Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Updesh Manjari
Front matter
No text on this page.
उपदेशमञ्जरी
अर्थात् ..
1
श्री १०८ स्वामी दयानंद सरस्वतीजी के
.
१५ व्याख्यानों का हिंदी अनुवाद
जिसको
1
उक्त स्वामीजी ने पूना नगर में वर्णन किया था
उसी को
महाशय श्यामलाल वर्मा श्रार्य-पुस्तकालय
बरेली ने
-
श्रीमान् पंडित यदरीदत्त शर्मा कानपुर द्वारा
सरल और मनोहर भाषा में अनुवाद
कराकर प्रकाशित किया
,
पंचमधार
सन् १९२५ ई०
{
मूल्य
"
बावू चन्द्रमोहनदयाल मैनेजर द्वारा दयाल प्रिंटिंग वर्षस मिशन रोड,
लखनऊ में मुद्रित-१६२५
* सूचीपत्र * ... १ ૧૨ व्याख्यान विषय १-ईश्वर-सिद्धि २-ईश्वर-सिद्धि विषय पर वाद विवाद ३-धर्माधर्म ४-धर्माधर्म विषय पर शंका समाधान ५-वेद ...' ६-जन्म ७-या और संस्कार ८-इतिहास ... २५ ५० ६८ ८८ " १०५ ११० {१२३ १३५ . ... " t. १४७ १३- १५-नित्यकर्म और मुकि १५-स्वयं कपित जीवन-चरित्र
* ओ३म् *
उपदेशमञ्जरी
--
श्री १०८ दयानन्द सरस्वती जी
का प्रथम व्याख्यान
ईश्वर सिद्धि विषयक
स्वामी दयानन्द सरस्वतीजी ने पूने के बुधवार पेठ में के
भिड़े के बाड़े में तारीख ४ जौलाई सन् १८७५ के दिन, रात्रि
समय में व्याख्यान दिया था
सानांश निम्न
लिखित है
-
ओ३म् शन्नो मित्रःशंवरुणः शन्नो भवत्वार्य
मा शन्न इन्द्रो वृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः !
नमो ब्रह्मणे नमस्ते वायो त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मा.
सि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि ।
-
.
इत्यादि पाठ स्वामीजी ने प्रथम कहा
ओ३म् यह ईश्वर का सर्वोत्कृष्ट नाम है क्योंकि इसमें
उसके सब गुणों का समावेश होता है।
ईश्वर की सिद्धि प्रशम करनी चाहिये पश्चात् धर्म प्रबन्ध
का वर्णन करना योग्य है, क्योंकि "सतिकुछये चित्रम्" इस
-
( २ . न्याय से जब तक ईश्वर की सिद्धि नहीं हुई तब तक धर्म व्याख्यान करने का अवकाश नहीं। यः सं० - पर्यगाच्छुक्रमकायमत्रणमनाविर थे शुद्धम् पापविद्धस् । कविमनीपी परिभूः स्वय म्भूर्याथातथ्यतोर्थान् व्यवधाच्छाश्वतीभ्यः स माभ्यः ॥ न तस्य कार्य करणं च परास्य शक्तिविविधैव श्रूयते । स्वाभाविकी ज्ञानवल क्रिया व - यह वाक्य कहकर स्वामीजी ने उसकी व्याख्या की। मूर्ति देवताओं में ये गुण नहीं लगते इस लय मूर्तिपूजा निपिद्ध है। इस पर यदि कोई ऐसी शंका करे कि राव- णादिकों के सदृश दुष्टों का पराभाव करने के लिये और भक्तों की मुक्ति होने के अर्थ अवतार लेना चाहिये, परन्तु ईश्वर सर्वशक्तिमान् है इस से अवतार की आवश्यकता दूर होती है क्योंकि इच्छा मानही ले वह रावण का नाश कर सकता था, इसी प्रकार भक्तों को उपासना करने के लिये ईश्वर का कुछ न कुछ अवतार होना चाहिये ऐसा भी बहुत से भोले लोग कहते हैं परन्तु यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि शरीर स्थित जो जीव है वह भी आकार रहित है यह सब कोई मानते है अर्थात् वैसा आकार न होते भी हम परस्पर एक दूसरे को पहिचानते हैं और प्रत्यक्ष कभी न देखते भी केवल गुणानुवादों ही से m ( ३ ) सद्भावना और पूज्यबुद्धि ‘मनुष्य के विषय रखते हैं उसी प्रकार ईश्वर के सम्बन्ध से नहीं होलकता बह कहना ठीक नहीं है, इसके सिवाय मन का आकार नहीं है मन द्वारा परमेश्वर ग्राह्य है उसे जड़ेन्द्रिय ग्राह्यता लगाना यह अप्रयोजक है श्रीकृष्ण जी एक अद्र पुरुष थे उनका महाभारत में उत्तम वर्णन किया हुआ है परन्तु भागवत में उन्हें सब प्रकार के दोप लगाकर दुर्गुणों का बाज़ार गरम कर रक्खा है। ईश्वर सर्वशक्तिमान् है इस से शक्तिमान् का अर्थ क्या है ? "कर्तुम कर्तुं अन्यथा कर्तुम्" ऐली शक्ति से तात्पर्य नहीं है किन्तु सर्वशक्तिमान् का अर्थ न्याय न छोड़ते काम करने को शक्ति रखना यही सर्वशक्तिमान् से तात्पर्य है, कोई कोई कहते हैं कि ईश्वर ने अपना बेटा पाप मोबनार्थ जगत् में भेजा, कोई कहते हैं कि पैगम्बर को उपदेशार्थ भेजा सो यह सब कुछ करने को परमेश्वर को कुछ भी आवश्यकता न थी क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है। वल, शाम और क्रिया ये सब शक्ति के प्रकार हैं, बल शान किया अनन्त होकर स्वाभाविक भी हैं, ईश्वर का आदि कारण नही है। आदि कारण मानने पर अनवस्था प्रसंग आता है, निरीश्वरवाद , की उत्पत्ति सांख्य से हुई प्रतीत होती है, परन्तु सांख्यशास्त्रकार कपिल मुनि निरीश्वरवादी न थे, उनके सूत्रों का आधार लेकर कपिल निरीश्वरवादी थे ऐसा कोई कोई कहते हैं परन्तु उनके सूत्रों का अर्थ घराबर नही किया जाता, वे सूत्र निम्न लिखित हैं ईश्वरासिद्धेः।
(४ मुक्तबद्धयोरन्यतरामावान्न तसिद्धिः ! उभ- यथाप्यसत्करत्वम् मुक्तात्मनः प्रशंसा उपा- लादि सिद्धस्य वा। इत्यादि, परन्तु सूत्रसाहचर्य ने विचार करने पर वर एक ही है दृग्नग नहीं है ऐग्गा भगवान् कपिल मानते थे, क्योंकि उनका सिद्धान्त था कि गुरुप है, वहीं पुरुष सहस्त्र- शादि सूत्रों में वर्णन किया हुआ है; रनो सम्बन्ध से - वेदाहमतं पुरुषं महान्तम् । इत्यादि कहा हुआ है, प्रमाण बहुत प्रकार के हैं, प्रत्यक्ष, अनुमान, मन और शब्द इत्यादि, भिन्न-भिन्न शास्त्रकार प्रमाणों का भिन्न-भिन्न संख्या मानते हैं। मीमांला शालझार जैमिनिजी दो प्रमाण मानते, गौतम न्या शास्त्रकार आट, कोई कोई अन्य न्यायशास्त्रकार वार, पातजलि योगशास्त्रकार तीन प्रमाया लांख्य शास्त्रकार तीन और बार छेदान्त में छः, प्रमाण स्त्रीकार किये है, परन्तु भिन्न-भिन्न संख्या मानना यह उस शाला के विषयानुरूप है, खारे प्रमाणों का, अन्तर्रार करके तीन, प्रमाण अवशिष्ट रहते हैं। 7 प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द, इन तीन प्रमाण की लापिका फर ईश्वर ,सिद्धि. विषय.प्रयत्न करते समय प्रत्यक्ष लापिका करने के पूर्व अनुमान की लापिका करनी चाहिये, क्योंकि प्रत्यक्ष का ज्ञान बहुत संकोचित और क्षुद्र है, एक व्यक्ति के - इन्द्रिय द्वारा कितना कुछ ज्ञान हो सकता है ? अर्थात् बहुत ही थोड़ा होती है। इस से प्रत्यक्ष को एक और रखकर शास्त्रीय विषयों में अनुमान - प्रमाण ही विशेष गिना गया है, अनुमान के विना भविष्यदाचरण के विषय हमारा जो दृढ़ निश्चय रहता है, वह निरर्थक होगा; कल सूर्य उदय होगा यह प्रत्यक्ष नहीं तथापि इस विषय में किसी के मन में ज़रा भी शङ्का नहीं होती, अब अनुमान के तीन प्रकार हैं, शेषवत्, पूर्ववत् और सामान्यतोष्टम्, पूर्वपत् अर्थात् 'कारण से कार्य का अनुमान, शेपवत् अर्थात् कार्य से कारण का अनुमान, सामान्यतोदृष्ट अर्थात् जिस प्रकार की संसार में व्यवस्था दिखलाई देतो है उस पर ने जो अनुमान होता है, वह इन तीनो अनुमानों की लापिका करने ले ईश्वर परमपुरुष लेनातन नाम सब पदार्थों का वीज. है. ऐला. सिद्ध होता है, चना रूपी कार्य दीखता है इस पर से अनुमान होता है कि इनका रचनेवाला अवश्य कोई है, पंचभूतो की सृष्टि आप ही आप रची हुई नहीं है, क्योंकि व्यवहार में धर का लामान विद्यमान होने ही ले केलं घर नहीं बन जातो, यह हम देखते हैं यही अनुभव लवंत्र है, मिश्रण नियमित प्रमाण ले और विशिष्टकाय उत्पन्न होने की सुगमता के बिना कभी भी आप स्वयं घटना नही होती, तो इस ले स्पष्ट है कि सृष्टि में की व्यवस्था जो हम देखते हैं उसका उत्पादक और नियंती ऐला कोई श्रेष्ठ पुरुष अवश्य होना चाहिये, अब किसी को यह अपेक्षा लंगे कि ईश्वर की सिद्धि में प्रत्यक्ष ही प्रमाण होना चाहिये, तो उसका विचार यूं है कि प्रत्यक्ष रीति से गुण का शान होता है, गुण का अधि- करण जो गुणी द्रव्य उसका ज्ञान प्रत्यक्षरीति से नहीं होता, वैसा ही ईश्वर सम्बन्धी गुणः का शान चेतन और अचेतन - T
(
सृष्टि द्वारा प्रत्यक्ष होता है, इसी पर ले इस गुण का अधिक
जो ईश्वर उसका हान होता है पेला समझना चाहिये। ..
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे
भूतस्य
जातः
पतिरेक आसीत् । सदाधार पृथिवी द्यामुतेमां
कस्मै देवाय हविषा विधेम ।
हिरण्यगर्भ का अर्थ शालिग्राम की बटिया नहीं है किन्तु
हिरण्य अर्थात् ज्योति जिसमें है यह ज्योतिरूप परमात्मा
ऐसा अर्थ है, मूर्तिपूजा का पागलपना लोगों में फैला हुआ है
इसे क्या करना चाहिये यह एक प्रकार की जबरदस्ती है,
भूर्ति पूजा का आडम्बर जैनियों से हिन्द लोगों ने लिया है।
यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति ।
नान्यद्विजानाति स भूमा परमात्मा !
वह अमृत है और वही सब के उपासना करने योग्य है
और उससे जो भिन्न है यह सब झूठ है, वह अपना आधार
नहीं है । ओ३म् शांतिः- शांति शांतिः ।
मंगलवार तारीख ६ जौलाई १८७५
श्री १०८ दयानन्द सरस्वती जी के ईश्वर
विषयक द्वितीय व्याख्यान पर हुए वाद
विवाद का सारांश
प्रश्न-कार्य और कारण भिन्न भिन्न है या किस प्रकार
( ७) 30-कहीं कहीं अभिन्न है और कहीं कहीं -भिन्न भी है, जैसे मृत्तिका से बना हुआ घट मृत्तिका ही रहता है, परन्तु मांस शोणित से नख उत्पन्न होते हैं तथापि मांस शोणित ये नम्व नहीं हैं, इसी प्रकार मकड़ी के पेट से जाला उत्पन्न होता है परन्तु इससे मकड़ी जाला नहीं होती। -- . गोमयाजायते बृश्चिकः । तो भी गोबर और बिच्छू क्या कभी एक ही हो सकते हैं ? सर्वशक्तिमान् चैतन्य में चेतन पर सर्वशक्तित्व चैतन्य निघृत्य कारण है अर्थात् सामर्थ्य के कारण होता है, इस स्थल पर जड़ एदार्थ जो विश्व का उपादान कारगा वह और निमित्त कारण चेतन एक नहीं है, अब एकमेवाद्वितीयन । ऐमी श्रुति है उसका अर्थ करने के लिये इस ऊपर की व्यवस्था से आपत्ति नहीं आती, कारण अद्वितीय अर्थात् ईश्वर ही उपादान हुआ ऐसा नहीं, 'कारण भेद तीन प्रकार का होता है कभी कभी स्वजातीय भेद रहता है तो कभी कभी विजातीय और कभी स्वगत भेद होता है। अद्वितीय है अर्थात् सब जो कुछ है वह ईश्वर ही है पेसा अर्थ आधुनिक वेदान्त में लेते हैं परन्तु यह अर्थ काम का नहीं किन्तु अद्वितीय, का अर्थ दुसरा ईश्वर नहीं अर्थात् एक ही ईश्वर है और वह संयुक्त नहीं यही अर्थ है, अच- ईश्वरः सर्वदृष्टिं प्राविशत् ।
( ८ )
ऐ अर्थ.की श्रुति है तो अब उसका अर्थ किस प्रकार
करना चाहिये ? अधत्रा---
सर्व खल्विदं ब्रह्मः।
इस वाक्य का अर्थ कैला करें ? आधुनिक वेदांती
'इदंविश्व' ऐसा मानकर उस शब्द का अन्वर मर्य इन
की ओर करते हैं परन्तु साहचर्य अर्थात् ग्रंथ का अगला
पिछला अभिप्राय इस की ओर दृष्टि देने से इदं शब्द का
अन्वय ब्रह्म शब्द की ओर करना पड़ता है 'इदं सर्व घृतम्'
अर्थात् यह बिलकुल घी ही तेल मिश्रित नहीं, उसी तरह यह
ब्रह्म नाना वस्तुओं से मिश्रित नहीं, ऐसा सर्व शब्द का अर्थ
है, ऐसा अर्थ करने से ऊपर के हमारे कहे अनुसार श्रुति का
अर्थ होने में दिक्कत नहीं रहती 'नाना वस्तु ब्रह्मणि' अथवा
वृहदारण्यकोपनिषद में 'य आत्मनि तिष्ठन् आत्मानं वेद'
अथवा यस्य आत्मा शरीरम्' इस वाक्य के अर्थ के विषय
आपत्ति आवेगी इल का विचार करना चाहिये, एक ही शरीर
के स्थान में व्यापक और व्याप्य इन दोनों धम्मों की
योजना नहीं करते बनती, गृह- आकाश में स्थित है और
आकाश यह व्यापक होकर गृव्याप्य है इसलिये 'आकाश
और गृह ये एक ही हैं का अभिन्न हैं ऐसा अनुमान निकालते
नहीं आता, इसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा ये अभिन्न हैं
ऐसा रहने का अवकाश नहीं रहता।
अहं ब्रह्मास्मि।
इस वाक्य का अर्थ किया जाय तो यह अत्यन्त प्रीति का
उदाहरण है, यही लौकिक- दृष्टान्त पर से समय होता है,
T जैले मेरा मित्र अर्थात् मैं ही हूँ ऐसा कहते हैं परन्तु मैं और मेरा मित्र इन दोनों की सर्वथैव अभिन्नता है ऐसा फलितार्थ नहीं होता, समाधिस्थ होते समय, "तत्व मंसि” ऐसा मुनि लोग कह गये; परन्तु साहचर्य की ओर ध्यान देने से मुनियों का यह भाषण जीवात्मा और परमात्मा अभिन्न है इस मर्त का पोषक नहीं होता, क्योंकि इसी पचन के उत्तर भाग में इस सारे स्थूल और सूक्ष्म जगत् में कारण सम्बन्ध र परमात्मा को ऐतरात्म्य है, परमात्मा का दूसरा नहीं आत्मा' वही आत्मा है 'तदतर्यामि त्वमति जो सब जगत् का आत्मा वह तेरा ही है इसलिये जीवात्मा और परमात्मा इनके बीच परस्पर सेव्य सेवक, व्याप्य व्यापक, आधाराधेय के सम्बन्ध ठीक जमते हैं, ऐतरेयोनिषद में- - "प्रज्ञानं ब्रह्म " ऐसा शक्य है, उनके महावाश्य विवरण में- - M "ज्ञानमानन्दं ब्रह्म' ऐसा विस्तार किया हुआ है, फिर भी परमेश्वर ही सृष्टि बना ऐसा अर्थ "तत्सृष्टि प्राविशत्" इस वाक्यं पर से करने पर कार्य कारण की अभिन्नता होती है, यदि ईश्वर ज्ञानी है तो विद्या माया आदिको के स्वाधीन होकर सूष्टिव्युत्पत्ति का कारण हुआ ऐसा कहने में उस को भ्रान्ति हुई ऐसा प्रति. पादन करना पड़ता है, देश फॉल वस्तु परिच्छेद हैं वहाँ म्रान्ति है, यही भ्रान्ति ब्रह्म को हुई यह मानने से ब्रह्म का ज्ञान अनित्य ठहरता है, यह विचारणीय वार्ता है, इसी तहर जीव- 1 (१०) है परन्तु अखिल भावना भ्रान्ति का परिणाम है भ्रान्ति दुर होने से जीव ब्रह्म हाता है यह समझ ठीक नहीं क्योंकि भ्रान्ति परमात्मा में नहीं संभव होती, आधुनिक वेदान्तियों की सदृश मुक्ति को समझ लेने पर ब्रह्म को अनिमोक्ष प्रसंग आता, जी और ब्रह्म को यदि एक कहें तो जीव में ब्रह्म के गुण नहीं हैं जीव को अपरि- मित ज्ञान और सामर्थ्य नहीं, यदि हम ब्रह्म बन जावे तो हम जगत् भी रच लेवें, इस ले पुनः एक दफे और कहना पड़ा कि विश्व जद ब्रह्म चेतन है और इनका आधाराधेय, सेव्य सेवक व्याप्य व्यापक सम्बन्ध है, "सुखमवाप्लम्' इस अनुभव की योजना करते बनती है क्योंकि चैतन्य या नियमानी है, तैत्तिरीयोपनिषद् में आनन्दमय कोश ६ अवयव वर्णन किये हुये हैं, सारांश जीव ब्रह्म नहीं. जगत् ल नहीं, इस स्थल पर कार्य कारण भिन्न-भिन्न है यही प्रकार सत्य सजीव और निर्जीव पदार्थ ईश्वर ने अपने सामर्थ्य से निर्माण किये वह सामर्थ्य उसी के पास सदा रहती है इस कार्य से भेद नहीं आता। प्रश्न २-तुम कहाँ हो कि अवतार नहीं हुए तो ईश्वर को सगुण वा निर्गुण क्यों मानते हो ? उत्तर-प्राकृत जनों में सगुण अर्थात् अवतार और निर्गुण अर्थात् परब्रह्म ऐसा अर्थ कर-कर इस सम्बन्ध ले वाद चलता है, परन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है "सपर्यगात्" इस श्रुति पर से अवतार का होना बिल्कुल नहीं संभव होता, कविः मनीषी एकभृतो, निर्गुणश्च, ऐसे-ऐसे, श्रुति वाक्य हैं इस पर से ईश्वर सगुण और निर्गुण दोनों हैं, झान, शक्ति, आनन्द इन गुणों के सहित होने से वह सगुण है. परन्तु जड़ के गुण उसमें नहीं हैं इन गुणों के - ( ११ ) सम्बन्ध से वह निर्गुण है प्रथम ,जो मैंने श्रुति कही उसके साहचर्य की आर. ध्यान देने से यही अर्थ निकलता है। प्रश्न ३-प्रार्थना क्यों करना चाहिये. ईश्वर सर्वज्ञ है और सर्वशक्तिमान भी है तो उसे हमारे मन की विदित है और उसने हमें इस प्रकार फैले उत्पन्न किया कि हम पाप करें, फिर इस प्रकार की पाप विषयिणी प्रवृत्ति हम में रखकर भी हमारे पाप हा दण्ड देता है तो ईश्वर न्यायी कैसा ? - 4 . उत्तर-हमारे माता पिता ईश्वर के बनाये हुए पदार्थ लेकर हमें पालते हैं तो भी वे इस पर बड़े उपकार करते हैं, इन उपकारों का स्मरण करना हमारा धर्म है ऐसा हम स्वीकार करते हैं, फिर जब ईश्वर ने सृष्टि उत्पन्न की तो हलके असंख्य उपकार को हमें अवश्य स्मरण करना वाहिये, द्वितीय-कृतशता दिखलानेवालों का मन, स्वतः प्रसका और शान्त होता है, तृतीय-परमेश्वर की शरण जाने से आत्मा निर्मल होता है, चतुर्थ-प्रार्थना ले पश्चात्ताप होता है और आगे को पापवासना का बल घटता जाता है, पञ्चम- सत्यता प्रेम हम में दृढ़ होने जाते है, पष्ट- स्तुति अर्थात् यथार्थ वर्णन, ईश्वर स्तुति करने से अपनी प्रीति बढ़ती है क्योकि ज्यो त्यो उसके गुण सम्झ में आने जाते हैं त्यो त्यो प्रीति अधिक जमती जाती है, फिर यह भी है कि उपासना के द्वारा आत्मा में सुख का प्रादुर्भाव होता है इस उपाय को छोड़ पाप नाशन करने के लिये अन्य उपाय नहीं है, काशी जाने से हमारे पार दूर होंगे यह समझ अथवा तोवा करने से पाप छूटना किम्बा हमारे पाप का भार अमुक भद्र पुरुष लेकर सूली चढ़गया इत्यादि अन्य लोगों की सारी - समझ अप्रशस्त है अर्थात् भूल पर है, उपासना के द्वारा विवेक उत्पन्न होता है, विवेकी होने से क्षणिक यस्तुओं से शोक और आनन्द ये दोनों नहीं होते, अव ईश्वर ने जीव स्वतन्त्र किया इसलिये उसले पाप भी होता है, यदि उसे परतंत्र किया जाता तो वह केवल जड़ पदार्थयत् बना रहता, जीय स्वातन्त्र्य से ब्रह्म की सर्वशता में कोई बाधा नहीं आती, क्योंकि इन दोनों में परस्पर सम्बन्ध नहीं है, बच्चे को छुट्टा छोड़ा जाय तो वह बोट लगा लेवेगा यह सोच माता बालक को बाँध नही रखती तो भी बालक दंगा धूम फसाद अवश्य करेगा यह शान माता को रहता ही है, इस लौक्षिक उदाहरण पर ब्रह्म की वंशता ल जीव के स्वातन्मय को कुछ भी हरकत नहीं आती, बान के विषय स्वतन्त्रता उसकी है, उली तरह आचरण विषय हसले दिये सामर्थ्य की मर्यादा में स्तनदा मनुष्य की है, यदि ऐसी स्वतन्त्रता न होती तो जो सुलोपभोग आज वोरहा है वह न होता और जीप सृष्टि की पुत्पत्ति व्यर्थ हुई होगी। । तृतीय व्याख्यान ओ३म् ओ३म् भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरंगैस्तुष्टुवार्थसस्त- नूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायुः ॥ ओम् शान्तिः शान्तिः शान्तिः। ऋक् संहिता मं० १ । अनु०१४ । सू० ८१ । सं०८॥
1
1
यह ऋचा स्वामीजी ने कही, फिर धर्माधर्म इस विषय
पर व्याख्यान प्रारम्भ किया, परमेश्वर की आज्ञा यह धर्म,
अवशा यह
अधर्म, विधि यह धर्म, निषेध यह अधर्म, न्याय
यह धर्म, अन्याय यह अधर्म, सत्य यह धर्म असत्य अधर्म,
निःपक्षपात यह धर्म, पक्षपात यह अधर्म, व्रतनेदीक्षापमाप्नोति
( मं० ) इस प्रतीक का शुक्ल यजुः संहिता का मंत्र कहा, उल
का अर्थ किया, अब लत्यमूलक यदि धर्म तो सत्य क्या है ?
प्रमाणैरर्थ एपीक्षणं, इल - न्याय से जो अर्थ सत्य ठहऐ वही
सत्य है; आश्रम बार है ब्रह्मचर्याश्रमः गृथाश्रम, वानप्रस्थ
और संन्यास
अहिंसा परमो धर्मः ॥
-
'
धृतिः क्षमा दसोऽरलेयं, शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।।
( मनु०६ । ६२)
--
धर्म और अधर्म ये अनेक परन्तु उनमें ले विशेष
रीति से ब्याह धर्म और ग्यारह अधर्म हैं, उनका स्वामी जी
ने विशेष विवरण किया है।
इस प्रकार ग्यारह धर्म सनातन उपदिष्ट हैं, प्रथम अहिंसा
का लक्षण
अहिंसासल्यास्तेयब्रह्मचर्षापरिग्रहा थमाः ॥
( योगसूत्र साधनपाद ३० सूत्र.)
॥
(१४)
है
अहिंसा-इसका केवल पञ्चादि न मारना ऐसा अकुं.
चित अर्थ करते हैं परन्तु व्यासजी ने ऐसा अर्थ किया है कि:-
सर्वथा सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोहः
अहिंसा जेया।
अर्थात् वर त्याग करना।
धृति-अर्थात् धैर्य, राज्य गया तो भी धर्म का धैर्य
छोड़ना नहीं चाहिये, धैर्य छोड़ने से धर्म का पालन नहीं
होता । क्षमा अर्थात् सहनता बड़े ने कोई अपकृत्य छोटे
मनुष्य के लिये किया तो उले छोटे ने सहन कर लिया, यह
क्षमा नहीं है, इसे असामर्थ्य कहते हैं, किन्तु शरीर में सामर्थ्य
होकर दुरे का प्रतीकार न करना यही क्षमा
दम नाम मनसो वृत्तिनिग्रहः-मन की वृत्तियों का निग्रह
भरना इसी का नाम दम है वैराग्य ऐसा अर्थ नहीं है, अस्तेय
अन्याय से धनादि ग्रहण करना, आशा विना पर पदार्थ उठा
लेना स्तेय है और स्लेय त्याग अस्तेय कहाता है। शौच-दो
प्रकार का है, शारीरिक वा मानसिक, उत्कृष्ट रीति से स्नानादिक
विधि का आचरण करना यह शारीरिक शौच है, किसी भी
दुष्ट वृत्ति को मन में आश्रय न देना यह मानसिक शौच है,
शरीर स्वच्छ रखने से रोग उत्पन्न नहीं होते तथा मानसिक
प्रसन्नता भी रहती है।
इन्द्रियनिग्रह अर्थात् सारी इन्द्रियों को न्याय से धाक
में रखना, इन्द्रियों का निप्रह बड़ी युक्ति से करना चाहिये,
इन्द्रियों का आकर्षण परस्पर लम्बन्ध से होता रहता है, मनु ने
-
कहा है कि
( १५ )
मात्रा स्वस्त्रा दुहित्राकान विविक्तासनों भवेत्।
बलवानिद्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ।
.
इस वाक्य का अर्थ-इंद्रियाँ इतनी प्रबल हैं कि माता
तथा बहनों के साथ रहने में भी सावधान रहना चाहिये ।
धी---- अर्थात् बुद्धि, सब प्रकार बुद्धि को बल प्राप्त हो
बैले ही आचरण करने चाहिये, शरीर बल बिना बुद्धिबल को
क्या लाभ ? इसलिये, शरीर बल लम्पादन करने के लिये
और उसकी रक्षा करने के लिये बहुन प्रयत्न करते रहना
चाहिये।
विद्या-योगसूत्र में अविद्या का लक्षण किया हुआ है-
अनित्याशुचिदुःखानात्मलु नित्यशुचिसुखात्म
ख्यातिरविद्या ।
(योगसूत्र साधनपाद २४ सूत्र)
तस्य हेतुरविद्या ।
-
अविद्या अर्थात् विषयालक्ति, ऐश्वर्यभ्रम, अभिमान यह
हैं, बड़े-बड़े पाठ करने से ही केवल विद्या उत्पन्न नहीं होती
पाठान्तर यह विद्या का साधन होगा, यथार्थदर्शन ही विद्या
है, यथाविहित ज्ञान यह विद्या है, प्रमा के विरुद्ध भ्रम है,
विद्या को भ्रम नहीं होता, 'अतात्मनि आत्मबुद्धिः' 'अशुचि
पदार्थ शुचिचुद्धिः यह भ्रम है, यही अविद्या का लक्षण है
और इसके विरुद्ध जो लक्षण के विद्या के है. जिस पुरुष को यह अभिमान होता है कि मैं धनाढ्य है वा मैं बड़ा राजा हूँ उसे अविद्या का दोष है, दूसरा शरीर क्षीपा रहना यह अविद्या का कारण होगा, इससे सब प्रकार की विद्या सम्पादन करने के विषय प्रयत्न करने चाहिये हमारे देश में न्यून अवस्था में विवाह करने की गति के कारण विद्यालादन करने की आपत्ति होती है, अपवित्र पदार्थ के स्थान में पनित्रता मानता यह अविद्या है, ईश्वर का ध्यान यह पूर्ण-विद्या है, यह मारी विद्याओं का मूल है किसी भी देश में इस विद्या का हास ( न्यूनता ) होने से उस देश को दुर्दशा आ घेरती है। सत्य-तीन प्रकार का है. सत्यभाव, सत्यवचन, सत्य- क्रिया, सत्यभापता होनी चाहिये. सत्य भाषण करना चाहिये और सत्य आनण तो करना ही चाहिये, किसी प्रकार का विकल्प मन में न होना चाहिये, असत्य का त्याग करना चाहिये, विवेक का लक्षण योगसूत्र में लिया हुआ है, शि- शब्दमानानुपाती कातुशून्यो विकल्पः । Homed- र समय झोत ना और असमय कौन सा, इला विचार करना शाहिय, कुरुमवर्ण के विषय में तुलसीदासजी का एक दोहा है कि- योजन एक-मूछ रही टाढ़ी। योजनाधार नासिका बाढी ।। निसान में देव मामलेदार कर कर कोई साधू हुआ है
-
(१७)
उसकी यथात 'उड़ाते हैं कि उसने अपने वचन से पुरुष
की स्त्री बनाई, ऐसी ऐसी असम्भात्य बात हमारे देश में
बहुत सी फैल गई हैं, इसलिये प्रमाणों के सहाय से
अर्थ विवेचन कर-कर देखने ले विचारांश में निश्चय
होता है कि कौन . स्ली बात लत्य और कौन सी झूठ है यह
समझता है।
अक्रोध-बड़ा भारी जो क्रोध उत्पन्न होता है उसका
सर्वथा त्याग करना चाहिये, स्वाभाविक क्रोध कभी नहीं जा
सकता, परन्तु उले रोकमा मनुष्य का धर्म है। प्राधाबीन
होने से बड़े-बड़े अनर्थ होते हैं इस प्रकार का एकादशलक्षणी
सनातन धर्म है, जो मनुष्यमात्र का कर्तव्य है।
एतद्देशत्रसूतन्य सकाशादग्रजन्मनः ।
हवं छ चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः ।।
(मनु० अ० २ श्लो०२०)
व्यवहार धर्म की ओर भी ध्यान देना चाहिये, सारी
दुनिया में इसी आयवर्त से विद्या बाई, इस देश के आर्य
पुरुषों के वैभव का वर्णन, जितना ही किया जाय थोड़ा
है, . समुद्र पर चलने वाले, जहाजों, पर कर लेने की आज्ञा
भगवान् मनु ने अष्टमाध्याय में लिखी है, इससे स्पष्ट है कि
समुद्रयानादिक पहिले हमारे लोग करते थे।
समुद्यानकुशला देशकालार्थदर्शिनः ।
स्थापयन्ति तु यो वृद्धिं सातत्राधिगम प्रति ॥
'(म० अ०८ श्लोक १५७)
.
-
( १८ .)
अधर्म-अर्थात् अन्याय, इसका विचार करना चाहिये,
मनु ने ऐसा कहा है कि-
परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिंतनम् ।
वितथाभिनिवेशश्च त्रिविध कर्म मानसम् ॥
पारुष्यमनृतं चैव पैशुन्यं चापि सर्वशः।
असम्बद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम् ॥
अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवां विधानतः।
परदारोपसेवाच शारीरं त्रिविध स्मृतम् ॥
( म० अ० १२ श्लोक ५।६। ७.)
मानसिक कर्मों में से तीन मुख्य अधर्म हैं ; पर द्रव्य
हरण, चोरी, मनसानिष्टचिंतन अर्थात् लोगों का बुरा चिंतन
करना, मन में छेष करना, ईर्षा करना, विनथाभिनिवेश अर्थात्
मिथ्या निश्चय करना, बाधिक अधर्म चार हैं, पारुण्य अर्थात्
कठोर भाषण, क्योंकि सब ठौर सब समय मनुष्य को उचित
है कि वह मृदुभाषण करे, किसी अंधे को “आ अंधे" कह कर
पुकारना निस्सन्देह सत्य है परन्तु कठोर भाषण होने के
कारण-अधर्म है, अनृत भाषण अर्थात् झूठ बोलना, पैशुन्य
अर्थात् चुगली करना, असम्बद्धप्रलाप अर्थात् जान बूझकर
बात को उड़ाना, शरीरिक अधर्म तीन हैं, अदासाना मुपा-
दानम् अर्थात् चोरी, हिंसा अर्थात् सब प्रकार के कर कर्म,
परदारोपसेवा अर्थात् रंडीबाज़ी वा व्यभिचारादि कर्म करना,
किसी मनुष्य ने अपने खेत में की जमीन में न बोते अपना
-
(१९)
बीज लेकर दूसरे की ज़मीन में बोया तो उसे हम क्या कहेंगे ?
क्या उसे हम मूर्ख न कहेंगे अपने वीर्य का 'जो मनुष्य अगम्बा-
गमन से खर्च करे वह महामूर्ख है, कोई कोई ऐसा कहने
लग जाते हैं कि हम नकद पैसा देकर बाज़ार का माल मोल
लेते हैं इसमें सो व्यभिचार क्या होगा? परन्तु वे मूर्ख नहीं
सोचते कि पल्ले का रुपया खर्च कर अपने अमूल्य वीर्य को
खर्च कर डालते हैं यह व्यापार किस प्रकार का है ? अर्थात्
ऐसा व्यापार करनेवाला तो क्या महामूर्ख नहीं है ? अवश्य
मूर्ख है।
धर्म के तीन स्कन्ध है यज्ञ, अध्ययन और दान, यक्ष
अर्थात् होम, यज्ञ करने से वायु शुद्ध होकर देश में बहुत सी
वृष्टि होती है, मीमांसा और ब्राह्मणादि ग्रन्थों में मन्त्रमयी
देवता तो माना है और विग्रहवती देवता कही भी नहीं मानी
इस व्यवस्था के द्वारा शास्त्रकारों ने बहुत सा झगड़ा मिटा
दिया, परन्तु-
--
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा ।
इस पुरुषसूक्त में की ऋचा की व्यवस्था का लगाना ज़रा
अच्छा हो कठिन पड़ता है।
A
अध्ययन-अर्थात् लड़कों को तथा लड़कियों को सिखाना
"
पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिष्क्रिया ।
(मनु०२।६७)
(२०)
'इसमें गुगै चासः अर्थात् कुल्लू क भट्ट ने पति के घर में
वास करना ऐसा अर्थ कर-कर 'अर्थ का अनर्थ कर दिया,
पूर्वकाल में आर्य लोगों में खो लोग उत्कृष्ट गति से सोबती
थी; आर्य लोगों के इतिहास की और देवो-श्री लोग आजन्मे
ब्रह्मत्रर्य त धारण कर का रहती थीं और साधारण स्त्रियों के
भी उपनयन और गुमराह में वास इत्यादि नरूकार होते थे यह
सय को विदित ही है।
गार्गी, सुलमा, मैत्रेयी, ज्ञात्यायन्यादि बड़ी-बड़ी मुशि-
क्षिता स्त्रियाँ होकर बड़े-बड़े ऋषि मुनियों की शंकाओं का
समाधान करती थीं, फिर नहीं मालूम कुल्लूका अहने:"पति-
सेवेवगुगैवासा" ऐसा अर्थ कहाँ से किया ? अथर्ववेद में
कहा है--
ब्रह्माचर्येण कन्या युधानं विन्दते पत्तिम् !
