Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Panchanga Ratnavali
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ग्रन्थकर्ता का बंश वर्णन ॥ दो०शिव गिरजा गणपति सहित शारदश्री गुरुदेव । सुमिरूं राधाकृष्ण को युक्त और जो देव ॥१॥ सूर्यादिक खेचर सकल धरूं हृदय विचध्यान । कृपा दृष्टि दाया करहु बुद्धि हीन मों जान ।। श्री क्षत्री बंशोब्रव टंडन कुलके चन्द।। पंजाबरायनामसे जगमें कियो अनन्द ॥३॥ तनय भये तिनके चतुर सुखानंद प्रभुलाल । लाला शिवजी लालजी और बिहारीलाल !! दै सुत शिउजीलालके थे दुर्गाप्रसाद । लल्तराम इन नाम से वृद्धि भई मर्याद ।। लल्तराम सुत ऊपजे चाहू लाल सुजान । तिन सुत धूमामल भये विद्यायुत गुणवान ।। लाला धूमामल तनय दै उपजे आनंद । जेठे राजाराम हैं गंगाधर लघुनंद ।। गंगाधर मम नाम है शाहजहांपुर वास । संवत्सर फलतादि की पुस्तक कीन प्रकाश ।। यह पुस्तक के विषय में जो कछु होय अशुद्ध । बुद्धि हीन मों जानके करें गुणीजन शुद्ध । प्रह शर नव शशि वर्ष में राधाकृष्ण सुमास । भूमि तनय युत सप्तमी संग्रह कीन प्रकाश ।। सुपचांगरत्नावली पुस्तक को धरिनाम । वत्सरादि फलक्रम लिखत करि गुरुको परिणाम।।
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भमिका॥
सर्वविद्वज्जन महाशयों से हमारी प्रार्थना है कि इस पुस्तक
में जहां कहीं भूल वा अशुद्धता देखें उसको कृपा दृष्टि से शुद्ध
कर लेवे और इस पुस्तक में भाषा वार्तिक और केवल मूलही
मूल का टीका पुस्तक बृहद होने के कारण नहीं लिखा
गया इसपुस्तक में संवत्सर के राजादि का ज्ञान और
उनका फल इत्यादि अनेक विषय लिखे हैं मैं आशा करता
हूं कि विद्धजन महाशय हमारे परिश्रम को सफल करें पंचांग
बनाने की तो अनेक पुस्तके सूर्यसिद्धांत ग्रहलाघवादि हैं
परंतु इन पुस्तकों में केवलगणितहै इसहेतुछोटीसी पुस्तककी संग्रह
की गई कि पंचांग में नो फल लिखना होते हैं वह सब इस
पुस्तक में क्रमानुसार लिखे गये हैं पंचांग में फलित लिखने
को परमोपयोगी हैं।
सर्व सज्जनों का हितैषी
गंगाधरवर्मा
लालाकूचा-शाहजहांपुर
N.W.P.
दूसरापता
गंगाधर वर्मा
हरदोई
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श्रीगणेशायनम ॥
पंचाङ्गरत्नावली॥
चतुर्युगप्रमणाम् ॥
कृत्युगप्रमाणम्१७२८००० त्रेतायुगप्रमाणम् १९९६००० द्वापर
प्रमाणम् ८१४००० कलियुगप्रमाणम् ४३२००० संवतविक्रमीय में
३०४४ अथवा शाके शालिपाहनीयमें ३१७६ जोड़ देनेसे गति
कलि होता है कलिगति को कलियुग प्रमाण में हीन करने से
भोग्य कलि होना है।
अथ सम्वत्सरोत्पत्ति ज्ञानम् ।।
शाकाको २ जगह रखना प्रथमको २२ से गुणा करना उसमें
४२६१ जोड़ देना तिसमें १८७५ का भागलेना जो अंक लब्धि
• पंचाङ्गरत्नावली मिलै उसे दूसरी जगह के शाकेमें जोड़देना फिर उस्में ६० काभाग देना जो शेष बचे सो बृहस्पति के मतसे प्रभवादिगत सम्वत्सर होताहै शेपमें १ जोड़ लेनेसे प्रवेश संवत्सर होता है ।। १८७५ के भागदेने से जो अंक शेष बचाहै उसको १२ से गुणाकरिके फिर (१८७५)का भागदेय जो लब्धि होय वह प्रवेश संवत्सर के भुक्त मास होंगे फिर शेषको ३० से गुणा करिके (१८७५)का भागदेय जो लब्धि होय वह भुक्त दिन होते हैं फिर शेषांक को ६० से गुणा करिके (१८७५) का भागदेय जो लब्धि होय वह भक्त घटी होती है फिर शेषांक को ६० से गुणा करिके (१८७५) का भागदेय जो लब्धि होय वह मुकफल होते हैं भुक्तमासादिक को १२ मासमें घटाने से भोग्य मासादिक होते हैं यह संक्रांति मासवशात जानना ॥ श्री शाके १७७६ घटानेसे भी, वर्तमान संवत्सर होताहै ।। नरमदायां उत्तरे भागे व्यवहरति इस संवत्सरमें १२ हीन करके जो संवत्सर प्राप्ति होय सो नरमादायां. दक्षिणे भागे व्यवहरति ।।।। सम्बतसर स्वमीज्ञानम् ॥ पांच वर्ष की १युग संख्या होती है प्रभवादि ६० वर्ष में १२ युग होते हैं तिन वर्षों के अवि देवता क्रमसे मुनियोंने कहे हैं युगप्रति क्रमसे विष्णु १ बृहस्पति २ इन्द्र ३ अग्नि ४ त्वष्टा ५ अहिवुन ६ पितर ७ विश्वदेव ८ चन्द्रमा १ अग्नि १० अश्वनी कुमार ११ भगदेव १२ ।। पहिली वीसी ब्रह्माकी दुसरी बीसी विष्णु की' तिसरी घीसी शिवकी।
ॐ पंचाङ्गरत्नावली संवत्सरों के नाम प्रभव विभव प्रमोद प्रजापति मंगिरा ५ भीमुब धाता ईश्वर बहुधान्य प्रमांधी विक्रम ८ १२ वृष चित्रमा समानु. तारण पार्थिव उपय सर्वजित २० मधारी विरोधी २२ २३ विकत 1 २४ नंदन २५ बिजय २५ मन्मथ धुर्मुख हेमलंय विलंब विकारी | संघरी . शुभकत् शोभन सवंग कीलक क्रोधी | विश्वास पराभव ३८ ४० सौभ्य साधारण विरोधक परिधावी प्रमादी मानव राक्षस ४४ ४८ ४९ कालयुक| सिवार्य दुर्मति पिंगल ५१ बुंदुभी ५२ 3 . . . रुधिरोदू गारी ५० क्रोधन ५९ ५८ ॐ पचा रत्नापला संक्रांति वाहनादि ज्ञानम् ॥ "संक्रांति का ज्ञान चक्रों से जानलेना चाहिये ।। - ऋतु चक्रम् ॥ सूर्धराशि, १०।११।१२।१ २१३ ३.७८1८; ऋतु शिशिर वसंत प्रीम बर्षा शरद 17 अमन ভাবীঃ दक्षिणायरविः सूर्यराशि |१०॥ ११ ॥ १२ ॥ १।२।३। ४१५६७८९ संक्रांति मूहूर्ती चक्रम् ।। . महती मुहर्ती, हर ३० श्ले-सत-आद्रा स्वाति-भ-ज्ये- धनिष्टा-कम- Ni - वि.पुन:रो: उफा उषा-उभा. पूफापूपा पूमा मूमचि-- 'अनुराधा अश्व. पुष्य- जघन्य हा सम संज्ञा बृहत्संहा " राहन ब जा ति ठा १.अपमृ. फल युवा हिपतिः - 'el यम नेष्ट, फल hindi A. ( लोह संकीति बाहनादिकम् ॥ संझान्ति जिस कारण में लगै उसी के हिसाब से चक्रमे देललेष बोलवाकौलव तैतिर्क 'पणिज्य विष्टि शकुनी | चतुष्पद हाथी व्यात "माईष घोहार स्वान मेषा गौर मीठाबर, धलद ऊंट सिंह शार्दूल माहिष ध्यान भीति सुभिक्ष क्लेश सौर्य समिक्ष पाड़ा सौर्य कुमारी गताल प्रौदा प्रगलमा बया मति बंश पुरेशावली सन्यासिनी , बैठी ऊर्थ ठी मुस्त “बैंठी सुप्त, ऊर्व मध्यम "मह 'नेष्ठ मध्यम मध्यम महर्ष मध्यम नेट मध ताम्र कांस्य खप्पर कंकण, मोती 'प्रवाल 'मणि गुंजा कौरी नील कांच सुवर्ण भूषण भूजर्य, सित. पांड कृष्णाजिव च बत्कल पात पांड श्याम असित चित्र कम्मर दिगम्बर मेघसरश धनुष तोमर माला पाश परमान्न ! “भिक्षा पकान्न निचित्राने गुर शक्कर भोजन तरी | केसर 'माटी गोरोचन महावरि केप भूत सर्प पक्षी मृग शंकरवर्ण मदार दूब बेला पाहर दुपहरिया! पुष्प E पर्ण पांडुर कधुकी M HANNE " .. बिलार हरिद्रा-सुरमा चमला ® पंचाङ्गरत्नावली सम्वत्सर मध्ये लाभ व्यय ज्ञानम् ॥ विंशोत्तरी व अष्टोत्तरी क्रमसे राशिके स्वामी की वर्ष संख्या से वर्ष के राजाकी वर्ष संख्या को परस्पर जोड़ देवे ३ से गुणाकरे ५और युक्त करै १५ का भाग देय जो शेष रहैं वह लाभ होता है लन्धि को उसे गुणा करे ५ युक्तकरै १५ का भाग देय शेष जो बचै वह व्यय (खर्च) होताहै ।। चक्रसे समझ लेना सम्बत के • राजा म्यादिसे जानना ।। १२० विंशोत्तरीमतानुसार लाभव्ययः॥ . राशि मेष वृष मि.क. सिं० ० तु.१० ध० म.कुं.मीन ८ १४ २ २ ५ ५ ५ २पिया ८ २ ५ २ . ५ १४ ८ २ २ ८ १५चा म. १४ २ ५ १४ ATv २ -- ८ ५ २ ८ ८या १४ ८ ८ ५ १४ ११ २ ८ २ ११ शुः ' ११ ५ ८ १ २ ८ ५ . ८ ८ शनि ३-५ २ १४ १४ १५ * पंचागरनावली १०८ अष्टोत्तरीमतानुसार लाभव्ययः॥ " 4 राधि मे. दृ., मि०० सिं• क. तु० ० घ० म.कु.मी. N २ ८ ८ ३ १४ ५ लाभ ५ २ ८१४ २ ५ २ ठा १४.३ २।१४ عر عر ग्य 07. १४ ११ १४ ૨ ८ ५ ११ न्य ५ ८ २ १४ ला० ५ ५ ५ . १४ ११।१४ ५ ૨ १४ २ ५ ८ ११।१४।११ ५ ११।१४ शु० १४ शनि २ ला० १४ १४ ५ २ ८ . ५ १४ २ संवत्सर मध्ये वर्षादि विश्वा ज्ञानम् ॥ शाके को तीनसे गुणा करिके सात का भाग लेना लब्धिको अलग रखना शेष को दना करके पांच जोड़ देना जो अंक होय सो वर्षा के विश्वा जानिये और लब्धि को तीनसे गुणाकरके सात का भाग देना लब्धि को अलग रखना शेषको दूना करके ५जोड़ देना जो अंक होय सो धान्य के विश्वा जानिये फिर लब्धांक को इसी प्रकार गणितक्रिया बारम्बार करनेसे तृण-शीत. तेज-वायु- बृद्धि-क्षय-विग्रह इन सबके विश्वा पूर्व प्रकार अलगर निकलेंगे।शाके को ४ से गुणा करना उस्में ७ का भाग लेना
१०
ॐ पंचाङ्गरत्नावली
लब्धि को अलग रखना शेषांक को दूना करना और जोड़ देना
जो अंक होय सो क्षुधा के विश्वा जानिये लब्धि को फिर ४ से
गुणा करके ७ का भाग लेना लन्धि अलग रखना शेषांक को
दूना करना ३ और जोड देना जो अंक होय सो तृषा के विश्वा
जानिये फिर लब्धांक को पूर्वोक्त बारम्बार क्रिया करने से
निद्राआलस्य, उद्यम, शांति, क्रोध, दंभ, पाखंड, लोभ,
मैथुन, रस, फल, उत्साह के अलग २ विश्वा निकल आयेंगे
॥श्री। शाकाको ८ से गुणा करना १ का भाग देना लब्धिको
अलग रखना शेषांक को दूना करके १ जोड़ देना जो अंक
होय सो उगत्व के विश्वा जानिये फिर लब्धांक को ८ से गुणा
करके ९ भाग देने से जो लब्धि होय उमको अलग रखना
शेषांक को दना करके १ जोड़ देना जो अंक होय सो
पाप के विश्वा जानिये फिर 'लब्धि को वारंवार इसी प्रकार
क्रिया करने से पुण्य व्याधि-व्याधिनाश आचार-अनाचार-मृत्यु
जन्म देशोपद्रव देशस्वास्थ्य चौर चौरनास- अग्नि अग्निशान्ति
इन सबके विश्वा अलग २ बन जावेंगे || श्री ॥ शाके
को चार जगह सवै प्रथम को ५ से गुणा दूसरे को ७ से गुणा
कर तीसरे को ह से गुणा कर चौथे को ११ से गुणा करै इन चारों
अंकों में अलग २ सात का भाग देय शेषाकों को दूंना'दूना
करके तीन तीन जोड़देय तो कम से उद्भिज-जरायुज-अंडज
स्वेदज-जीवों के विश्वा बनजावेंगे ॥ श्री ! शाका को
सात से गुणा करना और ६ का भाग लेना लब्धि को अलग
रखना शेषांक को दूना करना उसमें३और जोड़ देना जो अंकहोय
-
-
["
पंत्राङ्गरत्नावली
सो टीड़ी के विश्वा जानियेो फिर लब्धांक को ७ से गुणा करना
और ९ का भाग लेना लब्धिको अलग रखना.शेषांक को दूना
करना ३ और जोड़ देना जो अंक, होय सो तोताके विश्वा
जानिये, फिर लब्धांक को बारम्बार इसी क्रिया से. मूषक-सोना
तांबा-स्वचक्र परचक्र बृष्टि बृष्टिनास के विश्वा अलग-अलग
निकल आयेंगे। श्री।।
संवत्सरविश्वाज्ञानम् ॥
- कर्क की संक्रांति जिस दिन होय उसी दिन के
अनुसार
सम्बत्सर के विश्वा जानिये यथा रविवार को कर्क की संक्रांति
होय तो संवत्सर के १० देश विश्वा जानिये सोमवार को २०
विश्वा मंगलको - विश्वा बुधको १२विश्वा बृहस्पति को विश्वा
शुक्रवारको भी १८ विश्वा शनिवार को कर्क की संक्रांति होने से
सम्वत्सर के ५ विश्वा होते हैं।
चतुर्मेघज्ञानम्॥
शाके में ३५ नोड़कर भाग ४ को देय शेष १ बवै
आवर्तक नाम मेघ २ व. तो संवर्तक नाम ३ व तो पुष्कर
नाम तो द्रोण संज्ञक मेष जालिये। मेषफलम।
आवर्त में महावत होय संवर्तक में बहुत जल व पुष्कर में चित्र
विचित्र वर्षा होय द्रोणमें चूड़ाआवै ॥
अथनवमेघज्ञानम्॥
शाके में १५१२ हीन करके ९ का भाग देय जो शेप. रहै
उसको में हीन करदेय जो अंक प्राप्ति होय सो क्रमसे जानना
१२
पंचाजरत्नावली
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यथा-आवर्त १ संवर्त २ द्रोण ३ पुष्कर कीलक ५ नील
वरुण ७बायुदतम ९फलम
अष्टनागज्ञानम् ॥
शाके में रसादि (७६) युक्त करके ८ का भागदेयं शेष बचे
सो क्रमसे अष्टनाग जानना यथा अनन्त १ वासुकी २ पन
३ महापद्म ४ सुतक्षक ५ कुलीर ६ कर्कट ७ शंख ८॥ फलम् ॥
हादशनागज्ञान॥
शाके में १५१० हीन करके १२ का भाग देय शेष बचे सो
क्रमसे दादश नाग जानना यथा सयुद्धो नन्दसारी २ कर्कोटक
३ पृथुश्रवा ४ वासुकी ५ तक्षक ६ कंवल ७ अश्वतर ८ हेममाली.
