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Sarhad Ke Paar

Ramdari Singh Diwakar · 2011/03

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सरहद के पार

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सरहद के पार
रामधारी सिंह दिवाकर
दिनमान प्रकाशन
3014, चवालान, दिल्ली-110006

मस्य: 35.00 रुपये प्रथम संस्करण: 1990 /प्रकााक : दिनमान प्रमान, 3014, घरोंवानान, दिल्ली-110006 / भापरण : जोगी/ मुफ दि प्रिटरी, हदरा, दिल्ली

'पराग गोप्ठी' की स्मृति में
प्रोफेसर कमला प्रसाद सिंह को
तथा
निर्मली के साथियों को
जो सृजन के साक्षी रहे।

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सरहद के पार
दबी हुई उंगली का दर्द
अव्यय अतीत
अपनी-अपनी जगह
मोहरे
आतंक
झूठी कहानी का सच
विकल्प
पलो, यहां से चलें
25
34
49
54
64
75
80
93
105
पित शोक

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सरहद के पार पाहर की हालत आजकल ठीक नहीं है। शाम के बाद ही सन्नाटा छा जाता है सड़कों पर। पंद्रह सोलह दिन पहले सांप्रदायिक आग की एक विगारी बगल के कस्बे से सड़ कर शहर के एक मुदले पर आ गिरी थी। कावे में किसी बात को लेकर हिन्दुओं-मुसलमानों के बीच मार-पीट हुई। छुरेबाजी और आगजनी की घटनाएं भी हुई। प्रशासन की सख्ती और राहत का काम उबर चल ही रहा था कि इस शहर के एक मुहल्ले में भाग भड़क उठी। यहां भी छिट-पुट वारदातें हुई, लेकिन अफयाह ज्यादा उड़ी है। मिनट-दो मिनट पर दिखने वाली पुलिग की गश्ती माडिया दहशत पैदा करती हैं। कुछ इलाकों में शाम के बाद लोगों की आमद-रक्त बिलकुल कम हो जाती है। अपना निवास ऐसे ही इलाके में है, इमलिए मैं एकदम सबेरे लौट आता हूं। उस दिन भी सवेरे ही लोटा था-शाम से कुछ पहले ही। ऊपर अपने फ्लैट के पास गया तो ड्राइग रूम का दरवाजा खुला मिला। रूम के बाहर बेढब दुफितिया चप्पलें पड़ी हुई थीं। अंदर बाबूजी सोफे पर अपने दोनों पर मोड़े बैठे हुए थे । अप्रत्याशित रूप से उन्हे आया देख मैं कुछ क्षणो के लिए स्तंभित रह गया । जाने किस भावनात्मक आवेश के तहत भने उनके पैर छुए। उनकी आंखें छलछला आयी। भायी हुई आवाज में वे देर तक मुझे असीसते रहे।

10: सरहद के पार । मैं उनके सामने खड़ा था और देख रहा था कि उन्होंने अपना बोरिया-विस्तर कहां रखा है। कही कुछ दीख नही रहा था। मैंने पूछने की गरज से यों ही पूछ लिया, "आपको यहां तक पहुंचने में कोई दिक्कत तो नही हुई ?" बाबूजी फीकी-सी हंसी हंसने लगे, "नहीं, कुछ खास नहीं । पता था मेरे पास। फिर भी पूछना पड़ा लोगों से।" वे सामने की दीवार की तरफ देखने लगे। दीवार पर एक बड़ा-सा लैंडस्केप टंगा हुआ था और एक दूसरे फ्रेम में एक हिरन था जो पानी की तलाश में वेतहाशा भागा जा रहा था। ये दोनों चित्र मेरे एक कलाकार मित्र की कलाकृतियां हैं । बाबूजी की आंखें देर तक उन चित्रों की सीध मे टंगी रहीं। इसके बाद जैसे कोई विषय ही नही था बातचीत को बढ़ाने के लिए। मैंने गौर से बाबूजी के चेहरे को देखा। कटे धनखेत की तरह चेहरा था उनका-वैसा ही सूखा, सूना और उजड़ा। दाढ़ी के सफेद बाल खूटियों की तरह उगे हुए थे। गड्ढों मे छिपी मरियल-सी आंखों के आसपास धुंध-जैसी कालिमा थी। अदर कमरे में गया तो रश्मि ने अस्फुट स्वर में पूछा, "यापके पिता जी हैं क्या ?" "हां, कब आये हैं ?"--थोड़ी ही देर पहले। मैं बाहर निकल रही थी। यीशू को लिए हुए थी गोद में । कि ये वाल्कनी में चुपचाप सड़े मिले। पूछा कि किमको खोज रहे हैं तो साफ-साथ कुछ बोले नही। एकाएक घबरा-से गये। फिर धीरे से बोले, "नरेन"नरेंद्र रहता है यहाँ ? सहरसा वाला नरेंद्रो" पूछा कि क्या काम है तो कुछ बोले नहीं। मैंने सोचा कि कैसे विचित्र आदमी हैं। आगे बढ़ने लगी तो बोले, "वो नरेंद्र... मेरा लड़का है।" में ठिठक गयी।"कभी के देखे रहें तब ना ! "अच्छा चाय-वाय कुछ दी?" "हां, गयी पी पाय लेकर। बोले, "नहीं पीता हूं।" लोटा कर ले थायी। कमरे में सड़ा में सोचता रहा कि बाबूजी इस तरह एकाएक पले सरहद के पार:11 कैसे आये। वे कभी आये नहीं थे यहाँ। तकरीबन सात बरसों से उनमें मुलाकात भी नहीं हुई है । इस बीच सिर्फ तीन बार उनके खत यि थे। हर खत सूचना के तौर पर था। चार-पांच वर्ष पहले मों की मृत्यु की सूचना लेकर उनका पहला खत आया था। खत इतने विलंब से मिला था कि क्रिया-कर्म भी तब तक समाप्त हो चुके थे। दूसरा खत छोटे भाई की शादी की सूचना तेकर आया था और तीसरे खत में उस बाढ़ का जिक्र था जिसमें घर-द्वार सब डूब गये थे, मवेशी मर गये थे और खड़ी फसल का तिनका तक न बचा था। इस तीसरे पत्र के जवाब में मैंने तीन-सौ रुपये का मनिऑडर बाबूजी के नाम भेज दिया था। इस बाढ़-पीड़ित सहायता राशि को उन्होने स्वीकार कर लिया था। पावती की रसीद मुझे मिल गयी थी। रसीद पर कैथी लिपी में बाबूजी का हस्ताक्षर था- यदुवीर प्रसाद । शनैः शनैः एकदम लुप्त होती जा रही इस कधी लिपि में बाबूजी के हस्ताक्षर को पढ़ने में मुझे कोई असुविधा नहीं हुई थी। हालांकि मेरी पढ़ाई-लिखाई के सिलसिले में कैथी लिपि कभी आयो नहीं थी, लेकिन पारिवारिक कारणों से इस लिपि का ज्ञान मुझे हो गया था। बहुत पहले जब मैं मैट्रिकुलेशन मे था, वावूजी के लिए कभी-कभार कथी लिपि में मुझे कुछ लिखना पड़ जाता था। वैसे बाबूजी को कामचलाऊ उर्दू भी आती थी, लेकिन उर्दू वे लिख नही पाते थे। पढ़ भर लेते थे। उनके पास अपनी शिक्षा-दीक्षा का कोई भी प्रमाण-पत्र नहीं था। गांव में मौलवी साहब का पुराना मदरसा था जिसमे बाबूजी को कागजात वगैरह पढ़ने-लिखने की व्यावहारिक और कामचलाऊ तालीम मिली थी। चूंकि गांव में खानगी मिडिल स्कूल तब खुला था जब मैं लोअर प्राइमरी पास कर चुका था, इसलिए मेरी आरंभिक शिक्षा भी मोलवी साहब के उसी मदरसे में हुई थी । "बाबूजी के हस्ताक्षर वाली पावती की रसीद पर विस्मृत होती उस लिपि को देखना एक सुखद अनुभव था मेरे लिए। काफी 12 : सरहद के पार देर तक मैं कैथी लिपि के अक्षरों को अपनी स्मृति मे लिखता मिटाता रहा था। ."बाबूजी सोफे पर उसी तरह पर मोडे बैठे थे। अपनी दोनों टांगों को बाहों से घेर कर बैठने की उनकी परिचित मुद्रा और छत के शून्य में खोयी हुई-सी आखों को देखकर मुझे उस गोरैये की याद आयी थी जो कुछ ही दिन पहले इसी कमरे में एक आधी मे कही से भटक कर आ गयी थी और रात भर सोफे के नीचे एक कोने मे पडी रही थी। प्राण-रक्षा मे जैसी बदहवासी मैंने उम अकेली पडी गोरेये मे देखी थी, वसी घबराहट किसी आदमी में मैंने कभी नही देखी। बाबूजी एकदम चुप थे। मैंने सन्नाटा तोडने के लिए यों ही पूछ लिया, "आप एकाएक चले आये ।" उन्होने बनावटी खांसी से गला साफ किया। कुछ और बात कहना चाहते थे शायद, लेकिन एकदम संक्षिप्त हो गये, "हां, यो हो।" मैंने अपने पहले वाले प्रश्न को दोहराया, "डेरा खोजने में कोई दिक्कत भी हुई ?" ....कोई खास नही। लिखा हुआ था।" बोलते हुए उन्होने पर्चा मेरी ओर बढा दिया । पर्चे पर कैथी लिपि मे मेरे निवास का पता था। यात फिर चुप्पी के बीच कही फंस गयी। वे फिर सामने की दीवार की तरफ देखने लगे थे। कमरे के बाहर सूर्यास्त को उजास कटे प्रति- विव की तरह अधसुले दरवाजे से आ रही थी बाबूजी के आधे चेहरे पर उस उजास की छाया थी जिसमे उनकी अघमंदी आंखों का मौन महसूस किया जा सकता था। पाहर की वारदातों और अफवाहों की दहशत में मार्च महीने की तनहा शाम बाहर की सड़क पर धीरे-धीरे गहरा रही थी। विचित्र-सी पुटन यी कमरे में। तकरीबन सात बरसों बात बाबूजी से मुलाकात हुई पी, लेकिन उनके पास कहने के लिए कुछ नही था। संवादहीनता का वह 1 ।

सरहद के पार :13 तनाव मुझ न वहां से उठने दे रहा था न इतमोनान से बैठने ही दे रहा था। मेरा कोई दुश्मन नही था वहाँ । सामने बैठे हुए व्यक्ति मेरे बाबूजी थे, लेकिन ऐसा लगता था जैसे मैं बस की उसी सीट पर बैठ गया हू जिसकी बराबर की सीट पर मर्डर केस का मेरा मुद्दालह बैठा हो । पता नहीं, एक अबूझ से मानसिक तनाव में यह सब मैं क्यों सोच रहा था। कम से कम बाबूजी की बावत यह सब सोचना शांत और विवेकशील मन.स्थिति में निश्चय ही गैरवाजिब था। उनके साथ वैमा तनावपूर्ण कोई भी रिश्ता नहीं था। बस सूखती हुई झील की तरह हम दोनों के बीच की आतरिकता थी, जिसमें आरोप-प्रत्यारोप का कोई भी दृश्य-आधार नही था। किचन में रश्मि नाश्ता तैयार कर रही थी ।-"उनके लिए बना रही हो?" मैंने पूछा तो रश्मि ने कड़ाही में पकते हलवे तरफ देखते हुए कहा, "आप भी ले लीजिएगा।" किचन में हल्का अंधेरा था, लेकिन पहले से किचन मे रहने के कारण रश्मि को अंधेरा महसूम नही हो रहा था। मैंने बल्व जला दिया। थोड़ी देर वही खड़ा रहा। समझ में नही आ रहा था कि बाबूजी से क्या बात करूंगा। अलग-अलग संदर्भो के कटे हुए वाक्यों को लेकर मैं फिर ड्राइंग में गया और सामने बैठते हुए पूछा, "घर का हाल-चाल कैसा है ?" "अच्छा नहीं है।" उनका सपाट और बेलाग जवाब या। बाबूजी का यह वाक्य प्रसंग-बीज की तरह था । मैं वीजांकुर को जड़ से ही तोड़ देना चाहता था। बाबूजी मेरी चुप्पी को स्पष्टीकरण का संकेत समझ बैठे थे। कहने लगे, "बम जी रहे हैं किसी तरह । हम-लोग तो.." इसके बाद उनकी आवाज एकाएक कट गयो । शायद वे भीतर से लड़खड़ा गये थे। संभलते हुए बोले, "किरन यही अस्पताल में है। ऑपरेशन हुआ है पेट का। आज तेरहवां दिन है। "नहीं, चौदहवां दिन है आज । पट्टी खुल गयो है । फिर भी"" 14:सरहद के पार "चौदह-पंद्रह दिनों मे आप यही हैं आपने खबर नहीं दी ?" मैं भीतर से बेहद अपमानित महसूस कर रहा था। चौदह दिनों से बाबूजो मेरी छोटी बहन को लेकर यही, इसी शहर के अस्पताल मे हों और मुझे खबर तक न हो, यह बात मुझे बुरी तरह कचोटने लगी थी। बाबूजी एकदम निरुत्तर हो गये। मेरे भीतर बौखलाहट थी। मुझे लग रहा था कि बाबूजी के पास इसका उत्तर है जरूर, मगर वे कहना नहीं चाहते। उत्तर के उस भाषाहीन अर्थ को मैं समझ रहा था। वह स्थिति साफ-साफ महसूस हो रही थी जिसके तहत एक अतराल हमारे बीच कायम हो गया था। धीरे-धीरे सदं होते रिश्ते के प्रति अपनी-अपनी तट- स्थता लेकर हम जहां तक पहुंचे थे, उसके बाद से किसी अन्युक्ति कोई आवश्यकता हम दोनों को शायद नही थी। लेकिन बावूजी चले कैसे आये क्या अपनी पराजय को वे जीत में बदलने का निर्णय लेकर इस तरह चले आये है ? यही अस्पताल में मेरी बहन का ऑपरेशन हो, दो हपले बीत जायें और मुझे खबर तक न हो, क्या यह प्रतिशोध नहीं है उनका"न आते। क्या फर्क पड़ जाता? वावूजी का उत्तर शायद मुझे मिल गया था। अपने भीतर के किसी पत्थर बने अंश को घिसने का प्रयास करते हुए पूछा, "कौन-सी बीमारी है किरन को ?"-"पेट की बीमारी थी। गांव मे ब्लॉक के डॉक्टर ने कहा-"पटना या दरमंगा ले जाइए, किसी बड़े अस्पताल में । ऑपरेशन का केस है ।".."बाबूजी कुछ सोचने-से लगे । पोड़ी देर चुप रह कर कहने लगे-"हार कर आना पड़ा। बड़ी मुसीवत थी। पंसे-कौडी का कोई उपाय नहीं था। आखिर सुलेमान भाई बोले कि चलिए पटना। पटने में उनको बेटी रहती है न नग्मा। दामाद यही अस्पताल वाले कॉलेज में कलक है ।"कोई दिक्कत नहीं हुई। सुलेमान भाई के दामाद ने सब निजाम कर दिया। बोलते हुए उनकी आवाज थक गयो थी। कुछ क्षणों ? - सरहद के पार: 15 तक सुस्ताने के बहाने वे दरवाजे के बाहर अंधेरे की तरफ देखने लगे। बहुत दिनो बाद सुलेमान चाचा की याद आयो। बिलकुल पड़ोस में -~अपने घर के बाद का दूसरा दरवाजा है उनका, जहां से मुसलमान टोले को सरहद शुरू होती है। जब मैं छोटा था, मुझे अपने और सुलेमान चाचा के घर में ज्यादा फर्क महसूस नहीं होता था। ऐसा भी होता कि अपने घर में कभी नमक नहीं रहता, या कभी सरसों का तेल ही कम हो जाता तो मां मुझे या किरन को सुलेमान बाचा के घर भेज कर मंगा लेती थी। सुलेमान चाचा के घर में कोई जरूरत होती तो सबसे पहले मेरे घर मे पूछ-ताछ की जाती। सुलेमान चाचा की बेटी नग्मा और किरन में बहिनपा लगा हुआ था। इस रिश्ते की वजह से नग्मा की अम्मी मेरी मां को 'दियादनी' कहती थी । सुलेमान चाचा के पास ज्यादा खेती थी, इसलिए उनकी हालत बेहतर थी और कई मायनों में बाबूजी को सुलेमान चाचा पर निर्भर रहना पड़ता था। सुलेमान चाचा और बाबूजी हमउम्र थे, मौलवी साहब के मदरसे में दोनों की तालीम हुई थी, इमलिए सखा-भाव भी था। यह संयोग ही था कि जिम मौलवी साहब ने बाबूजी और सुलेमान चाचा को पढ़ाया, उन्होंने मुझको, किरन को और नग्मा को भी उसी दालान वाले मदरसे में पढ़ाया। उन दिनों कोई स्कूल ही नहीं था गांव में। जब मिडिल स्कूल खुला, मैं मौलवी साहब के मदरसे का तीसरा और आखिरी दर्जा पास कर चुका था। मदरसा सुलेमान चाचा की दालान में पलता था, इसलिए लगभग मेरे दरवाजे पर ही था। किरन छोटी थी। नग्मा के साथ उसकी पढ़ाई की शुरुआत भी मौलवी साहब के मदरमे से हुई। बाद में किरन और नग्मा उसी खानगी मिडिल स्कूल में पढ़ने लगी जिनमे दो साल पहले मेरा दाखिला हुआ था। मिडिल के बाद गांव में आगे की पढ़ाई की कोई सुविधा नहीं थी, इमलिए किरन और नम्मा की तालीम वही रुक गयी। मैं गांव से दूर कस्बे में हाई स्कूल में पढने चला गया।

16 : गरहद के पार मैट्रिकुलेशन के बाद पटना विश्वविद्यालय में मेरा प्रवेश हुआ। घर के साथ दुआ-मलाम का रिश्ता रहा । समय पर मनिऑर्डर मिल जाया करता था। मनिऑर्डर की उस राशि का इतजाम कहां से होता था, इससे मेरा कोई सरोकार नहीं था। मनिऑर्डर में कभी देर हो जाती तो बाबूजी का क्षमा-याचना जैसी भाषा मे पत्र आ जाता था। उस पत्र से इतना आभास अवश्य होता था कि बडी मजबूरी में रुपये भेजे जा रहे हैं । इस विषय पर माथा-पच्ची करने का अवकाश मेरे पास नहीं था। कि बाबूजी की क्या मजबूरी है। ऑनर्स के साथ बी० एस० सी० किया। उमी वर्ष विहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा में उत्तीर्णता मिल गयी। प्रोग्रेशन पीरियड में जब रावी में ट्रेनिंग चल रही थी, उन्ही दिनो बाबूजी ने सुलेमान चाचा को मेरे पास भेजा था। वे मवाद-वाहक के रूप मे मेरे पाम आये थे। उन्ही मे मालूम हुआ था कि वावूजी ने मेरी शादी तय कर रखी है । बगल के गाव मे कोई लड़की है जिसके अभिभावक को बाबूजी ने 'जवान दे रखी है। समधी के रूप मे तीन-चार वर्ष पहले से आना-जाना चल रहा है। सुनकर मुझे हंसी आयो थी। शादी मुझे करनी है और रिश्ता बाबूजी तय कर रहे हैं। दरअसल अपनी सहपाठिनी रश्मि से में शादी करना चाहता था। हम दोनो के बीच आगे के उस रिश्ते को आधार-भूमि तैयार हो गयी थी और मुडना बहुत कठिन हो गया था। मैंने सुलेमान चाचा को साफ-साफ कह दिया कि शादी मुझे करनी है। अपना भला-बुरा मैं खुद सोचता हूं। सुलेमान चाचा लौट कर चले गये। पटने मे ही मेरी नियुक्ति हो गयी। दोस्तों से मिलकर शादी का दिन भी तय कर लिया गया। बाबूजी को शादी की तारीख भेज दी। लेकिन वे आये नही। यह शादी उनके और मेरे बीच की अंतिम विभाजक-रेखा बन गयो शायद । गांव, घर या बाबूजी की कोई आवश्यकता भी नहीं रह गयी थी मुझे। कोई पत्र-व्यवहार भी नही हो रहा था। साल भर बाद सरहद के पार : 17 मुझे मालूम हुआ कि बाबूजी मान किये बैठे हैं। कहते हैं कि नरेन्द्र को सुद आना चाहिए । मेरा आरोप था कि मेरी शादी मे वे शामिल नहीं हुए, मेरा अपमान हुआ है। गाव-घर की प्रतिक्रियाए मुझ तक पहुंच रही थी और वे प्रतिक्रियाएं मेरे भीतर तनाव पैदा कर रही थी। आखिर मैंने सोच लिया कि गांव नही जाऊंगा । चार वर्षो तक बाबूजी भी एकदम चुप रहे। उसके बाद शायद पराजित होकर उन्होंने एक-एक वर्ष के अंतराल पर तीन पत्र लिखे जिसकी चर्चा मैं पहले कर आया हू । .''इतने लये समय के बाद बाबूजी एकाएक आ गये है। मुझे लगता है, उन्होंने अपनी पराजय स्वीकार कर ली है ! लेकिन दूर के किसी रिश्तेदार की तरह वे महज मेंट-मुलाकात वाली रस्म-अदायगी करने क्यों आये हैं ? चौदह दिनों से पटने में हैं। हॉस्पिटल मे मेरी बहन का ऑपरेशन हुआ है और अब जब कि वे गाव लौटने वाले हैं। एक बार इधर चले आये ट्यूब लाइट की रोशनी में बाबूजी को देखता हूं। सोफे पर बैठे हुए वे झपको ते रहे हैं। उनकी वही पोशाक है-पहले वाली। खद्दर का पूरी बांह का कुर्ता जो कई जगहों से तुड़ा-मुड़ा है । घुटने से कुछ नीचे तक जैसे- तैसे बंधी हल्के गेरुए रंग की धोती। मुझे याद आता है कि कपड़े का यह रंग कुए के पानी की वजह मे है । सोचता हूं कि अब तक वही कुआं है घर पर और उसी हालत मे है : बाबूजी उमी कुएं की बावत कहते थे कि हर साल यदि कुएं को उलीचा न जाय तो पानी गदा और बदबूदार हो जाता है । जिस कुएं से बराबर पानी नहीं निकाला जाना, वह कुआं धीरे- धीरे भर जाता है। "बाबूजी की धोती का गेरुआ रंग देख कर मुझे लगता है, वह कुआं निश्चय ही भर गया होगा। बैठे-बैठे बाबूजी उसी तरह ऊंघ रहे थे। मैंने कहा, "खाना खा लीजिए अब।" वै एकाएक जैसे सतर्क हो गये, "नही,' .."खाना आगया होगा वहा अस्पताल मे।"

18 : सरहद के पार "अस्पताल में ?.."कहाँ से आया होगा?" बाबूजी एकाएक चहक-से उठे, "अरे,“वो सुलेमान भाई के दामाद हैं न 'नग्मा के..." "अच्छा हो । नग्मा यही रहती है।" "हां, पहले उपर दरमंगे में थी। अब यही है। क्या नाम है मुहल्ले का..? "हां, मुसल्लहपुर । वही रहती है।" में एकाएक छोटा,'''बहुत छोटा पड़ गया था। मुझे लग रहा था, मैं दूर, बहुत दूर होता जा रहा हूं और बाबूजी की आकृति धीरे-धीरे ओझल होती जा रही है। बाबूजी की आवाज किसी अतल से उठती हुई प्रतीत होती है, "दामाद के कारण कोई दिक्कत नहीं हुई। ऑपरेशन का पैसा भी नहीं लगा। बस खाली दवा और थोड़ा-सा सामान लगा- ईथर, इंजेक्शन 'बाबूजी किसी आत्मिक आह्लाद में डूब कर बोल रहे थे जैसे । “अरे, वो नग्मा तो सखी है न किरन की। जिस दिन ऑपरेशन हुआ-करीब दो बजे दिन मे, तब से लेकर रात भर बैठी रही वह । दूसरे दिन गयी। खाना भी घर से ही भिजवाने लगी। मैंने कहा भी कि खा लिया करूगा, लेकिन जिद कर बैठी। दोपहर का खाना दामाद ले जाते हैं दफ्तर आते वक्त । रात का खाना भी नग्मा भिजवा देती है। किरन को तो सादी खिचडी खिलानी पडती है। वह भी वही से बन कर आती है। डॉक्टर बोला है कि अब रहने की जरूरत नहीं है । कल या परसो छुट्टी मिल जायेगी अस्पताल से ।.." बाबूजी प्रसन्न मुद्रा में बोल रहे थे और मुझे लग रहा था, अपने ही भीतर के किसी दलदल में मैं आकंठ घंसता जा रहा हूं। कोई अंश धीरे- धीरे कटा जा रहा था अंदर का। लेकिन वाबूजी के मन मे गजब का उत्साह था। परिचित मरियल-सी आवाज की जगह किसी अतिरिक्त उत्साह से बढ़ी हुई आवाज पो-"."सुलेमान भाई का सहारा न मिलता वगैरह।..."

सरहद के पार: 19. A तो मर गयो होती किरन । दुल्हाजी तो कलकत्ते मे रहते हैं। किरन के घरवालों को तो मतलब ही नही है किसी के मरने-जीने से । मुझे खबर मली। किरन को ले आया। ब्लॉक के डॉक्टर से दिखाया तो डाक्टर ने कहा-ऑपरेशन का मामला है। दरभंगा या पटना ले जाइये । लेकिन ले कसे जाते? घर में तो कुछ था नही । आखिर सुलेमान भाई ने मदद की। घोले कि चलिए पटना-वहा तो अपने दामाद हैं ही अस्पताल में । रुपये भी उन्होंने ही दिये साथ-साथ आये अपने खर्च से ।..." किसी अंतरंग कृतज्ञता से बोझिल उनकी आवाज टूटने-सी लगी, । 'गांव मे इतने लोग हैं । अपने भाई-भतीजे, चाचा, गोतिया सब हैं, लेकिन जरूरत पड़ने पर सबने हाथ खीच लिये। बड़े भइया से उधार मागा तो अपने बड़े बेटे सुरेश के विषय में बोले कि वही मालिक है घर का । सुरेश ने बहाना बना दिया- रुपये कहां है काका। बाद में एक-दूसरे आदमी से मालूम हुआ कि सुरेश कहता है--कौन देगा उधार ! जिस आदमी को उसका बेटा ही नही पूछता है उसको कौन देगा उधार?" किसी अपमान के जहर को पीते हुए बाबूजी एकदम कारुणिक हो गये थे। मैं सोच रहा था, क्या बाबूजी अपने अपमान के बहाने मुझे अपमानित करने की कोशिश तो नही कर रहे है ? .."उन्होने तो निश्चय कर रखा था कि यदि में उनके पास नही जाऊंगा तो वे कभी नहीं आयेंगे मेरे पास। फिर वे आ कैसे गये एकाएक खाना उन्होंने नहीं खाया। यही कहते रहे कि वहां आ गया होगा खाना । बर्बाद हो जायेगा। रहने दो।... रात हो गई थी। घड़ी में समय देखा-नौ बज रहे थे । जाने के पहले बाबूजी बोले, "मुन्ना कहां है ?" देख लेता एक बार।" मुन्ना मेरे बेटे के नाम का सामान्यीकरण था । बसे हमलोग यीशू कहते हैं अपने मुग्ने को। अन्दर बेडरूम मे यीशू गाढ़ी नीद में सो रहा था। सोई हुई स्थिति में हो मुन्ने को गोद में उठा कर बाबूजी के पास ले आया। गोद में लेने के ?