( अ० ० ११।५।१८)
.
२४
क्षि
ऐला स्पष्ट वाक्य है, इन वाक्य को एक ओर रखकर
कुल्लूक भट्ट के अर्थ को ग्रहण करना ज़रा कठिन होगा, सुशि-
स्त्री लोग मुटुम्बी गृहस्थों को सब प्रसार लहाय हारने-
वाली होती हैं, संगति का बल कितना चढ़ा इसका
विचार को विद्वान फो अविदुपी स्त्री से संग परेनो इलमा
परिणाम कैसे लगे ? फिर लियाँ ही दिल पढ़ें-इतना ही नहीं
किन्तु लारी जातियाँ वेदाभ्यास करने का अधिकार रखनी
है, देखो-
यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य ।
।
( २१. ),
ब्रह्मराजन्याभ्या : शूद्राय:चार्याय च स्वाय,
चारणाय च ॥
( यजु० अ० २६ मं०२)
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् ।
क्षत्रियाजातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥
शूद्र का ब्राह्मण होता है और ब्राह्मण का भी शुद्ध होता
है, इस. मनुवाक्य का भी विचार करना चाहिये, अध्ययन
करना अर्थात् ब्रह्मचय निभाना यह बड़ा ही धर्म है, ब्रह्मचर्य
के कारण शरीरस्वल और बुद्धिवल प्राप्त होता है, आजकल
लड़के लड़कियों के शीघ्र विवाह करने की चुरी रास्म पड़ गई
है, काशीनाथ ने शीघ्रबोधनामक एक ज्योतिषःका ग्रंथ बनाया:
है उसमें ऐसा कहा है कि-
अष्टवर्षा भवेद्गौरी नववर्षा तु रोहिणी ।
दशवर्षा भवेत कन्या तत ऊर्ध्वं रजस्वला ॥
माता चैव पिता तस्या ज्येष्ठोभ्राता.तथैव च।
त्रयस्ते नरकं यान्ति दृष्ट्वा कन्यां रजस्वलाम् ॥
लड़की शीघ्र गौरी होती हैं, रोहिणी होती हैं, रजस्वला,
होती है इत्यादि बहुत कुछ बकवाद की हैं।
इस ग्रंथ को, बने अभी:- १०० वर्ष भी नहीं हुए - होंगे।
स्वयंवर के विषय भगवान मनुजी का आदेश है कि-५६,
( २२ ) त्रीणि वर्षाणयुदीक्षेत गृहे. कन्यतुमत्यपि ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम् ॥ इसी प्रकार मनुजी कहते हैं कि कन्या को भरने तक यहि वैसी ही कुमारी रक्त्रो परन्तु बुरे मनुष्य के साथ विचार में रसेन दो, वाक्य- काममामरणात्तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि । न चैवैनां प्रयच्छन्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ।। पुगतन सुश्रुत चरकादि वैद्यक के प्रन्यों में चार भाग कल्पना किये हैं, ' वृद्धि २ यौवन, ३ सम्पूर्णता और र हानि, इनकी व्यवस्था इन वाक्यों में दी है सो दबो तिस्रोऽवस्था शरीरस्य बुद्धिौवनं सम्पूर्णता। किञ्चित् परिहाणिश्चेति, भाषोडशाद वृद्धिः।। श्रायञ्चविंशतेयॊवनं, आचत्वारिंशत: सम्पूर्णता, ततः किञ्चित् परिहाणिश्चेति ॥ आयु के 4- .. ॥ पुरुषों की योग्य अवस्था प्राप्त होने के लिये कम से कम चालीस वर्ष की आयु की आवश्यकता है निकृष्ट पक्ष में भी लड़के की पच्चीस से न्यूम भायु न हो और लड़की की सोलह वर्ष से न्यून आयु तो होना ही न चाहिये ऐसा सुश्रुत का कहना है।
( २३ ) . पञ्चविंशे ततो वर्षे पुमान्नारी तु षोडशे । समत्वागत:ों तौ जानीयात्कुशलोभिषक् । - आता है छान्दोग्य उपनिषद् में प्रातःसवन चौबीस वर्ष तक वर्णन किया हुआ है, यह पुरुषों की कुमार अवस्था है, चवालीस वर्ष तक मध्यसवन कहा है यही यौवनावस्था है और अड़तालीस वर्ष तक सायंसवन वर्णन किया है जो सम्पूर्णता की अवस्था है, इसके पश्चात् जो समय वही उत्कृष्ट, समय विवाहादि के लिये माना गया है, विवाह होने के पूर्व वेदाध्ययन अवश्य कराना चाहिये। इन दिनों ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थवश वेदाध्ययन छोड़ दिया है, मानो बिलकुल नष्ट कर दिया है सो प्रारम्भ होना चाहिये, अथर्ववेद में अल्लोपनिषद् करके घुसेड़ दिया है, यह मतलबी लोगों ने नये-नये लोक बनाकर लोगों को भ्रम में डालने के लिये रचकर डाल रक्खे हैं, सो बड़े ही दुःख की बात है, इस लिये ऐला हो कि स्थान-स्थान पर वेद- शालायें हो उनमें वेदाध्ययन कराया जावे, परीक्षायें लिबाई जावे अर्थात् वेदाध्ययन को हर प्रकार से उत्तेजना मिले ऐसा प्रयत्न करना चाहिये। है F दान-दान शब्द का आज कल जो अर्थ लेते हैं वह नहीं, पेटायूँ लोग कहते हैं कि- - परान्नं दुर्लभं लोके शरीराणि पुनः पुन :॥ इत्यादि विवेचनमूलक दान सदा होता रहता है, -
२४ )
इन दिनों लोगों ने "पीत्वा पीत्वा ब्रह्मापिमृतः" ऐसे ऐसे.
वाक्यों को कह-कई कर दान का मिथ्या ही अर्थ किया है
सो न हो किन्तु दान. वह है जो, विद्या बुद्धि के लिये द्रव्य
खर्च हो, कलाकौशल्य की जनति में धन लगाया जाय।
दीन, अपायज, रोगी, कुष्ठी, अनाथ आदिकों को सहाय करना
सभा दान है।
M
आश्रम चार हैं ब्रह्मचर्याश्रम का वर्णन पूर्व ही हो चुका है,
गृहस्थाश्रम में परस्पर. प्रीति बढ़कर सामाजिक कल्याण बढ़े
यही मुख्य धर्म है, इस प्रकार की सामाजिक प्रीति बढ़ने के
लिये पापाणादि मूत्तिपूजा का पाखण्ड,दूर होना.चाहिये।
सन्तुष्टो भार्यया भर्ती भार्या भों तथैव च ।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्र वै भ्रवम् ॥
उपर्युक्त श्लोक में कहे अनुसार गृहस्यों को आनन्द करते
निर्वाह करना चाहिये यह उनका मुख्य धर्म है।
वानप्रस्थ इस आश्रम में विचार करना चाहिये तप
अर्थात् विद्या को सम्पादन करना उचित है ।
संन्यासी-संन्यासी को उचित है कि सारे जग में घमे
और सदुपदेश' करे यही उसका मुख्य कर्त्तव्य कर्म है,
यथार्थ
उपदेश के विषय में मनु कहते हैं-
दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलम्पिवेत् ।
सत्यप्तां बदेवाचं मनःपूतं समाचरेत् ।।
"
( २५ ) 7, पंचशिखा और शंकराचार्य इनका इतिहास देखना चाहिये। कि उन्होंने सदा, सत्य और सदुपदेश-ही किये उसी प्रकार संच्यासीमात्र को सदुपदेश..करना चाहिये। सहनाववतु,सहनौ भुनक्तु सह.वीर्य करवाव है। तेजस्विनावधीतमस्तु माविद्विषावहै ॥ 70 ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः । . रा यह कह कर व्याख्यान समाप्त किया। A .. . " चौथा व्याख्यान धर्माधर्मविषयक। -, - 4 प्रश्न:-षया. वेदों में मन्त्रमयी देवतों का अथवा. विग्रह. वती देवताओं का प्रतिपादन है ?. सावयव देवताओं के विना.. जड़मति. अज्ञानी लोग पूजा किस.प्रकार..कर सके और धर्म, वयवहार में उनका निर्वाह कैसे लगे? उ०-वेदों के तीन काण्ड है-उपासना, कर्म और शान, परन्तु उपासनाकाण्ड में केवल एक उपासना'ही का प्रति- पादन हो. यही नहीं, ,अथवा ' ज्ञानकाण्ड में शान ही का प्रतिपादन हो वा कर्मकाण्ड में कर्म ही का प्रतिपादन हो यह नहीं, किन्तु औरों का भी है। जैसे उपासना काण्ड में उपासना तो प्रधान ही हैं परन्तु इसमें ज्ञान और कर्म का . . निरूपण भी मिलता है, इसी प्रकार सर्वत्र है मीमांसा का प्रारम्भ 'अयानोधर्मजिप्रासा' ऐमा ३, इस में कमधियार है इस में अथ और अतः इन दो शब्दों के अर्थ विषय में बो ही मेहनत की है और उस पर से मिन्न भिन्न काण्ड की बिलकुल भिन्न-भिन्न व्यवस्था प्रतीत होती है ऐसा कोई-कोई कहते हैं परन्तु वैसा कहना अप्रशस्त है-आश्वलायन ने जो व्यवस्था को है वह कुछ-कुछ ठीक है उसे देखना चाहिये। इन दिनों कर्म वेदमन्त्रों के अनुकूल नहीं होता क्योंकि जैमिनि ऋषि ने कर्मकाण्ड में मन्त्रमयी देवता माने हैं और कर्म का अधिकार नातक और योग्यता को चढ़े हुए पुरुषों को है तो इस पर से यह स्पष्ट होगा कि कर्म विषय में जो यह बुद्धि वह पुरुषों में योग्यता नहीं है यह होगा, कर्मकाण्ड में मन्त्रमयी देवता हो तो अब मुनि देवताओं को उममें घुसने का स्थान नहीं रहा. उपासनादिकों को योगशास्त्र का आधार है जैसे कर्मकाण्ड को मीमांसा में हैं, परन्तु योगशास्त्र में मूर्ति पूजा के विषय में कहीं भी वर्णन नहीं , शानकांड में मूर्ति की कोई आवश्यकता नहीं होती ऐसी सर्वसम्मति है, इस पर से जैमिनि के मतानुकूल व्यासजी के सिद्धान्तानुकूल और पातञ्जलि के सम्मत्यनुकूल तो मूर्तिपूजा ग्रहीत नहीं होती अर्थात् पूर्वमीमांसा शास्त्र. योगशास्त्र, उत्तरमीमांसा अथवा वेदांतशास्त्र हन में तो मूर्तिपूजा को कहीं भी अवकाश नहीं है, अब कोई ऐसा कहे कि स्मृतिग्रन्थों में मूर्तिपूजा है और स्मृति को अनुमान से श्रुतिमूलकत्व है, . उपलब्ध श्रुति में मूर्ति की पूजा, का उपदेश न हो तो भी लुप्त है और भुति में मूर्ति पूजा का विधान है ऐसा. मानकर मूर्ति पूजा करना चाहिये तो ऐसा श्रुति स्मृति का सम्बन्ध मानकर अनुपस्थित Men ( २७) . श्रीत का अवलम्वन कर-कर उपस्थित अन्यों के आधार में जो विचार करना है उस में गड़बड़ मचाना यह हमें प्रशस्त नहीं दीखता । इन दिनों चार वेद और प्रत्येक वेद की बहुत सी शाखायें भी उपलब्ध ( प्राप्त ) हैं, शाखा भेद फिर कई प्रकार का होता है जो कुछ मूल वीजरूप वेदों में वही उपलब्ध शाखाओं में तो न हो, किन्तु लुप्त शाखाओं में होगा यह कल्पना संयुक्तिक नहीं, आश्वलायन, कात्यायनादि श्रौत सूत्रकारों को नष्ट माखाओं में के मन्त्र लेते नहीं बनते, इसलिये अमुक मन्त्र ही नहीं लिये ऐसे कहीं भी कहते नहीं सुना और शास्त्र व्यवस्था के लिये स्मृत्यबलम्बन, करना चाहिये ऐसा भी उनका कहना नहीं था, हमारा भी यही कहना है कि, पूर्वमीमांसा योग और उत्तरमीमांमा इन शास्त्रों को कृपाकर लगाओ और विचार कर-कर देखो, इसी प्रकार शतपथादि प्रायों में, निरुक्त में, पाताल महाभाष्य में नष्ट शाखाओं का गौर्ण प्रकार से भी कहीं सूचक लिंग नहीं है, इसले स्मृति को श्रुतिमूलकत्व है। इस मत ले आधुनिक अशुद्ध व्यवहार को आवश्यकीय उतने ज्ञापनों को निकालना यह बहुत ही अप्र- शस्त है । अस्तु, वेदों में तथा शास्त्रों में मूर्तिपूजा का विधान कहीं भी नहीं, यह तो सिद्ध हो चुका, अब रहा यह कि मूद और अज्ञानी लोग सावयव देवताओं के विना अपना निर्वाह कैसे करें ? इस प्रश्न पर विचार करें. हमारे विचार से नो मूखों को भी मूर्तिपूजा की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि मूर्ख अर्थात् प्रथम ही जड़ बुद्धि और फिर उसके पीछे लगाई जाय जड़ पदार्थों की पूजा, तो क्या उसकी बुद्धि और अधिक जड़ न होगी ? क्योंकि जड़मूर्ति की पूजा ले तो जड़बुद्धि में जडत्व. ही जमेगा इस से उन्नति तो कमी भी न होगी किन्तु अधोगति १६
( २८
.
तो अवश्य होगी, भला अब यह देखें कि पूजा शब्द का अर्थ
क्या है..पूजा शब्द का शब्दार्थ सत्कार करना ऐसा ई नकि
पोडशोपचार पूजा, देखो-
मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।
श्राचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव ।
इस स्थल पर माता पिता, आवाय और अतिथिइनका.
पूजन अर्थात् सत्कार करना यही है। उसी प्रकार मनु में भी
स्त्री पूजनीय है अर्थात् भूषण, वस्त्र; प्रिय वचन इत्यादिकों
द्वारा सत्करणीय है, देखो मनु जी क्या कहते है ---,
47
.
*.
पितृभितृभिश्चैताः पतिभिर्देवरस्तथा।
पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः॥
जड़ पदार्थों की सत्कारार्थ में पूजा करते नहीं बनतो;
सचेतन का, सजीव का ही केवल सत्कार करते वनवा है,...
सजीव का अर्थात् भद्र मनुष्यादिको का सत्कार करने से
बहुत से लाभ होते हैं-
मनुष्यों को सत्संग होने से उनकी बुद्धियों की परिपकता
होकर वैशद्य को वे पहुंचते हैं और उससे मन्द बुद्धि पुरुषों
का कल्याण भी होता है, अब दूसरा यह कि मनुष्यों में
स्वभाव ही से ऐसी इच्छा होती है कि लोग हमें अच्छा कहें;
हमारी सुकीर्ति हो, आस पास के लोग भला कहैं, हमारे
आचरण को ठीक कहें इत्यादि, तो इस इच्छा पर से उनके
S
(
--
मन की सदाचरण की इच्छा बंद होती है पर यह होने का
पावे ? जबकि उसे 'सत् मनुष्यों की संगति हो तब ही ही
सकता है अन्यथा कभी सम्भव नहीं, हमें स्पष्ट विदित है
कि जड़ मूर्तियों के ससन्मुम्ब मन्दिरों में कैसे कैसे दुराचरण
होते हैं वैले दुराचरण ५ वर्ष के बच्चे के सन्मुल भी करने
की मनुष्य की हिम्मत नहीं होनी जैली कि 'जड़ मूर्ति के
सन्मुख करने हो लज्जा तनिक भी नहीं आती, इस पर ले
स्पष्ट है कि मनुष्य को मनुष्य जितना डरता है उतना जड़
मूर्तियों को नहीं डरता, किन्तु यह 'तो' होता है कि लाख
मूर्तियों में भी 'यति मनुष्य खड़ा किया जाये तो उसका चित्त
भ्रष्ट और चंचल होकर वह दुराचरण की प्रवृत्ति आप स्वयं
दिखाता है, जड पदार्थ के सत्कार से कभी भी मनुष्य के
मन की उनि नहीं होती परन्तु द्विार, महा विचारों
में मन लगने सेर्बुद्धि की उन्नति होती है, सत्संगति में
दूसरे का लत्कार करने से आत्मा प्रसन्न होकर प्रीति संघश
उत्तम गुण उसमें उत्पन्न होते हैं, यह इतना पूजन अर्थात्
सत्कार इस अर्थ से मूर्ति पूजा के विषय में विचार हुआ।
-
अन मर्ति के षोडशोपचार पूजा के विषय विचार करना
चाहिये, ज मूर्ति केवल जड़ पदार्थ इसी नाते ले.पूजा
नही होती किन्तु प्रथम उसमें उसकी प्राण प्रतिष्ठा करनी
पड़ती है, मूति में प्राण प्रतिष्ठा यह लिफ भावना हो परंतु
भावना का अर्थ विचारणा यह होता है।
יר
धादशी भावना यस्य सिद्धिभवति तादृशी॥
जैली-जैसी भावना वैसी ही उसको सिद्धि मिलती है
( ३० ) .. ऐसा कोई-कोई कहने लग जाते हैं परन्तु यह उनका मिथ्या प्रलाप है, क्योंकि सब मनुष्यों को सदा सुख प्राप्ति की हद भावना रहती है फिर उनको सर्वदा सुखप्राप्ति क्यों नहीं होती ? उली तरह पर्वत के बीच सुवर्ण की दृढ़ भावना की जाय ता मी पर्वत सोने का कभी नहीं बन सकता, हमारी भावना के कारण जमूर्ति में कुछ भी फेरफार नहीं होता और प्राण प्रतिष्ठा करने के पश्चात् भूति सचेतन नहीं होती और न कमी वह आँख से देखती है, यह हम सयों को खूब मालम ही है, अस्तु परमेश्वर का अखण्ड निश्चय इस सब जगत भर में चल -रहा है उसमें हमारी कृति से कोई परिवर्तन नहीं होगा, जो जड़ है. वह जड़ ही रहेगासचेतन वह सचेतन ही समझा जावेगा, अब रहा यह कि प्राणप्रतिष्ठा के कारण जम्मूर्ति को पूजा के अर्थ मानने का क्या आधार है उसे देखो, तो देखते हैं कि न तो चारों वेदों में, अथवा गृह्यश्रीत सूत्रों में और न पड्दर्शनी में कही भी प्राणप्रतिष्ठा के मन्त्र दिये हैं, तो फिर- प्राणेभ्योनमः। , इस प्रकार के प्राणप्रतिष्ठा के मन्त्र कहाँ से निकले, इस का विचार हम हिन्दुओं को नहीं नहीं मैं भूला हम आर्यों को अवश्य करना चाहिये हिन्दु शब्द का उच्चारण मैंने भूल से किया क्योंकि हिन्द यह नाम हमको मुसलमानों ने दिया है जिसका अर्थ काला,काफिर, चोर इत्यादि सो मैंने मूर्खता से उस शब्द को स्वीकार किया था, हमारा असली नाम तो आर्य अर्थात् विजानीद्यार्थ्यान्ये च दस्यवो वहिष्मते रन्धया -- . । - * - - (३१ ) शासवतान् । शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेता ते संधमादेषु चाकन । । (ऋग्वेद अ०४ । अ० १० १० । मं०८) आर्यो ब्राह्मणकुमारयो ( अष्टाध्यायी पाणिनीय) भाइयो ! दस्युसदृश अबतचारी लोगो के साथ लड़ने वाले हम व्रतवारी 'आर्य हैं सो स्मरण रहे, अस्तु; 'प्रति- ठामयू चादि अथवा लिंगार्चन वितामणि इत्यादि तंत्र ग्रंथों में के तंत्र लेकर हम जड़मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा करते हैं ऐला यदि कोई कहे तो हम उन्हें उन तंत्रयों का कुछ नमूना दिखाते हैं और पूछते हैं कि आया ये ग्रंथ माननीय हो सकते हैं वा नहीं। पीत्वा पीत्वा पुनःपीत्वा यावत्पतति भूतले। पुनरुप्थाय वै पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते। भला ऐसे-ऐसे तान्त्रिक मन्त्रों के बीच वैदिक मन्त्रों का सामर्थ्य कहाँ से आ सके ? इसीलिये जहमूर्ति में कभी भी चेष्टा नहीं उत्पन्न होतो, इस मन्त्र से स्वाभाविक जड़ पदार्थ में प्राण डालना तो दूर रहा परन्तु स्वाभाविक जीव रहनेवाले सावयव मृत शरीर में जिसमें प्राण आना चाहिये और मुर्दा जिन्दा हो जाय, परन्तु बैला भी नहीं होता तो फिर व्यर्थ ही इस प्रकार के प्राण प्रतिष्ठा के पावण्ड में क्या रक्खा है अर्थात् कुछ भी ऐसे पाखण्ड से नहीं निकला। १ । ६ (३२.) १ प्रध-भिन्न-भिन्न वर्ण तो आप नहीं मानते फिरवर्गाश्रमीय धर्म की व्यवस्था आप कैसे करोगे अर्थात् ब्राह्मण कौन ? वैश्य कौन ? और क्षत्रिय कौन ? तथा शुद्र कौन हो सकता है। उत्तरः आश्रम 'चार है ब्रह्मचर्य, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ और संन्यास, सुसंगति अध्ययनादि का अधिकार मनुष्यमात्र को है फिर जिस-जिस प्रकार जिस जिस पर संस्कार होगा उसी-उसी प्रकार उसकी योग्यता मनुष्य मात्र में बढ़ेगी, हमारे देश में कोई बड़ी धर्मलमा ‘नहीं जिसके कारण आश्रा व्य- वस्था और वर्णव्यवस्था कुछ की कुछ ही लोगई है, मला आदमी दुःख उठाता है, चाहिये उतने सजदर हम ठौर नहीं मिल सकते क्योंकि देश भर में टोलियाँ की टोलियाँ साधुओं की फिरती दिखाई देती हैं, आधुनिक सम्प्र- दायों के अनुकूल जो साधु बने हैं बतलाओ कि उन्हें किस आश्रम में माने ? क्योंकि शास्त्र का आधार छोड़ लोग मन. माने रहने लगे हैं यह एक प्रकार को ज़बरदस्ती है। शूद्र, वैश्य क्षत्रिय और ब्राह्मण यह व्यवस्था गुण, कर्म और स्वभाव से की जा सकती है और इसी प्रकार प्राचीन आर्य लोगों की व्यवस्था थी, वे जन्म ले ब्राह्मणादि वर्णनहीं मानते थे, जनश्रुनि, जावाल के नीच कुल ओथे. जाबाल ऋषि की कथा छायोग्योपनिषद सेबी दाही हुई है, कि उसकी माता व्यभिचारिणी थी. परन्तु गुरु नेपाल जाकर जायाल, लत्य बोला, हनने कथन शुरु रामन होला, लमसे कहने लगा कि 'जाबाल तुम लत्य भाषण के कारण ब्राह्मण हो ।' ऐसा कह कर उसे ब्राह्मणत्व दिया, अब पुरुष सूक्त में भी एफ श्रुति है. उसका भी अर्थ करना चाहिये। ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीवाहू राजन्यः कृतः। - ।
( ३३ ). - - अरूतदस्य यद्देश्य: पद्भ्यार्थशूद्रों अजायत ।। ( यजुः० ) पुरुष सूक्त के बीच में सहस्रशीर्षा यह, पद बहुव्रीहि. है, तत्पुरुष नहीं है, जिस प्रकार 'गंगागां घोषः' इसका अर्थ लक्षणा से करना पड़ता है। इसी प्रकार पद्धति रखकर ऊपर के वाक्य का अर्थ करना चाहिये। पूर्णत्वात्पुरिशयनाहा पुरुषः। (निरुक्त का प्रमाण है!), उस पुरुष का मुख अर्थात् मुख्य स्थान, अर्थात् विद्वान् शानधान् जो हैं वे ब्राह्मण हैं, शतपथ में लिखा है कि "बाहु" अर्थात् वीर्य ऐला. अर्थ दिया है। इससे स्पष्ट है कि वीर्यवानों का क्षत्रिय जानना चाहिये यह व्यवस्था होती है। व्यवहारिक विद्या में जो चतुर हैं वे वैश्य है, अब “पद्भ्यां शूद्रो अजायत" इस स्थल पर पद इसका अर्थ नीच मानकर मूर्खत्वादि गुणों से शूद्र होते हैं ऐसा. कहना किस प्रकार चल सकेगा तो यानि तीर्थानि सागई तानि ब्राह्मणस्य दक्षिणे पदे इस स्थल पर पद की कितनी भारी, योग्यता है यह तुम्हें विदित ही है इस विचार पर से शुद्र अर्थात् मी ऐसा ही अर्थ होता है और तब ही मनुजी के वाक्य का अर्थ सम्यक् प्रकार लग जाता है। man- शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चति शूद्रताम् ।
क्षत्रियाज्जातमेवन्तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥ ܝ सब वर्णों के अध्ययन का जो समय है वह ब्रह्मचर्य है और संसार को एक ओर रखकर अध्ययन करने में, उपदेश करने में, लोक कल्याण करने में जो सम्पूर्ण समय लगाया जाये यह संन्यास है। गृहस्थियों को समय इन सब कामों के करने को नहीं मिलता और संन्यासियों को बहुत अघकाश मिलता है, बस यही मुख्य भेद है, अब यदि कहा जाय कि जन्म ही से ब्राह्मण होता है तो जब कोई ब्राह्मण अपने सदाचरण को छोड़ यवनादिकों के से आचरण करने लग जाता है तो उसका ब्राह्मणत्व क्यों नष्ट होता है ? इससे सिद्ध हुआ कि केवल जन्म सिद्ध ही ग्राह्मणत्व नहीं किन्तु आचारसिद्ध है । यह तुम्हारे ही कामों से सिद्ध होता है, जिस समय इस आर्यावर्त में अखंड ऐश्वर्य था उस समय वर्णाश्रम की ऐसी ही व्यवस्था थी, अब यदि कोई कहेगा कि गृहस्थाश्रम का अनुभव किये बिना ही संन्यास न लेना चाहिये तो यह कहना अप्रशस्त है, क्योंकि यदि रोग हो तो औषध देना बुद्धिमानी है उसी प्रकार जिस पुरुष को विषयासक्ति की इच्छा नहीं, भोगेच्छा भी निकल चुकी है तो उसे नया संन्यास लेने की कोई आवश्यकता नहीं किन्तु यह तो स्वयं संन्यासी बना बनाया हुआ है। गार्गी ने कभी भी संसार सुख का अनुभव नहीं लिया, वह सदा ब्रह्मचारिणी यी संन्यासियों से बड़े-बड़े लाभ होते हैं संन्यासियों को शरीर सम्बन्ध तो केवल होता है, शेष व्यवसाय उन्हें नहीं होते, प- देश करना चा भधर्म की निवृत्ति करना यह संन्यासियों का मुख्य कर्तब कर्म है, अब यदि कोई पूछे कि पुत्रोत्पत्ति विना जन्म कैसे सफल होगा ? तो उन्हें यह उत्तर है पुष दो + प्रकार के होते हैं, विद्या और योनि, इन दोही सम्बन्धों से पुत्र प्राप्ति होती है। "गरीयान् ब्रह्मदः पिता" मूढ़ लोग जनपद में दुराचार कर-कर किसी आपत्ति में पड़ेंगे सो उन्हें सदाचरण की ओर लगाना यही चतुर्थाश्रमधारी शानी पुरुष का मुख्य काम है, परन्तु इन दिनों संन्यालियों पर बड़े-बड़े जुल्म हो रहे हैं अर्थात् संन्यासियों को वन में रहना चाहिये एक ही बस्ती में तीन दिन से अधिक न रहे इत्यादि-इत्यादि प्रतिबन्ध माने जावे तो भाई बताओ कि वह फिर किस प्रकार और किले उपदेश करे ? क्या यह एक गाँव से दूसरे गाँव को दौड़ता फिरे ? संन्या- लियों को, आग को न छूना चाहिये ऐसा भी कहते हैं परन्तु मरने तक वे अपने जठराग्नि को कैसे छोड़ सकेंगे ? अर्थात् वह तो उनमें बना ही रहेगा, आधुनिक विश्वेश्वरपद्धति नामक ग्रंथ स यह सब पाखण्ड फैला हुआ है फिर आधुनिक साधुओं को तन, मन, धन का समर्पण कैसे किया जाय ? भाई मन का समपण कैसे होगा? और तन का समर्पण करने में क्या मल. मूत्रादिकों का भी समर्पण होगा ? आधुनिक साधुओं ने कुछ विलक्षण ही व्यवस्था बनाई है, उन्हें वेद शास्त्रों से क्या काम ? विचारे संन्यासियों को अलबत्ता कष्ट होते हैं, मुझे कुछ धन चाहिये इसलिये ऐसा कहता हूं, यह बात नहीं किन्तु मेरा साक्षी परमेश्वर है, तुम उलटा मत समझना। प्रश्न-मूर्त पदार्थों के बिना ध्यान कैसे करते बनेगा? उत्तर-शब्द का आकार नहीं तो भी शद ध्यान में है वा नहीं ? आकाश का आंकार नहीं तो भी भाकाश का पान करने में आता है वा नहीं ? जीव का आकार नहीं तो भी ? आता ? ( ३६ ) जी का ध्यान होता है या नहीं ? शान, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न ये नष्ट होते ही जीव निकल जाता है यह किसान भी समझता है, ज्ञान यह ऐसा ही पदार्थ है, योगशास्त्र में ध्यान का लक्षण किया हुआ है - -- ~ रागोपहतिर्ध्यानम् ॥ १ ॥ ध्यानं निविषयं मनः ॥ २५ ॥ (सांख्यशास्त्र तत्र प्रत्ययकतानता ध्यानम् । (योगशास्त्र) सांकार का ध्यान कैसे करोगे ? साकार के गुणों का सानाकार होने तक ध्यान नहीं बनता अर्थात् सम्भव ही नहीं होता कि ज्ञान के पहिले ध्यान होजाय, देखो एक सूक्ष्म परमाणु का भी अधम उत्तम मध्यम ऐसे अनेक विभाग ज्ञान-बल से कल्पना में आते हैं, अब कोई ऐसा कहे कि मुट्ठों में क्या पदार्थ हैं तो विदित होने तक ढंकी हुई मुट्ठी की ओर देखने ही से' केवल उस पदार्थ का ध्यान कैसे करें ? तो इससे मेरा वहीं कहना है कि प्रत्यक्ष के सिवाय उस पदार्थ को जानने के लिये और भी दृढ़तर सबल उपाय हैं उन्हें देखो, अनुमान, उपमान, शन्द, ऐतिहा, अर्थापत्ति, संभव और अभाव ये आठ उपाय हैं, अनुमान शान के सम्मुख प्रत्यक्ष की क्या प्रतिष्ठा है अव यह विचारणीय. अस्तु । ओ३मू. शान्तिः शान्तिः शान्तिः । R (३७ ) पाँचवाँ व्याख्यान . वेदविषयक ओ३म् दृतेदृर्थ ह मा मित्रस्य मा-चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् । 'मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे । मित्रस्य चक्षुषा स मीक्षामहे ॥ (य० अ० ३६ । मं०१८) आज के व्याख्यान का विषय 'वेद' यह है, तीन प्रकार से इस विषय का विचार करना चाहिये, वेद की उत्पत्ति किस प्रकार हुई ? वेद का कर्ता कौन है ? और वेदों का प्रयोजन क्या है ? परमेश्वर वेदों का कर्ता है वेद अर्थात् शान, वेद अर्थात् विद्या, शान या विद्या- ये सम्पूर्ण सृष्टि पदार्थों के बीच उत्तम हैं, ज्ञान सुख का कारण है, शान के बिना सुख- कारक पदार्थ भी दुःखकारक होता है, क्योंकि ज्ञान के विना पदार्थ की योग्य योजना करते नहीं बनती, अनन्त शान, ईश्वर का है, इसीलिये "अनन्तावैवेदाः"-पेसा घवन है, अनन्त यह उसकी संशा है, अनन्त ज्ञान सम्पन्न परमेश्वर मनुष्य की योग्यता बढ़ाने के लिये और इसे ऊँचे दरजे को पहुँचाने के लिये सदा प्रवृत्त है और इसी हेतु : को सफल करने के लिये विद्या का प्रकाश करता है सो वही प्रकाश वेद है, मनुष्य इस अनन्त ज्ञान के लिये अर्थात् वेद-भान के अर्थ-योग्य .
