Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
Yuktyanushasanam
Front matter
शासक नाथूराम प्रेमी मंत्री, माणकचंद्र दि० जैनग्रंथमालासमिति, हीराबाग गिरगांव वम्बई। मुद्रक- श्रीलाल जैन काव्यतीर्थ, जैनसिद्धांतप्रकाशक ( पवित्र ) प्रेस; नं०८ महेंद्रबोस लेन, श्यामबाजार कलकत्ता।
धन्यवाद। इस अलभ्य ग्रन्थके उद्धार-कार्यमें नजीबाबाद जि० विज- नौरके श्रीमान् साहु गणेशीलालजी आनरेरी मजिस्ट्रेटकी धर्मपत्री जीने १००) सौ रुपयाकी सहायता देनेकी उदारता दिखलाई है, इसके लिए श्रीमतीजीको अनेक धन्यवाद । अन्य धर्मात्मा- ओको आपके इस शास्त्रप्रेमका अनुकरण करना चाहिए। श्रीमतीजीकी ओरसे उक्त सौ रुपयोंके अन्थ असमर्थ विद्वा- नोको बिना मूल्य वितरण किये जायेंगे। निवेदक-मंत्री -
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युक्त्यनुशासनस्य श्लोकानों अकारायनुक्रमणिका। ३ ए अ पृ० श्लो० इति स्तुत्यः स्तुत्यै १७८। ६५ स्मतत्स्वभावे ५८ । २७ उ अनर्थिका साधन ४५ । १८ उपेक्षा फलमाद्यस्य + अनात्मनानात्म १५० । ५८ | उपेयतत्त्वा ६०।२८. अनुक्ततुल्यं १००। ४२ अभावमात्र ५२ । १५ एकान्तधर्मा १३१ । ५२ अमेदभेदात्मक २१ ।२७ क अमेयमश्लिष्ट १३७। ५५ अर्थः प्रकरणं लिंगः १०२।+ कथंचित्ते सदेवेष्टं ८९ । + अवाच्यमित्यत्र ६१। २९ कामं द्विषन्नप्युपपत्ति १७४।६३ अशासदाजांसि ४८। २१ कार्यद्रव्यमनादि १३८+ अहेतुकत्वं प्रथितः ३३ । ९ कालान्तरस्थे ६८।३४ श्रा किंचिन्निति ११६ ।+ आत्मान्तरा १३६। ५४ १।१ . +एतचिन्हाकिता उक्तं तिश्लोकाः। कृतप्रणाशाकृत ४०।१४ कालः कलिर्वा कीर्त्या महत्या त lu न सच्च नासच ६४।३२ तत्त्वं विशुद्धं ४६ । १९ नानात्मता १२६।५० तत्रापूर्वार्थ ८४ | + नानासदेका १४५ । ५६ तथा न तत्कारण ३८ । १२ निशायितस्तैः १५१ । ५९ तथापि वैयात्य १४ । ३ नैवास्ति हेतुः ३८।१३ तथा प्रतिज्ञा १०४ । ४५ प तदेतत्तु समायातं १७३ । + प्रतिक्षणं भंगिषु ४२ । १६ तपासि यातनाः ७५ ।+ प्रत्यक्ष कल्पनापोडं ५ + स्यक्तात्यक्तात्म ७९ । + प्रत्यक्षबुद्धिः ४' । २२ त्वं शुद्धिशक्त्यो १४।।४ प्रत्यक्षनिर्देश ६६।३३ प्रमाणनयनित १।४ प्रमुच्यते च १३४ । ५३ दयादमत्याग प्रवृत्तिरक्तै दृष्टागमा १२२ । ४९ ८६ । ३८ दृष्टे विशिष्टे ७८।३६ भ द्वे सत्ये समुपाश्रित्य ४४ | + भवत्यभावेऽपि १५१ । ६० भावा येन निरुप्यते१७३।+ न द्वन्यपर्याय ११२। ४८ भावेषु नित्येषु २८।८ न बंधमोक्षौ भावकान्ते पदार्थानां ८६।+ ४१ । १५ न मांसभक्षणे ८३। + न रागानः स्तोत्रं १७७ । ६४. . मद्यांगवद्भू ७२। ३५ न शास्तृशिष्या ४३ । १७ । ममकाराहंकारौ १३२ + म
य
मिथोनपेक्षाः १२८।५१
मूकात्मसंवेद्य ४७। २० शीर्पोपहारादि । ३९
श्रीमद्वारजिनेश्वरा १८२ । ४
यदेवकारो
स
९९। ४२
याथात्म्यमुलंध्य १३ । २
सत्यानृतं बाप्य ६२ । ३०
सर्वान्तवत्
येषामवक्तव्य
१५६ । ६२
३५। १०
योलोकाज्वलय १७४ । +
सर्वात्मकं तदेकं स्यात् १३९ 1+
सर्वथा सदपायानां ११४ । +
सर्वथा सदुपायानां११४ । +
रागाद्यविद्या ५०। २३
सहक्रमाद्वा ६३। ३१
सामान्यनिष्ठा ९४ । ४०
वस्त्वेवावस्तुतां १०१। + साहंकारे मनसि न १७३ । +
व्यतीत्य सामान्य ५४ । २६ स्तोत्रे युक्त्यनु ८९ | +
व्यावृत्तिहीना १४८। ५७ स्थेयाज्जातजयध्वजा१८२ ।।
विद्या प्रसूत्यै ५०। २४ । स्यादित्यपि १०८। ४७
विधिनिषेधो १०५। ४६ स्वच्छन्दवृत्तेः ८१। ३७
१०२।४४
विशेषसामान्य १५३ । ६१ | हेतुर्न दृष्टोत्र ३६। ११
व
विरोधि चा
ह
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- श्रीविद्यानन्द स्वामी। जैनधर्मके दार्शनिक और नैयायिक विद्वानोंमें 'विद्यानन्दि' या 'विद्यानन्द स्वामी' बहुत प्रसिद्ध आचार्य हुए हैं । ये 'पात्र- केसरी' नामसे भी प्रसिद्ध हैं। इनके विषयमें एक कथा प्रसिद्ध है जिसके अनुसार वे मगधराज्यके अहिच्छन्न नामक नगरके निवासी थे और अपनी पूर्वावस्थामें वेदानुयायी ब्राह्मण थे। स्वामी समन्तभद्रके 'देवागमस्तोत्र या 'आप्तमीमांसा' नामक ग्रन्थका पाठ करनेसे उन्हें जैनदर्शन पर श्रद्धा हो गई थी और तब वे जैनधर्ममें दीक्षित हो गये थे। मालूम नहीं, इस कथामें सत्यांश कितना है। पर इतना अवश्य है कि विद्यानन्दस्वामीके जीवनका अधिकांश दक्षिण और कर्ना- टकमें ही व्यतीत हुआ होगा । उनके सहयोगी अकलंक, प्रभा- चन्द्र, माणिक्यनन्दि और प्रतिद्वन्द्वी कुमारिल, मण्डनमिश्र आदि सब कर्नाटकमेही हुए है। हुमचा जिला शिमोगाके शिलालेखमें विद्यानन्द स्वामीका जिन अनक राजाओंकी सभाओंमें जाकर विजय प्राप्त करना लिखा है वे सब दक्षिण और कर्नाटकके ही । इससे उनका दाक्षिणात्य या कर्नाटकी होना ही अधिक संभव जान पड़ता है। कहा जाता है कि वे नन्दिसंधके आचार्य थे। परन्तु हमारी The समझमें उस समय तक नन्दि, सेन, देव और सिंह इन चार संघोंका अस्तित्व ही न था। मंगराज नामक एक कर्नाटक- कविका शक संवत १३५५ (वि० सं० १४९०) का एक विस्तृत शिला लेख मिला है जिसमें स्पष्ट शब्दोंमें लिखा है कि भगवान् अकलकभट्टके स्वर्ग जानेके बाद उनकी परम्पराके मु- नियोंमें ये चार संघभेद हुए । और यह ठीक भी मालूम होता है। क्योंकि अकलंकदेवके समय तकके किसी भी अन्यकर्ता के अन्थमें इन संघोंका उल्लेख नहीं पाया जाता । जान पड़ता है, इनके 'नन्द्यन्त, नामसे ही ये नन्दिसंघके आचार्य समझ लिये गये हैं। १ विद्यानन्द स्वामीने अपने 'अप्टसहसी, ग्रन्थमें भर्तृहरिके 'वाक्यपदीय' ग्रन्थका निम्नलिखित श्लोक उद्धृत किया है:-- न सोऽन्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमाहेते । अनुविद्धमिवाभाति सर्व शब्दे प्रतिष्ठितम् ।। चीन देशका सुप्रसिद्ध यात्री हुएनसंग वि० सं० ६८६ में भारत भ्रमण करने आया था और ७०२ तक इस देशमें रहा शा । उसने अपनी यात्रा-पुस्तकमें लिखा है कि इससमय ब्या- करण शास्त्रमें भर्तृहरि बहुत प्रसिद्ध विद्वान है। इससे माळूम होता है कि भर्तृहरि वि० सं० ७०० के लगभग जीवित थे और विद्यानन्द उनसे पीछे हुए हैं। २ प्रसिद्ध दार्शनिक कुमारिलभट्टने अपने श्लोकवार्तिक नामक ग्रन्थमें अलंकदेवकी अष्टशतीके वाक्योंको लेकर उनपर क्षेप किया है और उनका निवारण अकलकदेवक पशिष्य वि- द्यानन्दने अष्टसहस्रीमें जगह जगह किया है । श्रीयुक्त पं० बाबू काशीनाथजी पाठक बी० ए० ने इस विषयमें एक बडाही मह- त्व पूर्ण लेख प्रकाशित किया है और उक्त विद्वानों के ग्रन्थों की भीतरी जांच कर बतलाया है कि कुमारिलभट्ट और अकलंक- देव एक ही समयमें हुए हैं, और कुमारिल अकलंकदेवके कुछ बादतक जीवित रहे हैं । कुमारिलभट्टका समय वि० सं० ७५७ से ८१७ तक निश्चित है। अतएव विद्यानन्द स्वामी भी लग- भग इसीसमयमें अथवा इससे कुछ पीछे हुए होंगे। ३ चिविलास कृत 'शंकरविजय' से मालूम होता है कि मण्डनमिश्रका दूसरा नाम सुरेश्वर था और सुरेश्वर आद्य शं- कराचार्यका शिष्य था । आद्य शंकराचार्यका समय वि० सं० ८०७ से ८६५ तक निश्चित किया गया है, अतएव मण्डन मिश्रका भी लगभग यही समय मानना चाहिए। इस मण्डन मिश्रके वृहदारण्यकवार्तिक' के कई श्लोकोंको विद्यानन्द स्वामीने अष्टसहस्रीमें तद्धृत कर उनका खण्डन किया है । इससे विद्या- नन्दका समय भी वि० सं० ८५ के लगभग मानना चाहिए। ४ परन्तु उनका समय वि० सं० ८९५ से और पीछे नहीं माना जा सकता । क्योंकि इसी समय अर्थात् शक संवत् ७६० (वि० सं० ८९५) के लगभग भगवजिनसेनने आदि पुगणकी रचना की है और उसके प्रथम पर्वमें उन्होंने पात्रके सरी या विद्यानन्द स्वामीका स्मरण किया है:- (४) भट्टाकलंक-श्रीपाल-पात्रकेसरिणां गुणाः । विदुषां हृदयारूढा हारायन्तेऽतिनिर्मलाः ॥ १९ ॥ इससे मालूम होता है कि वि० सं० ८९५ के लगभग विद्यानन्द स्वामीकी अच्छी ख्याति हो चुकी थी। भट्टाकलंक, विद्यानन्द, प्रमाचन्द्र, माणिक्यनन्दि, आदि सव समकालीन विद्वान् थे। इनमें सबसे पहले अकलकदेव हैं। क्योंकि इनके किसी भी ग्रन्थमें विद्यानन्द आदिका उल्लेख नहीं है। किन्तु प्रभाचन्द्रने न्यायकुमुदचन्द्रोदयमें लिखा है कि मैने अकलकदेवके चरणोंसे बोध प्राप्त किया, साथ हा उन्होंने वि- घानन्दका भी उल्लेख किया है। इससे अकलंक और विद्यान- न्दको उनका पूर्ववर्ती मानना चाहिए। इसके सिवाय माणिक्य. नन्दि भी उनसे पूर्ववर्ती है। क्योंकि उनका प्रमेयकमलमार्तण्ड माणिक्यनन्दिके परीक्षामुख नामक ग्रन्थका ही भाष्य है । परन्तु माणिक्यनन्दी, अकलंक और विद्यानन्दका स्मरण करते हैं, अतएव वे उनसे पीछेके है। इस तरह हम इन आचार्योंका क्रम इस तरह मानते है--१ अकलंक, २ विद्यानन्द, ३ माणि- क्यनन्दि और ४ प्रभाचन्द्र । ये सभी अपने समयके महान् तार्किक विद्वान थे। मल्लिषेण प्रशास्तिसे मालूम होता है कि भट्टाकलंकदेव राष्ट्रकूट ( राठौर ) राजा साहसतुड़की सभामें गये थे । साह- सतुंगका दूसरा नाम कृष्णराज था । डा० भाण्डारकरने अनेक प्रमाणोंसे इसका राज्यकाल वि० सं० ८१० से ८३२ तक ५ ) - । और निश्चित किया है। अतएव भट्टाकलंकदेवका समय भी इसीके लगभग निश्चित होता है और चूंकि प्रमाचन्द्रने उनसे बोध प्राध किया था, तथा प्रभाचन्द्र विद्यानन्दका स्मरण करते हैं तथा विद्यानन्द अकलंकदेवके ग्रन्थों के टीकाकार हैं, अतः विद्यानन्द- का अस्तित्व वि० सं० ८३२ से ८६५ के बीचमें माना जाना चाहिए। विद्यानन्दस्वामी अनेक तर्क ग्रन्थों के रचयिता हैं। उनमें से अष्टसहमी ( आप्तमीमांसालङ्कार), श्लोकवार्तिकालङ्कार (तत्त्वार्थालङ्कार ), आप्तपरीक्षा, पत्रपरीक्षा, प्रमाणपरीक्षा, पात्रकेसरीस्तोत्र और युक्त्यनुशान टीका ये ग्रंथ छप चुके हैं। प्रमाणमीमांसा, प्रमाणनिर्णय, विद्यानंदमहोदय, बुद्धेशभवन व्याख्यान, और आप्तपरीक्षालकृति नामक ग्रंथ अभीतक अनु- पलब्ध है। * प्रस्तुत ग्रन्थ, स्वामी समन्तभद्रके स्तोत्रग्रन्थकी टीका है। इसकी एक प्रति हमें जैनेन्द्रप्रेसके स्वामी पण्डित कल्लापा भरमापा- निटवेकी कृपासे प्राप्त हुई थी जो उन्होंने किसी कनडीप्रतिपरसे एक विद्वानके द्वाग लिखाई थी और दूसरी प्रति स्याद्वादपाठ- शाला काशीके सरस्वती भवनसे पण्डित उमरावसिंहजीकी कृपासे प्राप्त हुई थी। इन दोनो प्रतियोंपरसे इसकी प्रेस कापी साहित्य शास्त्री पं० इन्द्रलालजी चांदूवाडने की है और प्रूफ-संशोधन पं० श्रीलालजी काव्यतीर्थने किया है। * जैन हितैषी भाग ९ अंक ९ में प्रकाशित हुए विस्तृत लेखका सारांश ।
( ६ ) संशोधनादि कार्यमें यथासंभव सावधानी रखी गई है। फिर भी यदि कुछ अशुद्धिया रह गई हों, तो उनको विद्वज्जन संशोधन पूर्वक पढनेकी कृपाकरें। निवेदक- नाथूराम मेमी।
ॐ - श्रीवीतरागाय नमः। आचार्यप्रवरश्रीमद्विद्यानंदिप्रणीतया टीकया विभूषितं श्रीमत्समंतभद्राचार्यवर्यप्रणीतं युक्त्यनुशासनं । टीकाकर्तुमंगलाचरणं । प्रमाणनयनिर्णीतवस्तुतत्त्वमवाधितं । जीयात्समन्तभद्रस्य स्तोत्रं युक्त्यनुशासनं ।। श्रीमत्समन्तभद्रस्वामिभिराप्तमीमांसायामन्ययोगव्यवच्छे- दाद् व्यवस्थापितेन भगवता श्रीमतार्हतान्त्यतीर्थकरपरमदेवेन मा परीक्ष्य किं चिकीर्षवो भवन्तः ? इति ते पृष्टा इव प्राहु:-- कीर्त्या महत्या भुवि वर्द्धमानं खां वर्द्धमानं स्तुतिगोचरत्वं । निनीषवः स्मो वयमद्य वीरं विशीर्णदोषाशयपाशवन्धं ॥१॥ टीका-स्तुतिगोचरत्वं स्तोत्रविषयत्वं निनीयवो नेतुमि- छनो वयं मुमुक्षवोऽयास्मिन् काले परीक्षावसानसमये स्मो भवामरलां वीरं नान्यत् किंचित्कर्तुकामा इति प्रतिवचनेनाभि- -- २ युक्तयनुशासन। संबंधः । कुतः स्तुतिगोचरत्वं नेतुमिच्छवो भवन्त इत्याहु:- अद्धमानमिति प्रवृद्धममाणत्वादित्यर्थः, ऋद्धं प्रद्धं मानं प्रमाण यस्य स एव वर्द्धमान इत्युच्यते । किं पुनस्तत्र प्रमाणं प्रवृद्धमिति चेत्, तत्वज्ञानमेच, तत्त्वज्ञानं प्रमाण स्यादिति वचनात् तस्यैव प्रवृद्धत्वोपपत्तेः स्याद्वादनयसस्कृतत्वात् । सन्निकर्षादेरुपचारादन्यत्र प्रमाण- स्वायोगानिर्विकल्पकदर्शनवत् प्रवृद्धत्वासंभवात् । तत्त्वज्ञानं पुनः स्वार्थव्यवसायात्मकं तत्त्वज्ञानत्वान्यथानुपपत्तेः। न ह्यव्यव- सायात्मकं तत्त्वज्ञानं नामाकिंचित्करस्य तत्त्वज्ञानत्वप्रसंगात् । नाकिंचिन्करं तत्वज्ञानं व्यवसायकरस्य तत्वज्ञानत्वादिति वेद, न स्वयमव्यवसायात्मनो दर्शनस्य व्यवसायकरत्वैविरो- धात् सुगतदर्शनवत् । क्षणक्षयादिदर्शनबुद्धव्यवसायवासना- प्रबोधसहकारि दर्शनं व्यवसायकारणं नापरमिति चेत्, कुतो व्यवसायवासनाप्रवोधः ? दर्शनादिति चेत्, तर्हि क्षणक्षयादा- चपि स्यात्कथं च सुगतदर्शनं न स्यात् ? तत्राविद्योदयसत्त्वा- दिति चेत्, तर्हि भविद्योदयसहायादर्शनात् स च भवतु क्ष- णक्षयादौ, नास्तीति मतं तदा, दर्शनभेदप्रसंगः, न ह्येकमेव दर्शनं नीलादौ व्यवसायवासनामबोधनिबंधनाविद्योदयसमा- क्रान्त क्षणक्षयादावन्यथेति वक्तुं युक्तम् । स्यान्मतं, दर्शन- स्याविद्योदयवैचिच्याद्वैफियं ततस्तस्यान्यत्वात्तदन्यत्वे दर्श- नस्य वास्तवत्वाविरोधाद , वास्तवं हि दर्शनमवास्तवा वावि- या तदुभयभेदामं दर्शनभेद इति । तदपि स्वसिद्धान्तमात्रं, ~ टीकासहित ३ . तस्या विकल्पवासनाहेतुत्वविरोधात् , वास्तवे हि किंचित् क- स्यचित् कारणमिष्टं नावास्तवं शशविषाणं, न चाविद्या वा- स्तविका । यदि पुनर्यथा वास्तवं कारणं वास्तवमेव कार्यमु- पजनयति तद्वदवास्तवमवास्तवं विरोधाभावात् , ततश्चाविद्यो- दयः स्वयमवास्तवो विकल्पवासनाप्रवोधमवास्तवं करिष्यती- त्यभिधीयते, तदा विकल्पवासनाप्रवोधोऽप्यवास्तवो नीलादि- व्यवसायमवास्तवमेव जनयेत् । वास्तवदर्शनहेतुत्वात् वास्त- वोऽपि नीलादिविकल्प इति चेत् ; तर्हि वास्तवावास्तवाभ्यां दर्शनविकल्पवासनाप्रवोधाभ्यां जनितो नीलादिविकल्पो वा- स्तवावास्तवः स्यात्, तथा च तज्जनकं दर्शनं कथमिव तत्त्व- ज्ञानमुपपद्येत संशयादिविकल्पजनकस्यापि दर्शनस्य तत्वज्ञान- स्वप्रसंगात् । यथैव हि नीलादिविकल्पः स्वरूपे वास्तवः स्वा- लंबने चावास्तवस्तथा संशयादिविकल्पोऽपि, सर्वचित्तचैताना- मात्मसंवेदनस्य वास्तवत्वात् तदालंबनस्य चाऽन्यापोहस्थावा- स्तवत्वात् वास्तवावास्तवोपपत्तिः । ननु दर्शनपृष्टभाविनो वि- कल्पस्य वस्तुव्यवसायकत्वात् तज्जनकं दर्शनं तत्त्वज्ञानं, न पुनः संशयादिविकल्पजनकं तस्यावस्तुपरामर्शित्वात् । नहि संशयेन विषयीक्रियमाणं चलिताकारद्वयं वस्तुरूपं, नाऽपि विपर्यासेनालंब्यमानं विपरीतं वस्तुरूपं यतोऽस्य वस्तुपराम- शिता स्यादिति कश्चित् । सोऽप्येवं प्रष्टव्यः, कुनो नीलादि- विकल्पम्य वस्तुव्यवसायित्वं सिद्धं ? वस्तुव्यवसायिविकल्प- वासनाप्रबोधात्, सोऽपि वस्तुव्यवसाय्यविद्योदयादिति चेत् .
युक्तयनुशासनं । तहविद्योदयवंशप्रभवो नीलादिविकल्प इत्येतदायातम् । तथा च तजननान दर्शनं तत्वज्ञान युक्तमतिप्रसंगात् । तदविसंवादकत्वात् तत्त्वतानमिति चेत्, तदपि यद्यर्थ- क्रियाप्राप्तिनिमित्तत्वं तच्च प्रवर्तकत्वं तदपि प्रवृत्तिविपयो- पदर्शकत्वमुच्यते तदा न व्यवतिष्ठते दर्शनस्याव्यवसाया- स्मनः प्रवृत्तिविपयोपदर्शकत्वे क्षणक्षयाग्रुपदर्शकत्वप्रसंगात नीलाद्युपदर्शकत्ववत्, नीलादिवत् क्षणक्षयादावपि दर्शन- विपयत्याविशेषात् । क्षणक्षयादौ विपरीतसमारोपान्न तदुपद- शकत्वमिति चेत्, सोऽपि कुतः ? सदृशापरापरोत्पत्तिदर्शनाद- विद्योदयाचेति चेत्, न सदृशापरापरोत्पत्तिदर्शनस्य समारोप- निमित्तस्यापरापरजलघुग्रंदोत्पत्तिदर्शनेन व्यभिचारात् तत्रै- कत्वसमारोपासंभवात् तथान्तरंगस्य चाविद्योदयस्य वाह्यकार- ग्रहितस्यासपर्थत्वात् तन्मात्रादेवान्यथा सर्वत्र विभ्रममसंगात्। स्यान्मतं, अपरापरजलयुबुदेषु सदृशापरापरोत्यत्तिदर्श- ने सत्यप्यविद्योदयासंभवान्नैक्त्वसमारोपः ततो न व्यभिचार इति । तदयुक्तम् , क्षणक्षयादिदर्शनस्याबोधिसत्त्वादमसिद्धः, पश्यन्नयं क्षणिकमेव न पश्यतीति वचनस्य स्वपनोरथमात्र- त्वात्, शक्यं हि वक्त्तुं पश्यन्नयं नित्यमेव पश्यत्यनाद्यविद्योद- यादपरापरज्ञानोत्पत्तिषु क्षणिकत्वसपारोपान्नावधारयतीति । रुपयोगपद्याभ्यामर्थक्रियाविरोधस्तु नित्यस्येव क्षणिकस्यापि विद्यत एव तत: पगन्नयं जात्यन्तरमेव पश्यति दर्शनमोहोद- यात्तु दुगगमजनितवासनासहायाद्विपरीतसमारोपसंभवान्नाव- धारयतीति युक्तमुत्पश्यामः । तथा चाक्षादिज्ञानस्य द्रव्यप- टीकासहित। यात्मकः कथंचित् नित्यानित्यात्मा सद्देशतरपरिणापात्म- कः सामान्यविशेषात्मकः जात्यन्तरभूतोऽनेकान्तात्मार्थो विष- यः सिद्धः, सुनिश्चतासंभवद्भावकप्रमाणत्वात् तदुपदर्शकत्वं प्रवृत्तिविषयोपदर्शकत्वं तत् प्रवर्तकत्वं तत्वार्थक्रियाप्राप्तिनि- मित्तत्वं तदप्यविसंवादित्वं तल्लक्षणं तत्त्वज्ञानं कथमविकल्पर्क जात्याद्यात्मकस्य सविकल्पकस्यार्थसामर्थेन समुद्भूतत्वा- ज्जात्यादिरहितस्य स्वलक्षणार्थस्य सर्वथाऽनर्थक्रियाकारिणो- ऽनुपपत्तेः तत्कारणेन तत्त्वज्ञानस्योद्भवासभवात् निर्विकल्प- कत्वादसिद्धः। स्मान्मतम् , संहृतसकलविकल्पावस्थायां अ- श्वविकल्पकाले गोदर्शनविषयाणा निर्विकल्पकं प्रत्यक्ष प्रत्य- क्षत एव सिद्धं । विकल्पेन नामसंश्रयेण प्रत्यात्मना वेद्येन रहितस्य प्रत्यक्षस्य संवेदनात् । तदुक्तस्- प्रत्यक्ष कल्पनापोडं प्रत्यक्षेणैव सिद्धयति । प्रत्यात्मवेद्यः सर्वेषां विकल्पो नामसंश्रयः ॥ इति तदसत् । व्यवसायात्मकस्यैव प्रत्यक्षस्य स्वसंवेदनप्रत्य- क्षतः प्रसिद्धः नामसंश्रयस्य विकल्पस्य तत्राऽनुपलंभेऽप्यक्षादि- संश्रयस्य संवेद्यमानत्वात्, संहतसकलविकल्पावस्थायामपि स्तिमितेनान्तरात्मना स्थितस्य चक्षुषा रूपमीक्षमाणस्याक्षजा- या मतेः सविकल्पकात्मिकाया एव प्रतीतेः । अन्यथा व्युत्थि- तचित्तावस्थायां तथैव स्मरणानुपपत्तेः एतेनानुपानात्प्रत्यक्ष कल्पनाविरहसिद्धिरपास्ता । पुनः किंचिद्विकल्पयतो यथाऽ- श्वाल्पना ममासीदिति वित्तिस्तथा गोनिश्चयोऽप्यश्वविकल्प- ६ युक्तयनुशासनं। काले ममेन्द्रियवलादासीदिति वित्तिरपि कथमन्यथोपपोत ग- वाश्वविकल्पयोर्युगपद्विरोधात् । नैवं वित्तिः सत्येति चेत् , न तयोः क्रमादेवाशूत्यत्तेयौगपद्याभिधानात् । तत्वतो ज्ञानद्वयस्य सोपयोगस्य युगपदसंभवात्, कचिदुपयुक्तानुपयुक्तज्ञानयोग- पद्यवचनेपि विरोधाभावात् । तर्हि गोदर्शनमनुपयुक्तमश्वक्कि- रूपस्तूपयुक्तस्ततम्तयोर्युगपद्भावो युक्त एवेति चेत्, न किंचि- दनिष्ट स्याद्वादिनां। तथाऽनुपयुक्तवेदनस्य निर्विकल्पकत्वस्या- पीष्टत्वात् । कचित्किंचिदुपयुक्तं हि ज्ञानं व्यवसायात्मकमि व्यते सर्वथाऽनुपयुक्तस्याव्यवसायात्मकस्य तत्त्वज्ञानवविरो- धात् । न चैवं केवलज्ञानमतत्त्वज्ञानं प्रसज्येत तस्यापि नित्योप- युक्तत्त्वेन व्यवसायात्मवत्वोपगमात् । ननु च वीतरागाणां क- चित्प्रवृत्यसंभवात् सर्वदौदासीन्यादुपयोगाभावादनुपयुक्तमेव ज्ञानमनुमन्तव्यम् । तथा च निर्विकल्पकं तत्सिद्धं । तद्वदक्षा- दिज्ञानमपि निर्विकल्पकं सत् तत्वज्ञानं भविष्यतीति केचित् , तेऽपि न युक्तिवादिनः, योगज्ञानस्यानुपयुक्तत्वे सर्वपदार्थप्र- तिभासनस्य विरोधात् , तस्यैवोपयोगरूपत्वाद् , युगपत्सर्वार्थ- ग्रहणमेव खुपयोगः सर्वज्ञविज्ञानस्य, न पुनर्जिहासोपादित्साभ्यां हानोपादानलक्षणा प्रवृत्तिः, तस्या रागद्वेषोपयोगनिबंधनत्वात प्रलीनरागद्वेषस्य सर्दज्ञस्य तदसंभवात् । कथमेवं सर्वज्ञविज्ञानं निष्फलं न भवेदिति चेत् , न तदभिन्नस्य फलस्य सकलाज्ञान- निवृत्तिलक्षणस्य सद्भावाद , सर्वस्य ज्ञानस्य साक्षादज्ञाननि- तिफलत्वाद्धानोपादानोपेक्षाविषयस्य परंपराज्ञानफलत्वप्र- टीकासहितं। सिद्धेः सकलवेदिविज्ञानस्य परम्परयाप्युपेक्षामात्रफलत्वात् । तथा चोक्तम्- उपेक्षा फलमाद्यस्य शेषस्यादानहानी। पूर्वा वाऽज्ञाननाशो वा सर्वस्यास्य स्वगोचरे ।। इति नित्योपयुक्तत्वात्सर्वज्ञविज्ञानस्य स्वार्थव्यवसायात्मकत्वमेवं युक्तमन्यथा तस्याकिंचित्करवप्रसंगात् तद्वदक्षादिज्ञानानाम- पीति न किंचिदव्यवसायात्मकं तत्त्वज्ञानमस्ति येन साधन. व्यभिचारः स्यात् । अत्रापरः प्राह-सत्यम् , व्यवसायात्मकं तत्त्वज्ञानं अर्थव्यवसायलक्षणत्वात् , न तु स्वव्यवसायात्मकं तस्य ज्ञानांतरेगा व्यवसायादिति । सोऽपि न प्रेक्षावतामभिधे- यवचनोऽनवस्थानुषंगत्यात् । कस्यचिदर्थज्ञानस्य हि येन ज्ञानेन व्यवसायस्तन्न तावदव्यवसितमेव तस्य व्यवसायकं परात्मज्ञा- नवन, ज्ञानान्तरेण तद्व्यवसाये तु तस्यापि ज्ञानान्तरेण व्य- वसाय इत्यनवम्थानं दुर्निवारं । ननु च ज्ञानस्य स्वविषये व्य- वसितिजनकत्वं व्यवसायात्मकत्वं तच ज्ञानान्तरेण व्य- वसितस्याऽपि युक्तं सन्निकर्षवत् । न हि सन्निकर्षादिः केनचिद् व्यवसितो व्यवसितिमुपजनयति तद्वदर्थज्ञानं ज्ञा- नान्तरेणाव्यवसितमेव व्यवसितिमुत्पादयतीति कश्चित् । सो ऽपि न प्रातीतिकवचनोऽर्थज्ञानस्यापि ज्ञानान्तरेणाव्यवसित- स्यैवार्थव्यवसितिजनकत्वप्रसंगात् ज्ञानज्ञानपरिकल्पनवैय- •त् । तथा लिंगस्य ज्ञानेनाव्यवसितस्य स्वलिगिनि, शब्द- स्याभिधेये, सादृश्यस्योपमेये, व्यवसितिजनकत्वसिद्धेस्तद्वि- .
युक्त्वनुशासनं । ज्ञानान्वेषणं किमर्थं पुष्णीयात् । यदि पुनरुभयथा दर्शनाद- दोष इति मतं तदाऽपि किंचिल्लिंगादिकमज्ञातं स्वलिंग्यादिषु व्यवसितिमुपजनयत्कथमपवार्यते । चक्षुरादिकमपि किंचिद्वि- ज्ञातमेव स्वविपये परिच्छित्तिमुत्पादयदुभयथा दर्शनात् । झ्यान्मतं चक्षुरादिकमेवाज्ञातं स्वविषयज्ञप्तिनिमित्तं दृष्ट, न तु लिंगादिकं तदपि ज्ञातमेव नान्यथा ततो नोभयत्रोभयथा प्रसंगः प्रतीतिविरोधादिति । तहि यथार्थज्ञान व्यवसितमर्थ- ज्ञप्तिनिमित्तं तथा ज्ञानज्ञानमपि ज्ञानेऽस्तु तत्राऽप्युभयथा परिक- ल्पनायां प्रतीतिविरोधस्याविशेषात् । कया पुनः प्रतीत्यात्र विरोध इति चेचक्षुरादिषु कयेति समः पर्यनुयोगः । विवादापन्न चक्षुरादिकमज्ञातमेवार्थज्ञप्तिनिमित्तं चक्षुरादित्वात्, यदेव तदेवं यथाऽस्मचक्षुरादि, तथा च विवादापन्नं चक्षुरादि, त- स्मात्तथा। विवादाध्यासितं लिंगादिकं ज्ञातमेव कचिद्विज्ञप्तिनि- मित्तं लिंगादित्वात्, यदित्थं तदित्थं यथोभयवादिप्रसिद्धं धूमादि, तथा च विवादाध्यासित लिंगादि, तस्मात्तथेत्यनुमानप्रतीत्या तत्रोभयथाकल्पने विरोध इति चेत्, तर्हि विवादापन्न ज्ञान- ज्ञानं ज्ञातमेव स्वविषये ज्ञप्तिनिमित्तं ज्ञानत्वात्, यदेवं तदेवं य- थार्थज्ञानं, तथा च विवादाध्यासितं ज्ञानज्ञानं, तस्मात्तथेत्यनु- मानप्रतीत्यैव तत्रोभयथा कल्पनायां विरोधोऽस्तु सर्वथा वि- शेषाभावात् तथा चानवस्थानं दुर्निवारमेव नैयायिकंमन्यानां । स्यादाकूतमर्थज्ञानमप्यर्थे ज्ञानांतरेणाज्ञातमेव ज्ञप्तिमुत्पाद- यति यथा विशेपणज्ञानं विशेष्येर्थे, न पुनर्ज्ञानं तद्विज्ञानोत्पत्तेः + टोकासहितं । ६. प्रागेव तत्र ज्ञप्रभावप्रसंगात्, न चैवं, तथा प्रतीतेरर्थजिज्ञासाया हि स्वहेतोरर्थज्ञानमुत्पद्यते । ज्ञानजिज्ञासायान्तु पश्चादेव ज्ञाने ज्ञानं प्रतीतेरेवंविधत्वादिति। तदप्यसत्यम् । स्वयमर्थज्ञान ममेदमित्यप्रतिपत्तौ तथा प्रतीतेरसंभवात् प्रतिपत्तौ तु स्वत- स्तत्प्रतिपत्तिानान्तात् वा । स्वतश्चेत् ? स्वार्थपरिच्छेदक- स्वसिद्धिवेदनस्य वस्तुवलप्राप्ता कचिदर्थे जिज्ञासायां सत्या- महमुत्पन्नमिति स्वयं प्रतिपद्यमान हि विज्ञानं स्वार्थपरिच्छे- दकमभ्यनुज्ञायते नान्यथेति जैनमतसिद्धिः। यदि पुन- ानान्तरात्तथा प्रतिपत्तिस्तदाऽपि तदर्थज्ञानमज्ञातमेव मयार्थस्य परिच्छेदकमिति स्वयं ज्ञानान्तरं प्रतिपद्यते चेत्तदेव स्वार्थ- परिच्छेदकं सिद्धं, न प्रतिपद्यते चेत्कथं तथा प्रतिपत्तिः ? किं चेद च विचार्यते-ज्ञानान्तरमर्थज्ञानमर्थमात्मानं च प्रति- पद्याज्ञातमेव मया ज्ञातमर्थ जानातीति प्रतिपाद्य.ऽप्रतिपाद्य वा प्रथमे पक्षेऽर्थस्य तत् ज्ञानस्य स्वात्मनः स्वपरिच्छेदकत्वविप- यं ज्ञानान्तरं प्रसज्येत । द्वितीयपक्षे पुनतिप्रसंगः, सुवादिकम- ज्ञातमेवादृष्टं मया कगेतीत्यपि जानीयादविशेषात्ततः किंबहुनो- तेन ज्ञानमर्थपरिच्छेदक तमिच्छत स्वपरिच्छेदक मेषितव्यम् । यथेश्वरज्ञानं स्वपरिच्छेदकत्वाभावेर्थज्ञानत्वानुपपत्तेः । तथा चैप्रयोगः कर्तव्य:-विवादाध्यासितं ज्ञानं स्वपरिच्छेदकमर्थ- ज्ञानत्वात्, यदर्थज्ञान तत्स्वपरिच्छेदकं यथेश्वरज्ञानं । अर्थज्ञानंच विवादाध्यास्तिं तस्मात् स्वपरिच्छेदकं । न चक्षुरादिना हे- तोर्व्यभिचारस्तस्याज्ञानत्वात्, नाऽपि मूच्छित्तादिज्ञानेनार्थवि- युक्त्यनुशासनं । शेषणत्वात् । तद्धि मूछितादिज्ञानं नार्यज्ञानं पुनस्तदर्थे रूम- रणप्रसंगात् । न च मूच्छितादिदशायां परैनिमिष्टं येन व्य- भिचारः स्यात् । येषां तु तस्यामपि दशायां वेदनया निद्रया- वाऽभिभूत विद्यमानमेव मत्तदशायां मदिरेत्यादिवत् मदाभि- भूतिवेदनवदन्यथा तदा नैरात्म्यापत्तेरिति मतं, तेषां विज्ञानस्य स्वव्यवसायोऽपि तदभिभूतप्रसिद्ध एवेनि कथ तेनानैकान्ति- कता ज्ञानत्वस्य हेतोः स्यात्ततोऽर्थज्ञानत्वं स्वव्यवसायात्मकत्वं साधयन्येव साध्याविनाभावनियमनिश्चयात् । नन्वीश्वरज्ञान- मुदाहरणमाध्यशून्यं तस्य स्वव्यवसायात्मकत्वाभावादिति चेन्नेश्वरस्य मर्वज्ञत्वविरोधात् । ज्ञानान्तरेणात्मज्ञानस्य परि- ज्ञानात् सर्वज्ञत्वे तदपि ज्ञानान्तरं स्वव्यवसायात्मकं चेत्तदेवो- दाहरणं । ज्ञानान्तरेण व्यवसितं चेदनवस्थान तत्राऽप्ये पर्यनुयोगात् । न चेश्वरस्य नानाज्ञानपरिकल्पना युक्ता सह- स्त्रकिरणवत् साक्षात्सकलपदार्थप्रकाशकमेकमेवेश्वरस्य मेच- कज्ञानमिति सिद्धान्तविरोधात् , तदीश्वरस्य ज्ञानमुदाहरणमेव साध्यवैकल्यानुपपत्तेः साधनकल्याभावाच्च । अर्थज्ञानत्वं हि साधनं तदुदाहरणे विद्यत एव विपक्षे वाधकप्रमाणसद्भावाद्वा साध्याविनाभावनियमम्य प्रसिद्धेः प्रकृतसाधनं साध्यं साध- यत्येव । स्वव्यवसायरहितत्वे ज्ञानस्यानीश्वर इवेश्वरेपि प्रमाण- विरुद्धत्वात् । स्वव्यवसायात्मकसकलार्थज्ञानात्कथंचिदभिन्नस्य परमात्मन एवाप्तपरीक्षायामीश्वरत्वसमर्थनात् । ततः स्थितमे- तत्स्वार्थव्यवसायात्मकं तत्त्वज्ञानं प्रवृद्धं मानं प्रमाणमिति । , टीकासहितं। परमार्थतः स्वव्यवसायात्मकमेव तत्त्वज्ञानं चेतनत्वात् स्वप्ने- न्द्रजालादिज्ञानवदित्यपरस्तस्यापीदमनुमानज्ञानं स्वव्यवसा- यार्थस्य व्यवसायकमव्यवसायकंवा, व्यवसायकं चेत् सिद्ध स्वार्थव्यवसायात्मकं, तद्वत्सर्वतत्त्वज्ञान तथा स्यात् । अव्यव- सायकं चेदसाधनांगं व्यर्थत्वात् । संव्यवहारतोऽनाद्यविद्यो- दयकल्पितात्तव्यवसायान्मकमिति चेत् तर्हि परमार्थतो ना- स्मादनुमानात्स्वव्यवसायात्मकं साध्यं सिद्धयेदिति। यत्कि- चनभाषी स्वव्यवसायात्मकज्ञानैकान्तवादी म्बार्थव्यवसाया- स्मनो ज्ञानस्यार्थक्रियार्थिभिः संव्यहारिभिगदरणीयत्वात् , प्रकाश्याप्रकाशकस्य पदार्थस्य प्रकाशार्थिभिरनादरणीयत्वा- सदलपतिप्रसंगेन प्रपंचत: प्रमाणपरीक्षायां प्रमाणस्य तत्त्वज्ञा- नस्य स्वार्थव्यवसायात्मकस्य परीक्षितत्वात् । ननु च त्वां वर्द्धमानं वीरं स्तुतिगोचरत्वं निनीषवः स्मो वयमद्येति वाक्यं न युक्तं व्याख्यातुं, त्वां वा त्वामेव वीरमे- वैति वाशब्देनावधारणार्थेन ततोऽन्यतीर्थकग्समूहस्य स्तुत्य- स्याभिमतस्य स्तुतिगोचरत्वव्यवच्छेदानुषंगात् तथा च सिद्धा- न्तविरोध इति कश्चित् । सोऽपि न विपश्चित् , स्तोतुरभिप्राया- परिज्ञानात्तस्य ह्ययमभिप्रायोन्त्यतीर्थकरस्यैवैदंयुगीनतीर्थप्रका- शनप्रधानस्य वर्द्धमानत्वेन स्तुतिगोचरत्वसमर्थने सकलस्य स्तुत्यस्य सिद्धान्तप्रसिद्धस्य स्तुतिगोचरत्वं समर्थितं भवत्येक वर्द्धमानत्वस्य तत्साधनस्याविशेषात् थस्य यस्य वर्द्धमानं प्रर्द्ध मानंप्रमाणं केवलज्ञानं परमगुरोः श्रुतज्ञानादि वा परगुरोनिश्ची- युक्त्यनुशासनं । यते सुनिश्चिनामभवद्वाधकप्रमाणत्वेन सुखादिवत् तस्य तस्य स्तुतिगोचरत्वं प्रसिद्धं भवति । वीरशब्देन वा सर्वस्य स्तुत्य- स्याभिधानात्, नायुक्तमवधारणार्थ वाशब्दव्याख्यानं महता महासत्वस्यासहायस्यान्तरारातिनिर्जयनोद्यतस्य पुरुषविशेषस्य शक्तिशुद्धिप्रकर्ष दधानस्य लोके वीरशब्दप्रयोगात् । विशिष्टां मां लक्ष्मी मुक्तिलक्षणामभ्युदयलक्षणांवारातीति वीर इति व्युत्प- त्तिपक्षाश्रयणाद्वा सर्वस्य स्तुत्यस्य संग्रहात् प्रकृतवाक्यव्या- ख्यानं युक्तमुत्पश्यामः ।। किं विशिष्टं मां वीरमृद्धमानं निश्चिन्त्र- न्ति भवन्तो यतः स्तुतिगोचरत्व निनीपवोद्य भवन्तीति भगवता पृष्टा इच सूरयः प्राहुः-विशीर्णदोषाशयपाशबन्धमिति । अत्राज्ञा- नादिदोपस्तस्याशयः संस्कारः पूर्वो दोप आशेतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्तेः । दोपहेतुर्ग ज्ञानावरणादिकर्मप्रकृतिविशेषोदय इति भावकर्मणो द्रव्यकर्मणश्च वचनं, दोपश्चाशयश्च दोपायौ ता- व पाशो ताभ्यां वन्धः पारतंत्र्यं विशीर्णो दोपाशयपाशवं- न्धोऽन्येति विग्रहः । तदैतेनैतदुक्त भवति, यस्माचा विशीर्ण- दोपाशयपागवन्धं वयं निरणेष्म तस्माद्वर्धमानं स्तुतिगोचरत्वं निनीपवः स्म इति । कथमेवंविधं मां निरणैपुर्भवन्त इत्याहुर्यतः कीर्त्या महन्या भुवि बर्द्धमानं त्वां निरणैष्म । कीत्यन्ते जीवा. दयस्तत्वार्था यया सा कीर्ति भगवतो वाक्, महती युक्तिशास्त्रा- विरोधिनी तया । भुवि समवशरणभूमौ साक्षात्परंपरया सक- लपृथिव्यां परमागमविषयभूतां वर्द्धमानः पुष्यन्निखिलप्रेक्षाव- जनमनांसि परापराणि व्याप्नुवन्नित्यभिधीयते । सर्वत्र स- ..
