ता है उस का कुछ अच्छा उपयाग भी हो सकता है यदि वसा लक्ष्य हो । एक तो मेरा ख्याल है कि काव्य वाचन को फिर से नया महत्त्व दिया जा सकता है और शायद दिया भी जा रहा है। रगमच का उपयोग भी काव्य को प्रस्तुत करने के लिए बढ़ेगा, और बढे तो अच्छा है। और एक कुछ मिश्र माध्यम भी हो जैसे वाणी भी है जो कि कवि का पहला माध्यम था। उस के साथ कुछ उस का यात्रिक विस्तार भी हो और कुछ छविया भी उस के साथ प्रसारित की जायें, या चल चित्र का भी इस्तेमाल हा या नाटकीय मचन इत्यादि, जिस को कविता की मिश्र प्रस्तुति कह सकते हैं । मेरा ख्याल है कि उधर कवियो का भी और दूसरा का भी ध्यान जायेगा। यह भी अच्छा ही है। इस के सहारे फिर उन अर्थों को भी समाज के सामने लाया जा सकेगा जो कि समाज के लिए महत्त्व रखते हैं उस के सवेदन का समृद्धतर बना सक्ते - रचना क्या, क्या, किन के लिए, किन के बीच १४१ हैं और उम छिटोपन से बचा गरते है जा टी० पी० ये लिए आरपा हाता है। अब मैं फिर यही परम्परा को यात को ओर लौटना चाहूंगा। जय हिंदी का पवि परम्पराको यात करता है तो उस मे कहीं भारतीयता में सरकार की बात भी करता है। पर भारतीयता को आप किस तरह प्यारयायित करते ह ? यिशिष्ट दानिक परम्परा के स्प मे देखते हैं या पोई और सस्वारों को परम्परा के रूप में देखते ह, सवेदनागत परम्परा के रूप में देखते ही बसे इसे परिभापित करेंगे? दापनिय परम्परा भी उसका एक अग हानी चाहिए। लेकिन एक समय अस्मिता या ही महत्व होना चाहिए । भारतीयता का मतलब है भारतीय अस्मिता की पहचान व्यक्ति के सामन एक आत्म बिम्ब हो जो कि भारतीय हो। लेकिन यह भी है कि उस को सीढी म एक स्थान पर मैं रख देना चाहूंगा क्या रि भारतीय हो जान ये नाते ऐसा नहीं है कि मनुष्य मनुष्य नहीं रहगा। तो एक शत यह रही कि एक मानव के नाते मैं क्या हूँ, यहाँ है-मानवता की एव पहचान हानी चाहिए। फिर दूसरी तरफ में जिस प्रादशिप समाज में जीता हूँ वह है--यहा पर ऐसे समाज है, जन-जातियां हैं, वन जातियां हैं, जिन का जीवन उस बिरादरी के बाहर बहुत कम जाता है। बाहर के प्रभाव उन म आवे जरूर हैं-~चीजें महंगी हाती हैं या दुलभ हो जाती हैं और उस का असर उन पर पड़ता है, फिर शहरी लोगा द्वारा शोषण ता है हो । रोकिन उन का सामाय सास्कृतिक जीवन उसी एक बिरादरी की सीमा मे रहता भारतीयता की बात के साथ ही एक और सवाल जुडा हुआ है। खास तौर से आपने एक-आध दफा इस तरह के वक्तव्य भी दिये ह जिहें देखते हुए मै समझता हूँ कि पुनज म या कमवाद की बात के बिना भारतीय जीवन दष्टि का विचार सम्भव नहीं होता। खास तौर से काल की आप की जो कल्पना है, चकाकार, वह भी कहीं-कहीं पुनर्जीवन या पुनजाम को पात पर आधारित है या उस को पुष्ट करती है या दोनों ही एक दूसर को पुष्ट करती है। लेकिन आप पुनजम को नहीं मानत बल्कि जहां तक मुझे स्मरण होता है एक-आध जगह पर आपने कहा भी है कि पुनजम में स्वीकार नहीं करता। ऐसी स्थिति मे भारतीय जीवन-दृष्टि से या भारतीय सस्कार से कसे अपने १४२ रचना क्या और किन के बीच को जुडा हुआ अनुभव करते ह? क्यो कि यह तो भारतीय सस्कार का एक हिस्सा है पुनजम? भारतीयता की वात तो मैंने की है, लेकिन एक तो पुनजम की बात जरूरी तौर पर भारतीयता का अग नहीं है । दूसरे मैंन ठीक यह नही कहा कि मैं इसे नहीं मानता। इतना ही कहा है कि पुनजम को मानना अनिवायतया उस काल की मेरी अवधारणा से जुडता नही है। उस के बिना भी काम चलता है। तो जितनी क्म चीजें मान कर काम चल जाये उतना ही ठीक है। लेकिन फिर भी पुनजम एक ऐसी धारणा है जिस से किसी तरह को टकराहट के बिना भारतीय मन कसे रह सकता है ? बात इतनी ही है कि मैं पुनज म मानना जरूरी नहीं ममयता, यही मैं कह सकता हूँ। इस का प्रमाण नहीं है कि पुनज म नहीं होता। उसे मानना अनावश्यक है, बस इतन तक ही मानता हूँ। या काल की जैसी जवधारणा है, चक्रगति की जो बात है, उस म मैं समझता हूँ कि पुन- जम की बात को मन मे पीछे कही रखते हुए यह कहे कि जीवन में अवस्थिति का निणय करने के लिए एक तो दिक का विचार करना होता है कि कोई चीज 'कहाँ है, दूसरे काल का विचार करना होता है कि कोई चीज़ 'कब' है। और तीसरे कह लीजिए कि अस्ति का, अस्मिता का विचार करना होता है--वि कौन है । ता पुनज म मे यह जो मान लेना है कि दुवारा फिर वही सयोग होगा कि वही दिग्विदु, वही काल बिदु और अस्मिता का भी वही पुज सव इक्टठे होंगे, यह मानना मुझे अनावश्यक जान पडता है। काल की चक्रगति है, लेकिन जिस को अस्मिता कहत हैं