Charan Sahitya Shodh Sansthan, Ajmer
Kavya Ratnakar
Front matter
प्रार्थना . -- सर्व साधारण काव्यरसिक महाशयोंसे सविनय निवेदन है । कि, जो इस ग्रंथके अंतमें कुछ समस्या अपूर्ति लिखी है यदि जो सुकवि सज्जन महाशय कृपापूर्वक उनकी यथाशक्ति सुन्दर पूर्तिकर निम्नोक्त नामधाम पर प्रेषित करेंगे तो हम उन महाश- योंके परमानुग्रहीत होंगे. और उन पूर्तियोंमें जो उत्तम पूर्ति । होंगी उसे हम समाचार पत्रोंमें प्रकाश करनेके पश्चात् जो न- वीन पुस्तक प्रकाशित होगी उसकी एक प्रति उन पूर्तिकर्ता : महाशयोंके प्रसन्नतार्थ उनकी सेवामें पारितोषकार्थ प्रदान करेंगे. (पतापूरा आनेपर ) आशा है कि सुकवि महाशयगण अवश्य अविलंब इसप्रार्थना पर ध्यान दे हमे प्रोत्साहित करेंगे-. . सुकवियोंका दास, बनवारीलाल गुप्त संदरबजार जबलपूर. पंडित सूर्यनारायण त्रिवेदी मत्री, "नागरी साहित्यरसिकसभा" स्थान सदर बाजार, जबलपूर.
-- निवेदन पत्र। Dear नागरी रत्नभंडार. सम्प्रति नागरीकी दुरावस्था से नागरी पुस्तक समूहका 'एक स्थानमें संग्रह अर्थात् पुस्तकालयों का भी अत्यन्त अभाव है, विशेषतः इस क्षुद्र नगर जबलपूर सदरबाज़ार में परमावश्यकता है अतएव समाने इस अभावके पूर्त्यार्थ प्रयत्न किया है, बरन यह महत्कार्य बिन सर्व सज्जन हिन्दी हितैषियों की सहायताके होना दुर्लभ है इसकारण समस्त हिन्दी भाषाके ग्रंथकार, सुलेखक, तथा यंत्राधीशोंसे विनय है कि निज अ- द्वितीय पुस्तकों की एक २ प्रति कृपापूर्वक अर्पण कर सभाके उद्देश्यकी पूर्ति कीजिये, और यह भी संकल्प किया है कि नित्य नवीन मनोहर ग्रन्थ नाटक, उपन्यास,काव्य, प्रहसन, भाण आदि रचेजांय और उन पुस्तकोंका स्वत्व हिन्दी प्रेमी यं- त्राध्यक्षोंको प्रदान किया जाय इसकारण सम्पूर्ण हिन्दी हिते- च्छुक यंत्राधिकारी महाशयोंसे निवेदन है कि उक्त पुस्तकोंको प्रसन्नतापूर्वक प्रकाशितकर. मातृ भाषा हिन्दीका जीर्णोद्धार कीजिये और हमारे उत्साहको वृद्धिंगत कीजिये- पं. सूर्यनारायण त्रिवेदी मंत्री, " नागरी साहित्यरसिकसभा" स्थान सदर बाजार जवलपूर. .. --
धन्यवाद।
हम अतिशय कृतज्ञतापूर्वक प्रगट करते हैं कि हमारे का-
व्यानुरागी पंडित श्रीसूर्यनारायण त्रिवेदीजीने हमारी प्रार्थनानु-
सार इस ग्रंथके संग्रह करनेमें अमित सहायता प्रदान कर हमें
अनुबाधित किया, जिससे हिन्दीभाषा, काव्यरसिकानुरागी
महाशयोंको भी इसका आनंद प्राप्त होगा, और वे देखेंगे कि
धर्तमानसमयमें भाषा काव्यकी क्या दशा है, अंतमें हम अपने
श्रीमान् परम सुजान खेमराज श्रीकृष्णदास योग्य बम्बई निवासी
कोसी शतशः आन्तरिक धन्यवाद देते हैं कि उक्त महाशयने
इस ग्रंथके मुद्रांकका सहर्ष स्वत्व स्वीकार कर हमारी विशेष
सहायता की है.
स्थान
सदर बंजार
जबलपूर
आपका कृपाकांक्षी,
बनवारीलाल गुप्त.
उपक्रम। श्रीसच्चिदानंद आनंदकंद सर्वगुणाकर कपासागर परमेश्वरको कोटिशः नमस्कार है कि जिसकी अलायकपासे आज हमारी मनोकामना परिपूर्ण हुई कि “काव्यरत्नाकर" ग्रंथ प्रकाशित हुआ, नागरी भाषाके प्राचीन एवं नवीन ग्रंथोंके संग्रह करने तथा रचनेमें हमारा स्वाभाविक अनुराग नित्य रहता है और अनेक प्राचीन वा नवीन ग्रंथ हमने सपरिश्रम खोज २ कर एक- त्रित भी किये हैं उन सुन्दर ग्रंथोंके प्रकाशनार्थ भी हम सदा प्रयत्न करते हैं. परंच शोक है कि द्रव्याभाव और हमारे भारत- वासी महाराजोंसे लेकर निर्धनतक सर्व सामान्यमें पाश्चमीय शिक्षाके प्रादुर्भावसे हमारी मातृभाषा देवनागरी (हिन्दी) की कैसी दुर्दशां हो रही है अस्तु, इस क्षुद्र ग्रंथके प्रकाश करनेका अभिप्राय यह है कि, बहुधा हिन्दी समाचार पत्रोंमें नित्य नवीन मनोहर समस्यापूर्तिक कवित्त वा सवैया अनेक विषयोंके अ- नेक काव्यरसिकों द्वारा प्रकाशित होते हैं और मनुष्य अज्ञान- तावश उन सुन्दर काव्योंका अपमान कर रद्दीमें फेंक देते हैं जि- ससे कुछ लाज नहीं होता है, इसकारण हमने यह विचार सप- रिश्रम प्राचीन वा नवीन उत्कृष्ट कविता, भक्ति, श्रृंगार करुणा, वीर, प्रेम, हास्य, प्रकृति विविध रसोंसे परिपूरित संग्रह कर उक्त ग्रंथको प्रकाशित किया है.यदि काव्य रसिकानुरागियों की कुछ प्रीति इस ओर दृष्टि पडेगी तो शनैः २ हम अन्योन्य मनभावन और सुललित काव्योंके ग्रंथोंको भी प्रकाशित करेंगे. आशा है
उपक्रम।
कि काव्य प्रेमीजन इस "रत्नाकर "के रत्नोंको छांट अपने
कंठका हार बनावें और शंख वा घोंघोंको निरुद्यमी मूल्के
निमित्त छोड़कर हमारे परिश्रमको सफल कीजिये और हमारा
उत्साह बढ़ाइये, महाशय ययपि यह "रत्नाकर" है तो भी यह
न समझना कि शंख वा घोंघोंसे रहित है-
आपका बनवारीलालगुप्त,
स्थान सदरबजार
जबलपूर.
ता० २९-४-९५०
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श्रीगणेशाय नमः । समस्यापूर्ति रत्नाकर। मंगलाचरण। दोहा-आदिदेव दाता सुमत, वंदों दोउ कर जोर । दास जान रखियो कपा, चितवत हों तब ओर ।। शीशधरत तुव चरण पै, विनवत वारंवार । पुरवहु सब मनकामना, हृदय सुनेक विचार ॥ नहिं विद्या नहिं बुद्धि बल, और नहीं कछु ज्ञान । ग्रंथ समस्यापूर्ति यह, अवलोकहु धरि ध्यान ॥ सोरठा-विनवहुँ वारंवार, गणनायक गजवदनको । लघु मतिके अनुसार, संग्रह कर यह ग्रंथ शुज ।। संतनको कर जोर, विप्रनकों परणाम करि । मति मेरी है थोर, कृपादृष्टि करिये सबै ॥ सवैया-गणनायकके पदवंदत हों अब वेग कपाकर दुःखहरो । महाराज कपा करो दीनन पै इमि नेक न यामें बिलम्ब करो॥ बनवारी पुकारत देर भई शंका प्रक्षु आनके तुरत हो। दोऊ कर जोर करों विनती गणनायक आय सहाय करो॥१॥ करिवर वदन सदन गुणके गणनायक बुद्धि विनायक हो। बनवारी कहे कर जोर प्रक्षु निज भक्तनके सुखदायक हो। हो बुद्धि प्रकाशन कष्ट हरन अरु दुष्टन हित भयदायक हो । मम लाज रखो निज दास जान गणनायक आय सहायक हो।२॥
काव्यरत्नाकर। समस्या १-हमहूं पै कृपा कबहूं करियो । श्रीनंदनंदन आनंदकंद सदाजन आनंद सों भरियो । मोरपखा मुरली बनमाल कपोलनकुंडल सों लरियो । ज्यों गज द्रौपदी दासन पीर हरी बहुबारहि त्यों हरियो । सो कविनाथ दया करिके हमहूं पै कपा कबहूं करियो ॥१॥ चम्पकरूप कटाक्ष कटारसे कलिकंदसे दंतनसो भरियो। कंदुकोन सजे कुच कंचुकी नवली त्रिवली की भली परियो । नीवी नितम्बकी कान्ति छटा पै लटा मन भोगी नटा हरियो। कविनाथ अनै रति मूरतसी हमहूं पै कृपा कबहूं करियो।।२।। सुनो उद्धव योगको जाल कहां लौं फैलायके गोपिनको छरियो। नहिं एक चलेगी तिहारी यहां के अनेक उपाय नहीं तरियो। शिवकी यह बात अलीक नहीं तुम चेत सोया चितमें धरियो। यह जाइके गोपीसँदेश कहो हमहूं पैकपाकबहूं करियो॥३॥ अक्रूरके साथ ही जात जो नाथ तो क्रूरस्वभाव नहीं धरियो । बिनवों पग लागि तोहिं ललापुनि गोकुल आनँद सों भरियो। विरहानलज्वालको ताप महा दिनचारिमें आइके सो हरियो। शिवहू करजोरके टेरत है हमहूं पै कृपा कबहूं करियो ॥ ४ ॥ दलि दारुण दारिद दुःख घने चित चिंतितक्लेश कबै हरिहौ । गृहमार अपारकि व्याकुलता तनु दुर्बलते कब धों टरिहो ॥ कबधों अवशोक तरंगनिते क्षमिक अघमों तरनी तरिहो। हगफेरिफते सम दीननपै प्रक्षु दृष्टि दया कबधों करिहो ॥ ५॥ कबधों निजमाव अनुग्रहते शरणागतमें करुणा धरिहो ।
९ काव्यरत्नाकर। दुखदायक भासिक अल्पअहै कंबधों यह आपतिको हरिहो । सब पातक नाथ क्षमा करिके मम कारजको कबलों सरिहो । हगफेरि फते सम दीननपै प्रभु दृष्टि दया कबधों करिहो ॥६॥ समस्या २-केहि कारण पानीमें आग लगी- रघुनन्दन सिंधुसमीप खडे मग मांगत बानि बिनीतिपगी। दिन तीन गये विनती न सुनी प्रक्षुके रिसि राशि हृदय उमँगी ।। बलदेव सजो धनुबान जबै तब सागरमें अति ज्वाल जगी। दधि डोषनको रुख राम कियो यहि कारण पानीमें आगलगी।। जब देव अदेव पयोधि मथ्यो तब देश हलाहल भीर भगी। हरिकूदि परे यमुना जलमें उगल्यो विषनाग सो देह दगी॥ जबलंक दह्यो बलदेव तबै बरखे धन औरहुँ ज्वाल जगी। बड़वानल सिंधुबसे नितही यहिकारण पानीमें आगलगी ॥२॥ समस्या ३-केहि कारण शेषके शीश हजार- कद्रू कश्यपकी पतिनी पतिसेय प्रसन्न कियो यकवार । नाग सहस्र मेरे सुत होइँ यहै बर दीजिये मोहिं उदार ।। सो सुनि आशिष दीन्ह ऋषै बलदेव अनन्त लियो अवतार । एकमें अंश सहस्र हूं को यहिकारण शेषके शीश हजार ।।१।। जो भगवन्त अनन्त कहावत जासुके अंग सहस्र विचार । सो सहसानन रूप भयो फन एक धरयो बसुधाकर भार । गान करे बलदेव नितहिं परमेश्वरके गुण नाम अपार । छन्द अनेक उचारणको यहि कारण शेषके शीश हजार ।।२।। समस्या ४-प्रीति पुनीति भई परतीतसो-
१०.
काव्यरत्नाकर।
पर्यक पै जात लजातसदा नहीं गात छुये पतिको सुठिप्रीतसों।
मुख धुंघटही में छिपाये रहे नहीं नाह सों नेहकरे पुनि हीतसों॥
शिव कोटि उपाव करै तबहूं नहिं वैनकदै कबहूं रसरीत सों।
अलीसोई ललीको लखेकिनआजसोप्रीतिपुनीति भई परतीतसों
समस्या ६-मानो पानी परो कुम्हलानी लतामें-
पिय जायके छाय विदेश रमें दिनरात रहौं उनहींके पतामें ।
प्रेमके फंदकी फांसीपरी उननाम रव्यो मैं मंद गतामें ।।
इक प्रातकी बात सुनी सजनी जब जात नहानको गंगतटामें।
उन्हें आवत देखके मनभई मानोपानी परो कुम्हलानी लतामें
प्रभुपुरको इक ब्राह्मण भेज नहीं प्रभु आये रही दुचितामें ।
राक्षसने कर कीन्हो जो हाथ भयो यह जीव सदा विपतामें ॥
रुक्मिणी होय अधीर विशेष पै ध्यान दियो प्रकी प्रशुतामें।
प्रसुआगमविप्रसुनायो जोआय मनोपानीपरोकुम्हलानीलतामें२
रास समय नंदलालने खेल अनोखी रची सबही वनितामें।
अतान भये क्षणमें जब देखी सखी सबही ममतामें ॥
स्तुतिठानि अनेकन भांति कही पशु नाहि कोउ समतामें।
प्रगटे गोपाल मुदित सखियां मनो पानीपरो कुम्हलानीलतामें३
यूथके यूथ जो भूप लगे सब एक ते एक बडे प्रशुतामें ।
शंशु शरासन टारिसके नहिं मीजत हैं कर एक मतामें ॥
श्रीरघुनन्दन भंज्यो चाप नहीं कोऊ एको रह्यो समतामें ।
यहविलोकिसियाजी मनभई मनोपानीपरो कुम्हलानीलतामें ४
उन्नतिकी रचिरंच बिलोक सो आश उमंगधसी ममतामें।
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काव्यरत्नाकर। ११ . बीजबयो जिन बीर बेधन्य करो सब सींच मिले इकतामें । कालके तेजसे जाय न सूख रहे न उपाय कछू कमतामें । आज भयोमन येतो आनंद मनो पानी परो कुम्हलानी लताम।५। अनेकनबीर सनेरसबीर अनेकसने रसकी कवितामें । अनेक वियोग अरु प्रेमसने सो अनेकन हास्यसने लहितामें । अनेकन रौद्रको भावबताय सनो यह शब्द विधो जगतामें । मेलकियो यों होयगो हर्ष मनोपानी परोकुम्हलानीलतामें ॥६॥ धीर धुरीन धरा अधार गयो गढ़ लंककी हेमछटामें। आयो त्रिलोकीनाथ जबै घननाद प्रहार कियो है गदामें । शंभुकी शक्तिको मान दियो अरु खेचलयो तब होत नशामें। देख दशा लघुचाताकी उन मनोपानीपरोकुम्हलानीलतामें॥७॥ समस्या ६-करमीजत भामिन हेतु न जान्यो- लंकेशने सीय हरी प्रकी निजमुक्ति विचारके बैरजो ठान्यों। निजरानीनेदीन्ही सलाह अनेक पैअंत बिचारिकेनेकनमान्यों ॥ बहुभांतिबिचारिकेजानिलयीपियशीशपै आयकेकालतुलान्यों। हाय दई कह हाय दई कर मीजत भामिन हेत न जान्यों॥१॥ एक समय यमुनातटमें गोपाल जू जायके रास जो ठान्यों। गोपिका मान भयों जवहीं मनमोहन ते बहुमान जो ठान्यों गर्व प्रहारी जू देखो जबै सब गोपिन जीवमें गर्वसमान्यों। अंतर्ध्यान भये प्रभुजी कर मीजत भामिन हेत न जान्यों ।२। सबदेख विचारकरें मनमें प्रण है दृढ ये मिथिलापतिठान्यो। नहिं सीयविवाह विरंचिरच्यो यह खेद सबैहिय बीच समान्यो। .