१ नरेद्रं १० बब्रदंष्ट्र ११ बृष १२ ॥ फलम् ।।
सप्तवायुज्ञानम्॥
शाके में शशांक (१)युक्त करके ७ का भागदेय शेष जो
बचे सो क्रम से सप्तवात जानना यथा आवहः१ प्रवहः २ संवहः
३विवहः ४ उदहः ५ अतिवहः ६ वायुः ७॥ फलम् ।।
सम्बत्सरों के फल।।
.१-प्रभव १ ब्रह्मा स्वामी चैत्र बैशाप श्रेष्ट समस्तु वर्ष समर्थता
ज्येष्ठ-अपाढ़ श्रासधान्य महर्षता गोधममुगादीनां युगंधारीनां
च विशेष महर्ष भाद्रपदोषि शुभः आश्विनिश्वकविन्मयता
पश्चादोगपीड़ा महती सर्व क्रयाणक महर्षे ॥
२-विभवः २ विष्णुस्वामी-रोग व्याप्तिः पृथिव्यां नागपुरीषभंगः
तैलंग मगध चीन देशे महर्घता उच्च मुलनानस्थलमहाविग्रहः
ॐ पंचाङ्गरत्नावली 3E अन्यत्रसमताः चैत्रादिमासस्त्रयो महर्षता ततो मेघबाहुल्यं कार्तिकादयोमासेषु सर्ववस्तु समर्घता गोधमा समा ॥ ३-शुक्लःश्रुद्रस्वामी-उत्रभंगो म्लेच्छ देशेषु मंत्रिणोराज्य चैत्रादि मास ३ समता आषादादि मास ३ महामेघः आश्विने जनरोगः घृतानांसमधु फाल्गुण मासो व ड्वर सर्वत्रविग्रहः लोक ग्राम पीड़ा देशेषु आकुलता शून्यत्वंगामेषु ।। ४---प्रमोद ४ रवि स्वामी मध्यमवर्षा अलबृष्टि मंडले मेद पात पीडा देश उद्देशः म्लेच्छ वर्णक्षयः छत्रभंगा पर्वत तटे स्वल्पप्रजा तैलंगराजविड्वरंचैत्र बैशाषेचमहर्घता ज्येष्ठेरोगः पीड़ा आषाढ़ादि मास ३ अल्पमेधः आश्विने किविदर्भाधान्यस्यत्रयोदशंफदिया कलसिका कार्तिकादि मास ४सबरस महकमा फाल्गुनमध्यमो। ५-- प्रजापति ५ चन्द्र स्वामी-द्वादशैव मासा शुमा अल्पमेघः' आश्विनेरोग बाहुल्यं घान्यस्य कलशिका त्रिंशत्फादियानाणकः कार्तिकादि मास मंदं पोषादि मास ३. मरिष्ठ कचिदुत्पात दर्शनेपि पीडा।। ६-अगिरा ६ मंगल स्वामी चैत्र वैशाषश्चमंदः ज्येष्ठे वायु प्रवल आपाढ़े मेघबाहुल्यं श्रवणादि मास ३,रोग पीड़ा कार्तिके सर्व धान्य निष्पत्तिः पापादि मास ३ समता ।। ७- सुमुखः ७ बुधस्वामी चैत्रेसर्व धान्य महर्घ आषाढ़े कृष्णपक्षे अत्यन्त मेंघवर्षाः श्रावणे गोधूमा महर्षी घृते धान्येच दिगुणो लाभः वणिक लोग पीड़ा पश्चिमायां रौरवम् पूर्वस्याम परचक्रं उच्य मुलतानस्थले प्रजापीड़ा भाद्रपदे वर्षा अश्विनादिषु प्रजा प्रसन्नः ॥ - 1- SATREAK . पंचाङ्गरत्नावली ८- भावः ८ गुरु स्वामी-बहु क्षीरा गावो वर्षा बहुला विंशोप काः सर्व वस्तु महर्घता: उच्च मुलतान अयोध्या सुराजविवर लोक पीड़ा घृन गई अहिफेन पुंगी:मंजिष्ठ, मरीच, चंदन बस्तु महर्षता चैत्रे.समताः वैशापे महर्घ धान्ये द्विगुणो लाभः आषाढ़े श्रावणे किंचिद्वभारे मेध,वर्षा आश्विने रोग बाहुल्यं कार्तिक उत्तमा मार्ग शीदि मास ४ राजविवर-मंद ॥ । E-युवाइ शुक्र स्वामी भूकंप उल्काभयं बहुलं चैत्रादि मास २ उत्पातः ज्येष्ठ रोगः आषाढ़े. शुद्धपक्षे महामेघः वायुः: अन्न महर्ष भाद्रपद दिने १४ महावृष्टिः व्याकुलता राजविग्रहः उत्तर देशेरौरव-दुर्भिक्ष-पूर्वस्याम्, निष्फला कृपिर्दक्षिणस्याम् विराधो मार्गे विपना पश्चिमायां लोक पीड़ा पश्चात्दुर्भिक्षं सर्वरसेषुसमता कार्तिकादि मास २,उत्तमः पौष्ये माघमध्यमः फाल्गुण मासे किंचित्क्लेशः माघादी मार्गे विग्रहः ॥ : १०-धाता १० शनि स्वामी चैत्र वैशापे सर्व धान्य महर्षता ज्येष्ठे मासे समता आपाढाल्प मेघः घृत तैल युगंधरी कार्यास मंजिष्ठ मरीत्र पुंगीफलं महर्षताः श्रावणे, सर्वधान्य ! महर्घताः भादपदे पुरुषा नपुंसकानि पश्चिमायां महतीमेघ वर्षा सर्वधान्यं महर्घ दक्षिणोत्तरयोर्मध्ये महामेधः पालोक - पीड़ा आश्विने रस कस धातु महर्घता कार्तिक में सर्व अन्न समघ ।। ११--ईश्वर ११ राहु स्वामी- उत्तरस्यां दुर्भिक्ष पूर्वस्यां सुभिक्ष पश्चिमायां परस्पर विरोधः चैत्रं बैशापे अन्न महर्घता जेष्ठापाठ्यो रल्य मेघः परं सर्व धान्य : महर्घता आश्विने घृत महर्घता कार्तिके रौवं दुर्भिक्षं मंजिष्ठ मरीच लवण लवंग एला पुंगी ॐ पंचागरत्नावली, एतदस्तु महर्घता मार्ग शीर्षादि मास ४ अति दुर्भिक्षं धान्य महधैं मनुष्याणां रंड मुंडादि भूम्या पतंति ॥ १२-बहु धान्य १२ केतु स्वामी-पुरुषानिर्याः पश्चिमायां शुभिक्षं परं सौख्यं सर्व देश मध्ये दक्षिणस्यां विग्रहः परं यहा भयं उत्तर पथे सर्व देशेषु पीड़ा पूर्वस्यां दुर्भिक्षं अन्न संगृहकार्याः चित्र बैशाषयो किंचिन्महर्घता ज्येष्ठ मासे चतुर्गणो लाभः श्रावणाषाढ़योर्मेधः अन्नंसर्वमहधैं - षड्गुरोलाभः । भाद्रपदे अत्यंतमेघः । सर्वधान्य समर्घता आश्निमेघः कणक धाराभिः कार्तिकादि ४ मास समता ॥ १३--प्रमाथी १३२विस्वामी-आषाढ़े श्रावणेच अल्पमेघः भादपदे पंचम्यां किंचन्मेघः चैत्रेगोधूम युगंधरी महर्घता वैशाषे ज्येष्ठेवा सर्वप्रधान्य महर्घता परं कृष्ण सप्तमी अमायां महामेघः परंअति- बारिष्टं कार्तिके दिने २१ मास ५ सर्वअन्न महर्घता सरस महर्घता मंजिष्ट पुंगी हिंगुल काश्मीर अगरु पट्ट सूत्र नारिकेल एतदस्तु महर्षता॥ १४--विक्रम् १४ चन्द्रस्वामी राजा प्रजा सौख्यं अतिमेधः चैत्र वैशापे महर्घ अन्ने दिगुणलाभः परं वैशापे म्लेच्छभयात् नगरं उदसण्ये वासः वैशापे दिन १० महावायुः भूमिपं प्रजा पीड़ा ज्येष्ठमासेदुर्भिसं आषाढ़े प्रलयः श्रावण भाद्रपदे महामेघः प्रजा सुखं सर्वधान्यसमध सर्ववस्तु समता आश्विने रोगः सर्व रससमता कार्तिकादि मास ५ सर्व अन्न समता ।। १५-वृषः१५ भौमस्वामी- बहुला परंनृपाणां पीड़ास्त्रभंगा ज्येष्टेवर्षे अन्न समर्घता धान्ये त्रिगुणोलाभः आपाढ़े अन्न महर्षता BASEXSTOESIGAZap १६ ® पंचाङ्गरत्नावली ECORDERSAR श्रावणे महान्मेघाभाद्रपदाश्विनी सर्व धान्ये समता घृत महर्षता पश्चिमेन्नमहधैं देशा उद्रशाः पश्चिमायां किंचितदुर्भिक्षं अश्विनेमेषः सर्ववस्तु : समर्घता कार्तिके किंचिदरिष्ठं मार्ग शीर्ष दौस्य पौपादिमास ३ महर्षता परं मध्यमं समयः ।। १६-चित्रभान १६ बुधस्वामी लोक सुखी पूर्वे अल्पं मेघः पश्चात्महती वर्षा धान्यघृतं समता वैशाषे अन्न समंभावनः ज्येष्टादि मास तीन महान्मेषः सर्वधान्य महर्षता भाद्रपदादि मासा २ रोगतिः कार्तिके महामारी भयम् मार्गशीर्षदयेऽरिष्टं माघद्रये सरोग प्रजा परं सर्वान्न रस समर्घता बैशाष ज्येष्टयो रोग पीड़ा अन्न व कर्पणक सर्व वस्तु महर्षता॥ -१७-सुभानु १७ गुरुस्वामी-पूर्वस्यां दुर्भिक्ष लोक सुखी चैत्रे महर्षता वैशाष ज्येष्ठयो रोग पीड़ा आषाढ़े अन्न महर्ष श्रावणे मेघः अन्न समता भाद्रे महामेघः आश्विने रोग पीड़ा गोधमा समता युगंधरी मुद्रादि मणप्रतिफदिया नाणकानि १२ धातु सर्व वस्तु महर्घ घृत समता कार्तिकादि मास २ मध्यम राजपीड़िता लोकाः पौष्यादि मास ३ रोग पीड़ा भयंकरः परस्पर विरोधः॥ । १८-तारण १८ शुक्र म्वामी-अतिवायुः परस्परं युद्धं वहुलं चैत्रे सरोगा बैशाषे सर्ववस्तु समर्घ ज्येष्टे महान्यायुः आषाढ़े अल्प वृष्टिः श्रावणे सप्तमी तो नवमी तो वा वर्षा भादपदे एकादश्यां अत्यन्त मेघः आश्विने अन्न महर्घ सर्वरस संग्रह कार्यः कार्तिके महर्षता मार्गे बिग्रहः धान्य मइथं योगिनी पुरे महाभयं राज्ञा बिरोधम्लेच्छभयं पौष्ये युद्ध पश्चिमायां धान्यं महर्घ उत्तरपथे महा दुर्भिक्षं फालगुण मासे मध्यमः तस्कर भयम् अन्न महर्घ विग्रहः है ® पंचारत्नावली. राजा विरोधात महत्वातकं पूर्वायां-दक्षिणस्यां वा वनेवासः पश्चि- मायां महायुद्धं परं अन्य वस्तु समर्ध । १९–पार्थिव १९ शनि स्वामी-उत्पाता बहुला चैत्रे वैशाषेच महर्घता सर्वतो विग्रहः ज्येष्ठे रोग पीडा नृप युद्धं आषाढ़े अल्पमेघः धान्यं मह महाबायुः श्रावणेखंड बृष्टि भाद्रपदे नैर्ऋत्य वायुः अन्न महर्घता अश्विन वृष्टि गोधूमयुगंधरी, मुद्दादि महर्षता कार्तिकादि दयरोग, पीड़ा पौष माघयो महर्घता फाल्गुणे समता ॥ २०-व्यय२०राहु स्वामी-अना बृष्टिः दुर्भिक्ष रौरवं चैत्रो,मध्यमः वैशापद्धये महर्घता देश विग्रहः आषाढ़े अल्पमेधः-परं महर्षता श्रावण दुर्भिक्ष मध्य देशे विग्रहः दक्षिणस्यां प्रजापीड़ा भाद्र पैदे खंड वृष्टिः अन्न महर्घता आश्विने रोग पीड़ा पूर्वस्यां विग्रहः, गोधूमामहर्षतामध्यमःसमये कार्तिकरोगपीडा यदाविग्रहोपशमः मार्गशीर्ष मासे अन्न महर्षता परं युद्धं किंचित पोषादि २ मास अति महर्घता फाल्गुणे समता परं मार्ग वैषम्यं अन्नं मह ।। इति उत्तम विंशतिः।। २१.सर्वजित २१ ब्रह्मास्वामी चैत्रादि ३ मास समर्घ आषाढ़े अल्पमेघः श्रावणे महामेघः सर्वधान्य रस वस्तु समर्घता नवीन मुद्रोदयः राजाविग्रह परस्परं अन्नमहर्घता भाद्रपदे दिन ५ पश्चान्महतीवृष्टिः आश्विने रोगार्तिः सर्वधान्य समर्घता कार्ति के राजा राज्यं करोति प्रजासुखं अन्न समर्घता मार्ग पौषोत्तमौ सर्वलोकमुख माघमासे मेघा दिन ३ मंजिष्टा मुहरा मरीत्रिशुंडी BAD - - ॐ पंचागरत्नावली के पिप्पली सुपारी प्रमुख महर्घता फाल्गुणे सर्ववस्तुं समता उत्तमः समयः॥ २५-सर्वधारी २२ विष्णुस्वामी-राजीराज्य सुस्थः प्रजामुखं असम मार्ग शीर्ष पोध्यौ उत्तमः सर्वलोकसुखं पट दर्शन महत्पूजा सर्वनगर देशेषु स्थानवासः चैत्र संबंधान्य समता उत्तरापथे दुःकाल बैशाष महर्घ जेष्टे महर्घता महाभयं अरिष्टा- पादे महामेघः श्रावणे अल्प वर्षा अन्नं मह) भाद्रपदे दुर्भिक्षं माश्विनेरोगः अन्न समता राज्ञांपरस्पर विरोधः अन्नमहर्घता ।।। । २३.विरोधी २३ रुद्रस्वामी-चैत्रादि ३ मास धान्य महर्घता आषादे श्रावणे अतिवर्षा भाद्रपदे खंड वृष्टिः मासत्रयऽतिभयं किंचिदुत्तपात राजाप्रजा सुखी कचिदाज्य युद्धं सर्वधान्य सम.. पता आश्विने सर्वसमर्थ कार्तिके मारीरोग बहुलता मार्गशीर्षादि मास ४ गुजरे महदेशे अन्नमहघु ॥ २४-विकृत् २४ रेबिस्वामी अकाले वर्षा राजविग्रहः देशा उदसा मरुधरायां दुर्भिक्षं चैत्रादिमास ४ महर्षता कण कलशिका प्रतिफदिया नाणके एक सतेन लाभः श्रावणमास द्वय मेघवृष्टि- नास्ति रोखं दुर्भिक्षं आश्विने उत्पात भूकंप कार्तिके क्षत्रभंगः सुवर्णादि सर्वधातु समर्पता कण कलशिका प्रति २० फदिया नाणकानां एक प्राधिन भवति ।। २५-खर २५चंद्रस्वामी-चैत्रादिमास ५ महतीवर्षा सुभिक्ष प्रजासुखं सर्वलोके गुरुणां महत्वं पश्चिमायां मुभिक्षं आश्विने अन्न समता रस महर्घना मंजिष्टा सुहागा वस्तुतो मरुधरायां' त्रिगुणो लाभः म्लेच्छक्षयं परं रोगपीड़ा सर्वधान्यनिष्पत्तिःप्रजा C - । 1 ॐ पंचाङ्गरत्नावली सुखं कार्तिकादि मास ५ मध्यम सर्वधान्य समर्पता ।। २६-नंदन २६ भौमस्वामी-प्रजासुखं सर्वधान्य समता चैत्र मध्ये करका पतनि वैशाषे धान्य महर्ष प्रचंडवायु ज्येष्टेपि तथैव महर्घ आषाढ़े महामेघःश्रावणे अल्पवर्षा भाद्रपदे महावृष्ठि अश्विने सुभिक्ष राजाराज्यं प्रजासुखं कार्तिके मुभिक्षं अन्न समता मार्ग शीर्षादि ४ मास महर्षता मंजिष्टा लवणी महर्षता ।। २७-विजय २७ स्वामी बुधः सर्वदेशे महापीडा राज्ञां परस्पर विरोधः अन्नमइधै तुच्छ जलं महिलोहित पापिनी विप्र गो महिष अश्व इस्ती, पीड़ा चैत्रमध्ये महती, वर्षा शाषे ज्येष्ठे अन्न महर्घता आषादे भावणे अल्पमेघः कण कल. शिका प्रतिफदियाभाद्रपदे वर्षा वर्षति कलशिका प्रतिफ. दिया १४ आश्विने मध्ये बणिक जन पीड़ा अन्नं महर्षता फाल्गुणे समतापरं विप्रहः धान्ये षट् गुणोलाभः । २८- जयरगुरुस्वामी-महासुभिक्षं चैत्रे महर्षता वैशाष ज्ये. तुष्ठयो समर्घता आषाढ़े मेघवर्षा अन्नमहर्घ श्रावणे दिन २५ महामेघः भाद्रपदे दिन ७ मेघवृष्टिः आश्विने अन्नसमर्घ कणा नांमणं प्रतिद्वामा ३५ लभ्या स्वर्णादि धातु समता कार्तिकादि मास ५ उत्तमं अन्न समता अन्य वस्तूनि महर्घता भवति मौक्ति अप्रवालकादि महर्घता मार्गशीर्षे रोग बहुलता बणिक पीड़ा उच्च मुलतान देशे रोग पीड़ाछत्रभंगालोकदुखिता। २१-मन्मथ २६ शुक्रस्वामी राजविरोधापूर्वदेशेलोकपीड़ा परं अतिवृष्टिः रोग बाहुल्यं धान्यं संग्रह चैत्रे वर्षाभूमि कंपः बैशापे समर्षताज्येष्टाषाढ़ महर्घता धान्ये पद्गुणोलाभःश्रावणे अल्पमेष 35 - २० * पंचाङ्गरत्नावली भाद्रमहामेघः दिन २४ आश्विने रोग पीड़ा अनं महधं धान्यं मणं प्रतिद्रामा ६० लभ्यते सर्वधान्य समर्पता कार्तिके मुभिक्षं अन्नसमता मार्गशीर्षादि मास ३ अन्नसमर्थ राजा लोकौ सुखं सर्वधातु समर्घता वनमहर्षता॥ ३०-दुर्मुख ३० शनिस्वामी-अत्र अशुभ अल्पमेघः महतो लोकानां पीड़ा सरोगाकुलाः उत्तरापथे दुःकालः पश्चिमायां महापीड़ा पूर्वदेशे सुभिक्ष अन्न महर्घ क्षत्रियेषु नकुल सभ्यां विषगृह्यते चैत्रादि मास ३ महर्घता आषाढ़े अल्पमेधः श्रावणे प्रचंडवायुः सर्वधान्य महर्घता भाद्रपदकणानांमणं प्रतिद्रामा ८५ लभ्यते खंडवृष्टिः आश्विने रोगपीड़ा सर्वधातुवा) समर्घाः कार्तिकादि मास ४ रौरवं दुर्भिक्षं जीवादयो' अकराः प्रवर्तते मातापुत्रं विक्रयः पितापुत्र स्नेहमुक्तः फाल्गुणे रोगपीड़ा राज्ञा परस्पर विरोध लोक पीड़ा ।। 1 - ३१-हेमलव ३१ राड्ड स्वामी अति रौरवं सरोगा लोका भूकं- पादयः उत्पातः वणिक पीड़ा चैत्रे वैशाषे पीड़ा धान्यादि मंजिष्ठा मंदभावः परंचक्रागम ज्येष्ठादिमास ३ धान्यं महर्षता चतुर्गुणो लाभः भाद्रपदेमहामेघः अन्नसमता मंजिष्ठा मरीच लवंग महघता कार्तिके छत्र भंगः लोक पीड़ा अन्न कलशिका प्रतिफदिया १०२ सर्व धातु समर्पता चतुष्पदानां पीड़ा मार्ग शीर्षादि मास ४ राज्ञां सुस्थतालोक सुखिनः॥ ३२-विलंब ३२ रविस्वामी चैत्र वैशाषयो धान्यं समता आषाढ़े श्रावणे धान्यं कलशिका प्रति टका ५ फदिया २५ लभ्यतेआषाढ़े मेघ अल्पाश्रावणेमहामेघःसुभिवं भाद्रपदेदिन२१ T" HEATERE पंचाङ्गरत्नावली वर्षा बहुला परंगोधूमाश्च महर्घता पश्चिमायां सुभिक्षं राजविग्रहः पूर्वेदेशे अन्न महर्घ अन्नं दुःप्राप्यं दक्षिणदेशे संज्ञामन्योन्य विरोधः आश्विने अन्न महर्घता रोगपीड़ा सर्व कृयाणक बस्तु महर्घ कार्तिकादिमास ५ धान्य कलशिका प्रति फदिया १० लभ्यते॥ .३३-विकारी ३३ चन्द्रस्वामी-सर्व अन्न महर्घ सर्व,वस्तु मह घता दिजः सुखिनः चैत्रादिमास ३ धान्य .महर्घता आषाढ़े श्रावणे महान्मेघः सुभिक्षं भाद्रपदे स्वल्प मेघः आश्विने सर्प भयं केतूदयः अन्न कलशिका प्रति फदिया १० लभ्यते सर्व वस्तु महर्घता कार्तिकादिमास २ धान्यं समर्ष पौषे रोगपीड़ा लोकः सुखी फाल्गुणे धान्य महर्घता ॥ ३४--सर्वरी३४भौमस्वामी प्रजाप्रलय अल्पवर्षा राज्ञां विरोधः चैत्रादिमास ३ अन्न समता आषाढदये महामेघः परं खंडवृष्टिः अन्न समर्पता भाद्रपदे वर्षा नास्ति राजपीड़ा लोकेषु आश्विने रोगपीड़ा अन्न, कलशिका प्रति फदिया १० बाण कैलभ्यते पश्चिमायां दुर्भिक्षं पूर्वस्यां सुभिक्षं कार्तिकादिमास २ अन्न महर्ष पौष्यादिमास ३ धान्यसमघ ।। ३५-प्लव ३५बुधस्वामी-बर्षाकाले वर्षाबहुला उत्तमः समयः चैत्रेधान्य मंदता वैशाषे भूमि भयंकरी ज्येष्ठे अन्न समर्घता तेलंगे पूर्व देशे पीड़ा आषाढ़े महावायुः उत्पात लोका सरोगाः श्रावणे महान्मेघो दिन २७ वर्षा भाद्रपदेश्वनो घनागम-धान्यं समर्घ कणकलशिका ११ फदिया नाणकैरष्टभिर्लभ्यते आश्वि- ने सर्व बस्तु सर्वधातु समर्घता गोधूमानां महर्षता कार्तिके 1 * पंचाङ्गरत्नावली® अन्न समर्घ लोक सुखी मंडपांचालो विग्रहः पोषादि मास । अति सुभिक्ष राजराज्यं आनन्दम् ।। ३६-शुभकृत् ३६ गुरुस्वामी-अति वर्षा राजापजा सुखेन वर्त ते उत्तरापथे वहि भयं चैत्र बैशाषे समर्घता धातु समर्घता श्रावणो ९ तिथितो वर्षा अन्न समर्पता भाद्रपदे महान्मेषः वह्निभयं अन्न- कलशिका एकाफदिया - नाणकै रष्टभिः घृत तैलं समर्घ कार्तिकादि मास ३ युगंधरी गोधूम चणक तिल मुद्ग तंदुला इत्यादि अन्न समर्घ राज्ञां परस्पर विरोधः ज्येष्ठादि मासेषु सर्व वस्तु समर्घ फाल्गुणे किंचिदुत्पातः मरु देशे रोगः परं सुभिक्षं ॥