उसे-आत्मा का अमर मान भी लें ता- वही ज्या का त्यो वही पुज इकटठा हाता है यह मानना अनावश्यक है । वह कही बना रहता है, या किसी विश्वात्मा मे एक हा कर रहता है, कोई ऐसी बडी चेतना है जिस में वह भी चला जाता है और उसी एक बिंदु कभी अलग हो कर फिर रूप लेता है-इस रूप मे, अगर आप इस का पुनजम कहे, यानी कह कि कुछ है जा मिटता नही है और बार-बार प्रकट होता है तो इस का परिणाम यह नही निक- लता कि वह ठीक वही है । लेकिन अगर आप पुनजाम को परिभाषा ही ऐसी करें तब दूसरी बात हो जाती है । मैं तो सोचता हूँ जिस तरह हम एक निरवधि काल की कल्पना करत हैं, जैस एक महासागर है उस मे से एक बूद आप ले लीजिए या उस म लहरें आती है--पुरानी कल्पना भी यह रही है कि एक उस का स्थिर रूप है और एर उस की रचना क्या, क्या, क्ति के लिए, दिन के बीच १४३ सतह पर लहरें आती रहती हैं-इसी तरह चेतना का भी एक महा सागर हो सकता है जिसका एक अशेष और अनतम्य है और जिस मे जब तब लहरें उठती रहती हैं-एसा मान सक्त हैं। मैं जर पुनज म की बात को अनावश्यक मानता हूँ तब इस रूप की बात नहीं कर रहा हूँ वल्कि ठीक उसी इकाई वे फिर किसी तरह प्रस्ट होने की और पिछल जम की स्मृति वगरह की बात करता हूँ। यह मव मानना अनावश्यक स्मृति तो नहीं, लेकिन कमवाद का सिद्धात यह जरूर मानता है कि जिसे आप अस्मिता का पुज कह मा आत्मा यह वह जब तक विश्वात्मा मे विलीन नहीं हो जाती-अगर वह हो जाती है तो उस के बाद अगर उस मे से कुछ निकलता है तब तो वह दूसरा कुछ हो सकता है फिर भी तात्विक अन्तर उस में नहीं होता-- तबतक वह रही है। दूसर, यह कहना नी एक तरह से भाषा का प्रयोग ही है, इस के अलावा कुछ नहीं है। लेकिन उस मे विलीन होने से पहले भी और देह के न रहने पर दुवारा वह देह धारण करती है तो वही पुज अस्मिता का है। दिक और काल तो बदलते हैं लेकिन अस्मिता का पुज वही रहता है, उस की पहचान चाहे तात्त्विक स्तर पर न रहे पर उस की बाहरी पहचान जरूर बदलती है। यह जो धारणा है पुनजाम को मैं उस के बारे में बात कर रहा था? देखिए, क्मवाद के साथ इस का जोडत हैं तो मेरा ख्याल है कि वहां पर एक दूसरी समस्या उस के साथ जुडी होती है--वि क्मिी ने जो अच्छे-बुरे क्म दिये उस का पल उसी को न मित कर अगर किसी दूसर को मिलता है तो यह कसा याप हुआ? पल उसी को मिलना चाहिए। अगर वह एक जीवन जी के फिर वही वह नही रहा ता फल उस का कसे मिलता है और एक के कम के कारण दूसर का लाभ या कष्ट हा नो फिर ऐसा लगता है कि इस विश्व म कही पाय नही है। इस बार म आसान जवाब तो यही है कि 'मैं नहीं जानता कि 'माय है। लेकिन मानना चाहता हूँ कि कुल मिलाकर पाप भी हो जाना चाहिए या एक सन्तुलन बनना चाहिए और अगर मचमुच हम ऐसा मान लेते हैं कि य अलग-अलग इकाइयां नहीं हैं तो यह मानन म भी वाई बदन वही कठिनाई नही रहनी वि फिर जा याय होता है या सन्तुलन बनता है वह उस बड़े पैमाने पर जा कर बनता है, छोटी छोटी इवाइयाना अलग-अलग एक समाकरण बने यह तब अनाव- १४४ रचना क्या और किनारे बीच श्यक जान पड़ता है, यह शायद सम्भव भी नही है। लगता है कि ऐसा नही होता होगा, किसी बड़े पैमाने पर जा कर ही सब चीजो का हिसाब बराबर होता होगा। निरन्तर आप की कविता मे रूप के प्रति एक आकषण मिलता है । दूसरी ओर अस्प के प्रति भी उतना ही आकषण मिलता है। बल्कि कहीं-कहीं लगता है--जसे एक चिडिया गा गयो वाली कविता है, उस का शोषक भूल रहा हूँ-जिस मे यह कहा गया है एक अरूप को उधार देते मानो डर लगता है, न जाने ऐसा कौन है । दूसरी ओर यह भी है जसे 'आंगन के पार द्वार' की कविताएं हैं, जिन मे है कि 'रूपो मे एक अरूप सदा खिलता है' या कि 'आत्मा की भांवरें महाशूय के साथ रची गर्यो । तो क्या इन दोना मे आप कोई अतविरोध नहीं देखते-इन दो तरह की अभिव्यक्तियों मे? जहां तक मेरा सवाल है, मैं तो यह कह सकता हूँ कि अगर उस मे विराध है भी, या किसी को दीखता है तो मुझे क्या । आपको क्या लगता है? आप बताइये कि विरोध क्या आप को दीखता है ? मुझे लगता है एक तरफ अरूप के प्रति इतना आक्षण है और सभी रूपो मे एक अरूप को देखते हैं, वह 'महाशूय' भी अरूप हो है जिस के साथ आत्मा की भावरें रची जाती है। दूसरी ओर निर तर आप एक रूप को ही महत्त्व दे रहे ह और जहां मन मे एफ सदेह है, एक डर जो उस कविता में प्रकट होता है जहा उस अरूप को उधार देते हुए मन डरता है यानी अरूप के प्रति समपण करते हुए मन डरता है तो क्या इस मे ऐसा नहीं तरह को मन स्थितियों मे लिखी हुई कविताएं ह जब कि हुआ यह कि 