१२ काव्यरत्नाकर। न नारि समाजमें धूममची नहिं जानतबर परब्रह्मलिखान्यो। हाय दईकर हाय दईकर मीजत भामिन हेतनजान्यो ॥ ३ ॥ आई छबीली छटाको बगार अटा चढ़ भारत सुखपलान्यों । रूप विचित्र विलोक थके अरु रीझपचे कछु स्वाद न भान्यों ॥ नेहको नातो गयो बढ़ बेग सुकेल कुटुंब करै मन मान्यों। हार प्रतीत गई हियमें कर मीजत भामिन हेत न जान्यों॥४॥ राजतथे सुखके सब साज अरु गाजतथी विद्यामन मान्यो। . द्रव विलोक द्रवैबहु लोग गये हिय हारिमिल्यो न ठिकान्यो। नेहको मेह भरो सब गेह विदेह हो मेल शरीर समान्यों। हाय भयो कहभारत आज कर मीजत भामिनहेतनजान्यों ।५ समस्या ७-हमसे तुमसे अब काज कहा है- नहिंकानकियो जो पियाने कह्यो अवधेश परिक्षहि लीन्हचहाहै। • धारि सिया वपुबाद कियो प्रभुसे यह कीन्ह अनर्थ महा है ॥ भाव सुभक्ति विचारि हिये तज शंभुसती श्रुति पंथ गहा है । सुन प्राणप्रिया इहि हेतुविषै हमसे तुमसे अब काज कहा है १ करके करार गयो निशि आवन आयो जो लालप्रभात यहां है। बात सुने हरि हाथ गहे उर नागरि छायो अनन्द महा है । झक झोरत बांह किये रिसऊपर बात अली ये सुनाई कहा है। जहँ रैन बसे तहँ जाव लला हमसे तुमसे अब काज कहाहै।२। समस्या ८-पहिचानत हैं तेहि लानत हैं- झकिमारनको बनि ब्यासकै पंडित वेद पुरान बखानत है। करिदान अनेक नहायके तीरथ पुण्य कहानिन छानत है ॥ १ काव्यरत्नाकर। १३ हरिचन्द्र जू प्रेम नहीं हियमें वृथा श्रमकी वह जानत है। परमेश्वर कौन जुपै जगमें पहिचानत है तेहि लानत है ॥ १ ॥ मन जो मनमोहनके सँगको तिहिको फिर फेरके आनत है। अरुझाइ चुकी हगताहि कोऊ जगमें सरुझाइबो जानत है । जब प्रीतिको प्रेत लगै सजनी कि सिखावन मंत्रते मानत है। यह आंसव पीके पतिव्रतको पहिचानत है तेहि लानत है ॥२॥ यह ऊधव श्याम सखा है सखी पर प्रीतिकी रीति न जानत है। विजया धसि ज्ञानको छानभलै तजि आनन नाकसों पानतहै । हम लोगनसे कहें योग करो सबते बड़ योग बखानत है । उलटी बुध प्रेमतो योग बड़ो पहिचानत है तेहि लानत है॥३॥ समस्या९-जायतोजायभलैतनजोपरकैहूं नहींहमरोपणजाइगौ- आजलों जोन मिली तुमसों धरि धीरहिये दुख द्यौसबिताइगौ । ताइगो तेरो शरीर समीर वियोगलता तबहूं मुरझाइगौ ॥ आश मिलाप धरे रहिये जंगमोहन एक दिना मिलजाइगौ। जायतो जाय भलै तन जो परकैहूं नहीं हमरो प्रण जाइगौ ।। होय न जैसी लिखी करतार लिलार हमारे डरों न डराइगौ । बूडै चहे कुल कान अली निज बात न हौं कबहूं विसराइगौ। पै जो कही जगमोहनसों मिलिहैं मिलिहैं नहिं अंतर ताइगौ। जायतो जाय भलै तन जो परकैहूं नहीं हमरो प्रण जाइगौ ॥२॥ काहे न धीरज धारे रहो इक द्यौसतो हों मिलिबोहुलसाइगौ । आवेधरी घरी वाही घरी जब जीवनको सुखहू तुम पाइगौ ॥ सोइयखोइ संदेह सबै जगमोहन एक दिना बिलसाइगौ १४ काव्यरत्नाकर। जायतो जाय भलै तन जो परकैहूं नहीं हमरोपण जाइगौ ॥३॥ तेरो धरे नहिं धीरज हीयतो हो ही सदा विरहागी जराइगौ। कैसी करों धिक प्राण औकानहिं जाके रहे सबही बिनशाइगौ ॥ एक रही मिलवेहीकी आश सोहा जगमोहन बाहि लगाइगौ जायतो जाय भलै तन जो परकैहूं नहीं हमरो प्रण जाइगौ ॥४॥ देखो अली वह जीवनमूरिसो कैसो हमें हँसिके तरसाइगौ। नैनसों नैन मिलायके भौंह कमान लो तान कहूं विरमाइगौ ॥ होतो बिकी जगमोहन हाथ तो होय जो मेरे लिलार लिखाइगौ। जाय तो० ॥ ५॥ जोरकही तुम दीन्ही लिखी मिलि हैं तुमसों सुई क्यों बिसराइगौ। जो पै कही समुझावनहींके लिये पुनि क्यों विश्वास जनाइगौ ॥ जो न पतिआवे कही अपनी जगमोहन पाती कहोतो दिखाइगौ। जायतो जाय भलै तन जो परकैहूं नहीं हमरो प्रण जाइगौ।। द्वैकेअधीरलिखीपतियांकबको मिलिबो तुमसों ठहराइगौ। बात बनावती रोज सुनो हँसिके सबही विधजीव हराइगौ ॥ बीते निते जगमोहन द्यौसनिशाविरवाह है क्योंतरसाइगौ। जाय तो जाय० ॥ ७॥ कैयकबार लिखी प्रणके अब तो भला पूरो करोउरझाइगौ । हाय दई सहिये किमि पीर विना तुम द्यौस सुनो नियराइगौ । चाहतप्राण चले जगमोहन फंद फंसे अबको सुरझाइगौ। जाय तो जाय० ॥ ८॥ जो अब पूरी करें न अहो सजनी रजनी दिनदूनोदिखाइगौ।
काव्यरत्नाकर। १५ . . औधि विसासनि दीन्हीं कहूं जगमोहन जीवजरोअकुलाइगौ। - पावत कोटिकलेशतऊबरुपिंजर प्राण शरीर उडाइगौ। जाय तो जायः॥९॥ जो मन तेरे दगाही रहे जगमोहन नेहतगान लगाइगौ। पै लगी छूटे ते छूटे भले जब प्राण शरीरहि संग छुटाइगौ ॥ काहे लिखी पतियां बदकै करकै गहिरो प्रणधीर धराइगौ । जाय तो जाय भलै तन जो परकैहूं नहीं हमरोपण जाइगौ।१० समस्या १०-हारहियोको सम्हारन लागी- सोई हुती नवला परयंक पैशंक बिना सबरैनकी जागी । वाके छुटे कुचपै कच श्यामल वेदी सरोरुहआनन रागी ॥ तौलों परी पग आहट कान सनेह भरी रस पीयके पागी। चौंक उठी जगमोहन केश औ हार हियेकोसम्हारन लागी।३। सोई निशंक जहां परयंक बितान कलिन्दकापी अनुरागी। फूली निवारीजुही जलकूल लख्यो जगमोहन स्वममें पागी ॥ प्यारी गटोकर चुम्बन लै पपिहा सुनकूकसुचौंक जागी। नींदकेडारे रह्यो मन अन्त सुहार हियेको सम्हारन लागी! २। पी परदेश मरूंकर द्यौसकटे ग्रहकाज भयोदुख भागी। ज्यों त्यों भई रजनी अपनी सजनी समसाजिके सेजलेजागी.॥ ध्यान धरै टुक नींदलगी मुरलीधर आपकह्यो विरहागी। जानि उरोज खुले जगमोहन हार हियेको सम्हारन लागी।३। बैठी वधू जगिके उठि सोवत मीजतहाथन नैननरागी। भूली शरीर दशा सजनी संग प्रेम अलाप बिलापमें पागी ॥
१६ काव्यरत्नाकर। चेत रह्योन कहाँ अचरा जगमोहन आयो तहां अनुरागी । चौंकी चितै झाट घूघटलाय सुहारहियेको सम्हारन लागी।४। समस्या ११-कृपाकर दीनको दास करे रहो- जबलों तन प्राण वसे तबलों शुचि धर्म विचार सुधीर धरेरहो। बलदेव सदा उपकारं दया दृढ संगति साधुन साजसरेरहो । सुख हर्ष विषाद समानसहो शिर.अंक न पै परतीतिपरेरहो। निशिबासर ईशसों यो विनवोकि कृपाकरदीनकोदासकरेरहो मुनिकेबिनती बहु बाल बली कहराम उठोसुखसों बिचरेरहो। हम चाहत नाकछू और प्रभू यहि अंगदको बलिबांहधरेरहो । जबलों नतजों तन ह्यां तबलों मुनिमान. हंससुयोहिंखरे रहो। जनमोज्याहि योनि तहूं बलदेव रुपाकर दीनकोदासकरे रहोर अब जाहु सखा अपने गृहको नितनेम हिये ममध्यानधरे रहो। सुनिके अतिशोच भयो मन अंगद आयसुतात शरण्यपरेरहो ॥ पदपंकजको तजिजाऊं कहा पशु बांहु गही सुसहीपै अरेरहो। जल मैन भरे विन्ती बलदेव कंपाकरदीनकोदासकरे रहो ॥३॥ परतीत सुप्रीति सुधारेहु रामहि रामहिके पथप्रेम परे रहो । पद पंकज ध्यान सदा उरमोंएक रामहिको करिआश अरेरहो। गुणज्ञान निरंतर रामहि त्यों फलजीवन पायमहीविचरेरहो। बिन्ती बलदेव सुदीन दयालु कपाकर दीनको दास करे रहो।४। जबलों जनिहोनहि ईश उदार बिकार ग्रसेकलिज्वालजरेरहो। तन मानुष ले धिक जीवनडै खर शूकर श्वानहिं तेइ तरे रहो । मदमोह दुराशभरे बलदेव निरंतरही भवफन्द परे रहो।
काव्यरत्नाकर। सुख होय तबै भजियेप्रक्षु पाहि कंपाकर दीनको दासकरेरहो।। समस्या १२वीं। धूम है फिरंगनकी- लाट बन बैठे हैं मुलुक दाद सुनिवेको हाईकोर्ट मुंशफी अदाल- नादि रंगनकी। हाकिम हमेशा सांच किज़िब विचारे बेश आगही आईन आछ मामल तरंगनकी ॥ गोरेशाही सेनापति दरवार सुदेश देश जीतत नरेश बलदेव सुउमंगनकी । दखल दुहाई वेक्टोरिया फिरा है चारु चित्त चाह चाकर सुधूम है फिरं- गनकी ॥ १ ॥ काबिल कचहरी फिरंगही हुक्कामन हैं बने हैं फिरंगही मात शाह जगनकी । मुलुक मताहेदी सुलाटहू फिरंगी है कौ- माली अनेक इन्तजामी हैं तरंगनकी ॥ शहर -२ देश देशन खलदारे सीधी लैन रेल्वे चलावत उमंगनकी । दौडरहीं बग्गिन ठेल टमटमादि ट्राम कहैं बलदेव देखो धूम है फिरंगनकी॥२॥ बखत हुमायूं सु अशोकसिंह. महाराज बीरसेन चक्कवै व लालसेन जंगनकी। भूपति घनेरे लक्ष्मणसिंह की न चेरे शाहन सकंदरसे तखत तरंगनकी ॥ मुहम्मद औरंग वो सुलेमान शेर- पाह, कबि बलदेव जाह दीखत उमंगनकी । दंगन दमामें त्यों बेलाने वेशशाहनको आयो राज्यकंपनी सुधूमहै फिरंगनकी॥३॥ समस्या १३वीं । बंक चितौनि चितै मुसकाई । बैठी हती सजनी गनमें सज नीके बनाय हिये हरपाई। त्यों तेहि औसर माह सुजान जु आय गयो तेहि ठांव कन्हाई॥
१८. काव्यरत्नाकर। देखि हियो मनमत्थजगो दुरिवेहित कांकर लाल चलाई । सोहे सखीनके सेष कियो इत वंक चितौनि चितै मुसकाई।। मैनकी मूरतिसी ललना.निज मंदिर सोवतथी सुखपाई । ताहि समय पिय प्यारे सुजान जू आय तहां रतिबात चलाई। लाज मनोजमें पागि गई तिय हां नहिंनाहि कछू न बसाई । प्यारे तऊ निज बात लही जब बंक चितौनि चितै मुसकाई।२। गौनते मौन पिया दुलही रही मौन ते बैठि हिये दुखपाई । त्योहिं सुजान जू जावक दैनको नाइन सासुरेकी तहँआई ॥ माडि महाउर चित्रितके पग हासिबेको इमि बैन सुनाई। प्यारे परे रहैं पाँय तिया सुनिबंक चितौनि चितै मुसकाई॥३॥ सोवत राधिका थीं सुखसेजपै आयगये तेहिं ठांव कन्हाई । वेगि जगाय अचानकही रतिरंगनकी तहँ बात चलाई ॥ भाषत गंगापरसाद यही तिय देखत श्याम गई सकुचाई। लाज भरी कछु बोली नहीं पर बंकचितौनि चितै मुसकाई॥४॥ समस्या १४ वीं । तेरी सों आंख पै आंखन देखी। देखी आंखें उन पक्षिनकीअरु कीर पर्तिगनकी बहुदेखी । देखी हैं केतिन वेश्यनकी अरु रानिनहूकी अनेकन पेखीं ॥ पेखी बहूतक पशुनकी जलजीवनकी तो करोरिन लेखी। लेखीगंगापरशाद सबै पर तेरी सोआंखपै आंखन देखी॥१॥ समस्या १५ वीं। हायबालरेजासीकरेजाकाढि लेंगई- . सुन्दर स्वरूप-चन्द्रबदन अनूप लखि जात मोहि भूप ऐसो रूप . - काव्यरत्नाकर। १९ . बाढि देगई । दाडिम दशन मृदु प्यारकी हँसन चित चाहकी फँसनमें कसन गाढि कैगई ॥ केसर तिलक धुंधरारीसी अलक दि- खलायके झलक चित्ररूप ठाढि कैगई। नैनसैन नेजा बच्चरामचित रोजा वह हाय बालरेजासी करेजा काढ़ि लेगई ॥ १॥ चम्पक बरन अतिकोमल कमल राशी दीपत शिखासी ज्यो- ति अंगमें उदै भई । देखत स्वरूप शीघ्र मोह जात रूपमान छूट जात ध्यान ज्ञान चेटक सों कैगई ॥. झांकिके झरोखे झलकाय छबि चोखे युग भ्रुकुटी चढायके झंटाकट देगई ।.बच्चूराम नैननकी सैनन चलाय बान हाय बाल रेजासी करेजा काढिले गई ॥२॥ केशर सों अंगपर केशरके रंग सजे मोती गुहे मंग रति रंग रूप वै गई । रम्भासी रमासी मेनकासी मृदु सोहेगात शचीसी उ- मासी सुखराशी ज्योति कैगई.। तडित तरंगन सों अंगन श्रृंगार शुचि रूपको दिखाय प्रेम प्रीति बेलि बैगई । बच्चूराम नैननकी सैनन चलायवानं हाय बालरेजासी करेजा काढि लेगई ॥ ३ ॥ गौर गात कोमल कलित बैस बारी बीच दीपक शिला सों द्युति चित्तमें चुभै गई । अंगन विर्षन सुरंगन बसन छबि जोबन तरंगन मतंग गति है गई ॥ चन्द्र मुख उज्ज्वल कुरंगहग दीरथ पै दाडिमदशन देखि सुमति नशै गई । रंग रूप बैस बैन सैन पञ्चबान मारि हाय बाल रेजासी करेंजो काढि लैगई ॥ ४॥ समस्या १६वीं। यह अवाई जान कामकी ।
२०. काव्यरत्नाकर। . करि मुख ओट पट पेखति उरोजतन पग गति विविध क- रति बाल बामकी । अषन सजित अति मधुर वदति बात सो- रहों श्रृंगार कला बारहों ललामकी ॥ कहैं द्विज रसिक सुप्रेम- को वधिक कर बेकल पथिककत कहौं रसनामकी। चरचा चबाई बात शुभगो बनाई कहु कतहूं न पाई यह अवाईजानि कामकी ॥१॥ जाय जिन गोकुल सुन सखी मैं बुझाऊं तोहिं चोर बटपार पन्थ लगे रहेंशामकी।तामें तू अकेली कोउ सहेली नहिं तेरे साथ लोक लज्जा होवेगी पिताके तेरे नामकी ॥ अपन जडाऊ जेते जडे तेरे अंगनमें इन्हें कमजाने तूं यह सब है बडे दामकी । येते के सोच नहीं माने मैं तो हर्षराम पै यह शोच दाहत है अवाई जान कामकी॥ २॥ 'कलित कलीन कस किंशुक ललित बन बिछी सो फरस रस बसवसु जामकी । चांदनी तनी सो चंन्द चांदनी चहूंघा चारु चञ्चरीक चारन चपल मत वामकी ॥ कबिसितकंठ कहैं 'कोकिल कुहुक हैन कूक शूरबीरन सुनाई गति बामकी । लाईना अबेर मान गढ़पै.चढ़ाई फेर सुरभ सुहाई न अवाई नृप कामकी ॥ ३ ॥ छाई तरुणाई रंग रूपकी निकाई अंग अंगन तरंग दरशाई छबिधामकी । चंचल चलाई मंद २ मुसकाई अरु. दृगनकी श्यामताई बाम अभिरामकी॥फबत "फतेह" फेर बसन सुगंधताई .
काव्यरत्नाकर। २१ चाह आधिकाई बरसूषणललामकी । ऐसी गतिलाई रुचिमोहकी प्रबलताई बैस या सुहाई में अवाई जानि कामकी ॥ ४ ॥ समस्या १७ वीं । सोई वीरताई है। धीरचितधारै सव इन्द्रिन को मारै फते"बुद्धि को सँवारै करि शीलकी दृढाई है । सकल बिकारै तजि सत्यको सुधारै जगजा- लको बिसारै हरिभक्ति अधिकाई है। पर उपकार ब्रह्म जीवके विचारै तजि मांसको अहारै जीह जाय में जमाई है । विषय निवारै श्रम खेद भेद टारै जोई ऐसे उपचारै रुचि सोई बीर ताई है ॥ १ ॥ तनुके सुदेश में महीपति स्वतंत्र मन मंत्रिन विवेक रुचिरोपं की सुनाई है। बञ्चक अनेक पञ्च विषय विकार अरु इन्दिन के गुण यह आत्मा रिझाई है। कहत "फतेह"एक मनहीको जीते. पुनि इन्द्रिन को त्यागे सुख जीव मुक्ति पाई है। कामजीत को- धजीत लोन मद मोह जीत पांचहू को जीते तब सोई वीर लाई है ॥ २॥ लेतही कमान निज समान नपीजाने भूमि अर्ध मुख डोले फिरे जैसे कोई नाई है। बाटिका तडागनके पक्षिनको मारै आ- प सोरकर मारे घर आपे निज दाई है।माई औ भौजाई भाई स- बनको मारैः खूब दुर्बल को मारै जैसे चढे भूत बाई है। सुन- तही मुहीम को अफीम की तयारी भई हरषराम कहें कहो यांही बीरताई है ॥ ३॥ .
२२ काव्यरत्नाकर। '. सुनत ही नगाडे चोप उठे बेखौफ आप मनमे उछाहं मुख कमल सों छाईहै ! जूझिवे को चाव पांव टरत नहीं पाछे को मोर तोर मारे चोट कोटि महराईहै । राखे नहिं औड़न औ करोड़न में घमशान है गज कोट एक रामकी दुहाई है। रुण्डनते कपान सान छूटे नहीं शूरमा की हर्षरामकहो वीर याही बीरताई है ॥ ४ ॥. समस्या१८वीं बैस तो सिरानी पै न मानी बात ज्ञानी की। बालही समयते अन्ध फन्द सब करन लागे भागे निज धर्महि ऐसी बदनामीकी । तियनके संग रंग ढंग में बितायो दिन फूले फूले फिरत बात बकतेहैं ज्वानी की। आंख में अंधेली औ अधेली की न भूली सुध मेरी२करते बरबाद जिन्दगानीकी। ह पराम कहें प्रत ध्यान में न लायो शठ बैसतो सिरानी पैन मानी बात ज्ञानी की ॥१॥ जानी अनजानी की निशानी नहिं जानी कहूं मति घबरानी. मनो गति बढ रानी की।मानत कहानी वेद बानी नयमानी- यो ऐसो अघखानी बदै मानीबेईमानी की । कहे सितकंठ तेरी स्यानप भुलानी सब हितकी न मानी न. प्रमानी पहिचानी की । एरे अभिमानी महामूरख अज्ञानी तेरी बैस तो सिरानी पैन मानी बात ज्ञानी की ॥२॥ समस्या१९ ची । मुरारि पै प्राणको वारि चुकीं । सब हांसी करें डगरी डगरी गरे प्रेमकी डोरि तोडारि चुकीं।.
काव्यरत्नाकर। २३ कुलटा कहलाय चुकी सजनी कुलकी कुलकानि विगारि चुकीं। फल होत कहां समझाइबे में अबतो सब सामुझ जारि चुकीं। कर ऊंचो उठाय पुकार कहों मैं मुरारि पे प्राण को वारि चुकी। ॥१॥अबतो जगमें खुलिहै चहुंधा प्रन प्रेमको पूरो पसारिचुकीं। कुलरीति औ लोक की लाज सबै हरिचन्द जू नीके बगारि चुकीं। वह सांवली सूरत देखतही अपने सरवर वहि हारि चुकीं । जग में कछु कोउ कहो किनहोंतो मुरारि पैप्राण तो वारि चुकीं।२। समस्या२० वीं। उपकार कहावत कौन पदारथ । काल परयो हरिचन्दके राज्यमें सरबस दीन्ह गँवाय प्रजारथा त्यों बाल भूप उदार फते करि दान कियो सब वश कतारथ । इन्द्रके काज दधीचि दियो तनु गीधको.प्रान पयान सियारथं । दानमें लोभ कियो न कछु उपकार कहावत याहि पदारथ॥३॥ खाइ खवाइ सकै न कछू सब जोर छिपाय धरे नहिं स्वारथ । 'अन्त फते सब छोड चले अरु खाय बहायहै लोग अकारथ । सोच. आपहिं भूल तबै जगमें कछु छैन सक्यो परमारथ । लोसमें जानो नहीं हमने उपकार कहावत कौन पदारथ ॥२॥ बाग लगाय बटिहिनके हित कूप खुदाय कियो परमारथ। मन्दि र तालं रचे पथिकालय भोजन वस्त्रदियो धर्मारथ । जारीहै पुण्य प्रबाह फते सब दुःख उठावत हो परस्वारथ । ताहू पै पूंछत औरनते उपकार कहावत कौन- पदारथ । ३ । लोम में झूल रहो निशिवासर ताहि से बैन सक्यो परमारथ । बैठि कुसंगत काव्यरत्नाकर। . ही में फते निज खोइ चले सब आप अकारथ । ज्ञान गुरू को धन्यो नहिं कान सुदौर थके जगहीं के सुखारथ ! आजही चेत भयो सुनते उपकार कहावत कौन पदारथ । ४ । जीव सतावन . पाप कमावन वैस विताव मचायके भारथाधर्म अधर्महि साथ चलै अरु जे जगधंध यहीं के सुखारथ। प्राण छुटे बिलगातसबै यह गातहूं साथ न जात सहारथ । तौहु न चेतत चित्त फते उ पकार कहावत कौन पदारथ ।६ मातु पिता सुरभी सुर भूसर क्षि क्षिक सेइके होत कतारथ । धर्मके कर्ममें लीन रहै वर पावत अंत में सर्व महारथ। दीनन के दुख दोष हरै भरि शक्ति सदैव करै परस्वारथ। औरन के हित हो जिहि में उपकार कहावत तो न पदारथ ॥६॥श्रुति चारहु शास्त्र छवों दश आठे पुरानहूं दीन्ह लगाइ यथारथ । कारज सों करनी जो हुवै अपनी अथवा पर के परमारथ। सो सब निवृति याहि सुग्रथनि ते करते न गयो श्रम कारथ । बूझो बह्यो ना आई तुम्हे उपकार कहावत कौन पदार थाशवालापन में साधुन सन्तनके हम टारत राह हरारथाज्यानि में त्यों बहु कूप खनाय लगाये सुवागनको परमारथ । बृद्धि में वारि औ अन्न के दान हूं देह दिवाये सदा उपकारथ । ता क हो उपकार करो उपकार कहावत कौन पदारथ॥८॥ भीम युधि- ष्ठिर वीर भये निज प्राणहि तुच्छ गिन्यो परमारथ । दान दियो । बहु ब्राह्मणको उपकारके हेतु तज्यो न सत्यारथ ॥ नृग ने किये अपराध अजान परे यहि कारण कूप अनारथ । मैं नहिं जानत काव्यरत्नाकर । २५ . और कछू उपकार कहावत कौन पदारथ॥९॥पूजी नहीं अभि- लायें जबै अति गर्व कियो.देवराज पदारथ । मेघ बुलाय कह्यो रिसयाय अब तुम जाय करो बजगारथ । आयसु पाय चले धन धाय सबै यदुराय कह्योन अनारथ । लीन्ह उठाय पहाड प्रा उपकार कहावत याहि पदारथ 1१०. रावण दुष्ट हरो हरि सीत- हि श्रीहनुमान सह्यो न अनारथ । लंक जरायके खाक करी हति कोटिन राक्षस मर्दि यथारथ । शक्ति लगी उर लक्ष्मण के गिरि कोहि उपार लियो परमारथ । लाजतहीं सुन बात यहै उपकार कहावत कौन पदारथ ॥११। हे कवि कोविद ज्ञान सुजान सने- हसमूह कपालु यथारथ । भूपन वंश प्रकाशक अंश बितावन हारन काल अकारथ। मो मन शंकहि दूर करो गंगापरशाद कहैं पर स्वारथ । ध्यान लगाय विचार करो उपकार कहावत कौन पदारथ ॥१२। रावण जानकी जाय हरी तब गिद्धने प्राण दि- ये परस्वारथ। धेनुके हेतु दिलीपहुने बिचकाननके हरिसों कियो भारथ । देह को दान दधीचि दियो गंगापरशाद कहें उपकारथा पण्डित कुंदनलाल सुनो उपकार कहावत याहि पदारंथ । १३॥ समस्या २१ वीं । कहु काके वियोग विभूति रमाई ॥ प्यारी वियोगके ताप लपी मृग चमके आसन लीन्ह विछाई । नेत्र सुअच्छके बिन्दु मणी इक आशके धागन माल सुहाई । 'आई सुयोगनि रूप धरे सखियान के द्वारे समाधि लगाई। पूछे लगी बजबाला सबै कहो काके वियोग विभूति रमाई ।। प्यारे - -- २६ काव्यरत्नाकर। हमारे गये जबते लिखी पाती कबो नहिं मोहिं पठाई आश उसा सकी सास जिओं उन प्रीति की रीति सवै विसराई । शोचति यो निज मानस में सखियान मिली करमाल सुहाई।पूछे लगी ब जबाला सबै कहो काके वियोग विभूति रमाई।२। काहू वियो- गनी रूप धरे सखियानके द्वारेहि फेरी लगाई । नाम जपे प्रिय नामहि को तुलसी कर माल अहै छबि छाई दिंड कमंडलुहस्त लिये कटि बीचहि सहर अंज सुहाई । पूंछे लगी बजवाला सबै कहु काके वियोग विभूति रमाई ॥३॥छैल छबीले के प्रेम पगी हम ताके बिछोहन लाज गमाई । काम दवानल देह दगी अशु- . आन की माल बिरागन पाई।तूकर चन्द कपाल गहे धवली क- तअंगन ज्योति जुन्हाई । बावरी रात सों वात कहे कहि काके वियोग विभूति रमाई ॥ ४ ॥ समस्या २२ वीं । केहि कारण रूप धरो गिरिधारी । घने दानव भूमि पे वाटे जबै तहँ लमि गऊ बन दीन्ह पुकारी। वाणी अकाश भई परब्रह्म की संत गऊ की करों रखवारी। होतो अजन्म अनूप अदेह अनादि अलेख विभव उपचारी। भक्तन को बर पूर्व दियो यहि कारण रूप धरो गिरिधारी। १ । एक अखंडित व्यापक ब्रह्म अरूप अदेह अनाम अपारी। सो लख भक्तन की चित चाहं स्वरूप धरे पै रहे अविकारी। निर्गुण ब्रह्म उपासक निर्गुण ध्यान करे गत आप विसारी। सर्गुन भक्तन पैकी दया यहि कारण रूप धरो गिरिधारी ॥२॥ *
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काव्यरत्नांकर।।
२७
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कोप कियो सुरराज जबै वर्षाक्त मूसल धारन वारी । बजके
सब लोग . लुगाई भजे बिललात फिरें अति आतुर भारी ।
सब गोप गुवाल स्वगौवन लै मधुमूदन पास करी जो गुहारी ।
राम नरायण देखे दुखी यहि कारण रूप धरो गिरिधारी।३। .
