Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Garamay Shiksha Ka Itihas
Front matter
No text on this page.
ग्राम्य-शिक्षा का इतिहास लेसक- श्रीनारायण चतुर्वेदी, एम० ए० (लन्दन ) ० पी० एजुकेशनल मरिम प्रकारार- सरस्वती पब्लिशिङ्ग हाउस, इलाहाबाद १९३% पाला सरकार [RRY प्रकाशक- सरस्वती पब्लिशिङ्ग हाउस, जार्ज टाउन, इलाहाबाद मुद्रक- परशोतम सहाय, सरस्वती पिण्टिङ्ग प्रेस, जार्ज टाउन, इलाहाबाद भूमिका जिस समय मैंने अपने प्राठ की शिक्षा के माध्यमिक रिमाग को दोड़ कर प्राइमरी विभाग को अपना कार्य क्षेत्र पनाया, उस समय मुझे अनुभव हुमा कि मैं बिय पेय में उतर रहा था, मुझे उसके इतिहास सामान प्राय मिलकुल नहीं था। इसलिए मैन इस प्रान्त की प्राइमरी शिपा को अपना अध्ययन-विषय बना लिया। मुविधानुसार मैं ने अपने मापयन को तीन घों में विमा किया । मन् १८४० से ११२६ वक के प्राम्य शिक्षा के इतिहास की प्रमागत वियिवार प्राति के यर्दन को मन प्रथम स्थान दिया । फिर मैंने उसी को वर्तमान समय तक, उपति के मम मे अपपन कर दूसरा विषय पनाया और तीसरे को प्राम्य-विषा का समस्यापों को मुलझाने को रटि से भरना सम्मति मस्ट करने का माधार बनाया। इस प्रकार प्रस्तुत पुस्तक मेरे पापपन के प्रथम भय पा परिपाम है। मयुर प्रान्त की प्राम्य शिक्षा के इतिहास की बातें अनुभम से देते हुए, उसके मुण्य मा को पारकों के सामने रम देना होमप्रस ध्येय है। पचपि सन् १२१ में २ काजीपाना इविकास पष्टि से रिलाल नवान, टो मी, घकि सन् १३२९ में ही अनिवार्य गिताका मिदान्त दुमा, उस समय पाटों का ममावेशर देना भारपाया।
(२)
पाठकों को इस पुस्तक
में
सयुक्त-भात की शिक्षा-सम्बधी
समस्यायों पर कुछ निश्चयात्मक विचार, उसके भविष्य की रूपरेखा या
यावत् विषयक किसी प्रकार की सुधार योजनाएँ न मिलेंगी। मेरा
विचार इन सब बातों को इसी विषय पर लिसा जाने वाली आय दो
पुस्तकों में विशद रूप में देने का है।
इस विषय के अध्ययन में मुझे ढा० जे० डोवर विक्सन, एम० ए०,
सी.लिट्, सरकार टि ला प्रोस, नाइट, सी० आई० ई०, थोर
मिस्टर ए० ई. ट्वे टीमैन, एम० ए०, थादि ने अनक सत् परामश दिये
है, जिसके लिए मैं उन सज्जनों का यहा प्रभारी हूँ।
श्रीनारायण चतुर्वेदी
विषय सूची पृट-मस्या प्रस्तावना . १ १३ पहला अध्याय-ग्रामनियानी रमा साधन--उसका मायरताप दुसरा अध्याय-शिना या प्राचीन मम चीर शारसी के स्न-उधे दरन केसून-विधार्थी- गिताका बिम्नारदमा स्कूलों को शिक्षा-माधीन शिक्षा प्रपाली के प्रधान लापों पर एक टि-अनुगमन- ममालोपना- तीसग अध्याय-प्रारम्भिक उद्योग- मान्लीप मापा ३ महता-जमीन पन्दोवस्त्र का विश प्रसार म माम्प-शिश मार के विस्तार की जांच- देमा पाठरसामों । उरणगिता - महाव-पमा उपध्म र प्रोग्यापर-1 की जिमग प्रया-विता-सम्पपी मपी मोरना-पोजनामीपस्थी. शि-दूसरी पोगरा-पोनादि- ( ४ ) पृष्ठ सख्या E चौथा अध्याय-व्यवस्थापन और एकीकरण (१८५० १२ ई०) अधिकारी वर्ग फा शिक्षा पद्धति पर प्रभाव-प्रारम्भिक कठिनाइयाँ -उध नातियाँ और उनके भाव में परिवतन-- शिक्षा प्रसार पर इस परिस्थिति का प्रभाव-देसी भापायों के विरुद्ध भावना-तीन लिपियों से कठिनाइयों और शालोपयोगी पुस्तकों का अभाव योग्य अध्यापकों और इन्स्पेक्टरों के अभाव की कठिनाइयाँ-रीड साहय का कार्य-तहसीली स्तूझ-इनाय दी स्कूल-देसी मदरसो की अवनवि-सन् १८५४ का खराता-शिधा-कर-शिश कर का पूर्व रूप-शिक्षा-वर का मालगुजारी में जोड़ा जाना-इस्तमरारी पदोबस्त के जिलों में शिक्षा कर- शिक्षा-कर के निय प्रण के लिए जमीदारों का मांग- सरकार का सव-स्कूल कमिटियों की स्थापना-स्कूल कमिटियों को असफलता-नयी कमिटियों का रख-सन् १८८२ की अवस्या- पांचवां अध्याय-सन् १८५२८३ का शिता-यमीशन १८५४ ई. के वरीते पर कितना अमल हुमा-शिक्षा प्रचार की मद उसति-कमीरान की सिशरिरॉ-हमारे प्रान्त के सम्बन्ध में विशेष सिप्रारिश-~- ह-सस्था १६. छटा अध्याय-सन् १८८२ पाने कमीशन के याद की उन्नति जिला पोड़ों के मधिकार में गांवों की प्रारम्भिक प्रयस्था- यो काधनाम य मम्वधी कठिनाइयाँ-देवात में प्राइवेट सूजों की सफलता के कारण-९वीं शतान्दा कमत में प्राइमरी हलकावदी स्कूलों की यस्या-जन साधारण सफ शिक्षा का न पहुँचना-धन की थावश्यकता- साता अध्याय-उन्नति का युग १५वीं सदा के अन्त में देरातों में होने वाले सामाजिय सपा प्राधिक रिक्तन-हमारे मा त में शिक्षा का मद गति-नामाव-शिपा विमाग और इमदादा मदरम- इमदादी पनों की शिक्षा फी घालोपना-देहाता स्कूलों के पाव्य-ग्रम में उग्रति करने को घेग-सन् १९०१ में लाकान का शिधा-सम्बन्धी प्रस्ताव- पाटा अध्याय-अनियायता पा सूत्रपान शिया पर राशनाति का प्रभाव-विरोधी मठामन-शिरा को प्रामीप रूप देन की गएं-महासमर का प्रभाव- मया सामन-मुधार- नयाँ अध्याय-प्रारम्भिर शिक्षा की उन्नति की प्रगति पर पुध विचार २०४ पृष्ठ सरया पहला परिशिष्ट २२० लडकियों की शिक्षा- दूसरा परिशिष्ट २६५ अध्यापकों का शिक्षण- तीसरा परिशिष्ट ग्राम्य शिता या नियत्रण- चौथा परिशिष्ट पारशाला जाने योग्य बालकों की अवस्था- पाचन परिशिष्ट प्राचीय दाइरेण्टर और शिशाम घटा परिशिष्ट कुछ यावश्यक तालिकाएं- २५० प्रस्तावना हमारे देश पगाँग म रहने बाल तन मुदाय की शिक्षा की समस परल स्थानीय नहा है, गल्ल उमा सम्बध सारे निश सामान और अतराष्ट्र स भी है । भारतपय म सारे ससार थी जनमाना गयाटग भाग मौजूद है शीर निटिंग-साम्राग्य की जन साया का दौनिहारिग जनमानाम प्राय १०० म से .. मनुष्य गाँस रहने वाले है । यार हमार देशपाधी मुसहव है और हमारी सभ्यता रनार यर या पुगनी हा गया है,रि भी हमारे यहाँ इस समय निरवाता और पार अविद्या का सामान्य है. यहाँ तक HT१६३१ म हमारे यहाँ की सादरता का अनुमान (स्त्री और पुल दान मिला कर)प्रतिशत से अधिक नहीं था। यह निरतरता हमारे लिए लाना ही नहा है, पलि यही रिना ना मी है, स्याकि हमारे यहाँ ये प्रपद, गदि मस्त और मीच-साद रिमानों में हर मार, मा आन्दोलन प्रचार हो गया है और ऐसी परिस्थिति में इनकी নবীন কাল যব ( লি, যা বাবা যান্তি निर मापद समास। म देश का पिछले २० वर्षका परिवार हमारे इस कपन का मनाए है।
जनसंख्या के विचार से, भारतवर्ष म हमारे प्रा 1 का दूसरा नम्बर है और हमारे यहाँ की जनसरया म १०० पीछे ८६ मनुष्य गाँव निरासी हैं। इस कारण से हमारे यहाँ की ग्रामीण जनता की समस्या यहुत महत्त्वपूर्ण है। और चूँकि हमारे यहाँ की जनता बहुत कम साक्षर है, इसलिए सार्वजनिक शिक्षा की समस्या वास्तव में प्रारम्भिक शिक्षा की समस्या ही है। अँगरेजा के अधिकार होने के पूर ही से हमारे प्रान्त म जन-साधारण की शिक्षा की वही अधागति भी, परतु पिछली शताब्दी के अन्तिम ५० वर्षा से अब तर निरिश सरकार ने ग्राम्य-क्षेत्रों में शिक्षा प्रचार की बहुत कुछ चेग की है। हमारे यहाँ की देसी पाठशालाएँ, यद्यपि उस समय मी, बहुत कुछ अवनत हो गयी था, रि भी वे उन लोग की शिक्षा के लिए मुविधा प्रदान करने के लिए कापी थी, जो उस समय पढने के अभिलापी थे । इनम से चुछ तो अवश्य ही ऊँचे दरले की यो, लेकिन अधिकाँश छार्टी छाटी ग्रामीण पाठशालाएँ ही था, जिनमें नित्य प्रति की साधारण परतु व्यावहारिक शिक्षा दी जाती थी। इन पाठशालाओं की शिक्षा का रिद्याथिया श्राचरण पर बड़ा गहरा प्रभार पड़ता था। निटिश सरकार को शुरू म यह नीति रही किरही पाटशालाया द्वारा नयी शिक्षा प्रदान करने का प्राव किया जाय, तारि गौर की जनता नये काना को और उनरे द्वारा प्रात हाने गले श्ररने अधिकारी और अपो उत्तरशयित्व को समम मरे। परतु थोड़े ही समय याद सरकारी पाटशालाएँ स्थापित करने की नीति जारी हो गयी, निनमें
नि शुल्क शिक्षा दिये जाने के कारण लोग बड़ी उत्सुकता से पहुंचने लगे।
य दो तरह की पाठशालाएँ एक साथ जारी न रह सकती थी और परिणान
यह हुआ कि देसी पाटयालाएं अधिकाधक सख्या महान लगा।
इसका प्रभार यहाँ तक पैला कि इन सरकारा पाटयालाया की तरह
सरी, सरकार सदारता स चलने गाली पाठशालाएँ भी न पनप सका।
इसका कारण यह था कि हमार प्रान्त म जन-साधारण र उद्यान ते
शिक्षा की देसी उचन व्यस्था न हा सका, नेसी सरकार द्वारा हाती थी
और चूँकि पाठशालाग्रा क काय-कम म कायापयुनता का हा सर से
अधिक विचार रखा जाता है, इसलिए देसी मरसार न सहायता प्राप्त
सूल यदुत अधिक न चल सर।
सारा शिक्षा र सरकार का दाग में हाती थी, परन्नु सरकार
भी जनसाधारणका सहयात पात करने लिए उत्नुक थी और इसी
उदे स पहले सून सामरियाँ और रि तिला कमिटिग श्रादि
बनाकर प्रयास किय गय| इसर बाद जाम स्वायर शासन
का सिद्धान्त स्वीकृत ग्रा, प्राम्य शिक्षा का प्राय अधिकाधिक में
जनता द्वारा निगाचत सदर का दम रेगमहान लादाँ ताकि
श्रर प्रामाग शिक्षा का समन्न शासन पाय निरिएक्ट राहों के हाथ में
श्रा है ना अब 7 करत जन धार द्वारा निवाचित मरयाएँ
हैं और रि १२.३० साउन मुभार कमर नेता शिक्षा की
नादि और उसका प्राविमा मारा अधिगर भारतार गिजानना
अविरार न पागा, वापर प्रान मागे लिए जनता द्वारा
मनानीवनरस्पानिया समाप्रति उचरदापी है।
अगर जरा गौर से देसा जाय तो हमारे प्रान्त के अधिकारियों ने शिक्षा से जनसाधारण म अधिकाधिक प्रसार करने की अपेक्षा उसके लक्षण-गुण पर अधिक ध्यान दिया है, यद्यपि हमारे यहाँ के पाठ्यक्रम म पर उनति होती रही है और उसे जनसाधारण की श्रावश्याताया के अनुसार उपयोगी बनाने का प्रयत्न भी किया जाता रहा है। इसी उद्देश्य से प्रेरित हो कर देसी स्कूला के अध्यापकों के शिक्षण, उनके वेतन और उनकी भविष्यानति की योर भी शिक्षा विभाग का दरार ध्यान रहा है। स्तूला की इमारतें, उनका सात-सामान और उनम पढ़ने वाल रियाथिया क लिए उपयुक्त पाठ्य पुस्तकें तैयार कराने की यार भी उनतिकारी चेष्टाएँ हाती रही हैं और इस प्रकार अरश्य ही ग्राम्य शिक्षा प्रसार की नाव यरावर मुद्दढ़ और मुमगटित ननायी गयी है। परन्तु इस शिक्षा प्रसार का पारणाम हमारे यहाँ की शिक्षा प्राप्त लोगा की सख्या को देखते हुए कुछ अधिक उत्साहपदक नहा है । हमारी सरकार लामारकारी शिक्षा का ही प्रयध र सस्ती थी और यह उसने कर ही दिया, परन्तु यह लागा का इसमा उपयोग करने के लिए याध्य नहा र सस्ता । हमारे प्रान्त की शिक्षा कुछ विशेष जातियों तथा कुछ विशर वृत्तियां + लागा तक ही परिमित थी और जब तक इन लागा की मांग पूरी नहीं हो गयी, जितनी बार शिक्षा प्रसार के लिए अधिकाधिक व्यय की माँग परा की गयी, शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्या थिया की सल्ला भी बदती गती, परन्तु माम्य शिक्षा विस्तार के लिए जा नयी याजनाएँ उपस्थित की गरी, उन्हाने नयी मांग उत्पन्न करने से विपरीत पूचि ही यदाने का काम किया और इसलिए इतना सब कुछ होते हुए भी सभी वफ वह दिन निस्ट नहां या पाया, पर हमारे देश म साक्षरता देशव्यापी हो जाय । इन नये खूला मजिस प्रकार की शिक्षा दी जाती थी, उसरा पार ग्रामीण जनता का यहुत अधिक आकर्षण न होने क प्राधिक और सामाजिक कारण है, क्या वे लाग भी जो अपने गलस सदन सूला म पढ़ाने के लिए भेजते रहे हैं. दहा वारणा से पाध्य हा र उह यहुत अधिक समय तक नहीं पढ़ा सके और इस कारण इन स्खला की शिक्षा से पूरा-पूरा लाभ नहीं उठा सके। इस प्रकार कल यपनी प्रचि हो के कारण शिक्षा ग्रहण करने की लोगा की निग्लता प्रकट हो गयी और ऐसी परिस्थिति में शिक्षा को अनेरार्य कर देने सिराय फोर दूसरा उपाय न रह गया । इस प्रकार हमारे प्रान्त ममाम्य शिक्षा का इतिहास यास्तर म देसी भाषाओं की शिक्षा की नीर का मुद्दद करने के सफल प्रयास का ही लेगा कहा जा सकता है। हमारे यहाँ से प्रारम्भिक और मिडिल मूल, दूसरे प्रान्ता के अधिकार ऐसे ही सूलों स, अपने विद्याधिरा की सान्या का धार पर, और पिसी भाव म कम नहीं है और इस सग्या वृदि की मन्दानति के लिए हमारे यहाँ का शिक्षा विभाग उचरदायी नहीं है, क्योकि किसी भी देश म अनिरापता परिना विद्या का प्रचार नसाधारय म नहीं हो सका है। हमारी सरकार सिमान्त रूप से अनिय शिक्षा ये विराध में नहीं थी, लेकिन अधिक पर्ने और लागा पर दसार और जोर शुल्म फे भर से इसका सूत्रात करन से हिचस्ती था। दूसरे, सरकार का पर भी निरास या रियनिगता का समय अभी नहीं आया।
( १२) १६२६ इ. म अन्ततोगत्वा इस अनियता का भी श्रीगणेश हो ग- और यब गिला चोर्ड और म्युनिस्पिल मोर्ड सस्थाओं को इस बा का अधिकार प्रास हो गया है कि वे जहाँ चाहे, अनिवार्य शिक्षा के प्रसार करें। इस प्रकार १६२६ इ० म हमारे प्रान्त के ग्राम्य क्षेत्रों म, लोगों का प्रवृत्ति अनुसार ही शिक्षा प्रसार के लिए उद्योग करने का कारक समाप्त हो कर, अनिवायता की नार पर शिक्षा प्रसार का नवयुग शुरू होता है। पिछले ७५ वर्ष म सरमार न शिक्षा की उन्नति के लिए जितने प्रयत्न किये हैं, उनके कारण इसकी नार रही सुदृढ़ हो गयी है और उसे मुसगठित और मुचारू रूप से चलाने की परम्परा स्थायी हो गयी है । इमलिए पर हमारे यहाँ की शिक्षा के अनिवार्य कर देने म इस बात का भय नहा रहेगा कि उसक कारण हमारी शिक्षा कृतिम या दिसावटी हो जाय और उसका काइ स्थायी मूल्य ही न हो।
ग्राम्य शिक्षा का इतिहास
पहला अध्याय
ग्रामवासी
(१) उसके साधन
सयुक प्रान्त घागरा व अवध में नगर कम और गांव
अधिक हैं । सन् १९३१ को गणना के अनुसार इस प्रान्त की
जन-सन्या ४,९६,१४,८३३ है। किन्तु उसमें से केवल १०६ फ्री
सदी न्यक्कि ही नगरों म रहते हैं , शेप ८९४ की सदी मनुष्य
अपना ज्ञापन गराम गिताते हैं। इस प्रान्त में, ६ व्यकि
एक वगनाज कृषि भूमि पर सारिका के लिए निर्भर है, अर्थात
प्रत्यक व्यफि के चांट में कठिनता से एक एकड़ भूमि पाती
है । पर मर ग्लिा म यह श्रीमत मा नहीं पड़ता। किसी-किसी
जिन में ता ॥ एकड़ प्रति व्यक्ति का औसत पैठ जाना
है। अवश्य भय सता के लिए और भूमि का मिलना अत्यन्त
फठिन हा गया है।
भूमि पर जनता की आजीविका का अत्यधिक भार है। चूँकि सेती ही देश का एकमात्र प्रधान उद्यम है, इसलिए किसानों में सेत पाने के लिए बडी लागडोंट रहती है। फिर, भूमि अधिकतर जमींदारों के पास है, इससे किसानों की आपस को चढ़ापढ़ी के कारण भूमि का लगान यहुत बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त यतो करने के ढग भी पुराने है और यह होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि सेत प्राय इतन छोटे होते हैं कि उनम नये ढङ्ग से सती करना असम्भव सा है। इसस उपन भी श्रीक्षाकृत कम ही होती है। इस ग्रान्न के गांव भिन्न भिन्न प्रकार के हैं। एक साया रण आकार के ग्राम म औसतन १०० या इससे कुछ अधिक घर होते हैं। कहीं कहीं जमींदार गाँव में ही रहते हैं। जमी दार प्राय ऊँची जाति के होते हैं। गांव के अधिकांश घर कच्च होते हैं । गाँव म साधारणतया एक मन्दिर अथवा एक मसजिद होती ही है । एक "चौपाल" भी होती है, जहाँ गाँव वाले यहुधा एकत्रित हुश्रा करते है। इन गांवों की जनता रा वर्गीकरण कई तरह से--जाति वार, धन्धेवार या वन-सचय की स्मी शी के जा सकता है। यह सम्भव है कि ऐसे वर्गीकरण करन म जो वग बनते हैं वे कभी कमा एक दूसरे से मिलते-जुलते हों, फिर भी यह आवश्यक नहीं है कि जा जाति म बड़ा हा यह धन म भा पड़ा हो। वस्तुत धन की रष्टि स गांव की जनता का ठीक- । अनुसार-किया .
ठीक वर्गीकरण करना बड़ा कठिन कार्य है। हां, यदि गांव के
जमींदार और वोहरे को एक वग म रख दिया नाय तो गार के
शेप निवासी दूसरे वर्ग में रम्य जा सकते हैं।
हिन्दुओं में तो चार जातियाँ हैं और यद्यपि इस्लाम जाति
पांति का प्रायल नहीं, फिर भी मैयद का नुलाह के प्रति अपना
उच्चता का इतना विचार ता स्वभारत (और रिशेपत जहाँ
विवाहादि क सम्बन्ध की यात हा) ना ही रहता है नितना
किनाक्षण में अपना जाति स नाच का नाति के प्रति रहता
है। हिन्दुश्रा में नाझप, चनिय (ठाकुर ), वैश्य पनिया और
शूद चार मुरल नातियां हैं। इन अलापा पाँची जाति
और भी है जा अस्त कहलाती है। मम गया बीता काम करक
य अपनी जीविका चलाते हैं। प्रयम तन नातियाँ उच्च जातक
नाम स पुगारी जाती हैं और नासो 'नीच सीम" माना जाती हैं।
इनमें प्रामण, रायस्थ और पै.य माहित्य मवा जातियां हैं,
स्याफिनकी पानीविका रिना एच पद लिव चल नहीं सकता।
जमीदार यग तो प्राय क्षत्रिय हैं । योर माग्या यमुन्धरा'
का पुरानी सस्कृत लाकाक्तिक अनुमार प्रापान काल म तलवार
क रल पर हानि का अधिकार नाग नाता था। अव शस्त्र
चिन्ता में पढ़ कर शान चिन्ता का पार मनत्रय-नाग किनारा
फसी कर गय । पर मुमलमाना में नंद, गन्न और मुगल ऊँग
फोन फ मान नात हैं। इनमम पहल गया कलाग सादित्य
सपी है। लेकिन माहित्य-मनी लागों का नया गांवों म सात
1
थोड़ी है। अत जिन गांवों में केवल ऊँचो ही जाति के लोग
बसते हैं, उनको छोड़ कर गांवों की अधिकांश जनता में साहित्य
प्रम की परम्परा का अभार ही है।
श्रर यदि हम ग्रामीण जनता का वर्गीकरण उपजीविका
की ष्टि से करें तो यह जनता-कृपोपजीवी और शिल्पजीवी-
दो वर्गों में बैंट जाती है। कृपोपजीवी समाज परिमाया में ८०
फा सदी और शिल्पजीवी समाज २० फीसदी ही होगा गांवों
म घर तक जिस गति स पि कम और गृह शिला प्रणाली चल
रही है, उसके सीखने में तथा उसके द्वारा भाजीविका चलाने
में भी नवीन शिक्षाप्रम के अनुसार पढ़ने लिखने या दिसार
सीपने की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं है।
प्राय प्रामीण जनता या पश्चमांश अमींदार वर्ग है, जो
सामान्यत साचन सम्पन्न है। लेकिन विवाह की शान शौकत तथा
अदालत के खर्च का इन पर इतना अधिक पोम रहता है कि य
लाग सदा मे ही कर्ज मे दये हुए हैं। सौभाग्यवश कज या
राम न हो तो भी इन खचर्चा के कारण रचत ता कदाचित
ही होगी। कुछ किसान, जिन्ह भूमि पर कानूनी अधिकार प्राप्त
हैं, जरूर युशहाल है , लेकिन अधिकांश पोपजीवा समाज
'शिकमी' हो हैं यानी भूमि भाड़ पर लेकर 'भारत' करते हैं।
शूद्र या पञ्चम वा का इस ग म अधिरता है। गांव के
शिल्पजीवी लोग भी अपनी आय की कमी पूरी कान के अभिप्राय
से बाही बहुत भूमि जोत-धो लेते हैं। इन वर्गा मत वर्ग ता
सरसे गया गता, निधन और साय होमरसे अधिक परिश्रम प्रस्त
समुदाय है। मस्या म भी यह सरसे चदद कर है। फसल
समाप्त हुई और गरमी में जहाँ पि कार्य सन्द हाकि इनकी
कारी रद जाती है। मारांश यह कि य लोग कठिनाइ स अपना
पट भर पाते हैं।
मामाए जनता का २७ की सदी अवशिष्ट वर्ग शिल्पजावी,
व्यापारो, ममात्र समी, स्वतन्त्र पानीविनुयाया, और भिक्षा
पर जीरन यापन करन वालों से है। इन ग्रामों में शिल्पकारा
द्वारा पानी जीविका चलान गाले कुम्हार, ठठेरे, लुहार, मुनार,
दर्जी, सरचुने, जुलाई, पटव, चुदिहार, रगरेब और माला
आदि हैं। लेकिन याजारों में मशीन के बने सामाना का ग्ल
पल होन से इनको अपना व्यवसाय जीवित रसना कठिन हा
गया है। मुनार, लुहार और कहीं कहीं दर्जी को छोड़ कर अन्य
मभी प्राम्य शिल्पियों को दैनिक भार इतनी कम होती है कि उन्हें
अपना निर्वाह करन क लिए यादो मेदी भी करना पड़ता है। इस
लिए पुछ अश में उन ऊ निवांद का भार भी भूमि पर ही पड़ता है।
प्राम के व्यापारो रग में अनाज अदतिय, तेला दल.