'आंगन के पार द्वार' बाली कविता पहले लिखी गयी है, यह बाद मे-छपी तो बाद में ही है, यह बिल्कुल तय है, मैं नहीं जानता कि लिखी कब? क्यो कि एक कविता 'आंगन के पार द्वार' की है और दूसरी 'कितनी नावो में कितनी वार' की पहली कविता है। नही । एक तो यह है कि दाशनिक को अपने सारे विचारो म जिस तरह का सामजस्य चाहिए, कवि को उस की आवश्यक्ता नही होती, और अगर वह उसके पीछे जाये तो फिर एक दूसरी नीरसता ही उस को मिल सकती है। इस अथ मे तो फिलासफी मे और काव्य मे एक लगता किये 7 रचना क्या, क्यो किन के लिए, किन के बीच १४५ ? अतर है। वसी बसिस्टेसी कवि का प्रयाजनीय नही है। नहीं तो इस तरह के दाशनिक सवाल भी उठ सक्त हैं कि यह जो शूय की बात आप करते हैं तो बौद्ध दशन म जात हैं और अस्प की बात करते हैं तो वेदात में जाते है-यह सब क्या घपला है? में केवल सवेदनागत बात कर रहा हूँ। धूप भी मेरे लिए तो वह नहीं है जो कि अंग्रेजो का वैकुअम है। इस का अगर आप अन्तविरोध ही मानते हैं तो ठीक है, वह तो वविता म हाता है और इस की परवाह नहीं करनी चाहिए। और अगर वैसा नहीं है तो रूप और अरूप की जा बात है, अगर ऐसा है कि 'रूपाम एक अरूप सदा खिलता है", तो क्या नहीं दोना के प्रति आवषण होना चाहिए और क्यो नहीं यह प्रश्न सब के सामने आते रहना चाहिए कि दाना म क्या सम्बध है कि हम एक के माध्यम स कस दूसरमा पहचाने ? नहीं, यह सवाल इस लिए भी थोडा-सा महत्त्वपूण लगता है कि अरूप के प्रति अगर केवल इस तरह का सदेह ही ध्यक्त हुआ होता और वह कविता मे पहले हुआ होता,-अब मैं नहीं जानता क्या क्रम रहा होगा-तब तो मुझे विकास के क्रम मे लगता कि शायद ऐसा सम्भव है। लेकिन जिस दृढता के साय, बहुत गहरे विश्वास के साथ यह बात कही गयो है कि "रूपो मे एक अरूप सदा खिलता है" और उस के साथ जुडो हुई दूसरी कविताआ मे, उस के बाद की कविताओ मे, सदेह है, तो मुझे थोडा सा लगा कि ऐसा क्या है ? इस लिए मैने यह सवाल पूछा। यह तो मैं मानता हूँ कि कविता में इस तरह का अन्तविरोध महत्त्वपूर्ण नहीं है। बल्कि शायद यह कहना चाहिए कि कवि की सवेदना हो इन सब को अपने घेरे मे, परिधि मे, लेती है क्यो कि वह केवल तक के आधार पर तय नहीं करता है। सिफ कविता की बात न कर के कवि की ही बात करे ता इस कवि की शिक्षा दीक्षा तो जितनी भारतीय चिन्तन मे हुई उतनी ही विज्ञान में। बल्कि मा औपचारिक शिक्षा थी वह ता विज्ञान की हुई~भौतिक विज्ञान की। फिर राजनीति की जो पहली दीक्षा हुई उस म जडवाद का महत्त्व दिया गया था जो विज्ञान वा तत्कालीन रूप भी था। (विज्ञान न भी उतनी दृढता से जड पदाथ से सृष्टि मात्र की उत्पत्ति मानन का आग्रह छोडा नहीं तो कम जरूर कर दिया या यह कहा कि इस बारेम हम जानत नहीं हैं। यह भी बाद की बात हुई। तो अगर चितन वसा है और कविता मे पहले इस तरह के आग्रह प्रक्ट होते हैं या उस स भिन १४६ रचना क्या और किन ने बीच आग्रह नहीं प्रकट होते हैं ता इस को चिन्तन का स्वाभाविक विकास यो कि दीक्षा के आधार पर आत्म का विकास मानना चाहिए । मैं एक तो चेतन की अपनी सत्ता मानता हूँ। वैस पहले के जडवाद के साथ, या भौतिक विज्ञान के आग्रहा के साथ इस बात का मेल बैठाता हूँ, इस का मेरे पास काई जवाब नही है। इतना ही है । इस से प्रतिकूल आग्रह ले कर चलें तो भी यह सारा विश्व समझ म नही आता समस्याएं बनी रहती हैं। विज्ञान भी यह कहता है कि उतना ही मान कर चलना चाहिए कम स कम मानना चाहिए उतना ही जितने स कि जो तथ्य सामने है वे समझ म आ सकें। मैं यह पहूँ कि मुझे जान पडता है कि चेतन तत्व का मानन से कुछ चीजे समझी जा सकती है जा अयथा नही समझी जा सक्ती और काव्य के लिए यह आधार काफी है । और जगर जुडाव की बात भी करत हैं, विश्व स जुडन की बात भी करत हैं, तो वह चेतन के स्तर पर ही होता है। जड से जड + जुडन का कोई आग्रह कविता मे कुछ अथ नहीं रखता। कहीं भी अय नहीं रखता? हा चेतन से जुडन का ही अथ हाता है । पचत्व-प्राप्ति की बात छाहिए। चेतना की स्वतत्र सत्ता की बात आपने की। और अभी थोडी देर पहले एक विश्व चेतना या एक परम चेतना की बात भी आपने को-कि उस मे से छोटी छोटी चेतनाएँ उभरती हैं और फिर उस मे विलीन होती हैं । रूप और अरूप की बात भी हुई। तो क्या उस चेतन सत्ता का कोई स्पष्ट रूप भी आप मानते हैं, उस परम चेतन सत्ता का कोई भी रूप आप मानते हैं या अरूप हो उसे मानते ह ? दूसरे शब्दो मे कहूँ तो क्या उसे ईश्वर जसी किसी अवधारणा के निकट समझते ह? पता नही । इस से ज्यादा कोई निश्वयात्मक