३६॥ ३७-शोभन ३७ शुक्र स्वामी राज्ञां प्रजानांच सुखम् अति वर्षा चैत्रादिमास धान्यं समर्थ राजा विग्रहः किंचिदुत्पात आषाढ़े अल्पमेघः श्रावणे अति बर्षा परलोक पीड़ा भाद्रपदे महान्मेघः आश्विने सुभिक्षं ततो अवि किंचिद्विग्रहः । १३८-क्रोधी ३८ शनिस्वामी-दादशमासान अन्न महर्ष मध्य मः समयः राज्ञां परस्पर विरोध प्रजायां परलोको निर्धन व्यापा- रीनां चैत्र बैशापे कळपातः रोगभारी भयं ज्येष्ठे धान्यं मह आषाढ़े समता अल्पो मेघः श्रावणे रोखं भाद्रपदे खंड वृष्टि अन्नं महर्ष अश्विने मेघ वर्षा सर्वत्र रसकस बस्तु समता अन्न बस्तु सर्व समध कार्तिके समता ।। ३६-विश्वावसु ३६ राहुस्वामी-वर्षा समता अन्न महर्घता चैत्रे राज्ञां विरोधाधान्यं महर्ष वैशापे मंडपदुर्गे विग्रहः अन्न स्य ४५ फदिया नाणकै रेकाकलशिका अन्यत्रदेशे सुभिक्षं . 8.पंचागरत्नावली मश्विने रोगपीड़ा रोगवाहुल्यं गो.महिषी बोटक अजा महर्घतो सुवर्णादि धातु महर्षता कार्तिकादि भास ३समर्घता कण कलशिं का एक फदिया । ४० पराभव ४० केतु स्वामी द्वादशमास वर्षां मध्यम वृष्टि चैत्रे बैशाषे अन्न महर्घ मेघ गर्जते ज्येष्ठे धान्य संग्रह उदंड वायु- आषाढ़े अल्पमेघः अन्ने दिगुणलाभः भावणे महतीवर्षा अन्न समता भाद्रपदे खंड वृष्टिः परंदुर्भिक्ष आश्विने किंचिल्लोक मुखःपर धान्य रसवस्तु महर्घता धातु समर्घताकार्तिकादि मास! समता पश्चिमायां अन्न समता सिंधुदेशाधान्यागमाइति मध्यम विंशति फलम् ॥ ४१-प्लवंग ४१ ब्रह्मा स्वामी-चैत्रे बैशाषे महर्घता ज्येष्ठ मध्ये राजा पीड़ा आपाढ़े अल्पमेघःभूमिकपः हस्तिपीडातुरंगम महर्घता श्रावणे महामेघः भाद्रपदे ८ सीतो महामेघः आश्विने रोगः रस महर्घता फाल्गुणे कण कलशिका एक फदिया १० प्रमाणो अश्व महिषी तथा लोक पीडा ।। ४२-कीलक ४२ विष्णुस्वामी-वर्षामध्यमः चैत्रेधान्य मह विशाषेरोगः मरुदेशे दुर्भिक्षं पश्चिमायां समर्घता ज्येष्ठे धान्य संग्रह आषाढ़े श्रावणे अल्पमेघः अन्यसमर्घ धान्येदिगुणोलामः भादपदे अष्टम्यांमेघः आश्विनेवर्षा अन्नमहर्घ राजधानी नगरे उदसता रोगाबहुला गोधमा महंघः सर्वधान्य व रसः समर्घाघृते एक मणं प्रति फदिया ५०० कार्तिकादि मास ३ समर्घता माघे अन्न महर्घ रोगपीड़ा महती फाल्गुणे राजा राज्य सुस्थः प्रजा सौख्यं भन्नसमताः।
40 . 8 पंचाङ्गरत्नावली ४३-सौम्य ४३ रुद्रस्वामी - अल्पमेघः गावःअल्पक्षीगः वृक्षे अल्पफलम् चैत्रे महर्घवा वैशाषे उइंडबायुः ज्येष्ठेविप्रहः प्रजा पीड़ा आषाढ़ेअल्पमेघः अन्नं महषं श्रावणे महामेघः धान्यं दिगुणो लाभः गोधूमानां कलशिकाएकाप्रतिफदिया ५० प्रमाणं लभ्यते सर्वधान्यसमता रसमहर्घता भाद्रे खंडवृष्टिः अन्नं दुर्भिक्ष आश्विने राजाविरोधः लोकपीड़ा मार्गे विषमता अन्ने संग्रहः धान्ये द्विगुणोलाभः सर्वरसधातुं समर्पता कार्तिकादि मास १ तेषुसमता परंराज्य विदरं बालक रोगः देशाउदस्ता देशांतरीय लोकपीड़ा फाल्गुणे उदंडनायें पश्चिमायां मुभिवसिंधु देशे राजबिरोधः अन्नं समर्घता ।। ४४-साधारण ४४ रविस्वामी-चैत्रेधान्य मंदता वैशाषे ज्येष्ठे उत्पातः भूमिकपः रोग बृद्धिः राजाविरोधः धान्यमहर्घता आषाढ़े वायुदंड रोखं कचिदलपमेघः श्रावणेमहती वर्षा अन्न समताभाद्रपदे अलामेघः आश्विने अल्पधान्य निष्पत्तिः कार्ति कादि मास २ मध्यमारिष्टं भूमिकंपः अकस्माद्राज विग्रहः अन्न महर्घता सर्वरस संग्रह परं राजासुखी । ४५-विरोधकृत४५चन्दूस्वामी-पंडपाल दुर्गविग्रहः कोकण देशे मेहपाट मंडले मध्यदेशेमहा रौरवं परस्परं राजविग्रहः मार्ग विषमः चैत्रादि मास ३ अन्नसमता आषाढ़ेअल्पमेघः प्रारणे महा वर्षा अन्न समर्पता भादपदे मेघः अनसमता सर्व धातु महर्घता फाल्गुणे देशविरोधामार्ग वेपम्यं मंजिष्ठा सोपारिका पट्टसूत्रं दंतमहादस्तु तुरंगमादिमहर्घता ।। ४६-परिधावी १६ भौमस्वामी-दुर्भिवं नागपुरे मेह पाटे WEBOXBEEMES * पंचागरत्नावली, जालंधरदेशराज्ञांविरोधाचैत्रादि ४ मास अन्नसमता तत्रसंगूहः कार्या:लोके रोगभयंचतुष्पद महिषी तुरंगहस्तीनां पीड़ा श्रावणे भाद्रपदेअल्पमेघाखंडवृष्टिःअन्नमहर्घनासर्वरसमहर्घतासर्वेधातवः समर्घाः कार्तिकादि मास ५ धान्यसमता राजा विड्वर सिंधुदेशा- द्धान्यागमः ॥ ४७-प्रमाथने १७ बुधस्वामी-कोकणदेशे दुर्भिक्षं विग्रहः चैत्रे धान्य समता बैशाषज्येष्ठयो(न्यसंग्रहः आषाढ़े नवीनमुद्रा पर अल्पमेघः श्रावणस्याः मेघ वर्षा अन्नमहर्षे धान्ये त्रिगुणो लाभः भादूपदे महामेधः अन्नप्तमध आश्विनादि मास : सुभिक्षं सरस महर्घता लोकः सुखी गुरुणां पूजा महिष बृद्धिः राजापाः॥ १८-आनंद गुरुस्वामी-वर्षा बहुला. सुभिक्षं चैत्रवेशाप अन्नसमर्घ ज्येष्ठाषाढ़योर्मध्यमवृष्टिःपर नवीनमुद्राजायतेश्रावणे महामेघः भादूपदे खंडवृष्टिः गोधूमा महर्घता आश्विने समर्घा रस अन्नबस्तु समताधातु महर्षता कार्तिके अकस्मानयं लोक पीड़ा मार्गशीर्षे लोकानां दक्षिणदिशि गमनं पौष्य माघे मेष वर्षा अन्न समर्घ फाल्गुणे धान्य महर्घ ॥ VE-क्षस १९ भृगुस्वामी-धान्यसंग्रहः कार्यः चैत्रे करका पतंति शाषे ज्येष्ठ तैल महर्घ ज्येष्ठे आषाढ़े गुड़ शर्करा द्रव्यं महर्घ श्रावणेद्धय अल्पमेघः अन्न महर्घता आश्विने समता कार्तिके रोगार्तिः मार्गशीर्षादि मास ४ धान्य समर्पता राजा सुखी प्रजाराजा मान्या फाल्गुणे समर्घता बृक्षा' नवपल्लवा मार्गे सुखे सुभिक्षं ॥ F 8 पंचाङ्गरत्नावली * '५९-जल ५० शनिस्वामी-अल्पमेघपरं समर्घ चैत्रेरोग पीड़ा बारिर्द बहुला वायु प्रवला वैशाषे अरिष्टअन्नसंग्रहः कार्यःज्येष्ठे राज्ञांपरस्पर विरोधः लोकमागै वैषम्यं कचित् आषाढ़े संग्रह कार्यों कार्तिकेविक्रयः मार्गशीर्षादिमाम ३ अन्दसमताफाल्गुणे बालानां रोगः तस्करेभयं उत्तरादेशे दुःकालः पूर्वस्याम दुर्भिक्षम् ।। ५१-पिंगल ५१ राहुस्वामी-उच्चमुलतान नागपुर मरु दिल्ली मंडलेषु मथुरायां पूर्व देशेष दुर्भिक्षा सर्वधातु अन्नं वा समर्षे परं सर्वत्रविग्रहः नगरे बास गामानां उद्धसतं ५०० रोग पीड़ा राजा सुस्थं प्रजासुखं अन्न संमतो गुर्जरदेशे समर्घता सिंधु देशे धन्यागमः चैत्रे धान्य महर्षता प्रजापाड़ा वैशाषादि मास ३ अन्न समर्घता प्रजाक्षयः अश्वपीड़ा आषाढ़े श्रावणे अल्प मेघः धान्ये चतुर्गणो लाभः भाद्रे खंडवृष्टिः आश्विने समता कार्तिक मास ५ विग्रहः पीड़ा अन्न महर्षता चनुपद रोगः॥ . ५२-कालयुक्त ५२ कालवत्सरे ५२ केतुस्वामी अल्पमेघः देशे उदसनं अल्प व्यापारः राजविग्रहः चैत्रे शास्त्र अति अरिष्टं उत्तरापथदेशभंगः ज्येष्ठ धान्य संग्रहः धान्येषट्गुणो लाभः आषाढ़े अल्पमेघः लोके सुखं मागें विषमता श्रावणे महान्मेषः अन्न समता भाद्रपदे खंडबृष्टि धान्यं दुर्भिक्ष उत्पातः आश्विने रोग शीतलादि विकारः धान्य फदिया ७५ नाणकैः कलाशिका एका लभ्यते सर्वरस महर्घता सर्वधात समर्घता कार्तिके माप्त पंचके यावत परंराज विद्धरं अश्व चतुष्पदपीड़ा। ५३-सिद्धार्थ ५३ रविस्वामी-सुभिक्ष सर्व देशे वसति बहुला भन्न विक्रयः चैत्रे वैशापे लोक पीड़ा ज्येष्ठापादयो उदंडवायुः ॐ पंचाङ्गरत्नावली २७ है श्रावणेदिन । महावर्षा सर्वान्न महर्घना भाद्रपदे खंडवृष्टिः आश्विने अन्न समता कार्तिके धान्य निष्पत्ति; बहुला अन्न समर्घता सर्वधातु समता मार्गादिमास ४ अनंतर सर्वत्र ग्राहकता उत्पातः कचिद्राज विरोधः लोक विग्रहः अश्व मूल्य महर्षता ॥ ५४रौद्र ५४ चन्द्रस्वामी-पृथिव्यां विरोध बाहुल्यं चतुष्पद नाशः क्षत्रभंगः स्वदेशे ग्रामभंगाः अल्पमेधः चैत्रादि मास ३ अन्न महर्घ आषाढ़ श्रावणे अल्पमेघः खंडवृष्टिः भाद्रपदे महान्मेषः अन्न समर्घना अन्यदस्तु मंजिष्ठा सौंपारिका लवंग महर्घता लोक सुखी चतुष्पद समर्पता हस्तीनां पीड़ा ।। ५५-दुर्मति ५५ भौमस्वामी-त्रे शापेच धान्य समय ज्येष्ठे अन्न समतां आषाढ़े उदंडवायुः श्रावणे अल्पमेघ कण कलशिका फदिया ३५ प्रमाणेनलभ्यते सर्वधातवः समर्पता लभ्य ते आश्विन सर्वरस समर्घता धान्य समता कार्तिकादि मासं २ यावत् सर्ववस्तु समता राजास्वस्थः ग्रामे ग्रामे नवीन बसति संचलोक सुखी अश्व महर्षता चतुष्पद ३२ महर्घता पौषादि मास ३ यावत् सर्वधातु समर्घता ।। ५६-दुंदुभी ५६ घुधत्वामी-वी बहुला अन्न समर्थता रस कस वस्तु समर्घता चैत्रादि मास ३ अन्न समर्थना आपाढे दिगुणो लाभः अल्पमेघः श्रावणे दिन ११ महावृष्टिः भादपदे मेघ दिन १ वर्षति अन्नं समर्ध देशा नवीना वसति आश्विने अन्न समर्घ रोगाः बहुला-मंजिष्ठा मरीचानां समता सरस सर्वधातु समर्थः कार्तिके धान्यं ममर्धे अन्न दुर्भितं पश्चिमायां शुभम् मागशीर्षे समधना राज्ञांपरस्पर विरोधः लोका देशांतरयांति MIXSAXSEE GE . ॐ पंचाङ्गरत्नावली पोषादि मास ३ समता अश्व वा मंजिष्ठा-महर्घा ॥ " । ५७ रुधिरोदारी ५७ गुरुस्वामी राज्ञां. परस्पर विरोधः लोके देशान्तरयांनि दुर्भिक्षं-द्विज पीडा जीवादि दुःख म्लेच्छ राज्य परदेशात धान्या मायात्-आषाढ़े शुक्लपक्षे महामेघः श्रावणे दिन १५ महावर्षा चैत्रादि मास ३ समर्पता धातवः समर्घः उत्तरापथे उच्चमुलतानं तिल तैलंगे गौड़े मोठ एषुदेशेषु दुर्भिक्षं पश्चिमायां: सुभिक्षं सिंधुदेशे धान्य निष्पत्तिः भाद्रपदे खंड- वृष्टिः धान्ये त्रिगुणो लाभः आश्विने समताः रोगः बालक: कार्तिकादि मास अन्न समध मेदपाटे लोक पीड़ा.॥ ५ताक्षर शुक्र स्वामी-अन्न समधु मेदपाटे वृक्षे महा. मेघः आषाढ़े महती जल वृष्टिः सुराष्टायां ग्रामे प्रवाहकः अन्नं सम, श्रावणे अल्पमेधः किंचिदिग्रह भादपदे अल्पवी, रोग पीडा आश्विने अन्न समर्घ कार्तिकांदि मास धान्य महध विवाहादिक नास्ति अश्व:पीडा पश्चिमायां शुभम् ।। ९-क्रोधन ५६ शनिस्वामी सेना बहुला मंदबृष्टि, प्रजा. पीडा उत्तरापथे दुःकालः लोका निर्धनाः चैत्रे वैशाषे अल्पमेघः अन्न'समर्थता ज्येष्ठे मंद रोग पीड़ा अन्नसमता आंपाद श्रावणे अल्पवर्षा धान्य त्रिगुणो लाभः भाद्रपदे मेघः अन्नसमधु आश्विने रोग पीड़ां कार्तिके विप्रहः धान्य सममार्गशीर्षे धान्य समता अकस्मादुत्पातः पौपेप्समर्थता बणिक पीडा धान्ये दिगुणो लाभा. अन्यबस्तु समय। ६०-क्षयः ६० राहुस्वामी चैत्रे काकापातः बैशापे उत्पातः भूमिकपः ज्येष्ठापादयो रोगवालका नवीन मुद्रा उदयः अल्पमेघः XEEEXSEXERE .. * पंचाङ्गरत्नावली अन्नसमर्घता भाद्रपदे खंडवृष्टिः चतुष्पदहानिः फदिया ५० नाणके धान्य कलशिका एका आश्विने रोगः परं अन्न समर्थ सर्वधातु समता मध्यमः समयः राजविरोधः पश्चिमायां सुभिक्षं अन्नसमर्थ सिंधु देशातस्थलदेशादा अन्नागमः पूर्वस्यां विडुरं अन्न समता६० इतिकश्यप संहितायां संवत्सर फलम समाप्तम् ।। अथ सम्बत्सर फलान्याह कश्यपः॥ १ इनयश्चाग्निकोपेश्च व्याधयःप्रचुरोभुवि ॥ प्रभयान्दे मन्दवृष्टिश्च तथापिसुखिनोजनाः ॥ १॥ दंडनातिपराभूया बहुस स्यार्घवृष्टयः ॥ विभवाब्देखिलालोकः सुखिनम्युर्विवैरिणाः ॥ २॥ शुक्लान्देनिखिलालोकाः ' सुखिनःसुजनैःसह ॥ राजानोबुद्धं निरताः 'परस्परंजवैषिणः ॥ ३॥ प्रमोदादेप्रमोदंते राजानोनि खिलाजनाः ॥ वीतरोगावीतभया इतिवैरिविवर्जिता ॥४॥ नचलत्यंखिलालोकाः स्वस्वमार्गातकथंचन ।। अन्देप्रजायतानून बहुसस्थार्घवृष्टयः ॥ ५ ॥ अन्नाद्यभुजतेशश्चज्जनैरतिथि भिसहः । अंगिराब्देखिलालोका भूयोश्चकलहोत्सुकाः ॥ ६ ॥ श्रीमुखाब्देखिलाधात्री ‘बहुसस्यार्घसंयुता ॥ अध्वरेनिरताविप्रा वीतरोगविवैरिणः ॥ ७ ॥ "भावान्देप्रचुरारोगा मध्यसस्या वृष्टयः ॥ राजानोयुद्धंनिरतास्तथापि सुखिनोजनाः ॥ ८ ॥ प्रभूतपयसोगावः सुखिनः सर्वजंतवः ॥ सर्वकामक्रियासक्ते युवान्देयुवतीजनः ॥ ९॥ धात्रिवर्षेखिलाक्ष्मेशाः सदायुद्ध परायणः ॥ संपूर्णाधरणीभीत बहुसस्यार्घवृष्टया ॥ १०।। धानाधात्रीवसर्वदा ॥ पोपयमतुलं 'चान्नं फलंमासेत्रित्रीहिभिः ॥ ११ ॥ अनीतिवटलावृष्टि दे म -- - 8 पंचाङ्गरत्नावली, बहुधान्याख्यवत्सरे ॥ विविधैर्धान्यनिचयैः संग ॥ १२ ॥ नमुंचंतिवयोवाहः कुत्रचित्कुत्रविज्जलं ॥ मध्यमा वृष्टिरर्घश्च नूनमन्दप्रमाथिनी ॥ १३ ॥ विक्रमान्देधराधाशा विक्रमाक्रांतभूतयः ॥ सर्वनासर्वदामेघ मुंचंतिप्रचुरंजलं. ॥ १४ ॥ वृपादेनिखिलामै शायुध्यंतिवृषभोजव ॥ विद्यः प्रशक्ताविप्रेद्राजयते . सततंसुरान् ॥ १५ ॥ चित्रावृष्टि सस्याचे विचित्रनिखिलाधरा ॥ निराकुलाखिलालोकाश्चित्रभानो श्ववत्सरो ॥ १६ ॥ सुभानुवत्सरेभूपो भूमियानांचविग्रहः ॥ भातिभूर्भूरिसस्योदय भयंकारभुजंगमाः ॥ १७ ॥ कथंचि- निखिलालोका स्तरंतिप्रतिपत्रता ॥ नृपाहवक्षताद्रोगानेषज्यै सारणब्दे ॥ १८॥ पार्थिवादेतुराजानः सुखिनःसुप्रजाभृशं ।। बहुभिफलपुष्पाद्यैर्विविधैश्चपयोधरैः ॥ ॥ व्ययान्दे निखिलालोका बहुव्यपराभृशं । वीरमत्तेभतुरंगैस्थैर्भूपतिसर्वदा ।। ॥ २०॥ सर्वजिदत्सरेसर्वे जनास्त्रिदशसन्निभः ॥ राजानोविलपं योति भीमसंग्रामभूमिपु !! २१॥ सर्वधार्याब्दकेमपाः प्रजापालन तत्परा ,प्रशांतवैरासर्वत्र बहुसस्यार्घवृष्टयः ॥ २२ ॥ विरोधी वत्सरेभूपाःपरस्परविरोधिनः ॥ भरिभूवियुता भूमिभूरिवारिसमा कुला२३ प्रकृतिविकृतियातिविकृतिः प्रकृतितथा ॥ तथापिसुखिनो लोकाः शविकृतिवत्सरं ॥ २४ ।। खराब्दे निखिलालोकाः अन्यो न्यसमरोत्सुकाः ॥ मध्यमावृष्टिरत्युग्ररोगै पालयंययुः ॥ २५ ॥ नंदनाब्देसदापृथ्वीबहुसस्यार्घ वृष्टयः ॥ आनंदोप्यखिलानातं जंतूनांसमहीभुजाम् ॥ २६ ॥ विजयादेतुराजानःजयसंघोष तत्पराः ॥ सुनदंतिप्रजासर्वेवहुसस्यार्घ वृष्टयः ॥ २७ ॥ जय * पंचाङ्गरत्नावली मंगलघोषाद्यैर्वाणाभीतिसर्वदा ॥ । जयाद्धरणीनाथः संग्राम जयकांक्षिणः ॥ २८ ॥ मन्मथान्दे प्रजाःसर्वे तस्कारात्पति लोलुपाः॥शालीञ्जयवगोधूमैनयनाभिनवाधराः ।। २९ ॥ दुर्मुखान्दे मध्यवृष्टि रितिचौराकुलाधराः ॥ महावैरामहीनाथः वीरवारिण वाजिभिः ॥ ३० ॥ आकुलहेमलंबेतु मध्यसस्याघदृष्टयः । भाति भूर्भपतिक्षोभव हुविद्युल्लतादिभिः।। ३१ ॥ विलंबीवत्सरेभूपाः परस्पर विरोधिनः ॥ प्रजापीड़ाअनयत्वं तथापिसुखिनोजनाः ।। ३२ ।। विकार्यदेखिलालोकाः सरोगाबृष्टिपीड़िता ॥ पूर्वमस्यफलस्वल्पं बहुरंचापरफलम् ।। ३३ ॥ शर्वरीवत्सरेपूर्णा धरासस्याबृष्टिभिः ।। जनाश्च सुखिनःसर्वे राजानस्युषिवैरिणः ॥ ३४ ॥ लवाब्देनि खिलाधात्री वृष्टिभिप्लवसन्निभाः ॥ रोगकालान्वीतिभीतिः संपूर्णैवत्सरेफलम् ॥ ३५ ॥ शुभकृद्वत्सरेपृथ्वी संपूर्णविविधो सवैः ।। आतंकचौराभयदा राजानःसमरोत्सुकाः ॥ ३६ ॥ शोभकृद्रत्सरेधात्री प्रजानांरोगमोकदा ॥ तथापिसुखिनः लोकाः बहुसस्यार्घवृष्टयः ॥ ३७ ॥ क्रोधान्देनिखिलालोकार क्रोधलोभपरायणाः। इतिदोषेसासततं मध्यसस्याघवृष्टयः ॥ ३८ ॥ अब्दोवश्वावसासश्वद् घोररोगाधरानराः ॥ सस्यार्घवृष्टयोमध्या भूपालानातिभूतयः॥३६॥पराभवाब्देराज्ञस्यात्समरं सहशत्रूभिः।। आमयःक्षुद्रसस्यानि प्रभूतान्यल्पवृष्टयः॥ ४० ॥ प्लवंगाब्देमध्यवृष्टि रोगाचौराकुलाधराः॥ अन्योनसमरेभूपो.शत्रुभिर्हतभूमयः ॥४१॥ कीलकाब्देसीतिभीतिः प्रजाक्षोभनृपाहवौ ॥ तथापिवर्धतेलोकाः समधान्यार्घवृष्टिभिः ॥ ४२ ॥ सौम्याग्देनिखिलालोकाःबहुसस्याई दृष्टिभिः ॥ विवैरिणोधरावीशा विप्राश्चाधरतत्पराः॥ १३ ॥ .
