Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Chandramahipati

Shastri,srinivas · 2012/08

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वैयाकरणकेशरणा पूज्यजनक- श्रीनवरङ्गरायशास्त्रियां करारबिन्दयोः समर्पणम् आराध्यदेव! श्रीचरणसान्निध्ये समधिगतं शास्त्रप्रयागमयं- जगतो विभीपिकान्यतमस विलुम्पति । तस्य क्षीयमाणनानप्रकाशस्य कतिपयानवशिष्ट- सन्दागूनवचित्य त्यास एप सम्भालयितुम- शक्यः सम्भाव्यमानः श्रीमद्भ्य एव सादरं सश्रद्धं सलजञ्च प्रत्यावर्तयता समप्यते- -श्रीनिवासन श्रावणी पूर्णिमा १९६१ म. भारद्वाजमवनम्, राजगड, चौवानर (राजस्थान) निर्यातित स्यात् । जायमानो.पं.वाक्षणस्त्रिभिणाणवाञ्जायते। तत्र- ऋण देवस्य योगन ऋषीणां पाठकर्मणा। सन्तत्या पितृलोकाना शोपयित्वा परिव्रजेत् ॥ इति हि धर्मशास्त्रकाराः समामनन्ति । तत्र ऋषीणां पाठकर्मणेसिवचनस्य तात्पर्य मिदमेव यदृषिभिः प्रज्ञानत्रेण विलोक्य यद् ग्रन्थेषूपनिबद्ध तत्सा• भिनिवेशमनुशीलनीय तदनुरूपा नव्याश्चापि प्रन्या विरचनीया इति । एवमेवपिप्रतिपादितं रिक्यं परिरक्षितं परिवद्धितञ्च स्यात्, ऋषि ऋणञ्च अघन्यतया पुनरस्माकमद्यत्वे खलु निरल्पतमा एव ऋषिऋणविनयाय प्रयासमातिष्ठन्ति, सुविरलतमाश्च तत्र साफल्यमधि- गच्छन्ति । एष्वेव च सुविरलतमेष्वन्यतमः श्रीश्रीश्रीनिवासशास्त्रि- महाभागः। साहित्यव्याकरणादिविविधशास्त्रेषु कृतश्रमेण विपश्चिदप- श्चिमेन शास्त्रिमहाभागेन रसभरनिर्भरेण गद्येन चन्द्रभूपतिकथा समुपनिबद्धा। "प्रोजः समासभूयस्त्वमेतद् गद्यस्प जीवितम्" इत्युपदेशमनुपाल- यतापि शास्त्रिमहोदयेन लेशतोऽपि प्रसादो न परित्यक्तो न वा माधुर्य- मुरसारितमित्यही सुवर्णेऽपि परमामोदः । प्रमादा अत्र वर्तन्ते केचन, पर चारुतरतरुण्याः कपोलकज्जलवन्न प्रभवन्ति ते कयागतमुत्कर्षमप- हन्तुम् । अवश्यमेव समास्वादनीयः कथाया अस्या रसः महृदयः। प्रतिविद्यालयं प्रतिमहाविद्यालयं प्रतिपुस्तफशालञ्च रक्षणीयमिदम् । पुस्तकस्यास्य कृते शास्त्रिमहोदयो राष्ट्रक्र्णधारः पारितोपिकेण सबर्द्धनीय इति नः प्रतिभाति। अत्र पद्यान्यपि भूयासि विलसन्ति । तेषु च कानिचन प्रन्यकृत एव, अपराणि च तेषा तेषा क्वीनाम् । सर्वाष्येव सरसानि मनोहराणि च । इतरकविषु च प्रतिवादिद्विरदपञ्चानने पण्डितराजजगन्नायै शास्त्रि- महोदयस्य बहुमानो दृश्यते । शास्त्रिमहाभागस्य गये पद्ये च सममेव नं पुण्यं परिलक्ष्यते। चिरञ्जीवतु शास्त्रमहोदयश्चिरञ्च समलङ्करोतु सुरसरस्वती- मीदृशोभिः सुमनोमालाभिरिति शिवम् । ८, भूपेन्द्र बोस एवेन्यू श्रीक्षितीशचन्द्रचट्टोपाध्यायः बलकत्ता २१॥४॥५६ मञ्जूपासम्पादक wr

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चन्द्रमहीपतिः
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वैयाकरणकेशरी श्रीनवरङ्गरायशास्त्री

राजभवन चण्डीगढ। पञ्जावराज्यपाल महामहिम श्रीनरहरि विष्णु गाडगील महोदय का प्राक्कथन। . मनुष्य प्रातःकाल उठ कर अपने शरीर के कार्य करता है, फिर अपने वाययों के, फिर मित्रों के, फिर दूसरों के। यह सर पहलुओं में लागू होता है। कुछ स्वयं बन कर राष्ट्र को बनाने का उद्देश्य उत्तमपृष्यों का सभी राष्ट्रों में रहा है। उन्हीं सब कार्यमलापों के एक प्रणालीद्ध निरुपण यो उम पुरुषोत्तम के द्वारा या वाद में एक पाद का म्वरूप मिलता है। इसी उद्देश्य से विश्व में विश्वहित के लिये विभिन्न पद देखे जाते हैं। बाद के प्रणेता एव टमुके अनुगामी उम साने वाद को ही सर्वाधिक विधानदिताय मानते हैं। परन्तु इन घर वादों से ऊपर उठ कर इनको वाम्बवाना देगने से समी बर्ण से दिगाई पड़ते हैं। यही कारण है कि अनेकों बाद विश्वमय पर आये और विलीन हो गये। परन्तु रारोदय एक ऐसा समन्वयारमक पार है बिसनें स्थायित्य की क्षमता है। रेमा ने सर्माभ्युदय का प्रयोग विशेष उद्देश्य से किया है और प्यान्या को है...'सरेंग' 'सब मनुष्यों द्वारा' 'सम्मिन् 'पर फाल और स्थितियों में' 'सर्वस्मै 'मर के लिये' 'सर्वरमा 'सत्र उपायों से सस्य' 'प्राणिमात्र का' अभ-'ममन्तात् उदय सर्वाग्युदया।

इससे उसकी व्यापकता म और चार चाद लग जाते हैं , सवका उत्कर्ष और वह भी सर्वतोभावेन। लेखक की दृष्टि में यह कोई वाद नहीं अपितु स्वभाव है और वह स्वभाव मानव मे सृष्टि के आदि से है। सवै भवन्तु मुखिन सर्वे सन्तु निरामया । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुखभाग भवेत् ।। यहा सब के लिये कल्याण और सुख की कामना है, बहुजनो के लिये नहीं। यह पुरातन ऋषि का सर्वप्रथम आशीर्वाद है, सकल्प है। यह कोई हवाई किला नहीं अपितु विश्वरोगों को व्यवहरणीय अव्यर्थ महौषध है। इसकी आधारशिला है आध्यात्मिक अद्वैत । समन्वय, सामञ्जस्य, सामरस्य इसकी प्रणालो है। यह वस्तुत जीवनमान के लिये जीवनामृत है। यह मानवनिर्मित वैषम्य को दूर करता है और प्राकृतिकवैषम्य को घटाता है। यहा प्राणिमात्र के लिये समादर प्राप्त है। इसमें स्वामी और नौकर का, मिलमालिक और मजदूर का अन्तर नाममान का रहता है। यदि घर में कोई नौकर कार्य करता है तो वह कृपा करता है कि आना कार्य छोड कर हमारा कार्य करता है। अत उसके लिये हम हेय भाव नहीं रखना चाहिये, अपितु समादरभाव रखना चाहिये। "भोजन जीवनस्तरश्चाधिपतिसम स्यात् ।" इसी प्रकार व्यापारिक प्रतिष्ठानों में काम करने वालों का अधिपति के ममान खल होना सर्वाभ्युदय का उद्देश्य है। दस घोस आदमी मिल कर काम करें तो वह साझेदारी का काम है अगर उसमें कोई अधिक हाना चाहे तो वह बेहयापन है तथा चोरी है। सर्वाभ्युदय का उद्देश्य है दूसरों के लिये जीवो, एसा समाज निर्माण जिसमें व्यक्ति को सर्वविध विकास का अवसर प्राप्त हो। इसमें न अमीर न गरीब, फिर मिशुक का तो प्रश्न ही नहीं। आज भ्रमी को श्रम का मूल्य नहीं मिलता। किन्तु यथाकश्चित् जीवनधारण के लिये कुछ मिलता है। शेष वह पामेदार हहर जाता है जिसे आज की जवादी भाषा मे "स्वामी" कहा जाता है। इस हराम की कमाई का निराकरण सर्वाभ्युदय के लिये परमावश्यक है। यन्नों का उपयोग मानवविकाम 1 - अतिरिक इनका के लिये हो, धनसंचय के लिये नहीं। आज मानवना सस्ट में है और उनसे प्राग पाने का एक मात्र रास्ता है "सांभ्युदय"। हमारा इन शताब्दियों का इतिहास पूंजीवाद से प्रभावित होकर म्वार्थ- नोति से नितान्त दूषित रहा है। हममें से ही कुछ ने विदेशोंसे अतनायियों को भारतविदलन के लिये बुलाया। हमारे मोतर विद्यमान म्हायों के बल पर ही टनका शासन चला। मनमाने अत्याचार हुये और अन्त में मारतमाता के गड हुये। आज भी यत्र, तत्र, सर्वन राजनीति, व्यापार और सम्प्रदाय में यह स्वार्थ हो सर्वोपरि है। सरकारी नौकरियों व व्यापारिक प्रतिष्ठानों में अंचे पदों में स्वार्य व पक्षपात हो दृष्टिगोचर होता है। तिकदमी स्वार्थी समानशील अधिकारियों से सांठगांठ कर भ्रष्टाचार फैलाते हैं। ऐसे सक्षम मनुष्यों से न तो समाज की रक्षा होती है न उत्यान। धनार्जनके कोई टद्देश्य नहीं होता। इस प्रकार की धनलोटाता पतन अवश्यमावी है। इन तया समाज में व्याप्त अन्य समस्त दोषों के लिये सर्वाभ्युदयवाद अनोप औषध है। आइये, हम स्वार्यपूर्ण इतिहास को राजमल बनाने के लिये कटिबद्ध हों। हिमालय के समान रज्ज्वलधवल, य'काशके समान विशाल, वायु के समान व्यापक एवं सूर्य के समान काम संस्कृत पारमय में गयप्रन्यों को अपनाका कारण टस समय के रसिकों की रच का यमाव ही प्रतीत होता है। उस समय छन्दोबद्ध विषयों का ही जनता रसास्वादन करतोयी। और विशेषतः पद्यात्मक रचना हो करिता मानी जाती थी। यही कारण रहा होगा कि इस पानय में गयपन्य अगुलगपनीय ही रहे। अब इस और विद्वानों का ध्यान जायेगा तो अवश्य ही टमको पूर्ति हो जायेगी। आधुनिक काल में साहित्य की श्रीद्धि में अपिट हाय गयमयों का ही रहता है। अन्य भाषाओं का साहित्य गायों के हो अपर पर समृद्ध हुआ है। शान्ति लाने में सबमे प्रथम काम साहित्य का है। उदार मनुष्यों के मनस पा प्रभाव डालने वाला साहित्य दो भविष्य में प्रन्ति लने की क्षमता रखता है। आज भी हन रावा का पुवा उलने हैं और एम को पूजते है तथा कृ को प्रगान का है और कमको गाली देने है, विभिन्न ।

--- - । (८) तीर्थस्थारों की यात्रा करते हैं। यह सब साहित्य के कारण हुआ और हो रहा है। अत उत्तम साहित्य ही राष्ट्रके स्थायी स्तंभ हैं । कवि समय का प्रतिनिधि होता है, उसको रचना यद्यपि इतिहास नहीं होती पर उस समय का ज्ञान अवश्य कराती है। यह बात प्रस्तुत लेखक की कृति के अन्दर सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। लेखक ने जिस विषय को चुन कर जो सर्वथा मौलिक अभिनवकृति साहित्य को दी है वह सामयिक तो है ही पर भाषासौष्ठव से अभिराम व मोहक भी है। सम्भवत सस्कृतसाहित्य में यह सर्वप्रथम पुस्तक है जिसमें लेखक ने सर्वाभ्युदय की स्थापना की है। पुस्तक का बाह्य कलेवर भाषा है। सर्वप्रथम उसो को ओर पाठक का ध्यान जाता है और वह आकर्षित होता है। भाव या उद्देश्य तक तो धीर गम्भीर बुद्धि वाले ही जा पाते हैं। प्रस्तुत पुस्तक की भाषा को छटा बहुत आकर्षक है जो लेखक को प्राचीन कवियों की श्रेणी में उपस्थित करती है। वर्णन में छोटे छोटे पदों के कारण सुगमता होते हुए भो कहीं कहीं बाण और दण्डी के जैसे दण्डक भी हैं। यदर्थ लेखक ने अन्तमें रिखा है दि-न्यासि कचन कचन प्रीत्यै विदुपा मया नु काठिन्यम् । नीरजमृदुला तन्वी कुचयो कठिनैव सम्भाति ।। प्रकृतिवर्णन लेखक प्रकृतिवर्णन में अद्भुत योग्यता रखता है। पाठकों को इन मनोमोहक अशों का आनन्द अवश्य लेना चाहिये। लेखक इसी तरह आधुनिक शैली के प्रयोगमें भी सफल हुआ है। उद्देश्यनिरूपण यद्यपि पुस्तक के अतमें लेखक ने प्रतिपाद्य वस्तु का सर्वाङ्गनिरूपण किया है किन्तु पुस्तक के प्रथमपद में ही उसकी झलक प्रतीत होती है। सूर्यप्रभा के साथ प्रथम आलाप, स्वतन्त्रता समाम के मुकदमे का वणन, दुर्भिक्ष, बाट और दुर्घटना आदि के विवरण में उसच्चा प्रयक्ष अनुष्टान दिखाया गया है।

समस्त पुस्तक में लेखक के विविध विषयों के झान की सट छाप स्थल स्थल पर दिसाई देती है, जिसके कुछ उदाहरण नो वे दिये जा रहे हैं। जीवन में प्रतिदिन व्यवहरणीय भोजनों तथा यन्त्रशनों व वैज्ञामिनयों का समन्वय साहित्यमयी भाषा में करके पाठकों के लिये एक अद्भुत उपयोगी कोप दिया है। यथा- "प्रोढमनोरमेव कुचमईनेन सद्वतशरोराभवद् यामिनी, विप्राय शब्दरत्नभैरवीत्वं जह विभावयाः" "पणावति स्वमित्र जातार्यगुमि.", "ध्याप्ति लक्षमिव प्रभूतनिवेशभा- समानः, खानसारखाद्य मेनसण्डिनाने कशासन, शब्देन्दुशेसा इन सिद्धान्तन्याख्याता"। 'मुप्युपास्यो मधरिरिव पात्रंशोऽलाकृतिः। 'रसगुगलि जारितारदसेवनक्षीणतयः साक्षाचन्द्र वालक्षि। 'वर्णादिगिरिगुहाया- मामलकोयं रसायन माखो', 'प्रदर नायितु पुष्यानुगमिर सेवमानायामनुपेयाभिर्दुग्ध- धाराभिरिव सिपमानायां वमुपत्या", "विविधकमा सविमाना सासवा समस्मचूर्ण चरकसंहिवेव यमी होलिका । मुश्ता वाग्मटेंन केना-मनु तरेण नारतस्थे ।" "अस्या पाणी भगाद्भक्तिरता कवितैव सरमा गाङ्गप्रवाहवत् बच्छा, शिशुहासवत् साला, पनलि. भणितिरिव भावपूर्णा सुबोधा च विद्यते ।" "चन्द्रस्तु न नाऽऽझलौकिकासहकारमक्षरोरीपानपीनमधु पुषवा", "आयुर्वेद- शास्त्र मन लक्ष्मीविलासमागी", "प्रियवालमनोरमस्यामार्ग इव', 'कामेश्वरमोदकमुदिता', 'रम्याणि चित्राणि पुण्यश्लोकानां सहदोनांसर्वनामानि पाकतानि सन्ति', 'रचिताहण्यासो वररुचि , यापनरिदैत्यारिःोशो विगुदयो होतृकार', बन इब मुखरमज्ञायमानम्वस्तितया, 'सोऽय वारणायांनामोशितः कालो वर्तने, यत् कुन कुमेना किनोऽधितोमण्ठिनाशाने गुम्फिलो गुणरलैः, "अनुस्वारस्य ययि परसर्ग:" इस सोदाहरणो राजा राजते । कुछ ऐसे वास्य है जो जोवन को उपदेश देते हैं, चमत्कृत करते हैं । यया- "मर ! स्मन्यः कृतोऽसि पुरभिमाशे जागपि जगति"। "हऽपि वि भवति सौन्दयेऽरि गरलम्","अपट नोयघटनापटीयमः पाटवं साटपाटस्य को जानो","अनुरपग्निः कान्तारमन्तपनि', "देवदतन हाशनिलयेऽपिशिवमानेऽपि मुखो न विति", "वस्तुती रन स्थान ए राज", "पुमान्नुधे सर्व विरमति", "महामो लामोरिसम्" "आर्त- पसलोभगवान स्वतःसर्व साधयति", "लेवानको विधारमलिना साया सम्यां भेजे", 4 (१०) "भोजनप्रिये विप्र मनखितेव नेक्ष्यते स्माहाद", "मुभिक्षे वणिगिव दुर्दश्यदशमासोन्नगरम्”, "व्याकरणकाव्ये रसानुभूतिरिख क्वचन क्वचन प्रेक्ष्यते स्म जनावस्थिति", "परतन्त्रताया घृतादनात् स्वतन्त्रताया घासादन गरीय","मरमणि प्रतापो घासमेव जघास", "खाथिनो देया वा स्युविदेश्या वा स्वार्थ लुण्ठतां रक्त शोषयता धनिना वा नान्तरम्", "कुशाग्रबुद्धि- रुद्योगशील सद्य 'साफल्यमश्नुते", "मृत्युमुख विशता कोऽवसर उत्सवस्य”, “समुद्र शुष्कोऽपि मानप्त सरस्तिरस्कर्तु प्रभवत्येव", "दृढप्रतिज्ञ साहसिन नर प्राकृतिक्यो बाधा निश्चितपयान निवारयितु शका", "साधनाविरहित कय प्राप्नुयान्मानवोऽभीप्सितम्”, "मम प्रासाद साधनास्थल नभोगभूमि","दोषा देव!भावनाश्रया","मात्सर्य भोगभूमावेव भवति न साधनास्थले", "आप्रियमेलन प्रेयसीना दुखम्", "प्रज्ञावता प्रज्ञायास्तदेव सुकर्म येनानाडम्बरमप्रदर्शन जगतो विराजो भगवतोऽफलाभिलापमर्चन भवेदिति”, “अहिंसा प्रेम च मानवखभाव", "वित्तच्छायायां नरो विवेकविच्युतो भवति ।" अन्तमें सर्वाभ्युदयस्थापना मे महाकवियों के पद्यरत्नोंके गुम्फन ने इस वर्णपुस्तक को हीरकमण्डित सा कर दिया है। मैं चाहता हूँ कि इस प्रकार के सदों का समाज में अधिकाधिक आदर हो। और सद्य प्रचार की दृष्टि से इसका परीक्षाओं में सर्वत्र सन्निवेश हो, ताकि सस्कृतसाहित्य की श्रीवृद्धि को प्रोत्साहन मिले। अन्तमें आधुनिक भाषा की इस उत्कृष्टतम कृति के विद्वान् लेखक कविराज श्रीनिवास शास्त्री को भूरि भूरि धन्यवाद के साथ आशीर्वाद देता हुआ परामर्श देता हूँ कि वे सस्कृतसाहित्य के विशाल भवन में इसी प्रकार के अन्य ग्रन्थ भी दें। अत्यन्त आनन्द और स्नेह के साथ चण्डीगढ़ दिनाह १९३५९ ( 38 ) अभ्यस्तानेकदेशमापोऽनल्पलिपिज्ञः कलिकाताविश्वविद्यालयस्य तुलनात्मक- भाषाशास्त्रे सम्मानिताध्यापको भारतशासनसघटित संस्कृतायोगस्य भूतपूर्वाध्यक्षः पन-- 67 ATEITY4: M.A. (CALCUTTA), D.LIT, (LONDON) সভাপতি বিধান-পরিষদ পশ্চিমবঙ্গ foretti Chairman Legislative Council West Bengal, Calcutta December 2, 1958 सभापति विधान परिषद पश्चिमवत I have gone through the Sanskrit work in both prose and Terbe "OHANDBA MA FIPATI" which has been composed by Kaviraj Shri Shriniwag Shastri of the Shri Visuddha and Saraswati Marwari Hospital in Calcutta This is a work of a now type in which ho has sought to give io simple sanskrit prose, with verbe stenzs3 in different metres occasionally interpersed, an exposition of the Sarvoisya ideal, in the form of & story. The Author bag s very remarkable facility in the use of Sanskrit and he is & trae poet to whom Sanskrit Versification in different Styles comes most easily. I am Bure, & boot like this will be very much appreciated by those who can read Sanskrit, and it should bo useful for students of Sanskrit wbo want som, good reading matter outside of the classical texts which they have to study. I wish & wide pablicity for this Book and I TRUST ON ITS OWN MERIT3 it will be accepted by oar 5an6bit Scholars all over the country. + Sumit Kuman liglering

GOVERNMENT SANSKRIT COLLEGE
Calcutta, tbe 14th January, 1959.
No. 2339/A1
I have gone through the book entitled "CHANDRA
MAHIPATI" by Pt. Sbriniwas Shastri, It has given mo
very great pleasure to notice that even in present time a
Scholar can write gabekrit Prose with much ease and flexlbility
of style. I would only wish the book & wide publicity,
Dr. GAURINATH SHASTRI,
Principal
Sanskrit College, Calcutta.
Judge High Court
36, Ballygunge Park,
Calcutta-19.
Calcutta
I have read with great pleasure and interest CHANDRA
MAHIPATI & Banskrit work of Kaviraj Sbridiwag Shastri
of 8.V.B M. Hospital, 118, Amberst St, Caloutta-9, The book
18 well written, The Story ringe true to the universal
ideals of the Hindu Sanatan Dharma. The author has done a
distinct service First, to the ideals of sach Dharma and Secondly,
to the cause of Sanskrit. It is a Commendable endeavour.
Dated Monday the 9th day of February, 1959
(82) P. B, MUKBARJI
(Honourable Justice High Court Calcutta)
President. Bangiya Sanskrit Shiksha Pariebad.

MINISTER
Law Deptt. and Local Self-Goveruinent
and Panchayats Departmont
Government of West Bengal.
६२-५९
मैने पं० श्रीनिवासजी शास्त्री का "चन्द्रमहीपति" नाम का उपन्यास संस्कृत
भाषा मे पड़ा। शास्त्री जी ने इस उपन्यास को अत्यन्त सुन्दर रूप से लिखा
है। इसके भाव और भाषा दोनों ही सराहनीय है। यह पुस्तक सस्कृतज्ञों के लिए
पठनीय है। इस सफलता के लिए में पडितजी का अभिनन्दन करता हूँ।
ईश्वरदास जालान
विश्वविख्यातश्रीसरआशुतोषमुखर्जीमहोदयज्येष्टपुत्रस्य, लोकनायकस्य मुचात्मनो-
ऽमरकोत्तेःश्रीश्यामाप्रसादमुखर्जीमहाशयस्यामजस्य न्यायसिन्धुरमाप्रसादपुख्योपाध्यायस्य-
Phone ४८-१८९१
७७, आशुतोपमुखी रोड, कलकत्ता-२५
कविराजश्रीनिवासशास्त्रविरचितं कथाकाव्यमालोक्य परां प्रीतिमाप्तवानस्मि ।
प्रशसनीया पदविन्यासपरिपाटी, आधुनिकविभिन्न विषयाणामनुशीलनशैली, भारतीय
संस्कृताक्नुपमानुरक्तिश्चास्य काव्येऽस्मिन् मया समवलोकिताः। व्याकरणसाहित्या-
युर्वेदादिषु वैदुष्यमुपेयुषः शास्त्रिणः काव्यकलानैपुण्य मनीषिमनप्रोणनहेतुतामर्हति ।
परमेशप्रसादात् श्रीनिवासस्य कदे. कान्यमिद यशसेऽर्थकृते शिवेतरक्षतये चास्तु
इति मे शुमाश सा।
श्रीरमाप्रसाद मुख्योपाध्याय न्यायसिन्धुः
कविचक्रचक्रवर्तिनाचक्रवत्तिनो महामहोपाध्यायस्य श्रीकालोपद-
तकाचार्यस्य कविकाव्यप्रशस्तिः
श्रीश्रीनिवासशास्त्रिप्रथितं नानागुणैः समाइिलछम् ।
चन्द्रमहीपतिकाव्य गद्यनिबद्धं मया दृष्टम् ॥१॥
गद्य सहृदयहृद्य कविगुणनिक चिरं वदन्त्यार्याः।
बाणसुबन्धुप्रमुखाः कवयो यन निताः कीत्तिम् ॥२॥

( १५ )
सस्कृतकाव्यविभूति ममश क्षीणा वसुन्धराष्ट।
दृप्त जनयति तापं सुचिरात्तत्रानुरकानाम् ॥३॥
पद्य कथमपि हृद्य बहन कवय सदा निवघ्नन्त ।
सम्प्रत्यपि सन्तोप विदधति यत्लरनायासै ॥४॥
किन्तु न गनियन्धे भाति बहना विपश्चिता यत्न ।
अथवा सत्यपि तस्मिन् स्वल्पजनानामिहोत्कर्ष ॥५॥
श्रीश्रीनिवासशास्त्री व्यरचयदेतद् यदुत्तम काव्यम् ।
सुघटितगद्यमय तत् सुखयति चित्त सचित्तानाम् ॥६॥
वृत्त बहरसवित्त नितचित्त स्वया धियोपात्तम् ।
कवितोत्कर्षात् सत्य प्राकृतमप्राकृत भाति ॥७॥
नून कल्पनरन कविना यत्नाद् वृत पर चित्रम् ।
बाणप्रतिक्वीना स्मरण येन प्रसिद्धानाम् ॥८॥
शक्ति कापि समृद्धा स्वभावसिद्धा मतिनयाविद्धा।
सुकवेरन समिद्धालस्कृतिशास्ने तथा श्रद्धा ।।९।।
ललितालछ कृतिरम्यध्वनिपदसुभगा कृतिर्यथा योषा ।
विलसत्सुरसविशेषा रसयति चेतो रसज्ञानाम् ॥१०॥
शब्दपयोनिधिपार न किमयमाप्त कवीश्वरो बाढम्।
येन विवक्षितभावा विस्ता सर्वे रफुटाकारम् ॥११॥
क्वापि सुरम्य गीत क्वापि सुपद्यं प्रसङ्गतो नद्धम् ।
सारस्वतगतिभेदे कथयति निखिले कवेक्ष्यिम् ॥१२॥
प्रोच्छुसदच्छन्तरङ्गा रिगति गङ्गा यथा निरासा ।
प्रसरति ललितोल्लासा तद्वत् सुकवेरितो भाषा ॥१३॥
एष हि काव्यनिवन्ध सुमधुरवन्ध प्रसाधितानन्द ।
सुकवेरस्य फिल स्याद् विजयपताका जगत्यस्मिन् ॥१४॥
दवयतु दैवतवाणीमृतिपरिवाद जनै कृतोन्नादम् ।
मानरहितमहिमान बहतु किलासौ ससम्मानम् ॥१५॥

श्रीश्रीनिवासशास्त्री मुरुविधमि मुशभयन्नाश । रमिकविशेषानेर रमयतु नियत साखता ॥१६॥ सामयविरहितमश्विरमपमीयाद्दयावशादानु । एव ललितनिवन्धराध्य जगतस्तथा दिद्यात् ॥१७॥ इंशकायविचाराट विक्षुधा मुग्या दृढ विबुध्यन्ताम् । सस्कृतभाषामसमा राष्ट्रियभाशपदे यम्याम् ॥१०॥ बयति कविकुलश्री श्रीनिवामो नवीन गुमघामुरवाणोगद्यविद्याप्रवीण । जयति विबुधवाणी तेन दृप्ताभिमाना लपति भरतभूमिखटगुणैरेधमाना ।। १३६१ बजब्दीय सीरमार्गशीर्षस्य ? महामहोपाध्यायश्रीकालीपटतकाचार्यस्य। साद्यन्त प्राचीनकवीना मनोज्ञमथुरा म० म० हा० श्रीयोगेन्द्रनायतसाहयवदान्ततीयांनामाशीवाद - कृत्रिराश्रीनिवासशास्त्रिप्रणीतश्चन्द्रमहोपतिनामक सन्दौ मया मवालोकि। सन्दर्भोऽयमधुनातनी समस्या स्पृशन्, इहानान्तनी प्रणाली व्यवहान, रोतिमप्यतिशयानो वागस्य प्रयन्यसौन्दर्यम्, कालिदासस्य सामाविताम, दण्डिन पदलालित्यम्, भारवेरर्थगौरवम् माघस्य पाण्डित्यम्, हर्षस्य वर्णननैपुण्यम्, निविक्रमभट्टस्स इटेपम्, शङ्करस्याद्वैतगिद्धातच पुन पुन रमारयति। मन्ये सस्कृतसाहित्येध्यमपूतों विषयो लेखोन साधिकार निबद्ध । अमेणास्य प्रसीदनह सस्नेहमाशिषा सयोजयामि। म० म० डा. योगेदनाथतर्कसाइयवदान्ततीर्थ टि० लिट्, दिनाइ २७३५९ सत्यं परं धीमहि महामहोपाध्यायमहाकविभारताचार्यश्रीहरिदाससिन्दान्तवागीशमहोदयानामाशीर्वचनं बगाक्षरं देवनागरी लिप्याम्- श्रीश्रीनिवासशास्त्रिप्रणोतं चन्द्रमहीपतिकाव्यमवलोक्य नितरामानन्दितोऽस्मि । येन हि पदे पदे अनुप्रासालङ्कारझकारेण काव्यमिदं स्मृतिपथमानयति महाकविश्रीहर्षकृत महाकाव्य नैषधीयचरितम् । स्थाने स्थाने भावगाम्भीर्य माधुर्म्यमातनोति । प्रायेण नानाविधा अर्थालङ्कारा नितरां प्रीणन्ति हृदयम् । तन्मन्ये कामिदं काव्यरसरसिकेपु पण्डितमण्डलेषु सर्वथा समादरं लफ्यते इति । श्रीहरिदाससिद्धान्सवागीशशर्मा तारिख २२-७-१३६५ महनीयमहिम्नोः श्रीजीवन्यायतीर्थश्रीनारायणचन्द्रस्मृतितीर्थयो:- गद्यपद्यरचनानिपुणश्रीश्रीनिवासकृतकाव्यविशेषम् । चन्द्रभूपतिविचित्रचरिन शोलयन्नतुलमोदमुपैमि ॥ शतिप्रकाशकुनुको कविरेप नव्यं काव्य परैरपरिशीलितमार्गगामी । निर्माय निर्मलमतिः सुमनोमनस्सु सानन्दसान्द्ररससौरममातनोति ॥ भट्टपल्लीवास्तव्यश्रीश्रीजीवन्यायतीर्थशर्मणः अन ममापि सम्मतिरति प्रीतिमाशीर्वचोऽपि वितरतो भट्टपल्लीवास्तव्य- श्रीनारायणचन्दस्मृतितोर्थशर्मणः । कलिकाताविश्वविद्यालयाध्यापकशास्त्ररत्नाकरविद्यासागरमीमांसा- न्यायसाहित्याचार्यश्रीपी०एन पट्टाभिरामशास्त्रिणाम्- पण्डितवरैः श्रीधीनिवासशास्त्रिभिविरचितं 'चन्द्रमहीपति-नामकं मधुरं गद्यकाव्य- महमवालोकयम्। संस्कृतवाङ्मये गद्यकाव्याना सत्यपि वैशिष्ट्ये तद्विरचने लोकानां प्रत्तिलमायैव । तत्रापि सरसानां सरलानाञ्च गद्यानां वैरल्यमेवेति कयनं नासनतमिव । तदिद वैरल्य श्रीशास्त्रिणोऽसहमाना इव ग्रन्थमिमं रचयाम्बभूवुरिति ते नितरामभिनन्दनीया ( १७ ) एव । अस्मिन् काव्ये न केवलं कथावस्तु सहृदयानां मनांसि रञ्जयति, वर्णनाचार्तु यम्, सरलानामेव पदानां गुम्फनम्, प्रायो दीर्घसमासराहित्यम्, शैल्या मधुरिमा आमूलफल प्रसादगुणप्रवाहचेति नून हृदयान्यावर्जयन्ति। स्वतन्त्रेऽस्मिन् भारते शिक्षाधिकारिण इम अन्य शिक्षाको संयोग्य साकं निलिम्पवाण्याः प्रचारेण श्रीशास्त्रिणः पुरस्कुर्युरिति विवसिमि। पट्टाभिरामशास्त्री ६१५९ अधिगतमस्माभिरान्तमधीतच जयपुराभिजनेन श्रीमता श्रीनिवामशास्त्रिणा विरचितं चन्द्रमहोपतिरित्याख्यमुपन्यासग्नम्। एतादृशे मनोऽभिरामे वस्तुनि रत्नमिति नैकान्तत उच्चैर्वादः। पठितु प्रत्तस्यारामाप्य त्या खिद्यते पुरोवत्तिरत्त- विज्ञानोत्सुझं चेतो जनस्य। सलीलापि सरलापि ललितपन्धशालिनी भापति यत् सत्य मुवणे गन्धसम्बन्धोऽयम् । क्रमोत्कर्षमारोहन्ती विविना घटनापरम्परा उत्कण्ठा- कष्टमितानि करोति पठतां चेतांसि। एतस्य परिच्छेदाः प्रत्येकमेकनि वाउसमाप्यतया निवाससम्ज्ञामलभन्त। तत्र तत्र पणिता वनशैलकालादिरूपा प्रकृतिरपि वृत्तावत- पतिनस्य सस्थापनामिव विदधाति मानसस्य। न केवलं गद्यनिषद्यायां पद्यपदव्यामपि दृश्यतेऽस्य क.महार्ह पण्यजातम्। एतानि च पद्यानि न केवल सहजकवित्वसर- सान्यपित्वाहाकविप्रतिभाभासुरैः श्लेपयमककिनादिभिर्भूषितानि चिन्ताशक्त्युन्मेषेऽपि किमपि साहायक विधति पाठकानाम् । सलता खल्वधिगुणेष्वल्पभापणमपोति विदन्नपि प्रमादिपालोचनयानैव विरमन् नवीनस्यास्य कविप्रकाण्डस्योत्तरोत्तरोन्नति- मीशसकाशे मुदृढमाशासे इति शुभम् । सायतीर्थस्य श्री उपेन्द्रमोहनदेवशमण.! १८८० शकीयसौरमाघस्य पक्षमदिवसीयम्। } मुनीन्द्रविद्यायतनम् ४, आनन्द लेन, कलकत्ता। सम्मतिरन श्रीनगेन्द्रनाथशास्त्रिणः, ईश्वरचन्द्रशास्त्रिणश्च ।

( १८ ) श्रीबालाजोमन्दिरचान्दोदवडोदास्मश्रीधर्मचन्द्रोन्यपीठाधीश्वर वेदान्तशिरोमणिश्रीमदनिरुद्धाचार्यवेङ्कटाचार्याणाम् -- सरलया सरसया सस्कृनभाषया युदरतम सरसमेकमुष यास चन्द्रमहीपतिनामय श्रीनिवासशास्त्रियो निववधु । यस्मिन् वर्तमानकारिको जनसमुदाचार समुपन्यस्त । काव्यरसिका कथारसिकाचेममवलोकेर िनत्यानेटयाम । खतनया शैल्या कषि स्वाभिप्रायानाविस्करोति। अधिकरोति चोपनिबद्धा तेषु। प्रथस्य कर्ने वेदोक्ता अशिप आशासाना वय प्र यस्य प्रथनमभिलपाम , इति शम् । क्लात्ता-दिनाङ्क २८१५९ अनिरद्धाचार्यवेङ्कटाचार्य ना० २५ २६ २७ दिसम्बर १९४० में प्रथम वोकानेरराज्यसाहित्य- सम्मेलन, डा० श्रीदशरथ शर्मा एम० ए० के सभापतित्वमे हुआ था। उसमें चमहीपति को प्रथमश्रेणी का प्रमाणपन निषायों ने दिया था, एव नीचे लिखी सम्मति दी। मैंने पण्डितवर श्रीनिवासजो शास्त्री द्वारा रचित चादमहीपति का कुछ अश देसा एव पदा है, प्रयास पासव में स्तुत्य है। रेखक महोदय ने कवित्व एवं संस्कृतज्ञान दोनों का ही अच्छा परिचय दिया है। आपके चिनालङ्कार वास्तवम अपने टगके बहुत अच्छे नमूने हैं। आशा है कि आप नवीन हगसे कुछ नवीन उपयास एव आरयायिकाओं को रिखकर सस्कृतसाहित्यससार को अवश्य उपकृत करेंगे। मापने कथानक को पयाप्त रोकक बनाया है प्रकृतिवर्णन की भी कमी नहीं। हम आशा है कि मस्कृतमाहित्य के विद्वान् इनकी कृति को अपना कर लेखक महोदय की उत्साहवृद्धि एव सस्कृतसाहित्य की श्री रद्धि करेगें। । २७७१२४. (डा०) दशरथ शमा बीकानेरराज्यसाहित्यसम्मेलनप्रधानसभापति ।

( १६ ) हुगर कालेज, बीकानेर के हिन्दीविभागाध्यक्ष ख्यातनामा श्रीस्वामी नरोत्तम दासजी- श्रीमान् पडित श्रीनिवासजी शास्त्री की अभिनव अनुपम कृति चन्दमहापति के कई मेक अश मैंने देखे और मुने। यह प्रयपडितजाको काव्यशक्ति का मुन्दर परिचायक है। वर्णना की निराली छटा के साथ साथ अलकारादि का तथा व्याकरणविषयक विविध बातों का मनोहारी सौन्दर्य प्रथम सनि दृष्टिगोचर होता है। पडितजी की यह रचना सर्वप्रकारेण अभिनन्दनीय है। आशा है जिस प्रकार की अनेकानेक मुदर रचना से पडितजी अमरवाणी के भडार को भरते रहेंगे। पोपदि १४ स. १९९७ नरोत्तमदास स्वामी एम० ए० सप्रमोदमिदमावेद्यते यद्राजस्थानीयविद्वन्मणिमालायानभिनवमणीयमानस्य श्रीमत श्रीनिवासशास्त्रिण आयुर्वेदाचार्यस्यामिनवा कृति “च दमहीपति"-नामक सस्कृतोपन्यासमन्योऽशत समालोकि। इत प्रागपि कियाश्चिदशोऽस्य दृशी गौचरतामनायि। महानय हपावतरो यदधुनापि सस्कृनविटुपामुर्वराशक्तिसम्पन्न मस्तिष्कमीट शि सर्वविधगुणसम्पबानि काव्यानि निर्मातु प्रभवति। काव्यस्यास्य मापा, भाव, रीति, गुणालङ्कारादियोजन चेति सर्वमेव मनोहारि। ग्रन्थरत्नमिद मायाद्य सूचियेनुर्भगवती भारती प्रमीदतामिति निर्मायन मनसाऽऽशासे- हनुमत्प्रसादशमा ( साहित्याचार्य ) विद्यावारिधि प्रधानाध्यापक सरदारशहर विद्याधरशास्त्रो एम० ए० एच० आर० सस्कृत कारेज सस्कृतविभागाध्यक्ष रामगढ (सीकर) डूगर कालेज, बीकानेर राजस्थान ने.स. १९९७ शब्दरत्नभाण्डागार इव ललितहास्यरुविसमवित सस्कृतभाषाविकासहतुत्वादध्येतव्य सामयिमचार्य श्रीनिवाससारित्रणश्चन्द्रमहीपति कमलानामको प्रथ । सृद्धिकामस्त्रिकालदशी तीर्थराजमिनज्योतिपी।

( २० ) श्रीनिवासशास्त्री का चन्द्रमहीपति देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वर्णनशैली, भाषा प्रवाह विशेषरूप से उल्लेखनीय है। मानसिक भावों का सघप उपन्यास के तलों में प्रधान गुण माना जाता है जिसे सुन्दर रूपसे सन्निविट किया है। रामकृष्ण भारती, शास्त्री, बी० ए० साहित्यरत्न सरदारशहर, २६।१२।४. सरस्वती कालेज, लाहौर Sri Bhandarakere Mutt Udipi, ( South Kinara) Dated 221969 Camp कलकत्ता। स्वस्तिधीमत्परमहसपरिव्राजकत्वाद्यनेकविरुदाङ्किनवदिक द्वैतमतप्रतिष्ठापकजगद्गुरुश्री ममध्वाचायशुभसम्प्रदायप्रवर्तकश्रीमदुपिभण्डारकेरिमठाधिपतिश्रीविद्यामान्यतीर्थ- स्वामिपादाच द्रमहीपतिनामस्प्रन्थकर्तृभ्य श्रीनिवासशास्त्रिभ्यो नारायणस्मरण पूर्वक निवेदयन्ति युप्माक चद्रमहीपतिनामको अन्य सर्वाभ्युदयायात्युपयुक्त प्रतिभासते, मनोहरकथाप्रसङ्गेन जनाना चित कषक इति मन्यामहे । अस्मिन् पन्थे सर्व जना आदर करिष्यन्तीति वयमाशास्महे, इत्यनेकनारायणस्मरणानि । [वेदविद्याप्रयतमानमानस Naurang 6 South End Park कलिकातास्थो व्यापृतवैरिष्टर PO Rash Bebari Avenue. श्रीकालीप्रसादसेतान ] Calcutta29 22nd March 1959 The publication of CHANDRA MAHIPATI by Kavira) Shrioiwas Sheetri is a very interesting event in the field of modern Indiso literature It is an vel written in modera Sanskrit The style is Composite partly of the old and partly of the new Ingenious forms of grammar and of descriptions of nature alternate with coided scientific expressions and modern political and social topics I most state fraplly that all the translations of the scientifie words ere not likely to be Accepted by the pablic Bat that does not affect the merit of the book 14 14 & bold attempt to employ Sanskrit once again 28 & mediam for popular literature What is more is that the book is bound to prove to be a source of 10 epiration to writers In Sanskrit even including himsell .. (50) Kali Prasad Khaitan dharma लेखकस्य द्वित्राः शब्दाः युगद्ये व्यतीने पञ्चविशति सम्प्राप्तो युवेत्र चन्द्रमहीपतिमन्मभूषातो निसुल्य मृत्पूर- निरुद्धो वीजाडर इव श्रीमतां समझ समायात एव । सर्वन राष्ट्र स्वातन्त्र्यपूरे प्रवहति, प्रत्येकरस मानसे सुखेन समृद्धया च युक्त राष्ट्रद्रष्टु व्याकुले, विदुषां संसारे विभिन्नभाषासु सत्स्वप्यनेकेषु ग्रन्थरत्नेषु "सर्वोऽप्यों युथैः स्पृष्टो यद्यपीह तयापि मे। सत्सन्दा शक्तिता ममता केन वार्यते"। इति युवदिशा दुपाहसेन मयैप निबद्धः। पर संस्कृतलेख छानामाथिको स्थितिभीषणा, प्रकाशनमतिदुप्फरम् । मधुनैतत्प्रकाश्यते इति विचार्यवाहं प्रसीदामितमाम् । विशे वयति यौवनोचितया निरनुभवया स्वेच्छाचारितया, अबहुज्ञतया, भबहुदर्शितया च सह लेखनबचनाभ्यासः शैशवमुलगा पण्डितम्मन्यता चासीत्। अतः सन्दर्भेऽस्मिन् तत्सुलभमौद्धत्यं कचन कचन विद्यते। परिग्रहफल्गुत्वमपि शिशोः प्रमोदास्पदम् । तद्विदनप्यहं तथाविधभेव मुद्रापयितु निरदिशम्, यतो पालकवेर्मानसस्य परिचयः पाठर्ययावलभ्येत। प्रौढकवीनां मकरन्दस्यन्दिन्यः पीयूषमाइच्यौतयन्त्यो हाईकमय्यो रचना भवद्विरनेकश आवादिताः, सम्प्रतीमां बालकालीमप्यालयन्विति । पदार्थस्याभिव्यक्त्यै सन्धिनियमे क्वचन वचन शैथिल्यमवलम्वितम् । तदर्थ पूज्यान धृष्टतारै क्षमापगे। उपमानोपमेये समानलिङ्गवचनतायाः शास्त्रीया परिपाटी विद्यते, परम्, “नोपमा दूपणायाल यनोगो न धीमताम्" इति दण्डिनः काव्यादर्शस्याश्रयेण तां विद्वत्सह्य परिवत्तितवानस्मि। महनीयमहिममण्डिताः कुन्दकुमुदविलसत्सत्कीर्तयस्तपोमूर्तयो मान्याः! पुरा भारवे भारवाहा अपि संस्कृतां वाचं भाषन्ते स्म। परमद्य तु कतिपय एव तन शक्ताः । यद्येवमेवाभविष्यत्तदा संस्कृतग्रन्थाः पुरातत्त्व विभागसंस्कृतागारस्य सम्पत्स्वा एताभविष्यन् । समस्खमस्तकमण्युचिता अस्मदादिभिर्जीवद्भिरपि पुत्रैरुपेक्षिता जननी शोचनीया दयनीया चेदिद महद् दुःखावहम् । किं भवद्भ्य एतदेव रोचते ? अवधार्यताम्, कयमय हिन्दी एधते ? नवोदितैपा कथ राष्ट्रभापासिंहासन- मयास्ते ? क्यमस्याः साहित्यश्रीरैपिष्ट ? तन कारणमासीद् यनवीनानामल्स- ज्ञानामपि रचना जनराहताः। विशेषतो न गणनीया अपि रचनाः परीक्षामु स्थानं २ खल्पज्ञाना अपि ( २२ ) प्रापिता । एक्कश आसन्नविंशानि सस्करणानि तेषा भूतानि । लेखका कण्ठमधुरिम्णा मञ्चमापूरय तस्तुकान्तपदैर्यशो धनचापु । फलतो नवीनाया अपि अल्पज्ञलोकबाहुल्येन लोकप्रियतामुपेताया हि द्या राष्ट्रभाषात्व भूतमेव । पर सस्कृतम् १ प्रथमतो लेखका एवाङ्गुलिगण्या, तेऽपि दीना जीवनयानायां व्य पूता वीतरचनानैपुण्या विरचण्यापि प्रकाशयितुमकल्पा प्रकाशितेऽपि च केतन् न लभते। सस्कृताजीविनोऽपि सस्कृतम थान् क्रीखा न पठति । सस्कृतपरीक्षा सञ्चालका विश्वविद्य लयेषु पाट्यनिर्धारयिनीसमिते सस्कृतसदस्याश्च नवीना रचना परीक्षासु न सनिवेशयितु गृहीतशपया इव प्रेक्ष्यते। केवल प्रावीनानि घृष्टपिष्टानि पुस्तकानि निवेश्यते। अस्या स्थिती कथ सम्भाव्येत सस्कृतोन्नति ? पाम्, सखपि विषमकष्टेप्वस्माभि प्रतिज्ञ तव्यम् , समस्तभाषाजनन्या आद्य भाषाया उन यै चष्टितव्यञ्च । नवीनलेखकानां सबद्धने, स्वप्रभावेण नवीनरचनाना परीक्षामु सन्निवेशने लेखनप्रकाशन विक्यण च सोत्साहैरस्माभिभवितव्यम् । अथ विस्तृन् गत्वा नवीना कृती क तु जिज्ञासितव्यम् येन ता ग्यास्तिष्ठेयु । विद्यालये पयन बा एता कृतीरुपहत्त प्रेरयितव्यश्च । भवादृशाना विद्य धनाना सस्कृत प्राणाना विदुपामाशीवचनैरेव दुरूहेऽस्मिन् पथि सानद प्रयातु पाय्यते। देववाण्या अन योपासका अप्रतिमा प्रभाव तस्तस्यै सो साहमिद विधास्य तीत्या शासानो विरम मि। अथवा मामकीन श्रमस्तु श्रीमता करारवि दयौराधानानन्तर मुपरमति सम्प्रत्यग्रिमकत्तव्ये श्रीमन्त प्रम णम् । एतावत्सरसिजकुडमलस्य कृत्य भित्वाऽम्भ सरसि विनिर्गमो बहिर्यत् । आमोदो विकसनमिन्दिरानिवास- स्तत्सव दिनकरकृत्यमामनन्ति ॥ पुस्तकमिद धीमता समक्षमेव, करकवणाय दपणन किम् ? प्रथमधीयतां श्रीमता विचारान् ज्ञानुमहमुत्सुक । रामनवमी, २.१६ चक्रम ११८, अमहट स्ट्री कलकत्ता १७४।५ , श्रीः "चन्द्रश्चन्द्र इवातन्द्रः" (समालोचना) लेखक : कविराजः श्रीहनुमत्प्रसादशास्त्री, साहित्याचार्यः, आयु- वेदाचार्यः, विद्याभूषणः, विद्यावागीशः, संस्कृतार्णवः, जामनगरस्ये आयुर्वेदीयस्नातकोत्तरशिक्षणकेन्द्र मौलिफसिद्धान्तविभागस्याध्यक्षः। 'वारजन्मवैफल्यमसह्यशल्यं गुणाद्भुते वस्तुनि मोनिता चेत् ।' नेवाद्रियन्ते बहुभापिणं तु दुर्गे पथि प्रक्रमणं मदोयम् ।। अयमुदयतेऽभिनवोऽपि परिपूर्णः, सलकलोऽपि निष्फलक, सनि श्वासोऽप्य- मन्दानन्दप्रकाश , कथाकाव्यबन्ध बन्धुरयन्, उपन्यासाकाश भासयन्, रसिकजनमनांसि चन्दयश्चन्दमहीपतिः। इतो विंशतेभ्यः प्रागय काश्चित्वाला एवादोशत्, अधुना स्वसिलाभिस्वाभिर्मध्येगगन मोदमानो नभो द्विचन्द चरीकति । यद्यपि भापान्तराणां वाङ्मयानि गद्यैरेव तुन्दिलयन्ति वपू पि, खत्पान्येव तेषु पद्यानि प्रचझासति। परन्तु सस्कृतवाड्मयस्य कथैवान्यथा। इह तु वेदाः पद्यमया, पुराणानि पद्यात्मकानि, स्मृतय पद्यगतय , आयुर्वेदोऽपि पद्यै मुवेद , आस्तामन्यन्, कोपोऽपि न पोषु निौष । छन्दोऽनुरोयादवच्छन्दा अपि तस्मिन्नेव पथि स्वैर प्रासरन् कयय इति तु मन्ये देशस्यास्य आनन्दैकतानताया गानकाभिव्यम्यता पश्यत सस्तेरेव माहात्म्यम् । यद्यपि “नम्मोजः प्रसादो वा रसभावविदः कवे" इतिवत् नैक पद्य न गद्य वा रराभावविदा कवे” इत्यपि वतुं शक्यम्, अन्वसरंध तमेतमाभाणका पाणदण्डिसुबन्युसदृशा महारयो निबव-धुथ ते निरवलुंगेधैरपि श्रा याणि काव्यानि, तथापि ते सन्त्यगुलिगणनीया । अभून्नातिचिरातीतायां शताच्यामपि राजधानगौरवगीष्पति , नानाविधगद्यपद्य- निबन्धवन्धनकविधि, जेगीयमानावधानविधानावदान., घटिकशतकोपाधि , श्रीमान- म्बिकादत्तव्यासो नाम महाकविः, यदीय 'शिवराजविजय' नाम गद्यकाव्यं सीटवेन, सारल्येन, भाप व्यु पत्या, विषयनिरूपणपरिपाट्या चातीव प्रशस्यते मनीपिभि । पुनस्यमातरति रगभूमी राजस्थानीय एव महाकविः श्रीनिवासो नाम वस्तुतः .

साखतीनिवासो विद्वन्मूर्धन्यश्चन्द्रमहीपति प्रकाशय नद्वितीयानपि महाकवीन् सद्वितीयान् विदधच। यद्यपीद युगमस्ति तुलनात्मक्समालोचनाया, तथापि क्स्यचिल्लघनेन कस्यचिच महनेन युद्धिभेदापादन पूर्वेषा कृतिकीतिविलोपनञ्च न रचिर मन्यन्ते नीरागरोपा मनीषिण । नैव नासस्तादृशा अपि चाटुकारा केवलकवय कपयो ये दिनकपर्या प्ताहारलाभपरितुष्टा पचपग्रामाधोशमपि 'त्वमर्कस्त्व सोम' इति स्तुवन्तो वाच विग्लापयामासु, परन्तु न सर्वेऽपि तादृशा, न वा सर्वे कुचकचनयनवदनेऽम्रियन्त । यहि राष्ट्रम् समाजम, धर्मम्, सस्कृतिश्च समुजीवयितु कृतो वाचो देव्या वरदानस्य इलाध्य सदुपयोग , वस्तुतस्ते निकालवन्दनीया सर्वस्य जगत । इलाध्यताया अयमेव परीक्षानिकपो यजनसेवा सर्वाभ्युदयकामना च । प्रस्तुतमभिनव चन्द्रमहीपतिनामधेय काव्य परीक्षमाणा सर्वथा निर्दोपमेतदा कलयाम । इह काश्चिद् दृष्टिकोणान् पुरस्कृत्यैव समालोचन विदध्म , ते मे क्रमश - (१) लक्षणानुसरणेन यद्यपि कथाकाव्यमिद व्यपदेष्टु शक्यम् कादम्बर्यादिवत् वासवदत्तादिवच्च, कपितनायकादिमत्त्वात्, तथैवारम्भे बहुभि श्लोकमशलादिसमाच रणाच, तथापि तनेवान कथासम्बद्धाना नायनायिकादीनां देशनगरादिपरिचय पूर्वमेव न दीयते, अपि तु घटनाक्रमेणौत्सुक्यमुत्पाद्य तदनु तदुपशान्तिरुपज यते । सस्कृतवाछ मये सर्वथैवाभिनवोऽय पथा आल्यादिषु नवलकथावत् हिन्द्यादिधूपन्यासक्च कामिदपूर्वा छटा विच्छुरयतीति उपयासकाव्यमिदमिति कथनमधिकमुचितं भाति । कल्पितत्वेऽपीतिवृत्त तथान मुदिलष्ट सुसात च यथा तस्य क्रमिक हृदयोपारोहे न मनागपि श्रमानुभव स्यात् । पाठक सकरपुस्तकं हरते कृत्वा लालसमानसोऽग्रेस वृत्तरसमाखादयस्तत्परिचयाय त्वरमाणध समाप्ति यावत्तन्न जिहासति । (२) युवकाना युक्तीनां चापि रागाराधभिव्यअनावसरेऽपि न क्वचिदुच्छखलता नग्नता वाऽवलम्वता, प्रत्युत "अनौचित्यादृते नान्यसभनस्य कारणम्" इति नियमा- नुरोधेनौचित्यरक्षणाद् रसनीयता रात्रैवाव्याहता रधु शश्या। ततथ कुमाराणां ईमारीणां यूनां वृद्धानाच सर्वेषां हस्ते निर्विचिकिरस निविशद्वय दातुमर्हमिदम् । (३) कान्यकप्रणयिनो रसिस यथेह समुचितेन, अलष्कृतेन, सगुणेन, ललित ललिवेन वन्धसौष्ठवेन रसभर निपीय मोमुदति, तथैव हि वैयारणा इदन्प्रथमतया निगुम्फितसूतसिद्धान्तादीनां काव्यातामनुभूय प्राणान्तःकरणा भवन्ति, नैयायिकाः स्वनयेषु मनो नयन्तो नेपदपि तदुद्विमतां निनीपन्ति, साल्याः सतत्त्वानि सङ्स्याय सर्वतद् विचिख्यापयियन्ति, वेदान्तिनोऽप्यत्रानिर्वचनीयां शान्तिमनुभवन्तो न नोपसोदन्ति, वालकचालिका ललल्लीलारसालसाः स्युएन, नैतिता नीतिवित्ता, समाजो- द्वारकाः मुपारधोरणो धीराः, सेवाहेवाकिनस्तत्प्रकारपरिचिताः, सभासमितिससदाजद- सारव्यवहारनपुणोप्रणीतमनसश्च त.पटनः स्युः, किंबहुना, काव्यपुराणदर्शनायुर्वेद- ज्योतिषविज्ञानादिविविधविषयविशेषविषकचित्ताः सर्व एवं स्वस्वपरिचितविषयोचिता सामग्रीमिह सम्प्राप्य सम्प्रमीदेयु । सा एवोक कविना- वित्तो प्याररणेषु काव्यनिपुणः पौराणिक प्वप्रणी- गप्पो दर्शनवेदिनां व्यवहृती सम्प्राप्यसम्पाटवः । थायुर्योतिरधीतिनां मुशलो विज्ञानविशो मती राष्ट्राचारविर्दा वरो वरमतिः स्पश्यादिदं पुस्तकम् ॥ इति । इहे पोपनापि नास्मिन् पुस्तके हस्तमपि दद्यादिति नैर निषेधे तात्पर्यमा स्थेयम्, अपि तु कि किमत पुस्तके श्रमेण निगुम्फिनमस्तीति स एव ज्ञातु शक्नुयाद् यो ह्येतावद्योग्यतासम्पन्नः स्यात्, स्पशेर्ट शेरिख ज्ञानसामान्यार्थवावित्वादिति सर्व समासम् । (४) स्थलविशेष मिटाप्रतीताप्रयुकनया भासमाना अपि केचन शन्दा न केवल तज्जैन विना प्रयुकास्तग्नेषु गुणायैव सम्पद्यरन, प्रत्युत विक्सति नवनवे जानविज्ञान प्रचारप्रसारे विगोलति चैककुटुम्बिनामिव देशदेशान्तराणां पारस्परिक विविध व्यवहारेऽमिनवरादाबनाय गोवाणवाणीगुखमेव प्रेक्षन्ते सर्व इति शब्दास्ते याव- हारिकशन्दभाण्डागारमपि पूरर्ययुरेव, एतादृशशब्दाचनाय मार्गमपि दशयेयुरेव च । (५) इह कविना हृद्यानि पद्यान्यपि तत्र तत्र व्यरच्यन्त प्रायुज्यन्त च, “गा कवीनां निकय बन्ति” इति परीक्षानिकपे तु तदोयानि निरवद्यानि गद्यान्येव सर्वथा निर्मलाभी रेसामि. समकितान्युश्चयन्ति काधन चमत्कृति चेतस्सु। अस्मिन् विषये कविरय सर्वया सामन्यमवाप्उवानिति निर्माय निगद्यते। किं च शिशुपाल- नाना- ( २६ ) वकाव्यनिर्मातृमाधवन, शिवराजविजया दकाव्यनिर्मातृश्रीमदम्बिकादत्तवत्, काव्यादिनिर्मातृहरिद्विजवच कविरयं श्रीनिवासशास्त्रिप्रवरोऽपि राजस्थानीय । अनेकपा पावनचरिनाणा राज्ञा महाराजानामिव, पण्डितप्राण्डाना वैज्ञानिकधुरन्धराणामिव च राजस्थानस्य पुण्यभूमिरेतादृशाना कविपुगवानामप्युवरा प्रसविभीति सदा प्रम देरन्लेव गुणकपक्षपातिनो निर्मत्सरा मामिका । (६) इह हि नानाशास्त्राणा मनोरमसमन्वयवत्, नवमभाभास्वराणां जीवनी पयोगिनां समस्ताना यानादिसाधनानाम्, शस्त्रास्ताणाम्, यन्नाणाम्, वादानाम्, व्यव• हाराणाश्चापि तथा नाम तोहारी सनिवेशोऽक्रियत, यथा नाम कवेरस्य सर्वन बहुशता बहुदर्शिता च प्रस्फुट प्रतिभासते। विरला एवैतादृशा क्वयो व्युत्पन्ना विद्वांसश्च । (७) इह सूर्याच द्रमसोरदयात्मया, नक्तदिनस्यावस्थापर्याया , शरद्वसन्त- हेमन्तादीनामृतूनां प्रत्तय , वनोपवनरम्यहयेनदनदीसरित्समुदपर्वतदरदादिस निवेशाना वर्णनानि च चेतश्चटुलयन्ति तथा सजीवानि सति, यथा द्रष्ट पुरस्ताचित्रमिवा. इयन्ति। सद्विरमृत्यात्मान मुग्गो विदग्धो जनोऽलौकिके कस्मिंश्वनानन्दापार- पारावारे चिर निमजत्येव, यावदुन्मनति तावत् पर कश्चनान दीप पुर प्रसन्नात्मनि विलीनयति सहृदयम् । नेमानि कथचिदपि हीयते कादम्बर्यादीनां वर्णनेभ्य इति मुचकण्ठ वक्त शस्यते।

तदेतदन्न पर्याप्त नियूदं रस्यवे रसिकः मुभूमाध्ययनेनामन्दानन्दसन्दोहपरम्पराः परिप्राप्या (१०) सर्वतोऽप्यधिक यदेतत्काव्यसम्बन्थे वक्तव्यं तदिदम्-"भारतीयस्यादर्श- भूतस्य समाजस्य स्वरूप तयात्र विशदम्, सजीवम्, मूर्तम्, टज्ज्वलञ्च निबद्धमस्ति यदितोऽन्यस्मिन् साहित्ये प्रायो दुर्लभमेव । प्राचीना चीनादर्शयोरयं समन्वयप्रकारोऽ- भूतपूर्वः सातिशयमुदारश्च । श्रीश्रीनिवासव्यतिरित्तोऽन्यः कश्चिद् विद्वानिदं कर्तुमाश्यन्न वेति सन्देहं तु भविष्यन्नेव कालो निराकरिष्यति। कृतिरियं कविना श्रीशास्त्रिणा तस्गे पयस्येवाकारि, येयमिदानीं दृशोगोंचरतां प्राप्य सुरसरस्वतीसेवेकरसिकानां सहृदयानां मनांसि पदैव मोदयिष्यति। कवित्वशक्तिस्मिक्षन्मजातेति सूच्यते । तावति वारुम्ये मन्ये साएव मुदिलरमुसम्बद्धकान्यनिर्माण विशिष्टप्रतिभानवन्तः स्युरिति । यस्य समाजवादस्यादर्शरूपं चित्रितं कविना, सोऽयं रामलीनेन महात्मना गान्धिना 'सर्वोदय'-नाम्ना व्यपरिश्यते स्म। अस्मिन् काव्ये तु तस्य नाम 'सर्वाभ्युदयः' इति निदिश्यते कविना। सांभ्युदयशब्दस्तु “पुर्वेण = समाजस्थमनुग्येण, सर्वस्मिन्- काले, सर्वस्मै – मानवाय, सर्वरमादुपायान, सर्वस्य प्राणिजातस्य अमि- समन्तादुदयः साभ्युदयः' इति व्युत्पत्ति पुरस्कृत्य कविना कृत इति संस्कृतभाषाया व्युत्पत्तिनिर्वचनादि- विवयाऽर्थप्रतिपादनेऽभुता कामदुधा शकि सूचयति । श्वेश्वाति तन मर्मज्ञतामा- विष्फोति। सर्वाभ्युदयवादस्यास्यातीव सजीवं दार्शनिकं पाण्डित्यपूर्णच विवेचनमिह लप्स्यन्ते भावुकाः, अनुमविष्यन्ति च दार्शनिकीमनुमूर्ति स्वैरम् । (११) प्राचीनादानां सर्वेषां होनतानुभावके, तत एव च शिपमविषमयज्वाला- वलोविलीटदुःखौघनिपातदुःसहे निर्महेऽस्मिन्ननेहसि कान्दिशीकानामितस्ततश्च विदवतां जागतिवानां जीवानां भारतीया संस्कृतिरेव समुद्वारायालं भविष्णुः। तस्याः संस्कृतेः प्रकाशय केवलं सरहतबिदुपामेव कृतिसाभ्यः। परन्तु- बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मरदूषिताः। अवोधोपहताश्चान्ये जीर्णभरे मुभाषितम् ।। इति विसतर्यपूर्वमुदोरितेन भर्तृहरिवठा, न माने, कति कति वसुन्धरारत्नभूताता- दृशा विद्वांसः स्युर्यपा रचना दस्रिताव शात्प्रकाशमनासाद्य खावेव जीन्ति, न केवलं . ( २८ ) ता एव, अपि तु तद्रचनाकारोऽपि स्वापु जीर्णा अहरहार्यन्ति च। परन्तु व्यतीत तद् वैदेशिकपरतन्नतापाशपारवश्य दुरितोदकं दुर्युगम्। सम्प्रत्यभ्युदितो युगान्तरकारी खातन्त्रयसूय । केन्द्रीयशासने प्रान्तीयेषु शासनेषु चाने के महामहिमशालिनो मन्त्रिको राज्यपालाश्च, राष्ट्रसर्वस्व राष्ट्रपतिश्च निखिलभुवनकधानी तामेताममरभारती हृदयेना भ्युदिता कामयन्ते। सा चेदियमात्मगौरवोचिते सिंहासने भूयोऽपि प्रतिष्ठाप्येत, तहि न दवीयस्वद् दिन यत्र शान्तिसुधाधार' सर्वाभ्युदयाय सवन निघ्यन्देरन् । मातृभूमिगौरव सरक्षणजागरूकै समाजनेतृभिविषयेऽस्मिन्नौदासीन्य विहाय जागरितव्यम् । पुरस्करणीया राष्ट्राभ्युदयायैव न, अपितु, विश्वाभ्युदयाय जाग्रत सस्कृतविद्वास , विशालेन सध्घटनेन प्रकाशनीया प्राचीना सारभूता ग्रन्था । सर्वासां वैज्ञानिकीना प्रवृत्तीना चिरजीवनाया भिनवा विरचनीया शास्त्रस दर्भा । भूयोऽप्यन चिरविलुम सारस्वत स्रोत प्रतिदिश प्रवहन् पावयेन्निखिला बधु वसुधराम् । अभ्युदेतु च सर्वोऽपि लोक । ये सन्त्यधुनापि कतिपये प्राचीना विद्वांसस्तत्साहाय्यमवश्यमिहोपयोज्यम् । कविरपि चाय द्विनै शब्दैवाच्यो यद् युगेनानेन परिवतितान् प्राचीनादर्शान प्रतिष्ठा पयितु खनिर्माणकौशलेनान्यानपि समुत्साहयेत्, परस्परसहयोगेन च न केवल भारते यप एव, अपि तु, विश्वस्मिन् भुवने भारतीयसस्कृतेरादशान् प्रचारयितु नेतृत्वमालम्वतामिति । सर्व समाजोऽप्यत्र सर्वात्मना सहयोग विदध्यादिति च । काव्यमिद हृदयेन प्रशस्य भूयोऽपीदमाशसे- 'गद्य कवीना निक्प वदतिरेखोज्ज्वला तन च याऽद्भुताऽभूत् । सा श्रीनिवासस्य कवे सदा स्यात् सर्वन सर्वाभ्युदयैक्धानी ।। इति ।। २६.३३५९ गुरी A Review By Dr Satkari Mookerjee, Director, Nava Nalanda Mabavibara Nalanda (Patna) Chandra Mabipatı-a modera novel in Sanskrit by Kaviraj Sri Srinivasa Sastri, price R. 6) only. Nobody could imagine that in modern times a scbolar endowed with an extra or 010ary poetic skill and a wonderful mastery of the Sanskrit idiom could write a novel in faultless Sanskrit in the manner of the Classes written by the novelista of Europe and India It proves that Sanskrit 18 still a living langaage and can evolve unwanted modes of expression embodying the charming features of Banabbatta's Kadambarī together with the modern realistic approach. It 18 a tour de force of talent and scholarship A Sopskrit scholar will be really surprised by the novel neances of expression which wbile rexinecent of Classical beauty of tbe romances composed by Subandha Banahhatts end Dandın ard examples of modern realytic pictores cl the current state of things Apart from the plot the author's melodious language is bare to grir the attention of the lovers of poetry The author has couped new expressions which faithfully and effectively represent modern ideas Those who are steeped in the terms of the old Sanskrit Classics, whose number, however, 18 extremely fewer than the modorn output, will be thrilled with pleasant surprise to find that the work under review makes a happy departure from the ancient style and manner without forfeiting the attracti- Tepegs of Classic3 Though on several occasions the diffi coltios caused by a familier expres31908 may be felt by modern studeots accustomed to easier espressions he will be amply recompensed by the labour undergobe in mastering a rich In the general course of this story, the style of vocabalary ( 30 ) the author 19 gimple direct expressive and effective and the reader will not feel the jerks and jolts which are frequent in the celebrated classics The work is thus remarkable for its combination of the old and the new styles As is the case with modern novels it contains dialogues and conversations in a style which will not allow the interest of the reader to flag or flop Of course it is pre sapposed that the reader 19 possessed of a modicum of knowledge of Sanskrit in order to be able to appreciate the boaaty of this achievement I am optimistic enough to believe that in India and outside where Sanskrit is cultivated the present adventare will not fa I to win the approbation of a large number of connoisseurs This is a brief my evaluation of the author g language and style which ought to be regarded as sevtiog up & new genre The eatbor ha ls from Rajasthan wb ch is noted for its malttadinoda episodes of chivalry and romance The love and adiniration of the chivalry of the mediaeval hoight errants has been imbibed by him from the milies and the tradition of the Brahmanical fatdily devoted to the cultivation of the poetry and scientific discipl de of the old in which he has been nurtured In the present day when Accustomed to the drab commonplaces of struggle for exi stence the story of love adventure tbrills and narrow escapes may strike a toodern reader as unrealistic and romant c But with a little imagination and sympathy the reader will get to the core of the homsn interest anfolded in it It must be acknowledged that the author believes with Bernard Shaw in recent times and Dammsta Bhatta of the 12th Century that the poet has e m193108 and & philosophy of life which he teaches for the edification of his readers He is not purposely didactic and has skilfally shunned the boring effects wbich a -pedagogae produces on his auditors The author 19 pot men ere on slavishly chained to the ideas of the old order of kings and koights and has faith in the inherent rights of the average rad of men and women to the good things and opportunities of tho world. The story he has span, underlives the transition from aristocracy and platocracy to real democracy. The communistic philosophy is now extending its way over the undeveloped countries of the world. This pbilosophy is hased on the hatred of classes and seks to root out tho inequalities in the distribution of wealth by violence. It ends in Dictatorship wbich ironically enough thrives the enplavement of the mars. It seeks to conciliate the mob by providing food and drink and shelter in exchange of hard labour in factories. Tbe author is keenly alive to the misery and degradation of poverty. He pleads for the liquidation of this debasing state of things in which a few men and women fatton on the drodgery of the mass. But his method is entirely different In this novel, the author democetrates the way in which this position of affairs can be radically reformoi by a philosophy of love. Bo believes that, if persons who hola position and power are trained in the philosophy of love to develop a cultured and sensitive mentality, they will ungrodgingly share their wealth with their fellow beings. H. calls it 'Sarpābhyadays' which he prefers to 'Sarvodaya' This philosophy of life has been preached by Mahatma Gandhi and is going to receive a concrete sbape under the leadership of Binoba Bhave with his able lieutenants as Sri Jayprakash Narayan and the like. The author has mada his hero Chandra Mabipati, a kiog who gives up all his wealth to his subjects. The king feels supremo joy and satisfaction in denuding bimself of his superflaity of the material possessions. This was the ideal of Ramachandra and also of Mebattaa Gandhi who cr&ved for ( 37 ) the establishment of 'Rama Rajya' in India after the departure of the British rulers Our present author shows that this is not & unattainable utopie He develops bis plot with confummate skill and makes the trapeition from monarchy and aristocracy to democracy a natural process and eventuality Now the monarchial state of things has come to an end 10 India India hag adopted the parliamentary system of ol Government which 18 in vogue in Great Britain and America Bat the bigb officials from Governors and Ministers down to the humble officers of the state are threatening to form ani order of aristocracy which tends to widen the cleavage between the ralers and the ruled This condition can be remedied and reformed of the love of superfluous wealth is abown to ond in self stultification The horrors of poverty accentuated by foreiga role of pearly one thousand years have produced an unhealthy reaction Our people are becoming egocentric and individualistic It 19 necessary that they sbould learn the leason of History that the poverty of the majority and the wealth of the minority can not go uncombatted A new ob losophy of life is to be ovolved in which pobody should exploit the poverty and greed of the people If abundance cannot be secured we must all elect of our own free accord to share the privations with our fellow men god women I trast that the work of Sripipás Castrı will prepare the ground for this consommation The present novel proves the truth of the mazın ol Bhinaha the ancient author of Seaskrit poet cs that there 18 ao art or science which does not contribute to the making of #poet a work Oar author 19 8 versatile scholar He has showed bis capacity to utilize his knowledge of Panipi, classics and systems of Indyan philosophy in the constitution of & work Art Yith saitable instractiops even & beginner will be ablo to appreciate the propriety and beauty of these gems constituting a mosaic of ancommon excellence. It is encouraging to find that tbe persons who are placed in high positions are now realizing the necessity of preserving and fostering the cultivation of the Bangkrit languago and the age old treasures of wisdom and science for the emergence of a united Indian natiou, Sapskrit was the cultural language of eptire lndia, Centuries of foreign rule bare not succeeded in patting Sanskrit ont of vogue. Sanskrit can still claim to be the universal language of India. It is not more difficult than English. With wise modification is pedagogy and carricalum, it can be made the official and cultural language of India as before. It ie almost impossible to hope that a provincial langaage will become the sll India language. Sanskrit can be made easy. It is only imperfection of knowledge which is responsible for imperfection of sympathy. We have bad enough of lip-bomage rendered to Sanskrit. It is now time to get down to brags tacks. The Sangkrit Commission bas recommended the aniversal culture of Sanskrit in cur schools and colleges. Our author has showed that Sanskrit possesses an anlimited power for evolving Dew words and expressions for representing the modern concepts of science, politics abd law etc. No other languago in Indis can approximate to this perfection of Sangkrit, Only if the modern upirersitics can tako courago to make Sanskrit the upiversal langage of colture in India and give rightfal encouragement and patronage to modern writers like the author of the book ander reviowy, the aspiration will attain fruition and falfloont. Salkari Mookerjec 13-1-59 lostitute of Asian African Relations 108 Raja Basanta Roy Road, Calcutta-29 Director Dr KALIDAS NAG, A. (Cal), D Litt (Paris) Visiting Professor of Asian Civilisation, Hill foundation, St Paul Vinnesota, USA President: Iado Middle East Association, Calcutta Chairman Tagore Centenary Committee Calcutta Member Indian Council for Cultural Relations, Ministry of Education New Delhi Phone 46 4315 Dated 25 January, 1959 11 Kaviraj Sbridiwas Shastri 19 not only & Vaidya for the human body but aspires to cure the mortal diseases of our Body Politic 83 depicted by our master Dharmashastring lake Wanu and Yajna valkya With full faith in the efficacy of Hindu Juristic ideas, Kaviraj Kavi Sbrinivasji bas composed en original apanyas 10 Sanskrit where ho sbois mastery forcefal Prose and charming Poetry The plot 18 worked out a3 in our age of transition from individual monarchial stato to socialistic welfare state "Sarvodaya" as outlined by Mahatra Gandhi, the father of Indian freedom, I offar my deep appreciation to the learned author for his literary and moral ideas which should inspiro men and women of free India So I recommend the excellent book 'OHANDBA MAKIPATI” to the Schools and Colleges bere simple Sanskrit language as the spiritual language of Bharat b9og taught and cultivated. I wish the suthor esery success. Dr Kalıdas Nag Els Member Ray Sabba, Life member V1B & Bbaratı Santiniketan 16 " सुप्रसिद्धमेव सुरभारत्या क्लान्तरस्थायि नवयौवनवैशिष्ट्यम् । आसृष्टे जगत्या कियलो भाषा समुत्पता कालेनाकाले कवलिताश्च । प्राकृतमागधीवालीसाहित्यावलोकनानिवप्रच तामा साम्राज्यमनुमातु शक्यते परम्, "सर्व यस्य वशादगान् स्मृतिपथ कालाय तस्मै नम इति स्मृत्वैव दोघ निवसन्ति तद्भका । परमिमा चतुर्दशविद्याना चतु पष्टिक्लानाध प्रसविनी प्रतिनिगेप नवनवायमानामविकृतामविकलाङ्गीमनुक्षण लोकोपकारि साहित्य सृजन्तीमाद्या देवभापामालोक्य कमपि नव मोरमुकाम । सर्वदेवानया यथाशक्य जगत्सेवानत निरलसया निरूटम् । आस्तित्नास्तिकसिद्धाता , दर्शनानि, विविधा वादाश्चास्या सम्यनिवद्धा इति को नाम विपश्चिन्नाजीयात् । नान तनीयान् सशयदेशोऽपि यदधुना सातिशय लोकप्रियतामुपेते सर्वोदये साम्यवादे च नदीनेन कविना भिपग्वर्यण श्रीनिवासशास्त्रिणा प्रापलस्कृतेनोपनिवद्धोऽतीवमनोहरश्चन्द्रमहीपतिरुप यास कादम्बरी दशकुमारचरितशैलीमनुकुन्नतिशय प्रमोदोत्सवमावहति । कविरन विषयवस्तुप्रतिपादने ऽतीव मफल । आधुनि पचारित साम्यवादो निरीश्वर केवल भौतिकोऽतो न भा तीय- विदुपा प्रमोदावह । पर कविनामुना सेवरो वैदिको भरतीयो मनुव्यासादिसम्मत साम्यवाद प्रतिष्ठापित । ( यावद् नियेत जठर तावत् खख हि देहिनाम् । अधिक योऽभि- मन्येत सस्तेनो दण्टमर्हति ॥ योऽसभ्यो धनमादाय स धुभ्य सम्प्रयच्छति। स कृत्वा प्लबमात्मान तारयेत्तायुभावपि ) किमस्मादप्यधिकमुत्क्रामक वचो विद्यते मार्सवादेऽपि ? भारतीय साम्यवाद ईश्वर धर्म परलोकच सम्यम वान साम्यमगिरपति प्राणिनाम् । तच्चन्दमहीपतेभापणे नवमनि श्वासे सम्यगालोचयन्तु विचक्षणा । भारतीयविद्यालये- प्वश्याध्यापन छात्राणा रास्कृतिमुरय निरुन्धत् वैदेशिकसाम्यवादादुत्तम साम्यवाद शिक्षयिष्यतीति मे मति । आशा क्वे कृतिरराम राम्मानमाप्स्यतीति- दिनाङ्क ६४७९ काव्यसाट स्यस्मृतितीर्थ कविराजहरिवक्षजोशी प्रकाशक का नम्रनिवेदन यह काव्य आप के हाथों में देख कर प्रसन्नता है। कलकत्ते में मुद्रण व्यय अधिक है और सस्कृतज्ञ कम्पोजिटरों प्रूफरीडरों की अल्पता अथ च सयुक्ताक्षरों को न्यूनता भी। मुद्रापण का यह प्रथम प्रयास था और प्रूफ शोधन एक कला है, जिससे जानकारी न थी, अत पुस्तक में यत्र-तन बहुत अशुद्धियां रह गइ, कुछ अश छूट गये तथा कुछ उलट पुलट छप गये ये सव अव द्वितीय मुद्रण में ठीक होंगे। फिर भी जिन श्रद्धास्पद मा मिनों ने अपने व्य पृत जीवन के अमूल्यकणक्षण देकर इस कार्य को बहुत सरल बना दिया, उनके नाम हम बड़ी श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं- (१) कामेश्वर औषधालय, नोहर (राजस्थान) के प्रधानचिकित्सक- श्रोसत्यनारायण शास्त्री साहित्याचार्य आयुर्वेदाचार्य । (२) श्रीकृष्णाचार्यजो मिश्र, व्याकरणाचाय, साहित्याचार्य । (३) श्रीतिलकधारीजो पाण्डेय, साहित्याचार्य, एम० ए० । इनके अतिरिक्त श्रीहनुमत्प्रसादजो शास्रो साहित्यायुर्वेदाचार्य, संस्कृति एवं संस्कृत के प्राण सस्कृत मासिक पत्रिका 'मञ्जूषा" के यशखी सम्पादक श्रीक्षितीशचन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसमें सवतोमुख सहयोग दिया। गुप्तप्रेश के मुयोग्य परिचालक श्रीसमोरकुमार वसु एव वहाँ के विभागीय कर्मचारियों ने भी बड़ी धीरता एव लगन के साथ इस कार्यका सम्पादन किया। पक्षाघ के महामान्य राज्यपाल महोदय ने अपने व्यापृतजीवन में समय निकाल इस पर प्रायन लिखा, डा० श्रीशतकोटि मुखर्जी, डायरेक्टर, नव नाल दा महा विहार, नाल दा ने अप्रेजी समालोचना तथा पोस्ट ग्रेजुएट ट्रेनिङ्ग से टर इन आयुर्वेद, जामनगर के सीनियर प्रोफसर, साहित्यावतार क० श्रीहनुमत्प्रसादजी शास्त्रो ने सस्कृत म समालोचना लिखने की कृपा की। इन सभी महानुभावों ने अपने सस्कृत- भाषाप्रेम के कारण अपना कत्तव्य पालन किया है, धन्यवाद वा भाभारप्रदर्शन से इनके कार्य की महत्ता को लघु करना सङ्कत नहीं। प्रार्थना है कि सभी सस्कृतज्ञ इसी प्रकार अपना कत्तय्य पालन करें। विनयावनत-प्रकाशक

श्रीमदाचार्यश्रीनिवासशानिकविताकान्तविरचितः
चन्द्रमहीपतिः
स्वोपज्ञपार्वतीसमाख्यया विवृत्या विवृतः
कमला
प्रथमो निःश्वासः
समरदितत्याऽऽदित्यदर्पप्रमा
ललिनपदनभालाद्विस्रवत्स्वेदवृन्दा ।
विगलदमृतविन्दोबिभ्रतो कान्तिमिन्दो-
जयति विहतविना कापि सा भक्तिनित्रा ॥१॥
महाईरत्नाचितरफशाटीसुवोतमध्यागुनकत्रकान्तः।
जन्ति फुल्लन्नलिनाषितानि प्रशान्तनेनान्तनिरीक्षितानि ।
कार्तस्वराभाखरवस्त्रभासो युपेन्द्रसम्मानपरम्परस्य ।
श्रिया निवासस्य विदा घरस्य प्रियप्रियायाः कमलालयायाः ॥
प्रत्यूहपूराइतिदिधारेणयः शिरे ! शिवास्त्वत्पदपद्मरेणयः ।
जयन्ति साष्टाद्पत पुरन्दराः फिरोटभामानुजुपो विकखराः ||
वनायनि यद्विारमिज्ञसिद्धःप्रासोददलं विपुलाचनेन ।
दिश्याद्विपद्गमनङ्गमद्गो भगों विनामनुकूलभूतः ॥५॥

प्रथमो निःश्वासः 3 तदन्वये धन्वनि धान्यधन्ये सखेतडीरक्षितलाम्बिपल्ल्याम् । निश्शेपवेदान्तविशुद्धयोधो हनूतरामो व्रतिना विरामः ॥१७॥ भूपालमोलिमणिशाणितपादपद्मः सत्पात्रदत्तधनराशिविधूतपापः। तापग्रतप्तजगतो नवनीरदाभो लेभे प्रभां विपुलबुद्धिवरो वरेण्याम् ॥१८॥ वाग्देवता मण्डलमण्डनस्य प्रकाण्डवागन्धिवगाहिनोऽत्य । स्वयं भवन्ती समुपस्थिताऽरं मातेव कार्य सकलञ्चकार' ॥१६॥ विवेकविद्याजलपूरपूर्णाः सत्तन्त्रमोनाश्चितचेतसोऽमो । सत्पुरुषाम्भोदचयनिपीता जयन्ति सज्ञानपयोनिधानाः ॥२०॥ इन्द्रो यथा कश्यपतेजसोऽजनि स नारदोऽप्यात्मभुवो यथाऽजनि । तथाऽजनि श्रीमदमन्दमोदकः श्रीभानुरामो महसा निधिस्ततः।।२१।। १ जयपुरराज्याधीनखेतडोराज्यान्तर्गतलाम्बीवासिनो हनूतरामस्य शिष्यो निकटस्थ- परीग्रामाधिपः क्षत्रियो नरहत्यापरावे आजन्मकारावास प्राप। तद्वन्धुभिरानम्य हनू- तरामो निवेदितः। एतहत मोश्यते भगवतीप्रसादात् । ततस्तैश्चण्याः पाठ आरब्धः। आणताह नोत्तस्थुन जथुन चोचुः, किम्बहुना भासनपरिवर्तनमपि न चः। यस्मिञ्जीर्ण- तृणोटजे देवीमस्तीत्तदकस्माद्धारित्यं भेजे। तदेव पचेरीतो रथ आगल उपराजमातृ एतान्निनाय। तत्र किलकारसिंहमुसाजज्ञातं यदह केनापि महसा जयपुरकारातो नि सार्य सम्रामसीम्ति निगडमोचं पातितः, इति । ताभिरवनताभिरुळ याच्या यथेटम्। परन्तै याचि, केवल परीवासिविप्राणां विवाहकरमोचनाय न्यवेदि। ताभिश्च प्रतिशतम् । श्रूयते तदुर्गऽन्त पुरे वृद्धभावात्तेश निष्ठ्य तचिन मितिलानं राष्ट्रवान्त पुरस्था आइनन् । मुघालितेऽपि सीधे तस्यानमलिसमेवास्त । अयादशशताव्या नवतितमे वर्षे वृत्तमः। एवविधाः दातशश्चमत्कृतयस्तेषां गोयन्ते। पचौत्तरकोन. विशतिशततमेऽन्दे ते देहं तत्पनु ।

चन्द्रमहीपतो पार्श्वस्थपोरनजपूजितो यो रेजे दधचन्दनपुष्पमालाः । माहेश्वरध्यानपरायणस्य यस्यास्त हस्तामलकं त्रिलोकी ॥२२॥ भवन्ति सत्यामृतवर्पिणो भवे रहोजुपस्तथ्यपुपो विपश्चितः । क तादृशाः संसरणस्वभावके भवन्ति चेत्ते विरला वनौकसः॥२३॥ ततोऽभवत् पण्डितमण्डनाग्रयः कुशाप्रमुद्धिः श्रुतपारदृश्वा । सन्तुष्टिदारः श्रितशास्त्रसारो विद्याधनो नान्यकरामसञः ॥२४॥ धैर्य घरा तेजसि चित्रभानु क्रोधे यमं वाचि गुरुसुराणाम् । जित्वाऽमृताप्तिप्रतिभाप्रसन्नश्छन्नेऽर्चयामास सुरान् सुसं यः ॥२५॥ तस्मात् सुपुत्रौ निपुणावभूता मन्दारकल्पायवनी द्विजानाम् । ज्येष्ठो बुधेन्द्रो नवरगरायः पत्यन्तरोऽन्यो गणरायनामा ॥२६॥ ज्येष्ठो वरिष्ठेरथ जुष्टनिष्ठः पट्शास्त्रवाधैरवगाहवित्तः। संसेव्यमानः कृतिभिः समास्तेऽसौ पण्डितेन्द्रो नवरगरायः ॥२७॥ यत्पाठिवाश्छात्रमचचिका अलं प्रकाण्डसत्त्वाः प्रथिता मनीपिपु । अधीतविद्याः प्रतिवादिभीपणाश्चरन्ति चर्याचकितीझताचलाः ॥२८॥ तप सुपुष्पा शुचिकीर्तिवल्लरी पट्शास्त्रसौगन्ध्यवती क्षमाफला। आशामु येपो विततातिशोभना छात्रालिसगीतगुणा क्षरद्रसा ॥२६॥ अयातयामागमदीप्तकान्तेः शान्तात्मनस्तोपधनस्य यस्य । कायायनीकान्तकृपाकटाक्षैर्हेमा तेः पञ्च सुताः स्तुताः स्मः ॥३०॥ ज्येष्ठश्च वादीन्द्रवितीर्णमुद्रात् प्रशस्तशास्त्रौघबृहत्समुद्रात् । अभूद् बुधः केशरनामिकाया विद्वद्विनेयः करणात्मिकायाम् ॥३शा वालोऽल्पदी श्रुतविश्रुतेभ्यः शब्दागमे प्राप्य मनाप्रवेशम् । अज्ञानद्धन्द्रियचापलोऽयं स श्रीनिवासो विदुपा विधेयः॥३२।।

प्रथमो निःश्वासः येनायमद्धा सुकुमारसंविदा मनिदनानन्दमभीप्सता मुवि । अनष्टमोहाविलया विमुग्धया धिया विनोदाय वुधां निवध्यते ॥३॥ कथारम्भः आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्र राजन्यः शूर इपन्योऽ- तिव्याधी महारथो जायतां दोन्नो धेनुवोंडानड्वानाशुः समिः पुरन्ध्रि- र्योपा जिष्णू रयेष्ठाः। सभेयो युवास्य यजमानस्य वोरो जाग्रता निकामेनिकामे नः पर्जन्यो वर्पतु फलपत्यो न ओपघयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम् ।। शु.य.वै.२०२२॥२२॥ अयमाद्यो राष्ट्रियः सांभ्युदयभावः। है ब्रह्मन् । राष्ट्र बामणः विप्रः (वय अघीते वेद वा) ब्रह्मवर्चसी = ज्ञानप्रकाशित आनायताम् - सम्यक् प्रसारण भातु । राजन्यः -- धनिया, शूगः-पराक्रमी, दसवः- पुप्रयोगालः, अतिव्याधी - अविकान्तं धर्मशनून वा विष्यति सः, महारयः- योद्धा. आजायताम् । ब्राहो मानप्रधानः क्षत्रियश्च कर्मप्रधानः। तमोः सम्यग्योगादेव राष्ट्रस्योन्नति, परिवारस्य दम्पयोरिव । वैश्ययोः सेवकयोः पूर्बद्धयोस्तित्वेन न पृघनिर्देशः। धेनुर्दोग्यो, अनः- शकट वदति सोनवान् बोटा-वह्नझम', सप्तिः अधा, आशु -शीघ्रगानी बायता- मिति सर्वनान्वयः। स पावोऽपि स्वम्ममि नैपुण्यभाजः स्युः । यांभ्युदयः। योपा - स्त्री, पुरन्तिा-परिवारपालनवाला स्यात् । भस्य यजमानस्य- देवानां गुआंदोनां सतर्नः सजिगमिपोदनिशीलस्य च युवा वीरो विष्णुः-विषयो, स्पेष्टा - योद्धा, यमेयः- राष्पटनशीलो जाताम् । नः- अरमाक राष्ट्र पर्जन्यः- मेषः निकामेनिकामे-या परितोपर्पत। औपचयः - ओषप्यः परपावान्ताः, मनेन संपामन्नानामपि प्रहपम्। परवत्य प्रशस्तम्लयुधाः (प्रासम्त्ये मनुप) पच्यन्ताम्= पाः स्यु, देहे क्षेत्रे । ना-भस्मास योग. अश्यलाभो योगः, लपक्ष अनु एवैष क्षेमध, कल्पतम्।

चन्द्रमहीपतो विकलयति कलाकुशलं हसति शुचि पण्टितं विडम्बयति । अधरयति धीरपुरुष भणेन मकरध्वजो देव ॥ निविक्रमभट्ट । स्वस्वव्यापृतिमनमानसतया मत्तो निवृत्ते जने चञ्चकोटिविपाटिताररपुटो यास्याम्यह पञ्जरात् । एव कीरवरे मनोरथमयं पीयूपमास्योदय- त्यन्त सम्प्रविवेश वारणफराकार फणिप्रामणी ॥ पण्डितराजजगन्नाथ । "प्रवर्पणधौता इव साभा ककुभो व्यपगतरजस कलाजुप प्रासादा प्रसादपत्रप्रभा पादपा कृष्णोज्ज्वला वरमीक प्रविविक्षव सपा इव सरग विदूरगामिनो लोकपथा श्चावश्य मन प्रसादयन्ति देव!। प्रियदिदृक्षाहर्षविधुतविवेका यहो कालाद्वियुक्तेव सरन्तुमुत्त्वरा वक्रगत्या मार्गलाघव रचयन्ती, अष्टोलिं दुर्वती सायन्तन्या सौरीप्रभया रक्ताम्बरावृतेव नवयौवनोल्लसिता वप्रमिव विधित्स ती तुझोमिभि, स्वयमुल्लासवाद्य वादयन्ती सुधा मधुरै कलकलैरान दमेधयमाना उच्छलत्तर रवगुण्ठनमपनीय प्रियप्राप्तिमिव प्रेक्षमाणो नतग्रीवा मदिरेक्षणा परिणतयौवना नदी मानिनीव रूपगविता दुरेऽक्षिपथाल्लुप्ताऽन्तहिता । यत्र जनसान्निध्ये तस्या महदधैय वीक्ष्येव मूढा उमत्ता इवासङ्गता द्विना दूर प्रेक्ष्य ते पादपा ध्यानमग्नेव शाता धरिनी च । चलत्तरङ्गभङ्गाया पीतमनाया इव पूर्णमानाया नद्यास्तट उत्फुरलकमलामोदऽमलवारिणि हारिणि कृतिमेऽवकोकिले सरसि मृदुमृणालिनी मुकुलशग्याशायिभि प्रजोपवननिकुशोभिनो मचा मुक्ता इदानी व्यश्चा शनैश्शनै पूयन्ते। येषु महाहवाससामाकविका विकसितस्मिता आकृतय कमलासनस्य कौशल प्रकाशयति । केचन वार्ताममा भग्नप्रेमाण उदव परस्परावद्धकैकयाइनि यौवनमवुमधुराणि सेप्य वीक्ष्य युगलानि विक्षता विलोक्य ते, परे चाभिनवप्रेयसीप्रेमपतिता अवैधप्रम्णा प्रकृष्टमाकृष्टा प्रचण्डवासनावातोद्ध तबुद्धयो बधिर धा महामोहाधा। केचन पाशपनपुटकेषु दध्यम्लवेशवारोपस्कृतान् वटकान् पीतशाकररसान् रसगुल्माश्च प्रसाद विकसिते प्रेयसीमुख ददतो भक्षयति परे च पुटपात प्रतीक्षमाणा मनोर्माणवका पतनसमकालमेव ताल्लिहन्ति ।

C प्रथमो निःश्वास इतश्च नरा अप्यवायिना वहन्ति नारीनरांश्च म्वसमान् । कोशो व्यामोहः। कोहल- पम्यम् ! यद् दृष्ट्रा मनः खिद्यते । केचन विद्यालयमसमये दिमुन्य कायरममनाखाद्य वारगीमका दोलालोला लामों निवन्द्धं युतव्यासका अन्वयागतपरम्परागटनम्टको रूपयौवनममृद्धा सविवेकाञ्चलचित्र- गानिरता वित्तभूचित्तममता मोशेन्मादिनो वान्तो मचनटोनाममालां पुष्पमाला यक्षसि श्रयन्त थानासिकं पापप निममन्तः प्रेक्ष्यन्ते पितृपितामहाजितचना निकुववासविता घुतमायुताः साधितयापिता जीवनचिन्तामणि कावमूल्येन विकोपाना निदागास्तव्यपथ्य- पयाद्विद्र ता वासनायासिनो वितृभा युवानः, इतश्चैकान्तप्रियाः प्रियविद्या भविष्यजीवन- बनवान्तविदिष्यविषया नवनीलनोदिविरेऽ कुरित द्वारछाये शान्नाण्यभ्यस्यमानान । इतश्च कल्चुरुकोशालनपटकः पक्षकोटरपइतधनातकरशियको गुरवेऽर्पयन्ति यामाजित भिक्षामिव चिन्बच्योरविकोषितयानि शिक्ष्यमाणाश्च । इतध पश्चिमाशाभरणश प्रतीक्षमाणा. प्रत्रयसो यदनवलीका अप मसगारकमितवणनेन तिरोहितवलीकाचन्दन- वन्दितवदनथिया यमनरेन्दु जिगीषव इव पालतकस्तिकेयोऽपि गार (मिजाव) सरच्युतदन्लोऽपि कलितपन्लो व्यस्तविनया टोलादयः कान्नाकारकशकीर्ण- फुन्दरममा वलयितन्याले घम्मिले फुल मतमुनत्रबः परिमलगन्धवहान्वीकृतकामुका नितशोणिम्नोरघरयोः कयामयोः कोलयो रागम्, चाहयकोरवदलवरयोः प्रजागर- मुन्दिलशोणयोल्मदापोः कबलस्य सूनां रेखाबायोचाप वनवयुवतयः सर्वदोल्ला स्ता इव प्रसनप्रमा यौवनबलविरहिता नीरसा अपि मररससरसिम्मन्याः कमलमुगल- ठूलकोमली कुचौ लोभूनां परिरिष्णयेव सनुयाय मनोभवभूपतेः पटकट्येव कन्चुकिया कुलिशम्शी प्रत्यापयन्सोऽविष्टिनामृतबिन्दुनिव वर्षन्य. प्रियेषु, नारीलोकस्य स्वतन्त्र्य दुरुग्यु-दाना इदानीन्तननारीसमावण्य मार्गदशिया हिताहितविचारविहिन्युयोऽनार्य- इष्टवेशविशालगाः शिशिरतरेऽपि रारनि समारे चटिल्लेयामनेपदावव्याधूयमानेनाम्यरंप दिगम्बरा इव साम्बरा अप, शाम्बरी मिश्रिता मायां मनामयस्य मायाः पवना- पर्न तारिमलनुरभितनमाकाः वियच्च युवकहताश्लेषचनुरा युक्कविलोकनारखचेतमो दुर चामधारा भ्रमातुमित'शा र नियमानाः कामलातरितपिल मरमतको बनानां मनांसि नीति वा पिरेट कमनीयम होतम्लेलनेल परन्थाः सुगम्यः ८ चन्द्रमहोपतो प्रियप्रेमौदे कस्खलितैललितलीलाविलसितैर्मदभरशिथिलन्यस्तैरखर्वविचारपर्वतेप्लिव साभि- प्रार्य स्खलन्त्यश्वलन्त्यो विषयाम वनाग्निदाहं रखमाना इवानुद्देश्या अप्यनूनवेग वजन्त्य कामिन्यः, चश्चदञ्चितवासोभिरानसशिसं रमजटितरलतारै चालकृतास्तम्यामनभ्र द्योतमाना विद्युत इस समणमणवर्यमरुत्तरादवतीर्यानधिगतचातुर्यास्तुर्यामिवावस्था भजमाना धनानन्देन साशङ्कमितस्ततो वीक्ष्य 'एकं धन द्वितीयं नास्तो'तीव निश्चित्य दधिमृष्टान् वटवान् नीत्वा युगपदेव निजिगलिपया व्यात्तमुख्यो नि सात्स्रवन्ने त्रा एकाकिन्यो धनिन्यश्च या वीक्ष्य मनस्तस्यति। इतश्च श्यामदूर्व कुचमादिनः शिशव, यान् वीक्ष्य मानस हृष्यति । इतथोद्यानकोणे प्रारब्ध राजनीतिविपलानां वरकार्यविघटनपटूनां कटूना गजितबधिरितदिशा परोन्नतिकथामाण शिर-शूलिनामभ्यस्ताक्षरद्वयानामप्यल्पज्ञानोद्भतप्रतिभाभिमानानां परदोषदिव्यदर्शिनां पूर्वप्रासिद्धानां लोकप्रियव्र वाणानां वाचालानां वाग्जालम्, वृत्तवित्ताना वृत्तपनप्रतिनिधीनां गुप्तचराणां सङ्कतलेखनञ्च। अपरस्मिँश्च भवभय विधाताय क्षिप्तां शप्ता सुप्तां लुप्तां लुण्ठिता मानवतां पुन प्रचिचारयिपूर्णा विगतायासक्लेशानां शास्त्राभ्यासे गमितवयसां लोककल्याण कमनसा पापापनोदनपटीयसां तमदछन्न जीवनपथ प्रकाशयतां दुष्कृतबहिष्कृतानां गुणागाराणां काव्योरुमेरूणां पुराणप्रवीणानां नन्दनीयवन्दनीयकर्मणां प्रसादमधुराणा वीतसारमपि ससारं ससार सम्पादयतामिद्धबोधानां सतां विदुषा प्रवचनम् । यन द्वित्रा एजनीवा विलक्यन्ते वाचंयमा । एते भ्रान्ताः समाजेन सावमान सगलग्रहणमवकरगत निक्षिप्ता अपि समाजस्य भूत्यै विशिथिल परिकरं वन्द मुाजाना प्रतीयन्त एव विक्षिप्तचेतसो मुग्धाः। यान् वीक्ष्य चक्षु क्लिद्यते । इतवाल्पवयसोऽनस्कुरितकूर्चका उत्फुल्लामलकोमलोत्पलमुखा मुग्धस्मिता- शिशव उपानपरिष्करणे दाक्ष्यम्, केचन मुद्गफलीनाम कुरितानां मुद्गमकुष्टानां प्रशसा समुद्- घोषयन्तो लवणाम्ललिताना मृष्टखिन्नचणकाना बल्यतामुष्णताञ्चोपदिशन्तः शार्करजम्बीर- चूपिका विक्रीणाना उदरभत्सिता विद्योद्योग जीवनस्य श्रेष्ठामिष्टामिष्टि मिष्टि विहान बाधिता भ्रमन्ति, यान् वीक्ष्य मनः क्लाम्यति । इतश्च विश्वम्भरस्य विश्वभरणप्रतिज्ञामिवायमानायभुक्षाभक्षिता वरिना कलिना क्वलित धर्मण पुण्यभूमेरितस्यासाधारणमहिमानस्तपोधामानो मुनय इव शुद्धाः प्रगृह्यपदवदविकारा नीरजसोऽपि रथ्यारजोयूसरिता प्रकृतिप्रत्ययोपेता अप्यपदा. पुमास , अनन्यक्षुण्णश्रीका प्रथमो निःश्वासः ६ पि शुत्क्षीपाश्रीकाः पतिपरायणाः पापाणाक्रान्ता दुर्वा इव पीता महिलाम्यत्क्षोणीश्रयिणः सुरक्षामा सवा इव शिशवश्व, याससतोत्पादितविपुलझेत्रसम्पदः समस्तमस्तकमप्यु- चिता अपि शताब्दीभ्यः समाजानुमतिप्राप्त थोरैरतप्रणतकरणैररुणाः परपरितापन- कुकिभिरकटकालमूटटिलैराजीननाभ्यस्वपापपटलप्रतिष्टितैः कर्कशोमतीबाभदभावः सर्वजयिलोमलुष्टितमतिभिः परिपूर्णभोगाभोगगरिमभि गिभिः सर्वग्रासिभिर्वा पि- निष्प्रयोजनं प्टितसर्वखाः कृपाकणिकाशून्येन मोनमग्नेन समाजेनानिरास्ततापविपदः, जिजीविषया, टप्रदंष्ट्रान्मृत्योर्मुसान्नियियासया सरतापशमन कमेपनं प्रपन्नभयभजन मृत्युधयमिव नगरं मत्वाऽऽश्रिता लोकपथपार्थानाकुलयन्तो घर्षयन्तच प्रयन्नमहनेणापि मृतिमनाप्नुवन्तः स्वेदस्यन्दिनः पिन्नास्तुन्ना दीना दूनाः प्रतिनिमेषं विषवर्द्ध मानदुःखा परज्वलनज्वालोत्तमाः प्रसारितफम्पितहस्ता एकतानकातरदृष्ट्या वीक्षमाणाः सकरुणामभि. व्यक्म्,ि असहायां विहुल्तां निष्कपटी भनिय प्रत्यादधाना अनभ्यस्खयाचनवचनैः सहेय विसरमाणा अल्पप्राणाः प्रेक्ष्यन्ते ग्रामीणाः, यान् वीक्ष्य मनो भ्राम्यति । इतम्बायपणया दारगवं विहाय राजधानीमुपेता वैफल्यविझलाः परिभ्रमणभान्ताः कर्मचन्ताः पर्तव्ये भ्रान्ता मललिता भावशून्याः श्रमल्लमापनोदनाय सरितः इलक्षणशीत- विलासूपविशन्तो युगानः, यान् वोश्य मानसं स्त्रियति । देव । बृहच्छोको लोकः।" "नियतिः केन नियन्तुं शक्यते देवि! कर्मणां विधिविपाको होशः। बलवान् विधिरय स्वेच्च्याऽऽचूलमूलश्रीकांस्तुच्छ्यन् भमखर्परान् प्रपूरयन्, विदुषो विडम्ययन, घमुदान पिरियन्, उन्नयन् पातयन् आउलयन् मुखयन् क्रीडति, नान कश्चन परिवर्तने प्रभुः । धावनेन चेदाग्योदयस्वदायः या या सर्वाधिस्मुदियात् । परं कि कियच्चाचक्ष्महे साम्प्रतिकजीवजगतः। नताशेपु विषयेषु तवोनितो विचारः। अस्तु, अपि सारथ्य- मनुगवति भवती व्यपगता चोदरवेदना !" “आम्, भार्यपुन! सम्यर स्वास्थ्यमनुभवामि ।" "पस्ते विचारो नवेन्दुना सम्पन्धाय ?" "मन्ये पाल्ये शयनासनाहारविहारान् मोसाकीतुकं बन्धुन्वव्यास्थया भायिविधानग मान् पधित, तदा कपन्य नासीद् यत् सोऽप्यमहत्त्वं राज्य समधिगमिष्यति । मिनु सम्प्रति समधिगतमातुलराग्यस्य तस्य यौवनोदमलगदमिनवप्रमं नवं वरप्रचुरवलेन चन्द्रमहीपती यशसा सहैवासादिता न्यकृतामरश्रीः श्रीः, जनसकुलं कुलम्, अवरुद्धपरपदक्रमो विक्रमः, अपुण्यजनदुर्लभा लब्धख्याते राज्ञः पुत्री पत्नी, प्रचुरवमुर्वसुन्धरा, लोकोत्तरचमत्कृतिर्मतिः, जितपुण्डरीकाखवेगवं जगद्वितानीभवद्भव्यं यशः इति महामहिमा महाकर्मा नवेन्दुवर्मा खभावपरवशो वृत्तमिदमुपहासास्पदं विमृशेच्चेत् ?" "अये । चालविहसितवत् सरलः, मुविभणितवत् सरसः कान्ताकटाक्ष इव मनोहरो हास्याभिमुसो गर्ववर्वरेणादूपितः शैशवत एवाभिनवविलासोक्तिचमत्कृतः श्रीमतः स्वभावः।" "श्रीमते यथा रोचते तद्विधेयम् । धात्रीनिविशेषाणां गृहविहारिणीनां रमणीना- मन का परामर्शः। सन्ततिसंस्काराणां प्रायशः पितैव प्रभुः।" "अस्तु, प्रसवानन्तरं वयमुज्जयिनी यास्यामः। यन भगवत्या हरसिद्धया अर्चना भविष्यति जातस्य चौलसंस्कारश्च ।" "देव ! केयमुज्जयिनी ? अपि देवो गतास्तत्र ?" "उज्जयिनी मालवदेशस्य राजधानी। रम्योऽसौ प्रदेशः स्वास्थ्यप्रदश्च । भवती तत्र प्रचुरं मनोविनोदं मुदृढच्च स्वास्थ्यमधिगमिष्यतीति मामफोनो विश्वासः। के नाम न परि- चिन्वन्ति तमःस्पृशो जगदलयमपजिहोपोंर्भगवतो महाकालस्याधिवासभूमिम्, संमृति- ख्यातमाहात्म्याया भगवत्या हरसिद्धया विहारवाटिकाम्, धाराधरेशपरमप्रेमपूजितपादपद्मस्य भामिनीभर्सनाभस्मितमौर्यस्य विश्वविख्यातवैदुष्यस्य कविप्रवरकालिदासस्याराध्यायाः कालिकायाः क्रीडास्थलीम्, विश्वविश्रुतविद्यावैभवां धन्यनामधेयामुनायिनीम्। के चाप- परिचिता आदित्याङ्कस्य दीनदुःखदहनपटोः सवत्सरप्रवर्तयितुर्वीरविक्रमस्य प्रातराख्येयेन नाम्ना। प्रजाहितत्रतिनं यं प्रातः स्मरन्तो धन्यास्तपस्विनः। यस्मिंश्च राजराजे महीं शासनि निरागसामविदग्धमुग्धानां शिशूनां वक्षो रक्षःसमै राजपुरुषैः परपं परशुभिर्न भिद्यते स्म, स्पष्टं प्रादतां वनं वेन भज्यते स्म । सत्यस्य धर्मनीतेश्च हिसा नासीत् । कुलाजनानां शीलं राजपथेऽधिकारमदैन घिछि यते स्म । कारागाराणि जनसेवकानां कुलेन नाफुलान्यासन् । मद्यः प्रमदाभिश्च न्याया न विक्रीयन्ते स्म । प्रतिदिनं बुभुक्षा- राक्षसीभक्षितानां पर महस्राणां यूनां शिशूनाश्च शवैर्गङ्गास्रोतसि सेतुर्न निर्मीयते स्म ।

प्रथमो निःश्वासः मुटिमानमकुष्टाय धुव्याकुन्टेन कुलीनेन माना निरन्तनिश्शेषदोषा तरणी भगिनी व्यभि- चारिपु न विकोयते म। मुझया रुदतां शिशूना करुणकन्दनेन मातृगां वक्षः शिशुभिः सममेव न विदीयते स्म । योजनदीपु राजमागेषु सुपारोपितानां शबानां गगनचुम्विनः कडालकूटा नेश्यन्ते स्म। अधिचरगवितानां यानानि सुत्पीडितांचिलवतो वक गन्तुन्चासमर्थान् मुखेषु तृणमाधान राट केतैरेव प्राणमिज्ञा भिज्ञमाणान् नियमाणान् सम्मर्य तेषामम्धिकट्वालं सन्र्ण्य शिष्टान् द्विवान् शोणितपाय पथि प्रसार्य शुषकानाणि 'वभ्यो विकीर्य पविनमारतरकेनानिच्छन्तोमपि भगवती मेदिनी मेदखिनी विधाय च न भ्रमन्ति स्म । देवशमकानां गलपाशप्रोपितपतयो युक्तयो निरवलम्या नासन् । येन च विवनिता राजपेन सनायासीन् सरस्वती मही भारतं वर्षच ....." "आर्यपुन । दिरम्यताम्, नाहमयिकं श्रोतु समर्था । वैदेशिकशासने परतन्त्राः पक्षियोऽपि दुसिताः, का क्या ज्ञानविज्ञानसम्मन्नानां मानवानाम् ।" "बहमप्येकदा परममिनेग नवेन्दुना सार्द्ध तत्र समग्रामैतिहासिकसामग्री महाशम् । सोऽयमेर नवेन्दुर्यस्य धर्मपनी ऐपनो भाद्र गुरुदाम्यां पुनान भासून।" एकस्मिन् मृदुलले तरलमचे सितोपरहं पठेन स्पृशन्ती गर्भमरसालमाऽपालरणा मुन्दरी, जिज्ञवामीकरोत्पलसौन्दयण देशपाशकारागन चन्द्र व मुग्गन स्मितामृतः प्रसाद- यन्ती प्रामादम्, ग्रोवधा परिमवन्ती लावण्यरन करोद्भुतम्सुम्, धनहाभरगकाश्मीरतिलका नितनियाँधिनीलनीरजनिविशेषनेया स्मिते किचिद्भताभ्या कोलाभ्यां निर्वासित- काश्मोरसेवा, घाटियनुकोटिसनुत्सारितसाम्या, हारगुलिकावदातदन्तपष्टतयाऽनन्त- पालिन्ना सौन्दर्यसमुद्रजेनेव विद्रुमाघरेण, मिताधिगन्यमानालधारशितचरणा, समस्यूतपुष्पलनास्तरकारीतां रां शार्टी दधाना मुनेत्र टन्मुल्याचीरं प्रापादाटू प्रशयन्ती स्थिनानि विश्ववधुन्या पापि धन्या। पुरय वेत्रामन्दीमासीनधन्दनगौरः पुरोनयन मुन्दावन्लबदनो विस्तृतभालो वसमा भारदिनदः सविग्रह इव वीरमो गौरवारिता गौरगोभिना पनगा, इति- हसानदेन विपुलोसवेनोरमा परिपाभ्यां मामलाभ्यां भुजाम्पाय विपितम्लवादी १२ चन्द्रमहीपतो विमलपुरसृष्टिपरमेष्ठो रामपाल पूर्णलालवा केशरमृगमदपरिमलं नागवल्लीदल दलयन् तर्पयश्च प्रासादमध्य सुग धपटलै राख्या गर्भभस्क्लेशमपनयते वार्तान देन । * * पौषो मास । शैत्यजडितवपुर्वराकाणामलक्ष्यविपक्ष पक्षोऽयं शुक्ल । तिथिश्च तृतीया। सर्वत शीतस्य साम्राज्यम् । प्राणिनो जडेन जलेन साक पापाणीभूता । शीतभयाद्विभावमुरपि सोचितजालमाल आत्मीयाङ्गानीवाशाराणि भस्मचयनीशारेण सद्य एवाच्छादयति । परमानोऽपि सत्वरसत्वर व्रजन् विदूरगिरिगुहामु विरिरमुखि 'माऽस्मान् सततप्रणयिनो विहाय प्रव्राजी ' इति सकोलाहल व्याजिहीर्ष शकुनिकुल भर्सय िनव निवारयनिव लोलल्लताप्रति । शीतभयभीता विद्रुता दिशोऽपि दूरीभूता । आकाशमपि शीतशितशरीरमिव शूयता बिभत्ति । किमपि कर्म कर्त नोत्सहते मानसम् । ईपदपि प्रावरणपृथग्भूतमग विनश्यदिव प्रतिभाति । अथ लोकघटीप्रतिनिधौ चलच्चचौ चञ्चलचूड़े ताम्रवडे तारमधुर शब्दायमाने सरोजिनीशरीरसहरणस्फुटागसि हेमन्ते तरङ्गहस्तैर्व्यजितक्रोध इव प्रतीयमाने पद्माकरे साधनासमये हेमतेन भक्षितपनपुष्पफलेविव काण्डशेपेषु पय पृक्तप्रकम्पनप्रेरितेपु परस्पर शाखासघर्षणन खटखटशब्दैर्द-तानिव घट्टयत्मु वृक्षेपूपविष्टास्तपश्चरन्तो योगिन ईश्वर साक्षात्कारमिव दिनेश्वरसाक्षात्कार प्रतीक्षते पक्षिण । गोजाविक म्लानम् चुल्लीगुहाभस्मवयमुप्त वा ताडितोऽपि नौग्मति। वराका खाङ्गानि खस्मिन्निहोतुमिच्छन्त कच्छपवत् सङ्कुचन्ति । अथ कमठकोडकारों "मुक्त सुमन सौरभभ्रातैमङ्गगीयमानगुणो मृणालिनीविलासोल्लासवाही विरहविधर कोकवधूब धुरबधुदिडमण्डलीमणिमुकुटमण्डनहीर उत्फुपद्मिनीप्रतिबिम्बेनेव लोहितो हित शोतातना निधूमो मारवशमोकाष्टाङ्गार इवाग्मितप्ताभिरायसोभि कशाभिरिवा रुणाभि सत्वरमिवरीभिमरीचिभिविदीर्णदिग्धा तौघ, उदयधराधरमूर्धमणिरनभि नदनाकाक्ष फलानपेक्ष सेवाव्रती शोतल शितो भोतश्विर सुप्त इतीवायामिनीम् शीतार्ता विपनपतिका पतिनता सुब्बमुब्वायमानामभिरिव तुहिनकणे क्लिन्ना भ्रातृजायामिव हैमनी यामिनी नियम्य विश्व प्ररयितु प्राविशत्सेवाशनम्। सूर्यस्य रम्या किरणावठी "मृता सुखावहन सौरातपेन स्नाता श्यामा सर्व सहाऽऽप्रकाशिता च पर प्रथमो निःश्वासः १३ शीतस्य स्वकीयेऽस्मिन् समये गगताटीपञ्चाननेन न किमपि कत्तुं शके। दिनमशेष शीतेन परिहत्यमानदारीर सत्वरमेवान्तमाय । सळो दिनपतिरप्यस्तगिरिगृहां विविक्षरम्य- रतलादवालम्वत। विमलपुरराजभवनेऽद्यानन्दलहरी प्रमृता । व्यमा पुरन्त्रीवर्ग. सन्दरसत्वरं प्रजन् कार्यस्य महत्त्व ज्ञापयति । राजचिकित्सालयस्य विदुषो वैद्या परिचारिका बोधयति । विमल- स्तूलराशिरमरानमन्त्राणि च पूयन्ते। उष्मायतेऽन्तईसन्तीभिर्भवनम्। गीतं गायन्तीभिगायिकाभिवेंदवादिभिविष भूपतिभवनं भूप्यते । राजा रामपाल उत्त उरविशन् प्रतिक्षण मित्तिघी मणिपन्धघटीन्च पश्यस्तयोः समयसाम्य वीक्ष्यापि मन्दगतित्वं मुहुर्नहुराराकते। । अन्त पुरादागच्छन्ता दारया मुवात् किमपि शुश्रूषुः समुत्तिष्ठति । "देव! देवस्य ग्रह भगवती स्वय सनाथयाञ्चकार" आगत्य प्रगम्य कञ्चुझिनोवे। जन्मा एव सरला मुग्या कमला कैरपि रुदती न दृष्या। कदापि विषादराया मास्या मुखकमले स्थानमकारि। बालमुलभमनिमियदर्शन सच्छन्दो हास. स्यामाविकी प्रतिमा उत्तानामृतमधुरा मुख वहा बालकाली च सर्वेषां मनास्यापतिस्म। सर्व एव ठा मारयामचोकमन्त। सत्यपि धात्रीसहन्न महिषी वा खप लालयति स्म । नरपतिस्ता- मुन्सने त्या नितरां प्रासीदत् । विहायनी कमला मित्तिदर्पणेषु समकान्तमूतिरपर- वालालापेन्छया मृश स्मयमाना तर्जनीसाहाय्येन तां विहायापि च शद्वितन्यवाद प्रचलन्तीवन्ततः प्रेक्षगेन सममेव पनिता सत्वरमेयोदरिष्टन् । * 'देव ! एषु दिनेषु बहवोऽनुरका मचा हरसिद्धिप्रमादायोजयिनी समायाता.। श्रीमती मिन राजनगरब्रह्माण्डप्रमापि।" "अपि सत्यम्, मम मियं नवेन्दुः मामयीन सन्देशमादाय सपदि गच्छ।" "भयाशाप्यते देवेन।" * "हि, अनुकम्पप, भूतोऽस्मि भूनाना मानभाजनम्, यस्यावास भवारशाचरण- रैम पावन्ति, कञ्चित् पूजिता देवी!" रिनुखर्जनी गद्दीला शनैशनचलन्ती मुवि पालिका प्रेमोका नयता नदेन्दुनो।