वार, नाला, इंजड़, कलवार, पसारा, बगज और गले का
व्यगरी है। थपन प्राहरु वर्गक अधिक मान्न न दान क
कार ये भी अधिक सम्पन्न दशा में नहा है।
मारा यह है कि रेयत' यग अत्यन्त दरिख है।यह भरना
मन्तान से छुटपन में ही महनव मजदूरी कराने क लिए मजबूर
है और उनके पढ़ाने लिपान में नाम मात्र खर्च को भी वह महन नहीं कर सकता । पाठ्य पुस्तक आदि चीजो का सर्च तो उसकी शक्ति स पर की बात है। (२) उसकी आवश्यकताएँ 'रैयत' वग की, जो इस देश का सर्वस्व है, यह दुर्दशा है । उसका सारा जीवन नीरव और नीरस है। शतादियों के कप्टो न उस जजरित कर दिया है। यौहरे के ताजों को, जमींदारों की वगारो को, और कभी-कभी पुलिस की ज्याद- तियो को वह उमी वेरमा के साथ सहन कर लेता है जिस वेवमी के साथ वह इन्फ्लुऐञ्जा, प्लेग, या हैजा आदि को देवी कोप समझ कर सहता है । जमीदार को ग्राय कृषको की इन कठिनाइयों का काई श्राभास नहीं होता। भारत म कृपक वग के अवकाश के समय के लिए मनोरजक- माधन प्रस्तुत करना और उसके जीवन में सुग्यमय विकास की सामग्री प्रस्तुत करना एक विकट प्रश्न और आवश्यक प्रश्न है। गांव वालों में सस्कृति की कमी हो, सा वात नहीं है परन्तु उनक बीच म र काइ आश्रयदायिना और प्रात्साहनपर्धक मस्या नहीं रही है। इगलैंड क गांवों में तो गिरजाघर का पादरी एक ऐमा व्यक्ति हाता है जिम द्वारा गांव भर में सस्कृति रा प्रसार होता है , लेस्नि भारत में एसा कोई साधन पर नहा रहा है। प्राम्य-जीवन का एकरसता में परिवर्तन करन क राद कोई अपमर हैं तो करल विवाह, भोज, मेला या धार्मिक यात्रा धादि है। परन्तु प्राय यमो उस उपरणका भार लाग्न का कारण रनत हैं। भाउम सादर विचार में प्रति यप ईश से मरन वाले 100 में ५० मनुष्य इन भोजों के कारण अाना जान गंगाते हैं। रानर में इम उपरा की जड़ उन नित्यति फ जापन का रूखापन है, जिससे अकर हकिमी भी अधमर का गनामत मान कर मनी- विना में लग जाते हैं और अपनी इस प्रचको धार्मिक या सामाजिक धन की आड़ में छिपान का प्रयत करत हैं। इस प्रसार प्राम्यतन क जापन सुधार के लिए केवल आर्थिक शक्ति वृद्धि की हा श्रारम्ना नहीं है, बल्कि 35 पी भी सामग्री उपस्थित सरन का भारश्यस्ता जिसस उस जीवन में समुपलवाभाया जाय। यह यात सभा साकार करते हैं किमान्य जनता में रिचाभ्यास के प्रति माहाता, लगिन उमरी प्राधिक धारया इतनी शाचनीय है कि रिना हिमी भसन्त पारस्पा एवम् प्रभास- सादक भारत के यह अपने पत्र का शिक्षा क लिए भारी भारी आरम-स्याग नहीं कर सकती। विद्याभ्यास में लोगों की प्रवृत्ति करान या यान परम्परा, सान सम्पादन करन की उत्स्ट इमा, तथा भाजीविका का प्रापरयन्ता पार सामाग यदान फनिमित्त शिया-यह पार पारशहा सरव है, जिनस সব ঙ্ক্য বা যিল্প ঃ গুন গু প্লাক্কায় ।
८
विद्याभ्यास का परम्परागत प्रवृत्ति ब्राह्मण, कायस्थ, सना,
और वैश्यों आदि साहित्य-सेवी जातियों म वत्तमान है। इनके
अलावा ऊँची जाति क मुसलमाना में भी विद्या प्राप्त करने
की रुचि है। इनके साथ केवल परम्परा का ही प्रश्न नहीं,
वस्ति रोटी कमान का भी प्रश्न रहता है। सरकारी नौकरी
करके ही अपना निर्वाह करना इनकी पानीविका है। ये ही
साहित्य-सेवी जातियां भारतीय जन समुदाय में मध्य ग
जातियाँ हैं । ये वसते भले ही प्रामों में हों, परन्तु इनको पानी
विका वश नगरों में ही रहना पड़ता है। राज की पार से
कोई प्रबन्ध न हो तो भी अपनी सन्तान को शिक्षित बनाना
इनके जीवन का परम प्रयोजनीय और आवश्यक कार्य है।
सघन समाज में जिन्हें जीविका के लिए नौकरी आदि
करने की आवश्यकता नहीं-विद्याभ्यास
जो प्रवृत्ति पैदा
होती है, उसका एक मात्र कारण शान सम्पादन करना हो सकता
है। लेकिन यह बात तो प्रसिब है कि अब तक कोई भी ऐसी
प्रचि इनमें जागरित नहीं हुई। केवल प्रामण या मौलवी
समुदाय के लोग इस भाविक प्रवृत्ति से मान सम्पादन
के लिए विद्याभ्यास की बोर मुब्वे हों तो मुब्वे हो।
भाजपामीवार लोग अपनी सन्तामों को इस अभिप्राय से
शिक्षित बनाने का प्रयास करने लगे हैं कि अपने घराने की
सम्मान-विलिय, पिटीशनरी, पुलिस सुपरिटेन्मेन्दो
बादि सरस्वतीको पानीलामी
- नहीं करा मरते। जमीर लोग प्राय गारों में रहते हैं। श्रत इनमें शिक्षा का प्रचार होन स प्राम्य शिक्षा क्रम में सुधार होना आरश्यम्भाती है। लेकिन रैयत अपना सन्तान किस देश से विद्या-याम करान के लिए बैठारे ? यदि सम पुर पढ़ना लिसना सीस भी ले ता किस काम का ? उममा जान रहयान का तेर सचित है। उस संग सम्बन्धी उमो गांव में या पाम-पड़ोस में रहते है। वह पत्र व्यवहार का शोऊ नहीं रखता। फिर गांव में भी ना कोई एसी बात नहीं जिसमें उस लिसने पढ़न की भारश्यकता पढ़े? उसक लिए कोई ऐमा उपयागी और सस्ता साहित्य भी उपलब्ध नहीं जिसे वह सरलतया प्राप्त कर सम्। गांवों में पुस्तकालय, करकावास श्रयमा रात्रि-पाठशालाएँ भी नहीं हैं। फिर पढ़ेलिसे लोगों से मिलन भेटन का अवसर या सुयाग ही उस कहां और कर मिल पाता है ? जापाढा रहुत पढ़ लेवे हे वे गार छोड़ कर शहरों में चले जाते हैं और फिर उनक लिए गाँव म जाने के बहुत कम अरसर रह जाते हैं। देशी भाषाओं में निक्लन वाले समादपना का पहले वो मूल्य हो उसके लिए इतना अधिक है कि वह उन्हें मोल नहीं ले सस्ता और कदाचित् ऐसा सम्मर हा तो इन पत्रा का भाषा रिन्याम और उनकी शैली सी है कि उसकी समझ में श्राना दुलम है। इन पत्रों में विनोदात्मक या मनोरंजनात्मक साहित्य, कथानक, सायिक चुटकुले आदि का वो अभाव सदा रहता हो है। इसलिए विद्याभ्यास का परम्परागत प्रवृत्ति ब्राह्मण, कायस्थ, खना, और वैश्यों आदि साहित्य-सेवी जातिया म वर्तमान है । इनके अलावा ऊँची जाति के मुसलमाना में भी विद्या प्राप्त करने की रुचि है। इनके साथ केवल परम्परा का ही प्रश्न नहीं, पक्ति रोटी कमान का भी प्रश्न रहता है। सरकारी नौररी करके ही अपना निर्वाह करना इनकी आनीविका है। ये ही साहित्य-सेवी जातियों भारतीय जन समुदाय म मध्य नग जातियाँ हैं । ये बसते भले ही ग्रामो मे हों, परन्तु इनको पानी विका वश नगरों म ही रहना पड़ता है। राज की पार से कोई प्रवन्ध न हो तो भी अपनी सन्तान को शिक्षित बनाना इनके जीवन का परम प्रयोजनीय ओर श्रावश्यक कार्य है। सधन समाज में-जिन्द जीविका के लिए नौकरी आदि करने की आवश्यकता नहा-विद्याभ्यास की जो प्रवृत्ति पैदा होती है, उसका एक मात्र कारण ज्ञान सम्पादन करना हो सकता है। लेकिन यह यात तो प्रसिद्ध है कि अब तक कोई भी ऐसी प्रवृत्ति इनमें जागरित नहीं हुई। केवल ब्राह्मण या मौलवी समुदाय के कुछ लोग इस आस्तिक प्रवृत्ति से ज्ञान सम्पादन के लिए विद्याभ्यास की ओर मुकते हों तो मुझते हों। आजकल जमींदार लोग अपनी सन्तानों को इस अभिप्राय से शिक्षित यनाने का प्रयास करने लगे हैं कि अपने घराने को सम्मान-वृद्धि के लिए, डिप्टी कलक्टरी, पुलिस सुपरिटेन्डेन्टो धादि सरकारी पदों की प्राप्ति के अपनी सन्तानों को बिना पढ़ाये (९) नहीं करा सकते। जमींदार लोग प्राय गांवों में रहते हैं। प्रत इनमें शिक्षा का प्रचार होन से प्राम्य शिक्षा कम म सुधार होना आवश्यम्भावी है। लेकिन रैयत अपनी सन्तान को किस उद्देश से विद्याभ्यास करान के लिए बैठारे ? यदि उसका पुत्र पढ़ना लिसना सीस भी ले तो किस काम का ? उसका जान-पहचान का क्षेत्र सकुचित है। उसक सग सम्पधी उसी गांव में या पास पड़ोस में रहते है । वह पत्र व्यवहार का शौक नहीं रखता। फिर गांव में भी तो काई एसी बात नहीं जिसमें उसे लिसन पढ़ने की भावश्यकता दे? उसके लिए कोई ऐमा उपयोगी और सस्ता साहित्य भी उपलब्ध नहीं जिसे वह सरलतया प्राप्त कर सके। गाँवों म पुस्तकालय, कृपरावास अथवा रात्रि पाठशालाएँ भी नहीं है। फिर पढे लिसे लोगों स मिलन भेटने का अवसर या सुयोग ही उस कहाँ और कर मिल पाता है ? जो थोड़ा बहुत पढ़ लेते हैं वे गार छोड़ कर शहरों म चले जाते हैं और फिर उनके लिए गाँव म जाने के बहुत कम अवसर रह जाते हैं। देशी भाषाओं में निकलन वाले सपाद पना का पहले तो मूल्य ही उसके लिए इतना अधिक है कि वह उन्हें मोल नहीं ले सस्ता और कदाचित् ऐसा सम्भव हो तो इन पना का भाषा विन्याम और उनकी शैली ऐसी है कि उसकी समझ में आना दुर्लभ है । इन पत्रों में विनोदात्मक या मनोरजनात्मक साहित्य, कथानक, सामयिक चुटकुले आदि का वो अभाव सदा रहता ही है। इसलिए ( १० ) उस पदाचित ही कभी इन पढ़ने का काम पडता होगा। गांव म तो दुकानों पर उनके नाम की तख्ती या अन्य कोई विज्ञापन भी नहीं होता, जिस कमा काइ निगाह उठा कर पढ़ ले । गाँव चाल रामायण और आल्हा क प्रेमो होते है जरूर, परन्तु इन्ह व दूसरों स सुनकर ही अपना मनोविनोद पूरा कर लेते है। इन पुस्तका को मोल लेकर रसने और पढने के लिए उनके पास पैस कहाँ होते हे ? रही लेन देन को रसीद पुजों को पढने का जात, सो पदल तो ये पुजें ऐसी लिपि म लिये जाते हैं कि इनर पहन पाले भी कठिनता से पढ़ सकते हैं और दूसरे अगर वह पड भा लें ता उसका लाभ उठाने के लिए जमींदार या मुशाजी स लड़ाई माल लेन की ढिठाई करना उनकी शक्ति से परे की बात है। तर यह प्रश्न भी उसक सामने आता है कि क्या यह शिक्षा- क्रम उसक व्यवसाय म उपादेय बन सकता है ? विचार करने पर मालूम हाता है कि प्रस्तुत स्वरूप म पिवग का किसी प्रकार की शिक्षा अपचित नही, क्योकि कृषि कार्य क तराकों में उनति' की बहुत कम गुञ्जाइश है। उनका कहना है कि पान कल की शिक्षा काका का सन्तान में सेत म सड़े होकर काम करने में अरुचि पैदा कर दती है। कुछ रुपक तो यह भी कहते हैं कि यह शिक्षा उन्हें निधन बनाने का कारण बनता है। एक नाई ने मुम स कहा कि उसन अपन लड: फा नाहफ अगरेजी पढ़ा कर अपना सत्यानाश पिया। उसने कई बार ९चो कक्षा में फेल हकर अन्त म २० रुपये की नौकरा कर ली और शहर में रहने लगा है। अगर यह अपना काम करता ता उस इससे नहीं अधिक आय होती और इतना खर्च भी न पढ़ता। इसी प्रकार मुझस एक देहाती स्कूल के एक मुनरिस ने कहा कि उसने जितना रुपया अपना पढ़ाई म खर्च किया था यदि उतने रुपये इकट्टे परक यह इका मोल लेकर भाडे पर होता तो आर्थिक दृष्टि से वह इम मुदरिंसी की अपेक्षा कहीं अच्छा रहता । श्रत यह बात रिलकुल स्पष्ट है कि ग्राम्य जन सामने ऐमी कोई आवश्यकता नहीं निसक कारण वह अपना धन और समय लगा कर शिक्षा सक्सिी भारी लाम की आशा कर सक। कुछ लोगों का विचार है कि शासन सुधार के युग म प्रारम्भ होने पर कृषकों का वाट देने के जा वृहत अधिकार मिले हैं उसस उनमें विद्याभ्यास की प्रवृत्ति ढगी। पर भारतीय जनता चुनाय क परचों को पढ़ कर किस वोट देना चाहिए, यह निश्चय नही कर पाती । दूसरे चुनार र परचे गांवों तक शायद ही पहुँच पाते हैं। ऐसी परिस्थिति में पोट देन के अधिकार की वृद्धि क कारण विद्याभ्यास के प्रचार में अधिक सहायता नहीं मिल सकती। यह तो ग्राम्य नन की दृष्टि स विचार करन पर वस्तुस्थिति का दशन हुआ, जिसस प्रस्ट है कि यदि उसी इच्छा पर लोड दिया जाय, तो उसके पास कोई ऐसा कारण नहीं है जिससे वह अपन वच्च की पढ़ाई के लिए समय और धन का मोह छोड दे।
( १२ ) लेकिन यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि वह विद्याभ्याम के विपक्ष में भी कदापि नहीं है। जर तक उसका चालक चार पैसे कमाने लायक नहीं बनता तब तक, यदि स्कूल पास म हे और पढ़ाई के खर्च मे उसको गाँठ के पैसे अधिक सर्च नहीं होते, तो वह अपने बच्चे को प्रसन्नता से स्कूल में बैठा सक्ता है। लेकिन जहाँ वह वच्चा काम मे हाथ बटाने लायक हुआ कि उसे स्कूल से विदाई लेनी ही पड़ेगी।
दूसरा अध्याय शिक्षा का प्राचीन क्रम भारत क जो प्रदेश अब आगर व अवध के सयुक्तप्रान्त क नाम से पुकार जाते हैं व इतिहास में पहले हिन्दुस्तान के नाम स प्रसिद्ध । शता दयों तक ये प्रान्त धन और सुख की गोद में फूले फ्ले और इसी मुम्ब समृद्धि के लोभ से प्रेरित होकर पश्चिमातर के आक्रमणकारियों द्वारा य प्रान्त इन चीजा स पचित भी किये गय। ५६वीं शतादी में मुगलों न यहाँ अपनी सत्ता अच्छी तरह जमा ली थी। लेकिन उनका पवन होन के साय ही ये प्रान्त शक्तिशालुप प्रतिस्पर्धियों की मुठभेड का असाई बन गये। सन १७०७ में औरङ्गरोर की मृत्यु क बाद स लगा कर, रङ्गाल के अहाते में मिलाने के समय तक, य प्रान्त अशान्ति और पिता के घर रन रहे। एस विपजनक समय में जावन रक्षा में व्यग्र रहन क कारण, इन प्रान्ता क निवासी शिक्षा दीक्षा की ओर आवश्यक ध्यान न दे पाये। जन अगरज लाग इस प्रान्त में पहुँच तो उन्होंन देखा कि इन प्रान्तों के निगामी शिक्षा विहीन हैं। परन्तु उस समय भी, प्राचीन परिपाटी की स्मारक, एक प्रकार की शिक्षा प्रदान की परम्परा यहाँ फिर भी मौजूद थी। अत अगरेजी शिक्षा के प्रादुर्भाव काल से पहले की इसी शिक्षा प्रदान शैली का वर्णन हम करेंगे। डाक्टर एक डल्लू टॉमस ने इन प्राचीन शैली की पाठ शालाओं को हिन्दु प्रारम्भिक और हिन्दू शास्त्रीय पाठशाला, मुस्लिम प्रारम्भिक स्कूल तथा मुस्लिम मकतय इन चार भागों म विभक्त किया है । हिन्दुश्रा में छोटे पडे दोनों प्रकार के विद्यालय पाठशाला के नाम से पुकारे जाते थे, वैसे ही मुसलमान अपन छोटे-बड़े विद्यालयो का मकतब के नाम से पुकारते थे। लेकिन यस्तुत ये दोनों नाम केरल ऊँचे दरजे को पढाइ की सस्थानी का दिये गय थे। गड साहब ने अपनी प्रथम रिपोर्ट में प्राचीन पद्धति पर शिक्षा प्रदान करने वाली सस्थायी का १० विभागो म विभक्त किया है। उन्हाने ये विभाग उनम सिग्मायी जान वाली भापाश्रा की विभिन्नता के अनुसार निर्धारित किये थे। लेकिन अपने उद्देशानुसार हम यहां पर केवल दा, यानी प्रारम्भिक शिक्षा प्रदान करन वाले तथा उच्च शिक्षा प्रदान करने वाले विशालय क विभागा को मान लेते हैं और उनक साथ हिन्दू धार मुस्लिम इस प्रकार दो उपविभाग माने स हमारा काम चल जायगा। सब से पहली बात जो हम यहां बतला दना चाहते हैं वह यह है कि भाज दिन निम अर्वम 'स्टूल' शब्द व्यवहार म भाता है एक शताब्दी पहले उसके यह प्रान थे। उन दिनों
( १५ )
एक शिक्षक के निरीक्षण में किसी एक स्थान पर एकत्रित होकर
कम से कम दो चार या अधिक स अधिक पन्द्रह बीस लहके
जहाँ पढ़ते थे, उस स्थान का पाठशाला या स्कूल कहते थे।
ऐसे स्कूलों में न तो काई कज्ञाएँ या श्रेणियां थी और न चटाई
के सिवाय किसी प्रकार का सामान । इन स्कूलों में पढनवाले
लड़कों के पास लकड़ी के कहने की बनी हुई 'पट्टी' या 'तख्ती
होती या। इसका हरी घास या पत्ता समनहर हरा रंग दिया
जावा या और गोटे से रगड़ कर चिकना किया जाता था।
पास हो के सतों की फिसा नाड़ी में स वाडकर सरकह की
कलम बनाया जाती थी और मट्टी को छोटा सी कुलिया न
सड़िया मट्टी घोलकर दनात वैयार हा जाती थी । पुस्तकें पढ़ने
का मुखोपभोग उन्हें कहां नसीर था।
१८७१ ई० में लण्डन म एक अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी हुई थी।
इसमें एकत्रित शिक्षा सम्बन्धी पुस्तके, अन्य सामग्री तथा उपकरणों
के विपय म डाक्टर स्मिथ न एक रिपाट पश का था। उनम
भारतवर्ष का एक मामीण चटसाल (पाठशाला) का एन इम
भाति किया गया है। 'भिन भिन देशों म प्रचलित शिक्षा
पद्धतियों पर प्रकाश डालन के लिए इम अन्वराष्टीय प्रदर्शना
का आयोजन किया गया है। इस युरोपियन शिक्षा विभाग न
जहाँ लम्बे चौड आडम्परयुक्त बहुमुल्य साज सामान का प्रदशन
है, वहाँ दरिखना ऋन्मिगटन : अजायबघर म भारतवप का
प्राचान पद्धति के अनुमार शिना प्रदान करन वासो पाठशाला क
माडल में हमें क्या दिसायी देता है ? ताड़ के पत्तों से स्वयम पढ़नेवाले वालकों द्वारा बनायी हुई हलकी सी चटाई, जिसे उठाने और रसने में कोई कठिनाई नहीं होती और जिसका मूल्य भी एक आना मात्र है । इस चटाई के अनुरूप ही उनके पढ़ने का स्थान है । इसे बडे आदर सूचक शब्दों में हम 'विद्यालय का भवन' कह सकते हैं । यह भी इसी सादगो का नमूना था । कहीं कहीं अध्यापक का कच्चा झोपडा ही स्कूल के काम आता था। कहीं गौर के मुखिया के घर के दालान में स्कूल लगता था और कहीं किसी महानन के द्वार पर खुले चबूतरे पर ही पठन पाठन हाता था । अगर कही इस काम के लिए मन्दिर, मसजिद या थाना आदि सार्वजनिक स्थान मिल गया, तब तो विद्यार्थियों के भाग्य ही उदय हुए जानना चाहिए। अगर इन सब में से किसी बात को सुविधा न हुई तो फिर किसी सायेदार पेड़ के नीचे ही चटसाल लगती थी" सन १८६८ ई० में एस० लाँग साहब ने ऐडम साहब को रिपोर्ट का सम्पादन किया। 'मुमलमानो शासन के प्रारम्भ हान के पूर्व बगाल म देशो शिक्षा' इस रिपाद का विषय था। इमक अनुसार गांवों में हिन्दुत्रा का प्राचीन प्राम-सघ (Old Municipal System ) प्रचलित था। इसके अनुसार हर गांव म एक मुसिया, पुरोहित, बढ़ई, लोहार, कुम्हार, नाई, धोरी, भाट, वैद्य और अभ्यापक, जिस 'गुरु महाशय' कहते थे, रहता था। यह प्राम्य सङ्गठन अनेक राजनीतिर पान्दालना और विप्लवो के वेग को सहन करता हुआ सैकडों बरसों से ज्यों का त्यों बना रहा। मैटका साहन के शब्दों में 'यद्यपि इस देश मे हिन्दू पठान, मुगल, मराठे, सिक्स और अगरेज वारी- वारी से अधिपति बनते गये परन्तु यहाँ के ग्राम्य समुदाय का स्वरूप पूर्ववत् ही बना रहा"। फिर भी यह कहना सत्य ही है कि मुसलमान शासकों की उदासीनता का प्रभाव इस अपरिवर्तनशील प्राम्य जनता की सस्कृति के प्रादुर्भाव पर पिना पडे न रह मस। इस दीर्घका लीन उदासीनता के बाद, वडा रिसरमय समय उपस्थित हुआ। इमक कारण प्रजा के जान माल तक पर वन आया। ऐसी कठिन परिस्थिति म जप ग्राम समुदाय को लाचार हो अपना ध्यान केवल उन्हीं बातो की रक्षा करने म परिमित करना पड़ा, जो तत्कालीन समाज का स्वरूप स्थिर रसने के लिए परमा पश्यक थी, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ऐसे महान सकट के समय में शिक्षा को अपहेलना हुई । डाक्टर लोचर ने पञ्जान को देशी शिक्षा पद्धति का वर्णन करते हुए अपने लेस में यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि कम से कम पञ्जान म तो ये प्राचीन शैली की पाठशालाएँ वस्तुत अपने प्राचीन स्वरूप की कङ्काल मात्र रह गयीं थीं। मुगल साम्राज्य के अध पतन के बाद गाँव के कार्यकर्ताओं मे 'गुरु महाशय' की तो सव से अधिक गयी बीती अवस्था थी। इस समय के अध्यापक या तो चयोवृद्ध कार्य क्षमताहीन प्रा०शि० इ०-२ -
( १८ )
कायस्थ होते थे या कोई वेकारी के मारे घर बैठे हुए नाह्मण, जिनके
लिए अपनी ऊँची जाति के गर्व के कारण और कोई काम धन्धा
करना असम्भव होता था। इन अध्यापको का वतन भी बहुत
कम होता था। जन गांववालों के यहाँ फसल कट जाने पर नाज
सलिहान मे आ जाता या तो प्रचलित प्रथा के अनुसार इन
अध्यापक जी को भी हर घर से एक अ या ( २॥ सेर ) से
लेकर दो पसेरी (१० सेर ) तक नाज मल जाता था। हिन्दुओ
क लड़के हर एकादशी को एक धेले से लेकर दो पैस तक
अध्यापक की भेंट करते थे। इसके अतिरिक्त हर तिथि त्यौहार
के अवसर पर मिठाइ, फ्ल, क्पड़-लत्ते, रुपये पैस आदि की भेट
पूना भी पालको से मिल जाती थी। पाठशाला में प्रवेश, या
विवाह श्रादि सरकार के अवसर पर भी चालका की ओर से
अध्यापक को भेंट विदायी या अ य पुरस्कार मिलते थे।
अगर गुरुती नाक्षण हुए तो तिथि-त्यौहार पर उनको विद्यार्थियों
क यहाँ स 'सीवा' भी मिल जाता था।
उक स्कूलों म यह भेंट नियमित रूप से भा मिलता यो।
प्रत्यक पट्टा' (पाठ) समाप्त करन ओर उसे थपन माता पिता
को कठस्थ कर मुना दन पर अध्यापक को दो थाना प्रति पट्टी
(पाठ) के हिसार स पारमिक मिलता था। इतनी भेट पूना
और पारश्रमिक को थायोनना हान पर भा हमारे प्रान्त में सन्
१८५०३० म अध्यापक का प्राय सामासिक पासत ४ रुपय
मानधा।
( १९ )
गाँवों मकिसो किता के यहां अपने घर पर पढ़ाने के लिए
निज के अध्यापक मा रहत थे। लोग अपने बाला को पढ़ाने के
लिए अध्यापक को नौकर रस लेते थे। ऐसा करना उनके
सम्मान और उचर पद का वाधक था। याज कल भी हमारे
प्रान्त म 'घर पर पढ़ान क लिए अध्यापक' रसने की जो कुप्रथा
प्रचलित है उसका कारण क्वल आधुनिक शिक्षा प्रणाली का
दोप ही नहीं है परन् इस प्राचीन परम्परा की प्रेरणा भी है।
मुसलमान अमीरा क यहाँ घर पर पढ़ापाले अध्यापक
प्राय इसलिए रहते थे कि वे उन यहाँ भोगन भी कर सकते
या ऐम अध्यारक अपने गांववाले सहोद्योगी की अपेक्षा कहीं
अच्छी अवस्था म रहते थे। वेतन और भोजन के अतिरिक्त
उनको जाड़ा म गरम कपड़ भी मिल जाते थे और वे अपने
मालिक के पास पड़ास में रहन वाले लड़को को पढ़ाकर उनसे
नकद रुपये भा प्राप्त करते थे ! कुछ अध्यापक ऐस भी होते ये
जो रिना शुल्क लिये श्रान घर पर ही रालका को पढ़ाया करते
यं परन्तु प्रारम्भिक शिक्षा को चटसालों और विद्यालयों में ऐसे
अध्यापकों का माया प्राय नाम मात्र ही थी।
इस प्रकार जिस पश में (उस जमाने में भी ) घसियारे से
भी कम तन मिलता था, भला यह कय सम्भव हो सकता था
कि उसम नान क लिए मुशिक्षित लोग पारपित हो फिर
गाव याने ता शिक्षा के नाम से कोरे ही, इसलिए जो भी
चार अक्षर पढ़ा हुआ उन पर प्रभाव जमाना चाहता वह सहज
1
( २० )
ही उस क रुपात म आ जाते थे। इस पर भी गाँव म उन
लोगों को छोड़कर जो स्वयम् पडित ये साधारण लोगों मन
तो स्पृहा थी और न वे ऐसे थपूर्ण विद्यानुरागी ही ये फि अपन
चालकों को पटित बनाना उनका पेय हो। जो लोग अपने
बालकों को पडित या मौलवी बनाना चाहते थे उन्हें किसी
सस्कृत पाठशाला या फारसी के मफतर में पढ़ने के लिए भेज
देते ये अथवा घर पर ही अध्यापक रस कर उनके पढान की
न्यरस्था करते थे । साधारणत मध्यम श्रेणी के ऐसे ग्राम
निवासी जिनक पास थोड़ा बहुत धन होता या अपन बालका
का अक्षर ज्ञान क्रान के लिए पाठशाला में पढ़ाते थे।
इन पाठशालाया में यह साधारण शिक्षा भी बिना किसी
उपकरण के दी जाती थी। और यह कुछ कम कौतूहल की बात
नहीं है कि ऐसी अवस्था में भी स्वयम् कुछ अधिक शिक्षित ।
होते हुए भी य अध्यापक अपना काम ग्वूर चला लेते थे।
सन् १८५२ ई० मे एच० एस० रीड साहब न एक रिपोर्ट
प्रकाशित की । इसमे 'श्रागरे मे देशी शिक्षा और वाक्युलर
सूलों के सम्बन्ध में लिखा है कि हिन्दी के अध्यापक पढ़न में
प्राय असमर्थ होते थे। किसी कितार का उपयोग न करते
य, परन्तु गिन्ती और पहाड़ बनानी रटा दिया परत थे। बहुत
स ऐसे शिक्षक जो कुछ टूटा-फूटा पढ़ लेवे ये एक एक अतर को
जोड़ फर पढ़ पाते थे। कोई विरला कायस्थ शिक्षक नागरी पढ़
पाता था और बहुत स प्रामण अध्यापकों की भी यही दशा की।
(२१) जिस किसो ने इन प्रामीण पाठशालामा के विद्याथियों को परीक्षा ला हागी उस यह दसम्र अरश्य आश्चर्य हुश्रा होगा कि इनम पढ़ने वाले चालकों का उन शिक्षक क्त्तिना कम पढ़ात थे। परन्तु इस सम्बन्ध में यह बात भी याद रखने योग्य है कि शिक्षको का जैसा वेतन दिया जाना या उसके विचार से इसम अधिक अन्धी शिक्षा प्राप्त होना असम्भव या किसी सस्था की मफ्लता या पिफनता के सम्बन्ध में निर्णय करते ममय उसक शिक्षा विस्तार पर ही अधिक ध्यान न देकर यह भी देखना श्रावश्यक है कि उसका नैतिक प्रभाव और अनुशा सन कितना लाभगक था। इम अन्तिम रात का विचार हम याद म करेंगे। श्रन हम गावा का इन प्रारम्भिर पाठशालाओं के पाठ्यक्रम पर विचार करेंग । बहुत मी एसी पाटशालाओं म हिन्दी, महा जनी या कैथी का वर्णमाला सिसाया जाता था। महारानी का व्यवहार साहूकार महानों में पहले का भांति पर भी होता है और इमी कारण इस लिपि का नाम भी महाजनी पड़ गया है। कधी कायस्थो के नाम से प्रचलित हुई। कायस्थ हमेशा से लिसने-पढ़ने के काम करते रहे हैं । अतएर इन्हें,सरलता से शीत्र लिखी जाने वाली कैची लिपि का प्रयोग करना पड़ा । इन सूलों में लिसन की भांति पढ़ने में भी नही विभिनता थी। नागरी या हिन्दी स्कूलों में साधारण विषयों की शिक्षा होती थी, किन्तु महानी और कैथी सूलों में व्यापार और खेती-बारी के (२) हिसाव फितार की शिक्षा विशेष प्रकार से दी जाती थी। इन स्कूलों में पढ़ने लिसन के साथ मौसिक गणित और साधारण हिसाव भी सिखाया जाता था। इन सन विपयों की पढाइ कुछ- तो शिक्षक की योग्यता पर, कुछ। विद्यार्थियों के मातापिताओं के झुकाव पर और कुछ उस काल पर निभर करती थी निस समय के लिए विद्यार्थी पाठशाला मे रह सकते थे। यह तो प्रत्यक्ष हो है कि गांव के विद्यार्थी का पाठशाला में पढ़ने के लिए रहना सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर था। इस प्रकार इन पाठशालाओ अपने चारो ओर की परिस्थिति के अनुसार अपना कार्यक्रम रखना पड़ता था और जिस प्रकार पानी की धार अपने उद्गमस्थान की ऊँचाई से अधिक ऊँची नहीं चढ़ सक्ती, उसी प्रकार ये पाठशालाएँ उत्तनी ही शिक्षा देती थीं जितनी उस जाति क लोगों की आप श्यकताओं के लिए उपयुक्त होती थी। यह बात हम पहले ही यतला चुक हैं कि जो लोग अपने वालको को उच्च शिक्षा दना चाहते थे व उन्हें पड़ी पाठशालाया म भेजते थे और इसलिए चटसालो में केवल उन्हीं लोगो के चालक पढ़ते थे जिनको थोडी सी कामचलाऊ शिक्षा दिलानी होता थी। इसस प्रकट है कि घटसालों में लड़कों को उतनी हो शिक्षा दी जाती यो जिसस उन्हें साधारण बाता के सममन और चिट्ठी इत्याद लिसने पढ़न का मान हो जाता था। इन घटसाला म उनको इतना हिसार भी सिखा दिया जाता था जो गांव का दूरस्थ और एकान्तवासी ( २३ ) प्रना की साधारण प्रापश्यकतामा क लिए काफी होता था। परन्नु जर महानना या कायस्था क लड़को को किमा विपय का विशेष ज्ञान प्रात करना होता पाता इन स्कूना म हो जितनी शिक्षा हो सकता या उई दो जाता था और इसके अलावा स्तिो दुकान या कारखा कुछ सनय तक काम सीन कर इनका व्यवहारिक ज्ञान परिसूण करा दिया जाता था। पालका को पढ़ने से पहले लिखना सिखाया जाता था। सर से पहले उन्ह परों का ज्ञान कराने के लिए लिसने के साथ प्रत्येक स्पर का उच्चारण कराया जाता था। इमो प्रकार व्यजन सिसाये जाते थे और उनके उच्चारण को विधिक अनुमार उनका मारण करके पढ़ाया जाता था। पे-पफ व भ म---इति आप्टम् । परन्तु हिन्दा की चटसाला म इन्हें बारहसड़ी की कविता पार कराक पढ़ाया जाता था। ये बारह- सड़ा कई भौति का होतो था। किता किप्ता म महापुरुष को कहानियाँ होतो योता फिसा में नीति का चातें लिखायी जाती यौं । मुदामा चारहत्तम सुदामा को कथा का वर्णन है और इस कथा का हर दोहा वणमाला के अतरा से कनानुनार प्रारम्भ होता है। इसी प्रकार नीति के दोहा को बारहखड़ा के प्रारम्भ म वर्णमाला के अक्षर होते थे जैसे- 'दहा दाप न दीने काहू, दोप कर्म अपने हो। जना जपै सोई गति पारे । 'सरसा-साधु सग पावै जन कोई।
( २४ )
हिन्दुआ म इस प्रकार अनेको वारहसडियाँ यों ओर वालको
को इन्हे रट कर याद करन मे खून आनन्द प्राता था ।
जन पालक वणमाला सोस लेते ये तम उनका परोक्षा ला
जाती था! शिक्षक उनको पट्टो पर काई अक्षर लिख कर चालक
से उसको पहचान कराता था या फैिसो कागज के टुकडे म
इतना बड़ा छेद करके, जिसम हाफर केवल एक हा अक्षार
दिसाया दे, फितार के ऊपर नाचे घुमा कर वालक से छेद के
भीतर स दिसाया देने वाले अक्षर को पहचान कराता था।
कभा कभी शिक्षक परीक्षा लेन म बड़ा बड़ाई दर्शाते थे। उनका
ममझ म कदाचिन् यह वात न बानो थो कि एक हा अक्षर का
चार बार देखते रहने से वह नाल का के ध्यान म जम जाता
था। परीक्षा म जा पालक अरने शिक्षक को सन्तुष्ट कर देता
या उस फिर बारहखड़ा सिसायो जातो था।
यह चारहसडा शन्द द्वादशाक्षरी सस्कृन शद का ठेठ
हिन्दी है । आ इ ई उ ऊ ए ऐ या आ अ अ-देवनागरा
वणमाला म यह पारह स्वर हाते हैं और किसी एक व्यञ्जन
के साथ इनरा याग हा नाने का नाम पारहपड़ा है। जैसे-
क का किसी कु कू कै को को क क ।
अन्य ३२ व्यग्ना के साथ इमा प्रसार को वारहसड़ा
सोस लेने पर हिन्दी भाषा म किता शन्द का उच्चारण सुनकर
उसको लिस लेना बालक के लिए बहुत सरल हो जाता है।
यह वात नागरी अतरों को स्वरम्पनि की शुद्धता के कारण
( २५ ) इतनी सुलभ है। इस प्रकार यद्यपि चारहसड़ी सीसने में एक महीने का समय लग जाता था, परन्तु इसका प्रभाव बड़ा लाभ- प्रद होता था। क्योकि अब वालक रिना किसी विशेष कठिनाई के साधारण चीजो के नाम लिस पढ़ सकता था। इसके पश्चात् सयुक्ताचार सीसन की पारी पाती गी । परन्तु इनके सिसाने की कोई विशप प्रामाणिक विधि नहीं थी। सयुक्त अक्षर सिसाने म शिक्षक पाय हर वालक की पट्टी पर 'सिद्धों की पट्टी' लिख दिया करता था और चालको को उसकी नरल करना पडती थी। इस स्थान पर यह बतला देना अाधक उचित होगा। इस पट्टी का नाम सस्कृत भाषा के 'कलाप व्यापरण' के प्रारम्भिक शद क पहले अक्षर से लिया गया था। इस व्याकरण म हर प्रकार के सयुक्त अक्षरों से बने हुए शब्द मिलते हैं। इस पट्टी क पढ़ाने का एक कारण यह भी था कि इस समय तक छोटे से छोटे गाय म भी सस्तृत व्याररण पढान की परम्परा जारी थी। क्योंकि अब भा लोगो का यह विचार था कि सस्कृत के व्याकरण के ज्ञान के बिना कोई शिक्षा हो ही नहीं सक्ती। इस 'सिद्धों की पट्टी' मे ४५ पृष्ठ थे, और इसके लिसने का अभ्यास कर लेन से बालक को सयुक्ताक्षरों के कठिन शब्द लिपने का अच्छा ज्ञान हो जाता था। यद्यपि यह यात सत्य है कि इम अवस्था में उनको इन शदों के अर्थ का कुछ भी ज्ञान न होता था। इमी समय बालकों से देवताओ, मनुष्यो, नगरों,
नदियो, और पहाड़ी इत्यादि के नाम लिसवान का अभ्यास
कराया जाता था। हर लडका अपना, अपन पिता का तथा
अपन इष्ट मित्रो और कुटुम्बिया का नाम पट्टी पर नित्य
लिसता था।
इसी के साथ साथ दिन का नाम, महान का नाम ऋतु का
नाम तया अपने गांव या नगर का नाम भी उसे नित्य लिखना
पडता था। इस प्रकार के अभ्यास म वालकों का खूर चित्त
लगता था। यह अभ्यास समाप्त हो जाने पर उसे विभिन लोगों
के नाम चिट्ठी लिसन का अभ्यास कराया जाता था।
इतनी शिक्षा ममाप्त कर लेने पर बहुधा अधिकांश लड़क
पठशाला छोड़ देत थे। परन्तु जो लड़के इसके बाद भी शिक्षा
ग्रहण करना चाहते थे वे प्राय अपने घर स रामायण की पाथी
लार पढ़ने लगते थे। छपा हुई पुस्तको के प्रचार हाने के पूर्व
ऐमी पोथियो बहुत कम पढ़ने को मिलती यां, क्याकि भारतवर्ष
म १८ वीं शतादी क श्रत और १९ वीं शतावरी के आरम्भ म
छापमान का प्रादुर्भाव हो पाया था।
साधारण पाठशालाओं का शिक्षा का एक उगेश्य यह भी
था कि उनमें पढ़न काले बालों का अङ्कगणित का साधारण
ज्ञान प्राप्त हो जाय । इम विचार से अदगाएत की शिक्षा यथा
सम्भव व्यावहारिक रूप में दी जाती थी। प्रारम्भ म मौखिक
अगणित पर अधिक जोर दिया जाता था और सय गुर
जवानी याद कराय जाते 4। इन पाठशालाओं म हिसाय
( २७ )
सिपाल फी भी पहा शिक्षण विधि प्रचलित थी जिसका भाषा
पढ़ाने में उपयोग किया जाता था। लड़को को पहले पहल
गिनता सिखाया जाता यो और सैकड़क दस दम भाग करके
पक दफम एक भाग सिखाया जाता था। पाठशाना को छहा हो
"जान पर यह गिनती मा लड़क एक लड़के के पोछे जार चौरस
चिला कर गोलत और रट र याद कर लेते थे। परन्तु जर
गिनती लिसाने का प्रागणेश होता था उस समय गुरूजी पालक
का हाय प्रश्न हाथ में पकड़ कर पट्टा पर एक अङ्क के नीचे
न्दूमरा अङ्क इस तरह लिसाते थे जैसे चीनी वणमाला लिया
जाती है।
गलक अफ का लिसन के साथ बोलता भी जाता था। इसके
या उससे एरा की पट्टी लिसायी जाती थी। सारो पट्टी भर
लिसन पर या बर तक वह पा न हो लेता था तक उसे
चराचर इस लिसना पड़ता था। फिर उसकी परीक्षा हावी या
और उसस कोई भा अङ्क जैस-९ ६, ८, ३ इत्याद तुरन्त
लिसन के लिए कहा जाता था। इसके सद ग्यारह, इकीसा,
इकतीसा इत्याद का पट्टो लिसा कर १.० तक गिनना पूरा को
जाती या| किसा कमा पाठशाला में तागिनता पढ़ते समय
उलटी गिनती भा बुजगायो जाता था ! मैं स्वयम् सारा उलटा
गिनतो १०० से १ तक गिन लेना या और वह भा एक मिनिट
में। मैंने सम विषम, क साथ यत्र क ममान चालन का
भी अभ्यास कर लिया था।