20: सरहद के पार लिए उन्होने बाहें पसार दी। कुछ क्षणों तक वे यीशू को निहारते रहे । ट्यूब लाइट की दुधिया रोशनी में यीशू का धपधप गोरा चेहरा कुछ ज्यादा गोरा लग रहा था। वावूजी की गोद मे यीशू एकाएक जोर में चीखा। इतनी जोर से चीखा कि अन्दर से रश्मि दौड़ी हुई आ गई। बाबूजी अनुभवी आदमी की तरह बिलकुल अनुद्विग्न हुए बोले, "डर गया है सपने में । इसके सिरहाने कजरोटा या लोहे की कोई चीज रख दिया करो। नही डरा करेगा।" बाबूजी उठने लगे। बाहर अधेरा था। मैंने रोकना चाहा उन्हें, "अभी जाना ठीक नहीं है बाबूजी। शहर मे अशांति है।" बाबूजी धीरे से हंसे, जैसे किसी अबोध बच्चे की बात हो यह,-"नही, कोई बात नही । शहर के लोगों को डर होगा। हम लोग देहात के हैं। फिर जाना जरूरी है। किरन अकेली होगी वहाँ ।" बाबूजी रुके नही। सीढियों से नीचे उतरते हुए उन्होने किरन का बैडनम्बर और डॉक्टर का साइड बता दिया। यह भी बोले कि कल भर हैं, परसों चले जायेंगे। मैं रोड तक उन्हें छोडने गया। बिलकुल सूनी थी सड़कें । भीतरी दहशत के कारण अंधेरा ज्यादा भयावह लग रहा था। मैंने कहा, चौराहे पर शायद कोई रिक्शा मिल जाय ।" बाबूजी में वही निश्चिंतता थी। बोले, "कोई बात नही । बहुत दूर नहीं है।" अपने निवास की तरफ लौटते हुए मैं बाबूजी को ही कही हुई एक लोक -कथा पर सोच रहा था जिसमे एक पंडित एक शापित नदी के किनारे बैठा था। उसने नदी में एक उगली डाली और पाया कि वह उंगली पत्थर बन गई है। वह इसी मोच में नदी किनारे बैठा हुआ था। तभी लट्ठ लिये एक देहाती आदमी आया और बिना कुछ सोचे-विचारे नदी में प्रवेश कर गया । "फिर सेरता हुआ उस पार चला गया। "अगले सरहद के पार : 21, दूसरे दिन दफ्तर से कुछ पहले लौटा। रश्मि यीशू के साथ पहले से तयार बैठी थी। हॉस्पिटल के सजिकल ब्लॉक बैड नम्बर पंतीम पर जो मरीज लेटी हुई थी उसको पहचान पाना मुश्किल था कि वह मेरी छोटी बहन किरन है । तीमारदारी करने वाले बाबूजी उस वक्त नहीं थे वहा । हम लोगो को देखते ही किरन उठ कर बैठने की कोशिश करने लगी। सहारा देकर मैंने उसे बिठा दिया। क्षीण-सी मुस्कराहट किरन के बीमार सूखे चेहरे पर उभरी, लेकिन कुछ ही क्षणों बाद न जाने क्या हुआ कि वह एकाएक रोने लगी। रश्मि किरन के पायताने बैठी थी। मैं मीशू को अपनी गोद में लिये हुए रश्मि के सिरहाने के पास था। किरन ने जाने कितनी चार यीशू को चूमा । फिर जोर-जोर से रोने लगी। अगल-बगल के बेडो पर पडी हरणाओ और उनकी तीमारदारी करने वाले लोगों के लिए हम तमाशा बन रहे थे। मैंने किरन को किसी तरह चुप कराया, लेकिन मिस- कियों के रुकने के बावजूद उसकी आंखें लगातार रोती रही। एकदम दुबली-पतली हो गई थी किरन। चेहरा सूखा और पीला पड़ गया था। किरन को देख कर मुझे निर्जल मेघ की हल्की परत के बीच कटे हुए चांद की याद आई थी। उस क्षण किरन का बचपन याद आ रहा था मुझे। गांव के मिडल स्कूल में दो जमात पीछे पढ़ने वाली किरन और नग्मा'वर्ग शुरू होने के पहले प्रार्थना हुआ करती थी। प्रार्थना की घंटी बजते ही तमाम विद्यार्थी पक्तिबद्ध खड़े हो जाते थे। प्रार्थना की आगुअई. करने का दायित्व मेरा और किरन का था । हम दोनो मिल कर आगे-आगे गाते थे.- "हे प्रभु, आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए। शीघ्र सारे दुर्गुणों से दूर हमको कीजिए। लोजिए हमको शरण में हम सदाचारी बर्ने......" मुझसे सिर्फ तीन वर्ष छोटी किरन, लेकिन उसके शरीर का विकास देख कर मा कहती थी कि लड़की बदनसीबो के समान बढ़ती है। मां कहा - .

22 : सरहद के पार कर हंसने लगती थी और किरन लजा कर भाग जाती थी।"चल और नटखट वही किरन धीरे-धीरे स्मृति के पार चली गई। जाने कैसे बाबूजी ने किरन की शादी की। जीजा जी को मैंने कभी देखा नहीं। इतना मालूम हुआ कि वे कलकत्ते में कोई छोटी-मोटी नौकरी करते हैं। साल-छह महीने "पर कभी आते हैं और महीने पन्द्रह दिन रहकर चले जाते हैं । .""लेकिन हॉस्पिटल के बेड पर यह जो किरन लेटी हुई है वह बचपन की उस किरण के करुण व्यंग्य-चिन की तरह लगती है। चित्त लेटी हुई है किरन । आखों के कोरों से गिरे हुए आंसुओं से सिर के अगल-बगल का बिछावन भीग गया है। कुछ बोलती नहीं है वह । बस कभी-कभी अन्दर. ही-अन्दर रोने के दरम्यान आने वाली हिचकियां घुटती हुई प्रतीत होती घटे से ज्यादा निकल गया है । बाबूजी बाजार से लौट आये हैं । पूछते हैं, "कब आये हो ?" मैं घड़ी में समय देखता हूं और समय को ज्यादा बताता हूं, "करीब डेढ-दो घटे मे हूं।" बाबूजी नीचे फर्श पर बैठ जाते हैं, "अब ठीक है सब । रोग निकल गया है शरीर से । कल, नही तो परमो चले जायेंगे। शाम में गाडी मिलती है न प्रयाग एक्सप्रेस-जोगबनी वाली! मुझे कुछ पता नहीं है । फिर भी कहता हूं, "हां, शायद शाम में ही किरन एकटक देख रही है-मुझको, रश्मि को और यीशू को । उसकी आखें पत्थर की आंखों-सी स्थिर हैं। मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। कुछ बेधता- -सा लगता है । चलते वक्त बाबूजी से कहता हूं, "कोई जरूरत हो तो..." "नही,''कुछ नही।"फिर नग्मा तो है ही यहां।" बाबूजी की संतुष्टि और मुस्कराहट जन्त करती हुई प्रतीत होती हैं मुझे। लगता है, किसी तेज ‘पार घाले हपियार से आहिस्ता-आहिस्ता कोई मुझे छील रहा है । बाबू- 'जी प्रसन्न मुद्रा में कहते हैं,-"छट्टो मिल जायेगी कल । "लेकिन नग्मा सरहद के पार: 23 Fr ..ranA । तो जाने नहीं देगी कलॉ परसों शाम की गाड़ीसकेड लेंगे। शहर अभी तक सामान्य नहीं हुआ अपराहोते ही सड़कें सूनी हो जाती हैं । पन्द्रह-सोलह दिन पहले सिर्फ दो दिन के कपर्प ने किसी गम्भीर बीमारी की तरह शहर को अन्दर से बहुत कमजोर कर दिया है। फिर भी जाना ही पड़ा स्टेशन । गाड़ी नहीं आई थी प्लेटफार्म की वेंच पर किरन बैठी हुई थी। उसी से सटकर नग्मा बैठी थी। पहचान में नहीं आ रही नग्मा । "आदाब भाई जान" मुस्कराती है नग्मा बहन । गौर से देखता हूं । एकदम भरी-पूरी, स्वस्थ और प्रसन्न । वगल मे एक लड़का नम्मा का कंघा पकड़े खड़ा है-चार-पांच साल का होगा। अन्दाजा लगाता हूं, नग्मा का बेटा होगा। जो सज्जन टिकट लेकर आते हैं, मैं समझ जाता हूं, वे नग्मा के सोहर होंगे। बाबूजी मुस्कराते हैं, "यही हैं दामाद जी-रफीक आलम । रफीक साहब 'आदाब अर्ज' कह कर मेरी तरफ देखने लगते हैं-"नरेन्दर जी...." मैं मुस्कराने की कोशिश करता हूं; लेकिन इस कोशिश में मुझे लगता है, मेरा चेहरा कारुणिक हो गया है। बाबूजी कहते हैं, "देखते हो न यह सौगात! इस टोकरी मे पूरा 'सर-सनेस' भरा हुआ है। पूरी बिदाई ही कर दी है नग्मा ने। धोती, साड़ी, मिठाई, पान-सुपारी" बाबूजी को प्रसन्न मुख-मुद्रा में दुख या अभाव की कोई रेखा तक नहीं है । बुढ़ापा उनके शारीर से सरक कर जैसे मेरे अन्दर आ गया है और किसी संक्रामक रोग के कीड़े की तरह रेंग रहा है । मुझे भीतर से बेचनी हो रही है। शहर मे तनाव है। मुझे जल्दी लौटने की चिन्ता हो रही है। गाड़ी आ गई है। किरन और नग्मा गले मिल रही हैं । मैं खिसक कर बगल में खड़ा हो जाता हूं। देखता हूं नग्मा को। शहरी तहजीब के बावजूद बुरका नही पहना है उसने। विदा के समय बाबूजी के पैर छूता हूं। हड़बड़ी में होने के कारण वे आशीष देना भी भूल गये हैं। नग्मा किरन को सहारा देकर डिब्बे में बिठा 24 :सरहद के पार किरन रही है । मैं चुपचाप देख रहा हूं। मेरे लिए कोई काम ही नहीं है। प्लेटफार्म की भीड में मैं अकेला खड़ा हूं और देख रहा हूँ। का आसुओ से भीगे चेहरे का अर्थाश मेरी तरफ है । नग्मा खिडको के माम खडी बाबूजी से कुछ कह रही है। गाडी धीरे-धीरे खिसकने लगती है । नग्मा आंचल से आखें पोछती है। लेकिन मेरे भीतर कोई भावानात्मक आवेश नहीं है । खिसकती गाड़ी से किरन मेरी तरफ देखती है । उसके मांसुओं का बांध टूट गया है । वाबूजी ने मेरी तरफ एक बार देखा है, लेकिन मैं निर्णय नहीं कर पाता कि विदा लेती उनकी दृष्टि मे किसके चित्र साथ जा रहे हैं । एकाएक मुझे लौटने की हड़बड़ी हो जाती है। शहर मशांत है और शाम गहरी होती जा रही है। (रविवार, 4 दिसम्बर '83) दबी हुई उंगली का दर्द कमरे में लेटे-लेटे वह दिन के बदले हुए मिजाज पर मोचता रहा। वैसे दोपहर के आसपास का समय रहा होगा लेकिन सूरज लापता था। धुंध सी छाई हुई थी चारो तरफ । हल्की ठंडक थी जो गर्मियो के इस मौसम में दृष्टि-भ्रम उत्पन्न करती थी। लगता था बैसाख जेठ का यह दिन पीछे खिसक कर माध-फागुन के आमपास मा गया है । बारिस बिलकुल नहीं हुई थी एक बूंद भी नही बस बादलो की घनी छांह थी और मौमम के स्वभाव के विपरीत सुखद ठंड थी मेघ कही दूर बस रहे थे शायद । दूरागत हवा का मोठा स्पर्श ऐसा लगता था जैसे गर्मियों में किसी अनजान युवती की नंगी बांह शरीर को छू रही हो। ऐसा दिन बडा बोझिल होता है बोझिल उदास और अकेला। किसी काम में जो नहीं लगता। जिसके पास अपना परिवार होता है या किसी तरह की व्यस्तता रहती है वह तो मजे से काट लेता है ऐसे समय को लेकर रध्धू जैसे आदमी के लिए ऐसा समय किसी काम का नहीं है ऊब से भरा ऐसा समय बस आराम से लेटे रहने और अनाप-शनाप सोचते रहने के लिए बड़े भइया अपने कमरे में भाभी के साथ ताश खेल रहे हैं । सिर्फ दो आदमी जाने कसे ताश खेल रहे हैं। आज कोर्ट बन्द है उनका । रविवार है। कभी-कभी भाभी और भइया की बातचीत और हमी की खनखनाहट । 26 : सरहद के पार इस बाहरी कमरे मे भी आ जाती है। बड़ी भाभी की हंसी रध्धू को बड़ी विचित्र लगती है । सो कर उठने के बाद बड़ी भाभी बाहें उठाकर अंगड़ाई लेती हैं तो उनकी चूड़ियां ठीक इस हंसी की तरह बजती हैं । बड़े भइया भाभी से बात करते हैं तो आवाज एकदम मुलायम रहती है विलकुल मखमल की तरह जो उनके तकिये के ऊपर लगा है। मगर रघू से बात करते समय वही आवाज एकदम खादी वाली धोती बन जाती है भारी और रुखडी। बड़े भइया की यह मखमली आवाज वढी भाभी मां और बच्चो तक सीमित रहती है। दूसरे किसी से कुछ करेंगे तो लगेगा ही नही कि वही भइया है। बात बात पर जिरह करेंगे । लगेगा कोर्ट मे बहस कर रहे हैं । विचित्र स्वभाव है। हां, जब कोई भारी काम कराना होता है तो बहुत मुलायम हो जाते है । उसी समय मालूम होता है कि सहोदर भाई है। बाकी समय में तो एकदम पुलिस अफसर की तरह बात करते हैं मां भी बड़े भाइया को समझाती नही। डरती हैं शायद । समझती है बड़े भइया नाराज हो जायेंगे तो घर की देख भाल नही करेंगे। रुपये नहीं देंगे..'नही देंगे तो नहीं देंगे। मगर घोंस जमानेवाली यह आदत छोड़ दें । बड़ी भाभी का भी वही हाल है। पैर मे जरा भी घूल न लगे। घंटे-घंटे चाय चाहिए। कभी पूछेगी भी नहीं कि रघ्यू, चाय पीजियेगा? बस काम के समय रध्धू की याद आती है "रध्धू जी जरा वाजार जाइये तो। "एक दिन तो रथू जानबूझकर हुबकी लगा गया था बुलाती रहें बड़ी भाभी। यहां नौकर है कोई । लेकिन मा पहुंच गई थी तुरन्त क्या है बहू ? आवाज मे मिश्री घोल कर बोली थी मां। यही मिश्री रघु के पास पहुंचकर नीम की पत्ती क्यों बन जाती है यही समझ मे नही आता है। ...रे रघु । जवाब नहीं मिला तो रघुआ पर उतर आती हैं। रेंकती रहेंगी. ..."रे रघुआ। रघुआ।" ठीक बड़े भइया की तरह लगता है कि कोर्ट है"रघुनाथ । हाजिर हो कितना अच्छा-सा नाम है रघुनाथ । लेकिन पुकारता है कोई इस नाम से ? सब कहते हैं रघुआ । मच्छे से नाम को .

दबीहाउगी को दंदै । 27: बिगाड़कर इन लोगों ने रघुआ कर दिया है । ठीक है भाई.कह लो रघुभा दिन अच्छे आयेंगे तो ये ही लोग जो रघुओ कहते है रघुनाथ बाबू कहेंगे। कोई जरूरी नहीं है कि बी० ए०, एम० ए० करके मजिस्ट्रेट ही बना जाय। सिर्फ आई० ए० पास है रघुनाथ तो क्या हुआ। रुपये कमाने की अक्ल आनी चाहिए। फिर संयोग है। अगर पैसे वाली नोकरी मिल गयी तो ये बी० ए०, एम० ए० पानी भरेंगे। मझले भइया जरा ठीक है। ठीक इसलिए कि वे ज्यादा काम नही कराते । दिन भर डूबे रहते हैं किताबों में । मझली भाभी भी थोड़ा मनहूस स्वभाव की है लेकिन किसी वात पर खिसियाती बहुत हैं बोलती हैं गुर्राती ज्यादा है। गनीमत है कि सिर्फ रधु पर ही नहीं गुस्माती, मां पर भी भनभनाती है। मां सब जानती हैं लेकिन हंस कर टाल देती है मां? जवाब क्यों नहीं देती ? डरती क्यों हैं समझ मे नही आता । मझले भइया सब समझते हैं जानते हैं कि मां की मझली भाभी से पटती नहीं है फिर भी कुछ बोलते नहीं है । ऐमा कभी नहीं हुआ कि एक बार डांट दें अपनी पत्नी को। मझली भाभी किसी भी बात पर झिड़क देती है मां को । भइया सुन लेते हैं । भीतर घुट कर रह जाते हैं शायद । लेकिन बोलते कुछ नहीं हैं रध्धू की समझ में यही बात नहीं आती है कि ये पढ़े-लिखे लोग सही बात भी क्यों नहीं कह पाते हैं ? डरते क्यो हैं ? बस अपने आईने के सामने लाल पोले होकर रह जाते हैं बड़े भइया रोब दाब वाले आदमी है बड़ी भाभी भी इस मायने में खुले मिजाज की है। जो बोलना होता है, सामने बोलती है पूरे उसक के साथ । जिनके मन में जो आये कहे । मगर प्रोफेसर साहब की इस पत्नी की सूरत हमेशा बीमार-सी लगती है । रध्धू को लगता है हर बीमार किस्म की औरत ऐसी ही चिड़चिडे स्वभाव की होती है। प्रोफेसर साहब तो जैसे खुद पर ही गुस्सा करते हैं । कॉलेज में पढ़ाई समय भी मझले भइया का ऐसा ही भूड़ रहता था। अंग्रेजी वाले पीरियड में पढाने आते थे तो सबसे पहले उनकी आंखें तलाश करती थीं रम्धू है य 28 : सरहद के पार हिस्ट 1 नही। रप्पू क्यो नहीं रहेगा? दूसरे किसी यलास में रहे, न रहे, भइया के पलास मे तो रहना ही है । भइया पढ़ाने लगते और पीछे की बेंच पर कही जरा भी बातचीत होती तो ममले भइया की कड़कती आवाज आती" हयर इज मरमरिंग शिनास्त नहीं हो पाती तो ये सुद होने लगते थे। असली वात का तो पता ही नही पा उनको ये समझते ही नही थे कि उनको अंग्रेजी हम लोगो की समझ में नहीं आती थी। हम लोग चाहते थे कि हिंदी मीडियम से वे अग्रेजी पढायें लेकिन उन पर तो अंग्रेजी का भूत सवार था। ठीक है माइते रहिए अपना भूत । लड़के नहीं समझेंगे तो बातचीत करेंगे ही 'डू यू फोलो करते रहिए। उस पार इसी कारण सत्तर परसेंट विद्यार्थी फेल हुए थे अंग्रेजी मे। प्रिमिपल साहब ने बुलाकर पूछा था बड़े भइया से । मजा आया था। क्या पढाते थे क्लास में वे जाने । मझले भइया घर आकर बड़े भइया और बड़ी भाभी के सामने अंग्रेजी के गिरते स्तर का रोना रो रहे थे। रघु मन-ही-मन खुश हो रहा था। अच्छा है कम-से-कम महसूस तो कर रहे मझले मइया । अंग्रेजी तो जायेगी ही एक दिन । मझले भइया कब तक रोके रहेंगे। अगर अग्रेजी को अंग्रेजी में ही पढाते रहे तो यही दशा होगी। विद्यार्थियों की बात पहले ही मान गये होते तो यह हालत न होती विद्यार्थियों ने तो आग्रह किया था सर हिंदी मे पढाइए । मझले भइया अंग्रेजी मे गुस्साने लगे ये ह्वाट ननसेंस ? पता नहीं उनकी समझ मे बात अब भी आई है या नहीं। रघू पढाई छोड़े तो दो साल हो गये। थर्ड डिविजन में आई० ए० पास किया तो कालेज ही छुडा दिया गया। बड़े भइया ने कहा मुसकोल है मझले भइया ने डल कहा और मां ने हामी भरते हुए कहा जनम से ही मंदबुद्धि का है आगे चांस ही नही दिया। एक बार भी चांस देते तो दिखा देता ग्रेजुएट बनकर। दिन रात एक कर देता पढाई के पीछे। लेकिन सब एक मत हो गये पढ़ना चंद । या तो कही क्लर्की खोजे रघु या घर का काम देखे । लेकिन बलकी भी कहां मिलती है ? यह तो किसी से होता नहीं कि कोशिश परवी कर को ।

