Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Deshanveshan Ki Saral Kathayen

Panday,lalliprasad · 2011/04

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देशान्वेपण की सरल कथाएँ
सम्पादक
पी. एन. चक्रवर्ती,
वी० ए०, एन्त० टी, एफ० आर० जी० एम०
और
लल्लीप्रसाद पाण्डेय
प्रकाशक
इडियन प्रेस, लिमिटेड. प्रयाग

Printed and published by K Mittra, at The Indian Prera I Allahabad

१
१६
१६
विषय-सूची
विपय
माको पोलो
प्रिन्स हेनरी नाविक
बार्थोलोमो डियाज
वास्को डि गामा
कृस्टोफर कोलम्बस
ऐमेरिगो वेस्पूका
वास्को न्युनज डी बल्बोवा
सिम्टियन कैवट
फनैडो डी मंगलहम या मैगिलन
फनैडो कोर्टिस
सिरको पिजाग
सर ह्यूग विलानी
मर फ्रैंसिस ड्रेक
सर मार्टिन मोनिशर
सर वाल्टर रेले
जैक्स कर्टियर
सेमुयेल डी शैप्ले
मगो पार्क
३६
३६
५६
છ3
७७
-२

विपय
पा
नेम्स भ्रम
-
१००
१०७
११०
जॉन इनिग पाक
डनिट लिविग्स्टन
हनरा मार्टन स्टेन ना
पनिल जेमन टस्मन
विलियम बैंपियर
कप्तान कुक
मैथ्य पिलटर्स
चार्ल्स स्टर्ट
एटवड जॉन प्रायर
मर अलेक्जेंडर मजी
सर जोन प्रकलिन
डास्टर मिनोफ नैनमन
कमान एमडसेन और कप्तान स्कॉट
११५
११७
१२०
१२३
१२५
१२७
१२६

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विषय
जम्म अम
जॉन ननिग स्पाय
डपिट लिमिग्स्टन
सनरी मार्टन स्टेन
एविल जसन
विलियम बैंपियर
कप्तान कृक
मैथ्य फ्लिडस
चाल्म स्टद
एदवड जॉन अ.
सर अलेक्जेंडर
मर जोन में कहि
डास्टर मिजोफ
कप्तान एमेंडमेन

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देशान्वेपण की सरल कथाएँ मार्को पोलो जन्म-स्थान-वेनिस, लगभग १२५० ई०, मृत्यु-१३२३ ई० मैन फेलिस का ऐंड्रीया पानो मार्को (मृत्यु १२८० में) निकोलो मैफियो एक देश मार्को पोलो हम उस समय की बात कहते है जब न तो रेलगाडी थी, न हवाई जहाज, न परगाडी और न मोटरकार । से दूसरे देश में जाना कठिन था। जगल, पहाड, नदी और मरुभूमि के अतिरिक्त डाकुओं का भी भय था। लोग चिर- काल के लिए विदा लेकर घर से निकलते थे। निदा के समय राना-पीटना मच जाता था। मामान लादने के लिए ऊँट,

-
7
.
गावपा का मरल कथाएँ
पचर या पल तिघmal कमाकभी ये मयारी का
भानाप नाहय निकलना निरापद न था। यह
+
7, पर माला ननपार और पाय आदि साथ परम
r' | इतनी कठिनाइयों के होते हुए भी धर्म-प्रचारकों ने
", 7 कार्य दीलान किया। योरोप में ईमाई धर्म फैला
"पा था। इमाइया का एशिया में भी, अपने धर्म का प्रचार
काका प्रवल छा था ।
टना प्रारद्वाप जा योराप के दक्षिण में है, उस समय बड़ा
हा प्रसिद्ध धा। धर्म गिना, वाणिज्य प्रमृति प्रत्यक विषय में
इसी
प्रायद्वाप,
भारतवर्ष के ही मदृश, विरयात था। यहाँ
का धर्मकन्द्र गम नगर था। प्रधान धर्मयाजक यहा रहा
करने । धामिक विषयां म इन्ही का मत सय ईमाई
मानते थे। इनक अधीन अन्य धर्म प्रचारक पादरी थे।
दूर देशों में ये ही लोग जा जाकर धर्म का प्रचार करते थे।
शारीरिक कष्टा और विपत्तियां को, धर्म के निमित्त, ये तुच्छ
समझते ध। जिस प्रकार गेम धर्म का फन्द्र था उसी प्रकार
वेनिस वाणिय का केन्द्र पा। शेक्सपियर की प्रमिद्ध
पुस्तक 'मचट आफ निम" का नाम कदाचित् नुमने सुना
हागा। शाइलाक वेनिम का ही रहनेवाला था। वेनिस
क जहाज भूमध्यसागर के किनारे के हर प्रान्त में व्यापार के
निमित्त पहुँचा करते थे। प्राकृतिक स्थिति के विचार से
भी यह एक अच्छा वाणिज्य केन्द्र था। मानचित्र मे देसा--

मार्को पोलो
यह एड्रियाटिक सागेर के उत्तरी किनारे पर, भूमध्यमागर के
प्राधे मार्ग म, एक अन्छा बन्दरगार है। और, पाल्पम के
दरें बहुत दूर न होने के कारण यहाँ मे मध्य योरोप की
व्यावमायिक वस्तुएं मुगमता से एशिया का भेजी जा सकती
है और वहाँ की वस्तुएँ यहाँ लाई जा मकती हैं
निकोलो वेनिम नगर का ही रहनेवाला था। यह धर्म
और वाणिज्य की बढ़ती क निमित्त, अपन भाई मैफिया के
साथ, सन् १२५० ई० में एशिया की ओर चल दिया।
स्नेह भी इस कार्य में बाधा न हुआ।
इसका पुत्र मार्को
पालो, जो इसी वर्ष वेनिम नगर में जन्मा था, अभी एक वर्ष
का न होने पाया था कि निकोलो को धर्म और वाणिज्य की
सूझ ने घर बेठने न दिया। वह इस बच्चे को छोड टर्की
की गजधानी कुस्तुनतुनिया होता हुआ, बहुत दिनों के पश्चात,
बुमारा जा पहुँचा।
पर वहाँ उसकी मापा कौन समझता ?
वहाँ मुगलो की भाषा बोली जाती थी। निकोलो ने देगा
कि यदि वह मुगल भापा नहीं सीसता है तो धर्म प्रचार और
वाणिज्य के कार्य में सफलता नही हो सकती। इसलिए
वह इस मापा को सीस कर फारस के राजदूत के साथ
कुवलईखों का राजधानी की ओर चल निकला।
कुबलईखों गेंगिमगा का पार था। वह एक विस्तृत
गज्य का शासक था। तातारियों ने १३वों सदी में भगो-
लिया के पठार से इधर चीन तक, जिसको कथे भी कहते हैं,

४ पश्चात, मन् दशाननपण की सरल कथाएँ श्रार 'धर गगप में देरी तक अपना राज्य फैला लिया था। इस मानाय की राधिानी सिङ्गन पहाड पर शांगह नगर म यर स्म्राट् बडा पतापशाली था। इमने विदेशियों # घटी आवभगत का और सी पादरियों को निमत्रण भेजा कि उसम गज्य म पाने और तावारियों का अपनी विद्या और बुद्धि का बल में इसाई बनावे । इम निमनण-पत्र को लेकर निकातो अपने भाई के साथ, १६ वर्ष के १२६६६० र घर लौट पाया। यनं पधान धर्म-याजक का देहान्त हो चुका था और पादरी लोग विदेश जाने का प्रस्तुत न थे। इसलिए ३ वर्ष तक अपा देश में रहन के पश्चात् निकालो अपने भाई मैफियो, पुत्र माका पोलो और कवल दो पादरियों को माय लेकर एशिया के पश्चिमा प्रान्त सीरिया में पहुँचा। उसने कुबलइयाँ क लिए जरुमलम के पवित्र मन्दिर के दाप से तेल ले लिया, क्योंकि कुबलईग्गा ने प्रधान धर्म-याजक को इस तेल के लिए भी लिया था। इस समय यहाँ पर विदेशियों ने आक्रमण कर रस्सा था। इस कारण पादरी लोगों को इतनी घबरा- हट हुई कि उन्होंने आगे बढना पसन्द न किया, वे लोग इटलो लौट गये। साढ तीन वर्ष चलने के पश्चात् निकालो. मार्को पोलो और उसका चचा मैफियो कुबलईयों के दरवार में दूसरी बार पहुँचे। कुबलईसा इस समय कमेनफु नग- यह नगर अब शांगटू के नाम से प्रसिद्ध है या घा।

-
D
--
MAN
कुबलात्रा का एक डाकिया

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पर
शक्ति उसमें अद्भुत थी। यहाँ तक कि कुबलईमाँ ने एक
एक प्रसिद्ध मनुष्य होगा। कुबलईमाँ ने नवयुवक मार्को
अतिरिक्त मगोलिया की राजधानी, कराकोरम, मियाम्पा, जो
दक्षिणी इडोचीन में है, सुमात्रा और फारस की साडी में भी
वह भेजा गया था। उसे बडे बडे पदों पर उमने नियुक्त
भली भौति देखा और आचर्यजनक बातों को लिस लिया।
बहुत दिनों तक नहीं टिकते। ऋतुपरिवर्तन के
मार्को पोलो
चीन की दीवार के बाहर पेकिा नगर से ३६७ मील दूर है।
आजकल हम यहाँ रेल से जा सकते है।
कुबलईयों को इनसे मिलने की आशा न थी।
३१ वर्ष के पश्चात् इन लोगों को देखकर वह बहुत ही सन्तुष्ट
हुआ। उसके बुलाये हुए १०० पादरी तो नहीं आये थे पर
नवयुवक मार्को पोलो को देखकर उसके आनन्द की सीमा
न रही।
मार्को पोलो ने अब
कई भाषाओ के सीसने का निश्चय
किया। घोडे ही समय मे उसने मगोल, फारसी और
तिब्बती भाषाएँ सीस ली । कहानी लिसने और करने की
बार इसके लिए यह कहा था कि यदि यह जीवित रहा तो
पोलो को चीन और भारतवर्ष मे कई वार भेजा। इसके
किया। इसी समय मार्को पोलो ने चीन के प्रत्येक प्रान्त को
चीन में पहले पहल यही योरोपनिवासी गया था। इसने
तातारियों के विषय में लिया है “ये लोग एक स्थान

.
,
।
दशान्दया का मरल कथाएँ
य भी स्थानपरिवार करते है। शीतकाल में लोग दत्तिण
के एन टप्ण प्रदेशा म चले जाते हैं जहाँ इनके पशुओं के
घर का घास होता है और ग्रीष्मकाल आते ही उत्तर की
उंची मगर सपढी नगहा म चले जाते है। यहाँ इनके पशुओं
का लिा घास चार पारी पर्याप्त मिलता है। मच्छरों का भी
उपन्य नायक नहा होता । इनके माय डरा होता है जिसको
निस हुए य लोग देश देशान्तर का भ्रमण करते है । इनका
मुम्च भर गाय, बैल, दकग, बकरी, भेड, ऊँट और घोडे है
इन जानवरों के गल्ले हजार दो हजार से कम नहीं होते और
इनाक जगह ग्मना कठिन होता है एक स्थान की
घास समाप्त हो जाने पर इनको दूसरी जगह ले जाना पड़ता
है । पर इसका यह अर्थ नहीं कि राज्य में कोई अच्छा प्रबन्ध
नहा है। सडमें अन्छी हैं, उनके किनारों पर पेड लगे हुए
हैं। इसमें गर्मियों में छाया रहती है और जाडो में जब
धरती बरफ मे ढक जाती है तब इन पेड़ों से रास्ता प्रकट होता
है। पचीस मील क अन्तर पर धर्मशालाएँ होती है। वही
चार मा घोडे मर्मदा प्रस्तुत रकये जाते हैं, क्योंकि राजदूतों
का न जाने कब इनका आवश्यकता हो। चिट्ठी-पत्री भेजने
का भी प्रबन्ध है"। तुमने देखा होगा कि आज-कल गाँवों
में डाकिया, डाफ ले जात समय, कैसे घुघरू बजाता हुआ जाता
। इसा प्रकार उस समय भी, हर तीन मील पर, ऐसे ढाकिये
कमर में घुघरू बाधकर डाक लिये हुए दोडते और एक दूमरे

७ मार्को पोलो को अपनी डाक दे देते थे। निर्दिष्ट स्थान पर, बिना अधिक श्रम के, डाक पहुँच जाती थी। राज्य में कोयला, मिट्टी का तेल और अन्य गनिज पदार्थों की भी कमी न थी। राज- महल के बार मे लिखा है कि राजा ऐसी मगमरमर की कोठी में रहता था जिसके कमरे स्वर्णमण्डित थे मार्को पालो चीन के मौन्दर्य पर मुग्ध तो अवश्य था पर घर से निकले उसे बहुत दिन हो गये थे अत वहाँ से लौटने क लिए वह व्याकुल हो उठा। परन्तु कुपलईसों उसको इतना चाहता था कि उसे घर नहीं जाने देता था। अन्त में ईश्वर की पा हुई। सन् १२६१ ई० में फारस के वृद्ध सम्राट् की रानी का देहान्त हो गया और उसने कुवलईयाँ की कन्या से पाणिग्रहण करना चाहा। कुबलईखाँ की बेटी उस वक्त कवल १७ वर्ष की थी। इतनी दूर की स्थलयात्रा असम्भव समझकर कुवलईसों ने इन वेनिस-निगासियों को, जो समुद्रपथ को जानते थे, लडकी पहुँचाने का भार सौंपा। कुबलईसाँ की बेटी के साथ चीन होते हुए ये लोग फोकीन, जा प्रशान्त महासागर के किनारे पर है, पहुँचे। वहाँ से समुद्र-यात्रा प्रारम्भ हुई। हजार मनुष्यों को लेकर • २३ जहाज तीन महीने तक चलते रहे। सुमाना द्वीप दिपाई पडा। ६०० नाविकों का देहान्त हो चुका था और मार्ग भी बहुत तय करना था। पर मार्कोने तुमने नकशे म सिगापुर का बन्दरगाह ये लोग अन्त में बढाया।

देशानपाए का मरल कथाएँ मिगाएर हात हुए सालान के दक्षिण में पहुँचे और वहाँ से भारत के पश्चिम पटक निकट से होते हुए प्रारमज पहुँचे। 'द्र गम का मृत्यु हा चुकी थी। इमलिए उसक पुन धजन नगमारी के साथ विवाह कर लिया। अर मार्को को घर या का असर मिान गया। उसे दो परवाने (अनुमति-पत्र)। Fri| जलमार्ग छोडकर ये लोग सीध म्घल-पथ से काले सागर क किनारे ट्रेनानांड नगर में पहुँचे। यहाँ फिर इनको काज मिन्ता और य वेनिस की ओर चल दिये। भन् १२ १५ ३० मे जब य वेनिस पहुँचे तो वहाँवालों ने न ता इनका पहचाना और न इनकी बातों पर विश्वास ही किया। मार्को ने एक दिन अपने भाई-बन्धुओं का न्योता जब सब लोग आये तो वह मखमल के कपडे पहन- कर निकला। उनके सा पो चुकने पर उसने रशम के कपड़े परने और मखमल क कपडे वाट दिय। अन्त में जब लोगों की विदाई का समय आया तब उसने फिर नये कपडे पहन लिये और रशमी कपड बॉट दिये। इस अमीरी चाल पर लोग बडे ही आश्चर्यान्वित हुए। पर उन्हे अब तक एशिया के धन के किस्मे सत्य प्रतीत न हुए पे कि इनन में मार्को ने अपना एक पुराना कपडा फाड डाला और उसमे से बहुमूल्य हारे, मोती, पना आदि निकालकर वह बाँटने लगा। भला किसको विश्वास न होता? एशिया की वहुमूल्य वस्तुओं को देसने के लिए मार्मा के घर में भीड लग गई। भेजा। ,

मार्को पोलो
६
कुछ दिनों के पश्चात् वेनिम और जिनेवा मे युद्ध प्रारम्भ
हुआ। यहाँ मार्को पोलो एक जहाज का नायक बना दिया
गया। किन्तु सन् १२९८ ई० में वह वन्दी बनाकर जिनेवा
क कारागार में भेज दिया गया। इसी कारागार में इमने
एशिया का पूरा वृत्तान्त, एक साथी कैदी से, लिसवाया।
इस कैदी का नाम रस्टिसियाना था। यह "पिसा' का रहने-
वाला था। कारागार से छूटते ही मार्को पोलो वेनिम गया
और वहाँ पेंड कौसिल का मदस्य बना दिया गया । एशिया
के विवरण का इसने फिर फ्रेंच भाषा में अनुवाद करवाया
परन्तु उसे छपवा न सका।
सन् १३२३ ई० में इसका देहान्त हो गया। मृत्यु के
वाद सन् १५५६ ई० में इमका 'एशिया के भ्रमण का विवरण
छापा गया। इस विवरण का पढकर योरोप के अन्य प्रान्तो
के लोगों को भारतवर्ष और पूर्वी देशों क देखने की प्रबल
इच्छा हुई। तुमने वास्को डि गामा और कालम्बम का नाम
सुना होगा। इनके बारे में तुम्हें फिर बताया जायगा ।

प्रिन्स हेनरी नाविक + जन्म स्थान-आपार्टी, १३९४०, मृत्यु-१४६३ ई० गाका पाला क पश्चात् और कई भ्रमणकारी एशिया मे मार श्रार कुछ दिनो तक भ्रमण करक अपने देश को लौट गये। इनम वनिमनिवासी फ्रायर प्रोडोरिक और टैगियर- निवासी इन वन्ता प्रसिद्ध हैं। इन सबने अधिकतर स्थलमार्ग म हा देश भ्रमण किया। पर हम जिनके विपय में लिस रहे हैं गन्होने जतमार्ग से ही दूर टर तक जाकर नये नये देशों का पता लगाया था। कारण क्या था? वेनिसवाले भी TT भूमध्यमाार क मिन भिन्न प्रान्ता में अपना माल ले जाते और वहाँ का वस्तुएँ अपने देश में लावे थे। दुर देशों में जाने का प्रयाजन भी यही था। तुमने पढ़ा होगा कि एशिया क स्थल-मार्ग निरापद न घ। लुटेरों से बचना कठिन या और समुद्र का यात्रा से सव लाग डरते थे। इस निपय में बहुत सी अद्भुत कहा- नियां भी रची गई थी। एटलांटिक महासागर के विषय में कुछ लोग करते थे कि यह जल-दैत्यों से भरा हुआ है, कोई इसे साँपों से भरा हुआ बताते, और ' कोई कहते कि -

सठिया कर
an
Romala
di
प्रिन्स हेनरी नाविक

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देना पडता पा। वैसे ता एशिया और अमिररमान लिया। उमसे इनके पाँच लाटाला उसकद्वारा भारा भारी वस्नु मामाला लाई जा सकती थी । परन्तु यारोपवालों में तब तक ये लोग भी विवश थे। परन्तु र मूर- शासन से छुटकारा पा चुक थे। अनुदपर नका स्थिति क विचार मे इनको जानकी मुगमता धी। पूर्व में भूमध्यसागर पार पालांटिक महा- सागर होने के कारण य इम कामदार याच्य भी। धार्मिक उत्साह की भी इनमें कमाराम ममय इन एक राजा भी अच्छा मिल गया था गना जॉनने १३८३-१४३३) इस स्फुरण की दिदगा। इन्होंने 0क वार चल दियर नही । प्रिन्स हेनरा नाविक मूर्य इतना पचण्ड है कि प्रादमी वहाँ जाने हा मन हैं। ऐसे ममुद्र में लुटेर कता ? फिर समुद्रमा भी छ। ममुद्र में न रेगिस्तान है, न पहाइ, न मार न झोल या दी-नाले। मबसे बड़ा लाभ यह था कि उन्हें गुमन्नमान्ने यो यागपवालों से अपनी वस्तुओं के देन म मन कर भी लेते थे। ममुद्री मार्ग का पता था जब तक भी ध्यान गया। . राजकुमारी, जॉन आफ गार का स विकार जमाना ओपोर्टो मे, सन् १३६४ में, , एक बार देशान्वपा की सरल कथाएँ हेनरी वटा मातृभर, देशभन्न और धार्मिक था। मूर लोगों का पराजित करने का इसका प्रण था। जय यह मना लेकर चलने लगा, इसकी माँ वामार हो गई श्रो इममा ककना पडा। मरते समय इसकी माँ ने भी इमका मूर विजय के लिए अनुमति दी थी। माता क मृतक- मस्कार के बाद इसन अपनी सेना महित भन् १४१५ ई० में जित्राल्टर के दस्सिन सिक्टा पर प्रारमण किया और इस मूरभूमि का जीत लिया। इम जीत के बाद हेनगे पुर्नगाल लौट आया और फंप मट विसेंट के निकट समुद्रतट पर ना चालन और ममुद्र-यात्रा क विषय में पढ़ने और पढाने लगा। उमने बहुत से नकरो एकत्र किये और अपने नाविकों का मेरिनर्स कम्पास (फुतु- वनुमा) का उचित प्रयोग सिसाया और आकाश-विज्ञान भी "सिपाया। इम विद्या को सासने यहाँ दूर दूर से नाविक आय और उन्होंने बहुत लाभ उठाया। धार्मिक उत्माह इसमें था ही। जब मूरों से इमने सहारा के दक्षिणी भाग के विषय में सुना और उनको वहाँ का माल-सजूर, सोना, हायोदॉत, छुहार आदि-लास देया तो इसके मन में उक्त प्रदेश में समुद्र-मार्ग से पहुँचने की प्रबल इच्छा हुई। कई वर्षों तक यह अपने कप्तानी को इधर-उधर भेजता रहा और उनकी जानकारी से लाभ उठाता रहा। इसने चाहा कि अफ्रिका के ध्रुव-दक्षिण को पार कर भारत की राह

प्रिन्स हेनरी नाविक
खोज निकाले। इसी सोज मे इसने अपनी सारी अवस्था चिता
दी। परन्तु एक आकाश-विज्ञान की जानकारी से ही लाभ
नहीं हो सकता था। इसी कारण इसने एक प्रकार क ऐसे जहाज
बनवाये जिनसे दूर की यात्रा किसी सीमा तक निरापद हो
सकती थी। इन जहाजा को कैरावेल कहते है।
मन् १४१५ ई० से १४३० ई० तक पुर्नगाल के नाविको
ने कैनरी द्वीपसमूह और मडिग का अपना लिया। यहाँ के
लकडी के व्यवसाय से इनका बडा लाभ हुआ। इसके पश्चात्
कई एक करावेल कप बोजाडार के दक्षिण की ओर भेजे गये।
सन् १४३४ ई० म हेनरी का एक कप्तान भी वोजाडार के
दक्षिण पहुँचा । मन् १४३५ ई० में वोजाडार से पाँच सौ मील
दूर ये लोग राया डी पारा तक पहुँचे। सन् १४४१ ई० मे
पहली बार इन्होने कप ब्लाको पार किया। यहाँ कुछ काले
आदमियों से भेंट हुई।
य आदमी बहुत ही बदसूरत थे।
इनकी नाक चपटी, आँसें छोटी छोटी और होठ फूले हुए
थे अपने शरीर का इन लोगों ने गोदने के चिह्न से भर
लिया था।
बदन पर कोई कपडा न था। केवल लँगोटी
लगाये रहते थे।
हाथ म या तो भाला था, या सङ्ग,
तीर-धनुष । बोली इनकी अद्भुत थी। प्राय ये लोग विदे-
शियों से इशारे से ही बातें करते थे। इनका मुख्य भोजन
पशुओं या मनुष्यों का मांस था और इन्ही का शिकार
अब ये लोग वन्दी का
या
करना इनका पेशा था।