( २८ ) गिनती आ जाने के बाद पहाडे सिसाये जाते थे। पाठशाला मे बैठने के पहले हो दिन स बुट्टी होन के साथ हो एक कतार में सड हो कर सर के साथ हर एक बालक को एक बोली पर ये पहाडे दुहराने पड़ते थे। इस प्रकार हिसार सीसना प्रारम्भ करन से बहुत पहले ही ये पहाडे बालका के मस्तिष्क में जमा दिये जाते थे। बहुतेरी पाठशालायो म एक से ४० तक के पहाडे याद कराये जाते थे, परन्तु कुछ पाठशालाऐ तो ऐसो यी जहाँ सर पहाड़ १०० तक याद कराये जाते थे। किसी किसो पाठशाला में० २५ तक के पहाडे सिसा कर हो पहाडा को पट्टी समाप्त कर दी जाती थी। पहाडा याद हो जाने पर ५ड़ो परीक्षा ली जातो थी ओर हर दस पहाडे के बाद दूसरी दहाई का पहाड़ा याद करने को दिया जाता था। पहाडों को परीक्षा जपानी होती या । गुरु जी पूँछते थे १. पचे? या कै सत्ते ९१ १ इत्यादि। मरे गुरु जी का तो कहना था कि पहाड़ इतने पक्के याद होने चाहिए कि सोते म भी यदि पहाड़ा पूछा जाय ता उत्तर ठीक ही मिले और तुरन्त मिले। इस प्रकार पूरे श्रफ के पहाड़े याद पर लेने पर भिन्न के पहाड मा सिखाये जाते थे। पी, पौना, सवैया, ड्योढ़ा, ढैया या अदया, हूँठा ( साढ़े तीन) और ढ्योचा (साढ़े चार ) आदि के पहाड़ इनमें चुन लिये गये थे। इन कठिन पहाड़ा का जानो याद करने में वालको के मस्तिष्क पर स्तिना जोर पड़ता होगा इसका अनुमान करना कठिन नहीं है। उस जमाने की प्रथा के अनुसार इनको याद ही नहीं रल्कि खूब याद करना पड़ता था क्योंकि शिक्षक पहाड़े की परीक्षा बड़ी कड़ाई से लेते थे। परन्तु वास्तव में बालकों पर पहाडे याद करने का भार अधिक न पड़ता था, क्योंकि उन्ह राज गा गा र बोलने से ये वालों को कठस्थ हो जाते या उनके जहन में उतर जाते थे। पहाड़े बालने का दन बढ़ा अद्भुत होता था और इन्हें बार गार गागा कर बोलते पोलते ही य बालकों का याद हो जाने थे। पोश्रा, पौना आदि के शुरू करने से पहले गालको को सादे जोड़, वाकी, गुणा, भाग सिसा दिये जाते थे। गुरू जी वाला को पट्टी पर कह हिसार के सवाल लिख देते थे, लक उन्ह पूरा हल र गुरु जी को दिग्पाते थे। ठीक होने पर गुरु जी उन्हे और सवाल लिस देते थे तथा अशुद्ध होने पर सजा देते थे। इसके बाद रुपये, पाने, पाई, मन, सेर, छटाक, और पैमायशी नापों क जाड वाकी, गुणा, भाग सिखाये जाते थे। और उनके अक भी लिस कर बताय जाते थे। इसी समय गुर भी समझाये जाते थे। ये बोटे गुर याद वरलेन पर सवाल हल करने में बड़े महायक होते थे। दाम जोड़न के, नाप जानने के और बट्टा, सूदि आदि निकालने के अलग अलग गुर होते थे। यहाँ हम एक बटाँक का दाम निकालने का अत्यन्त सरल नियम उदाहरण सहित उद्धृत करते हैं- -
( ३० )
गुरजितने रुपये सेर को वस्तु हो उतो ही आने एक
छटोंक के दाम जानो।
यथा पिसी चीज़ का भार १० रु. सेर है तो उसी एक
छदाक चीज का दाम १० श्राना होगा।
बहुत सी ग्राम्य पाठशालाओं में जमीन की पैमाइश सम्बन्धी
सादी बातें भी सिसायी जाती थी। भिन्न भिन आर वाले
सेता को नापना और उनका क्षेत्रफल निकालने के नियम भा
मिसाय जात थे। पटवारी और शायद जमींदारों के लडके गांव
का हिसारस्तिार और पटवारी के कागजों का भी अध्ययन
करते थे। परन्तु साधारणत यह बात पाठशालाओं में नहीं
सिसायी जाती थी, क्योकि पटवारी लोग इन्हें अपने पेशे का
रहस्य समझ कर अपने घर अपने लडकों का ही सिपाते थे।
जिन पाठशालाओ मे वैश्यो के लडके अधिक पढ़ते 4 उनम
देसी व्यापार गणित (व्यवहार गणित, सूद दर सूद, हानि
लाभ आदि) की सब बातें सिखायी जाती थीं। हुण्डी लिसना
तथा व्यापारी पत्रव्यवहार करना भी उन्हें यही सिखा दिया
जाता था।
उर्दू और फारसी के स्कूल-गोवा म जितनी अधिक
सरया म हिन्दा के फूल । उतनी अधिक सरपा म उदू
पारसीक सूल न । लेकिन जैस पान कल अगरवी की
इनत जारिका की -टिस दशम ह म हा वारसा पर पहले
लागा की पड़ी आस्था बी क्याफि मुगल बादशाहा, उनके नवाग
और १८३५ ई० तक अगरजी श्रदानता म भी फारसी का ही
व्यवहार होता था।
इम प्रकार नित्य प्रिति का नाम-कान चलान की शिक्षा
दना ही इन पाठशालाश्रा का उद्देश्य था। इमक अलाया
जिन लोगा का जरा ऊँचे मभ्य समान में श्रान जान और
'तहजीर' स लोगा क मा पत्तन का काम पड़ता या उन्हें इन
स्कुला में शिष्टाचार की विशेष शिक्षा मिलती थी। इही मर
कारणा स प्रारमी कम्यूला म गांव वाले भी जाते थे, और अन्य
ला भी उस भी हाते थे। कायस्थो सग्या तो प्राय मुमलमानों
म भी अधिक होती थी। लेकिन जर स प्रारमी अपने रानभाग
पर म न्युत हुइ इमरी प्राधिक महत्ता घट गयी। सरकारी
नौकरी या पड पड़ बाहर पान में प्रारसा सहायक न हागी,
यह बात विद्याथिया का जल्दी ही विदित हो गया। इम भावना
को निम्नास्ति पर म या प्रस्ट मिया गया है
पद पारसी पर्चे तेल,
यह दाउरत कसल।
इम प्रकार पारसी क सूला को जो वका लगा उसन इनको
चौपट कर दिया। लेकिन निटिश राज्य से पहले इनका काफी
पालनाला या। उदू और फारमी एक साथ एक ही मफतर में
पढ़ापी जाता था। वस्तुन प्रारम्भ में जा अनर ज्ञान पारसी
क इन मक्नगो में राग जाता या वह उर्दू और फारसी
दाना म एक समान था | डा. एफ. ढल्लू० टामस के
( ३२ )
शब्दों में "बड़े स्कूल वस्तुत छोटे स्कूलों की पढ़ाई के अँच
दरजे ही ये।
इन स्कूलों में पढ़ाने की शैला हिन्दी स्कूला की शैली से
मिलता-जुलती थी। सात वरस को उम्र में बच्चे यहाँ भर्ती
होते थे। अपनी तस्नो पर शिक्षक क लिसे अक्षरा पर थे उस
समय वक हाथ फेरा करते थे। बर तक इनके लिसने और
पहचानने की पूरी मश्क न हो जातो या यह क्रम राबर जारा
रहता था। इन अक्षरो को पहचान और उनका ज्ञान हो जान
के बाद लड़को को जेर, जपर, पश ओर तोगीन के निशानात
सिसाये जाते थे।
हिन्दी की अपना उर्दू म हिज्न करना अधिक कठिन है।
क्योकि उसमें एक ही उच्चारण क लिए अनग अनग कई अक्षर
होते हैं, जैसे "स" का उच्चारण 'स्वाद' से' और "सीन"
हीनों से हो सकता है। इससे शिक्षा को इनके सिखानम अधिक
समय सच करना पड़ता था। हिज्ने रन थौर श्रारा के मिलान
के नियम सिखाने म भी काफी समय लगनाया। यह बात ध्यान
में रखने को है कि इन मकवना मलिखना और पड़ना दाना
एक साथ सिसाय जाते।
वस्तुतः उर्दू को पदाइ तो यहां समाप्त हो जाता या श्रार
फिर आगे फारसी की पढ़ाई प्रारम्भ होतो या। पहला मितान
जो फारसी में पारम्भ म हा अक्सर पड़ायो जाता थी उसका
नाम "सालिक यारी" है। यह उदू फारसी, परयो और हिन्दी
-
का गुटका कोप है। इसमें दी हुई पहली कविता के प्रथम रात
के अनुसार इसका नाम रसा गया है--
सालिक घारी सिरजन हार,
वाहिट एक चिदा कार।
इसके बाद प्राय 'रामा' नाम की दूसरी फिनार पढायो
जाती थी। इसका अमली नाम 'सश्रदा का पदनामा' है,
परन्तु इस भी पहले मन्द स इसका यह माजनिक नाम पह
गया था। इस पुस्तक में नैतिक शिक्षा के लिए विनाएं हैं।
ये किता प्राय रटा दी जाता थी और पहली बार की पढाई
में इन मतलन न मममाया जाना था। हिन ठार
याद करान के लिए पढाते ममय हर शदर उचारण क साथ
समको हिज्ने करनी पडता थी। इसका पद लेन के राद महमूद
नामा, मामुकोमा, गुलिलो, वास्ता इत्यादि पड़ाया जाता थीं।
चूंकि भारमी रामदरपार को भाषा था, इसलिए फारसो में
खत लिखना सिखाना भी इस पाठ्य प्रणाली का एक आरश्यक
अङ्गया। इन्शाय मायोराम या अवुल फरल क खता क सग्रह
भो पढाये जाते 4 { फारमी पत्र के नाम स प्राय प्रेमपूण पा ही
पढ़ाये जाते 4 , यद्यपि यालकों के लिए इन पद्यो का पढाया जाना
उचित न था । इसा समय इमला और मुलेस का भी अभ्यास
कराया जाता था। जो लड़के आगे की पढाई भी करना चाहते
थे, उन्द सिकन्दरनामा ( पछ-अन्य ) और वहारे-दानिश (गद्य
प्रा०शि० इ००३
( ३४ )
अन्य ) पढ़ाये जाते थे । उस जमाने में ये किता, फारसी साहित्य
मे शैली के विचार से अपना सानी न रखती थीं।
यह सारी पढाई सात से नौ वरस में पूरी हो पाती थी
और मक्तब छोड़ने के समय लड़कों को फारसी साहित्य का
काफी अच्छा ज्ञान हो जाता था। इन विद्यार्थिया को पारसी से
तथा पारसी में भी अनुवाद करने की क्षमता आ जाती थी और
वह पड़े सुन्दर अक्षरों में हर प्रकार के और हर विषय के पत्र
लिस सस्ते थे।
इन स्कूला म व्यावहारिक शिक्षा काफी ली जाती थी, फिर
भी इस पाठच क्रम में हिसार स्तिार कुछ भी नहीं सिखाया
जाता था। कायस्थ लोग अपने लड़कों का हिसार फितार की
शिक्षा पर पर हा दिया करते थे। लेकिन मुसलमानोंम यह कमी
चनी रहती थी। व्याकरण की शिक्षा भी इनमे नहीं दी जाती थी।
ऊँचे दरजे के स्कूल-यापि जहाँ-तहाँ प्राम्य क्षेत्रों में
अच दरज क स्सूल भी बुले हुए थे, ता भी इस पुस्तक म उनरा
विशेष विवरण दना इमको सामा क बाहर होगा। इन सूना
का प्राय जनता पर जा प्रभाव था यह विशप रूप से सास्कृतिक
या। मुसलमाना क ऊच दरने के स्सूला म परमी पढायी जाती
या। इस पढाइ म याकरण, नाक और यम आदि का शिक्षा
मम्मिलित थी। इन अलावा कुछ कुरान पढ़ान वाले मक्तन
भी थे। अधिकतर य मस्तर मसारदा म हा लगते 4, पार
इनमे लड़की का पुराना प्रायते रटाया जाता था।
सरात पाठशालायो को सख्या इनसे कहीं अधिक थी और हेन्द-समाल पर इनका प्रभाव भी प्रत्यक्ष था। यह पाठशालाएँ अधिक स्थायी थी क्योंकि इनक शिक्षकों के लिए शिक्षण-वृत्ति हो कौटुम्धिक वृत्ति था। इनम पढाई निशुल्क होती थी और कई विषयों का शिक्षा दी जाती थी । इससे इन शिक्षा- म का विस्तार भी रहुन था। वदान्त, न्याय, गणित, ज्योतिप, व्याकरण, मीमांसा, महाभारत, रामायण, साहित्य, फलित च्यातिय, आयुर्वत, मनुस्मृति और पुराणादि की पढाई यहाँ होती थी। इन पाठशालाओं में हिन्दा या प्रारम्भिक गणित नहीं पढ़ाया जाता ना। यद्यपि इन पाठशालाओं को शिक्षा से बहुत योड़ लोग लाभ उठाते थे, फिर भी प्रामीण जनता के प्राचार- विचार और उनक रीति रिवाजा पर इनका बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता था। इन स्कूलों की इस उपयोगिता पर हम यथास्थान विचार करेंगे। विद्यार्थी पर हम इन पाठशालामा म पढ़ने वाले विद्या- विया का विचार करते हैं। ब्रिटिश प्ररश के पूर्ववर्ता काल में किस सिपातिक स्तिने फितन विद्यार्थी इन पाठशालाओं में पढ़त में यह रतलाना रडा कठिन यात है। मिरीड के पाठ अजमाइशा हलका क सम्मर मे सन् १८५२ के दिये हुए अको को नय र शिक्षा मन्सया परिस्थिति का अटल से कुछ अनुमान किया जा सकता है। २६,२५३ विद्यार्षिया म से (जो सालहक4)५४९१ ना मुसलमान ये,गपम ब्राह्मण रियाथिया की सख्या ६६९४, कायस्थों को ४६५०, बनियों की ३९५८, राजपूतों की १८२१ तथा अन्य जाति के लोगों की ४२९९ यो। पहली तीन जातियों पढी लिसी होने के कारण उनके विद्याथियों की सरया समस्त हिन्दू विद्यार्थियों को सख्या का तीन चाधाई होती है। राजा लाग प्राय जमीदार थे, श्रत उनकी संख्या ऐसी अधिक नहीं थी। इन श्रङ्कों में एक और मार्के की पात यह है कि समस्त जनसरया के अनुपात के हिसाब से मुसलमान विद्याथियों को सरया का अनुपात अधिक था। जनसाया में उनम औसत १६ फीसदी या जो अब भी उतना ही है परन्तु मुसलमान विद्यार्थिया की सस्या २८ पीसदी थी। ये मुसलान विद्याया किन स्नि उपनातियों के थे, इसका कोई व्योग नहा मिलता, परन्तु यह मान लेने में विशेप हर्ज नहीं है कि इनमें बहुत से पड़ोलिसी और ऊँची जातियों के ये। उपरोक विवरण मे यह स्पष्ट है कि जहा तक शिक्षा का सम्बन्ध या यह प्राय ऊँची जातियों में हा अधिक पैली हुई थी। शिक्षा का विस्तार-3पर रिये हुए श्रफ उद अधिक नहीं है और अगर हम इस बात का रिचार करते हुए कि इस प्रकार की गणना करन में कितना कठिनाई होती है, तथा घर पर शिक्षा पान वाले लड़कों को सरया इनम शामिल नहीं है, इनको ठाक मान लें तो भी हम यह थनुमाा पर म कोई मूल नहीं करते कि उस समय शिक्षा का प्रचार यहुत अधिक न था। मि० टॉमसन के अनुसन्धानानुसार शिक्षा प्राप्त करन योग्य विदियान स स्रज ५ का मर्ग वाला ही शिक्षा प्राप्त करते 4। सौभाग्य स प्रायशिना रा अवस्या का मामा वर्णन तो सन १९५० ई.म अपानाहरा मा पुस्तक की भूमिका म सूप पिलार सदिया हुअा है। "पाहर और किसान दाना हो प्रशिक्षित हैं। बहुतेर गांवों में ता पाहा में अरिया इतनी अधिक फैला हुइ है कि व नोग अपने व्यवहार के लेन दन का हिसार मा दियो म ठाकठीक नहीं लिख सकते और जमोदार तो प्राय मभी अनपढ़ है। एमी परिस्थिति में अज्ञान क काररा इनकीच कुछ न कुम मगडे टट सड हो जाना तो बड़ी महन बात है। बहुतेरे साहकार तो स हे जासभा दुध तिसत ही नहीं सिफ अपनी याद- दाव पर भरोसा रमर ही सारा लेन देन चलाते हैं । कुछ ऐस भी हैं जा स्वयम् तो नहीं लिख सकते, परन्तु पटवारी इत्यादि स अपना हिसार फितार लिखया लेते हैं। कोई-कोई बोहर अपन हाथ से हा गलत सलव हिसार लिख कर अपनों आत्मा को मन्तोप या योगा देते रहते हैं। नर वाहप की शिक्षा की यह हालत हो, जिनका सारा काम कान रही-साते पर चलता है, तो कृपका का निरक्षर होना और आश्चर्य की बात है ? यह बड़े दुस की बात है कि अज्ञान और काहिला के कारण ये लोग बालकपन म शिक्षा प्राप्त करन का ओर ध्यान नहीं दवे और फिर जीवन भर प्रशिक्षित रह जान स बड़ी छोटी-छोटी बातों के लिए दूसरो के आश्रित रहते हैं।"
आगरे के आस पास को एक जाति विशेष के लोगों का शिक्षा सम्बन्धी यह वर्णन वहुत कुछ चढ़ा चढा कर लिसा हुआ मालूम पड़ता है । सम्भव है कि उपर्युक्त पुस्तक के लेखक ने अपनी पुस्तक का महत्व बढ़ाने की धुन में ऐसा लिस दिया हो। उमके सम- कालीन अन्य लेसको के लेस से यह स्पष्टतया सिद्ध किया जा सकता है कि मुगल सत्ता के विनाशयुग मे भी कुलीन तथा मध्य वर्गीय जनसमुदाय में थोड़ो बहुत शिक्षा का प्रचार अवश्य था। मेजर ब्राउटन ने 'हिन्दुओ में प्रचलित काव्य' नामक पुस्तक में इस सम्बन्ध म या लिया है - "जिन बातों के जानने की मुझे आवश्यकता थी उनकी जानकारी यदि सन्तोषजनक रूप में किसी से प्राप्त हो सकती थी तो हमारा पलटना के सिपाहिया स हो। इन में हर जाति के हिन्दू हैं, जिन में अधिकांशत ब्राह्मण और राजपूत हैं । ये लोग प्राय हिन्दुस्तान के सभी प्रान्तो के रहने वाले हैं। ये लोग उलीन पा घराणों की सन्तान हैं और गाँव छोड़ने से पहले श्रावश्यक शिक्षा मा प्राप्त कर चुक हाते हैं। ब्राह्मण लोग अपन धर्म के साधारण सिद्धान्ता और कर्माण्ड के साथ तत्सम्बन्धी ऐतिहासिक कथाप्रा से भा भला भौति परिचित हैं। इनमें से बहुत से सेना में भी हान के पहले इन विषयों के अच्छे शाता .मेजर माउटन फो पबटन उस समय मालियर में पांचोर उसके प्रपिशव सिपारी पश्चिमी सयुत प्रान्त भौर अवध के निवासी पी।
थे। थोड़े समर मदनी पुरानी मरणता कम हो जाता है और में अपने अफसरों क देश भार उनक रीति रिवाज के सम्बन्ध में जानकारी प्राम करन क इच्छुरू हो जाते हैं। इम जिज्ञासा पूर्ति के बदले में अपने देश से सम्बन्ध रखने वाली ऐमी सर रातें बतलान को ये बड़ी प्रसनतास तैयार हो जाते हैं। से हो एक सिपाहो स मुझ इस पुस्तक में प्रकाशित अनक कविताएँ प्राप्त हुई है। इस सिपाहा क मम्मर में मेंन यह बात पहुवा दसरा या फि किमो विषय पर बात करते समय वह प्राय किसा लोकप्रिय करि की कुछ कविता जरूर कह देता था। एक दिन जर उसने ऐसी ही एक कविता पड चाव से मुनायी और जर मन उसक सम्बन्ध म उससे पूछ ताछ की तो पडो प्रसन्नता म उसने उसकी व्यारया कर डाली। उसकी कविता सुन कर मन उसस उस कविता को मुझे लिसकर देने की इच्छा प्रक्ट की और जन मैन उसकी व्यारया मुनो ना उस काव्य में इतनी मरसता पोर समक विचारों में इतनी कोमलता मुझे प्रतीत हुई कि मन उससे उसकी भार प्रादि के विषय में अधिक जानकारी प्राप्त करने की चेष्टा की। मैंने उससे यह भी कहा कि इसी प्रकार की कविताओं का एक संग्रह यह मेरे लिए तैयार कर दे और यह सहप इसके लिए राजी भी हो गया । मरस इस जिज्ञासा का हाल मारा पलटन को मालूम हो गया और बहुत मे सिपाहियों न मेरे इस कौतूहल का पूरा करन के लिए श्रा पा कर मुझे इस सम्बन्ध में बहुत कुछ जानकारी करा दी। अपने देश की कविताओं और
ग्राम्य गीतों के इस विचन में मेरी सरल और सची जिज्ञासा
से प्रभावित होकर वे लोग डे गोरप से मेरी महायता करते
थे और उनक इम प्रेम और श्रद्धा न मुझे अपने इस काय क
सम्पादन में वडा उत्साह और सन्तोप प्रदान किया।"
मन् १८५२ ई० का इण्डिया एजूकेशन रिपोर्ट म कनिंघम
माहर मानिन्नलिखित क्यन उद्वत किया गया था
"भारत लागा म ज्ञान सम्पादन की इच्छा का अभाव
नहीं है। स्पन या ग्रीस के तुन्य सभ्य दश भारत में नित्य प्रति
जीवन क काम न चलान क योग्य पढ़ने लिखने और हिसार
की शिक्षा अपय नी जाता है और साहित्यिक और वैज्ञानिक
पाण्डित्य र लिए हिदू और मुसलमाना में युरोपियन लोगो
के समान ही आदर मिलता है। मध्य भारत और युक्त प्रान्त के
कायस्थ, पञ्जान करना और काश्मार, बहाल और दम्सिन के
नामण अपन सलका का नियमित रूप स शिक्षा दते हे निससे
र सरकारी दरनर या किमी सठ साहूकार को नोकरा कर सकें।
नाझण अपन लगा का पारिवारिक पुराहित और ज्यातिषी
अपरा मुशा या छोटा मोटा अफसर बनाने की दृष्टि स शिक्षा
दिलाते हैं । बाहर और उनिय श्रपन लड़को का हिसान कितार में
खूर पक्या कर दत है और प्रासश्यकतानुमार वहा सात क काम
में भी उस्ताद ना दत हैं। गरीब से गरीष मुमलमान का यहा
इच्छा रहता है कि उस लड़के कम म म एक पार ता उरूर
ही उरान पढ़ लें। यपि उन्ह भाषा का एक भी ज्ञान नहीं हो
( ४१ )
पाता फिर भी मर अक्षरा क ज्ञान मात्र से फारमी म पड़ी
सहायता मिलता है । पदधा अग्रेजी विभाग के दफ्तरा में नौकरी
मिलन की श्राशा स लड़: अमेजी मूला में भरता करा दिये
जाते हैं, क्याफि अग्रेजी विभाग के दप्तरी म देशी भाषा विभाग
की अपत्ता अधिक वेतन मिलता है । कुरान हिपज करान,
'पारसी पढ़ान, अथवा तशी भाषा के सिसान के लिए और
व्यापारी शिक्षा दन के लिए हर शहर या कमर में एक या एक
स अधिक स्कूल अवश्य ही मिलेंगे। इनम श्रध्यापका का चार
थाना या इमस अधिक फीस और इसक अलावा मीचा मामान
पद लत्ते, ईवन, अथवा अन्य कई प्रकार का सहायता मिलती
ही है। वहाँ मालगी साहर या पाडतजी का जो सम्मान हाता ह
वह अत्यधिक है। इसी तरह मुसलमाना का श्ररपी कानून
ज्ञान अपना पारसी विताया की जानकारा लाक प्रामद्ध
है। सा भा क्म या अधिक पढा लिसा हिन्दू
तुरन्त 'शाखा", या "मिद्धान्ती जा" प्राति का पदना मिल जाती
है। हिन्दू और मुसलमान दोनों के शिष्ट ममुदाय म यह
लाकाकि प्रचलित है कि ज्ञान 'शराप्त या इन्सानियत का
पदक और मनुष्यता का चिन्ह है।"
तत्कालीन दाना लेसकों क उपर्युक्त लेयों स यह बात तो
स्पष्ट ही है कि उन दिनों ग्राम्य समुदाय में भी शिक्षा का प्रचार
रिसी न किसी रूप म जरूर था। पालकामा शिक्षा अधिकांशत
घर पर ही, घर पर पढ़ाने वाले अध्यापक या अभिभावका द्वारा
स्यान हास
मिलती थी। समयोचित शिक्षा ता तत्कालान मध्य श्रेणी क लोग और साहित्यसेवी समाज अवश्य प्राप्त करता था। हाँ, ग्राम्य जनता का अधिकांश-विशेष रूप से निम्न वर्ग--तो शिक्षा के नाम से विलकुल कोरा ही रहता था। इतनी सरन्या मस्तूला के वतमान होत हुए भी इस अवस्था का कारण परल प्रजा को शिक्षा के प्रति उदासीनना ही थी। प्रचलित प्रथा के अनुसार उन्हें अपन लडको को स्कूल भेजना आवश्यक था। उनके निक जीवन की नीरसता में कुछ परिवर्तन हो जाने से जो कौतूहल उत्पन होता था, इससे व अपने लड़ा को चूल भेन देते थे। लेकिन स्कूल में केवल भरती हो जान स यह तात्पर्य न था कि वे कुछ काल तक विद्यालयों में टिक कर विद्यालाभ कर सकेंगे। श्रीयुत रोड साहन के मतानुमार प्रत्यक भारतीय के छात्रजीवन का भासत अधिक से अधिक डेढ़ साल था। परन्तु यह अववि भा वास्तविक अवस्था सा योव नहीं कराती, क्याकि स्कूल की मजूरशुदा छुट्टियों के प्रति रिक, जा एक महीन में ७ दिन की होता यां, प्राय कइ दिनो तक चालक रसूल का मुँह न देय पात । गदर क समय म प्रमिद्धिप्राप्त राना शिवप्रसाद मितारे हिन्द न (जो युक्तमान्न म सूला क पहल हिन्दुस्तानी इनसक्टर थे)मन् १८२ क जांच कमीशन के सामन इस प्रान्त लागा की गरीनी क फ्तिन हो उदाहरण दिय थे। उन्होन महाया, 'पहले लोगों का पट भरना चाहिए फिर उनको शिक्षित बनाना चाहिए।
। { ४३ ) गरीवी ही एक ऐसी चला है जो लोगों को उपयोगी और वांछनीय बातों से दूर रखता है। छाटे छोटे २च्च सेतों से चिड़ियों उड़ाने में, ईधन के लिए गार जमा करने में, चौपायों को चराने और पानी पिलाने में और वास्तव में ग्राम्य पावन के हर काम म अपने माँ राप की मदद करते हैं। मां-बाप अपने बच्चों को इस मदद सपन श्रापका वचित नहीं रस सस्ते। हो, जा लाग एसा पर सकते हैं वे अपने बच्चों को किसी पास के स्कूल म भेजने के इच्छुक ही नहीं, परन् उत्सुक रहते हैं।" राना साहर जैसे साम्य विचारवादी और अनुभवी व्यक्ति क इस कथन स यथार्य अवस्था का दिग्दशन हो जाता है। यह अवश्य कहना पडगा, कि रूपक थपन बच्चों को मदद से हा अपने को पचित न समझते थे, वरन् उनके इस तरह शिक्षित वन जाने म व कोई अच्छाई या माथी लाभ भा अनुभव नहीं करते थे। परिणाम स्वरूप जा मां बाप अपन बालरों का स्कूल भेजत भी ये, ये उनकी तात्कालिक सहायता मिलन मे बाधा पड़ने के कारण स्यूल भेजना व र दते थे और यह एक प्रकार स आवश्य- म्भागी भी या हिन्दी मूला में नाला ८-९ वास को अरस्था मे भरती होते थे और दा एक साल ही में पढ़ना छोड़ देते थे। इस प्रकार की व्यवस्था के कारण स्कूला पर बड़ा बुरा प्रभाव पड़ता था। लम्बी गैरहाजिरी या उट्टी के कारण बालक अपनी पढ़ाई लिखाई सब भूल जाते थे। अत एक बार पढा हुआ पाठ भूल जाने के कारण ही दुवारा फिर पढ़ाया जाता था।
( ४४ ) इन सत्र नाता स स्कूल का कायारयुक्तता म भी कमी रहती थी और साथ ही उस स्थिति डांवाडोल रहती थी। स्कूल स्थिर होर चल भी नहीं पाते थे। प्रतिमर्प स्कूलों का नये सिरे से निर्माण होता था और जन तक गाँव के पढे लिखे कुटुम्बो में पालको को इतना सरया रहती थी पिससे शिक्षक को जीविका चल सक तर तक शिक्षक उस गांव म रह कर प्रति वर्ष नया स्कुल सालने म कोई हानि न समझता था। परन्तु जन पालको का सरया म कमा हो जान के कारण जीविका चलाने में कठिनाइ पड़ने लगती या तर शिक्षक दुमरे गाँव में चला जाता गा। इस प्रकार प्रारम्भिक शिक्षा दन वाले अनेक स्कूल बहुत ही कम समय तक चल पाते थे। उच्च श्रेणा के स्कूलो म, जहाँ शिक्षा द्वारा जीविका चलाना परम्परागत कार्य था, और जहाँ नि शुल्क शिक्षा दी जातो पी, इतने परिवर्तन न होते थे। जिर स्कूला म श्रध्यापक 'घरू शिक्षक" के तौर पर कार्य करता था, वे स्कूल भा अपक्षात अधिक स्थायी होते थे। उच्च शिक्षा देन वाले स्कूलों का उपस्थिति प्रारम्भिक शिक्षा देन वाले विचारे शिक्षक के लिए प्राय हानिकारक ही प्रमापित होती थी। पहले तो व उच्च श्रेणी की शिक्षा ही दते थे, इसस प्रारम्भिक सूली की स्थाति म बाधा पहुँचती थी। दूसरी बात यह था कि उच्चभणी क खूलों में नि शुल्क शिक्षा दी जाती थी, इसस अधिकांश पाल का ग आपण उधर हो हो जाता था जो योड़ नदुत पालक पप रहते थे उनको उस निम्न श्रेणी की शिक्षा के लिए शुल्क देना पड़ता था। तीसरी बात यह थी कि उच्च श्रेणी क शिक्षक विद्या न बेचन के पारण श्रद्धास्पद मान जाते थे और इस विपरीत विद्या बेचने के कारण प्रारम्भिक स्कूलों के शिक्षा अधिक मान को दष्टि से न देखे जाते थे। लेकिन दश निधन था, श्रत शिक्षा की मांग कम थी और फ्लत शिक्षकों की आय भी तानुसार बहुत घल्प हुश्रा करनी थी. थत यह स्वाभाविक व योकि जो लोग इस जनम जीवन निर्वाह के लिए उतरते थे ये ऐसी अंगीक लागन हाते ये जिनक प्रात जनता की प्रद्धा और विश्वास हो। देशी स्तूला की शिक्षा-पुरान स्कूला का जो पणन प्राप्त है वह क्वल इनर वाह्य सरूप काही विवरण है और जहाँ तक मेरी जानकारी है उनकी भीतरी चया का काई वर्णन प्राप्त नहीं है। मरी शिक्षा नीता तीन प्रसर के पुराने स्तूला में हुई है । मुझे घर पर उदू पढ़ान के लिए एक मौलवी साहर आते थे, अन मुझे उनके अन्तरग साप का परिचय है। लेक्नि एक बात में यहाँ बना देना चाहता हूँ किनिन म्युला म मैन शिक्षा पायी थी, वे इस समय प्राय लुप्त हो चुक हैं। सुन्दर सम्भा और मुगलकालीन महरारों से मुसधिनत, म पर से दोपलाद पर एर छोटा सा मन्दिर या। इसमें एक दालान था। इसी में पडित मोतीलालजी भट्ट अपनी पाठशाला लगाया करते थे। इस पाठशाला म अधिक से अधिक २० बालक
और यहाँ हिन्दी की पढ़ाई होती थी। मुझे अब पण्डितजी के
विषय में अधिक वाते स्मरण नहाँ रही हैं, तथापि इतना तो
स्मरण हे कि हिन्दा पढ़ना लिसना मेंने इसो पाठशाला मे सासा
या। वहाँ सडिया मट्टी के घोल मे सरकडे को कलम से पट्टी पर
वारह्सडी लिसने का ही मुरय कार्य था। इस पाठशाला क मर
जीवन म वह पडा ही सुदिन था जिस दिन पण्डितजी ने मुझ
स सास साम व्यक्तियों के नाम लिखवाये थे। मुझे लियाप्रेस
का छपी प्राइमर भा पढ़ने को मिलो या। बस इस पाठशाला म
अधिक से अधिक इतनी ही पढाई होती थी।
पण्डित जी अनुशासन म काफी कडाई करते थे। स्कूल ता
तिराह पर था, फिर भी रास्ते का ध्यान हम लोगों को नहीं रहता
था। थोड़ा भी गलती या काम में ढिलाई हुई कि 'चश्मा लगान
वाले पण्डितनी' सर ताड़ जाते थे। उनके हाथ मे वेत तो जरूर
ही रहता था, लेकिन उसका व्यवहार बहुत कम किया जाता था।
कड़ी निगाह और डाट फटकार सुनते ही हम सब ठीक ठिकान
बैठ जाते थे।
य पडितनी ब्राह्मण 4, श्र। पसपार म एक बार उनक
लिए एक सीधा पहुँचाया जाता था। इस अतिरिक्त मरे चाया
और नापा जा उनका कुछ नकद फीस अलग दिया करता
यह तीम स्तिना दा जाता था, यह मुझ ठार डाक विदित नहा
है, परन्तु मरा ममझ म यह पास करल कर थान हा दा
जाता होगा।
1
इस पाठशाला में केवल पढ़ाई ही नहीं होतो धौ वरन पालको
के लिए सेल-कूद और मनोरिनोद के भी मौके पा जाते थे।
प्रति दिन छुट्टो हान म पहल पाठशाला के सभी पालक एक लैन
म सड़े हो कर पर जार सचिल्ला कर पहाड पालते थे। दानान
घटे चुप चाप बैठ कर काम करन के कारण पालको में जो एक
प्रकार की सुम्ती सी श्रा नाती यो यह ऊँची पापाज से और गागा
कर पहाड़ों का पाठ करने म हवा हा जाती थी। इस प्रकार पक्षाड़
दुहराने में किसी प्रकार भार भी मस्तिष्क पर न पहता था।
जिस बालक की पारी पहाड बुलवान को होतो थी, सिफ उसे इस
बात का वडा ध्यान रखना पड़ता था, कि तनिक भी गलनी न
होन पाय, स्याकि एमा होन पर उसे तुरन्त ताहना मिलता था।
पाडतजी की इस पाठशाला की पढ़ाई थोड ही दिनों में
पूरा करके में अपन पिता के पास प्रयाग भेज दिया गया
और वहाँ एक महाजना पाठशाला म पढने के लिए बैठा दिया
गया । यहाँ रहोपाता, गणित, और महाजनी पढायी जातो यो।
यह पाठशाला शहर के बीचाच महाननीटाल म लगती थी।
एक महानन न अपना दालान और चबूतरा इस गम के लिए
- रबा । इसमें गुरुनी पढाया करत या पाठशाला
म चालीस स अधिक विद्यार्थी , अत गुरुता के दाना पुत्र
मा नका मद पर रहते थे। उनमा दा पुन ता अभी सालह
रस का ही हागा 1 दिन म दा पार पाठशाला लगती थी।
सर आठ सस ग्यारह पन तर और अपराद म दाया
(४८) तीन बजे से पांच बजे तक। बड़े नगर मे छोटे छोटे बालक अकेले पाठशाला आने में असमर्थ थे, इसलिए गुरूनो का बड़ा पुत्र लड़कों को उनके घरों से ले पाता और फिर उन्हें पहुंचा पाता था। लेकिन वह उन्हीं बच्चों के घर पर जाता था जो घर क मालदार और प्रतिष्ठित होते थे और पढाई भी आठ पाने या इससे कुछ अधिक देते थे । इस पाठशाला में छोटी बड़ी उम्र के और ऊची नीची जाति के सभी तरह के लड़के पढते थे। पाठशाला में पहुँच कर हमों लोग उसे साला करते थे। पहले दालान को सफाई का जाता थी। फिर एक कमरे में रखी अधफटी चटाइया निकाल कर झाड़ी और पिलायी जाती यां। पट्टियां भी वहीं रखी रहती थी। सरलडके अपनी अपनी पट्टियाँ निकाल कर घोटते थे। इसके बाद पढाई शुरू होती थी। पहाड़े और गुर रटाये जाते थे। सुलेस लिसाने का भा अभ्यास कराया जाता था। किसी प्रकार की लापरवाहा या काहिली अक्षम्य ची और जरा सी भी गलती करने पर सजा मिलती थी। इससे काम अन्धा हाना था ऐसा काम र नये स्कूलों म देसन का भो नहीं मिलता। पट्टी के गद कागज पर लिसाना शुरू कर दिया जाता था। गुरुतो न बहुतेरा पुरानी यहियो एकत्र कर रसी थी । इन्दी की नस्ल हम लागो स करायो जाती थी। इसक अतिरिक व्यापार सम्बन्धी पन, हुण्डो आदि भो लिसरायो जाता थी। महाजनी म पत्र व्यरहार फरना एक बड़े महत्त्व का बात है, क्योंकि महामना में फिमको किस प्रकार का सम्बोधन (४९ ) या शीर्षक देकर लिखना चाहिए, यह साधारण तरह के पत्रों से मिन होता है। हिन्दी में भी पत्र लिसना सिसाया जाता था और जन मुनीमी के काम क लिए अच्छी योग्यता प्राप्त हो जाती यी तो किसी देशी दुकान म काम मिलन में कठिनाई न होती यो। हमारे गुरूती का बहुत से महानना के साथ अच्छा परिचय था , क्याकि वहुतेरे महानन और बहुतेर वडे पड़ मुनीम भी वो उन्हीं क पढ़ाये हुए थे। इसस उनकी सिफारिश से लड़की का कहीं न कहीं मुनीमी जरूर मिल जाती थी और उनकी पाठ- शाला म पढ़ना इसक लिए कापी सिफारिश समझी जाती थी। इस पाठशाला में गुरू जी को नकद वेतन मिलता था। कभी कभी मेरी मातामही कुछ सामान भेंट के रूप में भेजवा देवा थीं, परन्तु वह कपल अपनी इच्छा से । इसका कोई नियम न था। अमीर घरा के लड़के गुरूजी को "जड़ावल या जादों के कपड़े" देते थे। हो, गुरुपूजा के दिन सभी लड़के गुरुजी की पूजा के लिए जन तक कुछ दक्षिणा जमा न कर लेते, तर तक कुछ भी भाजन न करते थे। अच्छे अच्छे महानन लोग वढ़िया कीमती कपड, मिठाई, दक्षिणा, बरतन आदि से गुरूनी की पूजा करते थे और गरीन लोग फल-फूल और वताशे ही गुरूजी के सामन रस कर अपनी श्रद्धा का परिचय देते थे। लेकिन सब लोग फूलों की एक-एक माला तो जरूर ही लाते थे। पहले हर वालक गुरूजी के सामने नाता और मुक कर प्रणाम करता था, फिर गुरूजी के माथे पर चन्दन लगा कर उनके गले म प्रा०शि० इ०-४ ( ५० ) माला डाली जाती और फिर साथ में लाया गया सामान उनके सामने रस दिया जाता था। इसके बदले में प्रसन्नता और स्वीकृति के चिह स्वरूप, गुरू जी भी उसके माये पर टीका लगा कर थोड़ी सी मिठाई फल-फूलादि प्रसादी के रूप में उसे दे देते थे। सस्कृत पाठशालाओं में यह पूजन बड़ी विधि से होता था, क्योंकि यहाँ बडे नियम से मन्त्रोच्चारण के साथ सब काम किया जाता था । एक प्रकार स यह उत्मव एक धार्मिक अनुष्ठान सा बन गया था। बच्चों के लिए महानमा पाठशाला मे सर से अच्छा दिन नागपचमी का होता था। उस दिन विद्यार्थी अच्छे से अच्छे कपड़े पहनते और डडे बना पर गाते निकलते थे। साथ में सुर मिला कर चौमुरी और ढोलक भी बजती चलता थी। एमा ही 'स्वोर्ड स"कासेल मेंन इग्लैंड में आक्सफर्डशायर के एक ग्राम्य स्कूल के बच्ची का सलते देसा है। हमारी पाठशाला क सभी बालक एकत्र होकर टोली बना कर गाते जाते हुए निम्लते और अपनी टोली के प्रत्येक पालक के घर पर जाकर उसके द्वार पर प्राकृपए के जीवन से सम्बन्धित काई घटना चिन या किसी अन्य देवता का रगीन चित्र लगा दते थे । इस प्रकार सार शहर का परकर हो जाता था। शाम को सब लोग बाजार म एकत्र हाते 4 , वहाँ अन्य पाठशालाओ क विद्यार्थियों को टोलियां भी माती थी और सल-सेल में काफी प्रतिद्वन्दिता दा जाती थी। मैं मुनीम बनने के लिए इस पाठशाला में नहीं भेजा गया
याद करने के
था, मेरे लिए तो गणित का अच्छा अभ्यास कर लेना ही यहाँ
जाने का उद्देश था। इस महाजनी पाठशाला की पढाई समाप्त
करने पर मुझे एक सरकत पाठशाला में बैठा दिया गया ।
यहाँ पालको की संख्या लगभग ४. और कभी-कभी इससे
भी अधिक रहती थी। फीस कुछ भी नहीं ली जाती थी। यहां
अधिकांश बालक निधन थे, अत उनके रहने और भोजन की
व्यवस्था भी पाठशाला को भोर से ही होती थी। यहाँ मुझे
সনহতীথ আর কয়া সাক্ষীৰ লগুৱী
लिए दा गयो । इनकी कुछ बातें मुझे मममायो भी गया पी,
किन्तु उस समय 7 मेरी समझ में नहीं आती थी। यहाँ की
पढाई मुझे रडी कठिन प्रतीत हाने लगी और मेरो इच्छा अग्रेजी
पढने को हुई। उस समय वेद के कुछ सूक भी मुझे याद कराये
गय थे।
नित्य को पढाई लिखाई के अतरिक्त सस्कृत पाठशाला को
अन्य बातें भी उल्लेखनीय हैं। पाठशाला के पडितनी को सस्कृत
की अगणित कहानियों याद थी। उनको ममय समय पर सुना
कर वे हम लागा का मनोरजन भी करते थे और शिक्षा भी देते
थे। पाठ पढाते समय इन कथाओ को उदाहरण के रूप में कह
कर वे पाठ्य विषय को समझा देते थे। बालकों के विद्यार्थी-
जीवन के पादर्श और भविष्य की रूपरेखा अनजाने ही इसी
पाठशाला में बन जाती थी। हम लोगों को छोटे-छोटे बहुत से
पलोक याद करा दिये गये थे। इनमें श्री शकराचार्य रचित प्रश्नो.