(३८)
-
अधिकारी है, इस मान की उत्पत्ति मनुष्य से नहीं है, अब
यदि ईश्वर साकार नहीं तो उसने वेद का प्रकाश कैसे किया
ऐसा प्रश्न उद्भव होता है, तालु. जिह्वा, ओष्ठ आदि जिस
अधिकरण में नहीं हैं तो वहां से शब्दोचार कैसे बनेगा
इसका उत्तर देना सरल है, ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो फिर
सहज ही में यह सोच सकते हैं कि उसे मुखादि इन्द्रियों की
अपेक्षा नहीं संभव होती, शब्दोच्चार को संयोगादि कारण
अल्प शक्तिवालों को लगते हैं, कि-
अपाणिपादो जवनो ग्रहीता,
पश्यत्यचक्षः स शृणोत्यकर्णः ।
स वेत्ति विश्वं न च तस्यास्ति वेत्ता,
तमाहुरग्रथं पुरुषं पुराणम् ॥
(मुण्डकोपनिषद्)
आप सब यह क़बूल करते हो कि हाथ के विना ईश्वर
ने सब सृष्टि की रचना की फिर भला मुंह बिना वेद को
रचना क्यों न हो सकेगी? कोई यदि ऐसी - शंका करे कि
चेदरूपी पुस्तकों की रचना तो शक्य काम है इसलिये ईश्वर
के साक्षात् कृति की कल्पना न करे, परन्तु इन स्थल पर
जरा विचार करना चाहिये, विद्या और जड़ सृष्टि रचना में
महत् अन्तर है, जट सृष्टि रचना ही केवल परमेश्वर ने कर दी
तो इसले उसका बड़ा सा माहात्म्य सिद्ध नहीं होता,
क्योंकि विद्या के सम्मुख जड़ सृष्टि रचना कुछ भी नहीं है,
इसलिये विद्या को कारण भी ईश्वर ही है ऐसा मानना चाहिये
(३६. ) अन्य क्षुद्र पदार्थ निर्माण कर-कर विद्यारूपी घेद ईश्वर उत्पन्न न करे वह कैसे हो सकेगा? अब वे विद्या ईश्वर से उत्पन्न हुई तो इसका तात्पर्य क्या है ? ऐला प्रश्न उत्पन्न होता है तो उसका असर यह है कि आदि विद्या अर्थात् सब विद्याओं का मूल तस्वमात्र ईश्वर द्वाग प्रकाशित हुई उसका विशेष प्रभाव मनुष्यों के हाथों से अभदास द्वारा होता है, 'अब यह आदि विद्या अर्थात् वेद ईश्वर ने प्रकाशित किये हैं उसके प्रमाण-: . प्रथम प्रमाण यह कि वेद में पक्षपात नहीं, ईश्वर सब दुनिया पर उपकार करनेवाला है इसलिये तत्प्रणीत जो वेद उममें पक्षपात कारहना कैसे सम्भव होगा? इसी तरह ईश्वर न्यायकारी है हस- लिये उसमें पक्षपात की संभावना नहीं हो सकती जिसमें पक्षपात हो वह विद्या ईश्वर प्रणीत नहीं है, इसका उदाहरण देखो कि वेद की भापा क्या ? संस्कृतं होना ? तो बतलाओ कि संस्कृत भाषा वेदो की होने में क्या पक्षात नहीं है ? ऐसा कोई कहे तो उसका यह कहना ठीक नहीं है संस्कृत भाषा सारी भाषाओं का मूल है, अंग्रेज़ो सदृश भाषाएँ उससे परंपरा से उत्पन्न हुई हैं, एक भाषा दूसरी भाषा का अपभ्रंश होकर उत्पश होती है 'घ' इस संस्कृत शब्द में के 'यम्' को सम्प्रसारण होकर 'वुई' यह शब्द उत्पन्न हुआ, उसी तरह 'पितर' से 'तेतर' और 'फादर' 'यूयम्' और 'आदिम' से 'आदम' इत्यादि ऐसे-ऐसे अपभ्रंश कुछ नियमों के अनुकूल होते हैं और कुछ अपभ्रंश यथेष्टाचार से भी होते हैं इसके वारे में पुद्धिमानों को कहने की कुछ अधिक आवश्यकता नहीं है, ईश्वर में जैसा अनन्त आनन्द है उसी तरह संस्कृत भाषा में भी अनन्तानन्द है, कहो कि इस भाषा के लाश मृदु, मधुर और व्यापक सर्व भाषाओं की माता अन्य कौन सा भाषा है ? - (४०) अर्थात् कोई भी दुसरी नहीं, अब यदि कोई कहे कि यह भाषा एकही देश की क्यों होना चाहिये ? तो देखो कि संस्कृत मापा एक ही देश की नहीं है, सर्व भाषाओं का मूल संस्कृत में है इसलिये सर्वज्ञान का मूल जो वेद हैं वे भी संस्कृत ही में हैं, जिस-जिस देश में संस्कृत भाषा घुसी है उस-उस देश में के विद्वान् लोगों के मन का आकर्षण करती जाती है और यह दूसरी भाषाओं के मातृस्थान में है. ऐसी योग्यता प्राप्त करती जाती है, फिर देखो कि वेद ही में की कुछ-कुछ मुख्य मुख्य बातों का प्रचार जगत् में के लारे देशों में चल रहा है, यहूदी लोग सदा वेदी रचकर यक्ष करते रहते थे, यह शान उन्हें कहाँ से प्राप्त हुआ था? उन्हें होता, उद्गाता, ब्रह्मा इन की व्यवस्था के साथ यज्ञ करना विदित नहीं, परन्तु इस में कुछ अधिक भेद नहीं, हम आयौं की रीतियों की उन्हें भूल पड़ी है, इसी तरह पार्सी लोग भी अग्यारी में अग्निपूजा करते हैं, क्या यह आचार वेदमूलक नहीं हैं ? वेद में पक्षपात नहीं है यह स्पष्ट है, यहूदी लोग अन्य लोगों का द्वेष करना सीखे थे, मुसलमान लोग दूसरों को काफिर' कहते हैं, और उनकी धर्म पुस्तकों में ऐसा करने की प्रेरणा की गई है, परन्तु इस प्रकार के अभिमान के लिये वेदों में उत्तेजन नहीं है, इस लिये वेद ईश्वर प्रणोत हैं ऐसा होता है। द्वितीय प्रमाण-वेद "यह सुलम ग्रंथ है, अर्वाचीन पंडित अवच्छेदक अवच्छिन्न पदों को घुसेड़ कर बड़े लम्बे चौड़े परिष्कार करते हैं, परन्तु उन परिष्कारों में केवल शन्द जाल मात्र रहता है विशेष अर्थ गांभीर्य नहीं होता, इस प्रकार वेद ग्रंथ नहीं हैं, अब कोई कहे कि दुर्बोध के कारण परिकार में का काठिन्य पाण्डित्यसूचक है, तो आप जानते हैं जबकि 1
-
कौवे आपस में लड़ते हैं तब उनकी भाषा का अर्थ किसी को
भी नहीं समझ पड़ता, तो क्या इससे दुर्बोध के कारण काक
भाषा. पाण्डित्य की सम्भावना होगी? कभी नहीं, अस्तु,
वासुलभता है और अर्थ गाम्भीर्य यही सामर्थ्य का प्रमाण
है, ज्ञान प्राप्ति क्लेश विना होना यह ईश्वर कृति दर्शकहै, योही
"शाक्यता अवच्छेदक शाक्यता अवच्छिन्न" कहने की जगह
सुलभ शब्दों से जो भगवान् वात्स्यायनजी ने प्रतिपादन किया
है, उसे देखो-
प्रमातुः प्रमाणानि प्रमेयाधि गमार्थानी-
तिशक्यप्राप्तिः ।
इसी सुलभता के कारण वात्स्यायन.महा पण्डित क्या
आधुनिक शास्त्रियों की अपेक्षा पागल ठहराया जा सकता है ?
नहीं नहीं, फिर वात्स्यायन जी की.भाषा की अपेक्षा तो वेदों
की भाषा तो लाख दरजा सरल है।
तृतीय प्रमाण-वेदों से अनेक विद्या और शास्त्र सिद्ध
होते हैं जैसे-
नमोस्तु रुद्रेभ्यो ये दिवि येषां वर्षमिषवः ।
तेभ्यो दश प्राचीर्दश दक्षिणा दश
प्रतीचीर्दशोदीचीर्दशोर्वाः ॥
तेभ्योनमोस्तुतेनोवन्तुतेनोमृडयन्तुते।
यं द्विष्मो यश्च नोंहोष्ट तमेषां जम्भे दध्मः ।।
(य० सं० अ०१६ । सं०६४)
( ४२ )
मनुष्यों के किये हुए पुस्तकों में एक ही विषय का
प्रतिपादन रहना है, जैमिनिजी के सारे मत का प्रवाह एक
धर्म और धर्मी इस विषय में विचार करते-करने पूर्ण हुआ,
भगवान् कणाद के मन का आंघ पट पदायों का विचन
के विचार ही में समाप्त हुआ, इसी तरह वैधक अन्ध,
व्याकरण भाष्य और योगशास्त्र की व्यवस्था दगाने में
भगवान् पातअलि जी की सारी आयु प्रीती, परन्तु वेद-ये
अनन्त विद्या अधिकरण है इस लिये वेद मनुष्य कृन नहीं है
किन्तु ईश्वर प्रणात ही हैं, अब सारी विद्याओं के अधिकरण वेद
हैं अर्थात् वेद में सारी विधाओं के मूलतत्वों का दिग्दर्शन मात्र
है, उदाहरणार्थ देखें-
वाराह्योपानहोपनह्यामि०
सहस्रारित्रां शतारित्रां नावमित्यादि
एका च में तिरश्च में पञ्च च मे०॥
(य० सं०)
प्रथम उदाहरण में रचना विशेष का निरूपण किया हुआ
है, दूसरे में नौका शास्त्र का निरूपण किया है और तीसरे में
गणित शास्त्रका निरूपण यतलाया है।
अव यदि कोई पूछे कि ईश्वर ने सब विद्याओं के
तत्व ही क्यों प्रकाशित किये, और साधान्त विद्या का और कला
का क्यों विवरण नहीं किया? तो उससे मेग यह कहना है कि
जैसे ईश्वर ने मनुष्यमात्र के वुद्धि व्यापार को उसी तरह बुद्ध्यु-
म्नति को भी अवकाश रफ्ता।
- सात म ( ४३ ) चतुर्थ -- कोई कोई पेमी शंका भी करें कि अनेक पुरुष घटित वेद हैं तो इसका यह उत्तर कि यदि अनेक पुरुष घटित वेद होते तो वेदों में एक वाक्यतादि गुण हैं ननकी व्यवस्था कैसी लगाओगे ? अब पूर्यकाल भिन्न-भिन्न विद्याये भरत. खण्ड में वेदों के कारण प्रसिद्ध थीं, जैले विमान-विद्या, अस्त्र विद्या, इत्यादि विद्याओं के पुस्तक नष्ट होने से वे विद्यायें भी नष्ट होगई, मुसलमानों ने लकड़ी को जलाने की जगह पुस्तकों को जलाया, जैनियों ने भी ऐसा ही अनर्थ किया, सन् १८५७ के सुना जाता है कि जब दंगा फसाद हुआ था उस समय किसी एक यूरोपियन ने अमृतराव पेशवा के भारी पुस्त- कालय में आग लगा दी थी ऐमी दन्त कथा है. इस विचार करो कि तिनी विद्या नष्ट होती आई है उपरिचर नामक राजा था वह सदा भूमि को स्पर्श न करता हवा ही में फिरा करता था, पहिले जो लड़ाइयाँ करते थे उन्हें विमान रचने की विद्या भली प्रकार विदित थी, मैंने भी एक विमान-रचना की पुस्तक देखी है, भाई उस समय दरिद्रियों के घर में भी विमान थे, भला को कि उस व्यवस्था के सन्मुख रेलगाड़ी की प्रतिष्ठा क्या हो सकती है ? अर्थात् कुछ भी नहीं। यश्चम-वेद सनातन सत्य है, इससे उनका सामर्थ्य भी बहुन बसा हैं, देखो कि शाप { जर्मन् ) देशों के लोग वेदों का, अवलोकन भर कर उनकी कीर्ति और गुणानुवाद गा रहे हैं, इसी तरह सब देशों के विद्वानों के मन का आकर्षण वेद के सत्य के सामर्थ्य से हो रहा है अब सारांशा यह कि सत्यता. एक बाध्यता, सुगम रचना, भाषा, लारण्य, निप्पक्षपात, सर्व विद्यामूलकत्व ; ये गुण वेदों ही में केवल सम्भावित होते हैं, इसी से वेद ईश्वर प्रणीत हैं, इन दिनों A ~ +
मनु ने लिखा है कि ब्रह्माजी ने अग्नि. घायु, आदित्य और
अंगिरा इन चार ऋषियों से वेद सीख फिर आगे वेद का
प्रचार किया, ब्रह्माजी का चतुर्मुख ऐसा नाम है इससे यह
नहीं समझना कि सचमुच उनके चार की मुख होंगे, यदि
सत्य में ऐसे चार मुख होते तो बेचारे ब्रह्माजी को बड़ा ही
दुःख हुआ होता और फिर वेचारा सुख से कैसे सोता, तो
ऐसा नहीं है, किन्तु 'चत्वारो वेदाः मुखे यस्य इति चतुर्मुखः'
ऐसा समास करना चाहिये, प्रथमारसम में ईश्वर शान से
इन चार ऋषियों के ज्ञान में वेद प्रकाशित हुये और
उनसे ब्रह्माजी सीखे और पश्चात् उन्होंने सारी दुनिया
भर में फैलाये और उनसे मनुष्यों को शान प्राप्त हुआ
इसलिये उनका वेद ऐसा नाम है और पहिले ऋषि लोग
एक दुसरे से सुनते आये इसलिये श्रुति ऐसा वेदों का
नाम है।
अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा इन चार ऋषियों को वेद,
प्रथम प्राप्त हुये, इस पर कोई कहेगा कि ये आदि में चार ही
ऋषि क्यों थे, एक या अधिक क्यों न थे तो ये शंकायें पाँच या
तीन होते तो भी बनी रहती, यह अशो वनिका न्याय होगा,
अब कोई कहेगा कि वेद आधुनिक हैं और नित्य नहीं हैं ?
क्योंकि ब्रह्मदेव के मन में मानलहर उत्पन्न हुई और उसी समय
से वेद की परम्परा कहते बनती है फिर नित्य कैसे ? सो भाई
इस प्रकार नहीं है, देखो ईश्वर का अपूर्व ज्ञान है और शान
रचना नित्य है, सृष्टि का तथा वेदों का आविर्भाव तिरोभावही
केवल है, क्योंकि-
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ॥
(ऋ० सं० अ०८। अ०८1०८)
।
इत्यादि वचन ईश्वरीय नित्य ज्ञान का प्रमाण हैं ब्रह्माजी
के पीछे विराट उत्पन्न हुआ फिर वशिष्ठ, नारद, दक्षप्रजापति.
स्वायंभुव मनु आदि हुये, इन सब ऋषियों के मन में ईश्वर ने
प्रकाश किया।
अब यह व्याख्यान पूर्ण करने के पूर्व वेद विषय में साधारण
विचार करना चाहिये, कोई-कोई कहते हैं कि चाँद सूरज आदि
भूतों की पूजा वेदों में उपदिष्ट है परन्तु यह कहना बिलकुल
असम्भव है।
शुक्ल यजुर्वेद
तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुम्तदुचन्द्रमाः ।
तदेवशुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स प्रजापतिः॥
तथा-इन्द्रं मित्रंवरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः ।
ससुपर्णो गरुत्मान् एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति ।
(ऋ० सं०)
अग्नि, इंद्र, वायु ये सब परमेश्वर ही के नाम हैं इसलिये
अनेक देवताओं का वाद विलकुल ही नहीं रहता।
प्रशासितारं सर्वेषामणीयांसमणोरपि ।
रुक्मानं स्वप्नधीगम्यं विद्यात्तं पुरुषं परम् ॥
एतमग्नि वदन्त्येके मनुमन्ये प्रजापतिम् ।
इन्द्रमेकेऽपरे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम् ॥
(मनु: अ०१२)
.
.
(४८) - १ परिच्छेद, प्रकार, विकार इत्यादि सम्बन्ध से एक ही मात्मा के भिन्न-भिन्न नाम हो सकते हैं। कोई-कोई कहते हैं कि वेदों में गेभत्स कथा भरी हुई है, माता च ते पिता च ते इस वचन पर महीधर ने भाष्य कर- कर बड़ा ही वीभत्स रस उत्पन्न किया है गर्भ के स्थान पर वर्ण विपर्यास कर-कर भगे यह शब्द निकाला है, परन्तु इस सम्बन्ध में शतपथ ब्राह्मण को देखो- वृक्ष वृक्षो राज्यं भगश्रीः स्पर्शो राष्ट्र श्रीर्वा वृक्षम्याग्रम् । इस प्रकार राष्ट्र के स्थान पर इस वचन की योजना करने से वीभत्सपन नहीं रहता। इसी तरह पुराणों में काश्यपीय प्रजा का वर्णन है, मरीचि का पुत्र कश्यप है, दक्ष की साठ कन्याओं में से तेरह कन्याओं के साथ कश्यप का विवाह हुआ, इस प्रकार का वर्णन किया हुआ है, इस कथा के लिये वेदों में कहीं भी आधार नहीं है, कश्यप अर्थात् आद्यन्त के विपर्यास से 'कः एश्यः' परमात्मा का नाम तो हो सकता है। कः पश्यः सर्वदृक् परमात्मा ग्रहीतः । इसी प्रकार हर किसी ने "ब्रह्मवाच' लगाकर कुछ कथा बना पुगणों का खण्ड रचा है, इस प्रकार का दुष्ट,उद्योग आधुनिक सम्प्रदायी लोगों ने तो बहुत ही किया है। ब्रह्मोवाच-टकाधर्मष्टकाकर्म टकाहिपरमपदम् । यस्य गृहे टका नास्ति हा टका टकटकायते ॥ + VE ) इस सम्प्रदाय का बाजार आज कल खूब गरम है, इसके कारण जो दुकानदारी प्रारम्भ हुई है उसे सम्प्र- दायी लोग क्यों कर छोड़ेगे ? यजमान की चाहे तीन क्या दश जन्म तक की भी हानि हो, तो उन्हें क्या मतलब ? इसलिये जब सब स्त्री पुरुष सर्वत्र वेदों को अवलोकन करेंगे तब इन सम्प्रदायियों की लटपट बन्द होगी, तव ही कंठी द्वारा वैकुण्ठ मिलने का सुगम मार्ग बन्द होगा। भाई सोचो जो एक ही कंठी से वैकुण्ठ मिल जाय तो बिसाती को कुल कण्ठियों की पेटियाँ गले में लटकाने ले संसार में क्यों सुख नहीं होता? चन्दन तिलक छापों से यदि स्वर्ग मिल जाय तो सारे मुंह पर चन्दन लोग्ने से क्यों न सुख मिले ? इस लिये भाई सोचो! चन्दन, तिलक, कण्ठी, ये सब पाखण्ड सम्प्रदायी लोगों का द्रव्य-हरण करने के लिये है, ये सच्चे तीर्थ नहीं हैं, सच्चे तीर्थ कौन से हैं सो इस के विषय वचन है अहिंसन् सर्वभूतान्यत्र तीर्थेभ्यःसतीर्थ्यः । सब्रह्मचारी विद्यावतस्नातः ॥ (छान्दोग्य उपनिषद्) ब्रह्मचारी पुरुष विद्यास्नात, व्रतस्नात होते थे इस से वेद. विद्या ही मुख्य तीर्थ है। ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः । A 1 .
• (५०) + . छठा व्याख्यान जन्मविषयक ओ३म् भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं प- श्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरंगैः स्तुष्टुवार्थ सस्तनू- भियशेमहि देवहितं यदायुः। (ऋ० सं० मं० १ । अनु० १४ । सू० ८६ | मं०८) यह ऋचा स्वामीजी ने प्रथम कही। आज के व्याख्यान का विषय जन्म यह है, अब जन्म का अर्थ क्या है इसका लक्षण प्रथम कहना चहिये। शरीर के व्यापार और क्रिया करने योग्य परमाणुओं का जब संघात होता है तब जन्म होता है, अर्थात् सब साधनों से युक्त होकर क्रिया योग्य जव शरीर होता है तब जन्म हाता है, सारांश यह है कि इन्द्रिय और (प्राण ) अन्तःकरण ये शरीर के मध्य जब उप. युक्त होते हैं तब जन्म होते हैं, जन्म अर्थात् शरीर और जीवात्मा का संयोग, तोइस से स्पष्ट है कि शरीर और जीवात्मा का वियोग भी मरण कहलाता है, अब इस जन्मान्तर के विषय में अनेक मत हैं, कोई-कोई कहते हैं कि मनुष्य का एक ही जन्म है अर्थात् मरने के पश्चात् फिर पुनर्जन्म नहीं होता और दूसरे लोग कहते हैं कि जन्म अनेक है अर्थात् मनुष्य को मरने , पर फिर दूसरे जन्म है। हमारा सिद्धान्त-मनुष्य का पुनर्जन्म है अर्थात् जन्म भनेक हैं ऐसा है- . ( ५१ ) एक जन्मवादियों के और अनेक जन्मवादियों के कहने में बहुत सी युक्ति प्रयुक्तियों का आधार है। अब उन उक्ति प्रयुक्तियों का विचार · करे, 'गतानुगतिको ‘लोक' इस न्याय से परम्परागत ज्ञान का स्वीकार करना यह विद्वानों को उचित नहीं, तर्क वितर्क कर-कर निर्णय करना यह विद्वानों का मुख्य कर्तव्य है- १ - . एक जन्मवादी ऐसा पूर्वपक्ष करते हैं कि इस में जन्म के पूर्व यदि कोई जन्म होता तो उसका हाल कुछ तो भी स्मरण रहना चाहिये था और जब कि पूर्व जन्म का कोई स्मरण ही नहीं है तो इस से यही कहना ठीक है कि पूर्व जन्म न था। इस पूर्व पक्ष का समाधान हम यों कहते हैं कि जीव का झान दो प्रकार का है, एक स्वाभाषिक और दूसरा नैमित्तिक है, स्वाभाविक ज्ञान नित्य रहता है, और नैमित्तिक ज्ञान को घटती, बढ़ती, न्यूनाधिक और हानि आदि का प्रसंग आता रहता है, इस का दृष्टान्त-जैसे अग्नि में दाइ करना यह स्वाभाविक धर्म है अर्थात् यह धर्म तो अग्नि के परमाणुओं में भी रहता ही है, यह उसका निज धर्म उसे कभी भी नहीं छोड़ता, इसलिये अग्नि की दाहकशक्ति जो ज्ञान है वह स्वा- भाविक ज्ञान समझना चाहिये, फिर देखो कि संयोग के कारण उष्णता यह धर्म उत्पन्न होता है और ऐसा ही वियोग होने से उष्णता धर्म नहीं रहता, इसलिये जल के उष्णता विषय का जो ज्ञान है वह नैमित्तिक ज्ञान है और जल में शीतलता विषय का जो ज्ञान है वह स्वाभाविक शान होता है, अब जीव को- मैं है, अर्थात् अपने अस्तित्व का जो शान है यह स्वाभाविक जान है, परन्तु चक्षु, श्रोत्र इत्यादि इन्द्रियों से जो शान पत्र -- है यह 5 (५२) होता है वह आत्मा का नैमिसि प्रान नैमित्ति ज्ञान तीन कारणों से उत्पन्न होता है, देश, काल और वस्तु, इन तीनों का जैसा जैसा कमेन्द्रियों के साथ सम्बन्ध होता है धैसे-वैसे. संस्कार आत्मा पर होते हैं, अब जैसे ये निमित्त निकल जाते हैं वैसे-वैसे इस नैमित्तिक ज्ञान का नाश होता है, अर्थात् पूर्व जन्म का देश, काल, शगर का वियोग होने से उस समय का नमित्तिक ज्ञान नहीं रहता, इस को छोड़ इस विचार में एक बात और ध्यान रखने योग्य कि ज्ञान का ही स्वभाव ऐसा है कि वह अयुगपत् क्रम से होता है अर्थात् एक ही समया- बच्छेद करके आत्मा के बीच दो तीन ज्ञान एकदम नहीं स्फुरने लगते, इस नियम को लापिका से पूर्वजन्म के विस्मरण का समाधान भली भाँति होजाता है, इस जन्म में मैं हूँ अर्थात् अपनी स्थिति का ज्ञान आत्मा को ठीक ठीक रहता है, इसी लिये पूर्व जन्म के ज्ञान का स्फुरण आत्मा को नहीं होता। -फिर इसी जन्म ही में कैसी-कैसी पवस्था होती है इस का मी विचार करें, मैं ही जो इतना भाषण कर चुका उल सारण का उसी तरह उस सम्बन्ध के मनोव्यागार फी सब परस्पराओं का मुझे कहाँ स्मरण रहा है ? हाँ! भाषण के स्थूलाश्यच का अवश्य स्मरण रहा है परन्तु बोलते ही वोलते सूक्ष्म अवयवों का विस्मरण होगया है, इस से यह नहीं मानते बनता कि मैंने भापण ही नहीं किया, फिर देखो जो बातें चाल्यावस्था में हुई उनका :अब विस्मरण हुआ है सो इस से चे बाल्यावस्था में थी ही नहीं-ऐसा नहीं मानते बनता, पुनरपि जाग्रत् अवस्था में जिन-जिन बातों का स्मरण रहता है उन-उन बातों का निद्रा में, सर्वथैव विस्मरण होता है, सब कारणों से यह सिद्ध होता है कि पूर्व जन्म का स्मरण ( ५३ ). . नहीं होता, इतने ही से पूर्व जन्म , को असम्भवपना सिद्ध नहीं होता-दो जन्म के बीच मृत्यु आ फँसो है और मृत्यु होना अर्थात् महाव्याहत अंधकार के बीच में गिरना हे फिर देखो. मन का.धर्म कैसा है। इसका विचार करो, मन का स्वभाव ऐसा है कि वह सिन्निधि पदार्थ के विषय राग द्वेष उत्पन्न करता रहे, लन्नध्य छूटने से उलको विस्मरण होता है फिर अर्थात् पूर्व जन्मावस्था में के दूर गत. पदार्थों . के विषय यदि आत्मा को विस्मरण होता है तो इसमें आश्चर्य ही क्या है, अर्थात् इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं, मैं एक दृष्टान्त देता हूँ। पाठशाला में कुछ विद्यार्थी विद्याध्ययन करते रहते हैं उनमें से कुछ लड़कों को अपने विषयों की समझ . झट उत्पन्न हो जाती है, तो दूसरे कुछ ऐले भी होते हैं कि उन्हें वह विषय उपस्थित या समझने के लिये कुछ विलम्ब लगता है, परन्तु तीसरे को तो उसी विषय के उपस्थित करने में बड़ी ही कठिनता पड़ती है, इस प्रकार यही के यही ही उत्तम बुद्धि, मध्यम बुद्ध और.. अधम बुद्धि ऐसे भिन्न-भिन्न प्रकार दावते हैं, तो फिर भला मरने के पीछे पूर्व जन्म के शान की उपस्थिति के.विषय कितनी दिक्कत होतो होगी? यह सहज ही ध्यान में आ सकता है, इस स जन्म एक ही है ऐसा प्रमाण मानना यह बिलकुल युक्ति विरुध है। शान यह आठ प्रकार का होता है, प्रत्यक्ष, अनुमान, उप- मान, शब्द, ऐतिह, अर्थापत्ति, सम्भव और अभाव ऐसे आठ प्रकार हैं, इनमें इन्द्रियार्थसनिकर्षमूलक प्रत्यक्ष शान यह तो बिलकुल ही क्षुद्र है, अव्यभिचारी, अव्यपदेशी और निश्चित ऐसा ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से कभी भी नहीं हाता।
इस से दूसरे प्रान साधन का अवलम्बन करना आवश्यक
हुआ, दृष्टान्त-कि जो कोई वैद्य नहीं है ऐसे पुरुष को यदि
रोग हो जाय तो यह नहीं जान सकता कि मुझे किस कारण
से यह रोग हुआ। तो फिर उस बेचारे को निदान को शान
कहाँ से हो सकता है जो रोगी को ऐलाशान नहीं तो
भी इससे यह कहते नहीं बनता कि उसे रोग ही नहीं है,
क्योंकि का'ण विना कार्य नहीं होता, इसलिये इस रोग का
मी छ न कुछ कारण होना ही चाहिये, ऐसा अनुमान होता
है, रोगी को कारण का ही केवल ज्ञान न होने से रोग का
कारण नहीं है ऐसा भी क्या कभी किसी ने माना है? कभी
नहीं, आगे गेग देखकर और उसका निदान और चिकित्सा
कर कर अमुक-अमुक कारण से यह रोग उत्पन्न हुआ ऐसा
अनुमान प्रमाण वल पूर्वक वैध ठहराता है और फिर यह बात
हमें भी स्वीकार करनी पड़ती है, ऐसी योग्यता अनमान
प्रमाण की है, अस्तु परमात्मा न्यायकारी और निष्पक्ष है यह
बात भी सब स्वीकार करते हैं। ऐसे न्यायकारी परमात्मा द्वारा
निर्मित संसार में लोगों की स्थिति के बीच और सुख लाभ
में बड़ा ही भेद दीखता है, यह भी निर्विवाद है । इसके विषय
दृष्टान्त देना चाहिये देखो एक ही मा बाप वे दो पुत्र हुए
और
उन्हें एक ही गुरु के पास अध्ययन के लिये रकावा और उनके
खाने पीने की व्यवस्था भी एक ही सी रावी, ऐसा होते
हुए भी एक लड़के की धारणा शक्ति उत्सम होकर वह बा
सिद्वान् नीतिमान होता है तो दूसरा भूलनेवाला, मूर्ख ऐसा
ही रहता है, सो पतलाओ इसका क्या कारण है ? इस बुद्धि
भेद का कारण इस जन्म में तो कुछ भी नहीं हैं और भेद तो.
प्रतीत होता है, यदि यह कहे कि ऐसा निरर्थक भेद ईश्वर
. ( ५५ )" ने किया तो ईश्वर पक्षाती ठहरता है, यदि कहैं ईश्वर ने नहीं किया तो भेद की उत्पत्ति नहीं होती, तो हमसे पूर्व जन्म है ऐसा ही मानाना अवश्य होता है, पूर्व जन्मार्जित पाप पुण्य के अनुसार यह व्यवस्था होती है ऐसा माने विना दूसरी कोई भी कल्पना नहीं जमनी । अस्तु एक जन्मवादी ऐसा कहेंगे कि ईश्वर स्वतन्त्र और स्वेच्छाचारी है, जैसे कोई माली अपने बगांचे में चाहे जैसे वृक्ष लगाता है और बाहे. उसे खाद डाल बढ़ाता है, उसी तरह हम जगत् में ईश्वर की लीला है, इस प्रकार का स्वतन्य ईश्वर में मानने से ईश्वर के न्यायत्व की हानि होती है और उन्मत्त प्रसंग ईश्वर पर आता है, परन्तु सब प्रकार सृष्टि क्रम के और वेद के अबलोकन से परमेश्वर न्यायी है. ऐना सिद्ध होता है । तब इस विरोध का निराकरण करने के लिये पूर्व जन्म था ऐसा मानना ही चाहिये, यदि ऐसा न माने तो स्थिति भेद कैला उत्पन्न होता है इसका सम्यक ( ठीक-ठीक ) उत्तर नहीं मिलता। संग प्रसंग भेद से यह स्थित भेद हुआ ऐसा भी कहते नहीं बनता, क्योंकि संग प्रसंग भेद की कल्पना जहाँ नहीं है, ऐसी जो माता के उदर में की स्थिति वह भी लबों के लिये कहाँ समान रहती है ? पेट में होते हुए एक जीव के लिये सुख होता है तो दूसरे को वहीं क्लेश होते हैं, एक धर्मात्मा के पेट जन्मता है और दूसरा पाप स्थान में जन्म लेता है। तो बताओ यह भेद कहाँ से और क्योंकर हुआ? पूर्व जन्म न मानने से इस भेद के कारण ईश्वर पर कितना भारी दोष आता है इसका कुछ विचार करो, पूर्वजन्म के विषय उपयुक्त अनुमान के सिवाय एक प्रत्यक्ष प्रमाण भी है, जीव की शरीर चेष्टा होने के पूर्व । (प्रथम) हमें प्रत्यक्ष होती है फिर आत्मा पर संस्कार . ?
( ५६ ) होता है फिर स्मृति होती है और पश्चात् किसी कार्य के विषय प्रवृत्ति निवृत्ति होती है, यह प्रकार सर्वत्र प्रतीत होता है, अब देखो कि शरीर योनि में से यथा बाहर पड़ने के पूर्व पेट में था, बाहर गिरते ही श्वाँस लेने वा रोने लगता है, तो यह प्रवृत्ति उसे पूर्व संस्कारों के विना कैसे होगी? माता का स्तन खींचकर दूध पीने लग जाता है. यह प्रवृत्ति कहाँ से थी ? दुध के विषय तृप्त होने पर निवृत्त होना है तो यह निवृत्ति भी किस प्रकार की है ? माता ने कुछ धमकी दी तो झट वा समझता है तो यह पूर्व संस्कारों के बिना कैसे होगा ? इससे निश्चय पूर्वक पूर्व जन्म था. यह प्रत्यक्ष और अनुमान दोनों प्रमाणों से सिद्ध होता है। पुनरपि, सब चराचर साष्ट की उत्पत्ति, स्थिति और लय का क्रम यदि देखा जाये तो उस सादृश्य से जीव सृष्टि का भी पूर्व-जन्म था, यह हमारा मध्यम जन्म है और मोक्ष होने तक अभी भी जन्म होनेवाले हैं, इस परम्परा से इस मध्य-जन्म की सम्भावना तभी हुई जब कि पूर्व जन्म पहिले था, क्योंकि यदि कुये में जल न हो तो डोल में पानी कहाँ से आवे ? इस दृष्टान्त की योजना इस स्थल पर ठीक होती है, अब कोई यह कहे कि परमेश्वर तो सदा व्यवस्था करते इये बैठा है और यह व्यवस्था कभी तो बिगड़ती है और कभी सध भी जाती है, जैसे ईसाइयों के धर्म पुस्तक में कहा है कि ईश्वर ने एक सुन्दर बगीचा बनाया और उसमें एक स्त्री पुरुष का जोड़ा रख उसमें एक जानवल्ली मी लगा रक्खी और परमेश्वर ने दोनों स्त्री पुरुषों को आशा दी कि तुम श्रान के पेड़ के फल मत खाना अर्थात् तुम अशानी रहो, तब सहज ही उन स्त्री पुरुषों ने ईश्वरीय आशा को . ( ५७. ) तोड़ा तो परमेश्वर को बड़ा गुस्सा आया, फिर तो ईश्वर ने इन्हें वहाँ से निकाल दिया, परन्तु अब सोचो कि यदि ईश्वर की व्यवस्था इस प्रकार विगढ़ गई तो वह सर्वश कैसे रहा? इसलिये ऐसी-ऐसी व्यवस्था ठीक नहीं, इमी. वास्ते एक-जन्म बाद भी नहीं जमता। ईश्वर सब जगत् का धारण मात्र करता है परन्तु उसने कृति एक ही दफ़ कर रक्खी है ऐसा जानना चाहिये । कोई ऐसा न समझे कि उसने सात दिन श्रम किया और फिर आठवें दिन आराम किया 'अर्थात् विश्राम लिया, यह कहना सर्व शक्तिमान् परमेश्वर के विषय किसी प्रकार नहीं लम्भव होता, उसी प्रकार बगीचे के बीच जो व्यवस्था की उसे एक समय भूला और फिर उसे ठीक क यह ईश्वर के मन में आया इल- लिये उसने लोगों के पाप-निवारणार्थ यह व्यवस्था की। यह कहना भी ठीक-ठीक सम्भव नहीं होता । मनुष्य को स्वमत के विषय सहज ही दुराग्रह उत्पन्न होता है यह मनुष्य का स्वभाव है, परन्तु सुज्ञ पुरुषों को उचित है कि दुराग्रह को फेंक सत्य की परीक्षा करे यही उनका भूषण है। अब कोई-कोई ऐसा भी पूर्वपक्ष. करते हैं कि राजा पालकी में बैठना है और कहार पालकी ले जाता है। इसमें एक को सुख अधिक और अधिक और दूसरे को दुःख अधिक है ऐसा कहना यह भ्रम है, राजा के मन में परचक की अथवा राज्य- व्यवस्था की चिन्ता दुःख का पहाड़ उत्पन्न करती रहती है, इसलिये बाहर से जितना राजा को सुख होता है उतना ही अन्दर से दुःख . रहता है, रात्रि को नींद आने, में भी. हाय बाँय मचती है। इधर देखो तो इसके बिलकुल विरुद्ध कहार को बाहर से तो बड़ा क्लेश होता है पालकी बहना
( ५८ )
पड़ता है और सूखी भरखी रोटी उसे मिलती है तो भी कमल
डाल लेटते ही गाढ निद्रा में सोना है अर्थात् स्वस्थता से
उसे नींद आती है, इससे दोनों स्थितियों में सुख दुःख
समान ही है, इसलिये एक जन्म ही मानना ठीक है, इस
पूर्वपक्ष का समाधान सहज ही में किया जा सकता है।
श्रीमानों को और दरिद्रियों को, सशक्तों को और अशक्तों
को सुख दुःश्व समान ही है यह कहना सारे अनुभवों के
विरुद्ध है, राजा के एक पुत्र उत्पन्न हुआ और भंगी के भी
एक पुत्र हुआ, राजपुत्र को गर्भ समय में सुख, जन्मते समय
सुग्व, आगे लड़कपन में भी सुख, खाने पीने के और दूसरे
सब प्रकार के पदार्थ हाथ में ले खिदमतगार (सेवक)
लोग तैयार हाज़िरी में खड़े रहते हैं। इसके विरुद्ध भंगी के
लड़के को गर्भ समय में दुःश्व, जन्मते समय किसी पापाण
के सदृश पेट में से बाहर आ पड़ता है, बाल्यावस्था में
खाने पीने में भी रोना पीटना मत्रा रहता है. वस्त्र का तो
नाम तक निकालते नहीं बनता, अन्न जल के लिये बेचारे को
रो-रोकर जी धयराना पड़ता है। सारांश, इस प्रकार के
अनेक कार्य दृष्टिगत होते हैं तो बतलाओ यह सुख दुःख
का भेद कहाँ से आया? फिर देखो कि सब मनुष्य जीवों
की सम्पत्ति मिले और अपने से श्रेष्ठ लोगों की सी स्थिति
प्राप्त हो यह स्वाभाविक इच्छा रहती ही है, यह भी तुम
देखते ही रहते हो, इस इच्छा के कारण सब संसार' का
क्रम चल रहा है इससे सिद्ध हुआ कि सुख दुःख भेद
वास्तविक है अर्थात् भ्रम नहीं है, अब यदि सुख दुःख
भेद है और जन्म भी एक ही है तो ईश्वर इससे अन्यायी
ठहरता है और ईश्वर में अन्याय का आरोपण करना यह
।
(५६) हैं । इसलिये यह हमारे प्रथम सिद्धान्त के विरुद्ध है, इसलिये जन्म अनेक यही कहना योग्य है, अर्थात् ईश्वर न्यायकारी है और जन्मान्तर के अपराधानुरूप जीवों को वह दण्ड करता है, अर्थात् जितना ही तीन पाप जीव करना है उतना ही उसे दुःख. भोगना पड़ता है, ऐसा सिद्ध होता है। कोई-कोई ऐसा पूर्वपक्ष करें कि मनुष्य के पाप करने के कारण वह पशु जन्म को गया, ऐसा कुछ काल के लिये मान भी ले परन्तु वह पशु होते "मैंने पाप किया पशु-जन्म मुझे प्राप्त हुआ है" ऐसा यदि उस मनुष्य को ज्ञान नहीं है. तो ज्ञान, विना दण्ड भोगना यह व्यवस्था किस प्रकार की है ? इल का समाधान-इल जन्म में भी ऐसी ही व्यवस्था दीखती है, दुःख भोगते भी दुःख के कारण का भान कभी भी नहीं रहता, अघोरी वन बहुत खालिया और फिर उसके कारण कोई रोग शरीर में जकड़ा तो उस समय जो दुःख होता है उस दुःख के कारण उसके असल सवव का स्मरण रहता हो ऐसा कभी भी देखते में नहीं आता, इसी तरह अन्यत्र बहुत सी व्यवस्था इस संसार में प्रतीत होगी, अर्थात् वैसी व्यवस्था मिल सकेगी। ܝ ܐ अस्तु इस संसार में सुख दुःख के जो भेद दीखते हैं उन का कुछ न कुछ कारण अवश्य होना चाहिये, कारण के विना ये कार्य नहीं हो सकेंगे, हम सुख दुःख के भेदों के कारण पूर्व- जन्म के कर्म हैं, इसलिये शेषवत् अनुमान से सुख दुःखादि भेदों की व्यवस्था ठीक-ठीक लग जाती है। अब कमों को भी कहा जाय तो वे भी विचित्र हैं, नाना प्रकार के आत्मा पर जो.