जवाव तो कभी मेरे सामने नही आया। हो सकता है, लेकिन मैं नहीं जानता। एक कवि के रूप मे आप को सवेदना मे किस तरह का अहसास होता है ? दाशनिक स्प मे या चितन से उस को पुष्ट करें यह आवश्यक नहीं है-तक से पुष्ट वरने की बात नहीं कर रहा हूँ। दोनो ही हो सकते हैं, दोनो ही स्वीकार हो सकते है दानो ही समद्धि दे सक्ते है । और मरा इन के बीच अभी अपना काई चुनाव नही हुआ है । जब आप एक कविता मे यह कहते हैं कि "तू बढ़ा कर हाथ सहसा खींच लेता, गले मिलता है", तो जो 'तू' है वह क्या कोई अहप हो है, या आप के मन मे कोई इस का स्प भी है ? स्पष्ट न हो तो भी . रचना क्या, क्या, किन के लिए, विन के वीच १४७ क्या एक श्य है उस का? नही, इस म आगे बढ़ेग ता भाषा की सीमाओवा भी विचार वहां करना पडेगा। अल्प भी हो सकता है, यह तो मैं मानता हूँ। अरुप के लिए भी 'तू' का इस्तेमाल तो हो सफ्ता है। हा । पर इस तरह की बातो म यह परिणाम निकालना ठीक नहीं होगा कि मैं उस रूप म ईश्वर मे--- ईश्वर चाहे न सही, क्यो कि इस कविता मे पहले जो बात कही गयी है वह यह है कि- पश्चिमी परिभाषा म जिसे पसनल गॉड कहते हैं-- मैं नहीं जानता। लेकिन इस कविता मे पहले जो कहा गया है, कि एक रपातीत पुनीत गहरी नींव है और उस मे से तू यदा कर हाय सहसा खोंच लेता है तो रूपातीत की स्थिति तो पहले से है और उस मे से एक और 'तू' पदा होता है । यह सवाल इस लिए मन में उठता है कि रूपातीत मे से कोई एक और रूप निक्लता है, वह 'तू ह, या रूपातीत का भी कुछ और आधार है वह 'तू' है। इस तरह नही इस का जवाब मैं नहीं जानता और आवश्यक भी नहीं है । क्यो कि हाथ बढा कर जिसे ग्रहण किया जाता है वह भी उस स्तर पर ता चेतना का ही पुज है । कोई सरूप चीज नहीं है जिस का ग्रहण किया जा रहा है। एक तरफ अगर चेतना को ग्रहण किया जा रहा है तो दूमरी तरफ भी चेतना के द्वारा ही ग्रहण किया जा रहा है, इतना ता उम मे है । लक्नि इस से ज्यादा म्प उसे देना आवश्यक है । मैं यह भी सोचता हूँ कि गोंड की प्रेजेंस की प्रतिज्ञा के बिना भी डिवाइन की प्रजेंस की बात सोची जा मक्ती है-~~और उस तत्व के अनुभव का महत्त्व है। ठीक है। काल-बोध की ही कुछ और बात करना चाहता हूँ। एक तरफ आपने भारतीय काल-बोध की या जिसे पूर्वो कह सकते ह उस को चर्चा करते हुए उसको चक्राकार माना है, वर्तुलाकार माना है। और दूसरी ओर पश्चिमी पाल-बोध को आपने एक रेखीय माना है या कि ऐतिहासिक काल इसे कहा है। बल्कि साधि काल भी उसे कह सकते हैं। लेकिन लगता यह है कि पश्चिम मे भी अतत इस सावधि काल कालाप कर, उस का ट्रासेंड कर के, निरवधि काल मे प्रवेश ही जीवन का उद्देश्य है । क्यो कि अतत 'पराडाइज रोगेन' करना है, जो शत हिदू परम्परा से शुरू होती है और उस रचना क्यो और विन वे बीच

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जिस पत्रगति की वात वरत हैं उस म ऐसा कोई अत तो नही हाता। हां, पर इस में भी, ईसाई मत में भी जो अत होता है उसके बाद भी एफ निरवधि काल है। पुन स्वग में पहुंचने के बाद का जो काल है। यह नहीं है कि उस के बाद सप्टि नष्ट हो जाती है- उस के बाद भी उस में एक निरतरता बनी रहती है। लेकिन कोई मानवीय काल वहां नहीं रहता। तो यदि एक निरवधि काल को कल्पना वहां भी इस तरह हो जाती है, तो फिर बुनियादी फक क्या होता है दोनों स्थितियो में? निरवधि तो फिर उस को नहीं कह सकते। सिफ अतहीन कह सक्ते हैं । या-- या कालहीनता की स्थिति कह सकते हैं, 'टाइमलसनस' जिसे कहा जाता एक बात और में जानना चाहता हूँ क्यो कि आपने उस की भी काफी चर्चा की है । क्यो कि काल-बोध हो सस्कृति का मुख्य आधार है, और हमारे कला स्पो पर भी काल बोध और दिग्बोध का प्रभाव रहता है क्यो कि वे इहीं को "यक्त करते हैं, तो अगर पश्चिमी काल बोध और भारतीय काल-बोध में या पूर्वी काल बोध में कोई फक आप देखते हैं जो कि आप देखते हैं तो इन दोनो सस्कृतियो के काव्य स्पों में श्या सरचनागत कोई फर्क, बुनियादी अतर आप पाते हैं ? पहली बात तो यह है वि थोडा सा सशोधन करूं। सस्कृतियो का आधार भापा है । भाषा के विना सस्कृति नही है। और काल-बोध के बिना भापा नहीं है। इस लिए सस्कृतियो म विशिष्ट काल बोध पाते हैं और उन की समस्याएँ भी भापा के साथ जुडी हुई है, उस से अलग नही की जा सकती। आपने जो सवाल उठाया वह शायद भाषा के बारे मे नही है, वह लय के बारे मे अधिक हो जाता है शायद । वह तो मैं अब पूछने वाला हूँ ! अभी तक तो कला रूपो के बारे में हो पूछ रहा