(५२)
तरी के श्लोक भी थे। मैं यहाँ पर कुछ श्लोकों का उद्धरण करता
हूँ। इससे विदित हो जायगा कि ये श्लोक विद्यार्थी समुदाय में
किन भावों का प्रवेश कर देते थे, क्योकि इन विद्याथियों में गुरु
के प्रति परम्परागत श्रद्धा होने के कारण उनके मुख से जो भी
निकलता था वह अत्यन्त हितकर समझ कर ग्रहण कर लिया
जाता था। प्रश्नोत्तरी की तो विशेष महिमा थी, क्योंकि यह तो
साशात श्री शकराचार्य द्वारा प्रणीत थी।
अपारससारसमुद्रमध्ये समन्नतोमेशरण किमस्ति ।
गुरो कृपालो कृपया वदैतद्विश्वेशपादावुजदीर्घनौम ।।
'इस अपार ससार सागर में मुझ डूबते हुए का शरण क्या
है, हे कृपाल गुरु कृपा करके मुझे बतायें | इसे पार करने के
लिए विश्वेश के कमल पद रूपी नड़ी नौका प्रस्तुत है।'
विप क्या-क्या है?
हर प्रकार के विषय भोग।
कौन लोग सदा दु सो रहते हैं ?
जो लोग विपयों म लिप्त रहते है।
कोन लोग प्रशसनीय हैं ?
जो लोग परोपकार करते हैं।
पूजनीय कौन हैं?
जो पदार्थों की वास्तविक्ता को देस लेते हैं।
निर्धन कौन है?
जिसमें अनेक बड़ी पड़ी आता है।
( ५३ )
अमीर कौन है ?
सन्तोपो।
जीवित ही मृत कौन है?
जीविकाहीन।
मृत्यु तक कोन वातें वाये में रसती हैं ?
झूठी आशाएँ।
विजली के वेगवाली वस्तुएँ क्या है ?
धन, यौवन और
आयुष्य।
सर से उत्तम पारितापिक क्या है ?
जो योग्य पुरुप को दिया जाय ।
मृत्यु पर्यन्त पुरुप का क्या कर्तव्य है ?
धर्मपथ का अनुसरण करना।
चाणक्य नीति भी इन पाठशालाओं में सूर पढायी जाती
थी। वालों पर इसका आश्चर्यनक प्रभार था, क्याकि इसकी
भाषा अत्यन्त सरल, शैली निर्मल तथा ओजपूर्ण है । यही बात
उक्त प्रश्नोत्तरी के विपर में भी कही जा सस्ती है। यहाँ
चाणक्य नीति से उद्धृत कर के एक-दो श्लोकों का अर्थ दिया
जाता है
'जिन माता पिता ने अपने बच्चों को शिक्षित नहीं बनाया,
वे अपने बच्चों के शत्रु हे क्योंकि वे शिक्षितों क सा
इसों में वक के समान दिसायी देते हैं।
'प्रत्येक पहाड़ में रन्न नहीं मिलते, प्रत्यक हाथी मे मुक्ता नहीं मिलता और न हरेक वन में चन्दन क वृक्ष ही मिलते हैं और न हर जगह सच्चे महात्मा ही मिलते हैं। कभी कभी बड़े बड़े विद्यार्थी पाठ्य विषय में से किसी विपय पर शास्त्रार्थ भी करते थे। वह सदैव सम्झत में ही हुआ करता था। पराक्षा तो उन दिनों होती न थी, श्रत शास्त्रार्थ में जीत हो जाना ही पड़ी प्रतिष्ठा की बात थी। नगर के प्रतिष्ठित विद्वान इन शास्त्रार्थो म उपस्थित होते थे और होनहार विद्यार्थी पर उनकी दृष्टि अवश्य पड़ जाती थी। इन शास्त्रार्थो में जा विद्यार्थी अद्वितीय प्रसरता का परिचय देता या उसका उपस्थित पढित समाज अनेक धन्यवाद देता और "न्याय रत्न" "वेदान्तकेसरी" आदि की उपाधि से उसे अलत करता था। लेकिन य उपाधियो केवल वास्तव म योग्य विद्यार्थी का ही मिल पाती थी, क्योकि पडित लोग प्राय अनुदार भी होते थे और उपाधियों इतनी शीघ्रता से नहीं दे देते थे। इस वणन स स्पष्ट है कि इन पाठशालाथो का ससार ही चिभिन था। अपकारियों के प्रति विशेष प्रकार की श्रद्धा विद्या. थिया म उत्पन्न की जाती थी, और साथ ही साथ एक प्रकार का विश्वास और धर्म निष्ठा विद्यार्थियों के जीवन का एक अग बन जाता थीं। इस प्रकार उसके जीवन का सारा दृष्टि कोण ही सकीएं हो जाता था। अपने कर्तव्यों का तो उस पूरा-पूरा ज्ञान हो जाता था, परन्तु अपने अधिकारों का यह कोई मर्म न जानता था । इस प्रकार की शिक्षा से वह भादर्शवादी तो अवश्य ही बन जाता था, परन्तु उममें स्वद्धि की लालसा ग्लिन न रह जाता था। यह शिक्षा उस इतना चिन्तनशील कना देती थी कि वह व्यवहारकुशल नहीं हो पाता था। इन सस्कृत पाठशालापान इमा प्रकार की शिक्षा दी जाती थी। दम विपर पर विस्तृत विचार हमी श्रध्यार में पारा किया जायगा। प्राचीन शिक्षा प्रणाली के प्रधान लक्षणों पर एक दृष्टि ५-रटान की प्रवृत्ति -लिमान क अन्याम का प्रभाव -परीक्षाओ का न होना ४-मानाटर की प्रथा ५-कना प्रथा का न होना प्रारम्भिक तथा उच्च शिक्षा दन वाने दाना ही प्रकार के स्कूलों में लडकों से अधिकतर रटाई का काम लिया जाता था। शिवाम मौलिकता को काई स्थान प्रान न था। प्राचीन अन्य ही झान-कोप का सीमा समझे जाते थे। इमलिए विद्यार्थियों के लिए सोचम माग रही था कि वे उन ग्रन्थों का अध्ययन करें। लेकिन पुन्त भी उस समय इवना मरलता स नहीं मिलती थीं १८वीं मढी कमर और तासरे दशक म पहले प्रेस की छपी पुस्तकें सयुक्त प्रान्त न प्रचलित नहीं हो पायी थी। सार्वजनिक पुस्तकाला का ता सर्वथा अभार या, व्यक्तिगत पुस्तकालयों में अपरिचित पुरुप का प्रवेश दुश्फर या। पुस्तक प्राप्त होने पर
( ५६ )
भी नकल कर लेने में प्राधिक और अन्य अनक कार की
कठिनाइयां पड़ती थी। फिर पुस्तकों की मांग भी न थी। इसीसे
जल्दी लिसन की गति का विकास न हो सरा। जिसके पास
कोई पुस्तक होती थी, उसे सदा यही डर लगा रहता था कि कहीं
कोई दूसरा व्यक्ति उसे चुरा न ले जाय ।
इस प्रकार पुस्तकों पर भरासा न रस कर ज्ञान भांडार को
अपने मस्तिष्क में जमा कर लेना उचित समझा जाता था। इसी
लिए सस्कृत में यह लोकाक्ति प्रसिद्ध है -'पुस्तकस्था तु या
विद्या, पर हस्ते गत धनम्
अर्थात् 'पुस्तक की विद्या और
पराये हाय का धन समय पड़ने पर कभी काम नहीं आता।'
इसी से रटने में सरलता उत्पन्न करने वाले उपायों का आदि
फार किया गया था। निबन्ध की अपेक्षाः कविता याद करन में
अधिक सरलता हाती है। लम्बे लम्बे पैराग्राकों की अपेक्षा
छोटे-छोटे वाम्या को याद कर लेना सरल है। इसी तरह पर
जो घात गा-गा कर याद को जाती है वह अधिक सरलता से
याद रहती है । इमलिए शद काप, आयुवेद, ज्यातिप, औषधि,
गणित, वेदान्त आदि जैन निवन्यात्मक विपयो को भी काव्य
में परिणत पर दिया गया था। और व्याकरण के सूत्र यना
दिये गये थे। नित्यप्रति के व्यवहार म पाने के लिए गणित के
नियमो के 'गुरु' बना दिये गय थे।
परन्तु इन सब बातों से यह निप्पन निकालना चाहिए
कि रटाई की प्रथा मभी स्कूला में प्रचलित थी। उछ पाठशालाएँ
ऐसी अवश्य थी जिनमें विगायों की विचारगति के विनस के लिए भरपूर असमर दिया जाता था, लेकिन इनमें भी मार- म्भिक शिक्षा प्रचार में रटाई को आवश्यक अङ्ग मान लिया गया था। माम्य पाठशालाश्री में ता काठस्थ प्रया पूरे ठौर स देसने में भाती थी। लिखने का अभ्यास भी मामग्नीक अभार कारण अधिक नहीं हो पाता था। पट्टी या वस्ती के अभ्याम से निश्चित सीमा तक ही गति प्राप्त हो सम्वी थी क्योंकि पट्टी पर छोटे-छोट अक्षर लिसना कठिन है। कागज उस समय कठिनाई से मिलता था और मूल्य मा उसका अधिक होता था। बड़ी उम्र के लोग भी कठिनाइस वाहपर", या "माज पर" का व्यवहार करते म जो सदियों तक निगडता नहीं या फिर धो का लिखने का अभ्यास रान के लिए काग मिल ही कैसे समता या? इसके अलावा गांवों में लिग्रने लिखाने को भारतकता भी नहीं पड़ती थी। चिट्ठी चपाती मा रुदाचित् ही कभी लिम्बी जातो हो। ननियों या महाजनों के लड़कों को नही पाता लिखने का पाठशाला में अच्छा अभ्यास राग दिया जाता था, क्याकि स्वच्छ, और सुन्दर लिसावट का अभ्याम किये गिना मुनीमी के योग्य नहीं समझे जाते थे। लेकिन ऐमे वालों को भी लिसन का श्रव्यात करान के लिए साग इतना मुविधा से न मिलवाया। यद्यपि उपयुक्त अभ्यास में कमी रह जाती थी, फिर भी उनका लिखावट उचम कोटि को होती थी। एक दो सदी की पुरानी बहियो के देखने का अरसर मुझे मिला है। उनको लिखा- वट देख कर में दद्ग रह गया। फारसी के स्कूलों में तो लिसावट का अभ्यास करना एक कला का काम समझा जाता था। लोग इसका सरक्षण भी अच्छा करते थे। ब्रिटिश काल के पूर्व की फारसी, अरवी, हिन्दी या सस्कृत को उत्तम काटि को हस्तलिखित पुस्तके इस बात को भली भाति प्रमाणित कर देती हैं। दूसरी विशेप बात यह थी कि इन पाठशालाओं में किसी प्रकार की परीक्षा नहीं ला जाती या । अध्यापक और विद्यार्थी मे परस्पर इतना घनिष्ठ सम्पन्धरहताया कि अध्यापक अपने विद्यार्थी की योग्यता से भला भांति परिचित होता था, अत उसे उसकी योग्यता जानने के लिए फिसा अलग परीक्षा को आवश्यकता न पढ़ती थी। परीक्षा का दूमरा उपयाग पर यह है कि उसकी सहा- यता से जीविस या प्रतिष्ठा प्राप्त करन में मदद मिलती है , लेकिन उन दिनो नौकरी चारी रन के लिए तो विद्या पढ़ी नहीं जाती थी। सभी को अपनी भपनी परम्परागत जीविस मिल जाती थी। जीविकाएँ तो उनका जातिगत या कुल परम्परा के अनुसार निश्चित रहती थी और उनम विद्या की प्रतिष्ठा के लिए परीक्षा कोई माप नहीं थी, परन्तु जो लोग जीवन भर अपने पाण्डित्य की मर्यादा पनाय रख सकते थे, विद्वान समझे जाते थे। इस प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए धार्मिविपयों पर शास्त्रार्थ पर उनम जीव हान म किसी व्यक्ति की योग्यता का परिचय मिल जाता था और इन्हीं के द्वारा विद्वानों को कोक्ति पमकती - थी। विद्या के सरसरू मा परीक्षा को पावश्यक नहीं समझते थे । यद्यपि परीक्षा का श्रमाव कुछ लागा को अवश्य ही पाण्डित्य प्राप्ति के लिए उत्साहित करता था, फिर भी इसक अभाव म साधारण विद्यारियों की योग्यता का काई माप नहीं था। बडे बड़े स्कूलों में एक ही अध्यापक के होन से विद्यार्थियों में 'मानीटरों द्वारा अनुशासन रसन की प्रथा चल पड़ी थी और ऊँची पढ़ाई के विद्यापिया के हो पढ़ाने म अध्यापक का इतना अधिक समय निकल जाता था कि प्रारम्भिक अध्ययन करने वालों को पढ़ाने का काम पिसा ऊँची पढाई करने वाले विद्यार्थी को सौंप देना पड़ता था। यह कम प्रारम्भिक शिक्षा के स्सूलों में प्रचलित नहीं था। क्याकि इस स्कूल के अच्छे से अच्छे लडक म भी इतना योग्यता नहीं हो सक्ती या कि स्कूल के पिछड़े हुए वाला का स्वत पहा सका फिर एक बात यह भी थी कि इन स्कूला में विद्यार्थिया की सख्या चाडो हो रहा करती थी और अध्यापक का समय भी अपेक्षाकृत प्रत्येक विद्यार्थी पर कम सर्व होता था। इन स्कूलो में श्रेणियों भी नहीं होती थीं। सभी बालक एक. साथ बैठ कर पढ़ते 4। प्रत्येक पालक अलग अलग जो विषय पढ़ना चाहता, पढता था ! पढ़ने के लिए भी किसी विशेष पुस्तक का नियम न था। विद्यामा नो पुस्तक चाहता पढ़ने लगता था । वास्तव म जो पुस्तक उसे मिल जाता थी वह वही पढ़ लेता था। समान विपय और समान पुस्तकों का अध्ययन करने वाले और (६०) समानगति से चलने वाले विद्याथियो की सग्या बहुत ही अल्प थी। कभी कभी तीन तीन, चार चार बालको का टालियों बन जाती यीं ओर वे एक साथ पढने लगते थे। लेकिन इसका कोई नियम न था । प्रारम्भिक शिक्षा के स्कूलो में पहाड़ो के पढ़ने के लिए तो एक "दरजा" या, इसमें प्रत्येक विद्यार्थी को अवश्यमेव पाना हो पड़ता था । इसके अतिरिक्त अन्य विषयों में तो जितने विद्यार्थी होते उतने हा दरजे भी हो जाते थे। ऊचा पढ़ाई के विद्यालया म इस शैली से विद्यार्थी को यहा लाभ होता था, किन्तु प्रारम्भिक पढ़ाई क स्कूलों में तो समय और शक्ति दोनों का हो अपव्यय होता था। अनुशासन-प्रारम्भिक स्कूलों और उच्च कोटि के विद्यालयों के विद्यार्थियों के अनुशासन में भी भारी थन्तर था । सस्कृत विद्यालयों में तो कदाचित ही कभी अशिष्टताके लिए किसी विद्यार्थी को सजा मिलती हो । हिन्दी पाठशाला के विद्यार्थियों में भा अपने गुरु के प्रति बहुत अधिक श्रद्वा होतो था (जा पर भी चली जाती है )। उनके लिए अपन गुरु की उचित या अनुचित याज्ञा का पालन करना स्वाभाविक सा बात हाती थी। प्रचलित प्रथा, विश्वास तथा दूमरा का उदाहरण गुरु के प्रति इस श्रद्धा को विद्यार्थी के स्वभाव का एक अङ्ग बना देते थे। इसका अनुमान नाचे लिये श्लाक से होगा- असडम ढलाकार व्याप्त येन चराचरम् । तत्सद दर्शित येन तस्मै श्री गुरुवे. म' || इत्यादि- 'चराचरों में व्यात, असड मडलाकार रूप परमात्मा क पदों का दर्शन जिसकी सहायता से हुआ है उस गुरु 'अज्ञानान्धकार में भी देखने के लिए पिन गुरु ने ज्ञान का अन मरी औसा में लगा दिया है में उनका नमन करता है।' "गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही शिव , गुरु हो स्वयम् परमात्मा हैं। एस गुरु का में प्रणाम करता हूँ। जर इस प्रसार के विचाग को प्रत्येक विद्यार्थी के हृदय म अकुरित कर दिया जाता है, तो फिर वह उम सहज सत्य समझ कर उसका पालन अवश्य करेगा। इसके अलावा दूसरी चान यह भी है कि उसके इस आगरण पर प्रथा और प्रच- लित आचार विचार का भी बहुत ही अनुकूल प्रभाव पड़ता है। पाठशाला म पहुँच कर प्रत्येक विद्यार्थी गुह का पदस्पश करता है या अपने गुरु के पदों में माथा टेकता है और फिर बुट्टी पाने पर भी इसी प्रकार गुरु के प्रति भक्ति प्रकट की जाती है । पाठशाला में पहल हो प्रवेश करते समय विद्यार्थी गुरु की पूजा करता है और प्रति वर्ष गुरुपूना के दिन भी रडे समारोह में गुरु की पूजा की जाती है । गुरु और राना के दर्शन के लिए जात समय कोई व्यक्ति, वह चाहे कितना हो गरीर क्यों न हा, कभी खाली हाय नहीं जायगा। फिर य विद्यार्थी अपने बड़ी का भी तो ऐसा ही पाचरण करते देखते हैं। प्रयाग में मर घर के हो समीप म्यार सेंट्रल । (६२), कालिज के सस्कृत के भूतपूर्व प्रोफेसर प० आदित्यराम भट्टाचार्य जी रहते थे। उन्हाने प० मदन मोहन मालवीय जी को पढाया था। जब कभी वे उनके पास आते ये तो पड़ी श्रद्धा के साथ उनके चरणों में माथा टेकते थे । देश के सर्वमान्य महापुरुषों को इस प्रकार आचरण करते देख कर हम पच्चो पर भी उसका वडा भारी प्रभाव पड़गा ही। प्रत्येक विद्यार्थी के चित्त मे यह वात पैदा हो जायगी कि गुरु की सेवा करना और उनकी थाज्ञा में रहना बड़े सौभाग्य की बात है। व कदापि कोई बात जानबूझ कर ऐसी न करते थे कि जिसस गुरु उनके प्रति रुष्ट हो जायें । सस्त विद्यालयों मे गुरु क प्रति विद्यार्थियों को इस श्रद्धा ने अनुशासन की अनेक समस्यात्रा का स्वत मुलझा रक्सा था। हिन्दी स्कूलो म भा सस्कृत पाठशालाश्रा को तरह वालको म गुरु के प्रति श्रद्धा रसने को शिक्षा दी जाती थी, किन्तु यहाँ अनुशासन का काम प्रेम अथवा श्रद्धा को अपेक्षा ताड़ना से ही अधिक चलता था। पालका को छाटी उम्र को देखते हुए पढ़ाई के घटे अधिक थे, फिर पढ़ाई का क्रम और विषय भी ऐसा रूपा था कि छाटे छोटे नशा का मन सड़क, उद्यान और धारा चगाचा के लुभावने दृष्य की ओर अवश्य जाता था। ऐसी अवस्था में केवल श्रद्धा और आज्ञापालन क अतिरिक्त गलको पर अनुशा सन करने के लिए अधिक प्रभावशाली साधना के उपयोग की आवश्यकता थी। वह समय भी ऐसा वा जप सदियों के अत्या चार और पाशविक, निर्दय व्यवहार ने मनध्य स्वभाय को
उसका आदी बना दिया था। उस समय यदि निर्दयता स
चालकों का मारन पीटन वाले अभ्यापक रहे हों तो कोई आश्चर्य
की बात नहीं है।
सन् १८५० में मि० रीड न अपनी रिपोर्ट में पत्तिमोत्तर
प्रान्त में तत्कालीन प्रचलित स्वयम् दग हुए चार प्रकार क दण्डों
का वर्णन किया है। इम मम्बन्ध में उनके मत का हम यहाँ
उद्धृत करते है। "ऊपर जिस दण्डविधान का वर्णन हुआ है, वह
ऐसदड ये जो उस बालक का अपने माथिया की दृष्टि म हीन
और हास्यास्पद बनान का काफी । स दण्ड प्राय पारमी
और हिन्दी स्कूला म रिय जात थे । लेकिन ये दण्ड विधान इतने
घृणित और इतन निप्छर ये कि काई अध्यापक उन्ह प्रभावशाली
घरानों क लडका पर प्रयुक्त करन का साहम नहीं कर
सस्ता था। इस प्रकार एम दण्ड क मर्वया पाने याग्य पालक
भी कभी कभा दण्ड से मुक हा जाते थे। यदि गाई पालक कभी
अन्टी तरह स पीट दिया गया, ता उस माता पिता इसी
वहान उसे स्कूल स हटा लेते 4 और माय ही मार स्कूल की
"वाया" फीस भी जानबूझ कर ना भूल जाते थे । तात्पर्य यह
कि इस प्रकार सदएड उरिष्ट पन को प्रात करने में
श्रमफल
सिद्ध हाता है। निर्दयता की मात्रा अधिक हान से यह दण्ड
असह्य हो जाता है। साथ सरस अधिक नटखट वालकको
भी दो चार तमाच या वेतों से अधिक दण्ड देन की पारस्य
कता नहीं है।"
( ६४ ) यह बात स्मरण रसने की है कि कम से कम गांवों में वो अवश्य ही माता पिता स्कूल जाने या न जाने के लिए बालक को पूरी-पूरी स्वतन्त्रता दे देते हैं । वे वालकों पर स्कूल जान के लिए कोई दवार नही डालते थे। ऐमी अवस्था में भारी दण्ड देना अध्यापक के लिए एक प्रकार से अपने ही हाथों अपन पैरों पर उन्हाड़ा मारना या । परिणामस्वरूप दण्ड प्राप्त वालक ही नहीं, वरन उसे देय कर अन्य बालक भी भय वश उसक पास नहीं जाते थे। तथापि यह वात माननी पड़ेगी कि कभी-कभी अध्यापक का शिक्षक की अपेक्षा सिंहपालक का वीभत्स रूप धारण करना पड़ता था और इसी प्रकार इमो प्रकृति के मातापिताओं का भी कभी कभा सामना रना पड़ता था। समालोचना 1-ऊपर पुरानी शैली के ऊँच और प्रारम्भिक स्कूलों के पाठ्यक्रम, उद्देश्य तथा, उनम प्रचलित जीवन का विव- रण किया जा चुका है, परन्तु इतने दीर्घकाल के उनके सम्बन्ध में क्सिी वात का निणय करना कठिन है। उनके सम्बन्ध म जो सम्मतियां इस समय उपलब्ध हैं, वे अधूरी और पक्षपाव पूर्ण हैं । कुछ लोग यदि उसको भूरि भूरि प्रशमा करते हैं तो कुछ लोग कड़ी निन्दा। डा. एफ. उन्लूर टामस क श दो में "शुरू शुरुमें पाने वाने मिशनरी लाग ता हिन्दू देवताओं पर लाइन लगान में इतन अधिक व्यप्रये कि उस समय की शिक्षा के सम्बन्ध में उनरी मम्मति अधिकतर अण, एकरगी और पक्षपातपूर्ण था।" अगरजी के पक्षपाती और प्राच्यविद्या के बाद, प्रशसकों के सम्बन्ध में भी यही बात कही जा सस्ती है। लार्ड वेन्टिङ्ग से व्यवहार पटु गरनर के निर्णय का ही बहुत दिनों तक ये दानों दल यहाँ की परिस्थिति को ठीक ठीक न समझ सके। लन्दन की अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी के अपमर पर भारतीय विभाग में पुन्तकों और अन्य माधनों के सम्बन्ध न एडिनारा के डास्टर जार्ज स्मिा न १८७१ ६. म अपनी रिपोर्ट लिखी थी। उनका मत है कि नशी मदरमों और चट- शाला में पूर्वी दशा की विचार पद्धति के अनुमार दशन शान्त्र और भाषा विज्ञान सम्बन्धी बहुत उच्च-काटि का शिना दी जाती थी, परन्तु उसस असत्य ज्ञान का ही नीर पड़ती थी। इस शिक्षा से नया शक्ति प्रएटित न हाता था और न पिया थियों के जीवन पर ही इस का काई स्थायी प्रभार पड़ता गा। पहले को भात पान भी मिथ्या और कल्पित इतिहास, वनावटा विज्ञान तथा मूले दर्शन शान्न का ही प्रचार हाता था। इस रिपरीत टाक्टर लिटनर कपिवार म अनक भारतीय पण्डित और मौली जर्मन विश्वविद्यालया तक का प्रतिष्ठा पढ़ान याग्य य । इन पुरान स्कूलों की प्रारम्भिक शिक्षा प्रणाली में किंडर गाटन का पाट शैला का आभास मिलता है और यहाँ के उच काटि शिक्षण में आधुनिक शैलियों का दिग्दर्शन हावा । इन शिक्षालवा म प्राप्त होने वाली याग्यता की व भूरि भूरि प्रशसा करते हैं। बिहार के एक प्रसिद्ध सिविलियन डरिक पिनमाट न भी इन पाठशालायो का बड़ी प्रशसा की है। ग्रा०शि००५ इन सब आलोचनाओं में कुछ न कुछ सार अवश्य है। भारतवर्ष में अँगरजों के प्रवेश-काल की शिक्षा प्रणाली की इस गिरी हुई अवस्था को यदि इस दृष्टि से देखा जाय कि यहाँ की जनता का जीवन शताब्दियों से अशान्ति में गुजरा था, और फिर भी वह अपनी श्रद्धा और परम्परा से प्रेरित हो कर थोड़ा बहुत विद्याभ्यास कर लेती थी, तब अवश्य ही इस ओर हमारी सहानुभूति होगी। एक तरफ सस्कृत पाठशालाओ और मदरसो की शिक्षा मिल्कुल पारमाथिक उद्देश से दी जाती थी, तो दूसरी तरफ प्रारम्भिक पाठशालाओं की शिक्षा का उद्देश विलकुल मांसारिक था। एक ओर तो सांसारिक्ता के नाम-मात्र से घृणा थी, यहाँ तक कि जनता की व्यवहार की भाषा तक का निषध था, तो दूसरी ओर हिन्दी उर्दू के प्रारम्भिक स्कूलों में ठाक इसके विपरीत व्यावहारिक्ता का ही बोल वाला था। जिस समाजम मध्य स्थिति के लोग का अभाव होता है वहाँ मध्य माग का अनुसरण करना कठिन हो जाता है। जहाँ तक वस्तुत शिक्षा दीक्षा का सम्बन्ध था, यहां तक उच्चकोटि के सूलों की पढ़ाई सफल कही जा सकती है। मिस्टर एफ. उन्ल्यू टामस न भारत म अगरेजी शिक्षा का इतिहास और उमकी उपयोगिता नामी पुस्तक में लिखा है कि यहाँ क प्राचान पण्डित युरोप क पूर्वकालीन नवयुग क विद्वाना स किसी तरह भी कम नयाच वनायट व पासएड को तिरस्कार को रष्टि स देराव ध और हमशा हर यात की तह तक पहुँच कर ही सन्तुष्ट होते थे। इनकी ज्ञान पिपासा नही सरल थी। अनेक टीकाएँ रट कर याद कर ली जाती थी। मूरमाति-सूक्ष्म प्रश्नो के विवचन म कई कई दिन वक बाद विवाद होता रहता था। पत्र विपक्ष समर्थन में गृह से गूद भाषा प्रयोग का साधन बनती थी और जर किसी प्रान की पुष्टि में भाषा विज्ञान की समस्त उनियाँ लगा कर एक दिन पियार्थियों का सन्ताप कर दिया जाता, वर दूसर दिन गुरु जी कहते, 'वत् असत्' अर्थात् यह तक असगत है। फिर चे अपन पक्ष के समर्थन में विद्या थियों द्वारा दिये हुए प्रमाणों का सएटन उपस्थित करते । इन सर बातों में किनन समय का दुरुपयाग होता था, इसका को किमी से विचार भी न था। लेकिन किसी भी विषय के समर्थन या उसके सडन में जो प्रमाण उपस्थित किये जाते थे, व एक हा तरह के हाते थे, क्योंकि वास्तविकता की अनुपस्थिति म डाम कोई नवीनता पाना असम्भव या! पटित अधिकादत्त व्यास रचित 'पढ़ पढ़ पत्थर' नाम के प्रहमन म इन शास्त्राथो को अव्यावहारिस्ता का प्रदर्शन खूप अच्छी तरह किया गया है। इनके तर्क में बाल को साल निकालन का उपहास्य प्रयन साफ नजर आता है। इतना अवश्य मानना पड़ेगा कि इन विद्यार्थियों को व्याकरण, चिकित्सा शास्त्र, वशाख, कर्मकांड, काव्य, पुराण, शान, और कुरान इत्यादि का श्रन्छा ज्ञान होता था। यह सत्य है कि विश्वनात्मक शैली से इन विषयों का अध्ययन न होता था और इनके अध्यापकों को
वास्तविक ज्ञान की अपेक्षा इन विषयों का कितानी ज्ञान अधिक
था। लेकिन जब हम यह दसते हे कि युराप म मा नवीन
शैली के अनुसार अध्ययन करन की परिपाटी थाड़ हो समय से
चली है, तो फिर भारतवर्ष म इस शैली के प्रचार का न होना
कोइ आक्षेप या पाश्चय की बात नहीं मालूम पड़ती। प्रारम्भिक
स्कूलों में पढ़ान लिसाने और हिसार सिसान का बड़ा उत्तम
प्रवन्ध था। जगनी हिसार में लड़ा इतन दत्त हो जाते थे कि
आधुनिक शैली पर चलन वाले स्कूलो के लडक, उनस बढ़ कर
निकलने को पात ता दूर रहा, उनकी घरारी भो नहीं कर
सकते। पिनकाट साहब के कथनानुसार लड़कों का इन स्कूला म
विपयों का ज्ञान ऐमी पद्धति से कराया जाता था जो उन क लिए
बड़ी उपयागी सिद्ध हाती या। इन छोटे सूतो में, व लिग्रते हैं,
जयानी हिसार का अभ्यास इतना अधिक करा दिया जाता है
कि उसे देख कर बड़ा पाश्चय होता है। लन्दन क क्शक यदि
इन पद्धनग वालों का १०० तक पहाड़ा क गुणा का प्रयाग
जरानी करते देस ता उनक श्राश्चय का सोमा न रह । उछ
लड़क तो हिमान फितार म इतन तब श्रार सिद्ध हल है कि
जगाना हो अनक प्रकार का प्रान हल कर लेत है। उ ह दय
कर करल कागत पन्सिल स हो हिमार हल करन वाला का
थवार रह जाना पड़ता है।
पहा पाता, लन-दन, व्यान रहा आदि का पयादा रात मा
योग्यता और याराकी समिसायी जाता योकि उस इस पर
हम उनकी प्रशंसा किय विना नहीं रह सकते। यद्यपि उन दिनों लिसन की सामग्री आनकल जैसी मुलभ नहीं थी और न इवनो प्रचुरता में ही मिल सकती थी, फिर भी सुलेस लिसन का इतना अच्छा अभ्यास करा दिया जाता था कि उसकी घरापरी सभी साधन-युक्त श्राधुनिक स्तूल भी नहीं कर पाते। किसी भी मामूली पुरानी हस्त लिपि या वही सात को देखने से यह यात स्पष्ट हो जाती है। इस प्रकार इन पुरानी परिपाटी क स्कूला म साधारण गणित और लिसन का अभ्यास तो पूरी तौर से करा दिया जाता था और यदि पढ़ने का अभ्यास त्रुटिपूर्ण था तो उसका कारण यहा था कि छापेखाना क न रहन से उस युग म पढ़न की सामग्री मिलने मे बड़ा कठिनाइयां थीं। इन कठिनाइया को देसत हुए उन दिना की पढ़ाई का अभ्यास भी इतना बुरा नहीं कहा जा सकता। पुरानी पद्धति के स्कूलों म पढाई चाह कैसी भी रही हो परतु विद्याथियो के चरित्र निमाण पर इसका बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता था। इनम से सांच के ढले जैसे विद्यार्थी निकलते थे। बडों के प्रति श्रद्वा, विद्या व्यसन, विनय, त्याग और धर्म म प्रवृत्ति-यही इन स्कूलों म पढ विद्यार्थियों के स्पष्ट लक्षण ये अध्यापक और विद्यार्थी म पिता पुत्रवत् स्नह रहता था। गुरु ही उनक लिए नियम निर्माता, गुरु ही उनका संरक्षक, गुरु ही उनके लिए तत्वदर्शी तथा गुरु ही उनका शुभचिन्तक और मिन होता था। अपने गुरु के प्रति भक्ति और शास्त्र के प्रति श्रद्धा (७०) प्रकट करके गुरु ही स्वयम् विद्यार्थियों के समक्ष आचरण का आदर्श रखता था। पिनकाट साहब के विचार में ये स्कूल यालको को साक्षर भी चनाते थे और साथ ही अपने हदय और मस्तिष्क पर अनुशा सन करना भी सिसाते थे। उनमें ईश्वर के प्रति भक्ति, गुरु एवम् शास्त्र में श्रद्धा तथा विद्याभ्यास में प्रेम पैदा करते थे । गुरु सेवा को सम्मानास्पद पतला कर अपने हाथो अपना काम करन में प्रतिष्ठा का समर्थन करना सिसलात थे। केवल विद्या प्राप्ति के लिए हो अध्ययन करने का उस समय कितना अधिक प्रचार था, इसके लिए आज भी अगणित पण्डितो के जीवन इसस सासी दवे हैं। इन पुराने स्थूलों, विशेषत सस्कृत पाठशालाओं, से निकले हुए विद्यार्थिया में विनय का भाव बहुत अधिक पाया जाता है। "विद्या ददाति विनयम-विद्या विनय पैदा करता है और जिस प्रकार फलों से लदे हुए वृक्ष उनक भार स मुक जात हैं, उसी प्रकार विद्या प्राप्त करफ विद्वान भी यिनीत हा जात है। इन स्कूला में पद हुए लागों के चरित्र के इस पहल का उझेस एडम माय ने भी किया है। वे लिखते हैं कि व लाग अधिकतर पतुर, विक्कशील और उमाशाल हाते हैं। उनका यह विनीत भाव किसी अफसर के ममत दीनता प्रदर्शित करन के लिए नहीं होता, परन् अपने समकक्ष नागों के प्रति भी उनका स्वभाव सदा विनम्र रहता है। मैं ने कई बड़े म पढ़ विद्वाना फोभपनी विद्वचा और विद्यानुराग का यद ही मरल और विनीत शनों में परिचय देते, अपने मामन अस्थित किसी अपरि- चिन ग्रामीण परिदन को प्रशसा करते, किसी नार निवामी, परन्तु अनुपस्थित परिडन के पारिडत्य को पड़ो प्रतिष्ठा करने तथा किसो दूमरे नगर के रहन पाने Z और पदत्यागा पण्डित को भूरिभूरि प्रशसा करते सुना है, यद्यपि इन लागों को उपस्थिति मये उन कोनिद्वत्ता के सम्बन्ध में मौन रहना ही पसन्द करते। वेदान्तशि स्वामी के एक प्रतिद्वन्द्वी न स्वामी ना के साथ प्रतियोगिता को थी। इन गोनो में याचना का प्रमाण थोड़े से 'लोकों की रचना ठहरायो गया थी। परन्तु जन नियत समय म स्वामी जी द्वारा बनाये श्लाकों को मख्या के बाथ 'लोक भो वह न चना ममा, तो उसके पति और तिरस्कत होन पर भी यामी जी ने कहा, 'शूझरो एक मात्र छै सच्चे पैठा करक भी हमिनी के एक पच्च को बरापरी नहीं कर मस्ती, क्योंकि चह इस्ति सापक राजा की समारो काम में आकर सम्मानास्पद बनता है। उपरोक्त माहरण इन लोगों की विनय भावना का घडा स्पष्ट परिचायक है। विद्यानुराग को ये लोग धर्म का मूलमन्त्र मानते थे, क्योकि उनक धर्म के अनुमार श्रात्म शुद्धि का यही एकमात्र साधन या। इसी कारण उनके लिए विद्याभ्ययन अनिवार्य या। श्रार भी बहुत मे पडित और विद्यार्थी बनारस तथा अन्य स्थानों में मदा गरोजी म रह कर ज्ञान सम्पादन के लिए सस्तव एवम् अन्य प्राचीन ग्रन्थों का अध्ययन करते हैं। यद्यपि आर्थिक दृष्टि
से इस शिक्षा का कोई मूल्य नहीं रहा है, परन्तु उनको विश्वास
है कि ऐसा शिक्षा प्राप्त करना उनका परम पम है। वास्तव
में सस्कृत पढ़न वाले विद्याधियों का जीवन ऐसी कठिनाई और
गरीवी म गुजरता है कि अगर इस शिक्षा का ऐसा सतोगुणी
और धर्मनिष्ट प्रभाव न होता तो उनकी अवस्था बड़ी शोचनीय
हो जाती। इस प्रकार सांसारिक जीवन के प्रति इनम एक प्रकार
का विराग उत्पन हो जाता था। जीयन की सादगी और
विचारा की उच्चता का सिद्धान्त न करल आरश हो माना जाता
या, परन वह उन लोगा क आचरण स भी प्रत्यक्ष या। शोरानी
की ता वात हा दूर रही, साधारण मुस का वाते भा उनक मत
स असगत थी, जैसा कि नीच क रलाक स विदित होता है
मुसार्थिना कुता विद्या,
कुता विद्यार्थिन सुखम् ?