देशान्वेषण की मरल कथाएँ गये। ITक कुटुम्बियां ने उनका छुड़वाने के लिए इन पर- देशियों का बहुत मा सोना दिया, जिसमे मालामाल होकर जन य र लौटे तो लोगों ने इनकी बडा आवभगत को और हेनरी के इस उद्योग की प्रशमा हुई। पर इसका फल विपरीत हया। पुर्तगालवालों का प्रय इन काने आदमियों के पक न का हो । यान बह गया, और देशो का पता लगाने में अधिक उन्नति न हा पाई। हेनरी के निकट जब ऐसे बन्दा मा जाते थे तो उनका वह शिज्ञा देता था और ईसाई बना लेता था। मन् १४४५ ई० में नाविकों का कुछ सजूर के पेड देख पड। इससे उन्हा। सोचा कि रगिस्तान की अन्तिम सीमा आ चुका । वास्तव में ये लोग केप पामस म पहुँचे थे। यहाँ इनका फिर काले प्रादमी मिले। ये लोग बहुत ही अद्भुत किश्तियों में बैठे हुए थे। ये किश्तियाँ ताड के पेडों का तना खोसला फरक बनाई गई थी। किन्तियो को ये लोग अपने पैरो से ये रहे थे। पुर्नगाल के कैरावेल जहाजों को देनकर इन्होने समझा कि काई वडी चिडिया आ रही है और ज्या ज्यो ये निकट आते गय त्यो त्यों इनका भय बढता गया और ये लोग किनार की ओर भाग गये। कुछ देर के पश्चान् भाला और ग्यङ्ग लेकर बहुत से काले प्रादमी समुद्र- तट पर आ पडे हुए। तब जहाजो से उतरना निरापद न ममझकर पुर्नगाली लौट गये।

प्रिन्स हेनरी नाविक
हेनरी ने अय की यार बहुत से जहाज इसी दिशा में
भेजे। इममे धाडा यहुन पोज का काम होता रहा । सिने-
गाल नदी का भी पता लग गया। पर लोग अननान देश
में जान म डर और स्वदश को लौट गये ।
सन् १४५५ और १४५६ ई. में पेनिस निकासी केटामोस्टो,
जो हेनरी का नाकर था, गैम्बिया नदी के पास पहुँचा ।
उसने वहाँ के लोगों मे मेल कर लिया। मन १४५८ ई.
में हनरी ने डीगा गोमेज का अन्तिम बार भेजा। इसने
मियरालियाने की साने का मानों का पता लगा लिया।
रेनरी ने अब एक सुन्दर नया नशा भी बनवा लिया था।
पर सन् १४६३ में टमका देहान्त हो गया।

दशा की मरन कपाएँ
गये। फ कम्यिया ने निको हुर या क लिए पापा.
देशियों का गरमा माशा दिया, निगम मालागान होकर
नायलॉट ते नागों ने इनकी बड़ी आवभगा की प्रार
हाग कइम गागकी प्रामा पाइमफा फल विपरीत
।। पुर्तगाामानों का प्रय इन पार भादमियो कप:-
का तोयान गह गया, और देशों का पता लगाने में
अधिक रति नपा। हनगक निकट म म मन्दी
मानना का पह शिवा देता था और ईमाई बना
तामा
मात्र १४५५ ६० में नाविकों का पुत्र गनर के पेड़ देय
पड़ा इम्म उन्दा सोचा कि रगिस्तान को अन्तिम सीमा
पा चुका ! वाताव में य लोग कप पामस में पायेगे। यहाँ
का फिर काल पादमी मिन्न । य लोग यव दा अदभुन
किरिता में पठे तुप प।
य फिस्नियाँ गायक पेटा का
राना पोयला फरक यनाई गई या । फिश्तियां का ये लाग
अपन प स य रहे थे। पुर्तगाल के रान जहाजों को
देखकर इन्होंने समझा कि कोई पडी पिपिया पा रही है
और ज्या ज्या चेमट प्रात गये त्या त्या इनका भय पढता
गया और ये लाग किनार का भार भाग गये। कुछ देर के
पश्चात् भाला और यह लेकर बहुत से काले भादगी मगुद्र
सट पर मा सो हु।
सम जहाजों से उतरना निरापद 7
ममझकर पुर्नगाली लौट गये।

भेजे।
प्रिन्स इनगे नाविक
१५
हेनरी ने अय की वार बहुत से जहाज इसी दिशा में
इमम घोडा यहुत ग्याने का काम होता रहा । मिने-
गाल नदी का भी पता लग गया। पर लोग अनजान देश
में जान में डर और म्वदेश फी लाट गये।
मन १४५५ पार १४५६ ई० में निम निवासी केदामोस्टा,
जा हेनरी का नौकर घा, गैम्बिया नदी के पास पापा।
उमने वहाँ के लोगों में मेल कर लिया। सन् १४५८ ३०
में हेनरी ने डोगी गोमेज का अन्तिम बार भेजा। इसने
सियरालियाने की साने की ग्याना का पता लगा निक
हेनरी न अन एफ मुन्दर नया नकशा भी यनवा लिया था।
पर मन् १४६३ म इसका देहान्त हो गया।
।

वार्थालोमो डियाज
शिधिज्ञ गया।
मृत्यु-सन् १५०० ई.
निग की मृत्यु के पश्चात् नये देशों के खोजने का कार्य
एक-आध उत्साही युवक अब भी जहाज
लेकर समुद्र-यात्रा करके थोडे से स्थानों का पता लगाता रहा,
लेकिन इन लोगों का कार्यक्षेत्र बहुत विस्तृत नही था।
मिसा बडे स्थान का पता लगा भी नही ।
सन् १४७१ ई०
म फरमानटोपो ने एक द्वीप का आविष्कार किया और अपने
नाम से उसको प्रसिद्ध किया। फिर उसने विषुवत रेखा को
भी पार किया।
सन् १४८१ ई० में जॉन द्वितीय पुर्तगाल की राजगद्दी
पर बैठा और फिर खोज का कार्य प्रारम्भ हुआ। सन्
१४८४ ई० मे डीगो काव काडो नदी के मुहाने तक पहुंचा।
उसने वहाँ अपना ऐसा मिका जमाया कि वहाँ का राजा
उसक कहने से ईसाई हो गया। सन् १४८६ ई० में डीगो
काव वारिवश की साडी तक पहुंच गया।
उधर बार्थोलोमो डियाज दो जहाजों का लेकर सन्
१४८६ ई० में अधिका के दक्षिण की ओर चल पडा । जहाँ
तक हो मका, उसने पश्चिमी किनार से अधिक दूर अपना
१

यालामा डियाज आँधी - जहाज न रक्या। फल यह हुप्रा कि इस यात्रा में बहुत दिन लग गय और अन्त में या प्रारंज नदी के मुरगन के पास पहुँचा। मकररेया फ दनिण अव मर्दी अधिक मालम होन लगा। यहाँ जलधारा वेगवती थी। भी प्रचण्ड घी। डियाज क जहाज अब किनार में बहुत दूर हो गये पार १५ दिन तक किनारे का कुछ भी पता न चला। डियाज पूर्व का भोर चलकर फिर उत्तर की ओर चला। अय भूमि दृष्टिगाचर हुई। यह मासेल की साडी में पहुँच गया। अर उमसे पूर्व एक दृमरी गाडी मे पहुँचा जो अल- गोवा वे के नाम से विख्यात है। फिर यह ग्रेट फिशरीवर के मुहान नक गया पर इसफ माघी घर लौटने के लिए व्याकुल हा गय थे. इससे इसका घर वापस आना पड़ा। लाटते समय यह किनार के निकट ही निकट चला और उस अन्तरीप का, जिसको लोग बहुत दिनों से पार करना चाहते थे परन्तु पार नहीं कर मके थे, इसने पहली बार देखा । अब मय लोग बद ही आनन्दित हुए और इस ममाचार को पहुँचाने के लिए वापस प्राय । यहाँ राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने इस अन्तरीप का नाम केप आफ टेम्प्रेस्ट रचना उचित न समझकर उसका नाम को डी विउना एस्परेसा या कप आफ गुड होप रस दिया। वास्तव म उमने सोचा कि अब पुर्तगालवालों के लिए भारत और पूर्वी देशा का मार्ग खुल गया। -

देशान्यपण की मरल कथाएँ
लोगों को अब एटलांटिक महासागर से होकर एशिया
जाने की सूझी और ऐसे ही किसी प्रलय में ग्रेजील की ओर
जाते समय सन् १५०० ई. के लगभग डियाज ने ऑधी में
अपने प्राण से दिये।

. 和「THI

वास्कोडिगामा
जन्म-स्थान-साइन्म, मृत्यु-स्थान-कानीन
वास्को डि गामा का जन्म मन् १४ ८६० कलगभग पुर्तगाल
क साइन्स नगर म हुआ था। इसकी वारवावस्या की बातें
हमें मालूम नहीं। इसका प्रनिद्धि उस समय हुई जब इसने
डियाज के पश्चात् कप आफ गुड हाप का पार किया और
भारत की नई राह निकाला। स्पेन के राजा ने कालम्स को
एटलांटिक का पश्चिमी किनाग दूरने की अनुमति दी थी।
उसकी यात्रा के बाद जब चह प्रनिद्ध हा गया कि वह चीन
पहुँचा है तो पुर्नगाल के गना इमायल 7 मन् १४६७ ई०
म वास्को डि गामा का चार जहाजो के साथ डियाज का कार्य
पूरा करने के लिए भेना। वास्को डि गामा ने अफ्रिका
के किनार किनारे चलना पसन्द न किया , क्योकि उसमे
अधिक दिन लग जाते । वह गफ आफ गीनी को छोड साधा
आरज नदी के दक्षिण जा पहुँचा। वहाँ से केप आफ गुड
होप को पार करता हुआ वह ईसा के जन्म के दिन नेटाल
के पूर्वी किनार पर जा सका और वहाँ से मुजैम्बिक के किनारे
पहुँचा। वहाँ से मुम्बासा होता हुआ मलिन्दा में आया।
मार्ग में साथी लोग बीमार पड़ गये। मुम्बासा म वहाँ के

२०
देशान्वपण की सरल कथाएँ
लोगो ने इससे कुछ रोक टाफ की किन्तु ईश्वर का पा से
मलिन्दा क राजा न इसका आदर किया।
इस राजा ने
वाका डिगामा का भारतवर्ष का समुद्री राह बतान के लिए एक
नाविक साध कर दिया । २० दिन के पश्चात् सन् १४९८ ई०
म मई महीने में कालाकट के पास इसका जहाज पहुँचा।
कालीकट का नाम तुमने सुना होगा। यह बहुत पुराना
तिजारती स्थान है।
भारत के हर प्रान्त से व्यवसायी लोग
यहाँ अपना माल लाते और विदशियो से वाणिज्य-व्यवहार
करते थे। यहाँ क 'क्यालिका' कपड़े की ख्याति दूर दूर
देशा तक फैली हुई है।
यहाँ पारका डि गामा को अधिक कष्ट नहीं हुआ,
क्योंकि यहां के राजा जमारिन ने इसके साथ अच्छा वर्ताव
किया। वह यहाँ की कुछ वस्तुएँ-मसाला, कपडा इत्यादि--
मोल लेकर घर लौट चला। माग म इसक साधा फिर
चामार पट, कुछ लोग मर भी गय। दो वर्ष पश्चात् मन्
१४६६ ई० में य लोग लिस्वन पहुचे।
सन् १५०२ ३० म यह वास जहाजों के साथ दुवारा
भारतवर्ष में आया। लौटते समय इमने मुसलमानों के १३
सौदागरी जहाजी को भारत सागर में वन्दा कर लिया।
मन १५०३ ई० में यह पुतगाल लौट गया और वहाँ काउट
आफ विडिक्करा बना दिया गया। इसके पश्चात् कुछ दिनों
तक इसका पूछ-ताछ न हुई। इसी समय पुर्तगालवालों
-

मच तो
वास्को डि गामा
ने कई बार भारत पर आक्रमण किया और गो तथा
कानीकट ल लिया। अपने साथ वाणिज्य-व्यवहार के लिए
भी इन लागी ने भारतवासियो का वाध्य किया।
यह है कि उन दिनों भारत मागर के प्रत्येक और पुर्तगालवाले
ही दिसाइ पडते या
सन् १५२४ ई० मे, २१ वर्ष क पश्चात्, राजा जॉन तृतीय
ने इसका भारत में पुर्तगाल-राज्य का राजप्रतिनिधि बना
दिया। दुर्भाग्यवश वारका डि गामा का अधिक दिना तक
यह सुस न मिल मका। सन् १५२५ ई० में कोचीन में
इसका देहान्त हो गया।

4 कृस्टोफर कोलम्बस जन्म-१४४० ई० के लगभग, मृत्यु-१५०६ ई० ढामेनिको कोलम्बोसुसाना । T कृस्टोफर कोलम्बस गियाना लामो भनी जेम्स ग्याकोमा (जन्म १७३७)(जमा४५८)(जम:४५०)( म१४६४) (जन्म १४६८) कोलम्बस जिनवा नगर के एक ऊनी माल के कारीगर कोलम्बो का पुत्र था। उसका जन्म जिनेवा मे हुआ। कुछ लोगों का मत है कि उसका जन्म १४४७ ई० के लग- भग हुआ। यहाँ उसने मार्को पोनो का पुस्तक पढ़ी और उसको देश भ्रमण तथा नय स्थानों का पता लगाने की इच्छा बहुत ही प्रबल हुई। फिर क्या था, २४ वर्ष की अवस्था में ही पैरिस नगर में जाकर उसने ज्योतिप-शास्त्र और ना विद्या का अध्ययन आरम्भ किया। इसी समय 'उसने पुर्तगाल के राजा हेनरी के बारे म सुना, दुर्भाग्य-वश सन् १४६३ में हेनरी का देहान्त हो गया था। उसने भूगोल की कई पुस्तके भी पढ़ा और 'इमागा मुडा' प्रघ को पढते ही उसे भारत में पश्चिमी राह से पहुँ- चने की प्रबल इच्छा हुई, पर अर्थ और सामर्थ्य का अभाव पर +

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कोलम्बस

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देशान्वपाग की सरल कथाएँ को अफ्रिका क पश्चिमा तट का हाल मालूम हो गया। वह कुछ समय तक अपना ससुराल मे रहा। वहा उसने पुर्तगाल क नाविकां से बहुत कुछ सुना और सीसा। सोज का इच्छा बढता हा गई। उसने सोचा कि यदि एशिया में पूर्वी राह से पच सकते है ता पश्चिमा मार्ग से भी पहुंच सकेंग और एट- लाटिक का पार करना असम्भव न होगा। इटली का रहनेवाला टारकेनेलो आकाश-विज्ञान का पण्डित था। कोलम्बस ने उसको पत्र लिखा। उसने इसको यह बताया कि पुर्तगाल का राजा भी पश्चिम ओर से भारत जान की राह का पता लगाना चाहता है। उसने इसका अपना भू-चित्र भी दे दिया। अव इसका नवीन जगत् का खोन का धुन बढती ही गई। एक दिन इसने कुछ वृक्षों का, जिनमें चिह्न लगे थे, और मुदा का एटलांटिक सागर म बहते पाया। इससे इसका विश्वास दृढ' हा गया कि नई दुनिया पश्चिमी किनारे पर अवश्य हागी और वहाँ मनुष्य रहते होंगे। अब इसने एट- लोटिक पार करने की ठान ली। सन् १४८२ ई० मे इसने पुर्तगाल के राजा जॉन द्वितीय से, सहायता के लिए, आवेदन किया। पर इस राजा ने चालाकी से अपने आदमियों को सोज के लिए भेज दिया। ये लोग डरपोक थे, इससे बिना कुछ किये घोडे ही दिनों म लाट गये। राजा से सहायता न पाकर, दुसित हो, कालम्बस

हस्टाफर कायम
ने अपने भाई का गर्ने राजा नरा ममम क पाम भा
पर समुद्री डाकुमा ने गमका मय मामा नट लिया। भूचित्र
भा नष्ट हो गये। भरि दुवाग यनपाने पर भार साज के
फामनिम्म दान लगा।
इमा अपमर पर कानम्बस न अपादश स मदायता मांगी,
किन्तु जिोगवान भी कुछ महाना न का। नय निराग
कर साम्पाका श] नो। गता फर्डिनेड मार रानी
इसारनान इम याना पर विचार फग्न के लिए कुछ निद्वानी
से
कहा,
पर इन विद्वानों की ममझ मे काई वात न भाई।
प्रय त कालम्बम का कुछ भी प्राशा न रहा। लोग उसकी
दंसी करने लगे। को भा उसफो चिढाने लगे।
पर उर प्राह टल गये और इमारला न धन से सहायता
करना स्याफार किया। तीन जहाज मिले, लेकिन साथ जाने
का कोई प्रस्तुत न हुआ। अन्त में घूम देने और धमकाने से
१२० मनुष्य मिल गय। चलन का तेयारा हा गई। एक वर्ष
के लिए पर्याप्त भाज्य पदार्य ले लिये गये।
रानी ने परदेशी राजा के नाम चिट्ठी लिख दी और इस
प्राशा से, फि कालम्बस मव विधर्मियों का ईमाई वना मकेगा,
उसे जाने की अनुमति दे दी । कालम्बस से कहा गया कि यदि
वह वस्तुत कोइ नया प्रदेश ढूंढ निकालेगा तो उसक धन में
उसका भा दसवां भाग लगेगा और उसक वशो का भी
यही धन मिलता रहेगा, वह जिन प्रदेशा को ढूंढ निकालेगा

२६
देशान्वषण का मरल कथाएँ
उनका राजप्रतिनिधि बना दिया जायगा और जल-सेना का
'ऐडमिरल' (सेनापति) भी बना दिया जायगा। यदि वह किसी
नये प्रदेश का पता न लगा पायगा तो उसे कुछ न मिलेगा।
कोलम्बस सान्ता मेरिया जहाज म बैठा और "पिन्ता"
तघा 'निना" जहाज के सार ३ अगस्त सन् १४६२ ई० में
पालस के निकट माल्ट्स से रवाना हुआ। इसके साथी
पहले से ही डरते थे, अन रे कनेरी द्वीप में टेनेरिफ ज्वाला-
मुखी पर्वत का देनते ही घबरा उठे। गस डरपोक साघिया
को लेकर चलना भी अपूर्व माहस का कार्य था। कोलम्बस
न उनका हर तरह से समझाया। वह कभी तो उनसे कहता
कि स्थल वहुत दूर नहा है, कभी कहता कि अभी चले ही
कितने मील है। कभी धन का प्राशा दिलाता, कभी उन्हें
लजित करता कि वे कायर हैं और कार्य पूरा किये बिना ही
लोट जाने से लोग उनका हंसा करगे ।
इस प्रकार कुछ दिन
वीतने पर उन्हाने सरगैसा सागर देसा। यहाँ समुद्रा घास
दिसाई पड़ा और कुछ पक्षी भी दृष्टिगोचर हुए। इससे मबने
सोचा कि भूमि बहुत दूर नहीं है। ये लोग रात दिन चलते
हो गये, अन्त म बहुन दूर पर प्रकाश दिसाई पड़ा । फिर क्या
था, जहाज मे हलचल मच गई। किसा ने कहा कि यह प्रकाश
किसी दूसरे नहाज का है, और किसी कहा कि यह प्रकाश
स्थल पर है। अन्त में राव का दो बजे स्थल स्पष्ट रूप से
दिग्याई पड़ा। सब लोग सवेग होने की अपेक्षा में बैठे रहे।
-

में उतरे।
कृस्टोफर कालम्पस
२२ अस्तूवर १४८२ ई० को ये लोग सैन सैलेवडर द्रोप
यह द्वीप लगभग २३ मोल लम्बा और ७ मील
चौडा है। नाविक प्रानन्द से नाच उठे, उन्होने कालम्बस फो
छाती से लगा लिया। फिर ईश्वर का धन्यवाद देने के लिए
सब घुटनों के बल बैठे। द्वीप में स्पेन का झण्डा गाड दिया
गया। यहां के निवासी पहले तो बहुत डर, परन्तु इनका
अपूर्व रूप, वेप और अस्त्र शस्त्र देखकर उन्ह बड़ा अचम्भा
हुआ । इनमे विपत्ति की प्राशङ्का न देखकर वे इनस वस्तुओं
का आदान प्रदान करने लगे।
कालम्बस ने इन मनुष्यों के पार में अपने लड़के से यह
कहा था-"ये लोग जब समुद्र के किनार पर मिले, निरस्त
थे। इनके साथ कोई बी न थी। पुस्प प्राय ३० वर्ष
के थे। इनका रङ्ग वादामी और कद मैंझाला था।
बाल काले और काना के ऊपर तक कतर हुए थ। कपाल
चौड़ा था। इन्होने शरीर रंग लिया था और य अस्त्रों
का प्रयोग करना न जानते थे । नगी तलवार को जब इन्होंने
देखा तो बहुत आश्चर्यान्वित हुए और उसका उल्टा, धार की
ओर, पकड लिया। समुद्र-तट पर इनकी बहुत सी छोटी छोटी
किश्तियों थी ।" इन लोगो ने सुग्गे पकड-पकडकर कोलम्बस
को दिये और धुनी हुई रुई भी दी। कोलम्बस ने भी इनको
घटी, काँच की माला और लाल टोपियाँ दी थी। इनकी
भाषा कोई नहीं समझ सकता था पर ये इशार से बात करते थे।
.

.
ऐमेरिगो वेस्पूकी
जन्म-स्थान-फ्लोरेंस, मृत्यु-स्थान--सेविल
मरिगी वस्पूका का जन्म फ्लोरेस नगर में, सन् १४५१
ई० म हुप्रा । ४६ वर्ष की अवस्था म कैरटाइल के राजा का
प्रा. से पर भी कालम्बस की तरह एटलांटिक सागर पार
करन का चला। अभी तक कोलम्बस के दक्षिणी अमेरिका के
माल निकालने का हाल किसी का मालूम नहीं हुआ था।
ग्मरिगो ने नन १४६७ ई० म दक्षिणी अमेरिका के उत्तरी
भाग का पता लगाया और यही इस देश का ढूंढ निकालने-
वाला कहा गया । इसने किनारे किनार उत्तर का ओर चलना
चाहा और कुछ दिनो म गरफ आफ मेक्सिको को पार करक
उत्तरी अमेरिका का पता लगा लिया।
सन १४६६ ई० में इसे दूसरी वार कैस्टाइल के राजा ने
भेजा। अब मा बार यह मेजील पहुँचा। इसने अब पुर्तगाल
का नौकरी कर ली।
सन् १५०१ ई० में दक्षिणी अमेरिका
के किनारे किनारे यन दक्षिय का और चला और हार्न अन्व
रीप के प्राय निकट हो जा पहुंचा। इस सोज से ऐमरिगा
का रयाति वढ गई। दोनों महाद्वीप, जो पनामा नहर
निकलने से पहले एक थे, इसा के नाम से प्रसिद्ध हुए। उत्तरी,
.