1 प्रकार (-६० ) संस्कार होते हैं उनके कारण नाना प्रकार के मानसकर्म उत्पन्न होते हैं. ईश्वर की ऐसी व्यवस्था है कि उन-उन कर्मों के से योग पाप पुण्य उत्पन्न होने चाहिए । इस पाप पुण्य का हिस्सा विना भोगे छुटकारा नहीं होता, अर्थात् पापों को भोगना ही पड़ेगा वे कभी भी नहीं छूटते । अव कोई ऐसा हे कि ईश्वर की भक्ति, प्रार्थना आदि करने से उसे दया आती है और फिर वह पाप का दण्ड नहीं देता, सो इस पूर्वपक्ष का समाधान सरल है कि ईश्वर की भक्ति का प्रार्थना से पूर्वकृत पापों का दण्ड नहीं चुकता किन्तु यह तो सम्भव है कि आगे के होने वाले पापों से केवल निवृत्ति होती है, यदि ऐसा न होता तो पाप करने के लिये यश्चित् भी भीति किसी को भी न लगी रहती, अब इस सम्वन्ध्र से एक वार्ता और कहना चाहिये कि कोई-कोई ऐसी शंका करंगे कि ईश्वर सर्वज्ञ है उसे हमारे मन के सारे भाव विदित ही हैं . अथांतू जैले पतिव्रता की भक्ति किस की है और वेश्याओं के सदृश भक्ति किस की है यह उसे विदित है, हम मनुष्यों को तो प्रसंगवशात् ही केवल लोगों के मनोभाव विदित होते हैं ईश्वर सर्वज्ञ होने के कारण उसे सदैव सब लोगों के मनोभाव; पाप पुण्य बालना और परमेश्वर भक्ति भावना ये सब. प्रत्यक्ष हैं, यदि पूर्वकृत पापों को अवश्य भोगना पड़े और ईश्वर की भक्ति करने से वह दया कर-कर पापदण्ड ले तो न छुड़ावै तो फिर मुक्ति किस प्रकार होगी ? ऐसी शंका है इस लिये. मुक्ति किस को कहते हैं इसका ही प्रथम विचार करें। 1 - sane मुक्ति अर्थात् ईश्वर प्राप्ति, ईश्वर की ओर जीव का आकर्षण होकर उसके परमानन्द में तल्लीन हो जाना यही मुक्ति का लक्षण है, इस प्रकार तल्लीन होने से सहज ही में (६१) से आत्मा हर्ष और शोक दूर होकर सदानन्दस्थिति प्राप्त होती है, शोक से चित्त विगढ़ता है यह तो ठीक ही है परन्तु हर्षले भी चित्त बिगड़ जाता है इसे दिलखाने के लिये दृष्टांत देना चाहिये, किसी गरीब आदमी को लाख रुपया एक दम मिलने से उस हर्ष के कारण उसे पागलपना आ घेरता है, सबों को यह बात स्मरण रखना चाहिये कि ईश्वर को छोड़ बाहे कितने ही दूसरे कर्म किये जाय परन्तु उन मुक्त नहीं होता, मुक्त होने के लिये जो कुछ है वह एक ही ईश्वर प्राप्ति का कारण है। अब कोई ऐसा पूर्वपक्ष करेगा कि जब कि हम सृष्टि को अनादि नहीं मानते तो अवश्यं सृष्टि का कहीं न कहीं प्रारम्भ होना ही चाहिये, और जब सृष्टि का आरम्भ हुआ उस समय योनिभेद था, यदि ऐसा कहा जाय तो ईश्वर अन्यायी ठहरेगा, क्योंकि कुछ आत्मा पशु आदिको के नीच योनि में जायें और कुछेक मनुष्य की योनि में जाय यह कैसा! इस पूर्वपक्षी का समाधान ऐसा है, कोई-कोई ऐसा कहते हैं कि पहिले परमेश्वर ने एक स्त्री पुरुष का जोड़ा उत्पन्न किया, फिर स्त्री ने सर्प के कहने ले शानवल्ली का फल खाया तब स्त्री के अप- राध के कारण स्त्री पुरुष पतित हुये इसलिये जगत् में पाप और पुण्य घुला । तो ऐसी-ऐसी गपोड़ कहानियों को कह कर । हन अपना समाधान नहीं करते, किन्तु सृष्टि की उत्पत्ति कैले हुई और इस विषय में आर्य लोगों के शास्त्र द्वारा सूक्ष्म रीति से क्या विचार किया गया है उसे देखे, जिस स्थिति में आज- कल. सृष्टि है उसी स्थिति में प्रारम्भ में सृष्टि नहीं थी, इसी- लिये वर्तमान सृष्टि को उत्तरसृष्टि ऐसी संज्ञा देता हूँ. और पूर्व सृष्टि को आदि सृष्टि ऐसी संशा देता है कि जिससे झट समझ में आ जाय। - . .
तस्वाहा एतस्मादात्मन श्राकाशः सम्भूतः,
श्राकाशाद्वायु:, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अभ्यः
पृथिवी, पृथिव्या श्रोषधयः ॥ इत्यादि ।
(ते. उपनि०)
आदि सृष्टि में ईश्वर ने बहुत से मनुष्य, पशु और पक्षी
उत्पन्न किये "ततोमनुष्या अजायन्त" इत्यादि य० सं० में है,
परन्तु उनमें अब जैसा मान के कारण और कृति के कारण
भेद न था उन सबों को केवल आहार विहार और मैथुन
इतना ही केवल विदित था और इन विषयों में भी सब प्राणी
एक ही से और एक रस थे, सब शरीर सब जीवों के भोग के
लिये हैं अर्थात् एक ही जीव के लिये नहीं है, ये सब जीव जन्तु
परमेश्वर से उत्पन्न हुये।
१
सन्मूलाः सोम्येमाः प्रजाः सदायतनाः सं-
प्रतिष्ठाः। तथाक्षरात्सोम्येमाः प्रजा प्रजायन्ते.
इत्यादि ।
(छान्दोग्योपनिषद्)
-
जैसे छोटे-छोटे बच्चों को अब भी यहाँ पर स्थित रहते हुये
उसी तरह आगे मरने पर किसी प्रकार कादण्ड नहीं होता, उसी
तरह इस. आदिसृष्टि में सब मनुष्य बाल्यावस्था में थे उनकी
अशिष्टाप्रतिषिद्ध चेष्टा थी अर्थात् उन्हें शासन वा प्रतिषेध
नहीं लगाये थे, नेत्रों से अपना काम करें,अर्थात् अप को देखें,
(६३ ) - r ' श्रोत्रों से अपना काम कर अर्थात् शब्द सुने, पाँव से अपना काम करे अर्थात् इधर उधर फिरें, बस इससे. और विशेष व्यापार आदि सृष्टि में नहीं था, ऐसी व्यवस्था आदिमृष्टि में पाँच वर्ष चलती रही, फिर परमात्मा ने मनुष्यों को वेद- शान दिया। ओ३म् खंब्रह्म । याथातथ्यतोर्थान्व्यदधा- २. च्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः । (य० सं०) अब वेदशान से पाप. पुण्य का ज्ञान हुआ और वैसा-पैसा आचरणभेद होता गया, फिर प्रत्यक्ष ही है कि पाप पुण्य की व्यवस्था के अनुसार सइज ही में कार्य उत्पन्न होने लगे। मनुष्य पाप के कारण पशुजन्म को गये और पाप छटने पर फिर भी मनुष्यजन्म में आये, आदिसृष्टि में पशुओं को एक दफे मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ फिर तो आचार भेद के अनुकूल पाप पुण्यानुसार वे भी जन्मान्तर के चक्कर में आ फंसे, अब कोई-कोई ऐसी भी शंका करें कि मनुष्य को पाप पासना ही क्यों हुई ? तो उसका इतना ही समाधान है कि परमात्मा ने (मनुष्यों को स्वतंत्रता दी है और उस स्वतन्त्रता के जो-जो परि- णाम होगे उन्हें भी स्वीकार करने चाहिये, सुख के सब सामान होने पर भी यदि स्वतंत्रता नहीं है तो वह स्थिति दुःखमिभित स्वतन्त्रता देकर अति दुःसह होती है तब पाप वासना होती है यह अपनी स्वतन्त्रता का विकार है । इसलिये ईश्वर पर दोष नहीं लगा सकते । कोई-कोई ऐसा मानते हैं कि दुःख विशेष देश नरक है और सुख विशेष देश स्वर्ग है और इस उभव (६४) प्रदेश में मनुष्य को पाप पुण्य के अनुकूल एक समय अगत् प्रलय के समय में न्याय कर-कर अनन्त काल तक सुख में वा दुःख में ईश्वर रक्खेगा, ऐसा प्रतिपादन करने से ईश्वर अन्यायी ठहरेगा, ईश्वर के न्याय का ऐसा अटकाव नहीं है, प्रत्येक क्षण में ईश्वर के न्याय की व्यवस्था जारी है और अपने-अपने पाप पुण्य के अनुसार हमें बुरा भला जन्म मिलता है। पाप पुण्य मनुष्य जन्म ही में केवल होते हैं पश्यादिको के जन्म में भोग होता है, नये पार सम्पादन नहीं होते, कोई कोई शंका करेंगे कि मनुष्य जन्म एक ही समय मिलता है वा कैसे ? तो इसका उत्तर यह है कि मनुष्य जन्म बारम्बार प्राप्त होता है अब पहिले कह ही चुके हैं कि मृत्यु अर्थात् जीव का और शरीर का वियोग होना यह है तो वह केले आता है, इस विषय में कोई-कोई कहते हैं कि गरुडपुरान में कहे अनुसार मनुष्य का प्राण हरण करने के लिये यमदूत आते हैं, इन यमदूतों के मुख दरवाजे इतने बड़े होते हैं और शीर पर्तन के सदृश होते हैं यह वर्णन सर्वथैव अतिशयोक्ति का है, निरुक्त में अन्तरिक्ष काण्ड है उसमें वायु के यमराज धर्मराजा ये नाम दिये हैं- यमो वैवस्वतो देवो यस्तवैव हृदि स्थितः । इससे जीव' यम की ओर जाता है अर्थात् वायु में घायु अन्य योनि के बीच उसका प्रवेश होता है ऐसा समझना चाहिये- मरने पर जीव वायु में मिलता है, अस्तु । ऐसे-ऐसे हमारे
• ( ६५ )
-
4
उपदेश से कहता लोगों की दानि होगी, विद्वानों की क्या
हानि हो सकती है ? अर्थात् विद्वानों की कुछ भी हानि नहीं
है। हाँ ! अवश्य,धूर्ती की हानि हो तो हो, हमारा निरुपाय है।
कोई-कोई ऐसा भी कहते हैं कि 'जीच ले परन्तु जीविका
न ले। हमारे भाषण से वा लेव से गरुडपुराणादिक ग्रन्थों
के विषय में लोगों की अश्रद्धा होने से फिर स्वयं ही कहाओं
की जीविका डूबेगी उससे हमें पाप लगेगा। सो भाई हमें
इसका भय नहीं है, क्योंकि राजा दुष्ट लोगों को दण्ड
करता है, उसी तरह हमारे वचनों से दुष्टों को जीविका
डूबेगी तो उसमें हमें पाप किस बात का लगेगा? ब्राह्मणों
को अर्थात् विद्वान् आर्यों को अध्यापन, याजन करने का
अधिकार है, उन्हें मतलब.सिन्धु साधने के लिये कडापन
का धन्दा करना वा जन्म पत्रिका बनाना या आपछी शनि
बन लोगों को ठगना और दुष्ट उपायों से उपजीविका करना
अत्यन्त अनुचित है, क्योंकि ये सब पाप आज कल के उन
ब्राह्मणों के सिर मढ़ते हैं। जरा विचार तो करो कि कहीं भी
सारे महाभारत भर में जन्म-पत्रिका का वर्णन आया है ?
कहीं भी नहीं, इससे सिद्ध हुआ कि फल ज्योतिष की जड़
कहीं भी आर्य-विद्या में नहीं है। यह स्पष्ट
यमदूत जीव को ले जाता इससे यह आशय समझे कि
वायु जीव का हरण करता है । अस्तु, वायु मनुष्य को हरता
है और फिर आगे पुनर्जन्म प्राप्त होता है, इस प्रकार ईश्वर
नियम की व्यवस्था से यह सब सहज ही में बन जाता है
इसमें कहाँ से वैतरणी नदी और गोपुच्छादि पाखण्ड मत को
अवकाश हो सकता है ? अर्थात इन सारे प्रलापों का आधार
वेदादि सत् शास्त्रों में कहीं भी नहीं।
मृत्यु समय में
-
चौरासी लाख योनियाँ हैं अथवा न्यूनाधिक हैं तो इन
गपोड़ कथाओं का वर्णन करने की भी कोई आवश्यकता नहीं
है, जगत् में कितनी योनियाँ हैं इसका शोध लगा, गिनकर
इमारे शास्त्री लोग बतावें।
विद्वांसो हि देवाः शतं ये मनुष्याणामानन्दाः
स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः श्रोत्रियस्य
चाकामहतस्येत्यादि ।
(तै० उपनिषद्
जिनके पाप पुण्य सम होते हैं वे मनुष्य जन्म पाते हैं,
मानसिक स्थिति सात्विक जिनकी रहती हैं वे देवता पापाति-
शय के कारण तिर्यग् योनि को प्राप्त होते हैं, परन्तु पाप की
अपेक्षा पुण्य अधिक हो अथवा पुण्य की अपेक्षा पाप अधिक
हो तो इन्हें भोगकर जब ही पाप पुण्य सम हुआ कि मानो
मनुष्य जन्म प्राप्त होता ही है, इस प्रकार पाप पुण्य पर सारी
व्यवस्था ईश्वर ने नियत कर रखी है और यही व्यवस्था
यथार्थ है।
अब कोई ऐसी शंका निकाले कि पूर्व कृत पापों का दंड
जीव को बिना भोगे छुटकारा नहीं मिल सकता यह हमारा
म्त है, तो फिर पश्चात्ताप से कुछ भी लाभ नहीं है कि क्या?
उसका उत्तर यह है कि पश्चात्ताप से पाप क्षय नहीं होता
परन्तु आगे पाप करना बंद हो सकता है।
कृत्वा पापं हि संतप्य तस्मात्पापात्प्रमुच्यते ।
नैवं कुर्यां पुनरिति निवृत्या पूयते तु सः॥
(मनु० अ० ११ श्लोक० २३०)
.
(६७ )
चाहे कितना भी पश्चात्ताप किया जाये तो मी कृत पापों
को तो भोगना ही चाहिये, इसका दृष्टान्त जैसे कोई कुयें में
गिग और उसके हाथ पाँच टूट गये तो अब वह चाहे कितना
ही पश्चात्ताप करे तो भी उसके हाथ पाँव जो टूटे सो तो
टूट ही चुके, बद तो कुछ भी किये नहीं छूट सकता, हाँ आगे
के लिये कुये में न गिरेगा इतना ही केवल होगा।
-
-
अब पाप का फल शोक है और पुण्य का फल हर्ष है,
तो पाप पुण्य भोगने के लिये देश, काल, वस्तु ये साधन
भी अवश्य चाहिये, इन निमित्तों के बिना भोग कैसे होगा ?
जव कि भोग न भोगा जावेगा तो फिर आनन्द भी कैसे प्राप्त
होगा ? अव इस पर कोई पेला कहेगा कि मुक समय में शरीर
न होने पर.मुक्त जीव को सर्वज्ञ परमेश्वर का शान होकर वह
परमेश्वर को ही जाकर लटकता है फिर एक परमेश्वर ही
रसका आधार रहा और फिर ऐसे परमानन्द समय में शरीर
का प्रयोजन नहीं है ? तो जानना चाहिये कि शरीर अर्थात्
भोगायतन वह इस जगतू में पाप पुण्य भोगने का साधन है,
इसका सम्बन्ध, मूलावस्था में नहीं है।
अब पुनरपि, मुक्त जीव का शान कैसा है इसका
विचार करें।
कोई ऐसीशंका करेगा कि इस जन्म में पूर्वजन्म का विस्मरण
होता है तो सर्वदेव जीव को पूर्व जन्म का ज्ञान नहीं होगा।
जिस ज्ञान का निमित्त छूटता है तो उस ज्ञान की भी भूल
होती है।
"युगपत् ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिंगम्"
।
"-
(गौतमंसूत्र)
(६८) ये सब आपत्तियाँ अमुक्त आत्मा को लगती है परन्तु धनञ्जय वायु का जिसे शान हुआ है और जिसका आत्मा उसमें संचार कर सकता है और जिसके आत्मा से पूर्व जन्म संस्कार निकल चुके हैं वह और जिसके आत्मा में शान्ति उत्पन्न हुई है, जिसके आत्मा को अत्यन्त पवित्रता, स्थिरता. झानोन्नति की पहिचान हो चुकी है और जिसको दृष्टि को और मनोवृत्ति को ज्ञान सुख के विना अन्य सुख विदित नहीं हैं ऐसे योगी को गरमानन्द प्राप्त होता है, ऐसे मुक्त पुरुषों को देश, काल, वस्तु, परिच्छेद ज्ञान होता है उन्हें युगपत् मान की अटक नहीं है, इसका दृष्टान्त जैसे एक कण शकर का यदि चींटी को मिले तो वह उसे ले जाया चाहती है पान्तु उसे वहीं एक शकर का गोला मिल जाय तो उसी शकर के गोले को वहीं पर चींटी लिपट जाती है, इसी तरह योगियों की आत्मा की स्थिति परमानन्द प्राप्त होने पर होती है। ओम शान्तिः शान्तिः शान्तिः V सातवाँ व्याख्यान यज्ञ और संस्कार विषयक ओ३म् द्यौः शान्ति रन्तरिक्षर्थशान्तिः पृथिवी शान्ति रापःशान्ति रोषधयःशान्ति । बनस्पत यः शान्तिर्विश्वेदेवः शान्तिब्रह्मशान्तिः सर्वथ शान्तिः शान्तिरेवशान्तिः सामाशान्तिरेधि॥१॥ (य० सं०) आज कर्तव्य है। यह ऋचा कहकर व्याख्यान का आरम्भ किया गया और संस्कार क्या है.. का-विवार प्रथम यज्ञ का विचार करें-यश का अर्थ क्या है ? या साधन को कौन से हैं ? उसकी कृति कैसी है ? और उनके 'फल कौन-कौन से हैं ? ये प्रश्न उत्पन्न होते हैं, इनके उत्तर अब हम, यथाक्रम देते हैं । यश शब्द के तीन अर्थ हैं, प्रथम देव पूजा, दूसरा संगतिः करण और तीसरा अर्थ दान है। अब प्रथम देवपूजा के विषय में विचार करें, केवल देव पद का मूल अर्थ द्योतक अर्थात् प्रकाशस्वरूप है, और वेदमन्त्रों की भी देव संशा, है, क्योंकि उनके कारण विद्याओं का द्योतन अर्थात् प्रकाश होता है, यहं कर्मकाण्ड का विषय है, यज्ञ में अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेधपर्यन्त का समावेश होता है, देव शब्द का अर्थं परमात्मा भी है, क्योंकि उसने वेद का अर्थात् शान का और सूर्यादि जड़ो का प्रकाश किया है, देव अर्थात् विद्वान ऐसा भी अर्थ होता है, क्योंकि शतपथ ब्राह्मण नामक ग्रंथ में "विद्वासोहि देवाः" ऐला वर्णन किया है, पूजा शन्द का अर्थ सत्कार है। है "पितृभिः । पूजितोऽतिथि: । पूजितोगुरुः इत्यादि। अब देव को पूजा कहने से परमात्मा का सत्कार करना यह अर्थ होता है,चेतन पदार्थों ही का केवल सत्कार सम्भ- वित है, जड़, पदार्थों का अर्थात् मूर्तियों का सत्कार नहीं सम्भव होता, मुख्य तत्व से वेदमन्त्र के पठन से ईश्वर का
(७०)
सत्कार होता है इसलिये प्राचीन आर्य लोगों ने होम के स्थल
में मन्त्रों की योजना की है, इसी तरह यज्ञशाला को देवायत्तन
अथवा देवालय कहा है।
तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्
( म० भा०
इसीलिये ब्रह्मयज्ञ अर्थात् वेदाध्ययन भी पाँच महायशो में
से एक यश है।
१
"स्वाध्यायेनाचयेतपीन् होमदेवान्यथा
विधि" मनुः ।
इस कथन से अर्वाचीन देवालय अर्थात् मन्दिरों को कोई
न समझे, देवालय का अर्थ तो यशाला ही है।
अव दूसग अर्थ-संगतिकरण--अर्थात् अत्यन्त प्रीति-
पूर्वक, प्रेम-पूर्वक, देवता का ध्यान, देवता का विचार तथा
सत् पुरुषों का संग करना इसे भी यज्ञ ही कहते हैं ।
-, अब तीसरा अर्थदान है-विद्यादान को छोड़ दूसरे दान,
दान नहीं हैं, केवल विद्या का दान ही दान है, अन्न वस्त्रा.
दिकों के दान विद्यादान की सहायता करते हैं इमलिये उन्हें
भी दान कहना उचित है, विद्यादान अक्षय दान
अब यश' से क्या-क्या फल होते हैं इसका विचार कर,
यज्ञ का रूट्यर्थ वेदों में काष्ठ घृतादिकों का दहन करना है.
तो इसमें ऐसी शंका उत्पन्न होती है कि व्यर्थ ही काष्ठादि
स
यह है कि-
( ७१)
तथा घृनादि द्रव्यों को अग्नि में क्यों जलावें इसका सामाधान
है कि-:
शतपथ ब्राह्मण में कहा
'जनतायै यज्ञो भवतीतिः
(शतपथ ब्राह्मण )
A
-
पुष्टि. वर्धन, सुगंधप्रमार और नैरोग्य ये चार उपयोग
होम अर्थात् हवन करने से होते हैं, ये लाभ उपदिष्ट रीति से
होम होने पर ही होते हैं, कहा है कि-
संस्कृतं हवि: होतव्यमिति सेषः।
(शतपथ ब्राह्मण )
.
योग्य रीति यथा विधि होम करना चाहिये, एकदम मन भर
घी जला दिया या चम्मच चम्मव करके मन भर घृत को वर्ष
भर जलाते रहे तो भी होम नहीं होगा-फिर कोई-कोई
कहते हैं कि होम अर्थात् देवनोद्देशक त्याग है, देवता लोग
यजन देश में आकर सुगन्ध लेते हैं इसलिये होम करना
चाहिये तो यह कहना अप्रशस्त है ।
क्या देव लोक में कुछ सुगन्धि की न्यूनता है जो वे हमारे
क्षुद्र हविद्रव्य की अपेक्षा करते हैं ?
इसी तरह कोई-कोई कहते हैं कि श्राद्धादिको में पितृ
लोग आते हैं और यदि उन्हें श्राद्धान्न और तर्पण का जलन
मिले तो वे तृषार्त रहते हैं। तो क्या वे प्यासे रहकर भूखों
मरेंगे? और पितृ लोक में लय दरिद्रता ही दरिद्रता है?
( ७२ ). सारांश यह कि सब समझ और विचार ठीक नहीं है क्योंकि देव-लोक मैं वा पितृ-लोक में कुछ न्यूनता नहीं है, मोम हवन उनके उद्देश्य से कर्त्तव्य नहीं है, किन्तु सुवृष्टि और वायु शुद्धि होम-हवनादि से होती है इमलिये होम करना चाहिये, क्योंकि सब प्रकार के नैरोग्य और बुद्धिवेशद्य को वायु और जल का ही भाधार है, इसमें दृष्टान्त सुनो कि इन दिनों पंढरपुर में ( हिन्दू लोगों की एक यात्रा का स्थान हैं ) बड़ा हैजा (पिचिका) जारी है तो वहाँ का जल वायु ही बिगड़ने से इस बात का कारण हुआ, हरद्वार में एक समय मेला हुआ था वहाँ पर घायु विगढ़ने से हज़ारों मनुष्य काल वश हुये अर्थात् मरगये, ग्रह्माण्ड में सञ्चार करनेवाला जो वायु है वही जोध का हेतु है, अन्तरघायु द्वारा ठीक-ठीक व्यापार हो इसलिये माहर का ब्रह्माण्डवायु शुद्ध रहना चाहिये, ब्रह्माण्डवायु शुद्ध करने के लिये यन्नकुण्ड में घृत, कस्तूरी केशदि सुगन्धित, पुष्टिकारक द्रव्यों का हवन करना चाहिये, सुगन्धित द्रव्यों दहन से ब्रह्माण्डवायु की दुर्गन्धि का नाश होता है इस हवन के कारण जो सुगन्धि उत्पन्न होती है उस सुगन्धि के सन्मुख घायु के सब दुष्ट दोष दूर होकर नैरोग्य उत्पन्न होता है, अब कोई अर्वाचीन लोग ऐसी शंका करें कि पदार्थो का दहन होने से उनका पृथक्करण होकर उनके गुण नष्ट हो जाते हैं तब फिर हवन से नैरोग्य कैले उत्पन्न होगा? इस विषय में हमारा प्रथम उत्तर यह है कि सब द्रव्यों में स्वाभाविक और संयोग- जन्य- दो प्रकार के गुण हैं, उनमें स्वाभाविक गुणों का नाश कभी नहीं होता, संयोगजन्य गुणों के वियोग से हाम (घटती) होता है यदि स्वाभाविक गुण पदार्थों में न माने जायँ तो समु- दाय में गुण कहाँ से आवेगा? ?
( ७३. ) . दृष्टान्त-एक तिल्ली के दाने से थोड़ा ही तेल निकलता है इसलिये समुदाय स्थित बहुत ले तिलों का तेल बहुत निक- लता है, एक जल परमाणु: में शीतता है इसलिये परमाणु समुदायरूप जल का शीतता स्वाभाविक धर्म है, सुगंधित पदार्थों का सुगन्धि स्वाभाविक गुण है वह दहन से फैलता है, उसका नाश नहीं होता। द्वितीय -सुगन्धि जलाने से दुर्गन्धि का नाश होता है. यह.प्रत्यक्ष है। तृतीय-जब हम अर्क निकालते हैं तब जैसा द्रव्य होता है वैसा ही तद्गुणविशिष्ट अर्क निकलता है, अब अर्क अर्थात् अस्त्रादि अतर आदि द्रव्य हैं। अग्नि परमाणु में जो गुण हैं, वे अग्नि के परमाणु अत्यन्त सूक्ष्म होकर मेघमण्डल तक विस्तीर्ण होते हैं और उससे घायु शुद्धि परिणाम होता है। अब कोई ऐसी शङ्का करे कि होम एक छोटी सी कृति है इससे ब्रह्माण्डवायु कैसे शुद्ध होगा, समुद्र में एक चम्मच भर कस्तूरी डालने से क्या सारा समुद्र. सुगन्धित और शुद्ध होगा? इसका समाधान यह है कि सौ घड़े रायते में थोड़ी सी ही बघार ले रुचि आ जाती है यह प्रत्यक्ष है, इसकी जैसी उपपत्ति समझी जाती है तद्वत् ही यह प्रकार भी है, कोई ऐसी शंका करें कि होम तो यहाँ करो और अमेरिका में उसका परिणाम कैसे होगा। इसका समाधान यह है कि वायु द्वारा शुद्धि सर्वत्र फैले। m । ( ७४ ) यह वायु का धर्म है, सिवाय-यदि सब लोग अपने-अपने घर में आर्य सम्मत रीति से हवन करें तो यह शंका ही नहीं सम्भव होती, परले आर्य लोगों का ऐसा सामाजिक नियम था कि प्रत्येक पुरुष प्रातःकाल स्नान कर बारह आदति देता या क्योंकि प्रातःकाल में जो मल मूत्रादिकों की दुर्गन्धि उत्पन्न होती थी वह इस प्रातःकाल के हवन से दूर होती थी, इमी तरह सायंकाल में हवन करने से दिन भर की जमी हुई जो दुर्गन्धि उसका नाश होकर गनभर वायु निर्मल और शुद्ध चलती थी, प्राचीन आर्य लोग बड़े ही युक्तिमान् थे इस में किन्नत् भी सन्देह नहीं है । फिर अमावस्या और पोर्णवासी के दिन समस्त भरतखण्ड में होम होता था उससे भरतावण्ड में वायु शुद्धि के कितने साधन उत्पन्न होते थे, इसका विचार करने से यह छोटा ही सा. प्रकार है, ऐला किसी को भी प्रतीत न होगा, अब वायु शुद्ध रहने से वृष्टि का जल भी शुद्ध रहता है वृष्टि से और वायु बड़ा ही घनिष्ट सम्बन्ध रहता है और सब देश का जल वृष्टि से उत्पन्न होना है। जल स्वच्छ और वायु के भी स्वच्छ रहने से वृक्षों के फल, पुष्प, रस ये बड़े ही शुद्ध और पुष्टिकारक होते हैं, उसी तरह अनादि सब द्रव्य शुद्ध और पुष्टि कारक होते हैं इसीलिये शरीर को सुख होकर अन्न से बल उत्पन्न होता है, प्राचीन आर्य लोगों के शौर्ष का वर्णन इस प्रसंग में करने की कोई आवश्यकता नहीं है, वायु और जल की दुर्गन्धि नष्ट होकर उनमें शुद्धि और पुष्टिवर्धनादि गुण बढ़ने से सब चराचरों को सुख होता है, इसीलिये कहा है कि-- स्वर्गकामो यजेत् । सुखकाम इति शेषः ॥ ( ऐतरेय० शतपथ ब्राह्मण ) से - ( ७५ ) ६ होम-हवन ले परमेश्वर की सेवा कैसे होती है ऐला" यदि कोई कहे तो उसे विचार करना चाहिये कि सेवा का अर्थ प्रिय आचरण है, परमेश्वर की सेवा अर्थात् उसको जो प्रिय वह आचरण करने से वह न्यायकारी होने के कारण उसके द्वारा योग्य प्रत्युपकार होता है ऐसा एक नियम ही है, अब स्वर्ग अर्थात् सुख . विशेष अथवा विद्या और नरक अर्थात् दुःख विशेष. अथवा अविद्या है, विद्या स्वर्ग प्राप्ति का तथा बुद्धि वर्धन का कारण है, बुद्धि वर्धन को शारीरिक दृढ़ता अवश्य चाहिये, और शुद्ध वायु, शुद्ध जल और शुद्धान के विना शरीर-दृढ़ता कैसे प्राप्त होगी ? होम-हवन से वायु शुद्ध होकर सुवृष्टि होती है उस शरीर निरोग और बुद्धि विशद होती है। विद्या प्राप्त होती है अर्थात् स्वर्ग प्राप्ति, सुज्ञ प्राप्ति होती है कोई कोई ऐसी भी शंका करें कि वायु शुद्धयर्थ यदि हवन है तो उसमें वेद मंत्रों के पठन को क्या आवश्यकता है और होम करने में अमुक हो गति की ईटें रहकर अमुक ही प्रकार की वेदी बना ऐनी विशेष योजना किल वास्ते चाहिये ? इस शंका का लमाधान यह है कि विशेष योजना के अनु- कूल कोई भी पात किये बिना उससे विशेष कार्य नियमित समय पर प्राप्त नहीं होता, इसी तरह कच्ची इंटों की चार अंगुल गहरी और सोलह अंगुल ऊँची गणित प्रमाण से वेदी बनाकर उसमें नियमित प्रमाण का ही मसाला लेकर प्रमाण से घृतादिक का हवन करने से, अल्प व्यय में अतिशय उष्णता उत्पन्न होती है, और उष्णता के कारण वायु शुद्ध होकर जल परमाणु वायु में उड़ जाते हैं और इस उष्णता के कारण वायु का ,
( ७८.)
श्रीर्वा राज्यस्थानमित्यादि।
(शतपथ ब्राह्मण
अब कोई ऐसा कहे कि, अश्वमेध में घोड़े के शिश्न
का संस्कार यजमान की स्त्री के सम्बन्ध से कहा है, इस
से ऐसा प्रकार वेदों में बिलकुल ही उपदिष्ट नहीं है, सो
ठीक है परन्तु इसके सम्बन्ध से जो-जो वीभत्स कथायें
लिखी हैं उन्हें पढ़ते हुये मानों उलटी आती है, नथापि ऐसा
चीभत्सपना कभी भी प्रचार में न आया हो यह कइते नहीं
चनता, क्योंकि पद्धतिनिरूपक ग्रन्थों में यह बात साप स्पष्ट
मिलती है।
-
पच्चीस सौ वर्ष के पूर्व चौद्ध लोगों ने जो-जो ग्रन्ध बनाये
उनमें ऐसी-ऐसी बातों का उद्देश्य कर-कर ब्राह्मणों की
निन्दा की है।
अब कोई. ऐसी शंका करें कि अरतु जो हो, परन्तु
वीभत्स कथायें तो भी उनमें हैं वा नहीं ?
अश्व को फेरते थे और लार्वभौम राजा लोग इस ले क्या
14
शत्रुता उत्पन्न करते थे ?