'मुस का कामना करन वाल के लिए विद्या कहां है और
विद्या का कामना करन वाले लिए सुख कहाँ है ?' इस प्रकार
परम्परा थोर शाखा की अनुमति द्वारा य यात उनक सभार का
अश ही नहीं यन जाती थी, बल्कि उनकी प्रकृति सी हद हा
जाती थी।
एडम साहब ने उनके इस प्रकार के जीवन का विशद
वर्णन किया है । व लिसच है, "मैंन इन लोगों का पिता प्राप्त कर
लेन पर कवल निरभिमान ही नहीं दसा, बल्कि प्राचार-व्यवहार
में भी अत्यन्त सरल पाया है। उनका व्यवहार शायद ही
कभा इतना भद्दा होता हाकि उस पर लोगा को क्रोध श्रा जाय। उन्ह दसकर इङ्गलैण्ड और स्कॉटलैण्ड क सरल-स्वभाव कपका की याद आ जाता है। ये लोग हमशा अर्द्धनग्न अवस्था म रह कर भूतकालीन असभ्य या श्रद्धसभ्य जावन का अनुभव करते रहते हैं। रे लागसी नापड़ियो म रहत है कि यदि उनक नैतिक जापन का अनुमान हम उनकी शारारिक परिस्थिति क प्रभार स लगायें ता स्वभारत यही प्रतीत हागा कि इस स्थानों म रहन गाला का या ता ज्ञान-विकाम अपूण ही हुआ होगा या बहुत हा मचित श्रीररिरूप । किन्तु वास्तव में इनमें स किन हा व्यक्ति ससार को परमात्कृष्ट दारानिक भापा के ज्याकरण का नाराशियों क जानकार हुए हैं, जा न केवल उस भापा का विभिन शैलिया क उपयागा का हा भली भांति जानते य, गल्कि उसका रचना शैला और तत्सम्बन्धी सिद्धान्ता क भा पूर जानकार रह हैं जा राष्ट्राय कानून और साहित्य के विभिन अगों के ज्ञाता और ग्नक व्यावहारिक स्वरूप स पूर्णत परिचित रह हैं तथा दशन शास्त्र और तर्कशास्त्र के गूढतम तस्या पर पड़ी तत्परता स शास्त्रार्य करत रहे हैं। ग्राम का दोटी सा पाठशाला भी अपन विद्यापिया म इन्हीं गुणा का समावेश करान के लिए था। लेकिन ज्ञान द्वारा उनकी बुद्धि इतना परिमानित न होन क कारण उनमें प्राय यहा गुण दासता का लक्षण मानलिये जाते थे। यद्यपि यह वात समनन में असंगत प्रतीत होगी, तथापि मर विचार में य उपर्युक्त गुण ही उनके टाप थ। किसी विद्वान ( ७४ ) ने गुणों का अतिरेक ही दोष की परिभाषा मानी है। प्रारम्भिक पाठशालाओं में इन बातों की शिक्षा सीमा से अधिक दी जाती थी। यदि यही उचित मात्रा म दी जाती तो इसमे गुण ही गुण बने रहते। पालकों में नडों के प्रति नम्रता का भाव इतना अधिक भर दिया जाता था कि ये स्वतन्त्र रूप से विवेकपूर्ण व्यवहार ही नहा कर सकते थे। उनमें स्वतन्त्र रूप से स्वयम् कार्य करने या किसी विषय पर विचार करन की शक्ति निलकुल ही दया दो जाती थी। बहुत से लोग कुछ विषया म एक नियमित सोमा तक इस प्रकार की शास्त्र विहित शिक्षा देना तथा किसी नियमित और असलाबद्ध विचार प्रणाली के प्रतिपादन में रटाई का अभ्यास कराना इसलिए उपयागी समझते हैं कि इनम विचार प्रणाली म परिशुद्धि और यथार्थता आ जाती है। लेकिन इन सर वातों को कवल प्रगतिशील साधन ही समझना चाहिए, न किसी पत्थर फा लकीर जिसके याग किसी प्रकार का पतन्य तक व्यव ही नहीं, बल्कि पापमूनक सममा जाय । इस अतिरिक्त उस समय क परिडतों का यह समार हो गया था कि जिन विचारा काय प्रतिपादन करते थे, उनसे उस विषय को इतिश्री हो जाती थी और उनके शिष्य इसके अतिरिक्त भार युद्ध करन क अधि कारा नये कि ये उन्द सत्य मान पर प्रद्धा से उन पर विश्वाम फरें और उनक अनुसार अपना प्राररण बनायें। इन पण्डितों के विषय में यह अवश्य कहना पड़ेगा कि ये अपन विद्यार्थियों के सामने उन शास्त्रों का भी वैसी ही योग्यता से प्रतिपादन करते 4 जा उन विरुद्ध पडत 4 परन्तु साथ ही साथ इन विचारों को शास्त्रों क प्रतिकूल रहन और उनक विरुद्ध पक्षपात स्थापित कर देन में वे अपने व्यक्तिगत प्रभार कापूरा-पूरा उपयोग करते हैं। इस विषय म य अध्यापक अपनी श्रद्धा और विश्वास के अनुसार अगर ठीक समझे जायें, परन्तु सच तो यह है कि उनके दुराग्रहपूर्ण प्रतिपादन स उनक विद्यार्थी पुरानी ड़ियों में जकड र लकीर क पकार वन नाते 4 और उनम यह थटल विश्वाम हा जाता पा कि प्राचीन काल की सभी पात मर्वोत्तम और सर श्रेष्ट हाती थीं, जिनका अतिक्रमण असम्भव था। इस प्रकार उनमें किमी प्रकार का अनुसन्धान करन की प्रेरणा तथा शक्ति का मवथा नाश हो जाना था। पिनयी भार का इतना अधिक महत्त्व दिया जाता था कि विद्यार्थियों में किसा विषय पर असम्मति प्रकाश करन या रिमी कमत का विरोध करन की समता कारिलकुल नाश हो जाता या। विनय अवश्य ही विद्वानों म मद्गुण है, परन्तु मूब और अज्ञानियों क लिए तो यह अपनी मूसंता ही नहीं, वाल्क अपन दाप दिपाने का भा पढ़ा अच्छा श्रावरण हो गया था। इसक अतिरिक्त विद्यार्थियों में उगसीनता या विरक्तता का भार उत्पन हो जान स उनमें से सर्वाचम विद्यार्थी श्राधिक, मामानिक तथा अन्य एदलौकिक उद्योगों के केन्द्र से बाहर हो जाते थे और इस प्रकार यह प्रवृत्ति हमारी भौतिक उन्नति को उनका दृष्टि में हीन ही नहीं बना देती थी, बल्कि उनक माग में नायक भी हो जाती थी । इन पाठशालाओं में पारमार्थिक विपयों और पार. लौकिक गुणों की श्रेष्टता का इतना अधिक प्रतिपादन किया जाता था कि मानव जीवन का वास्तविक स्वरूप और उसकी शारीरिक आवश्यक्ताश्रा और बाकांक्षाओं का पिल्कुल ध्यान न रक्सा जाता था। तात्पय यह है कि इस शिक्षा का श्रीगणेश इन्द्रिय दमन और श्रात्मनिग्रह से होना था और वहीं इसका अन्त भी। इस प्रकार हमारे "श में शिक्षा का यह एक ऐसा अनासा क्रम था जो हमारे मन को सदा भूतकाल की ओर सींचता रहता था और जिसका लक्ष्य कोइ उम्पल भविष्य न हो कर भूनकाल का अदृश धुंधला प्रकाश या निसका नतीजा यह हुआ कि न केवल हमारे विद्यार्थियों की, बल्कि सारी जनता की दृष्टि सदा के लिए पृष्ठपेक्षी हो गयी। यह तो विचार हुश्रा राष्ट्रीय दृष्टि से । यद्यपि उपराफ कारणों स अनक हानियाँ हाती थी, तो भा व्यक्तिगत हित की दृष्टि से इस प्रणाली स, अधिक पढ़ लिये लोगों को मानसिक श्रानन्द और भौविक मन्ताप मिलता था। इससे उनका जायन प्रतिभाशाला, मुसी और आनन्दमय हा जाता था।जा लाग केरल साजर, उनका भी जीवन इसी प्रसार मुस-सन्तापमय यन जाता था। लेकिन इम शिक्षा प्रणाला म सब से बड़ा पात यह थी कि लोगा में श्वर के प्रति अटूट भफि उत्पन हो जाता था निसस उनस जावन धममय और सदाचारमय बना रहता था। उनमें लाभादि दोपा का दमन करन का पसी विपिन शक्ति उत्पन्न हो जाती थी कि इनका ज्ञापन पुण्यमय बीतता या।
तीसरा अध्याय प्रारम्भिक उद्योग प्रान्तीय भापा की महत्ता फलकत्ते से अपना प्रान्त इतना दूर होन के कारण सन १८३५ ई०क शिक्षास-पया वहमा को चहल पहल यहाँ तक नहीं पहुँच पायो यो । सन् १८४० म प्रान्तीय शिक्षा क सचालन का दायित्व वगाल सरकार से निकल कर पश्चिमात्तरी प्रान्त (यू० पी.) की सरकार क श्राधीन हा गया था। १८४३ ई० म प्रान्तीय लाट सर जो० भार लान थपना यह मत व्यक्त क्यिा पाकि वगाल की श्रवस्था चाह कैसा भा क्या न हा पश्चिमातरा प्रान्त के लिए तो यह बात निश्चित थी कि यहाँ अमेजो के प्रचार की विशेष श्रावश्यक्ता नहीं था, क्याकि इन प्रान्त में अप्रेजी भाषा सीपने के लिए कोई प्रलोभन ही न था । यहाँ न से चुरापियन का हा एसी अधिक वस्तो यो, न धना व्यापारी समुदाय का अंग्रेजी म काइ कारवार हो होता । न यहाँ अँग्रेज वकाल य, और न अँग्रेजा क समुद्री व्यापार का यहां कोई केन्द्र था। जिन सरकारी नौकरियों में बाढ़ो बहुन अंग्रेजी की जानकारी की धारश्यकता ऐसी उत्कर्ष प्रदायिनी शक्ति की आवश्यक्ता थी जो उसको अपने स्वत्त्वा का ज्ञान करा देती। सरकार को यह पूण रूप से विदित न था कि यहाँ का जनता इतनी अशिक्षित और हतोत्साह हो गयी है कि वह अपन स्वत्त्वों का रक्षा करन के लिए लिसने पहन की साधारण शिक्षा प्राप्त करने क लिए भी तैयार न होगी। परन्तु सरकार का यह विचार ठीक था कि इस प्रकार की जनता के पुनरुद्धार के लिए शिक्षा प्रसार ही एकमान साधन था। देशी पाठशालायो की उपयोगिता का महत्त्व अंग्रेजा जाताय स्वभाव मे मान्तिकारी परिवतनों पर विश्वास न करन का भाव निहित है। इनकी सदा यह चेष्टा रहती है कि किसी कार्य को अविच्छिन्न गति म बाधा न पड़, वनी-बनायी सस्थाश्रा का उन्नति सुधार द्वारा होती जाय और उनस, जितना भी सम्भव हो, लाभ प्राप्त कर लिया जाय । अस्तु, इसी उद्देश से प्रेरित होकर इस प्राश पत्र म इसकी भी चर्चा की गयी थी कि नक्षित व्यय की प्राप्ति क लिए शिक्षा प्रसार द्वारा क्या-क्या साधन उपस्थित हो सफ्ते थे। इसमें लिखा था, "देश भर म फैना हुइ पुरानी पद्धति की पाठशालाएँ हो हमार व्यय की प्राप्ति में साधक बन सकती हैं। यह सम्भव है कि इस समय ऐसा पाठशालाओ का सस्या अधिक नहीं है और इनम दो जान चाली शिक्षा ना बहुत साधारण और असररत है, परन्तु उनका माया बढ़ायी जा सस्ता है और उनकी शिक्षा पद्धति में भी उनति की ना सस्ता है।"
इस प्रकार प्रारम्भ म सरकार की शिक्षा प्रचार की नीति यह
थी कि उस समय की पाठशालाओं की स्थिति का सुधार हा
और उनकी शिक्षा प्रणाली की उन्नति की जाय । सरकार का यह
विश्वास था कि जनसाधारण की शिक्षा सम्बन्ध म हमारे
प्रान्त की पाठशालाएँ पड़ी अर्दत सम्भारनाओं से परिपूर्ण हैं
और हमारे यहाँ का सशस्ति और रूदिप्रस्त जनता में शिक्षा-
इचारक लिए नयी-नयी पाठशालाएँ सालन की अपेक्षा दसी
पाठशालाओं हो म पारश्यक मुधार करक तथा उनकी सरया
बढ़ा कर, उन्हों के द्वारा शिक्षा प्रसार करना अधिक मुविधा-
जनक, चितम्पूर्ण पोर मितव्ययता का काम होगा।
मजा के उपक्रम का प्रोत्साहन
इस श्राश पत्र का एक और महत्त्वपूर्ण और उपयागी नीति
यह थी कि लागों पर शिक्षा का भार न लाद दिया जाय और
न सरकारी कर्मचारिया द्वारा ही उसका प्रचार किया जाय ।
भले हो सरकार वडा जरदस्त प्रोत्साहन देकर जनसाधारण
म शिक्षा के महत्व का समझने का ज्ञान पैदा करे, परन्तु प्रत्येक
अवस्था में कार्य जनसाधारण की पार से ही प्रारम्भ होना
चाहिए। साथ ही साथ यह प्रवृत्ति एकपक्षीय भी न होनी
चाहिए और जनसाधारण को इसके खर्चे में ही नहीं, बल्कि
इसके प्रति अनुराग प्रकट करने और इसके प्रतिपादन की
सलमता में भी भाग लेना चाहिए। हमारे देश में शिक्षा-
।
( ४ )
प्रचार की उन्नति उसी समय सम्भव है, जर सरकार का जन
साधारण का सहयोग प्राप्त हो। इसीलिए इस सक्युलर का यह
मन्तव्य ठीक ही था कि इन सव और अन्य चेष्टाओं में यह
नितान्त आवश्यक है कि सरकार को जनसाधारण का सहयोग
प्राप्त हो और उसकी यह नीति रहे कि वह उनकी सुचेष्टाओं
म उनकी सहायता करे, न कि सरकार अपनी सारी शक्ति लगा
कर जनसाधारण की चेष्टा की प्रवृत्ति को ही मन्द कर दे । इस
प्रकार के विवेकपूर्ण प्रोत्साहन से ग्रामीण पाठशालाओ की उन्नति
में ही सहायता न मिलेगा, बल्कि शिक्षा प्रचार के लिए ऐसे
मनुष्यों का सहयोग प्राप्त हो जायगा, जिनका जनसाधारण अपना
शिक्षक और सहायक मान लेने को प्रस्तुत है। इस सक्युलर
मे यह भी थाशा प्रकट की गयी थी कि शीघ्र ही गांव का
अभ्यापक जनता क ऐस प्रतिष्ठित और सायनिक सवक का
स्थान प्राप्त कर लेगा जिसका पारिश्रमिक गांव की आय पर एक
नियमिव और अधिकृत व्यय माना नायगा।
१८४५ ई० की शिक्षा सम्बन्धी प्रास्रा
इस आदेशपन में जिले के अधिकारिया को शिक्षा प्रसार में
प्रोत्साहन प्रदान परासा परामश दिया गया था, परन्तु उसका
मुख्य उद्देश दूसरा था। सरकार शिक्षा सम्बन्धी सारी बातों का
जानकारी प्राप्त करना चाहती थी, जिसस यह नवीन शिक्षा
अपार की योजना पार कर सफ। यह जांच ३१ जिलो म फा
गयी थी। इनम से रिले अर पश्चार प्रान्त म सम्मिलित हैं।
अवध उस समय तक इस प्रान्त को थमलदारा में सम्मिनित
नहीं हुश्रा या। अंग्रेज्ञा और मिशन सूना को छोड़ कर
सारे प्रान्त मनगर और गांव के हर प्रकार के सलों की
चस्या रुरल ७२ .या। शिक्षा ग्रहण करन याम्य अवस्था के
पालकों को सख्या १९३३,१३८ थी। इनमें से केवल २६
अथवा -७ प्रतिशत यालक ही उस समय शिक्षा प्रहण
कर रहे थे।
यह औसत इतना कम होन पर भी, शिक्षा के अभाव का
सच्चा निर्देशन था। , इससे शिक्षा की गिरी हुई दशा का
कुछ आभास अवश्य मिलता था। जमीन्दार जैसे प्रतिष्टित व्यक्ति
भो अपनी सन्तान को शिक्षित बनाने को जरा भी परवाह न
करते थे। सारी जनता में अविया का अन्धकार छापा हुआ
या। यतुत गांव में कदाचित ही कोई सा व्यक्ति मिल सकता
था जो किसी प्रकार थोड़ा बहुत शिक्षित कहा जा सकता हो।
शिक्षा सम्बन्धी नयी योजना
इस जांच की रिपोर्ट आधार पर मि. टॉमसन ने अपनी
शिक्षा प्रचार की योना तैयार का, जिसका धाभास आदेश पर
में ही मिल चुका था। बङ्गाल और बिहार की पाठशालाओं के
सम्बन्ध में मि० एडम से रिपोट स प्रभावित होकर ही, उन्होंने
देसी स्कूलों को गोसाहन देने, उनसी मरया बढ़ान और उन्हें
सगठित करने की योजना तैयार की थी, लेकिन उनका स्थायो
बनाने की योजना तो नितान्त मौलिकया।
भारतवप में बहुत पुराने समय स निरङ्कुश शासन चला
आता है, इसलिए यहाँ की जनता हर बात म शासक की
अप्रसरता की यादी पड़ गयी है। मि० टॉमसन का यह
आदर्श, जिसम जनता शिक्षा प्रचार के कार्य म पत अग्रसर
हो, फेवल जन सत्तात्मक शासन म सम्भव था। उस समय ता
इगलैण्ड में भी शिक्षा जन मत्तामक शासन के प्रधान न थी।
यहां की कठिनाइया का ध्यान रखते हुए उ हान मध्यम माग
का अनुसरण कर, जनता के उद्यागा और उपनाम का आधुनिक
नीति के साथ साथ सरकारा सरक्षण का भा महत्त्व प्रदान
करन की चेष्टा का। पहले क शासका न समय समय पर शिक्षा
प्रसार के लिए 'मुसाफी" और जागीरें प्रदान की यां। य
मुसाफ़ियां प्राय व्यक्ति विशेष का ही दी जाती थी, और व
उनकी परम्परागत सम्पत्ति धन नाती थी । जनता इस
जागीर प्रथा को अभ्यस्त थी और इसको उपयागिता भा र
समझती थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी न अनक जागार जन
कर ली थी, यहाँ तक कि शिक्षा प्रसार के लिए दी हुइ जागीरें
भी बच कर ली गयी थी। मि. टॉमसन का मत था कि
सरकार शिक्षा प्रसार के लिए ऐस रूप म सहायता द, जो
जनता को मारपफ मालूम हो और जिसक मूल्य को भा यह
समझ सके।
तैयार होगी सरकारी सहायता की आरश्याना सर का पिदित थी। जनता निधन यो और यद्यपि शिना प्रसार का थोडा रहत रार्य जारी था, परन्तु यह तो प्रत्यक्ष ही था कि जनता क लिए सरकारी सहायता रिना स्कूलों का मचालन करना कठिन था। इसलिए उन्हान एक ऐसा यातना तैयार को, निसक अनुसार २० से ४०० सालाना लगान का अपना ५स लेकर १० एकड़ तक का जमीन, प्रत्यक ग्राम क सूल का 'मुयाकी' के रूप म देन की सिफारिश की गया यो। जमीन्दारा यह विश्वास दिलाने पर कि इस 'मुबागी' स पाठशाला र अध्यापक का पापण पिया जारगा, सरकार उतनी जमान पर लगान माफ कर देन का । य जागार पुराना जागारो का भाँनि व्यक्तिविशेप को सम्पत्ति न हाफर अकिक हाना चाहिए या । स्थान विशेष क प्रतिष्ठित और गण्यमान्य सतना और जमान्दारा पर उस के सवालन का भाररपर इस यातना म पाश्चात्य लोक- प्रवृत्ति का भी स्थान दिया गया था। अध्यापक की नियुक्ति करना भी उन्हीं लोगा क हायम रखा गया था और उसकी कम स कम योग्यता भी निधारित कर दी गया थी। सरकारी नियन्त्रण भा इस योजना का एक अङ्ग था। कलक्टर को यह श्रादश या कि वह जमीन्दारा और प्रतिष्ठित लोगा का प्रार्थना पत्र पान पर स्वयम् इस बात की जाँच करके पता लगा कि गांव वाले तूल सोलने के लिए वास्तव में इच्छुक हैं या नहीं। वह यह भी देखें कि उनक दान के प्रस्तान
की कितनी यथार्थता है। इसके बाद वह सरकार से इस बात
की सिफारिश करे कि उस भूमि को लगान म मुफ कर दिया
जाय । इस याना में राज्य नियन्त्रण का भी समुचित प्रवन्ध
था, क्योंकि अध्यापक का नियुक्ति के सम्बन्ध म कलक्टर की
स्वीकृति आवश्यक थी और उसको स्वयम् या उसके सहायक
साधकारियों को समय समय पर स्कूलों का निरीक्षण करन का
अधिकार दिया गया था। उनका यह भी देखना पड़ता था कि
उस दान का उपयोग वास्तव म अध्यापक के निर्वाह के लिए हो
होता है या नहीं। उनको यह भी अधिकार या कि वे किसी
श्रयाग्य अभ्यापक को तुरन्त हटा दें और यदि ऐसा न किया
जाय तो स्कूल के लिए दान को हुई भूमि को वापिस ले लें।
यह यातना जांच के परिणाम के साथ साथ इस्ट इन्डिया
फम्पनी क डाइरेक्टर के पास उनकी स्वीकृति के लिए भेजी
गया, क्याफि गदर से पहले सार सच की स्वाकृति उन्हीं से ला
जाता थी। इसक साब क पत्र म हमारी प्रान्तीय सरकार क
सकटरी मिस्टर पानटन न लिया था, यह परिपाटी इम
प्रान्त की जनता के रीति रिवाज और उनकी मनावृत्ति के अनुकूल
है। इसा अनुसार अध्यापक गांव का एक ऐसा सावजनिक सयक
हो जायगा जिममा नियुकि और जिसका नियाह प्रामीण जनता
की पूर्व प्रधानुमार होगा' जागीर प्रथा की सिफारिश फलिए
प्रातीय सरकार जिस कारण सपरित हुई थी, रनरा उल्लेख
फरते हुए उसम लिखा था कि नगद पता दो की अपक्षा,
वतन भागी
मुभाको में भूमि दे देना कहीं अच्छा होगा, क्योंकि इससे वेतन
की अपक्षा, चाह वह उस भूमि की धाय से अधिक ही क्यों न
हो, लागों की निगाह में अध्यापक का पद अधिक सम्मान-सूचक
प्रकट होगा। इस अवस्था में अध्यापक का जनता के साथ भी ऐसा
सम्बन्ध स्थापित हो जायगा, जिससे उनमें मरफार
कर्मचारी की अपेक्षा उसकी सयामों का अधिक मान होगा।
परक अन्त में डाइरेस्टरों को माना जनक उत्तरदायित्व का
स्मरण दिलाने के लिए लिसा हुआ था, "प्रटिश गवर्नमण्ट पर
यह अभिशाप सदा लगाया जाता है कि वह पुराने शासकों द्वारा
दी हुइ जागीरों का ता रानर छीनती चली जाती है, किन्तु
स्वयम् उस उद्देश पूर्ति के लिए भी एक जागोर नहीं देती,
जिमम वह लयम भी उचित और उपयुक्त समझती है। यह
योरना इम अभिशाप को कुछ श्रश म अरश्य दूर कर देगी,
और वह भी इस प्रकार जिसे जनसाधारण पसन्द करते हैं ।"
जागीर देन की योजना पर थोड़ा श्रालाचनात्मक विचार
करन की पारश्यक्ता है। मिस्टर टॉमसनरागनारस उम-कोटि
क शासमा में है, जो जनसाधारण को भारनामा का प्रभावित
करने का प्रयत्न करते है, और कम से कम हमारे देश में तो ऐसे
हा शासक सफल हुए हैं जिन्होंन जनमाधारण पर उनसे
भारनामा के अनुकूल शासन करने की चेष्टा की है। शिक्षा क
लिए नागीर रेन की योजना स अवश्य हो उनकी मनोभावनाओं
पर बड़ा गहरा प्रभार पटवा । इमक अतिरिक्त टॉममन को
( ९०)
इच्छा थी कि इस शिक्षा पद्धति को जनसाधारण के रीति रिवात
और उनको मनोवृत्तियों के अनुकूल बना कर राष्ट्रीय स्वरूप
द दिया जाय । भारतवप में जनसाधारण को दृष्टि में भूमि का
स्थान इतना ऊँचा है कि विदशिया के लिए इसका अनुमान
करना भी कठिन है। यहाँ तो एक साधारण छोटे स जमीन्दार
का सम्मान क्सिी लसपती व्यापारी को अपना भी बहुत
यधिक है।
यहां की जनता का दृष्टि में किसी मनुष्य का पद और उसका
मान प्रतिष्टा इस बात पर अधिक थवलम्नित है कि उसके
अधिकार म फिनना भूमि है। इसीलिए भूमि मिलने से ग्रामीण
जनता की दृष्टि में अध्यापक का सम्मान अवश्य ही बहुत बड़
जावा और उनके साथ उसका सम्बन्ध भी अधिक हद हा जाता।
एक दूसरी बात यह भी थी कि यह प्रपन्य अधिक सुविधाजनक
और स्थायी भा हाना, क्योकि एमा कर दन स बार बार कम्पनी
क डाइरेस्टरा का स्वीति मेंगान का कष्टदाया थमुविधा से भा
वचाय हा जाता। अगर यह योजना खोरत हा गया हाता तो
पान प्रत्यक गांव म एक ऐसा प्रथा का नाम मुगढ़ हा जाता
जिसस, बादी बहुत अतिरिक बाप का व्यपरवा हो जाने पर,
हमार यहां को शिक्षा प्रचार की वतमान भाधिक समस्या बहुत
उस श्रों में हल हा जाती।
परन्तु इस प्रस्तावित याना के विरुद्ध बहुत सी आपत्तियों
भाभी। जागार मभ्पगली युग को सस्मारक अवश्य बास
( ९१ )
युग में, जब न तो अच्छी सड़क यो, न पान-नान के मुगम
साधन थे, और न मुद्रा का मुलभ श्रादान प्रदान सम्भर पा,
टीक समय पर और नियमित रूप से वतापितरण करना न
कठिन था। उम समय वा लिन लागा का चतन मिलता था,
उन्हें प्राय साल भर में या अले महीन हा एक बार मिल पाता
या। यह अपत्य ठीक है कि उस समय क जागीरदार मानता
पर बहुत प्रभाव या, परन्तु माय हा साथ तनिक मंगरिया
का मान भी दिन प्रति दिन रद रहा या 10 तरह स ता नागार
मिलने से अध्यापक की पाय अवश्य ही अनिश्चित हा जाती,
क्योंकि इस योनना में सूखा श्रादि स फसल मारी जान, दुर्भिक्ष
पड़न अथवा वादा जान सजा हानि हाती, उसका फाइ
प्रपन्धन रस्सा गया था और इसलिए अध्यापक की वृत्ति
एक प्रकार से स्थायी होन पर भी उमऊ लिए सदा चिन्ता का
कारण रहती।
योजना की अस्वीकृति
कम्पनी के डाइरेक्टरो न योजना के इस अश को पसन्द
नहीं किया और उन्होंने उस के इस अशको अस्वीकार कर
दिरा । फिर भी वे जनमाधरण म शिक्षा प्रचार के लिए
टॉमसन से भी कहीं अधिक उत्सुक थे । उन्होंने हमारे
प्रान्त में प्रारम्भिक शिक्षा प्रचार में प्रोत्साहन की आवश्यकता
का भली-भांति समझ लिया था और सयम् व्यापारी होन
की हैसियत से यह बात उनके घट इतर गयी थी कि यह
( ९० ) नितान्त आवश्यक था कि जमीन्दारों में कम से कम इतनी योग्यता तो अवश्य हो होनी चाहिए कि वे पटवारी के कागजों के इन्दराजों की जांच कर लें और यह समझ लें कि उनकी देनदारी क्या है? चाहे तो अनपढ़ जन साधारण में शिक्षा प्रचार की लोक- हितैपी इच्छा के कारण या पटवारी क कागजों के इन्दराजा की जांच करने और अपनी देनदारी की अवस्था का ज्ञान प्राप्त परन की चिन्ता के कारण (अथवा, सम्भव है, दोनों ही बातों से प्रभावित होकर ) ईस्ट इण्डिया कम्पनी के डाइरेक्टरों ने हमारे प्रान्त के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर के इस प्रस्ताव का बड़े उत्साह से समर्थन किया कि प्रामीण जनता में शिक्षा प्रचार की परम थावश्यकता थी। टॉमसन साहब ने अपना प्रस्ताव प्रस्तुत करने में अपन उत्साह फी अपना विवेक से अधिक काम लिया था, और इसलिए उन्होन अपनी योजना बनान में यड़ी सावधानी को थी। लेकिन डाइरेक्टरों ने इस विषय म यदा प्रशसनीय उत्साह दिसाते हुए लिखा कि ऐसी परिस्थिति में हम जनसाधारण म शिक्षा प्रचार फ लिए इसस भा अधिक ऐसा विस्तृत योजना को, जिससे सारे प्रान्त में सारजनिक शिक्षा का प्रचार हो जाप, स्वीकार करने के लिए तैयार है, जिसे प्रागरा प्रान्त की सरकार की भी स्वीकृति प्राप्त दा। गांव क अध्यापकों को जागीर रूप में पमीन देन का निपथ करत पर भा उहोंन लिसा फिय उन अभ्यापाको मायारी येतन दाकलिए तैयार है जो भावश्यक
योग्यतानुसार बड़बड़े गांवों में नियुक्त किये जायें अपना जो
पहले ही से नियुक्त हों। परन्तु ऐन अध्यापकों को वेतन देना
स्वीकार करते समय चे इस बात का देस लेना चाहते कि
अपना काम सुचारु और नियमित रूप से करन के लिए ये वैध
अधिकारियों द्वारा स्थानीय गवनमण्ट क समक्ष उत्तरदायी हा।
दसरी योजना
अर टॉमसन मार ने दूसरी योजना प्रस्तुत की। इसके
अनुसार हर तहसील में एक-एक ऐसा सरकारी स्कूल सोलन का
प्रस्ताव च्यिा गया था जा पास पड़ाम करसन के लिए आदरा
का काम दे। इस याजना में दमी सूनों को भा उपक्षा नहीं की
गयी थी, और उनके निरीक्षण के लिए भी व्यवस्था की गयी
थी। इन पाठशालाओं को देख भाल करन और जनसाधारण
दया सूलों का परामरा और सहायता देन तथा उनका उत्माह
बढ़ान के लिए से अधिकारिया का नियुक्ति का सिफारिश की
की गया थो, जिनका सरकार अपनो कमिक अति का सामान
नीति के अनुसार, 'इन्सपेक्टर के बजाय विजिटर' के नाम से
व्यक्त करना चाहती थी। इन इन्सपस्टरों को इस बात का
अधिकार दिया गया था कि वे योग्य अध्यापकों को पुरस्कार भी
दे सकें। यह पारितोषिक भविष्य में उनका वेतन नियत करने
का साधन भी बन सकता था।
इस पद्धति में हर जिले के लिए एक निरीक्षक और उसी
सहायता के लिए चीन परगना नायक रसने की योजना की गयी
६ ( ९४ ) थी और इनके काय क निरीक्षण और उसके नियमन करने लिए एक प्रधान निरीक्षक (विजिटर जनरल ) को नियुक्ति सिफारिश की गयी थी। प्रारम्भ में तो इस पद पर फिर अनुभवी योग्य सिविलियन को नियुक्त करना था, क्योंकि इ याजना की सफलता, ऐसे अधिकारी को मालगुजारी प्रथा प विस्तृत जानकारी और जन साधारण मे उस प्रभावशाली धा पर निभर थी, जो इस देश में हर सिविलियन के नाम के सा. परिवेष्ठित है। इस निरीक्षका और अध्यापकों की जा योग्यट इस योजना म अपेक्षित थी, उसके देसन स यह स्पष्ट हा जात है कि उस समय हमारे प्रान्त की शिक्षा क्तिनी हीन अवस्था के प्राप्त हो गयी थी। जिले के विजिटर (आरकल क डिप्टी इन्स पक्टर ) को हिन्दी और उदू को इतनी जानकारा होनी चाहिए 4 जिसस वह इन भाषाओं को पढ़ लिस सक और साधारणतय हिन्दी उर्दू में पढ़ायी जान वाली पुस्तकों का भी शान रसता हो उमक लिए पारसी या संस्कृत का भी कुछ ज्ञान होना आवश्यक था। अमौन क बन्दोबस्त को मिसिल तैयार करन, पटवारी के घहोपाते पाने और समझने नया साधारण गणित, जमीर की नाप आदि का भी उस जानकारा हाना थपत्रित थी। परामयिाउटश और तहमाल क अभ्यापका म हिन्दी- उदू का साधारण मान तथा हा भापामा म लिसी दुह अन्य साधारण पुस्तक पढ़ कर समझ लेन का याग्यता और रामसरन- दास फा घारों पुस्तमा का शान हाना जरूराया।
पढ़े लिसे श्रादमिया की उम समय म इतनी कमी थी कि इतनी कम योग्यता वाले पुरुष के लिए भी १०० रु० से २०० रु. तक मासिक वतन रखा गया था। इस समय रुपय का मूल्य पूर्वा पदा अत्यधिक घट गया है, फिर भी श्राजस्ल एम. ए. पास व्यक्ति का यदि १०० रु. मामिक मिल ता वह अपन को भाग्य- पान समझता है। इमी प्रसार परगना विजटरा का वतन ३० रु० से ४० रु. मासिक, और तहमाला सूलों के अध्यापको का १० स २० रु. मासिक दन की व्यवस्था इस यातना म रसी गया थी। इमक अतिरिक्त अध्यारका का वालका का पास का रुपया भी सयम् रस लेन का अधिकार मिला था। इतना वतन मिलन का व्यवस्था रहन पर भा विजिटर जनरल का शिकायत थी कि उस समय अच्छे और मुयोग्य अध्यापक मुश्किल स ही मिलते थे। योजना की स्वीकृति टॉमसन माहन ने पहल कवल आठ हो जिलों में इस यानना का प्रयाग करन और फिर इस वीर वीर सार प्रान्तम फैला देन का प्रस्तार किया था। किसानाम इस प्रकार को प्रारम्भिर शिक्षा की योजना को डाइरेक्टरों न तुरन्त स्वीकार कर लिया और इस कार्य क लिए ५० हजार रुपय सालाना का सच मन्जूर कर दिया। तदनुसार १८५० इ० म परली, अलागढ़, मथुरा, श्रागरा, मैनपुरा, शाह नहापुर, फाखावात और इटार क जिले में यह (- ९८ ) होने और उनके स्थान में नये सरकारी स्कूल या बोर्ड सूलों के खुलने के कारणों का विरेचन हम आगे यथास्थान करेंग। यहाँ पर यह उल्लेस कर देना ही पर्याप्त होगा कि मि. दामसन ने जन समुदाय में शिक्षा प्रचार के काम म सरकार की सहानुभूति उत्पन्न कर दी थी। उन्हाने शिक्षा प्रचार की नीति और उसके सचालन क लिए एक ऐसा साधन उपस्थित कर दिया या कि पश्चिमोत्तरी प्रान्त (यू०पी०) के शिक्षा प्रचार के इतिहास म एक नवीन युग प्रारम्भ हो गया।
चौथा अध्याय
व्यवस्थापन और एकीकरण
(१८९०-८२ ई.)