एमरिगो वेस्पूफी
मध्य और दनिणी अमेरिका ऐमेरिगो के नाम का ही
अपभ्रश है।
कुछ दिनों के पश्चात् यह स्पेन के जल-विभाग का प्रधान
नाविक बना दिया गया और कोलम्पम का सच्चा मित्र हो
गया। सन् १५१२ ई० म इसका देहान्त हुआ।

मकता वास्को न्युनेज डी बल्बोवा जन्म-सन् १४७५ ई० मृत्यु-सन् १५१५ ई० के लगभग साधारण मनुष्य अपने प्रयत्न स कैसे जगत् में प्रसिद्ध हो इसका उदाहरण न्युनज दी वल्यावा है। यह घर से निकाला टुआ बहुत ही दरिद्र पुरुष या । स्पेन के जरिस नगर म इसका घर था। इसने बहुत माग भी लिया पा और यह महाजनों से पीछा छुडाना चाहता था, इसलिए जब हिस्पनिमाला से कुछ स्पेन निवासी, कोलम्बस की मृत्यु के एक वर्ष पश्चात्, जहाज पर जा रहे थे तब यह जहाज के मालगोदाम में छिप गया। जहाज ब्रूटने पर कप्तान को ज्ञात हुआ कि वल्वोवा छिपकर भाग रहा है। इससे वह बहुत ही युद्ध हुआ। उसने बत्वोवा का किसी द्वीप में उतार देना चाहा । परन्तु जहाज के मल्लाहो के अनुराध से उमने उसे डेरियन में, जो अब पनामा के नाम से विरयात है, उतार दिया। यहाँ स्पेन निवासी आपस में लड रहे थे। जाते ही इन पर प्रभाव जमाकर यह इनका सदार हो गया। यहाँ के मूल- निवासा भी इसका सम्मान करने लगे और शान्ति स्थापित

.
वारको न्युनेज डा यस्याया
हो गई। इमन यहाँ एफ देगा राजा फरिटा की लडकीन
ब्याह कर लिया। अब लोग इसका दक्षिण कन्नमय देश फा
कहानियों मुनाने लग और इमने भी देश के पश्चिमी किनारे
क प्रशान्त महासागर का नाम सुना।
एक भार देशी राजा
फोमोगर पल्याला का मित्र भी गा था। इमा ने प्रथम
चार बचाना से प्रशान्त महामागर फी चचों का धी।
सितम्बर मन् १५१३ ई० में इसी बात का परीना क लिए यह
एक उंच पहाड पर पड़ने लगा। २५ मितम्यर सन् १५१३
ई. में इसने पश्चिम म वैमा हा एफ मागर देगा जैमा स्पेन मे
यहां माते ममय देया था। मामा पानी का नाम तुम्द स्मरण
हागा। उसने इम महामागर का एशियाई किनारा देखा था
और बल्यावा ने उसका पूर्वा किनारा देय लिया। अभी तक
ता लोगों का अमरिका के पूर्वी किनारे का और प्रशान्त
महामागर का ही ज्ञान पा, अब इनका इस महाद्वाप के
पश्चिमी किनार का और प्रशान्त महासागर का भी ज्ञान हा
गया। पर इतने नान से लोग कर सन्तुष्ट रह सकते थे।
चल्योवा की इस योज ने स्पेन में हलचल मचा दी और
जर इमने जहाज बनाने के लिए स्पेन-सरकार से कुछ सामान
मागा, तो उसने तुरन्त सब सामान भेज दिया और कुछ
मामान किनारे के वेस्ट इंडीज द्वाप पुख से भी पाया।
उसका इसने बडी सावधानी से जानवरों और मनुष्यों पर
लादकर पश्चिमी तट पर पहुँचाया और वहाँ जहाज बनाया
| maka

जारे लगा।
३८
देशान्वषण का सरल कथाएँ
नहाज बन ही चुका था कि इसके शत्रु
पेड्रारियम ने, जो स्पन-मरकार की ओर से यहाँ 'गवर्नर' था,
डाक मारे इमका हत्या करा दा।
रह मच है कि बल्यावा अपना कार्य पूरा न कर सका
परन्तु इसने औरा क लिए खोज का कार्य तो सुगम कर दिया।

सिबेस्टियन कैवट
जन्म-सन् १४७७ ई०, मृत्यु सन् १५५७ ई०
.
.
सिस्टियन कैवट का जन्म बिस्टल नगर में हुआ था।
यह जॉन कंवट का दूसरा बेटा था।
जॉन फैबट जिनेवा का रहने वाला था और वाणिज्य के
लिए विस्टल में आया था। इसने लेवेट में व्यवसाय
करते समय, एशिया के धन के विषय में, यहुत कुछ सुना था।
यह ऐसे राजा की सोज में था जो इसके उद्देश्य को पूरा
करने में सहायता करे। हम जिस समय की बात कहते हैं
उस समय इंगलैंड का राजा हेनरी सप्तम घा। तुम्हे स्मरण
होगा कि इस राजा ने कोलम्बस को सहायता नहीं दी थी
और जव उसके नये नये देशो के पता लगाने का हाल सुना तो
वह अपने व्यवहार पर बहुत लज्जित और दुसित हुआ था।
अब यह चाहता था कि किसी मनुष्य को आविष्कार के लिए
जव जॉन कैवट ने राजा से अपनी इच्छा प्रकट की
तो उसने तुरन्त इसको इस कार्य के लिए अनुमति-पत्र दिया
और उसमें स्पष्ट लिख दिया कि सोज इंगलड के नाम
पर की जाय और पता लगाये हुए देश से जो लाभ होगा
वह जॉन कैवट और उसकी सन्तान को प्राप्त होगा,
भेजे।

देशान्यपण की मरल कथाएँ
पाचवॉ हिस्मा राजा का मिलेगा। ऐसा अनुमति पत्र पाकर
जॉन बट अपन वट सिबस्टियन कैयट के साथ सन् १४९७
ई० मे आयरलड क दक्षिण होता हुआ उत्तर-पश्चिम की
पार चल पड़ा।
वर जानता था कि पृथ्या गोल है इसलिए
पश्चिम का गह म एशिया भी पहुंच सकते हैं। दक्षिण जाने
क अनुमति न पा, स्याकि हेनरी सप्तम स्पेन से झगड़ा मोल
ना न चाहता था। पूर्वा राह मार्को पोलो ने देखी ही थी
और उसम कठिनाइयों भी बहुत थीं। इस कारण कैवट न
पश्चिमा राह का ही पता लगाना चाहा।
इसका जहाज छोटा था और साथ में केवल १८ मनुष्य
ये लोग सैट लारस नदी के मुहाने पर पहुँच गये,
परन्तु इसने थोडे मनुष्यों के साथ एक अनजान देश म उतरना
निरापद न समझकर ये लोग बिस्टल लौट आये। तीन
महाने में लौटने पर जब इन लोगा ने अपनी खोज का वर्णन
किया तो हनरा सप्तम बहुत सन्तुष्ट हुआ। उसने कैचट को
बहुत सा पारितोपिक दिया। फिर दूसरी बार इसका
भेजने का तैयार की।
अव का बार कुछ अँगरेजी जहाज
माल लादकर भेजे गये और बहुत से अँगरज भी साथ
हा लिये। ये लाग मई सन् १४९८ ई० में निस्टल से
दुबारा रवाना हुए और जहाज लेकर उत्तरी अमेरिका क
किनार पहुँचे। परन्तु ये लोग ज्यो ज्यो दक्षिण की और
वढये गये, इन्हें इस देश का अन्त हा न मिला। इसका

सिरस्टियन कंचट
पार करने की आशा घटवी गई। बहुत दक्षिण में जाना
मना था, इस कारण ये लोग लोट पड़े। इधर एशिया जाने
का पश्चिमी राह भी इनको न मिली। अब तो हेनरी
सप्तम बहुत असन्तुष्ट हुआ। फिर उसन तोमरी बार यात्रा
करने में सहायता न का।
सन् १४६६ ई० में सिस्टियन कैवट ने अपने पिता के
कार्य को पूरा करना चाहा पर वह मृतकार्य न हो सका।
केवल न्यू फाउंड लैंड का पता चला ।
वह लिखता है कि यहाँ समुद्र मछलियों से भरा हुआ है,
और ज्यों ज्यो उत्तर की ओर चलिए समुद्र में जहाज से भी
वडे बडे उर्फ के सफेद ढोके तैरते देख पडते हैं।
सिवेस्टियन केंवट, पिता के साथ, सेंट लारस के दनिण
का यात्रा कर चुका था। इसलिए अब की बार वह उत्तर
की ओर गया। पर यहाँ सदा अधिक होने के कारण इसके
सापी आगे चलना नहीं चाहते थे इसलिए विवश होकर
ये लोग दक्षिण का ही ओर चलकर फ्लोरिडा तक पहुंचे और
एशिया के मार्ग का पता लगाने लगे। परन्तु फिर भी
इनका एशिया की राह न मिली।
जब हेनरी अष्टम गद्दी पर बैठा, कैवट एक बार
फिर एशिया की राह की खोज में चला और ब्रेजील तक
पहुँचकर हिस्पैनिग्रोला और पोर्टो रिको होता हुआ घर
लोट

-
४२
देशान्वषण की सरल कथाएँ
मन १५१६ ई० में इसो स्पन का नौकरी कर लो, परन्तु
आविष्कार का कार फिर भा पूरा न हुआ। सन् १५१७ ई०
म यह फिर अंगरजों का पार स लडर गया और वहाँ से
-इमा का चाडा में पहुँचा, परन्तु एशिया की राह फिर भी न
सिना । इमसे नित्माह होकर, स्पेन की नौकरी करके, यह
पाल का तट भूमि का स्पेन के अधिकार में लाने का चेष्टा
करता रहा।
सन् १५४८ ई० में यह इंगलैंड लाट आया ।
राजा एडवर्ड पष्ठ ने इसकी बातों से प्रसन्न होकर इसे १६६
पौड १३ शिलिग ४ पेंस की पेंशन दे दी और इंगलैंड का
पाइलट भी नियुक्त कर दिया ।
एक नई कम्पनी मचट एडवेंचरर्स के नाम से चल पड़ी।
मिस्टियन करट उसका नायक बना।
सन् १५५२ ई० में
उत्तर की ओर कुछ जहाजों के साथ सिस्टियन चला। अब
एशिया से व्यापार आरम्भ हा गया।
सन् १५५७ ई० में सिनेस्टियन कैवट का देहान्त हो
गया। यद्यपि न तो इसे और न इसके पिता को हा एशिया
के पश्चिमी समुद्रा मार्ग का पता चला, तो भी इनकी अधूरी
सोजों ने दूसरों के लिये मार्ग सुगम कर दिया।
इतना ही
नहीं , इंगलैंड का नई दुनिया के पूर्वी किनारे पर अधिकार
जमाने का प्रथम अवसर भी इन्हीं लोगों ने दिया था।

फनैडो डी मैगलहैस या मैगिलन जन्म-सन् १४७० ई० के लगभग, मृत्यु-सन् १५२१ ई० मैगिलन का जन्म पुर्तगाल मे हुआ। यह अच्छे कुल में जन्मा था और घोडी ही अवस्था में रानी का नौकर हो गया। बडे होने पर इसने राजा इमैनुयेल का नौकरी कर ली। वारको डि गामा के पश्चात् पुर्तगालवाले एशिया की और कई वार भेजे गये और मैगिलन ने भी इनके साथ हो लेना चाहा । सन् १५०४ ई० म एल्मिदा ने, जा नये ढूँढे गय देशों का वाइसराय होनेवाला था, मैगिलन को साथ ले लिया और केप आफ गुड होप की राह वह एशिया की ओर चल पडा। सन् १५०६ ई० में यह भारत को छूता और छोडता हुआ सुमात्रा और मलका पहुँचा। फिर वहाँ से भारतवर्ष आया। यहाँ वह अल्बुकर्क का नौकरी करने लगा। सन् १५११ ई० में यह एक जहाज में कप्तान बनाकर मलक्का भेजा गया और वहाँ से सन १५१२ ई० में पुर्तगाल लौट गया। वहाँ राजा से कुछ वातो मे इसकी अनबन हो गई और इसने घर छोड- कर बाहर जाना चाहा। उद्देश्य यह भी था कि ऐटलांटिक क करके मलका, जिसको स्पाइस आइलैंड भी कहते हैं. TTTP

देशान्वपण का मरल कथाएँ
पचे और यहां से मामान लाकर राना को मन्गुष्ट कर ।
पर यह राना म लड का I और जर इमने सपना इच्छा
प्रकट का नव राजा न महायता करना पकान किया। इस
पर पा सन फगना चारम पम के पाम गया।
पार लहाज २३३ मनुष्य और दो वर्पक उपयुक साद्य पदार
ग स्पाकार किया। मैगिनन का यह बता दिया गया कि
पुनमाल मरकार का मार से पता लगाई हुई भूमि पर वाह
शिकार न माय । हो, प्रार मश के नामद भाग का
73 प्रधिकाग दागा। मंगिलन ने फालम्बम के प्रापि कार
कागल मुना था। व-चौवा के पैसिफिक महासागर क विषय
का पावें भी उसके हृदय में बैठा हुई घों। उमने पैसिफिक को
पार करने का निश्चय कर लिया। वह २० सितम्बर सन १५१६
. में पेन से रवाना हुमा।
उमर साय भिन्न भिन देशों
कलाग थे। कुछ ऐसे भा घे तो उमक कार्य म पित डालना
चानते थे। मैगिलन पुतगाल को ढूंढ निकाली हुई भूमि में
नदा नाना चाहता पा। इमलिए उसने टेनेरिफ द्वाप म
पाँचकर दक्षिण पश्चिम का राद ली। वहुतरी विपत्तियों का
अतिक्रमण कर वह परनेम युका के निकट पहुँचा और वहाँ
म दक्षिणा अमेरिका के किनार किनार दक्षिण-पश्चिम चलवे
चलते रायो डो लाप्लेटा म सन् १५२० ई० म गए। वहाँ
से वह फिर दक्षिण का और चला। इधर दा जहाजों के
कप्तानों ने, जा पाले से हा विद्रोह के लिए प्रस्तुत छ, तीसर

दिसाई पडा।
फनडा डी मंगलहँस या मगिलन
जहाज के कप्तान का भी अपना साथ देने के लिए घेर लिया।
इसका पता लगते ही मंगिलन ने मुरय विद्रोही सरदार का
मरवा डाला। इससे सनसना छा गई। दो महीने तक य
लोग सेंट जूलियन में रुके थकि इनका पैटेगोनिया क निवासी
दिसाई पडे। उनसे कुछ पाने का सामान मिलन की आशा
इन लोगो को न रह गई था कि एक नङ्गा दैत्याकार मनुष्य
इसका मैगिलन ने अपने साथ ले लिया और
दो उद्दण्ड विद्रोहियो का कुछ साद्य पदार्य के साथ वहीं
उतार दिया। इससे जहाज म शान्ति हो गई। पर एक
महीने के पश्चात्, २१ अक्तूबर सन् १५१६ ईस्वी को, मैगिलन
ने उस जल-विभाजक का पता लगाया जिससे वह पेसिफिक
महासागर पहुँच सकता था। इस जल विभाजक का नाम,
इसी के नाम पर, स्ट्रेट आफ मैगिलन पडा । इस नल-मार्ग के
दक्षिण में उसने एक अग्निशिसामय द्वीप देसा और इसी लिए
इम द्वीप का नाम टियरा डेल फ्युगो रक्सा। टियरा डेल फ्युगो
का अर्थ अग्निमय भूमि है। इसी मार्ग के उत्तरी किनारे की
भूमि को उसने रमणीय बताया है, क्योकि ऊँचे पर्वतों से बर्फ
की नदी बहती हुई समुद्र म गिरती है।
सात दिन की कठिन यात्रा के पश्चात् २८ अक्तूबर सन्
१५१६ ई० को वह पैसिफिक के तट पर पहुँचा। इधर इस
मार्ग को पार करते समय एक जहाज डूब गया था और एक
जहाज के नाविक साथ छोडकर घर चले गये थे। अब केवल
।

रानधानीमरिसका सपना का ठान ली। इसस इसके साथा पडा। अब इसने दराफिजम डेरा डाला। यहाँ इसक पाम क्या में कुछ और लाश आ गये । लगभग १५० मनुष्यों का यहाँ छोडकर यह ३५० स्पेनवालों और लगभग ६००० देशा सिपादियो क साप मेक्मिको विजय करने को चला। तुमने वगाल विजय और आर्फट का कहानी सुनी है। थाडे से अंगरज सिपाहियों के साथ क्लाइव ने किस प्रकार हिन्दु स्तानी सिपाहियां का लड़ाई की शिक्षा दी और उन्हें अपन कार्य के उपयुक्त वनाया। कोटिस ने भी इसी प्रकार दशा ४८ . देशान्वेषण का भगत कथाएँ इसका कुछ देशा मनुष्य मिल। इन्होंने स्पेनवालों का भाद भगत का। य लोग मदिरा के राना मेटिजुमा के दूद घ और इस बात का प. गाने प्राय घ कि स्पेनशन क्या चाहते हैं। इन का साथ फोर्टिस ने अपने दश का वस्तुप्रा का पाता। किया और इनके राना स मिलना चाहा। आता ,मनि लने के लिए राजदूत राना के निकट लोट गर। विदशियों का बन्दूर iता का हाल सुनते ही वह घबग गया। उसन काशित कमिट सोने और चांदी का मेंट भजा और अपने का ह मिया दिया कि इन विदेशिया का म दश का दुर्गमता का कहानी सुनाकर डरवा दे । पर इस भट का दसान काटिस को लालच बढ़ गया। उसने माटेजमा डरपोक था। इन डर गय। उनका समझा बुझाकर यह उत्तर का और चल

फनैडो कोर्टिस
४६
-
बढ़ा।
सिपाहियो को युद्ध-विद्या सिसा दी। ये लोग अपने राजा क
# अत्याचागे से उबे हुए थे, इससे इन्होने कोर्टिस को लडाई में
सहायता दी । ऐसी सेना के साथ कोर्टिस मेक्सिको की ओर
वह रास्ते में लोगो से सोना-चाँदी लेने लगा। जो
। लोग न देते थे उनसे लडता था और उनका पराजित कर उनका
सर्वस्व छीन लेता था। यह समाचार जब मेटेजुमा के पाम
पहुँचता तब वह घगकर अधिक सोना-चादी भेजता और
कोर्टिस से कहला भेजता कि आग न वढो। लेकिन उमका
सुनना था ? कार्टिम विजयोन्माद स पागल हो रहा था।
उसने इनक धर्म पर भी हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया। वह
ज्या ज्या आगे बढता त्या त्या देश ऊँचा प्रतीत होता जाता पा
और देश का प्राकृतिक सौन्दर्य भी बढता जाता था। मोटेजुमा
का दुर्भाग्य था कि इसी समय ज्वालामुखी पोपाकैटेपेट्ल का
उद्गार हुआ । गजा इसका ईश्वर का अभिशाप समझने लगा।
इधर कोर्टिस अपन सिपाहिया क साथ सुन्दर मेक्सिको नगर
में जा पहुंचा। राजा मोटेजुमा देव दुर्विपाक से घबराया
हुमा तो था ही, कोर्टिस के आने क सवाद ने उसको और भी
विकल कर दिया। विदेशियों का प्रसन्न करने के लिए आगे
चढकर उसने उनका स्वागत किया। राज-कोष में जितना धन
था, सब लाकर उसने कोर्टिस के पैरों पर रख दिया। पर कोर्टिस
ने धूर्तता से मांटेजुमा का वन्दी कर लिया और यह कहला
भेजा कि अब मेक्सिका पर स्पन के राजा का अधिकार है।
.

देशान्वपण की सरल कथाएँ
कार्टिस इससे भा सन्तुष्ट न हुआ। उसने राजा से ईसाई
बनने का कहा। पर राना अपने धर्म का पका था। उमने
अपना धर्म न छोडा। इम पर क्रुद्ध होकर कोर्टिस ने देश
क देव-मन्दिरा और मूर्तियो का तुडवा दिया। ऐसे कर्म का
फल कब अच्छा होता है ? उसके देशी सिपाही विगढ सडे
उधर स्पेन के सिपाहियों का एक दल, जो कोर्टिस क
विपन म था, किनार पर प्रा उतरा। अव दोनो र सँभा-
लना कार्टिस के लिए कठिन हुआ। यह झगडा दस वर्ष
तक होता रहा। अन्त में कार्टिस कृतकार्य हुआ। सोने-
चादी से लोगों के थैले भर गये, लेकिन कोर्टिस का लाभ
बढता ही गया। कैलिफोर्निया का पता लगाने के लिए
उसने मेक्सिको से पेननिवासियों का एक जत्था भेजा और
आप भा इसका साज में लगा रहा। सन् १५४७ ई० में
इसका देहान्त हा गया।
.

व बहुत दिन
फ्रेंसिस्को पिजारो
जन्म-सन् १४७० ई०, मृत्यु-सन् १५४१ ६०
असिस्का पिजा का जन्म म्पन फ टूक्सिनो नगर
हुआ था। मूसरो की रखवाली करना इमका पया
इसे नये देशो क धन से मालामाल होने की इच्छा मार
धी। इमक लिए इसने उस्लोवा का साथ कर लिया।
कुछ दिनों तक पनामा म कृपक का कार्य करना इल।
इसन दक्षिणी देशों के धन क बार में नहा अदा
सुनी।
अवसर प्राप्त होने पर यह इन देगा *
चाहता था। यती क कार्य से इमन का
लिया था। सन् १५२४ ई० म का
मनुष्यों के साथ यह रवाना हुआ। Pट
कष्ट मिला, खाने-पीने के सामान
म विवश होकर पिजारा ने जा
लिए पनामा में लौटा दिया
और
किनार पर उतर पडा।
वहाँ जङ्गल ही जङ्गल
यान
घे
में
डा। रहावाली मन मा

५२
देशान्वपण की सग्ल कथाएँ
के उम दंश का पता लगा जहाँ पर्याप्त सोना था। ये लोग
वडा कठिनाई के माध समुद्र तक गस्ता पा सक। नब ये वहा
पहुचे ता इन्होंने अपने जहाज का माल में लदा हुआ पाया।
यह जहान पनामा से माल ले आया था। इमी जहान पर
बैठकर य लोग दनिण का पार चले। कुछ दिनों के बाद
इन्होंने एक बडी बम्ता देखी। जब ये जहाज से उतरकर
वस्ती की पार चल तो गाँववाले डरकर भाग गये। कुछ
देर बाद लौटकर इन पर उन्हाने आक्रमण कर दिया। मारे
डर क र लाग अपने जहाज पर लोट प्राय ।
जहाज भी हव रहा था इसलिए आगे बढना उचित न
समझकर य लोग पनामा लौट गये। जहाज की मरम्मत
हो जाने पर दा और जहाज़ लेकर, १६० मनुष्य के साथ,
पिजारा फिर रवाना हुआ। अब की बार यह जहाज म
कुछ घाइ भी लाया था। जव उम स्थान को पार कर लिया
जहाँ य लोग पहला वार पहुँचे थे, तो पिजारो जहाज से उतर
गया और इसन जितना सोना लूटा था वह सब जहाज पर
लादकर इस आशा से पनामा भेन दिया कि और लोग धन
के लोम स आ मिलगे। दूमरे जहाज दक्षिण का पार बढे
और गैलो द्रोप का पार कर गये। यहाँक निवासी शिक्षित
प्रवात हुए, क्योंकि ये लोग फिश्वा पर पाल चढाय घूम रहे
घे। पाल के चित्र और कारागगे का देसकर किसी को यह
भ्रम नहीं हो सकता था कि य लोग अशिक्षित है।
.

फ्रांसिस्का पिजारो जहाज के कप्तान ने इनमें से कुछ लोगों को पकड़ लिया। वर इनको अपनी भाषा सिपाने लगा। कुछ दूर और चल- कर वह पिजारो के निकट लोट पाया। इधर साद्य पदाथा का फिर कमी हुई। पनामा को फिर एक जहाज भेना गया। पिजारो ने अब गैले। जाने का विचार किया, पर उसक साधी तैयार न हुए और बलवा होने को ही था कि पिजारा ने मबको समझा बुझाकर साथ चलने का तैयार कर लिया। केवल घोडे से मनुष्य लाट गय । कई महीन बाद एक नहाज पनामा से माल लादकर ले आया। अब का बार फिर ये लोग दक्षिण की ओर बढे और गुयाकिल बन्दरगाह म पहुंचे। कार्डिलग पर्वत का सुजला सुफला पश्चिमीय तट-भूमि का देवकर ये लोग बहुत ही आन- न्दित हुए। यहावालों ने इन लोगो का फल, अनाज, लामा और ऊँट देकर सन्तुष्ट किया । ये लोग कुछ और दक्षिण चलकर पनामा लौट गये। पिजारा अब स्पेन गया और वहाँ से राजा की अनुमति लेकर पनामा वापस आया । सन् १५३१ ई० म तीसरी बार १८० मनुष्य, कुछ घोडे और तीन जहाज लेकर यह पेरू की ओर चला। विषुवत रेसा के पास आते ही यह घोडो और आदमियो क साथ उतर पडा। उसने जहाजो को दक्षिण की ओर रवाना कर दिया। दक्षिणी अमरिका काउंट की जाति का---एक पशु, जिस पर व्यवसायी लोग माल लादने ई। .