१४ चन्द्रमहीपती "सर्व कुशलम् । कथ न स्यात् कुशल यस्य भवादृशा पवित्रकीतयो राजर्पयो नाम्नैवामङ्गलना मङ्गल कामयन्ते। प्रातरेव पूजिता प्रसादमुमुखी परमेश्वरी कालिका देवदेवो महाकालश्च। श्व प्रातरेव ग तव्यमिति देवदर्शनसुसमनुभवितु प्रेरितोऽस्मि । श्रीमत्त यतो ज्ञातवानस्मि, तत एव विलम्बमसहमानोऽधीरतामनुभवामि।" 'प्रत्यावर्तितपत्त मन शैशवचरित पुरोभवदिवानुभावयति रामपाल ! नोत्सहते च श्रोतु प्रयाणवातामपि। किन्तु चित्रपटचञ्चला राज्यध्रिय कामिन्य इव नाधिक कालक्षेप सोढ समर्था । भगवाञ्छि। ईदृक् मुदिनम यदाऽप्युपहरताद् यनावय- मेलन सम्भवेत् ।' "अहर्निश प्रेक्षणीय राज्यम् । स्वभावदुजनो जनपद, दुर्दमनीयदानवनिकर इव लुण्टाकनिकर , आपद्गता विविधकर पीडिता प्रजा , सर्वेषामेव समये सम्भालनम्।" "देव, सज्जमुष्णपेयम्" प्रणम्य न्यवेदि सेवकेन । P 'एहि मिन, तव वासुखमनुभविष्याव ।" अथ सूर्यास्तेन विचलिते लोके तमोमग्ने च गगने दिगहनावदनचन्दनवि दुरिव मयूखले सोयोतितस्मररेस स्मरप्रदोपाछ्युर कुमुदमुलकुलविकासी यामिनीसौभाग्यसिन्दूर तम क्वलयन्, दुग्धतरपधौतविश्व शनवरुदभूत्साश्चर्यचर्यच दालोक । प्रियकरैरु मुफी तम'क'चुकी सलीलमपहाय प्रतिरोमनिर्यदानन्दाट्टहासा विरहिचरीव निशा प्रियेक्षणहर्ष वर्षोद तहाममिषेण जगदखिल हसपक्षतिसितीकरिष्यती नयनमानसाम दानन्ददायिनी विमलमृणाग्लावण्यलतिकामणिश्रणिपय स्पधिनी दतप्रभामिव ज्योत्स्ना सर्वतो दिश प्रासारयत्। कर्पू (धवन्धूलियतिधीत विश्व जहास । रसे द्रचि तामणिरिव घभी विभावरी चन्द्रोदयेन । पीयूषवर्पस्य च द्रालोक इव जगति प्रामापीच्च द्रस्यालोर । ब्रह्मसूत्राणीव घभी विश्व भामत्या। एपस्मिन् वर्तुले स्पटिकोत्तरे काठपीठे केशरमृगमदगधि युष्णे पयसि जिहां च्योतयति यथेच्छ गृहीत्वाऽभ्यवहरत्म, इतश्च कीडतोर्नवपरिचययोथदकमच्योरवद्रामप लमत्री- 'देवो। शैशवत एव प्रगाढप्रेमाणी समानस्वभावभावायुपौ च युवाम्। मामरीना जरठमतिमनुते यत् प्रेमाय वा सन्तत्योरप्यशुण्ण स्यात्तदाऽपरिमेयया मुदा प्रपूरितानि रय सर्वषो मानसानि । मुस्थिरय स्याद् भवतो सम्मेल।"

." १६ चन्द्रमहीपतो शङ साकृतयो रामणीयकमहोदधेरारामस्य हरिताः कम्बब इव भ्राजन्ते। सान्द्रा नवच्छदव- पुष्पाः प्रतानिन्यः प्रचण्डांशोस्तापं प्रावृपः प्रतापय धर्पयन्ति । वचनाकान्तकुण्डिका क्रौञ्चाः क्रेडारं कुर्वन्ति, कचन व केफिन उत्पन्नोत्पातरेका केकाम्। वचन शुकसगोतम्, क्वचन कोकिलकाकली, वचन सारससितम्, वचन हंसविहरितम् , वचन तरलतार- काणामेणकानां वल्गितम्, वचन पुष्पवरलोसमाच्छ नपादपनिलयेषु पारावतगुङ्कारः, वन गुञ्जन्मधुलुब्धमुदितमधुकरनिकामकार, वचन खेलचटकचुट्कारः। चन्द्रिकाचयेनेव पूर्णा जलजातजलजव्रजा विमलतला न त्यगाधजला मुदीर्घा दीपिका पवनप्रेरिततरङ्ग पार्श्वपादपपूरं हरितयन्त्याकर्पयति मनांसि। निशासु तारागणप्रतिमू जनितरत्नाकर- भ्रान्ति यस्या नीरं कामिनीशिरपरिमलपरिमलितं सौरभसौन्दर्यसरःसार इव पूतपारद इव रजतद्रव इव प्रतीयते। नागवल्लोदलधनुराकाशमु वेदिकामु पुष्पधनैदशाखिभिः काव्यभुवीव शोभमानायामुपवनभुवि क्रमानुसारिक्षपविटपन्यासै विलसति क्रीडापुष्पपर्वत , पादकन्दुकपाणिकन्दुककीडनाय रम्यदूर्व प्रदेशश्च । फलास्वादलोलुपा विदेशीया अपि कल विहारिणः पक्षपुटपूतपादपप्रान्ताः पक्षियो यन्त्र प्रचुर प्रेक्ष्यन्ते, हारिणो हरिणाः, विविधदेशासादिता विलेशयाः, कौशलेन सम्पादितानि चित्राणि च ! मध्ये च नवनीतमसृणधवलशिल गवाक्षाक्षैर्जगति स्वसमावमिव समीक्ष- माण राजोचितसम्भारसम्भृत विशालं बहुशाल हर्म्यम् , यत्र धवलोन्नतपाषाणस्तम्भेयूत्कोर्णा वल्लर्य्यः शिल्पिनो निष्णातता निश्चाययन्ति। कौशेयनीलास्तरणास्तृतमिव यन्त्रकर्तन- समानदूर्व सखीजनैः प्रणयप्रक्षिप्तशुभ्रकुसुमं तारकितं वियादव क्षेत्रम् । समस्तशस्त्रकलाकुशलया गानविद्या वित्तया साहित्यार्थशास्त्रनिष्णातया चाध्यापिकया शिक्ष्यमाणा. धनुषा भुशुण्डिकया लक्ष्यवेधने, करवालफलकमर्यादासु, जलतरणगजाधोष्ट्र- धावने मरुत्तरवायुयानादिपरिचालने कुशला कमलाऽत्रैव निवसति । सिद्धसौदामिनीव कस्तूरिकाकुछ कुमाञ्चितरनोदावरललाटा कदाचन कनकवल्लकीमादाय धरामुपगम्य कृतीचवसतिमियोपसमधरोष्ठेन प्रत्याययन्ती सुधोमिनिर्यासमधुरमुत्तासौधोत्सङ्गसनि सङ्गीत प्रासारयदानन्दजलदा आच्छादयन्ति स्म सुधासमीरणस्तृप्तास्तरखोऽपि व्यटभन् । वरारोहाया नितान्तं नवीनं वयः, विघनेन्दुसमति मुखे यौवनाभा, सुषमाशाली म प्रकटयति लोचनलोभनीयां छटाम्, तिरस्कृतविकसितोत्पलविलासे विकास - . १८ चन्द्रमहीपतो सिंहासनस्यैकत चित्रितशयुनिकुरेषु योगेष्वास्तरणपु, परिमलतैलानुसारि चचरीक चचिताना, मौलिमुकुटेश्चक्ष विचकितयता गुणगणाधिगतगौरवाणा राजकुमाराणामेक्तश्चो रणीपाल्यकृतशिरसा शोभते सितवाससा देशरत्नानामासन्ध । अद्यकुमारश्चद्रो युवराजपदेऽभिषेक्ष्यते, चिरजीवतात् प्रजाप्रणयी युवराजश्वद्र इत्येव श्रूयते सर्वतश्चर्चा । द्वारमुभयतो मध्यमुत्त मार्गा सशस्त्रसैनिकपक्ति विदूरपयन्त समयार्द स्थितास्ते। भाखता राजतेनानाहतेन मरुत्तरेण प्रणतप्रणामापलीन् प्रतिगृह्णन् मत्रिणा चद्रेण च युक्त. सभाभवन प्रविश्य गृहीतसैनिकप्रणामोऽञ्चकार सिहासन नवेन्दुपालवर्मा । सच विष्वक सेनश्चक्रपाणि विहितसत्याग्रहो माधवजगद्धवो विहसन्, शङ्कर इव विभूतिव्याप्तवपु, वामन इव कृतबलिग्रहण , हिरण्याक्ष इव धृतवसुघरो, णेरणाविति सूनमिव जातार्थगुप्ति , व्याप्तिलक्षणमिव प्रभूतनिवेशभासमान , खण्डनखण्डखाद्यमिव खण्डितानेकशासन , शब्दे दुशेखर इव सिद्धातव्याख्याता, रत्नमकुटालकृत , अवलम्बित श्वेतमुक्तेन, हाटकतन्तुस्यूतस्तबकेन कौशेयाप्रपदीनेनाच्छन्नतनु, गजदन्तमुष्टिना हेमकोशेन कौक्षेयकेण विलसितमध्यो गम्भीराकृति कृती रराज राजनगरभूमि भामिनोभ्रू भङ्गभागी नवे दुपाल । वामतश्च' प्रभव प्रकृष्टगुणानां पराभवभवन पापानां, अपस्पृष्टो दुष्टः, सज्जुष्ट शिष्ट, रखकर्ता पूवजान्, अवधिविद्याम्भौधे, निस्सारको लोकदुराचाराणां, निरवधिनिष्णातो निस्त्रिंशे, दु सह्यते जास्तेजखिना, दुरधिगमगाम्मीयौं, विलीयमान इव लोकहृदये, आधारो वीररसस्य, निकायो निश्शेपनयस्य, अधिप आपद्गताना, अपिधान वाचालानो, अति मुक्तकोश क्लावां, सुहृत्प्राणिमानस्य, उत्थान मनखिना, अभिभावको जगत , प्रतिष्टितप्रज्ञ, परिभूतभूरिवैरी, हासप्रिय प्रिय प्रजानां, सुद्ध युपास्यो मध्यरिरिख धानशोऽलाकृति , षडानन इव धाम्मी मूकीकृतवचविसमाज, सुदरमधुर स्निग्धचूर्ण तलोगौर, कपदिन ससारसर्वख , पिनाकिन सर्वास्त्रनिपुण, विरूपाक्ष पुण्डरीकाक्ष , कामद कामदो, विहसन्निव गिरीश सर्वेशोऽनुकुवशिव चतुराननश्चतुरानन कमलासन कमलासन प्रजापति' प्रजापति, समाक्षिपमिव देवकीनन्दन जगदानन्दन, पादसवाहनलगनश्रिय १ ममश सव उपसर्गा। . - प्रथमो निश्वासः १६ साहलानश्रीः, होरक्सचितेन स्वर्णमहणा हेमकोशेन चन्द्रहासेन पूज्यमानवामपालः, जातरूपतन्तुरचितमहामहोप्णीपा, पटवासवासितवासोबद्धविग्रहो, हिमगुत्रपौतवसनः स्मितेपन्नि मृतदशन, आरक्तदानवसनः, करवालकेलिचक्तिीकृतवीरवरी राजकुमारः वर्णासन्यां समलभत न्यानं धन्यजननीकश्चन्द्रः। यश्च रसगुणवलिजारितपारदसेवनक्षीणक्षयः साक्षाचन्द्र इवालक्षि। किमितोऽप्यधिक रम्यं मारवपुरयमेवस्मर इतिविचार्य कृष्णीकृतमिवकचकलापं भ्रमरः, मुगन्धितमिवनपुर्वसन्तेन मुकुमारीतमित्र मुमनोभिः प्रकटितमित्रत्वधर्म मिलितमिव मारमिन । दक्षिणतच काशनीकाशकेशाक्षिपश्मा, अन्वीक्षित आन्वीक्षियां, अद्वितीयत्रग्यां, मौण्डोदण्डनीती, वित्तोवार्ताम, विषभितामपश्चिमः, विहमन्निव एकाक्ष कमनीयाक्ष', रेजे रजतमय्यां शुभारान्या मन्त्रिवरोऽशेषविद्यापरोविद्याधरः। अय सजायो समज्यायां समेतेषु माननीयेयु नागरिवेषु, लोकप्रियेषु लोकहित- प्रतिषु, यथास्थानं स्थितेषु च, प्रयत्नसिद्धधूप-पितायाध संसद्भूमौ सफलं माण्डलिक- मण्डलमभ्युत्थाय क्रमशो दीवारिकदत्तपरिचयः प्रणनाम। भय स्मयमानोनरपतिः पीयूपपरीतयेव मधुरया, अगाधहृदयान्तर्वसत्येव गमीया वाचा वचुमारमता श्रद्धया महर्षयः, प्रियाः प्रजाच, महामहिम्नो विश्वशासितुः परमानुकम्पा राज्यकुर्वतो मे चत्वारिंशद्वर्षाणि व्यतीतानि । यत्प्रमृत्यहं प्राप्तयोयनोऽस्मि प्रजाना सर्वविधानि कटान्यपनेतु तारोऽरिम। दुष्कालमहामार्यादिसङ्कटकटकविनाशकं जगदनुप्राहकं परमेशानं प्रति सादेवानतोऽस्मि प्रत्यहं प्रार्थयमानो भवनां योगक्षेमाय । मपि राज्ये च या प्रगाढा भश्चित्यागो ययानृतं प्रेम भवद्भिः प्रदर्शित तेन रामेषां रा इदि अतुली हर्षवर्षः सम्भवति । यश्च पदोः कालात् राज- अजयोः प्रचलित थारीत् पितृपुनवत्सम्बन्ध, गर्वोन्नतशिरा अदमद्यापि व पारोमि यत्सोऽयाप्यावयो मानससरोजे राजते समानं मुदृढमूलः सम्बन्धः । भवतां मुसे दुःस च सदैव सहचारीभवनायम्। यदा यदा भगवदनुकम्पया . १८ चन्द्रमहीपतो सिंहासनस्यैक्त चित्रितशकुनिकुरेषु औणेवास्तरणेषु, परिमलतेलानुसारि चधरीक चर्चिताना, मौलिमुकुटवा वि चक्तियता गुणगणाधिगतगौरवागा राजकुमाराणामेकतचो. पणीपालडकृतशिरसा शोभन्ते सितवाससा देशरलानामासन्ध । अद्यकुमारश्चन्द्रो युवराजपदेऽभिषेक्ष्यते, चिरजीवतात् प्रजाप्रणयी युवराजश्चन्द्र इत्येव श्रूयते सर्वतश्वर्या । द्वारमुभयतो मध्यमुषमार्गा सशस्त्रसैनिकपति विदूरपर्यन्त समयार्द स्थितास्ते। भाखता राज तेनानावृतेन मरुत्तरेण प्रणतप्रणामाशलीन् प्रतिगृह्णन् मन्त्रिणा चन्द्रेण च युक्त सभाभवन प्रविश्य गृहीतसैनिकप्रणामोऽल्यकार सिहासन नवेन्दुपालवर्मा । स च विष्वक्से नश्चक्रपाणि विहितसत्याग्रहो माधवजगद्धवो विहसन, शङ्कर इव विभूतिव्याप्तवपु , वामन इव कृतबलिग्रहण , हिरण्याक्ष इव धृतवसुन्धरो, गेरणाविति सूनमिव जातागुप्ति , व्याप्तिलक्षणमिव प्रभूतनिवेशभासमान , खण्डनखण्डखाद्यमिव खण्डितानेकशासन , शब्देन्दुशेखर इव सिद्धान्तव्याख्याता, रनमकुटाल कृत , अवलम्बित- श्वेतमुक्तेन, हाटकतन्तुस्यूतस्तबकेन कौशेयाप्रपदीनेनाच्छन्नतन, गजदन्तमुष्टिना हेमकोशेन कौक्षेयकेण विलसितमध्यो गम्भीराकृति कृती रराज राजनगरभूमि- भामिनोभ्र भन्नभागी नवेन्दुपाल । वामतश्व' प्रभव प्रकृष्टगुणाना पराभवभवन पापाना, अपस्पृष्टो दुष्टैः, सञ्जुष्ट शिष्ट, रनुकर्ता पूर्वजान् , अवधिविद्याम्भोधे, निस्सारको लोकदुराचाराणा, निरवधिनिष्णातो निस्त्रिशे, दुसह्यते जास्तेजखिना, दुरधिगमगाम्भीर्यो, विलीयमान इव लोकहृदये, आधारो वीररसस्य, निकायो निश्शेषनयस्य, अधिप आपद्गताना, अपिधान वाचालाना, अति- मुक्तकोश कलावता, मुहृत्प्राणिमात्रस्य, उत्थान मनस्विना, अभिभावको जगत , प्रतिष्टितप्रज्ञ , परिभूतभूरिवरी, हासप्रिय प्रिय प्रजाना, सुद्ध युपास्यो मरिरिख धातशोऽलाकृति , षडानन इव वाग्मी मूकीकृतवचरिखसमाज, सुन्दरमधुर स्निग्धचूर्ण कुन्तलोगौर, कपर्दिन ससारसर्वस्व , पिनाकिन सर्वास्त्रनिपुण , विरूपाक्ष पुण्डरीकाक्ष , कामद कामदो, विहसन्निव गिरीश सर्वेशोऽनुकुर्वन्निव चतुराननश्चतुरानन, कमलासन कमलासन, प्रजापति प्रजापति, समाक्षिपन्निव देवकीनन्दन जगदानन्दन , पादसवाहनलग्ननिर्य १ क्रमश सर्व उपसर्गा। , प्रथमो निश्वासः २६ सालमी:, होरक्वचितेन वर्गमस्या हेमकोशेन चन्द्रहासेन पूज्यमानामपार्वः, जातरूपतन्तुरचितमहामहोगीपः, पटवासयासितवासीयद्धविग्रहो, हिमशुम्रपौतवसनः म्मितेपन्निःमतदशन, आरक्तदानवसनः, करवालकेलिचरितीकृतवीरखरी राजकुमारः खर्णासन्यां समलमत स्थान पन्यजननीमचन्द्रः। यश्च रसगुणलिजारितपारदसेवनक्षीणक्षमः साझाचन्द्र इवालक्षि। किमिनोऽप्यधिकं रम्यं मारवपुरयमेवलर इतिविचार्य कृष्णीकृतमिवकचकलापं भ्रमरैः, मुगन्धितमिववपुर्वसन्तेन मुम्मारीकृतमिद मुमनौमिः प्रकटितमित्रत्वधर्म मिलितमिव मारमिः। दक्षिणनच काशनीकाशकेशाक्षिपश्मा, अन्वीक्षित आन्वीक्षिक्या, अद्वितीयम्नया, गौग्डोदण्डनीती, वित्तीवार्ताम, विपचितामपश्चिमः, विहाभिन एकाक्षं कमनीयाक्षः, रेजे रजतमा शुभासन्या मन्त्रिवरोऽपविद्याधरो विद्याधरः । अय सजायो समग्यायां समेतेषु माननीय नागरिवेणु, लोरपियेपु लोकहित- प्रतिपु, यथास्थानं स्थिठेपु च, प्रयन्ननिधूपपूपितायाध संसद्भनौ सम्लं माण्डलिक- मण्डलामभ्युत्थाय कमशो दीवारिकदत्तपरिचयःप्रपनाम । यय स्मयमानोनरपतिः पोयूपारीतयेद मथुरया, अगाथद्यान्दवसत्येव गमीया वावा बक्तमारमना श्रदया महर्पया, प्रियाः प्रनाथ, महामहिम्नो विवशामितः परमनुस्म्परा राज्यध्युतो मे चत्वारिंशद्वर्षाणि प्यतीतानि। यत्प्रमृत्यई प्राप्तयौवनोऽस्नि प्रजानां सर्वविधानि कटान्यपनेनु तसरोऽस्मि। दुष्कालमहानायांदिसटम्टकविनाशकं जगदनुमादक परमेशानं प्रति सर्वदेवानतोऽस्नि प्रवदं प्रथयनानो मरता योगक्षेमाय । मपि राज्ये च या प्रगाटा भक्त्यिवत्यागो पयातुल प्रेम भवतिः प्रदशिन वेन समेो राश इदि भनुलो दवः सम्भाति । यथ यहोः कलात् राज- प्रायोः प्रलिन आमीत् मित्रवत्सम्बन्धः, गामधिरा अदमचापि वर्ष पनि योद्याचावयो मानससरोजे राजते ममनं मुटमूलः सम्बन्धः। भवता मुगे दुस २ सदैव पहचरीभवनामम्। यदा यदा भावनाम्या - २० चन्द्रमहीपती ममानन्दावसरा प्राप्ता दुसावसराय यच जगत स्वाभाविकोधर्म सहि भवद्धिरपि मे साहाय्य कृतमारते। भगवतेऽनतकोटिनह्माण्ड सामिने प्रणामोपायन मुपहरामि येन राज्यनिरीक्षणक्षमा, सदसद्विवेधनाचेतना घराधुराधरणसह वपुरपूत्रापूर्वकार्यचिकीर्षाप्रवण उत्साहो जगदव लोकयितु सत् स्वास्थ्य च मे प्रदत्तम् । सकरस्य राज्यस्य सेवाय सर्वविधनवीनसाधनसम्पन्ना जलस्थलवायुसेना शनुमुख शातनेऽसाम्यमासादयति। अह सर्वदैव प्रजाधिकारसुरक्षायै तासामावश्यक्तापूत्यचौद्युषानोऽस्मि । राज्यस्य विधिसभासदस्या जनतया निर्वाचिता राज्यसचलनोचित राष्ट्रोन्नतिकरच विधिविधाय विधानुकरणीयाँ व्यवस्था व्यवस्थापयन्ति। प्रतिग्राम प्रामीणग्रंथिता प्रामण्य एवं पारस्परिक विवादाभियोग शमयन्तो वैषम्येा भस्मयन्तो प्रामोन्नति कुर्वन्ति । लघुष्वपि प्रामेष्वेका स्वल्पीयसी रम्या पाठशाला, आरोग्यशाला, व्याख्याने प्रौढशिक्षणशाला, पत्रालयो, वाचनालय , खयसेवकभीडास्थल, वाटिका, स्वय प्रामीण श्वातुर्येण रचिता राजमार्गा , कुल्या, प्रभूतधान्यानि क्षेत्राणि, च वीक्ष्य कस्य न मन परमानन्दस्यावधि समेति । आभ्यन्तरव्यवस्थाये न राज्ये रक्षकसेवकानामावश्यकता। चौरजारानौचित्याचारच.व न धूयते, न कश्चनागृह्यमाणोऽपि वराक किमपि जिधृशति । तस्य हृदि स्वयमुपाजितवस्तुन एव उपभोगेच्छावर्तते। न राष्ट्रऽद्यबुट्टिनी न धाराङ्गना, न मद्यालयो, न छूतालय , मधूर्ती, नवञ्चको, नाननुशासनो, न निर्धनो, न फुचल। नास्त्या स देहलवोऽपि यदाज्यमिद यौप्माकैरास्माश्च पूजैर्महता श्रमेणोन्नते परा कोटि नीतम्। अनया पैतृकसम्पत्त्याऽस्माक सत्यो गर्व । परन्विदमपि न विस्मरणीय यदेपा स्थितिरस्माभिमहता श्रमेणानीता। अत्रैव प्रतिशतमेकोनर शिक्षितो नहि साक्षर आसीत् । अव शिशुना मृत्यु प्रतिशतमशीतिरासीत् । दुराचारव्यभिचारव्याधिना नरा आसन्। क्षय सामायप्रतिश्याय सर्वन प्रसृत आसीत्। दुर्भिक्षण प्रजा प्रतिवर्षमेवस्थानादपरस्थान या त्य । सर्वदेव चौरजाराणी भय सर्वान् बाधते स्म। पर त्वधुना सर्व एवैते . ग्रस्ता राग्यच प्रथमो निधामः क्यावशेषाः संवृताः। सर्वगतद् राज्यस्व भवाय श्रमस्य प्रन्यसंपलम् । भवन्तो घन्यवादाम्पदमा परन्त्वनाम्मा केवल मिदमेव कृत्य नासि यदिर दर्तमानमेवम्प पिमृया, किन्नु लोकोतरसमुन्नतः शिपरमारय निरात सानन्दं निवसन्त्यः प्रज्ञा वान्नविक्रमानन्दमुरमुनीरनिन्ति । सोष्टमधुनारद्धोमूनः। वादस्यमावान्नवनवेषु कार्यप नोत्सहते चेतः। प्रभविष्यपि वपुरवश्यकर्त्तव्येषु शयिय भजते । न मतिर्मननीयमा मगुते मतम्। करमजात कार्यकरमान्दनिय मन्ये । कुमारश्चन्द्रः मुधिशितः मुविनी- तोयुवा क्षमोगुना धुरमिमां वोटुमतो योचोऽयमस्मिन् कर्मणि-दति विज्ञापामिनुमंत्र भवन्तः सादरमामन्त्रिताः। पदप्रदानात् पूर्व कुमारायापि विनाप्यमस्तियन्मा नाम राज्यधीमदमत्तः प्रमाया योग:मं विस्मापी। महापमायो लक्ष्मीमदो मधुमथनमपिमोहति । लगन्मणि- होरस मुकुट कटकाकोण जानीहि । कौशेयलिक सर्मसिहासनं शिला- शकलाकलिनं कलय। सशरीरं विवानमिवारदा विति। चामरयुग्मं घोष सद्भावनानाम्पक फुव्यसनानां मन्यस्व । नहि विलासालमा राजानो रामस्य प्राग्यमुरकारं कर्तुं क्षमाः। प्रजाना सातन्त्र्यवीवनं स्थिरयितुं सदैव रक्षणो भवः । दस्पदनने सततं करवालम्रो भूयाः। विदुषां सत्तावश्ययलम्मा गाः। E:प्रजाः।

२२ चन्द्रमहीपतो युवराजविभाभूपितमुखश्चन्द्रो जनसमूहस्य करतलवादनेन सह समुत्थाय स्मितेन सित. यन्न तासभमभापत- पूज्यपादपद्मा महर्षयो, मान्या राजषय सहयोगिन सभ्याश्च । योऽय कार्यभार श्रीमद्विरस्मस्कन्धआरोपित श्रीमता सहयोगादक्षमोऽप्यह समर्थों भविष्यामीत्याशासे । अद्यतन राजपद न विलासस्वक, अपितु प्रधानसेवकतासूचक प्रधानप्रहरित्वमेव घोषयति। उपहारप्रदानादिना य सम्मान श्रीमन्तो मयि प्रदर्शितवन्त स नमम, अपितु राष्ट्रसेवकस्य-राष्ट्रस्य जागरूकप्रहरिण सम्मान । नाहमेतस्य सत्यो योग्य उपभोक्ता। अत एता सामग्री बालविकासपरिषद उपहरामि, बाला हि भाविनो भारवाहा राष्ट्रस्य। मान्या, बहुविद्यतेऽस्मारकरणीयम्। अद्ययन्त्रयुगे विज्ञानस्य महत्यावश्यकतावर्तते। वयमधुनापर्यन्तमत्यन्तावश्यकपदार्थोत्पादनाय सलना आस्म, परमद्य तेन भयेन वयं मुक्ता स्म । परन्तु कदापि परेषा दयापागाणि यथा न भवेमतथाऽस्माभिर्यतितव्य- मस्ति । अद्यसायंकालिकसभायामस्मिन् विषये विचारयिष्याम । + "देव व्यत्येति भोजनवेला। आगन्तुका मान्या अतिथयोऽपि श्रीचरणौ प्रतीक्षन्ते । आखेटार्य गतो युवराजविरयति”-मन्त्रिणोपेत्यावोचि । "न जाने कथ विक्लवता भजते चेत । किमप्यज्ञातभयमिव भावयति भावना । आखेटार्थ गतश्चन्द्रो नाधुनापि प्रतिनिवर्तते। अद्यतनोत्सव राजभोजश्च विदन्नपि स कथ चिरयतीति महदुत्कण्ठितं चेत। अभितोऽशुभच्छायामिवपश्यामि, क्रन्दनमिव चिकीर्षति मामकीनं मन । न जाने किं भावि ।" "देव ! सर्व शर्व श विधास्यति, देवस्य वात्सल्यमेव एव चिन्तयति । ( सम्मुख पश्यन् ) 'कथय देवव्रत कथ विस्यति युवराज देवव्रत -(प्रणम्य उच्छसन् ) देव, कुमारमिनेण विश्वशेखरेणाद्य श्रीमत एको विलक्षणप्रेक्षणीयोऽव उपहत आसीत् । कौतुकक्रीतमिव भवति युवकहृदयम् । परिणाममपरिचिन्वती च मति, विगतसाध्वसञ्च साहसम् । अपेतसारल्यञ्च तारल्यम् । ।'

प्रथमो निश्वासः
युवराजचन्द्रलमारहास्मामिः शनैश्शननुगतोऽकरमादेकरमाद् विटरव्यूहान्निसान्त -
मुपदंष्ट्र पचाननं वीश्य हन्नुमनासदनु प्ररिपतः, अस्मागिरयावष्टलग्नतुगनः
कानननेशान्यकारे पथविच्युतैरवीक्षितगोरगोचर एव संवृत्तः ।
विद्वद्वरेण्यनपद्धतनूजनुर्यः
सालोचनं विपुललालितकाव्यमालः ।
सश्रीनिवास उररीकृतनन्यरोपिः
शं न्यश्वसदरमुधोवरणीयमाद्यम ।।
श्रीमन्नवरायशाबितनुजनुपा श्रीनिवासशानिमारने
चन्द्रमहीपतौ
प्रथमो निश्वा सः

द्वितीयो निश्वास: भिन्ना महागिरिशिला करजाप्रजान- दुद्दामशौर्यनिकर करटिभ्रमेण । देवे पराचि करिणामरिणा तथापि कुनापि नापि सलु हा । पिशितस्य लेश । -पण्डितराज जगन्नाथस्य उत्पूजन्तु वटे वटे वत बका काका घराका अपि काङ्कुवन्तु सदा निनादपटवस्ते पिप्पले पिप्पले सोऽन्य कोऽपि रसालपल्लवल्यग्रासोल्लसत्पाटय- भीडत्कोकिल्कण्ठकूजनकलालीलाविलासक्रम । सुभाषितरत्नभाण्डागारम् अथ जातोदये पीयूपमरीचिमालिनि सकर शस्यपितृके जैवातृके, स्वर्णादिगुहाखा 'मलकीय रसाय-मास्वादव सवरसत्वरमम्बरमवतरति रतिवितारके तारकेश्वरे ज्योत्स्नया रिल यामिलायां प्रकाशमाने वस्तुविसरे, राजतपनाच्छादिते कर्पूरपराग मिव वर्षति नभसि प्रदर' नाशयितु पुष्यानुगमिवसेवमानाया', मनुपेयाभिर्दुग्धधाराभि खि ज्योत्नाभि सिच्यमानायां वसुमत्या, प्रफुह वैश्वेषु, सरस्सु, सत्रपकमरिनीषु दीपिकामु रमरमानान- सु च बुमुदिनीषु समाधिमिवालिप्य निद्रादेवीमाराधय सु जनेषु द्विना पुरुषा पर्वतात प्रदेशे स्थिता सन्ति । महानय प्रदेश । अभितो रघुल्धव पर्वता पादपप्राचुर्यव तो ये समागतृनेन निपातात्तान् वश्चयन्ति । प्रदरोरोग पुष्यानुग २ पूर्णन शाग्यते। पक्षे प्रकृष्टो दरोभय , पुष्यइति नक्षतो परक्षण तायनुगानि यस्यतेन च द्रेण नान्यते । नक्षनोदये भय नायतीतिभाव । . बचाते हैं इति भाषा द्वितीयो निश्वासः मध्ये विविषयासविभासी, हरिणरोममृदुलोरम्यस्तापहारी, शीतलः प्रदेशः । गण्टर्शलान् कतैयन्ती बयजला सरिदका वहत्येक्तः। या पावतमप्यमासायाश्या भवति । पूर्वतः पुरुपैस्मुस्तम्पुरुषगम्या दुर्गमा दरत् । मध्ये नितरां सान्द्रा पादपावली। यत्र तत्र कुटन्नटे ऽभोटे मधुमक्षिकाः भनभनायन्ते । इतस्ततोत्रमन्तो दुष्टात्मानोऽत्रैवात्मानं मुखिनं मन्वते। पुटदुष्ट स्थानमेतं लुटाकानां लीलानिलयं, चौराणामाचारचत्वरं, दिनाचानां पत्तनं, रक्षसामासनं, यक्षागां भक्षणमयनं, टपतानामुत्पत्ति, वराधिकानां विलीनप्रपन्नगमाचक्षते। विस्मृतमगिरपियन सम्बन इतो नाटीकते । अद्यापि त्रयः पुरया भनारलोक्यन्ते । निश्चप्रचन्ते दुष्टात्मान-इतितु स्थानमेवाख्याति, परन्तु तदालापशुश्रुपा चेन् “पाठकाः पाठिका"श निमृतमागन्छन्तु मा नाम नपुरशिखित तान् मुचेतसैन्-म्मः कि विचार्यवे। यदचैतेपु गिलापोटमपितिटन नायक इव प्रतीयते वयसा पविशनिवणे विपुलांसः प्रोचकुलजात श्व सभ्यवंशो नातिमुन्दरो बलवान् पटखाटेन वेदविन्दून प्रोउन्नास्ते । भन्यो द्वीच मुर्घटतशरीरी सैनिकवमनौ पद्धकटितटी, स्कन्यावलम्बमानझन्थी, कृष्णाहि- कोराकक्षेयश्री भिन्दिपालपूक्तिपाचौं युपानौ सम्मुखोनशिलातले समुपविष्टौ स्तः। अधुनको निस्टनिःसान्निधकाम द्विनालीमुभगकटितटोऽसितपटो वीरभटः । "एहि रे प्रल ! चिराप्रतीशसे"-"देव, समय एव समागतोऽरम्याज्ञाप्यताम्" "प्रिया! यूयं सदैव मत्कार्यसाधनाय सक्षणाः स्य। प्राणान् संदायशिखरमारोप्य मत्कार्यसायने तत्पराणां नानुभ्यमासादयिनुमलमस्मि। प्रदलेन ययोपकृतोऽरिम, मन्ये पिता येव न पालयैन्, माताप्य नमानयेत्, भ्राताप्येवं नविधियान् । प्रल-देव ! भवन्पादयोः सम्यगपचितिः कदापि न भूता। मुथैव देवो राजिका पदेतात। वृत्तिमुडो वयं यदि देवनाराधयामोऽपि तत्र कि निःसार्थम्। वेतनं भुपना भपि यदि न सेवामहे, सदानु पानेममितानां न जाने करिनन्निपातः स्य निरये। यतः प्रमृति महाराजो नन्दनपुरेश्वरो परलोकमनायितवस्तन एव प्रतिक्षण चम्पष्टिमि, प्रयान च परमेशानं पन् प्रभो कदाहमेताभ्यां लोचनाभ्यां धीमन्मप्रियमारान् श्रीरशान्तिरिहान् नन्दनपुरराज्यसिंहामनेरममितो द्रक्ष्यामि। दर-दरां। २सोनापाठ। ३ सयरोट। ४ नहीं पटरने।

चन्द्रमहीपतो कान्ति-प्रल ! विरमास्माद् वाङ्मयात् । नाहं राज्यं कामये। भ्राष्ट्र भजता साम्राज्यम् । नास्माकं प्रयोजनं राज्यवार्तयापि। यासां योगक्षेम रक्षन्नह राज्यकामुक आस, ताः प्रजा एवारमाकं विरोधिवचो ब्रू युस्तदास्माकमेव तेन किम् ? राज्यग्रहणे कि मम कश्चन नैजः स्वार्थ आसीत् ? प्रवल-सर्व जाने देव ! परन्त्वन्येन कर्णे फूत्कृतो जन स्वार्थमपि नाशयति । अस्तु, आदिश्यतां कश्चनादेशः। निष्कर्मणान्तु दिनान्येव नातियन्ति । कान्ति-मलया सह परिणयप्रतिज्ञा कृतवानस्मि-इति तु भवतां विदितमेव । मम प्रतिज्ञायां, तव प्रावल्ये, वीरवरस्यचातुर्ये, सूर्यसिंहस्य साहसे च द्वयोर्द्ध योश्चतुर्भावइवमे विद्यासः। अपि सत्य रोचते वीरवर ? वीर०-देव ! एकदावय सकमलं भवन्तमन शैलशिलातले समुरविष्ट प्रणस्यामः । कान्ति -परन्तु भायो विज्ञातमेवास्ते यद् द्रविणमन्तरा न किमपि कर्तु पार्यते । सर्वत्रधनस्यावश्यकता विशेषतश्च विवाहे पुनश्च राजकुमार्यासह। वासोभूपण कला- नामुन्यूनतोन्यून पञ्चलक्षमुद्राणामावश्यकता। अपि! वीरवर ? कश्चनैतदर्थेऽपि स्थिरीकृत उपायः। वीर०-आँ देव ! [किञ्चिस्मृत्वेव ] विदूरमितोऽस्ति राजनगरनाम्नि नगरे मम मातुलेयो भ्राता शिल्पाजितबहुधनदृसो वाल्यतएवममापराधा विश्वशेसरो नाम युवक- मान्यः। परार्यपि स मातुलान्याः समक्षमेव मां दुर्वचोवाणैमर्मण्यविध्यत् । एवाहति देवो द्रविणमानेतुम् । प्रतिशोधविधावधीरोऽहमपि कार्येऽस्मिन् देवस्य चिर- स्मरणीय साहाय्य विधास्ये । कान्ति-कियगुरमितस्तरस्थानम् ? वीर०-देव! आस्माकोनस्य उपनर्मदनीलकाननस्योपकाले श्रीमन्नन्दनपुरनरेन्द्रा- वासाय मुभगशिलोचपे रचिताया गुहायाः सन्निकटमेव। राजनगरप्राप्त्यै च तत आदीनोऽध्या। कान्ति-आँ जाने! परन्तु मुदूर तत्स्थानम् । वीर--(विहस्य ) महाराज ? कः साहसिकानां सुदरविदुरभाव । मुझे नवयं मुभगशैलगुहामु गमिष्याम एव । अहह ! एपु दिवमेप तनाम्राणां समुदइव समुद्योतते । तत प्रल- चन्द्रमहीपतो -(मध्ये एव) देव। बालोऽयमवहुदशि चास्य हृदयम् । विचारधाराभिरव धीरितधैय सद्यएवोत्पथायते। कालेन श्रीमद्धि शिक्षितो भविष्यति योग्य । क्षम्योऽधुना। सूर्य-शनैशन ) कोमर्पयिष्यतीतितु समयेन ज्ञास्यते । * . 'उत्तिष्ठ ज्ञानमाधेहि । अचेतनावस्था गतस्य तब दिननयमत्रव्यतीतम् । तवाङ्गानि सचेतनान्युग्णानि च प्रतीयन्ते। भगवाञ्छिवो मदीया सेवा सफ्लयितु मिच्छति। निद्रा जहि हि, पश्य सूर्योदयो जात । पक्षिणस्तवेदशी दशा विलोक्य सशोकाइव दृश्यन्ते । तएव मम परिजनास्तव कुशलमिव पृच्छन्त आतुरास्तिष्ठन्ति । तव सर्वाङ्ग स्पर्शन सुखयन् मातेव मातरिश्वा व्यप्रो मूक परिभ्रमन् न स्थैर्य लभते । उत्तिष्ठ ममाप्येपाहवनवेला। गौरपि वत्सधपयितु हुङ्करोति। सापि दिनत्रयात्तवेदृशी स्थिति विलोक्य त्यक्ततृणाऽवर्तत, अद्य शप्पो मुखा प्रतीयते। शुभमिद लक्षणम् । मन्ये तव चेतना शीघ्र प्रत्यष्यति। विषाद हिहि । सर्वाण्येतानि तव मङ्गल सूचयन्ति, उत्तिष्ठ जागृहि । काल ? क्दात्व मोचयिष्यसि मातर पविना भारती भुवम् । मारमान् भृश दु सितान् कार्की । मा मातर दुःशासनावमानिता विधा, मा खातन्यसग्राममहायज्ञे प्रदत्तपतिपुत्रगृहधनाहुतीविधवा अधिक खेदी । माशासनापहृतसर्वस्वान् यून कृशय- मन्ये एषोऽपि वोराङ्गनाङ्करत्न केनापि दुर्दान्तशासकेन नद्या क्षिप्तइमा दशामाप”- 'बाहमस्मि ललिते, श्यामे, देवव्रत, कोऽय जटिल प्रतीहार," उद्विग्नचेतसा विस्फारितनेणामुनोचे। "शान्ति भज ते सर्व एवाविलम्ब समागमिष्यन्ति, उबुध्यस्ख, स्थानमिदमेकस्य विरत्तस्यास्ते। यतश्रीमान् काष्ठफलकाश्रितो नद्योह्यमान प्रात स्नानाथं गतेन मया नि सार्य जीवनीयशक्तिममृता विज्ञाय कुटीर समानीत । दिननय व्यतीवमद्य श्रीमान् चेतना भजते"-इत्याहादित मामक मन । इदमुष्ण पयो गृहाण, शिथिलानि तेऽङ्गान्यनेन सामध्यं प्राप्स्यन्ति," आम्रप वेन पयो मुखे ददता महात्मनोच। युवा च मुख व्यादाय शनै पयो जग्राह। स महात्मदत्ताश्रय शनै शनैरुपविष्ट । तस्य चक्षुषोरमे नवमेव दृश्यमासीत् । महात्मना तैल सजीकृतमासीत् । स शनै ८ द्वितीयो निवासः २६ सानर्मदयितुमारेभे। यूनः शून्यालेषु चेतना प्रासापीत्। मनोरमोऽयं प्रदेशः । सर्वतोऽनन्तरालं स्थितानां निम्बानी भित्तिरिख भाति। मध्ये च चतुरखो पासविभासी प्रदेशः। एकत एका स्वच्छा रम्या कुटी। धवलपाषाणखण्डनद्धय युट्टिमम् । सम्मुरो च कुटीद्वयम्। एकस्यां हिमधवला मांसला वात्सल्यपूर्णाधेनुः सम्मुसमीक्ष माणा स्थितास्ति । पार्व व पयः पानं वामे पाणी, आम्रपल्लवश्य दक्षिणे दधत् उपपष्टिवयाः विमलश्री प्रदीप्तप्रभः कौपीनवासाः स्थितोऽस्ति । युवचेतसि शनैः शनै चेतना प्रस्ता-स्मृतिरागन्तुमारेभे, तं स पुनरुणं पयः पायित्वा शाययित्वा च कालग्नः । "अधुनाई स्वस्थोऽस्मि, कथं कैदशब्दराभार प्रदर्शयामि-नजाने। बुभुक्षा बाधते, शौचाचित्य युभुक्षामि"। "नागरिकजनवदाभारप्रदर्शनं नावश्यक, पार्शएव शौचान्नित्य कोप्णजलेन स्नास्वाऽऽगच्छ, सिद्ध पायसं तवोल्लापायालम् । "सत्सु समेपु लेह्ययोप्यपेयादिषु महार्हपापु नेदगानन्दोऽधिगतो योऽय पदलीदले प्रसर्पतोऽविरलस्य पायसस्य भोजने"-क्षीरं प्रयत्या लिहता यूनोचे । "एकान्ते भगवन्तं भजता मयाप्येष आनन्दोऽव मनसि मूर्धनीरतः" अस्तु, अधुना त्वं स्वस्थोऽसि, जिज्ञासा च मामाभीदण्यैनमुरारयति, कस्त्वम् । कथमित आगमनं कथं चेहशी दशा तव ! "देव ! अपरं जन्म प्रदानुर्भवतः सम्मुख नाहं मिथ्या वदिष्यामि यतादशी जिज्ञासा पत्तते चे च्छू यशाम्- "अहं राजनगरपतेः श्रीनवेन्दुवर्मणः पुत्रचन्द्रोऽस्मि यदि धीमतः कदापि कर्ण- मस्पृशम्। मम युवराजमहोत्सवदिने मम मिनं मामेकमश्वं प्रादात् । तमचमारमा- गटार्य मित्रः साई गतसानासम् । सौभाग्येनानायाममेर सिंह एकोऽभ्युपेतः । भय शुभशकुनमिदं युवराजमहोत्सव-इति पिचार्य समन्यवायम् । परन्तुस पन्यपशुः समस्तां रात्रि यापयित्वा छापि विलीनः । धमतरायियधावनेनश्वोऽय नितरी प्रान्तोऽभूवम् । सवस्य स्वेदमात पुः प्ररम्पद्रे स्म। मामकीन सस्थि- पुगधाधवपुपाऽभेदभावं भजदिव प्रतीयते रन । परन्तु व्यापमप्यवादयतीर्य- - चन्दनाय निम्ब चन्द्रमहीपतो शनै शनै पदातिश्चलनमभ्यस्य किमपि स्थान प्राप्तुमैच्छम्। पाश्व एवैक शिवालय मपरम्। शिवाल्यो वृषव्यूह निलीन मासीत् । प्रवपणन तस्यराग कणीभूत आसीत् । शिसरदनोऽभग्नो लोहदण्डो यस्मिन् कदापि ध्वज समुच्छितो भने यता विभत्तिरमा कवाटमेकमेवासीत्तदपि भग्न दग्धम् । अन्त कृष्ण दृपपीठ शिवमूत्तिरासीत् । शिवमूत्तिदिव्या धीविभवविभाव्या भव्याऽऽसीत् । केनापि शिवभक्तेन महामनाघ्न रहसि बित्वव्यूहेऽकनिकरे निम्यक्दम्बे धनूरपूरेऽभङ्गभग गझेशस्य शस्यप्रशस्ये स्थले स्थापना कृता भवेत् परन्त्वद्य मन्दिर भक्त स्याभावभावयति स्म। केवल जलसितमगण, शरावे धूपभस्म दीपशलाका मलिन तूल भग्नो दीप अनता दूर्वापुष्पाणि च कमपि पूजक सूचयन्तिस्म । कोऽपि इत कुतोऽप्यागत्य क्दाप्यचति-इति प्रतीयते स्म । काप्टखण्डमेकस्या भमकुण्डिकाया पतितमासीत् पूजनाय भग्ना तुम्बी च। अमाजनात्सवमवारकूट शैत्यान्महतीं दुगधितां प्रसारयति स्म । भित्तिपु, अधना पिमुदृढामु पल्योनि शमयन्त्य आसन् । मदिरस्य पार्वेऽपराप्येका विद्वासीत् परतु कुट्टिमहीना पाथानां चुल्लीधूमेन कृष्णीकृता दीनावस्था वन्यपशुमूनिता नितरा भ्रष्टाऽऽसीत् । नितरा श्रान्तो विश्रममनिच्छन्नपि वन्यपशुभयङ्करे वने गमनाशकशरीर क्थकथमपि स्थान वियूय मुप्तवान् । परन्तु निद्रा द्रुत ऽऽसीत् चिरा वेषणनापि सा नापि किन्त्वन्ततोऽङ्गानि शरीरच निद्राङ्के सवस समप्य सुष्वाप । अक्स्मादेवावस्य प्रवलया हपया मम निद्रा भन्ना। सहस्ररश्मि प्रकाशते स्म । मया दृष्ट यदेक पञ्चाननो ममावस्य पृष्ठ विदारयति । यावदह सद्यएव कृपाण निष्कोश विधाय सज्जोऽभव स वृक्षान्तनिलिल्ये। घोर वन शिथिल शरीर चतनाहीनानीवाङ्गानि, अध व मृत किमधुना करणीयमिति विचारयति मयि पुन स दृष्टिपथमागत । अहमधुना रक्षणाय मागम वेष्टुकाम शनैश्शनै निष्कोपकृपाणकरोऽचलम् । अह क्षगैरेव पाश्व एव सवेग प्रवहन्त्या नद्यास्वीर आगत । पूर्णपीयूषपानीयां नदी परितो हरिता पादपा सुरभिधनिकोपवनपवन सेवमान इवेतस्तत सञ्चचार । अन्य कणेहत्य पीत्वा शैथियमभजन् ।

द्वितीयो निश्वासः मुपामधुरमधरीकृतमाक्षिकेशुक्षीर नीरं प्रस्टप्रचुरदय पादपतले शीतलमुरभिसमीरणेन श्रममपनेतुं समुपविष्टः। कुशलवृत्तमिवपृच्छति शकुनिकुले, स्वेदविग्रुपो विदूरयति मातरीन मातरिधनि, दासीगण इव पादयोः पतति दूर्वा विसरे, भ्रवृप्विर सगलवन्धं मिलत्सु द्रुमशासामु पितरीव छायांकृत्वा दशासाः शिरः स्पृशतिपादपे, प्रियायामिव परिजनसोबाद- मिलनयाँ तरङ्गभग न्यायोत्याय लीयमानायामित्र नद्या मया दृष्टं यत् स एव सिंहः प्रलम्वया जिहया करालदंष्ट्राप गर्जनेन च भीपयमाणो ममाभिमुसं सत्वर सत्वामागन्यति। तस्य मुसमुद्रया ॥ दृढनिश्चयः प्रतीयते स्म। परिस्थिति टिला ऽऽसीत् दशहस्तान्तर एव सिंह आसीत्। अहं निमिषेणैव बद्धपरिकरो युयुत्सुः सक्षातः । सिंहः सत्वरमागत्य मुसंव्यादाय अप्रपादाभ्यामाहन्नुमना यथा प्रचलति, तयाह पुद्विमः क्रीनेऽरहो निष्कोशं करवालं तन्मुखे प्रावेशयम् । माइतोऽपि स या तन नसाघातेन रतमसावयत् । परन्तन्ततः पदको निपपात । হুদ্ব হাসির पुफ्तः प्रक्षालनाय नदीतीरं गत्वा यापजलमाहरामि तावदेवाययो युदेनजर्जरीभूतं मन्तई तमृदं नदीतीर मयासदेव नद्यापपात । अद्दउ नितरांश्रान्त आसम् । परन्तु मृत्युभीत्या प्रियमाणेप्यप्पङ्गेषु चेतना व्याप्ता, सम्मुसेच काटफलागेकं नद्योत्तमान- तनापरथायामधिगतवान् । पश्चात् कि जातमित्यहं न जाने। अधुना देयः सम्यनु, यत्कोऽयं प्रदेशः। यिद ये तो राजनगरम् ।” "पुत्र चन्द्र बहूनि कटानि विषय जीवितेशस्य द्वारमिवाप्य प्रतिनिहत्तोऽसि । दनस्य नदीप्रवाहे कष्टपट्टे व्यतीत्य अद्यत्यां जीवन्तं दृष्ट्वा परमानन्दमनुभवामि । पार्व एव विमलपुरं विद्यते यत्र भूमहेन्दो जगत्पालो रामपालो निवसति । एतान्युपहन दर्शनीयान्युरवनान्यपि राजकीयान्देव । स्वस्थतामाग्य प्रान्तमिमं निरीक्ष्य शीघ्र प्रतिनिवस । त्वदीयौ पितरी न जाने का दशामनुभवतः।" "विमलपुरं रामपालमहाराजाय विमलपुरमिति सार्य सांगुलीन्यासं सोखण्ड गमति चन्द्रे "" "" इति गहन संन्यासी स्तकाय नमः। * * *देवि | यात्वं सौन्दर्यतारावपया ययाइनासा, नावनोमिता तपी नरमालिोष . चन्द्रमहीपतौ सजीवा, सविभ्रममितस्ततः पश्यन्ती दृष्टिमिव कुर्वन्ती अभिरामताविग्रुषां द्वारदेशेस्थिता । कस्य चेदमुद्यानम् । किमत्र स्थान प्राप्तु शक्यते ।" "श्रीमन् , मनोहरमुपवनमिद जितारेतारेश्वरकान्तिकोत्तै राज्ञो रामपालस्य प्रियपुत्र्याः कमलायाः। यत्र प्रान्ते भ्रमन्तः पुंस्पक्षिणोऽप्युपरुध्यन्ते, तन भवाशा दृशा विक्षिप्तकामिन्यः सशरीरा इव कामा वामाभिरामाः कथं समेताः। यदि नाम युष्मादृक्षाणां भ्रमण श्रूयेतोपोद्यान तदा नियता वसतिः कारायाम् । अतोऽस्मात्प्रदेशा ज्झटिति तथा यातव्यं यथा कोऽपि दृष्टिमपि न क्षिपेत् , मक्षिकाऽपिनेक्षेत।" क्षन्तव्या चेयमनपराधिनी परवती क्रीतदासो, "देवि, त्वदीयां भाषणभङ्गीमाकर्ण्य पुन पुनर्भवति चेतस्त्वद्वचः श्रवणाधीरम् । परन्तु न वयं कस्यापि निर्दूषणस्यापकाराय ।" "देव, क्षम्यतामपराधः, देव आकृत्योचालो दैवदुर्विपाकेन दुरवस्थ. प्रतीयते आज्ञाप्यतां का चन सेवा।" "अहमन नवीनोऽस्मि न कमपि जाने। कञ्चित् कालमन ध्यत्यापयितुमिच्छामि, त्वं यदि मत्कृते स्थानमेक व्यवस्थापयेः, आजीवनं स्मरिष्यामि।" "भगवन् , निकट एवैकस्य धनिनः प्रोच गगनचुम्नि रम्य भवन विद्यते । कमलोपवनसान्निध्यादधुनैतन्नव्यवहत्तुं शक्यते। केचनैतद्भूतावासमपि मन्वते। परं भवनं सुभगभोग्य योग्यमस्ति । अभितो रम्या वाटिका । दक्षिणत आदर्श निर्मला वामतश्च निपुणनिर्मितो लीलाशैलः। मध्येच रक्तपापाणचितो राजोचित प्रासादः। श्रीमद् यो यदि रोचते विभ्रम्यतामन कञ्चित्कालम् ।” शब्दशास्त्राधिमग्नानां जलविप्लुतचेतसाम् । कृते द्वितीयो निश्वासः सोऽयं चन्द्रमहीपतेः।। श्रीनिवासशास्त्रिणा कृते चन्द्रमहीपतौ द्वितीयो निश्वासः । वापी पीयूषपूर्णा।

तृतीयो नि:श्वासः एताः स्सलद्वलयसंहतिमेसलोत्य- मकारनूपुरपराजितराजहंस्यः। कुर्वन्ति कस्य न मनो विवशं तरुण्यो वित्रतमुग्यहरिणीसशः कटाक्षैः॥ भर्तृहरिः मध्ये त्रिवलीविपये, पीवर कुवरत्वरे च चपलदृशाम् । छलयति मदनपिशाचः पुरुपं हि मनागपि स्सटिवम् ।। त्रिविक्रम भट्टः उद्धगमहावर्ते, पावयति पयोधरोन्नमनकाले । सरिदिव तटमनुवर्ष विवद्ध माना सुता पितरम् ।। याणा अपहस्तितान्तरायानांनुररीठतान् प्रसाधयतः । विधिरपि विभेति तस्मानिरविशयं साहसं यस्य ।। निविक्रम भट्टः मत्तमकुम्भविदलनतनम मुममन्तम्मतिमम् । यमलोकदर्शनेछुः सिहं योधयति को नाम ।। "मया श्रुतं यद् राउनगरं प्रति मुद्रा पिता, अप सत्य, मनोरमे।" मनो-ललिने। युतं तु मयापि चन्दालानुभात् । चन्दला-मामनि विलोत्तमाद। ललिगा-या तिलोत्तमा? चन्दरला-मेव मन्धिनः प्रमुसा दामी। दिमाद !" रितपा योत्स्नं पृष्टम् ।

३४ चन्द्रमहीपतो चन्द्रकला -एवमाह यद् राजनगराधीशपुनेण सह प्रतिज्ञातचर कमलाविवाह । विवाहयोग्याच ना वीक्ष्य कमलापाणिपल्लव योजयितु तिलक प्रेषित । ललिता-श्रूयते यत् सौन्दर्य स साक्षात्काम । केचन नाशिताशेपोपद्रव प्रजाभक्त मसक्त व्यसनेषु विक्रमिण धृतावतारमर्जुन मन्यन्ते। परे च मुखमुद्रया जगदानन्दयन्त भगवन्त चद्रमसमाचक्षते। इतरे चाप्रतिहतशक्तिया जगदमजलविनाशनिरत भरत व्याचक्षते । यस्य पिता प्रवलप्रभापरिभूतभूतगण कथ न स्यात् तस्य पुनोऽपि प्रतापपपी परिप्लटरिपुपूर, यस्य पिता द्विधारधारासमाकृष्टशत्रुसीमतिनीसौभाग्य कथ न स्यान् तस्य पुनोऽपि विजयवामभ्रूदक्षिणभुजलताभूपितकन्धर । मनोरमा-तदस्माक कमला कि रते यूंना ? अरब्धामरशरीर मार मत्येऽन्वेष्टुमिवा गता, वासन्तपुष्पविकासनीकाशहासा, श्रियं, माधुय , वात्सल्य प्रेम वयोविभ्रममुद्रमती, 'प्रसिद्धा हसगत्या, परागभूता प्रमदाना, अपचितिश्चेतोभवस्य, ससरण हावानां अनुजेव मोहिन्या , अवतसभूता सौन्दर्यसरसीनाम्, निश्शेषकलालया, निरतिशयसौकुमार्या, दुई श्या दुरदृष्ट , दुर्दम्योत्साहा, विहसितहसितविधु विम्या, आपूर्णा प्रेममकरन्देन, निणि मन्मथमहेन्द्रस्य, अधीश्वरी सुरभिनिधासाना विलाससदनस्य घ, अपिधान वैराग्यभावाना, अतिका तशिरीषकुमुमामार्दवे, सुवणवर्णा, उज्ज्वला ललन्तिक्या, अभिरूपा मुखमण्डलेन, प्रतिपन्नपदार्थतत्त्वा, परिखेवानन्दाम्भोधे , अनुपाधिसुन्दरी कमला कथमिव प्रेक्ष्यते । पश्य। अलककरागरकचरणतया, खभावरकवालभास्करायितौष्ठतयाच, अचिर मृदितरक्तवीजरकानुरक्तचरणा तत्पानरत्तौष्ठी दुर्गेव, जनकप्रिया रामाभिरामा सीतेव, केशकलापाकलितललितकुसुमपरिमला, तत्त्वबोधिनी प्रशस्तपलिझा सद्धातुगणा विपुल समासा कौमुदीव जगदभिरामा, द्विफालप्रसाधितशिरोरुहा सरणिमिवस्मरस्य प्रदर्शयन्ती, बिन्दुभूषित मध्या, रक्कापाङ्गस्पशिप्रफुल्लपुण्डरीकनयना, पद्मरागजटितस्वर्णकर्णपूरा, उन्नतस्निग्धस्मरशराणुतीक्ष्णघोणा, रक्तोन्नतकपोला, कलङ्कमुक्तन्दुकलाविमलहीरक- शकलसोदर्यरदनवदना, शुभ्रहारहारिवक्ष स्थला, दाडिमीफलकठोरकुचा, प्रेमपूर्णनाभि पल्वलावताशय निवलीसोपानरम्या, प्रेमपयोधौ नौदण्डायितेनेव करयुगलेन सतरत्येपा निश्चित निविवाद ललाम ललनामु। १ क्रमश सर्व उपसाई।

तृतीयो निश्वासः एनामुत्पाद्य सजातो विधातुः सौन्दर्यरचनासम्भारनिधेः कलाक्लापस्य च क्षयः। किं श्यामे ? 1 - स्यामा-रतेः किं साम्यं कमलया। घाऽनङ्गस्य वनिता कोकिलाली मनोमन्दिरा । एपा च विश्वविदितवीरवरस्य परा वनिता मनोरमासखी कदासौ सुभगः समयः समेप्यति, चेत आनन्दस्य चरमसीमानमाप्स्यति, यदा प्रियासखी रक्तकणनिषद्धमणिपन्धाऽलककालंकृतहस्ततला परिमिताभरणा सविभ्रम भ्रमन्ती कमला-तिष्ठत, न युष्माभिः सहाक्रीडमेष्यामि। प्रगत्मभाषिष्यो विरता एव न भवथ । यात मनोरमा-चन्द्ररुले । यतः प्रमृति तं युवानमेपाऽपश्यद् विमनस्कान वापि शान्ति लमते। विलक्षणधाराीदीश्वरप्रेरितः स युवा। मामकीनं मनोऽपि तस्मै सस्पृहम् । कया स्फूया सोऽस्माकं वनिसमकालमेव समागत्य करालदष्ट्र गर्जनैरुपवनं भाययन्तं पचाननं पञ्चत्वमगमयत्, साधारणशशशिशुमिव तमक्रीडयद् वस्तुतः प्रशंसनीयो विद्यते । चन्द्रकला-युवा तु सस्पृहणीयर्माऽऽसीत् । सालया निर्भयया गत्या सिहं करयालेन विदाय "अस्तु यामी"त्युक्त्वाऽनाशसितप्रशसो यथागतं प्रतिनिटत्तः । यदि स उचकुलस्त- दानु कमलास्टहा नागुपयुक्ता वक्तुं शक्यते, इतरै गुगैस्तु स योग्यतमः प्रतीयते। मनोरमा-परन्तु कमलाया वाग्दानं शैशव एव सजातम् , नार्यस्न्या असकृत् प्रदीयन्ते। अथार्त्तमय॑भीत्यपनयनप्रतिनि, अरुणपुरस्सरे समाजिगमिपति भगवति गमस्तिमालिनि, स्पेता गमनवेला गन्तव्यमुदादरीदर्पदलनायति विचायैव विचिदुदयचन्युपु पत्तूिप, असफलल्यानेष्विव मुखमन्तर्दधत्स्डुपु, प्रचण्डवण्डकिरणभयेन प्रातः संध्यां विधातुवा पथिमतट यियासति मन्दत्यिवि चन्द्रमसि, सरोजराजविकसनोत्यानप्रबोधक भ्रमद्गुअत्पट- पदवन्दिनि, सूर्यचळवति-स्वागतचिठीपत्सूर्यमुखपुष्पसामन्तसमुद्रसितमार्गप्रान्ते, प्राभातिक पायुलोलदललताललिते चोपवनेऽरुणरिरणमार्जनीमिर्जियनगत्तमास्युदगाद् भवाब्धि- ताणिस्तरणिः क्षणाय रफीशेययितानितमिवाभूद्विश्वम्। राजकमिव महाराजागमनेन सफल- मेरो विचकास प्रमझमरं कमलकुटम् । इतरेक्षणेन सापनपा इव मुमुदिन्यो

३६
चन्द्रमहीपतो
मुलिता । श्यामले दुर्वास्थले प्रसास्तुहिनमणी श्चेतुमिव मालभास्करस्याभिनवा
किरणावली वणरेसव विशदनीलाम्बरतो हसन्ती विक्सन्ती नीरवतरति स्म ।
निकु अषु वनेषु वसतां पक्षिणां दिनेशागमनजयशब्देनेव विरावण मुसरित
वभौ विश्वम्। चलुश्च ते प्रणमन्त इव विहायसम् । विकासमाज उपवममुमनसो
विटपाश्चान तान दमुधापानाय प्रतीक्षमाणा इवासन् । विविधयुमुमाना मादकेनामादेन
कोण कोण मुदितम्।
मनोरमा कदम्बकुमुमस्तवक ललिताया सीमवे यस्याती तस्या कणे फूचकार ।
साच ता पुष्पसजा तताड। श्यामा च न्यायाधीशता सम्पद्य पक्षविपक्ष शुश्राव ।
चन्द्रकला च प्राडिवाकीभूय वचो विचित्रयुक्तिभिरयुक्तमपि युक्तयितुमचेटत । शिरीष
कुसुमकरा कमला मठिकावलरीवितानेष्वलिकेलिलीला पयती मञ्जमजरीमण्डित
महीरहमण्डपेप पुँस्कोकिलान् प्रक्षमाणा करकनिष्टिकानिष्टयोमिक्या दीप्ता कुसुममाला
तजन्या लोलय त्येकाकिनी भ्रमतिस्म। शीत मुरभिसमीरविलुलिता तस्या श्यामश्यामा
कुश्चितकुश्चिता महणमस्णा स्नेहवद्धिताऽलकावली सर्पिणीव नितम्बेऽवरोह त्यापाद
प्रसूताऽऽसीत् । सुवणप्रसूनाऽलभ्यत तुसयोगा नवनीतनिर्मितेव मृदुला तस्या शाटी
वायुलोला काठिन्येन बियते स्म । क्षणमव्यक्त कण्ठेन कूजन्ती सा स्फट जगी
कुडमला दधति छवि मातरिश्वविचालिता । (स्थायी)
ध्वनिनामुना सर्वा सत्य सङ्घीभूता क्रमशो जगु
मनोरमा।
योगिहृदय कामिनीनो लिम्पते योगात्त्वरम् ।
पुष्पपक्त योगतो मरुतो हि भूता गधिता ।
चद्रकला.
चम्पको बकुलो रसालो मालतीगणिकागण
चदनोवरनीरतृप्तश्च तसा हारीमत ।
ललिता।
वायुलीना पुष्पपक्ति भिनवणमनोहरा
पनमध्ये राजते का तेव का तविमदिता ।

तृतीयो निःश्वासः ३७ दयामा०1 पूर्वसंयोगे यथा ललनामुसं परिवर्तते मधुरेपुपतत्म तद्वद् विचलिता उपवनलताः। कमला। अफुल्ले पनन्दे नीरजं शतपनन् श्रीनिवासो देवन्दे शोभते वापीस्थितः। * * * सा एकाकिनी, अनीकिनीव कामस्य कमला, एकस्यां निम्बाम्रोदुम्बरकदम्बजम्बू- जम्बोरशोमितायां, चलदलबकुलकुलसंकुलायां, कन्धिनन्धूकम्न्धुरायां लोटलवाललितायां, मग वेतशिलायां कमलकुमलेय सानन्दमुपविष्टा कमलेव राजते । अकरमादेको मधुरोऽवधायनप्यनिः कमलाकर्ण स्पृष्ट्वा नेने चचलीयकार। सा क्षणेनेत्र स्थिरोभूय घनिः कस्याः दिशः समेतीति निश्चित्यापश्यद् यदेका रकवेशा चलपूजाधमाडा हरिणम धावयति । कमलाऽऽखेटनिपुगाऽऽमोत् । सा तस्मिन् सान्ध्ये मुमगसमये मनो विनोदाय प्रस्टोत्कण्ठा सायासेटवेरामायोग्य स्खीयमधमारय तामन्वेव प्रस्मिता । रपयेन इरिणमनुवन्य पूर्वमेव हन्तुमना दूतगत्याऽवन्चालयामस। मनोरमापि तामेकाग्निी गरउन्ती दृष्ट्वाऽपराधमारस्वानुमसार । कमलेच्छद् यत् परपयेन पूर्व गया हरिणं निहत्यनां लजयिष्यामि, परन्तु मागन्तिरगमनेन समयोन्यतीतः । हरिण प्राप्य साऽपश्यद् यत् स जीवन्नेगनुगम्यते । कमला शरं शरामन आयोज्य सायेर शिशु लक्षीय विसमई। परन्तु लक्ष्यं चलमासोन् । बागो हरिपापहर्तरजदमास्य पतितः। कमलाऽपरसद् यद् यं सा नियममन्यत स पुरषोऽस्ति । मुचेपच्छिन्नं पाहुं फरपोछनेनायध्य कमला रश्चरा मत्वा प्रतिशोधमनियमपि तस्या वीनाभिमानं नमयावारे समीयानं या प्राधिपत् । अयथामुनाऽऽपातेन तथोच्चललोयया कमला पमान भूमिमालिशमानाम। मत्यरं कमला मुपाप्यकरिमन् शिलपलो. विधमयिनुमानीय विवक्षति तायटेय सव्यतनो- सच दार:- अस्मान् ....... ३८ चन्द्रमहीपती "आ ! त्वमसि वीर! अस्माक सिंहात्ताताऽनाशसितपुरस्कार वञ्चयितु स्त्रीवेश मिवाधायान भ्रमसि" "नानवञ्चना, आज्ञापय तव कामर्चनाञ्चराम । पिपासिताचेजलमानयाम , बुभुक्षिता चेत् फलान्याहराम । क्लेशिता चेत् क्लेशमपनयाम । मन्ये कापि देवी व भुवि भ्रमणायावतीर्णा" "स्त्व पौन पुन्येनैषु दिनेष्वितोऽवलोक्यसे ?" 'देवि ! नाहमस्म्येतद्देशीय । द्विनै सप्ताहै घुणाक्षरन्यायेनेत समागतोऽस्मि, निवसामि च पा श्रीसिद्धेश्वरदेवस्याश्रमे। मनोविनोदाय कदाचन विमलपुर यामि । वात्सल्यपूर्णेन देवेन सहयोगी हरिणशिशुरय मह्य प्रदत्त । मार्ग एव श्रीमत्या भवन विद्यतेऽत श्रीमत्या दर्शन द्विस्तिर्जातम् । यदि कापि नुटिश्चेत् क्षन्तव्योऽह नवीन । अधुना देवस्य सन्ध्यावेला विद्यते, चपलोऽय हरिणशिशुरितस्ततो ब्रजति, अतएनमप्यश्व उपवेश्य शोघ्र यास्यामोतिबुद्धयाऽहमेन ग्रहीतुकाम आस पर श्रीमत्या बाणेन व्याघात कृत । अधुनाह श्रीमती प्रसाद्यानुचिताचरणाय यामि" स च हरिणशिशुना सहेवावमारुह्योत्तरमप्रतीक्षमाणो यथा प्रचलितस्तथैव मनो रमोपेता। कमला चान्वश्ववार पश्यन्ती स्तब्धेव तस्थौ। "कमले, स्पष्ट कयय युवयोर्व्यवहारेण किमपि ज्ञातुमनुमातुच शक्यते” मनोरमयो मनुष्यमाननिषिद्धमगनोपवनप्रान्त निश्शङ्कमध्यास्ते । विचिनोऽसि, अङ्गीव बैलक्षण्यमापादयसि, त्व यदि देही स्यास्त्वत्कर्म कोऽनुमातु थक्नुयात् । प्रातविवाहवार्त्तयैवार्ता सखो समवारुधत् सैव कमला धैर्यघस्मरेण स्मरेण लक्ष्यीकृता ? स्मर ? स्मर्तव्य कृतोऽपि पुरभिदाऽशेषे जागपि जगति । हर्षेऽपि विष भवति सौन्दर्येऽपि गरलम्। तव दर्शनसमकालमेव यूनोऽस्य प्रवचन- चातुरी भग्ना, कठोर मन सुन्दरीदर्शनेन द्रुतम्। तोभस्तोमसहमपि वपुर्वपते स्म । करिकरकठोरोऽपि करोऽकम्पत कदलीदलमिव । य उत्कूर्दमान केशरिकिशोरमपि भूमिशायिन व्यधित स त्वां प्रेक्ष्य स्खलद्गात समात । येन कदापि गजेन्द्रकुम्भ विदारिणो हरे पृष्ठमप्रगाश्य न मुक्त स एवाद्य स्वेदनातस्तवापराधमविगणय्य त्वामेव क्षमामभिक्षत। कोय अनङ्ग तृतीयो निःश्वासः ३६ जाने विलमगोऽयं मरतस्य लीला च। अस्यैव कृपया मोहिता दलाः मुषां विहाय मयं पपुः, मगवान् विष्णुरपि तुलसीप्रेमपिपामुस्टल रवनामाम, कृमोऽपि राधा- पादारापनाचिरं विदधे, मोहिनीमतशिवोऽपि विधिरदिखैर, परस्त्वज्ञवालखमावे नवीनेऽस्मिन् यूनि वदीयो भावोऽनुचिताचारतां प्रस्टयति । कमले । कलीना सि!" मा चानुत्तरन्त्यवमाउरोह । * * "अमात्या कमलाऽनानन्दितचित्ता, शुन्यमानसेव सालसगमना, शक्तिहृदयेक प्रक्षिानेना, कोणे पश्यन्तीवालल्यनिद्रवान्यमनस्लेव वर्तते। केयं दया पुन्याः। परिणयस्यास्योपस्थिता। यत्तस्यै स्थिरीकृतौ वरः सोऽपि न यः। मत्समीप नाधिकं तिरति, प्रातकालिकं वन्दनं विचाय भवेयारसति । वस्तु कमलाऽऽयानेव नहि, श्रुतं तस्याः शिरोत्तिविद्यते। किं करणीयम् । खिन्नोऽस्मि" टच्छसता राशोचे । अमात्य०-"नहि देव, शान्तं पापम्। बने विनयचालिनी तपसिनी मुग्यो कमलाम् । पपःखमावोऽयम् । यदि ऋचन प्याधिः, सम्बन्धेऽस्मिन् सर्व विमृश्य सुयियामि। भय विमलपुरसंसरणं पुनः पताकामिरवीज्यत । पुनः सैनिकालिर्जनाधस्तियामास । पुननारीनेत्राणि वातायनेम्यो पहिनिपेनुः। पुनस्रावकोलाहलो दिगन्तनुत्तरपामास । पुनर्गमुलगन्धो अनसनम्रमयत् । पुन द्यानां तडतडता घगतो नीरवतां बमन । राहकालः। रानोरामासस्य समाय दनसमुदयेन व्याप्ता यौ। राजकुमारण इन्दयुदै सिंहो हतः, बालोन्साहवर्द्धन टन्सवः। भरिनन्नेवोत्राचे धानुका परीक्षाय रियत्तिक एोदोपः प्रज्वलयिप्यते। यः कोऽपि धनुको मप्या पत्तिशमाहरिप्यति, अनियपियन्नुमे स सविशेष पुरस्करिप्यते । अयोच्चः स्वसिंहासनासीने राशि दक्षिणतय पाटस्थिडे राइकुमारे, राजमापा फसलन्यां, परितच या स्थान रियोपु मान्देषु सनुपस्थितेषु च बहुपु पानुष्केप, दास्यः प्रविश्य निर्दय पाहत्य कायस्वाल पस्ता स्थापयन दरो विति, देवः प्रमाम" मियाद।

४० चन्द्रमहीपतौ 'प्रवेशय -दत्ता महीपतौ प्राविशदेको युवा । युवासौ महाजनीतिपुवोद्भताखिलाङ्ग झ तेजस्वी मुरभिचिक्कणै कुञ्चितकृष्ण लौलविलम्विभि कचैनिचितशिरस्क कटिलम्यमानद्विधार सिह इव निभीक परम रमणीयोऽस्ति। यस्य प्रलम्बखणपट्टाष्टमोच द्रशकलानुकारी, स्लाटपट्ट, पर्यस्तालक मेघच्छन्नकुमुदबा धवय धुर मुख, ईषदुमिपच्छमधुरुत्तरोष्ठ, विस्तृते वर्णे मासलो नता ग्रीवा नासाच, विद्रुमारक्तोऽधरो मासलौस्क धौ परिणाहि पीनमुर, कृशमुदर करिकराघातसह सक्थियुगल महत्ता सूचयन्ति। सभासद्धि कारवीररसविनिमितावयव स सप्रेम प्रैक्षि । राज्ञोऽपि परमरम्येऽस्मिन् यूनि स्पृहावती निपपात दृष्टिः । अभूच तयोरालाप- महाराज -वीरवर 1 कुत समागमनम् । युवा-देव सुदूरमरम नगर राजपुरम् । घुणाक्षर यायेनेत समागतोऽस्मि । अद्य धानुष्काणा परीक्षायोजनस्य प्रत्यक्षानदानुभूत्यै समागतोऽस्मि । महा.-किन्ते नाम। युवा-देव ! शशधर । महा.-समासादित पाटव कस्मिनपि कायें। युवा-आं महाराज। महा.-केप देय शश-प्रायश सर्वेषु महा-या जातिर ग्टक्रियते सवज्ञान! श-( किश्चि-जित इव ) देव क्षनियोऽस्मि । महा.-(आसन विदिशन् ) उपविश । समये धानुकाणां परीक्षा प्रारम्या। पसाशद्धस्तानन्तर दीप एक प्रज्वलित आसीत् , यस्मिंस्तिस्रो त्किा अझ यनतर प्रज्वर त्य आसन् । योद्धार रस्थिता । वेचन याणवगेन वत्तित्रयमेव निर्वाफ्यामामु । एक्स्तु दीपमेव पर्यवत्यत । पुनरपरो दीप आयोजित ! पुनरेको योऽथी शरमसाधयत्, परतु वत्तित्रयमेव स नीतवान् निरवापयच सर्वा ।

तृतीयो निश्वासः ४१ महाराज दहिवेन शराधरमसूचयन् । धानुष्क सेप्प साकूतं वोक्षित एपल्पीयसा हस्तेन शरासनमावृष्य शरं व्यसृजनिरवापयञ्च मध्यमा वत्तिकाम् । महा.-धन्यो धन्यः। नितरां प्रसीदामि। युवासौ विलक्षणो विचक्षणः । शशपर! नियुक्तस्त्वमद्य मृत्यः। समामवने तवोपस्थिति. प्रतिदिनमवश्यम्भवेत् । कोशाध्यक्ष प्रतिदिन्मस्मै शतं मुद्राः प्रदेयाः, अद्य पुरस्कारभूता वर्णस्य सहस्रमुद्राश्च । "देवस्याऽनयाऽहमपि विचिद् विवक्षामि तुष्यतु देव" उत्थाय राजकुमायौंचे। महाराजः-आम् आम्। कमला-श्रीमते पूर्वमेव निवेदितास्यस्मि यदहमकदा प्रातरेवोपवनं गता पचानन· प्रेशिवा प्राणाय साहाय्यमयाचिपि, तदाऽयमेव युवा पुतोऽप्यागल मामरक्षयत् , सदत्त. परिचयः पुरस्कारानभिलापः साधुवादमप्यगृहीत्वाऽपमृतः । स एवायमद्य धानुक- परीक्षायां प्रथममायातः सविशेपमस्मामिमन्तव्यः। श्रीमतामाज्ञयाऽहमस्मै प्राम- पञ्चक पुरस्करोमि, प्रार्थये च यदयमेव वीरो मद्भवनस्य प्रधानव्यवस्थापको भवेत् । महा.- अह मनुमोदयामि । भवनस्य द्वारशाला शशधरस्यावासास्यात् । * * "कमले, केय दशा, कापि शान्ति न लभसे। सर्व दिन सा विभावरीच बिचार एव व्यतियापयति । सावधान न पटणोयि, उत्कण्ठितेव दरोदृश्यसे। आकारः कम. प्यालागि हसति, पालभमइय। प्रातः रासोभिः कय कयमप्युत्साहिता ताभ्यः संत- वृत्तेव "कोलाहलं श्रोतु नोत्सहेते श्रोने एकाकिन्येव यास्याम्युपश्नमिति" व्याजेनेवो पदनमुपैथि। प्रतिक्षणं विचारपयोनिधी निममेव प्रेक्ष्यसे। कौशिकीर सूर्यातपाद् विमपि चन्द्रिकाचयात्। मुसमये मृश दयमे । सानुनय निपिदापि दिवा स्वपिपि, खने हससि, अस्पयाक्षरं किमपि वशि भित्तिचिनैः किमप्यालरसि । रात्री भ्रमन्ती तारागणयन्तो किमपि प्रलरसि। सलग्जेत्र दृश्यते कपोलपाली, शुष्को निम्बाधरी मानालमेव तनुलनाऽने पु गौरयम् । स निरूपय केय स्थितिः"। कमला-नदि नहि। प्रमागितासि मनोरमे, अनुपरिवर्तनजन्येयमस्वस्थता, नान्यः को विशेष मनो-जाने, यह योमत्याः सहचर्यस्मि । शैशवत एव भवत्याः मनोदशा ४२ चन्द्रमहीपतो मनोव्यथाच सम्यग् युध्ये। नेटगृतुपरिवर्तनं कदाप्यनुभूतम्, विश्रब्धं सूचय यथाशक्य यतिष्ये । अहमप्यभिन्नप्राणा एव। सूचय किमस्मिन् यूनि तव विशिष्टा स्पृहा ! कम-जाने नहि का स्पृहा नाम ! किन्वेका मधुराऽनभिव्यक्ता श्रद्धेव तस्मिन् मम वर्तते। गतदिनेऽहमुपवन गता दीपिकायास्तटे शिलातलमुपविष्टा किमपि विचा- रयन्त्यासम् । पार्श्व एव मदीय. प्रिय सहचरो हरिणशिशुरप्यासीत् । अह शिशुना मनो विनोदयन्ती जगजालेन विक्षुब्धं मानसं सान्त्वयन्ती कदाचन त हस्तेन परा- मृशन्ती, रोमराजिं निपुणमीक्षमाणा, दाडिमीबीजाभा तस्य दन्तपंक्ति गणयन्त्यासम्। मन्द मन्द मारुतोऽयतेस्म। सान्ध्यगगनस्य लोहित्यं दीधिकायां सिन्दूर- द्रवस्य भ्रममुत्पादयति स्म, पवनप्रेरितेषु तरङ्गेषु शिशोः प्रतिमूतिरनुपमेया कान्ति प्रकटयतिस्म । नितरां चञ्चल आसीद्धरिणशिशुः विचित्रा च ममावस्था। अह दीपिकाजलेन प्रसूतिमापूर्य हरिणशिशवे पाययितुं प्रत्ता। अकरमादेव मम दृष्टिः सम्मुखोनसान्ध्यशकुनिकलरव प्रति प्रपत्ता, एवश्चास्मात् प्रसूतिरपि विदूरीभूता। शिशुचाय केवल प्रसूतिदृष्टिविद प्रासरत्, तावदेव स्खलितचरणों गृहीतोदीर्घिकया। शिशोस्तरणशक्तिदुर्बलाऽऽसीद् वापीभित्तिश्च बहिरयने धाधिका, स क्षणेन खिन्नोऽभवत् । अहं म्रियमाण ते नावलोकयितुमशकम् । शिक्षाधिगतसाहसा, प्राणिप्राणनेच्छया वाप्यां निपत्य शिक्षासम्पादितपाटवा विविधैः प्रकारैर्जलमवाघाक्षि। एपुदिनेयु मम स्वास्थ्यमुत्साहो मन स्थितिश्च न शोभना, वस्त्राणि च विश्वलान्यासन्। पर तथाप्यह शिशुमनहोष किन्तु चञ्चलोभीत' सन्त्रस्तः स सपोर ममहस्तानि मृतः। एतेषु दिवसेवह जले विहरन्ती नासम्। खत्पेनैव समयेन प्रान्ता। आशाटी मा पाशवदभान्सीत् । एका ईयवस्था क्थमस्यां मुदीर्घायां दीपिकायां पारमाप्स्यामीति विचार्य मम मनो धैर्यमजहात् । मम जीवनाशा महता बलेन "प्रात, त्रात 1 निमजामि, निमजामि" इत्यवोचत् । अघटनीयघटनापटीयसः पाटव 'खाटपाटस्य को जानीते। विश्वेश्वरो यमवति तस्य कृपापूर्णा दृयि दयते तस्य नास्ति वापि भीतिलेशोऽपि । तदायमेव युवा जलतरण- १ से बटन्तीति वाटाः पक्षिणस्तान् पातीति खाटपो गरुडस्तेनाटति य स ।

तृतीयो निःश्वासः ४३ भगवत्प्रेरित इव मटित्यागय मां हरिणच कूलमानीय, तार्णपार्णस्याग्नेः प्रबन्धं विधाय मामुट्योधितवान् । राङ्कवास्तृते व मूदुले दूतिले मूलच्छिन्ना कदलीवाहं प्रमताऽऽसम्। मृगशिगुरपि लब्धोधोऽन्तेवासोव पार्व आसीत् । वहिना व्यजनेन द्विजकलरवैश्योन्मीलितनयनादं श्रमस्वेदपिन्दुवातविषण्णमुख, मलकाकुलमूर्धानं प्रेक्ष्यामु युवानमुत्यातुमनाः "भगवति, अस्वस्थानि तेऽझानि कियतालमावास्योत्यारयसि" इत्युक्ता क्रियत्कालं विधम्यावासं प्रतिनिटत्ता। सोऽय सखि, महानुभावो मधुरमथुरमालपन्, दयनशतैः समये दयमान आमारिणी कृतवानस्ति । भारतीया संस्कृतिजीवनदाने जीवनदानेनाप्यानुष्यमासादयितु मां प्रेरयति। अहं त्वां नियोजयामि यदस्य पूर्णः परिचयः प्राप्तव्यः । * "तपखिनी तरुणी कामकेलिप्वलन्यवेदग्या मुग्धा, मृणालविशदप्रभा सजीवेव मणि पुत्रिका भभूपितननुलता, वामकरतलविन्यस्तकपोलपालीका अनधिगतनिद्रानन्दा रहस्तप- माश्रित्य किमपि विचारयन्ती मध्ये मध्ये उत्थाय गवाक्षतो द्वारतो नभस्तः कमपि गवेषयन्ती वर्तते कमला। अहह केयं दशा राजकुमार्याः"-उद्यानपालिक्या चिन्तितम् । “हन्त, अहमेवस्या दशाया करणे मुख्यास्मि। कमलाया विगीती वचनीयता- याबादमेव प्रधान निदानमरिम। इन्त! मृतारिम। पापपिठरस्य सनिस्टमवसानम् ।" "इतश्च पश्यामि शशधरस्य दशामपि। स च सर्वाग्यहानि यामिनीश्च नेनयो- मध्यतएव व्यतिगमयति । तस्य लक्ष्यच्युतमिव चैतः दापि स्थायि नास्ति । सर्व दिनमभ्युपानमेव यापयति । निस्सेपुवास,अनिमिषदर्शन, अनारतं विचारः अपरे तर्जनी, मनस्य'शामवनानि, तारासंख्यानमिन्येतस्या इव तस्यापि दिन रात्रिचर्या चास्ति ।" 1 * गतयपुर्नगतोऽस्तम् । क्षगेन क्षणा शोधात्परतः क्षमेव समाजगाम । क्षपा- प्रदुवित्ताभिव घिदपुः फलनाशकुन्ताः शान्ताः । क्षितिः क्षण सान्थ्य विधि रिपार्नु मानमिव दयो। प्रदोष पूर्वरानो मध्यायो निशीयः प्रदरिण व बस फार्ममशून्यमउखन् । निमादेव्याः साम्राज्यमेधार। मशिनापशनिमाकोप्वकर्मा, ४४ चन्द्रमहीपतो भ्रमभ्रमरगुञ्जनमपि विभाव्य विक्षिप्तनयना वृत्तिभुजः प्रहरिणोऽपि तन्द्राभिभूतकाया मध्येमन्दनिद्र' दिलष्टभित्तयः पतन्तो जागरणं लभन्ते। परितो रम्यपुष्पवाटिकं विशालमदो भवनम्। द्विपदशननिमितविचित्रचित्रकवाटानि शोभन्त आवासभवनानि । अभिभित्ति स्वर्णपरिवरणानि, भित्तिप्रतिष्ठितद्विपदन्तपीठ- प्रतिष्टितानिः महान्त उत्तेजसो भूयांसो मुकुराः, उपर्यसितश्येतशोणितहरितानि काचभाण्डानि बल्लयों विटपाः शोभां संवर्धयन्तोऽवलम्बन्ते। येष्वगुरुघनसारवृत्तयो दीपाः सौरभेन सह प्रकाशन्ते। अभितो भवनं देवानां, अनुकरणीयचरिताना प्रतापप्रभृतीनां राज्ञां सजीवानीव चेतोहराणि चित्राणि । मणिमयमुष्टिकावलमारी विस्मृताच्छादनानि सुगन्धिद्रव्याणि घ्राणंतर्पयन्ति । नागदन्तेषु शुकपिकसारसानां सौवर्णानि गृहाणि निपतत्सुधामयूखमयूखै राजतानीव प्रेक्ष्यन्ते । अथ पवनपथपार्धप्रसुप्तां, उन्मुखमयूखजितचन्द्रेणेव द्विरददशनेन निर्मितचतुष्पादे गगनापगापयःफेनपटलायितप्रशस्ततूले, चित्रितकौशेयोत्तरच्छदे सौपबहें, पद्मामिव पुण्डरीक- पटले, वरटामिव हंसपक्षतौ पल्यवाई शयानां ददर्श कमलाम् । कमलामुखचन्द्र तन्मुसमुपमा निपीय नृत्यन्ती चन्द्रिकाऽपूर्वा छवि चित्रयते स्म । मुकुरेषु कमलाप्रतिकृतिः प्रकृति विकुरुते स्म। रक्ता कौशेयी शाटी तस्या अङ्गमाश्लिष्य सुप्ताऽऽसीत् । सूक्ष्मेण पादध्वनिनोनिद्रिता न्यक्तामरकामिनी कमलोत्थाय सण-सणायमानभुपणं स्पृष्टा करेण प्रियसखीं प्रियोदन्तप्राप्तिप्रहर्षरुद्धकण्ठा वक्तुमसमर्था सुधाविनिन्दकेन स्मितेन पूजयन्ती, मृणालकोमलाभ्यांफराम्यामाप्कृप्याऽऽसन्दी तत्रोपवेशयन्ती भित्तिमञ्जूपातः सौवर्णी पेटिकामेकां नि-सार्य तत्र धृतानां पूगानां शंकुलया शक्लानि विधाय एलागुरुपत्रजसुधा- शतपुष्प केशरमृगमदसहित विरचय्य नागवल्लीदलं वीटिकां स्वहस्तेन ददती "कथय मनोरमे। क उदन्तः" धोरतां विहायावोचत् । "धैर्यमाधरस्व सर्व सूचयामि"- इतः समायाते शशधरेऽहमेकदा तस्य वासस्थानं भूतावासमगच्छम्। मया द्विवैदिन- निर्णीतं यच्छशधरः कदाचन सिद्धेश्वराश्रमे बहुशश्च भूतावासे स्वपिति। स्थान- विदं रमणीयं परं वासाभावाद् विरूपतां प्राप्तमासीत् । धूलिप्राचुर्यात् पदपंक्तिः स्पष्टमव- लोक्यतेस्म। अहं सोपानेन द्वितीयभूमौ गत्वा एकमावासञ्चोद्घाट्याद्राक्षम् । एकस्मिन् तृतीयो निःश्वासः ४५ लोहमच द्विवाणि पुस्तकानि दैनन्दिनी, समाचारपत्रं मसीपानं लेखनी चाचीदेक- स्मिन् कोणे च शयनस्य व्यवस्था। यहं क्षणेनैव सर्व बोदय दैनन्दिनीमादायापलम् । सैपा दैनन्दिनी मासचतुष्टयनारयाऽऽसीत् । रपट प्रतीयतेस्म यल्लेखकेन मासदयस्य- वृत्तमेकस्मिन् दिनएव लिखितम् । इतरमासद्वयस्य च वृत्तं प्रतिदिनं विस्तरशोलिखित- मासीत्तस्य सारोऽस्ति यदसौ राजनगरस्य राज्ञोनवेन्दोः पुत्रश्चन्द्रोऽस्ति, रोऽस्ति यौवराज्याभिषेकदिन आसेटार्य सिंहपृष्ठानुगामिनः सहायत्रस्यास्य नद्यां पातोजातः । दिनत्रयानन्तरं चायं नद्योधमानः सिद्धेश्वरेण निष्कासित उपचरितश्च। अत्र लेखन साविशायिनी श्रद्धा सिद्धेश्वरे प्रकटिता। उल्लापेन विमलपुरेक्षणाय समागतेनानुना सिहात्तव रक्षा कृता। अन लेखकेन त्वयि शब्दसौष्ठवं प्रयुतम्। धानुष्कपरीक्षायां समुत्तीर्णतानन्तरं प्रतिदिनमनेन दैनन्दिनी लिखितेति "अय" "अ" शन्दैः प्रदीयते। एकं प्रतिज्ञापत्रमपि महाराजहस्ताक्षरैद्वितं तत्रैवासीद् यस्मिंश्चन्देण सह तव विवाहस्य पण आसीत्। एप पत्रेषु ठेसकेन स्वस्या विपत्तेविशदं सजी विवरण- मलेरिस येन मम लोचनयोपत्र्तराविरभूत् । अनुकूलप्राहि तव हृदयं विचार्य मम मन भानन्देन पूर्णम्। उत्कण्ठास्थानं धैर्यण धृतम् । आशया खर्गमुखान्यनुभूतानि दम्पता करेण मया तव पुस्तकं न्यायि। सोऽयं, यस्य लं दर्शनात् प्रागेव भूरिभूरि प्रशंसामाणितवतो, यस्य च वीरता लाघवञ्च बहुशः प्रेक्षितवती, देवेन तब पाणिर्यस्य कमलकमनीये करिकरकठोरे करे दातुं स्थिरीकृतोऽस्ति, यस्य च चरणयोराराज्जीवन- सर्वस निधाय तस्रोदस्वेदविन्दुरन्दविदलनस्पृहा तचरणरेणविक्षा च त्वां चपलयति स्म, यमुद्दिश्याशातप्रवेशोऽयं स्मरोऽसूर्यम्पश्यां त्वां विरोति, स शुद्धमानसपरिचितस्ते भाषी भर्ता चन्द्र एवं शशधरोति' इति । प्रेमाधूणि प्रावयन्ती बाप्पावरुद्धकण्ठा कमला च तां प्रेम आलिलिङ्ग । * * * ऋतुरर्य वसन्तः होलिकोत्सवश्व। स्वच्छंनीलमम्बरम्। मातिशीतोष्णो वातस्तन सुखयति । उदवो महता प्रयासेन इगत्तमोऽपहन्तु प्रयतन्ते। राजेवारतकार्यान् विज्ञाय सैनिकान् पृतझालोरवर्गवेशोऽशेषन्तमोऽपहन्तुमुरस्थितयन्द्रः । राजदेवगिरिव किरणलया नाशितन्तमः। विचमात तेन मनोमोदयता विजयेन पन्यबादमिर ।

चन्द्रमहीपतो सर्वगत् । विजयपटहवानमिव चक्र नवोढा वलयनूपुरमणिमीरशिजितम्। निशान्तेयु प्रमुप्तकान्तावसनध्वजच्छलेन भुवने विस्तारयामासेव विजय वायु अद्यतनेषु दिनेषु सर्वन भङ्गाभवान्या सप्रेम पूजनम्। साहि परूषकवेलजवाताद दाक्षाखाखसबीजपञ्चकबकुलदलमिश्रा मिश्रेयदुग्धसितासङ्गिनी, अङ्गिनां साझमामोद विनोद नोदयति। सम्प्रत्यहिफेन आदियते आसव आसूयते, निकुन्जेष गजाया अनिमृत सेवा । गुलालस्य कथैवका, याया वोथिरवलोक्यते गुलालरवितेवाभाति। आरक्तवासस्तया स्त्रीनिविशेष पुरुषा विदूरतो वीक्ष्यते। यहुविधरागपूर्ण निमरै' र्जना जगदेव रञ्जयन्ति । वराकाना गदर्भानामद्यत्वे गरीयसो दुःखस्य समय उपस्थित । एते यन क्वापि भ्रष्ट कूपनिपाने निपतितगृहकोणे श्मशानगृहे वाऽऽत्मान तिरोभावयन्ति तत्रैवैते नागरिका दुर्याला एतेपा वराकाणा पृष्ठ न शूय कुर्वते। ताज्यमाना धान्यमाना रेडारशब्देनान्यान् सहयोगिन सूचयन्त इव व्यथा प्रकटयन्त इवाभित प्रक्ष्यन्ते। अश्लीलशब्दैरुन्मुक्तमख मानन्दसाम्राज्यमनुभूयते। एकतो मनुष्या महता चर्मनद्धन ढक्केन सहोहोकार कायन्ति, इतरतश्च कामिय सवठ्यसणकार तार गायन्ति। एकतो युवानो मध्यधृतमुरजा वत्त लन्यासेन स्थिता दण्डखण्डेन दण्डखण्ड वादयन्तो गा दडदडायन्ते। अन्यतश्च वधूट्यो यौवनच्छटा वचसा वाससा, निरीक्षण, भूषणश्चलनेन, गमनेन, हावै, हाँसेनोद्वमन्त्य खेलायन्ति । वचन कादमीरागुरुपूर्ण मुष्टिरामृश्यते कचन भस्मगोमयगोमूत्राणि निषिच्यन्ते। प्रतीयते सवत्सरसञ्चिता पाशवप्रवृत्ति पुमानशेषेण प्रमाष्टुं सजते । विविध पा सविमाना सासवा सभस्मचूर्णा घरकसहिदेव बभी होलिका। मुश्रता वाग्भटेन वेनाप्यनुत्तरेण नावतस्थे । नन्दनविनन्दकेन, पादपातितचैत्ररथपरिमलेन सफलससारमुगधसारमृतेनेव कान्य कुन्जोद्भवेन जितेन्द्रियाणामपि प्राणमामघयता, मुरभिलोलुपमिलि दन्दविहितपिधानेन निहारिमा वेण पूरिता होलिकोत्सवाय परिकमलाभवन स्थापिता शुभ्रमणिखचिता नील इपग्निमिता तारकितमिवनभोऽनुम्वत्यः स्नानजलगुण्डिका विशेषतो भवनं मासयति । रामयेऽस्मिन्नविगणय्य कमलिनीसवोचशोक रोलम्यकदम्वेनारधा मतिरनुमुगन्धि पिचारा।

तृतीयो निश्वासः ४७ द्रवम्। आमोदिना तेन दिशः प्रसेदुः। जन्मभूखि सौरभल्व प्रभवमिव पग्रिन्याः कमला- भवनमवर्तत। अय क्षिपतमोदतायां सलतकूदतायां इंदितहस्तायां क्रमशः शान्तायां सर्वदिन- व्यग्रेषु शय्यापातं मुप्तेषु निसिलेप्लेका नीरवता परितः प्रासापीत् । मनोरमा हर्म्यस्य कोणं कोणं सारा पसन्ती गतोपकमलम्। सा च सत्वर- मुत्थाय कुचमरमन्यराक्रम्यमाणेन विपुटेन वयनाथलेन मन्दोदरी पस्पर्श पाणि सस्मितं कुवलयारणेन कराण। एकस्यां मित्तिमाया काचमुटयो निर्भरा आसन् । मनोरमयाऽऽकृय जलेनापूरि । इतः कमलयापि। उमयतो जलशय निरगच्छन् । दास्योऽपि जलमरणसणकारं श्रुत्वे- वसतो निन्मृत्य तस्मिन् महोत्सवे शतगुणितोत्साहेन संयुकाः। चिरं केलि बभूव । तेनामुना सारिमलजलनेफेन जगदेव परिमरितं प्रतीयते स्म । सायपरः कार्य रमाप्य कमलामबनतो विस्मृतात्मैव विचारममोऽधोनेत्रः सत्वरं सत्वरं गच्छनासीत् । प्रासादस्य ममणस्कटिकट्टिमास्य महणतां द्विगुणयत् मुगन्धिजलं प्रमृतमासीत् यस्मिन् स्खलन् कृन्दप स्थिति निवारितवान् , किन्तु सखीनामट्टहासेन तस्य विचारसरगिरिछना। एका ससो सन्यनमाह- लीलयव सिंदहन्तारोग्य बलस्टेदेन विलवतां यान्ति" अपरा च "दूरस्योऽयं वराकोऽवश्यमद्य होलोत्सव स्मृतप्रिय उन्मनायवे मालासनाय थभिपयोध्य"मिति कथयन्ती पलनिर्गमं व्यश्चित् । समयलमेव शतशोधारास्तमभ्यपियन् । क्षणेनैव पलेदो द्विगुपितः । इतत्रिविक्रमभट्ट इस इलेवाश्चन्दोऽपि नितरां हिटपट एवासीत् । सर्ग सम्मुन्न मदिति निःसत्तुं कानः स्वां वीक्ष्य समयमानः सत्वरसत्वरं प्रचलितः। किन्नु मनोरमा त पान्छ। सगानन्तरं कमलानि विद्युदिव मारामाना मुगन्धन वि विनोयन्ती तस्य पच्युपस्थिता। "धीमता कायांवधिस्तु चतुवांदनपर्यन्तमेवारिस, कपमय विलम्यः।" "मोहं यासामोति महारानसकंवातारा मतिप्यत्कार्यकमप्यवस्थापनेचविलम्योजाता" "श्रीमान् धारयति, मदनस्य थ्यपायापको मानचिया पियामी, महल दाधयम्"-चिन्तागोपारसनयनया कमलयोवे ।

४८ , चन्द्रमहीपती 'देवस्य यथा देव्या अप्यय मानकृत् । देवेनोक्त यदह कमला सूचयिष्यामि आवश्यक कार्थे विलम्मा कृथा । 'हुँ, अहमपि शुश्रू पे इदमावश्यक कार्यम्, नो चेद्धानि ।" 'किन्तु"--इतस्ततो वीक्ष्य चद्रेणोचे। कमला-(परित प्रेक्ष्य ) एकान्तम् । शशधर -( सर्वासु गतामु ) अद्य चरेण समदेशि यद् राजेन्द्रपालो विमलपुरविरुद्ध मेक महत् पडयन्न महती सेनाञ्च सज्जयति। प्रबल पराक्रमशालिसेनश्वायराजा। स यद्यान स्यति, निश्चित मुदरतमस्य क्लालयस्य विमलपुरस्य विनाश , सम्भाव्यते पराजयश्च। तत्र देवस्येच्छा वर्तते यत्कोऽपि वीरवरस्तन गत्वा रहस्यमुद्भद्य तत्रैव कार्य विघटयेत् । सम्भाव्येत चत्तनैव युद्धयेत च । कार्यायामुष्मै अबैका सभाऽभूत् । प्रस्तावे प्रस्तुते न कोऽप्यप्रेसरो बभूव । महाराजो मयि चशु प्राक्षिपत् । भह समुत्याय समादियमाण' सर्वान् प्रतिज्ञातवान् यत् श्रीमतामाशिपा कार्य साधयित्वा प्रतिनिवत्स्यें ।' कमला-(साभनयनेव ) नहि नहि, राजेद्रो मायावी दुष्टश्च । मामकीन मनो विल्ला भजते सत्र गन्तु नाहमनुमोदयिष्यामि। इत समायातेन पितरौ सवथा विस्मृती, अधुनाऽवश्यन्तौ क्लिश्यन्तौ स्त । मुधैव समय व्यतियापयसि । यदि हृदये खल्सीयस्यपि पितृभक्तिखश्य पूर्वमिदमेव कर्त्तव्यम् । शशधर-दुष्कृत्यनाशकृतसङ्कल्प क्षनिय वापि कातरता न भजते । कमला-किं कथयामि, अनभ्रवज्रपातेन विमूढारिम, चेत शिष्टाचारावधि थप यितुमिव यतन। शशधर-कथमय पैलक्षण्यं वाचि। कमरा-श्रीमन् ! अह ज्ञातवत्यस्मि यत् श्रीमान् राजनगरस्य युवराज । किं महाराजोऽपि रहस्यमेतदेत्ति: शराघर -कथ भवती पत्ति। कमला-धामा दैनदिन्या शरघर -था करम् । नहि, नाखियाधुनावश्यता। कमग-कतिदिवमानां कर्यम् तन गमनेन

तृतीयो नि श्वास
४६
नाताधा-पात, मान, पप, साहेन, युगेनापति तु को जानीते।
कमरा-आगनने त्वरानुटे या नो चेग्माधवीलदेव दिग्ममहसा, वियोगेन दमा
एका श्रममता कर्मवरी क्यावशेषा
घरा०-यतिप्ये।
कमा-नाधीरता मां मुदति । जगदीया एव रक्षकोऽधुना। देवदेवाय
दिन।

चन्द्रमहीपतो मामाहयाइ “यदनि घासांस्यधुना प्रक्षाल्य देयानि ।” राशीभवने न सर्वदा भुज्यते महता सीमाग्यनैतत् स्वर्णदिनं दृष्टमिति विचार्य अर्हत्तममेतद्वासो विदित्वा रजकखभाव परिघाया- गतोऽस्मि। सोऽहं देव ! अज्ञानेऽपराद्धा सकृत् क्षम्यः। सच विकम्पमानो वनाण्युत्तार्य "नहि नहि मा भैपो" रित्युक्त इतरवस्त्रयुगलेन गत्सत्य भोजयिनु नीतः। * * "प्रभो, न माने...कोऽपि विदस्था'मुग्धाकृतिरदत्तपरिचयो मा स्थासीः स्त्रीजनोचितो. चानस्य रामीप" मिति पहुशो वार्यमाणो विभी मा भाययन् भूतावास प्रतिवसति । रा पुन मजति शेतेऽत्ति, भ्रमतीति किमप्यह न जाने। अज्ञातजनपदस्य साहाय्य मानवधर्म इति कृत्वा तस्य वनप्रक्षालने साहाय्य कृतवत्यस्मि । क्षन्तव्या नागस्कारिणी भवचरणसेविनी" इति।

तृतीयो निःश्वासः "क्षमस्व देव, नरेण पादोऽपि विचार्य क्रमणीयः। अविचारो ह्यसंस्कृतपारद- भक्षणम्, अनमिपातं दहनम् । अलक्ष्म्याश्च निपानम्। विचारो हि भूमियशसः श्रिया जीवनस्य मर्यादायाश्चः। युधिष्टिणमृतयः प्रमतयः पुरा किल विचारेणेवाध्यासया- मासूराज्यम्, अविश्यकारिणां कृते सतोपं जोपं विदध्मः । महाराज, यस्य पराममोपक्रम, सौन्दर्यसम्पत्ति बुद्धिदैभवश्च श्राव भावं हृप्यन्नास, येन सह स्थिरीकृतः कमलाविवाहः यस्मै तिलकोऽपि प्रेषितः, यस्मै महीमहेन्द्रेण न्याहतपस्यारिवगेण, प्रगे स्मरणीयनाम्ना, हिरुनाचारेण तप्यते दिवानिश महाराजनवेन्दुना, श्रूयते शोकलोम्मावहन्ती यस्य जननी नितरां क्षीणा, सोऽगुलिनोमिकेव न लक्षितो न- विदितः, पादाप्रज्वलन - इव न कार्य कृतः। स एव वीरवारयर्णनीयवीर्यस्य राज्ञो नवेन्दुवर्मणः पुनो : विकादिशशारदशर्वरीवरगुतचन्द्रः शशघात्वेन यजपुरवामित्वेन प्रकाशितमप्ययं पवनरचनया तिरोदयद् राज्यकार्य प्रसाधयितु राजेन्द्रपालपुरं गतः। पश्यन्वितं श्रीमल्लिखितं प्रतिज्ञापन गीतिय शदाधरनिबद्धा । हरसिद्धियाना टजयिनी निवेशः जगद्विततयशोराशेर्नवेन्दुपालाय मनीयमहिम्नो रामपालस्य वाद्यननः प्रस्तावः परमप्रमोदारसद सम्पद्यते। श्रीमतोः सन्तत्योचन्द्रकमलयोशन्द्रस्यों यावन् परां प्रीति प्रकाशयतु गुणोत्त। समये विवाहसूत्रसूत्रितं युगलमेतत् स्वर्गऽपि न वियुग्पताम् ; युज्यत यायुषा विद्यया, कन्या, प्रिया, सम्पदा यशसा । पूरयतुचे मा प्रतिशा परमादनः परमशानः। - विसमप्रमाणीकरोति- ! रामलः। विमलपुरम् नियमन सीउस्ते नवेन्दुपन्तः राजनगाम् रघुनन्दनः- कुल पुरोदियः अक्षयतृतीया १८.

चन्द्रमहीपतो मामाहूयाह “यदमूनि वासांस्यधुना प्रक्षाल्य देयानि।" राज्ञोभवने न सर्वदा भुज्यते महता सौभाग्येनैतत् स्वर्णदिन दृष्टमिति विचार्य अत्तममेतद्वासो विदित्वा रजकखभाव परिधाया गतोऽस्मि। सोऽह देव 1 अज्ञानेऽपराद्धा सकृत् क्षम्य । सच विकम्पमानो वस्त्राण्युत्तार्य "नहि नहि मा भैपो" रित्युक्त इतरवस्त्रयुगलेन सत्कृत्य भोजयितु नीत । "प्रभो, न माने . कोऽपि विदस्या मुग्धाकृतिरदत्तपरिचयो मा स्थासी स्त्रीजनोचितो द्यानस्य समीप" मिति बहुशो वार्यमाणो विभी मा भाययन् भूतावास प्रतिवसति । स कुन व्रजति शेतेऽत्ति, भ्रमतीति किमप्यह न जाने। अज्ञातजनपदस्य साहाय्य मानवधर्म इति कृत्वा तस्य वस्त्रप्रक्षाल्ने साहाय्य कृतवत्यस्मि । क्षन्तव्या नागस्कारिणी भवच्चरणसेविनी' इति। अथ लोलत्कनीनिकामुद्यानमालिनी कोट्टपालहस्ते समर्प्य सशस्त्रसैनिकानाज्ञापयामास सुप्त भ्रमन्त भक्षयन्त वा तमानेतुमिति । 'देव, आज्ञप्ता वय भूतावास गत्वा गिरिगृहासुप्त केशरिकिशोरमिव सान्दनिद्र नरव्याघ्र प्रेक्ष्य त प्रभावपरिभूता मूका एवाकृतपादध्वनय प्रत्यावत्तिता । देव, सोऽय राजे दपालविजये कृतप्रतिज्ञ शशधर एवासीत्। देव, कोनाम यमेन रमेत, भुवनभयङ्कर कालाहि करेण कल्येत् , कोमूढ उल्लोलसहन हिंस्रसष्टकुल पारावार प्रविशेत, मत्तगजेनाजि रचयेत् बुभुक्षित सुप्त पश्चाननमुन्निद्रयेत् , अतोऽविदितस्वभावमशक्का स्मो विगतनिद्र कत्तुं' मिति, सैनिकैन्यवेदि । "आ गेहेशूरा भीख औदरिका अपसरत जाल्मा" इति क्रुद्धो गुप्तचर विभागा ध्यक्षोऽभिकोट्टपाल चक्षरक्षिपत् । सच मनोभाव ज्ञात्वा, गत्वा च तन विशदरम्य सूर्यातपतप्तमपि सुरभिपुष्पपवनवीजितमासाद्य भूतावास शूय पर्यक पनेषु लिखितां गीति, दैनन्दिनी चमपेटिकाश्चापत्। सर्वा सामग्रोमादायाध्यक्षाय यवेदयत् । अध्यक्षश्च सर्वा सामग्री सूक्ष्मेक्षिकया प्रेक्ष्य सक्षिप्तविवरणेन सह मत्रिण समीप प्रेपयत्। मन्त्री चापरेा महाराजनुपगम्या त- स तृतीयो निःश्वासः "क्षमस देव, नरेण पादोऽपि विचार्य ममणीयः। अविचारो यसरवृत्तपारद- भक्षणम्, अनग्निपात दहनम्। अलक्ष्म्याश्च निधानम्। विचारो हि भूमियशसः धिया जीवनस्य मर्यादायाश्वः। युविटिप्पमृतयः प्रमतयः पुरा किल विचारेणेवाभ्यासया- मामूगज्यम्, अविमृश्यकारिणां कृते सतोपं जोप विदध्मः । महाराज, यस्य पराक्रमोपक्रम, सौन्दर्यसम्पत्ति बुद्धिवैभवच श्राव श्राव हुयनास, येन सह स्थिरीकृतः कमलाविवादः यस्मै तिलकोऽपि प्रेषितः, यस्मै महीमहेन्द्रेण न्यऋतपश्यारिवाण, प्रगे स्मरणीयनाम्ना, हिस्टनाचारेण तप्यते दिवानिश महाराजनवेन्दुना, श्रूयते शोकलोकमावदन्ती यस्य जननी नितरां क्षीणा, सोऽद्गुलिनचोमिकेव न लक्षितो न- विदित , पादाग्रजलन इव न काय कृत। स एव वीरवारवर्णनीयवीर्यस्य राज्ञो नवेन्दुवर्मणः पुनो विकाशिशारदशर्वरीश्वरमुखचन्द्र. शरारत्वेन राजपुरयासित्वेन प्रकाशितमप्यर्थ वचनरचनया तिरोदधद् राज्यकार्य प्रसाधयितु राजेन्द्रपालपुरं गतः । पश्यचिदं श्रीमलिगित प्रतिज्ञापन गीतिश्च शराघरनिवद्धा । हरसिद्धियात्रा उजयिनी निवेश जगद्विततयशोराशेनवेन्दुपालस्य महनीयमहिम्नो रामपालस्य चाद्यतन. प्रस्तावः परमप्रमोदारसद सम्पद्यते। श्रीमतो सन्तत्योश्चन्द्रकमलयोधन्दमूर्यो यावत् परा प्रोति प्रकाशयतु गुगोल्प । समये विवाहसूनसूनित युगलमेतत् खगेंऽपि न वियुग्यताम् ; युज्यतयायुषा विद्यया, कल्ल्या, प्रिया, सम्पदा यासा। प्रायतुचे मां प्रतिमा परमावन परमेशान। - विषयममुप्रमाणीकरोति- रामगल'1 विमलपुरम् नियमन सस्ते नवेन्दुगल राजनगाम् रघुनन्दन पुरपुरोहित अक्षयचीया १९८० चन्द्रमहोपतौ फुल्लाप्यमन्दमधुरं मकरन्दमूर निष्कासयद्भिरभितो विकचैः पयोजः । पद्माकरेश, नलिनी बलमोपणाभ्यां भोग्या न मानिभिरियं भ्रमरलेभ्यः॥ सम्मान्य मान्यमहिमाग्विलवारिणोऽस्मान् दद्याच्च शिष्टिमुपभोक्त मनाप्तकामान् । गुञ्जन्त ईश गुणिपु प्रगुणान् महात्मन् गायन्त आजिपु भटानिव गाञ्चराम: आवासः चन्द्रः (शशधरः) विमलपुरम् राजनगरम् "अये, किं शशधर एव चन्द्रः” सोल्लासं राज्ञोचे "हन्त हो हो हर्षः।" सम्भावितमप्येतदेवासोद् यदवश्यमयं कस्यापि राज्ञः पुत्रः, परन्तु वृत्तान्तप्रश्नावसर एव नाधिगतः। किन्तु अमात्य, कष्टसाध्यमिदं कार्य, परमो मायावी च राजेन्द्र', सुकुमारो नवीनचाय कुमारः किन्नु करणीयम् । मन्त्री० -नात विचारणा सर्व सुसिद्ध वीरखराणाम् । अणुरप्यमिः कान्तारमन्तयति । साहाय्यायान्ये प्रेपयि यन्ते। आनन्दोदधौ हर्षोल्लासा उत्तस्थुः । निमिपमात्रेण वानभ्रा वृष्टिर्बभूव । वार्ताखाकाश- पातालयोरन्तरमभूत्। राजापि कमलाप्रियसखी मनोरमामाहूय वृत्तमदो व्यशदयत् । * * प्रान्तरे' निस्त्रिका प्रहिः । 'अन्धुरधुनात्मनो जीर्णभावं निवेदयति । तस्य *निपानानि, येषु दर्दुरा दर दूरयन्तो यन्तो स्वन्तिस्म, येभ्यः सहस्रशो धेनवो मृगा शशशल्यकगालास्तृषां शान्तयन्ति स्म, धूलिपूर्णान्युद्गतविटपान्यासन् । 'वीमाहो विहीनः पाषाणाः प्रसूता दूरत एव स्वल्पस्वल्पैः समीरसमीरितैराहाव भवैः क्षुपध्वजैरे- १ प्रान्तर-दूर शून्योऽधा (वियावान उजाड ) २ त्रिका भूण (चमः) ३ प्रहिः- अन्धुः कूपः। ४ खेलकोठा। ५ वीनाहं मुखबन्धनं ( ढाणा आदि)।

, तृतीयो निःश्वासः तत्यमाणमिवास्ति यद् यात यात्रिकाः? दूरत एव यात, एतस्माद्भूयर्द्धनेन पृथिवीसमाकरकूपादन्यथाऽन्धकारान्धीकृतान् वोऽम वृषणदशोऽस्यति । पाधएकः पादपो विपद्नस्तेन कूपेन सहनुभूति प्रस्टयन्निव घ्याणुभूतः स्वशरीरमाप चिन्ताचितायां चिचाय । तस्य महता प्रकाण्डेन सून्यते यदयं कस्मिन्नपि काले शालशासाभिविशालो भवेत् । तस्यैका शिफा काकुय विदार्य निर्गता वेनाल्यन्तिकं प्रेम प्रष्टयति । कूपो मूलादत्तेन जलेनैनं, पादपः स्वसन्छापया चैनं-एवमेतौक दापि परस्परं मुटसम्यन्यावास्तां परन्तु सम्प्रति द्वयोरेव दशाऽतिसार किणः क्षयिण" व चिन्त्या। अन्त' धर्मचटकाचरचरायन्तेस्म । 'वरटानां तन बहु बलमासीत , आन्तभितिषु सपी, छत्राणि महत्या संरययाऽऽध्यायन्तेम्म। ते देशेन कालपाशेन' यमदृता इव विधविश्रुता आसन् । केऽपि तेषां निर्गमनसमये तस्य पार्वतो न टोकन्तेरम् । एतेषां सातत्यवासात् परियं प्रदेश एयापहृत भासीत् । पतशिका धरायोऽपि तेषां मध्ये दत्सु जिह्वे व यथाकधिनिहन्ति स्म । आँ पारावतपुरवा नितरां प्रसमा आसन् । कृपयुक्तकुलायानां तेपामनवरतगृङ्कारः सर्या काननस्थली मादयति स्म । विश्वलानि शिलाशकलानि सम्प्रत्यति पान्थविथमाय विस्तृवान्यासन् । एक: पथिक शङ्कितचित्त इव पमपि कोणेऽन्वेषयभिवतस्ततो वीक्ष्य परत्र- पटकारेण शिलामेका पिशोध्य कूपवेदिकायामुपविरः । मुग्यात्पतता स्वेदाजेन प्रवेग प्रचलता वासेन याय नितरां भ्रान्तः प्रतीयते स्म। यमुपविश्व स्वधावलम्धिनी कन्यामक्तः संव्याप्य पुनरितस्ततः प्रेक्ष्य शनैशनरस्फुट नदितुमारेमे- घहुभिःपरतस्य कान्तिसिहहतरस्य साहाय्यमाचरामि, परमयं दुष्टः केवलं प्रबलमेर मानयति, तस्यैव गायां गायति । एक गूट्राहस्यमारयाति । अहह । दुष्टेनामुना कमलया विवाह प्रतिज्ञातः । अहो? कमिवैनं दुट गर्नु पुरलीनाऽमुलीनं राजकुमारी व्यंसरं वृणीतम्। हन्त ! येनानेन निर्दयं स्वपिनावि परलोक्पर्य प्रापितो विषेण । स्वस्वामिपुती सरोजिनी भगिनीनिविशेषाऽपि दुनक्षिता। समस्मिन् राज्ये चापूर्व 'यशः प्रसारितम् । १ चमचे। शठिया (पीतभ्रमरः) ३ तितली। ४ (यह बहाने लगा-) ५ या पूर्व परय तत् अयश इतिभायः। तस्मा तन्व मन्त्रयति । - ससुख तमपि। चन्द्रमहीपती प्रजापि निष्करण लुण्ठिता बहुश । सतीना सतीत्वऽप्यसदाचरितम् । सोऽय हन्त क्षत्रियहतक कस्य कस्य सुख भङ्ग विधास्यति । भानन्दोत्सङ्गसुप्तान कास्कानुन्निद्रयिष्यति आशाभव्यभवनेषुपविष्टान् कास्कॉश्चर्णयिष्यति। प्रेमपयोधी सन्तरत कांस्कानिमटि प्यति। पर वहमप्येतस्य कान्तिसिंहहतरस्य पितृव्योऽस्मि । निद्रयिष्यामि। तस्य शय्या, यां पुष्पमुकुमारा मनुते, कण्टकाकीर्णा विधास्यामि तस्य मनोरथ व्यर्थयिष्यामि। अधुनाऽहमपि प्रतिजाने। क्मला का रहभूषण न भविष्यति न भविष्यति। किं कातिसिंह एव सौन्दर्यसम्पत्तिमभिलपति वयमपि वान्छाम , नहि वयमेव वाञ्छाम । अद्यैवाखादमाखादयतु दुष्ट कान्तिसि एतस्य लालसाद्रुमस्य। प्राणानविगणय्य, अपयश प्रसार्य, कुलरीतिममिसात्कृत्य मर्याद सम्पर्य व्यसकता व्यसनीकृत्य यस्य कार्य साधयाम , स केवल स्वमुख एव सक्तोऽरमान पश्यति, तदास्माकमपि कर्तव्य यद्वयमप्युचित विधारमाम ( सम्मुसमवलोक्य ) अस्तु अधुना वीरवरप्रवलौ समागच्छत सावहित्य तिष्टामि। ( तयोरभिमुख) मया ई विचारित बहुसमयो भूत , अद्य नागमन सम्भाव्यते । किमस्माकमपि कार्यक्रम परिवर्तते । अपि सूर्यसिह ! देव समायात सूर्य-नहि। अधुनायावत्त तेषां सूचनैव न समागता। प्रवल०-तेऽपि समायाता एव । उपविश तु क्षण श्रममपनुदाम । एते यथा कथामुतार्योपविशन्ति, तथा कान्तिसिहोऽपि समायात । इतश्च कपटपटना पाटव प्रक्षितुकाम इवात द्रश्च द्रोऽण्याकाश विभासयामास । प्रबलपरिशोधिते कूपशिलातले स्थितिमता क न्तिसिंहन तेपा बभूवुरालापा 30-तदिने तु देव ! अस्माक कार्यमल्पेनवायासेन सिद्धम् । वीरवरश्च तुष्ट । सम्यगवसरत्वेव लब्धो यत्तनत्यो गजकुमारोऽसूचयित्वैव क्वपीत आसीत् । सर्वे प्रहरिणश्चेतस्ततो व्यग्रा समासन् । प्रचुरोरा प्राप्त । कान्ति-परतश्च यदाज्ञप्त तत्कृतवानसि पिम् । प्रबल-आ देव ! कानिचिद् भूपणानि तु वीरवरस्य मातुलेयभ्रातुरानीतवन्त १ अहित्या-आकारगोपनम्। २ प्रोग्राम। ३ थैला । वीर०-साधु। प्रवल..