१३. टोकासहित वंदा सर्वेषां युक्तिशास्त्राविरोधिवाक् सिद्ध इत्यर्थः । ततोऽयं समुदायार्थः, स्तुतिगोचरो भगवान्वीरः परमात्मा ऋद्धमानत्वात् यस्तु नैवं स'न बर्द्धमानो यथा रथ्यापुरुषस्तथा चायं भग- वानिति । तद्वद्वर्धमानो भगवान् विशीणदोषाशयपाशवन्धत्वात यस्तु नेत्थं स न तथा यथा मिथ्याक् तथा च भगवान् इति। विशीर्णदोषाशयपाशबंधो भगवान् कीर्त्या महत्या भुवि बर्द्ध- मानत्वात् यस्तु नैवंविधः सन तथा यथा प्रसिद्धो नाप्तः, की- ा महत्या भुवि वर्द्धमानश्च भगवान् तस्माद्विशीर्णदोषाशय- पाशबंध इति केवलयतिरेकी हेतुरन्यथोपपत्तिनियमनिश्चयैक- लक्षणत्वात् स्वसाध्यं साधयत्येव तथाऽऽप्तमीमांसायों व्या- सतः समर्थितत्वात् । किंलक्षणा स्तुतिर्यद्गोचरत्वं मां नेतु- मिच्छन्ति भवन्त इति भगवता प्रश्ने कृत इव सून्यः प्राहु:- याथात्म्यमुल्लध्य गुणोदयाख्या लोके स्तुति रिगुणोदधेस्ते। अणिष्ठमप्यंशमशक्नुवन्तो वक्तुं जिन त्वां किमिव स्तुयाम ॥२॥ "याथात्म्यमुल्लंघ्य गुणोदयाख्या लोके स्तुतिः" इति चतुर- शीतिर्लक्षाणि गुणा स्वेपां. गुणानां याथात्म्यं यथावस्थितस्व- भावस्तदुल्लंध्य गुणोदयस्याख्या लोके स्तुतिरिति लक्ष्यते यत्येवं तदा स्तुतिकरिस्तावन्तः किं शक्ताः भगवता इति पर्यनुयुक्ताः माहुः- युक्त्यनुशासनं। "भूरिगुणोदधेस्ते । अणिष्ठमप्यंशमशक्नुवन्तो वर्तु जिन त्वां किमिव स्तुयाम ।" इति, तर्हि भूरिगुणोदधेर- नन्तगुणसमुद्रस्य ममाणिएमप्यंशं सूक्ष्मतममपि गुण ववत यदि न शक्नुवन्ति भवन्तः किमप्युपमानमपश्यन्तस्तदा कि- मिति स्तोतारो भवन्तीति भगवता पर्यनुयुक्ता इव पाहु:- तथापि वैयात्यमुपेत्य भक्त्या स्तोताऽस्मि ते शक्त्यनुरूपवाक्यः । इष्टे प्रमेयेऽपि यथास्वशक्ति किन्नोत्सहन्ते पुरुषाः क्रियाभिः॥३॥ "तथाऽपि वैयात्यमुपेत्य भक्तचा स्तोतास्मि ते शत्तयनु- रूपवाक्यः ।" तथाऽपि तेणष्ठमप्यश वक्तुमशक्नुवन्नपि वैया- त्यं धाष्टर्यमुपेत्योपगम्य भक्तथा हेतुभूतया ते वीरस्य स्तोता- ऽस्मि शक्तयनुरूपवाक्यः सन्नहमिति संवन्धः परेऽप्येवमुत्सह- मानाः सन्तीति दर्शनार्थमिदमुक्तम् । "इष्टे प्रमेयेऽपि यथास्वशक्ति किं नोत्सहन्ते पुरुषाः क्रियाभिः ।" इति उत्सहन्त एवेत्यर्थः । यदि यथास्वशक्ति स्वेष्टे प्राप्येर्थे प्रत्यादिक्रियाभिः समुत्सहमानपुरुषवत् भव- न्तः स्तुति ववतुं प्रवर्तन्ते तदा कियत वक्तुं शक्ता इत्याह- त्वं शुद्धिशक्त्योरुदयस्य काष्ठां तुलाव्यतीतां जिन-! शान्तिरूपाम् । -- टीकासहितं। ११ 0 अवापिथ ब्रह्मपथस्य नेता महानितीयत्प्रतिवक्तुमीशाः॥४॥ ज्ञानदर्शनावरणविगमादमलज्ञानदर्शनाविभूतिः शुद्धिस्त- थान्तरायविनाशाद्वीर्यलब्धिः शक्तिस्तयोरुदयस्य प्रकर्षस्य काष्ठाऽवस्था तां जिन ! भगवन् ! अवापिथ त्वं । किविशिष्ट तुलाव्यतीतामुपपातिक्रान्तां तथा शान्तिरूपांप्रशमसुखात्मिका सकलमोहक्षयोद्भूतत्वात्ततो ब्रह्मपथस्य नेता महान् परमात्मे- ति, इयन्मानं प्रतिवक्तुमीशाः समर्था इत्यनेन यावती स्वशक्तिः भगवत्संस्तवने तावती मूरिभिनिवेदिता । तत्र शुद्धिः कचि- पुरुषविशेषे पराकाष्ठामधिष्ठिीति प्रकृष्यमाणत्वात्परिमाण- वत् तथा शक्तिः कचित्पुरुष-िशेषे पगं काष्ठामवाप्नोति प्रक- प्यमाणत्वात्परिमाणवदेवेति शुद्धिशक्त्योः प्रकर्षपर्यन्तं गमनं प्रतिवर्यते न पुनर्ज्ञानं कचित्पराकाष्ठां प्रतिपद्यत इति साध्यते। अतिज्ञानस्य श्रुतज्ञानस्य च धर्मित्वे परस्य सिद्धसाध्यतानुषंगात् स्याद्वादिनश्च स्वेष्टसिद्धरभावात् । अवध्यादिज्ञानत्रयस्य धर्मि- वे परेषां धर्यसिद्धिः । सर्वज्ञवादिना साधनवैफल्यं तत्सिद्धे- रिव साध्यत्वात । ज्ञानसामान्यधर्मित्वेऽपि मीमांसकस्य सिद्धसाध मेव चोदनाज्ञानस्य परमप्रकर्षप्राप्तस्य सिद्धत्वात् । शुद्धस्तु धर्मित्वनिर्देशे नोक्तदूषणावकाशः परेषां तत्र विवादात् सिद्धसाध्यतानुषंगाभावात् वादिनः स्वेष्टसिद्धरमतिबंधात् सर्व- ज्ञत्वसामान्यस्य-प्रसिद्धः। + युक्त्यनुशासनं । ननु च यद्यहमेव महानिति प्रतिवक्तुं शक्यस्तदा मदीय- शासनस्यकाधिपत्यलक्ष्मीः किमन्यतीर्थिभिरपोह्यते तदपवाद- हेतुः कश्चिदस्तीति चेत्सोऽभिधीयतामिति भगवत्प्रश्ने सूरयः याहु:- कालः कलिर्वा कलुषाशयो वा श्रोतुः प्रवक्तुर्वचनाशयो वा। खच्छासनकाधिपतित्वलक्ष्मी- प्रभुत्वशक्तेरपवादहेतुः॥५॥ तव शासनं मर्वमने कांतात्यकं इति मतं तस्यैकाधिपति- व सरवश्याश्रयणीयत्वपर्थक्रियार्थिभिरन्यथा तदनुपपत्तेस्त- देव लक्ष्मीः,निःश्रेयसाभ्युदयलक्ष्मीहेतत्वाचस्यां प्रभुत्वं सकल प्रवादितिरम्कारित्वं तत्र शक्तिः मामर्थ्य परमागमान्वितायुक्ति- स्तस्याः संप्रत्यपवादहेतुर्बाह्यः गाधारणः कलिरेत्र कालः सोऽ साधारणस्तु वक्तुर्वचनाशय एव, अन्नरंगस्तु स्तोतुः कलु- घाशय एव दर्शनमाहाक्रांतचेतः । सर्वत्र वाशब्द एक्का- शार्थी द्रष्टव्यः क्षान्तरमूचको वा, तेन कलिर्वा कालः क्षेत्रा- दि; तथाविध इर' वगम्यते । तथाचार्यस्य प्रवक्तुर्वचना- शयो वाऽनुष्ठानाश या वेनि ग्राह्यम् । तथा स्तोतुः कलुषाशयो वा जिज्ञासानुपपनि हेतुवादक इति प्रतिपत्तव्यः ।। कीदृशं पुनर्मदीयशासनमित्यभिधीयते;- AA टीकासहितं । दयादमत्यागसमाधिनिष्ठ नयप्रमाणप्रकृतांजसार्थम्।। अधृष्यमन्यैरखिलैः प्रवादै-- जिन ! त्वदीयं मतमद्वितीयम् ॥६॥ साकल्येन देशतो वा प्राणिहिंसातो विरतिर्दयाव्रतमतृ- तादिविरतेस्तत्रान्तर्भावात् । मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयेषु राग- द्वेषविरतिर्दमः संयमः । वाह्याभ्यन्तरपरिग्रहत्यजनं त्यागः । । पात्रदानं वा । प्रशस्तं ध्यानं शुक्ल्यं धयं वा समाधिः । दया च दमश्च त्यागश्च समाधिश्चेति द्वन्द्वे निमित्तनैमित्तिक- : भावनिबंधनः पूर्वोत्तरवचनक्रमः, दया हि निमित्तं दमस्य तस्यां सत्यां तदुपपत्तेः, दमश्च त्यागस्य, तस्मिन्सति तद्घट- नात्, त्यागश्च समाधेस्तस्मिन्सत्येव विक्षेपादिनिवृत्तिसिद्धे- रेकायस्य समाधिविशेषस्योपपत्तेः, अन्यथा तदनुपपत्तेः । तेषु दयादमत्यागसमाधिषु निष्ठा तत्परता यस्मिन्मते तत् त्वदीयं मतं शासनमद्वितीयमेकमेव सर्वाधिनायकमित्यर्थः । कुतो मदीयं मतमे- वंविधं सिद्धमिति चेत् “नयप्रमाणप्रकृतांजसार्थम्" यस्मात् नयौ च प्रमाणे च नयप्रमाणानीति द्वन्द्वे प्रमाणशब्दादभ्य- हितार्थादपि नयशब्दस्याल्पाच्तरस्य छन्दोवशात्पूर्वनिपातो न वेरुद्धयते । प्रकर्षेण सर्वदेशकालपुरुषपरिषदपेक्षालक्षणेन कृतो निश्चित इत्यर्थः । अंजसा परमार्थेन प्रणीत आजसोऽसं- अवद्धाधक इति भावः । अर्थो जीवादिद्रव्यपर्यायात्मा। नयप्र- " - १. २ युपस्यनुशासन। माणैः प्रकृत प्रांजसोऽर्थोऽस्मिन्निति नयप्रमाणप्रकृतांजसाथै मतम् । नयप्रमाणैः सुनिश्चितासंभवद्भाधकविषयमित्यर्थः । तथाविधमपि कुतः सिद्धमिति चेत् यस्मादधृष्यमन्यैरखिलै। प्रवादैरिति निवेद्यते । दर्शनमोहोदयपरवशैः सर्वथैकान्तवा- दिभिः प्रकल्पिता वादाः प्रवादा: सर्वथैकान्तवादास्तैगखिलैर- खिलदेशकालपुरुषगतैरधृष्यमबाध्यमिति निश्चयः । कस्मात्तैः कलिता वादा न पुनः परमार्थावभासिन इति चेत्, यस्मातू त्वदीयमतादन्ये वाह्याः सम्यगनेकान्तमताब्धे ह्या मिथ्यका- न्ता भवन्ति ते च कल्पितार्थाः प्रसिद्धास्तद्वादाः कथमिव परमार्थपथप्रस्थापकाः स्युर्यतस्तैरबाध्यं त्वदीयं मतं न स्यात, न हि मिथ्याप्रवादैः सम्यग्वादो बाधितुं शक्योतिप्रसंगात् । ननु च द्रव्याथिकनयेन निश्चितीर्थो न पारमार्थिको मदीय- मतस्य सिद्धः परेषां संभवद्भाधकत्वात् , पर्यायाथिकनयैस्तु निश्चितार्थवत् । तथाहि-न जीवादिकद्रव्यमेकमनपायि वा- स्त्तवं क्रमयोगपद्याभ्यामर्थक्रियाविरोधात् । नहि द्रव्यस्य दे- शकृतस्तावत् कश्चित् क्रमः संभवति निष्क्रियत्वात्तस्य देशा- न्तरगमनायोगात, सक्रियत्वे सर्वव्यापकत्वविरोधात् । नाऽपि कालकृतः शाश्वतिकत्वात्सकल कालव्यापित्वात् प्रतिनियत- कालत्वे नित्यत्वविरोधात् द्रव्यत्वाघटनात् । स्वयमक्रमस्य सह- कारिकारणक्रमापेक्षः क्रम इत्यप्यसारं, सहकारिभ्यःकचिदप्य- तिशयमनासादयतस्तदपेक्ष'नुपपत्तेरतिप्रसंगात् । सहकारिकृत- मुपकारमात्मसात्कुर्वतः कार्यत्वप्रसंगादनित्यत्वापत्तेः। यदि तु टोकासहितं । १६ नित्यदन्यस्य कंचिदप्युपकारमकुर्वतामपि सहकारित्वमुररीकि- यते तेन सह संभूय कार्यकरणशीलानामेव सहकारित्वव्यव- स्थितिरिति मतं, तदपि न नित्यद्रव्यस्य क्रमः सिद्धयेत् तस्याक्रमत्वात् । सहकारिणामेव क्रमवश्वात् । सहकार्यपेक्षः क्रमोऽपि द्रव्यस्यैवेति चेत् न, तस्याऽपि देशकृतस्य कालकृत- स्य वा विरोधात् । तथा क्रमेण सहकारिणमपेक्षमाणस्य कालभेदादनित्यत्वप्रसंगात् कार्येणाऽपि क्रमेणापेक्षमाणस्य भेदापत्तेः सहकारिविशेषवत् ततो न क्रमः सर्वथा द्रव्यस्य संभवति । नाऽपि योगपy युगपदेकस्पिन्समये सकलार्थक्रिया- निष्पादनाद् द्वितीयसमयेऽनर्थक्रियाकारित्वेनाऽवस्तुत्वप्रसंगात निष्पादितनिष्पादनप्रसंगाद्वा । तदेवं द्रव्यान्नित्यात्मकात् क्रम- यौगपद्ये निवर्तमाने स्वव्याप्यामर्थक्रियां निवर्तयतः, साच निवर्तमाना वास्तवत्वमिति व्यापकानुपलब्धेर्चाधिकायाः संभवान्नासंभवस्यकत्वं द्रव्यस्य सिद्धं सौगतानां । नापि पर्यायस्य क्षणिकस्यासंभवद्धाधकत्वं सिद्ध्यति तत्रापि व्या- पकानुपलंभस्य बाधकस्य संभवात् । तथाहि-पर्यायो न वा- स्तवोऽर्थक्रियानुपलंभात् , न तत्रार्थक्रियोपलंभः क्रमयोगप- यविरोधात् , न तत्र क्रमयोगपद्ये संभवतः परिणामानुपल- ब्धेः, न तत्र परिणामोऽस्ति पूर्वोत्तराकारव्यापिद्रव्यस्थितेरनु- पलब्धेः , न तत्र पूर्वोत्तराकारच्यापिद्रव्यस्थितिरस्ति प्रतित्त- गणमुत्पादानन्तरं निरन्वयविनाशाभ्युपगमात् । न च तत्र क- स्यचित्कृतश्चिदुत्पत्तिर्घटते , सति कारणे कार्यस्योत्पत्तौ क्ष- , २० युक्त्यनुशासनं । * गणभंगप्रसंगादसति कारणे कार्यस्योदये विनष्टतमस्य भविष्य- तमस्य च कारणत्वप्रसंगस्तस्मिन्नप्यसति कार्यस्योदयात् । ए- तेन स्वकाले सति कारणे कार्यस्योत्पत्तिरिति पक्षान्तरमप्यपा- स्तम् । कारणत्वेनाभिमतस्यापि स्वाकाले सचोपपत्तेः । त- दित्थं नयनिश्चितोऽर्थो न पारमार्थिकः शासनस्य संभ- बद्धाधकत्वात्तैमिरिकज्ञाननिश्चितेन्दुद्वयवत् । तथा प्रमाणपक- तोऽप्यों द्रव्यपर्यायात्मको नांजसः सिद्धयेत् , तत एव तद्वत् स हि येनात्मना नित्यस्तेनैवात्मनाऽनित्यश्चेद्विरोधो वाधकः, स्वभावांतरेण चेद्वैयधिकरण्यं तस्य प्राप्तं परस्परविरुद्धयोनि- त्यानित्यात्मनोरेकाधिकरणत्वादर्शनात्, कचिद्देशे शीतोष्ण- स्पर्शवत, तयोरेकाश्रयत्वे वा युगपदेकेनैवात्मना नित्यानित्यत्व- योः प्रसक्तेः संकरः स्यात् । येनात्मना नित्यत्वमिष्टं तेना- नित्यत्वमेव, येन चानित्यत्वं तेन नित्यत्वमेवेति परस्परगम- नात् व्यतिकरः, अयमात्मानं पुरोधाय नित्यो जीवादिरर्थः क- थ्यते, एवं पुरोधायानित्यस्तौ यदि ततोऽर्थान्तरभूतौ, तदा वस्तुत्रयप्रसंगस्तानि च त्रीण्यपि वस्तूनि यदि नित्यानित्या- त्मकानि तदा प्रत्येकं पुनर्वस्तुत्रयप्रसंग इति अनवस्था स्यात् । बदि तु तौ ततोऽनन्तिरभूतौ तदा जीवाद्यर्थ एव न तावा- मानौ तदभावात्ते न नित्याश्वानित्याश्च व्यवस्थाप्यंते, तावेव चात्मानौ न ततोऽपरोऽर्थः स्यादिति कस्यचिन्नित्यत्वा- नित्यत्वे तौ साधयेयातां । स्वयमेव तौ नित्यानित्यौ स्याता- मिति चेदि यो नित्यः स नित्य एव, यश्वानित्यः सोनित्य टीकासहितं! २६ एवेति प्राप्त, तथा चोभयदोषानुषंगः सर्वथैकस्य नित्यानि- स्थात्मकस्यार्थस्याप्रतिपत्तिप्रसंगः। दृश्यतयोपगम्यमानस्य छ सर्वथाऽनुपलब्धेरभावप्रसंगः तस्यादृश्यत्वप्रतिज्ञाने चादृष्टप- रिकल्पनमनुषज्येतेत्यनेकबाधकोपनिपातान्न प्रमाणनिश्चितोऽर्थः शासनस्यांजसः स्यादाकाशकेशपाशप्रकाशकशासनवत् तैमि- रिकस्येति कथं नयममाणमकृतांजसाथ मदीयं मतं स्यादन्यैर- खिलैः प्रवादैः सौगतादिभिः धृष्यमाणत्वात्तत एव न दयाद- मत्यागसमाधिनिष्ठं सर्वथा संभववाधकस्य जीवस्य दयादिचतु- प्रयासंभवात् तद्विषयस्य दयादिनिष्ठत्वासिद्धेस्तथा च कथमद्विती- थं सर्वाधिनायकत्वानुपपत्तेरिति वदन्तमिव भगवन्तं विज्ञापयन्ता मुरयः प्रमाणनयप्रकृतं पारमार्थिकं तत्त्वं साधयन्ति- अभेदभेदात्मकमर्थतत्त्वं तव स्वतंत्रान्यतरत् खपुष्पम् । अवृत्तिमत्त्वात्समवायवृत्तेः संसर्गहानेः सकलार्थहानिः ॥७॥ टीका-अभेदो द्रव्यं नित्यं, भेदः पर्यायो नश्वरस्ता- आत्मानौ यस्य तदभेदभेदात्मकं तव भगवन् ! अर्थतत्त्वं जीवादितत्त्वं परस्परतंत्रं द्रव्यपर्यायात्मकमित्यभिधीयते अ- स्माभिने पुनः स्वतंत्रं द्रव्यमानं पर्यायमात्रं वा तदुभयं वा विज्ञाप्यते तस्य खपुष्पसमत्वात्, प्रतिपादितक्रमेण संभवद्बाध- कस्यास्माभिरपीष्टत्वाद्वास्तवत्वानुपपत्तेः, नयप्रकृतस्य प्रमाण- युक्त्यनुशासनं। प्रकृतस्य वाऽर्थस्य जात्यंतरस्यांजसस्य त्वदीयमतेन स्वीकर- णादद्वितीयमेव तवेदं मतमनुमन्यामहे ततोऽन्यैरखिलैः प्रवा- दैरधृष्यत्वसिद्धेः । ननु चास्तु स्वतंत्रं द्रव्यमेकं खपुष्पसमानं प्रत्यक्षादिभि- रनुपलभ्यमानत्वात् क्षणिकपर्यायवत् तदुभयं तु द्रव्यगुणकर्म- सामान्यविशेषसमवायरूपं सत्तत्वं प्रागभावादिरूपमेवासत्तत्वं स्वतंत्रमपि कथं खपुष्पवत् स्यात्तस्त्र द्रव्यादिमत्ययविशेषवि- पयस्य सकलजनप्रसिद्धत्वादिति चेत्, न कारणकार्यद्रव्ययोर्गु- णगुणिनोः कर्मतद्वतोः सामान्यतद्वतोशेिष्यतद्वतोश्च पदार्था- न्तरतया स्वतंत्रयोः सकृदयप्रतीयमानत्वात्सर्वदावयवावय- च्यात्मनोर्गुणगुण्यात्मनः कर्पतद्वदात्पन: सामान्यविशेषात्मन- श्वार्थतत्वस्य जात्यन्तरस्य प्रत्यक्षादितः सर्वस्य निर्वाधमव- भासनात् । स्यान्मतं, परस्परनिरपेक्षमपि पदार्थपंचकं समवायसंबंध- विशेषवशात् परस्परात्मकमिवावभासतेऽनुत्पन्नब्रह्मतुलाख्य- ज्ञानातिशयानामस्मादृशामिति । तदपि न परीक्षाक्षम सर्वदाऽ- स्मदादिप्रत्यक्षस्य भ्रांतत्वप्रसंगात्तत्पूकानुमानादेरपि प्रमाण- त्वानुपपत्तेरप्रमाणभूतात्मत्ययविशेषात्पदार्थविषयव्यवस्थापना- संभवात् ; तथाऽभ्युपगम्यापि पर्यनुयुंज्महे-अवयवावयव्यादीनां समवायत्तिः पदार्थान्तरभूता ततो वृत्तिमती वा स्यादत्तिमती वा? न तावत् प्रथमकल्पना संभवति तत्र संयोगवृत्तेरयोगात्तस्या द्रव्यदृचित्वादन्यथा गुणत्ववद्विरोधात् । न समवायवृत्तिः समवाया टीकासहितं। स्तरस्यानभ्युपगमात् विशेषणभावस्यापि वृत्तिविशेषस्य स्वतं- अपदार्थादिषयत्वादन्यथातिप्रसंगात् सह्यविंध्ययोरपि विशेषण- विशेष्यभावानुषंगात् । संभवंती वा विशेषणभावाख्या वृत्तिमद्भ्यो ऽर्थान्तरभूता वृत्त्यंतरानपेक्षा न जाघटीति तवृत्त्यंतरापेक्षायाम- नवस्थानात कुतो वृत्तिर्व्यवस्थिता स्याद्यया समवायवृचित्ति- मतीष्यते । यदि पुनरवृत्तिमतीति कल्पनोत्तरा समाश्रियते तदाप्यवृत्तिमत्त्वात्समवायवृत्तेः संमर्गहानिः सकलार्थानाम- नुषज्यमाणा महेश्वरेणापि निवारयितुमशक्यापनीपोत । यदि पुनः स्वभावतः सिद्धः संसर्गः पदार्थानामन्योन्यं न पुनरसं- स्पृष्टानां समवायवृत्त्या संसर्गः क्रियते समवायसमवायिवदिति मतांतरमुररीक्रियते तदा स्याद्वादशासनमेवाश्रितं स्यात् स्वभा- बत एव द्रव्यस्य गुणकर्मसामान्यविशेषाशेषैः कथंचित्तादा- म्यमनुभवतः प्रत्ययविशेषवशादिदं द्रव्यमयं गुणः कर्मेदं सा- मान्यमेतत विशेषोऽसौ तत्संबंधोऽयमविष्वग्भावलक्षणः सम- चाय इत्यपोद्धृत्य सन्नयनिबंधनो व्यवहारः प्रवर्तत इत्यनेका- न्तमतस्य प्रसिद्धत्वात् स्वतः परतोवार्थानां संसर्गहानौतु सक- लार्थहानिः स्यात, तामनिच्छद्भिरभेदभेदाल कमर्थतत्त्वं परस्प- रतंत्रं मातीतिकमक्रियासमर्थ सामर्थ्यात् समर्थनीयं तत्र विरो- धानवकाशात्तत्रोपलभस्याबाधितस्य सद्भावात् तद्विरोधस्य वाऽनु- पलंभलक्षणत्वात्सुदूरमप्यनुसृत्य सर्वैः प्रवादिभिरेकस्य वस्तुनो ऽनेकात्मकस्याश्रयणीयत्वात् योगैः सामान्यविशेषवत् ; न हि सा- मान्यविशेष एक एवानुवृत्तिव्यावृत्तिप्रत्ययजननशक्तिद्वयात्मको - युक्त्यनुशासन । नेष्यते । स्वसमयविरोधाच्छक्तिद्वयस्य ततो भेदो नैकोऽनेका- स्मक इति चेत् न, तस्य निःशक्तिकत्व प्रसंगात् । तस्य शक्ति- भ्यां संबंधान्न निःशक्तिकत्वमिति चेत्तर्हि तस्य शक्तिभ्यां संबन्धौ स्वीकुर्वतः कथमनेकात्मक न स्यात् । तसंबंधयोरपि ततो भेदे तदेव निःशक्तिकत्वं ताभ्यामपि संबंधाभ्यामन्ययोः संबंधयोः परिकल्पनायापनवस्था स्यात् । तदसत्, तत्संबंधात्म- कत्वोपगमे शक्तिद्वयात्मकत्वमेवास्तु शक्तिशक्तिमतोः कथचित्ता- दात्म्यात्, तथा च सामान्यविशेष एवैकोऽनेकान्तात्मके वस्तुनि विरोधं निरुणद्धीति कि नश्चिन्तया, तद्वद्वैयधिकरण्यादिदृषण- कदंवकमपि ततो दुरतरं समुत्साश्यतीति कृतं प्रयासेन; स्वयं मेच- कज्ञानं चैकानेक प्रतिभास स्वीकुर्वत् कथमनेकान्तं निरसितमु- सहते सचेतनः। मेचकज्ञानमेवेत्ययुक्तं तस्य नानास्वभावत्वा- भावेऽनेकार्थग्राहित्वविरोधात नानार्थग्रहणस्वभावोऽप्येकएव त- स्येष्यते सत्त्वादिसामान्यस्य नानाव्यक्तिव्यापकैकस्वभाववदिति वैत्, न तथा परं प्रति साध्यत्वात् सत्मत्ययाविशेषाद्विशेषलिंगा- भावादेकं सत्चसामान्यमेकम्वभावं सिद्धं तद्वत् द्रव्यादिसामान्य द्रव्यत्वादिप्रत्याविशेषाद्विशेषलिंगाभावाचेति चेत्, न सत्त्व- द्रव्यादिप्रत्ययस्य प्रतिव्यक्तिविशेषसिद्धेः सचद्रव्यत्वादिसामा- न्यस्यानेकत्वव्यवस्थितेः । इदं च सदिदं च सदिति समाने इमे सती तथा समाने द्रव्ये गुणौ कर्मणी चेति समानप्रत्ययात् समान- परिणामस्य प्रतिव्यक्ति व्यक्त्यंतरापेक्षया भिद्यमानस्य निर्वाध- बोधाधिरूढत्व त् । तत्र चिविकल्पानवस्थादिवाधकस्यानवका- टीकासहित। शात् । ननु च समानपरिणामेपु समानप्रत्ययात् समानपरिणामा- न्तरमसंगादनवस्थानं बाधकमत्रास्त्येवेति चेत्, न सपानपरिणा- पानां व्यक्तिष्वेव स्वेष्वपि समानमत्ययहेतुत्वादनवस्थानुपपत्तेः स्वयं व्यक्तयस्तथा समानप्रत्ययहेतवः सन्तु किं समानपरिणा- मकल्पनयेत्यप्यनालोच्याभिधानं कांदिव्यक्तीनामपि गोप्र- त्ययहेतुत्वप्रसंगात् । गोरूपेण समानेन परिणता एव खंडादि- व्यक्तयो गोप्रत्ययहेतव इति चेत्. मिद्धः समानपरिणामोऽनेका प्रतिव्यक्तिभेदप्रतीतेः । नहि गोत्वं सामान्यमेकं तत्समवा- यात् खंडादिषु गोप्रत्यय इति व्यवस्थापयितुं शक्यं कर्मादि- व्यक्तिष्वपि तत्समवायात् गोप्रत्ययत्वप्रसंग त् । न च सर्व- व्यक्तिभ्यः सामान्यस्य समवायस्य च सर्वथा भेदेऽपि खडा- दिव्यक्तिष्वेव गोत्वं समवैति न पुनः कर्कादिष्विनि युक्तम्- रपश्यापः । इह खंडादिषु गोत्वमिति सत्पत्ययाविशेषाखंडा- दिष्वेव गोत्वस्य सपवाय इति चेत्, तर्हि न नासमवाय: सिद्धः प्रतिसमवायिप्रत्ययभेद त् सपवायिन एव नानासम- वायस्तत्वंभावेन व्य ख्यामिति वचनात् । सत्तारत्तदेकदा- सिद्धेरिति चेत्, नैकस्य निरंशस्य देशकालभिन्नसायिपु सर्वथेहेदमिति प्रत्ययहेतृत्वविरोधात् संयोगस्याप्येकस्यानंशस्य संयोगिषु संयुक्तप्रत्ययहेतुत्वप्रमंग त् तथा चैक एवं समवा- यवत् संयोगः स्यादिति यौगमनमतिवर्तते । यदि पुनर्नाना संयोगः शिथिलः संयोगो निविडः संयोग इति विशेषप्रत्य- यान्मन्यध्वं तदा नित्यः समवायो नश्वरः समवाय इति प्रत्य- २६ युक्त्यनुशासनं। यभेदात् समवायोऽपि । नानावस्तुसमवायिनोरनित्यत्वात्स चेत तहि संयोगिनोः शिथिलत्वात्संयोगः शिथिल इत्युपच- र्यतां परमार्थतस्तस्य निविडरूपत्वात् । नानासंयोगो युतसिद्ध- द्रव्याश्रयत्वाद्विभागवदिति चेत् न, द्रव्यत्त्वेन परस्परव्यभिचा- रात् तथा समवायो नाना स्यादयुतसिद्धावयवावयविद्रव्याश्र- यत्वाद् द्वित्वसंख्यावदित्यपि शक्यं वक्तुं । समवायस्यानाश्रय- वादसिद्धोत्र हेतुरिति चेत्, न पण्णामाश्रितत्वमन्यत्र नित्य- द्रव्येभ्य इति वचनविरोधात् । समवायम्योपचारादाश्रितत्व- सिद्धेस्तथा वचनं न विरुध्यते समगयिनोः सत्तोरेवेहेदमि- ति प्रत्ययोत्पादस्योपचारकारणस्य सद्भावादिति चेत्, कथ- मेवमवयवावयविद्रच्याश्रयत्वात् इति हेतुरसिद्धः स्यात् तस्यो- पचारानुपचारानपेक्षयाश्रितत्वात्, सामान्यरूपत्वेनाभिधानात् । परमार्थतोऽनाश्रितत्वेऽपि एतदभिधीयते-नानासमवायो नाश्रि- तत्वात् परमाणुवदिति । नन्वेवं वदन् समवायं धर्मिणं प्रप- यते चेत्, कालात्ययापदिष्टो हेतुश्च धर्मियाहकप्रमाणवाधि- तत्वात् । न प्रतिपद्यते चेदाश्रयासिद्धो हेतुरित्यपि न दूषणं समवायस्याविष्वग्भावस्वंधस्य कदाचित्तादात्म्यलक्षणस्यैक- त्वानेकत्वाभ्यां विवादापन्नस्य प्रतिपत्तेमिग्राहकप्रमाणान्त- रैकत्वासिद्धेस्तेन बाधाऽनुवपत्तेः कालात्ययापदिष्टवायोगात् । तदेकत्वसाधनस्य च प्रमाणस्थासंभवात् स्वमत्ययाविशेषस्यासि- द्धत्वात् । कालादिभिर्व्यभिचार इति चेत्, न तेषामपि कथंचि- न्नानात्वसिद्धेः कालस्यासंख्येयद्रव्यत्वात्खस्यानंतप्रदेशत्वात् टीकासहित। २७ स्याद्वादिनांमते, ततः समवायस्य नानात्वप्रसिद्धौच सामान्यस्य प्रतिव्यक्तिसमवायं कथंचित्तादात्म्यं प्रतिपद्यमानस्य नानात्व- सिद्धिर्नानाव्यक्तितादाम्येन स्थितत्वात् व्यक्तिस्वरूपवदिति नैकस्वभावं सामान्यं सत्वं द्रव्यत्वादि वा परमपरं वा सिद्धं यह इदमुच्यते नानाव्यक्तिव्यापकैकस्वभावसामान्यवन्नानार्थग्रा- हकैकस्वभावं मेचकज्ञानमिति । नान स्वभावत्वे तु मेचकज्ञा- नस्यैकस्य तदेवाभेदभेदात्मकं वस्त्वेकानेकात्मकं नित्या- नित्यात्मकं साधयेत् सकलविरोधादिबाधकपरिहरणसमर्थत्वात् सौगतानां च वेद्यवेदकाकारसंवेदन तत्त्वमेकमनेकात्मकं साध- यत्येव । वेद्यवेदकाकारयोभ्रांतत्वे संवेदनस्य चाभ्रान्तत्वे भ्रान्तेतराकारमेकं संवेदनं, भ्रान्ताकारस्य चासत्वे संविदा- कारस्याभ्रान्तस्य सत्वे सदसदात्मकमेकं, विषयाकारविवे- कितया परोक्षत्वे संविद्रूपतया प्रत्यक्षत्वे परोक्षप्रत्यक्षाकारमेकं विज्ञानं कथं निराकुयुः यतोऽनेकान्तसिद्धिर्न भवेत् । कपि- लानां तु तत्त्वमेकं प्रधानं सचरजस्तमोरूपं सर्वथैकान्तकल्प- नां शिथिलयत्येव । तस्यैवानेकान्तात्मकवस्तुसाधनत्वात् । सवादीनामेव साम्यमापन्नानां विनिहत्तप्रसवप्रवृत्तीनां प्रधान- व्यपदेशात् । तद्व्यतिरिक्तप्रधानाभावान्नैकमनेकान्तात्मकमिति: चेत् नैकप्रधानाभ्युपगमविरोधात् प्रधानत्रयसिद्धः। सर्वसं- हारकाले प्रधानमेकमेवाद्वयं न सच्चादयस्तेषां तत्रैव लीनत्वा- दिति चेत्, कथमेकस्मादनेकाकारं महत् प्रजायेतातिप्रसंगात् । सुखदुःखमोहशक्तित्रयात्मकत्वात्प्रधानस्य न दोष इति चेत्..
युक्त्यनुशासनं। कथमेवमेकमनेकशक्त्यात्मकं प्रधानमनेकांत न साधयेत्, भो- क्तृत्वायनेकधर्मात्मकपुरुषतत्ववत् । भोवतृत्वादीनामवास्तवत्वा- देकमेव पुरुपतत्वमिति चेत्, न वास्तवावास्तत्वसिद्धेः, पुरु- यस्यानेकत्वानिवृत्तः। तस्यावास्तवधर्मरूपेणासत्वान्नानेकरूप- त्वमिति चेत्, न तथा सदसदात्मकतयाऽनेकांतसिद्धेः । ततो भगवतो जिनस्य मतमद्वितीयमेव नयप्रमाणप्रकृतांजसार्थत्वा- दखिलैः प्रबादैरधृष्यत्वाच्च व्यवस्थितमिति योगमतस्यैव स- दोषत्वसिद्धेरखिलार्थहानियवतिष्ठते । इतश्च सकलार्थहानियागानामित्यभिधीयते- भावेषु नित्येषु विकारहाने- न कारकव्यापृतकार्ययुक्तिः। न बंधभोगौ न च तद्विमोक्षः, समंतदोष मतमन्यदीयं ॥८॥ टीका-दिकालाकाशात्ममनःसु पृथिव्यादिपरमाणुद्र- व्येषु परममहत्तादिषु गुणेषु सामान्यविशेषसमवायेषु च भा- वेषु नित्येष्वेवाभ्यनुज्ञायमानेषु विकारस्य विक्रियाख्यस्य हानिः प्रसज्येत । विकारहानेश्च न कारकव्याप्तं कर्नादिका- रकव्यापारस्य विक्रियापाये संभवाऽभावात् । क्रियाविष्टं द्रव्यं कारकमिति प्र-िद्धः । कारकव्यापृत्ताभावे च न कार्य द्रव्यगु- गकर्मलक्षणं प्रतिष्ठामियतीति । तदप्रतिष्ठायाञ्च न युक्तिरनु- मानलक्षणानुबंधे साध्ये तस्याः कार्यलिंगत्वात्तदभावे चाघ- 1 टोकासहित। २६- स्नात् । बंधाभावे च भोगः फलं न भवति । नापि तद्विमो- शस्तस्य बंधपूर्वकत्वादिति सकलार्थहानिः स्यात् । भावानाम- भावे प्रागभावादीनामप्यसंभवात्तेषां भावविशेषणत्वात्स्वतंत्रा- गणामनुपपत्तेः। एतेन मीमांसकानां शब्दात्यादिषु भावेषु नित्येषु प्रतिज्ञायमानेषु विकारहानेः कारकव्याप्तकार्ययुक्तिः प्रत्याख्याता, तन्निबन्धनौ च बंधभोगौ, सद्विमोक्षश्चानंदात्म- कब्रह्मपदावाप्तिरूपः प्रतिक्षिप्तः । कथंचिदभेदभेदात्मकत्वे तु, भावानामभ्युपगम्यमाने स्याद्वादाश्रयणं नित्यत्वैकांतविरोध- प्रातीतिकमवश्यं भावि दुर्निवारं इति समंतदोषमन्यदीयमन्येषां वैशेषिकनैयायिकानां मीमांसकानाञ्चेदमन्यदीयमिति प्रति- पत्तव्यम् । अथवा कापिलानां मतमन्यदीयं समन्तदोषमिति व्याख्यायते समन्तात् देशकालपुरुषविशेषापेक्षयाऽपि सर्वतः प्रत्यक्षानुमेयागमगम्येषु सर्वेषु स्थानेषु सर्वत इति ग्राह्य सम- न्तात् दोषो बाधकं प्रमाणं यस्मिस्तत्समन्तदोषं, तच्चान्यदीर्य मतं न त्वदीयमिति भावः । कथं तत्समन्तदोषमित्युच्यते । यस्माद्भावेषु नित्येषु निरतिशयेषु पुरुषेषु सांख्यैरभिमतेषु निर्विकारस्य पुरुषार्थप्रधानप्रवृत्तिविक्रियालक्षणस्य हानिः प्र- सज्यते । स हि प्रधानस्य विकारो महदादिः पुरुषार्थों भवतु, शुरुषस्य कंचिदुपकारं करोति वा न वा ? यदि करोति तदा पुरुषादनान्तरमर्थान्तरं वा । ततोऽनन्तरं चेत् , तमेव क- रोतीति कार्यत्वप्रसंगात घुसो नित्यत्वविरोधः । ततोऽर्थान्तर चेन्न तस्य किंचित्कृतं स्यादिति कथं पुरुषार्थः प्रकृतेविकार ३० युक्त्यनुशासनं । स्यात् । प्रकृतिकृतविकारोपकारेण पुरुषस्योपकारान्तरकरणेऽ- नवस्थामसंगात् । ननु चन पुरुपस्योपकारकरणान्महदादिः पुरु- पार्थोऽभिधीयते सांख्यैर्नाति पुरुषेण तस्योपकारसंपादनात सर्वथा तस्योदासीनत्वात् । किं तर्हि पुरुषेण दर्शनात् पुरु- पार्थः वःथ्यते । पुरुपभोग्यत्वादिति केचित्, तेऽपि न परीक्ष- काः सर्वथोदासीनस्य पुरुषस्य भोक्तत्वविरोधात् दृश्यस्य भोग्य- त्वायोगात् । ननु च वीतरागसर्वज्ञदर्शनवत् पुंसो विषय- दर्शनं भोगः, स च शुद्धस्यात्मनः संभवत्येव रागादिमलाभा- वात् । तद्विषयस्य च भोग्यत्वं निर्विपयस्य भोगासंभवात्ततः सर्वथोदासीनस्यापि भोक्तृत्तं न विरुध्यते इति चेत् न, परि- णामित्वप्रसंगात् स्याद्वादिनः सर्वज्ञवत, स हि सर्वज्ञः पूर्वोत्त- रस्वभावत्यागोत्पादनाभ्यामवस्थितस्वभावः परिणाम्येव सर्वा- न्पिश्यति नान्यथा, प्रतिसमयं दृश्यस्य परिणामित्वे द्रष्टुरप- रिणामानुपपत्तेर्न चायं दृश्यमर्थमपरिणामिनं वक्तुं समर्थः स्वयं तस्य परिणामित्वोपगमात् सिद्धांतपरित्यागानुषंगात् । चि- च्छक्तिरपरिणामिन्येति चेत्, नादर्शितविषयत्वत्यागेन दर्शित- विषयत्वोपादानादवस्थिताया एव नस्याः परिणामित्वसिद्धेः। एतेनाप्रतिसंक्रमत्वादपरिणामिनी चेतनेति प्रत्युक्तं । प्रति- विषयं दर्शितविषयत्वे संक्रमात् तथा बुद्धरेव प्रतिसक्रमो न तु चिच्छक्तेरिति चेत्, न बुद्धेरप्यप्रतिसंकाप्रसंगात् विषयस्यैष्ठ अतिसंक्रमप्रसंगात्, बुद्धयावसीयमानस्य विषय प्रतिसक्रमे बुद्धेः कथमतिसंक्रय इति चेत्, तर्हि बुद्धेः प्रतिदर्शि- टीकासहित । कायाः प्रतिसंक्रमे तद्विषयस्य चितिशक्तिः कथमतिमंत्र- मेति चिन्त्यं, यथैव हि विषयं प्रतिनियतं दर्शयन्ती बुद्धि- श्चितिशक्तये संक्रामति तथा क्रमेण चितिशक्तिरपि पश्यंती विशेषाभावात कथमन्मथा क्रमेण दर्शितविषया स्यात् । चि- छक्तिरप्रतिसंक्रमैव सर्वदा शुद्धत्वादिति चेत्, न शुद्धात्मनो- ऽपि स्वशुद्धपरिणामं प्रनि क्रमाविरोधात्तत्राशुद्धपरिणामसंक्र- अस्यैवासंभवात् । शुद्धपरिणामेन पि चितिशक्तिरप्रतिसंक्र- मानंतत्वादिति चेत्, न प्रकृत्या व्यभिचारात्। साऽपि ह्यनंता सांतत्वेऽपि नित्यत्वविरोधात् । प्रकृतेर्मदादिपरिणामसद्भावा- अतिसंक्रमः सिद्धचेन पुनश्चिन्छक्तेरपरिणामित्वादिति चेत्, न तस्या अपि दृश्यदर्शनपरिणामसद्भावसिद्धेः । एतेन चि- उछक्तेरपतिसंक्रमे साध्ये परिणापरहितत्वे सत्यनंतत्वादिति इतोरसिद्धत्वं व्यवस्थापितम् । स्यान्मतं, चिच्छक्तिरपरिणामिन्यप्रतिसंक्रमा शुद्धन्वे सत्य- नेतत्वात्परसंग्रहविषयसत्तावदिति । तदप्यसत् । सत्ताया गु- णीभूतपरिणामसंक्रमाया एव परसंग्रहविषयायाः स्याद्वादिभिर- भीष्टत्वात् माध्यसमत्वादुदाहरणस्य । न हि निराकृतपरिणा- मसंक्रमं किंचिद् द्रव्यं द्रव्यार्थिकनयं प्रत्यापयति दुर्नयत्वप्रसंगात् ब्रह्मवादवत् । नापि स्वपरिणामभिन्नमुपचरितपरिणामसंक्र- धमुररीक्रियते, यतस्तदुदाहरणीकृत्य चिच्छक्तिस्तथाविधा साध्येति । ननु च परेषां दृश्यम्य द्रष्टुरत्यंतभेदात् दृश्ये परिणा- मिनि प्रतिसंक्रमो द्रष्टुरिति चिच्छक्तिलक्षणे शुद्धात्मनि उप- युक्त्यनुशासनं। चर्यते तयोः संसर्गाश्चेतनस्य दर्शितविषयत्वोपगमात् ततो न परमार्थतो परिणामप्रतिसक्रम पानिपेद्धमुचितमिति चेत् तर्हि दर्शितविषयत्वम्योपरिनत्वे दर्शनमनुपचरितमात्मनः असज्येत, अथ दश- भेदस्तत्रोपचरित एव भिन्नस्य दर्शनस्य वृशिशक्तिरूपस्य वास्तवत्वादिति मतं तदपि न सम्यक् । हाश- शक्तेः स्वभावभेदमन्तरेण नानाविधदृश्यदर्शनविरोधात् तद्द- शितविषयस्वभ वभेदस्य पारमार्थिव स्यैव सिद्धः । स्यान्मतं चिन्छक्तरेक एवाभिन्नः स्वभावोऽभ्युपगम्यतेऽ- स्माभिर्येन यो श्दा यत्र यथा दृश्यपरिणामो बुद्धयाध्यवसीयते तंतदा तत्र तथा पश्यतीति दर्शितविषयत्वेपितस्याःप्रतिविषयं नस्वभावभेद इति । तदप्यसंभाव्यं, तथा बुद्धेरप्येवस्वभावत्वम- संगात् । शक्यं हि वक्तु बुद्धेरेक एव क्रममाव्यनेकविषयव्यवसा- यस्वभावो येन यथाकालं यथादेश यथाप्रकारं च विषयम- ध्यवस्यतीति न किंचिदनेकस्वभाव सिध्येत्तथेन्द्रियमनोऽहंका- राणामपि विषयालोचनसंकल्पनाभिमननैकस्वभावत्वप्रसंगात् । तन्मात्रभूतानामपि नानास्त्रकार्यक्रणवस्वभावत्वोपपत्तेः । कस्यचिदनेक्शोऽनेककार्यहेतोग्नेकक्रियाशात्तिस्वभावत्वेचि छक्नेरपि नानाश्यदर्शनक्रियास्वभावनानात्वं कथमपा- क्रियेन । तथा च न चिछवितनिरतिशयैकनित्यस्वभावा सिध्यति तत्र दर्शितविषण यतम्तदर्थों बहुधाऽनेकविकारो महदादिः स्यादिति नित्येषु भावेषु प्रकृतिपुरुषेषु विकारहानिः सिद्धा । विकारहानेश्च न कारकव्यापृतकार्ययुक्तिः । करोति ३३ - , टीकासहित। इति कारक कर्तृप्रधानं तस्य व्यापृतं व्यापारः, कार्य महदादि व्यक्तं, युक्तियोगः संबंधः संसर्गः कारकव्याप्तं च कार्य च ताभ्यां युक्तिः पुरुषस्य संसर्गो न स्यात् । तथा कारकत्वेनाभि- मतं प्रधानं न महदादिकार्यकारि निर्यापारत्वात् पुरुषवत्। निर्व्यापार तत् सर्वथाविक्रियाशून्यत्वात् तद्वत् । विकाररहित प्रधानं नित्यत्वादात्मवदितिन कारकव्यापृतकार्ययोर्व्यवस्था। तदभावे च न ताभ्यां युक्तिः पुरुषस्य सिद्धयेत् , तदसिद्धौ च न बंधभोगौ स्यातां मुक्तात्मवत् , प्रधानन्यापारकार्यायोगे हि न धर्माधर्माभ्यां प्रकृतेर्बधः संभवति, तदसंभवेच नतत्फलं सुखदुःख यस्य भोगो दर्शनं पुरुषस्य स्यात्तदभावे न तद्वि- मोक्षः प्रधानस्य सिद्धयेद्धंधाभावे मोक्षानुपपत्तेः, बंधपूर्वकत्वा- दिमोक्षस्येति समंतदोषं मतमन्यदीयं सिद्धम् । "स्यान्मतं नित्येष्वप्यात्मादिषु भावेषु स्वभावत एव विकारः सिद्धयेत् ततः कारकव्यापारः कार्य च तद्युक्तिश्चोपपद्यते इति सकल- दोषासंभव एवेति तदपि न परीक्षाक्षममित्याहु:- अहेतुकत्वं प्रथितः स्वभाव- स्तस्मिन् क्रियाकारकविभ्रमः स्यात् । आबालसिद्धेर्विविधार्थसिद्धि- र्वादान्तरं किं तदसूयतां ते ॥९॥ टीका-स्वभाववादी तावदेवं प्रष्टव्यः-किमयं स्वभावो निर्हेतुकत्वं प्रथितः१ किमुत आबालसिद्धेविविधार्थसिद्धिरिति?