दबी हुई उंगली का दर्द : 29 कही लगवा दें या पूंजी ही दे दें कि जाओ व्यापार करो। बड़े भइया कोर्ट से लौटते हैं तो मां आगे पीछे करने लगती है बड़ी भाभी के सिर में जरा भी दर्द हो जाय तो खुद मालिश करने पहुच जाती हैं । खुद चाय पहुंचा आती हैं। कोई पूछने वाला नहीं है कि रध्धू भी तीसरा भाई है उसको चाय मिली या नहीं। बड़े भइया और मझले भइया के खाने में तरह-तरह की चीजें रहती हैं । रघु के खाने के समय में ही सारी चीजें कम पड़ जाती हैं। आश्चर्य है कि यह सब मां की आंखों के सामने होता है। मां सब देखती हैं लेकिन कुछ कहती नही हैं । कहने को तो मां कहेंगी मेरे लिए तीनों बेटे बराबर है और झटसे उदाहरण दे देंगी चाहे यह उंगली कटे चाहे वह उंगली पोर तो बराबर होती है।" खाक बरावर होती है पीर। यह सब कहने की बता है। उस दिन कितनी परेशानी थी सर दर्द से। एक बार भी मां बाहरी कमरे में झांकने नहीं गयो । पूछ भर लिया दई "कैसा है रघू?" यह नहीं हुआ कि बाजार से टैब्लेट मंगा दें या मालिश ही कर दें। मझले भइया या बड़े भइया को कुछ हो जाये तो देखो मां परेशानी सुनते ही तेल की कटोरी लेकर हाजिर भी हुई और कहने लगी डाक्टर को खबर दे रघु जरा बुता लाओ डाक्टर को । यहां साले मर जाओ कोई देखने वाला नहीं है। कितने-कितने कपड़े हैं बड़े भइया और मझले भइया के पास अपने पास बस दो ही पंट हैं । एक तो एकदम रही हो चली है । मां सब देखती हैं लेकिन बिना बार-बार कहै नयी पंट मिलने वाली नहीं है । कही बाहर जाना हो तो कह कर जाओ। पिक्चर जाना हो तो पैसे लेते समय बड़ी भाभी का भाषण सुनो और मा का उपदेश पिओ। जरा भी देर हो गयी लौटने में कि बड़े भइया सिर पर आसमान उठा लेते हैं आवारा हो गया है। कमाई-धमाई कुछ है नही मटरगश्ती करते-फिरते हैं आवारा छोकरों के साथ । मां उपदेश देने लगती हैं अच्छी संगति करनी चाहिए वेटे। कोई काम सोचो नौकरी ढूंढो।" - 30 : सरहद के पार मगर रघु कहां से ढूढे नौकरी? बिना रुपये के नौकरी खरीदी जाती है आजकल ? बहे भइया और मझले भइया को चिता ही नहीं है कि तीसरा भाई भी है। पत्नी और बच्चे की खुशी के पीछे बेहाल रहते बड़ी असमर्थता महसूस होती है ग्धू को । यही लगता है कि उसका बेकार होना और कम पढा-लिखा होना ही सारी मुसीबतो की जड है। लेकिन किया क्या जाये। जब मां ही बेटों और बहुओं से डरती हैं तो अपनी क्या हस्ती है ? मां को तो कम-से-कम पक्ष लेना चाहिए ? कहना तो चाहिए कि रध्धू को देखो तुम लोग? ""आसमान उसी तरह धुएं जैसे मेघों से घिरा हुआ है लेकिन बारिस का एक बूद नहीं है। बस हल्की-हल्की ठंडक है। ऐसे अनमने समय में एक फालतू आदमी को सोने में मजा आता है। भागलपुरी चादर ओढकर लेटे रहो और सोचते रहो सोचते रहो रघ्यू अपने को ही गाली देता है तुम्हारे लिए काम ही क्या है साले? कोई देखने वाला नही है । मा भी एक नजर से नहीं देखती। वह भी देखती हैं कि कमाऊ पूत कौन है। रघ्घ आज इमी तरह लेटे रहना चाहता है दिन भर कोई न तो अच्छा । भले छाये हुये है बादल । नही तो इस बाहरी कमरे मे इतनी उमम होती है कि सोया नहीं जाता। रात में ऊपर छत पर सोना पड़ता है और छत पर मच्छरों का आतंक है । अदर के दोनों कमरों मे सिलिंग फैन है । आराम से पड़ी रहती हैं दोनों भाभियां । किसी को याद भी नहीं रहता कि बाहर वाले कमरे में रघू है और विना पंखे के सो रहा है। मा कहती हैं बाहर तो खूब हवा आती है। छत पर तो खूब नीद आती होगी 'बुलाये . रघू?" उम समय तो बहुत अपमान महसूस होता है जब आये गये लोगो के सामने मां रोना रोती हैं एक यही रध्ध रह गया है बेकार। पढाई भी नही पर सका किसी छोटे-मोटे काम में भी लग जाता तो संतोप होता । सुनने 040mA दुली हुई गली का द-31 वाले की हमदर्दी से मन में आग लग जाती है रघु के सामने खड़े रहती मुश्किल हो जाता है । वह धीरे-से खिसक जाता है वहां बड़े भइया और मझले भइया की भी यही आदत है। कोई भी रिसे दार आता है तो बात धूम-फिरकर रध्धू के पास चली आती है। रध्धू की तबीयत होती है कि भाग जाय घर से। यह घर उसके लिए नहीं है। मां को भी देख लिया। मां भी अपने कमाऊ पूत को ही चाहती हैं जो बेटा बेकार बैठा है वह मां की आंखों में गडता है । रघु के मन में कभी-कभी विद्रोह जगता है । खाना और कपड़ा देकर कौन-सा उपकार करते हैं घर के लोग? मुफ्त का खाना नहीं खाता है रघू । काम करता है तो खाना, कपड़ा मिलता है । बड़े भइया या मझले भइया के लिए बाजार से झोले मे सब्जी ले आना भी प्रतिष्ठा पर पडत है शर्म आती है । इसलिये ऐसे मोटे काम है रघ्यू के जिम्मे । चावल ले अ वाजार से, गेहूँ ले आमो, घरेलू सामान ले आओ। सब रघु के जिम्मे है . प्रतिष्ठा और शमं सिर्फ बड़े भइया मझले भइया के लिए है । रध्धू तो नौकर है जो ज्यादा पढ़े-लिखे हैं अच्छी नौकरी में हैं प्रतिष्ठा का सवाल उनके लिए है। । मां कहती हैं, बड़े भइया कहते हैं, मझले भइया कहते हैं, दोनों भाभियां कहती हैं जरूरत हो तो पैसे मांग लिया करो। लेकिन मागना कितना महंगा पड़ता है, यह रथ ही जानता है। हर मांग तो कहने को होती नहीं । कसे मांगा जाय? मांगने पर पचास हुज्जत । कमखर्ची का उपदेश ऊपर से भाषण सुनने के बाद मिला हुआ पैसा भीख में मिले पैसे की तरह लगता है । इससे तो अच्छा है कुछ मांगा ही न जाय । कसे कहा जाय कि बड़े भइया ने इलेक्ट्रोनिक घड़ी खरीद लेने के बाद जो पुरानी घडी रध्धू को दी थी, उसका बेल्ट टूट गया है । कैसे कहे कि नया बेल्ट चाहिये । कहेगा तो बहे भइया या भाभी कहेंगी-'हां घड़ी तो बंधनी ही चाहिये हमेशा । रम्प को दफ्तर जाने में देर हो जायेगोन।" अब लो। पैसे तो 32 : सरहद के पार मिलेंगे लेकिन भाषण और व्यंग्य के बाद। रघ्धू का मन तो इतना आजिज हो जाता है कि चपरामी वाली नौकरी भी कही मिल जाये तो कर लें । जय यही काम करना है तो वही करें। किसी दफ्तर मे समय से ही काम करना पड़ेगा न । यहां तो चौबीस घंटे झंझट। मिल भी रही थी चपरामी वाली नौकरी । फूफा जी आये थे पटने से कह रहे थे कि फोथं ग्रेड में कुछ बहालियां हैं उनके दफ्तर मे । वे चाहें तो एक-दो को लगा सकते हैं । उसने फूफा जी से अकेले में कहा पा""लगा दीजिये मुझे।" बाद मे किसी अच्छी नौकरी के लिये कोशिश करूंगा।" फूफा जी ने यह बात बडे भाइया से कही थी। सुनते ही बडे भइया की त्योरी चढ़ गयी थी। "चपरामी वाली नौकरी करेगा रध्धू ? मेरा भाई चपरामी बनेगा?" वह चुप रह गया था। और सुद ही कोसने लगा था "चल रध्धू यही ठीक है। घर में चपरासी बन कर रहो, लेकिन बाहर नहीं। यही पिसते रहो अपना नसीव । कुर्मी तोड़ नौकरी तो मिलने से रही घर बैठे बादत उमी तरह घिरे हुए है, लेकिन एक भी वूद गिरी नहीं है। भीतर-ही-भीतर जैसे मुर्रा रहा है आसमान। मां पुकार रही हैं "रध्धू जानता है काम भाभी को है लेकिन बुला रही है मा । जानता है रघ्यू कि काम क्या है। मां कहेगी "जरा मंट को ले जा । दिसा लाओ साफ्टर से । गांमी ठीक नहीं हो रही है। मेकिन रप्पू मान जायेगा नहीं । बोलेगा ही नहीं कुछ। पड़ा रहेगा विठायन पर । पुवार कर हार जायेगी मां । जाना है तो जाय मझले भाया । यह मौसम रही याहर निकलने का नहीं है । अपने सोभाराम में बंटवर पाय पी रहे होंगे और मझली भाभी गप्प मढ़ा रही होंगी । काम करने के लिये मिर्फ रप्पु है । रम्प नहीं जायेगा यार । मौमस का मानन्द है तो मबरे लिए है। .. - देवी हुई उंगली का दर्द : 33 लेकिन मां पुकारती-पुकारती कमरे में आ गयी--"रे रघू अरे मंटू की दवा ले आ बाजार से।" उसने कुनमुना कर अपनी नाराजगी जाहिर की, लेकिन मां ने जाग दिया- "जा उठ 1 मालत ठीक नहीं।" उसके मन में आया कि कहे - "हां मेरे लिये ठीक नहीं है, बाकी लोगों के लिये ठीक वह जबरन इस तरह उठा जैसे बंधुआ मजदूर हो । बिछावन छोड़ते हुए वह यह भी भूल गया कि अभी कुछ ही देर पहले उसने न उठने का -संकल्प लिया था। (अवकाश, सितम्बर प्रथम '84) अव्यय अतीत । पिछले हफ्ते मामा के गांव के नौकर अजोधी दास ने किसी से खत लिखवा कर मां को सूचित कर दिया था। खत पाते ही मां अपने मायके जाने के लिए व्यग्र हो उठी थी। छोटे मामा एक-दो दिन के लिए गांव आ रहे थे। पंतालीस-छियालीस की उम्र सीमा पर पहुंची हुई मां को अपने मायके के प्रति यह उतावली देख कर मुझे मन-ही-मन हंसी आ रही थी। मामा ने कोई चिट्ठी-पत्री नहीं लिखी थी मा को। यदि मामा अपने गाव आ रहे हैं तो क्या अपनी छोटी बहन से मिलने यहां तक नहीं आ सकते थे? छोटे मामा को मैंने सिर्फ दो बार देखा था और दोनों ही बार शोक के अवसरों पर देखा था। आठ-नौ साल पहले नानी के देहांत पर उनको पहली बार देखा था, जब वे क्रिया-कर्म के लिए गांव आए हुए थे। दूसरी बार भी ऐसे ही अवसर पर उनको देखा-कोई चार साल पहले। इस बार छोटे मामा के माथ बड़े मामा भी आये थे। मां मुझको और बड़े भैया को साथ लेकर पहुंची थी। आठ-दस दिनो की उस अवधि में मुझे बड़े मामा या छोटे मामा से कोई निकटता या आत्मीयता महसूस नहीं हुई। दोनों मामियों मे से कोई भी नही आयी थी। चूंकि मामा के घर में औरत के नाम पर निकटतम सम्बन्ध को सिर्फ मां थी, इसलिए स्वाभाविक था कि मां की पूछ-ताछ खूब हो रही थी। मां हम दोनों भाइयों को यह दिखाने . की भरसक कोशिश करती थीं कि दोनों मामा मोको मदुपारने हैं। बार येबात मां छोटे या भड़े मामा से कोई सलोन मदिरा करने write सेकिन मैं देखता कि छोटे मामा मो की बातों पर कोई विशेष सी हो रहे हैं । ये सिर्फ हूं-हा करते थे और किसी दूसरी तरफ देखते रहत पावर मामा को मां अतिशय स्नेह से 'बड़का भया' कहती थी। लेकिन मां के बड़का भया मां को भातों पर उसी तरह ध्यान देते थे जैसे कोई बड़ा अफम अपने चैम्बर में किसी मामूली आदमी की शिकायत सुनता है। इसके पहले मां बड़े गर्व से अपने दोनों भाइयों की चर्चा करती थी बड़े मामा कुछ वर्ष अमरीका में रह आये थे। उसके बाद से बंगलोर किमी प्राइवेट कंपनी में कंचे पद पर काम कर रहे थे । बड़े मामा की दं लड़कियों की शादी बंगलोर से ही हुई थी। रस्मी तौर पर दोनों ही बा शादी के निमंत्रण-पत्र वावूजी के पते पर मां के पास आये थे। अलग से को आग्रह नहीं किया गया था। दो साल पहले बड़े मामा की छोटी लड़के अरुणिमा के विवाह का निमंत्रण-पत्र तो विवाह के कोई सप्ताह भर बा पहुंचा था। मां का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया था। इसके पहले मा मुझ और बड़े भैया से कहती रहती थीं, "देखना, अरुणिमा को शादी में बड़क भैया जरूर बुलायेंगे बंगलोर । तयार रहना तुम दोनों भाई चलने लिये।" अरुणिमा की शादी के कोई सप्ताह भर बाद जब विवाह का निमंत्रण पत्र खुले लिफाफे मे मिला था तो मैंने व्यंग्य से मुस्कुराते हुए मां के हाय लिफाफा थमा दिया था। मां-पराजित और गमगीन मेरे चेहरे की तर देखने लगी थी। लेकिन मोह-मंग की यह स्थिति अधिक दिनो तक टिक नही पायी बड़े मामा के बाद मां अब छोटे मामा की प्रशंसा करने लगी थीं। छो मामा बंबई में कोई उच्चपदस्थ सरकारी अधिकारी थे। मां छोटे मामा पास बबई कभी गयी नहीं थी। मां को इतना ही मालूम था कि समुद्र --- 36 : सरहद के पार किनारे छोटे मामा को बड़ा-सा पलेट मिला हुआ है । अपनी गाड़ी है और घर मे ऐसी-ऐसी चीजें हैं जिन्हें यहां के धनी से धनी लोगों ने देखा तक नही हैं । मामी किसी कॉलेज मे अंग्रेजी की प्रोफेसर हैं और देखने मे एक- दम मेम की तरह लगती हैं। अपने दोनों भाइयो की चर्चा करते वक्त मां इतनी उत्फुल्ल हो जाती थी मानो सब कुछ मां का अपना हो । मेरे बड़े भैया जो दो साल से बी. एस-सी. करके बैठे हुए थे, मां से अक्सर सुनते रहते थे, "मैं कहती हूं, एक बार हो माओ बंबई से । तुम्हारे मामा हैं वहाँ । मैं पत्र लिख दूंगी। किसी अच्छे काम पर लगा ही देंगे।" यही बात मां बाबूजी से भी कहती रहती थी। मां के बहुत कहने पर बड़े मैया बबई गये थे एक बार । छोटे मामा ने मां का पत्र पढ़ा था और जेब में रख लिया था । दस-बारह दिनो बाद महानगरी बंबई देख कर बड़े भैया लौट आये थे। उनको जवाब मिला था कि नौकरी उनके पास रखी हुई नहीं है । कोई जोगाड लगने पर वे सूचना देंगे। छोटे मामा से मा का मोह-भंग फिर भी नहीं हुआ था। कहती थी कि देख लेना, छोटका भया जरूर बुलायेंगे। मां को इस बात का अतिरिक्त गर्व था कि दो भाइयो के बाद वह अकेली छोटी बहन है और छोटी बहन भाइयों को बेहद प्यारी होती है। बार-बार की अवहेलना के बावजूद मां का यह सम्मोहन कम नही होता था । मैंने एक विचित बात देखी थी मा मैं । पहले तो वह अपने दोनों भाइयों को गौरव-माहित करती थी। फिर अपनी आर्थिक और सामाजिक स्थिति से जब कुछ हीनता महसूस होने लगती थी तो अपने बचपन के प्रसंगों में चली जाती पी। विस्तार से बताने लगती थी कि तीनों भाई-बहन में कितना प्रगाढ़ स्नेह था। बचपन में होने वाले आपसी झगडों के विपय में या बडी-सी पल ग पर जगह को लेकर दोनों भाइयों के साथ छीना- 'झपटी की बातें बताते समय मां एकदम बच्ची-जैसी बन जाती थी। आंखो मे पाने कहां की चमक उभर आती थी।" रेलगाड़ी में अपने मायके जाती मां की आंखों में मैंने फिर वही धमक अव्यय अतीत:37 । देखी। चेहरे पर मोरललाटपर उन की खड़िया मे खिची रेखाएं कुछ धुंधली जान पड़ती थी। मरी हुई नदी बरसात के महीनो मे जैसे एकाएक जी उठती है, मां कुछ मंसी ही लगी थी। मां का स्वभाव वाचाल नहीं कहा जा भकता। वह अक्सर बेहद घरेलू और काम-काजो बातें किया करती है, लेकिन रेलगाड़ी पर अपने मायके जाती मां अपने स्वभाव की सीमाए तोड़ कर बेमतलब वोलती जा रही थी। यह जानते हुए भी कि मैं अवोध नही हूं, बी०ए० में पढता हूं, मुझे मेरी उम्र से छोटा समझ कर मा रेल-यात्रा का व्यावहारिक विधान समझा रही थी। पूरे दस घंटे की रेल-याना । सवेरै छः बजे रेलगाड़ी पर सवार होकर पार बजे शाम में में मां के साथ उस छोटे-से स्टेशन पर उतरा। रेलवे स्टेशन लगभग वैसा ही था जैसा कुछ वर्ष पहले देखा था। लैंपपोस्ट का वेकार हो गया खंभा थोडा मुक गया था। शीशे नहीं थे लपपोस्ट में । उसकी ठीक बगल से बिजली के तार शून्य में पतली रेखाओं की तरह खिचे चले गये थे। प्लेटफार्म के छोर पर स्टेशन का नाम सीमापुर ताजे लिखा- वट की वजह से उस धूमिल परिवेश मे कुछ इस तरह चमक रहा था जैसे किसी गरीब देहाती औरत नै मैला जाते समय बड़ी-सी लात बिंदी लगा ली हो ललाट पर। प्लेटफार्म के बाहर गुलमोहर का बूढा पेड़ लाल-लाल फूलों का पहाड़-सा उठाये झुका हुआ खड़ा था। उसकी छह मे तीन-चार रिक्शे और उतनी ही संख्या के मरियल घोड़े वाले तांगे खड़े थे। रिक्शे और तांगे वाले हांक लगा रहे थे-"मधुरा"""मक्कापुर सीमापुर हाट" स्टेशन के बाहर एक हलवाई की दुकान में मांमिठाई खरीदने गयी । मैं समझ नहीं पा रहा था कि मिठाई किसके लिए खरीदी जा रही है । छोटे मामा तो अकेले आये होंगे । वे क्या यही गंदी और भिनकती मक्खियों वाली. मिठाई खायेंगे? मां की मूढता पर मुझे हंसी आ रही थी। अपने भाई से मिलने मां इतनी दूर आ सकती हैं । मगर छोटे मामा का अपनी बहन से. ।

38: सरहद के पार इतना ही स्नेह था तो क्या वे अपनी लंबी यात्रा में पांच-छह स्टेशन जोड़ कर अपनी बहन से मिलने नही सकते थे। मामा की और मां की सामा- जिक और आर्थिक स्थिति की तुलना करते हुए मैं सहज ही इस निष्कर्ष पर मा गया था कि मामा-जैसे उच्चपदस्थ अधिकारी और महानगरवासी के लिए हाई स्कूल के एक हेडमास्टर से रिश्ता कोई महत्त्व नही रखता है । सम्बन्धों में ताजगी भी वही देखी जाती है जहां आर्थिक और सामाजिक हैसियत की थोडी भी समानता रहती है। एक लाल गमछे मे मां ने लड्डू बाघे । पैसे देते वक्त हलवाई की दूकान के उस दुबले-पतले लड़के से मां पूछने लगी, "हरिहर साव की दूकान यही है न बउआ?" लड़का कडाही में गर्म होते डालड़े में बुदिया का एक छोटा देकर परीक्षा कर रहा था। मैंने देखा, बेसन की बुंदिया का वह छोटा पल भर मे जल गया था । लड़के ने मां की बात पर ध्यान नहीं दिया । अपना सवाल मां ने फिर दोहराया तो लड़का अकचका कर देखने लगा । मां ने शायद अपने को उपेक्षित महसूस किया। दूकान से निकलते समय आत्मतोप के लिए या भैप मिटाने के लिए मुझसे कहने लगी, "नही जानता था यह लड़का। मगर हरिहर साव को दूकान यही है । मैं छोटी पी तव । हरिहर साब की यह दूकान सूब चलती थी।" एक विशे वाले से मां बात करने लगी, "फूल वायू की हवेली चलोगे?" मैंने देसा रिक्शे याला मां का मुंह ताक रहा है, "कौन फूल पावू?" रिक्शे वाला उसी अंदाज में मां की तरफ देख रहा था जिस अंदाज में थोड़ी ही देर पहले हलवाई की दुकान में उस लड़के ने देखा या। मां जैसे चकरा गई थी, "अरे फूल बायू की हवेली ! मक्कापुर घोक ! कोलामो पाट!" रिसो बाला मरकापुर चौक तक जाने के लिए राजी था, लेकिन किमी फूल यायू मी हयेली को नहीं जानता था। मैं फिर मन-ही-मन हमा। मां भी सूद हैं। फूम चायू की हवेली! मेरे नाना को हवेली। जैसे 'किगी राजे-महाराज का महस हो। मुझे यह हवेनी पाद हो आई जिसको अम्पप अतीत:39 : कुछ वर्ष पहले देखा था। ईंट की दीवारों पर टीन की छस और उसके ऊपर टाली खपरैल का लिहाफ । दहतो हुई पारदीवारो। दरवाने पर टेदा हो गया कच्चा कुआं। सुपारी-नारियल के कुछ पेड़ । मही है फूल बाबू की हवेली। उसी गाव में किसी यादव का दुमंजिला परके का मकान तिर्फ 'घर' कहलाता है और टीन पर सपरेल वाला घर हथेली हो गया। बाबू साहब का घर है न! होली कहलाता है। रिक्शे वाले से मैंने बात की। दो रुपये में मक्कापुर चोक तक जाने के लिए वह तैयार हो गया। मां रिक्शे वाले से कहने लगी, "नही जानते हो फूल बाबू की हवेली ? अरे, मक्कापुर चौक से एकदम सटी हुई ही है।" मैंने सुना। सोचा, एक किलोमीटर की दूरी मा एकदम से पचा गई है। पोच रोड़ को दोनो तरफ धूसर-वीरान सेतों का अंतहीन दायरा था। खजूर और ताई के इक्के-दुक्के पेड़ अकेलेपन के किसी अभिशाप से ग्रस्त खुद में जलावतनी का एहसास करा रहे थे । शाम से पहले सूरज को बुझती हुई आग धूल मे सन कर धुआं-सो रही थी। सूरज आधा बांस ऊपर था जब रिक्शा नदी के पुल पर पहुवा। रिवशे वाला अपनी तरफ से कुछ कहता इसके पहले ही मां उत्फुल्ल होती हुई बोली, "आ गया कोलासी घाट मक्कापुर चौक! "वह रहा शिव मंदिर।"~मदिर नहीं, "टूटे हुए मंदिर का अवशेष । मां के मन्दिर दशब्द पर गौर करते हुए मैंने सोचा। कोलासी घाट पर रिवो वाले ने रिक्शा रोक दिया। पसी सड़क वहां थोड़ी देर विलम कर उधर उत्तर की तरफ मुड़ जाती है । सड़क के मुहाने के कुछ दूर बाद में मामा की हवेली दिखने लगती है। विस्कुल देहातिनों की तरह मां ने माथे पर गट्ठर रख लिया था। एटेची मैं हाथ में लटकाये हुए था। मां के पैरों में जाने कब की छिपी हुई चपलता उभर आई थी। निर्देशिका की तरह वह आगे-आगे इस तरह चल रही थी जसे गांव की हर मेड़ मां के पैरों की पहचानी हुई हो। थोड़ी दूर आगे वह खंडहरनुमा शिव मंदिर मिला ! गभिषों के दिन का दीर्घजीवी .

40: सरहद के पार सूरज अभी डूबा नहीं था। मा मंदिर के पास जाकर रुक गई। गंबद नहीं होने के कारण मंदिर सिरकटा-सा लगता था। मंदिर के दरवाजे के पास मां ने घुटने टेक कर मंदिर को या घरती माता को सिर नवाया। कुछ क्षणो तक जाने क्या बुदबुदाती रही । थोड़ी-सी मिट्टी चुटकी मे लेकर मां ने मेरे ललाट पर लगा दी। गोधूलि वेला के क्षीण प्रकाश मे मैंने मां के चेहरे को देखा। मा एक क्षण के लिए एकदम अपरिचित-सी प्रतीत हुई। अपरि- चित, चचल और माटी के अनुराग में भरी-भरी-डबडबाई आखों वाली मां। उस खडहरनुमा मंदिर के जाने किस मलबे से बूढ़े पंडितजी निकल आये – रहस्य-रोमाच के किसी कथा-पात्र की तरह । सामने खड़े थोड़ी देर तक पहचानने की कोशिश करते रहे। मा ने पंडित के पर छुये और मुझे भी वैमा ही करने का इशारा किया। पडितजी की रीढ़ एकदम झुकी हुई थी और एक हद तक वे चौपाये को हरह चल कर अंदर से आये थे। छोटे- छोटे सफेद केश । उम्र का आखिरी हेमंत पंडितजी की विरूप आकृति को कुछ-कुछ डरावना बना रहा था। पंडितजी मां को पहचान नहीं पाये। याखिर मा ने अपना नाम बताया, "नही पहचाना? बुच्ची दाय"फूल वायू की बेटी।"पुरनियां वाली।.." झुके चेहरे के कारण मैं पडितजी की मुस्कुराहट देख नहीं पाया। सिर की कंपकंपी में हास के आंसू छिपे हुए पेशायद । आंधी को सायं-सायं जैसी आवाज में वे कह रहे थे, "अब नही सूमता है बेटी। पल-फिर भी नहीं पाता। मंदिर की हालत देख ही रही हो। कोई मरम्मत कराने को तैयार नहीं । वह तो थोड़ी-सी जमीन है मदिर की, इसलिए सा-पी लेता हूं किसी तरह । गाव अव वह नही रहा बुच्ची दाय । तीन चार वर्ष से रोज ही मार-दंगा। फेस-मुकदमा । अभी हाल ही में रजपुताही और सोलकान टोसे में मार-पीट हुई। रजपुताही का एक बादमी मारा गया। उधर यादव-कुरमी-पानुक भी घायल हुए। कुछ सोग अभी तक अस्पताल में पड़े हुए हैं। पुलिस-पलेट्री का अड्डा यना हुआ था अव्यय अतीत :41 गांव । अभी तक पुलिस को जीप बाती रहती है पंडितजी की भीगी और भर्रायी आवाज से लगा, वे रो रहे हैं । उनका इस तरह रोना कई दशाब्दियो पहले की बुच्ची दाय से मुलाकात होने के कारण था या नष्टप्राय मंदिर के क्लेश के कारण या गाव की दुर्दशा के कारण यह मैं समझ नहीं पाया। फिर सोचा, मृत्यु के कगार पर पहुंची उम्र में आंखें बरसाती बादलों की तरह यों ही बरसने लगती हैं। सूरज छिप गया था, लेकिन उजास अभी अंधेरे में पूरी तरह विलीन नहीं हो पायी थी। मंदिर के मागे कच्चे रास्ते पर टोले का एक आदमी मिल गया था। मां उस बीस-बाईस वर्षीय युवक को पहचानती तो नहीं थी, लेकिन उसके बाप को जानती थी। नाम मुझे याद नहीं है। इतना ही याद है कि उस युवक ने अपने नाम के आगे मंडल लगाया था। उस युवक से मां खोद-खोदकर गांव का हाल-चाल पूछ रही थी। मरियल-सा वह युवक मजदूर वर्ग का मालूम होता था। पहले वह खुलता नहीं था, लेकिन मां से परिचय हो जाने के कारण खुला तो खुलता ही गया। गांव के दहशत भरे माहौल के विषय में उसने जो कुछ बताया उसका साराश यह था कि गांव में दुर्भावनाओं का जहर फैला हुआ है। अगड़ी और पिछड़ली जातियों के जो पढ़े-लिखे लड़के हैं उन्होंने ही इस जहर को ज्यादा फैलाया है। कुछ वर्ष पहले नौकरियों में आरक्षण के सवाल को लेकर यह गांव दो भागो में साफ-साफ बट गया था। मार-पीट होती रही। कुछ दिनों बाद राजपूत टोले के लोगों ने एक यादव लड़के की हत्या कर दी। हाल में यादवो ने इसका बदला लिया। एक राजपूत लड़के को अकेले में पकड़कर जान से मार दिया और लाश को नदी में बहा दिया। उसके बाद तो राजपूतों और छोटी जातियों में रोज ही मार-पीट होने लगी। गांव में पुलिस-चौकी कायम कर दी गयी। अभी भी कुछ लोग अस्पताल में हैं और कुछ लोग जेल में। दोनो पक्षों से केस-मुकदमे चल रहे हैं।

42:मरहद के पार गांय अशांत है।"पगडंडी पर अलग होते-होते उस युवक ने सलाह दी कि ऐमें गांव में जाना ठीक नहीं है। बिल्कुल एक सोप में तीन टोलों को पार कर जो टोला मिला उसका पहला पर मां के मायके का यह घर पा जिमको मां बटे गवं से फूल बाबू की हथेली कहती हैं । मैं यहां दो यार पहले भी आ चुका था। पिछली बार इम हवेली फो देसा था तो लगा पा, एक मिटता हुभा-मा बाकार शेष है, लेकिन इस बार नोवो या दसयों को पांदनी रात में उस हवेली फो देखा तो लगा, जैसे कोई पुराना मंसाड़ पेड़ हो यह हवेली। भांप भाप करते सन्नाटे में मां के साथ होली के सामने मड़ा पा। मां बार-बार अजोघीदास को पुकार रही थी । यही कोई प्रत्युत्तर नहीं पा। थोड़ी देर बाद एक यूटा आदमी हाय में पुरानी-मी घुआती सालटेन लिए अंदर आंगन की तरफ से निकला। मां को येसास्ता पहचानता हुआ बोला, "अरे ! वुच्ची दाय!".."उसकी आवाज भीतरी माह्लाद को हंसी में विलुप्त हो गयी। फिर वह सहसा युद्बुदाया, "मुदा देर हो गयी आने में। छोटका मालिक आज ही चले गये ।" मां अचानक उदास हो गयी, "आये, आज ही चले गये छोटका भया?" मां को विस्मित-विमूढ देख कर मुझे चिढ से भरी हुई सुशी हुई। मां को अपने छोटका मैया से इतना नेह-छोह है । दिन-रात प्रशसा की माला जपती रहती हैं और भाई हैं कि एक दिन अपनी मगी बहन के लिए रुक नहीं सके। उस भग्न हवेली के जिस कमरे में अजोधीदास ने हम दोनों के सोने का इतजाम किया था, वह कमरा असुरक्षा का भय उत्पन्न कर रहा था। किवाड़ का एक पल्ला अलग से उढकाकर पूरे किवाड़ की शक्ल बनायी गयी थी। लालटेन को मरियल-सी रोशनी में कमरा भयानक प्रतीत हो रहा था। मैं चाह रहा था कि लालटेन हटा दी जाए। कभी-कभी अपर्याप्त रोशनी से भय बढ़ जाता है। अजोधौदास की गतिविधियो से मुझे मामास हो गया था कि अव्यय अतीत :43 हमारी खातिरदारी के लिए सही गया का भी नहीं है हवेली में घंटे भर कही बाहर रहा अजोधीदास शायद हा भोजन के इंतजाम में लगा हुआ था। इस बीच में दरवाजे के बाहर कुएं के पास आ गया था और तजवीज कर रहा था कि जो हवेली कुष्ट व हिरे में देखकर गया था वह कितनी बदली है । गर्मियो को धूमिल-सी चांदनी में सारा माहौल बड़ा उदास और गमगीन लग रहा था। अहाते के बाहर पक्के कुएं का गोलाकार ऊपरी भाग टेंढा होकर थोडा झुक गया था। कुएं की जगत टूटी हुई थी और वहां छोटे-छोटे जगली पोधे उग आये थे। नारियत के कुछ पेड़ तो सही-सलामत थे, लेकिन सुपारी के सिर-कटे पत्र-हीन पेड़ खूटे की तरह गड़े मालूम होते थे। खाना खा लेने के बाद अजोधीदास बताने लगा कि मेरे छोटे मामा सब बेंच बाचकर हमेशा के लिए यहां से चले गये हैं। दरवाजे के बाहर ठूठ सुपारी के पेड को मैंने फिर देखा। इस बार मुह कटा पेड़ किसी वाक्य पर अतिम पूर्ण विराम की तरफ प्रतीत हुआ । अजोधीदास ने बताया कि पिछली बार बडे मामा आये थे। उन्होने अपने हिस्से की जमीन-जायदाद बेच दी। सुनकर मां एकदम चुप हो गयी थी। उनके मायके मे अपना कहने के लिए कुछ भी नहीं बचा था। बूढा अजोधीदास कमरे की चौखट के पास बैठा था । बहुत देर की चुप्पी के बाद मा ने पूछा था, "तुम्हारे लिए तो भैया ने कुछ छोड़ा होगा?" अजोधीदास निरुत्तर था: धरती में सिर गडाये चौखट को उगलियों से खुरचता हुआ बहुत धीरे से वह बोला, "नहीं, कुछ नहीं ।.." मा आत्मालाप-सी करने लगी, "बाबूजी बोलकर मरे थे कि दो एकड जमीन अजोधीदास को गुजर-बसर के लिए दे देना। बासगीत भी लिख देना।" नहीं दी जमीन किसी ने। वेचारा जीवन भर हवेली की सेवा करता रहा । बड़का भैया छोटका भैया और मैं सब इसकी गोद में खेले हैं। बूढ़ा हो गया सेवा करते-करते । इतना ईमानदार आदमी किसी ने कुछ नहीं ......