था। क्ला रूपो के बारे मे उपयास मे तो ऐसा काल हाता है। आवर्ती काल भी वहां पर है हमारी कहानियो मे। पूर्वी देशा की कहानियो म ही आवर्ती काल का उल्लेख है, पश्चिम की नही। उन म एक दूसरी तरह के काल का सक्त तो कभी-कभी मिलता है । मैंने विस्तार से इस का विचार अपनी पुस्तक सवत्सर मे क्यिा है। कहानियो के आरम्भ में इस । रचना क्यो और दिन के बीच तरह के सकेत मिलते हैं जहां कि एव सनातन, अनन्त वतमान की बल्पना है। (ऐसा दूसरी सभ्यताओ मे भी है ।) वाव्य मे, यानी काव्य के उस रूप मे जिस को आज काव्य कहते हैं यानी कविता मे, तो यह बात छद के माय जुडती है । उप यास, कहानी वगरह और नाटक बाहर चले जाते हैं । वहाँ भाषा के साथ तो समस्या जुडी रहती है लेकिन कविता के साथ फिर वह लय की समस्या हो जाती है। हां भारतीय संगीत मे जार काल का एक ऐसा बोध दीखता है जो वि पश्चिम के काल-बाध से अलग है यानी उन के सगीत मे जो दीखता है उस से अलग है। और उस मे यह जो सम पर लौटना है वार-बार यह काल के आवतन का एक रूप है। वहा पर तो मैं समझता हूँ फरु है, काल वा अन्तर है । बाकी काव्य म लय म कहाँ यह दीयता है, यह शायद सोचन की बात होगी तत्काल उदाहरण तो नही द सकता। मुझे लगता है कि सद्धान्तिक स्तर पर अगर यह मान लेते हैं तो यह दीख सफ्ना चाहिए काट्यों मे, खासतौर से इस लिए भी कि कविता क्यों कि साहित्य का सबसे प्राचीन रूप है और दो सस्कृतियो मे या फाल-दृष्टियों मे यह भेद है तो इन दोनों काल-दृष्टियो से उपजने वाली कविता में भी और उस के खास तौर से लय विन्यास मे यह भेद होना चाहिए । 'डेस्क्रिप्शन' के रूप मे या उक्ति के रूप में तो शायद बहुत जगह देखा भी जा सकता हो, लेकिन उस की पूरी सरधना मे यह दिखाई दे सकना चाहिए, मेरा ऐसा ख्याल है। यदि यह नहीं दिखाई देता तो कहीं काव्या म या साहित्य मे कह तो दीखता है । इतिहास की जो परिभाषा है उस में भी यह ठीक है। (इतिहास और हिस्टरी मे अन्तर है।) और अनुष्ठानों के साथ जो क्याएँ जुडी होती हैं उन मे भी कुछ यह होता है। अय सभी जगहो पर यह दोखता है । इस लिए यह सवाल मेरे मन मे उठा है। कविता की सरचना मे भी यह दीख सकना चाहिए। इसके लय वियास मे भी दीख सक्ना चाहिए। इस के अलावा भी कुछ और सवाल मैं करना चाहता था। वह कुछ सकोच के साथ कर रहा हूँ, आप को कविताओ के बारे में हो। आप को कविताओं मे खास तौर से जिस गुण को बहुत चर्चा हुई है वह यह कि एक बहुत ही असाधारण काव्य सयम उन में दिखाई देता है । लेकिन कहीं-कहीं, बल्कि कह सकता हूँ उतनी ही सीमा तक शायद इस तरह की कविताएं दिखाई देती हैं जो किहीं दूसरी कविताओं को व्याख्या-सी करती रहती हैं, या उही मे अत रचना क्या, क्या, दिन के लिए, किन के बीच १५१ मे अनुभव को एक व्याख्या जसी हो जाती है। वह व्याख्या 'पोएटिक' होती है इस मे कोई सदेह नहीं, पर लगता है जसे पूरी कविता के अत मे एक जोड-सा है। इस के लिए मैं 'असाध्य वीणा' के अतिम अश को कोट कर सकता हूँ। 'एक बूद सहसा उछली' वाली जो कविता है उस के भी अतिम अश को में कोट कर सकता हूँ। मुझे लगता है उस के बिना भी वह सारा अनुभव काव्यात्मक स्तर पर सम्प्रेषित होता है-चाहे उक्ति के रूप मे सम्प्रेषित न होता हो, सीधा विचार के रूप मे सम्प्रेषित न होता हो। क्या काव्यानुभव को विचार के रूप मे सम्प्रेषित करना आप इतना अनिवाय मानते हैं? य जा आपन दो उदाहरण दिय, ये ता विल्कुल अलग अलग तरह के हैं। जो छोटी कविता है उस म वह जो दीयता है-उछलती बूद का आलो. वित हो उठना-वह तो इतना छोटा, इतना सघन अनुभव है कि उस 'उमोचन' की भावना ही उस मे प्रधान है। यह कहना ठीक नहीं होगा कि उस मे स्टेटमेट है । एक ही इकाई है उस आलोक्ति वूद को देखना और उसी क्षणिक झाकी म मुक्ति का अनुभव, उस की पहचान । अगर वह विना कहे भी कही जा सकती है तो उस मे और अच्छी कविता होगी लेकिन उतनी छोटी रचना में वह कह भी दी जाये तो इकाई टूटती नहीं। लेकिन असाध्य वीणा' के अन्त म जो बात है वह तो विल्कुल दूसरी है । उस का आप आरम्भ देखिए। आरम्भ वडे नाटकीय ढग मे होता है- आ गये प्रियम्वद, केश कम्बली, राजा न आसन दिया" -~-वगरह । आ गये तो आ गये, उस के बाद कहानी चल पडती है। तो इस प्रकार एकाएक उस के पाठक या श्रोता को हम एक काव्य के दूसरे आयाम मे ले जाते हैं जिस मे यह घटना होती है और कहना चाहिए इतिहास की परिभाषा मे इति ह आस--वह घटना घटित होती ही चली आयी है अब तक । अत मे जो युक्ति है वह इस लिए अपनायी गयी है कि उस काल से हम श्रोता या पाठको को वापस सामाय काल मे ले आते हैं-"युग पलट गया/उठ गयी सभा/सब अपने अपने काम लगे/ यो मेरी वाणी भी मौन हुई ।" यह भी एक तरह से अनावश्यक होता है कहानी तो इस से पहले समाप्त हो गयी जब "केश कम्बली गुफा गेह मे चला गया।" लेकिन वह काल समाप्त हो गया। उस के बाद पाठक को जब सीधे सम्बोधन करते हैं तो उसे उस देश-काल से, उस घटना से, खीच कर उस के सामाय जीवन मे प्रतिष्ठित करते हैं.