३४ युक्त्यनुशासनं । निर्हेतुकत्वं प्रथितः स्वभाव इति चेत्, तर्हि ज्ञप्त्युत्पत्तिवक्ष- णायाः क्रियायाः प्रतीयमानाया विभ्रमः स्यात्स्वभावत एव भावानां ज्ञानादाविर्भावाच्चान्यथा निहतुकत्वासिद्धेः । क्रिया- विभ्रमे च कारकस्य सकलस्य प्रतिभासमानस्य विभ्रमो भवेत्, क्रियाविशिष्टस्य द्रव्यस्य कारकत्वप्रसिद्धेः क्रियायाः कारकानुपपत्तेः । न च क्रियाकारकविभ्रमः स्वभाववादिभि- रभ्युपगंतुं युक्तो वादान्तरमसंगात् । अस्तु सर्वविभ्रमैकान्तो वादान्तरमिति चेत्, तर्हि विभ्रमे किमविभ्रमो विभ्रमो वा स्यात् ? यद्यविभ्रमस्तदा न विभ्रमैकांतः सिध्येत् तत्रापि वि- भ्रमे सर्वत्राभ्रान्तिसिद्धिः सर्वत्र विभ्रमे विभ्रमस्य सर्ववास्तव- स्वरूपत्वात् ततो वादान्तरं किं तदसूयतां ते तव भगवतः स्या- द्वादभानोः असूयतां विद्विषां विभ्रमैकान्तस्यापि वादान्तर- स्थासंभवान किंचिद्वादान्तरमस्तीति वाक्यार्थः । अथ ना- हेतुत्वं प्रथितः स्वभावोऽभ्युपगम्यते किं त्वावालसिद्धेविविधा- र्थसिद्धिः प्रथितः स्वभाव इति निगद्यते तर्हि सैवावालसिद्धे- निर्णीतिनित्यायैकांतवादाश्रयणे न संभवति यतः सर्वेषामर्था- नां कार्याणां कारणानां वा सिद्धिः स्यात् । न च प्रत्यक्षा- दिभपाणतो विविधार्थसिद्धेग्संभवे परेषां पर्यनुयोगे स्वभाव- वादावलंबन युक्तमतिप्रसंगात्। प्रत्यक्षादिप्रमाणसामर्थ्यात् वि- विधार्थसिद्धिः स्वभाव इति वचने कथमिव स्वभावैकांतवादः सिध्येत् । स्वभावस्य स्वभावत एव व्यवस्थितेस्तस्य प्रत्यक्षा- दिप्रमाणसामर्थ्यात् व्यवस्थापितत्वात् , वादान्तरं तु किं तत् ३५ . टीकासहितं। तेऽसूयतां स्यात् ? तव सुहृदामेव वादान्तरं सम्यगनेकांतवा- दरूपं प्रसिध्येत् न तु तव प्रतिपक्षाणां मिथ्र्यकांतवादिना- मित्यर्थः । किं च नित्यैकान्तवादिनः किमात्मतत्वं देहादनन्य- देव वदेयुरन्यदेव वा ? प्रथमकल्पनाया संसाराभाव: प्रसज्येत, देहात्मकस्यात्मनो देहरूपादिवद्भवांतरगमनासंभवात्तद्भव एवं विनाशप्रसंगात्, नित्यत्वविरोधाचार्वाकमताश्रयणप्रसंगश्च । स चप्रमाणविरुद्ध एवात्मतत्त्ववादिनोनिष्टश्च । द्वितीयकल्पनायां तु देहस्यानुग्रोपघाताभ्यामात्मनः सुखदुःखे न स्यातां स्वदे- हादध्यात्मनोऽन्यत्वाभिनिवेशात् देहान्तरवत् , सुखदुःखाभावे च नेच्छाद्वेषौ, तदभावे च धर्माधर्मों न संभवत इति स्वदेहेऽनु- रागसद्भावादनुग्रहोपघाताभ्यामात्मनः सुखदुःखे स्वगृहाद्य- नुग्रहोपघाताभ्यामिव कथमुपपद्यते । देहादनन्यत्वान्यत्वाभ्यामवक्तव्यमात्मतत्वमभ्युपगच्छता बाधकमाहु:- येषामवक्तव्यमिहात्मतत्त्वं देहादनन्यत्वपृथक्त्वक्तृप्तेः। तेषां ज्ञतत्वेऽनवधार्यतत्त्वे का बंधमोक्षस्थितिरप्रमेये॥१०॥ टीका--न देहादात्मतत्वस्यानन्यत्वक्लूप्तिापिपृथक्त्व- क्लूप्तिरुक्तदोषानुषंगात् । किं तर्हि ? देहादनन्यत्वपृथक्त्वकल्प- नादात्मतत्त्वमवक्तव्यमेवेति येषामभिनिवेशस्तेषां ज्ञतत्त्वं सर्वयाऽ- ३६ युक्त्यनुशासनं। नवधार्यतत्वं प्रसज्यते तत्स्वरूपस्यावधारयितुमशक्यत्वात् । देहादनन्यत्वेन पृथक्त्वेन वा तस्यानवधारणे प्रोक्तदोपानु- पंगात् तदुभयकल्पनयाप्यनवधार्यतत्वस्य प्रसिद्धरवक्तव्यत्ववत् । तथा च सकलवाग्विज्ञानगोचरातिक्रांतमात्मतत्त्वमित्यायातं । तत्र चानवधार्यतत्त्वे ज्ञतत्त्वे का बंधमोक्षस्थितिरप्रमेये सर्वथा- ऽनवधार्यतत्त्वं ह्यात्मतत्त्वमप्रमेयमापन्नं तत्र चाप्रमेये प्रत्यक्षा- दिममाणाविपये ज्ञतत्त्वे का बंधमोक्षस्थिति संभाव्यते बंध्या- पुत्रवत् न कापीत्यर्थः। तदेवं नित्यैकांतात्मवादिमतं समंतदोषं व्यवस्थाप्य संप्र- त्यनित्यात्मवादिमतमपि समंतदोषमुपदर्शयितुमारभते- हेतुर्न दृष्टोऽत्र न चाप्यदृष्टो योऽयं प्रवादः क्षणिकात्मवादः। न ध्वस्तमन्यत्र भवे द्वितीये संतानभिन्ने नहि वासनाऽस्ति ॥ ११॥ टीका-योऽयं क्षणिकात्मवादः सौगतानां न ध्वस्त चित्तमन्यत्र द्वितीये भवे क्षणे भवेदिति, स भवाद एव केवल: प्रमाणशून्यो वादः प्रवादः प्रलाप इत्यर्थः । कुत एतत्, योन क्षणिकात्मवादे हेतु पकः कश्चिन्न विद्यते 'यत्सत्तत्सर्व क्षणिक' - यथा शब्दविद्युदादिः संश्च स्वात्मेति स्वभावहेतुआपकोऽस्त्येवेति चेत्, स तर्हि स्वयं प्रतिपत्रा दृष्टो वा स्याददृष्टो वा न तावत दृष्टः संभवति, तस्य दर्शनानन्तरमेव विनाशादनुमानकालेड- टीकासहित। व्यभावात् तदनुमातुश्च चित्तविशेषलिंगदर्शिनोऽसंभवात् । न चाऽप्य दृष्टो हेतुः कल्पनारोपितः संभवति तत्कल्पनाया अपि अनुमानकाले विनाशात् ।व्याप्तिग्रहणकाललिंगदर्शनविकल्प- विनाशेपि तद्वासनासद्भावात् अनुमानकाललिंगदर्शनप्रबुद्धवा- सनासामर्थ्यादनुमानं प्रवर्तत एवेति चायुक्तं हेतुहेतुमद्भाव- व्याप्तियाहिचित्तादनुमातृचित्ते संतानाभिन्ने चासनानुपपत्ते सन्तानभिन्नमिव सन्तानभिन्न चित्तं तस्मिन्न हि वासनास्ति, जिनदत्तदेवदत्तंसतानभिन्नेपि चित्ते वासनास्तित्वानुषंगात् । देवदत्तचित्तेन साध्यसाधनव्याप्तौ गृहीतायां जिनदत्तस्य तत्सा- धनदर्शनात साध्यानुमानमासज्येताविशेषात् । तथा च वासना जास्ति संतानभिन्ने चित्ते, तथा न तत्कारणकार्यभावः संभव- तीति क्रियाध्याहारः। संतानभिन्नयोरपि चित्तयोः कार्यकार- गणभावे देवदत्तजिनदाचित्तयोरपि कारणकार्यभावः प्रवर्तत । सामान्यरूपाणामेव चिचक्षणानामेकसंतानवर्तिनां कार्यका- रणभावो न तु भिन्नसन्तानवर्तिनामसमानरूपाणामिति चेत्, न तर्हि चित्तक्षणाः क्षणविनश्वरा निरन्वयाः केन समानरूपाः? न केनापि स्वभावेन ते समानरूपा इत्यर्थः । तथाहि-यदि तावत् सत्स्वभावेन चित्स्वभावेन वा समानरूपाः स्युस्तदा भि- संतानवर्तिनोऽपि तथा भवेयुरविशेषात् । यदि पुनरत तुभ्यः संतानान्तरवर्तिभ्यश्चित्तक्षणेभ्यो व्यावृत्तेन तद्धत्वपेक्षित्वेन समा- रु नरूपाः केचिदेवैकसंतानवर्तिनश्चितक्षणाः इष्यन्ते पूर्वपूर्वस्यो- १ तदनुमातुः स्वचित्तविशेषस्य' इति पुस्तकांतरे ।
३८ युक्त्यनुशासनं। पादानहेत्वपेक्षित्वादुत्तरोत्ताचिस्येति मतं तदापि तदुचरं चित्तमुत्पन्नं सत्स्वहेतुमपेक्षतेऽनुत्पन्नमसद्वा । न तावत् प्रथमः पक्षः। सतः सर्वनिराशसत्त्वादुत्पन्नस्य हेत्वपेक्षत्वविरोधात् । द्वितीयपक्षे त्वसत्खपुष्पं न हि हेत्वपेक्ष दृष्टं । एतदुक्तं भवति, यदसत् तन्न हेत्वपेक्षं दृष्टं यथा खपुष्पं असञ्चोत्पत्तेः पूर्व कार्य- चित्तमिति ततो न सिध्यत्युभयोरसिद्धं । न हि किंचिदसदपि हेत्वपेक्षं वादिमतिवादिनोरुभयोः सिद्धमस्ति । यन्निदर्श- नीकृत्योचरमुत्तरं चिशमनुत्पन्नमपि तद्धत्वपेक्षं साध्यते तदसाधने च कथं तद्धत्वपेक्षत्वेनापि समानरूपाश्चित्तक्षणाः केचिदेवैकसंतानभाजः सिद्धेयुर्यतः कारणकार्यभावस्तेषा- मुपादानोपादेयलक्षणः स्यात् , वास्यवासकभावहेतुरिति न तन्त्र वासना संभवति भिन्नसंतानचित्तक्षणवत्, ततः सूक्तं सरिभिरिदम्- तथा न तत्कारणकार्यभावा निरन्वयाः केन समानरूपाः। असत् खपुष्पं न हि हेत्वपेक्षं दृष्टं न सिध्यत्युभयोरसिद्धम् ॥ १२ ॥ टीका-खंडशोऽस्य व्याख्यानात् । यथा च हेतोरपेक्षकं फलचित्रमसन्न घटते तथा हेतुरपि फलचिरस्यापेक्षणीयो न संभवत्येवेत्याहुः- नैवास्ति हेतुः क्षणिकात्मवादे , टीकासहितं । ३६ न सन्नसन्वा विभवादकस्मात् । नाशोदयैकक्षणता च दुष्टा संतानभिन्नक्षणयोरभावात् ॥१३॥ टीका-अभ्युपगम्येदमुक्तं-कार्यचित्तं सद्पमसद्रूपं वा न हेत्वपेक्षमिति परमार्थस्तु क्षणिकात्मवादे हेतु वाऽस्ति । स हि सन्वा हेतुः स्यादसन्वा ? न तावत्सन्नेव पूर्वचित्तक्षण उत्तरचित्तक्षणस्य हेतुर्भवति विभवाद्विभवप्रसंगादित्यर्थः । सत्येकक्षणे चित्ते चित्तान्तरस्योत्पत्तौ तत्कार्यस्यापि तदैवो- त्पत्तिरिति सकलचित्तचैत्तक्षणानामेकक्षणवर्तित्वोत्पत्तौ यु- गपत्सकलजगद्व्यापिचित्तप्रकारसिद्धेविभुत्वमेव क्षणिकं क- थमिव निवार्येत । पूर्व पश्चाच्च चित्तशून्यं जगदापनीपोत तथा च संताननिर्वाणलक्षणो मोक्षो विभवः सर्वस्यानुपायसिद्धा स्यात् । अथैतद्दोषभयादसन्नेव हेतुरति ब्रूयात् तदाप्यकस्मा- कारणमंतरेण कार्योत्पत्तिप्रसंगस्ततोऽसन्नपि न हेतुः संभवति। स्यान्मतं-यस्य नाश एव कार्योत्पादः स तद्धेतु शो- दययोरेकक्षणतोपपत्तेः, कारणनाशानंतरं कार्यस्योदयस्यानि- टेरकस्मात्कार्योदयप्रसंगादिति चेत् , तदप्यसत् । यतो ना- शोदयैकक्षणतायाः संतानभिन्नक्षणयोरभावात्, भिन्नौ च तौ क्षणौ च भिन्नक्षणौ कालव्यवहितौ संतानस्य भिन्नक्ष- गौ संतानभिन्नक्षणौ तयोः सुषुप्तसंताने जाग्रचित्तप्रबुद्धचि- लक्षणयोरभावान्नाशोदयैकक्षणताया इति विभक्तिपरिणामः ।
युक्त्यनुशासनं। न हि तत्र जाग्रचित्तस्य नाशकाल एव प्रबुद्धचित्तस्योदयोऽ- स्ति मुहूर्त्तादिकालेनानेकक्षणेन व्यवधानात्तथा च जाग्रच्चित्रं प्रबुद्धचित्तस्य हेतुर्न स्यात् तन्नाशस्यैव प्रबुद्धचिचोदयत्वाभा- वात् जाग्रचितमबुद्धचित्तनाशोदययोरेकक्षणतापायात् । अथ- वा संताने मदीपादेनिरन्व्यनाशिनि नाशोदययोरेकक्षणताया असंभवात् भिन्नक्षणतेति व्याख्येयं ततोऽसत्येव हेतो कालान्तरेण स्वयमुत्पद्यमानोऽर्थः प्रलय इवाकस्मिकः स्यात् । तत्र चेदं दुपणमावेदयन्ति सूरयः- कृतप्रणाशाकृतकर्मभोगौ स्यातामसंचेतितकर्म च स्यात् । आकस्मिकेऽर्थे प्रलयस्वभावो मार्गों न युक्तो बधकश्च न स्यात् ।। १४॥ टीका-यथा कारणमन्तरेणैव भवन्प्रलयः स्यादाकस्मिक सौगतस्य तथा कार्योदयोऽपीति प्रलयस्वभावोऽर्थः प्रमाण- वलादायातः परिहर्तुपशक्यत्वाचस्मिंश्वाकस्मिकेऽर्थे प्रलयस्त्र- भावे युक्त्या पूर्वचित्तेन कृतं कर्म शुभमशुभं वा तस्य तत्फल- भोगाभावात् कृतमणाशः स्यात्तदुचरभाविना च चितेनाकृत- स्यैव कर्मणो भोगः स्पादेकस्य फर्मणां कर्तुस्तत्फलभो- क्तुश्चावस्थितस्याभावादिति कृतपणाशाकृतकर्मभोगौ स्यातां । तथा येन चितेन संचेतितं कर्म तस्य निरन्वयमलयात् येना- १ 'तदन्यानु' इति पुस्तकांतरे ।
टीकासहित संचेतितमुत्तरचितेन तस्यैव कर्म भवेदित्यतोऽसंचेतितं च कर्म स्यात् । तथा च सकलास्रवनिरोधलक्षणमोक्षस्य चित्तसंतति- नाशरूपस्य वा शांतनिर्वाणस्य मार्गों हेतु रात्म्यभावनालक्षणो न युक्तः स्यान्नाशकस्य कस्यचिद्विरोधात् । तथा कार्याचप्रा- णिनः कश्चिद्धकोऽपि न स्यात्तद्वधकस्य प्रलयस्वभावस्या- कस्मिकत्वात् । किञ्चान्यत्स्यादित्याचार्या व्याचक्षते- न बन्धमोक्षौ क्षणिकैकसंस्थौ न संवृतिः साऽपि मृषास्वभावा । मुख्याहते गौणविधिर्न दृष्टो विभ्रान्तदृष्टिस्तव दृष्टितोऽन्या॥१५॥ टीका-क्षणिकमेकं यच्चित् तत्संस्थौ बंधमोक्षौन साता। यस्य चित्तस्य बंधस्तस्य निरन्वयप्रणाशात्तदुत्तरचित्तम्या- बद्धस्यैव मोक्षप्रसंगात | यस्यैव बन्धस्तस्यैव मोक्ष इत्येक- चित्तसंस्थौ वधमोक्षौ संवृत्या तदेकत्वारोपविकल्पलक्षणाया स्यातामिति चेत्तर्हि सापि संवृतिर्मुपास्वभावा स्यात् गौण- विधिर्वा ? तत्र तारम संकृतिः मृपास्वभावा बंधमोक्षयोः क्षणिकैकचित्तसंस्थयोः मृपात्वप्रसक्तेः । गौणविधिरेव संकृति- रिनि चेत्, तर्हि मुख्यौ बंधमोक्षौ कचिच्चिचे संतिष्ठमानौ प्रतिपशव्यौ यतो मुख्याहते गौणविधिन दृष्टः पुरुषसिंहवत् । न हि मुख्य सिंहाहते गौणस्य पुरुषे सिंहविधेर्दर्शनमस्ति ।
કર , युक्त्यनुशासनं। तदेवं विभ्रान्तदृष्टिस्तव दृष्टितोऽन्या, तव वीरस्य स्याद्वादा- मृतसमुद्रस्य या दृष्टिरवाधिता ततोऽन्या क्षणिकात्मवादिह- ष्टिविभ्रान्तदृष्टिरेव समतदोपत्वादिति मरेरभिप्रायः । तमेवाहु:- प्रतिक्षणं भगिषु तत्पृथक्त्वा- न मातृघाती स्वपतिः स्वजाया । दत्तग्रहो नाधिगतस्मृतिर्न न क्त्वार्थसत्यं न कुलं न जातिः ॥१६॥ टीका~क्षणं क्षणं प्रति भगवत्सु पदार्थेषु प्रतिज्ञाय- मानेषु न मातृघाती कश्चित्पुत्रोत्पत्तिक्षण एव पातुः स्वयं नाशात् तदनंतरे क्षणे पुत्रस्यापिप्रलयादपुत्रस्यैव प्रादुर्भावात् । लोकव्य- वहारतो मातरं दूरतरं हन्तुं प्रवृत्तोऽपि न मातृघाती भवेदि- त्यर्थः । तथा न स्वपतिः कुलयोपितोऽपि कश्चित्स्यात् तबोहुः पत्युर्विनाशादन्यस्योत्पादात् । तदृढाया योषितश्च विना- शात् तदन्यस्या एवोत्पादास्पारदारिकत्वप्रसंग इत्यर्थः । तथा स्वजायाऽपि न स्यात् । तत एव तथा दत्तग्रहो न स्यात्-धनि- नादत्तस्य धनस्याधमत् ग्रहणं न स्यात् दातुर्निरन्वयनाशाद- धमर्णस्याप्यन्यस्य प्रादुर्भावात् सातिलिखितादेरपि परिर्व- सादित्यर्थः । तथाऽधिगतस्य शास्त्रार्थस्य स्मृतिरपि न स्यादिति शास्त्राभ्यासस्य वैफल्यमासज्येत । तथा न क्त्वार्थसत्यं पूर्वो जरक्रिययोरेककर्तुकयोः पूर्वकाले क्त्वार्थसत्येन परमार्थेन प्रमा- टीकालहितं । -- खोपपन्नेनन्यायेन क्त्वार्थश्व सत्यं च क्त्वार्थसत्यं "राजदंतादिपू परं" इति सत्यपदस्य परनिपातः, तदपि प्रतिक्षणं भंगिषु विषय- विषयिषु नोपपद्येत । तथा न कुलं सूर्यवंशादिकं भवेत् क्षत्रि- यस्य, यत्र कुलेऽसौ जातस्तस्य निरन्वयविनाशात् तज्जन्मनि कुलाभावात् । तथा न जाति: क्षत्रियत्वादिः तद्व्यक्तिव्यति- रेकेण तदसंभवात् । अनेकव्यक्तेरतद्व्यात्तिग्राहिणश्चित्त- स्यैकस्यासंभवात् तदन्यापोहलक्षणायाच जातेरनुपपत्तेः । किञ्च- न शास्तृशिष्यादिविधिव्यवस्था विकल्पबुद्धिर्वितथाखिला चेत् । अतत्त्वतत्त्वादिविकल्पमोहे निमजतां वीतविकल्पधीः का॥ १७ ॥ टीका-शास्ता सुगतः शिष्यस्तद्विनेयस्तयोविधिः स्व- भावस्तस्य व्यवस्था विशेषेणान्यव्यवच्छेदेनावस्था सापिन स्यात्, प्रतिक्षणं भंगिषु चित्तेष्विति सम्बन्धनीयम् । तत्त्वदर्श- नं परानुग्रहतत्वप्रतिपिपादयिषा तत्वप्रतिपादनकालव्यापिन: कस्यचिदेकस्य शासकस्यानुपपत्तेः। शिष्यस्य चशासनशुश्रूषा- श्रवणग्रहणधारणाभ्यासनादिकालव्यापिन:स्यचिदघटनात्। अयं शास्ताऽहं शिष्य इति प्रतिपः कस्यचिदयोगात । तथादि- शब्देन स्वामिभृत्यविधिव्यवस्था जनकतनयविधिव्यवस्था नप्त पितामहादिविधिव्यवस्था च न स्यादिति ग्राह्यं । ननु च वहिरन्त- युक्त्यनुशासनं । श्च प्रतिक्षणं विनश्वरेषु स्वलक्षणेषु परमार्थतोमात्यातीत्यादि- शास्तृशिष्यादिविधिव्यवस्थाव्यवहारोन संभवति। किं तर्हि वि- कल्पबुद्धिरियमखिलानादिवासनासमुद्भुता मातृध त्यादिन्य- वस्थाहेतुर्वितथैव सर्वनिर्विषयत्वादिति यद्यभिमन्यतेसौगतास्त- दातेषामतत्त्वतत्त्वादिविकल्ममोहे निमज्जतां का नाम वीतविकल्प- धीरर्यवती तथ्या कथ्येत । मात्घात्यादिसकलमतत्वमेव ततोऽ- न्यत्तु तत्त्वं इति व्यवस्थितेरपि विकल्पवासनावलायातत्वात्संह- तिरतवं परमार्थतस्तर,मित्यपि विकल्पशिल्पिघटितमेव स्याद। ननु वस्तुवलादिति विकल्पमोहो महाम्भोधिरिव दुष्पार! प्रसज्येत । "द्वे सत्ये समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना । लोक- संवृतिसत्यं च परमार्थतः" इत्येतस्यापि विभागस्य विकल्प- मात्रत्वात्तात्त्विकत्वानुपपरेः । वीतसकल विकल्पा धीः स्वलक्ष- गमात्रविषया ताचिकीत्यपि न संभाव्यं तम्याश्चतुर्विधाया इन्द्रियमानसस्वसंवेदनयोगिप्रत्यक्षलक्षणायाः परमार्थतो व्य- वस्थापयितुमशक्तेः। "प्रत्यक्ष कल्पनापोढमभ्रान्त" मिति प्रत्यक्षसामान्यलक्षणस्य प्रत्यक्षविशेषलक्षणस्य च विकल्प- पात्रत्वादवास्तवत्वोपपतेः । न चावास्तव लक्षणं वस्तुभूतं लक्ष्य लक्षयितुमलमतिप्रसंगादिति कि केन लक्ष्येत । अत्रापरे प्राहु:-न वहिः स्वलक्षणालंवनकल्पनाविकला काचिद् बुद्धिरस्ति सर्वस्या बुद्धेरालंबने भ्रान्तत्वात् स्वप्नवु- द्धिवत् स्वाशमात्ररूपपर्यवसितत्वाद्विज्ञानमात्रस्यैव तस्य प्रसिद्धे- रिति । सोऽप्येवं प्रष्टः स्पष्टमाचष्टां--विज्ञानमात्रस्य सिद्धिा टोकासहित। ससाधना निःसाधना वा ? ससाधना चेत्साध्यसाधनबुद्धिः सिद्धा । सा चानथिकाऽर्थवती वास्यात् ? प्रथमपक्षे द्वितीय- पक्षे च दूषणान्यभिदधते सूरयः- अनर्थिका साधनसाध्यधीश्चे- विज्ञानमात्रस्य न हेतुसिद्धि अथार्थवत्त्वं व्यभिचारदोषो न योगिगम्यं परवादिसिद्धम् ॥१८॥ टीका-विज्ञानमात्रं हि तत्त्वं परवादिनोऽनुमानादेव प्रत्याययेयुः स्वसवेदनप्रत्यक्षेण तेषां प्रत्याययितुमशक्तेः । तच्चानुमान-यत्सतिभासते तद्विज्ञानमात्रमेव यथा विज्ञानस्वरूपं प्रतिभासते च नीलसुखादिकमिति । न चाविज्ञानं प्रतिभासते जडस्य प्रतिभासायोगादिति पक्षे बाधकप्रमाणमनुमानसमर्थन असमर्थितस्यासाधनत्वादिति। तत्रेदमनुमानं साधनं विज्ञानमात्रं साध्यमिति साध्यसाधनधीबद्यनथिका तदा विज्ञानमात्रस्य तत्त्व- त्य यो हेतुः साधनं तस्य सिद्धिर्न स्यात्स्वप्नोपालंभसाधनवत् । अथार्थवत्वमेव तस्याः साध्यसाधनबुद्धस्तदाऽनयैव व्यभिचार: प्रकृतहेतोः सर्व ज्ञानं निरालंबनं ज्ञानत्वादित्येतत्परं प्रति वक्तुं युक्तं न स्यात् स च महान् दोषः परिहर्तुमशक्यत्वात् । यथै- व हीदमनुमानज्ञानं स्वसाध्येनावलंबनेन सालवनं तथा विवादाध्यासितमपि ज्ञानं सालंबनं किं न भवेदिति संशयकरत्वात् । यदापि विज्ञानमात्र सर्वस्य वस्तुनः प्रतिभा- ५६ युक्त्यनुशासन। समानत्वेन हेतुना साध्यते, तदापीदमनुमान वचनात्मक परार्थप्रतिभासमानमपि न विज्ञानमात्रं ततोऽन्यत्वादिति व्यभि- चारदोपः प्रकृतहेनोः स्यादेव । साध्ये विज्ञानमात्रात्मकरखे साधनस्य साध्यतमत्वानुषंगात्तत एव समाध्यवस्थायां प्रतिभा- समानं संवेदनाद्वैत तत्त्वमस्तु स्वरूपस्य स्वतोगतेरिति च व सुभाषितं तस्य परवादिनामसिद्धत्वात् । न हि योगिनो गम्यं परवादिनां सिद्ध नामेति स्वगृह- मान्यमेत् त् । किं चेदं संवेदनाद्वैतं नानासंवेदनवत् न स्वस्थ इसिद्धं न च परस्मै प्रतिपाद्यमिति निवेदयन्ति । तत्त्वं विशुद्धं सकलैर्विकल्पै- विश्वाभिलापास्पदतामतीतम्। न स्वस्य वेद्यं न च तन्निगद्यं सुषुप्त्यवस्थं भवदुक्तिवाह्यम् ॥ १९ ॥ टीका कार्यकारणग्राह्यग्राहकवास्यवासकसाध्यसाधनवा- ध्यबाधकवाच्यवाचकभावादिविकल्पैः सकलैविशुद्धं शून्यं तद्वि- ज्ञानाद्वैत तत्त्वं न स्वस्य वेद्यं । संहृतसकलविकल्पावस्थायामपि योगिनो ग्राह्यग्राहकाकारविकल्पात्मनः संवेदनस्य प्रतिभासनात् नापितं निगदितुं शक्य । विश्वामिलापास्पदतामतीतत्वाद् विश्वे च तेऽभिलापाव विश्वाभिलापा विश्वाभिलापा जातिगुणद्रव्य- क्रियायदृच्छा शब्दास्तेषामास्पदमाश्रयो विश्वामिलापास्पदं तस्य भावो विश्वामिलापास्पदता तामतीतं तवं कथमिव निगा परस्मै टोकासहितं । स्यात् । नहि जात्यादिशब्दस्तन्निगद्यते जातिद्रव्यगुणक्रियादि- कल्पनाभिरपि शून्यत्वात नापि यदृच्छाशद्धेन तत्र तस्य संकेत- यितुमशक्तेः संकेतहेतुविकल्पेनाऽपि शून्यत्वादिति सुषुप्तौ याऽवस्था सवेदनस्य सा स्यात्तत्वस्य । ततः सुषुप्त्यवस्थमेतत् सर्वथा विकल्पाभिलापशून्यत्वाभ्युपगमाद्भवदुक्तिवाह्य भवतो वीरस्योक्तिः स्याद्वादस्ततो वाह्यं सर्वथैकान्ततत्त्वमित्युच्यते । विज्ञानार्थपर्यायादेशाद्धि विज्ञानार्थतत्त्वं सकलविकल्पाभिला- पविकलमृजुमूत्रनयावलंविभिगभिन्यते व्यवहारनयायिभिर्वि- कल्पाभित्नापास्पदमिति स्याद्वादाश्रयणे तत्त्वं न भवदुक्ति- तो वाह्य स्यादित्यर्थाद्गम्यते । पुनरपि परमतमनूध दूपयितुमाहुगचार्या:- मूकात्मसंवेद्यवदात्मवेद्यं, तम्लिष्टभाषाप्रतिमप्रलापम् । अनंगसंज्ञं तदवेद्यमन्यैः स्यात् , त्वद्विषां वाच्यमवाच्यतत्त्वम्॥२०॥ टीका--यथा भूकस्यात्मसंवेद्यं स्वसंवेदनं तथात्मसंवेद्यमेव संविदद्वैतं न च त्मसवेद्यमिति शब्देनाऽपि तत्त्वमभिलप्यते तत् कुतो यतो म्लिष्टा अस्पष्टा भाषा मूक भाषेत्रः तस्मतिमः मलापो निरर्थको यस्मिम्लिभाषाप्रतिमप्रलाप न पुनर- भिलाप्यं ततस्तदवेद्यमेवान्यः प्रतिपाचैरिति मन्यते केचित् । यथा चाभिलापास्तदवेधमन्यैस्तथांगसंज्ञयाऽपि सूचीहस्तलक्ष- ४८ युक्त्यनुशासनं। ण्याऽनवेद्यमनंगसंज्ञत्वात् । यद्धि सर्वथाऽनाभिलाप्यं तत्रांग संज्ञासकेतोऽपि न प्रवर्तते । न चासंकेतितांगसंज्ञा कचिहित्ति निमित् शब्दवदिति च ये प्रनिण्यते तेषां त्वद्विपां संविदद्वै तवादिनामवाच्यमेव तत्वं वाच्यं स्यात् , नैव स्यादिति काक व्याख्यातव्यम् तेपां मौनमेव शरणं म्यादिति यावत् । तदेवं सौगतमतमुपहासास्पद मेवेति निवेदयंति- अशासदजांसि वचांसि शास्ता, शिष्याश्च शिष्टा वचनैर्न ते तैः । अहो इदं दुर्गतमं तमोऽन्यत् त्वया विना श्रायसमार्य किं तत्॥२१॥ टीका-शास्ता सुगत एवाश सदनवधानि वचांसि यथा- र्थदर्शनादिगुणयुक्तत्वान्न च तैर्वचनैः शिष्यास्ते प्रतिपादिता इतीदमहो दुर्गतमं साश्चर्यमन्यतमः स्यात् कृच्छ्तमेनाधिगम्य त्वात् । तत्त्वानुशासनं हि सनि शास्तरि गुणवति प्रतिपाये- भ्यस्तत्त्वप्रतिपशियोगेभ्यः सत्यैरेव वचनैः प्रसिद्धं । तत्र सु. गते शास्तरि प्रसिद्धपि सौगतानां तद्वचनेषु च सत्येषु संभवत्सु शिष्याः सन्तोऽपि प्रणिहितमनसो न शिष्टा इति कयममोहः प्रतिपद्यतेति प्रेक्षावतामुपहासास्पदमिदं दर्शनमाभासते । स्मान्मत-संवृत्या शास्तृशिष्यशासनतदुपायवचनसदा- चान्नोपहासास्पदमेतत्परमार्थतः संविदद्वैतस्य निःश्रेयसलक्षण- स्य प्रसिद्धेरिति, तदप्यसत् । न्वया स्याद्वादन्यायनायकैन टीकासहितं+ १६ विना भगवन् ! आर्य ! वीरभट्टारक ! मे नैव श्रायन किंचित संभवति यतः प्रमाणेन परीक्ष्यमाणमिति प्रत्येयं । तत् तसिंविदद्वैतरूपं निर्वाणं प्रत्यक्षबुद्धिबोध्यं लिंगगम्यं वा, परार्थानुमानवचनप्रतिपाद्यं वा स्याद्गत्यंतराभावान्न च तत्र प्रत्यक्षादिप्रमाणं संभवतीति प्रतिपच्यभावमेव साधय- त्याचार्याः- प्रत्यक्षबुद्धिः क्रमते न यत्र तल्लिंगगम्यं न तदलिंगम्। वाचो न वा तद्विषयेण योगः का तद्गतिः कष्टमशृण्वतां ते॥२२॥ टीका-यत्र संविदद्वैत तत्वे प्रत्यक्षबुद्धिर्न क्रमते न प्रवर्तते कस्यचित्तथा निश्चयानुत्पत्तेस्तल्लिंगगम्यं स्यात्स्वर्गप्रापणशक्त्या- दिवत् । न च तत्रार्थरूपं लिंग संभवति तत्स्वभावलिंगस्य तद्वत् प्रत्यक्षबुद्धयतिक्रान्तत्वाल्लिंगान्तरगम्यत्वेऽनवस्थानुषंगात्तत्वार्य- लिंगस्य वा संभवात् संभवे वा द्वैतप्रसंगात् । न च वाचः परा- र्थानुपानरूपायास्तद्विपयेण संविदद्वैतरूपेण योगः परंपरयापि संबंधायोगात्, ततः का तस्य तत्वस्य गतिर्न काचित् प्रत्यक्षा लैंगिकी शाब्दी वा प्रतिपत्तिरस्तीति कष्टं दर्शनं ते तव शासन- पशृण्वतां ताथागतानामिति ग्राह्यं । संवृत्या तत्पतिएत्तिर्न कामिति मन्यमानान्प्रत्याहु:- ५० युक्त्यनुशासनं । रागाद्यविद्यानलदीपनं च विमोक्षविद्यामृतशासनं च । न भिद्यते संवृतिवादिवाक्यं भवत्प्रतीपं परमार्थशून्यम् ॥२३॥ टीका-यथैव हि रागाद्यविद्यानलस्य दीपनं च वाक्य अग्निष्टोमेन जेन स्वर्गकामः" इत्यादिकं संकृतिवादिनां सौगताना परमार्थशून्य तथा विमोक्षविद्यामृतस्य शासनमपि वाक्यं “सम्यग्ज्ञानतृष्णाभावनातो निःश्रेयस" मित्यायपि ततो न मिद्यते परमार्थशून्यत्वाविशेषात् । परमार्थशून्यत्वं । सर्वथैकान्त विषयतयैवोपगतत्वात् भवतो हि वीरस्यानेकान्तशासनस्य न विचिद्वाक्यं सर्वथ परमार्थशुन्यं रागाविद्यानलदीपनत्यापि वाक्यस्य बंध- कारणलक्षणेन परमार्थेनाशून्यत्त्वात विमोक्षविद्यामृत- शासनस्येव मोक्षकारणरूपेण परमार्थनेति तात्पर्यार्थः। न्नु च संवृतिवादिनोऽपि श्रुतमयी चिन्तामयीच भावना प्रकर्षपर्यन्तं प्राप्ता यागिनः प्रत्यक्षसंविदद्वयं प्रस्ते, गुरुणोपदि टायाः वस्याश्चिदविद्यायाः प्रकृष्टविद्याप्रसूत्यै स्वयं शील्य मानायाः संभवाविरोधादिति च प्रतिपद्यमानान्प्रति प्राहु:- विद्याप्रसूत्यै किल शील्यमाना, तद्वाक्यम्य भवत्पतीपत्व व वक्यस्य टोकासहितं। भवत्यविद्या गुरुणोपदिष्टा। अहो त्वदीयोक्त्यनभिज्ञमोहो, यजन्मने यत्तदजन्मने तत् ॥ २४॥ टीका-सकला ह्यविद्या तावदविद्यान्तप्रमूत्यै प्रसिद्धा लोके सा गुरुणाप्युपदिष्टा भाव्यमाना विद्याप्रमूत्यै भवतीति बदतः सौगतस्य कथमहो भगवन् ! वीर ! सदीयोक्त्यन- भिज्ञस्य मोहो न भवेत् ! दर्शनमोहोदयापाये विरुद्धाभिनिवे- शासंभवात् । यद्धि निमित्तमविद्य लक्षणमविद्याजन्मने तदेव तस्याः पुनरजन्मने प्रसिद्धं स्यादिति विरुद्धोऽभिनिवेश: स्यात् । नहि मदिरापानं मदजन्मने प्रसिद्धं मदाजन्मने नि- मित्रं भवितुमर्हति । ननु च यथा विषभक्षणं विषविकार- कारणं प्रसिद्धमपि किंचिद्विषविकागजन्मने दृष्टं तथा काचि- दविद्याऽपि भाव्यमाना स्वया विद्य जन्माभावाय भविष्य- ति विरोधाभावादिति कश्चितः सोऽप्यपालोचितवचनः । अन्यद्धि जंगमविषं भ्रमदाहमूर्छा'दविकारस्य जन्मने प्रसिद्ध तदजन्मने पुनरन्यदेव स्थावरविषं तत्प्रतिपक्षभूतमिति विषममु- दाहरणं । तरविद्यापि संसारहेतुरनादिवासनाममुद्भूताऽन्यैवा- विद्यानुकूला, मोक्षहेतुः पुनरनाद्यविद्याजन्मनिवृत्तिकरी विद्याऽ- नुकूला चान्या तत्प्रतिपक्षभूतत्वादिति साम्यमुदाहरणस्यास्तु विशेषाभावादिति वचनं न परीक्षाक्षम अविद्यापतिपक्षभूताया एवाविद्यायाः संभवाभावाद्विद्यात्वानुषंगात् । नन्वेवं विषप्रतिप- युक्त्यनुशासनं। सभूतस्य विपान्तरस्यापि विपत्वं माभूत्तस्यामृतत्वानुपंगात् । इत्येतदपि न प्रतिकूलं नः । जंगमविपप्रतिपक्षभूतं हि स्थावर- विषमत एव विपममृतमिति प्रसिद्ध सर्वथा तस्य विपत्वे वि- पान्तरमतिपक्षत्वविरोधात् । कथंचिद्विपत्वं क्षीरादेरपि न निवार्यते तदभ्यवहरणानंतरमपि कस्यचिन्मरणदर्शनात् । काचिदविद्या तु विद्यानुकूला यदि कथंचिद्विद्या निगद्येता- न्यथानाद्यविद्यापतिपक्षत्वायोगात्तदा न किंचिदनिष्टं स्याद्वा: दिमताश्रयणात्संवृतिवादिमतविरोधात् । स्यावादिनां हि के- बलज्ञानरूपां परमां विद्यामपेक्ष्य क्षायिकी क्षायोपशमिकी मतिज्ञानादिरूपापकृष्ट विद्याप्यविद्याऽभिप्रेता नानादिमिथ्या- ज्ञानदर्शनलक्षणाविद्यापेक्षया तस्यास्तत्मतिपक्षभूतत्वाद्विद्या- वसिद्धेरिति न सर्वथाऽप्यविद्यात्मिकाभावना गुरुणोपदिष्टापि विद्याप्रसूत्यै व्याघाताद् गुरोरपि तदुपदेष्टुरगुरुत्वप्रसंगाद्विद्यो- पदेशिन एवं गुरुत्वप्रसिद्धः । ततोऽनुपायमेव संविदद्वैतं त- चं सर्वप्रमाणगोचरातिक्रांतत्वात् पुरुषाद्वैतवदिति स्थितम् । संप्रत्यवसरप्राप्तमभावकांतवादिमतमनूय निराकर्तुमार- भन्ते सूरिवर्याः- अभावमात्रं परमार्थवृत्तेः सा संवृतिः सर्वविशेषशून्या। तस्या विशेषौ किल बंधमोक्षौ हेत्वात्मनेति त्वदनाथवाक्यम् ॥ २५॥ - टीकासहित। ५३ - . टीका-न च पहिरन्तश्च निरन्वयक्षणिकपरमाणुमात्रं तत्वं सौत्रान्तिकनिराकरणात् । नाप्यन्तःसंक्त्पिरमाणुमात्रं संविदद्वैतमात्रं वा योगाचारमतनिरसनात् । किं तीभाव- मात्र तत्त्वं माध्यमिकमतमेव परमार्थवृत्तेरभ्युपगम्यते । सा तु परमार्थवृत्तिः संवृतिः न पुनः शून्यसंविचिस्तात्त्विकी यतः शून्यसंविदो विप्रतिषेधः स्यात् । तथाहि-सा परमार्थवृत्तिः संवृतिः सर्वविशेषशून्यत्वात्सर्वेषां विशेषाणां पदार्थसद्भाव- वादिभिरभ्युपगम्यमानानां तदभ्युपगमेनैव वाध्यमानानां व्य- वस्थानासंभवादविद्याया एव प्रसिद्धः, बंधमोक्षावपि तस्या एवं संवृतेरविद्यात्मिकायाः सकलतात्त्विकविशेषशून्याया अपि वि- शेषौ सांवृतौ सांदृतेनैव हेतुस्वभावेनात्मात्मीयाभिनिवेशेन नैरा- म्यभावनाभ्यासेन च विधीयमानौ न विरुद्धौ किलेति शून्यवादिमतसूचनं, तदेतद् त्वदनाथानां सर्वथा शून्यवादिना वाक्यं, न पुनस्त्वं भगवान् वीरो नाथो येषामनेकान्तवादि- नां तेषामेतद्वाक्यं तैः स्वरूपादिचतुष्टयेन सतामेवाकल्पिता- समकानां पररूपादिचतुष्टयेनार्थानां शून्यत्ववचनात् । तदभाव- मात्रस्यापि स्वरूपेणासत्त्वे पारमार्थिकत्वविरोधात् । संवि- मात्रस्य शून्यस्य स्वरूपेण सत्वे पररूपेण ग्राह्यग्राहकभावा- दिना चासच्चे सदसदात्मकस्य कथंचिच्छून्यस्य सिद्धेः स्या- द्वादिवाक्यस्यैव व्यवस्थानात् ततस्त्वदनाथवाक्यमव्यवस्थि- तमेव मृषेत्यर्थः। यथा न शून्यवादिनां शून्यं तत्त्वमनुपपन्नं तथाऽनेकान्त- - ५४ युक्त्यनुशासने । वादिनस्त्वत्तः परेपामपि शून्यमनुपपन्नमपि समाप्तमिति प्रति यादयन्ति श्रीसूरयः- व्यतीतसामान्यविशेषभावा द्विश्वाभिलापार्थविकल्पशून्यम् । खपुष्पवत्स्यादसदेव तत्त्वं प्रबुद्धतत्त्वाद्भवतः परेषाम् ॥२६॥ टीका-ये तावद् व्यतीतसामान्यभावात्सर्वतो व्याव- सानर्थानाचक्षते भेदवादिनः सौगताः प्रवुद्धतवाद्भवतो वीरा- स्परे तेषां सामान्याप्हवे विशेपाणामभावः प्रसज्येत तेषां सामा- न्यनांतरीयकत्वात्तदभावे तद्भावायोगात् सर्वथा निरुपाख्यं- मेवायातं । येऽपि च सामान्यमेवप्रधानमेकं प्रवदंति महदहंका- रादिविशेषाणातव्यतिरेकेगाासत्वात्तेषामपि भवतः परेषां सकलविशेपाभावे सामान्यस्यापि तदविनाभाविनोऽसत्त्वप्र- संगात् व्यक्ताव्यक्तात्मनश्च भोग्यस्याभावे भोक्तुरप्यात्मनोऽस- भव इति सर्वशून्यत्वमनिच्छतोऽपि सिध्येत् । व्यक्ताव्यक्तयोः कथंचिद्भेदनतिज्ञाने तु स्याद्वादन्यायानुसरणान्न त्वदनाथवा- क्यं स्यात् तथा-परस्परनिरपेक्षसामान्यविशेषभाववादिनो यौगाः कथंचिसापान्यविशेषभावानभ्युपगमात् व्यतीतसा- मान्यविशेषभावाः प्रसिद्धा एव भवतः परे तेषामपि खपुष्प- वदसदेव तत्वमायातं विश्वाभिलापार्थविकल्पशून्यत्वात् व्य- नीतसामान्यभाववादिवत् व्यतीतविशेषभाववादिवच्च । सर्वथा H टीकासहित। शून्यवादिवद्वेति वाक्यभेदेन व्याख्यातव्यं । परं हि सामान्य सवं द्रव्यगुणकर्मभ्यो भिन्नमभिदधतां द्रव्यादीनामसी स्यात्सत्वाद्भिन्नत्वात्मागभावादिवत् । ननु द्रव्पादीनामप्रति- पत्तौ हेतोराश्रयासिद्धिः प्रतिपत्तो धर्मिग्राहकप्रमागाबाधित: पक्षः कालात्ययापदिष्टश्च हेतुरिति चेत्, न द्रव्यादीनां धर्मिणां कथंचित्सत्वादभिन्नानां प्रत्यक्षादिप्रमाणतः सिद्धेम्त- रेदैकांतसाधनायैव प्रयुक्तस्य हेतोः कालात्ययापदिष्टन्वसिद्धेः । ननु च सचान भिन्नत्वादित्येतस्य हेतोरप्रतिपचौ स्यादसिद्धत्व: प्रतिपत्तौ तु धर्मिग्राहकप्रमाणवाधित: पक्षो हेतुश्च कालात्ययो- दितः स्याद् द्रव्यादीनांसवादभेदग्रहणस्य द्रव्याद्यस्तित्वप्रति- पशिनान्तरीयकत्वात्तदसत्त्वे तदभेदप्रतिपत्तेरयोगादिति च न समीचीनं वचनं प्रसंगसाधनप्रयोगात् इति चेत् न सत्त्वाद्भिनव हिमागभावादिषु परैः स्वयमसम्वेन व्याप्तं प्रतिपन्नं द्रव्यादिषु प्रतिपद्यमानमसन साधयतीति साध्यसाधनयोाप्यव्यापक- भावनिश्चये सति व्याप्याभ्युपगमस्य व्यापकाभ्युपगमनान्तरी- यकस्य प्रदर्शनं प्रसंगसाधनमनुमन्यताम् । ननु च किं सत्त्वा- सपवायोऽसचं साध्यते किं वा नास्तित्वमिति पक्षद्वितयं । न तावदुत्तरः पक्षः श्रेयानास्तित्वेन सत्त्वाद्भिन्नत्वस्याव्याप्तत्वात् । प्रागभावादीनां सत्त्वाद् भिन्नत्वेऽपि सद्भावादन्यथोदाहरण- त्वविरोधात् । प्रथमपक्षे तु प्रमाण बाधः सवसमावायस्य द्रव्यादिषु प्रमाणतः प्रतीतेः सत्त्वासमवायस्य तया बाध्यमा- नत्वं । तथा हि-द्रव्यादीनि सत्तासमवायभांजि सत्प्रत्यय- ५६ युक्त्यनुशासनं। विषयत्वात् , यत्तु न सत्तासमवायमाक्तन सत्मत्ययविषयो यथा मागभावाधसत्तत्वं । सत्मत्ययविषयाश्च द्रव्यादीनि तस्मात्सत्तासमवायभांजीति द्रव्यादिपु सत्त्वस्य समवायप्रतीति: सच्चासमवायस्य वाधिकास्ति ततो न द्रव्यादीनामसत्त्व सन्यासमवायलक्षणं साधयितुं शक्यं नास्तित्वलक्षणासत्त्ववदि- ति केचित् । तेऽपि न परीक्षकाः । सत्मत्ययविषयत्वस्य हेतोः परेषां सामान्यादिभिर्व्यभिचारात तेपु सवसमवायासंभवेऽपि भावात् । यदि पुनर्मुख्यसत्पत्ययविषयत्वस्य हेतुत्वान्नोपच- रितसत्प्रत्ययविषयत्वेन व्यभिचारोद्भावनं युक्तमतिप्रसंगादिति निगद्यते तदा सामान्यादिषु कुतः सत्मत्ययविषयत्वमुपचरि- तमिति वक्तव्य । स्वरूपसत्त्वनिमित्तत्त्वादिति केचित् । व्याह- तमेतत् स्वरूपसत्त्वनिमित्तं चोपचरितं चेति को ह्यबा- लिशः स्वरूपसत्चनिमित्तं सत्पत्ययविषयत्वमुपचरितमर्थान्तर- भूतसत्तासबंधत्वान्मुख्यमिति यादन्यत्र जडात्मनः, यष्टि- स्वरूपनिमित्तं हि यष्टौ यष्टिपत्ययविषयत्वं मुख्य लोके प्रसिद्ध, यष्टिसंबंधासु पुरुषे गौणमिति मुख्योपचरितव्यवस्था- तिक्रमादनादेयवचनताऽस्य स्यात् । स्यादात ते सत्तास- मवायनिमित्तं सत्मत्ययविषयत्वं द्रव्यादिषु मुख्यं तद्विशेषणस- स्वग्रहणपूर्वकत्वाद्विशेषणप्रत्ययनिमित्तस्य विशेषप्रत्ययस्य मु- ख्यत्वसिद्धेः यष्टित्वविशेषणग्रहणनिमित्तकविशेष्ययष्टिप्रत्य- यवत् सत्त्वविशेषणग्रहणमंतरेण सामान्यादिषु सत्मत्यय- १ 'यष्टिसवधवत्सु पुरुषेषु' इति पुस्तकांतरे ।
टीकासहित। श्योपचरितत्वसिद्धेः पुरुषे यष्टित्वग्रहणमन्तरेण यष्टिप्रत्ययव- दिति । तदप्यसम्यक् । तत एव व्यभिचारसिद्धः सत्प्रत्य- पविषयच्चस्य सत्वसमवायासंभवेऽपि भावात् । ततो द्रव्यादीनां सत्तातोऽत्यंतभेदोपगमे सत्वासमवायलक्षणमसत्त्वं सिद्धमेव । तथा पृथिव्यादीनामद्रव्यत्वं द्रव्यत्वाद्भिन्नत्वाद्रूपादिवत्, रूपा- दीनां चागुणत्वं गुणत्वादन्यत्वादुत्क्षेपणादिवत् , उत्क्षेपणा- दीनामकर्मकत्वं कर्मत्वादन्तिरत्वाद्धरादिवदिति व्यतीतसा- मान्यत्वं द्रव्यगुणकर्मणामसत्त्वं साधयति व्यतीतविशेषत्ववत् । तत्सूक्तं मूरिभिः सदसत्तरी यौगानामसदेव व्यतीतसामान्य- 'विशेषभावात् खपुष्पादिति सामान्य विशेषसमवायानां हि स्व- यमसामान्य विशेषत्वाभ्युपगमात्प्रागभावादिवन्नासिद्धं व्यती- तसामान्यविशेषत्ववत्वं साधनं । नाऽपि द्रव्यगुणकर्मणां सामा- न्यायभावे प्रसिद्ध तेषां व्यतीतसामान्यविशेषत्वस्याप्रसिद्धि- स्थवा द्रव्यादीनां नास्तित्वमेव साध्यं खपुष्पवदिति दृष्टांत- सामर्थ्यात् , ततो विश्वाभिलापार्थविकल्पशून्यं तत्त्वमायातं । अभिलापः पदं तस्यार्थः, अभिलापार्थः पदार्थ इति यावत् । तस्य विकल्पा भेदाः षट् द्रव्याइयो वैशेषिकाणां, प्रमाणादयः चोडश नैयायिकानां, विश्वे च तेऽभिलापार्थविकल्पाश्चेति स्वपदार्थशिस्तैः शून्यं तत्वं स्यात्व पुष्पवदसदेव प्रबुद्धत- वाद्भवतः परेषामिति वचनाद्भवतो वीरस्यानेकांततत्त्ववादिनो नासत्तत्वं स्यादिति प्रतीयते । कथंचिसामान्य विशेषभावस्य द्रव्यादिषु प्रतीयमानत्वात्प्रमाणादिषु बाधकाभावात् द्रव्या- .
६० युफ्त्यनुशासनं। पक्षदूंपणत्वात्तत्सिद्धिरेवेति चायुक्तं यस्माद्वाच्यं यथार्थं न च दूषणं तत् यद् दुपणं परपक्षे स्वयमुच्यते क्षणिकैकांतवादिना तत्र च यथार्थं वाच्यं तच्च न सम्यग्दपणं वक्तुं शक्यमित्यर्थः । न नित्यं वस्तु सदनर्थक्रियाकारित्वात् क्रमयोगपद्यरहितत्वात् खपुष्पवदिति दूपणस्यायथार्थत्वादुपणाभासवसिद्धेः परप- क्षवत्स्वपक्षेऽपि भावान्न तत्मत्यनयोः पक्षयोः कचिद्विशेषोऽ- स्ति । ताभ्यां हि सर्वथैकांताभ्यामनेकान्तो निवर्ततें विरोधा- त्तनिवृत्तौ तु क्रमाक्रमौ निवर्त्तते तयोस्तेन व्यासत्वात् । एक- स्यानेकदेशकालव्यापिनो देशक्रमकालक्रमदर्शनात । तथै- कस्यानेकशक्त्यात्मकस्य नानाकार्यकरणे योगपद्यसिद्धेः । क्रमाक्रमयोश्च निवृत्तौ ततोऽर्थक्रियाया निवृत्तिस्तस्यास्ताभ्यां व्याप्तत्वात् क्रमाक्रमाभ्यां विना कचिदर्थक्रियानुपलब्धेस्त- निवृत्तौ च वस्तुतत्वं न व्यवतिष्ठते तस्यार्थक्रियया व्याप्त- त्वात् । न च स्वपक्षं परपक्षवत् निराकुर्वदुषणं यथार्थ भवि- तुमर्हति न सर्वथाऽप्यसत्तत्त्वं तत एव नोभयमनुभयं चार्थक्रि- याविरोधात् । किं तर्हि सकलमवाच्यमेवेत्येकान्तवादेऽपि दूपणमा- चेदयन्ति । उपेयतत्त्वानभिलाप्यताव- दुपायतत्त्वानभिलाप्यता स्यात् । १ प्रमाणत्वात् इति पाठान्तरं ।
टीकासहित। अशेषतत्त्वानभिलाप्यतायां द्विषां भवद्युक्त्यभिलाप्यतायाः॥२८॥ टीका-भवतो वीरस्य युक्तिया॑यः स्याद्वादनीतिस्तस्या अभिलाप्यता कथंचित्सदेवाशेषं तत्वं स्वरूपादिचतुष्टयात्कयं- चिदसदेव विपर्यासादित्यादिवचनविषयता तस्या द्विषां श- त्रूणामशेषस्यापि तत्वस्यानभिलाप्यतायामभिप्रेतायां कि स्यादुपायतत्वस्यानभिलाप्यता स्यादुपेयतत्वस्येवाविशेषात् । ततश्च यथोपेयं तत्त्वं निःश्रेयसं सर्वथाभिलपितुमशक्यं तथो- पायतत्त्वमपि, तत्माप्तेः कारकं ज्ञायकं चेति सर्वथाऽप्यनमिला- प्यं तत्त्रमित्यपि नाभिलपितुं शक्येत प्रतिज्ञातविरोधादित्य- भिप्रायमावि:कुर्वन्ति स्वामिनः- अवाच्यमित्यत्र च वाच्यभावा- दवाच्यमेवेत्ययथाप्रतिज्ञम् । स्वरूपतश्चेत्पररूपवाचि स्वरूपवाचीति वचो विरुद्धम् ॥२९॥ टीका-सर्वथाऽप्यशेष तत्वमवाच्यं स्यात्स्वरूपतो वा पररूपतो वा गत्यंतराभावात् । प्रथमपक्षे तावदवाच्यमयथा- प्रतिज्ञं प्रसज्येत इति क्रियाध्याहारः। कुत एतत् अवाच्य- मित्यत्र वाच्यभावादवाच्यमित्यस्यैव वाच्यत्वादित्यर्थः । सप्त- म्याः षष्ठयर्थत्वाच्चशब्दस्यैव शब्दार्थत्वात् । स्वरूपेणावाच्य- युक्त्यनुशासनं । मिति द्वितीयपक्षे स्वरूपवाचि सर्व वच इति विरुद्धवचनमा- सज्येत । पररूपेणावाच्यतत्वमिति तृतीयपक्षेऽपि पररूपवाचि सर्व वच इति विरुध्यते । सर्वत्र स्वप्रतिज्ञाव्यतिक्रमादयथा- प्रतिज्ञमिति सम्बन्धनीयम् । तदेवं न भावमात्रं नाभावमात्रं नोभयं नावाच्यमिति चत्वारो मिथ्याप्रवादा: प्रतिपिद्धा: सामान्न सदवाच्य तवं नासदवाच्यं नोभयावाच्यं नानु- भयावाच्यमिति निवेदितं भवति न्यायस्य समानत्वात् । कालबद्वाच्यत्वप्रतिज्ञाया तत्त्वस्य प्रतिपादकं वचनं सत्यमेवानृतमेव वे यायेकान्वनिगसार्थमाह:- सत्यानृतं वाऽप्यनृतानृतं वाऽ- प्यस्तीह किं वस्त्वतिशायनेन । युक्तं प्रतिद्वंद्वयनुबंधिमिश्र न वस्तु तादृक् त्वदृते जिनेदृक् ॥ ३०॥ टीका-किचिद्वचन सत्यानृतमेव ऽस्ति प्रतिद्वन्द्विमिश्र सत्येतरज्ञानपूर्वकत्वाच्छाखायां चन्द्रमसं पश्येति, यथा तत्र हि चन्द्रमसं पश्यति सत्यं चन्द्रमपो दर्शनात्संवादकमादुर्भा- वात् । शाखाय.मिति वचनमनृतं शाख प्रयासमा चदर्शनस्य चन्द्रमसि विसंवादकत्वात्तनिर्वधनवचनस्यानृतत्व सिद्धः। सत्यं च तदनृतं चेति सत्यानृतमातिष्ठते प्रतिद्वन्द्विभ्यां सत्यान- ताभ्यां वस्त्वंशाभ्यां मिश्र युतमिति संबंधनीयं । परवचनम- नृतानृतमेवास्ति तच्चानुबंधिमित्रं यथा चन्द्रद्वयं गिरौ पश्ये- टीकासहितं। ६६ ति। तत्र हि यथा चन्द्रद्वयवचनमनृतं तथा गिरौ चन्द्रवचन विसंवादिज्ञानपूर्वकत्वात् । एकस्मादनृतादपरपनृतमनुबंधि स- मभिधीयते तेनानुबंधिना मिश्रमनुवधिमिश्रमिति प्रत्येयं । प्रति- द्वन्द्वि चानुबंधि च प्रतिद्वन्द्वयनुबंधिनी ताभ्यां मिश्रं सत्यानृतं चाप्यनृतानृतं चेति यथासंख्यमभिसंवधाद्वाशब्दस्यैवकारार्थत्वा- देव व्याख्यातव्यम् । तच्चेदृक् भगवन् ! जिन! नाथ! वहते त्वत्तो विना वस्तुनोऽतिशायनेनाभिधेयस्यातिशयेन वचनं प्रवर्तमान किं युक्तं, नैव युक्तमित्यर्थात्तवैव युक्तमेतदिति गम्यते तादृगने- कान्तमेकं नावास्तवं भवति त्वदृते सर्वथैकान्तस्यावस्तुत्व- व्यवस्थानात् । कथं पुनः किंचिदनृनमपि सत्यं सत्यमप्यनृतं किंचि- दनृतपनृतमेवेति भेदोऽनृतस्य स्यादित्यावेदयन्ति । सहक्रमाद्वा विषयाल्पभूरि भेदेऽनृतंभेदि न चात्मभेदात् । आत्मान्तरं स्याद्भिदुरं समं च स्याच्चानृतात्मानभिलाप्यता च ॥ ३१॥ टीका-विषयस्याभिधेयस्य लभूरिभेदोल्पानल्लविकल्प- स्तस्मिन् सति स्यादेवानृतं भेदवत् यस्य हि वचनस्याभिधे- यमल्पमसत्यं भूरि सत्यं तत्सत्यानृतमिति, सत्यविशेषणेनानृतं भेदि प्रतिपाद्यते । यस्य तु वचनस्याभिधेयमल्पं सत्यमनृतं भूरि नदनृतानृतमिति, अनृतविशेषणेनानृतं । न चात्मभेदादनृतं ६४ - युक्त्यनुशासनं। भेदि भवितुमर्हति तस्यानृतात्मना सामान्येन भेदाभावात् । आत्मान्तरं-तु तस्यानृतस्यात्मविशेषलक्षणं स्यात् भिदुरं भे- दस्वभावं विशेषणभेदात्स्यात् समपभेदस्वभावं विशेपणभेदा- भावात् चशब्दादुभयं हेतुद्वयार्पणाक्रमेणेति यथासंभवमभि- संवध्यते न तु यथासंख्यं छन्दोवशात्तथाभिधानात्सहद्वया- पंणात् । स्याच्चानृवात्मानमिलाप्यता च सहोभाभ्यां धर्मा- भ्यामभिलपितुमशक्यत्वाच्चशब्दोऽनमिलाप्यांतराभिलाप्यांतर- भंगत्रयसमुच्चयः स्याद्भिदुरं चानभिलाप्यं च स्यात्सम चाऽन- भिलाप्यं चेति स्यादुभ्यं चाऽनामिलाप्यं चेति सप्तभंगी प्रत्येया। ननु च न वस्तुनोऽतिशायनं संभवति, सदेकरूपत्वादि. त्येके । असदेकान्तात्पकत्वादित्यपरे । सच्चासत्त्वावशेष- धर्मप्रतिषेधादिति चेतरे । तन्निराकरणपुरःसरं वस्तुनोज्नेका- तिशयसद्भावमावेदयन्ति- न सच नासच न दृष्टमेक- मात्मान्तरं सर्वनिषेधगम्यम्। दृष्टं विमिश्रं तदुपाधिभेदा- स्वप्नेऽपि नैतत्त्वदृषेः परेषाम् ॥ ३२॥ टीका-न तावत्सत्त द्वैतं तचं इष्टमिति स्वभावानुपलं- भेन सन्मानं निराक्रियते । तथा हि-नास्ति सन्यानं सकल- विशेषणरहित दृश्यस्य सतोजातुचिददर्शनात् असन्मात्रवदि- टीकासहितं। ६५ S त्यनेन नासदेव तत्वं दृष्टमिति व्याख्यातं चशब्दस्य समुच्च- यार्थत्वात् । परस्परनिरपेक्षं सत्तत्त्वमसत्तत्वं न दृष्टमिति घटना- तेन न परस्परनिरपेक्षं सदसत्तत्वं संभवति सर्वप्रमाणतो दृष्टत्वात्सन्मात्रतत्ववदसन्मात्रतत्त्ववद्वेति प्रतिपादितं प्रतिप- त्तव्यं । तथा न सन्नाप्यसन्नोभयं नैकं नानेकमित्यादथ- शेषधर्मप्रतिषेधगम्यमात्मान्तरं परमब्रह्मतत्त्वमित्यपि न संभवति। कदाचित्तथैवादर्शनादिति न दृष्टमेकमात्मान्तरं सर्वनिषेधग- व्यमिति व्याख्यानव्यं । तदेवं सत्चासत्चविमिश्रं परस्परापेक्ष तत्त्वं दृष्टमित्यनेन सदसदादेयकांतव्यवच्छेदेन सदसदादय- नेकान्तत्व साध्यते, तदुपाधिभेदात् । उपाधिर्विशेषणं स्व- द्रव्यक्षेत्रकालभावाः परद्रव्यक्षेत्रकालभावाश्च तद्भेदादित्यर्थः। तेनेदमुक्तं भवति-स्यात्सदेव सर्व तत्त्वं स्वरूपादिचतुष्टयात्, स्यादसदेव सर्व तत्वं पररूपादिचतुष्टयात् , स्यादुभयं स्वपर- रूपादिचतुष्टय द्वैतक्रमाप्तिात् , स्यादवाच्यं सहार्पिततद्वैतात् , स्यात्सदवाच्यं स्वरूपादिचतुष्टयादशक्तेः, स्यादसदवाच्यं प- ररूपादिचतुष्टयादशक्तेः, स्यात्सदसदवाच्यं क्रमाप्तिस्वपररू- पादिचतुष्टयद्वैतात्सहार्पिततद्वैताच्च । इत्येवं तदेव सदसदादि- विमिश्रं तस्वं दृष्टमिति वस्तुनोऽतिशायनेन किंचित्सत्यानृतं , किंचिदनृतानृतं वचनं तवैव युक्तम् । त्वत्तो महर्षेरन्येषां सदायेकान्तवादिनां स्वप्नेपि नैतत्संभवतीति वाक्यार्थः प्रतिपत्तव्यः। ननु च निर्विकल्पकं प्रत्यक्षं निरंशवस्तुप्रतिभास्येव न " - 1 - ६६ युक्त्यनुशासन। धर्मिधर्मात्मकवस्तुमतिभासितपृष्ठमाविविकल्पनज्ञानोत्यं धर्मी धर्मोऽयमिति धर्मिधर्मव्यवहारस्य प्रवृत्तेस्तेन च सकलफल्प- नापोटेन प्रत्यक्षेण निरंशस्त्रलक्षणस्यादर्शनमसिद्धं कथं तद- भावं साधयेदिति बदन्तं प्रत्याहु:- प्रत्यक्षनिर्देशवदप्यसिद्ध- मकल्पकं ज्ञापयितुं ह्यशक्यम्। विना च सिद्धेर्न च लक्षणार्थी न तावकद्वेषिणि वीर ! सत्यम् ॥३३॥ टीका-प्रत्यक्षेण निर्देशः प्रत्यक्षनिर्देशा, प्रत्यक्षतो दृष्ट्वा नीलादिकमिदमिति वचनमन्तरेणांगुल्या प्रदर्शनमित्य- र्थः । स प्रत्यक्षनिर्देशोऽस्यास्तीति प्रत्यक्षनिर्देशवत् । तदप्य- सिद्धं । कुत एतत् , यस्मादकल्पकं ज्ञापयितुं कुतश्चिदप्य- शक्यं, हि यस्मादर्थे । तेनेदमुक्तं भवति-यस्मादकल्पक कल्प- नापोटं, न विद्यते कल्पः कल्पनाऽस्मिन्निति विग्रहः , तद् ज्ञाप- यितुं संशयितेभ्यो विनेयेभ्यः प्रतिपादयितुं न शक्यं, तस्मा- प्रत्यक्ष निर्देशवदपि तत्त्वमिदमसिद्धमिति । तद्धि प्रत्यक्षमक- ल्पकं न तावत्प्रत्यक्षतो ज्ञापयितुं शक्यं तस्य परासंवेद्यत्वात् । नाऽप्यनुमानात्तत्प्रतिवद्धलिंगमतिपत्तेरसंभवात्परेषामगृहीतलिं- गलिंगिसम्बंधानामनुमानज्ञानेन ज्ञापयितुमशक्तेः । स्वयंप्रति- पन्नकल्पनापोभत्यक्षप्रतिवद्धलिंगानां तु तज्ज्ञापनानर्थक्यात् ।
टीकासहितं। ६७ को हि स्वयमकल्पकं प्रत्यक्ष तदविनाभाविलिंगं च प्रतिपद्यमान: प्रत्यक्षमकल्पकंन प्रतिपद्येत ।प्रतिपद्यमानस्यापि विपरीतसमारो- पसंभवार ज्ञापनमनुमानेन नानर्थकमिति चेत् , न, समारोपव्य- वच्छेदेपि पर्यनुयोगस्य समानत्वात् । किं प्रतिपन्नसाध्यसाध- नसंबंधस्यानुपानेन समारोपव्यवच्छेदःसाध्यते, स्वयमप्रतिपन्न- साध्यसाधनसंबंधस्य वेति ? न तावत्पथमः पक्षः, समारोपस्यै- वासंभवात् । स्वयं प्रत्यक्षमाल्यकं तदविनाभाविसाधनं च पति- पद्यमानस्य सपारोपे परेण प्रत्यायनेऽपि तस्य समारोपप्रसं- गात् । नाऽप्यप्रतिपन्नसाध्यसाधनसंबंधस्य साधनप्रदर्शनेन समारोपव्यवच्छेदनं युक्तमतिप्रसंगात् । यदि पुनर्गृहीतविस्मृ- तसंबंधस्य साध्यसाधनसंबंधस्मरणकारणात्समारोपो व्यव- च्छिद्यत इति मतं, तदप्ययुक्तम् । संबंधग्रहणस्यैवासंभवात, स्वयमविकल्वकप्रत्यक्षानिश्चये तत्स्वभावकार्यानिश्चये च तत्सं- बंधस्य निश्चेतुमशक्तेः । परतो निश्चयात्तन्निश्चये तत्स्वरूप- स्यापि निश्चयान्तरानिश्चयप्रसंगादनवस्थानात् । निश्चयस्व- रूपानिश्चये ततोकल्पकप्रत्यक्षव्यवस्थानानुपपत्तेः सर्वथा तस्य ज्ञापयितुमशक्तेः कुतः सिद्धिः स्यात् ? विना च सिद्धेन च लक्षणार्थः संभवति "कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्ष" मिति ल- क्षणमस्यार्थः प्रत्यक्षप्रत्यायनं, न च प्रत्यक्षस्य सिद्धेविना तत्पत्यायनं कत्तुं शक्यमिति नैव लक्षणार्थः कश्चित्संगच्छते । ततो न तावकद्वेषिणि वीर ! सत्यं सर्वथा संभवति । तवाऽयं तावकः स चासौ द्वेपी चेति तायकद्वेषी तावकगछरित्य- १८ युक्त्यनुशासनं । र्थः । तस्मिन्न सत्यं वीर ! भगवन्निति व्याख्यानं । अथवा तवेदं मतं तावकं तद् द्वेपीति तावकद्वेपी सदायेकान्तवाद- स्तस्मिन्न सत्यमेकांततः साधयितुं शक्यत इति व्याख्येयं । यथासत्यं न संभवति तथा कर्त्ताशुभस्याशुभस्य वा कर्मणः, कार्य च शुभमशुभं वा तद द्वषां न घटत इति प्रतिपादयंति- कालान्तरस्थे क्षणिके ध्रुवे वाऽ- पृथक्पृथक्त्वावचनीयतायाम् । विकारहानेन च कर्तृकार्ये वृथा श्रमोऽयं जिन! विद्विषां ते॥३४॥ टीका- वन्तुनो जन्मकालादन्यः कालः कालान्तरं तत्र तिष्ठतीति कालांतरस्थं तस्मिन्वस्तुनि प्रतिज्ञायमानेऽपि न कर्ता कश्चिदुपपद्यने, क्षणिके ध्रुवे वा । वाशब्द इवार्थम्तेनेदमुक्त भवति, यथा क्षणिके निरन्वयविनाशिनि वहिरन्तश्च वस्तुनि न कर्ताऽस्ति क्रमयोगपविरोधात् क्रियाया एवासंभवात् । यथा च ध्रुवे कूटस्थे नित्ये निरतिशये पुरुषे मति न कर्ता विद्यते तथा कालांतरस्थेपि अपरिणामिनि पदार्थे न कश्चिक- संभवति, कर्तुरभावे च न कार्य स्वयं समीहितं सिध्यति कर्तनान्तरीयकत्वात्कार्यस्येति । कुत एतदिति चेत्, विकार- हानेर्विकारः परिणामः स्वयमवस्थितस्य द्रव्यस्य पूर्वाकार- परित्यागाजहदुत्तरोत्तराकारोत्पादस्तस्य हानिरभावस्ततो विकारहानेरिति हेतुनिर्देशः । विकारो हि विनिवर्तमानः टीकासहितं। ६६ क्रमाक्रमौ निवर्तयति तयोस्तेन व्याप्तत्वात् , तन्निवृत्तौ तन्नि- वृत्तिसिद्धेस्तौ च निवर्तमानौ क्रियां निवर्तयतस्तस्यास्ताभ्यां व्याप्तत्त्वात् । क्रियापाये च न कर्ता क्रियाधिष्ठस्य द्रव्यस्य स्वतंत्रस्य कर्तृत्वसिद्धेः । कर्तुरभावे च न कार्य स्वर्गापवर्गल- क्षणमिति वृथा श्रमोऽयं तपोलक्षणस्तदर्थ क्रियमाणः स्यात् जिन ! स्वामिन् ! वीर ! तब द्विषां सर्वथैकान्तवादिनां सर्वे- वामिति संक्षेपतो व्याख्येयम् । ननु च वस्तुनि क्षणिके विकारस्य हानिरवस्थितस्य द्रव्यस्याभावात्, ध्रुवे च पूर्वाकार विनाशोत्तराकारोत्पादाभा- वात्, कालान्तरस्थेतु कथं तत्रोभयसंभवादिति केचित् । तेऽपि न प्रामाणिकाः। प्रागसत एशोत्पन्नस्य कालान्तरस्थस्याषि पश्चादसत्चैकान्ते सर्वथैकक्षणस्थाद्विशेषाभावादनन्वयत्वस्य तदवस्थत्वात् । ननु नित्यस्यात्मनोन्तस्तत्त्रस्य पूर्वानुभूत- स्मृतिहेतोः प्रत्यभिज्ञातुरर्थक्रियायां व्यःप्रियमाणम्य कर्तुः कार्यस्य च तेन क्रियमाणस्य घटनाद्विशेष: कालान्तरस्थस्य क्षणिकादिति केचित् । नात्मनोऽपि नित्यस्यैककर्तृत्वानुपपत्तेः। बुद्धयाद्यतिशयसद्भावात् कर्त्तात्मेति चेत् , न, बुद्धी- च्छाद्वेषप्रयत्नसंस्काराणामात्मनोऽन्तिरत्वे खादिवत्वत्तृत्वा- नुपपत्तेः, इद मे सुखसाधनं दुःखसाधनं चेति बुद्धया खलु किंचिदात्मा जिघृक्षति वा जिहासति वा ग्रहणाय हानाय वा प्रयतमानः पूर्वानुभवसंस्कारात्कार्यस्योपादाता हाता वा कों- च्यते सुखदुःखे च यदात्मनो भिन्ने स्यातां खादेरिख न तदा ७० युक्त्यनुशासनं। सुखदुःखे पुंस एवेति नियमः सिध्येत् । तयोः पुंसि समवा- यात्पुंस एव सुखदुःखे न पुनः खादेरिति चेत् , कुतस्तयोः धुंस्येव समवायः स्यात् । मयि सुख दुःखं चेति बुद्धेरिति चेत् , सा तर्हि बुद्धिः पुनरात्मन्येवेति कुतः सिध्येत् । समवा- यादिति चेत्, कुतस्तस्यास्तत्रैव समवायो न च गगनादाविति निश्चेतव्यं । मयि बुद्धिरिति बुद्धयंतरादिति चेत्, तदपि बुद्धयंतरमात्मन्येवेति कुतः ? समवायादिति चेत्, कुतस्तस्या- स्तत्रैव समवाय इत्यादि पुनरावर्चत इति चक्रकप्रसंगः । यस्य यद्बुद्धिपूर्वकाविच्छाद्वेषौ तत्र तबुद्धेः समवाय इति चेत्, कुतः पुंस एव बुद्धिपूर्वकाविच्छाद्वेषौ न पुनः खादेरिति निश्चयः ? पुंस एच प्रयत्नादिति चेत्, प्रयत्नोऽप्यात्मन एवेति कुतः संप्र- त्ययः ? प्रवृतेरिति चेत् सा तर्हि प्रवृत्तिरुपादानपरित्याग- लक्षणा कुशला वाऽकुशला वा मनोवाकायनिमित्ता प्रयत्न- विशेष बुद्धिपूर्वकमनुमापयंती पुंस एवेति कुतः साधयेत् ? शरीरादावचेतने तदसंभवात्पारिशेष्यादात्मन एव सेति चेत् , मात्मनोऽपि स्वयमचेतनत्वाभ्युपगमात् । चेतनासमवायादात्मा चेतन इति चेत्, न स्वतोऽचेतनस्य चेतनासमवाये खादि- हदपि तत्प्रसंगात् , स्वतश्चेतनत्वे चेतनासमवायवैयात् । स्वरूपचेतनया साधारण रूपया चेतनस्य साधारणचेतनासमवाय इति चेत् , नासाधारणचेतनायाः पुंसोऽनन्तरत्वे साधारमा- चेतनाया अप्यनन्तरत्वमतिप्रसंगाचेतनाविशेषसामान्ययोः घुसस्तादात्म्यसिद्धौ च परमतानुसरणं दुर्निवारं । चेतनावि- - टीकासहितं । शेषस्यापि चेतनासामान्यवदात्मनोऽर्थान्तरत्वे कुतो न गगना- देविशेषोऽचेतनत्वादिति शरीरादाविव पुंस्यपि प्रवृतिर्न सि- ध्येत्तदसिद्धौ न तत्रैव प्रयत्नसिद्धिरिच्छाद्वेषसिद्धिर्वा सुख- दुःखबुद्धिश्चेति न कर्ताऽत्मा सिध्येत्, कार्य वा यतः कालांतरस्थे बुद्धयादौ कर्तृकार्ये न विरुध्येते क्षणस्थितिबुद्धयादिवत् । अथवा महदादिः कालांतरस्थायी नित्यात्प्रधानादपृथग्भूतः पृथग्भूतो वा ? प्रथमपक्षे न कर्तृकार्ये, विकारस्य हानेः, कर्तृ प्रधान, कार्य महदादिव्यक्तं, तयोश्वापृथग्भावे यथा प्रधानमवि- कारि तथा महदादि व्यक्तमपि तदपृथक्त्वात् प्रधानस्वरूपवत तथा च न कार्य प्रधानवत, कार्याभावे च कस्य कर्तृ प्रधान स्याद्विकारस्य कार्यस्याभावात् ततो नापृथक्त्वे व्यक्ताव्यक्त- यो कर्तृकार्ये व्यक्ताव्यक्ते स्यातां। द्वितीयपक्षेऽपि न कर्तृकार्य, तथा हि-न प्रधानं कर्तृ महदादिकार्यात् पृथग्भूतत्वात पुरुषवत् , विपर्ययप्रसंगो वा महदादि च न कार्य कर्तुरभा- वात्पुरुषवत् । न हि प्रधानं महदादेः कर्तृ तस्याविकारित्वात्पुरु- पवदिति नासिद्धः कर्तुरभावः । यदि पुनर्व्यक्ताव्यक्तयोरपृथ- क्वपृथवत्वभ्यामवाच्यता स्वीक्रियते तदाऽप्यपृथक्त्वपृथक्त्वा- बचनीयतायां न कर्तृकार्ये विकारस्य हानेः पुरुषभोक्तृत्वादि- वत् । पुरुषाद्धि भोक्त्तृत्वादिरपृथक्त्वपृथक्त्वाभ्यामवच- नीयोऽन्यथा तदपृथक्त्वेन भोक्ता नित्यः सर्वगतोऽत्रियो निर्गुणोऽकर्ता शुद्धो वा सिध्येत् पुरुष एव भोक्तृत्वनित्य- स्वसर्वगतत्वाक्रियत्वनिर्गुणत्वाकर्तृत्त्वशुद्धत्वधर्माणामन्तर्भावा- ७२ युक्त्यनुशासनं । त् । तेषां पुरुषात्पृथग्भावे वा स एव दोषः स्यात् भोक्तृत्त्वादि- भ्योऽन्यस्य भोक्तृत्वादिविरोधात् । प्रधानवदपृथक्त्वपृथक्त्वा- 'भ्यापवचनीयत्वे चन कर्त्तात्मा भोक्तृत्वादेर्नापि भोक्तृत्त्वादिः कार्य पुरुषस्येति नोदाहरणं साध्यसाधनविकलं कर्तृकार्यत्वाभा- वसाधनस्य विकाराभावस्य साध्यस्य पृथक्त्वापृथक्त्वावचनीयत्व.. स्य च साधनस्य सद्भाव'त्, ततो यत्रानन्यत्वान्यत्वाभ्यामवच- नीयता तत्र विकारहानिः साध्यते । यत्र च विकारहानिस्तत्र कर्तृकार्यत्वाभाव इति कालान्तरस्थेऽपि महदादौ न कर्तृकार्ये । पृथक्त्वापृथक्त्वावचनीयताया विकारहानेरिति वाक्यभेदेनापृथ- यत्वे पृथक्त्वे च व्यक्ताव्यक्तयोरपृथक्त्वपृथक्त्वाभ्यामवचनी- थतायां चेति पक्षत्रयेऽपि दृपणं योजनीयम् । तथा च सांख्या- नामपि जिन ! तव विद्विषां वृथा श्रमः सकलो यमनियमास- नप्राणायामप्रत्याहारध्यानधारणासमाधिलक्षणयोगांगानुष्ठान- भयासः खेदो वृथैव स्याद्वैशेषिकनैयायिकानामिवेति वाक्या- र्थः । तदेवं समतदोषं मतमन्यदीयमिति समर्थितं । जिन ! स्वदीयं मतमद्वितीयमिति प्रकाशितं च । ततस्त्वमेव महा- नितीयत्पतिवक्तुमीशा एव वयमिति प्रकृतसिद्धिः । साम्प्रतं चार्वाकमतमनूद्य दूषयन्ति- मद्यांगवद् भूतसमागमे ज्ञः शक्त्यन्तरव्यक्तिस्दैवसृष्टिः। इत्यात्मशिश्नोदरपुष्टितुष्टै- .