44: सरहद के पार दिया।......" अपने मायके के लिए मां का सारा उत्साह ठंडा पड गया था। रात भर प्रवासी और बेजमीन होने को कुंठा से ग्रस्त मां जागती रही थी। नोंद मुझे भी नहीं आयी थी। रात भर चमगादडों के फड़फड़ाने और बाहर पेडो पर बादुर पक्षी के वजनदार हनों की आवाजें सुनाई पडती रही । सवेरे जब आखें लगने को हुई तो पिछवाडे के बगीचे से कोयल की मीठी आवाज आ रही थी। कमरे के बाहर आया तो देखा, गांव के कुछ लोग खड़े हैं। दो बूढ़ी औरतें ड्योढी पर खड़ी थी। उधर कुएं की जगत पर तीन-चार आदमी थे जो अपनी आकृति से किसान या खेतिहर मजदूर प्रतीत होते थे। मां कमरे के बाहर निकली। मैंने देखा, दोनो औरतों से बारी-बारी मा गले मिल रही हैं । फिर मां को और दोनो औरतो को आंचल से आखें पोंछते हुए देखा । उन भावाकुल क्षणों से मैं बिल्कुल उदासीन था और सिर-कटे सुपारी के पेड पर घढ रहे सूरज को देख रहा था। दरवाजे पर आकर मा उन दोनों बूढों के पैर छूने लगी। अजोधीदास ने मुस्कराते हुए मुझे बताया कि उन दो बूढों मे से एक लवखन केवट है । मल्लाह है । मा जब छोटी थी और नदी पार के अपर स्कूल मे पढने जाया करती थी, तो यही लक्खन केवट नाव से पार करता था। जो बूढा लाठी टेकता हुआ चलता था उसके विषय में अजोधीदास ने बताया कि वह चतुरी गोप है। दोनों औरतों में से एक जो सन की तरह फरफराते उजले केशों वाली बुढ़िया थी वह लुखिया चमाइन थी । अजोधीदास ने हंसते हुए में कहा, "तुम नही जानते होगे बबुआ, तुम्हारी नानी को जब दूध नहीं उतर रहा था तो तुम्हारी मां को बरही के पहले इसी चमाइन ने अपना दूध पिलाया था। दूसरी बुढ़िया के विषय में मालूम हुआ कि वह गांव की नाइन है। अजोधीदास सबेरे-सबेरे गांव में मां के आगमन की खबर बाट आया मेरे कान अव्यय अतीत :45 था। गांव की पड़ी-बूढ़ी औरतें, अधेड़-बूढ़े लोग मां से मिलने आ रहे थे। मुझे आश्चर्य और दुख हो रहा था कि मेरे मामा के गोतिया-दियाद सब हैं बगल में । अच्छे खाते-पीते और धनी लोग हैं सब के सब । लेकिन अभी तक कोई भी मां से मिलने नहीं आया था। मां अपने जिस 'छोटका- भया' से मिलने इतनी दूर से आयी थी वे एक दिन रुक नहीं सके । आपसी स्नेह और अतीत के लगाव का ढिंढोरा पीटने वाली मां की घोषणाओं की निस्मारता पर सोचकर मुझे हंसी आ रही थी। मजोधोदास से मालूम हुआ कि मेरे चचेरे मामा वगैरह इस बात के लिए खार खाये बैठे हैं कि छोटे मामा और बड़े मामा ने उनके हाथ जमीन-जायदाद क्यों नहीं वेची। दुश्मनों के हाथ जमीन और हवेली बेचकर उनको बेइज्जत क्यों किया गया? दिन चढते चढते दरवाजे पर बहुत लोग एकत्र हो गये थे। मैंने गौर किया, तमाम औरतें, मर्द और बच्चे सब निचले तबके के लोग थे। सब मां को अपने घर ले जाने की जिद कर रहे थे। मां उन औरतों मे किसी फो भौजी, किसी को काकी, किसी को दोदो, किसी को बुआ भादि रिश्तों से संबोधित कर रही थी। कोई भी औरत या मर्द बिना रिश्ते का नहीं था। मुझे आश्चर्य हो रहा था --बूढ़े झंखाड पेड़ों जैसे इन गंवार लोगों के बीच मां अभी तक इतनी प्रिय कैसे बनी हुई हैं। गांव की भयावह राजनीति के विषय में जो कुछ सुना था उसके साथ मां को समर्पित इस स्नेह और सम्मान को संगति नहीं बैठ पा रही थी। मां को अपने-अपने घर ले जाने की जिद में आखिर चतुरी गोप की विजय हुई। चतुरी गोप के घर मे मैं मां के साथ दो दिन रहा। चतुरी साधारण किसान था। दरवाजे पर गाएं और भेमें थीं। उन दो दिनों में मां ने और मैंने जितना दूध-दही खाया, मुझे याद नहीं कि कभी इतने कम समय में इतना दूध-दही खाया हो। बड़े-से बट्टे में मलाई वाला दूध जब मैं पी रहा होता तो देखता, मां गर्व से मुस्कराती हुई मेरी ओर देख - 46 : सरहद के पार रही हैं। आंखो ही आंखो में मा शायद पूछ रही होती थी—इतना दूध मिला कभी पीने को?...."सुबह-दोपहर-शाम लोग मा से मिलने आते रहते थे। पिछले समय की जाने कितनी सारी बातों और घटनाओ की माज के दूपित परिवेश के प्रसंग मे याद की जाती थी। गांव के वे लोग जो दुनिया से चले गये, वे लोग जो किसी तरह जी रहे हैं, सब बातो के सिलसिले में आया करते थे। बीच-बीच मे मेरी ओर देखकर मां मुझसे कहने लगती कि उस जमाने में किसी तरह पूरा गांव ही घर जैसा था। मैं मन-ही-मन कहता-माज भी क्या फर्क पड़ा है मां! मामा की हवेली विक जाने के बाद भी तुम्हारा मायके पहले की तरह सुरक्षित है। हां, जिमसे तुम मिलने आयी, बंबई वाले तुम्हारे वे 'छोटका भैया' एक दिन तुम्हारे लिए रुक नहीं सके। .. पाचवां दिन या और लौटने की जिद के बावजूद मां को इजाजत नहीं मिल रही थी। इस बीच मां के साथ में भी कुछ घरो में जा-जाकर खाना खा आया था। फिर भी कई लोगो के निमंत्रण पडे हुए ने घर की समस्याओं का रोना रोया तब जाकर छठे दिन चतुरी गोप से आज्ञा मिली। विदा के समय चतुरी गोप के आंगन-दरवाजे पर भीड़ लग गई थी। संख्या बूढ़े और बुढियों की ज्यादा थी। मामा के चचेरे भाइयों का संपन्न टोला बगल में ही था, लेकिन उधर से कोई झांकने तक नही माया या। अजोधीदास से मालूम हुआ, आज ही मामा के चचेरे भाई जयपाल बाबू की बेटी मालती का द्विरागमन है । मा सिर उठाकर मालती नाम की लड़की को अपनी स्मृति मे तलाशने लगी। अजोधीदास ने मुस्कराते हुए कहा, "मालती को तुम नही जानती होगी बुच्ची दाय । पटने में रहकर पढी-लिखी है। साल-छमाही कभी आती पी यहां। हम लोगों को क्या मतलव ! आती थी तो बस घर मे ही बंद रहती थी। किसी से मिलती- जुलती भी नहीं थी। कहती थी वत्र देहात है यह।.." मा पाअधयक्षतीत 7 मां मुझसे कहने लगी, सुनते हा छोटू, जयालि मैम्प को चेट्टी का द्विरागमन है आज । मैं यही है। कोई बुलाने हो माया-" अजोधोदास ने बताया कि जयपाल वावू कहते हैं, बुच्ची, मेहमान बनी हुई है । हम क्यों पूछने जाय ?..., गंदे-फटे कपड़े पहने मैली-कुचली बूढ़ी औरतों, कुछ 'कनिया-बहुरिया' लड़के-लड़कियों और किमान-मजदूर तबके के कुछ अधेड़-बूढ़े लोगों से घिरी मां जिप्त समय कच्चे रास्ते पर आयी, गमियों का सूरज ललाट तक चढ़ आया था। एक काफिला-सा था मा के साथ । रास्ते पर थोड़ी ही दूर आगे बढा था वह काफिला। मामा के टोले की तरफ से एक जीप आयी और पूरी भीड़ पर धूल झोंकती हुई निकल गई। मालूम हुआ, जीप पर मालती थी। पहली विदाई में ससुराल जा रही है। दुल्हा लखनऊ में इंजीनियर है। दुल्हा इंजीनियर है चाहे कुछ है, लेकिन मा को विदा करने आयी उस भीड़ के आमने-सामने इसी गांव की मालती नाम की लड़की को वह पहली विदाई धन और प्रतिष्ठा के प्रदर्शन के बावजूद मुझे एकदम फीकी और पराई मालूम हुई। मुझे लगा जैसे शहर की ओर से आकर पाहर की ओर जाने वाली इस जीप के लिए यह गांव सर्वथा अपरिचित था। अपने शरीर पर पड़ी धूल को झाड़ते हुए मैंने आगे देखा। गांव को कच्ची सड़क पर धूल उड़ाती भागने वाली जीप धूल में ही अदृश्य हो गई थी। मां को विदा करने आयी औरतें रो रही थी। मां भी रो रही थीं। अपनी रुलाई रोकने की कोशिश में असफल मेरी भी आंखें डबडया आयी। मा के मायके से मेरा कोई गगात्मक संबंध नही था, फिर भी विदा होने का वह समय बडा गमगीन और भारी हो गया था। लगता था जैसे गांव के इन लोगों के साथ मैं भी लबे समय तक जुड़ा रहा हूं और सबको छोड़ कर जा रहा हूं। भावुकता में डूबी अपढ़-गंवार औरतों के द्वारा मां कं 48 : सरहद के पार विदा करने का वह दृश्य तो ऐसा प्रतीत होता था जैसे गांव की बेटी पहली बार ससुराल जा रही हो। रिक्शे पर मेरी बगल मे बैठीमा बार-बार पीछे की ओर मुड़कर देखती थी। मुंह मे तो जैसे आवाज ही नहीं रह गई थी मां के। वह वाचाल प्रकृति जो आते समय मा मे देखी थी अव सागर में विलीन नदी बन गई थी। मैं भी चुप था । ऐसी खामोशी या तो दुख के बोझिल क्षणों में होती है या आत्मिक आह्लाद से भरे हुए क्षणो में । जब कुछ भी बोलना उस गहन स्थिति को हल्का करने की कुचेष्टा बन जाता है। (धर्मयुग, 12 मई 185) अपनी-अपनी जगह विशाचालको को तीन दिन की हड़ताल खत्म हो चुकी थी। किसी अधिकारी या सत्ता-प्रतिष्ठान से रिक्शाचालकों को मांग नहीं थी, आम जनता से किराया बढ़ाने की मांग थी, इसलिए इकतरफा समझोता कर लिया गया। यानी रिवशाचालकों ने किराया बढ़ा दिया। मैंने भी सोचा कि ठीक ही है । महंगाई के आधार पर जब नौकरीपेशा वाले लोग आये दिन हडताल कर भत्ते बढा लिया करते हैं तो रिक्शाचालको की मजदूरी भी बड़नी ही चाहिए। ये शोपित मजदूर हैं और महंगाई वेतहाशा भाग जिस दिन रिक्शाचालकों की हड़ताल समाप्त हुई उसी दिन अपने एक रिश्तेदार से मिलने हॉस्पिटल जाना था। मिलकर सर्जरी वार्ड से बाहर निकला तब तक शाम हो गई थी। जाडे की शाम । पछिया हवा 'सिहर रही थी। मेडिमिन वार्ड के सामने से गुजरा तो पोटिको के आगे एक लाश के पास एक औरत को बैठे रोते देखा। थोड़ा हटकर एक आदमी भी सिर पर हाथ रखे रो रहा था। हॉस्पिटल में ऐसे कारुणिक दृश्य अक्सर दिखाई पड़ते रहते हैं । यहां तो जिंदगी और मौत का ही खेल चलता है। अक्सर मौत हारती है, लेकिन कुछ मामलों मे जिंदगी ही हार जाती है। बहरहाल, हॉस्पिटल में किसी की मौत क्षणिक करुणा के बुलबुले ही उत्पन्न कर पाती है।

50 : सरहद के पार लोग पोटिको के आगे रखी हुई लाश की वगल से आ-जा रहे थे। एक नजर उधर देखते और निकल जाते। मैं लाश के पास खड़ा हो गया था । लाश किसी बच्चे की थी। तय था कि रोने वाले स्त्री-पुरुष बच्चे के माता-पिता रहे होगे। उन दोनो को देखने से ही लगता था कि वे बेहद गरीब हैं । स्त्री मली.. फुचली और अस्त-व्यस्त साड़ी पहने हुए थी। पुरुष नंगे पांव था और गंदी सी धोती लपेटे था। एक झूलता हुआ-सा फटा-पुराना साफ स्वेटर था उसके बदन पर। उम्र चालीस-पंतालीस के मास-पास मालूम होती थी। लाश के पास ही बोरिया-बिस्तर की एक बड़ी-सी गठरी पड़ी थी। मैं अवसन्न और उदास उस लाश के पास खड़ा रहा । स्त्री और पुरुप की गरीबी और निस्सहायता बच्चे की लाश के साथ घुल-मिलकर ऐसी कारुणिक परिस्थिति उत्पन्न कर रही थी कि मैं नजरंदाज कर आगे नहीं बढ पा रहा था। पुरुप से मैं कुछ पूछना चाहता था, लेकिन यह दुख में इतना डूबा और बदहवास था कि कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी। थोड़ी देर बाद पुरुष से पूछ-ताछ की तो मालूम हुआ कि महीने भर से ये बच्चे को लेकर अस्पताल मे पड़े थे। एक तो दवा के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे, दूसरे कर्मचारियों और जूनियर डॉक्टरो की हड़ताल हो गयी। पैसे वाले रोगी तो हॉस्पिटल छोड़कर प्राइवेट क्लिनिक मे चले गये, लेकिन वे कहां जाते। रात पिछले पहर बच्चा मर गया। बातचीत के सिलसिले मे मालूम हुआ कि पुरुप पटने मे रिक्शा चलाने का काम करता है। बच्चे की बीमारी की खबर पाकर गांव आया था। प्राइवेट मे इलाज कराने का साधन नहीं था, इसलिए लोगों की सलाह पर बच्चे को हॉस्पिटल में भर्ती कराया। पंसे की व्यवस्था नहीं हो पा रही पी। इसलिए उसके गांव के ही एक रिक्शाचालक ने उपाय सुझाया । गांव का यह रिक्शाचालक कुछ दिनो के लिए शहर छोड़कर बाहर जा रहा पा। उमी ने सि के मालिक से कह-सुनकर अपने एवज में इस आदमी अपनी-अपनी जगह : 51 । -- । को लगा दिया। पुरुप अब रिक्शा चलाने लगा था। दिन भर की जो कमाई होती, उससे बच्चे की दवा वगैरह खरीदता। पचीस-तीस रुपये वह कमा लेता था। छोटे डॉक्टरो की सहानुभूति भी उसे मिल रही थी। सब ठीक- ठाक ही चल रहा था, लेकिन इसी बीच जूनियर डॉक्टरों और कर्मचारियों को हडताल हो गयी। फिर तीन दिन रिक्शे की हड़ताल रही। सारा काम लडखड़ा गया। हॉस्पिटल मे हड़ताल हुई तो देखभाल करने वाले जूनियर डॉक्टरो ने सलाह दी कि प्राइवेट इलाज मे बच्चे को लेकर वह चला जाय । प्राइवेट इलाज का खर्च उसके बूते की बात नहीं थी। आखिर बच्चा रात पिछले पहर मर गया। तफसील में पूरी बातें सुनने के बाद मैंने पूछा कि अब लाश को लेकर वह कहां जायेगा । पुरुष ने बताया कि वह गांव लौटना चाहता है। वही लाश को दफनायेगा। गांव के लिए बस मिलती है। लेकिन बस-अड्डा दूर है और शाम हो गयी है। उस पुरुष की आंखें किसी रिक्शे पर थी। उसके साथ-साथ मैं भी आगे सड़क पर आ गया। वह बड़ी बेसब्री से कोई रिक्शा खोज रहा था ताकि बस अड्डे पर पहुंचकर आखिरी बस पकड़ सके । उसने कहा कि समय ही नहीं है, वरना अपने रिक्शा-मालिक से मिलकर वह खुद ही कोई रिक्शा मांग लाता । नुक्कड़ पर उसने दो-तीन रिक्शाचालकों से बात की, लेकिन कोई भी लाश को लादकर ले जाने के लिए तैयार नहीं था। वह पुरुष जो खुद रिक्शा-पालक था, रिक्शा-चालको को खुशामद कर रहा था, लेकिन सदियो को शाम में कोई भी लाश को लादकर बस-अड्डे तक जाने के लिए तैयार नहीं था। शायद उसकी खुशामद से तंग आकर रिक्शा- चालक उम नुक्कड़ से धीरे-धीरे खिसकने लगे थे । एक रिक्शा चालक को रोककर मैंने अनुनय-विनय के लहजे मे समझाया--"अरे भाई, यह बेचारा तकलीफ में है । आदमी के नाते हो सही, मदद तो करो! ढाई-तीन किलोमीटर कौन-सी लंबी दूरी है ! पैसे तो दे हो रहा है यह !" 1 52 : सरहद के पार लेकिन मेरा कुछ भी प्रभाव रिक्शा-चालक पर नहीं पड़ा। वह झूठ- मूठ रिक्शे का ब्रेक-टायर वगैरह टो-टा का देखने लगा। फिर बहाना बनाने लगा-"मेरा तो रिक्शा ही खराब है।" बोलता हुआ वह धीरे-धीरे रिक्शा लेकर खिसक गया। वह पुरुप निराश होकर नुक्कड़ पर खड़ा रहा। जो रिक्शा चालक पहले इस नुक्कड पर खड़े थे वे थोड़ी दूर आगे पान चौक पर चले गये थे। शाम गहरा रही थी और ठंड भी बढ़ रही थी। मैं स्वेटर-कोट पहने हुए था, फिर भी ठंढ महसूस हो रही थी, लेकिन वह पुरुष जो फटेहाल था, अपनी बदहवासी में ठंड महसूस नहीं कर रहा था। पानचौक से एक रिक्शा लम्पपोस्ट की रोशनी मे माता दिखा तो मैंने निश्चय किया कि यह रिक्शा जरूर ठीक हो जायेगा। पता नही, उस अनजान देहाती गरीब आदमी से मेरी क्यों इतनी सहानुभूति हो गई थी कि यदि मैं वहां से चला जाता तो रात भर वेचनी से यही सोचता रहता कि संकट में पड़े उस आदमी का क्या हुआ? रिक्शा-चालक को हाय के इशारे से मैंने रोका। तब तक गोद में लाश लिए वह स्त्री भी सड़क पर आ गई थी। वह पुरुप झपटकर रिक्शे के पास पहुंच गया था। रिक्शा चालक को देखकर मुझे लगा कि यही रिक्शाचालक पहले यही इसी नुक्कड़ पर था। यह पुरुष रिक्शा चालक की खुशामद फिर करने लगा था, "किसी तरह पहुंचा दो भैया बस अड्डे तक । आखिरी बस छूट जायेगी!" में भी उस पुरुष के साथ हो गया था, "हां भाई पहुंचा दो नही तो बस नही मिलेगी।" रिक्शा-चालक ने आखिर अपना किराया बता दिया, "वीस रुपये लगगे बस अड्डे का।" "बीम रुपये ? अरे, वहा का किराया तो ढाई-तीन रुपये हैं।" "तोखोज लीजिये ढाई-तीन रुपये वाला रिक्शा।" वह आगे बढ़ने को हुआ तो मैंने लपककर उमको रोका । मुझे गुस्सा आ रहा था तीन रपये की जगह बीस रुपये ? रिक्शा चालक ने रियायत की-"ठीक है, अपनी-अपनी जगह : 53. पंद्रह दे दीजिये।" रिक्शा चालक उस समय रोगी की मृत्यु से निरपेक्ष चिकित्सक की तरह प्रतीत हो रहा था। गुस्से की गुंजाइश वहा नहीं थी। खुशामदी मुद्रा में सांझ और ठड को महसूस करते हुए मैंने रिक्शा चालक से दम रुपये पर तय करना चाहा तो रिक्शाचालक जो चालू किस्म का शहरी छोकरा था, विद्रूप हंसी में बोला, "कहीं ज्यादा माग रहा हू मालिक ! आखिरी आदमी की सवारी नहीं है, लाश है लाश !" (प्रसारित जुलाई '86) मोहरे कस्बे में 'वीर महाराणा प्रताप स्मारक कॉलेज' की स्थापना के साथ 'विचित्र-सी हलचल शुरू हो गयी । अव्वल तो कॉलेज के नामकरण पर ही उग्र मतभेद था । इस छोटे-से कस्बे में कॉलेज खोला जाय, इस बात पर सब सहमत थे, लेकिन सहमति के समय कॉलेज नामकरण सामने नहीं आया था। कॉलेज जब स्थापित होने लगा और नामकरण की समस्या सामने आई, तब भारी हंगामा शुरू हुआ। कॉलेज के लिए बाबू बसंत मिह ने अपना गोदाम खाली करवाया था। इसलिए उनका दावा था कि कॉलेज उनके पिता बाबू राजवंशी सिंह के नाम पर हो। राजपूत मोहल्ले के कुछ प्रभावशाली राजपूत आपसी ईर्ष्या के कारण इस नाम पर सहमत नहीं थे। वे लोग राजपूत गंधवाला कोई नाम जरूर चाहते थे, लेकिन राजवंशी बाबू का नाम कॉलेज से जुड़ जाय, यह उनको सह्य नहीं था। कॉलेज के लिए मात्र एक गोदाम दे देना नामकरण का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता था। विश्वविद्यालय से संबंधन की सुरक्षा-निधि के लिए पचहत्तर हजार की जो राशि एकत्र की गयी थी, उमका माधा भाग राजपूत मोहल्ले से दिया गया था। शेष राशि दूसरे मोहल्ले के लोगो ने दी थी। गोदाम के आमपास तीन एकड़ का प्लाट हुनुकलाल साह ने कॉलेज को दिया था। नुकलाल साह का कहना था कि कॉलेज उनके पिता अमुकलाल साह के मोहरे:55 , नाम पर हो । उनका दावा था कि गोदाम से सटी जमीन की कीमत गोदाम की कीमत से दुगुनी है। कस्बे के 'बनिया-समाज के लोग कहते थे कि कॉलेज महात्मा गांधी के नाम पर हो। गांधी जी के नाम का कोई क्यों विरोध करे ? गांधी जी तो राष्ट्रपिता थे! राष्ट्रपिता का जवाब राजपूतों ने महाराणा प्रताप से दिया। राजपूतो का कहना था कि वीर महाराणा 'प्रताप स्वाधीनता के प्रतीक थे। "कॉलेज के नामकरण की भावना के पीछे छपे हुए ययार्य, यानी जातिवादी कुत्सा को कोई प्रकट करना नहीं चाहता था। क्षेत्र के विधायक चूंकि यादव थे, इसलिए उनकी 'लावी' के लोग कॉलेज को चरणसिंह के नाम से जोड़ना चाहते थे, इसलिए स्थानीय स्तर पर यादव कुछ उन्नीस पड़ते थे, बनिये भी रणभूमि में सशस्त्र प्रकट होने की स्थिति में नहीं थे। लिहाजा, कॉलेज का नाम 'वीर महाराणा प्रताप स्मारक कॉलेज' ही रहा । प्रबंधकारिणी समिति के सचिव बाबू वसंत मिह थे। विश्वविद्यालय से संबंधन के आवेदन पत्र में उन्होने यही नाम रखा और समिति से इसका अनुमोदन करा लिया। इस पहले मोर्चे पर स्पाटत: राजपूतों की जीत हो गई थी। इधर धनिये, मादव और पिछड़ी जातियों के लोग कॉलेज को एक चुनौती के रूप मे ले रहे थे और चाहते थे कि एक ऐसा कॉलेज खोला जाय, जिसमें चरण सिंह के नाम के साथ गांधी जी का भी नाम रहे और कर्पूरी ठाकुर का भी। संसदीय चुनाव-क्षेत्र के सांसद हरिजन थे और उनका विचार लेकर कुछ हरिजन नेता उष्टल-कूद मचाये हुए पे कि अंबेडकर का नाम भी इसके शुरू में जोड़ा जाय । लेकिन यह नाम जम नही रहा था और 'अशोभनीय रूप से काफी लंबा हो जाता था। याखिरकार ऐसा कोई कॉलेज नहीं खुला और कस्बे में एकमात्र कॉलेन 'वीर महाराणा प्रताप स्मारक कॉलेज' को हो स्वीकृति दे दी गई। कॉलेज में असली जोर-आजमाइश तव शुरू हुई, जब शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारियों को नियुक्ति का समय आया। प्राध्यापक पद के 56: सरहद के पार - लिए 'डोनेशन' के रूप में दस हजार लेने की बात तय हुई। लिपिक-पद के लिए चार हजार और चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी पद के लिए तीन हजार रुपये लेने की बात निश्चित की गई। यह रेट तब और बढ़ाना पड़ा, जब उम्मीद- वारो की बहुत लबी कतार लग गई। कस्वे मे पहली बार चहल-पहल शुरू हुई थी। आज लोग इस छोटे-से कस्बे को मरी हुई झील ही समझते थे। अब जाकर मालूम हुआ कि इस झील मे कितना कीचड़ और कितना पानी है। जातीय स्तर पर जो सम- रसता पहले दिखती थी, अब खुलकर सामने आने लगी थी और लोग एक-दूसरे को जातीय आधार पर पहचानने लगे थे। हम तीन साथी थे इस कस्बे के, जो मिडिल स्कूल से साथ-साथ स्नात- त्तर स्तर तक पहुंचे थे। दो वर्ष से हम तीनों वेकारी झेल रहे थे। हम कई अन्तर्वीक्षाओ से निराश हो चुके थे और अपनी ऊब मिटाने के लिए सिनेमा पौक की एक चाय की दुकान को अपना अड्डा बनाये हुए थे। पिछले साल अवर सेवा चयन परिपद में टी० के० यानी तारेश्वर कुमार का चयन हो गया था, लेकिन पच्चीस हजार रुपये रिश्वत का जुगाड़ वह यथासमय नही कर पाया। दूसरा साथी वी० के० यानी विनय किशोर था, जो भौतिकी मे एम० एम० सी० था और कई अन्तर्वीक्षाओ मे पराजित या। तीसरा में या जी० के० यानी गौरीकांत । अर्थशास्त्र में एम० ए० और दो साल से बेकार। टी० के०, वी० के० और जी० के०-इन तीनों मित्रों का नियोग कस्बे में चर्चा का विषय था। हम लोग हालाकि अलग-अलग टोले मोहल्ले के थे, लेकिन एकजुट ये अपनी मित्रता पर हमें गर्व था। सच कहा जाय तो यह हम लोगों को मित्रता ही थी, जो हमे डाढ़स बंधाती थी। कोई एक अगर ऐसी स्थिति में होता तो शायद अकेलेपन मे ग्रस्त होकर दम्यू, उदंड या पलायनवादी हो जाता। संभव है, डाकुओ के गंग मे शामिल हो जाता। सेकिन, हम तीन पे और तीनों इस बात को महसूस करते थे कि हम एक- दूसरे का दुख बांट रहे हैं । मिडिल स्कूल सेमिनातकोत्तरे तुरा को पढाई के बीच हम लोगों को कभी यह एहसासविही तुम कि कौन किसी जाति का है । हम तीनो को अपनश भविसमा और हम ऊंच-नीच का भेद-भाव नहीं मानते थे। मैट्रिकुलेशन की परीक्षा का फॉर्म भरते समय ही हम तीनों ने अपने नाम के आगे से जातिवोधक पदवी हटा ली थी।टी० के०, वी० के० और मैं कभी कभी एक ही थाली मे खा भी लेते थे। स्नातकोत्तर उपाधि लेने के वाद जब घर बैठने की स्थिति हमारे सामने आयी, तो पहली बार हम तीनों को दिन में तारे दिखने का मुहावरा सार्थक प्रतीत हुआ । हम तीनों की पारि- वारिक पृष्ठभूमि भी ऐसी नहीं थी कि सिफारिश करा पाते या दस-बीस हजार घूस की व्यवस्था हो कर पाते । सरकारी-गैरसरकारी, कोई भी विज्ञापन निकलता, तो हम तीनों एक साथ आवेदन पत्र भेजते। 'पोस्टल आर्डर' खरीदने के हम इतने अभ्यस्त हो गये थे कि कस्बे का डाकपाल हमसे पहला सवाल यही करता था, 'पोस्टल आर्डर' चाहिए? हम मिदा हो जाते थे और मेंप मिटाने के लिए बिना वजह ही-ही करने लगते थे। हमारी नौकरी की जरूरत इस मीमा तक बढ गई थी कि हम तीनो उन पदों के लिए भी आवेदन पत्र भेजने लगे थे जिन पदो के लिए न्यूनतम योग्यता मैट्रिकुलेशन होती थी। ऐसी वेकारी के बीच और जगहो की देखा-देखी अपने कस्बे में भी कॉलेज खोलने की बात हुई तो हम बहुत खुश हुए। टी० के०, वी के० और मैं मोठी कल्पना में कई दिनों तक मुस्कुराते रहे । यह आश्वस्ति हमारे लिए काफी थी कि कहा तो लिपिक तक का पद भी हने नहीं मिल रहा था ओर कहाँ अब हम एकाएक प्राध्यापक हो जायेंगे। हम कॉलेज की स्थापना के प्रयास में जी-जान से जुट गये। चंदा करने से लेकर गांव-गाव पोस्टर बांटने, फ्लेट बांटने और अभिभावकों को विश्वास दिलाने की कोशिश में हम दो-तीन महीने तक परेशान रहे । चार-पांच महीने की जद्दोजहद की 58:सरहद के पार परिणति जब सामने आई तब मामला कॉलेज के नामकरण पर आकर सटाई में पड़ने लगा। हम तीनों ने ऐसे समय हिम्मत से काम लिया। हम लोगों को कॉलज खुलने से मतलव या। किमी राणा प्रताप, गांधी, जवाहर या लोहिया, परण वगैरह से हमको कुछ लेना-देना नहीं था। हम बेरोज- गार पे, रोटी का जुगाड़ चाहते थे, निरुपाय थे और अन्तर्वीक्षाओं में पिटे हए थे। लेकिन, इलाके में राजपूत, यादय, बनिये वर्गरह जिनके पेट भरे हुए पे, कॉलेज की स्थापना को एक सेल की तरह से रहे थे। उनकी मासेज से उतना मतलब नहीं पा, जितना कॉलेज के नामकरण से हम लोगों ने इस यक-भक और विवाद का हटकर विरोध किया और यही कोशिश थी कि फलिज किमी व्यषित-विशेष के नाम पर न हो, भले ही वह व्यक्ति गांधी- जवाहर-राणा प्रताप-परण-लोहिया कोई भी क्यो न हो । इन विभूतियों के माम के पीपे जातिवादी मकगद की गंध हम पा गये पे। यादय होकर भी टी. के. लोहिया-परणकर्पूरी आदिमा विरोध कर रहा पा और रामपूरा होने के बावजूद पी. के. महाराणा प्रताप या कुंवर सिंह के नाम का विरोधी पार म स्वयंशानिमा यनिया पा, पेरिन यह नहीं पाहता था कि कामिन मिमी यनिमाविभूति' के नाम में जाना जाय। मेरिन, हमारे करले गे पसा होता? विवाद मिल पुमा पा ओर पिया नो योप था, जिन्होंने बरती गमतिमा पुछ भाग तमिरगी स्थापना में ममाया पार्मिी ने मानित भवनमाम पर गोदाम सामी परायापा, रिमी मे मागागही जमीनदीपीरिणीने मार दिया था। हमारा परामही पमा माहित ीि गाड़ियों और नियों वापरतारगाम होगाामा गानो भी गया। मोहम्मामने-वीर महाराणा प्रmमारमित्रारी.., पी. t.rat..., पानी मोगरारमियादिपमो, मोहरे:59 कोई भी नाम रहे, क्या फर्क पड़ता है। बस कॉलेज रहे, इतना ही काफी टी० के० ने हिंदी विभाग में, वी० के० ने भौतिकी मै और मैंने अर्थ- शास्त्र विभाग में प्रथम पद पर ज्वाइन किया। कॉलेज की स्थापना में हमारी सेवा को देखते हुए प्रबंधकारिणी समिति ने हमसे चार-चार हजार रुपये किस्त पर अदा करने को कहा। हम तीनों ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। कॉलेज की प्रबंधकारिणी समिति के सचिव बसंत बाबू यद्यपि मैट्रिक पास ही थे, फिर भी कई हाई स्कूलों और इंटर कॉलेजों की स्थापना ने उनको काफी अनुभवी बना दिया था। यह बात दीगर है कि उनके धनी बनने का रहस्य ये संस्थाएं भी थी। जब से हम तीनों ने अपने-अपने विभाग में पद-भार ग्रहण किया, न जाने क्या हुआ कि हमारे बीच बचपन से मौजूद आपसी समझ और संकल्प के सूत्र में धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगे। पहले तो व्यस्तता आदि का बहाना लेकिन धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि वी० के० मुझसे कटा-कटा रहने लगा है । वह अक्सर कॉलेज के सचिव बसंत बाबू के साथ रहता था। इधर टी० के० का भी कोई चक्कर चल रहा था । वह अक्सर पटना दौड़ने लगा था। मालूम हुआ कि इस क्षेत्र के विधायक पुहुप लाल यादव और अन्य यादव नेताओं से वह कोई 'विचार विमर्श कर रहा है। मामला मेरी समझ में आता नहीं था कि यह दौड़-धूप आखिर क्या है ? कॉलेज की स्थापना मे सबसे ज्यादा संपत्ति लगाने वाले टुनुकलाल साह को प्रबंधकारिणी समिति का अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन अपनी बौद्धिक अक्षमता के कारण वह कठपुतली बने हुए थे। कुछ राजनीति वह समझ भी जाते तो डर से समिति की बैठक में बोल नहीं पाते थे। वणिक वर्ग के लोगों ने मुझसे कहना शुरू किया कि देखते क्या हो ? राजपूत, यादव, कुर्मी, नोनियां, धानुक सब अपने-अपने लोगों को कॉलेज में घुसा रहे हैं और तुम मुंह ताकते हो? फिर मालूम हुआ कि बी० के० इस कोशिश में है कि प्रोफेसर चला, 60: सरहद के पार -- एकदम अकेले इंचार्ज वही बने । वी० के० को असली हर मुझमे था, क्योकि एम० एस० सी० में उसको द्वितीय श्रेणी मिली थी और एम० ए० में मुझे प्रथम श्रेणी। हम तीनों के पद-भार ग्रहण की एक ही तारीख और एक ही समय था । पद-भार ग्रहणपत्र लिखते समय हम तीनों ने यह सोचा भी नही था कि प्रोफेसर इंचार्ज कौन बनेगा। मुझे मालूम हुआ कि वी० के० ने मुझसे और टी० के० से आतंकित होकर अपना पद-भार ग्रहणपत्र ही बदल दिया है। सचिव ने एक दिन पहले की तारीख मे वी० के० का पद-भार माना है। वी० के० अपनी इस चालाकी के कारण मुझसे मिलने मे घबराता था । बस फॉलेज में ही मुलाकात होती थी। मिलने-जुलने का हमारा पुराना अड्डा सूना हो गया था। हम तीनो अपने-अपने खेमे में थे, लेकिन पड गये थे। कॉलेज मे नियुक्तियो का सिलसिला जारी था। सचिव रुपये बटोर रहे थे, डोनेशन के नाम पर । सचिव बसंत बाबू विश्वविद्यालय का चक्कर लगाने हफ्ते में एक बार अवश्य जाया करते थे। निरीक्षण शुल्क उन्होने जमा कर दिया था। प्रोफेसर इंचार्ज का लेटरपंड छपकर आ गया। मैंने देखा, उस पर वी० के० का नाम था। टी० के० ने मुझसे कहा, "इसका विरोध करो। यदि तुम विरोध नही करोगे तो मैं करूंगा।" वी० के० को प्रोफेसर इंचार्ज बनाने का एक ही आधार था कि वह राजपूत था और सचिव भी राजपूत थे। एक हिमाव से कॉलेज की पूरी व्यवस्था राजपूतो ये हाथ में चली गई थी। हम लोगों के शुरूवाले प्रयास से पचास से भी अधिक छात्र नामांकित हो गये थे। उधर टी० के० अपनी जोड़-तोड़ मे लगा हुआ था। यादव विधायक ने उसको चढ़ाया । टी० के० ने यादव तथा अन्य पिछड़े वर्ग के छात्रों का एक गुट तैयार किमा। उधर वी० के० ने सचिव से मिलकर ब्राह्मण. राजपूत-भूमिहार और कायस्थ छात्रो का एक दल तैयार किया। कॉलेज के सबसे बड़े होनर और प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष टुनुकलाल साह ने मुझे अपनी गद्दी पर बुलाया और समझाना शुरू किया, "तुम्ही तो मोहरे:61 - हम बनियों की आंख हो। इस तरह चुप क्या बैठे हो ? दो लाख की संपत्ति मैंने दो और राजपूत राज करें? चुल्लू भर पानी में डूबकर मर नही जाते ? जितने रुपये की जरूरत हो, मुझसे लो, लेकिन पीछे मत हटो।" टुनुकलाल साह के चचेरे भाई हरिकिशनलाल साह अधिसूचित क्षेत्र के उपाध्यक्ष थे। उन्होंने भी मेरी पीठ ठोकी, "किसी भी हालत में विनय और तारकेश्वर को पछाड़ना है। आगे हम देख लेंगे।" हरिकिशनलाल साह कांग्रेस (इ) के जिला-मत्री थे। उनकी बात मे मुझे वजन महसूस हुआ। इस बीच टी० के० ने प्रोफेसर इंचार्ज का अपना दावा ठोंक दिया और सचिव पर पक्षपात का आरोप लगाकर वी० के० की छीछालेदर करते हुए विश्वविद्यालय के कुल-सचिव को लंबा पत्र लिखा। कॉलेज का निरीक्षण हो चुका था और पता चला कि वी० के ० और टी० के०, दोनो ने मेरे साथ दगाबाजी की है, तो मैंने भी वरीयता का अपना दावा ठोंक दिया । सचिव को अग्रिम प्रति भेजकर सोधे कुल सचिव को आवेदन पत्र लिखा । अब वी० के०, टी० के० और मैं, तीनों अलग-अलग विभागों के अपरिचित प्राध्यापक की तरह स्टाफ रूम मे (रूम गोदाम का गंधाता हुमा अंधेरा कमरा था) मिलते थे। हमारी वातचीत लगभग बंद हो चुकी थी। कॉलेज में दो-तीन गुटों में बंटे छान जब-तब जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाते थे। दो बार स्थिति तनावपूर्ण हो गयी। थाने के दारोगा को आना पड़ा, रायफलधारियों के साथ। जब-तब बगल के राजपूत टोले से समर्थक लाठिया आ जाती थीं। एक बार टी० के. के समर्थन सेना भी आ गई बगल के टोले से। मेरे पास लाठी का बल नही पा। मुझे वार-बार महसूस होता था कि टी० के० ओर वी० के० ने मेरी पीठ मे छुरा घोंपा है। कॉलेज के समय के बाद हम तीनो पुराने मित्र अलग-अलग ग्रुपों के साथ रहते थे। टी० के० का उठना-बैठना विधायक जी के यहा होता था या यादव टोली के मुखिया प्रमुख के यहां। वी० के० प्रायः सचिव वसंत बाबू की मोटर साइकिल की पिछली सीट पर छिपकली की तरह यादव- - 62 : सरहद के पार सटा दिखायी पड़ता था। मैं प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष हुनुकलाल साह की 'गद्दी पर अपने ममर्थकों के साय सुबह-शाम बंटने लगा था। इस वीप मेरी जानकारी के दायरे के बाहर एक और पटना घट गई। कुछ दिन याद मालूम हुआ कि जो जमीन कॉलेज को दी गई है, उसकी बदोवस्ती का फागज पुस्ता नहीं है। टुनुकलाल साह के छोटे भाई सुयुक लाल साह ने उग जमीन को लेकर 'पार्टीशन सूट' डाल दिया। वकील ने कागजात की प्रति विश्वविद्यालय के कुलसचिव को भेज दी। कुछ ही दिनो में कुलसचिव का पत्र आ गया कि प्रस्तावित कॉलेज अनिवार्य शत पूरी नहीं कर रहा है, इसलिए किसी भी स्थिति में इसके सबंधन पर विचार नही किया जायेगा। कॉलेज उजड़ गया। कॉलेज के अहाते की जमीन को ट्रैक्टर से जोता जाने लगा। कॉलेज-भवन मे गोदाम का पुराना ताला झूलने लगा। धीर महाराणा प्रताप स्मारक कॉलेज' का बड़ा-सा बोर्ड एक पनवाडी खलीफा उठाकर ले गया। कस्बे का मकवूल पेंटर टीन की उस चादर की पीठ पर अमिताभ बच्चन का चेहरा बनाने लगा। जिन उम्मीदवारो ने सचिव को होनेशन दिया था, वे सचिव के दरवाजे की धूल फांकते देखे गये। वी० के०, टी. के. और मैं फिर अपने उसी धरातल पर लौट आये थे। एक दिन मैंने वी० के० को पान की दुकान पर लाटरी का टिकट खरीदते हुए देखा। मुझको देखकर उसने कन्नी काटने की कोशिश की, लेकिन मैंने झपटकर उसको पकड़ लिया। उसकी पीठ पर एक घोल जमाते हुए कहा, "कहो प्रोफेसर इंचार्ज?" वह हंसने लगा । हम दोनों काफी देर तक अपनी मूखंता को याद कर हसते रहे। हंसते-हंसते हम दोनों टी० के० के घर गये । टी. के. बैठक में दरवाजे की तरफ पीठ किये गमगीन बैठा था। दवे पर हम दोनो बैठक में घुसे। वी० के० ने टी० के० को बांह पर एक घूसा मारा। टी० के० अचकचाता हुआ मुडा और हम दोनों को देखकर वैवकूफ की तरह हंसने - मोहरे : 63 लगा। वी० के० ने उसकी बांह पकड़कर उठते हुए कहा, "उठ साले प्रोफेसर इचार्ज!' सिनेमा चौक की तरफ जाते हुए हम तीनों को चाय की ललक थी। मैंने वी० के० की जेब टटोली । जेब में पैसों की जगह लाटरी के कई टिकट ये। एक टिकट एक करोड़ का था। उसने टिकट मेरे हाथ से झटक लिये। टटोलने पर टी० के० की हिप-पॉकेट में तीन रुपये मिले । चाय की दुकान मे हम तीनों बैठ गये थे। दूकान के मालिक बैचन मंडल से मैंने कहा, "ये बेचन "तुम जब रामलीला-पार्टी में थे, उस समय की वह बात एक बार फिर सुनाओ तो! क्या होता था रामलीला में...? राम और रावण रंगमंच पर युद्ध करते थे और ग्रीन रूम में लौटकर एक ही बीड़ी आधी राम पीते थे और आधी रावण"" इस बात पर वेचन के साथ वी० के०, टी० के० और मैं खूब जोर से हंसे। टी० के० ने चाय की पहली चूंट ही ली थी। वह हंसते-हंसते बुरी तरह खांसने लगा। वी० के० देर तक अपनी दाहिनी हथेली से उसका सिर ठोंकता रहा। (उत्तरगाथा जुलाई,'86) आतंक बहुत संक्षिप्त-सा तार आया या गांव से । कोई खुली हुई वात तार की भाषा में नहीं थी। वस जल्दी आने को कहा गया था। नीचे बड़े भइया का नाम था-रामनरेश । बड़े भइया का तार देना एक बड़ी बात थी। अध्वल तो वक्त जरूरत ही वे कभी-कभार खत लिखते हैं । साल-छमाही, कभी किसी खास बात को लेकर उनका खत पहुचता है । पिछले दो वर्षों में उनके सिर्फ तीन खत मिले थे। पहला खत बड़े बहनोई के देहांत की सूचना का था, दूसरा खत छोटी बहन की शादी की तारीख लेकर आया था और तीसरे खत में बड़े भइया की बेटी मालती के गोने की सूचना थी। बस कुल जमा तीन ही खत दो वर्षों की अवधि में मुझे मिले थे। लेकिन अचानक यह तार ? " मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वजह क्या है। यदि कोई बीमार होता या किसी की मृत्यु आदि की भी बात होती तो संक्षेप में लिखा जा सकता था तार मे भी। मैं चिंतित भी था और गुस्सा भी आ रहा था। साफ-साफ क्यों नही लिखा बड़े भइया ने ? दफ्तर मे आकस्मिक अवकाश का आवेदन-पत्र फेंका और रात को गाड़ी से गांव के लिए रवाना हो गया । दूसरे दिन सबेरे गाव के स्टेशन पर उतरा। स्टेशन के पास ही दुर्गा-मन्दिर के अहाते में दशहरे-मेले की तैयारी आतंक: 65 'शुरू हो गई थी। दूकानों की पास-पट्टियाँ' गिर रही थीं। पटेर को घटा- इयों और पूटे तिरपाल पगैरह टंग रहे थे। हल्के मुहामे मे लिपटी सुबह और घटक मोठी पूप । आश्विन को सप्तमी यो यह । दुर्गा-मन्दिर से ढोल- बाया की आवाज मा रही थी। मैं कुछ देर के लिए चिन्ता पेयेन्द्र से अलग होकर आस्विन के खोल की आवाज की मादकता में सो गया। मेरे 'माता' दाद पर पिसी शहरी सस्कृति में पले आदमी को हगी मा मफती है । सैकिन यह सच है कि मुभ-जैसे गाव में पले आदमी पे लिए भादियन के टोल फो आयान महल भावान नही है । माश्विन को हो मुहागे वाली गुपह को नीरवता में टोल फी मायान एक पूरा परियेत है। सदउदामी में मिरहा गाती भरपाई की यात्री को क्या नाम दिया गाय ? मंमे कहा जाय हमरो कि मोग गे नहाई मारियन की भोर और धनसेतों पर यि बुहागे को पारदी मीसिमा ये स मे कौन-मा सुरा मिलता रैमये स्टेशन रे उस पार गढ़क मे मुहाने पर गिरदेव पाना में मुना. पास हो गई थी। उन्होंने अपका कर मुझे देना दा- "बहुम देर मे आगिवेग!" "देर होहु पापा! गातार पिमा मौर पनदिया। नारद सिता भीमो नहीं पाकि"गिर पापारीमा मगा पाकिमही बात करेंगे।