समस्या २३ वीं। काहे गही इतनी निठुराई ।
नित सांझ सबेरे हमारे यहां तुम आवत थे तब आप कन्हाई।
हियमें लगि ताप बुझाकै सदा सुखदेत रह्यो मुख चन्द दिखाई।
जानी न जाय कछु मनकी प्रिय काके समागम रैन गँवाई ।
प्राण पियारे कहो हमसों अब काहे गही इतनी निठुराई ।।
कौन उपाय करौं मैं सखी उन कान्हर को किन दीन्ह ढिठाई
कोट गरीबी में ताप कहों तक आवे न नेक हिये करुणाई ।
कैसी अहै वा प्रवीन त्रिया मन मोहन को निज प्रेम लगाई ॥
कैसेहू भूल भई न हती उन काहे गही इतनी निठुराई । २ ।
. समस्या २४ वीं । प्यारी की दृष्टि है काम कटारी ।
को अस शूर जने जग जौन लगे करि आह परै दुख भारी ।
देखहु खोज सुशील तिहूं पर भाषत हाथ उठाय पुकारी ।
कौन कहे नरकी सुरकी पशु पक्षिन की बुधि हीन विचारी।
योगी यती हूं डरेजेहिते अस प्यारी की दृष्टि है काम कटारी।
जो तिहुँ लोकन लोगन को वश माहिं करे अपने बल भारी ।
सो प्रबला अबला कवि भाषत जाने गई उनकी मति मारी।
नेक सुशील विचार करी नहिं नाम धरी हि प्राण पियारी।
२८
काव्यरत्नाकर।
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प्राण अरी कहतोतो भलो जेहि प्यारी की दृष्टि है कामं कटारीश
अंग मनोहर शीतलता अहै. तीनहुँ ताप मिटावन हारी ।
त्यों कर कंज मयंक लो आनन है सब भांति महा सुखकारी।
भावतहावहु भाव भले पर एक सुशील है आपति भारी।
चीर करे जेहि पीर बढावत प्यारी की दृष्टि हैं काम कटारी।
जारी न बातें बनावे यहां जबते हों लखी चढी ताप तिजारी।
होस हवास ठिकाने नहीं नहिं जानत जा केहि ठाम सिधारी।
चीर करेजेहि रेजे करी अरु हारी सुशील महा दुख नारी।
खून भरी रंग रात लखावत प्यारी की दृष्टि है काम कटारी॥
भोक गड़ी जबते उरमें तबते वह क्योंहूँ टैरे नहिं टारी ।
शालति है तन हालत ना परे सेज कराहों में रात दिनारी ।
होय उपाय कछू तो करो नतु चाहत प्राण सुशील सिधारी ।
भूलहूंदेखत ना यदि जानत प्यारी की दृष्टि है काम कटारी ।।
नैन लगै अरु पार करे सिगरे तनको करे खून खुआरी ।
पास न बैठन देतहै काहुहिँ चाल सबै यहिकी अनियारी ।
नाहिन प्रात सुशीलनसे नहि लागन देत इको उपचारी ।
आपहि मार जिवावत है अस प्यारीकी दृष्टिहै काम कटारी ६
फूलको बान शरासन तानत भारत वालक कोननिहारी
फौजहु राखतहै अबलान की जोधनकोनि जिन्हे बल जारी ।
जो कहुँ जोरत अर्जुन रावन राम समान तो होत कहारी ।
यों डरते कँपते कहते जब प्यारी की दृष्टि है काम कटारी ७ ।
पास रहे तो हुलास भरे कहे जीवन मूरि है प्राण पियारी
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काव्यरत्नाकर।
२९
राखत मोपे विशेष कृपा तिरछी हग ताकि करैहै सुखारी।
सोई जहां दिन दूरी भई अकुलात सुशील के बाप मतारी।
रोवत कातर आस्त भाषत प्यारीकी दृष्टिहै काम कटारी । ८॥
समस्या २५ वीं। अक्ला अबलों अवलोकतिहै।
गवने ताज धाम विदेश पिया त्रिय व्याकुल है अति शोकतिहै।
जब प्रीतम दृष्टिकी ओट भये तब नैनन ते जल रोकतिहै।
सुखभोग संयोगके छूटतही विरहानल में तनुझोकतिहै
पति प्रेम फवे चढि ऊंचे अटा अबला अबलों अवलोकति है।
छबि खान बखान तोजात नहीं थकि जातकहे कबिकी मति है।
-- समता किम दीजिय औरन की जेहि देख लजाति हिये रतिहै।
रति चिह्न निहार प्रभात सोई रिस ते पति सों नहिं बोलति है।
कर दीठ दमोदर पै तिरछी अबला अबलों अवलोकतिहै ।२।
समस्या २६वीं । 'अब जाजिन ऐसी मिजानजनित ।
आयो नहीं तनु योबनरी सखि मानिन मोतेरताजिन हैतू ।
जाहु-अजो प्रिय सेज अरी सुखभोगन में मन राजिन हेतू ।.
प्राण पियारे न भूलकरी कछु काहे इतो इतराजिन हैतू ।
पाय. परेहू न मानतरी अब जाजिन ऐसी मिजाजनि हैतू १
समस्या २७ वीं । कहु काके वियोग विभूतिरमायो।
कै तेरे कन्त विदेश रमें तिन्हें खोजन को यह क्षेप बनायो।
कै तेरो. चित्त लगो हरिसों जिन उद्धवके कर योग पठायो।
आषत गंगापरशादयही कि केहू हित मंत्र औ यंत्र जगायो ।
- ३०
काव्यरत्नाकर।
ये मुगलोचनी चन्द्रमुखी कहु काके वियोग विजूति रमायो ।।
भात छुटे पितु मात छुटे कुल नात छुटे संवही विसरायो ।
धाम छुटे सब काम छुटे निज ग्राम छुटे निरमोह कहायो ।
लोग छुटे सुखभोग छुटे उद्योग छुटे त्रियहू विलंगायो ।
आलसमें कछु है न सक्यो तब द्रव्य वियोग विभूति रमायो।२।
कोमल गौर शरीर मनोहर मंजुल प्रेम तरंग बढायो ।
नैनकी सैनने प्राण हरयो सुखमा मुखचंद्र की चित्त लुभायो ।
भूपण चीर सुंरगति पै छवि देखें फते नहिं और सुहायो ।
मोहनी मूरति देखको हम तेरे वियोग विभूति रमायो । ३ ।
काकहिये केहिसों सजनी मन माने नहीं कितनो समझायो । --
जाय फँस्यो वह प्रीतिके फन्दन ताते उबार नहीं बन आयो।
फोर विचार कियो मन मांहकि प्यारीकी प्रीति बडो दुखपायो
ताते जजों रघुनन्दनको सोतो याहि वियोग विभूतिरमायो ।४।
अंजन खंजन नैन नहीं अधरान पै पान नहीं कस खायो ।
फूल न बीच सुबैनी खुली अंगराग सुअंगन नाहिं लगायो।
कंचुकी फाटि धरी कुचमें मरगजी चूनर देह पधायो
ये संग वासिनी पूंछतमैं कहु काके वियोग विजूति रमायो ५।
एक समय हरिने बजबाल वुलावनको मुनि नेप बनायो।
कूल कलिन्दीके कुंजन में मृग आसन डारि सुनाद बजायो। ।
सो सुन धाई विलोकन गंग पिछान पिया विच तर्क नहायो।
बैस किशोर अबै तुम्हरी कहु काके वियोग विभूति रमायो।
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- काव्यरत्नाकर। ३१ नाम जलन्धरको सुनिकै तिय सत्य सतीपनसों दरशायो। त्यागि विशव भवके सबही जरिछार भई सुपरम्पद पायो । - सो प्रक्षु कौतुकसों लखि आप दया वश है मनमें पछतायो। गंगकहैं यहिते हरिने तन वृन्द वियोग. विभूति रमायो । ७ । त्यागि सबै घरकी धन संपति कानन २ घूमन आयो । क्यों तजि भोजन छैरस नीरस शाक चबावन कष्ट उठायो। जोतनु सुंदर वस्त्र विभूषण जोगतिहै इहि भांति बनायो । सोग मच्यो मुँह सोह रह्यो कहु काके वियोगविभूति रमायो का भारत-नाम प्रसिद्ध सबै जग कौन नहीं मुहिं पूजन आयो। कौन नहीं नमिके हमसों धन त्यों गुन आपन नाम बढ़ायो। हायहमारेहि ऐसे. कपूत जने अब जो इमि मोहनशायो । पूंछत का दुखी भारत ते कहु काके वियोग विभूति रमायो ९॥ छोडि सरस्वतित्यों लक्ष्मीहू भजो जिनको जियते अपनायो। औ बल' उद्यम साहसहू तजिके उन दोउन साथ सिधायो । जीव लगै अब नेक नहीं विधि वेमुखो सब मोर जशायो। उत्तर देऊ कहा इहिको कहु काके वियोग विभूति रमायो१० राम युधिष्ठिर विक्रम. भोज समान अनेकन पूत चबायो। मारि सरस्वति औ लक्ष्मीकहँ सात समुद्रके पार भगायो। उद्यम साहस धीर पराक्रम काल. कराल सबै बिनशायो। पूंछतका दुखी भारतते कहु काके वियोग विभूति रमायो॥११॥ राम सियायुत वंधु मनोहर जाय रहे वन बाप पठायो।
३२
काव्यरत्नाकर।
तिन संग सती छल कीन्ह अनामय यद्यपि नाथ बहुत समुझाय
सों अपराधसे त्याग कियो तिन जाय पिताघर प्राणगायो
महाबीर सदा श्रुतिपंथ रहे शुचि नारि वियोग विभूति रमामो
समस्या २८ वीं । पपिहा जब पूंछिहै पीव कहां।
पिय मोरे विदेश-को नाम न लो सुनके उरहोत है शोक महां
दिन चारन आये भये अबहीं सुसरयो कछ काज न मोरे यहां
इत पावस आय गयो शिरपै तुम मानत ना वजिजात वहाँ
धारहौं किम धीर सुजान पिया पपिहा जब पूछिह पीव कहां
उठि है नामें घनघोर घटा बक पांति फिरेगी यहां ते वहां
मुरवा चहुँधा नचिहें वनमें रचिहें सखियां सुहिंडोल तहां
करिहैं मनमोद ते कोलि सबै लखिके हिय होयगो शोक महा
तुम जाते सुजान बुझाइहै को पपिहा जब पूछि, पीव कहां
तजिकै कुलकान बडों जन की तुमौं करी प्रीति मैं आय यहां
समुझी घरहाइन की नहिं बात सिखाय रही बहुतेकं तहां
सोइ पावसहीमें सुजान पिया परदेशमें जान कहो दईहाँ
यह प्रीति तबै समझी परिहै पपिहा जब पूछिहै पीव कहाँ। ३
मनभावन जाय विदेश बसे कछुके न सन्देश पठायोयहाँ
निशि बासर शोच रहै यहिको अरी काह भयो दई हाल वहाँ
जिय चाहत है विधि पंख जो दे-तोय जाय मिलोपिय प्योरजहां
बिन प्यारे सुजान कहा करिहों पपिहा जब पूछिहै पीव कहां४
पियप्यारे विदेश को जात तजे सहि नायगो दुःख अतीवकह।
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काव्यरत्नाकर।.
1.:.-1
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उनई नई बार घटा नामें लखि धीर धरायंगी तीव कहां ।
बन कूकति कैलि कलोलनिते सुनि जीवन धारिहै जीवकहां ।
। सबते दुख होय सुजान बड़ो पपिहा जब पूंछिहै पीव कहां।५।
प्रीतम मेरे विदेश नजाई नहीं मेरो चित्त लगेगो यहां ।
पावस में उठे कारीघटा अरु मण्डुक शोर करेंगे महां ।
गंगापरशाद अंधेरी निशा में अकेली पड़ी मैं रहोंगी तहां ।
कैसे परी कल प्यारे हमें पपिहा जब पूछि है पीव कहां। ६ ।
समस्या २९ वीं-कोहि कारण कूप में डोलत पानी ।
पूंछत में नाहिं लाज लगी जलमें कवि कौनहै आप कि सानी ।
काज सरै जिन बातन सों तिन बातनके हित बोलिय वानी।
। लाभ कहा जो बतायं दियो हमते कछु कारण सत्य प्रमानी ।
शंकर शोच तुम्हें ये वृथा केहि कारण कूप में डोलत पानी।।
बूझिय नीति सुधर्म कथानको बूझिय देहको कौनहै पानी ।
बूझिय ज्ञान विवेक विचारहि बूझिय कर्म अकर्म की बानी ।
बूझहूं शब्दरु ब्रह्म सो जीवहिं बूझहु क्या जग प्रेम कहानी।
शंकर बूझत लाभ कहा केहि कारण कूप में डोलत पानी । २।
एक सुनारि श्रृंगार किये जल लेन गई अति रूपकी खानी।
नेत्र पराजित मीन तहां भय लीन मनो तनुहै बिन पानी।
कंज नहीं अब ज्योति निहारिके होय सकै अखियानकी सानी।
लोटन सो शिर फोर दुखी यहि कारण कूपमें डालत पानी ।।
गुणकी अगरी डगरी २ बगरी. गगरी भरिये सुखदानी ।
चपलासी चली चटकीली भली देख्योचहै वारिमें रूप सयानी।
my
४ काव्यरत्नाकर। चख चंचल २ मीन लखे कवि रामनरायण सो थहरानी। कूप परी सफरी फरकी तेहि कारण कूपमें डोलत पानी । ४ । एक समय जल आननको घरसे निकसी अबला बजरानी। जात सँकोच में डोलभरन जल बँचत थी अँगिया मसकानी । देखत ही छतियां उधरी कवि सन्त कहैं मनसा ललचानी। हाथ बिना पछतात रह्यो तेहि कारण कूप में डोलत पानी ५ समस्या ३० वीं। रति रस रंगनमें कौन अंग डोलेना ॥ कौन कवि कोविद प्रवीण है यकीन वाला कौन शरवीर जौन काम रस बोलेना। कौन योगी कौन भोगी कौनहै वियोगी रोगी नारि पर्यंकपै निशंकहकै चोलेनो।कौन है पतिव्रता पतिव्र- तान जाने जौन करिकै कुसंग कौन कुपथ टैटोलेना । कौन वीर काजरकी कोठरीते बचि मायो रति रस रंगन में कौन अंग डोलना ॥१॥ चांदनीसे उज्ज्वल सुश्वेत अहिफेनहूसे मन्द२ मारुत अनंगहू ते शूलेना। छिटिक रह्यो तारागण यामिनी अंधेरी माहि ताहू पै कुह २ काकपालि बोलेना । भनत कुवेर केशरीकिशोरी कुमार दोऊ वृन्दाबन कूलन बिहार रस कौलना । खेले रस रंग ज्यों अनंग रति उन्नति है रति रस रंगनमें कौन अंग डोलेना ॥२॥ याम भर यामिनी गमाय जमलेशगये कामरकामनीकीकरिके किलोलेना। आगमन जानि प्राण प्रीतम को प्राण प्यारी परी पर्यक पै पलकऊ खोलेना। निद्राक्षयको उपचार कीतो कीतो भांति कीन्हो प्यारीकीतो भांतिन हुलायो मुख बोलेना। करी काव्यरत्नाकर। जंघा जघन में मैनके उमंगन में रवि रंस रंगन मे कौन अंग डोलना ॥ ३ ॥ तन सुकुमारी युति दामिन दमकवारी मैन मदहारी प्यारी संग में किलोलेना । सुन्दर अटारी में निवारी की सवारी सेज तापे परी उरज उतंग बंद खोलेना । बालमविहारी भुज डारी गले बार बार चूमत कपोल दोऊ लोल मुख बोलेना । मुगधा विचारी सकुचातकर चुपात बहु रति रस रंगन में कौन अंग डोलेना ॥४॥ बैठी बनबीथिन विशेष बहु बागनकी बिसर बिहार बल जात लखि लोलेना। बीती अँधियारी निशि आधीतऊ आधि नाहिं अति अकुलाय पट खोले पुनि खोलेना। पिछले पहर पिय आय . गहि सेजन पै फेरि मुख माननि मनोज मुख बोलेना । हिय हरषात बरषात रस रंगनमें रतिरस रंगनमें कौन अंग डोलेना॥५॥ करिके श्रृंगार मांग मोतिनकी संवारी अति रसकी रसीली सेज पौढ़ि कछू बोलेना । नायक नबीन कोक कलाहू प्रवीन तहां आय मुसकायो कही नीवी क्यों तु खोलेना ! सुनत सुधारो बैन बोली प्राणप्यारी तबै दीजिये जवाब आज कोई मोतेबोलेना। रति रंस रंगन में कौन अंग डोले नहिं डोलें सब अंग एक नैन कहूं डोलेना ॥ ६ ॥ प्यारी पर्यकपै पौढ़ी पिय संग सखी मैन मदमाती तऊ नीबी बंद खोलेना। कुच मसकते लंक लचकत जंघ युग थर २ होत तन प्यारे को सतोलेना । चुम्बन करत हरषातहियं गंग कवि काव्यरत्नाकर। सीसीसुर रागे दूजो वचन सु बोलेना । आनंद बिलास छकी एक टक जोवे मुख रति रस रंगन में नैन सैन डोलेना ॥ ७ ॥ चिबुक अधर कर रसना ललाट उर जंक औ नितम्बनकी हलनि सु भूलेना । भ्रुकुटी कपोल मोरवान कटि बदर की शीश दृष्टि नासिकाकी फरकनि बोलेना। भाषत गंगाप्रशाद भूपति मनोज बर ऐसो कोऊ अंग नाहिं जेहि में कलोलेना । सकल सुदेह विच मैन नृप थर थरात रति रस रंगन में कौन अंग डोलेना। ८॥ आई. है सकारे आज बीर तेरी नई बीर पूंछै क्यों न पीर यो अधीर मुख बोलेना। टारि पट धूंधुट निहार नैन नीचे कर बोली सकुचाय चढ़ी तापतन टौलेना । होसना ठिकाने मे- रो अंग अंग डोलत है डोलत न जायं मोसों आज कछु बोलेना। बोली नई बीर हँसि हरे हरे राम राम रति रस रंगनमें कौन अंग. डोलेना ॥ ९॥ केश बिखराय नैन सैननही बात करे भौंह नचैं नासिका को सिकुर कलोलेना । नाहीं जी नहींजी किये रसना अधररद कंठ सुकपोल रहि जात हैं अडोलेना । बाहु पीठ उरज जंघ और अंग अंग जेते करत प्रसंगको उमंग है उछौलेना । मनहूं मन माह करे मनन गुनावन तब रति रस रंगनमें कौन अंग डोलेना ॥१०॥ बाल है अधीर लाल बाढ़ी तन पीर साल देखो चलि हाल आजु नेक नैनं खोलैना । सखियां सहेली जाय बार २ पूंछति .