इसमें हमारा समाधान यह है कि शतपथ में लिखा है कि-
अग्नि अश्वः । आज्यं मेधः ॥
(शतपथ ब्राह्मण )
अश्वमेध अर्थात् अग्नि में घी डालना-इतना ही अर्थ
( ६ )
है, उसी तरह ग्रन्थ साहचर्य की ओर ध्यान देने ले हरिश्चन्द्र,
शुनःशंफ इत्यादि बातों का निर्वाह होता है।
-
अब केनोपनिषद् में एक यक्ष की वार्ता है, यक्ष ने
'अग्नि के सन्मुग्न तृण डाला, और अग्नि से कहा कि
स तिनके को तू जला दे, अग्नि से वह. तिनका न
जल सका फिर वायु से कहा कि
तू इस तिनके को
उड़ा लेजा, वायु सं भी वह निनका न उड़ सका, ऐसा
कहकर जा हरवात नातक ब्रह्मविद्या है उसका माहात्म्य
दर्शाया है, यश में माल आदि खाना यह गपोड़ा अर्वाचीन
पण्डितों ने निकाला है।
कोई-कोई व्यभिचार के विषय में भी ऐसी ही कोटियाँ
निकालते हैं, कहते हैं कि क्या इन्द्र के पास मेनकादि
अपसराय नहीं है? हम नकद रुपया दे बाज़ार में कोई माल
मोल लेवे तो इसमें दोप क्या है ? तो भाई सोचो कि ये
बातें कहना क्या तुम्हें प्रशस्त दीखती हैं ? कभी नहीं।
अस्तु, पुरुषमेध का अब थोड़ा सा विचार करें, यजुर्वेद
के इल मन्त्र को देखो
विश्वानि देवसवितर्दुरितानि परासुव ।
यद्भद्रं तन्न पासुत्र ।
( य० सं०)
होम तो देवताओं का हो और मांस पशुओं का तथा
मनुष्यों का रक्खें तो कहो यह व्यवस्था कैसे ठीक-ठीक
(८०) है ? ऐसी व्यवस्था परमेश्वर बनावेगा यह हमें तो निश्चय नहीं होता, अर्थात् ऐलो व्यवस्था को अन्याय के सिवाय क्या कह सकते हैं। M परमेश्वर की न्यवस्था में ऐसा अन्याय नहीं है, और ऐसी निष्कारण हानि का बर्ताव भी नहीं है, देखो, गी सघश परोपकारी गरीब पशु को खाने के लिये वा या के लिरे मारने से कितनी हानि होती है। एक गाय चार मेर दुध देती है, इस दूध को औटकर खीर (क्षीर ) पकाने से न्यून से न्यून निदान चार मनुप्यों के लिये तो भी पौष्टिक अन्न होता है, अर्थात् प्रातःकाल सायंकाल दोनों समय का दूध मिलाकर आठ मनुष्यों का पोषण होता है, यदि उस दल महीने दूध दिया तो समझ लो कि चौधीस सौ (२४००) मनुष्यों का पालन उस गाय के एक बेत में होगा, इस प्रकार आठ औलाद औसत एकड़े तो ( १६२०० ) उन्नीस हज़ार दो सौ लोगों का पालन होगा, वही गाय कोई यदि मारकर खा जाय तो पञ्चील तीस मनुष्यों का पालन एक टंक का होता है, इस प्रकार युक्ति की रीति से भी मांस भक्षण ठीक नहीं है। गाय ने अस्तु, इन दिनों मांसाहारियों ने राज्यवल के आधार से इतना ज़बर हाथ फेरना प्रारम्भ किया है कि चौपाये बिलकुल न्यून होते जाते हैं, पाँच रुपये बैल के आजकल पच्चीस रुपये लगने लगे हैं और गरीब लोगों को दुग्ध घृत मिलने में बड़ी ही कठिनाई होती जाती है, जिस देश में बिलकुल मांस नहीं खाते उस देश में दूध घी की खूब ही बहुतायत हो रही है अर्थात् वहाँ पर खूब समृद्धि रहती है।
wa (८१) । अस्तु, अबलों तो पशु-वधः होम में न, करने के लिये युक्तियों का तथा शास्त्र का विचार किया, अब इस शंका का विचार करें कि. अथवा कमी होम में पशु को मारते थे वा नहीं? होम दो प्रकार के हैं, एक राज धर्म सम्बन्धी और दूसरा सामाजिक, इतने समय तक सामाजिक होम का निरूपण किया अब राजधर्म सम्बन्धी जो होम है. उसकी सबही व्यवस्था भिन्न है, उसमें पशु मारने की तो क्या ही बात है परन्तु कभी-कभी मनुष्यों को भी मारना पड़ता है, युद्धप्रसंग में हजारों मनुष्यों का प्राण लेना यह राज धर्म विहित है, भयंकर श्यापदादि जो खेती को उजाइते हैं वा मनुष्यादि को हानि पहुँचाते हैं. उनको मारना ठीक ही है क्योंकि जंगली पशुओं का विध्वंस करना. अत्यावश्यक है, परन्तु सब ही होमों में मांसाहार लाना यह सर्वथैव अयोग्य है, किसी प्राणी को पीड़ा देना--कहो यह धर्मः विहित कैसे होगा, और इतने पर भी बेचारों का मुंह बाँधकर घुले मार- मारकर उनका जीव लेना तो ईश्वर प्रणीत व्यवहार कभी भी न होगा। अब यश के विषय में किलका अधिकार है. ऐसी कोई शंका करे तो जानना चाहिये कि कर्मकाण्ड में जिनकी प्रवृत्ति है नहीं को केवल अधिकार है, कर्म ले विचार शक्ति थोड़ी- थोड़ी जाति होती है। उपासना से विचार में निर्मलता सत्पन होती; फिर शान में विचार, दृढ़ता..और पकता आकर फिर यह शान मार्ग का अधिकारी होता है। - अबहमः होम के विषय में छोटी-छोटी-शंकाओं का विचार करते हैं।
(८२)
कोई-कोई कहते हैं कि जब राज नियम से इन दिनों प्राम
स्वच्छ रहता है तो फिर होम किस लिये करें? उनके प्रति
हमारा यह उत्तर है कि हमारे घर स्वच्छ बनाए विना ग्राम
कैसे स्वच्छ रहेगा? और ग्राम के बाहर की दुर्गन्धि कैसे
दूर होगी ? दूसरी शंका यह करते हैं कि जब आग गाड़ी
में ( रेल के इंजन में । और रसोई के घर में तो धुआँ (धून )
यहुत उत्पन्न होता है फिर दृष्टि भी बहुत होना ही चाहिये,
तो फिर होम किस बाते करना चाहिये ?
.
•
इस पर हमारा यह कहना है कि यह धून दुर्गन्ध और
दूषित रहता है इसमें वायु शुद्ध नहीं होता।
इन दिनों होम के न्यून होने से बारम्बार वायु विगड़ रही
है, सदा विलक्षण रोग उत्पन्न होते जाते हैं।
।
अब तक यश का विचार हुआ अब थोड़ा-ला संस्कारों का
भी विचार करें।
-
२ भाग-संस्कार
"
-
संस्कार मिले सहते हैं ? इस प्रश्न का प्रथम विचार
करना चाहिये।
+
किसी द्रव्य को उत्तम स्थिति में लाना इसका नाम संस्कार
है, इस प्रकार का स्थित्यन्तर मानवीय प्राणियों पर होवे एत.
दर्थ आर्य लोगों ने सोलह संस्कारों का योजना की है, परन्तु
उन प्राचीन आर्यों को इससे यह इच्छा न थी कि संस्कारों के
कारण पेटार्थ पत्रा-पांडे हमारा माल उड़ावें और आलसी बनें
( ८३ ) क्योंकि वे आचार्य आर्य महाजन थे, तो फिर वे अनार्य अर्थात् अनाड़ियों की समझ में क्योंकर मदद देते । निषेक अर्थात् ऋतु प्रदान यह प्रथम संस्कार है, पिता निषेध करता है इसलिये पिता ही मुख्य गुरु है। निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि । सम्भावयति चान्येन म विप्रो गुरुरुच्यते ॥१॥ ( मनु०) * - . ऐसा मनु में वाक्य है, पिता ही फको सब उपदेश और संस्कार करने चाहिये. पुत्रेष्टि का वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् में किया है, उस स्थल पर गर्भ धारण करनेवाली स्त्रियों को क्या क्या पदार्थ खाने चाहिये मिलले पुत्र के शरीर और बुद्धि में दृढ़ता आती है यह मुख्य का विचार किया है, प्राचीन काल के आर्य लोग अमाधवीर्य थे और स्त्रियों में भी पूर्ण वय होने के कारण वीर्याकर्षता रहती थी, पुष्टि यह गृहस्थाश्रम का प्रथर धर्म है। - २ पुंसवन-इस संस्कार का प्रयोजन वीर्य को पुनः शरीर में किस प्रकार जमावे इस योजना के सम्बन्ध है, वीर्य में सदा स्थिरता, दृढ़ता और नैरोग्य गुण रहने चाहिये अन्यथा विकृत वीर्य से सन्तान में नाना प्रकार के विकार उत्पन्न होते हैं, एतदर्थ सूत्रकारों औषधियाँ बतलाई हैं, वीर्य वृद्धयर्थ और शान्त्यर्थ वर्ष भर ( साल भर तक ) पुरुषों को ब्रह्मचर्य रखना चाहिये ऐसा भी निर्वन्ध कहा हुआ है। ३ सीमन्तोनयन-लियों को अकाल में गर्भपात होने "
("८४ )
क
१
को बड़ी भीति रहती है सो वह न हो और निरोगी, पुष्ट
पदार्थों के सेवन से और मन के माह रहने से गर्भ की स्थिति
उत्तम रहे एतदर्थ इस संस्कार की योजनाई।
४ जातकर्म-इस संस्कार के विषय में विशेष होम
करना कहा है, कारण कि सूतिका गृह का (जबा के घर का )
अमंगलपना दूर
करने के लिये सुगन्धिवर्धक होम करना योग्य
है, बधे को नाभि काटने से दुःख न हो, जबा सुखी रहे इस
प्रकार इस संस्कार का उद्देश्य है।
५ नामकरण-नाम रखने में भी कोई भूल न करे यहाँ
तक प्राचीन आर्य लोगों की बारीक दृष्टि थी, नाम का
सुख से ,उच्चारण हो, उसमें मधुरता रहे, इसलिये दो अझर
वाला वा चारं अभरवाला नाम होवे ऐमा कहा है, याही व्यर्थ
लम्बा चौड़ा नाम न होवे, नहीं तो कभी-कभी इन दिनों लोग
मथुरादास, गोपवृन्द, सेवकदाम ऐसे लम्बे चौड़े नाम रेखकर
गड़बड़ मचाते हैं. कभी-कभी कौड़ीमल, भिकारीमल, घोड्या,
पथरघा आदि मिलक्षण नाम रखते हैं, इन दिनों सब प्रकार
पागलपना फैल रहा है, फिर नाम रखने में दोष हो तो आश्चर्य
क्या है ? दोष देने में कुछ भी उपयोग नहीं, स्त्रियों के नामों में
भी मधुरपना होना चाहिये जैसे भामा, अनस्या, सीता,
लोपाद्रमा, यशोदा, सुखदा ऐसे-ऐले प्राचीन आर्य लोगों की
"लियों के नाम होते थे।
६ निकमण-कोमल शरीर के बच्चों को बाहर हवा खाने
के लिये ले जाना, यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है।
७ अन्नप्राशन-योग्य समय में बच्चे को अभप्राशनादि यदि
प्रारंभ न करें तो बड़ा ही दुःख होता हैं। इसलिये इस
संस्कार की योजना है।
(८५ " - - आर्य ८ चूझकर्म-मस्तक में शुष्णता उत्पन्न न हो और उष्ण घायु. में पसीने आदि के कारण मैल जमता है वह दूर होवे, इसलिये इस संस्कार की योजना की ६ प्रतबन्ध- ( यज्ञोपवीत ) पुरुषों को विद्यारम्भ के समय उत्साह हा, इस उद्देश्य से अतबंध विषय में विशेष नियम ठह- राये हैं अर्थात् बनाये हैं, स्त्रियों को भी विद्या- सम्पादन का अधिकार पहिले था और उसके अनुकूल उनका भी व्रतबंध संस्कार पूर्व में करते थे, विद्वान् अर्थात् ब्राह्मण लोग, कुलोत्पन्न बालक. को विद्यारम्भ के लमय कापास का अर्थात् रुई का यज्ञोपवीत विशेष चिह्न जान धारण करने को देते थे। इसके धारण करने में बड़ी ही जवाबदारी रहती थी, क्षत्रिय वैश्यादिको के बालकों .को , भी कार्पास का तो नहीं किन्तु दूसरे पदार्थों का यज्ञोपवीत धारण करने के लिये देते थे, यदि ठीक-ठीक विद्या-लपादन न हुई तो चाहे ब्राह्मण ही कुल में उत्पन्न हुआ तो भी उसका यज्ञोपवीत छीना जाता और उसकी अप्रतिष्ठा होती, उली तर शुद्रादिक भी उत्तम विद्या सम्पादन कर कर ब्राह्मणत्व के अधिकारी होकर यज्ञोपवीत धारण करते थे, इस प्रकार की व्यवस्था प्राचान आर्य लोगों ने कर रक्खी थी, इस कारण सव जाति के पुरुषों को और स्त्रियों को,विधा- सम्पादन करने के विषय में उत्साह बढ़ता रहता था, विद्या के अधिकारानुसार उत्तम, मध्यम, कनिष्ठं ऐसे यशोपवीत, के भूषण सबों को धारण करने को मिलते रहते थे १० -११ तदनन्तर वेदारम्भ और ग्यारहवाँ वेदाध्यान: समाप्ति अर्थात् समावर्तन ऐसे दो संस्कार हैं। १२ विवाहइस., संस्कार का आगे जब इतिहास विषय . + ( ८६ ) में न्याख्यान देंगे उस समय विचार करेंगे, इन दिनों मुहादिक के विषय में जो आडम्बर मचा रक्खा है यह केवल बलात्कार (ज़बरदस्ती) है। व्यर्थ ही कालक्षेप न हो और नियमित समय पर सब वार्ता हो इसलिये कालनियम के विषय में ध्यान देना अत्यावश्यक है, परन्तु उनी के शास्त्रार्थ में व्यर्थ हाय-टीय करना अनुचित है, इसी प्रकार पहले आर्य लोग स्वयम्बर करते थे, एक नाड़ आई और मनुष्य गण आ घुसा और अमुक ग्रह नहीं मिला और फलानी राशि दी दुई इत्यादि गपोड़े उन दिनों में नहीं थे। १३ गार्हपत्य-गृहस्थाश्रम में पंचमहायता करने पड़ते हैं इसका विचार भी आगे इतिहास विषय में व्याख्यान देते समय करेंगे। १४ वानप्रस्थ-पुत्र का बेटा होते ही गृहस्थाश्रम मैं वास करनेवाला गृहस्थी वानप्रस्थाश्रम धारण करे ऐसी योजना थी, धानप्रस्थाश्रम में धर्माधर्म और सत्यासत्य के विषय में निर्णय होता रहता था, क्योंकि विचार के लिये समय मिले और गुण दोष का निर्णय करने में आवे इस- लिये वानप्रस्थाश्रम की योजना की है। १५ संन्यास-धर्म की प्रवृत्ति विशेष दो और जनहित करने में आवे इसलिये यह आश्रम है। १६ अन्त्येष्टि-आश्वलायन सूत्र में इस संस्कार का वर्णन किया है, आज कल हमारे देश में अन्त्येष्टि के तीन ( ८७ ) प्रकार जारी हैं, कोई तो जलाते हैं वा कोई जंगल में डाल आते हैं और तीसरे जल समाधि देते हैं। प्राचीन आर्य लोगों में अन्त्येष्टि यज्ञ है, उसमें दहन प्रकार मुख्य है, अब मुर्दे को , गाहनेवाले ऐसी शंका करें कि जलाना बड़ी निष्ठुरता है, परन्तु मुसलमान आदिकों को विचार करना चाहिये कि सुदै को जमीन में गाइने से रोग की उत्पत्ति होती है। ? कोई-कोई ऐसी भी शंका करेगा कि जल में देह डालने से मच्छियाँ उस्ले खाती हैं तो क्या यह परोपकार नहीं है? परन्तु जल बिगता है। इसका भी तो विचार करना चाहिये। गंगा सदृश महान दियों में प्रेतों को डालने से जल में विकार उत्पन्न होता है, तो फिर छोटी मोटी नदियों की तो कथा क्या है। अब गंगा में हड्डियाँ ले जाकर बहुत से लोग डालते है तो बतलाओ यह कितना भारी भोलापन है ? मरे हुये प्राणी की देह मृत्तिका है, उसे गंगा में डालने से क्या लाभ होगा? चन में फेंकने से भी दुर्गन्धि उत्पन्न होकर रोग उत्पन्न होता है हले झड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। इससे प्राचीन आर्य लोगों ने दहनविधि ही को मुख्य माना । है और यही ठीक है, वे श्मशान भूमि में एक वेदी पनाया करते और उसे पक्की ईटों से बाँधते और फिर उसमें मृत देह को जलाते समय बील सेर घृत डालकर चन्दनादि सुग- न्धित पदार्थ भी डालते थे, शुक्ल यजुर्वेद के ३६ वें अध्याय में इस विषय का वर्णन किया है। आज कल अन्त्येष्टि संस्कार यथाविधि नहीं होता नाम- - ।
(८८) मात्र होता है, अलबत्ता कट्टहाओं की चैन उड़ती है, सो यह ज़बरदस्ती है. सबों को रचित है कि फिर संस्कारों को मुधारे जिससे कल्याण हो । ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्ति । 1 आठवाँ व्याख्यान इतिहासविषयक श्रोम् यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु । शनः कुरु प्रजाभ्योऽभयन्नः पशुभ्यः ॥ १ ॥ ( य० सं० अ० ३६ मं० २२), इतिहास-यह आज के व्याख्यान का चिपय है। क्रम क्रम से यह व्याख्यान होना चाहिये, इतिहाप्त अर्थात् "इतिहाँसो नाम वृत्तम" इति वृत्तं अर्थात् अतीतवर्णन को इतिहास कहते हैं, इतिहास जगदुत्पत्ति से प्रारम्भ होकर आज के समय तक चला आता है। जगदुत्पत्ति के सम्बन्ध से दो एक- प्रश्नों का विचार करना पड़ता है। जगत् कैसे उत्पन्न हुआ और किसने उत्पन्न किया। 2 नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो -- 1 (८९), नो व्योमापरोयत् । किमावरीव कुहकस्य शर्मः। नम्नः किमासीद्गहनंगभीरम् ॥ १॥ .. (ऋ० अ०८ अ०७३ १७) मूल में प्रकृति भी नहीं थी और न कार्य ही था, उत्पत्ति, स्थिति, लयादिको कार्य कहते हैं, सत् ' अर्थात् प्रकृति का वर्णन सांख्यशास्त्र में किया है. उस शास्त्र में सत्व, रज, तमोगुण की जो समावस्था है वही प्रकृति है ऐसा माना है,,.. सांख्य सूत्र देखो- प्रकृति से आगे उत्पत्ति कैसे हुई इस विषय में सांख्य शास्त्र का सूत्र नीचे लिखे अनुसार सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः प्रकृते- महान्महतोऽहंकारोऽहंकारात्पञ्चतन्मात्राण्युभ- यमिन्द्रियं पञ्चतन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्चविंशतिर्गणः ॥ १॥ सां० अ०१ सू०६१) - मूल में प्रकृति नहीं थी तब सृषि का कार्य कैसे हुआ.इस विषय में यदि संशय कोई करे. तो उसके लिये एक, दृष्टान्त है सो पढ़ो- भूमि पर ओस पड़कर घास पर वृक्ष की पत्तियों पर उस के विन्दु बन जाते हैं, इससे यह ओस पृथ्वी का आवरण नहीं 4 (१०) होता, इसी तरह पहिले किसी प्रकार का भी आवरण नहीं था। ईश्वर की इच्छा होकर उसने सृष्टि उत्पन्न की, ऐसा भी कोई-कोई कहते हैं और उसमें निम्न वचन का प्रमाण देते हैं। तदैक्षत बहुःम्यां प्रजायेयेति । (तैत्तिरीयोपनि० ब्रह्मानन्दवल्ली अ:०६) परन्तु इस वचन से इच्छा के प्रकार का बोध नहीं होता क्योंकि ईक्ष शब्द का उपयोग किया है, इस धातु का अर्थ दर्शन और अंकन है, परन्तु इच्छा अर्थ नहीं है, ईश्वर को इच्छा हुई यह बात सम्भव नहीं होती, इच्छा होने के लिये किसी भी वार्ता की अप्राप्ति होनी चाहिये, सो ईश्वर को सृष्टि में कौन सो यस्तु अप्राप्त है ? अर्थात् कोई भी अप्राप्त नहीं, फिर (छा करनेवाले को देश, काल, धस्तु, परिच्छेद होते हैं यह बात भी ईश्वर में नहीं सम्भव होती, इसलिये ईश्वर की इच्छामात्र से सृष्टि उत्पन्न हुई ऐसा कहना अयोग्य है। - मूल में प्रकृति हुई और प्रकृति से सारी सृष्टि उत्पन्न हुई। + ऋतञ्च सत्यञ्चाभीद्धात्तपसोऽध्य जायत ततो रायजायत ततः समुद्रो अर्णवः ॥ १ ॥ समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरो अजायत ॥ अहोरा- त्राणि विदधद्विश्यस्य मिषतो वशी ॥२॥ सूर्या ( ६१ ) चन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् ॥ दिवञ्च पृथिवीञ्चान्चरिक्षमथो स्वः ॥३॥ (ऋ० अ०८ अ० ८०० ४८) 1 तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः आकाशाद्वायुः, बायोरग्निः, अग्नेशपः, अभ्यः पृथिवी, पृथिव्या ओषधयः, ओषधिभ्योऽन्नम, अन्नाद्रेता, रेतसः पुरुषः, स वा एषपुरुषो- नरसमय: ॥ (तै० आर० ब्रह्मानन्दवल्ली अनु०१) आकाश धिभु होने से सब पदार्थों का अधिकरण है, और उस से भी विभु और अतिसूक्ष्म परमात्मा है, आकाश ईश्वर ने उत्पन्न किया। आकाशस्तल्लिंगात्। (व्याससूत्रम् ) नों खं ब्रह्म । - (य० सं०) आकाश और परमात्मा का आधाराधेय सम्बन्ध है, अव्यक्त प्रकृति की जो अव्यक्त स्थिति उसी को आकाश कहना चाहिये, अब कोई ऐसी शंझा करें कि ईश्वर को जगत् उत्पन्न करने का क्या प्रयोजन था?
: (६६) तस्माच्च देवा बहुधा सम्प्रसूताः। साध्या मनुष्याः पशवो वयांसि ॥ अर्थात् उसके अनेक सामर्थ्य के कारण मृष्टि उत्पन्न हुई। ततो रायजायत । - है इन सब बातों का विचार सत्यार्थप्रकाश और पञ्चमहा- यज्ञ आदि-पुस्तकों में भली भाँति किया.गया है । यदि ईश्वर ने 'यथापूर्व जगत् उत्पन्न नहीं किया ऐसा कहें तो क्या नवीन जगत् उत्पन्न करने ममय उलने पुरानो भूलों को सुधारा है ? अथवा जो इसे विदित न थी क्या ऐसी बातों को उसमें डाला है ? कभी नहीं । इस स्थल पर तर्क का अप्र- तिष्टान उत्पन्न होता है और अनवस्या प्रसंग भी आता है और फिर ईश्वर की सर्वक्षता में दोष आकर पूर्वानवस्था उत्तरानवस्था का प्रसंग आता --सबों के पश्चात् मनुष्यप्राणी उत्पन्न किया गया, वे मनुष्य बहुत से थे, अन्यान्य मतों में तो दो ही मनुष्य थे ऐसा मानते हैं सो ठीक नहीं है। इस प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति का इतिहास हो चुका। ५ अब मनुष्य सृष्टि होने पर मनुष्य जाति.का इतिहास प्रारम्भ करना चाहिये। अनेक देशों के अनेक लोगों में प्राचीन काल में अनेक प्रन्धकार हो चुके हैं, उन सब प्रन्धकारों का प्राचीन होने के कारण हमें मान्य करने के लिये कहना कितनी अयोग्य बात हमें सत्यासत्य निर्णय करना आता है, कहीं ठग लोगों के पुस्तकों में यह कहा हो कि मनुष्यों को मार कर चोरी करना चाहिये तो क्या वह ग्रंथ प्राचीन है, इसलिये उसकी सब बातें मानना चाहिये ? कमी नहीं । व्यर्थ ही पुरानी पुस्तकों का नाम रखकर दाम्भिक मत का माहात्म्य बढ़ाना, इस उद्योग को क्या कहना चाहिये? अब (असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे ) इस न्याय के अनुकूल अनेक दुसरे देशों का इतिहास छोड़कर अपने ही देश का इतिहास कहना योग्य है, प्रथम मनुष्य जाति हिमालय के किसी प्रान्त में निर्माण हुई-ऐसा मानने से प्राचीन आर्य- ग्रंथों की परदेशस्थ लोगों के ग्रंथों के मतो के साथ एक वाक्यता होती है, और प्राचीन आर्य लोगों के ब्राह्मणादि मंथों में कहा ह- सर्वेषांतु ल नालानि कर्माणि च पृथक पृथक् । वेदशब्देश्य एबादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे ॥१॥ इस बचन के अनुकूल आर्य लोगों ने वेदों का अनुकरण करके जो व्यवस्था की वह नर्वत्र प्रचलित है लदाहरणार्थ लब जगत् में सात ही बार हैं, बारह ही महीने हैं और बारह ही राशियाँ हैं, इल व्यवस्था को देखो, अब भिन्न-भिन्न भाषाएँ कैले उत्पन्न हुई इलका विचार करना अत्यावश्यक है-इल सम्बन्ध ले यहूदी लोगों में एक ऐसी कहानी है कि उनके पूर्वज स्वर्ग इतना ऊँचा एक बुर्ज बना रहे थे, इससे ईश्वर उन पर अप्रसन्न हुआ और उसने उनकी बोली में गरबा मचा
दी बस इसी से जंगत् में अनेक भाषाएँ उत्पन्न हुई, सो यह
कल्पना बिलकुल अप्रशस्त है।
देश, काल, भेद, आलस्य, प्रमाद के कारण एक मूल
भाषा से व्यवहार में भेद पहकर भिन्न-भिन्न भाषाएँ
उत्पन्न हुई।
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वेदांश्च प्रहि-
गोतितस्सै०
पश्चात् आर्य और
वेदाध्ययन और अध्यापन, इन दोनों कामों में ब्रह्मा आदि
ब्राह्मण आदि आचार्य और आदि गुरु हैं, उनका पुत्र विराट
और उससे परम्परा से स्वायम्भुव मनु तक वेद का उपदेश
किस प्रकार हुआ, यह व्यवस्था मनुस्मृति में
कही हुई है।
मनुष्य सृष्टि उत्पन्न होने पर एक मनुष्य जाति ही थी
दस्यु
ये भेद हुये।
"विजानीद्यार्यान्ये च दस्यको"
(ऋग्वेद संहिता)
अर्थात् ऊपर सहे आर्य और दस्यु, आर्य शब्द से विद्वान्
लोग और दस्यु कहने ले दुष्टौ का बोध होता है, फिर आर्यों
में गुण कर्मानुसार चार वर्ण हुये, ब्राह्मण अर्थात् पूर्ण विद्वान्,
क्षत्रिय अर्थात् मध्यम विद्याधिकारी, वैश्य अर्थात् कनिष्ट
विद्याधिकारी, और शद्र अर्थात् अविद्या का स्थान ही
समझना चाहिये।
, (E) ब्राह्मणादिको योजन अध्ययनादि मुख्य धर्म है, वैश्यों का कृषि कर्म व्यापारादि, शूद्रों का सेवादि कर्म है, उसी तरह राजधर्म युद्धधर्म ये क्षत्रियों के कर्म धर्म हैं, इस प्रकार चार वर्ण हुये, इस के आगे चार आश्रम हुये, इन चारों आश्रमों का विचार अन्य प्रसंग में हो चुका है, अब मनुजी का धर्म- शास्त्र कौन सी स्थिति में इस का विचार करना चाहिये। जैले साल लोग दूध में पानी डालकर उस दूध को बढ़ाते है और माल लेनेवाले को फँसाते हैं, उसी प्रकार मानवधर्मशास्त्र को अवस्था हुई है, उसमें बहुत से दुष्ट क्षेपक श्लाक हैं, वे असल में भगवान मनु के नहीं है, यदि कोई कहे कि यह कैले ? तो इसका प्रमाण यह है कि, एक दर ( कुल ) इन श्लोको को मनुस्मृति की पद्धति से मिला कर देखने से वे श्लोक सर्वथैव अयुक्त दीखते हैं, मनु सदृश श्रेष्ठ पुरुप के ग्रन्थ में अपने स्वार्थ-साधन के लिये चाहे जैसे वचनो को डालना बिलकुल नीयता दिखलाना है, अनुभूति स्वामी नाम कर के कोई महान् पण्डित था जल के मुंह ले 'पुंस' इस प्रयोग के स्थान में 'पुंक्ष' ऐसा अशुद्ध प्रयोग निकला अब उसी की उपपत्ति कर-कर पण्डित लोग दिखाते हैं कि वह शुद्ध ही है, सूद लोगों की रीति कुछ-कुछ कौने के सहश है, कौवे को किसी जानवर के ब्रग झट दिखाई देते हैं परन्तु उन्ही जानवरों के शुद्ध भाग नहीं दीखते, अशुद्धियाँ झट दिखलाई देने लगती हैं, हमारे पंडित भाइयों का स्वभाव इन दिनों बहुत बिगड़ गया है। आग्रहेणारम्भः कार्याच्छेषं कोपेन पूरयेत् । किसी ने शाल शब्द का उपयोग किया तोट प्रथम ही
णपस
पूछने लग जाते हैं कि, "शास्त्रस्यकोऽ:" ऐसे-ऐसे प्रश्न
पूछकर वितण्डावाद करने को उनको बड़ी ही हौस हो रही
है,
परन्तु वितण्डावादी को कोई वितण्डावादी ही मिले तो
वह सहज ही प्रश्न निकालेगा कि "शकारस्य कोऽर्थः"
"स्वकारस्य झोऽर्थः" "अनुस्वारस्य कोऽर्थः' और इस
प्रकार फिर वही वितण्डा होगा इत्यादि, सो भाई वितण्डा-
वाद छोड़ करके शान्तवृत्ति धारण कर याद करें यह हमें योग्य
है । भगवान् पतंजलिजीने
महामाप्य कहा
है कि जो दौड़ेगा
सो गिरेगा, उसमें कुछ दोष नहीं।
में
'धारतःस्खलनं न दोषाय सवतिः
( सहा०)
इल वचन के आधार ले हमारे बोलने में कुछ प्रमाद
अथधा अशुद्ध प्रयोग निकल आवे तो पण्डितों को उसका
विषाद न मानना चाहिये । हम सर्वज्ञ नही और सबातें हमें
उपस्थित भी नहीं, हमारे बोलने में अनन्त दोष होते होंगे
इसका हमें ज्ञान भी नहीं है, दोष बतलाने पर हम स्वीकार
कारगे, सत्य की छानबीन होनी चाहिये चितण्डा न होगी
चाहिये, यही हमारी बुद्धि में जाता है, गुणलेश होने पर लेलेने
और दोष की क्षमा होनी चाहिये, शान्तता अर्थात् शाम, दम,
तप ये ब्राह्मणों के मुख्य गुण हैं, और. जिनमें ये शुण होंगे
निस्संदेह के हो ब्राह्मण हैं। ब्राह्मणों का काम अध्यापन है, उस्ली
तरह उनकी जीविका अध्यापन, याजनादिका की दक्षिणा ले
होती है, व्यर्थ प्रतिग्रह लेना अप्रशस्त ही है।
उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः ।
--
4 (११) तेन ते प्रेत्य शुतां बजत्यन्नादिदायिनाम् ॥ (मनु) शम-अन्तःकरण को वृत्तियों का शमन, दमन, जितेन्द्रिय- व, तप, विद्यानुष्ठान, दोनों प्रकार का शौच, शारीरिक और मानसिक शांति, नमूता अर्थात् अनाग्रह, ये धर्म . जब ब्राह्मणों में होते हैं तब उनमें गाम्भोर्य रहता है, है, और कच्चे ब्राह्मण अर्थात् अब्राह्मणों में ब्राह्मण्य का बड़ा ही घमंड रहता है सो ठीक ही है। किसी धनिक को दरिद्री कइने से उसे क्रोध नहीं आता परन्तु दरिद्री को दरिद्री कहने से बहुत ही क्रोध आता है, पाप रहित अन्तःकरण को वृत्तियों के अनुकूल मनुष्यों की बोलने की रीति होती है। आज कल के स्टाम्प्रदायिक साधु परमेश्वर का नामो- चारण करते समय अपनी वृत्तियों के अनुकूल उस नाम में जोड़ लगाते हैं। उदाहरणार्थ जैसे ब्राह्मण साधु हो तो यह कहता है कि- 'राम नाम लडुवा गोपाल नाम घी' क्षत्रिय साधु हो तो वह कहता है कि- 'राम नाम की ढाल बनाकर कृष्ण कटारा बाँध लिया।' यदि साधुजी कोई बनिये हुये तो यो कहते हैं कि- 'राम मेरा बानियाँ समझ करे व्योपार' शद्र साधु हो तो वह यों कहने लग जाता है कि 'हरिको भजे सो हरिका होय, जात पाँत पूछे ना कोय ।'
(१०५) कहीं सुन्दर प्रदेश देखा किट वहीं पर बस जाते, इस प्रकार सब जगत् के प्रत्येक देश में मनुष्य फैले, इसी समय में राजा स्वाकु ने विद्वान् लोगों को अपने साथ लेकर इस भरतखण्ट में प्रथम वस्लाइत की, आर्यावर्त देश कहने से पश्चिम में सरस्वती अर्थात् सिन्धु नदी और पूर्व में ब्रह्मपुत्रा अथवा पद्वती, उत्तर में हिमालय और दक्षिण में विन्ध्याद्रि आदि के बीच का जो प्रदेश ६ उसी को आर्यावर्त कहते हैं। यह आर्या वत कितना सुन्दर है, शितना सुपीक (जरलोज़) है ? और जल वायु भी यहाँ का कितना उत्कृष्ट है ? इसमें छहा ऋतु झम से आते रहते हैं। देव अर्थात् विद्वान् ये हैं उन्हीं के कारण देव नदी ऐसी संशा उत्पन्न हुई इसीलिये "देवनद्योर्यदन्तरम्" ऐसा कहा है, प्रथम गंगा का नाम पद्मा था फिर उस नदी की नहर भागीरथ ने निकाला इसलिये उसका नाम भागीरथी और समय ब्रह्मचारी और ब्राह्मण इनका नाम आर्य था, उसका सूत्र है कि:- 'पार्यो ब्राह्मण कुमारयोः' पाणिनिसूत्रम् । ऐसी हरवस्था होते हुये हमारे देश का नाम आमस्थान आर्यखण्ड होना चाहिये सो उसे छोड़ न जाने हिन्दुस्थान यह नाम कहाँ ले निकला ? भाई श्रोतागण ! हिन्दु शब्द का अर्थ तो काला, काफिर, चोर इत्यादि है और हिन्दुस्थान कहने से काले, काफिर चोर लोगों की जगह अथवा देश, ऐला अर्थ होता है तो भाई इस प्रकार का बुरा नाम क्यों ग्रहण करते हो? और आर्य अर्थात् भेष्ठ अथवा अमिलात इत्यादि, और । (१०) अवर्त कहने से ऐसों का देश अर्थात् आर्यावर्त का अर्थ श्रेष्ठों का देश ऐसा होता है । सो भाई, ऐसे श्रेष्ठ नाम को तुम क्यों स्वीकार नहीं करते ? क्या तुम अपना मूल का नाम भी भूल गये? हा ! यह हम लोगों की स्थिति देखकर किसके हदल के क्लेश न होगा, सवही को होगा । अस्तु, सजन जन ! अब हिन्दु इस नाम का त्याग करो और आर्य तथा अर्यावर्त इन नामोका अभिमान धरो। गुणभ्रष्ट हम लोग हुए तो हुए परन्तु नामभ्रष्ट तो हमें न होना चाहिये। ऐसी आप सबो से मेरी प्रार्थना है। ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः। - नवाँ व्याख्यान इतिहासविषयक इक्ष्वाकु यइ आर्यावत का प्रथम राजाहुआ,इक्ष्वाकु की ब्रह्माले छठी पीढ़ी है, पीढ़ी शब्द का अर्थ वाप ले बेटा यही न समझे किन्तु एक अधिकारी से दूसरा अधिकारी ऐसा जाने, पहिला अधिकारी स्वायम्भुव था, इक्ष्वाकु के समय में लोगों ने अक्षर स्याही आदि लिखने की गति को प्रचार में लाये ऐसा प्रतीत होता है, क्योंकि इक्ष्वाकु के समय में वेद को बिलकुल कण्ठस्थ करने की रीति कुछ-कुछ बन्द होने लगी, जिस लिपि में वैद लिखे जाते थे. उसका नाम देवनागरी ऐसा है, कारण-देव अर्थात् विद्वान् इनका जो नगर ऐसे विद्वान् नागर लोगों ने अक्षर द्वारा अर्थ संकेत उत्पन्न करके ग्रंथ लिखने का प्रचार प्रथम प्रारम्भ किया, ब्रह्मा तक दिव्य सृष्टि थी, पश्चात् मैथुना सृष्टि उत्पन्न हुई, उस से विराट हुआ, और विराट के पीछे मनु हुआ, मनु ने धर्मव्यवस्था बनाई, मनु के दस पुत्र थे, उनमें स्वायम्भुव के समय से राजकीय और सामाजिक व्यवः स्थाएँ प्रारम्भ हुई, इक्ष्वाकु राजा हुआ तो वह इनसे नहीं कि राजकुल में वह उत्पन्न हुआ था अथवा उगने वला से राज्य उत्पन्न किया हो विन्तु सारे लोगों ने उसे उसकी योग्य- तानुकूल राजसभा अध्या स्थान पर बैठाया, उस समय सारे लाग वैदिक व्यवस्थानुकूल बनने थे, भृगुजी ने अपनी संहिता में यह सब व्यवस्था प्रटी और यह ग्रन्थ श्लो. कात्मक है, इसले वाल्मीकिती ने उसे घनाया यह कहना कितना सयुक्तिक है सो देखो, इस व्यवस्था के सम्बन्ध ले मनु के सातवें आठवें और नवे अध्यायों में जो राज्यों की व्यवस्था बतलाई है उसे देखो, केवल अकेले राजा ही के हाथ में किली प्रकार का हुक्म चलाने की शक्ति न थी, वह तो केवल राज सभा में अध्यक्ष का अधिकार चत्ताना रहना, राज्यों की व्यवस्था कैसी थी उसे संक्षेप से इस स्थल पर कहता । ग्राम, महा प्राम, नगर, पुर, ऐसे-ऐसे देश विभाग रहते थे, ग्रामों में सौ-सौ घर, तो मझा ग्रामों में हज़ार, नगर में दश हज़ार और पुर में तो इन्लले भी अधिक घगे की संख्या रहती थी, दश ग्राम पर एक शतेश चाम का अधिकारी रहता था और सहन ग्रामों पर सहस्त्रेश नाम का अधि- कारी होता था, दश सहनों पर महा सुशील नीतिमान् ऐसा एक ही अधिकारी रहता था, लिखन पढ़ने के कामों में अनुभव शील ऐसे सब देशों में गुप्त दूत बातमियाँ १०७ ) (खबर) पहुँचाने के लिये तथा अधिकारी लोग कैसा अधिकार चलाते हैं इसका शोध रखने के लिये चारों और फिरते रहते थे, और यह दूनों का काम पुरुष वा. स्त्रियाँ भी करती थीं, राज्य में चार प्रकार के अधिकारी होते थे, राज्याधिकारी, सेनाधिकारी, न्यायाधिकारी और कोषाधिकारी ऐले चार महकमे के चार अधिकारी रहते थे, इक्ष्वाकु राज सभा का प्रथम अध्यक्ष था, यदि सभा के विचार में दो पक्ष आ पड़ते उस स्थल पर निर्णय करने का काम अध्यक्ष का शा, देश में भिन्न-भिन्न जाति की सभाये थीं, उनमें राजार्य सभा ही मुख्य थी और धर्म सभाएँ अर्थात् परि पद भी स्थल-स्थल पर थीं, दश विद्वान् विनाजे बिना परिषद सभा नहीं होती थी, और न्यून से न्यून तीन विद्वानों के आये गिना तो पभा का काम चलता ही नहीं था, धर्म - समा. ही ओर किल्ली प्रकार का अधिकार न था किन्तु उल में धर्माधर्म का शिवचन और उपदेश ही होता था, परीक्षा और शिल्पो- नति की ओर भी इस सभा का ध्यान रहता था, न्यूना- धिक के विषय राजार्य सभा को विदित करके उस सभा की ओर ले दण्डादिक की व्यवस्था होती थी, महा भार- तान्तर्गत सभापर्व में भिन्न-भिन्न सभाओं का वर्णन किया हुआ उसे देखो, लेला के बिगाही लोगों को आशा मानना ही मुख्य कर्तव्य कर्म है ऐला बतलाकर उन्हें धनुर्वेद लिखाते थे। आर्य लोगों की "कवादय क्या है" यह विदित न था ऐसा बहुत ले अँगरेज़ी पढ़े हुये लोग कहते हैं परन्तु यह कहना पागलपने का है। क्योंकि मकर- म्यूह, बकव्यूह, बलाकाव्यूह, सूचीन्यूह, शूकरव्यूइ, शकट--
(१०८)
व्यूह, चक्रव्यूह इत्यादि कवायद के नाना प्रकार प्राचीन काल
में आर्य लोगों को विदित थे, और सैन्य में की भिन्न-भिन्न
टोलियों पर दशेश, शतेश, सहस्रश ऐसे अधिकारी रहते
और उस समय के उनके हथियार अर्थात् शक्ति, अंलि,
शतघ्नी, भुशुण्डो आदि होते थे, अँगरेज़ी लोगों में अब तक
व्यूह रजना का पूर्ण ज्ञान नहीं हुभा है, अर्थात् वे नहीं जानते
कि व्यूह रचना किसे कहते हैं । थोड़ी बहुत कवायद करते हैं
उतने ही से वे प्राचीन आर्य लोगों की अपेक्षा कुशल है ऐसा
तुम्हें प्रतीत होने लगा है, सारांश "निरस्तपादपे देशे एरण्डो-
पिद्रुमायते" यह कहावत सत्य है।
इससे अंगरेजों में हमारी अपेक्षा विशेष गुण नहीं है ऐसा
मेरा कहना नहीं है ; किन्तु उनमें भी बहुत से अच्छे गुण हैं:
सो उनके अच्छे गुणों को हम स्वीकार करें यहो हमें योग्य है.