३२ * पंचाङ्गरत्नावली साधारणाब्दे वृष्टयर्थे भयंसाधारणमतम् ॥ मध्यसयंद्धराधीशाः प्रजास्युःस्वस्थचेतसाः ॥ ४४ ॥ विरोधकद्वत्सरेतु परस्पर विरोधिनःमाप्त जनानृपाश्चैव मध्य सस्यार्घवृष्टयः ॥ ४५ ॥ भूपा होमहारोगो मध्यसस्यघि बृष्टयः ॥ दुःखिनोजंतवःसर्वे वत्सरे परिधावनी ।। १६॥प्रमाधीवत्सरे तत्र मध्य सस्यर्घ वृष्टयः॥ प्रजा कथंचिज्जीवति समात्सवीक्षितश्विराः ॥ ४७॥आनंदान्दखिला लोका सर्वदानन्दचेतसः ॥ राजानःपुखिनःसर्वे वत्सरेमेदनी शिवे ॥ ४८ ॥ राक्षसाब्देखिलालोका राक्षसाइवनिकृयाः॥ इन्द्रोपिन जलंदद्यात् सुभिक्षं नैव जायते ॥ ४१ ॥ नलान्दे मध्य सस्यार्घ बृष्टिभिःचराधराः ॥ नृपंसाभिसजाता भूरितस्कर भीतयः ॥ ५० ॥ पिंगलाब्देत्वीतिभातिमध्य सस्यार्घवृष्टयः ।। राजानोविक्रमकांता भुज्यतेशत्रुमेदनी ॥ ५१ ॥ वत्सरेकाल युक्ताख्ये सुखिनःसर्वजंतवः ॥ संतीततोपिसस्यानि प्रचुराणि तथागदाः ॥५२ ॥ सिद्धार्थीवत्सरेभूपा शांतवैरस तथाप्रजाः॥ सकलावसुधाभाति बहुसस्या वृष्टिभिः ॥ ५३ ॥ रौदाव्दनृप संभूत संक्षोभ क्लेशभागिनः || सततत्वखिलालोका मध्यसस्पार्घ बृष्टयः ॥ ५४ ॥ दुर्मत्यान्देखिलाभूपा लोकदुर्मतयःसदा ॥ तथापिसुखिनःसर्वे सग्रामाः संतिवेदपि ॥ ५५ ।। सर्वसस्य युताधात्री पालिताधरणीधरैः ॥ पूर्वदेशादिनासस्यात्तत्रदुर्दुभि वत्सरे ।। ५६ । अहिवेवनिताःसर्वे भूपारोगैस्तथाजनाः ॥ यथा कथंचिज्जीवति रुधिरोद्गारिवत्सरे ।। ५७ ॥ रक्ताधीवत्सेर सस्य वृद्धिवृष्टिरनुतमा प्रेक्षतेसर्वदान्योन्यं राजानोरक्तलोचनः ५८॥ क्रोधनान्दे मध्यवृष्टिः पूर्वदेशे विशेषतः ॥ संपूर्ण निरताःसर्वे । + * पंचाङ्गरत्नावली, भूपाः क्रोधपरायणाः ॥५९ ॥ कार्पासंगंधतलेच मधुसस्य विना शनं ।। क्षीयमाणाश्चापिनग जीवतिक्षयवत्सर ।। ६० ।। इति ।। संवत्सरमध्येराजादिज्ञानम् ॥ .. , संवत्के आदिमें (चैत्रशुक्ल १ को ) जो बार हो वह संवत् का.राजा, होताहै मेषकी संक्रांतिको जो बार होय सो -मंत्री होता है वृषकी संक्रांति को जो चार होय सो कोषाधिप होता है मिथुन की संक्रांति अथवा आदेऽर्कः जिस बारको- होय सो मेघाधिप होताहै इत्यादि चक्रसे जानना चाहिये ॥ वर्षे राजादीनां संक्षेपात्फलम् ॥ गुरु वा शुक्र वा चंद्रमा राजादि होवें तो मनुष्यों को सुखदेनेवालेहैं बर्षा अच्छी सुभिक्ष होवै तथा देश स्वास्थ्य भी कर और जो शनिश्चर मंगल राजादि होय तो दुर्भिक्ष विग्रह कर ।। बुध राजादि होय तो सुख थोड़ाकर और मूर्य राजादि होय तो दुःख होय तथा विशेष फल आगे लिम्वेगें अब पहिले राजादि ज्ञान के लिये चक्र लिखने हैं।। । . अगर बैत्राधिक मास हो तो प्रथम चैत्र शुक्रको जो पार हो राजा होता है और दूसरे चैत्र शुक्ल को नवरात्रारमादि होताहै इसका निर्णय शायरी नवरात्र प्रमाणसे है। २ ॐ पंचाङ्गरत्नावली ESSAGERTRYSEXBETEXSAEmkha वर्षेराजादीनां विशेषफलंतत्रादौराजाफलम् ॥ सूर्येनृपेस्वल्पफैलाश्चमेघः स्वल्पंपयोगोषजनेषुपीड़ा ।। स्वल्पंसुधान्यंफलस्वल्प वृक्षाश्चौराग्निवाधानिधनं नृपानाम् ॥ चन्द्रेनृपेमंगलशोभनानि प्रभूतिवृष्टिःप्रचुरचधान्यम् ।। सौख्यंजनानांमुदयोनृपाणां प्रशाम्यतिव्याधिजरानराणाम।।२।। 'भौमेनृपेवन्हिभयंजनक्षयं चौराकुलंपार्थिवविग्रहंच'।। दुःखपजाव्याधिवियोगपीडा स्वल्पंपयोमुचतिवॉरिवाहा ।। ३ ।। बुधस्यराज्येसजलमहीतलं गृहेगृहेतुर्यविवाहमंडलम् ।। प्रकुर्वतेदानदयाजनीपिस्वस्थं सुभिक्षंधनधान्यसमाकुलम् ॥४॥ गुरौनृपेवर्षतिकामदंजलं महीतलेकोमदुधाश्चधेनवः ।। यजन्तिविप्रावहवाग्निहोत्रिणो महोत्सवंसर्वजनेषुवर्तते ॥ ५ ॥ शुक्रस्यराज्येवहुसस्यसंकुला स्वतीत्रवेगासरितोवुराशिभिः ।। फलंतिवृक्षावहुगोप्रसूतिर्वसुंधरा पार्थिवसौख्यसंयुता॥६॥ शनैश्चरेभूमिपतौसकृज्जलं प्रभूतरोगैपरिपीडयतेजनाः॥ युद्धंनृपाणांगदतस्तुराधै भूमंतिलोकाक्षुधिताश्चदेशान् ।। ७ ।। इतिराजाफलम् ॥ अथमंत्रीफलम्॥ नृपभयंगदतोपिहतस्कराप्रचुरधान्यधनादिमहीतले ॥ रसचयहिसमर्घतमंदतारविरमात्यवदहिसमागतः ॥१॥ शशिनिमंत्रिगतबहुसस्ययत्यपिधरास्मतेसुखमण्डिता ॥ विपतिवारिधरावहुवर्षिणोजनपदाःसुखराशिसुशोभिता। ॥ २ ॥ अवनियोननुमंत्रिपदंगतोभवतिदस्युगदादिजवेदना ॥
® पंचाङ्गरत्नावली ३५ जनपदेषुजयसुखसंचयनषहुगोषुपयोदिजकर्मचः॥ ३ ॥ शशिसुतेशुभमंत्रिसमागतेस्वपतिनारिमतेमंदनक्रियां।। बहुधनंबहुवारिसमन्वितंयवमसूरिचणानमहर्घता ॥४॥ विविधधान्ययुताखलुमेदिनीप्रचुरतोयघनामुदितोभवेत् ॥ नृपतयोजनपालनतत्परानुरगुरौननुमंत्रिसमागते ॥ ५ ॥ भृगुसुतेननुमंत्रियदंगतेशलभमूषकरांवषमाहिपेः ।। भवतिधान्यसमघतयाममंजनपदेषुजलंसरितोधिकम् ।।६।। रविसुनेय दिमंत्रिणिपार्थिवाविनय संरहितावहुदुःखदाः ।। नजलताजलताजनतापदाजनपदेषुसुसंधनदंवचित् ॥ ७॥ इतिमंत्रीफलम् ॥ अथसस्येशफलम् ॥ .. सस्याधिनाथेतरणौहिपूर्व धान्यसमघवहयोपिचौराः ॥ युद्धनृपाणांजलदाजलाढ्याः स्वल्पंचसस्यंबहुभूरुहाश्च ॥ १ ॥ सस्याधिपेशीतकरेप्रजासुखें मेघा यथोमुचतिगोयगोधुक् । देवद्विजाराधनतत्परानृपा धराभवेधान्यधनौषपूर्णा ॥ २ ॥ प्रथमेधान्यपतौधरणीपती गजतुरंगखरोष्ट्रगवामपि । प्रभव दावहुरोगधनोजलनसमसौख्यकरंतुषधान्यहत् ॥ ३ ॥ "जल धराजलराशिमुचोभृशं सुखसमृद्धियुतंनिरुपद्रवम् ॥ दिजगण स्तुति पाउकरासदा प्रथमसस्यपतौसतिबोधने ॥४॥ सस्य पतोसुरराजपुरोहितेसकलसौख्यकराश्रुतिपूर्वकाः - जलधरा जलदावहुसंस्यदारसपयांसिवहूनिवसूनिवै ॥ ५५ ॥ शुक्रोपदा धान्यपति-धरायांमेघाजलंवर्षतिशोभनमियम् ॥ गोधूमशालेक्षु -- 2 - ® पंचाङ्गरत्नावली, घनप्रियंगुवृक्षेपुपुष्पानिसुखप्रदानि ॥ ६ ॥ रविसुतेयदिधान्य पतौजनौनृपतिभिः परिपीडितविग्रहः ।। गदभयंतुषधान्यहरंसदा हदुरितवादविवादयुतानराः ॥७॥ इतिसस्येश फलम् ॥ अथधान्येशफलम् ॥ पश्चाद्धान्याधिपेसूर्ये ' पश्चाद्धान्यंतदानहि ॥ विगूई भूभृताधान्यं महज्वरपीडनम् ॥ १ ॥ चन्द्रेधान्याधिपेजात प्रजाद्धिप्रजायते ॥ गोधूमासर्पपाश्चैव गोषुक्षीरंतथावहुः ॥ २॥ भूमिजेग्रीष्मधान्येशे ग्रीष्णधान्यमहर्षकम् ॥ शालीवुघृततैलादि महर्धाणिभवतिच ॥ ३ ॥ बुधेधान्याधिपेमेघाः जलमुचित वैभृशं ॥ सैद्यवैलाटदेशेच माधवोल्पंचवर्षति ॥ ४ ॥ गुरौ धान्यपतीयाति यवगोधूमशालयः । पच्यतेसर्वदेशेषु यज्वान ब्रह्मवादिनः ॥ ५॥ भृगौपश्चिमधान्येशे पश्चाद्धान्यनपश्यते सस्यासमर्घतोयांति स्वल्वंक्षीरंगवामपि ॥ ६ ॥ दुर्भिक्षजायतेतत्र कलहंदेशविग्रहम्।।सौराष्ट्रदेशनष्टश्चयत्रधान्याधिपोशनिः । इति अथमेघेशफलम। जलदयेयदिवासरपेतदासरसिवैरमतेजनतारसय बचनेक्षुतिका रसुशालिभिः सुखवयंसुलभभुविवर्त्तते ॥ १॥ शशिनियौयदये यदिगोमहिष्यजवरादिषुदुग्धरसंतदा ॥ फलवत्तीधनधान्यव तीधरोविविधभोगवतीननुभाविनी ॥ २ ॥ अवनिजेजलदस्य पतौभुविश्रुतिविचारविहीनधराभवाः ॥ कृचिदपिप्रचुरंजल मल्पकं कृत्रिदवप्रबुरंबहुतापदम् ॥ ३॥ अमृतरश्मिसुतेयदि वारिवहुजलंनुषधान्यरसादिकम् ॥ द्विजवरायजनोत्सुकचेतसा .. 1
ॐ पंचाङ्गरत्नावली
विविधसौख्ययुनाधरणीतदा ॥ ४ ॥ गुरुरविप्रियदृष्टिकर सदा
खिलविलाशवतीधरणीतदा ॥ श्रुतिविचारपरानरपालका रस
समृद्धियुताखिलमानवाः ॥ ५॥ भृगुसुतेजलदस्यपतिर्थदा जल
युताजलदादिविशोभनाः ।। धननिधानयुतादिजपालकानृपतयो
जनदासुखदायकाः॥ ६॥ रविसुतेजलदस्यपतो भवेदिरतवृष्टिवती
वसुधातदा ॥ मनसितापकरोनृपतिःसदा विविधरोगरताजन
तापदा॥७॥ इतिमेघेशफलम् ॥
अथरसेशफलम्॥
रसपतौतरणौधरणीतदाविरसभोगरताल्पपयोधराः॥ वसनतैल
घृतप्रियमानवासुखरसंचभुनक्तिमहीपतिः ॥ १॥ यदिविधौरसपे
भुविमानवोनवनवायुवतीवुभुजेप्रियाम्।जलधरावहुवारिविघायका
रसवतीधनधान्यवतीमही ॥ २ ॥ यदिधरातनयोरंसपोभवेत
नरसराशियुताजनताशुभा ॥ नरपतिर्विषमोजनतापदो नजलदो
वहुवृष्टिकरोभुवि ॥ ३ ॥ रसपतौद्विजराजसुतेमहीसुलभधान्य
घृतादियुताजनाः ॥ प्रमुदितावरनायकपालितावहुजलाखिलदेश
सुरक्षिताः॥५॥ यदिगुरौरसपेजनसौख्यदाकमलवंतिसरांसितृणा
निच ॥ जनपदादिजपूजनतत्परागजसवाजिस्थोष्ट्रयुतानृपाः ।।
यजनयांजनकोत्सवकोत्सुकाजनपदाजलनोषितमानसाः।। सुख
सुभिक्षसमोदवतीधराधरणिपाहतपापगणाप्रिया ॥ ६ ॥ रविसुते
रसपेरससंक्षयोनजलदागददाश्वपयोधराः ॥ अजगवांगजवाजि
खरोष्ट्रहाजनपदेषुनरानरसयुता ॥ ७॥ इतिरसेशफलम् ।।
अथनीरसेशफलम् ॥
निरसाधिपतौसूर्येत्रयुचंदनयोरवि ॥ रत्नमाणिक्यमुक्ता