66 : सरहद के पार । और मझली दीदी बगल में बैठी हुई थी । बड़ा भतीजा अमरेन्द्र दीवार के सहारे खड़ा था। बडे भइया को नीद का इंजेक्शन दिया गया था। वेसुध थे। मालूम हुमा, भाले और छुरे के गहरे घाव हैं। सिर पर और चेहरे पर पट्टियों के कारण भइया की पहचान एकदम खो गई थी । एका- एक वातावरण बहुत कारुणिक हो गया था। हाक्टर से बात हुई । डाक्टर ने बताया कि अब चिन्ता की बात नही है । जान बच गई। भाभी ने आंखें पोंछते हुए कहा कि डकैतों ने कुछ भी नही छोड़ा। गहने रुपये, बर्तन- वासन, कपड़े सब ले गये । भतीजी मालती पहले गौने के बाद लौटी थी। उसके भी सारे समान डकैत ले गये। बाद में मालूम हुआ, सिफ एक महीने में यह तीसरी डकैती थी गाव में। इसके पहले भगतजी के घर डकैती हुई थी। भगतजी का लड़का महेन्द्र उसी मे मारा गया। महेन्द्र स्कूल का मेरा साथी था। जब भी मैं गांव लोटता था, मेरा ज्यादा समय महेन्द्र के साथ कटता था। दो-तीन वक्त का उम्दा खाना तो उसके घर खाना ही पडता था मुझे ! उस लंगोटिया यार के इस तरह मरने की बात सुनकर बहुत तकलीफ हुई थी मुझे। दूसरी डकैतो पचम यादव के घर हुई और आठ दिनों बाद यह डकैती हुई। एक श्रृंखला में तीनों डकैतिया दहशत पैदा करती थी। डकैतों के विषय में कोई कुछ बोलता नहीं था। तीसरे दिन बड़े भइया से थोडी बातचीत हुई । उन्होंने कहा कि डकैत आये तो खूब शोर हुआ। उनका बड़ा लड़का अमरेन्द्र दालान में सोया हुआ था। वह भाग निकला। गांव में दौड़-दौड़ कर वह चीखता-चिल्लाता रहा, लेकिन एक भी आदमी घर से बाहर नहीं निकला । कती के विषय में सुनकर तो कुछ लोगों ने किवाड-खिड़कियों को अच्छी तरह बन्द कर लिया। डकैत लूट-मारकर चले गये तो गांव के लोग जमा हुए । वडे मइया ने कुंहरते और फुसफुसाते हुए मुझमे कहा कि यहां अस्पताल में तो नही, लेकिन घर लौटने पर अमली बात बतायेंगे। भाभी ने एकदम एकांत में मुझे ले जाकर बताया कि डकतों 1 आतंक: 67 - की शिनाख्त तो आसानी से हो सकती है, वे आसानी से पकड़े भी जा सकते हैं, लेकिन नाम बताना खतरे से खाली नहीं है। दारोगा जी भी पूछ रहे थे कि किसी को पहचाना तो बोलो। मगर बोले कोन? क्या दारोगा जी नही जानते हैं ? फिर भी पूछने लगे की डकैत किस भाषा में बोलते थे, कैसे घुसे घर मे, डील-डौल कैसा था, वगैरह-वगैरह। गोल-पटोल बता दिया बड़े भइया ने । सही बात नही कही। मैं चकरा गया सुन कर । पूछा भाभी से, "आखिर डर क्यों है भाभी? जब भइया पहचानते हैं, आप भी कुछ को पहचान गई तो पुलिस को बताने में क्या हिचक है ?' बड़े भइया से बात हुई । अस्पताल में तो कुछ बताने से वे इनकार कर गये, लेकिन तीसरे दिन जब बैलगाड़ी पर लादकर उन्हें घर ले आया गया तो मैंने फिर वही शंका की, "आपने पहचाना डकंतो को ?" भइया इधर- उधर सूंघते हुए धीरे से बोले-~-"अरे पहचाना क्या, रोज ही देखता हू । लेकिन..." "लेकिन क्या ? जब आपने पहचाना तो बोल देना पाहिए दारोगाजी को अभी ममय बीता नहीं है।" भइया एकाएक सख्त हो गये, "तुम नहीं समझोगे शिवेश! मैं सिर्फ दो को छोडकर चौदही-पंद्रहो को पहचानता हूँ । अपने यहां हलवाहा पान बिसुनियां ! वही घूम-घूम कर घर में रखी चीजों को बता रहा था। मुंह पर कपड़ा बांधे हुए था, लेकिन योली को कहां छिपाता! दुलिया सरदार था डकैतों का। वह भी बगल के गांव का है। कई बार आया है मेरे पर खर्चा-पानी लेने । इन तमाम डकैतों को अपने मुखियाजी का संरक्षण प्राप्त है। उन्हों को बंदूक जाती है डकैती में। पिछले माल नेपाल योर पर जो हकती हुई थी उसमें मुखिया जी को बन्दूक पकड़ी गई थी। लेकिन मुरिया- जी ने पेंच बिठाकर बन्दूक ले ली दारोगा से । बन्दूक पाली बात को 'मtre तोप' दिया गया। दुलिया भी पकड़ा गया था। उसकी पैरवी होने ।

68 : सरहद के पार अपने विधायक जी खुद परवी कर रहे थे। जमानत हो गई उसकी। डकैती और मर्डर के कई केस चल रहे हैं दुलिया पर । कुछ केसों में वारंट भी हैं उसके ऊपर, लेकिन खुले आम घूमता है। पुलिस देखती है । कुछ करती नही है । एक दूसरा गैग है समसुलवा का। तीन-चार महीने पहले समसुलवा ठीक सात बजे शाम मे मोटर साइकिल पर आया। गांव की हाट थी उस दिन ! उधर दूकान में लोग सौदा-सुलुफ ले रहे थे, इघर आंगन में घुस गया समसुलया और दुलीचन्द सेठ को गोली मार कर चला गया। गोली मारने के पहले बोला कि बेईमानी और दगाबाजी की सजा देने आया है वह । दुलीचन्द सेठ डकतो का माल रखता था। सुनते हैं, लेन-देन में कोई झझट हो गई थी। दुलीचन्द को गोली मार कर जब समसुलवा जाने लगा तो यह भी चेतावनी देता गया उसके बेटे को कि अगर किसी से नाम कहा तो पूरे खानदान को मार डाला जायेगा। सुबह दारोगाजी आये। 'फिर वही बात पूछने लगे, "पहचाना? कौन था?" दुलीचन्द के बेटे ने नाम नहीं कहा। "तो यह हालत है अपने गांव को !" मेरी इस स्वगतोक्ति पर बड़े भइया धीरे-धीरे कराहने लगे । घावों से भरे उनके चेहरे पर आत्मदया या विवशता का ऐसा भाव उभर आया जिसे महसूस कर मैं चुप रह गया । बडे भइया कहने लगे, "कोन आफत मोल ले नाम बोल कर? पंचम यादव के यहां डकैती हुई। कुछ दिनों बार डकतो के हो एजेंट पंचम यादव से कहने आये कि माल पडा हुमा है । वापस चाहते हो तो रियायती दाम पर लोटा दिया जायेगा। पंचम यादव का बेटा गया और जरूरी सामान खरीद कर ले आया। पुलिस के पास कौन जाय ? और जाकर भी क्या होगा? सबको सांठ-गांठ है । सिर्फ बाहर से दिखाने के लिए है गिरफ्तारी केस- मुकदमा! कुछ दिन पहले जब दुलवा कंत की गिरफ्तारी हुई तो यहां के 'एम.एल०ए०, मुखिया, प्रमुख सब में होड़ लग गई कि कौन दुलवा की परवी करता है।