पठार और देशान्वपण का सरल कथाएँ जब पिजारा मय जहाज के गुयाफिल तक पहुँचा तव सव ने देश के अन्दर जान का विचार किया। सन् १५३० ई० मे तर म कुछ दूर पर डरा डाला गया। कुछ लागों को छाटकर पिनारा अन्दर का ओर चला। यहां इसने इन्का गता अता हुाल्पा का नाम सुना था । इस राजा का राज्य आनकल पेरू के नाम स प्रसिद्ध है। यह बड़ा ही धनी गन्य मा। पिजारा ने इसका लेना चाहा। राजधानी हुक्मामरका ण्डीज पर्वत के दूसरी तरफ घो। पवन क पार करन पर ही कोई वहाँ पहुँच सकता था। पिजारो क साथी पहले पहल घबराये, पर धन क लोभ म आगे बढे। इन्का ने इनको सोने-चाँदा और ऊनी कपडा का भेंट दा, पर य लोग आगे ही वढते गये और कैक्सामल्का राजधानी दिसाइ पडा। सवाद पाकर इन्का स्वय मिलने आया पर स्पेनवाले उस पर टूट पड़ । वह वन्दी कर लिया गया। पिनारा ने अब इससे नगर का सव धन इकट्ठा कर- वाया, फिर इसका मरवा डाला। सन् १५३४ ई० में कज्को नगर भी स्पेनवालो के हाथ आया और धीरे धारे पै और चिली इन्हीं लोगों क हो गये। अता हुाल्पा का मृत्यु के पश्चात् नय इन्का न बदला लेने की ठाना। पर स्पन के सिपाही शिक्षित थे और मस्या में भी अधिक थे, इसलिए बडे मामान युद्ध के पश्चात् इन्का माग गया। उसका एक सिपाही भी प्राण लेकर न भाग सका। -

सिक्का पिजारा
स्पेनवालो न दश का लूट लिया। कहा जाना है कि लूट के
माल म दम या यारह, मनुप्प फ फद की, मुवर्ण-मूर्वियो गो।
लूट क माल के ४८० हिम्स किये गये। हर मिपाहा क
दिस्से म २५००० हनार रुपर पाय ।
पिजारा का भाई फर्नडा पिजारा भी बडा निर्दय था।
इम लूट के कार्य में उसी ने अधिक हिस्सा निया पा।
पसी निर्दयता का फल कब अच्छा हावा है? सन् १५४१
ई० मे इसी के आदमियों ने इसका, ७० वर्ष का अवस्था में,
मार डाला।

मर ह्यूग विलोवी पर उत्तर- मृत्यु-सन् १५५४ ई० बागका। तुम्हें माझा पाला का किरसायाद हागा, कुबल- सपा क बरामर देश का पता लगान क लिए उसने कैसे कैसे कष्ट नाय । और फिर प्रिम हेनरी ने जलमार्ग से +1 1 चीन पहुँचने के लिए कैसे कैस नारिको का बाज क कार्य के लिए भेना या, अन्त में कैस वास्का डि गामा उत्त- मा अन्नरीप हाते हुए भारत में पहुँचा था। पूर्व का समुद्रो राह से चीन पहुँचने का किसी ने विचार नहीं किया था। हाँ, केवट ने अवश्य इस राह क बार में अगरजा का सुझाया था। यदि मान के कार्य के लिए लोग वाहर न निकलते तो यारोप के जिस नकश का अब तुम अपन सामने दसवे हो वर सम्भवत ठीक ठाक न बना होता, विशेषत उत्तरीमरहद का ठीक पता लगना वा असम्भव साधा। तुमने मचेंट ऐडवैचर्स कम्पनी का नाम किसी पिछले पाठ म सुना है। इसी कम्पना के अगुवा वनकर सर युग विलौना और कप्तान रिचर्ड जैसलर सन् १५५३ ई० म उत्तर-पूर्व का गह ढूंढने क लिए निकले। चलते ममय इनका इँगलिस्तान क राजा एडवर्ड पष्ठ ने कय या चीन के राना से मिलने के

सर यूग
.
चिलावा
लिए चिट्ठी दा और चर कर दिया कि किसी राजा से या उसकी
प्रजा से न तो बेडछाड करना और न किसा के राज्य में,
विना उमी अनुमति क, उतरना। उसन विदेशी राजानी से
भा कहला मजा फि यदि य अंगरेज नाविक मङ्कट में पड तो
इन पर मनुष्याचित दया दिसाइएगा।
काटलैंड के उत्तर में शटलैंड द्वीप है। यहां इन नाविकों
ने रुकना चाहा, पर आंधी चलने के कारण य वहाँ रुक न
सक और लोफोटेन म पहुँचे। इनको रास्ता नहीं मिल रहा
था लेकिन भाग्य स नार्वे का एक माह छोटी सी किश्ती
नेता हुआ दिखाई पडा। उसने इन लागा को नार्वे के
किनारे पर आने के लिए कहा। ये लोग तैयार हो गये और
किनार के फिोर्ड्स के पास पहुंचे। इन फिओ की चट्टानें
बटुत ऊँची और सडी दिखाई पड़ी । नदियाँ, जो में
गिर रही थीं, बहुत ही सुन्दर मालूम होती थी। पहाडा
पर चीड क पड सड थे और मल्लाहों की किश्तियाँ मछली
मारने के लिए किनार पर तेयार सडी घों। इनमें से
एक अच्छे मल्लाह को, रास्ता दिखाने के लिए, विलीनी ने
माथ ले लिया।
य ज्यों ज्यो उत्तर की भार बढते घे त्यो त्यो दिन
छोटा होता जाता था और जब ये हैमरफेस्ट क निकट पहुंचे
तो सूर्य केवल घटे दो घटे के लिए दिसाई पड़ा। इसको
'मिड नाइट मन' कहते हैं। यहाँ रानि के समय मल्लाह लोग

दशावपय का सरल कथाएँ
किरिया म उमर मधा पकड़ने के लिए निकलत और
पटे देर में यमनियां निकलता ६ तम उनका
पाई।
यहा इमा ममय दुभाग्य-यश, इतर वेग स आँधा घना
+7 का नहार किनारे से बहुत दूर हा गया और
का माया सरन नाम अपने नहाज के माध किधर
जाग। चिलाना प्रिय हैं का उत्तरी हिस्सा पार कर
हिया पार व नोगाजन्ना द्राप पर जा रुका।
वह
में गम का प्रार नोटा और सफेद सतुद्र का पार कर
अपन मिनार भाग।
भव जाई के दिन प्राय भार
मा रुमा गर्दा पड़ा कि इस माया ठिठुरफर मरने लगे।
मनुट का पारी जम में जहान भी भाग नहा यह
पन १५५४३०१ नगभग पिताना प्राण
मा न पर टे।
नाकान पाकर सलर अपने माधिया ममत
पExt रहा परग। रहा इनको एक अदभुत याव
ग्या तुमने कभी ऐसा मुना है कि किसा
राम दिन मा गनिहा दावा हा मार माकाग में
मामा समय रहन ? यद्रमा का शान था।
मन पर मिन्वन का निरपय गितामा पार सर
पहा कर लिया था, पर दिनों का प्रवाधा क बाद
भर मनमाया का मानदेय न माग
FREE

सर यूग
पिलाया
वा। मर्दा का मौसम निकट 'पा। कफना निरापदन
समझकर लोगो की भयात्पादक बातो का परवा न करके
यह मफेर ममुद्र में मा पहुँचा। यहां कुछ मन्त्राह दिखाइ
पड। य इनन भयभीत कि अपनी फिश्तियां के माप किनार
पर भाग प्राय । अँगरेजों ने इनका वहुन समझाया और
दाढस बंधाया। घाई समय क पा इन पर उनका इतना
विश्वास हा गया कि वे इन विदशियों के पर
चूमन
फोदाई
और इधर-उधर से इन लिए बहुत सा ग्याना ले पाय, पर र
किसी तरह अँगरजों का माल लेने का तैयार न हुए। राजा
की अनुमति के बिना दूसरों का माल लना दण्डनाय था।
उन्हाने इन लोगों से अपने राजा क मार मिलने का आग्रह
किया। मास्फा नगर इम देश की राजधानी घो। यह नगर
समुद्र-तट से दूर था। य विना पदियो का गाडियों पर बैठकर
राजधानी की ओर चले। एसी गाडियां को स्लेज करते है।
इस भू-भाग पर जर धर्फ बहुतायत से पडती है तब इन
गाडियां को वारदसिघे सींचते है।
गसी ही गाडियो म बैठकर कुछ दिनो म चंसलर, अपने
साधियों समेत, मास्को के राजा के पास पहुँचा। राजा ने इन
लोगों की बडी आवभगत की और पैंसलर क आगमन तथा
कुछ व्यापार के विषय म भी अँगरेज राजा क पास पत्र भेजा।
दूसरी बार सन् १५५५ ई० म चैंसलर मध्य रूस की
रूस से चीन के रास्ते का भी पता लगाने
ओर चला।

दशान्वपण की सरल कथाएँ
किश्तियों में बैठकर मना पकड़ने के लिए निकलते हैं और
घटे देर घटे क उजल में जब मछलिया निकलती है तब उनको
पफ लत है।
यदा इसा समय दुभाग्य वश, इतने वेग से आँधी चला
fr पदीया का नहाज किनारे से बहुत दूर हो गया और
का माया चसलर न मालम अपने जहाज के साथ किधर
चला गया। क्लिारा ने अव नावें का उत्तरी हिस्सा पार कर
निग और वह नोवाजेंग्ला द्वाप पर जा सका। फिर वहाँ
म पश्चिम का मार लीटा और सफेद समुद्र का पार कर
परंडक किनार आया ।
अब जाडे के दिन प्राय श्रीर
हाना कता मौ पड़ा कि इस मागे ठिठुरकर मरने लगे।
समुद्र का पाना जम जाने से जहाज भी आगे नहा बढ़
सन् १५५४ ई. के लगभग पिलीमा के प्राण
-सा नहान पर ट।
उधर क्लिीवा को न पाकर चंसलर अपने माधियो समय
नपर्नड में वारडा पहुंचा। यहां इनको एक अद्भुत बात
दिग्ा पड़ा।
क्या तुमने कभी एसा सुना है कि किसी
दाम कुछ दिनों नक राति हो न होवा हो और आकाश में
सूर्य सर्वदा चमकत रहते हो? यह एसा स्थान था।
इस स्थान पर मिलने का निश्चय विलापा और चसलर
ने पहले हा कर लिया था, पर कुछ दिनों का प्रतीना के बाद
जय सर ने पिलीग का पाते न दग तब वह भाग
सरुवा घा.

सर शुग
ਕਿ
पदा। सर्दी का मामम निकट था। रुकना निरापद न
समझकर लोnt का भयोपादक यात का परवा न करके,
यह मफेद ममुद्र म मा पचा। यहां कुछ मात्रा दिग्गई
पड। य इसन भयभीत कि अपना फिश्तियां क माय किनारे
पर भाग प्राय। अगरेजों ने इनको पहन समझाया और
ढाढस बंधाया। घाड समय क पत्राा इन पर उनका इतना
विश्वास हो गया फिर इन विदशियों के पैर घूमने का दौडे
और इधर-उधर से इस लिए बहुत सा गाना ल आये, पर में
किसी तरह अंगरजों का माल लो का तैयार न हुए। राजा
की अनुमति के बिना दूमर का माल लेना दण्डनीय था।
उन्होंने इन लोगों से अपने राजा के साथ मिलने का आग्रह
किया। मास्को नगर इस देश की राजधानी यो। यह नगर
समुद्र-तट से दूर था। य विना पहिया की गाड़ियों पर बैठकर
राजधानी की प्रार चले। एसी गाडियां का स्नेज करते हैं।
इम भू-भाग पर जब बर्फ बहुतायत से पड़ती है तब इन
गाडियो का वारदसिधे साचते है।
सी ही गाडियो म बैठकर कुछ दिनो म चैसलर, अपने
माधियों ममेव, मारका के राजा के पास पहुँचा। राजा ने इन
लोगों की बडा आवभगत की और चमलर के आगमन तथा
कुछ व्यापार के विषय में भी अँगरेज राजा के पास पन भेजा।
दूसरी बार सन् १५५५ ई० म चैसलर मा
रूस 'चीन के रास्ते का
और चला।

देशान्त्रपण की सरल कथाएँ की अनुमति इसको गिल चुकी थी। चैसलर अबकी बार रूस म ही रह गया। उसने अपन साथिया का वापस भज दिया । मन् १५५६ इ. म तामरी वार गरजा का एक दल चना। इन लोगों को लैपलंड के निकट विलोग क जहाज का भग्नाश मिला। इसर चसलर, मास्का के ए रानत को साथ लेकर, उत्तर-समुद्र का आर चल पडा। प्राय हुए जहाजा में इसने साल गौर हेल मछलियों का तेल मोम उन और कुछ जान- वग क सुन्दर राल तथा कुछ सूत साध ल लिया। अव यह इंगलैंड का और चल पडा। पर अबका वार इसके दो जहाज दब गये और वीसर का बहुत दिनों तक पता न चला। चाप जहाज म चैसलर स्वय चा। स्काटलैंड के किनारे आत हा वहाँ के डाकुनों ने चेंसलर का, सब माल छीन कर मार डान्ता।

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- 12110
मर फ्रंसिस ड्रा
เ
ฆ์เจน
116
- -

ऊछ हशियों को लाने के लिए गरा:
वेस्ट इडाज म स्पेन-निवामिया कर
लेने को तैयार रहते थे। हाल
फि अँगरज लोग स्पेनवाला
पेचकर बहुत सा धन इकट्टा
सर फ्रैंसिस देश
जन्म-सन् १५३९ ई०, मृत्यु-
सर पेंसिस डेक का जन्म टेविस्टर
अँगरज नाविको म इसा ने मरस पर
क्रमा का धी। इमका पिता डिवनमः
बारयावस्था में इसन नाव चलान 4
सीरी धी। फिर डोगर बैंक म पा
तक काम सीखता रहा। जब दरिन
साथ था। इन हल्शियों को पर
ऐक का मुख्य कार्य था। इन का
लाभ होता था,
क्योंकि स्पनर
थे। इसी व्यापार के लिए हानि
किनारे जा पहुंचे।
स्पेन कद
और भी
• हुआ
म

देशान्वपण की सरल कथाएँ
स्थाना म अाना-नाना प्रारम्भ किया है। अब उसने यर
घोषित कर दिया कि स्पेनवाले न तो अँगरेजों से कोइ वस्तु
सरादें और न उनक हाय कुछ बचें।
इसा कारण हाकिस और ड्रेक वघा स्पेन के बीच
लडाइ छिउई। ड्रेक वहाँ से किसी प्रकार प्राण बचाकर
भाग निकना और इंगलैंड पहुँचा। मार्ग में उसे वनुत कष्ट
मिला। खाने पीने का मामान घट गया, अन्त मे विवश
होकर कुछ लोगों को एक द्वीप म उतार देना पड़ा। सन्
१५६८ ३० म यह कार्नवाल पहुँचा। स्पेनवालों के अत्या-
चार क फिरसे ड्रेक से सुनकर अँगरेज बहुत हा उत्तेजित
तुए। उन्होने हर तरह से ड्रेक की सहायता करने की इच्छा
प्रकट का।
स्पेन और इंगलैंड में अब तक मित्रता का भाव या,
लेफिन ड्रेक की कहानियाँ मुनने क बाद दोना जातियों में
शत्रुता का भाव उत्पन्न हो गया। तुम्हे पेरू विजय की कथा
का स्मग्ण हागा। वहाँ सोना-चॉदी इतना अधिक था
कि पनवाले जहाजों में भर भरकर पनामा भेज देते थे और
वहाँ से पचरा पर लादकर नींबर डिडिओस में भेजते थे।
यह नगर एटलांटिक महास गर क किनार पर है। यहाँ
पैसिफिक महासागर के जहाज नहीं आ सकते थे, माल
पनामा में उतारना पडता था और वहाँ से मनुष्य या पशु
ढा-ढोफर इरिग स्पल-सयोजक के पूर्वी तट पर ले आते

, । - सर फ्रैंसिस ड्रेक थे। आज-कल पनामा नहर बन गई है और प्रशान्त महा- सागर के जहाज एटलाटिक महासागर में, कुछ ही घण्टों में, पच सकते हैं। डेक ने उन जहाजो के बार में, जो नौवर दिदि से माल लादकर म्पेन ले नाते थे, मुना था। उन्हों को जन्म उसने अपने अपमान का बदला लेना चाहा। ई० मे दो जहाज और कुछ फिश्तियाँ साथ लेकर की ओर चला और नाबर डिडिग्रीस जा पर देखते ही स्पेनवाले भाग गय। अब उमने मन मत को लूट लेना चाहा, पर दुर्भाग्यवश वह अँगरेजों ने उसको जहाज पर पहुँचा दिनकर कार्य बन्द न हुआ। कुछ दिनो मे ट्रेक अच्छा हक निवासी किमरन लोगो से मेल कर रखा के कठोर व्यवहागे से बड़े हा दुख चाहते थे। एक दिन उन्हान ; #दर टम पनवाले नौंवर डिडिओम म दान है.' खबर पाते ही ड्रेक ने थोडे सी, प्रस्थान किया और रास्ता दुर्गम था, लेकिन देश के नाम मुग्ध कर लिया और इसम मा माई हा। चलते चलन -

के एटलांटिक महासागर को और पारर
पाया। पनवालों को उसके आगमन का पता ला
देशान्वेपण की सरल रुघाणे
से वह पूर्व
प्रशान्त महासागर का दस सकता था।
प्रशान्त महासागर को देखते ही, बल्यावा :
ड्रेक के हृदय में जगत् की परिक्रमा करन का
पर जिस लुट के कार्य के लिए वह गया था वह पूरी न
सन १५७२६
था। फिर भी उमन कई बार हमला करने की चष्टा क
अन्त मे कुछ धन उसके हाथ लग गया।
में वह घर वापस गया। जब अंगरेजों ने सुना कि ड्रेक न
प्रकार स्पेनवाला से बदला लिया है तो वे बहुत सन्तुष्ट हुए।
लेकिन रानी पलिजावेथ ने उसके काम को पसन्द न किया।
सन् १५७७ ई० म ड्रक एक बार फिर रवाना हुआ और
गनी एलिजारथ ने भी अबकी बार स्पेनवालों से असन्तुष्ट
हाकर उसे कुछ रुपया दिया। १३ दिसबर सन् १५७७ ई.
में ड्रेक मारको का और गया और जब वह वहाँ पहुँचा
उसका बहुत ही सुन्दर जल-वायु का अनुभव हुआ। जाडे का
मातु थो। वर्षा हा रही थी, पेड हर-भर थे। अगूर, जैतुन,
नारदा और गहतूत चारा और दिसाई पडदे थ, लेकिन अधिक
विलम्ब न कर ये लोग कप वर्ड द्वीप-पुत्र में पहुंचे। यहाँ
इन्होन मदिरा स लदे हुए एक जहाज का पकडा। फिर
ये ज्या ज्या दक्षिण-पश्चिम में चलन लगे, हवा भी अस्प वग
से करती हुई मालूम होने लगा और अन्त में एक ऐस स्थान
.

देशानापाका सरल कथाएँ
म व पूर्व क गटाटा हामागर को और पश्चिम के
प्रगान्त महासागर दे सकता था।
मान्त महासागर दाने हो, बल्योवा के मटश,
दुक क हाय न जगा का पारामा करन की प्रबल इच्छा हुई.
पर जिन तर के काय क लिए वह गया था वह पूरा न हो
"पनमालो का उसके आगमन का पता लग चुका
गा। फिर भा उमन कई बार हमला करने की चेष्टा की।
पधा उसके हाथ लग गया।
सन् १५७. ई०
म वाघा बाम गया। जब अँगरजी न सुना कि ड्रेक ने इस
पर सवाला म बदला लिया है तो वे बहुत सन्तुष्ट हुए ।
नांकन राना लगानय ने उसके काम का पसन्द न किया।
सन १५७७ ई० म ई क एक बार फिर रवाना हुआ और
गना एलिनावर ने भी अबकी बार म्पेनवालों से अमन्तुष्ट
हाकर उसे कुछ स्पा दिया। १३ दिमबर मन् १५७७ ई०
में डेक मागको को और गया और जब वर वहाँ पहुँचा
उसका बहुत ही सुन्दर जल-वायु का अनुभव हुआ । जाड का
अतु था। वर्षा हा रही थी, पेड हरे-भर थे। अगर, जैतून,
नारङ्गी और शहतून चारों ओर दिसाई पड़ते थे, लेकिन अधिक
विलम्ब न कर ये लोग कप बर्ड द्वाप पुश में पहुँचे। यहा
इन्होंने मदिरा मे लदे नए एक जहाज का पकडा। फिर
ये ज्यो ज्यो दनिण पश्चिम मे चलने लगे, हवा भी अप वेग
से बहती हुई मालूम होने लगा और अन्त में एक ऐसे स्थान

सर फैसिस ड्रेक में आ पहुंचे जहाँ हवा विन्कुल रुक गई और जहाज वहुन धीर धीरे चलने लगा। तुमने शान्त कटिबन्ध का नाम सुना होगा। इसका विषुवत रेसा के पास डालड्रम भी करत है। यहाँ हवा बहुत धीरे-धीर चलती है। डेफ क जहाज डालड्रम मे आ पहुँचे थे और हवा न चलने क कारण उम समय क, पाल लगे हुए, जहाज वेग से नहा चल सकते थे। जब य लोग और आगे बढे तो इनको फिर पृष्टि और ऑधा का सामना करना पड़ा। गर्जन होता था। आकाश में बिजली चमक रही थी और लगातार मेघ- ५४ दिन के पश्चात् ये लोग ब्रेजील के तट पर पहुंचे। जब इन्होंने देखा कि यहाँ क निवासी इनरु नाश के लिए तैयार बैठे हैं तो और दक्षिण की ओर चले और प्लेट नदी के मुहाने पर पहुंचे। यहाँ इनका स्वच्छ पानी मिला पर य लोग आगे बढते ही गये और मेंट जुलियन बन्दरगाह में पहुँच । यहाँ समुद्र में सील मछलियाँ बहुत दिसाई पडी और पैटेगोनिया के पठार में दैत्याकार मनुष्य देख पडे ये लोग अँगरेजों से बहुत बडे थ। इनके शरीर पर कोइ कपडा नहीं था। नाचते-कृदते य लोग अपने देश की वस्तुएँ-जैसे एमू चिडिया और उसके पर-लेकर परदे- शियों के पाम आये। इन्होंने उनको यह सब दे दिया। 1

देशान्येपथ को सरल फगाएँ
परन्तु जर अंगरज इसका कुछ देन लगे वो इन्होंने अपने
राध मे नहीं लिया किन्तु उनका भूगि पर ग्पने के लिए
मकर किया।
दो महीन तक सेंट जुलियन में रहकर हेक फुल तीन
नहाजों के माय दक्षिणी अमेरिफाक नुव दक्षिण का और यहा।
गह जब मंगिलन जल-मयाजा में पहुँचा तब इसन देना कि
पश्चिमी गद्द बहुव टेढ़ा-मेढी है और समुद्र भी कम गहरा
नहीं है। यहाँ क किसी द्वीप में इाको पात से पती मिले।
इन पनियां का इन्होंने, मारकर साने के लिए, जहाज में भर
लिया। जब ये लोग प्रशान्त महामागर में पहुंचे तो इनका
एक जहाज आँधी से दूब गया और दूमरा घर वापस गया ।
ट्रेक एक ही जहाज फ साथ उत्तर फी भर किनारे-
किचार चला और वालपग्जो पहुँचा। यहाँ सान क माल से
भर हुए एक जहाज का उमने गिरफ्तार कर लिया और वही
उतरकर लूटना प्रारम्भ किया। धन के लोम से मैंगरेज अब
बार-बार जहाज से उतरन लग। इस वरह बहुत सा मान
उनके हाथ लगा।
जब ये पेरू के किनारे पर पहुँचे तो इन्हें
कुछ लामा (एक प्रकार के ऊँट) भी मिले । उन्हें इन लोगों ने
साने के लिए जहाज पर लाद लिया। लोमा में ड्रेक ने १२ जहाज
लूटे। आगे चलकर एफ और स्पेनी जहाज का लूटा जिसमें
इसको बहुत मा सोना और चाँदी मिली। लूट का सामान
इतना हा गया था कि स्पेनवाले इन अंगरसों के पके शत्रु हो