टीकासहितं। निभियहाँ ! मृदवः प्रलब्धाः॥३५॥ टीका-बद्यांगानि पिष्टोदकगुडधातक्यादीनि तेत्रिय तद्धेतुभूतानि पृथिव्यप्तेजोवायुतत्वानि तेषां समागमः समुदाय- स्तस्मिन्सति ज्ञश्चेतनः परिणामविशेषः सुख दुखहर्षविषादादि- विवर्त्तात्मको गर्भादिमग्णपर्यन्तः प्रादुर्भवत्याविर्भवति वा कार्यवादाभिव्यक्तिवादायिणामिति भावः । पृथिनशेजो- वायुरिति तत्वानि तत्समुदये शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञास्तेभ्यश्चै- तन्यमित्यत्र सूत्रे कार्यवादिभिरविद्धकर्मादिभिरुत्पद्यते इति क्रियाध्याहारात्, तथाऽभिव्यक्तिवादिभिः पुरंदरादिभिरभि- व्यज्यत इति क्रियाध्याहारात् । भूतसमागमे ज्ञ इति भूतसमु- दास परंपरया कारणवप्रमिव्यंजावं वा प्रत्येयं । साक्षा- च्छरीरेन्द्रियविषयसंज्ञेभ्य एव अस्योत्पादाभिव्यक्तिवचनाद अहं चक्षुषा रूपं जानामीति ज्ञातुः प्रतीतेस्तेषामन्यतमत्याप्य- पाये इस्थापतीतेनिक्रियायाः कर्तृहरणकर्मनान्तरीयकत्वात् । तत्र शरीरसंज्ञस्य कर्तृत्वाच्चैतन्यविशिष्टायव्यतिरेकेणापरण्या- त्मनस्तत्त्वांतरस्य कुतश्चित्प्रमाणादप्रतिपत्तेश्चक्षुरादींद्रियसंज्ञस्य करणत्वाच्चैतन्यविशिष्टन्द्रियव्यतिरेकेण वरणस्याऽसंप्रत्ययात् । विषयज्ञस्स वा कर्यत्वात्तस्य ज्ञेयतयाऽस्थितत्वात् । न च मृतशरीरेन्द्रियविषयेभ्यश्चैतन्यक्ष्यानुदयदर्शातेभ्यश्चैतन्यमिति दुःसाधनं, चैतन्यविशिष्टानामेव जीवशरीरेन्द्रियविषयसंज्ञानां संज्ञाननिबंधनत्ववचनात् , कुतः पुनर्भूतानां सर्वेषामपि समागमे १ क पुस्तके 'अबिद्धकर्मादिभि.' नास्त्ययंपाठ. !
७४ युक्त्यनुशासनं। शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञा असंभवत्यः प्रतिनियम्यते ? शरीराधारं- भकभूतानामेव समुदाये सति संभवंति न पुनः पिठरादिभूत- समुदय इति न चोधं तेषां शक्त्यन्तरव्यक्तेः । यथैव हि मयां- गानां पिष्टोदकादीनां समागमे मदहेतोः शक्त्यंतरस्य व्यक्ति- दतथा पृथिव्यादिभूतानां ज्ञानहेतोः शक्त्यतरस्य व्यक्तिः स्यात् । तर्हि शक्त्यंतरव्यक्तिप्रतिनियतेष्वेव भूतेषु समुदितेषु संभवन्ती दैवनिमित्ता म्यात, दृष्टकारणव्यभिचारदिति च न शंकनीयं दैवस्य तत्सृष्टिनिमित्तस्य कादाचिततया दैवान्त- रात्सृष्टिप्रसंगात् । यदि पुनर्दैवव्यक्तिः कादाचित्स्यपि स्वा- भाविकीति न तस्या दैवात्सृष्टिः परस्मादन्यथानवस्थाप्रसंगा- दिति मतं तदा शक्त्यंतरव्यक्तिरप्यदैवसृष्टिः सिद्धा सुदूरम- पि गत्वा स्वभावस्यावश्यमाश्रयणीयत्वात् । शक्त्यंतरं हि भक्तिविशेषोऽन्तरशब्दस्य विशेषवाचिनः प्रयोगात् ततो यथा मद्यांगानां समागमे कालविशेषविशिष्टे पात्रादिविशेषविशिष्टे चाऽविकलेऽनुपहते च सदजननशक्तिविशेषव्यक्तिरदैवसृष्टि- ईष्टा मचांगानामसाधारणानां साधारणानां च समागमे सति स्वभावत एव भावात्, तथा ज्ञानहेतुशक्तिविशेषव्यक्तिरप्य- दैवसृष्टिरेच ज्ञानांगानां भूतानामसाधारणानां च समागमे सति स्वभावत एव भावात्, ज्ञानजननसमर्थस्यैव कललादिशरीर- स्थासाधारणस्य शरीरसंज्ञत्ववचनात्तथा ज्ञानक्रियायां साधक- तमस्यैवेन्द्रियस्यासाधारणस्येन्द्रियसंज्ञस्वसिद्धेविषयस्य च ज्ञा- नक्रियाश्रयस्यैवासाधारणस्य विषयसंज्ञत्वोपपोर्न सर्वे श- टीकासहित। शरीरादयः शरीरादिसंज्ञात्वं लभन्ते यनः प्रतिनियमो न स्या- कालाहारादेरेव साधारणस्थानियमात्ततो दृष्टनियतानियत- कारणसृष्टित्वाच्चैतन्यशक्त्यभिव्यक्तेन सा दैवसृष्टिर्मदशक्त्य- भिव्यक्तिवद्विरेचनशक्त्यभिव्यक्तिवद्वा, हरीतक्यादिसमुदये न हि देवतां प्राप्य हरीतकी विरेचयतीति युक्तं वक्तुं कदाचि- ततः कस्यचिदविरेचनेऽपि हरीतक्यादियोगस्य पुराणत्वादिना शक्तिवैकल्यस्यैव सिद्धरुपयोक्तुः प्रकृतिविशेषस्य चामती- तेरिति यैरभिमन्यते तैम॒दवः प्रलब्धाः, सुकुमारप्रज्ञानामेव मृदूनां विप्रलंभयितुं शक्यत्वात् । कीदृशैस्तैनिहींभयैः शिश्नो- दरपुष्टतुष्टैरिति । ये हि स्त्रीपानादिव्यसनिनो निर्लज्जा निर्भ- भारत एव मृदून् विपलभंते परलोकिनोऽभावात् परलोका- भावः पुण्यपापकर्मणस्तु दैवस्याभावात् तत्साधनस्य शुभा- शुभानुष्ठानस्याभाव इति यथेष्टं प्रवर्तितव्यं, तपःसंयमादीनां च यातनाभोगवंचनमात्रत्वादग्निहोत्रादिकमणोऽपि बालक्री- डोपमत्वात् । तदुक्तम्- तपांसि यातनाश्चित्राः संयमो भोगवंचकः । अग्निहोत्रादिकं कर्म बालक्रीडेव लक्ष्यते ॥ इति नानाविधविप्रलंभनवचनसद्भावात् । परमार्थतोऽनादिनिध- नस्योपयोगलक्षणस्यात्मनो ज्ञस्य प्रमाणतः प्रसिद्धेः भूतसमागमे ज्ञ इति व्यवस्थापयितुमशक्तेः। तानि हि पृथिव्यादीनि भूतानि कायाकारपरिणतानि संगतान्यपि अविकलानुपहतवीर्याणि नैतन्यशक्ति सतीमेव प्रागसतीमेव वाभिव्यंजयेयुः सदसती ७६ युक्त्यनुशासनं। वा ? गत्यंतराभावात् । प्रथमकल्पनायामनादित्वसिद्धिरनंतत्व सिद्धिश्च चेतनाशक्तेः सर्वदा सत्या एवाभिव्यक्तिसिद्धेः । तथा हि-कथंचिनिया चैतन्यशक्तिः सदकारणत्वात्पृथिव्यादि- सामान्यवत् न पृथिव्यादिव्यक्तयानेकान्तस्तस्यास्तत्सत्त्वेऽपि सकारणत्वात्, नाऽपि प्रागभावेन व्यभिचारस्तस्याकारणत्वेऽ- पि सद्रूपत्वासिद्धेस्ततः समुदितो हेतुर्न व्यभिचारी सर्वथा वि- पक्षावृत्तित्वात् तत एव न विरुद्धो, नाप्यसिद्धः सतोऽभिव्यं- ज्यस्य सदकारगावसिद्धेराभिव्यंजकस्याकारणत्वात् । ननु च मद्यांगैः पिष्टोदकादिभिरभिव्यज्यमानाऽपि यदशक्तिः प्राक्सनी ननित्याभ्युपेयते ततस्तया सदकारणया व्यभिचार एव हेनोरिति चेत, न तम्या अपि कथंचिन्नित्यत्वसिद्धेश्चेतनद्रव्यस्यैव म्द- शक्तिस्वभावत्वात् सर्वथाऽप्यचेतनेषुपदशक्तेरसंभवात् । मनसो पदशक्तिरिति चेत्, न तस्याप्पचेतनत्वाद्भावमनस एव चेतनस्य मदशक्तिसंभवात् । एतेनेन्द्रियाणामचेतनानां मदशक्तेरसंभवः प्रतिपादितः। भावेन्द्रियाणां तु चेतनानामेव मदशक्तिसंभा- वनायां न किंचिदचेतनद्रव्य माधति नाम मद्यभाजनस्यापि मदप्रसंगात् । न चैवं मुक्तानामपि मदशक्तिः प्रसज्यते तेषां तदभिव्यक्तिकारणासंभवात् । मदशक्तर्हि बहिरंगकारणमभि व्यक्तौ मद्यादि चेतनस्यासनस्तस्यानियतत्व त् । अन्तरंग कारणं मोहनीयाख्य | न च मुक्तानां तदुभयकारणमस्ति यत- स्तेषां मदशक्तेरभिव्यक्तिः स्यात् । तत्रानभिव्यक्ता मदशक्ति- रस्त्विति चेत्, सा यदि चैतन्यद्न्यरूपा तदास्त्येव, मोहो- टीकासहित। -- दयरूपातु न संभवति मोहस्यात्यंतपरिक्षयात्कर्मान्तरवत्, तन्न मदशक्त्या व्यभिचारः साधनस्य, मदजननस्य शक्त्या मद्यांग- समागमेनाभिव्यज्यमानया सत्या कारणया व्यभिचार इति चेत्, न तस्याः सुरांगसमागमकार्यत्वात् , ततः पूर्व प्रत्येकं पिष्टा- दिपु तत्सद्भावावेदकप्रमाणाभाव त् । एतेन मोहोदयनिमि- चयाऽऽत्मनो मदशक्त्या पराभ्युपगतया व्यभिचारोद्भावनगपा- स्तं तस्याश्च मोहोदयकार्यत्वात्क्षीणमोहस्यासंभवात् ततो निरवद्यो हेतुश्चैतन्यशक्तेनित्यत्वसाधने सदकारणत्वादिति सिद्धः परलोकित्वमनिच्छतां न सती चैतन्यशक्तिरभिव्य- ज्यत इति वक्तव्यं । यदि पुनः प्रागसती चैतन्यशक्तिरभिव्य- ज्यते तदा (के) प्रतीतिविरोधः सर्वथाप्यसतः कस्यचिद- भिव्यक्त्यदर्शनात् । कथंचित्सती वासती वाऽभिव्यज्यत इति चेत, परमतसिद्धिः, कथंचिद्रव्यतः सत्याश्चैतन्यशक्तेः पर्या- यतश्चासत्याः कायाकारपरिणतपुद्गलैरभिव्यक्तेरभीष्टत्वात्स्या- द्वादिभिस्ततो विप्रलब्धा एव चैतन्यशक्यभिव्यक्तिवादिभिः सुकुमारप्रज्ञाः, सर्वथा चैतन्याभिव्यक्तेः प्रमाणबाधितत्वात् । येषां तु भूतसमागमकार्य चैतन्यशक्तिस्तेषां सर्वचैतन्यशक्ती- नामविशेषमसंगात् प्रतिपाणि बुद्धयादिचैतन्यविशेषो न स्यात् । प्रतिसत्त्वं भूतसमागमस्य विशिष्टत्वात्तद्विशेषसिद्धिरिति वदन्तं प्रति प्राहुः सूरय:-- १ "क" चिहात् 'ख' चिहपर्यन्त. पाठा प्रथम पुस्तके न वर्तते ।
19८ युक्त्यनुशासनं। दृष्टेऽविशिष्टे जननादिहेतौ विशिष्टता का प्रतिसत्त्वमेषाम् । स्वभावतः किं न परस्य सिद्धि- रतावकानामपि हा प्रपातः॥३६॥ टीका-दृष्ट एवाविशिष्टे हेतौ पृथिव्यादिसमुदये तन्नि- मिचे वा शरीरेन्द्रियविषयसंज्ञेऽभ्युपगम्यमाने दैवसृष्टेरनभ्युप- गमात् का नाम विशिष्टता सत्त्वं सत्चं प्रति भूतसमागमस्य स्यात्, न काचिद्विशिष्टता संभवतीत्यर्थः । रत्रभावत एवं विशिष्टभूतानामिति चेत् , (ख) परम्याऽपि पृथिव्यादि- भूतेभ्योऽन्यस्यापि पंचमस्यात्मतत्वस्य सिद्धिः किं न स्यात् किं भूतकार्यचैतन्यवादेन ? स्यान्मतं, कायाकारपरिणतभूतकार्यत्वाच्चैतन्यस्य स्वभा- वतः सिद्धिस्तर्हि भूतानि किमुपादानकारणं चैनन्यस्य सह- कारिकारणं वा ? यधुपादानकारणं तदा चैतन्यस्य भूतान्बय. असंगः सुवर्णोपादाने किरीटादौ सुवर्णान्वयवत् । पृथिव्यायु- पादाने वा काये पृथिव्याधन्वयवत् । प्रदीपोपादानेन कज्जलेन मदीपानन्वितेन व्यभिचार इति चेत्, न कज्जलस्य प्रदीपो- यादानत्वासिद्धेः प्रदीपज्वाला हि प्रदीपज्वालान्तरस्योपादानं नकज्जलस्य, तस्य तैलवयुपादानत्वात, प्रदीपकलिका सहका- रिणीमासाद्य तैलं कज्जलरूपेण परिणमय गच्छदुपलभ्यते । मच तत्तलान्वितं रूपादिभिः समन्वयदर्शनात् । एकस्य टोकासहित पुद्गलद्रव्यस्य तैलरूपतां परित्यज्य कन्जलरूपतापासादयतः प्रदीपसहकारिविशेषवशाद्रूपादिनान्वितस्य प्रतीतिसिद्धस्यान्य- था वक्तुमशक्तेः, त्यक्तात्यक्तात्मरूपस्य पूर्वोपूर्वेण वर्तमानस्य कालत्रयेऽपि विषयस्य द्रव्यम्योपादानत्वसिद्धः । तदुक्तम्- त्यक्तात्यक्तात्मरूपं यत्पूर्वापूर्वेण वर्चते । कालत्रयेऽपि तद्रव्यमुपादानमिति स्मृतम् ।। न चैवं भूतसमुदायः पूर्वपचेतनाकारं परित्यज्य चेतना- कारं गृह्णन धारणेरेणबोष्णतालक्षणेन भूतस्वभावेनान्वितः संलक्ष्यते चैतन्यस्य धारणादिस्वभावरहितस्य संवेदनात् । न चात्यंतविजातीयं कार्य कुर्वाणः कश्चिदर्थः प्रतीयते पार- दादिः पारदीयं कुर्वन्नपि नात्यंतविजातीयं कुरुते रूपादित्वेन सजातीयत्वात्, तर्हि चैतन्यमपि नात्यंतविजातीयं भूतसमु- दायः कुरुते । तस्य सत्त्वाक्रियाकारित्वादिभिधर्मः सजातीय- त्वादिति चेत्, किमिदानी जलानलादीनां परस्परमुपादा- नोपादेयभावो न भवेत् तत एव तेषां तत्वान्तरत्वात् । धारणा- द्यसाधारणपरस्परविलक्षणत्वान्नोपादानोपादेयभाव इति चेत्, किमेवंभूतचैतन्ययोरसाधारणलक्षणयोः परस्परविलक्षणयो- रुपादानोपादेयभावोऽभ्यनुज्ञायते । धारणादिलक्षणं हि भूत-. चतुष्टयमुपलभ्यते न चैतन्यं तदपि ज्ञानदर्शनोपयोगलक्षणप्लुप- लक्ष्यते न भूतचतुष्टयमिति न परस्परविलक्षणलक्षणलं भूतचैतन्ययोरसिद्धं ततो नोपादानोपादेयभावो युक्तः । सा- धारणसत्त्वादिधर्मसाधर्म्यमात्रात्तयोरुपादानोपादेयत्वेऽतिप्रसं- युक्त्यनुशासनं। मस्तथा हि गस्य दुनिवारत्वात् । यदि पुनः सहक.रिकारणं भूतसमुदय- श्चैतन्योत्पत्तौ प्रतिपाद्यते नदोपादानकारणमन्यद्वान्यं, निरु- पादानस्य कस्यचित्कार्यस्यानुपलब्धेः । शब्दविद्युत्मदीपादि- वन्निरुपादानं चैतन्यमिति चेत् , न, तस्यापि स्वोपादानत्व- सिद्धेः । तथा हि स्वोपादानकारणपूर्वकः शब्दादिः कार्यत्वा- त्पटादिवत् । किं पुनस्तस्योपादनं ताल्लादिसहकारिव्यति- रिक्तं दृष्टमिति चेत् , शब्दादिपुद्गलद्रव्यामिति शब्दादिः पुद्गलद्रव्योपादान एव वाहेचन्द्रियपत्यक्ष वात् घटवत् । सामान्येन व्यभिचार इति चेत् , न, तस्यापि मूर्त्तद्रव्याधारस्य सदृशपरिणामलक्षणस्य वाहेयन्द्रियग्राह्यम्य पुद्गलद्रव्योपा- दानत्वसिद्धः । तथा रति सामान्यस्यानित्यत्वासंगः इति चेत् , कथंचिदिष्टवाददोष इनि सर्वथा नित्यस्य सामान्य- स्य रवप्रत्ययहेतुत्वनिरोधात् । द्रव्येण संग्रहनयविपणेगा सा- मान्येनानेकांत इति चेत् , न तस्याप्यतःन्द्रियस्य वाह्येन्द्रिया- प्रत्यक्षवात्तेन व्यभिच.राभाव त् । यत्र बाइयेन्द्रिग्राहचं पुद्गलस्कंधद्रव्यं व्यवहारनयमिद्धं तन्मूक्ष्मपुद्गलोपादनमेवेति कथं तेनानेकांत इति च । ततो नानुपादानं शब्दादिकस्ति यतस्तद्वत्सहकारिमात्राचैतन्यमनुपादानमुत्पद्यते इति प्रपद्येमहि । न चोपादानसहकारिपक्षद्वयव्यतिरेकेण किंचित्कारणमस्ति येन भूतचतुष्टयं चैतन्यस्य जनकमुररीक्रियते । ततः स्वभावत एव चैतन्यस्य सिद्धिरस्तु पृथिव्यादिभूतविशेषवदिति तत्त्वान्तर- सिद्धिस्तामपन्हवानामतावकानां दर्शनमोहोदयाकुलितचेतसां टीकासहितं। . जीविकामात्रतंत्राणां विचारयतामपि, हा ! कष्ट, प्रकृष्टः प्रातः संसारसमुद्रावर्त्तपतनलक्षणः संजात इति सूरयः करु- शाविषयत्वं दर्शितवन्तः। दीक्षात एव मुक्तिरिति मन्यमानान्मंत्रिणः प्रत्याहुः स्वच्छन्दवृत्तेर्जगतः स्वभावा- दुच्चैरनाचारपथेष्वदोषम् । निर्घष्य दीक्षासममुक्तिमाना- स्त्वदृष्टिवाह्या वत विभ्रमति ।। टीका-हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहा उच्चैरनाचारपथाः पंच महापातकानि तेष्वनुष्ठीयमानेष्वप्यदोषनिर्घोषयन्ति के चित्, स्वभावत एव जगतः स्वच्छन्देन वृत्तेरित्युपपत्तिमाचक्षते । तथा हि-जगतोऽनाचारपथा महान्तोऽपि न दोषहेतवः स्व- भावतो यथेच्छंवर्त्तमानत्वात् प्रसिद्ध जीवन्मुक्तवदिति निघु- ध्य दीक्षासमकालां मुक्तिं मन्यन्ते । दीक्षया समा समकाला दीक्षासमा साचासौ मुक्तिश्च सादीक्षासममुक्तिस्तस्यां मानोऽ- भिमानो येषां ते दीक्षासममुक्तिमाना इनि पदघटना । ते चत्व दृष्टेधमोक्षतत्कारणनिश्चयनिबंधनस्याद्वाददर्शनात् वाह्या, सर्वथैकांतवादित्वात् विभ्रमत्येव केवलं वत कष्ट, पुनस्तत्वनिय नासादयन्तीत्यर्थः । दीक्षा हि मंत्रविशेषारोपणमुपसनमनसी- व्यते, सा च यदि यमनियमसहिता तदा त्वदृष्टिरेवेति भग- बद्दर्शनादवाह्या एव दीक्षावादिनस्तथा तत्त्वविनिश्चयप्राप्तः । ६ युक्त्यनुशासनं अथ यमनियमरहिता दीक्षा कक्षीक्रियते तदा न सा दोषविपक्ष- भूताऽनाचारप्रतिपक्षभूता वा यतोऽनाचारक्षयकारिणी स्यात्, न चानाचारक्षयकारणमन्तरेण दीक्षासमकालमेव मुक्तियुक्ति- मवतरत्यतिप्रसंगात् । स्यान्मतिरेपा भवतां समर्था दीक्षोच्चैर- नाचारपथमथनपटीयसी न पुनरसमर्था यतो दीक्षासमये एवा- ऽनाचारनिराकरणमुपसन्नजनानामनुषज्यत इति साऽपि न श्रेयसी दीक्षायाः सामर्थेऽपि तत्समकालं मुक्त्यनवलो- कनात् । तथा हि-सामर्थ्य दीक्षायाः स्वभावभूतमर्थान्तर- भूतं वा ? स्वभावभूतं चेत्, कथं कदाचित क्वचित कस्याश्चि- देव स्यात् । दीक्षातोऽर्थान्तरभूतं सामर्थ्यमिति चेत तरिक कालविशेषरूपं देशविशेषरूपं दक्षिणादिविशेषरूपं वा ? कालविशेषरूपं चेत् , न, तिथिवारनक्षत्रवेलादिकाल- विशेपस्याविशेषेऽपि कस्यचिद्दीक्षासमकाले मुक्त्यदर्शनात् । क्षेत्र विशेषसामर्थ्यमिति चेत् , न तीर्थस्नानदेवतालयमंड- लादिविशेषसाम्येऽपि कस्यचिन्मुक्त्वभावात् । दक्षिणादिवि- शेषरूपं सामर्थ्यमिति चेत, न, गुरुदक्षिणायां यथोक्ता सत्यामपि विनयप्रणमननमस्कारात्मसमर्पणसद्भावेऽपि चो- च्चैरनाचारपथमवृत्तिदर्शनात् । सकला सामग्री श्रद्धाविशेपो- पगृहीतद्रव्यगुणकर्मलक्षणा निवर्तकधर्मविशेषजनिका दीक्षायाः सामर्थ्य मिति चेत, कः पुनः श्रद्धाविशेषो नाम ? हेये जिहासा शश्चदुपादेये चोपादित्सा श्रद्धाविशेष इति चेत्, तर्हि हेयं दुःखमनारतं तत्कारणं च मिथ्यादर्शनं रागादिदोपश्चेति टोकासहित। कथमनाचास्पथेष्वदोषो निर्घष्यते । श्रद्धाविशेषश्च सम्यग्द- र्शनं तदनुगृहीता दीक्षा सम्यग्ज्ञानपूर्विका सम्यक्चारित्रमिति सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रयादेव सात्मीभावमापन्नान्मुक्तिरुक्ता स्यात्तथा च त्वदृष्टिरेव श्रेयसी । तद्वाह्यास्तु विभ्रमन्त्येवेति सूक्तम् । -- अथवा दीक्षासं यथा भवत्येवममुक्तिमाना मीमांस- कास्त्वदृष्टिवाया वत कष्टं विभ्रमति ! किं कृत्वा उच्चैरना- चारपथेष्वदोष निर्घष्य- "न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।" इति वचनात् । कुत : ? इत्युपपत्तिमाचक्षते-स्वच्छंदत्तजे- गतः स्वभावादिति प्रवृत्तिरेव भूतानामिति वचनात्, न कदा- चिदनीदृशं जगदित्यभ्युपगमाच । कुतस्तेषां विभ्रम इति चेत्, दोषेऽप्यदोषनिर्घोपणात् वेदविहितेषूच्चैरनाचारपथेषु पशुवधा- दिष्वदोपो निर्घष्यते न पुनर्वेदवाह्येषु ब्रह्महत्यादिषु तत्र दोष- स्यैव निर्घोषणात्, "ब्राह्मणो न हन्तव्यः सुरा न पातव्येति" निषेधवचनात् । स्वच्छन्दवृत्तरपि जगतः स्वभावाद्वेदेन श्रेय:- प्रत्यवायसाधनप्रकाशिना नियमितत्वात्, तथा वेदविहितदीक्षा- याचाप्रतिक्षेपात् पाखडिदीक्षाया एव निरसनात् । नामुक्तिमाना: श्रोत्रियाः परमब्रह्मपदावाप्तिलक्षणस्य मोक्षस्यानंदरूपस्य तैः स्वयमभ्युपगमात् । अनंतज्ञानादिरूपाया एव मुक्तेनिराकर- णादिति केचित् तेऽपि स्वगृहमान्या एव, वेदविहितेष्वप्य- नाचारेषु दोपाभावस्य व्यवस्थापयितुमशक्तेः । खारपटिकशा- ८५ युक्त्यनुशासन। स्त्रविहितेषु सधनगर्भिणीवधादिषु दोपाभावानुषंगात् । खार- पटिकागमज्ञानस्याप्यप्रमाणत्वान्न तद्विहितेष्वनाचारेषु दोषा- भावप्रसंग इति चेत्, वेदज्ञानस्य कुतः प्रामाण्यं येन तद्वि- हितेषु पशुवधादिषु दोपाभावो व्यवतिष्ठते । दोपवर्जितः कारणैर्जन्यमानत्वादिति चेत्, न स्वरूपेऽपि वेदज्ञानस्य मामा- रायप्रसंगात, दोपाश्रायपुरुषेणाकृतस्य स्वरूपवादस्यापि सिद्धे तत्रापूर्वार्थविज्ञानं निश्चितं वाधवर्जितम् । अदुष्टकारणारब्धं प्रमाण लोकसम्मतम् ।। कार्यवादवत् दोपवर्जितः कारणैर्जन्यमानत्वाविशेषात् बाधवर्जितत्वाच्चोदनाज्ञानस्य प्रामाण्यमिति चेत, नासि- द्वत्वादनाचारविधायिनश्चोदनाज्ञानस्य वाधसद्भावात् । तथा हि-पशुबधादयः प्रत्यवायहेतव एव प्रमत्तयोगात्माणातिपाता- दित्वात् खरपटागमविहितसधनवधादिवत् । प्रमत्तयोगोऽसिद्ध इति चेत् न, काम्यानुष्ठानस्य रागादिममादपूर्वकस्य प्रमच. योगनिबंधनत्वात् । सत्यपि रागादिप्रमादयोगे पशुवधादिषु प्रत्यवायासंभवे सधनवधादिष्वपि कुतः प्रत्यवाय: संभाव्यते सर्वथा विशेषाभावात् । पशुवधादीनां स्वर्गादिश्रेयःसाधन- त्वान्न प्रत्यवायसाधनत्वमिति चेत्, न सधनवधादीनामपि धन- श्वर्यादिश्रेयःसाधनत्वात् प्रत्यवायहेतुत्वं मा भूत, तदात्व- स्तोकश्रेयासाधनत्वेऽपि सघनवधादीनां पारत्रिकहत्म- त्यवायसाधनत्वमपि विरुद्धमेवेति चेतहि पशुवधादीनामपि पशुलाभार्थलाभादिस्वल्पश्रेयासाधनत्वेऽपि पारात्रिकदृहत्प्रत्य- टोकासहित। बायसाधनत्वादेव स्वर्गादिश्रेयःसाधनत्वं माभूद्विरोधात् । ऋत्विगादिदक्षिणाविशेषादीनानाथसकलजनानंदिदानविशे- थाच्च श्रद्धापूर्वकव्रतनियमाभिसंबंधाच्च यजमानस्य स्वर्गा- दिश्रेयःसाधनत्वं पशुवधेऽपि न विरुध्यत इति चेत् किमेवं पशुवधादिना, दाक्षणादिभ्य एव · श्रेयःसंप्राप्तेस्तदभावे प्रत्यवायस्यैव सिद्धेस्तस्य शेयःसाधनत्वासंभवात् । कथं चायं सधनवधकादीनामपि दानादिविधायिनां धर्माद्यभि- संधिश्रद्धाविशेषशालिनां स्वागमविहितमार्गादिगामिनां स्व- गादिश्रेयाप्राप्तिप्रतिषेधसमर्थः । ननु च धर्माभिसंधीनां सधनवधादिरधर्महेतुर्विरुद्ध इति चेत्, पशुवधादिस्तादृक् कथ. मविरुद्धः १ तथा वेदविहितत्वादिति चेत् खरपटशास्त्रविहित- स्वात्सधनवधादिरपि विरुद्धो मा भूत् । धनलोभादिनिबंधन- त्वात् सधनवधादेर्धर्माभिसंधिविरोधे स्वर्गादिलोभनिमित्तत्वा- त्पशुवधादेर्धर्माभिसंधिविरोधोऽस्तु विशेषाभावात् । दृष्टार्थधन- लोभादेरदृष्टार्थस्वर्गादिलोभादीनां महत्त्वाच्च तनिबंधनस्यैव पशुवधादेर्धर्मविरोधो महानेवेति च युक्तं वक्तुं । नन्वनंत- निर्वाणसुखलोनिबंधनस्य स्वपरकायपरितापनस्याप्येवं ध. विरोधः कथं महत्तमो न स्यादिति चेत् न, योगिनां निर्वा- णसुखश्रद्धायामपि लोभाभावादिति ब्रूमस्तेषामात्मस्वरूप- प्रतिबंधिकर्ममलविगमायैव समाधिविशेषप्रवृत्तेः कचिल्लोभमा- पि निर्वाणमाप्तिविरोधात् । तदुक्तम्--"मोक्षेऽपि न यस्य कांक्षा स मोक्षमधिगच्छतीति" । तर्हि याज्ञिकानामपि प्रत्य- युक्त्यनुशासन। खविहितेषु सधनगर्भिणीवधादिषु दोपाभावानुषंगात् । खार- पटिकागमज्ञानस्याप्यप्रमाणत्वान्न तद्विहितेष्वनाचारेषु दोषा- भावप्रसंग इति चेत्, वेदज्ञानस्य कुतः प्रामाण्यं येन तद्वि- हितेषु पशुवधादिषु दोपाभावो व्यवतिष्ठते । दोपवर्जित कारणैर्जन्यमानत्वादिति चेत्, न स्वरूपेऽपि वेदज्ञानस्य प्रामा- रायमसंगात, दोपात्रायपुरुषेणाकृतस्य स्वरूपवादस्यापि सिद्ध तत्रापूर्वार्थविज्ञानं निश्चितं वाधवर्जितम् । अदुष्टकारणारब्धं प्रमाण लोकसम्मतम् ।। कार्यवादवत् दोपवर्जितैः कारगर्जन्यमानत्वाविशेपान बाधवर्जितत्वाच्चोदनाज्ञानस्य प्रामाण्यमिति चेत्, नासि- द्वत्वादनाचारविधायिनश्चोदनाज्ञानस्य वाधसद्भावात् । तथा हि-पशुवधादयः प्रत्यवायहेतव एव प्रमत्तयोगात्माणातिपाता- दित्वात् खरपटागमविहितसधनवधादिवत् । प्रमत्तयोगोऽसिद्ध इति चेत् न, काम्यानुष्ठानस्य रागादिप्रमादपूर्वकस्य प्रमचा- योगनिबंधनत्वात् । सत्यपि रागादिप्रमादयोगे पशुवधादिषु प्रत्यवायासंभवे सधनवधादिष्वपि कुतः प्रत्यवाय: संभाव्यते सर्वथा विशेषाभावात् । पशुवधादीनां स्वर्गादिश्रेयःसाधन- त्वान प्रत्यवायसाधनत्वमिति चेत्, न सधनवधादीनामपि धन- श्वर्यादिश्रेयःसाधनत्वात् प्रत्यवायहेतुत्वं मा भूत, तदात्य- स्तोकश्रेयःसाधनत्वेऽपि सघनवधादीनां पारनिकटहत्म- त्यवायसाधनत्वमपि विरुद्धमेवेति चेत्तर्हि पशुवधादीनामपि पशुलाभार्थलाभादिस्वल्पश्रेयासाघनत्वेऽपि पारत्रिकवृहत्मत्य- टोकासहित। २५ वायसाधनत्वादेव स्वर्गादिश्रेय साधनत्वं माभूद्विरोधात् । ऋत्विगादिदक्षिणाविशेषादीनानाथसकलजनानंदिदानविशे- याच्च श्रद्धापूर्वकवतनियमाभिसंबंधाच्च यजमानस्य स्वर्गा- दिश्रेयःसाधनत्वं पशुवधेऽपि न विरुध्यत इति चेत् किमेवं पशुवधादिना, दाक्षणादिभ्य एव श्रेयःसंप्राप्लेस्तदभावे प्रत्यवायस्यैव सिद्धेस्तस्य यःसाधनत्वासंभवात् । कथं वायं सधनवधकादीनामपि दानादिविधायिनां धर्माद्यमि- संधिश्रद्धाविशेषशालिनां स्वागमविहितमार्गादिगामिनां स्व- गादिश्रेयाप्राप्तिप्रतिषेधसमर्थः । ननु च धर्माभिसंधीनां सधनवधादिरधर्महेतुर्विरुद्ध इति चेत्, पशुवधादिस्तादृक् कथ. मविरुद्धः १ तथा वेदविहितत्वादिति चेत् खरपटशास्त्रविहित- स्वात्सधनवधादिरपि विरुद्धो मा भूत् । धनलोभादिनिबंधन- स्वात् सधनवधादेधर्माभिसंधिविरोधे स्वर्गादिलोभनिमित्तत्वा- पशुवधादेर्धर्माभिसंधिविरोधोऽस्तु विशेषाभावात् । दृष्टार्थधन- लोभादेरदृष्टार्थस्वर्गादिलोभादीनां महत्त्वाच तनिबंधनस्यैव पशुवधादेर्धर्मविरोधो महानेवेति च युक्तं वक्तुं । नन्वनंत- निर्वाणसुखलोभनिबंधनस्य स्वपरकायपरितापनस्याप्येवं ध- मंविरोधः कथं महत्तमो न स्यादिति चेत् न, योगिनां निर्वा- णसुखश्रद्धायामपि लोभाभावादिति ब्रूमस्तेषामात्मस्वरूप- प्रतिबंधिकर्ममलविगमायैव समाधिविशेषप्रवृत्तेः कचिल्लोभमा- त्रेऽपि निर्वाणप्राप्तिविरोधात् । तदुक्तम्-"मोक्षेऽपि न यस्य कांक्षा स मोक्षमधिगच्छतीति" । तर्हि याशिकानामपि प्रत्य- ८६ युक्त्यनुशासनं। वायजिहासया नित्यनैमित्तिकवोर्वेद विहितयोः प्रवृत्तेर्न स्व- दिलोभनिबंधनत्वमिति चेत, किमेवं खारपटिकानांदौर्गत्य- जिहासया सधनवधादिपु प्रनिर्धनलोभनिवधनाऽभिधीयते ? दौर्गत्यजिहासैव धनलोभ इति चेत्, प्रत्यवायनिहासंघ स्वर्गादिश्रेयोलोभः कथं न स्यात् । न चैवं योगिनां संसारकारणक्रोधलोभादिनिराचिकी निश्रेयसो - लोभ इति वक्तुं युक्तं व्याघातात्, मोक्षार्थिनां सर्वत्रामवृत्तेन लोभनिबंधना प्रवृत्तिरिति विषमोऽयमुपन्यासः । ततः सूक्त- मिद पशुवधादियज्ञवादिनां वेदवाक्यानां वाधकमनुमान, पशु- बधादयः प्रत्यवायहेतवः प्रमत्तयोगात् प्राणातिपातादित्वात् सधनवधादिवदिति । चैत्यालयकरणादिषु नानामाणिगणमा- पातिपातादिभिरनेकांन इति चेत् , न प्रमत्तयोगादिति वच- नात् , न च चैत्यालयकरणादिषु प्रमचयोगोऽस्ति सम्य- पत्ववर्धनक्रियायाः समीहितत्वात, तत्रापि निदानकरणे प्रत्य- वायहेतुत्वस्याभ्यनुज्ञानात् पक्षान्तरवर्तित्वान्न तैरेनैकांतिक- तोद्भावयितुं युक्ता। तन्न वाधवर्जितत्वेनाऽपि चोदनाप्रमाणं वाधकस्य व्यवस्थितेः खारपटिकशास्त्रवत् अप्रमाणकं चोचैम्नाचारपथेष्वदोष निर्घोषयन्तः कथं न विभ्रमयंति मीमांसकाः। इति त्वदृष्टिबाह्यानां कष्टमनिवार्य ततस्तम एव मरूद याज्ञिकानां सर्वचेष्टितमिति सूरयो निवेदयन्ति- प्रवृत्तिरक्तैः शमतुष्टिरिक्तै- टोकासाहित। रुपेत्य हिंसाऽभ्युदयाङ्गनिष्ठा। प्रवृत्तितः शांतिरपि प्ररूढं तमः परेषां तव सुप्रभातम् ॥ ३८॥ टीका-हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेषु नियममंतरेण प्रक- घेण वृतिः प्रवृत्तिस्तत्र रक्ता मीमासकास्तथाऽभिनिवेशात् । तैरुपेत्य प्रवृत्ति स्वयं प्रतिपद्य हिंसाभ्युदयस्य स्वर्गादेरंग- कारणं निष्ठा, किंभूतैस्तैः शमतुष्टिरिक्तैरिति हेतुवचनं तेन शम- तुष्टिरिक्तवादित्यर्थः, क्रोधादिशान्तिः शमः, तुष्टिः सन्तोष: शमेन तुष्टिः शमतुष्टिस्तया रिक्तैरिति प्रत्येयं । तदेतत्मरूद वृहत्तमं तमः परेषां यज्ञवादिनामज्ञानत्वमित्यर्थः , तथा- चितः शान्तिरपि प्ररूढं तमः परेषां तस्याः शांतिप्रतिपक्षि- लात् । प्रतिहि रागाद्यद्रेकस्य कारणं न पुनारागादिशा- न्तावातात् । स्यान्मतं, तेषां प्रवृत्तिधा, रागादिहेतुः शांतिहेतुश्च । • तत्र या वेदवाक्येनाविहिता सा रागाद्युदयनिमितं यथा वा- मणवधसुरापानादि । वेदविहिता तु शांतिहेतुर्यथा यज्ञे पशु- वधादिस्तस्या अदृष्टार्थत्वात् क्रोधाद्युदयनिबंधनत्वाभावादिति। तदप्यसत् । वेदविहितायाः प्रवृत्तेः शांतिहेतुत्वनियमानुपपत्तेः अन्यथा मातरमुपैहि स्वसारमुपैहीति वेदवाक्यविहिताया:मात- स्वसृगमनलक्षणायाः प्रवृत्तेः शांतिहेतुत्वप्रसंगात् । वेदाविहि- तायाश्च प्रवृतेः सत्पात्रदानादिलक्षणायाः शांतिप्रतिपक्षत्वा-: .