तृतीयो निश्वासः एर। अपराणि च पत्रभूषणानि सनानि । देव । भानन्दस्य भवद्विवाददर्शने महतीन्टाऽऽसीत् । परन्तु स वराको विवशेखरप्रहारमवद्ययन् मृत एव । कान्ति-(उन्मना इव) माँ नवीन एवाधीत्सः। आपातच तस्य मार्मिक भासीत् । पान्तरमाकं स्टे उन्मृत्युना काचन हानि भून् । वोर ? त्वमपि कृत्यं गृतवानसि। ... वीर०-समये ऽह गतः परन्तु यस्मै कार्याय प्रेरितस्तत्तया न कृतवानस्मि । दिवासमयः, सतर्का, सास्त्रशस्त्रोभयत सजा गरीयसो सेना। यद्यपीयस्यवि समदेहा दृष्टिनिपतवेत्तदवश्यं प्रणानामेव सशयः, अत केवल मददयेव सूर्य देव ! कमलाया शैशव एव स्थिरीभूतो विवाहचन्द्रेणेति तु विज्ञ'तमेत्र । तद्देव ! किमय कस्यापि सुरां भज्यते। मुधैव परलोकमनालोकायते । एतलोकं फलदायते, पाश्शता योषितः सौन्दर्यदयों माचरणरेणुं जिघृक्षन्ति ; व्यर्यमेव कमलाकाकलीमायिनुमाफुलीभूताः स्य । कान्ति--सूर्य पहु विमृशानि। सर्वतः प्रथमं मनोरमया सह मरुत्तरारूढा भूगर्या युवती कमला मया दया । कीहक् कौशलं कीरशी क्षिप्रकारिताऽऽसीत् । वरपाश्चिक कपोलपाली, कोमलोमनाभ्यां कराभ्यां मुशुण्डिकारलनमद्यापि ममात्योः पुरतः स्फुरतीव । तत एव विमुग्धम्मलादर्शनेन सुधामधीरयता मुखेनाइमन्य एव संहत्तोऽस्मि। चिरानाप तनैव मृगय वन पितवानस्मि, परन्तु हन्त, पुनः खा परिषयमेव नोपेता। अहं व्यचारय यन्मम दशा सर्वदेवेशी न भविष्यति, समपेन समासादितप्रसादो भविष्यामि, पामाग्येनामिज्जालेव एषते। विचारयामि चदेग मह तस्या विवाहा थिरीमतो, योम्योऽय राजमारो बोरक्ष । स्यापि मुरास्यान्तरायो भूरिति मानरां मां मुहुर्मन्त्रयति । परं किं घुयाँ तस्याः प्रतिमूतिः प्रतिक्षणविलक्षणा स्वप्नेऽपि साम्मुख्य न मुमति प्रबल:- मध्याव) न मोदति च। देव ! प्रतिक्षात वीरा न परित्यजन्ति । बीमारंपन्ति। धीर.देवोऽधारममेवीदमोन्पमालम्यते । मया तुरीयं सम्यग् विपरितम् । •-शिमिर....... मारम चद्रमहीपतो वीर०-मयाद्य श्रुतं यच्चतुर्ध्या रामपालस्य जमदिनम्। अस्मिन्नवसरेच विशिष्ट भोज्य मद्यरानादिकश्य कान्ति-सत्य, ( हर्षेण प्रोच्छरच्छरीर ) अस्माक प्रयोजन मुसिद्धम् । क्षत्रियकुरे एताइगासरे सर्व एव मदमत्ता भवन्ति विशेषतो दासीदासम् । धीर०-ओं, तदपि सर्व विचारितम् । हर्म्यस्योत्तरहरिति विविक्त कमरावास स्तनपभद्वारलोहदण्डे' गोधापाशमायोज्य सुखमुपरि शक्यं गन्तुमिति न कश्चन दासी दासयोर्भयो । केवल चन्द्रिका मा शिथिलयति कान्ति०-कि भयम्। अनुनिशीथ गन्तव्यम् । एपोऽवसर पुन ने लप्यते । सूर्य। तथापि क्थन कस्मा अप्यवसरायोचित नाम, परन्वरे ! -यस्या यौवनमपेक्षमाणो हृप्यन्नास घटितानेमनोरथो विस्मृतमान्सस्त्यक्तापरकार्य केवल तत्प्रदक्षिणाय मेवास सव क्मला दुग्धमक्षिकामिव मां दूर प्रक्षिप्य बद्रेश रतुमना मुखमनुतुभूपति । किं तसुखमह सोढुमर्हामि नहि सूर्य -तद्युपित विधास्याम । पापाग व पापाणप्रतिशोध विधाम्याम । यधाज्ञाप्यते तथैवाचरिष्याम । वी1 क कार्यक्रमस्त्वया निरधारि । चीर-सप्रपलोऽह तन गमिष्यामि। सूर्यश्च प्रामाद् दहि समरुत्तरो मिलनु सूर्य । वायुप्ल्वोऽप्यानेय । * * . प्रात पौरा पवमानसेवनाय पुराद् यहि प्रयान्ति । नगरसीम्नि विशदमधुरजलो विकासिकुमुदिनीविशोभी हदो हादयति जनानां मन । विमलतरङ्गशीकरशीत समीरण , मधुरमधुर स्वन्त पक्षिण , चलला द्रुमाश्च निरोज स्वपि विनोदप्रमोदस्य भावमापादयति। अद्य राज्ञो रामपालस्य जन्मदिनम् । वर्णाश्रमीया इतरे च राज्ञ प्रासादे भक्ष्य ते न कस्यापि गृहेऽमिप्रज्वाल । राजभोज्यसजायै सर्वे सजन्ते। केचन भङ्गा पिवन्ति । १ चौरा लुण्टाकाश्च भवनारोहणाय गोधायुक्ता रज्जु मुत्क्षिप्य तस्या भित्तिदिलष्टाया तदावद्धरज्ज्वाभवनेष्वारोहन्ति । २ वायुपूर्णों जले प्लवनतरणसाधन 'लाइफ्नोट" इत्याख्य ।

चन्द्रमहीपतो मन्तीयते। क्वचन पुरोगेन पौरोगवेन' जनगीयमान यशो भोजनप्रशमा श्रूयते । पटोलशाक', कूष्माण्डशाक, वास्तुकशाक', कर्कटीशाक, मूलकशाक भेण्डाशाक, वृन्ताक, गोजिह्वाशाक', महाकोशातकीशाक, कालिङ्गशाक, कारवेलशाकार, आलकशाक ३, नपुषशाका दीयता देहि, आनय, अल, गृहाणेत्येव श्रूयते सर्वतो ध्वनि । घृतपदा गवानफलिनी'५, करीरफल १६, पर्पटकश्च७ परिवेषित -भोजनयज्ञस्य पूर्णाहुतिर्जाता। पचतमजता पखादरापिवता, आहरभुदवा, हसतमोदता क्रमश उपरता । लब्धावसरा क्षणदा दिनपतिमस्त विज्ञाय स्वाधिपत्य तेने। निशानाथोऽप्येकाकिनी प्रयतमानां प्रिया प्रेक्ष्य सद्य एवोदयगिरिमारोह। सच्छासकप्रसन्चे जगतीच कलानाथ विभासिनि नभसि दैनिककर्मश्रान्ता मृत्याश्चन्द्रिकयाऽऽल्हाद्यमाना , सद्यो निद्राऽङ्क भेजु । . * * दूर एव तिष्ठतम् किं न जानीय इद नितरा श्रान्तौ ख , प्रहरी हम्यमभित शिथिलमर्याद सालस गतागत दुर्वेश्चन्द्रप्रकाशे दृरत एवायान्तौ द्वौ नरौ दृष्ट्वाऽऽह-"को महाराजशयनगृहम् ।" "प्रहरिन् । विदुरप्रचलनेन नितरा श्रान्तौ स्व । किमिद महाराजशयनगृहम् । सत्य न जानीव ।। "कुनत्यौ युवाम् , वेशभूषादिभिरनत्याविव प्रतीयेथे।" "प्रहरिन् । अस्यैव देशस्य प्रियौ पुनावाख परन्तु हन्त ? दारिद्रयदुर्गतौ परदेश एव वद्धितौ शिक्षितौ च । भ्रात प्रहरिन् । बहुकालेनापीत वर्नते तमाल सम्प्रति क्वाप्यग्निर्लन्धु शक्यते । मूर्स प्रहरी अनभिज्ञश्च चतुरससारस्यैतयोर्वात्त या सकरुणो जात । एक्न धूमपाने" तमाल न्यधायि , प्रहरी च हसन्त्यार वहिमानीतवान् । पूर्व धूमपात्र प्रहरिण एवोपहृतम् । स द्विस्निस्तद् वलेनाकृ'य मूच्छित । एकेन विहस्योक्त, "प्रबल ! मूढ १ महानसाध्यक्ष , २ परवल, ३ कोहला, ४ वथुवा, ५ ककड़ी, ६ मूली, ७ भिण्डी, बैगन, ९ गोभी, १० घीया, ११ मतीरा ( तरबूज ), १२ करेला, १३ पाल, १४ पीरा, १५ गुवरिफ्ली, १६ कैरिया (टीट), १७ पापड़, १८ सर्वन मयूरव्य १९ चिलम, २० सिगढ़ी।

तृतीयो निःश्वासः ५६ कथं जिहामचर्परायदधुना वेतस्य पुत्रोऽपि नोत्थास्यति । निद्रितसर्वजनं दृश्यते भवन, स्वरस्य । अहम नव वा प्रतिपालयामि। त्वमुपरिगच्छ"-इति । * * सहस्रनगर्वगर्व लुम्पतोऽर्वतः कौतुकाद्वामपाणिना, कविकासणकारेण वल्गामाकृप्या- वतीर्य, वृत्तोलः शिष्टविशिष्टरधिष्टितं कौशेयवितान, अगुवन्द्रवत्तिकासुरभितं न्यव्यतामर- राजकुल, प्रविश्य राजकुलं, साभ्युत्थानं साञ्जलि साशीनिर्देशं सत्कृत उपराज वासन- मलचकार चन्द्रः। "मान्या., जनस्योत्सुकतामालोच्याभ्यथितो महाराजकुमारश्चन्द्रोऽद्य स्खयानावृत्तान्त- मस्मान् श्रावयिष्यति । भवन्तस्तेन लाभान्विता भविष्यन्तीत्यहमाशासे । उमारो वृत्त विशदयतु-"उत्थाय मन्त्रिणोकम् । स्मितजितज्योत्स्नचन्द्रः परितः प्रेक्ष्य प्रवक्तुमारभतः- अहः सायः समीपमासीत् । गोपालगुप्ता गायो बनान्तराद् रोमन्यायमानाः फनायमाना ग्राम प्रत्यावर्तन्ते स्म। काश्चन वृषस्यन्त्य उत्पुच्छ्यन्ते स्म, काथनोदन्यन्त्यः शरीरगौरवेण गुयोऽपि मन्दा गति विहाय पाश्चत्यं प्रयन्तेरम। इतरा क्षीरस्यता शिशूनां प्रबलप्रेम्णा सवद ग्धा विरावारम्भं रेमन्ते स्म। तासां खरोभूता धूलिराकाशे श्यामपटेव प्रतीयते स्म। क्षेत्रसीम्नि स्थिताः कृषका. सारनेनैस्ताः पश्यन्तिस्म । गोपा अपि तासां पतिवद्धनालने सयन्नाः प्रेक्ष्यन्ते स्म। वेषां स्वल्पीयसाऽप्यनवधानेन ताः परदण्डानां कटुवचसांच गोपैः सहैव लक्ष्यीमति रम। गोपक्त पश्चात् कालिग्ना काकनिकरमपि तिरस्कुर्वन् निशितखुराप्रै मुंव विल्सिन् गम्भीरतरस्योष्णवासश्वसनेनाधीरधैर्यमपनयन् विशालविषाणमारेणेव नतशिराः प्रलम्ब- पुच्छनुच्छीकृतदण्डः प्रतिपक्षिप्यो वनमक्षिक प्रक्षिपन् वदनविगलितफ्नैर्धरां तारवितामिव कुर्वन् सालसं मन्द मन्द चलन् महिषीसमोऽपि गर्दा व्यूह व्यपोहतिस्म । स्यूलममृणमहिपपृष्ठे हस्तमाधाय नियामस्याटका कक्षे फलयन्तो वेणु रणयन्तो गोपा अपि मधुरमधुरमशिक्षितपाटवं गायन्ति स्म। केचनाऽऽदत्तभिन्दिपालाः गोफण करे कलपन्त, कृषीवलाला. स्ष्टकाकीर्णजीर्णशीर्गवाससः पापाणक्षेपणविभीपिकया पक्षिणस्वासयन्ति स्म। केचन शिरोधृतपासविसरा सत्वरं सत्वरं गृहप्राप्त्यै प्रयतन्तेरम ।

धेनुकेन। चन्द्रमहीपतो चतुष्पथे स्थिता ज्यायास आयतीगव प्रतीक्षते स्म। क्षणेनैव ग्रामटिका व्याप्ता गवा पृष्टपरामशिगा हस्तेन ध्वनिमत्यभूत पल्ली। आसीच तिष्टद्गु मुतने होपस्नुता पयखियो धारासारेण ससार सतर्पयामासु । अहमपि तेनैव सार्थेन तच्चरणरेणुरूपितपवित्रगात्रो वाजिनमारूटस्तस्यामेव ग्रामीण ग्रामण्यो गृह गतो भुक्त्वा सर्वा विभावरों यापयित्वा, निकट एव तपस्यत कस्यापि महाप्रभारस्य साधोईत्त ग्रामीणेभ्यो विदित्वा तद्दर्शनोत्सुकोऽश्व ग्रामण्यो गृहे “यस्य पदातिरेव गहन कानन प्राविशम् । खगसहायो विच्युतपथो निविडतरे हिसकविहारभूमौ वनेऽस्मिन् सव दिनमतिबाह्य निद्रे सुर्महात पादपमेकमारुह्य विभावरीमत्यवाहयम् । प्रातरान देनेव तिग्ममह साऽऽच्छादितामु दिक्षु उत्तनशिखरमारुह्य दृरवीक्षणेन गव्यूतिपञ्चके उपगण्डशैक तपन्त कञ्चन साधु दृष्ट्वा देवा मनस्येव नमस्यन् , कण्टकाकीर्णसर्वाङ्गो विशिथिलसन्धि सापड्कालतोऽर्वागेव तनागमम् । महात्मान परितोऽन्तेवासिन इव व्याघ्रसिहशार्दूला मृगवच्छादलमध्यास्य स्थिता मां वीक्ष्य सकृदुत्थापितकर्णा पुनरवनतशिरसो मा प्रणमत इवासन् । अह तेपा मण्डलमतिक्रम्य मध्ये परिष्कृतभूम वुपाविशम् । रम्य शा त वातावरणम् । सम्मुखमेवैका स्वल्पीयसी फुटी गण्डशैल कर्त्तयित्वा कृता गुहा, स्वच्छो निर्भर सम्मुखञ्च मुने स्थितिभू । पशव आदेश शुश्रूषव इव मौना अभिमुनि स्थिता असन् । महाल्मन शरीरमस्थिमात्रमपि तेजोवितानमिवासीत् । लम्बम ने हिमवले फमणी प्राशु शरीर प्राचीन कालस्य स्मृतिञ्चधुश्चत्वरे चित्रयते स्म । विशाल उदग्रा घोणा प्रलम्यौ को शशिश्वेता जटा साभ मुखमण्डल पश्य रतेन जातिदेशकुशलनामानन्तर कार्याय पृष्ट सर्व सत्य सत्य यवेदयम् । महात्मा-वत्स, दु साध्यमिद कायम् । खञ्चातिमुकुमार । अह् सत्य देव, तदपि राष्ट्रस्य रक्षा स्वस्य जीवनदानेनाप्यवश्य करणीयैव । महात्मा-विषयेऽस्मिन्नाह विशिष्य वेनि। श्रूयते राज्ञो राजेद्रप रस्य परमा सुदरी विदुषी वीरवरा क या, सा कर्मण्यस्मिन् विशेष साहाय्य कत्तु समर्था । -प्रोचरणौ प्राप्यापि विफ्नो भविष्यामि कि देव ! स्थानम्। भाल तृतीयो निश्वास महात्मा--zणु, राजेन्द्रपालस्य राजधान्या पार्श्व एक निवि- वन विद्यते, तवस्थान सिंहान् हन्तुमना सा प्रत्यहमति। कार्यमदस्व तन तथा साधय यथा सा प्रसीदेत् सा प्रसन्ना पितर प्रमादयिष्यतीति । दोघाही निदाघ । सूर्यास्ते घटिकापटकावशिष्टो दिट । विराज वासेनेत्र श्वसनेनोत्थापित रज पथोऽजातीकरोति स्म। नासानलिकामु कपोलयिष्य, पोरगत्तपु, निपतदनो म्लेच्छानपि हतेच्छान् करोति। पार्यवस्त्वपि स्पशेण परिचीयते। परम स्मानिदायमजितधरापृष्ट आपाटस्य प्रथमपनो न्यपतत् । अमेक विशाल महाशाल नगर दूरादेव दृष्टवान् । पूर्वद्वारे धृतभुगुण्डीको द्वारथौ समयाद स्थितावारतम् । क्षणमह तो सजीवावेवाचिन्तय, परमचल नेत्रपाभ्या श्वासानिर्गमनेन निपतद्रजोऽनपायेन चनिनीयौ निश्वित्व शिल्पिनश्चात्य विस्मित पुरो व्यचरम्। नगरे सर्वन सादत पिवतो विपणिषु क्रयविश्य कुर्वतो वेश्यग्राहकान् त्रिय पुरुषान पक्षिणश्व पापाणमयानपश्यम् । रानी द्याने च महीरह सपनपुष्पफ्लान् दूर्वा लता पपणमप्यो, बाप्या तागाधारि जलय पन्मयमपश्यम् । रात्रिज्ञाता, सर्वस्मिन्नगरे नेकत्र वार्ता न प्रमाशो नशब्द। नगरानहि प्रोचे सैरते मुप्त्वा प्रातत्याय पुरप्रेक्षणोत्सुको दुर्गे प्रदरिणी हरिप्रणहरिण करिणय पश्यन् विशाल राजभवनः प्रविश्य, परितो द्विरदरदनेषु मुरक्षिण कलितविविधरूपा भूपा, पा' वीररसस्य भुको भत्तर समाजिरे रमसीना सनापतयो मन्त्रिणय, मध्ये मरकतसोपानाया वेदिकार्या सिंहासने रमपमान नृपय वीक्ष्य हम्यं प्रविस तनच मध्ययावरे करत केशान्ता प्रमाधनिया देशान् प्रसाधयन्ती सम्मुसमुकुरवामीकृतवामनवा उचनिचय प्रेक्षमागा, पुचाधेगर दम्पर म्यादतयाऽनोहये पेक्षमाणामन पशि पनिमिता त्रिभुवन मुन्दरी रामारोमपश्यम् । पुन यमालनीमालिन्य तेने तिरोहित सरदण्ड प्रचन्नो मातंन्ट । रमाशोदा दिशोऽवसर प्रघ व्यावे प्रभवम् । पूर्वयुविशयि, किन्तु समप्रदिनय्यधियोऽ- पदमियो मम निद्रापि मोलेर नाम माययो। भय निशीथे कयरप्यालापन नाचमपररयम् । पणत शस्यसम्पन्नाया चन्द्रमहीपतो प्रथमा वाक०-पश्य देय दशा पुरस्यामुष्य । परिवर्तनशील जगद् विनश्वरा उच्छाया। द्वितीया वाक०-नगरस्य समृद्धि विद्यावैभव यदा स्मरामि, विकम्पते पेत । राज्ञोऽस्य न्यायप्रियता, प्रियता प्रयता' प्रजाया, जायाङ्कीकृतरते २, रते पत्यु परिभावकस्य कस्यापि विषुधवर्यतां नियामयतो, मयतोऽधिविदो वास्तौ, प्रजापालन व्यवहारे लोकोत्तर एवासीत् । परन्तु हन्त, सा सिद्धि कथयापि नावशिष्ट। प्रिय, कि विस्मयते राज्ञ उपवनम् । प्र० वाक-तदपि कि विस्मर्त्त शक्यते, स्वर्य फलपूर, पूरक पतत्तिजठरपिठराणा विविधा लताश्च परिमलेन मलिनानपि मोहयन्त्य आसन पर वर्तमानेन राज्ञा सर्व चरित्र मानीकृतम्। सोऽय प्रतिक्षण युद्धवातप्रिय स्वकीय पुरमपरस्मिन् मार्ग निर्मायेद पुर जगतो भ्रमाय पाषाणेन प्रकल्प्य सततं युद्धाभ्यासनिरतो जगत ईश्वरतामभीप्सति । श्रूयते एतस्य कन्यैनमस्मिन् कर्मणि नियोजयति शास्ति च। यदि कश्चन चतुरस्ता राजकुमारी सत्पये समानीय युद्धमार्गात् प्रतिनिवर्त्य लोककल्याणे योजयेत्तदोन्नति हस्तामलकवत् सुलभा। राज्यायत प्रतिशत नवतिमुद्रा सैन्यप्रसाधने व्येति। यदि स धनराशि जगत सेवायै शिक्षायै समुन्नत्यै चीयाच्चेद् वर्षपश्चकेनैव स्याद् गरीयसी सद्व्यवस्था-इति रुद्धोऽय वाचा प्रसार । अह मासद्वयेन नगरस्य, राज्ञो राजकुमार्या प्रदेशस्य च रहस्य विज्ञायैकदा मुनि वचनानुसार पार्श्ववन प्रविश्य सूक्ष्मेक्षिकया तन पञ्चाननस्थिति निश्चित्यैकस्मिन् प्रोच्च तरी सजशस्त्रास्त्र उपविष्ट । अपराहवेलायामाखेटवेशा कृष्णावा वचतुष्क्युताप्येकाकिनी अनिन्द्यसौदर्या मुन्दरी वन प्रविवश। श्वान सकेतैराखेट समीपमेव घोपयामासु । सा सनद्धाऽसिं करे कलय ती सतर्काऽभवत्। अहमपि शरासेने शरमायोज्य प्रतीक्षायामासम् । अकस्मादनल्पक्रोधो निशितद्रष्ट्र सिहो नित्यवैरिण्या वधाय कृतसङ्कल्प इव गर्जन् सत्वरमेकस्माद् गुल्मान्नि मृत । मृविकणी लिहन्ती तस्य जिह्वा सत्वरमेव मानुपरक्ताखादलोलुपाऽवर्त्तत: सोऽमिसुदरि प्रस्थित । सिंहदर्शनसमकार मेव १प्रयतापविना, २ जायाया अडीम्ता, पुनीत्वेन रतियन स तस्य, ३ कस्यापि - ।

- तृतीयो निःश्वासः बिना मुन्दरी तस्या अवश्चाप्रपादावुत्थाय एलादिनुमना इकोटिमः संवृत्तः। सिंहोऽभ्यक्षमा भावश्च वेगेनारोहिणीमुन्सिप्यक्तः प्रययौ। याखेटवित्ता मुन्दरी च भूमी- प्रमृता। सिंहथाप्रपादानुत्याप्प गुन्दात्तनः राकरणं वीक्षितो यावदने प्राचलताद- देव महापरिक्षा करणं क्रन्दन घरामधासीन् । एतत्सर्वमेस्मिन्नेव क्षणे नावम् । देवि, कालमस्मिन् वीरमयहरे वने एकाकिनी मूठुलतानुलताऽऽत्मानं सन्देहसिन्धी निपान्य भ्रमसि, तत्त्वानुरूपम् । निवेदय यत्र त्या प्रेषयामि, वच तब पितरी कयं पयो प्रटासि" -वृक्षादातीर्य तस्याः संशयमपहरता विनीतेन मया न्यवेदि । "अहमन पार्व यत्तिनो राज्ञो राजेन्द्रपालस्य पुत्र्यस्मि, युद्धाभिरुचिरहं सर्दवाखेटार्य- मागरवानि। बहवः सिहा हेल्यैव मा निपातिताः, परन्नु हन्त, अयानेन नवीनाश्वेन मुषितारिम। समये यदि भवान्नागमिष्यदहमवश्यममरिप्यम् । अधुना जीवनदानृत्वना- हेत्तमोदय याख्यात्वमिज्ञानम्”–वनखण्डेन स्वेदं पुलियापनयन्त्या मुन्दयाँचे । "मा एवमलं वात्सल्यमावर्ग महिलाममाजे जन्म लम्वाप्यः हिरातकोलमिल- सेति गहिनं कमाङ्गीकृतवत्यसि तत्र रिमु वक्तव्यम्। नहं शान्:िमुधारता मे वाचं भवत्या पदालापेनोत्तेजविप्यानि, सम्यो याम्यहमधुना, श्रीमती चेत् सामिलापा गन्तु विभूतोऽयमय भारयागच्नु", अश्वाभिनुसं प्रचरता मयोचे साच नितरा विनीताऽऽमारं हृदयेन प्रदर्शयन्ती परिचयाय मुहर्मुहुराडपाइ। अत्यावोचम् । देवि, समातिपातिनी के प्रत्तः। पश्य सनि युद्धकमपि प्रत्तायां का दशा तब देशस्य । सर्व एव विभागाः नाममात्रमासते। एकदाहं तजिज्ञासया तव नगरपर्यवतमाय नगरपालिकाया भायमार्गः सम्मानोऽति, किन्तु कोचावादाः कर्मकरा चतुर्षमागमेव संगन्ति । नगरस्य रप्या राजमार्गाः ममा न कोऽपि पर्यवेक्षते। फेवलं प्रासादमार्ग व मुमगः परलः स्वच्छपवति। रथ्यामु गत्तान्यासन् या पार्द- दार्ग मलगमजसमागत्य रयानिवामिना स्वारस्य दूपान् दुर्गपिता प्रसारयति । रप्या नितरां विग्नाः। महमूहानि प्राचीन हतो हवं हसद्धमने निस्तानि सन्ति । मन्ये पोपदिनाधिकरण इत्यो महीला गृहपतरिच्छानुसारमनुदानन्ति । पेन रप्पना सौन्दर्य मुगमदा व प्रासति। राम्रो न प्रान्य प्रबन्यः। केवलं पर- प्रतिटनमस्पानामधिकारिपार महानि परिप्रतिटनेन प्रमान्यन्त। इतरे विश्वप्पन्ति । प्रत्तः ।

दशप्रस्थ चन्द्रमहीपतो यदयमेतेपामेवाधिकार । प्रधानमागप्ववकरस्य कूटा प्रेक्ष्यन्ते। न कोऽपि भद्रपुरुष प्राणायामाभ्यास विना तेषु मागषु पन्तु शक्नोति। वराकास्त मार्गस्थायिनो विविधचर्म रोगपीडिता गतचक्षुषोऽहर्निश कण्डूयनपरा मशकमक्षिकानिवारणमारणपराश्च खस्यैव दौभाग्य दुष्कर्मताञ्च स्वीकुर्वन्ति। नगरे वराकवालाना पोषणाय मोशालैका पौरप्रतिष्ठान स्यास्ति । गवा द्विशती तत्र दुह्यते परन्तु सदस्याना शिशव त्रियो भृत्या गोशाला कर्मऊराश्च पय पीत्वा शेषस्य पयसो दधि विधाय नवनीतच प्रधानसदस्यगृहेषु प्रेष्य केवल मुदश्चित् परिचितशिशुन्य प्रदीयते येषा मातर सदस्यगृहेषु नि शुल्क कर्म कुर्वत्यो विशेषाज्ञा लभन्ते। एव तेषा नाम विलिख्यागष्टाङ्क गृहीता तत् श्वेत जल दध्यम्लमिश्र तेभ्य प्रदीयते। नगरस्वास्थ्याध्यक्ष प्रधानो नगरवैद्य प्रतिदिन प्रस्थनय नवनीत पयश्चादाय पौरप्रतिष्ठानानुसारि स्वास्थ्यविवरण ददाति। तेनैवादेशि यत् प्रातःकालिक पय प्रवाहिका करोति, अत शिशुभ्य उदश्विद्दे यम् । आदेशे चास्मिस्तस्य खार्थ सदस्यानाच हित सन्निविष्टमस्ति । दयनीयेय दशा देशस्य । पाठशालाना नैव साध्वी व्यवस्था। अध्यापका अपसमये समायान्ति । आगत्यापि केचन विश्राम्यन्ति, अपरे वासासि प्रक्षालयन्ति, केचन पर लिखन्ति परे छात्रेण गृहादानीत भोज्य भुञ्जते, इतरे मिनै सहालपन्ति । केचन कृषिसरक्षणाय छानान् प्रेषयन्ति, अन्ये गृहकार्यसम्पादनाय, मध्ये मध्ये · कोऽपि कदापि विनरूप कोलाहल कुद्भ्य इछानेभ्यो दण्डचपेटादिक दत्त्वा पुन खकायें लगति । अधिकाकोशी शिक्षक श्रेष्ठो गण्यते। योम्या शिशवस्तन खबुद्धि व्यर्थ यन्ति । अहह आत्महत्येयम् । लोकस्य भावि य आशा एवं दुर्व्यवहियन्ते। स्थाने न वायो, न प्रकाशस्य, न स्वच्छताया प्रबन्धोऽस्ति । यन तन चलाना सिघाण, शिक्षकाना निष्ठीवनच प्रसृत वर्तते। भग्ना पट्टिका, खण्डितानि मपीपानाणि भाभुनानि पुस्तकानि साट्टहासमध्यापकानां सूमेक्षिका प्रसारयन्ति। धृत, राज्यस्य शिक्षा- विभागीयनिरीक्षक प्रतिवर्ष समेति। केवल तस्मिन् दिने वणिगागारतो मार्जनी समानीयते, पुन सा मुख्याध्यापरस्य गृह नीयते। तहिने प्रतिवाल मुदै का शुर्व गृयो तेन स निरीक्षको मधुरभोजनेन पुरस्कारेण च प्रसाधने। एव गृहीतवलि सोऽदृष्टशिशुगपि अध्यापकानुमोदित शिशूनग्राक्षामु करोति । योग्या वराकयाला ।

तृतीयो निःश्वासः बाणानां विपाकगोलकाना वमानाचावस्यकता। जगन्धान्तिमभिलपति। जगतो जीवनेच्छा प्रवला, एतादृशे जगति न भवादृश्या आवसकता। "क्षण विनम्यापराधिन्या अपरान मर्पत्वार्यः। सापराधोऽपि परितप्यमानः सामुभिरयश्यं मर्पणोय एव।" "क्षणिके परितापे को विद्वान् विश्वसिति। अद्य मृत्यु- सम्मुखमुपलभ्य श्मशान- वैराग्यमिव परितप्य पुनविस्मृत्व स एव पन्यास्तदेव चन्नम्।" "देव, सत्समद्य पर्यन्तमहं युद्धाभिरुचिरासम् , कन्याप्यहं पितुः पुनस्थानीया विवं विजिगीपुरारा, किन्त्वद्य भवद्धिनारमाकर्ण्य युद्ध त्यक्त तसङ्कल्पास्मि । मम पितू राज्ञो गजेन्द्रपालस्याहमेव युदपरामर्शदात्री, अहमेव बहून् राज्ञो विजित्याधुन! रामपालेन योडुमुद्युक्तवतो। परमद्य विचारः परिवत्तितः।" "तिम्ममहसा वीरवरेण रामपालन सह भवत्या युद्ध सर्वयाऽसमीचीनमासीत् । एतत्त्व न वेत्सि। अहं युद्धभयङ्करं रामपाल शनाप्नविचक्षणा तस्य चमूच सम्यम् वमि। तेन युद्धे निश्चित भवत्याः पराजयो हवामलकवत् प्रत्यक्षम्। अहमैहिकी सवा शक्ति विज्ञातवानस्मि यत् कीदृश सार श्रीमती बहति ।" "शान्त पापम्, अह भगवन्त सूर्यम् , परितः स्थितान् पादपान् वनदेवतां जीवनदातार भवन्तच साक्षित्वे न्यस्य क्षत्रियसर्वस्व धनुश्च स्पृष्ट्वा प्रतिबाने यद् विघसनात्मक कार्य विहाय राष्ट्रोन्नत्यै सर्वात्मना लगिप्यामि। नुप्यत्वधुना देवः।" "नितरा प्रसीदामि। अस्तु, अनेरमै महते कार्याय वृत्तसपोऽविलम्ब यामि, देवो दटयतु तावकोन यलम्।" अप्राप्तोत्तरोऽह श्रीमद्दिशि प्राचलमिति । जनानन्दिने चन्द्राय साधुवाद वितरत्सु परिजनेषु “चिरजीव, बुद्धिवल विमृश्य नितरा प्रसीदामि" हापि मुमता राा प्रत्यपादि। "परन्तु पुन, इतोऽप्यधिक गरीयः कार्य समापतित येनाह विषीदन् बक पुर. स्थानुश न शनोमि। नैतस्मिन् कायें त्वत्तोऽधिकं कमपि परयो रानी मनोरन्या सह चन्द रहे मुप्ता कमला प्रावन तावक सन प्रक्षे। लधा चन्द्रमहीपतो परित्रमन्त प्रहरिणश्चौराणा मुयोगाय सूचनायै च चरन्ति । कस्यापि विपनि मनस्य विपद्विवरणमपि नीलिख्यते विनोत्कोचम्। सतीनां सतीत्व, धार्मिकाणा धर्मः, धनिना धन, सुजनामा सौजन्य भयाभिभूतम्। किं भावीति विचारे सर्वेऽस्थिर बुद्धयो नोन्नति कर्त समर्था । किमेतस्योत्तरदायित्व त्वयि नास्ति । केवल युद्धकर्मण्यतिप्रवृत्ता समृद्ध सम्पन्न देश व्यकार्षी 1 यदि कश्चन निष्पक्षो न्यायालयो भवेत्त्वा देशद्रोहापराधे आजन्म कारावास प्रापयेत् । परन्तु मा नाम भूदन तव कारावास , भगवान् जगदीश्वरोऽणुकणसन्निविष्टस्त्वामवदय दण्डयिष्यति । थ्ण नाधुना जगति कोऽपि युद्धमभिलपति। सर्वे शान्तिसुधा पिपासव शारित वार्तामेव शुश्रूषन्ते । निरवधिनिखच्छिन्नशान्तिप्रिये पविने भारते पुनारक्तकणान् प्रसारयितुमीहसे! नाधुनाऽणुवमानामावश्यकता। जीव, लोकजीवने च सहाया भवेत्येव प्राणिवर्गस्याभिलाष । परन्वमधुना लोकसहारकृतसङ्कल्पेत्र शस्त्रास्त्राणि निर्मापयसि। कस्य कृते! साम्यवादस्य प्रबलधारया समाप्लुतेऽस्मिन् जगति तव साम्राज्यवादस्याहैतुक आश्चर्यकर कदमिलाप हास्यास्पदम्। जर्जरीभूत साम्राज्यवाद सहैव स्वैरनुयायिभिरर्थवादादिभिधीयासमाधातमेव प्राप्य विनाशाम सज्ज इव स्थित । किं भवती कस्यापि विवेकवतो हृदये साम्राज्यवादसामन्त वादार्थवादान् प्रति श्रद्धा प्रेक्षते !! "परन्तु देव, एपा प्रवाहपतिता नौरिवाधुना महता वेगेन प्रवहति विचारधारा, किन्तु क्षुद्रोऽस्य कार्यकाल । एषा धारा न चिर स्थातु समर्था । शीतत्वमिनाऽवश्य दूर क्रियते सकृत्, किन्तु स्थायिनी स्वाभाविकी शीतता न सर्वथाऽपहत्तुं शक्यते। एवमेव निर्धननिनो सरोगनीरोगयो दुर्बलसुबलयो विवेकाविवेकवतो साम्य न कदापि स्थिरयितु शक्यते। एकदैथैव नौ पर्वतादाघात सम्प्राप्य प्राप्तविवेका प्रत्यावर्त्यति। तदा पुनरेप भवतां साम्यवाद' पुस्तकालयाना अन्यसख्या वर्द्धयिष्यति।" "अनुमोदयाम्यहमपि तावकीन विचारम्। मा नाम चलीत् साम्यवाद आलय, एप नवनवे समुत्सुकस्य जगत स्वाभाविको धर्म किन्त्वेकदेष समस्मिन् विश्वस्मिन् प्रवलिप्यति, प्राचीनमर्यादाक्ष पिनाशयिष्यतीति ब्रुवसत्यम् । एतदपि सत्य यन तव अपां तृतीयो निःश्वासः बागानो विपाकगोलकाना वमानाचावश्यकता। जगच्छान्तिमभिलपति । जगतो जीवनेच्छा प्रवला, एतादृशे जगति न भवाश्या आवश्यकता"। "क्षण विनम्यापराधिन्या अपरावं मर्पत्वार्यः । सापरावोऽपि परितप्यमानः सामुभिरवश्य मर्पणीय एव।" "क्षणिके परितापे को विद्वान् विश्वसिति। अद्य मृत्यु- सम्मुसमुपलभ्य श्मशान- वैराग्यमित्र परितप्य पुनविस्मृत्य स एव पन्यास्तदेव चक्रम् ।” "देव, सत्यमय पर्यन्तमह युद्धाभिरुचिरासम् , कन्याप्यह पितु. पुनस्थानीया विश्व विजिगीपुरारा, फिन्त्वद्य भवद्विचारमाकर्ण्य युद्ध त्या कृतसङ्कल्पास्मि । मम पितू राज्ञो गजेन्द्रपालस्याहमेव युद्धपरामर्शदात्री, अहमेव वहून् राज्ञो विजित्याधुना रामपालेन यो मुद्युकवतो। परमद्य विचार. परिवत्तित.।" "तिग्ममहसा वीवरेण रामपालेन सह भवत्या युद्ध सर्वयाऽसमीचीनमासीत् । एतत्त्व न वेत्सि। अहं युद्धभयङ्करं रामपालं शस्त्रास्त्रविचक्षणा तस्य चमूच सम्यम् वेधि। तेन युद्धे निश्चित भवत्याः पराजयो हखामलकवत् प्रत्यक्षम्। अहमैहिकी सर्वा शक्ति विज्ञातवानस्मि यत् कीदृश सार श्रीमती वहति ।" "शान्त पापम्, अह भगवन्त सूर्यम् , परितः स्थितान् पादपान् वनदेवता जीवनदातार भवन्तच साक्षित्वे न्यस्य क्षत्रियसर्वस्व धनुश्च स्पृष्ट्वा प्रतिजाने यद् विघसनात्मक कार्य विहाय राष्ट्रोन्नत्यै सर्वात्मना लगिप्यामि। नुष्यवधुना देवः।" "नितरां प्रसीदामि। अस्तु, अहमेवरमै महते कार्याय कृतसङ्कल्पोऽविलम्ब यामि, देवो दयतु तावकोन यलम्।" अग्राप्तोत्तरोऽह श्रीमदिशि प्राचलमिति । जनानन्दिने चन्द्राय साधुवाद वितरत्सु परिजनेषु “चिरञ्जीव, बुद्धियलं विमृश्य नितरा प्रसीदामि" हर्षाधूपि मुखता राज्ञा प्रलपादि । "परन्तु पुन, इतोऽप्यधिक गरीयः कार्य समापतित येनाह विषीदन् वक्त पुरः स्थानुश्च न शक्रोमि। नैतस्मिन् कायें त्वत्तोऽधिक कमपि परयो रात्री मनोरमया सह चन्दरहे मुप्ता कमला पावन तावक सन प्रक्षे। हत्या

चन्द्रमहीपती
येपा
रङ्गारमुख्या अहमहमिकया तालवृन्ते नियुक्ता
वैदभ्ाद्याध येपा पदतलदलनप्राप्तसौभाग्यहृष्टा ।
श्लेप श्लिष्टोऽङ्गमर्दै रसिकजनमुदे शात्रिणा श्रीनिवासा-
नामेत् काव्ये तृतीय परिमलललित कान्तनि श्वास एप ।
इतिश्री-
मान्यमृधन्य-विद्वत्पारायणिक श्रीमन्नवरायात्मजेन
काव्यालङ्कारेण श्रीनिवासशारिणा रचिते
काव्यकोविदकुमुदकुमुदिनीनायके च द्रमद्दीपतौ
तृतीयो नि श्वास

चतुर्थों निःश्वासः सायं शशाङ्ककिरणाहतचन्द्रकान्त- निःप्यन्दनीरनिकरेण कृताभिषेकाः। अपिलोल्लसितवहिभिरद्वि तता- त्तीनं महानतमिवात्र चरन्ति वप्राः।। मुभापित रनभाण्डागार जीवन्नरो भद्रशतानि पश्येत कचिद् भूमी शय्या कचिदपि च पर्यशयनः कचिच्छाकाहारी क्वचिदपि च शाल्चोदनाचिः। कचित्कन्याधारी कचिदपि च दिव्याम्बरधरो मनस्वी कार्याधी गणयति न दुःसं न च मुलम ॥ भर्तृहरिः चन्द्रमहीपतो स्यति चन्द्र क गतश्च द्र ॥ कमपि पृष्ट्वा गतश्चन्द्र ! कदापि केनापि कुनापि गमनाय श्र तच्च द्रमुखादितिप्रश्नपारम्पयें विचारचातुर्यमातुर्यश्च सभाभवने । भविष्यद्विदां ज्योतिक्दिा पण्डितानाञ्च प्रासादे सम्मेलो दरीदृश्यते। आदर सम्भारेण ते पूज्यन्ते सक्रियन्ते कौशयोत्तरच्छदामु सौवर्णीष्वासन्दीपु साभ्युत्थान समुपवेश्यन्ते। केचन महोप्णीपास्तिलकाङ्कितमस्तका आप्रपदीन दधतो राजती यष्टि कलय त श्मश्रु शालिन प्रगल्भभाषणे महीपति मोह्यन्तो धन लिप्सयाऽऽडम्बरताण्डव विरचयन्ति । अपरे च जटिला आत्मान देश भगवतीभक्त विरयापयन्त आरक्तकौशेयवसना भाषणभूषणा भूपति तोपयन्ति । इतरे च दुग्धव्रतिनोऽखिला सिद्धि कर एवं कलयात शोषितकाया भवन प्रभासयति । पर कोऽपि सत्य “श्व परचो मासतो वर्षतो नवाऽऽयास्यति चद्र' इति कथयति । पुनप्रणयिनी जननी उपजरस वय समाश्रिता 'हा चद्र 1 मन्मन कैरवविकासक ? चन्द्र । क गतोसि अप्रसूच्य प्रियां मातरम्'-इति विलपन्ती तस्य शयनागार, प्रसाधनसामग्री वाजिनश्च प्रतिक्षण प्रेक्षमाणा, स्मार स्मारमहनिशमश्र पूर्णलोचनसरोरुहा खास्थ्यमेव गमयाञ्चकार। तद्रा महाराजो रुग्ण प्रजागरकृशो निमीलने त्रयुगलो गतसत्व इवोपबर्हमाश्रयन स्थित । विदुरे चैको भृत्य प्रलम्पदाम्ना व्यजनमाकर्षति। न कोऽपि शक्तो मौनप्रभो प्रभुत्वमपहन्तुम्। 'विद्याधर : हरि-सुभद्रौ महत्या प्रतिज्ञया गती अपि प्रतिनिवृत्तौ ? साम्राज्य मर्दयन्महाराज आह । मन्त्री-आम् देव ! परिभ्रमणकृशकृष्णविग्रहो म्लानमुखौ प्रातरेव प्रतिनिवृत्तौ। परन्तु महा.- मध्य एव ) अकृतकार्यो। किमेतदेव । मन्त्री-आम् देव महा.-एतदेव सम्भावितमासीत् । शतवषमिव वर्षचतुष्टय वीतम् , नास्ति कोऽपि जोवति नवेति प्रतिदिन पटव प्रतिदिश प्रेय॑न्ते, पर वेतनभुज पटव प्रेक्ष्यन्त चतुर्थो निःश्वासः ७१ चतुरशिरोमगोना समवायः समीक्ष्यते, परं कस्यापि मुखमण्डलं कृतकृत्यत्वेन साभं नावलोक्यते। प्रतिदिनमेतदेव भ्रूयते, मद्भाग्यत एतद्भिन्नाऽक्षरावलिरेव लुप्मा । (विचिनियस्य ) नविन ? उद्विग्नोऽस्ति, अस्माद् दुखोदधे निःसर्त मतकामोऽस्मि । बहु घोटा, झोऽधिकं सोढुं नालमस्मि । मन्त्री-नैवच्छोभते धैर्यधारिघुरन्यरे भवति भगवन् ! पुरा लि नलरामयुधि- प्टिरादयो विपत्तिमनादृतेन वक्षसा सहन्तः कालेनातुलां सम्पदं प्राप्य प्रचुरं यशस्तेनुः । राकिररोप्यात्मनाऽस्निका लानोऽस्ति ....। महा०- मध्य एव )-अपि अप्पासादितः कवन समाचारमशक्तिपरस्त्र ? मन्त्री र, अयेत नागमन सूचितम्। मन्ये कृतार्यः स निवस्वति । सोऽपि समदुःखमुखः। महा.- विमनायमान इव ) अम् लक्ष्यते। अधुनव वत्रहत्तो दौवारिक प्रविश्व निर्बयं व्याहृत्य "देव ? श्रीनन्मन्त्रिमारोऽपरेण केनचिदस्वनामधेयदेशजातिना साई श्रीमचामा प्रणिनंसति, श्रीचरपी प्रमाणमित्यूचे'। महा.-[टत्यापिठनयनो दौवारिक निपुणं निरीक्ष्य ] आन् प्रेष। दौवारिक, कावस्यक्ता शकौ व्यवहारस्यामुय, अस्तु, शोघ्र पर। प्रणम्य प्रमाते प्रहरिणि समायातः समहचरः शतिधरः। महाराज मन्त्रिाव प्रगम्य, राजा-"पुन! शकिपर! चिरजीव"-इत्युच्यमानवनिदिष्टकाटनीठिकाया- नुपविरः पाये च सहचरः। प्रतिरोऽसौ वर्गन शोणितप्रभः, आरला मुफ्नाधरो मन्जुलो वरसा पविशतिवर्ष- देशीयो, जनपदवेगीयनानमेव्य'-चीन' विग्रहर'-पुरुह शेनुपी गुनः, कोमलबलेवर टत्साहसखः प्रभावित समस्तसभोऽस्ति । यहचरचास्य विवर्णः प्राइमर्जटिठो वितत्तनुपटियमनीततः, प्रवेदविन्दुपूर्ग- कपोटावठः पीतदशनोसितवासा युवारि वृद्ध इव प्रतीयते। अब महाराजो नेसतेन सूचवन्नुवाच- र पुशल पुर? वनपि नितरा शोभूतः, कोश्य समानीठस्त्वया । १ पविनम्। २ विमलम्। इविद्यालम्। ४ पुिलम्। ५युद्धिः।

शकि- चन्द्रमहीपतो -श्रीचरणकृपया कुशलम् । महाराज ! कि विस्मयतेऽसौ चन्द्रमित्रं विश्व- शेखरः। यो हि युवराजमहोत्सवे तस्मा उच्चकुलप्रसूतमश्वमदात् । महा०-(विस्मृतं पूर्वोदन्तं स्मारित इस पूर्वानुभूतां युवराजसमयच्छटामनुभावित इव विस्फारितनयनः ) आः ( क्षणं निवस्य) यधारा चन्द्रोऽस्मान् दुखितांचकार शफि०- कथयतो महाराजस्य मध्य एव ) देव! प्राप्तिसाधनमप्येष एव । पीयूषपरिप्लुतामिव मधुरा श्रोत्रस्रोतसा मानसमानन्दयन्ती वाचमिमामाकर्ण्य श्रोतुम- धीरो महाराज ऊचे, अप्यासादितः कश्चन समाचारः खमित्रस्यापि पुत्र ? कश्चित्तस्य कापि गमनपदवी लब्धा ? अपि कुशली वास्ते चन्द्रः१–विशकलय्य कथ्यता स्वकीय- याना-वृत्तान्तः। शक्ति०-देव, अस्मान्नगरान्निर्गतोऽह विचित्रविचित्राणि, शोभनशोभनानि बनानि स्थानानि नगराणि कन्दराश्चापश्यम् । परतश्च नर्मदाकूलशैलशिलागुहासु जातशविरं तत्र वासमकल्पयम्। नर्मदायाः मुरम्योऽय प्रदेश । उभयतस्तटं हरिणमुख-यन्त्रकत्तिता दूर्वा कूलकान्ति कुर्वत्यासीत्। विदूर यावन्नितरामकुटिला नर्मदा इवेतसूत्रभित्र प्रत्यैत । कूले इलक्षणाः स्नानशिला अतीतकाले पुरुषसत्ताम सूचयन्। एकतः कूले नितरां निविई वनमासीद्, द्वितीयतश्च विरलपादपः समः प्रदेशः। एकतः शाईल हरि-वराह भटूक- खड्गिनां प्राज्य राज्य, द्वितीयतश्च मृग-चमर-शश-गवय प्रभृतीनाम् । एकतो निशितनस- विदारितकरिणा हरीणां वेडा', परतश्चाक्रान्तकदम्बकाण्डानां केकिनां केकाः। एकतः समूलपादपोन्मूलने बुहित, परतश्च फ्लाखादहारि रुतम् । परस्परविरोधि प्रदेशद्वर्य विभजन्ती नर्मदा प्रवहन्त्यासीत् । अह नर्मदारोघसि स्थितासु शिलास्पविष्टोऽनन्तानन्दसुधां पिवन् कदाचन हरिण- शावकानां स्वाभाविकी तरलता, कदाचन वन्यशशकानां सैक्तप्रदेशे निश्शव क्रीडर्न कदाचनोपनर्मदकर्दमेषु 'लुलायलुण्ठनं, कदाचन पादपेषु कपिपुङ्गवप्लवनं कदाचन भूरिमायसमुदायमायाः पश्यन्नवत्तिपि। नमदायास्तीरे मुनिभिरभ्युषितचर एक आश्रम आसीत्। अतीतकाले केनापि १ श्वेड़ा-सिहनादः। २वृहित-करिगजितम्। ३ तिरश्चां वाशितं - रुतम् । ४ लुलायो महिषः। ५ भूरिमायः मालः । .

निर्गता आसन् । चतुर्थी निवासः विरकन तपखिना स स्थापितो भवन् । शवयतापसमारास्तस्मिन्यवसन्, हविर्गन्धि- विभावमुचूमः पार्खप्रान्तमपुनात, परमद्य 'ध्वंसावनेपनाममासीत् । यिस्वाक्षाणां सान्द्ररछायामु निमिताः परिधयोऽद्यापि यज्ञवेदी आम्रस्थाशिवकपुर धेनुदामनीपर्पग- गश्च सौरमेयीणां प्रचुरां सम्पदनसूचयन् । ट्यानं यस्मिन् तापसाः सविधनं व्यहार्युः काननीभूतमासीत्, कंवलं कचन कचन स्थिता वन्यदाडिना वीजपूराश्च तस्य प्राचीनपरिचयमस्चयन् । कोणेप्वद्यानि देवनन्दिराज्यासन, भग्नानि नितरां जीनि। तेषां भित्तीविदार्य बहवः सुपा अग्रिनवेदिकाना-यासु वेदवतिनो वेदमध्यापयामामुः-लोथनि प्रकान्यासन्। तत्र 'वामटूरपूराणां पिपीलिकापूर्णाना प्राचुर्गम् । एक विशालं भग्नावशेषं विनाऽज किमपि नासीत् । परमद्यापि-सम्प्राप्तदशमीकः' सोऽतयिठेवां न व्यस्मरत् । विदुरयानिणोऽद्यापि तस्य छायामु विधान्यन्तो प्रोप्मनीष्मस्य प्रचण्डचण्डकररित्रणवाणानपानेषुः । विस्मृतमागा अवनीना मद्यापि प्रावृपेयान् भन्मावातानसहन्त । लघुलघुभिरपि स्वल्पस्वन्यैरपि फल पटरदेवमतपयन्। यूयमुच्यन् मृगानद्यापि स खवेदीनानन्तः श शाययित्वा निविन रात्रि व्यतियापयितु सहायिष्ट। अर्जुनधातानु निपग्णाः पक्षिण आश्रम- स्वातीतगाधानद्याप्यागन्नुकानधातयन् । नगराणां मदमत्तनानवेषु प्रासादेष, विलास- चालियूपानेवानन्दस्य शतवमोऽवंशो नास्ति पत्तनाश्रमस्य भग्नावशेपेवासीत्। तस्य मूसरेण रूपगे, अकृत्रिमौदासीन्ये भूतगथाना व विलक्षमा मादकताऽऽसीत् । माधुर्वपूर्ण प्रस्तसमासीत् । सोऽयमाश्रम एव ममाधुना वास आसीत् । अहमितस्ततः सन्द्रहस्थानेषु परित्रम्य तवादिष्टम्। तस्य भवनानि सम्प्रति वासयोग्यानि नासन् । आश्रमस्य मध्य एकः रिपबासीर स्थित अधी, को बानीव तिमिवारपन, जीवन कीददी: अनुसादापानलयाय व्यग्रतो भवेत्, परन्तासीद्विस्तृतो निश्चलो निकम्मच। अधुना तस्प लगा वाईस्य व्याडोत् । शाखामु यासत्व युवत्वर वावमासीत् । तस्य वासामु १ सदर-इतिभाग १ चूटा। ३ चोटियों का स्थान । (दशनी-अन्त- मावस्था। ५अपनीन:-पधिक।

थान्तस्य मे चन्द्रमहीपतौ सहस्रश पक्षिण कुलकमेण न्यवसन्। शेष इव सोऽपि तान् स्खशिरसाऽधापीत् । ते तत्रैव न्यष्ठीवनमूतयन्नहदन्ननृत्यन्नकूर्दन्तारुवश्च, परन्तु स सर्व सह आसीत् । मया तेषा समीपे पिप्पलस्यैकतमे उच्चै प्रकाण्डे काण्डे एको महो व्यरचि । महता श्रमेण तालकाण्डै वंशदण्डैरेकाकी तमकार्पमेव। सुन्दरसुन्दर कोमलकोमले पुष्पपराच्छादिता सा कौशेयास्तरणमप्यत्यशेत । वशानागेका छिदमयो भितिरपि मया परितो निरमायि। अह विदूरात्कार्य कृत्वा समायन् सस्नेह सगर्व तां मनोरमा कुटों पश्यन्नासम् । मन्नेत्र तस्या वियोग न सहमाने आस्ताम् । सापि मा नेरिव सहसशश्दिरनिमिपनयना पिबन्तीवासीत् । अह तस्या कोणे बहुविधानि फलानि रक्षन्नासम् । तान्येव मम जीवनस्य साधनान्यवतन्त। कदाचन तृषितो रानी हिसभयङ्कर नद्यास्तटमगच्छन् वन्यदाडिमीफलाना रसमेवापिनम् । एकदाह सर्व दिन कार्य मुव्यग्र आसम् । क पर्यमासीद् यत् कति गब्यूतयो मयाद्याबजगाहिरे, परन्तु मम शरीर नितरामशकमभूत् । सोऽपूर्वो दिवस आसीत्, मच्छरीर स्वेदरूपेण बहिनिरैत् । अह नर्मदापवित्ररोधसि शिलाफलकमेकमधिशयान कदाचिदात्मान, कदाचन भयङ्कर कानन, कदाचन स्वस्याबहुदर्शितामकृतकृत्यताश्च कदावन वन्यपशून् कदाचन चन्द्र, कदाचन भवन्त, विमृशन् श्रममपनुदन्नासम् । दिनपति पतनासीत् । दिनमपि तच्छौके सुसेवक इव म्लानमभूत् । अकस्माद् भीषणभीपणेधूलिमिश्रितैर्वायुपते पर्यपूर्यत पश्चिमाशा। मुदक्षसेनानीसचालित पूर्णसाही सैनिकरिताकारक्षेत्र व्याप्त पानप्रेरितधूलिधराधरै । मदीयागु मृतप्रायेप्पिय शिविलेप्वभिनव भय सच्चरितम् । जीवनधारणस्य ममतैक विलक्षण साहसमारोत्, श्रान्तेप्वङ्गेषु नवीना হাঝি দুনি समागच्छन्। अह सत्वरसत्वर पिप्पलाभिमुखोऽचलम् । मन्दवायोरेकसबारेणव विश्व पोतमासीत् । एव प्रत्यैद् यद् विराजो भगवत स्वलित पीतमम्बर अकस्मात् पीता रकता समपियत् । 7 स्थिता, क्षणनेव तद्रूप कालिग्नि परवतितम्। हस्ततो हस्तो नावालोक्यत। मेगोसाटिताभ्यां चशुन्या पुर स्थितमपि वस्तु नारश्यता प्रचुर । शमति प्रस्तम्। परन्नु रक्तवापि मुचिर चतुर्थो निःश्वास शक्तिभिः प्रकाशदीपैरपि तिमिदुर्ग नाशितुमशक्यमासीत्। महेश्वरीया मायेव भुवनं व्यामोहयत् । परन्वहं मत्कुट्यां प्रविष्ट आसम् । मया दुर्ग' प्राप्त मितीवाह व्यवसम्। काननं वन्यपशुपक्षिणां रोमाचकारिणा कोलाहलेनोद्विग्नमासीत्। सर्वे सायप्रवणा आसन्। सौभाग्येन मुहूर्तासरतदशनैशनेवियद्विशददशामापत् । निश्चळा टडवो विपद्ग्रताकाशेन सहानुभूतिमिव प्रकटयन्त्य आप्रकाशन्त । यथास्थधिनीरवता विस्तृता। वनभूमिः स्वपुत्रान् लालयन्तीव गाडनिद्रितश्चिकार । अहमी फलानि प्राश्य मुप्तः परन्तु सशक सचेष्टश्च। शिरोवेटनं शिरस्येवासीन्, कृपाणः कटितटे लम आसीदेव, वस्त्राणि सर्वाणि परिहितान्येवासन् । केवल मानयुगलमुन्मोच्यैकस्मिन्कोणे निहितम् । कुटीरस्यै एकहत्ततोऽपि न्यूने द्वार एवाह शयान आसम्। भकरमान्मम निद्रा भामा । मम धैर्यधारि हृदयमधीरताममृत । तस्य गतिः- शवतोऽप्यधिकाऽऽसीत् । आकस्मिकेन भयेनोद्विमः सहसा पार्शनिकुबाद गर्जनमधौपम्। उपविश्पष्टुपी विस्फार्यादाक्षं यदयो निकुञ्ज जिल्या सकिणी लिहन सिंहो भ्रमति। तत्याद्वाप्रतिने अक्षिणी शिकमन्धकार कर्तयन्ती द्योतेते। पुच्छमुत्याप्य स गभीरगभीरं सत्वरसत्वरं बुभुक्षित इव पादान्न्यस्यन्नितत्ततोऽभ्रमत् । वस्य भयङ्करा दंष्ट्राः सन्तमसेऽपि प्रत्यक्षमैश्यन्त। तस्योत्पाटितं मुसं मुपटो- राखेटिनः पाटबोत्पाटने पटासीत् । तस्यका लघीयसी दृष्टिमकुटीरे न्यपतत्, एकैनैवोत्कूर्दनेन स मकुटीरोपर्यासीत् । हृदयभावश्चापोरग्रतः समायातः। स निश्शाई गर्जन् कुटीरच्ने भ्रमन्ना- सीत् । तस्य मुखादामनांसगन्यो मन्मानसमुदविजीत् । मर्मरतः पुटी स्वस्थाः शोचनीया दां मां सररर्ण न्यवेदयत् । परन्तु सम्प्रति जीवनसंगीती चिन्ताचमसमीक्ष्य हस्तधृतनिस्त्रिशोऽभीखिाभूवम् । परं मन बुटी सन्जस्तैवासीत्। तस्व निशिता वंशप्राचीरस्य पार्श्वतोऽन्तः प्रविय आसन् । . सिहवल्गितेन पर्णकुटी सर्वात कम्पत । पिपलवासा मर्मसयन्लोड- दृश्यन् । फुटीप्रवेशाय केवलमेकमेवासीद् द्वारम् । यस्मिन्नई स्थित एवारम् । मयाऽनुस्याहतेनाक्षिणी उपरि कृते स मृचं गजितः। द्वावता मम नितरा समोपे नखा उच्छत्य पतितः। सा कट कड ७६ चन्द्रमहीपतो ज्वलन्तावास्ताम् । तस्य सक्रोधः वासः कुटीमपूरयत् । सिंहो भीषणं सायं द्वारस्य सम्मुखीनकाण्डे समैत् । मयापि खड्गोऽक्षिणी निमील्य प्रहत एव । परन्तु सिंहः प्रहारं वञ्चयन्नुच्छल्य पुनमहता वेगेन कुटीरे अधुना कुटी विश्वला जाता। तस्या भङ्गानि शिथिलान्यभवन् । शब्देन खशरीर सिंहनखानावहौषीत् । अनेनाकस्मिन व्यतिकरेण सन्त्रस्तः सिंहोऽपि सङ्गय॑ एकतः संपूर्य कुजलीनोऽभूत् । मया च तस्मै नमोऽकारि। कुटीदशा विचित्राऽऽसीत्, भूकम्पोत्तरं नगरस्य सप्राम- सम्गमगानस्य वीरस्येव । प्राची प्राकाशत। सूर्यदीपमादाय भुवननीराजनामिवाचरन्ती सा नितरामराजत् । अहं प्रातराश विधाय गन्तुं व्यचारयम् । तस्मात्स्थानान्मम मनस्तृप्तमासीत् । क्षणं भामगानां कुटी, क्षणमाश्रमं क्षणं पिप्पल, क्षणं मत्प्रतिवेशिनः पक्षिणः सस्नेह वीक्ष्य पार्श्वपर्वतकन्दराभिमुखमगच्छम् । उपवनमेवासीत् पर्वतः। वनपर्वतयोर्मध्ये एक विस्तृतं मुरम्य चक्षुसवख क्षेत्र पार्वतनिराणां विमलजलेन सितमुपवनता दधदासोत् । एकतः शिल्पिनिर्मितेव सरला प्रोच्चा वशभित्तिरभ्राजत। अन्यतश्च शिखरैराकाशं स्पृशन् विविधद्रुमलतागुल्मगहना शैलोऽवनितलमाक्रम्य वियत्सुधामापिबद्भिः करीरपनसतिनिशपारिभद्रार्जुनादिमि निर्माणामनवरतसणत्कारेण च व्याप्त आसीत् । अहमेकस्य सच्छायमहीरहस्य शीतले तल उपविष्टः पार्वतीः घनघना वृक्षावली. अफरमान्मया दृष्टः यत् सान्द्रद्रुमनिलये आलपन्तौ द्वी पुस्खौ पर्वतपापाणविकतननिर्मितायां गुहायां प्रविशतः। भास्रोत , क्यिता श्रमेण कतिभिच वर्षेः सा सम्पादिता भवेत् परमद्यापि गुहाभवनान्निर्गतो "हे प्रभो? हे नारायण ? हे दीनबन्धो ? मां जीवयेति विरलविरलोऽस्फुटाक्षरो ध्वनिमत्कणी सतर्कावकरोत् । अखनपदन्यासोऽहमपश्य यल्लोहदण्डद्वारायां कारायां विश्वशेखरः प्रवृद्धश्मभुः कृरी प्रेक्षमाण आसम् । वस्तस्या निर्माणकाल मा पडोसी-इतिभाषा ।

चतुर्थी निश्वासः कृष्णो दोनो म्लानोऽपरिचीयमानोऽस्ति । तन्मुखादेव तानि पदानि नि सान्ति । वाहगनस्थ दृष्ट्वा हृदयमसाधारणया करुणया पूर्णम् । लघुरेख 'विष्कम्भक आसीत्तदन, पापापपातेव त सद्योऽभिदम्। ततन यथाऽऽनीतवानस्मि, तथा श्रीमतामने स्थित एव। भनेन कथित चन्द्रगमनवृत्तमिति । ततश्च सभासदा साधुवादन सहैव विरते श्रीमति शकिधरे प्रबर्द्धमानायाच महाराज- स्यावीरताया मौखर्य भजत्यु च उसयेषु शकिधरालब्धसङ्केतः स व्यजिज्ञपत् । देव। केवल देहमानभिन्ने परमसुहृदि श्रीमति चन्द्रकुमारे गते द्विनेषु दिनेषु व्यतीतेप्वह मम निकेतनस्य क्षोमेरे सुप्त आसम् । ममाकस्मानिद्रा भग्ना। निशीथः। सर्वतः प्रसूता च भीपणा निस्तब्धता। यूरतामन्तर्धत्त तमखिनी च नितग तिमिरिणी। मिलीकरणमटकारमन्तरा कोऽपि शब्दः श्रुतिपय नावादरत्। समत जगदापादमस्तक भयमममिवासीत् । क्षिप्रधाविणा श्रवणे- नानुभूतो भवनस्याधोभागे कश्चनापूर्वी ध्वनिः। उद्विग्नो भीतवाहमसामयिकेन धानेन, भित्तिमपातः पचगुटिक 'भिन्दिपालमेक नि सार्य कुक्षि गुटिकाया सस्थाप्य, नागदन्तेषु लम्वमानाना चन्द्रहासानामेस्तम लघीयास हवे कृत्वाऽशब्दितचरण. सोपानरवतीर्या- ऽदर्श यन्मम दासा लुप्तचेतना एकस्मिंनिद्वारे साज्ञान शेरते। तान् विहाय- ध्वान विचिकित्सता मया कवाटसूक्ष्मच्छिद्धनिर्गमनलघु दृष्टं ज्योतिः । कपाटे पादापातेन निरचैप यलपाटयुगलमन्तरतो 'मुद्रितमस्ति । अनुभूति. प्रत्यक्षता मधूत। कतिचन पुख्याः शनैरालपन्तदिछदितभित्त्या मम कोशजातं सत्वरसत्वरं बदिनिरक्षिपन् । 'बिमर्दप्रकाशिकाप्रकाशश्वाखिल वस्तुजातं प्राकारात । द्वारमन्मुद्रयिष्यन्तीति पर्यालोच्य पहिरागस दृष्टवान् यत् त्रय पुष्पा मम. कोशजातं प्रमोप्य पोट्टलिकास्वावध्य वाजिप्यायोग्य गन्तु सजाः। नयः पुरूषा. शरीरेण, पाहसेन, बुदपा, शच्या, शस्नग, एलेन, मोधेन च गरिष्टा:- एकचाइमिति विचार्यापि शकथोर्यमाण कोशजात दप्तम्। नाभवमह १ तालाइविभाषा। २ उपरकोमजिलम। ३ पिस्तौल। ४ पेटके पास की जेव। ५ मुंदा हुवा-इति भाषा। ६ टॉर्चराइट।

चन्द्रमहीपतो 'तिष्टत रे। चौर्यकलपट्किला ! दुष्टप्रा-इति सगर्जनमाभाष्य सदश्चमेक मारूढो निष्कोशकृपाकृपणकृपाणपाणिरहमन्वधावम् । किञ्चिद्द र गतो व्यचारयम् । यदेते निर्दया साहसिका-एकाकिन मा हन्युस्तदा दुखदमिम सवाद क श्रावयिष्यति स्वजनसम्बन्धिन । सवै मित्रबान्धवैरविज्ञात एव मरिष्यामि। मम हृदयगति पदे पदे प्याकुलता चावद्धत। उद्गता वीरभावा एकपद एव विलीना। मुखमण्डल खिन्नम्। करोऽकम्पत। शरीर शिथिलतामभापत् । अकस्मादव-'हिँ हिँ शब्देन स्तब्धतामभन । तद्वाचि उत्साह आसीत्। खामिभक्तिरात्मविश्वासश्च । अकस्मात्स्थिरमभूद् हृदयम्। भीतिवीता। अहमस हायोस्मीति भावना नष्ट । पपुरयमस्माक किमुपकरिष्यतीति विदन्नपि तस्य हे पया- नवीनेनोत्साहेनाह प्रतिबोधितोऽद्भुतधैर्येण पूर्ण । सम्प्रति मदीयो वाहो वातेन समलपत् । तेषा वाजिनोऽपि वेगेन मार्गमतियन्त आसन् । परन्तु ममाप्यवस्तेभ्यो विदूरो नासीत्। को जानीते कति क्रोश मध्यानमह व्यत्यायं, परन्तु नक्षनक्षणेन राति खल्यैवावशिष्टा प्रत्येत् । तेऽकस्मा दश्वेभ्योऽवतीर्णा । अहमप्यवतीर्य वल्गा करीर शाखाप्यायोग्य मर्यादया स्थितो भिदिपाल नि सार्य प्राहरम् । चतुर्दशी चन्द्र उदैत्। व्यग्रस्य ममाक्षिणी सम्यछ नापश्यताम्। तथापि द्वौ पुरुषावाहतो, मकरवम्। घना वृक्षालि। चन्द्रप्रकाशानाश्य तम । जनसम्पर्करहितश्चाय प्रदेश । यदाह मामकीन धनराशि जिघृक्षुरप्रपदे प्राचलं, तदेव “वीर ! वीर ! पश्यसि ! पश्यसि"- इति समश्रूयत कर्णकुहरविस्फोटन करालो घोर भावाद ।। धृत्वा चैतच्छुष्यद्गलनले बुण्ठित रसने विधूतधावनशची प्रोउलहृदये कम्पमानकरकरवाले भीला निपतित भिन्दिशाल उत्यितरोमनिरम्ने स्वेदाई स्तब्धशरीरे मयि निकटवृक्षवमा मधु निन्मृत कमलजल गलितेनेव, कालकम्बलेनेव मपोपूरपरीतेनेव अशेषशेषादिसरीसप समूहनिर्मितनेव, अखिलेलाकलापद्धनिपुरम्पपरिरम्भिवेनेव, कासरचर्मणेव काककोकिल ग्लोव, षट्पदसहत्येष महेश्वरीयभावनेव, हत्यारन्देनेव पक्ष्यहृदयेनैवाप्रपदीनेन - एकञ्च परेतराजस्याध्वनीन १ आवाज।

चतुर्था निःश्वासः कृष्णपटेन समारतशरीरो नीलवनावगुख्तिाननो भयङ्कराकारः सागर इस कालो दृढशरीरो मल्ल इव हस्तकृतमलः कश्चन ना। साक्षान्मृत्युमिव पुरःस्थितं त वीक्ष्य शोचनहमात्मानं विकृतमकार्षम्। नवरवृत्ते वित्तस्य गरीयसा लोभेन प्राणानपि स्वहस्तेन संशीतिमारोपयता मया स्वस्याविमृश्यकारित्वं ध्यक्तम् । तरजपञ्चला चञ्चला जीवनपारामारे समभ्येति नश्यति च बहुशः, परन्तु तनुरत्नमिदं न पौन-पुन्येनाप्यते, हन्त । कथं निःसर्तव्यमस्मान्मृत्युमुखात् । कथनस्य विपत्- पारावारस्य परं पारमाश्रयेयमिति चिन्ताकुलो मरणमवश्य सम्भाव्यमानः सत्वरमेवा- सिना प्रारम् । परन्तु बलिष्ठेन प्रकोष्ठे गृहीतोमुना कालेन केवल स्या निम्बसन् अन्त स्थित शोध- महिन्यां यमन्नासम् । तावदेव वायुध्वनिना' सकेतितः कश्चिदागत्य शिरसि विपमय- प्रचुरपरिमलमूचादायकोपपपरीतं वस्त्र प्राक्षिपद्येन घ्राणाप्रत्तिनैवाहं नष्टसंशः सरत्तः। नष्टमूर्छवात्मानं लोहदण्डनिमितद्वारे कारागारे प्रापम् । यस्मिंश्च कम्बलद्वयं प्रावरणविस्तरार्थ, पयःपूर्णपट भमतुम्बापात्रं विना नान्यत् किमप्यासीत् । पश्चिम्मूको दासो द्विवरहोभिर्मह्यमन्न प्रयच्छन्नासीत् । तेनैवाहमियन्तं काल दुःखमा- करस्यापि जीवानि। मन्यदा प्रभावे स्वममन्वभवं यचन्द्रः करेणुकामारुढो महति समारोहे समाद्रिय- मापोऽदश्चरे नगरे राज्ञो हाभिमुखं प्रयाति, समन्वहमपि वाजिनमाल्टो यामि । विलक्षणो वायध्वनिमाड मुतरयति । अकस्मादेको महाँलोम चलितः। तेन- नहाशब्देन व्यग्रोऽहं निशामजहाम्। क्षणं स्वप्नं क्षण सकीयां वर्तमानां दशा विमृशन्नई निशा व्यगमयम् । वभून सुप्रभातम्। अद्य दिनं मम जीवनस्य विशिष्ट दिनमासीत्। स्वर्णसूर्य उगात् । किरणावली प्रमोद प्रावत। पक्षियो स्वेन भानिसन्देशमिवासूचपन् । गुहायासिनो मृगा अपि सहानुभूति प्रकटयन्त इव नीयद्वारदण्डे फण्डूमपानवान् । विचारध्यमे मयि अविदित इव मध्याहमतीत्यापरदोऽभूत् । पादयनिरिवाधावि । मयानु- मित मूरदासो भोजनमानयति। अहं जीवने निराशत्वासमेव । सद्यो जीवनक्षपणाय १ हिसिल, सीरी। २ तोभा-तोप इतिभाषा।

चन्द्रमहीपती परमेश प्रार्थयमानेन कारावासदुर्घलाभ्या नेनाभ्या प्रैक्षि यच्छ्रीमा मत्रिकुमार परमशक्तिधर शक्तिधरो द्वारस्य पुरो वेदिकामध्यारते। क्षण मया चन्द्रम्वप्न इवैपोऽपि स्वप्न एव मत । पर तु क्षणेनैव आहितमाये मनसि विवेकरेखा रामचरत् । भम्ने तालके सद्भिवलेनाहमुदतिष्ठम्। सस्नेह, सकरुण, सत्वर मजीवनशरणयोश्चरण सरोरुहयो पतितोऽध्रुस्रोतसा वनभ्रमणधूलिमक्षालयम् । आभारी ऋणी कृतज्ञश्चास्मि यदद्य अपेक्षितसूयभ्राजा सम्राजा नितरामसम्भावित दर्शनसुखमनुभवामीति कथयित्वा विरिरसतीद तप्टरि, 'चद्र कच्चित्वा --मिति साधीर भाषमाणे च राज्ञि पुन प्रारभत वक्तु सौढप्रचुरकष्टस्तष्टा । देव, चन्द्र क्व किमर्थ वा गत -इत्यहमेव जानन्न सम् । यत स मया सहैवाम त्र्य गत । शक्तिधरस्तु नासीत् । महा-आम्, अस्माभिरप्येतदेवान्यमायि यद् विधशेखरोऽपि तमनुगत । विश्व०-एतदेव विचारितमासीत्, पर मध्य एव यस्मिन् विपत्पयोधी न्यमन तच्छी मता पुरो निवेदितमेव । महा.-(किञ्चिदधैर्यण ) आम्, आम् तत । विव-देव, कि न स्मर्यते भगवद्धरसिद्धियात्रा, विमलपुरेश्वरपु-या व चन्द्रस्य परिणयप्रतिज्ञा। महा.-(सोत्कण्ठेन मनसा स्मृतपूर्कदन्त इव ) आम् कथ न, चन्द्र गते सताहे व्यतीते ततस्तिलक समायात ! विश्व-एकदा साधिवेल विधि समाप्य प्रादोपमशनमुपभुज्य भवनमुखोपबने पवनानन्दमनुभवति मयि द्वास्थचन्द्रागमन न्यवेदयत् । स्मितेन रानिमुख राजयति मौनमुपविष्टे तरिम नहमवोचम् - वातलेऽपि स्विन्ना पोल्पाली गरीयांसमाधि प्रस्टयति म्लान मुख कातर्यमिय व्यनक्ति स्फुरदधरो धैयमिवावधीरयति, रसरती चरण महतीमुत्सुकता सूचयत, किमिद किश्चास्य कारणम् !! चद्र-सत्यमुपलक्षित मिन! वस्तुतो नितरां सिनाऽस्मि । अह-कुमार, कोऽयमभिनव खेदावसर ।

चतुर्थो निःश्वासः चन्द्रा-आम्, अभिनव , यदर्थमामन्त्रणायागतोऽस्मि । अह-अयमह धीमता जन्मनोऽगिव दासः । चन्द्रः-सखे, सखेदोऽस्मि। पश्य पितुराप्रपदोनाद्वाससो वस्राध्यक्षेणलब्यमिद पनम् । विश्व-देव, तदेवेदं पनमासीद्, यदुनयिन्या विमलपुरेश्वरेण लिखितम् । तदिद पठित्वा स मृशमुदताप्सीत्। व्यजितक्रोधोऽवोचच । “जगजुगुप्सितमनार्यनरणीयमयशस्यमाचरितमिदपत्र विस्मरता तावेन, महत्तवाग्दाना चेत् परिणीता, यतो न पूर्ण वय. प्राप्य तिष्टन्त्यविवाहिता• कुलीनाः कन्यास्तदा महद- न्याय्यम्।" "कुमार, शान्त पापम् । अमरस्पदिनी ते सम्पत्ति, नेनशतविलोक्या काममोहिनी ते मूत्तिः भूपाल वककोतितकीतः थोलश्रीमहाराजनवेन्दुरालस्यैकाकी प्रिय. पुरः, पूर्ण वयसि वत्तमानोप्येतत्सम्बन्धजिघटपयाऽदत्तवाग्दानस्वन्मन्ये सापि भवचरणसरोरुहदास्यमपे स्व एव । विलक्षणाऽय भगवान् विधि."। "सम्भाव्यते, पर सोभाविराजतिलकपर्यन्तमन स्थित्वा परत एतदर्थ यास्यामि।" इति। वरेव, चन्द्रो विमलपुर गतः सर्व क्षेममेव विधास्यति देव प्रमथनाय । स्तुत्यमेव श्रीप्यते देवेन चन्द्रस्य। अहमेतत्सम विदापि श्रीमते निवेदनायालयावसर असम्। "पर बिलम्बे कोऽवलम्बः" इत्युक्त्वा मूरितो महाराजः। उमार्नकल यल, * * प्रान्त काल , कमलबनोद्घाटनपास्सर विचास मुप्रभातम्। कार्यकरणप्रेरणानि कार. चन्ना भास्करकिरणावली जगतः कोणे कोणे प्रसता। शकिधरो जिगमिपु. प्रणि-सया उद्यानको दर्शनाम्यनुरीलयन्त खपितामुपागमत् । स च हास्येनाभिनन्दस्तमाह- " महानिम्बखरसायित कटुकामथायित परिणाममुख कर्म कुर्वन् नरो यहीयो यातनोति, मतो राजमारान्वेषमाय मनताद. शन्दपाधेयमरस्वमेव चवदर्तव्यम्। "मनोभारो मनस्वैर वान् । परिचयवता किन्तु सतरंगानुच्छाटेन च नवितव्यम् । मित्रागिक तस्वया व्यवहरक्याल दासमभवे,मिन्नु मा नाम पिज्ञाताचारविचारेभ्यः प्रमः। विवाद परिदर वितिहाय तस्मिन् ददो नकपथा न स पुनरुत्सहेत।

चन्द्रमहीपती ण, मा वद। सर्वेषां विचार ध्रुत्वापि निर्णये खतन्त्रः स्याः। निधि निरीक्ष्य प्ययेः। वत्राभूपणे सभ्यता मर्यादोकृत्य बजे। धने नादाता नच दाता भूया ! सत्यमालेषि- भव्यभावन. सर्वदैव सक्षणो भके। प्रतिज्ञातपरो भूया इति ।" * उपसमुद्र स्थलम्, वर्णकणा इस मुद्रानिभा धूलिकणायटकिरणसम्पर्य भ्राजन्ते । कस्मिक्षषि दिग्भागे शकुनिकुलालिता नेक्ष्यन्ते सान्द्रपादपाः। स्वचन कारन सराणा नारिकेलानाच विरलविरलाऽऽवलि । शक्तिधरो यानस्य प्रतीक्षाभवने क्षण विनम्य राशे पित्रे च सन्दिश्य सहयोगिनोऽभि- नन्यागुशुक्षगितरणि प्राविशत् । तरणिधेयमेकाऽल्पीयसी नगर्देवासीत् । पृथक पृषर श्रेणिविभागः वाचनालय , भोजनालयः भ्रमणार्थ कीार्यच वेदिका निवासायावासा । तेपुर शयन-वित्रम शौच स्नानादिर्मणां कृते नितरी सौकर्यम्। शकिधरोऽगि प्रार: व्ययस्थ पितमावास प्रविश्य कार्यक्रम निरमासीत् । - . चतुर्थो निश्वास समुद्रोऽद्य उच्छहरमनुष्यैरनवरत विधीयमाना धर्षणमितोऽधिक सोनु न शक्ष्यताव प्रत्येत । खभावगम्भीर तस्य हृदय मानवाना स्वाथपरताया विरोधीव रणागो गर्जतो देत्यादपि प्रचण्ड, प्रलयकारि चासीत्। सो स्तादिततरे , मुसलधार पतता धारासारेण हतोत्साइस्य प्रधानकैवर्तकस्य मनो विह्वलता प्रापादि पदे पदे। निमीलितंकनयन स कदाचन दुरवीक्षणेन परा नाव, कदाचन जल्प्राबल्य, कदापन झल्म'वातस्य गति, वस्या प्रशमनकालच परामशत् । जनमानसानि भगवनामजपे मतान्यासन् । किन्तु शक्तिधरदशक्तिधर एव । 'तस्य सुघटित शरीर निर्भीको यौवनमुल्म भात्मविश्वासस्वेन साईमासीत् । भयकरेऽपि 'समये सरिता पत्युस्ताण्डव पश्यन् , गायन्नास्त । अकस्मात् कोलसहत्या भृशमाहता तरिखियम्भूता, जनताया सकरुण कालाहल- समस्तोमे लीन । दिशि दिशि ततस्याते विद्वद्वरानवरङ्गतो विततमहस शादे शालेऽवतीर्णहस्पते व्य धित कृतधी के० के० शास्त्री मनोज्ञकविप्रिय- बहुलमधु तुर्यो नि श्वास. स चन्द्रमहीपते । इति श्रीटीकमानीवेदवेदाविद्यालयमुख्याध्यापकानां पण्डितप्रवरायितच्छानपूजितपादारविन्दाना श्रीलश्रीनवाजरायशानियां वनयेन सान्यालद्वारेण श्रोनिवसशारिणा रचिते चन्द्रमहीपती चतुर्थों निवास ।

पञ्चमो निःश्वासः
अपि दलन्मुकुले वकुले यया
पदमधायि कदापि न हेलया।
अहह । सा सहसा विधुरे विधी
मधुकरी वदरोमनुसेयते ॥
सुभाषितम्
अगनवेदी वसुधा, कुल्या जलधि , स्थली च पातालम् ।
घल्मीकश्च सुमेरु कृतप्रतिज्ञस्य वीरस्य ॥
बाण
इतो विद्य द्वल्लीविलसितमित केतकरज
स्फुरद्गन्ध प्रोद्यन्जलदनिनदस्फूर्जितमद् ।
इत केकिक्रीडाकलकलभर पक्ष्मलहशां
कथ यास्यन्त्येते विरदिवसा सम्भ्रमरसा ॥
सुभाषितम्
देव
प्रत्यूष प्राकाशत। गुकुरोज्ज्वला मुक्तावतला उडुजिपक्षन्निव विय क्षेत्र
धावन् दिदृक्षमाण इव वा सासारिकमाञ्चय भगवान् भाखानाहरोहोदयगिरिम् । आतपोष्मणा
जगत उद्धमविधमया च मन निद्रा भग्ना। मम क्षिप्रपरीक्षिणा घणनानुभूतो भवने
विलक्षणो T। नितस शिथिलानि गतस्फूर्तीनि ममाझा यपि मूर्छामिवासूचयन् ।
व्यायामि वपुश्च पर्यवपरित्यागेऽनीहम् । पाइवें कमलापयक निष्कमल प्रेक्ष्य मन'
साशामभूत् । झटित्युत्थायतस्ततो वीक्ष्य बहिरेत्य सहवीरपृच्छम् ।
मम
ता प्रत्यू

पञ्चमो निःश्वासः 'मनोरमे, कि भणसि बहिस्तु न समेता खामिनी जागरणसमयमपेक्षमाणा चिरं प्रतीक्षमाणा भवती मुन्निद्रयितुकामा इत आयत्यः स्मः'। 'किन्तु भवने नास्ति राजकुमारी साशवाई प्रावोचम् । एका प्रवाहः प्रस्तः, क्षणेन भवनस्य कोणं कोणमवगाढम्। महाराजो निवेदितः । सकोट्टपाला नगरनियामका मन्त्रिणा सहवागत्य व्यवस्थिरे, परं कमला नाधिगता । देव, श्रीमति याते प्रत्यह शुप्यन्ती नेममाघात सोढुं सत्यति, देवस्त्वरयतु" "राज्ञ आरक्षानियुफैरन्ततः किं विनिणीतम्"। "देव, अन्ततो मन्त्रिणा नैशः प्रासादरक्षको देवलः समाहूतः, श्वयथुमन्नेत्रो रज्जुबद्धः शिथिलाङ्गो निष्प्रभमुखो घर्घरवता वरेण सर्व नैशोदन्त प्रायोधयत् । अनेच राठी प्रेपितानां चराणां मुखा हेयः गणोतु :- देवस्योत्सवे समागमाशङ्ख्या 'देव, परह्यो रात्री पञ्चषा जना मरुत्तरारूटायरैः साश्वयं वीक्षिताः, किन्तु विशेषत आशङ्किताः। एको मरुत्तरो राजावुपर्म्य वीक्षितः, स एव च रात्रौ नदीमार्गमारूढोऽवलोकितः। नद्यास्तटे नाविकनायकेन सूचितं यदपरराने कतिचन पाटचराः शवेन साद्ध जीवननौगातारूढा बनं विविशुः" इति। चन्द्रश्वराणां योग्यतामफला विभाव्य तान् किमपि निदिस्य स्वयमेवाप्रेसरोऽभून् । * * "पिपासा वायते शुद्ध जलं लब्धु शक्यते ।" नवागन्तुषेन या प्रायोचि । "अवश्यम्, उपनदि चाहुल्यमस्य, क्षण विवाम्य, धूलिधुसरणमनवरतभ्रमण, दीर्घो- निवासस्नुव्यती पास् च त्वां प्रान्त पोपयति । तादृशाना कोमलरलेवराणामेर निस्यसहायं भ्रमणं मनो भ्रमयति ; अहमद्य भवन्त दुर्घटनाग्रस्तमिवानुभवामि ।" -गोविन्द, सयो जलनानय"-मुस व्यारल केवर्नऊ आह । "नाविक त्वमदा कार्य कुर्वन्नेव वृद्धो भूतः, मन्ये यहयो घटनास्त्वया टा" "महाशय, नदीवटं दुर्घटनानां स्थानम्। यदा पस्न महन्महावैगेन प्रवर्पणेन च प्रावत नदी, गृहाणि रहिण्यः पुनाश्च विङमा, भ्रमणव्यसनिनश्च प्राहाणां कवलोभूताः।" "दस्यवोऽपि नद्या लाभान्विता भवन्ति" !

चन्द्रमहीपतो . ... अप किम्"। "एपु दिनेषु खया किमप्यस्थाने दृष्टम्" 'परह्यो निशोधात्परतो निश्शब्दगमनलघुतरमरुतराढास्त्रय पुरुषा' समेतर पाच एव तमालनीला सान्दामा स्थल्यस्ति, निशीथे तत आगमनमाश्चर्यकरमासीद अह जागस्ति एवास वृद्धभावान्निद्रा सम्यग् नैति, यतश्च कनीयान् मृतोऽस्ति सा नजाने वदरीलीना, सर्वा 'स्थाने," ततस्तत, औत्सुक्याचस्वति नोठयतोक्तम् । ‘से मां मुद्रापञ्चकमातर' दित्सवोऽतिवेलमाग्रहीपु , किन्तु कदभिप्रायस्त्रिाननुमा साहाय्य नाकृषितमालधूममाकृष्य पुन प्रोवाच नाविक-इत पारमस्मिन् व विचित्रभवनानि नरान् वचयन्ति, जगत्ख्याताना लुण्टाकानामेवाय निलय । ये गतर न प्रतिनिवृत्ता ।" "आम्, ते कगता "क गता” इति तु ज्ञातुमशक्यम् । ते मरुत्तरादेक शवभिव, वायुपूर्णा मसण स्तरणसाधना जीवननावश्चोत्तार्य नद्यां निपत्याभिवनं यान्तश्चक्षुषोरगोचरे सवृत्ता' मरुत्तरश्च गतो यथागतम् ।" "शवो नार्या आसीनरस्य वा" वस्त्रान्तरित आसीच्छव (किञ्चिद्विचार्य) शिञ्जितमिव श्रूयते स्म । स्त्रीशव आसीत् ।" 'त्वमा पार प्रापयिष्यसि!' 'नहि देव, नैतत्स्थान धात्रा सज्जनाना कृते व्यरचि ।' "दुर्जना सबनान् पीडयन्ति, तदिद मे गमनमार्तनाणाय।" "यद्येव तावश्यगेव सहेप्यामि । कि नाम भक्त " " मन " * * उपापगमेवासीलपवनेनापि दुष्प्रवेश्य, विवस्वद्गभस्तिभिरपि दुरवगापहृदय, कलानी १ आतर स्तरपण्यम् पञ्चमो निःश्वासः कल्यावस्पृश्यतल, विशालशाखशाविसहनसकुल, कुउमदन कोळेयकानां गृहं गहना निलय लुलायानां, सन सिंहानां वन व्याप्राणां निम्तनं काटना अन्तारम् । अतिशयशीतलांग वनावनावभिनवानि पदविशनि पसंचरितः गुयन्ती गठनलिकामोरयोः प्रसूता पाटी प्रत्सन्दमन चेउस नारज उरसेनावास्य श्रुतवानदो वकः। "वाः दुष्टयः, सर्व बीवनं दुष्कर्म मादरो विगमन इत्यमुपहनोऽस्मि । शवयो निरपरारा निर्दयं हन्त हता, आः बलन्, हन्त गलोजरुथ्यते। सत्यः पतिताः.. महालानोमानिताः, तसलं नालन्यम् । किं ..(परवता खरेप ) हन्त, बरामी कमला "

चन्द्रमहीपती
तकस्मिन् पादपे कौशेयदामनिबद्धायां दोलाया समानवयोवर्णवासोभूपणास्तिवः
मुन्दर्य रसापाकृतपीयूष सरससरस मधुरमधुर तारतार गायन्ति -
रूम् भूम् रूम झम् सलिलद ! वर्षसि । स्थायी।
श्रावणमासो हासो भूमे सान्द्रो वातो जगदभिरामम्
मारामृतमिव वर्षसि । (१)
विदिय वारुणवर्णा विस्फूर्जितबधिरीकृतकर्णा
आहत्याकुशमशयति (२)
अभितश्छन्ना नीरदमाला कालिम्ना क्लुपीकृतशाला
मम मानसमसितयति। (३)
विमलेयं शाटी मम तन्वाऽऽदिलष्टाऽऽर्दा तादात्म्यमुपेता
अमितोमा सखि हसति। (४)
पिक्वाणी श्रवणान्तविटा विमथितमानसवद्धितकष्टा
रुटा द्रष्टुमिवेच्छति। (५)
मजुल्व लसान्द्रनिकुळे केकाविरुत सारसरसित
मन्मथमदिरा वर्षति । (६)
गानेनामुना विस्मृतान्यव्यापार उन्मुखो मृगगणो मन्त्रमुग्ध इव पीतमद इव
वशीकृत इव रज्ज्वाऽऽबध्यावृप्यमाण इव विवशस्तन व्यभिष्ट। साश्चर्य सावधान
श्चन्द्रस्ता वीक्ष्य यावदने प्रचार तस्तादत्ता दोलादाम्नैव सान्द्रपादपेप्वारूढा सर्वात्मना
लीना ।
चन्द्रो व्यचारयत् --व मानुषीपु कदापीहक रूप प्रैक्षि । अद्य कल्पना रूपसरसा
मासरसां साक्षा वृत्या प्रत्यक्षीकृता। स्मिाभिरपहता भवेत्कमला ? किन्त्वासा रूपमीदछ
नाख्याति। किं कुशेशय किसलय करपत्र यते 11 प्रकृतिस्थ पानीयमपि प्रज्वलयति ।
सुषमा . वाहमाधुर्यम् विचित्रम्। अवश्यमेता एतत्प्रदेशस्याभिज्ञान्य । एतासा
साहाय्येन कमलावश्य लन्धु शक्यते।"-विचारचयभचक शिञ्जितमाकानशिभित
लब्धाशोऽन्वसरत् ।
अदृष्टचरावटबीवनुमितमागो विभीभ्रंमन् शारदमेघनिवहमिव सित भालमिव

पञ्चमो निःश्वासः ८६ भुवनस्य सान्द्रमुधानिधुइवेतमसमित्ति, यूपमिव प्राचीनयशोधनाना स्तूपमिव धर्मस्य वीक्ष्य प्रासाद तासामावास मन्यमान. प्रविविक्षुः प्रदक्षिणं कृत्वाध्यैष्ट यनितरां वर्तुलमदो भवरं यन नास्ति द्वारस्य पक्षद्वारस्य वा चिह्नमपि। हृदयाहितस्मल विष्णुमिव सौध परिक्रमतश्चन्दस्याशासन्तान तम-स्तोमे विलाय विपापतिरदृश्यतामधात् । स्वभावतस्तमखिन्यां वनभूमौ सूर्यस्यास्तमयनेन विश्वव्याप्त तमः। वृक्षप्राचुर्यात्तमसोऽपि प्राचुयें धवलभवनधावल्यमप्यासीदविञ्चित्करम् । शर्वर्या पादप सुतोऽलब्धनिद्रानन्द प्रत्यूप एवोत्थाय भवनभावनायो लमः । अस्माद् गोधामेकामारोहणसाधनामुपलभ्य कौपीन दधत् शिरोवस्त्रेण धोतवनमायोज्य गोधाच सयोज्योदक्षिपत् । नसालिष्टभित्तौ तस्याश्चन्द्रोऽप्यनायासायेनोपर्याजगाम। किन्तु दैवे प्रतिकूले सर्व प्रति कलम् , यतो बहुभारायासिता वालगोधा प्राणानुदशष्ट । भवनत्य नीलशिलारचितः क्रीडामणमिय कालिकाया. महिपगोष्ठमिव यमस्य विलास- वेदमेव मृत्योः विशाल उपरितनो भागः। एकतो भित्तो मुढ लोहनिर्मित द्वारम् । निपुण- निरीक्षणेन निरचायि यत्सोऽय द्वारे काटभागो द्विदस्वपरिमितो नीलरगेण रको दुर्लक्ष्य- योगो लोहफल के प्रतिष्ठापित आसीत् । क्षणं विचार्य शिथिलानि वासासि सम्यगावथ्य कखालचेतस्ततो निरीक्ष्य पानाप्रभागेन पाटसन्धि विस्पप्ठ्य काष्ठपलरमतुनटत् । नीरवतरणाय सोपानानि प्रेक्ष्यन्ते स्म । निकोशम्पाणपाणिः साशक, थरथरा- पतचनिनाSSरानचतुस्लिशानि सोपानान्यवतीर्य मुदितप्रदेशखिन कस्यापि धनिन औदार्य शिल्पिनश्चातुर्यच साश्चर्य विमृशनमाक्षीत् - अन्तः श्वेत वर्तुल वृहद् भवनमदः । अभितो लग्नपित्तलविफम्भका भित्तिमन्जूपा त्यलिमा भित्तिरूपा प्रतिभात्य सन्ति । बुष्टिम केनापि धातुपनेणाच्छादित, रिलिप्तमिव चोधनाभावायलतां पादयो- लिम्पति । एकत' पाषाणाभ्यन्तरसात. प्रलम्यो लघीयान् मुरमतत एवाल्सीयसी तेजोरेशाप्रतीयतेऽस्ति। स्मनामीतिवीतभीतिरच तमसः प्राज्यराज्ये मुझे सत्वरसत्वर प्रविश्य तमोवश्वान् - ६० चन्द्रमहीपती क्लिन्ने पूतिगन्धौ पथि पतित स नियमाणमिवामन्यत । दुरत्ययो दुदैवविपाकः । कामाग्निहवनकुण्डे सर्वख जुह्वति युवान । निर्वपतो जीवनदीपस्य स्खल्पीयसी प्रभा तदश्योरनतोऽनतीत् । जीवनमरणसधौ स सकृत् स्वकीय मुखसमुदयमस्मरत् । “पाटचराणा विनाशाय कृतया प्रतिज्ञया सहैव कमलापि नष्टा, कोदृशोऽह दुरदृष्टः । हन्त, पालयिनी ही सर्वापदा मान्या जननी, वात्सल्यविगलदश्रुस्नपितश्मथः पूज्य पिता क च शकिधर । यानसूचयित्वा समायातोऽस्मि कृतन । कागत्य मृतोऽस्मि । मत्प्रतिज्ञायामाहितविश्वासो रामपालो व्यर्थ, व्यर्थमेव च प्रियप्रजानामपेक्षणम्। व्यर्थान्येवाशाभवनानि विरचग्य प्रलोभितवानस्मि। हन्त प्रिये मन्दभाग्य ।' प्रजा * इवासन्। मसूणपापाणा उद्यानविश्रामवेदिका प्रात काल । रामुदीयमानश्रीभगवान् विमाकर । पर्वतशिखरे लालित्य वर्तते। पवतात प्राकृतिक ऽय प्रदेश उपवनानि परिभावयति। तरुवारपूर्णे परमरम्येऽस्मि प्रदेशे फलपादपा फलभरेण मनुज मनामनागमन सूचयन्ति, यान् परिपिश्चन्त्येका तन्वी सरित् प्रवहति। अभियोऽनारोह्या पार्वती भित्ति, तत सेहुण्डस्य घना भित्ति। प्रदेशमध्य कृत्रिममिवास्ते, परमधुनाऽपरिष्कृतम्। पथिष कुण्डिकामु वयविटपा उद्गता, स्यले स्थले पतितपर्गाना कूट, वेदिकासु पोजानि पक्षिपुरीपसङ्करश्वावलोक्यते । प्रणाल्यो धूलिपूर्ण अविदिता असम्पूणा काठोय भजन्ते। कृत्रिमनिर्भरकुण्डिकासु मरक्तपुत्रिका अगभगर्ता पातं उद्यानस्यैस्त एक पुराणभवन वृत्या दावेन वन्यै पशुभि पक्षिभिविकृत भ्रशितदश मासीत् । दचिद् भान छन क्वचिदग्धे कवाटे, सण्डिता भग्ना भित्तिश्चिकसर्पपूर्णा । चन्द्र प्रकृतिदेव्या पुष्पाभरण पक्षिसगीत कीचकवनकशीभिनिराणामनातनादेन सरससमीर- समीरणेन कविठल्पनाऽग्लानीयमानन्द विभावयन् हरितहरितेषु सा द्रसान्द्रेप पादपकुम्भेषु प्रतामान दाना मारमधुर कूजतां तर्जयतामिव प्रतिपक्षिणां पक्षिणां विरावं वन् शून्यहृदय शून्यनिकुञ्ज विविककोणषु कमपि गवेषयन् नद्यास्तटेऽनो भ्रटताधोपगता।

- पञ्चमो निःश्वासः ६१ हाना घाया शिलायां विधम्य वासस्सिवतार्य प्रज्ञात्य शाखिशाखामु शोषणार्थमायोज्य धृतकौपीनो नद्यां चिर सात्वा धौत वासः परिधाय छायाशीतले शिलापट्टे तसन्घ्य उपस्थाय तराधिवशिवार्चनस्तादियो नदीतागान्प्रेक्षमाणः मधुगणि सरसानि मृशमास्वाध- फलानि मनोहदश्यहरो लन्यखारथ्यः पक्षिणा प्रियाभिः समं चञ्चनोट फलखण्डमक्ष महोत्सव पश्यन्नवर्तत। रम्यस्थाननिरीक्षणेन तस्य रमिकचरं चेतः पाठप्रत्यावर्त्तनेनेव- स्मृति शान्तिचापत् परमज्ञातमार्गपा वाणी तस्य शान्तिममनकः- "मगा बहुशः प्रेम्णा साम्नाऽऽग्रहोता पर साऽस्मन्निन्दनादन्यन्न किमपि जूते, अत्ति, च। कथयति दुष्टस्पृष्टं न भक्षयिष्यामि अपि मारप्यामि।" नितां क्षुद्रभापिणी सा का हानिः।" मैतद् व्रहि, महत् कष्ट विषयत्मानं गन्देहसिन्धी निपात्य यामानीतवास्तस्यै नैतागू वचः। तथाऽवर यथा सास्मामु प्रसीदेत्। हठिनी किं करिष्यति गलभूषणातिरितम् । फलानि प्रेषय।"- “अस्तु तथा करिये।" चन्द्रो व्यमोऽभूत, दन्ता अवरमकाम्यन, वाहू अस्फुरताम् । भ्रटिरशरासनायत । साम लोचने प्रापेयजलदावियाचरताम्। स कोधमदिरा निपोय विवेकविकलो. प्रान्तो प्रणितहृदयः दोरग इव श्वसन्नुयायानुमाय यत्पातभित्तेरपरतादनुनदी- प्रवाह वाणी समेति, अविदितान्यमायोलिडाटमावघ्य सधमप्यानेन नद्यां पतितोलीनश्चान्तः। * * । विशालोऽयं प्रदेशः। ऊन्या दूर्वाया प्राज्यत्वेन नीरकण्टकण्ठसन्निभशेय- वाससान्टादिशेव भूविभाति। कवित्वचित्यल्दा मालतीमौलिधोगणिसाबकुलादयः प्रतिष्ठा वई यन्तः पुपविटाः महान्तो महोराश्च राजन्द। प्रिया प्रणयपरिष्वथन्द्रो बांसासि सशोप्य विकीपिकव्य विमुश्य सदनया मा खागतीक्रिश्नान स दृश्या मतमोइमाणो विदूरे देवनष्टकोणं भानमे प्राप्य मध्यद्वारे सितशिलालेड- सितारैः, "न प्रोटयनन्तः" इतिरिस्तिशिष्ट। बहुपु द्वारेषु भवनस्यारमा- न्तराइवेष्वे रमेव द्वार चहि भल्या बदमासीत् । चन्दानु ठेवमध्यापन , तदन्तः प्रविश्य ददर्शः-सर्वाणि दाराणि नीलमंशय ६२ चन्द्रमहीपतो जवनिक्रया समाच्छन्नानि सन्ति । अनल्पा भित्तिमञ्जूया वस्तुभृता भित्तिषु लग्नास्सन्ति । अभित शोभना महार्हा आसन्य ', मध्ये च वर्तुलमतुल महदेक स्फाटिक पीठमास्ते। या पुस्तकानि रमणीय काचखण्डे नेमाकान्तानि पनादीनि च राजन्ते । एकचर्मनद्ध पत्रपुस्तकमपि तवास्ते यस्मि-प्रेषितान्यागतानि च पत्राणि सन्ति । तेषामेकतम पन दृष्टिपथमागत निसाय पपाठ विजयतां श्रीमान् दीप्य प्रतापसिह कान्तिसिह , श्रीमन् भवदाशी सद्धिततनुग्हमाज्ञाकारी दास कमलाकान्त कमलाभवन गत्वा धूपाग्नौ मूछौषधि निक्षिप्य मूर्छा निश्चित्यानीय च प्रच्छन्नद्वारस्य मायाभवनस्य द्वादशसख्ये कारागारे स्थापितवानस्मि । सा चाधुना नष्टमूच्छाँस्ति । अस्मद्वलेऽपि कोऽपि सन्देहो भासतेऽत श्व प्रातरेव भवद्धि समेतव्यम्। शेष धमक कुशलम्। प्रवल । प्रिय प्रबल, कान्तिसिह । पन प्रान्ते तिर्यगक्षरै लिखितमासीत्- लब्धाबकाशश्चेत् थोऽवश्यमायास्यामि- इति पठन एवास्य क्रोधानलमवर्षातामक्षिणी रकानात इवाभवद्विग्रही रुपा । परन्तु पुन पर्यालोच्यामर्षमवरुथ्य पत्रान्तरमपठत्- महोदय, मम पत्रान तरमपि देवदर्शन न भूतम्, महत खेदस्यावसर । कि नास्त्येतत्कृत्यम् । अद्य सूर सिहो न जाने क गत कस्मिंश्च कार्य लग्न । विचार्य स्खल्वेष विषय । सम्प्रति सपघेवाग तव्यम् । श्रेमक प्रबल' अपरपावं लिरितमासीत्--- सायमवश्यमागमिष्यामि, पार्वकानने मिल त्वम्। कान्तिसिह । तृतीयध पन मुद्रामुद्रित प्रतिज्ञापत्रमासीत् १ बुसी। २ गोलमेज।

पञ्चमो निःश्वासः ६३ श्री प्रतिज्ञापत्रम् सूर्य साक्षित्वे निधाय विश्वेश्वरं भगवन्तश्च प्रणम्य प्रतिजानीबहे- आवां सदैव श्रीकान्तिसिहास्यानुज्ञा पालयिप्याकः श्रीमत्प्रतिकूलांश्च समूल- मुन्मूलयिप्यावः। धीमत्प्रतिकूल: कमलानिःसारणविहितप्रयत्नः केवलमासीत्सूर्यसिंहः। स चेतः पलायितोऽपि पावकाननेऽकरमाल्लब्धो हतः। उचित एवेष न्यायो विश्वासघातिनाम्। अन्योऽपि यद्येवं व्यवहरिप्यदवश्यमीदृशी गति प्राप्स्यत् । वीरवर-प्रनलसिंही श्रीप्रचुरचतुरचारणः विषयममु प्रमाणीकुस्तः। कान्तिसिहः श्वेतकन्दरा अधुना स कमलां प्राप्तु महोत्कोऽभूत् । विचाराश्चारा इस चेतसि समकाम्यन् एका विलक्षणाकारा तालिका तबासीत् । तया मित्तिमञ्जूषामेकामुद्घाट्य दृष्ट यच्छतशः कीलकेषु लिखिताक्षरास्तालिका विविधाकारा राजन्ते। तासामेकामादाय निर्दिष्टभवन- मुद्घाट्यादाक्षीद् यत् कोशोऽयम् । अयोमजूषा' लमहत्तालकाः स्वस्यां कनकराशि ख्यापयन्ति। कचिकनकसूत्रप्रथितानि पर्यवेषु राजन्ते गजाहाणि वस्त्राणि। काचमपामु पट्टराशीसमुचितानि मणिमाणिक्यसचितानि प्रभामाजि महार्हाणि नवानीवालनमलानि विभूषणानि च। नागदन्तेपु सौन्दर्यसारा हाराः जाम्बूनदमयं गलसूत्रमालम्यते। योमपायां घृतेऽच् गुरीयके चन्द्रचारपतत् । चन्दः सद्य एव तत् पचिनोत् "एतदगुरीयकं तु मित्राप विवशेखराय दत्तवान् । तदा कथम् ! कि विधशेखरोऽपि ममानुपदं समायात एपां दुष्टाना हस्त गतः! संवमेतत्ताद गवस विहाय द्वादशसंख्या; तालिकामादाय परं द्वाग्मुद्घाट्य पावविवक्षति, तावदेव पर्यपूर्यत चास्य नासा महता पूतिगन्धिना। परमवं नासाग्रे- वस्तमायोज्यान्तः प्रविश विज्ञातवान् यत्कारागारमः। यन कचित् पाणिपाद- पवितायला असला अपि सस्या भातरकलेवराः अस्थिमानावशिष्टाः प्रवीयन्ते कथामामावशिष्टाः। इतरनेपच्छप्काः सवदसपूरितक्टाहा, वलभीपु बद्धाः, १ तिजोरी। कचन हट। चन्द्रमहीपती भापयन्ते नरकवाला । एकस्या शिलावेदिकाया लोहकीलकपरिश्ताय मेक सद्यो मृत पचजन प्रतीयते, सूक्ष्मया दृष्ट्या निरणायि यत्सोऽय शवो य पार्थकानने वचन जोणे झर्मरास्थि कङ्कालस्य प्राचीनत्व प्रथयति । वचनाधोनिम्न्द्र कचिद् भग्न कपालास्थि दण्डाघातेन मृत्यु सूचयति। वचिद्वर्तलभिन्न शह्वास्थि भिदिपालगुल्किया मृत्यु प्रमापयति । क्कचन विशृङ्खलकशेरुक कङ्काल पाशमृत्युः विख्यापयति। इतरे वक्षोऽस्थिन प्रविष्टच्छुरिका दाादनपगतच्उरिका सद्यो भारिता इवावगम्यन्ते। आयुर्वेदीयशवच्छेदविभाग इवास्मिन्नाम्चर्यचकित शोकाशकी भय विस्फारिताक्ष कमपि गवेषयन्नयमधुना मधुनाऽप्यहायें दुगन्धनिधानेऽनाचार प्रधाने, सद्वितिरोध ने प्रकाण्डहत्याकाण्डमाण्टे प्रचण्डे भवनखण्डे विभीभ्र मन् पार्थ भित्तिवातायनादारुणितवान् “हा ? प्रिय म्रिये, “हा त्व न वेरिस कथमहमस्मि' इति। करुणाकपारपूरपरिप्लुतेऽस्मिन् वचसि काप्यद्धतेव शकिरासी द्यतश्चन्द्रस्त्यक्तान्यविषयो द्वारानभिज्ञ उपकुज्य पाषाणानायोग्योत्थापितपाणि प्रैक्षिष्ट यत्-कूपनिम्ने कारागारे एकस्मिन् कृष्णकम्बले, रसालकपोलशालिनी मलाचितवसना, शुष्कगण्डमण्डला, म्लानमुखच द्रा, मृतकापेव शिथिला, हतप्रभेव- दीपदीप्ति , शुष्यज्जलेव महानदी, नष्टवमेव वाटिका, भृतनपेय पुरी भयङ्करा, शिखेत कृपीटयोने'माचिता, आज्ञव सम्राजो धूतैरवमानिता, वीतमुषमाऽसमा वामाना मानाम्भोधर्वला लोहद्वारे कारागारे भित्तिमाश्रित्योपविष्टास्ति। अधुनापि तस्या मुरा--निष्प्रभमपि सुदरमासीत्, सत्य "रल पड़े न लुप्यते” । सम्मुख चैक प्रचण्डचण्ड पिचिण्डिलो गृहीतासिधेनुक स्थितोऽस्ति । क्रोधाचा सरोप वक्त मारभत- कि पौन पुन्येन छुरिकां दशयसि । अरे न वेत्ति, यस्य भारतस्य परमपूतनामधेया सीतादमयन्तीद्रौपद्य पुत्र्य आसन्,-तस्य भारतस्य- यस्मिन्नाना जीवन्त्य एव खामिनाञ्चितासु भस्मीभूता भगवतो भूतभावनस्याङ्गरागत सम्पद्यते-तस्याहमप्येका पुत्र्यस्मि । तासा चरित्र, साहस, कर्म, तदेव भारतीय रुविर मदीयश्चिराजालेषु प्रसुद्धमास्ते। अमूल्यपातिव्रत्यधर्म कर्म मादृशीनां प्राणार्पणम् । मुधैव मुहुर्मुहुरसि दोपयसि, धारा निशातयसि, यदि युवासि, वीरोऽसि कमला तस्या कमला र पाप।

पञ्चमो नि.वासः ६५ तहिं सायेव प्राणानाहर। पर दुट!! निकृष्ट! लत्सम्नुले प्रापास्ता नास्मि मन्त्रा। मां देहि इमां छुरिका, यया स्वाभीष्टं साधयानि । थाः विवशास्मि, नहि तु नहि तुलां किं कारयानीति विचारः परम्'- इति कथयन्ती विञ्चिच्छिविला जाता, परन्तु पुनः प्रोवाच- कानोन्मत्त। पापान्ध! पत्य! अक्षिणा उन्मुद्रव, विचारख। क्षपिपजावन बालमातृप्त्यै कोदश महान्तमपराध शिरसा वोढु मिच्छसि । मुलाशार ! न वेरिस भारतामणीनावः स्वगमुन्दरं सजनवच इव मृदुल, प्रजा- पालयश इवोज्ज्वलं, तपोधनविचारवत् पवित्र शिशुखभाववन् सरल, कविकल्पना वोऽपि प्रबल भवति। यन लोभलोलाया, भयभावनायाः, विलासवासनायाः, एल च्यापाया भगुरपि नास्ति। नरपिशाच मानसमुफाभक्षणस्पृहा इसी किनवकर किरति ! बक विलोम्यत, नेपमतमयूरः सह नृत्यन्ती मयूरी कि गईपीय श्मशाना स्वप्नेऽपि गते । मूर्ख ? मुधैव कुबेरायसे, स्वाती पतिवा विमुदेव चातस्तृप्त्यै अल, सा नहान्त स्नारमपि कुटिलेन कानमा नेक्षते । इतोऽधिक चन्द्रा योनु नाशकत्। धर्यशिला, विपरगाथै पयोनिधी भिज्य- नमा। प्रलयकरिणा झमवतेन धेरै दमो ब्यनाति । स क्टक्टाक्तिदानः प्रत्युत्प मरोये, नापो, आ. युमुमोम । सम्प्रतं पटरमधिशेते ? यसाम्प्रदम् । क ते स्थान मसिलमत्तेः। प्रिये । कागतस्ते प्रिया-दवि बाढन्य मितेः परतो भविष्यति द्वारनित्यालोच्योदत। कमला स्पनिक वाचमिना श्रुत्लोलाऽभूत्, पर निप्पलम्, यतो भित्त्यारोदयनकालनेव, उपार बालोदापातान्नच्छितचन्दः। आसायाः परिपूर्ण तरिचिलत नापट्य जूनिटाना दल पस। विध दुर! विवरेज्य प्रसाद। परितो रन्नेपु स्तम्भेषु अनपाय मनोहर स्थानम्। ईपहर मुलना रयाना वाजिनामापासाय स्थानानि सन्ते । परितो हरितो' हरिवन, चार १ दरिदो दिया।

६६ चन्द्रमहीपतौ परिमलेन प्रान्त प्रोणत्, फुल्लद्विविधमुम, लग्नविपुलफलमवकोकिल, वापीवियुट्पान- पोवरपवनपरिलसितमुपवन राजते। यन मधुरमधुमय्या मालतीताया मकरन्द मत्ता मधुना माद्यन्ति। यनोपवनचतुष्पधेपु स्फटिककुण्डिकासु मारकत पाश्चालिकाम लघुलघून विन्दून निपातयन् नितरामाभाति कृतिमनिर । यथोचितमिष्टकाभिविरचिता सरणिर्मालाकारस्य कृतित्व, स्वामिनो विलासित्व ख्याफ्यति। प्रासादो हि रक्तपाषाम विहित मुपहच्छूितो रमणीयश्चास्ते । मसणवेतशिलाभीरचितानि, आसनविंशानि सोपानानि, करटिरदन शकलशबलिता द्वारशाखा, दृढ राजतपत्रच्छन्न कवाटयुगल, यत्र पवित्रा वल्ल्यो विटपाथ शिल्लिन शिल्पकर्मणि पुण्य द्योतयन्ति । सभाभवने वातव श्रूयते । पञ्चमु द्वारेषु केवल मध्यद्वारमेवानास्तम् । भित्तिमन्जूपा, कुड्यमुपुरा, छालना काचवल्लयों भाण्डानि च पर छविमेधयन्वे भवनस्यामुय । भवनेऽस्मिंस्तिन्त्र स्त्रिय आसन्नविशतिवयस, गौरवर्णा, पीरुपाय आलपन्ति । महासुन्दरी, सुषमासनिर्जनि सौन्दयस्य, नायिकेवाभाति, या वय नामज्ञान यावत् 'मुदरी' पदेन बोधयिप्याम , समुपविष्टास्ति। किमिव निरूपयामोऽस्या सौन्दर्यम् । अभिनवलायम्यसतिका, स्वर्गीयसीकुमार्या चन्दनगौरा, राजायेव मुषमा, प्रफुल्ललवेव ललिता, विमलसरलतरलकमललोचना, मारोग्यला, मन्जुभापिगी, कामकान्ता, पूषोभतेव ज्योत्स्ना, प्रेमप्रतिमा, सौन्दर्यशिला, पाटातटिनी प्रशाप्रभापत्तन, यस्या मानससर कमलमलिकाकमनीययो नन्दनकानन पारिजातपुष्णस्तवम्योरिवोन्नतयो स्तनयो पनरागमाला, स्वता कौशेयी शाटी कटितटे, कम्युन कायो नासायां प्रोने च हीरक केलिं स्चयति, सौवर्ण भौजनभाजने भोजन परिवेषयन्ती गृहीदवी आद- 'चाले ! दवाव समये समेता, सोऽन्यथा क्षणेनामरिप्या। पर.-अम्। मूरितरत्वास देय। अहमेशाप्रचित्तेन पुष्पाभ्ययधिक्त्यसम्। अस्मा भया पद भुत्ला रट यत् कश्चन भित्तिमाम गति । तत शीघ्रमेव मालिनी विलगियो। २ हौडिया। सदनभूषणा तासा या मध्ये

पञ्चमो निःश्वासः
माहूय तत्पादमाप्योद्यानस्य मध्यभवने पर्यड शाययित्वा बकुलपट्टिकामायोज्य
सक्षमप्रे इगेन तं परिचोय सान्द्रद्रुममासाद्य वचेश भारतम् ।
मुन्दरी०-धौतनसनं कदा निहितम् ?
चपला--तस्मिन् वार्या प्रविष्ट एकस्यां शिलावेदिकायामहाच्छः शादी व
घृते। तां विस्मितनेत्र आवध स्मयमानः सन्ध्यां विदधाति। मन्मुसं किमीक्षसे ?
शोघ्र परिवेषय। वदागमनात्यूवमेवाम त्रमेतद् भवने स्थापयितुमिच्छामि। थामरस
परिवषय, दावि सयाच परिवषय। अहं वर्णभाजनान्यानयामि (आनीय) एषु
एयर पृयर शाकानि परिवपय ।
सुन्दरी-किं परिवपयामि, विवसाऽस्मि ।
चपला-आः मुन्थे। बहुशः शिक्षितापि न ज्ञातरत्यसि ।
मुन्दरी-वं मुवेव क्षत्रियाणामेकातोरत स्याऽऽडम्बरं स्वासि, परमद्य न रामसदृशा
राजन्याः। अद्य क्षत्रियाणामुपदश विवाहाः सम्पद्यन्ते। वं व्यर्थमेवारण्ये रोदिपि,
अहं कथयामि यत् पार्यकानने दर्शनानन्तरम नीशास्मि मनसः ।
चाला-धाम, कामिनि ! (सव्यायम् ) देहि पाप यामि ।
चपला सय एव निभाजना समेता।
गुस-यासीत्।
च५०-नाम न गृहासि किम् ? (विदस्य ) वाप्या भायन्नासीत् ।
मु०-अस्तु
चला-अये। कुमुदिनि ? कप न यदसि ? यि । मौनीभूता रिम् !
कुमुदिनी- मोति मद्वास्यम्। कि स्वविचार पपि पथिकेन्यो
-
...
विरामि।