पहिले समय में जो कोई युद्ध में मरता तो उसके लड़के बालों
को वेतन मिला करता और युद्ध प्रसंग में जो लूट मिलती तो
उसे नियत समय पर व्यवस्था से वांट दिया करते, सैन्य की
योग्यव्यवस्था के सम्बन्ध से उस समय बहुतेरे कार्यों की ओर
ध्यान दिया करते, और समस्त ऐश्वर्य को मूल कारण सेना
है। यह जान सेना में के लोगो को कोई प्रकार को चिन्ता वा कष्ट
न होने देते इसलिये अधिकारी लोग उस समय बहुत ही दक्ष
होते थे । यदि सेना में कोई बीमार पड़ता तो उसकी विशेष
चिन्ता की जाती थी अर्थात् उत्तम रक्षा होती थी।
कार्षापणंभवेद्दण्डयो यत्रान्यः प्राकृतो जनः ।
तत्रराजाभवेद्दण्ड्यः सहस्रमिति धारणा ॥१॥
(१०१) श्रेष्ठ पुरुषों को और राजा को गरीबों की अपेक्षा शतपट (सौगुना ) दण्ड अधिक दिया जाता, और राजा लोग मुनि लोगों ने साथ धर्मवाद करने में समय लगाते रहते, इस विषय में पिप्पलाद मुनि की कथा देखो, इस प्रकार इक्ष्वाकु के समय में राज्यव्यवस्था थी, इक्ष्वाकु राजा इस प्रकार का सुशील, नीतिमान्', सुश, जितेन्द्रिय विद्वान् और गुण सम्पन्न राआथा। बहुत सी पीढ़ियों के पश्चात् सगर गजा राज्य करने लगा, उस समय राजा लोग यदि मूर्ख होते तो उन्हें अधि- कार से दूर कर देते अथवा अधिकार ही न देते। इन दिनों हमारे गजा लोगों को खुशामदियों की हाल चौकड़ी ने घेरा है सहज ही राजाओं में सारे दुर्गुण पास करते हैं इसमें आश्चर्य ही क्या है ? बस सारांश इतना ही है कि यह हमारे आर्यावर्त का दुर्दैव है। बहवः पुरुषा राजन्सततं प्रियवादिनः । अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥१॥ (महाभारते) लर ता सुशील और नीतिमान् था, इस राजा का मूर्ख और दुष्ट ऐखा असमंजस नाम का पुन उत्पश हुभा, सलने एक रानी के बालक को पानी में फेंक दिया इसकी प्रार्थना का न्याय राजार्य सभा के सयुम्न होने पर राजा ने टले शासन किया, और उसे एक महा भयंकर जंगल के बीच कैद कर रक्खा, इसी का नाम न्याय है, नहीं तो आज कल के राजा लोग और उनके न्याय का क्या पूछना है, कहते हैं कि- - दुआ है इस कारण से जहाँ अग्नि का मन्थन होता है अर्थात् अग्नि की अनेक प्रकार की सुन्दरता होती है वहीं अग्नि के वल से निश्चय कहा जाता है कि सम्पूर्ण संसार इसी के बल से स्थित है। यह बज अर्थात् अग्नि है। इन संगार को उन्नति देती है। उस समय राजा नल अयोध्यापुरी के गाना ऋतुपर्ण के यहाँ नौकर था वहाँ से दमयन्ती के स्वयम्बर में नल को विद्याशक्ति से एक ही दिन में गजा ऋतुपर्ण पहुँच गया था इस कारण से नल की बढ़ी प्रशंसा हुई थी। इस के साथ दुर्वल श्यामकर्ण घोड़ों की मनुष्य अटपटाँग बातें करते हैं इन में कुछ भी सच्चाई नहीं है, इल में अनन्ता भरतकुल में राजा होते रहे, इसी कारण पर उस समय ले आर्यावर्त का नाम भारतवर्ष भी होगया। तदनन्तर राजा रघु हुआ वह भी बड़ा महात्मा था | राम राजा से रघु राजा बड़ा था। रघु के पीछे राम गजा हुये। इनका रावण से युद्ध हुआ। इनका इतिहास रामायण में वर्णन किया गया है। ऐले-ऐसे वीर, पराक्रमी, बुद्धिमान, विद्वान, वैद्य और न्यायकारी राजा लोग आर्यावर्त में हुये हैं। उस समय आर्यावर्त में प्रत्येक स्थान पर बड़ी भारी शति थी। कोरस्टिकनी ब्राह्मण में लिखा है कि सब पुत्र वा पुत्रियाँ पाँच वर्ष की अवस्था में पाठशाला को भेजे जाते थे। यह एक सामाजिक नियम था । परन्तु माता पिता इल लामा- जिक नियम को तोड़ने तो राजलमानको दण्ड मिलताया। इस तरह की उन्नति का समय व्यतीत होते हुए राजा शान्तनु समय आ पहुँचा इस समय आर्यावर्त की द्रव्य बात बढ़ द्रव्य के नशे के कारण से सहज हा इस आर्या- बिगड़नी प्रारम्भ हुई। जिसके पास द्रव्य बहुत ।
1 - 1 - । + थी वह नशा में मस्त था। इस कारण से एकाएक देश में सामाजिक नियमों से विरुद्धता हुई थी। राजा शन्तनु को द्रव्य का बड़ाभारी. अभिमान. उत्पन्न हुआ और देश में व्यभिचार बढ़ गया। निष्कराटक राज्य होने के कारण ले. शन्तनु और भी विशेष अभिमान संयुक्त हुआ! मनुजी ने कहा है - अर्थकामेष्वलतानां धर्मज्ञानं विधीयते । धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुति ॥ जो मनुष्य सांसारिक विषयों में फैले हुये हैं उन्हें धर्म का शान नहीं हो सकता। धर्म के जिज्ञासुवों के लिये परम प्रमाण वेद है । इसके अनन्तर शन्तनु अत्यन्त विषयों की अधीनता में ही चला । सत्यवती पर इसकी चालाकी का' समाचार आप सब लोग जानते हैं। परन्तु शन्तनु राता भी इस पर बल न कर लक्षा! सत्यवती के पिता ने उसको डाटा था। जब तक भीष्म में अपना अल हक सत्यवती के पुत्रों को देने का निश्चय नहीं किया तद तक लत्यवती के दरिद्री पिता ने आज्ञा स्वीकार नहीं की। भीष्मपितामह के इस निश्चय पर हसने अपना कुल' हक सत्यवती के पुत्रों को दे दिया। सत्य- वती के दरिद्री पिता ने राजा का कहना स्वीकार किया। इससे ही प्रकट हो सकता है कि प्राचीन आर्य मनुष्यों में कितनी स्वाधीनता थी। राजा लोग भी. सामाजिक प्रबन्ध में किस प्रकार प्रबन्धकर्ता हुये थे । इस आर्यावर्त के राजाओं की नेकी वा नेशनामी संसार में फैल रही थी । योरुप आर अमे- 7 राजी की ३ (११४) रिका के कुल राजा लोग इनकी सेवकाई में तत्पर होकर कर देते थे। अब सोचिये कि वर्तमान समय में देश की दशा ऐसी गिर गई है। ये सब बातें महाभारत के राजस्य और अश्व- मेध पर्यों में वर्णित है। निदान शन्तनु राजा के समय में पाप पदने जगा और राज्य का प्रबन्ध विगड चत्ता, यह ही पार अन्त में बढ़ते-बढ़ते कौरवों वा पाण्डवों के बड़े भारी संग्राम पर समाप्त हुआ और उसी समय से इस देश को भाग्य विग- उनी प्रारम्भ हुई। अब इस जगह राजा लोगों का इतिहास समाप्त किया जाता है। अब आगे देवता, विद्या और ऋपि आदि के इतिहास प्रारम्भ करते हैं । शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि देवता विद्वानों को कहते है । इन विद्वानों के तीन प्रकार थे-प्रथम देव, द्वितीय ऋषि. तृतीय पितृ : इन तीन प्रकार से पृथक ब्राह्मण श्रादि ग्रंथों में तेतिस देवता वर्णन किये गये हैं और तेतीस करोड़ का मानना जो नवीन पुरुषों ने किया है वह बाहुन अनुचित है, क्योंकि कोटी का अर्थ प्रकरर है और इनसे पुस्तक निमापक लोगों ने करोड़ का अर्थ करके ऐसो गल्ती खाई है कि विष्णु, आदित्य, रुद्र, इन्द्र आदि इस तरह के तेतीस देवता शतपथ ब्राह्मण के वृहदारण्यक उपनिषद् में वर्णन किये गये हैं, यह देख.लेना चाहिये । इन तेतीस देवताओं, गरह आदित्य अर्थात् -महीने, ग्यारह.रुद्र । रुद्र शन्द्र का.अर्थ यो है कि इस शरीर में से प्राणों के निकल जाने पर लोग रोया करते हैं इस- लिये प्राणों को रुद्र कहते हैं, इसलिये दशवों प्राण और जीवात्मा मिलकर ग्यारह रुद्र समझना चाहिये, क्योंकि इनके शारीर से अलग होने पर ही सम्बन्धी रोते हैं। जो कि निम्न- गीत परावर्णित है।
( १९.५ ) १ पृथिवी, २ जल, ३ तेज, ४ वायु, ५ आकाश ये पाँचो शुद्धिसृष्टि में के ६ देव ७ चन्द्रमा ८ सूर्य ये सब मिलकर आठ दल सौ हुये, बत्तीसवे प्रजापति, तैतीसवें विष्णु वैकुण्ठ में रहनेवाले थे और वह ही उनकी राजधानी का नगर था। महा- देव कैलास के रहनेवाले थे । कुवेर अलकापुरी के रहनेवाले थे। यह सब इतिहाल केदारखण्ड में वर्णन किया गया है। हम स्वयं भी इन सब ओर घूमे हुये हैं । जिस पहाड़ पर कि पुरानी अलकापुरी थी उसपर भी मैं इस विचार ले गया था कि एक बार ही अपना शरीर बर्फ में गला कर संसार के धंधों से निवृत हो जाऊँ ; परन्तु वहाँ पहुँच कर विचार में आया कि इस जगह पर मर जाना तो कोई पुरुषार्थ नहीं है, अलबत्ता ज्ञान प्राप्त करके परोपकार करना पुरुषार्थ है। इस विश्वास के बदलने पर लौट आया था। अब तो विदित होता है कि जीवात्मा को मृत्यु ही नहीं है। काश्मीर से लेकर नेपाल तक हिमालय की जो ऊँची चोटियाँ हैं वहाँ देवता आर्थात् विद्वान् पुरुष रहते हैं । गत समय की तरह प्रायः इस समय बर्फ नहीं पड़ती यो । ऐसा विचारांश होता है कि यदि इस समय भी वहाँ बर्फ पड़ता होती तो देव अर्थात् विद्वानों का इस स्थान पर निवास कैसे होता। इस देवलोक में भद्र पुरुष प्रत्येक स्थान पर राज्य करते थे, इस समय भी भरतखण्ड में हमारे कथन का प्रमाण मिलता है। देहली में इन्द्रप्रस्थ नामी स्थान था। वहाँ इन्द्र का राज्य था । पुष्कर और ब्रह्मावर्त में ब्रह्मा ने राज्य किया । काशी वा उज्जैन और हरद्वार आदि में महादेव जी का राज्य था । इन विद्वानों अर्थात् आर्यों को वैरी अनार्य भील आदि थे। इनके साथ बराबर आर्यों के करना पड़ता था। गुब्बारों में बैठकर भी युद्ध करते थे। केवल 1 में (११६) यही नहीं, किन्तु जहाँ कहीं स्वयंवर रचा गया और बुलाबा गया कि उन्हीं गुच्यागे पर चढ़कर शीघ्र ही उस स्थान पर पहुँच जाते थे ! इन देवनों में बड़े देवता लोग अत्यन्त वीर थे, इनशी स्त्रियाँ मर्दाना जोश से अपने पनियों के साथ युद्ध, जाया करती थीं ! इन पहाड़ के रहनेवाले देवताओं के राज्य के व्यवहार आज तक के राजपूत लोगों से अबतक मिलते हैं। प्राचीन समय के राजा लोग यद्ध के समय रथों में बैठे भोजन किया करते थे। इस नमय भी राजपूतों में ठाकुर लाग अवसर आने पर ऐसा ही करते हैं। राजपून लोग जिस स्थान पर जी चाहे खाते हैं । इली के लम्बन्ध में मैं एक रिवायत सुनाता हूं। जो कि शहर जयपुर, कुछ समय पहले ले प्रलिद्ध हैं। जयपुर के राजा लोग ब्राह्मण को रसोईदार बना कर नहीं रस्वते । इसका कारण इल रीनि एर वर्णन करते हैं कि तीन बार पुशनों से पहले रसोई का काम बाह्मण लोग नहीं करते थे। ब्राण वा क्षत्रिय और वैश्य इन तीन वर्गों के घर में शूद्र रलाईदार रहते थे और यह आचार मनुस्मृति में भी मिलना है। वर्तमान में यही राजपूत के रलोईद्वार हैं, ब्राह्मणों को रसोई मास के लिये न रखने का कारण यह वर्णन करते हैं कि गत समय पक बार ब्राह्मग ने राजा भोजन में विध डाल दिया था। प्राचीन समय में जिलको त्रिष्टुर देश कहते थे उलको वर्तमान में सुल्क तिव्वत कहते हैं। कोई-कोई हम से प्रश्न करते हैं कि विष्ण, महादेव, इन्द्र आदि देवता आज कल में दिनलाई नहीं देते। उनके लिये हमारा उत्तर यह है कि नेक और पराक्रमी, विद्वान् जो थे वे लव के सब मर गये। सोई-कोई पूछते हैं कि हिमालय में दाज्य करनेवाले लोग
-
कहाँ चले गये । कोई-कोई . कहते हैं कि देव अमर
परन्तु हम पापी लोगों को दिखाई नहीं देते । भला देवता
लोग तो अमर होने के कारण न देख पड़े, उनके नौकर
चाकर भंगी आदि क्यों नहीं दिखाई देते। ठीक बात तो
यह है कि जो, उत्पन्न हुआ है वह दिखलाई देता है और
वह अवश्य एक दिन मरनेवाला है, इस तर्कणा से देव
सीमर गये।
यदृष्टं तन्नष्टम् ।
देव मर गये इल से यह अभिप्राय है कि इस पृथिवी पर
से उनका शरीर जाता रहा परन्तु देवता और मनुष्य का
आत्मा अमर है, इसलिये जाति के विचार से देवजाति अर्थात्
विद्वानों का समूह अमर है अर्थात् सदैव कुछ न कुछ विद्वान्
पुरुप रहते हैं । इस कारण से कहा है कि-
S
विद्वाथलो बैदेवाः
।
इसलिये देव जाति तो अमर है। अब प्रश्न है कि हमारे
देश के इतिहास में ऐला गड़बड़ क्यों होगया और इसका
क्या कारण है कि किसी स्थान अथवा लेख के दिन आदि का
ठीक पता नहीं लगता है । जानना चाहिये कि मतलबी लोगों
ने पुस्तकों में तारीखें छिपा दी और जैनियों वा मुसलमानों के
ग्रन्थ जला दिये । यह संक्षेप ले देवताओं का इतिहास वर्णन
किया गया।
1
अब संक्षेपरीति ले विद्या का इतिहास कहा जाता है कि सव
--
(१२८) से पहला विद्वान देव ब्रह्मा हुआ, इसने, अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा चार ऋपियों के पास वेद पढ़ा। इस ब्रह्मा का पुत्र विराट, उसका पुत्र मनु मनु के दशपुत्र मरीत्रि, अत्रि, अहिरा आदि थे। इम समय में पढ़ने-पढ़ाने की रीनि क्या थी, यह सरलता से विदित हो सकता है । ऋग्वेद की इकोस शावा, यजुर्वेद की एक सौ एक शाखा, सामवेद की एक हज़ार शाग्वा और अथर्व वेद की नव शात्रा थीं, इसी नाह पर ग्यारह सौ इक्कीस शाम्बा पढ्ने पढ़ाने के लिये थीं। चारों वेदों को सहित अर्थ के जाननेवाला जोमेघयज्ञ का करनेवाला होता था, उसको ब्रह्मा कहते थे। ब्राह्मगों के बनाये हुये जो वेदों के व्याख्यान थे उनको ब्राह्मण पुस्तक कहा जाताया। ऐसे ब्राह्मण और अनुब्राह्मण रूप बहुन ली पुस्तकें हैं-साफ़ पानी और हवा जिन एकान्त स्थानों की होती थी ऐलै एकान्त स्थानों पर जा करें रहनेवाले मयि मन्त्र, दृष्टि, श्रवण वा मनन करनेवाले पदार्थ वा विवेचन करनेवाले, चा ब्रह्म विचार करने के वास्ते. वा लिद्धान्तों के निश्चय करने के लिये नैमिषारण्य आदि स्थानों में सभा करते थे। पं. महर्षि पाणिनि की बनाई दुई अष्टाध्यायी में ही देखो कितने प्रकार के नाम ऋषियों के आये हैं, आज कल के स्वेच्छाचार्ग चौरगियों के समूह को देखकर कृपा पूर्वक प्राचीन ऋषियों को अनुमान पादापि न कीजिए ! सचं तैयार की हुई पुस्तकों पर एक सिद्धान्नों की पुस्तक तैयार करते थे फिर उस पर प्रपियों की समा में विवाग। होता थी । राजसमा के विषय में मनुजी कहते हैं कि- मौलाञ्छस्त्राविदःशूराल्लव्धलक्षान्कुलोद्गतान् । सचित्रान्सप्तचाप्टौत्रा प्रकुर्वीत परीक्षितान् ॥ -
1
7
( १९६ )
श्रापि यत्सुकर कर्म यदप्येकेन दुष्करम् ।
विशेषतोऽलहायेन किन्तु राज्यं. महोदयम् ॥
तैः साई चिन्तयेन्नित्यं सामान्य संधिविग्रहम् ।
स्थानं समुदयं गुप्तिं लब्धप्रशमनानिच ॥
तेषां स्वस्वमभिप्रायमुपलभ्यः पृथक् पृथक् ।
समस्तानां च कार्येषु विदध्याद्वितमात्मनः ॥
(देखो मनुस्मृति अध्याय ७-श्लोक ५४.से.५७ तक)
अपने राज्य आर देश में उत्पन्न हुये, वेद वा शास्त्रों के
जाननेवाले, शूरवीर, कवि, गृहस्थ, अनुभवकर्ता सात अथवा
आठ धार्मिक, बुद्धिमान् मन्त्री राजा को रखना चाहिये। क्योंकि
सहायता के लिये साधारण काम भी एक को करना कठिन हो
जाना है। फिर बड़े भारी राज्य का काम एक से कैसे हो
सकता है । इसलिये एक को राजा बनाना और उसी की
बुद्धि' पर सारे काम. का बोझ रखना बुद्धिमानी नहीं हैं।
निदान महाराजा को उचित है कि मन्त्रियों समेत छः बातों
पर विचार करे-मित्र और शत्रु में चतुरता, अपना स्थान,
शत्रु के अवसर से देश की रक्षा, विजय किये हुरे देशों की
स्वास्थ्य प्रत्येक विषय पर विवागंश करके यथार्थ निर्णय
से जो कुछ अपनी और दूसरों की भलाई की बात विदित हो
न्याय करना।
इन श्लोकों से राजसभा का वर्णन यथार्थ विदित होता
है। पुराने राजा युद्ध करनेवाले सिपाहियों की रक्षा अपने
4
-
( १२० ) ने पुत्र की तरह-करते थे, इसलिये उन सिपाहियों को युद्ध करने में बड़ा भारी उत्साह होता था। इन विचारांशों पर सर राजा लोग चलते थे और सव सामान वा देश की रक्षा करते थे और उनके लिये, खज़ाना जना करने में लगे रहते थे । मनुजी युद्ध में जयं के विषय में विस्तार पूर्वक वर्णन किया है और उसी युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुये सिपाहियों के हक़ भी बतलाये हैं और क्षत्रियों का धर्म पूर्णतया वर्णन किया है। केवल यही नहीं किन्तु मनुजी ने विद्या की रक्षा और विद्वानों के सत्कार आदि के लिये नियम भी राजा को किये हैं। महाभाप्य में लिखा है कि ब्राह्मण को छ: अंगों समेत वेदों की शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। ब्राह्मणेन षडमो वेदोऽध्येतव्यश्चेति । इन छः अंगों में व्याकरण मुख्य है और पाणिनि बड़े विद्वान वैयाकरण हो गये हैं इनकी जितनी प्रशंसा की जावे उतनी ही कम है । इन महामुनि ने पाँच पुस्तकें बनाई हैं-१ शिक्षा, २ अणादिगण, ३ धातुपाठ, ४ प्राति पादिक गण, ५ अष्टाध्यायी यह बात निश्चय करने के लिये कि पाणिनि कब हुये अनेक प्रकार की तर्कणार्य प्रस्तुत की जाती हैं, परन्तु इस विधाद से कुछ लाभ नहीं हो सकता। यह बात तो ठीक है कि पाणिनि बहुत पुराने ग्रन्थंकर्ता हैं । प्राचीन समय में चौदह विद्याओं के पढ़ने की रीति हमारे देश में थी, चार वेदों के 'नाम तो सभी जानते हैं। चार उपवेद और छः अङ्ग मिलकर चौदह होते हैं-चार उपवेद और छह अङ्ग कौन से हैं उनका विचार करेंगे । चार उपवेद जो हैं उनमें से पहला आयुर्वेद है इस पर जो ग्रन्थ चरक और सुश्रुत मिलते हैं उनके बनाने (.१२१ ) वाले.धन्वन्तरि ऋषि हैं,. इस विषय में वर्णन हमारे सत्यार्थ प्रकाश ने तीसरे समुल्लास में किया है। दूसरा धनुर्वेद है जिसमें अस्त्रशस्त्र विद्या का विचार है, इस उपवेद में ब्रह्मास्त्र, पाशुश्लअस्त्र, नारायण अस्त्र, वरुण अस्त्र,मोहन अलं. बादशास्त्र आदि की व्यवस्था लिखी है। यह सच अन्न वेदार्थ के विचार करने और वस्तुओं के गुण और दोष जानकर तैयार किये जाते थे। क्षत्रिय लोगों को यह धनुर्वेद बड़े परिश्रमले पढ़ना पड़ता था । यह कहना दीवानापन है कि केवल मन्त्रों के उच्चारण ले शस्त्र और अस्त्र तैयार हो जाते थे । तीसरा गाँधर्ववेद है जिसमें विद्वानों की गानविद्या का वर्णन किया है। इल समय में नये वेप की कविता अर्थात् पद, ध्रुवपदा ख्याल, लावनी . आदि नहीं .,गाते थे। प्राचीन आर्य लोग वेदमन्त्री रलीला गायन करते थे। चौथा अथर्ववेद' अर्थात् शिल्पशास्त्र इसका विचार यमसंहिता, वाराहलंहिता विश्वकर्मसंहिता आदि पुस्तकों में बहुत तरह पर किया है । एक अंपूर्व ‘बात इस लमय स्मरण हुई है वह आप को सुनाता हूँ, एक अंग्रेजी विद्वान् डाक्टर हम को मिला उलने मुझ से कहा कि हमारे प्राचीन आर्य लोगों में डाक्टरी औज़ार का कुछ भी प्रचार न था और उन्हें विदित न था, तब मैंने सुश्रुत का "नेत्र अध्याय"' जिसमें कि वारीक ले बारीक औज़ार फा वर्णन है निकाल कर उले दिखाया, तब उसको स्वास्थ्य हुई कि 'आर्य-लोग चिकित्सा में बड़े चतुर थे और उन्हें औजारों की विद्या भी उत्तम ज्ञात थी। छः वेदांग हैं-१ शिक्षा, २ कल्प, . ३. व्याकरण, ४ निरुत, ५. छन्द, ६ ज्योतिष-ये सब मिलकर चौदह विधायें का 15 २ - - .
- अभ्यास . (१२२') हुई। इन सब पुस्तकों को अबलाकन करने में बारह वर्ष लगते हैं और 'इन्न ग्रंथों का दृढ़ चुद्धि में उत्तमता पैदा होती. थी। इस समय कुछ ऐसा अनुचित शिक्षा प्रवन्ध का प्रचार हुआ है कि इनमें से एक भी विद्या अत्यन्त परिश्रम करने पर चौबीस वर्ष में भी नहीं आती है। इसका कारण यह है कि केवल तोता- पाठकी घोषाधोष चलती है। इस प्रकार की शिक्षाप्रणाली बन्द करनी चाहिये । प्राचीन ऋषियों ने विद्यास्नातक होने को. ब्रह्मचारी के लिये केवल बारह वषों की इद्द र कात्री है। उद्दालक ऋषि के पुत्र श्वेतकेतु ने ये सब विद्यार्य बारह वर्षों में सीखी थीं ऐसा लेख मिलता है और यदि प्राचीन गति के अनुसार इस समय भी शिक्षा दी जाये तो यारह वर्षों से विशेष समयः इस काम में नहीं लगेगा। . अब कुछ, थोड़ा सा विचार छः दर्शनों का किया जाता है, पहला दर्शन जैमिनिजी का बनाया मीमांसाशास्त्र है, इसमें धर्म और धर्मों का विचार किया है और प्रत्यक्ष वा अनुमान ,इन्हीं दो प्रमाणों को माना है। धर्म की प्रशंसा करते हुये इन्होंने वर्णन किया है कि आमा ही धर्म का लक्षण है । दूसरा कणाद मुनि का बनाया वैशेषिक दर्शन है. इसमें • द्रव्य को धर्मी मानकर गुण आदि को धर्म स्थापन करके विचार किया हैं इन्होंने भी दो ही प्रमाण माने हैं और छ: पदाधों का निरूपण किया है। तीसरा गौतम का बनाया न्यायशास्त्र है इसमें यह तर्क प्रारम्भ करा के धर्मी के धर्म और धर्म के धर्मी क्यों नहीं होता, प्रमाण और प्रमेय का सम्बन्ध बतलाया है और. सोलह पदार्थ मानें हैं, इस पर कोई-कोई यह कहते हैं कि इस शास्त्र में परस्पर विरोध ( १२३ ) . शब्द के अर्थ पर विचार करना चाहिये । यदि एक विषय में अवगुण संयुक्त विचार को प्रवेश हो तो उसको विगें, कहते हैं। परन्तु यदि अनेक विषयों के विचार ले अनेक विचारों का वर्णन हो तो उनको विरोध नहीं कहते हैं। ये छहो दर्शन अपने अपने लेखों पर चलनेवाले हैं। ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः । प्र madarasia . ग्यारहवाँ व्याख्यान इतिहास विषयक 1 . - गौतम ने निम्न रीति पर सोलह पदार्थों का वर्णन किया है.१ प्रमाण, २ प्रमेय, ३ संशय, ४ प्रयोजन, ५ दृष्टान्त, ६. सिद्धान्त, ७ अदेच, ८ तर्क, ६ निर्णय, १० बाद, ११ जल्प, १२ बितण्डा, १३ हेत्वाभास, १४ छल, १५ जाति और १६ निग्रहस्थान | इसके अनन्तर आठ प्रमाण स्थापित करके इनकी जाँच की है और अन्त में चार ही प्रमाणी, के अन्तरंग आठो को ठहरा दिया है, इन प्रप्राणों के मेल से अर्थ की जाँच होकर सत्य और, अस्लत्य का विचार हाना है। वे आठ प्रमाण ये हैं-१ प्रत्यक्ष, २. अनुमान, ३ उप. मान, ४. शब्द. ५ हेतु, ६ अर्शपन्ति, ७ सम्मर, ८ अभाव, इनमें से पाँचौ तो चौथे में मिल जाते हैं और छठा, सातवाँ, आठवाँ अनुमान में मिल जाते हैं। प्रमाण, प्रमेय, प्रमाता, प्रमिति का लक्षण यह है कि इलको प्रमाण कहते हैं और जिससे कि ठोक अर्थ प्राप्त हो वह प्रमेय है। निश्चय करनेवाला --
(१२६ )
सहायता नहीं मिलती है। श्रवण, मनन, निदिध्यासन
का विचार योगशास्त्र में किया है। मीमांसाशास्त्र में धर्म
और धर्मों के लक्षण कहे हैं। कर्णाद ऋषि के वैशेषिकसान
में द्रव्य और गुण का यथार्थ विचार किया है । गौतम
के शास्त्र में यह वर्णन किया है कि प्रमाण और प्रमेय पर
क्यों कर विचार करना चाहिये। इन तीनों मीमांसा और
वैशेपिक और न्यायशालों ने मानो श्रवण, मनन के साधन
का ही द्वारा बनाया है अब श्रवण मनन के आगे
एक ही सीढ़ी है अर्थात् साक्षात्कार करना। इस विषय
पर योगशास्त्र में वर्णन किया गया है कि चित्त की वृत्तियों
को निरोध करने से और अविद्या की निवृत्ति से प्रान
चढ़ता है परन्तु वह निवृत्ति किस प्रकार की होनी चाहिये
इस पर विचार होते हुये विदित होता है कि सब बाहरी
वस्तुओं का ज्ञान होते हुये भी मन बाहर खिंचा हुआ 'न.