'आतंय - मेरे भीतर बौखलाहट हो रही थी। आवेश में बड़े भइया से कहा, "लेकिन इस तरह चुप रह जाने से काम नहीं चलेगा! और प्रोत्साहन मिलेगा अपराधियों को ! लोग इसी तरह हर कर डकैतो के नाम बताने से कतराते रहे तो दूसरे लोग भी यही काम करने लगेंगे "बड़े भइया के चेहरे पर वही अमहाय भाव था, "सो तो है शिवेश ! लेकिन यह आफत कौन मोल ले ? नाम कह देने पर गवाह नही मिलेंगे। डकैत गिरफ्तार भी होंगे तो पैरवी से छूट कर चले आयेंगे और उसके बाद फल मुगतने के लिए कोन तैयार होगा? गाव की हालत तो ऐमी हो गई है कि कही डकैत होती है तो पड़ोसी अपने किवाड़ कस कर बन्द कर लेते हैं । कोई घर में निकलता नहीं है । इलाके के जितने धनी लोग हैं सब डकैत पाल कर रखते हैं। कोई डकैत जेल चला जाता है तो उसके परिवार का खाना-कपडा वह धनी लोग देते है । वोट के समय नेता लोग इन्ही डकतो की सहायता ले हैं। जो डकैतों को नहीं पातते उन्ही के घर डकैती होती हैं, उन्हीं की जान जाती है।" मैं अपने तर्क पर अडिग था, "नही भइया, इस तरह चुप रहने से कार नही चलेगा। मैं कल जाता हूं, सुबह की बस से एस० पी० से मिलूगा सच्ची बात बताऊंगा कितना आतंक फैल रहा है गाव में।" भइया एकाए घबरा-से गये, "नही शिवेश ! यह काम मत करना ! रहना है हम लोगों क यहां ! तुम तो आग लगा कर चले जाओगे। बाद में किसी दिन तुम तर खबर पहुचेगी कि रामनरेश मारा गया। मेरी शपथ." मैं चुप रह गया । भीतर विचित्र-सी बेचैनी थी। शाम के कुछ पहले बाजार की तरफ जा रहा था तो रास्ते में सिरदे चाचा ने मुझे एकांत में बुलाकर कहा, "तुमको तो सब पता चल ही गर होगा शिवेश ! लेकिन कही कहना मत । यदि चाहते हो कि तुम्हारे पनि वार पर कोई आफत न आये तो मन की बात मन में ही रखना।" सुनक में हतप्रभ रह गया। गांव का हर भादमी इस तरह हरा हुआ है कि खुल क 70: सरहद के पार बोल भी नहीं पाता। यह नपुंसकता भयावह प्रतीत हो रही थी मुझे। उस दिन गांव की हाद थी। हाई स्कूल के सामने जहां हाट लगती है, में पुराने वरगद के नीचे बने हुए चबूतरे के पास खडा हो गया। मन-ही-मन किसी हमउम्र साथी की तलाश भी करता रहा। मन में आ रहा था कि कोई पिछले समय का संगी-साथी मिलता तो खुल कर बात करता। मन तो हल्का हो जाता कम-से-कम ! इसी समय मेरा भतीजा अमरेन्द्र मेरे पास आया। मुझसे सट कर धीरे-धीरे कहने लगा, "चाचा, बीच रोड पर उधर एकांत में जो आदमी मुखियाजी से बात कर रहा है न "देख रहे हैं ? .. वह लम्बा-सा भादमी ? वही है दिलबा। उसी ने डकैती की थी अपने घर !" कहते हुए अमरेन्द्र डर रहा था। दिलबा को अच्छी तरह पहचानने के लिये मैं थोड़ा आगे बढ़ गया । मुखियाजी ने मुझे देखा और दिलवा को छोडकर मेरी तरफ बढ आये, "कहो शिवेश ! कब आये ? उसी बात को लेकर आये होगे, क्यों?" "हा, वही बात थी।" "अरे मैंने तो कहा रामनरेश से कि किसी को पहचाना तो बोलो दारोगाजी भी पूछ रहे थे, लेकिन किसी को पहचान नही सका रामनरेश ! इधर तो गांव की हालत बहुत खराब हो गई है। डकैती-मर्डर इतने बढ गये हैं कि कुछ समझ में नहीं आता। दारोगाजी का तबादला हो गया है इसी कारण । दूसरे दारोगा आ गये हैं चार्ज लेने !" मैं मुस्कराया, "दारोगा का तबादला हो जाने से सब ठीक-ठाक हो जायेगा मुखिया जी ?" मुखियाजी वगल झांकने लगे, -"सो बात तो नही है शिवेश ! मगर सरकार तो अपना काम करेगी।" कहते हुए मुखियाजी आगे बढ़ गये। मैं वही खड़ा रह गया । कोई ऐसा आदमी नहीं मिल रहा था गांव की हाट में जो मुझसे मिल-बैठकर थोड़ी देर बातचीत कर सके। जिस गांव में पूरा बचपन बीता, जिस गांव का हर चेहरा पहचाना हुआ था, उसी गांव की हाट में ढेर सारे लोगों को पहचानते हुए भी मैं अकेला खड़ा था। कोई - आतंक: 71 -संगी-साथी दिखता भी है तो आंखें चुरा कर आगे निकल जाता है । कही लोगों को यह तो नहीं लग रहा है कि डकैती की बाबत मैं किसी से पूछ. ताछ कल्गा? मुझे असह्य अपमान-सा महसूस हो रहा था। वहां महानगर की अपरिचित भीड़ मे कोई बात करने वाला मिले तो अस्वाभाविक नहीं लगता, लेकिन यह तो अपना गांव है ! यही सब मैं सोच रहा था कि चाम की दूकान के पास एक आदमी पर मेरी नजर पड़ी। तीन-चार आदमियों से घिरे उस कद्दावर जवान को मैंने पहचाना और चुपके-चुपके उसके पास चला गया । जाने कौन-सी आत्मीय शरारत मुझे सूझी कि पीछे से उस लम्बे-सगड़े आदमी को मैंने कलाई पकड़ ली, "कशों इन्दर ? देख कर आखें चुराते हो आय...?" इन्दर हाई स्कूल में मेरा साथी था। बचपन से एक साथ पढ़े थे हम दोनों। इन्दर मुझे देखकर पहले तो सहमा, फिर मुस्कुराने लगा । उसके मुस्कुराने में स्वाभाविकता नहीं थी, एक बनावटी. पन था या व्यवहार का छल था जो मुझसे छिपा नही रहा। चाय पान की उस दूकान में इन्दर ने मुझे चाय पिलाई, पान खिलाया। इधर-उधर की बातें की। लेकिन मुझे यही महसूम होता रहा कि इन्दर के भीतर धवरा- हट है और मुझसे पिंड छुड़ाने की कोशिश कर रहा है । फिर मिलने की बात कह कर इन्दर अपने शागिदों में जा मिला। थोड़ी देर बाद अमरेन्द्र फिर आया मेरे पास, "चाचा, किससे बात कर रहे थे आप ?" "क्यों ? वह तो इन्दर था-इन्द्रानन्द ! अरे मेरा लंगोटिया यार था वह !" अमरेन्द्र विद्रूप-सी हसी हंसने लगा, "रहा होगा आपका लंगो- टिया यार ! अब तो वह इनरा डकैत है। अपने यहां की डकैती में इनरा भी था। आपको क्या पता होगा!" मेरे पैर तले जमीन जैसे खिसक रही थी। लग रहा था, यह कोई तिलिस्म है, कोई अजनवी दुनिया है। अपना गांव नहीं है यह"। इन्दर जब स्कूल में मेरे साथ पढ़ता था, अक्सर मेरे घर आता था। मां और भाभी के पैर छूता था। एक ही थाली में खाते थे हम दोनों । वहीं - 72 : सरहद के पार - इन्दर डकैती करने मेरे घर आया था?..." अपना गांव एकाएक बेहद पराया और क्रूर दिखने लगा। शाम को घर लोटते हुए मैं यही सोच रहा था कि अपने गाव से ज्यादा सुरक्षित तो मेरा शहर है। कुछ होता भी है तो कम-से-कम मुझ-जैसे गाव के लोगों के मन मे मोह के आइने तो नही टूटते हैं ? यह सन्तोप तो रहता है कि चलो, यह शहर पराया है । अपना गाव थोडे ही है ? .. कच्ची सडक की बगल में गाव की चौपाल एकदम सूनी थी। आश्विन की नवमी का चांद आममान में चमक रहा था। उस धुधली-सी उजास में चौपाल के चबूतरे के ऊपर झंखाड पाकड़ को ठूठ मोटी डालियां कटे हाथों की तरह दिख रही थी । चबूतरा एकदम ढह गया था। दिन में चौपाल की इस जगह को देखा था। इस पर जंगली घास उग आयी थी। लाल- भूरी-मटमली इंटें जगह-जगह से उखड कर नीचे गिर गयी थी। सिर्फ वीच में थोड़ी-सी जगह बची हुई थी। इस चबूतरे को देखकर जाने क्यो, मुझे मरणामन्न कुष्ट रोगी की याद आयी थी जिसका अंग-अंग सड़ा हुआ था, हाथ-पांव की उंगलियां कट-कट कर गिर गयी थी । शायद मोसमी हवा में रची-बसी हल्की ठंडक के कारण या अपने जेहन में उभरी एक भयावह सादृश्य कल्पना के कारण मेरी देह मे सिरहन हुई थी। जुगुप्सा भरी उस कल्पना से बचने की कोशिश करता मैं घर लौट रहा था। आस- पास के घरों के बाहर कही भी रोशनी नही थी। शाम में ही लोग कछुए की तरह अपने-अपने में सिमट गये थे। एक जलती हुई लालटेन मद्धिम-सी चांदनी में गमगीन और डरी-डरी-सी दिखाई पड़ती थी। ऐसा लगता या जैसे दीवाली को एक रात पहले घर के पिछवाड़े में रखा हुआ 'यम का दिया' हो! बहे भइया दलान की खाट पर लेटे हुए फूहर रहे थे। थोड़ी देर पहले गांव का कम्पाउंडर इजेक्शन देकर गया था। बडे भइया के पायताने भाभी उदास मंठी लालटेन की रोशनी की तरफ एकटक देख रही थी। स्याह आतंक:13 ! शीशे में रोशनी नही, रोशनी की परछाई थी और घुआं भरा हुआ था। भाभी की खोई-खोई-सी मनःस्थिति में भविष्य की आशंका थी या हाल ही में लुटी-पिटी घर-गृहस्थी का नामद अनुताप था, यह मेरी समझ में नहीं आ रहापा। भइया चुप थे। कभी-कभी कराहने की घुटो-घुटी आवाज सुनाई पड़ती थी । भाभी पहले की तरह स्याह शीशे वाली लालटेन की तरफ देख रही थी। पुआं उगलती रोशनी की परछाई वाली वह लालटेन हमारे बीच के फैले मौन को ज्यादा गहराती प्रतीत होती थी। भइया धीरे-धीरे कहने लगे, "तुमको तो सब पता चल ही गया है शिवेश! लेकिन डकैतों के बारे में किसी से कहना नहीं । नहीं तो जीना मुश्किल हो जायेगा हम लोगों का! तुम तो रहोगे नहीं । झेलना तो हम लोगों को पड़ेगा!" मैं चुपचाप सुनता रहा। बडे भइया की नवविवाहिता पुत्री मालती गर्म पानी ले आयी थी। हल्के अंधेरे में लिपटी मरियल-सी रोशनी में भी मालती की सूनी कलाइयां, सूने कान और सूनी गर्दन दिख रही थी। गोरे चेहरे पर विषाद का मौन था । मैं उस भयावह कल्पना को झेल नही पा रहा था। वचपन का वह साथी इन्दर जो एक ही थाली में मेरे साथ खाता था, भाभी खाना खिलाती थी और जब तक हम दोनो खाते रहते तब तक सड़ी रहती थी हमारे पास उस इन्दर के हाथ कैसे उठे होगे मालती और भाभी के गहनों पर, यह सोचकर मैं बेहद हैरान था । झपट्टा मारते उन खूस्वार पंजों की भयानक आकृति वन रही थी मेरे भीतर और वे पंजे धीरे-धीरे बड़े होते जा रहे थे। रात काटना मुश्किल हो गया था मेरे लिए। पूरी रात जागता ही रह गया था। मेरे भीतर गांव को लेकर मोह का जो घुला-पुछा आईना नगर-जीवन के एकांत में मुझे प्रतिबिंबित करता था। बिलकल टूट चुका था। मेरे भीतर जमे हुए अतीत की कोमलता में टूटे हुए शीशे बेतहाशा धंस रहे थे।

74: सरहद के पार वापसी के समय बड़े भइया घावों के दर्द से कराहते हुए रोने लगे थे। भाभी आसू पोंछ रही थी और मालती सूनी उदास आंखों से मेरी तरफ देख रही थी। बड़े भइया और भाभी के पैर छूते हुए मैं खुद रो पड़ा था। दशहरे की 'यात्रा' थी उस दिन । दुर्गा-स्थान से दशहरे के ढोल की आखिरी आवाज आ रही थी। लेकिन उस आवाज में रूमानी अहसासों की बाहट तक नही थी। मुझे लगता था, मातम की मुनादी है यह ! गाव की पुरानी चौपाल के उसी प्रागण के णस पंडित दूधनाथ मिल गये थे। कलश- पंक पर जनमी 'जयती' लिये पौरहित्य का रटा हुआ विजय-पाठ पढ़ते हुए उन्होने 'जयंती' मेरे सिर पर रखनी चाही थी, लेकिन मैंने उनका हाथ बीच मे रोक दिया, "नही, पडित जी "जयंती नही।" पाकड़ को ठूठ डाली पर डोमकोआ अशुभ-सा उचार रहा था। (सारिका, अगस्त-प्रथम'86) झूठी कहानी का सच हर शहर में, हर कस्बे में, हर गांव में एक आदमी है। इस आदमी को मैं रोज देखता हूं।शहर या कस्बे में वह रिक्शा खीचता है, खोमचों पर ठेलों पर मामान बेचता है, लोगों के बाल काटता है, जूते सोता है मा कुली-कबाड़ी का काम करता है। उसकी औरत रद्दी कागज के थैले बना- कर बेचती है, सिर पर फलों की या सब्जी की टोकरी लिए सड़क-सड़क, मुहल्ले-मुहल्ले आवाज लगाती फिरती है या सुविधा प्राप्त लोगों के घरों में दाई का काम करती है । यही औरत घर-घर घूमकर खाली कनस्तर, बोतल-शीशिया वगैरह तरीदती है और कबाड़खानों में वैच आती है। ऐसे कई तरह के काम यह आदमी और इस आदमी की औरत करती है। यह आदमी हर शहर में है, हर कस्बे में है, हर गांव में है । यह आदमी न रहे तो न शहर रहेगा, न कस्वा रहेगा, न गांव ही रहेगा। इस आदमी का माम कुछ भी हो सकता है। मसलन वह सीताराम है, अनवर है, अलबर्ट है, हरभजन है नाम में क्या रखा है! गरज यह कि इस आदमी की औरत घर में बैठी नहीं रहती। वह कुछ-न-कुछ काम करती है-ऐसे काम जिनका मकसद पेट से सीधे जुड़ता है। यह आदमी और यह औरत आज के कथा-साहित्य के केंद्र में है । इस आदमी और इस औरत पर मैंने भी कई कहानियां और कुछ उपन्यास लिखे हैं । यह औरत मैरे उपन्यासों में भी है, मेरी कहानियों में भी है। यही 76:सरहद के पार : औरत मेरे घर मे दाई का काम भी करती है । यह दाई जो मेरे घर में सुबह-शाम चौका-बर्तन करने आती है, अपनी गोद में छह-सात महीने के बच्चे को लेकर आती है। जब वह काम करती होती है तो बच्चे को बाहर बरामदे पर रख देती है । दाई के घर में कोई नहीं है जिसके भरोसे वह अपने बच्चे को छोड़ आये। बड़ा बेटा नौ-दस साल का है जो कहने को तो नगरपालिका स्कूल में पढता है, लेकिन मैं अच्छी तरह जानता हूं कि जब स्कूल ही सिर्फ नाम का है तो पढाई क्या होती होगी ! खैर, मैं दाई के बड़े बेटे के विषय में नही, दाई के विषय में बात कर रहा हू । वह दाई सवेरे-शाम मेरे घर में काम करने आती है और जब भी आती है अपनी गोद मे बच्चे को लिए आती है । फटे-गंदे कपड़े में लिपटे बच्चे को वह वाहर बरामदे पर रख देती है और अपने काम मे लग जाती है । बच्चा रोता रहता है और वह काम करती रहती है । बच्चा जब रोते- रोते बदहवास हो जाता है और हम लोगो के लिए भी इसका रोना असह्य हो जाता है, तब वह बच्चे को गोद में ले लेती है । बच्चा जब तक गोद मे रहता है तब तक चुप रहता है, लेकिन गोद से अलग होते ही फिर रोने लगता है। सुबह मेरे लिखने का सबसे अच्छा समय होता है-सबसे निरापद और शांत समय, लेकिन ठीक इसी समय दाई अपने बच्चे को लिए चली आती है और मेरा रचनात्मक समय एकदम वेकार हो जाता है। दाई अलस्सुवह ही आ जाती है और सर्दियों में इतने सबेरे जग कर किवाह सोलने के लिए दरवाजे तक जाना तकलीफदेह होता है । परिवार में सारे लोग जब कम्बल-रजाई ओढे दुबके रहते हैं, उसी वक्त दाई किवाड़ खटखटाने लगती है। मन मे गुस्सा तो बहुत आता है, लेकिन किवाड़ खोलने के लिए मुझे ही उठना पड़ता है । रजाई मोढ़े में उस वक्त लिखता रहता हूं। मन-ही-मन दाई को कोसता हुआ किवाड़ खोलता हूं और निश्चित हो जाता हूं कि अब लिखना बंद । दाई अपने बच्चे को बरामदे झूठी कहानी का सच ; 77 पर रखेगी, बच्चा रोना शुरू करेगा और तब कुछ भी लिखना या सोचना संभव नहीं होगा। उसके बाद मेरी बौखलाहट शुरू होती है । पिचले तीन-चार दिनों से शीत-लहर चल रही थी। मैं घर मे ही वंद रहा और रूम-हीटर के सहारे समय काटता रहा । उसी शीत-लहर वाली एक सुबह दाई काम करने चली आई थी। रोज की तरह उस दिन भी दाई ने बरामदे पर दीवार की ओट में चटाई बिछा कर बच्चे को रखा और कमरो मे झाड़ देने लगी। बच्चा रोज की तरह रोने लगा। मुझे बौखलाहट होने लगी। लेकिन मुझे लगा, बच्चे का रोना कुछ दूसरी तरह का है. करुणा-मी कराह के साथ रोने की आवाज मुझे बेचैन करने लगी। ओवर कोट पहने मैं बाहर बरामदे पर निकल आया ! बच्चा चटाई पर पडा कराह रहा था। मैला-सा एक फटा ऊनी स्वेटर और सूती कपड़े की टोपी थी बच्चे के शरीर पर । मैंने दाई से कहा कि बच्चे को वह बरामदे से उठाकर अंदर वाले बरामदे पर ले जाए। दाई फर्श पोंछने का काम बीच मे ही छोड़ कर बच्चे को अंदर वाले बरामदे पर ले गई। अंदर हवा का झोका नही था। अंदर वाले बरामदे पर बच्चे को रख कर दाई फिर काम मे लग गयी और बच्चा फिर रोने लगा। बच्चे का रोना मुझसे बर्दाश्त नहीं हो था। उधर से ध्यान हटाने के लिए मैंने रेडियो की आवाज तेज कर दी। मैं भीतर से कुछ उद्विग्न हो गया था। दरअसल इस बच्चे के कारण मेरी हर सुबह बेकार हो जाती है। आज कुछ आवश्यक लेखन करना था। उपन्याम पूरा हो गया था और अब पहले दिये गये शीर्षक पर माथापच्ची चल ही रही थी कि यह दाई आ गई बच्चे को लेकर । मैं मानसिक वेचैनी की स्थिति में बाहर निकल आया और बरामदे पर चहलकदमी करने लगा। दाई ने बच्चे को अंदर वाले बरामदे पर चटाई बिछा कर लिटा दिया था। बच्चे के रोने और कराहने की आवाज बाहर तक आ रही थी। मुझे लग रहा था, यह बच्चा बीमार है। कोई डेढ़ घंटे बाद दाई अपना काम 78 : सरहद के पार - ममाप्त कर चली गयी। उम दिन शाम में दाई काम करने नहीं आई। दूसरे और तीसरे दिन भी 'वह काम पर नहीं आई। तीसरे दिन पत्नी से मालूम हुआ, दाई का वह बच्चा मर गया। बच्चे को न्युमोनियां हो गया था। दाई की गैरहाजिरी लंबे समय तक नही खिंची। सातवें दिन वह फिर काम पर लौट आई। ठड अभी चल ही रही थी। एकदम सबेरे का समय था और मैं कम्बल ओढ़े लिख रहा था। किवाद पर ठक-ठक की पहचानी हुई आवाज पर मैंने दरवाजा खोला। दाई अवसन्न भाव से सामने खड़ी थी। मैंने उसको गौर से देखा। उसकी गोद आज खाली यो। मैं कमरे में लौट आया और एक अधूरी कहानी पूरी करने लगा। हफ्ते भर पहले तक सबेरे का समय दाई के बच्चे के लगातार रोने के कारण वर्वाद हो जाया करता था। अब कोई ऐसी बाधा नही थी दाई घर को झाडने-वुहारने के काम में जुट गई थी। मैं अपनी अधूरी कहानी को आगे बढ़ा रहा था। मुझे राहत महसूस हो रही थी कि अब सवेरे का मेरा मूल्यवान समय बर्वाद नही हो रहा है। उसी समय मैंने सोचा कि यह कहानी जब पूरी हो जायेगी तब मैं इस दाई की जिंदगी पर एक कहानी लिखूगा । दाई की लाचारी और दुख पर एक अच्छी-सी दर्दनाक कहानी लिखी जा सकती है। पर्याप्त कपड़े, दवा और रख-रखाव के अभाव में उसका बेटा मर गया । कैसी करुण स्थिति है कि वह मातम भी नहीं मना सकी ठीक से । वच्चा मरा और हफो भर बाद ही काम पर चली आई। काम नहीं करेगी तो खायेगी क्या? उसकी इस लाचारी पर मैंने कहानी का प्लॉट बनाना शुरू किया दाई के बच्चे के मरने की कारक परिस्थितियों और स्वेदनात्मक सूत्रो पर सोचने लगा जिससे कहानी गरीबी के संघर्ष से जुड़ कर सायंक दिशा का संकेत दे सके । कहानी जव पूरी हो जायेगी तब मैं इस कहानी को किसी व्यावसायिक पत्रिका को प्रकाशनार्थ भेजूंगा । मुझ-जैसे स्थापित कहानीकार को कोई कहानी संपादक लोटाता झूठी कहानी का सच : 79 नहीं है, इसलिए कहानी छपेगी ही और छपेगी तो मुझे अच्छा पारिश्रमिक भी मिलेगा। सुबह और शाम को मेरा वक्न अब बर्बाद नहीं होगा। दाई अब अपने रोगी बच्चे को गोद में लेकर काम करने नहीं आयेगी। मुझे सुकून-सा महसूस हो रहा है । लगता है, एक लंबी मानसिक परेशानी से निजात मिल गई है। की मजूरी खुद महीना पूरा होने पर पागर देते समय मैंने दाई से पूछा कि वह कितने रुपये लेगी तो दाई ने पूरे महीने की पगार से एक सप्ताह ही कम कर दी। दाई ने जितना कहा, मैंने उसके हाथ मे रख दिया। एक मप्ताह के पूरे दस रुपये मेरे हाथ में बच रहे थे। मैंने इसे अपनी बचत मान ली और खुश हो गया। (आज, 7 दिसम्बर '86) विकल्प शहर को चिकनी सडकों पर दौड़ने वाली कार की आवाज गांव की कच्ची सडक पर आते ही बीमार आदमी की हफनी जैसी बन गई थी। धूल और घुआ दोनों ज्यादा हो गये थे। गति मद्धिम पड़ गई थी। कोई नगर-किन्नरी जैसे गांव की सड़क पर आ गई हो, मेरे अफसर मित्र की फिएट कार की वही दशा थी। अपनी इस ऊट-पटांग सादृश्य-योजना पर मैं मन-ही-मन हसा और गाव की सीमा में अपनी उम्र के पिछले पड़ावों की पहचान करने लगा। किसी आदमी को यदि यह माप करनी हो कि वह अपने से कितनी दूर चला गया है तो उसको उस जगह आना चाहिए जहां उसका बचपन बीता हो। पांच-छह साल वाद 'प्रसगवश' में गांव लौट रहा था। शुरू मई महीने का तीसरा पहर । दरवाजे के अहाते के बाहर बरगद की छांह में ड्राइवर को गाड़ी लगाने के लिए कह कर मैं दरवाजे पर आया। दरवाजे वाले बाहरी कमरे में खेती-बाड़ी की देख-रेख करने वाले रिश्ते के मौसेरे भाई राम विलास की तलाश की, लेकिन वह कही दिखा नही । अंदर आंगन की तरफ गया। थोड़ा वक्त लगा पहचानने में कि यह मेरा ही घर है । घर की बनावट में आये किसी बदलाव के कारण ऐसा नहीं था। घर तो विल. कुल वही था-सात कमरों वाला पक्के का मकान । आगन, बरामदे, विकल्प : 81 गलियारे वगैरह । इस मकान का नक्शा खुद मैया ने बनाया था और नक्शे मैं इसका पूरा ध्यान रखा गया था कि मकान गांव में बन रहा है । नगर, महानगर और गांव मे बनने वाले मकानो में सुविधा और बनावट की दृष्टि से जो बुनियादी फर्क रहता है, उमका मैया ने पूरा ध्यान रखा था। दहलीज के पास अचकचाया हुआ मैं खड़ा था। आंगन में तीन-चार बच्चे जो खेल रहे थे, मुझको देखते ही सहम गये । दक्षिण वाले बरामदे पर तीन-चार स्त्रिया वैठी हुई थी। उन्ही मे एक मां थी। मैं अकस्मात् पहुंचा था आंगन मे। मन के भीतर मेरी वह बाल-चपलता ही रही होगी जिसके तहत मैं मां को चकित कर देना चाहता था । मा ने मुझे देखा, लेकिन मुझे ऐसा नही लगा कि वह चकित हुई हैं। मुझे देख कर वह -स्वभावजन्य नेह भरी हसी हंसने लगी। औरतों के बीच से उठ कर आने लगी तो लपक कर बरामदे पर ही मैंने मा के पैर छू लिये । आह्लाद के आप्लावित आवाज मे मां ने पूरा, "इस तरह अचानक आ कैसे गए ?" इस बार मां को चकित करने में मैं सफल हो गया, "बस तुमसे मिलने आया हू और क्या !' मां शायद मातृत्व की गौरव-प्रतीति से मुस्कराने लगी। हालांकि मैं प्रसंगवश ही आया था, लेकिन यह बात मैंने मा से कही नहीं । दिल्ली से पटना आया था अपने एक आई०ए०एस० मित्र की बहन की शादी में शरीक होने। पटने से अपना गांव दो-ढाई घटे दूर था कार- यात्रा के हिसाब से । अफमर मित्र की कार उपलब्ध हो गई तो सोचा, मां से भी मिल ही लूं। जाने फिर कब आना हो इधर उत्तर बिहार को ओर। केंद्रीय इजिनियरिंग मेवा में होने के कारण भया जहां-तहां पद- स्थापित होते रहे। गाव आ ही नहीं पाते हैं। मां की देख-भाल का भार एक तरह से उन्होंने मुझ पर ही मौंप दिया है । लेकिन, मुझे भी फुसंत कहां मिल पाती है। जो पद जितना बड़ा दिखाई पड़ता है, आदमी को वह उतना ही सीमित भी तो करता है। आंगन में खडा मैं यही सब सोचता रहा। कुछ ही देर में मेरे लिए 13 82 : सरहद के पार कुर्सी आ गई । भरी बाल्टी के साथ लोटा रख दिया मेरे सामने । यह सब मां ने नहीं किया । एक सांवली-सी युवती कुर्सी ले आई थी और बारह- तेरह साल की एक लड़की भरी बाल्टी और लोटा रख गयी थी। मैं प्रश्न- सूचक आंखों से मां को देख रहा था। अपनी स्मृति में मैं अपने रिश्तेदारी की तलाश करता रहा । वरामदे पर बैठी यह बुढिया कौन हो सकती है, यह गोरी-मी अधेड उम्र की स्त्री कौन हो सकती है और यह सावली-सी युवती जो चाय बनाने बैठी है, यह कौन हो सकती है। रिश्तेदारों की पूरी पड़ताल में ये सूरतें मुझे कही नजर नही आयी। मां उन मब के सामने ही उनका परिचय देने लगी। उम परिचय से मैंने जाना कि यह सावली-सी युवती आदिवासी है । नाम है शांति एलिजा- वेथ । 'शांति' के साथ 'एलिजाबेथ' शब्द का तुक नही बैठ रहा था। मा ने हंसते हुए बताया कि सिर्फ धर्म ही अंग्रेज का है, बाकी सब कुछ बिलकुल अपनी-जैसा है । मास-मछली कुछ भी नहीं खाती है । हजारीबाग जिले की है । यहां गांव के हेल्यसेंटर में काम करती है। गोरी-सी अधेड़ उम्र की स्त्री के बारे मे कहा गया कि वह ग्रामीण बैंक में काम करने वाले किसी यादव जी की घरवाली है और बुढ़िया यादव जी की मा है । बच्चो ने मां को घेर रखा था। दो-ढाई माल का एक गोरा-चिट्टा लडका मां को गोद मे आकर घम से गिर गया और खिलखिला कर हंसने लगा। उस बच्चे की बहन जिमका मुनमुन नाम बताया गया था, मां के कधे पकड कर बच्चे के साथ बांख-मिचौनी खेलने लगी। यह सब मुझे बडा प्रीतिकर लगा, लेकिन मन मे जाने क्यों, हल्की-सी चोट भी लगी। मां एकदम विभोर थी। ऐसा मेरे अचानक आने के कारण था या मा की अपनी दिनचर्या के कारण था, यह मैं समझ नहीं पाया पडोस के चाचा के घर से लौटा तब तक शाम हो गई थी। दरवाजे पर खाट लगी हुई थी। मां अधेड़ उम्र की उस स्त्री के साथ दरवाजे की आखिरी छोर पर खड़ी मेरी ही राह देख रही थी। दरवाजे पर आया तो विकल्प: 83 । गांति एलिजावेथ नाम की उसी सांवली-सी युवती ने खाट पर चादर बिछा दी और बगल में चुपचाप खड़ी हो गयी जैसे किसी आदेश की प्रतीक्षा में हो। थोड़ी देर बाद उसको जैसे कुछ याद आया और वह झपटती हुई आंगन की तरफ चली गयी। बगल में दहलीज के पास बिजली का बल्ब जल रहा था। पुरवैया सिहर रही थी और झूलते तार मे लटका बल्ब धीरे-धीरे हिल रहा था। बल्ब के हिलने के कारण रोशनी सागर की लहरों की तरह किनारे तक आ-आ कर फिर लोट जाती थी खाट पर मेरे सामने मां प्रसन्नचित बैठी थी और मुझसे घर-परिवार बहू का हाल-चाल वगैरह पूछ रही थी। मेरे भीतर शुरू से ही कुलबुलाता प्रश्न बाहर निकल आया, "इस घर को धर्मशाला बनाने की क्या जरूरत थी मां? ऐसी क्या जरूरत हो गई कि मकान को किराये पर लगा दिया ?" मा ने मेरी आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की, "नही... किराए पर कहां लगाया है ! .."यह शांति बैचारी गांव के अस्पताल में आई । बच्चा लिए हुए थी गोद में। कही ठौर नहीं था गाव मे । आखिर मैंने ही कहा कि आकर रहो मेरे साथ । मैं भी अकेली हूं इतना वडा घर... बड़ा सूना-सूना लगता था बेटा।"इस प्रसंग को मैंने काट दिया और मां को दूसरे हल्के-फुल्के सवालों और जिज्ञासाओ से बहलाने की चेष्टा करने लगा। लेकिन मां थी कि लोट-लौटकर वही आ जाती थी। कहने लगी, "ग्रामीण बैंक वाले 'जादो जी' (यादव जी) तुम्हारे ममहर के हैं- कोशिकापुर के बगल मे है न रामघाट ! वहीं के हैं । इनको भी कोई जगह नहीं मिल रही थी।" मैंने मन-ही-मन कहा कि अच्छा अजायबघर बना रखा है मा ने इस घर को। गांव मे जिसको भी जगह न मिले वह ना जाय इस मकान मे । किराये वगैर के विषय में मा ने कुछ बताया नहीं। यादव जी की बारह- तेरह साल की लड़की मुनमुन इस बीच चाय दे गई थी । मा अंदर आंगन ।

84 : सरहद के पार की तरफ गई और शांति एलिजावेथ के साल भर के बच्चे को गोद मे 'लिए वापस आ गई । यादव जी के बच्चे मां को बुआ कह रहे थे जिसका अर्थ यह था कि यादव जी को मां अपना भाई मानती हैं। दहलीज के पास बिजली के तार में झूलते बल्ब की रोशनी को लहर जब हमारे पास तक पहुंचती तो मैं गौर से मां की गोद में पड़े बच्चे को देखता । बच्चा मेरी ओर अजनबी आंखों से देख लेता और सहम कर मा के शरीर से चिपकने लगता, "यह बच्चा तुम से खूब घुलमिल गया है मां । नाम क्या है इसका ?" मैंने यह प्रश्न मां से पूछा था, लेकिन उत्तर पास खडी शांति एलिजावेथ ने दिया, "नाम तो रॉविन था। मां जी 'रवीन' कहती हैं। अब यही रबीन नाम चल गया है।" "रबीन या रवीद्र ?" मैंने मुस्कराते हुए पूछा तो शाति हल्की-सी हसी हसने लगी। रोशनी की लहर में सावले-चिकने और एक हद तक सुंदर चेहरे पर हंसी उजली रेखा-सी खिंच गई। गोद के बच्चे को दुलारते हुए मां ने मुझसे पूछा, "मुन्ना तो इससे वडा हो गया होगा, नही ?" "कौन मुन्ना? बंटी के विषय में पूछ रही हो क्या मां ?" "हां-हाँ "क्या नाम है, बंटी?" "हां, बंटी कहते हैं हमलोग । वह तो बडा हो गया है। सूब दौडता है अब तो।" "मां ने ऊपर आकाश की तरफ देखते हुए अपनी स्मृति मे कुछ टटोला । कुछ दाण चुप रहकर धीरे से बोली, "बहुत दिन हो गए। बंटी के जन्म के समय मैं तुम्हारे पर थी।" "तुम्हारा पर क्यों मां?" मैंने हल्की-सी पीडा झेलते हुए कहा तो मां चुप हो गयी। फिर घुटती हुई आवाज में बोली, "घर तो तुम्हारा ही है नरे।" मां के संवाद को ध्वनि बहुत गूढ नही थी कि पकड में न आती। मैं मायूस हो गया। मां ने मेरे या भैया के घर को ज्यादा चर्चा नहीं की।