६६ चन्द्रमहीपतो परिमलेन प्रान्त प्रीमत् , फुल्लादिविधमुम, लमविपुलकारमयकोम्लि, वापी विमुदान पोवरपानपरिलसितमुपहन राजते । पत्र मधुरमधुमया मालतीरताया मचन्द मत्ता माग मान्ति। यत्रोपपनचतुष्पधेषु टिहिसामु मारस्त-पचालिनु लघुलघून विन्दून निप तयन् नितरामाभाति एत्रिमनिर्म। क्योचितमिकामिविरस्थित सरणिर्मालाकारस्य तित्य, सामिनो विलासित्व ल्यापयति । प्रासादो हि रकपासप विहित मुरच्छुितो रमणीयधारते। मसणवेतशिलाभीरवितानि, आसमविंशानि सोपानानि, करटिदिन शकलशरिता द्वारासा, हत' राजतपत्रच्छन कवाटयुगल, यत्र पवित्रा वल्ल्यो विटपाथ शिसिनः शिसम्मणि -पुष्य योतयन्ति । सभाभवने वात्तव ध्यते। पथ्मु दारेषु केवलं मध्यद्वारमेवानामृतम् । भितिमजूपाः, पुज्यमुरा उनलमा: काचवलयो भाण्डानि च पर उविमेधयन्ते भवनस्यामुष्प। भवनेऽस्मिंस्तितः त्रियः आसन्नविशतिवयसः, गौरव, सदनभरमा पोख्याशय आलपन्ति । तासा या महामुन्दरी, मुपमासनिर्जनिः सौन्दर्यस्य, नायिकेवाभाति, यां वयं नामशान यावत् 'मुन्दरी' पदेन रोधयिष्याम, मध्ये समुपविष्टास्ति। किमिव निरूपयामोऽस्या. सौन्दर्यम्। अभिनवलावण्यलतिका, सगीयसौकुमार्या चन्दनगौरा, सीवेव मुषमा, प्रफुल्ललतेव ललिता, विमलसरलतरलम्मलोचना मुउरोज्यला, मजुभाषिणी, कामकान्ता, पूजोभूतेव ज्योत्स्ना, प्रेमप्रतिमा, सौन्दर्यशिला, पाटवतटिनी प्रज्ञाप्रभापत्तन, यस्या. मानससर कमलकलिकाकमनीययोः नन्दनकानन- पारिजातपुष्पस्तवकयोरिवोन्नतयोः स्तनयोः पनरागमाला, श्वेता कौशेयी शाटी कटितटे, कम्युग्रीवायां नासाया श्रीने च हीरक केलिं रचयति, सौवणे भोजनभाजने भोजन परिवेषयन्ती गृहीदवी आह.- "चपले। दैवात्त्व समये रामेता, सोऽन्यथा क्षणेनामरिष्यत् । चपला०-आम् । मूच्छितस्त्वासीदेव। अहमेकाग्रचित्तेन पुष्पाण्यवचिन्वत्यासम् । अयस्मान्मया शब्द श्रुत्वा दृष्ट यत् कश्चन भित्तिमारा मूच्छित । ततः शीघ्रमेव मालिनी 1 विल्लोरियां। २ हॉडियाँ।

पञ्चमो निःश्वासः
६७
नाहून तत्पादनाकृष्योद्यानस्य मध्यभरने पर्यद शाययिता वकुलपट्टिकामायोज्य
उस्मोइन परिचोय सान्द्रदुमनासाद्य तथा सम् ।
मुन्दरी०-धीतवसनं कदा निहितम् ।
चपला-तस्मिन् वाप्यां प्रविष्टे एकस्यां शिलावेदिकायामहाच्छः शाटी च
वे। वां विस्मितनेत्र आग्ध स्मयमानः सन्या विदधाति। मन्मुखं किमीक्षसे ?
शान परिवेषय। वदागमनापूर्वमेवान ब्रमेतद् भाने स्थापयितुमिच्छामि। आमरस
परिवर, दापित्यं सपाच परिवषय। अहं स्वर्णभाजनान्यानयामि (आनीय) एयु
प्रया पृथर शाकानि परिवेषय ।
मुन्दरी-किं परिवपयामि, विवशाऽस्मि ।
चाला-आः मुन्ध ! बहुशः शिक्षितापि न ज्ञातवत्यसि ।
मुन्दरी-वं मुधैव क्षत्रियाणामेकानोरन स्याऽडम्बरं स्चासि, परमय न रामसहया
जन्याः। अद्य क्षत्रियाणामुम्दश विवाहाः सम्पद्यन्ते। त्वं व्यर्यमेवारम्ये रोदिपि,
अहं कथयामि यत् पार्यकानने दयनानन्तरम नीशास्मि मनसः ।
चाला-आम्, कामिनि ! ( सन्यजयम् ) देहि पात्र यानि ।
चपला सद्य एव निभांजना समेता।
मु.-कासीत् ।
चर०-नाम न रासि किम् ? (विहस्य ) वाया आपन्नासोत् ।
मु-अस्तु
चला-अये। मुदिनि ? कप न वदसि ? अव । मोनीभूता हिम्!
मुदिनी- गोति महास्यम् ।
कि स्वविचार पपि पथिकेभ्यो
विरामि।
चन्ला-(समोधे) त्रिम रिपास्यशि, किमी कथयिष्यसि वा! घरोजिनि,
आनित करनीकोतुम् !
अनुदिनी-मस्तु, कथयामि, परमैठन्न कविप्यानि यलय सावायरिन ।
वन्मन्नि सन्ति सहेन विवाहाप मानीवाऽसि माननीया भामिनी चन्दपनी कमल।
वमन्वंयन् राजनारो माभिरानो रानोपहस्तिचन्द्रोभस समेतः। यथ

६८ चन्द्रमहीपती पर्वकान देगस्यापि त्वामवायत् । चरनयनचन्द्रिका प्रसन्नद्वारस्य म भवनस्य वारशराप्यारकारायां निगरिता सरो०-(साधय सहर्षम् ) पदा! या पुमुदिनि । पुमुदिनी-नीत यास्तु पक्षो प्यतीतो भवर (रिधिस्थित्वा ) सरोजिनि । ३ यमन कारातो नि सार्य पत्त्य तस्या पुर प्रेम्मा पवायामर मस्तूया, मन्ये फारामोचनप्रस ना, ऋष्मपन्निवी स्वपतिना विवाहमनुमोदयेद, परन्तु मा नम फातिसिहो वृत्तमदो विजानीयादारया सोऽरमासपिए निकृष्टो वैयिष्यते। सरोजि.-मुद। प्रिये! पय ज्ञातवत्यसि । सल कथय । कुमुदिनी- विहस्य ) योगिन्यरिम, योगप्रभावाशशतवती। चपरा-नव कथयसि यदियोगिन्यरिम प्रयतस्य । ( उभे हसत ) * त्वमेवैतस्य भगिनि ! कमले। स्तोक दाडिमीरस पिब, पक्षो व्यतीत, नाधुना तवाल धु दायम्। पीता कपोलपती गर्तगते गल्ले निष्प्रभे नेने मम सेवा कदधयन्ति । कथय कापि त्रुटिरपहेला यखि सपदपनयामि कमपि मुचिकित्सकमाइयामि । गृहस्य खामिनी, वयमाशावाहिन्य' आज्ञापय । कमला-सरोजिनि, कि पक्षि। भविष्याम्यन्नृणा। कुमु०-( शनै ) भविष्यसि। कमला-भगिनि । नहि नहि मात। देवि! ( सरोजिनी हस्ताभ्यां कमलाया मुखमाच्छादयति) सरोजिनी-प्रिये। कमले ! व्वयाह भगिनीनिविशष दासीनिविशेष सम्बोध्या भह स्वस्था सन्तुष्टा चास्मि। त्वत्त कदापि न बोध्या च। कमला-यद् भवत्यै रोचते, परमृणभारमसमरिम वोढुम् । चपला-यदि कोऽपि भवतीमनृणा कत पारयेत्तरमै किमपि देयं नाम: कमला-देयम् । शिरोधरामुताय पादयो पातयिष्यामि जीवनवनमेव तक्ते समुच्छेत्तु शक्नोमि।

पञ्चमो निःश्वास: ६६ चाला-अपि सलम् । कमला-सत्यम्, क्षिनियकुलप्रस्ताया रसना द्विभापते । सत्यम् नितरां सत्यम् । चपला-परमप्रियवस्तुवितरणे वदान्योऽपि सोचमञ्चति, अतः सम्यक् पृच्च्यते । कमला-तहि विस्सष्टवचोभिवेदय क्यमानृण्यमासादयितुं नोनि। चस्या-सरोजिनि, त्वमधुना विश्राम्य, अह श्रीमत्या मनो विनोदयामि। (टमे- गस्टतः) श्रूयताम:- नस्त्यन सन्देइलवोऽपि यन्नन्दनपुरेवरो नन्दनसिंहः प्रतिभावान् सहस्रशो नगराणामधिपतिरासीत्। राजसभागनं जनसमुदयेन प्रपूरितं श्यते स्म । शतम्रो गायकार, कलाकाराः, चिनकारा भवनमत्राजयन्त। वयकान् साचनं व्याटभन्। शतश आर्यभवनान्यद्यापि तस्य प्रतिभा परिचाययन्तो राजन्ते, येषु निलीनः पुमान् प्राणानेव कटेन जहाति। येवलातं धनं निहितमास्ते। यद्यपि सर्वाः कला अद्यत्वे कालयरितालथापि तदवशिष्टांश एव विस्मयायालम्। वर्षद्धय व्यतीत स बुद्धिमत्प्रियण पिढीजसाऽऽहतः स्वर्ग सनाययानास। तसल्योऽपि अप्सरोउपेण सेवितमनुग्नः । नन्दनसिहो निप्पुन एवासीत् । केवटमेपा, एमाक्षी सरोजिनी एकाकिन्येव तस्य पुत्रयन्ति । अस्या यौनुम्मावर भवनेषु मुगुप्नात। आर्यभवनस्य, वन्मागां निधे, सरोजिन्येव पूर्णनिता। राज्ञो मन्त्र्यपि एकः प्रजाभको रहो राजकुळे कुलीन आश्चर्यभवन- विशेषत मासीत् । महाराजे सम्मरेत स एवना राज्यय पलयबासीत, परन्तु प्रियपुग कान्ति सहन मन्त्रिपरप्राप्त दत्तविपः स्वामिनमनुसार।

१०० चन्द्रमहीपतो भस्या वाणी भगवद्भतिरका कवितेव सरसा, गाजप्रवाहवत् खच्छा, शिशुहासवत्सरला पतञ्जलिभणितिरिव भावपूर्णा सुबोधा च विद्यते। एतस्या पनितावल्लो सौन्दयवितानस्य सान्द्रशीतलच्छायायां विरिरसया बढ्दो वीरा मानस तोषयितुमच्छन्। सैपाऽधुनाऽबोधवालिका नास्ति, अस्या कमनीय कायकानने वसन्तेन वासो विहित , सौन्दर्यसमनि प्रेमाकुरो निगतः । हृदयसरोवरे स्मरसरोज विकसितम्। प्रततप्रतिभे पितरि परेते स्वस्या सय खामिनी। खभावचञ्चलचेत एकदा यशोनिजितव ने चने चद्रेक्षणन व्यासक्तम् । तच्चार्यकुलप्रसूताया निम्ननीत नीरमिव न प्रत्यावर्तयितु शक्यते । कथ नाम न भवेत्तणाग्नियोगे ज्वलनम्। भवत्येष योषिता सदोत्सुक मनो ठूष, पुनश्च समेते वरे नरे, मानसमुन्मथयति ममथे विलासशालिनि, केवल सखीसहाये रहोनिक्सने प्रचुरचातुयतुच्छीकृतायविचार्य च मनोविचारे क्थ स्यादक्षण ब्रह्मचर्यस्य । अधुनैषा अखण्डब्रह्मचयव्रतपारणा विधातु चष्टते। अहमप्यभिलपामि यद् हादमिदयुवयोवयोऽन्त यावत् स्थिर भवन्विति । कमला-ज्ञातनिखिलतत्त्वास्मि, धन्यास्मि, यस्या मन्दभाग्याया साम्मुख्य राजकुमारी मारीविहसिनी, सिनीवालीकेशा, केशामोदसमाकृष्टपटपदा पदारविन्दविनिन्दिका दकाच्छतनुलता, लता गुणागृतफ्लानामभिरपति। भृशमुधोक्ष्यामि। परन्तु हन्त । वियुफया मया तेषां वागेवैकदा श्रुता हा : हन्त, हतास्मि । एव कथयन्ती कमला मूच्छिता। चपलाहता सरोजिनी कथइयमपि बकुलजलेन हिमपट्टिकया, ओषधीप्रदानेन, व्यजनवावेन ता खस्थाश्चकार । * अभूचोप काल । गत स्वराज्य विभावरीमहाराज्या भा च भव्यूहस्य। भ्रमर कुलमधुना, मधुनासमेधितसम्पदा पदाइविक्षतकिसलयाना विकसन्मधुरिम्नामिभानामित्र नवमधूना यूनां मनो हरति रतिप्रणयिनामुपरि पतन् सरज सरोजानाम्। सरसामान सारसाशन ना लघुपदविन्यासेन विभाति विभात काव्यमिव । परमसरस मरममधुरा कान्ता शातेय प्राथट । यद्यपि नाय तास्ता धनावल्यो घना - घनध्वाना , न च सौदामिनीसूदारचमत्कृतय उत्पन्नदारादरा, न च सपटापटशब्द क्षोभित पञ्चमो निःश्वासः १०१ क्षोणीक्षोणीधराः पुष्करधरा , न च नाशिताशेषपादपा ममावाताः, तथापि शस्य- सम्पत्तिसम्पादितासिटेलानन्दा, पूरितसर्वजलाशयः, रोमन्यायमानगम्भीरगमनपशुसमजोऽ- मन्दानन्दनिमीलितनयनकृपकजनलालित नहुनुस्य ससारे समुझसति, वर्द्धयति च वेषातः । अथ जगदनवद्यसौन्दर्यसर सरोजिनी सरोजिनी विचार्य कर्म, वर्म परिधाय महण. कन्यायां निहितभोजना, जनान् जयन्ती साहसेन, लघु सुन्दरं दृढमेमचन्द्रहास कटितटे भाग्थ्य, कृष्ण गुल्फलम्वि शिथिलमहरक्षक परिधाय, खभवनान्नि ससार । इतस्ततः प्रक्षिप्तप्रेक्षणा, समुच्छरद्गाना कचिदप्यनवलोक्य हृष्टा, कलहसगमना, मनागप्यास्ता, भीषणाप्यतिरोहितरतिसौदर्यसौन्दया, लप-लपायित-चक्र-मकायितद्विधाराधारकरा, पुनः पुनस्तमेवाभितः पश्यन्ती आनन्दितसमस्तकचाऽयकगाम्भीर्यया गत्याऽयासीत् । पूर्वदिशि पार्वतपाथ-पूरपूर्णोऽविज्ञाततल आयतः स्वच्छशीताम्बरः सुमरण- सितपत्सोपानो हदो ल्हादते। यस्याभ्यर्ण मूलजलादानसङ्गिविकसिता भूरुहाः उतज्ञतामिव प्रस्टयन्तः सन्तत शकुनिकलावैर्धन्यतामिवावदन् । सरोजिनी समेषु कोणभवनेषु निपुर्ण निरीक्ष्य प्रान्ता हतोत्साहोलब्धचन्द्रा विभावरीव म्लाना, पादपतलमेकमासाद्य, क्षण तिरम्य, विधम्य विभाव्य वस्नाणि सम्य- गाध्य हदसमीपं गता सकृदात्मान सदुद्यानं सत्सरो वीक्ष्य, अविज्ञातमर्मणि वारिणि पतनसमकालमेव मौक्तिकानीव, तारका इव, सप्तर्पय इव स्नात्वा स वियासव , कन्धविन्दव उच्चरिताः। कदम्बकाण्डोपत्रेशिनः केफिनश्च भोकरया केच्या भुव विराक्यन्तो भृश नेदुः । साहित्यसारस्वतचातुरीतुरी- धुरीणशास्राधेशिरोमणः करें। अस्वस्थचित्तस्य कृती महीपती ततो सता मुर्सयतो नु पञ्चमः ॥ काव्यम्लामलोनिधिशीतांशुना श्रीनिवासशास्त्रिणा चन्द्रमहीपती पचनो निवासः। पातयामास आत्मानम् ।

षष्ठो निःश्वासः यो दिव्याम्बुजलोलमत्तमधुपप्रोद्गीतरम्यं सर- स्त्यक्त्वा मानसमल्पवारिणि रतिं वध्नाति कैदारिके । तस्यालीकसुखाशया परिभवक्रोडीकृतस्याधुना हंसस्योपरि टिट्टिभो यदि पदं धत्तेत्र को विस्मयः ।। सुभाषितरत्नम् हृदयतृणकुटीरे दीप्यमाने स्मराग्ना- वुचितमनुचितं वा वेत्ति कः पण्डितोऽपि ।। त्रिविक्रम भट्टः गरलसहोदरजाता (लक्ष्मीः) यन्न मारयति तदपि वरम् ॥ स्फुटकम्। यामिन्याः प्रथमो यामः। वायु धाति । गणहारहारिवक्षसां सुगन्धशीतव्यजनेन वीग्यमानानामपि निर्लज्जेव वनिता नाम मुञ्चत्युष्णता। उष्णता उष्णता, तालशोपस्तालुशोषः, हिम हिम, बकुलपट्टिका वकुलपट्टिका, कर्पूरलेपः कपूरलेपश्चन्दन चन्दनं, जल जलम् अहो स्वेद', कण्डः कण्डू मशका. मशकाः, वायुर्वायुरित्यैव श्रूयते सर्वतः श्रुतौ। क्वचन प्रलम्बगुणाकृष्यमाण- कचन अवनिद्रसुन्दरीन पुरझवार, क्वचित् करधृतव्यजनिकाभिर्जननीभि विधीयमानः स्वेदजालप्रशमनः शिशूनां रोदनप्रशमनः संलाप. । प्रत्यट्टालिक प्रतिगवाक्ष समीरमिव मृगयमाणानां मृगीदृशा वेवेष्टि क्लयशिजितम् । नवनवेष्वपि वासोवेष्टितेष्वपि घटेषु प्रतप्तमेव पानीयम् । उशीरनीरसिच्यमाना पक्षद्वारपट्टिका उष्णतामेव पुष्णाति । बकुलकुलशय्याशायिनां गणिका- व्यजनस्वन, पष्टो नि.श्वासः हार एव भारोङ्गदमेवाङ्गदम् । ललन्तिकैवान्तिका, रशनवायना, वन्नमेवात्र, तूलिकैच शलिका, उपधानमेवापत् । किंबहुना वायुरपि वायु वाग्छति, सरसामपि सलिलहा, पिरामाक्षामदेहा नद्योऽप्यद्य सद्यः समुदमनुधावन्ति। मोनोऽपि दोनः। तुहिनमपि हीनम् । कमल- मपि समलम्। प्रतिप्रतोलि "हे भगवन् । हे नारायग! दोनबन्यो। कथं जगदिद' जीवयिष्यसि” इति श्रूयते प्राद्ध. प्रसुद्धद्वयोपः । सोमलोकलोक लोकंलोकवियमध्यमव्यास्ते चन्द्रः । मुशीतलजलशीतलतले शयनागारस्पायट्टिमे मन्चे उस्थानमाश्रयन् महाराजौ- रामपालो विनोतविशदवेषमूत्यैर्महमा तालान्ताभ्यां वीज्यमानो मन्त्रिणाऽऽलपति । समीपे च न नितरां राजवे राजते दोपाधानेऽप्यररिस्कृतो दीपः। अद्य रामपालमन्दिरे मालिन्यसम्राजः शासन समवलोक्यते । धावल्य विदूर- प्रसतेपु यशरयु, चापल्य लनालोनेपालिघु, 'अग गीतमः प्रताः संसारे, चालन न्यजनाना, • फुल्लता पुष्पाणां, विकासो जृम्मितास्ये, सम्मेलोऽक्षिपश्नम्। विक् धिक् कुर्वती घटी लोल लोलकेनाधैर्य च्यनकि । “मन्विन् ? शेष यहु व्यतीता रानिः"। मन्त्री०-आम् देव । शयिष्ये। भूपेन्द्र प्रतीक्षे, तत एव ..... महा.-( मध्ये एव ) किं सम्भावयसि मन्दिन् । यत् कमलां पुनश्यामि !... हन्त | महात्मनो नवेन्दुधर्मणोऽस्म्यहमेव, दुःखकारणम्। जोवन्ने। मृतोऽस्मि । मन्त्री०-नहि, देवनव वाच्यम् । महाराजाना चागो शपे, यती भूपेन्द्रो- गतोऽखि चराकेण जगदाणादम्। नासी सालपो यत्कार्यमर्नु प्रमादेन जलात् । वत्पनमपि समायातम् (कशिगुटिकाया नि सार्य ) । महा.-किलिखति स.- मन्त्री०-(दीपतिको किचिदुद्दीय) देव ! समा सम्बोध्य लिखति- कति योजनानि प्रत्यहमहो? मयाजगायन्ते। पटपटिद्वात्मके काले सोऽपि - १ नाखि गो पासा तागा-ग-रहिताः देतर इ.सवः। २ लोलक पेण्डुलम ।

टिपासर } १०४ चन्द्रमहीपतौ शान्ति न लभे। विविधरूपपरिवर्तनेन प्रतिक्षणमात्मान सन्देहसिधौ निमजयनधुनापि साश। क्षमश्चेद् गुरौ भवता मिलिनुमिच्छामि, मद्वचनात्सप्रणाम सान्त्वनीयो महाराज । जीवनेन कार्य विधास्ये। शेष कुशलम् । आज्ञापालको- भूपेन्द्र महा०-अद्य मन्नी-आम् देव ? अद्य गुरुदिनम्। मन्येऽधुना स आगत्यास्मान् हर्पयिष्यति । महा.-दृश्यताम्, किं भावि, मन्त्रिन्। विरक्कोऽस्मि । मन्नी०-देव! आपद प्राणिग्वेद पद दधति। पुरापि पृथुप्रतिष्ठा पार्थिवा आपत्तीराप्यापि धैर्य न तत्यजु । धैर्यधारिधुरन्धरा भवादृक्षा अपि धैर्य हास्यात, चेत् तदा हन्त ? क नामाश्रयिष्यत्यनाधया धीरता। गगनमेव गति शक्नोति सूर्यमण्डलस्य । द्वा स्थो भूपे दागमनमसूचयत् । आगतश्चैक सभ्यवेश प्रभावितमुखोऽरक्षाकृति' उपनिशवया, दीघाकारो व्यायामिविप्रहोऽदृष्टजन्व्रज पुरुष । मन्त्री०-भूपेन्द्र, अपि बुशलम् । कचिलब्धो वृत्तान्त ? भूप, तथैव चर्चा भवति यामेष्वटमु । भूपेन्द्र-किमिव कथयामि देव, अनवरत रतो भवत्सपर्यायां पर्यायेण प्रचुरनगराण्य वगाहमान स्वास्थ्य गमयित्वापि पूर्णोदन्तं न शतवानस्मि । श्रीमाथदो मरुत्तरास्टो गतवान् , तदा चालोन विमपि प्रत्यासत्य न निवेदितम् । मत्री-विपत्ती विपर एष पद पुयो। को जानी तत कि सूचितमायेंग, परन्तु स बराक समायर पथ्येव पेरि हराः। मरुत्तरधनीत । सोऽयख एवं भमपाय मानीतोऽन्वेषक। सत्पपपिच गश मदत्या मुसलधारया पृष्ट्या। भूपेन्द्र-(निवस्य ) सहि देव । पेय गायिमेवागतोऽस्मि । कदाचित्पन प्रदिनुवानि, तत्काय श्रीमद्रि रास्यरमेव क्रिमा । * 'चाले। अकारणवायवे, बहुभिदिपसरस्मा सेक्यसि। सकीयममूल्य समय प्पयसि। पुरामयागमनेनारमान समये भारोपपति। याहि तवाभिल 'यत .

पठो निःश्वासः १०५ ददामि, ते स्वामिन्या अभिलपितं पूरयिष्यति परमेश्वरः। परन्तु चपले ! सरोजिनी विवाहमहोत्सवे वयं न विस्मर्तव्याः।" 'आम्, अपरं मण, कोऽपि पटुवी प्रबलसिहस्त्वत्खामिनीप्रेयांसं चन्द्र द्रुह्यति, अपि जानासि तम् चपला-आ देव! तपमाविगतसिद्धर्भवतः किं तिरोदधामि । स एव मम सहवः कुमुदिन्याः प्रणयपानं वर्तते । तस्याः सूचनादेव कमला मोचिता। सर्व वृत्तधावगतम् । परन्तु सोऽमित्कृत्यमण्यपि न जानाति। न च कुमुदिनी तस्मै सूचयति । अतु, तहि तदर्थे किमपि करणीयं किम् । महात्मा-नहि, कि करणीयम् न करणीयम् । कुमुदिन्यपि न सूचनीया । अन्यथा सत्यवीरः प्रगलः कान्तिसिहदुष्टाय सूचयिष्यति। कीटशो वीरो दुष्टस्य हस्ते समापतितः। चपला-देव! एते सर्व राशो नन्दनसिहस्स मृतिभुज आसन्, परन्तु देवावे- दिवं गते दुष्टस्यतस्य हस्ते पतिताः । परन्तु प्रबलः सम्प्रत्यपि सरोजिनी मानयति। महात्मा-अस्तु, खमधुना गच्छ। सोऽयं महात्मा करमाकालातपस्यति इति सर्व एव इतस्तरला जानन्ति। विर- कस्पास्य एवत्प्रान्तीयाः सर्व एष परिचिताः विशेषतचौरधूर्ताः। फायसिदय त एनं तान्ति, आदियन्ते। एषा चपलाप्येकदा महात्मकीत्तिमुखखिया सरोजिन्या काय- सापत्न्याय प्रेषिता। महात्मना-"देवि! महात्मना सेवयानन्वतन्त्र वशीकरणम्, सैय करतलगता सिद्धिः। ते मान्यत्किमपीच्छन्ति" इत्युक्ता प्रतिदिनं सेवितु विनीतशा प्रत्येति। महात्माप्युत्कण्ठया सरोजिनीमियमाणं चपल्या विनियमाणं फर्म पानेन भणोति। महात्मन्ययं विशिष्ट गुणो यद् येन सावालाति तना- जीवन वायति। युच्युतिमिनोहयति। सः Bह मृद भापवे विहस्य ककि, परन्तु करमैपन यश का झप्पति, तदपि करणे। अत एव एनं सर्प आदियन्ते । प्रबल सहादयोऽप्येतस्य नितरां परिचिताः पर्वन्ति चिन्ति च महात्मने सूपान्त।

चन्द्रमहीपतो सोऽय महात्मा एतत्प्रदेशजानां कर्मणामभिज्ञाता, परं स्यान्नाम किमनेन महात्मकः! स तु एकेन कर्णेन शृण्वन्नपि अपरेण निष्कासयन्, स्वयजनयाजन एव रत भास्ते। * * कृष्णः पक्षः। निशीथः समयः। सधूलिर्वायुः सकम्पाः पादपाः। निद्रितःऽशेष- जन जगत। परं यथास्यधि निशयाऽटमीन्दुई विजिल खसाम्राज्यं विस्तारितम् । तस्याः पैशाचिकी चन- थराचरे प्रभावमाच्छादयत्। सतयश्चन्द्ररश्मय इब न्यलीयन्त। वन्यहिंस्र मन्तबोड सद्वृत्तय इव विस्रब्धमुप्तानां वराकजन्तूनां विजिपसियाऽभ्रमन् । स्वच्छसलिलं सरः। सरस्वटे अतिथिविश्रमायावासभवनानि। आलवालेषु पिपर- निम्य न्यग्रोधा यथास्थानमराजन्त। भूपेन्द्रः शिशयिषुः, सहचरैः सम्मन्व्यैकस्मिन् भन्ने व्यरमत् । श्रान्त आसीदेव पतन्नेव गाढमाकान्तो निद्रया। "सहयोगिनः ! अधुनैवाह खनमन्वभवम्”-भूपेन्द्रेणोत्यायोकम् । यदह शून्यनगरान बहिरश्वारूढो यामि। अकस्मादयो गहनं वन प्रविष्टः। पार्यतो वृकव्याघ्रशार्दूलाः शब्दायन्ते। मम हस्ते चैक वेत्रमास्ते। न्मनो ददयन् यनाभितः। अग्रे एका नदी प्रवहति । तस्यां जानुमित जलम् । तस्यामवारूढ एवाह पारं प्राप्नुमिच्छामि। अहमानदीजलमल जलप्रवाहो वाहोगकारो कोशेषु विस्तीर्णः। जले प्रोच्चा जलपर्वताः प्रादुभान समीररयोत्यापितसलिलेनाकान्तोऽहं साधो निमचन् केनापि तपखिनाऽस्मादागवेन निम्नसितः पार गतः पातितः। अकस्मादने दाानळस्य प्रचण्डो वेग उत्थितः। अहम भीतो यथा पलाये, तथा पनि विस्तीण जाले पतितो अद्धश्च । तेन भयेन सप्ने यथाऽरोदिय तथा मम निद्रा भग्ना" इति । सल्याशियधुना रात्रिर्गन्तव्यमस्माभिरिति सम्मन्न्य जातवेदसं दृष्ट्वा तमेव लक्ष्यीकृत्याचलत्। चतुरस्रो भूभागः। एकतो लपोयसो नवीना टो। अप्रभुवि च कम्पल विस्तृतम्। अमिः प्रमलते, यस्मिन् कमण्डलमता भारा भापयन्ते। अनतिदुर एवैकः शान्तो निष्प्राण वाचला, निमीलिननयन जान्वप्रातहवयुग, सरीरक्ष धर्मः कलिकालकालनभयेन विनवनवसनतिरोहित, प्राद्धम्। चलितः स चरित्र कृवेक्षण भारत। पप्टो निःश्वासः २०७ हितः प्राणिमात्रस्येव सत्यः, अहेतुकधानुकप्रकृष्टनिप्छुदुटसन्त्रासनस्तयाऽलब्ध- शरण्यया दयया पूरिता व पीवरः वासदशकलवेष्टित-कटिभागो, नाग इव निभी को निर्षितग्राण, साच्चान्तरसः, करुणाप्रवाहप्रवर्तकः, अपारतपपारावारपारीणधुरीणः, भसितसितकेशपामस्मभु ायतललाटो महारमा कुशासने स्थितः। सनीपे चैका तुम्बी नारिफेलस्य सर्परपानं चिम्मटं दण्डः इति । अथासौ प्रनुरं विचार्य महात्मनोऽनतिदूर उपविष्टः समाधिभगमपेक्षमाणस्तन्मुस- घटिकारयेण महात्मा साजमर्द सजम्ममुत्यायाऽनि प्रदक्षिणी- कृत्याचम्य हवयुगलमायोज्य लोकमिममपत्- अपार-संसार-समुद्र-तारिन् ! सभक भूताखिल-दुःख हारिन् । निशाचर-स्तोम-विनाश-कारिन् । पायस मामुत्पलमालभारिन् । "श्रीमतां चरणसरोरुहयोः प्रगमामि" महात्मना सावधान पीक्षितः प्रात भूपेन्दः । महात्मा.--(तूष्णीम्भूतः किमपि विचारयति) भूपेन्दः-भगवन्, देदीप्यमानप्ररतसाम्राज्यस्व कलेः केलिकाले, पादः प्रमथ्यमान- तगेघनगोधननिहारम्बे महात्मना तपोऽभिद्धिरवश्यमानन्दावहा । सबारे भगवद्भजन- मेर श्रेषः। तदन्तरा पुंसः परस्मिल्लो नैका काश्म्यिपि प्रादुर्भवति। विषवमुखं 'माहेय 'माहेयमिव हेयम् । देव 1 भवदशा एव जगदर्णवर्णधाराः, सन्ति । भवाशाना योगबलेने स्थितास्ते भूः। भगवन् ! दुस्परिम, यराकोऽस्मि, भवतां लघीयसापि हस्तेन अस्यावतंपतिता नी परिप्पति। महालन्। दयनीयोऽहम्। भवन्ति मिल मादशाः साधूनामनुकम्प्याः । महात्मा:-अस्य ववनभरीमाकर्थ मुद इस सिन्दूरमियान्यामिर, पुरः तिमीटयोनिप्रतिषिन्त्रिता विरोहितवरामान्यां विशालाभ्या नेनाचा दहभिर, उदरसाकुनित्र, विपक्षनिर, चेतनी तमननकाननया, गम्भीरया प्रतिध्वनि चनुर्गपणा याचाऽनम ति सामर व सम्भसयन् प्राह) म.नान विस्मृतदु सा- १ मा भरम हेयम्। २ हौ भवन हेव-निन् ।

सततसन्ततिततिकर्यविस्तर मन नाह तर भ्रमे कीदृशेनाज्ञातखभावेनावसर १०८ चन्द्रमहीपतो रूपारगर्भप्रतिज्ञानाम्, ज्ञानाम्भोधिपानागस्त्यानाम् , तारगतचेतसाम् , अयधीनमरणाय भकार्यकरणापेयपानाखाचखादनापाव्यपठनादृत दर्शनम्नुपितैन पूरितनिन्दानिधिमेधानाम् , असदभिनिवेशप्रदुष्टस्वान्तानाम् , कुकृत्य सम्पादितयशसां, 'अनभ्यासमित्यानां पशुपतिपराणां नराणां वाया आवश्यकता । पूर्व भगवद्भजनमाहात्म्य कथयित्वा सम्प्रति नावमावतपतिता शोचति । कौपीनग्रन्यो निबद्धास्ते नौ, उन्मोचय मम का विलीनास्ते निष्कासय। धूर्त ! मा नाम गार्हस्थ्यवात या दूषित विधेहि मनः। अपेहीतः। पतिष्यामि धूर्त। कुलागार । कपटप्रिय 1 पथिम्वञ्चक ! है हैं हैं हैं (हसति) विचिनमदो हास्यमासीत् । भूपेन्द्रो गतप्राण इव सम्भूत'-तस्य चेतति सायिका विचाराश्चेरु स शौचन्नासीद् यदद्य समापतित । ईश्वर एव क्षेममाचरिष्यति । परन्तु हासेन जात किञ्चिदाशाबन्धन प्राणेषु । क्षण पक्षद्वयत एव नीखताऽऽच्छन्ना। पुन प्रशान्तया वाण्या मधुरशब्दैराह महात्मा- पान्य । किमिच्छसि ! क्य तव नौरावत पतिता। वयं साधवो गतस्पृहा। न कमपि प्रेक्षामहे। अखिल विद्म । प्रेमपात्रस्याप्रे क्थयामोऽपि । प्रयोजनम्। भूपेन्द-महाराज] विभेमि। यद्यभय भवेत्तदा किमपि निवेदयेयम् । महात्मा० -अभयन्तेऽस्तु, क्थय । भूपेन्द०-महाराज! राज्ञो रामपालस्य पुत्री कमला रानौ मुप्ता प्रातर्न लब्धा । ताश्चान्वेषयनस्नाकं राज्ञो भावी जामाता नाम्ना चन्द्र -जनगरराजकुमारोऽपि गत । यदि श्रीमता मतिमदा शन्तात्मना महात्मनां या भवेत्तयो स्थिति सूचयेयु- खदाहमपि लब्धमदोपदारश जीम्यास शरदः शतम्। महात्मा०-चन्द्र कमला लोपहार लप्स्यसे, किमनेनास्माकम् । भूपेन्द्र हि नहि देव! कल्याणभुजो भविष्यन्ति भपन्तः । अगता कन्याणकत्तारो यतः कथय किन्ते साधनो दून. परिहत्तव्यानाम् ।

भूपेन्द्र
पष्टो निःवासः
१०६
महात्ना-भवत एताः कशिजयति, हुम्, अस्नु नहिं सत्यं कथयामि किम् !
- महाराज।
महाना.चन्द्रोऽभुना "नन्दन पुरे" आते। दांव च तत्स्वामिमुता
कमला। परमशकस्वं ती लब्यु; यतः कस्यायन प्रेम्नि यःमः।
भूपेन्द्र के प्रवकन्यम् । अहं पातालादार शकोऽस्मि निस्सारितुम्, का च्या
नन्दनपुरग्रमटिकायाः।
महात्मा०-आ, एवम् । नज साधय, कुरु कार्यम् ।

११० चन्द्रमहीपती कारा, काराबन्धनं तस्य शोचन्ती, तदुद्योग तल्लक्ष्यं क्षणेनैव ज्ञातक्ती। विरं चिन्तयामास हन्त । महानयमनों जातः। अस्तु यबातंतजातम् । * * * पायोनिकेतने वैत्यन्यक्कृततूल कूलमासाद्य पर परमभ्रमललितलोहितलपनमा लग्नाम्भ करें: सरोजिनीव वभौ सरोजिनी । सा चोत्पन्नमहाऽपहायोदस्वन्ति वसा मरणमपया शुष्कत्रमाणि धृत्वा भीरुभामिनीभूषणं दूपर्ण साहसिकानामपहाय शोकलोकं बाहीकभूमावागत्याभिनवां रथलेखामविदूर एवापश्यत् । आति- मना एकस्मिन् प्रोच्चं गण्डशैलमारूह्याऽभितः पश्यन्ती गव्यूत्यन्तराल उद्धाविन्दा भुवि शनैशनैर्यन्तं रथमेकमैक्षिष्ट । रथसम्मुखपादपेभ्योऽकस्मान्निमृतया पर सारथेरेवमभूवन्नालापाः। सरोजिनी-क यासि रे! पाटच्चर, तिष्ट, पश्यामि। रथे रिमति । सारथिः-मन्ये धृतनीवेशः कोऽपि धूतोऽसि, परं नाहं वेशेन दयिष्ये। मिला चर्परयिष्यसि चेल्लनचपेटो धरी धास्यसि । नज, अपेछि, न तेऽवस्था (कशयाऽची ताइयति)। परोजि०-मूढ : मदाशामवशाय व पलायितुमिच्छसि, पश्य सजौ भव । सरोजिनी एकतो भूत्वा रथ्यस्य शिरोधरा कृपाणमोपकेन सद्य एव हारयाचकार । गतग्रीवे चार्वति, अतिरोपकषाये च सारस्तुण्डे क्रोधोयमतरलनेत्रायां सरोजिन्यां समजनि जन्यम्। पादाहतः कृष्णोरंग इव प्रादुर्भूतमदः करीव भीकरकायर रोपोच्ठलगानः स सरोजिन्या वराक्या उपरि कटकटायितदशनः कृपाणपाणिः पतितः। परन्तु सरोजिनी सौन्दर्य एव केवल नायगया, किन्तु कलाकलापालापिनामपि, यत स्तत्प्रहारं व्याकृत्य लघीयया हस्तेन तच्छिरः फलमिव पक्व पिल्वस्य निपातया चकार। मृते सारथौ रथ्ये पररथ्ये च गन्तुमसमर्थेऽर्थे सफला सा सद्य एवं रधान्मूच्छितं वस्त्रवेष्टित पुख्यमेकमुत्तार्यापश्यत् फेनमृतमुखचन्द्र'समनःकुमुदचन्द्र रिपुपूरतमश्चन्द्रश्चन्द्रम् । तमेव चिन्त्यां दशामनुभवन्त वीक्ष्य नालभन्ताणि स्थानमन्तः । सत्वरमन्तर्गतदुःखताडितान्नि धावमानानि नेत्रद्वाराभ्यां बहिराल तदुःखदुःखिता तानि पप्ठो निःश्वासः १११ नुवनि सिषिचुः। "क्यमेकाकिनी शसकुळे सोपवे विग्ने बने विलयानि । कोऽत्र सत्यां विपत्ती साहाय्यमाचरिष्यतीति तसा पतक्रियमाणा निपुगं नाही परामृत मी विजय तदपनयनौषधीं तस्मा आघ्राप्य, कॉरिद्विन्दूनपि उन्मुले नेत्योच निपास प्रतीक्षमाणानिष्टत् । घटिकापष्टांशेन र नेने उम्मील्येतत्ततो मुखं प्रोन्य यावदुत्तिष्ठ सति प्रमामेका चन्द्रहासतारन्येन चक्षुम्नियन्दी वीक्ष्य “नहि शस्त्रात्यन्ताभावशालिनि पुसि मत, नवदेव प्रबलमवमत् । धेयान् शस्त्रपात" इत्याह। सरोजिनी त्वन्तः पतितं सारथेः तदा लक्ष्यीकृत्य "गृहापान खड्गमहमपि वीर कर्म दिशे" अनुत्तीर्य योद्ध मसजत। पटियां यावद यहुलविधानं जन्यम् । "कस्त्वम्, थाहान् युध्यसे।" "महाराज! एते दुष्टाः श्रीमन्वनावध्यानैपुरिविनमहं शाला मनार मेषितरती। मूल्ठनशिथिल नस्य भवतो मनोविनोदाय आलस्यापनयनाय च मोडिना, न स्या, सैच फुटता साधुशालः सम्या। सम्प्रति अनुगमीन, मोनमिव पीन रथावशिष्टनवनाम्य यथाभिलषितं प्रदेश प्रयातु देव, महनपि यामि। "किनाम देवस्य ।" "चन्द!" "कुन भरती नियसति ! किस नाम भवसाः।" “पाल एव नन्दनपुर तव मा वसतिः आत्या च सरोजिनी नर्तव्ये कायें" इति कथयिता सीवं गुमलम्बि, अरक्षक सक्दपहाय फकारण पूलनानपयार्य पुनरायोज्योत्तरमनपेक्षमागा, प्रस्थिता । चन्द्रय व्यतिकरेपानुना विस्तव्ये व्यगुहन् । भर विरोचनो रोचीपि समोचन् । बिदूरप्रसूतहिमततिताइनसकुचितासिर काटनु प्रायस्य बभूव तमसः। सर्वनाम तमसोमो ग्याप। दुदिनानीव दीनान वनासि भुवं प्यास्याम मुः। देवदतन हाशक्षिलयेऽपि शिवभवनेऽपि मुसी न तिष्ठति । तस्यान्दपि विसावते, मुखमाधन दुसार, प्रसूनान्दी प्रहारायन्ते, मतमन्दिरमार यमनन्दिगपते। महेनुमा भार करोनन्ति। अनुमोनो-स्पेगन्दा!

व्यस्त, तावदेव प्रथलमवमत् । पप्ठो निश्वासः १११ भुवमपि सिपिचुः। "कथमेकाकिनी शसयुले सोपवे विजने पने विलपामि । कोन सा विपत्ती साहाय्यमाचरिष्यतीति चेतमा सतक्रियमाणा निपुणं नाडी परामृत्य मूळ विज्ञाय तदपनयनौषधी तस्मा आघ्राप्य, कांदिचदिन्दूनपि तन्मुसे नेत्रयोश्च निपात्य प्रतीक्षमाणातिष्टत् । घटिकापष्टांशेन र नेत्रे उन्मील्येतस्यतो मुख प्रोग्य यावदुत्तिष्ठासति प्रमदामेको चन्द्रहासतारल्येन चक्षुश्चकित्यन्तीं वीक्ष्य “नहि शनात्यन्ताभावशालिनि पुसि धेयान् शस्त्रपात" इत्याह । सरोजिनी त्वेकतः पतितं सारथेः खड्गं लक्ष्यीकृत्य "गृहाणामु खड्गममपि वीर कर्म दिदक्षे” इत्युत्तीर्य योद्ध मसज्जत । पटिकां यावदभूद् यहुलविधान जन्यम् । "यस्त्वम्, अग्रहरन् युध्यसे।" "महाराज ! एते दुष्टाः श्रीमन्तमावथ्यानैपुरिवित्तमहं ज्ञात्वा मनाम् सेवितपती। मूर्यनशिपिलाजस्य भवतो मनोविनोदाय आलस्यापनयनाय च क्रीडिता, न रुपा, सैय घटता साधुशीलैः धम्या। सम्प्रति अनुरामीनं,' मीनमिव पीन स्थावशिष्टमचमारा यथाभिलषितं प्रदेशं प्रयातु देवः, अहमपि यामि । “किनाम देवस्य।" "चन्द्रः" "कुल भरती निवसति। किच नाम भवत्याः।" "पार्व एव नन्दनपुर तव मम वसतिः आख्या च सरोजिनी स्मर्तन्पेयं कायें" इति कथयित्वा स्वीयं गुल्फलम्बि, अगरक्षक सदपहाय फटकारेण धूलिकणानपसार्य पुनरायोज्योत्तरमनपेक्षमाणा, प्रस्थिता। चन्दच घ्यतिकरणामुना . किर्तव्ये च्यमुहत्। भप विरोचनो रोचीपि समझौचत् । विदूरप्रमृतहिमततिताइनसवितास्तिव काष्टामु मावस्य बन्द तमसः। सर्वनाकाशे तम स्तोमो व्याप। दुदिनानीव दीनान तमासि भु प्यायलयामामुः। देवहनन हरः सजिलयेऽपि शिवभवनेऽपि मुसी न तिति । तस्यान्तमपि विपायवे, मुरसाधनं दुःयायते, प्रसूनान्यपि महारायन्ते, मातृमन्दिरमपि यममन्दिरायवे। अहेनुका भादा एफारीभवन्ति। अनुममोनो-यपेरगन्दा।

पप्ठो निःश्वासः १११ मुवमनि सिपिचुः। "कयनेकाकिनी असदुले सोपवे विग्ने बने विलपानि । कोन सयां विपत्ती सहाय्यमाचरिष्यतीति चटमा सतत्रियमापा निपुणे नाडी परामस्व मूळ विज्ञाय तदपनयनोपनी तरमा माघ्राप्य, काचिद्विन्दूनपि उन्मुचे मैत्रयोश्च निपत प्रतीक्षमागादित्। घटिकाष्टांशेन स नेत्रे उन्मील्येतस्तो मुखं प्रोन्टर यावदुत्ति सति प्रमदामका वन्द्रहासतार येन शुश्चम्तियन्ती वीक्ष्य "नहि हास्नात्यन्वाभावशालिन पुसि पत, ववव प्रवरमदमत् । प्रेमान् शस्त्रपात" इत्याह । सरोजिनी खेतः पतितं सारथः सुद्गं लक्ष्यीकृत्य "गृहाणामु खड्गममपि वीर कर्म दिशे" अनुत्तीर्य योद्ध ममत। पत्रिका यावदभूट् बहुलविधनं जन्यम् । "कस्वम्, अप्रहरन युध्यम।" "महाराज ! एते दुष्टाः श्रीमन्तमावघ्यानपुरतिहत्तमहं सत्ता मनन सेवितवती । मू नशिथिलङ्गस्य भवनो मनोविनोदाय बालस्यापनयनाय च क्रीडिता, न स्या, संयं घटना साधुशीलः म्या। सम्प्रति अनुशामीनं,' मननिय पीन रथावशिष्टमधमारख ययाभिक्तिं प्रदेश प्रयानु देव, अहमपि यामि। "किनाम देवस्य ।" "चन्द:" "कुन भारती निवसति। किच नाम मबलाः।" "पर्व एव नन्दनपुरं तव मम यमतिः सारया च सरोजिनी स्नर्नव्यैर्य करें" इति व्ययित्वा सीयं गुफलाम्य, अगरक्षकं सपहार फटकारेण धूलियानरमार्य पुनरायोज्योत्तरमनपेक्षमागा, प्रस्पता। पन्य व्यतिकरणामुना' विकतन्य व्यमुदन् । अपविरोचनो रोचीपि समोचन्। विदृप्रतहिमततितादनसंचिताखर काटनु प्रावयं बभूव तमसः। सर्वसामारो दम तोमो व्याप। दुर्दिननीव दीनान् समामि मु प्यालयामामुः। दैवतन हिलयेऽपि शिवमनेऽपि मुसी न दिति । तस्यापि विषयते, सन्म धनं दुश्मयते, प्रसूनामी प्रहारायन्ते, मातृमन्दिरमरि यमन्दिर यते। महेनुका भार मारोमान्ति। धनुगमोनो-पगन्दा ।

पप्ठो निःश्वासः १११ भुवमपि सिपिचुः। "कथमेकाकिनी शसख्युले सोपवे विजने पने पिलपानि । कोज सत्यां विपत्ती साहाय्यमाचरिष्यतीति चेतसा सतक्रियमाणा निपुणं नाडी परामृश्य मूछों विज्ञाय तदपनयनौषधी तस्मा बाघ्राप्य, कोचिद्विन्दूनपि तन्मुखे नेयोच निपाल प्रतीक्षमाणातिष्टत् । घटिकापटांशेन स नेत्रे उम्मील्येतस्ततो व्यस्त, तावदेव प्रबलमवमत् । मुख प्रोग्य यावदुत्तिष्टासति प्रमदामेको चन्द्रहासतारन्येन चक्षुश्चकित्यन्तीं वीक्ष्य “नहि शस्त्रात्यन्ताभावशालिनि पुसि श्रेयान् शस्त्रपात" इत्याह। सरोजिनी त्वेस्तः पतितं सारथः खड्ग लक्ष्यीत्य "गृहाणामु खड्गमहमपि वीर कर्म दिदृशे" इत्युत्तीर्य योद्ध मसज्जत । घटिका यावदभूद् यहुलविधानं जन्यम् । “कस्त्वम्, अप्रहरन युध्यसे।" "महाराज ! एते दुटाः श्रीमन्तमावथ्यानैपुरितिवृत्तमहं शात्वा मनाक् सेवितवती । मूनशिथिलाइस्य भवतो मनोविनोदाय आलस्यापनयनाय च क्रीडिता, न स्या, सैवं घटता साधुशीलः क्षम्या। सम्प्रति अनुसामीनं,' मीनमिव पीनं रथावशिष्टमवमान यथाभिलषितं प्रदेश प्रयानु देवः, अहमपि यामि। "किनान देवस्य।" "चन्द्र!" "कुन भरती निवसति ! किन नाम भवत्याः ।" "पाल एव नन्दनपुरं तव मम वसतिः आरया च सरोजिनी स्मर्तव्येयं कायें” इति कथयित्वा सोयं गुल्फलम्बि, अारक्षकं सकदपहाय फटकारेण' धूलिकणानरसार्य पुनरायोज्योत्तरमनपेक्षमागा, प्रस्थिता । चन्द्रय न्यतिकरेगामुना' किर्तव्ये न्यमुहत्। भनिरोचनो रोचीपि समोचत् । विद्रप्रमतहिमततिताइनसंकुचितास्सिव काटामु प्रायत्य बभूव वनसः। सर्वनामा तम स्तोमो व्यापप्रे। दुदिनानीव दीनार तमासि भु प्यारण्यामामुः। देवदतन हाः शामिलयेऽपि शिवनवनेऽपि मुखी न निष्ठति । तस्यामृतमपि पिपायवे, मुखमाधन दुखापत्रे, प्रस्नान्यपि प्रहारायन्ते, मानृमन्दिरमपि पमनन्दिरायदे। अहेनुका भारीभवन्ति । अनुगमोनो-पेटगन्ता।

११० चन्द्रमहीपतो कारा, काराब-धन तस्य शोचन्ती, तदुद्योग तल्लक्ष्य क्षणेनैव ज्ञातवतो। विर चिन्तयामास हन्त ! महानयमनर्थों जात । अस्तु यजात तज्जातम् । * . तया पायोनिकेतने इवैत्यन्य कृततूल कूलमासाद्य पर परगश्रमललितलोहितलपनपदा समाम्भ कर्ण सरोजिनीव बगौ सरोजिनी । सा चोत्पन्नमहाऽपहायोदस्वन्ति वासासि मरणमञ्जूपया शुष्कवस्राणि धृत्वा भीरुभामिनीभूपण दूषण साहसिकानामपहाय शोकलोक बाहीक्भूमावागत्याभिनया स्थरेखामविदूर एवापश्यत् । आशकित- मना एकस्मिन् प्रोच्च गण्डशैलमारुह्याऽभित पश्यन्ती गव्यूत्यन्तराल उद्धातिन्या भुवि शनैश्शनैर्यन्त रथमेक्मैक्षिष्ट । स्थसम्मुखपादपेभ्योऽकस्मान्नि सतया सारथेरेवमभूवन्नालापा । सरोजिनी-क यासि रे। पाटच्चर, तिष्ठ, पश्यामि। ये किमस्ति । सारथि -मन्ये धृतस्त्रीवेश कोऽपि धूर्तोऽसि, पर नाह वेशेन दयिष्ये। जिहां चर्परयिष्यसि चेलमचपेटो धरी धास्यसि। व्रज, अपेहि, न तेऽवस्था ( करायाधी ताडयति)। सरोजि०-मूढ : मदाज्ञामवज्ञाय क पलायितुमिच्छसि, पश्य सजो भव । सरोजिनी एकतो भूत्वा रथ्यस्य शिरोधरा कृपाणमोपकेन सद्य एव हारयाचकार। गतप्रीवे चार्वति, अतिरोपकपाये च सारयेस्तुण्डे क्रोधोद्यमतरल्नेत्रायां सरोजिन्या समजनि जन्यम्। पादाहृत कृष्णोरंग इव प्रादुर्भूतमद करीव भीकरकाय रोपोच्चलदान स सरोजिन्या वराक्या उपरि कटकटायितदशन कृपाणपाणि पतित । परन्तु सरोजिनी सौन्दर्य एव केवल नाप्रगण्या, किन्तु क्लाकलापालापिनामपि, यत स्तत्प्रहार व्यर्थीकृत्य एघीयमा हस्तेन तच्छिर फ्लमिच पक विल्वस्य निपातया. धकार। मृते सारधौ रथ्य परथ्ये च गन्तुमसमर्थेऽथें सफला सा सद्य एवं स्थामूच्छित वस्त्ररित पुरुषभेकमुत्तायापश्यत् पेनमृतमुखचन्द्र स्खमन मुद्धद्र, शिरतमथ यादम् । तमेव चित्या दशामनुभवन्तं पोक्ष नालभन्ताधूणि स्थानमन्त । तानि सत्वरमन्तर्गतदुःसताडितानि धावमानानि नेनद्वाराभ्यां बहिराणस तदु रादु सिता पष्ठो निःश्वासः १११ भुवमपि सिपिचुः। "कथमेकाकिनी शसध्युले सोपवे विजने पने विलपामि। कोत्र सत्यां विपत्ती साहाय्यमाचरिष्यतीति चेतमा सतक्रियमाणा निपुणं नाडों परामय मूर्दा विजय तदपनयनौषधीं तस्मा बाघ्राप्य, काचिद्विन्दूनपि तन्मुखे नेनयोश्च निपास प्रतीक्षमाणातिष्टत् । घटिकापटांशेन स नेत्रे उन्मीत्येतत्ततो व्यक्षत, तावदेव अवलमबमत् । मुखं प्रोग्य यावदुत्तिष्टासति प्रमदामेकां चन्द्रहासतारल्येन चक्षुश्चरित्यन्दी वीस "नहि दास्त्रात्यन्ताभावशालिनि पुसि श्रेयान् शस्त्रपात" इत्याह । सरोजिनी वेकतः पतितं सारयः खड्ग लक्ष्यीकृत्य "गृहाणामुखद्गमहमपि वीर कर्म दिदृक्ष" इत्युत्तीर्य यौद्ध मसजत। घटिकां यावदद् बहुलविधानं जन्यम् । "कस्त्वम्, अग्रहरन् युध्यसे।" "महाराज। एते दुष्टाः श्रीमन्तमावघ्यानैपुरिविवृत्तमहं ज्ञात्वा मनाक् सेवितवती । मूर्छनशिथिलागस्य भवतो मनोविनोदाय आलस्यापनयनाय च क्रीडिता, न स्या, सैयं धृष्टता साधुशील क्षम्या। सम्प्रति अनुकामीनं,' मीनमिव पीनं रथावशिष्टमधमारुह्य यथाभिलपित प्रदेश प्रयानु देव, अहमपि यामि। "किंनाम देवस्य ।" "चन्द:" "कुन भरतो नियमति ! किन नाम भवत्याः।" "पात्र एव नन्दनपुर तनैव मम वसतिः भाख्या च सरोजिनी स्मर्तव्येयं कायें" इति क्ययित्वा खोयं गुल्फलम्वि, अङ्गरक्षक सकृदपहाय फटकारेण धूलिकणान्पसार्य पुनरायोज्योत्तरमनपेक्षमाणा, प्रस्थिता। चन्द्रश्च व्यतिकरणामुना किंकर्तव्ये व्यमुद्दत् । अब विरोचनो रोनीपि समकोचत् । विदूरप्रमृतहिमततिताडनसंकुचितास्सिव काष्टामु प्रावस्प बभूव तमसः। सर्वनाका तम खोमो व्यापप्रे। दुदिनानीव दीनान् तमासि भुवं व्याकुलयामामुः। दैवहतकेन दृशः शनिलयेऽपि शिवभवनेऽपि मुखी न तिष्ठति । तस्यामृतमपि विपायते, मुखसाधन दुःखायठे, प्रसूनान्यपि प्रहारायन्ते, मातृमन्दिरमपि यममन्दिरायते। अहेतुका आपदः स्फारीभवन्ति। १ भनुकामोनो-यपेटगन्ता।

११२ चन्द्रमहीपतौ यतश्चद्र सरोजिनीमनुचलितो गहने गहने मदमत्त इवेयाय । चन्द्र प्रथमन्तु ज्वलिन जातवेदस महात्मानश्च वीक्ष्य 'काऽऽयातोऽस्मीति भीतोऽपि, महात्मन समीपमयासादेव । स च चरणध्वनिना सतक आग तुकमपश्यत् । इतश्च द्रोऽपि साधुवीक्षणसमकालमेवावादवतीय वलगामापयन् साधोरभ्यामुपेत । चद्र-(प्रणाम कर्तमीहमान इव) भगवन् ! महात्मा-नाह प्रणम्यस्त्वया वधिक 1 वराकामुधैव हिसन् भ्रमसि । चद्र-(महात्मखनुचित कोप प्रशमय्य) महात्मन् ! भवता कथ ज्ञातोऽस्मि यह वधिक। महात्मा०-(हृष्टोऽपि कृनिमकोप प्रदशयन् ) आम् महात्मन् ! कृपाणपाणे। जगदक्षक ! व नासि वधिक । क्य स्मो वधिका । योगिराज ! स्वागत तेऽस्तु । बद्र-( निरीहो वास्तविक स्तवनीयकीतिमहात्माय प्रतीयते) महात्मन् । कि खड्गधारिण एव बधिका भवन्ति, किं मालाविकेतारो भगवद्भक्ता ? गङ्गाम्बुपायिनी दर्दुरा अपि स्वर्गसौभाग्यभागिन ! महात्मा०-नाह भवत उपमान शिक्षयामि। कस्याश्चन नायिकाया समीप ब्रज। चद्र-लक्ष्योऽखिलकूरचधुपा, विपदाच, पात्य प्रेयसा त्याज्य सरदेहिनामस्मि । भवतापि वधिकपदेन सम्बोध्ये महात्मा०-(शान्तो भूत्वा ) अस्तु, उपविशासने । स आयोजय। कुटीरे शष्प वत्त ते, अश्वाय देहि। श्वो गन्ता । चन्द्र-दया भविष्यति चच्छीमताम् । अश्व प्रलम्वया वलाया वृक्षे नियम्य शष्पश्चाग्रे निपात्य महात्मप्रदत्त फलमूलादिक मुपभुज्य चन्द्रोऽपि महात्मन समीप एव कृष्णकम्बले पाण्डुकम्बलाई शयन कल्पित वान् । द्वयोरेव चित्त प्रचुरविचार पूर्ण द्वावेव च महोत्तो प्रत्यैताम्। द्वयोरेव नेन समाज सकुटिले सणवीक्षण पारस्परिक भाव विज्ञातु मुखरिते आस्ताम् । परन्तु द्वावेवावसर प्रक्षाताम् । अन्तत खभावचतुरो महात्मैव वव सन्दोह अध प्रावर्त यत् । महात्मा-पाय! किन्ते नाम ! काच जाति 1 "कुवारी पष्ठो निःश्वासः ११३ चन्दः-मां लोका 'चन्द्र' इति सम्बोधयन्ति । जात्या क्षत्रियोऽस्मि । महात्मन् । कि नाम भवतः? महात्मा०--(स्मयमानमुखः) अस्य शरीरस्य 'शक्तिनाथ'-इति संज्ञा । अस्तु, चन्द्र! सत्यं कथयिष्यसि, यदहं प्रक्ष्यामि। चन्द्र०-आम देव ! कथं स्यात्तिरोधानं करामलजगतां भवतां पुस । शक्ति-न तेऽङ्गानि श्रमक्षमाणि, न च प्रतीयते आहितश्रमं वपुः। न च विदित- वनसत्तान्तं मनः, न च क्रूरदृत्तिः प्रकृतिः। पुनः किमथं 'च्यौलीभूयाटवीतोऽटवीं, पुलिन्दकुणिन्दा श्राव श्रावं पुरः पुरं नगादगं भ्रमसि। 'फुटवासिनो भवादृशा नाररु रुरु रोदिवशिवास्कन्दनसिंहक्ष्वेडाव्याघ्रविजृम्भणव्यालकालकेलिलालिते- शार्दूलदोलनशक थावनविधुतधैर्य, अन्यान्यवन्यशीव विसरसते, 'सत्वनस्तितृ हिपद्व्याप्तेऽवने" बनेऽनवना भ्रमन्ति इति न चेत् कापि क्षतिस्त्रहि सक्षिप्य कथनीयस्तावकोऽयं वृत्तान्तः । चन्द्र-किमविदितं भगवत्पादानाम् । सर्व विदनपि याल्यदाचरसि । धन्या भवन्तः, यैरखण्डाच्छेद्याकाव्यतपोहुताशेन भस्मितममितं कुलस्याप्येनः। पावकपूतं वनमिवाद्वारा- वशेष पूत प्रतिभाति येषां वपुः। धन्यौ भवतां जनिती यावीशं पुत्ररलं प्रासूताम्। भगवन् ! अलमेतादृशमलिनवृत्त श्रुत्वा। भगवन् ! मृशं दुःखितो. ऽस्मि, दुःखकल्मपयुजामसवात्मुखसूर्योदयानां भवादृशा भवविमोचका एव भवन्ति शुभाश्रया इति कवोष्णं निश्वस्य चन्द्रःखकीयमुदन्त विस्पष्टं न्यवेदयत् । गलितयौवना कामिनीव यामिनी शैथिल्यमभजत । चन्द्रो निःशङ्क सुप्तः। शतिनाथस्तु निमृतगुत्थाय, गतो यथेच्छम् । भराजत प्रावीकामिन्याः सौभाग्यारुणसिन्दूरबिन्दुर्विशालभाले । उन्नतिपये त्यतमेरुः पेः। प्रहरमात्रेणेव बभूव मध्यमहः। परन्तु युवराजश्चन्द्रः सुप्त एव। तस्यानल्पपोपा घोणा निद्राभरं व्याञ्जोत् । परं कोमल-दूर्वाकुरभक्षण- १च्यौलो गमनशीलः। २ कुणिन्दः शब्दः । ३ पुटर वन्नगृहम्। अररुः शनः। ५ रुमंगभेदः। ६ शक्का-हस्ती । ७ वा भगाल। ८ शोवाजगरः। ९सूत्वा-ब्रझा। १० अपने-निर्जले। -११ अरक्षणः । वभून चाग्रेसर ।

११४
चन्द्रमहोपतो
गतनमो हर्पकृतह प. शरीर धुन्वन् वाजी एनमुन्द्रियत्। अथ चस्तिो
भीतश्चोत्याय व गतो मुनिरिति सकृत् सम्भ्रान्तः, अथवाऽऽयास्यति किमस्माकमिति
निश्चिन्तः, स्नात्वा प्रचण्डबुभुक्षाक्षामवदनो मुनेराज्ञा विनापि फुटीकोणतानि फलानि
समुपभुज्य वाहमा रह्याभिमुखं दण्डमाथमाश्रित्यायासीत् ।
नन्दनपुरप्रवेश एवासोच्छुल्कशाला। अध्यक्षेण चन्द्रस्याभूदालापः ।
"भोजनालयोऽप्यन्तः"
"आम्, भोजनालय,
शैत्याधाकृतहिमालयो जलालयः । पनवाचनालय.
भोजनसमये च नृत्यस्य प्रबन्ध , रानौ च मनोरञ्जनाय गानवाद्यमिति सर्वा सुखदसामग्री
भवता पुरो नृत्यति"।
"कस्या भूमौ स्थान दास्यते"।
"तृतीयायाम् , यतस्तत्रैव राङ्कवास्तरणास्तृताः मुसज्जा पर्यशाः। महार्हा आसन्धः ।
विचित्राणि चित्राणि । सर्वा राजोचिता व्यवस्था।"
"घोटकस्य..."
"आम्, घोटको मन्दुराया स्थास्यति। अस्मै घासादिकमप्यस्माभिर्दास्यते।"
"भोजनशालाया. प्रबन्धः कीटकू?"
"देव । सामिपं निरामिषञ्च भोजन पृथक् पृथक् स्थानेषु निर्माप्यते। सुपाचक्रपक्व
वैये परीक्षित विशुद्ध भोजन दीयते ।
"तहिं निर्दिश पन्थानम्।"
"कियच्छुल्कमेतस्य"-
"प्रतिदिन दशमुद्रा" इत्युत्तीर्य तालिका समये "फ्स्यापि वस्तुन आवश्यकतायामह
सूचनीय इति वदन् गत.।
भवने शौचस्नानवेशागार आसीत् । स च स्नात्वोपस्थाय पाचकानीतं मधुरमधुरं
सादु भोजन प्राश्य भवनाप्रभूमावे शतपदी विरचय्य मृत्यानीत ताम्मलदलमेफ सञ्चऱ्या
निश्शमशयिष्ट।
*
एकस्मिन् भवने लघीयसि दीपावाने स्थित प्रदीपो मन्द मन्दं प्रकाशते।

पप्ठो निःश्वास ११५ प्रकाशेनामुना न शक्यते शमयितुममन्द कौटं तमः। एकस्मिन् भमकाष्ठपोठे स्थिती द्वौ पुस्तौ रानैदशनरालपतः। "न पाने कोऽस्य कय साहाय्यमाचरति वीर ।" "कापि विशेष शकिरेनं रक्षति प्रबल ! परमधुनाऽरमाक जाले तथा पतितोऽखि यथाऽऽख्यावशेष एव संवत्स्यति । कान्तिसिहाय पूर्वमेव बहुशोऽस्य धायावोचं परं न जाने किमिव विचास्यति, यतः ‘गुप्तगुहायामेव प्रेपयितुमैच्छन् परमयं सारथिमवच निहत्य इहायातः।" प्रल-(चायचपक निपीय ) अस्तु, गत सोऽवसरः, अधुना करणीय विचारणीयम् । वीर०-विचारितमेव विद्यते। आवा तारखरेण चौरश्चौर.-इति कथयिष्यावः । रवेण सर्व नष्टनिद्रा भविष्यन्ति, न चन्द्रः । यतस्तस्य भोजने पाचकेन प्रचुरं भजा दत्ता। मादिनीमत्तः स नृश शेवे तद् दृयमेव । तत आवां तद्भवनस्पा स्थिती “अस्मिन् भवने प्रविष्टश्चौरः" इतिकथयियाः। एप उपायः कार्यसाधकः । शुल्कशालाध्यक्षश्च नुदाशतं दत्वा सानुकूल: कृत एव । क्षणे व “चौरश्चौर' इत्युत्थितः प्रचण्डो धनिः। जनधोनिद्रितः । मुप्त एवासीत् । शुल्कशाल.कोट्टालोपि कोलाहलममुमाकर्ण्य ससहचरः समेतः । तेषां कपटपटना कथनानुसारं सद्य एव चन्द्रभवन प्राप्ताः । पद्या कवाटयुगलमाजनुः-प्रवलमाजुहुवुश्च पर कर्णविस्फोटकेन 'धडधड' निनादेन चरित स उत्थितः । भिर्युच्यमान एवासीत्। उत्यायापि “घडधड' ध्वान कुर्वतस्तान् शत्रूनेव विश्य सामर्प. परत कृपाण पाणी कृत्वा कोशादाप्य द्वारमुद्घाटय युयुत्सु. सत्तः। को नाम मृत्योर्मुख आत्मान निपातयेत्, सर्व एव दर्शका. कान्दिशीकाः स्खलन्तो निपतन्तो दुद्रुवुः । केवल ससहचरः कोट्टपाल प्रबलवाखरौ च स्थिताः। कोट्ट- पालस्य मनस्यपि च्याणपाणी तस्मिन् दृटत्वमाप चौरविश्वासः। “प्रकृष्टद्युएश्चौरोऽय यद्धन- मपत्यापि युयुत्सुविद्यते, इति चासा निश्चिल सतहबरः कोट्टपालो वीरवः प्रचलश्च युगपदेव खड्गपातञ्चकः । परश्चन्द्रस्तु चन्द्रहासचालनचुन्चुरासोद् यतस्तेपा मध्यात्प्रोच्छल्य वीरवरशिरी भूमिसात्कृत्वा यावदपर प्रनिहोर्षति तावदेव पृष्टतः प्रश्न दृढमावद्ध- ते सर्व एवं स नोत्थितः। अन्ततः खप्नेऽप्येप शव ११६ चन्द्रमहीपतौ हस्तयुगलोऽवत्तत। ते च साम मुष्टिचपेटापादायात श व्यथयत्त कटुवचौभिर्माणि स्पृशन्तो युवराज प्राध्यवृत्य' भीषणाकाराया काराया निपातयामासु । * वाति। प्रात समय । व्युटवायुनवीन जीवन सचारयन् रयन मदोऽमदमानन्द तन्नन् उदीयमान सूय पूर्वत एवारुणदूतं प्रध्य स्वागमन सूचयति । अमरेश्वर राजभवनमिब वीक्षितुमुच्चै शिरा, पत्तोचप्राकारो रकभित्ति कूपनिम्नया कण्टविट्ठमया नितान्तदुर्गमया महत्या परिखया परीतो विचित्रको विहितरक्षो रक्षोदर्पघ्र अदा दुगौ राजते महाराज श्रीमान् कामेश्वरसिंहो वाजिनमारूढ, एकाकी प्राभातिकपवनसेवाय वनाय जगत प्राकृतिक सौदर्य समयस्य रामणीयमच विलोकयन् मनस्येव मग्न इतस्ततश्चक्षुरविक्षिपन् यनासीत् । सघनवटवृक्षस्यैकस्य तले आलवालकृतासनो माला विभ्रामयने काक्येवासीत् प्रचुर शकिश्शाकनाथ । कामेश्वरसिंहोऽप्येतस्य नितरा भक्त एतस्य वैराग्यव्याख्याने सर्वोदयग्रवचने बहुश उपस्थाय खमतुलात्मनो महात्मनश्चरणयोरार्पयत्। बहुश एन नन्दनपुरागमनायाग्रहीच। तमद्यानोपविष्ट वीक्ष्योपगम्य अश्वादवतीय देह नमयन् 'सावो! प्रणमामि"-इत्याह । शकि०-- शनै ) चिर जीव । कामेवर-( शक्तिनाथेन निर्दिष्टशिलातल उपविशन् ) भगवन् ! अनीया औदास्यन कथम् । केनाप्याराद्धः किम्। कथ दुखित इव प्रतीयते भवान् । शक्ति-राजन् ! अपराधस्तु साधुसद्धर्मरक्षितरि भवति भत्तरि न सम्भावयितु शक्यते। परन्तु यस्य योगक्षेमनाशिताशपभीतय साचारा प्रजा मुख शरते, येन विविश्रुतयशसा शशाङ्कनिमला ख्यातिर्वर्द्धमानमहाप्रचारेणधर्मेण सहैव दिगन्त नीता, यत्य प्रभावण त्यावैरा विरोधिन पशवोऽपि परस्परमवादक क्रीडति स्म। येन चुरापहृत हिरण्यं समुत्पादितनयं भृश दण्डित लुण्टाफल यस्यारातिहदयदाहोन प्रतापवाहना १२थनेनानुकूल्य विधाय 'प्रादयन्यने।'

काने-माम्। पष्ठो निवास ११७ विद्वतभीतयो भामिन्यो यहाणा द्वारमेव नाश्त्रु य पितरनिव पालक मातरमिव मानदात्व ऋतरभित्र हाहाकर गुमव शिक, कुवेरनिव घननिवरन्तकोश प्रजा मेनिरे प्रजापतिम् तस्यैव वणाश्रमत्यवस्थापकस्य सनातनधर्मसमाध्यस्य श्रीमतो नन्दनपुरनरेशस्य शस्य- समृद्धवृद्ध योग्वजनसम्मदा पद र नध्यतीति विचार्य दुखित मे चेत। "किमिति क्रयमिति कुत इति" वामप सगव सविस्मय सभय सनयनत्स्फार सासूच कथितवति श्रीमति नन्दनपुरखमाण्डब्रह्मणि स पुन' प्रावोचत् । वोखर! बरमशा शपधारा विचराम। समेषा मुगुप्तान्यपि मानसमहोदधि रीनानि वृत्तरत्नानि परेशदावा विद्म । निश्चितमेव। शक्ति-भावी विमलेश्वरजामाता, माता वारधैयामा राजनारराजकुमारो भवत्पुरे समायातो राजकीयगुकशाल्पानावास परिकल्पितवान् । स चाधुना घूतश्चौरोतो व्यथितय काराया गया निधिनिगडित आस्ते। तनुमोच्च तत्प्रसादाय वपुत्री सरोजिनीच समनगुणात्यय तस्मै प्रदाय मुखाभवितुमिच्छसि चद्भव। मा नाम अतुल शस्य विपुलकौशलम्सूल देश रतरजितभुव भुव वीराणा, रोद्यमान चेखिद्यमान चक्लिसमान नारीवातवाल-समुदय कारी। महतो हृतिसम्पन्ना सेनस्य । राजनगाधिपतास्य पितुरपि प्राप्तप्रशस्तिका चमू । तत्समय एव हदयसायुरू मद्वाश्यम्। कानेवरसिंहस्तु श्रौतच्छिथिलाडो पूड सन्मन्त्रय प्रजविना जवनेन गुल्कशाला सद्य एव प्रापत् । शौकशालिकाश्वाचितमहाराजागमनसम्भ्रान्ता भीता हस्तगुगलान्यायोज्य प्रणमन्त क्षमा याचनाना जपान् भापनापा एम्त सन्तस्थिरे। वास्ते कोट्टपाल" इत्युफेऽहं सहकुचन विरत एवं प्रणमन् महत छादतधैर्य नाययौ स । महाराजा-कति सबका सन्त सम्प्रति । कोट्ठः-देव। श्रामतः प्रवलप्रतापतग्नेन नाशित भीषणवृत्तसन्तमसम् । तदह द्वौ सेवकावेव पयाप्तौ विज्ञाय नियुक्तवानस्मि । अग्रे श्रीचरणाभिधानम् । महा.-मपि नाभूत्कापि घटनागतेहि कोट्ट-जगत्पते! रात्रौ वञ्चनपटुना चौरेणकेनापहृत प्रचरोय।

११८ चन्द्रमहीपतो समये मारितश्चक पथिक । अधुनापि स सिहवद् गजति । श्रीमद्भयो निवेदय नेवास श्रीचरण पूवमेव पृष्ट । महा.-(विमनायमान इव ) कोट्टपाल ! न्यायाधीशतामुपगतोऽपि अविमृश्य कारी मूढ इव अन्याय्यमाचरसि। किं तस्य समीपे चुराप्रमाणमास'दितम् ! कोट्ट०-(विभ्य मुख पश्यति ) प्रमाण तु नाधिगतम् । यथाज्ञाप्यते । महा.-तत्कथ स निगडित । स्वादृशे न्यायभार दवा विषीदामि। अस्तु तस्य कृते राजसम्मानमायोजय। त्वरा विधहि । कोट्टा-दयानिधे। यामि महा-आम्, शीघ्र यतख । कोट्टपालो राजोचिता सामग्री विरचय्य मत्रिणमपि विदितवृत्त विधाय राजाहवासास्यु पायनचादाय क्षणैरेव राजान्तिकमाययो। तानि च उमोचितश्वलाय सदावास स्थिताय चद्राय राजोपहारेण प्रैष्य स्वागमन ससूच्य आजगाम तिथयवर कामेश्वरसिह । चन्द्र०-(उत्थाय अजलि बद्धा ) श्रीमचरणसरोरुहयो प्रणमत्ययम् । महा.-चिरजीव ! अज्ञानतो भ्रमतोऽनुष्ठित मृयकृय मर्पणीय कुमारेण । चन्द्र कथमसह्यो भारो निपात्यते। महा.-नहि नहि। युवराज ज्ञातोऽसि यच्छीमानेच प्रजापति श्रीमानेव विमलपुरनराधिपकन्यारत्नसौभायभागी। मये द्राव्यमपि भवत केनापि सम्बधन पविन भविता। अतो मषणीया इमे भवतो मृत्या । क एपा दोष क्षम्या एते। दैव हि जगता मानापमाने सुखदुखे लाभालाभे च हेतु । महा.-कुमार। उत्कण्ठामावन्ति दशका राजधानों मुनाथय । अथ चद्रो घोटकालढोऽसहख्यजनानुगतो राज्ञा स्वय निर्दिश्यमानविशिष्टरचनो राजधानीमाग य सबनविश्रमे व्यधाम्यत् । राजनगर तत्सपाव पष्ठो नि.वासः ११६ शक्तिनाथस्यान्यनुज्ञपुरोहितमामन्य विवाहतिथि निश्चिन्वति राशि चन्द्रण न्यवेदि यत् पूर्व कमलया सह विवाहो भविष्यति तदनु चान्यो विचारः, इति । विमलपुरै व्यप्रतामाकलय्य श्रीकामेवरसिंहेनामन्व्य कुमुदिन्या मुक्त भूपेन्द्र विमलपुर प्रैपयदलिखच्च। देव, सादरमभिवादनम् । श्रीचरणानुसम्पया कुशल्यह परेशानुकम्पया प्रासव्य प्राप्तवानस्मि ; सर्व वृत्त भूपेन्द्रो निवेदयिष्यति । श्रीमन्नन्दिनी नाद्यावधि स्वस्था, सारथ्यप्रदः मुलभसर्वमुखदसामग्रीको रम्पयाय प्रदेशः इति कतिचिदिनान्यध्युष्या- ऽऽयास्यामि, न कापि व्यग्रता कार्या। शेष मुशलम् । श्रीमताम् ललितवनम्। } वीताध्य द्वियामसमखिनीदिष्टः । ज्योत्स्नाजयिनी महार्हमण्डनमण्डितानां हाणां प्रभा भासने स्म। तन्नोरणरणकेन पशोविमलविरावेण कोकिलकाकल्या विलासिनीविभावैश्च विलसति स्म ललितवनम् । अकस्मान्मेधैर्मदुरं दुरवस्थं जातं जगत् । निशावशाल्लल्यावकाश निशीथसहायेनाधिकप्रसरं तमाशासन साइसेन विततम्। यर तर विद्युद्दीपा राजद्रोहिण इव शासनमवहेलिनु दृढप्रतिज्ञाः, किन्नु तत् प्रबलसेनयाऽनयारब्धराज्यो राजेव तातिरस्कर्तुमवकाश गवेषयति । अस्मिन्नेवानेहसि हसिला तडिन्मिपेश, साहसमिर वद्धिनु तमसो बारिधरैः समारब्धः सपटपटाधान पृथुविघुट्काघातः। येन युगपद्वीतनिद्रातन्द्र सम्ल कलकल-विकल- धभूव विष्टपम् । चन्द्रस्यावासे कमला निश्श पर्यो गतातडा राकवावरणा, रणाधिगता विजय- लक्ष्मीरिख, विलक्षणश्री', दुजनसंगगापि अलमलपका स्वपिति। विन्दुप्रपातभवेन- रवेग चन्दनिद्राऽवत् । तदेव देवचेरित संघटयन् जवनिकान्तरितविग्रहोऽन्तपुर- विहारो प्रहरी-"देव । स्वामिन्याः सरोजिन्याः सकाशादागत एको मुल्यो ललितवन- चहिद्वारि तिठति, नायमनेहा देवदर्शनस्येति क्रियासमनिहारेण कथ्यमानोऽपि सोऽत्यावस्यक किमपि विज्ञापन विज्ञाप्पमिति कथयति, अने देवः प्रमाण" मित्यसूचयत् । “सूचय १२० चन्द्रमहोपतो चहिरेवायामि'-इत्युत्तीर्य पन्नाण्यायोग्य, बहिरेत्य, इतस्तत पर्यव्य, बहुश आहूय कमपि पुमास नापश्यत् । किमभूदिति चिन्ताचक्रवरितचित्तचन्द्र परामृशन् सद्यएव प्रतिनिवृत्त । * मामाहु- 'प्राभातिको मातरिया ललिताले लत्युमुमा सुगविसरमुद्वमन्त्यो वासन्त्यो लताथ मुखयन्ति त्वाम् ? (वन्मेलनहपचर्पविधुतस्मृतिरह वृत्तमेव नापृच्यम् । तत्कथय कथ व्यवहृत त । अह स्थानस्यामुप्य परिचितोऽस्मि लमपि किमय कदापि समायाता? कमला-शशधर यस्मिन्समये मयूगमा नादेन मम मूच्छा नष्टा, सम्मुखे मुखायोजितनास्त्रयो भयङ्कराकारा कारुण्य वनदहना असभ्यतानिधय आकलितचुराविग्रहा, ग्रहा इवीत्पातिका पुरुपा सपा न्यक्कृतमृत्यव स्थिता आसन् । ते 'कमले। केनाप्यविज्ञातोऽय प्रदेश, चतुरैरप्यज्ञयोऽस्य पन्था अस्मद्वपतिरिका गमने च भव मरणम् । अस्माक देव कान्तिसिंह कार्यशाद् बाहोकप्रदेशान् पीक्षितु गतस्तदाज्ञयैव वय तदनुचरास्त्यामानीतपन्त । सोऽपि समये भवतीं द्र.सति । तावकीनोऽय प्रदेश इति विज्ञाय स्वस्थान इवान व्यवहरतु भवती इत्याभाष्य चक्षुपो- रगोचरे सवृत्ता। अहश्च सत्यपि क्षुत्पिपासाशामके फळबहुले चिन्ताचक्रचालनीक्रिय- माणचित्ता सर्व वासरमत्यवाहयम्। तस्मिंचिन्तापारावारे मदीयचातुरोतरणिनिमना। साह छमवेशान, शत्रप्रयोगान, विविधसाहसिककार्याणि वेधि-इति साहस सरभस धूणितम् । दुखित स्वान्तं निजजनान्सस्मार-अहह । क पिता। हन्त। सा तु दुर्भगाया मम शैशव एव वर्गता। पालयिनो धानीव धात्री अपि हन्त कीदृग्दशा अहो साम्प्रतमेव आनन्दाशाकिरणावली समुदिताऽऽसीत् । विचारितमासीद् यदधुनाऽमितसुध सुख चिर लप्स्यते । हन्त ! क्वाग तास्मि, कीदृशी मन्दभागाऽस्मि । 'वा' वेतिरससम्पूरितवचोभि व विमोहयन् क भ्राता मे राम । एवमह विचारय ती चिरायात्मानमेव व्यस्मरम् । लन्धबोधया मया त एव जय सम्मुखे स्थिता इति कथयत प्रक्षिता । देवि अस्माक खामी, देव कातिसिंहोऽतिशयसुदर । सौन्दर्य चन्द्रसदृशश्वरण दास्येऽपि नाधिकृत यथा स सदू पो भूपोऽस्ति, तथा गुणी ज्ञानी मतिमान् जननी हा!

पठो निःश्वासः १२२ बटवान् ओरखी पाली वाग्नी वानुरौतु वन्नुवायोऽप्दैक एवास्ति। अतो माती रतिरननीयां च सादरं प्रार्ययानो रदन भवती नः समिनी भूत्वा नियस्यास्व, यौवनस्य च आनन्दमन्दोदननुभवन्ती निर रमतम् । मा नन प्रचन्डयन्ती चिन्तक्षपी कमलकोमलमपालपरवपेशलमिद शरीर पातनु। चन्ददशा बहवो राबानत्वचरणान्युजरेणुक्यगानुरागिणः सन्ति, मन्यस्वदं सवच" इति । निग्रीय एकदा शोचन्ती समाप्रित्यान्दिा एवा स तावदेको मनुष्यो नदभिमुखमा- पच्छमासीत् । भदव "शहना भीता पाइपटनति न्टिीना समनवम् । स मानवियाह । "कमले। लरनुचरोऽह भवतों स्थानादरमाइनिनवानि। परशा मा एते मां सरलमनोरथ द्रा नहन्ते । आयुनावसरोति सत्यागच्छ ना मैपीः । मनुत्तरन्यनपि स मा तरबन्ध नेतुं प्रस्थितः। वासंच चालावट पाराकान्तः। नीवाहचन्द्रदाउपायेन मूरिष्ठाऽनाम् । सम्मन्नति न अने। ततः प्रत कार वमः। दुतविचारगभाषः। तैरव प्रमा। चोराना व्यपन्न् । प्रागरागरेण दरानन्। सन्तापरिहन भक्षयन् । दमोमिलः। नुदाभिरातिभिःखेसा। दस्व का दया - १२२ चन्द्रमहीपतो अहन्तु तादृशजीवना-मरण श्रेयो मन्वाना वचनचातुर्याचित्त विमोहयन्या. स्कन्धमवलम्ब्य भवनमगाम्। तस्या निर्मायपरिचर्यया स्वल्परेव दिनरधिमत- खास्थ्याऽभवम् । एकदा सरोजिन्या प्रिया ससो चाला सरोजिन्या हृदयभाव न्यवेदयत् । अहमपि तदाभारतम्रा प्रतिज्ञातवती। सेय देव, मम भवतश्च जीवनदात्री रमणीया रमणो सत्कुलीना मम भगिनीनिविशेषाऽवदयमुद्वाह्या। "कथमेतत् सम्भविष्यति, सरोजिनीसदृश्यो नरायमाणा रमण्योऽपि पुरुष- मपेक्षन्ते।" "स्त्री धनम् , धनस्याधिपतिना रक्षण भवितव्यमेव ।" "अद्य स्त्रिय पुरुपमनुजीवन्ति, नैतच्छोभार्हम् । आद्याशक्तिप्रतीका स्नी रक्षायै पुरुषमपेक्षते ! भगत प्रसू पालिका स्वपुरषमता स्वपुत्रानेवायति । यां पितृतोऽधिक वन्द्या विद्म, आत्ती यामेव भगवत्स्थाने स्मराम सा पुत्र पति भ्रातर वाऽऽहयेद् रक्षितुम् । अशोभनम्। स्मर्यताम् , अपरेण रक्षित कदापि सुरक्षितो न भवति, य स्वरक्षित स एव सुरक्षित । यथा नर स्लीनिरपेक्ष जीवन यापयितु शक्तस्तथैव स्नियोऽपि पुरुषनिरपेक्ष जीवन व्यतियापयितु शक्का स्युस्तदैव ता खरक्षिता सुरक्षिताश्च भविष्यन्ति।" "सत्यम्, पर स्त्रीषु मातृत्वभावनाऽन्तनिहिता। मातृपदमनधिष्ठाय न स्त्रो खा कृतकृत्या मनुते। अत स्त्रियाऽवश्य पतिमत्या भवितव्यम् । भावनामेना स्त्री केवल ज्ञातु समर्था न पुमान् । मातृत्व लिना स्त्रीत्व न सार्थकम् । तच विवाह रा च गुमासमपेक्षते। पुमांश्च मुशील सुन्दरो विद्वान् कुलीनो धनी समवयस्को वर- स्तदा वरणीय एव। एकदा यदि तृतस्तदा त एव सक्दा । भगवान् कृष्णोऽपि नरकासुरवधोत्तर मनसा कृष्ण पतित्वेन वुवर्षुणा भाव स्वीचकार एव। परिस्थिति प्रकला। भारतोयसर्वस्व ववस्तु रक्ष्यमेव ।" पादध्वनि विभाव्योत्कर्णेन चन्द्रेण त्रयो जना अवलोकिता । भीता कमला तान् परिचीय सन्धय आदिशत् । चन्द्रस्तु ता मध्यस्थकाष्टपीठस्याध स्वात् कृत्वा “पक्ष्य पौरुपम्, एतेऽपि फलमनुभवन्तु-" इति कथयन् सतर्कोऽवातिष्टत । 'कस्त्व रे, अप्रवेश्ये भवने प्राविश, दाखादयाशासनपादपफ्लम्, पातय च - विदः, यत पप्ठो नि.श्वासः १२३ कान्तिसिहसगधाराप्रवाहे खम् , नैशी योजना विफलीभूता तामधुना साधयिष्यामः" इति समय॑ युगपत् सगधारया अभ्यपिश्चन्। परन्तु चन्द्रस्तु न “नाऽऽउमलो" फकिकासहकारमजरीपीयूषपानपीनमधुप पुङ्गवः, न च 'व्यधिकरणधर्मावच्छिन्नसामान्य- लक्षण मण्डनपण्डितः, नवाद्वैतवादिवादीन्द्रवेदान्तिकप्राप्तपाटयः, किन्तु करवालकेलिफो. थापततवान् मर्यादयापहत्यैकेनैव लघीयसा हस्तेन कान्तिसिहशिरः रामपातयत् । तस्य कवन्धे च पतिते प्रकर्षामाँ चन्द्र इयमागता तेऽस्तमन- वेला, वीरवरदु खमपि महताभीलेन यथाकथञ्चित् सोढम् , पर वोटुभेन कथमपि न शश्यावहे, अधुना तु ते शोणितामलिभिरेवैनं तयिष्यावः । स्मर स्वेटदेवम् , भव सजः इति साक्षिविक्षेप व्याहृत्य गृध्राविव जित्सू खड्गाभ्यां युगपदाकाम्यताम् । परश्च चन्द्रोज्ज्वलहासः स चन्द्रहास एव तौ समरुधत् । प्रशस्तारवालपतनसमकालमेव तयोः खड्गी भनौ। चन्द्रस्तु अपिज्ञायतद् मृत्यशिरोऽनुनटत् । ततो गतासिः प्रल.-"चन्द ! किं निश्शनश्शनुर्हन्तव्यः1 धर्म एष आर्यवीराणाम् ? अस्तु जातन्तनातम् । सम्प्रति सम्प्रतिष्ठ! द्वन्द्वयुद्ध समाचर मया सह । चन्द्रस्तु किमपि. विवारपि वाग्वेगमवाध्य योद्धमेव सद्यः सनो पभूव । निबद्धकौपीनेन बभूव सावकाशदर्शनं सपार्श्व परिवर्तनं मुहूर्त यावजन्यम्। परन्त्वन्ततः प्रचण्डदोर्दण्डविरमो युवराजस्त कटितटे समुत्थाप्य भूमौ प्राक्षिपत्। सच विहसन् तत्क्षणादेव चन्द्रचरणयो. निपत्यावोचत,-"देव 1 ममैपा प्राणसमा उपांशु प्रतिज्ञाऽऽसीद् यद् यदि कदापि- कोऽपि मा द्वन्दयुद्धे निपातयिष्यति तस्याह दासः सवत्स्यामि" इत। तहे व ! प्रभृति प्रभूणां चरणशरणः सवृत्तोऽस्मि इति। वस्तृतो स्त्र स्थान एवं राजते। ईदृशपुरुपरनस्य, सत्यवीरस्य, अतुलस'हसरय उपचन्दमेवावश्यस्ताऽऽसीत् । अद्य विविधधातुरतामुमत्तवरेणु यांशधवलेणु राजतपत्राच्यादितेपु लम्भेप लगाना फवसनकतितकरीनरीनृत्यमानाभिमलरोणा वासदशरलरसूताटदरकमलविदित- सेवकजनचानुर्यागा, रस्वासोयितानानानध आयुर्वेदशासभिर लक्ष्मीविलायभागि लसन्मदिरं राजकुल राजते। तत्रैव च झमभणयमानमणिन् पुराः पुर्णा वयसा, १२४ चन्द्रमहीपतो वयसामपि विमोहिन्य, काञ्चनकाचीकिङ्किणीशिञ्जितरञ्जितसमस्तशस्तास्तालस्यजना , कदापि कटितटे तटे कामकूलकषाया , कदाचिदुरसि रसिकचेतोहरे, कदाचन शिरसि रसितशिरोरले, कदाचिद्धस्ते हस्त न्यस्यन्त्य, मोहिन्य इव धृतामृतामना, लोल- स्पटप्रान्तप्रक्ष्यमाणानचेतोहरा हरिणाक्ष्यो वारवध परममधुर, स्रवद्रस, पञ्चजनान् गानेन सकर्णवद्धमाकपपन्त्यो गायन्ति । वैणविका पिकखरा स्वरान्समेल्य मार्दशिव" सह सहस्तस्फार तार रणरणायन्ते। भ्र कुसा भ्रू विक्षेपजनितविक्षेपा जनान् समूह यन्ति। सर्वनाभिनयो हर्प, पताका अपि अघ्र लिहन्त्य फर्फरायमाणा दुखोदन्ताकर्णन दुखितमाकाशमद्य वीजयन्तीव । प्रबलनेजस्का निष्कासिततमसस्तडित्प्रदीपा अहो ? निशामपि दिनयति। सर्वन सौगन्ध्यम् । समस्मिन् मन प्रसाद । सर्वन हास्यलास्ये। स्थैर्यमजीवेषु श्रूयमाणगानगमने चालस्यमासीत् । गोऽय महोत्सवो विविधाख्याननिपुणैविद्याविलासशालिभि कविकोविः केवल शान्तस्वान्तवेद्य सम्मलस्य च द्रस्येयत् महत् कष्ट विषय सकुशलनिवृत्तौ स्वागत सम्पादनाय विहित आसीत् । रात्रिमुख एव दीपा प्रज्वलिता चिमलपुरयहिभूमौ चद्रप्रासादपाय खागतसामग्रीव्यग्रो जन इक्ष्यते । वितानस्थायिना सर्वेषा चक्षू वि सम्मुखीनमार्गे लमानि सन्ति। अस्मादेव ससरणाच द्रागमन सूचितम् । हये न सजितारान्ति सरोजिनी नितरामुत्का। प्रतिक्षणमितस्तत सखीष्ट प्रेरयति । मरुत्तराणां दीपप्रकाश सर्वउनसमूह मुखरयामास। पश्यत एव द्वे मरुत्तरे समाययतु । पुरीय सजवनिक मरुत्तर प्रासादमाससाद, परच वितानभूमिम् । अथ सकललोकजयशब्देन सह समवतीर्य महनीयरामपालचरणसरोज नयन नीराभिषक प्रणम्य, सगद्गदमाशिष प्रतिगृह्य सभासदैर्यथायोग्य सत्कृतो रामपालनिर्दिष्ट- मासनमलस्कृत्य, उत्तजिज्ञासातिशय विज्ञाय भूपेन्द्रभणितमपि सक्षेपेण निगद्य राज्ञाऽऽमन्य विश्रमाज्ञा जग्राह । अथ महाराजो राजसदने दिनादौ दोपज्ञो, वरिवसिता सिताम्बरो वरो वीरेषु प्रताप निजितमहेद्रो भूमहेन्द्रो रामपाल, नन्दनपुरेश्वर कामेश्वरसिहश्च मुख्यै सामतैरशेष विद्यानिधिना निधिना जराया राया होतकुवेरेण मतिमता वरेण मत्रिणा मतिवरेण, मत पप्ठो निःश्वासः १२५ आयुर्वेदमहोदधिमथनमहनीयमहिम्ना हेन्नो दाम्ना विभासितगटन धाम्नां धाम्ना नाना चन्द्रशेखरेण शेखरेण ज्योतिविदा कनकदण्डोपनेनेण क्षेत्रण सम्लकलानां वेताक्षिपश्मणा कुठगुरुगा च परामशति । मध्ये हन्तलिखिता भूर्जपत्रमयो जीर्णाऽऽकी स्वर्णाक्षरैः खच्यासोवरितापि न मनोमोहिनी विराजते राजते पत्रे पुस्तिका। यस्याः पनाणि इतस्ततः प्रचात्य किमपि हस्तपयमु गणयन्ति गणकवरेण्याः। दिशेन देवनेन निरचापि नेत्री पूर्णिमा विवाहे वरणीयतमा वेला च त्रियामायास्तृतीयो यामः। "सौजन्यजन्मनो नवेन्दुवर्मणः समागमन लघीयसि समये न सुपट पुन्यक्ष पूर्णवयसो वेलाविलम्यायोग्याः" इति मन्त्रिणामन्त्र्य कमलाविवाहसमारोह समारभते रामपाल.. * * "महात्मन्, महाराजः कामेश्वरसिदो रामपालश्च पमिद प्रेय जिज्ञासन्ते यद् यानादिकं कदा किंवा प्रेभ्यम्" -अस्वादुत्तीर्ण. सादी प्राइ । महात्माच जत्वपहायपन पपाठ आत्मीया, एकोऽह बहु स्यामिति समायग्रमणः प्रथमस्पन्दनेन व्यकं चराचरसप्टे- मूलतत्त्वं पुरुषः प्रकृतिश्च । युगलोभूय सन्ततिपरम्परया सस्तेर्धाराया अनवरत प्रवाहणं पुराणपुरपस्याभिलाप । विवाहस्तस्याभिव्यक्तिः सामाजिकी। सोऽयम- भिलपो रामपालस्य पुन्याः कमलाया, नन्दनधिहस्यात्मनायाः सरोजिन्याय महा महिम्नो राशो नवेन्दुपालस्य पुत्रेण श्रीचन्द्रामारेण या पूर्णिमायां विवाह रूपेण स-पायवे। श्रीमन्त उत्साम्पत्य उपस्थानु प्रायन्ते। कामेयरसिहः रामपाल नन्दनपुरम् विमलपुरम् कोगेऽस्तिमासीत् :- गशितोऽभिलाय धीमतामाशिपा सम्पूर्यते। भनागननेऽपूर्णतेव प्रत्येप्पति । सतन्या महात्मानः यतेभ्यो विधिः। -सरोजिनी * चन्द्रमहीपतो महात्मा-सूचय समये समेष्यामि। न यानस्यावश्यकता। * अद्य चैत्री पूर्णिमा या वहो कालाल्लोकश्रवणयो रपरणायमानाऽऽसीत् । अद्य तुच्छतुच्छस्यापि मनुजन्मनो मनोभवभवनमनोरमे रमेशकृपाकटाक्षवीक्षिवे क्षिते पत्युभवने नास्ति वातविकाशलेशोऽपि। यन ता पन्थान परिक्रियन्ते, शारराणि द्वारणि रच्यन्ते, आसन्ध आसाद्यन्ते, जवनिका विस्तार्यन्ते, साश्चा सादिन शिश्यन्ते, द्विपा भूष्यन्ते, शिविका साध्यन्ते, भृत्या भय॑न्ते वासासि सुवास्यन्ते। अथ भूते दिनस्य साये विमाना पुना इव विभावर्या नि सारिते प्राय उडुगणऽपनीत- तपनतापामु धू'धूपितासु दिक्षु तोभधानेन बधिरीक्रियमाण च दिगन्तराले, सन्तमस नाशप्रबलशक्तिविद्यदुमुकैदिवाभूताया यामिन्या, उपगवाक्षमागच्चत्कामिनी नूपुरशिजितजितजितेन्द्रिये समये, सभुशुण्डिकोतान समान सतर्क कर्केषु घण्टापथमु- भयत स्थिलेषु कटिप्रान्तावलम्बमानाखालेषु अबालेषु राजपुरुषेषु, सुगन्धनीरेण रेणुरहिते सिच्यमाने ससरण, स्वस्वभवनेषु बनेषु सौन्दर्यशाखिना ललित गायन्तीषु ललनामु, सपुष्पाक्षतोत्क्षेपमाशिप वदत्सु दत्सु समाहितताम्बूलीदलेषु विप्रप्रवरेपु सजयान विचलयन् विश्व, कम्पयन् सकानना मेदखिनी प्रारब्ध प्रचलित मदित सवसहो महामह । अप्रत प्रश्तेतरवाद्यधिक्कारो टकाटदार, ततोविहिताश्वस्थितय प्रमतयो मौरजिका , तत सुबाससा मुखाइगुलिवाद्यवादकाना पड्कय , ततो विपरीप्रपत्रचतुराणा, कामलोसमाकृष्टजनमनसा सुवेशसदलकाररचनाविजितासरसा, हेलासमाकृष्टकामिना वारभामिनीना निपतन्ने नराजयो राजयः, ततश्वश्चन्महोप्णीपमस्तकई ढयापरिकरै- पंल्गावर्षणसध्यानकररवलम्बितानस्त्रिशै सादिभिराक्रान्तपृष्टा उच्छलत्पुरतोत्साहिता इवान गन्तुमुत्थाषितपादा, पादाङ्गदभूपिता सिता असिताच, हेपाहक्तिस्वामिनो मोननयना सदयना उत्यापितका अनेकवर्णा आजानेया, तत क्षुद्रघण्टिकाविहित- महावाणा वाणावविशोभिवोरवराधिष्ठिताना, कनककलशशोभमानशेसराणा सण खणायमानानां रथाना वोय, तत स्वर्णसूतसूनितचित्रचिनितकौशेयकुतिरोहित- पप्ठो निवासः कृष्णवर्णानाम्, महाहरनखचित-वर्गपीठस्थित-समधिसमरजविसामन्टकुमाययाम, महा- मानभवनरुद्धशीघ्रगीना , परिणां मुण्डादण्डविराजितमुगन्धिपुष्पदाननीमभितो- प्रमझमरश्रेणयः श्रेणयः, ततो भुशुण्डिकामलग्न चञ्चनिशिवितासिधेनुकासोभित- स्कन्धदेद्यानां परेपा करमस्तिनिष्काश रवालानां तीक्षपफालशोभिकुन्तधारिणां, राजपुरुफ्तख्यापवर्तुलपित्तलपट्टिकालकूदवा स्थलाना, स्थलाना वीरतायाः रताना. राजनि, अनिमतां सत्कुलेषु, कुलेयुधिधनुधारिणा वीरवराणां वारः, तो मुचानिमित- राजहंसमिथुनेन, मध्यमुक्ताकलापेन, नीलमणिना रचितमपूरयुगलेन भास्वता कना- दग्डन रक्तकौशेयसम्पादितन, पृष्टस्थसत्तामन्तगृहीतेन, विशदेन आतपत्रेण प्रटित- मुपमः, उभयतो हस्तिवराल्टाभ्यां सामन्तराजभ्या प्रचात्यमानचामरयुगल, महाहर ननिचिरीविभासिभालो लोलालक, शनीपनवुमुमकोरकतुझ्यु नकाश्मीर- चचितमुखमण्डलः, दशननिजितकलानिधिः, कलानिधिः, स्वर्णसूत्रस्यूतपुप्पलवास्तवक- प्राजा, रफकोशेवनापपर्दानेन वनसम्राजा सवितश्रीः, श्रियो यशस उदारताया वीरतावा: सौजन्यस्य च भाजन सश्रीफलेन टुकुटेनानदकटितटः, भाउता स्यूलवर्तलमुक्ताहारण चन्द्रहारेण य इसानुततारापतिः, पतिः राजनगरवगुनत्याः, नत्या विहस्तिकाव्य, काव्य- रचनाचनूर, तुजविद्याप्रवीण, वीणाकगनमुग्धीहताना मदोत्कटरिन्टपाटन पाटवधितः, कपविशोभिमणिबन्धेन दौरस्सचितस्वर्णत्सस्नोलकौशेयकोशकरवाल- धारिणा रनजटितोमिकदारणा करेण द्योतितचापन्योऽन्यः, प्रधौतधौतयमनः, मुभग- पादनाग, महाईपरिस्तरमायां राज्ञो रामपालस्य परमप्रेमभुवि भुवि सम्पदा प्रतिष्टानाथ करेणुकायां कायाडिनचिनायां कृतवर्मासनस्थितिः, स्मिवेन दयनासनयोस्तिस्टमा प्रसारपन् रसिम्तां, विचातयन् कानिनीने नमुदानि, उद्दोपयन्मनोभवाभावान् सत्कायमिव पदे पदे हृपयन् सचेतासि पासोत् कामिनीयानिनीमनी- विवादयन्दः। पृष्तथ महान्तननलारणमपि अलरमनवानामधारसनाल्ड सीन्महामात्यो मदिवरोऽनुगतः सयरवारोहिभिवासरः । कामिनीपातितः कुमुमालभिः स्तवय मला ताम्वेिवाभहसुन्धरा । १ पल नासमतीति पत्या, न स, सोऽमयो-न मासभोय।

१८ चन्द्रमहीपतो चारुहासिनीहास्यः कथमपि हात, विलासिनीनयन्वागुरवा कयङ्कथमपि मुफ नूपुर- शिक्षितैर्यथाकथञ्चिदनाकृष्टः, वामधू दर्शनभाराकान्त इव शनैरशन्श्वलन् समारोहोऽयं महामहिम्नो रामपालस्य दुगान्तहर्म्यमाडुडौके । अद्य हि भगवतोऽवतो वसुधा मुपास्मतस्य रामपालस्य भवन वन विलासिताया, विभाति महेन्द्रस्येव । हाटकघटिवेन घोतितशिल्पिनैपुण्येन पत्रेण जटित, चरिती- कृतावलोवलोचननिचय मुखद्वारम्। अभितो लग्नाश्च पुष्पस्तबकलतायुक्ता कौशेय्यो जवनिका' । सम्मुखे तस्य रककोशेषनिर्मित विलसद्वाजतकुसुम नृत्यत्प्रान्तप्रता नवी'- वीजितसकलजन द्वात्रिंशत्स्तम्भैविहितायाम महावितान विततम् । यन मुसबिनानि सिंहासनानि सहस्रश वर्णासन्यो राजतासन्यो वेनासन्यो राजन्ते। यमभितो निष्कोशकृपाणपाणय' पटवो भटा समर्यादमासते। मुग्धा नूपुरशिजितद्विगुणितस्थकिद्विणीखनाश्विरप्ट्य, मोहिउसमाजेन विपञ्चोवि- नन्दकेन कोरिलानुकारिणा करिणामपि मनो हारिणा खरेण नधुरमधुर वारतार गायन्ति । इतराण्यपि वाद्यानि यद्यपि स्वस्वविजयाय मनुजमानसान्यपहर्तुं प्रयतन्ते, परन्तु मुग्धवधूगानमिद सवानिशायि विजयमध्यगात् । अथ वादकेप्वेस्तो भूला वादयत्सु यत्सु मुक्तमार्ग च सैनिकसमुदये हर्म्य सम्मुखकुट्टिममायाता करेणुका आयतललाटपराजितचन्द्रस्य चन्द्रस्य । निश्रेणियोजनेन जनेन दत्ताशिषि समवतीर्णे बरे हस्तिाकेनान्यतो नीतायां करेणुकाया करते सौवर्ण कृतिमानमरें. मुगन्धविसर यमद्भिः सुरभिते जनसमुदये, सहास समन समुल्लास व्रवत्सु चलमु च पञ्चजनेषु विहिततोरणाघात आहतोऽपि परममुन्दरीपा दरीणा मनोभवस्य भवस्य सारै कटाई, अतीत्य हर्म्यप्रथमद्वारमासमाद वधूविधूयमानमानसराजहसपातिसितव्यजन सौन्दय- पिपूर्णितनयन, नयननीरजर्नीरजाकयिताजिर, फन्कदण्डचामरप्राहिमोभिस्वाम्बूल- वाहिनीभिः, पतग्राहधारिणीभिभूपणभूषितानिदांसोभिर्वाचालित, माला खरित द्वितीय द्वारम्। १ प्रतानिनी मालरो इदि भाषा।

प्रपन्च पाठो निश्वासः १२६ वन चाइनाभिः कृतंचने कमलयानि यापिनदुखदयामिन्या सरोजिन्या सहद सवित्रम ललनान्तरितशरीरलता पुष्पलक्कनाहते चन्द्रे इतस्ततः सविलास प्रभावामु विलासिनी गौडविद्वौजसा परिकल्पितमम्भारो परत कदलीप चतुरा वेदिकां सपनीका कामेश्वरसिंहो रामपालश्व कन्यादानाय परिकल्पितमहाई- सम्भारावविद्यताम् । समये जगदानन्दी चन्दोऽपि मण्डपे स्वर्णपीठे पदचकार । ययानिधि कमलासरोत्रिन्योयन्देम सन्नन्नो विवाहसंस्कारः। शामील भरन वरवरयोरणान्यमामास। राजा रामपालः खमातृभावनोपेतः कानेवरच दासदासीहत्यवरपरनालशरफ चौतुक कौतुककरमदान् । दधनुश्य विवाहख्यापकानोभाः। सम्मन्ने विवाहे चन्द्र आचार्य राजानं रामपाल कामेश्वरम शतिनाथस्य पादसो परमप्रम्मानिनंनुः "केवटेन नमस्कारेण किम्, कामपि भूयसी दक्षिणां देहि यां यावजीच स्मरामः।" इत्युक्तः सायं महार्ह मध्गुलीयकं ददौ । अथ सम्पन्ने उपपमनेऽजलाभित्रलादाहूतः पुरनोरनः शिपानवल्या कमलया सजोरजन्या सरोजिन्या चानुगतो गतवानुरदेव देवयन्द्र । तत्र च पृतकुलाचारो- महिलाभिरागृहीतो नेनसम्पावेन परितः प्रेस मदनसदनखामिनाभिः प्रमदानदाभिः सोकस्टमवलोक्यमानोऽचिर विचार्य पद्यमदः पाठ कल्याणाना निधानं कलिमलमथनं पावनं पायनाना पाथेयं यन्मुमुक्षोः सपदि परपदप्राप्तये प्रस्सिवस्य । वित्रामस्थानमेकं कविवरवचसा जीवनं सबनाना यौनं प्रेमद्रुमस्य प्रभवतु जगता भूतये चुचु कामम् ।। लेखेक नहाईनगुलीयकम् । तत्र र साररसस्रोतमि प्राहनाने प्रत्यैव हासप्रिरा प्रिया सती कमलाया मनोरमा, रमाविनिन्दरूपामारं तईयन्ती गुमरनंः, समंतिनुस यहि एमरस्रिवस्त्र, निमित्सरिवक्तितर हनुननाटकीयं परमर श्रुता रमपमान- मुखी टवाच- १३० चन्द्रमहीपतो देव । यदिन कालेक्षेपो यदि च प्रसादसम्मुखो देवोऽस्मासु, सहि भवढ्यात्यात शुभूपामहे पद्यमदः। अवोधविक्लवस्य ललनाजनस्यानुपेक्षणीयोऽयमनुरोध । "कलितवैदाम्यस्य दग्यस्यापि स्मरस्य प्रधानजीवनसद्मनो विमुग्धस्यापि मुग्धम्मन्य- स्याहनाजनस्य कृतानुभवः सख्केतोऽप्यन गरीयान् । कठिनार्थविशदनमात्रफलिका हि विदग्धवृत्ति ।' विकसितसिताम्भोजभव्यमुखश्चन्द्रोऽवदत् । "तथाच कलिरन प्रणयकलहः स एव मल, तदपनयपनञ्च मथनम्। गुमुझोनीदि- मिविशेप । पर पदाभ्यां तत्प्राप्तये प्रस्थितस्य, इत्येव भाषमाणे चन्द्र व्याधुन्वता हस्तेन निषेधयन्ती, अलमलमितिव्याहारनञ्चला चुटकितकमला समुत्तग्यौ मनोरमा विमोचितचन्द्रोत्तरीयः प्रमदाजनश्च । * वासन्तनिशीथयौवनमचेतने जगत्यपि सजीवसौन्दर्य पूरयति स्म। विशदनीलाम्बरे वरे रजनीरमणीरमण उदारोज्ज्वलेन हासेन भुव भासयते स्म । दिगङ्गना नक्षत्रपुष्पाजलि- मादाय जगजनार्दनस्यार्चा विदधाति स्म। शुभ्रज्योत्स्ना जगतीतले शान्तिमुर्धा प्रसार्य कीडन्त्यासीत् । कचन वचन नारीनूपुरा निशीथिनीनीरवता भजन्ति स्म। इन्दीवरस्याम वियद्वपुस्ताराहारावलोमण्डितं राजतमाप्रपदीन परिदधन्नने रजयति स्म । पविनपाथ परिपूर्णपुष्करिणीपवलपरागं प्रचौर्य सरसि स्नात मुभगसमीरो रसालकुञाचितो मन्द मन्दं वहति स्म। विविधरागप्रकल्पितभित्ति चन्द्रभवनमद्य भवनेषु राजानति । सजीवनिर्जीवभ्रममुत्पाद- यन्तीनां मूतीनां शोभा सत्यमवाऽऽसीत् । वर्णचरणौ मुगन्धिकुसुममध्यौ चेतोहरौ पर्यवावमितो लसता क्षुपानामावलिः विभिन्नवर्णा दीपाश्चेतोहारिणी प्रसाधना। चन्द्रशमलयौश्चिरप्रतीक्षित समयः समेत.। नाद्य गमने सोच, न च वाचि मान्यम्, न च चकिता दृष्टि, न चोच्छलच्चेतः शरीरम् । चन्द्रः सहास काश्मोरं कमलापोलयोलिम्पति। विहसितनि मृतदशनविभासित. भवना गुठालपमति प्रसारयन्तो चन्द्रावस्वहस्ता स्ववक्ष एवं रजयति चाम्पेय पयः पातयितुकामा च्युतलक्ष्या वमुधामेवाई यति। श्रमशिथिल तयो. शरीर पष्टो निवास १३१ विश्रमितुमैच्छन्, शर्करामधुद्राक्षामिश्रमासवमाखाद्य पल्यवागतयोरचिरादेवाविभूष नयनयोनिद्रा। वीताध्यद्वियामा नियामा। चन्द्रस्तरलतररमणीये शयनीये गवाक्षागतमुरभिनमखद्गाढ- निद्रोऽस्वपत् । प्रियतमा च तस्य भर्नर विहाय उपपर्यत पतिकामेकामध्यास्त । द्रुतनिद्रा, साद्य निर्भर चन्द्रप्रकाशे चन्द्राननामृत निपीय विलक्षणां तृप्तिमध्यगात् । महोत्का सा चन्द्रस्योरसि कपोलयो शिरसि पाणिपल्लव भ्रमयन्ती तमपि गततन्द्र चकार। "पत्य देव, कीडशी मनोरमा यामिनी, वियत् सुधाविग्रुप इव वर्षति ।" चन्द्र -“निस्सन्देहम् । परमेपास्या शोभा पत्या चन्द्रेणैव । अस्तु स्वपिहि मधुरा निद्रामनुभवामि । चिर रात्री क्रीडतो शैथिल्यमापन्नयोनिद्रव स्वास्थ्यप्रदा। अवधेहि जगति परिस्थित्यनुसार मनोरमममनोरम वा भवति, शेष्व । “(मध्य एव तद्वात्तामश्रत्वा ) प्रिय ! भगिनी सरोजिनी योग्यभर्तृकृतपरिणया अल गर्विता। सम्प्रति तु सा केनचिद् ब्रवीत्येव नहि-" चन्द्र०-अये। केन कि प्रवीपि मुग्धे । "अह तन्नाम न जिघृक्षामि। यत कृपण 'केलिकाले आमाश मजति।" चद्र-किन्तहि चन्द्र । "आम्, आम् भार्यपुन, स एव यस्य कृवे महान् दर्प शिरस्यारूढ सरोजिन्या । कि वदामि अद्यत्व तु सा विलक्षणा मानिनी सम्पन्ना।" चन्द्र०-अरे! एतकिम् ? किं सर्वधैव विम्टासि यदसम्बद्ध प्रलपसि । 'कथम् , झिमह सरोजिनों न जानामि, थाहोखित्तत्पतिं न जानामि। सोऽपि सविधन भ्रमति।" चद्रः-(सौगम् ) अरे! त्व कासि | चिन्ते नाम ? "धन्या (सहासम् ) भवद्भिरप्या भता पीता, सत्य क्षीरा सर्व विस्मरन्ति । अहह । पतय पनीरपि विस्मरन्ति धन्या । सत्यम्भवन्तो मन्नामापि विसरमा । अस्तु, सम्भाव्यते कामोन्मादे स्मृविधश ।' १ रानौ।

१३२ चन्द्रमहीपतो चन्द्र-स्मृतिभ्र शः? आः पापिनि? वञ्चितोऽस्मि, छलम् (प्रकाशं प्रज्वाल्य बलात्तन्मुख वीक्ष्य) आः कुटिले । किं कृतवत्यसि। नाहमस्मि तव पतिः। "स्वप्ने ? उत जाग्रति" चन्द्र०-जाग्रहशाया प्रकृती स्थितोऽह वच्मि यत्-यत्व स्वपति मन्यसे सोऽय पुरस्ते चन्द्र। (सनयनोत्स्फार मुख दृष्ट्वा ) "नहि नहि भवन्तो धौर्यं विरचयन्ति । मुकुरे मुख पश्यन्तु भवन्तः।” (मुकुरमानयति स स्वमुख वीक्ष्य विस्मितो भवति ) चन्द्र०-अवश्यं मद्रूप केनापि परिवर्तितम् ( जलेन क्षालयति रागः पतति ) पश्य में रूप केनापि परिवत्तित वञ्चकेन । "अरे! ( अश्र मुखी ) भवतां किमनेन नष्ठम् , अह नष्टपातिवत्या नष्टास्मि । राजकुमार ? नेद भवदनुरूपम् । खय रूपं परिवर्त्य स्त्रीणामुज्ज्वलपतिव्रतविनाशन कि भवद्विधानां कर्म ? अहह ! भवादृशा एव धर्मस्यैतस्य पालकचरा नाशाय भविष्यन्ति चेत्तदा हन्त ! वत !! क नामाश्रयिष्यत्येपः। अन्याय्यम् ?" चन्द्र०-कथ मा दृपयसि ? सर्वथाऽदूपणोऽस्मि । मां निरयपातिन विधाय स्वय सतीत्वस्य ढक्का निनादयसि । "तहि क दूषयामि ? ( सविलक्षविस्मय ) अहो । भगिन्याः सरोजिन्या अपि एषैव दशा भूता भविष्यति । सा मम पत्युरावास गता भविष्यति । अहह। विस्मृत्या, हिया, सद्कोचेन, मूढदासीकथनेन द्वयोरेव च्युतौ धमः, हा !" चन्द्र०-किं किं मदीया प्रिया परस्याङ्के। (सग निष्कोशंकुर्वन् ) कोऽस्ति । “युवराज । किम्भवन्त एवं क्षत्रियाः। श्रीमन्त एव शूरवारवरा! कि मत्सतिर्नास्ति क्षत्रियः। तस्य तनावपि प्रोष्ण राजन्यरक्त' राजते। वीरवार- वरणीयवीर्यः स को जानते किमाचरिष्यति रुष्टः। अब्रह्मण्यम् । यस्य प्रियां भवन्तो रहसि उलेन प्रियाप्रेमपरायणो युवराजः कुकर्म कृत्वापि जिहे ति... इत्यनर्गल प्रवदन्त्यामेव तस्या समाजगाम विकसितवदनसरोजा सरोजिनी। हसन्त्या सरोजिन्या धोतवदना चन्द्रेण साक्षयं वीक्षिता च तत्सम्मुख एव क्मला समवर्तत। महदभूद्धास्य लास्यम् । न " पष्टो निवासः १३३ युवजानियन्त्रचन्द्रवदनवा कालवा सजवविकसितनयनसरोजया सरोपिन्या च रमनामः पदमुकुनेखानामप्रवलावरसिंहविरीयमानरो विवस्त रक्षित- प्रसादोऽविपादः सानन्दं राज्यमीउमाणः नीतिनाशिवभीतिः रातिरविद्वानीति प्रत्रः प्रवेशपरमप्रगय वहन् , मानन्नविकारिण आश्चर्यमवनानीतविपुलधनराशि- देवान् वृद्धान् विप्राध मानयन् प्रसन्नप्रजो विमलपुर एव स्थितिमलयत् । पुनान् मुखे सर्व विमरति। प्रचरं कटं विषय खत्रीयं जोवन सन्देहसिन्धौ निवास जनयित्री प्रियां मातरं, कृन्तामनुभूय धनादिकमर्चयित्वात्मजमेव सर्वस्व मत्वा पालयन्त पितर शवसहचरानि निनानि, कलमपुत्रातृनपि विरनति । हन्त ? महामदो लनीविषम् । शुद्राणान्नु कथैव का यां प्राय शेशवे हेयशवोननुट, अशेपदेवदानवरक्षोननुप्यसिद्धसायकिन्नरमुनिनु ब्रह्मादिराजषिदेवपिएसविग्जट अस्ट- लिट केटभद्विदपि क्षीरनिधी निदामेव चुफ्तेऽनारदम् । अहह ! सत्यं ! "हालाहलो नैव विपं विषं रमा"। यामिमां लघ्वा सततव्यं परमात्मानमपि विस्मरन्ति स्मरणीय चरिता विपश्चितः। का क्या उमारसमादृष्टेन्दियावाना नुच्छानम् । यद्यपि याच्येयं सर्वस्य भूनुको उनस्य, परन्तु यां प्राप्यापि न मुखेन बुद्धन्ति, अपि नु महता दुःखबजेन । सर्वनर्यया, सर्यया, मोघेन, जिपक्षया विपत्ता, युभूपया, अनन्त कष्टसमुदसमसौलमते। योऽसौ नेत्रनिरीक्षितप्रकृतिको सनापवाटिका- वाप्यारामतडागरूपसरिता श्यत्य ममंग्रहः । वेन तेन वयोनन कविना प्रीशास्त्रिया द्विस्त्रिणा तस्मिंश्चन्द्रमहीपतो मुमतयः! पप्ठो गरिप्ठो गवः ।। - श्रीडितेन्दत्यप्रतिलिश्रीलयीनवरहराययास्त्रितनदेन दाबलनेन काव्यालारेन श्रीनिवास शास्त्रमा हते चन्द्रनहीन्ती पो निवास।