युफ्त्यनुशासनं। पत्तेः। अथ मतमेतत्-परंपरया प्रवृत्तिरपि शांतिहेतुरुपपद्यत एवं यथा देवताराधनादिप्रकृचिरिति । तदप्यसंभाव्य, वेदविहि- तहिंसादिप्रवृत्तेः परंपरया शांतिहेतुत्वानुपपत्तेः । न च शान्त्य- र्थिनः शांतिप्रतिकूलेपु हिंसादिषु वर्तमानाः प्रेक्षापूर्वकारिण: स्युर्मदाभावाय मद्यपाने प्रवर्तमानजनवत् । सत्पात्रदानदेवतार्च- नादिषु स्वयमनभिसंधितसूक्ष्मप्राणिवधादिप्रवृत्तिस्तु परंपरया शांतिहेतुरुपपद्यत एव दर्शनविशुद्धिपरिग्रहपरित्यागप्रधानतया तस्याः समवस्थितत्वादन्यथा तद्भावविरोधात् । इति सूक्त- मेतत् प्रवृतित: शांतिरिति वचनं महातमोविजृम्भितं परेषा- मिति ततस्तवैव मतं सुप्रभातं सकलतमोनिरसनपटीयस्त्वा- दिति सिद्धम् । साम्मत मतान्तरं निर चिकीर्षवः प्राहु:- शीर्षोपहारादिभिरात्मदुःखै- देवान किलाराध्य सुखाभिगृद्धाः। सिद्धयन्ति दोषापचयानपेक्षा युक्तं च तेषां त्वमृषिर्न येषाम् ॥३९॥ टीका-शीर्पोपहार स्वशिरोवलिश्छागादिशिरोवलि । स आदिर्येषां गुग्गुलधारणमकरभोजनभृगुपतनप्रकाराणां ते शी- पोपहारादयस्तैरात्मदुःखर्जीवदुःखनिमित्तदेवान् यक्षमहेश्वरादी- नाराध्य सिध्यन्ति दोपापचयानपेक्षा दोषापचयमनपेक्षमालाः सुखाभिगृद्धाः कामसुखादिलोलुपाः किलेति सूरयः प्रमा- टोकासहितं । गानुपपन्नत्वेन रुचिं प्रकाशयन्ति । केषां पुनरिद युक्तमित्यभि- धीयते-"युक्तं च तेषां त्वमृपिन येपा" मिति । येषां न त्व- मृषिर्गुरुर्वीतदोषः सर्वइस्शमी न भवसि तेषामेव मिथ्याई युक्त उपपन्नमेवैतत् प्ररूढं तमो न पुनर्येषां त्वं गुरुः शुद्धि- शक्त्योः पराकाष्ठामधितिष्ठन्नभिमतोऽसि तेषां सम्यग्दृष्टी- नां हिंसादिविरतिचेतसां दयादमत्यागसमाधिनिष्ठं त्वदीयं म- तमद्वितीयं प्रतिपद्यमानानां नयममाण विनिश्चितपरमार्थयथाव- तारिजीवादितत्वार्थप्रतिपत्तिकुशलमनसां प्रमादतोऽशक्तितोका कचित्तवृत्तिमाचरतामपि तेषां तत्राभिनिवेशपाशानवकाशात् । तदित्थं समंतदोषं मतमन्यदीयं संक्षेपतो दर्शितम् । विस्तर- तो देवागमे तस्य समन्तभद्रस्वामिभिः प्रतिपादनात "भावका- ते पदार्थाना" मित्यादिना । तत एव त्वदीयं मतमद्वितीयमिति च समासतो व्यवस्थितं । व्यासतो देवागमे एव तस्य त- था व्यवस्थापितत्वात् , "कथञ्चिचे सदेवेष्टं कथंचिदसदेव तद्" इत्यादिना तथैव स्वामिभिरभिधानात् । स्तोत्रे युक्त्यनुशासने जिनपतेर्वीरस्य निःशेषतः संप्राप्तस्य विशुद्धिशक्तिपदवीं काष्ठां परामाश्रिताम् । निर्णीतं मतमद्वितीयममलं संक्षेपतोऽपाकृत तबाह्यं वितथं मतं च सकलं सद्धीधनैर्बुध्यताम् ।। हति युक्त्यनुशासने परमेष्ठिस्तोत्रे प्रथमः प्रस्तावः ।
२० युक्त्यनुशासनं। अथ भेदाभेदात्मकं सामान्यविशेषात्मकमर्थतत्त्वं पदीयं मतमद्वितीयं नयप्रमाणमकृतांजसार्थत्वादस्तु नाम केवलं सामा- न्यनिष्ठाः विशेपाः स्युविशेषनिष्ठं वा सामान्य स्यादुभयं वा परस्परनिष्ठमिति भगवत्पर्यनुयोगे सूरयः प्राहु:- " सामान्यनिष्ठा विविधा विशेपाः" इति सामान्य द्विविधमूर्ध्वतासामान्य तिर्यकसामान्यं चेति । तत्रोर्ध्वतासामान्य क्रमभाविपुपर्यायवेकत्वान्वयप्रत्ययग्राह्य द्रव्यं । तिर्यवसामान्य नानाद्रव्येपु पर्यायेषु च सादृश्यप्रत्ययग्राह्य सहशपरिणामरूप। तत्र सामान्ये निष्ठा परिसमाप्तियां ते सामान्यनिष्ठाः । के ते? विशेपाः पर्यायाः। किं प्रकाराः? विविधाः केचित् क्रमभुवः केचित् सहभुव एकद्रव्यवृत्तयः । तत्र क्रमभुवः परिस्पंदरूपा उत्तेपणादयः,अपारस्पंदात्मका: साधारणा साधारणासाधा- रणाच असाधारणाश्चेति त्रिविधाः । साधारणधर्माः सत्वप्रमे- यत्वादयः, साधारणासाधारणाः द्रव्यत्वजीवत्वादयः, असाधा- रणाः प्रतिद्रव्यं प्रभिद्यमानाः प्रतिनियता अर्थपर्याया इति विविधप्रकाग विशेपा एकद्रव्यनिष्ठत्वादृर्ध्वतासामान्यनिष्ठा- स्तव्यतिरेकेणासंभाव्यमानत्वात् । नन्वेवविधं विशेषनिष्ठं सा- मान्य कस्मान स्यादिति चेत्, न, कस्यचिदिशेपस्यापायेऽपि सामान्यस्य विशेषान्तरेधूपलब्धेः सर्वविशेषनिष्ठत्वविरोधात् । कतिपयविशेषनिष्ठत्वे तु सामान्यस्य तदन्यविशेषाणां नि:- सामान्यत्वप्रसंगात् । विनष्टानुत्पन्न विशेषनिष्ठत्वे सामान्यस्य वि- नाशानुत्पादमसंगो व्याहतः प्रसज्येत। विशेषाणां विनाशेऽपि टोकासहित। १ सामान्यस्याविनाशेनागतत्वेऽपि वर्तमानत्वे च विरुद्धधर्माध्या- सात् भेदप्रसंगान विशेषनिष्टत्वं सामान्यस्य प्रसज्येतातिप्र- संगात् । विशेषेषु व्यक्तिरूपेषु द्रव्यगुणकर्मसु सामान्यस्य सम- वायाविशेषनिष्ठं सामान्यमिति चेत् न, तस्य तिर्यक्सामान्यरूप- स्वात्, न चैतदपि विशेषनिष्ठं द्रव्यत्वस्य सकलद्रव्यव्यक्तिनिष्ठत्वे कार्यद्रव्यव्यक्तिविनाशप्रसंगात्कतिपयद्रव्यव्यक्तिनिष्ठत्वे द्रव्य- व्यक्त्यंतराणां निःसामान्यत्वप्रसंगस्य तदवस्थत्वात् । नित्य- सर्वगतत्वात् सामान्यस्यायमदोष इति चेत्, न, सर्वव्यक्तीनां नित्यत्वप्रसंगात्तत्र नित्यसामान्यस्य निष्ठानात् । यदि पुन- पिकं सामान्य (व्यक्तीनां) व्याप्यास्तु व्यक्तयस्ततो व्याप्या- भावेऽपिव्यापकस्य सद्भावाविरोधात् सत्यपि नित्ये सामान्ये व्यक्तीनामभावाविरोधान्न नित्यतापत्तिरिति मतम् तदा सामान्यनिष्ठा एवं विशेषाः स्युरवस्थिते सामान्ये विशेषाणामु- पादाद्विनाशाच्चेति सिद्धाः सामान्यनिष्ठा विविधा विशेपार, न पुनर्विशेषनिष्टं सामान्यं । एतेन परस्परनिष्ठमुभयमित्यपि पक्षः प्रतिक्षिप्तः। यदि सामान्यनिष्ठा विशेषास्तदा पदं किं विशेष नयते सामान्य वा तदुभयं वाऽनुभयं वेति शंकायामिदमभिधीयते सरिभिः- " पदं विशेपान्तरपक्षपाति" विशेष नयत इति विशेषो द्रव्यगुणकर्मभेदात् त्रिविधः । तत्र द्रव्ये प्रवर्तमान पदं द्रव्यद्वारेण विशेषांतरं गुणं कर्म वा स्वीकरोतीति विशे. पान्तरपक्षपाति, पक्षपातो हि स्वीकारः परिग्रहः सोऽस्यास्तीतिः युक्त्यनुशासनं। पक्षपाति विशेषांतरे पक्षपाति विशेपान्तरपक्षपाति । यथा दंडी- तिपद संयोगिद्रव्यद्वारेण द्रव्ये देवदत्तादौ प्रवर्तमानं गुणमपि दंडपुरुपसंयोगलक्षणं परिगृह्णाति, कर्म च दंडगतं पुरुषगतं च परिस्पन्दलक्षणं विशेषान्तरं स्वीकरोतीति । तदस्वीकारणे द- डीतिपदस्य द्रव्ये प्रवृत्तिविरोधात् । तथा विषाणीति पदं समवा- यिद्रव्यविषयं समवायिविपाणिद्वारेण गवादिसमवायिनि प्रव- तैमानत्वात् । तत्र च विषाणिद्रव्ये प्रवर्त्तमानं तद्गुणमपि विशे- पांतरं धवलादि गृहात्येव, क्रियां च विशेषांतरं गवादिगतं • विपाणगतं वा स्वीकरोत्येवेति विशेषांतरपक्षपातीत्युन्यते । तथा शुक्ल इति पदं, गुणद्वारेण द्रव्ये प्रवर्गमानं गुणविषयतां स्वीकुर्वत्तदन्वयद्रव्यं विशेषांतरं परिगृह्णातीति विशेषान्तरपक्ष- -पाति । तथा चरतीति पदं क्रियाद्वारेण द्रव्ये प्रवर्त्तमानं कि- याविषयतां प्रतिपद्यमानमपि विशेषांतरं तदाधारद्रव्यं तदेका- र्थसमवायि कर्म च स्वीकरोतीति विशेषांतरपक्षपाति सिद्ध, विशेष नयत इति द्रव्यं गुणं कर्म च नयते प्रापयतीत्यर्थः । चतुर्विध हि पदं नामाख्यातनिपातोपसर्गभेदात् केचि- दमंसत । कर्मप्रवचनीयं च पदमिति पचंविधमन्ये । तत्र नाम पदं किंचिद् द्रव्यमभिधत्ते गुणं वा, तद्वन्निपातपदं। श्रारख्या- तपदं तु क्रियामभिदधाति तथा चोपसर्गपदं तस्य क्रियो- द्योतकत्वात् । कर्मप्रवचनीयपदं तु पारिभाषिकं कर्मेति सं- प्रतिपद्यते । तदेवं सुप्तिङन्तविकल्पाद्विविधमपि पदं चातुर्विध्य पांच विध्यं वा समास्कन्दद्विशेषांतरकृतिसविशेषं नयते समान- सी टीकासहितं। भावं समानत्वमिति । नयतेर्दिकर्मकत्वादभिसबंधः कर्चव्यस्तद- नेन प्रधानभावेन द्रव्यादिव्यक्तिरूपं विशेष गुणीभूतं सामान्य पदं प्रतिपादयतीत्यभिहितम्। अन्यत्पदं जातिविषयं समानभावं. सामान्य विशेष नयते यथा गौरिति पदं गोत्वजातिद्वारे द्रव्ये प्रवर्त्तमान जातिपदं स्वाश्रयभूतद्रव्यविशेषमपि सामान्य- रूपं प्रापयति तथा गुणस्वजातिपदं गुणत्वजातिद्वारेण गुणे वर्तमानं गुणमपि रवाश्रयं विशेष जातिरूपतां नयते । तथा कर्मत्वजातिपदं कर्मत्वजातिद्वारेण कर्मणि प्रवर्तमानं कर्माफि स्वाधिकरणं विशेष समानभावं नयते । कुत इत्युच्यते, "अ न्तर्विशेषान्तरवृतितः" इति अन्तर्गतं विशेषांतरमस्येत्यंतर्वि- शेषान्तरः समानभावः समानपरिणामस्तत्र वृतेः प्रवर्तना- त्पदस्येत्यर्थवशाद्विभक्तिपरिणामः । तदेतेन प्रधानभूतसामा- न्यं गुणीभूतं विशेष पदं प्रकाशयतीति निगदितं । ततो निर्वि- शेषमेव पदं न नयते सामान्यं निरपेक्षं तस्यासंभावात् खर- विषाणवदिति न व्यक्तिवादे पदार्थः संगच्छते तत्र तस्यास- त्यत्वप्रसंगात् । नाऽपि सामान्य केवलं विशेषनिरपेक्ष पदं प्रकाशयति तस्याऽप्यसंभवात् कूर्मरोगादिवदिति । न जाति व्यक्तिर्वाऽस्य पदार्थः समवतिष्ठते तस्यापि तन्मात्रे प्रवर्समान- स्यासत्यतापतेः । न च परस्परनिरपेक्षमुभयं पदार्थस्तस्या- व्यप्रतीयमानत्वात् वंध्यापुत्रादिवत् । तत्र प्रवर्त्तमानस्य पद- क्यायथार्थत्वंप्रसक्तेः। न चाप्यनुभयं पदमावेदयति तस्याप्यन्य- यावृतिमात्रस्यावस्तुभूतस्य प्रतिपादने पदात्प्रवृत्तिविरोधात् ।
युक्त्यनुशासनं। जात्यन्तरं तु सामान्यविशेषात्मकं वस्तु प्रधानगुणभावेन पदं प्रकाशयत् यथार्थतां नातिकामति मतिपत्तुः प्रवृत्तिमाप्तिघटनात् प्रत्यक्षादिप्रमाणादिवेति देवागमपद्यवार्तिकालंकारे निरूपि- प्रायम् । तद्यथा- सामान्यनिष्ठा विविधा विशेषाः पदं विशेषांतरपक्षपाति । अन्तर्विशेषान्तरवृत्तितोऽन्य- समानभावं नयते विशेषम् ॥४०॥ इति वृत्तं खंडशो व्याख्यातम् । अथवा पदं किंचिद्विशेष संकेतकालवर्तिनं समानभावं नयते कुतो यस्माद्विशेषान्तरपक्षपाति, संकेतकालवर्तिनो वि- शेषादव्यवहारकालवर्तिविशेषोऽन्यो विशेषांतरं तत्पक्षपाति- त्वादित्यर्थः । अन्यत्पदं समानभावमपि विशेष नयते कस्मा- दन्तर्विशेपान्तरवृत्तितः, विशेषान्तराणामन्तः अन्तर्विशेषा- न्तरं । अंतःशब्दस्य पूर्वनिपातो "अन्तरादेष्टा" इति ज्ञापका- दन्तर्मुहूर्नवत् । अन्तर्विशेषान्तरे वृत्तिरन्तर्विशेषान्तरवृत्तिस्ततो विशेषान्तराणां संकेतसमयवचिसामान्य विशेषणविशेषेभ्योऽ- न्येषां विशेषाणामन्तवृत्तित्त्वाद्विशेषान्तराद्वहिर्भावादित्यर्थः । कृतः १ पुनः किंचित्पदं विशेषे द्रव्यादौ प्रवर्गमानं तं विशेष सामान्यरूपतां नयते परन्तु सामान्ये प्रवर्तमानं द्रव्यत्वादौ सामान्यमपि विशेषरूपतां प्रापयतीति चेत्, यतः सामान्य टीकासहित। निष्ठा विविधा विशेषा इत्युपपचिरभिहिता यस्मात् सामान्ये निष्ठा विशेषाणां तस्मात्पदं विशेष सामान्यरूपतां नयते य- स्माच्च सामान्यमपि पदं विशेष नयत इत्यर्थः । किं पुनस्तत्पदं वहिर्भूतं वर्णात्मकमन्तर्भूतं वा चिदात्म- कमिति शंकायां पदस्य विशेषणमन्तरिति । तेनैवं व्याख्या- यते यदन्तःपदं ज्ञानात्मकं तदन्यदेव वर्णात्मकपदात् विशे- पांतरशितो विशेषान्तरपक्षपाति सद्विशेष समानभावं नयते न पुनर्वर्णसमूहलक्षणं वर्णानामुत्पन्नापवर्णित्वात्समूहानुपपत्तेः पदस्यैवासंभवात्। वर्णनित्यतायामपि तदभिव्यक्तेरनित्यत्वाद- भिव्यक्तवर्णसमूहात्मकं पदं न संभावयितुं शक्यं, गौरिति पदे गकाराभिव्यक्तिकाले तदवयवभूतयोरौकारविसर्गयोरभिन्य- त्यभावात्तदभिव्यक्तिकाले च गकाराभिव्यक्तेर्विनाशात् । न चाभिव्यक्तानभिव्यक्तवर्णानां समूहः संभवति। यदि पुनः क्रमे- णोत्पन्नानामभिव्यक्तानां वाबुद्धौ विपरिवर्तमानानां क्रमविशे- पात्मकः समूहः पदमित्यभिधीयते तदाऽप्येकवर्णबुद्धिकाले रन्तरबुद्धेरनुत्पनेरुत्तरवर्णबुद्धेरुत्पत्तिकाले च पूर्ववर्णबुद्धः मध्वंसान्नैकबुद्धौ वर्णानां नानात्मनां विपरिवर्तनं संभवति। न चैका वुद्धिर्नानाक्रमवर्येकवर्णकालव्यापिनी संभवति तस्याः कालान्तरस्थायित्वासंभवात् । बुद्धिजनितसंस्कारः कालान्तर- स्थायीति चेत् न , नानावर्णविज्ञानजनितसंस्काराणां क्रम- भुवां वर्णस्मरणमजनयतामसत्कल्पत्वात् , जनयतां तु न युगपत स्परणं संभवति, क्रमतो वर्णस्मरणसंभवेऽपि नैकवर्णस्मरणका- , ६६ युपत्यनुशासन। ले वर्णान्तरस्मरणमस्ति विरोधात् कुतः स्मर्यमाणानामपि वर्णानां समूहः, तत एव पदस्फोटः पदार्थमतिपचिनिमित्तं, वर्णानां प्रत्येकमर्थप्रतिपत्तिनिमित्तत्वे वर्णान्तरवैयर्थयमसंगात्स- मूहस्यासंभवात् तद्बुद्धिस्मरणसमूहवदित्यपरे । तेषामपि पद- स्फोटो नित्यो निरंशः सर्वगतोऽमूर्तः किमनभिव्यक्त एवार्थपति- पत्तिहेतुरभिव्यक्तो वा १ प्रथमपक्षे वर्णोच्चारणानर्थक्यं सर्व- दा सर्वत्र सर्वथाऽप्रतिहतार्थमतिपत्तिः प्रसज्येत ! कदाचित् क- चित् कथंचिदसंभवाभावात् । द्वितीयपक्षे तु पदस्फोटोऽभिव्य- ज्यमान; प्रत्येकं वर्णेनाभिव्यज्यते वर्णसमूहेन वा? यदि प्रत्येक वर्मोनाभिव्यज्यते तदैकवर्णन सर्वात्मना तस्याभिव्यक्तत्वात सर्वत्र सर्वथा वर्णान्तरोच्चारणययं कथं विनिवार्येत । पदार्थान्तरपतिपातिव्यवच्छेदार्थत्वाद्वर्णान्तरोच्चारणस्य न वै- ययमिति चेत् न , वर्णान्तरोच्चारणादपि पदार्थान्तरपति- यत्तेरेवानुपंगात् , यथा हि गौरितिपदस्यार्थों गकारोच्चारणा- सतीयेत तथौकारोच्चारणदौशनस इतिपदस्यार्थः प्रतिपद्येता- धेन गकारेण गौरिति पदस्येव प्रथममौकारेणौशनस इति पदस्य स्फोटस्याभिव्यक्तेः । तथा च गौरिति पदादेव गौरी- शनस इति वाक्यार्थप्रतिपत्तिः प्रसज्येत, संशयो वा स्यात् । किमेकपदस्फोटाभिव्यक्तये गकारायनेकवर्णोच्चारणं पदां- वरस्फोटव्यवच्छेदेन, किंवाऽनेकपदस्फोगभिव्यक्तये गका- राधनेकवर्णोच्चारणमिति ततो नैकेनैव वर्णेन पदस्फोटस्य स- चात्मनामिव्यक्तिर्घटते । नाऽप्येकदेशेन सांशवप्रसंगात, टीकासहितं। ६७ सांशस्य च स्वांशेभ्योऽनन्तरत्वे नानात्वप्रसंगो नाना- वयवेभ्योनान्तरस्यैकत्वविरोधात् । एकस्मादनान्तरभूतानां नानावयवानां नानात्वविरोधवत् । स्त्रांशेभ्योऽर्थान्तरत्वे तस्यानभिव्यक्तिमसक्तिस्ततो भिन्नानामेवांशानां नानावगैर- भिव्यक्तित्वात् । यदि पुन नावाभिव्यक्तैः पदस्फोटस्यां- औरभिव्यक्तिरभिधीयते तदैकवर्णाभिव्यक्तपदस्फोटावयवेन सर्वात्मना पदस्फोटस्याभिव्यक्तौ वर्णान्तराभिव्यक्ततदवयव- वैयर्थ्यमासज्येत, तस्यैकदेशेनाऽभिव्यक्तौ नानावयवत्वमवयवा- न्तरैरिति, तेभ्योऽपि तस्यानन्तरत्वार्थान्तरत्वविकल्पयोस्तदे- व दृषणमनवस्था च दुर्निवारा स्यात् । यदि वर्णसमूहेन पद- स्फोटोऽभिव्यज्यत इति मतं, तदापि क्षणप्रध्वंसिनां वर्णानां कथं समूहः सिद्धयेत् योभिव्यंजकः स्यात, नित्यानामपि वर्णानामनभिव्यक्तानां समूहो न व्यंजकः सर्वदाभिव्यक्ति- प्रसंगात् । अभिन्यक्तानां तु समूहो न संभवत्येव तदेकवर्णाभि- व्यक्तिसमये वर्णान्तराभिव्यक्त्ययोगात्, व्यक्ताव्यक्तात्मकानां तु वर्णानां समूहो न पदस्फोटस्याभिव्यंजकः स्यात् तदु- भयदोपानुषंगात् । स्यान्मतं, पूर्वपूर्ववर्णश्रवणज्ञानाहितसंस्कारस्यात्मनोऽ- त्यवर्णश्रवणज्ञानानंतरं पदस्फोटस्याभिव्यक्तः पदार्थप्रतिपत्ति- रिति । तदप्यसत् । तथैव पदार्थप्रतिपत्तिसिद्धः स्फोटपरिकल्पा- नानर्थक्यात् । चिदात्मव्यतिरेकेण तत्वांतरस्य स्फोटस्यार्थप्रका- शनसामर्थ्यानुपपत्तेः । स एव चिदात्मा विशिष्टशक्तिः स्फो- ७ ९८ युक्त्यनुशासन। योऽस्तु "स्फोटति प्रकटीभवत्यर्थोऽस्मिन्निति स्फोट"चिदात्मा, पदार्थज्ञानावरणवीर्यान्तरायक्षयोपशमविशिष्टः पदस्फोटो, वा- क्यार्थज्ञानावरणवीर्यान्तरायक्षयोपशमविशिष्टो वाक्यस्फोट इति प्रकरणादिकाध्यायशास्त्रमहाशास्त्रादिरंगप्रविष्टांगवाह्यविकल्प: स्फोटः प्रसिद्धो भवति, भाषश्रुतज्ञानपरिणतस्यात्मनस्तथाभि- थानाविरोधात् । न हि निरतिशयनित्यैकान्तस्वभावोऽयमात्मा नानार्थग्रहणपरिणामविरोधान्निरन्वयविनश्वरक्षणिकचित्तवत् क्रमयोगपद्यविरोधात् । नापि सातिशयनित्यैकान्तस्वभावोत्य- न्तार्थान्तरभूतैरतिशयः संबंधानुपपत्तेः । ज्ञानादिपरिणापानामा- स्मनि सयवायसंबंध इति चेत् न, तस्य कथंचित्तादात्म्यव्यतिरेके- ण पदार्थान्तरस्यासंभवात् । परिणामिनस्तु प्रमाणवलादेव स्थित- स्यात्मनो नानार्थग्रहणपरिणामोपपत्तेरन्तःस्वरूपं पदं चिदात्म- कमिति व्यवतिष्ठते । तस्मिन् सति वक्तुः क्रमविशेषविशिष्टवर्ण- समूहलक्षणं वाह्य पदं श्रोत्रज्ञानविषयभावमापद्यमानमनुमन्या- महे तस्यैव श्रोत्रिजनपदार्थज्ञानजनननिबंधनत्वनिर्णयात् । तत- स्तदेव विशेष समानभावं नयते विशेषांतरपक्षपातित्वात् सा- मान्यं च विशेष नयते विशेषान्तरवृत्तेः स्वयं सामान्यनिष्ठवि- -विधविशेषविषयीकरणसमर्थत्वात् । एतेनांतरंग वाक्यं प्रकरणमान्हिकमध्यायः शास्त्रादि मावश्रुतविशेषं विविधं समानभाव नयते, सामान्यं वा नैकमकार विशेष नयत इति प्रतिपत्तव्यम् । 1 टोकासहित। अथाऽस्ति जीव इत्यत्राऽस्त्येव जीव इत्यवधार्यते वा नवेति प्रथमकल्पनायां दूपणमावेदयंति सूरय:- यदेवकारोपहितं पदं त- दस्वार्थतः स्वार्थमवच्छिनत्ति। पर्यायसामान्यविशेषसर्वं, पदार्थहानिश्च विरोधिवत्स्यात् ॥४१॥ टीका-एचकारेणावधारणार्थेन निपातेनोपहितं विशिष्ट यत्पदं तत्स्वार्थमस्वार्थाद् व्यवच्छिनत्ति यथा तथा स्वार्थप- र्यायान् व्यवच्छिनन्येव । तद्यथा-जीव एवेनि पदस्य जीवत्वं स्वार्थस्तद्विरोधी चास्वार्थः स्यादीवत्वं तच्च यथैवजीवत्वं व्यवच्छिनत्ति तथा जीवपर्यायानपि सुखज्ञानादीन् व्यव- च्छिनत्येवान्यथा सुखादिपदोपन्यासवैयर्थात् जीवपदेनैव तेषां विषयीकृतत्वात्, तथा चाहं सुखीत्यादिप्रयोगो न भवेत् । सामान्यमपि द्रव्यत्वचेतनत्यादि सर्व व्यवच्छियात् अन्यथा द्रव्यमहं चेतनोऽहमिति प्रयोगो विरुध्यते जीवपदे- नैव द्रव्यत्वादेरभिधानात् । तथा विशेषानप्यर्थपर्यायाननंतान- भिधानाविषयान् व्यवच्छिद्यादन्यथा तद्विषयीकरगाप्रसंगात् । तथा च पर्यायाणां क्रमभुवां धर्माणां सामान्यानां च सहभुवां विशेषाणां चानभिधेयानां व्यवच्छेदे पदार्थस्य जीवपदाभिधे- यस्य जीवत्वस्यापि हानिः स्यात्तद्विरोध्यजीवत्ववत् (तेषामभावे प्यजीवत्ववत्) तेषामभावे तदसंभवात् । प्रतियोगिनमेवाजीवपदं युक्त्यनुशासनं। 1 व्यवच्छिनत्ति न पुनरमतियोगिनस्तत्पर्यायसामान्यविशेपान तेषामप्रस्तुतत्वादिति चेत्, नैवं स्याद्वादानुप्रवेशप्रसंगात् । तर्हि द्वितीयकल्पनास्तु सर्व पदमनेवकारपिति वदंतं प्रत्याहुः- अनुक्ततुल्यं यदनेवकारं व्यावृत्त्यभावानियमद्वयेऽपि । पर्यायभावेऽन्यतराप्रयोग- स्तत्सर्वमन्यच्युतमात्महीनम् ॥४२॥ टोका-अस्ति जीव इत्यत्रास्तीति यत्पदमनेवकारं तद- नुक्ततुल्यं नास्तित्वव्यवच्छेदाभावान्नास्तित्वस्याप्रतिपादनात् । तथा जीव इति पदमनेवकारमजीवत्वस्यापि तेनाकथनात् । निय- मद्वयेऽपि व्यावृत्यभावात् । अस्त्येवेति पूर्वावधारणं, जीव एवे- त्युत्तरावधारणं नियमद्वयं । तस्मिन्निष्ठेऽप्येवकाराभावे व्या- त्यभावात् प्रतिपक्षनिवृत्त्यसंभवादित्यर्थः । तथा चास्तिनास्ति- पदयोर्जीवाजीवपदयोश्च पर्यायभावः स्याद्धटकुटशब्दवत् अस्ती- तिपदेन नास्तित्वस्यापि प्रतिपादनान्नास्तीतिपदेन चास्तित्व स्यापि प्रतिपादनात् । तथा जीवपदेनाजीवार्थस्यापिवचनात,भ- जीवपदेनापि जीवार्थस्यापीति, पर्यायभावेच परस्परमतियोगिप- दयोरपिसकलजनस्यान्यतराप्रयोगः स्यात् घटकुटपदवदेव, तद- न्यतराप्रयोगे च सर्वमभिधेयं वस्तुजातमन्येन प्रतियोगिना च्युतं त्यक्तं स्यादस्तित्वं नास्तित्वरहितं भवेदिति सत्ताद्वैतमापयेत । नास्तित्त्वाभावे च सत्ताद्वैतमात्महीनं प्रसज्येत, पररूपापोहना- टीकासहित। भावे स्वरूपोपादानानुपपत्तेः कुटस्याकुटापोहनाभावे स्वात्मोपा- दानासंभवात् । नास्तित्वस्य चास्तित्वच्युतौ शून्यवादानुषंगः । न चाभावो भावमन्तरेण संभवतीति शून्यपप्यात्महीनमेव स्यात, शून्यस्य स्वरूपेणाऽप्यभावे पररूपापोहनासंभवात् पटस्य स्वरूपोपादानाभावे शश्वदपटरूपापोहनासंभवात, स्वपररूपोपा- दानापोहनव्यवस्थापाचत्वाद्वस्तुनो वस्तुत्वस्य । नन्वेवं वस्तुनोऽ- प्यवस्तुपोहनेन भवितव्यं वस्तुत्वोपादानवत्तथा चावस्तु कि- चिदभ्युपगन्तव्यमिति चेत् , न वस्तुन एव परद्रव्यक्षेत्रकाल- भावचतुष्टयापेक्षायामवस्तुत्वसिद्धेः सकलस्वरूपशून्यस्यावस्तु- नोऽप्यसंभवात् । तथा चोक्तम्- वस्रावस्तुतां याति प्रक्रियाया विपर्ययादिति ततो न किंचिद्वस्तुप्रतिपक्षभूतावस्तुवर्जितमात्मानं लभते यतः सर्वमन्यच्युतमात्महीनं भवेत् । सुदूरमप्यनुसृत्य कस्यचिदिष्टस्य तत्वस्यात्महीनत्वमनभ्युपगच्छतान्यहीनत्वं नानुमन्तव्यं । तद- प्यननुमन्यमानेन नान्यतराप्रयोगोऽनुमन्तव्यः, तं चाननुग- छत्तान पर्यायभावः प्रत्येयस्तमप्रतीयता नियमद्वयेऽपिव्यानृत्य- भावो नाभ्यनुज्ञातव्यः । तमप्यनभ्यनुजानता नानेवकारं पद- मंगीकर्तव्यमिति सर्व पदमेवकारोपहितमेव वक्तव्यं तत्र चोक्तो दोपः । नन्वेवकारप्रयोगाभावेऽपि प्रतिपत्तुरर्थप्रकरणलिंगश- ब्दांतरसन्निधिसामर्थ्यात्सामान्यवाचिनामपि विशेषे स्थितिर्भ- विष्यतीति तथैव व्यवहारस्य प्रवृत्तेः ।
१०२ युक्त्यनुशासनं । 1 तदुक्तम्- अर्थः प्रकरणं लिंग शब्दस्यान्यस्य सन्निधिः । सामान्यवाचिशब्दानां विशेषे स्थितिहेतवः ॥ इति ॥ तदप्यनालोचिताभिधानं । अर्थपकरणादिभिरपि यद्येवका- रार्थे विशेपे स्थितिः क्रियते तदैवकारोपहितपदप्रयोगपक्षमा- विपणगणः परिहर्तुमशक्यः । अथ ततोऽन्यत्र विशेष स्थि- तिहेतवोऽर्थप्रकरणादयस्तदाऽनेवकारपदप्रयोग एव समर्थितः स्यात् । तत्र चोक्तो दोपः। स्यान्मतं-कचिदेवकारोपहितं पदं कचिदनेवकारं यथा पूर्वावधारणे पूर्व पदमेवकारोपहितमुत्तरमनेवकार, उत्तरावधा- रणे पुनरुत्तरं पदमेवकारोपलक्षितं पूर्वमनेवकारमिति । तदप्य- सत् पक्षद्वयाक्षिप्तदोपानुषंगात् । यदि पुनरस्तीति पदेना- मिधेयमस्तित्वमनेवकारेणापि नान्येन तत्प्रतिपक्षभूतेन नास्ति- वेन च्युतं भवति, तस्य तदभेदित्वात्, सत्त्वाद्वैतवादिनोऽ- स्तित्वव्यतिरेकेण नास्तित्वासंभवादन्यत्रानाद्यविद्योपप्लवात् । तत्सर्वथा शुन्यवादिनो नास्तित्वव्यतिरेकेणास्तित्वे च वर्तनेनात्महीनं प्रसंजनयितुं शक्यमिति मतं तदापि दूषण- याहुः स्वामिन:- विरोधि चाभेद्यविशेषभावात्” इति । नास्तित्वमस्तित्वात् सर्वथाप्यभेदि येनाभिधीयते तस्य तद्विरोधस्य भेदवद्भवेत् सत्ताद्वैतेऽभिधानाभिधेययोविरोधात् । कस्माद् ? अविशेषभावादविशेषत्वात् सकलविशेषाणामभावा-
टीकासहित।
दित्यर्थः । अनाद्यविद्यावशाद्विशेषसद्भावाददोष इति चेत् , न,
विद्याविद्याविशेषयोरप्ययोगात्, अन्यथा द्वैतप्रसंगात् । अथवा
नास्तित्वमस्तित्वादभेदीति विरोधि चस्यान केवलमात्महीनमिन
ति चशब्दार्थः कस्मात्? अविशेषभावाद्विशेषस्य भेदस्यास्तित्व-
नास्तित्वयोरभावात् । यो हि ब्रूयादिदमस्मादभेदीति तेन तयोः
कथंचिद्भेदोऽभ्युपगतः स्यादन्यथा तद्वचनायोगात्, कथंचिदपि
भेदिनोरभाव तत्प्रतिषेधविरोधात् । अथ शब्दाद्विकल्पभेदातें-
दिनोः स्वरूपभेदः प्रतिषिध्यते तदापि शब्दयोर्विकल्पयोश्च भेद
स्वयमनिच्छन्नेव संझिनो भेदं कथमपाकुर्वीत ? पराभ्युपगमादेव
शब्दविकल्पभेदस्येष्टेने दोष इति चेत् , न, स्वपरभेदानभ्युप,
गमे पराभ्युपगमासिद्धेः। विचारात पूर्व स्वपरभेदः प्रसिद्ध एवेति
चेत्, न, तदाऽपि पूर्वापरकालभेदस्यासिद्धेः। तत्सर्वथा भेदार
पहवे स्यादेवाभेदीति वचो विरोधि विशेषाभावादिति स्थिती
नन्वेमस्तित्वविरोधान्नास्तित्वं वस्तुनि कथमभिधीयते
स्याद्वादिभिरेवकारोपहितेनास्तीतिपदेन तस्य व्यवच्छेदाद-
नेवकारेण तस्य वक्तुमशक्यत्वादनुक्तसमत्वात् । ततश्चावाच्य-
तैवापतेत् प्रकारांतराभावादित्याशंकायामिदमुच्यते--
तयोतनः स्याद्गुणतो निपातः।
विपाद्यसन्धिश्च तथांगभावा-
दवाच्यता श्रायसलोपहेतुः॥४४॥
१०४ युक्त्यनुशासनं । टीका-तस्य विरोधिनो धर्मस्य द्योतना स्थादिति नि- पात: स्याद्वादिभिः संप्रयुज्यते । यद्येवं विध्यर्थिनः प्रतिषेधे- ऽपि प्रवृत्तिर्भवेत् द्वयोरपि प्रकाशनप्रतिपादनादिति न मन्तव्य गुण इति वचनात् । विधौ प्रयुज्यमानं पदमस्तीति प्रतिपेई गुणभावेन प्रकाशयति स्यादिति निपातेन तथैव द्योतनात् । तथा विपाद्यस्य विपक्षभूतस्य धर्मस्य संधिश्च स्यादंगभावादंगस्याव- यवस्य भावादवयवत्वादित्यर्थः । सर्वथाऽप्यवाच्यता तु न युक्ता तस्याः श्रायसलोपहेतुत्वान्निश्रेयसतत्वस्याप्यवाच्यत्वात्तदुपा- यतत्ववत् । न चोपेयस्योपायस्य वचनाभावे तदुपदेशः संभवति, न चोपदेशाभावे श्रायसोपायानुष्ठानं संभवति, नाप्युपाया- नुष्ठानानुपपत्तौ श्रायसमित्यवाच्यता श्रायसलोपहेतुः स्यात्ततः स्यात्कारलाञ्छनं पदमेवकारोपहितमर्थवत् प्रतिपत्तव्यमिति तात्पर्यार्थः। नन्वेवं सर्वत्र स्यादिति निपातस्य प्रयोगप्रसंगात्पति- पदं तदप्रयोगः शास्त्रे लोके च कुतः प्रतीयत इति शंका प्रतिनति सूरयः- S तथा प्रतिज्ञाशयतो प्रयोगः सामर्थ्यतो वा प्रतिषेधयुक्तिः। इति त्वदीया जिननाग ! दृष्टिः पराप्रधृष्या परधर्षिणी च ॥४५॥ टीका-तथा स्याज्जीव एवेतिप्रकारेण या प्रतिज्ञा टोकासहितं। जस्यामाशयोऽभिप्रायस्तथा प्रतिज्ञाशयः प्रतिपादयितुरभिप्रा- यस्तस्मात् प्रतिपदं स्यादिति निपातस्थाप्रयोगः शाखे लोके च प्रतीयते एवकाराप्रयोगवत् । शास्त्रे तावत् सम्यग्दर्शनज्ञान- चारित्राणि मोक्षमार्ग इत्यादौ न क्वचित्स्यात्कार एवकारो वा प्रयुज्यते, शास्त्रकारैरपयुक्तोऽपि विज्ञायते तेषां तथा प्रति- ज्ञाशयसद्भावात् सामर्थ्यतो वा प्रतिषेधस्य सर्वथैकान्तव्यवच्छे- दस्य युक्तिः स्याहादिनामन्यथा तदयोगात्, न हि स्यात्का- प्रयोगमन्तरेणानेकान्तात्मकत्वसिद्धिरेवकारमयोगमन्तरेण स- भ्यगेकान्तावधारणसिद्धिवत् । “सदेव सर्व को नेच्छेत्स्वरू- पादिचतुष्टयाद्" इत्यादौ स्यात्काराप्रयोग इति न मन्तव्यं, स्वरूपादिचतुष्टयादिति वचनात्स्याकारार्थप्रतिपत्तेः, "कर्य चित्ते सदेवेष्टं' इत्यादौ कथंचिदिति वचनात्तत्प्रयोगवत्, तथा लोके घंटमानयेत्यादिषु तदप्रयोगः सिद्ध एव । इत्येवं 'जिननाग ! जिनकुंजर ! त्वदीया दृष्टिः परैः सर्वथैकान्तवा- दिभिरप्रधृष्या प्रमाणनयसिद्धार्थत्वात् । परेषां भावैकान्तवा- दिनां प्रधर्पिणी च त्वदीया दृष्टिरिति संबंधः । तेषां सवथाड- विचार्यमाणानामप्रयोग:-यथा चाभावैकान्त:दिपक्षा न्यक्षमा प्रतिक्षिप्ता देवागमाप्तमीमांसायां तथेह प्रतिपत्तव्या इत्यलमिह विस्तरेण । कथं पुनर्विपाधसंधिश्च पदस्यामिधेयः स्यादिति स्वयं सूरयः प्रकाशयन्ति- विधिनिषेधोऽनभिलाप्यता च १०६ युक्त्यनुशासनं। त्रिरेकशस्सिद्विश एक एव। त्रयो विकल्पास्तव सप्तधामी स्याच्छब्दनेयाः सकलेऽर्थभेदे॥४६॥ टीका-स्यादस्त्येवेति विधिः स्यानास्त्येवेति निषेधः स्यादनभिलाप्यमेव सर्वमर्थजातमित्यनभिलाप्यता, तेऽमी त्रयो विकल्पाः एकशस्त्रिरिति वचनात् पदस्येत्यर्थवशाद्विभक्तिपरि- णायः । एषां विपायेन विपक्षेण संधिः संयोजना स्यादस्ति नास्त्येव स्यादस्त्यवक्तव्यमेव स्यान्नास्त्यवक्तव्यमेवेति त्रिर्दिशो भवति । द्वाभ्यां द्विश इति द्विसंयोगजा विकल्पासिरिति त्रिम- कारा भवन्ति । स्यादस्तिनाम्त्यवक्तव्यमेवेत्येक एव विकल्पो भवति । तदेवं विपाद्यसंधिप्रकारेण त्रयोऽमी मूलविकल्पा: सप्तधा भवंति । किं कचिदेवार्थे किं वा सर्वत्रेति शंकायामि- दमुच्यते--सकलेऽर्थभेदे निरवशेषे जीवादितत्त्वार्थपर्याये, न पुनः कचिदेवार्थपर्यायभेदे, प्रतिपर्यायं सप्तभंगीतिवचनात् । विकल्पाः सप्तधा भवंति तवेति वचनात् न च परेपामप्यमी । नन्वस्तित्वं प्रति विप्रतिपन्नमनसां तत्प्रत्यायनाय यथा स्याद- स्त्येवेति पदं प्रयोगमहति तथा स्यान्नास्त्येवेत्यादिपदान्यपि भयोगमहेंयुः सप्तधावनमार्गस्य व्यवस्थितेरिति पराकूतं नि- राचिकीर्षवः स्याच्छन्दनेया इति प्रतिपादयति। यथा विधिवि- कल्पस्य प्रयोगस्तद्विवादविनिवृत्तये स्याद्वादिभिर्विधीयते तदा निषेधादिविकल्पाः शेषाः पडपि स्याच्छब्देन नेयाः स्युः।न टोकासहितं। १०७ पुनः प्रयोगमर्हति तदर्थे विवादाभावात् तद्विवादे तु क्रमशस्तत्म- योगेऽपिन कश्चिद्दोपःप्रतिभाति प्रतिपाद्यस्यैकस्यापि सप्तधावि- प्रतिपचिसद्भावात् । तावत्कृत्वा संशयोपजननात्ताज्जिज्ञासो- पपत्तेस्तावदेव च प्रश्ववचनमवृत्तेः "प्रश्नवशादेकवस्तुन्यविरोधेन, विधिप्रतिषेधकलाना सप्तभंगीति" चार्तिककारवचनात् । नाना- प्रतिपाद्यजनानिवैकप्रतिपाद्यजनमपि प्रतिपादयितुमनसां सप्त- विकल्पवचनं न विरुध्यत एव । ननु च स्यादिति निपातोऽने- कांतस्य द्योतको वाचको वा, गुणभावेन भवेत्प्रधानभावेन वा ! तत्र यदि गुणकल्पनया द्योतकोऽभिधीयते तदा तद्वाचकपदा- न्तरेणाऽपि गुणकल्पनयैव वाच्यत्वप्रसंगः सर्वत्र पदाभिधेयस्यै- व निपातेन द्योतयितुं शक्यत्वात्, तदनुक्तस्यार्थस्य तेन द्योतने तस्य वाचकत्वप्रसक्तेस्तत्प्रयोगसामर्थ्यात्तदर्थप्रतिपत्तेः । स्यान्मतमेतत्-अस्तीतिपदेन निपातेन तावदस्तित्वं प्र- धानकल्पनयोच्यते स्यादितिपदेन निपातेन नास्तित्वादयो धर्मा द्योत्यंत इति प्रधानगुणकल्पनयाऽनेकान्तप्रतिपत्तिरेव- कारप्रयोगादन्यव्यवच्छेदसिद्धेरिति । तदप्यसम्यक्; अस्ती- तिपदेनानुक्तानां नास्तित्वादिधर्माणां स्थाच्छन्देन द्योतने सर्वार्थद्योतनप्रसंगात् । सर्वार्थानामेवकारेण व्यवच्छेदान्न तद्- द्योतनप्रसंग इति वचनं न युक्तिमत् नास्तित्वादीनामपि तेन व्यवच्छेदादनुद्योतनप्रसंगात्ततो न द्योतका स्याच्छब्दोऽने-- कांतस्य युज्यते नाऽपि वाचकः स्यादिति निपातमयोगादेव तत्प्रतिपत्तेरस्तीत्यादिपदप्रयोगानर्थक्यात् । : T .