। पंचागरत्नावली FEEREYEARSEXERCTEX दिर्घवृद्धिप्रजायते ॥ १ ॥ शुक्लवर्णादिवस्तूनिमुक्तारजनवास साम् ॥ अर्घवृद्धिप्रजायनशशांकनिरसाधिपे ॥२॥ नीरसे शोयदामोमःमवालंरक्तवाससं ॥ रक्तचदंनताम्राणांमर्घवृद्धिर्दिने दिने ॥ ३ ॥ चित्रवस्त्रादिकत्रैवशंखचंदनपूर्वकं ॥'अद्धिः प्रजायेतनीरसेशोवुधोयदि ॥४॥ हरिदापीतवस्तूनांपीतवस्रादिकं चयत् ॥ नीरसशायदाजीवेसर्वेषांप्रीतिरुत्तमा ॥ ५ ॥ कर्पूरागरुगंधानां हेमौक्तिकवासप्ताम् ॥ अर्घवृद्धिःप्रजायत नीरसेशोभूगर्यदि ॥ ६ ॥ त्रयुःपिंडादिलोहानांकृष्णवस्त्रादि- वस्तुनां ।। अर्घ बृद्धिः प्रजायेत मंदेनीरसनायके । इतिः॥ {! • अथधनेशफलम् ॥ । द्रविणपे यदिवः सरपेतदावणिजमो बहुदव्य समागमाः ॥ गजतुरंगमपखरोष्ट्रतोधनयंलभतेकयविक्रयात् ॥ १॥ धन पंतिम॑गलांछनकोयदारसचयालयविक्रयतोधनं ।। वसनशालि युगंधनजंव द्रविणतैलधृतनृपसौख्यकम् ॥ २ ॥ असतिमौल्य करोघरणीसुतःशरदितांवकरस्तुषधान्यहृत् ॥ महमिभासिभवे द्विगुणंतदानपतिर्जनशोकविधायकः ॥ ३ ॥ द्रविणयोहिमर श्मिसुतोयदाविविधसंग्रहवस्तुफलायदा || द्विजवराजपयोगसु सयुंता:कृषिविशेषविशेपिनमानसाः ॥ ४ ॥ सुमनसांचगुरुर्द विगाधिपो वणिज बृत्ति परासुखभाजनाः ॥ फलितपुष्पितभूमि रुहाः सदाविविधद्रव्ययुताभुविमानवाः ॥ ॥ द्रविणपोभृगुजोद्र विणैर्युतासमधनाः सकलातनुमानवाः ॥ सममुखाक्रयविक्रय जीवनोनृपतियोजनपालनतत्पराः॥६॥ वाणिपेयेरविजेविरलंधनं गदरतधरणीवतयःसदा ॥ अधनवांवाणिजाकृषिजीविनाद्विजवरा ॐ पचाङ्गरत्नावला ३१ । परिपीडितमानवाः ॥७॥ इतिद्रव्येश (धनेश) फलम् अथ फलेश फलम् ॥ मवतीफलपुष्पवतीधरा प्रमुदिताफलभोगविरोधतः।।,बहुजलं: जलदोभुवि मुंचतिकचिदपिप्रमितं फलयोरविः ॥ १॥ यदिविधुप फलयोबुमराशयः फलयुतावातिभिः कुसुमैर्युता॥ द्विजमुखावरभोग समविन्ता नृपतयोनयनाटनतत्पराः ॥२।। फलपतीयादिभूतनयो भवेल्प वहुपुष्पफलान्वितमेदिने । गतभयानृतदेशजनास्तदा नृप (तयोवहुविगृहकारकः ॥ ३ ॥ यदिवुधेफलयेफलमुत्तमं जलधराजल राशिमुचस्तदा । वहुतृणंकुसुगंकमलैर्युतंजनपदा जनसौख्यमुदा विता॥ ४ ॥सुरगुरु फलनायकांगतोगतमय बनीशमहाद्रुमः यजनयाजनकोत्सवमंदिराः श्रुतिविचारपराद्विजपूर्वकाः ॥ ५॥ यदिफलस्यपतौभृगुजेधराः मृदुकुमारमहीरुहराशयः ॥ वहुपथा नरनाथसुभोगदा द्विजवराश्रुतिपाठपरायणाः ॥ ६ ॥ यदिशनिः फलमकलहाभवेन्जनित पुष्पगणस्यद्रुमःसदा हिमभयं नरतस्कर जंतदाजनपदा जनराशिसमाकुला. ॥ ७ ॥ इतिफलेशफलम् - ।। अथदुर्गेश (सैन्याधिप) फलम् ॥ नयविशेषकरस्तरणिस्तदागतभयानरराजपुरोगमाः । समाधि केनतदानृपजोन्यजखपथिसंधजतानभयंकाचित् ।। १।। गढपतिः मृगलांछनकोयदानृपमुराज्यविलाशितपौरजा || बहुधनेक्षुज ॥ २ ॥ अवनिजोगढ़ ॥ जनपदेषुजना क्रयविक्रयेभयविशेषतयानफलंक्वचित् ॥ विषयसाम्यसुखशगि ® पंचाङ्गरत्नावली जैप्रभाभवतिराशिततेषुविशेषतां ।। शशिसुतेयदिकोटकपालके पथिषुद्रव्ययुतानभयंकचित् ।। ४ ।। सुरगुरीगढ़पेनयशोभितानर में वरानरपाःकरपालिताः ॥ गिरिघुवैनगरेपुसमंसुखसुखमतीदिज शास्त्रवतांनिश ॥ ५॥ नरवरेषुविशेषपतिर्यदाभृगुमतोवहुसौख्य करोमतः ॥ विनयवाणिजवाहसमासुखोगतवननिकटेपिवदूरतः ॥६॥ रविसुतेगढ़पालिनिविग्रहसकलदेशगताश्चलिताजनाः ।। विविध वैरिविशेषितनागरा कृषिधनंशलभभुषितंशुचिः ॥ ७ ॥ इतिकोटपालफलम् ।। इतिराजादीनांफलम् ।। : गुरुउदयवशेनवर्षफलम् ॥ नक्षत्रेणसहोदयमस्तंवायेनियातिसुखमंत्रीतत्संझंवर्षस्यात् ।। कार्तिक्यादिसंयोगे कृतिकादिद्वयंदयं ।। अंतीपांत्यौपंचमच विधामासत्रयस्मृतम् ॥ अथफलम् ।। सस्यानिधृतकापास तैला दिसुखसंचयः ।। चैत्रवर्षेभवेवृद्धि पसौख्यफलप्रदा ॥ १॥ अर्थ विविधभावेन जायतेदविणप्रदनिकजानिर्भयपालोकावैशाषेजन पूजिताः ॥ २ ॥ तस्कर पापरोगा पीडयतेपीडयाजनाः ॥ भ्रमंतेस्वेच्छयाभुम्या निद्रव्यज्येष्ठसंज्ञके ॥ ३ ॥ अर्धेमहघतायांति धनधान्यसमंभवेत् ॥ आपाढ़ेस्वल्पवृष्टिश्च तुषधान्यमहर्षता १४ मनोल्हादार्थकुति जनाःसौख्यसमायुताः ॥ श्रावणेबृष्टिरत्यु गागोमहिष्यादिकंसुखं ॥ ५ ॥ अर्धेमहर्घतांयांति धनधान्यसम भवेत् ।। माधवावर्षतिस्वच्छं संपदोभाद्रवपके ।। ६॥ सुभिक्षपूर्व सस्यस्याज्ज्वरोगाकुलंजगत् । अश्विनेशोभनावृष्टिर्नुपसौख्यकरी सदा ।। ७ ।। पापवुद्धिरतोलोका' भवंतिकार्तिकसदा ॥ देवतानवमन्यन्तराज्यंचतस्करहतम् ॥८॥ कासादिमहर्घस्याद ॐ पंचाङ्गरत्नावली. STAINERIES गोधूमाषातिलादिकं ॥ मेघोवर्षतिदवोवामार्गशीर्षविशेषतः । ९। ज्वरारोगक्षुधार्ताश्च नानाजनपदाःसदा ।। महर्घतियोमासापी ज्येस्वस्थ्यंततःपरं ॥ १० ॥ सुभिक्षपूर्वयाम्यायां मध्यमपश्चिमे तथा ॥ उत्तरेरौरखमाघे वर्षधान्यसमर्थता ॥ ११ ॥ सुभिक्षप्रचुरा वृष्टिः उत्तरेयाम्यपश्चिमे ॥ पूर्वस्योरोखघोरं फाल्गुणवत्सरेशुभम् ।। इतिगुरुवर्षफलम् ॥ अंथगुरुचारशनिचारफलम् ॥ अथानःसंप्रवक्ष्यामिगुरुचारमनुत्तमम् अनेनगुरुचारेणप्रभवाद्यन्द संभवः ॥ १ ॥ मेषराशायदाजीवचैत्रसंवत्सरस्तदा ॥ प्रवुद्ध नामाजलदवर्षाचसर्वतोमुखी ॥ २ ॥ मुभिक्षविग्रहोराज्ञांसमवस्त्र कर्पटम् ॥ हेमरूपंतथातामूकासिंचप्रवालकम् ॥ ३ ॥ मंजिष्ठा नारिकेलंचपट्टसत्रसमर्घता । कांस्यलोहंतथैवेक्षुपूगादीनांचसंग्रहा ॥ ४ ॥ अश्वपीडामहारोगोदिजानांकष्टसंभवः ।। मासत्रये फल मिदपश्चाद्भाद्रपदेपुनः ॥ ५ ॥ गोधूमशालीमाषानां आज्य स्याग्रेमहर्घता ॥ दक्षिणामुत्तरस्याँखंडवृष्टिपूजायते ॥ ६ ॥ दक्षिणोत्तस्योदेशे छत्रभंगोपिकुत्रचित् ॥ दुर्भिश्चमपिषण्मासा आश्विनेफाल्गुणेतथा ॥ ७ ॥ पश्चात्सुभिक्षंदौमासौनाम्ना मेघोजलेंद्रकः॥ कार्तिकमार्गशीपंच कार्पासान्नमहर्घता ॥८॥ मेदपाटेराजपीड़ा देशभंगोल्पवर्षणम् ।। लोका-सरोगादुर्भिक्षपोष्ये रसमहर्घता । वाणिज्येसंशयोलाभ वैशाषेदुर्जरारसाः ॥ छत्रभंग स्तथाषाढ़े श्रावणेचभयंयुधि ॥ १० ॥ नवीनोजायतेराजा क्वचि मेघोपिकार्तिके ॥धान्यानिसंग्रहेलाभात्रिगुणोमासपंत्रमे।। ११ ॥ अन्दमध्येयदाजीवःक्रमाद्राशीत्रयंस्पृशेत् ॥ तदासुभटकोटीभिः पंचाङ्गरत्नावली प्रेतपूर्णावसुंधरा ।। १२ ॥ उदक्वीथीचरन्जीवः सुभिक्षक्षेमकारका मध्यमेमध्यमंचार्थमेवमन्येपिखेवराः॥ १३ ॥ एपराजकिलमेषविशेषः, शेषमत्रगुरुगम्यमशेष ।। द्वेषमत्रगुरुवारविचारः संग्रहेभजनुजानु उनकश्चित् ।। १४ ।। इतिमेपेगुरुफलम् ।। वृषराशायदाजीवो बैशा- पोवत्सरस्तदा ॥ नंदशालिभवेन्मेघ सर्ववान्यसमर्थता ॥ १५ ॥ बैशापेअश्विनेमासेम्रीणां रागोश्चदंतिनो ।। अस्वानांचमहापीड़ा गृहेवेरंपरस्परं ।।, १६ ॥ उत्तरस्यामनावृष्टिः दुर्भिक्षमंडलेक्वचित् ।। पूर्वस्यांचमहासौख्यं राजवृद्धिविपर्जयः ॥ १७ ॥ घृतं तैलंचमंजिष्ठा मौक्तिकंचप्रवालकम् ॥ लवणंरक्तवत्रंचनारिके लसमर्घना ॥ १८ ॥ गोधूमाशालिचणका मुद्राभापास्तथातिलाः ।। महर्षी श्रावणेज्येष्ठे मेघानांचमहाजलम् ॥ १९ ॥ शृंगालकेमालवेच उत्पातोराजविग्रहः । देशभंगाद्भयमन्यं घृतधान्यममर्थता ॥२. मेदपाटेग्रीष्मऋतौ समर्घधान्यमीरितं ॥ गरौधान्यंघृतंतैल महर्घ धातवोन्यथा ॥ २१॥ अश्वरोगश्चतुष्पाद नाशतीडागाकचित ।। आपाढ़ेश्रावणेवनिवर्षाभाद्रपादके ॥ २२ ॥ सिंधुदेशेनागपुरेश्री विक्रमपुरस्थले ॥ धान्यंगहर्धेसमधुमेदपाटिनदाभवेत् ॥ २३ ॥ मासदयंसंग्रहास्याद्धान्यानांचनतोशुभम् ।। दुर्भिक्षमासदशकेमार्ग रोध प्रजाक्षयः ॥ २४ ॥ मुनिपभैपभतो गुरौफलंसकतमेवमादि ष्ठम् ॥ जिनवृषभष्टया नवलादवलासर्वत्रसरसास्यात्।। ५५ ।।इति।। मिथुनेसंगतेजीवेज्येष्ठाख्यौवत्सरेभवेत् ॥ वालानांदोपमश्वानांखंड वृष्टितदाभवेत् ॥२६॥ कर्कोटकस्तदामेघो गंडूयदोमतांतरे। तस्करैः पीड्यतेलोकापापोपहतमानमः२७पश्चिमायांसिंधुदेशे वायव्येची उत्तरादिशि ॥, चित्राविचित्राजायते रोगा:पीडोत्तरापथे ॥ २८ ॥ - ® पंचाङ्गरत्नावली श्वेतवस्रतथाकाश्य करिंचन्दनार्दिक । मंजिष्ठोनारिकेलंच पुंगी स्वर्णवरूप्यकम् ।। २९।। मासानापंचयावत् समचिंत्रतोभवेत्।। पश्वात्महर्षापूर्वोक्तं धान्यानांचसमर्थता ॥ ३० ॥ पूर्वाग्निया म्यनेत्या मीशानेवसुभिक्षता ॥ श्रावणेतुमहत्कष्टं महिपानांच हस्तिनां ।। ३१ ॥ राजायुद्धप्रजावद्धिः सुभिक्षमंगलंभुवि ।। समर्धेतलखंडानि शर्करांधातवोपिच ।। ३२ ॥ शृंगालदेशेचोत्पाता: कयाणकेयुमंदताः ॥ महावर्षाधृतधान्यसमधूचगुरुस्तथा ॥३३॥ शुंठीमरीचपिप्पल्योमंजिष्ठाजातिकोशकाः ॥ महमेतद्वस्तूस्यात् फाल्गुणेधान्यसंग्रहः ॥ ३४ ॥ कासिलवणंगुडतिलगोधूमयुगं घरीचणकमुद्गान् ॥ ग्राह्यविक्रयक्रितस्त्रिगुगोलाभात्रिमासांते ।। ३५॥ गुरुपिमिथुननिलीनसारस्यंमनस्यतः करोतिजनेव्याभि चारचारचर्वावलाकाचित्देशभंगभयम् ॥ ३६ ॥ इतिमिथुन ।। कर्कोगुरुस्तथापादेवत्सरेतत्रजायते.॥ पूर्वदक्षिणयोमधोमध्यमकवः लोभियः ॥ ३७ ॥ महघसर्वधान्यानांकार्तिकेफाल्गुणेतथा । पश्मिायांसिंधुदेशेवायव्येवोत्तरादिशि-॥३८॥ क्षय चतुष्यदानां स्यात्दुर्भिक्षमृगसैव्यकम् ॥ हेमरूप्यतथातामंपट्टसूत्रप्रवालकम् ।। ३६ । मौक्तिकद्रव्यमन्नादिलोकोक्यालोकविक्रयः । मंजिष्ठा श्वेतवस्त्राणांमहसुभटक्षयः॥ ४० ॥ गोधूमशालितलाज्यलयः गादिगुंडयुतः ।। मापामहर्घजायतेपापकर्मरतोजनः ॥ ११ ॥ कार्तिकेद्रितधान्यंघृततैलमहर्घता पट्टसूत्रंचवस्त्रानिजातीफल लवंगकम् ।। ४२ ।। मरीचंशीतकालेषुसंग्राह्याणिवणिकजनैः।। वैशाषेज्येष्ठयोलीभोद्विगुणस्तस्यविक्रयात् ॥ ४३ ॥ वर्षाकाले महावर्षासर्वधान्यमहर्घता ॥ सुभिक्षेतिलकार्पासवर्णक्यानांगुढ़ १४ , ॐ पंचाङ्गरत्नावली स्यच ।। ४५ ॥ गोधूममापतुवरीयुगंधरीमुद्गकोदवादिनां । आषाढ़े संग्रहतोलाभः पुनरुद्रवोदिगुणः ॥ ४५ ॥ इतिकर्कराशिफलम् ॥ सिंहेजीवश्रावणाख्यो वत्सरेवासुकिर्घनः ॥ बहुधीरघृता गावो जलपूर्णाचमेदिनी ॥ १६ ॥ देवब्राह्मणपूजास्थानराणां, मान्यतासतां ।। रोगाविवाहश्चान्योन्यंचतुष्पदमहर्षता ॥ १७ ॥ म्लेच्छदेशेमहायुद्धं छत्रभंगश्चविड्वरं ॥ उद्रसक्रियतेलोका पश्चिमोत्तरवायुषु ।। ४८ ॥ गोधूमातिलमाषाज्य शालीनांच महर्घता ॥ सुवर्णरूप्यताम्रादिप्रवालानांसमर्घता ॥ ४९ ॥ सुभिक्षसर्वदेशश्च मेघोप्यापादभाद्रयोः ॥ श्रावणेबृष्टिरल्पैःवसुका' लाकार्तिकस्मृतः ॥ ५० ॥ सोपरीिखोपराडोंडा मंजिष्ठा धुंठि' खारिका ॥ पट्टकूलंजातिफलंकपरंसुमहर्षकम्॥५॥उदकालेगुरुः खंडाहिंगुघ्नीश्चित्रशर्करा ॥ महर्षमेतद्वस्तूस्यात्धान्यस्याति समर्थता ॥ ५२ ॥ ज्येष्ठेपृष्कंदकैन्यं लभ्यतेमणमानताः ।। स्कंदकैपंचविंशताघृतंतैलंतुर्विशिपे ॥ ५३ ॥ स्कंदकैर्दशभिल भ्यां गोधूमामणसंमता ॥ धान्यंकासितैलादि रससंग्रहणं, शुभं ॥५४॥ फाल्गुणेरत्रतोज्येष्ठात् लाभौदिगुणतःपरं ।। गुरौ सूर्यगृह प्राप्सेसर्वत्रभ्रामिकोदयः ।। ५५ ॥ इतिसिंहराशिफलम् ॥ कन्याभोगगुरोर्जातेमेघनामनमस्तमःभादसंवत्सरस्तत्रसप्तमासान रौरवं ततोपरंसुभिक्षस्यात्कातिकान्याधवावधिः आद्यासंग्रहणा लामोद्रिगुणोभाद्रमासतः५७चतुष्पदानांपीडापिगोधमाशालिश करातिलमाषामहर्षाणिगुडादीक्षरस्तथा॥५८ शूदाणांमत्यजानांच कष्टसौराष्ट्रमंडलं ॥ खंडवृष्टिदक्षिणास्यान्मुत्पाताम्लेच्छमंडले ॥ मेदपाटेश्रृगालेचपरचक्रभयरणं ॥ सर्वदेशोवन्हिभयमेघोल्पश्त्र .