सप्तमो नि:श्वासः अघटितघटित घटयति घटित घटित च दुर्घटीकुरुते। विधिरेव तानि घटयति यानि पुमान्नैव चिन्तयति ।। फुल्ल षु य कमलिनीकमलोदरेपु चूतेषु यो विलसित कलिकान्तरस्थ । पश्याद्य तस्य मधुपस्य शरद्व्यपाये कृच्छ्रण वेणुविवरे दिवसा प्रयान्ति ।। -पास रावलिप्त इव चञ्चञ्चन्द्रिके वियति यतिमानसक्मिले परिमलोद्गारिणि प्रफुल्ल बैरवामोदखामोदे दीधिकार्णपणे, हिमशीते चरतिदोलितल्ते, अगुरुपनसार चन्दनधूपधूमे रसिकघ्राणरन्ध्र सतर्पयति नैशिके मातरिवनि, मयनेव निर्मिते वैभवभवने कौशेयास्तरणास्तृते महति मचे उपबमाश्रियोपविष्ट च द्र परित समासीनेषु सभ्येषु प्रकाशेन दिनमनुकुर्वाणाया विभावर्या गान साधयत्सु गायकेषु हर्पमुद्रमति जन निवहे वेत्रहस्त प्रहरी प्रविश्य 'जयतु जयतु देव -इति निर्ध्याहृत्य कश्चन शान्ति परीततनु तनुमानिवोत्सहोऽविषादी सादी भवत्सभामव्यमय समेतुमिच्छति, देव प्रमाणम्-' इति निवेद्य, 'आम् प्रवेशय इति श्रुत्वा गत । चद्रव दूरत एव प्रहरिनिदिश्यमानमार्ग परितो वीक्षमाण हृप्य तमागन्तुक वीक्ष्य परिचितामिव गति चिरानुभूतामिवाकृति वहुश अवलोकितच पादविष ससभ्रम गाम्भीर्येण पश्यन् समीपमायातच परिचीय भास्वानिव मेरोझटित्युत्थ य 'आ कि भवान् प्रिय शकिधर ' इति कथयन् स्मयेनोत्तरमधिगम्य सकण्ठप्राह समालिङ्गय साश्रपात सत्कृत्य मच एव समुपावेशयत् अवोचच । 'अभ्यागतोऽय दयितमान शैशवत एव सहचरो मन्त्रिमार सचिधर' (सर्व) विजयतां श्रीमान् मनिकुमार शकिधर एको वृद्ध सभ्य-

परममिनं इमारत
सप्तमो निःश्वासः
"द्विपः। अद्य कुमारस्य पुत्ररत्नजन्मनः पष्ठ दिनम् ।
श्रीशकिपाश्च समेतः, अब निरवधिहर्षः। देव प्रार्यो जातस्य शिवोहवर्द्धन इत
नामकरणाय"
स सभ्या एकवरेण: "अय किम्"
चन्द्र-अपि कुशलम् ? कुशलिनस्तानपादाः? मद्वियोगद खिता अन्वा वासराणि
सानन्द व्यतियापयति कच्चिन् ? पितुः पामश्रद्धासदं मन्त्री कुशली ? भक्ता
कुशलत्त वेदिनु व्यग्रोऽस्मि ।
शक्ति-मृश दुःखितोऽस्मि, हिमिव क्ययामि ।
चन्द्र.-(सभ्यान् प्रति ) अद्यतनो महोत्सवो द्विगुणतरोत्साहेनानुष्टातव्य आर्यः ।
अहमपि समये समेप्यामि । 'प्रेममन्दिरे 'प्ररल। शोघ्र प्रवन्धमायोजय'-
*
*
चन्द्रः-श, मम दुःखानि परैरनुमातुमयक्यानि ।
शक्ति-अये, तन राष्ट्रोपकृत्यै, तपसे, सिद्धये, विद्यायै धनाय का, किन्तु प्रियाय
(दस्त हस्तेनायोज्य हसति, चन्द्र खनामागुनगुतीयक वोक्ष्य इवेतमुखो भवति )
मौनम् , अस्या एव कृते वनाइन भ्रान्तोऽसि, कारासेवोच्चोऽसि वाडितोऽसि बद्धोगि,
शतम् एव लम्पन्ते मन प्रियाः प्रिया.।
चन्द्र-मृश मा वैत्सो. सिन्नचरम् ।
शक्तिः-वेदः। अटवीतोष्टवों भवनाद् भरनमटतो महान्त काल यापरत, भीरु-
भानिनीभिरभिनोटा मोना कुर्वद भयानकळमनवान शयाना, 'अस्सलामनीक्षित.
"भवन्यू, 'वरी शर्यरोवन्य बन्युसमन्युगर्जना वनावनिमरना बन्चर्यमापस रहा
'सायन्तभापण च विदधतो न ते खेदलदोऽपि, सम्प्रति स वात्तांभिरेव ? न जिहेपि ?
चन्द्रः नव नित्र मर्पय।
शक्तिःस किंक्षम्यो भवति यः पातर पिरमाननस्यवहां मावर विवधयोजनाबद्ध
१ वायुः
निर्जला ९साधुः।
२ अजगर. ३ मा ४ स्वः ५ पुटलः ६हिच
जीव

१३६ चन्द्रमहीपतो चित्ता प्रजा सहयोगिनो मित्राणि चासूचयित्वा दोनो हीन व आसां जीवनरनकृष्ण- यामिनीना कामिनीनां पृष्ठलग्नोऽशेषवान्धवाज्ञातश्चरणरेणु चुम्बन् त्यक्ताभिमान कारी- भवति लक्ष्यीभवति च किन्नरमुटितलानाम्। हन्त हता मनखिता। चन्द्र-अस्त्याग तथापि क्षम्योऽहम् । प्रथममेलने किमेव मण्ड्य। शक्ति-अहन्तु सखे, मिलितवान् पर खन। प्रियापरमप्रेमपानीयागाधपाधोधौ शिखामामन आसी। चन्द्र -मा स्म पापारावरे पातय शक्ति-त्रपा वराकी स्मृतिपथमायाताय, भाग्यम् । सा तु त्वां स्मृखा नपते। चन्द्र -अल, विरमास्माद् शक्ति - तहिं पश्यैनम्। (अब लीयक दर्शयति ।) चन्द्र -पूर्वमेव प्रैक्षि। इद शक्तिनाथाय विवाहायतौ दत्तवानस्मि । शफि-स शचित्नाथ एव शक्तिधर । चन -आ एव किल तत् ! विचिन रूप परिवर्तितवानसि, मायाविन् । पाधि-मायान का, एपातु कला। * 'चपले, इय दिनपर्यन्त क स्थिता ? केवल दिनद्वयार्थ गता सप्ताहमेवागमय ।' "महाराज्ञी कमला देवी सरोजिनी च विजयताम् । अह देव्याज्ञया पितृपाद दृष्ट्वा मातरच सम्भाव्य आयन्ती पित्रानुशासिता यद्विमलपुरमस्माक प्राचीना पू। मत्पिता महोऊन कदाचन प्रधानामात्य आसीत्, पर पिशुनेन भ्रमितमतिर्देवस्त निरवासयत् । तत्प्रति नन्दनपुरेश्वरस्य उपच्छायायामावास । तनव व्यतिकरेऽस्माक सवा सम्पत् राजाऽऽत्मसात्कृता केवल नगरान्वे एका वाटिकावशिष्टा यस्यां मम मातामहवशो न्यवसत् । अद्यापि तत्र मम वृद्धा मातामही निवसति । पिना मात्रा च प्रेरिताह तां दाटुकामाऽगमम् । वाटिक्य विशाला किन्तु भवनं दुर्गतम् । वाटिकाभित्तिर्भमा पतिता च गृहमपि ताहगवस्थम् । परितोऽवकरकूट, पशिविष्ठा। अह अमेण परिष्कृत्य जलानयनासमया पक्षामारुच्य पूर्व गला जलमाप्य घट शिरस्यायोग्य प्रत्यावर्ते तावदेवागत एको मामपरिचितां वीक्ष्योदिमो मद्विदलनतमति प्रयुरपय पानपीनो सप्तमो निःश्वासः १३. गोवत्सः। अह 'ग्रामवं नायध्वम्' इति वदन्ती लब्धपादा मृतुं प्रतीक्षमाणासं परमेको युवा देवप्रेरितोऽवा नजन्नात वचः श्रुत्वा “मा भैपी, अवमहमागत एवं" इतिश्ययन् लवादुत्तीर्य वायुगत्या प्रजन् क्रोधोद्वेगवमहायुपूर्णपोणं यत्समनुधावन्नुपेत्य मम वत्सस्य च मध्यमुतस्यौ। तुदो गर्वितच वत्सस्त बोत्याहन्नुमनाः प्रचलितः । युवकस्तस्य भडकावादाय पवाञ्चकार। पुनः स पशुल्त्याय यूनः शिरसि तयाऽऽक्ष- पान यथा रक्तधारा प्रादुर्भूता। पर युवक ल्याय एकेन हस्तेन तस्य नासा परेप च दिह्यामाचर्य। एतावता च मनामन्दन श्रवा पुरुषाः प्रमेत्य पल्स रज्नुनिबंधन्युः । युवा च मूच्छितो भुव पसर्ग। तमम् चनुदिन यावत् ससेय्य प्रसाद मुलं ज्ञात्वाऽऽमन्व्य श्रीमती सूचयितु मागतास्मि यदाज्यमासादयित् मह्यमपि अवसरो देयः।" “यूनोऽयः विवर्ष आसीत्" "मेचा, वराको मूकः पशुः खामिनमोहगवस्थ प्रेम प्रकटितानल्यदुःखो बेगेन पाक्तिः 'को वासस कश्च सनय भासीत् "वो प्रातः सप्तवादनसमय निथित कथपा शक्तिधरमेवानुसरति । स एव प्रावनगाय गतो न निवृत्त स्वस्यैर नेवसोवो मन्तुरायानटवादनगनवे रिपृष्टो निरत्त' 'कोऽवशतिधर 'देवस्य परमनिन निमारोऽस्माक चिरपरिचितः कुमारान्वेषपाय विरक्त वेशःशचिनायः 'आः शचिनाय रख शरियरः ? हे ईश्वर, सत्य सत्यसरूपत्वम् 'देवो नितरामशान्तरत्वरया सूक्य रत्तम् 'आम् यानि “देशस परममित्र शकिपरो नां रक्षन् गोवसेनाहतो मद्दमप्यास्ते निश्चिन्तो भवन, देव, चाल्योचम्

१३८
चन्द्रमहोपतो
शकिस्त्वद्ग्रहमास्ते । स्वस्तिमेव प्रधानराजकोपपिरित्यकेन यह गत्वाऽऽनय'
*
*
कथय कीशी स्थिति, अरमाता लोऽवस्य प्रत्यारसनबस्मानरोदयत् ।
दाउणो देवोऽय यत्ता युरिन पशामि। मन्ये शीघ्रमेव सस्थो भविष्यसि त
सेवायै हताभिरपा चाला चार स्थास्यति, भाप ला समये सामिा" चन्द्रोऽओस
*
शक1 कोदसी स्थिति
स्वस्योऽस्मि अयेव स्नाता शिव पूजितवानस्मि'
कथयात्मै कायाय को विशेषत' पुरस्काय'
'एषाऽनिन्यसु दरी दिव्यदेहा चाा। एपा नदिन त्यचाहारविहारनिदाऽनलमा
मामेवापत्यत्। मूच्छिते मयिं भिगवरमपृच्छन् 'भिरग्या, अपं जोयन धारयिष्यति
किम् ? जीवने ने पुण्यस्मभिभगवन्तमेतस्य जोवनाय प्रार्थये। अहमेना रहो
कालाजाने, किन्त्वस्मिन्नासरे एतस्या वितरणरमणीय मनोनलोस्तिवानस्मि
'कथय चपले किं देयमस्मै उपचाराय'
देवो मनोऽभिलपितं दास्यति ।
कथमन सदेह
विश्वस्खोऽप्यात्मा केवल वाचा सदेग्धि'
निचित वान्छित ते दास्यामि
यथाज्ञापयति देव इति कथयन्ती शकिधरस्योतरीयप्रान्त गृहीत्वा शिर'कृताचला
लज्जावनतमुखी अतिछन् ।
'योग्य प्रशस्तस्तेऽभिलाप, नितरां प्रसीदन् युगलस्य सौम्याय प्रामरातक
ददामि
देव अपरोऽप्येक उपहारो देयो नाम देव प्रसीदतु'
कथय कोऽसौ
'देव सर्वोऽपि परिजन कुशल कलयति, केवल कुमुदिनी प्रबलबद्धप्रेमा देवाज्ञा
प्रतीक्षमाणा वत्तते-देवोऽनुमोदयतु'

सप्तमो निःश्वास १६६ 'यमद्य व जिह्वा समुदिता 'देवस्य स्नेहो मां मुखरयति' 'मनु * कधरे हर्ष कयं रोदिपि, आश्चर्यम् ? 'उन्नारसास कय कुमारस्यैतादृशी अवस्था । 'अरा मर्पतु देवी, अद्य सापाले कुमारः सबोभिः सनातामहामात्य- बुन्टरनरचकुलप्रभवः सानानविनैः कुनारैः पूषनप्रेरिते सुकोमले टपवने क्रीडन् कमपि अविवयसं वैश्यशिशुमनाज्ञाकारिण रुता चपेटाभिरताडत् । चपेटापाव- संचिता न वैश्यबालेनाभाणि-मुथैव दपितोऽसि, दुःशील, नंटिक इन मातभहनेहे कौलेयकवदन्नमसि, न ज्ञायते कस्य कुलस्य देशस्य प्रामस्वाधीशो दासो वा पिता, क च पैत्रो पैतामहिको सम्पत्, न वा। अत्र दयालना गज्ञानसन्मत्या परिपोप्यते सपरिवारः पिता, ददधुना मातामहनहिन्नोऽनुभव मुभोगम्, वाडयानपराधिनः शिशून, दुश्चरितैश्विरं चर। तो निवासितस्यते किं पुनारः शान्, को जानीते पाटवीप्वाहिण्डमानो युभुस्तिो मत्ता।" इत्युपमित्र वनकः ननंदनः लोहमारनिमितः पशुपतिरपुनिशितैरिभकुम्भविशाटनपटुभिः सिहनवि बानुबटुकटु- वोभिनितक्रियमापोरस्तः सकम्पोऽनलोपनो पाश्रप्लुताक्षो निस्सन्द रदन मुचमुगावितो मरा चिरं सानयनानोऽप्पद्यान्तः धीमतोमपेतः- लालपन्या क्यद्वयनपि सान्त्वनवचोभिः गोर हापयितुं क्यान्तां उन्नावरि स प्यच्च कास्ना देशः, कि पुलं पितुः, अन वयं कथं निवसानः, यदि कवयितुं शकोसि विरादय नो चेत् स्विरमाच्छे ।' “यय विलक्षगोपन तब वचः श्रुत्वा प्रसीदानिवनाम्, र अस्माकं राजधानी प्रतिमारते मारवे स्यातनाम रेयं, ध्येयं सद्गुनीयसिमुभिः, राजनगरं नान शन्तेना- निगलनाबमरमिर नगरम्। तब पिता विवस्याठे राज्ञो नवेन्दुगलस प्रिः पुत्रः। एदा घुमाइन्यायनतः समायावेन सरकारद्यान्नन बाटो विवादः । सानन्दमन निवसामः। खनाअपि नोबिनः पानय तव रोदनमाम्यं मनापि क्षत्रियोचिता विचारः प्रचरन्ति।"

१४० चन्द्रमहोपतो 'मातरौ नाहमन तिष्टासामि सामि क्षणम्। लग्जात्सदमेतत् क्षनस्य कृते'। * प्रयाणसज्जा प्रारब्धा। शक्तिधरप्रबलसिहयो शासकत्वे कमलासरोजियो चपलाकुमुदियोर्हपस्य च दासीदासगणेन कोशन च सम सेनासुरक्षितानां गमन सुनिश्चितमासीत् । जलविहारप्रेमिणश्चन्द्रस्य च जलमार्गेण । किन्तु कमलाहपावपि जलविहरणोत्सुकी वीक्ष्य सह गमनमनुमोदितवान् । पुनि, त्रिनयनाम्यररागविमर्दिभि धिकृतैरायतबलै स्वरूपसम्नासितदिग्गज गजै परिवेष्टितां फेनसितखलीनै निमृतोकगैविपुलवणैस्तुरगै परिव्रता राप्तकात म्वरभाखरवसनवर्णाभिर्दासीभि सेविता पटुपटहप्रहननविगतविपादां यन्ती भवन्ती प्रेक्षमाणो भृश सुखमनुभवामि'-साश्रुनेत्रेण गद्गदवाचा रामपालेनोक्त “परमेशरत्वा सदैवेदृशसौभाग्यशालिनी रक्षेत् । पर मोहमदिरामोहितो वियोग वीक्ष्य भृशमुदिनोऽस्मि । दुहित 1 हितायायको वृद्ध पिता न कदापि विस्मर्तव्य । श्वशुरगृहे सदैव गुरुजनाज्ञा कारिणी पितृकुलमुन्नतमापादये । अनाज्ञासम्पादिन्यो हि दुहितर पितृपदमवन मयन्ति, चिरायुष हर्ष प्रेम्णा परिपालये' जलाविललोचना कमलापि 'पित । सत्वरमेवायास्यामि भवत्पादपद्मप्रक्षणाय"- इत्यामन्य प्रणनाम सरोजिनी तत्सख्यो हर्षश्च । अनीतजीवनस्मृतौ भविष्यजीवनयापने च कल्पितानल्पकल्पनश्चद्रो जलधरावृताभोग भितमालनीलमुल्लोल ब्रह्मपुत्रम विशत् । स्वत्पा विहरणतरणिध्वनिना गमन सूचयन्ती शब्दायमाना स्सलन्तीवाचलत् । अन्तवत्नी कमला इयत महा तमनालोक्यमान जगातिरिक्तवस्तु वीरभीपक प्रेक्ष्य दृश्यमुद्विग्नचेता भज्यमानेन लजमानेन खरेण जलप्लुतविलोचनाऽवोचत् । आयपुन, आष्य प्रादुर्भवन्ति, शिथिल कुक्षि सशूल जघन समन्तात्कट्या पोडा मलमूलत्यागेच्छा च अ सन्न प्रसव सूचयन्ति, प्राणनाथ प्राणा निजिगमिषति आ दुखम्। आ कटम् । अवरुभ्यता यानम् । 'किमुच्यते, कध भयङ्करे सरिस्पतौ यानमवरोध शक्यते, क्षण धैयमायत्स्व श्य मल मुदूर निकटतटख्यापि,खल्पेनैव समयेनक्य पार प्राप्स्याम, भगवान् शिव शिव विधास्यति।"

सप्तमो निःश्वासः १४१ "नाः प्रिय,"दत्युन्या नुमूर्च कमला। * "आर्यपुन, ययं कुन स्ल"। "प्रिये, आर्तवत्सलो भगवान् खत एव सर्व साधयति । एषः प्रासादः केनापि सिकेनान प्रवालपर्वतम्योपरि निर्मापितः मुखदसामप्रीपूर्णो भ्राजते स्वर्गस्य खण्डमिव । स्वतस्फटिनिमितं विशाल भवनं शरदभ्रायवे । स्वर्गदम्डा मुकुरा हंसमिधुनाटदलमासि उज्ज्वल कुटिमं निर्मप्पुत्रिका आसन्यः कलाविदः कलावत्ता स्थापयन्ति" "प्रपलं शूलमनुभवामि, हन्त, दैवं किं विधिसति"-इति कथयन्ती मुमूर्छ कमला। चन्दो यथा जलमन्वष्टुं प्राचलत्तस्य शिः शिलालेखेऽगच्छत् विरन्नाव बलयानिणे मुखं प्रदानु सदा नवीनेन नवप्रियेण राज्ञा राजदेवेन भानन्दभवमिदं धमेण सिद्धयाच निमापित, पाव व्रगपुनः लिमितः स्नानागारे जलनपि निर्मलम् इत्येव पठिला पालनानागारतः सच्टबलमापूर्य प्रत्यावर्तनानेन समागि जातरियो रोदनम्। सम्भ्रान्तनागत्य दृष्टं यत्-विद्योतितान्तवन आयतललाटो मानापनयनदुःखो नवशिशु रोदिति । कमला च प्रसवपीडामूचिता हर्पश्च मुखे दत्तगुलि धरितः स्थितोऽति। चितुम्स्पृष्टाङ्गुष्टचन्दोऽपि चिर चिन्तयामास- विलक्षण घटन विधानुः। कवितारातर्नवेन्दोः पौनरन् । अन पुनः प्राप्रपठे भसम् । कुतश्च प्रसूतापरिचयांय वैद्यन्द धान्यो दास्यथ। इन्त, विलक्षमो विचक्षण या भगवान् किंचिकोपति। कांगुलिम्बन लादोत्तरीयंग ग्रोतलेन मतरिवना व्ययमनि प्रयोप्य शि शीवाभिरद्भिण्वास्स नोवेदनादिश्माची मृगरोममुटुले पर्व शाययित्वा सप्रेम जगाद चन्द्रा- प्रिये, वपरमः साहसैमसरणा दुर्गमविहारप्रियाः शत्रियाः। भास्सया न तस्यन् । भमनारमारसमीपभोग्य कालात्यपाय। नवना प्रापसह व वपुः अनुभूतभावन- भावन बस्तिप्यमेव । भनोट भव भक्षनानेगुनासन्ननगरं यानि, अन्ययात्र सपमेव ध्व मरणम् । सूचना मानन्द निवसत। सीमन्न पार्य व प्रेरते १४२ चन्द्रमहोपतो आशितङ्गयोनमरण्यमत सायाहात् पूर्वमेव प्रत्यावर्त्तन निश्चितम् । शीघ्रतायै चतुरो नाविकान् सहैव नेष्यामि। वराकी कमला किं ब्रवीतु, अगाधे पयोराशी प्रियेण सह वियोग. बालद्वयसहायो भोज्याभाव -सर्व युगपद् विचार्य गन्तुमनुमेने । हर्पस्योत्कण्ठिते नेत्रे सवदभ्र कमलामुखं सप्रेम प्रेक्षमाण "नवशिशु पर्यवेक्षणीय' इति कमला प्रर्य यानमारोटुकाम. प्रवला नाविकानवोचत्- "यथाशीघ्र चलत।" 'देव, विहरणतरणिरवतरणसमये दुरवस्थाऽभूत् व्यरस्माभिस्तदा नाध्यायि। अधुना सूक्ष्मेक्षिकयाऽवेक्षणेन तस्य स्थितिर्न शोभना प्रतीयते।" नाविका प्रत्यवोचत् । 'भगवान् श विधास्यति सम्भववेगेन चलितव्यम्' छपछपाशब्देन नौचलिता । यन्त्रस्यास्वाभाविक शब्द, मध्ये मध्येऽवरोधश्च सपा गनस्तु भयमुदपादयत्। पर्वता- कारा कल्लोला अभित उत्थाय नावमुपायन्, परं नाविकाचातुर्येण पन्थान निर्माय सत्वरसत्वर निर्गन्तुमचेष्टन्त। किन्तु विधेरिच्छा विचित्राऽऽसीत् । जीर्णशीर्णयन्त्रा कल्लोलाघातविहता विहरणतरणि. सामुद्रपर्वतेनाहत्य शतधा भिन्ना। दुर्गम्यकाव्यविज्ञानदुःखिताना कृते कृते । यात. सप्तमनिःश्वास. श्रीनिवासस्य शास्त्रिण.॥ इतिश्रीभूदेवमौरिमणिशाणायमानचरणस्य विपश्चित्तल्लजस्य श्रीनवरहरायशास्त्रिणस्तनूजेन श्रीनिवासशास्त्रिणा कृते रसिकमन. कैरवचन्द्र चन्द्रमहीपतौ सप्तमो निश्वासः।

अष्टमो निःश्वास:
आरामाधिपतिविवेकविकलो नूनं रसा नीरसा
वात्याभिः परुपीकृता दश दिशश्चण्डातपो दुस्सहः ।
एवं धन्वनि चम्पकस्य सकले संहारहेतावपि
त्वं सिञ्चन्नमृतेन तोयद ! कुतोऽप्याविष्कृतो वेधसा॥
पण्डितराजजगन्नाथः
पाटीर ! तव पटीयान् कः परिपाटीमिमामुरीकर्तुम् ।
यत्पिपतामपि नृणा पिष्टोऽपि तनोपि परिमलेः पुष्टिम् ।।
पण्डितराजः
रोलम्बन विलम्वितं विघटितं धूमाउलैव्याकुलै-
मायूचलितं पुरंप रभसाकीरेधीरैर्गतम् ॥
एकेनापि सुपल्लवेन तरुणा दावानलोपप्लवः
सोढः को न विपत्सु मुश्चति जनो मूनापि यो लालितः ।।
मुभाषितम्
मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णा-
त्रिभुवनमुपकारणिभिः प्रीणयन्तः ।
परगुणपरमाणून पर्वतीमत्य नित्यं
निजहदि विकसन्तः सन्ति सन्त. कियन्तः॥
भर्तृहरिः
सुन्दरमुनीन्द्रवसतिं दूपचितुं याति शूकरो विड् भुक्
इति पधिकेनापि मया मुदृढं झुत्तोल्यते लगुडः।।
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१४४ चन्द्रमहीपतो जहीहि गुरु गर्जितं विजहि शुण्ड्या शीत्कृतं परिभ्रम शनैर्वनं किमु गजेन्द्र ! गर्वायसे । तथा न किल केशरी गिरिदरीपु निद्रा त्यजन् विमूर्छयति जम्भया सुभग। तावकीनं मनः ।। सुभाषितम् शीतम्। ।। प्रातः। प्रियवालमनोरमदछात्रवर्ग झधनिजनसुखकारी, वराकनरदुःख- कोशोदारभाण्डागारिक, समुसद्वसननिवृन्दवन्दनीयः परमात्मरूपो मासचाय मार्गशीर्षः। अहः प्रथमो यामः। अस्मिन्ननेहसि हसितमनोहयो, रयेन दुःखयन् प्रचुरप्रबल कार्पासोर्णाकवचनिबद्धातनुतनूनामपि तनुमतां तनू, शरनिशाते, प्रवेशनिपुणैः खप्रवाहैर्वाति विपुलितशीतो वियद्गातरणसद्ग, तपनतापातप्त शीतलं भुवस्तल जडयन्, हाहाकारितजगत् , पातितापत् , विततप्रभावो हैमन्तिको मरुत् । पराका अवना अधुना चेलचयनिचिताः, मलविशीर्णशरीराः, हिमकुन्जिताः शिरोविधृतपाणय , अग्निशरणाः, एकनीभूय पार्समेल स्थिताः सन्ति। इतो धनिन आखादितवावादसयावाः, निपीतपयस्विनीपयस , कामेश्वरमोदकमुदिताः, वासोवारिधि. निममा अविदितहिमागमाः, यन्त्रैरुष्णीकृतभवनाः पर्य?षु सानन्दमुपविष्टा जगति सौभाग्यं तन्वन्तो भगवत समदर्शिता न्यायिताच विलज्जयन्ति । कचन साता विमा राम! शिवेति भणन्तः, तिलकातिप्रशस्तमस्तकाः, धर्म- प्रतिमूर्तयः, चक्षुलं भगवन्त ध्यायन्तः सासनेपु फम्पमाना आसते। कचन शपथ पम्यपूर्ण हटे "मुप्रभातं बहुहानि बहुधानी' वा कारय” इति धनिभिः सहस्सद्धान वधिरयन्ति केतन विश.। वराकाः शकुन्ताः समसाधनहीना अन्योन्यं तनयोजयन्तो दुःखस्य पर काष्ठामुपयन्ति। विलक्षणोऽय भगवान् काल । अयं जगत सर्वभावाना भवाभवे हेतुः। पामेटिक सृटी स्थिती लये चास्यैव कारणता । एष एव उत्सादयति वर्द्धयति नाशयति च जगत् । १ वृणी-बोहणी वा। मेनुहुहानि, विक्रतुल बहु धीयते यस्यां सा मया ता तथाभूतां कारय। तस्यां बहुजनस्य बहुधन समागच्छेत् ।

अष्टमो निश्वासः १४५ अमुष्मै विलक्षणाय नमोऽस्तु भगवते कालाय । भवव्याकुलतया सह रजनी बीता। परमकारुणिका सारुणो गृहीतनमस्कारो भावानहस्करो हैम दुख ताइयन् रकचमकशाभिरिवारुणाभिर्दीधितिभिरुदेति। सूर्यस्य कोमलकोमलः सरलसरलो वालालोक. पुण्डरीकेषु नवदुमदलेषु वल्लीपल्लवहिमकण- प्रकरेषु कोडन्धाधक। बालभास्करणमया विकसितकवाट: प्रासादोऽय सिन्दूरपूरितकेशमध्यायाः, अनवगुण्ठितमुरया नववध्वा. साम्य पत्ते। यस्य सस्कृत- काचखण्डमण्डितोऽप्रभागः, सूर्याक्षणफिरपारुणितो बवा. पद्मरागमगिजटितचूडामणि- तुलना धत्ते। महामहिम्न. भाखदतुलप्रतापतपनस्य राज्ञश्चिनपुराधीशस्याभिनयपद्धतिनिर्मित नव्य भव्य भवन भ्राजते। यद्यपि भवनस्य निखिला सामग्री हिमपिता परं नवीनेय रवनारीतिविधकर्मणा श्रमेण विचार्याविष्कृतेवावभाति। कुड्ये घुभुशुण्ड्यादि- लक्ष्यार्थ रचितैः छिद्रचक्षुभिः साम्यमिवावलोकयत, निनिमेपनेनमखिलामिला पक्ष्यतीव । प्रोन्नतभूभागे शोणितपापाणदृढप्राकारस्य मध्ये विस्तृतक्षेने रमणीयतमाऽस्य रचना । परितो मस्कूपनिम्ना वन्बूलव्याप्ता दुस्तरणीया 'रणीया परिसा। द्वाराभिमुसय नवनीतमूदुलसितश्यामोपल युट्टिम प्रकाशयति यतिप्रहादनी सुषमाम् । द्वारे काचम्याटा अट्टालिकाः सम्भोक भर्भाग्यमद्वितीय प्रस्टयन्ति । गोपुरे धृतोर्णावसनोऽपि ऋनुपलविधूय. मानगान , कश्तो हस्तनि सारणमनीहमानोऽपि जनपालशासनभयविवतोऽप्रलमचन- चन्द्रहासा भुशुण्डिकां करे कलयन् हिममपनयन सत्वरसत्वर नगरदशामी ठमाणी- भ्रमति गीपुरिक।

अत्रकचन अष्टमो निःश्वासः १४७ द्वारमिदं मारतपन्निवकुटिमं बहुभिर्भवनविभासनानं विकासते। आजरे च रमणीया पुष्पवाटिका, तदुत्तरतोऽवलोक्यते राजभवनम् । पुष्पवाटिका न विशाला, पर तिर्यगिष्टकारचित थिभिः, पक्षिमिथुनाङ्कितमारकतलवाल' लग्नविटपपरिमलैः, विचित्रै- द्रुमः, द्विद्विरेपमयूरसन्नादितैश्च नायवनों वनावनोमत्वरीत । पुपवाटिया उत्तरतो द्वितीयं द्वारं विपुललोहं विशाल शालोन्नतश्च । हे पाध्वनिमहिनजना वाजिनः, कचन निमोटिवेक्षणा मत्ता अमन्नधुलिहः करिणः, कवन चकोरकोरगिरा विपर्णिक्षणाः हरिणाः शोभन्ते । तृतीयद्वारकपाटयुगलं स्वर्णपणे मणिगणेन रचिलतापुष्पस्तवः लावचपन्यनैपुच्चमा- दधत् चिल्पिनः प्रमाणपत्रमिवावभासठे। उभयतः मुपिटपानां परिमलभाजा- पुष्पाणां परिमलमतिनिहारिण प्रागतर्पणं समैन्यो विभजन् भगवान्परमानो विदलितोद्यानविटपः प्रवृद्धरयोऽपि कदलीपप्पुप्फरकखण्डितवेगातलयो योद्धेव मन्द वाति। अब वैश्यः कौशेयजनिकस्व हर्म्यस्यान्तः प्रविश्यापश्यद् यत् , मुसुरोज्ज्वलायां श्लशामित्तौ रम्याणि चित्राणि पुण्यश्लोकानां सर्वादीनि सर्वनामानि चाहितानि सन्ति । मध्ये च परितो जाम्वूनदानन्दीद्विगुणितनुपनायां, सदुपलसम्पादितावामुन्न्वन्तसित- तूलिकामहोपबहपरिष्कृतायामेमतो वीघ्रशातसम्भनिनितेऽक्षिलग्रोदधिसारवड्ये, मारत- बहें, नीलकौरोगाला वृत्तपछे, जातरूपातपत्रे मयूराराने अनुपविष्टो गुह इच, उपहार- दानेतराजन्यकुमारोपगूदः, गूटपरशत्रुः, अनारतधराधरपतिपुत्रीवेवितः शिव इव, प्रोषादिलासरस्वतीकः, राम इव दु.खितदुःखहारो, अर्जुन इव भारतप्रसिद्धः, राधेर इव दानादीन, भोप्न इस ब्रह्मवारी धनुविद्याक्त्तिः, रचितन्न्यायो वररचिः, पारंपरिः, दैत्यारिः श्रीगो विष्णुदयो होतकारः, नुप्रीवः, सातदो हनुमान, सनविरलकचोऽपि परिमलटब्याट्पदन्दुलितशः समुज्जलायतमस्तको दीर्घजुन्दरम: गोपुरमबाटोर:- स्थलो राजा राजते। तं कवनोपोषयति, कवनोपदलोक्यति, कश्चन दूरस्थायी सामन्तः सार्शलवन्ध प्रणमनपराधभिक्षा भिसते, कश्चन दुःखबालचलितचेताः कथं निवेश्यदे। अध १गमला।

१४८
चन्द्रमहीपतो
तमायतदोपमदोष विकचोडुविसराया वाशुरायाचन्द्रमिव नरेन्द्र किञ्चिदुपहृत्यैकत उपविष्टे
भूमिस्शि, महाराजस्य स्नानवेलामाकलय्य भ्रभगवैलक्षण्येनैव निरितेषु षु
महाराजवैश्ययोरेवमभूदालाप ।
राजा। आनन्दितोऽसि श्रेष्ठिन् ।
वैश्य .। (स्वजातिप्रभावेण विभ्यत्) आम् जगद्रक्षक। को नाम के स्याद्
भवति भवद्राज्ये च कोऽप्युत्पात ।
गता दूरचौरा । महद्भय यस्मादासीत्तदपि
पलायितम्। विरञ्जीवतु श्रीमान् चिरमवतु ।
राजा० । कोऽपि हेतुरस्ति किमागमने !
वैश्य देव! देवपादानां दर्शनाहते को नाम मुख्यो हेतु सम्भवति,
वन्यपाद ! वय वणिजो देशाद्देशमटन्त सुन्दरमुन्दराणि विचित्राणि वस्तून्यवलोकयामो
देवपादाना दयया लभामहेऽपि। गतयातायामह काश्मीरदेशमयासिषम् , ततश्च
वपु परिमलमोहितमुनिजना मुरभिनि श्वासा स्त्रियमानीतवानस्मि । सकलदेशतिल्काय
माना साऽशेपभुवनभालायमानो भवामतोऽह समवेतसौ दर्या दासीत्वेनोपजिहीर्षामि
सकामावामामा
राजा । बढ्योऽत्र दास्य, नास्ति प्रयोजनम् ।
वैश्य .। पर देव, महता कष्ट नानीता तो श्रीमचरणसरोजरज सेविनी द्रष्टु
नितान्तमुत्सुकोऽहम्।
राजा। अस्तु, प्रेप्या।
.
'देव देवीमह ता वक्ष्ये, सा वैश्योपहृता 'काश्मीरीये ति कृतनामधेया दासी भवता
ज्योति शास्त्रानुसार परीक्षितुमनुशिष्टा परीक्षिता। महता श्रमेण अनुनयविनयेन सा
खहस्तमदर्शयन्न मुखम् । सा सत्य त्रिभुवनपट्टमहिपीत्वानुरूपा कमिमा दशा भजते
इत्येव विचार । एका खल्पीयसी रेखा तस्या साम्राज्यं विदरयति, मन्ये द्विपैरेषा इमा
दशामनुभवति। एषावश्य भगवतीस्वरूपा व कदाप्यवमान्या मान्या च पट्टमहिपीव”।
'किं कथयसि ज्योतिविद्
"सत्य देव"!

- अष्टमो निश्वासः १४६ "दृश्यता कि भवति" "देव, विलक्षणोऽय विधि, प्रातःमता मयाद्य द्वौ गोपनाल'वपि ते मयन्सी वीक्ष्य तयोईती विलोकिती। भावेव राज्याहावास्ताम् । नियांधराज्यदानी तयो रेखा। अह तयो स्थितिज्ञानायाहोरात्र वावपश्यम्। दुविनीतो विचिनोऽय काल, विचिनश्चास्य महिना । यस्य आत्मन प्रतिमुर्तय इव मन्त्रिमामन्त- मान्यनिवशावतसा बमलकुलजलनिलयनिर्गता मणय शाणोल्लीटा वर्णस्यूतवासस सुगन्धिगौरशरीरा योभाला तृप्प्पवाला वाला सहाया उचिता- स्तस्यैव शिहाणपूर्णपोगा स्रवल्लाला दूपिशापितवीक्षणा प्रकान पुद्विन्ति सविप्रहा इव कारा नमा बाला सहचरा आसन् । यस्यालकै प्रयनसिद्ध परिमलातुलं तलं, मुगन्धमुग्वगन्धवाह परागपटलभिन्नमवलेपनशोषित तस्येव दुदिनपरिभूत- प्रभस्य पेरोरिव एडकामूतमिथिता धूलिधारणाय । प्रतिदिनधावननिघुयोत्तरच्ढरे प्रतिदिन चौलिघ्तन्यमानतूले मृदुलमृगरेमातरणे शीतलविद्युद्वपजनवोजिते सौवर्ग कौशेयतन्ती परिसुगन्यो मधेश मनोचितो हलफाल वरमेषु प्रचण्डकरत पु स्थलेषु रापान आहूतोऽपि न जागत्ति स्म। यस्य मुमधुर सामोद घरदाज्य भोज्यमुचित तस्व यवागू. यात्रायमरानम्, तदपि कदाचिदपर कदाचिल्धम् । कादमीरनरमामपालदाडिमोका- पिशायनीफलोचितस्य करारखान दुष्प्रापम् । माधवन इवोपवने श्रमणोचितोऽजागोष्ट- नपुटसेवी। धानीभिनातापितृभ्याच सप्रेमान्यर्थनोचितो भोजनाय रोदिति स्म, विलपति स्मा यालगणिकाचाम्पेयनागरेचरवन्जुलमञ्जुलजटेन सानोचितोऽद्य स्वेदविन्दुपित. वयते। । स्क्षा परिणता युकालय केशा अनीशा समर्थयन्ति । कयो पोलपम्, भाग पिका, हारोचिते गले मलरेखा, तनी दंगभ्यम्, करयोस्त्यटनम्, कमलकोमल्यो. पादयोगिदिमा, शरीरे कार्यम्, मत्या मान्दन्, प्रतिभावनप्रभलमन्द्रह- मन्यतनम् । दुर्म, देव, विजान से मनपराधिन विसी, विलोऽसि रे मपटन- पटनापटनाटोय । सोऽमनय देव, नयापरोऽवसरों से देका दासमेत सरेसा पदयाम। मन मदिवा प्रान्ता शाम्नानि वा विपरतानि नामसिनोनि।" पनिर नापिनु विरचितारनेरच्या मरदो क्षत्रियसनव प्राची संधानन् देवा १५० चन्द्रमहीपतो विक्षिपती धनध्वान्तमध्वसयत् । पराजिता रानिमुखमन्तर्दधौ। प्रातरन्न पिपतीनां पुरयोषितां मन्द्रगम्भीरो दृपद्धनिर्मादकता प्रसारयामास। प्रकृतिस्त्रस्तचरेण मुखेन पुनर्जहास । पङ्कजवनस्य मुकुलानि विचकसु । प्रगेतन पवम ने सेवितु सदश्वमारूढो याति चित्रपुरेश्वर । मार्गे कावपि मुग्धौ अज्ञात वाफपाटवी कोमलकमनीयतनू मलिन मुखौ शीर्ण-वस्त्रौ बालौ दृष्ट्वा स ज्योतिविदोक्त स्मृत्वा सस्पृह सप्रेमावोचत् 'बालौ। कस्य तनयी स्थ कृष्णगोपमुती स्व।" ग्राम्यशिशुमुल्भया हिया हृतधैर्योऽपि ज्येष्ठोऽवत । 'अपि शिक्षितौ किञ्चित् ।" "नहि देव ! अध्यापको रुप्यक याचते, अस्माकमुदरदर्येव न पूर्यते, पितारमाक गतमासे मृतो गावो महिष्यश्च महामार्या मृतास्तदा वराकाणामस्माक क सम्भाव्येत पठनप्रबध' 'आवामनवृत्त्या माश्चारयाव"। 'अपि कार्य कर्तुं शक्नुथ ?' 'देव । कथनास्मभ्य कार्य ददात्येव नहि । आवा व्यजन चालयितु, गाश्चारयितु शक्नुव पर नास्मादृशेषु कश्चन दयते, दरिद्राणा दर्शनमेव परिहरति लोक । श्रीमता यदि दया भवेत्तदाऽऽवामपि दु खोदन्वत पार लभेवहि । राजा तु विहस्य दुर्गे व्यजनचालनकार्याय आदिश्य जगाम । अधुनतयो सुदिनानि समितानि । पाचकेन सहाप्येतयो प्रम भूतम्। करुणदशे दरिद्रे सहृदयो दयते। सोऽप्यवशिष्टम्भोजन ताभ्या प्रायच्छत् । अधुना तयो राग खभावो बुद्धिविशदता परिवर्तिता। तो स्वक्मणा विनयेन आज्ञावहनैन बाल सुल्भया मत्या च राजकुल वशवदयामासु । उभावेव राजनामाङ्कितवतलपित्तलपट्टिकाभूपित वससौ तदुचितवाससौ महाराजशयनागारेऽ ववसर बाहीक व्यजनकार्यमपुरता समये सलममनसावपठताच । ग्रीष्म, रात्रि, उष्णता, शीत प्रेतम, वायुरनायुरिव प्रतीयते। चित्र पुराधीश कमलकोरक्कृतोपबह चकुलशय्यायां निमान व स्वपिति। उष्णतापोषक विद्यद्वयजनमवरुध्य काश्मीरीया हिमशीतेन व्यजनेन शिर पार्थ स्थिता सतर्क वीजयति।

अष्टमो नि श्वास १५१ मध्ये मध्ये राशो मुख निपुण निरीक्ष्य किमपि विचारयन्ती पुन स कर्म सावधानमा चरति । यहि स्थितौ वाली च राजभयेन शिगुस्वभावाच्छनै शनैरालपन्ती बृहता सनणान्तर्वजन चालयन्तौ स्थिती स्त्र । यद्यपि गिरोगृह परितोद्वार तदपि कम्या अपि दिशोऽद्य भगवान् समीरो न सरति। दूरस्थयोलियोप्प्यालाप काश्मीरीया ध्यानेन भृणोति। कनिष्ट-भ्रात कामपि गीतिमालप रे! ज्येष्ठ-नाह जनामि। कनिष्ट-केशवस्तु बहु जानाति । ज्येष्ट-वेन किमस्माकम्। आवान्तु न जानीवहे । कनिष्ठ:-तहि किचिदन्यदालप। अन्यथा तन्दा शिथिलयति, उप्मा ग्लपयति । ज्येष्ठ-यदि आग्रहस्तहि भ्शु- थद्य मया एकपद्य रचित, गुरवे धावयिष्यामि त्वमेव पूर्व Y - क राजास्ते चन्द्रोऽस्तमितरिपुवृन्दो नरवर क हो वालोऽस्ति क नु जलधिजातो नवशिशु । क माता मान्या नावहह । कमला धर्मविमला करालोऽकाले हा। किमिव विदधे कालवधिक ॥ बालस्तु प्रवणमानप्रसन्नो नरप्रमील गुचिर्वभूव । परन्तु काश्मीरीया वीजयन्ती मधुरमधुर स्फुगक्षर युगम्यार्थ इलोकमिम चा किमरि स्म विव निशितच्छरिकया हदि वितरितेव सन्तामततायी मुमोच। तानि च वस्रा विशदप्रमादेन नरेन्द्र- मस्तके निपेतुः। अयोगोलकतापत तप्तखि भृशोगैरभ मिनटनिद्र णोपितेन राज्ञा पृथ्म- 'कथ रोदिपि ? काश्मीरीये, विशदय, अह ते दुसकारणमचिर जिज्ञसे"। का-देव! भवति शास्तरि कोन दुखमोऽी। किं तमलोमहन्तरि भगवति सविनारि समुदिते सम्भाव्यते तमोरेशोऽपि । रा-सत्य कथय कथ रोदिप अभय ते ददामि।

क १५२ चन्द्रमहीपतो का.-महाराज! विमाग्रहेण, किन्नु कथयामि, नितरां दुखिन्यस्मि । नाह सात्तिभिर्दु खवा भि सदय भवद्ध दर्य विखेदयिषामि। न चाशुचि' शान्ते खाते दुखशल्यमारोपयितुमुत्सहे, अल्मधुना कदुदन्त श्रुत्वा। मा नाम प्रलीनमनल सधु क्षयन्तु,खपन्तु। उदितजिज्ञासस्तेनोत्तरेण बहुश काश्मीरीयावृत्त ज्ञातु कृतसङ्कल्पथ स उत्थाय पर्यध्य पानीय निपीय बहिश्चत्वरे आसन्दीमाकृप्योपविटो वृत्त श्रोतु सजोऽभवत् सा च कथमप्यवरुद्धवाप्पा पृथिव्यां समुपविश्य प्रवक्तु प्रारभत- जनपाल ! यद्यत्यन्त कुतुहल यदि च मन्दभाग्याया दुर्वर्ण दुःखद रत्त शुश्रूषते तदा शृणोतु- वर्त्तते प्रततप्रतापपर्परीक र सादितशत्रुशर्शरीकः,' धनपुथ्योधभरीक श्रीविमल पुरेश्वरो रामपालो नाम विलक्षणख्यातेर्यस्याह मन्दभागा तनया राजा-(साश्चर्यम् ) तत्र भक्तो विमलपुरेशस्य पुत्री । काश्मो । आम्, देव! राजा-आम्, तत, त्वरख। का०-ततो देव, श्रीमन्नरेन्द्रवातभालायमानस्य नवेन्दुपालस्य पुनो विवश्रुतयशा' परिणीय प्रसूतपुत्रा श्वशुरालयमानयत्। जलमार्गे ममाभूदेकोऽभर पुन । आहारादिक नासीत् । जीवनायावश्यक वस्तुजातमानेतु मत्पति वमारोह। तरि बहो कालात समुद्र स्थिता जीर्णाऽऽसीत् , अवतरणसमय एव विट्ठमपर्वताहता दुरवस्थामभजत् । किश्चिद्दर गता समुद्रपर्वतेनापट्टिता, मत्पतिश्च पर्वतोच्चतरने विलीन । अहमसमर्थापि पक्षद्वारेण विलोकयन्ती आशङ्कितानिष्टा न्यपत सर्व सहायामसहाया। रुदतो हर्षस्य वारिजस्य चाक्रोशेन कथइयमपि नष्टमूर्छा हर्ष वाग्भि वारिज शिर स्फोरणे सान्त्वयन्ती 'नानिष्ट शङ्कनीय"मिति मनसैव दीयमानधैर्याऽतलस्पर्श पयोराशी भोजनमानेतु गत पति प्रतीक्षमाणा सर्व दिन व्यत्ययापयम् । अथाशेषदिननिरन्तरयात्रापरिश्रान्ते रक्तमिते विरिरसौ पश्चिमदिशमवलम्बिते भगवति १ अशुचि-अशोके । २ सूर्य । ३ हिस्र । ४ शरीरम् (ौणादिका )।

अष्टमो निःश्वासः सहनदीधिती रत्कण्ठितं हर्ष शान्तयन्ती स्वयमपि युभुक्षिता तृपिता बलमन्वेषयन्ती टेखानुसारं जलागारं प्राप्य पानीयं नियोत्सझवारिजाऽद्राक्षम् । चन्द्रिका विकसिताऽऽसीत्। पर्युद्यानं प्रोचा भित्तिः। एका जलनलिका पादपतर्पणाय भित्तरवस्तात्सनायाति । रक्षाः सफलाः सपुष्पाथासन्। बुभुक्षितो हर्षवर्जनीमाकर्पयन् मामदुःखयत्। वालविलापमाकर्ण्य साधनेग्रा परोद्यानप्रवेश- शवितात किमरिप्यम्। पत्रपुष्पफलानामविशोधनेव पातं सङ्करं परिहरन्ती मटिति गला रसालानि नारज्ञाणि दाडिमानि च पोटयित्वा धौठवम्नपुटे संस्थाप्य सभ वीक्षमाणा तस्मै यददाम् । स च वन्यान्यपि फलानि सानन्दमुपभुज्य सुप्पाप । मदीपा दशा विलक्षणाऽऽसीत्। भरागमनं प्रवीक्षमाणा, नौकाविघट्टनेनानिष्ट- माराङ्कमाना प्रसववेदनाभिभूता बहुकालं निद्रा नालभे। शान्तो निशीथसमयः, सर्वतः प्रान्तां तन्दापूर्विका निद्रा मां प्राप। प्रातजल. गर्जनवीतनिद्रा किमकरिप्यमहं रोदनाहते। युभुशाप्येका प्रथला पिशाची दु.खेऽपि दुःखिनं दुःखाकरोति । उयाकान्ता- ऽयसम् । प्रतिदिनचौर्याभ्यासः फलापहरणमुचितं मैने । पक्षो मास नरयनं व्यतीयाय । अहं परमात्मानं स्मरन्ती फलान्यदन्ती भवन एव सनयं यापयन्ती भवत्तिपि । एकदाई बहिरलिन्दे केशजलं शोपयन्ती तहनुफ्नया वाली हादयन्ती वस्तु. पूर्णनावं विदेशव्यापार परखममुमद्राशम्। नार्या मागे निकेतनत्य पार्श्वत एवासीत् कलोलाजन शान्ता आसन्। अद्यवाहं यहोः कालात् पुरुपं दृथ्वती। सहसा • चलन्ती नौ रवा, पावें एवाहमासम् , भीतिविहलो वणिमूचे देवि, कयय किमिच्छसि । वृद्धि कि करवान, भगवति, प्रचालय नावम्"। "महानुभाव, काहं रोधिका नावः, मन्येशुल्टनेश्वरेण भवन्त इतः प्रापिताः। अहं मानुप्यस्नि। सत्यां भवदयायामनाशंसित भूभागमाभ्यानेय लोचनाभ्यामहनि परत्येयम्"-विविधिलेन सरेणाहमुदतरम् । "भगवति, त्व मम धर्मभगिनी, आगच्छ वामहं परं पार प्रापयिष्यामि।" इति वणिजोश क्ष विचार स्पुना नावमारदा, नाविस्यलेनाचलत्तरिः। विचित्रोऽयं विधिनामनुगच्छनासीत् । महता वेगेन प्रारमत बार्नु पृपदश्वः।

वायुना ग्लपितचेतसा चन्द्रमहोपतो विरमिव जिगमिपुरकूपारतल दिहशुश्चचलाभवन्नौ । नावि भाराधिक्यमासीत् पापपुजव। उभयत कल्लोलाघातवासादेव मुद्रसम । शुभाशया सहैव भग्ना नौ । एकस्मिन् शरले हर्पवारिजी परस्मिन् कुमना वणिक अहश्च । शेष भृत्यभाण्डादिक यादसा पत्या खावे कृत्या खाश्रितेभ्यो वितीर्णम् । मजतां जनाना भीषण चीत्कारमाकये जलधिहास ! जलताजविरमपवाह्य मानौ विहलो हपंवारिजौ विलोक्य द्विहस्तमितकाष्ठफ्लकसहायाह चिरसखी मूळ मालिङ्गितवती । अर्यस्यास्य विशिपे भन्नोऽभून्मे मूसिवेश । एप मा नगरान बहि वाटिकायामरक्षत् । उत्तमा प्रसाधनसामयो, चतुरा प्रतिक्षण मां कामवासनासु सलमा दिदृक्षव सप्रयत्ना दास्यो ममाने प्रस्तुता आसन् , महत्तम भोज्यच । एकदा रात्रौ चञ्चच चाकाशे प्रसाधितवेश परिमलालक स्वार्थपर पापपुरेश कलुषितहक विट भगिनी मत्वाऽऽनीतायां मयि पतिव्रताया पासुललरनासुलभा दृष्टिं प्रज्ञेप्तुमैच्छत् । पर मया, 'नीच ! कदर्य । वितधप्रतिज्ञ! नाह गणिका, अपि तु कुलीना क्षत्रियास्मि, तन्मूढ यदि मामझस्पर्शेन दूषयिष्यसि चेन्नियता ते मृतिमत्करात्" इत्युक्त परमभीरुर्नुभुक्षिताया सिंह्या इव सक्रोधाया मम वचौभिर्भसित स्वकर्तव्य धिक्कुवन्, स्वभावचतुर, भ्रष्टेनापि कार्येण भवतो धनमानेप्सुति वैशद्यन भवदभ्यर्ण प्रेपयत्। पूर्वस्मिन् दिने भवद्वयजनचालकयो लकयोराकृति दृष्ट्वा विस्मिता व्यचारयम् , ममापीदृक्षौ वालावास्ता यदि जीवत कुत्रचित् परन्तु शक्नुतोऽपरावपि समानाकृती भवितुमिति विचार्य मौनाऽवत्तिषि परमधुना पद्यश्रवणनष्टसशया क्षनियवीरपत्नी वीरपुत्री सविनय सप्रणाम सारद सोत्साह सरोदन सहास सकरब धमह प्रार्थये यद्दापनीयौ प्रलीनपतिकाया अनायाया दुर्भगाया मे पुनौ। दीनसमाश्रय! कुरु मामपि साश्रयाम् । हत दैवी विचिना गति । हिरण्मयसूतस्यूतमहाप्रशस्तविस्तृत पटपरिखता च दनदण्डा महाॉपवर्हा मुखनिलयामध पातितदु खारूढामिव शिविका चच्चलेय मित्यवाम यत फिङ्किणीसहस्र शिसरवणकुम्भविभासि साजियुज स्थमपि शब्दितगमनमिति, हेपाहषितजन फेनमृतयुक्तिपीयुगरमुच्चै श्रवरा ततयराय वाजिनमपि वरमाकपणकष्टमिति, सकुथमञ्जनानुकारि द्विरदद कृष्णरूपमित्यवामन्यत अष्टमो नि.श्वास १५५ यो राज्ञामका श्रमन्नावकाशमलभत यञ्च भाविनवम्वत्तिनं विदुरणीयवाणयो वचनतत्तस्याशेपा दशा ? विचिकित्सा शास्त्रपु मामक मनः। हन्त ! किमिदम् ? राजा. हन्त किन्नाम भ व त्याः कादमीरोया. देव! कमला। राजा तु सत्वरमुधाय विगलदः सर्वदाऽवगुण्ठननिलीन धादशि तस्या मुख मटित्युद्घाट्य निपुण निरीक्ष्य कराभ्यां इट बवा मृशमरोदीत्। कमला तु महाराजस्यापूालिगनतां विलोक्य निविणा वित्रिभुरपि वकुमरामर्धा सम्भ्रान्ता विस्फारिताभ्यां नेत्राभ्यां कमपि प्रनुर दृष्टचामिव पश्यन्ती कथमपि विपुलेन बलेन फराभ्यां मुक्ता विवेकविकला एकतः स्थिता। राजा तु विहुलः पादयोरानतः "प्रिये ! यस्व नष्ट मन्यसे, यश्च त्वममाओं बारा राशाजहात् , यस्य कृत्वे व वराकीव सेवितमृतिका भ्रमसि, यश्च श्रीलश्रीनवन्दु- नयनानन्दनोऽप्यनानन्दनः सोऽसावभाग्यो भाग्यशाली व मतां तव चन्दः।" कमला तु पुननिपुण निरीक्ष्य मुखचन्द्र चन्द्रस्य "हाप्राणेश" इति कथनेन- साई कसलमुपगता पतिता व मालती लठेव चन्दाढ़े। विलक्षणो मनोहारी परममधुरः सहृदयहृदयसवैद्यामन्दानन्दस्यप समागमः। नाटीयवस्तुनो जवनिकापातो जातः। क्षण व मद्ददन्तर जातम् , शतशो दास्यो विविधोपचारैर्मुमिपनियुः। पनीवृताकाशशोभास्तीभाः' कमलासम्नानाय विष्णुपद 1 विदलयामामुः।

। चन्द्रमहीपतो विविधमहर विज्ञाय मम मातामहसदनमायावो देवदयया सम्यक्ताजीवन सुख न्ययसत् । स ऐपम क्सनकपीडितो देह जदौ तस्यैवावा तनयौ स्व । हष किन्त्व कृष्णस्य पुनोऽसि अपि स्मरसि परिचिनोपि माम् । किं जलनिकेतन विस्मृतवानसि ?' -पस्नेहृदुःखविगत्दश्रु स्नाताननया कमलयोच । यून -(स्तब्ध इव आश्चयचकित इव कमलामुख निनिमेपनयनो विलेक्य तद्वचनरीतिच्च परिचीय) था मात ? इत्युक्त्वा साधगलमालिलिङ्ग । उत्तापतप्तमरौ पीयूषवर्षिण प्रापण्या वारिदा वसुधा खगयामासु, ऊपर आरामती भेज। स्थली रसिकाना मनोमुदे क्रीडास्थली जाता। कृष्णगोपालस्य पनी ससम्मानमाहूता पृथ्वा चाववीत्- एकदा मध्याह्न वृद्धो मामुपेत्याह । प्रिये नावयो सन्तति , वृद्धोऽह त्वमपि च, वार्द्ध के आवयो सेवायै परमकारुणिकेन भगवता प्रेषिताविमौ विधिविपाफदारुणवेदना विपन्नौ रोदनस्तब्धकण्ठौ जलसम्पत्रिणी प्रवाहोह्यमानदारुशकल्सहायौ यथाक्थमपि सुकोमले तटे समानीतौ कम्बलान्त कृत्वा घृत विलिप्य त्वदन्तिकमानीतौ पालय चमौ देवदत्तौ-इति। खभाववशाहमवोचम् समाप्तसप्तमीक, बुद्धिस्ते भ्रष्टा, प्रतिदिन कमपि समानयसि, अद्य मृताम्बो वत्स अद्य व ऽय गदभ मन्ये त्वमेव धात्रा निराश्रितानामेकमानमाश्रय' सूट । शृणु एकदाह युवतिरास, त्वदाज्ञापालने कष्टानुभवो नासीत परमधुनाह द्धा स्वस्यैव जीवनाय आवश्यककृत्येऽपि सालस्य वपुरेतेषां निराजिताना सेवायै नालम् । क्षमस्त अद्याह तान्तिमाम ज्ञा पालयिष्यामि पर नान्यदाहमाज्ञप्या' - इति । ऋणु युद्ध! एतौ मानवजातीयौ देवदत्तो वालकी, एतादृशावयैवानीतवानस्मि । इमोप्रम्णा परिपाल्य। गृहे देव गवा माहषीणाञ्च समूह आसीत् । अध्यादक धृत प्रतिदिन भवति स्म । दुग्यस्य दध्न व पटा पुयन्वे स्म। थानोऽपि पयस्तृप्ता आसन् । गृहे केवलमावा दम्पती आस्त । अहमेतावेवस्या कोमलाया शय्याया शाययित्वा नवनीत विलिप्य पर्यचरम् । खत्यसमयेन। व्यपगतवणवेदनौ हष्टपुष्टाजो सातौ। आवामेवयो मान्यकुर्व न्यून ऊनथ ति। प्रवधारोष्णपय पानपीनी, नवनीताहाररकसपलदेही सुन्दरकन्धरी आकान्तः। अष्टमो निश्वासः १५७ मुपरिणाही सवेणीको अभूतामेती। वृद्धतयोविवाहादि कत्तु पयो विकेतु मजेडकापालनचारब्धम्। किन्तु देव, रद्धोऽप्ताभिलार एव मृतः । वसनकेन स प्रामे कश्चन वेद्यो नासीत् । परप्रामत एको दाकरः पचासन्मुद्रा आदायागतः परं सोऽल्पजस्तस्य जीवन रक्षितुं न शशाक। तस्यान्तिमेच्या एतयो विवाहस्यासीत् । अधुना देव, एतौ मम जीवनस्य त्वम्भी भवता दयया मृत्यौ नियोजिती। एतयोः कवे कन्ये मयावलोकिते, मुद्राश्च सचिवाः, शीतकाले एतयोविवाह विधाय आनुष्यमापादयिष्यामि देवस्य कृपया। यद्यपि नेती विवाहयोग्यौ, परमह वृद्धा न जाने कदा वदेहं सजेसम्, अतो विवाह विधाय निश्चिन्ता वुभूपामि ।" "वृद्ध नितरा प्रसीदामि"-दवाभ्यामुत्थाप्य सिंहाधनमारोहपता राक्षोचे "समय- प्रमृति आजीरन हर्म्य एव स्थास्यसि राजमातेव सम्मानवती, एती च तव पुनी धस्य राज्यस्य राजानी" इति । हर्पवारिजातुरनयनयोग्यावास्ताम् । सलने सम्पन्नः संस्कारः। भविपद्धापी ज्योतिपिदपि प्रामसत प्रापन् । प्रत्ययसामग्रा स्नपिती भावदाससौ वर्णकोशासि- धेनु विलसन्मपी मुरभिशरीरी विविधशिक्षक शिक्ष्यमाणो मनोयोगेनाध्येतु प्रवृत्ती यौ। * * 1 मासोऽयमाषाढः । दिनकरसरतरकरनिकरभज्यमानतनुतनाः प्रक्षीपाः पक्षियोऽनहताभि- नबदलेषु मेषु सपरिवार स्थिताः प्रचलताबमानपर्गमर्मरप्पनिगदिता ईशणमुन्मीलयन्तः तान्यवहारा मालस्यमभ्यस्यन्ति । पदिशा न तश पधि पाय पाथः पथ्य क्या मन्नते। मासेऽस्मिन्नाति पाधापूरपूरिताम्बरधरच्छटाश्यामल वियन्, न च तौभसहनधानपरिभावको बालीविनारको विस्फूर्तपु, न च स्वचाउचम्चमतिवन लोचननियमनकरिमो पीताम्बरस्य भगवतो नीलवपुरोऽनुकती, महान्धसरेऽपि सनरालाकत्र प्रपद प्रदर्शवित्री, पलपराइगिनी सवयरटा रटा। कवियामिनीव सा सनम होना दोना विभाभयावहे जगत स्वमुत्र मुरा दायितुं न उस्नोतं च । वगोन्नुस मलयरदर्शनोन्नतननमा मनादानुला सना नीरदपटलम्यामलगलनालसतिशत वाशितनपि शांतने। प्रकुलरमलममरोजरोहीतमानसाना पुस्खोलिना श्रापरमन चन्द्रमहीपती स्तमपि विरतम् । दृष्टिजलभरिप्यमाणालबालानां बालाना शासितां मनोहारको नूतन- स्छदनविकाशोऽपि निराश । सिकतिले, तिलोपममुखे से प्रोडीयमानरजसि प्रदेशेऽन्तराऽप रूपान् विरूपयन, पल्बलान् किमु हदानपि विशोप्योत्पाटयन, शासिशाखा नाशयन्, स्वभावनील नभो धूल्यामारेण पोतयन्, अनभिभवनीयाभाभिभूतसकलानिधि, सत्येन निजितहिमालय- मालयमिव गिरीशस्य, हास्यमिव प्रकृते, यश इव क्वीना, प्रभवस्थानमिव मुक्ताना, मुधालिप्तसति भवनमपि मलिनयन् प्रचलत्युत्पातवात । मनुतनूजाना नास्येषु हास्य नच प्रभया विजितबिम्बफलचरेष्वधरेषु राग 1 तेष्वद्याभ्रक वेता पर्पटी प्रसूता। परश्चन्द्रस्तु चित्रपुराधीश पुनपनीसमेतो नितरां सुखी मचे शयानोऽस्ति । विलक्षण चर्योऽय भगवान् काल । एकस्मिन् काल एव विविधभावना विभावयति । एक समय आसीत्, च द्रस्य कमलाया हर्पस्य वारिजस्य च का दशाऽऽसीत्, स्वायपरायण जगत् काणेनाणाऽपि तान्नेक्षते स्म । जगत् ससुखे व्यासकमासात्, कस्यापेक्षा क कीदशोऽस्ति, जगद्गते निपततु पात ल वा प्रयातु, किमितरेण प्रयोजनम् । परमद्य न गतदिवससाधारण साद्य पतिपुत्रसमेता स्फीता, महिषी देवी पट्टराज्ञीपदैर्भूप्यते। एकाढ़ाने शतशो दास्य सकरमन्ध पुर सम वतिष्ठन्ते। विलासेनापि भ्र कुटिविलाससकोचे सर्वमन्त पुर परमेजते। अहेतुकेऽपि तिर्यनेन विन्यासे सन्यास'इव समागच्छति । अद्य तु रूक्षैरलकैरलष्कृतचर शिर प्रयत्नसिद्धेन पुष्पमुगन्धिना तैलेन स्नेह्यते । यस्याधो भ्रूमध्यलग्न ललाटविभासि काश्मीरतिलकमनन्वयालकारस्योदाहरणम् । यस्या नासिकोदरौष्ठजवादन्तकर्णलाच सौन्दर्य प्रच्यवत इव । ग्रीवायां वेयकस्तस्मिन्नेव वक्षोजविषमे, उर क्षेत्र यस्मिन्नासीत्सतताश्रुपातदुर्दिन सविभ्रम भ्रमत् । नवा मृदुल- कौशेयनिर्मिता रक्तवर्णा, स्वर्णसूत्राङ्कितपुष्पा कव्यां शाटी, शिरसि रसिकास्त्र शिरोरत्न सीमन्ते पारितथ्या, ललाटे पत्रपाश्या, गले ललन्तिका, करमे पारिहार्य , सौवर्ण केयूरद्वय मुक्ताजटिता षट् मणिबन्धे वलय'बन्या, वैदूर्यखचितोमिका, पद्मरागव द्रकान्तमणि १ सन्यासो नाम रोग। २ का वर्णशिखर यत्र स्त्रिय स्वर्णवलयका दधति । ३ भापाया-"बन्द वगड़ी। कमलाया काल ।

अष्टमो निश्वासः १५६ चटिता सप्तको, नसेपु मुखरमओर, स्वर्गकिङ्किणीशतालस्कृत गुल्फालङ्करणम् , घश्चालिटजधनदण्डं चण्डात' करे वासिंतपटदतऽधिक छविमेधयन्तेऽस्याः । परमप्रेमपरा, सतीशारभूता कमला वीजयति। प्रचुरानुकम्पा चम्पा च पादौ सवाहयति । एकस्यां शुभासन्धामुपविथ्या व्यजने व्याप्रियमाणया कमलया भवत्यालापश्चन्द्रस्य च । कमला-देव, तदपि कथनीयम् । चन्द्र-अये, किमिव कथयामि, महानसौयत्तान्त', शोकाकरश्च । कमला--आश्वेव जिज्ञासे श्रीमन् , यावन श्रोष्यामि तच्छान्ति नेप्यामि । चम्पापि नमुत्का- चन्द०-श्रूयता यदि कुतूहलम् , प्रवालपर्वतहान भवत्या विद्युत्कोऽद्ध... कमसा-(मध्य एव ) नाय! को नामाय प्रवालपर्वत-1 चन्द्र-मुग्धे! जलजन्तव. प्रवालकीटा. स्वावासाय जालमय गृह विरचन्ति, तदेव वर्द्धमान कालान्तरेण पर्वतरूपतामुपैति, तव हयं निर्मितमासीत्। प्रमाल- पर्वतान्त पातित्वेनैव तनत्य जल मधुर निर्मल वत्सानिध्यादेव तरकाणां मित्यदासीत् , परन्तु प्रशसकेन प्रभावो धोतित आसीत् । अस्तु, भवत्या दत्तज्ञ. शीघ्र निकटवतिनो नगरायमूलीयौपधीः बलातेल गव्यमाज्य यवानोमोदकान् पूगपाम्यानेनुसामः प्राचलम् , परन्तु मम नर्भिमा। विभिनफ्लकेषु जीवनरक्षाव्यापतानां तत्प्रयोजको हेनुश्च विपिरेवासीत् । पयोधिपय शैत्यशीतले रमलामलरणाचितनभस्वत्म्यिमानव्यजने कोमलसीदळे सिकतिले व्यपगतमूछोऽपि नितान्त शिथिल. शोतवातवी जितनन्द्रा- पत्रिका निद्रामलमे। पर तोपालम्भप्रचुरै खप्नरपेतनिद्रस्त्वां हपंचाधिहत्य दलाम् । हन्त, प्रचण्डवाडकरकरनिरैमरी मालती पादमार मामिप्यते। हो, वेध! एतदेव विपटयिनु वयवदाचरितम् । विवासिन्यामशातायां प्रेम मृत्युमुरोपात्मानं निपात्य यामानीतवान् हन्त, स्य पानामचिन असहाया मफस्यो। ममपेक्षमापा तन्या इस वहन्ती टसन च वारिज बहिनतान्त मुर्वती माननागरटन्त वीस रियोगरा नून पाधी पतिता करपापि तिनेः करलोभूना । भन्मस्वात! प्रपातव । समुदबन्यो। बारनपाकर मराः कराया गीत। १ "लहंगा, भापारम्।

१६० नस। वदा चन्द्रमहीपती मिन! प्रवात ! श्रूयते त्वं प्रामानपि प्रचलन् मुरावहसि, बनायपि समूलान्येव 'प्रवात । अहमेव बहुभार ?-( हसित्वा) पश्यत कोशी निष्ठुरा अस्या करुणापि नादेति कमला-आम् आम् करुणाभार ! भवतामिव करुणा जनेषु कस्यापि मा नाम भूत् । धन्या! नियमपि न सस्मरु । हन्त! कारभ्यम् । चद्र०-अस्तु पुनरहमेव व्यलापिपम् । सुसिनोर्वत । केलिकामयो परतन्योरपि साम्यमीयुपो । हरता महमावयोविधे । निहता हन्त । वय नु दु खिन ||१|| हे विधे। केलिकामयो क्रीडाभिलाषयोरत एव मुसिनो तन्वोभेदेऽपि अभिन्न जीवयोरावयोमहम् - उत्सव हरता नाशयता दुखिनो वयं निहता ॥१॥ रतिहास्यपदानि चिन्तयन् गमने विभ्रमचेष्टितानि च । विजितेन्दुमुखे कथ प्रिये ? कमले । कम्धन हा । निजीविपेत् ।।२।। विजित इदु येन तादृश मुख यस्या सा-तत्सम्बुद्धौ प्रिये कमले रतौ ते हास्य पदानि, गमने विभ्रमेण चेष्टितानि च चिन्तयन् कश्चन् कथ जिजीविषेत् ॥२॥ जघनेऽयि । निधाय मच्छिरो रचयन्त्या रचना कचे कचित् मुखवासन एति शस्त्रता कुसुमेपोरधुना स्म किं । प्रिये ॥३॥ अयि प्रिये! मरिछर स्वजपने निधाय बचित्-स्थाने समये को उपवने वा क व रचना रचय या भवत्या मुखवासन कुसुमेपो शत्रतागेति स्म । अधुना किम् , त्वयि मृताया वाता एवावशिष्टा इति भाव ॥३॥ तपनीयललाटपट्टके ललित वर्तुलविन्दु ते सखि । स्मरतोऽपि कुजीवन प्रिये। ब्रजति स्मृत्यवशेषता नहि ॥४॥ प्रिये ! ते तप तपनीय-स्वर्ण तद्वद्भास्वरे ललाटपट्टके ललित वर्तुलबिन्दु हिटगुलस्य योगेन रचित वनलबिदु स्त्रियो दधति । तत्स्मरतोऽपि ममैतत्वुज्जीवन स्मृत्यवशषता-मृतिं न व्रजति ॥४॥ १ प्रवात-सामुद्रिक बबण्डर ( साईक्लोन ) अष्टमो निःश्वासः प्रथिताभकपोलतहलात् ललितात् पकरसालवट् वरात् । व्यथते हृदयं ममाधुना हसितात् कन्दुकवत्समुज्ज्वलात् ।।६।। प्रथिता - जगत्यसिद्धा आमा यस्य तस्मात् कपोलतल्लजात्याद् गण्डयुगलात् , पकरमाटेन - रसालफालेन तुल्यात् वरान, इसिवे दासावसरे कन्दुकवत् समुज्ज्वलात्= समुन्नतान् कन्दुम्वद्भासमानात् कपोलादना मम हृदय व्ययते ॥५॥ कुमुमाचितहेमपट्टिकाललिस्तिन्धि ! विचुम्ब्य तेऽलकान् । त्ववातसुगन्धसक्रियः सदयं शाययतीव मारुतः all कुसुमैः-पुप्पत्वेन न्यतः, होक्शकले. आचिता = खचिता हेमपट्टिका-शिरो- भूषणभेदः, वेन ललितानलकान् विनुम्ब्य, लत्तोऽवाता मुगन्धसमिया येन लत्केश- परिमल्याप्ला प्रसन इति भावः ।। मास्तः - वायु, सम्प्रति मां-सत्कारकारिया- स्खव पति सदय - तव ऋणित्वेन शाययतीव ॥६॥ यिफचानन आकुलाङ्गनी रजनीनाथ उदेप्यति प्रिये.! तितुल्यगुणो महात्मना मुखदो हन्त ! हता महात्मता 111 प्रिये । भय रजनीनायचन्द, विकचं प्रफुल्लमाननं यस्य अत एव माकुला अाना येन कामोद्दीपकत्वात् तथाभूत उदेप्यति । यतो हवस्तुल्यगुणः समानगुणो पनवम्भूतः। महात्मना-महाशयानां गुखदः हर्षप्रदः अद्यदना महाशयाः ससमाने नटे प्रसीदन्ति। हन्त ! खेदे, महात्मता पुरातनी महात्मपद्धतिदता "सर्वे भद्राणि पश्यन्नु' इति तेषां विचारोऽपि विदलितः। तब टोचनमित्रमन्युज समदुःसप्रमदं विकल्पये। प.निमन्तमुदीक्ष्य यद् विघु समकोचीत् तब मृत्युशया l नई अम्यु, दर लोचनमित्र मताव तव दुखेन अनदेन च समो-तुल्यौ दुःस प्रमदी - दर्षश्च यस तयाभूत विकल्पये - विचारयामि। यतमलं विधु' युतिमन्त वीक्ष्य तुमननाय, कमलायां सत्यान्नु कदाप्येव प्रगलाननो नौदगाव, यदयोदेति, उन्मन्ये - मता कमति विचार्य, सनसोची-सष्टयम्यान ॥८॥ -ना। ११ पित्राभिर्गाम्भीयपूर्णाभि कव्युक्तिभिरिव वितवाभिर्मण्डलाकाररचनाभिर्जटाभिर्भाभियो १६२ चन्द्रमहीपती अधरे मधुरानने । प्रिये सुरतामोदनवेऽधुना स्मृतम् । न्यसन तव कोमलाङ्गुलेविरत मा विदधाति जीवनात् ।।६।। अयि मधुरानने । मुरतस्य य आमोद मनोहारी परिमलस्तेन नवे ! मुरतोत्सव अधरे कोमलाङ्गुलेयसन = स्थापन मां जीवनाद्विरत विदधाति ॥९॥ समितो नहि विस्मृते सृति सुभगो विल्वसमौ कुचौ तव । अयि मन्जुलदेहवल्लरीसुषमान्यक्कृतकामकामिनि । ॥१०॥ अयि! मञ्जुलदेहवल्ला सुपमया = परमया शोभया न्यक्कृता- दूरीकृता कामकामिनी-रतियया तथाभूते ! ते सुभगौ बिवसमी, कठिनी वर्तुलत्वेन शालिनौ च कुचौ विस्मृते सृति - विस्मृतिमाग न समित' न गच्छत । कमला-(मद हसन्ती, अपाङ्गेन च पश्यन्ती निश्वसिति ।) चन्द्र - हसन् ) किमर्थ मुधैव कृत्रिमनि श्वासविधौ व्याप्रियसे। कमला-नहि देव ! अह भवतो जीवन एव नौकाधट्टनात् शहिताऽऽसम् । परतु भान्तो घृत्तास्वादमनाशयन्तोऽविच्छेदेन प्रकृतमनुसरतु। आ तता ? चन्द्र-ततोऽह पुनरपि देव ! विमनाय कृतवानसि, असिताक्ष ! विपना मातर दृष्टाऽपेतहों हपोऽपि नून कथावशेषता यास्यति । हा! नवजात शिशु मे विदलिते लवेव पृथिवीतले प्रसरिष्यति। मामदृष्ट्रा रुद त बाल हर्प कमला सान्त यिष्यति 'पुन! हर्ष! नवीननवीनानि वासास, स्वर्णसूत्रस्यूत छत्रम् , थासक्त मुक्कामुष्णीषिका पटत्कारान्, फुल्लनरी ज्योतिशलाका आनेष्यति मा दिदि रे इप! मा रुदिहि" परतु इन्त ! कियत्काल सान्त्वयिष्यति, अन्तत हन्त 1 प्रिये| भग्नास्ते मनोरथा' इति विपुल विलप्य चेतनामजहाम्। सवा विभावरीश्च प्रकृष्टालिटमू य एवं व्यत्याययम्। जिहासुरात्मानमुपजिहीपुत्रंहपुत्र गत्वाऽऽत्मान जलसाकर्तुं सज आसम् पात प्रात प्रयुद्धो क्लिपन् जीवन भव्यभावनो भगवान् यदिच्छति तदेव भवति, यतस्तस्मिनेव समये एयाय - 7 - अटमो नि.श्वासः मासिवनुतनग्लः प्रोन्न्तायतलटाटो मातरोन्नतयोगो भस्मनिपुरद्रायिवारिगाहिल्लाट- मासलवन्यटः, सव्येन दग्डमिवरेण कमन्दलु करेण कल्यन, लम्बमानस्वासमाटः, कदलीदलकौपीना, पानश्चनुरगम्भीरातः तृती, तेजसा शान्तेन पाप्पुतानपि वपन् " पारिवानस्य दलना, प्रभवो धर्नस्य, विद्दतपापपुद्धोऽतमा, शमदमनिर्मलमना, अस्टहयामुर्दपर्नुनिः। स च गभीरया वाचा ग्रन्दयन् शन्दगुणमुवाच- पुष्करा३ नाति पापनात्महनननुल्यम्, यस्ने दुन्बय त्रिसे तत्तेऽचिरादेव सम्पत्स्या मुखन् । नाम पातक पीः। बावाहि तपोवनं प्रविद्यापोऽतियत्वेऽनकला, इति । वनभूनि विधूय पिशिशुभमेण निर्मित आश्रमो लपीयानेवाची, पर पन्द्रपोज पुष्पपरिमन धुपगन्धेन च मुखरित आसीत् । कचन निदशहा हरिणा रोमन्य वर्तवन्ति स्म। कचन धेनवो नीपस्पेन स्नस्तिषः बनन्यवान् स्तन्य पायन्ति स्म । चन पनपानाइटावाः पुष्पाभ्यवचिन्वन्ति स्म। भसर्वभक्षिणोऽमपा. पशिमोऽन्यास- प्रात्रुयांच्यानाम्यन्यस्यन्ति स्न। तृतरक्षा शव दिपुलरपरिटोपिउनुनयो नवोपादिताः प्रजा इव पल ददति स्न पापिनामपि मनसि तरथमात्र जनयन्तो वनावनीय विलक्षमा नव्याननीयाणीयमाप्यनसा रहिता हितानोत् । वनाह चित्लालमध्युम्यान सत्रनोऽरण्या- नावसकताः। परिपत्सनानवरवारपदकुम्भात्पाटननिस्तमुक्कामाखरनखमयूखाः देवा इव ज्योतिषा भास्वन्तः, सम्प्रभावप्रष्टकात्यायनीप्रदत्तधन्यवादरता व हर्ष- वप हरियानान् हान्दो वारणमारगोपारदम्वा अनिवार्षवितादननदभरमन्धराः, जुम्भनदरोदृश्यमानयोवियोपरदवसदनाः, पलनास्वपन्न, नगराउवल्यापक- घजेनेर, मृदुललोननिचितापुच्छपदेशेन शोभिवष्टप्रदेशाः पनक्सवय , केशरिपो वचन केशस्चिारकाः मीनियहर केशोरसौर्य चन्ति स्म। स्चन करिपोलमभूषितासितपास, अल्पज्जगदागदपत् , सायेहः सानु सरो गच्न, गुम्हेपु नीरमापूर्य प्रतालबाउं, नयनान, सबन्नदं चटकवरी कवलपर्यवमिवाउना धुपित, युभुक्षित, प्रवरकरटं करटिशन कुल्या भाकुयात रन । विहित हिताः द्विसोवाय राहिवं हिसन्ति स्न। कचन' मुकमन्टुक वान्त- निशान्तायां निप्नुरक्षगानगरपूरप्रिवर्ष कान्नमुवि, नुर्व विदा मालासमारतक, मृम। २ पड़ी। - रसायन्ते स्न।

. सप्रम वचन वचन वचन प्रकाण्ड . चन्द्रमहीपतो शाणोत्लोढोप्रविषाणा घोरशोणधोपा, घोपिनो दुमान् पर्पयन्ति स्म । वचन व्याधमुत्सर-कोटेयकवास, त्यकाधववितरोमन्यै, फेनिरल्पनै , जडजानुभि, जीवने हतारीरितरस्मिसनुपि मेरिप्याम इत्यादिलष्टमृगी, मृगीभि कण्डूयमाने , मृगेविस्फार्यमाणनना सनातनवा इव, नरीनृत्यमानमयूरा मन भगालीलीलाललिता, विशालविदारलाळिता, वन्यरामभाव राभस्यनीरसा, सततभक्तभकशब्दितपस्वला, शुक्रपिसक्रियमाण जयघोपा, तरलभृग नेगीयमानगुरोरभिनवा कुरितपनपूरपूरितदुर्जटवटे सरण्डमण्डितकाण्डैस्तालतमालरसालकालावत्यनिम्बे विहितपिधाना, भनी यमाता, वचित्करिरदनलोलुपबुणिन्दफुलाऽऽहिण्ज्यमाना, भयङ्करदशना, शु-न्युनध्भागा, अविदिततत्त्वा , वनभूमाधमन, वचन पर्वत, बचन वृक्षमा हन् , सिद्धगजजन्यमवलोकयन, रुदन, हसन, विलपन, पतन्मुत्तिष्टन् जीवन्दमनेक्मयपदार्थे वत्तमान सतर्कमीक्षमायो वञ्चितदृष्टि, अपेतापोटमुक्तपतितापनस्तैरत्यशो दुखितो, दर्श दर्श जीवानामात्मनो वनस्य च दशा भ्रमन्नवत्तिपि। लेखकललनेव विचारमलिना सध्या शय्या भेजे। केशा इव तमोरदमयस्तया प्रादुर्बभूव च कलाम्बरधारिणी विधवव विभावरी । दीपिकाया राजहसैई सीभि ह्यमाणमृगारावास्तटभवने वनेऽपि निदशकोऽशयिपि । प्रत्यूपम्। अरुणित वियत् पत्रस्थसमुदयवातवीजितम् । परामु उदम्भासि कमलवनानि पुस्फुटु । कौमुदी त्यक्ताभ्यासस्य विपश्चित इव तनिमानमधृत । पेचका शोक, कोकाश्च शोकविमोकमापु । प्राभातिको राग इव मनोहरन् बभौ पाल्सगमन प्रभवन । तपोवनवासिना श्रोनियाणा वेदध्वनिः सर्वतो व्याप । अथाह विचारवैपुल्यविनष्टवित्रक प्रात'कृत्य विधाय. व यफ्लानि प्राय पावञ्च पोट्टलिकायामावध्य जनपदगामिन पन्थानमाधितो यथाकश्चिद् राजदुग नाम विद्वत्पुरुषक श्रीमन्नरथ नगर पापम् । विशालविपणौ वाटकललाटे ऊर्ध्वपुण्ड्रायम ण नादयोतितसमय घण्टागृह जनान् बोधयति स्म । मम दशा विशवला, वस्त्राणि नितरा• मलिनानि अव्यवस्थितानि चासन् । १ वीनां पक्षिणा चारेण गमनेन । विक्षेपिता । अहमकस्था चन्द्रमहीपतो इशानकोणस्थानद्वारे आलपता महर्षिबालकस्यानां बदनभाग्भालानां छात्राणां परमात्मस्तवान् शुश्रूपुस्तनागमम् । प्रैक्षिपि च छाना भगवन्तमुपश्लोकयन्ति । केचनोपलचयरचितकण्डिकाप्रतिष्ठापितस्य महामहिम्न शिवस्य समरे विदधति । वचन ऋद्धिसिद्धियुतस्य भगवत करिधोत्रस्यान्तरायनाशका सवा पठ्यते। इतरत्र काष्ठपीठ विराजितपित्तलगुभासनस्य श्रीललनस्य पादोदक जरीगृह्यते। अन्यत्र पार्श्व कुव्यन्त प्रविश्य सिदूराङ्कितविदूरविभासिवणमालाया, केशरिणो लावण्यधरायां कराया विराजमानाया निशूलरूपाया भगवत्या जगदम्बिकाया पादयोनिपत्यते। सम्मुखे चास्य भवनस्य काठपीठप्रतिष्ठितपुराण , श्मश्रुनिचितमुख प्रौढ जसराम इत्याख्य इमो भगवच्छङ्कराचार्यकृता गीति गायन्नासीत्- जय नारायण | जय पुरुषोत्तम । जय वामन । कसारे । उद्धर मामसुरेशविनाशिन् । पतितोऽह ससारे ॥१॥ दीनोद्धरण । नरकरिपो । नर । केशव | कल्मपहारिन् । मामनुकम्पय दीनमनाथ कुरु भवसागरपारम् ।।गा जय मुकुन्द । राधावर । सुन्दर । जय शिशुपालविनाशिन् । नय करुणामय । जय गरक्षक । जय वैकुण्ठनिवासिन् ।।३।। त्व जननी जनक प्रभुरच्युत। त्वञ्च सुहृत् कुलमित्रम् । त्व शरण शरणागतवत्सल । त्व भवजलधिवहिनम् ।।४।। जय जय देव । गयासुरसूदन । जय मुरमधुहन् विष्णो । जय लक्ष्मीमुखकमलमधुव्रत । जय दशकन्धरजिष्णो । ॥शा पुनरपि जनन पुनरपि मरण पुनरपि गर्भनिवासम् । सोडु नाल पुनरपि माधव । उद्धर मा निनदासम् ॥६॥ यद्यप्यह सकल कलयामि किमपि हरे न हि तत्त्वम् । तदपि न मुञ्चति मामिह माधव । पुनकलत्रममत्वम ॥७॥ ।

अष्टमो निश्वासः १६७ अपराध मे मुरहर ! परिहर कुर्वे चरणश्रयणम् । संसारार्णवतरणे करुणावरुणालय ! भव शरणम् ॥८॥ जनकसुतापतिचरणपरायणशङ्करदृढपरिगीतम् । तारय नाथ । परं पुरुपोत्तम ! मां भवजलधिनिपीतम ॥६॥ तनत्याश्छाना यदा रात्रौ पठन्ति स्म, सूर्य उदेति स्म । तेषां शारनाभ्यासः शुद्धः सुदृढ, गुरुभक्तिः स्थिरा पूर्णा, निवसन सरल विनीतम्, वचनावली मधुरा ओजखिनी, खाद्यं पानञ्च देश्यं साधारणञ्चासीत् । ईश्वरभक्तिस्तेपामीदृशो यत्ते घरैः शिवं स्नापयन्ति स्म, विविधनियमनतानि, पालयन्तिस्म । तेषा सद्व्यवहारोऽविनीतान्नमयतिस्म, पाश्चेतो वैरविरोधेन शून्यमासोत् । ते परस्परं मात्सर्य न कुर्वन्ति स्म । सहपाठिभिः पाठचर्या चरितु, प्रोचान् विनीतभावेन सत्कर्त', ते शिक्षितपदार्थमादातुच ते प्रवीणा आसन् । पारस्परिक प्रेम तेषां जीवनकालस्य विशिष्ट आनन्द आसीत् । मध्याह्नसमये सद्विश्छात्रैः सक्रियमाणोऽभुक्षि। पाकशाला खल्पीयसी धूमपूर्णा चासीत् । उद्धृतोदनाः स्थाल्य एकत्र निहिता आसन् । भोजनभागनेषु एकैक द्वौ द्वौ वापूपी, सूपः, स्वल्पमोदनय परिवेषितमासीत् । मह्यमप्येक भोजनभाजन दत्तम् । सत्ये वच्मि, यथा स्वादुत्व तस्मिन् भोज्ये आसीत्तया नाद्यावधि मयाखादितम् । यतो भोज गोज भोज्य पृतगन्धि, पाय पायं कौण्ड पयस्तृप्ति नाध्यगमम् । तमोजनसम्पदि तव सर्वा भोजनरचना व्यर्थतामुपयन्ति । सायमभूत्। अहमुत्थाय दक्षिणदिशि अध्यापनभवने तूलिकोपरिधान, महोपयोंप. नृ हितपृष्ठदेशान, मुखरमुसान्, पवित्रधर्मकायान्, परिहतलौकिकमायान्, अधर्मसायान, खरूरक्षरसन्तुष्टोन् मलयजचचितप्रलम्वभावरमस्तकान् , विमलबसनविभूषितवपुषः, पुषः समस्तशास्त्रयाथातथ्यस्य, सर्वतन्त्रधीरधिषणान्, प्रसारितैफचरणान्, शान्तान् , दान्तान, व्याकरण-सहकारपक्किकामनरीमधुलिहः प्रकाण्डकर्मकाण्डसरोराजिराजहसावतंसान, अनाचारप्रचारधुरीगतृणधनजयान, धर्मवसकरीपाशुशुक्षणीन, जनातिरविपज्जलद- घटापहरणमातरिक्षन', सेवकजनवैभातिकवायन, कासयश कुमुदवान्धवान् , सहृदयश्रवण पुटकपेपीयमानजेगीयमानानवयगुणाणान, इन्द्रानिव युधवरपूज्यमानपादपमान, परमेष्टिन अप्रमो निःश्वासः १६६ पण्डिताः-भवद्धस्तरेखामु मिलोकीराम्ममुनु पश्यामः। (क्षगं रिम्ब) परनन्यीयसी वाधा, अर्द्धस्य सत्तां नु न निवारयति शेऽपि। तव्यं वा कपा व्याहृतिः। अहम् -टदरपूत्यं अलब्यान्नानां नः धरपीरमात्र भाभूपि शरीरम् । पण्डिताः-क्रिमिव च्ययानः। अइम्-देव! बहनपि अस्माद दिनार्णवानि सरिप्यानि, ममाप्युद्धारों भविष्यति कदापि पडिताः-टदारः, (घटीवन्यं पुत्तभावलोक्य गयित्वा )आमुद्धतिस्तु भगवती- प्रसादान् भोप्रमेव, परमप्वव दिनेषु दुःखमपि लप्स्यते । अह-देव! देवेन दायनानं सर्व सहिये । साय सन एव आना प्रचुरश्रमपर्वध्ययनाः अननपनेतुं शौच नितिनिनुन पनि स्म। अहमति पग्टितवरान् शिरसा सादर प्रणम्य सतीय सहागनम् । घाने बहुवपि त एव नुल्या आसन् , ये पण्डितानामन्तिके दृष्टाः। एते मुथामा- धीरयन्ला पृन्दारकगिरा वनमपि नगरयन्तः, हास्येन, क्रीडया दिनभनमपनयन्तो विचः। व्यचारव विलक्षणयुद्धयो विद्यार्थिनः । सोचं निर्वत परात्तास्तेऽहमपि । विद्यालये उत्तता, उपभित्ति खपबला अमृतमधुरजलब पल्वलम्-कुण्डम्। उपपि पुष्पविटपाः सुगन्ध विकिरन्ति स्म। चान्ये विधी वाटना अन्दवासिनः। विद्यालयपूर्वदिशि मलय मासोन्। वैद्यानरे पयःपूणां नि पात्राणि सन्तानिच्या राजन्ते स्न। तैलन्निधान्यानाः दण्डे पटियात समाः। व्यायामो जीवन प्राणिमानस्येति साना व्यायच्छन्ते स्म । पूर्वगनः। प्रथमतस्तु अमावस्यानिशा, द्वितीयतश्च नपाना महासम्मेलनम्। प्रतनन्। यथा विदरयात्रिका नेघाः सीप कजलायन्ते। अह धुमशटीपविकावाडे' मनायम् । स्थान रमनीयं विरलजनमेवामीत् । सनसन्यावार आगच्छन्ति रन। प्रकाशम्भेषु लग्नाः प्रदीपा इटुभिः सहव में विधाय तनमा युपन्त रम। पदापोपोऽनन् । तो उनमः प्रारितः। एका १ मुसाधिताना। कृपामीत्।

सतत १६८ चन्द्रमहीपतो झ हमध्यसापिनीकान् , विष्णूनिव द्विजेन्द्राधयान, शिवानिव लग्मविभूतीन, भवभूतीन, कालिदासान्, निविक्रमान, रामानिव शास्त्रार्थमवनिमुपागतान, कृष्णानिवार्जुनसम्पृकान, नारदान्, श्रीमन्नृपतिमुक्टायितवीरबलविपुलोरस्कासलातदलोमश्रीगगासिंहशासित बीकानेरराज्यान्तर्गतदृढप्राकारवेष्टितभास्वदाजदुर्गराजदुर्गस्य, शिवाधिष्ठितेशानकोणविराज मानच्यानपुरपुरितान्त करणसद्धर्मनिधानधरणदध्वस्यमानधर्मशरणप्रतिष्टितवरणाधार्मिरमाण शास्त्रर्मच्छानवारणसन्निलयटीकमानीवेदवेदाविद्यालयप्रधानाध्यापकानपश्यम् । नय पारायणिका पुस्तिका उद्धाट्य स्थिता आसन् । म तथा स्थित वीय तेषा मेकतममाहाचार्य --'ननु रामचन्द्र। पृच्छ, कोऽयम् , कुत समायात, विमिच्छति । आकृत्योचजातिरिव प्रतीयते। दृढोरुवक्षा , प्रभाविललाटचन्दनो, व्यायततनु श्वेतवासा , नि सरच्छमश्रा शास्नाध्ययनाविलया वाण्या सप्रश्रयमाह स-पान्य'! कुत समागमन, का च जाति 'अहश्च विदूरादागमन क्षत्रियोऽस्मि" इत्युदतरम् । स च तदेव वाक्य विपश्चितामपश्चिमाना पुर प्रापयत् । अहमपि विमूढ इवत स्तत पादो विक्षिपन् तेषामन्तिमुपगम्य प्रणम्योपविश्यागादिषम् , 'भगवन् ! कामपि हृदयान्तवत्तिनी वार्ता चिकीर्षामि, यदि अथ ते मामजानन्तोऽपि खसौजन्य प्रकटयन्त आवश्यक कार्य विहाय अन्धपरिश्रमश्रान्तमपि ससत्त्व गौर तेपामेकतम कथयामासु- “सोहलाल ! अजत यूय श्व प्रातरेवागन्तास्थ" अथ उन्मनस्के तस्मिन् रामचद्रेण, अपरेण चाज्ञाताभिख्येन सहपाठिना, पाठन भवनानिसते स्निग्धया वाचा पीयूषमिव वर्षन्त शुप्यन्तो मद्ध दयहृदभूमि वचनमेघ जलैरापूरयन्तो मा जगदु 'किम्भवानाह' "भगवन् । दु खस्य परा काठामनुभवामि"। 'एवम् ? हस्त दर्शय" अह तेपा पुरतो हस्त प्रसार्य सूक्ष्मेक्षिकयाऽवालुलोक यत्ते क्षण विचार्य हृष्टा इव । पण्डिता -क्षत्रियोत्तम ! इमां का दशामनुभवसि । शास्त्राण्यधवाऽमधाधानि ! अहम्-कथ देव। ' अश्नो निःश्वासः १४ पहता.-मवद्धतरेखामु निलोतीरामल पम्यामः । (क्षण निरन्य) परनमीती याना, अर्द्धव सत्ता नु न निवसति कोऽपि। तथ्य वाच्च या चाहतिः। महन्-उदरपूवं अलब्यानना न. ३ धरनारमात्र माननि शरीरम् । पटिदा.-किमिव क्यामः। बान्-देव ! अहमपि मरनाद दिनाबानिवरिप्पन, ननाप्युद्धारो भविष्पति कपि पहिवा.-उदारः, (घटीयन्वं पुखचालोक्य म यत्वा अनुनिस्नु भगाती- प्रमागत् चोरनेव, परमदेव दिने दुःखमति तस्यते । व्हाव! देवेन दीरमान सर्व सहिये । सार सन ( नाना प्रचुरश्रमपर्वध्ययनाः अमनपनेनु, चीन नियनच गन्न रन। अहमति पन्डितवान् शिरमा सदर प्रणय सतीप्यः सहागनम् । नेय वटुपपि त एल मुद्धा वसन्, ये पण्डितानामन्तिकं टष्टाः। एते नुवानव- चौरमन्ता वृन्दारनिरा यनति नगरसन्त, हास्येन, दया दिनभनमानान्तो विचर । चरख विलकपबुदयो विद्यार्थिनः । छौच निवर्स पत्तास्तेऽहनपि । विद्यालये उत्तरत, उपभित्ति खपला प्यासीत् । अमृतनजुरमलच पयलम्युहम्। टपी पुष्पवटपाः गुगन्ध रिन्ति स्म। सान्ये विधौ व्याहता अन्दवासिनः। विद्यालयपूर्वदिशि महव्य बन्। वैवानरे पापूणानि पातापि अन्तानिया रायन्ते स्म। तेन्निधान्यानाः दडे वाम ताः। व्यापामो गोवन प्राजिमानस्येति छाना व्यायच्छन्ने स्न। "रानः। प्रथमदस्तु अमावस्यानिशा, द्वितीपदश्च मेघाना महासम्मेलनम्। अवनमन्। यथा निदरमानिका पा समूर कवलापन्ते। अह युनयटीपथिकावाने' बनवान् । म्यान रमणीय विरलहननेवासीत् । अनशन्यातार बागद्धन्ति स्म। प्रकारस्तम्भेषु सताः प्रदीपा रटुभिः सहग विधाय तमसा युक्त रन । पटापोऽन्त्। इतो उन्समुद्रः प्रदितः। एका १ मुमारिखना। -- चन्द्रमहीपती उद्धमविधमा प्रापरत् । क्षणेन धक-धकायितधरणी, पधिकचोकहरणी, दिकरिणीव अभीष्टदेशप्रापणतटी शम्टो समेता। अहं प्रथमश्रेण्या आवासेऽविशम् । शतश उपनेप्रधारिण्यो रमन्यो वातायनेभ्यः प्रेवन्ते स्म । देवाद्विद्यालये मया वत्राणि प्रक्षालितान्यासन् यतः कोऽपि पृच्छको मां चिटिकायै नाखेदयत् । * * कान्तारम् । बहुशोऽवलोकिता सान्दा द्वमावली। दूरत एव द्वमदलमयतो दृश्यमाने रकबज रस्य कृत्वाहमचलम् । गव्यत्यन्तरे परमरमणीय मन्दिर प्रोचभूमौ शिलाशकलानि सौन्दयण न्यस्य विरचितमासीत् । अग्रे च प्रस्तरमयं कुटिमं यत्र सहस्रशो मनुष्याः स्थातुं शक्नुवन्ति, नवीननिव प्रतीयते न। तमसूणपापागसम्पादिता द्वारशासा, शिल्पिसम्पादित कपाटयुगल- मासीत्। मन्दिरमनादृतमेवासीत्, अहमन्तरविशम्। सुन्दर विशालमजिरम्, भव्यानि भवनानि, चेतोविकपि च सभाभवनमासीत् । मन्दिर भगवत्याः शाकम्भर्या भासीत्। पवित्रमूर्ति पूजकश्च स्वकीयमनुष्ठेय निर्वोपविष्ट आसीत् । परमातिधेय स मदीय वनौचित सत्कार विधाय मद्त्तमपृच्छत् । अहमपि सर्व विशुद्धभावेन न्यवेदयम्। जगदम्बिकाचरणशरणो मदुःखहरणे सकरुणः स मा मन्त्रमेकमुपादिशत् । सप्ताह यावत्पूजकाज्ञया कृतार्चनजपच्यानोऽस्वार्थवन्धु पूजक प्रणम्य, लब्धाशी, मात्माल्यविभूषितकण्ठः प्रसन्नमनाः प्रातरेवैकं पन्थानमाधितोऽचळम् । सायद्याला प्रभाविभासी भास्करो विरहितां पश्चिमाशामालिङ्गयारुणिम्नाऽऽवक्रमे । विदूरतः सपरणसम्मुखमेव करिकुम्भाघातसहाभ्यां जटिततीक्ष्णायसशूलाम्यामाय- साम्बामाताभ्या कपाटाभ्यामुत्पाटितम्पुिसाहस, हसन्तमिव वीरगणं वीर्यग, प्राणापहारक, नीलशिल तोपकोपसङ्कोचकं गोपुरमपश्यम् । वहिविस्तृते चतुष्कोणे क्षेने ननिस्त्रिंशानां रक्षकानां चन्द्रहासचमत्कार' रायसान्यप्यरराणि राजतानीव राजन्ते स्म। पन्थानमभितः शीतलच्छाया सान्दा द्रुमणिः। प्रतिद्धनं मारकतप्रभया दूर्वया लालितानीव ललितालवालानि व्यद्योतिषत । "रक्षकाः" मया पृष्टं 'कयाऽऽख्ययाला क्रियतेऽदो नगरम् । भूप! कानि चाक्षराणि यमाप्य धन्यानि भवन्ति ! कस्य चशस्था- अष्टमो निस्वासः १७१ ते मामहमहमिक्या व्याह.-"पाय! चित्रपुरनाम्नोऽमुप्य नगरस्याधिपतिः द्यमपिवश्य श्रीमान् कयापतिह, वशिष्य प्रवेशाज्ञास्यते” इति रातिर्मुख व्यादाय वियद्विपिने वेगेन धावन्ती समापतत् । अह नगरा बहिः किन्तु द्वारस्यान्तरेकस्मिन्भमभवने शयनमुपाक ययम् । अकस्मादकस्या भट्टालिकावा , गीतष्पनिमौषम् । कापि वियोगिनी विमुचवाय गापति स्म। प्रियवर। पातं नेत्रयोः मम चेतोऽतिव्यथते (स्थायी) अरे वधिक । अयि निप्प । मम वृद्धार्य किशोर। मचित्तं पलतो हरन वे उन गतोऽसि रे चौर । (२) मोहकमन्त्राशीकता प्रिय । भवदीक्षणतः विरशास्मि गतचेतना पद्धा प्रेम्णि पवित्रा (6) स्हियांमहमातुरा न प्रियमेलनमास विरहाग्निस्तुते तनु निधनं यामि निभास ! (३) विलक्षण कारम्बमासीदस्यां क्रन्दनगीतौ यदो मदीयं पापाणमय हृदय दु खाघात. सनण शतमा भवितुमचेटिट। चतुरस्रोत. सारयामास, वपुरवेपत सत्यम् । दृस्येव दुखिनो दुम्समनुमानु शस्नोति । वनिप्रासाचित्रशालामि सचिनमासाचिनपुरम्। वैयाकरणकाव्ये रसानुभूतिरिव वचन बचन प्रत्यते स्म जनावस्थिति । भोजनप्रिये विप्र मनखितेव नेयते स्माऽऽहाद। मुभिसे वणिगिव दुई यदशमासीन्नगरम् । सरस्सु न ननोमोहिनी मन्जुशोभाऽनधीयानेषु छाप्षिय। मुत्र मुपमया सह मुरपुरमिव यात प्रतीयते स्म दीव्यता चरिनमिव । रसिकाना सततावासचरा कुजा कोताना गुकृतितिा आसन् । स्रोतासि, येषु नभोविम्ब दृश्यवे स्म, मलिनान्यासन् । मधुमधुररावाणां कलहसाना वारिपु क्रीडा सत्रीडेवासीत, न चासीदाखादितमकरन्दाना पुस्कोकिल ना रसालकल, प्रायश. पन्धान. शष्पावृता क्रीडागृहाणि या पुस्या अहमहमिक्या आमोदविनोद- न सटमीक्ष्यन्ते स्म।

चन्द्रमहीपती प्रमोदिन प्रतियुवक योद्ध युध्यमानांश्च द्रष्टु समवयन्ति स्म नामपट्टिकया लय ते स्म। गोपालिकाना प्रसनहृदयोद्दाररूपा गीतयो वीता आसन् । पूर्वरानमतिवाय मध्यरात्र आयन्नासीत् । तीक्ष्णरयो वायुरशरायत । आल्टिनी शारा स मुख सुप्ता। पथिकाना किमु प्रहरिणामपि यातायातोऽवरुद्ध आसीत् । ससरणदीपा मूकमुनय इव दण्डिता नरा इव च नियला आसन् । एका खप्नभग्ननिद्रा मुग्धा विधवा विदूरे व्यलपत्, परन्तु शातनिशाया निकटमिव प्रतीयते स्म । निशे । हे आलि । नाथ कास्ते मे' सुप्तास सुसनिद्रया, निद्रा स्वप्न । जहर्थ (स्थायी) रे। स्वप्नाधम ! वञ्चक । प्राणास्ते वियुनज्मि । स्वप्नारे । दुष्टासत्य कथं दृष्ट ॥१॥ मन्दस्मितसुधया हरन् , मत्प्रासादसुधाम् . विहुतयर । नाक यातोऽसि ॥२॥ स्पर्शनाग विपुलयन् , यन्नवीरितहस । हताशा मुक्त्वा यातोऽसि ॥३।। मुकुरे वीक्ष्य मुख मयाऽभूपि शरीर हन्त । 'वदनजितनीरज 1 यातोऽसि ॥४॥ भृशदु साह चन्द्रिके। मयि दुस माऽऽधेहि हितायासनीय भगिनि । ॥१॥ नासि तमिस्रा यामिनि । रुचिरादा न श्रुतासि । दयितवरमयि । दयिते देहि ।। ।। २ १ राजस्थानी गीत 'कुजाए रानी पिया मिलादे ऐ।' २ शहीद।

अष्टमो नि.वासः जलमग्ना अभवन्मम आशा ग्राफस्फीय मृत्यो। चरणो ते शरणम् ।। एतस्या पनिवी च करुणामयी हृदयस्पशिना नासीद् यत् पर्वता द्रवन्ते स्म, सिन्धव सन्मुक्षन्ति स्म। ममापि समारोद्विग्नस्य विरचस्य हृदयचत्वरे दुखस्य दृश्य चचार। नगर कदापि ज्ञानविज्ञानन कल्या विख्यात भूत भवद्, परमद्य दुरवस्थम् । मन्दिराणि, विद्यालमा, पुस्तकालया, प्रदर्शनालया, स्मृतिभवनानि च दृष्टिपथमागत्यापि न विभाव्यन्त स्म। अलिलमनसा मनुष्यागो मुखकमले शोककालिम्न कला पलि कलयति स्म। , , सदर्शनासट्टालिकासनवारप्रवाहसिन्नथिन्लवक्षस. श्यामलवसना, मनर हरणा, बतावरणशा, दृशा दम मनसिजमपि जीवयन्त्यो विधवा विविववियोगवृत्तेन जगदेव दावान्ति स्म। ससरणेषु सङ्करसहति , शून्यगृहपिशाचोत्पातश्रुति नगरस्य स्पष्टा दशामुदघोपरन्ति स्म। पारावतपुरीपष्टीकृतप्रान्वेषु निशान्तेषु दीर्घसूतनिवानिन्यवसम्बन्ते स्म कन्टुकानि। शून्यापणेषु रासभा रास रचान्ति स्म। न्यानहारिका मक्षिकाभियुद्धान्त स्म। टस्यु गायत्सु, गुरमुरेषु रसिकेषु कपोतेषु तालनिपुणेषु, शिवा वन्य वादान, येना उपहारान् वितरन्ति स्म। महान् महाकालोत्सव, कय व्यपेत'मु व प्रतीयते पुरमिति चिन्तयति मयि समधूयत प्रबुरकरण समधिकंवदन हा! पुन! इति प्रचुरं रोदनम् । दुखी सर्व विष्टपमेव टु-खि पयति । नपुत्रकलयोऽहमपि खजीवनेन परपामा भीलमपविहीपुरभिनन्दन झटिति प्राटिपम्। परन्तु पथ्येव एकरमा पार्श्वगृहानिर्गत एष वि पवागीतध्वनिमा व्यसम्बयत् । हा । गतः कासी प्रियो मे कृष्णकेशः शोभितः (स्थायी) यं विना सततं भजन्ती दुखपूरं दु.खिता। मामनाथाहा । विहाय, सोनजद् भृशमर्थित. ॥१॥ १ एक विशालजल्यान जो १९३९-४५ युद्धमे डर गया था।

स्वच्छच्च १७४ चन्द्रमहीपतो चन्द्रभासिललाटपट्ट , शुभ्रवारिजलोचन । रम्यतैलसुगन्धिमूर्धा हन्त । दव । समापित ॥२॥ मच्छिर स्वाङ्क निधाय लालयन्त सत्पतिम् । हा। लभे काह हताशा हन्त । त । हा। हा । हत ।३।। श्वेतपरमशिरोरुहा श्वभूमदीया त्वद्गतिम् । याता भवन्त द्रष्टुकामा नाथ । नाथय वागित ॥४॥ तानि पूवदिनानि चित्ते, हा । विचार्य करोमि किम् । श्रीनिवाससुशान्तरूप, सनमामीशं सत ||५|| करुणया कण्टकितचेता अभ्याक्रन्द गच्छन्ने क भव्यभावत सजनमन इव विशाल गृहमपश्यम्। नूतना रसालपर्णस्रजोऽशुष्कानि सिन्दुरकुङ कुमस्वस्तिक चिहानि अर्द्धच्छिता कदलीस्तम्भा पूर्णा जलकुम्भास्तस्याभिनवा वास्तुप्रतिष्ठामसूचयन् । शतश क्लिनचक्षुषो धैर्यधरा नरा विनता वनिताश्च गतागतेन देहलीमघर्षयन् । अस्मिन्नेव ग्रावद्राव जना क्रन्दन्ति स्म । अथाह विपुलविचारो विप्रप्रासादानियत कस्माचिन्नुरज्ञासिष यदिद जनपदगुरो वेदविदुष कर्मशौण्डस्य विप्रस्य भवनम् । अस्य चैक एव पुनो युवा। एप एकदा लोकमचे सर्वहितैपिसभाया स्वातन्त्र्यमुपदिदेश। अतोऽय शङ्कितमनसा जनपदाध्यक्षेण निगदितुमाशतोऽवश्य मृत्युदण्डाय कल्पयिष्यते । निदोपोऽयम्। नवीन हर्म्यमनेन निरमागि। वृद्धो पलीपलितो धवलमूर्धा चञ्चलप्रोवोऽरदनवदनो यष्टिधृताशयष्टिभंग वत्सहायोऽस्य पिता। अपनेता विलुप्तश्रवणशक्तिर्जरती जननी । सम्यगजात यौवनवनविकासा हुन्त ! हताशा नबोला कुलीना सुन्दरी वास्याप्रजा धर्मपन्नी, सर्वेषा मेषामाश्रय एष वेदविद्याविचक्षणोऽद्य विपत्स्यते विप्रयुवक इति दुखितानां वाई- मात्रेण सहानुभूति प्रकटयति नागरिको जन । किं न पश्यसि । एता सर्वा विपुलभया भट्टालिका मलिनाम्वराभिविधवाभिरेवाध्यास्यन्ते । सहस्रशो युवान स्वतन्त्रतासमामे दृप्तकुनेत्रवोक्षिता पाशेन यमावास प्रेषिता इति । राजपय एव विप्रप्रासाद पाव वासीत् सर्वहितपिसभाकार्यालय । मह तन अष्टमो निश्वास प्रविश्य जवनिकारसनद्वारस्य गृहस्यान कृष्णकाष्ठप? 'प्रधानमन्त्री, इति पठित्वा "अन्त रागन्तु शनोमि महाशय" इति पृष्ट्वा तेन 'आम् स्वैरम्' इति प्रत्युत्तरित प्रविश्यादाक्ष यदेको वृद्ध समाप्तसप्तमीक एकस्मिन् भन्नमलिने पीठे उपविष्टोऽस्ति । भित्तौ च लोक नेतमा नटितभुमानि चिनागि। अहाच प्रणम्य भूतले उपविष्ट "भगवन्, कथ केय दशा नगरस्यास्य"- अप्यस्त्रि कश्चन शासकोऽस्य नगरस्य :" इत्यप्राशम् । "अस्य नगास्य शासको द्युमणिवश्य कल्याणसिहो नाम प्रख्यातपौरुषो वीरेषु, शासनव्यवस्था चायतनेषु दिनेषु नगरस्य प्रक्षीणा -मद स उदतरत् । “यो नाम्नैव केवल कल्याणसिंह पालकम्मन्य सूयवश्य सन्नपि दुरवस्थस्य राज्यस्य रक्षाय असमयों मुधैव क्षत्रिय उद्यते। तस्मिन् जीवति जापति वैदेशिको राष्ट्र विपदयति, तस्य कीति कलड्डयति, क्षत्रियत्व व्यपाकरोति, विग जीवनम् ! धिक चास्य 'प्रजाहितवतिनो वयम् इत्युद्घोष । यथा हरिणप्राणहारी हरिमृगेन्द्रस्तथायमपि क्षीय कल्याणसिह"। प्रधानमन्त्रो०-नैतत् सत्यम् । शासकस्त्वय बलवान् कृतव्रत एवासीत् । परमधुना रद्ध । के दब गोरामाधीनम् । किमय कर्त शक्नुयाद्वराक । शासनच तस्य न परम्पराप्राप्त किन्तु बलाधिगतम्। तदाह शिशुरेवासम् , मम पिता कथयति स्म यदस्य नगरस्य जनसख्या लक्षनयमितासीत् । एको राक्षसोऽस्मिनगरे समायनासीत् । यावती नरास्तस्य सम्मुख समागमन् सर्वानभक्षयदमारयच । अत्रत्ये नागरिके पलाय्य नगरान्तर गतेऽपि राक्षयोऽत्यावरत, अतोऽनत्या क्वापि स्थान न लभन्ते स्म। एकदा एतत्प्रदेशाधिपेन राज्ञा "यदेव कृते कतिपयैरेव दिवसजग्धप्रज शून्यराज्यो भविष्यामि" इति विचार्यव प्रावधि यत् , प्रत्यक गृही प्रत्यवसर राजाज्ञानुसार निशीथे पमशानशिलायामेक तरुण मासल महिप सपादमणमित मिष्टान्नमेक नवीनधातु युवान (न तु त्रिय ) प्रहेयाद् इति । राजा प्रतिदिन रक्षोभक्ष्यमानुपद्वारा प्रार्थयत च "मा नाम राष्ट्र नाशय” इति । राक्षसोऽपि तत प्रभृति अप्रयासप्राप्तमनन् प्रासीदत् । एकदा दुर्भाग्यकृष्णाहिदुर्दष्ट्रादयस्यैकस्य ब्राह्मणत्यावसर आसीत् । वृद्धस्यैक एवासीत् विप्रगृहे। चन्द्रमहीपता पुनो वृद्धाया मातुर्युवत्या स्त्रियश्व कमात्र समाश्रय । अयमस्माकमद्यतनो राजा तदा कस्यामपि सेनायां सैनिकोऽविकारिणोऽसूचयित्वाऽऽगतो विधान्तश्वासीद् अयञ्च युवा क्षात्रभावोपपन्न करुणरोदन श्रुत्वोद्विग्न उत्थायापश्यद् यदेक्तोऽश्र स्रोत सारयन्, भित्ती रोदयन् निरुद्धगद्दठो वक्त मशक्तोऽपि वृद्धो 'हा1 पुन, तत्राह यास्यामि रक्षोवुभुक्षामो व होम्यामि त्वमा गा' इति विलपति । पुन! अपगतलोचना सुलोचन! को नेष्यति नयज्ञ ! सम्भाषिप्यति भाषणदक्ष । सुख प्रक्ष्यति पटो! हा! हतास्मि बटो! अमुष्मै दिनायैव पालितो दुग्धघृतसेचनेन हा ! सूनो। इति समस्तम्ताडन रुदती त माताऽऽतुरास्ति । अन्यत प्रिय ! प्राणेश्वर । मनयनचन्द्र ? अविदितजगदानन्दास्मि ? हा। हत॥ भवन्तमन्तरा हिविष्यामि, अवेष्यामि स्वामिन् ! भवन्त स्वामिनोऽनुज्ञा पाल्यात सानन्द गच्छतु हा! प्रिय ! इति प्रचुर चीत्कृत्य ससक्थ्युर शिरस्ताडन रोरुद्यमाना युवकान जानि भुवि लोठयति। एकतश्च मुमूर्षवे विप्रबालकाय राक्षसतृप्त्यै चोलखलप्रस्फोटितस्य 'तितविशोषितस्यान्नस्य रसवत्या बल्लवैरन्तिकायारे मधुर क्षरदाज्य भक्ष्य निर्मीयते । एकतोऽलिभरेषु', पिठरेषु च "ऋजीपपश्व घृताक्त सोपस्कर सचुवेल्लजाजाजीक विधभेपजजलामिश्र बाह्रीकगन्धि सनिशाह साक्षीव राक्षससम्बन्धि मिष्टान्न निष्ठानश्च परिवेष्यते। विदलितभीरुथैर्य दुखिना दृश्यमदो वीक्ष्य समुपजातदयो गृहाजिरे निश्शङ्क भ्रमन्, पशङ्क दृष्टो गम्भोरखाचा तान् सम्मुखयन् प्रावोचत्-'मा शोक काष्ट, यतो मृतसकलगुटुम्वोऽह ससारे निवृत्तजीवितेच्छो मरणमेव भयो म ये। अमुना नश्वर शरीरेण ईदृक्ष सदासर कदापि न लप्स्यते अतोऽहमेवाद्य तस्य रक्षोराजस्य भायीभूयोपैष्यामि। उद्धौ। मा शोचतम् । भवदाशालताश्रय पादप सुदृढमूल चिर स्वैर विलसतु । नवोदे। मा स्म तनु शोकाग्निसाकाषी , न वियोक्ष्यसे। पत्यु जीवनोत्सव विधेहि इति। वृद्ध-कस्त्व देव । एभि सुधामधुरै शब्दै सिञ्चन्नागतोऽसि स्वर्गत परन्तु १चारनी। २ सूपकार । ३ चुति । ४ महाकुम्भ । ५ तापवाहन 'तवा' ६ सलवणम्। ७ तेमनम्।