-सीधे सम्बोधन से १५२ रचना क्यो और किन के बीच एक प्रकार से सामाय स्थिति म ले आते हैं । और सामाय स्थिति म ले आना क्यो जरूरी है, इसका एक उत्तर यह भी है इस प्रकार उस दूसरे काल जो चुनौती है उस मे हम पाठव/थाता का बचा भी लेत हैं और मुक्त भी नहीं करते। नहीं, मैं जो कहना चाह रहा था वह दूसरे ही अश के बारे मे था। मैं यह भी जानना चाहता था लेकिन इस के साथ साथ यह वि प्रियम्वद को जब राजा और सब लोग 'धय धय' कहते हैं, श्रेय देने लगते हैं, जब फदि यह कहलाता है कि-"श्रेय नहीं कुछ मेरा, मैं तो डूब गया था स्वय शूय मे/जो कुछ सब ने सुना, वह तो सब कुछ को तयता यो"-आदि, इस तरह की जो पक्तियां हैं तो मुझे लगता है पूरी कविता का एक साराश दिया गया है। जो काव्यानु भव के पूरे रेशे रेशे मे फला हुआ है उस का इस तरह अलग एक जिस्ट निकाल कर दिया गया है इन पक्तियों मे। वह अपने मे बहुत पोएटिफ है, पर क्या आवश्यक्ता थी उसे इस तरह से रखने को ? इस की आवश्यक्ता यह थी कि इस का हटा कर आप देखिए कि वात बनती है या नहीं। दप्टात काव्य म तो सब का सव दप्टात ही होता है। असल बात तो वही होती है जो निष्क्ष के रूप म निकले। लेक्नि एक आधुनिक कवि के रूप मे खास तौर से एक ऐसे कला कार के रूप में जो कि इतना सक्षम है कि बिना उस के सारी बात कह सकता है-पूरी कविता अभिव्यक्त करती है सारी बात--पेड के साथ जिस तरह का लगाव है जाहिर है 'सब-कुछ को तयता के साथ ही लगाव है। इस लिए मुझे लगा कि यह सम्प्रेषण का जो आग्रह आप का रहता है उस की वजह से है या किसी काव्यात्मक अनिवायता की वजह से ऐसा हुआ है ? मैं जब भी कविता को पढ़ता हूँ तो वह भाव पहले से आ चुका होता है मेरे मन मे। तब मुझे लगता है अलग से इस को लाने की क्या आवश्यकता थी? पहली बार पढी थी तब से यह बात सच है या बाद म जब पढी तब मे यह सब है? पहली बार पढी थी तब से यह सच है इतना तो अब नहीं स्मरण कर के कह सकता, पर यह जरूर है उस को पढता हूँ तो लगता है कि हा, यह बात समझ मे आ रही है। मैं समझता हूं कि जो सस्कारवान पाठक है, सम्भव है उस का वही बात समझ आ जाये जहा "कापी थी उँगलियाँ" वाला उल्लेख है-वह पाठक वही भाप जायगा कि पूरी कथा क्या है। लेकिन सभी लोग वैसा करेंगे रचना क्या, क्या, किन के लिए, किन के बीच एसा मुझ नही लगता । फिर जो "अवतरित हुआ ब्रह्मा का मौन" वाली बात है ठीय है कि एक स्टेटमट है, लेविन सगीत ने क्या किया-बिना बताय शायद पाठक वहां तक नहीं पहुंच सकता है। यह तो ठीक है। अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग जो 'मीनिंग' हैं जो ये सुनते हैं-समान मे आता है कि यह बताना भी जहरीया। अगर इतना ही कहा गया कि सगीत का यह सव असर हुआ, तो फिर तो उस के बाद मैं समझता हूं यह कहना अपेक्षित है कि 'यह मैंन नहीं किया, यह आप सब लागो ने स्वय किया, आप ही म इस को सम्भावना है।' नही तो सारी बात झूठी हो जाती है । अगर प्रियम्वद को इस का श्रेय है -यह प्रभाव पैदा करन का-तब ता सारी पविता म जो कुछ कहा गया है उस का एक तरह से नकार हो जाता है। हो, चरित्र के रूप मे अगर प्रियम्बद को देखें तब तो शायद यह बात ठीक लगती है जो आप कहते ह । लेकिन यह लगता है कि आखिर यह चरित्र भी जो चुना गया वह एक अनुभव को व्यक्त करने के लिए ही चुना गया है । उस चरित्र को इस तरह से उस अनुभव के अनुकूल ही प्रस्तुत किया गया है। तब यह लगता है कि वह चरित्र उस तरह से भी जब बात को रख रहा था, उस के बाद केवल आवजन करना हो, राजा को धयवाद से रोकना ही पर्याप्त होता। हो सकता है यह उस तरह की हो बहस हो जसी कि इस कविता की दो पत्तियों को लेकर चलायी जाती रही है। हो सकता है यह आप ठीक ही कह रहे हो पर मैं समझता हूँ ' यह तो सब कुछ की तथता थी" यह कहना, और उस में यह ध्वनित करना कि यह आप की भी तथता है उस को पहचानिए- चुनौती तो वही है और मदेश भी वही है । दूसरी बात जो मै कविताओं के बारे मे ही कहना चाह रहा था यह अक्सर आरोप की भाषा मे ही कही जाती रही है पर मैं उस तरह से नहीं कहना चाहता-मै यह जरूर जानना