काव्यरत्नाकर। हैं परीहै अचेत पर्यक सटी बोलैना । कहत सुशील धारे कौन परवाह याको दीजियो बुझाय फेर झूलियो हिंडौलेना । जानती तुहूंहो भले झूलत हिंडोले और रति रस रंगनमें कौन अंग डोलेना ॥ ११ ॥ सुरत छबीले संग करत दबाये रही भूषण सखीरी जासों सोरकर बोलेना। हाहा करि हारी मेरे हरुवे हलाओ अंग ' झटक झटाक ऐंच बैंचिये निचोलेना । काम मतवारो प्यारो चिचदै न चेत करै गुरुजन लाज गरुवाई मन तौलेना । ता नो कहा देत मोहिं जानो जू सुजान जिय, रति रसरंगनमें कौन अंग डोलेना ॥१२॥ समस्या ३१ वीं । यारीमें पियारी अति पीअरी परति जात । जबसे लगी है प्रीति श्याम रावरसों सखी, कीरति किशोरी लोक लाज न मरति जात । चैन न परत दिन रैन मुख देखे विन नैनन न नींद तनु ज्वाला सों जरति जात । खान पान वसन न भाव गृह काज कछु विनहू सताये सबकाहूं सो लरति जाव .। नन्दकेकुमार मनमोहन विहारी जीकी यारी में प्यारी अति पीअरी परति जात ॥ १ ॥ बदन मलीन छबि छीन हीन मारे मन नैनन सदाही जलढारसी ढरति जात । व्याकुल फिरत नहिं काहूसे कहत भेद, ठिठुक २ पग धरनि धरति जात । मौन ढ रहत कुछ सोच में न जानी जात बोलत बुलाये सांस शीतल जरति जात ।
३८ काव्यरत्नाकर। काहेकों मचाई बिलगाई रे कन्हाई तेरी, यारीमें प्यारी अति पीअरी परति जात ॥२॥ वालम विदेश विरमाये काहू वैरिनने कामिन विलाप आप आपही करति जात । लोग परिवार घर बारहूं अंगार लागे विरह तपन तन तापसी बरति जात । खड़े न पड़ेही कछु बैठे ने उठेही चैन रैन दिन याही विध सोचन मरति जात । सर्व सुख कारी हितकारी निज स्वामीकी यारीमें पियारी अति पावरी परति जात ॥ ३॥ खात पान राग रंग द्वेष मद मोह छोड़ काम क्रोध लोग जीत बासना हरति जात । सत्य शील ज्ञान भक्ति धीर नीति दान धर्म विनय विवेक श्रम साहस करति जातादीन हितकारी उपकारक सदैवचित, इन्द्रिनकी रुचि सत मारग धरति जात । सन्तनकी देह निराकार परब्रह्महीकी यारीमें पियारी अति पीवरी परति जात ॥ ४ ॥ बामा बिन बालम विहाय वंश वृन्द वेष व्याकुल बदन विरहानल बरति जातिकठिन कराल काल काटति कहांलों कहों कोमल किसोरी कुल कानहू करति जातिाजाहिर जगतयशं यौवन जवानी जोर जान जगदीश-योग ज्वालमें जरति जाति । सुन्दर सलोने सुखसिंधु श्याम साँवरकी यारीमें पियारी अति पीवरी परति जाति। ५। समस्या ३२ वीं। प्रीति करो तो प्रतीति न छोडिये । पाहनकी प्रतिमा गढीके तेहि शीश नवाय दोहूं कर जोडिये।
काव्यरत्नाकर। चन्दन अक्षत पुष्प चढाइकै ऊपर ते जल कुम्भहु फोडिये । ध्यान सदा जड कल्पित ईशपै और केहू दिशि चित्त न मोडिये। ताहूपै काज सरे तबहीं यदि प्रीति करो तो प्रतीति न छोडिये।। व्याकुलता सियकी लखिकै कह कौशिक राम सों चापही तो- डिये। रानिनके दुख शोच महीपको मानिनके मद मस्तकं फोडिये । अगुवरके नमको हरिके मिथिलेशसे आज समागम जोडिये । व्याहो अवश्य विदेहसुता यदि प्रीति करो तो प्रतीति न छोडिये॥२॥लीजे न प्रीतिको नाम कौं यदि कीजे तो अंत लौ फेर न तोडिये । आपने दुःखको आप हरो अरु मित्र व्यथा अपने शिर ओडिये । चाहो सदा हित शुद्ध हिये प्रगटौ गुण अवगुण ते मुख मोडिये। राखो न दम्भ दुराश फते यदि प्रीति करो तो प्रतीति न छोडिये ॥३॥ कृष्ण बिछोहमें व्याकुल व सखियां कहें श्याम सों नेह न जोडिये । आपतो जाय रमें कुबरी गृह भेजे हमें लिख योगही ओडिये। कोई कहे वह व्यापक सर्वके आइहै वेगं सनेह न तोडिये । जोगुरु भक्ति बढाय रहो यदि प्रीति करो तो प्रतीति न छोडियै ॥ ४॥ व्यापक ब्रह्ममें लीन रहो अरु सत्यकी वृतिसे चित्त न मोडिये । नम्रता शील दया भम साहस न्याय क्षमा धृत आदिक ओडिये । कीजै दुखी नहिं जीव कोई मनमें खल पंच विषय नहिं जोडिये । पूरण लाभ मिले हरि सों यदि प्राति करो तो प्रतीति न छोडिये ।५। समस्या ३३ वीं । मुरि मुसक्यानकी ललाके सौंहखानकी। दक्खिनकी बाल डील डौलमें विशाल होत सुन्दर स्वरूपवान ४० काव्यरत्नाकर। उरज उठानकी । कलितकपोलकटि केहरि गयन्द गति नैनकी निकाई अति चित्त हुलसानकी । दशन हँसन श्रुति नासिका रसीले वैन सैनशूल हूलहिय प्राण नुकसानकी । बानके समान तन तानके वसी है छवि मुरि मुसक्यानकी ललाके सौंह खानकी ॥ १ ॥ ब्रजकी नवेली अलबेलिन सहेली संग करत रसीले गान कंठ सुरतानकी । कान्हके सनेहमें विहालबाल प्रात होते कुंजनमें फिरत किशोरी वृषभानकी । बाँसुरीकी ध्वनि गति नूपुर दोउन छबि माधुरी हँसन अरुणाई मुखपानकी। प्रेममें परी है बानि स- खिनकी बारबार मुरि मुसक्यानकी ललाके सौह खानकी । २। पश्चिमकी नारी सुकुमारी गुणवारी अति रंग रूपवान सुाठे गरब गुमानकी । दाडिम दशन मृगसावक सरिस नैन कलित कपोत कंठ गांन पिकतानकी अधर कपोल श्रुतिनासिका नितंब करि केश कुच कर सब अंग अनुमानकी । मोहनी मतंगगति साजती सुरंगपट मुरि मुसक्यानकी ललाके सौंह खानकी ॥३॥ कंचुकी कसन कच श्यामकी डसन छबि माधुरी हसन अरुणाई मुख पानकी । रंगकीचटक होड नैनकी मटक,मृदु बैनकी खटक मनभाई गति तानकी । रैनकी रमन तन मैनकी दमन तिहुँ तापकी समन करि केहरि समानकी ।बार २ वचनमें बाल की परी है बानि मुरि मुसक्यानकी ललाकी सौह खानकी।४। पूछो कछु राजनीति धर्म कर्म मर्म कछु पूछो जीव ब्रह्म भेद पूछो बात ज्ञानकी । पूछो दृढ दृव्य वायु पञ्च तत्त्व इन्द्रीदश पू-
काव्यरत्नाकर ।
छो तम सत्व रज त्रिगुण महानकी। पूछो कौन ईश कौन भोगत
शरीर दुःख मैंहूं कौन कैसी जग माया अभिमानकी।कहत फतेह
याके पूछिबेमें लाभकौन मुरिमुसक्यानकी ललाकेसौंह खानकी।
समस्या ३४ वीं। मृदु मुसिक्यानमैं चुराय चित्त लैगई-
रामजी कहत देखो लखन सियाकी छवि वाटिकाके बीच में
लताके ओट ढगई । सखिनके साथ चली जात गौरि पूजबेको
दरश दिखायके दुसह दुःख दैगई । नवलकिशोरी मनमोहनी
अनूप रूप कंजन कटाक्ष नैन सैन सों चितै गई । जनकदुलारी
ऐसो सहजं पुनीत मेरो मृदु मुसक्यानमें चुराय चित्त
लैगई ॥१॥
चौंकके अटापै एक कंचनी नवल बैस केश छिटकारे
ठाढी मनमें मझेगई, पीअरे वसन बर भूषन विलोकि गर
मोतिनकी माल व्याल फंद में फंस गई, चन्द्र मुखवारी मनहारी
मतवारी चाल भाल भौंह भूषित दिखाय । दुख दैगई तान
कलगान मुखपानकी अरुण छबि मृदु मुसक्याय के चुराय
चित्त लैगई ॥२॥
ओढ़े पीत सारी जामें बैंजनी किनारी सोहै बारी वैस.
वारी प्यारी प्रेम सों पगैगई । भनत फतेह भरि षणके नारन
सों मंद मंद मारग गयंद गति द्वैगई । कोमल कलित कटि के-
हरि कलाप केकि केश कर करक करेजे कुन्त कैगई।
माधुरी हँसन द्युति दामिन दशन छबि मृदु मुसक्यान में चुराय
चित्त लैगई ॥ ३ ॥
काव्यरत्नाकर । मनहै मलीन काम क्रोधही में लीन रहै अबुध विवेक हीन लाज सब ध्वै गई। विविध विकारन में बेधित बिताई बैस बहंकि बढ़ाय बैर वेलि विष वैगई, ईशहि विसार भव वन्धन में भूलि रह्यो पाइकै कुसंग सब सुमति नशै गई । कहत फतेह ऐसो फंद में फँस्यो है ताते मुदु मुसक्यायके चुराय चित्त लैगई ॥ ४ ॥ लैगई लुभाय लखि लोगनकी लोक लाज दामिन दमक देह दूनो दुख दैगई दैगई दिखाय दृग दारुण दुसह- दम्भ हेरत हँसीली हूल हूल हिय ढगई बैंगई । हमारे हित हेमकी हरनहार चंचल चपल चख चलन. चुसँगईं । भैगई फतेह भाभरे भरि भीरनमें मृदु मुसक्यान में चुराय चित्त लेगई ॥ ५ ॥ समस्या ३५ वींदृगकी निकाई लखि मृगहू लजात हैं । कारे रतनारे श्वेत त्रिविध रसीले नैन, पूरित गरल मद सुधा से दिखात हैं । हेरन हरन पान देखके मरत केते केते महि गिरत परत झुकि जात हैं। केते देख जियत पियत प्रेम रस देखि मुख ना मंडलके रवि शशि. मातहैं। कंजनके गंजन सुखजनकी कौन कहै दृगकी निकाई देख मृगहू लजातहैं ॥१॥ केदली कुठारी कंठ जानु सुघराई देखि केहरि कराह कटि देखि दुरजातहैं । गात अवलोकके लजाय जात जातरूप देखिके गयंद निजगतहू भुलातहैं।बदन विलोकि विधु वारिदकी ओट होत .आलिन के वृन्द केश देख सकुचात, दशन को -ra. .
काव्यरत्नाकर।
४३
देख देख दाडिम- दरकि जात दृगकी निकाई लखि मृगहूं
लजात हैं ॥ २॥
शक्ति की मयन्द गति हूलसी हसन होत, भौंहन कमान
तान मान कर अघातहैं । कुंतसे कराल कुच शुकसे कपोलकंठ
सारे दुखदायक भरेही यह गातहैं । बानसे विलोक नैन खगसे
कटाक्ष नैन व्याकुल दिवस रैन चैनना दिखातहैं । ताहू पै फतेह
से कहाओ तुम बार २ दृगकी निकाई लखि मृगहू
लजातहैं ॥ ३॥
बारी बैस बदन विभूषन विगनै वेश बसन विलोकि.
विज्जु वारिद बिलातहैं । भोग भरी भामिनको भावत भलोही
भेष भमिके भैषज्य निज भेषज भुलातहैं । मंजुल महक मृग
मदकी मयंक मुख माल मुकताइलपै मोहे मन जातहैं । अंजन
बिनाही मन रंजन पियाके दोऊ दृगकी निकाई देख मृगहू
लजातहैं ॥४॥
चरन२ चलि चिह्नहू बनावे महि बरनरवर भूषन सुहातहै।
नरन २ मन मोहत निरख नैन सरन २ में सरोज सकुचातहै।
घरन२घहरात ध्वनि नूपुरकी दरन २दरशन दरशातहै । करन२
फहरातसी फिरत जाके हगकी निकाई लखि मृगहू लजातहैं ५॥
समस्या ३६ वीं ज्ञानी के आगे बयान गुनीको ॥
राम कथा हरि भक्तहि सोहत योगहि जाय हनाय धुनीकोकाव्य
कला कवि को उर सोहत ज्योतिष चित्त रमै सगुनीको सोहत
वेदहि रोग विचार निवास तपोवन श्रेष्ठ मुनीको।त्योही फते करि
बो अति सोहत ज्ञानीके आगे बयान गुनीको ॥ १ ॥
काव्यरत्नाकर। . , शूरके आगे कथा रणकी नर कूरके आगे प्रपंच दुनीको । सन्तहि ज्ञान विवेक सुहात असन्तहि रूप छटा तरुनीको । सज्जनको उपकारकी बात निलज्जनको यश आपननीको।त्योही फते करिबो अति सोहत ज्ञानीके आगे बयान गुनीको ॥२॥ समस्या ३७ वीं । कौन उपाय हिये नाहिं भावै । दम्भअनेक दिखाय छली नित झूठ विवादमें द्रव्यकमावाकोटिन पापकरें निशि वासर उत्तम जन्मको व्यर्थ गमावै । कर्म अकर्म करै ठगिके शुभ कर्मकी ओर न चित्त चलावै । अन्त में जौन 'चले संग जीवके तौन उपाय हिये नहिं भावै ॥ १ ॥ आनन्दकंद दयानिधि पालक दुःख निकन्द कलेश नशावै । आपनी भक्ति दृढ़ायहिये मम औरके मोहसे त्याग करावै । पंच विषै बसि भूलि फते निज ईश विसार कहा सुख पावै । अंतमें जौन चले संग जीवके तौन उपाय हिये नहिं भावै । समस्या ३८ वीं । अंकुर उरोजनके रोजन बढे लगे। तजन लगीहै खेल मेल वैस वारिनकी नारिनकी चाल शुद्धबैन अब कढै लगे,प्रीतमकी प्रतिमा उर अन्तर बसाई अरु गालपै गुलाबीरंग कछुकचदै लगे रसकी कहानिनको पूंछत सखीरिन सों कोमल उर अंतर कामबाणहू अलै लगे।कहत हर्षराम ये मयंक की कलाकी भांति अंकुर उरोजनके रोजन बढे लगे ॥ १ ॥ समस्या ३९ वीं । वंशी जबै बन श्याम बजाई । व्योम थक्यो रविको रथ बाजिसों धूम ध्वजा प्रगटयो शितलाई। अम्बर माहि सुरासुर मोहित ढकरपाहनसों रह्यो छाई ।
काव्यरत्नाकर।
कुंजन में खग स्वस्थ सुजान भो सिंधु समीर लही शितलाई।.
शंकर हूकी समाधि गई छुटि वंशी जबै बन श्याम बजाई॥१॥
शारद मास विलास विलोकि उयो विधु पूरण माह जुन्हाई ।
मन्द सुगंध समीर बहै रबिजा रह्यो पंकजने छबि छाई ।
जाय कलिन्दीके कूल कलोलते टेक कदम्बके डार सुहाई ।
भई बजनार विहाल सुजान जू बंशी जबै बन श्याम बजाई॥२॥
केहरि सों कटि माह दुकूल कसे बर-पीत महा छबि छाई ।
कुंडल गोल अमोल कपोल पै डोलत चित्त सो लेत चुराई ।
यामिन माह जुहार अकेल सो कुंज करीलनके रह्यो जाई ।
सो न डरी तिय जाय मिली जहँ बंशी जबै बन श्याम बजाई३॥
शब्द अचानक कान परयो हरि देखनको मनमें अकुलाई।
कानि गुरूजन की न गिनी अपने २ गृहते उठधाई ।
वेधत करक पांयन मों दुख झेलत मारगमें बहुताई ।
जाय मिलीं तिय प्यारे सुजानसों वंशी जबै बन श्याम बजाई४॥
कोऊ कहै कितते यह शब्द भो कोऊ कहै किये शब्द कन्हाई ।
कोऊ करै सुधि चीर की ना उर कोउ धरै नहिं धीर दुहाई ॥
काहूके लाज न काज रह्यो गृहकाहू बकै निकसै अकुलाई ।
होय गई वनिता उन्मत्त सों वंशी जबै बन श्याम बजाई ॥५॥
बात न मानतहै पतिकी कोउ लाज बड़ेनकी शंक न आई।
गोकुलके कुलको न गिनी एक बारहिते गृहकाज भुलाई ॥
श्याम सनेह सबै अटकी नटकी सुधि धारि हिये हरपाई।
धाय सुजानसों रासरची सब वंशी जबै बन श्याम बजाई ॥६॥
काव्यरत्नाकर। प समस्या ४० वीं-शिर ओढ़नि बैंजनि पैंजनि पायन । तुंग तने कुच भूधर से युग केहरि सी कटि खीन लखायन । पीन नितम्ब सरोरुहु पाणि मयंक सो आननहै छबि छायन । हाटककी पुतली मनु नारि लखे उपमा कविके मुख आयन । जातचली सोई आज सजै शिर ओढ़नि बैंजनि पैंजनि पायन ॥१॥ कौन बिथूर दई कच कुंचित को हियहार कियो उरझायन । पील कपोलन पै किन पारि दई किन रूप बिगारि सुहायन । कौन छुड़ाय दई कुच कुंकुम को नखघात दियो कर गायन । सांचीसुजान सों कौन दई शिर ओढनि बैंजान पैंजनि पायन॥२॥ अंग सुधार सुगंधनिसों कच मोतिन गूंथ लई छबि दायन । तुंग उरोजन पै कसि कंचुकि धारि लई मुख पान सुभायन ॥ मोहनके मनमोहन हेतु बनाय सबै विध रूप लुभायन । जात सुजानपै साजि अली शिरओढ़नि बैंजनि पैंजनि पाक्न॥३॥ पावसके अँधियारमहा निशि पौन झकोरतहैं चहुँ घायन । कीच मचो मगहै तेहि अपनो निशिमें जहँ गात लखायन ॥ या अभिसारमें काज शृंगारके कौंन लखात अहै ठकुरायन । सादे चले ने सजे यहिते शिर ओढ़नि बैंजनि पैंजनि पायन ॥४ क्यों इतनो बतराति गँवारन मानतिहै गुरु लोग सिखायन । राति दिना झगरा पियसों करि मान रहे मुखके अनखायन । तू समझे सिख मोर नहीं कह अन्त सुजान किसौं पछितायन। मारिकै छोरिनले तुम्हरो शिर ओढ़नि बैंजनि पैंजनि पायन ५॥ छैल बने सब गैल में घूमत राय कहावतहो चहुँ घायन ।
काव्यरत्नाकर। ४७ प्रेमकी बात करें नित आय टका कहुं गांठ खुले न सुनायन ॥ . आजु सुजानकी सौंह परयौ कर बात कही झुठजो बहुतायन । मूछि उखारि लिहों नतुला शिरोड़नि बैंजनि पैंजनि पायन॥६॥ समस्या ४१ वीं। मत माननि मानु मनावन ते । तोहिंसों हितकी इक बात कहों कहियो न निज मन भावनते ॥ तव नाह सुजान जू गोपिन ते अहे प्रीति किये तिय गावन ते । अब युक्ति वतावत नीक भई मुख फोरकै बैठियो आवनते ॥ जबलों करि सौंह न ताहि तजै मति माननि मानु मनावन ते॥१॥ तबलों न कियो कछु कान अरी बहु भांति भटू समझावनते। अब बूझि परी रघुबीर भलै जब सौतिनि ताव वितावनते ॥ यह मान मेरोसिख गांठि करो अब आपहिआवन वावनते। जबलों पदपैन गिरै तबलों मति माननि मानु मनावनते ॥२॥ तुम्हरे हितकी इक कैकयी ज हम बात सुनी तिय गावनते। कल रामहि राज्य समर्प हिंगे दशरथ सुजान जू चावनते ॥ तुभ मान कै बैठ भरत्थ लिये बन राम कहो मनभावनते । जबलों न स्वीकार करें तबलों मति माननिमानि मनावनते॥३॥ समस्या ४२वीं-पिय जाय विदेशमें छाय रहे। जिनके हित लोककी लाजतजी घर बाहरके दुरबैन सहे सुनते नहिं बैन सुधारसके उर जातहै आग वियोग दहे। नित प्रेम विलास में पायो महासुख सो अब जात न बैन कहे । मन व्याकुलहै अति कैसो जियों हरि जाय विदेशमें छाय रहे३ ॥
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४८
काव्यरत्नाकर।
. 'अबतो नहिं खान औ पान सुहाय न गेहके काम को चित्त चहे।
मुखकी छवि को नहिं ध्यान टैर उरकी विरहामि अतीव दहे ।
कवि लक्ष्मणका तकसीर करी कबहूं नहिं बैन कुबैन सहे ॥
हमतो हैं अभागिन जो तजके पिय जाय विदेशमें छायरहे ॥२॥
आयो बसन्त सुहावन लागत मोरवा चहुँओरसे बोल रहेहैं।
डोले समीर कलोलति कामिन कुंज लतासों लता लपटे हैं ।
योगी-यती औ सती तपसी सबहीं विरहानल आय लरेहैं।
मोसों रहो नहिं जाय सखी हरि जाय निदेश में छाय रहेहैं ॥३॥
समस्या ४३ वीं । फाटि गयो पै दरार न आई।
छैल छबीले कह्यो चलिबो परदेश उये दिन नाथ ललाई ॥
सो सुनि बैन न चैन रह्यो सब रोवत २ रैन गवाई।
बहुत विचार गहे उपचार रहे न सम्हार गिरी मुरझाई ॥
प्रात भये पह फाटतही हिय फाटि गयो पैदरार न आई ॥१॥
जब कृष्णको लेन अक्रूर गये सिगरे नर नारि गये बिलखाई। .