अप्टमो निश्वासः १७७ महाशय! अहं भारतीयः सस्प मुखस्य कृते न का दुःखयिष्यामि । भवानपि स्वर्णशरीरः कस्या अपि मभूषणं सौभाग्यासिन्दूरं नयनोत्सवश्व। मह स्वनेने सोपयित्वा परेषां नत्रे नार्दयिष्यामि।". "अहं कल्याणो नान क्षत्रियकुमारो पति न कमप्यात्मीयं पश्यामि । मां मृत विज्ञाय न करन नेत्रे आर्द्रयिष्यति । भारतीयक्षत्रियस्य कर्तव्यं मां विवशयति यन्मय ज्ञातववृते जीवति विप्रकुमारं हन्तुं न कश्चन समर्थः । अहमप्यारों भारतीयां संस्कृति न कलयिष्यामि। वृद्धः-(वृद्धा लक्षीकृत्य ) अहो। धन्योऽसौ कल्याणः। यस्य नामसङ्कीर्तनेन दनुव॑रति स्म, अतिसारश्चाप्रतिपिद्धो भवति स्म वृहद्गद्वापरेणापि, भीता भामिन्यो निपातयन्ति स्म गर्भानपि, राज्ञः सन्देशहरमेव दृष्ट्वा जिगमिषन इवासन्नसवस्तस्यैव नाशितवीरधैर्यस्य एक्षोगजस्य पुरः स्वेच्छया प्रयियासति, धन्योऽयं धन्यौ चास्य पितरी यावीदृशं मुसाहसं पुत्रं जनित्वन्तौ यः परायें प्रेम्णा देहं दनदपि निरहस्कारः अथ ते श्रोत्रचपखदीयां मुधामधुरां ववत्तति पेपीयमानाः, क्यद्यमपि जातनिश्चयाः कामपि शान्ति रेभिरे। सायमभून् । बितमभूद् भक्ष्यं परिपुष्टे मांसले महिपे। इतस्त्रतो मित्राणि अन्तिम- दर्शनायाऽऽगच्छन् । राजपुरुषो मनो मूर्छयता, प्राणान् हरता च वचसा राजशासनं सूचयाचकार। वृद्धः कन्दनदावितधरः पुत्रं प्राह युद्धाभव ? प्राप्तस्तवानेहा हा ! हा! पुत्र! त्राहि । याहि अहमप्यायामि इति । जय कल्याणखान् सान्तयित्वा शिलादर्शनाय विप्रविप्रियं विप्रप्रियं समादाय महिप- सिद्धान्नैः सह प्रस्थिती निर्भयो निदशोकय । गरिकाचितोज्ज्वलयनरागपूणेव, पिशावक्रीस- कुद्धिमम्, रत्तयां स्थितिभूः, स्थापितमुण्डचपका, दुःखददानववसप्रेयसी, बोणितपङ्कपविला, नैयायिम्वरणिरिव समेतवैयाकरणा, कलुपिता, असिता शिला शल्यायते स्म। एकतो गोमायुकुस्कुरश्चर्यमामाध्यन्यो रोराजस्य सिंहासनमिव मृतमनुष्याणां कीक्सपर्वतः, कचन निष्पना सता इव सिराः, वचन नूनं सुपितनागोर्दम् , कवन भीतल्लार- शमलम् , निमा सो नरकवालः, कशेरुकाकुलम्, अर्द्धभुना करोटिः परशुकृत्तेव पशुका, १ मृतमानवमस्तिष्कम् । . १२ चन्द्रमहोपतौ अवक्षण ऊर, प्राणिप्राणहारिणी भयङ्करा मनम्विमानोदीपनी भीपणा सामग्री। कल्या णश्च विसृज्य विप्रात्मज कासर धावयन्, कासार गता पय पीत्वाऽधिगतशान्ति पथि कस्मैचन वराकाय हालिकाय सैरिभ दत्त्वा, शिलामेत्य अपूपादीनुपबहींकृत्याशयिष्ट। अथ मौनमाकलयति पतनिपूरे, अधकारेणाधीकृताखाशासु, किञ्चित्प्रकाशमानेपूडुपु, अञ्जनमिव वपति वियति, मृत इवेक्ष्यमाणे समस्मिक्षगति, निशीथदीपेष्विव विद्योतमानेषु खद्योतेषु, निशीथप्रायायां निशीथिन्या सहाहाकार रुदरमु गोमायुपु, सानलज्वाल कोशन्तीषु शिवासु, राक्षसागमनमपेक्षमाणे, विचारोमिसङ्कले च कल्याण प्राचलदुत्पातवात । मन्दरय समीर क्षणेन सूक्ष्मपत्खण्डवत्ता दधत् प्राबल्य भेजे। प्रकम्पनकम्पिता पादपा सहतोडीयमानै पक्षिमि सूचयामासू राक्षसागमनम् । अयोन्निद्र स दूरत एवापश्यत्-अशुभदर्शन निष्केशेन भूर्जत्वकातिना विस्फोटकवणाट्टितेन रजकस्य वस्त्रप्रक्षालनोपलेनेवाशिखेन शिरसा, निम्नमध्येन अभित उच्चन धूम्ररोमराजिविभासिना भालेन, ग्रीष्मत्तौ कूलान्तकृशा कालिन्दीमिव सिकतिले भरमपछक्तिमिव च दधानम्, विरलवाला धूसरितां भ्रकुटीम्, शुष्काभुग्नपादनाणाविव श्रवणी, करे गर्तगते वदरबोजोपमिते सिक्तावर्णपक्ष्मणी वीक्षण चोन्मीलयत भेकाकारया पूतिधिशिवाणभृतया शैशवेऽध पतनप्रसृतया शाखामृगैक्षितयेव मसूरिकाकिणया बभूव इव मुस्पष्टमज्ञायमान वस्तितया विपुलबालया नासिकयोपलक्षितम्। निशितान शीघ्र मासजिघृक्षया चिकत्तिपया वा बहिनिंगतैरालोहितसिताशुनाशितो पस्तविवकै रदनै प्रपूर्णवदन विस्तृतपुष्टोभयाधर प्रलम्बमानजिह हीनहनु सरोवरविव निर्नीराबुद्यदच्युरी गण्डौ दधान पुण्यद्वेपिणा पापपुों नेव आरोहितेन बहिनिंगतेन विरलेन इमशुजालेन व्याप्ताननम्, प्रत्यक्षमीक्ष्यमाणजव्यूहया मासादनमासलया प्रीवया धिस्विसहनन पीनेन सर्पप्रतिमेन मदितानेकानेकपसज्जनेन रुधिदिग्धेन नखविपर प्रविटमासपूतिधिना स्पुटनाडोकेन भयस प्रस्तपलायितपुरुषोपरोधकेनेव दीप प्रचण्डन दोदण्डनानुमितरिटशरीर परिणादिनिकेशस्फुटकीकसोरस्क मनुप्यमहिप मांसापादिनिधानमिव प्रलम्पमुदामुदहन्तम्, अमितमासभक्षणनि सतेन उपहियमाण मानवमारणभुशुण्डिकाप्रभागेनेव नाभिदेशेन प्रदेश भीषयमाणं विस्तृतकटितट करिवर्मा गृतगोप्यप्रदेश जानुपात मारिखपुस्रोपपुरपापातसहदृढोल्युगल सर्जरमिव प्रांतु मांस समुपजत अष्टमो निश्वास १७६ उण्डप्रवरितोभयनातया समन्ताद् मन्नशिक शुफायतपद इवेतनखनपि रचनत मक्षितभुवनमप्यनाप्तभुवन सतत भुजतमप्पलब्यान्न प्रस्फुटविपादिक समरस्टवर भवनानव दानवम्। ३ यमभित धान इव व्याधम्, कुनन्त्रिण इस कुनृपतिम्, असत्प्रतीहारा इवोत्कोचिनो न्यायाधीशान,' मुनिमा इव घनिन सहचरा केचिदेकरुणा कचिद्भग्ननासिका. वृत्तीचा लम्बोदरा अनना काणा ककरा कुमार गुप्कोदरान्तनुतनवोऽतनुतनवश्चोर्वराजत- शूला इवैश्यन्त। परिपदिय सबनजलपानागस्त्यभूता, नियमाममेघोच्छदनस्टूपा, वदन्ध नानिसमा, योगिजनसमुन्मूलनवात्या देवानप्रचारनौवरणाल्यावत्तात्मिका कारम्यग्रासाद सम्पानुल्या दयालुदावाग्निसमा, विद्यार्थिकुलतान्तरूपा, विपुलमुरा अपि सनतनधर्मों द्वारकास्कपुर सरा मसात् । अग्रे च कालापसव्युत्पन्नेन आटवनावरण्नव चर्मपा सखशरीर, परिपुष्टमासराव , रम्याभुग्नविषाणमण्डलो, ललिततिलकायमानसितर माज परिष्कृताऽऽयसपट्टायितललाट , प्रलम्बपुच्छदण्डेन भ्रमता दूरयन् विश्वसदावन, उपर विन्यस्तन तैरपूर्णचतुर्वतिना स्वदापेन प्रकाशितशरीर सभीकृतभ परिभ सरल गानन्द सजम्म साराव विस्फारितनन सजिह्वात्रामण पश्यनारछत् । येपामाइतिरेव जगदस्न्नुदा कय न स्यात्तेपा मासादत्व प्रतिसिद्धम् । यतस्त पामागमनेन मुप्ता वियद्गतयोऽपि निद्रा बहु । सहसा दापो निवापता गत । प्राडे तनसि सर्वे सहचरा इन्द्रियागोवरता बन्नु'। समलप्रवेशद्धप तरखनाकृती रासथ शिल समापगेल जीवन्त त महिषानुवरम यस सिद्धान्नस्य न्यूनता महिपाम वध विभाव्य नगरदाहिना झोपामिना भक्ष्यमाण 'कस्व रे' इत्युच्चरत्रोत् । मीनमबम्बमाने च तस्मिन् पुन व साभिनाननह-'सुनु” । नन्दभ चो वो भूपा द्वापदिप मा विस्तृतवान् किम् ? किं स न वत्ति यत्तस्य नगर मन प्रातराशायाप्पा यम् । सन्य स कय विजानीयात्, मयापि तन्नारे एए दिवशेषु नामि । अस्तु, वनधुना मने शब्द १ मुनीम, मुनानप निमत परिमान्ति शब्दयन्त - मत्सयन्ति च । माग व “बचोऽनुजयों का २ दिपुट कुरा अप्रियायुपमयमृतो स्थानव भूताधि। पो-पिपुर मुरा-मदिरा स्था सा। ३ टेर।

. १८० चन्द्रमहीपतो दष्ट्राभूषण विधाय नगर प्रवेश्यामि, उत्तिष्ठ, स्मराभीष्ट यावदह कुलिशक राभ्यां कराभ्या लानामृशामि। विपुलोत्साह स्मित्वा क्रोधोत्पन्नवेपथुरूत्थाय सम्भयिन् सोऽत्रूत-कोऽसि रे ? सत्ताधम । किमर्थमुपशिलमागत्य निद्रा हापयसि १ स्वपिमि, सपद्यपसर इत, सिहस्य सुखनिद्राभनको मृगो मा भव ! याहि याहि दशय पृष्टम्, इति । राक्षसे त्वश्रुतपूर्व परुपवचोभिरुद्दीपितमन्यौ कल्याण प्रबलपराक्रमया तोभगोल्क भयङ्करया दृढया साछ गुष्ठागुलिबद्धया सिद्धया मुष्टिकयोर आहत्य सप्रौद्धि अवदत् ‘राक्षसाधम ! समेतस्ते मृत्यु । कर्य। नाधुना ते विमुक्ति । तावद्गज शोच भ्रम उच्छल यावन्मम मुष्टिइष्टिविनष्टतनुयष्टिर्मतिमवाप्यापेतसमीरो विमुक्तमोऽन्यस्मि जनुपि कस्यचिद्रक्षयोऽजिर न पश्यसि । विपुलाघ! यहवस्त्वया धर्माश्रया देशभक्ता मानिनो विपश्चितो नीच। भक्षिता । विधवानेनि घ्य देन महीयसी सरसी त्वया सम्पूरिता अधुना त्वधन्य ! प्राप्तस्तव प्राणहत्ता कता चित्रपुरवासिनागरिकनिकरस्य सुखम् । चिन्त्यान्त! चिन्तयान्तिमचिन्तनीयम्।' इति अथ क्ष्वेडानुकारि धनधनाधनध्वानानुसारि दमितजनारि वच आभाप्य उत्प्लुत्याय समिव तच्छिरो दृढेन करालकरतलेन मृदुलयत्। पुरुरोपयो सत्वरपदन्यासमृदुलितधरयो मुष्टिकापतनसत्कुचितावयवयो खिन्नखिन्नगानयोस्तयो सध्वान सकरतलपात बभूव तुमुले जन्यम्। स शुण्डिशुण्डामिव प्रचण्डा शिलामिव नीला शालग्रामस्य मादिपीमिव आयसीमिव तद्ग्रीवा दोदण्डेन भृशमाहत्योत्थाय गजमिव त चलदस्त श्रौप्योर्भूतलेऽपातयत्। वेन च दिगन्तव्यापिना कणकुहरभेदकेन ध्वानेन भीत पक्षिपूर आख्यातुमिव वियद्विहारिण विनतानन्दन शब्दितसकलप्रदेशो दिशावगमद् क्ते केकाभीपितजन केकिनम् । अथासौ प्रसृतस्य तस्यौरसि समुपविष्टस्तुदन् वचनसूचीभि प्रारब्धमुष्टिदृष्टिरप्रवीत् । "रक्षोऽपसद ! जगतोविषाद ! निषाद ! क्षणस्थायिनस्ते प्राणा, स्मराभीष्टम' इति । पर परमगव स क्रोधाश्रुपूणवीक्षण पद्भ्या दझ्या नखाभ्या तुदन्, नासिकया प्रपल समुच्छसन्, मुट्याऽऽहतो मुनि, फेनमुद्रमन् नसा रुधिरच, मुखं व्यादाय शत्रुतो मान मनमनुभूयान तविश्रामम वभवत् । तस्य प्राणमरुत् नागरिक मित्रतेष सय एवं तत अष्टमी निस्वासः २८२ स्वत्र वीतः। वस्त्र पटिवनपि मुख मौल्यै पत। न्यः न प्रदशः प्रहार- कोल इन गुपितः। तस्व लेहपेटा मनोपाः प्रहाराः नौ चलती चटनी निधिता दन्तः स्वरकोटी निवसन्ता नामिका तस्य वीरत्याराडा अटलान् । परंस उत्तः। तत्पचनावानिर्गन मतिना नोगाटेन पिल्टिन प्रतिष्पत पा शतवन, दयदा अन्दात्यां मुमुद इस मसिनो। सयासी अन्यन्यनयान्तो विस्तृत माहिसं वाढीव रजोवोसनी- स्य गाटमपिट। शवादनाचारानियाटकर करमच्दानाकोटद्वार- दावल्यमेहकररागा रावेग साद वायबानेन सविस्मयनुत्थितोऽपरवत् स यत् वर- गन्नौर सुरजन्दावालपत्खिादिनीवादिनो वैदियय पदजना उमयान्ति। सुनिचल्यस्यनपिजटिवशतवरमपनाया' मदोन्मत्तम गमनाया दन्ताववन्तिाया चिनपुरपतिः मन्त्रिप्रभृतयोऽसन्यताः मुव वाढवाजिनः सादिनशान्ति स्म। स्यान्नु सैनिक आसीद् व्यवहाराननितः, बुल्सनाऽऽनवतान् विनानो विकोशासियांटोदनदयोदवित। "टव ! सागत विनीतभावन वियम् , पुनरयनरमपुरवाता सविशेष सत्कार्यः, अतः पस्यानेव चटनीयम्, मन्दया को बली रिमाचरेस दुगा" इति मन्त्रिमा प्रविकोधितो हदिनोऽवतीयं चकरिवहनो मन्त्री राजा च उनन्यईपानाज सनारेहेन पुरमानयच । “वीरवर देशव दुरामानन मारिवर राजानमेव नहि मटेयमेव वशी- मृतवानति। अस्मदये प्रचुर कट विपन्न मतिरतां देशोऽक्षयां टकात।" ज्यान.-चार्य ! अबदुन्तनाननं भवटामित श्रुत्वा रिहनि। प्रिय धर्मः। चा नवीनता! मन्त्री०-महता महत्तन्य देवार्य न कृत्वात न प्रमायन्ति । कल्याग:-केन सूर्यन राज एतत्कटं दन्! नयी-विरचितानविन ! इति ना नानातिन् पंच प्रहपन्दि। वे चारारदिने दर “य मदो वः" इति दिल्या पन्ति। देव मानरय महता प्रसासन रामो मृतो मनः। टनोपहारटिनका स्वजेन रिसदस्या पटेल-यो।

। १८२ चन्द्रमहीपतो राज्ञ राक्षसमारण सूचयाचम् । केचन दलमायोज्य वासासि लिप्त्वा "अस्माभि स देव ! प्रसह्य हत-इत्यपि प्रोचुः परस्पर व्यवादिषुः। महाराजमुखगगने नवीन ज्योतिरुदगात्। मानससमुद्रस्योपहारतरता कराभ्यां निर्जग्मु । ग्रामाणामधिकारपत्राणि लिखितानि। सर्वेषां मुष्टयो भारम॑ता । अह विचाऱ्यांवोच "देव! किमर्थ निर्धनीक्रियते कोश । अत्रत्या एवेते न कदापि व्यापादि राक्षसोऽवस्थैरेव । अद्य किमेषु दैव बलमुपेतम् । देव ! यदि राक्षसो मृतस्तहि अनन्यसाधारणो हन्ता तत्पृच्छतु कस्यावसर' कोऽगमत्" इति । तत्र च व्यतिकरे भवद्गमन भवच्य्यनञ्च विदितम्। अत' पर यजात तज्ज्ञायत एव श्रीमद्भि । कल्याण-आम्। मन्त्री०-कस्य वंशस्य विभूषण देव । कल्याण-राजन्यकुलप्रभवोऽहम् । ससरणे सदासोभूषणैर्नरैनारीभिश्च कसुमनम्भिर्मधुरादरवाग्भिश्वाद्रियमाण कल्याणो राज्ञा राजभवनमानीत । केवलमेतन्नगरनिवासिन एव न हि प्रान्तीया अपि समूहिता.। मानवमहोदधेस्त- रहास्तरङ्गिता आसन् । सर्वो जन प्रान्तप्राणप्रदातुर्दर्शनाप आकुल आसीत् । कल्याणी महाराजेन सह राजभवनस्य गवाक्षे स्थितो जनसमूह नन्दयामास । चिनयता विद्युत्प्रदीपा लोकचक्षु पि चमदकुर्वन् । महाराजश्च लोक सम्बोध्य' ध्वनिविस्तारक- साहाय्येन प्रावोचत्- प्रिया प्रजा ! अद्यतन दिनमस्मजीवनस्य प्रदीप्ततम दिन वर्तते। केन शब्देन क्या रीत्या केन कर्मणाऽस्य महाप्रभावस्य यून आभार प्रदर्शयामो मनो न निश्चिनोति । अस्मत्सविथे नैताटक किमपि यत् प्रत्यर्प्य वयमानृण्यमासादयाम । नन् पातीति नृप-इत्येवं वेजोऽतिशायित्वात् पालनाच सामान्यो मानव एतद्गुणवैशिष्टयन राजाभिहित । एतद् गुणद्वयमस्मिन् यूनि वर्तते। अतोऽय राजा भवितुमर्हति । भगवता रास. पद योग्यतानिष्टमेव १ लाबुड स्पीकर। शास्त्रकार राजनाद् राजा अष्टमो निश्वास १८३ रचितम्। अस्माभिदौरात्म्येन तत्कुलपरम्मरया खोकनम् । अबैन युवान वीक्ष्य अनुतप्तो लजितचास्मि, अत इत प्रमृति अयमेव प्रजाना शासक । लोकस्य न्यास योग्येऽधिचरिणि समर्प्य भारहितोऽह नितरा प्रसोदामि। नवीननरपालस्य शासने सर्व विधमानन्दमनुभवन्तो भवन्त प्रेय श्रेयवानुवन्तु इत्यस्तु मे शुभाशीवाद इति । महाराज खय स्खमुकुट तस्य शिरसि पर्यधापयत् करवाल करयोरादायार्पयत् , चामरचादाय सर्वत प्रथम व्याजयत् । महाशय, अधुनाय नितरा युद्ध केवल नाममात्रेण राजा। केन्द्रादेशानुसारिकार्य- निर्वदणे विश कि करोतु वराक इति । अथाह प्रधानमन्त्रिण सम्भाव्य ब्राह्मण बटुनाऽऽपितुफामस्वस्यावारा गत्वा यमदूतो- पमैश्चतुर्मी राजपुरुष कृतेक्षण सलाबद्धपद सहयोगिभिभविष्यत्कार्यक्रमायाऽऽल्पन्त मनितरसाधारणवैदुष्यमनालस्य कम कर्तमा व्यन्त विप्रयुवान बोदय तद्भावमुग्धस्तस्योद्देश्य विभाव्य तस्य जीवन परमावश्यक मन्वान उदघोषयम् "मान्या, शासनस्यान्याय्य परा काटा स्पृशति। परोऽपराध्यति दण्ड्यते चापर । अस्मदीया एव भ्रान्त्याऽस्मान् हन्तुमसरा । कर एव गल्मपजिहीपेच्चत्स्य जीवनम् । अस्माक भ्रातर एवास्मान् हन्युस्त दा कय जोविष्याम । अरमामि प्रतिज्ञावय वर्ष सघटिता शासनमनुरयिप्याम । एतदर्धमेका रिचारपरिषत् स्वतन्त्रोपवने परेद्यपि पचनदनसमये भविष्यति सर्व समेतव्यम्। एतदाद्धानन्य सर्वेन्य भावयितव्य येनाधिका जना समागच्छेयुरिति ।" रदानुपगम्यायो, “शोक त्यजतम्, अह भवत्पुनमन्यांध कारवासिन उन्मोचयिप्यामि नो चेत्स्वीकृतापरायो भवत्पुत्रस्थाने शूलमारोवामि। अह कथयिष्यामि यमम प्रबन्धी मदाज्ञया मयि रोगग्रस्तेऽनेन पठित । पाठो निदाप । भवत्पुनस्य रक्षर्ण देशस्य ते परमावश्यकम् । धन्यौ भवन्ती यो स्वार्थ परित्यज्य देशस्य निनाणाय स्वातन्याय च प्राणापक मुत प्रामुपादाम्। भवाशामाश्रयेणेव स्थिता । योदशपलन्यूने पचनदनसमये खतन्त्रावने मनुष्या नियथावग्नु । धरिणो मानवान् प्रसबनानेव प्रवीयते स्म। पचनदनपस्टापोपेण सममहमुत्थाय सभापतिरदाय जनात्गुरु प्रस्तूप पाम स्थापिताया भारतनानु प्रतिमाया गळे पुष्पहार समयावोचम् ।

१८४ चन्द्रमहोपतो समवेतसहयोगिन ! मुहृदः! सर्वत प्रथम व सर्वथा निरीक्ष्यास्माभि प्रतिज्ञातव्यम् , यदह स्वेच्या ख भारताय तस्य सेवायै स्वतन्त्रताय उन्नत्यै च समर्पये। एतदर्थ कशाघातो वृश्चिका तोद कारावासो मशकादन परिजनैवियोग क्षधा द्रव्यदण्डो मृत्युश्च मन्निर्णय प्रतीपयितु न शका। खार्थ परित्यज्य देशहिताय वणवर्गधर्मनिरपेक्ष कार्य करिष्यामीति । यूय सर्वे भारतस्याधिपतयः, स्वतन्त्र भारते सर्वस्य समानमुत्तरदायित्वम् , इदमनुपयुक्त भविष्यति यदहमाज्ञापयामि, परमह भवद्भिनियोजितोऽनुशिष्ट सहयोगीव निवेदयामि । अस्माभिर्यथाशक्ति सघटय देशस्योत्थाने यतितव्यम् । बैतद् विचारणीय यत् स्वाधीन भारत द्रष्टु कः स्थास्यति-एष विचार कर्मणि शैथिल्यमौदासीन्यशापादयति । सर्वेषामस्माक कर्तव्य यद् वयमस्मजीवनसर्वस्व स्वतन्त्रभारतस्याधारशिलाया अधखात् स्थापयिष्यामो यन कोऽपि नेक्षेत । अद्यतना भोगा अस्मद्वान्धवरकसिक्ता हातव्या । अवधार्यताम् , परतन्त्रतायां घृतादनात् स्वतन्त्रताया घासादन गरीयः। मरुमणि प्रतापो घासमेव जयस। विश्वसन्तु, एप दासो विजये पराजये तेजसि तमसि मुखे दुःखे सहैव भविष्यति । अह किं दातु शक्नोमि, ऋते क्षुधा तृषा श्रम खेद क्लेश मृत्यु वा। एतज्जीवन भारतमातुश्चरणयोरपये। मुहृदो मातरो भगिन्यव, सपर्ष चालयितु धनस्यावश्यकता वर्तते। निर्धनो ह्यसमर्थ स्थातुमद्यतने समये । एतदर्थयुगम्। अर्थस्याद्य महती प्रतिष्ठा। धनस्य प्रतिष्टोन्मूलनमस्माक ध्येयम् । अत कटकेन कष्टकमिवानेन परतन्त्रतोन्मूलनीया। अस्मांक सहपो दीर्घकाल कठोरथ सम्भाव्यते । शासकस्य हदय नवनीताभ न भवति अपि तु पनाभम् । यत्र स्त्रीणा चीत्कारा शिशूनामार्त्तनादा वृद्धाना श्वेतकेया अधद्म कर्तुं न शमा । अत सर्वसाधनाना सग्रहोऽस्माभि अस्माफ भ्रातरो भगिन्यश्च करकावाला भुशुण्डिकामादाय सर्वविधा परिस्थिती प्रतिरोद्ध समथा भवेयु, यद्यपि नास्माक शस्त्रेणु विश्वास'। पर क्षमाऽपि शची सत्यामेव वयसो। भारतस्य परिश्रमप्रियाभि प्रजाभिनेंदमाश सितव्य यत् परेषा पर नाय तस्य समय । कार्य न सरलम् ।

अष्टमो निःश्वासः १८५ चन छठेन व्यसनेन लुण्ठन्तो बनिन, साम्राज्यवादिनः शासनस्य गुण्ठ्ने साहाय्यना- चरन्तोऽस्मत्साहाय्यं करिष्यन्ति। यनिभिः स्वार्थ साधयितुं सलक्ष्यः साम्राज्यलोलुपः सद सम्मित्य विवस्यानदाता कृपकोऽवाय परमुखापेजी, विश्वव्यापाराय तन्तून् क्यन् तन्तुवायच तरुण्याः पुन्याः लबाय वासासि याचमानो विहितः। कास्मयविश्वकर्मानुस्स प्रासाद निर्मायापि शूकरवास वसन् मत बाधितः, स एव समानस्य कल्ः खायी चलोका इव शासनस्य घटक स्वस्य साधारणमनोरञ्जनाय लक्षशो रूप्यकाणि प्रवाहवति । एषोऽन्यायो बहुदिनं यावन् न स्थास्यति। आधुनिको धनी जालामुख्या क्रीडति चेदद्यापि सोऽनयदितो निश्चित पतिप्यति । कि सम्भाव्यते सोऽरमाभिः सहायिप्यते ? सोनाक शवे इसिप्यति, खाधीनसयामाग्नौ दत्तपत्याहुतीरवहेलयिष्यति, क्लीबोऽपि सविपयरतः प्रेमच्या अंशयितुमेपिप्यति । खायिनो देया चा स्युविदेश्या का स्वार्थ गुण्टता र शोषयतां वनिनां वा नान्तरम् । सगृहीतधनस्य पणाः स्वतन्त्रतामन्दिरस्य पधि विरिप्यन्ते, भारतमातुश्चरणयो- परिप्यन्ते इति । . तथाप्या- सभास्थले विशेषतो विधवाः स्त्रिय आसन्निरलङ्करणा नराश्च, भागना पूरिखबाभूत् । क्षणेनव भारतमातुरप्रभूः कर्णनासागलाभरणैरगुलीयकैच व्याता । परमनेन स्त्रीणा तृप्तिन बाता, ताभिने ज्ञातमासीद् यदरा धन प्रहो भविष्यति, ता आरदिन सभाये आजगृहुः । तासामाग्रहेण द्वितीयस्मिन् दिने तस्मिन्नेव सनये प्याने च समाऽऽता। नगरस्य सर्वाः स्त्रियोऽद्य आलिता इस कौशेयखण्डेषु पश्चत्यभान्याभूपणान्यायध्य सन- सापूर्वमेवोपेताः। तासा मुखेप्वझा विलक्षणा तेजोमयी चारा व्यापत् । आभूपपाना सदापो बहुमूचाना राजतानां सौवर्गाना भावनानाच फूट भारतमातु वरपयोजातम् । बीवने टपद्वादश वसन्तान् प्रक्षितवत्यो बारिकाः पुलपिताः प्रणयलजारमनुल्यो यो हिमस्यः स्वार्य वासमनुभूपर इस क्षाः स्वतन्त्रभारतदिकाया जीवनसम्धित माउस न्ययुः। एका निरसन्न रुदती युवति उमालय नुवमुमारिता उपदयाः नियः सनाजग्नुः । ता यथामविसाव्यता गलेन ट्यता भग्यता सरेम प्रायोधरन् यदस्याः साल.

१८६ चन्द्रमहीपतो मुशील युवा भर्ता राजद्रोहापराये पदोऽय शूलमधिरोन्ति इति । "इन्त, हन्त," इव कोर दल सर्वतो गगन व्यनादयत् । अयपूर्णारतलोचना रमणी च ससौभाग्यसिन्दूरेष सह रनसचित यश्चत् शिरीरममघौ रत्ता भारतमानुधरपयोरापयत् । सत्यम्, इंदशदेव्यावरणरेणु प्रहोतु देवासपोरता मुनयश्च रालायिता । एका युद्धात्सलन्ती एपेन हस्तेन वक्षसाश्लिश चित्र परेण च दण्ड दधदी समता । हिमश्वता सा रुदत्यवोचत् "एतन्ममैकमानस्य पुनस्य चित्रमस्ति । अस्य पिता महा- पण्डितो विद्याव्यसनो मनखी निर्धनी युवावस्थायामेव देहमजद्वात् । तस्यन्ति मेच्छाऽऽसीद् यतस्य पुनो महान् विद्वान् भवेत् । भिक्षा पत्या निविदाऽऽमन् तवृत्या च पुत्रमानसे निम्ना दयनीया भावना न भवेचातोऽह बनात् शुम काट समानीय विक्रीणन्ती सुत पाठयन्ती जीवन्त्यासम् । एकदा मन पचदशवर्षों निर्भीक भाषमाणो माणवक शासनेनावद्ध । एको गौरान आयुक्तः सह दशभिरन्यै राजपुरुपर्नु शिशुमाहूयावदत्-"वन्दे मातरम्" न वक्तव्यम् । पर विक्टसाहसोऽदम्योत्साह स तस्याने एव तारस्वरेण "वन्दे मातरम्" इत्यवदत् । पाशवप्रत्तिरविकारी कशयाऽऽहन्तुमादिदेश । विद्यालयस्य प्राङ्गण एव सड सडेति शब्दायमाना कशास्तस्य कमलकोमले कलेवरे निपेतुः। एतदन्तर माघ्या- कालिक भोजनमादायाहमप्युपेवा। स वन्दे मातरमिति कथयन् भूमौ पतितः । तेन कदापि ताडन नानुभूतमासीत्। तत्य त्वचो निरवद् रक्क च्यवते स्म। शनैदानै ‘वदे मातरम्' वदन् स जीवनावलि भारतमातुश्चरणयोरार्पयत्। गौराष्ट्र- स्य सिंहायित वा शिशोरुग्ण सद्योरक्त लिहन् स्वामिन प्रियता बभार। अह च जडाभूता पश्यन्ती सक्षोभनटविवेका रुद्धगला उन्मत्तेव विस्फारितनेना शिशोदशरीरे निफ्त्य मूच्छिता। दिनत्यानन्तर ममोटने मम मूच्छा भग्ना। गौरी सारमेयोत्पटिता वच घृतमधुमधुयटिभिरुपनयन्ती भासीत् । शरीर सवाणि वनाधि रक्तदिग्धान्यासन् , यानि दृष्ट्वाह पुनर्मूच्छिता। तस्य विवाहाय मया मुक्ग क्रीतमासीत् , यदेष एना गतिं प्रापितस्वदा भया मुवर्णस्य शिशोश्चित्रस्यैषा शाखा निमापिता। अद्यतनोऽवसर पुरा न प्राप्त , एतत्कर्मण्य पंणा मम शिशोरामा शान्तिमधिगमिष्यति इति कथयन्ती वृद्धा वित्र भूमौ समस्त अष्टमो निःश्वासः प्राधिप । रद्धाविवरणेन सर्वो उनः स्फुट रोदिनुमारेभे। अश्रोतः नेत्रद्वारेमान् नासिकानात्या बहिस्वाह, धयत्व पन्धः कणशो भन्नः। काचो भन्नः। चित्रान् मनस्विता वति स्म। मुग्धस्नितं तस्वोष्टयोः कयौले च प्रमृतमासीत् । उद्ध्या चित्र सौपणी शाखा च मानुथरणयोरारात् स्थापित। अहमुन्यायावीचम्, वयमवस्वं सफला भविष्यानो यदृश्यः शरमागतोनात्तपरिनाम परायणा देव्यो निवसन्ति, तद् भारत का विपीटेन् ? याभिः पतरः पुत्र प्रातरः पितरः परिजनाय स्वाधीनतावेदिकापानारोपिता आहुताश्च, Trai भारत कथमवीटन् ? सभास्थले धावन्नेको युवो मा पत्रमदात् । अहचोट्याटय जनतामयावचम् :- प्रत्यूरत्व प्रधने किरणोदनेऽरनाक भाग्यनिर्णयो भविष्यति । अस्मदवसानमनु हृदयस्पन्दनं समीपात् समीपतरनेति । अस्माक जीवनप्रदीपः प्रातमणी विलेप्यते, उपाधिनाशे घटाकायो महाकारा इन। परमस्नदोया विचारा विद्यस्मिन् विद्यन्टेखाव- चमकुर्वन्तो जागरण सम्पादयिष्यन्ति । अरनाक नुष्टिनेय भरम यदि विनयेत, न म्।ि शासनस्यात्याचारान् वविरसमाजाच भावयितुनभित्रीगोजय योज्यः। तेन जगतो जागरणसम्भावना। वर सानुरोध निवेदयिनुमुगुक्ता यंदेश सन्टिाव- चलनीयो यावन् मुटिनेयाना शक्तिशालिना श्रमियु भारतायेषु प्राकृतिकशाधनेषु च स्वार्थ सायनुमधिकारतिछेत् । इलायानां वीराणां वनव भवता सपयों यलवान् नविष्यति । वेपानानं साहसमुन्चरादौ निर्भयतापूपो भावय विवंचनवरिष्यति । अन्ते, ज्ञानेशाने वा भूतानां घटतानां कृते क्षनामभ्यर्थमानः परम समापयानि- "अनेकप्वक" वन्देमातरम् । * * पर राजधानी गताः। शुल्कशालायामको घटक' च्यमपि विदिवोदेखोऽस्नानु दयानदर्शयन् । तस्य प्रेरण्या वेकः कपस्यो वाकोलो पटकटतमहाप्रभावोऽ लल्यावकाशः स खतन्त्रतासयाभियुक्तानामुन्नोयनाय पचमहसमुद्राभिः स्थिरीकृतः । मोऽरनान् बहुवित्रं पृष्ट्वा मांणि पान्दरनाकं विचाराध विभाव्य पान्य पन न्यायाधीशस्योपस्याता' मुसलिनः सलोननामा विद्यते, तेन नेलनमावस्त। १ दलल। २यः पयामि न्यायाधीशायोपस्यापति (विरस्तेदार, पेशचर ) १८८ चन्द्रमहोपतो समागमो यद्यपि सिद्धातविरुद्ध आसीत्, परमातनजनपरिज्ञानाय, राष्ट्राय कारावासे म्रियमाणेभ्यो लोकभावनामधिकारिभावनाच ज्ञातु समागममपरिहाय्यं मत्वा विहितसमयास्तस्यावास गता । पामसीम्नि कस्यापि समानशीलस्य धनिनो विशाल भवन वेन स्वायत्तीकृतमासीत् । तस्य विशाले सभास्थले कुमुमफुड्मलाझारेषु पुण्डरीकसितेषु सहस्रश काचभाण्डा उत्प्रभा प्रदीपा प्रद्योतन्ते स्म। अभित उपविष्टाभिरुपदशश्यामाभिरप्सरोभिरधिष्टिता मिन्दपुरीमनुकुर्वति सभास्थले नगरस्यानजितधना धनिन कृपकोपाजितराय सामन्ता उत्कोचिनो राज्याधिकारिणय कौशेयासनेषु वृहदुपबहपृष्टा मद्य पिरन्तस्ताम्बूल चयन्त पतगृह निष्ठीवन्तो धूममाकर्पन्त आसन् । मध्ये च विलासलीन सलीम । * * गृहीत मुद्रण द्वारपालेन बहिरेवासूचि यदुपस्थाता महोदयो गानसमाप्तिसमकाल मेवान्त पुर प्रवेक्ष्यति, आलापेच्छा चेत् प्रतीक्षितव्यमेव । वय कोण कथङ्कथमपि प्राप्तस्थाना हृदये शोफशल्येन विद्धा अपि गानमच्चे उपविष्टा । अथैकाऽऽनखशिसान्त रत्नखचिता नर्तकी नि सरदनन्तवद्रा पौर्णमासी निशेव भाखरा अन तचञ्चत्तारासमायुक्त पारावताम्वर शिरसा वहन्ती स्यूतरत्ननवनीतकौशेयचण्डातका विद्युलेखेर मञ्चमुपेता। सा जानुभ्यामवनि गत्वा बृहत् कमलकुडमल हनुस्पर्शण विकाश्य अजलावादाय स्मितेन सितयन्ती सभास्थल जनसाधुवादेन सार्द्धमुपस्थातु श्चरणयोरापयत्। पार्दवतिनी ज्ञात यदुपस्थाता महान् कलाकारोऽस्या गुरुवेति गुरुवदना। अथ सा प्रतिस्पद्धिभिरनेकैर्वणविकर्मादगिरनुस्वर प्रकणभिरनुगता हस्त भ्रमयन्ती विरकितपदन्यासा ह वध शिरसि मध्ये च हस्त न्यस्यन्ती अडगुष्टतज यौ परस्पर योजयती मण्डलितपश्चचण्डातका अलक्तकचित्रितहस्ततला विद्यदिव च चाञ्चल्या झङ कृतनूपुरा कदाचन चूणकुतलान् स्पृशन्ती कदाचन झणझणायमाना रसना प्रणय ती कदावन मुद्या हस्तौ सयोज्य विभजन्ती उत्तरीय हस्तयोरादाय वातवेगेन रतिध्वजमिव प्रसारय ती पादतलेनापि ताल स्चयन्ती चधुर्मुद्रया विश्व विमोदयन्ती प-मविलासविभासिसौदर्या मुद्राभिरेव गानस्यार्थमुबोधयन्ती सप्रभमुखी ओष्ठमुद्रया अष्टमो निःश्वासः १८४ मनोजभाव मानवमानसे उचिद्रयन्ती ग्रीवा मध्यच वळान्तो कमलङ मलायितानुरोजी कम्पयन्तो कनलाक्षी प्रलम्बकृष्णकुन्तला दीपशिखाविलका साझविज्ञेप नृत्यन्ती मातुमारभत.- मम मनो व्याकुलम रापिन्टिवमलि । मिलनं चिन्तत् । (स्थायी) शीत. सान्द्रो वायुवाति विद्युत् पत्या सह चाभाति प्रोपितपतिका मुग्धा तरुणी घनघोरघटा पश्चन्ती भृशमेतद। उद्विजते। मम मनो व्याकुलम् (२) उद्दीप्याशादीपं हष्टा थगनमव्यमहो उपरिष्टा सन्जा भूपापाद्यरलि। द्रष्टुं श्याममुसं भृशमुत्का मुविलन्यो मा तुदते। मम मनो व्याकुलम् () तियावीक्षणमधुरालापन- हस्तस्पर्शः प्रेमोत्पाद्य चक्षुर्मलं निद्रा हत्या यशय न वारा. गणितुम् प्रियतम! त्वरहि । मम मनो च्याटम (३) १६० चन्द्रमहीपतो उभयतो हस्ताभ्यां नवनीतचण्डातकमुत्थाप्य छनच्छननच्छनन्नपुरा भ्रकुटिकोट्या कामकोटिं वशयन्ती विद्युल्लेखेव क्षणस्थिरा आपततो भ्रमरकान् कोमलपलम्बाभिरछ गु लिभिर्मध्ये मध्येऽपसारयन्ती अब गुल्यछ गुष्टसाहाय्येन शिरसि मकुटमद्रा रचयन्ती अपाङ्ग कर्णमूले नेत्रयोश्च हस्त विन्यस्य विविधभाव प्रकाशयन्ती मध्ये मध्ये स्कन्धा सुनमयन्ती मोहिनीव राज । मध्ये भावोद्वोधनाय द्रुतविलम्बिता गतिमाप्रिल आरात्तिकमुद्रा वा प्रकल्प्यागासी तदा भित्तिरिष्टकाथापि धयवादान् व्यतरन् । मदोन्मत्त उपस्थाता सर्वेपा समक्षमेव प्रदर्शितानुरागस्वस्या कम्वुकमनीये उन्नतबधुरे कन्धरे सप्तावलिहार स्वहस्तेनावध्य हस्वमायोज्यान्त पुराभिमुख गन्तुमना अभवत् । एतत्सछकेतेन सर्व एवोत्याय अपसत्र । अहच कथमपि जनव्यूह प्रतीर्य तमुपेत्य अनभ्यस्तदैन्योऽपि त प्रसादयन्नवोचम् 'स्वामिना समयो दत्त" इति। पर मेरेयमत्त कभीकृतकामिनीसमुपास्टगों विगलितदन्तश्च्यवदोष्ठोऽस्फुटवाक् भयिन्नाह-"अपेहि नायमनेहा"। अथाह वहिरुपेय सहयोगिन सूचयित्वाऽचलम्, द्वास्थ पुनरुपहाराय हस्त प्रासारयत् । 'एतादृशस्य धनिनो द्वास्थस्त्व किमु अस्मान् खेदयसि ? समुद्रे छ बिन्दो स्थानम्" : अहमवोचम् । "कान धनम्। खामी प्रतिमास पञ्चविशतिमुद्रा प्राप्नोति शासनत , व्ययश्च प्रतिदिन पदशतम्। वर्षद्वय व्यतीतम् , मासिक मुद्रात्रयमेव न लभ्यते। शिशूना पालन भवादशाना दययैव सम्पाद्यते" स उदतरत् । वय समयात् पूर्वमेव न्यायालयमुपेता । वाकोलस्यान्वेषणमारब्धम् । तत्र जन समुद्देऽ वेपणमेव दुष्कर नवीनेन । पर तस्य लेखक उपलब्ध । सोऽवत यदय गानवाद्यरसिको वाबोल उपवनभोजने कस्या अपि गायिकाया सम्मानभोजने पञ्चसहस्रमुद्रा गृहोत्वापि देशसेवकाता प्रणे क्रीडा विचार्य सम्मिलित इति। मनो घृणया पूर्णम् । न्यायालयो जनसमुदयेन परिपूर्ण । अप्राप्तस्थाना बहिरजिरे वृक्षाणामालवालेषु प्रयः। अष्ठमो निवासः १६१ स्थिळे टाविशन्। समये आरस्पुन्यदिशः शासनस्य विशेषानमा नियुकै विधि- दिग्नः सह न्यायासनमलबकार! अभियुलनामनुपस्थितार पां नामनिर्नया वल्ये सहा अजा किं परानुसते ? परिजरप्पेश ननितिरनियोग- प्रतिरोधार समितालीत् । तदा नियोडितो वारीला प्रार्ययत यदपिनां समानेवाभियोगकार्यबहन नदिति। शासकारप्राइविधाको विभिन्न प्रस्ताव यात्रहनवायकं बनोत्तेवक निर्णय प्रतिधम्दानुत । परनस्लदायमाद्विद्यारम्या- प्रत्यालगाभिमुचिनिरन्तनःसार्वता प्रानन्यायाधीनोदमोवि यदपविनानुस्थिता- वाभिमोगः श्रीप्यते इति। परदिनाय श्रवण स्थगिढन् । विवरयानं तु ममा तनाबादव, अधुना प्रवेः प्रवृत्तेच हेतोः प्रतिदिननलिका सनी विधिपुस्तकालय एव व्यत्येव स्न। यानबुद्धिस्योगार: सर सायमनुते । इटापरहितो पनि बदहमाना विधिज्ञो भूतः । विश्वस्य सोणे, इतरशासननिनीतानासुद्धरपेऽद्ध सर्वदा सटर भासम्। एकदा विधिपुचचालये विधिविधा निविकमाण्डिवेन सह नन नमोऽभूत्। एनस्थ नान नया भूठमातीत् । अय यदा कदा न्यायालय नुवैति स्म। एपोभुन्तचार्य “असद इति परलन गोसेवायामेव टमः। नया साधरजपरिचयेनारि सर्वोऽभियोगस्वरने धावितः। सस्वभावः श्रुत्वा प्रभावितो निशुल्कनेवास्मनुतक उन्जोऽभून् । जब महारमा बझाला सर्वपु नहप्रभाव आसीत् । पक्षियतिरीक्षनरूपेण साझिनो बनाय दरमा भ्यति स्न। न्यायाधीरेषु वाकलेगु वादितिवादिषु च तस्य समानः प्रभाव अन् । न्यायाधीशत्रय वन्य नंद विभति स्म । वस्त सनोज्ज्वला प्रलम्या स्न्यापिनी उद्या शिखोन्नत पहलाट दीप्यमाने गुरो उदया नामा नन्द्रगन्नीरा या कार च मां शिरो नमान वीरन्या एवानवा अभिवादिदिवादि परुन् मनोनिविष्ट नागाल रहवं वा प्रसदाहरिप्पन प्रादव रन सः। जम्पा क्षिपदस्य रति रष्ट्रा हटपा लायन्द स्म। परदिने रहनसहन्द्रोऽरमक पाटोऽयुननदन आपातः । दन्न तस्य चरित्र डिदिनपोनपोषयन् ।

१६२ चन्द्रमहीपतो. अद्य समस्मिन् नगरे सर्वेषु कर्मसु हरिताल' प्रसृतम्। नगरस्योद्युद्धयो न्यायालय- मुपेताः। कारावासिनः सैनिकसुरक्षिताः समये समागताः। कारावासिना सङ्ख्या अधिकाऽऽसीदतो दर्शवागन्तुमानताः। आगतमाना एव ते "वन्दे मातरम्" "जयतु स्वतन्त्र भारतम्" "उत्क्रान्ति वतात्" इत्युद्घोपविष्णुपदमेव व्याकुलयामामुः । असङख्येयजनगलनादिना ध्यानेन न्यायसमितेरासनमेव दोलायितमभूत् । कारावासिनः पुष्पमालाभिराच्छन्ना आयस गृहमानीताः। मृतभुशुण्डीकान्द्र सनिकाना पङ्क्तिरभितः सनाऽऽसौदेव । शासकीयप्राड्विवाकोऽभियुक्तानामपराधं पुन. श्रावयामास । (१) अभियुफोर्म ग्धा जनता महाप्रताप राजान द्रुह्यन्ती कारिता। राजद्रोह । (२) सभाया बहवो वधा जाताः। नरहत्या । (३) दुर्बलमनसा मनस्सु दुर्भावनां सङ्घर्षभावनाञ्चोत्पाद्य तेषा दुर्गतिहरणेब प्रजाना दौस्थ्यम् । आदिरादिः । प्रतिदिन होराष्टकमेतत्कार्य प्रचलदासीत्। शतशः साक्षिणो भारतीया टी स्वतन्त्रतासङ्घर्षणा विरुद्ध मुद्दालोभेनानृतं वक्त सजा. स्थिरीता आसन् । अभि योगोऽयमादश-यो वर्षेभ्यश्चलन्नासीत् । अपराधिषु वहवो राजपुरुषैः परुप ताडिना देहमत्यजन, केचन रुग्णाश्चिकित्सालयेषु न्यवरान् । शासनस्य निंशलक्षमुद्रा अस्मिन् व्ययिता आसन् । पर कार्य निर्णयाभिमुख नासीत् । अतः शासनेनैका विशेषा समिति घटिताऽऽसीत्। अतः सर्व बलं सर्वः समयोऽस्मिन् कार्ये लग्न आसीत् । पण्डितपुत्र प्राप्त्याभियोगे जीवन समेतम् । अन्ततोऽन्तिम प्रतिपरीक्षणदिनमभ्युपेतम् । न्यायावी- शाना मण्डलं चर्चरायिताभिरुपानद्भिर्मणकृष्णपरिधान. प्रलम्वेन भ्राजमान ग्रीवाबन्धनेवर चञ्चद्दण्डेनोपनेण मणियन्धघटीं पश्यत् सम्मानित उच्चैव्ये कक्षे यथाखमासने- पूपविष्टम् । सम्मुख एव वाकीलानामासन्ध. सज्जा आसन् । पुस्तके उद्धरणसौविध्याय दत्तपत्रखण्डा. सहयोगिभिस्तर्कसंग्रहकुशलरुपेताः परपक्षखण्डनपण्डिता. वाकाय १ सस्कृताध्येतारोऽशुद्धपदेषु हरितालमायोज्य सूचयन्ति स्म "इदमव्यवहायम् ।' एवमेवाद्यतने कर्मावरोधे। नायः हट्टतालस्यापभ्र शः। तालवाचकस्य तालस सस्कृतवाङ्मयेऽभावात्। २ न्यस्टाई। - अष्टमी निश्वासः १६३ अन्युपेना। अस्माम्नातासहरूनद्रोभी कयनति लगावकाशः ! स्वल्टुपनेर वेदस्वेदनातः पुनकोतवनुरागतः। होराचतुष्टय यावदन्तिमं प्रतिपरीक्षर्ग जातम् । केनिोकमोचिनी न्यायालयाविरं मोहानामुः। पेऽना निविक्रमपन्डित लासीत् । जनकरतलम्वनिना वदिटवामीप्रवाहः प्रचुरोत्साहः कृतसनाह स न्यायाधीश- महिलाभिमुखोभूत्वावदत् । सर्वे श्रोतारधिनलिखिता इवाभवन् । यदा कदा जनकरतल वनितानवाचाफ्यात् । तल भाषणस्य सारमिदमस्ति । यदि कथन स्वभ्रातरं शिक्षयितुमुन्नेतुं स्वावलम्बनाय खोनत्य वा प्रयत। स किं साराधः? देश स्वतन्त्रयितु सेवकसपटन तेषां बनशमठोत्सादनच तेषां नैतिगुस्थान न राजद्रोहः। शासनस्य प्रणाली समालोचान् स्वस्थताः किं दोग्या? टलोचिनां खार्थसाधनाय परान् पोटयमानानामधिधारिणां समालोचने कि राजद्रोहः ? असख्यावा नरा नार्यश्च कारानु निगडिताः, रहयो पसन्दा वीतास्तेऽध वाभिवोगा एव कापनु सीदन्ति, राष्ट्र वेपामावत्यै चिन्तितम् । भारत स्वतन्त्रयितुंकट सहनानेभ्यो यदि दण्ड दास्यते, यी तेऽधुना दण्डव भुचन्ति यहुभिवः कारामु कष्ट सहन्ते, तेनालधिका विरोपिनी भावना भारतीयेषु बागरिप्पति, येन शासनस्स नहती हानिः सम्भाव्यते । खन्नतिः सातव्य सर्वतः प्रथमो धर्मः। देशमको देशेवरवार्य यदि मनकि तदान कोऽप्यायधः। भय नागरिाचारोऽतः सदाचारो गम्यते। अत एव निदोषा। भारयजीवायतलमाश्रित्य निरोजी शिवराजो राजनीतो न कारि सापरायो गणितः। सोन्नतं कदाचन सर्नसिद्धान्तप्रतिक्लनपि समाश्रयन् न हेयो गयो। खाउन्त्र्य सर्वेषां जन्मसिर ईश्वरपदतोऽधिपः। स नरहत्वापराधी यः वच्च्या परान् लक्षीकृत्य माररूपेण प्रहरन् रुग्लो भवति । आश्चर्यम् । वासनविहिता हिंसा लोकशिक्षकेष्वारोप्यते ! सा हिसाः सासनीदराजपुरुयैः कृताः। अतो नस्त्ये- पानीपानपि दोपः। न्यायस्य नांदायानेते सर्वयाऽदोगः। न्यायस्व परिपाटयाः रन न्यायालयास प्रधान कर्म इति । न्यायापोशानां कृते सरस्थितनासीत्। परोक्षपतिपरोनि तेभियोगावं साधावागन्छन् । देन कारावारिनानारायः प्रमापिनो नाभून् । परं व्यापनधि दण्डन्यथा दुरेव । द्विशती पां निराधोसोप्य मुला। प्रियदी दसवकारा- - १६४ चन्द्रमहीपतो वासेन पञ्चशती पञ्चवर्षकारावासेन दण्डिता। कारामु निवसता दण्ड समाप्तप्राय आसीत्, अत' स तत्क्षणमेव मोचिता पौरप्रतिष्टानस्य विशाल भवनमुपेता जनसमूहन सोल्लास सत्कृता रानावेव चिनपुरमायाता । कात्तिक कृष्णपक्ष । दीपावलीमहोत्सवो बहुभिर्व रुद्ध आसीत् । मृत्युमुख विशता कोऽवसर उत्सवस्य ? सर्वे दोनवदना अल्पिताशा हतोत्साहा हीनहासा दृश्यन्ते स्म, तेषु महोत्सववात्तवात्तिकरी। सर्वेषु कारावासिपु मुक्तपु राजाज्ञयोत्सवश्वके। सुधा कारिणा कारुणा महघता सम्पन्ना। तैरहोरात्र गृहाणि धवलयद्भिभॊजनवेलैब न लब्धा । इत पटरागिणा काष्ठरागिणामप्यभाव । सर्वेषा मुखे मनसि चानद । सर्वेषा करौ पादौ च परिमाजने लग्नौ। गृहा अवकरनिकरव्याप्ता विपणयश्चाद्य सहरकूट मुदगिरन् । पौरप्रतिष्ठानस्य भृत्या सरणिसङ्करपरिमार्जनाया प्राचुर्येण व्यग्रा अनवरत महिषैगदर्भर्वहतो व्याकुला आसन् । नगरे नवीन जीवन समेतम्। सुधालिप्तैग है। रागरक्तौश्चिनचिनितैस्तैलस्निग्धै क्वाटैश्च नगर विचकास । मलिन मालिन्य हिया गर्तगतमभूत् । ससरणानि जननिरीक्ष्यता भेजु । महालक्ष्मीरानौ प्रदोष एवं गृहेषु विचकमुर्दीपावल्य । विविध न्यस्ता दीप पछक्तयो ससरण दीपयामासु । विलक्षणराग प्रकाश प्रकाशते स्म। का दविकाश्चेत प्रसादयद्भिालामाश्चोतयदि स्वर्णरजतपत्रलिप्त सवैचित्र्य न्यस्तै काचमञ्जषा जुप माणैमिष्टान्न विपणि पूणयामामु सौन्दर्येण । इत फलविक्रतारोऽपि दाडिमजम्बीराङगूरै स्वरहितपिठरा पुरुषानार्पयामासु । वस्त्रापणिकानां विपणयोऽद्य प्रोज्ज्वलाभासवासोभि दीप्य व स्म, येषु पटप्रभा द्विगुणयत प्रकाशा अवलम्बन्ते स्म । मनोहरम जूपामु विधृत खणरजनभूणा भूषणविकतारश्च चक्षुवशयन्ति स्म । ताम्बूलिकाना विपणिप्वद्य मेलापक इस लक्ष्यते स्म। तेषां वातविकाश एव दुर्लभ । परिणामे परिदेविनो द्यूतदेविनश्चाद्य राजाज्ञयाऽदीव्यन् । युगपद्धयनोद्भास्तेपा कोलाहल आकाशमपि व्याकुलयति स्म। तेषु केचनाहसन् , परे उदासत । अभितो वेदध्वनय श्रूयते स्म। विभविनां भवनेषु गायका गायन्ति स्म । रमणीभूपणशिजित नि विजयन्ते स्म। पठवासवासितवसना परस्परालापप्रटितप्रेमाण' पुरुया प्रेक्ष्यन्ते स्म। यथारीति सम्पन्नोऽभूदुत्सव ।

. १६४ चन्द्रमहीपतो वासेन पञ्चशती पञ्चवर्षकारावासेन दण्डिता। कारासु निवसतां दण्डः समाप्तप्राय आसीत्, अतः सर्वे तत्क्षणमेव मोचिताः पौरप्रतिष्टानस्य विशाल भवनमुपेताः जनसमूहेन सोल्लास सत्कृता रात्रावेव चित्रपुरमायाताः । कात्तिककृष्णपक्षः। दीपावलीमहोत्सवो बहुभिर्वर्ष रद्ध आसीत् । मृत्युमुस दिशता कोऽवसर उत्सवस्य ? सर्वे दीनवदना अस्पिताशा हतोत्साहा हीनहासा दृश्यन्ते स्म, तेषु महोत्सववार्तवात्तिकरी। सर्वेषु कारावासिषु मुक्तेषु राजाज्ञयोत्सवश्वके। मुवा- 'कारिणां कारणां महर्षता सम्पन्ना। तैरहोरात्रं गृहाणि धवलयद्भिर्भोजनवेलैव न लया। इतः पटरागिणां काप्ठरागिणामप्यभावः। सर्वेषां मुखे मनसि चानन्दः । सर्वेषां करी पादौ च परिमार्जने लग्नौ। गृहा अवकरनिकरव्याता विपणयश्चाद्य सरकूट मुदगिरन् । पौरप्रतिष्ठानस्य मृत्याः सरणिसङ्करपरिमार्जनायां प्राचुर्येण व्यग्रा अनवरत महिपैगर्दभैर्वहन्तो व्याकुला आसन् । नगरे नवीनं जीवनं समेतम्। सुधालिप्त है। रागरफौश्चित्रचित्रितैस्तैलस्निग्धैः कवाटैश्च नगर विचकास । मलिनं मालिन्य हिया गर्तगतमभूत्। संसरणानि जननिरीक्ष्यतां भेजुः । महालक्ष्मीरात्री प्रदोष एव गृहेषु विचकमुर्दीपावल्यः । विविध न्यस्ता दीप पछयो ससरण दीपयामासुः। विलक्षणरागः प्रकाशः प्रकाशते स्म। कान्दविकाधेतः प्रसादयानालामाश्चयोतयद्भिः खर्णरजतपत्रलिप्तः सवैचित्यं न्यस्तैः काचमञ्जूपां जुप माणैमिष्टान विपणि पूर्णयामामु. सौन्दयेंग। इतः फलविक्रेतारोऽपि दाडिमजम्बीराङ्गूर- स्तरहितपिठराः पुरुषानारर्पयामासुः। वस्त्रापणिकानां विपणयोऽद्य प्रोज्ज्वलाभासै सोभि- दीप्यन्ते स्म, येषु पटप्रभा द्विगुणयन्ता प्रकाशा अवलम्बन्ते स्म । मनोहरमञ्जूपामु विधृत- खणरजतभूषणा भूपणविकेनारश्च चक्षुशयन्ति स्म। ताम्बूलिकानां विपणिप्वद्य मेलापक इव लक्ष्यते स्म। तेषां वार्तावकाश एव दुर्लभः। परिणामे परिदेविनो घूतदेविनश्चाय राजाज्ञयादीव्यन् । युगपद्वचनोद्भवस्तेषां कोलाहल आकाशमपि भ्याकुलत्यति स्म। तेषु केचनादसन् , परे उदासत । • अभितो वेदयनयः श्रूयन्ते स्म। विभविनां भवनेषु गायका गायन्ति स्म। रमणीभूषणशिजितानि विजयन्ते स्म। पटवासवासितवसनाः परस्परालापप्राटितप्रेमाणः पुरुया प्रेक्ष्यन्ते स्म । यथारीति सम्पन्नोऽभूत्सवः ।

" अष्टमो निवासः २८५ अपरदिने सनाभवने सनामानेपत्तिल्यु सानन्तेय, प्रतिष्टित नागरिकप च, वाषि- कारस्यन्तेषु च लग्ने पु एकस्मिन् तपासने शिते नवि सजयां च समनाया राजा राबगिहासनात्याय वन्यान् सन्योप्यान्तः प्रियाः! सन्याः। विदितनवतद् पनगरजननननसिनियरकप वावरविरो- चनस्य श्रीचन्द्रकुमारस्य सागचिर्पा भाभारप्रदर्शवनिनैतन्य महत कासारस्व च्चे किमत देयनसनीइनाणाः केवलान् सानुवादान् दिन्सनहे, इत्येव महोत्सवस्य विषयः। नहत मानन्दस्वासरो प्रत् धीचन्द्रकुमारी वात्रनिन्द्रस्य श्रीनवन्दुपालस्य पुनो विनयपुरनन्दननरेशयोय जामाता विरत। प्रापदाने प्राणदानमपि खल्यदानन्, परन्तु 'अदानन्नन्ददान श्रेय, इत उत्ता कमनि नुच्छां सति जनारचरपरेपोरारादापात्यै। श्रीनन्तो जनन्ति पदनाक पूर्ती महाराजो ना जोतिशामित्वेन पालकत्वाच राज दत्तवान, ते गुपा अद्य मयि हानाः, न्यतिवना बह प्राः पालयितुं सर्वयाऽसमर्थः । अतोह राज्य लोकस्य न्यास योन्य सर्वधुरी सविन्मनेम्मानसन्तया रानाश्चिम्पानाः पाणिपत्ननप्युशहानि । बनेन कर्नपारनाकं पूर्वस्व राम प्रगाली पारिता नवत या न्तिानुपयुक्ता इति । प्रयसतां जनाना सानुकान सहेव मच्छिनि एनं चामरतुगले च सलग्ने । उसने च्यूटा व चन्द्रिकायाचितेद, नवनानिनिदेव, नालन्दुला, सघनवटन्ढयंत्र नवरियास्तिनावलीव शीदला, नन्दमुस्मिता, शस्वस्खामला कधेव बावना, लाव लाविचारिणी, वीणावायत्रीणा, नविनलकोटा, हिमशुत्रबदना, कापी, पवनामा मुराधा त्वनिवापरा चन्या। ततश्चत प्रार्थन, नापोंदारेन बनिनाम- नाभिनवता नाव। दवावपि लयचराप्य लब्धा, पुनावरि । समृद्धमा यशवा राज्येन नोपुनान्यावेव ननोदन्तः। श्रीविचिरं नितान्तमधुरं वागोशवन्य टस- शास्त्रं तन्त्रतनि विद्रसिपागावाहितोऽगादुपि । रम्यं नानिमनश् चिरं रमवता तत्वाप्टनोऽयं वचन् इष्टवस्य भवेन् नयूसमहिना होनो गुणः सत्कृपः। दतः सम्प्रति मुखी

१६६
चन्द्रमहोपतौ
इतिश्री-
समस्तशस्तशास्त्रवततिततिपुष्परधरस्य पुराणमकरन्दमधुकरस्य
महामान्यविपश्चित्तल्लजस्य श्रीनवरगरायशाविण पुत्रस्य
विश्वविद्युतविपश्चिमण्डलाखण्डलानरूपदर्पदलनदनस्य
तस्यैव गुरो परमानुकम्पाऽवणपारस्य काव्यालङ्कारस्य
श्रीनिवास स्त्रिण
चद्रमहीपती निरगादयमटमो नि वास ।
अखिलवैदुष्यरूपया श्रिया युक्ता य विद्वासस्तेभ्यो रुचिरम् साधारणजनायापि नितान्त
मधुरम् लसशास्त्रम् अतएव वागीशैवद्य किमपि वचन्-व्र वन् विदा रसिकाना पाणी
आहितश्च द्रमहीपतिनामको प्रथ भुवि ज्ञानिमन चिरं रमयताम् ।
ज्ञानपूर्वक चक्षुषा पयवसकोऽध्ययनशील मयूखैरिव विविधै विषय महित युक्त
अतएव गुणै अहीन =पूर्ण सता कृपा यस्मिन् एभूतो भवेत् । तस्यायमष्टमो नि वासो-
ऽगात् । पयऽस्मिन् श्रीनिवासशास्त्रिणा विरचितश्च महीप-इतिवाक्य नि सरति ।
एतस्य द्रष्टाच

नवमो निःश्वासः विद्वज्जनसम्पकों नष्टेटज्ञातिदर्शनाभ्युदयः । कस्य न सुखाय भवने भवति नहारद्रलाभव ॥ नीनवती नवनाभ्या चरणाभ्यामपि प्रफुलकमलयवी । शैवालिनी च केशः मुरसेवं मुन्दरी सरसी ॥ अद्यापि ता कनचम्पदामगौरी मुखारविन्दनपना तनुरोमराजिम् । मुमोत्थिता मदनविह्वलसालसाह्रीं विद्या प्रमादगलितामिव चिन्तयामि ।। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । स भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग भवेत् ॥ रचना विरच्यनानाऽनुपदं क्लेयायति नत्रानेर । कालेन परिचिता सा नुरा गलभूपगीतम्। अत उपसहराम्पेनन् । शरिधरो मनोमोदिन्या कुदिन्या प्रचितपल्या आपल्या सदन्परन्तराधन्यवा 'सरोजिन्या च सहितः समापातो राजनगरम्, वकीय चन्द्रस्य च वृत्तं राज्ञ. पुरो न्यवेदयन् । सरोजिनो पालारन विना प्रभातनिव नन्दनस्यसनीर विना कुबुमितवसन्त इव प्रेयांस विना नापिनराजत, किन्तु किण्फुदिन्तत एकाकिन्येव वयपादौ सृष्ट्या माग प्रविष्टा । चन्दविलम्वे शक्तिपरस्य सरोजिन्याय विशेतः द्वितमभूनचेतः, परं परमविनो- दिनोऽस्य सम्मायदे विनोदविलम्ब इति विचाय किरदाय बभूव मनः। नाव ऋतुरपनम्, ऊनवों व प्रवाशायाने व्यतायुः। शुतयः सूयादिना निनामा, सुदीपनि महान्याययुः सानानि वभूदृश्य। विशाला निया राज्य तेनुनगुश्च, विटा विचच्नु. कन्डमानपावत- स्थरै च। परं चन्दो न समापतः । महाराजो विनिमनश्यनियर प्रतिदिनं वेदाति ।

. ૨૯૮ चन्द्रमहीपती पुनः पटप प्रेरिता, पुनर्वियोगवारा निधे, शोक्सागरस्य च प्रवाहोद्गाराः प्राबल्य प्रापुः । मालिन्य पुनर्मनुजमुखमण्डलान्यभजत। महाराजे मन्त्रिमा मन्त्रयति द्वा स्थो गुप्त- विभागाध्यक्षागमनमसूचयत् । इशिताज्ञत. स त त्रैपयत् । स च निःप्रणम्यासूचयत् -- 'देव, महत्या सेनया राजनगरमधिगन्नुकामश्चिनपुरेशः समेति । शतं शिविकानाम्, प्रतिशिविकं निष्कोपनिस्विशानां बलवद्वपुषां पदातीना शतम्, भोशुण्डिकाना सादिनाच विशती, मदमतमातस्थायिना द्विशतो, भलकराणां नराणा चतु शती। विज्ञानक्ला असख्यातयन्ना परा सेना, तस्या रक्षायै चावारोहिणां पदातीनाञ्च दशसाहस्रो। परा च मरुत्तरारूटा वस्तुजातरक्षायै पञ्चसाहस्री। सहस्रशश्च कर्मकराः सेवका. पाचका निवेशकाः। प्रतिदिन गव्यूतिपञ्चक प्रचल्न वनाइन कृतनिवेशः समायाति ।' राजा-दुईवेऽविचारितागमना विपद स्फीता भवन्ति। मन्निन् , को विचारः मन्नी--युवराजे गते सर्वत्र शिथिलता विद्यते विभागेप, अस्यां स्थितौ सन्धिरेव गरीयान् । राजा.-नहि नहि, एतन्न भवितु शक्नोति । महाराजो नवेन्दुवीर आसीत्। शक्तिवरप्रबलावपि गणनीयगुणावास्तम्। एतेपा साहसगिरा निर्जीवाना मानसेऽपि साहसविक्रमाच्या समचारि। राजनगरसेना जगद्विदितपौरुपासीत् , चन्द्र गते शिथिलता तामजूगुहत् , तथापि समुद्रः शुष्कोऽपि मानस सरस्तिरस्कर्त, प्रभवत्येव । - विभागास्त्वासन्नेव, विद्युत्स्पशेनेव तेष्वेका नवीना स्फूत्ति समाजगाम । सेना जलै वियद्वाहिनी च वियति, मरुत्तरचमूश्च स्थले सज्जिता। 'छत्रधारिसैनिका खाभ्यास वर्द्धयामामुः। नगरमन्धतमसेन परिचित कारितम् । स्वम्भानां प्रवन्धका नियुक्ताः। जलनिमजिन्यो' विरङ्गीकृतरणपोताः सुरङ्गाश्च समुई पर परप्रपोडकास्तारपीडका. परपोडायै प्रेरिता ! आटङ्कना लोहस्स चञ्चला दुर्भद्यदुर्गा भीषणशक्त्या जगदुद्दयामासुः । सहस्रन्यो दलमनतोपा अय समुद्र प्रकाश- प्रसारिता.। १ पैराशूट २ अन्धेरा (Black out) ३ (Light-housa) ४ पनडुब्बियां ५ मुझे ६ तारपीटो (Torpeedo) ७ टैक (Tank)।

नवमो निवासः १६६ तेलनिन्धा बभूवुः। जगती सन्देहसिन्धी जुबुझिनु वियोदामका बनाः विस्फोटम्वना' नगरभस्मध्माणोऽनिश्मा' शीभविस्फुटनशीला, सनयापेक्षिग'श्व वनाः प्रचुरमाना निनिताः। गोटिकदामिनीना तिः परीक्षिता। नरसहरमा शिक्षा अश्रुसारिणः क्षाविषः तोदोत्पादिनो विसर्पदम्पादिनच नेपाः," प्रभाव- प्रचारेणेव भुव भीसाइकिरे। परप्रदान गैपान् व्यर्ययितु दुष्टबातोपोधिका". सहमहा सनारयः। परममुन्दयों गानवायप्रगलोलाप्रतीपा पाण्यावरतानाचेर। "वासोपन्नागि सैनिकवासमां कृते नियन्त्रितानि। तारविमाने, दूरालापयन्त्र विभागे," "अठारहत्तोदोपविभागे व राजनिमन्त्रणानि यनद । राजभवनानां निभवना- ननुपरि पानतश्च सिकवासंग्रहः समबनि। विचित्सालयेषु विशेषविहान्यहितानि । शिशूनां स्त्रीपाद वे पृथव्यवस्था प्रारभ्यत। भूरक्षागृहापि" प्रचुरमाश्या सलरसत्तर निनिवानि। पायानविष्वाकतोपाः भविष्यनिदेशकयन्द्रप" व्चत निदेशकयन्त्रण च सयुक्ता आश्चर्यकर कृत्यं चनुः। वायुयानदर्शनाच प्राधीनि प्रकाशयत्रापि" आदिवनि । समस्मिन् राजनगरे यानान्तनबाटा:" प्रसारिताः। गुप्तमायाप्रयोगाः १ वमतीति वनः "वन् उदिर,' 'पचाय। विस्फोटतीति विस्फोटकतस्प पदाथाय ना इत्पर्यः। (Hith explo are bombs) २ दाहकवन (Incandiary bombs.) ३ पृथ्वीपर गिरते ही पटनेवाले Immediate tombs. ४ टाट्न पर फूटनेवाले वम (Delayed Action Bombs) 1.५ मशीनगन Nachinegans, ६ वरीली गैस (Poi-onous gases)। ७ रुलाने वाटी गैस Tear gaat ८ रिकने वाली गैड Sose irritant gast ९ चुनचुनाइटपैदा करने वाली 19 Lang trritant sas! १.फकोले उत्पन्न करनेवाली नैस Blister gast अत्र संघ गेप अनिन्दापनित्यस्मात् पनि 'गेष, शब्दः । अन्विच्छा-अन्वेन- मावि दरमितिवादन् । ११ गैस के असर को न होने देने वाली टोपी Gasmasis | १२ काटनमित्स। १३वार। १४ टेलीफोन । १५ रेडियो। १६ नोंदोज रगइ । १७ हवाईजहाद को नष्ट करनेवाली तो Anti Aircrafs Gun. १८जिसने यह माल होता है कि गोला जब वहां पहुंचेगा, वहीं दबाब नो होगा। १९ जहाज की लम्बाई नील, कोट, झाने मादन करने का यन्न। २० अधिक पावरवाली टाइट। २१ बैन रे (Balon Banse) एतरह का पाल, विमसे रगड़ लाते ही उहज में आग लग जाता है। 1 २०० चन्द्रमहीपतो सङ्केतलिपयश्वार्धप्रापण नवां रीतिमनुसत्र । पक्षिणोऽपि श्वानोऽपि शिक्षामाहेदु । सूक्ष्मबुद्धय इन्द्रियज्ञाननिपुणा विविधभापाप्रवीणा, लिपिजाळारयुधा तत्त्ववोधविभो' नियुक्ता। ल्यवो युद्धपोता रक्षकपोता' सहायकपोता औपचारिकपोताश्च विविध २ सम्भार सम्मृता । भय राजनगरस्य चत्वरान् चतुष्पथसमुद्रानभितोऽभिनव आहवकोलाहरस्तरजायते । सोऽय वारणार्थानामोप्सित कालो वत्तते। अलङ्कमाणेषु नवयुवकेप किमु प्रौढप्वपि नवीन उत्साहो मुखरीभवति । सर्वेषां करौ स्मभ्रसाधने लग्नौ स्तश्चधुपोश्चारुणिमा प्रक्ष्यते परितो वीरतावरवचास्युच्यन्ते यन्ते च। भटानां वीरभावो भेरीमकारेण दुदुभ ध्वानेन चतुर्गुणितो भवति । युद्धवाद्यन योद्ध णा पादा स्वयमप्रतश्चलन्ति । पूर्णीजसोऽत्यतीना अश्वा अपि रणकण्डूमपनेतु सर्वप्रथम जिगमिपया कृत्छण सादि भिर्वार्यन्ते। मदमत्ता करटिनो घण्टापोपैविश्व वाचालयन्त प्रावृपण्या सविद्युतो वारिदा इव अभितो भ्रमन्ति। खाना खणत्कारेण कुन्ताना प्रभया भुशुण्डिकाना तोभाना तुमुलेन शब्देन शबखाना ध्वनिना सर्वा दिशोऽद्य परस्परमालपन्त्य इव प्रतिभा त। सर्वोच्चदुगशिखरेऽभिमानलालिता जगमानिता कीतिलतेव विजयपताका फपरायते । मुकुरमनोहरे, निमलनिमले, प्रोच्चमोच्च आकाशे हाणा कनककलशा , विरोचनकिरण कुलेन धौता इव विश्व विहसन्ति। तत्र तत्र वातायनेषु स्थिता सौभाग्यमु दय कमनीया कन्याश्च पुष्पाणि पुष्पमालाश्च विकिरन्ति । यत्र तन वन्दिदेन वीरवराणा वर्णना वण्यन्ते। भगिनीभिर्धातृभाला भूष्यन्ते। कश्चन सवर्मयति, इतरोऽनुलोमयति परोऽभिषेणयति । मन्त्रणामन्दिरे मत्रिणो मनस्यापक्षीणतामक्षीणयितु अमित सतर्का धृतद्विनलिका सैनिकपहरिण सर्प भ्रमन्ति । एको दूतश्चिनपुरनामा वितपदकप्रतिष्ठ आगत्य प्रहरिणमसूचयद् यत् स चित्रपुरेशस्य पत्रवाहकोऽस्ति सप्रयना प्रतीयते। १ सैन्सर । २ छोटा जंगी जहाज Sloop | ३ Escort ship ४ Auxilary Vessels Hospital Ship नवना नि.यासः महराज दिहते" इति। प्रहरी व त प्रहरिपडमध्ये न्यस्य, दन्त समान्य राजालनचयत् । स च तलागमन दूतागमनविपिनमर्नु । अधिनिबद्ध- पट्टिक स परित आसनसन्याया परिषद समागत्य नहाराज ददर्श यत् उकुनाद- तोदिनोऽष्टितः धास्त्रेषु गुन्मितो गुगरने, अनुसारच पति परतवर्म इस सोदाहरणो राजा राजठे। न्ध निः प्रपन्य जननेविविधनावभनया वचनामः पत्र प्रादात् । महारानः पन पृथ्वोऽवटोक्य मन्त्रिण फनायाटिशत । बनन्ययोदप व्य प्रय हटो राजानमप्ययावत् । श्रीमत्तेजम्यान्तखान्तसमकानन्ददेदीप्यमानार्गाजतनापटिमलिन्दुब्योरपलन- खदीपिवितिनाशितापमवतनस्ट अन्वतनमुखाहनकाल्मुला पुची तोकृतनिविष्पेप प्रत्याभास्करायमानेषु श्रीपितृवरप सादर सस्नेह मियाचा पुरस्सर अपमति। नाता उंचविशुद्धः इन चित्रपुरम् अथ चन्द्रस्य पनिदमिति मुखरितेप्पलिटेप शोन्नम तिमि त विचारपत्नु वोरम्मन्येषु प्रमानेच राजत पत्रवाहकन वह नत्रिम उनहाल - "जयलो धिचन्द्रो महाराज" "बा देव।" “जाने क्षत्रियोऽति।" "या देव" "धरोरेण साह न पुटबन्द" [सकीय राति एलप्रपोगम सिख इन ] "ला देव !" "कि महत्ला नया चिनपुगोस्वन सनावातचन्द्राव" "मा देव "चित्रपुरत एव त्वा प्रपिटवन् !' "टिव" नवमा निश्वास ००१ महाराज दिक्षते" इति । प्रहरी च त प्रहरिपत्रकमध्ये न्यस्य, तदात्त सभाम्य राजानमसूचयत् । स च तस्यागमन दूतागमनविविनानुमुमुदे। अक्षिनिबद्ध- पट्टिक. स परित आसनसभ्याया परिषदि समागत्य महाराज ददर्श यत् कुङ्कुमेनाविक तोऽधितोऽकुण्ठित शास्त्रेषु गुम्पितो गुणरत्ने, अनुस्वारस्य ययि परसवर्ण इव सोदाहरणो राजा राजते। तञ्च नि प्रणम्य जननेविविधभावभङ्गया वीक्ष्यमाण पत्र प्रादात् । महाराज पन पृष्टतोऽवलोक्य मन्त्रिण पटनायादिशत् । अमात्यचोद्घाव्य प्रपठ्य हटो राजानमप्यावयत् । श्रीमत्तेज शान्तखान्तसमस्तसामन्तदेदीप्यमानागणितर्माणखचितौरिमुष्टोज्ज्वलन- खदीधितिततिनाशिताशेपभयतमस्सु, असन्तस्तप्रजासुखाट्टहासप्रकाशसमुत्पनयश पुन तीकृतनिविटपेषु प्रत्यप्रभास्करायमाणेषु श्रीपितृचरणेप सादर सस्नेह समायाचनपुरस्सर प्रणमति। चित्रपुरम् भवता मुचिरवियुक्त पुन चन्द्र । जय चन्दस्य पत्रमिदमिति मुखरितेप्वसिटेप शोभनमापतितमिति विचारवत्सु वोरम्मन्येषु भ्रमव्यग्रे च राजनि पनवाहकेन सह मन्त्रिण एवमभूदालाप "कुशी कञ्चिचन्द्रो महाराज ?' "आ देव।" "जाने क्षत्रियोऽसि" "आ देव "शरीरेण साहसेन पुष्टश्चन्द्र ।" [खकीये राशि एरत्यप्रयोगेप खिन इव ] "ला देव ।" "किं महत्या सेनया चिनपुराधीसत्वन समायानश्चद्र एव ।' "देवा" "चिनपुरत एव वा प्रपितवान् ?' "देवा" चन्द्रमहोपतो "तदाम्मिरमसत्कियामपेक्षवेस ?" "आं देव।' "तहि सूरय वयमायास्याम ।" " देव।' किचन्देण'आ दक्ष-इत्येव कथयितु नियुक्त !" "ओ देव!' वात्तव परिवत्तिता। इश्चिन्द्रायणयोराम्रनिम्ययो, दीनारकपदयो , सुभिक्षदुर्भिक्षयो युद्धसभ्योरिव भेदा बभूव। शोरभिमुख प्रयानी महती सेना चन्द्रस्वागत चिकोर्पया प्रोज्ज्वलमानता बभूव । कणाकणिच्या क्षणे समाचार सर्वत्र प्रस्त । मलिनमुखे नगरनरे विलक्षमा दीप्तिरागता। सवै सम्मिल्य पताकाभि' ससरणसेवन परिमलविटप यासैमालामालाभिद्वाररचनैश्च पुर पुर दापुरय मामु । हारकावरस्थकोरगिरा विधूणिते प्रासादे रम्यासन्धामासीना राजमाता। भित्ति भजमानाना श्राजमानानां विटपाना पुष्पलताना सौन्दथ्य भवनसौरभचादाय धीरधीर समीरो विश्वस्मिन् वितरितुमिव वाति। सरोजिनी च सलपि सखोशते दासीसहस्र परमप्रेमप्रसद्धप्रणया खयमेव लघुना व्यजनेन व्यजयति। करकलितळीरा कुमुदिनी च शिल्पिनो नैपुण्यवीक्षणे निमग्नचित्ता अधस्तादुपरिष्टात् पार्श्वतश्च हर्म्यस्य रचना सौन्दर्य दौर्बल्य द्वरागि अवस्थानश्चेक्षते। सेव हर्मरक्षायै अधिकृता। शतशो दात्यस्तस्या आज्ञया परितो भ्रमन्ति। एका दासी तस्या कर्णान्तिक शनैरवोचत् । साच सरोजिनीम् । सरोजिनी.-सत्यं कथयसि वा व्यामोह । कुमुदिनी०-व्यामोह ? महाराजमुखाच् ध्रुतम् । सरोजिनी-किश्रतम् । कुमुदिनी-यच्चित्रपुरेशत्वेन तब सौभाग्यसिन्दूर समायाति । सरोजिनी-कास्ति द्वारि। तिहारिणी 10-(प्रविश्य ) आज्ञाप्यता महाराज्ञि !

नवमो नि.श्वास २०३ सरोजिनी-तारतां राजसभास्वादः । * * योजनदीर्घः समारोहोऽय नगरससरणानि व्यापत्। हर्पवर्षप्रसन्ना भूमिहरुीय आकाशमपि विदितत्त चकार। तोपानां निनदन दियोऽपि विपिता। सनये राजभवनं प्रविश्व अवनपितपितृपादः पितर मोहमुग्धमुखी मावरच प्रगनाम चन्द्रः। प्रगेमतुश्च हर्पभुवनेशौ । अय सरोजिनी कविकामिनीव वृशा प्रोच्चविचारा कमला प्रणम्य प्रदनशतेन कुशलमपृच्छत् । कमला व कमनीया गुल्या चां निर्दियन्ती सर्वमसूचयन् । करुननसा सरोजिनी व प्राणप्रियाणानेता विपत्ति सघुल नाराकमोद वाप्याणि । * * . "देव, नहतो दुःखस्य विपर, महानात्यो विद्याधरः सन्यानाकान्तोऽकरनाजगजहाँ" -गवस्नेन नृत्येन महाराजो नवेन्दुर्चददि। "आः विद्याधरो दिव गतः, अधु-व मया सह बहुशो राष्ट्रिययोजनासालप्य गती तय हन्त : कीरक झगभगुरमिद शरीरम्, कोहयो व्यामोह , नीतिर्मानकीन क्या, विसः परमसुन्दयोऽप्सरस इव स्नुपा. सोदयां झारलहाः मृदुलतभावाश्च, प्रियतिसा जगदमपविपुलपतिनश्चन्दः सुभगो पानी, मुनस्थानच राज्यम्, तथापि नाह लकुमुन्सहै, अनन्तेय नोहन्द्रा हन्त ! "नल! यानमायोवध शाघ्र मा गुरुसमीप प्रापय-"वन्दुना प्रोचम् । "गुरो! श्रीगय समारः कथनस्मादावत्ताद् हिर्गन्तुं शक्यते"? राजन्, अहानमेव बन्धनम्। अजानन् क्या पुमान् नवनपरे भ्रमननुमति वन दुखय तया न जानन् । मानमेव मोक्ष, सनमेव पन्धनम्। सरि नान मुखन्। पुनानोमुराया नमन् दुम्पनेवाप्नोति । मुरा नु वल भगदत्तत्वानुसन्धानम्। तमप्रकान्ते निवसन् नटुविधिना प्यार मागोन चिरेम प्रायधिनिप्पीति ने विश्व मापात्मिना "वन्य परिगत किनान भवन" है २८४ चन्द्रमहोपतो महाशय! मा जना के के शारनीति भाषन्ते" के के शास्त्रीत्यस्य कोऽथ 1 के के ०-अर्थन्तु भाषका एव जानन्ति पर लोके भाप्यते मनामैतत् सैनिक ! सैनिक •-(सहसम् ) एतदेव पृच्च्यतेऽनयक साधक वैतत् ? के के.-को जानीते। सैनिक ०-क-ब्रह्म व जानाति? के के.-(अनपेक्ष इव ) सम्भाव्यते । सैनिक -(सादरम् ) मपत्वाय । उत्कण्ठाकलित तसा पृष्टम् । के के-केचन कविताक मिनीका त परे च कमलाकान्त इति खरूप प्रकाशयन्ति । सैनिक -आ एवम् । आडग्ललिप्यनुरूपम् (रिचिद्विरम्य ) कि क्रियतेऽत्र महानुभावेन। के के ..-कि क्रियते अस्मिन् काले किमपि कत्त शक्यते । क. पृच्छति पण्डिता कोऽद्य पिपठिषति सस्कृता वाचम् । दोहासवैयारचयितृणामल्पज्ञाना केवल कण्ठमधुरिम्णा मोहयितृणा तथाकथिताना नवीनानां कविम्मन्यानामद्य सम्मान । साद्य जगद्भापाजनन्यपि विश्व नोच्यमानापि विभिन्नरूपेण, मृतभापति शब्द्यते म्लेच्छ भाषाविद्भिनवीनै । सस्कृतज्ञाना सुदुस्तरतरा दारिद्रयापगा प्रतिदिनमेधते। यया प्रपीड्य मानमहोदधिवराश्चक्रवत्तिभिरपि प्रत्यहमज़मानचरणयुगलचरा अविगणय्य अम्बरमभ्यगणितगभस्तीन् खेदनाता प्रतोलोत प्रतोली पयति वचनव । येऽनलिजलमानतुष्टास्तपोधना राज्ञोऽपि वाहीकृत्य फ्लु सक्रोधषु येषु लोकपालानामपि त्यत्तस्यैयधैय मन त एते प्रक्षीणतपोवैभवा अज्ञातजातीना धनिना गृहेष्वनाहूता यान्तों विना प्रणाममाशिप बदत उद्गारे जम्भण च विरोव इत्यादिवतो मिथ्याचारा ध्वाछ क्षायन्ते। असत्योत्कोचद्यताधिगतधनाचरिनाचारविरहिता धनिनश्च समुद्रपेनमुधासार कारण्डवण्डपटलायित्तसितहितशीतवसनविभूपिता कुन्तस्तलपरिमलेन भवनमामो दयन्त पक्षद्वारलामोशीरा शीततापनिय प्रण सेव्यमाना राजतपादपेप मोप स्थिता नद्य माना सम्प्रति नवमो नि.श्वासः वेधमिव वन्तः स्वत्योत्पादकान् पर्वकाश्च नाह्मणान् भवन्ति । धर्मरक्षकाः प्राधान्ये- नासन क्षत्रियाः, पर तेऽधुना मासे मद्येच शौर्य चिन्तयन्तो निन्ना जवाब लानिवांपाय परन् नन्तोऽनुपनीता वालाः कन्यादानपातचिनः परस्परविरोधविनाशितधरा विशा लालाटिम्टा कुर्वन्तस्पा पुत्रोत्सव सम्मान लभन्ते। राजानश्च विलासाचारपावकाशमेव न लभन्ते दुराचारा वश्यामकः। सैनिक, विचित्रचरित्रोऽयं कलन्ततपशोराशीन कारणबन्धून राज्ञोऽपि भिक्षुकन् करोति, धर्मसूतीन हरिश्चन्दादेन् गच्छोपनीविनः श्मशानसेवितो निष्कस्य नृत्लतनुपनर्यात सौदासदी च नरभौजित्व प्रापयति । दृश्यतास्मिन्नेव नगरेऽस्मा: सुवराजश्चन्द्रो विद्यावुद्धिविवकवित्तोऽपि प्रयसा- प्रगमपूजनामा दिलासामुक्तः समयमविवाहयति । नितरा चोम्यवादमासीत, बझ. प्रटिना अनेन कृतवरा प्रजातन्नपद्धत्या शासन्मनेन प्रविनावावर परमाना मधुना हृतविवेकः च्य स्मरत, प्रेसानूपुरमा तो कय प्रजाकर गुगन्। सैनिक .-सत्य देव! एतदर बातम् । पर चन्द्रो हृदयन शुद्धः सदचारच, परिस्थितयत्तमेवभूतनकर्षः। अह चन्द्रस्व सन्निकटः स शीघ्रमेव स्वविनानुसारं चिकीर्पत। परमेतनिश्चित यत्तस्योद्यान मालतीपरिमटेन गणिकामुरभिषा बालगन्येन गुपिकलहसकलसनकरन्दलुब्धाना पल्पदान महनिराजन्येन मुशोभित- मासाद् कुटिलकालकटाक्षकृष्णाहिनष्ट धुलियूसरित रमशानायित बातम्, पर चतुरी मालाकर व तशीघ्र पुनरजीवयिष्यति । स न मयपो न च श्रीभक। वस्य विवहनयनी परिस्थित्या जातम्। सरोजिन्या विवाहः कमलाऽऽहम। चम्पया च कमलां वा विज्ञाय राष्ट्रप्रत्यावर्तनानुसुच्चन । तस्य स्नियोऽी पुरुपनिविशेष राज्यमनपुमा प्रजातन्त्रपद्धती प्रेरयन्ति । धूपः स खास्त्रिय एव विभिब प्रान्तेषु राजप्रतिनिधिवन यिनुमिच्छति। हिन्त्वेतत् संबंया सत्व यद्विपरीतारते कालः। प्रत्येकस्मिन् क्षेने विपरीत नैव स्थिति परवानः। नयाटिनः पुरयाः पुरा वरा गयन्त ग्न, अधुना न शिरसि विन्यतया निमुखाः स्त्रीनिविशेन एव शिष्टा लभन्ने। करवली या मालिकानां वर वधुनिकता क्या वर्षा वायति । । .

२०६ चन्द्रमहीपतौ पूर्व पुरुषाणामाज्ञया स्त्रियोऽधुना च ता एव वाम दक्षिणयन्ति। प्राचीनाना वास्मिता यथा तथैवाधुनिकाना धूर्तता। नवीनाः सम्प्रदाया प्रतिदिन प्रेक्ष्यन्ते। जगति जागरूकदम्भारम्भा जना जठरपिठर• पूरणाय अविवेकिजनवञ्चनाय सुतरा खपरिवारपूत्यै मिश्यायशःप्रचाराय च नवीन सम्प्रदाय प्रचारयन्ति । नवीनत्वञ्च प्रचलितविपरीतत्वम्। जगत्प्रचलितस्य सम्प्रदायस्य व्यवस्थापका जटिला मुण्डिनो वा, अतो नवीनै केशा लुन्च्यन्ते, प्राचीनाः स्नान्ति जनता परोपकाराय प्रेरयन्ति च, नवीनाश्चानान्तो मातापित्रोरपि सेवा कदर्थयन्ति। चन्दमुख्य कमलिनीकमनीयतनुलताः कदलीकोमला वालिफा. परलोकतारिण्यादिपदैश्वाटुशतैः प्रवचन- वचोभिः प्रलोभ्य यौवने पदमर्पयन्त्यः प्राधिता अनेकवरैः प्रथिताः पृथुगुणै. केशान् विलुच्य वास पट्टिका मुखे आवध्य स्नानज्ञानाचारसस्कारान् सर्वथा परित्यज्य केवल विषयनिरतैः ( केवलिभि. ) छद्मधर्मगर्तेषु पात्यन्ते । के०के०-अक्षरशः सत्य कथयसि । सैनिक.-भगवन्, जगत खाभाविक एप धर्म । स्थापयितुं शक्यते, कि पुनर्मानवानां चञ्चला प्रवृत्ति । विचाराः प्रतिक्षण परिवर्तन्ते। अस्तु, अह देवस्य परिच्य श्रोतुकामः । के. के.-खल्पीयान् कविरहमस्मि, सोऽहमधुनाऽस्वस्य इति गृहीतावकाशो गृहे निवसामि। सैनिक -तहिं धीमन्तः कवितामपि तन्वन्ति ।। के० के०-आम्, कशचित्तुहलपरवशः। सेनिक'-किंविषयिणी देव! के० के०-को विपयः, यस्यावसरः समापतेत् , स एव विषय । सैनिक:-गुरो! जगजालोद्विग्न चेत. साहित्यवर्वाश्चरितुचेष्टते। यदि नास्ति भवतो वेलाविलम्ब', यदि चेम साहित्यमुधयाऽनुजिघृक्षन्ति, तहि पूरयन्तु ममाभिलापम् । के. के.-क्षत्रिय । कः संसारविहारी एतस्माजगजालादुन्मुक्तोऽस्ति । माशा अप्यस्मिन्पाशे मुमृश यद्धाः, परं साहित्यचर्या चरितुमोहास्ति चेद् ब्रूहि क विषयमधिकृत्य खां प्रसादयामः । त्वमस्माकमद्याभिनव. साहित्यातिथिः । नद्या. प्रवाहोऽपि नैकर 4 २८७ नवमो निश्वासः निर-गुरो! साई बनानवापिटत्य नि सा नने नोहिनी स्वान्तः प्रसादनी रखना भवेत् । कु.३०-पतिष्ये। गद्य रोचते रत परम् । निक-भगवन् । परन् । के० ३०–ोतच तन् । महनव समपस्व सचिन नः पुर जापानि- मुपदशारदपोर्णिमचन्द्रमामुविशदप्रभभाखरविरहान् । अबहुदश्यनुरती नती विपुलविनमचिन्त्यगुगा नुनः (१)। मुख ददाति नन्दो यः शरदिनःशारदः "छवम् चारदः पोजिमचन्दरदन- विधानः चलचन्ति , नातरच विनहो यस्याः सा तम् भबहुदशि भवस्त्र वृतो - रचनावां विप्नसमूहम् आधारमन्ती अनिवनगुणा कमर तुनः । जिगमिपुर्दिशि पाशभृतः पपीरपहरन कमटश्रियनीक्षितः परिचितेरित लजितमानसः ममभवन् परिरक्तसिताचतिः (क)। पासवः वरुनय, दिश-पशिनाना, धिनिपुः गन्नुमच्छुः पा स्य, परितो र चासो, मिा भाइतिर्वस्वत सनमवत् । काटनां शिव-शोमा कहरन् , परिचित-लोक-लोकः इति टन अदएष जिवनाना झ। अाहरमवनय बॉऽपि जठे। भनव उहरिनसुनिन् दगा कर्मगि प्रवृत्त दव नदानास्पदम्। लवनस्य मुख र ति च भवतीत्यनुभूठन् । सम्ल्यासरविनिमगातपत्र्यथितकाय योमलितोऽमिना । जलनिवाविव मइन्तु नमोहते कमरबातविशोफिविभारः (३) । कमवादवियोको ची मिनार-मालयोनारी र सूबः। किता उच्चस्त व वडिदन्यः प्रहलो र इव, सलवासरे दिन, दिनरुवा भदपेन पतिया-दुरिजरीर इव अनिया में नकार्नुभन हन हन । प्रणरीक्षितपापदन्यकं गमचिनयितुं नुनितानिनः । गिरिगुहामुपविश्य तितप्तति वटादितवाधिनुपनि वा (e) २८८ पन्द्रमहीपतो इनः सूयः। मगे वोक्षित दृष्ट, पापकदम्बकम् - अनावारसमूह,गमयिनु = नाशयितुं, मुनिता - नुनिभावं, मयितु = प्राप्तु, गिरिगुहाम् - अस्ताचलदरीम्, उपविश्य = आसनत्वेन परिकरप्य तितप्सति - तप्तुमिच्छति । खस्मात् (जात) कुल-खकुल-सूर्यवंशस्तेन वद्धितो वाधिः समुद्रः (पटिसहस्त्रसगरमुताश्व मृगयमाणरेप सनितः-इति पौराणिकाः )त वा उपेति । उपतटोद्गतपाइपमञ्जुले किसलयारणिते नववजुले विशदवारिणि वाधितटे शुचावयि । विधित्सति सान्ध्यविधि रविः (१) रवि, तटस्य समोर उद्गतः = उत्पन्नः पादपैः नन्जुले-मुन्दरे। किसलयै- नवानररुणिते, न्याः- नूतनाः वन्जुला = वेतमा यत्र, गुचौ -विशुद्ध जन्दुर्गम- त्वादितिभव । विशद वारि यत्र तथाभूते वापित = समदकूले, सान्ध्यविधि विधातुं- कर्तमिच्छति इव । क्षितितले कमला भवता प्रिया युवकराजकवाञ्छितसुस्मिता । इति निवेदयितुं जलशायिने सरितमस्तमगादिव भास्करः (६) क्षितीति-"युवैव युवक, राज्ञा समूहो राजक “गोत्रोक्षे ति वुन" तेन वान्छित अभिलपित मुस्मित यस्याः सा भवता प्रिया भवतां प्रियेव सुन्दरी कमला, क्षितितले मर्त्यलोकेऽस्ति-इति जलशायिने भगवते विष्णवे निवेदयितु इव भास्करः = सूर्य, त्वरित यथा स्यात्तथा अस्तमगात् । सैनिक० । शास्निन् । केय कमला। के० के० । कवयो हि नाम केवलकीर्तनपरा वस्तुनः सौन्दर्य मुनिरन्तो निर्दूषणा न दोपभाजोभवन्ति, अम्भोजनिरिवाम्भस'। कापि भवेत् कमला । सनिकः । तदैव निस्तारः। अस्तु, प्रकृतमनुसरन्तु । उपगतेऽपगति जगदक्षणि विपुलगर्वसर्वविधूननात् 'गगनसंसरणात्परिमार्जितं निपतितं पततीन्दुसमं रजः (७) नयमो नि.श्वासः २०६ जगतोऽक्षणि: =चरावरस्य ने भगवति सूर्य, अपगति-अस्त प्राप्ते, विपुलगर्व- श्वासी सदा-श्रेष्टाश्वस्तस्य विधुननात् = कम्पनात् निपतितम् , इन्दुसम-कर्पूरतुल्यं रजा, गगनमेव ससरण - राजपयस्तस्मात् परिमाजितं सत् पतति । श्रान्तोऽश्वः शरीर विधूनयति । , उदरदर्पविनाशझतनमाः शुकम्पोतमयूरपिकादयः । कथयितुं दिनदृष्टमिवाद्भुतं विविशुरेत्य कुलायचयाँस्तरून् ।।८।। उदरस्य “नाह केनापि पूरणीय भवामि” इति यो महान् दर्पस्तस्य विनाशे- सकृनाशे कृतः श्रमो यैस्ते शुकादयः पक्षिण, तरून्-खाश्रयान् दृशान् एत्य दिनदृष्टमद्भुतम् = आश्चर्य परस्पर पालेभ्यो वा कथयितुमिव कुलायवयान विविशुः । अगरुतः शिशवोऽशनयान्विताः सफणचन्चुपुटानथ वीक्ष्य तान् । विधते विरुतम् , नवपत्रिताः शकुनिभिर्विटपाः सुपमामिव ||६|| न गरुत् येषां तेऽगरुतः - अपक्षाः, अतएव शिशवः-बालाः पक्षिशावकाः । अशनया = बुभुक्षया, अन्विताः-युकाम अझण-अन्नकणसहितं चन्चुपुट येपा ते, तान् पक्षिण, वीय दृष्ट्रा, विरुतं-- कलरव विदधते-कुर्वन्ति। अय विटपाः शकुनिभिः-पक्षिभिः शुकादिभिः, नवपरिताः- सजातनवपना इव मुपमा परमां शोभा धारयन्ति । :-साधु । पण्डित | साधु । वस्तुतः कविताकामिनीकान्तोऽप्यसि। कवीन्द्र । अनुभूतोऽस्येकस्मिन् विपये, पुनरिमा पूरयित्वा अनुगृहाण विलक्षणार्थी समस्यां "दिनकरे रजनीकरतां गते।" के. के-क्षण नभो विलोक्य ) भृणु- प्रचलितेऽहि, तमोलिहि भास्करे कमलिनीवलनादिव संस्थिते । मुसरितं विहितं विभिरावनं दिनकरे रजनीकरता गते ।।१०।। अहि दिने प्रचलित, तमोलिहि-तमोहन्तरि भास्करे- सूर्ये च, कमलिनीवलनात् - पसिनोपहोचात् 'वल सवरणे ल्युट् सस्थिते इव- मृठे व लक्ष्यमाणे, अत एव दिनकरे सूर्य, रजनीकरता गते प्राप्त, विभिः-पक्षिभिः, आसमन्तादनमावनं मुखरितः - १४ २१० चन्द्रमहोपतो वाचालितम् । निशाकरणे सूर्यस्यापि अस्तमयनेन साहाय्यम् , अतो दिनकरस्यापि रजनीकरत्व युक्तम् । लघुष पुष्यरथेषु कृतस्थिति भ्रमति वृन्दमिद रमणीजुपाम् । विमलमाल्ययुजा सुहृदामितो दिनकरे रजनीक्रता गते ॥१|| दिनकरे रजनीकरता गते लघुषु खत्पेषु, पुष्यरथेषु-सुखभ्रमणार्थेषु रथेषु ' तागा" "वग्घी' इत्याख्यातेषु "असौ पुष्यरथचक्रयान न समराय तत्' इत्यमर । कृता स्थितियन तत्, रमणोजुषा-स्रीपरिप्रहशालिना उन्द-समूहो भ्रमति। इतश्च विमलमाल्ययुजा - निर्मरसजा मुददा मित्राणा द्वन्द भ्रमति । अरुणिते सुरवर्त्मनि तारका वृहतिकाङ्कितशुभ्रकुशेशया । वभुरियातनुभास इनद्विपो दिनकरे रजनोकरता गते ॥१२|| दिनकरे - सूर्ये, रजनीकरता=अस्ततामिति यावत्, गवे प्राप्त, इनद्विप = सूर्य- विरोधिन्यस्तारका, सूर्य उदिते एता निप्रभा भवन्ति अत एता सूर्य द्विषन्तीतिभाव । अत एवातनुभास = प्रोज्ज्वला । अरुणिते = लोहिते, मुरवमनि - वियति, बृहतिकाया- उपयाच्छादनवस्त्रे , अङ्किता रजतखणसूतैश्विहिता, शुभ्रकुशेशया = सितम्मलानीव यभु । वियति मौक्तिस्वृन्दमिवातत रवितुरङ्गमकण्ठतलाच्च्युतम् । विपुलभं भमल प्रतिभात्यदो दिनकरे रजनीकरता गते ।।१।। सर्वेऽस्ते विशिथ्यभ नक्षत्रवृन्द रवितुरआमाणां - सूर्याश्वानां कण्ठतराच्युत विति- आकाशे, आतत= विस्तृत मुक्तावृन्दमिव अल प्रतिभाति । कमलिना मलिनो समभूदर कुमुदिनी मुदिनो भ्रमरै समम सरसिका रसिकाचितभूमयो दिनकरे रजनोकरतां गते ॥१४॥ दिनकरेऽस्ते कमलिनी-नलिनी, अरम्-शीघ्र मलिनो समभूत् । सरसिका - सरस्य रसिक - भारके, आचिता-व्याता भूमयो यासा ता अभूवन् । अहनि कार्यकदम्बभृशाकुलं जनकुल शयनीयगृह गतम् । नभस आविरभूत्सुमहत्तमो दिनकरे रजनीकरतां गते ॥१शा , नगमो निवास. ०११ सूर्यऽस्ते, अनि = दिने, कार्यक्दम्वेन-कर्मसमूहेन, नृशमाकुलम्, नरकुलम् अपनाच- गृहम् स्वाबास गत । नभस सकाशात् मुमहत्तनश्वाविरमूत् । क्षणदया विततं स्वशिरोऽशुकं रजतपुष्पयुतं कृमिकोशजम । गगनमृझगणेन विभासदो दिनारे रजनीकरता गते ॥१६॥ सूर्वेऽस्ते, भदो गगनम् -आमाशम् , मगन तारकासमूहेन क्षणदया - राया, रजतपुष्पत ऋमिकोशज-- कौशेय खशिरोंऽगुकम्-उपरिवन विततमितीव विभाति । यन्वदेशे स्त्रिय कौशेय रजतपुष्पादित “बोटना" पदवाच्य उपरिवासो दधति इति । फनम्दामहिमाशुमुचन्दनैर्विहितकल्पन एप महेश्वरम् । अभयदं भजते क्षितिनिर्जरो दिनकरे रजनीकरता गते ॥१७॥ दिनकरे रजनीकरता गते प्रदोपे, एप' क्षितिनिर्बर'- भूदेव, कन्कदाम - यत्तुरसर हिमांशुम कपूर मुचन्दन कादमीरगुल्लुचस्तै विहिता- पृता कल्पना पूजनसामग्री येन स , अभयद महवरम् - शिव भजते । यमदग्मिलं गतवासन नियतशात्तिनुपो विदुपो मन । भटिति सप्रयते विभुमव्यय दिनकरे रजनीकरता गते ।।१८।। नियतशान्तिपुर = निवाथा शान्ति दधानस्य विदुष-ज्ञानविज्ञानसम्मवस्य पनदने विनलम् , यमदमाभ्या मनसो विमलरामि सवाणि साधनान्युपलक्ष्यन्ते। वसहित मन पदोपे झटिति भव्यय विभु श्रयते। जपति मन्त्रपवित्रकुशासने वटुनने हरिणाजिनधारिणि । सनुद्गात् कुमतेरपि सन्मतिर्दिनकर रजनोस्रता गते । स्यास्वउनये मन्दै परिने कुशासन हरिनामचिन-चम धारयत तच्छल भजने - ब्रह्मचारिजने अपति उति = अप कुर्वत सति, मुमतेरपिन स्टिकस्यपि शोभना युद्धि मनुवाद। स्मरति योगिवने विधुशेसरं मलिनकम नुपामपि मानसम् । दुवमहो । परमात्मनि सततं दिनकर रजनीकरता गते ॥il . २१२ चन्द्रमहीपती सूर्येऽस्ते योगिजने विधुशेखरम् = शिव स्मरति सति, मलिनकर्मजुषा - निन्दितकार्य सेविना मानसमपि अहो। आश्चर्यम् , द्वतम् = शीघ्र परमात्मनि सङ्गतम् । नदति वाद्यवर सुरमन्दिरे कनककुम्भविभूपितसानुनि । प्रविधत् किल दुष्टजनव्यथा दिनकरे रजनीकरता गते ॥२१|| कनकस्य - सुवर्णस्य, कुम्भ - कलशैर्भूषित सानु यस्य तस्मिन् सुरमन्दिरे, दुष्टजनाना व्यथा प्रविधत् -प्रकुवत, वाद्यवर नदति । पिपठिपुर्निजपाठ्यसुपुस्तिका ज्वलयितुं किल दोपमयोमयम् । विशति सत्वरममिगृह बटुर्दिनकरे रजनीकरता गते ।।२२।। सूर्यऽस्ते निजपाठ्यमुपुस्तिका = पठनीयपुस्तकानि पिपठिषु, अयोमयं दीप ज्वलयितु घटु - ब्रह्मचारी सत्वरममिगृह विशति । किरणकमकरै परिशोधिते क्षणदया वितते तिमिरे घने । विपुलभ प्रतिभाति वियद्वपुर्दिनकरे रजनीकरता गते ॥२३।। दिनकरे = सूर्ये रजनीकरता = चन्द्रता प्राप्त सति, प्रकाशकत्वेन चन्द्राय तेजो दानाच। क्षणदयारान्या वितते विस्तारिते, घनतिमिरे किरणकर्मकरैः किरणकर्म- चारिभि शोधिते वियत -आकाशस्य वपु विपुला भा यस्य तथाभूत प्रतिभाति । विरहिणा प्रचुरार्तिकर शर विहितसालसचौरजनाकर । वितनुतेऽतनुतेजसि सत्वर दिनकरे रजनीकरता गते ।।२४।। अतनवेजसि विपुलतेजसि दिनकरे गते सति, विरहिणा-स्त्रीवियुकाना प्रचुराति कर = विपुलव्यथाप्रद शर इव । विहित = कृतः सालस चौरजनाकरो येन, चौराश्वन्दिकाया साल्सा भवन्ति, तथाभूत एष चद्रो रजनीकरता सत्वर यथा स्यात्तथा वितनुते विस्तारयति। दिनकरभयादिति भाव । मदनमोदकरो वनितावता धवलरश्मिभिरन्धमधो नयन् । ढयतेऽतुलकान्तिविधुनिंजा दिनकरे रजनीकरता गते ॥२५॥ दिनकरे गवे - सूर्येऽस्ते, अतुलाकान्तिर्यस्य तादृशो विधु, वनितावता - स्त्रीमा

नवमो निःश्वासः
२१३
-
मदनमोदकर
:स्मरकर, हर्षवरथ, धवलरश्मिभिः = शुभ्रकिरणः, अन्धं तमः, अघो
नान् निजा रजनीकरतां निशापतितां दयते।
अलकमञ्जुनिकुञ्जतिरोहितद्विजपतिः प्रथिताभमुविग्रहा ।
झटिति सजति विश्वजिगीपया दिनकरे रजनीकरता गते ।२६।।
दिनकरे रजनीकरतां गते = सूत्रेऽस्ते अलकाना मनिकुने तिरोहितो द्विजपतिया
सा, प्रधिता आमाप्त एवं मु शोभनो विग्रहो यस्याः सा कापि झटिति-क्षणमपि
नातिवाह्य वियं जेतुमिव सजति।
सैनिक:-असितधिषणधिपण! गुस्वर ! साधु,
भवति यच्छविमत्कमलाकरे नयति यत्कमलापतिरर्चने ।
ग्रहपतेविरहे मलिनं हि तत् कमलजं कमलं कमलाकरे ॥२७॥
कम्-बलम् अस्यति-भूपयति तत् कमलम्, कमलज-पयोज, कमलाउरे लक्ष्मी-
हस्ते, रविनद् भवति । यत्कमल कमलापतिरर्चने-पूजने नयति तदेव कमल प्रहपतेः
सूर्यस्य विरहे मलिनं कमलाकरे -हदे वर्तते । नारं स्थानं विधिसति ।
अथ वियोगजनिर्वत । कोकयोः प्रियवियोगमहोत्कटशोम्योः।
असुखमेति सुसात्परतः सदा नियतिसिद्धमिदं जगति ध्र वम् ॥२८॥
प्रियवियोगेन महोत्स्टगोच्योः कोच्योः-चबाच्यौः, पियोगजनिः-वियोगोऽ-
भूत् । मुखासरं सा दुस्खनुपेतीति नियतिनियमः।
गणिकया गणिका मुपमान्विता गृहगवाक्षनिधापितकूपरा ।
पथिचरान्नयनेन विकुर्वती धवलिते विबुधायन इन्दुना ।।२।।
विधायने आमाशे, इन्दुना धवलिते - प्रकाशि, गृगवाशे निधाफ्तिः = कूलरो
पया सा, गणिया -"हो"पदनाच्यपुष्पेण सुषमा-परमायोभा तयाऽविदा गणिका,
पपिचरान् पधिमन्, नयनेन विकुर्वती - विकृति नपन्तो विद्यते।
मुललनामणिनूपुरशिञ्जितं वलयाकृतयोऽमुखोदताः ।
कुमुदवान्वशोभितदिगमजे न पुरुपत्य हि कस्य हरन्ति इत् ॥३॥

वल्य २१४ चन्द्रमहोपतो कुमुदवाधवेन = चन्द्रेण शोभितश्चासौ दिगवजस्तस्मिन्, सुललनाना मणिखचितन पुराणा शिजितम् , अट्टानां शिरोगृहाणा, मुखेन - द्वारेण उद्गता = नि मृता मङ्क तयश्च कस्य पुरुषस्य हृद्-मानस न हर त ? अवश्यमेव हरन्तीतिभाव । सैनिक-साहित्यामलसरोराजराजहस ! कवीद्र! धन्या भवन्तो य एवमदनिश मकरन्दमोहिभि पीयूपमय कव्यालापविनोदयन्ति मन । नानायास भवादशा साहित्या वताराणा समागमा सागमाना सम्पयन्ते । के० के०-सेनापते। बहवो जगति काव्यकलाकलापलापिन किल। या काव्य मूर्तीना मादृशास्तु छानत्वेऽपि न मता । परन्तु सरणिरिय प्रत्यह प्रक्षीयमाणा । सैनिक -गुरो! चित्रालङ्कारपूर्णा कवितामपि तन्वन्ति भवन्त ? के० के०-तस्या काव्ये गडुभूतत्व मतमाचायें । सैनिक -भगवन् , तेपा रचने वैदुष्य तु परीश्यते एव भवेन्नाम गडुभूत वम् । सोऽपि रस आखाद्य । के. के.-आकणय- सैनिक -आमवहितोऽस्मि । देव ! सान्ध्यविध्युचितोऽय काल । तथा यतनीय यथा देवाना स्तुतिरपि सहैव भवेत् । के०के०-अस्तु, एवमेव यतिष्ये। अब सर्वतोभद्र शिवस्तव देव कुश शङ्ख बन्द रहता ककता हरम् । कुनाम्बर रम्बनाडुश सर व्यव्यर सशम् ॥३१।। कुत्सितान् = दुष्टान्, श्यति = तनूकरोति यस्तादृश देव- भगवन्तमुमापति, शरुकु - दण्डवद् वन्दे। किम्भूत-रहता -- वेगवताम् , अविचाय बुक्तामितियावद, क्कता गव कुवता "कक लौल्ये' लौल्य गवश्वाप यय । अनुदात्तत्वलक्षणमात्मनेपदमनित्य चक्षिलो भिरकरणात् । हरम् - नाशम्म् । सशम् = कल्यागसहितम् । युरसित न अम्बा यस्य तम्, रमन्ते-क्रीडति ते रम-विलासिन 'रमतविच वर्षा वनस्य - समूटस्य अध्यामिव । सरम् - ससार प्रति, अरम् - शीघ्र भकस्य विपरसमकाठमेव व्यवी- विधियोऽवी, रशक।