- * पंचाङ्गरत्नावली FREETTEE साल्पता ॥ ६॥ मरुदेशछत्रभंगाचेत्रेवामाधवेभवेत् ॥ गोधूमा घृततेलानिमहर्घाणिसमादिशेत् ।। ६१ ॥ वसकंवलवातूनारत्ना देश्चमहधर्ना | आषाढ़ेधान्यसंगृहयोभादलाभश्चतुर्गुणः।। ६२ ।। इतिकन्या॥ गुरौस्तुलायांमेघस्यात्तक्षकोवत्सरोश्चिनः॥ तदातिवृष्टिमंजिष्ठा नारिकेलमहर्घता ॥ ६३ ॥ अन्योन्यराजयुद्धानिसमभौज्यतेल- योः ॥ मार्गशीर्षतथापौषेद्रयोद्धीन्यस्यसंग्रहः ॥ ६४ ॥ लाभस्या पंचमेमासेमार्गादारभ्यचैत्रतः ॥ छंत्रभंगस्ततोराजविग्रहवापि मंडले ॥ ६ ॥ उत्पातोमरुदेशेस्यान्मार्गेभयंचचौरतः । कोटजे सलमेाद्यैःपरचक्रगमोमतः।। ६६ ।। स्कंदकैर्दशभिश्चैकमणवान्यं चउच्यते ॥ कार्तिकमार्गशीर्षेवामाघस्तेषादकेमहान् ॥ ६७ ॥ त्रयोदस्कन्धकैश्च पंडामणमवाप्यते॥ पंचासत्स्कंदकैमिश्रीशर्करा मणिविक्रयः ॥१८॥ रसायाणकादीनां संग्रहेणचतुर्गुणः लाभश्चतुर्थमासेस्यात् धातूनांचमहर्घना ॥३॥ इतितुलाराशि ।। वृश्चिकस्थेगुराँसोमे मेघःकार्तिकमासतः । संवत्सरापंडवृष्टि- धान्यमल्पभयंमहत् ॥ ७० ॥ गृहेपरस्परं वैरमष्टोमासानमंशयः ।। भाद्राश्विनेकार्तिकाख्यास्त्रयोमासामहर्घना ॥ ७१ ॥ तता सुभिक्षजायते मंदवृष्टिचमंडले ॥ पश्चिमायांनीववृष्टिदुर्भिसंवायु मंडले ॥ ७२ ॥ हेमरूप्यकांस्यताम्रतिलाज्यश्रीफलादिषु ॥ महर्घगुड़कासि लवणश्वेतवस्त्रकम् ।। ७३ ॥ महिषीवृषमाशा समर्घाधान्यमंडले ॥ तीडानाम्लेच्छ लोकानामहोपाताश्वसं भवेत् ।। ७४ ॥ शृगालदेशेकटकं रोगोश्वमहिषीषुव ।। राजा निवमहर्याणि हिंगुपारिकपोपरा ॥ ७५ ॥ देशभंगोस्वल्पवृष्टि ।
ॐ पंचाङ्गरत्नावली मता ॥ अष्टादशामिराज्यंच तैलंतैर्मनुसंमिते ।। १०८ ॥ श्रावणे वाभाद्रपदेधान्य संगृह्यतेतदा ।। पौषेस्यादिगुणोलाभः युगंधर्षाश्च विक्रणात् || १०१ ॥ इतिकुंभराशिफलम् ॥ * मीनेगुरोफाल्गुणिस्यादत्सर संभवोधनः ॥ खंडवृष्टिमहर्घाणि सर्वधान्यानिभूतल।११०॥वायुरोगश्चपीडाचदेशांतरजजेज्जनः।। मासानापंचम यावद्भयंराजविरोधनः ।। १११ ।। पश्चात्सुखसुभिक्षं चशालिगोधूमशर्करा ॥ तिलतेलगुडानांच महर्घत्वंसमारित ॥ ११२॥ मंजिष्ठानारिकेलानिश्वेतवस्त्रंचदंतकाः ॥ कर्पूरलवणा ज्यानां महर्घत्वंप्रजायते ॥ ११३ ॥ चतुष्पदानांमरणं वैशाषज्येष्ठ योर्भवेत्।। आषाढश्रावणेधान्यं घृतंतैलमहर्घता ।। ११४ ॥ श्रावण स्योत्तरेपक्षे महावर्षापजाते ॥ घृतंसमर्घभाद्रपदे शुभावाश्विन कार्तिकौ ॥ ११ ॥ समर्घास्तिलकार्पासाः छत्रभंगततोर्बुदे ।। मार्ग शीतथाषिउत्पातोमरुमंडले । ११६ ॥ ग्रीष्मेकाटकसंग्रामे चतुष्पदःमहर्षता ।। स्यान्नागपुरदुर्भिक्षं वर्षाकालेसुभिक्षता९१७॥ इतिकतिपयशास्त्रात् वीक्षणाद्गौरवेण गुरुचरितविचारः स्फारवोधाय वृद्धः ॥ इहमतिरतिशाषी नैवयुक्तापयुक्तादविकलफललाभो. वाक्यतोय यतः स्यात् ॥ इतिगुरुचारफलम् ॥ अथशनिचारफलम् ॥ मेषराशीयदाशौरी तदापश्चिमायां राजविग्रहः वस्तु महर्घता नृपतेर्भयं गुर्जरगौड़सौराष्ट्रदेशेषुधान्यमईघतादिगुणोव्यापारलाभः छत्रभंगः राशिभोगात्परतः उत्पात् बहुलामही तथा महीनदी पाश्वे पीड़ा राज्ञामुपद्रवः मेघावहवः सप्तधान्यानि युगंधर्या दीनिसंगृह्यते मास चतुष्टयानंतरे विक्रये द्विगुण लाभः गुर्जरे ॐ पंचाङ्गरत्नावली देशे अहिफेन गुड़ शर्करा खंडा गोधूम बाजर चवला विक्रये लाभः सुर्वणरूप्य लाभः प्रथमं शनैश्चर सप्त मास राशिभोगतः पश्चादुत्पातश्चालका भूकंप गर्जितः कचित्काल्गुणेउपद्रवः तदा वस्त्र महर्घता व्यापारेजयः मालपदेशे घृत शर्करा तेल खोपरां रायणः इत्येतानि महर्घाणि कटक चालकः अष्टौमासान इत्येत गौतम स्वामिभाषितम् राशिमंडलम् शनैश्चर प्रचारेण ज्ञातव्यं वर्षहेतवे ।। १॥ इतिमेषराशिफलम् ।। वृषेयदाशनि तदा विग्रहो दक्षिणादिशिपरचक्रभयं वैराडदेशे अश्वस्थता पश्चिमापतिर्दक्षिणस्यांयातिः देशउद्धश अनं महर्घ गोधूमचणक गापारे लाभः सुवर्णरूप्य पित्तलकांस्य व्यापारे लाभो मासषट्कंयावत् आषाढदि मास त्रये महान व्यवसायें. लाभः अशोरदेशे युद्धम्लेच्छ हिंदुराजस्यक्षयः भादपदे अहि फेनाल्लाभः अशोरदेशे युद्धं देवगढ़ देशेविग्रहः दुर्गभंगः शनि- श्चरस्यः राशिभोगे एकवर्षानंतरंच महर्घता तन्मधेअजमकः तस्य माघ मासेविक्रयेलाभः।। इतिवृषराशिः।। मिथुने शनि तदा पश्चिमायां दुर्भिक्षं राजकुल विग्रहः मालव देशविग्रहः राजभौगात् मासपंचक तत पश्चात् उज्जयिन्या उत्पातः दुर्गभंगः मासद्धयात्परं दुर्भिक्ष मास १ यावत्ततोवत्सरें शुभम् धान्यनिष्पत्तिः पूर्वदेशे उत्पातः गुड़समता लवंग केसर एलची पारदहिगुपानड़ी रेसमकथीर शुठिएतानिमहर्घानिक्षत्रिया णां मालवेदेशेषडेजयदुर्गेराधेः उच्चवस्तुविक्रयः।इतिमिथुनराशि । कर्कराशि शनिस्तदामेद पाटदेशे मालवा सीमांत उद्ध सता छत्रभंगो महीपतेः राजयुद्धं सवलं मालयदे मुगल पचाङ्गरत्नावलाक कटकं तापी नदीतीरे यावत् विग्रहः परं कुशलं दक्षिण दिशि लोकनाशः ग्रामभंगः श्रावणे धान्य महर्घ भाद्रपदे जलोपद्रवः मेघावहवः अश्विने वर्षा अहिफेन महर्घता मास दये पुनःसमर्थतः बासर वस्तु महर्घ घाटेक महिष महर्घता व्यापारेलाभः ॥ इतिकर्कराशिफलम् ॥ सिंहराशी,शनिस्तदा अन्न सर्वत्र निष्पद्यते जल बृष्टिहुलता, मालवा देशे व्यापारेलाभः राशिभोगांतरंमासगमनं यातिवला चलत्वं परं अन्न महर्षशोक वंधु तुल्याः संग्रामाः पतिनामां-गुड गोधूम चणक तंदुल शालि मसूरान्न घृतादि वस्तु. व्यापारे लाभः, पूर्व सुभिक्षं परं मारीभयं सर्व देशेषु पीड़ाः व्याकुलता अशुभं संवत्सर फुलं मरीच शुठिप्रमुख क्रयाणेलाभः ताम्र- पित्तल मह घेता घृततैलादि रस महर्षता कुंकुगदेशे तृणमहर्घता मालवा मध्ये उपद्रवः परं राज्यसुख कटक विग्रह पूर्वदेशे वस्त्रलाभः सर्व वस्तु महर्घ ।। इतिसिंहराशिफलम् ॥ . कन्यायांयदाशनिःतदादुर्भिक्षं चतुर्दिशासुपितापुत्र विक्रीणाति अन्ननाशः: जलव(नास्तिमरुदेशे शिवपूयादवणिदेशे राजपीडा छत्रभंग शैषासर्वदेशाःशुभाअर्बुददेशेसुभिक्षं शिरोहिमध्ये अन्न लाभः सर्वधान्यसंग्रहदिगुणलाभः मासनवकं यावत्धान्यरक्षणीयं पश्चादिक्रयः धातुवस्तुसमर्घ उत्तमवस्तुमहर्घ मालवदेशे परस्पर विरोधः राजभयांभूम्यांकचिदुत्पादि अशुभंगुड़समताधान्यमहर्ष अन्नभयंमहावृष्टि-त्रयंक्रयाणकानिसमर्धानि ।। इतिकन्याराशि फ. तुलाराशीयदशौरीसुभिक्षस्याच्चराचरं । प्रजानांसुखसौभाग्य धनधान्यंचसम्पदः ॥ ॥ बंगालदेशे विग्रहः तत्रैवप्रजापीडरोगा कापसाजरमापण का वहुलता कार्तिकेमहाजनत्रयेकष्टं बहुलवंगालेउत्पातः छत्रभंगः अर्द्धराशिभोगात्परंउत्पातः . दक्षिणदिशिंउपदवः गोधूमचशाक समामारंगीकांगुणीउडद ऐतमहर्घता ज्येष्ठमासादिक्रयेदिगुणो लाभः अन्येसदेशाः सुभिक्षसुस्थाः । इतितुलाराशि बृश्चिकेयदाशनिः तदाहस्तिनागपुरेतद्देशै वैराटदेशेविगृह, मालवमेदपाटवागड-गुजरातिसौर उत्तरार्धदेशे:एतेषुकटकचालक: अन्नातलाभः गोधूमकार्पासमसूरांन्नतिलकपडादिः व्यापारेलामा मासनवकपरंउपद्रवः राजराणांम्लेच्छानां परस्परंयुद्धं पातसाहिः गृहक्लेश मालवदेशेतिपीडाआयांतिसर्ववस्तुमूल्यवृद्धि अफीमलाभः ज्येष्ठमासा वृद्धिःअजमोमेथी प्रमुखविक्रय शेगचालकावर्षावहुलाः 3. इतिवृश्चिक राशि:::: धनेशनिःतदासर्वत्रमहर्घता लोकदुर्वलतातैलतिलेदाणागोधूमः चणकसमर्घा लौंगडोडाअसालिनु अनमोमेथी घृतएतानिवस्तूनि महर्घानि श्रावणादि मासचतुष्टये : मारीपीड़ाराजसुखं: उत्तरापथे कटकचालकः इतिधनराशिफलम मकरेशनिस्तदानन्दःसर्वसुभिक्ष राजनिर्भयः आरोग्यसमा धान तथाकपूरपारदजातीफललौंग खोपराहींगु जीरासोपारी आ- वीरहालीघृतलवणमहर्घता मूल्यवृद्धिःआपादादिमास सप्तकयावत् अहिफेनलाभादशिणास्यांअहिफेनमहर्षताचौरभयंदेशांतरेमहाज नपींग.धनहानिशाखाप्रमाणेन मालवदेशेरोगपीड़ा प्रथमवर्षमयं. करंपश्चात्शुभानदेवाभंगराशिभोगते ॥ इतिमकरराशिः॥ कुंभेशनिस्तदादक्षिणकुंकण महाविगृह राजक्षयःपजामयं धन प्रलेपाराशिभोगात् माससप्तकंयावत् सर्वधान्यगहर्षताआपादादि A Funu ran an ६ पचाङ्गरत्नावला For अथदृष्टिअवरोधकयोग ।।. वर्षा के दिनों में सूर्य के अंशों से मंगल आगे हो और सूर्य मंगल एक राशिको हो तो दृष्टि को रोकता है. यदिबुध और शुक्र एक राशि का होवै और दोनो के बीच के अंशों में सूर्य होवे तो कृयोग.वर्षा को रोकता है ।। २।। जब बृहस्पति औरमंगल, एकैराशिको होवे तो चौमासेमें वर्षा रोकताहै।३।सिंह कुम्भकाराहु केतु होवे और करग्रहों करिकै युक्त हो या क्रूरग्रह देखते हो तो वर्षा में बाधाहोती है.|| ४ || महर्घयोग ।। ज्येष्ठा नक्षत्र के सूर्य मंगल होवे तो मांसतंक गेहूँ महंगा रहै ।।.१. ॥ सूर्य और केतु. भरणी नक्षत्र के होंय तब- लवण . महँगाहोवै गाऽनुराधा का शनि और ज्येष्ठा का गुरु हो तो अन्न महँगाहोवै प्रजाजंगमचे धनका शनिश्चरमिथुनका मंगल इन दोनों ग्रहोंके साथ राहु वा केतु आ यापूर्वाषाढ़ का होवे तो अन्न और रस महँगा करै और ऐसा योग बर्षाकालमें हो तो वृष्टि का अवरोधकरै ।। ४।। धनिष्ठा का शनिश्चर मंगल होनेसे भी वर्षाका अवरोध होताहै ॥ ॥ शतभिप का गुरु. चित्राका मंगल माघ या फाल्गुणका महीना हो तो गेहूंकी फसलको लिगाड़ दे ॥ ६।। आद्रा नक्षत्रका शनिराहु होवै तो वर्षाका नाश और दुर्भिक्ष का संभव कर ।। ७ ।। बृषका राहु मंगल युक्त होनेसे अन्न खरीदनेवालेको ६ मासके अर्तपत दूंना लाभ होताहै ८ ॥ बृषराशिका सूर्य मंगल शनि हो तो.१ मास. वर्षाका अवरोध होताहैं ।।... उत्तराभाद्रपद का शनि विशापा का मंगल कर्क । NRNERBY ५५. m * पंचाङ्गरत्नावली का गुरु होवै तौ दुर्भिक्ष करै ॥ १०॥ उत्तराभाद्रपद और हस्तके राहु-तथा केतु होवे-तौ रस व कार्पास -महँगाहा तथा-एक-एक नक्षत्र पर एक एक होनेसे बहुत अशुभ फल जानना ॥ ११-|| मेष तथा वृश्चिकके शुक्र अन्न महँगा करते हैं ।।१२।। मकर तथा कुंभके सूर्य वसं महँगा करतेहैं ॥ १३ ॥ मकर तथा. कुंभका: राहु: तथा शनि और बुध होनेसे द्विपद तथा चतुष्पद प्राणियों को, महादुःख होताहै ॥ १४ ॥ मेष और वृश्चिक के मंगल तथा राहु केतु और सूर्य शुक्र होनेसे गुड़ व कपास महँगा होताहै१५॥ मेष और वृश्चिक का राहु तथा शनि होवै तौ ताम्र तेज होवे १६ समर्घयोगविचारः॥ महर्ष योग में यदि समर्घ योग आजावै तो महर्घ योग का नाश करता है। यदि चैकराशे शनिराहुं युक्तः अन्नं समः ।। श्लेषा नक्षत्र के मंगल बुध शुक्र होने से अन्न समर्घः राज्य प्रजा में आनंद हो ।। मूलका,शनि स्वाति का बुध अन्न संस्ता करताहै ।। आद्रा की बृहस्पति में रस कपास सता होता है ।। श्रवण-का बुध शुक्र पूर्वाषाढ़ का गुरुहो तो अन्न वं.रस कपासको सस्ताकरे :: मघा या धनिष्ठा का गुरु मृगशिरा का राहु भी अन्न मंदा करता है। सूर्य बुध शुक्र एक-राशि में हो तो सर्व धान्य सस्ता हो इसयोग में सूर्य से अधिक अंश पर बुध शुक्र हों तो-वर्षा श्रेष्ठ होती है कृत्तिका.और उत्तराभाद्रपद का गुरु, चांदी.चावल रस कपास सस्ता करता है.॥ विशाषा का और भरणी का शुक्र तथा गुरु होवे तथा पुनर्वसु का शुक्र होने से कपास और अन्न को सस्ता करें ।। श्रवण और धनिष्टा के शुक्र और गुरू होने से गेहूं. S : ॐ पंचागरत्नावली® को सस्ता करै। अधिक मास में यदि मंगल काराशि चार होवे। तो उत्तमवर्षा हो ॥शनिसे वें वें वें चंद्रमाहो और बृहस्पनि शुक्र की पूर्ण दृष्टि हो तो उत्तम वर्षा होवै । शुक्र से ७ 'चंद्रमा हो बृहस्पति की पूर्ण दृष्टि हो तो वर्षा का अभाव न होनेसे उत्तम वर्षाहोतीहै ।। तुलाका शुक्र मंगल हो तो अन्न. मंदाहो ॥ सूर्य आगे पीछे शुक्र बीचमें बुधहो तो अन्न सस्ता होवें ॥ इत्यादि। वर्षागर्मलक्षणम्॥ मार्गशीर्ष शुक्ल १ से जिस नक्षत्र में बद्दल वायु इत्यादि। गर्भ रहा सो १६५ दिनोंसे वर्षताहै परन्तु मेष संक्रांति में अश्वि- न्यादि नक्षत्र १० दश वर्षे तो उक्त दिन में थोड़ा वर्षताहै ।। पुरुषनपुंसकत्रीनक्षत्रसंज्ञा ॥ आदास स्वाति तक १० नक्षत्रस्त्री संज्ञा विशाषासे ज्येष्ठातक ३ नक्षत्र नपुंसक संज्ञा मूलसे मृगशिरा तक १४ नक्षत्र ।। पुरुष संज्ञा फलम् । वर्षा रोधक योगनहो और स्त्री नक्षत्रके दिन पुरुष नक्षत्रके मूर्य हों अर्थात् पुरुष स्त्री होनेसे पुरुषपुरुष होनेसे गर्मी पुरुष नपुंसक होनेसे गर्मीहो स्त्री नपुंसक योग' होनेसे. किंत्रित् वर्षा स्त्री स्त्री योग होनेसे बद्दल आवें ठंडारहै । और इस्काबाहन भी विचार लेना चाहिये ॥ यथा ॥ सूर्यके नक्षत्रसे दिन नक्षत्र तक गिनके १ का भागदेय शेष बचैतौ अश्व २ जंबुक ३ मंडुक मेष ५ घातक ६ भूपक तथामृग ७ महिष ८ खर९ नाग क्रमसे नक्षत्रके वाहन होते हैं ।
ॐ पंचाङ्गरत्नावली 'रोहिणी और समये बास ॥ मेषकी संक्रांति जिस नक्षत्र में लगे उस नक्षत्र से रोहिणी नत्र तक अभिजित्सहित गिने जहां रोहिणी आवै वहां रोहिणी बस प्रथम र नक्षत्र समुद्र तट १ सधि १ पर्वत् १ संधि १ तट इसी कमसे रोहिणीवास जान लेवे तथा रोहिणी चक्र से समझ फिलम्। समुदेतुमहावृष्टितटेवृष्टिसुशोभना पर्वतेविडुमात्रश्च संवृष्टिश्चसंधिषु.। समयकाबासजानना ।। रोहिणी का बास समुद्र में हो तो संवत्सर का वास माली घर होताहै, तट में धोबीघर बास संधिमें वैश्यघर बांस पर्वतमें रोहिणी कापास होनेसे समय का बास कुम्हारघर होता है । २८ समुद्र २ मालीरहे रजगृहे वैषगरे A औषयगृहे कुम्हारगृहे -वैश्वगरे हुम्हारगृहे वैश्वरे रजकगृहे • रजकपूर समुद्र मालीगृहे. रोहिणी तथा संवत्सर बास चक्रम् मालीगृहे . वैश्य 12 कुम्हारगरे रजकगृहे श वैश्यपहे Pen
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* पंचागरत्नावली,
ij समयवाहनबिचार ?