चाहता हूँ कि सम कालीन बहुत-सी महत्त्वपूर्ण घटनाओ का प्रभाव आप की कविता पर नहीं दिखाई देता और कुछ घटनाओं का दिखाई देता है- उदाहरण के लिए पाकिस्तान के साथ जो युद्ध हुआ उस का असर दीखता है और कुछ कविताएँ आपने लिखी हैं उस समय, युद्ध के समय । लेकिन बाग्लादेश के समय का और उस के पहले चीन के साथ जो युद्ध हुआ उस का इस तरह का स्पष्ट असर नहीं दिखाई १५४ रचना क्या और किन के बीच देता। इस को क्या वजह रही होगी? एक तो यह है कि जिन दो की जो आपने तुलना की उन म एक तो मेरे अनुभव के क्षेत्र मे काफी प्रत्यक्ष था और दूसरे का वैसा अनुभव नहीं था। दूसरे, वाग्लादेश वाली घटनाआ का भी उल्लेख है, उतना सीधा नही है क्यो कि उतना सीधा वह मेरे अनुभव के क्षेत्र में आया नही–लेकिन एसी कविताएं हैं जिन का सम्बध (मसलन) शेख मुजीब से था। मैंने कविता मे नाम उन का नहीं लिया, लेकिन कविता का सम्बध है उन से। यह तो जरूरी नहीं होता कि घटनाआ का सीधे सीधे उल्लेख किया जाये और उस मे कोई पक्ष लिया जाये-वह तो अपने आप दीख जाता है कि कवि कहां है। सामा यत यह मानते हैं कि चीन के युद्ध के बाद या उस से भारतीय समाज मे एफ मोह भग को शुरुआत होती है- आजादी के बाद से जो एक तरह के भ्रम मे जीवित रहा समाज । उस के बाद राजनीति में भी काफी परिवतन होते हैं और दूसरी तरह के परिवता होते हैं । कविता मे भी एक अलग तरह का परिवतन तब से दीखता है बहुत-से कवियो मे-जो पहले लिखते रहे उन मे भी, जिन लोगो ने उस के बाद लिखा उन मे भी। क्या आप ऐसा कहना ठीक मानते हैं कि मोह भग के नाम से काव्य धारा शुरू हुई ? नहीं, ऐसा तो मुझे नहीं लगता उस से हुआ। जो एक झूठी आदश- वादिता थी भारतीय समाज मे, उस को ज़रूर उस से एक झटका लगा और राजनीति एक व्यावहारिक स्तर पर आयी, जहाँ कि आदश छोडे भी जाते हैं, बदले भी जात हैं, सौदे भी होते हैं, इत्यादि-जो सब व्यावहारिक राजनीति का अश है। लेकिन जो मोह भग हुआ वह सिफ चीन की जिस तरह की मैनी के बारे में लोग कल्पना करते थे और विश्व मत्री की जसी क्ल्पना करते थे उस के बारे मे हुआ। राजनीति मे मित्र और अमिन समय समय पर बदलते रहते हैं-जिस का जसा राजनीतिक उद्देश्य या प्रयोजन हो, उस के आधार पर यह समझ विकसित हो गयी। लेकिन भारतीय राजनीति मे जो मोह भग हुआ उस के कारण और भी थे। आजादी से जिस तरह की अपेक्षाएँ बन गयी थी वे पूरी नहीं हुई। कहना चाहिए कि वास्तव म वह आजादी ही अधूरी हुई है यह ज्ञान धीरे धीरे प्रक्ट हुआ। मोह भग तो उस के साथ जुडता यह तो मैं नहीं कहूंगा कि आपने राजनीतिक या सामाजिक विषयों रचना क्या, क्यो, किन के लिए, किन के बीच १५५ पर कविताएं नहीं लिवों या इस तरह की चेतना बिल्कुल ही आप की कविताओ मे नहीं मिलती क्यों कि मैं जानता हूँ कि यह बहुत सी जगहों पर है । लेकिन फिर भी यह जरूर लगता है कि अगर आप की कविताओ का एक प्रतिनिधि सकलन कोई भी तयार करे तो उस मे उस तरह की कविताएँ नहीं होगी और काव्यगत-- नहीं होगी, ऐसा ता नही। नहीं होगी का मतलब मुझे लगता है कि अगर उत्कृष्ट कविताएं मुझ चुननी हो तो शायद वे कविताएं कम होगी या सम्भवत बिल्कुल नहीं होगी जो राजनीतिक विषयो से सम्बंधित कविताएँ आपने लिखी हैं या कुछ घटनाओ से प्रेरित हो कर लिखी हैं । वे कविताएँ दूसरी हैं, जिन का में नहीं जानता नामकरण कसे किया जाये, लेकिन जिह सामा यतया 'पसनल पोएम' या आध्यात्मिक कविता कह सकते हैं 'लव पोएम' कह सकते हैं, इस तरह की कविताएँ उस मे ज्यादा होगी। और आप को काव्य प्रतिभा भी सर्वाधिक उन मे ही मुझ लगता है अभिव्यक्त हुई है, ज्यादा मच्यो रिटी' के साथ हुई है। ऐसा क्या है ? क्या आप का जुडाव उन से बहुत गहरे स्तरों पर नहीं रहा है ? पा जब तक चीजें 'पसनल एक्सपीरिएस' तक नहीं पहुंची तब तक, गहरे स्तरों तक नहीं पहुंचों तब तक, उन का काव्य रूप भी उतना 'मच्योर' नहीं हुआ ऐसा क्या है इस का ता कवि क्या जवाव द सकता है ? आप को खुद लगता है या नहीं? है तो है, बस यही जवाब इम का हो सकता है। लेकिन उस तरह की चेतना नहीं है या कुल मिला कर मरे लेखन मे व्यक्त नहीं हुई है,- यह तो मैं नहीं कह रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ कि हुई है। हाँ, आप कह भी नही रहे है। कविताओ म कम हुई है। इस का दूसरी तरह मैं या भी कह सकता हूँ कि दूसरी विधाआ म हुई है। यो पहूँ कि पत्रकारिता में यह भी है कि इधर की हिंदी कविता का एक सक्लन तयार करें तो उस मे वह पक्ष लगभग अनुपस्थित हागा जो कि मरी कविताओम है, और