२०८ युक्त्यनुशासनं । सर्वार्थप्रतिपादने तेनैव पर्याप्तत्वात्पदान्तरस्य प्रयोगो वा शुनरुक्तत्वमनिवार्यमिति केचिन, नान्पति मूग्यः प्राहुः- स्यादित्यपि स्याद् गुणसुख्यकल्पै- कान्तो यथोपाधिविशेषवीक्ष्यः । तत्त्वं त्वनकांतमशेषरूपं द्विधा भवार्थव्यवहारवत्त्वात् ॥१७॥ टीका-अस्यायपर्थः, स्यादिन्यपि निपातो गुणमुख्य- कल्पैकान्तः स्यात्, गुणश्च मुख्यश्च गुणमुख्यौ स्वभावौ ताभ्यां कल्प्यन्न इति गुणमुख्यकल्पाः, गुणमुख्यकल्पा एकान्ता यस्य सोऽयं गुणमुख्यकल्पैकान्तः स्याद्भवेन्नयादेशा- दित्यभिपायः । शुद्धद्रव्यार्थिकप्रधानभावादस्तित्वैकान्तो मुख्यः, शेषा नास्तित्वाचैकान्ना गुणाः, प्रधानभावेनानपणा- दनिराकरणाच नास्तित्वादिनिरपेक्षस्यास्तित्वस्यासंभवात् खरविष,णवत् । स्य'च्छब्दस्तु तद्योतनः प्रधानगुणभावेनैव भवेत्तथैत्रास्तीति पदेनाभिधानात् पदान्तरेण यथाभिधानं निपातपदेन छोयितुं शक्यत्वात् । व्यवहारनयादेशातु ना- स्तित्वैकान्ता मुख्याः स्युरस्तित्वैकांतस्तु गुणः प्राधान्येना- विवक्षितत्वात्तदप्रतिक्षेपाच तत्रास्तित्वनिराकरणे तु नास्ति- त्वादिधर्माणामनुपपत्तेः कूर्मरोमादिवत् । नास्तित्वादिभिरपेक्ष- माणं तु वस्तुनोऽस्तित्वं स्याच्छन्देन द्योत्यत इति प्रधानगु- गाभावेनैव स्यादिति निपातः कल्पयत्येकांताच्छुद्धनयादेशा- ६ " टोकासहित १०६ मान्यथा । कुत इति चेत् , यथोपाधि येथा विशेषण विशेषस्य भेदस्य भावात् सद्भावात् “ धर्मे धर्मेऽन्य एवाऽर्थो धर्मिणो- ऽनंतधर्मिणः " इत्यन्यत्रापि वचनात् । नयादेशो हि वस्तुनो धर्मभेदाद्विशेषो न प्रमाणदेश इति । जीवादि तत्वमपि तर्हि प्रधानगुणभूतैकान्तमायातमिति न शंकनीयं । " तत्त्वं त्वने- कान्तमशेषरूपं" इति वचनात् । तत्वं जीवादि प्रमाणापित सकलादेशात् " सकलादेशः प्रमाणाधीन: इति वचनात तदनेकान्तमेव स्याद् अनेकान्तोऽप्यनेकांतो न पुनरेकान्तस्त- स्य नयार्पणयोक्तत्वात् । कुतस्तदनेकांतमित्युच्यते- यतोऽशे- परूपं अशेष सकलं रूपं यस्य तदशेषरूपं विकलरूपस्य तत्व- कदेशत्वात् । कथमिदानी स्याज्जीव एव स्यादजीव एवेत्यादिना प्रमाणवाक्येनाभिधीयत इति शंकायामिदमुच्यते- "द्विधा भवार्थव्यवहारवत्वादिति" तत्वं द्वाभ्यां प्रकाराभ्यां व्यवस्थितं द्रव्यरूप भवार्थ- वत्त्वात् पर्यायरूपं व्यवहारवत्त्वात् । भवार्थो हि सद्व्यं विधि- र्व्यवहारोऽसद्र्व्यं गुणः पर्यायः प्रतिषेधः, तत्तत्त्वमेव वस्तुन इति द्विमकारं तत्त्वं प्रकारान्तराभावात् । तत्र यदर यदा सद्व्यं जीवो धर्मास्तिकायोऽधर्मास्तिकाय आकाशं कालः पुनलो मनुष्यादिरिति वा विधिलक्षणभवार्थप्ररूपणायां सदिति शब्दाः मयुज्यते तदा कालात्मरूपसंसर्गगुणिदेशार्थसंबंधोपकार- शब्दरभेदेनाभेदात्मकस्य वस्तुनोऽभिधानात् सकलादेशस्य ३१० युक्त्यनुशासनं । प्रमाणाधीनस्य प्रयोगादशेषरूपं तत्त्वमभिधीयते । सदिति शब्दो हि सकलसद्विशेपात्मकं सदितरात्मकासद्विशेषात्मक च तत्वं प्रतिपादयति कालादिभिरभेदात् । तथा द्रव्यमिति शब्दो निशेपद्रव्यविशेषात्मक द्रव्यतत्त्वं सकलपर्यायविशेषा- स्मकमद्रव्यगुण द्य त्मकं च प्रकाशयति । तथैव जीव इति शब्दो जीवतत्त्वं सकलजीवविशेपात्मकं जीवपर्यायरूपं जीवाजीववि- शेपात्मकं च कथयति । तथैव धर्म इत्यधर्म इत्याकाश इनि काल इति च शब्दों धर्ममधर्ममाकाशं कालं च सकलस्वविशे- यात्मकं निवेदयति। पुद्गल इति शब्दोऽखिलपुद्गल विशेषात्मक पुद्गलद्रव्यमेवेति प्रतिपत्तव्यं विधिरूपस्य भवार्थस्य प्राधान्यात् । यदा पुनरसदितिशब्दः प्रयुज्यते तदाऽप्यसत्तत्वं पररूपादि- चतुष्टयापेक्षं कालादिभिरभेदेनाभेदोपचारेण सकलासद्विशे- पात्मकं तत्वं ख्यापयति, व्यवहारस्य भेदप्राधान्यात् । तथैवा- द्रव्यमजीव इत्यादि प्रतिषेधशब्दः सकलासद्विशेषात्मकमद्रव्य- स्वमजीवादितत्वं च प्रत्याययति । स्यादिति निपातेन तथा तस्योद्योतनादेवकारेणान्यथाभावनिराकरणात् । वस्तुत्वमिति शब्दस्तु स्यात्कारलांछनः सैवकारः सकलवस्तुविशेषसदसदा दिरूपं तचं कालादिभिरभेदेनाभेदोपचारेण प्रख्यापयति तस्य भवार्थव्यवहारवचाविधिनिषेधप्राधान्येन युगपदभिधानात् , यत्काले वस्तुनो वस्तुत्वं तत्काल एव सकलवस्तुविशेषास्तस्य तद्व्यापकत्वादिति कालेनाभेदस्तेभ्यो द्रव्यार्थिकमाधान्यात् । यया च वस्तुनो वस्तुत्वमात्मरूपं तथा सर्वे वस्तुविशेषाः टोकासहित। इत्यात्मरूपेणाभेदः । यथा च वस्तुत्वेन वस्तुनः संसर्गस्तथा वस्तुविशेषैरपि, सविशेषस्यैव तस्य सम्यक् सृष्टौ व्यापा- रात् ततः संसर्गेणाप्यभेदः । यस्तु वस्तुत्वस्य गुणस्य वस्तुगुणिदेशः स एव वस्तुविशेषाणामिति गुणिदेशेनाऽपि तदभेदः। य एव चार्थो वस्तुत्वस्याधिकरणलक्षणो वस्त्वात्मा स एव सकलवस्तुधर्माणामित्यर्थतोऽपि तदभेदः। यश्च वस्तुनि वस्तुत्वसंबंधः समवायोऽविष्वग्भावलक्षणः स एव सकलधर्मा- णामिनि संबंधेन तदभेदः । य एव चोपकारो वस्तुनो वस्तु- येन क्रियतेऽर्थक्रियासामीलक्षणः स एव सकलधमैरित्यु- पकारेणैव तदभेदः। यथा च बस्तुशब्दो वस्तुत्वं प्रतिपादयति तथा सकलवस्तुधर्मानपि तैविना तस्य वस्तुत्वानुपपत्तरिति श- ब्देनाऽपि तदभेदः । पर्यायार्थिकप्राधान्येन तु परमार्थतः का- लादिभिर्भेद एवधर्मधर्मिणोरभेदोपचारात् । वस्तुशब्देन सकल- धर्मविशिष्टस्य वस्तुनोऽभिधानात् सकलादेशो न विरुध्यते । ततः स्याद्वस्वेवेत्यादिशब्दः तत्त्वमशेषरूपं प्रतिपादयतीति ना- नात्वरूपस्यापि वस्तुनो वाचकसंभवः सकलादेशवाक्येन तस्य तथा वक्तुं शक्यत्वात् । ननु च द्रव्यमानं तत्वं तस्य द्रव्यपदेना- भिधानात् पदान्तराणामपि तत्रैव व्यापारात् तद्व्यतिरेकेण पदार्थासंभवादित्येके । पर्यायमात्रमेव तत्त्वं द्रव्यस्य सकलप- र्यायव्यापिनो विचार्यमाणस्यायोगात् द्रव्यादिपदेनापि पर्या- यमात्रस्यैव कयनात्तत्र प्रलिप्राप्तिदर्शनाच्चेत्यन्ये । द्रव्यं प- र्यायश्च पृथगेव तत्वं तयोस्तादात्म्यविरोधात् द्रव्यपदेन द्रव्य- ११२ युक्त्यनुशासनं। स्यैवाभिधानात्पर्यायपदेन पर्यायस्यैव निवेदनादन्यथासंकरव्य- तिकरप्रसंगादिन्यपरे । द्रव्यपर्यायद्वयात्मकं तत्वं द्रव्यपदेन प- र्यायपदेन वा तस्यैवाभिधानात् सर्वत्रापर्यायात्मस्य द्रव्यस्या- संभवात सकलपर्ण शून्यस्य च द्रव्यस्याप्रतीतेरितीतरे । तान् प्रति मुग्यो वक्तुमाग्भन्ते- न द्रव्यपर्यायपृथग्व्यवस्था द्वैयात्म्यमेकार्पणया विरुद्धम् । धर्मश्च धर्मी च मिथस्त्रिधेमौ-- न सर्वथा तेऽभिमतौ विरुद्धौ ॥४८॥ टीका-न तावत् द्रव्यमेवेति द्रव्यस्य व्यवस्था सकलपर्याय- रहितस्य प्रमाणागोचरत्वात्, न हि प्रत्यक्षं द्रव्यविषयं तस्य व- मानविषयत्वात् द्रव्यस्य त्रिकालगोचरानंतविवर्तव्यापित्वात् । न च वर्तमानमात्रविषयत्वे प्रत्यक्षम्य सर्वात्मना त्रिकालवि- पयद्रव्यग्राहित्वं युक्तं योगिप्रत्यक्षत्वप्रसंगात् । तर्हि योगिन- त्यक्षमेव द्रव्यविषयमिति चेत् न, अस्पदादिप्रत्यक्षस्य निर्विषयत्वप्रसंगात् । ननु अस्मदादिप्रत्यक्षस्यापि विधातृत्वात सर्वदा निषेधृत्वे विधिविषयत्वविरोधात् निषेध्यानामानंत्याद- नतेनापि कालेन निषेचा कर्तुमशक्तस्तत्रैवोपक्षीणशक्तिक- त्वात् कदाचित्कस्पचिद्विधौ प्रवृत्त्यनुपपनेविधिविषयत्वस्यैर युक्तिमत्त्वमिति चेत् , नैतत्सारं, सद्रव्यमाने प्रत्यक्षरुप प्रत्तो शश्वदसत्वे प्रवृत्त्यभावात् तदव्यवच्छेदमसंगात् । यदि पुनः टोकासहित। सन्मात्रे विधौ प्रवर्तमान प्रत्यक्षं तद्विरुद्धमसत्वं व्यवच्छिन- नीति कथ्यते तदाऽपि निषेधृ प्रत्यक्षं कथं न स्यात् १ यदि पु- नः प्रथमाक्षसन्निपातयेलायां निर्विकल्पं प्रत्यक्ष सन्मात्रमेव साक्षात्कुरुते, पश्चादनाद्यविद्यावासनासामर्थ्यादसत् निवृत्ति- विकल्पोत्पत्तेः प्रतिषेधव्यवहारोऽस्मदादेः प्रवर्तत इति मतं, तदा परमार्थतो नासत्त्वनिवृत्तिरिति सदसदात्मकवस्तुविषय प्रत्यक्षं प्रसज्येत । सन्मात्रस्य विधिरेवासत्त्वप्रतिषेध इति चेत्, (न) कथमेवं विधात्रेव प्रत्यक्ष निषेद्धृत्वस्यापि तवेष्टेः ? कथं च स्वयमेव न निषेद्धृ प्रत्यक्षमिति ब्रुवाणः प्रतिषेधं सर्वथा निरा- कुर्वीत न चेदस्वस्थः । अथाविद्यावलान्न निषेधृ प्रत्यक्षमिति निषेधन्यवहारः क्रियते परमार्थतस्तस्याप्यनभिधानात् किमे- उमवाच्यं प्रत्यक्षमिष्यते ? तथेष्टौ सन्मात्रमप्यवाच्यं स्यात्, तत्वयुक्ततरं परमत्यायनायोगात् - सन्मानं हि तत्वं पर प्रत्याययेन्न संविन्मात्रेण पराप्रत्यक्षेण प्रत्याययितुमीशा, परमार्थतः प्रत्याय्यमत्यायकभावाभावात् न कचित्किचित् कथंचित् प्रत्याययति सर्वस्य स्वत एव सन्मात्रतत्त्वप्रतिपत्तेरिति चेत् , न विप्रतिपत्त्यभावप्रसंगात् । यदि पुनः सन्मात्रे तत्त्वे स्वपरविभागाभावात् सर्वस्य भेदस्य तत्रैवानुमवेशान्न कश्चि- कृतश्चित्कथंचित्कदाचिद्विप्रतिपद्यत इति चेत्, न स्यादेतदे- वं यदि स्वपरविभागाभावः सिद्धयेत् , स हि न तावत्सत्यक्षता सिद्धस्तस्याभावविषयत्वप्रसंगात, नाऽप्यनुमानात्पक्षहेतु दृष्टांत- मैदाभावेऽनुमानानुपपत्तेः, कल्पितस्याप्यनुमानस्य विविवि- , ८ युक्त्यनुशासन। पयत्वनियमात, तस्य प्रतिषेधविषयत्वे प्रत्यक्षस्यापि प्रतिषेधवि- पयत्वसिद्धेःकुतः सन्मात्रत्वसिद्धिः। आगमात्स्वपरविभागाभा- वः साध्यत इति चेत्, न, स्वपरविभागाभावे कचिदागमा- नुपपत्तेः । भागमो याप्तवचनमपौरुषेय वा वचनं स्यात् ? न तावदाप्तस्य तत्प्रतिपाधस्य च विनेयस्याभावे वचनमाप्तस्य भ- वर्तते । तत्सनावे च सिद्धः स्वपरविभाग इति कथमागमात्त- दभावः सिध्येत् ? यदि पुनरपौरुषेयं वचनमागमस्तदाऽपि स्वपरविभागः सिद्धस्तव्याख्यातुः श्रोतुश्च सिद्धः स्वपरविमा- गोपपत्तेः । स्यान्मतं,स्वपरविभागाभावोऽपि न कुतश्चित्तमा- णात्साध्यते प्रत्यक्षतः सन्मात्रसिद्धेरेव स्वपरविभागाभावस्य साधनाकेवलमविद्याविलासमा प्रतिपाद्यप्रतिपादकभावःसं- वेद्यसंवेदकभाववदिति । तदप्यसम्यक्, संवेद्यसंवेदकभावन- तिपाद्यप्रतिपादकभावाभावे स्वपरप्रतिपत्तिविरोधात् सर्वथा • शून्यवादविकाशप्रसंगात् । तदुक्तम्- सर्वथा सदुपायानां चादमार्गः प्रवर्चते । अधिकारोऽनुपायत्वान्न वादे शुन्यवादिनः ॥ इति ।। तदेतदत्रापि संप्राप्तं । तथाहि-- सर्वथा सदुपायानां वादमार्गः प्रवर्तते । अधिकारोऽनुपायत्वान्न वादे सत्त्ववादिनः ।। ननु च विचारात्पूर्व तत्वाभ्युपगमा पश्चाद्वा ? यदि पूर्व तदा निष्फलो विचारः स्यात् , तत्त्वाभ्युपगमफलत्वाद्विचारस्य, टोकासहितं । तस्य विचारात्यागेव सिद्धेः। पश्चाचेत् सर्वस्याविचारसमणीयेल लोकव्यवहारेण विचारस्य प्रवृत्तेन पर्यनुयोगो युक्तः, विचा- रकाले हि न कश्चिदपि शून्यवादी सत्ताद्वैतवादी वा, येन सर्वथाऽनुपायत्वाद्वादेऽनधिकारः प्रसज्येत ! अनेकान्तबादि- नामपि तद्विचारोत्तरकालमेव सर्वमनेकान्तात्पकं तवमिति प्रतिपत्तव्यं, कथमन्यथा परस्पराश्रयाख्यो दोषो न स्यात्, प्रसिद्धेऽनेकान्तत्वे विचारप्रतिस्तस्यां च सत्यामनेकान्ता- सिद्धिरिति गत्यंतराभावात् । किंचिदपि तत्समनभ्युपगम्य परीक्षाप्रवृत्तौ तु न कश्चिदोषः परीक्षोचरकालं यद्विनिश्चित तत्तत्वमिति व्यवस्थानात् । तथा च सत्ताद्वैतवादिनोऽपि वि. चारसामर्थ्यात् सत्ताद्वैततत्त्वव्यवस्थितौ यथादर्शनं संवेद्यसंवेद- कभावस्य प्रतिपाद्यमतिपादकभावक्ष्य वा स्परविभागभावं- नाधीनस्य प्रतिबंधकभावात्सर्वमनबद्यमिति केचित् । तदप्यति झुग्धबुद्धिविनँभितं, किंचिनिर्णीतमनाश्रित्य विचारस्यैवान- वृत्तेस्तस्य संशयपूर्वकत्वात्, संशयस्य च निर्णयनिबंधनत्वात् पू- मनिर्णीतविशेषस्य पश्चात् क्वचित्संशयस्यानुपलब्धेः स्था- शुपुरुषसंशयवत् । य एव हि पूर्वनिश्चितस्थाणुपुरुषविशेषः भ. तिपत्ता तस्यैवान्यत्रोचंतासामान्य प्रत्यक्षतो निश्चिततस्त- विशेषयोः स्मरतः संशयोत्पत्तिदर्शनात् । न चैवं सत्ताद्वैततत्त्व किं वा सर्वथा शून्यमिति संशय उत्पद्यते पूर्व तद्विषयनिर्ण- यानुपपत्तेः । कचित्तनिर्णयोत्पत्तौ वान सत्त द्वैतवादिनः शून्य- बादिनो वा स्वेष्टसिद्धिः । यदि पुनः सर्वमभ्युपगम्य सत्ता- युफ्त्यनुशासनं। द्वैतशून्यवादयोरपि कचित्कदाचित्तन्निर्णयात्पुनरन्यत्र तत्त्व- सामान्यमुपलब्धवतस्तयोश्चानुस्मरतः संशयप्रवृत्तेर्विचारः प्रव- र्चत एवेति मतं, तदापि येनात्मना सत्ताद्वैतं पूर्व निर्णीतं तेनैव सर्वशून्यत्वं रूपान्तरेण वा ? न तावत्प्रथमः पक्षो व्याघातात् , रूपान्तरेण तु तन्निर्णये स्याद्वादमाश्रित्य विचारः प्रवर्तत इत्येतदायातं । तथा च नानेकांतवादिना विचारात्पूर्वमनेकांत- वाप्रासद्धिस्तदप्रसिद्धौ विचाराप्रवृत्तः। न च विचारादेवानेकां- तत्वसिद्धिा, प्रत्यक्षतः परमागमाच्च सुनिश्चितासंभवद्वाधकम- माणादनेकांतत्वसिद्धेरप्रतिबंधात्, न चैवं विचारानर्थक्यं तद्व- लादेव तत्त्वसिद्धेरभ्युपगमात्, प्रत्यक्षादागमाच प्रतिपन्नतत्त्वस्या- पि कुतश्चिदृष्टादृष्टनिमित्तवशात्कस्यचिकाचित्कथंचित् संश- योत्पत्तौ विचारस्यावकाशात् सर्वत्राऽहेतुवादहेतुवादाभ्यामाज्ञा- प्रधानयुक्तिप्रधानयोस्तत्त्वप्रतिपत्तिविधानात् । ततोऽनेकान्तवा- दिन एव वादेऽधिकारः सदुपायत्वात् । कचित् कदाचित् कथं- चित् कृतश्चित् कस्यचिनिश्चयसद्भावात् । किंचित्रिणीतमा- श्रित्य कचिदन्यत्रानिीते विचारप्रवृत्तेः सर्वत्र विप्रतिपद्यमाना- जां निराश्रयविचारणानुपपत्तेः । तथा चोक्तं तत्त्वार्थालंकारे- किंचिनितिमाश्रित्य विचारोऽन्यत्र वर्तते । सर्वविप्रतिपत्तौ तु कचिन्नास्ति विचारणा ॥ इति ।। सतो न विचारसामर्थ्यात् सव्यतत्त्वव्यवस्था नाऽपि पर्याय- तस्वव्यवस्था, द्रव्यविकलस्य पर्यायमात्रस्य सकलप्रमाणाधि- टीकासहितं। चयत्वात् द्रव्यैकान्तवत् । प्रत्यक्षतो वर्तमानपर्यायः प्रतिभा- सत एव सर्वस्येदानींतनतया प्रतिभासमानत्वात् । नष्टानुत्पन्न- योरिदानींतनतया प्रतिभासाभावादिति चेत्, नेदानींतनताया एव द्रव्याभावे प्रतिभासविरोधात् नष्टानुत्पन्नावस्थाद्वितयमनपे- क्षमाणस्य वर्तमानताप्रतीतेरयोगात्, नित्यत्वसाधनाच्चेदानींतन- ताप्रतीतेः शश्वदविच्छेदादात्मनोऽहंताप्रतीतिवत्-यथैव ह्यात्मा सुख्यहं दुःख्यहमिति सर्वदाऽप्यवच्छिन्नाहंप्रत्ययविषयभावम- नुभवन्न कदाचिदहंतां संत्यजतीति नित्यः, तथा वहिर्वस्त्वपि सततमिदानींतनतां न जहाति प्रागपि इदानीं पश्यामि पश्चा- दपीदानी पश्यामीति न सकलो देशो वा कश्चिद्विद्यते यत्रे- दानींतनताप्रतीतिर्नास्तीति तदव्यवच्छेदः सिद्धः । ततः समस्तं वस्तु विवादापन्नं नित्यमेवेदानीन्तनतया प्रतीयमान- त्वात्, प्रतिक्षणविनाशित्वे तद्विरोधात् । स्यान्मत, पूर्वेदानींतनतान्या पाश्चात्या च वर्तमानेदानींत- नता, नततस्तयोः संतानाविच्छेदः, प्रतिक्षणं तद्विच्छेदादि- ति। तदसत्, तद्विच्छेदग्राहिणः कस्यचिदसंभवात् । न हि ता- वत्सांपतिकमिदानींतनतायाः संवेदनं पूर्वापरेदानींतनतासंवे- दनविच्छेदं ग्रहीतुमलं तदा स्वयमभावात् । नाप्यनुमानं त- द्विच्छेदाविनाभाविलिंगग्रहणासंभवात् । यो हि कदाचित् कचित्पूर्वापरेदानींतनविच्छेदमुपलभते स एव तत्स्वभावस्य तत्कार्यस्य वा लिंगस्य तेनाविनाभावं साकल्येन तर्कयेत् न पुनरन्योऽतिप्रसंगात् । न च स्वयं पूर्वापरकालमव्याप्नुवन् युक्त्यनुशासनं । पूर्वापरेदानीतनतासंवदेनयोविच्छेदमुपलब्धं समर्थः। सन्तान- स्ताक् समर्थ इति चेत् , न, तस्यावस्तुत्वे सफलसामर्थ्या- दुपपणेः, वस्तुत्वे पुनरात्मन एव संतान इति नामकरणा- नित्यात्मसिद्धेः । स्यान्मतिरेपा ते, पूर्वापूर्वेदानींतनतासंवेद- नाहितवासनाप्रबोधात् तद्विच्छेदनिश्चयोत्पत्तेर्न नित्यात्मसंसि- द्धिरिति, साऽपि न सम्यक् । पूर्वापरेदानींतनतानिश्चयत्यैव तत्संवेदनाहितवासनाप्रयोधादुत्पोर्यथानुभवनिश्चयोपजननसं- भवात् न पूर्वापूर्व विच्छेदोऽनुभृतः । ननु प्रत्यक्षतः स्वरूपा- नुभव एव संवेदनस्य पूर्वापरसंवेदनविच्छेदानुभव इति चेन्न तदविच्छेदानुभवस्यापि स्वरूपानुभवरूपत्वसिद्धेरप्रतिबंधात् पूर्वस्मात् परस्माच्च संवेदनादिदं संवेदनं विच्छिन्न मिति निश्च- योत्पत्तेः संवेदनस्वरूपानुभवस्तद्विच्छेदानुभव एवेति चेत् । नाविच्छिन्नमहमामुहू देरन्वभवमित्यविच्छेदनिश्चयमादुर्भावा- सदविच्छेदानुभवस्यैव सिद्धेस्ततो निरतरमिदानींतनतया वहिरन्तश्च वस्तुनः प्रतीयमानत्वं कथंचिन्नित्यत्वमेव साध- यतीति नात: क्षणस्थितिपर्यायमात्रसिद्धिः नाप्यनुमानालिं- गाभावात् । यत् सत्तत्सर्व क्षणस्थितीति पर्यायमात्रं नित्यद्र- व्यमान्ने क्रमयोगपद्याभभामर्थक्रियाविरोधात्सर्वानुपपत्तेरिन्यनु- मानं पर्यायमात्रवस्तुसाधनमिति चेत् , न, विरुद्धसाधनादस्य विरुद्धत्वात् । तथा हि-यत् सत्तत्सर्वं द्रव्यपर्यायरूपं जात्यंतरं पर्यायमात्रे सर्वथाऽर्थक्रियाविरोधात् द्रव्यपात्रवत् सच्चायोगादिति निरूपितप्रायं । ततः सूक्तं न पर्यायैकांत- टीकासहितं । - व्यवस्था प्रमाणाभावात् द्रव्यैकांतवदिति । पृथग्भूतपरस्पर- निरपेक्षद्रव्यपर्यायव्यवस्थाऽप्यनेन प्रत्युक्ता तत्राऽपि प्रमाणा- भावाविशेषात् । न हि प्रत्यक्षतः सर्वथा पृथग्भूतयोव्यप- र्याययोः प्रतीतिरस्ति तयोरविष्वग्भूतयोरेव सर्वदा संवेदनात् । समवायात्तथा प्रतीतिरिति चेत् , सोऽपि समवायस्ताभ्यां पदार्यान्तरभूतो न प्रत्यक्षतः सिद्धस्तदात्मकस्यैव कथंचित्तस्य प्रतीतेः। अथ समवायसमवायिनोः परस्परमात्मनोश्च ताभ्या- मभेदप्रत्ययहेतुरित्यभिधीयते, न तर्हि प्रत्यक्षतो भेदप्रति- भासो नाऽप्यनुपानात् द्रव्यपर्याययोभैदैकान्तः सिद्धस्तथावि- धहेत्वभावात् । ननु द्रव्यपर्यायौ मिथो भिन्नौ भिन्नप्रतिभास- त्वात् । यौ यौ भिन्नप्रतिभासौ तौ तौ भिन्नौ यथा घटपटौ तथा च द्रव्यपर्यायौ भिन्नप्रतिभासौ तस्माद्भिन्नावित्यनुमानात् मिथो भिन्नद्रव्यपर्यायव्यवस्था भवत्येवेति चेत्, न, हेतोरसिद्धत्वा- त, भिन्नप्रतिभासत्वं हि द्रव्यपर्याययोर्न प्रत्यक्षतः सर्वथाऽस्ती- ति समर्थितं प्राक् । अनुमानाद्भिन्नप्रतिभासत्वमिति चेत् किम- स्मादेवानुमानादनुमानान्तराद्वा । न तावदायः पक्षः परस्परा- श्रयानुषंगात् । सिद्धे ह्यतोऽनुमानाद्भिन्नप्रतिभासित्वे सनीदमनु- मानं सिध्यति, सिद्धे वाऽस्मिन्ननुमाने भिन्नप्रतिभासत्त्रमिति गत्यन्तराभावात् । अनुमानान्तराद्भिनप्रतिभासत्वसिद्धौ तदेव वाच्यं द्रव्यपर्यायौ भिन्नप्रतिभासौ विरुद्धधर्माधिकरणत्वात् यौ यौविरुद्धधर्माधिकरणौ तौ तौसर्वथा भिन्नप्रतिभासौ यथा जलानलौ तथा च द्रव्यपर्यायौ तस्माद्भिन्नप्रतिभासावित्यनुमा- १२० युक्त्यनुशासनं। नस्य प्रत्यक्षविरुद्धपक्षत्वात् कालात्ययापदिष्टत्वाच्च हेतो त: साध्यसिद्धिः । एतेनावयवाक्यविनोर्गुणगुणिनोः क्रियाक्रि- यावतोः सामान्यतद्वतो विशेषतद्वतोश्च परस्परता सर्वथा भेदे साध्ये प्रयुज्यमानस्य हेतोः कालात्ययापदिष्टत्वं प्रतिवर्णित पक्षस्य प्रत्यक्षबाधितत्वात् । कथंचित् तादात्म्यवर्तिनोरेवावि- ध्वग्भूतयोस्तयोः प्रत्यक्षबुद्धौ प्रतिभासनात् । कथंचिद्भेदे साध्ये सिद्धसाध्यतापत्तिस्तत्र प्रत्यक्षस्य भ्रांतत्वादवाधकत्वे वहिरं- तश्च न किंचित् प्रत्यक्षतः सिध्येत् भ्रांतादपि प्रत्यक्षात कस्यचित्सिद्धौ प्रत्यक्षतदाभासव्यवस्था किमर्थमास्थीयेत ? न च भ्रांतं प्रत्यक्षं धर्मिदृष्टान्तहेतुव्यवस्थापनायालं, यतोऽ- नुमानमत्यंतभेदमवयवावयन्यादीनां व्यवस्थापयदभेदप्रतिभा- सिनः प्रत्यक्षस्य बाधकमनुमन्येमहि ततोऽनुमानं कस्यचिद्वा- धकं साधकं वा स्वयमनुरुच्यमानेन प्रत्यक्षमभ्रान्तं धर्मिदृष्टां- तहेतुविषयमुररीकर्त्तव्यं तचोररीकुर्वता न द्रव्यपर्यायौ पर- स्परमत्यंतभिन्नौ प्रतिज्ञातव्यौ प्रत्यक्षवुद्धौ सकृदपि तथा प्रतिभासाभावात् ततो न द्रव्यपर्यायपृथग्व्यवस्था युक्तिमती द्रव्यव्यवस्थावत्पर्यायव्यवस्थावच्चेति प्रपंचतोऽन्यत्र परीक्षितं प्रतिपचन्यम् । अत्रापरःमाह, द्वयात्मकमेकं तत्त्वं व्यवतिष्ठते द्रव्यमात्रस्य पर्यायमात्रस्य च पृथग्भूतद्रव्यपर्यायमात्रवत् व्यवस्थानुपपत्तेरिति। सोऽप्येवं प्रष्टव्यः, किं सर्वथा द्वयात्मकमेकस्याप्यते कथंचिद्वा ? प्रथमपते द्वयात्म्यमेशार्पणयाविरुदं न व्यवतिष्ठत एव, यो यात्म MM टीकासहितं । १२६ द्रव्यमतीतहेतुर्यश्च पर्यायप्रतीतिनिमित्त तौ चेत्परस्परं भिन्नावा- स्मानौ कथं तदात्मकमेकं तत्वं सर्वथा व्यवतिष्ठते भिन्नाभ्यामात्म- भ्यामभिन्नस्यैकत्वविरोधात । यदात्वेकस्मादभिन्नौ तावात्मानौ स्यातां तदाप्येकमेवावतिष्ठते सर्वथैकस्मादभिन्नयोस्तयोरेकत्व- सिद्धेरिति न द्वयात्म्यं विरुद्धत्वात् । को ह्यवालिशः प्रमाणमंगी- कुर्वन् द्वावात्मानौ सर्वथैकस्य वस्तुनो भिन्नौ स्त्रयपर्पयेत् ततो दैया- स्यं द्वयात्मक तत्वं सर्वथैकार्पणया विरुद्धमेवेति मन्तव्यम् । कथमिदानीमविरुद्ध तत्वं सिध्येदिति चेत , उच्यते- "धर्मी च धर्मश्च मिथविधेमौ न सर्वथा तेऽभिपतौ विरुद्धौं"। ते तवा भगवतोऽहंतः स्याद्वादिन इमौ प्रत्यक्षतः प्रतिभासमानौ सर्वथा सर्वेणाऽपि प्रकारेणानुपानादिमतिभासविशेषेण वि- दौ नेति संबंधः। कौ ताविमौ धर्मी च धर्मश्चेति धमिधर्मावि- त्यर्थः । किं तौ सर्वथा मिथो भिन्नावेवाभिन्नावेव भिन्नाभि- नावेव त्रिधा वा कल्प्येते । न तावत्पथमः पक्षः प्रमाणविरोधात्। नाऽपि द्वितीयः सहानवस्थाविरोधात् । नाऽपि तृतीयो विकल्प, भिन्नौ चामिन्नौ चेत्युभयदोषानुषंगेण विरुद्धत्वादिति कथमीव- रुद्धौ तौ यनस्तेऽभिमताविति न मन्तव्यम्,त्रिधापि तयोरभिमत- त्वात् । तथाहि-धर्मिधर्मी स्यादभिन्नौ द्रव्यार्थिकप्राधान्यात, स्याद्भिन्नौ पर्यायार्थिकप्राधान्यात्, स्यान्मिथो भिन्नौ चाभिन्नौ च क्रमाप्तिद्वयादिति त्रिभिः प्रकारैः स्याद्वादन्यायवादिभि- व्यवस्थाप्यते । न पुनः सर्वथाऽर्पितौ त्रियापि धर्मधर्मिणौ प्रत्य- १ व्यमिति पुस्तकान्तरे ।
१२२ युक्त्यनुशासनं। क्षादिप्रमाणविरुद्धौ तेऽभिमतौ, ततो वाक्यं न धर्ममात्रं न ध- मिपात्रं चा प्रतिपादयतीति न सर्वथाप्यभिन्नौ धर्मधर्मिणौ न सर्वथा भिन्नौ नाऽपि सर्वथा भिन्नाभिन्नौ प्रतीतिविरोधात् । द्रव्यैकान्तस्य पर्यायकान्तस्य च परस्परनिरपेक्षपृथग्भूतद्र- व्यपर्यायकान्तवत् व्यवस्थानुपपत्तेः समर्थनात् , तत्र युक्त्यनुशा- सनायोगात् । किंपुनर्युक्त्यनुशासनमित्याहु:- दृष्टागमाभ्यामविरुद्धमर्थ-- प्ररूपणं युक्त्यनुशासनं ते । प्रतिक्षणं स्थित्युदयव्ययात्म- तत्त्वव्यवस्थं सदिहाथरूपम् ॥४९॥ टीका-दर्शनं दृष्ट प्रत्यक्ष, प्राप्तवचनमागमः। दृष्टं चागमश्च दृष्टागमौ ताभ्यामविरुद्धपबाधिनविपयं यदर्थात्साधनरूपाद- र्थस्य साध्यस्य प्ररूपणं तदेव युक्त्यनुशासनं युक्तिवचनं ते तब भगवतोऽभिमतामिति पदघटना । तत्रार्थस्य प्ररूपणं युक्त्यनुशा- सनमिति वचने प्रत्यक्षमपि युक्त्यनुशासनं प्रसज्येत तद्व्य- वच्छेदार्थमर्थात्मरूपणमिति व्याख्यायते सामर्थ्यादर्थस्य त- दिति प्रतीतेः। तथाऽपि शीतोऽग्निद्रव्यत्वाजलवदिति, प्रे- त्यासुखप्रदो धर्मः कर्मत्वादधर्मवदिति च प्रत्यक्षविरुद्धमागपवि- रुद्धं चार्थप्ररूपणं युक्त्यनुशासनं माप्तमिति न शंकनीयम् । दृष्टा- गमाभ्यामविरुद्धमित्याभिधानात् । तथा चान्यथाऽनुपपन्नत्व- नियमनिश्चयलक्षणात साधनात्साध्यार्थप्ररूपणं युत्त्यनुशासन- टोकासहिनं। ६ मिति प्रकाशितं भवति दृष्टागमाभ्यामविरोधस्यान्यधानुपपत्ते- रिति देवागमादौ नितिप्रायम् । अत्रोदाहरणमुच्यते-प्रति- गां स्थित्युदयव्ययात्मार्थरूपं सत्त्वादिति । न तावत्मत्यक्ष- विरुद्रः पक्षः, स्थित्युदयव्ययात्मनोऽर्थरूपस्य वहिघटादेरियांत- रात्मनोऽपि सानादनुभवात् , स्थितिमात्रस्य सर्वत्रासाक्षात्कर- जादुदयपयमात् । न चायं स्थित्युदयव्ययात्मनोऽर्थरूप- स्यानुभव: सुनिश्चितासंभवदाधकप्रमाणात्मतिक्षणमनुपपन्न: कालान्तरे स्थित्युदयव्ययदर्शनात्तत्मतीतिसिद्धेरन्यथा सकृदपि तदयोगात् खरविपाणादिवदिति न प्रत्यक्षविरोधः । नाऽप्याग- मविरोधोऽस्य युक्त्यनुशासनस्य संभाव्यते । "उत्पादव्ययध्रौव्य युक्तं सदिनि" परमागमम्य प्रसिद्धत्वात्सर्वथैकान्तागमस्या- प्रसिद्धोष्टविरुदार्थाभिधायित्वान्मतारकापुरुवचनवदिति नि- वधः पक्षः प्रतिक्षा स्थित्युदयव्ययात्मकस्य विवादाध्या- सितम्य साध्यधर्मम्य जीवादेरर्थरूपस्य च साध्यधर्मिणः प्र- सिद्धस्थाभिधानात् । तथा हेतुश्च सत्त्वादिति नामिद्धः सर्व- प्रार्थरूपे तदभाये सर्वाभावप्रसंगात् । नाऽपि संदिग्धः सर्वत्र सत्वर मंदो संदेडम्याऽपि सन्वनिश्चयाविरुद्धन्यात् । नाप्य. ज्ञानासिद्धी हेतुः सर्वस्य वादिनः सवपरितानाभाचे वादित्व- रिगवान् । नापनकान्तिकः काय॑नो देशता वा विपक्षात्र- नित्यान दम्रो स्थिनिम्ना जन्मव्ययमहिनेन सता पर्यायमा- प्रेण चौपादपयवना स्थिनियन्येन हतारनेकान्त इति चेन , न सत्यस्य वस्तुत्वस्वम्पाप हेतुत्वान् मत्त्वपर्मस्व नयविषयमा १२४ युक्त्यनुशासनं। हेतुत्वानभ्युपगमात् । न च द्रव्यमानं वस्तु पर्यायमात्रं वा तस्य वस्त्वेकदेशत्वात् द्रव्यपर्यायात्मनो जात्यंतरस्य वस्तुनः प्रमाण- सिद्धत्वात् । न च द्रव्यस्य पर्यायस्य वा वस्तुत्वाभावादवस्तु- त्वप्रसंगस्तस्य वस्त्वेकदेशत्वेन वस्तुत्वावस्तुत्वाभ्यामव्यवस्था- नात् समुद्रैकदेशस्य समुद्रत्वासमुद्रत्वाभ्यामव्यवस्थानवत् । न च वस्तुत्वस्य सत्त्वस्य हेतुत्वे तदेकदेशेन द्रव्यसत्त्वेन पर्या- यसत्वेन वा व्यभिचारोद्भावना युक्ता सर्वस्य हेतोय॑भिचारप्र- संगात् सकलजनप्रसिद्धस्य वड्यादिसिद्धौ धूमादिसाधन- स्यापि तदेकदेशेन पांडुत्वादिना व्यभिचारमुद्भावयन् कथ- मनेनापाक्रियेत ? धूमस्य हेतुत्वे तदेकदेशेन पांडुत्वादिना न व्यभिचारस्तन्मात्रस्याहेतुत्वादिति चेत् तर्हि सत्त्वस्य वस्तु- स्वरूपस्य हेतुत्वेन तदेकदेशेन द्रव्यसत्त्वेन पर्यायसत्त्वेन वा कथमनैकांतिकत्वमुद्भावयेत् न चेदस्वस्थः । ननु च सत्वं वस्तुत्वविरुद्ध विपर्ययस्यैव साधनादिति न मन्तव्यम् । स्थितिमात्र इवोदयव्ययमात्रेऽपि तदसंभवात् । तथा हि-सत्त्व- मिदमर्थक्रियया व्याप्तं तदभावे तद्विरोधात् खपुष्पवत् , सा च क्रमयोगपद्याभ्यां व्याप्ता तदभावे तदभावात्तद्वत् । ते च क्रमयोगपये प्रतिक्षणं स्थित्युदयव्ययात्मकत्वेन व्याप्ते तदस्थि- त्येकान्तादुदयव्ययैकान्तादिव निवर्तमानं ततः क्रपयोगपये निवर्तयेत् , ते च निवर्तमाने स्वव्याप्यामर्थक्रियां निवर्तयतः, सा च निवर्तमाना स्वव्याप्यं सत्वं निवर्तयतीति, ततो निवर्तमानं सत्त्वं तीरादर्शिशकुनिन्यायेन प्रतिक्षणं स्थित्यु- टोकासहितं । दयव्ययात्मन्येवार्थरूपे व्यवतिष्ठत इति कथं विपर्ययं साध- येद्यता विरुद्धमभिधीयेत । सपने सवाभावादसाधारणान- कान्तिको हेतुरिति चेत्, कोऽयमसाधारणो नाम ? सपक्षवि- पक्षयोरसन्नसाधारण इति चेत् स किं तत्र निश्चितासद्भाव संदिग्धासद्भावो वा ? प्रथमपक्षे नानैकांतिक: : स्यात्, सर्वथा विपक्षे निश्चितासत्त्वस्य सम्यग्धेतुत्वात, सम्यग्हेताविपक्षासत्त्व नियमनिश्चयलक्षणत्वात् तदभावे सपने सतोऽपिगमकवायो- गात् । सपक्षसत्चनियमस्य हेतुलक्षणत्वाव्यवस्थितेस्तदभावे- ऽपि हेतोर्गमकलसिद्धः। यदि पुनर्द्वितीयः पक्षः सपक्षविष- क्षयोः संदिग्धासद्भावोऽनैकांतिक इति चेत् तदान सत्त्वादिति हेतुरसाधारणानेकांतिकः प्रमाणबलाद्विपक्षे तस्यासद्भावनि- श्वयात् संशयासंभवादनकांतिकत्वविरोधात् । संशयहेतुर- नैकांतिक इति सामान्यतोऽनकान्तिकलक्षणप्रसिद्धः । ततोऽसिद्धविरुद्धानेकांतिकत्वविमुक्तत्वात्सूक्तमिदं युक्त्यनुशा- सनोदाहरणं प्रतिक्षणं स्थित्युदयव्ययात्मकमर्थरूपं सत्त्वादि- ति । ननु च येन रूपेण स्थितिर्वस्तुनस्तेन स्थितिरेव येनोद- यस्तेनोदय एव येन व्ययस्तेन व्यय एवेति व्यवस्थायां नाने- कान्तात्मकवस्तुसिद्धिः स्थित्यायेकान्तस्यैव प्रसिद्धः, इति न मन्तव्यं, तत्वव्यवस्थमिति वचनात्, तत्र स्थित्युदयव्ययात्मार्थ- रूपं प्रतिक्षणपव्यवस्थं न विद्यते व्यवस्थाऽस्येति व्याख्यानात् । येन हि रूपेण वस्तु तिष्ठति तेनोत्पद्यते नश्यति च, स्थिती स्थास्यति च उत्पन्न मुत्पत्स्यते च नष्टं नक्षपति च । येन १२६ युक्त्यनुशासनं । चोत्पद्यते तेन तिष्ठति नश्यति च उत्पन्न स्थितं नष्टं च उत्प- स्यमानं स्थास्यन्नदयंश्च । येन च नश्यति तेनोत्पद्यते तिष्ठति च तथा नष्टमुत्पन्न स्थितं च नंयत्युत्पत्म्यते स्थास्यति चेति न कचिद् व्यवस्था येनैकान्तप्रसंगः, कथंचिदव्यवस्थितस्यैव तत्त्वस्यार्थक्रियाकारित्वप्रसिद्धेः । पटमुदाहरणीकृत्य सर्वमेत- इक्तव्यं, तथा हि-पट:भारंभक्षणापेक्षयोत्पद्यते तिष्ठति विनश्यति चानारंभसमयापेक्षया द्वितीयक्षणापेक्षया तुत्सत्स्यते स्थास्यति नक्ष्यति च नितस्वरूपापेक्षयोत्पन्नः स्थितो नष्टश्च पूर्वावि- नित्तरूपेणेति प्रातीतिकमेतत् । ननु चैकमेव वस्तु नानास्वभावमेवमायातं तच्च विरुद्धं कुतोऽवतिष्ठत इत्याहुः- नानात्मतामप्रजहत्तदेक- मेकात्मतामप्रजहच नाना। अंगांगिभावात्तव वस्तु तद्यत् क्रमेण वाग्वाच्यमनंतरूपम् ॥ ५० ॥ टीका-यदेकं वस्तु सत्त्वैकत्वप्रत्यभिज्ञानात् सिद्ध तन्नानात्मतामपरित्यजदेव वस्तुत्वं लभते, समीचीननानाम- त्ययविषयत्वात् यत्तु नानात्यतां जहाति न तद्वस्तु यथा पर- परिकल्पितात्माघद्वैत, वस्तु च विवादापनं जीवादि तस्मान्ना- नात्मतामप्रजहदेव प्रतिपत्तव्य । तथा यदवाधितनानामत्ययव- लान्नाना प्रसिद्धं तदेकापतामजहदेव तव वस्तु सम्मतं तस्या- + टोकासहित। न्यथा वस्तुत्वविरोधात् पराभ्युपगतनिरन्वयनानाक्षणवत् । ततो जीवादिपदार्थजातं परस्पराजहद्वृत्त्येकानेक स्वभावं वस्तु- त्वान्यथानुपपत्तेरिति युक्त्यनुशासनं । तत्कथं वाचा वक्तुं शक्यत इति न शंकनीयं क्रमेण तस्य वाग्बाचित्वात् । न हि युगपदेकात्मतया नानात्मतया च वस्तूच्यते वाचा, तादृश्या बाचोऽसंभवात् । न चैवं क्रमेण प्रवर्तमानाया वाचोऽसत्यत्व- प्रसंगस्तस्याः स्वविषये नानात्वे चैकत्वे चांगांगिभावात् प्र- नेः । स्यादेकमेवेति वाचा हि प्रधानभावेनैकत्वं वाच्यं गुण- भावेन नानात्वं स्यान्नानव बस्त्विति वाचा प्राधान्येन नानात्वं वाच्यं गुणभावेनैकत्वमिति कथमेवमेकत्वनानात्ववाचोर- सत्यता स्यात् ? सर्वथैकत्ववाचा नानात्वनिराकरणात नाना- वनिराकरणे हि तथैवत्वस्यापि तदविनाभाविनो निराकरण- प्रसंगादसत्यत्त्वपरिमाप्रभीष्टत्वात् तथाऽनुपलभ्यमानत्वात् । नानात्ववाचा चैकत्वस्य निराकरणातन्निराकरणे तदविना- भाविनानात्वनिराकृतिप्रसंगात् सत्यत्वविरोधात् । ततः क्रमे- णानंतरूपं यद्वस्तु तत् तवांगांगिभावादेव वाग्वाच्य बोद्धव्यम्। अगं ह्यप्रधानमंगि प्रधानं तद्भावो गुणप्रधानभावस्तमा- श्रित्य नानात्वैकत्ववचने यथार्थाभिधायित्वमेव वाच्यं व्यव- तिष्ठते । ननु च भवतु नामानंतधर्मविशिष्टं वस्तु ते तु धर्माः पर- स्परनिरपेक्षा एव, पृथग्भूतश्च तेभ्यो धर्मीति मतमपाचिफी- वः प्राहु:- १२८ युक्त्यनुशासनं। मिथोऽनपेक्षाः पुरुषार्थहेतु- नशा न चांशी पृथगस्ति तेभ्यः। परस्परेक्षाः पुरुषार्थहेतु- ईष्टा नयास्तद्वदसि क्रियायाम् ॥५१॥ टीका-अंशा धर्मा वस्तुनोऽवयवास्ते च परस्परनिरपे- सा: पुरुषार्थस्य हेतवो न संभवन्ति तथाऽनुपलभ्यमानत्वात् । यद्ययाऽनुपलभ्यमानं तत्तथा न व्यवतिष्ठते यथाऽग्निः शीतत- याऽनुपलभ्यमानस्तद्रूपतयाऽनुपलभ्यपानाश्च पुरुषार्थहेतुतया परस्परनिरपेक्षाः सचादयो धर्माः कचिदवयवा वा तस्मान्न पुरुषार्थहेतुतया व्यवतिष्ठन्त इति युक्त्यनुशासनं दृष्टागमाभ्या- मविरुद्धत्वात् , तथांशाः परस्परापेक्षाः पुरुषार्थहेतुतया व्यव- तिष्ठते तयैव दृष्टत्वात् । यद्यथा दृष्टं तत्तथैव व्यवतिष्ठते, यथा दहनो दहनतया दृष्टः, तत्स्वभावतया दृष्टाश्च पुरुषार्थहेतु- तयांशाः परस्परापेक्षाः तस्मात्तथैव व्यवतिष्ठत इति स्वभावो- पलब्धिः स्वभावविरुद्धोपलब्धिर्वा स्वपरपक्षविधानप्रतिषेधयो- वोद्धच्या । तथा नांशेभ्योऽशी पृथगस्ति तथाऽनुपलभ्यमान- ल्वात् , यद्ययाऽनुपलभ्यमानं तत्तथा नास्त्येव यथा तेजःशीत- तया, सर्वदाज्नुपलभ्यमानश्चांशेभ्यः पृथगंशी तस्मान्ना- स्तीति म्वभावानुपलब्धिः । न चात्र दृष्टविरोधः परस्परविभि- नानामर्थानां सह्यविध्यादीनामंशांशिभावस्यादृष्टत्वात् । न चागमविरोधस्तत्प्रतिपादकागमाभावात, परस्परविभिन्नांशां- .
टोकासहित। शिभावप्रतिपादकागमस्य युक्तिविरुद्धवादागमाभासत्वसिद्धेः । स्थान्मतमंशेभ्योऽशी पृथगेच पृथक्मत्ययविषयत्वात् । यो यतः पृथक्प्रत्ययविषयः स ततः पृथगेश्यथा स्तम्भेभ्यः कु- ड्यं, पृथक्प्रत्ययविषयश्चांशेभ्योऽशी, तस्मात्पृथगेयेति । तदप्य- सम्यक्, सर्वथा पृथक्प्रत्ययविषयत्वस्य हेतोरसिद्धत्वात्कथंचि- दपृथक्प्रत्ययविषयत्वात् । समवायादपृथक्प्रत्यय इति चेत् । न, सर्वथा भिन्नयोः समवायासंभवात् सह्यविध्यवत् । संभव- न्नपि समवायः पदार्थान्तरभृतः कथमिहांशेध्वंशीति प्रत्यय- हेतुरुपपद्यते ! सो विध्य इति प्रत्ययहेतुत्वप्रसंगात् । प्रत्या- सत्तिविशेषादिहांशेवंशीति प्रत्ययमुपजनयति समवायो न पुनरिह सह्ये विंध्य इति प्रत्ययमुत्पादयति प्रत्यासत्तिविशे- पाभावादिति चेत्, कः पुनः प्रत्यासत्तिविशेषः समवायसमवा- यिनोः संभाव्येत ? विशेषणविशेष्यभाव इति चेत्, ताई समवायिनोः समवायो विशेषणं किमर्थान्तरथूतमनर्थान्तरभूतं वा ? यद्यर्थान्तरभूतं विशेषणं तदांशांशिनोरिक सह्यविंध्ययो- रपि समवायो विशेषणं स्यादर्थान्तरभूतत्वाविशेषात् । यदि शुनरनर्यान्तरभूतं विशेषणं समवायः समवायिनोरग्नेरौष्णयवदु- पवयंतेतदा कचित्तादात्यमेव समवाय इति नांशेभ्यों- ऽशी सर्वथा पृथगवनिष्ठते तत्समवायस्याविष्वग्भावलक्षणस्य कथंचित्तादात्म्यस्यैव प्रसिद्धस्ततः परस्परापेक्षा एवांशांशिनः पुरुषार्थहेतुरिति निश्चितप्रायं । तद्वदेव नया नैगमादयः पर- स्परापेक्षा एवासिक्रियायां दृष्टा इति घटनीयं । तथाहि- १३० युक्त्यनुशासनं। नैगमादयो नया परस्परापेक्षाः पुरुषार्थहेतवस्तथादृष्टत्वा- दंशांशिवत् । तदनेन स्थितिग्राहिणो द्रव्यार्थिकभेदा नैगम- संग्रहव्यवहाराः, प्रतिक्षणमुत्पादव्ययग्राहिणश्च पर्यायार्थिक- मैदा ऋजुसूत्रशब्दसमभिरूदैवंभूताः परस्परापेक्षा एव वस्तु- साध्यार्थक्रियालक्षणपुरुषार्थनिर्णयहेतवो नान्यथेति दृष्टाग- पाभ्यामविरुद्धमर्थप्ररूपणं यत्सत्तत्सर्व प्रतिक्षणं स्थित्युदय- व्ययात्मकमन्यथा सत्वानुपपत्तेरिति युक्त्यनुशासनमुदाहृतं प्रतिपत्तव्यम् । ननु च परस्परनिरपेक्षाः नयाः कचिदपि 'पुरुषार्थमसा- धयन्तोऽपि सत्तामात्रेण व्यवस्थिति प्रतिपद्यंत एव सांख्या- भिमतपुरुषवदिति न मन्तव्यम् । तेपामसिक्रियायामपि हेतु- त्वानुपपत्तेस्तद्वत, यथैव हि परस्परनिरपेक्षा नयाः पुरुषार्थ- क्रियायां धर्मार्थकाममोक्षलक्षणायां हेतवो न संभवंति तथा- सिक्रियायामपि सत्तालक्षणायां खरविषाणादिवत्, ततः परस्परापेक्षा एव प्रतिक्षणं स्थित्युत्पत्तिव्ययाः सर्व वस्तुल- क्षणं प्रतिपद्यंत इत्यनेकांतसिद्धिः। स्यादाकूतं, जीवादिव- स्तुनोऽनेकांतात्मकत्वेन निश्चये स्वात्मनीव परात्मन्यपि रागा स्यात्कथंचित्स्वात्मपरात्मनोरभेदात्तथा परात्पनीव स्वात्मन्यपि द्वेषः स्यात्तयोः कयंचिद्भेदात्, रागद्वेषनिबंधनाश्चेासू- घामदमानादयो दोषाः संसारहेतवः सकलविक्षेपकारिणः स्वर्गापवर्गपतिबंधकारिणः प्रवर्त्तन्ते, ते च प्रवर्तमानाः समत्वं मनसो निवर्त्तयन्ति, तद्विनिवर्तनं समाधि निरुणद्धीवि टोकासहित। . समाधिहेतुकं निर्वाणं कस्यचिन स्याचतो मोक्षकारणं मन:- समत्वं समाधिलक्षण मिच्छता नानेकांतात्मकत्वं जीवादिवस्तु- नोऽभ्युपगन्तव्यमिति । तदपि न समीचीनमित्याहु:- एकान्तधर्माभिनिवेशमूला रागादयोऽहंकृतिजा जनानाम् । एकान्तहानाच स यत्तदेव स्वाभाविकत्वाच समं मनस्ते॥५२॥ टीका-एकान्तो नियमोऽवधारणं, धर्मो नित्यत्वादिस्त्र- भावा, एकान्तेन निश्चितो धर्म एकान्तधर्म इति मध्यमपद- लोपी समासः। तृतीयान्तात् क्त उत्तरपदे' इत्युपसंख्यानात् "गुडेन संस्कृता धाना गुडधानाः" इत्यादिवत् । एकान्तधर्मेऽ- भिनिवेश एकान्तधर्माभिनिवेशः, नित्यमेव सर्वथा न कथं चिदनित्यमित्यादि मिथ्यात्वश्रद्धानं मिथ्यादर्शनमिति यावत् । एकांतधर्माभिनिवेशो मूलं कारणं येषां ते एकान्तधर्माभिनिवे- शमूलाः, रागादयो रागद्वेषमायामाना अनंतानुवन्धिनोऽप्रत्या- ख्यानावरणाः प्रत्याख्यानावरणाः संज्वलनाश्च कषायाः, तथा हास्यादयो नव नोकपायाश्चादिग्रहणेन गृह्यन्ते । ननु च रागो लोभस्तदादयो दोषाः कथं मिथ्यादर्शनमूलाः म्युरसंयतसम्यग्दृष्टयादिषु सूक्ष्मसांपरायांतेषु मिथ्यादर्शना- भावेऽपि भावात् इति न मन्तव्यम्, तेषामनन्तसंसारकार- थानां मिथ्यादर्शनाभावे संभवाभावात् मिथ्यादृशां मिथ्याई १३२ युक्त्यनुशासनं। वर्शनसद्भाव एव भावात् मिथ्यादर्शनमूलतसिद्धेः । परेषां पुनरसंयतसम्यग्दृष्टवादिपु लोभादीनामसंयमप्रमादकषायपरि- णाममूलत्वेऽपि मिथ्यादृशि मिथ्यादर्शनसद्भाव एव भावा- मिथ्यादर्शनमूलत्वसिद्धिः । यद्येवमुदासीनावस्थायामपि मिथ्यादर्शनानामेकांतवादिना रागादयो जायेरनिति न शंक- नीयमहंकृतिजा इति वचनात् । अहंकृतिरहंकारोऽहमस्य स्वापीति जीवपरिणामः सामर्थ्यादिदं मम भोग्यमित्यात्म- परिणामो ममकारः प्रतिपादितो भवति, अहंकृतेर्जाता अहं- कृतिजा ममकाराहकारजा इत्यर्थः । तेन मिथ्यादर्शनप- रिणाम एव यदा ममकाराऽहंकारसचिवो भवति तदैव रागा- दीनुपजनयति न पुनरुदासीनदशायामित्येकान्ताभिनिवे- शमहामोहराजजनिता एव रागादयः । तथा चोक्तम्- ममकाराहंकारौ सचिवाविव मोहनीयराजस्य । रागादिसकलपरिकरपरिपोषणतत्परौ सततम् ॥ इति ।। ननु च भवंतु नाम रागादयोऽहंकारजन्मानोजनानां मोहवतां, बीतमोहानां तु सत्यप्यहंकारे रागाधभावात् कथं ते तज्जा: स्युरितिनचोय,मिथ्यादर्शनादिसहकारिण एवाइंकारस्य रागा- दिजनने सामर्थ्याचद्विकलस्यासामर्थ्यावान चावश्यं कारणा- नि कार्य जनयंति मुर्मुरांगांगारावस्थाग्निवत् । ननु चैकान्ताभिनि- धेशो मिथ्यादर्शनमिति कुतो निश्चीयत इति चेत्, अनेकां- वात्मकस्यैव वस्तुनः प्रमाणतो निश्चयात् , सन्नयाच्च सम्यगे- टीकासहित। कान्तस्य प्रतिपक्षापेक्षस्य व्यवस्थापनाच्चैकान्ताभिनिवेशस्य मिथ्यादर्शनत्वप्रसिद्धेरिति निर्णीतप्राय । ततः सम्यग्दृष्टरे- कांतहाने तद्विरोधिनोऽनेकांतस्य निश्चयात्तस्यैवैकांतहानाच स एकांतधर्माभिनिवेशो यत्तदेव स्यात् यत्किचित्स्यान्न स्यादित्यर्थः । सति धेकांतधर्म कस्यचित्तदभिनिवेशः संभा- व्यते तस्य तद्विषयत्वात्, तदभावे तु यद्वास्तवं रूपमात्मनो यथार्थदर्शनं तदेव स्यादेकांताभिनिवेशाभावस्य सम्यग्दर्श- नभावरूपत्वात् , तस्यैव स्वाभाविकत्वं सिद्धयेदात्मनः स्वाभा- विकत्वाच्च समं मनस्ते तव भगवतोऽहतो युक्त्यनुशासने सद्दष्टेर्भवतीति वाक्यार्थः। दर्शनमोहोदयमूले हि चारित्रमो- होदये जायमाना रागादयो जनानामस्वाभाविका एव ते- पामौदयिकत्वात्, दृङ्मोहहानाच चारित्रमोहोदयहाने रागादीनामभवात् सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रपरिणामानां स्वा. भाविकत्वं । तत्सम्यग्दर्शनस्यौपशमिकत्व क्षायोपशमिकत्वं क्षायिकत्वं वा स्वाभाविकत्वमात्मरूपत्वात् । सम्यग्ज्ञानस्य च क्षायोपशमिकत्वं क्षायिकत्वं वा । सच्चारित्रस्य तु सदर्शनवदौ- पशमिकत्वादित्रयं स्वाभाविकत्वं न पुनः पारिणामिकत्वं नस्य कर्मोपशमादिनिरपेक्षत्वात् । कथमसंयतसम्यग्दृष्टः सर्य मनः स्यादसंयमस्य रागद्वेषात्मनः सद्भावादिति चेत् , कचि. देकांते रागाभावात्परत्र द्वेषाभावाच विवक्षिताविवक्षितयोरे- कान्तयोरुदासीनत्वसिद्धेरविवक्षितस्याप्यनिराकरणात् तन्मा- त्रस्य मनःसमस्य सद्भावादिति ब्रूमः । नन्वेवमसंयतसम्यग्र- युफ्त्यनुशासनं। हेरपि संयतत्वप्रसंगो मनसः समत्वस्यैव संयमरूपत्वादिति चेत् , क एवमाह सर्वथा संयमस्याभावोऽसंयतसम्यग्दृष्टेरिति तस्यानंतानुबंधिकपायात्मनोऽसंयमस्याभावात् संयतत्वसिद्धेः। कथमस्यासंयतत्वमिति चेत्, मोहद्वादशकात्मनोऽसंयमस्य स- भावाचत एवानंतानुवंध्यप्रत्याख्यानकपायात्मनोऽसंयमस्या- भावात भत्याख्यानसंज्वलनकपायात्मनोऽसंयमस्य सद्भावात्सं- यतासंयतसम्यग्दृष्टिः समभिधीयते । नन्वेवं प्रमत्तसंयनादि सूक्ष्मसाम्परायान्तः संयतासंयतः प्रसज्येत संज्वलनकपाया- स्मनो नोकपायात्मनश्चासंयमस्य सद्भावादिति चेत् , न, संचलनकपायादेरसंयमत्वेनाविवक्षितत्वादुदकराजिसमानत्वेन मोहद्वादशकाभावरूपसंयमाविरोधित्वात्परमसंयमानुकूलत्वाचेति कपायप्राभृतादवबोद्धव्यम् । यथा चासंयतसम्यग्दृष्टेः स्वानुरूप- मनःसाम्यापेक्षया समं मनः सिद्धं तथा संयतासंयतस्य च नवविधरयेति न किंचिदसंभाव्यं ततोऽनेकान्तयुक्त्यनुशा- सनं न रागादिनिमित्तं तस्य मनासमत्वनिमित्तत्वात् । नन्वनेकान्तवादिनोऽप्यनेकान्ते रागात् सर्वथैकान्ते च द्वेषात् कथमिव समं मनः स्यात् यतो मोक्ष उपपद्यते ? सर्वदा मनःसमत्वे वा न बंध इति स्वमताद्वाह्यौ वंधमोक्षौ स्यातां मनसः समत्वे चासमत्वे च तदनुपपत्तेरिति वंदन्तं मत्याहु:- प्रमुच्यते च प्रतिपक्षदूषी जिन! त्वदीयैः पटुसिंहनादैः।
टीकासहित। एकस्य नानात्मतयाज्ञवृत्ते। स्तौ बंधमोक्षौ स्वमतादवाद्यौ॥५३॥ टीका-प्रतिपक्षं प्रतिद्वंद्विनं दृषयति निराकरोत्येवंशील: प्रतिपक्षदूपी प्रतिद्वन्द्विनिराकारी नित्यत्वैकान्तबादी क्षणिका- घेकान्तवादी च । स प्रमुच्यते च प्रमुच्यत एवानेकांतवादिनान पुनस्तत्र द्वेपः क्रियते सामथ पत्पितिपक्षस्वीकारी वाऽनेकांतवादी स्वीकृत एव न पुनस्तत्र रागः क्रियत इति चशब्दस्यैवकारार्थ- त्वाद् व्याख्यायते । कैः पुनर्हेतुभूतैरित्युच्यते-जिन ! त्वदीयैः पटुसिंहनादैः । किं रूपतयेत्यभिधीयते-एकस्य नानात्मतयेति स्यादेकमेव वस्तु स्यान्नानात्मेत्यादयः शब्दाः सिंहनादाः । सिंहनादा इव सिंहनादा इति समाधिः शब्दान्तरैन्यकर्तुमश- क्यत्वात् । यथैव हि सिंहनादा कुंजरादिनादैन तिरस्कर्तुं श- क्यन्ते तथा जिननाथस्य नादाः सम्यगनेकान्तप्रतिपादका: क्षणिकायेकान्तप्रतिपादकैः सुगतादिशब्दैन कथंचिनिराक्रि- यन्ते इ.युक्तं भवति । पटवश्यैते निःसंशयत्वात् सिंहनादा- श्वावाध्यत्वात् पटुसिंहनादास्तैरेव हेतुभूतः प्रतिपक्षदूषी प्रमु- च्यते व्यवच्छिचते युक्तिशास्त्राविरोधिभिः परमागमवाक्य - नात्मकैकवस्तुनिश्चयस्यैव सर्वथैकान्तप्रमोचनस्य सिद्धेस्तत्र द्वेपासंभवादनेकान्तरागासंभववत् । न हि तत्वनिश्चय एव रागः क्षीणमोहस्यापि रागप्रसंगात् , नाप्यतत्त्वव्यवछेद एव द्वेपः शक्यः प्रतिपादयितुं यतोऽनेकांतवादिनः समं मनो न भवेत्, तन्निमित्तश्च मोक्षः कथं न स्यात् ? न च सर्वथा सम- १३६ युपत्यनुशासनं । त्वमेव मनसः सर्वत्र सर्वदोत्पद्यते यतो रागदेपाभावाद्धंघाभावः असण्येत ? कथंचित् कचित् किंचित् कदाचित् गुणस्थानापे- क्षया पुण्यवंधस्योपपत्तेस्नतस्तौ बंधमोक्षौ स्वमतादनंतात्मकत- श्वविपयादवाह्यौ तत्रैव भावात् तयोईहत्तेः । जानातीति ज्ञ यात्मा। ज्ञे वृत्तिवृत्तिस्तत इति प्रधाने नैकात्मन्यपि न तो नस्याशत्वादिति निवेदित भवति । स्यानातं, नैकस्य नानात्मनोऽर्थस्य प्रतिपादकाः शब्दाः पटुसिंहनादाः प्रसिद्धाः सौगतानामन्यापोहसामान्यस्य वागा- रपदत्याद्वाचां वस्तुविपयत्वासंभवादिति । तदसदेव यस्मात्- आत्मान्तराभावसमानता न वागास्पदं स्वाश्रयभेदहीना। भावस्य सामान्यविशेषवत्त्वा- दैक्ये तयोरन्यतरान्निरात्म ॥५४॥ टीका-गोः स्वभावादन्यः स्वभावः स्वभावान्तरमात्मान्त- रमगवात्मा ? तस्याभावो व्यावृत्तिः स एव समानता सामा- न्यं, सा वाचामास्पदं न भवत्येव, कीदृशी सा न वागास्पदं, स्वाश्रयभेदहीना स्वस्या आत्मान्तराभावसमानताया आश्रयाः स्वाश्रयाः । स्वाश्रयास्ते च भेदाश्च, तैींना अन्यापोहसामा- न्यविशेषवाक्शून्येति यावत् । कुतः सा न तादृशी वागास्पद- मिति साध्यते ? भावस्य वस्तुनः सामान्यविशेषश्चात् । ननु च समान्यविशेपवत्त्वेऽपि भावस्य सामान्यस्यैव वागास्पदत्वं टोकासहितं । १३७ युक्तं विशेषस्य तदात्मकत्वात्सामान्यविशेषयोरैक्यसिद्धिरिति वचने दूषणामुच्यते-ऐक्ये तयोः सामान्यविशेषयोरन्यतरत्सा- मान्यरूपं विशेषरूपं वा निरात्म स्यात् । तत्र विशेषरूपस्य निरात्मत्वे तदविनाभाविनः सामान्यरूपस्यापि निरात्मत्वापत्ते सर्व निरात्मकत्वं प्रसज्येत, सामान्यरूपस्य च निरात्मत्वे विशेषरूपस्यापि तदविनाभाविनो निरात्मत्वानुषंगान्न तयोरै- क्यमभ्युपगन्तव्यम् । ननु च सर्वगतं सामान्य विशेषैरश्लिष्टमेव वागास्पद, न पुनरात्मान्तरापोहसामान्यं तस्यावस्तुत्वादिति वदंतं प्रति बदन्ति- अमेयमश्लिष्टममेयमेव भेदेऽपि, तद्वृत्त्यपवृत्तिभावात् । वृत्तिश्च कृत्स्नाशविकल्पतो न, मानं च नानन्तसमाश्रयस्य ॥५५॥ टीका-नियतदेशकालाकारतया नमीयत इत्यमेयं, सर्व- च्यापि नित्यं निराकारं सत्त्वादिसामान्यं तदश्लिष्ट विशेषैर- मेयमेवाप्रमेयमेव प्रमाणतः प्रमातुमशक्तेः । प्रत्यक्षतस्तत्समिति- स्मसिद्धा तत्र तदप्रतिभासनात् ब्रह्मवत् । नाप्यनुमानतस्तत्म- घीयते तदविनाभाविलिंगाभावात् । सत्सदित्याद्यनुवृत्तिप्रत्य- यो लिंगमिति चेत् न, असदसदित्याद्यनुवृत्तिप्रत्ययेन व्यभिचा- रात्, तस्यासत्त्वसामान्याभावेऽपि भावात् पदार्थत्वसामान्याभा- युपत्यनुशासनं। वेऽपि षट्सु पदार्थेषु पदार्थः पदार्थ इत्यनुवृत्तिप्रत्ययस्य सिद्धेः। स्यादाकूतं, प्रागसदादिष्वसदसदित्यनुवृत्तिमत्ययेन न व्यभि- चारस्तस्य मिथ्यात्वातून हि सम्यगनुत्तिमत्ययस्य मिथ्यात्वानु- वृत्तिप्रत्ययेन व्यभिचारोयुक्तोऽतिप्रसंगादिति। तदप्यसम्यक् , तस्य मिथ्यात्वासिद्धेः। प्रागसदादिपु मिथ्यैवासदित्यनुवृत्ति- प्रत्ययो वाधकसद्भावादिति चेत, किं तद्वाधक ? मागभावादयो नसामान्यवंतो द्रव्यगुणकर्मभ्योऽन्यत्वात् सामान्यविशेषसमवा- यवदित्यनुमानंतदाधकं । तदविषयस्य सामान्यस्य तेन निराकर- णादिति चेत्, न, अस्यानुमानस्य साध्याविनाभावनियमनिश्च- यासत्त्वात् । यस्तु सामान्यवान्न स द्रव्यगुणकर्मभ्योऽन्यो यथाs- यमर्थ इति व्यतिरेकाश्रयासिद्धिः । स्यान्मतिरेपा द्रव्यादिपदार्थ- त्येन सामान्यवत्वं व्याप्तं विनिश्चित्य प्रागभावादिपु द्रव्य. गुणकर्मपदार्थत्वस्य व्यापकत्वस्याभावात् तद्व्याप्यस्य सामा- न्यत्वस्याभावः साध्यते ततो नाविनाभावनियमोऽसिद्ध इति, साऽपि न साध्वी द्रव्यादिपदार्थत्वेन सामान्यवत्वस्य व्याप्त्य- सिद्धेस्तेषामपि सामान्यशून्यत्वात् । तथा हि-सामान्यशून्यानि द्रव्यगुणकर्माणि तत्चात्मकत्वात् मागभावादिवत् । नेह साध- नशुन्यो दृष्टान्तः प्रागभावादेरसद्वर्गस्य तत्त्वरूपत्वाभ्यनु- ज्ञानात् सदसद्वर्गस्तत्त्वमिति वचनात् तस्यातत्त्वरूपत्वे सर्वत्रा- सत्सत्ययस्य मिथ्यात्वापत्तेरनाद्यनंतसर्वात्मतत्वानुषंगात् । तथा चोक्तम्- "कार्यद्रव्यमनादि स्यात्लागभावस्य निह्नवे ।
टीकासहित। प्रध्वंसस्य च धर्मस्य प्रच्यवेऽनंततां व्रजेत् ॥ सर्वात्मकं तदेकं स्यादन्यापोहव्यतिक्रमे । अन्यत्र समवायेन व्यपदिश्येत सर्वथा ॥" इति । द्रव्यगुणकर्माणि सामान्यवंति मुख्यसद्वर्गत्वात्, ये तु न सामान्यवंतस्ते न मुख्यसद्वर्गा यथा सामान्यविशेषस- मवाया इति केवलव्यतिरेकिणानुमानेन प्रतिपक्षण सत्य- तिपक्षत्वात् सामान्यववाभावसाधनस्य तत्वात्मकत्वा- दित्येतस्य हेतार्न गमकत्वमिति चेत्, नाऽस्य प्रतिपक्षानुमा- नस्य प्रत्यक्षबाधितविषयतया कालात्ययापदिष्टत्वात् । नहि प्रत्यक्षबुद्धौ द्रव्यादिषु सामान्यमेकं पदार्थान्तरं प्रतिभासते समानानि द्रव्याणीमानि गुणा वा कर्माणि वेति प्रतिभास- नात्सदृशपरिणामस्यैव प्रतीतेस्तदयमनुवृत्तिप्रत्ययस्तदेवेदमि- त्याकारोऽसिद्ध एवेति । न सामान्ये लिंगं यतः सामान्यमनु- मानतो मेयं स्यात् । तत एव नागमता मेयं युक्त्यननुगृहीत- स्यागमस्याममाणत्वादन्यथाऽतिप्रसंगात् । न चोपमानतो मेयं सामान्यसदृशस्य कस्यचिद्वस्तुनोऽसंभवादिति न सामान्य तद्वतो भिन्नमनियतदेशकालाकारं प्रमेयमवतिष्ठते । तथा भे- देप्यभ्युपगम्यमाने सामान्यस्य स्वाश्रयेभ्यो न तत्प्रमेयं तद्- क्यपत्तिभावात् । तेषु द्रव्यादिपु वृत्तिस्तवृत्तिस्तस्या अपट- त्तिात्तिस्तस्या भावः सद्भावस्तस्मात् तद्वृत्त्यपत्तिभा- बान्न सामान्य प्रमेयं भेदेऽपीत्यर्थः । सामान्यस्य स्वाश्रयेषु वृर्तिन तावत्संयोगः कुंडे बदरवत्संभवति तस्याद्रव्यत्वात युक्त्यनुशासनं। संयोगानाश्रयत्वात्, संयोगस्य द्रव्यनिष्ठत्वात् । नाऽपि सम- पायो शिस्तस्यायुतसिद्धिविषयत्वात्, न च सामान्यतद्वतोर- युतसिद्धिः संभवति । सा हि शास्त्रीया वा स्याल्लौकिकी वान तावत् शास्त्रीया तयोः पृथगाश्रयायित्वेन युतसिद्धेरेव संभवात्, पृथगाश्रयाश्रयित्वं युतसिद्धिरिति वचनात् । यथैव हि कुंडे परमाणुरित्यत्र परमाणोः पृथग्भूतेषु कुंडावयवेषु स्वाश्रयेषु कुंड- स्थायित्वं पृथगायित्वं तथा सामान्यात्पृथग्भूतेषु स्वाश्रयेषु द्रव्यादेराथयित्वं पृथगायित्वं युतसिद्धिलक्षणं विद्यत एव । पदि पुनः कुंडस्य स्वाश्रयेपु स्वावयवेषु वदरस्य च स्वावय- येवाश्रयेवाश्रयित्वमिति कुंडवदरयोः पृथगाश्रयाश्रयित्वं पृथ- गाश्रययोराश्रयणी पृथगाश्रयणी तयोर्भावः पृथगाश्रयाश्रयित्वं मतुराश्रयमेवाभिधीयते तदा कयमिह कुंडे परमाणुरिति परमा- णुकुंडयोर्युतसिद्धिः स्यात्तल्लक्षणाभावात् । अथ मतमेतत्, न परमाणोः कुंडे वृत्तिस्तस्य निरवयवत्वादाकाशादिवत् । तद- प्यसारं, भवदभ्युपगतस्य सामान्यस्य निरवयविनो गुणादेश्व कचिद् दृश्यभावमसंगानिरंशत्वाविशेषात, परमाणुकुंडयोर्युतसि- दयभावे चायुतसिद्धिप्रसंगात्संयोगविरोधात्समवायमसंगो दु- निवार इति तयोः संयोगमिच्छता पृथगाश्रयाश्रयित्वं युतसि- दिलक्षणं व्याश्रयमपि प्रतिपत्तव्यं । नित्यानां च पृथग्गति- गत्वमिति लक्षणांतरस्यासंभवादात्माकाशादीनामयुतसिद्धि- प्रसंगात्तद्वत्सामान्यतद्वतोरपि तत्सिद्धमिति न शास्त्रीयाऽयुत- सिद्धिः । नाऽपि लौकिकी देशकालाभेदलक्षणा दुग्धांभसोर- टोकालहितं । प्ययुतसिद्धिप्रसंगात् ततो न सामान्यस्य द्रव्यादिषुवृत्तिः संभ वति । 'वृतिश्च कृत्स्नाशविकल्पतो न वृत्तिरभ्युपगम्यमानापि सामान्यस्य तद्वस्तुनेति संवंशः, चशब्दस्यापि शब्दार्थलात् । तथा हि-कृत्स्नविकल्पे वृत्तिः स्यादंशविकल्पे वा? न तावत् कृत्स्नविकल्पे कृत्स्नस्य सामान्यस्य देशकालाकारभिन्नार व्यक्तिषु सकृत्तिः साधयितुं शक्या सामान्यवहुत्वप्रसंगात तस्यैकस्यानंशस्य तदयोगात्, सामान्यं युगपद्भिनदेशकालव्य- क्तिसंवधि सर्वगतनित्यामूर्तत्वादाकाशवदित्यनुमानमपि न सम्यक् । साधनस्येष्टविघातकारित्वात् । यथैव स्वयं हेतुः सा- मान्यस्य युगपद्भिन्न देशकालव्यक्तिसंबंधित्वं साधयति तथा सांशत्वमपि व्योमवदेव, निरंशे सकृत्सर्वगतत्वविरोधादेकपर- माणुवत् । ननु निरंशमेवाकाशमकार्यद्रव्यत्वात्परमाणुवत्, यत्तु सांशं तत्कार्यद्रव्यं दृष्टं यथा पटादिकमकार्यद्रव्यं चाकाशं तस्मानिरंशमेव तद्वन्सामान्यमिति नेष्टविघातकारी हेतुः सर्व- गतत्वादि स्वेष्टसाध्यसाधनत्वादिति चेत, किमनेनाकार्यद्र- व्यत्वेनारंभकाभावान्निरंशत्वं साध्यते, स्वात्मभूतपदेशाभावा- द्वा ? प्रथमविकल्पे सिद्धसाध्यता स्यादाकाशस्यारंभकावय- वानभ्युपगमात् निरवयवत्वसिद्धेः । द्वितीयविकल्पे तु साध्य- शून्यो दृष्टांतः परमाणोपि स्वात्मभूतेनैकेन प्रदेशेन सांशत्व- व्यवस्थितेः । स्याद्वादिनां मते साधनशून्यश्च दृष्टांतः परमाणो- रकार्यद्रव्यत्तासिद्धेः । स्यान्मतं तेऽकार्यद्रव्यं परमामुरारंभकरहितत्वादाकाशद.