विकल्प : 85 बस अपनी नयी पारिवारिक जिंदगी के विषय में बताती रही। रिश्ते का मेरा एक मौमेरा भाई रामविलास जो यहां रहकर खेती-बाडी की देख- रेख करता है उसके विषय में मां ने बताया कि हफ्ते भर के लिए वह घर चला गया है । किसी केयरटेकर की तरह मां पूरी आमदनी का मोटा- मोटा हिसाब देने लगी। इन बातों में मेरी कोई दिलचस्पी नही थी। प्रसंग बदलते हुए मां कहने लगी, "मत भेजा करो तुम दोनों भाई रुपये। मैं क्या करूंगी इतने रुपये लेकर ! सेती की आमदनी तोखर्च हो ही नहीं पाती है । लोग रुपये मांगकर ले जाते हैं और जो ले जाते हैं वे लौटाकर तो कभी देते नहीं।" शांति खाना खाने के लिए बुलाने आयी थी । मा ने हड़बड़ाते हुए कहा, "हा, चलो खा लो। रात हो गई है।" मैंने कार में सोये ड्राइवर से खाना खाने के लिए कहा और मो के पीछे-पीछे आंगन मे आ गया । शाति और यादव जी की पत्नी खाना खिलाने के लिए तैयार खडी थी। थाली, छिपली और कटोरियों मे जो खाना मेरे सामने रखा गया उसको देखते ही मुझे लगा, मेरे लिए अति विशिष्ट भोजन तैयार किया गया है । खाने के दरम्यान पाति और यादव जी की पत्नी मेरे सामने खड़ी रही। बगल में मोढे पर मां भी बैठी थी। खाना समाप्त ही करने जा रहा था कि यादव जी आ गए। मा उनसे बोली, "तुम भी बैठ ही जाओ। साथ-साथ खाओगे तो अबुआ दो कोर 'बसी' खा लेगा।" लेकिन मैंने ज्यादा खा लिया था। आसानी से उठता हुआ बोला, "नही मा, अब बस करो।" आगन वाले चौड़े-से बरामदे पर मां का पलंग लगा हुआ था। खाना खाने के बाद में बाहर दरवाजे पर चला गया। यादव जी खाना खाकर आये तो देर तक उनसे बातचीत करता रहा। यादव जी ने मेरे मामा के घर-परिवार के विषय में बताया। दिन-ब-दिन टूटता मामा का परिवार विकती जमीन, गरीबी और बदहाली-तमाम बातें एक हद तक पुरानी ।

86 : सरहद के पार हो चली थी। मामा के घर से मेरा कोई रागात्मक संबंध कभी नहीं रहा इमलिए सूचित स्थितियो को असंलग्नता मे ही मैंने यादव जी की बातें सुनीं। आंगन वाले कमरे मे मेरे सोने की व्यवस्था की गई थी। यादव जी अपने साय मुझे आगन में ले गए। बरामदे पर लगे पलंग पर मां लेटी हुई थी । शांति का साल भर कर वेटा मां से सटा सोया था। शांति और यादव जी की पत्नी मां के पर दवा रही थी। उन दोनों ने मुझे देखा तो पर दबाना छोड पलंग के एक किनारे बैठ गयी। अवसन्न मनःस्थिति मे मैं आंगन में खड़ा रहा। फिर धीरे-धीरे चल कर कमरे में आ गया। सिलिंग फैन को थोड़ा तेज किया और मसहरी को सलीके से फैलाकर लेट गया। मेरी समझ मे अब आया था कि मकान के चार कमरे मा ने किराये के बहाने क्यों शांति और यादव जी को दे 'दिये हैं। मां ने शायद मुझसे झूठ ही कहा कि कमरे किराये पर हैं । कमरे निश्चय ही किराये पर लगे नही होगे । जहां स्नेह की इतनी प्रगाढ़ता है वहां बीच में पंसा कैसे आ सकता है ? मां की शायद यही भूख थी जो कभी तृप्त नही हुई मेरे या भैया के साथ रहकर । सुविधाएं तो मैंने भी कम नही दी मां को। कभी किसी चीज की कमी नही होने दी। दिल्ली के अपने बड़े-से फ्लेट में एक पूरा कमरा ही मां के हवाले कर दिया था। वे गमियों के दिन थे, इसलिए मां वाले कमरे में भी एयरकूलर लगवा दिया था। फिज के ठंडे पानी की व्यवस्था थी। पलग पर मोटे फोम का गद्दा था। मनोरंजन के लिए रंगीन टी०वी० सैट तो था ही। ऐसी-ऐसी सुविधाओं की मैंने व्यवस्था कर रखी थी जिनकी मां ने कभी कल्पना भी न की होगी। पत्नी सुलेखा भी यथासंभव मां का ख्याल रखती ही थी। हालांकि नौकरी में होने की वजह से घर के लिए सुलेखा को ज्यादा समय नही मिल पाता था, फिर भी वह मा से जब-तब कुछ पूछ-ताछ जरूर कर ।

विकल्प :87 लेती थी। इन सबके बावजूद चार महीने में ही मा एकदम ऊब गई थी और पहुंचा देने की जिद करने लगी थी। मां की यह जिद मुझे उसी तरह अच्छी नहीं लग रही थी जैसे किसी बच्चे को ढेर-सारे खिलौने दे दो, फिर भी वह रोता रहे । पत्नी चूकि आसन्नप्रसवा थी, इसलिए मां मन मारकर कुछ दिन रुकी रही । बच्चे का जन्म हुआ और उसके पंद्रह दिन बाद मां ने फिर गांव पहुंचा देने की बात उठाई। मैंने समझाने की कोशिश की, "वहा गाव में क्या रखा है मां ? वहां तो कोई है नही अब । यहाँ आखिर क्या कमी है तुमको?" इसका उत्तर मां को वह अयं पूर्ण हल्की-सी हंसी होती थी। छल के शून्य में कुछ ढूंढती-सी मां सिर्फ इतना कहती थी, "फिर भी अपने घर की बात कुछ अलग ही होती है, बेटा!" "अपना घर ? "यह क्या तुम्हारा घर नही है मो?" मां के पास इस जटिल-से प्रश्न का उत्तर नही होता था। वह उंगलियों से फर्श पर न 'खिचने वाली रेखाएं बनाने लगती थी और एकदम बेमन से बात को संभालने के तहत हस देती थी, "नही, है तो अपना घर ! फिर भी यह एक अधूरा शब्द 'फिर भी' मां के अंतर्मन की पूरी छाया को प्रकाशित कर देता था। मैं जानता था कि अपने जिस घर के लिए मा इतनी व्याकुल हैं, वह घर महीने दो महीने बाद से ही काटने दौड़ेगा और मा की भाग-दौड़ फिर शुरू हो जाएगी। पिताजी के इंतकाल के बाद से मां इसलिए अशांत और अनस्थिर रहने लगी थी। जब तक पिताजी जीवित थे, मां किसी रिश्तेदार के यहा कभी नहीं गयी। अब दूर-दराज के रिश्तेदार भी मां को याद आने 88 :सरहद के पार लगे थे। पिताजी को गुजरे दो-ढाई साल हुए थे तव । मै अफसरी मे उन दिनों नहीं था। कस्बे के एक कालेज में अस्थायी पद पर लेक्चरर पा। मां गांव मेथी। मां के अकेलेपन और अनाथय पर सोचकर मैं मां को अपने साथ ले आया था। दो-ढाई महीने में ही मां ऊब गई थीं। कहने लगी थी "मुझे, अपने मामा के गाव पहुंचा दो। छोटका भैया से मिले बहुत दिन हो गये हैं।" "बहुत दिन कहा हुए हैं मां? अभी पिछले साल ही तो गयी थी मामा के यहाँ।" दरअसल मैं मा को वहा जाने से रोकना चाहता था। मामा की आर्थिक स्थिति अच्छी नही थी। कई वर्ष पहले मुकदमे में उनकी पूरी जमीन बिक गई थी और वे गांव के ही एक बड़े किसान के यहां सिपहगिरी करने लगे थे। मामा के घर की गरीवी की बात मैंने मां से कही तो मां विवश भाव से हंसने लगी, "कुछ भी हो, आखिर है तो मेरा मायका फिर देखा नहीं है तुमने, तुम्हारे छोटका मामा कितना चाहते हैं मुझे ! हार कर मैं मां को साथ लिए मामा के गाव गया था। मेहमान को खिलाने लायक भोजन की व्यवस्था करने में भी मामा असमर्थ थे। उनके घर की गरीबी आंखो में और मन में टूटे कांच की तरह गड़ती थी। फिर भी मा के प्रति मामा और मामी का जो स्नेह मैंने देखा वह विभोर करने वाला था। उसी दिन मुझे यह बोध हुआ था कि किसी को यदि अपनी इज्जत और ऊंचाई देखनी हो तो अपने सबसे गरीब रिश्तेदार के यहां जाना चाहिए। ढाई-तीन महीने मां मामा के घर रही। फिर मामा को साथ लेकर ।

विकल्प : 89 - गांव चली आई । मेरा मौसेरा भाई रामविलास था गांव में। कुछ ही दिनों में मां को गाव के घर का सूनापन परेशान करने लगा था। मां रामविलास को ले सुदूर के एक गांव में अपनी किसी चचेरी बहन के यहां चली गयी । भैया ने मुझे चिट्ठी लिखी कि मां को मैं उनके पास लखनक पहुंचा दूं लेकिन मां उन दिनों अपने गांव में नहीं थीं। उसके बाद में सरकारी सेवा के लिए चुन लिया गया और कुछ ही महीने बाद दिल्ली आ गया। मिठियों के माध्यम से मां से संपर्क बना रहा। रामविलास भाई की चिट्ठियों से पता चलता था कि मां वहाँ हैं कैसी हैं ! मां का यहां वहां बेमतलब जाना मुझे बुरा लगता था। मैंया एक बार दिल्ली आए तो मुझसे बोले, "मां को आखिर कमी क्या है ? आकर रहे मेरे पास।" मैं भी यही सोचता था मां की बावत। मेरे साथ या मैया के साथ रहने मे मां की आखिर हिचक क्या है ? मंया दरमसल मेरी शादी के लिए मुझसे बात करने आये थे । लखनऊ, में ही उन्होंने मेरे लिए रिश्ता तय कर लिया था। शादी भी लखनऊ से ही हुई। मां बुलायी गयी थी। शादी के बाद मैं दिल्ली चला आया। मां को भैया ने अपने साथ ही रख लिया। चार या पांच महीने बाद भैया मां को लिए हुए मेरे पास आ गये । मैं समझ नहीं पाया कि मैया के पास इतने कम समय में ही मां ऊब कैसे गयी। मां से पूछा तो यही परिचित हसी, "मन नहीं लगा।" "खेर, मेरे साथ रही मां ! दिल्ली में मन लगेगा तुम्हारा । कोई तकलीफ नहीं होगी।" तकलीफ मैंने सचमुच नहीं होने दी। जितना कुछ हो सकता था, मैंने किया । फिर भी मुझे लगता था, मां उदास रहती हैं और भारमनिर्यात- सा झेल रही हैं। दिन में घर बिलकुल खाली हो जाता था। ।

90 : सरहद के पार अनुवाद ब्यूरो मे काम मिल गया था। यह यथासमय दफ्तर चली जाती थी। बड़े-से उस फ्लैट मे मां अकेली छूट जाती थी। मां के अकेलेपन पर सोचकर मुझे पीड़ा होती थी, लेकिन मैं कर भी क्या सकता था। एक उपाय मैंने सोचा। गांव में मैंने देखा था कि मां जब-तब खाली वक्त काटने के लिए 'सुखसागर' पढ़ा करती थी। कचौड़ी गली बनारस से प्रकाशित पुस्तकें बेचने वाले के यहां 'बम्बई अक्षरो में मुद्रित' 'सुखसागर' मिल गया। 'सुखसागर' पाकर मां प्रसन्न हुई, ऐसा तो स्पष्टतः मुझे नहीं लगा, लेकिन समय काटने का एक बहाना मां को अवश्य मिला। देर रात तक मां अपने कमरे में बैठी 'सुखसागर' पढ़ती मिलती थी । एक प्रसग मां बार- बार पढा करती थी और अक्सर पहले पृष्ठ से ही पढ़ना शुरू करती थी। 'सुखसागर' का आरंभिक अंश मां के बार-बार रटने के कारण मुझे भी याद हो गया था..."एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में एकत्र हुए शौनकादि अठासी हजार ऋषियों ने वेदव्यासजी ने कहा-“हे सूत जी, इस घोर कलियुग मे......" लेकिन 'सुखसागर' भी सुख नहीं दे सका मां को। मैंने एक और उपाय ढूंढा। पडौस की दो-तीन मा-टाइप बूढ़ी औरतों से मां का परिचय कराया और उम परिचय को प्रगाढ़ करने की भी कोशिश की। लेकिन मुझे इस उद्देश्य में भी सफलता नही मिली । अपनी भाषा, स्वभाव-संस्कार ओर ग्रामीण जीवन-प्रणाली के कारण मां इतनी अलग और दूर जा पड़ती थी कि उन बूढ़ी औरतों से संबंध और संवाद फा कोई पुल ही नहीं बन पाता था। गांव पहुंचा देने की जिद मां फिर करने लगी थी। रोज ही कहती, "गांव पहुंचा दो मुझे।" तंग आकर मां को गांव पहुचाने के लिए मुझे जाना पड़ा। हालांकि ला RATALort विकल्प पनि मैं खिन्न था और सोचा करता था कि आखिर मा चाहतो क्या है। सुविधाओं का मैंने अंबार लगा दिया था, संपन्नता और सुविधामा बावजूद मां गांव जाने के लिए वेचन थीं तो मैं क्या कर सकता था। की तरफ से भी कोई कमी नही हुई। हालांकि वह खुद नौकरी मे थी और मां के साथ समय बिताने के मौके उसको कम ही मिल पाते थे। फिर एक बात और थी। पल्ली सुलेखा का रहन-सहन, परिवेद, शिक्षा-दीक्षा, भाषा और जीवन-प्रणाली मां की जीवन प्रणाली से सर्वथा विपरीत पड़ती थी। उस खाई को पाटना मेरे लिए संभव ही नही था। सुलेखा देहाती बहू तो नहीं सकती थी जो अपनी सास की सेवा-टहल करे । जो पत्नी मेरे पर नही दबा सकती थी, उससे यह उम्मीद करना कि सास के 'हाथ-गोड़ करेगी, विलकुल फिजूल बात थी। मां को जब मैंने इस दफा गांव पहुंचाया तभी मुझे लगा कि सुविधाएं तो मैंने मा को दी और भरपूर दी। दिल से चाहता भी था कि मेरे और मैया के लिए जीवन भर दुख उठाने वाली मां को बुढ़ापे में पूरा सुख मिले, लेकिन मुझे क्या पता था कि मन का सुख सबसे बड़ा सुख होता है । आदमी सुविधाओं में नहीं, अपने इच्छित परिवेश में ही मन भर जी पाता बन ... "तीन वर्ष बाद गांव आया हूं मां से मिलने । घर को देख रहा हूँ। सब कुछ यथास्थान होते हुए भी, एकदम बदला हुआ है। लगता ही नही है कि यही वह घर है जहां पिताजी की मृत्यु के बाद भायं-भायं करते सन्नाटे मे मां अकेली किसी कोने में पड़ी रहती थी। एकदम बदला हुआ है सब कुछ। लगता है, मां के भीतर का खोया हुमा बहुत कुछ लोट माया 92 : सरहद के पार है। जीवन ही जीवन है मा के भीतर। सुबह सोया हुआ ही था, उसी समय यादव जी की पत्नी चाय की प्याली रख गई। हाथ में चाय की प्याली लिए मां भी आ गईं। मुझे सुबह ही लौटना था । शान्ति एलिजावेथ नामक उस आदिवासी युवती ने झट- पट नाश्ता तैयार किया। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे एक ही परिवार रह रहा है इस आंगन में और उस परिवार को प्रधान मां हैं । मुझे विस्मय हो रहा था। यह कैसी आत्मीयता है ! कैसा कौटुम्बिक सम्बन्ध है। एक कायस्थ परिवार में छोटे भाई को तरह यादव जी, भतीजी-भतीजियों की तरह बच्चे और हजारीबाग के जाने किस इलाके की यह आदिवासी ईसाई युवती! यादव जी, उनकी पत्नी-बच्चे और शान्ति एलिजावेथ सब मां के साथ मुझे कार तक छोड़ने आये। थोड़ी ठेस भी लगी मन पर और आश्चयं भी हुआ कि मां के चेहरे पर अकेले छूट जाने के दीन-भाव की छाया तक नहीं है। बहुत वर्षों बाद अपना वह खोया हुआ घर मुझे बड़ी शिद्दत से याद आने लगा था जब मैं और मैया कॉलेज में पढ़ते थे। दादा-दादी, चाची, मां और पिताजी सब तरह मुझे और भया को छोड़ने घर से आगे तक आते थे। उन स्थितियो को जैसे वापसी थी यह। मां की तुलना में मैं ज्यादा भायक और गमगीन हो रहा था । विदा के समय विपर्यय की यह विचित्र स्थिति पी जिसे मैं झेल रहा था। मां का चेहरा निर्विकार था, ऐसा तो मुझे नहीं लगा, लेकिन विकल्प खोज लेने की आश्वस्ति मां के चेहरे पर जरूर पी। मां की तुलना में मैं अपने को श्मादा अकेला महसूम कर रहा था । आश्चर्य था। महानगर की मुख-सुविधाओं, को इग्जतदार नौकरी, खूबसूत सुशिक्षिता पत्नी, बच्चे, विकल्प: 93 नोकर-चाकर, सोफर-चपरासी, इन सबके बावजूद मैं मां को तुलना में अपने को अकेला पा रहा था। सोचकर, दया भाव से आया था कि गांव में छूट गई मां अकेली और असहाय स्थिति में होंगी, लेकिन "। (1987) चलो, यहां से चलें करुणेश्वरी बाबू की मृत्यु यदि कॉलेज के अहाते में बने उनके क्वाटर न हुई होती तो निश्चय ही उतनी महत्वपूर्ण न हुई होती । एक शोक- सभा होती, संस्कृत विभाग के अध्यक्ष डॉ. शक्तिनाथ ठाकुर का लिखा शोक प्रस्ताव प्रधानाचार्य पढते, दिवंगत आत्मा की चिरशान्ति के लिए एक मिनट का मौन रखा जाता और सभा विसजित हो जाती । प्रधाना- चार्य एक दिन के शोकावकाश की घोषणा करते । बम इतना ही होता, क्योकि अमूमन यही सब होता है किसी कॉलेज मे। विश्वविद्यालय के प्रीमियर कहे जाने वाले कॉलेज में भी यही होता। न इससे कम, न इससे अधिक। विश्वविद्यालय का प्रीमियर कॉलेज है तो साल मे तीन-चार मौतें आश्चर्यजनक नहीं हैं । कभी कोई छात्र मरता है या आत्महत्या करता है, कभी किमी कार्यरत या सेवा शिक्षक की मृत्यु होती है, कभी तृतीय या चतुर्थ वर्गीय कोई कर्मचारी स्वर्ग सिधारता है। इस बार तो तीन महीने की अवधि मे दो मौतें हो गयी । ढाई महीने पहले दर्शनशास्त्र विभाग मे रीडर डॉ० राय दिवंगत हो गये । उम्र चालीस-बयालीस के आम-पास थी और तीन दिन पहले कार्यालय के लेखा विभाग में कोषपाल करुणेश्वरी शरण को मृत्यु हो गई। दोनों ही मौत हटं एटक से हुई। डॉ० राय लम्बी छुट्टियों में अपने घर रांची गये थे। वही चलो, यहां से चलें :95 एटक हुआ। कॉलेज जब खुला तब पता चला । डॉ० शक्तिनाथ बाबू को बुलाया गया । शोक-प्रस्ताव लिखा गया। फिर शिक्षकों, छात्र-छात्राओं और शिक्षकेतर कर्मचारियों की शोक सभा हुई। शोक-प्रस्ताव पढ़ा गया। एक मिनट का मौन रखा गया। प्रधानाचार्य ने एक दिन के शोकावकाश की घोषणा की। लोग डॉ० राय की यादों को बातचीत के प्रसंग में लाते हुए धीरे-धीरे बिखर गए। शांत मोये जल में फेंके गये एक छोटे ढेले से लहर उठी और धीरे-धीरे विलीन हो गई। करुणेश्वरी बाबू की मृत्यु चूंकि कॉलेज के अहाते में बने उनके क्वार्टर में हुई थी और शवदाह बगल में ही अहाते के बाहर नदी के दूसरे किनारे पर किया गया था, इसलिए मिला-जुला कर कॉलेज तीन दिनों तक बन्द रहा। करुणेश्वरी बाबू की मृत्यु डॉ० राय की मृत्यु की तरह एकदम अचानक ढंग से नहीं हुई थी, यह भी एक फर्क रहा। पहला एटक एक-सवा महीने पहले हुआ था। चिकित्सा चल रही थी। पटना मेडिकल कॉलेज- अस्पताल के डाक्टरों की सलाह पर उनको आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली ले जाया गया था। दिल्ली पहुंचते ही उनकी स्थिति में सुधार के लक्षण दिखाई पड़ने लगे। यहां सबर आई कि हर्ट का ऑपरेशन होने वाला है। खचं तीस-पंतीस हजार के आम-पास बताया गया था। अब सवाल यह था कि एक मामूली कर्मचारी इतने रुपये की व्यवस्था कैसे करे । करुणेश्वरी बाबू के पो० एफ० एकाउट मे नाम-मात्र की मुद्रा वची थी। अग्रिम वेतन से भी यह मवाल हल होने वाला नहीं था। शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्म- चारियों के स्थानीय शाखासचिवों ने इसका उपाय ढूंढ़ा । शिक्षक संघ फे शाखा-सचिव प्रो०पी०एल० श्रीवास्तव ने कॉलेज के शिक्षकों में आपिक महायता की अपील की ताकि करणेश्वरी बाबू के हट के ऑपरेशन के लिए घ्यवस्था हो सके । शिक्षक-सचिव ने निर्णय लिया कि कॉलेज शिक्षक संघ के सभी सदस्य पचाम-पचास रुपये की सहायता करें। तृतीय और चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों ने एक दिन का वेतन दे दिया। शिक्षक संघ की कॉलेज 96: सरहद के पार शाखा के सचिव प्रो० पी० एल० श्रीवास्तव ने एक अपील जारी की। अपील के अन्त में कहा गया कि प्रत्येक शिक्षक चाल महीने के अपने वेतन से पचास रुपये की कटौती करा दें। इम अपील पर आधे से अधिक शिक्षकों के हस्ताक्षर हो गये। कुछ शिक्षको ने सचिव से कहा कि वे पचास रुपये नकद ही देंगे, वेतन से कटौती नही करायेंगे । शिक्षक सचिव प्रघा- नाचार्य से मिले और इसकी बावत सलाह-मसविरा किया। प्रधानावार्य ने लेखा विभाग को निर्देश दिया कि जिन शिक्षको ने कटौती की अपील पर हस्ताक्षर किये हैं उनके चालू महीने के देतन से पचास रुपये की कटौती कर ली जाय और कटौती की राशि को अलग 'हेड' मे जमा किया जाय। यह प्रक्रिया चल रही थी कि चौदह-पद्रह दिन बाद करुणेश्वरी बाबू को दिल्ली से वापस ले आया गया। मालूम हुआ कि डॉक्टरो ने उनकी हालत में सुधार पाया है और ऑपरेशन के लिए उनको पाच महीने बाद जनवरी में बुलाया गया है। मरीज को यह सख्त हिदायत दी गई है। (दिल की बीमारी के हर मरीज को यही हिदायत दी जाती है) कि जज्बाती हादसे से बचे रहें। शिक्षको के बीच आबदान मे पैदा हो गये कीडों की तरह यह बात रेंगनी शुरू हो गई कि ऑपरेशन यदि अगले साल यानी पाच महीने बाद जनवरी में होना है तो चाल महीने के वेतन से कटौती क्यों की जा रही है ? शिक्षको के वैचारिक जगत में एक हलचल दिखाई पड़ी। कुछ शिक्षकों ने वेतन से पचास रुपये की इम कटौती को शिक्षक-मचिव का मनमाना फैमला पहा। यह भी कहा जाने लगा कि शिक्षक-सचिव का 'आविट्टरी लिमिजन' पातक है। शिक्षक संघ के सचिव को यह अधिकार ही नहीं है। किसी के वेतन से कटौती तभी हो सकती है जब यह शिक्षक लिखित रूप से इसके लिए प्रधानाचार्य से आग्रह करे और अपने वेतन-विपत्र में इसका स्पष्ट उल्लेस कर दे। यह कोई बकाया राशि के भुगतान का मामला नहीं चलो, यहां से चलें :97 है कि प्रधानाचार्य लेखा-विभाग को कटौती का आदेश दे देंगे। शिक्षकों का एक वर्ग यह भी कहने लगा कि फ्लेट रेट से पचास रुपये चंदा उगाहना गैरवाजिब है। जिस शिक्षक ने अभी-अभी पदभार ग्रहण किया है उसको भी पचास रुपये और जो शिक्षक रिटायर होने वाले हैं और साढ़े तीन हजार वेतन पाते हैं उनको भी पचास रुपये ? यह कैसा बेहूदा फैसला है ? यदि करुणेश्वरी बाबू की सहायता ही करनी है तो सहायता की राशि सहायता करने वाले की मर्जी पर छोड़ देनी चाहिए। कोई चाहे तो सौ रुपये दे, कोई चाहे तो दस दे, कोई चाहे तो न दे। यह क्या बात हुई कि शिक्षक संघ के सचिव ने मनमाना फैसला कर लिया और प्रधानाचार्य ने लेखा विभाग को आदेश दे दिया कि कटौती कर ली जाय? वाह रे वाह।" निवर्तमान शिक्षक संघ के सचिव डॉ. लीलाधर मिश्र ने कहा, "तव तो यही होगा कि किसी दिन शिक्षक संघ के हमारे मानवीय सचिव प्रधा- नाचार्य को लिखकर दे देंगे कि पूरे महीने का वेतन अमुक सहायता में चला गया। अब लीजिए।"यह तो बड़ी खतरनाक परम्परा शुरू हो रही है कॉलेज में।" डॉ. लीलाधर मिथ ने एक दूसरा हस्ताक्षर अभियान शुरू किया। शिक्षकों के निवास पर जा-जाकर उन्होंने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर लिए कि शिक्षक संघ के सचिव का बलात् पचास रुपये वेतन से कटौती कराना अजनतांत्रिक एवं तानाशाही रवैया है। हम इसकी निंदा करते हैं। साथ ही शिक्षक संघ के सचिव को यह चेतावनी दी जाती है कि भविष्य मे ऐसी कोई कार्रवाई न करें।... हस्ताक्षर अभियान मे ऐसा हुआ कि कुछ ऐसे शिक्षकों ने भी इस पर हस्ताक्षर कर दिए जिन्होंने शिक्षक संघ के सचिव प्रो०पी०एल० श्रीवास्तव की अपील पर हस्ताक्षर किये थे। इस नये हस्ताक्षर अभियान में "डॉ. लीलाधर मिथ जितने हस्ताक्षर बटोर सके वे हस्ताक्षर उनको संघ.