राजनीति की बहुत सी कविताएं हागी नहीं, यह बात इस लिए भी कभी कभी मुझ आश्चयजनक लगती है कि आप का सामाजिक सवालों के साय, राजनीतिक सवालों के साय और आर्थिक सवालों के साथ एक पत्रकार के रूप में रचना क्यों और दिन के बीच जो जुडाव रहा है, और निर तर आप उन पर विचार करते रहे, चितन करते रहे, लिखते भी रहे सामाजिक सवालो के बारे में भी, सारे समाज की कमियो को ओर सकेत भी एक पत्रकार के रूप मे करते रहे हैं-शायद ही कोई घटना ऐसी हुई हो जिस पर उन दिनो मे आपने कोई 'कामेट' न किया हो तो ऐसी स्थिति में फिर कविता में वह चीज क्या नहीं आ पाती। एक तरह से आप को एसा नही लगता है कि आप के सवाल मे ही उस का जवाब भी है ? अगर कुछ बातें कहन के मेरे पास दस और साधन थे, और कुछ बातें कहन का सिवाय कविता के कोई रास्ता नहीं था तो ऐसा क्यो नही होना चाहिए। एक तो यह है कि अगर ये सब बातें मैने न कही होती तो किसी न न कही हाती। दूसरे यह वि में भी उह कह सकता था तो कविता मे ही कह सकता था, और दूसरी बातें अय विधाओ मे भी कही जा सकती थी और कही गयी। हाँ। इसी लिए लगता है. यह तो समझ में आता है कि जो सामाजिक दायित्व है वह पूरा भी होता है। पर कविता में जसी बहुत सी बातें आती भी हैं, वे उतनी गहराई के साथ नहीं आती तो लगता है कहीं चेतना के बहुत गहरे स्तरो पर कहीं इन सवालो के साथ जो जुडाव है वह अस्तित्वगत स्तर पर महसूस नहीं करते, केवल नतिक स्तर पर महसूस करते हैं। क्या ऐसा है ? इन सवालो का मैं नहीं जानता कि हा या न' मे क्या जवाब द सकता हूँ। लेकिन यह जरूर है कि राजनीतिक प्रश्नों का ले कर मैंने राय प्रकट की है और उस के बारे म किसी का सदेह मे नही रखा और या रहन दिया। लेकिन इस के साथ साथ जा गजनीतिक मम है वह नहीं किया, यह सवाल बन सकता है कि जगर एसे विश्वास थे तो कम मे क्यो नही प्रक्ट हुए और इस का जवाब भी यह हाता है कि क्यो कि मैं क्रियात्मक राजनीति मे नही जा रहा था इस लिए इस स अधिक उस में भी आप गये। जब आवश्यकता थी तब तो गये हो। उस से अधिक अनावश्यक था। लेकिन मेरी जा भी राय है, जो भी कह लीजिए स्टड है, वह ता स्पष्ट रहा है। उतना काफी है। उस से आगे अगर शायद विरोध का कारण भी रयादातर वही रहा है मुझे लगता - इस राय का ऐसा स्पष्ट होना हो । मेरा सवात कविता हो को ले कर था। बाकी जगह विचार नहीं स्पष्ट है यह तो मैं नहीं कहता। बल्कि है, और बहुत साफ है। इस लिए कोई सन्देह नहीं । है। रचना क्या क्या दिन के लिए, किन वे बीच इस मे तो इतना ही कहना है कि आप को यह बात शायद सही है कि कविता मे यह चीज़ कम प्रकट हुई है। नहीं है, या जितनी कम अभि ध्यक्ति है उस के बावजूद भी वह बडी स्पष्ट नही है, मैं ऐसा तो नही मानता। नहीं, स्पष्ट तो है । पर उतनी गहरी नहीं है जितनी प्रकृति को कविताओ में, प्रेम की कविताओ में या आध्यात्मिक अनुभव को कविताओं में। कहा जाये कि उन में जिस तरह की 'इटेसिटी' है घसी- उस क्षेत्र या उस दिशा मे अनुभव मात्रा म फ्यादा हुए हैं, गहराई में ज्यादा रहे हैं। बल्कि क्या यह नहीं है कि राजनीति और अय चीजें कितनी ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हों, इस तरह से एक आध्यात्मिक अर्थों में या बहुत गहरे भावनात्मक अर्थों में हमारे अस्तित्व का हिस्सा नहीं बनतीं जिस तरह से कि आध्यात्मिक या इस तरह के सौदय के अनुभव बनते हैं? आप यह पूछ रहे हैं कि बन नहीं सकती। हाँ। यह तो मुझे नहीं मालूम । सामा यतया, हां, ऐसा मान भी सकता हूँ। पर राजनीतिक सिद्धान्ता की चुनौती कभी उतनी गहरी नही हो सकती यह नही कहूँगा । व्यावहारिक राजनीति की नहीं होती, वह ठीक है। पर सिद्धातो को ले कर आध्यात्मिक स्तर का लगाव आप को और कहाँ दोखता है-कविता मे, समाज में, या हमारी राजनीति मे भी? ठोस व्यावहारिक समाज म जी रहे हैं हम 00 • महसबाद दिसम्बर १९८५ में दिल्ली में हुआ। १५८ रचना क्यो और किन के बीच

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Rachna Kyun Aur Kin Ke Beech

Author
Aghe
Title
Rachna Kyun Aur Kin Ke Beech
File name
Rachna Kyun Aur Kin Ke Beech
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2011/03
Publisher
Bharatiya Sahitya Prakashan Merath
Language
Sanskrit
Pages
172
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551234
Barcode
4990010031995.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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