रहे। बाहरी शान वर्तमान होते हुये.अन्तर्मुख स्थिर रहना
इसी का नाम निवृत्ति है। जैसे कोई एक नदी का बहावं
बन्द कर देवे तो पानी पूर्णरूप से भर जाता है। इसी
प्रकार बाहरी विषयों से चित्त को हटाने में स्वयं रद्धता
उत्पन्न हो जाती है। यह योगशास्त्र का सिद्धान्त है कि
बाहरी विषयों में आसक्त न रहे । किन्तु एकान्त स्थान
में बैठकर समाधि लगाना चाहिये । कारण यह है कि
एकान्त में बैठने से चित्त निवृत्ति होता है । परन्तु नित्य
प्रति एकान्त में ही रहना अच्छा नहीं है क्योंकि मुख्य कर
एकान्त में रहने से भी शान नहीं होता। सत्संग से ही
धान प्राप्त होता है। योगशास्त्र का उपाय ईश्वर के साक्षात्
करने पर है।
. । तद्रष्टुः म्वरूपेऽवस्थानम् । (देखो-योगशास्त्र पाठ १ सूत्र ३). । इसमें द्रष्टा से अभिप्राय ईश्वर है। योगी 'विभूति को शुद्ध करता है, यह योगशास्त्र में लिखा, है । अणिमा आदि विभूतियाँ हैं । वे योगी के चित्त में पैदा होती हैं। सांलारिक लोग जो यह मानते हैं कि ये योगी के शरीर में पैदा होती हैं वह ठीक नहीं है। अणिमा का अर्थ यह है कि छोटी से छोटी वस्तु को, विशेष सूक्ष्म होकर मानने- चाला होता है। इसी प्रकार बड़े से बड़े पदार्थ को विशेषतर बड़ा होकर योगी का मन घेर लेता है। उसे गरिमा कहते हैं। ये मन के धर्म हैं, शरीर में इनकी शक्ति नहीं है। इस तरह पर श्रवण, मनन, निदिध्यासन साक्षात्कार हा जाने से निस्सन्देह स्पष्ट शान प्राप्त हो जाता है। महर्षि पतंजलिजी कहते हैं कि- - . तत्र ध्यानजं ज्ञानं निरामयम् । तत्र ऋतंभरोयजः अब योग के आठ अंग कहे गये हैं-१ यम, २ नियम, आसन, ४ प्राणायाम, ५ प्रत्याहार, ६ धारणा, ७ ध्यान, ८ समाधि । यम पाँच हैं-१ अहिंसा, २ सत्य, ३ आस्तिक्य ब्रह्मचर्य, ५ अप्रतिमह इनका और नियमों का वर्णन पहले भली भाँति किया है। स्थिरसुखमासनम् । यह आसन का लक्षण कहा है। आसन वही है कि जिससे सुख से बैठकर ईश्वर से योग हा सके, तो फिर 7 . - .
(१२८) नये लोगों का यह कहना कि यह चौरासी लाव आमनों वाला भानमती का तमाशा ठीक है । कैसे मान लिया जावे। इस तरह पर प्राणायाम के विषय में तमाशा वन रहा है। प्राणायाम को यथार्थ प्रशंसा प्रथम हो वर्णन कर चुके हैं । नासिका और मुत्र शंधकर प्राणों की रुकावट करने से कुम्भक होना, तो जो लोग · फॉली पर चढ़ते हैं उन्हीं को कुम्भक का ठीक साधन समझना चाहिये । यथार्थ स्वरूर कुम्पक कर यह है कि वायु को बोहर की याहर रोक रखना। बाहर निकालने में विशेष उपाय करने से रेक होता है। भोनर के भीतर प्राणों को रस्बने से पूरक होता है यह प्राणायाम का विधान है। ३ है . अब हठ योग का विधान वर्णन किया जाना है। योग में स्ति उसे कहते हैं कि गुदा के गले से पानी चढ़ाकर सफाई करना टकटकी लगाकर इ तरह पर देखने को कि जिसमें पलक न झपके ताटक महते है नाशिक्षा में सूत्र डालकर सुख से निकालने को नेति कहते हैं । मलमल का चार अंगुल चौड़ा और १६:: लेकर ८० हाथ तक लम्वा कपड़ा सुख रास्ते पेट में लेकर डाला पर फिर बाहर निकालने को धोती कहते हैं यह बाजीगरी का खेल है इनले कर निवृत्ति पाकर योग प्राप्त कर लगते होंगे। यह हवाले ही जाने कि इन कामों में वारियाँ पैदा होती हैं । अब प्राणायाम का विचार किया जाता है। प्राण अर्थात् श्वास और आयाम :अर्थात् लम्बाई- तात्पर्य श्वाँल की लम्बाई. को प्राणायाम करते हैं। प्राणा- याम का प्रयोजन यह है कि बहुत देर तक चॉल गेकी जाये। बहुत समय तक प्राणायाम करने से वित्त एकान हो ( १२६ ) जाता है। प्राणायाम का मुख्य लाभ यह है कि यदि योगशाल के अनुकूल भीतर और बाहर छोड़े तो शरीर की नीरोगता को उन्नति होती है । ईश्वर में लौ लगाने को प्रत्याहार कहते हैं। मुख्य-मुख्य स्थानों में चित्त को स्थिर करने का नाम धारणा है। आत्मा, मन और इन्द्रियों को किसी वस्तु में लगाकर उस वस्तु पर मनन करने का नाम ध्यान है और ईश्वर में लय होने का नाम समाधि है । जब धारणा, ध्यान और समाधि तीनों एकत्र हो जावे तो उसे संयम कहते हैं । इसी प्रकार पतअलि मुनि ने उपालना की युक्ति बतलाई है और मुक्ति के अनेक गाधनों का यथार्थ वर्णन किया है। परमेश्वर में वित्त लगाने को क्षिा करते हुये कहीं भी यह नहीं बतलाया गया कि मुर्तिपूजा भी कोई साधन है । इसलिये उपासना के वर्णन में कही भी मूर्तिपूजा का सहारा नहीं मिलता है । अब यह देखना है कि सांख्य शास्त्र की प्रवृत्ति कैसे हुई। सांख्यशाल झा मूल मुख्य कर पदार्थों की गिन्ती करने के वास्ते से । सांख्य के कर्ता कपिलदेवजी कहते हैं। न वयं षट्पदार्थबादिनो वैशेषिकादिवत् । मैं वैशेषिक आदि के अनुसार छः पदार्थों को माननेवाला नहीं हूँ और फिर बहुत से विवाद के पीछे यह निश्चय करते हैं कि अबस्तु के अभाव से विवेक होता है । अच्च इस पर यह उत्तर ठहरता है कि इस सांख्यशास्त्र व अन्य शास्त्रों के साथ विरुद्ध नहीं तो क्या है ? परन्तु यह विरुद्धता केवल बाह्यष्टि से ही विदित होती है । किन्तु अन्त में सांख्यकर्ता उसी-निर्णय को पहुँचता है जो कि अन्य शास्त्रकारों का सिद्धान्त है क्योंकि (१३० ) सांख्यकर्ता अविवेक का चित्र खींचता है और अज्ञान, अविद्या, भ्रम और अविवेक सब एक ही अर्थ में आते हैं। अन्य देशों के नवीन विद्वान् लोग तत्व शब्द की प्रशंसा यह करते हैं कि जो मुफरद हो अर्थात् आर्य शास्त्रकारों को पञ्चभूत (अग्नि, पृथिवी, जल, वायु, आकाश ) मानने पर निषेध करते हैं परन्तु यह दोष कदापि नहीं आलकता क्योंकि गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द इन पाँचों सिक्तों के मौसूफों को जुदे-जुदे नाम दिये गये हैं और वेही पञ्चमहाभूत कहलाते हैं। सांख्यशास्त्र में २५ पदार्थों का निरूपण किया गया है जोकि इस सास्त्र के अवलोकन से विदित होलकता है। सत्वरजस्तमलां साम्यावस्थाप्रकृतिः प्रकृते- महान् महतोऽहंकारोऽहंकारात्पञ्चतन्मात्राण्यु च्छ्यमिन्द्रियं पञ्चतन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतोस्ति पुरुष इति पंञ्चविंशतिगणः ॥ आचार्य ने अलङ्कार शास्त्र वनायें हैं, जिन पर कि भाष्य भी हुये हैं अर्थात् विस्तार से लिखा है । इस आर्ष ग्रन्ध में गंदे अधर्म की रीतियों पर रुचि को बढ़ानेवाले रस कुछ भी नहीं हैं । इनका मुकाविला नवीन अलङ्कार प्रन्यों के साथ कीजिये जिनमें कि गन्दापन और झूठ शृङ्गार रस भरे पड़े हैं। नालिंगिता प्रेमभरेण नारी वृथा गतं तस्य नरस्य जीवितम् ॥ है ( १३१ ) अर्थात् जिस पुरुष ने प्रेम में मस्त होकर स्त्री को गले में नहीं लिपटाया उसका जन्म निष्फल हो गया और फिर इस तरह के बेढंगे अलंकार हैं, जसे हे स्त्री! तेरा मुग्व चन्द्रमा के समान है इत्यादि, ऐसे दीवानापन के अलङ्कार में मग्न होकर क्या हो सकता है। किन्तु एक पत्नीव्रत करके जो पुरुष' गृहस्थाश्रमी रहेंगे वही ब्रह्मचर्य धारण करने के योग्य होंगे। छठा दर्शन वेदान्त “उत्तरमीमांसा' है जिसके कर्ता व्यास जी हैं । उन्हों ने ब्रह्म को कारण बतलाकर जगत् को कार्य कहा है और कार्य, कारण इन दानो पदार्थों की जाँच की है। व्यासजी ने पहले सृष्टि का वर्णन किया है। अनेक प्रकार के प्रलय वर्णन किये गये हैं अर्थात् वैशेषिक में अप्रमेय मण्डल तक, गौतम ने परमाणुवों तक और सांख्यकर्ता ने प्रकृति तक वर्णन किये हैं । परन्तु वेदांत में महाप्रलय का वर्णन किया है। इस महाप्रलय में परमात्मा और उसकी सामर्थ्य ही स्थित रहती है । इस तरह पर दूर दृष्टि बुद्धि से देखा जाये तो छहाँ. शास्त्र अपनी रीति पर वर्णन करते हैं । इन में विरुद्धता किसी नरह की भी नहीं है । अब मूर्ति-पूजा बुतपरस्ती पर फिर किसी प्रकार विचार किया जाता है। पराशर और आश्वलायन गृह्यसूत्रों में मूर्ति-पूजा का नाम भी नहीं है और कल्पसूत्र में भी मूर्ति पूजा का वर्णन नहीं है। इन ग्रन्थों पर परिशिष्ट रचे गये हैं उनमें चाहे मूर्ति पूजा होवे । परिशिष्ट का स्पष्टार्थ क्या है यह सब विद्वान् लोग जानते हैं कि शास्त्रों की दृष्टि ले मूर्ति-पूजा सिद्ध नहीं होती है । अब फिर इतिहास का कुछ वर्णन किया जाता है । राजा शन्तनु ने सत्यवती से विवाह किया, उससे दो पुत्र चित्राङ्गाद और चित्रवीर्य उत्पन्न हुये । तत्पश्चात् भीष्मपितामह काशी के (१३२) गना से तीन कन्यायें लाया उनमें ले अम्क्षा का विवाह शाल्व से हुआ अस्विका और अस्बालिका दोनों ने चित्रांगद और चित्र- वीर्य के साथ विवाह किया। तब व्यास के साथ नियोग होने ले पाण्डु, धृतराष्ट्र और दासी के पुत्र विदुर पैदा हये । पाण्डवों ने दो स्त्रियों के साथ विवाह किया, उनके कुन्ती और माद्री थी। माद्री ईरान के राजा की पुत्री थी । धृतराष्ट्र की स्त्री गान्धारी कन्धार की रहनेवाली थी । उसका भाई शकुनि कम्धार का राजा था । दुर्योधन के साथ स्तिनापुर में रहना था । कुन्ती और माद्री दोनों ने पुत्र के लिये नियोग किया था। उन धर्म (युधिष्ठिर ). भीम और अर्जुन उत्पन्न हुये और इसी प्रकार अश्विनीकुमार से नियोग करने पर नकुलं और सहदेव उत्पन्न हुगे । इम्न में इन्द्र, वायु के नाम समझना हान्ये । स्पष्ट विदिन है कि वायु के संसर्ग से पुत्र उत्पन्न नहीं हो सकता है । धृतराष्ट्र के यहाँ एक ही गर्भ से सौ पुत्र उत्पन्न हुये । इन सब प्राचीन आर्य लोगों में स्वयंवर होना था ( अर्थात् कन्या स्वयं अपना वर पसन्द करती थी ) किन्तु इस समय के अनुसार विवाह नहीं होता था । मारवाड़ी लोगों ने इस पर और विशेषता की है कि वे पुत्र और पुत्री का उली समय नाता कर ते अब कि दोनो गर्भ में ही होते हैं यह कैली फजीहती की बात है । विवाह के समय पर धर्म, अर्थ और काम के परस्पर निर्वाह के लिये निर्णय होता है । वह नर्णय विना पुत्र और पुत्री के वर्तमान हुये कैसे हो सकता है प्राचीन आय्यों में यह दृढ़ रीति थी कि प्रत्येक मनुष्य विधा- स्याल करे । जब तक कि विद्या के भूषण ले भूषित नहीं होते थे तब तक पुरुष स्त्री को विवाह करने की आज्ञा राजसभा से नहीं मिलती थी। जनमेजय के राज्य तक चारोणों का परस्पर में बर्ताव ( १३३ ) होता था और सामाजिक नियम, राजसभा, धर्मसभा, विद्या, लभा के प्रबन्ध में रीत्यानुसार चलते थे यह बात कि चारों चौँ का परस्पर में बर्ताव कैसा था, आप लोगों को महा- भारत के राजसूय पर्व और अश्वमेध पर्व के देखने से विदित हो जावेगा; मनुजी ने कहा है कि प्राचीन समय में स्त्रियों और पुरुषों के हक बराबर थे । इस समय में तो सब प्रबन्ध ही उलटा होगया है । अब घाल का तिनुका तोड़ने में देर लगती है । परन्तु हमारे धर्म टूटने में देर नहीं लगती है । चोटी में गाँठ न दंगे, तो धर्म गया । अंगरखा लम्बा पहना गया, तो धर्म गया। खाने पीने में तो बहा. भारी पड़ा खड़ा हो गया है। इन खाने पीने की वस्तुओं ने तो वीरों को कायर कर दिया और चौका लगाकर बैठे-बैठे अपनी सारी घड़ाई पर चौका पद गया । प्राचीन समय में सब क्षत्रिय राजा और ब्राह्मण, ऋपि आदि एक ही सभा में भोजन किया करते थे । इस समय इस प्रकार की रीति लिक्खों में रणजीतसिंह के समय तक थी। कुरीतियों से कभी भी जन्म का फल पूरा नहीं होता है । ब्राह्मण लोग छूतछात का ढोंग मचाते हैं। परन्तु वह ढोंग हींग शकर आदि पदार्थ सेवन करते समय कहाँ जाता है। यदि यह कहो कि केवल दृष्टि का ही दोष होता है, तो जो पस्तु दिखलाई न दे या हलका दोष नहीं है । क्या शूल ले यदि माँग खाली जावे तो नशा न करेगी? बड़ी-बड़ी बिरादरियो के अन्दर बहुत सी फिन्दियों के कारण विरादरियों के सम्बन्ध में खर्च बहुत बढ़ता जाता है, चाहे कोई मरे, चाहे किसी का विवाह हो । गुजरात देश में दोनों मौको पर बिरादरी को खिलाना पड़ता है, येला खर्च किस काम आयेगा एक का मरना और भूषंडों का पेट भरना । मरे हुये पुरुष के लम्बन्धी पुत्रादिकों को 4 (१३४ ) कर्ज में डुवाना, इससे बढ़कर दीवानापन और क्या हो सकता है। इन विरादरियों के झगड़ों और अनेक कारणों से युद्ध में कैसी-कैसी रुकावट होती हैं। एक बात कहता हूँ सुनने के योग्य है। पंजाब के राजा रणजीतसिंह का हरीसिंह (नला ) नामो एक लरदार था। उसने काबिल कन्धार पर चढ़ाई की और उन पर विजय पाकर निवास किया । मुसलमानों ने यह समझकर कि हिन्दू बैरी हैं। इनका सामान जो आ रहा था उसको रास्ते में रोक दिया। दोपहर के समय तक जब कुछ न मिला, तो हरीसिंह के सिपाही भूख ले व्याकुल होकर घबरा गये और सब मिल- फर हरीसिंह के पास गये। इस समय हरीसिंह ने मुसलमानां के उत्तर में उलटी तदवीर निकाली और सिपाहियों को आमा देदी कि मुसलमानों का कुल खाना इकट्ठा करो। यह आज्ञा पाकर मिक्खो की सेना ने धावा कर दिया और जो खाना कि मुसलमान लोगों ने अपने लिये तैयार किया था वह सब लूट लाये और उसको हरीसिंह के पास ढेर लगा दिया और फिर हरीसिंह ने कहा कि सुघर का एक दाँत ले आयो । वे दाँत ले आये। वह सुवर का दाँत हरीसिंह ने उस भोजन के ढेर के चारों तरफ़ फेर दिया और सिपाहियों ले कहा कि अब यह सारा अन्न शुद्ध हो गया। अब इसके खाने में हिन्दुवों को कुछ भी दोष नहीं है ऐना कहकर आपने भोजन किया, फिर लिपाहियों ने पेट भरकर अपने कष्ट को दूर किया। ऐ सुननेवालों! क्या चौके के बखेड़े में तुम अपना धर्म स्थित रख सकते हो? इस पर विचार करो। ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
( १३५) बारहवाँ व्याख्यान इतिहास पूर्व व्याख्यानों में आर्य-लोगों का इतिहास क्षित्रांगद और चित्रवीर्य तक पहुँचाया गया था। प्राचीन आर्य-लोग पूर्ण युवावस्था पर्यन्त ब्रह्मचर्य धारण करते थे, बाल विवाह का उस समय कोई जाम तक नहीं जानता था। क्योंकि आर्य इतिहालों में प्रायः स्वयंबर का ही वर्णन आता है। विधवा विवाह का प्रचार केवल शूद्रों में था। द्विजों अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों में नियोग का प्रचार था। विधवा विवाह से जो लोग विरोध करते हैं, उनकी पुष्टि करके विधवा विवाह का खण्डन करने की मेरी इच्छा नहीं है । पर यह अवश्य कहूंगा कि ईश्वर के समीप स्त्री पुरुष दोनों बरा. बर है ; क्योकि वह न्यायकारी है, उसमें पक्षपात का लेश नहीं है। जब पुरुषों को पुनर्विवाह करने की आज्ञा दी जावे तो स्त्रियों को दूसरे विवाह से क्यों रोका जावे। प्राचीन आर्य लोग ज्ञानी, विचारशील और न्यायी होते थे, आज कल उनकी सन्तान अनार्य हो गई है। पुरुष अपनी इच्छा- नुसार जितनी चाहे उतनी स्त्रियाँ कर सकता है । देश, काल, पात्र और शास्त्रका कोई बन्धन नहीं रहा । क्या यह अन्याय नहीं ? क्या यह अधर्म नही ? H प्राचीन आर्य लोगों में गार्गी, मैत्रेयी आदि कैसी-कैली विदुपी स्त्रियाँ हो गई हैं। आजकल स्त्री को विद्या पढ़ने का अधिकार नहीं, वह शुद्र के समान है। यदि स्त्रियाँ पढ़ी लिखी होती तो इन पण्डितों की बड़बड़ाहट का खण्डन १३८) महाभारत में व्यासजी ने विचित्रवीर्य की दोनों विधवा स्त्रियों से नियोग किया था। मनुजी ने भी नियोग की आशा दी है। प्राचीन आर्य लोगों में पति के.जीते जी भी नियोग होता था, इस्ल की पुष्टि में महाभारत में लिखे हुये बहुत उदाहरण दिये जा सकते हैं। व्यालजी बड़े पण्डित और धर्मात्मा थे, उन्हों ने चित्राङ्गद और चित्रवीर्य की स्त्रियों से नियोग किया और इन में से एक के गर्भ से धृतराष्ट्र और दूसरी की कुक्षि ले पाण्डु उत्पन्न हुये और यह पहिले हो वर्णन हो चुका है कि, पाण्डु की विद्यमानता में ही उसकी स्त्री दूसरे पुरुषों के साथ नियोग किया था। इन प्रशार नियोग का उग्न समय प्रचार था । पुनर्विवाह की अधिक आवश्यकता ही नहीं होती थी। अब इस समय में नियोग और पुनविवाह दोनों के बन्द होने से आज कल के आर्य लोगों में जो-जो भ्रष्टाचार फैला हुआ है, वह आप लोग देख हो रहे है हज़ा। गर्भ गिराये जाते हैं, भ्रणहत्यायें होती हैं। एक गर्भ गिगने से एक ब्रह्महत्या का पाप होता है। सोचो कि इस देश में कितनी ब्रह्महत्यायें प्रति दिन होती हैं । क्या कोई उनकी गणना कर सकता है ? इन सब पापों का बोझ हमारे शिर पर है। देखो! प्राचीन सामाजिक प्रबन्ध के विगड़ने से हमारे देश की कैसी दुर्दशा हो रही है । वेदमार्ग को एक तरफ ढकेल कर पुष्टिमार्ग चमक रहा है, महन्तों और साधुवों के राजसी ठाट लगे हुये हैं । देवालयों, मठों और मन्दिरों में पाप की भरमार हो रही है। न जाने कितने गर्भ गिराये जाते होंगे। यह पाप, दुराचार और अनर्थ का समय बन रहा है। जब तक स्वार्थी और लम्पट लोग लोकाचार की लीक (१३६ ) बनाते रहेंगे और साधारण लोग : अन्धपरम्परा से उस पर चलते रहेंगे, तब तक देश का कल्याण नहीं हो सकता। धर्म के विषय में लोग परम्परा की बड़ी प्रतिष्ठा करते हैं, परन्तु क्या सांसारिक विषयों में भी ऐसा ही है। क्या यदि चाप दरिद्र हो तो परम्परा के अभिमान से बेटा भी दरिद्र होगा । यदि बाप अन्धा हो तो क्या बेटे को भी परम्परा के लिये आँखें फोड़ लेनी चाहिये। वेदवाह्य रीतियों को हमें परम्पग की पदवी कभी नहीं देनी चाहिये । ग्नदुपदेशपूर्ण वेदों और आप ग्रन्थों में निस सच्ची परसमा का विधान किया गया है, उसका पालन करना चाहिये । अस्तु, अब फिर इतिहास का वर्णन किया जाता है। गजा धृतराष्ट्र स्वभाव से ही कपटी था और पाण्डु धर्मात्मा था ! पाण्डु की एक रानी माद्री सती होगई थी। सती होने के लिये वेद की आशा नहीं है । जिन्तु सती होने की कुरीति पहिले पहिल पाण्डु राजा के समय से चली । कौरव और पांडवों ने उत्तम शिक्षा प्राप्त की । धृतराष्ट्र ने अपने और पांडु के पुत्रों को द्रोणाचार्य और कृपाचार्य के स्तुपुर्द कर दिया । उस समय ब्राह्मण लोग युद्ध विद्या के भी आचार्य होते थे । अर्जुन ने धनुर्वेद में सबसे अधिक अभ्यास किया। इसलिये युद्ध. -विद्या में उसकी बड़ो ख्याति होगई । अर्जुन का समकक्ष कौरवों में केवल कर्ण ही था। पर कर्ण सूतपुत्र अर्थात् सारथि का बेटा था । इसलिये अर्जुन ने कर्ण की अवता की थी। परन्तु इस अवज्ञा से लाभ उठाने के लिये दुर्योधन ने कर्ण को बंगाले का राज्य देकर उसे क्षत्रिय वर्ण का अधिकार दे दिया था। इस प्रकार अनुचित अभिमान से इस राजकुल में द्वेष .
तदनन्तर प. प्रशा भोक हुमा, अपि. मुनि, AAM,
क्षत्रिय, चैटय और द सब में एक पंक्ति में बंटकर मौनकिया!
इसके बाद इन में ताला में युधितिरादि को फमा
कार बनधाग्न और अनाम दिया गया। विटा
नगर में गने गये अर्जुन ने विराट कोन्या उन्नग
नानी को नृत्यकला ही शिक्षा बोगी से
प्रकि
प्राचीन समय में राजकुमारियां भी गाया और नत्यकला
लीवती ही । नमानी गय का Tara
होता, जव न फि आपस में छूट न की। शुरवंश
में फूट पैदा होगई और स्वार्थ और विद्रोद गाद ने
लोगों को अन्धा बना दिया । इसके लिए एक ही
उदाहरण पर्याप्त · भीष्म जैसे frarन और धर्मवादी पुरुष
क्षपात के रोग में प्रश्न होगये। उनकी अनित तो यादगा कि
वे मध्यस्थ होकर दोनों पक्षों का न्याय का है और अपराधियों
और अन्यायियों को दण्ड दिलाने । ऐसा न करके उन्होंने
अन्यायियों का पक्ष करके कुरुवंश का नाश होने दिया।
देखिये भीष्म क्या करना है--
अर्थस्य पुरुपो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्।
इति मत्वा महाराज ! बहोऽस्म्यर्थन कौरवैः ।।
"धन का मनुष्य दाम है, धन किसी का दास नहीं।
ऐसा मानकर मैं स्वार्थ में बँधा हुआ कौरवों के पक्ष में है।'
इस प्रकार बुद्धिभ्रष्ट होने से और द्वेप बढ़ने से भीष्म,
द्रोण और दुर्योधन आदि कौरब एक तरफ हुये और पाण्डव
( २४३ ) - दुसरी तरफ हुये और बड़ा भारी युद्ध हुआ। इस युद्ध में तीन मनुष्य कौरवों की ओर क अर्थात् १ कृपाचार्य, २ कृतवर्मा, ३ सात्यकि और ६ पाण्डवों की ओर के अर्थात् ५ पाण्डव और छठे कृष्ण जीवित रहे थे, शेप सब का नाश हा गया । इस युद्ध से प्राचीन आर्य लोगों का वैभव सदा के लिये अस्त हो गया। इस लव अनर्थ का कारण केवल यह था कि सम्मति देने का काम नीच और क्षुद्र लोगों को सौंपा गया था। ऐसे अयोग्य जन नेता औ. परामर्श देनेवाले बन गये । जहाँ शकुनि जैले संकीर्ण हृदय और क्षुद्र मनस्क जन की सम्मति से राज्य- कार्य चलने लगा। फनक शास्त्री महाराज धर्माधर्म का निर्णय फरने लगे। वहाँ यदि घर में फूट उत्पन्न होकर घरवालों का विनाश हो गया, तो आश्चर्य ही क्या है । इसा प्रकार जिस देश में केवल सचाई के अभिमान से मार्टिन लूथर जैसे उदार- चेता पुरुषों ने सामयिक लोगों के विरुद्ध होते हुये भी पोप के अत्याचार के विरुद्ध उपदेश देना प्रारंभ कर दिया और अपने प्राण तक न्योछावर करने के लिये उद्यत हो गये। उस देश में यदि ऐश्वर्य और अभ्युदय का डंका बजा तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। इस रीति पर कुरु-कुल का तोनाश हो गया । अव कृष्णजी द्वारिका में राज्य करते थे, वहाँ उस समय यादवों ने बड़ी उन्नति की थी। दुर्भाग्य से इन में भी प्रमाद और विषया- लक्ति के कारण आपल में फूट पड़ गई, जिससे सब लड़ मर फर अल्पकाल में ही यादव कुल का नाश हो गया। पाठक! प्रमाद का फल देखिये, बलदेव मद्य पीने लगा और इवकर मर गया । सात्यकि साँप से लड़ा। ऐसे मूर्खता के काम जहाँ होने लगे वहाँ श्रीकृष्ण जैसे सत्पुरुषों की बात कौन सुने । इन
(१४४)
प्राचीन आर्यों के युः पश्चान्येवल इनकी स्त्रियाँ ही शेप
रह गई थीं। इन में अभिमन्यु का पुत्र एक पता भी बचा
था, वह कुछ विक्षिप्त साया, उस आर्य ग्रंध समझ में नहीं
आते थे, इसी कारण उसके समय में कुछ कुछ पुराणों का
प्रचार हो चला था, उसका पुत्र जनमेजय दुआ और उसके
पीछे वजूनाथ ने राज्य किया । इनने समय में मस्र्ण वैभव
का नाश हो गया। राजसमा, धर्मसभा और विद्यासमा तीनों
डूब गई। ग्रल पक गज्ञा की इच्छानुना मात्र राज्य कार्य
होने लगा। विद्वान् और सचरित्रों को, जो विधि निषेध की
मीमांसा और व्यवस्था करने का अधिकार था, बा दूर हो
गया । व्यार, जैमिनि और वैः स्पायन आदि मापि न रहे ।
चक्रवर्ती गल्य नष्ट होकर यत्रतत्र माराडलिक राज्य स्थापित
हो गये । ब्राह्मण लोगों में विद्या की कमी होनी गई और
अभिमान बढ़ता गया।
ब्राह्मवाक्यप्रमाणम् । ब्राह्मणान्तु सूदेवाः ।
इस प्रकार की उलटी समझ लोगों में फैल गई जिम्म
से मनुष्य अन्धपरम्प के दाम बन गये । और भी देखिये
ब्राह्मणों की लीला-
पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि तीर्थानि सागरे ।
सागरे यानि तीर्थानि पदे वित्रस्य दक्षिणे ।।
पृथिवी में जितने तीर्थ हैं, वे सब समुद्र में आ जाते हैं
और
समुद्र
में जितने तीर्थ हैं, वे लव ब्राह्मण के दाहिने पैर में
हैं। ऐसे लोगों के जाल में भोले-भाले लोग फंस गये। जय
+
( १४५ ).
देखा कि हमारा संत्र चल गया और लब लोग हमारी आशा
को मानते हैं । तब इन्हो ने अनेक प्रकार के व्रत, उपचाल,
उद्यापन श्राद्ध और मूर्तिपूजन आदि वेद-विरुद्ध कर्मों में
लोगों को चलाना प्रारम्भ कर दिया, जिससे अनायास अपनी
आजीविका चल सके । सर्च लाधारण ब्राह्मणों से विमुख न,
हो जावे. इसलिये पोले-ऐसे श्लोक गढ़े गये।
.