गोपिन त्राह कियो ब्रजमें अरु नंदजी रोहिणी हाय मचाई।
भाषत गंगापरसाद यही यशुदाजी हरीसों गई लपटाई ॥
जान वियोग दुहूसुतको हिय फाटि गयो पै दरार न आई॥२॥
सखनि सन्त सुपूत शिरोमणि मात पिताकी करी सेवकाई।
नारि विसारि चले वनको सज कांवरि अन्धन अंध चढ़ाई॥
नीरके तीर लख्यो अवधेश हन्यो शर बैंच मृगा उर लाई।
दोहुनको सुतके मरते हिय फाटि गयो पै दरार न आई ॥ ३ ॥
. काव्यरत्नाकर। ४९ जादिनते चरचा मैं सुनी तुम कान्ह भये सौतन वश जाई। तादिनते पिअरो भयो गात सो नि दिना सब रोवत जाई । भोजन पानहूँ दीन्यो बिसारि भला टुक प्यारे विलोकहु आई। और कहा कहिये तुमसों हिय फाटि गयो पैदरार न आई॥४॥ संगी सखानके संगमें सांवरे खेलत खेलत भानुजा जाई। छिपे श्रीदामें करी जमलेश सो कंदुक बार परी तहँ जाई ॥ भागत सों बरजोरी करी सुगोपाल कदम्ब चढ़े अतुराई। कूदे कलिन्द्री की धारहि माहिं जल फांटिगयो पैदरार न आई५ कालिकाधाय मिली जिनको गुरु लोगन में कुल कानि गवाई अंक भयो निरशंक भटू सुलटू लै लला सँग प्रीति लगाई ।। एकहि संग रह्यो विधिके रसरंग तरंग लह्यो सुखदाई । ताहरिके बिछुरे छतियां अलि फाटि गई पै दरार न आई॥६॥ ऐसे नरेश रहे अवधेश सुरेशहुकी जिन कीन्ह बड़ाई । और महत्व कहां लो कहों करुणानिधिसे सुत गोद खिलाई । ते मतिमंद छली तिरिया रघुनन्दनको वन पेलि पठाई। रामसों बेटा बिछोहतही हिय फाटिगयो पै दरार न आई ॥७॥ मो मन पंक समान रह्यो पिय अंक लगे दिन रात बिताई। सो पय प्रीतम के बिछरे सजनी यह होइ गयो पय नाई ॥ - पंक कटे वै जात दरार सुशील लखो इहि मूरखताई । जैसो को तैसो लखात अभों हहा फाटिगयो पैदरारन आई॥८॥ खारमें जन्म दियो मुँहतीत को जाने विरंचहि की निपुनाई।
५० काव्यरत्नाकर। होय जयंती कृष्ण जबै तब ताहि को ल्यायके काज चलाई ॥ नैन लख्यो न तऊ प्रभुको अरु नाहि गई मुखकी करुआई। सोचतर हीय फटोपै ऊपर नेक दरार न आई ॥ ९ ॥ समस्या ४ वीं- हमें आपने कामते काम अहै कुल के कुल नाम धरोतो धरो। अमला.हम लेतहैं घूस सदा बिन घूसके बात न कोई करो। चहो मीतं गरीब कै आपने हो पर सामने से रहो दूर खरो ॥ सुनिकै यहि बात हमारी अजी मनमें तुम चाहे जरोकै बरो। हमें आपने कामते काम अहै कुलके कुल नाम धरोतो धरो॥१॥ अबतो हम धत्त समाजी भये शिकवा जग मेरी करो तो करो॥ नित ढालि है जाय शराब मठी कहिहैं सब लोगकि खोटोखरो। न पुराणकी मानिहैं बात कछू चहै पूजक मूर्ति लरो तो लंरो ॥ हमें आपने कामते काम अहै कुलके कुल नाम धरो तो धरो२॥ नियं संग सदा हम चैन करें पितु मात औ बंधु मरो तो मरो। नित लूटके लावत कूटिके खात चहै कोऊ देखि जरोके बरो ॥ नहिं धर्म अधर्म से काम कछू'डर स्वर्गहू नर्कको नाहि परो। हमें आपने काम ते काम अहै कुलके कुल नाम धरो तोधरो॥३॥ निज वक्तृता आपने पास रखो इहिते कछु काम हमें न परो । जोहुतो विधिको करनो सोकियो अरु जो उहि भावै भले सोकरो। धन संपति की परवाह नहीं घर गांव गिरांव बसो उजरो॥ यह नाक पुरानी हमारी रहै कुलके कुल नाम धरो तो धरो ॥४॥,
काव्यरत्नाकर।
अलि व्यर्थ सबै समुझावती हो भय काहूकोहै नहिं नेकुपरो।
सब आपनी आपनि बातनको मुख खोलके बाहर नाहिं करो ॥
लखि चाल हमारी बुरी अतिही मनमाहिं जरोके टरोके बरो ।
, हमें आपने कामते काम अहै कुलके कुल नाम धरो तो धरो॥५॥
अबतो बदनाम भई बजमें घरहाई चबाव करो तो करो।
अपकीरति होहु भले हरिचंद जू सास जेठानी लरो तो लरो ॥ .
नित देखतो है वह रूप मनोहर लाज पै गाज परो तो परो।
मोहिं आपने कामों काम अरी,कुलके कुल नाम धरोतो धरो६॥
समस्या ४५वीं-बजनी धुंघरू रजनी उजियारी।
तू समझावति है हितकी अरु मैंतो विचारतिहौं हितकारी ।
मोहनसों चलिकै मिलिये हियकी दुविधा कुल कानि विसारी ॥
याहि विचार हिये करिकै मिलबे हितहैं हम कीन्ह तयारी ।
पै किमिके चलिये सजनी बजनी धुंघरू रजनी उजियारी॥१॥
दाहिने जागति सासु अहै दिशि वाम जगे ननदी वजमारी ।
सामुहे धामके पौरहि माहि जेठानि परी अहै मौनं विचारी ॥
क्यों घबराति सुजान किसों घरि दैकलों धीर धरो वनवारी ।
जायगी जानि सबै दजिहें बजनी धुंघरू रजनी उजियारी ॥२॥
कुन्दन क्रीट धरे शिरपै खसि मोरपखा तेहि छबिवारी।
सोहत त्यों कटि पीत दुकूल सुजान धरे तेहि बँसियारी ॥
कुंज करीलनमें यमुनातट बेगहि आजु लखें चल प्यारी।
नाचत लाल धरे पगमें बजनी धुंघरू रजनी उजियारी ॥ ३ ॥
५२
काव्यरत्नाकर।
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केसरसों करि मंजन खंजनसे हग अंजन रेख सँवारी ।
केसरिसों केटि मांह सुजान कसौ तिमि केसरिया रंग सारी ॥
केश सुधारि सुगंधनि सो शुचि मोतिन मांग भरी अति न्यारी।
तापर साज जई सजनी बजनी धुंघरू रजनी उजियारी ॥४॥
गोकुलके कुलको तजिकै हरि जादिनते मथुराको सिधारी।
तादिनवे पठयो कछु होल न लाल सबै सुधि मोरि बिसारी ॥
भूषण
भौन सुजान सुहात न आये हिये सुधि कुंजबिहारी।
शालतहै नट शालसों ये बजनी धुंघरू रजनी उजियारी ॥ ५ ॥
पूरण चन्दः रह्यो छजि जादिन शारद यामिन में मनहारी ।
त्योंहीं सुजान जूरास उमंगमें जादिन बाजतथी करतारी॥
जादिन भानु लली गल बांहदै नाचतथे वन कुंजबिहारी।
वाहि दिना बद दीन्ह भुजा बजनी धुंघरू रजनी उजियारी॥६॥
सोइ रही हैं चहूंदिशपे ननदी औ जिठानी सखी सँगवारी.!
• वीरन बैठे हैं द्वारहि करिकै यह सामुहे सेज तयारी ॥
तापर आई बुलावनको तुम कुंजनमें जहँ कुंजविहारी।
हाय मैं कैसी करों सज़नी बजनी धुंघरू रजनी उजियारी ॥७॥
समस्या ४६ वीं- देह धरेको यहै फल भाई॥
नैन लखें जग सांवरेही मुख गान करै तिहि नाम सुनाई।
केलि कथानि सुनै श्रुतिते पगते चलिकै अजमें रहे छाई ॥
कोउ कछू कहै कैसहिकै अपने जियमें करे भेद न राई ।
सन्त सुजान बखान करें बस देह धरेको यहै फलं भाई ॥ १ ॥
- काव्यरत्नाकर। •५३ जाय लखे दृग केलिको धाम जहां मनमोहन रास मचाई। त्योंही सुजान जू कुंज करीलनमें सिकै रटे नाम कन्हाई ॥ अंकनि भेटे कदम्बनको यमुना जलमों करै न्हान सुहाई । लोटो करै बजके रजमें वस देह धरको यहै फल बाई ॥ २ ॥ औन सुनै हरिकेलि कथा गमें रहै सांवरो रूप समाई । शीश नवै मुरलीधरको चरणामृत पान करै हरपाई ॥ खेलत खात उघात जम्हात सुजान सबै छिन चित्त लगाई। गान करै यदुनन्दनको जग देह धरेको यहै फल भाई ॥३॥ दै अधरा अधरे विधके अधरामृत पान करै हरपाई । . त्योंहि सुजान उमंग हिये करि केलि कथा प्रगटै बहुताई ।। चुम्बन चन्द मुखौ मुखके पर्यकमें जौलों रहे लंपटाई । न्यारो न अंकते होयं छिनोबस देह धरैको यहै फल भाई॥४॥ कानन जात सियाबरको लखि लक्ष्मण बोलि उठे हरपाई। तात विहाय हमें कित जात कहा हम नाथ करी कुटलाई॥ मातु पिता सुख सम्पति आदि सबै तुम्हरे बिन है दुखदाई। प्रेम रहै लुम्हरे पद कंजमों देह धरैको यहै फल भाई ॥ ५॥ आनन पूरण चन्द्र समान सजेवर कुन्दसों गात निकाई । श्रीव कपोत से सुन्दर राजत चाल लखे गज जात लजाई ॥ श्रीफलसे कुच तुंग दोऊ कच ते कटि सीन महाछबि छाई। या विधके तिय अंक लगै वस देह धरेको यहै फलं भाई ॥६॥ यातनु सुन्दर पाय अरे मन मूरख क्यों न भजै रघुराई । - - . काव्यरत्नाकर। जासु सनेह कियो गणिका गज गीध अजामिल ने गति पाई। और अधीनकी कौन कथा जग जाने तर सदनासे कसाई । नामन भूलो छिनो मथुरा.नर देह धरेको यहै फल भाई ॥ ७ ॥ समस्या ४७वीं-केहि कारण कांप उठी धरती ॥ नाश भयो सतधर्म विचार गऊकी पुकार हियो हरती। मानत कोउ न वेदकी रीति अनीति कुनीति नहीं टरती ॥ त्याग दियो निज धर्म सुधर्म सुर्मिन सैनकी शाह करै भरती। शंकर रूसकी वास बढ़ी यहिकारणे कांप उठी धरती ॥ १ ॥ श्रीयुत साहेब एलगिन लार्डकी आमद देख सती डरती एकट कोड न पास करें द्विज गायनकी करै कौन गती ॥ भारतवासी प्रजानके मालिक हिंदमें आप महान गती।' धर्ममें बाधा न डार कौं इहि कारण कांप उठी धरती ॥२॥ समस्या४८ वीं-नन्दके अजिरमें खेलत नंदलाल हैं । जाकी-शेश शंकर सुरेश सनकादि अज नारद मुनीश.ध्यान ध्या तिहुँकाल हैं।करत विविध जाप यज्ञ जागरण तप जाके हेतु मुनि जन सहत कशाल हैं।जाकी शुचि महिमा बखानत दिवस निशि नेतिके पुकारयो श्रुतिबंद सुख जालहैं । जायक लखै न. कि रूप धै सुजान सोई नन्दके अजिरमें खेलत नंदलाल हैं ॥१ खासन चढ़ाय कुश कासन पै आसनके करिक उपासन क्य सहत कशालहैं । ज्वलित हुतासनमें दाहे वपु बादिकाहे होक दिगम्बर औ ओढे मृगछाल हैं ॥ धूमि २ तीरथ क्यों सहिये सजान दुख इत उत वादि वितइये काहे काल हैं । जाय वि -- काव्यरत्नाकर । ५५ श्रमहि लखे न किन वाको जोय नन्दके अजिरमें खेलत नंद- लाल हैं ॥ २॥ पिंगल दुकूल कटि मुकुट जटित शीश चौतनि चटकहर मोतिनके माल हैं । चन्दन तिलक भाल लकुट शुजा विशाल . लिये हैं खुशाल बोल बोलत रसाल हैं।चकई चटक.चारु फेरत अनूप कर लटू लखे लाल लटू भई बजवाल हैं। हो तो लखि आई निज नैननते याही विध नन्दके अजिरमें खेलत नंदलाल हैं ॥३॥ माखनके चोरिवोको हियमें विचारि करि पैठो एक ग्वालिनके धा ममें गुपाल हैं।सुकबि सुजान तेहि औसर अचानके चुरावत हरीको लखि लीन्हो ब्रजवाल हैं । ढके चुप चाप डारि दारिके कपाट चली यशुदाको लाइके दिखैबेको यह हाल हैं। ऐसो हिय शोच नन्दधाम उतजाय तोपै नन्दके अजिरमें खेलत नन्दलाल है॥४ समस्या४९वीं-मकरन्दके कन्द भुलान्यो अली ॥ तनु श्याम सजे पटपीत "फते" मुरलीध्वनि सों लियो चित्त छली। छकि सौरभ पुष्प परागनकी मन रम्य प्रफुल्लित मंजु कली ॥ मधु अंध भयो मृदु मन्द सुगन्धन मत्त कियो मनमोह इली। रस लीन प्रवीनता छीन भई मकरन्दके फन्द सुलान्यो अली १॥ समस्या ५०वीं-नाचत कुंजमें कुंजविहारी ॥ शंकरसे सुर सिद्ध सबै जेहि भेद न पावत ध्यान मंझारी । शेष सुरेश थके भनिवेद अजो जिनके कछु वार न पारी ॥
काव्यरत्नाकर। - जाहि सदा पट चारि दसाठ सुहारि हिये केहि नेति पुकारी। प्रेमके डोरे सुजान बँधे सोइ नाचत कुंजमें कुंजविहारी ॥ १ ॥ मंडित कुंडल कुन्दनके श्रुति चन्द्रकला युग ज्यों उजियारी। तैसो सुजान कसे पटपीतहिं मोरपखा शिर है छबिवारी ॥ सो लखिकै.युवती घिरके मनमत्त कै गावत दैकरतारी । बांह धरे वृषभानु सुतागर नाचत कुंजमें कुंजबिहारी ॥ २॥ पूरण चन्द्रकला निकस्यो नभ शारद यामिनिमें मनहारी। होत सुजान हुलास हिये करि रास प्रकाश कियो बनवारी ॥ सो सुनिकै श्रुतिते वनिता उलटे पुलटे अंग भूषण धारी । धाय मिली ललना हरिसों जहँ नाचत कुंजमें कुंजबिहारी॥३॥ बाजत ताल मृदंग उपंग पसायुज बीण महा मनहारी। छाजत छत्र छपाकरके क्षिीत लाजत कोटिक मैन निहारी ॥ राजति मंडिल नारिनके मधि भाजत भानुलली बनवारी। काज तकै मत जाय लखै इमि नाचत. कुंजमें कुंजबिहारी ॥४॥ कूर अक्रूर भयो बजके बजराजको ले मथुराको सिधारी । तादिनते दुख दूनो बड़ो कछु बूझ परे न मूल्यो सुधि सारी ॥ प्यारे सुजान वियोगहुपै उर आवत भाषिये बात हमारी । भानुसुता गर बांह धरे अजों नाचत कुंजमें कुंजबिहारी ॥६॥ जाहिन जान सकें चतुरानन ध्यानहूं में न लहें त्रिपुरारी। वेदहुभेद न जासु लहे सर्वज्ञ अनन्त कोटि पुसरी ॥ रास बिलास समै यमुना तट संग लिये बहु ग्वारि गवारी। .
काव्यरत्नाकर । प्रेम भरे गरे हाथ धरे सोइ नाचत कुंजमें कुंजविहारी ॥ ६ ॥ जिन बीन बजाय बुलाय सबै छतियां सों लगाय २ निहारी । अपने कर भूषण वस्त्र सुधारत अंजन आंजि शृंगार सँवारी ॥ तिन कूबारके वश द्वै सजनी ब्रजकी सब ग्वारि गँवारि विसारी। सुध आवतही फटजात हिया जब नाचत कुंजमें कुंजविहारी॥७॥ समस्या २१वीं-बालिका वियोग नंदलाटके विहाल है। लेवाय कृष्णको गये अक्रूर साथलै बुलाय हाय भूप कंसधौं करेंगो कौन हालहै । समूह यातुधान जोरि चित्त ठानि मारिवो वृथा विसाह बैरको करी महा कुचालहै । सखी दशा इतै फते सुनी न जात कानदे बढी प्रचण्ड गातमें तरंग प्रेम ज्वालह । बिसारि खान पानं नींद ध्यानही किये हिये सुबालिका बियोग नंदलाल के बिहालैह ॥ १ ॥ कहाय श्याम राधिका भयेहैं कृष्ण कूबरी नशाय लोकलाज कौन ये गही कुचालहै। बढी तरंग प्रेमकी अधीर है कहै फते दहै शरीर को ऊधो संदेश योग ज्वालहै॥रमाय भस्म अंगमें रंगाय वस्त्र योगनी फिरेंगी द्वारश्जो बनेगो कौन हालहै । हृदय अनंद । मालिका फँसाय मोह जालिका सुबालिका वियोग नंदलालके विहाल है ॥ २॥ पड़ी कहराती घबराती रहे भवन माहिं बूझ्यो नहीं जाहि करदियो रहे गालहै।भूषन बसन औसनकी न चाह कछू दिनो दिन पीरो मुख में जानू बशकालहै । ओपधिः खिलाऊं की बुलाऊं कोऊ पंडितको खंडित करे दुखको विचार कर फालहै।
काव्यरत्नाकर। + देख भालकै के हर्षरामने सुनायो बैन सु बालिका बियोग नंद- लालके बिहालहै ॥ ३॥ समस्या ५२वीं-पै तेरे एकौ अंगना ॥ सुहायो प्रीति अंगना, - सनेहकी तरंगना, सुभाव की उमंगना कियो प्रचहि अपंगना । भईहै मति अंगना पियेहै कछु. अंगना, कोऊ डस्यो भुजंगना जो ये तजे कुसंगना । " फते" है कवि गंगना, जो लावे तुक अंगना, जो होत्यो.सतसंगना तो.आत्यो ऐसो ढंगना । न देखे ग्वाल अंगना जो चाहे देव अंगना सो ठाढ़े तेरे अंगना पै तेरे एको अंगना ॥ १ ॥ समस्या९३वीं-केहि कारण चन्द्र पिपीलन खायो । डोलत पंथ वृथा मरिजात सबै मिलिके इक मंत्र उपायो। : और उपाय न सूझे कछू चलि पीवें पियूष मिलै नियरायो । '. गंग दयाल सदाशिवजी सबसों यह आकर सों दरशायो। जीवन आश विचारिहियो यहि कारण चन्द्र पिपीलन खायो १॥ शिव व्याह मुहूरत आयो जब तवहीं गिरिजा यह बैन सुनायो। दै नर संग न और फिरों अह नाथ ललाटपै चन्द्र बसायों। बातसुने तज भूमि धरे रस लोन पिपीलन चाट चबायो। महाबीर सती सत नामरहै इहि कारण चन्द्र पिपीलन खायो॥२॥ बैठि अलीगण आपसमें बतरात रही बहु बात सुहायो । ताहि समै इक नारि नबेली भरी मद जोबन जाति लखायो । देखि सुशील खुले पट बूंघट आनन शीतला दाग बुझायो । 4 काव्यरत्नाकर। ५९ पूंछि उठी इकसों इक यों केहि कारण चन्द्रापिपीलन सायो॥३॥ आनन नासिका गोल कपोल त्यों अमृतसों अधरा लपटायो। हैं सबमें बे मिठास भरे मधु जासु मिठोपन जात लजायो । कौन न चाहत पावनको तिहि काहिं सुशील नहीं जग भायो। दाग न शीतलाकोहै मनो मधुकारण चन्द्र पिपीलन खायो.॥४॥ . वैद्यक भावप्रकाशमें दीखहै इन्दुकी संज्ञा कपूरहि खायो । पागमें डारि सुगंधिके हेतु बनावत मोद कहें मन भायो । शर्कराके हित चीटीं चलीं गंगाप्रसाद विचारि सुनायो । •वन्दकी वृन्द लखी चखने तेहि कारण चन्द्र पिपीलन सायो॥५॥ एक-समय पद्मासन मारि सो बैठ सदाशिव ध्यान लगायो। सोहत सुन्दर व्याल गरे पुनि मस्तक चन्द्र औ गंग सुहायो । उज्ज्वल अंग.विभूति रमाय सो खेचरी साधनमें मन लायो । बठ महेशं समाधि लगाय यहि कारण चन्द्र पिपीलन खायो॥६॥ अंक मयंक मुखी सुतको धर ब्योम छयो निशिनाथ दिखायो छैल छबीले लला हरखें निरखें शशिमोदक मात बतायो । छाय गयो घन आय तबै न लखाय परयो तबहीं विलखायो। माय मनावत रोवतरे केहि कारण चन्द्र पिपीलन खायो ॥७॥ . वेदनमें तो नहीं गम है पै पुराणन माहिं कहूं न सुनायो । पूंछतहौं जिहि पंडितसे करिक्रोध कहै यह झूठ बनायो । मित्र यह कैसे कवित्त बन गंगा परशादको वेगचितायो । कैसे वृथा हम झूठ लिखें केहि कारण चन्द्र पिपीलन खायो॥८. समस्या५४वीं-हम ना बरती तुम्हेंको वरतो ॥ A
६०
काव्यरत्नाकर।
शमशान विभूति बताओ भला करले निजको.तनुमें भरतो ।
गिया मलि कौन छकातो दमोदर कौन कही मनकी करतो॥
अवलोकतो कौन भयावनो भेष नहीं अपने मनमें डरतो.।
गिरिजा शिवसों यहि भांति कहैं हमना बरती तुम्हेंको बरतो॥
बरतो नहिं कोउ तुम्हें कबहूँ कर पीठ कपालु जुपै मरतो ॥
मरतोतिम कौन अहीशन शीशन शीश लखे मति नाहरतों।
हरतो श्रम कौन दमोदर जू सुखमा दिशि बाम भले भरतो ॥
भरतो नहिं काहूको होत अजों हमना बरती तुम्हेंको बरतो॥२॥
वृपयान पै खप्पर खंग लिये अर्दोग भये पगको धरतो ।
डमरू तिरशूल जटा अहि देख पिशाचनी संगतिको करतो ॥
बसि कानन कौन सदैव फते चित चिंतित द्वै दुखको भरतो ।
गिरिराजसुता कहै शंकर सों हम ना बरती तुम्हेंको बरतो॥३॥
समस्या५५वीं-दुहुँ लोकनमें यश छावतु है ।
जन्मे जन्मे वह अन्त मरे एक धर्मही संगमें जावतु है।
धन सम्पति मीत सखा परिवार त्रिया घरं काम न आवतु है ।
धन्य वही नित धर्म करै सिय राम सों नेह लगावतु है ।
सुख पावत है सब भांतिन सों दुहुँ लोकनमें यश छावतु है॥१॥