१४२ युफ्त्यनुशासमं। दिति । तदप्यतथ्यं हेतोरसिद्धत्वात् । प्रारंभकरहितत्वं हि यधुत्पादककारणरहितत्वं हेतुस्तदा परमाणोयणुकविनाशा- दुत्पत्तिः कथं सिध्येत् ? द्वयणुकविनाशो न परमाणोरुत्पादक: संभवति द्वथणुकोत्पादात्पूर्वमपि सद्भावात् । कालादिवदिति बेत् न, तस्य द्वयणुकोत्पादे विनाशाद विनाशे तु व्यणुका. दिकालेऽपि प्रतीतिप्रसंगात् । तथा च घटमतीतिकालेऽपि घ- टारंभकपरमाणपलब्धिः कथं वार्येत ? स्यान्मतं-पटप्रतीतौ तदारंभकारतंतवः प्रतीयन्त एव सा- क्षात्परंपरया तु तदारंभकाः परमाणवोऽस्मदाबप्रत्यक्षत्वान्न प्रतीयन्तेऽस्मदादिभिरनध्यक्षतस्तेषामनुमेयत्वात् । तथा हि द्वयणुकावयवि द्रव्यं स्वपरिमाणादणुपरिमाणकारणारब्धं का- यद्रव्यत्वात्पटादिवत् यद् द्वधणुकपरिमाणकारणं तौ परमाणू स- अनुमीयेते। परमाणोः कारणस्यासंभवान्न तदारभकत्वं संभाव्यते यतस्तस्य कार्यद्रव्यत्वं स्यात्ततो नाकाशादेरनंशत्वे साध्ये परमाणुवदिति दृष्टांतः साधनशून्य इति । तदेतदपि स्वदर्श- नरुचिप्रकाशनमात्रं, परमाणोरप्यनुमानात्कार्यद्रव्यत्वसिद्धः । तथा हि--परमाणवः स्वपरिमाणान्महापरिमाणावयविस्कंधवि- नाशकारणकास्तद्भावभावित्वात् कुंभविनाशपूर्वककपालवत् य- द्विनाशात्परमाणवः प्रादुर्भवति तत् व्यणुकादि द्रव्यमित्यनुमा- नसिद्धं परमाणोः कार्यद्रव्यत्वं ततः साधनशून्यमेवोदाहरणं । न च परमाणुनां स्कन्धविभेदनभावभावित्वमसिद्धं द्वयणुका- दिविनाशस्य भाषे सद्भावाभ्युपगमात् । सर्वदा स्वतंत्रपरमा- टोकासहितं। ६५३ णूनां स्कन्धभेदमन्तरेणाभावादसिद्धो व्यतिरेकस्ततस्तद्भाव एव भवनशीलत्वाभावादसिद्ध साधनमिति चेत् , न, सदा स्वतंत्रपरमाणूनामसंभवात् । तथाहि-विवादापन्नाः परमाणवः स्कंधभेदपूर्वकाः परमाणुत्वात् द्वयणुकादिभेदपूर्वकपरमाणु- यदिति न ते सर्वदा स्वतंत्रास्ततस्तद्भावभावित्वं साधनं सिद्ध- मेव । एतेन कपालानां कुंभभेदकारणत्वं साधितं तद्भावभावि- त्वाविशेषात् । ननु च पटभेदपूर्वकाणां केषांचित्तन्तूनामुपलंभा- तद्भावे भावस्य प्रसिद्धावपि परेषां पटपूर्वकालभाविनां पटभे- दाभावेऽपि भावान्न तद्भाव एव भावः सिध्येदिति चेत् न, तेषामपि कार्पासप्रवेणीभेदपूर्वकत्वेनोपालंभात्स्कंधभेदपूर्वक- त्वसिद्धः। स्यान्मतं, महापरिमाणप्रशिथिलावयवकासपि- डसंघातपूर्वकस्याल्पपरिमाणघनावयवकासपिंडस्य स्कंधों- दमन्तरेण भावात् कथं परमाणूनां स्कंधभेदपूर्वकत्वसिद्धि- रिति । तदप्यसत्, परमाणूनामेव स्कंधभेदपूर्वकत्वनियमसाध- नात् , परेपां स्कंधानां स्कंधान्तरसंघातपूर्वकत्वस्याऽपि प्रसि- द्धः, यद्धि यद्भावभाव्येव प्रसिद्धं तत्कारणमिति स्यावादिनां मतं, ततो ये स्कंधभेदभावभाविन एव ते स्कंधभेदपूर्वका एव यथा परमाणवो 'भेदादणु रिति वचनात् । ये तु संघातभाव- भाविन एव ते संघातपूर्वका एव यथा घनः कार्यासपिंड इति सर्वमनवयं परमाणोरपि कार्यद्रव्यत्वसिद्धः । तदेवमाकाश- मनंशमकार्यद्रव्यत्वात्परमाणुवदित्यनुमानं न साध्यसिद्धि- निबंधनमुदाहरणस्य साधनविकलत्वाद्धेतोधासिद्धत्वात् पर्या- युक्त्यनुशासनं। यादेशादाकाशस्यापि कार्यद्रव्यत्वसिद्धेः स्याद्वादिनां सर्वथा नित्यस्य कस्यचिदर्थस्याभावात् । खस्यानंशत्वाप्रसिद्धौ चान- शं सामान्य सर्वगतत्वादाकाशवदित्यत्र साध्यशून्यत्त्वादुदा- हरणस्य नातः सामान्यस्य निरंशत्वसिद्धिः सर्वगतत्वादित्यस्य हैतोरसिद्धत्वाच न हि सामान्यं सर्व सर्वगतं प्रमाणतः सिद्धं । सत्तामहासामान्यं सर्व सर्वगतं सिद्धमेव सर्वत्र सत्प्र- त्ययहेतुत्वादिति चेत् न, तस्यानंतव्यक्तिसमाश्रयस्यैकस्य ग्राहकप्रमाणाभावात् । तदेवाहुः सूरयः- "मानं च नानंतसमाश्रयस्य" इति । न ह्यनंतसद्व्यक्तिग्रहणमन्तरेण तत्र सकृद् सन्नितिप्रत्ययस्यो- त्पत्तिरसर्वविदा संभवति यतः सर्वत्र सत्प्रत्ययहेतुत्वं सिद्धथे- द । तदसिद्धौ च न तदनुमानं प्रमाणं सामान्यस्यानंत- समाश्रयस्यास्तीति न कृत्स्नविकल्पतो वृत्तिः सामान्यस्य सामान्यवहुत्वमसंगादिति स्थितं । एतेन व्यक्तिसर्वगतं सामा- ध्यं कृत्स्नतः स्वाश्रयेषु प्रवर्तत इति वदन्नपि निरस्तः तस्या- ध्वनंतव्यक्तिसमाश्रयस्य मानाभावाविशेषात् । एतेन देशतः सामान्यस्य स्वाश्रयेषु चिरित्यपि विकल्पो क्षितः, देशतो- ऽनंतेषु स्वाश्रयेषु युगपत्सामान्यस्य वृत्तिरित्यत्र प्रमाणाभा- बात, ततोऽस्मिन्नपि पक्षे "मानं च नानंतसमाश्रयस्य" इति सबंधनीयं । सप्रदेशत्वप्रसंगाच्च सामान्यस्य न चैवमभ्युपगन्तुं युक्तं स्वसिद्धान्तविरोधात् तस्य निरंशत्ववचनात् । ततो नैक सामान्यममेयरूपं कुतश्चित्ममाणात्सिद्धं यतस्तदमेयमेवनस्यात् ।
टीकासहितं। १४५ संप्रति सामान्यमनंतसमाश्रयमप्रमाणकमवस्थाप्य पक्षां- तरमनूय दूषयंति- नानासदेकात्मसमाश्रयं चे- दन्यत्वमाद्विष्ठमनात्मनोक। विकल्पशून्यत्वमवस्तुनश्चे- तस्मिन्नमेये व खलु प्रमाणम् ॥५६॥ टीका-नाना च तानि संति च नानासंति विविधद्र- ध्यगुणकर्माणि तेषां नानासतामेकात्मा सदात्मा वा द्रव्या- स्मा वा गुणात्मा वा कर्मात्मा वा स एवाश्रयो यस्य सामा- न्यस्य तन्नानासदेकात्मसमाश्रयं । एको हि सदात्मा समा- श्रयः सत्तासामान्यस्य स चैकसव्यक्तिप्रतिभासकाले प्रमाणत: प्रतीयत एव तदन्यद्वितीयादिसद्व्यक्तिमतिपचि- कालेऽपि स एवाभिव्यक्ततामियर्तीति तन्मात्राश्रयस्य सामा- न्यस्य प्रमाणं ग्रहणनिमित्तमस्त्येव तख्यानंतस्वभावसमाश्रयस्यैव मानं नास्तीति व्यवस्थितः। तथैको द्रव्यात्मा समाश्रयो द्रव्य- त्वसामान्यस्य, गुणात्मा गुणत्वसामान्यस्य, कर्मात्मा कर्मत्वसा- मान्यस्येति, तस्यैकां द्रव्यव्यक्ति द्वितीयां च प्रतीयन् द्रव्यस्व- भावमेकमेव प्रत्येति तत्समाश्रयं च द्रव्यत्वसामान्यमिति स- दात्या समाश्रयः, न तस्यामानता, एवं गुणव्यक्तीः कर्मव्यक्तीचा द्विवाः पश्यन् गुणस्वभावं कर्मस्वभावं च पश्यतीति गुणैका- मसमाश्रयं कमैकात्मसमाश्रयं वा गुणत्वसामान्यं कर्मत्वसा- युक्त्यनुशासनं। मान्यं वा प्रत्येतुं प्रमाणतः शक्नोतीति न तस्याप्रमाणता शक्या समापादयितुमनंतसमाश्रयस्यैव सामान्यस्य मानताऽघ- टनादिति यदि मन्यन्ते सामान्यवादिनस्तदैवं प्रष्टव्या:- किमेतत्सामान्यं स्वव्यक्तिभ्योऽन्यदनन्यद्वा ? न तावदन्यत्व- मस्य सदेकस्वभावाश्रयसामान्यस्य स्वव्यक्तिभ्यो भेदे तासाम- सदात्मकत्वमसंगात्मागभावादिवत्, व्यक्तेरसदात्मकत्वे च सत्सा- पान्यस्याप्यसदात्मकत्वापत्तिरसद्व्यक्तित्वादभावमात्रवत् । तत- थानात्मनोर्व्यक्तिसामान्ययोरन्यत्वं कस्यान्नैव स्यादित्यर्थः। त- दद्विष्टमिह प्रसिद्ध द्वयोरभाचे पुनरद्विष्ठमन्यत्वं केति संबंधनीयं एवं द्रव्यव्यक्तेद्रव्यैकात्मसमाश्रयस्य द्रव्यत्वसामान्यस्य भेदेऽ- व्यद्रव्यत्वप्रसंगो गुणादिवत् । तदद्रव्यत्वे च द्रव्यत्वसामान्य- स्थानात्मत्वापत्तिरित्यनात्मनोव्यव्यक्तिद्रव्यत्वसामान्ययोर- न्यत्वं क स्यात् । तस्याद्विष्ठत्वेन च द्वयोरभावे काद्विष्ठमन्यत्त्वमिति घटनीयं । तथा गुणत्वसामान्यस्य कर्मत्वसामान्यस्य चैकगु- गात्मसमाश्रयस्यैककर्मात्मसमाश्रयस्य च गुणव्यक्तः कर्मव्य- केर्वा भेदे गुणव्यक्तरगुणत्वप्रसंगः कर्मव्यक्तेश्चाकर्मत्वमसंग- स्तदनात्मकत्वे च गुणत्वसामान्यम्य कर्मत्वसामान्यस्य चाऽ- नात्मकत्वापत्तिरित्यनात्मनोर्गुणव्यक्तिगुणत्वसामान्ययोः कर्म- व्यक्तिकर्मत्वसामान्ययोश्चान्यत्वं क स्यात् ? द्वयोरभावे चा- द्विष्ठमन्यत्वं केति प्रतिपत्तव्यं ततो नान्यत्सापान्य स्वव्यक्तिभ्यो व्यवतिष्ठते । नाऽप्यनन्यत्, सामान्यस्य व्यक्तौ प्रवेशे व्यक्तिरेव स्यान च सामान्याभावे सा संभवतीत्यनात्मा स्यात्तदनात्मत्वे टीकासहितं । सामान्यस्याप्यनात्मत्वमित्यनात्मनोर्व्यक्तिसामान्ययोरनन्यत्वं केति योजनीयं । न च तद्विष्ठमनन्यत्वमस्तीति कानन्यत्वं ! एतेनोभयमपि निरस्तमुभयदोषानुषंगात् । ननु च वस्तुभूतस्य सामान्यस्यानभ्युपगमादवस्तुन एव सामान्यस्यान्यापोहलक्ष- पस्येष्टत्वात्तस्य चान्यत्वानन्यत्वादिविकल्पशुन्यत्वं खरविषा- पवदिति चेत्, तर्हि तस्मिन्नवस्तुनि सामान्ये क खलु प्रमाण संप्रवर्तत नैव किंचित्पमाणं स्यात् तस्यामेयत्वादन्यापोहस्य सर्वप्रमाणांतिकान्तवात् । तथाहि-न तावत्सत्यक्षमवस्तुनि प्रव- ते तस्य वस्तुविषयत्वात् । नाप्पनुमानं लिंगाभावात् । न हि तत्र स्वभावलिंग निःस्वभावस्यावस्तुनः स्वभावविरोधात्, स्व- भावस्य कस्यचित्सद्भावे वस्तुत्वप्रसंगात्। नाऽपि कायलिंग सक- लकार्यशून्यत्वादवस्तुनः, कस्यचित्कार्यस्य भावे तस्थावस्तुत्व- विरोधात् । तत्रानुपलंभो लिंगमिति चेत्, सोऽपि कचिदग्नौ तदन्यस्यानग्नेरभावो ह्यन्यापोहः सामान्यं, तस्य चानग्नेः क- स्यचिदेवोपलब्धिलक्षणप्राप्तस्य जलादेरनुपलंभः स्यात्सर्वस्य वा ? प्रथमविकल्पे न सर्वस्पादनग्नेरपोहः सिध्येत् । द्वितीय- विकल्पे देशकालस्वधावविप्रकृष्टस्य द्वीपान्तररावणपरमावा- देरनग्नेरनुपलब्धिलक्षणप्राप्तस्यानुपलभः कथमभावं कचिदग्नौ साधयेदभावव्यवहारं वा स्वाभ्युपगमविरोधादिति, नावस्तु सामान्य केनचित्प्रमाणेन मेयं, तस्मिंश् चामेये क खलु प्रमाण अवर्तते पराभ्युपगतवस्तुभूतसामान्यवदिति न किंचित् सामान्य परेषां व्यवतिष्ठते प्रमाणाभावात् । 1- १४८ - युक्त्यनुशासन। ननु चानुत्तिप्रत्ययलिंगं सामान्यं कथमप्रमाणमित्यपरे। अतव्यावृत्तिप्रत्ययसाध्यमन्यापोहसामान्यमित्यन्ये । स्वस्वसं- बेदनमात्रं साध्यं सन्मानं शरीरं ब्रह्मेति केचित् संप्रतिपद्यन्ते, तान् प्रति माहुराचार्याः- व्यावृत्तिहीनान्वयतो न सिद्धये- द्विपर्ययेऽप्यद्वितयेऽपि साध्यम् । अतद्वयुदासाभिनिवेशवादः पराभ्युपेतार्थविरोधवादः ॥५७ ॥ टीका-येषा तावत-द्विविधं सामान्य परमपरं चेति तेषां च न परंसामान्यं सत्तारख्यं साध्यं सदित्यन्वयादसव्याधि- हीनादेव सिद्धयेत् सदसतो. संकरेण सिद्धिप्रसंगात् । सदन्वय एवाप्तव्यावृत्तिरित्ययुक्तमनुचिच्यावृत्योर्भावाभावस्वभावयो- र्भेदाभ्युपगमात् । सामात्सदन्वयेऽसद्व्याशिः सिद्धथे- दिति चेत् , तर्हि न व्यावृत्तिहीनादन्वयतः साध्यं सिध्येत् । एतेनापरं सामान्य द्रव्यत्वादि द्रव्यमित्याद्यन्वयादव्यादिन्या- वृत्तिहीनान सिध्येदिति निवेदित, सामर्थ्यसिद्धादद्रव्यादिव्या- त्तिसहितादेव द्रव्याधन्वयात् द्रव्यत्वादिसामान्यस्य सिद्धेः तत एव तस्य सामान्यविशेषाख्यत्वव्यवस्थापनात् । येऽपि के- षांचिद्विपर्यये तव्यावृत्तेरेवान्वयहीनायाः सामान्य प्रतीयन्त इति तस्मिन्विपर्ययेऽपि साध्यं न सिद्धयेत् सर्वथान्वयरहिता- दतव्यावृत्तिप्रत्ययादन्यापोहसिद्धावपि तदिधेरसिद्धस्तत्र प्रवृ- - शोकासहित। शिविरोधात् तदर्यक्रियालक्षणस्य साध्यस्य सिद्धयभावात् । - श्यविकल्प्ययोरेकत्वाध्यवसायात् प्रवृत्तौ साध्यं सिद्ध्यतीति घेत, न, तदेकत्वाध्यवसायस्यासंभवात्, न हि दर्शनं तदेक- त्वमध्यवस्यति तस्य विकल्पाविषयत्वात्, नापि तत्पृष्ठभाविविक- ल्पस्तस्य श्याविषयत्वान्न चोभयविषयं ज्ञानान्तरमेकं संभ- वति यतस्तदेकत्वाध्यवसायात् व्यावृत्तिमात्रादन्वयहीनाद- न्यापोहसामान्यं सिद्धयेत् । स्वलक्षणेविति न साध्यसिद्धिः। तथान्वयव्यावृत्तिहीनादद्वितयादेव सन्मात्रप्रतिभासात्सत्ताद्वैत- सिद्धिरित्यपि न सम्यक्, सर्वथाऽप्यद्वितये साध्यसाधनयोर्भे- दासिद्धौ कुतः साधनात्साध्यं सिद्धयेदसिद्धौ चाद्वितयवि. रोधात् । यदि पुनरद्वितयेऽपि संविन्मात्रेऽसाधनव्यावृत्त्या सा- धनमसाध्यव्यारत्या च साध्यमित्यतव्युदासाभिनिवेशवादास- माश्रीयते, तदाऽपि पराभ्युपेतार्थविरोधवादः सौगतस्य स्यात् । पराभ्युपगतो हि संविदद्वैतलक्षणोऽर्थस्ताथागतैः स चात; व्युदासाभिनिवेशवादेनातव्यावृत्तिमात्राग्रहवचनरूपेण वि- रुध्यते कस्यचिदसाधनस्यासाध्यस्य चार्थाभावे तदव्यावृश्या साध्यसाधनव्यवहारानुपपत्तेर्भावे च द्वैतसिद्धेरपतिक्षेपार्हत्वा दिति सौंगतानां पूर्वाभ्युपेतार्थविरोधवादः प्रसज्येत । यदि तु साधनमनात्मकमेव न वास्तवं सौगतैरभ्युपेयते नाऽपि साध्यं तस्य संवृत्या कल्पिताकारत्वात्सतो न पराभ्यु- पेतार्थविरोधवादः स्यादिति निगद्यते । तदा दृषणमावे- दयन्ति- २५० युषत्यनुशासन। अनात्मनानात्मगतेरयुक्तिः, इति । अनात्मना नि:स्वभावेन सांटतेनासाधनव्यावृत्ति- मात्ररूपेणा साधनेन साध्यस्थापि तथाविधस्यानात्मनो या गतिः प्रतिपत्तिस्तस्याः सर्वथाप्ययुक्तिरयोग एव । मन परिहारमाशंक्य निराकुर्वन्ति- वस्तुन्ययुक्तर्यदि पक्षसिद्धिः। अवस्त्वयुक्तः प्रतिपक्षसिद्धिः, इति । वस्तुनि संविद्वैतरूपे साधनेनानात्मना सा- ध्यस्यानात्मनो गौरयुक्तेः पक्षसिद्धेरेवं संविदद्वैतवादिनः साध्यसाधनभावशून्यस्य संवेदनमात्रस्य पक्षत्त्वात्सिद्धं नस्त- चमिति यदि मन्यते परस्तदाप्यवस्तुनि विकल्पिताकारे सा- ध्यसाधनयोरयुक्तेः प्रतिपक्षस्य द्वैतस्य सिद्धिः स्यात् । न यवस्तु साधनं साधयति साध्यमद्वैततत्त्वमतिप्रसंगात् । साधनाद्विना स्वत एव संविदद्वैतसाध्यसिद्धिरिति परम- तमपाकुर्वन्ति- न च स्वयं साधनरिक्तसिद्धिः ॥५८॥ साधनेन रिक्ता शुन्या सिद्धिः स्वयं संविदद्वैतस्य न घुञ्यते, पुरुषाद्वैतस्यापि स्वयं सिद्धिमसंगात् कस्यचित्तत्र विप्रतिपत्त्यभावप्रसंगाच। तदेवम्- टीकासहितं। निशायितस्तैः परशुः परना। स्वमूर्ध्नि निर्भेदभयानभिज्ञैः वैतण्डिकैर्यैः कुसृतिः प्रणीता मुने! भवच्छासनक्समूढैः॥ ५९॥ टीका-परपक्षदूषणप्रधानैवैतण्डिकैः संवेदनाद्वैतवादिभिः कुमृतिः कुत्सिता गतिः प्रतीति: प्रणीता । मुने ! भगवन् ! भवतः शासनस्य स्याद्वादस्य दृशि प्रमूडैस्तैः स्वमूनि नि- |दभयस्यानभिनिर्भेदभयमजानद्भिः परधनः परशुनिशायित इति वाक्यार्थघटना । यथैव हि कैश्चित्परशुः परयाताय नि- शायितः स्वमूनि भेदाय च प्रवर्तत इति तद्भयानभिज्ञास्ते, त- यैव वैतण्डिकैः परपक्षनिराकरणायमानैः प्रणीयमानो न्याय: स्वपक्षमपि निराकरोतीति तेऽपि स्वपक्षघातभयानभिज्ञा एव । ते हि स्याद्वादन्यायनायकस्य गुरोः शासनदृममूढाः किं जा- नंते दर्शनमोहोदयाक्रान्तान्तःकरणत्वादिति विस्तरतस्तत्वा- र्यालकारे प्रतिपत्तव्यं । ननु च यदुक्तं "न च स्वयं साधनरिक्तसिद्धिः" इति । तत्र, संविदद्वैतस्यापि सिद्धिर्मा भूत्सर्वाभावस्य शून्यतालक्षणस्य विचारवलादागतस्य परिहर्नुपशक्यत्वादिति केचिदाचक्षते तान्मत्याहु:- भवत्यभावोऽपि च वस्तुधर्मों भावान्तरं भाववदहतस्ते।
१५२ युक्त्यनुशासनं। प्रमीयते च व्यपदिश्यते च वस्तुव्यवस्थांगममेयमन्यत् ॥६॥ टीका--न हि वहिरन्तश्च वस्तुनोऽसंभवे तदभावः सर्व- शून्यतालक्षणः संभवति तस्य वस्तुधर्मन्वात्, स्वधर्मिणोऽसंभये कस्यचिद्धर्मस्यामतीतेः। स ह्यभावः स्वरूपेण भवति न वा ? भवति चेदभावेऽपि वस्तुधर्मसिद्धेः कस्यचिद्धर्मस्याभावे धर्मा- न्तरमेव स च कथं वस्तुधर्मो न सिद्धयेत् । न भवति चेदभाव एच न स्यादभावस्याभावे भावस्य विधानात् । अथ धर्मिणो- ऽभावस्तदा भावान्तरं स्याद्भाववत् कुंभस्याभावो हि भूभागो भावान्तरमेवाईतो भगवतस्ते, न पुनस्तुच्छः सकलशक्तिवि- रहलक्षणो योगस्येवेति प्रत्येतव्यं । कुत एतत् ? यस्मात्ममीयते चाभावो व्यपदिश्यते च वस्तुव्यवस्थांगं च निगद्यते । अभावो हि धर्मस्य धर्मिणो वा यदि कुतश्चिममाणान्न प्रमीयते तदा कथं व्यवतिष्ठते १ प्रमीयते चेत्, नदा स च वस्तुधर्मो भावान्तरं वाधर्मपर्मिस्वभावभाववत् । तथा यद्यभावो न व्यपदिश्यते तदा कथं प्रतिपद्यते ? व्यपदिश्यते चेत्, वस्तुधर्मों वस्त्वंतरं वा स्यादन्यथा व्यपदेशानुपपत्तेः, तथा वस्तुनो घटादेर्व्यवस्थायाम- गमभावोऽनंगं वा । र द्यनंग, किं तत्परिकल्पनया। घटे पटादेर- भाव इति पटादिपरिहारेण (तु) घटन्यवस्थाकारणमभावः परि- कल्प्यतेऽन्यथा वस्तुसंकरप्रसंगादिति वस्तुव्यवस्थांगमभावोऽ- भ्युपगन्तव्यः । ततो वस्तु धर्म एवाभावो वस्तुव्यवस्थांगत्वाद्भाव- .
टीकासहितं । बत् । ननु च यथा प्रमाणं प्रमेयव्यवस्थांगमपि न प्रमेयधर्म- स्तथा वस्तुव्यवस्यांगमप्यभावो न वस्तुधर्मः स्यात्, यो यद्व्य- दस्थांग स तद्धर्म इति नियमाभावात्, व्यभिचारदर्शनात, न ह्यभावव्यवस्थांग घटादिर्भाव इति तस्याभावधर्मत्वं प्रतीये- तेति कश्चित् । सोऽप्यनालोचितवचनः, प्रमाणस्यापि प्रमेय- धर्मत्वाविरोधात् । प्रमाणं हि ज्ञानमविसंवादकमिष्यते तक प्रमेयस्यात्मनो धर्मः करणसाधनतापेक्षायां प्रतीयते, एवं प्र- मितिः प्रमाणमिति भावसाधनापेक्षायां तु प्रमाणस्यात्मार्थस्य धर्मत्वमपीति सिद्धं प्रमेयधर्मत्वमात्मनः प्रमितिर्थस्य प्रमिति- रिति संप्रत्ययात् । तथा घटादेर्भावस्याभावधर्मत्वमपि न विरुद्धयते, मृदो घट इति यथा मृद्धर्मों घट इति तथा सुवर्णाद्य- भावस्य मृदो धर्म इत्यपि प्रयुज्यत एव सुवर्णाधभावस्यासुन- मृदादिस्वरूपत्वात्ततो न व्यभिचारः। किंच हेतोर्विपक्षे का- सन्नाभावो हेतुधर्म इति स्वयमिच्छन्कथं हेतुलक्षणवस्तुव्य- वस्थांगस्याभावस्य हेतुरूपवस्तुधर्मत्वं नेच्छेत् । यत्तु न वस्तु व्यवस्थांगमभावतत्त्वं तदमेयमेव भाकान्ततत्त्ववत् । तदेवं परपरिकल्पितं सामान्य वस्तुरूपमरूपं वा यथा न वाक्यार्थस्तथा व्यक्तिमात्रं परस्परनिरपेक्षमुभयं वा न वा- क्यार्थः समवतिष्ठते तस्यामेयत्वात्सकलप्रमाणगोचरातिक्रा- तत्वात् । कि तर्हि वाक्यमभिदधातीति सूरिभिरवस्थाप्यते ।- विशेषसामान्यविषक्तभेद- १५४ युफ्त्यनुशासनं। विधिव्यवच्छेदविधायि वाक्यम् । अभेदबुद्धेरविशिष्टता स्याद् व्यावृत्चिबुद्धेश्च विशिष्टता ते ॥१॥ टीका-विसदृशपरिणामो विशेषः सदृशपरिणामः सा- मान्यं । ताभ्यां विपक्ताश्च ते च ते भेदाश्च द्रव्यपर्यायव्यक्तिरू- पास्तेषां विधिव्यवच्छेदौ तद्विधायि वाक्यमिति घटना। तत्र घटमानयेति वाक्यं नाघटानयनव्यवच्छेदमात्रविधायीति घ- टानयनविधेरपि तेनाभिधानात्, अन्यथा तद्विधानाय वाक्या- न्तरमयोगप्रसंगात् , तस्य प्यतव्यवच्छेदविधायित्वे तद्विधाना- यापरवाक्यप्रयोग इत्यनवस्थानुषंगात् न कदाचिद्घटानयन- विधिप्रतिपत्तिः स्यादिति प्रधानभावेन व्यवच्छेदविधाय्यपि वाक्यं गुणभावेन विधिविधायि प्रतिपत्तव्यं । विधिमात्र विधा- स्येव वाक्यमित्यप्ययुक्तं तदन्यव्यच्छेदेन विना विधिप्रति- पत्तेरयोगात्, तदितर पवच्छेदाय वाक्यान्तरप्रयोगापत्तेस्त- स्यापि तद्विधिमात्रविधायित्वेऽतव्यवच्छेदाय वाक्यान्तरप्रयो- गादनवस्थितिप्रसंगात, ततः प्रधानभावेन विधिप्रतिपादक वाक्यं गुणभावेन व्यवच्छेदविधायि प्रतिपादनीयं । जातैरेव विधिव्यवच्छेदोभयं प्रधानगुणभावेन वाक्यमभि- पत्ते, घटानयनसामान्यस्य विधानादघटानयनादिसामान्यस्य तत्मतिपक्षस्य व्यवच्छेदादिति मतान्तरमपि न युक्तिमत् । मेदविधिव्यवच्छेदविधायित्वाद्वाक्यस्य, भेदो हि व्यक्तिई- टीकासहित। व्यगुणकर्मलक्षणा, तत्र द्रव्यगुणयोर्गुणभावेन क्रियायाःप्राधा- न्येन विधिव्यवच्छेदविधायित्वप्रतीतेर्वाक्यस्य न जातेरेव वि- धिव्यवच्छेदविधायि वाक्यं व्यवतिष्ठते। एतेन करोत्यर्थस्य क्रि- यासामान्यस्यार्थभावनारूपस्य विधायकं वाक्यं शब्दभावनारू- पस्य वा शब्दव्यापारलक्षणस्येति प्रतिक्षिप्तं, यज्यादिक्रिया- विशेषस्यापि वाक्येनाभिधानानियोगविशेषवदन्यथा तद्वि- शेषे प्रवृत्त्यभावप्रसंगात्, लक्षितलक्षणया तत्र प्रवृत्तौ शब्दम- तिविरोधात्, शब्दप्रतिपन्नसामान्यलिंगादेव विशेषे प्रवर्तनात, शब्दमूलत्वात्तत्मवृत्तेः शाब्दत्वे परंपरया श्रोत्रंद्रियपूर्वकत्वाद तत्प्रवृत्त अक्षजज्ञाननिमित्तत्वप्रसंगात् । एतेनैव सन्मात्रसामान्य- स्य विधायकं वाक्यमित्यपि व्युदस्तं सद्विशेषस्यापि वाक्येना- भिधीयमानस्य प्रतीतेर्धात्वर्थविशेषवत्। भेदस्यैव विधिव्यवच्छे- विधायि वाक्यमिति मतमपि न चेयः, सामान्यविषक्तभेद- विधिव्यवच्छेदविधायित्वाद्वाक्यस्य सदृशपरिणामलक्षणसा- मान्यविशिष्टस्यैव हि भेदस्य द्रव्यगुणक्रियाख्यस्य विधिव्य- वच्छेद विधायितायां वाक्यस्य संकेतव्यवहारकालान्वयः स्या- मान्यथाऽतिप्रसंगात् । सामान्यचिषक्तभेदस्यैव विधिव्यवच्छे- दविधायि वाक्यमिति दर्शनमपि स्वरुचिविरचितमेव । विशे- षसामान्यविषक्तभेदविधिव्यवच्छेदविधायित्वाद्वाक्यस्य सा- रश्यसामान्यविशिष्टस्येव विसदृशपरिणामलक्षणविशेषविशि. स्यापि भेदस्य विधिव्यवच्छेदविधानप्रतीतेरवाध्यमानाया: प्रेक्षावनिराश्रयणीयत्वात् । तत्र भेदस्य द्रव्यादिव्यक्तिरूपस्या- . युक्त्यनुशासनं। विशिष्टता समानता सामान्यविपक्तता स्यादभेदबुद्धेः समा- नबुद्धेस्तेन समानोऽयमनेन समानः स इत्यभेदबुद्धिः सदृशपरि- णामात्मकसामान्यमंतरेणानुपपद्यमाना तदेव साधयतीति किं नश्चिन्तया । नन्वेकसामान्ययोगात्समानवुद्धिरन्वयिनी न पुनः समानपरिणामयोगादिति चेत् , न, सामान्यवानिति प्रत्यय- प्रसंगात, सामान्यतद्वतोदात्तयोरभेदोपचारात्समानमत्यय इति चेत् , न, तथाऽपि सामान्यमिति प्रत्यगप्रसंग' । यथैव हि यष्टियोगात् पुरुषो यष्टिरिति प्रतीयते तदभेदोपचारात्तथा सामान्ययोगात् द्रव्यादिः सामान्यमिति स्यानतु समान इति भावप्रत्ययलोपलक्षणाभावात् । स्यान्मतं , सामान्यस्य वाचकः समानताशब्दोऽस्तीति तेन समानेन योगात्समानो द्रव्यादिरिति प्रत्ययः स्यादिति तदप्यसदेव । सामान्यशब्दवाच्यस्य वस्तुनः समानशब्दवा- ध्यत्वाप्रतीतेः समानानां भावः सामान्य जनिन पुनः समान एव सामान्यमिति स्वार्थिकष्टयगाप्रत्ययः क्रियते येन समान- शब्दवाच्यं सामान्यं स्यात् । न च द्रव्यादिभ्यो भिन्नं सामान्य- मन्वयप्रत्ययात्सिद्धयति नाम, परापरसामान्येषु सामान्यान्तर- सिद्धिप्रसंगात् , तथा चानवस्था स्यात् सुदूरमपि गत्वाऽन्वयम- त्ययात्सामान्यान्तरस्यासिद्धौ प्रथमतोऽपि तदन्वयप्रत्ययात् सा- मान्य मा भवतु (सिद्धत) सर्वथा विशेषाभावात । द्रव्यादिध्वन्ध- पबुद्धिग्वाधिततयाऽनुषचरिता सामान्य वन्वबुद्धिरुपचरिता- ऽनवस्थामसंगेन बाधितत्वादिति विशेषाभ्युपगमोऽपि न युक्तः टोकासहितं। १५७ सर्वव्यक्तिषु सामान्यस्यैकस्यानंशस्य देशकालादिभिन्नासु युग- पत्तिविरोधेन बाधितस्यान्वयबुद्धया विषयीक्रियमाणस्यासं- भवादस्याप्यन्वयप्रत्ययस्यानुचरितत्वासिद्धेःसमर्थनात् । नन्वे- वं सदृशपरिणामरूपस्यापि सामान्यस्यान्वयबुद्धेः कुतः प्रसिद्धिः समानपरिणामेष्वप्यन्वय्बुद्धः समानपरिणामान्तरप्रसंगादनव- स्थायाः बाधिकायाः संभव त् , समानपरिणामस्यैकैकत्र भेदे बाधासंभवात्तस्यानेकस्थत्वादिति चेत् , न, समानपरिणा- मानामपि समानपरिणायान्तरप्रतीतेस्तेषामनन्तत्वादनवस्थान- वकाश त् । यथैव हि घटेषु घटाकारसमानपरिणामः प्रत्येक- मपरघटपरिणामापेक्षः प्रतीयते "समाना एते घटाः" इति तथा घटसमानपरिणामेष्वपि मृदाकारसमानपरिणामान्तरं प्रतिभा- सत एव 'मृदाकारेण समाना एते घटसमानपरिणामाः' इति तेष्वपि मृदाकारसमानपरिणामान्तरेषु पार्थिवाकारसमानपरि- णामान्तराणि पार्थिवाकारेण सपाना एते मृदाकारसमानप- रिणामा इति प्रतिभासनात् । पार्थिवाकारसमानपरिणामेष्वपि मूर्तत्वाकारसमानपरिणामान्तराणि, तेष्वपि द्रव्यत्वाकारस- मानपरिणामान्तराणि, तेष्वपि सत्त्वपरिणामान्तराणि, तेष्वपि वस्तुत्वपरिणामान्तरा'ण, तेष्वपि प्रमेयत्वपरिणामान्तराणि, तेष्वपि वाच्यन्त्रपरिणामान्तराणि, तेष्वपि ज्ञेयत्वपरिणामान्त- राणि तेष्वपि पुनः सत्वादिपरिणामान्तराणि प्रतिचकासंति अदनय प्राधान्यान्न तेषां वलयवदादिरंतोवा विद्यते यतोऽनवस्था बाधिका स्यात् । नाप्येकैकत्र भेदे समानपरिणामो विरुध्य- ६५८ युक्त्यनुशासनं। ते तस्य संयोगवदनेकस्यत्वाभावात् । विशेषवदनेकापेक्ष- यैव तदभिव्यक्तेः कृशत्वाधपेक्षया स्थूलत्वादिवत् । न च स- पानपरिणामोऽर्थानामपारमार्थिक एवापेक्षिकत्वादिति निधेतुं शक्यं संविद्वैशयेन व्यभिचारात् । न हि वृद्धाक्षसंवेदनापे- क्षया कुमारसंवेदनानां विशदतरत्वमापेक्षिकं न भवति तदविशे- पप्रसंगात् । नाऽपि तदपारिमार्थिकं येन न व्यभिचार: स्यात् । यदातु परिणामपरिणामिनोरभेदनयप्राधान्यात्कथंचित्तादात्म्य प्रतिपाद्यते तदा द्रव्येषु द्रव्यत्वसमानपरिणामो द्रव्यस्वरूप- मेव, तस्य च द्रव्यत्वपरिणामस्य सत्त्वादिसमानपरिमामा- तरं द्रव्यस्यैव प्रतीयते ततोऽर्थान्तरभूनस्य द्रव्यत्वपरिणाम- स्यासंभवादिति कुतोऽनवस्थाऽवकाशं लभते ? यदि वा येष्वेव द्रव्येषु द्रव्यत्वसमानपरिणामस्तेष्वैव सत्वादिपरिणामान्तराणि व्यवतिष्ठते, केवल तैरिवैकार्थसमवायवलात द्रव्यत्वममानपरि- णामो व्यपदिश्यते संख्यादिगुणान्तरैरिव रूपादिगुणा इति सर्व निरवा भेदाभेदोभयनयप्रधानभावाप्तिसमानपरिणामल- क्षणसामान्य विपक्तभेदविधिव्यवच्छेदविधायित्वनिश्चयाद्वाक्य- स्यान्यया निर्विषयत्वप्रसंगात् । यथा चाभेदबुद्धेदव्यत्वादि- व्यक्तेरविशिष्टता स्यात् तथा व्यावृत्तिबुद्धश्च विशिष्टताते भगवता स्याद्वाददिवाकरस्येति संप्रतीयते, विसदृशपरिणामलक्षणो हि विशेषस्तद्विषक्तताविशिष्टता सा चेदमस्माद्वयावृत्तमिति व्या- १ प्रथमपुस्तके 'अनेकथीत्वाभावादिति पाठ ।२ द्वितीय पुस्तके "भेद- जयादानात् ।" इति पाठ.