अविद्वांश्चैत्र विद्वांश्च ब्राह्मणं दैवतं महत् ।
प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥
रमणाने चापि तेजस्वी पायको नैव दुष्यति।
हूयमानश्च यज्ञेषु भूय एवाभिवईते ॥
अग्नि के दृष्टान्त से प्रकार किया है कि ब्राह्मण चाहे
विद्वान् हो या मूर्ख वह साक्षात् देवता है ! प्राचीन ग्रंथों में
इस प्रकार के बनावटी लोक डालकर और नवीन रचनायें
करके ब्राह्मणों ने अपनी शक्ति बढ़ाई और मन्वादि स्मृतियों में
भी अपने महत्व के वाक्य मिला दिये । यथा-
एवं ययप्यनिष्टषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु ।
सर्वथा ब्राह्मणाः पूज्याः परमंदैवतंहितत् ॥
यदि दुष्याचरणाले ब्राह्मण की कोई लिन्दा करता तो
उसको ब्रह्म-विरोधी कहकर उसकी हड्डी हड्डी निकाल लेते थे।
निदान ब्राह्मणों को सब प्रकार के दण्ड और शासन से मुक्त
कर देने के कारण सारी बुराइयाँ इन्हीं में घर कर गई। सदा
-
(: १४६ ) चार विलुप्त हो गया। धूर्तता और अत्याचार बढ़ गया । मूर्खता ने देश में अपना डेरा डंडा जमा दिया । जब देश की ऐसी दुर्दशा हुई, तब गाज़ीपुर नगर में एक राजा के पुत्र उत्पन्न हुआ (जो पीछे जाकर वुद्ध वना ) उसने वेदों की निन्दा करके ब्राह्मणों के अत्याचार से दूसरे लोगों को मुक्ति दिलाने का प्रयत्न किया। इसके उपदेश से लक्षों मनुष्य बौद्ध धर्मानुयायी हो गये । वुद्ध और उसके पश्चात् जैन मत के फैल जाने से निरीश्वरवाद बढ़ गया, ईश्वर की पूजा के स्थान में मूर्तिपूजा प्रचलित हुई । बौद्ध और जैन मत में ईश्वर को नहीं मानते, किन्तु मानते, किन्तु वे उन सिद्धों और तीर्थंकरों की भक्ति वा उपासना करना सिखलाते हैं, जो उनकी दृष्टि में महात्मा वा सत्पुरुष हुये हैं । यही कारण है कि बौद्ध वा जैन लोग अपने तीर्थंकरों की मूर्तियाँ बनाकर रखते हैं । पहले पारसनाथ आदि तीर्थंकरों की मूर्तियाँ बनाकर जैनों ने उनका पूजना आरम्भ किया । फिर उनकी देखा-देखी पौराणिक लोग भी अपने इष्ट देवों की मूर्तियाँ बनाने लगे। इस प्रकार वेदों का आत्मवाद और एक ईश्वर की पूजा इस देश से उठ गई । लोग मन्दिरों में जाकर मूर्तियों की उपासना करने लगे और इसी को धर्म का मुख्य अंग मानने लगे । जैनी लोगों में कुछ सहिष्णुता पाई जाती है । परन्तु इन्होंने वेदमार्ग को विध्वस्त करने के लिये कोई उपाय उठा न रक्खा । वेदों पर बड़े-बड़े आक्षेप किये । “वेद मे अश्लील गाथायें हैं, वेद में हिंसा है, वेद में बहुदेववाद है और वेद में अधिकतर ब्राह्मणों का और कुछ-कुछ क्षत्रिय, वैश्यों का पक्षपात किया गया है" इत्यादि आक्षेप किये। इनके विरोध और खण्डन से वर्णाश्रम व्यवस्था को बहुत कुछ हानि पहुँची। यहीं तक संतोष नहीं ।
( १४७) किया किन्तु जैनियों ने बहुत से वैदिक ग्रंथ जलाकर भस्मास्त कर दिये। इनके पश्चात् श्रीयुत गौड़पादाचार्य के प्रसिद्ध शिष्य स्वामी शङ्कराचार्यजी प्रादुर्भून हुये । शङ्करस्वामी वेद मार्ग और वर्णाश्रम धर्म के माननेवाले थे। उनकी योग्यता कैसी उच्च कक्षा की थी, यह उनके बनाये शारीरिक भाष्य से विदित होती है । शङ्करस्वामी के समय में जो अनेक पाखंडमत चले थे और जिनका कि उन्होंने खंडन किया है, वह शंकर- दिग्विजय के निम्न लिखित श्लोक से प्रकट होते है । शाक्तैः पाशुपतैरपिक्षपणकैः कापालिकैवैष्णवैः रन्यैरप्यखिलैःखिलैःखलु खिलंदु दिभिर्वैदिकम् से अनुमान किया जा सकता है कि श्रीमान् स्वामी शंकराचार्य ने वेदविरुद्ध मतों के खण्डन में कितना उद्योग किया है। ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः । .. - तेरहवाँ व्याख्यान इतिहास सुधन्वा राजा के साथ (जो बौद्धमत का अनुयायी था) शंकराचार्य का शास्त्रार्थ हुआ, इसमें प्रतिज्ञा यह हुई थी कि यदि शंकराचार्य पराजित हुये तो उन्हें बौद्ध मत स्वीकार (१५०) तब यह कहने लगे कि १८ पुगण सत्यवती-मुत व्याल ने बनाये हैं, इस प्रकार अनार्प प्रन्धों का प्रचार और आर्षयों का लोप होता गया । जड़ मूर्तियों में प्राणप्रतिष्टा करने लगे और प्रतिष्ठामयूख और प्रनिष्ठाभास्कर आदि ग्रंथ बना डाले जिनमें प्राणप्रतिष्ठा के मंत्रों के नम्ने देखिये- "प्राणा इहागच्छन्तु इह तिष्ठन्तु, इन्द्रियाणीहागच्छन्तु इह तिष्ठन्तु" इस प्राणप्रतिष्ठा के गगेड़े को आर्य शास्त्रों में सहाग कहाँ मिल सकता है। चारों वेदों की संहिता में कहीं एक मंत्र भी प्राणप्रतिष्ठा का नहीं मिलता। इस प्रकार के कल्पित मंत्र पौराणिक समय में लोगों ने गढ़ लिये और कहने लगे कि प्राणप्रतिष्ठा से मूर्ति में पूजा का अधिकार पैदा हो जाता है। मालूम होता है कि यह मूर्तिपूजा जैन मन वालों से हम में घुस आई है। और इसको लहारा देने के लिये पुराणों में इसका वर्णन किया गया है। अवतारों का वर्णन भी पुराणों में ही मिलना है। हरि- घंश में नृसिंहावतार की कथा है। अवतार्ग को कथाओं और मूर्तिपूजा के प्रचार से लोगों की मननशक्ति दुर होकर मन का झुकाव कर्म-मार्ग की तरफ हो गया। मन माने व्रत, उपवास उद्यापन आदि लोग करते हैं। ऐसे कामों से शारीरिक स्वास्थ्य की हानि और रोगों की वृद्धि होती है, इसके अति- रिक्त इन बखेड़ो से शैव,वैष्णव, बल्लभाचारी और रामानुजी आदि अनेक प्रकार के सम्प्रदाय उत्पन्न होकर आपल में विरोध बढ़ता है और जहमूर्तियों के आगे बालभोग रखने,
( १५१ )
उन्हें सुलाने और रासलीला करने आदि बालक्रीड़ाओं से
वैदिक धर्म की निन्दा होती है और देश के प्रत्येक प्रान्त में
पार को वृद्धि होती है। ऐपी और भी बहुत सी हानियाँ
मूर्ति पूता से होती हैं। मंदिरों में पुजारी लोग वैसा ही
प्रसाद देते. हैं, जैसी कि उनको दक्षिणा मिलती है। इसलिये
मंदिर क्या हैं मानो सेठ लोगों की दूकानें हैं । पुजारी लोग
अपने स्वार्थ के लिए आलस्य और मूर्खता को बढ़ानेवाले
बहुत से नये वाक्य बनाकर लोगों को फैलाते हैं । बहुत से
वाक्यों को अपनी इच्छा के अनुसार जोड़ मेल कर दिया है ।
कहते हैं कि-
Mic
पठितव्यंतदपि मर्तव्यंदन्तकटाकटेति किंकर्तव्य
प्रातःकाले शिवं दृष्ट्वा सर्व पाप विनश्यति ॥
(१) पढ़कर भी जब मर जाना है तो दाँत कटाकट करने
की क्या आवश्यकता
है
(२) यदि प्रातःकाल उठकर शिवलिंग का दर्शन कर तो
सारे पाप नष्ट हो जाते हैं
-
वाह ! क्या पुरुषार्थ है । ज्ञान के विना भोग पुरुषाथ. ओर
आनन्द नहीं है । परन्तु जहाँ ऊपर कही हुई भाँति पुरुषार्थ
की समझ है, तो वहाँ भागवत जैले पुराणों का जोर क्यों न
होगा। यथार्थ विद्याओं के पठनपाठन को एक तरफ़ हवाकर
पुराणों के केवल सुनने में सारे माहात्म्य लाकर धर दिये हैं।
प्रत्येक पुराणा, की समाप्ति पर उसके सुनने ले क्या-क्या लाभ
होंगे, इसके मनमाने फल वर्णन किये हैं।
इस प्रकार धर्मबुद्धि विगड़ जाने से लोग निर्बल और कायर होगये, तभी तो ऐसीघ्रान्ति में फैल गये कि नवग्रहों से हमारी हानि होगी। इसी आधार पर फलित ज्योतिप का आडम्बर फेलाकर तदनुसार नवग्रहों के जाए के मन्न बनाये गये । इन मन्त्रों के अयों का इन कामों के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं जिन करते समय कि उनका प्रयोग किया जाता है, इस विषय पर कभी किसी ने विचार नहीं किया। उदाहरण के लिये एक ही ( शन्नोदेवी ) मन्त्र को देखिये। इसको शनैश्चर देवता का मन्त्र ठहराया है और ज्योतिपो जी महाराज ने अपना खेत पकाया है। इसी प्रकार सम्प्रदायी लोगों ने तन मन धन गोसाई जी के अर्पण कर ऐसे-ऐसे उप- देशों से भोले भाले लोगों के मन भ्रष्ट कर दिये। पाठक ! यहाँ भलीभांति विचार कीजिये कि प्रमालान क्या है और प्रतिज्ञान क्या है ? देखिये जो वस्तु जैसी हो, उ.का वैसा ही ज्ञान होना प्रमाजान कहलाता है। प्रमाणैरर्थपरीक्षण न्यायः । है प्रमाणों से अर्थों की परीक्षा करना न्याय कहलाता इस वाक्य को कलौटी पर लगाकर सच झंठ की परीक्षा कीजिये। हमारे भाई शास्त्री लोग हठ करते हैं, यह हम सब का दौर्भाग्य है । हमारे भरतखण्ड देश से वेदों का बहुत सा धर्म लुप्त होगया है और रहा सदा हम लोगों के प्रमाद से नष्ट होता जा रहा है । और उसकी जगह पाखण्ड, अनाचार और दम्भ - ( १५३ ) यता जा रहा है। सदाचार और सच्चाई से हम लोग होते जारहे हैं, तभी तो हम लब की दुर्दशा हो रही है। इसमें आश्चर्य ही क्या है । लनातन आप अन्य वेदादि को छोड़कर पुराणों में लिपट रहे हैं और उनकी कल्पित और असम्भव गाथाओं को अपना धर्म समझ रहे हैं। यदि मुझसे कोई पूछे कि इल पागलपन का कोई उपाय सी है या नहीं ? तो मेरा उत्तर यह है कि यद्यपि रोग बहुत बढ़ा हुआ है, तथापि इसका उपाय हो संकता है। यदि परमात्मा की कृपा हुई तो रोग असाध्य नहीं है । वेद और ६ दर्शनों की सी प्राचीन पुस्तकों के भिन्न-भिन्न भाषाओं में अनुवाद करके सब लोगों को जिलले अनायास प्राचीन विद्याओं का ज्ञान प्राप्त होसके, ऐसा यत्न करना चाहिये और पढ़े लिखे विद्वान् लोगों को सच्चे धर्म का उपदेश करन की तरफ विशेष ध्यान दना चाहिये और गाँव गाँव में आर्यसमाज स्थापन करके तथा मूर्तिपूजादि अनावारों को करके एवं ब्रह्मचर्य से जप का लामर्थ्य बढ़ाकर सब चों और आश्रमों के लोगों को चाहिये कि शारीरिक और आत्मिक बल को बढ़ावें तो सुगमता से शीघ्र लोगों की आँखें खुल जावेगी और यह दुर्दशा दूर होकर सुदशा प्राप्त होगी। मेरे जैले एक निर्वल मनुष्य के करन से यह काम कैसे होसकेगा, इसलिये आप सब बुद्धिमान लोगों से आशा रखता हूँ कि आप सुझे इस शुभ काम में सहायता देंगे। ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः। A -- । । m -- - न (१५४ ) चौदहवाँ व्याख्यान नित्यकर्म और मुक्ति प्रत्येक स्त्री और पुरुष * जो प्रतिदिन के कर्तव्य हैं, उनको आह्निन कर्म कहते हैं। धर्म सम्बन्धी जो कर्तव्य हैं वे नित्यकर्म हैं। वे कर्म किसको किस प्रकार और कहाँ तक करने चाहिये और किसको न करने चाहिये, इस, विषय पर विचार किया जाना । बालक मूर्व और छोटा होने के कारण माता पिता के अधीन रहता है और वर्ष की अवस्था तक उसमें धर्मसम्बन्धी काम करने की योग्यता नहीं होती । इसलिये हमारे धर्मशास्त्रों ने व्रतबन्ध (यशोग्बोन) होने से पहिले बालकों के लिये नित्यकर्म का विधान नहीं किया है । इसी प्रकार वर्ण, आश्रम, विद्या, आयु और शा- रीरिक बल इत्यादि के अनुमार शास्त्रों ने नित्यकर्म की व्यवस्था की है । धर्मानुष्ठान के सम्बन्ध में नित्यकर्म निम्न- लिखित हैं- १ ब्रह्मयज्ञ-जो वेदों के पठन पाठन द्वारा होता है। ब्रह्म' शब्द के अर्थ विद्या, वेद और परमात्मा तीनों के हैं । 'या' शब्द का अर्थ विचार है इसलिये ब्रह्मयज्ञ के अर्थ वेदों का प्रचार या परमात्मा का विचार हुआ । ब्रह्मका के टोक अर्थों को मन में जगह देकर यह स्पष्ट मालूम होता है कि आजकल जिस रीति पर ब्रह्मयज्ञ दिया जाता है, वह निष्फल है और फिर यह आक्षेप मन में कभी स्थान न पावेगा कि आधुनिक ब्रह्मयश शास्त्र के अनुसार नहीं है। २ देवयज्ञ-यदग्नौ हयते स देवयज्ञः । जो अग्नि में होम
(१५५ )
#1
किया जाता है, वह देवयज्ञ है । कोई लोग देवयज्ञ का अभि--
प्राय देवता की पूजा समझते हैं । परन्तु ब्राह्मण ग्रन्थों और
मनुस्मृति के देखने प्ले मालूम होता है कि इस देवयज्ञ का
ठीक अभिप्राय होप अर्थात् अग्निहोत्र है । अग्नि दो प्रकार
का है, एक जठराग्नि और दूसरा भौतिकाग्नि । कोई लोग
कहते हैं।
होमैर्देवान् यथा विधि अर्चयेत् । होम से गिद्वानों का
यथाविधि सत्कार करना चाहिये । होम शब्द के पारिभापिक
अर्थ कभी-कभी दान
और
आदान
के भी हो जाते हैं । फिर
भी कोई मनुष्य किसी प्रकार मूर्तिपूजा को देवयज्ञ में शामिल
नहीं कर सकता।
३ पितृपक्ष-पितृभ्यो ददाति सा पितृयज्ञः । जिसमें
पितरों को दिया जावै अर्थात् उनकी सेवा की जावै, उसे
पितृयज्ञ कहते हैं । यहाँ पर पितृ शब्द के अर्थ पर विचार
करना चाहिये।
न तेन वृद्धो भवति येनास्थ पलितं शिरः ।
अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः ॥
न हायनैपलितैन वित्तैन च बन्धुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्म योऽनूचान; स नो महान् ॥
सुनीति, धर्म, सचाई और सच्चरित्रता आदि गुणों से युक्त
अत्यन्त सहिष्णु, महात्मा जो प्राचीन ऋषि हुये हैं उन्हीं को
अपने तपोबल के प्रभाव से बस्तु, रुद्र और आदित्य आदि की
( १५६ ) पदवियाँ मिला करती थीं । ऐसे ऋषि मच्चे पितर होते थे और उनका आदर सत्कार करना पितृयज्ञ कहलाता था। २४ वर्ष तक ब्रह्मचर्य धारण करनेवाला वसु, ३६ वर्ष तक रुद्र और ४८ वर्ष तक रहनेवाला आदित्य कहलाता था । छान्दोग्य उप्र. निपद में प्रातः मध्याह्न और सायंकाल के लिये ३ रन बनलाये गये हैं, जो तीनों प्रकार के ब्रह्मचारियों ले सम्बन्ध रग्बते है। इन सब के तात्पर्य पर विचार करने से मालूम होता है कि विद्या बाग आत्मिक जन्म देनेवाला ही पिता कहलाता और ऋषि मन्त्रद्रष्टा को कहते हैं। आजकल पितृयज्ञ कहने से जो मृतको का श्राद्ध और तर्पण समझा जाता है, वह ठीक नहीं है, क्योंकि मनुजी ने भो कहा है कि श्रद्ध। ले जो काम किया जाता है, उसे श्राद्ध कहते हैं और तृप्ति का नाम तर्पण है । इन सब अधों और प्रयोगों पर विचार करने से मालूम होता है कि आजकल जो देवयज्ञ और पितृयज्ञ की व्याख्या की जाती है, वह कवियों की अत्युक्ति ही है । भला सोचिये कि कवियों की अत्युक्ति से यथार्थ तत्व कैसे जाना जा सकता है ? विद्या साकार अ अर्थात् ऋषिसत्कार और पितृसत्कार अर्थात् विद्वानों के सत्कार को पितृयज्ञ मानना चाहिये । श्रद्धा के विना जो किया जाता वह धर्म कस्म अर्थात् श्राद्ध नहीं होता। मनुजी ने कहा है- पाखण्डिनोविकर्मस्थान बैडालबतिकाञ्छठान्। हैतुकान वकवृत्तींश्च बाङ्मात्रेणापि नार्चयत् ॥ पाखण्डी, वेदोक्षी आछा के विरुद्ध चलनेवाले, विडालवृत्ति वाले, हठी, बकवासी और बगलाभक्त मनुष्यों का वाणी से भी सत्कार नहीं करना चाहिये।
( १५७ )
वेदविहित पितरों की सेवा सुश्रूषा · छोड़कर समुद्र,
पहाह, नदी और वृक्षों का तर्पण करना और इसे श्राद्ध
मानना चला, यह पावराड नहीं तो और क्या है ? प्राचीन
पद्धति ही यदि लेनी थी तो ऋषियो की पद्धति तो
स्वीकार करते।
४ भूतयक्ष-यो भूतेभ्यः क्रियते स भूतयशः । जो प्राणियों
को भाग दिया जाता है, उसे भूतयज्ञ कहते हैं । इस विषय
में अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है, साधारण प्राणियों
का पालन करना भूत यश है ।
५ अतिथिया मनुजी लिखते हैं:-
"
अनित्याहि स्थितिय लोऽतिथिः सद्भिरुच्यते।
जिलके आगमन की कोई नियत तिथि न हो और स्थिति
भी जिसकी अनियत हो, वह अतिथि कहलाता है। अतिथि
यज्ञ का अधिकारी यही है, जो विद्वान् हो एवं जिसका आना
जाना और ठहरना अलियत हो, वह चाहे किती वर्ण का हो,
यह एक श्रेष्ठ कर्म है।
-
अब पुनः ब्रह्मयज्ञ पर विचार करना चाहिये । इल यज्ञ के
लस्बन्ध में सन्ध्योपासना अवश्य करनी चाहिये । इसके
विषय में एक सन्ध्योपनिषद् है, इस पुस्तक में विशेष व्याख्या
की गई है। इस उपालना का अधिकार यदि योग्य अवस्था
हो तो लड़के लड़कियों को बरावर है। दिन और रात की
सन्धि के समय में यह उपासना अवश्य करनी चाहिये। ऐसा
सन्धि लमय लायं प्रातः दो समय आता है, तीन बार नहीं
.
(१५८ ) होता । इसलिये दोपहर की सध्या कदापि नहीं हो सकती। प्लामब्राह्मण और यजुर्वेद का ब्राह्मण देग्न लीजिये. ms- तस्मादहोरात्रस्य संयोगे संध्यामुपासीत । (सामनाह्मण के समय सन्ध्योपासना दिन और गत की सन्धि करनी चाहिये। उद्यन्तमस्तथान्तमादित्यमभिध्यायत् । ( यजुर्वेदीय ब्राह्मण) सूर्य के उदय और अस्त होने पर संध्या करनी चाहिये । इन प्रमाणों से केवल दो संध्या ही सिद्ध होती हैं। संध्यो. पासना में गायत्रो महामंत्र के अर्थ पर करना चाहिये, इस मंत्र में सारे विश्व को उत्पन्न करनेवाले परमात्मा का जो उत्तम तेज है उसका ध्यान करने से बुद्धि को मलिनता दूर हो जाती है और धर्मावरण में श्रद्धा और योग्यता उत्पन्न होती है। दुसरे किसी मत में प्रार्थना के मंत्रों की ऐसी गहराई और सचाई नहीं है। ईसाई लोगों की प्रार्थना के मंत्र का अर्थ इस प्रकार है कि- "हे परमेश्वर ! हमको प्रति दिन रोटी खाने को दे" इसकी अपेक्षा इस आयो के महामंत्र का अर्थ केला गम्भीर है। आधुनिक समय में जो-जा मत निकले हैं, उनके प्रार्थना के मंत्र इस महामंत्र के सामने कैसे तुच्छ हैं, इस पर प्रत्येक बुद्धिमान को विचार करना चाहिये। संध्योपासना सदा सायं प्रातः इन दो कालों में ही करना चाहिये । इन दोनों कालों में मनोवृत्ति
( १५६ )
की स्थिरता में प्राकृतिक सहायता मिलती है। सूतक में भी
संध्या अवश्य करनी चाहिये। अनध्याय नहीं करना चाहिये।
इस विषय में मनुजी लिखते हैं-
वेदोपकरणे चैव स्वाध्याये चैव नैत्यके ।
न विरोधोस्त्यनध्याये होममंत्रेषु चैवहि ॥
-
वेदपाठ, नित्यकर्म और होममंत्रों में अनध्याय नही है
नित्यकर्म का अभिप्राय यह है कि अपने मन का लक्ष्य
परमेश्वर को बनाया जावे, इसलिये प्रत्येक कर्म की समाप्ति
पर यह कहा जाता है कि मैं इस कर्म को या इसके फल को
परमेश्वर के अर्पण करता हूँ। यहाँ तक नित्यकर्म का
विधान हुआ।
अब आगे मुक्ति के विषय में थोड़ा-सा विचार किया जाता
है । मुक्ति शब्द का अर्थ
छूटना
है। यहाँ प्रश्न होता है, किससे
छूटना ? उत्तर स्पष्ट है कि दुःख अर्थात् बंधन से
छूटना मुक्ति
है। जहाँ बंधन नहीं, वहाँ मुक्ति मी नहीं। जीवात्मा वद्ध है,
इसलिये इसको मुक्ति की आवश्यकता है। ईश्वर सदा मुक्त
है अर्थात् बंधन से पृथक् है, इसलिये उसको मुक्तस्वभाव कहते
हैं। मुक्ति का अधिकारी होना बड़ा ही कठिन काम है। मुक्ति
की दशा में नित्य सुख का अनुभव होता है। आज-कल तो लोग
यह समझते हैं कि सस्ती भाजी की तरह मनमाने कामों से
* हिंदुओं में जब किसी के घर सन्तानोत्पत्ति होती है, तो उसके
सम्बन्धियों के यहां दश दिन तक या तीन दिन तक सूतक माना जाता है।
इसी प्रकार मृत्यु में भी । इन दिनों में पूजा पाठ भादि वर्जित रहते हैं
।
+
( १६० ) मुक्ति मिलती है। परन्तु यह मूर्खपन की समझ है। मुक्ति के मन- माने चार भेद जो लोग बतलाते हैं ये हैं । स्नायुज्य, सारूप्य, सामीप्य और सालोक्य ये सब कल्पित हैं । वेदादि शास्त्रों में मुक्ति के ये भेद कहीं नहीं लिखे । प्रत्युत उनमें एक ही प्रकार की मुक्ति वतलाई गई है यजुर्वेद में लिखा है- तदेवविदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यलेऽयलाय । "टल परमात्मा को जानकर ही मृत्यु को जीत सकते हैं, दूसरा और कोई मार्ग नहीं है। इससे स्पष्ट सिद्ध है कि मुक्ति का मार्ग एक है और वह केवल परमेश्वर का ज्ञान है । इल पर प्रश्न होगा कि वह परमेश्वर कैसा है ? नतस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः। .. । यजुर्वेद) "उस परमात्मा की कोई प्रतिमा (मूर्ति या पैमाना ) नहीं है, जिसका कि यश वड़ा है" | फिर तलबकार और वृहदार- ण्यक उपनिपद को भी देखना चाहिये, जिनमें चतलाया है कि जीवात्मा के भीतर भी वह परमात्मा व्यापक है तथा उसे वाणी, मन, आँख, कान और प्राणों को भी अपने अपने कामों में लगानेवाला माना है और उसे एक तथा अद्वितीय माना है। इन सब प्रमाणों पर विचार करने से सिद्ध होता है कि परमे- श्वर के ज्ञान के विना मुक्ति पाने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
(१६१ ) वह परमेश्वर अरूप, अनादि तथा अनन्त है, वही ब्रह्म सब ले: बड़ा और सब का सहारा है। आज कल की मुक्ति तो यह समझी जाती है कि जीव और परमात्मा एक ही है, पल यह ज्ञान होना ही मुक्ति है। यह आजकल के वेदान्तियों का मत है, किन्तु यह सच्चा वेदान्त नहीं है और न वेदों का सिद्धान्त है। इस बात की पड़ताल करने पर कि पट दर्शनों के प्रणेताओं की मुक्ति के विषय में क्या सम्मति है ? इस झा तत्व मालूम हो जायगा। पहिले जैमिनिकृत पूर्व मीमांला में यह कहा है कि धर्म अर्थात् यज्ञ से मुक्ति मिलती है और वहाँ "यशो चे विष्णुः" इत्यादि शतपथनालण के प्रमाण भी दिये हैं। इस पर विचार कीजिये। . फिर मणादि मुनि ने वैशेषिक दर्शन में कहा है कि तत्क- ज्ञान से मुक्ति होती है। न्यायदर्शन के रचयिता गौमत ने अत्यन्त दुःश्न निवृत्ति को मुक्ति माना है। मिथ्याज्ञान के दूर होने से बुद्धि, वाक और शरीर शुद्ध होते और इनकी शुद्धि से यथार्थ ज्ञान उत्पन्न होता है, वही मुक्ति की अवस्था है। योग- शास्त्र के कर्ता पतञ्जलि मानते हैं कि चित्तवृत्तियों का निरोध करने से शान्ति और ज्ञान प्राप्त होते हैं और इलले कैवल्य (मोक्ष की प्राप्ति होती है। सांख्यशास्त्र के प्रणेता महानि कपिल कहते हैं कि तीन प्रकार के दुःखों की निवृत्ति होना ही परमपुरुषार्थ (मुक्ति ) है । अब देखिये कि उत्तर मीमांला अर्थात् वेदान्तदर्शन के रचयिता बादशायण ( व्याल ) क्या कहते हैं- अविशागेन्द्र - दृष्टवाञ्चितितन्मात्रेण ताल कवादित्यौडुलोमिः । श्रभावं वादरिराह ह्येवम् ॥ व्यास के मत से मुक्ति की दशा में अभाव और भाव दोनों रहते हैं । मुक्त जीवात्मा को परमेश्वर ने साथ व्याप्य व्यापक सम्बन्ध रहता है। दोनों एक अर्थात् जीवात्मा का अभाव कमी नहीं होता। सोगमात्रसाम्थलिंगाच्च । परमेश्वर के ज्ञान, सामर्थ्य और भारद कुछ जीवात्मा को प्राप्त होते हैं ईश्वर का आनन्द असीम है, वैसा आनन्द मुक्त जीवात्मा को हो नहीं सकता, जीव ब्रह्म में अभेद मानने से धर्मानुष्ठान के सब साधन योग, तप और उपामना आदि सब निष्फल हो जाएँगे । इसलिये परमात्मा और जीवात्मा को एक मानना ठीक नहीं है। व्यापक और व्याप्य सेव्य और सेवक आदि लस्बन्ध ईश्वर और जीव में वर्तमान रहता है और यही लम्ब- ब्ध जीवात्मा के जन्म मरण के बन्धन से छुटकारे का कारण होता है। ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्ति ।
. ( १६३ ) . पन्द्रहवाँ व्याख्यान स्त्रयंकथित जीवनचरित्र - हम से बहुत ले लोग पूछते हैं कि हम कैले जाने कि आप ब्राह्मण और कहते हैं कि आप अपने मित्रों तथा सम्वन्धियों की चिट्टियाँ मँगादें या आपको जो पहचानता हो, उसको चतलावें । इनलिये मैं अपना कुछ वृत्तान्त कहता हूं । दूसरे देशों की अपेक्षा गुजरात में कुछ मोह अधिक है, यदि मैं अपने पूर्व मित्रों नधा सम्बन्धियों को अपना पता दूं या पत्र- व्यवहार करूं तो मेरे पीछे एक ऐली व्याधि लग जावेगी, जिम्मले कि मैं छूट चुला हूं । इस भय से' कि कहीं बह चला मेरे पीछे न लग जाये, मैं पत्रादि मंगा देने की चेटा नहीं करता। धमाधश नास पक राज्य गुजरात दश में है, इसकी सीमा.पर एक मोरवीनार जहाँ मेरा जन्म हुआ था । में दाव्य ब्राह्मण हूं । उदीच्य ब्राह्मण सामवेदी होते हैं, परन्तु में पड़ी कठिनता ले यजुर्वेद पढ़ा था । मेरे घर में अच्छी ज़मीदारी है । इस लाय मेरी अवस्था ५० वर्ष की होगी। आठवें वर्ष मेरे बाद एक वहन पैदा हुई थी । मेरा एक चचेरा दादा था, वह मुझसे बहुत ही प्यार करता था । मेरे कुटुरिक्षयों के इस समय १५ घर होंगे। मुझको लड़कपन में ही रुद्राध्याय लिखलाकर शुक्ल यजुर्वेद का पढ़ाना आरम्भ कर दिया था। मेरे पिता ने मुझको शिव की पूजा में लगा दिया। दश वर्ष से पार्थिव ( मिट्टी के महादेव ) की पूजा करने - लग गया।
(१६६ ) ऐसा ही कहा- मुझे लोने के लिये कहते थे पर मुझे कमी अच्छी. . तरह नींद न आती थी। किन्नु मैं हर घड़ी चौक- चौक उठता था और मन में भाँनिमानि के विचार उटते थे। बहन के मरने के पश्चात् लोक रीति के अतुपार पाँच छः बार रोना होने पर भी जब मुझे रोना न आया तो सब लोग मुझे धिकारने लगे। , उन्नीसवे वर्ष में मुझ से अत्यन्त स्नेह रखनेवाले मेरे दादा को भी मृत्यु ने आन दवाया। मरने समय उन्होंने मुझे ल बुलाया। लोग उनकी नाड़ी देवने लगे। मैं उनके पास बैठा था, मुझे देखकर उनके टप-टप आँसू गिरने लगे। मुझे भी उस लमय बहुन रोना आया, मैंने गो-रोकर ऑन् सुझाली! ऐसा रोना मुझे कभी नहीं आया। इम लमय मुझे ऐसा मालूम होने लगा कि चचा की तरह मैं भी सर जाऊँगा । ऐसा विश्वास हो जाने पर अपने मित्रों और पण्डितों से अमर होने का उपाय पूछने लगा । जब उन्होंने योगाभ्यास की ओर संकेत क्यिा, तो मेरे मन में यह सूझी कि घर छोड़कर चला जाऊँ। इस समय मेरी आयु २० वर्ष की थी। मेरी बढ़ी हुई उदासीनता देखकर पिता ने ज़मींदारी का काम करने को कहा, परन्तु मैंने न किया। फिर पिता ने निश्चय किया कि मेरा विवाद कर दें ताकि मैं बिगड़ न जाऊँ। यह विचार घर में होने लगा. यह मालूम करके मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया कि विवाह कभी न करूंगा। यह भेद मैंने एक मित्र से प्रकट किया तो उसने नापसन्द किया और विवाह करने के लिये ज़ोर देने लगा। मेरा विचार घर
(१६७)
.
छोड़कर चले जाने का था, पर किसी ने सलाह न दी। जो
कहते वे विवाह करने को ही. कहते । एक महीने के भीतर
'विवाह की तैयारी हो गई। यह देखकर मैं एक दिन शौच
के मिष ( बहाने ) ले एक धोती लाश लेझर, घर ले निकल
पड़ा और एक सिपाही द्वारा शहला भेजा कि एक मित्र के
घर गया है। मैं एक पास के गाँव में गया । इधर घर में मेरी
प्रतीक्षा दल बजे रात तक होती रही। इली रात को चार
घड़ी के तड़के मैं गाँव निकल कर आगे चल दिया
और अपने गाँव ले दल कोस के अन्तर पर एक गाँव में
हनुमान के मन्दिर पर ठहरा । यहाँ से चलकर सावला
योगी के पास गया, परन्तु वहाँ पर भी मुझे शान्ति नहीं
मिली और लोगों ने सुना कि लालाभक्त नामी एक योगी
हैं, तब उनकी ओर चल पड़ा। मार्ग में एक वैरागी एक
मूर्ति रखकर बैठा हुआ था। बात चीत होने पर वह बोला
कि अंगुली में सोने का छल्ला डालकर वैराग्य की सिद्धि
कैसे होगी ? मुझे इस प्रकार खिजाकर मेरे तीनों छल्ले
मूर्ति की भेट चढालिये। लालाभक्त के पास जाकर मैं योग
साधन करने लगा। रात को एक वृक्ष के नीचे बैठ गया तो
वृक्ष के ऊपर घूधू बोलने लगा। उलकी आवाज़ सुनकर मुझे
भूत का भय हुमा । मैं मठ के भीतर घुस गया। फिर वहाँ से
अहमदाबाद के समीप कोट काँगड़े नामी गाँव में आया, वहाँ
बहुत से वैरागी रहते थे। एक कहीं की रानी वैरागो के फन्दे
में आ गई थी। इस रानी ने मेरे लाथ ठट्ठा किया, परन्तु मैं
जाल से छूट गया, इस स्थान पर मैं तीन महीने रहा था।
यहाँ पर बैरागी . मुझ पर हँसी उड़ाने लगे, इसलिये जो रेशमी
किनारेदार धोती मैं पहनता था, वह मैंने फेंक दी । मेरे पास
No text on this page.
पूछा कि आप कौन हैं, परन्तु उन्होंने यही उत्तर दिया कि मैं एक काकन हूँ, सुनने सुनाने से कुछ बोध प्राप्त हुआ है। एक दिन इस विषय में वार्तालाय हुआ कि वैष्णव लोग जो माथे पर खड़ी रेन्बा लगाने हैं, वह ठीर या नहीं। मैंने कहा यदि खड़ी रेखा लगाने से स्वर्ग मिलता है, तो सारा मुंह काला करने में स्वर्ग से भी कोई बड़ी पदवी मिलती होगी। यह सुनकर उनको बड़ा क्रोध आया और वे उठ गये। तब लोगों से पूछने पर मालूम हुआ कि यही उस मत के आचार्य है। स्वालियर से मैं रियालत करौली को गया, वहाँ पर एक कबीरपन्थी मिला, उसने एक छीर के अर्थ ये कबीर किये थे. और कहने लगा कि एक कत्रीय उपनिषद भी हैं। वहाँ से फिर मैं जयपुर को गया, वहाँ हरिश्चन्द नामी एक बड़े विद्वान् पण्डित थे। वहाँ पहिले मैंने वैष्णवमत का खण्डन करके शैवमत स्थापन किया। जयपुर के महाराज सवाई रामसिंह भी शव- मत की दीक्षा ले चुके थे। शैवापत के फैलने पर इज़ारों रुद्राक्ष की मालायें मैंने अपने हाथों ने लोगों को पहनाई । यहाँ शैवान का इतना प्रचार हुआ कि हाथी घोड़ों के गलों में भी रूद्राक्ष की माला पहिनाई गई। जयपुर ले मैं पुष्कर को गया, वहाँ से अजमेर आया। अजमेर पहुँच कर शैवमत का भी खण्डन करना आरम्भ किया। इसी बीच में जयपुर के महाराजा साहब लाट माहव से मिलने के लिये आगरे जानेवाले थे। इस आशंका से कि कहीं वृन्दावननिवासी प्रसिद्ध रंगाचार्य ने शास्त्रार्थ न होजाचे, राजा रामसिंह ने मुझे बुलाया और मैं भी जयपुर गया ।
( १७४)
पाठशालाय आर्य-विद्या पढ़ाने के लिये स्थापित की हैं। उनमें
अध्यापकों की उच्छृङ्खलता से जैमा लाभ कि पहुँचना
चाहिये था नहीं पहुँचा। गत वर्ष बम्बई आया। यहाँ मैंने
सुसाई महाराज के चरित्रों की बहुत कुछ छानबीन की।
चम्बई में आर्यसमाज स्थापित हो गया । वस्बई, अहमदाबाद,
राजकोट आदि प्रान्तों में कुछ दिन धम्मोपदेश किया, अब
तुम्हारे इस नगर में दो महीनों ले आया हूं।
यह मेरा पिछला इतिहास आर्यधर्म की उन्नति के
लिये मुझ जैसे बहुत से उपदेशक आपके देश में होने चाहिये ।
ऐसा झाम अकेली आदमी मला प्रकार नहीं कर सकता;
फिर भी यह दृढ़ निश्चय कर लिया है कि अपनी बुद्धि और
शक्ति के अनुसार जो कुछ दीक्षा लो हैं उसे चलाऊँगा।
अव अंत में ईश्वर से यह प्रार्थना करता हूं कि सर्वत्र
आर्यसमाज कायम होकर मूतिपूजादि दुराचार दूर हो जायें,
वेद शास्त्रों को सच्चा अर्थ सब की समझ में मारे और उन्हीं
के
अतुलार
लोगों का आचरण होकर देश की उन्नति हो जावे।
पूरी आशा है कि आप सब खजनों की सहायता से मेरी यह
इच्छा पूर्ण होगी।
ओ३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः
F
25FES
समाप्तोऽयम् ग्रन्थः
vesperoaresses
छप गया है !
छप गया है !!
स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती कृत
उपनिषद्-प्रकाश
हिन्दी का
तृतीय संस्करण
मूल्य २॥
इस ग्रन्थ रत्न की उर्दू की अनेक आवृत्तियाँ निकल
चुकी हैं । हिन्दी में इस उपयोगी ग्रन्थ रत्न की द्वितीयावृत्ति
सन् १९२३ में हुई, पर हिन्दी जगत् की माँग विशेष होने
के कारण पूरी न होती देख दो वर्ष में ही तृतीयावृति का
शुभ अवसर प्राप्त हुआ। इस ग्रन्थ के ग्राहकों के आर्डर
शीघ्र पाने चाहिये।
श्यामलाल वर्मा
आर्य-बुकसेलर, वरेली।
.
" २भाग ) २२- - " १ " ESI ५ व्याख्यान - ३ D २८- -- पढ़ने-योग्य अपूर्व पुस्तकें । १-उपनिषद-प्रकाश भजन-पुस्तके स्वामी दर्शनानन्द कृत २० १९-भजनप्रकाश १ भाग) २-कृष्टान्त-सागर भाग १ ર ३-१ ३ an ३ भाग 1) २२- ५--उपदेश मंजरी १५ २३- a) ५-शिवाजीव रोशनआरा) २४-स्त्री-ज्ञान-प्रकाश? भाग। २५- २ ६-भारत का जीवन-चरित्र) ७-नित्य-कर्म-विधि २६- ८-भारतवर्षकीवीरमातायें ) २७--संगीत-सागर १भाग) सशी देवियाँ ॥ २, a १०- ,, की वीर और विदुषी २९-ब्रह्मबोधिनी laj स्त्रियाँ २ भाग ३०-रूपरत्न भंडार भजन =) ११-महाराणा प्रतापसिंहा-) ३१- प्रतापसिंह का प्रताप B) १२- स्वामी दयानंदचरित्रा) ३२-हवन कुड बड़ा Mal १३-वेला सती ३) छोटा १४-भर्तृहग्-िशतक के चम्मच ॥ 10) १५- श्रीकृष्ण-चरित सामग्रीप्रति सेर ॥ १६-भीमपितामह 1-1 | ३६-जनेऊ कोड़ी बढ़िया ११) १७-दर्शनानन्द ग्रंथसंग्रह२॥ ३७-,, मामूली || १८-अनपढ़ स्त्री m घटिया नोट-इसके अतिरिक्त सब प्रकार की मार्य-सामाजिक पुस्तकें हमारे पुस्तकालय में मिलती हैं। बड़ा सूचीपत्र मँगाकर देखिये। मिलने का पता- "श्यामलाल वर्मा मार्य-बुलसेलर, बरेली ३३-" lay ३५- 1-)
No text on this page.