अधिकारी वर्ग का शिक्षा-पद्धति पर प्रभाव
शिक्षा विभाग क 'विजिटर जनरल'क पद पर वगाल सिविल
सरिस के एच स्टीवार्ड साहन की नियुक्ति हुई और उन्होन
सन १८५० स अपना कार्य प्रारम्भ रिया। सरकार को यह नवीन
योजना पूर्ण रूप स क्रान्तिकारी थी, क्योकि यह प्रजा क नैविक,
सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक जीवन के अन्तस्वल को
भली भारत प्रभावित और फुरित करने वाली थी। किन्तु इस
शिक्षाविभाग की स्थापना ऐसे शासनाधिकारियों की अध्यजता में
हुई थी जो अनुगमन मात्र से शिक्षा प्रचारक भी बन गये थे।
इसरा फ्ल यह हुआ कि हमार यहाँ का शिक्षा प्रणाली प्रारम्भ
ही स शासनाधिकारियों के विचारों क रग में रंग गयो।
शासन का कार्य सरलता के साथ चलान तथा पदाधिकारियों
की सुविधा की दृष्टि से शिक्षा विभाग भी शासन प्रवन्ध का एक
अग बना दिया गया था। मालगुजारी की योजना को सफल
बनाने की ष्टि से ही किसानों में शिक्षा प्रचार का आयोजन
३
( १०० ) किया गया था। शिक्षा के नैतिक लाभ का विचार को एक प्रकार से भावश्यकीय उपलत था जो बाद में इस नीति के साथ जोड़ दिया गया। इसका पाठ्यक्रम भी इसी दृष्टिकोण से तैयार किया गया था । वास्तव में शिक्षा विभाग का सगठन प्रान्त की मालगुजारी प्रथा को दृष्टिगत रस कर किया गया था और माल तथा शासन विभाग के अधिकारियों को आदेश दिया गया था कि ये लोग शिक्षा प्रचार के कार्य को भी अपना फत्तव्य समझे। फ्लस्टरों को आदश था कि वे समय-समय पर सूलों का निरीक्षण करें और याग्य अध्यापकों तथा परिश्रमा विद्याधियों को उचित पुरस्कार द कर उन्ह उत्साह प्रदान करें। इनशासनाधिकारियों ने शिक्षा प्रचार के सम्बन्ध में प्रयोगात्मक प्रयत्न करके अपनी सर्वदक्षता का एक और परिचय दिया। प्रसिद्ध हल्कापन्दी स्कूलों का आयोजन एक फलक्टर द्वारा ही किया गया था। कलस्टरों और तहसीलदारों द्वारा पठन पाठन के लिए पाठ्य पुस्तकें परापर वितरित की जाला घों और ऊँचे असर भी शिक्षा के सम्बन्ध में लाभप्रद सम्मति दिया करता शासनाधिकारियों के पितृतुल्य व्यवहार का यह सासा प्रदशन था, लेकिन उनमें से अधिकांश इस याजना को यल अच्छ मुसा, योग्य पटयारी भौर फायदच अमले प्राप्त फरन का साधन मात्र सममते थे। इस प्रकार इस प्रान्त में शिक्षा को सरकारी नौकरा पान का एक साधन समझने की प्रथा उसी समय से प्रारम्भ हो गया, और यह उसी रूप में मान भी हमार सामन मौजूद है।
लेकिन एक बात तो निस्सन्देह है कि शासनाधिकारियों की सहायता निना हमारे प्रान्त में शिक्षा प्रचार इतना विकसित न हा पाता। क्योंकि जिन जिन स्थानों में स्थानीय चुरोपियन अधिकारियों ने शिक्षा प्रचार में अपनी रुचि प्रकट नहीं की, यहाँ हल्कापन्दा ठूलो का चला लेना कठिन कार्य हो गया। यद्यपि शामनाधिकारी मवसाधारण के शिक्षा प्रचार में पर्याप्त रुचि प्रदशित करते थे, क्यापिने सभापत शिक्षा प्रचारकी के दपि कोण को अपने समक्ष रखने में श्रममय। प्रारम्भिक कठिनाइयाँ मिस्टर रोड के सामन श्रनक कठिनाइयों थी। जनता सर- कार के उद्दश को यथार्थ रूप म न समझ सकी थी। उस की ज्ञान शून्यता ता पढ़ो थी ही, फिर सरकार की ओर से शिक्षा- प्रचार की व्यवस्था ऐतिहासिक परम्परा तथा भारतीय राजनीति के विरुद्ध यो। इस प्रकार का शिक्षा प्रचार व्यक्तिगत जीवन तथा पाम संगठन में बहुत बड़ा सरकारी हस्तक्षेप या। ऐसी योनना, चाह वह किसी समय पर प्रस्तावित की जाता, ग्रामीण जनता में एक विचिन आशमा उत्पन्न किय रिना न रह सकती थी। कलक्टर साहब द्वारा अध्यापक अथरा विद्यार्थियों को वस्त्र, पुस्तक, और पुरस्कार प्रादि मिलने की बात तो जनता की समझ मा सम्वी वो। प्राचीन शासक भी विद्या प्रचार के सरता हात थे, किन्तु अँगरेजी सरकार ने तो सारे शिक्षा प्रचार को हो व्यवस्थित और केन्द्रीभूत करने के साथ-साथ व्यावहारिक बनाने का भी काम अपने पर उठा लिया था। इसलिए जब नियमित रूप से स्कूलों और विद्यार्थियों को नामावली तैयार की जाने लगी और इन्सपेक्टरों द्वारा उनका नियमित परीक्षण होने लगा, तव तो उनके लिए एक बिल्कुल नयीन यात उत्पन हो गयी। हमारे यहाँ के अध्यापकों को श्रम तक संरक्षका को सरक्षता का अनुभव था, किन्तु अपन अध्यापन कार्य का टीका टिप्पण। करने वालों का कोई अनुभव न था। उन्हें अब तक विद्यार्थियों को वैयक्तिक रूप से शिक्षा प्रदान करने का अभ्यास था, लेकिन विद्यार्थियों की कक्षाओं को उन्होंन थर तक न पढ़ाया था। ये शिक्षक ये और अपना व्यफित्य रखते थे। अपनी मनचाही पद्धति से ये विद्यार्थियों को पढ़ाते थे। परन्तु इस नवीन सगठन का आवश्यम्भारी परिणाम यह हाना था कि उनकी स्वतन्त्रता पर आघात पहुंचे और उनका व्यफित्व एक से बड़े व्यवस्थित शिक्षा क्षेत्र में तल्लीन हो जाय, जहाँ वे केवल मशीन के एक पुणे के समान आवश्यक होते हुए भी नगण्य ही रहें। ये इस प्रकार क सरलीकरण के लामा का ठीक- ठीक निरूपण भी न कर सकते थे, फिन्तु ये यह आसानी से अनुभव कर सकते थे कि इसस उनको मान मर्यादा, प्रविष्टा गौरय, व्या स्वतन्त्रता प्रादि का वास होता जा रहा था। इसलिए फोई आश्चर्य नहीं कि उसमें से कुछ लोगों ने प्रभाव भय की कल्पना स लोगों को इन बातो कपिल यहफाना शुरु कर दिया।
( १०३ )
उच्च जातियाँ और उनके भाव में परिवर्तन
इन सन्देदों के प्रभाव में पार उन-नाविया के लाग भी इन
अध्यापका के साथी हो गये थे, इसीलिए आरम्भ में ये लोग
मरकारी स्कूला से पचते रहे। लेकिन धीर धीर उनका यह भय
दूर होन लगा और गदर की घटना ने वा उनको श्रोस बाल दी
और फिर नवीन विचारधारा क आगे उनको नतमस्तक होना
पड़ा। शिक्षित समाज ने, जिसमें कायस्थ, पनिये, खत्री, कश्मीरी
और ब्राह्मण शामिल और जो सरकारी नौकरी से अपनी
जीविका चलाते थे, नयो सरकार की भांति नय सूला की महत्ता
चुपचाप स्वीकार कर ली और पुरानी परिपाटा को शिना को त्याग
कर वे नतीन प्रणाली का शिक्षा समान्य मममन लगे। लेकिन
जिनकी जाविका सरकारी नौकरी पर निर्भर नहीं थी अथवा
जिन्हें अपनी मान-मर्यादा का अभिमान था, उन लागों को इस
नवीन शिक्षा से अभ्यस्त होने में बहुत समय लगा। जर उन्हें
इसके विना अपनी मान-मर्यादा तक नष्ट होती दिखायी देने लगी,
वर भी इसको ओर अग्रसर हुए। महामपि प्रकार का इन
पक्तियों से इनका यह भार भली भांति प्रकट होता है-
सडक पे मांग है कुलियों की और मटों की,
कचहरियों में मांग है रत ग्रेजुएटों को,
खरानी है वो शेखजी के पटा की।
जिस समय की श्रालोचना यहाँ पर की जा रही है, उस
ममय सरकारी स्कूलों के प्रति धीरे धीरे जनता की धारणा
( १०४
बदलने लगी थी। इस बीच में इतनी राजनीतिक जाप्रति हो
गयो यो कि सन १८५९ ई. म जप इण्डियन नेशनल कांग्रेस
का आयोजन
हुआ,
तो
इस प्रान्त म भी उसके कट्टर विरोधिया
और ममर्थका की कमी न थी।
राजनीतिक जामति का प्रभाव शिक्षा पर भा आवश्यम्भाना
था, लेकिन यह बात जरूर कहना पडेगी कि अधिकांश लोगों
का शिक्षा क प्रति प्रेम मा अभिनय करल रोटी कमान के लिए
ही या। शिक्षा विभाग के डाइरक्टर एम. कम्पसन साहन
इस प्रवृत्ति का पहले हो समझ लिया था और उनका यह कहना
सत्य हो था कि देश की ऊची जाति के लाग जिस शिक्षा क
प्रहण करन म इस समय अरुचि और असम्मति प्रकाशित करत
हैं, मी शिक्षा का य लोग कुछ ही समय बाद सरकार स
अधिकार रूप म मांगन लगेग 1 इस सम्बन्ध म उनका अभिप्राय
विशप कर शहरी म वसन वाले उस श्रेणी फ लोगा और
मुसलमाना सया।
शिक्षा-मचार पर इस परिस्थिति का प्रभार
शिक्षा क प्रति भाव परिवर्तन के साथ ही साथ स्कूलों क
प्रति भी लोगो क भाव बदल गय। 4 देसी पाठशालामा को
तो अपनी चीज समझते थे, किन्तु नयीन पद्धति के सूल कि
'मरफारी' फहलाते 4 इसलिए उनके प्रति उनके हृदय में कोई
महत्त्व न था। यह भी नवीन भायोजना का एक दोप था।
शिक्षा विभाग इतना अधिक केन्द्रित और व्यवस्थित फर दिया
( १८५)
गया था कि उसम स्थानीय मारंजनिकराचरुवा क लिए स्थान
हा न था। धीर धीर इसका दमरा दुप्परिणाम यह हुआ कि
शिक्षा सम्बन्ध में जनता की रुचि नष्ट प्राय हो गयी और वह
अपनी शिक्षा के लिए भी सरकार पर उमी प्रकार निभर रहने
का श्रारी वन परी जितना कि पुलिस से रक्षा के लिए।
मरकार द्वारा शिना प्रचार का एक और परिणाम हुथा
जमा अनुमान लोगा का न था। शुरून इम शिक्षा विधि
आगनन में पुरानी पद्धति के सूला क ही आधार पर शिक्षा
न का मशा या। उनम उनति करक और उन्ह श्राविक सहायता
का निश्चय किया गया था, किन्तु वस्तुत इस आयाजना
न पुरानी पदति के सूलों क स्थान पर नयी पद्धति क स्कूल
स्थापित करा दिया
देसी भाषाओं के विरुद्ध भावना
रोड साहन का अन्य प्रकार की कठिनाइयों का भी सामना
करना पड़ा। इस नयी योजना में देसी भापाओं के माध्यम
द्वारा ही शिक्षा प्रचार का आयोजन किया गया था। किन्तु इन
दमा भापायों में लोगों को मचि नहीं थी। सस्कृत और फारसी
ज्ञान का श्रागार और ज्ञातन्य विपयो का एकाकी माध्यम
मममी जाती थीं। पढ़े-
लिखे हिन्द हिन्दी को नीची दृष्टि से
सते और उस 'भाषा' शन्द से सम्बोधित करते थे। इसी प्रकार
मुसलमान लोग भी उर्दू को निकृष्ट और हीन समझते थे।
।
भाषा के महत्व को समझाना तथा उसके प्रति लोगो में रुचि पैदा करना, उस समय टेढ़ी सीर थी। उर्दू हिन्दी के प्रचार के लिए उस समय हर प्रकार के उपाय किये गये, यहां तक कि सरकारी दवार भी काम में लाया गया। जर एक बार भाषाओं का प्रचार शुरू हो गया, तो इनका विस्तार अपने आप होन लगा-यहाँ तक कि पिछली शताटी म इनके प्रचार का वडा भारी आन्दालन उठ खड़ा हुआ । हिन्दू हिन्दी को और मुसलमान उदू फा इस हद तर अपनाने लगे कि इस नयी प्रतिद्वन्द्विता में दोनों जातिया म वैमनस्य बढ़न लगा। हिन्दी और उदू के प्रति पहले जो उपेक्षा दिसायी गयी थी उसके कारण स्कूलों में पढ़ायी जाने योग्य पाठय पुस्तकें उपलब्ध नहीं थीं। इसके फल स्वरूप शिक्षा सपालकों के सामने बड़ो कठिनाई उपस्थित हो गया। देसी भापायों के प्रति सार्वजनिक रुचि उत्पादन करन क अतिरिक्तशालोपयोगी-साहित्य को भी सृष्टि करने या भार उनके ऊपर था पड़ा और यह कार्य सहल भी नहीं था। तीन लिपिया से कठिनाइयां और शालोपयोगी पाठ्य-पुस्तकों का प्रभार प्रचलित भाषाभा को समस्या का पारसा नागरी पार कैथी लिपियों की उपस्थिति न और भा अधिक जटिल बना दिया था। इनमें कैथी नागरी का अमरकत और पसीट लिपि है जिसमा सृष्टि कायस्यों द्वारा हुई है। इसीलिए इमम नाम 'कथा' है सरकारी क्या गैर-सरकारी मस्याओं क सहयोग स इसका प्रचार चन्द करने का उद्योग किया गया। बनारस और श्रारा नागरी प्रचारिणी सभाओं ने विशेष रूप से तथा अन्य नगरा की सभाग्री ने सामान्यत बड़े उत्साह के साथ इस अान्दोलन का सहायता पहुँचायी। परन्तु नागरी और उर्दू लिपियों की समस्या न जातीय वैमनस्य का रूप धारण कर लिया जिसमें सर सैयद अहमद यो ने गर्दू का और राजा शिवप्रमाद तथा नानू हरिश्चन्द्र न हिन्दी लिपि का पक्ष लिया। हिन्दी उर्दू लिपि का यह झगड़ा पार भी पहले के समान ही समस्यापूर्ण बना हुथा याग्य अ-यापकों और इन्संक्टरों के प्रभाव की कठिनाइयाँ इन सर समस्याथों के अतिरिक्त एक समस्या यह और पी कि इस समय योग्य अध्यापक तथा इन्स्पेक्टर बड़ी कठिनाई से मिलते थे। इन्दी लोगा का योग्यता पर इस योजना पद्धति की सासवा निर्भर थो, परन्तु इन्हीं का नितान्त प्रभार या । जो लाग हाई स्मूलों या कालिना में अँगरेजी शिक्षा पा चुके थे, आगे उच्चाकांनाएँ भला मामीण या वहसीली स्कूलों को मास्टरों से 'सन्तुष्ट हो सकती थी ? यह लोग ऐसी परिस्थिति में, जहाँ अधिक काम करने के अतिरिक्त नगर छोड़ कर गाव में रहना पड़ता था और जिसके सम्पादन के लिए दृढ़ विश्वास और सलमता को आवश्यकता थी, भला क्यो रहना पसन्द करने ? इसके अतिरिक्त गांव वाले इनकी योग्यता से भयभीत होकर इन पर अपना विश्वास कैसे जमा सकते थे? इसीलिए यह लोग जहाँ कहीं गये भो, वहां इन्होंने अपने आप का अनुपयुक्त पाया।
(१८८ ) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र लिसित 'प्राम पाठशाला नौकरी के प्रह सन मे गांव की पाठशाला में इन अँगरेजी पढे अर्द्ध शिक्षित अध्यापको की करुण स्थिति का बड़ा सजीव चित्र दिसलाया गया है । ऐसी परिस्थिति में ग्रामीण पाठशालाओं के लिए जो अध्यापक उपलध हो सकते थे, वे उसी पुरानो परिपाटी के पण्डित थे। परन्तु फिर भी यह तो प्रकट ही था कि ग्रामीण हिन्दी स्कूलो क अध्यापक बहुत कुछ अनभिज्ञ होन पर भी उद्धत स्वभाव के न होते थे। उन्ह यानी कमी का वाध था और उस दूर करने के लिए वे प्रस्तुत भी रहते थे। उनमें एक विशेषता यह भी थी कि अपन विद्यार्थिया के माता पिताया से भला भांति परिचित 4 श्रार इसलिए उनक श्रद्धा भानन यन हुए थे। इयर यह नवीन शिक्षा प्रणाली पयाप्त रूप म क्रान्तिकारी थी, इसलिए उस समय की अवस्था में अध्यापकों को भी एक दम बदल दना बुद्धिमानी का कार्य न था। रीड साहा का कार्य इस प्रकार रीढ साहब के विजिटर जनरली क समय म यह प्रावश्यक हो गया था कि नवीन शिक्षा प्रणाली को नीय डालन के साथ ही साथ में देसो पाठशालामा की उमति म भा प्रोत्साहन दें, नय तहसीली पूरा स्थापित फर तथा प्रान्तीय भापामों म शालापयोगी माहित्य का निमाण भा कराय । रिला भोर परगना के निरोज फ पथ प्रदान के लिए विस्तृत नियम यन ही गुरु थे, इसलिए रीड साहब का भय इस प्रणाली का आगरा करना हो याही रह गया था। यह काम उन्होंने शीत्र शुरु कर दिया। शिक्षा सन्चन्या परिस्थिति का भली भांति मनन कर लेनक बाद उन्होंने तहमोली मा स्थापित करना और नमी सूज्ञा का निराजय करना तथा उनमो सख्यारत करना शुरू कर दिया। गोत्र ही यह पाव प्रस्ट हा गयी कि दसो पाठशालाश्रीक अध्यापक सरकार र प्रकाशित पुस्तकें पढ़ान तया इन्सपेक्टरा के निरीक्षण म मन्यमनस्क नहीं ये ओर इस लिए चार । समय-समय पर उन्हें पारितापि दिये जान लगव और उन्हें इस बात का मा अधिकार दिया गया था कि अपन विवाधिया का तहसीली स्कूलों में निशुल्क भरवो कपन को सिशरिश कर सक । यह सर मुविधाएँ होते हुए भी देसी पाठशालानी की स्थिति डोपांडोल थी। तो भो इनके लिए शिक्षकों का तयार करना विफल नहीं था, क्योकि जैस ही कोई अध्यापक एक पाट- शाला के चन्द हो जान पर खाली हा जाता था, वैस ही वह दूसरे गांव न जाकर दुसरा पाठशाला सोल लेता था। तहसीली स्कूल । यद्यपि इस नया प्रणात में इस बात का विशेष रूप से ध्यान रक्सा गया था कि वहसोला सून दसी पाठशालाओं के प्रति- द्वन्द्वान बन जाप, फिर भी शीघ्र ही ऐसे हल्कावन्दी स्कूल स्थापित होने को जो वास्तव में इन पाठशालाओं के प्रतिद्वन्दा | प्रारम्भ में हर तहसील में एक-एक वहसीली स्कूल आदरा स्कूल के रूप में
स्थापित किया गया था। उसके लिए किसी परम्परा का प्रतिबन्ध
भी नहीं था। जिन आठ जिलों में ऐसे स्कूल प्रयोगात्मय
इष्टि स स्थापित किये गये थे, उनका उन्नति पोर वृद्धि क
साय साथ इस प्रणाली को अति होती गयी ओर व सारे प्रान्त
म फैलन लगे।
हा रसूलों के पाठयक्रम म हिन्दी, उई, इतिहास, भूगाल,
ज्यामटा, धीज गणित, दसो यहासाता पार हिसार पैमाइश
श्रादि विषय साम्मलित थे। फारसा और प्राकृतिक विज्ञान क
विपय गाद में बढ़ाये गय, परन्तु फिर शोध हो हटा दिय गये ।
इन सूलों म अँगरजो पढ़ाने के लिए भी चष्टा को गयो यो,
परन्तु इसे सरकार को भोर स प्रोत्साहन नहीं मिला, क्याकि
उनका श्राशा थी कि यह सूल एक प्रकार के एस ऐंग्ला
चनाम्युलर स्कूल बन जायेंग जो प्राय अनुपयुक्त और भयाग्य
प्रमाणित हागे । इस प्रकार आगे चल कर उन्ह उच्च वर्नाक्युलर
स्थूलो का रूप देना अपक्षित हुया ओर १८७२३० में उनस
नाम बदल कर पर्नाम्युलर मिडिल सूल कर दिया गया।
इन सूज्ञा का स्थापित हुए अधिक समय न हुआ था कि
इनसा पयागिता और उपयुक्तता विदित हाने लगा। १८५३ ई.
म दाफ्टर मुभाव, वा शिक्षा काउन्सिल का मन्त्रा था, इनको
उपयुषवा स इतना अधिक प्रभावित हुना कि उसन विहार और
यहाल 1 भी इसा प्रकार का पालन का सिफारिश का)
इसा यार से सूरला का उपयोगिता प्रति वर्ष यता हा गयो
और १५५१ ई० में इनमें पढ़न वाले लड़कों की संरया १,४६५ स बढ़ कर १८५४ ई. में ४, हा गयी। यह उनति भी सनतोन्मुगा था। शिक्षण विधि में रार जति हो रही थी और वह क्रमश उच्चस्थान प्राप्त करती जा रहा था। साथ ही पाठ्यक्रम कायपय भी पढ़ते जा रहे और दमा पाठशालाओं का अपना थर इनम लड़ा अधिक समय तक ठहरने भी लग थ! परन्नु लड़का का साया वृद्धि का यह प्राशय नहीं था कि इन सूज्ञा में नसा पाठशालाश्रा की अपक्षा किमी दूमरी प्रकार के नो पियार्थी श्रापित हान लग थे। ब्राह्मण, यनिय और कायस्थ विद्याथा हा इनमें अधिक थे। मुसलमान बहुत बार चार थान लग य यार बाढ़ समय साद नकी मात्रा में भी यूर उनति हान लगा। जिन स्कूलोंम फारसी और उर्दू पढ़ानी जादा थी, उनमें ता मुमलमान विद्याथिया का सम्या पर्याप्त पाने लगी यो। इन स्तूज्ञा म हिन्दुआ की ५८ नातियों और उपनातिनों लड़ पढ़न आत 4 लेकिन फिर भी शितित जातियों क नडकों को मना ही नहुन अधिक थी। इन स्कूला में विद्याधिया सफीम ला जाता थी और देसी पाठशालाया क वही लडक इनमनि शुल्क भरती किये जा सकत प,जिनके अध्यापकों न विजिटर की हैसियत स उनकी सिरा. रिश की हा। प्रारम्भिक याजना में सब लडको स उनऊ माता- पिता को श्राप के अनुसार फीस लेना निश्चित किया गया था, परन्तु वास्तव में इस सिद्धान्त के अनुसार हर असमान परिस्थिात
का समाधान करना असम्भव हो गया और इसलिए हर लड़के
रे दो आने माहवारी क्रीस निश्चित कर दी गयी। भाज-फल
ह फीस बहुत थोडो मालूम पड़ती है, परन्तु उस समय की
प्रार्थिक स्थिति के विचार से इस का वास्तविक मूल्य जानन क
लए इसे कम से कम पांच गुना करना पड़ेगा।
परन्तु यह फीस देना भी गरीष गांव वालो के लिए भार हो
गया था। चे तो हर महीने फीस न देकर केवल फसल के समय
और वह भी अन्न देकर इसका चुकता कर सकते थे। फल यह
हुआ कि फीस समय पर वसूल न होती थी और बहुत से लड़कों
पर पाया निकली रहती थी। सैकड़ों लड़कों से वो केवल एक
ही थाना लेकर छाड़ दिया जाता था। अधिकांश लोगों की यह
धारणा थी कि अपने लड़कों को स्कूल में पढ़ने भेन पर पे
सरकार अथवा उसक अफसरों पर एक प्रकार का अनुप्रह फर
रहे है और इसलिए उनसे किसी प्रकार की फीस न लो जानी
चाहिए। परन्तु धार धीर फ्रीस वसूल करन म कड़ाई से काम
लिया जाने लगा और श्रीस न देने पर सूनों स नाम काट दने के
नियम बन जान पर, यशाया रसन चाला प्रथया फोस न दन
बालों की सख्या में कमी हो गयी।
जिन अभ्यापकों का १०) रु० से लेकर २०)२० तक मासिक
घेवन मिलता था प अपन विणर्थियों से वसूल की हुई
फीस भी ले लेते ५। पाद में इसी फीस म से नायर और
मानीटर का पेदन या लिखने-पढ़ने के सामान का पर्ष फाट
कर वाको रकम अध्यापक को ही पारितोपिक के रूप में मिलने लगी। १८२७ ई. में इन स्कूलो का सचं इतना बढ़ गया था कि इसे पूरा करने के लिए फ्रीम की सारी रकम लेना आवश्यक हो गया और इसलिए यह घोपणा कर दी गयो कि शीन मर- गरा सम्पत्ति है और वह नियमानुसार निस्टर सरकारी वज्ञान में जमा हो जानी चाहिए। श्राग चल कर इन स्कूला में और भी अधिक परिवर्तन और सुधार यि गय। पहल इन चूना में नात कक्षाएं थी जो बहुत अधिक हान के कारण ताड र चार र दा गनों और पर उनमें भरती हान वान विद्याथिया न पहले स अधिक ऊंची यो यता मतित हुई। १८७० इ में मार प्रान्त कमिटिल तूना लिए एक सरकारी परीक्षा का मानना हा गया। इमस मार प्रान्त में शिक्षा की उनति का तुलना और नर जाह समान प्रामाणिस्ता प्रान करन को मुविधा हा गया। पहली पराना जा उचरचापिया य कर टाहरक्टर नहार का बहुत कुछ मान्वना हुई और इतिहास, भूगाल, गणिव और प्रारमा न लडका त्रा याग्यता सन्तोषजनक प्रमाणित हुई। दम परीना स यह भी सष्ट हा रा कि अभी मातृभापा क अध्ययन में चरी उनति नहीं हो गयी या। इन सूली में एक भारा कमी यह थी कि उनमें किसी प्रकार के हस्त-कोराल सिसान का कोई प्रपन्य न था और रुडकी इनिनियरिंग शालिन ने गांग के लडकी का ड्राइगी या रता देशकर, अधिकारियन सहारनपुर जिले के स्कूला म, प्रयाग करने प्रा०शि०-८
( ११४ )
क विचार से, डाइन का विषय सिखाने के लिए विशेप योजन
कर दी । परन्तु यह विषय प्रान्त के सर स्कूलों म जारी:
हो सका।
प्रत्यक तहसील म ये माडल स्कूल श्रादर्श रूप स सोले
गय 4 और यद्यपि यह नहीं कहा जा सकता कि यह सर अंशो
में
आश हो गय थे, परन्तु विद्यार्या-जीवन की अवधि बढ़ जाने
से मारे प्रान्त के यालकों का जीवन अधिक मुसमय अवश्य हो
गया था। फिर इनमे पढ़न वाले विद्यार्थियो क लिए सांसारिक
जीवन की व्यमता कुछ काल के लिए तो अवश्य हा स्थगित सा हो
गया धी। माय ही अब यालको को अपने मानसिक विकास क
साधन भी अधिक उपल ध हो गय 4। इस पर भी अगर
अपन निक जीवन में इनका उपयोग नहीं कर सक्त थे, तो
इसके लिए रसूला को कोइ दोप नहीं दिया जा सकता था।
लागों में यह धारणा उत्पन हो चली थी कि यह शिक्षा सरकारी
नौकरियां की प्राप्ति क लिए बड़ा अच्छा साधन है। यह उन
लोगा की भूलों के कारण या, जिन्होन अमातिक सायना द्वारा
यहत शीघ्र ही विद्यामधार करना चाहा या प्रथया सिन्हान
ट्रेनिह प्राप्त अध्यापक अधिक और शीघ्र मिलन क विचार से
शिक्षा के प्रति लोगों के भाव यदल दिय थे। जिन लागा का
शिक्षा सम्बधा बादरा बहुत ही ऊँचा था, वे भी इन सूलो स
घोड़ यहुन लाभ की आशा अवश्य फरन लगे 4 और इनकी
सफलता पर फर एक समालोचक को यह कहने का साहस
हुआ था कि अगर जनता के नैतिक लाभ के विचार से ही देसा जाय तो देसी स्कूलों को बन्द कर और उन म प्रचलित पुस्तकों का प्रचार रोक कर, सरकार न बहुत ही योडे व्यय से प्रजा के लाभ के साधन उपस्थित कर दिये हैं। इस समय निरीक्षण के नच को छोड कर हर बालक की शिक्षा पर केवल २) रु० वार्षिक व्यय का श्रीसत निलता था। देसी पाठशालाश्री कन्द कर देने म जन-साधारण का नैतिक लाभ रहा हा या नहीं, किन्तु विद्या प्रचारक की दृष्टि से यह निश्चय है कि शिक्षा रम में पहले की अपेक्षा पर बहुत कुछ उनति हो गयी थी। परन्तु दुर्भाग्य की बात यह हुई कि आरम्भ से ही इन स्कूलों की शिक्षा सकीर्ण हो कर केवल पुस्तकों तक दी सीमित हो गयी। विद्यार्थियों को पुस्तकों के विषय के अतिरिक्त बाहर की कोई बात नहीं सिखायो जाती थी। इससे उनम अपने श्रास पाम की बाते जानने तक की उत्सुकता नष्ट होने लगी थी। इसीलिए इन स्कूलों का वातावरण निम हो गया था। एक समालोचक ने लिखा था कि इन स्कूलों में पाठ पढ़ाते समय बहुधा ऐसे स्थाना क नाम आ जाते हैं, अथवा ऐसे पुरुषो का प्रसग आ जाता है, जिनके सम्बन्ध मगर विद्वान अध्यापक कुछ विशेष बातें बता कर वालको की ज्ञान-वृद्धि करा दें तो इससे उनको अनेक उपयागी वाते मालूम हो जाने का सुअवसर प्राप्त हो जाय तथा उन्हें अपने पाठ म विशेष अभिरुचि उत्पन हो जाय। किन्तु इन बातो पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।
1
उनके सम्बन्ध में अधिक ज्ञान प्राप्त करने की उत्सुकता न तो
विद्यार्थियों में ही देखी जाती थी, और न अध्यापकों म ही उन्ह
प्रोत्साहन देने की प्रवृत्ति रह गयी थी। ऐसी परिस्थिति म
अध्यापक अथवा विद्याथिया से यह श्राशा नहा का जा सकती
थी कि ये पाट्य विषय में काइ उत्साह प्रदशित करें। परिणाम
यह हुआ कि अनक भाषपूर्ण विषयो थोर राचक स्थान की
जानकारी भी नीरस, निस्तेन और ऐसे प्रतिम ढग स कराची
जाने लगी कि सूल स साग वातावरण, थत्यन्त चहल पहल
का होन पर भा, निराह निजारता का परिचायक हा गया ।
ऐसी शिक्षा का, सिरा जीवन का प्रगतियों से साई सम्मधन
हो, यह परिणाम अवश्यम्भाया था। इसक अतिरिक्त क्लिन
क्विारा शिक्षा हान क कारण स्निान ही म चिपक रहन ।
प्रवृत्ति को प्रात्साहन मिलता था। परन्तु शिक्षा प्रणाली र दोषपूरण
होन के साथ साथ उपयुक्त अध्यापमा पाक्मी भाशा
तक इसक लिए जिम्मदार था।
हलकारन्दी स्थल
बहमीली सलता कयल आदरा मात्र नाय य ।
यविद्या के यन्धारा मिटान का वातविक सानो गांश
फदेमी नदरमों महा मरना या और टॉममा मादर को भी
यही योजना यो किन्नी मदरमा का दशा, उनारीवर कर
या यदा-कदा मम्मति और पारितोपिक यादि दार, उधारी
जाय। लेकिन मा१ 7मा याजना गमलाया
गयी, जिसने देसी सूलों का सदा के लिए भाग्य निर्णय कर
दिया। इसी स्कूलों म सुधार की आशा असम्भव समझ कर
मयुरा के क्लस्टर एलेक्जेण्डर साहब ने नये स्कूल सोलना
निश्चित रिया। लेकिन गांव-गांव में स्कूज्ञ सोलना भी दो
असम्भव था। इसलिए गांवों को हलमार दी करके, हर एक
हलक में पढ़न वाले लड़को की सग्या निश्चित की गयी। फिर
उस हलके की नमानन्दी रा भी निश्चय किया गया और उसके
श्राधार पर उसम रहनेवालों की आर्थिक स्थिति और उनमें
शुल्क दन की शक्ति का अनुमान कर लिया गया।
इन स्कूलों मे लड़ो क अभिभावको पर शिक्षा का वोक
न रसन की व्यवस्था की गयी थी। जमींदार स्कूलो के खर्च का
कुछ अश देने के लिए सहमत थे। चना देन के समय उनके
सामन "हमियत" मी वात रखी जाती थी। इसलिए उनसे कहा
गया कि अपनी अपनो मालगुजारों पर एक रुपया सैकड़ा के
हिसार से स्कूलो क मट में चन्दादें। लेकिन यह चन्दा अनिवार्य
न था और इसका रेना पिलकुल लोगो की इच्छा पर निर्भर था।
इस प्रकार जन स्कूल चलान के खर्च का पूरा प्रपन्य हो गया, वन
ऐस गान म स्कूल खोला गया, जहाँ उस हलक क सभी गांवा के
लड़र को स्कूल पास पड़ सक और जहाँ ये लोग नि शुल्कावद्या-
लाभ कर सकें। स्कूज क खचे के लिए सर मिला कर नितना
रुपया जमीन्दारों स चन्दे के रूप में वसूल होता था, उतना ही
सरकार भी दती थी। सबसे पहले हलकारन्दा स्कूल परगना
( १८ ) कोसी में मोर इमदाद अली को अध्यक्षता म सोला गया था। मथुरा में इस योजना को बड़ा सफलता मिला और अधिकारियों को भी यह योजना बहुत पसन्द पायी, क्योकि इममें विशफ्नया जनताही का उद्योगया । कदाचित् दूसरा रात यह भा याकि इमा बागडोर पूरी तरह से सरकारो थ धसरिया के हो हाथ मया। मथुरा में इनको सफनवा देस कर पास के जिना क क्लस्टरा को भी यह योजना रुचिकर प्रतीत हुई और कवल आठ जिला में ही नहीं, प्रत्युव प्रान्त के अ य जिलों म मा दलकारना स्कून सोले जाने लगे और इस प्रकार इनका प्रचार रखो तजो के साथ चढ़ने लगा। एक इटारा जिले म हो १८१ स्तूल एक वर्ष के भीतर खुल गये, जिनम ५,१८० विद्यार्थी विद्या लाभ करते थे। इन स्कूलों म पढ़ना लिखना, गणित पैमाइश, और भूगोल के विषय पढ़ाये जाते थे। प्रारम्भ म योग्यता री दृष्टि से इन्द अधिक सफलता नहीं मिली। ए० प्रा० धूम साहब न सन् १८५९ म लिखा था, "ऐसे विद्यार्थियारी सख्या बहुत कम है जो थोड़ी बहुत हिन्दी पढ़ लिस लेत ही पार सादे सवाल हल कर सकते हों। यह बात सत्य है कि कुछ लड़क ऐस ई जो अच्छी तरह से हिन्दी अथवा उदू लिस पढ़ लेते हैं, परन्तु इनका पीसन सैकड़े पीछे केवल दस ही समझना चाहिए।" इन हलकायन्दी स्फूना से जो लाभ हुआ, वह इस प्रकार प्रकट किया गया है-~"इन खूलों म पढ़ने के कारण लडको को शरारत का मौका नहीं मिलता और कम से कम उन्दे अच्छी
शिवारें पढ़न को तो मिल हो जाती है। पर इससे अधिक
इन स्यूना से कोई और लाभ नहीं है। शिक्षाको नट्रिस कम
लाभ होने का एक कारण (योग्य शिक्षकों की कमी क रामसूद)