धन सो धन पाय जो धर्म करै अभिमान नहीं जिय लावतु है ।
धन जो परिकै उपकारहिमें लगि वैस सदाही वितावतु है ॥
धन सो जो करै सतसंग सदा रघुनन्दनको गुन गावतु है ।
सुख होत महा अस लोगनको दुहुँ लोकनमें यश छावतु है ॥२॥
. . काव्यरत्नाकर। । सदाहि धन कोटि कमाई करै पर धर्म नहीं जो कमावतु है । वह अंत समय अकुलात महा यवरावतु है पछतावतु है ॥ धन अन्त न आवत काम कछू इक धर्मही संगमें जावतु है । । परलोक बने नरलोक बने दोहुँ लोकनमें यश छावतु है ॥ ३ ॥ उपकार दया क्षमा शीलरखे रघुनन्दनको गुण गावतु है। । नहिं भूलहूं पांव कुपंथ धरै परकारज देह लगावतु है ॥ अजिमान न लावत है कबहूं उर पापिनको डरपावतु है । अस लोगनको सब धन्य कहैं दुहुँ लोकनमें यश छांवतु है॥४॥ कंरिकै रघुनन्दनको गुणगान जो आपुन जन्म वितावतु है । नहिं पावत है दुख लेश कनौं भव शूल समूल नशावतु है । डरनेक नहीं यमदूतनको तेहि अन्त समय दरशावतु है । नर देह सबै धन धन्य नै दुहुँ लोकनमें यश छावतु है ॥ ५ ॥ तनसों परको उपकार करै मनसों हरि ध्यान लगावतु है। हग सों हरिमूरतको निरखे पग तीरथ तीरथ जावतु है । रघुनाथ कथा नित श्रवण सुने रसना हरिनाम रटावतु है। धन पाइके धर्म करै तिहको दुहुँ लोकनमें यश छावतु है ॥६॥ मुख सोहत है हरिनाम लिये कर दान दिये जल भावतु है । तनु सोहत है उपकार किये पग सोहत तीरथ जावतु सुत सोहत.मानत मात पिता धन खर्चत धर्म सुहावतु है। त्रियसोह सुशीलपतीव्रतते दुहुँ लोकनमें यश छावतु है ॥ ७॥ नित जो हरिको गुणगावत है मन योग समाधि लगावतु है। तजि मोह मया गृहिनी गृहको वसि कानन वैस वितावतु है ।। है है काव्यरत्नाकर। -- निजको न जनावत काहुहसे हरं भांतिनहीं जो छिपावतु है। । तऊ केवड़ा फूल सुवास लओ दुहुँ लोकनमें यश छावतु है॥८॥ वन वाटिका जो न लगावत है सर कूपको जो न खनावतुहै। पुनि मंदिर जो न बनावत हैं धन दान न जो न लुटावतु है ॥ तपसी बन खाक, रमाय तनैं कहुँ तीरथ जौन न जावतु है । • तेहु कोकाराम भजेहूं नहीं दुहुँ लोकनमें यश छावतु है ॥९॥ उपकार समान न धर्म कछू जगमाहिं इको दरशावतु है। यह ज्ञान सुजान दयानिधि कान्ह पै दीन विनय पहुँचावतु है । अब कान्ह करो न बिलम्ब करो प्रा जीव महा घबरावतुहै ॥ न सुशील किये विनु दीन दया दुहुँ लोकर में यश छांवतुहै १० समस्या ६६वीं-केहि कारण भारत गारदभा। वेद पुराणको जाने नहीं पितु मातु को यार निरादर मा ॥ पति छोड़के गैर करें दुहिता द्विज जातको काम सबैरदक्षा। ठग चोर चंडाल फिरें बहुते समताके नहीं कोइ शारदना । भगवानदास कहैं समझाय यहि कारण भारत गारदक्षा ॥ १॥ विद्या न पढ़ी बड़ी फूट बड़ी अरु गाय कसाइन मारत भा। निज देशकी वस्तु नहीं प्रियह उपदेशक नित्त पुकारक भा ॥ दस्तकारी विचारी सिधारी नहीं दज लाल दुलारे उचारत भा। व्यवपार विसार दई किरपी यहि कारण भारत गारद ना ४२॥ फूटको बीज बयो सबदेश अरु झूठ को बास सबै घर भा। जात कुजातकी पूंछ रही नहीं राज्य से एक सभी जगना ।।
काव्यरत्नाकर। ६३ . है। कुल पद्धति छूटिगई सवते जब इंगलिश भानु प्रकाशिदना । 11 निजउद्यमरीति व्यवपार तज्यो यहि कारण भारत गारदाना॥३॥ समस्या ६७ वीं- लागि जो जाय तो कीजे कहा सखि ये है। अँखियाँ रिझवार हमारी । । सुन्दर गोल कपोलन पै अनमोल सो कुंडल डोलन प्यारी ॥ । हो हलंके युति मोहनकी झलकै सुथरी अलक बुंधरारी। वा मुसक्यान विलोकतही कुलकान सबै तजि होत विदारी ॥ । . लागि जो जाय तो कीजे कहा सखि ये अंखियां रिझयार हमारी है अति भीत बाइनको हँसिहै अरि पापिनदै करतारी१॥ लाज गई ब्रजलाल विलोकत आजुलों में कुलझान सँभारी ॥ आवत जात सदा यहि गैल सों छैल छबील नं कुंज विहारी। लागि जो जाय तोकीजेकहा सखि ये अँखियाँ रिझवार हमारी॥ देत सदा सिख तू सजनी अरु मैंहूं विचारत हों हितकारी । मान किये गुणमान कहें सनमान बढ़े फिर है हितनारी ॥ मोहनी मूरति मोहनकी अवलोकन लोक रिझावन हारी। लागि जो जाय तोकीजे कहा सखि ये अँखिया रिझवार हमारी समस्या९८वीं-यह पाखें पतिव्रत ताखें धरों । ऋतु पावस आयगो भागनते संगलालके कुंजनमें विहरो। । नहिं पाइहों औसर और जूवत्व कहा अब लाज लजायं मरो ॥ गुरु लोग औ चोंच दहाइन सो बिरथा केहि कारण बीर डरो । चलिचाखें सुधा अभिलाहिये यहि पाखें पतिव्रत ताखेंधरो॥१ G ६४ काव्यरत्नाकर। . यह सावन शोक नशावन है मनभावन यामें न.लाज करौ। यमुनापै चलौ सो सबै मिलिकै अलगाय बजायके पीर हरौ ॥ इमि भापतहै हरिचंद पिया अहो लाड़िली यामेंन धीर धरो। चलि झूलो झुलाओझुको उझको यहि पांखें पतिव्रत ताखें घरों लीने अबीर भरे पिचका रसखानि खरो बहु भाय भरोजू ।. मारसे गोप कुमारसे दीखत ध्यान टरों नटरो न टरोजू ॥. पूरव पुण्य न हाथ परयो तुम राज करो उठि काज करोजू । ताहि सरो लखि लाख जरो यहि पाखें पतीव्रत ताखें घरोज॥३ समस्या९९वीं-लपटाने दोऊ पटताने परे हैं। हास विलाप बढ़ाय अली विध चुम्बन भांति अनेक करे हैं। प्रेम प्रतीतिकी बातनको कहि प्यारे उरोजन हाथ धरे हैं । रीति रची विपरीति आन्दित प्यारी विषयके सुहीय हरे हैं। शंकर खोज मनोज विथा लपटाने दोऊ पटताने परे हैं.॥ १ ॥ मैं अरु मेरी प्रिया निज रूपके प्रेम समुद्रमें साने परे हैं। रंचक चाह नहीं चितमें रहे आनदके उर आने परे हैं । धीरज तासु बिछौनाकियो और तोषकी चादर माने परे हैं शंकर आतम सुरत लिये लापटाने दोऊ पटताने परे हैं ॥२॥ राधिका माधव दोऊ मिले सो प्रेमके पंथ पगाने परे हैं। रति रंग तरंग कियो सुखसों नये नेहमें यों रस साने परे हैं रामनरायण त्यों मनुहार विहार सो हार थकाने परे हैं। घरी चारिक चौस चढ़ो अवलों लपटाने दोऊ पटताने परे हैं.३ . काव्यरत्नाकर। ६५ कामकलाकी उमंगनसों रसरंग तरंग सुमंजु भरे हैं । चूमिकै गोल कपोलनको करकंज उरोजन हाथ धरे हैं ॥ "छाकि सुधा मधुराधुरको कबि लालजी चारु बिनोद भरे हैं। "सी" कर सेजमें शीत समय लपटाने दोक पटताने परे हैं ॥४॥ समस्या६०वीं-मनोजके हाय हवाले परी ॥ जब चौगुन चाह तरंग बढ़ी नहिं जात हिये बिच धीर धरी। यह दुर्बल देह भई सिगरी बिरहानलमें अब जात जरी ॥ लखि व्याकुलता मम ऐ सजनी नहिं कोउ उपाय बतावै अरी। अजहूं नहीं प्रीतम आयो फतेह मनोजके हाय हवाले परी॥१॥ पहिले ही संभार कियो न सखी सखियानके सीखके जाले परी। रसियाकी सुनी बसिया जबते तबते भ्रमनाके आमाले परी ॥ कहि सांची कही सितकंठ सुजान सुजानके तानके पाले परी । मनमाने न रोज रही-समुझाय मनोजके हाय हवाले परी ॥ २ ॥ पति-प्रीतिके भारन जात उतै मतिके दुख भारन साले परी । मुख बातते होती मलीन. सदा सोई मरति पौनके पाले परी ।। द्विज देव अहो करतार कछू करतूति न रावरे आले परी । यह नाहक गोरी गुलाबकलीसी मनोजके हाय हवाले परी ॥३॥ समस्या६१वीं-है ऋतुराज बसंतको आवन ॥ आवनकी कर औध गयो पर आये नहीं अजहूं मनभावन । भाव न एकहू काज सखी बिन पीवरही जियरा तरसावन ॥ सावनहींसे वियोग भये पपिहारहौ पीव को शब्द सुनावन ।
- .. M काव्यरत्नाकर। . - . -- - . + -- नावन औधिकी और फते यहहै ऋतुराज बसंतको आव कोकिल केकी चकोर सुकीरनकी.ब लगै बरबोल र वस्तु सजे सरदारखरे हुम सूहे बिचित्र सुरंग सुनावन ॥ मंत्री रतीस समीर सदूत पठाय मजै बल लागे जनावन. पूरी छटा क्षितिछाई छबीली किहै ऋतुराज बसंत को आ समस्या ६२ वीं-आयो बसंत पै कंत न आयो। कुंजन कैलि कुहूके लगी पिक मोर चहूं दिश शोर मचा- औरन भीर जुरी चहुंघानि सरोजन पुंज परागिन छायो। अम्बक बम्ब लयो किसलै वरु मंजरि सुन्दर रूप लखार कैसे रहे उर धीर भटू कतु आयो बसंत पै कत न आयो बल्ली वितान वने बनधाम रहे तृसा मेदिन फर्स बिछ। पौन वजीर तृधात्रय भाष्य लये अबली अलिवाद्य बज चारणकैलि सुजान पढ़े यश कीर कपोतन गाज सुनायो। मान गढ़ी तिय तोहनको नृप आयो बसंत पैकत नआयो कीन्ह कुभांति तमालनि कुंज रसालनिको बिन पत्र वारि दये तरु दाखन ज्वाल दुखी कर कैलिंन कूक बर मैन विगारि सुजान दई सिगरे जगको बिन मान करायो क्यों नहिं मोह दिखाय भटू जोपै आयो बसंत पै कंत न गौन कराय लिवायके भौन पिया जब जान विदेश से मैं कितनो समझायरही अवहीं हरि मोहिं नजै कित जार्य पै हंरिएक सनी नहि. कान गयों कहि औध बसंत बता - 4 - - काव्यरत्नाकर। ६७ गह सुजान भयो विपरीति कि आयो वसंत पै कत न आयो।४ समस्या ६३ वीं-एसे भटू ऋतु आई वसंत है । [ग बागन फूले हैं फूल.अनेकन रंग सुगंधन कौन अनन्तहै ॥ खे न कानन जे द्रुम पुष्प सो जानत याहि दवामि अनन्त है। गि फिरें लखि आगी पलाशन ऐसे मेरे सखी वावरे कन्तहैं । बाहर होयके देखों तिहूं कढ़ि ऐरी भटू ऋतु आई वसन्तहै ॥१॥ सो. शरीर सुरंगित पीपर वस्त्रनकी छबि छाई अनन्तहै । योंहीं फते बन बागनके नव पल्लव फूलन वायु बहन्तहै । र भये हिम त्रास सबै सुखदायक चित्त तरंग उठन्तहै । यो चहूंदिश मंगल पै बिरहीनकी बैरन आई बसन्तहै ॥ २॥ समस्या ६४ वीं-ऋतुराजके चिह्न दिखान लगे । रियारी कंषीन की क्यारिन पै सरसों चहुँधा पियसन लगे ।। म जम्बु रसालन वौर फ़ते चहुँओर सुगंध उड़ान लगे । न कोकिल चातक मोरनकी ध्वनि कानन चित्त लोभान लगे। हेमत्रास सबै बिनशान लगे ऋतुराजके चिह्न दिखान लगे ॥१॥ बन फूले पलाश दवारसे दीशत शोभा भरे लंहरान लगे। वनि सारस मोरनकी चहुंघा पिक चातक शब्द सुनानं लगे । दु मंजिर गंध रसालनपै रसपी अली वृन्द उड़ान लगे। हेम वास सबै विनशान लगे ऋतुराजके चिह्न दिखानलगे ॥ २॥ समस्या ६५ वीं- नैन लगे अँसुवा बरसावन । सावन आयो नआये पिया सखियां लगी राग मलार सुनापन ॥
. ६८ काव्यरत्नाकर। नाव न जानों भटू वह गांव को छाये हमारे जहां मनभावन । : भावन लागी घटा सबके जिय लालन मोहिं लगे कलपावन ॥ पावन लागे महादुख प्राण सु नैन लगे अँसुवा बरसावन ॥१॥ समस्या६६वीं-बज अलवेलिनमें बेलिनमें बरसन । चहुंकित कुंजनमें परम निकुंजनमें पुंजन पलासन पतान लागेपरसन कवि मदनेश ठौरभौर भीरन पै सुरभि समीरन सुमीरन पै सरसन अम्बन अवनि कदम्बनकोकिला पै विदित बसंत यों दिसान लाग्यो दरशन । काम कर केलिनमें सकल सहेलिनमें बज अल- ब्रेलिनमें बेलिनमें बरसन ॥१॥ चन्द्र चैत चांदनीमें चार चौक चांदनीमें चम्पक चमेली चोवा चन्दनकी चरसन । शीतल मलिन्द अलिबिन्द मकरंदनमें सर सरि नीरन समीरनमें सरसन । कोकिल निकुंज पुंज किंशुक कदम्बन में अम्बनमें ओनिमें दिगम्बरमें दरशनावृन्दावन हेलिन नवेलिन वसंत लाग्यो, ब्रज अलबेलिनमें बेलिनमें बरसन ॥२॥ समस्या६७वीं-बीरबली धुरवा धमकावें ॥ धूरि भरे मतवारे महानभमें चहुँ ओर ते धावत आवे । हाथ सुरेश शरासन तानत बुंदके बाण घने बरपा ॥ सेवक जानि अकेलहि मोहिं न नेकहु हाय दया उरलावें । को बरजे पियप्यारे तुम्हें बिन वीर बली धुरवा धमकावें ॥१॥ सेवक पावस भूपति संग घनी बग पांतिकी सैन सुहावें । दादुरं कोकिल. मोरनकी व समीर तुरंग इतै उत धावें।
काव्यरत्नाकर। ६९ . इन्द्र-शरासन बुन्दके वान गराजत दुदुनी घोर वजावें । भान गढ़ी तन तोरन कारन वीरबली धुरवा धमकावें ॥ २ ॥ तुंगन तोपि चहूं दिशिते ना भीर बलाक लै धीर मिटावें । त्योंही पराग भरे मद सो गर0 अतिहीं जुगनू चमकावे ॥ सीरी समीर सहाय लिये लखु लोनी लवंग लता लम कावें। धावें गहे चपलाकी कपानि ये बीरबली धुरवा धमकावें ॥३॥ शोरकै धेरे घने २ आय बड़ी बड़ी बुदनको बरसावें । लीन्हे जमाति फिरे बक पांति सुहात न नेक सबै तनतावें ॥ . धावें चहूंदिश भावे भरी ललिते अस बिज्जु छटा चमकावें। पीय बिना बलहीन विचारिके बीरबली धुरधा धमकावें ॥ ४॥ टेरो करो पहिहा दिन रात औ मोर चहे तितो शोर मचावें । गायो करेंअलि आयो करै बकधायो करें जुगनू जित भावें । डोले समीर सुभायनसों ललिते चपला कलाकोटि दिखावें। पीयके अंक निशंक लगी अब बीरबली धुरवा धमकावें ॥५॥ समस्या६८वीं-राग भरी वह फागकी गावनि ॥ मेलनि कंठ भुजानिदै खेलनि झेलनि झोरि गुलाब उडावनि धुंधरि धूम धमारिनकी सि धावनि औ बलके गह लावनि ॥ त्यों ललिते लपटानि सुबानि सों,तानं भरी पिचकानि चलावनि आज लखी.नंदबार सखी भली राग भरी वह फागकी गावनि १ लाल भयो ना देखि परे सब मेघ समान गुलालकी छावनि । बै झरसी रही केशरि नीरकी कीच मची यहि बीच सुहावनि ।। .
11 काव्यरत्नाकर.। त्या ललिते चमकं चपला सम बाल भरी मदमोद बढ़ावनि । भाग भरी ब्रज देखो सुनो संब राग धरी वह फागकी गावनि २॥ समस्या६९वौं-भाग भरे मुखपै सुहाग बरसत है । : पौरीशाल ओढ़नी पढ़ रही अजलाव.मंजु महताबकी झलक तरसत हैं । उरज उठान मन्द मुसक्यान हूपै कछू ओज गुण अधर अमीको परसत है । कबि लछिराम कल शूधनु मरो- रगर कोरदार लोचनमें खाली सरसत है। जागे रंगजोबन अनंग अनुराग रुख भाग भरे मुख मैं सुहाग बरसत है॥१॥. कुन्दनसा रंग नव जोबन सुरंग उठे उरज उतंग धन्य प्यारी परसतहै । सोहत किनारी बारी तन सुखकारी देवशीश शशिफूल अधखुलो दरशतहै । बंदिया जडाऊ बड़े मोतिनसों नीकी नथ .. हसत तरोननमें रूप सरसत है। गोरी गजगौनी लोनी लवन दुलहियाके भाग भरे मुखपै सुहाग वरसतहै ॥ २ ॥ समस्या ७० वी- रंग दूसरो और चढ़ेगो नहीं अलि सांवरो-रंग ग्यो सो ग्यो। लखिकै मनमोहन मोहनी रूप सखी मन मेरयो ठग्यो सो ठग्यो । इन चाँचदहायनको को सुने अबतोजियजाय लग्यो सो लग्यो। उत्पात हजारन क्यों न करै चित छूटे न प्रेम पग्यो सो पग्यो । ग दूसरो और चढ़ेगों नहीं अति साँवसे रंग यो सो ग्यो॥१॥ ह ननदुनाली भुसुंडीसी फेरनि हीय हमारो दग्यो सो दग्यो। अहे सा 4 - . होस हवास सखी इक साथ भग्यो सोभन्यो।
काव्यरत्नाकर। , अबना कड़िहै कढहूं न कहूं पर दागतो आन लग्यो सो लग्यो । रँग.दूसरो और चढ़ेगो नहीं अलि सांवरे रंग रयो सो रँग्यो ॥२ समस्या ७१ वौं- हम प्रेमकी वारुणी छान चुकीं। जिनकी पद धूर चहें अज शंभु तिन्हें हमतो पहिचान चुकीं ॥ तजिकै कुल कानि सबै तेहिसों यह प्रीति अनूपम बानि चुकीं। जोहको सिगरी बनितान चबाइन या चरचानिमें जानि चुकीं । कोउ कतो बुझाय कहे अबतो हम प्रेमकी वारुणी छानचुकीं। अबका समुझावतही हमको संबकी बतियां हम जानचुकीं। जिनको सनकादि न भेद लहें इमि सारी सयानी बखान चुकीं। तिनकी छतियां लगके बजनार सबै निज प्रीतम मान चुकीं। अरी ऐरी भला तिनसों हमहूं अब प्रेमकी वारुणी छानचुकी२॥ समस्या ७२ वीं-सखीरी शिखापन तेरो भलो ॥ त्रिय एकही एक सिखाय रही जगमें शुभ पंथ निहार चलो ॥ जप दान पतिव्रत शोधि हिये नहि स्वारथमें परचित्त छलो। सत साहस शील सनेह फते श्रमधीर दया मनमें रखलो ॥ इतनी सुन बोल उठी मुसक्याय सखीरी शिखापन तेरोभलो॥१॥ प्रथमें म चहो चित्त तेतो कहो निवहो मनमोहनसों जबली। न सहीरी वियोगकी बीरविथा न संयोगकी सौजनसों अबलों। हरि आये अजोंन रहों धौं कहा विरहानलसों जियजात जलो। कबि सांची कहै सित कंठ सुजान सखीरी.शिखापन तेरोजलो२ नंदलालकी प्रीति प्रवाह अथाहमें क्योंही दिनोदिन जातगलो। तजि भूषण अंग शृंगार सबै सुधि आठहूयाम जलोंकी बलो ।
७२ काव्यरत्नाकर। . . मथुरा ससुरामें वसे हरखू तुम जानत नाहिन वाहि छलो। वह गूजरी ऊजरी बूझे कहारी सखीरी शिखापन तेरो भलो॥३॥ उठ एरी लली इकबात कहूं नेक मूरति आजकी देखो चलो। बांसकी बांसुरी हाथ गहे जुडि छांह कदम्बके डार तलो ॥ धुंधरारी लसें लटक मुखपैरुचिसाल हिये बनमाल गलो। हरपी यह बैन सुनाय तबै सखीरी शिखापन तेरो भलो ॥४॥ • समस्या ७३वीं- बरिहें हरि ये मिथिलेश कुमारी। मिथिलापुर देखन राम चले सुनि बाम सबै निज काम बिसारी। चढी धायके आपने धौल अटारी निहार स्वरूप भईसो सुखारी॥ बर सांवरे योग सियाकै सखी परचाप अहै शिवको अतिभारी। किमिताहि उठाय चढ़ायं करी परिहैं हरिये मिथिलेश कुमारी रामको रूप लख्यो जब सीय भवानीके मंदिर माहिं पधारी। अम्बतोही विनवों कर जोरि दयाकर कारज देहु सुधारी ॥ ध्यानमें लीन भई शिव सीय तबै गिरिजा यह वैन उचारी। धार धरो चित चेत करो बरिहैं हार ये मिथिलेश कुमारी॥२॥ दापसों चाप उठाय थके शिव काहु न ताहि सके तिलटारी। हाय भई भुव भट्ट विहीन कंह्यो मिथिलेश विशेष दुखारी ॥ बैन सुने थे सरोष सौमित्र सो नैनके सैनते राम निवारी । रामकी चातुर देखि कहैं बरिहैं हरि ये मिथिलेश कुमारी॥३॥ समस्या ७४ वीं- वाही समय पुनि जान परेगों। तू मन मूरख चेतत ना मदमातो भयो जगमाहिं फिरेगो ॥ जो मन आव सोई नहिं आवत वेद कलाम को टार धरेगो। .