सूर्यादि संवत्सर का राजाहोदै उसीसे क्रमसे समय बाहन
जानना यथा- अश्व । मृग २ वृषभ, सियार ४. चातक
दर्दुर ६ महिष उक्तं वारोंके कपसे समय वाहन जानना आषाद
कृणपक्ष की कृष्णारोहिणी कहलाती है।
अथसमयमुहूर्ताः समयदिनानि in ins
मेपादि द्वादश संक्रांतियों के मुहूर्तः एकत्र करने से समय.
मुहूर्त होता है ।। चैत्र शुक्ल १ से चैत्र कृष्ण ३० तक वारानुसार
जितने दिन हों वह समय के दिन होते हैं ।। कार्तिक शुक्ल
४ सौभाग्य पंचमी कहलाती है शुक्लपक्ष की १० रवि-युक्त होने
तो रविं. दशमी होती है शुक्लपक्ष की तिथि जिसवार युक्त हो
उसी वार के नाम से वह तिथि बोली जाती है दोनों पक्षों की
४मंगलको हो तो मंगलाचौथ ८ बुध होवै तो बुधाष्टमीहोती है ।
वर्षऔरवर्षेशकुंडलीबनानेकी रीति ॥
गत वर्ष की चैत्र कृष्ण ३० की घटी को इष्टकाल मानकर
लग्न गृहादि रख देवै वह वर्ष कुंडली होती है और मेपार्क प्रवेश
समय की लग्न वश लग्न होती है ।
पञ्चाङ्गमेंचंद्रलिखनेकीरीति॥
सर्वः बनाके जिस चरण में राशिं प्राप्ति हो उस घटी परिमित
इष्ट करिके.चन्द्र लिखदेवे।।
- * पंचाङ्गरत्नावली करणलिखनेकीरीति ।। एक तिथि में दो करण.भोग करते हैं। शुक्लपक्ष की परिवा के उत्तरार्द्ध में ववकरण एक तिथि में दो, करण के क्रम से कृष्णपक्ष की चतुर्दश के पूर्वार्द्ध में विष्टि (भद्रा) करण -भोग करता है और कृष्ण १४ के उत्तरार्द्ध में शंकुनी करण व अमावस्या को चतुष्पद करण नागकरण और शुक्ल परिवाके पूर्वार्द्ध में किंस्तुघ्न फिर शुरले परिवाके उत्तरार्द्ध में क्वकरण भोग करता है बारम्बार सीकमसे जानना ॥ करणों के नाम ॥ वव १ बालव २ कौलव ३. तैतिल ४गर ५ वणिज्य ६विष्टि (भद्रा.)७॥ शकुनी चतुष्पद, २.नाग-३ किंस्तुम्न ॥ शुक्लपक्ष की परिवासे ववादि करण: कृष्णपक्ष की १४ के पूर्वार्द्ध को बृष्टि आठ- आवृत्ति में : भोग करते हैं । और कृष्ण १४ के उत्तरार्द्ध से शुक्ल के पूर्वार्द्ध तक शकुन्यादि ४ करण भोग करते हैं । इंग्रेजीसन तथा महानीआदि.॥ शाकेमें ७ जोड़नेसें तथा संवत् में ५६ हीत करनेसे इंग्रेजी सन् पौष्य मास अर्थात् धनके सूर्यके ९७ अंश के अर्न पर्त में प्रारंभहोताहै। नाम महीना और तादाद दिन यथा ॥ १ जनवरी १५ दिनका २ फरवरी २८ दिनका ३ मार्च ३१ दि. ४ अप्रैल ३० दि०५ मई ३१ दि०६ जून ३० दिनका ७ जुलाई ३१ दिनका अगस्त ३१ दि० सितंबर ३० दि०१० अक्तूबर ३१ दिनका ११ नवम्बर ३० दि०१२ दिसम्बर ३१ दिनका और सन् में का भागदेने में जिस सनमें शेष शून्य बचै उस सन् में फरवरी २६
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पंचागरलावली
दिन की होती है और जब पूरे सैकड़े का सर होवे तो सन्
•४०० का भागदेय जोशून्य शेष बचे तो फरवरी २६ दिन
नहीं तो २८ दिन की होतीहै।।२५ दिसम्बरको बड़ा दिन होताहै।।
मुसलमानी हिजरी सन्और महीना।
शाके में ५४३ तथा विक्रमीय संवत् में ६७८ हीन
शेष को २ जगह रखकर ६१ के भाग से दूसरी जगह के अंक
हीन किये शेप के ३२ के भागसे लब्धको दूसरी जगहके अंक में
युक्त करके-१९ भागसे जो लब्धि मावै सो हिजरी सन् शेष बचे
'सोगतमास जानना चाहिये । दूसरी रीति | सं०.१९५९ के
प्रारंभ में हिजरी सन १७२० मुहर्रम मास प्रारंभ हुये हैं यह
मानी महीना चंद्राधीन होता है इसकारण ३३ महीने के बादलौंद'
पड़ने से इस्में अंतर होजाताहै जैसे कि एक अधिक मास होने के
नाद प्रारंभ संवत् मे सफर का महीना होगा जितने आधिक
होते जायगे उतने मुसलमानी मास प्रारंभ संवत् में बढ़ते जायगे.
अधिक मौसजाननकी स्पष्ट रीति आगे लिखेंगे।
अगर सं-१६५९ से पहिले का जानना हो तो विपरीति ग्रहण
पीछेजबका जानना होय वहां तक जितने अधिक
मास हुए हैं वह सं०१९५६ के ? मुहर्रम मासमें पानेसे अभीष्ट
संवत्का मास होवेगा ।। और ३३ वर्ष में १२ अधिकमास होते हैं
इसकारण हिजरी सन् ३३वर्षमें,एक संख्याबढ़ जाता है।। इत्यादि
1. पंचाङ्गतारीख लिखनेकीरीति॥
इसका महीना चंद्रमेके अनुसार होनेसे कभी २९ दिनका कभी
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पंचाङ्गरत्नावला
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३० दिनका होताहै कृष्ण पक्ष ३० को २८ तारीख लिखकर
उलटे क्रमसे अर्थात् कृष्ण १ को २७ कृष्ण १३ को २६ इसक्रम
से १ तक रखजावै ।। स्पष्टान्यक्रम् ॥ चन्द्र दर्शनहोने के बाद प्रात
को मुसलमानी महीने की पहिली तारीख होतीहै यह सिद्धांत है
शुक्लपक्ष परिवाको चन्द्र दर्शन होना व न होना जानने के लिये
आगे लिखेंगें।
मुसलमानी त्यौहार ॥
रोजा रमजान की १ तारीख से शुरू होताहै और सम्बालकी
तारीख को ईद मनाकर पूराहोताहे जिव्हिज की तारीख
को बकरीद और तारीखको हज्ज होती है मुहर्रम की तारीख
को ताजिया भोर सावानकी १४ तारीखको शब्बेरात होती है।
महीनोंके नाम।
मुहर्रम २ सफर ३ खीउलान्बल ४ वीउलाखिर जमादी.
उलावल जमादीउलाखिर ७ रज्जब ८साबान ९ रमजान १०
सवाल ११ जिल्काद १२ जिल्हज ॥
पोरसीसन जाननेकी विधि ॥
शाके में ५५ अथवा विक्रमीय सम्वत् में १८८हीन करने
सं शेष बचै सो पारसी सन (इयजदेजर्दी) होते हैं इसका प्रारंभ
भादों से होता है ।।
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• पचाङ्गरत्नावली के
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महीनों के नाम॥
फरवर्दिन २ आदिहस्त ३ खोरदाद ४ तिर ५ अमरदाद
६- शारेखर, ७ मेहर-८ आवान ९ आदर १० देह है। वहमान ?
आरपदाद यह सब महीने ३. तीस दिन के होते हैं पीछे दिन
की गाथा होती है।
याहूदीसनबनानेकाक्रम ॥
शाके में ३४३८,अथवा विक्रमीय संवत् में ३७०३ युक्त करने
से याहूदीसच होताहै | कुवार सुदी १ के समीप प्रारंभ होता है ।।
१३५ जोड़देने से विक्रमीय संवत् होताहै;
शुक्लेप्रतिपदांचन्द्रदर्शनजाननेकाक्रम् ॥
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: अमावाश्या की घटीको ६० घटीमें घटनेसे जोशेष रहे उस्को
दिनमानमें, जोड़ दे जो अंक प्राप्ति हो उसको अलग रक्लै
फिर देखें कि सूर्य किस राशिके है और राहु, किस राशिका है
फिर चन्द्र दर्शन सारिणी में उसी राशिके सूर्य के सामने और
उसी राशिके राहुके नीचे राहु सूर्य: मिलकरजो कोठा प्राप्तिहो
उस्में जो अंकहो वह अक पूर्व अंक अलग संखे हुयेसे अधिक
हो तो प्रतिपदाको चन्द्रदर्शन नहीं होगा दितियों को होगा और
जो पूर्व अकसे सारिणी अंक कमहो तो शुक्ल प्रतिपदाको चंद्र
दर्शन अवश्य होगा।
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पंचागरत्नावली 'चंद्र दर्शन सारिणी 1 मेष पुष | मि० कर्क सिंह कन्या तुलाधन मकर कुंम मीन | रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा राइ मेष ४१ ५४ ५५/५२ (५६ ५५ ५8 ५३ ५२ ५५ ५३ ५२ सूर्य ४०/५१/५४/८/७/५७ ५५ - ४७ ५६ " P ६० Ill ६२५२ ६४७३ सिह २ ७२ सूर्य . - ९७ १०२.१ । तुला ७६ ८४ ૮૨ सूर्य वृश्चि है ६३ ६४ ७३ ७८८२ धनी ६२४ , " ४२ ४८ ५३/५९ सूर्य ॥ मकर १० ५८५८/५६ |५३/५०४१४६/४६ ५४ सूर्य ४९.५० ५११५२/५३ सूर्य 4 ५४ ५३/५११५४ ।
* पंचारत्नावली अथ पञ्चशलाकाचक्रम् ॥ E - & विवाह के नक्षत्र के सामने १ रेखा पर कोई ग्रह उस नक्षत्र का होवे तो वेध होता है विवाहे वर्जितः।। विवाहलग्नमुहूर्तादि ॥ विवाह-मेष-वृष-मिथुन-बृश्चिक-मकर कुंभ-इन के सूर्य में करना शुभ है और मिथुन के सूर्यमें आषाद सुदी १० तक करना श्रेष्ठहै शुक्र गुरु का उदयास्त होवे तो अस्त होने से ३दिन पहि- ले से लेकर उदय के ३ दिन पीछे तक विवाह तथा शुभकर्म में वर्जित है और सिंह की बृहस्पति में भी विवाह करना अशुभ हे नक्षत्र रोहिणी १ मृगशिरा २ मघा ३ उत्तराफागुल्णी ४ हस्त ५ स्वाति १ ऽनुराधा ७ मूल ८ उत्तराषाढ़ : उत्तराभाद्रपद १० रेवती ११ यह नक्षत्र विवाह में शुभ हैं कृष्णपक्ष की १३ से शुक्ल पक्ष की परिवा तक (क्षीणचंद्र) विवाह में नहीं लेना चाहिये और व्यतीपात व वैधृत योग और विष्टि (भद्रा) करण यह विवाह में नहीं होना चाहिये ।। गोधूली तथा रात्रि की लग्न लेना शुभ हे लग्न से छठे आठवें (त्रिक) कोई प्रहन होय पंचारत्नावली - चंद्रमा वर कन्या की राशिसे शुभ होना चाहिये चंद्र जीवादि शुभस्थानों में होना चाहिये ।। अथलत्तादोषज्ञानम् ॥१॥ सूर्य अपने नक्षत्र से -१२ नक्षत्र को शनिश्चर आठने को और बृहस्पति,छठे नक्षत्र को मंगल तीसरे नक्षत्र को लत्ता मारता हि यह गृह अपने नक्षत्र से आगेवाले को लता मारते हैं तथा चंद्रमा अपने नक्षत्र से बाईसवें नक्षत्र को और राहु नवयं को बुध सतये नभत्र को लचा मारता है शुक पांचयें को लता मारता हे यह ग्रह अपने नक्षत्रसे पीछेवाले नक्षत्रको लत्ता मारते यह लला विवाह में वर्जित है । लात दोष मालव देश में वर्जित और सब देशो में होता है। अथपातदोषज्ञानम् ॥ २॥ व्यतीपात वैधृति गंड-साध्य-हर्षण-शूल इन योगों का जिस नक्षत्र में अंत होय उस नक्षत्र में पान दोष लगता है। बंग वा कलिंग देश में वर्जित है ।। वा कुरुक्षेत्र वा जांगल में वर्जित है और सर्वत्र विवाह होता है। युतिदोषज्ञानम् ॥३॥ . "जिस गृह में चन्द्रमा होय उसी घर में शुक्र बिना और प्रह होय तो युति दोष होताहै ॥ तस्यफलम् ।। सूर्य संयुक्त होय तो हानि होय मंगल युक्त होयतोमृत्यु होय राहु या केतु या शनियुक्त होवै तो मूल नाश कैरै अगर चन्द्रमा अपने वर्गोतम. में होय नांशाः मेषा उच्चको हो या मित्र घरहो तो युति दोष नहीं होता बुति दोपमें सर्वत्र विवाह होताहै ।। . ६ ॥ २६ क पंचाङ्गरत्नावली, ERTBSEX2053038 पंचशलाकावेधज्ञानम् ॥४॥ रोहिणीऽभिजित् का परस्पर वेधहै मृगशिरा उत्तरोपोट की आर्दा, पूर्वाषाद का पुनर्वसु मूलका पुष्प ज्येष्ठा का श्लेषा धनिष्ठा का मघाश्रवणका पूर्वाफाल्गुणी अश्वनीका और उत्तराफाल्गुणी रेवती'का हस्त व उत्तराभाद्रपद का चित्रा व पूर्वाभादपदका, स्वाति व शतभिष का विशाषा व कृतिका का ऽनुराधा व भरणी का परस्पर बेंध होताहे पंचशालाकाचक्रमेदेखो चक्रलिखचुके हैं। विवाह नक्षत्रके वेध नक्षत्रपर कोई ग्रह होय अर्थात पंचशलाका को एक रेखामें परस्पर विवाह का नक्षत्र और कोई ग्रह होय तो सर्वत्र वर्जित है ।। फलमृत्युकारक ॥ अथयामित्रदोषज्ञानम्॥५॥ विवाह के नक्षत्र से चौदहवें नक्षत्र पर कोई ग्रहहोय तौयामित्र दोष जानिये सो बर्जित, है, परंतु विवाह सर्वत्र होते हैं । अथबुधपंचकदोषज्ञानम् ॥६॥ सूर्य केगत अंशऔर १५ वा १२ वा १० वा वाइनकोअलगर धरके जोड़ना तिन अंकों में नव १ का भाग लेना शेषपांचव तो क्रमसे पांचौ स्थानमें पांच पंचक रोग १, अग्नि २, राज़३, चौर ४, मृत्यु ५, होती हैं सो विवाह में बर्जितहै केवल : मृत्यु पंचक विवाह में सर्वत्र बर्जितहै। अथेकार्गलदोषज्ञानम्॥ - १. अतिगंड विष्कुंभ वज्र परिध व्यतीपात शूल व्याघात वैधृति गंड इन योगनमें एकागल दोष का विचार होताहे सूर्यके नक्षत्र - . - पंचाङ्गरत्नावली - से चन्द्र के नक्षत्र नक अभिजित् समेत गिनै जो नक्षत्र) सम संबक होय और पूर्व कहै योगभी होंय तो एकार्गल दोष जानिये सो काश्मीरमें वर्जित है और देश में विवाह होताहै ।। अथोपग्रहदोषज्ञानम्॥८॥ सूर्यके नक्षत्रसे चन्द्रमाके नक्षत्र तक गिने जो पांचव या १०.याख्या १४ या १९ या १५ या १८ या २१ या २२ या ३' या २४ या २५ होय तो उपग्रह दोष जानिये सो कुरु वा बाहीक देशमें उर्जितहै और सब देशोंमें इस दोषमें विवाह होताहै ।। 5:, अथक्रांतिसाम्यज्ञानम् ॥९॥ * सिंह मेपके परस्पर तथा वृष मकर तथा तुला कुंभ तथा कन्य मीन तथा कर्क बृश्चिक तथा धन मिथुनेके परस्पर सूर्य चन्द्रम होय तोक्रांतिसाम्य दोष जानिये सो सर्वत्र बर्जितहै ॥ अथदग्धातिथिदोषज्ञानम् ॥ मीन वा धन के सूर्य में बीज तिथि दग्धा होती है और वृष वा कुंभ के सूर्य में चौथ दग्धा होतीहे और मेष वा कर्क के सूर में छा दग्धा होतीहै और कन्या वा मिथुन के सूर्य में अष्टमी दग्धाहै तथा वृश्चिक और सिंह के सूर्य में -दशमी दग्धा, है तथा मकर और तुला के सूर्य में द्वादशी दग्धाहोतीहै सो वर्जित है । बुध गुरु शुक्र लग्न केंद्र त्रिकोण में होतो शुभहै । अथपंचांग में इनदशौदोषों के लिखने का क्रम् ॥ लत्ता पातादि १० दोष जो ऊपर कह चुकेहें जिसमें दोषहो उसकी लकीर टेढ़ी (5)और जिस्में दोष न हो उसकी लकीर M । Hemalih.