सर सिस हक गये ये और बहुत दिनों तक यहाँ ठहरना ड्रेक के लिए उचित न था। यह मंगिलन जल-सयोजक के रास्ते से भी नही लाट सकता था। यहां इस शनु स्पेनवाले इसके लौटने की ही प्रतीक्षा म बैठे थे कि इमन प्रशान्त महामागर के पार करने की ठानी, और उत्तर का और अनुकूल हवा के लिए चल दिया। टेढ महीने चलन के बाद एक सानफ्रांसिस्को में पढुंचा। अभी तक काई यूरोप-निवासी यहाँ नहीं पाया था। यहाँ क देगी लोगों ने इन अंगरजो को देवता मानकर इनका प्रभुत्व म्चीकार कर लिया। ड्रेक ने इस जगह का नाम नबीन लनियन रक्सा और एक सम्भा गाड दिया जिममें अपने प्रागमन की तिथि और समय लिस दिया तथा यह भी सूचित कर दिया कि यह स्थान अब अँगरेजों का है। महारानी एलिजानेय का चित्र भी वहा रस दिया। यहाँ से ढाई महीने के पश्चात् डेक फिलिपाइन द्वीप पहुँचा और वहाँ से मागको के लिए चल दिया। यहाँ के एक द्वीप के राजा ने इसकी बडी आवभगत की और इसे चावल, चीनी, केला, लौग और मुर्गियों भेंट मे दी। इन द्वीपों को शाभा अपूर्व थी। लेकिन ड्रेक को घर लौटना था इसलिए इस सौन्दर्य का उपभोग करने के लिए वा यहाँ अधिक दिन तक न रुक सका और द्वीप- पुल के दुर्गम मार्गों से होकर वह जावा द्वीप में गया। वहाँ से सीधे उत्तमाशा अन्तरीप को ओर चला, फिर उसको पार करते हुए सिमरालिप्रोन म पहुँचा। यहाँ से प्लीमथ की ओर . ।

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देशान्वेषण की सरल कथाएँ
चला और मन् १५८० ई० में तीन चर्प के पश्चात् वह घर
पहुँचा। राना एलिजावेथ बहुत सन्तुष्ट हुई। उसने इसको
जहाज ही पर नाइट की उपाधि दी। मन् १५८५-८६ ई० में
इमन साज का काम नहा किया, पर पश्चिमी द्वीप-समूह में
जाफर कई द्वीप छीन लिये। सन् १५८७ ई० में इमने स्पेन
में कंडा पर हमला किया और स्पेनवालों का कई बार युद्ध में
परास्त किया।
तुमन स्पेनिश आर्मेडा (जहाजी वडा ) का नाम सुना
होगा। इस युद्ध मे सफलता पाना भी इसी का कार्य या।
सन् १५८८ ई. में यह पार्लियामेंट का सदस्य चुना गया।
फिर एक बार हाफिस के साथ पश्चिमी द्वीपसमूर में गया
और जहान पर वामार पडा। मन् १५६५ ई० मे, नौबर
हिडिग्रीस क बन्दरगाह मे, इमका देहान्त हो गया।

सर मार्टिन फ्रोविशर
जन्म--सन् १५३६ ई०, मृत्यु- सन् १५९४ ई०
उत्तरी-पच्छिमी राह से कैथे या चीन पहुँचने की कैट
को इच्छा पूरी न हो पाई थी। उसके बाद भी कुछ दिनों
तक ऐसा कोई नाविक नहीं हुआ जो उस कार्य को पूरा
करता। विलोपी और चंसलर के बारे म तुम्हे याद होगा
कि उत्तर-पूर्व की राह से भी वे कैये नहीं पहुँच सके थे। इम
देश में जाने की आशा अब अँगरेजों ने प्राय त्याग ही दी थी,
पर सन् १५७४ ई० मे जब सर हफ्रे गिलबर्ट को किताब छपी
और उसने लोगों के दिल पर यह बात अच्छी तरह से बैठा
दी कि कैथे मे उत्तर-पश्चिम की राह से पहुँचना असम्भव नहीं
है, तो इंगलैंड के कुछ सौदागरों ने मिलकर किसी ऐसे आदमी
को भेजना चाहा जो इम कार्य को पूरा कर सके।
मार्टिन मोबिशर तैयार हो गया।
यह एक अँगरेज नाविक था। इसका जन्म डॉनस्टर में
हुआ था। बचपन से ही यह ना-चालन के कार्य में लग गया
था। तीन जहाजों के साथ मन् १५७६ ई० मे डेप्टफोर्ड से
यह रवाना हुआ। ब्रिटेन के उत्तरी हिस्से को पार करते
हुए आर्कनीज और शटलड द्वीप-पुज से होता हुआ यह सीधा
सर

पहाड के जमे वर्फ
देशान्वेषण की मगल कथाएँ
पश्चिम की ओर चला।
एक मास क पश्चात् इसे ग्रीनलैंड
दृष्टिगोचर हुआ।
इम बर्फ से टकी भूमि के पार उतरना
असम्भव था, इमलिए यह, सापियो महित, लग्रेडर फी और
चला। समुद्र मे गवती ठण्ढी धारा थी। बडी बड़ी साल
और ह्वेल मछलियों दिमाई पडती थीं।
क टुकडे तैरते हुए दिखाई पड़ते थे। ये बर्फ के पहाड स्वाद
में माठे थे लकिन समुद्र का पानी बहुत ग्याग था। कहीं
कहीं बर्फ क ढोक टूटकर इतने वेग से गिरते थे कि
उनले शब्द से कान बरर हो जात थे। वेल मछलियों इतने
भयङ्कर शद क साथ नाक से पानी का फव्वारा छोटती
पा कि यदि काई जहाज मामने पड जाय तो चिना इये न
बचे। कभी कभी तो जन ने पानी के ऊपर प्राती प्रा तो
दूर से द्राटे-मोटे द्वीप सी प्रतीत होती पी।
मोनिशर के जहाज कुछ दिनों में एक द्वीप क पास पहुँचे।
यहाँ इनका किनारे पर थोडे मे मनुष्य दिखाई पडे। ये लोग
मोनिशर क जहाज देखने आये थे। ये तातारियो की नरह
लम्बे थे, इनका रङ्ग भूरा, बाल काले, नाक चिपटो और
चेहरा फैला हुआ था। ये साल भछनी का चमडा पहने हुए
थे। इनका फिश्वियाँ किनारे पर पडी थी जो सील मछनी
के चमड़े से मढी हुई थीं।
प्रोविशर का दल लैब्रेडर में उतरना चाहता था, परन्तु
जब वर्फ के ढोक टूटकर किनार से समुद्र में गिरने लगे
।

सर मार्टिन मोविशर तो वह जत्था वहाँ से वापस चला और वैफिनलड के निकट फ्रोनिशर साडी मे पहुँचा। निकट की भूमि को एशिया समझकर य लोग किनार उतरे। वहाँ की ऊँची भूमि से इन्हाने समुद्र में कुछ काली काली वस्तुओं को तैरते देसा। जय वे निकट आई तो देसा कि ये मछलियाँ नहीं, बल्कि चमई से मढी हुई किश्तियाँ हैं। किश्ती पर से उतरने पर इन लोगों को घण्टी बजाकर और शीशे में अपना प्रतिविम्ब दिसाकर आश्चर्यान्वित किया जाने लगा। जव इनका विश्वास हो गया व अँगरेजो ने इनको यही घण्टियाँ और शीशे दे दिये। ये एस्किमा लोग थे। एस्किमो लोगों ने भी भालुओं और सील मछलियों के चमडे दिये। मोविशर ने इनमें से एक मनुष्य को पकडकर इँगलंड ले जाना चाहा । बहुत चालाकी से उसने एक को पकड लिया । पहले तो कोई पाम नहीं आया लेकिन मोविशर ने जहाज पर बैठे बैठे घण्टी बजाना प्रारम्भ किया और ज्यों ही एक एस्किमो छोटी सी किश्ती लेकर निकट आया, हाथ पकडकर उमको सींच लिया। जन उम एम्किमो ने देसा कि वह कैद हो गया है तो मारे क्रोध के दाँतों से अपनी जीभ काटने लगा। पर फ्रोविशर ने उसको नहीं छोड़ा। जो चार-पाँच अँगरेज किनारे पर उतरे थ उनको इन एस्किमो लोगो ने पकडकर न मालूम कहाँ छिपा दिया। सन् १५७६ ई० में फ्रोविशर इस कैदी के साथ भालू और सील मछली के चमडे और एक काला पत्थर लेकर-

जब
देशानपण की मग्ल कथाएँ
इंगलैंड पचा। कंधे का रास्ता मिलने की सनर पाकर लोग
वारत सन्तुष्ट हुए। उम काले पत्थर की परीना के पश्चात्
जय डाको यह नाव हुआ कि इममें सोना है तो उनका लोभ
बहन बढ़ा। उन्होंने दुवारा मोपिशर का सन १५७७ ई० म
भना । प्रबका धार भी यह आस-पास के दो एक स्थानों
का पता लगाकर, कुछ काले पत्थरी का इकट्ठा करक, इंगलैंड
का पार चल दिया। रानी एलिजावेथ बहुन मन्तुष्ट हुई।
तीसरी बार सन् १५७८ ई० में मोविशर रवाना हुआ।
फादार पाडो के पास आया तब आँधी इतने वेग से चली
फिप्रोनिशर का जहाज हलमन जल सयोजक में जा पहुँचा
और कैथे जाने का ठीक मार्ग मिल गया, लेकिन मौसमी आँधी
के कारण ये लोग घर को लौट चले। वहाँ पहुँचते ही
इनको ज्ञात हुआ कि वे काले पत्थर किसी काम के नहीं हैं।
अव इनका चौथी बार कान भेजता ? सोना मिलने का भी
कोई पाशा नहीं थी और चीन पहुँचने के कार्य में भी उन्नति
न हुई थी। सन् १५८५ में मोविशर ने डेक क साय पश्चिमी
द्वीपसमूह में कार्य किया और सन् १५८८ ई० म वह स्पेनिश
आमेडा के युद्ध में भी था।
सन् १५६४ में बेस्ट का दुर्ग
लेते समय वह मारा गया।

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सर वाल्टर रेले
मंगा पार्क
डेविड लिविग्स्टन

सर वाल्टर रेले जन्म-सन् १५३२ ई०, मृत्यु-सन् १६१८ ई. वह ग्रीन- फ्रोनिशर की मृत्यु के पश्चात् जॉन इविस ने उत्तरी अमे- रिका में डेविस जल-मयोजक का पता लगाया। लैंड और जीलैंड हाते हुए ७३ उत्तरी अक्षांश तक पहुँचा। इसके पश्चात् उसने उत्तरी-पश्चिमी राह का पता लगाना छोड दिया। पर कई बार वह पूर्वी द्वीप-ममूर में गया और जापानी जल-दस्युओं ने मलका के निकट उसे मार डाला। हेनरी हडसन ने इसके पश्चात् हडसन जल-सयाजक का पता लगाया। फिर उत्तरी अमेरिका के पूर्वी किनारे को छूते हुए वह ४० उत्तरी अक्षांश म पहुँचा। यहाँ जो नदी गिरती है उसका नाम उसने हडसन नदी रक्या । सन् १६१० ई० में वह हडसन की गाडी में पहुँचा। साने का सामान चुक जाने पर उसका विवश होकर लौटना पड़ा। रास्ते में साथियों ने उमको और उसके पुन को छोटी सी किश्ती में उतार दिया। कोई नहीं जानता कि फिर उनका क्या हुआ। विलियम वैफिन ने सन् १६१२ ई० मे इस कार्य को उठाया पर किसी देश का पता नहीं लगा। सन १६१६ ई० मे उसने वैफिन की साडी का पता लगाया। फिर उत्तर-पश्चिम की राह देशान्वेपण का सरल कथाएँ का हँटा जाना बन्द हो गया। मन् १६२१ ई० में ऑरमज के पाम पुर्तगालियों से लड़ते लड़ते वह मर गया। मन १५७८ ई० में अनुमति पत्र लेकर सर हफे गिलबर्ट ने न्यूफाउडलंड को अँगरजों के अधिकार में कर लिया। इस द्वाप के पास उत्तरी ठण्ढो धारा में, जिमको लैब्रेडर धारा करते है दक्षिणी मेक्मिको की गर्म धारा आ मिलती है और कुहरा छा जाता है। जहाजों के लिए यह स्थान निरापद नहीं है। यहाँ कॉड मछलियाँ पाई जाती हैं। न्यूफाउडलैंड मे चाँदी और अन्य सनिज पदार्थ मिलने की बहुत प्राशा थी। थोडी सी चॉदी इसको मिली। साने पीने के लिए यहाँ के लोगों चपातियाँ और मदिरा दी। फल, घाम और तारपीन का तेल बहुत मिला। किन्तु गिलबर्ट के नाविक आपे से बाहर हो रहे थे और अत्याचार भी अधिक हो गया था। इसने सन् १५७४ ई० में चीन जाने के रास्ते के बारे म लिसा था और लोगो को उत्तेजित किया था। दूसरी बार जब यह अमरिका से लौट रहा था, इसका जहाज डूब गया। इमक सौतेले भाई सर वाल्टर रले ने न्यूफाउइलैंड लेते समय इसका बडी महायता का घो। सर वाल्टर रेले का जन्म डिवेनशायर के हेयास नगर में मन १५३२ ई० में हुआ था। वरजीनिया मे इसने आद- मियों का एक टुकडी भेजी और कुमारी रानी एलिजावेथ के नाम से इसको प्रसिद्ध किया।रेले ने इसी देश से पहले अपने

सर वाल्टर रेले
७५
देश में तम्बाकू और आलू पहुँचाया। इसने एल्टोरेडो के
विषय में यह सुना था कि वह सोने-चाँदी से भरा पड़ा है।
वह अब गायना के नाम से विख्यात है। इसी देश की सोज
में रेले निकला। ओरीनाको नदी में इसने छोटी छोटी
किश्तियाँ डाल दी। जहाजों को पीछे छोडकर यह अग्रसर
हुआ । वर्षा सूब हो रही थी। नदी में बाढ आ गई थी। उस
देश के लोगों ने पेडों पर अपने झोंपडे इसलिए बना रक्से घे
कि बाद में बह न जायँ । यहाँ गर्मी भी बहुत है। रेले के
साथी घबरा गये थे। लेकिन जब ये किनारे पर उतरे तो देश
बहुत सुन्दर प्रतीत हुआ। पेड फले हुए थे और रङ्गीन चिड़ियाँ
इधर-उधर उड रही थीं। यहाँ के निवासी पुर्तगालवालों से
बहुत घबराते थे। जब उन्होंने सुना कि ये पुर्तगाल के रहने-
वाले नहीं हैं तो उन्होंने इनको मदिरा, फल, चिडियाँ, कछुओ
के अडे और रोटियाँ ला दी। अब गायना पर्वत का भी पता
लग गया। बडे भयङ्कर झरने और ऊँची ऊँची घास दिग्पाई
पडी। हिरन चर रहे थे। पेड़ों पर बैठकर पक्षी सुरीली
बोलियाँ बोल रहे थे। इम स्थान को यहाँ पर लैनोम करते
है। दक्षिणी अमेरिका में यह वडी अच्छी जगह है। लैनोस
से बडे बडे पत्थर के टुकडे साथ लेकर रले घर की ओर
वापस चला। रास्ते में इसको ट्रिनिडाड द्वीप मिला।
सन् १६०३ ई० मे रले से जेम्स प्रथम का झगडा हो
गया। उसने रेले को कैद कर लिया। पर सन् १६१७ ई० में

पर + देशान्वषण का मग्ल कथाएँ यह छोड दिया गया, क्योंकि राजा को इसने गायना से सोना और चादा ला देने की आशा दिलाई थी। राजा ने स्पेनवालों स न लडने क लिए भी बार बार इमसे कह दिया था। रलेन वहाँ जाते ही स्पेनवालों से झगडा कर लिया। समाचार पाकर राजा जेम्स ने पेनवालों को सन्तुष्ट करने के पए इसे मरवा डाला। रले ऊँचा पुरा धीर पुरुष था पर था वडा घमण्डो । कहा जाता है कि बुद्धिमान, चरित्रवान् और उत्साही पुरुषों म यह अद्वितीय था। रानी एलिजावेघ का यह प्रिय सदस्य एक बार रानी वर्षा के पश्चात् टहलने के लिए घर से निकली तो रास्ते म उसको कुछ कीचड मिला। रानी एलिजा- वेघ अपने जूते का बचाने के लिए वहीं सड़ी हो गई। रेले गना से मिलने के लिए आया हुआ था। उसने बिना सोच- विचार क अपना नया कोट वहाँ फैला दिया और रानी पार हो गई। रेले के इस व्यवहार पर वह बहुत सन्तुष्ट हुई और तभी से मृत्यु-पर्यन्त रेले रानी के प्रिय पात्रों में गिना जाने लगा।

जेम्स कर्टियर
जन्म-सन् १४९४ ई०, मृत्यु-सन् १५५५ ई०
जिम प्रकार अंगरजी की ओर से केंवट, प्रोयिशर, डेविस,
हलमन आदि नाविक उत्तरी अमेरिका के उत्तरी भाग की खोज
में लग हुए घ उमी प्रकार फ्रांसीसी भी अपने नाविको को
इसी कार्य के लिए भजते रह । प्रांस के राजा फ्रांसिस प्रथम
ने जक्म कर्टियर को मन् १५३४ ई० में भेजा। जैक्स का
जन्म मंट मोलो में हुआ था। वह न्यूफाउडलैंड के निकट
पचा। यहाँ पर उमने एक द्वीप मे बहुत सी चिडियां देवीं ।
इन चिडियों की खोज में सफेद भालू भी ममुद्र में तैर रहे
थे। उस, इन्दा चिडियों और भालुओं का शिकार फ्रांसी-
सिया ने किया। फिर न्यूफाउंडलैंड के उत्तरी किनार से हाते
हुए जेक्स ने वेली जल-सयोजक का पता लगाया। इसके
याद वह प्रिस एडवर्ड द्वीप तक पहुँचा ।
यह द्वीप बहुत ही मुन्दर था। पेडी के पत्ते पर रङ्ग के
थे। सुगन्ध चारों ओर फैल रही थी और पेडी में अनेक
प्रकार के बेर लगे हुए थे। गर्मी बहुत ही अधिक थी।
ऋतु न थी। इसलिए कर्टियर फिर उत्तरी राह से

देशान्वेषण की मरल कथाएँ फ्रॉम लौट गया। चलने के पूर्व न्यू ब्रमविक से इमने यहाँ कदा मनुष्य का माप ले लिया। मन् १५३५ ई० म फर्टियर फिर लंबेडर के किनार आया और अर का वार न्य नसविक क उन दोनों आदमियों ने, तिनको कर्टियर फ्रॉम में ले गया था, रास्ता बताने में बहुत सहायता दी। इन्होंन कर्टियर को सेंट लारेंस की ग म देश के अन्दर जाने को कहा। कर्टियर चल पडा। गम्न म उसने बहुत से अद्भुत जल-जन्तुओं को देग्या । इनको अगरना ग वालग्स करते हैं। ऐसे जानबर प्राय ठण्ड समुद्र म ही पाये जाते हैं। चलते चलते कर्टियर अपने साथियों के साथ मेंट लारेम नदा के मुहाने पर आ गया। उमने ममझा कि एशिया जाने का गस्ता मिल गया है। परन्तु ज्यों ज्यो वह अन्दर की पार बढता गया, उमको पानी मीठा मालम होता गया । अभी तक लोग यही जानते थे कि एशिया और योरप के पाच में सारा ममुद्र है, माठा नहीं । अन वह धेरक पहुँचा और वहाँ अपने वडे यड जहाजों का छोडकर छोटी छोटी नावों में मांट्रोल गया। मट्रिोल मादम्रीयल शद से बना है। मोटघायल' का अर्थ राज- पर्वन है। यह छोटा सा गाँव पहाड पर वमा था। यहाँ स फिर ये लोग लौटे और रास्ते में, सर्दी के कारण, बहुत से बीमार पडे और मर गय । अबकी बार ये लोग बहुत से

७६
जेम्स कर्टियर
अमेरिका-निवासियो का अपने साथ ले आये और न्यूफाउडलैंड
के दक्षिणी रास्ते से गये। इस रास्ते को केवट जल-सयोजक
कहते है। कैबट ने ही पहले इसका पता लगाया था।
सन् १५४१ ई० मे फिर अन्तिम बार कर्टियर ने सेंट
लारस नदी में पैर रक्सा। यहाँ केक का किला बनवाया
परन्तु मांट्रोल के पश्चिम की ओर इतने झरने थे कि आगे
बढना असम्भव हो गया। अत यह सन् १५४२ ई० में
सन् १५५५ ई० मे इसका देहान्त
हो गया।
फ्रास वापस आ गया।

ܢ

मेमुयेल डी जप्लेन
इमने शर्शन झील का पता लगाया। इसके पश्चात् शंतन
कनाडा म आता रहा। इमन चौडियर जल-प्रपात और
पोटावा का पता लगाया । मन् १६१५ इ० में इसने जार्जियन
का याडी और पुरन झील का पता लगाया। फिर वहाँ से
परन क निकट के कुल अमरिकावाला क माघ इमो पटा-
रिया झीत को पार किया। इन मनुष्या क विपक्षी दल ने
इमको घायल किया और यह करू लोट गया।
यारपवानी में शप्लेन ही पहला मनुष्य था जिमने अमे-
रिका क अन्दर झीलों देशों और मनुष्यो का पता लगाया।
मा १६२० ई. म यह कनाडा का गवर्नर नियुक्त किया गया।
यहाँ इसने अपनी जल यानाओं के निपय में एक प्रवन्ध लिया।
मर १६३५ ई० में इमका देहान्त हो गया।

मगो पार्क नाम-मन् १७७१ ई०, मृत्यु-सन् १८०६ ई० पमिका के समुद्री किनार की भूमि का पता तो यारप. पाता लगा ही लिया पा पर अन्दर जाने का साहस बहुत चोड लोगो ने किया था। जैसे विपुवत रया के पार किये जाने के पहले समुद्र के विषय में बहुत अद्भुत और भयङ्कर कहा- नियों रची गई पी वैसे ही इम देश क भीतरी हिम्मे के बार में भी बडा भयदर कथा सुनने में आता धी। वास्तव में य किम्मे ठीक भी थे। देश या तो उजाड गण्डों से भरा है या नगला से। यहाँ पशु भी बहुत भयङ्कर हैं और अमभ्य नर- भनफा की अधिकता है जिनके मारे लोग भीतरी हिस्से तक नहीं पहुँच मके थ। इसी से अब तक अनिका का अज्ञात देश कहते थे। जो दो-एक साहसी पुरुप देश के अन्दर गये भी उनका फिर पता न चला। ऐसे देश में सोज का काम होना और सहा सही हाल जानना वडा ही कटिन है। स्कॉटनंट का रहनेवाला एक डाक्टर वडा सारसी था। यह पूर्वी द्वीप समूह मे भी हा आया था। इसने अफ्रिका के अन्दर के दशों का पता लगाना चाहा। इसका नाम मगा पार्क था। इमका जन्म सेलक के निकट फाउल

मगोपा
गीरम में हुआ था।
इमा एमिनवरा विश्वविद्यालय में
शिक्षा पाई थी।
मा १७६५ ई. में यह अधिका का पश्चिमा किनारे की
और नादार गदा का पता लगाने की इच्छाम, चला।
प्रभा तक लोगों का यही निम्बाम गा कि नाउर नदी
पश्चिम का भार यहती है। नकग म दमन म नुम्हे ज्ञान हो
नायगा किमान करनवालो न हम लागा का कितना पड़ा
भ्रम र किया है।
घरस लिन क एक महीना पश्चात् मगापागनिया नदा
क मुहान पर प. चा! यह नदी गारी था। कामह भी इमम
पहुन था। इमर किनारे पेड पड घ जिनका जई कराता
पानी म इवा थी और कहा किती घा। उनम मगर और
हिपापेटिमम भरे पड़े घ। पसी नदी म मगा पार्क न अपनी
किश्ती आनी। पूर्व की ओर चलन चलत यह पिसैनिया म
पहुँचा।
यह अगरजों के माल इकट्ठा करने की जगह घो।
यहाँ माने और हाघोदात का ढेर लगा था। निमा क लिए
यहाँ हमी भी इकट्ठा किय जाते थे। इस देश की भाषा
सीसने के लिए यह यहाँ रुक गया, पर बीमार पड
बरसात का मौसम आ गया था।
बहुत ही गग्मी पडती है। जब धूल से भरी हुइ प्राधा
चलने लगती है तो दम घुटने लगता है। बारिश इतनी तेना
से होती है मानो आकाश टूटा पड़ता हो। मेघ गर्जन भी
गया।
यहा दिन में