नवमो नि श्वास अम्या नुमो भासमाना वान्धवादशुभाटिमा । नुवाममा नाल्पभासमोदमानाननाऽऽशुभा ॥३०॥ रसासाररसामन्दकासारा तमसामताम् । वा मसामसुसाहित्या शमराररसाहिताम् ॥३३॥ युग्मम्। पूर्वमर्द्धभ्रमकम्, द्वितीयो मुरजवन्ध । ता भासमाना-तेजसा ज्वलन्तीम् अन्या-देवी नुम । पन्धो बन्धन तत्सम्बन्धी बान्ध स एष वाद गृहस्था अमरूपो वाद तस्मै शुभा श्रेष्ठा, आदिमा च। नुवा-प्रणमता मना- सहात्तिनो, नाल्पभास - विपुलतेजस्क मोदमानानन यस्या सा बागुभा आशु- सद्य प्रसरणशीला भा यस्या सा। रसाना=द्वारादीना य आसार = धारासम्पाव स एव रसो जलम् , तस्व अमन्द कासारा-महाजलाशयरूपाम्, तमसा-अज्ञानेन, अमताम् -अस्वीरता। मा लक्ष्मी रस्यास्तीति मम् - शोभासम्पन्नम् “अर्श आद्यन्' तयाभूत यत्साम तदेव मु-शोभन, साहित्य पाया सा ताम्, श-गुख म्रियते एभिरित शम्मरा = राक्षसा , 'इदोरप्" वानामयतीति "अम रोगे, विप्" शम्मग्रन् = विष्णु, तरान्ति-भाददत, इति शमराण - साधवस्या रसेन -प्रेम्णाऽऽहिता-व्याप्ताम् । मारतो विपमा चाररुचामादत्तकालिमा। मालिका देव्युमा गेया यागेऽमाजगतो रमा ।।३।। महेशवामनयना नमामो जगदम्बिकाम् । प्रदेशाधनयना समाप्या जगदर्भिकाम् ॥३क्षा युग्नम्। पूर्वन पद्मान्धा, उत्तरत्र गोमूनिकायथ । वय महास्य वन मुन्दरे नयन यस्या = सा ता नमान' । जगद् सम्ययति -प्रेरयति तथाभूतम् प्रदेव, याचते नयने यस्ता सा ताम्, समाभि - वरे, भाया-प्रथाम् "हायनोऽना घरसमा" इत्यमर । धमदव नमक-शिगुपस्यताम् = जगज्जननीम् । या मारतो विपना-विपराता। चाररुचा मुन्दरोपा मध्ये आदत्ता-रदाता काना - स्वादोनों पालि. पा लियया सा, चासौ मा। को नमगि समारत्मयनशेष भास्कर- - २१६ चन्द्रमहीपतौ इति मेदिनीकोश । मालिका जगद्धारिणी "मलधारणे" देवी- देवनशोला जगत = ससारस्य, अमा- सहवत्तिनी शक्तिरूपेण, यागे पूजाया गेया = 'सव वाक्य सावधारणम्' प्रथम गणनीया, रमा उत्कृष्टरूपा एव भूता या उमा ता नमाम । पालिका जीववृन्दस्य लये महति कालिका। कापि माता सता मान्या भवे जयति विश्वपा॥३६।। पाकशासनसम्मान्याऽनन्तदेवमहाधिपा। पाश विद्धपापिपूरा पाथोजाडनिसुपादुका ॥३७॥ खद्वध। जीवन्दस्य-प्राणिमात्रस्य पालिका-रक्षिका। महति लये-महा- प्रलये कालिका क्षयकी। पाक्शासनस्य =इद्रस्य सम्मान्या, अनन्तदेवाना=असख्या ताना सुराणां महाधिपा-अधीश्वरी, पाशेन आबद्ध पापिना पूर = समूहो यया सा । पाथोज = कमल तद्वदध्र यो सु-शोभने पादुके यस्या सा, विश्व पाति रक्षति सा, सता मान्या = पुज्या कापि विलक्षणा माता भवे जयति-सर्वोत्कर्षेण वर्तते । श्रीर्या नित्यं कुञ्जवास भेजे चन्द्रसमानना । मनोरमकलाधारा ता नुमो वीतसक्ति ॥३८॥ सततभ्रान्तकमलो हस्त शान्त्यै भवेद् ध्र वम् । दैत्यवृन्दशिरोही स्त्रीवरा नो दिशेद्धितम् ॥३६।। पर्वतब ध । युग्मकम् । या चन्द्रसममानन यस्या साश्री - राधारूपिणी कुञ्जपु चासो यस्य त कृष्ण भेजे - सिषेवे। ता मनोरमानां - हृद्यानां चतुष्पष्टिकलानामाधाराम्, महासरस्वतीरूपां चोतसवितो वय नुम । सतत भ्रान्त कमल येन तथाभूतो हस्त ध्रुवं शान्त्यै भवेत्। महालक्ष्म्या इति भाव । स्रीयु वरा-श्रेष्ठा दैत्यन्दस्य शिरोहनी महाकालीरूपा नोऽस्मभ्य हित दिशेत् - दद्यात् । रमा या मादमायामा क्षमा श्यामा दमान्विता । उमा प्रेमासमा वामा हे मात । मानमाचर ॥४०॥ हारय धोऽयम् । हे मात ! या त्वं मादस्य- हर्पस्य, 'मादो मदे" इत्यमर ।

नवमो निश्वासः -सदैव युवति । मायायाश्च अमा-सहपत्तिनी । “अमा सह समीपेच"। रमा लामोख्या 1 धमा= तद्पा, स्यामा दमान्विता, प्रम्गि-प्रेमविषये असमा वामा, नाति समस्तुल्यो यस्याः सा वामा टमा-पार्वतीरुपिपो त्वं मानमाचर = विरोहि। मुश्यिय । मुरारिस्त्रि। मुक्तोपेतमुसाम्बुजे । वामावर्येन कृष्णास्त्रिप्रिये । पूतपदाम्बुजे ॥४॥ चम्यन्य । हे मुक्तिवये । मुक्तिदाने श्रेष्ठे ! मुरारेः नि । मुक्त स्पेत मुखम्युज यस्या. सा तयाभूते! वामासु वये। कृष्णयासी अस्त्री-अस्त्रकुशलन्तस्य प्रिये ! पत-पत्रित पदाम्बुज यस्यात्तयाभूठे ! मा-तब शरणागत भव - रक्ष । सततं नम्यते या श्रीरस्तु सा निवर पवा। चारेण योगिनीना सहिता मा नितराममा ॥४२॥ पर्नुग्योऽयम् । वा श्री सतत नम्बते, सा योगिनीनां पारेप - समूहेन सहिता, मा-माता, निवरा पत्रा अत्यन्त पावनी, नितराममा च-अत्यन्त समोपवत्तिनी चास्तु । सेनिक..-एकदा देव । देशभ्रमणोत्कोऽद्ध विद्वन्मतद्विकाकान्तकमा भगवतस्तारक- वारयिनुनि सार्थमुचिपदस्य विद्यनाथस्य पुरी गत पूर्णपुरीनन्नपूर्णा शिरवाभि- नन्य, जगदधौधनाशनसन्यायां त्रिभुवनवन्याया महेशोत्तमासनाया गङ्गाया- मखिल मल वियोध्य, भैरवदण्ड कालभैरपश्चानम्य, भव विघ्याय, इन्दरवाणी- मुधाउतृष्ण-कवितोत्कः कस्यापि कवीन्द्रस्य भवनमगमम् । दोध पचमट- दलाकार यदभितोऽदलापु कर्तनानापि न्यस्तमासीत् । के. के.-आम्, आम्, भवन्ति तादशा अपि यन्धा.। तानपि - श्रीर्यस्य चञ्चन्मुसचन्द्रदैन्यशा नितान्तरम्या मुभाजिनी ली। चामेतर: स्यान्मुरदत्ययातुक स श्रीपतिमें मुद्रमावहच्छविः ॥१३॥ पर कमलबन्धाः। परम पिप्पोः रचन्-विलसन् मुखचन्दस्तेन देचम्-शक सति-वन्करोति सा. अत एव नितान्तरन्या, मुदनादिनी-दृप्रिया! रम्यान यदि हर्ष नापत्त वदा क्या किम् । श्री-लदनी, श्री पनी । स स्मावहन्ता छरिस्व उ 1 , नवमो निःश्वासः २२६ सैनिकः--आश्चयम् । शास्त्रिन् । यद्वदसि तस्य चित्रमेव पुरः स्थापयसि । विलक्षणो भक्तोऽभ्यासः। देव! किमाख्यं वृत्तमिदम् ! के० के० इयमुपजातिः। यद्यपीन्द्रवज्रोपेन्द्रवजाप्रभृत्योः समानाक्षरयोरुपजातिः प्रयुका प्रसिद्धा च, पर समलयेनेनोचार्यमाणानां वशस्थादीनामिय नवीनोपजातिः। "एव किलान्यावपि मिधितासु०-इत्यादिना तस्या विधानात् । सैनिकः-आ एवम् । गुरो। हारवन्धे नाम समागच्छेन्नाम, तदा मुशोभन स्यात्, यथा कल्याश्चन नायिकाया गलेऽपितमिव । यदि सम्भाव्यते तहि भवतव गीतगुणायाः सुन्दयोः कमलाया एव गलेऽर्प्यताम् । के० के.--उक्त हारयन्ये तु नाम ग समेष्यति, पर परस्मिन् पगुच्छके हारबन्धे समेष्यति। शृणु, साधयामस्वावत्-- मिय्यारम्येऽतिकान्तिप्रतिमसमसमष्टी मुखे मुद्रगमुद्रा, लेदाविद्रावहृद्य ! हृतहृदयदरे! दत्सु का कलो कः । मन्येऽमन्दं मलेनं विनशनकृतिकृत्ये कृतेशं प्रशन्धा । शम्भावे ! भारभासे ! मणिमयमधुरे ! धुर्यधुर्य ! रवीमि ॥४८॥ कविः कमलां विशिनटि हारबन्धेन । अयि। शम्भावे। विलासादिना आनन्ददायिनि ! कमले! मिप्येव रम्यवभासमानेऽस्मिन् जगति, अतिकान्त्या विपुलप्रभया, प्रतिमा- तुल्या, समा- सा, समयिस्य तत् तस्मिन् मुखे। एम्तः सौन्दय सब जगत् , एकतस्त्वन्मुखमेरम् , उभय समानमिति भावः । तादृशे ते मुये दृष्ट मुद-हर्प गच्छति दादृशी मुद्रा भवति। अह वन्मुरा वीक्ष्येच हप्या- अपि। लेदाविद्रावइये। लिनाति - इलेवयति सारे स ले.-मोह, "लिनातेरिय” ते दाति -कुत्सितां गतिं गमयनि सा छेदा - मुक्तिवत्सरपि । तस्या विदावेग हो। मनोरमे। हतो-गमितः हृदयस्व दरो दुःसं यया तथाभूते । दत्सु विपये कलो युगे को नाम कत्ता सन्भाति, भरत्या दन्ता अप्पनुलमुन्दरा इति भावः । अयि! भारेण भासे! उग्य। "भारः त्याद्विसतिस्तुला." "तुला स्त्रिया पलशतम्" इत्यमरः। प्ररणाशास्त्र भारः मुनस्यैव प्रयः, तेनैव स्मियामसार- मोतिभारः।

२१८ चन्द्रमहीपतो तथाभूतः, एतेन सौन्दर्य व्यज्यते, मुरदैत्यघातुकः = मुरहन्ता, एतेन वीरत्वं गम्यते । स श्रीपतिः-विष्णुम मम वामेतर:-दक्षिणः-अनुकूलः स्यात् - भूयात् । श्रीशङ्करः कामरिपु शुभस्पृशा नितान्तमव्यान्मखनाशकोऽस्त्री। वामेतरः स्यान्मदा कदम्बकसमृद्ध ईड्यो मदमत्तशीविः॥४४॥ कामरिपुः श्रीशङ्करः, मखनाशकः = दक्षयज्ञविध्वंसक , अस्त्री अस्त्रचतुरु, शुभस्पृशा नेत्रेण मां नितान्तमव्यात्। मद-हर्प ददतां कदम्बके - समूहे समृद्ध, मदेन मत्तानां - दृप्ताना शीविः- हिंसक ईड्यश्व अस्माक वामेतरः- दक्षिणः स्याञ्च । श्रोद्रोहिणामाशु विनाशकर्कशा निश्शेपदेशेऽशुभनाशिनी खी। वामाभिरामाऽऽशु निहन्ति दैत्यकसघं नुमस्तांशुचिना हृतो रविः ॥४५॥ या वामासु-स्त्रीप, अभिरामा - सुन्दरी, श्रोद्रोहिणा = समृद्धिविणां आशु विनाशे कर्कशा, या च निश्शेपदेशे - सर्वत्र, आशु-शीघ्रमुपद्रवसमकालमेव, अशुभ नाशिनी - अकल्याणही, अथ च दैत्यकसघं निहन्ति। यया च शुचिना = शृङ्गारेप "धारः शुचिरुज्ज्वल.” रविः-सूर्योऽपि हृतः- अपतेजाः कृतः। तां नमः । श्रीभास्करो दीप्ततनुः समस्शा निश्शकमव्यात्ततकान्तिरस्त्री। वारेण रश्मेस्तमसा व्यपोहकः समः समेपा तरुणारुणो रविः ॥४६॥ श्रीतुल्यां भास करोति अतएव दीप्ततनुः तता= विस्तृता कान्तिर्यस्य तादृशः- अत्री, रइमेः-किरणस्य, वारेण - सगूहेन, तमसां ध्यपोहकः = नाशकः तरुणारुण, समेषां = सर्वेषां समः- तुल्यः, रविर्मा निश्शङ्का - असंशयम्, भव्यात् - रक्ष्यात् । श्रीर्यस्य हस्तीशमुसस्य दुखशा नित्यं गतास्ते शरणं शुभा खी। वामः सलाना शरणं नु मेचकसों नुतोऽत्याशयविनजागृविः ॥४७॥ यस्य हस्तीशमुखस्य -- गजाननस्य, दुःख श्यति. तादृशी जगद्-सहन्नी, शुभा- पतिव्रता स्रो, श्रीः = ऋद्धिविद्धिरूपिणी, नित्यम् - सततं शरण- सेविकात्व गता-प्रसा आस्ते । स खलाना - दुष्टानां वाम', मेचकमर्गः-चित्रविचित्रावयवः अवस्वान्नरत्वाद उपरियाद् गजत्वात् । अत्याशयाः ये विनाखान जावि-जागरूकः । मे शरणमस्तु ।

नमो निःश्वासः २२६ सनिक --आश्चरम् ! शानिन् ! यद्वदसि तस्य चित्रमेव पुर स्थापयसि । विलक्षणो भवतोऽभ्यासः। देव! किमाख्य वृत्तमिदम् । के० के०-इयमुनजाति.। यद्यपोन्द्रवोपेन्दवजाप्रमृत्यो समानाक्षरयोजाति प्रयुका प्रसिद्धा च, पर समलयेनेनोचार्यमाणाना वरास्यादीनामिय नवीनोपजाति । “एर किलान्यास्वयि मिश्रितासु०-इत्यादिना तस्या विधानात् । सैनिक -आ एवम् । गुरो। हारवन्धे नाम सनागच्छेनाम, तदा मुशोभन स्यात्, यया कस्यायन नायिकाया गलेऽपितमिव । यदि सम्भाव्यते तहि भवत्व गीतगुणाया मुन्दयां कमलाया एव गलेऽयताम् । क. के.--उक्त हारयन्धे तु नाम न समेष्यति, पर परस्मिन् पद्गुच्छके हारवन्धे समेषति। भ्णु, साधयामस्ताबद- मिथ्यारम्येऽतिकान्तिप्रतिमसमसमष्टो मुसे मुद्रमुद्रा, लेदाविद्रावय। हृतहृदयदरे । दत्सु का कली क.। मन्येऽमन्दं मलेनं विनशनकृतिहत्य कृतेशं प्रशन्धा। शम्भावे । भारभासे । मणिमयमधुरे । धुर्यधुर्वे । रवीमि ॥४८।। विशिनष्ट हारबन्धेन। शम्भावे! विलसादिना आनन्ददायिनि ! कमले। मिथ्येव रम्यपद्मासनानेऽस्मिन् जगति, अतिगन्त्या : विपुलप्रभया, प्रतिमा - तुल्या, समासा, समर्यिस्य तत् तस्निन् मुखे। एक्त सौन्दये सब जगत् , एकनस्त्वन्मुसमेकम् , उभय समानमिति माव । तो वे मुखे दृष्ट मुद-हर्ष गच्छति तादृशी मुद्रा भवति । अह त्वन्मुस वीक्ष्येव हप्या- अधि। लेदाविदावइये। लिनाति -प्लेयपति सारे स ले-मोह, "लिनातेचि व दाति-कुरियता गतिं गमरति मा रेदा- मुस्सिन्सभिर्वा । तस्या विद्वावग हो। मनोरने! हृतो-गमित इसस्य दरोरा या द्वयाभूत । दमु frपये कलो युगे को नाम का सन्मति, भवत्या दन्ता थप्यनुलमुन्दा पनि भाव । उग्मले। “भार स्वाद्विशतिस्तुला" "तुला प्रियां पलशवम्" इत्यमरः। प्रकाशाचा भार मुर्गव , नैर स्त्रियानलार- कविः कमला अयित मातिभार । अच। भारेण भासे।

तथा २२० चन्द्रमहीपती निर्माणादिति भावः। मणिमयैः-- मणिखचितैराभूषणैर्मधुरे ! ममन्द = विपुल मलेन -तमोराज प्रति, विनशनकृतिः विनाशनम्, तत्र कृत्ये कर्मणि कृतेशम् - विहितेश मन्ये --जाने। चन्द्रानाश्य तमोऽपि त्वन्मुखं नाशयति । त्व प्रकृष्ट श= कल्याण दधाति तादृशी। अयि ! धुर्याणां = सौन्दये अग्रगण्याना धुयें । प्रथमगणनीये। अह त्वामेव रवीमि । सैनिक.-अहह ! पण्डितसार्वभौम! कविचक्रवत्तिन् । (खकीया मुक्तामाला शारित्रणो गले पातयन् ) धन्योऽसि! शोभन विरचितवानसि । नामातिरिक तद्गुणानपि वर्णयन् वैचित्र्यमाश्चर्यच कृतवानसि। (परितो वीक्ष्य ) अनुमीयतेऽर्हो याम इस गतो यामिन्या । के०के० । आम् , इयानेव प्रतीयते। चन्दचन्द्रिकया पुनर्दिवाभूता रतिः । सैनिकः-आम्। अन्यत्किमपि श्रावयिष्यते ? के०के०-( वक्षसि दृष्टि क्षिपन् ) अये ! इय कुतो ग्रथितहखचन्द्रा देदीप्यमानामल. वर्तुलमुक्ताऽमूल्या महार्हा माला। सैनिक -( गदितुमनोहमानोऽपि ) गुरुवर । एषा तुच्छोपहृतिः श्रीचरणाना मारादादरादाहिता श्रीमत्पादपद्मपरागप्लावितमनोवपुषा दासेन, कवितासक्तवेतोभिर्भवद्भिर्न ध्यानविषयीकृता। के० के०-अस्तु, शुश्रूषा चेदन्यच्छ्रावयामः। त्वमस्माकमद्य वचोऽननीयोऽतिथि । सैनिकः-आ दत्तावधानोऽस्मि देव । महतीच्छा । के०के०-शृण, नुमः प्रदानी गुणभूपणा मा नुमः प्रदानी गुणभूपणा माम् । नुमः प्रदात्री गुणभूपणा मां नुमः प्रदात्री गुणभूपणा माम् ॥४६|| सर्वयमकम् । प्रदानी - प्ररण दानशीला, गुणा एव भूषणानि यस्याः सा ता मा- आसमन्तात् नायते यः स भानः-विष्णु, तस्य स्त्री-आनी तां विष्णुत्रियमित्यर्थः। या प्रमाप्राण यति-सण्डयति दारिद्रय सा तथाभूता विष्णुपनी लक्ष्मी.। गुणानाम् - औदार्यादीनां भूरूपत्तिर्यस्याः सा चासो, उपणा, ओपति- दहति पापकर्तन या सा गुणभूपणा ता मा नुमः । "उप दाहे।" गुणानां भुवो गुणभुकः- लक्ष्मी नुमः।

- नवमो निःश्वासः कलाप्रमिपश्यानाः, तेभ्यः सन्वन्ति -ज्ञानं ददति ते गुणभूपणो विद्वांसः “सनोविच्" वेषां गुणभूषणांविदुषां कृते प्रदानी मां-मातर नुनः । गुणभुवम्पन्ति ते गुषभूषामः 'जय रुजायाम्' कनिन् तेषां गुणभूषणां = गुणम्याननाशकानां प्रदानी - प्रकर्पतवाऽवखण्डनशीला मां देवी नुमः । चिन्तामणिवावचितप्रसादसमुन्यलाङ्गा स्तुम ईशवामाम् । चिन्तामणिनातचितप्रसादसमुचलाङ्गास्तुम ईशवामाम ||२०|| उनुगमनम्। चिन्तामणिः-अभिलपितयस्तु रनम् । तत्व प्रावन समूहेन चित-निमितो यः प्रसादः-प्रसन्नता तेन सनुज्वलान्यज्ञानि यस्याः सा वाम् , देवानाम् --शिस्निय स्तुमः । अभ्यत-इत्यण शब्दा, बाटुलझात्पचायच्, येगामात तेऽणिनः शाब्दिका, ठयां बाठेन, नत प्रतिज्ञा यात्राध्ययनमा तदेव व्रात, तेन चित:: उसनो यः प्रसादो नेमल्य तेन समुज्ज्वला, चिन्तां -स्मृतिरूपान्, गांवामाम्, ईम् = लक्ष्मी सन्ति ते इंशाः प्रधानताद त्यास्तेषां वामा - प्रविलाम् स्तुमः सासिः सिसा सासिसासा सामुमूः सेः ससाससोः । सासासो सामुसा साऽऽन ससंसासिः ससाससा ।।२२।। (कुलकम्) एकाक्षरः। पन्ति-चिनिटायां सपन्ति मानवा यस्मिन् तत् ससम्-युद्ध तस्मिन् , असिना सह वर्तते या सामासि:-विधृतरहा। सिनोति - पनाति-पाचादिना सवि: बन्धः । पिन् बन्धने विन् “ज्ञापूर्वको विधिरनित्यः' इत गुणाभावः । सि- बन्धक स्पति-नाशयति सा सिसा । "पोन्न्तर्मणि कान्ताट्टाप्"। सासिमा असिना सह वर्तमानान् स्यति मा पूरकान्तावा । सानुम् अमुभिः सह वर्वन्ते ते सासवः -प्रापिन: भोजसिनः सनिका वा, तान् मुक्त - कर्मणि प्रपति या सा सानुना "स् प्रेर" बन्। से.-अस्य स्त्रोदे - सदनी:, तया सह वर्तठे यामा सेः। लम्या अभिन्नति भावः । समा- सन्ति ते साः राक्षसाः "मातोऽनुस क." वन स्पति सा, स्वतेविच्। - यस्यन्ति ते असा अपुरा', अस्पतेः 'पचाय , वन मुनोति पीडपति सा अससोः 'पन्' अभिाई पचायच् । सातासो-ससनं सास-तारापत सने, पन् । नम्, अनते - गमपति, “अस गतिदीपदानेषु" कर्मभ्यम्, अनन्तान् । जगजागाननी।

जजतो २२२ चन्द्रमहोपतो सासुसा-अमुभिः सह वर्तन्ते ते सासव. = विपुलौजसो दैत्या', तान् स्यति सा। असे = स्कन्धे असिर्यस्याः सा। ससाससा-समानान्स्यन्ति ते ससाः - दैत्या, एकपितृत्वाद्देवाना दैत्या. समानाः। “समानस्येति”सभावः। तान् अस्यति स्यति च सा, पचायच्-उत्तरन कान्ताट्टाप्। सा- गौरी "सा च लक्ष्मीः बुधैः प्रोक्ता गौरी सा स च ईश्वरः"- इत्येकाक्षरकोशः। आध-अमुराश्चिक्षेप। तामुमा नमाम इति परेणान्वयः । कुरुकम् । रजोजर्जजजज्जराऽजी जजज्न रजाऽजरा । रराजोजोऽजिरे राजे राजे रुजोरुजा ॥५२।। द्ववक्षरः। रजसा रजोगुणेन, जर्जन्ति-भयिन्ति “जर्ज भर्त्सनादौ, तुदादिः । तथाभूता ये जजन्तो दैत्ययोद्वार. “जज हिंसादौ" भ्वादिः । तान् जूर्यति सा 'जूरी हिंसायाम्' अजन्ताट्टाप् । अजी, अजस्म --अजन्मनो भगवतः त्री। जजज्ः- = युध्यमानान् “जज युद्ध" जिणाति = वयो हापयति सा "नि वयोहानौ बिन्। उरुजा, उरुतो महत्तो जातापि अजा । अजरा-नियतावस्था। राजेः- समूहस्य, दैत्यानामितिभाव. रुजा-पीडा जर्जरस्य क्षीणतां गतस्य, आजेयुद्धस्य । ओजोऽजिरे - ओजखिनि रणाने रराज = शुशुभे । योयायियाययीयायाऽरीरं रो रेररेररम् । ददादा दादुद्दे लालेला लोललीलला ।।३।। एकाक्षरपादः। यौति-मिश्रयति खजीवनधर्म स यो:- नीववृत्तो राक्षसादिः । "यु मिश्रणादौ, वि" त यातीति यायी - ताग्विधो रक्ष समूहः यातेणिनिः, युक्च, तयाति एवाभूतो यो ययी.-मार्गस्तस्मिन् यान यस्याः सा, तेषां विनाशायेतिभावः। या प्रापणे, धन्। सरीरं रोः। अरि- शन्मोरित्वा इशि भरीरम् , यो क्षेपे। शन प्रक्षिप्येत्यर्थः । रो. - शब्दायमाना। अट्टहासादिनेतिभावः। अरेः-शत्रोः समीपे अर - शीघ्र रेः- गमनशोला। "रिगती" विच्। ददाददा-ददते इति ददर, तमाददते सा ददाददा- दातृणा दानी। ददादुद्दा-ददान दातन् आदुनोति इति ददादुत् त यति- सण्डयति सा ददादुद्दा। इलायाः पृथिव्याः, लेला-दीप्तिः। लोला लीला लाति आदते सा तथाभूता।

नवमो निवासः लातातटळला तालोन्नता नीतोन्नति नुताम् । हंहो! हंसासिसंहासां नमामो मामुमाममा ।५४॥ द्वषारयादः । लातः-आदत्तो गृहीतो या अस्प-विष्णोः तलः पादवलनिति भावः। वस्निन् लला-ईप्सा यस्याः सा ताम्। तालादुन्नताम्। मुताम् नमस्कारिणा, नीता टप्नतिया सा ताम् । हमः अविश्व ताभ्यां समः सहायो यस्याः सा ताम् । अमा-निकट वर्तमानाम् , मां मा-भगवती नमानः । नमामहे हेममानभासिता जनता सिभा । शिवावाररवावाशि राजिताजिर्जिताजिरा ॥२॥ प्रतिलोमानुलोमपादः। हेम्नानुवर्णेन यो मानः चित्तसनुन्नतिः, मत्समो नास्तीति विचारः तेन भासिताम् = उज्ज्वलां नमामहे । किम्भूता सा -शिवानाम् गालीना वारस्य खेप वाराने तस्मिन् युद्ध, बजताम् = युध्यमानानां सिगा भारचित्री। पिनु हिंसाः, पाद्यचि टाप। जितमविर रणक्षेत्र यया सा। राजिता आजिर्षया सा । याचते मनसा वाण्या भक्तायादभ्रदापिनो । नोपिदाऽभ्रदयाऽऽक्ताभण्यावासा नमतेऽचवा ॥२६॥ गतप्रत्सागतम्। ननता वाण्या वा याचवे भकाय, अस्त्र-प्रचुर दापयति बच्चला। नीपम् = कदम्य तदस्यास्तीति नीपी = कदम्वप्रेमी भगवान् म्ग, तं ददाति अत्रदयाच्य =अप्रवन्मेघवद्दययाऽऽक्ता = आदां कोनलमानसा। मालो - विद्वांसस्तेषु आवासो यस्याः सा। अक्या - नास्ति चयाम् दिवाः सा । दषिकारमावस्योपलक्षणम्। तामसी नमते । जलजावलसद्धत्तद्द्याचाः शरणं गतः। साशकाना शरण्यायास्तस्याश्चरणनीरजे ॥२७॥ निरोष्टरः। इटवातेन- कमलेन लसन् शोभमानो हतो यस्याः सा या च सा। साराद्वानां घरम्यायाः चरजनोरजे पादपने शरण गतोऽस्मि । ततथा विसति श्री ३. के. शानिनि समावि "शानिन्। शानिन् ! रदि"-इति पनिः । . सेव्यत्वेन सा।

चन्द्रमहीपती के० के०-आय मि भगवन् ! (सैनिकाभिमुखम् ) आश्णु- नुमो मा सद्बुधान् दृष्टा मूढमानससूत्पलान् । ददद्वागनुकम्पातो मोदमाना त्वर सुतान् ।।५८।। अतालव्य । सद्बुधान्-श्रेष्ठकवीन् । मूढम् विचारशून्य मानससूत्पल येषा तान् यथाभूतान् सुतान् = पुननिविशेषान् कवीन् । दृष्टा ददद्वागनुकम्पात - दीयमार विवेकपूणवाणीरूपया दयया, त्वरम् = शोघ्र मोदमानाम् - हृष्यन्ती मा नुम । पुनरभावि, 'शास्त्रिन वास्तिन्" इति ध्वनि । के. के.-एमि प्रियवर! लक्ष्मीच द्र! एमीत्युत्तीर्य यावद् विवक्षति तावदेव प्रत्युत्पन्नमहोत्कण्ठोऽपच्छद् विचारचतुर सैनिक -देव ! कियद्वयसा महस्य महिता देवेन। के० के०--वोता शरदा विशतिरागत । मोदेन वयसि सातोपम् । अधुना धारासारैरविमलकेशा,भजामो माम् ॥५६॥ असयोग । हे आगत! वयसि - अवस्थाया, सातोष - सानद, शरदा विशतिः वीता. - गता। अधुना मोदेन-परमप्रेम्णा धारासारे, अविमलकेशा-कृष्णकचा मा- भगवती भजाम । पुन श्रुत 'थास्त्रिन् एहि सत्वरम् , व्यत्यति भोजनवेला, शीघ्रताय प्रेरयन्ति विपश्चित -इति धनि । के० के०-गहोदय, अनुल्लङ्घनीया गुरुजनाज्ञा, भवादृशा समागमोऽप्यान दद । पर समाहाननिबन्धो मा विवशयति । समयो लभ्येत चे पुनरपि साक्षात्कारेण सम्भाव्या । मन्य भवन्निवेशेऽप्यकारणविलम्बेन सोत्कण्ठा भविष्यन्ति भवदनुचरा । कि नाम सैनिक-(प्रणमन् ) देव, चन्द्र इति । के० के०-कुशलम्, अस्तु याम पयाते कवी तत्यागविधुर प्रदेश मूर्ना सम्भाव्य चन्द्रोऽपि निजमर्वतमारोह । आम्, भवता * * - नवमो निश्वासः आसप्ताह निरन्तर धारासम्पातः। गहने तमसि सौ स्वांचन्द्रमसी अष्पियनेन नागम्यताम् । वर्षाः, अन्धवमसम्, दन्ताघट्टन शीठम्, वीगरयो पयु, गृहेषु नाग्नि- प्रग्ज, कष्ट सिन्नम्, आरण्यच अद्रांत, दीपालाका शीतला, पन्यवोदिकानु पय- मबरुद्धम्, रहागां निस्तनधनिकः कटक शनिधितो गगनव्यापी कोलाहलः । सर्वन हाहाकारः प्रतः। समाचारपत्रापि योर्पत्याने 'बलप्लावस्य दुभिशस्य च दुभाव्य वृत्त प्रतिदिन प्रायानामुः। जनपदभ्यो नगरेन्यो नगपतिनिधिन्यः पौर- प्रतिष्टनेन्य'सारहत्तान्बुलन्यानि। विगारतः सर्पतः पीडितादेशाद् इत्तं वन् पसंश्चन्द्रो व्यग्रो बभूव । स युमुदिन्या आप्तकाशनलेश सह सरोजिनी दुनिशीडित प्रान्ते प्रेपरन् निरदियद यत् सा सवा परिस्थिति परिक्षाय स्थानीयाधिकारिभिरावश्यकी सहायताबादच परिस्थिति नियमपन्नी मां सूचयेत्। उपदिशच "सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः" तमास्मिन् क्षेने नवीना, यज्ज्ञाननद्यावधि नाप्पयनेन सात ददनुभवेन शर्नु युवामरिनन् समारे पानि, एप उत्कृष्टोऽवसर, परमिद सर्वदा देव यदस्य ससारस्य क्ले बुवयो। प्राण न भवेन, सफलीभूत समागतोः सागवे समुन्मुकोऽहम् । दृटपति साहसिन नर प्राकृतियो याचा निधितायाब निवारयितुं शका!" इति । पजनगरस्य विद्यालो दुर्गः प्रासादय पौडितानामावासाय दत्तः। पदेपोदयोषि यत् प्रजापनेन निर्मितःप्रासादः प्रजाया एवं समत्ति, प्रजाया दुरवस्थानु प्रासादोपभोगो गजान निरपगामिनं करोति । चन्दःशिविरमप्यवासीत् । कमला पनानोताना दुरवस्थापीडितानां सेवायै 'आयेन्याशालाप्रबन्ध निमुटा, पमा च हविहोनानानावासा भोजनप्रन्ये च। विमारिस्थिती चौरजुटामनान- व्यवस्यानेच क्रियये नियोजितः। प्रबलो वातुपानेन जललावनिमम बना द्रष्टुं प्रेक्तिः। एव स सनिष्टसुदरः कर्मनि नियोग्याषि न प्रसौदर। स सर्व राष्ट्र निशिनुम्नः पाविनाननाला प्रचरितः । वरोगाय सरक्षन १, २ द्वार से सनावार, ३ टूर काल, ४ मरताळ (To Fiti)| ५ महार (Gidar) नुस्वार चलनेवाला हवाई जहाज ।

२२६ चन्द्रमहोपतो सर्वत्र पृथ्वी जलाप्लुताऽऽसीत् । उन्नतभूभागेष्वभितोजलाः पल्ल्यो ग्रामाः प्रेक्ष्यन्ते स्म, येषामुटजेषु कूजता मानवानामार्तनादः सहृदयानां हृदय व्यथयति। नराः नार्यः शिशवः जलजीर्णशरीरा नग्ना बुभुक्षिता अद्धमृता मृताच शेजारूढाः सन्ति । जलप्लावे महता वेगेन शुष्कतृणीषा खटा गावो महिप्योऽवा रष्ट्राथोत्यमाना अलाचेतनाः करुणखरेण रक्षितुमाह्वयन्तः पतयः स्त्रियः, स्त्रियः पतीन्, मातरः शिशन परित्यज्य काष्ठे पूपविष्टाः सहैव हिंस्रः सर्पादिभिथोपेता अद्रुह्यमाणाः परिस्थित्या मित्रतामापन्नान क्रन्दन्तः प्रवहन्ति। उल्लोलाः पार्श्वभूमि भजन्तो वृक्षांश्चात्मसात्कुर्वन्तः शब्दायमाना बधिरयन्तो भीषयमाणाः व्रजन्ति। पुलिनेषु प्रजा एकत्रीभूयापि जलक्षतवपुषः साधनहीना दीना मृत्युमेवापेक्षन्ते। काश्चन पथिषु मुखं व्यादाय अक्षिणी विस्फार्य र विस्मृत्य च शून्यदृष्टयोऽविधान्तभावेनानुद्देश्य वजन्त्योऽवलोक्यन्ते। चन्द्रस्य मानसमदो विलोक्य नितरां दुखितम् । स शीघ्र प्रत्यावर्त्य वायुयानः सिद्ध भोजनं • वासासि काठ दीपशलाका. शुष्कमन्न पात्राणि निपातयितु प्रावघ्नात्। जले सहस्रशो नाव उडाश्च मुक्ता. 1. 'अस्वस्थपरिवहनानां सर्वत्र प्रबन्धो विहितः। सर्वतो 'भारवाहिमरुत्तरै बाष्पशकटीभिर्वायुयानैश्चातः समायात • प्रारब्धाः। आरोग्यशालायाः कृतयोग्याश्चिकित्सका मनोयोगेन तेषां सेवायै लानाः। आरोग्यशालाया केवल शय्यासहस्रमासीत्। रुग्णानां सङ्ख्या चासबाल्येया। चन्द्रेण अन्त पुरं रोगिणीनां कृते दत्तम् । कमला च रोगिसपर्याय नियोजिताऽऽसीदेव । आरोग्यशालाया अन्तःपुरस्य च कोणं कोण रुग्णैर्याप्तम् । विरामदेषु शय्यानियोजिताः । कमला आमध्याह्नमारोग्यशालायाम् अपराहत आपूर्वरानञ्च महिलारोग्यशालायां व्यतियापयति स्म । निशीथे च 'विमईप्रकाशिकामादाय पूर्णामारोग्यशालां पश्यन्ती अवर्तत। चिकित्सका धान्यः परिचारकाः सर्व एव ख ख कार्य कौशल्येनाकुर्वन् । प्रतिदिन सा व्रणिनां प्रणबन्धनं वय चिकित्सकेन वोन्मुच्य व्रणं परिशोध्य निवध्य च तेषां स्वास्थ्याय भोजनाय विधमाय निद्रायै च पृच्छन्ती धैर्यमुपदिशन्ती रोरुद्यमानान १ अम्बुलेन्स, २ ट्रक, ३ रेलगाड़ी, ४ योग्या - शल्यकर्माभ्यास, ५ वरामदा- 'विरामो विश्रमोऽवसानं वा। गृदिभ्यो विश्रमं गृहाय अवसानं वा ददाति सः। ६ टार्च लाइट।

नवमो निःश्वासः २२७ मृतलसवान्धवान् नष्टधनान् गतगृहान् सान्त्वयन्ती मुग्धस्मिवेन स्मय सञ्चारमन्ती रोगिण माहादयत् । नोविभागे कारप्यपूर्ण दृश्यमासीत्। मृतमातृकाणां शिशूनामपरिसङ्ख्ययाः दाम्या आसन्। प्रत्येफस्य कृते एका धानी क्रीडासाधनानि चासन् । अन्त पुरस्य सर्वा दास्यः शिशुसेवायां गृहीताः। कमला सयं मातृहृदयेन तान् लालयति स्म। यदा सा विभागे प्रविग्रन्याप्तोत्, सर्वे शिशवः "अम्बा मागता" इत्युच्चैवं वन्तता पर्याप्वन्ति स्म । लुपमातापिनृपतिपुनाः त्रिपोऽनारतमात्तं रुदत्यो जोवन हातु कृतसङ्कल्पा औपधं पच्य भोजनमनश्नत्य उच्छूननयनाः कमलां व्यथयन्त्य थासन् । सा तार्या परिचय- मधिगत्य जनसेवाविभागतः प्रतिक्षणं दूरालापतो उससम्बन्धिनां कृते जिज्ञासमाना सान्वयन्ती सहस्तेनीपय पथ्य भोजनं ददती धैर्यमुपदिशन्ती अवर्तत। स्वलै- रहोभिस्ता वा देवीत्याहुः। परं कर्मल्या भगिनीनिविशेष प्रेक्षणाय प्रेरिताः सौहार्दैन भगिनीशन्देनोल्लसयामासुः। सर्व एव रोगिणो व्यथासमये ता समीपमेय दहशुः । उल्लापाना पुरुषाणां महिलानां च कृते विविधाः कुटीरोद्योगाः स्थापिताः। शिक्षार्य रुचिमन्वीक्ष्य शिक्षका नियुक्ताः। शिशवः शिशुशालायां प्रेषिताः। सर्वे नामानि चित्राणि परिचयेन सह वृत्तपनेषु प्रकाशितानि । चन्द्रः प्रतिदिन जलाप्लुत क्षेत्र 'फर विमानेन स्वयमपश्यत् । एकदा स जलप्लनं प्रदेशमवेक्ष्य प्रत्यावर्तमान एकस्मिन् पुलिने शिविरसनिवेशमपश्यत् । स्थानमिद राजनगरतो नातिविदूरमासीत्। सनिवेशय सुभगः मुसः सनिकैः कृतरक्षो व्यवस्थितो जलपटावेनाप्रभारितः शान्तवासीत् । एका होरकमालेद भास्वरा सर्गरामा रमणी नद्यानटे सान्प्यविधये अभिपूर्वमुर- विराऽऽसीत् । चोणितयोणिती तस्याः को पासली बातम् । मान्धिवेलोऽगिमा तरमा यत् लोमतपोलपोनिपत्य ता सेवयति तस्यादवि द्विगुणयति । मुग्धा यदा कदा कोलपोरापवतः केशान् नदुलमृदुतामितनुतनुभिः कर लीभिरपसारत, स्व मुर चन्दमिव विशुपति। पमेयं विनीता वनिता स्थिताऽऽसीतस्मादनतिदूरे एवापरं पुलिनमधोमत। ५ पुर। २ लहार-चुपचाप पलनेराल्म हवाई जहार।

२२८ चन्द्रमहीपतो पुलिनं जलक्षालनप्रसन्नपत्रपुष्पैः धुपैः पूर्णमासीत् । उल्लास, शान्ति, सौन्दर्यम्, प्रकृते सुन्दरतम रूप तमासीत् । जगतचिन्ता, तृष्णा, मात्सर्यमभिशाप, आक्रोशः जनरयस्तर सर्वथा नासीत्। विविधरागाः पतगिका अलिप्तपक्षरनासक्किं घोपयन्त्यः क्रीडन्य भासन् । अभितः क्षुद्रा नद्यो मध्यकृशा मुग्धा इव प्रवहन्त्य आसन् । प्रचण्डधारासम्माता- द्विरता प्रकृतिः सम्प्रति शान्ता भवन्ती नीरवता शनैशनैः प्रसारयन्ती मलयानिलेन निर्जनशान्ति लालयन्त्यासीत् । सर्वतो जलक्षालनविगतमला नयनहारिणी विपिन- विभूतिर्मानस हरति स्म। सन्ध्यासमय आसीत्। प्रदेशशान्ततां विचार्य तनैव सन्ध्योपासना विधित्सुथन्द्र' सन्निवेशपुलिने स्थानाल्पतया अवतरणासौकर्येण पार्श्व पुलिने फकविमानमवतरणायादिशत्र नदीशिलातले उपविश्य मुख प्रक्षाल्याचम्य प्राणानायम्य सान्थ्यविधिप्रवणोऽभूम। आकाशबिम्ब खच्छनदीजले दृश्यते स्म। चंन्द्रो विचारयामास, महद्विशाल वर्तते एतदाकाशम् । अहह 1 हिमगिरिसदृशा दृशामनवधयोऽयुतशो वारिधराः सूर्यसदृशा ग्रहाश्वास्मिन् सावकाश चकासति। विज्ञायते सूर्यः 'सपादनवकोटिक्रोशमित दूरमस्ति । अस्माक पादाङ्ग ल्यां कण्टकेन विद्धाया यावता शैघ्येण मस्तिष्के ज्ञान भवति । तथैव कल्प्यता यद्यस्माकमगुली सूर्यसामीप्यमेत्य तत्तापाइहेत्, तदा तद्दहन पञ्चदशवर्षेर- स्माभिति भवेत् , इयान् सूर्योऽस्मत्तो विदूरोऽस्ति। अहह ! एतादृशा अनन्त- सख्याः ग्रहा आकाशाजिरे चरन्ति, ये विदूरत्वादस्माभिर्लघुलघवः प्रतीयन्ते । अकरप्यमानफल्पना नीहारिकाश्चास्मिन्नन्तब्रह्माण्डेऽनन्ता असङ्ख्येयाश्च सन्ति, विदूराश्यत्यो यत्-य. प्रकाशः प्रतिक्षण पडशीतिसहस्राधिकैकलक्षकोशमितमध्वानमति- कामति स प्रकाशस्तत्र निशल्लक्षवजेत् । विज्ञायते एषा भूमिरपि यस्यां सचराचरं जगदिद वसति कदापि सूर्यस्य भागो ज्वलदगारप्रतिम आसीत्। परं प्रकृत्या बहि शीतलीभूय कचन काले सूर्यगोलकान्नि सूता, अद्यापि तमभितो भ्रमति । एष चन्द्रोऽपि एकाजवर्षपूर्व पृथिव्याः सूच्याकृतिर्भाग आसीत् । सोऽयमेकदा पृथ्वी- तो भिन्नः । तेन भूमौ *सप्तविंशतिकोशनिम्नः खात समबनि । १सवानो करोड़ मील। २ प्रकाश का वेग १ मिनट में १८६००० मील है। - क्षण = मिनट । ३ एक अरव । ४, २७ मील गहरा । सभी जगह कोशसे मीलही पाय है। स एव समुद्र उच्यते।

नवमो निःश्वासः २२६ एषा भूमिः-अष्टसहनकोशमिता महतो स्थली-आकाशे प्रचण्डगत्या सततमवन्दी पर्तते। पूर्व यदा चन्द्रो पृथिव्या सहवासीदेतस्या गतिस्तीत्राऽऽसीत. तदाहोरात्रं लवेव मवदासीत्, परन्तु अधुनाऽस्या गतिर्मन्दा जाता, प्रतिहोरं' केवलं पट्यतोत्तर- पाटिमहतकोशमानम् । अहह ! यामिमां पृथ्वी महती कल्यामः स्पा आकाशीयतारानु कमवत् प्रतीयते। ज्येष्ठा नाम नक्षनमहो। इयद्विशाल वर्तते, यत्तस्मिन् सात- 'धमिवाः पृथ्व्यो मातुं शक्नुवन्ति । हन्त । एव विधायाश्चर्यवन्ति अनन्तानि नक्षत्राणि आकाराने भ्राजन्वे। भुवनक्षनमस्मतः पश्चाशन्महापद्माधिकद्विशघ्युकोशमितं' विदरमन्ति। हन्त । कोदशी विलक्षणाऽनन्तता महाकायस्य । चन्द्र कलङ्का भवन्तीति शान्न परिचाययति, परन्तु विज्ञायवे वेऽमी नद्यो भूधराय सन्ति-इति सो विज्ञानाति, परन्तु हन्त ! सूर्यऽपि-अनिर्वचनीयव्यस्से भगवति भाखत्यपि इयन्तो महान्तोऽस्थिराः, कलङ्काः भवन्ति, येषु पृथ्वी सावकाश समा- गच्छे। यदि सूर्यों जगद्विधाता सूर्यः सतारक्षेनपावकः सूर्यः, निरपेक्षस्वपखी, अवान्छितार्यदः सूयो न भवेत् , नौदिदात्, यद्यपि नेदं सम्भाव्यते, तदा दिनद्वयेन वायु- मण्डलस्य जलबाप्पं हिमीभूय समस्तं स्थावरजामात्मकं जगदेव नाशयेदिति । सूर्यः पश्चिमाशा स्वमार्पयत्। शब्दान्तरेण पृथ्वी पश्चिमायामरसर्व प्रापयत् । क्ष वमस्टनम्, परं सद्य एवं पूर्वांचाई शशाङ्कोऽयामास । शशिसम्भवा विभा बभौ । भगवता सुपरस्य ज्योत्स्ना "विद्यग्जनकस्यालोकन सम्मित्य रासकीच्या कीढन्ति स्म। प्रोपोस्पानविरता रतिप्रतीका रमणी पूर्णन्दु प्रसन्न न च पुष्पावलि समर्प भूचन्द्रमित चन्द खाक्षिलक्ष्यं विधाय सन्देहविधी सत्यसाक्षिणा निर्मलेन चेतमा क्षण विचिन्य एकाकिन्येव नायमारूढाऽभिचन्द्र प्रतस्ये । पुलिनान्तराल खात्यमेवासीत्, तरणितीपां रमपी पुलिनप्रदेशं प्रावियत्। विविध- रागाः मुमायस्वस्या मान्यादिलप्प धन्या अभवन, यासा सरकारे विलक्षणं "संगोत. १हर पन्टेने ६६६.. मोल ! २ सात नील .............. पृथ्वी समा सस्ती है। ३ दो नील पचास सरच मील २,५..., ४ Electric generater. ५आरकेष्ट्रा।

२३० चन्द्रमहीपतो, मासोत्। नीरसं शुष्कं वायुमण्डलं वासन्तिकेनोन्मादकेन सौरभेणेव पुष्पपरागपरिमलेन प्रकम्पितम्। ब्राह्ममौतिक तमोऽपहन्तुमुफ्प्रभवा विभव सा शनैशनैः पुलिन- मारोहत्। तस्याः मुखं पौणिमचन्द्रवदाहादक साभश्चासीत् । यं प्रसितुकामा सपिणीव वेणी-यस्यां कुन्दमुमनसश्चन्द्र रक्षितु वेणीसपिणीमाक्रमणेच्छयाऽऽश्लिष्टास्तारा इक्ष्यन्त-आपाणि लम्बमानाऽऽसोत् । साक्षालक्ष्मीरिव भासमाना सा सम्मुखीभ्य चन्द्र प्राणमत्। चन्द्रेणैतादृशी साधनसम्पन्ना सम्पन्नसौन्दर्या रमणी अद्यावधि नेक्षितासीत्। तस्याः मुखमण्डलेन सा परिचितेव कदाचिद् दृष्टेव च प्रतीयते स्म। विस्मितः स स्मितावलोकनेन तामुदतरत् । अथ सा “देव ! प्रमदाजनस्य धाप्टर्यमक्षम्यम्, परं विपुलं क्लिष्टस्य धार्य क्षम्यं भनति गुणशानाम् । अतोऽहं काप्यपरिचिता कांश्चिदपृष्टपूर्वान् प्रश्नान् पिपृच्छिषामि, दयनीयाहं दीनवत्सलैदीना” इति सप्रश्रयमवादीत् । तस्याः खरे यजीतवत् सुकोमलता माधुर्य्यचासीत् सौन्दर्य च कवित्वम् । उत्तेजना वशात्तस्या नेत्राभ्यां विचित्रं ज्योतिौतमानम्, ओष्ठौ स्फुरन्तौ शरीरय रोमाश्चितमासीत् । तस्याः स्फुट विकसितयोश्चक्षुपोर्मादकता, अरुणकपोलयोश्चोल्लास आसीत् । सौन्दर्य तस्याः शरीरसौधेऽट्टहासं कुर्वदासीत्। साधनायास्तेजोमय्याऽऽभया सा तपस्विनीव प्रतीयते स्म। अथ चन्दस्तस्याः निःसीमं साहसम्, उत्कृष्टा वीरता साधनाच, अनितरसाधारणों प्रतिभाम्, अलौकिक सौन्दर्यम्, पाष्णिस्पर्शिनः सुचिकणान् फलावलयितान् कृष्णोज्ज्वलान् केशान, सुभगान्यज्ञानि विलोकयंश्चकितखर्कतर्काकुलो नेयं लज्जावनता भयविह्वला सुर- सुन्दरीव भव्यदर्शना दुश्चरित्रा भवितुं शक्नोतीति विचारयनवोचत्- चन्दः-आम, स्वैरं स्वैरमभिधीयताम्। अभिधास्ये अभिधेयम् । रमणी-कदापि देवः स्वपवित्रपादविक्षेपणेन किमपि पापाणीभूतं पुरमलचकार ? चन्द्रः-आम्, एकदा रमणो०-कतीनां वर्षा वाता चन्द्र-युगादधिकम्भवेत् नवमो निःश्वासः रमणी-सत्यम्, तत्र भान् कति दिनान्यवात्सीत् ! "मासद्वयम्भवेत्। “राज्ञोऽन्तःपुरमप्यवालौकि?" "मा पाषाणपुरस्य पाषाणीभूतमन्तःपुरमवालोकि।" कि किमवालोकि तत्र?" "विपुलमवालोकि, भवत्यायवालोकि।" "अकार्यपि किमपि ?"-दृष्टा रमणी प्राह ।" "सिंहाखेटप्रवृत्ताया भवत्याः साहाय्यमकारि।" "नातः परं श्रोतव्यमखि देव !'-प्रफुलनयननीरजनीरेण पादाभ्यर्चनां रचयन्ती सगद्दमाइ अन्तनिहितहर्पभरभाराक्रमणरतमुखी रमगी "देव, साहं मन्दभाग्या राज- कुमार्यस्मि, या परातिहारिणा हारिमा हरिणाझेग देवेन पाषाणपुरे प्रेक्षिता रक्षितानुकम्प्तिा च। दुविदग्धदुर्दवः किमिव विधित्सतीति न कश्चन प्रमुर्शनुम् । क्षत्रियवातिकामुलभा ममेयं प्रतिज्ञाऽऽयोद् यदहं गुणाभिलषितं पुमांसं वरिष्ये। अहच रमणी रमप्रिया। न कोऽपि मामतोपयत्। भासेटसमये देवल विलक्षणप्रतिभया भया चाऋष्य कृतसङ्कल्पा पर प्रदीपसौभाग्या जगदितमहित देवं वीक्ष्यापि खाभिप्राय प्रवकुमसमर्पाञ्च पर्यन्तं हताशेवासम्। यतः प्रचुरपर्यालोचनेनापि श्रीमन्तो न लपाः। अहं देव, देशाराधन- उत्सरा विवियतकृयासी यमनियमनिरता पित्रावदापि भवतोऽन्वेषणाय निष्कान्ता परिमितसेनासहाया। अलं ज्वलतोऽवत्तिकस्य दोपस्येय मन दशासीत्। समीपे श्रीमतामभिधानम्, नान, कुलम् , निवासः, पदमिलादि मिपि नासोदन्वेषमाया- धारभूतम्। देवरो जानाति कानि कानि नगराध्यदाशम् , वनान्यविशम् , विचित्रावासेपु न्यवसम् , सरित उदतरं भयावहस्थानेषु चौरलयकान्देऽगमं परन्तु हन्त ! भवन्वं भया भासन्तं नारमे। साधनाविरहितः कयं प्राप्नुयान्मानवोऽभीप्सितम् । ततो विनलपुरवासिना जनेन केनापि झिनति बोधिधा कपनीयन्तं महान्तमध्यान- मतिकम्य गताझे राजनगरभूमि सनायता । मन्तधवेशस कुचिता पने वासनुचित मन्वाना मान्मेलनोरायमपेक्षमाणाम्। परमयं भगानिन्द्रः संवतरिख मेघः प्रटिश गोरो मामय न्यागत् । भगवाया मन पावें मां सानी भासीदतः मम २३२ चन्द्रमहीपती किमपि कष्ट नाभूत् । अव भगवानयममृतमरीचिर्मबीवनेऽपि मुधाविग्रुपो न्यसेचयत्, यदह पविनचरित्रण मनसा प्रेर्यमाणाऽऽयप्यदेवमध्यगमम्। भवत्यधिगते मम सर्या- चिन्ता व्यपगताः। यातायामसत्येयैः कष्टैराशङ्काभिश्च व्याकुलमानसाऽऽसम्। परमधुना आशङ्का, चिन्ता, व्याकुलता च युगपदेव व्यपगता। अधुनाऽऽदिसा कुटिलकालक्लिश्यमानाय दास्य कथनादेश, क्षम्यताच प्रकृष्ट लिष्टस्य प्रमदाजदस्य प्राज्ञोद्वेगकरी प्रथमा धृष्टता" इति । सर्वतः प्रसरति प्रावृषेण्ये सौरभे, ईपत्कम्पने मलयविकम्पने, उज्ज्वलायां चन्द्रिकायाम् , स्मयमानायर्या तारावल्याम् , विजने प्रदेशे, नैश्यां स्वन्धतायाम् , निर्मायगिरा विवचनवचनेन प्रकृति प्रसादयता प्रसने न मुखेन, मनः प्रसादयन्त्यामनुपमेयसुन्दा सोपक्रम विवक्षुरपि विजयाजित इव स्खलन् जरन्नैयायिक इव समदमवादीत- विकसितयौवनारामे। रामे। भवादृशीभिर्ट शोसादितमानसोन्माथिमन्मयाभिः, रणप्रियाभिः प्रतिज्ञातानि वैफल्यमाप्नुवन्ति कार्याणि नाम : परमह विवाहितः परिस्थितिवशान्मम तिन स्त्रियः। अहं राष्ट्रे बहुपत्नीकत्वं व्यपाकर्तुं सज्जः, कथमेतदपत्य खयमेव कर्तुं शक्नोमि। परतश्च मम स्त्रियो लोककल्याणे लग्नाः। सांसारिकभोगान विहाय मदाशया कर्माणि कुर्वतीनां तासां कामिनीमुलभा भोगाः सर्वथाऽपगताः। प्रासादः साधनास्थलम् , न भोगभूमिः । त्वच त्रैलोक्यसुन्दरी कथमपि न तत्र मनोऽभिल- पितान् भोगानवाप्स्यसीत्येष विचार्यों विषयः, अह विचार्य कथयिष्यामि । रमणी। सत्यम् , विचार्य जल पाययितुर्जलस्य दानेऽदाने वा नान्तरम् । पर पिपासाक्षामगलस्य जीवनमरणयो प्रश्नः। अथ च दोषा देव ! भावनाश्रयाः । बहुपत्नीकत्व दोषोऽपि सद्भावनावशाद् गुणः । साधनास्थले बहद शिष्याः समाने गुरौ युगपदेव साधना क शक्ताः। मात्सर्य भोगभूमावेव भवति, न साधनास्थले । चन्द्रः । अनुरागाभिलाषिणो विरक्त न सहाजीवनं सङ्गो न सुखावहः। भोगा- भिलाषिणः सहयोगिनो भोगिन एव युकाः। रमणी । मैवम्, खियो हि द्रवधानुसमा, परिस्थित्यनुसार भवितुं शक्ताः। अह तिसगामेव भगिनीनां दास्यमाचरन्ती धीमन्तमाराधयिष्यामि, नो चेदवामरण स्थित्वा दरतः श्रीमन्तमर्चयिष्यामि, 'कन्या सकृत् प्रदीयते' देव ।। मम नवमो निश्वास ૨૨ चदखस्या रणनैपुण्य साहस सौन्दर्य खस्मिन् भावमार्यनारीसस्कृतिक विचार्य बदनासीत्तदैव यानचालकोऽसूचयद् यद्राजनगरस्य समीपे सेतुभगाद् वाष्पशकटी दुर्घटनाग्रस्तेति विताररत्तोद्धोपेणासूचि-इति । "हन्त । दौर्भाग्य राष्ट्रस्य, जन्तु, यान सजय । (अभिरमणि) अस्तु, जात तजातम् । आप्रियमेलन प्रेयसीना दुखम् । पुरिन न मुखावहम् । भवती प्रासादे विश्राम्यन, भानापयतु चानुवरान् दुर्गमागन्तुम्। आरोह यानम्, व्यत्येति वेरा । किं नाम देव्या ?" 'दास्या नाम सूर्यप्रभा"। नद्रो वितारहत्तोरोपकेण सैनिकानीपचारिक्यूपश्च' घटनास्थल गन्नुमादिस्य स्वयमपि सूर्यप्रभया सह जगाम । सेतुर्नवीन आसीत, कथ स भात इत्यव तस्य विचार आयीत् । वाप्पद्यमय्यां प्रतिहोर नत्वारिंशत्क्रोशवेगेन धावन्त्यां सेतोलावलभी अकस्माद् भिदा। पाप्पशक्तियन्त्र' सह चतुभिः पथिकावासनद्यामपतत् । असङ्ख्या नरा नार्य विशव सह विपुलेन धनेन नद्या निमन्ना येपा चिहमेव नावलोक्यते स्म । शेषा दशावाया उत्ता' भन्योऽन्य प्रविष्टा । मानवा पिच्चिता, अदं मृता , तृतीयांशा आहृता सुर्या शा साधारणमाहता। नदोनिमन्नानां कृते टत्यापमा नियुक्ता, मृतानामाहता- नाब प्राथमिम्मुपचार कृत्वा अस्वस्थपरिवहनेन आरोग्यशालाया प्रबन्धो पिहित । ययाज्ञान परिचया पपु प्रकाशिता । घटनास्थले सैनिका आयोजिता । चन्द्रस्य चतो दुर्घटनापीहितान् विलोक्यावसन्नम् । “ष्टिपिरता, पर प्रवाहेषु जल प्रतिदिनमेधनान वत्तवे" इति चरेण चन्द्रो न्यवाद । चन्द्रेण जरप्लावस्य बाप्पास्टीदुर्घटनायाश्च कारण शातुमनुसन्धानमण्डल नियो जितम् , आश्मच पक्षाभ्यन्तरे विवरणदानाय । * प्राभातिको रागो पातमारा कशष्पली प्रविश्य मन आदादयति स्म। नेतो- १प्राथमिक चिकित्सा करनेवाले। २ लहे का गाटर। ३ भाप से शकि उत्पन्न- करनेवाला रेल्व इजिन । । हिग्वे। ५ उलट गये। ६ केन। Investigation Commisson ૨૨૮ चन्द्रमहीपतो विकृर्षि नारवता प्रसताऽऽमात्, यस्सा बनरमरणका उल्लस स्मृत्ति चतना बन्यन्त आसन् । वचन वचन नाझे मुहूत विद्या विरला वाचो भगवद्गउन सारत्वन परत श्रूयन्त स्म। यस्माद् वितारहत्तमपेपयत् यद् राजनारस्य पश्चिमोत्तरस्या दिन गतिदशकान्तरले वातहस' क्षतिमन्त । चन्द्र उत्थितनात्र एवैतच्छु तवान् । प्रबरोऽमुना वायुधानेन जलाप्लुत क्षेत्र प्रेशिनु प्रेपित असीत् । चन्द्रचिन्तयामास, क्यनह कुमुदिन्या अग्रे स्वस्यामि। हन्त। हवा कुमुदिनी! दुर्भिक्षग्रस्ते प्रदेशे सोत्साह जनान् सेवमाना सा यदद थोप्यति हन्व! धात! किं चित्रीपसि। प्रल 1 सत्य सफल त जीवनम् । घटनास्थल प्रक्षितुकामो मरुत्तरेण सत्वर गतवान् स । औपचारिका आसन्नेवा योजनविशाले क्षत्रे वायुयानस्य तस्मिन् स्थितानाच अवरवा अपरिचीयमाना प्रक्षिप्ता आसन् । एकतश्च रिण्डित ज्वालाभजित वायुयानम् । अग्रिमभागो वायुयाने नासीत् । अप्राप्तसन्तोषो वायुयानावतरणभूमि गतोऽजिज्ञासत उत्तरितच “वातहसे चालक- द्वयम्, द्वौ च सनिकावास्तम्, प्रबलो व्यवस्थायै नत्र स्थित"। सन्तोषस्य निश्वासो निरगात् । मनुष्य प्रकृति जतु कृतप्रयत्न' । जले स्थळे नभसि निवागमन स कृतकृन्यमात्मान मनुते । पर प्रकृतिस्तस्याल्पज्ञवा विचिन्त्याट्ट हास कुरुते । किमेप एव प्रकृविजय । मानव' कय भ्रान्त ? अल्पेऽपि ज्ञाने कोदशी तस्य मदाधता? इति स विचारयामास । * * माननीया महाराज्ञी सरोजिनी पर लिखितुमादिशति -कुमुदिनी विजयता भारतीया सस्कृति । अह जविना जापेन व्यवस्था सम्पादयन्ती प्रान्तममु पर्यगमि। प्रान्ते प्रतिशत । सवन दुभिक्षम्। ग्रामेयु बहवो मृता, केचन शमीपत्राणि शमोत्सवय न्ति। अन्नरहिता अपि नान याचितु पारयन्ति मनखिनो ग्राम्यम् । वायुयान का नाम । २ एरोड्रम । ३ जोवयति-युद्धादिषु शीघ्र सुदूर प्रापणेव स जीप पोदरादित्वात्साधु (जीप गाडी)। - २३६ चन्द्रमहीपतो रजनाय हास्यनिर्मरैः मुराचषकै दातालेस्तन्त्रीरणरणकै पुरशिक्षितैः सह पति- व्रतानां पतिव्रत्यं कुमारीणां कौमारं निर्दयं निणं निर्लज्जं राजतताम्रमुद्राभिः साट्टहासं लुण्ठन्तो विहसन्ति । येषां विशालाट्टालिकासु भोगा विलासैः सह रत्नजटितवर्णवपकैः मुरां निपोय नृत्यन्ति। यत्र कुलाङ्गनानां पतनं वीक्ष्य गर्वितमुख्यश्चम्तिहरिणीप्रेक्षणेन विमोहितसधनाः मुलोचना मन्दोदयों वारवध्वः स्मयमाना मौदममा नना इवान्व/वि- विधरागैरम्बरैभूषिताः पतसिका इव मनो रजयन्ति । यत्र भृत्याः वानश्चाप्यजीर्णग्रस्ता वम्यतिसारान् भजन्तश्चिकित्सालयेषु प्रलम्यां पक्किं 'विरचयन्ति । प्रजाः स्वभाग्यं धिक्कुर्वत्यः साधिकार खभाग साजितं द्रव्यं परैरुपभुग्यमानं विनाश्य- मानञ्च वीक्ष्यापि न किमपि कुर्वत्यो वरात्योऽकर्मप्याः कायराः कष्टानि जोषं सहन्ते। धनिनो मृत्यानुपदिशन्ति-भगवता परब्रह्मावतारेण कृष्णेनोदपोपि यत् ‘कृत कर्मण्येवाधिकारो न फले अतोऽहनिशं भ्राम्यद्भिः फलभूतस्य वेतनस्याकाक्षैव महत् पातकम् । अस्माभिरास्तिकैनवंविधं किमपि कर्त्तव्यं येन भगवद्वाक्यै विरोधः समापतेद् इति। हन्त ? कीदृशः स्वार्थान्धः संसारः? शासनेन 'आशनस्य प्रबन्धी विहितः। अन्नरोद्धा सापराधो घोपितः। कोऽपि पक्षन्यवहार्यादधिम्मन्न गृहे विपणौ वा रक्षितु नाधिकृतः। जनद्वेषिणो व्यापारिणोऽपार- मन्न निरन्धानाः सन्ति व्यसनोपजोविनः क्रव्यादाः। ते परिवारसदसः सर्वेषां सदस्यानां नाम्ना पार्धक्येन परिवारान् प्रकल्प्यान्न न्यरुधन् कूटनिपुणाः। 'पृष्ठविपणिः सर्वविधान्नेन परिपूर्णाऽस्ति, अप्रविपणौ चोवृत्ततूलासनः मक्षिका मारयन्नेकलः पणो। ग्राहकान् स कथयति, "भवतां दुख पश्यन्नह नितरां दुःखी, परं विवशोऽस्मि, विकेतु मम समीपे किमपि नास्ति, शिशुभ्यो दिमपमितमन्नं मुद्राशतेनानीतवानस्मि तर्द्धमगृहीतलाभो दातुं शक्नोमि।" आचारे व्यवहारे च सर्वत्र विशेषतो नगरेषु च्छलं दोषः समीक्ष्यते। पीडितमानवानां कृते पौरः समितयो योजिताः। शतशो युवान आतंत्राणाय सज्जा अभवन् । ते स्थ्यामु दुभिक्षपीडिताना सेयायै रक्षायै भन्नं वासांसि धनचायाचन्। जनता मुक्तहस्तेन ददी। १ क्यू। २ काये रमन्ते ते, औणादिको । ३ आ ईषद् अशनम् =आशनम् । खलं परिमितबाशनम् - राशन । ४ चौरबाजार । ५ गद्दी उलटाकर।

२३८ चन्द्रमहीपतो व्यवारीत्-राज्यस्य दशकोटिमुद्राणा वर्षचतुष्टयस्य च व्ययेन निर्मित 'आनन्दबन्धो भन्न । तद्वन्धविघातेनैव सा जनपदो जलप्लावे निमन । बन्धनिर्माणे नियुक्ती *मृत्तास्थाने सिकतामुपयोज्य भृत्स्नाच विक्रीय पुनाय पननिर्माणशाला श्यालाय अस्त्रनिर्माणशालाचाकारयत्। स एव जनपदस्य योगक्षमाय रचित आनन्दबन्धी नलबलेन भन्नो जनपद जलेनाप्लावयत्। वाप्पशकट्या सेतौ च राज्यतो दत्तानां लोहवलभीना स्थाने जीर्णा लोहवलभ्यो रागेण रक्का प्रयुक्ता नवीनाश्चान्यत्र विक्रीता । जीर्णाश्च निरन्तरप्रवर्षणेन काटयुजो भग्ना , इति । "आचर्यम् ॥" चन्द्रश्चिन्तयामास “जन खस्य लाभलोभेन विश्व विहन्तुमुयुक्त । लोहवलभीविक्रयेण सहस्र द्विसहस्र तस्य लाभो भूतो भवेत्, विनाशश्च कोटिमुद्राणां सहस्राणा मानवानाम् । असमर्थविकार , सग्रहविकार, सार्थविकारो जीर्णा लोहवलभी- मुपयुनक्ति मृत्स्नास्थाने सिकता। हन्त ॥ विलक्षणोऽयं विकार । विलक्षणयैव चास्य चिकित्सया भवितव्यम् ।' चन्द्रो ऽधिकोषमाज्ञापयामास पदमूषां धनमनुसन्धातव्यम्, अनुसन्धान यावत् बन्धसेतुनियुक्का ससम्बन्धिनो राज्याभिरक्षाया रद्दीता स्यु"इति । . * आग्नेयकिरणैरुरु तापितनिरपराधससार परितापपापेनेव पाथोधौ पतित दिनद्यमणि चीक्ष्य नैशो द्यमणिः समस्तदिनाकुलप्राणिन सान्त्वयन्निव, नक्षनमुक्तानां विशदविमल- विशालमुज्ज्वल हार परिधाय बुमुदव्याजेन विहसन् चयितताम्बूलमिवाताम्र गण्डूपेनेव रदिमजालेन विशोध्य मुख प्रकटितोज्ज्वलदन्तपकिर्गगनाइने साइनो धावति । उन्मुक्तवसना निरशना तपोधवला मुबला तपखिनीवोद्दे कलक्ष्याऽलक्ष्यसेवाग्रता निस्पन्दनीरवतटा प्रगाढा शान्ति दधाना प्रवहणस्य प्रशान्तमादक्कलकलेन वासन्तिक- मधुमत्तमोदिमधुकरेणेव मन्द्र निनादिता नदो मन्द मन्द प्रवहति । अशान्तानपि प्रसह्य शमयत् शात वातावरणम्, मुभगतरित' सौरस्यम्, ज्योत्स्ना धौताना सम्फुल्लानां दुमदलमुमनसा सौरभम्, मधुरमरीचिमालिनचन्द्रमसो जगज्जयिनी चन्द्रिका, तारकाणां सन्दननृत्यम्, प्रकृति सौन्दय्यानन्दसरसी निर्मातु सपना भासन् । आन्ध Dum] २ सीमेट। ३ पेपरमिल। ४ लोय मिल। ५ जग खाई हुई। फटे वषावरणयो। ६ बैंक । ७ कस्टडी Custody By Government नवमो निश्वास ०३६ प्रसवपूणायामुत्यकावा विजनमनोरमे सरितट विविध लीवलयित कोरकमुकुल- मुरभित चलदल दविफल मन्दारकोविदारोदुम्बरनिम्बजम्बोरपरिमृत माधबामल्टिकाशेफा सिनमायकरवीरकरीरचाम्पेयचम्पयन्धककनकरुचरकुरवकमलकवकुलकुलाकुळ निकुञ्ज कुटारम्। तमेव लक्षीकृत्य शनैशनै सरित प्रशान्तवज्ञ स्थल विभाजयन्ती क्षियिप्ररिता दरि कुटीरान्तिकमुपेयाय । तरि शकुनाऽऽवष्य भूमिमवतों युवा अनिकुटि व्रजन् अखण्डशान्तितरूपनिमनमध्यात्नचिन्तननिरत विरतवासनमात्मकल्पनालीन बाल्पनातीत कैलाशविलासकेश तजखिन मनोज्ञहास्य निरालस्यमुपास्ये निरतमान समवलोक्येकत टपाविशत् । आनन्दाश्रुप्लुताननो वर्षीयान् गदन्नावात्- अपरिमेयानि पापानि मम विश्वसर्वस्त्र ! अन्तविरहिता देया । ससारे भ्रमतो ग्ममवने पथ्यटतो जगजालजलपी प्रवहत उन्नत्तीभूय कर्तव्य विस्मृत्य जगतो मृगतृष्णा मनुयायमानस्य स्वेन व निम्तो मे आनुर्व्यतीतम्। अद्यावधि पिकारपेपपातिरिक नान्यत्कृतवानस्मि। अभ्यस्तविषयावादो गुस्वप्रेरितोऽशि विजने विपनो वसन्नपि कसमदनभुनाऽमान विचारयितु पारयानि । "अप्यधिपानान्महत सुमेरून्मूलनादपि । अपि वन्यशनाद् राम । विपमधित्तनिप्रह ॥" इति वसिष्टोल मुष्ठ। क्षाभ गुर विनशनशील जीवन विदतापि ना स्मन् जन्मनि नधन्यस्मिन् मया विवराया-यस्तम्। तथापि नाह निराध इत्येव तव कृपा। त्व भानुभरिप्पस आमसान् करिष्यसाति म मुदृढो विश्वास । मनापान नानन्त्यन् पर सा मा ६पेनवोदतु शता। तब चारुचरपो समाटिस्य सप्रेम मठो बहुजनमविदूर भवत्, परं वत्तवे ध्रव सलम्। निश्चित तमेच्दा ना बहसाऽरिमिप्यसि। अधीरता प्रताशास्निन्ननन्दा। कमन्नेवाह परमा चरमा रसानुभूति प्रयानि यदा तदा प्रप्तौ स्मिनुभवितव्यमिति त्वमिवचन यमव । कदाह मानोग्यता कोनामुमकिसलयकन परिजवास्मिटललिता सपशय्यामधियानस्य मुन्नारामतो दर्शनानन्दमनुभविष्यानि । पपल। २ या ३ कचरा स्वदयाप्यनन्ता।

२४० चन्द्रमहीपतो दीर्घाण्यघान्यधिशुचीव भवन्त्यहानि हानिर्वलस्य शरदीव नदीजलस्य । दुःखान्यसत्परिभवा इव दु.सहानि हा ! निःसहोऽस्मि कुरु निश्शरणेऽनुकम्पाम् ।। (जगदरभट्टस्य ) त विरतवाच शनैरुपसृत्यानम्य युवोचे- अर्थवादस्य दुर्दम्यपिशाचेन कारावास वसितु बाधितां दुराचारकर्कशलौहशृङ्खला- निबद्धा भारतीया भुव प्रजाच प्राचीनार्यभारतीयसस्कृल्या भूषयितुमुन्मुक्तवातावरणे नि वखितुं नरेन्द्रमण्डल समाह्वयति युवराजश्चन्द्रः। तस्मिन्नवसरे तातस्य वाग्भागीरथ्यां स्वानु सर्व परमोत्सुकः। इति। "शक्त ! चिरायुषश्चन्द्रस्य साधनायां व्यवस्थाया मम महान् विश्वास । मूकसाधकाल्व राममनुलक्ष्मण इवाशेष निर्वहसि । मया बहव उत्सवा दृष्टा उपदिष्टाः कृताः सञ्चालिताय । अधुनाहमुपरतः कालात्ययितो न वापि जिगमिपामि गुरुणाऽऽज्ञप्तः । चन्द्र प्रजामिन सयुयुक्षुभिरन्यै राजभिस्त्वया च परामृश्य यचिकीर्षति, तदेव वरम् । “गुणार्जनोच्छाय- विरुद्धबुद्धयः प्रकृत्यमित्राणि सतामसाधवः" अत. सर्वे परामर्शी वरीयान् , देवो दिशतु युप्मभ्यं साफल्यम् । अथ च किमुत्सवैः१ अल प्रजाधनदुरुपयोगेन । विश्वसाम्राज्यमि- प्सव. सहस्रश. सुन्दरीणां प्रियतमा, लक्षशः कलावता कोटिशः कर्मकराणामाश्रयाः भगवदनुजन्मान इव मनुजन्मानो दुर्गान् प्रासादानारामान निर्माप्य ससारसाधनारम्भे- ऽदभ्रारम्भा रमणीयतमानुत्सवानकायुः, पर वाद्य ते ? एवे भग्नावशेषा गूकमाकन्दयन्तो जगन्मानमर्दिभिवीरैरप्सर स्पद्धिसौन्दयाभिः सुन्दरीभिरध्युपितचरा अपि निर्भर- मुद्घोपयन्ति यद् वयमदयमदिता मर्दिता निष्ठुरनियत्याः क्रूरकरै। विश्वस्मिन् खविचारान् स्वरुचि प्रसारयितु सयन्ना हन्त ! अद्य कतेषा नामकालानुसन्धानमपि पुरातत्त्वविभागस्थानां शिरोऽत्तिकरम्। एष वायुः, एषा भूमिः, एतदाकाशम्, एतानि वनानि तान् तदनुजिगमिपूँश्च नि शब्द विहसन्तीव । वनक्षेषु निपतति सान्ध्यस्र्या- लोके क्षणं विविधरागार्णा प्रतीतिरिवास्मिन् ससारे सुखाना प्रतीतिः। प्रज्ञावतां प्रज्ञाया- स्वदेव मुकर्म येनानाडम्बरमप्रदर्शन जगतो विराजो भगवतोऽफलाभिलापमर्चन भवेदिति"। - नयमो निःश्वासः २४१ "तदेव देव । वय कर्तुं कृतसकल्पाः ।" * पीलोमीपतिपत्तनोपवनपरिमलेनेव परिपूर्णस्य प्रासादस्य विशुधावलिवलयिते सारस्वत. सातोधरैः मुरीवरदेशरत्नराकुले रनाकर इव प्रेक्षमाणे विशाले हाले मुखमासीनानां 'सामयिकोमावश्यम्ताननुभूव विचाराय समवेतानां विभिन्नमण्डल्लरपालानामेका विचार- परिपत् प्रारब्धा । प्रस्य ज्यावान विद्वान ज्ञानस्य प्रतिनिधिनिधिस्तपम. परफ्त्पतिपद- मलवयर। स्वस्तिवाचनानन्तर समुत्सुकेषु तूप्मीम्भव प्रतीक्षमाणेषु सर्वेषु चन्द्र आमन्त्रणस्य प्रयोजनं विशदयन्नुदतिष्ठन्। चन्द्रस्य विशाल शालोनत मुघटित विमक वपु, परिणवप्रारपेयजलपरधामानः स्निग्धोज्ज्वला भारति रम्या काम्या सार्मा मुन्ति स्कन्धवितपिगः प्रलम्बिनः कृप्पाः केशा, मानस्य मर्यादेय तपस्विनः साधनैव मांसलोन्नता प्रलम्बा ग्रोवा, निघनीलाम्बरे सहसोदितस्य सूर्यस्य मण्डलनिव तेजति मोहम्मापकमिन्दिराबन्दित मुखमण्डल सगु सम्भ्रम उचारयामास । स्मयमानः सप्रायोचत- । २४२ चन्द्रमहोपतो आर्यता व्याप्तिरासीत् । अस्माक ववस्ताम्रपत्रलेखायते स्म, पगश्च सूर्योदयवदप्रतिरुद्ध आसोत् । राष्ट्रान्तराणि यदा तमसावृतान्यनारतानि बिलेप शयानानि चासन् , अस्माकं राष्ट्र जगद्गुरुर्धनबलम्लाविवेकविज्ञानेष्वपास्ततुलमासीत्। अत्रैव विवस्य प्राचीनतमो ग्रन्थ ऋग्वेद, अस्मादेव विश्वस्मिन् शान्तिलताप्रसारक दर्शनात्मक ज्ञानज्योतिरुदगात् । अस्मादेव आग्नेयपाशुपतवारुणवायव्यब्रह्मास्त्रप्रमृतोनां विश्वभयङ्कराणामस्त्राणामुद्गमः प्रशमश्च । ज्ञानज्योतिरोप्या लोकान्तरीया अत्रैवाजिगमिपन्ति स्म । अत्रैव लोक- कल्याणैकमनसो मनखिनस्तपखिनो विविधा रीतिनीतीः प्रसारयामासुः। सर्वन प्रेम, वात्सल्यम्, सौहार्दम्, सहयोगिता, अभेदभावः, सहभावः, सद्भावश्चासोत् । परमय ? भूमिः सूर्यश्चन्द्रो वायुराकाश तु त एव सन्ति परं मानवभावनाः परिवर्तिताः। अत एवषा धरित्री ध्वस्तेव दृश्यते । हा 1 विलक्षपो दैवदुर्विपाकः । केन भावनास्माकं पूर्वजा न्यबसन्, क्यच्च केन निवसामः। पुरा सरसि मानसे विकचसारसालिस्पलत्- परागसुरभीकृते पयसि यस्य यातं वयः। स पल्वलजलेऽधुना मिलदनेकभेकाकुले मरालकुलनायकः कथय रे ! कथं वर्त्तताम् । पण्डितराजः । प्रतिवेशिनि बुभुक्षिते दीने रुग्णे च भोजनं गहितमासीत् । कस्मिंश्विनवीने ग्राममायावे सर्व प्रामीणास्तस्मै साहाय्य प्रदाय खतुल्यमर्छन् । तस्मिन् दुःखितेऽवसन्ने न्यूनेऽवरे च प्रामीणानामवरत्व प्रतिष्ठितमासीत। लाभार्थ सग्रहो हेय आसीत्। यधोऽधःक्षितो वित्तं निचखान मितम्पचः। तधो निलयं गन्तुं चक्र पन्थानमग्रतः ।। कय्यपूर्णामु विपणिषु यथावश्यक वस्तूपयोगाय विक्रीयते स्म । देशान्तरात ।यमानीय विक्रयो जनस्यावश्यकतापूरणच व्यापारिणः कर्तव्यम्, तदेव लाभो गण्यते स्म । अर्थार्ज- नस्योद्देश्यं नासोत्। सर्व ज्ञानधनार्जने परस्परं यथोचितेन सहयोगेन खौहानैकपरिवा- रम्यवस्थया निवसन्ति स्म। विदूरस्थमपरिचितं गृहमागतमीवरभावेनामन्यत गृहो । ईटरो वातावरणे क स्थानमधुना प्रतिपदं प्रतिदिन स्थापितानां स्थाप्यमानानाथ भोजनालयाना चन्द्रमहोपतो अगुणकणो गुणराशियमिह देवात् सलानने पतितम् । प्रसरति तैलमिवैकः सलिले घृतमिव जडत्वमेत्यन्यः।। भवधार्यताम्, अस्माक विशाले वाङ्मये कपाटावरोधिका केवल शृङ्खलैयास्ति न तालकम् । तालकमविश्वासभोत्योः पुजवादपुत्रयोरपत्यम् । सकलसौख्यशाधनस्याभेद- भावस्याद्यासता भूता, तस्य खसिहासने प्रतिष्ठापनमस्माकमुद्देश्यम् । समाजे सर्व समाना आसमर्थदृष्ट्या, पर केनन धूर्ताः खपक्षपोषणाय खार्थसरक्षणाय शासकैरुत्साहिता आन्यकरणभावमाश्रित्य प्रतियोगिताव्याघ्री निर्माय स्वस्थिति दृढयित्वाऽग्रे गच्छन्तोऽनुगामिन आहन्तुमारेभिरे कृतघ्नरः । अज्ञातदेशकालाश्चपलमुखाः पङ्गवोऽपि सप्लुतयः। नवविहगा इव मुग्धा भक्ष्यन्ते धूर्तमार्जार.॥ क्षेमेन्द्रः । अनुगामिनश्च सकृदाहताः पतिता. परिस्थितिपीडिता जानन्तोऽपि तेषां दानवीभूतानां धौर्य धाय॑ च नोत्थातुमवशा.प्राभवम् । उपेक्षते यः सलमाक्षिपन्तं साधुर्मनोऽबुध्यत कारणं तत् । द्विजिह्वमेनं स यदेकजित प्रयुक्तिभिर्न क्रमते नियन्तुम् ॥ सोमेश्वर । अपि तु परिस्थितिपतितास्तानेवाग्रगामिनो धूतन् पोषयामामुः। एते मत्कुणा मशका यूरा इव मानवरक्तमाचूषयन्तः परजीविनो मानवशरीर दुःखयन्तोऽपि मानवशरीरे स्थिताः । एते हि कालपुरुषाः पृथुदण्डनिपातहतलोकाः। गणनागणनपिशाचाश्चरन्ति भूर्जध्वजा लोके ॥ करतेपा विश्वासं यममहिपविपाणकोटिकुटिलानाम् । जति, न यस्य विपक्त कण्ठे पाशः कृतान्तस्य ॥ क्षेमेन्द्र । एतेषां शीर्षघातिनां प्रसह्यापसारण जीवनाय कि न परमावश्यकम् । सहयोगी नियमनञ्च समाजस्य जीवनभूती, तावद्य हन्त ! मृतौ। वस्तुतो धन लोकस्य न्यासः । परम्परया परिस्थित्या वा प्राप्त धन लोकस्य न्यासः। यथासम्भव शीघ्र यथारीति तस्य तदधिकारिषु प्रत्यावर्त्तन प्रतिदान न्यासधरस्य योग्यताया सूचकम् । अतोऽद्य या सम्पत्ति अस्याम २४६ चन्द्रमहीपती खलव खड्गश्च नहि स्वभावं जहाति कोशार्पणलालितोऽपि । यस्यातिमा मलिनात्मकस्य पर द्विधा कुर्वत एव राग ॥ सोमेश्वर । अत्यामेक एव सर्वग्राही वुभूपत्यातापिरिख, परस्पर धनमपजिहीपति च । वस्थायामाशङ्कापूर्ण वातावरण के आनन्द ? व मुसम् १ मन्यतां भवान् मृत्लमभिलपति, तस्मे किमपि भोजनबस्नादिक प्रदाय तस्य श्रमेण खकार्य चिकीर्पति, तदाऽवश्यमेव भवत्प्रतिवशिना निर्धनेन भवितव्यम् । भवदैश्वर्य भयत प्रतिवेशिनो दारिद्रयेऽवलम्वितम् । परम्, राष्ट्र कधन भोजनवस्रादेरिच्छको न भवेत्, रापा जीवनव्यापार स्वेन चलेत्तदा भृत्यमाप्तिरसरया। वपनम्, पशुवारणम्, भोजनम्, जलानयनम्, लेखन व्यवहारादिक तेनैव कार्यम् । राष्ट्र तद् यदि सम्पन्न भवेत्, सध्याचका अनभिलाषुकाच स्युवदा स्वर्णपते वर्णस्योपयोगिता पोतपायापखण्डतो नाधिका। तेन सचितमन्नवनादि घुणादिजर्जरितमेव भविष्यति, यतो न कश्चना- काङक्षक। स स्वयच नान्नम्, न वासासि, न गृहाणि वा शतसहस्रगुणमुपयोत्तमुपभोक्तु. वा समर्थ। अतस्तत् सर्व विनश्यति। वुध्यता तस्य सछ ग्रहस्य कोऽर्थ । स्वल्पा यानन्दायापि तेन श्रमिवत् कठिन श्रमितव्यमेव । विशाल क्षेन स खयमेककी न वस्तु नलवितुम् न चोपयोक्त समर्थ , न च विशालस्य हर्म्यस्य जीर्णोद्धारे उपलेपे क्मुि वासेऽपि समर्थ । स जीर्णशीर्णानि गृहाणि खकीयानि कथयन्नेव हध्यति । भविष्यति चान्यगृहनिर्माणेऽनुत्सुक । अत स लघीयसि गृह उद्याने वा वसन् सहस्त्र कृतसर्वकार्य एवातिसन्तुष्टो भविष्यति । धनार्जने चतुरो धनमर्जयेत्, पर तस्योपयोग सार्वदेशिको भवेत् यथा वायुराकाश जल विश्वजनीयानीश्वरप्रदत्तानि च तथैव धनम् । न्यास । विचार्यताम्, यदि माता शक्तिशालिनी चतुरा च, तदा किं सा दुर्बलस्य शिशोभॊज्य खादेत् । यदि खादेतदा कस्ता मातर कथयितुमीहत। सर्वे ता डाकिनी वदिष्यन्ति। विज्ञ सर्वसाधनसम्पन्न पितृस्थानीयो धनी गृहम् मातापितरौ, दायपत्यञ्च विहायागताना पुत्रायमाणाना नृत्याना भृत्यकृपोपार्जितसम्पत्प्रतिष्ठा निदयं सर्वस्व हतं सक्षण । धन लोक्स्य परमन नवमो निःश्वासः शोपणे सहायस्थ एवमल्पा अमृतं किरति हिमाशुः विपमेव फणी समुगिरति । गुणमेव वक्ति साधुर्दोषमसाधुः प्रकाशयति ॥ विवार्यतां श्रीमता सम्मतीस कय सम्योध्यः ? आधुनिक ज्ञान विज्ञानं केवल परिग्रहिां धनार्जनस्य साधनमात्रम्, परेपामारूपेगे अद्य विज्ञानाविष्कृतानि यत्राणि मानवमूल्यहराणि । प्रतीयते पुनरादोऽय यन्त्राख्ढो मानवजयो। यन्नं समावेशानां शकिवर्सनाय परिश्रमपरिहाराय कौशलेन समानवस्तून्पादनाय अवकाशसरक्षणाय च प्रतिष्टितम्। चपोः शक्तिवर्द्धनायो- पनेर दूरवीक्षण सूक्ष्भेक्षणन, वाचः शक्त्यै ध्वनिविस्तारकम् , पादयोः शतिवद्धनाय द्विचलिका, मरुत्तरम्, बाष्पयानम् , वायुयानञ्च । हस्तयोः शक्तिवर्द्धनायासछ्येयानि यन्त्राणि, लिपिधमपरिहाराय मुद्रणालयः। सोऽयं मानवविकासाय मानवादानां शक्त्युत्पाय गुणोदयाय चोपयोगः सम्मतः। पर योऽवकाशः सर्वविधयकीनामुदयाय यन्नेण दत्तस्तस्मिन्नेकाधिकारः पुजवादेन मृतः प्रतिद्वन्दितामुत्पाद्य । अवकासभोनिनोऽनत्याचानवकाशयोजिनः संवताः। सन्तापमोहकम्पान् सम्पादयितुं निहन्तुमपि जन्तून् । ससि ! दुर्जनस्य हि मति: प्रसरति दूर ज्वरस्येव ॥ गोवर्दनाचार्यः। अद्यतनं यन्त्रयेपुल्य मानवीयकलानां समाप्तिम्, प्रचुरमेकदा मुलभ सौम्यप मेत्पाय धन केन्द्रितं करोति, कलाभिवृद्धि याधते, उत्पादने मानवस्पर्श उपदि च। मन्यस्य विशसस्त्वनेन पुजवादप्ररितेन पराहत एव सम्प्रति तद् विकासापार मनुप्पमेय जियन्सन्ति । जिपसां निराकृल तस्योपयोगिता केवलनामाभियस्थाया। न परं फलति हि किञ्चित् सल एवानर्थमावहवि धावत् । मारयति सपदि विषतरुराश्रयमाणं अमापनुदे ।। यन्योदयात् पूर्वमानाभिरहवः पशवः समाजे सम्मेलितास्पयोगिता नीताथ, परमधुना पालिवपरं गवावरि मृति। भनुपपुग्यमानस्य रामाभवाऽऽस्यैव। स्वाभ्युदये मग मुदयः, पशूनामधुस-सस्कारोऽभिप्रेतः, मिनु द्वितीयभाने। पर सांभ्युदयीया- विस्मयोजनेऽस्माकं चिरपरिचिताना पारितानां पशूनां सपोरन तु नितरामावसकम् ।

२४८ चन्द्रमहोपतो स्मर्यताम्, राष्ट्र सर्वे समानाः शरीरेऽङ्गानीव । समये उत्वा पर्यवेक्षमाणो लविता कृषक, सन्धियोगनिपुणो नौनिमांता, लोहकारः कुम्भकाश्चर्मकारो व्यवस्थापक- चिकित्सकोऽध्यापकः, गृहकारुः, गृहकार्यदक्षा गृहिणी, स्वरान् संयोज्य गायन्ती गायिका, सैनिक, शोधको देशस्य सम्पादका मङ्गलकर्तारध। नैते करमाच्चिदपि प्रजाव्यवस्थापकाद् राज्ञः, सदसद्विवेचयतो न्यायाधीशाद् वा न्यूनाः । मम सम्मतौ राज्ञा धनिनाश्चायं विकासक्रमः। पुरा ग्राम्या ग्राम्यं वलवन्तमूचुः-"वय तव जीविका साधयिष्यामरत्व ग्राम रक्ष"। स खोकृत्य दण्डधरी नैपुण्येन प्राम रक्ष। तस्य कार्यप्रणालीप्रसन्नाः पार्श्ववत्तिनोऽपि त प्रामाणां रक्षार्थमनोदयन् । स खीकृत्य खाप्तपुरयान्नियोज्य रक्षितुमारेभे। एवं शनैशनैः स बहूनां नगराणा रक्षको बभूव । "प्रजाहितत्रतिनो वयम्" इत्येव तस्यादर्श आसीत् । ग्रामरक्षकाणामावासाय परेपा प्रहाररोधाय प्रजानां सुरक्षाये तेनाधुना विशाल दुर्ग निरमायि। व्याघातकानां कृते तेनायुधनिर्मितिरारब्धा । रक्षकाणा शिक्षणाय स्वपुत्राणामध्यापनाय च वनादाहूय विद्वांसो नियोजिताः। अध्यापयन्ति शास्त्राणि तृणीकुर्वन्ति पण्डितान् । विस्मारयन्ति जाति स्वां यराटाः पञ्चपाः करे।। यातायातमुसाय प्रामान्तरेषु लोकपथा निर्मिताः । वाहनानि सगृहीतानि, अजितधनेन सेना च सध्गृहीता। अधुना सोऽधिगतबलः पटुर्जनताया दौर्बल्यमनुभवन् काचित् खपक्षे कृत्वा स्वैरं कर ग्रहीतुमारब्धवान् । रक्षकोऽपि सोऽधुना भक्षको भरितुमारेभे । लोलुस इतररक्षकाणां रक्षाव्यवस्था विशृङ्सलामकलाबोल्पोप्य इतरप्रदेशान् स्वायत्तीर्यन् प्रजाहितप्रतिता प्रासारयत् । स एव लगुइधरो राजपदेन स्वीकृतः, यापु विशेषतो राजनान् । सम्भाव्यते स एवाधुनिसलगुडिना पूजः । लोफेन च मौर्यात् सदा सत्ता प्रामपालायितार राऽपिता। स्वमरमा कल्याण- माया, यदि वयं नेच्छामसहि दयनरमा कल्याणमाह, एनियन्त्रिता सप्ता राजोपाधिधारिणे प्रामालाय प्रसा। राजा सर्वसाधारणो मानवः, न तस्मिन् कारि विरासता किय, या सप्ताशक्षिा सा प्रजानामेव। एईस लोकस्य सतया शतमा नयमो निश्वासः २४६ च सार्थसंरक्षणाय लोमान् यथेच्छ दण्डयितुमारभत। प्रबनतो राजा निर्वाच्य आसीत् , यतो हि रक्षस्य निर्वचन रक्षगयोग्यतानुसारि । परं शनैशनैः सम्प्राप्तसाधनोऽनुरक- वियिविद्वजनः सोऽस्मसूर्वजो राज्य कुलकनागतम्यकार। वस्तुतोऽस्य स्थितिौर- पालवो नाधिध। ब्राह्मणैः क्षत्रवन्धुर्हि द्वारपालो निरूपितः। भागक्ने । यथा चादिराजः पृथुः- अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः । रक्षिता वृत्तिदः स्वेपु सेतुपु स्थापिता पृथा' ।। भागवते ४।२१।२२ राशा मर्यिविपत्परिहाराय जाता । रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभुः ।। मनुः ३६६ प्रभवतीति प्रभुः = प्रष्टसत्ता ( सार्वभौमसत्ता ) सम्पन्नाः प्रजाः। 'वित्रसम्योड़- सशावाम् ३३२।१८० नित्यमुद्यपदण्डः स्यान्नित्यं विट्टतपौरपः। मनुः ७।१०२ दण्डो दमनादियाहुस्तेनादान्तान् दमयेन् । गौतमस्मृतिः ११ । सर्वत्र शासनान्यायव्यवस्थायाः पार्ययेऽप्येतदेव कारणम्, पच्चसन द्वारकालाविता- धीनम्, न्यापध विधीनः। त्यहाखादा वने वसन्तो विपरिगो विद्ध गोऽप्यनाऽर. परमती गगनशिसोधे व मोहिता दु:खाकर वनवासामुन्नच, अमात्यपुरे हतादि- पदलोलान्तस्याभिषेकनाटक चक्रिरे अनुमुनुदिरं च कुरमागतम्र्मपि दाक्ष्यम् , ऊध 'अटाना लोकपालानां वपुरिसते नृपः' इत। सत्यम्। अपर्ध पदमर्पयन्ति हि धूतपन्तोऽपि रजोनिमीलिताः । यास्यास्पस्मृती (अ.११.९,१. ) रानां लक्ष प्रत्यादि- महोत्माहः स्थूललक्ष्य. इतक्षो वृद्धसेवः । पिनौत: सत्ससम्पन्नः कुलीनः सत्यपार शुचिः ।। मह पृयुः प्रजानां तिल-ति पदानि रम्यासालेर मः, तयाभूतं राष्ट्र सदातरो मापन यनुन्नि। स्वप मेनुगु-मांरनु स्थायिका दग्दरी रस्ता र प्रमिला।

२५० चन्द्रमहीपतो अवीर्घसून स्मृतिमानथुद्रोऽपरुपस्तथा। वस्य कर्मच- स्वराष्ट्र न्यायवृत्त स्थाः भृशदण्डश्च शत्रुषु । सुहृत्स्वजिम स्निग्धेषु प्राह्मणपु क्षमान्वित ।। मनु ॥३२ एव वृत्तस्य नृपते शिलो छनापि जीवत । विस्तीर्यते यशो लोके तैलविन्दुरिवाम्भसि ॥ मनुज३३ नवमो निःश्वासः २५१ परमद्य स्वष्वेव क्षेपेषु सर्व आप्ठ नग्नः। अनु, कुलकनागते सार्थरहित पुषवादाप्रभाविते कन्चनुभवस्तु गरीयान, पर पुषवादप्रभाविते तु दौगुप्यनेव । अत. शासनावन्न परिवर्तनवता भविश्यमेव । अन्ययाऽऽधुनिको राजेवारिगत- शस्त्रास्त्रः सङ्ग्रहीतसेनो वाहनवलः तदुर्ग आताईनजगत् सेवकोऽपि स सेव्यो भविष्यति, नरपालथापि नरपति.। परिस्थितियोषितः साधारणोऽन्यसाधारणः। परि- वर्तने दुर्वलमना उपभुकभोग परिवर्तनेऽनीहः शासनादिलष्ट एव भविष्यति । भोगैश्वर्यप्रसताना तपापहतचेतसाम् । व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधान विधीयते ॥ गोता। एवमेवोयोगविरपि परिस्थितियोषितः । यया च-अमुक्ग्रामादनमाहर वय नुन्य भोजन दास्यामः, इति ग्रामोनोंदितः पटुसेवकः सार्यवाहः स बहूनामनाहरपेन बहुभोज्यनाए। उसोगावशिष्ट देव विक्रीणानो विनिमयनान. अनेजातसमहो वैवधिकचरो पान स्थानञ्च निनाय जनस्यावश्यकतानुसारि वस्तुजात पावत्तिय एव क्रोला पेच्छमूचेन पार्यवत्तिभ्य एष विकोतवान् यपेच्छमूल्येन । सह वसतामप्पसता जलन्हजलयद् भनत्यसंश्लेप. । दूरेऽपि तता वसता प्रोतिः कुमुदेन्दुग्द् भवति ॥ मानैः सहोतपनो बलबईनष्ट शटचायोज्य प्रामान्तरेऽपि व्याप्रिपनापो मूलधन- मेधयत् । "लाभाल्लोमः प्रपद्धते” । एवं वाणिज्यर ' स धनिलमध्यगमत् । ततोऽन्यच्चयेन धिटामभावना तस्योत्सता। स ग्रोप्नावपे क्टोबई वाहयिता पचायन्मप. मितमारोप्प दरानुदा अनयित्वापि तमन्यवर्द्धने प्रयासदायकाय परिस्थितिविपनाय काय वलीबद्दय यथास्यचिबोवनधारणयोग्य कर्यानं भोज्यं प्रापन्उच्छेपघाताहरत् । सत्यम् । लब्धोदयोऽपि हि सल. प्रथमं त्वननं नु नाति परितापम् । उद्गच्छन् दवदहनो जन्मनुवं दारु निन्दादि । १ समाधि-अन्त करणम् । , वाणिज्याय उच्चति गच्छत स । " गतिप्रापनयो।" 'वनिजारा इति ।

प्रजासु चन्द्रमहीपतौ अदीर्घसूत्रः स्मृतिमानक्षुद्रोऽपरुपस्तथा । तस्य कर्मच- स्वराष्ट्र न्यायवृत्तः स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु । सुहत्खजिह्मः स्निग्धेपु ब्राह्मणेपु क्षमान्वितः॥ मनु. ७।३२ एवं वृत्तस्य नृपतेः शिलो छेनापि जीवतः । विस्तीर्यते यशो लोके तैलविन्दुरिवाम्भसि ।। मनु ॥३३ परमयास्मासु कति तथाभूताः सन्तीत्यात्मा निरीक्ष्यः । कुलानि जातीः श्रेणीश्च गणाखानपदास्तथा । स्वधर्मचलितान् राजा विनीय स्थापयेत् पथि ॥ याज्ञवल्क्यः ११३६१ शनैदशनैर्दु शीलशासकसन्त्रस्तासु ज्ञानप्रसाराभावादातकैनैव राजानो भुव शासयामामु- सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ॥ मनुः ॥२२ दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः दण्ड एवाभिरक्षति । समीक्ष्य स धृतः सक्यक सवां रजयते प्रजाः । असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः ॥ मनुः ७१८-१६ इत्यादिगुणैर्लक्षणे कर्तव्यै परिहर्तव्यैर्व्यसनैश्च स सेवको भृत्य एव च प्रतीयते, नवे सेव्यमनुसरन्ति। राज्ञामेतानि व्यसनानि सर्वथा परिहार्याण्यासन्- दश कामसमुत्थानि तथाष्ट्री क्रोधजानि च । व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ मनुः ४४५ मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परिवादः खियो मदः । तौर्यनिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः ।। ७४६ पशुन्यं साहसं द्रोह ईयाऽमूयार्थदूपणम् । चान्दण्डज च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽटकः ॥ ४७ 1 नवनो निवासः परमय लवंत देपेषु सर्व बस मन्नः। अन, कुल्यमागते सार्यरहित पुखवादाप्रभाविते कर्मन्यनुनवस्तु गरीवान, पर पुवायनास्ति नु दौगुप्यमेव । अनः शासनाचन्नं परिवर्तनवता भविश्यमेव। अन्ययाऽऽधुनिको रावेवारिगन- शवायः सद्दीतना वहनवलः कृटुन भावकवान् देवकोपी म सेव्यो भविष्यति, नरपालपाति नपतिः। परिस्थितिरिव साधारपोऽयमापारपः। पर- वत्तने दुसमना मनुकनोन. परिवर्तनीहः शासनादिलय एव भविष्यति । मोनैश्चर्यप्रसताना तापहृतचेतसाम् । व्यवसायानिका बुद्धिः नमाधों' न विधीयते ॥ गोता। एपमेयोद्योगपतिरपि परिस्थितियोक्तिः। पया 3-अनुच्यानादनहर व नुन्य नोन्न दासाना, इवि ग्रानी नोंदितः पत्रेयः सार्यवाहः स बहूनामनाहरगन रहुनोन्यमा । उसोगावशिष्टं दव विक्रीपानो विनिनयमानः शुदमझही वैविच पात्र व्यानच निनाय जनम्यवस्सस्वानुमारि वस्तु पार्वत्तिन्य व कला येउन येन पावत्तिय व निकोतवान् यथेच्चमूल्येन । सह वमतामरसता अलम्हालपद भरत्यसंस्लेपः। दूरेऽपि सता वनता प्रीतिः कुन्देन्दुपद भरति ! उनः मुद्धवपनो दलाई राष्टरपोय प्रनान्वर यासिनाचो भूतान- नैश्यत् । “लाभाल्लोनः प्रबद्ध ते”। (व गियर. स भनिन्वमध्यगमत् । ततोऽसयन निभावना तस्सेसना। उग्रीमान पटव यहपिया परयन्मन- मिटनारोप्य दशमन अपिवारितान्नद्धने प्रयान्नदायापपरधिविशवाय नूछाय वटीवाय क्याम्पबोनपरोन्य संशन नोय प्रापश्चगवाहरन् । सन्थन् । उपोदयोऽपि हि सरःप्रयमंत्वननं नु नरति परिवापन् । अच्छन् दबदहनो जन्लनुवं दान निदहति । १ मनाधिः-जन्दनन्। पानियाद कटते - गर्व 3.1 " गटियापनयो।' नारा । .

मानाना - २५२ चन्द्रमहीपती एपा पुजवादस्याद्या भावना ।, अधुना सोऽनायासेनाल्पव्ययेन च नित्यमुपयुज्य- वस्तूना निर्माणेच्छयाऽऽवश्यकताग्रस्वान्निधनांस्वन्तुवायांस्तक्षकॉल्लाहकारान् कुशलान् कार श्चामन्दोदया दया कुर्वन्निव नियोज्य वस्तूनि निर्माप्य जीवनधारणयोग्य प्रयच्छन् प्रचुर धनमैधयत। वराकास्ते च परिस्थितिपीडिता कि कुर्यु , यतो हि "सर्वारम्भास्तण्डुलप्रस्थमूला ।" सत्यमेव केनापि कविनोक्तम् । इयमुदरदरी दुरन्तपूरा यदि न भवेदभिमानभङ्गभूमि कथमपि न सहे भवादृशाना कुटिल कटाक्षनिरीक्षण जनानाम् ।। पति वपति लुनीते दोव्यनि सोव्यति पुनाति वयते च । विदधाति किं न कृत्यं जठरानलशान्तये तनुमान् ।। अथ च गो स्तनन्धयो वत्स प्रतिदिनमेकप्रस्थमित पय पिबन प्रतिप्रस्थमाणकद्वय मूल्येन सवत्सरे पञ्चचत्वारिशन्मुदाणा केवल पय पास्यति, शष्पादिक पृथक सेवास्थानादि- व्ययश्च पृषक । एकहायनस्य वत्सस्य मूल्यच मुद्रापञ्चकम् । चत्वारिंश मुदाणा हानिरिति विचाय गौर्वत्स विना कथ दुग्ध दद्यादित्युपायमन्विष्य जातमात्रमेव वसमेकया मुद्रया गोपातिभ्यो विनिमयते केवल खार्थपण्डित । अतिमलिने कर्तव्ये भवति सलानामतीव निपुणा धी । तिमिरे हि कोशिकाना रूपं प्रतिपद्यते दृष्टि ।। मुवन्धु । पुषवादे एतादृश्य कल्पना करा मण्यते विज्ञान वा। हन्त ! "ऋद्धिश्चित्त- विकारिणी।" स्वमातुर्दुग्धपाने वत्सस्यैवैकाधिकारो रक्षिणस्तु पीतशेपे, नैव तस्य विचार । भगवतो वसुधा पशूथ, वत्सस्य पिना यलोवन दृष्ट्वाऽधिगतमन्नम्, ग्या जात शप्प मनसा स्वायत्तीकृल यथेच्छाचरणाय खतन्त्र ईधामुपेश्य, राष्ट्रहितम्, अप्रति कुत्रता परिस्थित्या सूफानाच हितमपश्यन् पराजितस्याहरणाय स्वार्थपोपणाय रेटते परिग्रही। व परिस्थित्यजितधन स भौतिकोमु नतिमकरोत। परिस्थितिरेवाध अर्वच नयने परमा सापिस। यथा च कश्चन विप्र शिष्यगृह गत शिष्येण प्रोत "भवान्नास्मत्पश्मत्ति नचारमदानीत पय पिति, अतो भवानेव पचनु जरमाहरतु च" इति स खस्मै कुतवान् । शिप्यस्य स्त्रियां रणायां रजखलायां वा भूतायामितरजाति शिष्योऽवदन्- 1 . नवमो निश्वास २५३ “गुरो! भवान् पश्यत्येव, आवाभ्यानपि पतु दयताम्, तदर्थे गुदाने दाप्यामि, यतो न विना मूल्यमावां गुरुपाचित खादिष्यावः” इति शनैश्शनैश्चलित एप व्यवहारोऽद्य हन्त ! ब्राह्मणान् पाचकान् प्रपास्थायिनथ चकार। हन्त 1 दारणा परिस्थितिः। परिस्थित्या चान्त्यजाइश दशनैः कृतवाणिज्यादय उच वर्गमुपेताः। अतु, अद्याप्युद्योगपतिरनवरतमधिकाधिक धाम्यते परिस्थित्या प्रतिकर्तुमसमर्थाय अमिणे यधामश्विजीवन धतु किचित् प्रक्षिप्य, कायितासु कुटीपु पदपयामु वाऽस्वास्य सबस्त- मपहरत्यज्ञातभावेन । एतच्छोपगं प्रकटितभववावस्याऽऽनन्दोपवनदावाग्नेर्वराकघरमरर पुजवादस्य ज्येष्ठः पुनः। एवेषां लक्षाणां सहस्राणां वान्यनमः वचन कदावन कश्चन यशोथीं स्वार्थी किमपि ददाति चेत्तदानं नीवी' प्रमोप्य शतमुद्रा निकास्य ताम्बूलबीटिकाप्रत्यर्पणवत्, 'पन प्रचोर्य सूचिकादानपद्वाऽकिचित्तरम् । भय राजानः सामन्ता भूमिदारा धनिन उद्योगपतयो व्यापारिग इतरे च कृपकेषु जीवन्ति । सोऽय सर्वोपजीन्द ईश्वरस्य लघुभ्रातेव लोकजीवनाय सर्वथा सक्षणोऽपि निर्धन एवास्ति। तस्य पशुपालपालपरिषद्विभूषणाः शिखिशिखण्डकृतावतसाः बालमुकुन्दसमाः शिशः साधनविहीनाः खाद्याभावदुःखदादिपविलवा उच्छसन्तो नृत्युमुख विरान्ति, विवस कविरहिता अशिक्षिता वा जीवन यापयन्ति पशव इव । ते पयसः प्रधानस्रोत- सोऽपि पयः पातु न शक्नुवन्ति, नवनीतस्य निर्मातारोऽपि तन्नादन्ति, वस्त्रस्य वातारोऽपि नग्ना , अन्नस्यैकमान वतारोऽपि निरन्नाः। अन्य एव कश्चन हस्तस्पामशानदरिद्राणां मुग्धानां हस्वात्प्रसद्यादार तदुपभुल्के । हन्त ! कृतघ्नानामरमाफ कर निप्पतिर्भविष्यति । "कृतग्ने नास्ति निष्कृतिः।" तैरस्या परिस्थिती ज्ञानविज्ञानयोरुपयोग उपभोगो वा विधास्यते इति व मशक्यम्। बरवालालीवलयिवानां तेषां दापीयो दरिद जोवन पादकन्दुम्वत् केवल मनाना प्रक्लान् पादापातान् सोदुमिततो धाविनुम्, रेणुपु सागाय तिरस्काराय च केवलम्, इन्त ! "दारिद्रयदोपो गुणराशिनाशी" । कुलं शोलच सत्यञ्च प्रज्ञा जो धृतिर्यटम । गौरवं प्रत्स्यः स्नेहो दारिद्रधण विनश्यति ॥ गायः। १ नोवी-अन्टी। २ घन- पन लेहकूटनेत्र।

२५४ . - चन्द्रमहोपतो मानो वा दो वा विज्ञानं विभ्रमः सुबुद्धिर्वा । सर्वप्रणश्यति समं वित्तहीनो यदा पुरुपः ।। पञ्चतन्त्रम् । पर ते तु धन्या एव येषां मृतानां लोकोपकारभावौतप्रोतान्यस्थीन्यपि गुवीमुर्वी- मुदस्यन्ति । पाटोर ! तव पटोयान् कः परिपाटीमिमामुरीकर्तुम् । यत् पिपतामपि नृणा तनोपि परिमलैः पुष्टिम् ।। (पण्डितराजजगन्नाथ.) ग्रामोन्नत्यै सर्वो व्याचटे, परमुन्नतिर्नगराणां भवति, वराका वचनैर्वच्यन्ते । आजीविकासाधनान्यपि नगरेष्वेव सन्ति। स्वार्थः, पक्षपोषणम्, लोलुपत्वम्, करत्वम् परिग्रहिणां नागरिकाणा प्रधान धर्मः। वराका ग्राम्या दुर्भिक्षविक्षिप्ताः गतधना जनाः मुवर्णसुभग मन्जुलकुसुमसरसमुगन्धगन्धवहोद्वासितामयकुल सुरविटपिवाटीपरिवृतचरम्। पुजवादपुरखनपरिप्लुष्टं शरज्ज्योत्स्नाशुद्ध सौभाग्यजीवनजनन स्वास्थ्यहित महित वीत तपोवनमिव प्राममुत्सृज्य वर्गानरकमिव मशकमत्कुणमक्षिकासंरक्षितामु दुर्गन्धनिधानामु रथ्यामु निवासाय बाध्यन्ते चरकमायमाना यक्ष्मभक्षिता जीवन्तः परमभ्रमेण सञ्चिन्वन्तस्तनीयांसं पाशुमपि न सञ्चिन्वन्ति, न च सञ्चेतु शक्नुवन्ति । राज्याधिकारिणोऽपि नित्यनवप्रियाः चाकचक्यैकप्रवणरेतसः सासूयाः प्रामेषु न यान्ति । यतो हि न तत्र विविधव्यञ्जनोपहितानि द्विजनिजटस्फुरदिन्दोवरनिन्दि. मुन्दरवदनामृतहास्यगीतोपेतानि शङ्कितलज्जितरसभरचन्चलतापविमोचनमधुरहगन्तशो- मितानि उदग्रसूच्याकञ्चुकाञ्चितवशोविभूषितानि सधनोपनीतानि गोष्ठीभोज्यानि, न सौवर्णराजनभाजने पद्दतान्याहृताक्षाप्यमिनन्दनपत्राणि, न प्रच्छन्नच्छलैरुपहतानि पुष्पफलाच्छादितानि दीनारपिटराणि, न मुवासितसुमनसा वासितपाससो हारा, न निवासाय स्वर्गसुखदा आवासाः, न भ्रमपाय चक्षु पि चमकुर्वन्तो मरुत्तरा, न च सभोपेताना सहसयो मनुष्याणां चित्ताहादकः करतलपनिः। को नाम एव विधमाकर्षणमुत्सृज्य स्मशुष्केप्वसभ्याज्ञानदारिद्रयपूर्णप साधनाधमेषु प्रामेषु गन्तुमुत्सहेत ? पुअगदे मनुष्यो धनसग्रहस्य यन्नम्। केन व्यापारेण कया प्रणाल्याऽधिकाधिक धन मे प्रभवेदित्येव तस्योद्देश्यम् । नात्र मनुष्यस्य मूल्यम् । प्रतिदिनं यन्त्रेषु जीवनरन जहृतां जनानां क्वापि मूल्य निरोशितम् । सौचिक सूच्या भामायां शोचति दिमु ! .