● पंचागरनावली सीधी (इस क्रमसे दशो दोष की दश लकीर लिलदेने 'ग्रहणसंभवज्ञानम् ॥ सूर्य अथवा चंद्रप्रण होने से१५ दिन में तथा । साढ़े पांचमहाँने में तथा ६ महीने में तथा सा छे महीने ग्रहण का संभव होताहे मोर-पर्व (पूर्णावा अमावा) कालीन स्पष्ट रवि में राहु को घटाने से व्यग्वर्क होता है व्यग्वर्क मेषादि हो तो उत्तर तुलादि हो तो दारण होता हे व्यग्वर्क के भुज करके अंशं करें जो अंश से कम हो तो सूर्य अथवा चंद्रग्रहण का संभव होता है न्यग्वर्क दक्षिण" हो और अंश से कम होती और व्यग्वर्क उत्सर.हो और ८ अंश से अधिक और १५ अंश से कम हो तो सूर्य-प्रहण होता है इस विपरीति सूर्य ग्रहण नहीं होता है सूर्य वा चन्द्र ग्रहण संभव होने से भी यदि अमावाश्या दिन में हो तो सूर्य ग्रहण , दिखाता है और पूर्णमा रात्रि में हो तो चन्द ग्रहण दिखाई देता है। मेषादि द्वादशराशिंगतग्रहणफलम् ॥ 'उपरागोयदामेषे पीस्पतेसर्वदाजनाः ॥ कांबोजांविकिरातेश्च पांचालश्चकलिंगकः, in t... वृषेवग्रहणगोपाः पशवाधिका जनाः ॥ महांतोमनुजोयश्च पीत्यतेसाधवस्तथा ॥ २॥ रविश्व दमसौगस्तौ मिथुनेचवरांगनाः॥ पीड्यंतेवाहिकामत्स्या यमुना तट वासिनः ॥॥ कर्कटेगहणेपीडा मल्लादीनांचजायते ॥ अंतरंसरानांच तदामत्स्यविनाशिनः ।। ४॥ सिंहेचग्रहणेपीड़ा सर्वेषांवनवासिनाम् ॥ नृपानांनृपंतुल्यानां मनुजानांचजायतेशा कन्यायांग्रहणेपीडा त्रिपुराणांचशांलिनां ॥ कवीनालेखकानांच REAX
||
ॐ पंचाङ्गरत्नावली,
आयतेपीउपतेसदा ॥ ६॥ तुलायामुपरांगेव दशाणवाडकाहुका।।
मस्वश्चपरात्पश्च पीडते साधवश्वये ॥७॥ वृश्चिकेाहणे
पीडा सर्पजातेश्चैजायते ॥ औदुम्बरस्पभादस्य चोलायोध्येयक
स्वचः ।।८॥ यदोपरागेचापेचतदामत्स्याश्ववासिनः ॥ वि
हमल्लपांचालाः पीज्यंतेभिषकोविदेः॥३॥मकरेग्रहणेपीडा
नीचानांमंत्रवादिनाम् ॥ स्थविराणांभटानांच चित्रकूटस्थसंक्षयः
॥१०॥ कुंभेचेवोपरागेव पश्चिमस्थैस्तथार्दुदैः ॥ तस्करैरोगि
गांमृत्युः पीत्पतेवहुधाबुधा,॥ ११॥ मीनोपरागेपीरपंते जल
ल्याणिसाग़राः ।। जलोपजीवनोलोका येचयेद्यप्रतिष्ठिताः १२॥
अथभद्राज्ञानम्॥
कृष्णपक्ष में तीज और दशमी को भदा पर दल में वास कस्ती:
और सप्तमी वा चतुर्दशी को भद्रा पर्वदल में वास करती है।
शुक्लपक्ष में चौथ वो एकादशी को भदा परदल में वास करती
है और अष्टमी वा पूर्णमासी को भद्रा पूर्वदल में वास करती है।
पूर्वार्द्ध की रात्रि में और परार्द्ध की दिन में हो तो दोष नहीं
होता है।
अथभौमवतीवासोमवतीअमावश्यापर्वयोगः ।।
अमावश्या सोमवार हो तो सोमवती योगः मंगलवार को
हो तो भौमवतीयोग भौमवती में केवल गंगा स्नान से एक
हजार गोदान का फलहै और सोमवतीमइससे भी अधिकपल ।।
अथकपिलाषष्ठीपर्वयोगः॥
कुँवार बदी ६ को मंगलवार वा रोहिणी नक्षत्र' तथा व्यतीपात
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न i . - ॐ पंचाङ्गरत्नावली योग युक्त होय तो असंख्य पुण्यको देनेवाला कपिला नामक पर्व होता है तीर्थ स्नान में बड़ा पुण्य है,॥ - " अथपुष्करपयोगः॥ विशाषा नक्षत्र के जब सूर्य होंय और दिन नक्षत्र कृत्तिका होय तो पुष्कर संज्ञक योग होता है सोस्नान पुष्कर में दुर्लभ है अर्थात् बड़ा फल है | अथवारुणीपर्वयोगा। 'चैत्र कृष्ण त्रयोदशी को सतभिष नक्षत्र सूर्योदय में मिले तोवारणी पर्व होताहै तिसमें गंगास्नान करनेसे कोटिसूर्य ग्रहण समान फल होता है ।। भौर इस योग में शनिवार भी हो तो महा बारुणी संज्ञक पर्व होता है। शुभ योग वाशतभिष नक्षत्र व शनिवार त्रयोदशी यह सब योग होने से महावारुणी पर्व होता है तिसमें गंगा स्नान करने से तीन कोटि कुल को उद्धार करने को समर्थ है।।।।। "अथगोविन्दडादशीपर्बयोगः । धनकी वृहस्पनिहोय कुंभ के सूर्य होय कर्क का चंद्रमा होय फाल्गुण शुक्ल द्वादशी होय रविवार होय तथा पुष्य नक्षत्र और शोभनयोग होय तौ गोविन्द दादशी नाम पर्व होता है तिथि सूर्योदय होना चाहिये. इस पर्व में अयोध्या के स्नान को बड़ा माहात्म्यहै।। अथाडौंदयमहोदयपर्वयोगः ॥ माघ-या पौष्य की अमावश्याको श्रवण नक्षत्र और व्यती. - - . - है + + -- Air TN . पंचाङ्गरत्नावली के EPRESECRE पात योग होय तो अद्धोदय,पर्व होता है इनयोगों में से कोई हीन होय तो महोदय संज्ञक योग जानना । अद्धोदय योग,में सर्व जल गंगा के समान होताहै और ब्राह्मण सर्व-शुद्धात्माब्रह्मा के समान होते हैं जोकुछ भी किंचिन्मात्र दानदेय सो दान सुमेरु के बराबर होता है महोदय का भी यही फलहै ।। ५. अथ ब्रतादिनिर्णयों तत्रादौचैत्राश्विनशुलं प्रतिपदा नवरात्रनिर्णयः ।। अमावश्यावेधी परेवाको नवरात्र...करना वर्जिन उदयमें प्रतिपदा तीन मुहूर्ततकं मिले वही व्रत के योग्य है ।। HERE अथगणगौरीव्रतनिर्णयः॥ चैत्र शुक्ल चौथ को गणगौरीबन होताहै सो मध्याहन्यापनी लेना योग्य है पार्वती व गणेशजी का पूजन करना चाहिये पक्कान्न मिष्ठान्न पुष्पयुक्त ॥ अथएकादशी निर्णयः॥ एकादशी की हानिहोय दादशी संपूर्ण होयतो उसी दादशीको बत करना चाहिये और त्रयोदशीको पारण करे उदयमकादशा थोरीहोय अंत में त्रयोदशी होय मध्य में दादशी यहयोगदादशी 'की हानि होने से होता है इस एकादशी की अस्पृहा संबाहे 'एसी एकादशी का के योग्यविष्णु के प्रिय है ऐसी एकादशी 'एक का व्रत करनेसे हजार जन के तुल्य फलहे और पुग्य हजार • गुणाहै और इस्में त्रयोदशी को पारण करना योग्य है और बाकी - . + TTTT
पंचाङ्गरत्नावली.
में।१२ को पारण करना योग्यहै तथादशमी वेधी एकादशी के
व्रत करने से पहिला कियाहुआ भी फलनाश होताहै ।। .
REET अथानंतचतुर्दश्यादिनिर्णयः॥
कृष्णपक्ष की चर्तुदशी सब महीनों की शिवरात्रि इत्यादि
अर्द्धराति न्याविनी योग्य है और भादशुक्ल में अनंत चतुर्दशी
होती सो एक मुहूर्त -तक मिले तो व्रत के योग्य है तथा
बैशाष शुरल १४ को नृसिंह जत होता है. सो सायंकाल युक्त
लेना चाहिये।
नागपंचमीनिर्णयः॥
श्रावण शुक्ल की ५ नागपंचमी होतीहै सो छठि युक्त अर्थात्
सूर्योदय की पंचमी में करना योग्य है नागदेव प्रसन्न होते हैं
और शेष पंचमी जोहैं सो चौध विद्धा करै ।। अन्यप्रकारः अन्य.
प्रकार से मध्यान्ह व्यापिनी पूजा योग्यहै और आचार्य कहते
है कि पूर्वाह गामिनी मोक्ष की देनेवाली है ।।
अथश्रावणीनिर्णयः॥
श्रावण शुक्ल ५ को अपराह्न काल में रक्षाबंधन करना
योग्य है जो भद्रा में रक्षाबंधन करे तो पुरके राजाको हुने ।
अथबहुला ४ व्रतनिर्णयः ॥ :
भादपर कृष्ण चतुर्थी को बहुलावन होता है सो पूर्व वा पर
की जो चन्द्रोदयं विष मिले उसी को ब्रत के योग्य जानने
को कहा है।
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पंचाङ्गरत्नावली
श्रीकृष्णजन्माष्टमीनिर्णयः ।।
भाद्रपद कृष्ण ८ को जन्माष्टमी कहते हैं सो अर्द्धरात्रि व्या
पिनी योग्य है जो दोनो दिन अर्द्ध ब्यापिनी होय तो पर दिन
व्रत के योग्य है ।।
अथहरतालिकानिर्णयः ॥ ..
भाद्रपद शुक्ल ३ को गोरी ब्रत होताहै सो एक मुहूर्त तक
उदय समय में मिले तो वही ब्रतके योग्य कही गई है। अन्य
मतेन । मुहूर्तमात्र उदय में तीज मिले उसी दिन गौरी व्रत करै
और जो शुद्धाधिक (६० घटी से अधिकवाली तिथि वृद्धिा)
मिले उसकी गणयोग संज्ञाहै व्रतके योग्यहै ।।
अथऋषिपंचमीनिर्णयः॥
भाद्रपद शुक्ल ५ को ऋषिपंचमी व्रत होताहै मध्याहून गत
व्रतके योग्य कही है और हस्तोद्भव भोजन वर्जित है।
अथर्वाष्टमीनिर्णयः॥
भाद्रपद शुक्ल ८ को दूर्वाष्टमी होतीहै पूर्व व्यापिनी ग्राह्य है
तथा और आचार्यों का यह मत है कि शुक्लपक्ष की अष्टमी
नवमी समेत करना तथा कृष्णपक्ष की अष्टमी पूर्वविद्धायोग्यहै ।।
अथमहालक्ष्मी ८ निर्णयः॥
कुँवार कृष्ण ८ को महालक्ष्मी व्रत होताहै तीन महूत्त तक
पर मिले वही व्रतके योग्य है परन्तु धन लाभ की अभिलापासे
व्रत करनेवाला चन्द्रोदय व्यापिनी में व्रत करै ।।
अथविजय १० (दशहरा) निर्णयः॥
कुँवार शुक्ल १० को विजय १० कहते हैं सो पूर्वयुक्त अपराह्न
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0 पंचाङ्गरत्नावली,
कालमें लेना चाहिये पूजन प्रशस्त है और श्रवणके योगसे पर
मिले तो पर और पूर्वमिले तो पूर्व की ग्रहण करें ।
अथकर्क ४ निर्णयः॥
कार्तिक कृष्ण ४ को करवा चौथ कहतेहैंसो चन्द्रोदय व्यापि
नी में गौरीबत कहाहै सौभाग्यदेनेवाला है।
अथदीपमालिकानिर्णयः॥
कार्तिक कृष्ण अमावाश्या को सायंकाल व्यापिनी में दीप
दान करना चाहिये पूर्ण अर्द्धरात्रिको श्रीलक्ष्मीगीका पूजन
योग्यहै ।। दीपदानमें स्वात्यक्ष वर्जित है ।।
अथसंकष्टहरणचतुर्थीनिर्णयः॥
माघ कृष्ण ४ को सकट चौथ व्रत होताहै सो चन्दोदरा व्या.
पिनी ग्राह्यह तिसके व्रत करनेसे समगू सुख होता है ।।
अथहोलिकानिर्णयः॥
फाल्गुण शुक्ल पूर्णमासी की रात्रिमें पूर्वयुत् होलिका दाह
करना योग्य है परन्तु भद्रा वर्जितहै इसकारण पर में होती है।
शेषतिथिनिर्णयोसंक्षपः॥
तीज छठि हलछठि वसंतपंचमी यमद्वितीया अष्टमी श्रीराम
नवमी चतुर्दशी अमावस व्यासपूजा पूर्णमासी एकादशी इतनी
तिथि पर युत करनी चाहिये और वटसावित्री का पूजनमात्र
पर युत करना चाहिये । प्रदोष सायंकाल युत और गणेश चौथ
चन्द्रोदय में करना चाहिये । जन्माष्टमी बुध रोहिणी के युक्त
होय और शिवरात्रि व चौदसि इनको पूर्वयुत व्रत करना योग्य ।
है तथा तिथि के अन्त में पारण योग्य है तीज पंचमी दुर्गावत
पचाङ्गरत्नावला पर युक्त योग्यहै और जो बाकी रही तिथि सो पूर्व युक्त करना चाहिये ॥ इतिव्रतादिनिर्णयोः ।। अथाधिकमासज्ञानम्॥ जिस विक्रमीयसंवत्में अधिकमास जाननाहो कि अधिकमास होगा या नहीं और कौनमहीना लौंदकाहोगा।कम।।संवत् १९५१ विक्रमीयमें अभीष्ट संवत्को घटावै अथवा१९५१को अभीष्ट संवत् में घटावै शेषको दो जगह रक्लै १ जगह १६ का भागदेनेसे जो लब्धि होय सो (दूसरी जगह में ११ से गुणाकरके) गुणनफल मे जोड़देय फिर ३० का भाग देकर जोशेष फल बत्रै उस शेष फलको ३६ में ऋण धन करना तत्र स्पष्ट अंक होता यथा १६५१ में जो अभीष्ट संवत् घटे तो शेषफलको ३६ में ऋण करना और जो अभीष्ट संवत् १९५१ | तो शेपालको ३६ में धनकरके २०से भागदेकर शेपको ग्रहण करना तब स्पष्टांक होगा जिस संवत्में स्पष्टांक १९ तथा २० ॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ २४ । तथा १२५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ २८ ॥ २१ ००होवै उस संवत्में अवश्य अधिक मास होवेगा और स्पष्टांक जितनी गिनतीहो उसको चैत्रशुक्ला दि परिवामें जोड़नेसे जो तिथि प्राप्तिहो उस्के दूसरे दिन मेषकी सक्रांति हुआ करती है ।। मास जानने का क्रम । जिस महीने में संक्रांति न होय वह महीना लौंद का होताहै यहां महीना शुक्ल पक्षादिसे जानना ।। सरल रीति ।। पूर्वोक्त जो साष्टांकहै उस्को ३० मे घटावै जो शेष बचे उस्को आधा करके जो गिनती होय उस्के अनुसार वैशाप आदि करके जो मास आवै वही महीना लोंद का होगा अथवा १ न्यूनाधिक करनेसे लौंद मास होवेगा॥ इति ॥
- ७६ 8 पंचाङ्गरत्नावली, सप्तऋषियोंकीनक्षत्रस्थितिज्ञानम् ॥ संवत् १६५६में ५ राशि २१ अंश ३६ कलापर सप्त ऋषियों की स्थिति थी प्रति वर्ष ८ कला धन करनेसे माग्रिम वर्षकी स्थिति होतीहै अर्थात् सं० १९५६ से पीछे जितने वर्षका जानना होवै उन वर्षों को ८ से गुणा करके गुणन फल कलाओं को ५॥२१॥ ३६ १०० में ऋण करनेसे अभीष्ट वर्ष सम ऋषियों की स्थिति जानना इत्यादि। अगस्तकाउदयास्तज्ञानम् ॥ सूर्य राश्यादि । । २८ । ५६ । ०० के जब होते हैं तब शाहजहां पुरमें अगस्त्य का उदय होताहै क्योंकि यहाँके पलमा ६।२२ हैं। तथा सूर्य जब राश्यादि०० २७१४1081 के होते हैं तब अगस्त्य मुनिका अस्त होताहै।' दाडिम बीजज्ञानम्॥ दाडिम में जितने कंगूरे होवें उनको ७२ से गुणा करि देव जो गुणन फल होवें उतनेही बीज दाडिम मे होवेंगे। नींबूतथानारंगीवीजज्ञानम् ॥ नीबू तथा नारंगी पर जो रेखा बनी होती हैं उनको गिने जो विषम होय तो ३ से गुणा कर जो सम रेखा होय तो २ से गुणा करै जितना गुणन फल हो उतने बीज होते हैं। तबूंजतथाखरबूजावीजज्ञानम्॥ तरबूज तथा खरबूजे में जितनी फांक होय उनको ८८ से गुणाकर जो गुणन फल होवे उतनेही बीज होवेंगे। इति ।।
। भगवद्गीता भापाटीकासहित ॥ इसका टीका बहुत ही सरल कियागया है जिसमें हरकोई ऐसो पुस्तक का पाथय भलेप्रकार जानसकै ॥ मू०॥) पु० डा००) मनुस्मृतिदोहावली॥ मनुजोके हरश्लोक का एक एक दोहा कहा है हरग्रहस्थ को इस पुस्तकको पढ़नाचाहिये। मू०१) पु. डा००) मनुस्मृति भाषाटीका सहित ॥ हर श्लोक के नीचे टोका विस्तार पूर्वक सरल रीति से बनाया गया है उत्तम कागज मोटे अक्षर है॥ मू० २) पु० डा०1-) मुहूर्तमञ्जरी भापाटीकासहित ॥ यह मुहतों की प्रसिद्ध पुस्तक पुष्ट कागज पर छपी है ॥ मू० पु० डा०) मयूरचरित्र भाषा ॥ जिसमें अनेकानेक नक्षत्रों के उदय समय व अस्त समय का ज्ञान और उनके फलाफल का विचार वर्णित है। मू.) डा.)॥ शैवभक्तमनोरंजनी॥ इसमें शिव जी के अनेक प्रकार के भजन बिनय के बर्णित है शिव भक्तों के लिये तो यह पुस्तक बहुतही उपयोगो है इसके भजन बहुत मधुर मू०)डा० ॥ सीताहरणनाटक ॥ श्री जानकोजीका हरण नाटक को रोति पर वर्णन हे जिसके पढन से अवश्य आंसुओ को धारा चलती है। को०) पु. डा० ॥ हिन्दीभाषाभूपण ।। इसपुस्तक को बाबू सूर्यमल अखावरो अमिस्टेण्टमास्टर लायल झालोजियट स्कूलबलरामपुर जिला गोंडा ने बनाया है इसमें हिन्दी लिखने पढने के शब्दों को शुद्धता और उर्दू शब्दों के दूषण भलोभाति वर्णन किये है ॥ मू.) डा०)। विश्रामसागरगुटका ।। श्री बाबा रघुनाथदास रामसनेही महाराजजोके बनाये हुये गन्य विधामसागर को ऐसा कोन भगवद् प्रेमो है जो नही मानता जैसे कि बाबई में रामायणों के गुट के छपे हैं ऐसे हो विश्रामसागर का गुटका तैयार कियागया है कागज चिकना व मजबूत लगाया गया है जिन्द भो खूबसूरत व पुछना बनाई गई है कीमत साधारण को सुगमता के लिय केवल II ) रखे गय है अलावा डाक व्यय के-
मयूरचरित्र मायां ॥
जिसमें अनेकानेक नक्षोंके उदय समय व अस्तसमय का ज्ञान और उन
फलाफल का विचार बर्णित है।
मु. 1) डा०)।
महेश्वररसमौरकाव्य।
पञ्जावके प्रसिद्ध कवि रायदौलतरामजो ने भलेनकार नायकानायक भेद पारि
नवरसकाव्य उत्तम रीति से वर्णन किया है।
मु०) पु० डा० )
सुदामाकृष्ण नाटक।
इसमेसुदामाजी व कृष्णचन्द्र जीकासम्बाद नाटकरीतिपर बर्णित है मू०)डा०॥
मनुस्मृतिदोहाचली।
मनुजो क हरश्लोकका एकएकदोहाकहा है हर रहस्य को इसपुस्तकको पढना
चाहिये
मू०१) पु० डा००)
मुहूर्तमञ्जरीभापाटीकासहित ।
यह मुहतों को प्रसिद्ध पुस्तक पुष्ट कागज पर छपी है। मू० पुडा० ॥
ज्ञानगुणकवितावली॥
यीयुत पण्डित युताय पतिराज महाराज विरचित इसमें दोहा, सवैया,
वित्त, भजन, छन्द,खेमटा, कजरी, मलार, कुराइलिया, ज्ञान गुण व अनेक
प्रकार के रस वर्णित है ॥ मू.)-पु. डा० )।
विनायक वन्दना ॥
गणेश श्रादि देवताभी को बन्दना व लोला अति मनोहर कविता में वर्णित
मूक) डा०)।
हमारे यहाँकी छ हुई सब पुस्तके नीचे लिखे
ठिकानोंपर मिलती है
पण्डित रामरत्नं बाजपेयी
मैनेजर लखनऊ प्रिंटिंगप्रेस लखनऊ
दूसरापता
पनीलकण्ठ-हारकाप्रसाद
-बुक्सलर अमीनाबाद- लखनऊ