दशावपथ की मग्न पाएँ
भयानक । गति कममय मटफ नोलन लगते हैं। लोमडियो
पार लकडयग्य इतन जोर म चिल्लाने हैं कि किमी नये प्रारमो
के लिए यहाँ बोडी टेर भी ठहम्ना भावह हाना है।
इम प्रान्न म नग्मार गर्मियों में होती है और जाटे में
सपा पटता है दो ग मीमम होने है। मगो पार्क सूत्रे
क दिना म अन्ठा हो गया और पिसनिया से रवाना हुआ।
इसने दा हाशियां का अपने साथ ले लिया। सामान
लाटा लिए दा घोड और दो समर भी इमन ले लिये ।
उच दर चलकर इगक साय और रवशा पा मिले।
गोश मदाना पा पचे। नकशे मे देतो, यह अरय का
मदीना नहीं है। मदीना के राजा न इसका आगे बढने की
गय न दा, लकिन इमने जब आग्रह किया तो उमन एक
पथ प्रदर्गक साप कर दिया। ये लोग कुनार पहुँचे। यहाँ
इन्दोन देशा लोगो का कुश्ती लटते देखा। मगो पार्फ के
माथा अब आगे बढना नना चाहते थे, इसलिए एक पत्थर
पर मन्त्र फककर उस पर गुरुते थे और फिर उसा पत्थर का
मार्ग का रना के लिए अपने मामने फेंक देते थे। तीन बार
गेमा कग्न पर उनके हृदय में इतना विश्वास हो जाता था कि
वे नाचते कृढते आगे बढते थे। अब इनके मामने फेलमो नदी
यह मेनीगाल नदी की सहायक नदी है। नदी पार
ग्म प्रदेश की राजधानी थी। मगो पार्क वहाँ के राजा से
जा मिला और उसे अपनी छतरी और कोट दे दिया। राजा
पडी।

मगो पार्फ
सन्तुष्ट हो गया। मगो पार्क से रानियों ने भी बहुत स प्रश्न
किये। इसका गोरा रङ्ग देखकर रानियों को बडा अचम्भा
हुआ। उन्हाने कहा कि इसको मा ने जन्म के पश्चात् इसको
दूध म दुना दिया था, इसी से यह गोग है।
यहाँ से छुट्टी पाकर मगो पार्फ आगे बढा। अब उसे
सेनीगाल नदी दिसाई पड़ी। यह नदी इतनी गहरी न थी
जितनी कि गलिया। नल स्वच्छ पा। नदी मन्द गति से
ग्तीली और पथरीली भूमि पर वरती थी।
आसपास की
भूमि ऊँची पी और उम पर हरी हरी घाम थी। इसके
निकट ही सेती होता थी। इम नदी का पार करक
मगो पार्क कैमन गज्य म पहुँचा। यहाँ क गजा ने
मगो पार्क की आवभगत की और आगे बढने म इसकी
महायता की। कार्टी पहुँचने पर इम गोरे आदमी को
देखने के लिए बार बार लोग आने लगे। यहाँ से यह
मूर लोगो की राजधानी गाग नगर में पहुँचा। यह नगर
बहुत विस्तृत पा। यहाँ क मकान मिट्टी और पत्थर के थे।
राजा ने इमका पथ-प्रदर्शक देना अङ्गीकार कर लिया। अब
इसके साथी आगे बढ़ने को तैयार न हुए।
एक माथी के
सिना और सब भाग गये। इन दोनों क साथ मगी पार्क
उत्तर-पूर्व की ओर चला। रास्ते म मृर लोगो ने इसका बहुत
सताया और इसका बहुत मा सामान छीन लिया। अन्त में
निनाउन म यह पकड लिया गया। मूर लागों ने इसको

1
दशावपण की मग्ल कमाएँ
अपने गना क पाम पहुँचाया। राजा ग्यमा गाडं हुए एक
सुन मैदान म पड़ा था। इधर-उपर बकरियाँ चर रही थी
पौर बहन से ऊँट नया ढार भी पाम ही बडे थे। यहाँ
पन्चत ही इसका नलाशी ली गई और मार प्रभा के इमको
पागल कर दिया गया। यह जानने के लिए कि यह भी
“न्हीं की तग्र-मनुष्य है, इसका उँगलियों तक गिनी गई ।
यह कैद कर लिया गया। एक मूअर के माथ रहने के
लिए इमका जगह मिला । राजा ने इसका कुतुबनुमा ले
लिया और जब देखा कि उसकी मुई, जिधर भी रखिए, एक
हा पार धूमती है तो उसे जादू का ममझकर लौटा दिया ।
बालका, क्या तुम भा इसी गजा का नाई कुतुबनुमा का
देखकर घबगमाग? क्या तुम बता मफत हा कि यह सुई
एक हो और क्यों घूमती है। भला बनाओ वा वह कौन
दिशा है जिधर यह घूमती है। मगो पार्फ यथेष्ट अपमानित
हा चुका था। पर जब यह वीमार पड़ा और समूम हवा
रत के पहाड बनाने लगा तो बहुत धगया । उमने वहाँ
से भागना चाहा। मूर लोगों ने अपने शत्रुनो मे लडाई छेट
अपन शर्मा का, आगे बढ़ने की, यबर पाकर वे
मा उत्तर की प्रार बद। यहाँ मगो पाम से रानी का मेंट
हुई। मूर लोगों ने इसक मात्र अच्छा बर्ताव किया।
लोग रगिस्तान क निकट आ पहुचे
और रेगिस्तान का
कष्ट प्रारम्भ हो गया था। लोगों को जल अच्छी तरह से
।
दी थी।
पर
-

मगो पार्क
नब
।
नहीं मिलता था। यदि कहीं एक-आध कुमआ मिल भी जाता
तो वहाँ इतनी भीड लगी रहती थी कि आपस मे मार-पीट हो
जाती थी। मगो पार्क को विधर्मी समझकर वे लोग कुएँ
के पास जाने हो न देते थे। जानवरों को भी बहुत कम
पानी मिलता था और कभी कभी तो बेचारे गीनी मिट्टी
(कीचड) का ही माकर प्यास बुझाते थे।
मगो पार्क को अब जर्रा जाने की अनुमति मिली।
यह चला तो इतने वेग से ऑधी चली कि इसके कान और नाक
में धृल ही धूल भर गई। इसका दम घुटने लगा। जानवर
घयराकर इधर-उधर दोडने लगे। मगो को डर लगता था कि
वह इनके पैरो के नीचे दबकर कहीं मर न जाय । इस प्रान्त
म बुरके का व्यवहार कदाचित् इसी कारण होता है।
जर्रा में पहुँचते ही ज्ञात हुआ कि शत्रु निकट है। मारे
डरक मूर लोग, मगो पार्क का साथ लेकर, वापम लौटना चाहते
थे। परन्तु एक दिन यह बहुत सर भाग निकला। चलते
चलते प्यास क मारे मरने लगा। उस समय बडे वेग मे पानी
बरसने लगा। अपने कपडों म इस जल को इकट्ठा कर इसने
पी लिया । बहुत कष्ट के बाद यह सेगो नगर म
पचा। इतने दुस के पश्चात् इसको बहुत ही आनन्द हुआ
क्योंकि अब इसे ज्ञात हो गया कि वह नाइजर के किनारे
पहुँच गया है। मगो लिखता है कि नाइजर टेम्स के बराबर
चौडी है और धीर धीरे पूर्व की ओर बहती है। सेगो नगर

देशान्येपण की सरल कथाएँ
बहुत ही समृद्धिगाली है। अफ्रिका क वीच में एमे नगर का
होना उस समय पडे आश्चर्य की बात थी।
संगा पहुँचन क एक दिन बाद ही यह नदी के मुहान का
ओ चल दिया और मिला में पहुँचा। नदा बढी हुई थी।
पर यहाँ सलाट पडा। इसका स्वास्थ्य विगटन लगा।
गम्न म जगली जानवर भी अधिक घ, फिर हबशियों का भी
डर था। इसलिए ऐसी अवस्था में नदी के मुहान तक पहुँ-
चना असम्भव ममझकर यह एक कारयों के साथ पिस निया
गया। फिर एक जहाज पर बैठकर पश्चिमी द्वीप ममूह गया
और वदों से २१ वर्ष के बाद इँगलिम्नान पहुँचा।
मन् १८०५३० म मगो पार्फ दुवारा गैरिया की और चला।
अपका घार बनत स मिपाहियों को माघ लेकर यह नाइजर
नदा के पास पहुँचा। यहाँ इमन एक किश्ती कर ली। पाठ
आदमियों के साथ उसे रोता हुआ यह मुहान का प्रार चला।
दिबकट के बाजार में इसने अपनी वस्तुओं का आदान प्रदान
किया। वहाँ से कुछ दूर पूर्व की ओर येते हुए यह दक्षिण की
ओर चला और चीमा म पहुँचा। यहाँ के निवामियों ने इस
पर हमला किया और लगभग सन् १८०६ ई० मे इमको
मार डाला।
मगो के अधूर कार्य का लैंटर ने, मन् १८३० ई० में,
पूरा किया। उसका नाइनर का मुहाना मिल गया ।

जेम्स बस जन्म-स्थान--किनायर्ड, सन् १७३० ई०, मृत्यु--सन् १७९४ ई० जेम्स स स्कॉटलैंड का रहनेवाला था। खोन के कार्य में बचपन से ही इसको बहुत उत्माह था। पर इसे अव- सर बहुत कम मिलता था। यह मन् १७६३ ई० मे एलजी- यर्स में अँगरेज मरकार की ओर से कोमल (व्यापारी दूत ) नियुक्त किया गया। यहाँ इसको अफ्रिका के भीतरी देश के बारे में बहुत से किस्से ज्ञात हुए। इमने अरवा भापा भी सीस ली। सन् १७६८ ई० म यह काहिरा नगर मे गया। वहाँ का बादशाह आकाश विज्ञान और वैद्यक सम्बन्धा इसके गुणा का सुनकर बहुत मन्तुष्ट हुआ। उसने नील नदी की खोज करने में इसका यथासाध्य सहायता का। ३० गज लम्बी एक किश्वी लेकर ब्रुस नदा के उद्गम की ओर रवाना हवा विपरीत दिशा में चल रही थी। बडे बडे पाल काम नहीं देते थे। नदी के आस पास भूमि हरी-भरी थी। पिरमिड भी दृष्टिगोचर होते थे। अस्वान तक चलकर इसको जल-प्रपात मिले। इनको पार कर किश्वी को आगे बढाना बहुत ही था। इसलिए इमने केने तक वापस हुआ।

देशान्वपए की मरल कथाएँ
जाना ठीक समझा। यहाँ इसने किश्ती को छोड़ दिया।
फिर कुछ कारवाँ क माघ यह लाल मागर की ओर चल दिया।
घाई म घोडा अंटी और हवशियों को इमने माघ ले लिया था।
राम लाल मागर के रास्ते तक के वर्णन में यह लिखता है-
न्म कोइ भा प्राणी मष्टिगोचर नहीं होना। पेड-पौधे का
तो नाम तक नहीं है। पीने के लिए चारा पानी भी नहीं
मिलता। ऐम जानवर भी नहीं मिलते जो प्राय रेगिस्तानों म
पाये जाते हैं। आकाश में चिडियाँ भी नहीं दिसाई पडी।"
एस मार्ग से चलना ठण्ड देश के रहनेवाले के लिए बडा
कटिन कार्य था। पर धैर्य के साथ ब्रूम बढता ही गया ।
अब इसका रत के पहाड़ दियाई पडने लगे। ज्यों ज्यों यह पूर्व
की ओर चलता गया त्यो त्यो सङ्गमरमर के पहाड दिवाई
पडन लगे।
लाल सागर के किनारे सीयर नगर दिग्याई
दिया। यहाँ म किश्ता पर बैटकर घूम सिनाई प्रायद्वीप
गया, वहाँ स जद्दा पहुँचा। यहाँ एक महीना रहकर
बाबुलमदव का ओर चला और वहा से घूमकर एरीट्रिया
का पूर्वी तट पर ममावा नगर में पहुँचा। इमने काहिरा क
राजा की चिट्ठियां यहाँ के राजा को दी।
अब इसका बडी
आवभगन हुइ। एपीसानिया के राजा के लडके वीमार पड़
थे, उसने ममाया क राजा का चिट्ठी लिसी कि उस अँगरेज
डास्टर का भेज दीजिए जो आपक यहाँ था। कुछ साथियां
को लेकर अम एबीसीनिया की ओर चला।
रास्ते म
,

4-
जम्म प्रेम
सिह निकलते थे। घडी दहा शहर भी थीं। मार्ग में
काले आदमा प्राय इमका १५ पावरी सन
१७७०ई० म यह गांउर पश्चा! पदमानिया का गनारा
में नहा था, पर रानी ने अपन दग्दमका दिय।
बधो का चचक निकली। कमरकरवाजे और RPA
कियाँ बन्द कर दी गई शा। नम ने ग्यवानों
कियो का गुलया दिया पर मनाई कनिए जोर-३
एक नदी मिली, जिममें लाल मिट्टी नि rana
के पश्चात् इसना पानी हा गया पानी
का डुबा दिया था।
अव या गा
यहा के राजा ने अतिधि की दटा रहा
विचिनता यह थी कि चाँदी का
के रुपय काम म लाय जाते थे। एक
पर जिन्होंने इस
माग्यो का
देसा र उन्हें आश्चर्य नहा शाद: श्री
गेहूँ, जी और मटर है। पदाधि
मानी गोटर
नगर है। इसी नगर का पार गम्न में दाना
और झाडियों पी। असर में दावारे मार
बात थी।
राजकमार अच्छेहान लगे! .....-m
--

।
देशान्वेषण की मरल रुपाएँ
लाग पामार पड गय, कुछ भाग गये और कुछ मर गये।
स्पीक भी वामागे से बहुत दुनला हो गया। फिर भा चलवे
चलने वे लाग करन म पहुँच । यहाँ क राना न उनके मार
बहन अच्छा वाव किया ! मन १८०२ ई० म पीक मुन्दर
गांडा प्रदेश में पहुंचा। यहाँ का जलवायु बहुत अच्छा
है। कला अधिक उपन होता है। यहाँ मकानों में मफाई
अधिक है। यहाँ क निवासा अपने राना का सबसे अधिक
निशाला मानते ।
प्रभा तक नाल नदी का पता नहा चला था और पीक
इसी साज म विक्टोरिया न्याना क उत्तरी किनार को देवता
दयता आगे बढ़ गया। यहाँ से वह दक्षिण की ओर लोटा
यहाँ उमने रिपन प्रपात क पाना को १०० फीट का ऊँचाई से
गिरत देया । यह बहुत ही मुन्दर दृश्य था। मछलियाँ, मगर
और दरियाई घोड (हिपापेटिमम ) इधर-उधर पानी के
बाहर मिर निकाले फिर रहे थे। मछली माग्नवाले कॅटिया
लिये हुए किनारे पर बैठे थ । छाटी छोटी नामें इधर-उधर फिर
रहा पी। यह दृश्य देखकर ये लोग नील नदी के मुहाने की
ओर नावों में उठकर चने, परन्तु वहाँ के राजा ने उनका आगे
न वढने दिया। तब नारें छाडकर वे लोग नदा से बहुत दूर
पश्चिम की ओर चले गये। पर विक्टोरिया न्यानाक वाच की
झील कियोगा का पता न चला। एलबर्ट न्याना क विषय में
उन लोगों से यह सुना कि वह बहुत दूर नहीं है, पर वहाँ पहुँच
-

-
जॉन दैनिग स्पीक
न सक। इसलिए ये लोग नदी के मुहाने की ओर चले और
गोडाकागे में पहुँचे। यहा पर स्पीक एक और माथी सेमुयेल
कर और उसका वीम जा मिना। फिर यहाँ स काबिंग
होते हुए मन (८६३ ई० में वर गलैंड पहुँचा। बन्दुक की
गोली लगन मे सन् १८९४ ई० मे उममा मृत्यु | गई
सेमुयल चकर का फ़िरमा यह था कि यह काहिरा में
सन् १९६१ ई० में अपनी पत्नी क मार, स्पीक मिलन क
लिए, चला और थोडा मी अरनी भाषा सोचकर वर नक
पहुँचा। वहाँ मे गटबरा नदी में हाते हुए पीसीनिया
म गया और नील की नाला शापा क गो पारनूम पहुँचा ।
फिर नवंत नील के रास्ते गोडाकारो म स्पीक में मिला।
इमन म्पीक से एलर्ट न्याना का नाम सुनकर वहाँ
जान की ठान ला। मार्ग दुर्गम था। इसक माघिया न
भी इसका धोखा दिया। इम प्रान्त कगना न भी पहले-
पहल ठीक रास्ता नहा बताया। में
वन्दक लेकर उसने राह बता दी। मन् १९६४ ई० में
वकरन एलर्ट झील का पता लगाया और मर्चिसन प्रपात
तक नाव खते हुए पहुँचा। अब यह वापम चला और मुसीबते
झलकर गोंडोकागे पहुँचा। फिर वहाँ स पारत्म और
सौकिन क गन्ते, जा लाल सागर के किनार पर स्थित है,
सन् १८६५ ई० म यह विलायत पहुँचा
अन्त
चकरस एक

-
६४
देशान्वेषण की सरल कथाएँ
लोग वामार पड गये, कुछ भाग गये और कुछ मर गये।
स्पाक भी बीमारी से बहुत दुबला हो गया। फिर भी चलते
चलने वे लोग कैरन म पहुँच। यहाँ के राजा ने उनके सार
ब- अच्छा बर्ताव किया। मन् १८६० ई० मे स्पीक सुन्दर
यूगांडा प्रदेश में पहुंचा। यहाँ का जलवायु बहुत अच्छा
है। कना अधिक उत्पन्न होता है। यहाँ मकानों में सफाई
अधिक है। यहाँ के निवासी अपने राजा को सबसे अधिक
शनिशाला मानते थे
प्रभा तक नील नदी का पता नहीं चला था और पीक
इसा सोनम विक्टोरिया न्याना के उत्तरी किनार को देखना
दगता आगे बढ गया। वहाँ से वह दक्षिण की ओर लौटा ।
यहाँ उसने रिपन प्रपात के पानी को १०० फीट की ऊँचाई से
गिग्न देवा । यह बहुत ही सुन्दर दृश्य था। मछलियॉ, मगर
और दरियाई घोडे ( हिपोपोटेंमम ) इधर-उधर पानी के
वाहर सिर निकाले फिर रह थे। मछली माग्नेवाले टिया
लिये हुए किनारे पर बैठे थे । छोटो छोटी नावें इधर-उधर फिर
रही पी। यह नश्य देखकर वे लोग नील नदी के मुहाने की
पार नावों म पठकर चले, परन्तु वहाँ क गजा न उनको आगे
न बढने दिया। ना ना छोडकर वे लोग नदा से बहुत दूर
पश्चिम का ओर चले गय। पर विक्टोरिया न्याञ्जा क वाच का
झील कियागा का पता न चला। एलवर्ट न्याब्जा के विषय म
उन लोगांसे यह सुना कि वह बहुत दूर नहीं है, पर वहाँ पहुँच

पर
डेविड लिविन्स्टन
गॅबर्ट मुफैट ईमाई पादरी था। यर धर्म-प्रचार के लिए
यहा आया था। इसने देशा लोगों के माथ रहने से उनकी
भापा और आचार-व्यवहार भी सीप लिया था। खोज
के कार्य में इमन लिपिम्स्टन की बहुन सहायता की।
लिविरस्टन बचुभाना लोगों की भाषा सीसने की इच्छा से
बहुत दिनों तक उत्तमाशा अन्नरोप में रहा । फिर उन लोगों
का अपने वश में करके आप ईमाई धर्म के प्रचार-कार्य में
लगा रहा। यह जब भाषा सीस चुका तो ये लोग इसका
वहुत आदर करने लगे। सन १८४६ ई० म रवाना होकर
इमने नगामी झील का पता लगाया। मैवात्सा म इसको
एक सिह ने घायल कर दिया । पर यह उत्तर की आर बटता
ही गया ।
यहा क शामक ने सबका मिलकर रहने की
जगह दे दी। लिविस्टन यहाँ हर प्रकार के काम करने
लगा। कभी तो यह लडको का पटाता, कभी व्याख्यान
देता और कभी दवा बॉटता था।
यहाँ के डच निवासियो का बुअर करने हैं। उन लोगा
ने लिविग्स्टन को बहुत दुख दिया। सन् १८४६ ई.
में यह अपने साथ कुछ मनुष्यों को लेकर कलहारी
रेगिस्तान का और चला। कहा जाता था कि कलहारी
में एक झील है। लिविस्टन महीने भर नक उसे हूँढता
रहा, पर इमको एक बूंद भी पानी न मिला।
यह नगामी झील के पास पहूँचा और वहा से वापस आया।
अन्त में
७

डेविट लिविग्स्टन जन्म स्थान लेनटायर, सन् १८१३ ई०, मृत्यु स्थान-लाला, सन् १८७३ ई. नील लिविग्स्टन - इपिड जैनेट चास एग्नीन । - विड लिविस्टन छोटा उम्र में एक मई क कारखाने में कास किया करता था। इसन इतना धन इकट्ठा कर लिया या कि डाक्टरी पढन क लिए यह ग्लासगो चाना गया। फिर सन १८४० ई० मे, डाक्टरी पाम कर ले। पर, लदन मिश- नरी सामाइटा ने इसका अपना कर्मचारी नियुक्त कर लिया । इस चीन जाने की प्रबल इच्छा थी, पर उसी समय अँगरंजा और चीनियों में लडाई बिट गई थी इमलिए यह वहाँ न २० नववर मन् १८४० में यह अफ्रिका का ओर चल दिवा और अलगाया का साडी म उतरा। यहाँ इसने रॉबर्ट मुफैट की लडका स विवाह कर लिया । इम सम्बन्ध के कारण डविड लिविगटन का देशों में जाने में बहुत सहायता मिला। जामका।

इविड लिविस्टन
रॉबर्ट मुफैट ईमाई पादरी था। यह धर्म-प्रचार के लिए
यहाँ आया था। इसन देशी लोगो क माथ रहने से उनकी
भाषा और आचार-व्यवहार भी सीप लिया था। खोज
के कार्य में इसने लिचिम्टन की बहुन सहायता की।
लिविन्स्टन चुग्राना लोगो की भाषा मीनने की इच्छा से
बहुत दिनों तक उत्तमाशा अन्तरीप में रहा। फिर उन लोगों
को अपने वश में करके आप ईमाई धर्म के प्रचार-कार्यम
लगा रहा। यह जब भाषा सौय चुका तो ये लोग इसका
वहुत आदर करने लगे। सन १८४६ ई० म रवाना होकर
इमने नगामी झील का पता लगाया। मवात्सा म इमकी
एक मित्' ने घायल कर दिया । पर यर उत्तर का और बढता
यहा के शासक न सबका मिलकर रहने की
जगह दे दी। लिविग्स्टन यहाँ हर प्रकार क काम करने
लगा। कभी तो यह लडकों का पढाता,
कभी व्यारयान
देता और कभी दवा नौटता था।
यहाँ के डच निवासियों का बुअर करते हैं उन लोगो
ने लिविग्स्टन का बहुत दुख दिया । सन् १८४६ ई०
म यह अपने माथ कुछ मनुष्यो को लेकर कलहारी
रेगिस्तान का और चला । कहा जाता था कि कलहारी
म एक झील है। लिविग्स्टन महीने भर तक उसे हुँढता
रहा, पर इसको एक बूंद भी पानी न मिला। अन्त में
यह नगामी झोल के पास पहुंचा और वहाँ से वापस आया।
ही गया।
।

देशान्येषाण की मग्ल कथाएँ
सन १८५१ ई० म यह मक्कालोलो लोगों कराजा के पास गया।
यर देश बहुत ही उपनाउ था। यहाँ बहुत नदियाँ भी थीं।
एक वर्ष से कुछ ही अधिक दिनों तक यह अफ्रिका के पार
ग्न में लगा रहा और बहुत कष्ट उठाने के पश्चात् मेंट पॉल
में पञ्चा। नकशे में देसो सेंट पॉल कहाँ है। इसी स्थान
- लिपिग्म्टन ने जेम्बिी नदी का देगा। यहाँ से रह
फिर अपनी स्त्री को एक नगर में पहुँचाने गया । उसे पटुचा-
कर मजालाना लोगों क पाम वापस आया। फिर इनमें से
बुछ का लेकर लौऐटा नगर की ओर चला। लेकिन गम्व में
बमार पड़ गया, पर चलता ही रहा। इसने गस्ते में शत्रुओं
का ममझाया। मैजिक लालटेन की वरचीरें दिखाकर यह
उन्हे भुलाता रहा। देगा गजाओं ने मार्ग में कर मांगा
तो लिविण्टन न अपना कोट, बटन,
दुशाला
आदि दे दिया।
साना भी चुक गया था और लोग बहुत
घक गय थे। अन्त में बहुत ममझाने पर लाग समुद्र के
किनारे प्रा पहुंचे। मक्कोलोलो लोगों को वडा अाश्चय हुआ।
उन्होंने समुद्र का देग्यते हा सोचा कि पृथ्वी का अन्त श्रा
गया है। लिविग्स्टन का स्वास्थ्य निगड़ गया था।
चारना ता वहीं से घर लौट जाता।
पर मकालोलो
लोगा से यह कर चुका था कि उनको वापस घर पहुँचावेगा
इमलिए उनको घर ले जाने की इसन ठान ली। लिनिटी
नगर मकोलानो लोगों का मुरय नगर था। वहां पर यह
छुग और
यह