काव्यरत्नाकर।
७३
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A
व्यर्थ अनर्थ कियो जगमें कछु अर्थ नहीं सोइ काम परेगों ।
जादिन काल कराल ग्रसे कच वाही समय पुनि जान परेगो१॥
मनमानी करीन अली सजनी इन बातनसों नहिंकाज सरेगो
कोटिनबार बुझाय कही पिय प्रीतम को कछु ध्यान धरेगो ।
होगी वही घर जान जरूरहि लाख उपाय करे न टरेगो ।
पुछि, हरखूकी कथा धरकै तब वाही समय पुनि जान परेगो२।
छाडेतहो तुमतो मगमें संगकी सखियां सब आप धरेगो।
चुगली करि, निज लोगन ते कुलकानिकी हानि हमें ठहरेगो ।
अनुरागमें आग सुझेगी जबै मम भात पिता तुमते झगरेगो।
मेरीकहा हरवू की कहा-तब वाही समय पुनि जान परेगो॥३।
सत्य क्षमा न दया तनमें कबलोंधन पापको प्राप्त करेगी।
चेतु फते परिवार भये बहुअंत न एकते काज सरेगो ॥
प्राण निकारिके काल बली यमराजके सन्मुख जाय धरेगो ।
पाइहें कर्मको दंड जबै तब वाही समय पुनि जानपरेगो ॥४
दम्भ दुरास अनीति मृषा करिकै कबलों परद्रव्यहरेगो।
लोककी लाज न भय परलोकको है वश लोमसें पाप भरेगो
काम न आइहै एको फते तन धाम यही सब छोड़ मरेगो।
पाइहै कर्मको दंड जबै तब वाही समय पुनि जान परेगो ॥५
• समस्या ७५ वीं- पावस न होय प्रलयकालको नमूनाहै
प्रतिमप्यारे परदेशको पधारे अब ताहीते सुरेश क्लेशदेत मोहिंदूना
रैन अँधियारी जल होतहै अपार तासों आमो नहिं यार आ
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.७४ काव्यरत्नाकर। भयो गेह सूनाहै ॥ बानके समान आसमान ते गिरत बूंद लागत शरीर चैन परत कहूनाहै । जारत तड़ित तन होतहै विकल मन पावस न होय प्रलयकालको नमूनाहै ॥ १॥ गरंजत मेघ मानों छूटतहैं तोप ना देतहै उड़ाये वचे विरही कहूँनाहै । सुनत अवाज मन टूक २ होत नाहीं ऐसो धीर बीर. कोऊ देखो आजहूना है ॥ दादुरको शोर आदि · वधिर श्रवण करै तड़ितको लखि विरहामि ज्वाल दूना है । लक्ष्मण वियोगतेहै दुखको न वार पार पावस न होय प्रलय कालको नमूनाहै॥२॥ कोप कर घन गरजत बरषत जल घटाटोप अंधकार घलै कबहूनाहै । जगुन चमकि बरें तनमें लगावें आग तडित कपाण. प्राण लेत अजहूनाहै ॥ सैन बकपांतिकी सजीहै डरपावें मोहिं मोर शोरवानते लखत कभहूनाहै । प्रीतम वियोगते पुरन्दरने कोप कियो पावस न होय प्रलयकालको नमूनाहै. ॥ ३ ॥ अथ नर्मदाष्टकप्रारम्भः॥ समस्या ७६ वीं-दासके पातक टारनमें अब काहे विलम्ब करो महरानी ॥ प्रगटी गिरि गाहुरमेकलते सुर ईश मुनीशन शीश, चढ़ानी । विष्णुपदोंके समान गिनी सब पातक पोतक डाकिनी मानी ॥ त्यों जगन्नाथ बखान करै सुभई जगमें सुरलोक कहानी। दासके पातक टारनमें-अब काहे विलम्ब करो महरानी ॥१॥ पातक धाम न जानत हौं गुण अवगुणे बुधिमों लपटानी । भाषत है जगन्नाथ. कहों किमि जानतहो उरकी सुखदानी ॥ .
७५
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काव्यरत्नाकर
यां जगमें नहिं सार कडू यह पेखि महामति मो अकुलानी!
दासके पातक टारन में अब काहे विलम्ब करो महरानी ॥२॥
मात पिता सुत भ्रात अनेक कुटुम्ब गृहादिक है दुखदानी ।
कामरु ऋोधरु लोभर माहमें तत्त्व नहीं यह वेद वखानी ॥
भापत है जगन्नाथ कपालनी देव अदेवनकी वरदानी।
दासके पातक दारनमें अबकाहे विलम्ब करो महरानी.॥ ३॥
तो पद केजनके मकरन्दमें मो मति और समान भुलानी ।
भाषत है जगन्नाथ कबी तुव कीरति कल्प लता सम जानी ॥
हो कर जोर करों विनती सुनिये जगमात दया गुण खानी।
दासके पातक टारनको अब काहे विलम्ब करो महरानी ॥४॥
होत प्रभात अन्हायके अंगनि ध्यान धरें- तटपे मुनि ज्ञानी ।
शीतल निर्मल बारि बहै मन बांछित राजत हैं फलदानी ॥
भाषत जगनाथ गुणाकर दारिद टार है करके इमि ठानी।
रावरे दासके तारनको अब काहे विलम्ब करौ महरानी ॥५॥
वेद पढ़े तटपै द्विजराजरु यज्ञ करें बहु मंत्र वखानी।
भाषेत है जगनाथ कितेकहि दान करें फल दीरघमानी ॥
केते जपें शिवनाम सहस्र तिने शिवही फल देव प्रमानी।
रावरे दासके तारनमें अब काहे विलम्ब करो महरानी ॥ ६ ॥
तनमें लपटाय भुजंग भली विध अंगविभूति रमाय महानी।
लोचन तीन बनाय बघम्बरके अपनी रुचि त्यों हरपानी ॥
शंभु बनावत लाखनको बरमांग खवायके बैल चढ़ानी ।
रावरे दासके टारनको अब काहे विलम्ब करो मंहरानी.॥७॥
६ ७६ काव्यरत्नाकर। तो गुण गावव शेष सुरेष महेशहि आदिदे सारंगपानी.! भापत है जगन्नाथ दयालिन.मोसन क्योंकर जाय बखानी । पूत कपूत तो होवतु हैं पुनि मातं न होय कुमाति सयानी । रावरे दासके तारनको अब काहे विलम्ब करो महरानी ॥८॥ समस्या७७वीं-यमुनाके कूलनकी लाल प्यारी झूलनकी उड़त दुकूलनकी छबि दरशात है ॥ ब्रज भूमि आई सुखदाई तर बेलिनकी नवल सहोलनकी प्यारी बरसात है। सावन सुहावनकी शोना सरसावनकी धन घिर आवनकी पौन परसात है ॥ वृदावन कुंजनमें मति आली पुजनमें गुंजन छबीले देखि डर उरझात है । यमुनाके कूलनकी लाल प्यारी झूलनकी० ॥ ३ ॥ फूलनकी क्यारिनमें द्रुमनकी डारिनमें वारोबज नारिनमें जोगने जगात है । ललित लतानकें पतानके वितान बीच रतन हिंडोले अनमोल झलकात है. ॥ मोरनके शोरनकी शोभा घनघोरनकी रसिक छबीले लाल कापै कहि जात है ॥ यमुनाके० ॥ २ ॥ प्यारी-संग लालनकी अंगन बिशालनकी मुकता तन मालनकी ज्योतिले जगातहै ॥ बड़े २ झोकनकी गहि २ रोकनकी हंसन विलोकनकी रुचि उपजातहै । कुंडलके डोलनकी गोलसे कपो लनकी रसभरे बोलन छबीले जी समातहै ॥ यमुनाके कूलनकी लाल० ॥ ३ ॥ रसिक छबीले शिर मुकुट लटक नैन भौहन मटक कर . कटक समातहै।प्यारी अंग चूनर चटक मुखकजपे लटक २ काव्यरत्नाकर। । । लट आली लपटातहै । किंकिन पुर कटि तटपै निपट युति मनकी विलोके भटकन मिटजातहै । यमुनाके कूलनकी लाल प्यारी झूलन ० ॥४॥ फूलनके मालनकी हीरनके जालनकी अलक विशालनकी उरझ सुहातहै । बेंदीभाल केशरकी नासिकाके बेसरकी रसिक छबीले लाल आमा अधिकातहै । बेनी पीठ डोलनकी कामक कलोलनिकी झोकनि हिंडोलनकी गोरी झिझकातहै ॥ यमुना के कूलनकी० ॥ ५॥ बेना बन्दनीकी वृषभानु नन्दिनीकी. मनमत्थ मथनीकी नथिनीकी छबिजातहै। नैननके कोरनकी लाली लाल डोरनकी दोउ चितचोरनकी हिय हरजातहै। दम्पतिक दन्तनकी युतिसो छबीले लाल हीरनकनी की धनी महिमा लज्जातहै। यमुना०६॥ करनके बालनकी पदतर बालिनकी लालनकी लालनसों लाल सरमात है।अंकार भेटनकी भुजन लपटेनकी उमंग छबीलनर्क दृगनं समातहै ॥ दोहुनकी झांकी बांकी करके अदाकी भरी कौनकी कहाकी चाह बांकी रहजातहै।यमुनाके कूलन ० ॥७॥ अंगन अभूषनकी झलक मयूषनकी पूषनकी शोभा कर दूपन जनातहै । मधुर मलारनकी सुरसों उचारनकी भनक छवी लाल सुनि बलजातहै दाउनके मोदनकी पावस विनोदन की.कीने अनुमोदनकी कविता सुहातहै। यमुनाके कूलनक लाल प्यारी झूलनकी उड़त दुकूलनकी छबि दरशातहै ॥८ काव्यरत्नाकर। समस्या७८वीं-मन्द करे चन्दहि अमन्द मुख प्यारीकी । हीरनके भूषण अदूषनते जागे ज्योति मोती मौलि. मालाकार करके उजारीकी । सारीकी किनारी जरतारी दार दावें बोय दामनी दमक लक ललित कुमारी की.॥ बामन सुकवि नकवेसर विराजे मंज अजबअदाते धरे नैननकटारीकी । ताहित तरेरि हरि फेरि चहुँओरनते मन्द करे चंदहिं अमन्द मुख प्यारीकी ॥१॥ • जागत जवाहिरकी ज्योति जगमग होत दशहूं दिशाते वोय उमडे अपारीकी । हीरालाल नीलम अकूत मंजुमोतिनके भूषण विराजे अंग २ सुकुमारीकी । बामन सुकवि युति दाबत है दामिनीको उतर परीहै परी छबि सो सवारीकी ॥ लाज लजि जाहिं जब देखहि प्रत्यक्ष उहि मन्द करै चन्दहि अमन्द मुख प्यारीकी ॥ २॥ कोमल कपोल गोल अजब गुलाबी रंग मंद मुसक्यानहै कृपाण सुकुमारीकी । बेसरि विचित्र मन्मथको विराजे चक्र भौहन कमानहरै शान सुर तारीकी ॥ बामन सुकवि विन्दु.रोरी की ललाट मध्य मंत्रसों धरयोहै चतुरानन विचारी की ॥ नैनन कटारीको चलाये बरजोरी जाय मन्द करै चन्दहि अमन्द मुखप्यारीकी ॥ ३ ॥ पनगी परात शीश पटक पहारनमें देखिकै लोनाई औ निका ई लटकारी की भौंहनकी वंकता विलोकि पुरहूत धरयो धनुष उतारि जियहारि गर्बधारीकी ॥बामन सुकवि मृग मीनन परात देखि कंज सकुचात मञ्जु लोचन कुमारीकी॥झांकत जबैही पो- .
. काव्यरत्नाकर । ७९ . खराजकी लरीसी तबै मन्द करै चन्दहि अमन्द मुखे प्यारीकीट हीरनके हार कर कंगन सु बाजूबन्दमोतिनकेंमाल पहिरावत सवारीकी ॥ त्योंही शीशफूल नकबेसर सजाये फेरि बार २ चूनर कुसुम्बरंग सारीकी ॥ बामन हमारे बश रहत सदाही ऐसे जावक लगावन चहत पग टारीकी । पायन परत मेरे भापो ऐसो ऐरी बीर मन्दकरै चन्दहि अमन्द मुख प्यारीकी ॥५॥ रोज २ लाओ ऐसी कहत.हजार बार समुझो न एको बात मनहिं विचारीकी । लांगत न घात मेरी बातें ओहि ठौर जहां सखिन संमूहको विनोद सुखकारी की ॥ वामन सुकवितापे रानहै उजेरी यह बाजे पगपायल विचित्र झनकारीकी । बैज नीन सारी ते छिपाये रहे ताहूपै मन्द करै चन्दहि अमन्द मुख प्यारीकी ॥६॥ मंगल ते ललित लुनाई अंग अंगनकी बुद्धते विचित्र बुद्धि कीरति कुमारीकी । गुरुते गरूर भरपूर शान शोनादार शुकहूंसों सरस सलोनी छवि धारीकी । बामन सुकबि त्यों शनी हूते सहस्र गुणी कज्जल कटाक्ष धरे बाढ़ अति कारीकी। रवि प्रनामें बैस सोहत हमेश और मन्दकरै चन्दहि अमन्द मुख प्यारीकी गोरे गोरे अंगनकी ललित लोनाई फैलि कुन्द औ कपूर धूर करत लाचारीकी । त्योहीं पोखराजनके पटल प्रजाते भरे हीरन के भूषण सुजागेज्योति धारीकी॥ बामन कविनन्दनकी उपमा कहां लों बढ़े देखते दरै दामिनन दईमारीकी। बड़े २ नैननते तानत कटाक्ष तबै मन्द करै चन्दहि अमन्द मुख प्यारीकीट .
. ८० काव्यरत्नाकर। समस्या ७९ वीं-पांच ग्राह ग्रहत मतंग मन मेरेको । कारकै करार केंते पाँय मरि-बार २ पायो अवतार नर जानै हरि हेरेको । त्योही अनुसार सदा अपने परस्वारथके करतं उपाय रघुनाथ नाम टैरेको ॥ पै यहांतो आपति लखाति एक भारी महा छांडि क्योंहूं भजो विषय वासना धनेरेकोोनऊ ज्ञान सरि- तामें न्हात समय कर्म इन्द्री पांच ग्राह ग्रहत मतंग ॥१॥ जपते सदाही रामसीताराम राधे कृष्णनाथ नाम तेरेको। करके कछू न और कोऊ काम काम यहीं रातदिवस आठों याम . सांझ औ सबेरेको । काहू भांति खींच खांच अवशिः किनारे लात्यों बिच भवसागरते जीवत सबेरेको । जौन पांच प्रबल . महाये कर्मेन्द्रि नाथ पांच ग्राहं ग्रहत मतंगमन मेरेको ॥२॥ सुनि २ कठोर बैन मौन साधि बैठति है उत्तर कबों न देत कौन हेत तेरेको । त्योंही बहु भांति नित. मारपीट तेरी सहै कारन कहारी जैसे बर्तन कसेरेको ॥ बोली मृगनयनी उन मोते बहु बार कह्यो छांडि चले जाते हम कब या बखेरेको । जौन तेरे ये नैन-गाल भाल कुच नासिकामें पांच ग्राह ग्रहतं मतंग मन मेरेको ॥३॥ छांडिकै सनेह देह गेह परिवारनको जाते बन माहिं आत्म- ज्ञान हेरेको । कबहूं नदी न लैके जाय जाय भूपद्वार करते खुशा मद न नीच नीच चेरेको॥ अपमान सहते न जगमाहिं लोगनको रहते निश्चिन्त वज सबही बखेरेको । देख लेते जौन पञ्च बान' जके पांच बान पांच ग्राह ग्रहत मतंग मन मेरेको ॥ ४ ॥ - काव्यरत्नाकर। - हो दयालु दीनानाथ भापत पुराण वेदं टारहु अवलम्ब यासु शील दीन फेरेको । विरद विचारो दौरि द्वारकाते आये छिनमें नशाये सब द्रौपदी बखेरेको ॥ गजको जब ग्राह केवल एकही गह्यो है तब तुरत बचायो रख लाज नाम टेरेको । इतै तो हहा ये काम क्रोध लोभ मोह मद पांच ग्राह ग्रहत मतंग मन मेरो को ॥५॥ समस्या८०वीं-पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अँखियां दुखियां नहीं मानती हैं। सब शंक तजे गुरु लोगनके कुलकानि की आनि न आनती हैं ॥ करि कोटि उपाय बुझावै कोऊ अपनी यह टेकहि टानती हैं। परमेश जू और न जाने कछू यक प्रेमको पंथ पिछानती हैं । पियप्यारे तिहारे निहारे बिना अँखियां दुखियां नहि मानती हैं ॥.१ ॥ . एकही गांवमें बास सदा घर पासई हौ नहिं जानती हैं। पुनि पांचयें सातये आवत जातं को आसन चित्तमें आनती हैं। हम कौन उपाय करें इनको हरिचन्द्र महा हठ ठानती हैं । पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अँखियां दुखियां नहीं मानतीहैं। यह संगमें लागिये डोलें सदा बिन देखे न धीरज आनती हैं। छिनहूं जो वियोग परै हरिचन्द तौ चाल प्रलयकी सुठानती हैं । बरनी में घिरे न झपैंउ झ4 पलमें न समाइवो जानती हैं।
८२
काव्यरत्नाकर।
पिय प्यारे तिहारे निहारे बिना अँखियां दुखियां नहीं मानती
व्यापक ब्रह्म सबै थल पूरण हैं हमहूं पहिचााती हैं ।
पै बिना नंदलाल विहाल सदा हरिचन्द न ज्ञानहि ठानती हैं।
तुम ऊधो यहै कहियो उनसों हम और कछू नहीं जानती हैं
पिय प्यारे तिहारे निहारे विना अँखियां दुखियां नहिं मानती हैं
विशेष रस समस्याओंके कवित्त वा सवैया।
अंगमों सार सुगंध लगावंत बांस वही चहुदेशको जहको
करि आली श्रृंगार अटाको चली मुख देखत लालनको लहको।
कंगन एक गिरो करसों वह सीदिन सीढ़िन फिरे बहको।
कविगंग कहैं यक शब्द सुनो ठननन् उननन् उननन् ठहकोट:
राति समय रसकेलि कियो जब भोर भयो उठि मञ्जन धाई
नीरके क्षीरमें देह डुबी यमुनाजलसों जैसे चन्द्रकी छाई ॥
लैबुडकी जलसों निकसी उलझी अलकै मुख ऊपर आई।
दै कर केश सम्हार लियो निकसो रवि फोरि पहारके ताई ८.