नवनो निःश्वासः कस नियन्दत। द्धन नय तदने भनेर साररत दल विचरः। बाल विधुति द्वोन्दाहाने मः। धन्वत धनस्य मूलम्। बनानाय सस्तन, पुर्वान्, प्रनिन्,ि पुजन् विद्धन्दनन्, न्याय वाममारे विनुनला “मा मास्वतिद्धन्न" सिद्धन्दस्टन चन्द्र चिन्वे पद प्रहल निन्ति उत्तनुब उपवे। असन्! इस नन्नोऽन्त- माय मरनयन्न तत्व दाम, जीवनरक्षन टत्सायो मकः। परमपूजा यमितत्वमान्यापनपान पुच पापविञ्चर्य यदि वस्ने सपालदा दिन चन् ? इनन्दिनः समयो विहतो नानच्य। एप भारततापिता- भविष्यन्तः परन- उदा नन्दमुस्मितसचिनुखारविन्दा बाटायकानपु परिवेशलन्छ रम्यानु वर्गद- सनद्वालयन् प्रतुम्, सनूहे नीतीमाहर्तुम् अकुरितीनाः परस्तशारदारापरवाना रदतविद्धनौतिसदना निवर्गक्षानोद नन्दर्य कालिदासस्य कला इस भूतिया सत्त च्यळकोमलकाननाः कन्यार बिमलगानिचटनवान्पलिताः सनईनगरेषु वैश्यालयति नति वा कर्ने वाध्यन्ते । इन्त। वनन कीदृशी स्थितिः परिवत्तिा। सासनं केवलमनेन ईनन् । न कैनापि कापि विचरितमासीद् यद् द्रवस विनिमयसाधनस नानकमान एतस्यो प्रतिष्ठा भविष्यति। विस्मिन्नाति कोऽप्यन्यों यो धनेन न वाधयितुं सत्येत । अन्यायस्य, योपलस्य, चनिवारस्य, प्राचारस्प, चास्य, प्रतधाहरणस्व, हिसाया- थाधारशिला धनमेव केवलम्। सत्यम्, विक्तच्छापाया नरो विवेचविच्युतो नाति । यत्र धर्मों नीतिश्च न स्यात, सार्थः सवातिशायी तर यदि त्यागस्त्यपस्ता स्मिाचर्यम् ! "नोरनीचरतिनीचनोः सपायर्धनमेव साध्यम्। धन परमेश्वरः। वास्तविकः परमेश्वरस्तु शुप्फोपानभिराहतःक्षताइचिरित्सालये परिचवेऽसवदेशे। उसन, मा राज्यत्रीरभूत् पुसःश्रेयस्कामस्य मानद ! स्वजनानुत वन्धून वा न पश्यति ययान्यदृक् ।। भलव १८४६४ हन्तु। दुरपयोऽतत्त्वाभिनिवेशः। निभुवनराज्यत्यागमदतमहिमनिमतिमत्तम रानतर्पजे. कमिदमोप्सितमित्येवाचर्यम् । १ बाजार इढिलोके।

चन्द्रमहीपतो येनामन्दमरन्दे दलदरविन्दे दिनान्यनायिपत । कुटजे सलु तेने हा । तेनेहा मधुकरेण कथम् ।। जगन्नाथ'। अय प्रतिशतमेस्यानजितसम्पतावधिकार । व्यापारिपरिपहिणी सगुगी सधौ परस्पर पपकौ । एषा मुष्टिमेयमानवाना रक्षायै व्यवस्थाये ये स्वायत्तीकृतपरसम्पदो रक्षणमभिलपन्ति सर्व ग्लिश्यते । एतादृशे वातावरणे कार्यममुर्वन् धनार्जकचौरायित प्रसह्याहरको मुल्यको वा चतुरो गण्यते, हन्त ! दृश्यता पुरादे मापदण्डश्चातुर्यस्य 1 इतश्च रानिन्दिवं कार्य कुर्वन् 'कत्ता" इत्युच्यमानोऽपि न फलभाक् । अन प्रतिशत नवनवतेश्चाजितसम्पत्ता वेव नाधिकार, कथनाज्ञातहख एवं तामपहरति । परस्य चानजितसम्पत्तौ परमाधि गतसम्पत्ती पूर्णाधिकार । एकत समानेऽपरिधाम्यतामिन्द्रियाणि व्यर्थ वामुपयत्यनुपयुज्यमानानि, इतश्चेत रेपामत्युपयोगेन । एतादृशे समाने प्रतिशत नवनवतिर्मनुष्याणा, कठोरश्रमय बाध्यते, एकथानुत्पादकोऽश्राम्यननारत विश्रमाय विषयोपभोगाय सरक्ष्यते। सोऽनीक्षितक्षेनोऽ. सोढश्रम सर्वेषां श्रममश्रम बुद्धिमतां बुद्धिच झोला परैधितोर धनेनारमानप्पतिवर्तते, पर तस्य वास्तविकी स्थिति "प्रेष्यतोऽधिका नासीत्। परमय स परास्कन्दी । विपयरतोऽप्यतिविपम सल इति न मृपा वदन्ति विद्वास । यदय नकुलद्वपी सकुलद्व पी सदा कृपण ॥ मुबधु । खामिनोऽज्ञातभावेन हृत द्रव्य चौर्यम्। यथा च कृपकेण श्रमेण तूलमुत्पाद्य प्रतिमुद्र चतुष्प्रस्थ विक्रोतम् । तबिमितानि द्वादश धौतवासासि तेन पत्रिंशन्मुद्राभि क्रीतानि । विहगमावलोकनेनास्वेका मुद्रा तूलस्य, पञ्च कर्मकराणाम्, पञ्च शासनस्य पञ्च प्रबन्धस्य च, पर विंशतिर्मुद्रा एतादृशेनाज्ञातेन हस्तेनोद्भुक्ता येन न क्षेत्रमवलोकितम्, न निर्माणशालाश्रमोऽनुभूत , नचालेखन कृतम् । एतच्चौर्यम् । किन्त्वेतच्चौर्य व्यापारिकम् , मुसङ्घटितम्, समाजानुमोदितच। आधुनिकसमाजस्य परिभाषया न स चौर , अपि तु उद्योगपति, जीवजगतो जीवातु । १ वर्कर worker २ पैरासाइट Parasite ३ वैरा Bearer ४ परान स्कन्तु शोपयितु शीलमस्य 'स्कन्दिर गतिशोषणयो 'ताच्छील्ये णिनि । म - नवमो निश्वासः येपां प्राणिवधः क्रीडा नर्म मर्मच्छिदो गिरः । कार्य परोपतापित्वं ते मृत्योरपि मृत्यवः ।। परमवधार्यताम, नैतत् प्रवुदे मारते चसियति। वयमेतदन्यान्यनादत समवेताः । कस्यापि दुरवस्थया कोऽपि व्यभान्वितोन भवेत् । व्यतिक्रमविनाशोऽस्मानुदेसम् । परितो भोगाच्या सौवणी लय वन तनमुनीना कहालकूटं रामेण प्रेशितम् । दोपधनाः शान्तात्मानः पजराने यजनयाजने शानविज्ञानाविष्करणे प्रयतनाना चौकोन्नत्यै विश्वस्य मूल्यै श्राम्यन्तः प्रचोचारणा मुनयो रावधा, जनस्यानमार तदरम्यता षत्र, मुनिभूमिरपि सा मृत्युगलेवाभूदिति वालाविच ते। परम्, किं सम्भाव्यते यदेवददन दर्दष्ट्राभित्राभूत् ? नहि नहि, अपि तु तेषां नशाचर्या नात्या। धनेवरस्य ट्यूनाना धनीबुभूयुमा रावणेन शोयिताः शान्ताः शान्तिप्रियाः सविनवा मुनयः सम्मोहिताः समूहयो ता, शिशाश्वोबिना अबसन्ना दीना मृचः अनिमि विन्डमपि दानुन प्रामवन् । नेते साधनसम्पना दिव्यसिस्य उपयस्तेषां वाशापमानयादरम्यत्वात्। अपि त्वपस्सननशेपा प्रजा एव मुनित्वेन वर्णिताः मुशोलतात साधुटतवान् । रसोराको रावपो दराभोवो द्विदशकरच वनितः। परं किं सम्भाव्यते यत् कश्चन द्विपाद् दशग्रीवो दिदग्रकरच भवितु पोति ? वस्तुतस्वस्थ कर्मपः प्रवीको पादौ दावासम्, पर घरमादा शासकव दुर्मदत्तगुजैहपेतः स विंशतिकर, दर्शन्द्रियविषयानुपमोजुन्न दशानन नासीत्। अनया समहानोरया प्रोपागाचा दुरूपन, मनवान् पीढयन्, मुन्दरीरावरन् प्रैलोक्यं रावयामास, अतो गवपनाम्ना प्रसिद्धः। तस्य प्राता मद्यनासम- हिलामैसुनयामको लोकव्यवहारविरको न करनादपि किमपि शुभुमुर्महानि कम्मर इति, परय लोम्भोपयो विभीषप इति विश्रतः। उनस्याने चास्य दुत्तौ मुख्नौ शासका. वाता खो दूश्मय, इनौ गुनापि यविप्रहाकिद पुरस्सक्तिी प्रात्यात प्राबल्याच्च । वस्तुतः सर चास्नकाठोर्यम्, एनय सम्लदोपदमवत्या, घनस्याने एक्योरेव सामाग्य- मासीदत एव बनस्यानमरम्पा वभार । एनजिने राष्ट्रे दसरयाद्-दोन्द्रियापि स्याइन(नियतानिपीतानि येन) दस्मात् निशायाम् भन्यारे अनान्यकारे व यान्ति-मजयन्ति ते निशारा लेकमायः। २ ना किमपि फळ पसर, दरमा " चन्द्रमहोपतो कौशल्यायाम्-कुशलकमोंपेतार्या राम प्रसूत । स्वफर्मक्षमसर्येन्द्रिय एव युक्तम पुमासमु. सादयितु प्रभुः । तेन सर्वलोकहितैषिणा त्रैलोक्यरमणाद् राम इत्युपादिधता सर्वा मर्यादा प्रतिष्ठापिता' । रमयति विश्व स राम, तस्य स्त्री सीता कृषिप्रतोका राष्ट्रस्याजीविका जनकस्य उत्पादकस्य पुत्री। एव स त्रैलोक्यरमण सीतां परिणीय सलक्षण लक्ष्मणम्, विश्वभरणप्रवण विषयानासक विरक ज्येष्ठानुशासनेऽनुरक्त भरतम्, मर्यादाशनणां हनने शनानञ्च भ्रातृत्वे प्रकल्प्य “साधुतपखिकण्टक विरावण रावणमुप्रपौरसम्' निहत्य सर्वत्रानन्द प्रसारयामास । अत एव तस्य पुरी अयोध्या-न केनापि योद्ध योग्या शक्या वाऽऽसीत् । तस्य राज्य. मधुनापि स्मयते। यत्र प्रहृष्टमुदितो लोको हृष्ट पुष्ट सुधार्मिक | निरामयो ह्यरोगच दुर्भिक्षभयवर्जित ॥ विविधरूपेण भावुकास्त गायन्त्युपश्लोकयन्ति च। यतस्वस्य जीवन न खस्मै, अपि तु लोकरञ्जनाय । एपैव स्थितिहिरण्यकशिपो । हिरण्यस्य कशिपु - पर्यको यस्य, यत्र जना जलाय त्रस्तास्तत्र स पयङ्कमपि हिरण्मय मकारयत, एतादृशो दुत्तो भौगाभिलाषी च, य वपुत्रायितान् प्रहादमाना" जनान् निष्पीड्य स्वैर, विचचारोपेक्षितेश्वरान्तर इश्वरमानी निरछकुश प्रचुरैश्चर्य । वदा कश्चन नरसिंह एवाज्ञावागमनस्त्र क्षपयामास । प्रहाद इत्यव्यक्त शब्दायमानस्य दुखितसमाजस्योपलक्षणम् । एत एव राक्षसा पुरा रक्षका आसन् , आसीच तदा सम्मानबोधिका राक्षसपदवी, पर तेषा शसव्यवहारेण नैशाचर्या नीत्या च साप्यधोगति गता महत्तरदरिजनशब्दवत् । एते निशाचरा सामान्यसाधुजनानां शोषणादेव लङ्का सौवर्णी कशिपूथ हिरण्मयान कर्तु प्राभवन् । अस्माक सद्भावनारते विरतविद्वषे सस्कृतिसम्पन्ने शान्तसन्तुष्टजने राष्ट्रऽभितो दिश दृश्यमानान् प्रासादान् परित कहालकूट ततोऽप्यधिकमैक्षिध्यत यद्यानामन्यत्रोपयोमो नाभविष्यत् । एकस्यां प्रौवण्या लढायां शोषक भोगाभिलाषिण शासक समुच्छेत्त मर्यादा प्रतितिष्टापयिपू रामोऽवातरत, पामधुना परित प्रक्ष्यमाणासु सौवर्णीषु लदायितासु सर्वत सरता रावणायमानानां हिरण्यकशिपूयमानानां स्वानाच कृते मर्यादा प्रतितिछापयिपद्भिर्भवतिरेव रामरूपेण नरसिहरूपेण च भवितव्यम् । यतो हि, १ रक्षतीति राक्षस, रक्ष पालने अमुमन्तात्प्रज्ञायण। अधुना तु रक्षत्यस्मात् । २ भव्यफ शन्दायमानान् । हार भव्यके शब्द। गुर्राते हुए।

T . नवमो निःश्वासः २५६ यस्मिन् यथा वर्त्तते यो मनुष्यस्वस्मिस्वया वर्चितन्यं स धर्मः। मायाचारो मायया पारणीयः साध्याचारः साधुना प्रत्युपेयः।। नूनं नानामदोन्नद्धाः शान्ति नेच्चन्यसाधवः । तेपा हि प्रशमो दण्डः पशूना लगुडो यथा ॥ भागववे १०६१३१ नैतत् सम्भाब्यते यदेते वोधनेन घलये समागमिप्यन्ति । भूयोऽपि सिकः परसा घृतेन न निम्बशो मधुरत्वमेति । परमेवे प्रान्ताः सनानोच्यमानाः सम्भ्रान्ताः। प्रान्तानामप्युदयो दयापाना यसरेटय्य एव। यतः- रुद्रोऽदि जलधि हरिदिविपदो दूरे रिहायःभिताः भोगोन्द्राः प्रपला अपि प्रथमतः पातालमूले सिवाः । लीना पनपने सरोजनिलया मन्येऽथिसाथांदिया, दोनोद्धारपरायणाः कलियुगे ससूरुपाः केवलम् ॥ बिलायो दन्तावान केरि कुप्यत्यभेदात् । एतेजद्दतमुवर्णमदाविटाः। एस मद एषामपनेयो येनापतिकोनवस्था विहाय प्राकृतिको दा भजेमुः। "असतः श्रीमदान्धस्य दारिदयं परमाखनम्"। भागवते १.१०।१३। एप उम्मुकोनसरः। समुदाद्य देवेषु गवायां प्रिया या स्थिविदैत्यानामासीत् वाद्या- रमाक निनाव। “अन्तरापाति हि श्रेयः कार्यसम्पचिसूचकम् ।" भेदभावनाया परकीयभावनाा दीवायां विपळता, सनाना पासिरभेदमावस पति- नायस्पतभावस्याभिलावेच भवति, स एवास्नाक विरोपारिहार सर्वत्र समत्वापादनम्, कर्तव्यमुद्रपा प्रदर्शनात सहज कर्म च। शिशु सेवमाना माता तिरप्रयु विवरण प्रमापति ! माता सेवाया आर। नभोमन का मनुदीयमानः किमोपदे ! पदह ठनोऽपनियामि, परम प्रेरविष्यान, लोकान् कर्मपि योजपिप्यानि परमेतत्तस्य सत्तपा खतो भवत्येव । परिम प्रसारन विध तस्थामन्यायामल्पवराया- मल्पतमायाव मनमः सम्पावता। सबभ्यः २६२ चन्द्रमहोपतो,, छिमेतदेव पुण्यम् ? एप एव धर्मः पुण्यानुष्टायिनामेतदेव म! जित- तपसामधिगततपःफलानां तापमानामेप एव भापः? भुज्यन्ते स्वगृहस्थितैरिव सुखं यस्यार्थिभिः सम्पदः पट्टी यस्य मतिः तम.प्रतये द्वावैव तौ प्राणितः । यस्त्वात्मम्भरिरुनतेऽपि विभवे हीनश्च विद्वत्तया तस्यालेख्यमणेरिवाझविधृतः सत्ताप्यसत्ता ननु । खामिने सम्मलूट चिन्वतामनपराधिना मृत्यानामपि धनजिघृक्षयाऽपराधमुद्घोष्य धनमादाय भविष्यबाधानिरोधाय तान् कारायां निरोधयत्सु छाद्य दया, क क्षमा, क धर्म, वौदार्यम्, क्व दाक्षिण्यम्, क्व च लज्जा? परवादे दशवदनः पररन्ध्रनिरोक्षणे सहस्राक्षः। सद्वृत्तवृत्तिहरणे याहुसहस्रार्जुनो नीचः॥ धार्मिकम्मन्यानां प्रन्थेषु, यास्ते परमात्मकृतान् कथयन्ति, द्रव्यं सर्वसटाना पदम् , अपद पुण्यस्य, निपिदमग्राहामुक्तम्। दम्यवतामहमप्राप्य इति भगवानाह । "यस्याहमनुगृहामि हरिष्ये तद्धन शनै."। सङ्ग्रह ईश्वगेपासनायाः सर्वया प्रतिकूला। ऐश्वर्य विपर्दा वोजं प्रच्छन्नं ज्ञानवारणम् । मुक्तिमार्गार्गलं दाय हरिभक्तिव्यपायकम् ।। ब्रह्मवैवर्तपुराण प्र० स० ३६४० पर तदपि धामिम्ब वा समाजेनोच्यमाना ईश्वरपियाः देवाना प्रियाः परोन्नतिराहेन धन्याकुला अन्यायेन धनमर्षयन्ति। विशाला दुर्गापिताः प्रासादा, अधिलक्षजनरोधीनि च यन्यागि सन्तोपस्य चरमिवानपरत विदधति सर्वत. मोद्योषमवलोक्यन्त्रे, सवामिस्सग्दाय पापा कुमारामामित सम्पर्पस्वानरान्डाय सर्जरकोट थयते। पारस्परिकम्यवहारे खल्समाप्रयापि यदि स्नेहसहानुभूत्यो म्यवाहरिप्येताम् , ता विकसि. वाभ्यन्तरसरिनपेक्षित पद कार्यक्षमवाय प्रदमिनु यमकोऽयक्ष्यत् , उपधापि नामविपर, पाम् , प्रलमा भोलिसमा कठोरात्याचारपानुस्वपनाभिए पदीद सपनोऽपनी म्यहा मजा! विष्टनप्रिया निकृष्टया भ्रान्ताः सपिरारा: ।

नवमो नि.यासः २६३ खार्थान्धाः खामिनो दानाभाषमा नौपनाः न्तान्तस्य दूता इव प्रवनुवनबोद्भवदर्दगो करा विनायोन्मुखाः अमिक सहानयाद दुवहरन्ति । परक्षतक्षोदविनोदलीला: सलाच कामाश्च यदृच्छये । पानेऽप्यपाऽपि विगहणीयां वाचं च विष्ठाश्च समुत्सृजन्ति ।। मा! छन् । दुधे सोमेश्वरदेवः। एकः स एव जीवति हृदयविहोनोऽपि सहदयो राहुः। यो निखिललपिमझारणनुदरं न विभचि दुप्पुरम् ॥ पादाहतं रनोऽपि मूनिमपिरोहति, तदा कय न स्वातने दुनिवरव्यपे समुत्पीडिवे मानवे प्रशा? अस्तु, चरिना तेषां सायनभिग्नचिनाना पोट्टल्या सह सनवतानां घट- काना' वनेनानुमानु शस्यते, यवार्यता यतित्वमुररीकृत्य यनम्र वांधनाचारोऽनाचरित- मिशः क्षारपिन् , भारतोरता यतदार सत्येन सह रसातल प्रविविति। न नपरो, दया दूयते, मानो त्रिपते, मौनं चीबुस्टे, मार्वव मर्डटे, ब्रह्मचर्य बिदति, पाया रोदिति, द्यौः पित्सति, पृथ्वी प्रेउति, पापं पार्टति, पावित्यनुपेयते, सूर्व ओपति, कर कटायते, मनीषा शेते, दशः सं क्षति। सन्कायें याचते निरमाणार वा मुमान दिसन्, सस्कृतिप्रवापर शानविज्ञानगमोनत्यै च प्राषित. सर्वदा सम्प्राप्तायंहानिः, पर सोराय सर्वम् सर्छ सर्वदा सज्जः। प्राग्भवति- तासो यस्य विविध पानागुण्यां मुग्पवयुगवघ्नन्तश्वराः प्राचुपैम चरन्ति । यत्र तत्र वैज्ञानिम्नई वस्नानागारस्य कलानिकवनस्स सस्कृतिपरिपदो मन रखनशालया नेस- भोजनशायाथ मिषेपाभिनवप्रायपि व्दभिवारद्वापि सनेपन्त, पर मेरचाह वदनविदरिदेन्दीवरमदाः कृप्यपदमटायो सारस्नन्धोज्वलिनितम्या सूटमनोरमप्रलम्बाहुलीचस्तमीरनगमुस्यो नवोद्योतविहाँस्तरकोत्पलाः स्मिता- वनवज्योत्स्ना गढवदसाः व्लाटिलकेशोत्करपुरन्ममिलिलिवानाः सनरीट- अपनाः सरलतोवतीया मल्लियन्मालम्पो पियुदल्लीकन्दलीभातराः कल्यौत कलेवरा भयोनिमपतयौवना भुवनामाः पादनमारमशः थामोदर्दः मुमायः दलाल चन्द्रमहीपदो, कुमार्यो जोपमस तिस्लपितकसोटवक्षसो जीवन कदर्थयन्ति। पत्र कायशीतांशुसंश- केशः कपूरस्फटिकेन्दुमुन्दरावदात व प्रवचनधना धनोहामघामानोऽहीनभोगा महीन. भोगावचेतसो वपीयांसो धनिनो मकरन्दस्यन्दिनी मधुरतरलहरीमारयितुकामा कुमारीकोत्तिकौमुदीकलाइनकमपम्लपितरलेवरा काकानुनःप्रकाम प्रेक्ष्यन्ते। भधार्यताम्, एतदपास्यभेकदा राष्ट्रस्य विनाशाय समर्थम् । प्रात समधिगतयन सार्य निर्धनः सपिति मन्दभाग्य । स किं प्रात पुष्परा सार प्रनष्टपुण्या। पुनरपरसप्ताहे चाधिगत्पुण्यफल । वस्तुतो यान्ति रछलानि तायत्सो मुद्राः। वच्छलस्यतपति, सहनच्छल सहनापति, लक्षच्छलो लक्षपति, कोटिच्चल. कोटिवि, वर्षतु उछलात्मक । पतित्व हि स्वाधीनवटन एव सम्भवति. एल दि साधीन न द्रव्यम्, तस्य गमनशीलत्वात् । भत कोटिप'वान्देन कोटिरपतिौडम्यः । 'काधिवादित्वात्समास'।

नवमो निश्श्वासः मानः कस्य न वल्लभः १ परमुखोक्षित्वदुःस्था सितिः, कस्स प्रोतिकरी ? पाभरनतं करने शिरो रोचते ? किन्तु स्वामिनि सावलंपडदये दासीता: शत्रुभिः बुद्रानद्यतनेश्वरान् धनमदोवान् निपेवामहे ।। वस्तुतो ये सु-मुस गन्ति-दति ते मुराबभिन्ना अमुगः । सावनं धन संयोगान केवयम्, कन्वालबत्, पनाहरपच्च। न्दसुचस्प पयम् । वय च पुनर्नवदेव उभ्यते, कृच्छ्र उपाश्चैतदेव फलवेद, नियनयमदनादिभिरतदेव प्राप्यते चेद्दवानी दहवेतत्ताः पुन्धर, मस्न चाव रसातलेल्या निखातं भवेद् यथा प्रलयान्तर नोपर्युपेयात् । विद्याधनम्, पानम्, कृषिधनम्, कलायनं पुरा घनन्दवाच्यमासीत, पानहो । अद्य विनिमयसाधनानि मुदितानि दिखहानि धनपदव्यवहावापि ! आदर्यम् । भय निर्मा गुरुप्रसारिनः पादानुरिनचाषितपतिवरतनपरनपीवरपतिनः सार- सतम्बाकला मुनीयमाना विद्वानो घनदृट्वेत्रिवच्याङ्करमाटरपियो रोग्यापितषु स्थानेषु निवसन्ति वाशी वृत्तिमाश्रिता दद्धिाः। एता राष्ट्रग्य विस्तयो वाईके विविध वातिलमिच्यापिविरन्ना औषधोपयोगायायपारयन्तः श्लेप्नविण्यापूस्तिनलिका वयापन्ति, परं न कहन याचन्त- विषमङ्गता अपि बुधाः परिभवमित्रा प्रियं न वान्दन्ति । न पियन्ति भौमनन्मः सरजस्तं चातका होते। मवादिनो वि एल सीदन्ति, तद् राष्ट्रमन्नप्पतीत्वान उपुमादिदा पय- वादिता संग्रदैटापिता च। शश्च चचिननट्योपातिगमना सरि भ- विदिवागना यया सळ्यिन्ते यत्र ठेवाविभागः प्रबन्धन्दामोऽधे भवति । उदाचारविहीने कधन पानिकोऽस्यास्पत्तदा विठादशी रियादरविपर! विगतदेशा विद्या-धिगपि कविता धिर मुजनता वयो रूपं घिग थिा धिगपि च कुलं दुर्गनिमताम् | यसी जीयादेकः सकलगुणहीनोऽपि :यनवान् , बहिर्यस्य द्वारि तृणलवसनाः सन्ति गुनिनः।। - चन्द्रमहीपतो, कुमार्यो जोपमश्रुम तिस्तपितळपोळ्यक्षस्रो जीवनं कदर्थयन्ति। यत्र काशशीतांशुसंकाश- केशाः कपूरस्फटिकेन्दुसुन्दरावदातभ्र यः प्रवचनधना धनौद्दामघामानोऽहीनभोगा महीन- भोगास्तचेतसो वीयांसो धनिनो मकरन्दस्यन्दिनी मधुरखरलहरीमाकणयितुकामाः कुमारीकीत्तिकौमुदीकलङ्घनकल्मपकनुपितकलेवराः काककामुकाः प्रकामं प्रेक्ष्यन्ते। अवधार्यताम्, एतदपकृत्यमेकदा राष्ट्रस्य विनाशाय समर्थम् । प्रातः समधिगतधनः साय निर्धनः खपिति मन्दभाग्यः। स किं प्रातः पुण्यकर्मा सायश्च प्रनष्टपुण्यः ? पुनरपरसप्ताहे चाधिगतपुण्यफल: ? वस्तुतो यावन्ति च्छलानि तावत्यो मुद्राः। शतच्छलश्शतपतिः, सहस्रच्छलः सहस्रपतिः, लक्षच्छलो लक्षपतिः, कोटिच्छलः कोटिपतिः, तदूर्वतु स्टलात्मकः। पतित्व हि साधीनपस्तुन एव सम्भवति, छल हि खाधीन न द्रव्यम्, तस्य गमनशीलत्वात् । अतः कोटिपतिशन्देन कोटिच्छलपतिर्बोद्धव्यः । 'शाकपार्थिवादित्वात्समासः । फूटकलाशतशिविरैर्जनधनविवरैः क्षयक्षपातिमिः। दिविरैरेव समस्ता प्रस्ता जनता न कालेन ।। क्षेमेन्द्रः। नाद्यैषां सम्मानवाचकत्व राक्षसशब्दवत्। राक्षसा एवं स्तुतिप्रिया' । यन्नोपकारकं यन्न भूपणं यत् प्रकोपमातनुते । गुरुणापि तेन कार्य पदेन किं श्लीपदेनेव ॥ गोवर्धनाचार्यः । वस्तुत एतान् संस्कृतिविनाशकानां साधुसद्वृत्तपरिस्थितिपीडितमुनिजनायिताना राव पिपासूनो स्वार्थान्धानां देवद्विजदरिद्रापाझविधवावराकलुण्टाकानां पर्यायान् उयुद्धा मन्वते, परिस्थितिपीडिता नापि वक्तुं शक्नुयुः । परिस्थितिपीडितेन केनापि सत्यमेवोचम्- १ दोन्यतिर्दशार्थः, दशैव चामरे देवभेदाः। क्रमशश्चार्थोपलब्धिः। देवः = क्रीडा- प्रियः। विद्याधरः- विजिगीषुभावापनः । अप्सरा व्यवहारवित्तः। -पति- प्रियः। रक्षा-स्तुतिप्रियम् । गन्धर्वः-मोदी। किन्नर-मदासका। विशाचः- स्वप्नामिलापी, खप्न इत्यज्ञानोपलक्षणम् । गुह्यका- कामी। सिझ-अव्याहतगतिः। बैकल्पिप्रायशः सर्वगुणोपेतः। यक्ष:- .

नयमो निवासः २६५ मानः कस्य न वल्लभः ? परमुसप्रेक्षित्वदु स्था स्थितिः, कस्य प्रीतिकरी ? पाभरनतं कस्मै शिरो रोचते ? फिन्तु स्वामिनि सावलेपहृदये दासीकृताः शत्रुभिः क्षुद्रानद्यवनेश्वरान् धनमदक्षोवान् निपेवामहे ।। वस्तुतो ये मु-मुर्ख रान्ति = ददति ते मुरातभिन्ना अमुराः । भद्यतन धन संयोगात् केवलम् कान्तालवत्, पणाक्षरयच्च । नतत्पुण्यस्य फलम् । अब च पुग्यनैतदेव लभ्यते, कृच्छ्रनपश्चतक्ष फलचे नियनयमदमादिभिरेतदेव प्राप्यते चे दावम्नौ दहत्येतत्ताः पुण्यर, भरम चास्य रसातले तथा निखात नवेद् यथा प्रलयान्वेऽपि नोपर्युपेयात् । विद्याधनम्, पशुचनम्, कृषिधनम्, कलाधन पुरा धनपदवाच्यमासीत, परमहो । भय विनिमयसाधनानि मुद्रितानि कर्गदसम्हानि धनपदय्यवहायापि ! माश्चर्यम् ! भय निर्माय गुणनपयिनः पादपायुररिमर्यपावितपतितरतनपरमपावरपापिनः सार- स्वता सादपैकफला मुनीयमाना विद्वासो धनमृवेत्रियस्तहुशारकातरपियो रौरवायितेषु स्थानेषु निवसन्ति वासत्तिमाधिता दरिदाः। एता राष्ट्रस्य विभूतनो पाईके विविर- पातिम्लेमियायिविपन्ना औषधोपयोगावाप्यपारयन्त. श्लेप्नसियाणपूजितमलिष्का वयःक्षरयन्ति पर न करन यावन्ते- विपमङ्गता अपि बुधाः परिभवमिश्रा श्रियं न चान्छन्ति । न पिबन्ति भौममम्भः सरजस्तं चातका खते। या तपखिनो विद्वांस एव सीदन्ति, उद् राष्ट्रमन्नेप्रवीत्याशैव सपुष्पायिता शुध- मापिता सैकतैलायिता च । इतय चलचित्रनट्याप्रमशिवागमना या मक्त- विदितागमा यथा सम्मियन्ते यवसेदाविभाग. प्रमन्यम्यासकोऽयको नवति । वदयापारविहाने उघन यानिकोऽस्थापत्तदा रिमेतदवी रियतिरभविष्यत् ! धिगत्वैपा विद्या धिगपि कविता धिक मुजना चयो रूपं धिम् धिन धिगपि च कुल दुनिमवाम् । असी जीवादकः सकलगुणदीनोऽपि धनवान् . बहिर्यस्य द्वारि तृणलवसमाः सन्ति गुणिनः ।। .

नवमो निःश्वासः एकस्मिन् भवगहने तृणपल्लपवलयबालसंछन्नः। कूपः पतन्ति यस्मिन् मुग्धकुरङ्गा निरालम्वे ॥ क्षेमेन्दः। एष दोनश्रमियच्योर्दुरवस्यां विशाय सल्पेन मूत्याभेन झोला तेभ्य एव महार्य विक्रीणीते। एष एवं मृत्स्नात्याने सिकता नववलभीस्थाने वीर्ण लौहरलमी- मुपयुज्य, बीवनाउयौपधेषु यविधिन् समिध्य, शराय विचणितं कायम्, गोधूम- चर्ने तिन्तिडीकवीजचूर्णम् , पयदि पानीयमनेकविध पूर्गान्तस्त्र, मरिचविष्टकाचर्णम, हरिदायां पीता मृदम् वे वसा ढलान्तरानि च सम्मिध्य राष्ट्रस्य जनान् कोरियो धवच विनाशयितुं कुशापवुद्धिः। एवमनन्द स्निग्यः सिकश्च तरुपकच इव नोचो न कौटिल्यं विजहाति। सत्यम्, तस्करस्य कुतो धर्मः। मातरं पितरं पुत्रं भ्रातरं या मुहत्तमम् । लोभाविष्टो नरो हन्ति स्वामिनञ्च सहोदरम् ।। परम्, किमनेन राष्ट्रमुन्नेतु शक्यते ? गृह दग्ध्वा शालकाना मूब स्वल्पयितुं शक्यते किम् ? परिवार परिसमाप्यान्न मुलम विधानुममिलप्यते किम् ? अबधार्यताम्। मुनीतेरेव ध्रुवोत्पत्तिर्भवति। सम्मत्तेः परमोरयोगो यथासम्भवमधिशाधिक स्वस्थाना सप्रमाणा प्रसन्नता चिस्थिरवरायुषां विटुपां सध्या भवति। परमय- उणं निःश्वसिवि क्षिति विलिसति प्रस्तौति न प्रेयसः प्रीति सूक्तिभिरीशितः करतले धचे कपोल्पलीम् । वाग्देवो हृदयन्वरेण गुरुणाऽऽक्रान्ता हवाशैया नीताऽऽविष्फतकोपनिष्कपनृपत्तोपापात्रताम् ।। परिधाम्यते पूर्ण पारिश्रमिक दत्ते मृतोपं तम्मिन् पूर्गोंदरे च दानापर्यस्य राहुपयोग दोश हपितय्यम् । इत्यस्यानावश्यक सध्यहर न भवति, भवति चास्मायाः समाजेऽल्पता। परमय हन्ता अनुना सर्वप्रातिनारिकारेप जोवन्मृताः सनेवान्धाः सवामूका अमनम्विनो माना, कुशकाया गर्तगतलोचनाः सातपोल्य विशियिय- भुमसन्या विश्वास कुवा समाजस्य चलाः कला युसनथ निमिताः। हन्त ! कोदशो विडम्बना। शाः प्रतिशेप्यमानेरप्परनामिर्मिरत्वेन रद्दीवः ।

चन्द्रमहोपतो निद्राति स्नाति मुक्त भ्रमति कचभरं शोपयत्यन्तरास्ते दीव्यत्यक्षर्न चायं गदितुमवसरो भूय आयाहि याहि । इत्युद्दण्डै प्रभूणामसमृदधिगतान् वारितान् द्वारि पालै पश्यास्मानब्धिकन्ये । सरसिरुहरुचामन्तरङ्गरपाङ्ग ॥ परमद्य धूर्ती धर्मस्य ढक्षा केवल नादयन्ति वकभक्षा न च धर्म चरन्ति । समाज समत्वाय गुणकमविभागशथातुर्वर्ण्य चतुरेण सृथ्म् । परम् शिरो बदरीफलायते, भुजाविपीकायेते, पादौ शलाकायते, केवलमुदर दान प्रापणकर्म रिकताधर्म सुरसाशरोरमिक भूगोलार्द्धभागमिव वैधते। विवेकहोना समभावोगदक सर्वाभ्युदयमहितकर मन्यन्ते। नैतत्साम्यम्, यत्सर्वे परिमार्जन गृहनिर्माण वा कुर्यु प्रस्थ वा भक्षयेयुरिति । किन्तु सर्वे खखयोग्यतानुसार कर्म कुर्वाणा राष्ट्रतो जीवनोपयोगि योग्यतावद्ध कञ्च साधन समानं लभेरन् । धनबलेन स्थापिता सत्ताऽपूर्णा सन्दिग्धा च, पारस्परिकनिष्ठया समत्वे स्थापिता च स्थायिनो प्रभावोत्पादिका च । सा यदि प्रतितिष्ठत्तदा प्रतिदिन प्रेक्ष्यमाणो घोर पारस्परिक सङ्घपों विनश्येत् । अयायमथविकार शारीरिको रक्तविकार इव समस्त राष्ट्र देहमिय दूषयति। अनेनार्थविकारेण प्रबद्धन रक्तस्य चापेनेव समाजस्य पक्षाघात समजनि, हसितेन च रकाल्पता। एप समये समये श्रमिकान् प्रलोभ्य वधयति कल्पवृक्षोद्यानानि प्रदी तान् विनाशयति वशीं नादयित्वा कस्तूरीमृगमिव मोहयित्वा हन्ति । परमिद ध्येय यद् यो दरिद्रान् दुगमयति तस्य दुगतिर्धवा। विश्वास्य मधुरवचनै साधुन् ये वञ्चयन्ति नम्रतमा । तानपि दधासि मात काश्यपि । यातस्तवापि हि विवेक | जगन्नाथ' । खकार्य सिपाधयिषु पुजवादी नम्र, सिद्धौ च राक्षस । दम्भोऽभिमानक्ष पुजवादखभाव । मत्स्यस्येवाप्सु सदा दम्भस्य ज्ञायते गति केन । नास्य करो न च पादौ न शिरो दुर्लक्ष्य एयासौ॥ क्षेमेन्द्रः ।

नवमो निःश्वासः एकलिन् भवगहने तृणपहाबलयबालसंदन्नः। कूपः पतन्ति यस्मिन् मुग्यकुरक्षा निरालम्वे।। क्षेनेन्दः। एष दोननिहाच्योर्दुरवस्यां स्निाय सचेव नत्यानेन झोला उन्न एव महार्य विकीपाते। एष एवं नास्याने मिला नववलभीयाने पो लोहरलमी- मुम्युम, पवनउपौरपेषु विवि सनेध्य, रायो विनित काचम्, गोधूम- चनें विन्तिईस्वीजन , पनि पानोपननेवि चूर्णन्तरत्र, मरिचेषिष्टमचन, इसिम्या पोर्ता मृत ठे वा देलान्तरानि च सम्मिध्य राष्ट्रस्य उनान् कोटियो वनश विनायितुं क्यापवुद्धिः। एवमनन्दं निमः सिष्य तस्वळच इव नौनी न कोटियं निजहाति। उसन, उत्तरस्य कुतो धर्मः। मावरं पितरं पुत्रं भ्रातरं या मुहचनम् । लोभाक्टिो नरो हन्ति स्वामिनञ्च सहोदरम् ।। पाम्, जिननेन राष्ट्रनुन्नेनु शक्यते ! नई दवा वालकाना मूच बर्नु रायवे मिन्! परिवार परिसनात्यानं मुलन विभानुमनिलम्यते !ि यवपातन् मुनांवेरेर बोटत्तिर्मवति। सन्मतः परमोत्योगो सम्भवमधिकाधिक सस्याना पमा प्रावती चिन्थिरवरादुर्गा वि सध्या भवति। परमय--- उम्गं निःश्वसिति क्षिदि विलिसति प्रस्तौति न प्रेयसः प्रीति सूतिभिरीशितुः करतले घचे कपोलस्पटीम् । वाग्देवो हृदयचरेण गुम्याऽऽक्रान्ता हताशया नौनाऽऽविष्फुटकोपनिष्फपनृपनोपापात्रताम् ।। परिधाम्यवे ने पारिश्रमिक दत्ते सतोयं वम्मिन् पूनोंदरे र दानापरल सदुपयोग बोस हधिव्यम्। दम्पत्तानासम सपहस न भवति, नाति पाताया धमालवा। परमय हन्ता ननुना सांप्रदिनाविमरेप घोपन्नाः मनेगा सबा बनवितो माना, या गर्तवलोचनाः रानमोल रिशिपिय- समस्या विश्वास बासमास स्ट: कला युनय निवाः। इन्त। दयो विन्यना। ग्राः प्रतिगेप्यमानरपतमिनिग्रलेन सहीदः ।

सत्य
२६८
चन्द्रमहीपतो.
शरणे सभुजङ्गमे स्वपन प्रतिवुद्ध न परेण वोधितः ।
तरुणः खलु जातविभ्रमः स्वयमुपं भुजगं जिघृक्षति ॥ अश्वघोष ।
विशालस्याकाशस्याधो द्योतमानाना चन्दतारकाणां प्रकाशम् शोत मन्दं प्राहतो
वायो' शान्तस्टेशानन्द पिमुच्य के कारायिते गृहकोणे विद्व्यजनवाते
वासोस्माभिकीकृत ।
भानन्द एवाद्य पुजवादपूरे प्रौढ ।
मनटोपु वेश्यासु वानरभल्लूकप्रदर्शनेषु निपतन्ति मानवा आनन्द लिप्सवो दुकाले
बुभुक्षिता अन्नकणेविय। अहो। आनन्दाभासे प्रतिच्छायायामेवानन्दमनुबुभूति
मुम। अस्माक जीवने वाद्योत्साह ! क्य श्वसिमो यतो हि प्राणा न नियांन्ति ।
पर जोबने जीवन नास्ति, उत्साहस्य मानसशके वाभाव । कलाहीन नवीनताविहीन
भावनारहित रोरुयमान जीवनम् । किमेतदपि जीवनम् ?
अयमार्या। आर्यसस्कृतःप्रसाराय वयमेवाधिकृता । अस्माभिर्बहवो भोगा भुका
पर तृष्णाधुनापि युवतिरेव ।
या दुस्यना दुर्मतिभिर्जीयतो या न जोर्यति ।
ता तृष्णा दुःसनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ।। भागवते ९।१९।१६
अधार्यताम्, अस्माक माहात्म्य त्यागेनैव नतु भोगेन । अठर को न विभत्ति केवलम् ।
भोगविपया न शमिनु पार्य्यन्ते। अथ च यदि वयं भोगान त्यस्यामस्वदा
भोग अस्मान् विहाय प्रजिध्यन्ति। यदि वय प्रजानां क्षेमं न साधयिष्यामखदा
प्रजा खतखत् साधयिष्यन्ति। तदा कास्माक वैशिष्टयम्, क च सम्मान, किस
गरोयसोऽध्ययनस्य फलम् ।
याते मय्यचिरान्निदाधमिहिरज्वालाशते शुष्कर्ता
गन्ता के प्रति पायसन्ततिरियं सन्तापमालाकुला।
एवं यस्य निरन्तराधिपट नित्यं ययु.क्षीयते
धन्यं जीवनमस्य मार्गसरसो धिग वारिधीनां जनु ।
एवं समयस्यास्पता। भूमगरले यहूनि राष्ट्रणि जागरितानि। दरीचयों जातयो:-

मायः॥ नवमो निःश्वासः २६४ प्युनतज्ञाना जाताः। अस्माभिरपि वागरितव्यम्, योलम्यच विश्वस्य भूत। सततो- पकारनिरतमनसो भवादशा एखादो महत् कर्म कत्तुं क्षमाः। उद्धृती भवति कस्य वा भुवः श्रीवराहमपहाय योग्यता । एपा च सत्संस्कारस्य दिव्यधारा समस्तजीवने सततं प्रबहेत् । प्रबहपश्चरस्यां दिशि पर्वते पतित पानीयं शतमागेभ्यः प्रवहन सरितं निर्मातु' प्रभवेत् । तदेव चैकस्यां दिशि प्रबहत् स्रोतो भूत्वा धाराहपेग नदीरूपेण परिणम्य समुद्रनिव सोद्देश्य प्राप्नु समर्थम्। एपैव स्थितिः सकाराणाम् । जल हि निम्ने सर्वतः सत्ता दिई सयति । प्रथमदो भूमेः पोषण निहन्धदुर्वराशक्ति हासयति, द्वितीयतश्चैकत्रीभूत विपाशवायु प्रसारयन् मराकान् प्रकाममुत्पाय विषमज्वरमापादयति । अतो लोकहिताय जलहिताय च तस्य सर्वस्मिन् भूभागे विभाजनमेव वरम् । एवमेव दन्यस्य। ये हि 'द गती' धातोर्युसन्नम्, गतिशीलता तस्य प्रानं धर्मः। निरोधे व्यापत्। विविधव्याजद्दतलोकधनोऽनुत्पादकः खतो हियमनुभूय, चोरयमाणः परैदृष्टी हासमिषेण हिय दोष परिहान्निव खामित निएकुर्वन् स्वत्वं त्यजेत् । बलुतोऽ. परियाम्यत उपभोगेऽधिकार एव कथम् ! युभुक्षिताः पक्षिगः स्वयमाहाराव यतन्ते। क्षुधातस्य पुच्चान्तिः स्वयं भोजनेनैव। फत्तव पर्वम फलभा । समाजो हि सहयोगिनां सहकमिपा पारस्परिकभावपूर्णः सामजस्ये सामरस्य च समाधितः समुदायः। परमय तस्मिन् केचनासहकाणोऽनुत्पाद्यापि सर्वाधिक विश्न- जीविनश्च भूता व्यपेतलबाः। एतानन्तरेण न कापि धमाजे क्षतिः। यथा च- (१) प्याजोपजीवी-रस्थापि तमुद्रं भूपण क्षेत्रं एई पवाद वा न्यस्य आवश्परतापीडिताय पचाशन्मुद्रा ददाति न्यासधरः। एतस्य फुर्साई दर मुद्राः प्रतिमासम्। न्यासावतं नावधिमात्रयम्। परिस्थितिपीडितो न्यासकरोऽधिमध्ये उपमपि न्यास प्रत्यावर्तस्नुिन समर्थः।न्यासधरस्य कुसौदवाया पथा प्रविशनपते, स्वरार वर हासः। अत एव स महाउनः। चनो स्वनानोऽप्यजन-जनेतर:- मानचित्रगुपरहित, सोऽपि न सानान्योऽपितु महात् । अया 'भब पतिशेषयो:- मानः । न्यासेन सह मासपरस्याप्यात्मसात करणे सरपुर सपळय, सोऽपि महार। १ पर्युदासो नय।

२७० चन्द्रमहोपतो दस्युराजस्तु सम्पन्न भ्योऽपहरति, पामय तु वराकानक्रिश्चनान्,अभद्रभागान, भग्नमनसो विषण्णान्, खिन्नान् सन्नानवसादयति। अत एव प्राकृतै. स 'बाबू', 'लाला' आदिपदैः सम्बोप्यते। (२) व्यसनोपजीवी-परेपा व्यसनेन कटेन विपत्त्या यो लाभान्वितो भवति स । यथा वाकोलो वैद्यश्च । ज्ञान हि परेषां शर्मणे। यो ज्ञान विक्रीणानो लोकस्य विपत्या लाभान्वितो वुभूपति स किं ज्ञानोपासक ! " हित्वा काश्चन राशि पांशुराशिमुपासते"। सतु व्यापारी भगवत आशिप आशासानो भक्त इव "नस भक्त सवै वणिक् । य. शूल- मारोप्यमाणात् पञ्चसहस्र मुमूषोश्च शत जिपृक्षति विचार्यतां स कीदृश । 'यो मत- कामादपि हत्त काम'। नार्थाथ नापि कामार्थमथ भूतदया प्रति । वत्तते यश्चिकित्साया स सर्वमतिवर्तते ।। चरक। एतादृशास्तु राष्ट्रय गौरवम् । परमद्य कियन्तस्तादृशा । भदावे चिकित्सका प्रथम रुपनहि, तस्य पन दिइन्ते, स बीचतु निपता का। (३) शुल्कोपजीपी-गृहशुल्केन शझटशुल्केन जनचाहनशुल्केन जीवति, शत सहर वा मानवाना नियतवेतनेन नियोग्य यन्त्रादीना परिचालनेन वार्थगुपार्जयति स । (४) घटक–केवल पावित्त उभयोपभोफा उभयार्थहरश्च । (५) समानशीलस्य धनिन पोष्यपुनोऽपहृतहिरण्यस्य परिरक्षको लगुडी च । अद्य वय सर्वाभ्युदयाय कृतसङ्कल्पा समवेता । सर्वेण सर्वस्मै* सर्वस्मात् सर्वस्य' सर्वस्मिनमि उदय - सर्वाभ्युदय । सर्वेषामेकाङ्गिन्युदये न सन्तुलन सम्भाव्यते, अत समन्तादुदयोऽस्माकमभीष्ट । स चाविदैविकोनामाधिभौतिकीनामाध्यात्मिकीनाय शफीना- ममितो दिशमुत्कर्ष खभाववाधिकाया बाधाया अपनयनश्च । सोऽयं दरिद्रातभरिदोषानु १ बा=सहित, उर्दूका उपसर्ग। यथा वा कायदा बा इजत। बू-गन्ध । बदबू खुशबू यथा। दुर्गन्धार्थ सभ्यव्यवहारम केवल यू कहनेकी प्रणाली है। २ ला ला इत्यनुकरणम् सक्दा 'ला 'ला' इति करोति स । ला आदाने । अथवा परेषां धन दृष्ट्वा यस्य मुखाल्लालाइच्योतन्ति स । ३ जनेन । ४ प्राणिने । ५ उपायात् । विश्वस्य । ७काले परिस्थाने च।

नयमो निःश्वासः २७१ पहिपुजादोत्तमुङ्गमङ्गो, अभिमाननीप्नोप्मग्रीष्मतान्तान्तस्यन्दो जगनिवेदखेद- छंदो पराभूतभूतवानुसन्मी पुजाहुरातनुरहर्पी भवमयामिविविन्नास्ववी सनदरपंजरको आन्तरगुहागहनोहरहितध्यान्तविध्वसी कलहमदरशहरो मायामत्त. निजगदादद्वारा अस्पनहनां प्रिमोमयको नन्दोस्तीतिदिपद अगटर्ममा थानन्दयामा दिन्देशकालम्लननिरपेक्षरितात इटहेनरुचाम्, सकलकनस्लोपटमः नम्नानोमान् दोनजिनिगलसितोप्नशमनशोवमुभगमुरभिसमीरः पुख- वादप्लुटोपसारशिशिरो द्युमिन्युलहरीनिर्मलः कोरिखभापतीला विपमन्युः समलतापेवापन्नपालनप्रधिवप्रवीपः प्रायशो विश्वजनवाउननसाऽनुमोदितो महीमहितो विश्वस्त निश्पसनसमाउनोपजनपिन्तानमिनिसानान्यो वदान्यमान्यो वाद- न्योऽरमा प्राकन आदयः परस्परं फलानपेक्षः समाः। सोन सबस्ने न पाय न सम्प्रदायाय गरि नु लोग्र। 'बमुधैव कुटुम्बकम्, 'यो वे भूना वसुखम् । स चार परसरममेदमावत सहयोग र प्रतिष्टितः। सम्परप्परनेवाः । सम्यर पदनम् -प्राप्तिः (पदगी, या प्रतिः समन्यः सम्यग रूपेग जायते सेव ) पम्मतिः, या च विशिष्टकोन (केवळ रिशिष्टेन्यः प्रातिः) सा विपत्तिः। बनेको निरोदति नवनवविध नराणां शते विधीदति सा विपत्तिः पुसआदस्य परम् । भवानटानन शुद्धन युझेन नना पर्यम् । अयामिलाः शान्तः पर संयोजन सम्मानस्य, भूमिग्र धर्मस्य वर्णन व्यभिचारस्य इसते, एवं पूवे न सफ्टवा। सद्भावन प्रयवमाने सफलता सानाविष्ठे पलयो इवाइनि। अनुष्टानय समन्वयेन । समन्वको मानासभा न सम्पर्पः। द्वन्यानां दीपंता दोपांगाव इतना समन्वयमी, वनी: सततया एप नासायो न चानापान साप्प, परं प्रलमायोजनाभिनय एर। समस्मिन राष्ट्र भूमन्डळे जीवनावरे च समता अनुशासनन सह म्पपतिठेत। महोतादत्त भाना, असतानुसार पिवरपथमानसन् । टत्पादनस्व अपने फरमावलम्हात्तिः। एतीयर वारदातृतिरसाईन्छ । सानो नि बरन वठे रसनाले धनाजनार र निमोपन्ने यस पष्टस्य थनो पर्य। रगुतो विनिमपलभ्य पन पास्याने दोक्लेटिन्छिन् । दुर्जनाः माउस वारल्य दोपरालोमामलोभे नानारयम्बदनि निमांच नावल मिरपन्त चन्द्रमहीपतो सिदान्ततः सांभ्युदयस्यान्तिमा स्थितिः शासनान्मोक्षः। नेयमराजस्ताजन्या विसलता, अपि तु सर्वच्या सानुसन्धान परसरोदये समाधिता व्यपस्थापना । खारप्यापादनं चिकित्साविषयः, एवमनुशासनप्यास्यापन शायनस्य विषया। वस्मिन् व्यवस्थिते न शासनस्यावश्यक्ता बस्थाय चिकित्सरस्येव । बसन्ते पुरामपप्राणीय शासनं स्वयमपेयात् । चिकित्सस्य स एवाभिमतो परोयान् यस्मारिरित्सिते पुना गाविभाव एव न स्यात् । 'प्रयोगः शमयेद् व्याधिम्', 'मयेद् यो न कोपयेत् । एपमेव शासनमपि तदेव वर यदनन्तर शासनपररावश्यम्तैव न स्यात्। नागरिक. जोवने विशेष माग सदन्तरेण शासन रासनानुसार कार्य प्रयलेन् । पुशादमासे- नारिखो लोक परस्सरमाद् मिति न च परस्परस्मिन् विश्वयिति तदा भयापनोरनार शासनस्यापरसता, तग पेन्मानरमानक्षेभ्यः पलायेत, परस्पर विधायक पायेत वरा चाउनस्य कावश्यम्वा!

नवमो निःश्वासः २७३ पुक्षवादस्य नवीना रचनावस्थाने समागवाः, शुल्कशाला, सजत्यामा भक्ष्यशाला, पशु- पालनम्, महाविद्यालयटात्रावासश्व केवलं धनेन विनिमेयानि जातानि, यदाऽतिथीनां सेवा, समाजस्य व्यवस्था, गवां संरक्षणम्, लोकहितसाधकानां साधूनां सपर्या च विझा वदा वत्पूत्त्व आश्रमाः सत्रामि गौशालाय स्थापितानि । परं तान्यपि लुम्टिनुकामः परिग्रही विचित्तुच्छं दातुं प्रतिज्ञाय प्रविश्य भ्रंशयति । दुष्टदाम्मिकः शिश्वेशमायोज्यव दुटता कत्त शुकः। अनायास जिहोर्युपा चन्दनविन्दुमालाभासिना नित्यं गङ्गा- स्नाविना प्रदर्शनवता च भवितव्यमेव । आमध्याह्न नदोवासः समाजे देवतार्थनम् । सवतं शुचिर्वशश्चेत्येतदम्भस्य जीवितम् ।। नोलकरः। अथ च प्राप्ताधिचाये हि स्वार्थपरो ज्ञानविज्ञानयोम्स्य संस्कृत श्योपयोग स्वस्थ, केवलं वस्य लाभाव करोति। पापो हि स्पोनापि पातयति । पुशवादस्वातिश्य- सम्पपास्नासागतानां दोपागां फटनस्नाभि ज्यचे, पूर्वजन्मनः पनगां फलभिव, भोसले चानिवृत्तः, परं भविष्यबीवनायावधानताऽऽधेवा, यतस्तस्य सम्पर्कः छापि न विटेत । इदं मधुमुसं विपं हरवि जीवितं तत्क्षणाद् अपस्यमिदमाशिवं व्यथयते विपाके वपुः । इदं तृणगणावृतं विलमयो विधत्ते क्षणाद् यदन्न मलिनोल्वर्ण विणमर्जितं कर्मभिः॥ गद्धरः। अधुना वयं यस्य न केवल बहुजनस्वार्थसिद्धयेऽस्नाच्माया पदति प्रतिष्टापदिनु मनोवाः। उत्सादयस्य सत्वस्यान्नम्, धारिधान्यतः सत्वनिगमरमधारमाकमिटम् । वस्तुन्युत्पादयितुः क्षेपे वनुः स्वामिता, तदनन्तरं सनावात्य। पुजवादस्य प्रिया पुत्री प्रतिद्वन्दिता, प्रतिस्सयां, प्रतियोगिता कापि न भवेत्, परं परिस्पर्श भवेत् । न मानवस्य फोन नेविलय समेत वदेवोपयोगि मन्येत । मानपर्व सांविधायि स्वान् । धनव विनिमयस्य सामानं साधनम् । यस्तूनाव मुलभता । तत्र जोपनोपयोगिवस्तूनां सामहो हानिकराना पस्मार निषेपः स्यात्। मानवस शारीरबौदाशीना मनुधरो बोपनन वस्य च विकासात् । यत्र न पनी नदयोन शोप्यो न सोपोन चन्द्रमहोपतो स्वैरी न च स्वैरिणी। अत्र यथाशक्ति श्रमो यथाव्ययमादान न्यायोपेतच वितरणम् । पुजवादेन शके दुरुपयोगो लगुडिना भय भ्रष्टाचार इति, सङ्ग्रहो भिक्षा चौयमिति च निदोपा समाजशरीरे व्यावा, एतत्सन्निपातहरणाय सर्वाभ्युदयश्च द्रोदय । सवभूतहिते रता सर्वाभ्युदयिनश्चानुत्सिता कम कुरिन् । अनुत्सेक खल विक्रमालङ्कार । अद्वष्टा सर्वभूताना मैत्र करण एव च । निर्ममो निरहङ्कार समदु खसुख क्षमी ॥ श्रीमद्भगवद्गीतायाम् कर्तणा मन सरस्सु क्वाप्यसद्विचारपङ्क न तिष्ठेत्, यद् वाह्यमानास्पशैक्षदियात् । वय परस्पर साहाय्यमाचरिष्याम , पर न कमप्याश्रयिष्याम । प्रतिदिन मैनी हत्या विश्वमेव मिन करिष्याम ! निष्कामे गुरुतमे कमणि कर्तु केवल कर्म, फलम्ब न कस्याश्चिद् व्यक्तरपि तु व्यापकस्याव्यकभगवत । 'कृपणा फलहतव । अत एव जनताजनादनाय स्वेच्छया कर्मफलापणमस्माक सर्वाभ्युदयाथनीते प्रमुख सिद्धान्त । यद्यपि पुषवादेनैष दोष उदपादि यल्लाभ विना न कोऽपि कर्मणि प्रवर्तते 'खार्थ विना भादोऽपि न प्रवर्तते । यत कर्मण आध्यात्मिको भावना व्यपगता, कवलमर्थ स्यानर्थ कारिणी भावना च समागता । पर स्वार्थभाव पशूना भावो न बुद्धिजीविना मानवानाम् । अस्माक सिद्धान्त परजीवनाय जोवनम् , परान् भोजयितु भोजनम्, 'यज्ञशिष्टाशिन सन्तो गुच्यन्ते सकिल्विपै ।' यज्ञश्च 'यज देवपूजासङ्गतिकरणदानेषु।' केवलापो भवति केवलादी। केनलेन ह्यधर्मेण कुटुम्वभरणोत्सुक । याति जीवोऽन्धतामिस्र चरम तमस पदम् ।। भागवते ३१३०३३ । न ह्यस्मात् पापात् पापीयोऽखि यत् प्रतिवेशिनि बुभुक्षिते भक्षणम्। प्रतिवेशिनो मनुष्यानेव नहि पशुपक्षिणो नित्यसहयोगिनोऽश्वत्थतुलसीप्रभृतीनपि बलमपाययित्वा जलपान दुष्करम्। 'पातु न प्रथम व्यवस्यति जल युप्मास्वपीतेषु या । सैषा विधेनाभेदरूपता । मृगोष्ट्रसरमकाखुसरीसृप्सगमक्षिका । आत्मन पुनवत् पश्येत्तरेपामन्तर फियत् ।। भागवते ॥१४।९। परानध्यापयितुमध्ययनम् दुर्यलाना रक्षाये बलम् धन ज्ञानच राष्ट्राय । बहवो वैज्ञानिका शोधका ऋषयो महर्पयो दाशनिका सिद्धान्तटारच परेपा हिताय लोकस्य हिताय कणान् नयमो नि.वासः २७५ जावा वृक्षकोटरे जोवनं यापयित्वापि लोकाय रत्नानि दुः। विश्वविश्रुतो वेयाकरणो महामुनिः पाणिनिः, ककुप्फामिनीकर्णभूषणायमानीतिविवस्यैकमान दार्शनिको म्यागः, अतकितजगन्मृदितमलमायोऽतिविचारकः शङ्करच कमर्थ साधयितुं पर्यभ्राम्यन् ? राण. प्रतापः कस्मै सुखाय घासमघमन् ? महामनाः कस्मै लामाय विश्वविद्यालय निमांति ? महात्मा रस्य प्रान्तस्य राजा भविनु दण्डापातान् सहते ? कि मोहन भौग भोलुयवाहारं कुरुते यवाहर.१ सहस्रशो बलिवीरा हुतात्मान. कस्मै लाभाय हसन्तः शूलमारोहन्ति । एतन् प्रोन्नतमानवस्य पुरुषोत्तमस्य वैशिष्ट्यम् । सम्बाथ परित्यज्य ध्यापमार्याय यतते, अनुक्त एवासिल लोरमानन्दयति च । किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति गोभिः उमुदाववोधनम । स्वभाव एवोत्तमचेतसा सता परोपकारव्यसनं हि जीवितम् ।। एपाऽस्मारु परम्परा। खेलायामानन्दमनुभवन् वालो व्यायामगुणयुज्यत एप निरभिलापोऽपि। परमद्य स खभावो मानवेभ्योऽपगतः। अत एवैष्वधमताऽऽविटा । यन नदीप्रवाहपत्तिष्ठत् । नदो प्रतिक्षण निम्नाभिमुखा। एव धनमपि निम्नानामाव- श्यन्तामनुभवतामभिमुख भवेत् । “ददिान् भर कौन्तेय 1 ना प्रयच्छेश्वरे धनम् ।" परमधुना मनुष्यस्वभावे विकृतिरापादिता पुञ्जवादेन । मानवनिगुणः। (१) विवेकी, (२) भाषावान् ( ३ ) अङ्गुष्ठवाश्च । एतादृशी योग्यता ब्रह्मणः सृष्टी नान्यस्मिन्नुत्पादनेऽस्ति । विवेकेन स सदसन्च विचारयति, मानवे- तरान् वायति हसति रोदिति च। भाषया स्वाभिप्राय जनान् श्रावयित्वा स्वमत प्रसारयत्ति, भाषा लिपिराध कृत्वा स्वविचार विश्वस्मिन् कालव्ये चमवारयति । अगुष्टश्च तप फलाना प्रत्यापक। मानवागुष्टः सर्वा बगुलीः स्पृशति । येन स विद्वानोनति कत समर्थः। शरीरेऽङ्ग प्ठो ब्रह्मणो ज्योतिदिशखायाः प्रतिनिधिः। विश्वस्य मयंदास्थापने बागः प्रतिनिधेनियत्येव सामर्थ्यम् । “दावानलप्लोपविपत्तिमन्योऽरम्पस इत्त बालदात् प्रभुः क" परमय मानव. पुलवादेन प्रक्षीणसाम। परिस्थिवेनियन्तापि पुरुषो दौर्बल्यात परिस्थितिप्रतिरूपोऽभूत् । परनेपा विरतिररिष्टम्, अरमनभिन्त्यु नेप्यति । स्था कश्चन चौरः प्रतिदिन प्रतिवेशिनो खादन्न धन वसश्चापहरन् शनैशन मुगुप्त व्यवस्तया प्रक्रियया परदा दात व्यतियापयति, सन्ततिरम्परयैप यहारोग्नुवा . अत एव चन्द्रमहोपतो स्वरी न च स्वैरिणी। अन यथाशक्ति धमो यथाव्ययमादानं न्यायोपेतच्च वितरणम् । पुत्रवादेन सतर्दुरुपयोगो लगुडिना भय भ्रटाचार इति, सङ्ग्रहो भिक्षा चौमिति च त्रिदोपा समाजशरीरे व्याप्ता, एतत्सन्निपातहरणाय सर्वाभ्युदयश्च द्रोदय । सवभूतहिते रता सवाभ्युदयिनश्चानुत्सिता कम कुर्वीरन् । अनुत्सेक खलु विक्रमालङ्कार । अद्वष्टा सर्वभूताना मेन करुण एव च ! निर्ममो निरहङ्कार समदु खसुख क्षमी ॥श्रीमद्भगवद्गीतायाम् कत णा मन सरस्सु क्वाप्यसद्विचारपङ्क न तिष्ठेत्, यद् बाह्यमानास्पर्शरुदियात् । वय परस्पर साहाय्यमाचरिष्याम, पर न कमप्यायिष्याम । प्रतिदिन मैनीवरया विवमेव मिन करिष्याम । निष्कामे गुरुतमे कमणि कर्तु केवल कर्म, फलध न कस्याश्चिद् व्यरपि तु व्यापकस्याव्यक्तमगवत । कृपणा फलहतव । जनताजनादनाय स्वेच्छया कर्मफलापणमस्माफ सर्वाभ्युदयार्थनीचे प्रमुख सिद्धान्त । यद्यपि पुषवादेनैष दोप उदपादि यरलाभ विना न कोऽपि कर्मणि प्रवर्तते "खार्थ विना मदोऽपि न प्रवर्तते । यत कर्मण आध्यात्मिको भावना व्यपगता, केवलमर्थस्यानर्थ कारिणी भावनाच समागता । पर खार्थभाव पशूना भावो न बुद्धिजीविना मानवानाम् । अस्माक सिद्धान्त परजोवनाय जोवनम् , परान् भोजयितु भोजनम्, 'यज्ञशिष्टाशिन सन्तो मुच्यन्ते सवकिल्लिौ ।' यज्ञश्च 'यज देवपूजासहतिकरणदानेषु। केवलाघो भवति केवलादी। केवलेन ह्यधर्मेण कुटुम्बभरणोत्सुक । याति जोवोऽन्धताभित्र चरम तमस पदम् ।। भागवते ३॥३०॥३३ । न ह्यस्मात् पापात् पापीयोऽस्ति यत् प्रतिवेशिनि वुभुक्षिते भक्षणम् । प्रतिवेशिनो मनुष्यानेव नहि पशुपक्षिणोनित्यसहयोगिनोऽश्वत्यतुलसीप्रभृतीनपि जलमपाययित्वा जलपान दुष्करम् । पातु न प्रथम व्यवस्यति जल युप्मास्वपीतेषु या" । सैपा विवेनाभेदरूपता । मृगोष्ट्रखरमर्काखुसरीसृप्सगमक्षिका । आत्मन पुत्रवत् पश्येत्तरेयामन्तर कियत् ॥ भागवते ॥१४॥९। परानध्यापयितुमध्ययनम् दुबलाना रक्षाये बलम् धन शानघ राष्ट्राय । बहवो वैज्ञानिका शोधका ऋषयो महर्पयो दाशनिका सिद्धान्तटारश्च परेपा हिताय लोकस्य हिताय कणान् नरमा नि.वास: जन्या समोटर बोयनं यायित्वापि कार रलनि छ । विश्वश्रुतो नयारो महामुनि पापिनि, कानिनी भूमपायमानमत्तिविश्वस्यैकमन दार्शन्किो व्यास, मस्तिजगन्मृद्धिमलनापोतविवारः शवरथ कमर्थ सायनु पर्वधन्यन् । रान प्रतारः करले मुखार घमनपसन् । नहाननाः करने दनाय विश्वविद्यालय निमावि ? नहात्मा कस्य अन्तस्य रात नविनु दण्टाघातान् सहते है कि नोह्न भोग भोग्यवहार पुरते यपहर 1 बहसया बालवीरा हुवत्नान बस्ने लमय हसन्तः शूलमारोहन्ति ? एउन् प्रेमदनन्यस्त पुस्योत्तास वैशिष्ट्यम् । मन्वार्थ परित्यन्न व्यारावार यतते, अनुक एलन्दिल लोकनानन्दयति च । किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्मया करोति गोभि कुनुदावबोधनम् । न्वभार एवोत्तमचेतसा सता परोपकारख्यसनं हि जारितन ॥ एपाऽम्मा परम्परा। खेलायनान्न्दननुभवन् बाटो व्यायामगुणैर्युञ्चन एवं निरनिट पोऽपि। परमय म खनावो मानवेन्योऽपगतः। अत एप्वयमवविध । धन नदीप्रवाहवत्तिष्टत् । नदा प्रतिक्षन निम्नाभिनुखा। एव धननय निन्न नामाव- सम्वाननुभवताभिमुख भवेन् । “दरिन् नर कौन्तेय ! मा प्रयच्छेश्वरे पन्न् ।" परमधुना मनुष्यस्वभावे वितरासादिता पुश्वादन । मानवनिगुमः। (१)विकी, (२) मवान् (३) अगुवाच। तदया मोम्पदा नगा तटोनन्यरिनन्दलाइनेति । विवन स सदाच 'वचरपति, ननद- द्वगन् वराति हसति रोदिति च। नाका साभिनय जनान् धावयित्वा समत प्रसारयत मा लिपिवदास कृता सर्वचार विलिन् कारयेच प्रकरपते। अगुष्टश्च दम्प फटाना प्रत्यायमा मानवाएगुट व नाठीः स्मृति। न म बिहानव कत्त वमर्थः। गरीरेटो बनो योदिखाया प्रतिय। यदस्य मय दाम्याने द्रमा प्रवेनियमानवस्व मानन्। "वनलोविशत्तिमन्योरप्पस दत्तुं बलात् मनु" परमय मानव. पुसदेन प्रक्षीवानपरंम्पनियन्दर पुस्ता त्यत् परम्मतितिकोऽभूत् । परनेा वितरिम्, पानमन्त्यु नपते। या रशन चोर प्रतिदिन प्रतिशिनोहरन्न घन वनयादहरन् बनेर मात्र শৰত্ৰ দুৰণা যা রে মা, বৰ ভৰ २७६ चन्द्रमहोपतो प्रचलति च। एकदा प्रबुद्धेन प्रतिवेशिना ज्ञातम् , हन्त । अयमस्माक श्रमाजिता सम्पद चोरयन् स्वयमकृनश्रमोऽपि सानन्द सामन्तजीवनं यापयति। वयञ्चानेन दण्डिता नरकजीवन जीवितुम्। अनेन लक्षशो मुद्रा अस्माकमपहृताः शतशो जनाश्च विना मूल्य भूत्यतामुपनीताः। दुष्टोऽय कथमपि हृतं धनं प्रत्यावर्तयितुमशको हन्तव्य एव। एप आततायो। आततायिनमायान्त हन्यादेवाविचारयन्निति मनुः । एतदेव रक्तकान्तमूलम् । अतः समशीलानां धनिनामस्माकञ्चैव परिणाम एकदाऽवश्यम्भावी। अतो जोवन सुरक्षितु- मिच्छद्भिः समयात्पूर्वमेव जागरितव्य परेषां जीवनाय यतितव्यश्च । यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम् । अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति ॥ भागयते ।।१४।८। वस्तुत' परस्परविरोधस्य हेतुरेवायम् । यत्केवन भौतिकीमुन्नतिं खसुखसाधिका मत्वा प्रतिवेशिनो हिताहितमविचारयन्तः स धर्षे आक्रोशे सन्नद्धाः सम्पत्सख्महे मग्नाः । वस्तुतो य ईश्वरो विश्वमिद निर्मायनदक्शित् स समप्रसम्पदा सहैव। अतः सा सम्पदी- श्वरस्यैव । यथा वायोः सूर्यस्याकाशस्य जलस्य भूमेश्वोपयोगोपभोगे वय साधिकार- स्तथैव तब्बानामन्यासामपि सम्पदा समुपयोगे वय सर्वे समानत्वेनाधिकृताः। पर पुञ्जवादे- नेतद्वपम्यमुहपादि। तनिराकरणमस्माकमुद्देश्यम् । नात्र कश्चन परोपजीवी स्यादपि तु परस्परोपजीवी । सायपरस्य सौकर्याय प्रथम चेट त जीवेच्च । परिश्रमोयन व्रतभवेत् । सह यज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति. । अनेन प्रसविप्यध्वमेप वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ सत् स्वास्थ्यम्, भावश्यकं धनम्, ऐकमत्यभ्रातृघु, खच्छ मुपयः सम्पन सुपु पुर गृहस, मुशोलः शिशु, नोरोगिता, शोलरूपसम्पन्ना रमणी, अनपमान जीवनम्, सद्धिचार, तदनुसारिकर्मप्रभावश्च क्षेने सदसदाजीविका च मुर्मणि व्ययः इत्येव केवलं न सां- भ्युदयः । एपा भौतिकी समुपतिः। अरमाफ सांभ्युदयस्य नेताहशी धुदाऽऽधारशिला। अस्माकं पृष्टभूमिराध्यात्मिकी। विविधयाधा अङ्गीकृत्यापि मानवः शाधतमुखाभिलापः। १ज्योतिशास्रोता द्वादश भावाः प्रमशस्वनुधनादयः।

२७७ - नवमो निःश्वासः वस्तुतखदात्मसम्बन्धि मुखम् । नार्थसम्वन्धि । हन्द । वयमय केवलं परिवारस्य भरण- पोषणे एव व कृतकृत्यं मन्यामहे । योगस्थः कुरु कर्माणि सङग त्यच्या धनञ्जय !। सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥ योगः कर्मसु कौशलम् । जोवने सिद्धान्तानामनुटानं कला सैच योगः। प्रमोऽधुना विकोयतेऽतोऽप्रतिष्ठितः। अकर्म च प्रतिष्ठितम् । अत एव श्रमजीवी साधु जीवन्नपि गहितो विधमजोवी च गहित जोवन्नपि सत्कृतः। एषा पुखवादस्य परम्परा परमस्माभिः प्रमः प्रविष्टाप्यः। कम्यव विधमेऽधिकृतो भवेन्नाकमी। श्रमस्य विम्यो यदा विनश्यति तदा श्रमो धमनिष्ठो भविष्यति । स्वेच्च्या भ्राम्यतो मनोविनोदः । परस्मै पराग्रहेण परचापेन च धाम्यतोऽयराता दण्ड छ। श्रमी पूर्वस्मिन्नानन्द परस्मिथ काठोर्यमनुभवति। क्य वान्यामो यच्छ्रमः सम्पत्तिर्भवेत् । सर्वे च तस्या अमिलापुमाः । नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः । शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धय दकर्मणः।। गीता। सांभ्युदयसमाजथ सर्वत्रम्मत्येन व्यवतिठेव। बहुमवस्य शासने निरुतः स्वकीय- पक्षस्य स्थायित्वसम्पादने व्यग्रो न लोककल्याणं साधयितुं समर्थर। स साक्षस्य करपाणे विरोधप्रतिरोने समाप्तसमयो लोकसेवायामनवनाश एव स्थास्यति । दनुशासनं प्रति, पराधीनतायाः स्वाधीनता प्रति स्वाभाविकरूपेण गमननस्माकं ममः। नारिमन समाजे दाता न च भिक्षुः । सर्वः सर्वमालवयस्येत् खस्स कर्तव्य परस्याधिकारय । कर्म चोपकानिरपेक्षं सः कुशीत। निरभिलापं निरपेक्ष निवांसन कनैव मुळ्ये प्रभवति । कर्मजं बुद्धियुका हि फलं त्यच्या मनोपिणः । जन्मवन्धविनिर्मु काः पदं गच्छन्त्यनामयम् ।। वस्तुतः सद्भावेन कियनाणस्य कर्नमो न नायः। लास प्रतिदिन पीने शनि परानु दिने रानी च शिरसि गर्दभोझ भारमायोज्याचनयमननिरपेक्ष धावनः प्रष्ट कर सहमानान् गम्भाषितान् दुर्गवान् ससारिणो न नोति । रिमेया वारया न! पर लोधप धाय सबमपि मान्यतः सौति। यतस्ते निम्बार्थ अनिवः पूर्व चन्वार्थम् । शासना- पन्द्रमहोपतो अतोऽस्म भनिष्कामभावेनास्मिन् योक यम् । एव कुवर्ता विश्वमस्माक सहयोगि। 'खपमेव हिवतोऽने सारथ्य प्रतिपद्यते। मम मानसे भावनैकास्ति यत् प्रत्येको ग्रामो नागरिककृनिमताविरहित एककुटुम्ब वद् व्यवस्थित सरखतीविहारभूमिनिमलेन ज्ञानालोकेन स्वाभाविकेन सौदर्येण विकसित पुष्पोपवनसमृद्धो धायपूणकुसूलो गोदुग्धधाराभिरभिषिको नवनीतनवीनाभनरो विद्य:प्रभविद्वद्वाल खगतुल्यो दोप्येत। सुखसलिला नद्य सवत प्रसृता राज पथाव देश पोषयेयु । उदम्भासि सरासि हसझलरवैमनो मोदयेयु । प्रत्येक गृह मुलासेन वीण विरावेण बालानां काकल्या च मुखरित भवेत् । नाकालमृत्यु स्यात् । पितरि स्थित नात्मजनिधन न च विधवावैक्लव्य इपि भवेत् । सर्व स्वखधर्मे कमणि चस्थित परस्सरेण सह युजोत। वस्तुतो यतोऽभ्युदयो नि यससिद्धिश्च स धर्म । दुभिपस्य कथैव न धूयेत। न विग्रहो न चौय न व्यभिचारो न च लोकव्यवस्था पकाना सैनिकानामाप पकना भवेत्। जनानां मुपुष्ट मस्तिष्कं नवाविष्काराय सज्ज तिछेत। समाजस्य सेवा धारणा, वृद्धि, समृद्धि सर्वाभ्युदये व्यवस्थिता स्यात । बुद्धिवला शरोमनाथान समाना सवत्रोद्योगशीलनाया वृद्धि, समृद्धता च देशे न तु व्यफो। सामाभिविषमतानां शोषणस्य च विनाश । उत्पादनयोपयोगाय ।

- नवमो निःश्वासः २७ शिक्षालयेप्वध्यापनं सायं प्रातद्विर्भवेच्छिल्पशिक्षणध। अध्ययनायाध्यापनाय शिल्प- शिक्षणाय मनोरञ्जनशारीरक्रियायै चाहोरानपश्चमांशः। शयनकालवाहोरात्रस्य तृतीयांश आद्यायां शेषासु च चतुर्थी शः। प्रवेशसमये मूलप्रवृत्तिविभागे मासं छान आवास्यः । तदनुमोदनानुसारं विभागे प्रवेशो भवेत् । कक्षास्विनः । आद्यायां वर्पषटकम् । मध्यमायाश्च वर्षयम् । उत्तमाया वर्षद्वयम्। विभागीयाचार्यपरीक्षा प्रविविक्षुर्वर्षमेकमधीत्य योग्यता- परीक्षां प्रविष्टः प्रतिशत प्राप्तास्यधिकाइ प्रवेष्टुमधिकृतः। तस्यां वर्षवनुष्टयम्। प्रति- ग्राममायकक्षायाः पाठशाला। जनपदे च मध्यमाया जनपदच्छात्रावासश्च । अस्यादों व्ययो जनपदसर्वाभ्युदयसमाजेन देयोऽर्द्धवाभिभावकेन । भागोयनगरेपूत्तमावध्यध्यापन भवेत् । छात्रावासश्च पूर्ववत् । एतेऽधीयानाः शासनसेवां कुर्युः। केन्द्रनगरे । विभागीयाचार्यपरीक्षायै महाविद्यालयरछात्रावासश्च । छात्रावासव्ययय केन्द्रेण सोढव्यः । अध्यापकेभ्यः सपरिच्छद आवासः सर्वाभ्युदयसमाजेन देयो वेतनञ्च । भारतस्य चत्वारो भागाः स्युः। पूर्वनगरम्, दक्षिणनगरम्, पश्चिमनगरम्, उत्तर- नगरमितिभागीयनमराणि। केन्द्रश्च केवलं शासनपरः प्रदेशरहिततिष्ठेत् । केन्द्रनगरे प्रजाया वसतिन स्यात् । अधिकारिणां गृहापि, सर्वोचविद्यालयः, सर्वोच- चिकित्सालय, विभागानां कार्यालयाः, पुरातत्वविभागोऽनुसन्धान विभाग, राजदूतावासाः, सेनासनिवेशः, अतिधिनिवासः समाजेन व्यवस्थापिता विपणयो भोजनालयश्च स्युः। पर- विद्यतिययाः पुमान् खो च मन्तव्य प्रकाशयितु निर्वाच्यता प्राप्तुं च शक्नुयात् । समस्मिन् राष्ट्रे एका लिपिः सस्कृता च भाषा स्यात् । एषु भागेप्वेलक्षनिवांचजनः प्रदेशो जनपदशब्देन बोद्धव्यः। प्रतिजनपद सर्वाभ्युदयसमाजत्य सप्रथन ग्रामसर्वाभ्युदय- समयनसापेक्ष भवेत्। उपसहस्रनिर्वाचका प्रामग्गेशं नियुः। स च खक्षेने पञ्चगगान् स्वेच्च्या नियात्। गणेशरावर्जनपदरामात्र प्रकल्प्य तन्मध्यत एवैक जनपदगणेश मन्त्रिणय निरुच्य कार्य प्रचान्येत। सर्वत्र तृतीयभागस्य निर्वचनं वार्षिक भवेत्। अधिकारिगाश योग्यतासापेक्षम् । गोशे चैषा योग्यता शानदारः प्रतिपादितति दास्यविशेषमोपेत एष प्रजाभिनिर्वाच्यः । मुमुसः सर्वदा प्रसन्नमुखः। एकदन्तः-स्मिते निवृतैकदन्तो मन्दरमतः। केनापि तेनाविस्मितो गम्भोस ।

२७८ चन्द्रमहोपती अतोऽस्माभिनिष्कामभावेनास्मिन् योकव्यम् । एव कुर्वता विधमस्माक सहयोगि। "स्वयमेव हि वातोऽग्ने सारथ्य प्रतिपद्यते। मम मानसे भावनैकास्ति यत् प्रत्येको ग्रामो नागरिककृत्रिमताविरहित एककुटुम्ब. वद् व्यवस्थित सरस्वतीविहारभूमिर्निर्मलेन ज्ञानालोकेन साभाविकेन सौन्दर्येण विकसित पुष्पोपवनसमृद्धो धान्यपूर्णकुसूलो गोदुग्धधाराभिरभिषिक्तो नवनीतनवीनाभनरो विद्युत्प्रभविद्वबाल स्वर्गनुल्यो दोप्येत। सुखसलिला नद्य सर्वत प्रमृता राज- पयाच देश पोपयेयु । उदम्भासि सरासि हसकलावैमनो मोदयेयु । प्रत्येक गृह- मुलासेन वीणाविरावेण बालाना काकल्या च मुखरित भवेत्। नाकालमृत्यु स्यात् । पितरि स्थिते नात्मजनिधन न च विधवावैलव्य वापि भवेत् । सर्व स्वखधर्मे कर्मणि च स्थित परस्परेण सह युनौत। वस्तुतो यतोऽभ्युदयो नि श्रेयससिद्धिश्च स धर्म । दुभिक्षस्य कथेव न श्रू येत। न विग्रहो न चौर्य न व्यभिचारो न च लोकव्यवस्था पकाना सैनिकानामावश्यकता भवेत्। जनानां सुपुष्ट मस्तिष्क नवाविष्काराय सज्ज समाजस्य सेवा, धारणा, वृद्धि, समृद्धि सर्वाभ्युदये व्यवस्थिता स्यात् । बुद्धिबला शरीरबलाश्चात्र समाना, सर्वनोद्योगशीलनाया वृद्धि , समृद्धता च देशे न तु व्यक्तौ। सामाजिकविषमताना शोषणस्य च विनाश । उत्पादनचोपयोगाय । ग्रामाणामवस्थान पञ्चमहलजनसङ्ख्यातो नाधिक भवेत्, यन सर्वे परस्पर जानीयु । ग्रामीणा खावश्यकतानुपारि सर्व स्वयमुत्पादयेयु । क्रयस्यावश्यकतैव न भवेत् एषु प्रामेषु एकाऽनविपणिरेका वासोविपणिरेका चोपयुज्यमानवस्तु विपगि , बालाना प्रौढानां महिलानाश्च कृते निशुल्का नवीनसाधनसम्पन्ना पाठशाला आरोग्यशाला, उपयोगिपुस्तकावित आकाशवाणियुक्तो वाचनालय , विविधविषय प्रदर्शकपट्ट मनोरञ्जनव्यायामादित्यवस्थ जनोद्यानच सवाभ्युदयेन सन्चालित तिष्ठेत् । न कश्चनानक्षरस्तिष्ठेत्। रुग्ण आरोग्यशालायामेव चिकित्सितो भवेत्। आरोग्याध्यक्ष कस्मिंश्चिन्मृतेऽनाप्तदशमीके तस्य विवरणाय प्रष्टव्योऽक्षमोत्तरो दण्डभाक्, चौर्य चारक्षक । पर पतनविरसेष्वसारेषु श्रीविकारेप्ववयुद्धषु सर्वाभ्युदये च व्यवस्थिते न चौर्य सम्भाव्यते । व्यवस्थायें न परेपामावश्यकता, प्राभ्या वय व्यवस्थापयेरन् । प्रामाद् बहिर्यन्ताणाम. वस्थितिर्भवेत् । यताहोरानस्य तृतीयाशे कार्य भवेद्दशवर्षाणि यावत्, ततश्चतुर्था शे। तिष्ठेत। । स्वल्पा बा।

नवमो निःश्वासः २७ शिक्षालयेप्यध्यापनं साय प्रातद्विवेच्छिशिक्षणच। अध्ययनापाघ्यापनाव शिल्प- शिक्षणाय मनोरखनशारीरक्रियायै चाहोरानपञ्चमांशः। शयनकालवाहोरानस्य तृतीयांश भायायां शेपासु च चतुर्याशः। प्रवेशसमये मूरपत्तिविभागे मासं छान आवास्यः । तदनुमोदनानुसार विमागे प्रवेशो भवेत् । कक्षास्तिनः। आयायां वर्षपट्झम् । मध्यमायाच वर्षयम्। उत्तमाया वर्षद्वयम् । विभागोयाचार्यपरीक्षा प्रविविक्षुर्वर्षमेकनधीत्य योजता- परीक्षां प्रविष्टः प्रतिशत प्राप्तपटघिकाहःप्रवदनधिकृतः। तस्यां वर्षचनुष्टयम् । प्रति- ग्राममायकक्षायाः पाठशाला। जनरदे च मधमाया जनपदच्छानाबासश्च । भस्याओं प्ययो जनपदसर्वाभ्युदयसमाजेन देयोद्धयाभिभावकेन । भागोयनगरेपत्तमात्रघ्यध्यापन भवेत्। छात्रावासश्च पूर्ववत् । एतेऽधीवानाः ग्रासनयां कुर्युः। केन्द्रनगरे च विमागीयाचार्यारीज्ञाय महाविद्यालयछात्रावासश्च। छात्रावासव्ययश्व केन्द्रण सोटव्यः । अध्यापकेभ्यः सपरिच्छद आवासः सम्भुिदयसनानेन देयो वेतनश्च । भारतस्य चत्वारो भागाः सुः। पूर्वनगरम्, दक्षिगनगरम्, पश्चिमनगरम्, उत्तर- नगरमितिभागीयनगराणि । केन्द्रप केवलं शासनरः प्रदेशहितखिठेत् । केन्दनगरे प्रजाया वसतिर्न स्यात् । अधिकारिणां गृहापि, सवोचविद्यालयः, सर्वोच- चिकित्सालयः, विभागानां कार्यालयाः, पुरातत्त्वविभागोऽनुसन्धान विभागः, राजदूतावासा, सेनासनिवेशः, अतिधिनिवासः समान व्यवस्थापिता विश्गयो भोजनालयव स्युः। पञ्च- विपतिवयाः पुमान् खो च मन्तव्य प्रकाशयितुं निवांच्यतां प्राप्नु चयनुसत् । सनस्मिन् राष्ट्र एका लिपिः सस्कृता व भाषा स्यात्। एषु भागेप्वेतशनिवांचकचनः प्रदेशो जनपस्सन्देन योन्यः। प्रतिजनपद सांभ्युश्यसनाजस्स सप्रथन प्रामसवांभ्युदय- समपनमापेक्ष भवेत्। उत्सहस्र निवांचा प्रामगने नियुः। स च बझेने पश्चगान रखेच्च्या नियात् । गनेशरतबनपदमनाब प्रकल्प्य तन्मयत एवैक जनपदगणेश मन्त्रिगम निकच्य कार्य प्रचायेत। संघ तृतीयभागस्य निर्वचनं वार्षिक भवेत्। अधिकारिमा योन्मतासापेक्षम्। गर्ने वा योग्यता शास्त्रकार प्रतिपादितति द्वादविशेषनोपेत एप प्रमाभिनिवांच्यः। मुमुसः सर्वदा प्रससमुता। एकदन्त:-स्मिते निभूतकानो मन्दरमदः। केनापि तेनाविस्मितो गम्भीरः ।

२८० चन्द्रमहीपतो कपिल:- कपीनपि लाति-आदत्ते - गृह्णाति-कार्येषु योजयति सः अयोग्यपुरुषा- नपि कार्यप्रवर्तनानि कर्तु निपुणः इति भावः। अथवा साङ ख्याचार्यः कपिल इवाना- सक्तः, कर्म कुर्वाणोऽपि निलिमः। गजणः = सूक्ष्मतमश्रावी। वेन प्रदेशभवकर्मणां सौम्येण श्रोता। लम्बोदरः- अत्रोदरशब्दो न पाकस्थल्या नवोदरगुहाया वाचक , अपितु मध्यमानस्या प्रदेशवृत्तं श्रुत्वाप्यक्षुब्धः। अविकारिहत्त केनाप्यविज्ञात तिष्ठेदेवसरोपयोगाय । विक्टः- कर्तव्ये निष्पक्षो हटवती। न यन प्रेम्णो वैरस्य वा प्रभावस्तिष्ठेत् । विघ्ननाशः-प्रान्तहितव्याघातकानां तत्त्वानां नाशक । विनायकः = सर्वाभ्युदये न कोऽपि नायकः सर्वेषां समानाधिकारत्वात् , व्यवहार प्रचलनाय नियमनाय च तस्यावश्यकतास्त्येव । अतोन नायको नचानायकः, अपि तु विलक्षणो नायकः। अहम्भावे विगतनायकत्वाभिमानः कार्य च विशिष्ट इति वा । धूमकेतुः = आकाशे उत्पातविशेषद्योतक नक्षत्रम् । तन्न कस्यापि दुःखदान पर तस्य दर्शनाजना बिभ्यति, भवन्ति चातद्विताः। तद्वदेनं दृष्ट्वा सर्वे साशङ्काः सम्भ्रान्ता वा भवेयुर्यद्यप्यसौ न कस्यापि दुःखदः । गणाध्यक्षः-खगणानां कर्मणामधीक्षकः। येन कर्मकरेयु शैथित्यमुत्कोच पक्षपातो वा नोपेयात् । भालचन्द्रः भालचन्द्र इव (आहादकः ) यस्य सः -तेजविशान्तमुखमण्डल:। गजाननः-गम्भीरमुखमुदः। वस्तुजात निवेद्य न कोऽपि निवेदको निवेदनस्य भाव ज्ञानुप्रभवेत्। अस्माक राने सर्वत्रतादृशा गणेशा आसन् । कार्यारम्भे निर्विघ्न परिसमापनायै सत्कार एतेपामावश्यक आसीत् । अत एवैप शिवस्य = कल्याणस्य पुनः = फलम् । परमधुना साम्राज्यवादपुजवादमधुना वीतविवेके जगति तादृशपुरुपरलानामुत्पत्तिरेव विलुप्ता। पर गतानुगतिका मुग्धा गणेश नाम्नैव पूजयन्ति सऽपसते तस्य रेखामिव । निर्वचने प्रचारिण आजीवन निर्वचने निर्वाचने च नाधिकृताः स्युः। प्रजाः कानपि योग्यान् स्वेच्छ्या सानुरोध निबयुरयमरमाक प्रतिनिधिः। तेषां बहुत्वे कादाचित नवमां निवास. २८१ काफिले पनगणना नवन्नान्यथा। एव परस्सर परिचिन्वन्तोऽभय दास्यन्ति मतम्, * मत के अत्यम्, न च लगुदिना भयादश्रेष्टोऽयोग्यो बिक यक्यते । वनपरसवाभ्युदयसमावस्यकत्रमानुभव. पटाशतेनैव निरुको मागीयसवाभ्युदय- उपक प्रतिनिधित्वेन गन्टेन् । तन्मभ्यता मागालस्य मन्त्रिपश्य निर्वचन नवत् । मन्त्री च नागपालेनामन्य राष्ट्रियवरिष्टसनानेन च विनृश्य विभिन्नपदेषु मन्त्रिको न्टुिचीत । भागस्येसूवतापादनाय सर्वोच्चसर्वाभ्युदरासमायें साहय्याय च यत । जलपक्सेचनादिव्यवस्था मुगना साधारणव्यवाद कुर्वीत। भागीयसवाभ्युदयसमावस्य द्विपांनुभवो दशोऽशः सर्वोच्चमांन्युदरसमाज प्रास्य तन्मयो वरिष्टनमाजमेरनिराज्जनाना प्रत्ययेत् । तन्मप्यत एर भागाव- उनान्सदस्याना सर्वथा बहुमवेन वरिष्टसमाजस्वैकमत्येन च रात्रो मन्त्रिपच निर्वचन नन् । मन्नी व रानाऽऽमन्य विभागीयनन्त्रिमो निजात । सर्वोचवाभ्युस- उमाजो वरिष्टसमाजेन राष्ट्रस्य सर्वकार्यसम्पादने साधिकारतियत् । निम्नतमर्मचारिणो वतनासार्द्ध वतन गपंयस, तस्मात्साई जनपदनानमः, उस्मत्साई जनादगणेशस, तस्मात् सार्द्ध भागीवनन्त्रिगाः, दस्मात्साई नागपालस्य सोचम् भ्युदयसनावमन्त्रिगाम, तस्मालाई प्रधानमन्त्रिण, तस्मात्सर्द्ध च रक्षः। एम्पः सरिच्छद आवासो राष्ट्रप देयो यानछ। कनरा बापट यस समारवा कुर्वन्तोनकायकाले यावर्ष तान्मास वतन लमेरन् । निरन्तर पञ्चवर्ष कुलमा क्षेत्रस्य, नियत सरदा दवा शुल्केन हावासिनो गृहस्प व स्वतः सानिनः स्यु, एकल दमकमा गुल्मदातारश्चापि । यन्त्रेषु विरगियु निरन्तर दशवपाणि कर्म कुवामा स्वतो मनाभाव सु। सर्वत्र कर्मरामा नौजनाच्छादन जीवनस्तरमापानियन- स्यात् । मोच्चाभ्युदयसमाजानुसारिप्रपन्या आचरन् भागीयमान्युदयसमाजो मुद्रम् , सिन् , सामरिकम् , शासनव्यवस्थाम् , यातायातव्यवस्थानन्याच सर्वभगसन्धिनी चास्था विहाय सर्वच ततन्त्र.। स एव खरेने पेन्यान् नराश्चिीत नयादीत । करस्य पटारा राष्ट्रियसभावाय दद्यत्। अगदवता भवता सहयो- गेन दशभिवपरतल्लयुगस्यते। कि दुरापादन वे पुसनुदानतसाम्।" नागवते । एस वेरनाक राष्ट्रमधुनामि सत्यनुरमीयमेव ।

२८२ चन्द्रमहीपती नात्युनशिसरो मेरुनातिनीचं रसातलम् । व्यवसायद्वितीयाना नाप्यपारो महोदधिः॥ स चायमायो विचारः। यथा श्रीमद्भागपते नृणां त्रिशल्लक्षणवति धर्म भगवान् च्यास- अन्नाद्यादेः संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हतः । तेवात्मदेवतायुद्धिः सुतरा नूपु पाण्डव ! ७११११० नाय नवः सम्प्रदायो वादो वा किन्त्वस्माकं पूर्वजानां प्रणाली, मानवस्याद्यः सत्यः खभावः। सर्वाभ्युदयिना विचारेऽप्यनाग्रहवता भवितव्यम्। साग्रहो विचारो वादरूपतामवगाहते। यो हिंसाप्रधानत्वादधर्मः। विचारश्चापौरुषेयो बुद्धलक्षणम् । विचारस्य ज्ञानस्य न कश्चन निर्माता, केवलमभिव्यजक एव। अत एव ज्ञानमात्रस्या- पौरुषेयत्वम् । कर्णपरम्परया श्रूयमाणत्वाच तदेव श्रुतिः । अस्मिन् कायें लमानां प्रारम्भिक सहयोग आधारशिलेव भविष्यति। आधारशिला न कोऽपि पश्यति, पश्यति केवल गगनस्पथिन सौधम् । पर हर्म्यस्याधारो जनेनानीदयो विवेकिंगम्यो वास्तविकः। अनासकवृत्त्या कर्म कर्तु श्रेष्ठा बुद्धि तिश्चापेक्ष्यते। उप्ता शीघ्रमेव फलेप्सया भूमिमवगाहमाना वालाः श्रमेण सह बीजमपि विनाशयन्ति। "धैर्य धामवतां धनम्" इत्येव वाम्। लोकानां कटुसमालोचनया नास्माकं भीतिः । अस्मानवेहि कलमानलमाहताना येया प्रचण्डमुसलैरवदाततैव । स्नेहं विमुच्य सहसासलता प्रयान्ति ये स्वल्पपीडनवशान वयं तिलास्ते ॥ अतो वय लौककनिष्टया बुद्धया धैर्येण च युक्ता अखिनाः साधने यतिप्यामहे । "उत्साईकधने हि वोरहदये नाप्नोति खेदोऽन्तरम्”। चिन्तयतस्वदनुकूल व्यवहरतश्च पृत्तिपरिवर्तनम् । यथा यथा वृत्तिः परिवर्तते, पूर्वाभ्यासः शैथिल्य नवीनय दाय मुरैति । अनः प्रगल्भवृत्त्या प्रचारिण मन करिण गरीयस्या निष्टारज्ज्वा दृढमावघ्य प्रखरोद्यमेन राष्ट्रस्य करणेपूयम प्रपूर्य प्राणेवभिनवामक्षयां स्फूत्ति प्रतिपलमेधमानमुत्साह क्रियाशीलता समभावनां सद्भावनया सहोद्दीप्य सर्वतः प्रसृतमज्ञान दारिदयं दुख कलहर विनाश्य प्रयतिष्यामहे। अयमस्मा भूयासि श्रेयासि घटयतु विभुः। अस्माक प्राकालिक

नवमो निःश्वास
२८३
इतिहासो विशदोजल उत्साहवर्दकः। कर्तव्यारूढा अनेके मानवा अविचलिता मृत्यु
सहमालिश्य विधुशेखरस्यानरागवामुपगताः। सवा भूमि ददतोऽप्यविवलिताः। सलम् -
कियती पञ्चसहस्री फियती लक्षापि कोटिरपि कियती।
औदार्योन्नतमनसा रत्नरती वमुमती कियती ।।
येषां नाम स्मरन्तो वय धन्याः। येषां कोतिगीति गायन्तधारणा राष्ट्र राष्ट्रम्,
नगरं नगरम्, ग्रामं ग्रामम्, वनं वनं मुखरयन्तः शाब्दिक कीतितम्भनुच्छाययन्ति । येषां
महिम्ना वय मूर्धानं साभिमानमुच्चैः कर्तुं शक्षाः। “अपि स्वदेहालिमुवेन्द्रियार्थाद्
यद्योधनानां हि यशो गरीया"। अस्माकमयं प्राचीनो निधिर्महाहः पवित्रश्च ।
वदिदमतोत गौरख परवद्भिस्तस्यानुग्णमादायै यतितव्यम् ।
व्यसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन !
वहुशासा हनन्ताश्च युद्धयोऽव्यवसायिनाम् ।।
बुद्धियुक्तो जहावीह उभे सुकृतदुप्पते ।
तस्माद् योगाय युज्यख योगः कर्मसु कौशलम् ॥
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः शान्दिरशान्वस्य कुतः मुखम् ।।
एतत्सामान्य रेखाचित्र मम शरपेमाशस्य श्रीमतां समशमुस्थापि, परतय समये
सर्व समाजाः सम्मिल्य वैशयेनाधिकाधिकमुश्योगिनो नियमान विधास्यन्ति । अस्मत्पूर्वजः
पुजवादश्याल्या विश्वमुखं विचारित भवेत्, परमनया दुखम् , दादियम्, कलह, भय
अपिष्ट। आगच्छन्नु वयं प्रगतिविरोधिनामानन्दशत्रुमा व्यूह विचूर्व विश्व प्रकाशयामः ।
एस मामकीन प्रस्ताव पातश्च श्रीचरणाः प्रमानम् ।
उचिप्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निनोधत ।
पुनश्य, अरमाक रायनयान्त कुलकनागतमासो रिचार्यवद ग्दिनि । अवाध्य
ओकस न्यास काय प्रत्यर्प प्रसीदमितमाम् ! सम्भाव्यते केचन मां वन्तं मन्येन,
परमर भ्रमः सौश्याम रशिरानन्दस्य निधिध।

२८४ चन्द्रमहीपतो एतस्मिन् प्राचीनाचितेऽपि नवोनवद् भासमाने भुवनमान्ये पधि विचरतां कदाचन स्सलनमपि चेद् विश्वसिमि यद् भगवानस्मान् स्वयरक्षिष्यति। चलनमारभमाणः शिशुर्मानो पेक्षितोऽप्यन्वीक्षित एव सा सदा तं पतनाद्वारयत्येव । जाग्रद्दशायां रक्षायै सावधाना', यद्यप्यकिञ्चित्कर तत्, पर स्वप्ने यस्य शक्तौ विश्वसन्तो जीवामः सोऽस्मान् रक्षिष्यति । विश्वस्य यः स्थितिलयोद्भवहेतुराद्यो योगेश्वरैरपि दुरत्यययोगमायः। क्षेमं विधास्यति स नो भगवास्थ्यधीशस्तत्रास्मदीयविमृशन कियानिहार्थः जीर्णा तरिः सरिदियं च गभीरनीरा नक्राकुला वहति वायुरतिप्रचण्ड. । तार्याः स्त्रियश्च शिशवश्च तथैव वृद्धास्तत्कर्णधारभुजयोलमाश्रयामः ।। “सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु , सह वोर्य करवावहै, तेजस्वि नावधीतमस्तु, मा विद्विषावहै ।" 'सगच्छध्वम, संवद्ध्यम, सं वो मनासि जानताम् ।' 'मा मा प्रापत् प्रतीचिका' सुपारथिरवानिव यन्मनुष्यान्न नीयतेऽभोशुभिर्वाजिन इव । हृत्प्रतिष्ठ यदजिरं जविष्ठ तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥१॥ ये ते पन्थाः सवितः पूठ्यांसोऽरेणवः सुकृता अन्तरीक्षे। तेभिनों अद्य पथिभिः मुगेभी रक्षा च नो अधि च ब्रूहि देव ॥२।। यत् = मनो मनुष्याने नीयते अत्यर्थमितस्ततो नयति। मन प्रेरिता एव प्राणिनः प्रवर्तन्ते । मनुष्यशब्दः प्राणिमानोपलक्षकः। सुसारथि -शोभनो यन्ता यथा अभीशुभिः- प्रग्रहेरवान्नेनीयते, रश्मिभिनयति नियच्छति च। एवं मनोऽपि मानवान् प्रवर्त्तयति नियच्छति च। यच्च मनः हृत्प्रतिष्टम् = हदि प्रतिष्ठा यस्य तत् । यच्च मनः, अजिरम् - जरारहितम्, घालयुवस्थविरेप मनसः समानावस्थता। यच्च जविष्टम् - अतिजववद्वेगवत, तन्मे मनः शिवसङ्कल्पम् , शिव'- कल्याणपूर्ण. सङ्कल्पो यस्य तादृशमस्तु ॥१॥ हे सवितः । देव !-- जगत. प्रवाधिष्ठात-तेजोऽधिष्ठातश्च 1 ये ते पन्थाः पन्थानो मार्गाः अन्तरिक्षे मुटता. साधुस्ताः वर्तन्ते। कीदृशास्ते ? पूर्व्यासः पूर्वेषु कालेषु भवाः पूपीः। अरेणवः = नास्ति रेणुयंत्र-अपासुला', वेभि.-तैः पथिभिः = मागैरस्मान्नय ।

नवमो निःश्वासः २८२ भग एव भगवां अस्तु देवास्तेन वयं भगवन्तः स्याम । तं त्वा मग सर्व इनोहवी वि स नो भग पुर एता भवह ॥३॥ ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य वोधि तनयं च जिन्य । विश्वं तद् भद्रं यदवन्ति देवा वृहद्वदेम विदथे मुवीराः ॥४॥ स्वत्यस्तु विश्वत्य सलः प्रसीदतां ध्यायन्तु भूतानि शिवं मिथो धिया । मनश्च म भजतादधोक्षजे आवश्यतां नो मतिरप्यहतुकी ।। शिवमस्तु सर्वजगतः परहितनिरता भवन्तु भूतगणाः । दोपाः प्रयान्तु शान्ति सर्वत्र मुखी भवतु लोकः ॥ पश्येम शरदः शतम्, जीदेम शरदः शतम् । नन्दाम शरदः शतम, मोदाम शरदः शतम् । पुनश्च गच्छतोऽस्नान रह = पालय । अपि हिच भथि अहीत्य हि एते मदीया इति । या अधिन हि उपदिश यदस्माकं हितं पव्यय वन्। किन्भूतः पथिभिः । मुगेभिः = युगैः। मुखेन गम्यते येषु ते तः प्रभूतानपानः। च्यापिपिरहिवैः ॥२॥ हे देवाः = सत्वग्रधानाः, भग एव भगवानस्तु। भगः = ऐवसम्। "भग श्रीराम- माहाम्यवीर्यपनाकोतिपुइलनरः । “ऐवस्व सनग्रस्य धर्मस्य यशसः धिमः। ज्ञनराम्ययायव व पजां भग इतोरपा ॥" तेन भगेन वयं भगवन्तः = समसंदर्यसम्पन्नाः स्थाम। हे भग! सर्व इन्-सर्वएव इनः, त प्रसिद्ध ला- वो बोहवाति-पुनः पुनरतिशयेन च माझ्यति इसिद्धवे। हे मग ! विश्वविदितवीर्य ! स त्वनिह नः- अरमाक कर्मपि पुर एता- अप्रायो भव । अमेसरो भूत्ता सर्वकार्यानि साधय ॥३॥ हे वनसते । समस्त जगतो यन्ता-नियन्ता। सूकस्त -अस्मदुवस्य सायु- वचनस्य ( कर्मणि पटो) सूक्तं बौधि-बुध्यस । अस्न्दुका स्तुविनवता भायतानिति भावः। तनपञ्च चिन-अस्मदरस्यानि प्रोपाहि, वासादाद्देवा पदम् = कत्याग- मन्ति -पालयन्ति व विक्षन-सर्वम्, भानरमाम्मसु । शिव सुवीराः कयानाः पन्दो वनं विधे यज्ञ वृहत् महदूजितम्, वदेन दोपता भुग्यवामित्यायचारयेन ॥४॥ -

नवमो नि.श्वासः
२८७
खड्गबन्धः।
रामवद्राज्यं प्रशासद् द्वपेणान् दमयन् दृढम् ।
श्रीनिवासं शं नमन् सम्पुष्पितं भवतात् क्षिती ॥४॥
निश्वास एष नवमो गतश्चन्द्रमहीपती।
तौहिने नलिनोपने जगत्परे विलासिनि ॥१॥
निरर्थकपदान्यासे मञ्चलकारसोभिनि ।
निचिते श्रीनिवासेन पण्डितेन्द्राज्जनिझुपा ।।२।।
कमला तरुणवुधाना कान्त्या हरता कदापि नो चेतः ।
किन्तु समाहितशास्त्रं मानसमधिवसतु हंसीय ॥३॥
न्यासि कचन कचन प्रोत्ये विदुपा मया नु काठिन्यम् ।
नोरजमृदुला तन्वी, कुचयोः कठिनव सम्भाति ॥
किमिह कृतं प्रत्ययं सकटाक्षं भापिणो बुधा बहवः ।
किन्तु समाजे विदुपा विरलाः प्रतिभान्ति कर्तारः ॥५॥

२८६ चन्द्रमहीपतो भवाम शरदः शतम, शृणवाम शरदः शतम् । प्रत्रवाम शरद शतम्, अजिताः म्याम शरदः शतम् ॥ तैत्तिरीयआरण्यके। तस्य मुखहिमवतो निर्गच्छन्ती हितमितं च्योतन्ती ममान्दमरो शब्दनिर्मरिणी घटीसप्तकमविरलभावेन श्रावकान् वचनामृतेनाप्लाव्य व्यरमत् । लप्वी गुर्वर्थगम्भीर स्थिरतडिल्लेखाभावरां सरसां सुवर्णा लोकद्वयभ्रेयस्करीमार्यहृया नानापुराणनिगमागम- सम्मता क्वचिदन्यतश्चाप्युपलब्धां विधूतान्तध्वन्तिां वाचमाकर्ण्य साधुवादस्य गगनभ्यापिना हर्षपोषेण सह प्रस्तावानुमोदनपुरस्सर स्वस्वराज्यमहमहमिझया सर्वाभ्युदयाय स्वीकार वचश्चमत्कारप्रभारित प्रसन्नमानस नरेन्द्रमण्डलम् । A * प्राम उद्घोषितो निर्वचनसमयः सम्प्राप्तः। गृहेषु सबुद्धयः सद्दीभूय शान्तचेतसा शासनसामर्थ्य समाजप्रचालनयोग्यताश्च विचार्य खप्रतिनिधीन् निश्चिच्युः । गणेशाना निर्वचनं समस्ते भारते शान्त्या प्रेम्णा सौहार्दन जातम् । निरुक्ता- श्वापरदिने दर्भपाणयः प्राङ्मुखाः प्रातदेशस्य भूत्यै प्रतिजज्ञिरे । तस्माजनपदसमाज गत्वा समाज व्यवस्थापयामासुः, तस्माच गता भागीयसमाज ततश्च राष्ट्रियसमाजम् । एव विना व्ययं सर्वत्र निर्वचनमभूत् । राष्ट्रियसमाजश्व देशस्य सर्वा व्यवस्था सम्पादयितु खमध्यत एकत्रिंशन्मानवाना वरिष्टसभा निरुवाव । सबहुमान सर्वैरागृहीतो गुणगरी- यान्नियोजितश्शक्तिधरी मन्त्रित्वे, जातवायं चन्द्रो महीपतिः पट्टराज्ञी कमला च । बहिश्च का गजला गीतिन्दवाद्येन सहायत- अम्बिका भवतु प्रसन्ना रानि चन्द्र भूपतौ ( स्थायी) मारमिव यं वोक्ष्य वध्वो जालमागकृतेक्षणाः विस्मृतालङ्कारवस्त्रा मूच्छिताः पतिताः क्षिती ।।१।। यस्य चलवकर्म मर्मत्रोटिनो भृशदुःसहम् । श्रुत्वा मृतं विज्ञाय दग्धाः शत्रुकामिन्यश्चिती ॥२॥ यस्य धिपणां नीतिनिपुणा वोक्ष्य नोतिविचक्षणः । तत्यजे गर्यो मनीपिभिराहितः स्वस्या मती ||३|| नगमो निःश्वासः रामवदान्यं प्रशासद् द्वेषणान् दमयन् दृढम् । श्रीनिवासं शं नमन् सम्पुष्पितं भवतान क्षिती ||४|| निश्वास एष नवमो गतश्चन्द्रमहीपतो। वोहिने नलिनोपत्रे जगत्पत्रे विलासिनि ॥१॥ निरर्थकपदान्यासे मञ्चलवारशोभिनि । निचिते श्रीनिवासेन पण्टितेन्द्रान्जनिझुपा || सबन्धः । कमला वरुणवुधाना कान्त्या हरता कदापि नो चेतः । किन्तु समाहितशास्त्रं मानसमधिवसतु हंसीय ।।३।। न्यासि क्कचन कचन प्रोत्ये विद्रुपा नया नु काठिन्यम् । नीरजमृदुला तन्यो, कुचयोः फटिनव सम्भाति वा क्रिमिह कृवं प्रत्यन सम्टाक्षं भापिणो वुधा बहवः। किन्तु समाजे विदुपा विरलाः प्रतिभान्ति कारः ॥५॥ भ्याकेन्दु (१६६१) मितेऽन्दे ज्येष्ठ शुक्ले रखी दिवसे। एकादश्यामेप प्रारम्भि श्रीनिवासेन ॥६॥ ताताविपद्मयुगले सम्पोताशंपशास्त्रमकरन्दः । परमरछानविनोदी प्रत्यवसितगुरकुलक्लेशः || विद्वन्मण्डलकोचिवकोचिः प्रेम्या मुदे कवीशानाम । भारणकृष्णतृतीयारपिदिवसे पूरयत्स इमम् ।।८।। रविदिनविहिवारम्भो, रविदिनपूर्णी मनोहरन्यासः । सुखये कवी विरायासी चन्द्रः पञ्चसप्ताहः ।।६।।

२८८
चन्द्रमहीपतो
यस्याभिजनो लाम्बी हाधिवसता राजदुर्गमक्लेशम् ।
चक्र विशे वयसि स्थित्य भूत्यै च कीत्यै वा ।।१०।।
विद्वद्वीक्ष्य उपास्य आस्यरचनै रस्य प्रशस्य समे
सल्लोकव्यवहारशास्तविधिभि सम्पूरिताभ्यन्तर ।
रम्यश्चन्द्रमहीपति सुकृतिभि सेव्य सुखाकाक्षिभि-
विन्यस्त कमलानिवासकविना हृद्योऽनवद्यश्चिरम् ॥११॥
वित्तो व्याकरणेपु काव्यनिपुण पौराणिकेप्वग्रणी-
गण्यो दर्शनवेदिना व्यवहृतौ सम्प्राप्तसम्पाटव ।
आयुज्योतिरधीतिना सुकुशलो विज्ञानविज्ञो व्रती
राष्ट्राचारविदा बरो वरमति स्पृश्यादिद पुस्तकम् ॥१२॥
वेदे-द्वभ्रविलोचनेऽ (२०१४) नुसमय सस्कृत्य पोपेऽल्पश
काक्ष्यश्चन्द्रमहीपतिर्मतिमता मोदाय मुद्रापित ।
यस्या निर्भरसेवया बहुविधे व्यस्तेन कार्यक्रमे
स्तौम्यम्बा व पतञ्जलेस्तनुमती सेवा क्षमा पार्वतीम् ॥१३॥

पार्वतीविवृतावुद्ध तेतराणामप्रसिद्धानां शब्दानां कोपः पुष्पाङ्किता श दा नवनिर्मिता अवकर = कूड़ा उपबह - मसड अपश्चिम-पूर्व उदन्यन् = पिपासु अनुपेया = अनुपानम् उस्कोच रिश्वत अवगुण्ठन-पू घट उष्णीपिका-टोपी, पगड़ी *अटकेलि-अठसेली एपम = इस वर्ष ( एसके) *अचूणन पाउडर और्ण = ऊनी अन्तहसन्ती दिवाल की सिगड़ी अवस्तारकिङ्किपी = झालरी की घण्टी वणहत्य - मातृप्ति *अयोमन्जूपा -तिजोरी *मञ्चुककोश = थका धन अध्याढकसेर से अधिक *करकपट रुमाल अभ्यवहार भोजन *करवास अश्रुताभियोग - मुकद्दमे की सुनवाई के विना कविका-घोड़के मुह का कड़ा आयति = परिणाम करटो गज आरण्यका वनके छाणे कशेरका-पृष्ठास्थि आमनस्य प्रसवकष्ट करोटि -शिरोस्थि *आवास कम्पार्टमेन्ट कारण्डव - पक्षिभेद *आगुगुक्षणितरणि अगनवोट कान्दविक' कन्दोई, मिठाइवाले आक्रो-याग कासर = महिप कीकसम् -अस्थि आधीन-असे एक दिन म जाने योग्य मार्ग कसार आप्रपदीन -अचकन आवी- प्रसवव्यथा युणिन्द -वन्यजाति इला-पृथ्वी *कुचमादी-कुत्वाना स्तन्य पीत्वा माद्यति स-चाल। *उत्तरा-उतावली कुणि =वकर' १९ *उणीप-साफा ल (२६१ ) प्रवात-वडर ( साईलोन ) अस्पती - गर्भाधानार्थ वृषेच्छु गी। प्रावरण योदनेका वस्त्र वानु-वामी वटक- बड़े प्रामाविकः परमाती राग व्या:-बेचे पाय =जालम् वितान - तम्ब,भागनाना पानेसमिताः भोजनकले एव मजता वायुवनि -हासल पारितण्या-सोमन्तप्यस्वर्णपट्टिका(खाचा) पारिहार्य -(कान) वाशित पनिशब्द पिचित--पिचगये विस्तूः- वज्रनि? पिचुनन्द-निम्ब -वृन्दवाद्य-वैण्ड सूर्यः विरद्विवरण-ढायरी देना प्रोन्छन् - पोख्ता हुआ वोत्रम्-विमलम् चौरप्रतिष्टन-सिटी कार्पोरेशन ललन्तिकाहार *फुलमारी फूलकड़ी लिबाटः-उलोट (लिनटतीति ) व लुलायः-महिपः बालनिनः - उदयन् सूर्यः *लोकपयः-राजमार्गः भ *भूमिदारः-जमीन्दार *शुकच्छोयनबीवी =महतर शामालम्-शमी का भस्न मस्त्तर=मोटर +मनटो-स्टेज एक्ट्रेस शिरोरनम् -शिरोभूपग, वोर *भालाघव - शोर्टकट शुन्युः =अग्निः (३०७ टपादिः।) माधवनी-इन्द की गुल्कावास-होटल। मुद्रा-मुद्दा ( वाटान) स समापसानोक-सत्तरवर्ष से बूटा सगुन्नरसगुदा समर्यादम् -पता के साथ राजिका राई विस्तापातः- बाल के टीवे रोमन्य जुगाली *व-(एपल) ससरण-राजमार्ग वल्मीक- सर्पविल (वाम्बी) सजःप्रस्तुत, सतो बादो वा ( २६० ) कृष्णाप-खिजाव केकरः- विकतनेनः ( ऍचा) *केशनिर्मोकमोची-वालकी खाल खींचने *निवेशक:- तम्बू वाला कौलेयक= था क्षीरस्मन् - दूध पीने की इच्छा से ग गुल्फालङ्करणम् = पाजेब गोफणा=गोफिया गगाधररस.= अतिसाररोधकोषध । निशान्तम् = गृहम् गाड़ने वाले निष्टया-चाण्डाल निर्बन्धः- -आग्रह नीविः-अण्टी नीशार = रजाई-सोड नेमाक्रान्त= आधे दबाये नेकटिक भिक्षु प परारि - गतवर्ष पन्छी-छिपकली, छोटा गाव, ढाणी । *पक्षकोटर-पोकेट परिवरण-चौखदा, फ्रेम *परिवरण- पालिस पनपाश्या ललाटाभरण-मागटीका च =सिनेमा *चलचित्र *चषका प्याला *जम्बीरचूपिका = लेमनचूस जीवातु. = जीवनौषधम् । जैवातृकः- *ज्योतिशलाकारगशलाई -पटत्कार -पटाखे पनरथ-पक्षी *तरलमञ्च = स्प्रिगदार मचाण ताम्बूलबीटिका -पान बीड़ा द दाधित्वम् = दही से सस्कृत दीपशलाका- दिवासलाई। ध *धूमशक्टीपयिकापास:- मुसाफिरखाना *पथिकावास-पेसेनरट्रेन का डिब्बा *परजीवी- 1 दूसरों पर जीने वाले *परैधित (पैरासाइट) *पदपद्या-फुटपाथ --प्रतानिनी-भालरी प्रसूति.- चुल्लू *प्रतीक्षाभवन = वेटिंग रूम प्रतिपक्षण = जिरह ( २६१ ) प्रवात-वडर (साईझोन) पस्वती = गर्भाधानार्थ पेच्छु गौ। प्रावरण-मोदनेका वस्त वचक्नु-वाग्मी वटक -बड़े *प्राभाविक:=परमाती राग व्यवा: वे पाप-बालम् वितान-तम्बू, आसमाना पानेसमिता. भोजनाले एव साता वापुष्वनि - हासल पारितय्या = सोमन्तस्थवर्णपट्टिका (खाचा) वाशित-पशिशब्द पारिहार्यः-( कन) पिच्चित=पिचगये विसर्जपुः वज्रनिर्घोषः पिचुमन्द-निम्ब *न्दवाद्य-बैण्ड पेरू - सूर्यः *विपद्विवरण-डायरी देना प्रोन्टन् - पोचता हुआ वोत्रम् - विमलम् पौरातिष्टान - सिटी कार्पोरेशन ललन्तिका-हारः "पलारी-फूलमड़ी लिङ्गाट = लङ्गोट (लिङ्गमटतीति) लुलायः-महिप वामिनः-टदयन् सूर्यः लोकपया राजमार्गः भ श *भूमिदार.-जमीन्दार *शच्छोधनजीवी-महतर शामोलम् - शमी का भस्म *मदतर: मोटर *मनटो - स्टेज एक्ट्रेस शिरोरत्नम्-शिरोभाग, बोर *मालापन - शोर्टकट शुन्थ्युः-अनः (३०७ उपादिः।) भाषचनी-इन्द्र की शुल्काका-होटल। मुद्रा मुद्दा ( वादान) स र समाप्तसप्तमीक सत्तरवर्ष में बूढा परसगुल्मरसगुन समयांदम्-पतर के साथ राजिका राई सिम्तापवतः-वाल के टोवे रोमन्य-जुगालो *व-(एपल) सपरण-राजमार्ग पल्मीठ-पक्लियाम्बी) सजा प्रस्तुत सब बातो का वाईका शुद्धिपत्रम् उपर नीचे को मानायें, रेफ टूट गये, भ म, वय, अनुस्वार म्, आश्चर्यबोधक, सम्बोधन, प्रश्नबोधक, चिड़ों का विपर्यय, ओ, ई को मानाये ठीक न लगी, ये अशुद्धिया पाठक खय शुद्ध करें। विशेष अशुद्धियों को शुद्धि दी जाती है।-प्रकाशक पृष्ठ पक्ति अशुद्ध पृष्ठ पक्कि अशुद्ध ४ आधारो आधारी ७२ १३ प्रत्यैत प्रत्यैयत १८ २१ हासप्रिय उपहासप्रिय ७३ २४ वाद्ध क्य पार्द्धक २१ ५ वार्द्धक्यभावा ७४ २३ प्रत्यैद् प्रत्यैयत २३ २ तदनु तमनु २५ २४ प्रार्थयामि प्रार्थये ७५ २० मुदविजीत् मुदवजयत् २९११ व स्नात्वा ७५ २६ नाक्षिणों नाक्षणि ३१ १५ ह्यमान ह्यमानम ७५ १४ लिहन लिहान ३२१३ व्यत्या व्यतिया ७९ २३ मपानवान् मपानपुर ३४ ५चक्षते ८३ २ प्रत्येत प्रत्यैयत ६६ २२ गृहीदवी गृहीतदवी ३७ १४ खीय स्वकीय ११२ २२ द्वावेव च महोत्कौ - महोत्क ४२२२ जातत्रात त्रायध्वम् प्रत्ययत नायध्वम् १०७ २१ रुद्धरिष्यतिरुद्धर्त्त शक्यते ५० ६ माने जाने ११४ १७ सरोजिनी नितरा मनोरमा ६ दस्था मुग्ध विदग्धमुग्ध नितरा ७२ २० दूरयन्तों दवयन्तो १२६ १९ समाष्टकामिना समाकृष्ट ५४ ११ विधास्माम विधास्याम कामिनीना १ एलायितु पलायितु १२८ १हात ६५ १२ वेत्त • १३३ १७ प्रकृतिको प्रकृतिक ६७ २५ परयो पर ह्यो १३९ १६ मपेत सहमाना १४० १९ ताभोग वृताभोगम ७ स्मिकाये १४. १८ इयन्त महान्तम इयन्महद ਬਰੇ वेत मुपेत ६ सहन्त रिमन् कार्य पृष्ठ पति शुद्ध १६१ २६सवात् ६४ २मुचना १६५ १५वचनान्त पृट पछि अनुद हसित २०३ २४ख्य नुकसरत. १०८ २१ जगदलपि चानमदन्तः २२४ १६निबन्यो प्रोटो २२६ शाराम्सव हितापास २१ वचन यह जीन २२८ ३ चलिमा ८ प्रोड रहीन बगतोऽहनि निर्वन्यो। विस्फार्य व कौरटेन ਫਿਰ १ विस्तार्य १७२ ४ शारा.म १७२ १९ हितायाम १७८ १ सहतीहीच गीतिपरिचयः २८६ १७३ कुहना सविच्चविं नन्तरिधविचाटताः। अन्यि भानु प्रता रानि बन्दे भूपती। हात. वासौ पियो में हम शोभितः एवाति गालावाध्या.. निस हेलि नाय वास्ते में (स्थानी ) विधाडवाल कहरवा। R०० गमन० गम रेगम १७२ सुमार-(अन्धरा घ स स य स सा, सरिर ग० सरिन गमन गा रे ग सा - - १७१ प्रियवर पनवयौः। राजस्थानी भाइ -- अन्तरा सा नितारे ग ग 5 शो तः सा रम' प म रे म ग S प नि नि निपनि सानि 15 - पा-यु- वा ति - वि द्य तप-- त्या-- भन ग न 'म पप प ग - - - सह T ति F पि तप ति का- नि -- - सा सरे सानि ध प य ध - व घ य पनि मु घ न घो-र वटा - पध तो निघत प S म सानघ उप पन गग । | - प स्यं तो पृ श मे 3 रेगमप धप मगरेन सानिध निज ते

Chandramahipati

Author
Shastri,srinivas
Title
Chandramahipati
File name
Chandramahipati
Text
OCR done
Citation
1932
Published
2012/08
Publisher
Calcutta.,shri Nivas Shastri
Language
Sanskrit
Pages
343
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312762
Barcode
99999990321517.00
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Banasthali University
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