यह भी था कि लड़के स्कूलों में पर्याप्त काल वह नहा रह पाव ये
और इसलिए उनकी योग्यता भा अधिक न हो पाती थी।
सन् १८६६६७ में इलका न. १ के स्कूला में प्रवेश पाने
चाले २७,१५१ लड़कों में से करल ४,४२७ लड़क हा ऊँची
श्रेणियों में पढ़ते थे। कारण यह था कि निधन पर अपने
बालकों को अधिक समय व स्कूलों में बैठा कर आर्थिक
हानि नहीं सह सस्ते 4 । निस भानु म ये सून जाने
योग्य होवे थे, उठी में चवों पर भा काम करने योग्य हो
जाते थे। इसलिए उनके पास सूशा में जान का काल वही
समय था, जन कि उनक लिए सवों म कोई काम रह
जाय। इस परिस्थिति में उनमें विशेष योग्यता की प्राशा करना
ज्य या। यदि सरकारी सहायता और सहयोग न होता, ताये
हलचन्दी सूल भी पुराने मदरमा की तरह शीत्र ही नष्ट हो
जाते । अयनाट साहब न इस बात को स्वीकार किया था कि
जहाँ युरोपियन अधिकारियों ने इन न्यूलों के प्रबन्ध न कोई
हिस्सा नहीं लिया, वहां उनका चलना बहुत मुश्किल हो गया।
देसी मदरसों की अवनति
हलकान्दी स्कूल दसी मदरसों के प्रतिद्वन्द्वी थे और इनरी
प्रतियोगिता का प्रभाव हानिकारक भी हुआ। देसी मदरसे
( १२० ) शिक्षा विभाग के पनाये नहीं थे और न इस विभाग का आतङ्क ही इन मदरसों पर अधिक था। इसलिए शिक्षा विभाग इन मदरसी पर ध्यान नहीं देता था और इनको व्यर्थ समझता था। सन् १८७७-७८ तक तो इन देसी मदरसों के ब्यौरे शिक्षा विभाग के वापिक विवरणों में स्थान पा जाते थे, परन्तु इसके बाद इनका देना इस विचार से बन्द कर दिया गया कि वह विश्वसनीय नहीं समझ जाते थे और इन स्कूलों पर सरकारी निरीक्षण भी नहीं था। हलकावन्दी सरकारी स्कूलों के सुल जाने से जो प्रोत्साहन उन्ह पहले दिया जाता था, वह भी अब बन्द हो गया। सन् १८५५-५८ में ही शिक्षा विभाग के डाइरेक्टर ने उनके सम्बन्ध मे लिखा था, 'ये पाठशालाएँ तो शिक्षालय कहलाने के सर्वथा अयोग्य है। इन सत्र में सुधार की आशा रखना व्यय है । इनमें पढ़ान वाले अध्यापक भी तो किसी प्रकार हमारे अधीन नहीं है। परन्तु इतना होते हुए भी लोग इन मदरसों को हो पसन्द करते थे और उन्हें अपनाते थे। इस सम्बन्ध मे अपनी सम्मति व्यक्त करते हुए डाइरेक्टर महोदय लिखते हैं, "हमारे कृपक इस विभाग द्वारा सञ्चालित स्कूलो के लिए १,९०,००० रुपये प्रति वर्ष व्यय करते हैं। अन्य लोरप्रिय ठूला को परिचालित रसने मे २,६५,००० रुपया वापिक व्यय होता है। इतना अधिक खर्च वास्तव में व्यर्थ हो जाता है, क्योंकि इनके अध्यापक अयोग्य हैं और इनमे किसी प्रकार की आयोजना और शिक्षा क्रम का अभाव है।"
( १२१ )
लोग नये सरकारा स्कूलों में अधिक जान लगये क्योंकि-
उनमें शिक्षा नि शुल्क दी जाती थी। देसी स्कूलों की भी पर
इतना पूँछ न रही थी थोर थधिक सीन होने के कारण लोग
उनले उपक्षा की दृष्टि से भी दन्दन लग । शिक्षा-विभाग की
पार स पढ़ान लिसान क सम्बन्ध में लोगा को सभी जानन योग्य
तें बतायी जाती थी। इसलिए इन नय और निशुल्क विद्या
प्रान करन वाले स्सूलों को पार ही चालक अधिक मुकन ला।
दसा मटरमा का अपनति का एक और कारण भी था।
नक मर याच अधापक उन्ह दाढ कर सरकारी स्कूलों
इसलिए पहुँच गय 4 कि उन्हें यहां तन अच्छा मिलता
था। सन् १८८० में गिना कमीशन कमानन १०मी० नसाल्ड
सादर न अपना गाहो नते हुए न्बुले शन्दा म यह स्वीकार
किया था कि 'मरकारी शिक्षा विभाग न श्रच्छ स अच्छ दसी
मदरस ता कभी क हजम कर लिय और श्रपर इतन निर्मल
कर दिय गय है कि रत ममल मरकारी स्कूल बन्द न कर
रेय जांब, तब तक नन्द महारता न श्रमा उनको जति
करन का बात करना व्यर्थ ही होगा। मर विचार ने सरकारी
न उह दिलकुल निकम्मा कर दिया है और अब
नक जाणद्वार की काई श्राशा नहीं की जा सकती।'
दसा स्टूला की अपनति इसलिए हुई थी कि एक ता लाग
गरावीक कारण दो प्रकार के स्कूलों का भार वहन करन म
असमय में, दूसर ये मदरसे स्वयम् इस नयी परियतित परिस्थिति
शिक्षा-कम
( १२२ ) के अनुसार अपने क्रम में समयोचित परिवत्तन न कर सके, तीसरे इसलिए भी कि सरकार द्वारा प्रात्साहित और प्रतिष्ठापित इस नये शिक्षाक्रम क सामन लोगों की निगाह म इनका कोई कदर न रह गयी थी। फिर भी डाक्टर जी० डलू लिटनर के इन शब्दा में बहुत कुछ तथ्य है -"थोड़े से नवीन सूल खालन को अपेक्षा यदि सरकार देसो मदरसो की पाठ्य पुस्तका तथा अध्यापका के सुधार की ओर ध्यान देती और इस प्रकार जनता म यह भाव फैलाने का प्रयत्न करती कि शिक्षा प्रसार को देस रेस रसना सरकार का काम है (और किसी समान विशेष का नहाँ), तो उन्हें नवोन स्कूलों क इस अधूरेपन के स्थान पर देसो स्सूला में सुधार करने का बहुत बडा मुश्रवसर प्राप्त हा जाता।" सन् १८५४ का खरीता बगाल तथा विहार म एडम साहन का जांच, मदरास म सर टॉमस मनरा के अनुसन्धान और बम्बई मे सर मन्टस्टुअट एलफिन्स्टन के दिग्दशनात्मक विवरण स शिक्षा प्रचार को श्रवस्था गिरती हुई प्रकट हुई। हमारे यहाँ ता सन् १८४४ ४५ म टामसन साहब के विवरण से देसी मरसो को गिरती हुई अवस्था अच्छो तरह प्रकट हो गयी थी। इमो समय देसो मदरसों की खरान परिस्थिति के सम्बन्ध म मिशिनरिया ने ऐमा आन्दोलन किया कि अधिकारियों के कान सड़े हो गये । सरकार को जनता म शिक्षा प्रचार करन की आवश्यस्ता प्रतीत तो हुई, परन्तु सारी जनता को शिक्षित वनान के लिए एक साथ विद्यालय
( १३ )
खोलना उसके लिए सम्भव न था। इन विभिन प्रान्ती में
शिक्षा-सम्बन्धी अनुसन्धानों का सारांश सन् १८५४ के प्रसिद्ध
खरीवे म अद्वित कर दिया गया है। सरीते क लेखक सर
चार्ल्स वुड पिटले वाइसराय लाड इरविन क दादा य ।
इस खरीते ने प्रजा म ज्ञानोकप की शुभाशांना उत्पन कर
दी थी, इसीलिए यह सरीता भारत म अंग्रजी शिक्षा का स्वाधी-
नता का शामन-पत्र' कहलान याम्य है। उदार भागासात प्रोत
लार्ड डलहौजी के शदोम इसमें ऐसा याजना का निरूपण किया
गया है, जा असिल भारत के निमित्त तैयार की गायी और
जिस प्रस्तुत करन क लिए प्रान्ताय या भारतीय सरकारें कदाचित्
ही साहस कर पातीं। टॉमसन साहब की प्रतिभा की झनक इस
खरीते में भी दिसायी पड़ती है। सारी प्रना म-विशपत
प्रारम्भिक शिक्षा प्रचार के लिए-परकार का ध्यान ऊंचा जातियों
की ही शिक्षा की भार स हटा कर जन साधारण का शिक्षा
की ओर श्रापित करना, इसरा चरम उद्दश था। इस
नीति का समर्थन सराव के इन श दा म रिया गया था, 'गेमी
विशाल जनता म, जा विना क्सिी सहायता क नाम मान का भो
विद्या प्राप्त करन में असमर्थ है, किस प्रकार ऐमी व्यावहारिक
और उपयोगी शिक्षा का प्रचार क्यिा नाय जा सक जावन की
प्रत्येक अवस्था के लिए उपयागी और अनुकूल सिद्धहा।'
खरीते में लिया था कि ब्रिटिश सरकार यह चाहता है कि
भविष्य में इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए, उनकी यह योजना
( १२४ ) विशेष रूप से काम में लायी जाय और वे इसके व्यय के लिए अधिकाधिक धन दने के पक्ष में हैं। इस योजना का उद्देश्य अविद्या को समूल विनाश करने का था और साधारण जनता में विद्या प्रचार का महत्त्व इसमे स्वीकार कर लिया गया था। जनता को इसमे अग्रसर होने के लिए प्रोत्साहित करन की सिफारिश भी की गयी थी। सरकार की ओर से देसी स्कूलों की सहायता करने का विधान था। इसम देसी भापात्रा का भी वहिष्कार न किया गया था और सस्कृत तथा पारसी के तत्कालीन विद्यालयों की रक्षा का भी उचित समावेश था। इसमें प्रत्येक प्रान्त मे एक एक शिक्षा विभाग सोलने की माग पेश की गयी थी और देशी भापा म प्रारम्भिक शिक्षा से लगा कर युनिवर्सिटी की बड़ी से बडी डिगरी तक की योजना प्रस्तुत की गयी थी। इस खराते म वामिक विचारो के प्रति बिलकुल तटस्थ रहन की नीति रस्सी गयी थी। शिक्षा-विभाग की स्थापना इस सरीते के पहुँचन पर पश्चिमोत्तरी प्रान्त म शिक्षा विभाग की स्थापना हुई और रीड साहब उसके प्रथम डाइरेक्टर बनाये गये । उनको अवीनता मे चार सरिल इन्सपेक्टर नियुक्त किये गये और जिले तथा परगने के विजिटर डिप्टी तथा सर- डिप्टी इन्सपेक्टर कहलाने लगे। उस समय के वायू शिवप्रसाद, जो बाद को राजा हो गये, इन्हीं पहले इन्सपेक्टरा म से थे। गदर होने से कुछ ही पहले स्कूलों को सरकारी मदद देने के
नियम बनाये गये, जिनसे तहसीली और हलकाबन्दी खूलों को
अधिक प्रोत्साहन मिला। १८९६ ई० म टॉमसन साइन की मृत्यु
के एक मास पाद ही, उनकी योजना को सारे प्रान्त में प्रसार
करने की अनुमति मिल गयी।
हलकामन्दी स्कूलों को उन्नति के इस विवरण मे प्रान्त में
प्राइमरी शिक्षा के अधिकाधिक विस्तार का परिचय मिलता है।
सन १८५१ म इन हलावन्दी स्मूला की स्थापना हुई थी और
सन् १८५४ ई० म इनका मरया ७५८ हो गयी। इनम पढ़ने वाले
छानों को सरया उस समय १७,०२० यो । सन् १८५५ ई० के
प्रारम्भ म हलकारन्दी सूनो की सस्या १,४९१ हो गयी और
इनर पढ़ने वाले छात्रों की भी सर या उढ़ कर ३४,४२४ हो गयो।
सन् १८५० ई. मेश्रागरे का नाम सूल साला गया।
अध्यापकों की मांग अधिक हान स सन् १८५६ ई० म मेरठ में
और सन् १८२७ ई. बनारस म भी नार्मल सूल सोले गय।
गदर का दुपभार
'सरीते' को याचना के अनुसार कार्य क्रम को प्रारम्भ हुए
अभी तीन वर्ष ही वीतन पाये थे कि गदर हो जान के कारण
शिक्षा प्रचार की उन्नति को नारी यक्का पहुँचा । लेकिन यह एक
क्षणिक यावा यो। कई अधिकारियों को इस विभीपिका में अपने
प्राण गॅवान पड़े, किन्तु प्राय नीच से लगा कर ऊपर तक के
सभी शिक्षा विभाग के कर्मचारी राजभक्त बन रहे और अपनी
अपनी जगह पर काम करते रहे । पारियन्टल (फारसी) विभाग
- ( १२६ ) कुछ अध्यापक अवश्य बागी हो गये । इसका परिणाम यह हुआ कि इन विभागों पर से सरकार का विश्वास उठ गया और अन्तत ये विभाग बन्द ही कर दिये गये। इस प्रकार पञ्जाब की भांति अंग्रेजा क समक्ष रूप में, प्राइमरी स लेकर युनिवसिटी कक्षामा तक दशो भाषाओं द्वारा शिक्षा क्रम की उन्नति की सम्भावना पिलकुल जाती रही। हमारे यहाँ ता तहसीली स्कूल ही एक एसी सस्था रह गय, जिनम देशी भाषाओ के माध्यम द्वारा ऊँची से ऊची शिक्षा दी जा सकती थी। सन् ५७ का गदर उस समय के मृतप्राय राज्यों को बुझती हुई अन्तिम ज्योति के समान था। इन राज्यों ने अपनी सोयी हुई शक्ति को पुा प्राप्त करने के उद्देश्य से जी तोड़ कर यह अन्तिम प्रयत्न किया था। इसम उस असन्तोप को लहर से भी बुख सहायता मिल गयी थी, जिसकी जिम्मेदारी कुछ अश में सरकार पर भी थी। कि तु अन्त में इस भयानक घटना से एक अच्छी बात यह हुई कि सदा के लिए देश के भविष्य का निर्णय हो गया। लोगो को इसका पूरा पूरा अनुभव हो गया और उनमे अन्तरध्ययन को प्रेरणा जाग उठी। अन्त मे वे लोग भी, जो इस नये राजनीतिक परिवर्तन से यत्किचित असन्तुष्ट थे, यह विचार करके कि अन्यथा गति नास्ति, अनिवार्य के सामने नतमस्तक हो गये। सहज विश्वासी लोगो को यह विश्वास हो गया था कि अर सौ वर्ष पहले कोई नया परिवर्तन न होगा और ये उदीयमान सूर्य को अभिवादन करने क लिए व्याकुल हो उठे।
( १२७ )
इन लोगो में एक किम्बदन्ति प्रसिद्ध हो गयी थी कि जिस
प्रकार १७५७ ई. क पलासी-युद्ध के याद १८५७ ई० में गदर
हुआ, उसी प्रकार १९५७ ३० म पडे भारी क्रान्तिकारी परि-
चर्तन की सम्भावना है। गदर के बाद एक दो वर्प तो, हथियार
छान जान के कारण, लाग रुष्ट 4, लेकिन इसके बाद से शिक्षा
विभाग का पथ मिलकुल निष्क्टक हा गरा और असहयोग के
समय तक ऐसा ही रहा।
सन् १८५९ का द्वितीय खरीता
लकिन सन् ९९६ ५७ इ. की घटनात्रा से लेकर इस
नवीन शिक्षा म के सम्बन्ध म व्यय को अनेक भयास्पद
पाते फैलाया गर्छ। लिन लागा न मन् १८५४ के सरीते के
सिद्धान्ता कपिरुद्ध अपनी सम्मति दी थी, उन्होंने अप गटर के
हान का दोणारोपण भी इम शिक्षा नम पर लाद दिया। फलत
विलायत की सरकार न खरीते क कार्यक्रम की अच्छी तरह से
दानवीन की। यह इसलिए थी कि जनता म हाल ही म प्रयुक्त
होन वाले जो विधान सरकार न प्रस्तुत किये थे, उन्हें वगाल क
सैनिक विद्रोह का कारण सममा गया था। टिश शासनाधीन
अन्य भारतीय विभागो मे भी भय और शहा के जो भाव मौजूद
थे, वह भी इसी कारण समझ गय थे।
इम छाननीन क बाट सन् १८५९ म एक दूसरा खरीता
प्रकाशित किया गया। इसम पिछले खरीते के काम की आलोचना
की गयी थी और उपरोक भ्रमपूर्ण अभियोग को गलत ठहराया
( १२८ ) गया था। इस खरीदे मे भो १८५४ ई० के खरीते के सिद्धान्तों और मन्तव्यों का पोपण किया गया था। इसमें एक नयी बात यह थी कि प्राइमरी शिक्षा के प्रचार मे सरकारी सहायता की सिफारिश का समर्थन नहीं किया गया था। क्योंकि इसके द्वारा निर्धन लोगों पर आर्थिक बोझ अधिक हो जाता था। इससे शिक्षा के प्रति विराधात्मक भावों के फैलने का भय था और यह भी थाशा थी कि ऐसा करने से कहीं सरकार बदनाम न हो जाय । सरकार को प्रतिष्ठा का प्रश्न भी इसमे निहित था। इसमे सन्देह नहीं कि जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सरकार इतनी उत्सुक थी, उसी के लिए सरकारी कर्मचारियों का साग्रह चन्दा मांगना ओर उस प्रयत्न म असफल हाना सरकार के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाला था। इसी अभिप्राय स सरकारी अधिकारिया द्वारा प्राइमरी शिक्षा प्रचार करने की व्यवस्था की गयी थी और उसक व्यय के लिए एक प्रसारमा देक्स लगाने की सिफारिश की गयो थी। शिक्षा कर तहसीली स्कूलों का व्यय नियाह तो प्रान्तीय सरकार की मालगुजारी से ही होता था, लेकिन हलकावन्दो रसूलो का खच हलके में एकत्र किये हुए शिक्षा कर द्वारा चलता था। टॉमसन साहन ने गांव के स्कूलों के खच के लिए गाँव गाँव म जागीर दिलाने की सिफारिश की थी, लेकिन यह वात विलायत को सरकार को मजूर न थी। जन हलकावन्दी क्रम का श्रीगणश किया गया,
व जमींदारों ने अपनी मालगुजारो में से एक रुपया की सैकडे
के हिसार से हलमारन्दी स्कूलों के खर्च के लिए चना ना
स्वीकार किया।
शिक्षा-कर का पूर्व रूप
सन् १८२० में सरकार ने भी इन ग्रामीण पाठशालाओं के
स्वर्य में जमींदारों द्वारा एकत्र को हुई रक्रम क परापर धन दना
अगीकार किरा! मामीण शिक्षा के व्यय में जमींदार भार
सरकार का आधा साना हमारे प्रान्त के सिवा कहीं न
था। सहारनपुर के पन्दोवस्त की योजना म इस निर्देश के
लिए नियम पना दिये गय थे। इन नियमों द्वारा यह निश्चित
किया गया था कि जमीन की पैगवार की कीमत का अविन
अधिक ५० की सदा भाग सरकारी मालगुजारी ने दिया जाना
चाहिए। लेकिन सरकारी मालगुजारी निश्चित करन क पूर्व ही
शिक्षा-कर काट लेन की व्यवस्था की गयी थी। इस प्रकार शिक्षा
का भार जमींदार और सरकार पर वरावर परापर हो जाता
था। कहने को तो यह शिता कर जमोदार की इन्दा पर निर्भर
था, लेकिन न्याहार म इसे अदा करना सर के लिए अनिवार्य
था। परन्तु इस शिक्षा कर की वमूलयात्री अनिश्चित या और
प्रान्तीय लाट मिस्टर एडमन्स्टन साहा ने यह व्यवस्था दी थी
किपिन लोगा पर शिक्षा-कर पसाया रह गया था, जनसे उसको
जस्ती वसूली अनियमित यो।
प्रा०शि०-९
।
( १३० )
कुछ अन्य कारण ऐसे भी थे, जिनसे पहले तो इस विचार
में उछ परिवर्तन हुआ कि शिक्षा कर का देना लोगों की इच्छा
पर निर्भर था, परन्तु बाद में इस कल्पना का पूरा विस्फोटन हो
गया । सन् १८५० के खरीते में प्रारम्भिक शिक्षा के खर्च के लिए
अनिवार्य कर वसूल करने की व्यवस्था मौजूद थी। इस विचार
से न तो यह जमींदार की इच्छा पर ही निर्भर था कि वह इस
कर को अदा करे और न इस बात का ही कोई प्रबन्ध था कि
सरकार उसके साथ इसमें आधा साझा करे। परन्तु हमारे
प्रान्त म ये दोनों बातें मौजूद थीं। आर्थिक दृष्टि से भी इस प्रश्न
पर विचार करना महत्त्व की यात है। क्योंकि अगर सरकार के
जिम्मे इसका आधा भाग रहता है तो सारे प्रान्त मे शिक्षा कर
लगाने पर सरकार की ओर से मिलने वाले हिस्से का भार बहुत
अधिक बढ़ जाता है।
शिक्षा-कर का मालगुजारी में जोड़ा जाना
इसलिए सरकार ने सन् १८६६ में यह घोपित कर दिया कि
तत्कालीन बन्दाबस्त के हिसाब से जमीन की उत्पत्ति का ५५
प्रतिशत भाग लगान मे लिया जायगा। इसी में सडक, पुलिस
और शिक्षा आदि क अन्य कर भी सम्मिलित थे। लेकिन इन सब
करों को एक साथ लगान में मिला कर वसूल करने का आयोजन
करते समय सरकार ने ऐसी कोई विवेचना नहीं की थी जिससे
जमीदारों को इसके खर्च पर नियन्त्रण करने का अधिकार
दे दिया हो और न ही उनके ऐसे किसी प्रकार के अधिकार
के सरक्षण का जिम्मा लिया था जो उन्हें पहले ऐसे छोटे-छोटे करों के सम्बन्ध में प्राप्त हुए बतलाये जाते थे। ये छोटे कर तो वह पर भी पहले की भांति अपनी जब से देते थे, किन्तु र अन्तर केवल इतना ही हो गया था कि जहां पहले सरकार को उसके बराबरको रकम देनी पड़ती थी, वहां भव केवल उमींदार के ही सिर पर सारे खर्चे का भार था। इससे स्पष्ट है. कि जो शिक्षाकर पहले उसकी इच्छा पर निर्भर था और चन्दे की भांति वसूल किया जाता था, वही पर निर्धारित और निश्चित टैक्स के रूप में परिवतित हो गया था। इस समस्या का दूमरा स्वरूप प्रजा का परिवर्तित दृष्टिकोण या। जहां व कपि-यग का सम्बन्ध था, शिक्षाकर अब स्थानीय कर नहीं रह गया था, जिसका देनदार जमींदार हो। अब वो ना खर्च देहाता स्कूलों पर होता था, उसे बमोदार सरकारी सहायता समझता था और इसी कारण उसे इस रुपये पर किसी प्रकार के नियन्त्रण का कोई हक प्राप्त न हो सकता था। साथ ही साथ अब इस कर का स्थानीयपन भी नष्ट हो गया था, क्योकि अब वक तो यह रुपया उसी स्थान के स्कूल के ही उपयोग में आ सकता था, परन्तु अर वो इसका उपयोग सारे प्रान्त की प्रजा के लिए या, जिसमें वहसीनी और पन्य प्रकार के सभी स्कूलों का सामा या। इस प्रकार इस नयी व्यवस्था के कारण जमींदार और देहाती स्कूल में जो परस्पर सम्बन्ध स्थापित हुआ था, वह टूट गया।
। १३२ ) इस्तमरारी वन्दोवस्त के जिलों में शिक्षा कर जमींदार लोगो ने इस परिवर्तन को बिना किसी पानाकानी के मान लिया। इससे जाहिर है कि उनको भी इस शिक्षा कर के अनिर्धारित स्वरूप मे अधिक विश्वास न था। जिन प्रदेशों में जमीन का बन्दोबस्त निश्चित समय के लिए होता था, उनम ऐसे वन्दोवस्त के समय इस नये कर पा लगा देना आसान था, परन्तु जिन जिलो म इस्तमरारो बन्दोबस्त था, वहा इस शिक्षा कर के लगाने मे बडी कठिनाई थी। परन्तु फिर भी बनारस कमिश्नरी के उन चार जिलो मे, विनम इस्तमरारी व दारस्त जारी है, जमीदार लोग इस बात पर राजी हो गय किव गवनमेन्ट को अपने लगान की रकम का प्राधा प्रतिशत इस शर्त पर देरेंगे कि सरकार खुद भी आधा प्रतिशत दे । सन् १८६६ ई० मे गवर्नमेन्ट ने इस शर्त को मजूर कर लिया और इस प्रकार सारे प्रान्त के जमींदार ग्रामीण शिक्षा के लिए पर देने लग। शिक्षा-कर के नियन्त्रण के लिए जमींदारा की मॉग शिक्षा कर का देना जमींदारो की इच्छा पर निर्भर लिए बहुत से जमींदारो ने इस बात को मॉग पेश की कि उनको इस फड के नियन्त्रण का भी अधिकार मिलना चाहिए । चुनाँचे अलीगढ़ के जमींदारोन प्रान्तीय सरकार के पास इस आशय का एक मिमोरियल ( प्रार्थनापत्र) भेजा। यह प्राथना पत्र अली गढ़ साइन्टिफिक सोसाइटी की ओर से पेश किया गया था, था, इसी
जिसके मनी राना जयसम्पादास थे। यह सयम् भी जमीदार
ये और सदर के जमान की इनका विशेष सेवाएँ थी। इसलिए
यह गवनमेन्ट के भी विश्वास पात्र थे और जमीदारों का भी
इन पर पूरा भराता था।
इस मिमारियल में इस बात का शिकायत की गयी थी कि
शिक्षा के खर्च के लिए शिक्षा कर तो जमींदारों से वसूल
किया जाता है, परन्तु यह वडे ताज्जुर की रात है कि न तो
उह इस शिक्षा क्रम के प्रबन्ध म ही काई अधिकार दिया गया
है और न इस रुपये क सर्च पर ही उनका कोई नियन्त्रण
है। इसलिए उनको यह जान पर पड़ा कष्ट है कि इस सम्बन्ध
के किसी विषय में भी उनसे सलाह मशवरा नहीं लिया जाता
और इतना मर रुपया देने पर भी उनको यह भी नहीं रतलाया
जाता कि उसे किस प्रसार और किन किन महों में सर्च किया
जा रहा है। इसलिए उनी यह प्रार्थना थी कि जो रुपया वे
शिक्षा कर के रूप में सरकार को देते थे, और जो रुपया सरकार
शिक्षा को सहायताय देता थी, उस सर को मिलाकर एक
अलग शिक्षा फड बना दिया जाय, जो केवल उसी जिले की
प्रजा के हित के लिए खर्च किया जाय, जिनसे उसका रुपया
पल किया गया था। इस मिमोरियल में यह भी प्रार्थना की
गयी थी कि जिले के शिक्षा विभाग के कर्मचारी और जमींदारों
को एक ऐमो कमिटी अनायी जाय, जिसका अध्यक्ष जिले
का कलक्टर या कमिश्नर हो और जो इस शिक्षा कम की पूरी
( १३४ )
देख-रेख वधा उसके खर्च का पूरा नियन्त्रण कर सके और
इस कमिटी के अधिकार में उस जिले की शिक्षा का पूरा
भार हो।
भलीगढ़ के ये जमींदार काकी सुशिक्षित थे और अपन
स्वत्त्वों और अधिकारों का ज्ञान रसते थे। इसलिए यह कोई
आश्चर्य की बात नहीं है कि उन्होंने अपने अधिकारों की मांग
पेश की, परन्तु इसका महत्ता तो इस बात में है कि यह प्रार्थना
पत्र प्रजा की उस सष्ट इच्छा का सब से पहला उदाहरण है जो
उसने उस विभाग के प्रबन्ध में भाग लेने के लिए मर से पहले
प्रकट की, जिसके लिए उसने स्वयम् रुपया दिया था। इस मांग की
वैधता बड़े मार्के की थी और सरकार को इस बात के समझने
में अधिक देर न लगी कि हवा का रुख किस ओर था। यद्यपि
हमारी सरकार इस बात का स्वागत करने के लिए तैयार थी कि
हमारे यहाँ के जमींदार और तालुक्दार अपन उस दवाव को
अधिकाधिक काम में लान के लिए आन्दोलन सड़ा करें जो
उनको प्राप्त है और साथ ही शासन प्रबन्ध के साधारण कामों
में इन लोगों की सहकारिता ओर इनकी सहानुभूति का आदर
करने को भी तैयार था फिर भी उसे इस बात के अन्दशे को
दूर करने की शीघ्र हो कोशिश करनी पड़ी कि वे उस बात
की प्राप्ति के लिए अपना अधिकार प्रदशित करें जिसे कुछ
हद तक और फुछ विशेष कारणों से वह उनको स्वयम् देने
के लिए तैयार थी।
( १३५ ) सरकार का रुख इसलिए सन् १९६६ के अपने एक मन्तव्य में सरकार ने यह प्रकट किया कि हमारे सामने इस बात की शिकायत की गयी है कि जो लोग शिक्षा के खर्च के लिए धन देते हैं, उनको उस पति के प्रबन्ध में कोई अधिकार नहीं दिया गया है, अथवा उस रुपये के व्यय पर उनका कोई नियन्त्रण नहीं है। परन्तु यही वर्क इस देश के शासन के सम्बन्ध में तथा मालगुजारी और अन्य टैक्सों के व्यय और उनके नियन्त्रण पर भी लागू हो सकता है। इसलिए इस तर्क के सार्थक परिणाम को स्वीकार करते हुए उस समय के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर ने कहा, "इस शिकायत का एक ही जवार हो सकता है और यह यह है कि इसके पूर्व कि लोगों को शासन प्रवन्ध के नियन्त्रण में कोई अधिकार दिया जाय, उन्हें इस बात को प्रमाणित करना होगा कि वे इन अधिकारों और इस उत्तरदायित्ल के योग्य भी हैं या नहीं क्योंकि इसी योग्यता को उनमें उत्पन्न करने के लिए सरकार ने शिक्षा प्रचार के ये साधन उनके लिए उपस्थित कर दिये हैं।" शिक्षा-कर के सम्बन्ध में गवर्नमेन्ट ने यह घोषित कर दिया कि यह कर सारी प्रजा के हित के लिए लिया जायगा और सरकारी मालगुजारी में, जो पृथिवी को उपज की निसर्ची आय पर ५५ प्रतिशत देनी निश्चित हुई थी, यह कर भी शामिल कर लिया गया है। इस प्रकार शिक्षा सम्बन्धी व्यय भी मालगुजारी से ही दिया जाना निश्चित हुआ और इसलिए
( १३६ )
जमींदारों को उसके प्रबन्ध अथवा नियन्त्रण में किसी प्रकार
के अधिकार का प्रश्न एक क्षण के लिए भी उपस्थित नहीं हो
सकता था।
स्सूल कमिटियों की स्थापना
इस प्रकार इस मिमोरियल के वैध अश का उत्तर दे कर
सरकार ने इस बात की यावश्यक्ता महसूस की कि जिले के
अफसरों, जमींदारों और अन्य धनी मानियों को भी स्कूलों के
प्रवन्ध कुछ अधिकार दिया जाय, ताकि वे इस सस्थाओं की
उन्नति म अधिक योग दे सकें। इस विचार से सरकार ने कुछ
जिलो में शिक्षा कमिटियाँ नियुक्त कर दी और यही कमिटियाँ
कुछ समय बाद सारे प्रान्त में नियुक्त हो गयी।
मिस्टर टॉमसन ने इस बात की घोपणा की थी कि सरकार
अपन निजी स्कूल स्थापित न करके, प्रजा को इस बात मे सहायता
देने को तैयार थी कि वह स्वयम् अपने स्कूल स्थापित करे।
लेकिन यह सब कहते हुए भी गवर्नमे ट ने जमींदारो की उस
विशिष्ट मांग को जिससे उनका पूरा पूरा सहयोग प्राप्त होता,
स्वीकार न करके, एक चडा अच्छा अवसर खो दिया। परन्तु
इसके साथ साथ यह भी याद रखना चाहिए कि धन-कोप पर
अधिकार पाये वगैर शिक्षा विभाग को अपनी मान मर्यादा
स्थापित करना और उसे बनाये रसना कठिन हो जाता । अव
तो यह यात अनुभव से स्पष्ट हो गयी है कि अगर शिक्षा विभाग
के इन्सपेक्टरों के हाथ में से यह अधिकार ले लिये जाय तो
( १३७ )
'नकी मयाना और यहां वर कि उनकी उपयोगिता भी शीघ्र ही
पती रहेगा। एक गैर सरकारी खून के योग्य मन्त्री ने मुनमे एक
र कहा था कि उन लोगों को निगाह में इन्सपेक्टरी का मान
चल इसीलिए था कि उनके हाथ म वन का अधिकार था।
स्कूल-कमिटियों की असफलता
इम परिस्थिति में जा सून कमिटिया रनायी गरी थी, ग्नन
"तिमीन मागरा का राइ थारुपए न रह गया था। कुछ
मा का यह भी विचार हो गया था कि उनसे रुपया अधिक
न क लिए यह चाल चली गया। इन समिटियों क सदस्या
। कञ्च मा निश्चित नये योर इसाला लाग यह सममन
काय कि इन कमिटियों में शामिल हान के लिए जिले म जाना
अर्थ का ए और फिजूल का सब ठाना था। इस प्रकार उद
लोगों को उनासीनता, उछ का तिरस्कार, कुछ को असहकारिता,
और उच लागों के अहकार-इन सब बातों स एक तो कमिटियां
बनना हा कठिन हो गया था और फिर उनमें काम करना तो
रेलकुल ही श्रमम्भव हो गया। यह बात यहाँ तक बढी कि
परकार को भी इस बात की रिपोर्ट मिली कि अलीगढ़ के
अमींदारों ने, जिनके इशारे से यह कमिटिया बनायी गयी थी,
नमें रिमा प्रकार का सहयाग नहीं दिया ।
नयी कमिटियों का रुख
सन् १८७१ ई. में एकानून पास हुश्रा पिसक द्वारा, लोगो
श्रामदना अनुसार, हर जिले की शिक्षा के लिए एक टैक्स
( १३८ )
नियत किया गया और इसकी आय से सारे प्रान्त के लिए एक
कोप स्थापित करके हर जिले में एक कमिटी नियुक्त की गयो।
इसको यह काम सौंपा गया कि वह इस कोप में से उस जिले
के लिए जितना रुपया खर्च के लिए दिया गया था, उसका
नियन्त्रण करे। इस कमिटी ने कई उपसमितियों बनायों जिनमें
से एक का नाम शिवा-समिति रखा गया। यह कमिटी १८६६ ई०
में बनायी हुई कमिटियों के स्थान पर थी। इन नयी शिक्षा
समितियों का अधिकार पूरे जिले पर था और इनमें सरकार
द्वारा नियुक्त किये हुए जमीदार सदस्य बनाये गये थे। इन
कमिटियों को अध्यापकों की नियुक्ति करने, उनको बरखास्त
करने तथा अन्य प्रकार से दण्ड देने का अधिकार दिया गया
था और इनका कार्य था कि वे स्कूलो की इमारतों की देस
रेस रखें और गवनमेन्ट की मजूरी के लिए अपने जिले की
शिक्षा के खर्चे का बजट बनायें।
इस बजट में उन्हें खर्चे को हर मद का व्योग देना पड़ता
था और इस खर्चे के लिए नियम भी वही कड़ाई से बनाये
गये थे । इसके सम्बन्ध में १८८३ ३० की शिक्षा कमिटा
की रिपोर्ट में लिखा है, "यह सत्य है कि औरङ्गजेर के
शासनकाल के बाद १८७४ ई० में संयुक्त प्रान्त में शासन का
केन्द्रीकरण अपनी अन्तिम अवस्था को पहुंच गया था, लेकिन
उस समय की कमिटियों के अधिकारों पर जो प्रतिवन्ध लगाये
गये थे, उनको ढीला करने के लिए, बड़े जोरदार अधिकारी
( १३९ )
की आवश्यकता है और इसीलिए ये अभी तक शिथिल