नई अबला रसभेद न जानत सेज गई जिय माहँ डरी ।
रसबात कही तब चौंक चली त्योंही धायक कंतने बांहधरी ।
उन दोउनके झकझोरनमें कटि नाभिते अम्बर टूटि परी।
कर दीपक कामिन झांपिलियो त्यहि कारण सुंदरि हाथ जरी
उर शोभित है बनमाल पीताम्बर बांसुरी बैन सुनावत है।
इक छैल सखी मुसक्यात इतै नित जान अकेलहि आवतहै ।।
मन मेरो कियो वश प्रेम मों आपने शोच यही जिय छावतहै
+ काव्यरत्नाकर। ८३ । दिन रात नहीं कल देखे बिना त्यहि कारण भौन न भावतहै॥८४ एक समय वृषभानुसता सो प्रात गई सरितानके खोरन । । अञ्जन धोय अंगोछिके देह लगि वाहर वैठिके वार निचोरन ॥ ब्रह्म भने त्यहिकी उपमा जलके कणिका बहें केशके छोरन । मानहु चन्दको चूसत नाग अमीरस च्वै चल्यो पूंछकी ओरन८५ श्रीवृषभानु सुता नंदलाल विराजतहैं छवि पुञ्ज छये । कबि कृष्ण कहैं मन शील बहिक्रम चातुरता यक रंग रये ॥ सुख देखि सिहात सबै सजनी विधिसों विन अभिलाप नये । यह रूप विलोकिबको तनमा प्रति रोमन.लोचन क्योंन भये ८६ काजलसी निशि सज्जलसे धन तज्जलमें चली संग न साथी। कुंज अंधियारी सिधारी हुसेन विहारी जातथी शुद्धिमें नाथी॥ किञ्चित दब्बत-सर्प लग्यो पग सर्प घसीटत एक पगाथी। जोर जंजीर जरो जकरो मनो छुटिं चलो मनमच को हाथी ८७ जानतहै गति चोरकी चोर औ साहकी साह छलीकी छली। कच लम्पटकी कचलम्पट गति मतिराम न जाने कहां धो चली। उगकी ठग कामख कामखकी अरु जानत छैल छलीकी छली। कहुँ फेरिदयो नथको मुकुता विहिकारण फिरत गुलावकली ८८ शंकर तेल मलैरजको मृग नीरमें न्हाय सुवेप बनावै । भूषण धारण पुष्पनके फिर ओढ़ि दिगंबर देह दुरावै ॥ नाम असिद्ध असंभवकी धन देखि अभौतिक रूप दिखावै। पुत्र अभावहि गोद लिये बिन बारन मांग सँवारत आवै॥८९॥ ।
. ८४ काव्यरत्नाकर। कृष्ण रमायुत काहि लजावत को वर्षाऋतुको दुःख टारे। कोमलता विध काहे दियो अरु कौन रहे जगजालते न्यारे । धूनामें केहिकोत्सव जारत कौन दुखी रामाधीन विचारे । मैनके मंदिर माखनको मुनि बैठ हुतासन आसन मारे ॥ ९०॥ कुच मूलमें तूलकी लाय किनारी हमें नित प्यारी दिखाइयो ना। दिखाइयो तो न छिपाइयो फेरि लटें मुखपै लटकाइयो ना ॥ लटकइयो तो मटकायके भौंह कटाक्षके नैन चलाइयोना। मुसक्याय मया सरसाय दया दरशाय हमें तरसाइयो ना॥११॥ धुंघट ओट कहा करि सुन्दरि बूंघटसे कछु तोर न लैहैं जोतोहि रूप दियो करतारने दूर खड़ी हम दूर चितैहैं । जानके गर्व कहा कर सुन्दरि काल्ह परों दिन येऊ न रैहैं। या जिय जान भजो भगवान किं तोरे छिये वैकुंठ न जैहैं९२॥ साहाये पकरें कर चोरके चाटक ओट उठावत छप्पर । दामरि कामरि भूलि गई अब आयेहो ओढ़ि कपूरिया कप्परु ॥ कान्ह.अये कबते कुतवाल सखा लियको दानत पप्परु । तासों बडाई करौ कोइ जानेन काल्हके जोगी कलीदेके खप्परु९३ केतिक योस भये समझावत नेक न मानतहै मन भोंदू । भूलिरह्यो विषया सुखमें कछु और न जानतहै शठ तोंदू ॥ आंखिन कानन नाक विना शिर हाथ न पाँव नहीं मुख पोंदू। सुन्दरताहि गहे कोऊ क्योंकर नीकसिजाय बडोमन लोंदू॥९४ दौरतहैं दशहूँ दिशिको शठ वायुं लगी तबते भयो बेंडा।
काव्यरत्नाकर। ८५ पत्र लाज न काज कछू नहिं राखत शील स्वनांवके फोरतनेंडा॥ सुन्दर सीख कहा कहिदीजे भिदे नाहिं बाण छिदे नहि गेंडा। । लालच लागि रह्यो मन बीखरे बारहबाट अठारह पेंडा ॥९५॥ डोले नवेली अटापर बाल लसे कुसमानी छटान अनूसे ॥ और लाल बिहाल भये मगमें लखि श्वास लई अधरारस भूखे । । सैन करी यमुनातटलों चलिये उत न्हाइये प्रेम पयूखे ॥ । न्हायंचुकी यो जनावतीहैं तिहि कारण केश निचोरत सूखे९६ जान सजान सों प्रीति करी सहिके जगकी बहु भांति हँसाई । त्यों हरिचन्द जू जो २ कयो सो करो चुपद्वैकर कोटि उपाई। सोई नहीं निवही उनपै उन तोरत बार कळू न लगाई। सांची भई कहनावति वा अरी ऊंची दुकानकी फीकी मिठाई९७ संग रह्यो सुख संग लह्यो कबहूं न भयो इकहूं पल न्यारो। छोड़के सोई चलो अब चाहत कैसे बने बल-कोउ विचारो ॥ प्रीतमको अरु प्राणन कोहठ देख वहे अँसुआन पनारो। कैंधों चलेगो अगार सखी यह देहते पाणके गेह ते प्यारो॥९८॥ यह प्रेम कथा कहिबे की नहीं कहिवेही करो कोउ मानतहैं। पुनि ऊपरी धीर धरायो चहै तनु रोग नहीं पहिचानतहैं । कवि ठाकुर जाहि लगौ कसके नहीं सो कसके उर आनतहैं । बिन आपने पैर बेवाई गये कोउ पीर पराई न जानतहैं ॥९९॥ सजि सोहे दुकूलन बिज्जु छटासी अटामें चड़ी घटा जोवतीहैं। रंगराती सुनै ध्वनि मोरनकी मदमाती संयोग संजोवती हैं ।
८६
काव्यरत्नाकर।
कहि ठाकुर वे पिय दूर बसे हम आंशुनसे तन धोवती हैं
धनि वे धन पावसकी रतियां पतिकी छतियां लगि सोवतीहैं१००
परकारज देहको धारे फिरो पर जन्म यथारथ है दरसौ।
विधनीर सुधाके प्रमान करो सब भांतिन सज्जनता सरसौ ॥
घन आनंदजीवन दायक हो कछु मेरी ये पीर हिये परसौ ।
कबहूं वा बिसासी सुजानके आंगन मो अशुआनहुँलों वरसौ१०१
विशेष शृंगार रस और विरहावस्थाके अपूर्व सवैया। आयबो तीर बताइबो कोमल है मुसक्यायवो भावतोजीको । छायबो मोद वही ललिते मिलजाइबो और लगाइबो हीको ॥ रूप दिखायवों भायवो भावन नेह मिटायबो लागत फीको । जो हितको सरसायबो तो तरसायवो दूरहि ते नहिं नीको ॥१॥ कंजकलीसे उरोजनको पट खोल दुरे दरशावति काहे । नैननते तकि तोष उन्हें पर मैन भरे वरसावति काहे ॥ जो सुख लीवेनं दीवे तुम्हें यह पातक तो सरसावति काहे । नेह नये गुण गाहकको हक नाहकते तरसावति काहे ॥ २ ॥ मानकी औध है आधी घरी अरु जो रसखान डरे डरकेड। तोरिये नेह न छोड़िये पां परों ऐसे कटाक्ष महा हियराहर ॥ लाल गुपालको हाल विलोकरी नेक छुवेकिन दैकरसों कर । "ना"कहिये पर वारत प्राण कहा लखि वारि है "हाँ"कहिवे पर३ मीस उरोज दोऊ उरमें भरिकै शुज कंठमें कंठ लगाये। चूमि कपोल कपोल मिलायके ऊरु दुहून सों ऊरु दवाये ॥ काम कलोल कला कर कोटि कहै ललिते अतिही हरपाये । । श्यामके संग उमंग भरी रतिरंगके कोटि तरंग दिखाय॥ ४ ॥ बात चली चलिवेकी जहां तहां बात सुहानी न गात सुहानो। भूषण साज सके कहिको महारांज गयो छुटि लाजको बानो ।
. eć काव्यरत्नाकर। यों कर मींडत है बनिता सुनि प्रीतमको परभात पयानो। आपने जीवनको लखि अंत सुआयुकी रेख मिटावती मानो ५॥ बैठी सलोनी सहेलिनके ढिग चन्द्र सों चारु प्रभा अधिकारी। ताही समय परदेशकी औचक जायबेकी सुनी होत तयारी ॥ सामुहे है पिय लालजी सों कछु बोल सके नहिं लाजकी मारी। कंजमुखी पर्येक पै जाय रही मुरझाय मनोजकी मारी ॥६॥ प्रीतम गौन सुने गजगौनीको भूषन भौन सबै बिसरो है। अंग परी तलबेली महा कबिराज तहां भरि आयो गरो है ॥ नैननते जलधारं धस्यो मिलि अंजनसों उर आनि परो है। चीरबेको तियको हियरा बिरहा बढई मनो सूत धरो है ॥७॥ विनोदसों अंग उमंगन चारु अनंग तरंग सनाय सनाय । सुगंध सने पट भूषण लाय सुकेशर सींचो बनाय बनाय ॥ हँसी सिगरी निशि लालजी धारि गये बहु भांति मनाय मनाय। भरी रिस सोचे खरी अब काहे अरी हरि हारे मनाय मनाय ८ पांवरी आनि भिखारी मनो पजनेश सदाचित देत है फेरी । जीकी कठेठी अठेठी गॅचारिन नेक नहीं कबहूं हँस हेरी ॥ आंधरे रूपके जीमते बावरी जाने नहीं पर पीरता ऐरी। नंदकुमारहि देखि दुखी छतियां कसकी न कसायन केरी ॥९॥ धहराती घटा गणपाल लखो छहराती छटा छति वै अतियां । लहराती लता लपटी लटकें थहराती पपीहनकी बतियां ॥ नहराती नदीन नदीन मनो झहरांती झरी दिनहूं रतियां ।
. काव्यरत्नाकर। ८९ कहराती दरीनमें केकी लखोहहराती वियोगनकी छतियां।१०। विह पिय पारी सनेहं सने छहरें चुनरीके झवा नहरें । शिहरे नवयौवन रंग-अनंग सुभंग अपांगिनकी गहरें । बहरै रसखान नदी रसकी पहरें वनिता कुलहू भहरें। कहर विरही जन आतपसों लहरै लली लाल लिये पहरे॥११॥ अवहूं करि प्रीति सुनो हियधारि दयानिधि क जुड़ावो करो। मुरली. ध्वनि प्राणपियारे पिया कबहूँ मग कानन नावो करो ॥ गणपाल न चाहिये ऐसी तुम्हें नित चेतके हेत लगावो करो। अपनाय मिलाय बनाय हिये इतनो न भला तरसावो करो १२ को कहैं मोरवागण कूकि त्यों पोहैं अनन्द लता लहरानरी जोहैं बधू विधुकी पतिपारियांछोहैं ही बूंदरियां झहरानरी । गोह बलाकनकी गनपाल जू खोहें अनेक विधी थहरानरी ॥ भोहैं मनोजकी माती मनै लखि सोहैं घटामें छटा छहरानरी १३ दिन औधिक सोऊ व्यतीत भये पुनि पाई न पीतमकी पतियां। घहरानी अनोखी घटा ना त्यों चंपला चक चौधत हैं अतियां। गनपाल मनोज मनोज करें डरपावति आपनी के घतियां। सजनी अब कोऊ उपाय रचो दुखदेतीहैं सावनकी रतियां.१४ मकराकत कुंडलं गुजकी माल वे लाल लसें पग पांवरिया। बछरानि चरावनके मिस भावतो गयो भावती भांवरिया ॥ रसखान विलोकतही सिगरी भई वावरिया ब्रज डाँवरियां । सजनी इहि गोकुलमें विषसों बगरायो है नंदके सांवरिया॥१५॥.
९० काव्यरत्नाकर। अंगन अंग मिलाय दोऊ रसखान रहे लपटें तरु छांहीं। संग निसंग अनंग को रंग सुरंग सनी पियदै गलबाही ॥ न ज्यों मैन सुऐन सनेह को लूटि रहे रति अंतर जाही। नाबी गहे कुच कंचन कुम्भ कहे बनिता पिय नाहीजु नाहीं१६॥ ऋतु पावस श्याम घटा उनई लखिकै मन धीर धरातो नहीं। ध्वनि दादुर मोर पपीहनकी सुनिकै क्षण चित्त थिरातो नहीं । जबते कवि बिछुरे बोधाहितू तबते उर दाह बुझातो नहीं। हम कौनते पीर कहैं अपनी दिलदारतो कोऊ दिखातो नहीं १७ घूम घटा घनकी गरजें चमके चपला छित छुवें फेरी। शोर करें चहुँ ओरते मोर जुरी करें कैलिया कूक घनेरी ॥ गोकुल सारो समीर लगे केहि भांति सों धीर रहेगी घनेरी । मोहं विना यह सावनको निशिं भावन कैसे बिताय है हेरी १८ • मुख चुम्बनमें मुख लै जो भजे पियके मुखमें मुख नायो चहै ॥ गल बाही गुपालके मेलतही मुख नाहीं कहै मनते न कहै। नहिं देत निवाज छुवै छतियां छतियां में लगाये ते लागी रहै। कर खेंचतं सेजकी पाटी गहै रतिमें रतिकी परिपाटी गहै॥१९॥ विपरीति रची रति दम्पतियों जहां छाय रहे बंगला खसके। कविचन्द दुहूनके मोद बढ्यो कहि सो कवि बृन्द कथा नसके मुख चंबती भावते भावते की अरु देती उरोजनके मसके । रसके उपजावत पुंज खरे पिय लेत परे रसके चसके ॥ २० ॥ हमको तुम एक अनेक तुम्हें उनहींके विवेक विकाने रहो। .
काव्यरत्नाकर। इत चाह तिहारी उते व्यभिचारी सनेह में तो उतसाने रहो ॥ हमतो अब औरके और भई उनहीं को प्रिया निज जाने रहो। अरसाने रहो संरसाने रहो हरसाने रहो तरसाने रहो ॥ २१ ॥ बतियान सुनायके सौतनकी छतियानमें साल सुलाय लैंरी। सपनेहू न कीजिये मान आगे अपने योबना की बलाय लैरी। परमेश ज रूप तरंगन सों अंग अंगनि रूप रलाय लैरी। दिन चारक तं पिय.प्यारके प्यारसों चामके दाम चलाय लैरी२२ सुन नीको न नेह लगावनोहै फिर जोपै लगे तो निबाहनोहै। अति ओछीहै प्रीतिकी रीति सखी नहि रोसको जोस सुहा वनोहै।। चलि चन्द्रमुखी बजचंद मिलो तुमको हमें का समझावनोहै। दिन चारको रूप यह पाहुनोहै फिर तोपै रहेगो उराहनो है२३॥ खोजत जाहि सुरेश महेश दिनेशहू नित्य दुहूंदिश धावै । जाहि "फते" हग आंजि तपो लखि पूरण ब्रह्म सबै सुख पावै गौतमनारि परे पद रेणुके देह शिला तजि स्वर्ग पठावै। सोपद की रज खोजबेको शिर धूर गयंद हमेश चढ़ावै ॥२४॥ इति ॥ दोहा-परमेश्वरकी कपाते, पूर्ण भयो यह ग्रंथ । रसिक जननके पठन हित, अहै प्रेमको पंथ ॥ . प्रेम व्यथा शृंगार रस, और बीर रस जान । बहु प्रकार वर्णन कियो, यामें झूठ न आन रसिकनके आनन्द हित, यही ग्रंथ है एकं ।
९२
काव्यरत्नाकर।
उड़त समीर सुगंध मय, फूले फूल अनेक ॥
अरुण कमलसे नेत्र अरु, जिनके बाहु विशाल ।
तिनहीकी पदं रज चहत, निते बनवारी लाल ॥
सोरठा-प्रेमहि प्रेम अधार, प्रेम एक सांचो सदा ।
सोई प्रेम अपार, चहुँदिश यही दिखात है ।
भूल चूक जो होय, बुध जन लेहु सुधार सब ।
मैं बालकहूं सोय, बुद्धि-हीन जानत नहीं ॥
सब कवियनको दास, या बनवारी लाल है।
और नहीं कोई आस, एक आश तुम्हरी अहै ॥.
मम प्रिय मित्र उदार, सरज नारायण अहैं।
सर्व गुणन भंडार, उनहीमें हम देखियत ।
दोहा-तिनकी आज्ञा पायमैं, ग्रन्थ कियो तय्यार
उनहींकी सब कपासे, मैं पायो सुखसार ॥
अथ समस्या अपूर्ति।
पूर्ति करनेके निमित्त लिखी गई ।
१ नीच परी यह कीच कचाई २ नेह नवलासों अभिलाष.
सन्यो रहो ३ किन लोगन देश बिगाड़ दियो ४ शंकर केहि
कारण योगी भये ५ धर्म प्रचारक रीति बताओ ६ दूटि गयो
कँगना करसों ७ केहि कारण नारि सतीपन त्याग्यो ८ कर
पिक पल्ला सो पल्लों औ कंज मुख.९ मूशल मूशला धार बहायो-
१० केहि कारण योगी जटा पटका ११ बांधे जटा केहि
४
काव्यरत्नाकर। कारण योगी १२ पट पीत धरयो धरणी पै कहे १३ कह ज्ञानकी मूलको कुंड कहाँ १४घट कोरो बनो पर पानी भरेर केहि कारण नारि गुदावें गुदना १६ मानो शंकर पर चाबुक चलायो है १७ दशों अवतार किधों राधा नैन तेरे हैं १८:एक नार छियानवे नैननसो १९ घन बीच काहे कुच लीक-परी२० भूधर काहे भुजंग गह्यो २३ केहि कारण हंश चकोर लड़े २२ केहि कारण फूली फली न चमेली २३वारिधिसे विष काहे क- दयो २४ सतयुग पाछे क्यों भयो त्रेता २५ दिग देखपरै गहि जात नहीं है२६मानो सविता उछंगमें २७ श्रोणित-भार लचकी २८ बारहों महीना और मनावत वसंत हैं २९ कानमें तूल और आंखमें धूली ३० तनिक लिख पठेवी वा सूरत ससुरकी ३१ मग जात रही गिर काहे परी ३२ हम बारहिबार निहा- रत हैं ३३ कैसी करूं मैं प्यारे बिना ३४ केहि भांतिसे धीर ज होयनहीं ३५ अब नेक नहीं जिय लागत मेरो ३६ प्यारे मम प्राणअधार अहो ३७ प्यारी तुम्हारे समान नं कोऊ ३८ हमको यह दुःख महान भयो ३९ प्रीति लगी कहूं छूटत है ४० प्रीति ये कैसी भई अनरीत है ४१ हजार काम छोड़के बजार देख आइये ४२ अपनी जरूर जाजरूर जाइयत है ४३ केहि कारण शंभ त्रिनैन भये ४४ केहि कारण वर्षमें तीन ऋतु ४५ केहि कारणं देहमें रोमावली४३ केहि कारण ब्रजमें कृष्ण जये ४७ भलो मकरन्दको बुन्द चुओ४८ युवती क्यों मूंछ विहीन भई ४९ आज प्राणप्यारी बिन मंदिर लगत सून्यो है ५०
४
काव्यरत्नाकर।
+
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रावण रामहिं राशि दुहूँ इक रार मची कहु कारणका.५१कैसे
बंधे जल जालके बांधे ५२ पानी बिन जानी. जिन्दगानी कौन
• कामकी ५३ अबला केहि हेत पतिव्रत खोयो-केहि कारण
विप्र ये पूज्य भये ५४ जिवैये लीलिगये पतरी५५ सूमके ससुर .
सूमई होत हैं ५६ मृग सींगन आंसू जात बहे ५७. लागि पडे
बबूलमें दाखे २८ केहि कारण रैनमें चन्द्र भयो ६९ सीकेकी
टूटन और लपकन बिलैयाकी ६० देनेको न छोड़े फिर पीछे
दगा देते हैं ६१ किमि कारण- गौ मम ओर फिरी ६२ केहि
कारण भारत आरत है ६३ केहि कारण वस्तु विनाश भई ६
कैसन हो उन्नति भारतकी ६५ हमहूं कछु आज छपावत हैं
६६ नागिनकट पै बल खाय रही६७ गौऔंको क्लेश लखो नहिं
जाय दया करिकै अब बेग उपारो ६८ प्रीति निबाहन उपाय
बताओ ६९ उजारचली ससुरारि क टोला ७० घूस पुलीस
न लेतं जहाँहै ७१ तुम एक हमें हम हजार तुम्हें ७२ केहि
कारण जननी पुत्र भखै ७३ लन भये दिन कैसे करेंगे ७४
• लखिकै उरदी डरहू डर पावे ७५ साजिये सकार तो उदारको
· कवित्न होत अरु साजिये ककार तो बखीलको बखानिये ७६
अजै मुख आरतके दीजे वैराट सुत ऐसो मुखचन्द तेरो जोवन
कन्हाई री७७ ताप परातमें ऐसे परे, ७८ हैना ओस मोती पै
वनस्पति रोतीहै ७९ बिन बारन मांग संवारत आवै ८०कब
इन्दुपै छांह भुजंग कियो ८१ आज गुलाबके फूलको मुध्यो
८२आवत नारि उछारत निम्बू८३चार भुजानसों सोहत विष्णू
।
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काव्यरत्नाकर।
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-
८४ पॉयन बाज रहे बहु बुंघरू८५आंधरेने अधरात समय शशि
मंडल में रवि मंडल देख्यो८३मच्छ चढ़ोगिरिराजके ऊपै८७प्या-
री बिना सबरंग हैं फीके ८८ नई प्रीति हमे तो सुहावन लागत
८९अनोखी भई यह प्रीति तुम्हारी५० झूठहिं आज बघारत शेसी
(इसे अवश्य पढ़िये और अपने निज मित्रोंको सुनाइये)
उपरोक्त समस्याओंकी पूर्तियां निम्न लिखित पते पर आना
चाहिये इसकारण सुकवि महाशयोंसे निवेदन है कि, यथा
शक्ति समस्याओंकी पूर्तियां जहांतक होसके उनको भेंजकर
मुझे कृतार्थ कीजिये और उनसे जो पुस्तक बनेगी तो उन पूर्ति-
कर्ता महाशयोंके पास. उत्तम पूर्ति आनेपर एक प्रति उनकी
सेवामें पारितोष्कार्थ अर्पण की जायगी आशा है कि, सुकवि
महाशय हमारी इस प्रार्थना पर अवश्य ध्यान देकर यशके
भागी बनेंगे।
इति काव्यरत्नाकर समाप्त ।
आपका प्रेमाकांक्षी-
(निवेदक)-बनवारीलाल गुप्त,
सदरबाजार, जबलपूर..
पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना.
(मुंबई)
. .. ............ .......... ज्योतिषग्रंथाः। २७९ शीघ्रबोधभाषाटीका.......... ................... २८० संकेतनिधिसटीक पं० रामदत्तजीकृत यह ग्रंथ अत्युत्तम देखने योग्य है १-० २८१ षट्पंचाशिका भाषाटीका ................ २८२ भुवनदीपक सटीक २८३ जैमिनिसूत्रसटीक चार अध्यायका........ ०-१ २८४ रमलनवरत्न २८५ रमलनवरत्नभाषाटीका ०-१२ -१ २८६ सर्वार्थचितामणि ०-१२ ०-२ २८७ लघुजातकसटीक. २८८ सामुद्रिकभाषाटीका........ २८९ सामुद्रिक शास्त्रवडा सान्वय भाषाटीका.... १-४ २९० यवनजातक ०-२ 0-10 २९१ पंचांगनिथिपत्र सवत् १९५२ का........ ०-१॥ ०-॥ २९३ पंचांग १०वषका (ज्योतिर्विदोंकालोभदायक)१-८ ०-२ २९३ हायनरत्न १-८ २९४ अर्घप्रकाश ज्योतिष भाषाटीका इस्में तेजी मंदी वस्तु देखनेका विचार है. २९५ ज्योतिषकी,लावणी ०-१ २९६ शकुनवसंतराज भापाटीकासहित २९७ रत्नद्योतभाषाटीका २९८ बृहत् मुहूर्त्तसिंधु २९९ मकरंदसारिणी उदाहरण सहित ०-१० ०-१ ३०० भावकुतूहलभाषाटीका (फलादेशउत्तमोत्तम )१-० ०-२ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास. "श्रीवेंकटेश्वर" छापाखाना मुंबई, ITTTTTTTTT
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