टोकासहितं। १५६ वृत्तिबुद्धेरध्यवसीयते । ननु चायं विशेषोऽस्माद्विशेषान्तराद् व्यावृत्त इति व्यावृत्तिबुद्धेरपि विशेषेषु विशेषांतरसिद्धिमंस- गादनवस्था स्यात्तत्र विशेषान्तराभावेऽपि व्यावृत्तिबुद्धेः संभ- वे सर्वत्र ततो विशेषसिद्धिर्न भवेदिति केचित् । तेऽपि न समीचीनबुद्धयः, समानपरिणामबद्भेदाभेदनयप्राधान्यादनव- स्थानुपपत्ते , भेदनयादानंत्यसिद्धेविशेषाणामभेदनयामा द्रव्येष्वेव विशेषान्तराणामपि संभवात्, भेदाभेदनयातु तदे- कार्थसमवायिभिर्विशेपान्तविशेषस्य विवक्षितव्यपदेशसिद्धः • व्यावृत्तिबुद्धेविशिष्टतासाधनं साधीय एवान्वयबुद्धेः सयान- तासाधनवत्तता विशेपसामान्य विपक्तभेदविधिव्यवच्छेदवि- धायि वाक्यमिति मूरिभिरभिधीयते प्रातीतिकत्वात । यथा च विशेषसामान्यविपक्तभेदविधिव्यवच्छेदात्मको विषयः प्रतीतिबलाद्वाक्यस्य व्यवस्थापितस्तथा वाक्यमपि परमागमलक्षणं तदात्मकमेवेति प्रतिपादयन्ति- सर्वान्तवत्तगुणमुख्यकल्पं सर्वान्तशून्यं च मिथोनपेक्षम् । सर्वापदामन्तकरं निरन्तं सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव ॥ ६२॥ टीका-पर्वे च तेऽन्ताश्चेति स्वपदार्थत्तमत्वर्थीयः प्रत्ययो युज्यतेऽन्यपदार्थवृत्तेः परत्वेऽपि सर्वशद्वादौ तदपवादाजात्य- दिवत् , सर्वेऽन्ताः यस्य तत्सर्वान्तमिति परत्वादहुग्रीहौ सति ' -१६ युक्त्यनुशासनं। तेनैव मत्वर्थस्य प्रतिपादनाव मत्वर्थीयो न स्याद्वीरपुरुषको ग्राम इति यथा, सर्वशब्दादेस्तु पदादन्यत्र बहुव्रीहिरित्यप- वादवचनात्सर्वशब्दादेः पदस्य कर्मधारय एव भवति यथा सर्व- बीजी कर्पकः सर्वकेशी नट इति तेन सर्वान्ताः संत्यस्मिन्निति सर्वान्तवत्तीर्थमिदं परमागमवाक्यमिति संबंधनीयं । तरति संसारमहार्णवं येन निमित्तेन तत्तीर्थमिति व्युत्पत्तेः । सर्वा- न्ताः पुनरशेषधर्मा विशेषसामन्यात्मकद्रव्यपर्यायव्यक्तिवि- धिन्यवच्छेदाः प्रतिपत्तव्याः समासतस्तैरेवानेतानामपि धर्मा- णां संग्रहात् । तत्र स्यादस्त्येव वाक्यं स्वरूपादिचतुष्टया- . दिति विधिधर्मवाक्य, स्यान्नास्त्येव पररूपादिचतुष्टयादिति व्यवच्छेदधर्मवाक्यं स्वरूपं तु वहिर्वाक्यस्य परस्परापेक्षया पदसमूहो निराकांक्षः सहभुवामिव नानामवक्तृकाणांक्रमभुवा- मपि समूहस्य व्यवहारसिद्धेः प्रत्यासत्तिविशेषसद्भावात् । अ- न्तर्वाक्यस्य तु पूर्वपूर्वपदज्ञानाहितसंस्कारस्यात्मनोऽन्त्यपदज्ञा- नात्समुदायार्थप्रतिभासस्तव्यतिरिकस्य स्फोटस्य मागेव प्र- तिक्षिप्तत्वात्तदेतत् द्विविधमपि वाक्यं स्वरूपत एवास्ति न पुन: पररूपतः सर्वात्मकत्वप्रसंगात्, पररूपत एव च नास्ति न पुनः स्वरूपतः सर्वाभावप्रसंगात् । ततो वस्तुत्वसिद्धिः स्पपररूपो- पादानापोहनात्मकत्वाद्वस्तुनः तथा स्वद्रव्यं शब्दस्य तद्योग्य- शुद्गलद्रव्यं शब्दात्मनो वाक्यस्य पुद्गलपर्यायत्वव्यवस्थितेः । पर्यायो हि कार्यद्रव्यरूपो गुणरूपः क्रियारूपो वानाद्यपर्यन्तद्र- प्रथम पुस्तके 'अनंतप्रवक्तृकाणा' मिति पाठः।
टीकासहित। १६ व्यस्य स्याद्वादिभिरभिधीयते । तत्र पुद्गलद्रव्यस्यानादिनिध- नस्य पर्यायः शब्दोद्रव्यमनित्यमिति तावन्निश्चीयते, द्रव्यं शब्द: क्रियागुणयोगित्वात्पृथिव्यादिवत् , क्रियावांश्च शब्दः प्रव- क्तृदेशादेशान्तरमाप्तिदर्शनाद सायकादिवत्तथा संख्यासंयोग- विभागादिगुणाश्रयत्वेन प्रतीयमानत्वात् गुणवानपि शब्दा प्रसिद्धः पृथिव्यादिवदेव । न हि शब्देषु संख्या न प्रतिभासते कस्यचिदेकं वाक्यं द्वे वाक्ये त्रीणि वाक्यानीत्यादिसंख्या- प्रत्ययस्यावाध्यमानस्य प्रतीयमानत्वात् , तथा क्षकारादीनां संयुक्ताक्षगणां प्रनीतेः संयोगोपि शब्दानां प्रतीयत एव, क्षकारादेर्जात्यन्तरस्योत्पत्तरसयोगात्मकत्वपरिकल्पनायां दंड- पुरुषसंयोगोऽपि माभूत्तथा दंडिनो जात्यंतरस्य द्रव्यस्य प्रादु- र्भावादिति सर्व प्रतीतिवाधितमनुपज्यते । ततः प्रतीतिम- बाधितामिच्छद्भिः शब्दः क्रियागुणयोगी तथा प्रतीतेरभ्युपगं- तव्यः। एतेन न क्रियागुणयोगी शब्दोऽवरगुणत्वातन्महत्त्वव. दित्यनुपानं प्रत्युक्तं पक्षस्य प्रत्यक्षानुमानवाधितत्वात्कालात्य- यापदिष्टत्वाच हेतोः शब्दस्याकाशगुणत्वासिद्धेश्व। आकाशवि- शेषगुणः शब्दः सामान्यविशेषत्वे सत्याकाशात्मककरणग्राह्य- “त्वात् । यो यदात्मककरणग्राह्यः स तद्विशेषगुणो दृष्टो यथा पृथि- व्यात्मककरणग्राह्यो गंयः पृथिवीविशेषगुणः, आकाशात्मकश्रो. ग्राह्यश्च शब्दस्तस्मादाकाशविशेषगुण इत्यनुमानादाकाशवि- शेषगुणत्वसिद्धिरित्यपि न सम्यक् , सत्यतिपक्षत्वादनुमानस्य । तथा हि-नाकाशविशेषगुणः शब्दः सामान्यविशेषवत्त्वे सति , - युक्त्यनुशासन । वाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वाद् गंधादिवदिति प्रतिपक्षानुमानस्य सत्यस्य सद्भावः, तथा न गुणः शब्दः संस्कारवत्वाद्वाणादिवंदित्यनुमा. नस्य च प्रतिद्वंद्विनः संमत्ययात् । संस्कारवचमसिद्धं शब्दस्येति चेत्, न, वेगस्य संस्कारस्य शब्देषु भावात् वक्तृव्यापारादु- त्पन्नस्य शब्दस्य यावद्वेगं प्रसर्पणात् । शब्दस्य प्रसर्पणमसिद्धं शब्दान्तरारंभकत्वादिति चेत्, स तर्हि वक्तव्यापारादेकः शब्दः प्रादुर्भवत्यनेको वा? यो कस्तर्हि कथ नानादिक्कान्नानाशब्दा- नारभेत सकृदिति चिंतनीयं । सर्वदिक्कनानातावादिसंयोगज- नितवाय्याकाशसंयोगानामसमवायिकारणानां भावात् , सम- वायिकारणस्य चाकाशस्य सर्वगतत्वात् , सर्वदिक्कनानाशब्दा- नारभते सकृदेकोऽपि शब्द इति चेत् नैव, तेपां शब्दस्यारंभ- कत्वस्याप्यनुपपत्तेः । यथैव ह्याद्यः शब्दो न शब्दान्तरजस्ता- खाद्याकाशसंयोगादेवासमवायिकारण दुत्पत्तेस्तथा सर्वदिक्क- शब्दान्तराण्यपि न शब्दारब्धानि तालादिव्यापारजनितवा- खाकाशसंयोगेभ्य एवासमवायिकारणेभ्यस्तेषामुत्पत्तिघटना- त् , तथोपगमे च संयोगाद्विभागाच्छब्दाच शब्दस्योत्पत्तिरिति सिद्धांतव्याघातः। शब्दान्तराणांप्रथमः शब्दोऽममवायिकारणं तत्सदृशत्वादन्यथा तद्विसदृशशब्दान्तरोत्पत्तिप्रसंगो नियामका- भावादिति (केचि)चेत्, न, प्रयमशब्दस्य शब्दान्तरसदृशस्यान्य- शब्दादसमवायिकारणादुत्पत्तिपसंगात्तस्याप्यपरपूर्वशब्दादिति शब्दसंतानस्यानादित्वापत्तिः । यदि पुनः प्रथमः शब्द. प्रवक्त- व्यापारादेव प्रतिनियतादेवोत्पन्नः स्वसदृशानि शब्दान्तराण्या- mar टोकासहितं । १६३ रभत इति मतं तदा तत एव प्रवक्तव्यापारात्मतिनियतवाय्वाका- शसंयोगेभ्यस्तत्सदृशानि शब्दान्तराणि प्रादुर्भवन्तु किपायेन शब्देनासमवायिकारणेनेति न शब्दाच्छब्दस्योत्पत्तिर्घटते नैकःशब्दः शब्दान्तराणामारंभकः संभवति । अथाऽनेका शब्दः प्रथमत उत्पन्नःशब्दान्तराणि नानादिकान्यारभते इति द्विनी- यः पक्षः कक्षीक्रियते तत्राऽप्येकस्मात्ताल्वाद्याकाशसंयोगाक- थमनेकः शब्दः प्रादुर्भवेदहेतुकत्वप्रसंगादेकनादेकस्यैवोत्पत्तेः शेषस्य हेत्वभावात । न चानेकतावाद्याकाशमंयोगः सकृदे- कस्य वक्तुः संभवति प्रयत्नैकत्वात् , न च प्रयत्नमन्तरेण ताल्वा- दिक्रियापूर्वकोऽन्यतरकर्मजस्तावाद्याकाशसंयोगः प्रमूयते यतोऽनेका शब्दः स्यात् । प्रादुर्भवन्या कुतश्चिदायः शब्दो- नेकः स्वदेशे शब्दान्तराण्यारभते देशान्तरे वा ? न ताव- स्वदेशे देशान्तरेषु तच्छ्रवणविरोधात् भिन्नदेशस्थीतनन- श्रोत्रेषु समवायाभावात् , तत्रासमवेतस्याप्यनेकस्य शब्दान्तरस्य श्रवणे श्रोत्रस्यामाप्यकारित्वापत्ते:, शब्दान्तरारंभपरिकल्पना- वैयर्थ्यांचाद्यस्यैव शब्दस्य नानादिक्कोग्यदेशस्थैः श्रीवृभिः श्रवणस्योत्पत्तेः, अनेक शब्दपरिकल्पनावैयाच तम्यैकस्यै- व स्वदेशे प्रादुर्भूतस्य नानाश्रोतृभिरुपलंभात् स्वदेशे सतो रूपस्य नानादृष्टिभिरुपलंभवत् । स्यान्मतं, नायनरश्मयः प्राप्य रूपमेकदेशवय॑पि नानाद्रष्ट्टजनानां रूपोपलंभं जनयंति न .. पुनरप्राप्य येन रूपोपलंभो दृष्टान्तः शब्दोलभस्यामाप्लेरेव श्रोत्रैः साध्यत इति तदपि न श्रेषः । श्रोत्रविवत्तविशेषैः प्रा.
१६४ युक्त्यनुशासनं । सस्यैव शब्दस्योपलभप्रसंगात् । शक्यं हि वक्तुं नानादेशम्थ- जनकरणानि प्राप्य शब्दमेकमुपलंभयन्ति सकृन्नानादिग्देश- वर्तिभिः प्रतिपत्तृभिरुपलभ्यमानत्वाद् रूपवदिति । गंधेन व्य- भिचार इति चेत् न, तस्यापि पक्षीकृतत्वात्, सोऽपि कस्तूरि- कादिद्रव्यवती नानादिग्देशवतिमिर्जनरुपलभ्यमानः स्वस्व- प्राणकरणैः कथंचित्संप्राप्त एवोपलंमहेतुर्घटते गंधस्य देशान्त- रस्थजनप्राणेषु गमनासंभवाद्गुणस्य निष्क्रियत्वाद् गंधपरमा- शूनां गमनेऽपि तत्समवेतगंधस्यानुपलभ्यमानत्वात् , अनेकद्रव्ये- ण समवाचादूपविशेषाच रूपोपलब्धिरित्यनुवर्तमाने, एतेन गंध- रसस्पर्शेषु ज्ञान व्याख्यातमिति वैशेषिकैरभिधानात् । गन्ध- प्रच्यावयविनामुपलब्धिलक्षणप्राप्तानां देशान्तरेषु गमने तु मौल- कस्तूरिकादिद्रव्यव्ययप्रसंगस्तस्यैव सर्वदिक्कं खंडावयविरूपा- वयवानां तदारंभकानां गमनात् । यदि पुनने कस्तूरिकादि- द्रव्यस्य परमाणवो गंधसमवायिनो गच्छंति नाऽपि खंडावय- विनस्तदारंभकावयवास्ततो गन्धद्रव्यान्तराणामुत्पत्तेरिति मतं, लदाऽपि तदारंभकैः पार्थिवैः परमाणुभिर्भवितव्यं द्वयणुकादि- पिनुपर्लभैरेवोपलब्धिलक्षणप्राप्तानां पार्थिवावयविनामुप- लब्धिप्रसंगात्। न चानुपलब्धिलक्षणप्राप्तैः पार्थिवद्रव्यैरारब्धेषु द्रच्यांतरेषु समवेतस्य गधस्योपलब्धियुज्यते परमाणुसमवेतगं- ववदिति न गन्धद्रव्यान्तराणि कस्तूरिकादिगन्धद्रव्यमारभन्ते यतः प्राप्तान्येव दूरस्थतिपत्तृघ्राणतद्विषयतामनुभवेयुर्घाणेन्द्रि- यवितिभिस्तु गत्वा गन्धस्य ग्रहणे मोक्तदोषानवकाश इति टीकासहित। श्रोत्रघ्राणरसनस्पर्शनानि गत्वा स्वविषयज्ञानं जनयन्ति वा- ह्येन्द्रियत्वाञ्चक्षुर्वदन्यथा तेषामप्राप्यकारित्वप्रसंगात् । ततो न व्यभिचारः शब्दस्य नानादिक्कननकरणग्रहणसाधनस्योक्तहे- तोरिति नाबादनेकस्मादपि शब्दाच्छब्दान्तरोत्पत्तिः संभव- तीति सर्वदिकपरापरशब्दप्रसर्पणं यावद्वेगमभ्युपगन्तव्यंातथाच संस्काराख्यगुणयोगित्वं नासिद्धं यतः सूक्तमिदं न स्यात् 'न गुणःशब्दः संस्कारवत्त्वाद्वाणादिवदिति।' पुद्गलद्रव्यपर्यायात्म- कत्वे तु गंधादिवदित्यभ्यनुज्ञायमाने न किंचिद्धाधकमस्ति । ननु चन स्पर्शवत् द्रव्यगुणः शब्दोऽस्मदादिप्रत्यक्षत्वे सत्यकारणगु- णपूर्वकत्वात्सुखादिवदिनि वाधकसद्भावान्न पुद्गलद्रव्यपर्यायत्वं शब्दस्य व्यवतिष्ठते सुखादेरपि तथाभावप्रसंगादिति कश्चित् । सोड पिस्वदर्शनपक्षपाती,परीक्ष्यमाणस्याकारणगुणपूर्वकत्वस्यासिद्ध- त्वात, कारणगुणपूर्वकः शब्दः पुद्गलस्कन्धपर्यायत्वाच्छायात- पादिवत्,पुद्गलस्कंधपर्यायः शब्दोऽम्मदादिवाह्येन्द्रियप्रत्यक्षत्वा- चद्वत । न घटत्वादिसामान्येन व्यभिचारस्तस्यापि सपानपरिणा. मलक्षणस्य पुद्गलद्रव्यपर्यायवसिद्धेः तदसिद्धमेवाकारणगुण- पूर्वकत्वं शब्दस्य न साध्यसिद्धिनिबंधनं कारणगुणपूर्वकत्वेन साधनात् । हेतुविशेषणं चास्मदादिप्रत्यक्षत्वे सतीति व्यर्थमेव । परमाणुरूपादिव्यभिचारनिवृत्त्यर्थं तदिति चेत् न, परमाणु- रूपादीनामपि कारणगुणपूर्वकत्वसिद्धेः, परमाणूनां स्कंधभे- दकार्यत्वात् तद्गुणपूर्वकत्वव्यवस्थितेः परमाणु रूपादीनामिति निर्णीतप्रायं । यदप्युक्तं न स्पर्शवद्रव्यगुणः शब्दोऽस्मदादि- १६६ युफ्त्यनुशासनं। प्रत्यक्षत्वे सत्ययावद्दव्यभावित्वान्सुखादिवदिति, तदप्ययुक्तं विरुद्धत्वात्साधनस्य । तथाहि-स्पर्शवद्रव्यगुणः शब्दोऽस्मदा- दिप्रत्यक्षत्वे सत्ययावद्रव्यमावित्वाद् रूपादिविशेषवत्, नात्र साधनविकलमुदाहरणं रूपादिविशेषाणां यावत्पुद्गलद्रव्यम- भावात् पूर्वरूपादिविनाशादुत्तररूपादिविशेषप्रादुर्भावात् । नापि साध्यविकलं रूपादिविशेषाणां स्पर्शवद् द्रव्यगुणत्वाव- स्थितेः । सुखादिभिर्व्यभिचारः साधनस्येति चेत् , नास्मदा- दिप्रत्यक्षत्वे सतीति विशेषणात् । न च सुखादयः शब्दवदऽस्म- दादीनां वहूनां प्रत्यक्षाः, स्वसंवेदनप्रत्यक्षण तु कस्यचित् सुखादयः स्वस्यैव प्रत्यक्षा न पुन नास्मदादीनामिति न तै- व्यभिचारः । स्वस्याप्यस्मदादिग्रहणेन गृहीतत्वात् स्वप्रत्यक्ष- त्वमप्यस्मदादिप्रत्यक्ष रं सुखादीनांप्रत्यक्षसामान्यापेक्षयास्म- दादिप्रत्यक्षत्ववचनादिति चेत् , तथाऽपि न सुखादिभिर्व्य- भिचारा, स्याद्वादिभिः सांसारिकसुखादीनां कथंचित्स्पर्शवद्- द्रव्यगुणत्वस्य प्रतिज्ञानात् । यथैव ह्यात्मपर्यायाः सुखादयश्चिदू- पसमन्वयास्तथा सद्वेद्यादिपौगलिककर्मद्रव्यपर्यायाश्च, स्वपरतं- त्रीकरणरूपसमन्वयादौदयिकभावानां व मद्रव्यस्वभावत्वसिद्धः। मुक्तसुखज्ञा-दर्शनादिभिस्तु गुणैरस्पर्शद्रव्यात्मगुगौने व्य- भिचारस्तेषामस्मदाद्यप्रत्यक्षवादग्मदादिविशिष्टयोगिप्रत्यक्ष- विषयत्व चेषामयाबद्दव्यभावित्वाभावाचा तत्वेन यावदात्म- द्रव्यं भवनशीलत्वात् । ततो निरवद्यमेव विरुद्धसाधनत्वमेतस्य इतोरिति स्पर्शवद् द्रव्यपर्याय एव शब्दः प्रतीतिवलासिद्धः।
टोकासहितं । १६७ शब्दयोग्यपुद्गलानां सर्वत्र भावादन्यथा कचित्तल्वादिकारण- सद्भावेऽपि शब्दपरिणामानुत्पत्तिप्रसंगात् । न च शब्दपरिणा- मनिमित्तसन्निधौ कचित्कदाचिच्छब्दानुत्पत्तिः स्यात्स च श- ब्दपरिणामोनैक एव नानाश्रोतृभिःश्रवणविरोधात् । श्रोत्रस्या- प्राप्यकारित्वान्न तद्विरोध इति चेत्, न, तस्याप्राप्यकारित्वे कर्णशष्कुल्यन्त:प्रविष्टमशकशब्दग्रहणायोगात् चक्षुषोऽमा- प्यकारिणः तारकाप्राप्तांजनादिग्रहणादर्शनात्तथा चेदमभिधी- यते नामाप्यकारि श्रोत्रं प्राप्तशब्दग्रहणात्स्पर्शनादिवत्, यन्पु- नरप्राप्यकारि तन्न प्राप्तविषयग्राहि दृष्टं यथा चक्षुरिति नि- श्चितव्यतिरेकादनुमानादप्राप्यकारित्वप्रतिषेधः श्रोत्रस्य श्रेया- नेव । ननु चाप्राप्यकारिणा मनसा प्राप्तस्य सुखादेग्रहणाद् व्यभिचार इति चेन्न सुखादेरात्मनि समवेतस्य मनसा प्राप्त्य- भावात् । मनसा संयुक्त पुंसि सुखादेः समवायात् संयुक्तस- मवायप्राप्तिरिति चेत् न, दूरस्थैरपि मनसः प्राप्तिप्रसगात् , मनसा संयुक्तस्यात्मनस्तैः संयोगात्संयुक्तसंयोगस्य प्राप्ति- त्वात् , साक्षात्तैरप्राप्तिर्मनस इति चेत्, सुखादिभिरपि साक्षा- माप्तिः किमस्ति ? परंपरया तैमनसः प्राप्तिस्तु न प्राप्यकारित्वं साधयति दुरारिवेति सर्वत्राऽप्यप्राप्यकारित्वे मनसस्ततों न तेन व्यभिचार इति श्रेयानेव श्रोत्रस्य प्राप्यकारित्वसाधनो हेतुः । ये वाहुः शब्दोमाप्त एवेंद्रियेण गृह्यते दुरादित्वेन गृह्यमाणत्वाद्रूपवदिति । तेऽपि न परीक्षकाः, गंधेन व्यभिचा- रात् साधनस्य । गन्धद्रव्यस्य गन्धाधिष्ठानस्य दुरादित्वाद १६६ युक्त्यनुशासनं । गंधस्य दृगदित्वेन गृह्यमाणत्वान्न तेन व्यभिचार इति चेत् न, शब्दस्यापि तदधिष्ठानभेर्यादिद्गदित्वेन दूरे शब्दो दृग्तरे दूरतमे वेति ग्रहणादुपचारात्, दूरादित्वेन गृह्यमाणत्वस्य हेतोः परमार्थतोऽसिद्धत्वापत्तः । ततः प्राप्त एव शब्दो विवादा- पन्नः परिगृह्यते शब्दत्वात्कर्णशष्कुल्यन्तःप्रविष्टमशकशब्द- वदिति प्राप्यकारि श्रोत्रं सिद्ध । तथा चैक.स्य शब्दस्य युग- नानादेशस्थजनश्रोत्रःमाप्त्यसंभवान्नानाशब्दपरिणामाः सर्व- दिकाः प्रजायन्ते स्वप्रतिवन्धनकुड्याद्यसंभवे स्वावरोधकनलि- काद्यसंभवे च स्वप्रतिघातकघनतरकुडयादिविरहे च सति गंध- परिणामवत् , समानाश्च सर्वे गवादिशब्दविवाः समानताल्ला- दिकारणप्रभवत्वात्समानकस्तूरिकादिद्रव्यप्रभवगन्धविवर्शवत, शब्दोपादानपुद्गलानां सर्वशब्दपरिणामसमर्थानां सर्वत्र सद्भा- वेऽपि प्रतिनियतहेतुबशात्मतिविशिष्टशब्दपरिणामाश्च निश्ची- यन्ते, गन्धोपादानपुदगलानां सर्वेषां सर्वत्र सर्वगन्धपरिणाम- समर्थानां संभवेऽपि प्रतिनियतहेतुगन्धवशात्पतिविशिष्टगन्ध- परिणामवत् । ननु च वायव एव शब्दोपादानं तेषां सर्वत्र सर्वदा सद्भा- चादन्यथा व्यंजनादिना तदभिव्यक्तरयोगाद्वेगवद्वाय्वन्तरेणा- भिघाताचेति केचित् । तेऽपि वायवीय शब्दमाचक्षाणाः श्रो- ऋग्राह्यं कथमाचक्षीरन् तस्य स्पर्शनग्राह्यत्वप्रसंगात्स्पर्शवत् । तथा हि-वायवीयस्पर्शनेन्द्रियग्राह्यः शब्दो वायसाधारणगु- यत्वात्, यो यदसाधारणगुणः स तदिन्द्रियग्राह्यः सिद्धो यथा टोकासहितं। १६६ पृथिव्यप्तेजोऽसाधारणगुणो गंधरसरूपविशेषगुणः पार्थिवाप्य- तेजसघ्राणरसननयनेन्द्रियग्राह्यः, वाय्वसाधारणगुणश्च शब्द- स्तस्माद्वायवीयस्पर्शनेन्द्रियग्राह्य इति श्रोत्रपरिकल्पनावैयर्थ्य- मापद्येत । यदि पुनराकाशसहकारिकरणात्वाच्छब्दस्याकाश- समवायेन श्रोत्रेण ग्रहणमुररीक्रियते तदा स्पर्शस्यापि श्रोत्र- ग्राह्यन्वप्रसंगस्तस्याप्याकाशसहकारिवायूपादानत्वाच्छब्दवत् । गन्धादीनां च श्रोत्रवेद्यत्वं स्यादाकाशसहकारिपृथिव्याधुपा- दनत्वात् । न ह्याकाशं कस्यचिदुत्पत्तौ स्वोपादानात्सहकारिन भवेत, सर्वोत्पत्तिमतां निमित्तकारणाकालादिवत् । स्यान्मतं, नाऽयं नियमोऽस्ति यो यदसाधारणगुणः स तदिन्द्रिय- ग्राह्य इति पार्थिवस्य पंचप्रकारस्य वर्णस्य षट्प्रकारस्य रसस्या- नुष्णाशीतस्य पाकजस्य म्पर्शस्य च पार्थिवघ्राणेंद्रियग्राह्यत्व- प्रसंगात्तथा शीतस्पर्शस्य शीतस्य च रूपस्याप्यरसनेन्द्रियवेद्य- त्वं, तैजसस्य चोष्णस्पर्शस्य तेजसचतुर्वेद्यत्वं कथं विनिवार्येत ? तनियमकल्पनायामिति यस्य यस्मादिद्रियाद्विज्ञानमुत्पद्यते तस्य तदिद्रियग्राह्यत्वं व्यवतिष्ठते तथा प्रतीतेरतिलंघयितुमशक्ते केव- लमिंद्रियस्य प्रतिनियतद्रव्योपादानत्वं साध्यते प्रतिनियतगुण- ग्राहकत्वादिति । तदेतदसार, प्रतिनियतद्रव्योपादनत्व- स्य प्राणादीनां साधयितुमशक्यत्वात् । पार्थिवं घ्राणं रूपा- दिषु सन्निहितेषु पार्थिवगन्धस्यैवाभिव्यंजकत्वान्नागकर्णि- काविमर्दककरतलवदित्यनुमानस्य सूर्यरश्मिभिरुदकसेकेन चानेकान्तात् । दृश्यते हि तैलाभ्यक्तस्य सूर्यमरीचि- युक्त्यनुशासन। मिर्गन्धाभिव्यक्तिर्भूमेस्तूदकसेकेनेति । तथा रसनेंद्रियमाप्य- मेव रूपादिषु सन्निहितेषु रसस्यैवाभिव्यंजकत्वाल्लालावदि- त्यत्रापि हेतोलवणेन व्यभिचारात्तस्यानाप्यत्वेन रसाभिव्यं- जकत्वसिद्धेः। तथा चक्षुस्तैजसमेव रूपादिषु सन्निहितेषु रूप- स्यैवाभिव्यंजकत्वात्मदीपादिवदित्यत्रापि हेतोर्माणिक्योद्यो- तेन व्यभिचारात् । न च माणिक्यप्रभा तैजसी मूलोष्णद्रव्य- वती प्रभा तेजस्तद्विपरीता भूरिति वचनात् । तथा वायव्यं स्पर्शनं रूपादिपु सन्निहितेपु स्पर्शस्यैवाभिधजकन्चात्तोयशीतस्पर्शव्यंज कवाय्ववयविवदित्यत्रापि कर्पूरादिना सलिलशीतस्पर्शव्यंजकेन हेतोर्व्यभिचागत,पृथिव्यमेजःस्पर्शाभिव्यंजकत्वाचस्पर्शनेन्द्रियस्य पृथिव्यादिकार्यन्धप्रसंगाच्च वायुस्पर्शामिव्यंजकत्वाद्वायुकार्यत्ववद एतेन चक्षुषस्तेजोरूपाभिव्यंजकत्वात्तेजःकार्यत्ववत्पृथिव्यप्स- मवायिरूपव्यंजकत्वात्पथिव्यप्कार्यत्वप्रसंगः पतिपादितः। रस- नस्य चाप्यरसाभिव्यंजकत्वादपकार्यत्ववत्पृथ्वीरसाभिव्यंजक- त्वात्पृथिवीकार्यत्वप्रसंगश्च तथा नामसं श्रोत्र रूपादिषु सन्निहि- तेषु शन्द्रस्यैवाभिव्यंजकत्वात्, यत्पुनर्न नाभसं तन्न शब्दाभि- ज्यंजकं यथा घ्राणादि, शब्दस्याभिव्यंजकं च श्रोत्रं त- स्मानाभसमित्यनुमानस्याप्यप्रयोजकत्वात् नभोगुणत्वासिद्धेः शब्दस्य समर्थनात् नभसि समवेतस्य ग्रहणासंभवात् । ततो नेन्द्रियाणि प्रतिनियतभूनप्रकृतीनि व्यवतिष्ठन्ते प्रमाणाभा- वात् प्रतिनियतेंद्रिययोग्यपुद्गलारब्धानि तु द्रव्येद्रियाणि प्रति- नियतभावेन्द्रियोपकरणत्वान्यथाऽनुपपत्तेर्भावेन्द्रियाणामेव स्प- टीकासहितं। र्शनादीनां स्पर्शादिज्ञानावरणवीर्यान्तरायक्षयोपशमविशेषला णानां स्पर्शादिप्रकाशकत्वसिद्धेरिति पौद्गलिकः शब्दः पौगलि- कद्रव्येन्द्रियाभिव्यंग्यत्वात्स्पर्शरसगन्धवर्णवत्, न पुनर्वायवीयो नभोगुणो वा सर्वगतामूर्तनित्यद्रव्यं वा प्रमाणाभावात् । प्रपं- चतः प्रतिपादितं चैतत् तत्त्वार्थालंकारे प्रतिपत्तव्यं । तेन. शब्दस्य द्रव्यं पुद्गलाख्यं बहिरंगस्य निश्चीयते, तथा च स्वद्र- व्यतः शब्दात्मकं वाक्यमस्ति न परद्रव्यतः, सर्वात्मकत्वप्रसं- गात, परद्रव्यतश्च नास्ति वाक्यं न पुनः स्वद्रव्यतस्तस्याद्र: व्यात्मकत्वप्रसंगादिति विधिप्रतिषेधात्मकं वाक्यं सिद्धम् । तथा स्वक्षेत्रकालाभ्यामस्ति वाक्यं न परक्षेत्रकालाभ्यां सर्व- क्षेत्रकालात्मकत्वप्रसंगात्, परक्षेत्रकालाभ्यामेव नास्ति न पुन: स्वक्षेत्रकालाभ्यां, तस्याक्षेत्रकालत्वापत्तेः । तदेवं सामान्यतो विधिनिषेधात्मकं वाक्यं सर्वान्तवत्कथ्यते सर्वान्तानां विधिनि- षेधाभ्यां संग्रहात, तदनात्मकस्य कस्यचिदन्तस्यासंभवात् । वि- शेषतस्तु भेदाभेदात्मकं द्रव्यपर्यायव्यक्तयात्मकत्वात् तत्र द्रव्यं शब्दः क्रियावत्वाद्वाणादिवदिति शब्दयोग्यपुदूलद्रव्यार्थादेशाद् द्रव्यत्वसिद्धिः,तथा पर्यायः शब्दःप्रादुर्भावप्रध्वंसवत्वाद्धादिव- दिति श्रवणज्ञानग्राह्यशब्दपर्यायार्थादेशादिति पर्यायवसिद्धिः। तथा विसदृशपरिणामविशेषात्मकं सदृशपरिणामसामान्यात्मक च वाक्यं शब्दद्रव्याणां शब्दपर्यायाणां च नानात्वात्परस्परा- पेक्षया समानेतरपरिणामसिद्धेर्गन्धादिद्रव्यपर्यायवदिति सर्वा- .
चुक्त्यनुशासनं। न्तवद्रावो सिद्ध द्रव्यपर्यायसामान्यविशेषेषु सर्वान्तानापन्त - वात्सर्वस्यान्तस्यन्तत्स्वभावानतिक्रपात् । नन्वेवं द्रव्यपर्यायसामान्यविशेपात्मकस्य सर्वान्तवत्वे वाक्यस्य युगपत्तथा व्यवहारप्रसंग इति न शंकनीयं, तद्गु- रणमुख्यकल्पमिति वचनात् । द्रव्यस्य हि गुणत्वकल्पनायां पयायस्य मुख्यत्वकल्पनात्पर्यायो वाक्यमिति व्यवहारः प्रव- ते पर्यायस्य तु गुणकल्पनत्वे मुख्यकल्पं द्रव्यमिति वाक्ये द्रव्यत्वव्यवहारः प्रतीयते तथा सामान्यस्य गुणकल्पत्वे विशे- षस्य मुख्यकल्पत्वाद्विशेषो वाक्यमिति व्यवतियते, विशेषस्य च गुणकल्पत्वे सामान्यस्य मुख्यकल्पनात्सामान्य वाक्यमिति व्यवहारात्, सुनिर्णीतासभद्धाधकप्रमाणात्सर्वान्तवद्वाक्यं नि- श्वीयते, संकरव्यतिकरव्यतिरेकेण सर्वान्तानां तत्र व्यवस्था- नाद्विरोधादीना तत्रानवकाशात्परम्परापेक्षत्वात् । न चैवं पर- स्परनिरपेक्षमपि सन्तिबद वाक्यं कल्पयितुं शक्य "सर्वान्तशून्य च मिथोऽनपेक्ष"मिति वचनात् । न हि विधिनिरपेक्षो निषेधो- स्ति कस्यचित्कथंचित्कचिद्विधीयमानस्यैवान्यत्राऽन्यदान्यथा निषेध्यमानत्वदर्शनात,नाऽपि निषेधनिरपेक्षोवि धिरस्ति सर्वस्य सर्वात्मकत्वप्रसंगात् । तथा न द्रव्यपर्यायौ मियोऽनपेक्षौ नत्त- द्भावान्यथानुपपत्तेः, नापि सामान्यविशेषौ मिथोऽनपेक्षौ विद्येते. सद्भावविरोधादिति .सर्वान्तशून्यं च मिथोनपेक्षं वाक्यं सिद्ध तद्विषयत्वात्परस्परनिरपेक्षाणां सर्वेषामन्तानामेकत्वादीनां नि... रूप्यमाणानां सर्वथाऽग्यसंभवात् ।
टोकासहित। १७३ तेन यदुक्तं धर्मकीर्तिना- भावा येन निरूप्यन्ते तद्रूपं नास्ति तत्वतः। यस्मादनेकमेकं च रूपं तेषां न विद्यते ॥ इति । तत् स्यावादिनामभिमतमेव । तदेतत्तु समायातं यद्वदन्ति विपश्चितः । यथा यथार्थाश्चित्यन्ते विशीर्यन्ते तथा तथा ।। इत्यादिवत् । परस्परनिरपेक्षाणां केनचिद्रूपेणार्थानां व्यवस्थापयितुपशक्यत्वात् । ततः सर्वापदामन्तकरं तवैव परमागमलक्षणं तीर्थ सकलदुर्नयानामंतकरत्वात्तत्कारणशा- रीरिकमानसिकविविधदुःखलक्षणानामापदामन्तकरत्वोपपत्तः। मिध्यादर्शननिमित्ता हि सर्वाः प्राणिनामापद इति सर्वमि- ध्यादर्शनानामन्तकरं तीर्थ सर्वापदामन्तकरं सिद्धं । तत एव निरंतं केनचिन्पिथ्यादर्शनेन विच्छेत्तुपशक्तेरविच्छेदत्व- सिद्धेः । तथा सर्वोदयं तीर्थमिदं तवैव सर्वेषामभ्युदयकार- णानां सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रभेदानां हेतुत्वादभ्युदयहेतुत्वोप- पत्तेः। सर्व उदयोऽभ्युदयोऽस्मादिति सर्वोदयं तीर्थमिदं तवै- वेति वचनात् । परेपां तदसंभवः सिद्ध एव । ननु परोऽप्येवं यान्गत्म्यवादिन एव तीर्थ सर्वोदयं सर्वापदामन्तकरं न पुनः परेपामिति । तदुक्तम्- साहंकारे मनसि न शमं याति जन्मप्रवधो नाहंकारश्चलति हृदयादात्मदृष्टौ च सत्याम् । अन्यः शास्ता जगति च यतो नास्ति नैरात्म्यवादा- पुक्त्यनुशासनं। भन्नान्यस्तस्मौदुपशमविधेस्त्वन्मतादस्ति मार्गः ।। इति तथाऽन्यः परमात्मवादी ब्रूयात्परमब्रह्मण एव तीर्थ स- बोदयं न परेषां नैरात्म्यवाद्यादीनां तत्र संशयहेतुत्वात् । तथा चोक्तम्- यो लोकाज्वलयत्यनल्पमहिमा सोऽप्येष तेजोनिधि- यस्मिन्सत्यवभाति नासति पुनर्देवोंऽशुपाली स्वयम् । तस्मिन्बोधमयप्रकाशविशदे मोहान्धकारापहे, येऽन्तर्यामिनि पूरुपे प्रतिहताः संशेरते ते हताः ।। एवमन्योपीश्वरवादीश्वरादेरेव तीर्थ सर्वोदयमिति स्या- द्वादितीर्थमनेकधा द्वेष्टि । सोऽपि- कामं द्विषन्नप्युपपत्तिचक्षुः समीक्षतां ते समदृष्टिरिष्टम् । त्वयि ध्रुवं खंडितमान,गो भवत्यभद्रोऽपि समन्तभद्रः ॥ ६३॥ टीका-कामं यथेष्टं स्वदुरागमवामनावशीकृतान्ताक- रणः सर्वथैकान्तवादी द्विषन्नपि तवानेकान्तामृतसमुद्रस्य तीर्थ दर्शनमोहोदयाकुलितबुद्धिस्ते तवेष्टमनेकान्तात्मकमन्तर्वहिथ जीवादितत्वं समीक्षतां परीक्षतां समदृष्टि सन्मध्यस्थत्तिरुपप- तिचक्षुर्भूत्वा, मात्सर्यचक्षुपस्तत्वसमीक्षायामनधिकारादसमह- ऐश्च रागद्वेषकलुषितात्मन इत्युभयविशेषणवचनमुपपत्तिचक्षुः स- -मदृष्टिरिति, स तथा समीक्षमाणस्तवेष्ट शासनं त्वय्येव भगवति टोकासहितं। खंडितमान,गो भवति ध्रुवमिति संबंधः । मानो हि सवेथे- कान्ताभिमानः स एव शृंगं स्वाश्रयस्य विवेकशून्यतया पशुकर- णात, खंडितं प्रतिध्वस्त मानशृंगं यस्य स खंडितमानभंगः, यरित्यक्तसर्वथैकान्ताभिमान इत्यर्थः । तथा चाऽभद्रोऽपि मिथ्यादृष्टिरपि समंतभद्रः समन्ततः सम्यग्दृष्टिर्भवतीति तात्पर्य । अभद्रं हि संसारदुःखमनंतं तत्कारणत्वान्मिथ्याद- र्शनमभद्रं तद्योगान्मिथ्यादृष्टिरभद्र इति कथ्यते स च ममदृष्टि- भूत्वोपपत्तिचक्षुषा समीक्षमाणस्तवैवेष्टं श्रद्वत्ते सर्वथैकान्त- वादीष्टस्योपपत्तिशून्गत्वात्तत्रोपपत्तीनां मिथ्यात्वाचदभिमा- नविनाशात् , तथा तवेष्टं श्रद्दयानश्च मम्यग्दृष्टिः स्यात्समन्ताद्भ- द्रस्य कल्याणस्यानंतसुखकारणस्य सम्यग्दर्शनस्य प्रादुर्भावा- समन्तभद्रो भवत्येव । सति दर्शनमोहविगमे परीक्षायास्तका- रणत्वात् , तत्वपरीक्षा हि कुतश्चित्परीक्ष्यज्ञानावरणवीर्यान्तरा- यक्षयोपशमविशेषात्कस्यचित्कदाचित्कथंचित् प्रवर्तेत, सा च प्रवर्तमाना तचनिश्चयमतत्त्वव्यवच्छेदेन घटयति, तद्धटना च दर्शनमोहोपशमक्षयक्षयोपशमसद्भावे तत्त्वश्रद्धानं सम्यग्दर्शनं प्रादुर्भावयति । तेनोपपत्तिवनुषा समीक्षां विदधानः सम्यग्दृष्टिः समंतभद्रः स्यादिति प्रतिपद्येमहि वाधकाभावात् । न हि परी- क्षायामुपपत्तिवलान्नैरात्म्यमेवोपशमविधेर्गि इति व्यवतिष्ठते । स्यान्मतं, जन्ममबंधस्य कारणमहंकारस्तद्भावे भावात्तद- भावे चाभावात्तस्य चाहंकारस्य कारणमात्मदृष्टिः, सा च- नैरात्म्यभावनया नविरुद्धया प्रशम्यते तदुपशमाचाहंकारश्चे. .
युक्त्यनुशासनं । तसि समूलतलीपशाम्यति तदुपशमाच्च देहिनां जन्मप्रबंध- स्योपशमो निश्चीयते तेन तत्कारणाभावात्तेनोपपत्तिवलादेवो- पशमविधेनैरात्म्यभावनैव मार्गः समवतिष्ठते । तदसदेव, प्रा- त्मदर्शनस्यैव जन्मप्रबंधोपशमविधिमार्गत्वोपपत्तेस्तथा हि-ज- न्मप्रबंधस्य हेतुरहंकारो मोहोदयनिमिनोऽहंतामात्रनिमित्तो वा ? प्रथमपक्षे नात्मदृष्टिहेतुकः स्यादविद्यातृष्णाक्षयेऽपि चि- तमात्रनिबंधनत्वप्रसंगात् । सत्येवाविद्यावृष्णोदये चित्तमहंका- रस्य हेतुरिति चेत्, तर्हि सत्येव मोहोदयेऽहंकारहेतुरात्मदृष्टि- रिति किमनुपपन्नं । द्वितीयपक्षे तु युक्तिविरोधः, संसारस्याहं- तामात्रनिमित्तन्वे मुक्तस्यापि संमारप्रसंगात् , ततो नाहतामात्रं जन्मप्रवंचहेतुरविद्यावृष्णाशून्यत्वात्सुगतचित्ताहंतामात्रवदित्यु- पपत्याऽहतामानहेतुत्वं ससारस्य वाध्यत एव । न च सुगतचि. चस्याहंतामात्रमपि नास्तीति युक्तं वक्तुं, स्वसंवेदनस्याहे सु- गत इति प्रतिभासमानस्याभावप्रसंगात् । न ह्यहमिति विक- ल्पोऽहंतामात्रं सकलविकल्पशून्यस्य योगिनस्तदसंभवात्, ना- ऽप्यहमस्य स्वामीति ममेदभावोऽहंतामात्रं तस्य मोहोदयनि- तस्य क्षीणमोहे योगिनि संभवाभावात् । ततो न साध्यशृन्यो दृष्टान्तः साधनशुन्यो वा सुगतचित्ते स्वयमविद्यातृष्ण'शून्य- त्वस्य सौगतैरभीष्टत्व त् । नन्वात्पदृष्टेरविद्यावृष्णाशून्यत्वास- भवादात्मदृष्टेरेवाविद्यात्वादविद्याया एव च तृष्णाहेतुत्वादविद्या- तृष्णाशून्यत्वमसिद्धमेवेति चेत्, नात्मदृष्टेरविद्यावासिद्धेश्चित्त- क्षणदृष्टिवत् यथैव हि प्रतिक्षणं चित्तदर्शनं विद्या तदन्तरेण श टोकासहित। बुद्धिसंचरणानुपपत्तेस्तथानाद्यनंतात्मदृष्टिरपि तदभावेऽहंताप- त्यभिज्ञानस्यानुपपत्तेः । चित्तसंतानोऽहंतमित्यभिज्ञानहेतुरिति चेत् न, तम्यावस्तुत्वात् , वस्तुत्वे वा स एवात्मा स्यानाम- मात्रभेदात् । ततः कथंचिन्नित्यस्य क्षणिकस्य चात्मनो दर्श- रहंकारनिबंधनजन्मप्रन्यस्य मोहहेतुकाहंकारनिवृत्तिहेतुत्वसिद्धे मस्याविद्यातृष्णाशूबंधस्योपशमोपपत्तेर्न नैरात्म्यभावनोपशम- विधर्मार्गः सिध्येत्पुरुषाद्वैतभावनावत् । न हि पुरुष द्वैते संसारमोक्षतत्कारणसंभवो द्वैतप्रसंगात् । नाऽपि केचिल्लोकाः सन्ति तेजोनिधिर्वा यस्तान् ज्वालयति भाति च परमात्मनि सत्येव नासतीति मोहान्धकारापहो बोध- मयप्रकाशविशदोऽन्तर्यामी पुरुषः सिद्धयेत् , तस्मिंश्च ये संशे- रते ते हताः स्युः । सर्वस्यास्य प्रपंचस्यानाद्यविद्यावलात्परिक- ल्पने च न परमार्थतः कश्चिदुपशमविधेर्मार्गः स्यान्नैरात्म्यदर्श- नवत् । एतेनेश्वरादिरेवोपशमविधेर्मार्ग इति ब्रुवनिरस्तः, तस्या- प्युपपत्तिवाधितत्वात्सुगतादिवदित्याप्तपरीक्षायां 'विस्तरतस्त- वार्थालंकारे च निरूपितं ततः प्रतिपत्तव्यं । नन्वेवं भगवति वर्द्धमाने रागादेव भवतां स्तोत्रं द्वेषादेव चान्येषु दोषोद्भावनं न पुनः परमार्थत इत्याशंका निराकुर्वन्तो वृत्तमाहुः-- न रागानः स्तोत्रं भवति भवपाशच्छिदि मुनी न चान्येषु द्वेषादपगुणकथाभ्यासखलता।
युफ्त्यनुशासनं। किमु'न्यायान्यायप्रकृतगुणदोषज्ञमनसां हितान्वेषोपायस्तव गुणकथासंगगदितः ॥६॥ टीका--न रागानोऽस्माकं परीक्षाप्रधानानां भवति व- र्द्धमाने 'स्तोत्र प्रवृत्त कीर्त्या महत्या भुवि वर्धमानमित्यादिकं भवतो मुनेर्भवपाशच्छेदित्वात्तदर्थितया स्तोत्रस्योपपत्तेः, न चा- न्येष्वनेकान्तवादिपु द्वैपादेवापगुणकथाभ्यासेन खलता न- स्तत एव किमुत न्यायान्यायज्ञमनसां प्रकृतगुणटोपज्ञमनसां च च हिताहितान्वेषणोपायस्तव गुणकथासंगेन गदित इति ना- प्रेक्षापूर्वकारिता सुरेः, श्रद्धागुणज्ञतयोरेव परमात्मस्तोत्रे युक्तथ- नुशासने प्रयोजकत्वात् । साम्प्रतं स्तोत्रफलं सूरयः प्रार्थयन्ति । इति स्तुत्यः स्तुत्यैस्त्रिदशमुनिमुख्यैः प्राणहितैः स्तुतः शक्तया श्रेय पदमधिगतस्त्वं जिन मया। महावीरो वीरो दुरितपरसेनाभिविजये विधेया मे भक्तिः पथि भवत एवाप्रतिनिधौ।६५ टीका-भवतो जिनस्य पथि मार्गे सम्यग्दर्शनज्ञानचारि- त्रलक्षणेप्रतिनिधौ-प्रनिनिधिरहितेऽन्ययोगव्यवच्छेदेन नि- गीते भक्तिमाराधनां विधेयास्त्वं जिन १ मे भगवन्निति स्तो- त्रफलप्रार्थना परमनिर्वाणफलस्य तन्मूलत्वात् । कुतः स्वपथि भक्ति विधेयास्त्वमिति चेत्, यतो दुरितपरसेनाभिविजये वी- रस्त्वं यतश्च महावीरः श्रेयःपदमधिगतत्वात् यतश्च स्तुतः -शक्तया मयेति । कस्मात्वं स्तुत इति चेत् , स्तुत्यो यस्मात् , 4 J - टीकासहितं । १७६ स्वयं स्तुत्यैरपि त्रिदशमुख्यैः सुरेन्द्रमुनिमुख्यैश्च गणधरदेवा- दिभिः प्रणिहितैरेकाग्रमनस्कैरिति हेतुहेतुमद्भावेन पदघटना विधेया । नहि दुरितपरसेनाभिविजयो वीरत्वमन्तरेण संभव- ति, अवीरेषु वीर्यातिशयशून्येषु तदघटनात् , यतोऽयं वीरत्वे. नानतवीर्यत्वलक्षणे साध्ये हेतुर्न स्यात् । न चायं कर्मरिपुसे- नाभिविजयो जिनम्यासिद्ध एव । "त्वं शुद्धिशक्तयोरुदयस्य काष्ठां तुलाव्यतीतां जिन ? शान्तिरूपाम् । अवापिथ ब्रह्मपथस्य नेता महानितीयत्पति- बक्तुमीशा:" ॥ इत्यनेन तस्य साधितत्वात् । तथा महावीरत्वे सकल- वीराधिपतित्वलक्षणे साध्ये श्रेयःपदाधिगतस्यापि हेतुत्वमुप- पन्नमेव तदंतरेण तदनुपपत्तेः । न च भगवतः श्रेयःपदाधि- गतत्वमसिद्धं ब्रह्मपथस्य नेतेत्यनेन तस्य साधनात् । तथाऽ- न्येषां स्तुत्यैस्विदशमुख्यमुनिमुख्यैश्च प्रणिहितैरनन्यमनोवृत्ति- भिः स्तुत्यत्वे साध्ये महीवीरत्वं हेतुरुपपद्यत एवान्यस्य तैर- स्तुत्यस्य महावीरत्वानुपपत्तेरिति यः स्तुतिगोचरत्वं निनीपुरा- चार्यो भगवंतं वीरमासीत् (?) तेन स्तुतो भगवानेवेति भगवत एव पथि भक्ति प्रार्थितवान् , तस्याप्रतिनिधित्वातदाराधनाप्राप्तौ कर्मरिपुसेनाभिविजयस्य तत्कार्यस्य संप्राप्तिसिद्धेश्च श्रेयाप- दाधिगमोपपत्तेजिनत्वस्योपमेयस्यावश्यंभावित्वात् । कथं पुन- रसौ भगवतः पन्थाः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मको प्रतिनि- धिः सिद्ध इति चेत् । तदपरस्य ज्ञानमात्रस्य वैराग्यमात्रस्य पत्पनुशासन। वा तदुभयमानस्याचा परमात्मोपायस्यासंभवात्, सकलसंसा- कारण हि मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्रलक्षणं तत्कयं ज्ञानमा- प्रानिवर्तते मिथ्याज्ञानस्यैव ततो निहत्तेः, न च मिथ्याज्ञाननि- हतौ रागादिदोपादिकं मिथ्याचारित्रं निवर्तते; समुत्पन्नतत्त्व- ज्ञानस्यापि रागादिदोपसद्भावसिद्धेः । प्रक्षीणमोहात्तवनाना- नितिरिति चेत्, स एव मोहप्रक्षयः कुतः स्यात् । तस्वज्ञा- नातिशयादेवेति चेत् कः पुनस्तत्त्वज्ञानातिशयः प्रक्षीणमोहत्व- मिति चेत्, परस्पराश्रयः सति मोहप्रक्षये तत्त्वज्ञानातिशया सति वाऽतिशये मोहप्रक्षय इति । साक्षात्सकलपदार्थपरिच्छे- दित्वं तत्त्वज्ञानातिशय इति चेत् ; तत्कुतः सिद्धयेत् ? धर्मवि- शेपादिति चेत् ; सोऽपि कुतः स्यात् ? समाधिविशेषादिति चेत् , स एव समाधिविशेषस्तत्त्वज्ञानादन्यो वा तत्त्वज्ञानमेव स्थिरीभूतं समाधिरिति चेत्, तत्किमागमज्ञानं योगिज्ञानं वा! यद्यागमज्ञान दुःखजन्मपत्तिदोषमिथ्याज्ञानानां कार्यकारण- भावविषयं तदा न्यायदर्शनविदां तदस्तीति धर्मविशेष जन- येत् । स च योगिज्ञानमिति तद्भव एव मुक्तिप्रसंगः । अथ योगिज्ञानं समाधिविशेषस्तदेवेतरेतराश्रयः स्यात्-सति योगिज्ञाने स्थिरीभूते समाधिविशेषे धर्मविशेषः, तस्माच्च यथोक्तः समा- धिविशेष इति नैकस्यापि प्रसिद्धिः। यदि पुनस्तत्त्वज्ञानादन्य एव समाधिविशेषस्तदा स कोऽन्योऽन्यत्र सम्यक्चारित्रात् । सम्यक्चारित्रोपहितादेव तत्त्वज्ञानात्तत्त्वश्रद्धानाविनाभाविनः संसारकारणत्रयस्य परिक्षया सिद्धयेत् , न तत्वज्ञानादेव केवला " टोकासहित। दतोन तत्सकलसंसारहेतुप्रतिपक्षा, नाऽपि वैराग्यं तत्प्रतिपक्षः कस्यचिन्मूर्खस्य तपस्विनः सत्यपि वैराग्ये मिथ्याज्ञानस्य स- द्भावात् । तत्वज्ञानमेव वैराग्यं तस्मिन्सति मिथ्याज्ञानस्य संसा- रकारणस्य निवृत्तेस्तदेव संसारकारणप्रतिपक्षभूतमिति चेत् , किं पुनस्तत्परं तत्त्वज्ञानं । रागादिदोषरहितं तत्त्वज्ञानमिति चेत्, तर्हि सम्यक्चारित्रं तत्त्वज्ञानसहितं तत्त्वश्रद्धानाविना भावि संसारकारणपतिद्वन्द्वि सिद्धं, न पुनर्वैराग्यमात्र, एतेन तदुभयमात्रस्य संसारकारणपतिद्वन्द्वित्वमपास्तं तत्त्वश्रद्धानशू- न्यस्य तदुभयस्यापि संसारहेतुन्वदर्शनात् । सति श्रद्धाविशेषे तत्त्वज्ञानपूर्वकं वैराग्यं न पुनस्तत्वश्रद्धानशून्यं तस्य वैराग्या भासत्वादिति चेत् , तर्हि सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रत्रयमेव संसा- रकारणस्य मिथ्यादर्शनमिथ्याज्ञानमिथ्याचारित्ररूपस्य त्रया- स्मकस्य त्रयात्मकेनैव प्रतिद्वन्द्विना निवर्तयितुं शक्यत्वात् । मिथ्याज्ञानस्यैव विपरीतत्वाभिनिवेशविपरीताचरणकरणशक्ति- युक्तस्यैकस्य संसारकारणत्वव्यवस्थायां तु तत्त्वज्ञानमेव तत्व- श्रद्धानसम्यगाचरणशक्तियुक्न तन्निवर्तकमिति युक्तमुत्पश्या- मस्तत्त्वज्ञानस्य तत्त्वप्रकाशनशक्तिरूपत्वात्, तत्त्वश्रद्धानशक्तेः सम्यग्दर्शनत्वात्सम्यगाचरणशक्तेः सम्यक्चारित्रत्वात् त्रयात्म- कत्वानतिक्रमात् , संसारकारणस्य मिथ्याज्ञानस्य विपरीततत्त्व- प्रकाशन विपरीताभिनिवेशविपरीताचरणशक्तधात्मनस्तथात्मक- त्वानतिक्रमवत् । ततः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रात्मक एक परमात्मत्वस्य युक्त्यनुशासनं । अंगा: समहतिष्ठते न ज्ञानमात्रादिरिति स एवाप्रतिनिधिः सिद्धा ततस्तत्रैव भक्ति प्रार्थयमानः समन्तभद्रस्वामी न प्रेक्षा- पूर्वकारितां परित्यजतीति प्रतिपत्तव्यम् । स्थेयाज्जातजयध्वजाप्रतिनिधिः प्रोदभूतभूरिप्रभुः, प्रध्वस्ताखिलदुर्नयद्विषदिभः सन्नीतिसामर्थ्यतः । सन्मार्गस्त्रिविधः कुमार्गपथनोऽर्हन्वीरनाथः श्रिये शश्वसंस्तुतिगोचरोऽनघधियां श्रीसत्यवाक्याधिपः । श्रीमद्वीरजिनेश्वरामलगुणस्तोत्रं परीक्षेक्षणैः साक्षात्स्वामिसमन्तभद्रगुरुभिस्तत्व समीक्ष्याखिलम् । प्रोक्तं युक्तयनुशासनं विजयिभिः स्याद्वादमार्गानुगै- विद्यानंदबुधैरलंकृतमिदं श्रीसत्यवाक्याधिपः ॥२॥ इति श्रीमद्विधानद्याचार्यकृतो' युक्तयनुशासनालङ्कारः समाप्तः। . Bap 18 क समाप्तोऽयं ग्रंथः Boss Mastanasam0E
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