दपि लिमिण्टन यापम माया और कह दिन ठारकर यहां से पूर्वी ममुद्र-नट का मार चला। इसको पचाने लिए मसालाना नागों का राजा मेनियने जैपिनी नदो ना पाया। फिर इमन एक जन प्रपात देग, जिसका नाम विक्टोरिया प्रपान रस्पा। यहाँ फ लोग दमका रोगरे करते घे मार प्रव मामिमाटुनिया काते है। इम जन-प्रपात के प्रति निरुटम भी या नारी करा जा सकता कि नन-धारा किया का प्राम-पास चार्गे पार जन क कगा मे कुहग मा छा जाता है, मा भाप क यम्भ पडे । रसुव मावधानी स देखने पर मात हुमा कि नदी २८०० फीट चौडी है। नाचे गिरते ही वर १५ या २० गज क एक राज रास्ते स पहन लगती है। प्रय नदी गस्ते य लोग मागे यार किलो- मनी पहुँचे। सन् १८५७ ई० म लिविस्टन इंगलैंड गया। पां पर यह पूर्वी अफ्रिका का कोमल यना दिया गया। दो वर्ष पश्चात लिविग्स्टन, कुछ मनुष्यों और एक नाज के माध, किनीमनी में पाया। यहाँ एफ आटे जहाज पर बैठ- कर इसने जयिजी फ नीचे के हिस्से को देखा और शायर नदा की भी परीक्षा की। इसी समय शिरवा झोल का भी पता लगा। कुछ दिनों के पश्चात् न्यासा झील का देसा। इधर, पुर्तगालवाले लिविस्टन की नोजो से व्याकुल हा गये थे। उन्होंने प्रिंटिश गजा की यह मन्देश भेजा कि लिविस्टन दक्षिणी अफ्रिका में बहुत अत्याचार करता है। इस पर --

देशान्वेषण की मरल कथाएँ
लिबिम्टन इंगड वापस बुला लिया गया ! मन् १८६६ ई०
में फिर अप्रिफा का ओर चला। अव की बार इसने
न्यामा का उत्तरी भूमि का और नील नदी के उद्गम का पता
लगान का ठान ली थी। इसके बहुत से साथी भाग गये,
पर यह आग बढता हा गया और मोण्गे झील तथा वर्गलो
मात का पता लगा लिया।
उत्तर का ओर चलकर लिविग्स्टन उजीजी पहुँचा ।
यह बहुत दुर्वल हो गया था। एक बार फिर यह कांगो नदी
की शायरा लोसारजा नदी की और चना और सन् १८७१ ई०
में इस धाग के निकट पहुँच गया। यहाँ पर हरशी घेचे
जाते और मोल लिये जाते थे। जब यह उजीजी वापस
आया तब इसकी मम्पूर्ण भोज्य-मामग्री चुक गई थी ।
मौभाग्य से हनरी मार्टन स्टैनली ( इसके बारे में तुम अगले
फिरस मे पढोगे) कुछ साद्य पदार्य के साथ आ गया। इससे
लिविस्टन के प्राण में प्राण आये, पर दोनों म कुछ अनबन
हो गई। इसमे वह लिविग्स्टन का अकेला छोडकर पूर्वी
ममुद्र-तट पर जा पहुँचा। स्टैनली और लिविग्स्टन ने अच्छी
तरह से इस बात का जाँच कर ली थी कि टेगनिका के उत्तरा
किनार से नील नदी ही निकलती है। स्टैनली के चले जाने
के बाद लिविन्स्टन ने अकले ही बगेला की और यात्रा की।
८ महीने के पश्चात् यह गेला के दक्षिणी किनारे इलाला
नगर में पहुँचा। इस समय यह बहुत थक गया था। १ मई
पर

KUMA--
देविड लिपिम्स्टन
मा १८७३ ई० में इसकी मृत्यु हो गई। दमक दो
माधियों 1 इमक मृत शरीर का आठ महीन तक ल चलकर
ममुद्र-किनारे पर पहुँचाया, जहां सं वह ग्लिायत भन दिया
गया। वेस्ट मिनिस्टर क गिर्ने म बडा धूमधाम के माय
इमका शव गाड दिया गया।

हेनरो मार्टन स्टेनली
जन्म--सन् १८४० ई०, मृत्यु-सन् १९०४ ई०
इम
हनरी मार्टन स्टैनली का अमली नाम जॉन गलैंड है।
वह बहुत ही निर्धन था। डेनचिग के निकट उमका जन्म
हा था। १३ वर्ष की अवस्था तक सेंट आसफ के दरिद्रा.
श्रम म उसका शिक्षा मिला। फिर इस आश्रम को छोडकर
एक वर्ष तक उमन शिनक का काम किया। इसके पश्चात
एक जहाज म नौकर होकर वह न्यू आरलियस पहुँचा ।
यहाँ क एक सौदागर का वर स्पा-पात्र हो गया।
मादागर का नाम स्टनली धा।
उम सौदागर के कोई
लडका न था, इमसे उसने रोलट को गोद ले लिया। लेकिन
स्टैनली न तो अधिक दिना तक जारित रहा और न इस लड़क
क नाम कुछ लिग ही पाया। इससे स्टेनली के मर जाने
पर रालैंड का कुछ न मिला। गोद लेनेवाले पिता के नाम
से ही वह प्रसिद्ध रहा।
अब हेनरी को सेना में नौकरी करनी पडी। वह एक
छोटा अफसर हो गया। नौकरी छोडकर वह तुर्किस्तान
चला गया। वहाँ से फिर अमेरिका पहुँचा। अमेरिका में
+

गया।
हेनरी माई स्टैनली
वापस पान पर वह 'न्यूयार्क गड' ममाचार-पत्र का
संवाददाता नियुक्त हुआ।
मन् १८८ ई० में वर लिविस्टन की साज में भेजा
यर तुम पीछे पड हो चुक हो।
मन् १८७२६०
म निविण्टन का पता लगाकर पढ़ ऍगलिस्तान लाट गया।
वहाँ उमन अपने अधिका-दर्शन का अद्भुत कहानियाँ
मुगाई । महारानी विक्टोरिया ने सन्तुष्ट होकर उसको एक
मोन की सुँघनीदानी दी। रायल ज्यॉगराफिकल मोमाइटी
न भी उमका एक स्वर्ण पदक दिया। 'इलो टेलीमाफ और
'न्यूयार्क हेरगड' फ मम्पादकों ने उसको तीन वर्ष के बाद,
मन् १८७४ ई० में, निविण्टन क अधूरे काम को पूरा करने
के लिए मेना।
हनरी मार्टन स्टैनली का यह पता लगाना था कि विस्टो-
रिया न्याम्जा टैगनिका झील में काई मम्बन्ध है या
नहीं। तीन अँगरेजी क माय रवाना होकर वर जजीयार म
पहुँचा। उसने ४० फोट लम्बी फिरती अपने साथ ले ली।
इमक ८ टुकड़े किये जा मकते थे और इन टुकडों को पीठ
पर लादकर भी ले जा सकते थे। जजीबार में ३०० देशी
आदमियों को साथ लेकर कर रवाना हुआ, पर रास्ते में
इनमे से कुछ बीमार पड गय, कुछ मर गये, कुन्द्र भाग गये
और कुछ को देशी लोगां न मार डाला। लगभग १००
मनुष्यों के साथ वह यूगोगो नगर से उत्तर-पश्चिम का ओर
1
,

ना।
गाय घल,
देशान्येपण की सरल कथाएँ
पल दिया। वे लोग एक नवीन, सुन्दर और विस्तृत देश में
पर्दैन । घाम क एम मैदान दिपाई पडे जिनमें पेडों का नाम
भेड और बकरियों चरती दिखाई पड़ता
था। यह प्रदश विक्टोरिया न्याम्जा क दक्षिण में है। क्या
तुम बता सकते हो कि इस प्रान्त मे पेड क्यो न थे। क्या
रशिया में भा काई ऐसा स्थान है?
अन्त म चलते चलते
स्टैनली के एक साधीन विक्टोरिया न्याब्जा को देखा। पीक की
साडी कोपार करकोस्टैनली विक्टोरियान्याञ्जामें अपनी किश्ती
लेकर पहुँचा। यहाँ उमने बहुत से दरियाई घोड देसे। तेज
आंधी चल रही थी। विजली चमक रही थी। स्टैनली क माथा
घबग उठे। रिपन जल-प्रपात को पार करता हुआ वह विक्टोरिया
न्याजा में पहुँचा और वहाँ से यूगांडा पाया। यूगांडा के
गजा ने स्टैनला का वडी प्रावभगत की और उससे बहुत से
प्रश्न किये। अब वह वापस चला। पर उमका एक अँगरज
माथी मर गया। स्वय स्टैनली भी वामार हो गया।
यूगांडा का राजा मुसलमान नहीं होना चाहता था पर
अंगरजी का इतना चाहता था कि उनका धर्म स्वीकार करने के
लिए प्रस्तुत हो गया। उसने स्टैनली की सहायता करना स्वीकार
कर लिया। यूगांडा से पश्चिम और चलकर स्टैनली न लबर्ट
न्याजा और एडवर्ड न्याञ्जा का पता लगाया। इमक पश्चात
वह उजीजी गया। वहाँ से उसने किश्ती में तमाम झील का
चक्कर काटा । उमन अब अच्छी तरह से पता लगा लिया कि

उनक
इनरी मान देननी
१०५
विक्टोरिया न्याज्ञा क माय टंगनिका का फाइ सम्बन्ध नहीं
है। स्टेनना का पश्चिम का और पलन पर लुभानेना नरी
दृष्टिगोचर हुई। लुमानया क गन्ने चनने चलते पार नियां
पचा। यहां उसका एक अग्यो मिला।
इमन अपन
००० मनुष्यो क मार सहायता करन का वचन दिया ।
हनना भय घने वनों में से होता हुआ चला।
वनों में हनराले मनुप्य वरन ही छोटे कद कच। ऊँचाई
म ये प्राय गज भरघ। इनका मिर बहुत यडा और
दादी बहुत लम्बी थी। य दाटी छोटी झोपडियो में
रहते । झोपडियाँ कले के पत्ता का यनी शौ।
निकट दो-एक यारियां भी घधी हद घों। जङ्गलो मे धन्दर
रहत थे। हिल जन्तुओं में चीने इतने अधिक घे कि घोडी
घाडी दूर चलने के पश्चात ही दो एक अवश्य दिखाई पड़ते
थ। मॉप असाय थे। धूप अच्छी तरह नीचे नहीं पहुँचती
घी और पेडो स पाना का बूंदे टपकती था।
में कीड ही काचड़ धा। कहीं कहीं गस्ते में पानी इतना
इकट्ठा हो जाता था कि चलते समय दूसरों पर छिटककर
पडता था। अन उन्होंन जलमार्ग से आगे बढ़ने के लिए नदी
मे किरती डाली। कुछ लोग तो किश्ती मठ गये और
कुछ पैदल चले। रास्ते में दशी लोगो ने आक्रमण किया
बचते बचाते वे लाग उम जल-प्रपात के निकट पहुँचे जो
अब स्टेननी के नाम से प्रसिद्ध है। कुल सात करने मिले
नीची भूमि

१०१
काराकी गरल कार्य
FTET पारमग्नमदिन नग गये। इन अपातों
पाक द्रोपों मg T-मन गरी। हॉन कई बार
मामा किया। भाग यहोया य यात्रा पर्मान में मा
पहों का पाना था। इमा फा
साम मला पल गया गया। इस माग free निन
पार नी माया पर फिन्नियो गाकर भागे पता।
इमका तीगग गरज माया मर गया। मानी जय
मग म पास झग्न क पाम परेमा गोमा नदी के मुहान
17 पद र पाँचना याहा ।
अन्य म पर समुद्र के किनार
यामा नगर में पांच गया। वाग्न में उर्मान फोगा नया
का ठाकठीक पता लगाया। इम समय में यहां की मुस्त
...तन रथ प्रार मान्दात इत्यादि-भिन्न भिन दशों
में भेजी जान लगा।
मन् १८८५ मे ११००६० तक इनरी मार्टन स्टैनली
पार्लियामट फा मदम्य तामर १०४३. में उमफी
मृत्यु हुई। अमन अपनी जापनी यडा लनिग भापा म

ऐविल जैसन टेस्मन
था,
जन्म-स्थान-हर्न, लगभग सन् १६०० ई०,
मृत्यु--लगभग सन् १६४४ ई०
लोगों ने बहुत पुरान ममय से यह सुना था कि ध्रुव
दक्षिण में एक महाद्वीप है। पर उनके पता लगाने का
विचार किमी को बहुत दिनो तक नहीं हुआ। पुर्तगाल.
वालो और स्पेनवालो ने इधर-उधर के देशों का पता लगाया
पर बहुत दनिण मे वे भी नही गय थे। एशिया के
पूर्वी द्वीप-समूह मे य लोग आये हुए थे और व्यापार का
काम बढा हुआ था। किन्तु म्पेनवालों ने निर व्यापार के
निमित्त माज का काम नहीं किया था, उनकी इच्छा तो नये
देशों को ढूंढ निकालने का थी। उन्होंने सन् १५६५ ई.
मे मारकिजा द्वीप और न्यू हेनडीज का पता लगाया। जो
लोग वापस पाये उन्होने दक्षिणी महाद्वीप के बार में बड
अदभुत फिरस सुनाये। इनमें मे डी कीरास मुरय था। यह
सन् १६०५ ई० मे टारस के साथ दक्षिणी महाद्वीप का पता
लगाने को रवाना हुआ। यह हेनडीज के बडे द्वीप का पता
लगाकर वहाँ से वापस लौट आ । इसने टारेस को
दूसरी जगह छोड दिया था और उसी ने पहले पहल आस्ट्रे

देशान्येपए का सरल कथाएँ
लिया और न्यू गिनी के बीच क गम्ते का पता लगाया। यह
रास्ता पर उसी के नाम से प्रमिद्ध है। इमको टारेस जल.
मयाजक कहते है।
पूर्वा द्वीप-समूर मे अब पुर्नगालवालो की शक्ति बढ
गई। इन्होंने डच लोगों के बहुत से द्वाप ले लिये और
टेरा आस्ट्रेलिया या दक्षिणी महाद्वीप का पता लगाना
आरम्भ किया। मन् १५८८ ई० में एक डच ने आस्ट्रेलिया
क विषय में लिखा है-"यह सबसे दक्षिण का भूमि है।
टारम जल सयाजक इमको न्यू गिनी से अलग करता है।
यह इतना बड़ा है कि इमको पञ्चम महाद्वीप कह सकते
मन् १६०६ ई० से सन १६३० ई० तक डच लोगों
ने इसक बहुत से हिस्से का पता लगाया था-
जैसे लिगीन
अन्तरीप, हार्दाग द्वीप और कारपेंटरिया। पर इनमें मबसे
प्रसिद्ध एनिन टैस्मन है। सन् १६४०ई० मे यह टेविया
भेजा गया। यहाँ से यह मारिशस का ओर चला और
फिर वहाँ से दक्षिण पूर्व की ओर चलते चलते टममानिया म
पहुँचा। इस द्वीप का नाम इसने वैनडीमसलड रक्सा । पर
आजकल यह टममानिया के नाम से ही प्रसिद्ध है। इसको
यह पता नहीं था कि यह द्वीप है। यह पूर्व का ओर चला
श्रार न्यूजीलैंड के दक्षिणी द्वीप में पहुँचा, किन्तु यहाँ उतर
न मका। यहाँ क मनुष्य बहुत ही जङ्गनी थे। यहाँ से यह
उत्तर-पूर्व का ओर चला और फ्रेंडली द्वीप पुक्ष म पहुँचा।

पविरामन टम्मन
१०६
वहाँ से यटेषिया वापम प्राया। सर १६४४ ई. में यद
फिर ग्याना हुमा धार इमन प्रादेनिया के उत्तरी हिस्से का
पता लगाया।
या टारन जल-मयाकका पार नहा कर
पागाया कि इमका दहात हा गया।

. विलियम डेपियर जन्म--सन् १६५२ ई०. मृत्य-लगभग सन् १७१५ ई. हेपियर एक गरज नाविक था। वचपन में हो बाप के मर जाने स या नाविक का कार्य सीरसने लगा। इमने मन १६८८ ई० में प्रास्ट्रेलिया के उत्तरी पश्चिमी हिस्से का पसा लगाया । यह आस्ट्रेलिया क उत्तरी हिम्म के बार में लिपता *-"यहाँ के निवासी बहुत ही दरिद्र है। समुद्र से घोडी ही दूर पर रेत की छोटी छोटा पहाड़ियाँ धनी है, और इनके पीछे देश के अन्दर जङ्गल हैं। कहा पानी नहीं दिग्पाई पड़ता। कुओं सेोदन पर हा पानी मिलना " घर वापस जाकर इसने ऐसे अद्भुत किस्से सुनाये कि १६८६ ई० में यह एक जहाज लेकर दुबारा आस्ट्रेलिया की खोज के लिए भेजा गया। उत्त मागा अन्तरीप क गस्त से यह शाश्म की ग्वाडी में पहुँचा। यहाँ से उत्तर-पूर्व की ओर चला। यह भूमि रेतीनी थी, पर यहाँ बहुत ही सुन्दर फूल खिले हुए थे। इस बहुत दिनों तक पैदल चलना पडा। गम्ते में इसका भोजन मामग्री घट गई। बहुत दिनों क पश्चात यह टाइमर द्वीप में पहुँचा। न्यू गिनी के उत्तरी हिस्से को देयता हुआ यह बटेविया गया। वहाँ से इंगलैंड लौट गया। रास्ते में इसका जहाज एमशन द्वाप म डूब गया, परन्तु भाग्यवश यह बच गया। मन् १७१५ ई. क लगभग, इसी ममुद्री याना म, इसका देहान्त हुआ।

कमान कुक
जन्म--सन् १७२८ १०, मृत्यु - मन् १७७१०
फमाम सम्म पुरा का भन्म पगार गाना नगर में
एमा था। बाम इमाम "कान में नफरी कर गया।
यम या टिनी गर म गया।
पहां किसी जानक
गाशगर कयास नाकरा गया । परपन से ही इसकी
इच्दा नाशिक यान की । मा १७५५५० म जय अम
रिफा प्रामीमिया म अंगरेना का लाई द्विाना उसने
मी फौज म नाम निगमा निया।
यी दमन ऐसा भच्छा
काय किया कि या १७६५ ई. में अमरिका क उत्तर.
पूर्वी मगुद्र तट की देख-भाल के कार्य में नियुक्त किया गया।
मन १७६८३० में प्राकाश-विताकी उन्नति के लिए कुक
नाहिनि द्वाप मे गया। यहाँ फ गजा तुनहा न इसका नाम
मंत्रा कर ली। तादिति लोग चोर श इससे गुरु
तुत
का बडी मावधानी मे रहना पड़ा। यहाँ मे यह आगे पढ़ा
और न्यूजीलैंड फ पूर्वी तट पर ७ भक्टूबर सर १७६६ ई० मे,
पहुँचा। जिस स्थान पर यह पहुँचा था वर की दरिद्रता का
देखकर इमन उसका नाम पावर्टी (दरिद्रता) की

देशान्वेषण की सरल कथाएँ यहाँ क मनुष्य मावरियान इमको उतरन न दिया। ये लोग वीर थे और शानों का मारकर या नावे । । इसा लिए उत्तर का पार चलकर इसने किनारे किनारे उत्तरी तथा दनिणी द्वीप का परिक्रमा कर डाला। इन दोनों द्वापों के मध्य के जन-सयोजक का नाम कुक का जल-सयाजक ग्क्सा। इस देश को इसने फलो का उपन के लिए अच्छा समझा ! क्या तुम बता सकत हो कि यहाँ कौन कौन स फन्न उत्पन हो सकते है और क्यों। स्म सागर का जल वायु कैसा हाता है। न्यूजीलैंड क उत्तरी द्वीप का जल वायु भी ऐसे ही फलो क उपयुक्त है। दनिणा द्वीप की परिक्रमा के पश्चात् कुक आस्ट्रेलिया के हाऊ अन्तराप की पार चला। इसी के निकट पोर्ट जैस्मन बडा सुन्दर बन्दरगाह है। उसका छोटकर या उत्तर की पार बढा। ग्रेट वैरियर रीफ और प्रास्ट्रेलिया के समुद्र- तट के पाच का राह से यह धीरे धीरे बढता गया। लेकिन दिन्यूलेशन अन्तरीप फ निकट हवे हुएगो का नुकाली चोटियो से टकराकर, इमका जहाज दुवने लगा परन्तु इसने बड़ा साव- घानी से उसे बचा लिया। यहाँ पर छोटे छोटे काले मनुष्य दिपाई पडे । ये लोग नङ्ग-धडङ्ग थे और नाक के बीच में लफडा डाले रहते थ जिससे बहुत भयङ्कर प्रतीत हाते थे, पर वागव में ये डरपाक । अव गर्मी बढने लगी और हर तरह क रेशम के काडे, मच्छर और चीटे दिसाई पडे । जब तक जहाज का मरम्मत .