नहीं पड़े है।"
अवध के स्कूलों के इन्सपेक्टर मिस्टर जे०सी० नेस्कोल्ड की
राय में इन प्रतिबन्धों के कारण शिक्षा विभाग के दैनिक काम म
चहुत बड़ापन पड़ती थी। कार्यसञ्चालक समिति के कामों पर
वोइन कमिटियों को नियन्त्रण प्राप्त होना चाहिए ही था, लेकिन
इनके सुपुर्द सञ्चालन का सारा काम किया गया था। फिर इन्हें
रुपये पैसे के खर्च का कोई अधिकार न देकर, शिक्षा विभाग के
सामने उचरदायी बना दिया गया था। इसीलिए ये बिलकुल
असफल प्रमाणित हुई।
सन् १८८२ की अवस्था
१८८२ ई० के शिक्षा-कमीशन की जाँच के समय हमारे सूवे
सरकार द्वारा स्थापित ५,३२९ प्राइमरी और ४५५ मिडिल
सूल मौजूद थे। सन् १८५० ई० में केरल ८ जिलों म प्रयाग
की दृष्टि से स्थापित करके तहसीली और इलकानन्दी पद्धति के
स्कूल भी सारे सूत्र में फैज गये थे और अर इस समय यह
मालम करना असम्भर हो गया है कि इनमें से कितने देहातों म
थे और कितने कस्त्रों में थे। देसी स्कूलों को सरकारी इमदाद न
देने की नीति इननी अधिक सफल हुई थी कि इस समय
केवल ५६ प्राइमरी और तहसीली इमदादी मिडिल स्कूल थे।
गैर इमदादी देसी पाठशालामा का अब कोई ब्योरा नहीं
मिलता। प्राइमरी स्कूलों में यह नियम बना दिया गया था कि
( १४४ ) और उच्च कोटि की थी और इसीलिए प्रतिस्पर्धा में गैर सरकारी स्कूल बहुत पिछडे हुए थे। गवर्नमन्ट की इस नीति से सबसे अधिक हानि मिशनरियों को सहन करनी पड़ी। इसम सन्देह नहीं कि यत्र तत्र हिन्दुस्ता. नियों द्वारा सम्बालित खूल भी चल रहे थे लेकिन ऐसे स्कूलों में मिशन स्कूलों की सरया ही अधिक थी। देसी गैर सरकारी सूली की निस्मत मिशन स्कूलो के लिए बाजी मार ले जाना भी सरल था, क्योंकि उनके यहाँ युरोपियन और अमेरिकन शिक्षक होने के कारण पढाई के उत्तम साधन मौजूद थे। उनके यहाँ का प्रबन्ध भी बढ़िया था और उनके पास पर्याप्त धन होने के कारण उनकी धाक भी खूब जमी हुई थी। उन्ह अव यह भी आशा हो रही थी कि मरकारी अँगरेजी स्कूल मा शीघ्र ही उनके अधिकार में श्रा जायेंगे, क्योंकि उच्च शिक्षा प्रचार में सबसळ वनने में केवल मरकारी स्कूल ही उनके लिए बाधक थे। इस बाधा को दूर करन के अन्तरङ्ग उद्देश्य से उन्होंने शिक्षा विभाग के विरोध की शिकायत करनी शुरू को। यह आन्दोलन पहले भारतवर्ष में शुरू किया गया परन्तु जब उन्होने उसम सफलता होवे न देसी तो उसे विलायत में भी शुरू क्यिा। सन् १८७८ ई० मे लग्न म 'जनरल काउन्सिल आफ एजूकेशन इन इण्डिया' नामक सस्था स्थापित हुई। इसके सदस्या में सन् १८५४ के सरीते क लेसफ लाड हैलीफैक्स तथा अन्य गण्यमान्य व्यक्ति भी सम्मिलित थे। रेवरेंड जेम्स जानसन -
साहर इस सस्था के मन्त्री थे। इस सस्था ने अनेक प्रभावशाली
मनुष्यों की सहानुभूवि भी प्राप्त कर लो यो और जब सन १८८०
में लार्ड रिपन की नियुक्ति भारत के वाइसराय के पद पर हुई
जा उस समय इस सस्था ने लार्ड रिपन को एक अभिनन्दन
पर भी प्रदान किया था। इस पत्र में सन १८५४ क सरीवे
का पालन न हो मकने को शिकायत भी की गयी थी। इसके
उचर में लार्ड रिपन ने उक्त सस्था को शाश्वासन देते हुए
रहा था कि भारत में पहुँचन पर रे इस मामल की छानसेन
करेंग। इस प्रकार सन् १८८० में सर विलियम हन्टर के
सभापतित्व में एक शिक्षा कमीशन नियुक्त हुा । इस कमीशन में
मिशनरी सभासद काफी सस्या में थे। बङ्गाल के सर भूदेव
मुर्ती और हमारे प्रान्त के जस्टिस महमूद जैसे योय हिन्दु-
सानियों को भी नियुक्ति इस कमोशन पर हुई थी।
इस कमीशन की नियुक्ति ने देश में एक नया जाश पैदा कर
दिया। इसके सामने लगभग ३२३ प्राथनापत्र और १९३ गवाह
उपस्थित हुए । उन हिन्दुस्तानिया ने जिन्हें अगरेजो शिक्षा द्वारा
कारी लाभ हुआ था और जिनको मागों और श्रापरयकवाओं
का हो पूत्ति के लिए इस शिक्षा का प्रचार किया गया था, देश में
च शिक्षा प्रचार का पत्र लिया और हमारे प्रान्त के राना
भिनगा, सर सैयद अहमद साँ, राना जैप्टाम, बाबू
हरिश्चन्द्र, राजा शिवप्रसाद, मिस्टर जे० सी० नेस्सील्ड आदि
नैस प्रमुख व्यक्तियों ने कमीशन के सामने गवाहियां दी।
ग्रा०शि०-१०
(१४६ ) इन गवाहियों से सर्वसाधारण की शिक्षा के सम्बन्ध में कितनी ही महत्वपूर्ण गातें विदित हुई । उनम एक तो यह थी कि पुरानी पति पर सञ्चालित पाठशालाएँ वन्द होती चली जा रही थीं। दूसरी कठिनाई सारे प्रान्त म एक भापा न होने की यो । वहुतेरे गवाहा न अपने बयानों में लोगों को निर्धनता को प्रारम्भिक शिक्षा प्रचार की मन्द गति का कारण बतलाया था। साहित्यिक लोगों ने अपनी गवाहिया में सर्वसाधारण में शिक्षा प्रचार करने का समर्थन करते हुए इस बात पर जोर दिया था कि सरकारी सस्थामा म शिक्षाप्राप्त लोगो द्वारा जनता में शिक्षा प्रचार किया जाय। कमीशन की सिफारिशें इस कमीशन ने सारे भारतवर्ष की शिक्षा के सम्बन्ध म एक घड़ी लम्बी चौडी रिपोट तैयार की, पर तु इस पुस्तक मे हम केवल यह देखना है कि प्राइमरी शिक्षा के सम्म ध में इसने किन सुधारों की सिफारिश की थी। इस कमीशन की रिपोर्ट के चौथे अध्याय में सबसे पहली सिफारिश यह की गयी थी कि जनता में शिक्षा प्रचार करने के लिए प्राइमरी शिक्षा देसी भाषाओं में दी जाय और इसके द्वारा वे विपय पढ़ाये जाय जो विद्यार्थियों को उनकी स्थिति के अनुसार उनके जीवन मे उपयुक्त साबित हों। इसमें यह स्पष्ट कर दिया गया था कि यह आवश्यक नहीं था कि यह प्रारम्भिक शिक्षा विश्वविद्यालय की उच्च शिक्षा के लिए आवश्यक साधन हो। इसका मतलब यह था कि मात्र भापा के माधम द्वारा प्रारम्भिक शिक्षा सागसूर्ण हो और यह आवश्यक नया कि यह उन्च शिक्षा प्राप्ति के लिए आवश्यक साधन बने। इसके अनुसार प्रारम्भिक सूल केवल प्राइमरी शिक्षा के लिए ही साने जोय, न कि उरय शिक्षा का वैवारी के लिए। हमारे प्रान्त में वा याक्युलर और ऍग्ना वनान्युलर स्तूना के पाठ्यक्रमों के पारस्परिक अन्तर से बह रात सात प्रतीत हा रही है। इसो अध्याय में तासरीसिशरिश में इस रात का उल्लेख है कि हर प्रकार का शिक्षा के लिए सरकार की सहायता सर्वथा अपेक्षित है। जनता में प्रारम्भिक शिक्षा के साधनों को अभिवृद्धि और नातात करना, उस समय की स्थिति के अनुसार, सरकार का परम आवश्यक कर्तव्य होना चाहिए था और गवनमन्ट ने श्रर तक इस धार जितनी चेष्टा की थी, उसे अब इसस कहीं अधिक चेष्टा करन की पारश्यता थी। वास्तव में कमीशन ने सन् १८५४ के खराते की मिधारिशोंचाही समर्थन अपनी रिपोर्ट में किया था। इस शिक्षा प्रचार के लिए धन सम्बन्धी सहायता का उल्लेस करते हुए सरकार से सिफारिश की गया थी कि सरकार द्वारा शिक्षा प्रचार का नीति में प्रारम्भिक शिक्षा को प्रमुख स्थान दिया जाय और उसके खर्चे के लिए लोकल फड (स्थानाय कर-कोप) का पूरा रुपया तथा प्रान्तीय आय का बहुत रहा हिस्सा मिलना चाहिए। भारतीय सरकार ने इन सिफारिशों से पूर्ण सहानुभूवि प्रकट की, किन्तु प्रान्तों के विचारवान और बनविशील अधिकारियों
-
(१४८ )
की धारणा यह हुई फि कमीशन ने केवल समझौता करने की
दृष्टि से दोनों पक्षों को साधने की यातें की है। इस विषय मे दो
बातें उन्हें विशेष रूप से सटक्ती थीं। सरकार न उस समय की
स्थिति के पहान और अन्य प्रकार के शिक्षा क्रमो क प्रचलित
होने की आड़ में जनता मे, शिक्षा प्रचार को उन्नति को बहुत कुछ
परिमित रसने की चेष्टा की थी। फिर यह सिफारिशें अधिक
उन्नतिशील और लाभदायक भी नहीं थीं । परन्तु हमारे प्रान्न के
उस समय के लाट सर आलफ्रेड लायल का मत इन सिरिशो
की वायत सरकार के मत से भिन था, क्योंकि उनके विचार में
माध्यमिक और प्रारम्भिक दानो ही प्रकार के शिक्षा कम समान
रूप से महत्त्व के थे। उसके विचार से सहमत होने वाले
व्यक्तियों का यह भी कहना था कि यदि सरकार ने इसमें तनिक
भी दोल ढाल की तो अवश्य ही माध्यमिक शिक्षा की हानि होगी।
इसलिए उसे भी सरकार को भार से पयात सहायता मिलनी
चाहिए । जनता का चहुमत भी इसी विचार का समर्थक था।
इसलिए जर तक मध्य स्थिति वाली शिक्षित जनता का यह
विचार था, तब तक कमीशन की सिफारिशों के होते हुए भी,
माध्यमिक शिक्षा पर व्यय म किसी प्रकार की कमी होन का
भयनया।
कमीशन की सिफारिशों के अनुसार प्राइमरी शिक्षा में
व्यावहारिक विपयो को सम्मिलित करने तथा उस सर्वतोन्मुखी
घनाने के लिए यह आवश्यक हो गया था कि उसका क्षेत्र विस्तृत
( १४९ ) कर दिया जाय । इसलिए कमीशन न इस बात की भी सिफारिश ही थी कि शारीरिक व्यायाम को उनति के लिए स्कूलों में ऐसी सेल-कूद, जिम्नास्टिक, दिल तथा अन्य प्रकार के व्यायाम भी सिसाये जाया प्राइमरी शिक्षा प्रचार में शुल्क का प्रश्न बड़ी उलझन का या। नि शुल्क शिक्षा प्रचार का ध्यय तो उस समय उनके लिए भा अपेक्षित नहीं था, जो 'शिक्षा कर' देने वाले थे। फिर हमारे प्रान्त म वो कोस लगा देन स भारी बाधा पड़ने को श्राशका थी, क्याफि यहाँ तो प्राइमरी शिक्षा वास्तव में नि शुल्क ही दी जाता थी। नय लोकल सेल्फ गवर्नमन्ट ऐक्ट (स्वायत्त शासन विधान) के अनुसार जो जिला बोर्ड कायम हुए थे, उनके जिम्मे यह भार सौपा गया था कि ये देहातों के प्राइमरी स्कूलों का भी नियन्त्रण करें, परन्तु इस सरीते के चौथे अध्याय को ३६वी सिफारिश में शिक्षा विभाग का नियन्त्रण और शिक्षा नीति का मम एकसा नाये रसन के विचार से यह निश्चित किया गया था कि डिस्ट्रिक्टबोर्ड उन नियमो को यथाविधि स्वीकार कर लें, जो इन स्कूलों की सहायता तथा इनके नियन्त्रण करने के लिए शिक्षा- विभाग ने बना दिये ये और शिक्षा विभाग की स्वीकृति के विना इनम कोई परिवर्तन या पारवधन न करें। इसके साथ यह भी निश्चय किया गया था कि डिस्ट्रिक्ट घोर्ड शिक्षा विभाग द्वारा प्रमाण पत्र पाये हुए अध्यापकों की ही नियुक्ति करें तथा इनकी । १५० ) तरक्का और घरखास्तगी के मामले में भी शिक्षा विभाग से अनुमति प्राप्त किया करें। कमीशन की यह सिफारिश भी उल्लेस नीय है कि उहोंने देसी पाठशालाओं के प्रोत्साहन ओर उनकी प्रामाणिकता को भी उस हालत म मान लिया या यदि वे क्सिी प्रकार की लौकिक शिक्षा देते हो। हमारे प्रान्त के सम्बन्ध में विशेष सिफारिशे इस प्रकार यह निश्चित हो गया कि प्रारम्भिक शिक्षा के लिए लोकल फण्ड (स्थानीय कर कोप) का तो सारा रुपया व्यय किया जाय और शिक्षा प्रचार की मद का प्रान्तीय श्राय का भी अधिकांश भाग इसी पर खर्च हो। इसमा शिक्षा क्रम भी लोगों की आवश्यकताओं के अनुसार बनाया जाय और देसी पाठशालाओ को भा काफी प्रोत्साहन मिले। साथ ही उन जातियों में शिक्षा प्रचार करने के लिए विशेष रूप से चेष्टा को जाय जो कम शिक्षित थीं। कमाशन को इस बात रा विश्वास दिलाया गया था कि हमारे प्रान्त को वे जातियों जो सदा से प्रजा की दृष्टि में प्रतिष्टित और उच्च मानी जाती रही हैं, प्रारम्भिक और उच्च दोनों प्रकार की शिक्षा से प्राय वजित रहती हैं। इसलिए कमीशन के विचार म इन जातियों की शिक्षा में प्रोत्साहन देना परम आवश्यक था। उनके विचार मे हलकापन्दो मदरसे जमींदारों के लडकों को प्रारम्भिक शिक्षा देने के लिए स्थापित हुए थे और इसलिए
( १५१ )
व जातियों के जो लड में इन स्कूला म पढ़ने जाते थे, उनके
१ फीस देना अनिवार्य हाना चाहिए था। इसीलिए उन्होंने
पात की सिफारिश की कि कुछ समय के लिए हलकावन्दी
रसों में केवल जमादारों के ही लड़ रसे जाय और जिला
टियों की सहायता से जो देसी पाठशाला स्थापित हुई थीं,
म जनता को शिक्षा दी जाय । इन मदरसो के विद्यार्थियों को
फीस देना आवश्यक या।
यह तो उसी पुरानी पद्धति का अप्रत्यक्ष रूप में समर्थन
ना था और उन रईसो तथा मुसलमानो के लड़कों के
ए विशेष सुविधा प्रस्तुत करनी थी, जो अपने बालकों को
गर और बढ़ई के बालकों के साथ बैठा कर पढ़ाना पसन्द न
ते थे। पश्चिमी सभ्यता का एकीकरण विधान यहाँ के लोगों
लिए अत्यन्त अप्रिय प्रतीत होता था। इसीलिए कमीशन ने
को शिक्षा के लिए ऐसी सिफारिश की कि यदि कहीं उनके
नुमार काम किया जाता तो अवश्य ही शिक्षा प्रचार को वही
नि पहुँचती। हर गांव में दो दो सूलों का सर्च सहन कर
कने की शफि न थी। यदि हर गाँव में ऐसे दो स्कूल सोले
ते जिनम से एक स्कूल में रईसों के लडके और दूसरे में ग्राम
अन्य जातीय बालक शिक्षा पाते तो शायद धनाभाव से १०
सि ही में सभी स्कूल वन्द हो जाते ।
कमीशन की सिफारिशों पर पुन दृष्टिपात करने से हमको
ता लगवा है कि प्राय सभी प्रान्तों में उसको बहुत सी सिफारिशें
( १५२ )
लोगों को मालूम थीं। वास्तव में कमीशन ने १८५४ ई. के सरीते
की बातों का ही पिष्टपेपण किया था, परन्तु उसकी रिपोर्ट से एक
लाभ यह अवश्य हुआ कि उससे यह प्रत्यक्ष हो गया कि
सर्वसाधारण को शिक्षा से फितना लगाव था। इससे यह भी
प्रक्ट हो गया कि अगरेजी राज्य के प्रारम्भ से शिक्षा प्रचार के
लिए क्या क्या कार्य क्येि गये थे। ऐसी अवस्था म सारे देश
की निरक्षरता का विचार करते हुए क्या यह उछ कम आश्चर्य
की बात है कि इस कमीशन ने सर्वसाधारण म प्रारम्भिक
और उच्च शिक्षा प्रचार के लिए बजट में केवल दस लास
रुपये सालाना बढ़ाने की अनुमति दी थी।
सम्भव है कि इस परिस्थिति म जो उन्नति होती, वह स्थायी
होती, परन्तु वह कितनी मन्द हो गयी, इसका परिणाम प्राज
भी प्रत्यक्ष है।
छठा अध्याय
सन् १८८२ वाले क्मीशन के बाद की उन्नति
जिला गोडी के अधिकार में गांवों की प्रारम्भिक शिक्षा
मन् १८२ क कमीशन न शिक्षा प्रचार क काय में एक नयी
सूचि पैदा कर दी थी। यापि इसको सिफारिशें बहुत अधिक
कान्तिकारी परिवर्तन करन के पक्ष म न थी, फिर भी इनक
प्रकाशित हो जाने स शिक्षा प्रचार क काय की गति में युद्ध उनति
अपश्य हुई। इमा समय १८:३ ई. में लार्ड रिपन का प्रसिद्ध
स्वायत्त शासन विधान (लाल सैल्फ गवनमन्ट ऐक्ट ) स्वीकृत
हार कानून उन गया और उसक अनुमार प्रत्येक जिले क
डिस्ट्रिक्ट गार्ड को गांवों की प्रारम्भिक शिक्षा का प्रतिपालक
बना दिया गया।
य जिला पोड १८५ ई० में पुरानी जिला कमिटियों के
स्थान म बनाय गये और इनमें हमारे दश के शासन प्रवन्ध.
नाति से अनभिज्ञ वेचारे उदासीन सदस्या को अँगरेज अफसरों
का अभिभावुकता में इस नये प्रकार की शासन-विधि सिसाने
का पहला ही प्रयत्न या
। १८३३० के इस नये कानून के अनु-
सार गांवों में स्तूल सोलने, उनका समुचित प्रबन्ध करन तथा
उनक सञ्चालन करन का सारा भार इन्हीं जिला वोडों के ऊपर
( १५४ ) छोड़ दिया गया था। २५ फरवरी १८८५ ई० के मन्तव्य द्वारा सरकार ने उन्हे आदेश दिया था कि स्वायत्त शासन के अधीन करते समय गवर्नमेन्ट ने कई विभागों के सम्बन्ध म समय समय पर जो शासन सिद्धान्त निर्धारित किये हैं, उनके अनुसार सारा काम होना चाहिए और उनका यथाविधि पालन किया जाना चाहिए। साथ ही इन सब बातों में एक ही नीति का प्रयोग करने के विचार से गवर्नमेन्ट ने इन प्रतिवन्धो के दाइरे के भीतर ही डिस्ट्रिक्ट वोर्डो को यह भी अधिकार दे दिया था कि वे अपनी स्वेच्छा का यथावसर उपयोग करें। इसीलिए गवनमेन्ट के लिए यह भी थावश्यक हो गया कि वह इन वोडा को इस बात के लिए बाध्य करे कि कुछ श्रावश्यक मामलों में उनके लिए विभा गीय अफसग की अनुमति लेना वडा जरूरी था। वोडों की धनाभाव सम्बन्धी कठिनाइयाँ परन्तु इन जिला वोडी क पास शिक्षा प्रचार के लिए अलग से कोई निश्चित कोप न या। पुरानी जिला कमिटियों ने प्रान्तीय आय म से शिक्षा प्रचार के लिए कई विशेप मद मजूर करा लिये थे, परन्तु नये ऐक्ट की धाराओं के अनुसार इन नये पार्डी के पास शिक्षा प्रचार के लिए केवल स्थानीय और वोड क अधीन लोक-सेवा कार्यों के करों ही आय थी। इसके अतिरिक्त जो रुपये की कमी रह जाती थी, उसे सरकार प्रान्तीय कोप में से एक मुश्त देकर पूरा कर देती थी। साल में जो रुपया खर्च करने से बच रहता था, वह कमीशन की सिफारिश के प्रतिकूल सरकार
( १५१ )
में जन्न हो जाता था। चूंकि व्यापार या कृपि में किसी प्रकार
उनति का कोई प्रबन्ध नहीं था इसलिए उन लगन में
भी किसी प्रकार की वृद्धि को आशा नही हा सकती थी और
इसीलिए निम्ट भविष्य में शिक्षा के प्रचार म ना किसी प्रकार
की वृद्धि की मम्भावना नहीं थी। परन्तु शिक्षा पर खर्चा तो
तुरन्त बढ़ गया था, क्योंकि नाच दरने क ामर-डिप्टा और
सबढिप्टी इन्स्पेष्टरों का सरचा भी इन्हीं जिला गाढा पर
लादा गया था पार ऊँच दरज के श्रमसर-इन्सस्टरों और
असिस्टेंट इन्सस्टरो का कुछ खच भा उनका जन्में था।
नये एक्ट के अनुसार डिस्ट्रिक्ट पाडों पर कुछ उत्तरदायित्व
भारसा गया था। इसलिए शिक्षा के साथ साथ कइ अन्य
विभाग उन अधिकार में दिये गये थे। उनस यह श्राशा भी
का गयी थी कि वे प्रयन करक शिक्षा की ओर लोगा की
अभिरुचि बढ़ायो। इमलिए इस विचार से ता इन तिला
बाहों का काम अधिक सफल नहीं रहा, क्योंकि हमारे प्रान्त की
शिक्षा विभाग को सन् १८९७ मा रिराट म लिखा है कि शिक्षा
म इन जिला नोटों का सारा प्रयन जिल कलस्टर या डिप्टी
कमिश्नर के रुज पर निभर होता है। यात्तर में सिराय उस
अवसर क बाकि किसा का कोई नौकरी दिलाना हाती थी,
बोर्ड के मेम्बरों को कोई गणना न थी।
इसी वर्ष एटा बोर्ड के चेयरमैन ने एक ऐसा योजना तैयार
की थी जिसमें बोर्ड के प्रत्येक मेम्बर के जिम्मे कुछ स्कूल सीप
( १५४ ) छोड दिया गया था। २५ फरवरी १८८५ ई० के मन्तव्य द्वारा सरकार ने उन्हे आदेश दिया था कि स्वायत्त शासन के अधीन करते समय गवर्नमेन्ट ने कई विभागों के सम्बन्ध म समय समय पर जो शासन सिद्धान्त निर्धारित किये हैं, उनके अनुसार सारा काम होना चाहिए और उनका यथाविधि पालन किया जाना चाहिए। साथ ही इन सब बातों में एक ही नीति का प्रयोग करन के विचार से गवनमेन्ट ने इन प्रतिवन्धों के दाइरे के भीतर ही डिस्ट्रिक्ट वोर्डो को यह भी अधिकार दे दिया था कि वे अपनी स्वेच्छा का यथावसर उपयोग करें। इसीलिए गवनमेन्ट के लिए यह भी आवश्यक हो गया कि वह इन चोर्दा को इस बात के लिए बाध्य कर कि कुछ आवश्यक मामलों म उनके लिए विभा -गीय अफसरों की अनुमति लेना पडा जरूरी था। वोर्डो की धनाभाव सम्बन्धी कठिनाइयाँ परन्तु इन जिला वाडर्डी क पास शिक्षा प्रचार के लिए अलग से कोई निश्चित कोप न या। पुरानो जिला कमिदियों ने प्रान्तीय प्राय म से शिक्षा प्रचार के लिए कई विशेप मद मजूर करा लिये थे, परन्तु नये ऐक्ट की धाराओं के अनुसार इन नये चोडो के पास शिक्षा प्रचार के लिए केवल स्थानीय और वोड के अधीन लोक-सेवा कार्यों के करों की ही पाय थी। इसके अतिरिक्त जो रुपये की कमी रह जातो थी, उस सरकार प्रान्तीय कोप में से एक मुश्त देकर पूरा कर देती थी। साल में जो रुपया खर्च करने से बच रहता था, वह कमीशन की सिफारिश के प्रतिकूल सरकार में जन्न हो जाता या1 चूँकि व्यापार या कृपि में किसी प्रकार की उन्नति का कोई प्रबन्ध नहीं था, इसलिए उनक लगान में भी किसी प्रकार की वृद्धि की प्राशा नहीं हा सस्ती थी और इसीलिए निकट भविष्य में शिक्षा र प्रचार म भी किसी प्रकार की वृद्धि की सम्भावना नहीं थी। परन्तु शिक्षा पर खर्चा तो तुरन्त यढ़ गया था, क्योकि नाचे दरज के अफ्सर-डिप्टी और सबडिप्टी इन्स्पेटरों का सरचा भा इन्हीं जिला वोडों पर लादा गया था श्रार ऊँचे दरजे व अफसर-इन्स्पस्टरों और असिस्टेंट इन्स्पेक्टरी का कुछ सच भा उनक जिम्में था। नये एक्ट के अनुसार डिस्ट्रिक्ट राडा पर कुछ उत्तरदायित्व भी रखा गया था। इसलिए शिक्षा के साथ साथ कई अन्य विभाग उनक अधिकार में दिये गये थे। उनस यह श्राशा भी का गयी थी कि ये प्रयन करके शिक्षा को ओर लोगों की अभिरुचि बढ़ायेंगे। इमलिए इम रिचार स तो इन जिला बार्दा का काम अधिक सफल नहा रहा, क्योंकि हमारे प्रान्त की शिक्षा विभाग की सन् १८९७ को रिसाट मलिसा है कि शिक्षा म इन जिला बोडों का सारा प्रयन जिले के कलस्टर या डिप्टी कमिश्नर के रुख पर निर्भर होता है। वास्तव में सिवाय उस अवसर क जब कि किसी को कोई नौकरी दिलानी होती थी, वार्ड के मेम्बरों को कोई गणना न थी। इसी वर्ष एटा बोर्ड के चेयरमैन ने एक ऐमी योजना तैयार की थी जिसमें बोर्ड के प्रत्येक मम्पर के जिम्मे कुछ तूल सीप दिये गय थे। परन्तु यह भी बहुत दिनो तक न चल सकी, क्योंकि वास्तव में यह स्कूल सरकारी उद्योग और सरकारी सरक्षण पर चलने के इतने निर्भर हो गये थे कि जहाँ कहीं इसको कमी हुई कि इन स्कूलों की अवनति होने लगी। इलाहा- याद के मैजिस्ट्रेट मिस्टर फुलर न इसीलिए अपनी रिपोर्ट में लिसा था कि इन सूलो मे लडको की कम उपस्थिति और रद्दी पढ़ाई का एक जबर्दस्त कारण यह भी है कि तहसीलदार और डिप्टी कलक्टर इनको ओर विशेष ध्यान नहीं देते। इसीलिए जनता भी इनकी ओर से उदासीन होती जाती है। हमारे यहाँ को जनता के उत्माह का सोखलापन इससे अधिक और किन स्पष्ट शदों में व्यक्त किया जा सकता है कि १५ वप तक काम करते रहने पर भा इन जिला यो? म कोई उन्नति न हो सकी। सन् १९८० की शिक्षा विभाग की रिपोर्ट में भी इन जिला बोर्डो की यही शिकायत देखने को मिलती है, क्योंकि उसके अनुसार यह नहीं कहा जा सकता कि यह जिला वोर्ड शिक्षा म कोई विशेष उत्साह दिखा रहे हैं। सन् १९०१ की रिपोट में तो यह स्पष्ट लिसा हुआ है कि 'साल के पूरे बारह महीने में शायद ही कोई मेम्पर स्कूल के भीतर पैर रखता हो। लेकिन जब सालाना प्रस्ताव भेजने का समय आता है तो यह मेम्पर अध्यापकों के काम के सम्बन्ध में बड़े खुले शदों में अपनी राय प्रकट करने से नहीं शरमाते और इस समय ये लोग शिक्षा विभाग के मुकाविले म अध्यापकों के पक्षपाती और हमायती बन कर उनको उचित दण्ड मिलने से बचाने के लिए अपने अपन पद का पूरा-पूरा दराव डालने में नहीं हिचकिचाते।' वास्तव में डिस्ट्रिक्ट योड के मेम्परों और शिक्षा विभाग के वीच यह शिक्षा सम्बन्ध उचित और उत्साहपद्धक नहीं कहा जा सकता। मेम्परों के इस प्रकार के व्यवहार का कारण उनी अधिकार प्रियता ही कही जा सकती है क्योंकि उनसे अपने कर्तव्य पालन का कोई विचार या एहसास नहा था। ये लोग देहातों में केवल अपनी स्थिति के कारण मम्बर बना दिये गये थे और वास्तव में न तो ये स्वयम् ही अधिक शिक्षित ये और न इनको शिक्षा से कोई प्रेम ही था। ऐमा अपस्था मे यह कर श्राशा की जा सकती थी कि वे जनता को शिक्षा की भार ध्यान देगे। ऐसे गैरसरकारी मम्बर जो शिक्षा म कुछ उत्साह लेते हो, कस्बों के म्युनिसिपल बोर्ड में तो अवश्य पाये जाते थे। डिस्ट्रिक्ट बोर्डो के इस धनाभाव का प्राइमरी स्कूलों पर उलटा प्रभाव पड़ा। इनके पास रुपये की बहुत कमा थी, परन्तु अध्यापकों का वेतन बढाना भी जरूरी था। इसलिए बहुत से बोर्डो ने यह निश्चय किया कि कुछ हलकावन्दी स्कूला को तोड़ कर जो रुपया पचे, उससे योग्य शिक्षकों की वेतन वृद्धि को जाय । साथ ही अपर प्राइमरी दरजों की फीस भी बढ़ा दी जाय। इसका परिणाम यह हुआ कि जहाँ १८९६८७ में ४,९७८ सूलों में विद्यार्थियों की सरया १,७१,८१२ थी, वहाँ सन् १८९१९२ म १४,१८५ स्यूला में यह सत्या घट कर १,४७,७१४ रह गयी। साथ ( १५८ ) ही साथ अव एक विद्यार्थी के पढ़ाने का खर्च ३J से बढ़ कर ४) हो गया। सन् १८९४ में हमारे प्रान्त के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर सर एन्टनी मैकडानल्डन शिक्षा रिपोर्ट की पालाचना करते हुए लिखा था (१) हमारे सूवे म प्रारम्भिक शिक्षा पाने वाले सव विद्या- र्थियों की सरया हमारे यहाँ की जन सख्या के अनुपात मे ओर सब प्रान्तों से थोड़ी है। (0) हमारे यहाँ की प्रान्तीय और स्थानीय बाय के मुका- विले में सरकारी कोप से शिक्षा पर जो रुपया खर्च हो रहा था, वह बहुत कम था और इस रुपये का भी बहुत बड़ा अश माध्य मिक और अँगरेजी शिक्षा पर खर्च किया जा रहा था। (३) प्रत्येक बालक की शिक्षा पर व्यय का जो औसत आता था वह बहुत अधिक या और (४) नार्मल स्कूलों में अध्यापको को जो शिक्षा दी जाती थी, वह विल्कुल अपर्याप्त थी। इसलिए इस रिपोर्ट पर सन् १८९४-९५ के सरकारी मन्तव्य में, हमारे प्रान्त के ऊपर से निरक्षरता का लान्छन मिटाने के लिए, यह सिद्धान्त स्थिर किया गया कि हमारे यहाँ की शिक्षा मे व्यय को मात्रा मे क्झिायत करके शिक्षा के प्रचार में अधिक विस्तार किया जाय। इस शुभ इच्छा से प्रेरित होकर उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा के लिए हमारे प्रान्त की समाई के अनुसार सरकारो इमदाद की मात्रा अधिक से अधिक बढ़ा कर ५ हजार रुपया सालाना कर दी। यद्यपि यह इमदाद भी बहुत कम थी का भी जिला घोड़ों को साल भर म सिर्फ इसका दो विहाई खच करने का अधिकार मिला था। इसीलिए सरल से सरल प्रारम्भिक शिक्षा का प्रसार करने के विचार से यह निश्चित हुा कि इस सम्बन्ध में श्रर तक प्राइवेट सस्थाओं द्वारा स्कूल न सोलन देन की जो नीति रती गयी थी उस और न बढ़ने दिया जाय, वल्कि अन से जो लोग अथवा जो सस्थाएँ नये सूल सोलना चाहें, उन्हें सरकार की तरफ से सहायता भी प्रदान का जाय। इस प्रकार इस नयी नीति का शीन ही चदा सन्तोषजनक प्रभाव यह हुश्रा कि अधिकाधिक प्रारम्भिक स्कूल खुलने लगे- यहाँ तक कि १९९७ ई. में इनकी सरया बढ़ कर ६,०२५ हो गयो । इनके साथ ही साथ बोर्ड के स्कूलों में भी वृद्धि हुई और प्राइवेट सूल भी सरकारी इमदाद के नियमों का पालन करन लगे। एक इलाहाबाद जिले में ही प्रारम्भिक शिक्षा पाने वाले लड़कों की सरया में ५० प्रतिशत वृद्धि हो गयी। सन १८९६९७ ई० की शिक्षा सम्बन्यो रिपोर्ट म जौनपुर जिले के डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की यह रिपोर्ट थी कि इस नयी पद्धति ने एक बडी कमी को पूरा कर दिया है । गाजीपुर डिस्ट्रिक्टवोर्ड ने भी इसी प्रकार लिसा या कि नये स्कूलों के खुल जाने से एक बढ़ी आवश्यकता पूरी हो गयी है और थोड़े ही से खर्चे से विद्याथियों को सख्या प्रायः दुगुनी हो गयी है।
( १६० ) इसके बाद १८९७ ई० म सरकार ने इसी नीति के अनुसार -५,४०० रुपये की इमदाद और बढ़ा दी, लेकिन सन् १९०२ तक शिक्षा विभाग के अफसरों को इस बात का विश्याप्त हो गया था कि डिस्ट्रिक्ट बोर्ड इन नये इमदादी स्कूलों को बिना कुछ अधिक समझे यूझे ही सोल देने म अधिक तत्परता दिखाते थे। जिन स्कूलों का हम यहाँ पर वर्णन कर रहे हैं वे देसी पाठ शालाओं से मिलकुल भिन्न थे, क्योंकि ये पाठशालाएँ तो वोड के स्कूलों को प्रतिसर्धा म या तो बिलकुल नष्ट हो चुकी था, या अपनी कालापवर्तिता के कारण सरकारी इमदाद प्राप्त करने से पश्चित थीं। ये नये इमदादी मदरस एक प्रसर से वोड के उन घटिया मदरसों के प्रतिरूप ये निनम उनके सारे दोषों के साथ साथ न तो उनका जैसा सात सामान या, न उनको जैसी योग्यता थी और न उनको सी धन सम्बन्धो स्थिति ही ऐसो सन्तोपननक यो किजिससे उनकी मयादा स्थापित हो सके। इनम से अधिकांश तो बिलकुल निकम्मे थे। न उनम अधिक लडके ही पढ़ने जाते थे, न उनके पास मकान ही अच्छे ये, और न उनके अध्यापकों को ही पयाप्त वेतन मिलता था। इन स्कूलों की आमदनी का मुरय चरिया केवल ३,४ रुपया मासिक सरकारी इमदाद थी। इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि इन स्कूलों की उन्नति करने के लिए इन्ह अधिक इमदाद देने की आवश्यकता थी, ताकि वे अपने यहा कम से कम योग्य शिक्षक तो रस सके।