18: सरहद के पार शक्ति के प्रमाण थे। इस प्रस्ताव या फैसले (जो भी कहा जाय) की एक प्रति प्रधानाचार्य को दे दी गई। प्रधानाचार्य करुणेश्वरी बाबू को देखने एक या दो बार गए थे। कॉलेज में पांच-छह शिक्षक ऐसे भी थे जो श्रीवास्तव और मिश्र-गुट से एकदम अलग थे। इनको जो मदद करनी थी ये कर आये थे। ये अक्सर करुणेश्वरी बाबू को देखने जाते, हाल-चाल पूछते और उनकी पत्नी को आश्वस्त करते कि कोई आवश्यकता आ पड़े तो उनको अवश्य याद किया जाय । शेप लगभग सारे शिक्षको ने सुना था कि करुणेश्वरी बाबू को एटक हुआ था, उनको दिल्ली ले जाया गया था और दिल्ली में कहा गया कि कि ऑपरेशन पांच महीने बाद यानी अगले साल जनवरी में होगा। करुणेश्वरी बाबू की हालत अब कैसी है, सुधार हो रहा है या नहीं, इसकी मही जानकारी इनको नही थी। जानकारी थी तो बस इतनी कि यदि जनवरी मे ऑपरेशन होना है तो पांच महीने पहले पचास रुपये की सहा- यता-राशि की क्या जरूरत है ? दिसम्बर महीने में जिसकी मर्जी होगी वह देगा, जिसकी मर्जी होगी वह न देगा! शिक्षक स्पष्टतः दो गुटो में बंट गये । एक वर्ग जो पहले बडा था. लेकिन विरोधी गुट डॉ० लीलाधर मिश्र की चुनौती के कारण छोटा पड़ गया है वह प्रो० पी० एल० श्रीवास्तव का गुट है । इस गुट को अक्सर ब्राह्मणेतर शिक्षकों का समर्थन मिलता रहा है, लेकिन इधर यह गुट थोड़ा गडबडा गया है। डॉ. लीलाधर मिश्र ने शिक्षक संघ के सचिव प्रो. श्रीवास्तव की एक कमजोर नब्ज पकड ली है कि ऑपरेशन यदि जनवरी में होना है तो पांच महीने पहले वेतन से पचास रुपये की कटौती क्यों ? फिर कोई मनमानी अपील जारी करना और शिक्षकों को 'डेलिकेट पॉजिशन' मे हाल कर हस्ताक्षर करा लेना एक घातक परम्परा की शुरूआत नही तो और क्या है ? इस आधार पर मिश्र गुट इधर कुछ ताकतवर दिखाई पड रहा है। डॉ. लीलाधर मिश्र का यह भी कहना है कि करुणेश्वरी बाबू के चलो, यहा से चलें :99 । । लिए शिक्षकेतर कर्मचारियों का संघ क्यों कुछ नही कर रहा है । जब उनका मंघ अलग है तो वह संघ उनके लिए कुछ करे । शिक्षकेतर कर्मचारियों के लिए विश्वविद्यालय में सहायता-कोष है। जाकर करें हगामा विश्व- विद्यालय में । हम क्यों करें सहायता?" डॉ. मिथ ने शिक्षकेतर कर्मचारियों, खास तौर से कार्यालय लेखा- विभाग पर एक जबर्दस्त आरोप लगाया। कहा कि दर्शनशास्त्र विभाग में रीडर डॉ० राय, जिनको मृत्यु ढाई महीने पहले हुई है, उनकी विधवा को लेखा-विभाग परेशान कर रहा है। बेचारी विधवा एक तो यों ही किस्मत की मारी हुई है, उस पर लेखा विभाग उनको और परेशान कर रहा है। वेचारी अपने स्वर्गीय पति के पी० एफ०, ग्रुप इंस्योरेंस आदि के पैसो के लिए दौड़ रही है और लेखा-कर्मचारी उनसे घूस लेकर रसगुल्ले उड़ा रहे हैं । यकीन न आये तो जाकर पूछ लीजिए वेचारी विधवा से । कॉलेज के गेट पर बैठी एक दिन रो रही थी। लेखा-विभाग के कर्मचारियों का शिक्षको के प्रति ऐमा घृणित व्यवहार है तो हम क्यों करें उसी विभाग के कोपपाल की सहायता ?... यह सूचना बेधक थी और शिक्षकों का क्षुब्ध होना स्वाभाविक था। कार्यालय का लेखा-विभाग इसी कॉलेज के स्वर्गीय डॉ० राय की वेवा को रुला रहा है। मिश्र गुट ने इस बात का जम कर प्रचार किया। कुछ शिक्षको ने दबी जबान से यह भी कहा कि शिक्षक संघ के मचिव प्रो० पी० एल० श्रीवास्तव चूंकि कायस्थ हैं इसलिए करुणेश्वरी बाबू के लिए हाय-तोवा मचाये हुए हैं । दो साल पहले बड़ा बाबू हरेन्द्र झा लम्बी बीमारी मे जूझने-जूमने आखिरवार मर गये, तब श्रीवास्तव जी चुप क्यों हैं? अब श्रीवास्तव जी को करुणेश्वरी बाबू की पीड़ा सताने लगी है ? उम ममय कहां थे? जिम दिन बैंक मे वेतन जा रहा था उस दिन शिक्षकों ने प्रधानाचार्य का घेराव किया। लेखा विभाग से वेतन को जो सूची बैंक को भेजी जात 100 : सरहद के पार रही थी उममें उन शिक्षकों के वेतत से पचास रुपये की कटौती की गयी थी जिन्होने शिक्षक-सघ के सचिव प्रो० श्रीवास्तव की अपील पर हस्ताक्षर किये थे। प्रधानाचार्य के चम्बर में मिश्र-गुट के शिक्षको ने हंगामा शुरू किया कि 'डेलिकेट पॉजिशन' में डाल कर चालाकी से हस्ताक्षर कराये गये है। करुणेश्वरी बाबू का ऑपरेशन होगा पांच महीने बाद जनवरी में, फिर अभी चालू महीने के वेतन से हम क्यों कटौती करायें ? देना होगा तो हम बाद मे देंगे, लेकिन वेतन से कटौती नहीं करायेंगे। डॉ० लीलाधर मिथ की गोटो एकदम सही बैठी थी। श्रीवास्तव जी चा खाने चित्त जा पड़े थे। उनके समर्थको की संख्या कम हो गयी थी। मिश्र-गुट के शिक्षक यह आरोप भी लगा रहे थे कि प्रो० श्रीवास्तव शिक्षकों का विश्वास खो चुके हैं। संघ की सामान्य बैठक में इसका निर्णय होना चाहिए। कुछ शिक्षको ने खुलेआम प्रो० श्रीवास्तव पर जातिवादी होने का आरोप लगाया। प्रधानाचार्य ने आखिर तग आकर कार्यालय के लेसा-विभाग को आदेश दिया कि केवल उन्ही शिक्षकों के वेतन से कटौती की जाय जिन्होंने बेतनविपत्र में कटौती का उल्लेख किया है । डॉ. लीलाधर मिश्र के नेतृत्व वाले गुट में थोड़ी देर के लिए खुशी की लहर व्याप गयी। यह छोटी-सी विजय कम महत्वपूर्ण नहीं थी। श्रीवास्तव-गुट कटोती वाले मुद्दे पर लडखड़ा गया था। जातीय समीकरण ही गडबड हो रहा था। प्रो० श्रीवास्तव ब्राह्मणेतर जातियों के शिक्षकों के बल पर नेता बने हुए थे, लेकिन वेतन से पचास रुपये की कटौती का अभियान उनको ले डूवा । मिश्र-गुट तो यह चाह रहा था कि संघ की सामान्य वैठक बुलायी जाए और प्रो० श्रीवास्तव अपना बहुमत प्रमाणित करें। जिस दिन बैंक में शिक्षकों का वेतन भेजा गया उसके तीसरे दिन रात के दूसरे पहर करणेश्वरी बाबू को मृत्यु हो गमी । अगले दिन कॉलेज चलो, यहां से चलें: 101 में शोक-सभा हुई। संस्कृत विभाग के अध्यक्ष डॉ० क्तिनाथ ठाकुर ने झटपट शोक-प्रस्ताव लिखा। प्रधानाचार्य ने वह शोक-प्रस्ताव पढ़ा- शिक्षकों, छात्र-छात्राओ और शिक्षकेतर कर्मचारियों को यह समा महा- विद्यालय-कार्यालय के लेखा विभाग में कोपपाल श्री करुणेश्वरी शरण के असामयिक निधन पर गहरा शोक प्रकट करती है। साथ ही उनके शोक- संतप्त परिवार के प्रति हार्दिक संवेदना प्रकट करती हुई यह सभा दिवंगत आत्मा को चिर शांति के लिए परम-पिता परमेश्वर से प्रार्थना करती है। "सभा यह प्रस्ताव भी पारित करती है कि शोक-प्रस्ताव की एक प्रति उनके परिवार को तथा एक प्रति प्रेस को भेज दी जाए।..." कॉलेज बंद हो गया। छात्र-छात्राएं, शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी धीरे-धीरे बिखरने लगे। कुछ शिक्षक बातचीत करते हुए टुकड़ियों में निकले। कुछ करुणेश्वरी बाबू के क्वार्टर की तरफ चले गये। शव को बाहर निकाल कर रख दिया गया था। बड़े-बेटे के आने की प्रतीक्षा की जा रही थी। बड़ा बेटा संजय एम०आई०टी० मुजफ्फरपुर में अतिम वर्ष का छात्र था। कॉलेज का दरबान जंग बहादुर सुबह की बस से मुजफ्फरपुर चला गया था। शिक्षकों का एक झुंड शव के दर्शन के बाद गेट के बाहर पान-सिगरेट की दूकान पर रुक गया था। हिंदी विभाग में वीर रस के कवि मार्तण्ड जी कह रहे थे, "चलो, करुणेश्वरी शरण ने करुणा की और पचास रुपये बेलाग बच गये।" मुंह में पान के बीड़े दबाये शिक्षक उनकी इस टिप्पणी पर मुस्कराये। एक ने कहा, "हां, सो तो हुआ। करुणेश्वरी वायू की मृत्यु से एक विवाद भी खत्म हो गया।" लेकिन विवाद खत्म हुआ नहीं है। श्रीवास्तव-गुट के कुछ शिक्षकों का कहना है कि करुणेश्वरी बाबू के हर्ट के ऑपरेशन के लिए उन्होंने रुपये 102 : सरहद के पार दिये थे। रुपये एक अलग 'हेड' में पड़े हुए हैं। खचं तो हुए नहीं। और जब करुणेश्वरी बाबू ही मर गये तो ऑपरेशन की बात कहां उठती है ? इन शिक्षकों का कहना है कि उनके रुपये उनको लौटा दिये जायें। कुछ शिक्षक कह रहे हैं कि इन्ही रुपयों से करुणेश्वरी बाबू के बेसहारा हो गये परिवार की मदद कर दी जाए। परिवार को बीच मझधार में छोड़ गये है करुणेश्वरी बाबू । तीन लड़कियां हैं छोटी-छोटी । दो लडके हैं और दोनों कॉलेज में पढ़ रहे हैं। क्या होगा उनका! अव तो कॉलेज का यह क्वार्टर भी छोडना पड़ेगा। तब कहां जायेगा उनका परिवार ? कही कोई ठौर-ठिकाना भी तो नहीं है। गांव मे डीह भर बचा है। जमीन- जायदाद तो कुछ है नहीं। थोड़ी-सी जमीन खरीदी थी उन्होंने इस शहर में । सोचा था कि हाउसिंग बोर्ड से लोन वोन लेकर छोटा-सा घर बनायेंगे, लेकिन सारा काम अधूरा छोड कर वै चले गये।'' करुणेश्वरी बाबू के परिवार का कारुणिक दृश्य प्रस्तुत कर कुछ सहृदय शिक्षक यह दलील दे रहे हैं कि जमा किये गये रुपये उनके परिवार को दे दिये जायें। कुछ शिक्षक दबी जबान से इस प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं। कहते हैं कि ऑपरेशन के लिए उन्होने रुपये दिये थे। सहायता की वात अलग है। सहायता ही करनी है तो इतने थोड़े रुपयों से पया होगी सहायता? ऊँट के मुंह में जोरे का फोरन? चंदा अभियान शुरु किया जाना चाहिए। लेकिन एक काम तो इससे भी आसान है। क्यो नहीं करणेश्वरी बावू के दूसरे लड़के को कॉलेज के कार्यालय में ही किसी पद पर लगा दिया जाए? माल-डेढ़ साल डेली वेज पर काम करेगा तो रेगुलर हो ही जायेगा। ऐमा अगर हो जाए तो डूबते परिवार को भारी सहारा मिल जायेगा।"प्रो० श्रीवास्तव ने मिश्र-गुट में चले गये अपने कुछ पुराने समर्थकों से भी इसकी बावत बातचीत की। फिर एक दिन कॉलेज ।

की अंतिम घंटी के बाद कुछ शिक्षकों को सौंपालिकर व कामेश्वरी बाबू, के क्वार्टर पर पहुचे । क्वार्टर में भायं-भाव करता सेनाना था समाप्त हो गया था। शोक और चिंता की काजदा परिवार के अवसाद पर फैली हुई थी। क्वार्टर के भीतरी भाग में किवाड़ के चौखट पर करुणेश्वरी बाबू की विधवा बदहवास पड़ी हुई थी। बच्चे भी खाट पर और धूल भरी फर्श पर जैसे-तैसे पड़े हुए थे। एम०आइ०टी० मुजफ्फरपुर में अंतिम वर्ष का छात्र करुणेश्वरी बाबू का बड़ा बेटा संजय कमरे मे टूटी हुई एक कुर्सी पर बैठा था और सूनी-उदास आंखों से दरवाजे की तरफ देख रहा था। प्रो० श्रीवास्तव ने बरामदे से आवाज दी। बहुत धीरे-धीरे चल कर संजय बरामदे पर आया। प्रो० श्रीवास्तव ने छोटे बच्चे को पुचकारने के लहजे मे संजय से कुशल-समाचार पूछे और कहा, "जरा अपनी मां को भेज दे बेटे।" किवाड़ के चौखट पर पड़ी मां ने सुन लिया था। शरीर में थोड़ी हरकत हुई। अस्त-व्यस्त कपड़ों को यथासंभव ठीक 'किया और यंत्रवत् बरामदे के किवाड़ के पास थोड़ा ओट लेकर खडी हो गयी। प्रो० श्रीवास्तव ने मन की बात को पान की तरह चबाते हुए कहा, "विजय को इसी कॉलेज के दफ्तर मे लगाने की बात हमलोग चला रहे हैं।..." उनको पूरी उम्मीद थी कि संजय की मां इस सूचना से प्रसन्न हो जायेगी। संजय की मां ने आचल के छोर को दोनों हथेलियों में ले लिया और करबद्ध-मुद्रा में सामने खड़ी हो गयी । यह याद भी नही रहा उनको कि प्रो० श्रीवास्तव से वे परदा करती रही हैं। चीखती हुई-सी वे इस तरह बोलने लगी हर लफ्ज पर दिल टूट-टूट कर गिर रहा हो, "आपलोग रहम कीजिए हम पर! रहम कीजिए प्रोफेसर साहब ! कोई मदद नहीं चाहिए हमें । हम तो ऐसे ही मर गये हैं, अब और मत मारिये । विनती करती हूं।"इसी सोक में वे मर गये। "जब उनको मालम हुआ.

104 : सरहद के पार कि उनके ऑपरेशन के खर्च के लिए आपलोग चंदा बटोर रहे हैं और इसके लिए आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, गुटबाजी कर रहे हैं, कोई हां कर रहा है, कोई ना कर रहा है तो उनको बहुत चोट पहुंची। फूट-फूट कर रोने लगे थे वे। फिर जाने क्या हुआ कि छाती में जोर का दर्द उठा और." संजय की मां बोलते-बोलते पछाड़ खाकर गिर पड़ी।" (वर्तमान साहित्य, मार्च '88) पितृशोक अब इस विवेचन में क्या रखा है कि पिता जी की मृत्यु किन परि- स्थितियों मे हुई। वे चिकित्सा के अभाव में मरे या बुढ़ापे के कारण विक मौत इस माथा पच्ची में पड़ने का भी अब कोई अर्थ नही रह गया है। जब वे मर ही गये और उनका क्रिया-कर्म भी शानदार ढंग से संपन्न हो चुका तो इग बेमतलब के हेतुहेतुमद्भूत' में कुछ भी मार्थक क्या रह गया है ? ...लेकिन किया-कर्म की समाप्ति के बाद गांव से पहर लौटते हुए रेलगाडी में जो फटेहाल लडका दित गया था वह मुझे परेशानी में डाल देता है । मुझ जैसे अफसर के लिए रेलगाड़ी के सफर मे मिले एक अनजान देहाती लडके ही भला क्या अहमियत ! कोई सेतिहार मजदूर रहा होगा। काला-कलूटा, फटी हुई गंदी धोती और जगह-जगह से तुला-मुड़ा पुराना-मा बेडौल वुश्शर्ट पहने वह लड़का क्यों मेरे लिए चुनौती बन जाता है । यह भी नहीं समझ पाता हूं कि पिताजी के मृत्यु-प्रसंग में वह कुरूप, गवार और फटेहाल लड़का क्यों मेरी आंखों के आगे आ जाता है। इस गवार लड़के की याद के साथ क्यो एक सवाल मेरे जेहन में तूफान मचाने लगता है ? ऊपरी स्तर पर यह कहने मे मुझे सुविधा और सुरक्षा महसूस होती है कि पिता जी बूढे थे, इसलिए मर गये । वुढापे का कोई इलाज तो, लेकिन अपने भीतर बैठ कर कभी-कभी सोचता हूं तो लगता 106 : सरहद के पार - स्वाभाविक मौत नही मरे। कुछ वर्ष और जी सकते थे ये । आखिर यासठ- तिरेसठ वर्ष की आयु को ही बूढ़े होने को आखिरी सीमा क्यों मान लें? पिता जी के गभीर रूप से बीमार होने की सूचना पाकर जय मैं गाव गया था तव कई लोगों ने मुझे सलाह दी पो कि यदि ठीक ढग से इलाज हो और साने-पीने की अच्छी व्यवस्था रहे तो पिताजी कुछ वर्ष और देख लेंगे। मा ने दवी-दवी जबान मे इसकी तरफ इशारा भी किया था, "यहीं गांव मे दवा-दारू का इंतजाम हो नहीं पाता है बवुआ। छोटी जगह है, छोटे डागहर हैं । फिर उतना पैसा भी नहीं रहता है कि ढग का खाना दिया जा सके तुम्हारे पिता जी को।"."मां आगे कुछ और कहना चाहती थी, लेकिन मैंने बीच मे ही मां की बातों को दूसरी दिशा दे दी, "उसकी चिंता मत करो मां । मैं दे कर जाता हूं रुपये-पैसे ।" मां मेरी बात काटती हुई धीरे से बोली पो, "नहीं, खाली रुपये-पैसे की बात नहीं है बबुआ। मैं तो चाहती थी कि अपने साथ ले जाते इनको । बड़े अस्पताल मे..." मां की बात बीच में ही कट गयी पी । खपरैल की छप्पर की ओर एकटक देखती जमे अपनी कसी बात का सुधार करती हुई मां बोली थी, लेकिन पया ले जाओगे। सेवा-टहल में दिक्कत होगी वहां । गाव-घर छोड़ कर कही जाने को ये तयार भी हो तब न!" मां ने मेरे मन की ही बात छीन ली थी। प्रफुल्लित होते हुए मैंने कहा था, "यही तो मैं कहता हू मां। पिता जी गांव छोड़कर जायेंगे नहीं। इसलिए कहता हूं कि इलाज वगैरह यही हो और डॉक्टर के कहे मुताबिक खाना दिया जाय । असल बात यह है मा कि आदमी को वही रहना चाहिए जहां उसका जो लगे। जिस जगह आत्मा को संतोप न मिले, वहा रहने से आदमी टूट जाता है। है कि नही ? और पिता जी को तो जानती ही हो ! जब तक दो-चार लोग इनको घेरे न रहे तब तक इनका मन ही नहीं लगता । अब बताओ कि शहर मे इनको कौन मिलेगा?"-"ठीक ही कहते हो बेटा" बोल कर मां चुप रह गयी थी। रुपये-पैसे देकर मैं शहर लौट आया था। तीसरा महीना भी नहीं बीता था ।

पितृशोक : 107 कि बड़े भैया का तार मिला-पिता जी नहीं रहे ।" मृत्यु के पांचवें दिन तार मिला था। सपरिवार गांव पहुंचा। बड़े- चुजुर्गों ने जिस ढंग से क्रिया-कर्म और भोज-भात करने को कहा, उससे काफी बढ़-चढ कर खर्च किया गया । महाभोज तो इतने शानदार ढग से हुमा कि लोगो की याददाश्त में बसने वाली बात हो गयी वह । क्रिया-कर्म संपन्न करने के बाद रेलगाड़ी से सपरिवार लौट रहा था। वापसी की उस यात्रा में मृत पिता जी की बहुत याद आ रही थी । भन अनजाने ही पिता जी की मृत्यु के कारणों की तलाश करता रहा। हर कारण आखिरकार उसी विंदु पर पहुंच जाता कि पिता जी की मृत्यु स्वाभाविक मृत्यु नही थी। गांव के लोगों की और खास तौर से मा की सलाह याद आती तो मन किसी अपराध-भावना से ग्रस्त होने लगता । रेलयात्रा के दौरान मन बार-बार इसी उधेड़-बुन में उलझा रहा। गाड़ी किसी छोटे-से स्टेशन पर रुकी थी और वह काला-कलूटा फटे- हाल लड़का बाहों मे एक बुढ़िया को किसी सामान की तरह उठाये डिब्बे मे घुसा पा। चीथड़े जैसे मारकिन की साड़ी में बुढ़िया लिपटी हुई थी। लड़का बुढ़िया की बाहो में टांगे पूरे डब्बे में जगह की तलाश करता रहा और अंततः मेरे बैठने की जगह के सामने वाले पैसेज में आकर खड़ा हो गया । चीथड़ों में लिपटो बुढ़िया इतनी गंदी दिखायी पडती थी कि खाली जगह होने के बावजूद कोई यात्री बुढिमा को जगह देने के लिए तैयार नहीं था। पूरे डने का चक्कर लगा कर लडका मेरे सामने की बेंच पर साली जगह देखता खड़ा हो गया था। उस चेंच पर तीन आदमी थे। यावा मे दौरान उन तीनों मे मेरा परिचय हो गया था। एक हिंदी के प्राध्यापक थे, दूसरे डिप्टी कलक्टर थे और तीसरे एक मास्टर साहय पेः प्राध्यापक महोदय और हिप्टी-कलक्टर साहब ने जब पह: तो इस आशका से ज्यादा हो अपनी जगह पर पगर गये लड़का गंदी बुढ़िया को इसी वेंच पर न पिठादे की .

108: सरहद के पार पर बैठा था उग पर मेरा पूरा परिवार था। आसानी से वहां जगह नहीं बन गकती थी। लडका जप घोडी देर युढ़िया को बाहो मे किसी भारी मामान की तरह उठाये सडा रहा तो कोने में बैठे मास्टर माहब थोड़ा सिसक गये और लड़के के लिए जगह बना दी। लड़के ने पहले बुढिया को बिठाया और फिर उगलियों भर जगह पर बैठकर बुढ़िया को महारा देने लगा। बगल मे बैठे प्राध्यापक महोदय और डिप्टी कलक्टर साहब ने नाक सिकोड ली। मुझे भी पिन हुई देख कर । हम सब ने इसके लिए उम देहाती ढच्चर के मास्टर साहब को जिम्मेदार ठहराया। यात्रा के दौरान मास्टर माहब से सद्भाव का जो सबंध बना था वह अचानक ही टूट गया। हम मबने बुढ़िया की ओर से आंखे फेर ली। वेहद घृणा हो रही थी बुढिया को देख कर । एक मास्टर माहब थे जो वेमतलव लड़के से बतिया रहे थे। उम वातचीत से मुझे यह मालूम हो गया कि लडका बुढिया का बेटा है। बुढिया किसी गम्भीर बीमारी से ग्रस्त है। बेटा इलाज के लिए इसे शहर ले जा रहा है। अगले एक स्टेशन पर लड़का उतरा और दोडकर बुढिया के लिए पानी ले आया। बुढिया के शरीर से निकली दुगंध और कुरूपता से बचने के सिए मैं विपरीत दिशा की खिड़की से गर्मियो की शाम में भागते दृश्यों को देख रहा था। शौचालय की तरफ गया तो देखा, गौचालय का दरवाजा खुला है और वही लड़का बुढिया को सहारा देकर विठाये शौच करा रहा है । देख कर ऐसा लगा जैसे कोई पिता अपनी छोटी सी बच्ची को शौच के लिए विठाये हुए हो । बगल के दूसरे शौचालय से में बाहर निकला तो देखा लडका बुढिया को चीथड़े-जैसी साड़ी पहना रहा है । मैंने आंखें फेर ली। बेहद घृणा हो आयो देख कर । बुढ़िया बीमारी के कारण एकदम बदहवास-मी लग रही थी। बेटे की गोद में लुढकी पड़ी बुढिया का सिर दबाते हुए लड़का कुछ पूछ रहा था। घृणा भरे इम दृश्य से बचने के लिए प्राध्यापक महोदय कोई रंगीन पत्रिका पढ़ने लगे थे और डिप्टी कलक्टर साहब सुबह के बासी अंग्रेजी अखबार के पन्नों में डूब गये ।

पितृशोक : 109 थे। एक वही खूसट मास्टर साहब थे जो लड़के से कुछ पूछ-ताछ कर रहे थे। हैंडलूम की धोती-कुर्ता पहने उस देहाती ढच्चर के मास्टर पर हम सब का गुस्सा था, क्योकि उन्होंने ही बुढ़िया के लिए जगह बनायी थी। मास्टर साहब से लड़के की बातचीत के जो टुकड़े अनचाहे ही मेरे पास लुढ़कटे हुए पहुंच रहे थे, उनके आधार पर मैंने जाना था कि लड़का चार- पांच किलोमीटर दूर के अपने गांव से बुढ़िया को खाट पर लाद कर रेलवे- स्टेशन आया था। कोई चचेरा भाई भी था उसके साथ जो स्टेशन से लौट गया। वुढ़िया और उसका बेटा खेतिहर मजदूर हैं । संपत्ति के नाम पर एक बकरी थी और एक पाठा था जिन्हें बेंच कर लड़का अपनी मां को इलाज के लिए शहर ले जा रहा है। पांच-छह स्टेशन बाद लडका बढ़िया को पहले की तरह बाहो मे उठाये एक बड़े-से रेलवे जंक्शन पर उतर गया। हम सब ने राहत की सांस ली। डब्बे में एक परिवार आ गया था। अधेड़ उम्र के एक सम्य-सुसंस्कृत सज्जन थे। भाचार-व्यवहार से ही लगा कि उनके साथ उनकी पत्नी थी और दो जवान बेटियां थी । उनको जगह मांगनी नहीं पड़ी। प्राध्यापक महोदय मोर डिप्टी कलक्टर साहब ने जरूरत से ज्यादा जगह बना दी। सिर्फ देहाती वञ्चर के वै मास्टर साहब विना हिले-डुले बैठे रहे । मास्टर साहब के गवारूपन और असभ्यता का यह दूसरा प्रमाण था। मैरे साथ- साथ प्राध्यापक महोदय और डिप्टी कलक्टर साहब ने हिकारत की नजरों से उम देहाती मास्टर को देखा। मैं भी खिसक कर एक किनारे हो गया ताकि बॉन्ड हेयर वाली खूबसूरत युवती को खड़ा न रहना पड़े। सब आराम से बैठ गये तो मुझे एकाएक उस लड़के का ध्यान भाया जो कुछ ही देर पहले दिमा को लेकर रेलवे जंक्शन पर उतरा था। यह बड़ी विचित्र बात थी कि अपनी गैर-मौजूदगी के वह गवार और फटेहाल लड़का एक प्रश्न की तरह मेरी मांखों के सामने खड़ा था । उस गंदे, असभ्य सेतिहार मजदूर को में बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था,लेकिन अपने ही सामने 110 : सरहद के पार मैं बहुत लाचार था। अब मुझे पक्का विश्वास हो गया था कि जिस पिता जी का इतने शानदार ढंग से क्रिया-कर्म संपन्न कर मैं वापस जा रहा हूं, वे मेरे पिता जी स्वाभाविक मौत नहीं मरे थे । वे कुछ समय तक और जीवित रह सकते थे। आश्चर्य था कि यह बोध मुझे काले-कलूटे असभ्य और गवार लड़के से मिल रहा था जिस लड़के में मेरे चपरासी बनने की योग्यता भी नहीं थी। जाने क्यों, मैं भीतर से अशांत था और प्राप्त बोध मेरे लिए आत्म-यातना बनता जा रहा था। (हिन्दुस्तान, 17 जून '88) 00

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Sarhad Ke Paar

Author
Ramdari Singh Diwakar
Title
Sarhad Ke Paar
File name
Sarhad Ke Paar
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Dinmaan Prakashan Charkhewalan Dehli
Language
Sanskrit
Pages
114
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551115
Barcode
4990010031888.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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B4qWLuiKJ0o
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