फतान कुरु
।
होती रही वय सफ कुक न मयुद-नट की भूमि क बारे में यहुरा
सा छानबीन फा। जाग पर गाज टूटा था उम स्थान को
दिगृलगा अन्तरोप कहते हैं। इस म्यान में कुफ का या
सी गोभी और कल मिले। एक विचिय पशु भी ष्टिगोचर
हमा जा फुदक पुरफफर पलना । उमफा मारा
अपने यच्च का पेट क धले म ठाकर भागवी घो। वह
वारियों की भांति घाम मावी थी। इम पशु को "कगार"
कहते है। यहां के निवामी दनिगा भाग के निवामियों की
अपना दयालु हान है। ये शरीर का पिचिन रस से गते
है। इनके बाल ना तो पडे होते है या घुघराले ।
जहाज की मरम्मत हो जाा पर ये लोग फिर चल पडे
समुद्र तो यहाँ शान्त था पर चट्टाना मे टकराकर जहाज के दृटन
का भय भी बहुत था । चलते चलत ये लोग या अन्तरीप में
पहुँचे। याक अन्तरीप फ एक द्वीप पर उतरकर कुक न अँगरेजी
झण्डा गाड दिया। यहाँ से यह जावा की पर चल पडा और
यहां से अपन जहाज की अन्टी तर मरम्मत करवाकर सा
१७७१ ई० म पत्तमागा अन्तरीप क मार्ग से ईंगलंड पहुँचा।
दूसरी बार यर मन् १७७२ ई० मे रवाना हुआ।
सन् १७७३ ई० म इसने दक्षिण ध्रुव वृत्त फो पार किया,
फिर पूर्व का और चलते चलते न्यू जीनेंड पहुँचा। सर्दी यहाँ
बहुत थी। मगुद्र मे वर्फ के बडे बडे दोके तैर रहे थे,
जिनक
चागे और कुहरा छाया हुआ था। कहीं कहीं जलस्तम्भ भी

देशान्वपण की सरल कथाएँ
बडे भयाक रूप में दिखाई पड़े। सबको विश्वाम हो गया
कि दनिणी महाद्वाप का किनारा पा गया। इसी समय
नारफॉक द्वीप ममूह
श्रीर
न्यू
कैलेडोनियन का पता चला।
यहाँ में हॉर्न अन्तरोप के रास्ते यह लोट चला।
मन १७७६ ३. म तीसरी बार यह रवाना हुआ और
हवाई द्वीप में पहुंचा। यहाँ से यह पुन उत्तरी अमेरिका क
पश्चिमी तट की ओर चला और तट से अपने जहाज का
बहुत दूर न रखते हुए अलारका की ओर रवाना हुआ। फिर
वेरिङ्ग जल-सयोजक का इमन पार किया। पहले-पहल इसी ने
प्रमाणित किया कि शिया और अमेरिका मिन भिन महा-
द्वीप है। अधिक उत्तर का और जाना सम्भव न घा, क्योकि
बफ पड रही थी और समुद्र जम रहा था। इसस इसका
सन् १७७८ ई० मे यह हवाई द्वीप में
पहुँचा। यहाँ इमका बटा आवभगत हुई। पर जब इसने
यहाँ के लोगो पर चौरा का दोप लगाया तो ये बहुत ही
असन्तुष्ट हुए। कुक क प्रादमियों ने जब उन पर गोला
चलाई तो वे कुक पर टूट पड़ और उन्होंने इसका सन् १७८६
ई० में मार डाला । इसकी विधवा स्त्री और बच्चे का सरकार
ने पेंशन दी और गयल ज्योग्राफिकल सोमाइटी न इमक
स्मारक स्वरूप, इसके नाम से, एक सुवर्ण-पदक रक्या ।
वापस आना पडा।

मैथ्यू फ्लिडर्स जन्म -सन् १७७४ ई०, मृत्यु-सन् १८१४ ई० इमका जन्म मैथ्यू फ्लिडर्स अँगरेज नाविक पा। लिकन्शायर में हुआ। सन् १७६५ ई० में फिलडर्म आस्ट्रेलिया गया। सर १७६८ ई. म यह जार्ज बास के माथ हो लिया और टममानियों को प्रदनिणा करन ल । वहाँ से लोट- का इमने क्वींसलेंड फ पता लगाने का कार्य प्रारम्भ किया। मन् १८०१ ई. म यह विलायत को लौट गया। वहाँ से यह फिर रवाना हुआ और उत्तमाशा अन्तरीप के रास्ते लीविन पहुँचा। वहाँ से पूर्व-दक्षिण की ओर चलकर किंग जार्जुस द्वीप में पहुँचा। यहाँ अपने जहाज की मरम्मत फराकर यह पेट आस्ट्रेलियन बाइट के किनार किनारे चला। कंट्सट्राफी अन्तरीप क निकट इसक कुछ माथी इब गये। यहाँ से यह स्पसर की साडी म गया । इमने समझा कि प्रास्ट्रेलिया का पृवा किनारा यहीं से प्रारम्भ होता है पर इसक भीतर प्रवेश करने से पता लग गया कि यह तो गाडी है। किनारे पर उतरकर इमने फ्लिडर्म रज का पता लगाया । यहाँ से यह समुद्र में वापस आया। इस साडी के मुहान पर इसे एक द्वीप मिला । इस द्वीप मे बहुत से कगारू मिले। इन्हीं के नाम से इमने इस द्वीप को प्रसिद्ध कर दिया। ।

देशान्वेपण की सरल कथाएँ
आगे बटकर इसको मट विसेट की साडी मिनी । किनार
पर बहुत से पेड दिग्पाई पडे । ग्रेट आस्ट्रेलियन बाइट के उत्तर
मे पेड दिखाई नहीं पड थे। पूर्व की ओर चलकर इसको
मामीसियां का एक जहाज मिला। पिलटर्म ने इम साडी
का नाम एनकाउटर रक्या। यहाँ से पोर्ट फिलिप में
पहुँचा और बास जल-सयोजक होते हुए पोर्ट जैक्मन में
गया। मन् १८०२३० क जुलाई म यह उत्तर की ओर चला।
फिर आस्ट्रेलिया और मुंगे क द्वीप फ चीच की राह का देस
कर मेट वैरियर रीफ के पूर्व से टारेम जल मयोजक म आया ।
यहाँ से यह कारपेंटरिया की साडी में गया। यहाँ समुद्र
লিনা भूमि बराबर था। परन्तु स्थल पर उतरने का
इसका माहस नहा हआ। इधर इसक जहाज की यह दशा
थी कि प्राग बढना असम्भवथा। फिर भी १०५ दिन की याना
के पश्चात् यह आर्नहेम अन्तरीप होता हुआ मेलरिल की साडी
में पचा और वहाँ से प्रार्नहेम का साडी में गया । यहाँ पर
फ्लिडर्स का कुछ चीनी लोग मिले जो मछली पकटने आये थे।
फ्लिडर्स अब इंगलैंड का ओर चल दिया। रास्ते में
मारिशस द्वीप के निकट इसे प्रासीसियो ने कैद कर लिया।
यह छ महीने नऊ वही रहा । इसने एक पुस्तक लिग्नी है।
इसी पुस्तक मे टेरा आस्ट्रेलिस का नाम बदलकर आस्ट्रेलिया
रक्सा है। मा १८१४ ई० में इमका देहान्त हो गया।
था,

चार्ल्स स्टर्ट
जन्म--सन १७९५ ई० मुत्यु-सन् १८६९ ई.
माग्नेनिया क मानरी प्रदेश क पनालगायेजान का काम २५
वर्ष नक यन्दरमा भय अंगग्नप्राय पर्यो ममुद्र-तट को भूमि में ही
धमने लगेगे। अधिकतर देश का ठीक ठीक पता न लगन में
गांड के निर्वाचित दादा यहाँ भजनात थ । दाफ भीतर
प्रपेश न करने का या भा कारगया कि नट-मृमि के पश्चिमी
किनारे पर एक ऊँची पहाडी घा जिसका नहटी
जाल
थे। इस पहाडका पार करना असम्भर प्रतीन तापा।
पर मन् १८१३ ई० म एक किसान न पहाडा के शियर में
पश्चिमा उपजाऊ भूमि का पता लगाया। अब लोगों म
पहाड़ी का पार करना प्रारम्भ किया। मन् १८१५ ई. में
इवम न लैचनन नदी का पता लगाया और वैशर्ट क मंदान
रदिगाचर हा। मारा नदी का भी पता लग गया।
जब लोगा 1 मुना कि नदियाँ पश्चिम की ओर जाती है तो
उनका इम महादाप क पश्चिमी किनारे क भी मिन जाने की
प्राशा हुई।
सन् १८१७ ई० में ऑक्सले को सोज का कार्य सौपा
गया। उमने इन नदियों के बारे में घोडा परत

११८ देशान्वेपण की सरल कया और लाटते समय लिवरपूल के मैदान का भी देया। कुछ दिनों में मरजा नदी का पता लगा। सन् १८२५ इ० में धूम और हॉवेल ने मर नदा का पता लगाया। प्राग्ट्रेलियन आल्पस क वाच मे एक दर्रा मिला, इमसेव पोर्ट फिलिप म जा पहुँचे। मन् १८२६ ई० में टर्ट ने भी यह दग्पना चाहा कि य मय नदियों किसी वडा नदी में गिरती है या नहीं। रटर्ट का जन्म बङ्गाल में, २८ अप्रेल सन् १७६५ ई० म, हुमा था। इसने पन्टन में नाम लिसवाया और सन् १८०५ ई० म यर मिडनी मे गया। फिर एक किश्ती लेकर, ७पाद- मियों के माध, यह सन् १८२८ ईल्में देश के भीतररवाना हुआ। २१ दिन के पश्चात् यह मरवजी नदी के पास पहुँचा। इसके पास अधिक भाज्य-सामग्री न थी और जो कुछ थीं वह दृब गई ! अन्त में यह मरे नदी में आया। यहाँ पर इमका बहुत स देगा आदमी दिसाइ पडे। वे इसको मारने की चेष्टा कर रहे थे, पर यह आगे बटता ही रहा। इमको किश्ता डारलिग नदी में प्रा पहुँची। वहाँ से यह धीर धीर आगे बढा और समुद्र निकट आता गया । अन्त म अलेक्जेंड्रिया झील में यह जा पहुँचा। यह झील इतनी छिछला था कि किश्ती का सेना असम्भव हो गया और इसका, लौटना पड़ा। अब एक तो भोजन सामग्री चुक गई थी, दुसरे देशी लोगों का उत्पान भी बढ गया था। फिर भी स्टर्ट धैर्य के साथ अपने साथियों का समझाकर आगे बढ़ता रहा।

चार्म स्टर्ट
छ महीने के पश्चात् २००० मील का मफर तय फरफ दिई
अपने माधियों ममेत सिडनी पहुंचा।
स्टर्ट का स्वास्थ्य नष्ट हो चुका था, इमलिए मरकार ने
इसका पेंशन देना पीकार किया। जन यह इँगलंट पहुँचा
तो विलकुल अन्धा हो गया था। मन् १८६६ ई० म इमफा
देहान्त हो गया।

एडवर्ड जॉन पायर
जन्म-सन् १८१५ ई०, मृत्यु-सन् १९०१ ६०
अंगरेज लोग आस्ट्रेलिया म एक स्थान के पश्चान् ट्रमर
स्थान पर अधिकार जमाते रह । अन उनका ज्ञात हा गया
था कि यदि मिन भिन्न देशो म यता क मंदानों में भेट
बकरी, गाय, बैल और घोडे लाकर पाले जाय तो उनम लिए
यहाँ पर पर्याप्त पास है। उन्होंने कुछ ऐसे जानारी का
मैंगवा भी लिया था और उन्हें पालने का काम यहाँ क
फैदियां स लिया जाता था। पर अभी तक देश के बहुत से
भागों का पता नहीं लगा पा। इमलिए इन जानवरों के
अधिकारिया का इच्छा हुई कि घास फ और भी मैदानों का
पता लगे तो अच्छा हो। इसी निमित्त, सोज के कार्य के
लिए कुछ मनुष्यो का आवश्यकता पडी। पायर ने इस
कार्य का उठा लिया।
एडवर्ड जॉन आयर का जन्म पार्कशायर म हुआ था।
सन् १८३३ ई० में यह आस्ट्रेलिया प्राया था। इसने पहले
पहल भेडों की रसवाली का काम करना प्रारम्भ किया और
7 का सी भाषा और आदतों को भी सीख लिया।
A
जी

बढता ही गया।
रत
एडवर्ड जॉन प्रायर
१२१
सन् १८४० ई० में आयर दश क अन्दर घुस पड़ा । रास्ते
म इमको टारेंस झील मिला और प्रामपाम भी एसी ही
अनेक झीलें मिली । इसलिए इसने अपना मार्ग बदल दिया।
दनिण की ओर चलते चलते यह आयर के प्रायद्वीप में
पहुँचा, फिर वहाँ से पश्चिम का पार आस्ट्रेलियन वाइट
के किनारे किनारे चला। यह भूमि जलहीन थी। मीलों
नक जलाशय दिसाई नहीं पड़ते थे। मार्ग भी बहुत लम्बा
था। पहले-पहल यह फाउलर का साडी म पचा। यद्यपि
लोगा ने इसका आगे बढ़ने से गका पर यह आगे
ऑधी वहुत ही वेग से चलने लगी।
स ऑसें अन्धी होने लगा और छोटे छाटे कीडो ने इसको
बहुत ही कष्ट दिया। इमक साथ जितना जल या वर अब
समाप्त हो गया। मारे प्याम क यह घबरा उठा । इसके
साथा काले आदमियो ने भी इसे धोखा दिया। उन्हाने
आयर के अँगरेज माथी की हत्या करक उमका मामान लूट
पर अब इमने आस्ट्रेलियन वाइट का पार कर
लिया था और यह ऐसे प्रान्त मे पहुँच गया था जहाँ
जाडे के दिनों में वर्षा हो रही थी।
इसक पास कपडे नहीं
थे अतएव पानी मे भीगकर यह ठिठुरने लगा।
सौभाग्य-वश
एक मांसीसी जहाज तट के निकट दिखाई दिया। उसी से
इसे कुछ साना और कपड़ा मिला।
अब यह और पश्चिम
की ओर चला। रास्ते में छोटी छोटी नदियों मिली। इस
निया।

एटवर्ड जॉन ग्रायर
जन्म-मन् १८१५ ३०, मृत्यु-सन् १९०१ ई०
अँगरेज लोग आस्ट्रेलिया म एक स्थान के पश्चात् दृमर
पान पर अधिकार जमाते रहे। अत्र उनका ज्ञात हो गया
था कि यदि भिन्न भिन देशों से यहों क मानों म भड,
बकरी, गाय, बैल और घोडे लाकर पाले जाये तो उनके लिए
यहाँ पर पर्याप्त धास है। उन्होंने कुछ ऐसे जानवरों का
मॅगवा भी लिया था और उन्हें पालने का काम यहाँ क
दियां से लिया जाता 'गा।
पर अभी तक देश के बहुत से
भागों का पता नहीं लगा था। इसलिए इन जानवरों के
अधिकारियों का इन्चा हुई कि घास के और भी मैदाना का
पता लगे तो अच्छा हो। इसी निमित्त, साज क कार्य के
निए कुल मनुष्या की आवश्यकता पड़ी।
पायर ने इस
कार्य को उठा लिया।
एडवर्ड जॉन आयर का जन्म यार्कगायर में हुआ था।
सन् १८३३ ई० में यर आस्ट्रेलिया आया था। इमो पहले
पहल भेडों का रसवाली का काम करना प्रारम्भ किया और
नेगा लोगों को सी भाषा और आदती को भी सीप लिया ।

एडवर्ड जॉन पायर
१२१
सन् १८४० ई० मे आयर देश अन्दर घुस पड़ा । रास्ते
में इसका टारेंस झोल मिला और आसपास भी ऐसी ही
अनेक झीले मिली। इसलिए इसन अपना मार्ग बदत्त दिया ।
दक्षिण की ओर चलते चलते यह आयर क प्रायद्वीप में
पहुँचा, फिर वहाँ से पश्चिम का और आस्ट्रेलियन वाइट
के किनारे किनारे चला। यह भूमि जलहीन थी। मीलों
नक जलाशय दिसाई नहा पडते थे। मार्ग भी बहुत लम्बा
था। परले-पहल यह फाउलर का साडी म पहुँचा। यद्यपि
लागो ने इमको आग बढने से राका पर यह आगे
वनता ही गया। आँधी बहुत ही वेग से चलने लगी। रत
से आयें अन्धी होने लगा और छोटे छाटे कीडों ने इसका
वहुत ही कष्ट दिया। इसके साथ जितना जल था वह अव
ममाप्त हो गया।
मार प्यास क यह घबरा उठा। इमके
साथी काले आदमियों ने भी इसे धोसा दिया। उन्होने
आयर के अँगरेज साथी की हत्या करक उसका मामान लूट
पर अब इसने आस्ट्रेलियन बाइट को पार कर
लिया था और यह ऐसे प्रान्त में पहुंच गया था जहा
जाट के दिनों में वर्षा हो रही थी। इसके पास कपडे नहीं
थे अतएव पाना से भीगकर यह ठिठुरने लगा। सौभाग्य-वश
एक प्रासीसी जहाज तट के निकट दिखाई दिया। उमी से
इसे कुछ माना और कपडा मिला। अव यर और पश्चिम
का और चला। रास्ते में छोटी छोटी नदियाँ मिली। इस
लिया।

एटबई जॉन पायर
जन्म-सन् १८१५ ३०, मृत्यु-सन् १९०१ ई०
अँगरेज लोग आस्ट्रेलिया में एक स्थान के पश्वा दृमर
स्थान पर अधिकार जमाते रहे। अब उनका ज्ञात हो गया
या कि यदि भिन्न भिन्न दशो से यहाँ के मैदानों म भेद,
वकरी गाय, यल और घोडे लाकर पाले जायें तो उनके लिए
यहाँ पर पर्याप्त पास है। उन्होंने कुछ ऐसे जानवरों का
मँगवा भी लिया था और उन्ह पालन का काम यहाँ के
फैदिया से लिया जाता था।
पर अभी तक देश के बहुत
से
भागों का पता नहीं लगा था। इसलिए इन जानवरों के
अधिकारियो की इन्छा हुइ कि घास क और भी मैदानों का
पना लगे तो अच्छा हो। इसी निमित्त, सोज के कार्य क
लिए, कुछ मनुष्या का प्रावश्यकता पड़ी।
आयर ने इस
कार्य का उठा लिया।
एडवर्ड जॉन प्रायर का जन्म यागायर में हुआ था।
मन १८३३ ३० म यह आस्ट्रेलिया आया था। इमन पहले
पहल भेडों की रसवाली का काम करना प्रारम्भ किया और
देगा लोगो को सी भापा और आदतों को भी सीर लिया।

एडवर्ड जॉन पायर
मन् १८४० ई. म प्रायर देश के अन्दर घुम पडा। रास्ते
म इमका टारेम झाल मिना और आसपास भा एसी ही
अनक झोलें मिली । इसलिए इसन अपना मार्ग दल दिया।
दनिण की ओर चलते चलते यह आयर क प्रायद्वीप में
पर्नेचा, फिर वहाँ से पश्चिम की ओर आस्ट्रेलियन वाइट
के किनार किनारे चला। यह भूमि जलहीन थी। मोलों
तक जलाशय दिसाइ नहा पदते थे। मार्ग भी बहुत लम्बा
था। पहले-परल या फाउलर की साडी मे पहुँचा। यद्यपि
लोगों ने इसका आगे बढन से गेका पर यह आगे
रडता ही गया। आँधा बहुत ही
से चलने लगी। रेत
से प्रोसें अन्धी होने लगी और छोटे छाटे कीटो ने इसको
बहुत हा कट दिया। इसक माध जितना जल घा वह अब
समाप्त हो गया।
मार प्याम के यर घबरा उठा। इसके
सार्थी काले आदमियां ने भी इसे धोरगा दिया। उन्होंने
आयर के अंगरेज साथी की हत्या करके उसका सामान लट
पर अब इसन आस्ट्रेलियन बाइट का पार कर
लिया था और यह ऐसे प्रान्त में पहुंच गया था जहाँ
जाडे के दिनों मे वर्षा हो रही थी। इसके पाम कपड नहीं
थे अतएव पानी से भीगकर यह ठिठुरन लगा। मौभाग्य-वश
एक प्रसासी जहाज तट क निकट दिखाई दिया। उसी से
इसे कुछ साना और कपडा मिला।
अब यह और पश्चिम
रास्ते में छोटी छोटी नदियाँ मिली।
लिया।
की ओर

१२४
देशान्येपा की सरल कपा
नदी का पता बताया। मेफनी नदी मुहाने की पोर. गहरी
हाती जाती थी। उसक किनार पर सान को र मिलते थे।
वअर नदी के मङ्गम-स्थान पर कोयला जलता दिखाई पड़ा।
मेजी निता है कि यहाँ नुकीले पेड दिमाई पडने है और
उत्तर की और उनकी माया घटती जाती है। जब यह
समुद्र में पचा ता वर जमा हुआ जात हुआ और किरती
आगे न बढ मका । इमको फोर्ट चिपन में लौट जाना पड़ा।
मकना इंगलिस्तान वापस गया। इमा अब यर ठान
लिया था कि देश का पार कर पैसिफिक तट पर प"चें। इसलिए
यह ईगलिस्तान से लौटकर पीस नदी के रास्ते से रॉकी पर्वत
के समीप पहुँचा । अन यह माधियां समन अपने अमयाव को
कन्धे पर लादे हुए रॉका पहाड़ को पार करने लगा। वहाँ लम्ये
नुकीले पैड दिखाई पडे, वावर जानवर भी दिखाई पडा। जर
पहाड़ क दूसरी पार ये लोग पहुँचे तो इनको प्रेजर नदा पश्चिम
की भार बहती मिनी । इस नदी में कुछ दूर चलकर जव इन्होंन
देखा कि यह बहुत वेग से बह रही है तो य लोग किरती का
छोडकर पैदल ही सन् १७६३ ई० म ममुद्र के किनारे पहुँचे ।
यहाँ अपने पहुंचने का चिद्र रमफर ये लोग लाट पड। एक
महीने बाद मकैजो फोर्ट चिपवैन में पहुँचा। यही सबसे पहला
अँगरेज या जिमने इम महाद्वीप का पहली बार पार किया था।

निए भेना गया। सर जॉन फ्रेमलिन जन्म-मन १७८६४०, मन्यु-मन १८४७ ३० लाभग कनिन का जन्म निकनशाचर मारा। इमने बचपन में ही नाविक का काम प्रारम्भ किया था और परत वही बटी नडाइयों में नाम पैदा कर निया था। सन् १८१६ ई. में पर उत्तरी अमेरिका के उत्तरी हिम्स का पता लगाने क अनक दुम भोगन क पश्चात् फेकाला सन् १८२० ई० में विलायत वापस गया। यहाँ इसन विचार कर लिया। इसकी कप्तान की पदवी भी मिलो। इमने मेकेंजी के मुहाने से कापामाइन नदी तक का पता लगाना चाहा और यहाँ मे मगुद्र गस्ते उत्तर-पश्चिम का राह का भी पता लगान की इच्छा की। मा १८३१ ई० में प्राकनिन फिर रवाना हुमा । आस- पास की जगह गार मिगी से मगई थी। नदियों में बर्फ के बडे बडे दाम नग्ने थे किनी फा सेना बहुत ही कठिन था। पाव-मामपी ट ग थी। माग काई और जूतो का चमड़ा गाते थ। कभी पिड़ियां मिल जाती धी तो इनको बड़ा प्रसन्नता हाती था। ५००० मीन चलने के पश्चात् ये लोग या मैक्टरी में आय। ग थाना के पश्चात् मक- 1

.
१०६
देशान्त्रपण की सरल कथाएँ
लिन विलायत गया। इसका स्त्री मर चुका थी, इससे इसने
दुबाग विवाह कर लिया।
सन् १८३६ ई. में
यह चैन डोगमलेड का गवर्नर नियुक्त
हुप्रा। मन् १८४५ इ० में, ६० वर्ष की अवस्था में, उत्तरी
अमेरिका के उत्तरी समुद्र का पता लगाने क लिए, यह तीसरी
वार ग्याना हुआ। इसने अपने साथ दो जहाज ले लिये और
३
चर्प
के लिए उपयुक्त माय-मामग्री भी माय ले ली।
कामासमान पर यह रिले अन्तरीप मेवीची द्वीप के बीच एक
गुफा म टिका। पर कुछ दिनों के पश्चात् रॉस केयन और
पाइट विक्टरी के निकट इसक कपडे और डायरी मिली जिसस
ज्ञात हुआ कि यहा कहीं प्राम-पास, सन् १८४७ ई० क
लगमग, इमका देहान्त हुआ।
जाड

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॥
१२८ देशान्वपण की मरल कथाएँ
अन्तरीप को पार करक या उत्तर की ओर बढ़ा। अन व
पटन लगा लेकिन जहाज वर्फ में निकलता हो गया।
चलते चलते जहाज ८३° उत्तरी अक्षांश म पहुँचा। यहाँ
जहाज का छोडकर डाक्टर नैनमन पैदल चला। कुत्तों ने
इसकी विना पहियों का गाडी का वेग क साथ पाँचा। अब
यह५६ उत्तरी अनाश म पढेंचा ! यहाँ बर्फ की ऊँची दीवार
सडी था। इससे यह आगे न बढ़ सका। लौटते समय
रास्ते में सफेद भालुओं न इस पर प्राममय किया।
क्या
तुम इस प्रान्त क और भयङ्कर जानवरों का नाम बता
सकते हा?
नैनसन ने बड़ी कठिनाई मे अपनी रना की। #ज जोसे
फलैंड के पूर्वी द्वीप ममृहम इसने जाडे का मासम सन् १८६५.
६६ ई. म निवाया। फिर गर्मी पडते ही यह दक्षिण की ओर
चला। इस गाने का काई अनाज न मिला, इसलिए इसने
यहाँ क कुत्ता, भालुओं और सील मछलियों का मारकर
पाया। सन् १८८७ ई० में यह लौट आया।
सन् १८०६ इ० मे उत्तरी ध्रुव का पता पहली बार ण्ड.
मिरन पियरी न लगाया पा। ध्रुव क बारे में वह कहता है-
यहाँ भूमि नहीं है, गहरे समुद्र का उत्तरी सिरा जमकर बर्फ
हा गया है और चारा और बर्फ ही बर्फ दिखाई पड़ती है।
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Deshanveshan Ki Saral Kathayen

Author
Panday,lalliprasad
Title
Deshanveshan Ki Saral Kathayen
File name
Deshanveshan Ki Saral Kathayen
Text
OCR done
Citation
1935
Published
2011/04
Publisher
Prayag,indian Press Ltd.
Language
Sanskrit
Pages
148
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552282
Barcode
4990010033029.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
B7xTfZLFHXU
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